Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Jain Lavni Sangray
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श्री वीतरागायनमः ॥ जैन लावणी संग्रह ॥ ॥ श्लोक ॥ ॐकारं बिंदु संयुक्तं । नित्यं ध्यायंति योगीनां ॥ कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ॥१॥ ॥१॥ लावणी चाल:-लंगडी ॥ पार्श्वनाथ महाराज आपकी महिमा मुलकों में जहारी । कमंठा सुर को मान खंड नाग नागनी उवारी ॥ टेर ॥ वाणारसी नगरी अश्वसेन नृप भामादेवी पटराणी । चवदे खप्ना, देखकर माता मनमें हुलसानी ॥ जन्म लियो महाराज आपने मंगल गावे इन्द्राणी । बाल पणामें, करी है लीला प्रभुजी चितआणी ।। शेर || गंगा तट के उपरे । आयो एक अवधूत जी ॥ पंचाग्नि तपतापे । अंगे लगी भभूत जी ॥ १ ॥ अधोमुख झूला खावै । शटाझूट मुगटजी, ब्रह्मवासी है उदासी ॥ रहे नशा में गुटजी ॥२॥ छूट ॥ फिर भखे पान फल छल के दुदा धारी । महिमा सुन २ कर आवे बहुत नरनारी ॥ भामादे भाखे सुनो पुत्र एक म्हारी । दर्शन करवाने करो गज तयारी || मिलत ॥ सजी सवारी करी तयारी गंगा तट आया ललकारी ॥ कमठा ॥ १॥ देख ज्ञानसे कहे कुंवरजी तपस्या तेरी नहीं भली । जीवकी हत्या, देख तो नाग नागनी रया जली ॥ लक्कड़ फाड़ निकाल बताया तब जोगी रहा तलपड़ी । कियो नियानों करी है करणी वैसी गति मिली ॥ शेर ॥. क्रोध के वश मरण पायो असुर गति में वासजा क्रोध से तपसी की तपस्मा छिन में होत विनाश जी ॥ नाग नागनी देख दया उपनी दिल मुजारजी । उपकार जाणी उत्तम प्राणी दिया 'शरणा. चारजी ॥ छूट ॥ श्री पार्श्वनाथ महाराज नवकार सुनाया । धरणीन्द्र पद्मावति को पद पाया । महाराज कुंवरजी वर्त लई वन में आया । लई वन में आया । वो कमठासुर फिर देख बहन बबराया ॥ भिलत ॥ मेघ वृष्टी उपसरग करण को करी देव वर्षा भारी ॥ कमठा ॥ २॥ चड़ दल बादल या गगन में एटा घोर घन में छाई । फिर बाजे वायरो, जिस में,खबर कछु पड़ती नाई ॥ गाजबीज कर वरसत पानी नदियां 'पूर रही आई । नहीं मावत पानी, तोही नहीं रहती वर्षा वर्षाई ॥ शेर ॥ ऐसी तो वर्षा जोर से वरषी वन मुजारजः । दरियाव चढीया केतु फूटी वहे उल्टा खार जी ॥ १॥ चड़तो २ आयो पानी, प्रभु ध्यान के मायजी । पार्श्वनाथ भगवानके, गांवों से लागा आयजी ॥ छेट ॥ प्रभू' नाशा तांहीं नदिया चढ़कर आई । मेरु गिरी जैसे रहया ध्यान के माई । तब धरणीन्द्र महाराज को आसन कंपे । पद्मावतीदेवी मिलकर इणपर जंपे ॥ मिलत ॥ कर सिंहासन शीः छत्र धर धन २ हो थे उपकारी ॥ कमठा ॥ ३ ॥ इन्द्रकोप कियो - - कमठा सुरपर तुरत आई पावां लागे । अपराध खमायो, कर जोड़ खड़, प्रभु के आगे ॥ तुम हो देव देवन के देव तेरे चरणों की सेवा मांगे । तुम तुठा सेती, रहै नहीं दुमन बाय दुरा भागे ॥ शेर ॥ धरणीन्द्र पदमावती । सेवा करे दिन रातजी । महाराज कुँवर केवल पाया । चलाको शिव को साथजी ॥ १ ॥ नील वरण नव हस्थ काया । रूप अनन्तो धार जी । इन्द्र चौंसट करत सेवा । नहीं गुणां को पार जी ॥ २ ॥ छूट ॥ यो शहर जावरो देश मुलकमें जाणे । श्री जवाहिर लालजी महाराज बिराजे दश ठाने । हिरालाल कहै जोग मिलियो पुण्य परमाणे । जिनराज. धरम की करो शुद्ध पेहचाने ॥ मिलत ॥ हाथ जोड़के अरज करत हुं दीजो प्रभु सम्पत सारी || कमठा ॥ ४ ॥ ॥ २ ॥ भरत बाहुबल चरित्र ॥ लावणी चाल:-दूणकी यह दया दान प्रजा को पूर्ण की नी । महाराज ऋषभजी संयम लीनो जी ॥ दियो भरतेश्वरको राज । काज आतम को कीनो जी ॥ टेर ।। यह बाहूबल बलवंत को देश उत्तरमें । महाराज ॥ तख्त सिला एक नगरी जी । और रहे अठांनु पुत्र जिनों को देदी सारी जी ।। यह ब्राम्ही सुंदरी पुत्री आपकी दोई ।। महाराज ॥ रहीयो अखंड कंवारीजी ।। इनके नहीं कर्म का भोग । जाऊं जिन की बलिहारी जी ॥ अब पुण्योदय भरतेश्वर छःखंड मांही ॥ महाराज ॥ वैरीको किया आधिनो जी || दिया ॥१॥ यह चक्र रल नहीं आवे आप ठिकाने ||महाराज। भाई से करी तकरारी जी ॥ देखी भरतेश्वर की खेंच । आदम पे गये पुकारी जी ।। यह ऋषभदेव उपदेश देई समझाया AON ॥ महाराज || अठाणू कारज सार्या जी ॥ रहया बाहुबल सरदार- आय । बाका तरवाय जी ॥ नहीं माने आण परवाना परा पठाया ।। महाराज || शैन्य पर हुकमज दीनो जी ॥ दिया ॥ २ ॥ यह तीन लक्ष घर पुत्र बाहुबल जाया । महाराज ।। केई विद्याधर आया जी ॥ भिंड़ गया मोरचा रण खेत । हटे नहीं पीछा हटाया जी । जब भरतेश्वरजी चक्रको चाक चलायो । महाराज || चक्र जाय फिर फिर आवे जी । नहीं चले वंश पर जोर । देवता ऐसा चेतावे जी। एक अनल विद्याधर अनल की वर्षा कीधी । महाराज || चक्र जाई उत्तमांग लीधो जी ॥ दिया ॥ ३ ॥ जब इन्द्र आय दोनों को यों समझाया ॥ महाराज ॥ किसी को नहीं खपाना जी ॥ तुम करो करो आपसमें युद्ध । जीत होवे बलवाना जी ॥ जब केई तरह का किया युद्ध नहीं हार्या ॥ महाराज ॥ बाहुबल मूंठ उठाई जी | तब इन्द्र पकड़ लियो हाथ । सोचो दिलके मांही जी ॥ यह बात हुई नहीं होने जग के माही ।। महाराज || रस समता को पीनो जी ॥ दिया ॥ ४ ॥ यों कियो लोच सब सोच को अलग हटाया ।। महाराज || भरतेश्वर मन विचारी जी ॥ तुम मानो हमारी कहन भोगवो ऋद्धि तुम्हारी जी ।। नहीं माने बाहुबल बात के संयम लीनो ॥ महाराज ॥ दिल में धायो अभिमानो जी ॥ नहीं पडूं पांव लघु भ्रात । वनमें रह्या धर ध्यानों जी ॥ हीरालाल कहे अब करो मोक्षकी करणी ॥ महाराज ॥ आप छो ज्ञान का भीना जी ॥ दिया ॥ ५॥ ॥३॥ लावणी चाल:-दूणकी ॥ यों कहै ऋषम जिन् ब्राझी सुंदरी दोई ॥ महाराज ॥ मुनि को जांय समझावो जी ॥ थालीनो संयम
भार । मान तो परो मिटावो जी ॥ टेर ॥ यह करी बचन प्रमाण आण जिनवर की ॥ महाराज ।। वीर के पास
आवे जी ॥ मुनि धर्यो ध्यान अडोळ । पलक तो नाहीं मिलावे जी थां तजो सभी संसार भार उठायो । महाराज ||
गजपर कांई चढ़ बैठा जी ॥ गया सेल शिखर उतंग || अवे तो आत्रो हेटा जी ॥ या आत्म करणी करो पार
उतरणी ॥ महाराज ॥ सुख मुक्ति का पावो जी ॥ थां ॥ १ ॥ यह कठिन परिसह सह्या वनके मांही ॥
॥ महाराज | शीत और तापे सुखा ना जी ।। रही वृक्षलता लपटाय । अंगपर आब का पाना जी ॥ यो वर्ष
दिवस वितित ध्यान के मांही || महाराज ॥ अबे तो आवो ठिकाने जी || जब होवेगा कल्याण । केवल ज्ञान
उपजे था ने जी ॥ यों करे विनंती लुल २ चरणे लागे || महाराज || प्रभू के पास सिधावो जी ॥ थां ॥ २ ॥
यह क्रोध मान जो चारों मोक्ष अटकावे ॥ महाराज | ऐसी या सीख सुनाई जी ।। झट उतर गयो अभिमान ।
दिलकी थी गुमराई जी ॥ अब जाऊं जिनेन्द्र के पास मुनियों को वंदू ॥ महाराज ॥ पांव जब एक उठायो
जी ॥ तब ज्योति अधिक उद्योत । ज्ञान केवल प्रगटायाजी ॥ यह बाहुबल केवली एम कहवाया ॥ महाराज ॥
सभी मिल मंगल गावो जी ॥ थां ॥ ३ ॥ यह किया देव महोत्सव दुदुंभी बाजी ॥ महाराज ॥ आया समवसरण
के मांही जी ॥ श्री आदिनाथ महाराज ! सभा में दिया फरमाई जी ॥ यों लक्ष चउराशी पूर्व आउखो मोटो ॥
महाराज ॥ अटल अविचल पद पाया जी ॥ श्री रत्नचंद जी महाराज । शिष्य को ज्ञान भणाया जी ।। श्री
जवाहिरलालजी महाराज परम उपकारी ॥ महाराज | हीरालाल सब सुख पावो जी|| थां ॥ ४ ॥
- पै RamNRBE • ॥ ४ ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ।। नेमनाथ महाराज पधारया भवजीवां उपकार करण | भद्दलपुर का, बाग में रच्यो देवता समोसरण ॥टेर । नाग सेठ-माता सुलसा का छे नन्दन हुवा अति गुणवंत । नल कुँवरकी, ओपमा शास्त्रमें भाखी भगवंत ॥ वाणी सुन श्री नेमीनाथकी संयम लेनो धरी मन खंत । माता पासे आय कर, पूछत मूर्छा हुई मति मंत ॥ शेर । सेठ सेठानी कहे मुझे, हो इष्ट बल्लभ कंतजी । कुलदीपक चंद्र भानु । प्राण ज्यू अत्यन्त जी ॥ १ ॥ चारित्र है, अति दोहिलो, नहीं सोहिलो लगार जी ) कष्ट करणी. सभी वर्णी । करना उग्र बिहारजी ॥ छूट || बहु भांती : कियो उपाय कुँवर नहीं मानी, जब मातापिता लिया जान बड़ा है। ज्ञानी । महोत्सव कर संयम लियो प्रभु आणि । श्री. नेमनाथका शिष्य हुवा षट प्राणी ॥ मिलत ॥ वेले बेले करे पारणा जिनवर आज्ञा शीश धरंन ॥ १॥ दुवारा मति नगरी आया नेम जिन बंदन आये तब नरनार । छे भाईयों को पारणा आया तेला का चौवी हार ॥ आज्ञा मांगी नेमजिनंद की दोय दोय मुनि हुवा है लार, फिरता फिरता, आविया देवकी माता के दरबार. ॥ शेर ॥ मुनियों को देख्या आवता । धन २ गरीब निवाजजी । विनय भक्ति करी बोली कहत धन दिन || * बाजजी ॥ १ ॥ याल भरी मोदकतणी, प्रतिलाभ्या अणगारजी । शुद्ध भावां दान देवे पामे भवनो पारजी ॥ छूट ॥ मुनिराज अहार वेरी ने पाछा फिरिया । सिंघाडो दुजा आया फिर उस वीरिया । म्हारां पुण्य उदय वे वेरा पगला करिया । इम तीना सिंघाड़ा देख हर्प दिल धरिया ॥ मिलत ) हाथ जोड आड़ी फिर राणी अर्ज करे भाखो --- वरणण ॥ भ ॥ २ ॥ वारा योजनकी लम्बी नगा नव योजन चौड़ी जाणी । बलभद्र कृष्ण की . जगत में जोड़ी अविचल है बखाणी । द्रव्यवंत दातार घणेरा जिन भक्ता सुनता वाणी । मुनिराज कहो क्यों मिला नहीं फिरता तुमको अन्नपाणी ॥ शेर । देवकी से मुनिवर कह नगरी में बहु दातारज़ी तीन सिंघाड़ा षट भाई हम आया एक उणियार जी ॥ १॥ कौन मात तात थारा, कौन नगर कौन वासजी । भद्दलपुर में माता सुलसा, नाग सेठ सुत खासजी ।। छूट ॥ एक एक जनाने राणिया बत्तोस परनाई, है. कंचनवर्णी कमी कछु है नाहीं । इणभांत ऋद्धि मुनिराज सर्व समलाई । फिर आया नेम जिनपास आज्ञा पाई। मिलत मुनिवरों का वचन सुनी ने देवकी अचरज लगी कर न । भ ।। ३ ॥ मुनि एवन्ता कहाथा मुझको आठ पुत्र ऐसा जावे । भरतखंड में और नहीं दुजी माता कोई पावे । सात पुत्र होनेपरभा मुझे फक्त कृष्ण एक दिखलावे । नेम नाथसे करूंगा निरणायों मनमें ठावे ।। शेर ॥ रथवेसी वन्दनगयी, लार घणो परिवार जी । भगवंत संशय टालिया, जिसका घणा अधिकारजी ॥ १ ॥ पुत्र: नहीं कोई ओरका है, छेऊ तेरे सगजातजी, पूर्वको वरतन्त सारो कहयो जब जग नाथजी ।। छूट ।। माता मुनि बात हिवड़ा में हर्ष भराणी । निज नन्दन अपना देख के मन हुलसारी । करी २ वंदना आई नेम जिन पासे । जिन राज वचन को । रही हिये विमास ।। मिलत ॥ महिलों के बीच में आई देवकी चिंता उपजी चित्त परंपर। ४ ॥ सात पुत्र मुझ अंगसे उपणा. एकर को नहीं हुलरायो । बालपणा की बालक्रीडा कर के नहीं रमायो । छे पुत्र सुलसा घर बधीया सा सर्व जिनगर गायो । सोले वर्ष, नंद घर अहिर कृष्णजी कहवायो R ॥४॥ लानणी चाल:-लंगड़ी ।। नेमनाथ महाराज पधारया भवर्जीवां उपकार करण । भदलपुर का, बाग में रच्यो देवता समोसरण ॥टेर॥ नाग सेठ-माता सुलसा का छे नन्दन हुवा अति गुणवंत । नल कुँवरकी, ओपमा शास्त्रमें भाखी भगवंत ॥ वाणी सुन श्री नेमीनाथकी संयम लेनो धरी मन खंत । माता.पासे आय कर, पूछत मूर्छा हुई मति मंत ।। शेर । सेठ || सेठानी कहे मुझे, हो इष्ट बल्लभ कंतजी । कुलदीपक चंद्र भानु । प्राण ज्यू अत्यन्त जी ॥ १ ॥ चारित्र है, अति दोहिलो, नहीं सोहिलो लगार जी । कट करणी.. सभी वर्णी ! करना उन · बिहारजी ॥ छूट ॥ बहु भांती कियो उपाय कुँवर नहीं मानी, जब मातापिता लिया जान बड़ा हो जामी.। महोत्सव कर संयम लियो प्रभु पै ।। आणि । श्री. नेमनायका शिष्य हुवा पट प्राणी ॥ मिलत ॥ बेले बेले करे पारणा जिनवर आज्ञा शीश धरंन ॥ १॥ दुवारा मति नगरी आया नेम जिन मंदन आये तब नरनार । छे भाईयों को पारणा आया तेला का चौवी हार ॥ 8 आज्ञा मांगी नेमजिनंद की दोय दोय . मुनि हुवा है लार, फिरता फिरता, आविया देवकी माता के दरबार. ॥ शेर ।। मुनियों देख्या आवता । धन २ गरीब निवाजजी ! विनय भक्ति करी बोली कहत धन दिन| आजजी ॥ १ ॥ पाल भरी मोदकतणी, प्रतिलाभ्या अणगारजी । शुद्ध भावा दान देवे पामे भवनो पारजी ।। छुट । मुनिराज अहार वेरी ने पाछा फिरिया । सिंघाडो दुजा आया फिर उस वीरिया । म्हारा पुण्य उदय बे वेरा पगला करिया ॥ इम तीना सिंघाड़ा देख हर्प दिल धरिया । मिलतं ॥ हाथ जोड . आड़ी फिर राणी अर्ज करे भाखो 4. 14 वरणण ।। भ ॥ २ ॥ बारा योजनकी लम्बी नगरा नव योजन चौड़ी जाणी । बलभद्र कृष्ण की. जगत में जोड़ी अविचल है बखाणी । द्रव्यवंत दातार घणेरा जिन भक्ता सुनता वाणी । मुनिराज कहो क्यों मिला नहीं फिरता तुमको अन्नपाणी ॥ शेर ॥ देवकी से मुनिवर कह नगरी में बहु दातारजी तीन सिंघाड़ा षट भाई हम आया एक उणियार जी ॥१॥ कौन मात तात थारा, कौन नगर कौन वासजी । भदलपुर में माता सुलसा, नाग सेठ सुत खासजी ॥.छूट ॥ एक एक जनाने राणिया बत्तोस परनाई, है. कंचनवर्णी कमी कछु है नाहीं । इणभांत ऋद्धि मुनिराज सर्व समलाई । फिर आया नेम जिनपास आज्ञा पाई ॥ मिलत ॥ मुनिवरों का वचन सुनी ने देवकी अचरज लगी कर न ॥ भ ॥ ३ ॥ मुनि एवन्ता कहाथा मुझको आठ पुत्र. ऐसा जावे । भरतखंड में और नहीं दुजी माता कोई पावे । सात पुत्र होनेपरभा मुझे फक्त कृष्ण एक दिखलावे । नेम नाथसे करूंगा निरणायों मनमें ठावे || शेर ॥ रथवेसी वन्दनगयी, लारे घणो परिवार जी । भगवंत संशय टालिया जिसका. घणा अधिकारजी। ॥ १॥ पुत्र नहीं कोई ओरका है, छेऊ तेरे सगजातजी, पूर्वको वरतन्त सारो कहयो जब जग नाथजी ॥ छूट । माता सुलि बात हिवड़ा में हर्ष भराणी । निज नन्दन अपना देख के मन हुलसारी । करी २ वंदना आई नेम जिन् पासे । जिन राज वचन को । रही हिये विमास ।। मिलत ॥ महिलों के बीच में आई देवकी चिंता उपजी चित्त घरपोः । ४ ॥ सात पुत्र मुझ अंगसे उपणा. एकर को नहीं हुलरायो । बालपणा की बालक्रीडा कर के नहीं रमायो । छे पुत्र सुलसा घर बषीया सा सर्व जिनवर गायो । सोले वर्ष, नंद घर अहिर कृष्णजी कहवायो) GDO ना गाज ..॥४॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ।। नेमनाथ महाराज पधारया भवजीवां उपकार करण | भद्दलपुर का, बाग में रच्यो देवता समोसरण ॥टेर ।। नाग सेठ-माता सुलसा का छे नन्दन हुवा अति गुणवंत । नल कुँवरकी, ओपमा शास्त्रमें भाखी भगवंत ॥ वाणी सुन श्री नेमीनाथकी संयम लेनो धरी मन खत । माता.पासे आय कर, पूछत मूर्छा हुई मति मंत ॥ शेर । सेठ || सेठानी कहे मुझे, हो इष्ट बल्लभ कंतजी । कुलदीपक चंद्र भानु । प्राण ज्यू अत्यन्त जी ॥ १ ॥ चारित्र है, अति दोहिलो, नहीं सोहिलो लगार जी ! कप्ट करणी.. सभी वर्णी । करना: उग्र बिहारजी ॥ छूट ॥ बहु भांती || कियो उपाय कुँवर नहीं मानी, जब मातापिता लिया जान बड़ा है। ज्ञामी । महोत्सव कर संयम लियो प्रभु पै १३ आणि | श्री.नेमनाथका शिष्य हुवा पट प्राणी ॥ मिलत ॥ बेले बेले करे, पारणा जिनवर आज्ञा शीश धरंन ॥१॥ दुवारा मति नगरी आया नेम जिन अंदन आये तव नरनार । छे भाईयों को पारणा आया तेला का चौवी हार ॥ आज्ञा मांगी नेमजिनंद की दोय दोय मुनि हुवा है लार, फिरता फिरता, आविया देवकी माता के दरबार. ॥ शेर ॥ मुनियों को देख्या आवता । धन २ गरीब निवाजजी । विनय भक्ति करी बोली कहत धन दिन || .. आजजी ॥ १ ॥ थाल भरी मोदकतणी, प्रतिलाभ्या अणगारजी । शुद्ध भावां दान देवे पामे भवनो पारजी ॥ छूट ॥ मुनिराज अहार वेरी ने पाछा फिरिया । सिंघाडो दुजा आया फिर उस वीरिया । म्हारां पुण्य उदय वे वेरा पगला करिया । इम तीना सिंघाड़ा देख हर्प दिल धरिया ।। मिलन । हाथ जोड आड़ी फिर राणी अर्ज करे भाखो ।
वरणण ॥ भ ॥ २ ॥ बारा योजनकी लम्बी नगरा नव योजन चौड़ी जाणी । बलभद्र कृष्ण की . जगत में जोड़ी अविचल है बखाणी । द्रव्यवंत दातार घणेरा जिन भक्ता सुनता वाणी । मुनिराज कहो क्यों मिला नहीं फिरता तुमको अन्नपाणी ॥ शेर । देवकी से मुनिवर कह नगरी में बहु दातारजी तीन सिंघाड़ा षट भाई हम आया एक उणियार जी ॥ १ ॥ कौन मात तात थारा, कौन नगर कौन वासजी । भद्दलपुर में माता सुलसा, नाग सेठ सुत खासजी ॥.छूट ॥ एक एक जनाने राणिया बत्तोस परनाई, है. कंचनवर्णी कमी कछु है नाहीं । इणभांत ऋद्धि मुनिराज सर्व समलाई । फिर आया नेम जिनपास आज्ञा पाई॥ मिलत || मुनिवरों का वचन सुनी ने देवकी अचरज लगी कर न ॥ भ ॥ ३ ॥ मुनि एवन्ता कहाथा मुझको आठ पुत्र ऐसा जावे । भरतखंड में और नहीं | दूजी माता कोई पावे । सात पुत्र होनेपरभा मुझे फक्त कृष्ण एक दिखलावे । नेम नाथसे करूंगा निरणायों मनमें ठावे ॥ शेर ॥ रथबेसी वन्दनगयी, लारे घणो परिवार जी । भगवंत संशय टालिया जिसका घणा अधिकारजी|| ॥ १ ॥ पुत्रः नहीं कोई ओरका है, छेऊ तेरे शगजातजी, पूर्वको वरतन्त सारो कहयो जब जग नाथजी ॥ छूट ॥ माता सुनि बात हिवडा में हर्ष भरागी । निज नन्दन अपना देख के मन हुलसानी । करी २ वंदना 'आई नेम जिन, पासे । जिन राज वचन को। रही हिये विमासं ॥ मिलत || महिलों के बीच में आई देवकी चिंता उपजी चित्त घरपोः । ४ ॥ सात पुत्र मुझ अंगसे उपणा · एकर को नहीं हुलरायो । बालपणा की बालक्रीडा कर के नहीं रमायो । छे पुत्र सुलसा घर बधीया सा सर्व जिनवर (गायो । सोले वर्ष, नंद घर अहिर कृष्णजी कहवायो म OIN 13 ॥ शे: ॥ माता के पगे, पगे लागा आया तो कृष्ण महाराज जी । माता चिंता देखकर, गिरधर हुवा नाराजजी ॥ १ ॥ हाथ जोड़ पायां पड्या पुछियो विरतन्तजी । माता ने पुत्र के, कहा जो भाखियो अरिहंतजी || 43 ॥छूट | माता की। ता मेटी सर्व गिरधारी । हुवा भ्रात अष्टमा जगमे वल्लभ कारी । महाराज नेमकी वाणी सुन व्रतधारी । हीरालाल कहे गज मुनिको वंदना हमारी ।। मिलत ॥ जवाहिरलालजी गुरु हमारे भवसागर तारण तिरणं ॥ ५॥ ॥ ५॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ॥ पुरी द्वारिका वासुदेवकी आण अखंड वरतावे है || सब तीन खंडमें जीत दुश्मनको हर हटावें है ।। टेर ॥ कंचन में गढ़ कोट कांगरा मणिरत्नो का बनाया है ॥ इन्द्रपुरी की ॥ ओपमा शास्त्र माहि. बताया है ॥ गगन पंथसे आयो नारद हरि हलदर शीश नमाया है। आज्ञा मांगी ।। गाभा के महल के अन्दर आया है । उसी वक्त भामा राणीजी सब श्रृंगार सजाया है || आरिसा में || आप मुग्न देख रही मन चाया है ॥ शेर ॥ नारद को प्रतिबिंब पड़ियो, पुठ सेती आय जी । भामा राणी भयपागी, बोले ऐसी चाय जी ॥ १ ॥ रुप मेरो चन्द्र जैसो, यो आयो राहु समान जी । नारदको अति क्रोध आयो, जाने अगन घृतपान जी ॥ २ ॥ छूट ॥ या नारायण की नार गर्भ में बोले । म्हने कहे राहु आप बने चन्द्र के तोले || परणासु दूजी नार रुप में भारी ॥ नहीं ले भामा को नाम कर गिरधारी ॥ दौड़ ॥ ऐसो करके विचार, जोया घणा नरनार, भामा राणी के उणिहार, कहीं नहीं पायो ॥ कुंडल पुर के मुझार । भीमक राजाके दरबार रुखमैया के उणिहार, जाणी चल आयो, ॥ मिलन ॥ राज- सुता को देखन काजे राजभवन में ध्याया है ॥ १॥ नारद रिषिको देख भुवा रुखमण कों पावां डारी है ।। जब कहे नारदजी, हो जे तू माधव के घर नारी है ॥ शिशुपाल के करी सगाई ब्यावन की लग रही त्यारी है । नहीं जाणा उन को, आप मत कहो ऐसी अविचारी है ॥ द्वारामति नगरी वासुदेव वसुदेव घरे अवतारी है ॥ हुवा दोनों भाई, सुनाई वसुदेव की रिद्ध सारी है ॥ शेर । रुकमणि मन के विशै, निश्चय तो लिनो धार जी ।। परणू तो वो ही श्याम को, नहीं तो दूजो अवतार जी ॥ १॥ चित्रपटपर लेख लिखियो, नारद रुखमण रुप जी । द्वारामति जाई बतायो । हर्षयो जादव भूपजी ॥ २ ॥ छूट ॥ पूछे नारदसे क्यां नजर आयो थारे । मानु इन्द्राणी रुप तणे अनुसारे । तब नारद करयो वयान अति विसतारे । हरिजी को लागो मन परणवा लारे ॥ दौड़ ॥ कहे भुवाजी से बात, क्यां जादुवा को नाथ, बीत्या जाय दिनरात, कोई काम करो । लेख लिखीने हवाल कागद भेज यो ततकाळ, जाय दियो है गोपाळ, वांचो पत्र खरो ॥ मिलत ॥ मुख वचन जब कहे दूतयों सबी हकीकत सुनावे है ॥ सब ॥ २ ॥ कुंदनपुर भीमक राजा की पुत्री रुपवत्त कवावे । करी सगाई, राजा शिशुपाल चाल ब्यावन आवे || माघ मास सुदी अष्टमी दिनको लग्न पत्र जो ठहरावे । उन का मन में, नहीं कोई ओर पुरुष इच्छा चावे ।। प्राण दान दातार जो तुम हो तुमही से मन चित चावे ॥ हरी का मन में, हुवा अफ- सोस भाई से बतला वे ।। शेर ॥ नारी का प्राण बचावनो, पुरुषा तणी या बात जी ॥ लघुमाई को मन राखवा, कहे बलभद्र यो भ्रात जी ॥ १॥ मिलन तणी संहनाणिका, यूछि लियो समी ठाम जी ॥ कामदेव उद्यान में, आशोक वृक्ष अभीराम जी ॥ २॥ छूटथा देई दान मान तब दूत विदा कर दीनो । हरिहलदर महाराज रथ सज्ज कीनो । भामा भय आणि हरिका मन में ' बीनों | करि शस्त्र संग्रह शाज, घेर गढ़ लीनो ॥ दौढ़ ॥ अव नारद जी आय, शिशुपाल पासे जाय, कहे बात को बनाय, ब्याव सुणी आयो ॥ शिशुपाल तत्काल, बोले अति हुशियार, मुझ व्यावको विचार, होसी हुलसायो । मिलत ॥ कौन लग्न कौन गांव नाम है सो तुम हम को दर्शावें है ॥ ३ ॥ राजा मांड सब बात केही नारद सीस दीयो हिलाई ॥ कोई दीसे दूषन और कोई परणेगा दूजा आई ॥ भक्त जान हम ने तो तुझको पेरतर दीयो चेताई ॥ राजा का रंग में, कियो उत्पात स्वभाव मिटे नाही सज दलबादल शिशुपाल चढ़ आयो कुंदनपुर मांही ॥ नगरी को घेरी, मेरु जिम ज्योत चन्दन अहि लिपटाई ॥ शेर ॥ भुवा भतीजी सल्ला करी, पूजातणे प्रकार जी ॥ कपट छल बल केलवी, आया नगरी के बाहर जी ॥ १॥ एकाएकी गई वनमें, हरी हलधर तिण ठाम जी ॥ निरख नैना बोले त्रैणा, बैठाणि रथ में श्याम जी ॥ २ ॥ छूट ॥ आपो जणावा काज के शंख बजावे । सुन शिशुपाल थारी मांग लार हम आवे ॥ मीकम- राजा रुखमियों कुंवर थर्रा वे । लेले दल बादल हरि के पूठे ध्यावे ।। दौड़ ॥ वाजा वाजता रण तूर, शैल चमकत दूर एक एक से सनूर । आगे पांव धरे ॥ आयुद्ध छनीस हाजर, सुभट पेरिख पाखर, जमी धूजी थर थर, सिंध नाद करे ॥ मिलत । देवी देवता चैसठ योगिणी नारद हर्ष उमावे है ॥ ४ ॥ देख दलको जोर शोर तब रुख- । ---.--
मणि चिंता हुई दिल मुझार ।। तब दोनों भाई, मेटी चिंता रण भूमी आया तत्काल ।। धनुष्य चढ़ाई टंकार बाई
भागे वैरी क्या लागे वार ॥ रुखमैया को, बांध कर लाया जैसे पकड़ शियार ॥ करी विनती आप रुखमणि
बंधन छोड़ो कृष्ण मुरार ॥ जीत का बाजा, बजाई ले चाल्या घर अपनी नार ॥ शेर ॥ गिरनारी उपर आविया, ब्याव
तषी करी विद्ध जी । रुखमणि वन नाम दीधो लोक में प्रसिद्ध जी ।। १ ॥ खबर हुई द्वारामती, सामो आयो सब
साथ जी। सासू के बऊ पगे लागी उगते प्रभात जी ॥२॥छूट|| अन्न धन भरिया भंडार महेल में मेली । सदा वर्ते
परमानन्द कमाई करी पेली ।। भामा से नारद आई एम चेतावे । राहू किया को फल कहो कुण पावे ॥ दौड़ ।। वियां
जै जै कार, यश जगत मुझार, जवाहिरलाल जी अणगार, ज्यांका गुण गाऊ : संमन उगनी से के माय, बड़ी सादड़ी
में आय, दिया चौमासा दो ठाय, नाम सुनाऊं । मिलत || वर्ष पंचावन और छप्पन में हिरालाल गुण गावे है ॥५॥
॥६॥ लावणी चाल:-लंगडी ॥
लिखा लेख नहीं मिटे कर्म का बुरा मत करना कोई कोई । करता सो ही, फेर नर भुगते गा जब वोही
वोही ॥ टेर ॥ मधुभूप का जीव जबरन से नार पराई रखी घरे, उस का बदला । दिया है केई भवों में फिरते
फिरे ॥ हेमरथराजा की नार रुप योवन हे-सब में सिरे ॥ मधुभूप ने, बुलाई हो न हार सो नहीं टले ॥
हेमरथ राजाका उस राजापर जोर चलाया नहीं चले ॥ नारी कारण ॥ हुवा खफगान नग्न होय भ्रमण करे ।।
शेर ॥ इंदू: २ प्रभा राणी, करत फिरे सपाल जी ॥ नारी निरखन केरे काजे', आयो अयोध्या चाल जी ॥ १॥
.." M झरोखा अन्दर बैठी राणी, निरख्यो भ्रतार जी ॥ विलख रुपे फिरे गेहलों । सौर करे नर नार जी ॥ २ ॥ ॥ छूट ॥ दासी को भेजी भीतर वेग बुलायो; कहे राणी क्यों थे इतनो कष्ट उठायो, । मैं नारी तेरी नहीं केन मेरो नहीं मानी, नहीं बात, हाथे, तेरे, लेसी कोई जाणी, ॥ दौड़ ॥ परो निकल जा बहार, राजा करेगा खुवार, राणी दियो धुतकार, हेमरथ को सही ।। तब राजा को विचार, चित हुवो दुशियार, जाण लिवी घर नार, मोसूं बदल गई ॥ तापस के पास, जाय कर दिया वास, वृत पालीने हुलास, सुर गति को लई ॥ राजा राणी जी के संग, भोगे भोग भुजंग, मोह कर्म की तरंग, कछु सूजे नाहीं ॥ मिलत || अनंत काल पुदगल के परिचय ज्ञान दर्शण दीनो खोई ॥क ॥ १ ॥ राजा राणी महेलों के अन्दर भोगे पुण्य तणी करणी ॥ उसी वक्त में, आयो एक चोर त्रीया पर को हरणी ॥ सख्त सजा का हुकम दिया जब कहे राणी जी मुख से वरणी ।। ओर न को तो, करो दंड आप मुझे कैसी परणी ।। जोरावर को कछु दोष नहीं क्या गरीबों की गर्दन पकडनी ।। सुन कर राजा, हुवा हुशियार तजू राण्या सबही परणी ।। शेर । जेष्ट पुत्र राज छत्र, दिया बैठाई राज जी ॥ लघु भ्राता इन्दु प्रभा, ले संयम सुधारया काज जी ॥ १॥ चारित्र पाली निर्मलो गया बार में स्वर्ग तजी ॥ शेष पुण्य फल भोगवा हरिवंश में उत्पत जी ॥ २ ॥ छूट ॥ द्वारामति नगरी कृष्ण नरेशर राया । माता रुखमणि उदर मधु नृपती आया ॥ शुभ दिन मुहूर्त के माहीं पुत्र को जाया । महोत्सव करता २ दिन पांच कहवाया | दौड़ ॥ छट्टी रात के मुशार, गावे गीत नर नार, पामे हर्ष अपार, महा महोत्सव करी हेगरय राजा भूप, भमी भव भव कूप, हुवा देवता सरुप, आयो चित्त धरी ॥ बालक को देख, जाग्यो पूर्व भव को देख, नहीं तजी वैरी टेक, लीनो आप हरी ।। देव आकाश में जाय, फेर चिन्ते मन माय, बाल हण्यो नहीं जाय, करं गत्त खरी ॥ मिलत ॥ चरम शरीरी पूर्ण आवुखो इन्द्रादिक सब लो जोई ॥ २ ॥ तख्त पर्वत खादीरा अटवी शिला एक महा विकराळ । उन के हेटे, बालक को मेल दियो वैरी तत्काल ॥ पुण्य प्रभावे आल न आयो, आयो भूप विद्याधर चाल शिल्ला तोकी, देखता भाग्यवंत एक पाया लाल ॥ इन्दू प्रभा को जीव उपनों कणक माला रागी रुप रसाल । पुत्र को सोपी । महोत्सव मांड दिया नित नया रसाल ॥ शेर ॥ प्रद्युम्न कुंवर नाम दीनो, रतिपति अवतार जी ॥ अव जागी राणी रुखमणि, नहीं पायो पासे लालजी ॥ १ ॥ कुरलाट शब्द करी उठी, आया||* कृष्ण मुरार जी ॥ शोध करता नहीं पायो पतो, आगे सुणो अधिकारजी ॥ २ ॥ छूट || नारद जी आया सभी हाल सुनाया । निर्णय करवा ने विदेह क्षेत्र में ध्याया।। श्री मंदिर स्वामी . महाराज धर्म सुनावे । देखी प्रषदा की भीड तख्त तळ जावे ॥ दौड ॥ लघु काया धरी हाथ, पूछे चक्रवर्ती बात, भाखो त्रिभोवन के नाय, सभी पूछ करी ॥ सूणो भरत क्षेत्र, द्वारामति हें नगर, रमापति है गिरधर, राज करत हरि ।। जायो पुत्र रत्न, करता बहुत जतन, अप हरयो हरीजन, छठी रात खरी ॥ भाख्यो सभी अधिकार, नारद लीनो हिरदेधार, वैरभाव दीना टाल बारा प्रषदा भरी ॥ मिलत ॥ मात पिता से मिलन करन की अगली बात सुनो दोई ॥ ४ ॥ सोला वर्ष में सोला लाभ गुफा के अन्दर जावेगा । फिर माता पासे, विया दोई सीख कुंवर घर आवेगा । सूखा वृक्ष सा तात मात रुखमण जननी । S फल छलीत होसी सूखो सर जल पावेगा । फिर अन्ध पुरुष का, नैन खुल मूंगा गीत जो. गावेगा । कुरुपा अति रु 'वंत फिरं माता मन हुलसावेगा । पाछों आसी, जद जननी घर नंद कहलावेगा ॥ शेर ।। इत्यादिक सेनानी का, पुत्र आगमकी बात जी ॥ नारद ऋषि सब सांभली, उड़ गयो ते गगन हाथ जी ॥ १ ॥ वैताढ्य गिरी पर आवियो, कनक माला पासजी ।। नीरखी हो कुंवर नैना, आयो द्वारामति सेहवासजी ॥ २ ॥ छूट ।। महारान कृष्ण रुखमणि से हाल सुणावे । जिनवर वाणी परतित काळ गुजरावे । आशा धर अमर मनपा पूरण कीजे । पुण्यवंत सदा बलवंत के लावो लीजे ॥ दौड़ || चम्पक लत्ता परमाण, गिरी गुफा जिम जाण, दिन २ वधे वान, जैसे चन्द्र कला ॥ विद्या सिख्या जब दोय । वर्ष सोला माहीं होय, जीत्या भाई पंच सोय, सब साजन मिलया ।। अब रुखमणि मात, वाट जोवे दिन रात, कव उगेगो प्रभात, पुत्र आगम भला ॥ गिणे एक दोय चार, आठ दस ने ईग्यार, वर्ष हुवा सोला सार, अब करत सला ॥ मिलत ॥ नारद ऋषि को भेज दियो है अब तो जाई लावो जोई ॥ ५ ॥ मदन कुंवर कहे नारद से मेरी गत कैसे करणी । नहीं कोई संगी, पिता थारी हरी की धरणी ॥ तात मातसे जाकर पूछयो कहे मेरा सब दुख हरणी । उरण होवा, चाल्यो सब ही से मिलके यश वरणी ॥ शेर ॥ नारद कृत विमान में, तब वैसी गया है दोय जी ॥ गगन पंथे उडी चाल्या, सुभटा जिम जोय जी ॥ १ ॥ कोख भानु कुंवर सेती, आवी बाग बजार जी ॥ वसुदेव से युद्ध करके, आयो भामा के दरबार जी ॥ छूट ॥ सोले वर्ष मुनिराजको रुप बनायो । मोदक माता के हाथ पारणो पायो ॥ भामा को दांसया आई बे रुप करायो । महाराज श्री बळभद्रको युद्ध बतायो । दौड़ ॥ रुप प्रगट कराय,"माता पांवा पडयो आय, लियो छाती के लगाय, हिये हर्ष घणो | कृष्णजी से कियो जंग, सभी जादवा को संग, मिल्या धरी उछरंग, अति आनन्द पणो ॥ मिलया सबही संयोग, भोगे इन्द्र जैसा भोग मेटी कर्मा को रोग, वास मुक्ति तणों ।। जवाहिर लालजी अणगार, ज्ञान गुणा का भंडार, बिने करी नमस्कार, वली सूत्र भणो ॥ मिलत ॥ हीरालाल कहे जिनवर वाणी मेल मिथ्यात्व मिटे दोई ॥ ६ ॥ ॥७॥ लावणी चाल:-द्रौणकी ।। यह शीलवत अर्थ मोक्षकों दाता, महाराज शीलकी महिमा वर्णी जी ॥ तिर गये समुद्र संसार, रही एक गंगा तीरणी जी ॥ टेर ॥ ये उत्तर दिशी वैताढ्य गिरी के उपर, महाराज मेघपुर नामा नगरी जी । तिहा झमक अमर भूपाळ, कनक माला पटराणी जी ।। याने पाल्यो पुत्ररत्न जतन जो कीधा ॥ महाराज, यौवनकी वय जब आई जी ।। प्रद्युम्न कुँवर दियो नाम, वैरियों को जीत सवायो जी ॥ छूट || श्रृंगार करी, माताको पावापरी, माता रुप देख मोही खरीजी ॥ लज्जा खोली सही, पुत्र मेरा तूं नहीं, ऐसी राणी जी मुखसे कहीजी | मिलत.॥ या नारी जात या बात करी नहीं संकी जी ॥ महाराज, कहो अब क्या गत करणी जी ॥ १ ॥ तब.मदन कुंवर कर जोड़ कहे राणीसे ॥ महाराज, वाजे तूं मात हमारी जी ॥ मत करो बात खीलाफरखो दिल साफ पल फलीत होसी सूखो सर जल पावेगा । फिर अन्ध पुरुष का, नैन खुल, मूंगा गीत जो. गावेगा । कुरुपा अति रुवंत फिरं माता मन हुलसावेगा । पाछों आसी, जद जननी घर नंद कहलावेगा । शेर ॥ इत्यादिक सेनानी का, पुत्र आगमकी बात जी ॥ नारद ऋषि सब सांभली, उड़ गयो ते गगन हाथ जी ॥ १ ॥ वैताढ्य गिरी पर आवियो, कनक माला पासजी ।। नीरखी हो कुंवर नैना, आयो द्वारामति सेहवासजी ॥ २ ॥ छूट ॥ महारान कृष्ण रुखमणि से हाल सुणावे । जिनवर वाणी परतित काळ गुजरावे । आशा धर अमर मनपा पूरण की जे । पुण्यवंत सदा बलवंत के लावो लीजे || दौड़ || चम्पक लत्ता परमाण, गिरी गुफा जिम जाण, दिन २ ६चे वान, जैसे चन्द्र कला ॥ विद्या सिख्या जब दोय । वर्ष सोला माहीं होय, जीत्या भाई पंच सोय, सब सनन मिलया । अब रुखमणि मात, वाट जोवे दिन रात, कव उगेगो प्रभात, पुत्र आगम भला ॥ गिणे एक ar दोय चार, आठ दस ने ईग्यार, वर्ष हुवा सोला सार, अव करत सला ॥ मिलत ॥ नारद ऋपि को भेज दियो है अब तो जाई लावो जोई ॥ ५ ॥ मदन कुंवर कहे नारद से मेरी गत कैसे करणी । नहीं कोई संगी, पिता असगान शेल्यो माता धरणी । कहे नारद नारायण जैसा तात मात रुखमण जननी । मैं आयो लेवा, वाट जोवे थारी हरी की धरणी ॥ तात मातसे जाकर पूछयो कहे मेरा सब दुख हरणी । उरण होवा, चाल्यो सब ही से मिलके, यश वरणी ॥ शेर ॥ नारद कृत विमान में, तब वैसी गया है दोय जी ॥ गगन पंथे उडी चाल्या, सुभटा जिम जोय जी ॥१॥ कोरव भानु कुंवर सेती, आवी बाग बजार जी ॥ वसुदेव से युद्ध करके, आयो भामा के clip दरबार जी ॥ छूट ॥ सोले वर्ष मुनिराजको रुप बनायो । मोदक माता के हाथ पारणो पायो । भामा की दासया आई बे रुप करायो । महाराज श्री बळभद्रको युद्ध बतायो । दौड़ ॥ रुप प्रगट कराय, “माता पांवा पडयो आय, लियो छाती के लगाय, हिये हर्ष घणो | कृष्णजी से कियो जंग, सभी जादवा को संग, मिल्या धरी उछरंग, अति आनन्द पणो ॥ मिलया सबही संयोग, भोगें इन्द्र जैसा भोग मेटी कर्मा को रोग, वास मुक्ति तणों ॥ जवाहिर लालजी अणगार, ज्ञान गुणा का भंडार, बिने करी नमस्कार, वली सूत्र भणो ॥ मिलत ॥ हीरालाल कहे जिनवर वाणी मेल मिथ्यात्व मिटे दोई ॥ ६॥ ॥ ७॥ लावणी चाल:-द्रोणकी ।। यह शीलवत अर्थ मोक्षकों दाता, महाराज शीलकी महिमा वर्णी जी ॥ तिर गये समुद्र संसार, रही एक गंगा तीरणी जी ॥ टेर ॥ ये उत्तर दिशी वैताढ्य गिरी के उपर, महाराज मेघपुर नामा नगरी जी । तिहा झमक अमर भूपाळ, कनक माला पटराणी जी ।। याने पाल्यो पुत्ररत्न जतन जो कीधा ॥ महाराज, यौवनकी वय जब आई जी ॥ प्रद्युम्न कुँवर दियो नाम, वैरियों को जीत सवायो जी ॥ छूट ।। श्रृंगार करी, माताको पावापरी, माता रुप देख मोही खरीजी ॥ लज्जा खोली सही, पुत्र मेरा तूं नहीं, ऐसी राणी जी मुखसे कहीजी || मिलत.॥ या नारी जात या बात करी नहीं संकी जी ॥ महाराज, कहो अब क्या गत करणी जी ॥ १ ॥ तब.मदन कुंवर कर जोड़ कहे राणीसे ॥ महाराज, वाजे तूं मात हमारी जी ॥ मत करो बात खीलाफरखो दिल साफ करारी जी ॥ या राणी बात नहीं माने सिसहिलावे ।। महाराज, काम की अग्नि सलगा जी ॥ तुम भोगो भोग मिल्यो जोग मुख से कहने लागी जी ॥ छूट ॥ कुंवर मौन रही, राणी यों मुखसे कहीं, कुँवर उठ खड़ा हुवा वन में जई जी ॥ तिहां देख्या मुनि, ध्यान करके, खड़ा मुनि, कुंवर यों पूछता लिजो सुनी जी || मिलत ॥ या माता हमारी ऐसी दिल क्यों धारी । महाराज, पूर्वली कहो कथा वर्णी जी ॥ २॥ या पूर्व जन्म में इन्दूप्रभा राणी ॥ महाराज, पराई नार थे राखी जी ।। सभी मांड कहयो वृतान्त ज्ञान के जोर से भाखी जी ।। फिर संयम लेकर स्वर्ग बारमों लीधो || महाराज, हरि घर जन्म थे पायोजी ॥ हुई छठा दिन की रात वैरी ले गयो अठे आयो जी ॥ छूट । करमो की गती, भुगत्या विन नहीं छुटे रती, ऐसी दिल में जाणो मतीजी, माता रुखमणि, कृष्ण है जिसका है धनी, द्वारका नगरी सोने की बनी जी ॥ मिलत ॥ फिर आयो मात के पास बात कर बैठो महाराज, विद्या देवे नृप धरणी जी ॥ ३ ॥ या राणी लालच में विद्या दोई ठगा नी ॥ महाराज, पाछळी बुद्धि है नारी जी ॥ फिर बोले कुंवर कर जोड़ मात तूं गुरुणी हमारी जी ॥ इन कीन्हो नारी चरित्र पति सुन आयो, महाराज, भूपने घणो भरमायो जी ॥ सभी कुंवरों को बुलवाये हुकम राजा फरमायो जी ।। छूट ॥ वैरी को मारा सही, जानसे वो रखना नहीं, भवन में आया लेई जी ॥ धोखा किया घणा, मिली पांचसे जना, उम्मेद तो रही है उनके मनाजी ॥ मिलत ॥ जब राजा कुंवर के उपर चढ़ कर आयो ॥ महाराज, पाछो फिरिया लाजे जननी जी ।। ४ ॥ राजा कुंवर से हार गयो भा आयो । महाराज, विद्या राणी पासे मांगी जी ॥ ।
ले गयो कुंवर कर जोर राजा सब बातको जानी जी ॥ यो नहीं कुंवर को दोष रोष सब भूला ॥ महाराज, राणी को जानी झूठी जी ॥ मिल्या भाई पिता परिवार दूध साखर जिम घुटीजी ॥ छूट ॥ लाभ सोला लही, कुंवर घर आयो सही, माता के पांवा पड़े जई जी ।। गुन्हा मैंने किया, अपराध को क्षमा दिया, राणी कंठसे लगा लियाजी || मिलत ॥ उनीसो बासंठ रामपुरा के माही ॥ महाराज हीरालाल कहे विपता हरणी जी॥ ॥८॥ लावणी चाल:-द्रोण ॥ ये चरम शरीरी जीव जगत में वाजे । महाराज, मोह उनमत मचावे जी। हो उदय कर्मका भोग योग ले मोक्ष में जावे जी ॥ टेर ॥ ये नारद ऋषिश्वर मदन कुंवर को लाया, महाराज, मार्ग में केई छल कीधा जी । भामाराणी के दरबार जाय सब भोजन लीधा जी । या भामा राणी भोजन में आप ठगानी । महाराज लालची नहीं विमासे जी। ले गई महेल में पकड़ हाथ सव बात प्रकाशे जी । रागणी ।। इम बोले जी, इम बोले भामा राणी, तूं विप्र महा गुणजाणी ॥ कोही कीजे जी, कीजे वशीकरण उमावे, मुज पीऊ वश में आवे ॥ तब बोले जी, बोले ब्राह्मण वाह लो। करुं रुप इन्द्राणी रसालो। दिन तीनों जी, दिन तीनों समरन् की जे । मस्तक मूंडी माला ली जे । मिलत । छल गयो भामाने; रुप रंग नहीं आयो । महाराज रुखमणि मिळवा आवे जी ॥ १ ॥ यो सोला बरस मुनि राजको रुप बनायो । महाराज, दोष संयम का टाले जी ॥ लीधा झोली और पात्र जयणा से चाले जी ॥ या रुखमणि जो वे वाट झरोखे बेठी || महाराज, बचन जिनवर का मिलाया जी ॥ खुल रया अंध का नैन सूका वृक्ष फूले फलियो जी ॥ रागणी ॥ इतने में जी, इतने में मुनि आवतां देखी । आयो हिवड़े हर्प विशेखी ॥ धन धन जी, धन घड़ी दिन आज पायो । मुनिराज आंगणे आयो । मुनि बोले जी, बोले श्रावका शाणी । वर्ष सोले को पारणों जाणी ॥ हरि घरे जी, हरी, घरे पाटवी राणी ॥ गुण एकवीस बखाणी ॥ मिलत ॥ इम जाणी आयो घर यारे सार नहीं पूछी ॥ महाराज, अंतराय कोई आज मिटावे जी ॥ २ ॥ जब कहे रुखमणि वाट पुत्र की जोऊ ।। महाराज, आप कोई मुझे बतावो जी ॥ जब कहे मुनिश्वर दान दिया विन क्या फल पावो जी । यो मोदक केसरी सिंग सभी वैरायो । महाराज, हरि आसन पर बैठा जी ॥ रुख. मणि चिंतवे चित्त दीसे कोई मुनिवर मोटा जी ॥ रागणी ।। अणी अवसर जी, अणी अवसर भामा की दासी आई, रुखमणि को चित्त घबराई ।। नैना सुझी जी, यो नीर ढळतो जाणी ॥ मुनि बोले अमृत वाणी ॥ रुखमणि से जी, रुखमणि से यों फरमावे ॥ तूं सोच करे किस दावै ।। एक माया की जी, माया की रुखमणि सागे ॥ आप खोजो बन बैठो आगे ॥ मिलत ॥ जब कहे दासियां भामांजी हुक्म फरमायो ॥ महाराज, हर्ष धर सीस नमावे || जी ॥ ३ ॥ यो मस्तक मूंडता अचरज ऐसो पायो । महाराज, दांसियां को खबर न पाई जी ॥ ये कान नाक और केश कने पण पीड़ न आई जी ॥ जब चली बजार के अन्दर लोग हंसायां ॥ महाराज, मामा जी कोप भराया जी || जोय सभा विच बलभद्र जी को रूप दिखाया जी ।। रागणी ।। बलभद्र जी, बलभद्र हुकम फरमावे ॥ रुखमणि को महेल लटवा आवे वृद्ध रुपे जी; वृद्ध रुपे द्वार के बाहरी गया सुभट पांचसे हारी । बलभद्रजी, बलभद्र आप चढ़ आयो सिंह रुपे युद्ध मचायो । हलधर जी, हलधर मन में विचारी या तो बहु है कामणगारी ॥ मिलतं ।। यह रचना देख रुखमणि को मन हुलसायो महाराज, योही मुझ पुत्र सुहावे जी ॥ ४ ॥ जब कियो रुप प्रगट पुत्र पगे लागो महाराज, माता लियो कंठ लगाई जी। तब कहे रुखमणि मात पिता से मिलो तो जाई जी || जब कहे मैं मिळू निशान घुराई । महाराज, जोर जाधव को देखी जी ॥ श्री नेमिनाथ महाराज विना जोऊ सबकी खी जी ॥ रागणी ।। एक माया जी, माया की रुखमणि कीनी । आप बैठा विमान में लीनी । जादव जी, जादव की सभा भराई दियो सब को इम चेताई । हरि हलधर जी; हलधर है महा बलीया । पांडव सुणी क्रोंधे भरीया । केई सूरा जी, सूरा आगे चाले वह हाथी दांत उखाले ॥ मिलत ।। तूं देख हाथ दुर्जन आज हमारा महाराज, युद्ध का बाजा. बजावे जी॥५॥ ये मदन कुंवर पण सैन्या चक्रे कीनी महाराज वाण से अम्मर छाया जी । हरी जोवे नैना सनमुख हाथ नहीं चले चलाया जी। ये बलदेव पांडव प्रमुख सबही हाऱ्या महाराज, हरी दिल हुवा अचंभा जी । जब कहे रुखमणि नारद से जई थे मेटो दंगा जी ॥ रागणी ॥ हरी पासे जी, हरी पासे नारद आया । सब विता भेद सुनायो । जब जाण्यो जी जाण्यो रुखमणि जायो, यो वर्ष सोला में आयो। अति आनंद जी, आनंद अंग उमाही सब मिलिया सज्जन आई रुखमणि जी; रुखमणि हरी मुख जोवे यों पुत्र रत्न यो सोहे ॥ मिलत ॥ उन्नीसे त्रेसठ नीमच शहर के मांही हीरालाल यों गुणगावे जी ॥
॥ जयणा से चाले जी ॥ या रुखमणि जो वे वाट झरोखे बेठी || महाराज, बचन जिनवर का मिलाया जी ।। खुल रया अंध का नैन सूका वृक्ष फूले फलियो जी ॥ रागणी ॥ इतने में जी, इतने में मुनि आवतां देखी। आयो हिवड़े हर्प-विशेखी ॥ धन धन जी, धन घड़ी दिन आज पायो । मुनिराज आंगणे आयो । मुनि बोले जी, बोले श्रावका शाणी । वर्ष सोले को पारणों जाणी ॥ हरि घरे जी, हरी. घरे पाटवी राणी ॥ गुण एकवीस वखाणी ॥ मिलत ॥ इम जाणी आयो घर यारे सार नहीं पूछी ॥ महाराज, अंतराय कोई आज मिटावे जी ॥२॥ जब कहे रुखमणि वाट पुत्र की जोऊ ॥ महाराज, आप कोई मुझे बतावो जी ॥ जब कहे मुनिश्वर दान दिया विन क्या फल पावो जी । यो मोदक केसरी सिंग सभी वैरायो । महाराज, हरि आसन पर बैठा जी ॥ रुख. मणि चितवे चित्त दीसे कोई मुनिवर मोटा जी ।। रागणी | अणी अवसर जी, अणी अवसर भामा की दांसी आई, रुखमणि को चित्त घबराई ॥ नैना सुझी जी, यो नीर ढळतो जाणी ॥ मुनि बोले अमृत वाणी ॥ रुखमणि से जी, रुखमणि से यों फरमावे ॥ तूं सोच करे किस दावै ।। एक माया की जी, माया की रुखमणि सागे । आप खोजो बन बैठो आगे ॥ मिलत ॥ जब कहे दासियां भामांजी हुकम फरमायो ॥ महाराज, हर्ष धर सीस नमावे जी ॥ ३ ॥ यो मस्तक मूंडता अचरज एसो पायो । महाराज, दांसियां को खबर न पाई जी ॥ ये कान नाक और केश फले पण पीड़ न आई जी ॥ जब चली बजार के अन्दर लोग हंसायां ।। महाराज, भामा जी कोप भराया जी || जोय सभा बिच बलभद्र जी को रूप दिखाया जी ।। रागणी ॥ बलभद्र जी, बलभद्र हुकम फरमावे ॥ रुखमणि को मद्देल लूटवा आवे वृद्ध रुपे जी; वृद्ध रुपे द्वार के बाहरी गया सुभट पांचसे हारी । बलभद्रजी, बलभद्र आप आयो सिंह रुपे युद्ध मचायो। हलधर जी, हलधर मन में विचारी या तो बहु है कामणगारी ॥ मिलत ॥ यह रचना देख रुखमणि को मन हुलसायो महाराज, योही मुझ पुत्र सुहावे जी ॥ ४ ॥ जब कियो रुप प्रगट पुत्र पगे| 30 लागो महाराज, माता लियो कंठ लगाई जी। तब कहे रुखमणि मात पिता से मिलो तो जाई जी ॥ जब कहे कुँवर मैं मिळू निशान घुराई । महाराज, जोर जाधव को देखी जी ॥ श्री नेमिनाथ महाराज विना जोऊ सबकी | र सेखी जी ॥ रागणी ।। एक माया जी, माया की रुखमणि कीनी । आप बैठा विमान में लीनी । जादव जी, जादव की सभा भराई दियो सब को इम चेताई । हरि हलधर जी; हलधर है महा बलीया । पांडव सुणी क्रोधे भरीया । सूरा जी, सूरा आगे चाले वह हाथी दांत उखाले ॥ मिलत ।। तूं देख हाथ दुर्जन आज हमारा महाराज, युद्ध का बाजा बजावे जी॥५॥ ये मदन कुंवर पण सैन्या वैक्रे कीनी महाराज बाण से अम्मर छाया जी । हरी जोवे नैना सनमुख हाथ नहीं चले चलाया जी। ये बलदेव पांडव प्रमुख सबही हाऱ्या महाराज, हरी दिल हुवा अचंभा जी । जब कहे रुखमणि नारद से जई थे मेटो दंगा जी ॥ रागणी ॥ हरी पासे जी, हरी पासे नारद आया । सब वितक् || # भेद सुनायो । जब जाण्यो जी जाण्यो रुखमणि जायो, यो वर्ष सोला में आयो। अति आनंद जी, आनंद अंग उमाही सब मिलिया सज्जन आई रुखमणि जी; रुखमणि हरी मुख जोवे यों पुत्र रत्न यो सोहे ॥ मिलत ।। उन्नीसे त्रेसठ नीमच शहर के मांही हीरालाल यों गुणगावे जी ॥
- जयणा से चाले जी ॥ या रुखमणि जो वे वाट झरोखे बेठी ॥ महाराज, बचन जिनवर का मिलाया जी ॥ खुल रया अंध का नैन सूका वृक्ष फूले फलियो जी ॥ रागणीं ॥ इतने में जी, इतने में मुनि आवतां देखी । आयो हिवड़े हर्प विशेखी ॥ धन धन जी, धन घड़ी दिन आज पायो । मुनिराज आंगणे आयो । मुनि बोले जी, बोले | श्रावका शाणी । वर्ष सोले को पारणों जाणी ॥ हरि घरे जी, हरी. घरे पाटवी राणी ॥ गुण एकवीस | बखाणी ॥ मिलत ॥ इम जाणी आयो घर यारे सार नहीं पूछी ॥ महाराज, अंतराय कोई आज मिटावे जी ॥२॥ जब कहे रुखमणि वाट पुत्र की जोऊं ॥ महाराज, आप कोई मुझे बतावो जी ॥ जब कहे मुनिश्वर दान दिया विन क्या फल पावो जी । यो मोदक केसरी सिंग सभी वैरायो । महाराज, हरि आसन पर बैठा जी ॥ रुख. मणि चिंतने चित्त दीसे कोई मुनिवर मोटा जी ॥ रागणी ।। अणी अवसर जी, अणी अवसर भामा की दांसी आई, रुखमणि को चित्त घबराई | नैना सुझी जी, यो नीर ढळतो जाणी ॥ मुनि बोले अमृत वाणी ॥ रुखमणि से जी, रुखमणि से यों फरमावे ॥ तूं सोच करे किस दावै ।। एक माया की जी, माया की रुखमणि सागे ॥ आप खोजो बन बैठो आगे ॥ मिलत ॥ जब कहे दासियां भामांजी हुकम फरमायो ॥ महाराज, हर्प धर सीस नमावे जी ॥ ३ ॥ यो मस्तक मूंडता अचरज एसो पायो । महाराज, दांसियां को खबर न पाई जी ॥ ये कान नाक और केश काले पण पीड़ न आई जी ॥ जब चली बजार के अन्दर लोग हंसायां ॥ महाराज, मामा जी कोप भराया जी || जोय सभा बिच बलभद्र जी को रूप दिखाया जी ।। रागणी ।। बलभद्र जी, बलभद्र हुकम फरमावे ।। रुखमणि को मद्देल लूटवा आवे वृद्ध रुपे जी, वृद्ध रुपे द्वार के बाहरी गया सुभट पांचसे हारी । बलभद्रजी, बलभद्र आप चढ़ आयो सिंह रुपे युद्ध मचायो । हलधर जी, हलधर मन में विचारी या तो बहु है कामणगारी ॥ मिलत ।। यह रचना देख रुखमणि को मन हुलसायो महाराज, योही मुझ पुत्र सुहावे जी ॥ ४ ॥ जब कियो रुप प्रगट पुत्र पगे || 30 लागो महाराज, माता लियो कंठ लगाई जी। तब कहे रुखमणि मात पिता से मिलो तो जाई जी ॥ जब कहे कुँवर मैं मिळू निशान धुराई । महाराज, जोर जाधव को देखी जी ॥ श्री नेमिनाथ महाराज विना जोऊ सबकी सेखी जी ॥ रागणी । एक माया जी, माया की रुखमणि कीनी । आप बैठा विमान में लीनी । जादव जी, जादव की सभा भराई दियो सब को इम चेताई । हरि हलधर जी; हलधर है महा बलीया । पांडव सुणी क्रोंधे भरीया । केई सूरा जी, सूरा आगे चाले वह हाथी दांत उखाले ॥ मिलत ।। तूं देख हाथ दुर्जन आज हमारा महाराज, युद्ध का बाजा. बजावे जी ॥ ५॥ ये मदन कुंवर पण सैन्या वैक्रे कीनी महाराज वाण से अम्मर छाया जी। हरी जोवे नैना सनमुख हाथ नहीं चले चलाया जी। ये बलदेव पांडव प्रमुख सबही हाऱ्या महाराज, हरी दिल हुवा अचंभा जी । जब कहे रुखमणि नारद से जई थे मेटो दंगा जी ॥ रागणी ॥ हरी पासे जी, हरी पासे नारद आया । सब विता भेद सुनायो । जब जाण्यो जी जाण्यो रुखमणि जायो, यो वर्ष सोला में आयो। अति आनंद जी, आनंद अंग उमाही सब मिलिया सज्जन आई रुखमणि जी; रुखमणि हरी मुख जोवे यों पुत्र रत्न यो सोहे ॥ मिलत ॥ उन्नीसे त्रेसठ नीमच शहर के मांही हीरालाल यों गुणगावे जी ।
ग ॥ ९॥ लावणी चालः-लंगडी ।। शुद्ध समकित् और धर्म दलाली जो कोई मनमें लावेगा । भाई दोनों हरि हलधर पद तिथंकर पावेगा ॥ टेर ॥ द्वारिका नगरी सुव्रण में सारी अमर पुरी अनुहारी है । नेमनाथजी । पधाऱ्या जग तारण उपकारी है । कर अस्वारी गया वन्दन कथा सुनी मुरारी है । फिर पूछन लागा । हाथ दोय जोड़. अरज गुजारी है || शेर ।। द्वारका नगरी अति सुन्दर, कहो हाल दयाल जी । कौन कारण होत इनको भाखो शंका टाल जी ॥ १ ॥ नेम भाषे ज्ञान साखे, सुनों समी नर नार जी । हाल मालम होत जालिम, होसी होवन हारजी ॥ २ ॥ चौपाई ॥ मदिरा पान के चढ़ीया योगे । द्वीपायन ऋपिश्वर कोपै । विश्वानल अनल प्रभावे भस्म द्वारका नगरी पावै ॥ ॥ मिलत || जो कोई त्याग करे जगत का वो कोई मुक्ति पावेगा | भा ॥ १ ॥ संसार त्याग वैराग लावे जो कोई लेगा संयम भार । अहं अधन्ना ऐसो हरी लाया मन में बड़ो, विचार । कहे नेम जिन होई नहीं होसी वासुदेव छोड़े संसार क्या गति हमारी । बतावो आप इसीको करो नितार | शेर ॥ द्वारका नगरी जलेगा सारी, भुवा मिलन को जाय जी । पांडव मुथरा भाई पांचो, राज करे सुग्ख मायजी ॥१॥ एवन कसुंबी बीच बाला लगी भूख प्यासजी । बलभद्र भाई जल पिलावो, बीत्या छे २ मास जी ॥२॥ चौ ॥ पीले रंग पिताम्बर ओढी । शिला उपर रहेगा पोढ़ी । जरा कुँवर मृग ऐसो जानी । बाण वाम पगे प्रेह हाणी ।। मिलत ॥ सेहस्त्र वर्ष आउखो पूरण बालू प्रभा वस हो वेगा । भा ॥ २ ॥ हुवा सोच हरी के दिल अन्दर नीची द्रष्टी दिया गल हाथ । नेम जिन भाखे । .
सोच मत कर काना तूं सुन या बात । आगम काल चौवीसी के मांई होसी जिनवर तुहीं साक्षात । केवल ज्ञानी हुवा फिर मिटसी आवा गमन की बात || शेर ॥ श्रीमुख वाणी सुनी, आयो हिये हर्ष अपार जी । बारमों जिन "अमम" नामा, होसी जयजय कारजी ॥१॥ सिंहनाथ हाथ दीधा जमी धूजी थरथर्राट जी । आनन्द वर्ते समो- सरणे । प्रषदा का ठाठजी ॥२॥छूट ॥ पाछा फिर के महिलों में आया; सिंहासन बैठ हरिराया चाकर को बुलाय सुनावे, द्वारामति ढंढेरो फिरावे ॥ मिलत ॥ नगरी अस्वासति कही जिनवर; रहे गाफिला वो पछतावेगा || भा । ॥ ३ ॥ मात पिता धन धान त्याग कर जो कोई लेवे संयम भार । आज्ञा हमारी देर मत करना सुण लेना नर नार ॥ सेठ सेठानी राजकुमर और राणियां पर सुख है परिवार । महोत्सव करके नेम जिन पासे मेलू करूं अणगार ॥ शेर || महाराणी पदमावती पहिले हुवा तैयार जी । पटराणिया आठो जण्या । लीधो सयम भारजी ॥ १ ॥ नर नारी और कैही; भैटया श्री जिन राजजी । चारित्र लीधो साज दीधो । किधो आतम् काजजी ॥ २ ॥ छूट ॥ नेमनाथ दयाल की वाणी । सुनके सुख पाया प्राणी । संमत उगणीसे बासंठ आणी । रामपूरे दलाली बखाणी ।। मिलत ॥ जवाहिर लालजी महाराज प्रसादै हीरालाल गुण गावैगा ॥ ४ ॥ ॥ १० ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ॥ अयोध्या नगरी आया विचरता धर्म घोष उपकारी । राजा दशरथ । गयो है वन्दन को सन अस्वारी ॥ टेर ॥ सुनी देशना मुनिराज से संयम लेने की दिल धारी । जब भरत जी । तुरतही हुवा पिता के संग तयारी।
张器搬器器器器 किया विचार राणी कैकई ने पति पुत्र दोनों लारी । संयम लेवे, पीछेसे क्या गति होगा म्हारी || चौ० ॥ मांगू वर जो हे भंडारे, जिससे कारज सब ही सारे, विनय करीने वचन उचारे, राज भरत को देवो हमारे ॥ मिलत ॥ राजा दशरथ हुक्म किया भरतेश्वर नहीं धरतो आरी ॥ १ ॥ कहे भरतेश्वर सुणो सभी तुम राम छतां नहीं करूं मैं राज बोले रघुनन्दन, मैं बनवास खास जाऊंगा आज । धनुष बाण धर लिया हाथ में सीता संग हुई पति के काज । भाई लक्षमन, हरदम रहे सेवा में देता अवाज ॥ चौ० ॥ राज अयोध्या को भरत ने दीनो । संयम राजा दशरथ लीनो ॥ कैकई बोल राणी को बोल उतान्यो । मोटा बोल बोली नहीं हारयो । मिलत ॥ रामचन्द्र बनवास सिधाया फिकर नहीं किसीका भारी ॥ २ ॥ वज्र करण को जंग जीत बालीका बंध छुडाया है। ब्राह्मण के घर रया । वनमाला का प्राण बचाया है | और केईके काम सुधारी जटी को संग मिलाया है । फिर डंडा कार जा अटवी में वास वसाया है ॥ चौ० ॥ पाताल लंकाकों खर राजा; तस पुत्र सम्बुक सुत ताजा, विद्या सादत जीहां वंश जाळ; अधो मुख झूल रह्यो लाल, ॥ मिलत || रामचंद्र का हुक्म लई लक्षमन वन क्रीडा विचारी है ॥३॥ चंद्र हास खड़ग लिया हाथ में वंस जालपर चला दिया ॥ संभूम कुँवर का, कुंवर का सीस देख पश्चात्ताप किया। सहस्त्र चतुरदश खेचर संग खर दूषन वहां आय गया । जव लक्ष्मण जहां के युद्ध कर उस के तांई खतम किया ।।चौ।। श्रुपनखा जी लंका में जाई, निज भाई को कुबुद्ध भिड़ाई । सीता रुप की करी है बढ़ाई, लेने आयो दश किलर चलाई ॥ मिलत ॥ रामचंद्र संग सीता बैठी देख रावण यों विचारी ॥ ४ ॥ सींहनाद देवी ने कीनी रामचंद्र सुण कियो विचार । लक्ष्मणजी की, मदत को उठ यल्या लियो धनुष्य कर धार ।। पिछे रावण सीता को लीनी रतनजटी आयो तत्काल । रावण सेती, कियो है युद्ध न जीत्यों वह तिणवार ॥ चौ०. रावण सीताको बहु ललचावे, पावां पड़कर सीस नमावे । सीता सत सतके उपर रहावे, हीरालाल सदा गुण गावे || मिलत. ॥ जवाहरलाल जी महाराज गुरुके चरण नमों जयजयकारी ॥ ५.॥ ॥११ ॥ लावणी छोटी कड़ी ।। अब हरी सीता वनवास राजा रावण को । मेली लंका गढ़ बाग मौज करी मनको ॥ टेर ॥ जब सीताजी ने लिया अभीग्रह धारी । आवे राम लक्ष्मण की खबर मुझे सुखकारी || जब करतूं भोजन पिऊं गा निर्मल वारी । इम निश्चय कीन्हों मनमें दृढ़ता धारी ॥ नवकार मंत्र को जपे पाप हटे उनको ॥१॥ ये खबर शहर में हुई; सभी ने जाणी । रावण लायो परनार कुबुद्धि ठानी ॥ आ सीता पास यूं बोले विभिषन वाणी । कौन मात तात घर नार किसी विधि आणी । जब जाणी पुरुष प्रमाणिक कही हकीकत उनको ॥ २ ॥ जब मांड सभी हेवाल उन्हें सुनायो । राजा रावण छळ के मुझको यहां लायो ॥ यो लंका नगरी के गृह इसीसे आयो । ये दश मस्तक रावण के कातर कहवायो । अब जेमतेम कर भीजवा दो पति, चरणन को ॥ ३ ॥ जब सुना हवाल सीता का, विभीषन राजा उसकी तो बीगड़ गई बुद्धि सुधारु काजा ॥ आई राजा रावण पे करे अरज अब ताजा । नहीं देऊ सीता इम बोले छोड़ कर लाजा ॥ वो वनवासी दो जन. फिरे वनवन को ॥ ४ ॥ रावण की गफलत जाण करत दुशियारी । कुण जाणे होनी बात करे गढ़ तयारी । ये दार गोला खूब जड़बा भारी । सभी कोट कोटपर ओट लगादी सारी । हीरालाल कहे भाई का करो भलपन को ॥ ५ ॥ ॥ १२ ॥ लावणी छोटी कड़ी ॥ तुम सुणों पियाजी अर्ज एक अब म्हारी । यों कहती वारंवार मंदोदरी नारी ॥ टेर ॥ या दशरथ कुलवधु रामचन्द्र घरनारी । भा मंडल की है बैन विदेह म्हतारी ॥ सीता सतवंती नार जगत् में जारी । यों गावे वेद पुराण सभी संसारी ॥ हरलायो हुकम बिन मेली बाग मुझारी ॥ १॥ मैं अर्ज कर कर जोड़ एक अरदासी । ये लोक करे अपवाद होत जग हांसी ॥ तेने किया खोटा काम कुमत के वासी । ऐसे पापों से जनम जनम दुख पासी ॥ अब मानों हमारी सीख सीता दो डारी ॥ २॥ चढ़ दल बादल आया देखलो दूरे । सुग्रीवा दिक वीर सभी वो सूरे ।। हनुमन्त जिनो का दूत युद्ध में पूरे । लंका केरो बाग कियो सब धूरे । ये राम तणा एक काम देखलो भारी ॥ ३ ॥ जब बोले राजा रावण मंदोदरी सेती । तूं क्या जाणे ये बात महेल में रहती। मैं सभी को जीतूं देर लगे नहीं क्षण जेती । कौन लक्ष्मण कौन राम जगत में कहती । अब जाऊं लंका बाहर फौजले म्हारी ॥ ४ ॥ यों कहे कर रावण राज आयो है सामो । दशरथ सुतका पुरुष शूर है रामो ।। जब रावण लक्ष्मण हाथ मारियो तामे पहुंचो पर भव के माय हुवो बदनामो ॥ हीरालाल कहे इम होवे जो होवन हारी ॥५॥ - ॥ १३ ॥ लावणी चाल:-द्रोण ॥ यह अरज करे रावण से विभीषण भाई । महाराज, काम विमास के करना जी ॥ नहीं लगे दुश्मन का दाव जगत में सत्य का शरणाजी ॥ टेर ॥ या रामचन्द्र की नार आप क्यों लाया । महाराज, जगत में जुलम मचाया जी। पर तिरिया के परभाव केही ने प्राण गमाया जी॥ जलती गाडर घर बिच कबहु नहीं लाना । महाराज, विपित की वेल कहानी जी । लंका नगरी पर हाथ करके क्यो उत्पात् उठानी जी ।। मिलत॥ चढ़ आया राम और लक्ष्मण दोनों भाई महाराज, दुश्मन से कभी न डरना जी ॥ १ ॥ ये सुग्रीवादिक केही भूप संग में लाया । महाराज, हनुमंत हुवा अगवानी जी ॥ पुरी किष्किंधा दरबार सबही मिल मिसलत ठानीजी ॥ ये राजा सुग्रीव चौकस करी मुल्कों में । महाराज, रत्न जटि खबरा दीधीजी। चौरी कर राजा रावण लंका में ले गयो सीधी जी ।। जब खबर करण हनुमन्त सा दूत पठाया । 'महाराज, लंक का किया बे वरना जी ॥ २ ॥ अब हंस द्वीप में डेरा आकर दीना । महाराज समुद्र का तिरिया पाणी जी ॥ गये लंका के दरम्यान खबर सभी देश में जाणी जी ॥ अब दो सीता मुज हाथ फेर दूं पीछा । महाराज; रावण को जो क्रोध छाया जी । लिया खड्ग हाथ पर हाथ भिड़ गये दोनों राया जी ॥ जब कुंभकर्ण इन्द्रजीत जी झगड़ो मेट्यो । महाराज, विभीषण गया राम के चरणा जी ॥३॥ या लंकापति की पदवी अवसर पाई महाराज, अक्षौणी तीस लश्कर लेरांजी । हुवो रामभक्त अति शक्त लगा दिये तम्बू डेरा जी ॥ इन्द्र समान अभिमान रावण चढ़ आयो । महाराज; युद्ध पर रणरंग राता जी । विभीषण को - ॥ रावण के साथ भेजा श्री रघुनाथा जी ॥ ये राक्षस वानर सभी चढ़कर ध्याया । महाराज; भाई दोनों मदद करना जी ॥ ४ ॥ जब नाग पाश कुंभकर्ण को रामजी बांदयो । महाराज; और भी राक्षस बंधाना जी । किया जेल में जेर देख रावण घबराणा जी ।। जब विभीषण पर रावण हाथ उठाया। महाराज; हुवा लक्ष्मण अगवाणी जी ॥ किया दोनों भूपने युद्ध घणा घमण्ड गुमानी जी ॥ जब राजा रावण ने शक्ति बाण चलायो महाराज; पडयो जई लक्ष्मण धरणा जी ॥ ५॥ जब आई विशल्या शक्ति घाव मिटायो । महाराज; युद्ध पर चढ़ गया सूरा जी । बहु रुपणी विद्या साद आयो रावण हुजूराजी ।। जब देख बल लछमन पै चक्र चलायो महाराज; चक्र वो भी गया फेरी जी। फिर उसी चक्र के साथ हुई रावण की ढेरीजी ॥ मिलत ।। सभी लियो राज लंका को तीन खंड माही ॥ महाराज़ हीरालाल कहे जीत के करणाजी ॥ ६ ॥ ॥ १४ ॥ लावणी चाल:-द्रोण ।। अब अतुल वली बलवंत जगत के मांही महाराज फत्तेजंग हुवा परवानाजी ॥ सभी लिया राज तीन खंड आज घर रंग बधानाजी ।। टेर ॥ ये राजा रावण परलोक हुवा परजा में ॥ महाराज; राक्षस मिल भागन लागाजी । दीनी धीरज श्रीरामचंद्र रहो अपनी जागाजी ॥ दिया इन्द्रजीत मेघनाथ को दम दिलासा । महाराज; अनुजय कुंभ. कर्णाजी। बड़े २ घमंडी योद्धोंने लिया है आपका शरणाजी ॥ मिलत ॥ धीरज धर्म संतोप सभी को कीनो महाराज रावणका किया चलनाजी ॥ १ ॥ ये मंदोदरी प्रमुख हजारों राण्या । महाराज; जिनों को ज्ञान बतायोजी । हुवा O Ce ॥
शूरों में सर्दार युद्ध में कामे आयाजी ॥ अब करो आण परमाण राजा विभीषण की। महाराज; आनन्द और मंगळवर्तेजी । श्री धर्म घोष महाराज आया गढ़ लंक विचरतेजी ॥ श्रीरामचन्द्र प्रमुख वंदन को आया । महाराज, अनुभव अमृत पीनाजी ॥ २ ॥ सब सुणी ज्ञान उपदेश मुनि की वाणी ॥ महाराज; केई नृप हुवा वैरागी जी श्री कुंभकर्ण इन्द्रजीत हुवा त्यागी बड़ भागीजी ॥ ये राण्या प्रमुख संयम मार्ग लीनो । महाराज, सतियोंने सत्य न छोड़ाजी । किया नदी नर्मदा बीच संथारा मुनि कर्म को तोड्याजी ॥ मिलत ।। सब दिया लंका का राज विभीषण- जीको । महाराज; अयोध्यानगरी हुवा आणाजी ॥ ३॥ ये दिग्विजय कर देश सभी को साध्या । महाराज, सोला सहस्र भूप नमायाजी । करी तीन खंडमें जीत अयोध्यानगरी आयाजी ॥ उगन्नीसे चौसठ के साल कियो, चौमासो । महाराज शहर मंदसोर के महीजी ॥ श्रीजवाहरलालजी महाराज ठाना १० दस रहया सुख पाईजी ॥ मिलत ॥ ये युगल लावणी यस करणी जगत के माही । महाराज हीरालाल कहे मंगल गानाजी ॥ ४ ॥ ॥ १५ ॥ लावणी चाल:- खड़ी ॥ अमर लोकसे आया विभुधा सांच झूट की वाद पड़ी । धीज करन को अग्नि कुंडपर सीता सतपर आन खड़ी ॥ टेर ॥ सीता के सिरपर दूषन चढ़ाया बात चलादी गली गली | पटकी भ्रांति रामचन्द्र के जिकर आया जब चली चली ॥ दूध के अन्दर नीमक पट के दुश्मन ने की ऐसी मिली मिली । सत सहाई होवे देवता फिर भी बनेगा भली भली || छोटी कड़ी ॥ जब रामचन्द्र जी हुकम ऐसा दे दीना । सीता को करो वनवास खास यही कहना ।
जब हाथ जोड़ कहे लक्ष्मणजी यों बैना । होवे सीतामें कोई वांक मुझे कहे देना ॥ मिलत ॥ रामचन्द्र चढ़
आया हटपर विपति सीता के सिर पै पड़ीं ॥ १ ॥ श्याम वेष और श्याम रथमें बैठा सीता को ले गया । नरनारी
नगरी का कहेता देखो कैसा जुलम किया।। ऊंच पहाड झाड़ जंगलमें जहां सीता को उतार दिया । कहेता सारथी
सुणों मेरी माई हमने खोटा जन्म लिया ॥ छूट ॥ नवकार मंत्रका लिया आपने सरना । सत्र विघन विनाशक सुख
सम्पति करना । मामो सीता को आप ले जावे घर में । हुवा जुगल पुत्र प्रधान आया यौवन में । सवारी सजी
अयोध्या उपर रामचन्द्रजी से आन भीड़ी ॥ २ ॥ किया युद्ध हटाया लश्कर नहीं राम के हाथ चले । नैन
सेनान से जाणा सज्जन जन कोई आन मिले ॥ इतने में कोई आन सुनावे सीता सुत अंगजात भले । पुत्र पिता
सबै मिल्या सज्जन जन पुण्यवंत की आसफले ॥ छूट ॥ लोकीक उधारण काज के धीज ठेरायो । अग्नि को कुंड
अग्नि से खूब भरायो । सीता स्नान कर आला वस्त्र पहन के आवे । होवे सील सांच मुझ आंच रति नहीं आवे
नहीं खौप कोई दिल के अन्दर होवे जिसकी तकदीर बड़ी ॥ ३ ॥ अग्निकुंड का हुवा जल नर नारी सब ही
देख रहया । कुशुमकी वर्षा करी देवता जयजयकार शब्द किया । निशकलंक तन हुवा है निर्मल सकल विश्वमें
यश लिया। दुर्जनका दिल देख घबराया शरमिन्दे सर झुका दिया ॥ छूट ॥ यह शील महासुखकंद विघ्नको
ठाले । जो पाले निर्मल चित्त रीति में चाले । श्री रतनचंदजी महाराज कंजेड़ेवाले । श्री जव्हारलाल महाराज
सुमति को पाले ॥ मिलत ॥ चौसठ के साल भोपाळ शहरमें हीरालाल लगाई ज्ञान झड़ी ॥ ४ ॥
॥ १६ ॥ लावणी चाल:-द्रौण ॥ ये लिया व्रत पचखान निर्मला पाळे । महाराज, कष्ट में कभी न डीगता जी ॥ या विपत जाय सव दूर, मिले सुख सब मन गमताजी ॥ टेर । यो बंक चूल हुतो कुंवर राजाको । महाराज, पल्ली में जाकर वसियोजी ॥ दुवो चोरांका सरदार, सदा कुकर्म में फसियोजी ॥ एक दिन मुनीश्वर मार्ग भूलकर आया महाराज, पल्ली में चौमासो कीनोजी । मत देना यहां उपदेश मुनिने मानी लिनोजी ॥ शेर ॥ चातुःर्मास पूर्ण हुवा, मुनिराज कीनो विहारजी ॥ पल्ली पतिपहुंचाने चाल्यो, अपनी सीम के पारजी॥१॥ जब मुनिवर उपदेश दीनो, सोगन कराया चारजी ।। नमस्कार कर पाछो फिरियो, आयो अपने द्वारजी ॥ २ ॥ चौपाई ॥ बिन जाण्यो फल नहीं खाणो । नृपनारीको मात सम् जाणो । बिन चेताया वैरी नहीं हणीये । वायस मांस अभक्षमांही गणीये ॥ मिलत । एकदिन चोरसंग लेके धाड़े चढियो । महाराज; बखीला को रहे न समताजी ॥ १ ॥ प्रति शत्रूको जोर चोर सब भागा। महाराज; फिरत वो बनमें भमताजी । नहीं खाया अजाण्यो फल वंकचूल त्यागसे डरताजी । और केही चोरोंने वह फल खाया । महाराज, जिनोने प्राण गमायाजी ॥ वहांसे चलके आयो बंकचूल घरे अधरातको आयाजी ॥ शेर ॥ नार सोती पर पुरुष संग, देख चढी शिर झारजी । वैरीको मारन काजे, खेच काढी तलवारजी ॥ १ ॥ ठोकर लगा चेतावियो, तोकि तेग तिणवारजी । बहेन उठी आशीश देवे मैं सूती थी इणवारजी ॥ २ ॥ चौपाई ॥ नट नाटक करवा आयो, मैं तो तेरो स्वांग बनायो । सवी बात सुणी सुखपायो । बैन पातक आप बचायो ॥ मीलत ॥ एकदिन बंकचूल राजाके महेलामाहिं । महाराज चोरीसे चोर न डरताजी ॥ २ ॥ उड़ गई राणीकी नींद चोरको देखा महाराज, रुप मनमोहन गारोजी । कहे ललित वचन ललनाको सफल करो आज जमारोजी । मैं देऊंगी धनमाल मानकयो मेरोजी । महाराज, कुंवरको बहु ललचावेजी। नहीं माने कुंवर गुणवंत मातकहे कर बतलावेजी ॥ शेर ।। गुप्तपने सुने राजा, निजनार को चरित्रजी । जिनाखोरी चोर नहीं करे, वश कीनो अपनो चित्तजी ॥ १॥ जब राणीने हल्ला किया, पकड़ लिया वो चोरजी । पूछे राजा बात छानी, नहीं किया राणीपर गोरजी ॥२॥ चौपाई ॥ सत्यवादी कुंधरको जानी, दीनों कुंवर पणेपद ठानी । त्याग प्रभाव ये फल लागो। सत राख्या उदय हुवो भागो॥ ॥ मिलत ॥ एकदिन वैरियोंको जीतनकाजे राजा, महाराज, कुंवरपर हुकमजो करताजी ॥ ३ ॥ जाय अडया वैरियाकों दूर हटाया । महाराज, कुंवरके शर एक लागोजी । करे वायस मांसको आहार ऐसी कहे राजाके आगेजी । जव, राजा कुंवरको कहे कुंवर नहीं माने । महाराज; श्रावक जिनदास को तेडीजी । करो श्रावक वचन प्रमाण राज हट लिनी घेरीजी ॥ शेर ॥ मार्गमें जाता सेठको, रुदन करती मिली नारजी । सेठ पूछे किनकारणें, तुम रुदन करो इणवारजी ॥ १ ॥ नृपकुंवर तो जीवे नहीं, जो खासे वायसमांसजी । त्याग खंडे जनमहारे, यों कहती है प्रकाशजी ॥ २ ॥ चौपाई ।। श्रावक आयने सेठों कीदो, कुंवर अणसण पचखी लीदो, स्वर्ग बारवें पहुंतो सीधो, त्याग चार तणो फल लिधो ॥ मिलत ॥ श्रीजवाहरलालजी महाराज तणे प्रसादे । महाराज हीरालाल कहे सुमतके धरताजी ॥ ४ ॥ S
बंकचूल राजाके महेलामाहिं । महाराज चोरीसे चोर न डरताजी ॥ २ ॥ उड़ गई राणीकी नींद चोरको देखा ।
महाराज, रुप मनमोहन गारोजी । कहे ललित वचन ललनाको सफल करो आज जमारोजी । मैं देऊंगी धनमाल
मानकयो मेरोजी । महाराज, कुंवरको वहु ललचावेजी। नहीं माने कुंवर गुणवंत मातकहे कर बतलावेजी ॥ शेर ।।
गुप्तपने सुने राजा, निजनार को चरित्रजी । जिनाखोरी चोर नहीं करे, वश कीनो अपनो चित्तजी ॥ १।। जब राणीने
हल्ला किया, पकड़ लिया वो चोरजी । पूछे राजा बात छानी, नहीं किया राणीपर गोरजी ॥ २ ॥ चौपाई ॥
सत्यवादी कुंवरको जानी, दीनों कुंवर पणेपद ठानी । त्याग प्रभाव ये फल लागो। सत राख्या उदय हुवो भागो ।
॥ मिलत ॥ एकदिन वैरियोंको जीतनकाजे राजा, महाराज, कुंवरपर हुकमजो करताजी ॥ ३ ॥ जाय अडया
वैरियाकों दूर हटाया । महाराज, कुंवरके शर एक लागोजी । करे वायस मांसको आहार ऐसी कहे राजाके आगेनी
जब, राजा कुंवरको कहे कुंवर नहीं माने । महाराज; श्रावक जिनदास को तेडीजी । करो श्रावक वचन प्रमाण
राज हट लिनी घेरीजी ॥ शेर ।। मार्गमें जाता सेठको, रुदन करती मिली नारजी । सेठ पूछे किनकारणे, तुम रुदन
करो इणवारजी ॥ १ ॥ नृपकुंवर तो जीवे नहीं, जो खासे वायसमांसजी । त्याग खंडे जनमहारे, यों कहती है
प्रकाशजी ॥ २ ॥ चौपाई ॥ श्रावक आयने सेठों कीदो, कुंवर अणसण पचखी लीदो, स्वर्ग बारवें पहुंतो सीधो,
त्याग चार तणो फल लिधो ॥ मिलत ॥ श्रीजवाहरलालजी महाराज तणे प्रसादे । महाराज हीरालाल कहे
सुमतके धरताजी ॥ ४ ॥
॥ १७ ॥ लावणी चालः-द्रौण ॥ श्री पद्मनाभ महाराज तिर्थकर पहिला । महाराज, जीवकी दयाजो पालीजी । कियो धर्म तणो उद्योत हुवा दृढ समकित धारीजी ॥ टेर ॥ या राजगृही नगरी की महिमा मोटी । महाराज, जहां श्रेणीक भोपालाजी ॥ पटराणी चेलना पुत्र दोऊ हुवा रुप रसालाजी ॥ एक कोणक पुत्र हे जेष्ट महा तपधारी । महाराज, बहैल कुंवर है छोटाजी । जाने बक्ष दिया महाराज हार हाथी दोय मोटाजी ॥ छूट ॥ अब कोणक कुंवर के दिलमें ऐसी आई। मोको राज कब मिले करूं मौज मन चाई । ये काली कुंवर दस भ्रात लिया बुलवाई ॥ मिलत ॥ मिसलत करे सब सुणों एक चित्तभाई । महाराज, होतब की बात है न्यारीजी ॥ १ ॥ आपौ राजा श्रेवकको पकड़ पीजरे डालाजी । महाराज, राजकी करनी पांतीजी । अब कियो वचन प्रमाण हुवा राजाका घातीजी । एकदिन भूपतको देखी गफलतके मांही | महाराज, दमादम मिलकर आयाजी ॥ दिया पकड़ पिंजरे सींघ जोर नहीं चले चलायाजी ॥ अब कोणक कुंवर गादीपर आकर बैठा ॥ माताके पांव पड़नेको गयाथा बेटा । माताने आदर नहीं दिया रखा दिल सेंठा ॥ मिलत ॥ धर लिया ध्यान राणीने झुका सिर हेटा ॥ महाराज, कुंवर कहे मात हमारीजी ॥ २ ॥ मैं राज लियो थने हर्ष भाव नहीं आयो । महाराज, राणी सब बात सुनावेजी । यने कियो बापसे वैर मने हित कैसे आवेजी ॥ में दियो एकन्तमें डाल बाप थने लाया । महाराज, जिनोंसे या गत कीधी जी ॥ सुन उतर. गई सबरीस तापस, भवसे सीधीजी ॥ छुट । अब तोडूं पीजसे फसी हाथमें झेली । आता देख कोणकको MA aye मुद्रिका मुखमें मेली । कर गयो आयुश नृप गयो नर्कमें पेली ॥ मिलत || चौरासी सहस्त्र वर्षोंकी स्थिति भुगतेली, महाराज, कर्मगति टले न टालीजी ॥ ३ ॥ ये आता काल चौबीसीजी के मांही । महाराज, होसी जिनपद अवतारीजी ॥ श्रीपद्मनाभ महाराज विमल वाहण अखारीजी ॥ सुरपति सेवामें रहकर राज च लावे महाराज, देवसेन नाम कहासीजी ॥ फिर लेगा संयमभार, धर्म मार्ग चलासीजी ॥ छूट || यों केवलज्ञान पद प्रमार्थ को पावे ।। फिर जन्ममरण और रोग कभी नहीं आवे । हीरालाल कहे गुणवंत गुणीका गुण गावे ॥ ॥ मिलत ।। पावे रिद्धसिद्ध कल्याण घरोघर छावे । महाराज, कोई होवेपर उपगारीजी ॥ ४ ॥ ॥ १८ ॥ लावणी चालः-तर्ज लंगड़ी ॥ देखो जगत की रीत प्रीत मत करना कोई तो नर नारी । लोभ के कारण । पुत्र को बेच दिया है महतारी ॥ टेर ॥ राजगृही में ऋपिभदत्त ब्राह्मण रहता उसवारी घर में उन के, मिली है दुर्लक्षण दुष्टन नारी । चार पुत्र पुण्यवंत नहीं कोई ग्रहदशा ऐसी डारी । पूर्व जन्म की । करी है करणी जैसी मिली सारी । अमर कुँवर को कोई दिनों में मिला मुनीश्वर गुणधारी । नमस्कार मंत्रको । सिखायो कष्ट पड्या सानन्दकारी ॥ मि ।। इसी मंत्रकी रखो आस्ता विघ्न सभी जावे टारी ॥ १ ॥ राजा श्रेणिक ने महल बनाया चुन २ फिर गिर २ जावे । जब पूछे राजा । विप्रसे ऐसा कथन कही सुनवावे । होम करो कोई लड़के का जब राजा ढंढेरो फेरावें, कोई ले आवे । जिसको मन वन्छित इच्छित पावे । ऋषभदत्त जब कहे नारी से दो एक लडका धन आवे । अमर कुंवर को, वेत्र 帶盤整器器 माता ऐसा फरमावे || मिलत ।। जब लडका कहे मात तातसे मेरा प्राण क्यो ले प्यारी ॥ २ ॥ मातपितासे अर्ज करी पण नहीं किसीने दम दिया । लेकर नोकर, जायके श्रेणीक भूप के हाजर किया ।। जब लडका कहता राजा से वेगुनाह क्यों लेवो जिया । तब राजा बोले । नहीं मैं बे इन्साफ का काम किया, पूजी अरची फूल की माला विप्र मंत्र उच्चार रया । अमर कुँवर का कुँवर का, हलक हलक करता है जिया ॥ नि|| उसी वक्त में उसी मंत्रको याद कियो आनंदकारी ॥ ३ ॥ तुहीं मंत्र संसार बडा है तुहीं भवो दधिसे उतारे । तुही २ मुझको। आज तो इणी वक्तमें आधारे । अमर लोकसे आया देवता तुरत फुरत कारज सारे । कियो सिंहासन । शीशपर छत्र चवर सुरवर ढारे । विप्र भूपको ओंधा डाली कहे अमर सुनो सब नरनारे । ये करम तुम्हारा । सभी मिल लेयो सरणों दुःख टारे ।। ॥ मिलत । नवकार मंत्र गिण पाणी छिटकता हुवा सभी तो हुशियारी ॥ ४ ॥ राज सभामें देख सभीहि अचरज पाया दिल म्याने । इम बोले राजा । सभी मैं राजपंद देवा थाने । कुँवर कहे मैं संयम लेतूं ध्यान धयो है समसाने । माता सुनके, आई है मारन काजे मुनियां ने । ऋषिराज ने क्षमा करी ने स्वर्ग बारमें सुभ ध्याने । पिछी फिरता । मिली है सिंधनी मरगई तमानें । रत्नचन्द्रजी महाराज विराजे शहर जावरे सुलताने । कृपा करके । दिया है अक्षर दो पद गुरु ज्ञाने । मिलत || हीरालाल कहे गुरु देवको शरणों भवभव सुखकारी ॥ ५ ॥ ॥ १९ ॥ लावणी चाल:-लंगडी ॥ विदेह देश और मिथिला नगरी नमीराज जी बड़ भागी । कंकन केरो । सोर सुन राज रमण सब ऋद्धि त्यागी ॥ टेर ॥ बसंतपुर नगरी है अति सुंदर मनोरथ राजा राज करे । महेला उपर । देखता मयनरया पर नजर पड़े । लघु भ्रातकी नारी सुंदर राजा खोटा भाव धरे । दासीके हाथे । संदेशो भेज्यो कारज कैसे सरे । शेर ॥ राजाकी अनिति जानके, राणी करे विचारजी ॥ शील सावत राखवाने बुलाविणो भरतारजी ॥ १ ॥ पति गयो परदेशमें, राजातो लागो लारजी । लेख लिखी बात सारी, भेजयो अस्वारजी ॥ छूट ॥ जो जीवित नजरां देखो वेग घर. आवो । वांचीने राजा जान्यो भ्रातको दावो । दल बादल पीछा तुरत आपने फेरा । नगरी के बाहर बागमें दिया डेरा दोड़। मैनरया नार, जाय मिली भरतार, हो जो आप हुशियार, हवाल किया। होके घोड़े अस्वार । हाथलिवी खड़गधार, आयो भाईके दरबार । दुष्ट घाव दिया ॥ मिलत ।। मनोरय राजा पाछो फिरता सर्प पूंछपर खुर लागी कंकन ॥१॥ उसी वक्त सर्प नृपको डसीयो मरकर नर्का वास किया । मैयन रयाजी । पतिको तुरत धर्म का साज दिया । शरणा दे संथारो किधो देवलोकमें चला गया। मैयनरयाजी | निकल कर उपट वाट वनवास लिया | शेर । देखो गति है कर्मकी, पेटे पूरा मासजी ॥ महाराज कुंवरको जन्म दुवो । और नहीं कोई पासजी ॥ १ ॥ तनको धोई साफ कियो, लियो बालक हाथ जी, धरे पांव पड़े पाछा । करे विचार तिहां मातजी ॥ २ ॥ छ्ट ॥ जब चीर फाडने आदोआद बिछायो । शिला पर बालक हाथोहाथ पोडायो । अब पुण्य आपका आडा कुंवरजी आवे । माताकी छाती मांही दुःख नहीं मावे || दौड ।। राणी आगे जाय, कोई पीछे सेती आय, धोके रही मन माय, तिरे वेस रही । विद्याधर आयो एक, राणी रुप लियो देख, कोई करके विवेक, समो सरणमें गई ॥ मिलत ॥ BE संयम लेकर कारज सारयो धन २ सतियां अनुरागी ।। कंकन ॥ २॥ मिथिला नगरीकों राजाशिकारी वनवासको ढूंढ फिरे । फिरता फिरता । .आया तिहा बालकसूतो शिला परे ॥ तुरत कुंवरको तोक लिया है, पुण्यवंतकी सहाय करे । महिलामाही । लालको हुलरावत है अपने घरे ॥ शेर ॥ कुंवरका पुण्यप्रभावथी भोम्या नम्या सब आयजी ॥ नमी कुंवर नाम दिधो सुखमें दिन जायजी ॥ १ ॥ राजा तो संयम लेलियो, दियो कुंवरने राजजी ॥ एक सहस्त्र तिरिया संगे, भोगे सुख श्रीकाजजी ॥ छूट । एक दिन राजाके अंगमें हुई असाता । तन ताप अगन की दाह ज्वर कहलाता | अपना पियूके काज मिली सब प्यारी | बावना चंदन घसती न्यारी २ ॥ दौड -॥ वाजे कंकनको शोर, राजा बोले करी जोर, मोको लागे है कठोर । ऐसा कौन करे। तब राणियोंने विचार, पति राग है अपार, छोड दिया श्रृंगार, सभी भुषन परे । मिलत ॥ एक एक चूडी रखी हाथमें और सभी मेली आगी ॥ कंकन ॥ ३ ॥ कियो विचार राजा दिल अन्दर बहु परवार मिले आई । राग द्वेशसे । करत है कर्माकी या कमाई । कुटुम्ब विटम्ब सम कियो जिनवरजी ऐसी समजे दिलमांही । एक मनसे, किया है भावना तो ऐसी आई ॥ शेर । जाति समरण ज्ञान उपनों लिनों संयम भारजी ॥ बाग अंदर ध्यान करके बेठिया अणगारजी ॥१॥ इन्द्र सुधर्मा खर्ग पहले करत लील विलासजी । विप्ररुपे वेशधारी, आयो मुनिकेपासेजी ॥ छूट ॥ प्रश्न पूछे बहु भांतिके छलवा काजे । दिया अर्थ सभी समझाय सूत्रमें राजे ॥ भगवान रुप महाराजको प्रगटकीधो । मुनिराज- चरणमें सीस इन्द्रने दीधो । दौड || क्रोध मान माया लोभ, जीत्याचारों जवर जोध, क्षम्या करि है प्रभोध, EN MAG ENR गुणग्राम किया ॥ कर स्तुति सन्मान, चपला गतिके प्रमाण, कुंडल झलकत कान, इन्द्र रवर्ग गया || जवाहिरलालजी गुरुदेव, जाकि करुं नितसेव, हीरालाल स्वयमेव गुण ग्राम किया ॥ मिलत ॥ जिनमार्ग उद्योत हुवा है धन २ भाग दशाजागी ॥ कंकन ॥ ४ ॥ ॥ २० ॥ लावणी चाला-लंगड़ी ।। चंपानगरी धर्म घोष महाराज पधाया है जी यहां धर्म रुचिजी, ऋषिजी मास खमण तप पारणा किया ।। ।। टेर || उस नगरी में रहते है जी ब्राह्मण तीनों है भाई, घरमें उनके, भारजा तीनों के है सुखदाई ।। वारा बांध कर अपने २ भोजन करकर जीमाई । नागश्रीको । आयो है वारो एक दिन के माई । केई तरह की करी है रसोई भोजन जैसा मन भाई । कडवे तुम्बे । तुम्बे का साग करा पर गम नाई । केई तरह का दिया मसाला चाखी ने फिर छिपा दिया॥१॥ ब्राह्मण ब्राहाणी आकर सबही जीम गया निज घर घर रे । उसी बात का । पता नहीं पाया देखा किसी तरह रे । मास खमण को आयो पारणों दिन दोपहरां गयो ढररे । आज्ञा मांगी, मांगी जब गुरु फुर मायो हित कर रे । फिरता २ आया गोचरी । नागश्री के मंदिर रे । देख मुनिको । मुनिको राजी हुई है। किसी तरह रे । जाणी उखर्डी वेरा दियो सब पूरण पात्र भरा गया ॥२॥ आया गुरुके पास पात्रा, मेल हकीकत कही सारी । ऐसा तुझको। कहो तो कोन मिला है नरनारी । चाख लिया गुरु देव जरासा । जहर समाना है आहारी । दीनी आज्ञा, आज्ञा तो अचित भूमीपर पठवारी । आया मुनीश्वर देखी भूमी बूंद एक दिया डारी । कीडियां केई । मरगई 18 - 器樂器密器 SNg खाई. वह कियारी. | करुणा सागर करुणा लाकर । सलो जीबोंपर वारी दया ॥ ३ ॥ किया. आहार मुनिराज सभी तो। दिल बिच ऐसी आणी, जीव दयाको । दयाको धर्म मर्म लिकोः जाणी। प्रबल वेदना हुई अंगमें शक्ति आक्मकी घटामी । कियो संथारोः । संथारो भाव. उलट मनमें आणी । स्वार्थ सिद्ध बिमाण बिराजे । जहां पहुंचे निर्मल ध्यानी । पूर्ण स्थितिको । स्थितिको पाया आउखो निर्मल ज्ञानी । चषजासी महाविदेह क्षेत्रमें | सर्व. दुःखों का अन्त किया ॥ ४ ॥ खबर करनको गया मुनीश्वर भेद सभी जाणी लीनो । जागश्रीने । श्रीने जहर पारणामें| हीन । हुई शहरमें निंदा उसकी ऐसो अकारज क्यों किनों। मिलकर घरका । घरका वेष गहणो सब छिनी लिनो । बहु दुख देख गई नर्कमें । ऐसा अकारज जो किनो । मुनिराज 'तो, राज तो दया रस पूरण पीनो । शहर जावरे शुभदिन गाई हीरालाल धरी हर्ष हिया ॥५॥ ॥ २१ ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ॥ शालभद्र महाराज आपकी ऋद्धि को पार नहीं पायो । श्रेणिक राजा । आप खुद देखन काजे घर आयो ॥२॥ पूर्व जन्म ग्याल्या का भव में संगम नामा एक शरीर । माता पासे । बहु हद करके बनाई खावन को खीर । थाल भरी जीमन को बैठा मुनिवर एक महा शूरवीर । मास खमण के पारणे आया कोई जागी तकदीर । उलट भावसे दान दिया जव बदियापुण्य असूट समीर । उसी शहर में वसे गऊभद्र शेठ बड़ो धन धीर ।। शेर ॥ राजनही नगरी विपे ऐसा तो नहीं कोई औरजी । महापुण्यवंत भद्रिक भद्रा जन्म लियो तिण ठोरजी ॥ १ ॥ खप्न अन्दर देखियो । पाको शाली खेतजी । जन्म हुवो नाम दीधो, शालभद्र सब कहतजी ॥२॥ छूट ॥कंचन वर्णी त्रिया तन बत्तीसों परणी । मानु सुखदेव दुगंध जैसी ऋद्धिवर्णी । माणक मोती नहीं ज्ञानके रत्नाजड़िया । सोनों रुपो कोन गिने गिनत योंही पड़िया ॥ दोड़ ॥ सेठ कर गयो काल, पहिला वर्ग मुझार, हुवो देव अवतार, अतिराग धरी । वस्त्र भूषन श्रृंगार, भरी मजुसा मुझार, तेंतीश तेतीश प्रकार, नित हाजर करी ॥ मिलत ॥ भोगे पुण्य तणी या कर्णी हाथ हर्ष जो वैरायो । शा ॥ १॥ रतन कामल लेई आया वैपारी बेचन काजे फिरे बजार । कोई नहीं लिनी । उदासी होय गया पाछा तत्काल । शाल भद्रजी की आई दासियां जल भरणे पनघट पनियार । देख · व्यापारी । पूछियो उदास तुम क्यों हो इणवार । कहे व्यापारी नहीं बिकानी सोला कामल है मुज लार । माता भद्रा । मोल ले खोल- दिया भरया भंडार ॥ शेर ॥ सम्वा सव्वा लाख सुनयैया, एक एक कम्बल को मोलजी । गिणत आई वीस लाख, मांड दिया तोलजी ॥ १ ॥ आदोआद करी कामल, बत्तीस बहुओं काजजी । सासुकी मनवार जाणी, मोटा || घरां की लाजजी ॥ २ ॥ छूट ॥ वो रत्नकामल ले सबही नारयांपहरी, वांके अंग में चुनवा लागी कटक ज्यूं वैरी । तत्र स्नान करी अंगहीने एकन्त नाखी । लेगई मेतराणी नार जतन कर राखी ॥ दोड || कोई दिनों के माय, मेतराणी ओढ़ी आय, देख्यो राणी बतलाय, कहांसे ले आई। कहे मातंग की नार, सुनों राणीजी विचार, शालभद्रके दरबार, पाई जोगवाई ।। मिलत ॥ राणी हकीकत सुणी पाछली राजा से सब संभलायो ॥२॥ अभय कुमर और श्रेणिक राजा सेठां के घर आवे है । शालभद्रको । देखवा मन में हर्ष उमावे है । राय आंगण विचगिरी. मुद्रिका शोद्ध किया नहीं पावे है । जब माता भद्रा । भरी एक धोबो नजर करावे है । कहे माता सुनो पुत्र आज दिन मोत्यां मेह वर्षावे है | तुम नीचे आवो । आज घर नाथ आप पधरावे है ॥ शेर ॥ वचन माता का सुनी, हुवा घणा उदासजी । स्वप्न अन्दर नहीं सुनियों, यो बेन माता पासजी ॥ १ ॥ मेहलासे नीचे उतन्य, नारियां तणों भ्रतारजी । खमा खमा करता थका हुवा बहोत झणकारजी ॥ २ ॥ छूट ॥ मेहलासे उतरी आया भूपके पासे । देखीने नृपति दिलमें ऐम विमासे । यह देवलोकको जीव पुण्य प्रकाशे. । राजा धर अपने हाथ लियो हुलासे ।। दौड़ ।। आय बैठा खोला माय, जीव रहयो घबराय, कहे भद्रा मन लाय, हवे शीखदीजे । सुखमाल घों अंग, तजि आयो नारिसंग, हुवो रंग बेरंग, आप देख लीजे ॥ भिलत ॥ हुक्म लई तब गये कुंवरजी राजा राज्य- भवन ध्यायो ॥ ३ ॥ बैठ पलंगपर धरे ध्यान दिल म्यान विचारे ऐसी बात । नहीं किधी कर्णी । जिनोसे हुवा हमारे शिरपर नाथ । विचरत २ आये वीरजिन चवदा सहन मुनिवरसाथ । वंदन काजे, · आया केई नरनारी जाथों की जाथ । सुण उपदेश हुवा वैरागी शालभद्र कहे जोड़ी हाथ । माता पासे पूछकर लेतूं संयम तज सब साथ || शेर । घर आई इम कहे, मुझ हुक्म दो प्रकाशजी । वीरपासे संयम लेसूं, छोड़ कर घरवासजी ॥ १ ॥ वचन पुत्रका सांभली, माता गई मुर्छायजी । चेत लई समजावे सुतको, मत काढ़ो ऐसी वायजी ॥२॥ छूट ॥ बत्तीसी नारियां कहे आप करजोड़ी । पहेला क्यूं परण्याथें हथलेवो जोड़ी । या तरुण अवस्था जोग कठिण है भारी । चलनों खांडाकी धार अर्ज ये हमारी ॥ दौड़ ॥ एक एक नार, प्रतिदिन तजे निराधार, लेणो संयम श्रेयकार- मासा हुक्म करी । धनाजी पर नार, आय दियो है सवाल लिनों संयम सुखकार, दोनों हर्ष धरी ॥ ॥ मिलत ॥ महोत्सव कीनों भद्राजननि कहे मेरो एकन जायो ॥ ४ ॥ कहे भद्रा सुनों वीर । जिनेश्वर भूख प्यास खबरा लीजो । मत जाजो मूली, आप खुद करी खबर समता दीजो । सुत मेरा जाया कर्णी करता कोई. प्रमाद मति कीजो । मुझको छोडी, और जननि घर जन्म मतिलीजो । मास २ खमण तपस्या करता सोस गई फोनल काया। प्रभु फिरता २, फेरभी राजनही नगरी आया । शेर ॥ पारणाको दिन जाणी, पूछे तो कृपानाथजी । वीर भाषे नहीं शंका, होसी माता हाथजी ॥ १ ॥ भद्राके घर गौचदी, पहोंचा तो है मुनिराजजी । द्वारपाले दिया पर्जी, नहीं अवसर आवजी ॥ २ ॥ छूट ॥ पाछा फिरता मईयारी दुध वैरायो । ले आया जिनवर पास हाल समझायो । पूर्व भवको वृत्तान्त सभी बतलायो । अनसन करवाने शेलांशेखरपर ध्यायो ॥ दौड़ ॥ आयो मासको संथार, कर दिया खेवा पार, खार्थसिद्ध अवतार, धन्ना मुगति गया । जवाहिरलालजी गुरुदेव, करों ज्यांकी नित सेय, हीरालाल स्वयमेव, गुणग्राम किया । संवत ओगनीसे आधार, छप्पन्नसालके मुझार बडी सादडी श्रेयकार, तातुरमांस किया ॥ मिलत ॥ शालभद्रकी गाई लावणी दिन २ ऋद्धि सम्पदापायो ॥ ५ ॥ ॥ २२ ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ॥ हिमपुरी को राजा चंदजी शायर नीर पुत्र जाणी । महा सतवंती । पिलियागिरी नामा होती महाराणी ॥ न । एक दिन गहासब चंदनजी सुताथा वो अधराते । देवी आई । जा कर कहती है ऐसी बातें ॥ राणी पुत्र दोई लेकर निकलो नब होवेगा सुख साते ॥. होनहार. तो । मिटे नहीं क्रोड़ बात करलो ज्ञाता । हम तुम, कुलकी रक्षा करनको दियो चेताई " वेह " माता | सुणकर राजा । हुवा दिल सोच दुःख दिल में लाता ॥ ॥ छूट ॥ राणी मिलीया को जगा कहे महाराजा | अहो आई है अधरात ऐसी अवांजा । तब राणीजी को हुई चिंता अति भारी । नहीं मिटें कमों की गति ऐसी विचारी ॥ मिलत ॥ राणी पुत्र को लेकर निकल्या दिल में दिलगिरी नहीं आणी ॥ १ ॥ चले जाय राजा और राणी भुख प्यास लागी तन को । इम बोले बालक । पिताजी दो खाने कुछ हमको । दुःख पड्यो असमान राजापर नहीं समजे बालक मन को । बहु हट पकडी, गया कोई नगरी घर एक महाजन को । करी नौकरी राजा सेठ की भूलं गयो सब सज्जन को । वो घर छोड़ी, गली गली फिर २ के मांगे अन्न को ॥ छट ॥ ऐक सूना घर में जाकर कीना वासा । तिहां रहेता चारों जीव धरी मन आसा । पुत्र के पास रहे राजा वक्त जो दोरी । राणी जंगल से लावे काष्ट की मोरी ॥ मिलत ।। बेच बजार करे उदर पूरणा कोमल काया कुम्हलाणी ॥ २ कोई दिशावर फिरतो आयो टांडो लेकर वणजारो । मोहवश हुवो देखकर राणी को है जब उणियारो । दम दिलासा दे राणीको ले गयो तब तो निठारो । विषकी वाणी । बोलता तडक फडक कहे जब नारो । प्राण तजूं नहीं तजू शील को नहीं हारुंगा जमारो । संग तुमारे । रखूगा बेन भाई को आचारो ॥ छूट ॥ या बात कही फिर तपस्या से चित लावे | करे आमल लूखो आहार जोर लगावे । नवकार मंत्र को ध्यान जो मन में ध्यावे । तज दिया सभी श्रृंगार दिन गुजरावे ॥ मिलत || अंग जात और पति आपको 902 बस रहे हिरदा में जाणी ॥ ३ ॥ राजा चंदनजी जोवे वाटड़ी अब तक राणी नहीं आई । बालक बोले, मिला दो माता मेरी मुझताई ॥ रुदन करे नहीं माने कुंवरजी कहां गई मेरी मांई । यह देख अवस्था, गया है राजाजी भी घबराई । ले लड़के को चाले शोधने उलट घाट नदियां आई । नहीं जावे उतन्यो । बालक को मेलू किस पासे जाई ॥ छूट ॥ राजाने वृक्ष के दियो बालक को बांधी । एक ले उतरे जलपार पीठ पर फांदी । फिर दूजे किनारे दियो दूजा को मेली । लेवाने आवे भूप जो बांध गयो पेली ॥ मि ॥ नदी · बीच में आता राजवी उपर वास आयो पाणी ॥ ४ ॥ कैई दूरतक बहेतो राजवी दाव लेई निकस्यो बारे । आनन्दपुर के शेठ घर रहे तिहां कारज सारे । उसी शेठ की नारी कुभारजा बुरी नजर उसपर डारे । कहे राजा से, भोगवो भोग संग तुम हमारे ॥ ठेल बचन को उठ गयो राजवी जाय सूतो सरवर पारे । उस नगरी के । राजा की मृत्यू हुई है तत- काले ॥ छूट ॥ हस्तीने सूंड में लीनी फूल की माला । चंदन राजा के डाली गले तत्काला । जब राजा तख्त- पर बैठ हुक्म चलावे । मिटगया सभी दुःख फन्द आनन्द घर आवे ॥ मिलत || अब कुँवरों की सुनो वारता मेल मिले सब को आणी ॥ ५॥ रस्ता गिर फेर कोई शेठजी बालक को वह लेई गया । अति यत्न कर आपना जान कुंवर को बड़ा किया ॥ कर्म परिक्षा करणे काजे आया बाप चन्दन जी जीया । वणजारो भी । आयो राणीजी को लार लिया। राजसभा में ले राणी को जाय पुकारे पुत्र तिया । देखी राजा ओलखता हर्प भराणो सब का हिया ॥ छूट ।। ये राणी पुत्र सब आये आपका मिलिया। मिटगया सवी जंजाल विघ्न सब टलिया। जब कुसुम पुरी को दूत लंबाने आयो । महाराज पधारो यूं कही सीस नमायो । मिलत ॥ पुण्ययोग सभी थोक मिलत है मत करो कोई खेंचाताणी ॥ ६ ॥ एक पुत्र को इसी नगर का राज तख्त दिया बैठाई । राजा और राणी। सभी मिल कुसुम पुरी चाल्या आई ॥ सायर कुंवर को राज्य देके नृप संयम ले शुद्ध गति पाई । मुनिराज का जगत में शरणा सब को सुखदाई ॥ मुलक माळवा शहर जावरा मालूम हे सब के ताई । श्रीराम लक्ष्मण भी लीयाथा वास.एक दिन यहां आई ।। छूट ॥ या राजा चन्दन की एसी लावणी गाई । हे सुख दुःख दोई जोड़ा जगत के मांई । हीरालाल कहे यह सुणो सभी चित लाई । गुरुदेव चरण पर रहो शीश नवाई ॥ मिलत ॥ जैनधर्म और जिन मार्ग की अगम अगोचर है वाणी ॥ ७ ॥ ॥ २३ ॥ लावणी चालः-लंगड़ी ॥ 'मुनि सुवृत महाराज चरण भवसागर तारण जिनवाणी । लेकर शरणा कहूं मैं चन्द कथा अति हित आणी ॥ । टे। वीरसेन नृप आभापुरी को राजकरे अति सुख माई । राणी एक परणी । जिसी को वीरमती कह बतलाई ।। पदम शिखर राजा की बेटी चन्द्रावती अति चतुराई । है दूजी राणी ॥ जिसीके चन्द कुँवर जन्मियों आई । उसी कुंवरको गुणशिखरकी पुत्री गुणावली परणाई । राजाराणी, भोगवे पुण्यफल अति सुखमाई ॥ शेर । चंद्रावलीके द्रष्टीमें आयो, राजाके धोळो केसजी. ॥ कहे राणी दूत आयो जरा संघके आदेशजी ॥ १ ॥ राजा- राणी चन्द्रावती, लीनो संयमसाथजी ॥ करके कर्णी मोक्ष पहुता मुनिसुवृत के हाथजी ॥२॥ छूट ॥ अब राजकरे 鄂部器器较器縣器兹體部张张张游部都强 महाराज चंदजी नाका । वीरमती चलावे जोर विद्याबलजीका ॥ थें चलो हमारी सीखपुत्र धनीका । गुणावलीको लीधी गुंथ महा महत्रीका ॥ दौड़ ॥ माने राजा राणा कान, कोही लोपे नहीं आण, हुई देशमै प्रमाण, काम चलावे ॥ पुत्र बहु दोय, आज्ञा लोपे नहीं कोय, राज काजमांही जोय, हुक्म चलावे || मिलत ॥ भोली भेद समजे नहीं इनको भर्मी चंद तणी राणी ॥ १ ॥ कहे सासु सुनबात बहु एक विमलपुरी मकरध्वजभूप । पुत्री उनकी । प्रेमला लच्छी बहुत चतराई चूंप । सिंहपुरी नगरी सिंहस्थ राजा कनकधज कुंवर अतिरुप । आवे पर- णवा, आज आगी चालां देखन कौतूक अनूप || कहे गुणावली कोस अठारेसे किम चालू नृप छाने आज । वीरमतीने, रच्यो है विद्याबल सुधरे सब काज | शेर | बिना रुतु बिन अवसरे, वर्पने लागो मेहजी । विदा करी राजा कचेरी, गयो गुणावली घेरजी ॥ १ ॥ राजा आगे गुणावली, घणो रचयो परपंचजी । पण चतुर आगे केम चाले नारि कपटजो रंचजी ॥२॥छूट॥ तब चंदचतुर महाराज कपटमें सोवे । नारीको लेवा भेद पटन्तर जोवे ॥ उठ चली गुणावली सासु वाटड़ी जोवे । पीछेसे राजा उठकर लारां होवे । दौड़ ॥ कंभा कनेरकी मंगाय, ठपा तीन दिया जाय, नारी गई है छलाय, चंदनाहीं छलयो, करे सासु बहु बात, राजा सुने है साक्षातू, भेद पायो नरनाथ खरो जोग मिलियो । मिलत || सासु बहु दोय अम्बके उपर राजा कोचर बैठो छानी ॥ २ ॥ उडयो अम्ब आकाशमें चाल्यो राणी कौतुक दिखलावे । केई नगन्य जवरी, नदी नाला नग वन जौवत जावे || विमल पुरीके बाहर उतारी शहर. अन्दर दोनों जावे । पीछेसे राजा, धरी कर वाल हाय वह तुलसावे ॥ राजाको रोक "146 दिया दरवाजे चंद भूप कही बालावे । जबरनसे उनको । बनाया वीन्द कुंवर कही ठहरावे ॥ शेर ।। तोरनपर चढ आविया, निरखे सभी नरनारजी । अहो रुप घडियो विधाता, मानु है अवतारजी ॥ १॥ चवरयांके बीच विराजीया, गुणावली धरी सूतजी । सासुको कहे जो एंतो योपरणे थारो पूतजी ॥ ॥ छूट ॥ भोली तूं जाण सके केम वो आई । अणी चंद सरीखा केई जगत के माही ॥ हयलेयो छोड़ी परण मेहलमें आया । चौपड़को रमवा लागा रंगसवाया ॥ दोड़ । डाले पासा नर नाथ, मुख बोले ऐसी बात, चंद आभा पुरी जात, सोगटा लावे, दोय तीन वार, आभापुरीको विचार, राणी समजे नहीं लगार, जाणी भोले भावे ॥ मिटत ॥ फिकर पाछलो चंद भूपको चंचल चित्त राणी जाणी ॥ ३ ॥ चंद उठकर आवे बारणे हाथ पकड़ खेंचे राणी मत जावो मेली, कहो कई चूक पड़ी हमसे जानी ।। प्रथम समागम पहली रजनी केसरिया रुसन आणी । इम करे वीनती, आयो है हिंसक मंत्री दुःख दाणी ॥ चंद नीकाल कणकध्वजको भीतर मेल दियो ताणी । प्रेमलालच्छी नहीं कुछ वोल सकी लज्जा आणी ।। शेर ॥ राजा चंद उतावलो, बैठो जिहां तरु जायजी । पीछे से दोनुं जायके, चढ़ चाल्या गगनके मायजी ॥ १॥ आभापुरी उतरियो, विद्याबले बलवानजी । चंद राजा जाय. सूतो, मेहलके दरम्यानजी ॥ छूट || वीरमति सभी नगरीका लोग जगाया । गुणावली ने निज कंथको आन उठाया ॥ हाथों के मेंदी नैना काजल लागे । बहु जाय कहे सब सासुजी के आगे ॥ दौड़ ॥ मुज पिऊ विद्यावंत, देख्या सासुमें अतन्त, पिऊ परण्या धरी खंत, प्रेमला लच्छी ।। वीरमती तत्काल, हाथ लीनी - तलवार, चंद छातीपर सवार, चंडा चढ़ बैठी ॥ मिलत ॥ दुष्ट हमारा छेद देखतो आज तेग पाऊ पाणी ॥ ४ ॥ हाय जोड़ दश अंगुली मुखमें सासु अर्ज सुणों मेरी । बक्षी जे मुझको चूड़ो चूंदड राखो यारी जोरी ।। वीरमती जक वीरमंत्र भणी गले एक वांधी डोरी । राजाके ताई, कियो कुर्कट मेल्यो पिंजरपूरी । जतन करे राणी कुर्कटका दिन काढ़े दोरी सोरी । छातीके आगे, रखे घड़ी एक नहीं रहती कोरी, | शेर । अव सुणों हकीकत पाछली, प्रेमला तणी अवदातजी । वाट जोता नहीं आयो, गयो छोड मधरातजी ॥ १ ॥ कुप्टी सेजा जाय बैठो, कहे प्रेमलासे आयजी भूत्कार दीनों नहीं मान्यों, विष कन्या दी ठेरायजी ॥ २ ॥ छूट ॥ सुन मकरध्वज महाराज कोप भायो । कन्या वधवा के काज हुकम चढायो || जय मांड हकीकत वितक हाल सुनायो । रमतमें आभा चंदको नाम बतायो । दौड़ ॥ कहे राजा मंत्री बात, न धरो दोय रात, खबर करूं नरनाथ, होसी सांच स्वरो ॥ पाले श्रावक आचार, गिने नित्य नमोक्कार, मांड दिवी दान शाल, पता पूछा करो ॥ मि ॥ आभापुरीसे आई जोगनी नाम ठाम कहे निशाणी ॥ ५॥ आभापुरीमें शिव नट आयो राणी कुर्कट बक्षीस करे । शीवमाला पुत्री, पिंजरो सिरके उपर तोक्या फिरे ॥ दिवी भोलावण चला यहांसे गुणावली के नैन झरे । केई जीत्या भूपत, पोतनपुर लीलावतीके आया घरे ॥ विमलपुरी जहां अम्बको मेल्यो तिहां आय नट डेरा करे । सम्पती पाई, प्रेमला परण्योथोमैं इस नहारे ॥ शेर ॥ ताम्र चूड नट धरी आगे, मकर ध्वज महाराजजी । पूछ करता पतो पायो, आभा तणो सर ताजजी ॥ १ ॥ प्रेमला को सोप्यो पिंजर, तात मकर घज भूपजी । पुण्याई पूर्व पुत्री पारी होसी. मानव रुपजी ॥२॥ छूट । एक दिन प्रेमला शिवमाला गिरवर जावे । कुर्कट राजाने लेकर स्नान करावे । सोला वर्षकी आस आज, फल पावे | तूटो डोरो तब रुप भानु प्रगटावे ॥ दौड ।। मिटयो सकल जंजाल, हर्षया पणा नरनार, आया महेलके मुशार, महोत्सव खूब कयो, गुणावली गुणखान, प्यारी प्राणके समान लेख मेज्या परवान जाय आगे धो ॥ मिलत ॥ पिऊ नामकी बांची पत्रिका राणी तो हर्ष भराणी ॥ ६॥ पिछो पत्र पिऊ नामे लिखता उपर आसूं बूंदगीरे । निज महेला आवो, पिऊ परदेश रहया हो किसी तरे । वीरमतीको खबर पडी जब आई, चंडका खड्ग लियो । समली के रुपे, मारी दुष्टनको दूजो जन्म दीयो । सीख लेई आभापुर चाल्या बहु परवार लियो संगे। प्रेमला सेती ॥ पोतनपुर लीलावतीके घर रंगे ॥ शेर । मार्गमें केई भूप जीत्या, मनाई अपनी आणजी । परणी धरणी गिणत आई सातसो परिवारजी ॥१॥ आभापुरीमें आवीयो, हुओ घणों आनन्दजी । गुणावलीको जीव हर्षयो, जाने श्रीजिनन्दजी॥२॥ छूट । मिल्यो सर्व जोग संसार पुण्यफल पाया । इतने में तो जिनराज बीसमां आया । उपदेश सुणी बहु संगसु संयम लीनो। शिव अचलगतीमें वास चंदजी कीनों ॥दौड ॥ गायो चंदको सम्बन्ध, पाया हर्ष आनन्द, गुरुदेव जवाहीरचंद, जांकी कीर्ति घणी। संमत उगनीसे छप्पन, आसोज सुदी पुनम, हीरालाल धरी मन, बुधवार भणी ॥ मिलत ॥ शहर सादडी राज रजपूती श्रावक लोग बसे ज्ञाणो॥७॥ ॥ २४ ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी । शीष्य पानसे खंधक मुनीके क्षम्या करी में मुगति गया । जिन मार्ग में, जिनोंने जन्म सुधारी जस लिया ।
10 टेर ॥ देश कुणाला सावंती नगरी राजा जितशतरु राज्य करे। खंधक नामा, जिनोंके पुत्र महा पुण्यवंत सीरे । दया धर्म की बढ़ी आस्ता तीर्थंकर को ध्यान धरे । दिल में जीनके, संदेह नहीं कोई है किसी तरे ॥ पालक जाह्मण आयो सभा में नास्तिक वादी मत उच्चरे ॥ मिथ्या मतको, कियो है खंडन मानभंग हुवा गयो घरे ॥ खंधक कुवरने संयम लीधो मुनि सुवृत महाराज जीया ॥ जि ॥ १ ॥ अपनी बहेन समजावा कारण पूछे जिनवर से आई । आज्ञा मांगी, आप दो हुकम जिनेश्वर फरमाई, कुंभकार कठपुर जाता कठिन परिषो हय भाई ॥ तुम बिन टाली, अराधक होवेगा सब मुनिराई | कहे जिनेश्वर सुणों मुनीश्वर केवल ज्ञानी दरशाई ॥ आज्ञा लेकर, को है विहार वहांसे मुनिराई ।। आया बाग में सुनी शहर में नरनारी अमृत पिया.॥ जि ॥ २ ॥ पालक ब्राह्मण वोभी वहां था मुनीश्वर सेती द्वेश धरे ॥ राजा सेती, करी कैई उलट पुलट ऐसो काम करे ॥ राज लेनेको आयो आपको ऐसी जचाई चित्त परे । नदी विच में, घाल हथियार दिखाया इसी तरे । राजा रुठ कहे मुख से ऐसी तुम चित्त चाहै सोही करे । जंत्री में पिलाया, मुनिराज तो पंडित मरण मरे ॥ नारसौ नव्यानवे चढता भावा मोक्ष कीर्तको कायम किया ॥ ३ ॥ अल्प उमर एक मुनि की देख कहा; उस पापीने नहीं मानी। जव कियो निहाणों, क्रोध में कुछ नहीं सूझे अन्ध प्रानी, डंडाकार देश सभीसे लेऊ बदलो ऐसी आनी | अगनकुमर में, हुघा है देवता जाके अमिमानी । रुधिर खरडी मुख वस्त्रिका ले उड़ा · पक्षी आमिष जानी । महेला उपर पड़ी जब वेनडी देख के मुर्छानी ।। हुई सचेतन खबर करी है पालक दुष्ट ने ऐसा किया ||४|| ज्ञान देखकर आयो देवता बाईने संयम लीनो । सम्मो सरण में, मेलदी उपसम रस अमृत पिनोः। अनल वे करे करी लगाई देश सभी भस्म किनो । एक नर पापी, देखलो बहुत पुरुष दुख दीनो । मुनिराज तो धर्म क्षम्या करीने अपना कारज सिद्ध किनो, हीरालाल कहे यूं, मुनियोंने आत्मगुण पहिचान लिनो, शहेर जावरे गाई लावणी सतगुरु चरणे चित्त दीनो ॥ ५ ॥ ॥ २५ ॥ सती चंदनवाला चरित्र ॥ लावणी चाल:-द्रौण ॥ या चंपानगरी दधीवाहन नृपपुत्री ।। महाराज रुपमें ज्यों इन्द्राणीजी ॥ हुई, महावीरजी की आप शिष्यनी प्रथम वखाणीजी ॥ टेर ॥ यो कोसंबी नगरीको राजा चढकर आयो । महाराज, भूपके हुई लड़ाईजी । तब दधी- वाहन नृप हार गयों जब लूट मचाईजी ॥ एक दुष्ट नर चढ गयो महलके मांहीं ॥ महाराज, पुत्रीयां छिपकर वैठीजी ।. देखी रूप अनोपम अतुल्य पकडकर ले गयो सेंठीजी ।। यह किया बचन कठोर विषयकी वाणी ॥ महा-|| राज, राणीजी दिल घबराणीजी ! हुई ॥ १ ॥ यह सील भंग भय रानीजी जाणी ॥ महाराज, तवही संथारो कीधोजी ॥ फिर काटी दांतसे जीभ्या देवगतिवासो लीधोजी ॥ यों देखके दिल घबरानी चंदनवाला ।। महाराज, पुत्रियां ढलगई धरणीजी ॥ फिर किया रुदन विलाप कहां गई मेरी जननीजी ।। तस दी धैर्य घर पायक अपने लायो । महाराज, नारियां कलह करानीजी ॥ हुई ॥ २ ॥ वो बेचन चला बजार राज रंभाको ।। महाराज लक्ष सौनये देवारीजी ॥ एक वैश्या ले चली मोल, सासन देव विप्तीटारीजी ॥ कोई सेठजी ले गया मोल पुत्री कर राखी ।। महाराज सेठानी जंग मचायोजी ॥ म्हारे छाती उपर शोक सेठ या मोल ले आयोजी || एकदिन देख अवसर {डियो मायो । महाराज, लोहमयी धन बान्धीजी ॥ हुई ॥ ३ ॥ या दी भोयरा में डाल तालो जब सेंठो ॥ महाराज, तीन दिन तेलो ठायोजी ॥ फिर आया सेठ तत्काल सतीको कष्ट मिटायोजी ॥ यह खूणे छाजले उडद वाकला लीधा ।। महाराज, देहली उपर बैठीजी ॥ फेर भावे भावना चित्त, संत कोई आवे तो लेसीजी । श्री महावीर महाराज अभिग्रह कीधो ॥ महाराज, जोग मिल्या ले अन्न पानीजी ॥ हुई ॥ ४ ॥ यह सिद्धार्थ नंद आनन्द आवता देख्या ॥ महाराज रोमांचित हिये हुलशानीजी ॥ धन्य घडी धन्य भाग आज घर जहाज आनीजी ॥ एक बोल घट तो जानके पाछा फिरीया ॥ महाराज, नैन में नीर न पावेजी ॥ फिरगया दीन दयाळ सती के अनु आवेजी ॥ जई लियो पारनो हुई रत्न की वर्षा ॥ महाराज, दुदग्भी देव बजाईजी ॥ हुई ॥ ५ ॥ या बात सुनी बाई मूलां दोडकर आवे ॥ महाराज, रत्न कोई ले नहीं जावेजी ॥ थाने कीधो यो उपकार सती मुख यों फरमावेजी ॥ जब वीर जिनेश्वर केवल ज्ञानज पाया ॥ महाराज, सती पण संयम लीधोजी ॥ हुई छत्रीस सहस्र की गुरुणी वास मुक्ति में कीधोजी ॥ यह उन्नीसो त्रेसठ नीमच के माही ॥ महाराज आसोज सुदी पूनम चंदा जी ॥ गायो सती तणो सम्बन्ध दिनोदिन है आनन्दाजी ॥ श्रीजवाहिरलालजी महाराज धर्म दीपायो । महाराज, हीरालाल विधन हटानीजी ॥ हुई ॥ ६ ॥ ॥ २६ ॥ मानतुंग मानवंती की लावणी, चाला-द्रौण ॥. यह एवंती देश उज्जनी नामें नगरी । महाराज, मानतुंग महीपाल कहवानाजी । त्रिया की जालका फंद काम अंधभोग ठगानाजी ॥ टेर ॥ एक दिन भूप रजनी का मौका देखी । महाराज, शहर में फिर वो चलके जी ॥ चार चतुर कन्या मिल बातां करे हिलमिलकेजी ॥ आपा रमां आज की रात ब्याव मंडे कलकोजी ।। महा- राज, सासरे बासज लेनोजी ॥ यह सासू सुसरा जेठ पतिका कहने में रहनोजी ।। दोहा ।। मानपति एक शेठ की, पुत्री चतुर सुजान || कला चौसट जानेसही, अमर रुप इशान ।। १ ।। जो परणों प्रीतम भनी, वरतातूं मुश आन । चार बोल पूरा करुं, तो मानवती मुझ मान ॥ २ ॥ छूट ॥ चरणोदक पावू वृषभ रुप असवारी । करे ऐंठो भोजन सहे सो सो गाली हमारी ॥ यह सुनी बात राजाने दिल में धारी ॥ इसकू मैं पर' देखू सभी होशियारी ॥ मिलत ॥ फिर आय राजा प्रधान को तुरत बुलाया । महाराज, ब्यावकर रंग बधानाजी ॥ त्रिया ।। ॥ १ ॥ एक स्तंभ आवास वास कर मेली । महाराज, भूप कहे तूं मुज नारीजी ॥ थारा बोल्या बोल संभार याद कर बात तूं थारीजी || मत छेड़ो नार नृपति छेह नहीं लीजे ॥ महाराज, कागज लिख दीनो डारीजी ॥ मेरे संकट को कर दूर बाप मैं बेटी तुमारी जी ॥ दोहा ॥कारागीर बुलायने, सुरंग खोदायो एक । मानवतीका महेल में, दाखल हुवा सो देख ॥ १॥ आवे जावे बाप घर, करी जोगन को भेखें । राग अलापे शहर में, नर मिल देखे अनेक ॥ २ ॥ छूट ॥ या खबर शहर में हुई जाय राजा को । बुलायो जोगन सुनावो गाना हमको ॥ पांव जोडिया हाथ शरम नहीं उनको । हो गया रागवश फिरे मृग ज्यों वनको ॥ मिलत ॥ राजा को वश करलिया सुनावे गाली । महाराज, कपट से. भूप छलानाजी ॥ त्रिया ॥ २ ॥ एकदल स्यंभन की पुत्री रत्नवती नामा ।
जगह- महाराज, मानतुंग परणवा जावेजी । जब कहे जोगनसे चलो आप बिन नहीं सुहावेजी ॥ तब कहे जोगन क्या प्रिती तुमसे हमको । महाराज, राजा कछु एक न मानी जी। ले चल्यो जोगन को संग राजा मह बात न जानी जी || दोहा ॥ मार्ग जाता विपिन में, जोगन गई तिणवार । रुप करी कुँवरी तणो, हांचे अम्बा डार ॥ १ ॥ बहुत देर हुवा थकां, सोधन चाल्यो महिपाल । सर वर पाल सहकारने, झूले राज कुंवार ॥ २ ॥ ॥ राजा रुप देख कन्याको विषय ललचायो । भूल गयो जोगन को ध्यान इसीको ध्यायो ।। सब हाल नृप व्यावको ढंग ठहरायो । पीवे चरणोदत, बैल बनन कोल करायो ॥ मिलत । जब कियो व्याव राजा फिर आगे भ्यायो । महाराज, फिरवो जोगन की मायाजी ॥ त्रिया ॥ ३ ॥ अब आया शहर पाटन जोगन इम बोले । महाराज, हमें कुछ शरम जो आतीजी ॥ तुम परणों राजकुँवार हम वनवासको जातीजी ॥ यों करी छन. रत्नवती वो पास पहुंची । महाराज, कपटसे कोई नहीं लाजेजी ॥ कहे मानतुंगकी दासी आई तुम मिलनके काजेजी ॥ दोहा । परण्यो राजा हर्षसे, आयो आपके ठाम । रस्नवती की गुरुणी हुई, दियो राजाकोआराम ॥१॥ षट मास लग राखियो, ऐंठो खवायो कसार । गर्भधों सुख भोगतां, निपट कपटकी जार ॥ २ ॥ छूट । जब लीवी सेलाणी सब बोल हुवा है पूरा । पियु पहेलां पहुंची नगरी उज्जैनी सनूग । आई पिता आपके घर महल सनूरा । करो महोत्सव सवही प्रगट बताया पूरा || मिलत ॥ एक कागज लिखकर नृप नामें दूत पठाया । महाराज, हाल सब मांड सुनायाजी ।। त्रिया ॥ ४ ॥ यों वांची पत्र राजाको रोश भराया । महाराज, दुष्ट दुर्बुद्धि नारीजी ।। या लोक हंसावन वात करी या जगत् मझारीजी ॥ कहां गई जोगनी कहां रत्नवती की गुरुपी ॥ महाराज, सती प्रपंच लखानाजी ॥ जब ली सीख नरनाथ आया निज आप ठिकानेजी ॥ दोहा || राजा मानवती मिल्या, कहे कुलक्षणी नार ॥ गर्भ धोको पुरुषको, थें हंसायो संसार ॥ १ ॥ सेलाणी आगे धरी, या मुद्रिका यो हार । जोगन कन्या गुरुणी हुई, यह कृत मुज भूपाल ॥२॥ छूट ॥ राजमें हुवो आनंद महोत्सव जो कीधो । मानवती के जन्म्यो पुत्र नामज दीधो ॥ राजाराणी संयम · ले स्वर्गको रस्तो लीधो। श्री जवाहिर लालजी महाराज, सूत्र रस पीधो ॥ मिलत ॥ यह उन्नीसो पैंसठ रस्नपुरी मांही ॥ महाराज हीरालाल आनन्दे गायाजी ॥ त्रिया ॥ ५ ॥ ॥ २७ ॥ एलचीपुत्र चरित्र ॥ लावणी, चाला-द्रोण ॥ या पूर्व जन्मकी प्रीति रीतिया देखो । महाराज, मोहकर्म सांग बनायोजी ॥ धन दत्त सेठको पूत नटवीको देख ललचायोजी ॥ टेर ॥ इम कहे सेठजी पुत्रको यों समझावे । महाराज और परणादूं नारीजी ॥ मत जावो नटके संग मानलो कहीन हमारीजी ॥ यह कुंवर कबुल नहीं करे सेठकी वाणी । महाराज, सेठ नट पासे आवेजी || तुम पुत्रीको परणाय पुत्र मेरे मन भावेजी ॥ जब कहे नट घर रहे जमाई आई । महाराज, विद्या सबही सिखलाऊजी ॥ धन ॥ १ ॥ जब कहे सेठ या बात पुत्र नहीं कीजे । महाराज, कुलको लांछन लागेजी ॥ नहीं मानी सेठकी बात उठकर होगया आगेजी ॥ यों कियो नटको स्वांग ढोल बजावे । महाराज, विद्यामें हुवो प्रवीनाजी ॥ बारह वर्ष हुवा नटसंग रहे शठ रंगमें भीनाजी ॥ एक शहर जबर जो देख ख्याल रचायो । महाराज, वंश चढ़ बाजा बजायाजी ॥ धन ॥ २ ॥ यह देख रह्या सब लोक ख्याल खिलकतको । महाराज, भूपकी नजरां आईजी ॥ नटवी रुपका कूपमें भूप चित्त गया लोभाईजी ॥ नहीं देवू दान गिर पडे नट जो आई । महाराज, नारीने लेस्यूं परणीजी । ऐसी राजा विचारी बात कर्मगती कैसी करणीजी || नट मांगे दानं नृप घात विचारे उनकी । महाराज, त्रियासे जग भरमायाजी ॥ धन ॥ ३ ॥ एक मुनिराज महाराज गौचरी आया । महाराज, नटके नजरां पडियाजी। धन्य २ मुनि संसार त्याग फिर पार उतरियाजी ॥ यों भाई भावना कर्मोंका वृन्द उड़ाया । महाराज, ज्ञान केवल पद पायाजी ॥ यह राजादिक सब लोक ज्ञानसुन घणा सुलटायाजी ॥ श्रीरत्नचंद्रजी महारान विश्ववदिता । महाराज, जवाहिरलालजा यशवंताजी । यां को भाग बड़ो बलवंत वधे पुण्यवेल अनंताजी ॥ यह उन्नी । त्रेसठ नीमचके मांही । महाराज, हीरालाल यह गुण गायाजी ॥ ४ ॥ ॥ २८ ॥ लावणी, चालः-लंगडी ।। पंचेन्द्रिका झगड़ा सुनलो, समझवान समझो सारी । एक एकसे अधिक वो आपसमें लड़ती न्यारी | टेर ।। भुत इन्द्रि पहिले यों बोली मैं हुँ सबमें अगवानी, ध्यान लगाके, कानोंसे सुनती हुँ मैं जिनवानी । छे राग और छत्तीस रागनी लेती सबकों पहेचानी, मेरे जरिये, केई को तार दिया भवजल प्राणी ॥ शेर ।। गौतम सुधर्मा आदलेई, धन्ना मेघ कुमारजी । गजसुखमाल जम्बु खामी, त्यागी आठों नारजी ॥ १ ॥ इत्यादिक मुनिवर घणा, सुण २ हुवा अणगारजी । संसाररूपी माया त्यागी, ये मेरा उपगारजी ॥ २॥ छूट ॥ श्रेणिकको समकित
सुणिया सेती आई, परदेशी राजाको दिया आप समझाई, आगंदादिक दश श्रायग हुवा है भाई, श्रुतज्ञान भणेया
श्रुत इन्द्रिचित लाई ।। मिलत ॥ केई स्वर्ग केई मोक्षगति में पहुँचाया हुँ उपकारी || एक एक ॥ १ ।। हग इन्द्रि
उठकर यों बोली, सुन श्रोता एक मेरी बात, ये दुश्मन तुम्हारा, रागवस पडियां मृगकी होती घात । असीपंक
सह नैत्र कहावे, दीपक सूर्य तेज साक्षात, नैत्र प्रभावे, सभीकों मालुम होती दिन और रात । शेर ।। देवानंदा
ब्राह्मणीने, वंद्या श्री महावीरजी । नैन देखी पानो चढियो, पूछे गौतम गुणधीरजी ।। १॥ देवकी दर्शन पाई,
समोशरण, षट्पुत्रजी । नेम संशय टालियो, अधिकार है यो सूत्रनी ॥ २ ॥ छूट । अरिहंतके दर्शन करूंतो मैं
नैननसे, प्रसन्न होवे मित्र देख नैननसे, गौतमको खंधक मिले तो वो नैननसे, जीवोंकी रक्षा करूँ तो मैं नैनन
से ॥ मिलत ॥ मृगापुत्र साधुको देखी ले, जातिस्मरण सुखकारी ॥ एक एक से ॥२॥ सुण श्रोता हग इन्द्रि
दोनों, मैं हूँ सबमें ऊँचो नाक, मेरे कारण खलक में करते नाम हजारों लाख ॥ रामचन्द्रजीने सीता सतीको
धीज कराई सब ही के साख ॥ दशारण भद्रजी, इन्द्रको पांव लगाकर होगया पाक ॥ शेर ।। बाहुबली मुनिराजने
राखी प्रतिज्ञा एकजी ॥ केवल लेई समोशरण आया, कयो आदिनाथ यो देखजी ॥ १ ॥ स्थूलभद्र वेश्या घरे
राखी अपनी टेकजी ।। बात ऊंची रखने कारण, पुंडरिक पेहन्यो भेखजी ॥ २॥ छूट || केई साधु सतियों में
पडा कष्ट जो आई । अपने सत्य शीलमें रहे दृढ़ता लाई ।। मैं रखी केईकी बात कहुँ कहाँ ताई । ऊँचो हो बोले
नाक सभाके माई ।। मिलत । नाक नमन करे मुनि चरणों में उन पुरुषों को बलिहारी । एक एकसे ॥ ३ ॥
मजायाजी ॥ धन ॥ २ ॥ यह देख रह्या सब लोक ख्याल खिलकतको । महाराज, भूपकी नजरां आईजी ।। नटवी रुपका कूपमें भूप चित्त गया लोभाईजी ॥ नहीं देवू दान गिर पडे नट जो आई । महाराज, नारीने लेस्यूं परणीजी। ऐसी राजा विचारी बात कर्मगती कैसी करणीजी ॥ नट मांगे दान नृप घात विचारे उनकी । महाराज, त्रियासे जग भरमायाजी ॥ धन ॥ ३ ॥ एक मुनिराज महाराज गौचरी आया । महाराज, नटके नजरां पड़ियाजी। धन्य २ मुनि संसार त्याग फिर पार उतरियाजी ॥ यों भाई भावना कोका बन्द उड़ाया । महाराज, ज्ञान केवल पद पायाजी ॥ यह राजादिक सब लोक ज्ञानसुन घणा सुलटायाजी | श्रीरत्नचंद्रजी महाराज विश्ववदिता । महाराज, जवाहिरलालजा यशवंताजी । यां को भाग बड़ो बलवंत वधे पुण्यवेल अनंताजी ॥ यह उन्नीले । त्रेसठ नीमचके मांही । महाराज, हीरालाल यह गुण गायाजी ॥ ४ ॥ ॥ २८ ॥ लावणी, चाल:-लंगडी ॥ पंचेन्द्रिका झगड़ा सुनलो, समशवान समझो सारी । एक एकसे अधिक वो आपसमें लड़ती न्यारी ।। टेर ।। श्रुत इन्द्रि पहिले यों बोली मैं हुँ सबमें अगवानी, ध्यान लगाके, कानोंसे सुनती हुँ मैं जिनवानी । छे राग और छत्तीस रागनी लेती सबकों पहेचानी, मेरे जरिये, केई को तार दिया भवजल प्राणी ॥ शेर ॥ गौतम सुधर्मा आदलेई, धन्ना मेघ कुमारजी । गजसुखमाल जम्बु स्वामी, त्यागी आठों नारजी ॥ १ ॥ इत्यादिक मुनिवर घणा, सुण २ हुया अणगारजी । संसाररूपी माया त्यागी, ये मेरा उपगारजी ॥ २ ॥ छूट ॥ श्रेणिकको समकित 张黎黎黎路路器影路線器哪器 602 मुणिया सेती आई, परदेशी राजाकों दिया आप समझाई, आगंदादिक दश श्रायग हुवा है भाई, श्रुतज्ञान भणेया श्रुत इन्द्रिचित लाई ॥ मिलत ॥ केई स्वर्ग केई मोक्षगति में पहुँचाया हुँ उपकारी ॥ एक एक ॥ १ ॥ दृग इन्द्रि उठकर यों बोली, सुन श्रोता एक मेरी बात, ये दुश्मन तुम्हारा, रागवस पडियां मृगकी होती घात । असीपंक सह नैत्र कहावे, दीपक सूर्य तेज साक्षात, नैत्र प्रभावे, सभीकों मालुम होती दिन और रात ॥ शेर ॥ देवानंदा ब्राह्मणीने, वंद्या श्री महावीरजी । नैन देखी पानो चढियो, पूछे गौतम गुणधीरजी ॥ १ ॥ देवकी दर्शन पाई, समोशरण, षट्पुत्रजी । नेम संशय टालियो, अधिकार है यो सूत्रजी ॥ २ ॥ छूट ॥ अरिहंतके दर्शन करूंतो में नैननसे, प्रसन्न होवे मित्र देख नैननसे, गौतमको खंधक मिले तो वो नैननसे, जीवोंकी रक्षा करूँ तो मैं नैनन ! से ॥ मिलत । मृगापुत्र साधुको देखी ले, जातिस्मरण सुखकारी । एक एक से ॥ २ ॥ सुण श्रोता दृग इन्द्रि दोनों, मैं हुँ सबमें ऊँचो नाक, मेरे कारण खलक में करते नाम हजारों लाख ॥ रामचन्द्रजीने सीता सतीको धीज कराई सत्र ही के साख ॥ दशारण भद्रजी, इन्द्रको पांव लगाकर होगया पाक ।। शेर ।। बाहुबली मुनिराजने । राखी प्रतिज्ञा एकजी ॥ केवल लेई समोशरण आया, कयो आदिनाथ यो देखजी ॥ १॥ स्थूलभद्र वेश्या घरे यूँ राखी अपनी टेकजी ॥ बात ऊंची रखने कारण, पुंडरिक पेहन्यो भेखजी ॥ २ ॥ छूट ॥ केई साधु सतियों में पडा कष्ट जो आई । अपने सत्य शीलमें रहे दृढ़ता लाई ।। मैं रखी केईकी बात कहुँ कहाँ ताई । ऊँचो हो बोले नाक सभाके माई ॥ मिलत । नाक नमन करे मुनि चरणों में उन पुरुषों को बलिहारी ॥ एक एकसे ॥ ३ ॥ - रस इन्द्रि कहे सुनो सभी तुम, मैं हूं सबही में बहत्तर । पेरायत मेरे, रहती हो मैं रहती घरके भीतर । सूका लूखा के टुकडा खाकर बैठ रहती करके सबर, गुणवानोंका, गुण मैं गाती हूँ जो है जबर | शेर ॥ सूत्र भणु सज्जा करूं देती धर्म-उपदेशजी । अज्ञानीको ज्ञान देकर । करूँ ज्ञानमें परवेशजी ॥ १॥ चारोंका सिणगार त्यारी। मैंही कराती आपजी । कौन पूछे बात तुमकों, बैठ रहो चुपचापजी ॥ २ ॥ छूट || सब षट्रसकी पहेचान मैंही जे करती, शीतल मीठा वयण अमृत रसझरती । प्रश्नोत्तर मैं करूं भजन भज रहेती, सन्मान सभामें करूं बराबर सेती ॥ मिलत ॥ काज सुधारयां केई जीवोंका, न्याय किया मैं निस्तारी ॥ एकएकसे ॥ ४ ॥ फर्श इन्द्रियों कहे पांचमी, देखो मेरी क्या करणी, मैं करूं तपस्या, पूर्व जो पातक की मैं हुँ हरणी । पुरुषाकार प्राक्रम सब मेरा, त्यागुं चोषठ हजार परणी; ब्रह्मचर्यको, धार कर महाव्रत पार्टी कठिन करणी ॥ शेर ।। दुश्मनोंको जीतने को मैं हुँ आगेवानजी । हाथ ऊँचो कर आपुं, दान और सन्मानजी ॥ १ ॥ इस कायासे पैदा हुवे, बड़े २ बलवानजी । सहे परिषा कायासेती, रहे अडोल धर ध्यानजी ॥ २ ॥ छूट ॥ काया बिन कारज सिद्ध गति नहीं पावे, पर अपनी कीर्ति सबही गावे, पांचो इन्द्रि पुण्य जोगसे निर्मल पावे, गुरु जवाहिरलालजी महाराजको शीश नमावे ॥ मिळत ।। हीरालाल कहे पांचों मिलके, मोक्ष नगरकी करो त्यारी ॥ ५ ॥ ।। २९ ॥ लावणी चालः-लंगडी ॥ कृष्णमुरारी महाजस धारी तीन खंड सिर छत्र धरे, धात्रीखंडमें जाय द्रोपतां लाई सोंपी निज भ्रात घरे ॥टेर।। h
पांडवराजा राज करत हैं, हस्तिनापुर लीलाकारी; पांच पुत्र बलप्राक्रम पूरा, द्रोपतां जिनके घरनारी, अर्जुन भीम
और निष्कलंकजी, सहदेव साताकारी, युधिष्ठरजी बढ़ा सभीमें आपण कहिये मुखत्यारी । इन पांच जनोंकी माता
कुंया भुवा काहिये मुरारी, आठ जणा मिल अपना भवन में बैठरया सल्लाधारी ॥ चौपाई ।। अणी अवसरमें नारद
आया, राजा राणी सभी शीश नमाया; बैठो ऋषि मृगछाल बिछाया, नारद मनमें बहु सुख पाया ॥ मिलत ॥ नहीं
दिया आदर जान अव्रती द्रोपतां मनमें मून धरे ।। धात्रीखंड ॥ १॥ कियो विचार नारदजी मनमें रूप योवनको
गर्व घणो, जिनसे इसने नहीं कियो मेरो आव और आदरपणों; अमर कंखा धात्रीखंडमें राज तिहां पद्मोतर तणो,
सातसे अंतेवर लेकर बैठा आयो नारद तिणवार खरो । पूछे राजा कहांभी देखा मेरे सरीखा रावणो, पंच भरतारी
नारी द्रौपदी कियो वखाण सब अंगतणो ॥ चौपाई ॥ जदराजा मन ऐसी विचारी, उनको मंगाकर करूं घरनारी,
तेलो कर स्मरण दृढधारी, आयो देवता हुई इंसियारी || मिलत | कही बात सब अपना मनकी वार वार सुर मना
करे ॥ धात्रीखंड ॥ २॥ काम अंध माने नहीं कहेनो, किया प्रमाणे काम करे; सूती द्रोपतां सुखभर सेज्जा युधि-
ष्ठरके महेल परे । पलंग उठाई धयो बागमें, सुर चेताई गयो घरे, जागी द्रोपतां चउदिस जोवे मनमें एसो भरम
परे । राजा अंतेवर लेकर आयो, वचन कठिन मुखसे उचरे; सुख भोगवो संग हमारे मैं मंगाई इसी तरे ॥
॥ चौपाई ॥ षट मासा लग माफ करोजी, इतनां में कोई आवे खरोजी; तो तुम सारी मानीलोजी, मेली
महल में सुखसे रहोजी ॥ मिलत ॥ बेले वेले करे पारणा आमल लखो आहार करे ॥ धात्रीखंड ॥ ३ ॥
पांडव राजा खबर करी पर पता कहीं भी नहीं पाया, कुंथाजी को भेजी द्वारका वासुदेव पासे आया। दीनी खबर पीछी नारदजी, कारज सिद्ध हुवा मन चाया; दोनों तरफ से हुई चढ़ाई ले लशकर गंगातट आया । लणसठी देवता को तेलोकर स्मरण मन में धाया, आयो देवता कहे कर जोड़ी, हुकम करो थे महाराया ॥ चौपाई ॥ धात्री- खण्ड से द्रोपतां लानी, मारग दो समुद्र को पानी, कहे देवता ऐसी वानी, हाजर करूं मैं द्रोपतां रानी ॥ मिलत ॥ अमरकंखा को उलटी कर, राजा सवही डूब मरे । धात्री खंड ॥ ४ ॥ कहे नारायण सुनो अमर थे कहो जैसी ही है वाणी, वचन हमारा दिया भुवा कों जिससे मुजको है लानी, खटरथ और सात जनो का छिन में उतार दिया पानी, आय पहुंचा है अमर कंखा को दूत पेश किया अगवानी । राजा चढ़कर आया सामने पांडव से हुवा समराणी, हुवा झडाका काटी पताका हार गया पांचों प्राणी ॥ चोपाई ॥ पांडव पांचों जाय भागा, आय हरि के पांवा लागा, दीनी धीरज बैठो इस जागां, वैरी जीत तोई जिम तागा ॥ मिलत ॥ तुरी जोत रथ हांक दिया है, वैयोंके सन्मुख आन खरे ॥ धात्रीखंड ॥ ५ ॥ पंचायण संख लेई हाथ में मुख से ऐसा शब्द किया, तीजा भाग की, सैन्याभागी राजा रणमें खडा रया । धनुष चढ़ाई टंकार बजाई अम्मर में अचरज भया, शुभट पग छुटा जाय अपुठा राजा गढ़का शरण लिया । वेक्रेरूप नरसिंघ बनाई, पग पटकी अगराज किया, महेल झरोखा कोट कांगरा धडडड धडडड गिरी गया ॥ चोपाई ॥ राजा सती के शरणे आई, हाथ जोडके कहे तूं मेरी माई; अब तो मुजको लेवो वचाई, कहे द्रोपता अब तो योई ॥ मिलत ॥ उत्तम पुरुष है वासुदेवजी नहीं मारे जो कोई ॥
पांव परे ॥ धात्रीखंड ॥ ६ ॥ गीला कपडा पहेन भेटनो लेई द्रोपतां आगे करी, पूठे राण्या मंगल गावे इस
विध हरि के पावा परी । लेई द्रोपतां सोंपी भायाँ ने । रथ जोती ने चाल्या हरि, इसी खंडका वासुदेवने संख
सनने मिलनी करी । पद्मोत्तरको दिया निकाली पुत्र उसी को राजधरी, देखो मूरख ने खता जो खाया अपयश
लिया बांह भरी ॥ चोपाई ॥ धात्री खंड से द्रोपतां लाया, मारग उतरतां भागीरथकेवाया; पुण्यवंत का यश
सवाया, हिरालाल कहे सबही में गाया ॥ मिलत ॥ शहर जावरे महाराज विराज्या नरनारी सब भक्ति करे ॥
धात्रीखंड ॥ ७ ॥
॥ ३० ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ॥
पांडव पांचों संयम लेकर त्याग दियो सब संसारी, सती द्रोपती पति के संग हुई है व्रतधारी ॥ टेर ॥
पांडु मथुरा वसी है नगरी हरिके वचने वास किया, समुद्र किनारे, पाण्डव जाय वहां का राज लिया । राज
लीला सुख भोग भोगवे, पूर्व सुकत जो दान दिया, शत्रु को जीते; आप ही इन्द्र सदृश पद पाय रया ॥ शेर ।।
एक दिन के अवसरे, आया वहां मुनिराजजी । दरशन करते साधका, सुधरे तो सगला काजजी ॥ २ ॥ पांडव ||
पांचो वन्दने, गए बहु नरनारजी । उपदेश मुनिको सांभली, लिना हृदयमें धारजी ॥ २ ॥ मुनिराज सुणावे दया
भाव कर वानी, यो नरभव को अवतार मिल्यो है आनी, मिलना दशबोल का दुर्लभ लोतुम जानी । कर धर्म ध्यान
तुम सफल करो-जीदगानी ॥ मिलत ॥ हाथ जोडके अरज करत हैं, त्यागां गृहे पूछी नारी ॥ सती द्रोपती ॥२॥
पांडव राजा खबर करी पर पता कहीं भी नहीं पाया, कुंपाजी को भेजी द्वारका वासुदेव पासे आया। दीनी खबर पीछी नारदजी, कारज सिद्ध हुवा मन चाया; दोनों तरफ से हुई चढाई ले लशकर गंगातट आया। लणसठी देवता को तेलोकर स्मरण मन में धाया, आयो देवता कहे कर जोड़ी, हुकम करो थे महाराया ॥ चौपाई ॥ धात्री- खण्ड से द्रोपता लानी, मारग दो समुद्र को पानी, कहे देवता ऐसी वानी, हाजर करूं मैं द्रोपतां रानी ॥ मिलत ॥ अमरकंखा को उलटी कर, राजा सवही डूब मरे ।। धात्री खंड ॥ ४ ॥ कहे नारायण सुनो अमर थे कहो जैसी ही है बाणी, वचन हमारा दिया भुवा कों जिससे मुजको है लानी, खटरय और सात जनो का छिन में उतार दिया पानी, आय पहुंचा है अमर कंखा को दूत पेश किया अगवानी । राजा चढ़कर आया सामने पांडव से हुवा समराणी, हुवा झडाका काटी पताका हार गया पांचों प्राणी ॥ चोपाई ॥ पांडव पांचों जाय भागा, आय हरि के पांवा लागा, दीनी धीरज वैठो इस जागां, वैरी जीत तोडूं जिम तागा ॥ मिलत ।। तुरी जोत रथ हांक दिया है, वैयोंके सन्मुख आन खरे ।। धात्रीखंड ।। ५ ।। पंचायण संख लेई हाथ में मुख से ऐसा शब्द किया, तीजा भाग की, सैन्याभागी राजा रणमें खडा रया । धनुष चढ़ाई टंकार बजाई अम्मर में अचरज भया, शुभट पग छुटा जाय अपुठा राजा गढ़का शरण लिया । वेकेरूप नरसिंघ बनाई, पग पटकी अगराज किया, महेल झरोखा कोट कांगरा धडडड धडडड गिरी गया ॥ चोपाई ॥ राजा सती के शरणे आई, हाथ जोडके कहे तूं मेरी माई; अब तो मुजको लेबो बचाई, कहे द्रोपता अब तो योई ॥ मिलत ॥ उत्तम पुरुष है वासुदेवजी नहीं मारे जो कोई
पांव परे । धात्रीखंड ॥ ६ ॥ गीला कपडा पहेन भेटनो लेई द्रोपतां आगे करी, पूठे राण्या मंगल गावे इस
विध हरि के पावां परी । लेई द्रोपतां सोंपी भायाँ ने । रथ जोती ने चाल्या हरि, इसी खंडका वासुदेवने संख
मनने मिलनी करी । पद्मोत्तरको दिया निकाली पुत्र उसी को राजधरी, देखो मूरख ने खता जो खाया अपयश
लिया बांह भरी ॥ चोपाई ।। धात्री खंड से द्रोपतां लाया, मारग उतरतां भागीरत्यकेवाया; पुण्यवंत का यश
सवाया, हिरालाल कहे सबही में गाया ।। मिलत ॥ शहर जावरे महाराज विराज्या नरनारी सब भक्ति करे ॥
धात्रीखंड ॥ ७॥
॥ ३० ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी।
पांडव पांचों संयम लेकर त्याग दियो सब संसारी, सती द्रोपती पति के संग हुई है व्रतधारी ॥ टेर ।
पांडु मथुरा वसी है नगरी हरिके वचने वास किया, समुद्र किनारे, पाण्डव जाय वहां का राज लिया । राज
लीला सुख भोग भोगवे, पूर्व सुक्रत जो दान दिया, शत्रु को जीते; आप ही इन्द्र सदृश पद पाय रया ॥ शेर ।
एक दिन के अवसरे, आया वहां मुनिराजजी । दरशन करते साधका, सुधरे तो सगला काजजी ॥ २ ॥ पांडय और
पांचो वन्दने, गए बहु नरनारजी । उपदेश मुनिको सांभली, लिना हृदयमें धारजी ॥ २ ॥ मुनिराज सुणावे दया
भाव कर वानी, यो नरभव को अवतार मिल्यो है आनी, मिलना दशबोल का दुर्लभ लोतुम जानी । कर धर्म ध्यान
तुम सफल करो जींदगानी ॥ मिलत ॥ हाथ जोडके अरज करत हैं, त्यागां गृहे पूछी नारी ॥ सती द्रोपती ॥ २ ॥
। महेलोंमें आके पूछे भार्यासे हमको तो संयम लेना, त्यागन करना, कहोजी भाव तुम्हारा कह देना । प्रीतमसे जब कहे भाऱ्या, हमको भी गृह नहीं रहेना, संयम लेना, पिउजी यही हमारा है कहना ॥ शेर ॥ पुत्र महा पुण्यवन्त को, दीनो है राज बैठायजी । षट् प्राणी व्रत लीना, भावसे मन लायजी ॥ १ ॥ मास मास खमण का तप करे, एकाग्र चित को लायजी । चारित्र पाले निर्मला, विचरे भूमण्डल मांयजी ॥२॥ छूट ।। मुनिराज पांचों ने एसी मन धारी, नेमनाथ दर्शकी कोड़ २ बलिहारी । कर मत्तो मनमें चले उग्र विहारी । लग रही चरणमें चाय नेम चरणारी ॥ मिलत ॥ हस्त सिखर पुर आया मुनीश्वर, करज्ञान बहु उपगारी ॥ सती द्रोपता ॥ २ ॥ मास खमन का आया पारणा शहर अंदर लेने जावे, फिरता २ मुनि को एसा वचन कोई सुनावे । नेमनाथ महाराज मोक्ष में सिद्ध गति आसन पावे, संहस्र मुनिके साथमें जन्म मरण दुःख मिटावे ॥ शेर । ऐसी हकीकत नगरमें सुन, हुवा घणा उदासजी । और आहार लेना नहीं, आये गुरु के पासजी ॥२॥ शहर अंदर एसा सुना, नेमनाथ गया निर्वाणजी । मुगत गढ़ में वास कीनो, वावीसमां भगवान जी ॥ छूट || या बात सुनी कहे गुरु आप सुखदाई, मत करो आहार यो चलो मोक्षके माई । कर मत्तो मनमें दियो एकान्त पठाई, सेजय गिरी चढगया हर्ष मन मांई ।। मिलत ॥ पांचो मुनियों ने किया संथारा सागर जैसी समताधारी ॥ सती द्रोपती ॥ ३ ॥ शूरवीर बडे धीर मुनीश्वर, करम. कटक कीनो न्यारो, चडते भावसे आयो है दो मासको संथारो। शिवमंदर के अंदर पहुंचे, देख रया सव. पंसारो । आषा गमनको, मेठकर लख चौरासी दियो टारो ।। शेर ॥ सुख अनंते मोक्षमें, कहतां न आवे पारजी । जन्म जरा दुःख मेट दीना, नहीं लेवे अब अवतारजी ॥ १॥ एसा सुख संसारमें, दीसे नहीं कोई औरजी । सो तो सुख संयमी पामे, मुनीश्वरोंकी दोरजी ॥ छूट ॥ महाराज श्री श्री रतनचन्दजी सुहावे, श्रीजवाहीरलालजी महाराज शीतल स्वभावे । करे ज्ञान ध्यान शुद्ध संयमसे सुख पावे । निज बुद्धि शुद्ध कर हिरालाल गुण गावे ॥ मिलत ॥ ज्ञात सूत्रमें किया है वरनन, सुनो भविकजन हितकारी ॥ सती द्रोपता ॥ ४ ॥ ॥३१॥ लावणी चाला-लंगड़ी ॥ मगधदेश महिपाल कहीजे, श्रेणिक राजा हितकारी । तुरी खेलने आया है वन कौसंवी मुजारी || टेर ॥ नजर भूपकी पड़ी है वृक्ष के नीचे बैठा गुणधारी, मुनिराज की, सूरत दिखती है अति मोहनगारी । रूप रंग जब देख रिषीका, अचरज पायो अति भारी, इम बोले मुखसे, अहो थे सोम महासाताकारी ॥ छूट ॥ जब मुनि- राजके पासे भूपति आई। कर जोड़ बोलेयों नीचो शीश नमाई । या तरुण अवस्था जोग लियो क्यों भाई । सो महर करी महाराज दीजे, फरमाई ॥ मिलत || राजा श्रेणिक नहीं जाणे धर्मको, नहीं शुद्ध मारग आचारी | तुर खेलने ॥ १ ॥ जब राजासे कहे मुनिश्वर, नाथ नहीं या कोई मारे, जिससे हमने, लिया है जोगपद वाना धारे राजा श्रेणिक जब कहे मुनिको, एसी रिद्ध संपति तेरे, पुन्यवंतको देखतें नयन लोभा रहे मेरे । छूट || मैं नाथ आपको भोगवो भोग सुख साता । इस नर भवमें नर वार वार नहीं आता । तूं आपही पोते हैगा भूप अनाथा । कैसे हमारे शिरका नाथ कहलाता ॥ मिलत ॥ कठिन वचन लगे भूपतको, अपूर्व बात सुणी न्यारी ॥ तुरी खेलने ॥२॥ मेरे सभी परिवार के सज्जन | गज पैदल रस्य तुखारी; आज्ञा मेरी, नहीं कोई लोषे जगतके मझारी अंतेवर सुख भोग जोग सब, आय मिल्यो है संसारी; एसी रिद्धि मेरे, आप कैसे अनाथ कहो अणगारी ॥ छूट ॥ यों मृषावचन मत कहो आप मुखबानी । मैं मगध देशनो राजा लेवो तुम जानी । नहीं समझे नृप नायं अनाथके माई । सुन एक चित मैं कहुं तुजे वतलाई ॥ मिलत ॥ नगर कौसुंबी पिता हमारो, धन घणो अपरम्पारी ॥ तुरी खेतने ॥ ३ ॥ प्रथम वयमें अतुल वेदना भोगी, वो कहेनेमें नहीं आवे; सब अंग २ में, असाता वेदनी करमको न मिटावे । उपाव किया बहु तेरा, वैद्यने तोही समाधी नहीं थावे; पिता हमारो धन देवे बहुत जो दुख मिटावे । ॥छूटा माताने सोच मेरा बहोत जो कीना । भाईबंध सभी परिवार दुख नहीं लीना । काजल टीकी सिणगार भाहार नहीं कीना, नारीने मेरे काज आहार तजदीना ॥ मिलत || त्रिया हमारी झूरे विचारी, नैनोंसे झरता बारी ॥ तुरी खेलने ॥ ४ ॥ दुःख कोई नहीं मेट सका, तब मैंने विचारा क्या करना; अब संयम लेना, एसा नहीं और जगत में है शरना । इम विचार करतां मनमें तुरत हुवा शाशन नर ना, निद्रा आई मिट गई वेदनी सब आनंद वरना ॥ छूट ॥ फिर मात पिता से पूछके संयम लीना, हुवा नाथ सभी जीवोंको अभय मैं दीना । अपनी आतम का आपही मित्र कहावे, करता भोगता नंदन वनको ले जाचे ॥ मिलत ॥ अब अनाथ पनो दूजा को, सुन राजा एक चित धारी ॥ तुरी खेलने ॥ ५ ॥ कायर पुरुष जो संयम लेके, शुद्ध मन सेती नहीं पारे, मस्तक मुंडन, कियो है बहुत वर्षतक मन्यो है भारे । तप संयम शुद्ध लान विना नर पोली मुठ्ठी जैसे असारो, इत्यादिक सुनाया उसको शुद्ध मुनिका आचारो ॥ छूट ॥ सजाने सम्यकल जिन मारग की धारी, कियो धर्म तणो उद्योत जाऊं बलिहारी । या धर्म दलाली शुद्ध सम्यकत्व जो पाली, हीरालाल कहे जिन होसी आगामी काली || मिलत ॥ जवाहिरलालजी महाराज प्रसादे, दुरगति दुरमति दूर टारी ॥ तुरी खेलने ॥ ६ ॥ ॥ ३२ ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ॥ शालीवाहन राजा का फरजंद, नलवाहान नामा भूपार । मन केशर महेता, करता राज काज सबही अधिकार ॥ टेर ॥ जंबुद्वीप का भरत खंडमें पुर पइठाण नगर सुखकार, अति सुंदर शोभे, पवन छत्तीसों करता जहां रुजगार । एक दिन दरम्यान राजा सुतो, निद्रा में आयो जंजार, सुंदर एक परणी, दिन चढ़ गया नहीं जिस को खबर लगार ॥ शेर ॥ खान सुलतान मुसद्दी सभी, आया सभा दरम्यानजी । राजा जब आया नहीं महेते, जगाया आनजी ॥ १ ॥ राजा उठकर कोपियो, लियो खड़ग जो हातजी । रंग में भंग तेने किया, अब करूं तेरी घातजी ॥ २ ॥ छूट ॥ तब हाथ जोड़ कहे मंत्री सुनो महाराजा, मत मारो मुजको करूंगा सबही काजा । प्रत्यक्ष परणासु खप्ना की सुंदर ताजा, मन माही हर्षधर आयो सभा महाराजा || मिलत ॥ दान देवे नर नारी को पूछे पता सबही समाचार ॥ मन केशर ॥ १॥ मिली खबर किसी के जरिये है कणियापुर पाटण अभि- राम, राज वहां करता; चतुर है कनकब्रह्म है उसका नाम । पुत्री हंसावली है एक उनके, मनुष्य मुख नहीं देखती आम । सब राजा.आगे, कही मंत्री धीरज से सुधरे सवही काम । शेर || राजा प्रधान मत्तो करी, चाल्या दोनों परदेशजी । कहां ठाकुर कहां कोई, कहां जोगी का भेषजी ॥१॥ कणियापुर में आविया, सभी पाया बात बयामजी । देवी पूजा करवा आवे, राजकन्या इस स्थानजी ॥ २ ॥ छूट । जब देखा अवसर कन्या आने की वेला, मन केशर महेता छिपकर रहा अकेला, जब आई हंसावली मंदिर में पग मेला, देवी ज्यु कोपकर किया कुँवरी पेहेला ॥ मिलत ॥ हाथ जोड़ पांवां पड़ बोले बक्ष गुन्हों माता इसवार ॥ मन केशर ॥ ३ ॥ देवी कहे मतमार किसी को, कन्या मान गइ निज घर । फिर आई महलमें; देवी प्रसन्न हो, महेतासे कहे मांग तूं इच्छित वर । करूं चित्राम वरदान दिया है आया शहेर के, वह अंदर । देवी की शक्ति से महेता ने काम जमाया अछीतर ।। शेर ।। विविध भांति चित्राम कर, बेचे शहर में तामजी । नरनारी सब अचरज पाया, देवरूप अभिरामजी ॥ १ ॥ चिडा चिडी का चित्राम लेके, दास्यां बतायो आनजी । हंसावली जब देख पाई । जाति स्मरण ज्ञानजी ॥ २ ॥ छूट महेता को बुलाई यूछा हाल जो सारा, वो चङा मर के हो गया राजकुमारा । अब राज करत है पुर पईठाण मुजारा, है नाम उसका नर वाहन भूपारा ॥ मिलत ।। वो पति तुम्हारा जला आग में मोह में सूझा नहीं लगार ॥ मन केशर ॥ ॥ ३ ॥ जब कन्याको सन्तोष हुवा है, अपने पति को जानलिया । राजा के पास में, आयकर हाल सभी मालुम किया । सन्मान दिया महेता जी को अपने शहेर वो चला गया, फिर किया है सगपन, ब्याव का रंग ढंग सब मिला दिया ॥ शेर ॥ राजा को बींद बनाय के, करी जान तैयार जी। कणियापुर में आवीया, हर्षा घणा नरनारजी ।। ॥ १ ॥ हंसावली कन्या को, हुवा आनन्द अपारजी । पूर्व भव का प्यारा हमसे, आ. मिला भरतारजी ॥ २ ॥ छूट ॥
परणाई कन्या भूपति अति हुलसाई, दिया धनमाल फिर पहुचा दिया जमाई, आया पुर पइठाण स्थान बडा सुख- दाई, स्वपना की सांची महेते करी बताई ॥ मिलत || हिरालाल कहे फिर राणीजी के हंस वच्छ दोई हुवा कुँवार । मन केशर ॥ ४ ॥ ॥ ३३ ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ॥ मत करो भरोसा कोई दुर्जन का, झुंटी जाल फेलाते हैं । हंसराज और, बच्छराज को देखो गमन कराते ॥ टेर ॥ पुर पठाण नगर है सुंदर, नल वाहन नामा भूपाल । राण्या जिन के, तोनसो साठ वो अधकी रूप रसाल | लीलावती सब में पटराणी, राजा से अति रखती प्यार । हंसावली को, फिर परण्यो राजा यो बहु विस्तार ॥ हंस वच्छ दो पुत्र जिनों के, महाबलवंता तेज दिदार । और बावन वीर है, जगत में योद्धा महारण अजणहार ॥ शेर ॥ मोका देखी एक दिन, मिलिया सभी सिरदार जी । एक तरफ हंस वच्छ दोनों, एक तरफ राज कुमार जी ॥ १ ॥ खेल खेलतां गेंद वो, ऊंची गई असमानजी । लीलावती का महेल में, जाय पड़ी दरम्यानगी ॥ २ ॥ ॥छूटा। लीलावती ने गेंद हाथ में लीधो, इतने में हंसराज चल कर आयो सीधो । गेंद मांग्यो माता से राणी जाण नहीं दीधो, रूप देख कुंवर को विषय को प्यालो पीधो ।। मिलत ॥ हाथ जोड यों कहेती राणी सुख भोगो हमारी संगाते है । हंसराज ॥ १॥ हंस कुंवर यों कहे राणी से, मतकर हमसे ऐसी बात । है पातिक मोटो, तुम हो त्रिया बेगम थारी जात । राणी की बात नहीं मानी, गेंदले चाल्यो झपट राणी के हात । जब लीलावतीने, किया तोफान हाय से सुबुरी गात । त्रिया चरित्र कर जाके सूती, आयो भूपत सुणाई सब बात । यह किनी हम से, दुष्ट कों निकाल दिया मैं मारी लात ॥ शेर ॥ रोजा सुन के कोपियो, बुलाईयो परधानजी । राणी गात्र देखाईयो, नहीं पुरुष हाय-यह जानी ॥ १ ॥ राणी एक माने नहीं, मारो इसे या तजु प्राणजी । राणी को मन राखवाने, कहे मंत्री राजानजी ॥ २ ॥ ये कुल दीपक है जक्त दिवाकर जैसा, मत मारो इनको राज थंभ है ऐसा । त्रिया की हट्ट पड़गया भूपति कैसा, नहीं पाया नारी को मर्म जरा भी रहैंसा ॥ मिलत ॥ बिना विचार करे जो कोई वो नर फिर पछताते हैं । हंसराज ॥ २ ॥ हंस वच्छ को कहे मंत्रीशर, सुणो बात तुम राजकुमार । या गति करम की, टले नहीं रती करो तो केई विचार । बारा रतन दोई अश्व चढ़न को, और साज सब लीनों लार । परदेशा में, जाय के रीजो लिख जो हम को जुहार । पग लागी महेता के चाल्या, कहे मंत्री तूं प्राण दातार । उऋण न होवां, आज थे कियों हमारे पे जबर उपगार ॥ शेर । आखों से आंसु नाखता, मूकता निशासजी । हंसावली राणी से, मिलने की होती आसजी ॥ १॥ राणी रुदन करे घणो, पुत्रों की सुनकर बातजी । नींद लीला भोजन पाणी, षट्मास जिम एक रातजी ॥ २ ॥ छूट ॥ पारधी के पासे पहुचो प्रधान जो जाई, मृग नैत्र दो ले लिया उसी क्क माई । राणी की नजर कर दिया महल में जाई, ज़ब राणी यों कहे कहो हाल सुनाई ।। मिलत । वध भूमि- पर वध जो करता इसे वचन सुनाते हैं । हंसराज को॥ ३ ॥ जो कहना करता राणी का तो नहीं पाता दुःख लिगाड़, र मुख से बोला, फिर तो दुपा उसीका होवण हार | जब राणी कहे क्योंथें माऱ्या, गुप्तपणे मैं रखती सार । जब प्रधानने, जान लिया ये संबही इसका है जंजार.। गई. बात फिर हाथ कहां है, सोचो दिल में करो विचार । अब दोनों भाई, हुवा असवार तुरंगपर राजकुमार ॥ शेर | भाई दोनों इम चितवे, देखो करम की गतजी। विन गुन्हें इस राजघी, नहीं किया न्याय नरपतजी ॥ १॥ चलता जंगल बीच में, गहन वन मुजारजी। सिंह गुंज्जे पहाड अंदर, नहीं सोच लगारजी ।। २.! छूट ॥ एक बड़तले लियो विश्राम के विषधर आया, हंसराज के दीनो संक राज फिर पाया । वच्छ राज गया परदेश परण के लाया, मिला मात पिता से आप फते कर आया । 11. मिलत-॥ उगनी से इकोत्तर साल में अब हीरालाल यों गाते है । हंस कुंवार को ॥ ४ ॥ ॥ ३४ ॥ लावणी चाला-द्रोण ॥ जो पूर्व जनम से पूरा पुण्य ले आया महाराज किसीका जोर न चलताजी । मिले शुभ कमीका जोग बिधन भय पूरा टलताजी ।। टेर ॥ ये हंसराज बच्छराज कुंवर राजाका, महाराज, भूप देश बाहिर कड़ायाजी । चला जाय बंगल के बीच भूख त्रिसा से घबरायाजी । एक बड़तले लिया विश्राम अश्व दोई बांध्या महाराज, बच्छ जल मेने सिधायाजी । सोगया आप हंसराज आई निद्रा वृक्ष छायाजी ॥ छूट ॥ एक सर्प आय हंसराज को बैंक लगाया, हो गया कुंकर बेहोस कोमलथी काया । जल लेके जल्दी बड़ा भात जो आया, देखी कुंवरका हाल दिल घबराया ॥ मिलत ।। वच्छ किया घणा विलाप धीरज धर मनको । महाराज, कर्म से जोरनी चलताजी ।। मिले शुम ॥ १ ॥ एक वृक्ष जालपर हंसराज को. नव्यो, महाराज., अश्व एक करी अवसारीजी । एक लिया 語帶語樂器器带张张张张张器 हाय से सबुरी गात | त्रिया चरित्र कर जाके सूती, आयो भूपत सुणाई सब बात । यह किनी हम से, दुष्ट को निकाल दिया मैं मारी लात ॥ शेर ॥ रोजा सुन के कोपियो, बुलाईयो परधानजी । राणी गात्र देखाईयो, नहीं पुरुष छाय-यह जानजी ॥ १ ॥ राणी एक माने नहीं, मारो इसे या तजु प्राणजी । राणी को मन राखवाने, कहे मंत्री राजानजी ॥ २ ॥ ये कुल दीपक है जक्त दिवाकर जैसा, मत मारो इनको राज यंभ है ऐसा । त्रिया की हट्ट पड़गया भूपति कैसा, नहीं पाया नारी को मर्म जरा भी रहँसा ॥ मिलत ॥ विना विचार करे जो कोई वो नर फिर पछताते हैं ।। हंसराज ॥ २ ॥ हंस वच्छ को कहे मंत्रीशर, सुणो बात तुम राजकुमार । या गति करम की, टले नहीं रती करो तो केई विचार । बारा रतन दोई अश्व चढ़न को, और साज सब लीनों लार । परदेशा में, जाय के रीजो लिख जो हम को जुहार । पग लागी महेता के चाल्या, कहे मंत्री तूं प्राण दातार । उऋण न होवां, आज थे कियो हमारे पे नबर उपगार ॥ शेर ॥ आखों से आंसु नाखता, मूकता निशासजी । हंसावली राणी से, मिलने की होती आसजी ॥१॥ राणी रुदन करे घणो, पुत्रों की सुनकर बातजी । नींद लीला भोजन पाणी, षटमास जिम एक रातजी ॥ २ ॥ छूट || पारधी के पास पहुचो प्रधान जो जाई, मृग नैत्र दो ले लिया उसी क्क माई । राणी की नजर कर दिया महल में जाई, जब राणी यों कहे कहो हाल सुनाई ॥ मिलत ।। वध भूमि- पर वध जो करता इसे वचन सुनाते हैं । हंसराज को॥ ३ ॥ जो कहना करता राणी का तो नहीं पाता दुःख लेगा, हम मुख से बोल, फिर तो दुषा उसीका छोवण हार | जब राणी कहे क्योंथें माऱ्या, गुप्तपणे मैं रखती सार | जब प्रधाननें, जान लिया ये संबही इसका है जंजार.। गई. बात फिर हाथ कहां है, सोचो दिल में करो विचार । अब दोनों भाई, नुवा असवार तुरंगपर राजकुमार ॥ शेर ॥ भाई दोनों इम चितवे, देखो करम की गतजी विन गुन्हें इस राजवी, नहीं किया न्याय नरपतजी ॥ १ ॥ चलता जंगल बीच में, गहन वन मुजारजी। सिंह गज्जे पहाड अंदर, नहीं सोच लगारजी ॥ २.॥ छूट ॥ एक बड़तले लियो विश्राम के विषधर आया, हंसराज के दीनो घुक राज फिर पाया । वच्छ राज गया परदेश परण के लाया, मिला मात पिता से आप फते कर आया ॥ ॥ मिलत-॥ उगनी से इकोत्तर साल में अब हीरागल यों गाते है । हंस कुंवार को ॥ ४ ॥ ॥ ३४ ॥ लावणी चाल:-द्रोण ॥ जो पूर्व जनम से पूरा पुण्य ले आया महाराज; किसीका जोर न चलताजी | मिले शुभ कर्मीका जोग विधन भय पूरा टलताजी ।। टेर ॥ ये हंसराज बच्छराज कुंवर राजाका, महाराज, भूप देश बाहिर कड़ायाजी । चला जाय जंगल के बीच भूख त्रिसा से घबरायाजी । एक बड़तले लिया विश्राम अश्व दोई बांध्या महाराज, बच्छ जल मेने सिधायाजी । सोगया आप हंसराज आई निद्रा वृक्ष छायाजी ॥ छूट ॥ एक सर्प आय हंसराज को कक लगाया, हो गया कुंक्स बेहोस कोमलथी काया । जल लेके जल्दी बड़ा भ्रात जो आया, देखी कुंवरका हाल दिल घबराया ॥ मिलत ॥ वच्छ किया घणा विलाप धीरज धर मनको । महाराज,, कर्म सें जोरनी चलताजी मिले गुम ॥ १ ॥ एक वृक्ष लालपर इंसराज को. नव्यो, महाराज, अश्व एक करी अवसारीजी । एक लिया 心路器哪器遊 ॥ 48 आपके हाथ शहरकी राह विचारीजी । कुंधी नगरी मोमंद सेठ है मोटो, महाराज, माया हैं अपरम्पारीजी । देखी दुकान पे सेठ कुंवर यों कहे सुबिचारीजी ॥ छूट ।। ये बारा रतन दोई अश्व हमारे भारी, थापण थे राखो आज सेठ हमारी । दो बावना चंदन काज सर्व सुधारी, ले लिया सेठ जी बात भली विचारी ॥ मिलत ।। अत्र हकीकत कहूँ पाछली देखो, महाराज, हंसका दुख सहुटलताजी ॥ मिले शुभ ॥ २ ॥ ये उसी वृक्षपर गरुड़ पक्षि जो रहेगा। महाराज, डालपर बैठा आईजी, यो गरुड़ मुखको गर्ल; हंस मुख पड़ियो आईजी । ये हुवा कुंवर सचेत बंधन खोल्या, महाराज, वृक्षसे उतरयों आईजी । निज बंधव केरे काज डोलता बनके माहीजी ॥ छूट । एक निराज को देख पूछे नितलाई, मिलसी छे मासा माय भ्रात सुखदाई, कुंथी नगरीमें आयो सोधन के ताई, मिल गया एक केलन कबाड़ी आई ॥ मिलत । जब पूछी हाल सब पुत्र करीने राख्यो । महाराज, पुण्यसे आदर करताजी ।। मिले शुभ || ३ । अब ले चंदन बच्छराजजी जल्दी आया । महाराज, हंसकुंवर नहीं पायाजी, जद करी चोकर, आय परा अनुसार लगायाजी । पा हुई मिलनकी आस दिलके मांही, महाराज सेठ पासे फिर आयाजी । लो पदन दो अश्व पापण जो वरी सवाइजी ।। छूट ॥ यो मोमन सेठ है मूंजी एसी विचारी, इन की थापण में रक्बु बर मुजारी; जव कहे अश्व तुम लावो घर मुजारी, नहीं जानी कपट की बात जाल इनने डारी ॥ मिलत || जब बच्छराज जा अश्वको खोलन लागा । महाराज; सेठ हल्लो कियो भलताजी ॥ मिले शुभ ॥ ४ ॥ ये करी चोर पकड़ के उसको मारा । महाराज, राज के पासे लायाजी, ले जातो अश्वको खोल चोर ये हाथे आयाजी । इन्हें देवा दंड भरपूर प्राण वध करणों । महाराज, नहीं तो होसी दुखदाईजी, ले गयो पकड़ कौतवाल कुमरको मारण ताईजी ॥ छूट ॥ कौतवाल की नारी नयने देख्यो सूरो, नहीं दीसे चोर यो है पुन्यवंतो पूरो; घर राखो आपणे पुत्र घणो सनूरो, मान लिया वचन कौतवाल गयो दुख दूरो। मिलत / या खबर सेठको हुई राजापासे आया । महराज, कौतवाल रती न डरता जी ॥ मिले शुभ ॥५॥ ये पुष्पदंत है कुंवर सेठका नीका, महाराज; जहाज ले जाते है परदेश, नहीं चले जहाज या आज पंडितसे पूछे कहो क्या रहेंश । कोई थापण वालेकी थापण तुमने रक्खी, महाराज संग ले जावो उसे परदेश । सब उतरे पेले पार कनक ब्रह्म नामा है नरेश ॥ छूट ॥ एक चित्रलेखा है पुत्रि गुणाकी खानी, बच्छराज नित्य जावे घोडा को पिलावा पानी, है पुरुष कला सब अंग आप बखानी, इस को मैं करूं भरतार ऐसी दिल ठानी ॥ मिलत । एक लिखी पत्र मदनरेखा हाथ पहुंचायो । महाराज पति बनो काज मम सरताजी ॥ मिले शुभ ॥ ६॥ अब स्वयंवर मंडप मांड्यो राजकन्या को । महाराज, केई भूपति बुलवायाजी, पुष्पदंत वच्छराज वो भी वहांपर आयाजी । वच्छराज गले में डाली पुष्प की माला । महाराज, राजा सब रोष भरयाजी । या तुच्छ बुद्धि है नार नीच से प्रेम लगायाजी ॥ छूट ॥ करदीनी उसी के साथ दूर वसाया, मारण काजे राजा पुरुष पठाया; चित्रलेखा कहे सुन कंय दगासे आया; बच्छराज लिया ते जीत दुष्ट घबराया ॥ मिलत ॥ फिर राजा कियो उपावमारण के तांई। महाराज अहेडे भूप निसरता जी॥ दिले शुभ ॥ ७ ॥ एक दुष्ट अश्व पे बच्छराज को चढवा दीनो । महाराज, वश कर लीनो है तुखार । अब राजा कहे कन्यासे कोन आप पूछ जे तूं घर । जब धरी प्रेम प्रमदा से बात परकाशी । महाराज, राजा छ दुवो आनन्द में अपार । फिर दिया माल और देश दास दास्यां को है परिवार ॥ छूट ॥ विधना का लिखिया लेख कोन मिटावे, पुष्पदंत दुर्जन देख मन घबराके; अब लेके सीख फिर पीछा घर को आवे, पुष्पदंत धरे यो दाव नार चेतावे || मिलत ॥ या जहाज समुद्र में चली शुभ दिन देखी महाराज, दगा से रहेना डरतानी ॥ मिले शुभ ॥ ८ ॥ अब पुष्पदंत यों कहे आप यहां आवो । महाराज, कोतूहल देखा भारीजी, उठ चल्यो आप वच्छराज आडी फिर बोले नारीजी, मत जावो आप अर्धरात छोड घरनारी । महाराज, होनहार बात बन मानीजी जद गया आप बच्छराज डाल दिया समुद्र में तानीजी ॥ छूट ॥ धरा ध्यान मंत्र नवकार आया सुरभारी, करी मगरमच्छ को रूप पार उतारी | कुंती नगरी सलखु मालन का घर मुजारी, तिहां रहे सदा बच्छराज आनंद अपारी ॥ मिलत || फिर किया घणा विलाप चित्रलेखा नारी । महाराज, जहाज जल पार उतरताजी ॥ मिले शुभ ॥ ९ ॥ पुग्णदंत के दुवो हर्प दिल अंदर ! महाराज, नारि 'मैं करसुं घरणीजी । सब लोग कहे धन्य भाग लायो या ऐसी परणीजी । या खबर शहर में हुई मालन को जाई । महाराज, मिलन की कहुँ अब वरणीजी । हंसराज करे तिहाँ राज पुण्य की मोटी करणीजी ।। छूट ॥ नगरी में इंडी हंसराज आप फेरावे, मुज बंधव की मुजे बात कोई सुणावे; चित्रलेखा कहे सब बात राजा सुख पावे, सलखु मालन के घर मिलन को आवे ॥ मिलत ॥ ये भाई दोनों और नारी सबही मिलिया । महाराज, हर्प जल नैना ढलताजी ॥ मिले शुम ॥ १० अब मोमंद सेठ और पुष्पदंत घब- राया । महाराजा दुवा क्या गजब का गोला जी । पुत्र जोवे बापको मुख; पुत्र जोवे बाप का डोलाजी । अब राजाने .
दियो हुकम मारण सेठ को । महाराज, बच्छराज बचाया उनका प्राण । कर दियो देश से बहार; पापी को पहुंचो पाप जो आन || छूटे । जब लोग कहे सब देखो फल ये इनका, मुक्तेगा वोही जो कर्ता कर्म है जिनका । मत करो बुरा कोई किसी जीवन का, आखिर को नतीजा मिला मोमंदको उनका || मिलत ॥ ये लोग गया सब भाग आपके घरको । महाराज, कर्ता वोही आपका भरताजी ॥ मिले शुभ ॥ ११॥ ये पुण्य उदय इस बच्छराज के आया । महा- राज, राजकी संपति भारीजी, नहीं तजा आपने सत्य, जिन्हो की या बलिहारीजी । ये सुखे बसे सब लोक राजके माही, महाराज, अखंडित आण है सारीजी । दुश्मन को मनाई आन आपने ऋद्धिधारीजी ।। छूट । अब राज लीला सुख भोग भोगवे प्राणी, चित्रलेखा जैसी नार रूप इन्द्राणी, मालनको दुख सब दूर कियो वच्छ वाणी, परमार को दीनो राज हंसराजजी आणी ॥ मिलत । अब मात पिता से मिलने की मनमे आई । महाराज, संग में बहु लश- कर चलताजी । मिले शुभ ॥ १२ ॥ अब आया आप के देश मिल्या सब सज्जन, महाराजा राजा के पगे लागा जाईजी । हंसावली माता को भेट; लिया है कंठ लगाईजी । यो महेता को उपकार कभी नहीं भूले । महाराज, प्राण थे राख्या बचाई जी, लीलावती राणी को पियर दीनी मेलाईजी ॥ छूट ।। राजा राणी यम ले गया वर्ग के माई, दोनो भाई भोगवे राज पुन्य फल पाई, गुरु जवाहिरलाल जी महाराज घणा सुखदाई, हीरालाल कहे संपती मिले सत्यसे आई ॥ मिलत ॥ ये उगणी से बहोत्तर साल के मांई। महाराज वंच्छित सभी कारज । सरताजी || मिले शुभ ॥ १३ ॥ १ ॥ ॥ ३५ ॥ लावणी चाला-द्रोण ॥ श्रीपति करे है राजद्वारका मांहि । महाराज, भाई बलभद्र की जोडीजी; प्रद्युम्न शांभ कुंवर जादव की छप्पन्न क्रोडीजी ॥ टेर ॥ ये स्वर्गपुरी सम कही द्वारका नगरी । महाराज, आनंदमें वसे नर नारीजी ॥ कोई देसावर का दसवीस आया चल कर वेपारीजी || या देखी द्वारका स्वर्ग समान मन गमती । महाराज, लाभ बहु लिया कमाईजी। फिर आया राजगृह दरम्यान जरासिंध सभा भराईजी ॥ दोहा ॥ पूछे राजा परदेशिया कहांसे आये चाल । सोरठ देश द्वारामती, राज करे गोपाल ॥ १ ॥ ऐसी नगरी नहीं दूसरी, जादव वंश को जोर । गरुडध्वज चढ़ती कला, जिम उगती सूरज कोर ॥ २ ॥ छूट ॥ या बात सुनी जरासिंध कोप भराया, झट कियो दूत तैयार फरमान लिखाया । वो दूत द्वारिका आया सभामें सुनाया, सुन के श्री हरि महाराज क्रोध में आया ।। दोड़ ॥ तुम मानो मेरी आन, करले वचन परमान । नहिंतो जाय तेरा प्रान, सच्ची सुनावे ॥ १ ॥ कहेना जरासिंध को जाय आवो सामने चलाय | केशरी सिंहको बतलाय, क्या फते पावो ॥ २॥ मिलत || जब दूत विदाहो चल्यो राजगृही नगरी । महाराज, राजा कहे लंबी चोडीजी ॥ प्रद्युम्न ॥ १ ॥ जन जरासिंध महाराज हुकम फरमायो । महाराज, सेनापति को बुलवायाजी, करो कटक जल्दी तैयार सभी सरदार बुलायाजी। ये गज घोड़ा पैदल पाखरसे जडिया । महाराज, जमीथरहर धुजाणीजी, उड गर्द गई आकाश सूर्य की ताप छिपानीजी ॥ दोहा ॥ वाजिन्न का नाद सुन, अम्मर रयो घरणाय । ध्वजा उडे आकाश में, क्या निशान घुराय ॥ १ ॥ सिंहनाद करता थकां, चल्या -- शुभट दा मीच । झल हल खांडा चमकता, जिमबिजली आभा बीच ॥ २ ॥ छूट ॥'या बात सुनी द्वारिका मांही लष्कर आवे, श्रीकृष्ण कोप कर हुक्म आप फरमावे । अब देख हाथ यो केशरी सिंह घुर्रावे, उसी वक्त कटक तैयार वाजा बजवावे ॥ दौड ॥ मदझर्ता गजराज, घट्टा धनघोर गाज । तुऱ्या रंग चढ़ियो आज, हिंसार करे ॥ १ ॥ करि केशरियां जिणगार, शुभट है तैयार | स्वामि काज सरदार, आगे पगधरे ॥ २ ॥ मिलत ॥ ये समुद्र विजय पाण्डवजी प्रमुख योधा, महाराज चल्या सभी होड़ा होडीजी ।। प्रद्युम्न ॥ २ ॥ ये माता देवकी के पगे लागिया केशव । महाराज, वीर की माता कहला जोजी, मत देना रणमें पूठ वैरीको जीत घर आजोजी । ये भाई दोनों मिल बैठा रत्य के मांही। महाराज, रत्थकी क्या कहूं जोडीजी; देखी सहस्र कीर्ण समतेज वैरी जाय रस्तो छोडीजी । दोहा ॥ वस्तर शस्त्र सबलिया, विजय मुहुर्त धुरलेत । सामु चल के आवियो, जहाँ भूमी रणखेत ॥२॥ कटक दोनों भेला मिली, खेल जड़यो जाहान । ऊंची नीची शम करी, केई जोजन के परमान ॥ जब हुकम हुवा है दोनो. भूप का जहारी, शुभट खड़ा ले हथियार करी होश्यारी । नहीं दे पग पाछा पाण्डव बडा बलधारी, जब ही दुर्जन का लश्कर हटाया भारी ॥ दोड़ ॥ जरासिंध तत्काल, जरा विद्या दीनी डारी । नेमनाथने मुरार, होश्यारी ॥ १॥ नेमनाथ भगवान, श्नानोदग जलपान । छिटकिया हुवा सावधान, अतिसुख भारी ॥ २ ॥ मिलत ॥ ये जरासिंध फिर गया वापिस लश्कर से । महाराज, सेना गई रण खेत को छोड़ीजी ॥ प्रद्युम्न ॥ ३ फिर दामोदरजी अष्ट भक्त करी बैठा । महाराज, मदत को देव बुलायो जी, होसी सदा फते महाराज देव एसे फरमायोजी । फिर करी चढ़ाई जरासिंध मी चड़ कर आयो । महाराज, भूप दोनों भिड़गया भारीजी, फिर किया शस्त्र का जोर जरासिंध गयो तब हारीजी ॥ दोहा । जब जरासिंध भूपाळने, लीनो चक्र जो हाथ । हुक्म दिया उसी वक्तमें, तू कर दुष्मनकी घात ॥ १ ॥ माधव का सिर ऊपरे, चिक्र रयो घरणाय । उसी चक्रसे जरासिंध का, प्राण किया समाय ॥ फिर हुवा जयजयकार फल वर्षाया । वमुदेव नंद वासुदेव पद जो पाया | दिग्विजय करी त्रिखण्ड राजले आया, द्वारामति द्वारकाधि आप कहेवाया ॥ दोड । सोला सहस्त्र भूपार, आण माने श्री कार । त्रिखण्ड के मुशार, एके छत्र धरी ॥ १ ॥ रुखमणी भामानार, जाने इन्द्राणी अवतार | और घणो परिवार, होवो विस्तारी ॥ २ ॥ जवाहिरलालजी महाराज, साऱ्या आतमका काज । हिरालाल कहे आज, वंदना हमारी ॥ ३ ॥ मिलत ॥ श्रीनेमनाथ महाराज के भक्त हुवे पूरण । महाराज, जिनपदकी जुगति जोडीजी ॥ प्रद्युम्न ॥ ४ ॥ ॥ ३६ ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ।। कहुं कथा एक शीलनत की, श्रोता जन सव ध्यान धरे । धारे जिनका जन्म मरण दुःख सब दूर ॥ टेर ॥ चंपानगरी सुदर्शन सेठ था रूपवंत बहुगुण धारी, नारी जिनके है वो सीलवंत बहु सुख कारी । वारा वर्तको पाले सेठजी, श्रावककी क्रिया सारी, पांच पुत्र है, सूरति नल कुंवर के अनुहारी | शेर । एकदिन के अवसरे, पुत्र पांच लिया लारजी । त्य बैठी बाजार अंदर, लारे ले परिवारजी ॥ १॥ महेलोंके हेटे जावता, रानीकी नजरां आयजी । दीपक देख पतंग्यो जंपे, तिम राणी रही लो भायजी ॥ २ ॥ राणीरू देख के दिल ॥
में यो ठळचानी, अहो रूपवंत यो दिसे पुण्यवंत प्रानी । इन को महेला में रखु सुख विलसानी, तो होवे सफल यो जन्म आज जिंदगानी || मिलत ॥ ऐसो विचार करे राणीजी, दासी को भेज बुलवाऊं घरे ॥धारे ॥२॥ सेठ मिलावो प्यारी हमको, दूतियों से यों फरमावे, सबदास्यां मिलके, कहे हम चंदरोज में यहांपर लावे पोषध शाला में पोषा करके, सेठ सदा बैठा पावे, उसी वक्त में, दास्यां को खबर तुरत कोई पहुंचावे । शेर ।। मंजूस एक मंगाय के, भीतर दीया डालजी । पांच सात मेली मिली, ले चली तत्कालजी ॥ १ ॥ गुप्त दुवारे महल अंदर, जा धो मुंकामजी । हाथ जोड़ी कहे रानी, आप आया कौनसे ठामजी ॥ २ ॥ मिल्यो जोग भोग तुम भोगो सेठ हम साते । राह देखत हो गया दिन और राते ॥ अब नहिं बचेगा साबत आया हम हाथे । तुम खोलो मून हंस बोलो हमारी साथे ॥ मिलत ॥ जो नहीं मानोगे कहेना मेरा तो तुम्हारी यहां जान हरे ॥ धारे ॥ २ ॥ करी मून धरलिया ध्यान को, दृढ़ताई कर बैठ रया, सयो परिषो कठिन धन व्रत उलंघन नहीं किया । रानी उपाय किया बहुतेरा जोर जुल्म सब कर लिया, नहीं डिंगे शीलसे, सैठ समताका रस भरपूर पिया ॥ शेर ॥ जब राणी हल्ला किया, महेलों में आया चोरजी । राजा आगे रानी कहे में राख्यो, शील कर जोरजी ॥ १ ॥ सेठ सुदर्शन इस नगरमें, धर्मानाम धरायजी । कपट क्रिया कर्म करता, अब प्राण इसका जायजी ॥ २ ॥ चाकरके पासे लीया सेठ बंधवाई, सूलीपर इनको देवो आज चढाई । ले चल्या वजारमें दुनिया देख घबराई, ऊंचानीचा केई बोले लोग लुगाई ॥ मिलत ॥ सेठ समता सागर के मानिंद, राग द्वेष नहीं फरमायोजी 1.फिर करी चढ़ाई जरासिंध मी चड़ कर आयो । महाराज, भूप दोनों भिड़गया भारीजी, फिर किया शस्त्र का जोर जरासिंध गयो तब हारीजी ॥ दोहा । जब जरासिंध भूपालने, लीनो चक्र जो हाथ । हुक्म दिया उसी वक्तमें, तूं कर दुष्मनकी घात ॥ १ ॥ माधव का सिर ऊपरे, चिक्र रयो घरणाय । उसी चक्रसे जरासिंध का, प्राण किया समाय ॥ फिर हुवा जयजयकार फूल वर्षाया । वमुदेव नंद वासुदेव पद जो पाया । दिग्विजय करी त्रिखण्ड राजले आया, द्वारामति द्वारकाधि आप कहेवाया ।। दोड । सोला सहस्त्र भूपार, आण माने श्री कार । त्रिखण्ड के मुझार, एके छत्र धरी ॥ १ ॥ रुखमणी भामानार, जाने इन्द्राणी अवतार | और घणो परिवार, होवो विस्तारी ॥ २ ॥ जवाहिरलालजी महाराज, सान्या आतमका काज | हिरालाल कहे आज, वंदना हमारी ॥ ३ ॥ मिलत ॥ श्रीनेमनाथ महाराज के भक्त हुवे पूरण । महाराज, जिनपदकी जुगति जोडीजी ॥ प्रद्युम्न ॥ ४ ॥ ॥३६ ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ।। कहुं कथा एक शीलवत की, श्रोता जन सब ध्यान धरें । धारे जिनका जन्म मरण दुःख सब दूर टरे । टेर ॥ चंपानगरी सुदर्शन सेठ था रूपवंत बहुगुण धारी, नारी जिनके है वो सीलवंत बहु सुख कारी । वारा वर्तको पाले सेठजी, श्रावककी क्रिया सारी, पांच पुत्र है, सूरति नल कुंवर के अनुहारी ॥ शेर ॥ एकदिन अवसरे, पुत्र पांच लिया लारजी । त्य बैठी बाजार अंदर, लारे ले परिवारजी ॥ १ ॥ महेलोंके हेटे जावता, रानीकी नजरों आयजी । दीपक देख पतंग्यो जपे, तिम राणी रही लो भायजी ॥ २ ॥ राणीरू' देख के दिल में यों ललचानी, अहो रूपवंत यो दिसे पुण्यवंत प्रानी । इन को महेला में रखु सुख विलसानी, तो होवे सफल यो जन्म आज जिंदगानी ॥ मिलत ॥ ऐसो विचार करे राणीजी, दासी को मेज बुलवाऊं घरे ॥धारे ॥२॥ सेठ मिलावो प्यारी हमको, दूतियों से यों फरमावे, सबदास्यां मिलके, कहे हम चंदरोज में यहांपर लावे । पोषध शाला में पोषा करके, सेठ सदा बैठा पावे, उसी वक्त में, दास्यां को खवर तुरत कोई पहुंचावे । शेर । मंजूस एक मंगाय के, भीतर दीया डालजी । पांच सात मेली मिली, ले चली तत्कालजी ॥ १॥ गुप्त दुवारे महल अंदर, जा धो मुंकामजी । हाथ जोड़ी कहे रानी, आप आया कौनसे ठामजी ॥ २॥ मिल्यो जोग भोग तुम भोगो सेठ हम साते । राह देखत हो गया दिन और राते । अब नहिं बचेगा साबत आया हम हाथे । तुम खोलो मून हंस बोलो हमारी साथे ।। मिलत ॥ जो नहीं मानोगे कहेना मेरा तो तुम्हारी यहां जान हरे ॥ धारे ॥ २॥ करी मून धरलिया ध्यान को, दृढ़ताई कर बैठ रया, सयो परिषो कठिन धन व्रत उलंघन नहीं किया । रानी उपाय किया बहुतेरा जोर जुल्म सब कर लिया, नहीं डिंगे शीलसे, सैठ समताका रस भरपूर पिया ॥ शेर ॥ जब राणी हल्ला किया, महेलों में आया चोरजी । राजा आगे रानी कहे में राख्यो, शीळ कर जोरजी ॥१॥ सेठ सुदर्शन इस नगरमें, धर्मानाम धरायजी । कपट क्रिया कर्म करता, अब प्राण इसका जायजी ॥ २ ॥ चाकरके पासे लीया सेठ बंधवाई, सूलीपर इनको देवो आज चढाई । ले चल्या बजारमें दुनिया देख घबराई, ऊंचानीचा केई बोले लोग लुगाई ॥ मिलत । सेठ समता सागर के मानिंद, राग द्वेष नहीं किसी पै करे ॥ धारे ॥ ३ ॥ धयो भ्यान नवकार मंत्र को, शर्णा चारलिया मनमें; कियो संथारो, प्रतिज्ञा धार लिवी या निज तनमें । शील सहाई हुवे देवता, कार्य सिद्ध किया छिनमें, सिंघासन ऊपर बैठाके चवर छत्र जय करे वनमें ।। शेर ॥ नरनारी सब देखके, चकितभये तिणवारजी । राजा सेठ, सांचो शीलराचो, नहीं दोषलगारजी ॥ १ ॥ त्याग अपना पालके, कीधा सभी सिणगारजी । राजा सेठको लारे लिया, आयानगरी मुजारजी ।। २ ॥ छूट ॥ पूछे राजा क्या बात हुई जो खोले, नहीं कहें किसीका मर्म श्रावक मुख बोले । श्रीरत्नचंदजी महाराज गुण अमोले, गुरु जवाहिरलालजी महाराजका जश अतोले ॥ मिलत ॥ हीरालाल कहे शीलवरतसे मन वांच्छित काज सरें ॥धारे ॥४॥ ॥ ३७॥ लावणी चाला-द्रोण ॥ या करी तपस्या भाग उदे जो हुवा । महाराज, राज भरतेश्वर पायाजी । महिमण्डल आण अखंड सम्पति ले घर आयाजी ॥ टेर ॥ ये रिषभ देव के पुत्र आद कहेवाना । महाराज, चक्र जब आयो आयुध शालाजी, एक संहसदेव करे सेव हाजर नित रहे रखवालाजी । पृथ्वी की जीत करवाने हुवो अगवानी । महाराज, भरत सेना लेई चढियाजी, देखी भरतेश्वरको तेज वैरीसब पावां पडिया जी । या लेई भेट राजा को आण मनाई महाराज, समुद्र पे डेरा लगायाजी ॥ महिमण्डल ॥ १॥ ये मांगध कुंवर को अष्ट भक्त जो कीनो । महाराज, भरतजी बाण चलायोजी । जाई लागी महेल के चोंट देवता हाजर आयोजी । यो वरदाम और परभासक को पण जाणो । महाराज, जीतकी बंटे वधाईजी। फिर सिंधु कूट पे सिंधु देवी को आण मनाईजी । या देवी सेवा में आई भेंट नो लाई । महाराज, भरतका पुण्य सवायाजी ॥ महिमण्डल ॥ २ ॥ अब सेनापती पर हुक्म कीयो महाराना । महाराज, सिंधु सागर उतरियोजी, करि भरतेश्वर की आण भेट लेई पाछो फिरियोजी । वैताढ्य गिरि को कियो || 43 पांचमो तेलो । महाराज, देवको वस करलीनोजी, ऋतमाल और नटमाल देवको साधन कीनोजी । सेनापति द्वार खण्ड गुफा का खोले । महाराज, जोजन पच्चास बतायाजी ।। महिमण्डल ॥ ३ ॥ ये उत्तर भरतका देश सभी को साधी । महाराज, सैनापति है बलधारीजी चूल हेमवंत कुमार हुवा सुर आज्ञाकारीजी । ये रिखभ कूट पर नामलिखी फिर आया, महाराज, विद्याधर सैनादोईजी, एक रूपवंत पुन्यवंत भार्या लायो जोईजी । या खंड | गुफा खुल गई निकलकर आया । महाराज, गंगापर तंबु तनायाजी ॥ महिमण्डल ॥ ४ ॥ यहाँ गंगादेवीने पामणा इनको राख्या । महाराज, सीख लेई आगे पधारेजी, गंगाके तीर निधान नवी सब कारजे सारेजी। ये बत्तीस सहस्र देशोंका राज घर लाया, महाराज, सोला सहस्त्र सुर अगवानीजी, हुवा छत्रों का एक छत्र राजजो होवे पुनवानीजी । यो वनिता नगरी को द्वादशमो तेलो कीदो । महाराज, माता सोमंगला जायाजी ॥ महि मण्डल ॥ ॥ ५॥ ये शत्रु घड़ी वनीतामें आई असवारी || महाराज, तेरमो तेलो करावेजी, करी महाराज अभिक्षेप देवता वेठावेजी । या पूरव जनम की प्रगट हुई पुण्याई । महाराज, गुरु जवाहिरलालजी सुखदाईजी, रामपुरे शहर उगनीसे बांसट जया तिथीमें गाईजी । या हरष भावसें बीजे लावनी गाई, महाराज; हीरालाल कहे जशसवायोजी ।। 33
महिमण्डल ॥६॥
॥ ३८ ॥ लावणी, चाल:-लंगडी ॥
पंदरा तिथीका करूं मैं वरनन, चतुर समजलो मनमांही। धरो ध्यान अभिमान मेट के, सत्गुरु चरणे
चितलाई ॥ टेर ॥ एकम के दिन एक आसता जिन मारग की रखलेना, बीज बंध दो हैंगे जगतमें राग द्वेषको
तम देना । तीज तीन तत्त्व का निरणा, भिन भिन सेती करलेना । चोय चारतिर्थ जिनन्द का, उनसे हिल मिल
के रहेना । पांचम के दिन पांच जीतलो पांचों भजिये सुखदाई ॥ धरो ध्यान ॥ १॥ छठ छः काया जीव जगत
में उनकी रक्षा नित करना । सातम के दिन सात व्यसन की संगत दूरी तज देना । आठम के दिन इष्ट सुमर कर
आए कर्म को क्षय करना । नवमी नव तत्व को श्रावक मनमें यथा समज लेना । दशमीके दिन धरम भेद दस
वरनन किया सुत्र माई ॥ धरो ध्यान ॥ २ ॥ ग्यारस के दिन ग्यारा अंगमें जिनवाणी जिनवर गाई । बारस के
दिन बारावरत की मर्यादा करलो भाई । तेरसके दिन तेरकाठिया कर्मोंका है. दुखदाई, चवदसके दिन चवदा नियम ||
को चितारो चित्तके माई । पूनमके दिन पूरा पन्दरा सिद्ध हुवा है सुखदाई ॥ धरो ध्यान ॥ ३ ॥ इसी रीतिसे
पंदरा तिथिकी पन्दरा शिक्षा बतलाई, ज्ञानी समजे अपने ज्ञानमें मूरख क्या समझे भाई । जैन धर्मके मर्मको पाना
बहुत कठिन है जगमाई, भवसागरका पार उतरना यहभी मुश्किल है भाई । हीरालाल कहै ऐसी रीतसे जिन मारग
हिमा गाई ।। धरो ध्यान ॥ ४ ॥
॥ ३९ ॥ लावणी चाला-लंगडी ॥ सातवार तुम सुनो सुज्ञानी, दिल सुधमें जो धरलेना । पाप करम को छोड़ के प्राणी, दयाधर्म में चित्त देना ॥ टेर ॥ दीतवारमें देव अरिहंत का ध्यान सदाही दिल धरना, नही राग द्वेष है जिनों के ज्ञान अनंता कह देना । इंद्र इन्द्राणी देवी देवता, भेटे जिनवर के चरना । बड़े बड़े मुनिराज जगतमें, ले तिरते जिनका शरणा । भेरु भवानी चंडी मंडी, इन्होंसे नहीं होवे तिरना ॥ पाप करमको ॥ १ ॥ सोमवारने सुनो सुज्ञानी, श्री जिनवरजीकी वाणी, तपत तन की तुरत बुझावे अमरापद की है दानी । जिनवानी जिम नीर भन्यो है, निर्मल गंगा जिम जानी; स्नान करो हरवख्त इसीमें करम मेल धोदे ज्ञानी । डाबर डोहना न्हाना धोना, इन सेती नहीं हो तिरना ।। पाप करमको ॥ २ ॥ मंगलवार में मंगल कहिये दया धरम को चित्त देना; छः काया की; हिंसा हो उसी धरम से दूर रहना । रति अजाप नहीं होवे किसी को, ये जिनवर का है कहना; किसी जीवका बुरा न हो ऐसा दिल में लिख लेना । पाप करम में जो कोई राचे उसका नरक में है रहना ॥ पाप करमको ॥ ३ ॥ बुध शुद्ध तुग रक्खो अपनी कुसंगत में नहीं खोना, बुरी सीख मत मानों किसकी, ज्ञान ध्यान में रम रहेना । नीच मनुष्य लंपट कपटी की संगत दूरी तज देना, सात व्यसन को, जो कोई सेवे उसके साथमें नहीं रहना । साधु संत की संगत करना जिनसे होवे भव तिरना ॥ पाप करमको ॥ ४ ॥ बृहस्पत वश मत पडो जगतके, पांचोंइन्द्रि दम देना, खाना पीना भोग विलासन आसन उनसे नहीं रहेना । बीता जाय नरभव यह तेरा, क्योंनी मानता गुरु कहना; मात तात
महिमण्डल ॥६॥
॥ ३८ ॥ लावणी, चाला-लंगडी॥
पंदरा तिथीका करूं मैं वरनन, चतुर समजलो मनमाही । धरो ध्यान अभिमान मेट के, सत्गुरु चरणे
चितलाई ॥ टेर ॥ एकम के दिन एक आसता जिन मारग की रखलेना, वीज बंध दो हैंगे जगतमें राग द्वेषको
सज देना | तीज तीन तत्त्व का निरणा, भिन भिन सेती करलेना । चोथ चारतिर्थ जिनन्द का, उनसे हिल मिल
के रहेना । पांचम के दिन पांच जीतलो पांचों भजिये सुखदाई ॥ धरो ध्यान ॥ १॥ छठ छः काया जीव जगत
उनकी रक्षा नित करना । सातम के दिन सात व्यसन की संगत दूरी तज देना । आठम के दिन इष्ट सुमर कर
अष्ट कर्म को क्षय करना । नवमी नव तत्त्व को श्रावक मनमें यथा समज लेना । दशमीके दिन धरम भेद दस
वरनन किया सुत्र माई ॥ धरो ध्यान ॥ २ ॥ ग्यारस के दिन ग्यारा अंगमें जिनवाणी जिनवर गाई । बारस के
दिन बारावरत की मर्यादा करलो भाई। तेरसके दिन तेरकाठिया कर्मोंका है. दुखदाई, चवदसके दिन चवदा नियम
को चितारो चित्तके माई । पूनमके दिन पूरा पन्दरा सिद्ध हुवा है सुखदाई ॥ धरो ध्यान ॥ ३ ॥ इसी रीतिसे
पंदरा तिथिकी पन्दरा शिक्षा बतलाई, ज्ञानी समजे अपने ज्ञानमें मूरख क्या समझे भाई। जैन धर्मके मर्मको पाना
बहुत कठिन है जगमाई, भवसागरका पार उतरना यहभी मुश्किल है भाई । हीरालाल कहै ऐसी रीतसे जिन मारग
सहिमा गाई ॥धरो ध्यान ॥ ४ ॥
आके कहनाजी; येही क्षत्रिका धर्म जान पांब पीछा नहीं देनाजी । या वात- सुनी नरनाथ हुकम फरमायो, महा- राज; सेना की करनी त्यारीजी ॥ एसो तीन.॥ २ ॥ ये गज घोडा रत्थ जोड के पैदल पूरा । महाराज, जिन्होंपर पाखर पडियाजी, श्रीकुंभराज महाराज.,हाथीके होदे चडियाजी । ये चंबर बीजता चार आयुध संग लीना । महाराज, चमकती दूती जिम अणियांजी, आया देश आपके प्रांत हुकमसे तंबु ताणियाजी । ये दोनों तरफसे रण भूमिपर आया। महाराज, युद्ध जहां हो रहा जहारीजी ॥ एसो- तीन ॥ ३ ॥ ये छहुँराजा मिल जोर जबर उठाया । महाराज, कुंभका लश्कर भागाजी, लीनी मिथिला नगरी घेर सोच बहु राजा को लागाजी । जद मल्लिनाथ महाराज बात या पूछी, महाराज; बापको दिया दिलासाजी, नृपति लिया बुलवाय, महलके अंदर खासाजी-पुतली का रूप से सभी भूप लोभाना महाराज, मल्लिजिन ढंक उघारीजी ॥ एसो तीन ॥ ४॥ या आई वास दुर्गन्धकी भूप घबराना । महाराज, मल्लिजिन ज्ञान सुनावेजी। एसी काया कारमी जान भूप थे क्यों लोभायाजी । आपी तीजा भव में मेलो संयम पाल्यो । महाराज, हुवा सुरगति अवतारीजी, पाया जातिस्मरण ज्ञान बात या सुनी जब सारीजी । श्री मल्लिनाथ महाराज धर्म चलायो । महाराज, भूप तिहां संजम लीनोजी, उगणीसें बांसटके साल चौमासो रामपुरामें | हीनोजी । श्री ज्वाहिरलालजी महाराज विराज्या छे ठाणे । महाराज, हीरालाल कहे बलिहारीजी ।। एसो तीन ॥५॥ ॥४१॥ लावणी चाल:-द्रोण ॥ या जिनमारग की शोभा करनी वरनी, महाराज नंदी खेण भव के मांही जी, हुवा वासुदेव महाराज म क । कार और धन आरंभको, तजकर गया नंगा होना । करम धरम दोई संग चलेगा, और किसी को नहीं लेना ॥ पाप करमको ॥ ५ ॥ शुक्र सुकत कीजे करनी, दुष्कृत दूर गति वरनी, एक सुमता और दूजी कुमता, दो नान्यो चेतन परनी। काल अनादी दुःख अघाहादी, पायो कुमती कर करनी, गयो नरकमें उडे गरक में सुकृत नहीं 45 कीनी करनी । कुमता मोयो जनम यों खोयो, नहीं सुमता को कियो कहनो ॥ पाप करमको ॥ ६ ॥ थावर स्थिरता रक्खो मन में हाय हाय कहो क्यों करना, जैसे करम बांधे है जीवने; उसी तरह दुःख सुख सहेना । जो नर : is चाहता दुख मिटाना, तप संयम में चित्त देना । अखंड अरूपी ज्योति स्वरूपी शिवपुर में सुखसे रहना । हिरालाल | its कहे इसी तरहसे सात वार समझी लेना ।। पाप करमको ॥ ७ ॥ ॥ ४० ॥ लावणी चाल:-द्रोण ॥ श्रीमल्लिनाथ महाराज हुए अवतारी | महाराज, आप रहे बाल ब्रह्मचारीजी । एसो तीन लोक में रूप और नहीं कोई नरनारीजी ॥ टेर ॥ या मिथला नगरी पृथ्वी भूपण सोहे। महाराज, कुंभराजा बड भागी नी, जांके प्रमावती पटनार पतिसंग रहे अनुरागीजी । ये जयंत विमाण बत्तीस सागर सुख पाया । महाराज, भूप के घर अवतरियाजी , जहां छपन. कंयारी नार मिली सब कारज करियाजी । सुरपति सुमेरू गिरि पे महोत्सव कीनो। महाराज; वेद त्रिलिंगधारीजी ।। एसो तीन ॥ १ ॥ ये छः देशोंका भूप रूप सुन मोया महाराज, परणवा काजे आयाजी । लेई दलबादल जोर घोर निशान घुरायाजी । ये सुभट सभी सिरदार युद्धके करना; महाराज; कुंभको | * . क क आके कहनाजी; येही क्षत्रिका धर्म जान पांव पीछा नहीं देनाजी । या बात सुनी नरनाथ हुकम फरमायो, महा- राज, सेना की करनी त्यारीजी ॥ एसो तीन.॥ २ ॥ ये गज घोडा रत्य जोड के पैदल पूरा । महाराज, जिन्होंपर पाखर ,पडियाजी, श्रीकुंभराज महाराज,हाथीके होदे चडियाजी । ये चंवर वीजता चार आयुध संग लीना । महाराज, चमकती दूती जिम अणियांजी, आया देश आपके प्रांत हुकमसे तंबु ताणियाजी । ये दोनों तरफसे रण भूमिपर आया। महाराज, युद्ध जहां हो रहा जहारीजी ॥ एसो- तीन ॥ ३ ॥ ये छहुँराजा मिल जोर जबर उठाया। महाराज, कुंभका लश्कर भागाजी, लीनी मिथिला नगरी घेर सोच बहु राजा को लागाजी । जद मल्लिनाथ महाराज बात या पूछी, महाराज; बापको दिया दिलासाजी, नृपति लिया बुलवाय, महलके अंदर खासाजी-पुतली का रूप से समी भूप लोभाना महाराज, मल्लिजिन ढंक उघारीजी ॥ एसो तीन ॥ ४ ॥ या आई वास दुर्गन्धकी भूप घबराना । महाराज, मल्लिजिन ज्ञान सुनावेजी। एसी काया कारमी नान भूप थें क्यों लोभायाजी । भापी तीजा भव भेलो संयम पाल्यो । महाराज, हुवा सुरगति अवतारीजी, पाया जातिस्मरण ज्ञान वात या सुनी जब सारीजी । श्री मल्लिनाथ-महाराज धर्म चलायो । महाराज, भूप तिहां संजम लीनोजी, उगणीसें बांसटके साल चौमासो रामपुरामें हीनोजी । श्री ज्वादिरलालजी महाराज विराज्या छे ठाणे । महाराज, हीरालाल कहे बलिहारीजी । एसो तीन ॥५॥ ॥४१॥.लावणी चाला-द्रोण ।। या जिनमारग की शोभा करनी वरनी, महाराज नंदी खेण भव के मांही जी, दुवा वासुदेव महाराज राजऋद्ध सम्पत पाईजी ॥ टेर ॥ या करी प्रशंसा इन्द्र वर्ग के माही; महाराज; किसी के आसता न आईजी; करी रूप वेके देव मुनि से करी छलपत राईजी । ये मुनिराज नहीं डिग्या व्यावच माई, महाराज; देवता परगट हुवा जी, थांका इन्द्र किया बखान आया हम परगट जोवाजी । जब मुनिराजके देवता पाँवाँ पड़ियो, महा- राज; गया सुर निज स्थानेजी, मारी करणी को फल होय मुनिजी ने किया निहानाजी । मैं स्त्रि वल्लभ होऊँ जग्त के मांही, महाराज, मुनिने करणी गमाईजी ॥ हुवा ॥१॥ फिर मुनिराज ने स्वर्ग तणी गति पाई, महाराज, सोरी- पुर नगर सुहाना जी, हुवा जादुवंश दश भ्रात लघु वसुदेव कहानाजी । ये नल कुंवर सम रूप इन्द्र सम काया, महाराज, पूरबली करणी जबरी जी; हुवा कामणी मोहनलाल डोले संग नाऱ्यां सगलीजी । केई रहे उगाड़ा द्वार चोर घुस जावे, महाराज; लाज नहीं रहे नेना में जी; केई उलट किया सिणगार चलो नहीं पति के कहने में जी । जब वसुदेव महाराज रम्मत को जावे, महाराज; शहर में धूम मचाईजी ॥ हुवा वसुदेव ॥ २ ॥ ये लोक गया घबराय नाऱ्यां नहीं माने; महाराज; सेठ मिल आया दरबारे जी; सब किया हाल परकास बात बड़ा बड़ी विचारे जी । मैं रहूँ दूसरे ठाम भूमि बतावो, महाराज; राजा दम दिया दिलासा जी; रहे अर्थ मंत्री दोई बात सला कोई विमासाजी । अब सेवा देवीजी से समुद्र विजय इम बोले, महाराज; प्यारा सवाया जी, मत जावो बावड़ी बाग रहो महेलां के मायाजी । करलिया वचन प्रमाण हट्ट नहीं कीनी महाराज द्वारे सब दिया चेताई जी ॥ हुवा वसुदेव ३॥ करता रमत निज महेल के अंदर भारी, महाराज; कपट में कुंवर न जाणीजी, दासी के हाथ राजा के काज चंदन भेज्यो राणीजी । ये रमता आया वसुदेव दासी से मांग्यो, महाराज; त्रिया की ओछी बुद्धिजी; नटगई जोरसे जाय लिया जब थाप की दीधीजी । ये खोस लिया जबरन से जोर नहीं चाल्यो, महाराज; आप के अंग लगायो जी; और बांट दियो सभी साथ फेर तो घणो पोमायोजी। जब होई खिसानी दासी बात परकाशी, महाराज; कुँवर में है बहु चतुराईजी ।। हुवा वासुदेव ॥ ४॥ ये अश्व चढ़ी नृप वेस कियो मध्य राते थाप महाराज शहर के अंदर आयाजी । एक दरवाजे लिख्यो लेख हम से क्यों घबरायाजी । यो श्मशान में मुर्दो एक जलायो, महाराज भूषण सब दिया पहेराईजी । फिर किया विप्रका वेश बात को पतो न पायाजी । ये सोला वर्ष परदेश में फिरके आया, महाराज; बहोत्तर सहस्र नारयां परणीजी । हुवा हरिहलधर दोई पुत्र जक्त में महिमा वरणीजी । श्री जवा- हिरलालजी महाराज काज सुधारयो, महाराज; हीरालाल गावे चितलाईजी ॥ हुवा वासुदेव ॥ ५ ॥ ॥ ४२ ॥ लावणी चाल:-छोटी कड़ी। पाण्डव राजा के पुत्र पांच बलधारी, जुएँ के खेल में गए द्रोपती हारी ॥ टेर ॥ ये धृष्टराष्ट्र के पुत्र हुवे शत जहारी, कौरव कूड़ कपट लपट है भारी; पाण्डव राज की लिवी भूमि सब सारी, जब दोनों तफरसे हुवा लश्कर त्यारी । और बाजे शंख अरु बाण सरासर भारी ॥ जुएँ के ॥ १ ॥ हरि आया मदत पर पाण्डव जीत कराई, हुवा महाभारत कुरु क्षेत्र के माई । जब कौरव दिल के बीच गए घबराई, फिर एसा करे उपाव राज छिनवाई । दुष्मन नहीं छोड़े दाव कपट भन्यो भारी ॥ जुएँ के ॥ २ ॥ जन पाण्डवसे यों कहे कौरव मिल सारे, राजऋद्ध सम्पत पाईजी ॥ टेर ॥ या करी प्रशंसा इन्द्र खर्ग के मांही; महाराज; किसी के आसता न आईजी; करी रूप वेके देव मुनि से करी छलपत राईजी । ये मुनिराज नहीं डिग्या व्यावच माई, महाराज; देवता परगट हुवा जी,-यांका इन्द्र किया बखान आया हम परगट जोवाजी । जब मुनिराजके देवता पाँवाँ पड़ियो, महा- राज; गया सुर निज स्थानेजी, मारी करणी को फल होय मुनिजी ने किया निहानाजी । मैं नि वल्लभ होऊँ जग्त के माही, महाराज; मुनिने करणी गमाईजी ॥ हुवा ॥ १॥ फिर मुनिराज ने स्वर्ग तणी गति पाई, महाराज, सोरी- पुर नगर सुहाना जी, हुवा जादुवंश दश भ्रात लघु वसुदेव कहानाजी । ये नल कुंवर सम रूप इन्द्र सम काया, महाराज; पूरबली करणी जबरी जी; हुवा कामणी मोहनलाल डोले संग नाां सगलीजी । केई रहे उगाड़ा द्वार चोर घुस जावे, महाराज; लाज नहीं रहे नेना में जी; केई उलट किया सिणगार चलो नहीं पति के कहने में जी ।। जव वसुदेव महाराज रम्मत को जावे, महाराज; शहर में धूम मचाईजी ॥ हुवा वसुदेव ॥ २॥ ये लोक गया घबराय नाऱ्यां नहीं माने; महाराज; सेठ मिल आया दरबारे जी; सब किया हाल परकास वात बड़ा बड़ी विचारे जी । मैं रहूँ दूसरे ठाम भूमि बतावो, महाराज; राजा दम दिया दिलासा जी; रहे अर्थ मंत्री दोई बात सला कोई विमासाजी । अब सेवा देवीजी से समुद्र विजय इम बोले, महाराज; प्यारा सवाया जी, मत जावो बावड़ी बाग रहो महेलां के मायाजी । करलिया वचन प्रमाण हट्ट नहीं कीनी महाराज द्वारे सब दिया चेताई जी ॥ हुवा वसुदेव ॥३॥ करता रमत निज महेल के अंदर भारी, महाराज; कपट में कुंवर न जाणींजी, दासी के हाथ राजा के काज चंदन भेज्यो राणीजी । ये रमता आया वसुदेव दासी से मांग्यो, महाराज; त्रिया की ओछी बुद्धिजी; नटगई जोरसे जाय लिया जब थाप की दीधीजी । ये खोस लिया जबरन से जोर नहीं चाल्यो, महाराज; आप के अंग लगायो जी; और बांट दियो सभी साथ फेर तो घणो पोमायोजी। जब होई खिसानी दासी बात परकाशी, महाराज; में है बहु चतुराईजी ॥ हुवा वासुदेव ॥ ४ ॥ ये अश्व चढ़ी नृप वेस कियो मध्य राते थाप महाराज शहर के अंदर आयाजी । एक दरवाजे लिख्यो लेख हम से क्यों घबरायाजी । यो श्मशान में मुर्दो एक जलायो, महाराज; भूषण सब दिया पहेराईजी । फिर किया विप्रका वेश बात को पतो न पायाजी । ये सोला वर्ष परदेश में फिरके आया, महाराज; बहोत्तर सहन नारयां परणीजी । हुवा हरिहलधर दोई पुत्र जक्त में महिमा वरणीजी । श्री जवा- हिरलालजी महाराज काज सुधारयो, महाराज; हीरालाल गावे चितलाईजी ॥ हुवा वासुदेव ॥ ५ ॥ ॥ ४२ ॥ लावणी चालः-छोटी कड़ी ।। पाण्डव राजा के पुत्र पांच बलधारी, जुएँ के खेल में गए द्रोपती हारी ॥ टेर ॥ ये धृष्टराष्ट्र के पुत्र दुवे शत जहारी, कौरव कूड़ कपट लपट है भारी; पाण्डव राज की लिवी भूमि सब सारी, जब दोनों तफरसे हुवा है लश्कर त्यारी । और बाजे शंख अरु बाण सरासर भारी ॥ जुएँ के ॥ १ ॥ हरि माया मदत पर पाण्डव जीत कराई, हुवा महाभारत कुरु क्षेत्र के माई । जब कौरव दिल के वीच गए घबराई, फिर एसा करे उपाव राज छिनवाई । दुष्मन नहीं छोड़े दाव कपट भयो भारी ॥ जुएँ के ॥ २ ॥ जब पाण्डवसे यों कहे कौरव मिल सारे, आपी खेला जुवां राजा दाव धरे हारे; कौरवं कपट बहु पांसा जुगतसे डारे, पर जुवांबाज नहीं माने इस्क पड्यो लारे । पाण्डव गया हार जब द्रोपती दांव पर डारी । जुएं के ॥ ३ ॥ द्रोपती हार गया पाण्डव मुख विलखाना, होनहार टले नहीं होवे लाख सयाना; जब पकड पल्लो द्रोपती को खेंचन लागा, केशयां कसुमल चीर उतरवा लागा। पाण्डव खड़ा खड़ा देखे आवे नहीं आगा, द्रोपतीको लीनी घेर कौरव सब नागा, घबरानी सती अब लज्जा रखो कोई हमारी ॥ जुएँके ॥ ४ ॥ मेरे पांच पति भरतार देख रया दूरा । पर कोई न आवे पास पुण्य क्या पूरा; कोई शील सहाई देव आवो तो हजूरा, मारी साहाय करो भगवान होवे कोई सूरा | जब लगा वोल पाण्डवको उठे ललकारी ॥ जुएँके ॥ ५ ॥ अर्जुन भीमयों कहे दुष्ट कहां जावे, ये अपना किया पाप आप फल पावे; एक २ मारी लात परलोक पहुँचावे, दिया पकड २ गरदन जमी मिलावे । सब दुष्टोंकों डाले मार घरे लाया नारी ॥ जुएँके ॥ ६ ॥ या सती बडी सत्यवान जगत जश गाया, पर जिसने किने कर्म उसीने पाया; ये श्रावण मास शुभ दिन देख कर गाया, हीरालाल कहे शहर पाली चोमासा ठाया। श्रीनंदलालजी महाराज ठाणा सुखकारी ॥जुरके ॥ ७ ॥ ॥४३ ॥ श्रीशांतिनाथजी की लावणी, चाल:-छोटीकड़ी ॥ श्री शांतीनाथ महाराज अर्ज सुणो मेरी । तुम शांती करण जिनराज सरण आयो तेरी ॥ टेर ॥ येह स्वार्थसिद्ध विमाणसे चंवकर आया । हस्तीनापुर नगर में जन्म लियो जिनराया ॥तिहां छप्पन कुमारी मिलकर आपी खेला जुवां राजा दाव धरे हारे; कौरवं कपट बहु पांसा जुगतसे डारे, पर जुवांबाज नहीं माने इस्क पड्यो । पाण्डव गया हार जब द्रोपती दांव पर डारी । जुएं के ॥ ३ ॥ द्रोपती हार गया पाण्डव मुख विलखाना, होनहार टले नहीं होवे लाख सयाना; जब पकड पल्लो द्रोपती को खेंचन लागा, केशंन्या कसुमल चीर उतरवा लागा । पाण्डव खड़ा खड़ा देखे आवे नहीं आगा, द्रोपतीको लीनी घेर कौरव सब नागा, घबरानी सती अब लज्जा रखो कोई हमारी ॥ जुएँके ॥ ४ ॥ मेरे पांच पति भरतार देख रया दूरा । पर कोई न आवे पास पुण्य क्या पूरा; कोई शील सहाई देव आवो तो हजूरा, मारी साहाय करो भगवान होवे कोई सूरा । जब लगा बोल पाण्डवको उठे ललकारी ॥ जुएँके ।। ५ ॥ अर्जुन भीमयों कहे दुष्ट कहां जावे, ये अपना किया पाप आप फल पावे; एक २ मारी लात परलोक पहुँचावे, दिया पकड २ गरदन जमी मिलावे । सब दुष्टोंकों डाले मार घरे लाया नारी । जुएँके ॥ ६ ॥ या सती बडी सत्यवान जगत जश गाया, पर जिसने किने कर्म उसीने पाया; ये श्रावण मास शुभ दिन देख कर गाया, हीरालाल कहे शहर पाली चोमासा ठाया। श्रीनंदलालजी महाराज ठाणा सुखकारी |जुरके ॥७॥ ॥४३ ॥ श्रीशांतिनाथजी की लावणी, चाला-छोटीकड़ी ॥ श्री शांतीनाथ महाराज अर्ज सुणो मेरी । तुम शांती करण जिनराज सरण आयो तेरी ॥ टेर ॥ येह स्वार्थसिद्ध विमाणसे चवकर आया । हस्तीनापुर नगर में जन्म लियो जिनराया ॥ तिहां छप्पन कुमारी मिलकर 强强强强强强强强强强强强强强路器带路器 मङ्गल गाया । प्रभुका मेरु पर महोत्सव किया सुर धाया ॥ बाजेताल मृदंग अति चंग, दुन्दभी मेरी ॥ तुम ॥ १ ॥ जवशांती हुई सब देशका रोग मिटाया । तब नाम प्रभुजी का शांती कुंवर धराया ।। हुवा षट खंड नायक चक्र- वर्ती पद पाया । दिया वर्षी दान फिर संयम लेना चित्त चहाया। जब हुवा केवल ज्ञानप्रकाश जीतलिये वैरी ॥तुम।। ॥ २ ॥ मैने लिवी आपकी ओट चरण की छाया । तुम जग तारण जिनराज तजी जग माया । यह अष्ट कर्मके विकट कोट को ढाया । तुम लिया मोक्षका महेल हुवा मन चहाया ॥ जहां सुख सागर की लेहर अनन्ती हैरी ॥ तुम ॥ ३ ॥ श्रीजवाहिरलालजी महाराज हुकम फरमाया. । कुकडेश्वर ठाना तीन चौमासा ठाया ॥ सूत्र की वाणी मुणकर जोर लगाया । करी पचरंगी प्रमुख तपश्या भाया ॥ कहे "हीरालाल" दयाधर्म मोक्षकी सेरी ॥ तुम ॥ ४ ॥ ॥४४॥ श्रीमहावीरस्वामीका मंगल स्तवन ॥ लावणी चालः-लंगड़ी ॥ श्रीमहावीर बलवंत अनन्ता । कर्म शत्रूको दूर हरै ॥ वृद्धमान वृद्धीके कारण । ऋद्धिवृद्धि भंडार भरै ॥ अमरपति नरपति खगपति । सेवा करे जिन वर चरणं ॥ जय जिनेन्द्र जय जिनेन्द्रं । तुम शरणं हम सुख करणं ॥ १॥ चौसठं इन्द्र और इन्द्राण्यां । मिल मिल कर मङ्गल गावे ॥ फलोंकी वर्षा होवे शु शरखा । देख अरिदल मुर जावे ॥ जिन वाणी को सुणे सुणावे | सुखसागर लीला वरणे ।। जय ॥ २ ॥ अर्ज करं जिनराज आपसे || तुम रक्षा के करनेवाले । सेवे सुरिंदा तेज दिणंदा । दीपे जिणंदा प्रतिपाले ॥ अक्षय पुण्य कमाया दमकतीकाया । कंचन वरणं देह धरणं ॥ जय ॥ ३ ॥ रवि चन्द्रमा सभी जोतषी । भरा रहे समुद्रपानी ॥ भूमंडल अचल जिम व मेरु । तब लग रहो यह जिनवाणी ॥ सदा रहो गुलजार गिरामी । भवभव पातकके हरणं ॥ जय ॥४॥ सद! देव गुरु धर्म आपकी । बनी रहो यह गुल क्यारी ।। श्री रत्नचंद्रजी महाराज राजके । जवाहिरलालजी यश धारी ॥ संवत उन्नीसो पेंसठ वर्षे । हीरालाल कहे तारण तिरणं ॥ जय ॥ ५ ॥ ॥ ४५ ॥ उपदेशी लावणी-अधरवरणोंमें चाला-लंगड़ी ॥ सुणो जिकर यह इसी जगतका । सद्गुरु राह दरसाते हैं ॥ ज्ञानकी झड़ियां; लगाकर । तुर्त आनन्द दिखलाते हैं । टेर ॥ देखो चतुर नर दिलके अन्दर | कौन तुझे है तारण हार ॥ सज्जन सारे, इन्होंके । मोहमे नरतनकी नही हार ॥ धनदौलत और सारा खजाना । यह नहीं चलते तेरे लार || क्यों ललचाना, लालचसे दुःख देखता हे संसार ॥ कुसंगत नहीं करना । कुलक्षण नाहक लगाते है ॥ ज्ञान ॥ १ ॥ धन दौलत धरती अन्दर । धर २ चैतन्य राह धरी || कोड़ी कोडी, जोड़ जोड़ कर । लाखों क्रोडों संचय करी ॥ जिस दिन चैतन्य कूच करेगा। धरी रहेगा संची सिरी ॥ जिन्हने सुकृत्य किया, इसीसे । वोही संसारसे गये तिरी ॥ सतगरू करके दयासदा अज्ञानी को जताते हैं ॥ ज्ञान० ॥२॥ केई अज्ञानी करते निंदा । उनके संगे नहीं जाना ।। दुर्जन सेती शांति रख राग द्वेषको हटाना । गधा टेकको दूर हटादो। क्यों करते तानों ताना ॥ कर चतुराई करो कोई । गुण अवगुणकी पेछाना । ज्ञानीजन गुणके सागर हे सीधी राह लगाते हैं ॥ ज्ञान० ॥ ३ ॥ क्यो इस तनका लाड़ लड़ावो । अत्तर अर्गचा लगाया हैं ॥ कंठी डोरा धारण कर । चले निरखता छांया है ॥ साधू संतको देखके दुर्जन गंडक ज्यों घुरीया है । सोंच अज्ञानी आर्यक्षेत्र कठिनसे आया है ॥ छ काया की रक्षा करना । सूत्रोंसे दिखलाते हैं ॥ ज्ञानी ॥ ४ ॥ तजो त्रियाका संग है झूठा । जिनने केईको किया कंगाल ॥ जो नर हैं. अन्धे, उनको । नरकके अन्दर दिये हैं डाल ॥ दान दया सत्यशील आराधो । यही रचा है वर्गका ख्याल | सायरका गाना, सुनाते । चतुरनको यों हीरालाल ॥ रत्नचंद्रजी गुरुज्ञान सिखाया । उनको शीश झुकाते हैं ॥ ज्ञानी ॥५॥ ॥४६ ॥ लोकस्वरूपदर्शक लावणी चाला-लंगड़ी ॥ सुणो जिकर यह तीन लोकका । ज्ञानी का ज्ञान सुनाते हैं | चउदा राजू प्रमान देखलो। स्वर्ग नर्क बतलाते हैं । टेर ॥ सात राजू प्रमाण उंचे हैं । सात राजू नीचो जाणी ॥ पांचसो त्रेसठ भेद जीवका । त्रस स्थावर वस्ता प्राणी ।। चार गति चौवीस दंडक । सबही इसमें समानी ॥ सात राजू वो अधो पति व्यंत्तर नर्क ठानी ॥ व्यंत्तर देवके नगर असंख्या । लंबा चौड़ा पहचानी ।। सात कोटी और बहोत्तर लाख हैं । भवन पतियोंके मवनानी ॥ व्यंत्तर देव का बत्तीस इन्द्र हैं । भवन वीसा कहलाते हैं ॥ च० ॥ १ ॥ सात नर्क का बयान सुनलो । सात राजू जो फरमाया ॥ गुण पच्चास पांथड़े, चौरासी लाख नर्क का बतलाया ॥ वसे जीव बहुत काल नर्कमें । मोटा पाप जो कमाया ॥ परमाधामी पन्द्रह जातका । पापी को दुःख वह दिखलाया ॥ तिर्यंच मनुष्य और ज्योतिषी ।- मध्य लोकमें कहवाया । वरणन इनका सूत्र में देखो । यहां गाने में नहीं आया । द्विप समुद्र असंख्य २ है । सूत्रों में फरमाते है ॥ च० ॥ २ ॥ जंबू द्वीप है सत्र के अन्दर । लाख योजन के भवनमें ।। भवन मांही है ॥ कर्मा भूमी वसे जुगलिया । क्षेत्र नव मुख दाई है ॥ मेरु पर्वत सबसे ऊंचा । वन चार वीट्याई हैं । पडंग वनमें शिलाचार है । महोत्सव करे सुर आई है ॥ चंद्र सूर्य और सभी ज्योतिषी । रझा चक्र लगाई है ॥ सोला हजार सुर उठानेवाले। चंद्र सूर्य के ताई है ॥ रातदिन जो करे परियटना । शुभाशुभ वरताते है ॥ च० ॥ ॥ ३ ॥ स्वर्ग छब्बीस है ऊंचा लोकमें । बारह कल्प कहवाना है ॥ दश इन्द्रतक सभी रचना। आगे अहेमेन्द्र देवाना है । चउरासी लाख सतानु सहश्र । उपर तेवीस जो जाना है | स्वार्थ सिद्ध है सबसे ऊंचा । पुण्यवंतो का ठिकाना है | वहांसे बारह योजन उंची । सिद्ध सिलापर मुक्तिपाना है || सुख अनंता सिद्ध भगवंतका.। जन्म मरण दुःख मिटाना है । जवाहिरलालजी गुरुप्रसादे । हीरालाल सुख पाते है । च० ॥ ४ ॥ ॥ ४७ ॥ श्रीगुरुउपकारकी लावणी चाल:- अष्टपदी ॥ बंदगी करो गुरु की गुणवान । जिनोका है सिरपर अहसान ॥ टेर ।। अगर जो दिया है संयम भार ।। उनोंका है मोटा उपकार ॥ होवे जो ज्ञान तणा दातार । गुणों का गुण भुले जो गंवार ॥दोहा॥ रात दिवस चरणा विषे । रह्यो चित लपटाय ॥ अली पंखज और शंख सरीखा | उज्वल ध्यान लगाय || मिलत ॥ हमारी यह विनंति । मान ॥ बंदगी ॥ १ ॥ भण गुण किया गुरु होशियार, फिर, वो मरते खारोखार || बचन वो बोले कठिन तल- वार । चालसे चले दुष्ट आचार ॥ दोहा ॥ अपने मत फिरता फिरे । बोले औगुणवाद ॥ खच्छन्दी अंध मदमाता । नाम धसते साद ॥ मिलत ॥ लजाते घर अपना अज्ञान ॥ बंदगी ॥ २ ॥ डोळे केई नुगरा होवे संसार । जिनों ARRES परलाख पापका भार ॥ मत करो उनका होई इतबार । फेलाते जगमें झूठी जार ॥दोहा।। निनवादी सब देखलो । पर भवके दरम्यान || काला मुंहका होवे देवता । अलग जीनोका स्थान ॥ मिलत ॥ उन्हों को कोई नहीं छीते जहान ॥ बंदगी ॥ ३ ॥ सिखाया सूत्र अर्थ और पाट । बताई मोक्ष जानेकी वाट । उन्होंसे रखे जो दिलमें आंट । कपट की भरी गांठों गांठ ॥ दोहा ॥ मोका होवे कोई कामका । टल्ला लहे तुरंत ॥ पडेल बैल गलियार गधाजिम । चले न सीधा पंथ ॥ मिलत ॥ नतीजे का पुरा । है अजान || बंदगी ॥ ४ ॥ नुगरा करे मोक्षमें वास । कभी नहीं होय मोक्षके पास | उसके कर्मसे उसका नाश । फल जिम लगे जंगल में बांस ॥ दोहा ॥ कणक कुंड को त्याग कर । सूवर भिष्टा खाय. ॥ सडे कानके श्वान ज्यो । शास्त्र में बतलाय ॥ मिलत || मिले क्या मान और सन्मान ॥ बन्दगी ॥ ५ ॥ अपनी हेसीयत के प्रमाण । बंदगी करो पकड़ दो कान ॥ तकब्बूर तजो याने अभिमान । वही गुणीजन गुणकी खान ॥ दोहा ॥ गुरु महिमा सब मत में । वरणन करी अनन्त ॥ हीरालाल को जवाहिर- लालजी । मिले गुरु गुणवंत ॥ मिलत || जभी तुम करते हो व्याख्यान ॥ बन्दगी ॥ ६ ॥ ॥४८ ॥ ज्ञान बगीचा-लावणी चाल:-छोटी कड़ी ॥ मालीने लगाया बाग । बडा गुलजारी ॥ फूल रहे श्ल फलवाद । केशर की क्यारी || टेर || आत्म अपनीका अंबका पेड लगाया ॥ यत्नाका जांबू डालो डाल फैलाया । यह सतका सीताफ़ल शीतल है छाया ॥ लगत है अति मीठा अमृत फल खाया ॥ यह बड पीपल दोई अभय सुपात्र भारी ॥ फल ।। १ ।। मनका मोगरा चितकी चमेली फैली ॥ गुरुभक्तिका गुलाब डगाल्यां पहेली ॥ किरियाकी केतकी केवडा दोनों भेली ।। चरचाको चंदन शीतल सुगन्धी मेली ॥ या सील रसनी सडक बनी चउदारी ॥ फूल ॥ २ ॥ यह तीन तत्त्वका तीनों भेद कहलाना ॥ नारंगी नीम्बू जामफलका खाना ॥ नारेल खजूरा खारक पेड मेवाना ॥ उत्तम लेशा तीनों तीन पहचाना ॥ या दाखोंकी वेली विनयका मंडप जहारी ॥ फूल ॥ ३ ॥ यह नव तत्त्वका मेवा नाना प्रकारे । अंजीर अंगूर विदाम पिस्ता छुहारे ॥ चैतन्य माली करे रक्षा बागकी वाहारे ॥ क्षमाका कोट अति किया बहुत हुशियारे ॥ प्रमाद रुप वस्तुकी करो रखवाली ॥ फूल ॥ ४ ॥ या जिनवाणीका नीर भर भर पीलावे ॥ मन वच कायाकी जेर धोरी चलावे ।। जब अमृत फलके खाया रोग नहीं आवे ॥ सब जन्म जराके दुःख दूर टलावे ॥ हीरालाल कहे ऐसी बागकी बहार करो नरनारी ॥ फूल ॥ ५॥ ॥ १९ ॥. लावणी आत्मज्ञान ॥ अगर दुनियामें हो होशियार । करत दिल जानसो विचार ॥ टेर ॥ कहांसे आया हो तुम चाल । कहांके तुम रह वाल, किसके हुकमसे करते ख्याल, यहां तुम मोज करो महाबाल ॥ दोहा ॥ क्या तुम लेकर आये किसका किया उधार ॥ क्या कमाई पल्ले बांधी । अब क्या करो विचार ॥ मिलत ॥ किसके हुकमपर चलते यार ॥ अगर ॥१॥ भूले क्यों योवन के जोर घमण्ड । भूले क्यों देख दौलत प्रचंड ॥ भूले क्यों देख विरादर अखंड । होवेगा तेरे सिरपर यमदंड ॥ दोहा ॥ क्यों भूला गुल बदनपर । गजरथ तेज तुरंग ॥ राज पाट और जमी जेवर । हो ॥ क्या क्या आते संग ॥ मिलत ॥ बंदे क्यों होते हो अन्धे यार ॥ अगर ॥ २ ॥ घमंडी हुवे केई सरदार । उन्होंका पता न पाया यार ॥ डुबाया तुमको वारम्वार । होगा कयामतके रोज इजहार ॥ दोहा ॥ जज कोर्ट बीचमें । होगा वहां इन्साफ ॥ हाकिम हुकम वहां गर्मागर्म है । क्या तुम दोगे जबाब ॥ मिलत ॥ लगे क्या वहांपर रिस्तेदार ॥ अगर ॥ ३ ॥ आखिर आखिर होना है खलास । पहोंचना हजरतही के पास ॥ इताअत करोमिया फरमास जिंदगी जीना इनकार के वास ॥ दोहा ॥ जन्म सुधारण चहात हो । तो करो गुरुकी सेव ॥ हीरालाल दरम्यान सभाके । चेताते नित्यमेव ॥ मिलत ॥ गाफिल क्यों होते हो अन्धेयार ॥ अगर ॥ ४ ॥ ॥५०॥ पंडित लक्षण लावणी ॥ पंडित होवे जो प्रवीण । पापसे डरते रात और दिन ॥ टेर ॥ दर्द सब जीवोंका पहिचान । हटावो क्रोध लोभ और मान ॥ हणे नहीं किसी जीवके प्राण । समजलो यही ज्ञान और ध्यान ॥ दोहा ॥ केई कन्दमूल भक्षण करे । मदमांसको आहार ॥ रयणी भोजन रक्त काममें । दुर्बुद्धि आचार ॥ मिलत ॥ डोलते मायामें ज्यों बगमीन ॥ पंडित ॥ १ ॥ चंद रोज चलने के दरम्यान । गुजरी वक्तपर धर ध्यान || करो गुण अवगुण की पहिचान ।। 23 घमंड क्यो रखते हो इन्सान ॥ दोहा ॥ क्यों जाते हो वैरान को । सबिल बड़ा हैं दूर ॥ अंधे हो क्यों गिरो कूपमें । जो दरिया का पूर ॥ मिलत ॥ क्यों तुम करते हो गमगीन ॥ पंडित ॥ २ ॥ साधू का पंथ कठिन आचार । खोजा क्या उठावे तलवार ॥ गधे से उठे न गज का भार ! रंक क्या करे राजका कार ॥ दोहा ॥
माया जाल के बीचमें । फसे दौलत परिगर ॥ जुवां बाज अशक इश्कमै । क्यो होता है खुवार ॥ मिलत ।। डोलता लोभ माहे हो, लीन ॥ पंडित ॥ ३ ॥ असे अब ध्यान सदा महावीर । तोड़े सब कर्मोकी जंजीर ॥ पहोच जो जाता. मोक्षके तीर । कभी नहीं होते हैं दिलगिर ॥ दोहा ॥ गुन्हेगार के गुन्हे को । वफा करो महाराज ॥ जवाहिरलालजी महाराज चरणसे । सभी सुधरेकाज । मिलत ॥ हीरालाल चरणोंमें चित चीन ॥ पंडित ॥ ४ ॥ ॥५१॥ उपदेशी लावणी छोटीकडीमें ।। यह कंचन वरणी काय पाय सुन प्यारे । क्यों करके कर्म जन्म अमोलक हारे ॥ टेर । यह सातो व्यसन संग तजोरे भाई । जो कुसंगत से लगे दाग तुम ताई ॥ अब क्यों भूला है भरम मायाके माई । तेरा योवन का यह जोर चला छिन्न मांई । मकुन तकीये वर उम्मर नहीं पाय दारे ॥ पाय ॥ १ ॥ अब साधुजी महाराज सुनावे जिनवाणी । तुम रखो पक्की परतीत झूट मत जाणी ॥ अब करो सखावत सुपात्र हिये हुल्लसानी । और करो कर्म से जंग खडे मैदानी ॥ यों करो भक्ती भगवंत की जन्म सुधारे ॥ पाय ॥ २ ॥ यह फिरे कालका चक्र खोफ जरा लाना । निज नाम धनी का लगा देना निशाना ॥ मत पीवो मदिरा तजो मांस का खाना ॥ क्यों करते हो पर द्वारपर आना जाना । मत करो सोहबत जाहिलों की जन्म बिगारे ॥ पाय ॥ ३ ॥ यह जीना जिन्दगी यही फरज़ है तुमको ॥ भक्ति प्रभूकी. याद करो हरदम को ॥ यह क्रोध मानमद मोह जीतलो मनको ॥ करो ज्ञान ध्यान का युद्ध हटावो यमको ॥ कहे हीरालाल भगवत से ध्यान लगारे । पाय ॥ ४ ॥ VR VIL EVI2 ॥ ॥ ५२ ॥ लावणी उपदेशी-चाल:-छोटी कड़ी ॥ तूं क्यों करता है मान । थोडा है जीना । तेरा चला जाय यौवन । पानी का फीना ॥ टेर ॥ बड़े भूप केई गर्भ के अन्दर छाया ।। होगये दुनिया में जैसे बद्दल की छाया ॥ चिलका बिजली रेन में स्वप्ना आया ॥ क्या लाती है देर झबक झबकाया ॥ रावण के मुताबिक केई हुवे तखमीना ॥ तेरा ॥ १ ॥ महलों में होता था राग चमर ठूलाता ।। भरा रहता था दरबार पार नहीं आता ॥ दिन, रैन विषय में रहते रंग भर राता ॥ ले गया उनको काल पार नहीं पाता ॥ धरा रहा उन्हों का ठाठ राजका कीना ॥ तेरा ॥ २ ॥ जब उडे हंस समुद्र को सूखा देखी । कहां रहा नाम निशान जगत में एकी । केई हुवा तख्त मालिक आलीजा लेखी । बने दुर्गति के मेहमान जो करते सेखी ॥ ऐसे अक्कल में गौर हुवे परवीना ॥ तेरा ॥ ३ ॥ यह स्वार्थ का संसार सज्जन परिवारे ॥ ममताकी पोट क्यों धरते शिर तुम्हारे । सद्गुरु की सीख तूं मान मानरे प्यारे ।। यह दया धर्म दिल धार, पार उतारे ॥ हीरालाल कहे ऐसे होवो ज्ञान के भीना ॥ तेरा ॥ ४ ॥ ॥५३॥ लावणी-त्रियाचरित्र, चालः-खड़ी ॥ अमल अकल तुम सुनो चतुर नर । नारी के हुकम में नहीं रहना ।। तुच्छ बुद्धि त्रिया के तनमें । भेद उसको क्या देना ॥ २ ॥ पद्मावती राजा कोणिक की । थी पटराणी नारजी ॥ हार हायी लेने के वास्ते । कहा जो वारम्वारजी ॥ राजा को चेक ने नहीं विचारी | भाई से करी तकरारजी ।। हैल कुंवर उठ गये विशाला ।
नाना के दरबारजी । जब दोनों राजा के युद्ध हुवा था । शास्त्र में अधिकारजी ॥ हार हाथी हाथ नहीं आया
हुवा घणा संहारजी ॥ तजो मान भजो भगवान । सुनी गुरु ज्ञान हिये गहना ॥ तुच्छ ॥ १ ॥ मुनि एवंता आया |
गौचरी । कंसके महेला मायजी ॥ जीव जसा जब फिरगई आडी । करी कुबुद्धि बतलायजी ।। भाई तुम्हारा
राज करत है । थे डोहलो घरघर द्वारजी ॥ एक मात और तात तुम्हारा | कौन लेवे कर्म बटायजी ॥ जब मुनि ने
ज्ञान विचारा । होतब जैसा दरशायजी ॥ पुत्र नणंदका होसी सातमा । थने देसी खूणे वेठायजी || होनहार नहीं
मिटे किसीका नाम प्रभुका भजलेना ।। तुच्छ ॥ २ ॥ राजा रावण की बहिन पापनी । बुरी सीख बतलायजी ॥
बैठ विमाने चले राजवी । सीता लेनेको आयजी । करी कपट सीताको लीधी । लंका के बागमें लायजी ॥
हनुमंत उस की खबर करी है । सीता को सुख पायजी ॥ रामचन्द्र लश्कर ले चढ़िया । जब रावण घबरा-
यजी ॥ बांध लिया परिवार उसका । वो भी नर्क सिवाय जी ॥ ऐसा हाल मालूम हुवा है। चरित्र
त्रिया
का क्या कहना ॥ तुच्छ ॥ ३ ॥ और सूत्रों में कैईका वर्णन । समझो चतुर सुजानजी ॥ शामा
राणी के कहने सेती। हुवा घणा का घमशानजी ॥ अवला नाम सबले को जीते । तीन लोक
दरम्यानजी ॥ ब्रह्मा विष्णु शंकर इन्द्र । छत्रपति कौन ज्ञानजी ॥ पुरुष हुवा है पुण्यवंत केई । केई नाय
गुणखानजी ॥ धर्म ध्यान जो करे तपस्या । देवे सुपात्र दानजी ॥ हीरालाल हरदम सुनावे । सुधारस शिक्षा
बैना ।। तुच्छ ॥ ४ ॥
2 ॥५४ ॥ लावणी चाल:-लंगड़ी ॥ ज्ञान दर्सण दोही राह मुक्तिकी मेटे भव दुख जन्ममरणा। तन मन सेती अराध्या होवे हैं सागर तिरणा ॥ टेर । विकट पंथ है मोक्ष मार्गका भेद कोई विरला पावे । कथन कियासे कियासे गायो गायो सब गावे । इंद्रिया वश कर आत्म दमनों ऐसो दाय क्यों नहीं आवे । मुढपना से देखलो भेड प्रवाहसे मार्ग जावे । अष्ट करमका विकट दल है जीतने वाले कौन पावे । कोई जीते मनको स्वर्गाका रस्ता तो सबही चाहवे । पक्षपातमें पडकर प्राणी नहीं करता मार्ग निरणा ॥ १ ॥ प्राण घात मत करो किसी की नहीं छूटेगा बदला आय ते । नहीं उतरेगा हत्या गंगा-जमनाजी के न्हाये ते । नहीं उतरेगा हत्या पहाड और पर्वत उपर ध्याये ते । नहीं उतरे हत्या मथुरा वृन्दावन के वास वसाये ते । नहीं उतरेगा हत्या वेद कुराण पुराण ध्याये ते। नहीं उतरेगा हत्या भगवां वेस बनाये ते । करे कष्ट धरे इष्ट मनमें वसे जंगलमें क्या डरना ॥ २ ॥ कोई अज्ञानी फिरे अन्धता करे कष्ट तन ताये ते ॥ नहीं होवे तिरणा पंच अग्निके ताप तपाये ते ॥ नहीं होवे तिरणा अधो मुखसे झुले जो झुलाये ते । नही होवे तिरणा जिमीकंद अंध फंध के खाये ते ।। नहीं होवे तिरणा सिर पर जटा भभूती रमाये ते। नहीं होवे तिरणा भेष धर मस्तक मूंड मुंडाये ते ॥ क्रिया कष्ट केई करे अज्ञानी लेवे भिक्षा धर धरना ॥ ३ ॥ दया धर्म यहीं तारण तिरण है शुद्ध मनसे सेवा करो । जब होवे तिरणा सब जीवनकी रक्षा किया करो । होवे तिरणा साधुसंतकी भक्ति हरदम किया करो । जब होवे तिरणा दान दोही उलट भाव धर दिया करो । जब होवे तिरणा