Adarsh Library, Jaipur

Mann Pardeshi

Duggal Kartar Singh · 2011/03

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मन परदेसी

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करि सिंह दुग्गल मनपरदेशी

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मन परदेसी जे पीये सब देस पराया
-गदनान
(यदि मन परदेमी हो जाए तो सब देश पराया हो जाता है।)

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जेबा के नाम

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मन परदेसी

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. 00 "मेरे सिरताज ! मेरे मिरताज !! मैं क्या व? में कहा गाऊँ ??" इस समय कविस्तान में कोई औरत ! पूर्व मनावर को जैसे अपनी आखों पर विश्वास न हो रहा हो! अंधेरा हो रहा था । कविरतान मे सन- कर खड़े पेड़ी की परछाया क्व की रुक गई थी । जाड़े की शाम का या है. आख झपकी और रात हो जाएगी। घुप अधेरा । आजरल रात भी सो अधेरी है । मनावर को याद आया कि वह तो अमावस की रात थी। 'करमदीन! तुम कही याव तो नही देख रहे ?' और फिर मगावर मगरिय की नमाज के लिए अपने पीर के मजार पर सजदे में गिर गया। हुजरे में तो दिन चई भी रात ही रहती थी। दूर-दूर तक फैले हुए बिस्तान की और उसकी पीट थी। शहर का रईगी कनिम्तान पा । सब को धन-पत्थर की। यह और थात है कि पिछले कुछ महीनों मे जैसे गुहागर्दो मची हुई थी. कयामत आने. वाली थी। हर रोज हर दूमरे रोज कोई-नमोई जना नाया जाता। जय मे माप्रदायिक दगे हुए थे, मापद ही कोई दिन गाली जाना हो। जनाशों पर जना । मनावर दुरुपद-पड़कर थक हार जाता था। 'सोग पहते हैं, देस आजाद हो गया है। नौज मह भाजारी! दूमरे को छुरे घोपने पी यागादी एक-दूसरे को लूटने की आजादी ! एर. दूमरे का घर जलाने की आजादी! एवमरे की बहू-बेटियों की परत सूटने की आवादी! मन परदेमी/११ 'तोवा ! तोया !! यह कुछ कभी नहीं सुना था । यह कुछ कभी नहीं देखा था। और रेडियो वाले कल भोंक रहे थे-जिस तरह चुपचाप, हंसते-खेलते; जिस तरह विना हिंसा के, खून का एक कतरे वहाए वर्गर, महात्मा गांधी ने देस आजाद करवा लिया है, इसकी मिसाल और कहीं नहीं मिलती। कुफ है, महज़ कुझ । सारी दुनिया को ये लोग धोखा दे सकते हैं, कब्रिस्तान के चौकीदार से कोई कैसे छिपाए, दिन-रात जो कल हो रहे । कनें खोदनेवालों को फुरसत नहीं । कब्रिस्तान में तिल धरने की जगह नहीं बची। ' मैं तो कहता हूं, इन चूने-पत्थर की क़लों पर 'कराह' फेर देना चाहिए ताकि औरों के लिए जगह बन सके । पैग़म्बर ने खुद कहा था कि वन कच्ची होनी चाहिए। आठ-दस बरस में फिर एकसार हो जाए। नाम-निशान वाकी न रहे । अगर पहले नहीं तो अब उन्हें करना होगा । अगर शहर में यूंही छुरेबाजी होती रही-हिन्दू मुसलमानों को काटते रहे, मुसलमान हिन्दुओं को छुरे घोंपते रहे तो फिर आजाद हिन्दुस्तान और आजाद पाकिस्तान, आजाद कनिस्तान बन जाएंगे। यह अंधेर कभी नहीं सुना था, कभी नहीं देखाथा कि पड़ोसी, पड़ोसियों को काटने-मारने लगे। पहले जनाजा लाया जाता था, आधे उसमें मुसलमान होते थे, आधे हिन्दू होते थे। आजकल क्या मजाल कि कोई चोटी वाला नज़र आ जाए ! लाख लानत । इसीको तो कहते हैं कयामत ! कयामत कोई और थोड़े ही होती है ! जब भाई अपने भाई की परवाह नहीं करेगा-पड़ोसी भाई ही तो होते हैं---तव कायामत आ जाएगी। यही मेरे मुरशद ने कहा पा। नीली कमली वाले मेरे पीर-दस्तगीर ने ! सदके जाऊं उसको! मेरे मौला ने हिन्दू-मुसलमान में कभी फ़र्क नहीं किया था। हर किसीको एक नजर से देखता ! तभी तो उसके मजार पर हिन्दू शीरनियां चढाने आते थे। सिख सजदे करते थे। अब कोई इधर नहीं फटकता, जब से पाकिस्तान का हल्ला मचा है। बनता रहे पाकिस्तान, पाकिस्तानियों का! अपना घर, अपना देस भी कोई छोड़ सकता है ! कोई घर भी छोड़ जाए, अपना कविस्तान कसे छूट सकता है ?' मजावर, नमाज पढ़ते हुए, सारा वक्त कुछ इस तरह सोचता रहा, . • - १२/ मन परदेसी मोचता रहा। इन्ही विचारों में दुबा हुआया कि मरिय की नमारग्राम हो गई। 'साय मानत ! साग मानत !!' अपने आपको सानत भेजता हुआ मजावर, हुजरे में मे बाहर निकल आया। यह भी कोई नमार हुई! ध्यान कही-का-वही और अल्लाह के हमरे में कटा-चटक कर लो। • यही ती बावा नानक ने पहा था-बाया नानर माह फरीर; हिन्दूमा गुरु, मुमलमान का पीर ।--यही तो बाबा नानक ने गुलनानपुर के मौलवी से कहा था। मन उसका बढेगे में था और मस्जिद में नमार पा रहा था। बावा नानर ने कहा-में तुम्हारे साप या नमाज पढ़ना? नवाय कहने सगा-चो फिर मेरे साथ नमार पड़ लेते । वाया नानर ने उमका मह भी बंद कर दिया--तुम तो बायुल में घोड़ें मरीद रहे थे। 'करमदीन ! तेरा भी यही हाल है ! तेरे मजदे भी मू! वन, दिवापा! यम, ग्रानापुरी! मजदा हो तो उस बीवी की सरह, यंग गिरी हुई है, बद्र के कार' बाहें फैलाकर, जमे मारी-बीमारी पत्र को अपने वाओं में भर लिया हो। मिर मे पाव मक राफेद चादर में लिपटी हुई। यह तो कोई भगों ने मे सगती है ! मेगो को ही तो उधर य है--गारी. मी-मारी चून-पत्यर की। हर एक पर गगमरमर केय, 'हैं ! यह तो रो रही है। यह तो कोई बड़ी दुपिपारी है। परियार कर रही है। विलाप कर रही है। हिचविया भा रही है। बार-बार माता माया कद्र पर पटकती है । इमना परवाना होगा । उनको पुरार रही है-मेरे मिरतान ! मेरे निरताज !! मैं काम में कहा जा?' अंधेरा होने लगा था। घर-उधर वोगन पनिम्तान को दार, यौरत जैसे घबरामी गई होआज यो दिन है. अपने बाहर निकलने के? और फिर इन पान ग चादर में निपठी वेगम ने नोचा कि वह मामने हमरे मे से मनावर को अपने गाय से नेगी। यह उमे पर ता पट्टवा आएगा। आरन वैधागे सिमी औग्न का आने वाहर निकलने का जमाना नहीं है। और फिर वह नोचने लगी, गने तो चाहे उमेपोई मार ही डाले। इमम तो चाहे कोई हिन्द 'हर-हर महादेव' महार उनपर तेजाब या यम फो, और वह अलग जाए। इमग तो चाहं पाई मिरा अपनी शराण में .

- । । - . उसका सटका कर जाए । अव जीने को क्या रखा है ? वह सोचती, अपने शौहर की तब पर फ़रियाद करके, आंसू बहाकर, शायद उसका जी हल्का हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ था। उसके कलेजे में वैसी-की-वैसी आग धधक रही थी। वैसे-के-बसे जरो कोई उसका कलेजे नोच रहा हो । लहू-लुहान हुई पड़ी थी। उसे यूं लगता, जैसे पूरे-का- 'पूरा उसका कोई अंग किसीने कैंची से कतर लिया हो। जैसे किसी मस्जिद की कोई मीनार गिर जाए । जैसे उसका सारा ताना-बाना उलझ गया हो । आहत-सी औंधी पड़ी थी। मुंह-सिर झुलसा हुआ। वह तो अब किसी- के सामने खड़ी तक नहीं हो सकती थी। वह तो अब किसीको मुंह दिखाने लायक नहीं थी। हुजरे के पास वह पहुंची, तो मजावर के पांव तले से जैसे जमीन निकल गई हो। यह तो वेगम मुजीव थी। बड़े शेख अल्लाह उनकी रूह को बख्शे ----उनकी बीवी ! कई बरस हो गए, जब वह अल्लाह को प्यारे हुए थे। बड़ा खदापरस्त बंदा था। नमाज-रोजा का पक्का। लोग उसका नाम लेकर राह पाते थे । सारा शहर उसकी इज्जत करता था। जोमपरस्त । आजादी का दीवाना । फिरंगी गावैरी। तो भी तहसीलदार और थानेदार उसके घर का पानी भरते थे। अंग्रेज़ कलक्टर उसके बंगले में आता था। उराको मेम की, एक बार वेगम मुजीव के साथ बैठे तसवीर छपी थी। मोमिन लोग बेशक पाहते-~-मुसलमान पर्दादार औरत को किसी फ़िरंगन के साथ यूं बैठकर तसवीर नहीं छपवानी चाहिए थी। लेकिन बेगम मुजीव तो अपने शोहर के साथ दिल्ली, कलकत्ता, लाहौर और पेशावर तक हो आई थी। इतना बड़ा लीडर था उसका घरवाला। कई लोग तो यह भी कहते थे कि गोरे उससे डरते थे। इतना माना हुआ वकील था। जिस मुकदमे को हाथ में लेता, उसकी कभी हार न होती । बंगला मितना बड़ा बनवाया था। कितने एकड़ जमीन घेर रखी थी। आगे- पीछे मजिस्ट्रेटों और पुलिस अफसरों को कोठियां थीं। जैसे रो-रोकर बेगम मुजीव का गला बैठ गया हो। उसके गले में से आवाज नहीं निकल रही थी । एक बार उसने कोशिश की, दूसरी बार कोशिश की। और फिर मजावर आप-ही-आप बोल उठा, - १४/ मन परदेसी "विममिल्ला ! विममिना !! बेगम माहिना है ! भपने शेगमाहब से पर मे! मैं आपके साम पनता है। आजकल अकेने बाहर निश्नने के कौन- रो दिन है ?" और फिर करमदीन अपनी टूटी हुई जूती पांव मे घटपाकर बेगम मुजीव के माप हो लिया। चलने से पहले, उसने वरामदे के कोने में रणे रहे को उठा लिया। यह डडा उसके पोर मुरशद का पा। करमदीन को जय भी हुजरे से बाहर जाना होता, यह हा जरूर अपने हाथ में में लेता । उसके मुरगद का इंडा उसके हाप मे हो तो क्या मजाल कोई उमकी और देश भी जाए-चाहे कोई हिन्दू हो, चाहे कोई मिय हो, पाहे कोई . और। - . "पुरा यात आ गया है।" बेगम मुजीय के माय चसते हुए मुजावर आप-ही-आप योल रहा था, "बुरा वक्त आ गया है । इस दरगाह पर हिन्दू चादर चढ़ाया करते थे। मिस मलाम करने आया करते थे। मयके मन की मुरादें पूरी होती थी । जो कोई भी भाता, कभी ग्रासी हाप नही लौटता था । मुसलमानों में पयादा नो हिन्दू, मिरा दम मजार पर आते पे । अब कितने महीने हो गए हैं। कभी कोई भूलकर नहीं आया। आज. बल पता नही कॅमे उनके काम चल जाते हैं । कंगे टूटी गिरहे जुनी है फरी मन की मुरादें पूरी हो जाती हैं ! 'जिन दिनो, उधर पजार में अकालियों को पकड-बट हो रही थी, मैंने आज तक किगीको यात मही यताई। कई वरम हो गए है-दो गित भाई मेरे इमहुजरे मे आ हो ।यान पोपकर उन्होंने पोधे गिरा लिए। दोनी परत भाग घोटकर पद भी नगा करते, मुझे भी नशा कराते । मैंने उन्हें नमाज पढ़ना मिया दिया था। रमजान के दिन थे, मुबह महरी मरने, माम को मेरे साप रोशा गोनते। एह, आठ हाने यहा पडे रहे । रिमी. को मैंने पता नहीं लगने दिया। माई चार पुलिग 'मानग-गय"मानग- गध' करती आई। पूछताछ करके लौट गई। हर विमोमे बसा कि गरहर पाले पीर की दरगाह के मजावर है । गुनकर पुप हो जाते । यो शमिशाग गरदार थे। बरयानी ये पुनले । जान जैसे हनी पर रगी हो। अपने देश के लिए कोई रयानी कर मरने थे। जब मुह मोनने, पही मन परदेमी/१५ TET, तिरंगी गो यहां से प्रदेशगा है, गही हमें लाता है, यही हिन्दू- गुरासगान में प्रसाद कराता है। सारे हिन्दुस्तानी गाई-भाई है..." गजायर में बोल रहा था निगम मुजीब ठोगर पाकर एक ओर गोधी जा गिरी। २ गग गुजीब की जवान-जहान, गालेज में पढ़ रही, गरियों जैसी राघरात सगी सीमा में पिसी सिग्न सारो व्याह कर लिया था। वेगम गुणीत बेहाल थी। जिरा रागग उरी तार मिला, उसकी आँखों में रो जरी आसुओं की धारा पर निकाली हो। मछली की तरह यह राहप रही थी । उरामी रामश में गछ नहीं आ रहा था, गणा गरे, गया न करे। धारी.गहारा विधवा ! पाई घरस हुए, उरागार शौहार जल भरा | उगी हरती । सारे देश में उरामा नाम था, पजा भी। गग मुजीव ने रत्ती भर परवाह नहीं को । मला-गा था ) भाग को उसे दिल का दौरा पड़ा, रारा गो सिधार गगा। बेगम गुजीन ने अपने गानो रागमा लिया जा---गुपसिया ! तेरे बने सलागा रहैं, अल्लाह गा दिगा बहा छ है। एक बेटा, दो बेटियां ! भरा-पूरा परिवार--- सुपाद और सुपील । तुले अल्लाह ने गया नहीं दिया ! को उराग शुम अदा गारवा पाहिए, उरागी रवा में रहना चाहिए। और बेगम मुजीव , रमा गी जो गंजर था, सिर-मांगों पर ले लिगा। शीन गोगी गा, उसगी जपानी गाहे बल पुगी थी, लेकिन सिर का माल एम भी सोय नहीं हुआ था । अधेड़ उस की कहाणां, उसम्पहरे पर एमाधेपमान था। मेकिन अब तो एक दिन में यह निढाल हो गई थी; जैसे उरागी सारी पानित जाती रही हो । सीमामा सार देशमार, जसे उसने गले में किसी- ने गोली माग पो हो। यह सामने दीवान पर आँधी जा गिरी। यह तो - १६ / गन परदेशी अल्लाह का मुकया कि उसकी छोटी बेटी अभी पर मे पी, परने नहीं गई थी। उसने अपनी अम्मी को मभाल लिया। मामले कोटी मे, टास्टर गोपाल को बुलवारर टीरा सगवाया । एक टीका, फिर दूसरा टोरा। पटर गोराल को बाहर गेट तक पहुंचाकर लौटते हुए, वा अपने. आपमे बहने लगी-'मीमा आपा को अगर सर मारनी ही पी तो रिमी हिन्दू को घुन सेती । डाक्टर गोपाल कितना अच्छा आदमी है। फिर उसने सोचा-'प्यार मिय से हो और कोई हिन्दू पं. माय में भाग जाए ? और जंवा फे मुह का स्वाद कड़वा-कड़वा गया। "लेकिन हर बात के लिए कोई वक्त होता है । आजकल भला कोई जमाना है, कोई मुमलमान सडयो तिमी गैर-मुस्लिम से शादी कर ले ? और फिर मिय में गाय? तोबा ! तोरा !।' वा चाहे स्कूल में पढ़नी थी, लेकिन उसकी मोच उग्र से पही आगे पी। यू मोचते सोचते वह कोठी मे सौट आई। उसने देखा, उमयी अम्मी की जैसे आप लग गई हो । आयें मोचे, यह पड़ी हुई थी। आग मंगे लगनी? वेगम मुजीय ने तो जानबूमकर पस मूद ली धी। उगी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि अपनी छोटी बेटी की ओर देग मफे । जिम लडकी की बड़ी बहन ने यू मुह काला करवाया था, अब छोटी को कौन पूछेगा? उसके माप कोन म्याह करेगा? इस्लाम को छोडकर किसीका किमी मिय के पीछे चल देना, उमे विश्वास नहीं हो रहा था। और फिर आजकल, जब मियों ने पूर्वी पजाब में मुगलमानो के गाव-से-गाय सूट लिए थे। गाव-गाव नवाह कर दिए थे। हगरो को मौत के घाट उतार दिया था। हजारों की इम्मत सूटी थी । इधर से जा रहे महाजरी की ट्रेनों पर टूट-टूट पडते थे। और मरहद के पार, उग तरफ़. वग सहू से लपाय पाली गाडिया पहपती पी। माम्टर सारा- मिह ने भरे लाहोर महर में तलवार नगी करके मुसलमानों को मसरारा पा। बेगम मुजीब ने गुन रणा या कि यम्बर सिय हालाए हुए मे पूर्वी पजाव में फिर रहे थे । वही किमी ममलमान की भनक पर जाए, तो 'मानन-गध, मानम-गंध' बहते टूट पडत थे । पजाय ही क्यो, उन्होंने तो दिल्ली में भी अपना नगा-नाच गुरु पर दिया था। - मन परदमी १७ - आजकल किसी मुसलमान लड़की का, किसी सिख के साथ अपनी रजामंदी से व्याह कर लेना एक अनहोनी बात थी। कुफ था। कुम तो हमेशा था, लेकिन आजकल तो यह अल्लाह का कहर नाजिल कराने वाली बात थी। और फिर बेगम मुजीव मन-ही-मन पछताने लगी। उसे अपने पाकिस्तानी रिश्तेदारों का कहना मान लेना चाहिए था। बंटवारे से कितने दिन पहले उसका पाकिस्तानी देवर धार-बार उसे संदेश भेजता रहा । उसकी ननद मिन्नतें करती रही, बंटवारे से कुछ दिन पहले आप उसे लेने के लिए आई, 'कोई अपना घर भी छोड़ता है ? हमेशा बेगम मुजीव यही कहती रही। उसका सबसे बड़ा बेटा लंदन में डाक्टरी पढ़ रहा था। वह पाकिस्तानी बनने के लिए तैयार नहीं था। वेगम मुजीव का देवर, लाहौर में इंजीनियर था । उसकी इच्छा थी कि अगर हमेशा के लिए नहीं, तो दंगे-फसादों के चंद-दिन बेगम मुजीय उनके यहां चली आए। लेकिन वह नहीं मानी। बार-बार यही कहती. 'अगर लाहौर ही बंटवारा-कमीशन ने भारत को दे दिया तो फिर क्या होगा? अब बंटवारा-कमीशन का फैसला भी हो चुका था । लाहोर 'पाकिस्तान के हिस्से में आ गया था। पाकिस्तान के चप्पे-चप्पे में से हिन्दू- सिखों को बटोरकर हिन्दुस्तान खदेड़ दिया गया था या फिर उन्हें ख़त्म कर दिया गया था। पाकिस्तान सचमुच पाक होगा । सब अहले- सुन्नत । कोई दूसरा नहीं। वेशक कुछ ईसाई थे, लेकिन ईसाई तो अहले- किताव हैं। उनकी और बात है । वह तो फिरंगी का मजहब है । फ़िरंगी ने ही पाकिस्तान बनाया था वरना हिन्दू तो सारे-यो-सारे हिन्दुस्तान को हथियाना चाहता था। लोग कहते, 'गांधी बड़ा काइयां है, कट्टर हिन्दू । मुसलमान कीम, जिसने सैकड़ों वरस हिन्दुस्तान पर राज किया था, फिर उसे हिन्दुओं का गुलाम बनाना चाहता था। कोई बात भी हुई !' सीमा अगर दिल्ली में होती तो कोई उसे समझाने-बुझाने भी जाता । इन दिनों कोई अमृतसर कैसे जा सकता है ? पंजाब तो आजकल जैसे कत्लगाह बना हुआ हो। पश्चिमी पंजाब में हिन्दू-सिखों का बीज-नाश - १८/ मन परदेसी किया जा रहा था, पूर्वी पंजाब में मुगलमानों के पन की होली येसी जा रही थी। अमृतगर कोई नहीं जा मरना या। ट्रेनों पर हमले हो रहे थे। धन-घुनकर मुसलमानों को फल विया जा रहा था। पता नहीं मीमा अकेली कैसे वहां पहुंची थी? मगे तो अच्छा होता, कि उभे रास्ते में ही कोई पकड़कर गत्म कर देता। उन्हें यू जलील तो न होगा परता। हजारो मुसलमान लड़किया महोती का नाम पी गई थी। यह भी उनमें शामिल हो जाती। 'अव में इग,देस मे नही रहूगी। बेगम मुजीय मोच रही थी-'वेगा जायदार है, भट्टी में जाए । वेशक रिश्तेदार हैं, जहन्नुम में जाए । उधर पाकिस्तान में भी तो रिदार हैं । और बनाए जा गरते हैं। एक बेटी तो भाग गई। पता नहीं, दूमरी क्या फर बैठे ? इम्लाम गंगा मगर बार-बार नहीं मिलता। हाथों में आई जन्नन कोई पंगे गया है ? जय मेरी ननद इस्मत लाहोर मे मुझे लेने आई थी, तो मुझे उनके माप धने जाना चाहिए था। पर जाती पंमे दोनों बेटिया, घर पढ़ रही पी। गोमा कालेज में थी, जैया स्कूल में। "गे जानी ? कैसे जानी। इतना यहा यगला है यहां । इननी मागे दुकानें किराये पर चढ़ी हैं । यहनें हैं. भाई है। मारा महर मुझे जानता है। हर गली में चुदमिया थेगम को याद किया जाना है । मारा मुहल्ला मुग- पर जान छिडकना है । गुबह-गाम 'दगिया वीची. पुदगिया बीवी' पहने लोगों की जबान नहीं पकती। यहा हमारा यविस्तान है, जिसमे मेरा मोहर दफन है, ममुर दफन है, माम दफन है। पिछली बार चुनाव में मैंने काग्रेग पो पीट दिया था। गुद, महात्मा गाधी के नाम पी सली, दूसरों से उलयाई । इस उम्र में आकर गुद हिन्दी पटना गुरु रिया, अपने वनों को हमेगा हिन्दी पटने के लिए कहा। पहोगी के माय रहना हो तो पडोगो की उवान गोयने में या हर्ज है। • मेकिन अब मैं इम देग में नहीं रहगो। हिन्दी! हिन्दू! हिन्दुस्तान!!' मन परदेसी/१६ or - 'मेरी प्यारी अम्मी !' कुछ दिनों के बाद सीमा की अपनी मां के नाम चिट्ठी आई । 'आपको मेरा तार मिला होगा। मैं सोच सकती हूं कि आपको कैसा सदमा पहुंचा होगा। यह जानकर कि मैंने इन्द्रमोहन से व्याह कर लिया है, हमारे घर में कुहराम मच गया होगा। लाख-लाख आप लोग मुझे लानतें सुना रहे होंगे। मुझे इस बात का एहसास है, कि मैं आपके लिए मर गई हूं। अव मेरी उस घर में कोई जगह नहीं है । आप लोग कभी मेरा मुंह देखने के लिए तैयार नहीं होंगे । मेरी वहन, मेरे भाई मुझसे छूट गए हैं। मैं उनसे बहुत दूर निकल आई हूं। जो फैसला मैंने किया है, उसके लिए मैं यह सारी कीमत चुकाने के लिए तैयार हूं। मुझे यह भी डर है कि आप मेरी यह चिट्ठी पूरी पढ़े बिना, शायद चूल्हे में फेंक दें। लेकिन मेरी एक ही तमन्ना है, एक वेटी की अपनी मां से यह एक आख़िरी चाहत है कि आप इस चिट्ठी को जरूर पढ़ें । इसके वाद, जो फैसला आप मुनासिव समझें, कर लें । मुझे कोई शिकायत नहीं होगी । कोई गिला नहीं होगा। इन्द्रमोहन को आप जानती हैं, एक बार हमारे यहां आया था। एक रात हमारे यहां रहा भी था। मेरे साथ पढ़ता था। हमारी दोस्ती की चारों ओर चर्चा थी। हमारे कालेज में हर कोई यही कहता था कि हम किसी दिन भी व्याह करवा लेंगे। चाहे इसमें कोई सच्चाई नहीं थी। लोगों का कोई मुंह थोड़े ही पकड़ सकता है । इन्द्र के साथ मुझे हमदर्दी थी। उनका घर पाकिस्तान में लूटा गया था। उनके गांव को जलाकर खाक में मिला दिया गया था। उसके बूढ़े मां- बाप को क़त्ल कर दिया गया था। उसकी जवान-जहान बहन को फ़सादी अगवा करके ले गए हैं। अभी तक उसकी कोई खवर नहीं मिली । चाहे इन्द्र ने मुझसे कभी कहा नहीं, लेकिन मुझे यूं लगता, जैसे इन्द्र मुझमें अपनी वहन को देखता था। अम्मी ! शायद आपको याद हो, एक बार मैंने आपको बताया था, इन्द्र की बहन का नाम सीमा है। शायद मेरा नाम सीमा होने की वजह से, इन्द्र का मुझसे इतना प्यार था। । - २० / मन परदेसी हमने आम हिन्दुस्तानी लड़के-लड़कियो की तरह एक-दूसरे को वहन-भाई नहीं बनाया था। हम एक-दूसरे के दोस्त थे। हर माम हमारी एकमाथ गुजरती थी। मुझे यह सब कुछ कभी अजीव नहीं लगा। आखिर में शेख मुजीव की बेटी हू । मेरे अध्या हुजूर की नजरों में हिन्दू, मुमलमान, सिख, ईमाई सब वरावर थे। * आप यह भूली नहीं होगी कि अब्बा पहली बार नामा मे कैद हुए थे । मिखो का चलाया हुआ कोई आदोलन था। कई महीने उन्हें फिरगी की जेल में काटने पड़े-अपने पजावी हम-वतनों के लिए, जिन्होंने जलियानवाला बाग में फिरगो की गोलिया मोनो पर झेली थी। हिन्दू- मुमलमान-सिखों ने मिलकर अग्रेजो को ललकारा था । मबका लहू मिलकर अमृतमर को नालियो मे वहा था। मेरे अव्वा रोजा-नमाज के पक्के थे। लेकिन मारी उम्र उन्होंने काग्रेम का माथ दिया। सारी उम्र वे देश की आजादी के लिए लड़ते रहे। हिन्दू-मुसलमान एकता के लिए जान देते रहे। "मैं यह कभी नहीं भूली कि मैं उस अव्वा की बेटी हू । बेशक काग्रेम के साथ उनका मतभेद हो जाता । कई बार लोगों ने उन्हें फिरकापरस्त भी कहा लेकिन उन्होंने महात्मा गाधी का माथ कभी नही छोडा।वरतन- से-बरतन टकराता ही है। गलतफहमिया हो जाती हैं। लेकिन मरते दम तक वे कोमपरस्त रहे। इकलाब जिन्दाबाद का नारा उनके होठो पर था जब वे अल्लाह को प्यारे हुए। 'अम्मी ! मुझे अन्या का जनाजा कभी नही भूलेगा । कैमे हिन्दू उनको वेवक्त मौत पर रो रहे थे । कैसे मिख आगे बढ-चढकर उनकी मैयन को कधा दे रहे थे 1 लाख मुसलमान पदोसी बुदबुदाते रहे, अन्या हुजूर को मेरठ के शहरियो ने तिरंगे मे लपेटकर दफनाया था। हिन्दू, मुसलमान और मित्र-मभीकी यही जिद थी। 'अम्मी ! मैं उन अब्बा की बेटी हू, और अब मैं आपको बताने जा रही हूँ कि मैंने कमा शौहर चुना है। कंमा जीवनमाथी मैंने दढ़ा है, जिमके माय मैं जिंदगी गुजारने जा रही हू । मैं किम वाप की बेटी हू और किम शौहर को बीवी है ! - मन परदेसी/२१ । 'आपको शायद याद होगा, उस दिन इन्द्र हमारे यहां मेरठ आया था। रात को हमारे यहां रुका भी था। अगले दिन शाम की गाड़ी से हम दिल्ली लौट रहे थे । हम लोग मेरठ से ट्रेन में बैठे, पहले दर्जे के हमारे पास टिकट थे। गाड़ी चलने से पहले चार-छ: नौजवान हमारे डिब्बे में घुस आए । कालेज के लड़के मालूम होते थे। देखने में शरीफ़, अंग्रेजी बोल रहे थे। आते ही बातें करने लगे। गाड़ी चली ही थी कि इन्द्र टायलेट में गए । गाड़ी प्लेट-फार्म से बाहर निकल आई थी। यार्ड से भी बाहर । काफ़ी रफ्तार पकड़ चुकी थी। और फिर मेरी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गई। मैंने देखा, दो लड़के टायलेट के सामने जाकर खड़े हो गए। उन्होंने टायलेट को बाहर से बंद कर दिया। और बाकी मुझपर टूट पड़े। 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगाते हुए मुझसे उन्होंने बेहूदगी करनी शुरू कर दी। कोई मेरे गाल नोचता, कोई मेरी चोटियों को। उन्होंने मेरे कपड़े उतार दिए । जो नहीं उतरे, उन्हें फाड़ दिया। और फिर वे अपनी मनमर्जी करने लगे। जैसे हलकाए हुए कुत्ते हों। 'मैं बार-बार उनसे कहती रही कि मैं मुसलमान हूं। मैं बार-बार अब्बा का नाम लेकर उन्हें बताती रही। लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी। यही कहते रहे, अगर तुमने शोर मचाया, कोई गड़बड़ की तो तेरे उस सिख को भी जान से मार डालेंगे। तुझे भी खत्म कर देंगे। आपकी बेटी मेरठ से लेकर दिल्ली तक पाकिस्तान के नाम पर मुसलमान गुंडों की बर्वरता सहती रही। दिल्ली के पास, जब गाड़ी धीमी हुई तो वे लोग छलांगें लगाकर गाड़ी से उतर गए। जाते हुए मेरे गले में पड़ा हुआ लाकेट भी उतारकर ले गए। 'जो कपड़े बचे थे, मैंने अपने-आपको उनसे ढका । इतने में इन्द्र भी टायलेट से बाहर निकल आया था। हम एक-दूसरे के मुंह की तरफ़ नहीं देख पा रहे थे। दिल्ली से पहले गाड़ी कितनी ही देर सीटियां बजाती रही, चीखती-चिल्लाती रही। धुप अंधेरी रात थी। हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करें, क्या न करें। यही डर था कि गुंडे कहीं फिर डिब्बे में न आ घुसें, हमने अंदर से दोनों दरवाजों को बंद कर - - २२ / मन परदेसी लिया। 'कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उस रात दिल्ली पहुचकर हम अपने- अपने होस्टल की जगह, होटल में रुके। इन्द्र वार-वार अपने-आपको कोसने लगता। आखिर वह मुझे अकेला छोड़कर टायलेट में क्यो गया ? कभी कहता–क्योकि मैं सिख था, इसलिए इसकी सजा उसकी मुमलमान दोस्त को भुगतनी पड़ी। मैं जान पर खेल जाता-अगर मैं बाहर होता, और ये तुम्हारी तरफ बुरी नजर से देखते-यू लगता है, टायलेट में खतरे की ज़जीर काम नहीं कर रही थी। इन्द्र बार-बार उसे खीचता रहा। । 'अगली सुबह हम एक लेडी डाक्टर के यहां गए । इन्द्र की जिद थी। मुझे तो इसकी कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही थी। लेडी डाक्टर ने हमारी कहानी सुनी और बडे गौर से मुझे देखा । बार-बार यही कहती रही, खतरे की कोई बात नहीं। 'खतरे की बात क्यों नही थी? कुछ हफ्ते बीते तो मुझे महसूस हुआ कि कोई गड़बड जरूर है। मेरी तबीयत खराब रहने लगी। हर वक्त मेरा जो मतलाता रहता। और फिर मेरा डर ठीक निकला। किसके आगे मैं अपना दुख रोती? उन दिनो आपके यहा इस्मत फूफी आई हुई थी। सारा दिन पाकिस्तान के गुण गाती रहती। आपको अपने साथ लाहोर ले जाने के लिए मना रही थी । 'बस, इन्द्र ही मेरा हमराज था। एक के बाद एक, हमने कई जगह कोशिश की। कोई लेडी डाक्टर हमारी मदद करने को तैयार नहीं हुई। हम लोग आगरा भी गए। शायद छोटी जगह, कोई डाक्टर मान जाए। इन्द्र मुझे इस वला से छुटकारा दिलवाने के लिए कुछ भी खर्च करने को तयार था। लेकिन कोई कामयावी नहीं हुई । वस, एक ही चिन्ता उसे खाए जा रही थी, कही मेरी सेहत को कुछ हो न जाए। ‘दिन बीतते गए। हफ्ते बीतते गए। फिर एक दिन मैं इन्द्र के मुह की तरफ देखती रह गई; वह मुझे परेशान देखकर कहने लगा-मैं इस बच्चे की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हूं। मैंने सुना और मेरे हाथ-पाव ठडे हो गए । इन्द्र की यही जिद थी-हमे जो कुछ करना था, कर चुके । मन परदेसी/२३ । अव और दर-दर की ठोकर हम नहीं खाएंगे । अब और मैं तुम्हें डाक्टरों की नज़रों में ज़लील नहीं होने दूंगा-एक कुंवारी लड़की, जिसके पेट में वच्चा था ! हर डाक्टर फीस लेती। मेरा मुआयना करती और जब हम उसे बताते कि मैं कुंवारी हूं, यूं मेरी तरफ देखती जैसे मैंने कोई पाप किया हो। कूड़े का ढेर। किसीको मेरी आप-बीती पर यक़ीन न आता । मेरी कहानी सुनकर, इन्द्र को कोई मुंह लगाने के लिए तैयार न होता। हर कोई यही सोचता, कुसूर उसीका था। एक दिन तो एक डाक्टर ने हमें धमकी दी-अगर आप एक मिनट और मेरे क्लिनिक में नज़र आए तो मैं आपको पुलिस के हवाले कर दूंगी। 'उस दिन इन्द्र ने पक्का फैसला कर लिया कि वह मेरे साथ व्याह कर लेगा। चाहे कोई भी कीमत देनी पड़े, वह मुझे और जलील नहीं होने देगा। अम्मीजान ! आज मैं उस इन्द्र की बीवी हूं। 'मुझे अभी आपको और बहुत कुछ बताना है । डाक का वक्त हो गया है, इसलिए यह चिट्ठी यहीं ख़त्म करती हूं। आपकी वेटी, सीमा। - - ! . ४ । वेगम मुजीव अभी चिट्ठी पढ़ ही पाई थी कि शेख मुजीव का वड़ा भाई शेख शब्बीर दनदनाता हुआ उसके कमरे में आ घुसा। लाल-पीला हो रहा था। उसे अभी-अभी खबर मिली थी। वेगम मुजीव ने चिट्ठी को अपने तकिया के नीचे छिपा लिया। उसका जेठ निहायत दकियानूसी विचारों का जागीरदार था, कट्टर फ़िरकापरस्त । कहता था कि लड़कियों को पढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं। इन्हें किसीके पल्ले बांधकर अपनी जान छुड़ाभो। अव तुमने देख लिया कि आजकल की औलाद क्या गुल खिलाती है ? एक तुम्हारा मियां, मुंह- ज़ोर था, सारी उम्र अपने-आपको धोखा देता रहा । हिन्दू का पिळू वना . मैंन २४/ मन परदेसी रहा । हिन्दू-मुस्लिम एकता ! देख लिया न हिन्दू-सिखो की दोस्ती का नतीजा? इस लड़की के तौर-तरीके तो मुझे कभी एक आख नहीं भाए। पहले, इसे दिल्ली पढ़ने के लिए भेजा ही क्यो गया? क्या यहां अपने शहर में कोई कालेज नही था? और लोगों की बेटिया क्या तालीम नही पाती? कोई वात हुई कि मुझे जो मजमून पढना है, वह यहां पढ़ाया नहीं जाता। देख लिया तुमने कि वह कौन-सी पढ़ाई करने गई थी? कौन-मा मजमून पढ़ने गई थी? " मेरी बेटी होती तो मैं गोली से उडा देता। अव भी मैं कौन-मा उसे माफ़ करूगा? अपने खानदान की आवरू, मैं जान पर खेलकर भी, उसके उस 'मिख' मे बदला लूगा। अगर उनकी कोई वहन है तो उसे निकालकर लाऊगा । अगर उसकी कोई मां है तो उसे अगवा करवाना। चाहे मुझे हजारो न लुटाने पडे । हमारे शहर के गुडे दूर बंबई और क्ल- कत्ता तक वार करते हैं। ढेरों रुपये का चदा मैं उन्हें देता है । आज एक बरस से ऊपर हो गया है । कितनी हिन्दू और सिख लडकियो की उन्होंने इज्जत लूटी है । यदजात लडकिया चू तक नहीं करती।मुह से शिकायत तक नहीं करती। हिन्दू धर्म भी कोई धर्म है, जैसे रद्दी की टोकरी हो ! सब तरह का कूडा इसमे समा जाता है। " मैं कहता हूं कि पहला कुसूर तेरे शौहर का है । 'महात्मा गाधी । महात्मा गाधी' रटता रहता था। अब गाधी को बुलाकर लाओ कि छुड़ाए तुम्हारी बेटी को किमी सिप दरिन्दे के चगुल मे । बडा 'हिन्दू-मुस्लिम एकता' की डीगें हाकता था। जब जवाहरलाल की वहन, विजय लक्ष्मी डाक्टर महमूद से ब्याह करना चाहती थी, उसने आप बीच मे पडकर लडकी को रोक दिया, तब कहा गई थी उसकी हिन्दू-मुस्लिम एकता मुसलमान लड़की हिन्दू से ब्याह कर सकती है, हिन्दू लडकी मुमलमान से नही ब्याही जा सकती-आखिर क्यो?" इतने में येगम मुजीव को जेठानी आ गई। बाहर-आगन मे ही माया पीट रही थी। कमरे में घुसते ही उसने दहाडना शुरू कर दिया । वाल नोच रही थी और छाती पर घूसे मार रही थी। जैसे घर में किमीकी मौत हो गई हो। बार-बार सीमा को बुरा-भला कह रही थी। उसे इस . । मन परदेसी/२५ - । - तरह रोते-चिल्लाते देखकर, बेगम मुजीव की आंखों में भी मांसू उमड़ आए। उसने भी रोना शुरू कर दिया। यह देखकर उसकी जेठानी, बेगम मुजीव के गले से लिपटकर और ऊंचा रोने लगी। विलाप करने लगी। सारे घर में कुहराम मच गया। नौकर-चाकर इकट्ठे हो गए। जेवा छल- छल आंसू बहाती, एक कोने में आकर खड़ी हो गई। और फिर पड़ोसियों का जमघट लग गया। दूर-पास के रिश्तेदार इकट्ठा हो गए। घर में जैसे मातम छा गया । वेगम मुजीव की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करे और क्या न करे ! पहली बार उसने देखा कि उसके घर के दुःख-सुख में उसका कोई हिन्दू पड़ोसी शामिल नहीं हुआ था, जान-पहचान का कोई सिख नहीं आया था। सारे-के-सारे मुसलमान थे । क्या दोस्त-रिश्तेदार और क्या अड़ोसी-पड़ोसी! बेगम मुजीव के सामने बैठकर अजीब-अजीव कहानियां गढ़ी जा रही थीं । कभी कहीं खुसर-फुसर होती, तो कभी कहीं । और फिर लोग बेगम मुजीव के घर में बैठकर, उसके सामने कुछ इस तरह के ताने-बाने वुनने लगे । सुन-सुनकर उसके पांव तले से ज़मीन निकल जाती। "यहां, इस घर से लड़की को अगवा किया गया है।" "हिन्दू और सिख गुंडे आए। घर में औरतें अकेली थीं। छुरा दिखा- कर बड़ी बहन को मोटर में बिठाकर ले गए।" "लड़की खुद भागी है। लड़के के साथ उसकी आशनाई थी। मां मानी नहीं, उसके सिर पर खाक डालकर चली गई।" "वह तो कव की ताक में थी। घर के सारे गहने साफ़ करके निकली - "और बैठी भी जाकर अमृतसर है, जहां आजकल कोई पहुंच ही न पाए।" "आजकल अमृतसर की तरफ़ कोई मुसलमान मुंह कर सकता है ? किसीको जान नहीं चाहिए !" और फिर शेख मुजीव के बड़े भाई की सलाह से पड़ोसियों, रिश्तेदारों और दोस्तों ने फैसला किया कि थाने में रपट लिखाई जाए---मुसलमान लड़की को हिन्दू-सिख गुंडे अगवा करके ले गए थे। लड़की के साथ घर का २६/ मन परदेसी सारा जेवर भी लूटकर ले गए थे। और फिर यह भी फैसला हुआ कि एक प्रतिनिधि मंडल दिल्ली जाकर रोए-पीटे । क्या पता, कुछ सुनवाई हो जाए ! लड़की के अब्बा के कई साथी कांग्रेस सरकार मे ऊचे पदों पर थे। खुद जवाहरलाल उसे जानते थे। विट-विट, वेगम मुजीब हर किसीके चेहरे को और देख रही थी। उसको समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। उसकी आखों के आगे चक्कर- चक्कर, अधेरा-अधेरा-सा छा रहा था। वेगम मुजीव को लगता, जैसे वह किमी गहरे कुए मे उतरती जा रही हो। उसका दिल बैठता जा रहा था। कुछ देर के बाद उसका सिर एक ओर लुढक गया। वह वेहोश हो गई। सबके हाथ-पांव फूल गए। कोई उसकी हथेलिया रगडने लगा तो कोई उसके मूह पर पानी के छीटें मार रहा था। कोई डाक्टर को बुलाने दौडा। घर में अफरा-तफरी मच गई। कुछ देर बाद जब वेगम मुजीव ने आस खोली तो उसने देखा, उसके पलग के पास कुर्सी पर डाक्टर गोपाल की जगह डाक्टर सलीम बैठा था। सडक पार डाक्टर गोपाल का क्लिनिक था । हमेशा वही उनके यहा इलाज करता था। अभी तो उस दिन इनके घर से होकर गया था। लेकिन अब एक हिन्दू डाक्टर उनके लिए पराया हो गया था। तीन किलोमीटर दूर से डाक्टर सलीम को बुलाया गया था ताकि एक मुसलमान मरीज़ का एक मुसलमान डाक्टर इलाज करे । वेगम मुजीव ने इधर-उधर नजर घुमाकर देखा, कालू कही दिखाई नहीं दे रहा था। कालू उनका हिन्दू नौकर था । उसकी मा इनके यहा काम किया करती थी। उसका वाप सारी उम्र इनके यहा नौकरी करता रहा। दोनों इनके घर में ही मरे थे। कालू इनके घर में बच्चों की तरह पला था। बच्चों के साथ सेलकर वडा हुआ था। शेख साहब ने लाख कोशिश की थी कि चार अक्षर पढ जाए, लेकिन कमवस्त की किस्मत में पढ़ना नहीं लिखा था। और आजकल यह ऊपर का काम करता था, जैसे उसका वाप सारी उम्र करता रहा । कालू, इधर-उधर कही दिखाई नहीं दे रहा था। कालू तो वेगम मुजीब के साथ परछाई की तरह रहता था। क्या मजाल जो पल के लिए आख से ओझल हो जाए। खास तौर मन परदेसी/२७ की दीवारें खड़ी करता रहा हो, एक झटका लगा, और सब-की-सव ढह गई। फिर वेगम कश्मीर की खबरें पढ़ती । पाकिस्तानी कबाइलियों का मुकावला, कश्मीरी मुसलमान अपने हिन्दू और सिख भाइयों के साथ मिलकर कर रहे थे। कंधे-से-कंधा मिला लुटेरों के साथ जूझ रहे थे। उधर महात्मा गांधी नवाखली और विहार में गांव-गांव फिरकर फ़सादियों को लज्जित कर रहे थे। मुसलमान, अल्पसंख्यकों की हर तरह से सहायता की जा रही थी । उनको फिर से उनके गांवों को बसाया जा रहा था। जिनके घर जला दिए गए थे, सरकार उनके लिए नये घर बनवा रही थी। जो लुटे गए थे, उनको हरजाना दिया जा रहा था। जगह-जगह अमन कमेटियां वन रही थीं । मस्जिदों की मरम्मत हो रही थी। मदरसों की मदद की जा रही थी। मुसलमान बच्चों के वजीफ़ लगाए जा रहे थे। उस दिन सुवह यू० एन० ओ० में शेख अब्दुल्ला ने वयान दिया था- 'कश्मीर भारत का अटूट अंग है। कश्मीर के लोगों का भारत में शामिल हो जाने का फैसला आखिरी है। हम पाकिस्तानी हमलावरों से कश्मीर का चप्पा-चप्पा खाली करवाकर सांस लेंगे।' अहिंसा के दूत महात्मा गांधी ने कश्मीर की लड़ाई को उचित ठहराया था। यह लड़ाई न्याय के लिए लड़ी जा रही थी। जूठ और फरेव, हिंसा और जुल्म से यह जंग थी। सोच-सोचकर वेगम मुजीब का सिर चक्कर खाने लगता। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, क्या ठीक है, ठीक नहीं। टहलते-टहलते वेगम मुजीव नौकरों के क्वार्टर की ओर जा निकली। काल के कमरे का दरवाजा खुला था। सामने खिड़की भी खुली थी। जाने से पहले कमरे को साफ़ करके गया था। सफ़ाई का दीवाना-हिन्दू । क्या मजाल जो काग़ज़ की एक कतरन भी कहीं नज़र आ रही हो। कहीं धूल- धचा नहीं। वेगम हैरान रह गई। अपने कमरे के एक कोने में कालू के भगवान की मिट्टी की मूर्ति वैसी-की-वैसी पड़ी थी। मूर्ति के पास अगर- बत्ती और दियासलाई भी पड़ी थी। इन्हें अपने साथ लेकर नहीं गया था। फिर वेगम मुजीब को ध्यान आया कि हिन्दुओं में शायद एक जगह पर । क्या । - . ३०/ मन परदेसी स्थापित मूर्ति को उठाया नहीं जाता। कालू के भगवान की मूर्ति को देखकर वेगम मुजीब एकाएक भावुक हो गई । आप-ही-आप उसके कदम आगे बढे, और पता नहीं क्व उनने दियासलाई जलाई, और अगरवती को दिखाकर भूति के सामने टिका दिया। बिल्कुल उमी तरह, जैसे कालू किया करता था। कालू के भगवान की मूर्ति के मामने मुलग रही अगरबत्ती के धुए में बेगम मुजीव को एक पुराना दृश्य दिखाई देने लगा। इसी कमरे में कालू का जन्म हुआ था। उसके वाप ने नाचते-उछलते हुए यह खवर आकर उन्हें दी थी। और सब घरवाले नये जन्मे बच्चे को देखने आए थे। जैसे जोक-सी हो । जन्म के समय बड़ा कमजोर था। शायद पूरे दिनों का नहीं था। लेकिन शेख माहब ने उसकी देखभाल का खास ध्यान दिया और उसे बचा लिया और फिर कैसे वह घर के बच्चो के साथ सेल-सेलकर बड़ा हुआ। मीमा जितना । हमेशा उमे छेडा करता-मैं तुमसे पूरे पन्द्रह दिन बड़ा हूँ, तुम मुझे भाईजान कहा करों। अपने बच्चो की तरह हो तो वेगम मुजीब ने उसे पाला था। और कमे वह इस घर पर जान देता था ! क्या मजाल कि कोई निनका भी इधर-उधर हो जाए। क्या मजाल कि कोई नौकर घर का कोई नुकमान करें। खाली कमरे मे बत्ती नही जल सकती थी। धैकार नल नहीं बह सकता था। जब कोई बाहर निकले, पखा बन्द करके निकले । फमाद के दिनो में वह कमे तडपता था ' हिन्दुओ के माय हिन्दू और मुमलमानो के माय मुसलमान । जहा किसीको मुसीबत मे देखता, वहीं जा पहुचना । हमेशा कहता, कालू नाम होने का यही तो फायदा है । हिन्दू समझते हैं कि मैं हिन्दू हूँ और मुसलमान ममझते हैं कि मैं मुसलमान हूँ। "लेकिन तुम हो कौन ?" एक दिन वेगम मुजीव ने उससे "न में हिन्दू हू, न मुमलमान," वह छूटते ही वोला, जैसे रटा-रटाया हुआ जवाब दे रहा हो । "हिन्दू मा-बाप के घर जन्मा । मुमलमान मालिक के टुकड़ों पर पला। मैं न हिन्दू हू, न मुसलमान, मैं तो वम हूं इक इंमान ।" कालू के कमरे से लौटते हुए देगम मुजीब को अचानक ध्यान आया कि मीमा ने लिखा था कि वह उसे एक और चिट्ठी लिमेगी। अभी तक पूछा। । मन परदेसी/३१ उसकी चिट्ठी नहीं आई थी। आजकल की अफरा-तफरी में डाक का भी क्या एतवार । पता नहीं, कहां गाड़ी रोक ली जाए ! पता नहीं, किस गली में डाकिया को छुरा घोंप दिया जाए। अभी वेगम मुजीव अपने कमरे में पहुंची ही थी कि शेख मुजीव का बड़ा भाई उस दिन की तरह दनदनाता हुआ उसके कमरे में आ धमका। "वीवी ! तुम्हें चुल्लू-भर पानी में डूब मरना चाहिए," वह चिल्लाया और अपने हाथ में पकड़े हुए उर्दू के एक अखबार को घुमाकर अपनी भावज की ओर फेंका। वेगम मुजीव अपने जेठ के तमतमा रहे लाल सुर्ख चेहरे की ओर देख रही थी। अव और कौन-सी मुसीवत आई थी ! उसने न अख़बार उठाने की कोशिश की, न पढ़ने की। कोई फ़िरकापरस्त चीथड़ा था। " इस लड़की ने तो हमारी नाक काट दी। अगर तुझे एक सिख के साथ व्याह करना ही था तो कर लेती। अगर तुझे यह झक मारनी ही थी तो यह झक मार लेती । तुझे मज़हव वदलने की क्या ज़रूरत थी? तुझे सिख बनने की क्या मुसीबत थी? कचहरी में जाकर सिविलमैरेज करवा लेते। कल जब उसका चाव ठंडा पड़ जाता, जव सिखों की करतूतें देख- देखकर उसका मन भर जाता, तो अपने घर लौट आती । कचहरी में अर्जी डालकर, तलाक ले लेती । इस लड़की ने तो वेड़ा ही डुबो दिया है। पहले सिख वनी। फिर वाकायदा आनन्द-कारज करवाया। शेख मुजीव अहमद की बेटी की सारी करतूत इस अखवार में छपी है। कच्चा चिट्ठा । बाप चार बार हज कर चुका था। उमरा तो उसने कई वार किया होगा। और बेटी अपने वाप-दादा के मजहब को लात मारकर चली गई। हम तो किसीको मुंह दिखाने लायक नहीं रहे । मैं तो इस शहर में और नहीं रह सकता। किस मुंह से मैं मस्जिद में नमाज पढ़ने जाया करूंगा? आज जुम्मा है, मैं जमात में खड़ा होकर सजदा नहीं कर सकता । तोवा ! तोबा !! यह कैसी जहरीली नागिन हमने इस घर में पाली थी! कुछ तो उसे लिहाज़ होता, अपने अब्बा का! कुछ तो उसे ध्यान होता, अपने इतने बड़े खानदान का ! कुछ तो वह सोचती कि हमारे आंगन में अभी एक और बैठी है ! उस जैसी । जवान-जहान । उसे कौन मुंह लगाएगा ? अखवार में अच्छी हमारी मिट्टी पलीद की गई है । शेख मुजीब ? ३२/ मन परदेसी म-२ हिन्दू-मुस्लिम एकता का हामी था । सारी उम्र महात्मा गांधी का चमचा बना रहा। काग्रेस का पिट्ठू । और अब उसकी बेटी ने सिख धर्म कबूल करके अपने अब्बा के स्वाब को पूरा कर दिया है। सिख लड़के से व्याह कर अपने अन्या के अरमान पर फूल चढाए हैं ! मैं तो रास्ते में वकील से मिलता आया हूं। सरकार ने नया कानून बनाया है। इधर हिन्दुस्तान में भी और उधर पाकिस्तान में भी। फसाद के दौरान जिस किसीका मजहब बदला गया है, उसे नहीं माना जाएगा। जिस किसीका जबरदस्ती व्याह हुआ है, उसे मंसूख कर दिया जाएगा। सब मुसलमान लडकिया जो इधर भगाई गई हैं, अपने घरों को लौटा दी जाएगी। सव हिन्दू और मिस लड़किया जो उस तरफ अगवा को गई हैं, अपने मा-बाप के पास भेज दी आएंगी। मैं तो कहता हू, बस अर्जी-भर देने की देर है । पुलिस की टुकड़ी जाएगी और लड़की को बरामद करके अपने कब्जे में कर लेगी। मैं भी शोख शरीफ़ का बेटा नही जो चार दिनों में अपनी लडकी को निकालकर तेरे कदमों पर न डाल दू। वकील तो कहता है, इधर अर्जी देंगे, उधर पुलिस को हुक्म मिल जाएगा । अगर किसीकी मुट्ठी गर्म करने की जरूरत हुई तो वह भी कर दिया जाएगा। मैं खुद पुलिसवालो के साथ अमृतसर जाऊगा। मुझे डर है कि कहीं वह सिख का बच्चा, लड़की को इधर-उधर न छुपा दें। सुना है कि अगवा की गई लड़कियों को आगे-पीछे कर दिया जाता है। जब पुलिस के छापे की लोग सुनते हैं, तो इस तरह की लडकियों को बाहर सेतो मे छुपा दिया जाना है। ढूढना मुश्किल तो होगा, लेकिन कोशिश करने से क्या नहीं हो सकता !" "भाईजान ! सीमा को ढूढने की आपको तकलीफ नहीं करनी होगी," इतनी देर से अपने जेठ का लंक्चर मुन रही वेगम मुजीब आखिर वोली, "मह उसको चिट्ठी है, आप पढ लें।" "मीमा की चिट्ठी ?" शेख शब्बीर हैरान हो कर चिट्ठी पढने लगा। जमे-जमे चिट्ठी पढ़ता जाता, उसके चेहरे का रंग उडता जा रहा था। और फिर वह दरवाजे के पीछे, कोने में पड़े हुए सोफे पर जैसे धस गया हो। निट्टी पढते-पटते जैसे उसके होश उड़ गए हो। "अम्मी ! अम्मीजान !" इतने में जेवा कमरे में आ पुसी, "अम्मी- मामी जान ! अम्मीजान ! कालू के कमरे में जो मूर्ति है न, उसके सामने आप- ही-आप अगरबत्ती जलती रहती है । आज उसे गए हुए कितने दिन हो गए हैं । अगरबत्ती, आप-ही-आप हर रोज़ सुबह जल उठती है। सारे नौकर कमरे में इकट्ठा होकर यह अचरज देख रहे हैं। अब तो अड़ोसी-पड़ोसी भी आ रहे हैं."अरे ताऊ आए हैं। माफ़ करना।" अपने ताऊ को कोने में बैठे, सीमा की चिट्ठी पढ़ते हुए देखकर जेवा झेंप गई। ६ शेख शब्बीर सीमा की चिट्ठी पढ़ते हुए मानो उसमें समूचा डूब गया हो। कुछ देर के बाद वेगम मुजीब ने देखा कि चिट्टी उसके हाथ से गिर गई थी और उसका मुंह खुले-का-खुला रह गया था। फटी-फटी आंखों से वह अपनी भावज की ओर देख रहा था । उसके चेहरे पर एक अजीव-सी भयानकता उभर आई थी। "भाईजान, भाईजान ! यह आपको क्या हो रहा है !" वेगम मुनीव चिल्लाई । ज़ेवा कमरे में से जा चुकी थी। ख शब्बीर शहर का एक अमीर मुसलमान था । ढेर-सारी जमीन, रिहाइश के लिए पुरानी हवेली ! अड़ोस-पड़ोस में अच्छा नाम था। लाखों रुपये की आमदनी । घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। शहर के मुसलमानों का वह चौधरी था । अपनी प्रतिष्ठा के लिए वह हर किसीकी मदद करता रहता था । कांग्रेस वालों के साथ कांग्रेसी, फिरकापरस्तों के साथ फिरकापरस्त । हर किसीको खुश रखता। हर किसीकी रुपये-पैसे से मदद करता । और राजनीतिज्ञ, जब तक उन्हें पैसा मिलता रहे, वह इस बात की चिन्ता नहीं करते कि देने वाला कोन है, क्या करता है, उसका पैसा कहां से आता है। हजारों रुपये उसने कांग्रेस को चंदा दिया होगा और हजारों रुपये उसने लीग जैसी कट्टर फ़िरकापरस्त पार्टियों को।हर कोई उसे अच्छा-अच्छा कहता। सबकी नज़रों में वह एक रोशन-दिमाग, सर- मायादार था । अब, जब से साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए थे, वह फ़सादियों ३४/मन परदमी की मरपरस्ती कर रहा था, पैसे से, हथियारों से । और अगर जहरत पड़े तो अपने किले जमी हवेली मे उन्हें सिर छिपाने के लिए ठिकाना भी देता था। जिन मुसलमान गुंडो ने मीमा की इज्जत लूटी थी, वे तो शेख शम्बीर के भुगतान' में थे। उन्हें तो वह कई महीनों से बंधा हुआ माहाना दे रहा था। हर किसीको उसने देसी रिवाल्वर खरीदकर दिए थे। शेख शब्बीर को अच्छी तरह याद था कि इस घटना के बाद उन्होंने पूरा किस्सा आकर उसे सुनाया था। उन्होंने तो वह लॉकेट भी लाकर उसे दिया था। शेख शब्बीर ने जरूर उसे कही संभालकर रखा होगा। बार-बार कहते, "आज एक सिखनी की ऐसी-तैसी को है।" हर कोई बढ़-चढ़कर शोखिया बधार रहा था । कोई कहता, उसके भाई को टायलेट में वद करने की योजना उसकी थी। कोई कहता, लड़की पर पहले उसने हाथ डाला था। कोई कहता, अगर वह उसके तमाचा न जडता तो वह काबू में आनेवाली थोडे ही थी। कोई कहता कि वह तव मानी, जव उसने छुरा निकालकर उमको छाती पर रखा । कोई कहता कि उसके हाथ में रिवाल्वर देखकर उसके सोते सूख गए थे। बार-बार कह रही थी-मैं मुसलमान हूं। वार- बार अपने अब्बा का नाम बता रही थी, जो उन्हें याद नहीं आ रहा था। हर कोई कहता--सिखनी थी, सिखनी। उसकी चोटी पजावी लडकियो की तरह थी। उसके जीवन का उभार पजावी लडकियो जैसा था। पजाबियो जैसे गेहुआ रग। पंजाबियो जैसे दात, ज्यो मोतियों के दाने हो। ऊंची, लम्ची, अकेले-अकेले हममे से हर एक को पछाड देती। ये तो हम छह थे जो उमने हार मान ली। पहले तो एक शेरनी की तरह मुकाबला करती रही। नाखूनो से खरोचती रही। दातो से काटती रही। 'बदतमीज ! वदतमीज !' कहती रही। फिर शायद थक गई, शायद हार गई, शायद डर गई, शायद मक्ते मे आ गई, शायद वेमुध हो गई। उसने अपने-आपको हमारे हवाले कर दिया। जैसे मास का एक लोथडा हो और हममे से जिम किमीका जी चाहा, हम अपनी मनमर्जी करते रहे।... "नहीं ! नहीं !! नही !!!" चीखता हुआ, शेख शब्बीर, एकदम उठ- कर अपने मिर के बाल नोचता हुआ, बाहर निकल गया। । मन परदेसी/ ३५ - वेगम मुजीव, 'भाई जान ! भाई जान !' कहती हुई गेट तक उसके पीछे गई। लेकिन उसने इसकी एक न सुनी। पता नहीं वह क्या वोलता: जा रहा था ! उसकी समझ में कुछ नहीं आया। हाथ मलती हुई वह कोठी में वापस आई। कमरे में घुसते ही उसने देखा कि जेवा फर्श पर गिरी चिट्ठी को पढ़ रही थी। उसने अपनी जवान.. जहान वेटी से कुछ नहीं कहा । जेबा ने चिट्ठी पढ़कर अपने पास रख ली। वेगम मुजीव ने न उससे वह चिट्ठी कभी मांगी, न उसे ज़ेवा ने वह चिट्ठी कभी वापस की। उस शाम वेगम मुजीव अपने जेठ के यहां गई। टेलीफ़ोन पर किसी- ने बताया था कि उन्हें तेज़ बुखार है। बुखार का प्रभाव दिमाग पर हो गया था। आप-से-आप वह बोलता जा रहा था। डाक्टर ने उसके सिर पर बर्फ की पट्टियां रखने के लिए कहा था लेकिन इसका कुछ फ़ायदा नहीं हुआ था। वेगम मुजीव परेशान थी। यह बुख़ार कोई मामूली बुखार नहीं था। जिस हालत में, उसका जेठ सुवह उसके घर से निकला था, उसे तो कुछ- भी हो सकता था। शाम को जव वेगम मुजीब ने उसके कमरे में क़दम ही रखा तो शेख शब्बीर ने अपने तकिया के नीचे से सीमा का लॉकेट निकालकर उसके मुंह पर दे मारा। "तुम अपनी बेटी का लॉकेट लेने आई हो। यह लो उसका लॉकेट ।" अंगारों की तरह दहकती हुई लाल-लाल आंखें, मुंह में से झाग निकल रही थी। न जाने वह क्या बके जा रहा था। उसकी वीवी, बच्चे, अड़ोस-पड़ोस वाले जो कोई भी उसकी बीमारी का सुनकर इकट्ठा हुए थे, एक-दूसरे के मुंह की ओर देख रहे थे । फिर शेख शब्बीर ने छल-छल आंसू रोना शुरू कर दिया। वेगम मुजीब को अपने पास विठाकर, वह दहाड़ें मारता हुआ रो रहा था। एक बार फिर डाक्टर को बुलाया गया । एक बार फिर उसे टीका लगाया गया। कहीं रात ढल जाने पर चैन आया और उसकी आंख लग गई। हर कोई वेगम मुजीव से उस लॉकेट के बारे में पूछता। लॉकेट; ३६/ मन परदेसी का कर चेशक सीमा का था, लेकिन उसके ताऊ के पास कसे जा पहुंचा, इस रहस्य का किसी को पता नही था, वेगम मुजीव को भी नहीं । जब उसका जेठ सो गया तो वेगम मुजीय घर लौट आई। शेख शब्बीर का घर शहर में था । वेगम मुजीव का गला मिविल लाइन में। घर पहुंची तो देखा कि मीमा की दूमरी चिट्ठी आई हुई थी। 'अम्मीजान ! मैं आपको इतने दिन चिट्टी नहीं लिख पाई,' बेगम मुजीव ने अपने-आपको कमरे में वद कर लिया और सीमा की चिट्ठी पढ़ने लगी। इसकी जगह कि लोग आपको मेरे बारे में कहानियां गढ-गढ़कर सुनाएं, मैंने फैसला किया है, और इसमें इन्द्र मेरे साथ सहमत है, कि अपनी शादी की सारी कहानी आपको बता दें 'जैसे पंजाब के हालात आजकल चल रहे हैं, शरणार्थी अभी तक आ रहे है, महाजर अभी तक जा रहे है । अभी तक सूट-खसूट हो रही है। अभी तक औरतो को अगवा किया जा रहा है। अभी तक पडोमी पड़ोमियों रहे है । अभी तक आगजनी हो रही है। अभी तक गाड़िया लूटी जा रही है । अमृतसर में, जिसे गुरु की नगरी कहते हैं, हर चौथे भादमी के हाथ मुझे खून से रगे दिखाई देते है। हर शरणार्थी जो वाघा की सरहद पार करके आता है, जैसे उसका कोई-न-कोई अग कटा हुआ हो। कोई बेटियां गवाकर आए हैं, कोई बेटे। कोई माए जान पर खेल गई हैं, कोई वाप अपनी कुरवानी देकर अपने बच्चो को बचा लाया । जो लखपति थे, दर-दर की ठोकरें खा रहे है। बडे-बड़े जमीदार भूखे मर रहे हैं, पैसे-पैसे को तरस रहे हैं। 'इस हालत मे मेरा आपसे इजाजत मागना और आपका इसलिए रजामंद होना नामुमकिन था। और फिर मेरे पास वक्त ही कहा था, जो आपको रजामदी का इतजार करती? मैं तो हर रोज 'मुझे मालूम है कि यह जानकर कि मैंने एक गैर-मुसलमान से शादी कर ली है, आपका दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया होगा। मुझे साफ दिखाई दे रहा है कि आपकी आंखों मे से आसुओ की धारा बह रही है। लेकिन अम्मी ! जो कुछ भी हुआ, मैं खुश हू, बहुत खुश, शायद अल्लाह को यही मर्जी थी। . मन परदेसी/ ३७ -- चार दिन, और मुझे पंजावी वोली अच्छी लगने लगी है। इनका लहजा अव मुझे अजीव-अजीव नहीं लगता। मैंने शलवार-कमीज़ पहनना सीख लिया है। अब मैं पंजाबी खाना पकाना भी सीख रही हूं। लस्सी और मक्खन; पनीर और साग! हमारे यहां गोश्त बहुत कम पकता है, चावल बहुत कम खाए जाते हैं। अब मुझे इनकी कभी ज़रूरत भी महसूस नहीं होती। औरत कैसे अपने-आपको हालात के मुताविक ढाल लेती है ! 'हमारी शादी की यहां चारों ओर चर्चा है। अखवारों में हमारी तसवीरें छपती रहती हैं। लोगों ने जैसे हमें सिर पर उठा लिया हो। इन्द्र को यहां नौकरी मिल गई है। रहने के लिए घर मिल गया है। यहां खालसा कालेज में शरणार्थी कैम्प खुला हुआ है। हम दोनों इसमें काम करते हैं। चाहे इस ओर भी बड़े जुल्म हुए हैं, लेकिन मैं तो सुन-सुनकर हैरान होती रहती हूं। और जो अत्याचार उस ओर हिन्दू-सिखों पर मुसलमानों ने ढाए हैं, दोनों ओर हमने अपना मुंह काला कर लिया है। कोई किसीको दोपी नहीं ठहरा सकता। कुछ भी हो, मैं खुश हूं, वहुत खुश ! यह जानते हुए भी कि आप सब मुझसे छूट गए हैं, मैं इन्द्र जैसे शौहर की बीवी बनकर अपने-आपको खुश-किस्मत समझती हूं। जैसे मुझे जन्नत मिल गई हो। अम्मी ! अब मैं उस दिन का इंतजार कर रही हूं, जब मैं इन्द्र के साथ अपनी मां के घर में कदम रख सकूँगी। इन्द्र जैसे इंसान के साथ व्याह करने के फैसले में, मुझे यकीन है कि मेरे अब्बा की रजामंदी मेरे साथ है। आपकी वेटी-सीमा।' . . ७ "लेकिन सीमा को सिख बनने की क्या जरूरत पड़ी थी ?" उस दिन सुवह नाश्ते के लिए अम्मी के साथ मेज़ पर बैठी हुई जेवा, वातों-बातों में तुनक गई । एक जहर-सा था उसके लहजे में । उस दिन सीमा का जन्म- ३८/मन परदेसी दिन था और बेगम मुजीव को अपनी बिछुडी हुई वेटी याद आ रही थी। उसकी आवाज़ भरा रही थी। और वह देखकर ठिठक-सी गई कि जबा एकदम आग-बगूला हो गई थी। इतनी जोर में उसने अपने चाय के प्याले को मेज पर पटका कि प्याला टुकड़े-टुकड़े हो गया। "मीमा की चिट्ठी पढकर भी तुम यह कह सकती हो?" कुछ देर विट-विट जेबा के मुंह की ओर देखकर, वैगम मुजीब ने उमे याद दिलाया। "उसकी चिट्ठी एक फरेव है, एक धोखा है।" जेवा की आंखो में जैसे सून उतर आया हो। "क्या मतलब?" उसकी अम्मी तड़प उठी। "यह सब मक्कारी है। एक कहानी गढ़ी गई है, हमारी हमदर्दी जीतने के लिए।" "तुम यह क्या बके जा रही हो?" वेगम मुजीव को गुस्मा आ रहा था। "अगर हालात आम दिनों जमे होते, तो मैं आपको दिखा देती कि यह मरासर कुफ है। सीमा हमे उल्लू बना रही है।" "हालात आम दिनो जैसे होते तो जो कुछ उस मासूम-जान पर बीती, यह जुल्म होता ही क्यो ?" वेगम मुजीब की आखें सजल हो रही थी। "हालात के जिम्मेदार हिन्दुस्तानी हिन्दू हैं।" "कोई भी हो, दुरी बात बुरी है।" "कुछ भी हो, सीमा की कहानी कोरा झूठ है। जैसे किसी घटिया नावल का कोई किस्सा हो।" बेगम मुजीव, घोर उपेक्षा से जवा की ओर देख रही थी। उमकी समझ मे नही आ रहा था कि वह सीमा के लॉकेट के बारे में उसे कसे वताए, जो उसका ताऊ कही से ढूढ लाया था । लेकिन लॉकेट शेख शब्बीर के हाय कमे लगा? वेगम मुजीब कुछ समझ नहीं पा रही थी। कई दिनों में वह यह मोच-सोचकर परेशान हो रही थी। उधर उसके जेठ की तबीयत अभी तक खराब थी। उसे भी । मन परदेसी/३६ । ज्यादा नहीं कुरेदा जा सकता था। अभी उन्होंने नाश्ता किया ही था कि डाक आ गई । डाक में सीमा की चिट्ठी थी। कालू सीमा के पास पहुंच गया था। सीमा बहुत खुश थी। ऐसे लगता है, जैसे वो ही पुराना घर हो !' उसने लिखा था। पोवा ने जैसे ही सुना, वह और गुस्से में आ गई । क्रोध में उसके मुंह से झाग बहने लगी। उसके होंठ कांप रहे थे। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह अपने गुस्से पर कैसे काबू पाए ! वेगम मुजीव को मुंह का जायका भी करवा-फसला हो रहा था। यह हो क्या रहा था? उसके घर में ही हिन्दुस्तान और पाकिस्तान बन गया था। उसके परिवार को दो भागों में बांटा जा रहा था। आखिर कालू उनके घर का ही तो आदमी था। उन्होंने तो उसे कभी नौकर की तरह नहीं जाना था। क्योंकि देश का बंटवारा हो गया था, कालू भी अपनी सारी पुरानी मुहव्वत, सारी वफ़ा को भूलकर अपने 'भारत' में जा बैठा था। "यह सब साजिश है सीमा आपा की ! वही उसे समझाकर गई होगी । वही उसके फान भरकर गई होगी। नहीं तो कालू को इतनी असल कहां? कैसे अपने क्वार्टर को वुहार गया है ! अपना भगवान भी पीछे छोड़ गया।" जेचा आप-से-आप वोलती जा रही थी, "खुद ही चुपके से जाकर तांगा ले आया। खुद ही सामान लादा और किसीको बताए विना स्टेशन चला गया। क्या हममें से किसीका उसे लिहाज नहीं था ? क्या हममें से किसीके लिए उसे हमदर्दी नहीं थी ? आंख की शर्म भी तो कोई चीज होती है। मैं बार-बार मिन्नतें करती रही, आपने उसे समझाया; लेकिन उसने परों पर पानी नहीं पड़ने दिया। अगर उसे अपने ठिकाने का पता न होता तो क्या वह घर छोड़कर जा सकता था? आखिर उसे हुआ भी क्या था? उसे किसीने क्या कहा था? किसीने बुरा-भला नहीं कहा । आखिर उसका हमें यूं छोड़कर चल देना, इसका मतलब क्या है ?" अपनी बेटी की नाराजगी देखकर, बेगम मुजीव सोच में पड़ गई। क्या पता जो जेवा कह रही थी, वह ठीक ही हो। मेरठ से दिल्ली जा रही, खचाखच भरी गाड़ी में यूं किसी लड़की की इस्मत लूटना कोई मानने ४०/मन परदेसी वाली बात नहीं लगती थी। बेशक उन दिनों हालात अमाधारण थे। लेकिन यूं किसीकी इज्जत पर डाका डालना, एक फिल्मी कहानी-सा लगता था । और फिर कालू का विना कहे-सुने चल देना; वेगम मुजीब की समझ में कुछ नहीं आ रहा था । कालू तो सारी उग्र उसके इशारे पर चलता रहा था। क्या मजाल जो कभी सामने से जवाब दिया हो। लेकिन उस दिन तो वह नजर से नजर नहीं मिला रहा था। 'वेगम माहब, यही समझो कि कालू मर गया है,' बार-बार यह कह रहा था। लेकिन कालू को कैसे भुलाया जाए ? अपनी मतान को वेगम मुजीब भूल सकती थी, लेकिन कालू को भूलना मुश्किल था। जव से बह गया था, कई समस्याएं बेगम मुजीव के लिए खड़ी हो गई थी। नौकर का नौकर और बेटे का वेटा । जव कालू इस घर में था, तो उसने कभी मह- भूस नहीं किया था कि वह अकेली है। अवला औरत ! घर का राशन, कपड़ा-लत्ता उसके माय जाकर खरीद लाता। दुकानों का किराया इकट्ठा करता । जायदाद का कोई-न-कोई मुक लगा ही रहता था। कचहरियो की हाजिरी भरना भी उसके जिम्मे था। फिर घर की सफाई, वाग-बगीचे की देख-भाल और सारा छिट-पुट काम उमने सभाला हुआ था। क्या मजाल जो एक सुई भी इधर-से-उधर हो जाए। अव, जव से बह गया था, गली के बच्चे, बगीचे के अमरूद तोड-तोड़- कर खाते रहते थे। दिन में सड़क पर घूमते ढोर वगले के लॉन की घाम को मुह मारने लगते । ग्वाले ने दूध में पानी मिलाना शुरू कर दिया था। उसे बुरा-भला कहने वाला कोई न था । माली गायब रहने लगा था। जमादार इधर कोठी में दाखिल होता, उधर निकल जाता। न दग से झाडू देता, न फर्श रगड़ता । वही खानसामा था, लेकिन अब उसके पकाए खाने मे स्वाद नहीं रहा था। जब कालू था, तो मेज पर याना वक्त पर आ जाता था। खाना परोसने से पहले किस सलीके से वह उसे सजाता था! उधर जेवा थी, जैसे सीमा से उसे खुदा-वास्ते का वर हो । घर में कोई उमका नाम नहीं ले सकता था। हर वक्त उसको बुराइयां करती रहती । उसे शिकायत थी कि सीमा ने अपने सोने के कमरे में जो कैलेण्डर । मन परदेसो/४१ -- - - टांगा हुआ था, उसमें कृष्ण वंसी वजा रहा था। उसके शृंगार-मेज़ की दराज में कई तरह की विदिया निकली थीं। कालेज में ज़रूर माथे पर बिन्दी लगाती होगी। आम तौर पर उसकी दोस्ती हिन्दू लड़कियों से होती थी, कमला और विमला, मोहिनी और कल्याणी, सुन्दरी और सरोज; ; किस-किसका नाम कोई गिनवाए ? पिछले रमज़ान उसने एक भी रोज़ा नहीं रखा था। ईद वाले दिन ईदी इकट्ठी करके अपनी हिन्दू सहेलियों के साथ सिनेमा देखने सबसे पहले चल दी थी। उसकी अलमारी में से ढेर सारी हिन्दी की किताबें निकली थीं। जेवा ने धीरे-धीरे, सीमा की ओर से अपनी मां का दिल विलकुल खट्टा कर दिया। उसकी चिट्ठियां आती, पर वह जवाव न देती। फिर उसकी चिट्ठियां आनी बंद हो गई। जैसे-जैसे कालू के चले जाने से समस्याएं पैदा होती, वह भी उसके मन से उतरता जा रहा था। उधर अपने जेठ का, शहर में उसे बड़ा सहारा था। उसकी तबीयत दिन-पर-दिन गिरती जा रही थी। शेख शब्बीर को आगरे के मानसिक रोगों के अस्पताल में भी दिखा लाए थे। कोई फर्क नहीं पड़ा था। कभी मुसलमानों को बुरा-भला कहने लगता, कभी हिन्दुओं को। कभी पाकिस्तान को सलावतें सुनाने लगता, कभी हिन्दुस्तान को । वेगम मुजीव ने आजमाकर देखा था कि जब भी वह उसे मिलने के लिए जाती, उसकी हालत और विगड़ जाती थी । और बुरी तरह से इधर-उधर की हांकने लगता था । न सिर, न पैर । अब इनके यहां वह कभी नहीं आता था। पहले जव आता था, तो दस काम संवारकर जाता था। हर बात में वेगम मुजीव उससे सलाह लेती, फिर कोई काम करती थी। अब कोई नहीं था जो उसको घर के बारे में मशवरा दे। लंदन में रहने वाला उसका बेटा टस-से-मस नहीं हुआ था। उसकी वहन ने किसी इधर-उधर के आदमी से ब्याह कर लिया था, यह उसकी राय में एक जाती मामला था। अगर उसने ग़लती की थी, तो खुद भुगतेगी। अगर उसने ठीक किया है तो सुखी रहेगी। हर कोई अपने दुःख- सुख का आप ज़िम्मेदार होता है । वेगम मुजीव ने परेशान होकर उसे इतनी लंबी चिट्ठी लिखी थी, उसका दो सतरों का जवाब आया, जैसे । ४२ / मन परदेसी कुछ हुआ ही न हो। अपने पाकिस्तानी रिश्तेदारो ने बस इतना ही लिया था, कि अब छोटी को तो किसी तरह वचाकर ले आओ, नहीं तो वह भी किमी हिन्दू के माय फेरे ले लेगी। जेवा को, जुबैर चाचा को यह चिट्ठी पढ़कर, चारों कपडे आग लग गई यी । इससे तो जाहिद भाईजान कही अच्छे थे। बड़े प्यार से उन्होंने लिखा था कि जब जेबा मंट्रिक पास कर ले तो आगे पढ़ाई के लिए उसे लदन भेज देना। वेगम मुजीव को हैरानी इस्मत की ओर से हो रही थी। पाकिस्तान बनने से पहले तो वह इमे उघर ले जाने के लिए इतनी वेचन थी, मगर अब इतना बड़ा तूफान इमके सिर से गुजर गया था, वस एक-आध चिट्ठी लिखकर खामोश हो गई थी, जैसे भारतीय भावज के साथ उसका कोई रिता ही न हो । शायद इसलिए कि उसके घरवाला फौज का अफसर था, और पाकिस्तान की हिन्दुस्तान के साथ खटपट जारी थी। बेगम मुजीव की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करे, क्या न करे! कहा जाए, कहा न जाए। ८ । वही वात थी । कश्मीर मेलडाई छिड जाने के कारण, इस्मत खामोश हो गई थी, नहीं तो वह अपनी भावज पर जान देनी थी । न वे लोग इधर आ सकते थे और न ही पत्रव्यवहार कर मकते थे। उसका घरवाला फ़ौज में कर्नल था। फौजियो पर खास तौर पर पावदिया लगाई गई थी। फिर उधर से कोई आया, जिसके हाय इस्मत ने अपनी भावज को चिट्ठी भेजी-मीमा की हरकत पर वह सस्त परेशान थी। सीमा ने सारे खानदान की इज्जत को डुबो दिया था। और पास तौर पर इम मन परदेसी/४३ वक्त, जबकि मुसलमान कौम ने लाख कुरवानियां देकर पाकिस्तान वनवाया था। उसका एक सिख से व्याह करना, पूरे पाकिस्तान के मुंह पर चपत लगाने के बराबर था। कायदे-आज़म का फ़रमान था कि पाकिस्तान में कोई सिख नज़र नहीं आना चाहिए। इस्मत ने अपनी भावज को लिखा कि उसके मियां कर्नल इरफ़ान ने, मोटर में अपनी एक दोस्त को अमृतसर भेजा था। वह सीमा से मिला भी था । उसने बहुत कोशिश की कि सीमा किसी तरह उसके साथ लाहीर चली जाए । इस्मत ने अपनी चिट्ठी में बार-बार लिखा था कि वह लाहौर में, अपने चाचा-चाची, फूफा-फूफी और वाक़ी रिश्तेदारों से मिल जाए। लेकिन उसने एक ही जिद पकड़ी हुई थी-'मैं लाहौर तव आऊंगी जब मेरे साथ 'इन्द्र' भी आ सकेगा।' इस्मत के मियां ने उधर अपने तौर पर पूछताछ की थी। उसकी इत्तिला थी कि इन्द्रमोहन का बाप कट्टर अकाली था। मुसलमान मुजाहिदों ने उनकी सारी जायदाद जलाकर खाक कर दी थी। उनके घर की ईंट-से-ईट बजा दी थी। उसके माता-पिता मारे गए थे। उसके बाक़ी परिवार का, किसीको कुछ पता नहीं था। लोग कहते, उसकी एक बहन थी-पाकिस्तान में किसीके साथ उसकी आशनाई थी । वह 'पाकिस्तान में ही अपने मनपसंद लड़के के यहां टिक गई। उसकी किसी और को खबर नहीं थी । इन्द्र वच गया, क्योंकि वह दिल्ली में पढ़ रहा था। इस्मत को यही अफ़सोस था कि सीमा लाहौर जाने को राजी नहीं हुई। 'एक बार वह मेरे यहां आ जाती, तो फिर मैं उसे यहां से जाने ही न देती। किसी-न-किसीके साथ उसका निकाह पढ़वा देती।' इस्मत ने लिखा था, 'खैर, मेरी कोशिश अभी जारी है। हम लड़की को निकलवा- कर ही सांस लेंगे । इरफ़ान ने कसम खाई है कि वह सीमा को एक सिख के घर नहीं वसने देगी, चाहे जो कुछ हो जाए।' कुछ दिनों के बाद इस्मत की फिर चिट्ठी आई। बड़ी खुश-खुश लग रही थी। कह रही थी--अव कुछ दिनों की बात है । फिर सीमा हमारे यहां आ जाएगी। पाकिस्तान और भारत में समझौता हुआ था । अगवा । । ४४ / पनी की गई हिन्दू-सिख लड़कियों को उघर से निकालकर इधर भेजा जा रहा था। जिन मुमलमान लडकियों के साथ इस और जबरदस्ती व्याह करवा लिए गए थे, उन्हें बरामद करके, पाकिस्तान भेजा जा रहा था। और कर्नल इरफ़ान ने मिल-मिलाकर सीमा का नाम अगवा की गई औरतो को बरामद करने वाले विभाग को पहुंचा दिया था। उन्होंने वायदा किया था कि वह मीमा के घर छापा मारकर उसे निकलवा लाएगे । उम विभाग के लोग पूर्वी पजाव मे, किमी शहर, किमी गांव में जा सकते थे । अपने साय स्थानीय पुलिस को लेकर, जिम घर में कोई मुमलमान लडकी होती, उमका घेरा डाल देते और फिर भारतीय पुलिम की मदद मे लडकी को अपने कब्जे में कर लेते। 'अव किमी भी दिन सीमा यहां लाहौर आ जाएगी।' इस्मत ने लिखा था, 'आप मेरी अगली चिट्ठी का इन्तजार करें। कुछ दिनों में मैं आपको ख शखबरी दूगी।' लेकिन कई दिन बीत गए, इम्मत की कोई चिट्ठी नहीं आई । बंगम मुजीब की बुरी हालत थी। उमको समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वह सब कुछ जो इस्मत कर रही थी, उमे करना चाहिए था या कि नहीं? कभी यह सोचकर वह खिल-सी जाती कि उसकी बेटी सीमा अपनी फूफी इम्मत के पास पहुच जाएगी। कभी यह सोचकर कि वह पाकिस्तानी बन जाएगी, उमका दिल डूबने लगता। पाकिस्तान को अपना सकना, उसके लिए अभी तक सभव नहीं था। उसका घरवाला हमेशा पाकिस्तान के विरुद्ध वोलता रहा, हमेशा उसने अन-वटे भारत का माय दिया था। वंगम मुजीव सोचती कि वह अब कैमे पाकिस्तान को कबूल कर ले ? लेकिन फिर यह सोचकर कि उनकी बेटी ने एक गैर-मुमलमान के माय उसकी रामदी के बिना व्याह कर लिया था। उसका मन डावाडोल हो जाता। उमके कदम डगमगाने लगते । उसकी पलकें मुद जाती । न इधर की, न उधर की। अपने-आपको परिस्थितियों के हवाले कर देती। जैसे कोई विना पैदे का लोटा हो। जैसे एक खोखली शहतीर ममुद्र की लहरी मे हिचकोले खा रही हो। कभी इधर, कभी उधर । जिधर रेला ले जाता, उधर ही बह जाती। कितने दिन हो गए, इस्मत की लाहौर में कोई चिट्ठी नहीं आई थी। ।

। । । कोई पता नहीं चला कि सीमा का क्या हुआ था। बेगम मुजीव को डर खाए जा रहा था। सीमा साधारण लड़कियों जैसी नहीं थी। वह तो अपने इरादे की बड़ी पक्की थी। एक बार जिसका हाथ थाम ले, अपने अध्या की तरह उसे कभी छोड़ने वाली नहीं थी । उसे ख़तरा था कि सीमा कोई खरावी न कर बैठे। वेगम मुजीव से ज्यादा जेबा परेशान थी। हर रोज चेतावी से इस्मत फूफी की चिट्ठी का इंतजार करती। स्कूल से लौटते ही, पहली बात मां से पूछती-लाहौर से कोई चिट्ठी आई ? चिट्ठी तो कोई नहीं आई थी। जैसे-जैसे दिन गुज़र रहे थे, बेगम मुजीव को परेशानी बढ़ रही थी। जेवा वेचैन थी। उधर कश्मीर में लड़ाई जारी थी। "आखिर कश्मीर पर हिन्दुस्तान का क्या हक़ है ?" एक दिन बैठे- -बैठे जेबा के मुंह से यह बात निकली। अभी-अभी वह अखबार पढ़ रही थी। "क्या मतलव ?" बेगम मुजीव ने आग बबूला होकर अपनी बेटी के मुंह पर चपत दे मारी। पांचों को पांचों उंगलियां उसके गाल पर खुभ गई। "इसमें क्या शक है ? भारत की यह सीनाजोरी है।" जेवा जैसे चिढ़कर बकने लगी। "हिन्दुस्तानी हिन्दुओं का कश्मीर को अपने साथ मिला लेना एक धोखा है। जब यह फैसला हुआ कि मुसलमान वहु-गिनती वाले इलाके पाकिस्तान में शामिल किए जाएंगे, तो कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल होने से रोकना, फ़रेव है, कुफ है--पाकिस्तान के साथ ।" "कश्मीर के महाराजा ने, हिन्दुस्तान में शामिल होने का ऐलान किया है।" वेगम मुजीव बेटी को समझा रही थी। "क्या इस तरह का फैसला करने का अधिकार हैदराबाद के निजाम को दिया जाएगा? क्या जूनागढ़ का फैसला हिन्दू नेता मानने के लिए तैयार हैं ?" जेबा हमेशा की तरह जहर उगल रही थी। "कश्मीर का फैसला शेख अब्दुल्ला ने किया है । उसके दल ने किया " "शेख अब्दुल्ला नेहरू के हाथों में एक कठपुतली है । जो कुछ नेहरू कहता है, वही वह बोलता है।" जेवा बहस जारी रखे हुए थी। "मैं पूछनी हूं, तुझे यह अजीब-अजीब बातें कौन मिखाता रहता है ? शेख मुजीब की बेटी होकर तुम तो यू सोचने लगी हो, जमे किमी मुस्लिम लीगी के घर में कोई जन्मा-पला हो।" "मैं मुसलमान हूं, अम्मी !" जेबा बड़े अहकार से ऐलान कर रही थी। "अपने अधिकारी के लिए हम मुसलमान नौजवान लडके लड़किया जान की बाजी सड़ा देंगे।" बेगम मुजीव ने अपनी बेटी की ओर एक नज़र देखा और फिर अपनी आखें फेर ली। यह तो और-को-और जबान बोल रही थी। यह तो और-को-और तरह मोच रही थी। वेगम मुजीब को लगा, जमे जेवा उममे वहुत दूर निकल गई थी, उसमे, अपने अब्बा से । वह तो अपनी एक बेटी के लिए रो रही थी, सीमा का गम उमे खाए जा रहा था, इधर दूसरी भी उमे छोड़कर कही-की-कहीं जा पहुंची थी। मा-बेटी में कोई बात मेल नहीं खाती थी। मीमा ने इस्लाम को छोडा था, जेवा अपने देश में वेवफाई कर रही थी। अपने बाप के आदर्शों से मुह फेर रही थी। उम शाम के बाद मा-बेटी में जमे एक गाई-नी पैदा हो गई। वे एक- दूमरे में दूर-दूर रहने लगी। विना मतलब के कोई बात नहीं। और फिर यह खाई दिन-पर-दिन बढने लगी। एक छत के नीचे रहते हुए, एक मेज़ पर खाते हुए, उनमें मा-बेटी जमी कोई बात वाकी नहीं रही थी। इम्मत की ओर से कोई खबर नहीं आई थी। एक दिन बैठे-बैठे जेया फिर उत्तेजित हो उठी। "मैं कहती हू, मीमा आपा को कोई और झूठ मूझा होता, कि मेरे पेट में मुसलमान फमादियों या बीज या और एक मिख ने मेरे माध व्याह करने का फैसला कर लिया, यह कोई मानने वाली बात है?" "जेबा ! जेबा !! गदा के वास्ते मुझे और न मनाजो," बेगम मुजीव उमे हाथ जोड़ रही थी। "चलो, यह भी मान लिया कि उसके पेट मे पराया वीज था।" जया बदतमीजी पर नुली हुई थी, "क्या आजकल के जमाने मे उमे निकलवाया मन परदेमी/ । । से आसान शर्तों पर कर्ज दिए जाएं। नये कारखानों और मिलों के लिए उन्हें लाइसेंस दिए जाएं । नहीं तो हिन्दुस्तानी मुसलमान हिन्दू का गुलाम होकर रह जाएगा। हमेशा उसके रहम पर पड़ा रहेगा। दो वक्त की रोटी के लिए भी उसे उसके मुंह की तरफ़ देखना पड़ेगा।" वेगम मुजीव सोचती कि जो महमूद कह रहा था, वह विल्कुल सच था। यह सव कुछ देश के हक में है। "हिन्दुस्तानी मुसलमानों को हिन्दुस्तान में जीना और मरना है। यह जरूरी है कि वे मुंह उठाकर पाकिस्तान की तरफ़ देखना बंद करें।" "आप ठीक फ़रमा रही हैं अम्मीजान ! लेकिन जब तक हमें हमारे अधिकार नहीं मिलते, हमारी नज़र पाकिस्तान की ओर जाएगी ही। पाकिस्तान को देखकर हमारा हौसला बढ़ता है। पाकिस्तान दुनिया के दूसरे मुल्कों की तरह एक मुल्क नहीं है। पाकिस्तान, मुसलमान कीम के सपनों की ताबीर है । कुछ दिन बीतने दें, पाकिस्तान एक जियारत-गाह वन जाएगा---एक चश्मा, जिसके आवे-हयात से दुनिया भर के मुसल- मान अपनी आक़वत्त संवारेंगे । कायदे-आज़म जैसा लीडर किसी कौम को कहीं सदियों में नसीव होता है। पाकिस्तान की तरफ़ तो हमें देखना ही होगा।" "तो क्या तुम्हारी अपने देश के लिए कोई ज़िम्मेदारी नहीं ?" वेगम मुजीव ने हैरान होकर पूछा। "अपना देश !" महमूद एक जहर-बुझी हंसी हंसा । "अम्मीजान ! हिन्दुस्तान को दो क़ौमों की थियूरी पर बांटा गया है-हिन्दू और मुसलमान ! जब तक हिन्दुस्तान में वाक़ी वचे मुसलमानों को यहां के हिन्दू इज्ज़त और आवरू के साथ जीने नहीं देते, हम यहां रहेंगे या नहीं, इस बात का फैसला नहीं हो सकता।" वेगम मुजीब फटी-फटी आंखों से उसके मुंह की ओर देख रही थी। "भारतीयं मुसलमान अंग्रेजों की गुलामी की वेड़ियां उतारकर हिन्दू की गुलामी मोल लेने के लिए तैयार नहीं । हमें ज़रूरत पड़ी तो हम इसके लिए लड़ेंगे । हमें ज़रूरत पड़ी तो हम इसके लिए कुरबानियां देंगे। अपने- आपको हम इसके लिए तैयार कर रहे हैं।" ५०/ मन परदेसी ܕܝ . - "भारत के नारे मुमतमान आज एक्-मठ है।" महमूद को आवाज कची हो रही थी। "नो बेटा, तेरा मलब यह है कि गंगा का अग्या मारी उम्र अपने- मापको धोखा देता रहा?" "हां; हिन्दू के घरेव का निवार। महात्मा गांधी जमा कट्टर हिन्दू, इस देश में कोई पैदा नहीं हुआ। महात्मा गाधी जना पटा हुआ निपान- दान कौन होगा? दह नो कभी पारिन्नान न दनने देता अगर सरदार पटेल और नेहरू ने उसे मनवर न दिया होता । हिन्दुस्तानी मुनलमानों भी मव मुनीदन उनीकी पंदा की हुई हैं। वहीं विमी आजाद, वहीं विनी दिवई, कहीं मिमी जाकिर हनन को अपने पोद लगाए रखता है। उनका इरादा यह है कि भारत के मुसलमानों को दांध के रख दो। इनने इनकी जवान छीन नो, नारियों में इन माय भेद-भाव करी। काम- धन्धे, व्यापार में नो दे पहले ही मार लाए हुए हैं। वक्त के माप आप-ही- नाप हिन्दू-धारे में सो पाएगे । एक क्रीम की काम को नारा करने का यह एक मनवा है।" "मुझे तुम्हारी बात समझ में नहीं आ रही है।" बेगम मुनीद, उनहा- उलझी-मी, फटी-पटी आदी में महमूद को देख रही थी। "अम्मीनान ! मोठी दात यह है कि आपकी बेटी कोम्बन में हिन्दी पढाई जाती है कि नहीं? आर डेबा उई में रबादा हिन्दी जानती है। हर स्निीको हाय जोड़कर नमन करती है। मुसलमान नरियों की झुकाए दाह उठावर बादाद वाले मैंने उसे कभी नहीं देता। नमनऊ रेडियो में कभी 'नान' और 'हन्द', कृम्बानिया और जने श्राइनान्ट की जाती थीं। भाजपल ज्ञानी कही इक्का-दुक्का उर्दू का प्रोग्राम मुनने को मिलता है। आल इंडिया रेडियो के ननावारी की उदान हर रोड मुमिन होती जा रही है। कोई कह रहा था कि रेडियो दाल आउन हिन्दी में खबरें नहीं मुनकाने, द्रदर्ग में हिन्दी मुनाते हैं। मेरे तो पले कभी कुछ नहीं पहना । नौ दोनों दान पापिमान में नदर मुनता हूं। दातों-बातों में पीना पोख्ने लिए महर ने देर में में स्नान " मन पदमी/.

- निकाला और वेगम मुजीव देखती-की-देखती रह गई कि सौ-सौ के नये नोटों की गड्डी उसके सामने फर्श पर जा गिरी । महमूद ने जल्दी से उसे उठाकर अपनी जेब में रख लिया। और फिर महमूद किसी बहाने उठ खड़ा हुआ। इतने में उसे लेने के लिए एक मोटर आ गई । वेगम मुजीव ने देखा-जहाज़ जैसी मोटर चमचम कर रही थी। एक नौजवान लड़का उसे चला रहा था। मोटर में एक-दो लड़के, एक-दो लड़कियां बैठी हुई थीं। उस दिन के बाद वेगम मुजीव ने जेबा को जैसे बिल्कुल माफ़ कर दिया हो। कैसे इस्लाम और पाकिस्तान पर किताबें इकट्ठा करती रहती थी ! लाहौर रेडियो के उर्दू प्रोग्राम कितने प्यारे होते थे ! सुबह-शाम जेवा आप भी सुनती, अपनी अम्मी को भी सुनवाती। आजकल वेगम मुजीव को लाहौर रेडियो से तलावते-कुरान शरीफ़ सुनकर जैसे चैन-सा महसूस होने लगता । उसकी ज़िन्दगी में अचानक इतनी उलझनें आ गई थीं; अल्लाह का नाम सुनकर जैसे उसे एक तसकीन- सी मिलती। और फिर क़व्वालियां और नातें, जैसे ही एक बार सुनने वैठती, उसका रेडियो के पास से उठने को मन न करता । और इधर अपने देश का रेडियो था, हर वक्त पक्के गाने और कठिन हिन्दी, या फिर भारत की योजनाएं। इस तरह का राग अलापता रहता। किसीके पल्ले कुछ न पड़ता। और फिर किसीके हाथ, लाहौर से इस्मत की चिट्ठी आई । चिट्ठी पढ़कर जेवा को जैसे आग लग गई। अमृतसर की पुलिस ने, पाकिस्तान से भेजी गई पुलिस की टुकड़ी द्वारा सीमा को बरामद करने की इजाजत नहीं दी। अमृतसर शहर और निकट के गांव में से ट्रकें भरकर, अगवा की गई मुसलमान लड़कियों को वे ले गए थे; पर सीमा के घर की ओर जाने के लिए स्थानीय पुलिस राजी नहीं हुई थी। एक ही जिद कि बी० ए० पास लड़की का कोई अप- हरण नहीं कर सकता। और फिर सीमा की मां अभी हिन्दुस्तान में थी। उसकी एक वहन हिन्दुस्तान में थी । उसका एक भाई लंदन में था, लेकिन हिन्दुस्तान का शहरी था। लाखों रुपये की उनकी जायदाद थी इधर । . ५२/मन परदेसी मोमा हिन्दुस्तान में । इनके ख़ानदान में, पाकिस्तान बनने के बाद कोई भी तो उधर नही गया । वेशक कुछ रिश्तेदार उधर पाकिस्तान में थे, लेकिन वे तो पहले ही उधर रह रहे थे। लेकिन इस्मत ने लिखा था-'मेरा शौहर भी हार मानने वाला नहीं है। उसने पाकिस्तान की पुलिस में से किमीको तैयार किया है। अगली बार जब वह अमृतसर गए तो किमी-न-किसी तरह सीमा को जबरदस्ती उठाकर ले आएगे। एक बार यह सरहद से पार आ गई तो फिर हम उसे समाल लेंगे।' इस्मत को पूरा भरोमा था कि यह इम साजिश में कामयाय हो जाएगी। लेकिन यह सफल नहीं हुई । इनने दिन बीत गए थे। यू लगता, के चारों ओर इस्पात का एक जगला बना दिया गया था। उमे कोई हाय नहीं डाल सकता था। घर उसने अपने अम्मी को चिट्ठी लिखना भी बद कर दिया था । वास्तव में स्वयं वेगम मुजीय का जो नहीं चाहता था कि उममे कोई वास्ता रखें। बेगम मुजीव का मन खट्टा हो चुका था। कई दिनो से वह महमूस कर रही थी कि उसका गौहर शायद गलत राह पर था । उमकी बेटी जया जो कुछ कहती थी, वही ठीक था। और फिर जेबा और उसके मिलने-जुलने वाले लड़के-लड़किया हर रोज उमके कान भरते रहते। आजकल उनका वेगम मुजीब के घर आना-जाना लगा ही रहता था। और फिर शेख शब्बीर का इलाज कर रहे डाक्टर ने मशवरा दिया कि उमे पाकिस्तान भेज देना चाहिए। हो सकता है कि उमको बीमारी का इगीमें इलाज हो । बेगम मुजीब सोचती कि वह भो पाकिस्तान चली जाएगी। जहन्नुम मे जाए जायदाद । जान है तो जहान है । इधर भारत मे तो, उमे यू लगता था कि कही उमका भी वही हाल न हो जो उसके जेठ का हो रहा था। कभी तोला, कभी माशा। कभी एक पलड़ा भारी हो जाता, कभी दूसरा । कभी हिन्दुस्तान, कभी पाकिस्तान । उमको ममत में कुछ नहीं आ रहा था। मन परदेगी।

१० पक्का फ़ैसला था कि वेगम मुजीब पाकिस्तान चली जाएगी। उस अपनी जायदाद के ग्राहक भी ढूंढ़ने शुरू कर दिए थे। कुछ सौदे भी है चुके थे। कुछ रक़मों की पेशगी भी ले ली थी। जेवा खुश थी। बहुत खुश । उधर इस्मत के मानो ज़मीन पर पांच नहीं टिक रहे थे। जुबैर खुश था। अपनी भावज की ओर से अब वह सुर्खरू हो जाएगा। भारत में जब कहीं साम्प्रदायिक दंगे होते, पाकिस्तान का कोई लीडर जव भारत के विरुद्ध वयान देता, उसे वेगम मुजीव की और भी चिन्ता होने लगती थी। शेख शब्बीर ने अपनी लाखों की जायदाद कौड़ियों के भाव वेच डाली थी। उसने अपने नगदी को, अपने सोने-चांदी को उधर पाकिस्तान भिजवाने का डौल भी कर लिया था। लेकिन सवाल यह था कि वह जाएगा कहां ? किस शहर में जाकर बसेगा? पाकिस्तान के किसी शहर में तिल धरने की जगह नहीं थी। इधर से गए शरणार्थी अभी तक सड़कों पर पड़े हुए थे। उन्हें फिर से वसाने की किसीको चिन्ता नहीं थी। दस दिन, महीना, दो महीने, वे चाहें तो अपने किसी रिश्तेदार के यहां टिक सकते थे, लेकिन उसके बाद क्या करेंगे, वेकार वैठे तो कारूं का खज़ाना भी खत्म हो जाता है । आखिर उन्हें कोई धंधा पकड़ना होगा। खेती- बाड़ी के लिए तो ज़मीन चाहिए। यह सब कुछ कहां से आएगा? ज़मीनें उधर वांटी जा चुकी थीं। मकान अलाट हो चुके थे। और अभी लाखों लोग बेघर थे। कोई उनकी बात तक नहीं पूछ रहा था। लेकिन शेख शब्बीर ने फैसला कर लिया था। उसके घरवाले सोच रहे थे कि अगर भूखों भी मरना है तो पाकिस्तान में जा मरेंगे । अब वे और भारत में नहीं रह सकते थे। शेख शव्वीर की हालत दिन-पर-दिन विगड़ती जा रही थी। उधर वेगम मुजीव के लंदन-स्थित पुत्र ने जब यह सुना कि उसकी मां किस्तान जाने की सोच रही थी, उसने चिट्ठी लिखी और वेगम मुजीव ने समझाया कि वह यह भूल कभी न करे । पाकिस्तान के हालात बड़े । ५४ / मन परदेसी - खराब थे। जो लोग वहा महाजर बनकर गए थे, वे पछता रहे थे। पाकिस्तान के पजाबी किसी के पाव नहीं जमने दे रहे थे। यू०पी० वालो को तो वे शाम तौर पर 'भये' कहकर छेडते थे। उनका मजाक उडाते थे। वेगम मुजीव को समझ मे कुछ नहीं आ रहा था। इधर जेबा थी कि हर समय पाकिस्तानी लडकियो के फैशन के गुण गाती रहती। ढेरमारी सलवार-कमीजें उमने मिलवा ली थी। पाकिस्तानी पायची की 'पीडियो', पाकिस्तानी कमीज़ो के घेरे । पाकिस्तानी रग । चुनरियो पर पाकिस्तानी बैल-बूटे । "लाहौर के अनारकली वाज़ार मे एक दुकान का नाम 'पाब' है । एक का नाम 'कहकशा' है।" एक दिन बैठे-बैठे जेवा अपनी मा से कहने लगी। पिछले कुछ दिनो से वेगम मुजीब हर रोज अपने शौहर की कल पर जावर पटों अपने-आपसे बातें करती रहती। अपना दुखडा रोती। कही उमे अपनी समस्या का हल मिल जाए। उनकी गहरी अधेरी दुनिया में कही रोशनी की कोई किरण दिखाई दे जाए। कही उमका विश्वास नहीं टिक रहा था। जैसे घुप-अधेरी रात छाई हो। उने दिखाई नहीं दे रहा था । उसे कुछ मुनाई नहीं दे रहा था । जब मे गेख गब्बीर बीमार पड़ा था, वह बिल्कुल बेसहारा हो गई थी। कोई नहीं था जो उसे सलाह दे । कोई नहीं था जिसके मशवरे पर उसे भरोसा हो। जया बेशक वडी हो रही थी, लेकिन थी अभी लड़की ही। उसकी किमी वात पर मा का मन नहीं टिकता था। जो कुछ वह बोल रही होती, एक दाण-भर के लिए उसे ठीक-ठीक लगता लेकिन फिर वह डावाडोल हो जाती। और फिर जैसे एक वचपात हुआ हो। एक दिन, तीसरे पहर जव वेगम मुजीब सोकर उठी तो किमी काम से वह गोल कमरे की ओर गई। उमने पर्दा हटाया और उसकी आखें फटी-की-फटी रह गई। सामने सोफे पर महमूद बैठा था, और उसके गोद में सिर रखे हुए जेबा लेटी थी। उन्ही कदमो से वह अपने कमरे में लौट आई और औधे मुह अपने पलग में जा घसी। - मन परदेसी/ ५५ । N कुछ देर बाद ज़ेवा उधर आई और उसने देखा कि अम्मी तो वेहोश पड़ी थी। उसकी जीभ दांतों में आ गई थी। और उसमें से ख न वह रहा था। पलंग की चादर पर एक बड़ा-सा धब्बा पड़ गया था । बेगम मुजीव के हाथ-पांव ठंडे पड़ गए थे। मुड़ गए थे। जेबा ने अम्मी के दांतों को अलग किया। उसके मुंह में पानी डाला । उसके हाथ-पांव की मालिश की । कितनी ही देर तक वह अपनी मां से जूझती रही । फिर कहीं जाकर उसकी चेतना लौटी। वेगम मुजीव होश में तो आ गई लेकिन उसकी आंखों में से अविरल अश्रुधारा फूट रही थी। बार-बार वह जेवा की ओर देखती जैसे उसने उसके साथ घोर अन्याय किया हो, और जेवा की ढिठाई की यह हद थी कि अपने परों पर पानी नहीं पड़ने दे रही थी। बार-बार कहती, 'अम्मी, आपको ग़लतफ़हमी हुई है । मैं महमूद से अपनी आंख में लोशन डलवा रही थी। लेकिन मां अपनी आंखों पर विश्वास करती या अपनी बेटी की हठधर्मी पर? बेगम मुजीव की समझ में कुछ नहीं आ रहा था, क्या करे ! कहां जाए! आखिर उसने फैसला किया कि चाहे कुछ हो, वह पाकिस्तान चली जाएगी। जेवा को किसीके हवाले करके सुर्खरू हो जाएगी। जहां तक उसका अपना सवाल था, शौहर की मौत के बाद, एक औरत अपने वेटे की ज़िम्मेदारी होती है । अगर जरूरत हुई तो वह लंदन भी जा सकती थी। वेगम मुजीव स्वयं दिल्ली गई ताकि पाकिस्तान जाने के लिए परमिट बनवा लाए। एक दिन के लिए गई, उसे कई दिन लग गए। परमिट बनने में देर लग रही थी। हर रोज़ टेलीफ़ोन पर ज़ेवा को बताती रहती कि देर क्यों हो रही थी, क्या अड़चन थी। आखिर कह-सुनकर उसने अपना और अपनी बेटी का परमिट बनवा लिया। इतने दिन टाल-मटोल हो रही थी, जव बनने लगा तो एक किसीके टेलीफ़ोन करने पर मिनटों में बनकर तैयार हो गया। उस शाम बेगम मुजीब जब अपने घर लौटी तो जेवा मुंह फुलाए बैठी थी। कह रही थी कि मैं तो पाकिस्तान नहीं जाऊंगी। पीछे हिन्दुस्तान में वाकी बचे मुसलमानों है । ५६ / मन परदेसी । को जगह भारत में है। पाकिस्तान की अपनी समस्याएं क्या कम है ? उम देश पर और बोझ नहीं डालना चाहिए। और फिर भारत के सारे मुमतमान तो पाकिस्तान जा नहीं सकते। अगर ऊपरी तबके के लोग चले गए तो निचले तबके के गरीब अनपढ़ मुमलमानों का कौन महारा होगा? "हमने कोई किमीका ठेका लिया है ?" वेगम मुजीब नाराज होकर घोली । लेकिन जेवा अपनी जिद पर अडी हुई थी। टम-मे-मम नहीं हो रही थी। वैचारी विधवा औरत ' वेगम मुजीव को अपनी जवान-जहान पढी- लिखी लड़की के सामने हार माननी पडी। और उसने अपने बद किए हुए सन्दूक खोलने शुरू कर दिए। वेशक शेख शब्बीर और उसका परिवार चला जाए, बेगम मुजीव मोचती, उसके भाग्य मे मेरठ में ही मरना लिखा हुआ है। यही उसकी कद्र बनेगी। बहुत दिन नहीं बीते थे कि शहर में सनमनी फैल गई । कालेज के मुसलमान लड़कों के एक ठिकाने पर छापा मारकर पुलिम ने हथियार भी बरामद किए थे और लिट्रेचर भी जो मुसलमान, अल्पमध्यको को भड. काने के लिए तैयार किया गया था। कुछ लडके भाग गए थे । जो पकडे गए थे, उनमें महमूद भी था। जेबा से किसीने कहा था कि उमे पाकिस्तान सिमक जाना चाहिए। महमूद या उसके साथियो पर जब पुलिम सन्ती करेगी, तो वह सब कुछ बक देंगे । और इममे कोई सदेह नहीं था कि जेबा उनकी पार्टी की एक मुन्य सदस्या थी। हर माजिश में शामिल वह होती थी। हर कार्यवाही में वह भाग लेती थी। अब जेबा जिद करने लगी कि उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए । इससे पहले कि उनके परमिट की तारीख निकल जाए, उन्हें भारत छोड़ देना चाहिए। "यह देश मुसलमानों के रहने के हरगिज काबिल नहीं।" उठने-बटने जंबा अपनी मा के कान भरती रहती । "जब पाकिस्तान बना ही इन उमूल पर है कि मुमलमान एक अलग कौम है, और उनके लिए एक अलग । मन परदेमी/ ५० - । देश बना है तो फिर किसी मुसलमान का भारत में रहने का कोई मतलव नहीं है।" "लेकिन यह बात मुस्लिम-लीगी कहते हैं, हिन्दुस्तानी कोई नहीं कहता, कांग्रेसी कोई नहीं कहता, महात्मा गांधी कभी नहीं कहता, जवाहर- लाल कभी नहीं कहता कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग-अलग क़ीमें हैं ।" वेगम मुजीव अपने शौहर के बोल याद कर रही थी, "भारत में हिन्दू और मुसलमान दोनों रहेंगे। दोनों वरावर के शहरी हैं। भारत एक सैक्यलूर लोक-राज होगा।" "सब कहने की बातें हैं।" जेवा अपनी मां को वहस में हमेशा हरा देती। "सब कहने की बातें हैं। जगह-जगह मुसलमानों के क़त्ल हो रहे हैं । आर० एस० एस० वाले और जनसंघी मुसलमानों के ख न के प्यासे हैं। और कुछ वरस, और फिर भारत में कोई मुसलमान दिखाई नहीं देगा। या सारे हिन्दू हो जाएंगे या हिन्दुओं जैसे । हिन्दी भाषा बोलेंगे, हाथ जोड़कर नमस्ते किया करेंगे । मुसलमान लड़कियां माथे पर बिंदियां लगाएंगी और हिन्दू और सिखों के लिए बच्चे पैदा किया करेंगी। जैसे अमृतसर में मेरी एक बहन कर रही है।" वेगम मुजीब ने तैयारी फिर शुरू कर दी। फिर सामान बांधना शुरू कर दिया। इतने में उनकी जान-पहचान का एक पुलिस अफ़सर आया और बेगम मुजीव को मशवरा देने लगा, "अगर हो सके तो जेवा को कुछ दिनों के लिए इधर-उधर कर दें।" जवान-जहान लड़की को कहां छिपाती ? बेगम मुजीव ने फैसला किया कि वह कल की जाती, आज पाकिस्तान चली जाएगी। रात की गाड़ी उन्हें पकड़नी थी कि शाम को ख़बर आई, महात्मा गांधी की छाती में किसीने तीन गोलियां दाग कर उसे खत्म कर दिया था। क्योंकि वह मुसलमानों का पक्ष लेता था। क्योंकि उसने पाकिस्तान को, करोड़ों रुपये का उनका हिस्सा दिलवाया था, क्योंकि उसने पाकिस्तान को कोयला दिलवाया था, जिसकी कमी के कारण वह देश हाथ-पर-हाथ धरकर बैठ गया था । एक कट्टर हिन्दू ने उसे गोली से. उड़ा दिया था। " 1 . ५८/मन परदेसी बेगम मुजीव का सामान-वैसे-का-वैसा बंधा-धरा-वा-धरा रह गया। ११ महात्मा गांधी की हत्या का समाचार सुनकर जवा पर जमे एक जादू का मा प्रभाव हुआ हो। क्या मजाल जो किसीको गाधीजी के बारे में कोई अपशब्द मुह से निकालने दे। बापू की एक बहुत बडी तसवीर भग- याकर उसने अपने कमरे में लगा ली थी। प्राय उम तसवीर के सामने फूल रखे रहते ।ख शबूदार गुलाव की कलिया, मोतिया के हार । अपने- आपसे महात्मा गाधी की बातें किया करती। कोई वापू के विरद्ध एक शहद कहता तो उसकी आखो मे आसू भर आते। गाधी की अंतिम यात्रा में मा-बेटी दोनो शामिल हुई। लाखों लोग थे। उनमें वे भी थी । हजारो आखें रो रही थी। उनमे उनकी पलकें भी नम थी। उम दिन से जेया महात्मा गाधी को हमेशा 'बापू' कहकर याद करने लगी। महात्मा गाधी को 'बापू' कहती और उसके होठो से एक बेटी का प्यार, एक बेटी का आदर, एक बेटी की श्रद्धा झर-झर पडती। उमने तो अपने अब्बा के प्रति कभी इतना मत्कार नहीं दर्शाया था। गाधीजी को 'बापू' कहकर याद करते हुए, शेख मुजीब की बेटी जेबा को यू लगता, जैसे समूचा भारत उसका अपना घर हो। वह अपने आगन में खेल रही पी, खा-पी रही थी, परवान चढ रही थी। महात्मा गाधी को अन्थिया जब विजित की जा रही थी, तो वह अपनी कुछ सहेलियों के साथ इलाहाबाद गई। जब लौटी तो कितने ही दिनो तक वेगम मुजीव को सगम पर वापू के प्रति लोगों की अपार भक्ति और श्रद्धा की कहानिया मुनाती रही। इस तरह दिन, महीने, साल बीतने लगे। आजकाल शहर में जिन मुमलमान पर्दानशीन औरतों को उवा पडाने मन परदेगी/५६ - जाया करती थी, उनसे कुछ और तरह की वातें करने लगती, जिन्हें सुन- सुनकर वे हैरान होती रहतीं। वह तो अपने अब्बा शेख मुजीव की भाषा वोलने लगी थी। आजकल जेबा उन्हें बताया करती-हमारे देश में मुसलमानों के आने से पहले भी एक से ज्यादा धर्म होते थे। उन लोगों में भी ग़लत- फहमियां हुआ करती थीं। असल में सव धर्म एक जैसे होते हैं । सब धर्म बरावरी और सच का प्रचार करते हैं । ईमानदारी की ज़िन्दगी जीने की प्रेरणा देते हैं । बाहर से आए मुसलमान शासकों को इस बात का एहसास था कि कोई धर्म न तो जड़ से मिटाया जा सकता है और न कोई हमलावर किसी देश के लोगों पर उनकी रजामंदी के विना ज्यादा दिन राज्य कर सकता है । इसलिए ज्यादातर मुसलमान हुक्मरान हिन्दू धर्म की इज्जत करते थे। इस्लाम और हिन्दू धर्म को करीव लाने में सूफ़ियों और संतों ने बड़ी मदद की । इनमें ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने दिल्ली में, बाबा फरीद शकरगंज ने अजोधन (पंजाब) में और हजरत मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर (राजस्थान) में अपने-अपने केन्द्र बनाकर प्रचार शुरू किया। इधर चैतन्य महाप्रभु, भक्त कवीर और गुरु नानक जैसे कई और संतों ने उनके स्वर-में-स्वर मिलाया। उन्होंने कहा-जात-पात सब झूठ है । सब बन्दे एक ख दा की औलाद हैं । ईश्वर की भक्ति ही आदमी को पार उतार सकती है। आपसी मेल-जोल की इस लहर को अकबर के राज्य में बढ़ावा मिला। अकवर ने सव धर्मों की अच्छी-अच्छी बातों को अपनाया।हर मजहब में दूसरे किसी मज़हब से टकराव वाली बातों को नज़रअंदाज़ किया । अबुलफ़ज़ल ने अकवर के सिद्धान्त को इस तरह बयान किया है : 'एक ही अलौकिक सौंन्दर्य है, जो अलग-अलग ढंग से जलवा दिखाता है।' अकवर से पहले उसके दादा बाबर ने अपने वेटे हुमायूं को इस तरह की ही हिदायत की थी : १. कभी मजहबी तास्सुव में मत पड़ना । अपनी प्रजा के धर्म और ६० / मन परदेसी रीति-रिवाजों का खयाल रखना। २. गोया से परहेज करना । इस तरह यहां के लोग तुम्हारे शुष- गुजार होंगे। ३. किमी धार्मिक स्थान का निरादार मत करना। हमेशा इंमाफ करना ताकि तुम्हारे राज्य में अमन-शान्ति बनी रहे। ४. इस्लाम का प्रचार मुहम्बत से ही हो सकता है। तभी तो हुमायूं ने हिन्दू रानी कर्णवती की राखो कबूल को और उमे अपनी बहन बनाया । अकबर और उसके बाद मुगुल वादगाहों की हिन्दू रानियों के माय गादियां होने लगी। मुगल महलों में हिन्दू रीति-रिवाज आ गए । एक और मस्जिद में अजान दी जा रही होती, दूसरी ओर मन्दिर मे घंटे-घडियाल बज रहे होते । वेद और शास्त्रों के, रामायण और महाभारत के फारमी में अनुवाद हुए । फारसी और अरबी ग्रयों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया। उस जमाने के एक शायर ने कहा है 'चश्मे वहदत से गर कोई देखे वुन परस्ती भी हक परस्ती है।' इसी तरह १८वी और १६वो नदी में कई उर्दू शायरों ने हिन्दू देवी- देवताओं के बारे में लिखा। 'वेदिल' ने अपनी एक नरम मे रामचन्द्रनी का बखान किया। नजीर अकबराबादी ने शिव, कृष्ण और नानक के गुण गाए। मारी खरावी शुरू हुई जब फिरगी हमारे देश में आया । वहीं ममे फूट डालकर खुश था। अग्रेजो के आने के बाद हिन्दू और मुसलमानो के बीच खाई हानी गई। फिर यह खाई बढ़ने लगी। कोई-न-कोई शह देकर किरगी इस आग को भड़काते रहते। लेकिन कई मदियों से एकसाय रहते हुए हिन्दू और मुसलमान भारत में एक-जान हो गए थे। वक्त ने उनके भेद-भाव मिटा दिए थे। ममाज की भट्ठी में ढलकर वे एक कोम बन चुके थे। एक-से सपने, एक.मे रिवाज! हिन्दुओं की तरह अव भारतीय मुमलमानों में भी जात-पात का फ़ मन परदेसी)६१ - । माना जाने लगा है। सैयद ब्राह्मणों की तरह हैं और मुसलमान राजपूत, क्षत्रियों की तरह । शूद्रों की तरह किसी भंगी का मस्जिद में घुसना बुरा समझा जाता है। इस तरह की बातों के साथ-साथ जेवा उन्हें अपने देश को छोड़कर गए महाजरों की कहानियां भी सुनाती। उसके अपने ताऊ सव कुछ वेच-बाचकर पाकिस्तान चले गए थे । इधर उनका वोलवाला था, उधर दर-दर की ठोकरें खा रहे थे। कोई पूछने वाला नहीं था। न रहने के लिए घर मिल रहा था, न खेती के लिए जमीन । न किसी और काम-काज की जुगत वन रही थी। कायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्नाह अल्लाह को प्यारे हो चुके थे । लियाकत अली को रावलपिंडी के एक जलसे में गोली मार दी गई थी। वहां की सरकार ने पूरी कोशिश की थी लेकिन किसीकी समझ में नहीं आ रहा था कि एक जनता के प्यारे लीडर को क्यों ख़त्म कर दिया गया था। जव भी कोई अन्दरूनी मामला पाकिस्तानी हुक्मरानों के सामने आता, झट अपने लोगों का ध्यान कश्मीर की ओर दिलाने लगते । भारत की झूठी-सच्ची बातें उड़ाने लगते। बार-बार अपने लोगों से कहते कि भारत ने दो कीमों के सिद्धान्त को नहीं माना, किसी समय भी हमला करके वह पाकिस्तान को हड़प सकता है। भारत के विरुद्ध जहर फैलाते और इस नफ़रत को किसी-न-किसी तरह बनाए रखते। सवसे ज्यादा हैरानी वेगम मुजीव को हो रही थी। उसे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था। अपने कानों पर यकीन नहीं होता था। जेवा तो अपने अब्बा से भी चार क़दम आगे निकल गई थी। जेवा और मीमा में पत्र-व्यवहार होता रहता । जेवा अमृतसर जाकर अपनी बहन से एक से ज्यादा बार मिल भी आई थी। सीमा के यहां बेटा हुआ, लेकिन बच्चा वक्त से पहले हो गया था । डाक्टरों ने पूरी कोशिश की मगर वह वच नहीं सका। दूसरी बार सीमा के यहां वेटी हुई। उन दिनों ज़ेवा अपनी बहन के पास ही थी। वह हैरान रह गई। वच्ची हू-ब-हू अपनी नानी की शक्ल - । ६२ / मन परदेसी थी। सीमा अपने अव्या पर थी । अध्या जैसी नाक, अश्या जैसा माथा । अव्या का रग-रूप, कोई बात भी तो उसमें अम्मी की नहीं थी। और यह बच्ची जो उसने पंदा की थी, येगम मुजीब की तरह गोरी-चिट्टी थी। वेगम मुजीव की तरह बड़ी-यडी काली आंगे। वेगम मुजीव की तरह कोमलांगी, लम्बी-लम्बी उगलिया, तीगी नाय, जय मुंह ऊपर उठाती तो वेगम मुजीब की तरह उसके गालों में गड्ढे पड जाते। वेगम मुजीव मुन-मुनकर हैरान होती रहती । पना नहीं किम कोने मे सीमा ने अपनी मम्मी को छिपाकर रया हुआ था, और अपनी बेटी में फिर उसे मूर्तिमान कर दिया था। जया कहती -उग वच्ची में न नो यही कोई मिय था, न यही कोई पजाबी था, न कही कोई अमृतमरी ग था । वह नो ह-ब-हू अपनी नानी की नवामी थी। उसे देखती तो जेबा का बच्ची के लिए प्यार छलप नया पड़ता। लेकिन वेगम मुजीब थी कि टम-मै-मग नहीं हुई। यह अभी तक मीमा को माफ़ नहीं कर पाई थी । अभी तक वह उमे मुंह नही लगा भकी थी। १२ फिर एक बार जब जेया अमृतमर गई, कान को अपने माय व बाई वह फिर पहल की तरह पर में रच-बम गया। महमूद उन दिन बेगम मुजीब में मिलने वाया। पार्ने देगा और जल्दी में वेगम मुजीय के यमरे की ओर लपका। "वेगम माहब, आपमे मिलने के लिए कोई नया आया है।" "कौन है ?" "मैं नाम नो नही पूटा, मेदिन कोई मूवमूरन-गा नौरवान है।" बैंगम मुजीब साइज और पेटीरांट में घूम रही थी। उसने मारी मन पादमी/३ पहनी। शृंगार-मेज़ के सामने पल-भर रुककर वालों को संवारा और लोग कमरे में चली गई। महमूद को देखकर बेगम मुजीव का चेहरा उतर गया। महमूद ने उठकर जेवा की अम्मी को आदाव किया। "फरमाइए !" कुछ देर चुप बैठे रहने के बाद वेगम मुजीव ने खामोशी को तोड़ते हुए कहा । महमूद अभी भी चुप था। "आप कब रिहा हुए ?" बेगम मुजीव ने पूछा। पुलिस के छापे के वाद कई महीने महमूद पर मुक़दमा चला और फिर सज़ा हो गई। उसे रिहा हुए कई दिन हो चुके थे, वेगम मुजीव को इसका पता नहीं था। "वेटा और सब कुछ मैं समझ सकती हूं..." महमूद को 'बेटा' कहते हुए बेगम मुजीव की जीभ ज़रा लड़खड़ाई। फिर जो बात वह कहना चाह रही थी, उसके होंठों पर जैसे रुकी रह गई। "जी, अम्मीजान !" महमूद कैसे प्यारी तरह उसे संबोधित कर रहा या। उसके बोल बेगम मुजीब की छाती में छिपी मां के तारों को झनझना गए। लेकिन फिर सहसा उसकी आंखों के सामने उस दोपहर का दृश्य घूम गया जब उसने सोफे पर, ठीक वहीं, जहां वह बैठा हुआ था, जेवा का सिर उसकी गोद में देखा था। आंखें मूंदे, एक उन्माद में वह लेटी हुई थी। बेगम मुजीव के अंग-अंग में एक कड़वाहट घुल गई । "और सब कुछ मेरी समझ में आ सकता है," वेगम मुजीब ने फिर वोलना शुरू किया, "पर किसी आंदोलन का हिंसा पर उतर आना माफ़ तहीं किया जा सकता।" वेगम मुजीव अपने शौहर की जवान बोल रही थी। महात्मा गांधी की छाया में परवान चढ़ी, वह वापू का वाक्य दोहरा रही थी। "अम्मी ! मैं आपकी बात समझा नहीं ?" यह लड़का कितना मीठा वोल रहा था ! जब होठ खोलता, उसके बोल वेगम मुजीव की छाती में जा लगत्ते, जैसे किसी साज़ के तारों को कोई छेड़ रहा हो । वेगम मुजीव न चाहते हुए भी उसकी ओर देखने को मजबूर हो जाती। गेहुआं रंग, गालों पर एक गुलाव-सा खिला हुआ, आंखों में एक . ६४/मन परदेसी म-४ भाकर्षण । मापे पर एक मजीदगी, दूर-दृष्टि को झलक । होंठों पर शहद- सा घुला हुआ; मन को वान कर्मों की एक ललक । एक खुशबू की तरह, में वह लड़का उसके प्राणों में उतरता जा रहा हो। एक अजीव-सासवर्ष वैगम मुजीब के मन में चल रहा था। यह लड़का जिमने उनकी बेटी को गुमराह किया था, उसे बुरा क्यों नही लग रहा "यह नो मैं मानता हूं कि हममें एक पूरी पीढी का फ्रामला है, लेकिन अम्मी, हमने कोई ऐसी बात तो की नहीं, जिसके लिए हमें शमिदा होना पड़े।" महमूद के वोलों में आदर या, श्रद्धा थी। बेगम मुजीव के होंठों पर जमे फिर ताला लग गया हो। इतने मिठ- बोले लड़के से विरोध प्रकट करने में उसे कठिनाई महमूम हो रही थी। जब वह अपनी आंखों से देर चुकी थी कि जेवा का सिर उसके घुटनों पर था, उसकी चोटी उसके सीने पर अलसाई हुई-मी पड़ी थी। फिर जेवा क्यो बार-बार कहती थी कि उमने गलत समझा था? अपनी आंपो में वह लोगन डलवा रही थी। क्यों जेवामूठ बोलती पो? आज तक उसने अपना गुमूर नहीं माना था। कुमर? फिर ये शब्द एक प्रश्न-मूचक चिह्न बनकर वेगम मुजीब की आखो के मामने मद-मद मुमकराने लगे। और बेगम मुजीब को अपनी जवानी के दिन याद आने लगे । मेख मुजीब के साथ अपनी मुहब्बत का बुखार । तोवा ! तोबा ! परदेवाली हवेली में क्या-क्या वहाने उमे गढने पड़ते थे । अगर उसकी अन्ना मदद न करनी तो यह मजिल उममे कभी पार न होती। शेख मुजीब की वह दीवानी यी । बातें करते-करते उसके माथे पर वालो को जो लट सेलने लगती, उसे बहुत भाती यो। "आपने मुझे मेरा कसूर नहीं बताया?" बेगम मुजीब को एकाएक मौन देकर महमूद ने प्रश्न किया। बेगम मुजीब ने आगें उठाकर उसके चेहरे की ओर देखा। उसके माये पर, ह-य-हू गेग मुजीव जमी एक लट येकरार हो रही थी। वेगम मुजीव को मन परदेसी/६५ - - - जैसे किसीने झकझोर दिया हो। उसका चेहरा तमतमा उठा। "मेरा मतलव है...", वह ख़फ़ा होकर कुछ कहना चाहती थी, लेकिन फिर उसकी जवान जैसे रुक गई हो। "अम्मीजान ! अगर आपको अपनी नाराजगी जाहिर करने में कोई मुश्किल हो, तो फिर कभी सही । मेरा इरादा आपको परेशान करने का नहीं है।" महमूद में असीम धैर्य छलक रहा था। "नहीं, नहीं, वेटे," और फिर जैसे बेगम मुजीब ने हथियार डाल दिए हों । वेगम मुजीव के मुंह से ये शब्द निकलते ही मानो वह पूरी-की- पूरी प्रेम की मूर्ति बन गई हो। "मेरा मतलब यह है कि तुम्हारी पार्टी के दफ्तर में, गैरकानूनी असलहे का मिलना मुझे बहुत बुरा लगा।" "असलहा ? अम्मीजान ! आपने सारी उम्र फिरंगी से लड़ाई लड़ी है। आपको पुलिस के हथकंडे मालूम नहीं ?" महमूद ने हैरान होकर कहा। वेगम मुजीव फटी-फटी आंखों से उसके भरपूर जवानी के चेहरे की ओर देख रही थी। ऐसा मुंह कभी झूठ नहीं बोल सकता ? "पुलिस ने हमारे दफ्तर को घेर लिया। हम सबको पहले एक अलग कमरे में बंद कर दिया। फिर वे चारों तरफ़ तलाशी लेने लगे । कुछ के बाद जब उन्होंने बंद कमरे का दरवाजा खोला तो सामने वरामदे में रिवाल्वर और हथ-गोले पड़े हुए थे । ढेर-सारे इश्तिहार पड़े हुए थे, जो हमने कभी देखे भी नहीं थे।" "क्या मतलब?" "पुलिस वाले आप ही यह सब कुछ कहीं से लाए और हमारा नाम लगा दिया। हम देख-देखकर हैरान हो रहे थे। एक-दूसरे के मुंह की ओर देख रहे थे।" "इश्तिहार भी आपके नहीं थे?" "यह मैं नहीं कहता कि सारे इश्तिहार हमारे नहीं थे, लेकिन कुछ इश्तिहार जिन्हें खास तौर पर मुकदमे में पेश किया गया, वे हरगिज़- हरगिज़ हमारे नहीं थे। हमने तो उन्हें पहले कभी देखा तक नहीं था।" देर । - ६६/ मन परदेसी "इतना झूठ !" "झूठ-सा झूठ ! उन इस्तिहारों मे कुफ तोल रया था। और सितम यह है कि जवान तक गलत यो।" "फिर भी तुम लोगों को मज़ावार ठहराया गया ! जेल में ठूसा गया!" "कंद काटना कोई इतना मुश्किल नहीं था, जितना तफतीश के दिनों में हमे मताया गया । अम्मीजान! आपने हिंसा का जिक्र किया था, हम पर कौन-कौन-सा जुल्म पुलिस ने नही ढाया जब हम उनके कब्जे में थे।" "बेटा, मुझे बताने की जरूरत नहीं। फिरंगी के ज़माने मे हमारे सिर पर यह मव वीत चुकी है।" "हमारी पुलिस अब उससे भी चार कदम आगे निकल गई है।" और फिर महमूद ने अपनी एक आस्तीन उठाकर वेगम मुजीब को अपनी बाह दिखाई। जगह-जगह घाव के निशान थे। मास को जैसे जम्बूरों मे नोचा गया हो। "मेरे मारे जिस्म का यह हाल है ।" महमूद ने कहा, "मुझे मवमे ज्यादा पीटा गया। मुसपर सबसे ज्यादा कहर ढाया गया ताकि मैं इन बात का इकबाल कर लू कि जेवा भी हमारे माय पी।" "बेटा! तुम इकबाल कर लेते । जेया तुम्हारे साथ शामिल थी, इसमे भूठ क्या है ?" "हा-हा अम्मीजान ! यह वात वार-बार मेरे होठो पर आकर रुक जाती। मैं नहीं चाहता था कि जेबा को भी हमारी तरह परेशान किया । "परेशानी से कोई नही डरता, जितनी मुझे इस बात पर शर्म महमून होती कि मेरी बेटी किम कुमूर पर पर ली गई थी," बेगम मुजीव ने मोचते हुए कहा। "क्या मतलब, अम्मी?" "मेरा मतलब है कि किमी हिन्दुस्तानी मुसलमान या अपने मुल्क को छोड़कर पाकिस्तान की ओर देशना देशद्रोह है।" वेगम मजीव ने देवा, महमूद के चेहरे का रंग उड गया था। मन परदेसी/६७ १३ . "महमूद आया था," उस दिन शाम को जव जेवा से बेगम मुजीव की मुलाक़ात हुई, मां ने बेटी को बताया। जेवा ने जैसे उसे सुना-अनसुना कर दिया हो "अम्मी ! जिन औरतों को मैं पढ़ाने जाती हूं, उनमें से एक मेवाती है," जेवा मां को बता रही थी, "मेवाती आर्यो की नस्ल से है । इनका रहन-सहन, इनके रीति-रिवाज, मुसलमान होने के वावजूद आर्यों जैसे हैं। मेवाती बारह 'पालों' और बावन गोत्रों में बंटे हुए हैं । इस औरत का मायका, दिल्ली के पास बल्लभगढ़ में है। इनकी शादी हिन्दू रस्मों से होती है, निकाह भी इसमें शामिल है। बारात तीन दिन लड़की वालों के घर टिकती है । एक ही गोत्र में शादी नहीं हो सकती। आम तौर पर शादियां सावन के महीने में होती हैं । ये लोग देवी-देवताओं को पूजते हैं। होली भी मानते हैं, मुहर्रम भी !" उस शाम सोने से पहले बेगम मुजीब अपनी मेज़ की दराज़ में कुछ टटोल रही थी कि पुराने काग़ज़ों में से उसके हाथ एक तसवीर आई। एक क्षण के लिए उसे लगा जैसे वह महमूद की तसवीर हो। वहां रोशनी काफ़ी नहीं थी। वेगम मुजीब ने तसवीर को देखा और सिर से पांव तक कांप गई। अगले ही क्षण वह मुसकराने लगी। वह तसवीर तो उसके शौहर की थी। उन दिनों वह हू-ब-हू महमूद जैसा लगता था। इकहरा बदन, ऊंचा- लम्बा कद, सांवला रंग, सोच में डूबा हुआ। जैसे नज़रें दूर किसी मंजिल पर लगी हुई हों। बालों की एक नटखट लट माथे पर जैसे मचल-सी रही हो। उनके होंठों की बनावट एक जैसी थी; बात करने का ढंग एक सा था; वही लहजा, वही मुहावरा ।वैसी-की-वैसी मीठी जबान । अपने हर को कभी उसने ख़फ़ा होते नहीं देखा था, कभी ऊंची आवाज़ में लते हुए नहीं सुना था। इन्हीं विचारों में खोई हुई वेगम मुजीब की आंख लग गई । गर्मी के थे। ये लोग बाहर आंगन में इंटों के फर्शी चबूतरे पर सो रहे थे। ती-अपनी मच्छरदानियों में बंद । जेवा का पलंग वेगम मुजीव से काफ़ी ६८/मन परदेसी " फासले पर था। हर रोज सोने से पहले नहाती। वालों में कधी फेरती। कोल्ड-प्रीम लगाती। कितनी-कितनी देर तक हायो, गालो, मुह-माथे की मालिश करती रहती। और फिर वैसे-के-वैसे खुले बाल, पुशबू-गुशबू अपने पलंग पर आकर लेट जाती। इधर लेटती उधर उसकी आंप लग जाती उस रात सोने से पहले जेवा पजावी में कुछ गुनगुना रही थी : 'मन परदेसी जे थिए मय देस पराया।' बैगम मुजीव की छाती में जमे ये चोल चुभ रहे हो । “वेटी, ये बोल किमके हैं ?" अम्मी ने आवाज देकर जेवा से पूछा । आप-मे-आप वह यही गुनगुनाती जा रही थी। बाबा नानक के ये बोल है अम्मीजान !" और जेबा ने फिर उन बोलों को गाकर दुहराया 'मन परदेसी जे घिरा सब देम पराया।' "वावा नानक की यह वाणी में भारत के मारे मुसलमानों को सुनाना चाहती हूं। ये बोल सवको जवानी याद कराना चाहती हूँ। फिर कितनी ही देर तक वह यही बोल गुनगुनाते-गुनगुनाने सो गई। बेगम मुजीव की भी यही बोल सुनते-सुनते प्राण लग गई । सावन-भादो को रात थी। आकाश पर बादल मडरा रहे थे। बादलो में चांद आय-मिचौनी-सी येल रहा था, जसे कोई मुमाफिर रास्ता भूल गया हो। रात कुछ और गहरी हुई और ठहो-मीठी हवा चलने लगी। जरूर कही पानी बरसा होगा । अलीगढ मे मेह पड़ जाता, दिल्ली में बूदा- यादी हो जाती, लेकिन कितने दिनो से मेरठ वैसे-का-वमा मूखा रह जाता। बादल आते और वियर जाते। सोते-सोते पानी की एक बूद वेगम मुजीय के गाल पर पड़ी । कोई एक भूली-भटकी वूद थी। वर्षा का कही नाप-निशान नहीं था। बेगम मुजीव जमे पूरी-की-पूरी सरगार हो गई । एक स्याद-स्वाद । आगन के बाहर, कालू देर-रात की फिल्म देयकर लौटा था। 'तू कौन-मी बदली में मेरे चाद है, आ जा।' फिल्म का कोई गीत गुनगुना रहा था। " और 'कुदमी!' मन परदेसी/६९ । 'कीन मुजीव ?' 'हां।' 'मुजीब ! तुम यहां कैसे ?' 'तुम्हारी अन्ना ने रास्ता बताया है।' 'अन्ना बड़ी खराव है। 'धीरे बोलो । आधी रात का वक्त है। सव सो रहे हैं।' और फिर वह उसके पलंग पर बैठ गया । दूध-सी सफ़ेद चादर पर दूध-सी सफ़ेद चांदनी में। धूप-क्षी सफेद मच्छरदानी का दिल-फ़रेब पर्दा । दीवानों की तरह उसके वालों से खेल रहा था। कैसे उसके रेशम के लच्छों से उसके मुंह-माथे को वार-चार ढांपने लगता । उसकी आंखों को, उसके गालों को। कभी उसके बालों को उसकी गर्दन में लपेटता, दायें से बायें, बायें से दायें और फिर उसके गोरे-चिट्टे चेहरे को, मच्छरदानी से बाहर निकालकर, चांद को दिखाता। उसका मुंह-माथा जैसे दहक रहा हो । उसकी उंगलियां जैसे मचल रही हो। उसके हाथ जैसे बेकाबू हो रहे हों। उसकी वाहें जैसे वेकरार हो रही हो । यह वह क्या कर रहा था? उसके गले का एक बंद उसने खोल लिया था। उसके कंधे अनढके थे। उसकी अंगिया के बंधन एक-एक करके खुल गए थे । आंखें मूंदे वह मदहोश पड़ी हुई थी। जैसे संगमरमर की मूर्ति हो। दूध-सी सफेद चांदन में शवनम के मोतियों से उसे नहलाया जा रहा था। और फिर उसप जैसे फूल-पत्तियां बरसने लगीं। खुशबू-खुशबू-सी चारों ओर फैल गई। ए स्वाद-स्वाद में वह मदमस्त हुई जा रही थी। एक नशा-नशा, एक मधुर मादकता-सी ! वह तो जैसे आवे-हयात के किसी चश्मे में गोते लगा रह हो । मोतियों जैसा झिलमिल-झिलमिल करता पानी ! नीम-गरम-सा, मुहब्बत में मुग्ध होंठों का सेंक हो। और फिर चारों ओर जैसे साज़ व उठे। तार झनझनाने लगे। कोई स्वर ऊंचा, और ऊंचा होता जा रहा था यह कौन गा रहा था? स्वर में स्वर मिल रहे थे । एक, दो, दस, बीस-र पचास । मरद-औरतों के मिले-जुले सुर । और अब वे नाच रहे थे। दूध सफ़ेद कपड़े, बांहों में बांहें, नाच-नाचकर न थकते थे, न हारते थे। ना नाचते आकाश में उड़ने लगते। नाचते-नाचते धरती पर उतर: ! - - , । ७० / मन परदेसी कार, नीचे । नीचे, कसर । तेज योर तेज । माज पर-थक रहे थे । ताल टूट-टूट रही थी, लेकिन नाच की चाल वमी-की-चमी यो। वाहों को उठान वमी-की-बमी थी । अव किगीने गुलाल लुटाना शुरु कर दिया था। रगों मे मे रग उभरले आ रहे थे। लाल और नीले । हरे और पीले । रग और रंगो को आभा, रंग और रगों की चमक-दमक, रग और रंगों की गहराई; वह तो डूबती चली जा रही पी-कोई उमे अपने बाजू में भरकर नीचे और नीचे लिए जा रहा था। जैसे कोई मोए-मोए मागर पर तंर रहा हो। विशे-विय पानियों पर जैसे कोई फिमलता चला जा रहा हो। ... अचानक किसीफे चौगने को आवाज सुनाई दी। यह तो जेंया को 'चीन धी। इस वक्त । आधी रात इधर, आधी रात उघर । वेगम मुजीर मट अपनी मच्छरदानी से निकल, जेवा के पलग पर जा पहुची । जेवा पबराई हुई थी, परेशान-हाल ; फटी-फटी आगे, अपने पलग पर बैठी जमे अपने-आपको अपनी याहो में छुपा रही हो। "वह था, वह ।" जेवा की आवाज नहीं निकल रही थी। "कौन था, बेटी?" बेगम मुजीव ने मच्छरदानी हटाकर जेवा को अपने गले से लगा लिया। वहीं था।" जेवा ने अपनी अम्मी को ओर घूर-पूरकर . "वह था... "कौन पा, बेटी ? यहा तो कोई भी नहीं।" "वह था, महमूद !" जेवा ने कहा और अपनी अम्मी की गोद में सिर रसपर लट गई। एक क्षत, और फिर वह गहरी नीद मो गई थी। मपना था। वेगम मुजीय को यकीन था कि यह सपना था । लेकिन फिर भी वह जेवा का मिर उम तकिये पर टिकाकर, आगन में चारों ओर दंगने सगी । उसने बरामदे के कोने में नाका। फिर सामने पाके पोदे। फिर दीवार को परछाई मे। कहीं भी तो कोई नहीं था। मागन की चारदीवारी के बाहर कालू मोया हुआ था। उमरी चारपाई के पास उमका कुत्ता मोती बैठा रहता था । उपर तो कोई चिहिया भी पर नहीं मार मरती थी। सपना था, सपना । और फिर वेगम मुजीय अपने पलग पर आकर मन परदेसी/७१ बैठ गई । वह भी तो सपना देख रही थी। कितना प्यारा था उसका रापना ! बेगग मुजीम बार-बार अपने विस्तर की चादर को हाथ लगाकर देखती। सपना था, केवल सपना। १४ खाना खाते वेगग गुणीव को महमूद अच्छा-अच्छा लगने लगा था। क्यों ? इसका पारण वह स्वयं नहीं जानती थी। अकेली, खिड़की में खड़ी वह अपने मन को टटोल रही थी। लेकिन वह लड़का था किराका? वेगम मुजीव ने एक-दो बार जेबा से उसके बारे में बात शुरू की। लेकिन वह तो जैसे उसका नाम तक सुनने को तैयार न हो । उस दिन मां-बेटी में बदमजगी भी हो गई थी। मेज पर बातों-बातों में महमूद का जिन आ गया। बेगम मुजीव ने कहा, "मुशे तो यह लड़का बड़ा अच्छा लगता है।" "तो फिर अम्गी ! आप ही क्यों नहीं ..." पता नहीं क्या बकने लगी थी । आजकल शेया बहुत मुंहजोर होती जा रही थी। उसे जैसे एकदम गोध आ गया हो। वह खाना बीच में ही छोड़कर, मेज़ रो उठ गई। इस तरह की परिस्थितियों में वेगम मुजीव का एक नोजवान लड़के के बारे में सोचना, बेशक उसे अजीब-अजीव-सा लग रहा था। पर सच्चाई यह थी कि खिड़गी में अकेली खड़ी, बंगले के विशाल लॉन को देखते हुए वह महमूद के बारे में सोच रही थी। कालू घर के पिछवाड़े, आंगन में ग्वाले को छेड़ रहा था, "तुम कहीं दूध में हिन्दू पानी' मिलाकर तो नहीं लाते हो? चुटिया वाले का कोई भरोसा नहीं। हमारी वेगम साहिबा का ईमान कहीं ख़राब न कर देना। पानी गिलाना हो तो मुसलमानी-मटके में से निकालकर मिलाया कर।" "लो, मुझे आगे जाकर पया जवाब नहीं देना पड़ेगा? और फिर आजकल हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे को एक आंख देख नहीं सकते।" - ७२/मन परदेसी ग्वाला सुन-गुनकर हम रह पा, "मैं दो कमेटी के नल का पानी मिलाता हूं जितना भी मुझे मिलाना होता है।" "नल की भी तो हिन्दू लोग शुद्धि कर लेते हैं।" "मेरी गाय जो मुमममान है, मैंने शेगों को मही मे उन परीदा था।' "गाय कसे मुसलमान हो सकती है ? यह तो पैदा भी हिन्दू होती है और मरती भी हिन्दू है।" "तभी तो मैं कहता हू, भम का दूध लिया करो। लेकिन वेगम माहिया तो सारी उम्र गाय का दूध ही लेती रही।" "शुक्र करो, महात्मा गाधी के इन घेलों ने बकरी का दूध शुरू नहीं कर दिया।" पुद हंस रहे थे । वाकी नौकरी को हमा रहे थे। इनमें बावर्ची था, जमादार या, माली पा। खिड़की में पड़ी बेगम मुजीव को ध्यान आया, कि उसी पिडकी में राड़े होकर वह अपने शौहर की राह देया करती थी। उसका जीवन तो एक लम्बी प्रतीक्षा थी। इतवार के लमहो को जमे एक माला पिरोई हो । हर तरह की उसमे फडिया जुड़ी थी । लम्बी प्रतीक्षा की, छोटी प्रतीक्षा की, प्रतीक्षा जो कभी समाप्त न हुई, प्रतीक्षा जो एक क्षणभर के मिलन मे संतुष्ट हो गई । इस खिड़की में पड़े होकर वह इतजार करती थी, और उसकी मोटर गेट में से होती हुई पोर्च मे ना रकती थी। कभी उमको वन्धी के घोड़ों को टाप मुनाई देने लगती । इस पिड की मे पडे होकर, कई बार उसने पुलिस को हिरागत मे उसे जाते हुए देखा था। फूलों के हारो मे सदा हुआ, उसे जुलूम मे आते हुए देया था । जब वह आता, कलाय जिंदाबाद के नारे गूज रहे होते, जब यह जाता, इकलाब जिंदाबाद के नारे गूंज रहे होते। बेगम मुजीब, विकी मे गडी, इन विचारो में डूबी हुई थी कि उसने देखा कि सामने कोठी का गेट खुला और महमूद आ रहा था। शादी का पुरता, यादी का दूध-मा मफेद पायजामा, पाव में चप्पल । गेट में घुमने ही उसने अपने बड़े हुए बालों को मिर झटककर पीछे किया । हू-ब- इमी तरह उसका शौहर किया करता था। नीचे जमीन को देखते हुए, हमेगा मन परदेसी/७३ .

किसी खयाल में खोया रहता। यूं आंखें नीचे किए हुए, सिर झुकाए कोई देखे तो वाल मुंह पर आ पड़ते ही हैं। और वह कभी हाथों से, कभी सिर झटककर उन्हें पीछे करता रहता। 'आप इन्हें छोटा ग्यों नहीं करवा लेते?' वेगम मुजीव अपने शौहर से कहा करती थी। 'इसके लिए वक्त कहां से लाऊं, वेगम?' वह जवाब देता 'तब तो आप आजादी मिलने पर ही बाल कटवाएंगे ?' बेगम मुजीव उसे छेड़ा करती थी। और अगले क्षण, महमूद के साथ गोल कमरे में बैठी वेगम मुजीब उसे यह वात सुना रही थी। शर्म से महमूद का मुंह लाल-सुर्ख हो गया था। सचमुच उसके बाल कुछ ज्यादा ही बढ़ गए थे । अपने बालों को, दायें हाथ से पीछे करते हुए वह बोला, "हमें तो आजादी अभी मिलनी है।" "क्या मतलब ?" वेगम मुजीव जैसे तिलमिला उठी हो "अम्मी ! वेचारे हिन्दुस्तानी मुसलमान तो कसमपुर्शी की हालत में हैं । आपको मालूम है, अलीगढ़ में हिन्दू-मुसलमान फ़साद शुरू हो गए "हाय अल्ला ! यह कब ?" बेगम मुजीब तड़प उठी । उसके मायके अलीगढ़ में थे। "आज सुबह ही।" महमूद ने कहा । यह कहते हुए उसकी जवान रा-सी लड़खड़ाई। "लेकिन हुआ क्या ?" बेगम मुजीव परेशान थी। "फ़िरकावाराना फ़साद शुरू करने के लिए, फ़सादियों की जरूरत ती है, वहाना कोई भी ढूंढा जा सकता है।" महमूद बड़ी बेपरवाही से रहा था, जैसे एक फ़िरो का दूसरे फ़िरके से दंगा करना बच्चों का हो। "कोई वारदातें हुई होंगी ? मेरे तो मायके अलीगढ़ में हैं।" "किरा इलाके में वे लोग रहते हैं ?" "यूनिवर्सिटी के पास।" "फिर कोई खतरा नहीं । फ़साद तो शहर में शुरू हुए हैं।" ७४/ मन परदेसी "लेकिन यह आग लगी कसे ?" "मामला मारा पेट का है। हिन्दू चाहता है कि मुमलमान के मुंह की रोटी छीन ली जाए। अलीगढ के हिन्दू कहते हैं कि उनके देवी-देवताओं की पीतल की मूर्तिया जो मुसलमान कारीगर बनाते आ रहे हैं, अब ये नहीं बना सकेंगे।" "यह भी कोई बात हुई ?" "बस, इमी वात पर फसाद गुरू हो गए।" "और पुलिग क्या कर रही है ?" "उमका काम है तमाशा देखना, या फिर हिन्दुओं के साप मिलकर मुमलमानों के घरों को आग लगाना, निहत्ये मुमलमानों को गोलियों से भूनकर रय देना।" "यह फंसे हो सकता है ?" "अम्मीजान ! यह हो रहा है। आपके मायके शहर की गलिया यून से लयपथ हैं । नालियों में लाशे सड रही हैं । कपर्दू में कोई वाहर नहीं निकल सकता।" "ऐमा कभी नहीं सुना । ऐमा कभी नहीं हुआ "सारी पुलिस हिन्दू है । जो मुसलमान अफसर और सिपाही पाकिस्तान चले गए, उनकी जगह भी हिन्दुओं से भरी जाती रही। पुलिस और फौज मे अब मुसलमानो को नौकरी नही मिल सकती।" "मह मैं कैसे मान सकती है?" "अम्मी ! आपको मानना पडेगा। आपको बेटी वी० ए० पास करके वैकार बैठी है। आपके मामने एम० ए० पास एक नौजवान बैठा है जिमें नौकरी की तलाश है।" "मैं तो सुन-गुनकर हैरान हो रही है।" "आपका जवाहरलाल क्या और मौलाना आजाद क्या गद्दी पर बैठकर अपने सारे वायदे भूल गए हैं। कम-गिनती के लोगो को किमीको परवाह नहीं। इस देश में मुसलमान का जीना हराम है..." जितनी देर और वंठा रहा, महमूद इस तरह की बातें करता रहा। गुन-गुनकर बेगम मुजीव के कान परने लगे। उसे अपना-आप मंला-मना मन परदेसी/७५ " लगता । आस-पास से एक बू-सी आ रही महसूस होती। महमूद के जाने के बाद वह कितनी देर गुमसुम बैठी रही। इतने में जेवा आ गई । अम्मी को यूं परेशान देखकर, उसने इसका कारण पूछा। "लेकिन मैं तो बाहर से आ रही हूं, मैंने तो ऐसी कोई बात नहीं सुनी । न ही रेडियो पर कोई ख़बर थी।" जेवा हैरान हो रही थी। "रेडियोवाले भी सरकार के नीकर हैं । जो सरकार कहती है, वही बोलते हैं।" बेगम मुजीव चिन्ताओं में डूबी हुई थी। उसने जानबूझकर जेवा को नहीं बताया कि महमूद उनके यहां आया था, और वही उसे यह खबर सुनाकर गया था। जव शाम को भी रेडियो पर इसके बारे में कोई खबर नहीं आई तो जेवा ने अलीगढ़ टेलीफ़ोन किया। अलीगढ़ में तो सुख-चैन था। और मां-बेटी आराम की नींद सो गई। १५ अगले दिन सुबह रेडियो की ख़बरों में अलीगढ़ के दंगों का जिक्र था। 'रेडियो बोल रहा था, फ़साद पिछली रात अचानक भड़क उठे। और फिर अखवार भी साम्प्रदायिक दंगों की कहानियां लेकर आ गए। शहर की तंग गलियों में घर लूटे जा रहे थे। मकान जलाए जा रहे थे । वाजारों में छुरेवाज़ी हो रही थी। बम फट रहे थे। गोलियां चल रही थीं। कोई कह रहा था, मुसलमानों का ज्यादा नुकसान हो रहा था; कोई कहता, ज्यादा हिन्दू मारे जा रहे थे। कोई कहता, शरारत हिन्दुओं ने शुरू की थी। कोई कहता, इस बार दोप मुसलमानों का था। शहर में कपडूं लगा दिया गया था। पुलिस गुंडों की पकड़-धकड़ कर रही थी। उनमें से ज्यादातर लोग रू-पोश हो गए थे। विद्यार्थियों में तनाव था। 'विश्वविद्यालय बंद कर दिया गया था। परीक्षाएं स्थगित कर दी गई थीं। - । ७६ / मन परदेसी । फौज को तैयार रहने के लिए कह दिया गया था। राज्य के बाकी जिलों से पुलिस टुकड़ियां अलीगढ़ प्रशासन की महायता के लिए भेज दी गई थी। राज्य के कई मत्री अलीगढ़ पहुच रहे थे। प्रधानमंत्री ने दिल्ली में साम्प्रदायिक दंगों की भत्सना की थी । अलीगढ के शहरियों को अमन कमेटिया बनाने के लिए कहा जा रहा था। खबरें पढ़ते-पढते, अखबार उसके हाथों से छिटक गया । आजादी से पहले, आजादी के बाद,हर साम्प्रदायिक दंगायूं ही अचानक गुरू होता।न पुलिम को इसका पता होता, न शहरियो को। और फिर हरफमाद में जहां- तहा अल्पसंख्यक होते, उनपर बहु-गिनती वाले अत्याचार करते । हिन्दू मुमलमानों पर, मुमलमान हिन्दुओं पर । कयूं लगाया जाता। पुलिस चौकम की जाती। फ़ौज को बुलाया जाता। राज्य सरकार के मत्री घटना- स्थल पर पहुचते । दिल्ली से बयान जारी किए जाते। शान्ति-समितिया बनाई जाती। बेगम मुजीब सोचती, हमेशा यह सब कुछ होता था, फिर भी फ़माद होते ही रहते । गरीबों का प न वहता ही रहता । निहत्ये, धैमूर लोग मरते ही रहते। जब फसाद रुकते, जांच-कमेटिया विठा दी जाती । उनके बारे में फिर कोई खबर नही आती थी। मायद उनकी सिफारिशें दाल-दफतर कर दी जाती। ठोक वही कुछ अलीगढ़ मे हो रहा था, जो महमूद बेगम मुजीव को बताकर गया था। और वह सोच-सोचकर हैरान हो रही थी, उसकी बेटी के चेहरे पर कसी एक घृणा-सी, एक अनमनापन-सा चित्रित हो गया था, जब पिछली शाम मां ने उससे फ़माद का जिक्र किया था ! सुबह-मुवह ही नाश्ता करके, बाहर निकल गई थी। उसने तो अण्यार देखने की भी कोशिश नहीं की थी। यस रेडियो समाचार ही मुने थे। यदि अलीगढ़ में साम्प्रदायिक दगे हो रहे थे, तो मेरठ में भी चिनगारी भडक सकती थी। बड़ी निडर लड़की थी। अब की गई, पता नहीं कर लौटेगी! बेगम मुजीव सोचती, अगर महमूद कही मिस जाए नो वास्तविक स्थिति उससे मालूम की जा सकती थी। लेकिन उसे बूढ़ा में जा? मन परदेमी/७७ - कालू को शायद उसका पता मालूम होगा। पूरे शहर में कौन था, जिसे कालू नहीं जानता था। और वही बात हुई, इधर वेगम के मुंह से निकला, उधर कालू साइकिल पर जाकर महमूद को बुला लाया। जितनी देर वेगम मुजीब के यहां वह बैठा, महमूद हिन्दू-फ़िरक़ा- परस्ती की निन्दा करता रहा । कायदे-आजम के गुण गाता रहा । उसकी नज़र में, हिन्दुस्तान में मुसलमानों के साथ कदम-कदम पर सौतेला व्यवहार हो रहा था। साम्प्रदायिक दंगे तब तक चलते रहेंगे जब तक मुसलमानों को नौकरियों में उनका पूरा हिस्सा नहीं दिया जाता। जब तक हर तरह के उद्योग और व्यापार में उनका हौसला नहीं बढ़ाया जाता। यह वात वेगम मुजीव की समझ में भी आ रही थी । अगर पुलिस में मुसलमान भरती किए जाएंगे तो वे अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं होने देंगे। और अगर मुसलमानों के अपने कारखाने और अपना व्यापार होगा तो गुंडागर्दी और आतिशजनी से उनका भी उतना ही नुकसान होगा, जितना और किसीका । लेकिन जो वात वेगम मुजीव को परेशान कर रही थी, वह महमूद का बार-बार पाकिस्तान का जिक्र करना था। जैसे किसीकी आंखें सरहद के पार लगी हों। उसे पाकिस्तानी लीडरों में कोई बुराई दिखाई नहीं देती थी। उसकी सहानुभूति पाकिस्तान की जनता के साथ थी। उस देश की हर भूल के लिए उसके पास कोई-न- कोई औचित्य था। अपने देश की हर गलती को वह बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता था। उसका जिस्म भारत में था, मगर रूह पाकिस्तान में थी। इतनी देर से, उसके पास बैठे, बातें करते हुए उसने एक बार भी भारत को अपना देश नहीं कहा था। वेगम मुजीव हैरान थी, फिर भी यह लड़का उसे नापसंद नहीं था। उसकी बातों में उसे एक तरह की दिलचस्पी महसूस हो रही थी। और फिर वेगम मुजीव ने उसे दोपहर के खाने लिए रोक लिया। बातों-बातों में वेगम मुजीव को पता चला कि महमूद के अव्वा की शहर के बाहर ढेर-सारी जमीन थी। इसमें से कुछ ज़मीन सरकार ने विजली-घर के निर्माण के लिए अपने कब्जे में लेकर लाखों रुपयों का । - । ७८/ मन परदेसी मुआवजा दिया था, लेकिन फिर भी सरकार पर उन्होंने मुकदमा कर रवा पा । निचली अदालत में हार गए थे, अव हाई-कोर्ट में अपील कर रसी पी । उनका वकील कहता कि दो-चार लाय एपया यह उन्हें और दिलाकर रहेगा । याकी जमीन पर वे गन्जी उगाते थे। पिछले माल भी उन्होंने ऐमा ही किया था-और उसमें पिछले साल भी । "आगिर मन्जिया ही क्यों ? और कुछ क्यों नहीं?" बेगम मुजीव ने पूछा। "इमलिए कि जव जी चाहे, आदमी मम्जी की फसल को बेचकर आगे चल गकता है।" "क्या मतलब" "क्या पता हम ममलमानो को कब यह मुल्क छोड़ना पडे ?" बेगम मुजीव ने यह मुना तो उसके पाव के नीचे में मानो धरती मरक गई। कई लोग कमी-सी बातें सोचते हैं ? "हम पहले गेहू और धान लगाते थे। अब टमाटर, गोभी और ऐगी ही गजिया लगाते हैं । आज उगाओ, कस पा लो।" महमूद यू बोलता चला जा रहा था कि वेगम मुजीब ने उसका ध्यान बटाने के लिए उमसे पूछा, "आपके दूसरे भाई-बहन क्या करते हैं ?" "बस, एक बहन है। जिसे अम्मीजान लेकर आजवल पाकिस्तान गई हुई हैं । अगर कोई ढग का लडका मिल गया तो उसका रिना कर देंगे।" "लेकिन उन्हें अपने देश में कोई सरका दियाई नहीं दिया?" बेगम मुजीव ने पूछा। "अम्मी, क्या इस तरफ कोई काम का मुसलमान वाडी रह गया "कपी, मेरे सामने एक वंठा है।" बेगम मुजीव ने अपं-भरी नजरों से महमूद की ओर देखते हुए कहा । जैसे वह अपने मन की बात को वह डालने में सफल हो गई हो, वह पिल-मी गई। और फिर यह उठकर वाव याने की और चली गई। बेगम मुजीव को इस बात पर महमूद जमे विभोर हो उठा। एक नगे- नशे मे, मदमस्त, उमकी आगे मुदी जा रही थी। अकेला, वित्तुल अला, गोल फमरे के मोफे पर यटा हुआ यह मोचने समाजवा के माप उमरी मन परदेगी/ ७६ । - ग़लतफ़हमी अव जल्दी ही दूर हो जाएगी।' जेवा की अम्मी का 'वोट' अब उसकी जेब में था। अब जेवा भागकर कहीं नहीं जा सकती थी। बड़ी मुंहजोर लड़की थी । लेकिन हर हसीन औरत मुंह-ज़ोर होती है। हर हसीन औरत में खुद-दारी होती है, ग़रूर होता है। ज़ेबा जैसी लड़की अगर उसके हाथ लग जाए तो उसके मजे हो जाएंगे । उनकी पार्टी को वड़ा सहारा मिलेगा। यूं कुछ दिन ऐसे ही, वह बेलगाम फिरती रही तो महमूद को डर था कि वह किसी ऐरे-ौरे के साथ चल देगी। एक बहन पहले ही लुटिया डुबो चुकी थी। महमूद सोचता, दोप इन लड़कियों का नहीं था। एक तो उनके अब्बा की तबीयत ही ऐसी थी, और दूसरा, वेवा औरत की औलाद बड़ी बे-काबू होती है । महमूद देखकर हैरान रह गया। खाने की मेज़ पर वेगम मुजीव ने इतना तकल्लुफ़ किया हुआ था । कवाब और कोरमा। विरयानी और दही की चटनी। उन्होंने खाना शुरू ही किया था कि ज़ेवा आ टपकी। महमूद को खाने की मेज़ पर बैठे देखकर उसके माथे पर बल पड़ गए। कहने लगी "मैं किसी सहेली के यहां खाने बैठ गई थी, इसलिए मुझे देर हो गई।" और फिर वह दो-चार मिनट इधर-उधर की बातें करने के बाद, अपने कमरे में चली गई। महमूद को खाना खाकर गए हुए बहुत देर नहीं हुई थी कि बेगम मुजीव ने देखा कि खाने की मेज पर बैठी जेबा खाना खा रही थी। 'हू-ब-हू अपने बाप पर है।' बेगम मुजीव ने मन-ही-मन कहा। १६ खाना खाते हुए जेबा को अचानक ध्यान आया कि पिछले रोज़ जव अम्मी ने अलीगढ़ के दंगों का जिक्र किया था, उन्हें इस बारे में महमूद ने ८०/मन परदेसी म-५.

ही बताया होगा। रेडियो और ममाचारपत्रों के अनुमार माम्प्रदायिक दंगे पिछली रात शुरू हुए थे। उसे यह गदर पहले ही फैमे मिल गई, दंगे शुरू होने में पहले ही? जेवा का बार-बार जी चाहता कि यह अम्मी मे पूधे कि अलीगढ़ के फ़मादों की गवर उन्हें किमने दी थी। लेकिन फिर यह इने टाल जाती । महमूद के लिए उसके मन में इतनी घृणा थी कि वह उनका नाम तक लेने को तैयार न थी। और इधर उमकी मा थी, मानो उमकी दीवानी हो । युला-युलाकर उमको दायतें कर रही थी। पलगता पा, जैसे उम दिन कुछ होकर रहेगा। जेवा, मेज़ पर बैठी, अकेली, ग्राना मा रही थी। नोकर छुट्टी कर गए पे। जेबा स्वयं ही यावर्दोगाने में गई, और प्लेट परोमकर ले आई। मा-बेटी पाने के कमरे में ली थी। "बेटी ! तुम हमारे माय ही याना पा लेती ! अब हर एक चीज ठडी हो गई है।" बेगम ने जेबा के मामले मेज पर बैठने हुए कहा । "अम्मी ! आपको मालूम है, यह आदमी मुझे अच्छा नहीं लगता।" जेबा कहने लगी । वह कोगिरा कर रही थी कि वह गफा न लगे। "लेकिन उममे खराबी क्या है ? मुझे भी तो पता चले?" अम्मी सचमुच यह भेद जानने को उन्मुक थी। कोई दिन थे, जब सेवा महमूद पर फिदा थी। वेगम मुजीव ने गुद अपनी आयों में उन्हें गोल कमरे मे अटपटी हालत में देखा था। जंबा ने अम्मी के सवाल का जवाब देना उचित न ममता। याना पाते उसने जग मे मे पानी गिलाम में उडेला और फिर पीने सगी। "माते-पीते घर का लडका है। पढ़ा-लिया। चा-लवा। यूब- मूरत ।" अम्मी बोल रही थी। जेवा घुप थी। "आजकल अन्ये लड़के मिलते कहा है ? पद महमूद भी वहन के लिए लडका दूसने वे पाकिस्तान गए हुए हैं।" जेबा सी-की-चसो यामोग, पाना पा रही थी। यात-गाते, मा की और दुसर-टुकुर दे रही थी। "किता मिठ-योला सडका है ! कित्ता मलीरे वाला। कंगे प्यारी मन पग्देमी/१ - - तरह मुझे अम्मी कहकर बुलाता है जेवा को अपनी मां पर तरस आ रहा था। यह वही मां थी जो एक दिन इसका सिर उसके घुटनों पर देखकर वेहोश हो गई थी। "अगर तुम्हारी नज़र में कोई और है, तो मुझे वता दो-अपनी अम्मी को । मैंने कव अपने बच्चों के मामलों में दखल दिया है ?" "अम्मीजान ! आपको क्या जल्दी पड़ी है ? अगर आप मुझसे जान छुड़ाना चाहती हैं तो मैं वैसे ही घर से चली जाती हूं।" "जो मुंह में आता है-वक देती हो। क्या फ़िजूल वोले जा रही हो?" जेवा हंस दी। "मेरा मतलब है, हर काम के लिए वक्त होता है । तुम्हारी पढ़ाई अब ख़त्म हो गई है । अव तुम्हें अगले पड़ाव की तैयारी करनी चाहिए।" "किसीका घर बसाना चाहिए। किसीके आंगन में बच्चे खेलने चाहिएं । फिर बच्चों के बच्चे । फिर उनके बच्चे । बेचारा मेरा देश हिन्दुस्तान ।" "फिर तुम यूंही बैठी रहना । तुम्हारे जैसी जो मीन-मेख निकालती हैं, उनकी गाड़ी छूट जाया करती है। अपने पड़ोस में खान-बहादुर की बेटी की तरफ़ देखो। वाल सफ़ेद हो गए हैं और अभी तक हाथ पीले नहीं हुए। कोई वक्त था, लड़के वाले उनकी दहलीज़ पर माथा रगड़ते रहते थे। अब कोई उधर झांकता तक नहीं।" "तो फिर क्या हुआ, अम्मी ! कम्मो आपा स्कूल में पढ़ाती है । अपने काम में खुश रहती है।" "देखती नहीं, कैसे साइकल पर टांग चलाती, हर रोज़ स्कूल जाती है। इतने बड़े वाप की बेटी, अगर उसने व्याह कर लिया होता तो आज उसके नीचे मोटर होती। अपना घर-बार होता । नौकर-चाकर होते। मजे करती। उसकी हमउम्र माएं वन चुकी हैं। उनके बच्चे भी उसके स्कूल में पढ़ते हैं। उस दिन मुझे बता रही थी-'आंटी-आंटी' कहते रहते हैं।' जेवा का खाना ख़त्म हो चुका था। अम्मी अभी बोल रही थी, और वह सामने वाश-बेसन में हाथ धोने लगी। "अम्मी ! मैं वादा करती हूं," तीलिया से हाथ साफ़ करते हुए जेवा, . ८२/मन परदेसी बैंगम मुजीव की ओर आई, और उमे कंधों मे पकड़कर उसकी भागों में आंग डालकर रहने लगी,"अम्मी ! मैं वादा करती हैं कि मादी के मामले में मैं आपसे परेशान नहीं वहंगी"नही कम्पी।" वेगम मुजीव की आंगों में आगू आ गए। "येटी, अगर तुम्हारे अग्या आग होते तो महो किमी यान की फिक्र नहीं थी। अब जिम्मेदारिया जो मेरे मिर पर आ पड़ी है। बेटा कही बैठा है । उसकी चिट्टी के इनगर में बायें दुगने लगती हैं।" अपनी मा की आपो मे आसू देवकर जेना भी भावुक हो गई। "लेकिन इस लडके महमूद में बराबी क्या है ?" अवमर देखते हुए बेगम मुजीर ने अपनी बात आगे चलाई। संवा गामोश हो गई। "मैं जब उसका नाम लेती हूं, तुम गामोग हो जाती हो। आधिर मुझे भी तो पता चले कि अमल मे वात करा है ?" वेगम मुजीव दो-टूक फैमले पर तुली हुई लगती थी। ,"अम्मी ! मैंने महमूद को बहुन पाग में देया है। वह बहुन गमत आदमी है।" "मदं जाल ! कोई न कोई ऐव हर एक में होता है ।" बेगम मुजीब के भीतर का अनुभव बोल रहा था । "कई ऐव होते हैं जो नजरभदार किए जा सकते हैं. लेकिन कुछ ऐमें होते हैं जिन्हें माफ़ नही किया जा माता।" "म भी तो पता चले।" अम्मी अपनी जिद पर बडी पो। "महमूद, उमकी अम्मी, उमके अध्या, इस देश में यू रहते है जमे परदेमी हो।" "यह तो मुझे भी महगूम हुआ है । उन लोगोषी नजरें जमे मरहद में पार लगी हो। लेकिन इसमें परेशान होने की बात पपा हैउन जगई और हिन्दुस्तानी मुसलमान है। वक्त आने पर गुद ही गमा जाएंगे।" "महमूद जंग लोग कभी नही समझेगे। ये लोग नो मे पर तोल रहे परू हों। किमी वक्त भी उडान भरकर मरहद पार नले जाएंगे।" "लेकिन हमारे यहु-गिनती वाला भोकम-गिनती पानों के हर. मन परदेमी/६३ . . हुकूक का खयाल होना चाहिए।" "यह वात मेरी समझ में कभी नहीं आई," जेवा चिढ़कर बोली, "सारे हक कम-गिनती वालों के ही क्यों होते हैं ? कोई हक़ बहु-गिनती वालों का भी होता है।" "जवान को ही लो----उर्दू के मामले में हमारी सरकार की गफ़लत मुझे ज्यादती लगती है।" "उर्दू के बारे में गफ़लत उर्दू बोलने वालों की तरफ़ से हो रही है।" "इसलिए कि सरकार उनपर जवरदस्ती हिन्दी थोप रही है।" "यही तो मेरी शिकायत है । आखिर वहु-गिनती वाले अपनी जवान की सरपरस्ती क्यों न करें? जो हक हम अपनी जवान के लिए मांगते हैं, वह हक़ हम अपने पड़ोसी को क्यों नहीं देते ? इसलिए कि वो बहु-गिनती में हैं?" "मेरी नज़र में यही एक वजह है कि हिन्दुस्तानी मुसलमान पाकि- स्तान पर अपनी आंखें जमाए हुए हैं।" "क्या पाकिस्तानी हकूमत में पंजाबी ग्रुप, पूर्वी पाकिस्तान में अपनी जवान नहीं ढूंस रहा ? "कि अगर आप वंगला नहीं छोड़ना चाहते तो उसे फ़ारसी लिपि में लिखना शुरू कर दो। उस दिन इसी बात पर ढाका में कई बंगालियों को गोली से उड़ा दिया गया। अगर पाकिस्तानी वंगालियों को उर्दू पढ़ने के लिए मजबूर कर सकते हैं फिर अगर हमें हिन्दी सीखने के लिए कहा जाए तो इसमें कौन-सी ज्यादती है? पाकिस्तानी कश्मीर को अपने साथ मिलाने की बात सोच रहे हैं। मुझे तो लगता है कि वो वंगाल को भी अपने हाथ से गंवा बैठेंगे।" जेबा आवेश में आ गई थी। बेगम मुजीब ने बात वहीं समाप्त कर देता उचित समझा। ८४/मन परदेसी १७ अलीगढ़ में रियति अभी साम दिनी जमी नहीं हुई यो। अभी रा कपy लगता था कि एक मुह, जेबा अपने ननिहाल जाने के लिए ते हो गई। अगर यह उगको इन्छा धी नो उमे कौन रोक माना पा? चाहिए तो यह पा कि बेगम मुजीब भी अपनी बेटी के माप म हो जाती। लेकिन इन दिनो उमने पर छोड़कर जाना उचित नहीं सम उसके अन्या को, मिविल लाइन में फोटो पो। इस क्षेत्र में अमन-चैन कोई गार पतरे की बात नहीं थी। वास्तव में महमूद उमको आयों को भा गया था, और वह चा थी कि उस लड़के को किमी तरह जैया मे वाघ दिया जाए। जैया मान रही थी; धीरे-धीरे उमें मनाया जा सकता था। लड़कियों का है; पाते-पीते पर मा पढ़ा-लिया, गृश-शक्न सडका था। विमीको क्या चाहिए? जहा तक उमके मजहबी कट्टरपन का मवाल था, यह अच्छा ही था कि उसके कारण उममें और कोई दोष नहीं था। उन मिया कई बार परेशान होकर बहा करता था--'हर हिन्दुम्नानी। महागभापी है. हर हिन्दुम्नानी मुमसमान मुस्लिमलीगी है । हिन्दुस्तानी सिय, अकाली है । मुझे काग्रेसी नो कोई इसका-दुक्का हो । आता है । काग्रेमी तो यम एक गाधी है या जवाहरलाल नेहरू या मौलाना आजाद, या रफी अहमद किदवई...' उस गाम महमूद उनके यहा आया हुआ था। जब मे जया अन गई थी. यह प्राय बेगम मुजीव से मिलने आ जाता था। जवान-जहान बच्चों को मा, बेगम मुजीव मे एक अस्पनीय में या, जो उमने अभी तक ममात-मभात रया पा। एक मतीका, उदारता, एक निष्कपटता । हगती हुई मोटी-मोटी काली मा, यिः गुला माया, पिला हुआ, दमक रहा । आयु के गाय बीच-बीच में पर वाल, उसके काली लटों को जमे दुलरा रहे हो। गोरा रंग, अभी सालों पर मालिमा का आभास पाऊची-मदी.मे.

कुरता । सिर पर फिसलती रेशमी चुनरी । एक ख शबू-ख शवू-सी उसके साथ आई, जब उसने कमरे में कदम रखा। महमूद पर एक जादू का-सा प्रभाव हो रहा था । एक नशा-नशा-सा उसे चढ़ता जा रहा था। चाय के बाद, वेगम मुजीब अपने हाथ से लगा- कर पान उसे खिला रही थी। पान लगाते हुए, उसके साथ इधर-उधर की बातें भी करती जा रही थी। पहली बार आज महमूद का जी चाहा कि वह वस आज जेबा की अम्मी को सुनता जाए, सुनता जाए। जैसे कोई संगीत के माधुर्य में एकरस हो जाता है, ऐसा उसे महसूस हो रहा था। "कायदेशाजम जिन्नाह बेशक मुस्लिम लीग को कायम करने वालों में से थे, लेकिन वो लीगियों में सबसे ज्यादा तरक्कीपसंद थे। अगर वे जिंदा रहते तो पाकिस्तान को एक इस्लामी राज कभी न बनने देते । वो तो हमेशा यही कहते रहे कि पाकिस्तान बनने के बाद वहां का कोई भी शहरी अब मुसलमान, हिन्दू, या ईसाई नहीं, सव पाकिस्तानी हैं । " १६३४ में जिन्नाह ने कहा था--'मैं पहले हिन्दुस्तानी हूं, फिर मुसलमान।' ११ अगस्त, १९४७ को पाकिस्तान की आइन साज एसेम्बली के सामने उन्होंने फ़रमाया-~~-'चाहे कोई मंदिर में जाए, या चाहे मस्जिद, या किसी और जगह इबादत करे, किसीका कोई मजहब हो, कोई जात हो, कोई अकांदा हो उसके बुनियादी हकों से इसका कोई वास्ता नहीं है । हम सब एक मुल्क के, बराबर के शहरी हैं।' " पाकिस्तान में हर पांच बच्चों में से एक भुखमरी का शिकार हो जाता है। मैं कहीं पढ़ रही थी कि १६४६-५० में पाकिस्तान के आम आदमी को २०१० कोलोरी नसीब होती थी, अब कम होकर ये १९७० हो गई हैं। पाकिस्तान टाइम्प की एक खबर के मुताबिक, जेहलम में किसीने अपने बेटे को बाईस रुपये में बेच डाला ताकि उसके मां-बाप चार रोज पेट भरकर खाना खा सके। पश्चिमी पाकिस्तान में ६००० किसान, तेंतीस लाख खेतिहर कुनबों से ज्यादा जमीन दावे बैठे हैं। "पाकिस्तान में प्रेस की कोई आजादी नहीं। पाकिस्तान टाइम्ज, इमरोल, लेलो-निहार जैसे अखबारों को सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया है । जनरल अयूब कहता है-गरम मौसम वाले देशों में जम्हूरियत ८६/ मन परदेसी नहीं पनपती । जम्हरियन कग टटे मुरगों में ही रिन्दा रह गाती है । पाकिस्तान में मिनी यनीर का जय माग में अगरहनापी सरफ ध्यान दिलाया गया तो उनने जवाब दिया-आगिर हमारे पगंवर भी तो धन- "पाकिस्तान में पूर्ण वगाल के गाय एक कालोनी जंगा गनूग पिया जाता है, पाहे वो लोग पश्चिमी पारिम्नान में गिननी में कही ज्यादा है। उनरी जवान को दवाया जा रहा है। हर गाल पश्चिमी पानिम्तान वाले पूर्वी पाकिस्तान के करोडो सायं हटा कर जाते हैं । १६४८ मे १९५१ तर दंग की तरक्की पर जितनी रकम गयं दी गई, उगका यम २२.१ फीसदी हिम्मा पूर्वी पारिम्नान के लिए ग्गा गया । यह सूट-गमूट वा लोग कब तक महेंगे ? विमी दिन नाव इव जाएगी । गामी कभी भी पजाबियों की अशारादारी क्यूल नहीं करेंगे। " और अब मुना है, उन्हनि अमगेरा में दोग्नी गाठ सी है। दोन्सी क्या गाठी है, अपने-आपको अमरीकनों के हाय वेच ला है। गुराक की मदद के लिए, और हथियारों को जरूरत पूरी करने के लिए अपने देश की गिरवी रख दिया है । १९५० में नियारन यली या अमगेरा दौरे पर गए। १९५१-५२ में अमरीकी डालर पारिम्नान में पानी पी नरह बहने समें । इनके माय मलाहार भी आए और माथि भी। ममरीरावी विदेगी पालिगी, पापिम्नान की विदेगी पानिमी बन गई। थान समर पापिलानी राजनीति पर पूरी तरह मे हावी है । अमगेरा में दोस्तीरा मननर है --अमरीका के दोनों के माय दोम्नी, अमरीका की दमिनी विवन्नाम, कोरिया, पारसना, पश्चिमी एगिया पी पामिमी पाप पारिम्नान की महमति। अंने कोई नमवीर बोल रही हो, नहर मन-मा बैंगन मजीद पो मुन रहा पा । उसो चेहरे में जमानत टा रही थी। वेगम मुनीर की एस-एर बात उमरे दिल मोती प्रतीत होती थी। महरा माग बंगामडीय गरिमी यात को मानने गिर पार नहीं था, मेरिन रिमी दह यह मद युछ मुनद्रा जा रहा पानी दमा रो माजी न चाह रहा हो।रिदनी बारी वरमा दीरिना . " मन पानी/ । - अपनापन ! गशव का हुस्न होगा इरा औरत में, जब वह जवान रही होगी। महमूद कहना चाहता था, अगर कांग्रेस फिरकापरस्त नहीं है तो हर चुनाव में मुसलमानों के इलाकों में से मुसलमान उम्मीदवार ही क्यों खड़े किए जाते हैं ? चाहे चुनाव नामेटी के हों, चाहे एसेम्बली को, चाहे पालिया- मेंट के । मौलाना आजाद तक को हरियाणा की मुस्लिम वोटों से जिताया जाता है । लेयिान महमूद को जैसे होंठ न खुल रहे हों। वह अवावाशा बेगम मुजीच के चेहरे की ओर देखता जा रहा था, जैसे कोई दोषी किसी वाटहरे में खड़ा किया गया हो। "मैं यह मानती हूं कि इधर हम हिन्दुस्तानी भी कोई फ़रिश्ते नहीं हैं।" बेगम मुजीव महमूद की मजबूरी को भांप कर बात आगे चला रही थी, " हम शिवाजी को हमेशा एक हिन्दू सूरमा के तौर पर पेश करते रहे हैं--जो सारी उम्र मुगलों से लड़ता रहा। और यह बात हम भूल जाते हैं कि उराके वारूदखाने का दरोगा मुरालमान था । महाराजा रणजीतसिंह मुलतान के मुसलमान बैरी के खिलाफ लड़ने के लिए अपनी फीज मा मुसलमान जरनैल भेजा था। महाराजा रणजीतसिंह का विदेशी मामलों का वषीर मुसलमान था। कई मुसलमान बादशाहों ने हिन्दुओं के मंदिर बनवाए। दिल्ली के हुक्मरान मुहम्मदशाह ने बौद्ध गया के मंदिर के नाम जागीर लगवाई। देश में सबसे बड़ी पामींदारी दरभंगा, एक ब्राह्मण को उसकी लियाकत के लिए अकबर ने वशी थी। कश्मीर का बादशाह जैनुल आबदीन हमेशा अमरनाथ की यात्रा पर जाता था। हैदराबाद में अभी कल तक एक दरगाह का मुतवल्ली एक ब्राह्मण था। और हैदराबाद का निजाम उस दरगाह पर हाजिर हुआ करता था। " पंजाब में, विहार में, बंगाल में हिन्दुओं और मुसलमानों का रहन- सहन एक-सा है। एका-जैसे वे कपड़े पहनते हैं। एक जैसे लोक-गीत, जैसी लोककथाएं वे सुनते-सुनाते हैं । । मैं यह भी मानती हूं कि इधर हिन्दुस्तान में क्या और उधर पाकिस्तान में क्या, कई बार हिन्दू-मुसलमान दंगे इसलिए भी कराए जाते हैं ताकि लोगों का ध्यान सरकार की अपनी कामजोरियों से हटाया जा सके। पाही कीमतें बढ़ रही हैं और कहीं वेकारी लोगों को सता रही है । फाहों - - ८८/मन परदेसी " अमीर और गरीव में पाई बढ़ती चली जा रही है। साम ढलने लगी थी। हला-हल्या अधेरा होने लगा था। बैंगन मुजीय हाय बढाकर बत्ती जलाने सगी थी कि महमूद उठ या हुआ। जने सकार में लिपटी हुई धुनीन की गोलिया कोई रिमीको मिला रहा हो, कुछ ऐमा महमूद को महनूम हो रहा था।माज को गगक पाकी हो पुरी पी। इसमे रयादा यह शायद पचा न सके । यंगम मुजीव तो अपने प्यारे अदाज में बोलती चली आ रही थी। उनको कोठी में एक कदम याहर निकलते ही, जमे कोई जानवर बरसात में अपने कार पड़ी यूदी को पटक देना था, महमूद ने अपने गिर को दायें चायें हिलाकर बैंगम मुजीय मी मारी नगीहन को भुला दिया। 'इनको अभी हाथ नहीं लगे हैं।' महमूद दिस-ही-दिल में यह रहा या । 'हाथ लगे भी है, लेकिन अभी ममा नहीं आई है। एक बेटी गवा बैठी है, जब दूमरी भी हाप मे निकल जाएगी तब येगम साहिया को अबल आएगी।' १८ जया के नाना नरुयी रोड पर रहते थे, शहर और यूनिवमिटी फे. बीचोबीच । शहर में कपy लगातार चल रहा था। ननाव वैगे-का-यमा यना हुआ पा । रात के अधेरे में उसी प्रकार गोलिया ममती पो । उनी प्रकार आते-जाने किमी वेचारे गरीव को रेबाजी का गिरार बनाया जा रहा था । वंगी को-सी अनानक नारेबाजी होने लगती : 'अल्लाह हू अकबर' और 'हर-हर महादेव'! जगह-जगह हिन्दुओ यो उत्तेजित करने पाने इम्तिहार हिन्दी में लगे थे। मुसलमानों को भगाने वारे तिहार उर्दू में लगे थे। मुसलमान महल्ली में दीवारों पर 'पानिम्नान दिसाया' लिया हुआ पा । पुलिग याले मिटाकर जाने, इधर उनसरी पीठ होती, उधर फिर कोई लिग जाता । जैसे पाप-मिचौनी गेली जा रही हो। टी । सांझ ढल रही थी. जब जेबा अपने ननिहाल पहुंची। वह देखकर हैरान रह गई, कोठी के एक ओर, घास के विशाल लॉन के ठीक बीच में बैडमिंटने चल रहा था। जवान-जहान लड़के-लड़कियों का खेल जारी था। उनके मां-बाप, बड़े-बूढ़े वैडमिंटन कोर्ट के आस-पास बैठे, खड़े हंस रहे थे, गप-शप कर रहे थे। इनमें उनके पड़ोसी राय साहब राम जवाया का कुटुम्ब भी था; सड़क पार कोठी वाले सरदार नसीवसिंह का बेटा और बहू भी थे। कुछ देर के बाद, जब रोशनी कम हुई तो बैडमिंटन कोर्ट के दोनों ओर लगे विजली के वल्व जग-मंग-जग-मग करने लगे। "हद हो गई, हमने तो सुना है कि आपके शहर में दंगे हो रहे हैं।" कुछ देर के बाद जेबा बोली। अभी तक वह घरवालों से मिल रही थी। अड़ोसी-पड़ोसियों से उसकी मुलाकात कराई जा रही थी। "फ़साद अपनी जगह है, बैडमिंटन अपनी जगह है ।" सरदार नसीव- सिंह की पंजाविन बहू बोली। "इन लोगों को तो और कोई काम ही नहीं।" ज़ेवा की मामी कह रही थी । हैदराबाद दक्कन की तिलंगन, उसके चेहरे पर क्षण-भर के लिए एक घृणा-सी झलकने लगी। "लाओ वीवी, पान खिलाओ। तुमने यह नई लत हमें लगा दी है।" पंजाविन कह रही थी। "तुमने भी तो हमें लस्सी पीना सिखाया है। मेरे मियां तो एक निवाला गले से नहीं उतारते, जब तक लस्सी मेज़ पर न हो।" इतने में राय साहव राम जवाया की बेटी स्वर्णा अपने भाई राजीव के साथ, खेल खत्म करके, कोर्ट से बाहर निकली। स्वर्णा जेबा से बग़लगीर हो गई। उनकी पुरानी जान-पहचान थी। राजीव को भी वह जानती थी, लेकिन कई बरसों से उनकी मुलाकात नहीं हुई थी। वह विलायत पढ़ने गया हुआ था। कितना सुन्दर जवान निकला था! डाक्टरी की डिग्री लेकर आया था। एफ० आर० सी० एस०; और मालूम नहीं क्या-क्या? जेवा ने अपनी दाई वाह उठाकर, सिर झुकाते हुए, अवधी अंदाज़ में उसे आदाब करने की कोशिश की, लेकिन राजीव ने आगे । । ६०/मन परदेसी वाकर उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। "क्यों माई, रिलीवारामी सनि में हमने 'रबाजी की थी, जिसमें अनी तुमने, हम नीन सरयों कोहगा या । आनरल तुम्हारेरी के उगोरे रा श्या हाल है।" डबा फो एकाएक चादनी रात का यह दम्प याद आ गया । गर्मियों के दिन । लोन की पाम पर बैठे हुए उनमें होट लग गई थी। एक और वह अवेनी थी और इमरी और वे तीन सहक थे । जया ने उनको मात दे दी।बई वर्ष बीत चुकेधे । नोरा । नोया बिनने र गाको जवानी पाद "आज भी हाजिर है।" जेबा ने हमने हुए कहा । उमरा हाय अभी ता राजीव के हाथ में था। एक जवान-जहान मर्द . हाप में।एर नजर उन्होंन एव-दूसरे की बायो में देगा, और उवा को मगा, जंगे उमरा, एक कुंवारी सहमी मा नाजुक हाय राजीव की मुट्ठी में पारे की तरह मचल रहा हो। "लेकिन अब तो मुना है. आपको हिन्दी भी साजमी नौर पर पढ़नी पडी है।" राजीव कर रहा था। "इम परगान होने की कोई बात नहीं है। हिन्दी में. अपनी कलाम में हमेगा मैं पहले नम्बर पर रहनी रही है।" "तीया! तोरा तब तो आप हमारे शाम को ही नहीं।" ", हिन्दी की लिपि देवनागरी, मेरी राप में दुनिया भर की सिपियों में सबसे परामा माइन्टिफिक है।" "माइन्टिफिर नहीं, शानिक।" स्वर्ग बीच में बोली। "यम, इमामे हमारी सहमति नहीं है।" इतने में जेबा की मामी ने एक पान म्व लिए, और एक पान राजीव के लिए तैयार करके उन्हें पंग दिया। पान मेंने मगा, मी नही राजीव ने उवा पा हाय छोड़ा। "आप पान नहीं गा रही" गजीव ने उवा में पूछा। " पाऊंगी। पहले आप सीजिए।" उंबा ने रहा। राजीय ने अपना पान वा की और बढ़ाया। देवा ने मट मागे या कर से लिया, नहीं तो पितापत से मोटा मापा. यह तो गारद पान मन परदेगी/१ को उसके मुंह में रखने जा रहा था। "मुझे वापस आए हुए आज सात दिन हो गए हैं। वक्त कैसा उड़ता जाता है।” कुर्सी पर बैठते हुए राजीव बता रहा था। "नहीं, छ: दिन ।" स्वर्णा ने उसे टोका। "हां-हां"छ: दिन ! जिस दिन मैं आया था, उसी रात तो फ़साद शुरू हुए थे। इतवार और सोमवार के बीच की रात । आज शनिवार है न । छ: दिन ठीक हैं।" "फ़साद इतवार और सोमवार के बीच की रात को शुरू हुए या सनीचर और इतवार के बीच की रात?" जेबा ने चौंककर पूछा। "इतवार और सोमवार की वीच की रात ।" स्वर्णा ने बताया। "विल्कुल ठीक ! क्या उससे पहले कोई हो-हल्ला नहीं था?" "नहीं तो," स्वर्णा ने जेवा की मामी की ओर देखा। "हां-हां, राजीव घर पहुंच चुका था। अभी हमने खाना खाया ही था कि पुलिस कप्तान का टेलीफ़ोन आया। कहने लगा-~~-अच्छा हुआ, आप लोग वक्त पर स्टेशन से लौट आए। शहर में दंगे शुरू हो गए हैं।" जेबा सुनकर सोच में डूब गई । उसे अच्छी तरह याद था कि इतवार की शाम, जब वह घर लौटी थी तो उसकी अम्मी ने अलीगढ़ के दंगों का ज़िक्र किया था। फिर उसने अलीगढ़ टेलीफ़ोन भी किया था। राजीव के भीतर के पैनी नज़र रखने वाले डाक्टर ने जेबा की ओर देखकर कहा, "मिस शेख, आप तो सोच में यों डूब गई हैं-जैसे फ़साद पहले शुरू होना चाहिए था, यह लेट क्यों शुरू हुआ है !" राजीव की बात सुनकर आस-पास सब हंसने लगे। "सचमुच "मामला कुछ इसी तरह का है।" जेबा सोचती हुई, रुक-रुककर बोल रही थी। "क्या मतलव?" स्वर्णा पूछने लगी। "मुझे अच्छी तरह याद है, पिछले इतवार जव मैं शाम को घर लौटी, अम्मीजान ने मुझे कहा था, अलीगढ़ में हिन्दू-मुस्लिम फ़साद हो गए हैं। और फिर मैंने अलीगढ़ टेलीफ़ोन किया था।" ६२/ मन परदेसी "मैं बताऊं, यह मनोविज्ञान हो सकता है," राजीय हंमना हा पहले सगा, "इनने दिनों में दंगा कर रहे, इतने वरमों में अड़ोमीगडोमियो के गले वाट रहे, इतने सालों से भाई-भाइयों को हरे धार रहे-योई बड़ी बात नहीं। फमाद शुरू होने में पहले हमे उनकी परघासा दियाई देने लगी, येगहारा मजनूम लोगों की घोग-गुगर हमारे कानों में पाने सगी हो.''पू कई यार होता है । अगर मुझपर जब कोई मुमीयत आने को होती है, कुछ देर पहले मेरा दिल विना कारण बैटने लगता है । मैं चिड़चिडामा महमूग करने लगता है।" "जंगे आज शाम तुम्हे सग रहा था," स्वर्मा ने अपने भाई को पड़ा। "पय?" "चाय पोते हुए तुम मुममें उलाने लगे थे।" "हो, मेरा मूह जरा गराय या," राजीव ने गोनते हुए कहा। "क्यों, आपको भी किमी मुमीयत की पराई दिय रही पी ?"उवा ने उममें मजाक किया। "आज की शाम तो कोई ऐमी मुगीवत नजर नहीं..." "मिवा जैवा की मुलाकात के," स्वर्णा ने राजीव की बात को माटते हुए कहा । और फिर यहा बैठे मब लोग हम पड़े। १९ या अलीगढ़ गई हुई थी और इधर महमूद हर रोड यंगम मुजीव पं यहा आने लगा। जिम दिन यह अपने-आप न आता, बेगम मुजीव उमे युतया सती । कभी नाश्ता, कभी दोपहर का पाना; कभी मामी पाय और कभी रात का पाना यह उवा की मम्मी के यहां हो पाता। भी दोपहर बाद आता और देर रात गए लोटना। कभी गुरह-गुरह माता और जय जाता तो मान चुकी होती। मन परदेगी/१३ - बेगम मुजीब उसे घर के छोटे-मोटे काम बताती रहती। वह काम, जो कोई नौकर भी कर सकता था, कालू सारी उम्र करता रहा था। बिजली का बिल, पानी का बिल जमा कराना; धोवी और दर्जी के यहां जाकर कपड़ों के लिए तकाजा करना । अखवार वाला इतना काइयां था; अंग्रेजी का अख़बार तो ठीक फेंक जाता; उर्दू का अखवार हर चौथे रोज़ कोई-का-कोई दे जाता । वेगम मुजीव को किसी साम्प्रदायिक पार्टी के अखवार को घर में देखना जहर-सा लगता था। वह झट अखवार लौटा देती। अखवार वाला फिर वही ग़लती कर जाता। महमूद आता और वेगम मुजीब की छोटी-मोटी फ़रमाइशें पूरी करता रहता। बेगम मुजीव और-की-और होती जा रही थी। क्योंकि महमूद आ रहा होता, वह घर को उजला-उजला, साफ़-साफ़ रखती। गोल कमरे के गुलदानों के फूल वाक़ायदा बदलते रहते। वेगम मुजीब आप फूलों को सजाती। कभी किसी तरह, कभी किसी तरह । एक दिन महमूद ने बातों- ही-बातों में कहा था कि उसे अगरवत्ती की महक अच्छी नहीं लगती है, जैसे कोई हिन्दू शिवालय हो । और उस दिन के बाद से वेगम मुजीब के घर कभी अगरबत्ती नहीं जलाई गई। सारी उम्र वह अपने घर को अगरबत्तियों से महकाती रही थी। उसे इनकी ख शबू अच्छी लगती थी। अव जैसे इस सुगंध को उसने भुला दिया हो। बाहर लॉन में घास बाकायदा कटी होती।हर चौथे रोज़ मशीन फिरती । पहले माली एक वक्त आता था, आजकल दोनों वक्त आने लगा था। पानी का छिड़काव करने वाला कोठी के गेट से, पोर्च तक पानी का छिड़काव करता रहता। क्या मजाल जो धूल उड़ने पाए। बेगम मुजीब को अपना-आप कुछ जुदा-जुदा-सा लगता । सुवह सोकर उठती और बिस्तर में वैसे-का-वैसा पड़े रहना उसे अच्छा-अच्छा लगता। विस्तर में ही वह चाय मंगवा लेती। पहले कभी उसने ऐसा नहीं किया था। तड़के ही उठ जाया करती थी। सुबह की चाय अपने-आप वनाती थी। आजकल नहाने के लिए जाती तो कितनी-कितनी देर तक गुसलखाने में घुसी रहती। कई बरसों के बाद, कपड़े बदलने से पहले उसने सोचना शुरू कर दिया था। कभी किसी ब्लाउज़ को ढीला किया जाने लगा, कभी ६४/मन परदेसी किमी पुरते को तग किया जाने लगा । नहाहर निकलती, तो वाल गवार- कर उन्हें गुना छोड़ देनी। मारा दिन उसो वाल मागे-पीछे सम-नाम करते रहते । कभी उसके चेहरे पर आ गिरने, कभी छाती पर पहले वह रेडियो बम गवरें गुनने के लिए गोलती थी, बाजकल गवरो के बार अंगे यह रेटियो यद करना भूल जाती। अमर-बाहर, पाम करते हुए, आने-जाने, बाने में एक ओर पड़ा रेडियो धीरे-धीरे चलता रहला । फिल्मी गीत- 'तू कौन-गी बदली में मेरे चार है, आ जा', 'इक बगला धने म्यारा'. “चुप-चुप यो हो जहर कोई बात है, कभी-कभी अकेले मे वेगम मुजीब अपने मन को टटोलने सगती। उने यह क्या हो रहा था? कल इतना जोर में यह हमी थी। परगो बायचों पर उगे इतना गुरगा आया था। आजकल देर-रान गए तक उमें नीद नहीं आती थी। आपसे-आप, पिड़की बाहर, भागमान मे तारी भी निहारती रहती। दिन भर में मुने फिल्मी गीत, उनकी धुनें, उसके कानों में गूजती रहती। पिछली जुमेरात को वह अपने मोहर के मजार पर या जलाना भूल गई थी। उगरो पिछली बार भी उगने दीया नहीं जलाया था। यह मोचकर देगम मुजीय मिर में लेकर पाय तक पाप गई। यह पमोना. पसीना हो गई। पसीने की धार उसके बदन पर पीटियो की नरह घन रही थी। उसकी नाक, उगये कान सास हो गए थे। अकेसी, अपने समरे में बंटी, उगको आयों में छल-छल आमू बहने लगे, जगे बाढ़ आ गई हो। बेगम मुजीव ने देवा, मामन सहक पर गेट पुना और रहा था। यह लपककर गुमलयाने में गई। भगने सण, मद-मद मगररा रही बैंगम मुजीव, अपने मेहमान का स्वागत कर रही थी। उम दिन अग्रमार में पढ़ी रिमी रिपोर्ट के मुछ अग वह महमूद यो मुनाने लगी "भारत सरकार ने रोजगार पी पुद एपंती पो गर गे माम मोनी के लिए कई योजनाए बनाई है। एक योजना कार्यगर्ग और करनीरी जानकारी रयने वाली के लिए है । उन्हें अपने पेगेगी फिर में मिग्रमाई कराई जाती है। नई-नई गोजों, नये-नये तगरी में उनकी जानगरी महमः आ : मन परदमी/१५ करवाई जाती है। जिन्हें ज़रूरत हो, उन्हें डिप्लोमा और डिग्री के लिए तैयार किया जाता है । इस योजना के लिए बेशुमार अर्जियां आई। इनमें से कई उम्मीदवारों को अपना धंधा शुरू करने के लिए दो-दो लाख तक रुपया भी कर्ज दिया गया ताकि वह कोई घरेलू दस्तकारी शुरू कर सकें। लेकिन किसी भी मुसलमान ने इस योजना के लिए अर्जी नहीं भेजी। बस, एक अर्जी कर्ज के लिए आई थी, जिसे मंजूर कर लिया गया। क्या इसका यह मतलब लगाया जाए कि मुसलमानों में बेरोजगारी नहीं है ?" महमूद ने सुना और जहर-आलूद हंसी हंसने लगा। "अम्मीजान ! आप बड़ी भोली हैं । यह सब सरकारी ख़बरें होती हैं।" "यह ख़बर सरकारी नहीं है," वेगम मुजीव ने अख़बार उसकी ओर फेंकते हुए कहा। "किसी सरकारी पिठू की होगी।" महमूद ने अखबार को विना देखे ही कहा। "यह तो किसी सेमिनार के पेपर का कोई टुकड़ा हो।" बेगम मुजीव कह रही थी। "किसी सुसरे हिन्दू की खोज होगी।" महमूद ने नाक-भौं चढ़ाकर कहा। "लिखने वाला भी मुसलमान है।" बेगम मुजीव ने बढ़कर अख़बार महमूद के घुटनों से उठाया और पढ़ने के लिए उसकी आंखों के सामने ला रखा। - महमूद ने अलवार की ओर देखा तक नहीं। "आपको मालूम नहीं, हिन्दू किस तरह हमारी हस्ती को मिटाने पर तुले हैं।" महमूद वैसे-का-वैसा जहर उगल रहा था, "एक तरह से वे सच्चे भी हैं, हमने पाकिस्तान बना लिया है, अव हमारी जगह पाकिस्तान में है।" "लेकिन क्या पाकिस्तानी भी यह मानते हैं ? वह तो हिन्दुस्तानी मुसलमानों को एक नज़र देखना नहीं चाहते। उन्होंने तो अपने मुल्क में घुसने पर पाबंदी लगा दी है," वेगम मुजीव जैसे ताना दे रही थी। "वेशक वे सच्चे हैं। इधर से गए लोग जमीन से जमीन काटने- ६६ / मन परदेसी वाटने में लिए कहते हैं। रोजगार मे रोजगार का बंटवारा पाहते हैं। कोन गहना है कि उगयी जायदाद का कोई और हिम्मेदार बन यंठे?" "नो फिर तुम भारतीय मुमनमान किग मह पर कूदने फिरते हो?" "पही तो हमारी मुमीयत है । हमने पारिस्तान यनवाया है। हमने कुरवानिया दो हैं । पाकिस्तान बनने के बाद पनावियों ने उगे ममाल लिया।" "आशादी में पहले पजाब में मुस्लिम लीग पो गरकार तक नहीं पी।" "हम एक जग और लडनी होगी।" "धर पा उधर?" "धर भो और उधर भी." महमूद ने कहा और उटार गुमनवाने थी और चला गया। वंगम मुजीच यो इग सडपे पो कुछ ममा नहीं आ रही थी। वह हैरान हो रही थी, महमूद यी कुछ यातें, जिनमें उगे भी नफरत होती थी, आजकल उमे इतनी युरी नहीं लगनी थी। उन्हें यह मुनगे मग गई थी। नहीं तो कोई दिन पं, जब इस तरह की कोई वान करता मी वर भरी महफिल में उटपही होती। उसका जी पाहता, कानों में उगनिया दे में। अरने दंग के गिलाफ मुह मे मे बोल निकालने थाने में पापड दे मारे। महमूद के लिए फाँको बनाते हुए, आज फिर उसने आधा दूध और आधी काँको पाले में पोली पी। यह तो काली कॉफी पीना पाया फिर नाम मात्र का दूध। “जवान-जहान सड़को यो दूध पीना पाहिए। तुम्हें सो अभी बई महाया लड़नी है" मुमकराते हुए वेगम मुजीब ने कॉपी माप्पाला महमूद मो पेग रिया। पल उगने फैमला रिया पा कि अब अगर महमूद बेयात उगमे मिलने के लिए आया तो वह गाने पे लिए उगे नही रोरेगी। न दिन के पाने पे लिए. न रात से पाने लिए। न मानून, नॉरर परा गोरो होंगे आदी के मामने, उगरी परसाई गुयर उग पा रही पी-पह सासरा बडा मजूरे-नजर होता जा रहा है, !" और फिर उमरा रस पीमा पपने नना । आगे-पोदिमाग उरूर या बनाते होंगे। मेरिन जब मरमर मन परगी/१७ । लगा, बेगम मुजीव ने फिर उसे रोक लिया। फिर उसने आवाज़ देकर खानसामा को बताया, "महमूद मियां खाना खाएंगे।" और फिर वे बातें करने लगे। बातों-बातों में बेगम मुजीव ने जलाल-उद्दीन रूमी की मसनवी में से एक शे'र गुनगुनाया : 'मन जि कुरआन मग़ज़ रा वर दुश्तम उसतुखां पेशे-समां अन्दाखतम' महमूद को फ़ारसी नहीं आती थी। वेगम मुजीव ने इस शे'र का अनुवाद करके उसे बताया : 'मैंने कुर-आन से उसका मग़ज़ निकाल लिया है और वाकी हड्डियां कुत्तों के सामने फैंक दी हैं।' " "क्या मतलब?" महमूद पूछने लगा। "ज़रूरत यह है," बेगम मुजीव ने समझाया, “इस्लाम की असलियत को पहचाना जाए; कोरे दिखावे से कोई फायदा नहीं।" - २० । . घुप अंधेरी रात । ग़ज़ब की सर्दी । बाहर वला का तूफ़ान जैसे उखाड़-उखाड़ फेंक रहा था । नदिया-नाले, ताल और तलैयों पर कुहरा जमा था । ऐसी ठंड जैसे बिच्छुओं के डंक । अंगीठी में सुलग रहे कोयले राख से ढक गए थे, वुझ चुके थे। सोने के कमरे में अव उनकी लौ तक दिखाई नहीं देती। चारों ओर अंधेरा । घटाटोप अंधेरा। वेगम मुजीब की मुसीवत थी कि वह कभी मुंह ढककर नहीं सो सकती थी। सर्दी हो चाहे गर्मी । यह उसने कभी सोचा भी नहीं था कि कोई रात उसे शिमला में भी काटनी पड़ेगी। शिमला की बर्फानी ठंड । इधर अंगीठी में आखिरी कोयला ठंडा हुआ, उधर जेबा ने करवटें बदलना शुरू कर दिया । कभी दाई ओर, कभी बाई। लड़की जैसे बेचैन हो रही हो । उसके पलंग की चर्रमर्र लगातार सुनाई दे रही थी। किराये . १८/मन परदेसी पर लिए मिमना के ये पनंग । किराये का पनट। देगम मुजीच फरवट बदलकर देने सगी । उमेपू समता है जो जंबा आंग फार-फाड़कर उनकी और देश रही हो।न ममय ! आधी गन का प्रदर। बेगम मुनीर की पन मंद गई। की गोरोंगी नरह सेवा उमरे पनग गी और पूर रही योगे? मागिर परों ? बैंग आज की रान ? दुध पादा पी, मेरिन जवान- जहान नारीमो ठड को क्या परवाह ? उमरी उम्र की मारियों को सो यर्फ फी मिन्नी पर नीर यासर दोन मती है । वेगम मुजीव ने उमो लिए गद्दे भी एक को जगह दो pिom । उमसी राई भी भारी पी। कार इटली का कम्पन भी जोडा पारसायद उने गर्मी महमूग हो रही होगी। कम्बल और रजाई मिलकर यही सहरी लिए भारी नो नही हो गए थे? मेरिन यह पोर बायो ने मा के. पलगी और पूर-पूरकर क्यों देगी पी; जमे अम्मी विमोके माप भागकर जा रही हो !ीन बच्चो बीमा, अम्मी कहा भागकर जाएगी ! दी येटिया और एक बेटा बगर उमपा परवाना नहीं रहा था। इस उम्र में यह पहा आएगी? और फिर वेगम मुनीर को याद आने सगा, उसका गोहर जब अल्लाह को प्याग मापा, हर कोई यम यही महता या-हर मी मौत है। पुगिया पीबी के माय जुल्म हुआ है । अभी उमने देगा ही या है । बीपी यचे जननी रही, मदं फिरगी को जेन भोगता रहा । अब यही परत आया पामि गुग में चार दिन पार्ट। यह यरत होता है जब निश और बीवी एक-दूसरे को पहनानने मगने हैं। एक-दूसरे के गाय मी पाने मगले ये मारी बातें, जो लोग बेगम मुजीय की देवरा पहले थे, टोपी, गिन यह आतिरी चान मे उमरे कलेज में पुभार रा गई हो। उम पहन, जब उसके मदं ने उमरे भीतर पी औरतको पट्पानना पा, अन्लाह ने उगे टोन निया यासमी-कभी येगम मुजीन की माता जी उसके गाय धोया हुआ हो। सिमन ने दगा रिया पाएका फरेय । उमा मार लिया गया था। उनहाय में में जंग रिमाने जानतीन सीहो। मन परमो / ? अब जिंदगी जैसे एक बीहड़ हो । एक रेगिस्तान । जाड़े की बर्फीली हवा कंपकंपी पैदा कर रही थी। पलकें मूंदे हुए, सोच में डूवी वेगम मुजीव को लगा, जैसे सामने पलंग पर कोई उठकर बैठ गया हो। और उसने हौले-हौले पलकें खोलीं-आधी बंद, माधी खुली । और उसकी ऊपर सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गई हो । जेबा ने रजाई को आहिस्ता से उतारकर एक ओर कर दिया था। चोरों की तरह एक नज़र अम्मी के पलंग को टिकाए हुए, वह विस्तर में से निकल आई थी। एक टांग धीरे से पलंग से बाहर, और एक पांव चप्पल में । फिर दूसरी टांग धीरे से पलंग से बाहर और दूसरा पांव चप्पल में । नज़रें वैसी-की-वैसी अम्मी की मुंदी हुई पलकों पर टिकाए हुए। अगले क्षण अपने महकते हुए वालों को समेटकर गांठ लगाई और रेशमी 'नाइटी' में अधनंगी, अधढकी वह वाहर निकल गई। इस समय कहां जा रही थी ? शायद गुसलखाने में गई होगी। लेकिन अपने-आपको अच्छी तरह ढक तो लेती। शायद जल्दी में होगी। जवान-जहान लड़कियों को कहां ठंड लगती है ! लेकिन बाहर जाने से पहले, विस्तर छोड़ने से पहले, यूं एकटक अम्मी के पलंग की ओर क्यों देख रही थी? जैसे कोई चोर सेंध लगाने से पहले इधर-उधर देखता है। गुसलखाने का दरवाजा खुला था। वाथरूम गई थी। पेट खराव होगा। यही तो पहाड़ी शहरों में खराबी है। चाहे शिमला ही क्यों न हो। यहां का पानी किसीको मुआफ़िक़ नहीं आता । मालिक मकान सोने के कमरे के साथ गुसलखाना नहीं बनवा सकता। ढेर सारा किराया। कमरे से निकलो, आंगन पार करो, फिर कहीं जाकर सामने वरामदे में गुसल- खाना था । शिमला की ठंड में, अगर किसी रात किसीको वाथरूम जाना हो तोसमझो, निमोनिया हुआ कि हुआ। अव लड़की कैसे निकल गई थी। झिलमिल करती हुई नाइटी में । ठंड नहीं लगेगी तो क्या होगा' लेकिन लड़की ने इतनी देर क्यों कर दी थी? गुसलखाने में ही जाकर बैठ गई थी। बाहर ठंड कितनी थी! . - १००/मन परदेसी बेगम मुजीय कुछ देर और इन्तजार करती रही। फिर अचाला पह चौर उटी । गुमलवाने का दूमरा दरवाजा-माप के प्लेट में गलना पा। उग पतंट में एक पंचाग ना रहता था। जगान-जहान । एम. ए० माइनिहान देकर गिमला मैर ने लिए आया या विमा उमदार को पटगनी यद रहती है। लेकिन मटगनी गुन भी तो मकनी पीही महोपड़ी में मरी'। और येगम मुजीय आनी बाई पो पर फेर, गो-नी-मी नगे पाव बाहर आगन में जा पहुगी । मनमुन गामने पगमई में गुमलगाने का दरवाजा गुला पा। अगर दरवाना गला या तो देश गमनमाने में नहीं हो गाली थी। फिर जया कहा थी ? बेगम मुजीर अपने कमरे में नौटकर आई। जेया या पलग गाली पा।यटक पाली थी। आगन गालो पा । गुगन. गाना ग्राली था। जेया रहा इय गई थी। और फिर बैंगम मुजीव को लगा, जंगे गाय फ्लंट में गुमर-मगर हो रही हो । आगन में गड़ी यरवम यह पुनार उठी-बा. उवा... एक बार, दो बार, नीन यार। गिमला फोटो गत अधेरे में, एर. अकेली भौरा पमीना-पीना हो रही थी और फिर उगने देगा, मामने गुगतापाने में में जया एफ भीगी बिल्ली की तरह आग पुगाए, सगाई सजाई-गी आ रही थी; जमे पानी-गानी हो रही हो। घोर मेंघ पगारे हुए पारा गया पा। आधी रान का समय था। येगम मुगीय ने अपनी बेटी मे पुछ नहीं कहा । गुमलगाने की पटगनी सगाकर, अपने पतग पर आँधी ना दी। जंगे कोई अधे कुए में उतरता जा रहा हो। यह ट्रती जा रही थी, नीर मोरनी। बाहर धूप निकल आई पी, जब उसकी आग गुली। उसने बापट मी और मया देखती है कि पहोगी नौजवान मानावर उगर मामने गा मा। उगरे हाय में एक निफाका पा, जिनमें चगएर पति की एक गिट्टी थी . 'मैं जेया में प्यार करता है। आर मुगे अपना दामार पना गाते है ?' बेगम मुजीर ने चिट्ठी पो निधारे में सना और उसे अपने मन परदेगी।

। तकिये के नीचे रख दिया। कितनी देर वह वैसी-की-वैसी लेटी रही। जेवा रसोईघर में व्यस्त थी। वेगम मुजीव की समझ में कुछ नहीं आ रहा था । उसका सारा गुस्सा न जाने कहां काफूर हो गया था । उसका अंग-अंग जैसे एक स्वाद- स्वाद में विभोर हो रहा था। और फिर वेगम मुजीव पलंग से उठकर गुसलखाने में जा घुसी। कितनी ही देर गीज़र से गर्म किए हुए पानी में नहाती रही । हल्की-फुल्की होकर वह बाहर निकली और सजने लगी। जेवा नाश्ता करके सर को निकल गई थी। किस मुंह से अपनी अम्मी के सामने आती? पगली लड़की। आज उसका शृंगार ही जैसे खत्म होने को न आ रहा हो । चूड़ीदार पाजामा । खुला कुरता, और ऊपर शॉल । जैसे कोई पहाड़िन हो । वेगम मुजीव साथ के फ्लैट में जा पहुंची। यह तो महमूद था। पलंग पर पड़ा था। बुखार में उसका वदन भट्ठी की तरह तप रहा था । वेगम मुजीव ने उसे देखा और उसके मुंह, माथे, गालों, गर्दन, गिरेबान, कंधों, छाती. को प्यार करने लगी। दीवानों की तरह वह उसे प्यार किए जा रही थी। उसके पलंग पर बैठी । उसके साथ लेटी, उसे अपने वाहुपाश में लिए, चूम-चूमक र उसने उसे फूल की तरह महका लिया था। मंद-मंद मुसकरा रहा। शान्त, निश्चल, खुशियां विखेरता हुआ। "अम्मी ! अम्मी ! ! आज आप सोई ही रहेंगी?' जेवा उसके कमरे में खड़ी उसे जगा रही थी। कितना अजीब सपना था ! कितना भयानक ! वेगम मुजीव पसीना-पसीना हो रही थी। और फिर ज़ेवा उसके साथ पलंग पर बैठ गई। फटी-फटी आंखों से वेगम मुजीव ज़ेवा की ओर देख रही थी। कभी उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर दवाती। कभी उसकी वांहों को टटोलकर देखती । कभी उसके गालों को छूती। कभी उसके वालों को सहलाती! "अम्मी ! आप शायद कोई सपना देख रही थीं?" जेवा ने मां को लाड़ १०२/ मन परदेसी में अग्ने याह-मान में ले लिया विमा माना पा.बेगम मुनीर उमर बारमोचनी और मिर में पाव नापार-बार जानी। २१ । यंगम मुजीव रितनी ही देर तक सम्ध-मी पग पर पी रही। पनि मे जमे नहा गई हो। "आपको मया हो रहा है।" जया बार-बार अम्मी मे पूछ रही थी। उनके मुह पर विगरे हुए बालों को हटारर पाये कर रहीपी। "नाना पा।" वैगम मुजीब ने आशिरमहा और एक पोरी-गो हमी उमर चहरे पर गेलने लगी। "मपना पा।" और फिर गिर से पार तक एक परंपी-मी उमके गरीर से दौड़ गई। "मैं आपको चाप का प्याला सागर देती हू।" और उगा रमाई में चली गई। बेगम मुजीय मौन रहो पो कि यह कंमा मपना पा' गिमता गए हुए उन कई यपं हो चुके थे । तच जेवा पंा भी नहीं हुई थी। फिर महमूद पहा में आ गया? उगे तो पहनी यार उमने चन्द मास पहले ही देया 1 अजोय गहमदा थी। देगम मुजीव मोच नही पो कि मापद पिनी माम जब यह सेवामी सेने में लिए रेलवे स्टेगन पर गई थी. मरमूर उमर माय पा । और जेवा को उसे देगकर जंगे भौहें पड़ गई हो। मोये मुह उसने उममे बात नहीं पी पी। माटी सेट पी और परारर मान्बेटी भाने-अपने पमरे में सो गई पी। उन्हें इस बारे में यान करने का अवसर नही मिला पा। नहीं तो बैंगम मुजीव संवा मी पर पटगारती । यह भी पोई बात हुई ? पुछ भी हो, मिमी तमोर मो नहीं होनी चाहिए। पार का प्याला या फेहाय मे मार, बेगम मुत्रीय ने एक पट मरा मोर रेटी को याह में परमर भरते पान ठिानित। मन परदेमी/१०३ "वेटी ! कल रात रेलवे स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी, मेरे साथ प्लेट- फार्म पर महमूद को देखकर तेरे माथे पर जैसे बल पड़ गए हों?" "हां।" ज़ेवा ने रूखेपन से कहा । "तुझसे मिलने के लिए वह आगे बढ़ा और तुम मेरे गले लग गई। वह इंतजार करता रहा, करता रहा । और फिर तुम कुली को सामान के बारे में बताने लगीं। तुमने उसकी आंख के साथ आंख नहीं मिलाई।" "ठीक है।" "मोटर में उसने पूछा-अलीगढ़ में तुमने इतने दिन लगा दिए? तुमने इसका कोई जवाब नहीं दिया।" "हां।" "फिर जब वह जाने लगा, तुमने उसका शुक्रिया तक नहीं किया। वैचारा अपनी गाड़ी में तुम्हें स्टेशन से लाया था।" "हां।" "क्या यह वदतमीज़ी नहीं?" "अम्मी ! आप वस मुझे इतना बता दें-- अलीगढ़ के फ़सादों के बारे में सबसे पहले खबर आपको किसने दी थी ?" "महमूद ने । पर इस वेहूदगी का उससे क्या ताल्लुक ?" "इतवार का दिन था न?" "हां ! तुमने ही तो कहा था कि आज इतवार है, ट्रंककाल के रेट आए होंगे।" इतने में वाहर गैलरी में टेलीफ़ोन बजने लगा और जेवा टेलीफ़ोन सुनने के लिए चली गई। मां ने सोचा कि टेलीफ़ोन शायद उसकी किसी सहेली का होगा। कितनी ही देर तक वह टेलीफ़ोन पर इधर-उधर की वातें करती रही । जवान-जहान लड़कियों की बातें। वात में से बात निकलती आ रही थी। वेगम मुजीव उठकर गुसलखाने गई । गुसलखाने से होकर भी आ गई । जेबा अभी तक टेलीफ़ोन से चिपटी हुई थी। र फिर वेगम मुजीव घर के कामकाज में लग गई। अलीगढ़ से तों को खोल-खोलकर देखने लगी। वात आई-गई हो गई। लीगढ़ से था। राजीव का । जव तक टेलीफ़ोन एक्सचेंज १०४/ मन परदेसी वालों ने उनकी कॉन टी नहीं, दे दा कन्ने रहे। टेलीग्रीन नुनपर जब दह हही, न तो अन्नी ने उसने पूग गिनीज़ोन रिना या. और नही वेदाने नां को यह दवाने की जरुरत नहम रो। 'अलीगड़ मनाना नाता है तुन्हारे जाने के वाद !': राजीव के दोर बार-बार टमके कानों में गूरने मगढे। नेकिन नबने इतरी सदर जो ना अपनी मां को बनाना चाहती यो, सका भी नर ने बबनर नहीं निना था। राजीन, लंदन में पड़ रहे उंदा के माई शाहिद को जानता था। आत में मिलते-जुलते रहते थे। राव का इसान या रिउन्ने विनी हिरनिन में शादी करवा नी पी। पर शादी नहीं भी करवाई पो नो मी वै नियां-बीवी की तरह रह रहे थे। हर जगह इनछे देने राते थे। रानीव तो एक बार उनके मार्टमेंट में भी गया था। फिरमिन नही जाहिद को लंड नही की देवी दी। राजीव को ऐना नना. ने शाहिद काकना पर हो । इन तरह देदवल्ली में वह रह रहा था। इसका हिन्दुस्तान मांटने का कोई इरादा दिखाई नहीं देता पा, लौर न ही पाकिस्तान जाने का। पारिजान का नो दह नाम तक लेने को नगर नहीं था। पारिस्तान के दिशा व मी कोई तो होती चाहे पारितानियों को नरक में हो पा हिन्दुलानियों की तरफ से यह हाँगा उनमें आने-आने रहता था। दोरहर के गाने ने निटकर, उद उदा ने अन्नी ने दात की तो देगन नुजीब के मोते नूत पर हों। “उनके यन्ना मारी उनतिरको ने नहते रहे और बेटा फिरंगी ने रिश्ता माग्ने को चिन्ता है !" आखिर देगन मुजीद मुह मे निकला। "दन परेशान होने की का दान है। भारत ने भी अजना जाजादी की डग लड़ी। अब देग बाबाद होने के बाद फिरपी ने ना जोड़ लिया है। कामनन्य रा मैन्दर दन पया है।" वा मान्ने ने गुनारा रही थी। "मुझे यह वेकार को पार्ने पनद नहीं । वेपम मुबीच का उन दोन रहा था। मन परदेनी १०१ । "अम्मी ! इसमें खफ़ा होने की क्या बात है ? मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा है कि हमारे घर मेम भाभी आएगी। ।" "गिट-मिट-गिट-मिट अंग्रेजी बोला करेगी।" वेगम मुजीव ने चिढ़- कर कहा। "नहीं, राजीव कह रहा था कि भैया उसे उर्दू सिखा रहा है।" "यह राजीव कौन है ?" अम्मी ने हैरान होकर जेबा से पूछा । जब से लौटी थी, जेवा कई बार उसका जिक्र कर चुकी थी। जब भी उसका नाम इसके मुंह से निकलता, जेबा के होंठों में जैसे शहद घुल-घुल जाता हो। 'यह राजीव कौन है?' 'यह राजीव कौन है ?? 'यह राजीव कौन है ???' अम्मी के ये शब्द जेवा के कानों में गुम्बद की आवाज़ की तरह गूंज रहे थे। "अम्मी ! आपके मायके-घर के पड़ोसी राय साहब राम जवाया का वेटा।" "वह राजू ! वह राजीव कब से हो गया? उसकी तो नाक वहा करती थी!" "अब देखो तो सही उसे। विलायत पास करके आया है। कितना बांका जवान निकला है। उसकी तरफ़ तो देखा तक नहीं जाता। ऊंचा- ऊंचा, लंवा, सांवला सलोना..." "जैसे कृष्ण कन्हैया हो।" बेगम मुजीव ने जानबूझकर जेवा की टांग खींची। नहीं तो क्या मालूम वह कब तक बके जाती । कुछ इस तरह वह शुरू हुई थी। और फिर वेगम मुजीव देख-देखकर हैरान होती रहती। अलीगढ़ से हर दूसरे-चौथे रोज़ टेलीफ़ोन आ जाता । एक वार टेलीफ़ोन आता और कितनी-कितनी देर जेवा चोंगे को कानों से लगाए, गोंद की तरह चिपकी रहती। लेकिन जेबा तो अम्मी के लिए ज़ाहिद की एक और समस्या वांध १०६/ मन परदेसी लाई थी। एक-आध दिन इसपर विचार करके आखिर बेगम मुजीव ने जाहिद को चिट्ठी लिखी। सम्बी-चौड़ी शिकायते--'मुझे तुम्हारे हर महीने भेजे पैसों की कोई जरूरत नहीं । सीमा हमारे मुंह पर कालिष पौनकर चली गई । अब जवा का व्याह करना है। आखिर यह लड़की कब तक कुंवारी बैठी रहेगी? जवान-जहान; पढ़ी-लिखी, ब्याहने लायक । मैं अपनी जिम्मेदारी से सुखरू होना चाहती हूं। वस, तुम यह चिट्ठी देखते ही सोट माओ। कोई-न-कोई नौकरी तुम्हें यहा भी मिल जाएगी। और फिर तुम्हारा भी तो ब्याह करना है...' जेवा ने अम्मी को लिखी हुई चिट्ठी पढ़ी, और नीचे एक पंक्ति अपनी ओर मे जोड़ दी-भैया, अगर तुमने शादी कर ली है तो भाभी को लेकर आ जाओ। लेकिन आओ जरूर ।-जेवा।' २२ शेख शब्बीर की हालत ठीक नहीं थी। उसे पहले जमे दौरे पड़ते थे। उमने पाकिस्तान जाकर भी देख लिया। लाहौर में कई दिन तक उसका इलाज होता रहा । पागलखाने में भी रहा । डाक्टर यही कहते कि मरीज को कोई गहरा सदमा पहुंचा है । और शेख शब्बीर था कि अपने दिल की गाउ नहीं सोल रहा था। क्या तो डाक्टर और क्या वैज्ञानिक, सब सिर पटककर रह गए। अब उसमे एक नई तब्दीली आ गई थी। पाचो वक्त नमाज पढना। रोजे रखता। हज भी कर आया था। सारा दिन बस दो ही काम थे। या तो तसवीह फेरता रहता या फिर लोटा थामे दुजू करता रहता। टपनों से ऊचा पायजामा, मौलवियो जैसी दाढी, होठो के ऊपर मुह के इधर-उधर तराशे हुए बाल ।हर वार पेशाय करके उठना, कितनी-कितनी देर 'वटवानी' करता रहता। आजकल पेशाव भी उसे बार-बार आने लगा था। अपने मूह से कबूल नहीं रहा था, लेकिन पाकिस्तान आकर मन परदनी/ १०७ . सख़्त परेशान था। लाहौर से गुजरांवाला, गुजरांवाला से गुजरात, गुजरात से जेहलम; जेहलम से अब रावलपिंडी जा पहुंचा था। रावलपिंडी में भी छावनी के पास किसी वस्ती में किराये पर एक मकान मिला था । कामकाज कुछ नहीं था। काम करने की न तो उसकी उम्र थी और न उसकी सेहत साथ देती थी। उसके पाकिस्तान आने के कुछ देर वाद, शेख शब्बीर की जवान- जहान बेटी नूरी किसी पंजाबी लड़के के साथ निकल गई थी। कितने दिन 'धूल छानकर जब उसका अता-पता मिला, शेख शब्बीर ने लड़की का, उसी लड़के के साथ निकाह कर दिया। कितनी देर तो लड़के का धंधा उसकी समझ में नहीं आया था। कई-कई दिन घर से गायब रहता। कभी 'फाकामस्ती तो कभी पैसों की रेल-पेल। शेख शब्बीर हैरान होता रहता। फिर उसे पता चला कि लड़का भारत-पाक सीमा पर तस्करी का 'धंधा करता था । सूती और रेशमी कपड़े से लदे ट्रक; चीनी, चाय, पान के पत्ते, केले, आम, मिर्च-मसाले, तरह-तरह की शराब, एक दिन नूरी उसे बता रही थी कि स्कूली बच्चों की कापियां तक भारत से स्मगल होकर आती हैं। "इधर से भी तो कुछ जाता होगा?" शेख़ शव्वीर ने नूरी से पूछा। एक पाकिस्तानी की गरत, वह यह मानने के लिए तैयार नहीं था कि उनके मुल्क को इन सब चीजों के लिए पड़ोसी देश का मुंह ताकना पड़ता है। नूरी ख़ामोश रही। उसे इसकी जानकारी नहीं थी। पैसा हाथ का मैल होता है । आता रहता है, जाता रहता है। शेख शब्बीर को इसकी परवाह नहीं थी। लेकिन उसे परेशान करने वाली वात यह थी कि नूरी. का मियां अपनी बीवी के साथ बदतमीजी से पेश आता है । 'तू'-'तू' कहकर उसे बुलाता। कड़वा वोलता। मां-बहन की गाली तो जैसे उसके होंठों पर रहती थी। और अब नूरी पर उगने हाथ उठाना भी शुरू कर दिया था। उन दिनों शेख शब्बीर का लाहौर के पागलखाने में इल: . - १०८ / मन परदेसी । था। एक दिन वह नूरी के यहा गया। उसने देखा, लड़की के जिस्म पर नील-ही-नील पड़े थे और अपने कमरे में आधी गिरी हुई थी। पूटने पर पता चला कि उसके शौहर ने पिछली रात दारू पीकर उसे पीटा था और आप सुबह-सवेरे ही कही बाहर निकल गया था। लड़की, जैसे दर्द की गठरी बनी पलंग पर पड़ी थी। अभी शेख शब्बीर नूरी से पूछताछ कर रहा था कि उसका दामाद आ गया। "यह क्या बदतमीज़ी है, लडकी की यू वैरियो की तरह पीटना?" शेख शब्बीर लडके को देखकर खफा हो रहा था। "अब्बाजान | रमूल अल्लाह का फरमान है कि औरत की कभी- कभी पिटाई करनी चाहिए।" सिगरेट का कश लगाते हुए दामाद बोला। शेख शब्बीर की उगलिया उसके हाथ में पकडी तसवीर पर तेज- तेज चलने लगी। पोख शब्बीर का बेटा कवीर मजे में रह रहा था। उनके पाकिस्तान पहुचने के बाद ही उसके चाचा जुबैर ने उसे पी० डब्ल्यू. डी० मे भरती करवा दिया था। तनख्वाह चाहे कम थी, ऊपर की आमदनी ढेर-मारी हो जाती थी। बस एक ही खरावी थी कि उसका व्याह भी एक पजाबी लड़की के साथ हुआ था। और वह उसपर पूरी तरह में हावी थी। एक के बाद एक, दो बच्चे उमने पंदा कर लिए थे। न मा-बाप से, न किसी और रिश्तेदार से उमे मिलने देती। वेहूदा फैशन। लिपस्टिक से रग होंठ, सुखों, पाउडर से पुते गाल, कटे हुए बाल, लटें मुह पर पड रही । मेरा शब्बीर को यह सब एक बाष नही भाता था। सबसे ज्यादा तकलीफ उसे अपनी बहू की बोल-चाल पर होती। उमको पजाबी तो वह कुछ-कुछ समझने लगा था लेकिन जब वह उर्दू बोलने की कोशिश करती तो यूलगता जैसे उसके सीने परतड-नड गोलिया वरस रही हो । गलत मुहावरा, गलत उच्चारण, उल्टे-सीधे फिकरें। कही पजाबी, कही उर्दू । एक दिन कहने लगी, "यहा पर तो 'हैडू' भी सस्ता होना नाहिए।" "यह 'हेडू' क्या ?" शेख शब्बीर ने हैरान होकर पूछा। "हेडू ? हैडू का मतलब हैडू," यह कहते हुए उसने अपने ससुर को तरफ. ऐसे देया, जैसे वह निपट गवार हो। मन परदेगी/१०६ - । । सवसे बढ़कर शेख़ शव्वीर को यह दुःख था कि उसके अपने बेटे कवीर का लहजा भी विगड़ रहा था। पंजावी सुन-सुनकर पंजावी वोलने की कोशिश में उसकी जवान अजीब-सी होती जा रही थी। जवान का फ़र्क, रहन-सहन का फ़र्क, पंजाविन वह अपने घरवाले को सगे-संबंधियों से दूर-दूर रखती। और फिर उनके तबादले भी दूर-दूर शहरों में होने लगे थे। कहीं पुल बन रहा होता, कहीं सड़कें । कहीं नहर खोदी जा रही होती, कहीं बांध बांधे जा रहे होते। शेख शब्बीर सोचता, जहां भी रहे, लड़का खुश रहे। अपने वाल-बच्चों को पाले । उसने कभी अपने बेटे की आमदनी पर नज़र नहीं रखी थी। अल्लाह ने उसे अपने लिए काफ़ी दे रखा था। इस जिंदगी में उससे खत्म होने वाला नहीं था । मियां-बीवी दो जीव, उनका खर्च भी कितना था? वे तो रूखी-सूखी खाकर भी वक्त काट सकते थे। वस एक ही चिन्ता थी, और वह अपनी बीमारी की । जव कभी दौरा पड़ता तो कई-कई दिन न उसे खाना अच्छा लगता, न पीना । यही जी चाहता कि कपड़े फाड़कर वह कहीं निकल जाए। सोए-सोए 'अल्लाह हूं', 'अल्लाह हूँ' बोलने लगता। 'फटी-फटी आंखें। तव न वह वीवी को, न वेटे-बेटी को, न किसी और रिश्तेदार को पहचानता । जो मुंह में आता, बके जाता। न सिर, न पैर किसीकी समझ में कुछ न आता। "मारो, मारो! गुंडे, बदमाश, पैसे भी खा गए, लूटकर भी ले गए। पाकिस्तानियों का पाकिस्तान, हिन्दुस्तानियों का हिन्दुस्तान । आटे में घुन । चक्की में आटा । अल्लाह हू ! अल्लाह हू ! मेरे वाप का लिहाज ! मेरे ताऊ का लिहाज़ ! मेरी मां के आंसू ! मुझे काट क्यों नहीं देते ? कुंद छुरियां ! मुझे गोली से क्यों नहीं उड़ाते ! देसी हथियार । कोई शर्म, कोई हया । अल्लाह हू, अल्लाह हू ! एक, दो, तीन, चार, पांच, छ:..'छक छक छक, छक छक, छक । दगड़ दगड़ दगड़ । डज़ डज़, ठू-ठा । कच्ची कुंवारी गाड़ी के नीचे आ गई । लहू-लुहान हो गई। फाटक जो वंद नहीं था। टक्कर तो होनी ही थी। अल्लाह हू, अल्लाह हू ! मैं कहता हूं, अल्लाह हू अल्लाह हू ! करने का क्या फ़ायदा? तसबीह फेरनी चाहिए। ताले लगाने चाहिएं । 'विर्द' करना चाहिए। गांठ बांधकर रखनी चाहिए। न कोई । ! ! । । ११०/मन परदेसी आए, न कोई जाए। कच्ची-कुंवारी जैसे कोपल हो, कच्ची कुवारी जमे कली हो । मल्लाह हूँ ! अल्लाह हू ! चोरी करे तो हाय काट दो। पारी करे नो सो कोड़े मारो। दारू न पिओ, जुआ न मेलो ! चार बीवियां ईमान हैं। दो औरतें एक मदं के वरावर हैं। एक लड़की छ. मदों के पामंग भर । भल्लाह हू ! अल्लाह हू इस तरह आप-से-आप घटो बोलता रहता । वोलता-बोलता बाहर निकल जाता। न किसीके रोके स्कता । न किमीके वाधे बघता। जय दौरा खत्म होता । ठडा यख हो जाता । भला-चगा, जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो। २३ जाहिद की फ़िरगिन लडकी के माथ धस दोस्ती ही थी, उनकी शादी नहीं हुई थी। कम-से-कम वह लड़को उसके साथ नहीं आई। जाहिद अपनी अम्मी के कहने पर पहली फुरसत में मिलने के लिए आ गया। वेगम मुजीब ने उसे लोट जाने नहीं दिया। कह-सुनकर उसे एक अच्छी-सी नौकरी दिलवा दी। शेख मुजीव के बेटे के लिए सरकार सब कुछ करने को तैयार थी। और फिर जाहिद के पास इतनी बड़ी डाक्टर- डिग्री थी। उसकी नियुक्ति भी मेरठ अस्पताल में कर दी गई, ताकि अपनी मा की देख-भाल कर सके। यह सब करने में कई महीने लग गए। वेगम मुजीब को अब यह तमल्ली थी कि बेटा घर लौट आया था। वह वैसे सुखरू हो गई थी। वस, अब दो ही काम रह गए थे। जाहिद और जेवा का ब्याह रचाना। पहले जाहिंद का जो वडा भा और फिर जेवा का। जाहिद को आए अभी बहुत दिन नहीं हुए थे कि येगम मुजीव ने उसके लिए लडकी दूढना शुरू कर दिया। एक उम्र आती है जब हर औरन को लड़के, लडकियों के ब्याह रचाने में मजा आता है। पाहे. मन परदेमी/१११ । - अपने हों या पराये। महमूद के मां-बाप पाकिस्तान से खाली हाथ लौट आए थे। उसकी बहन के लिए उनको कोई उचित रिश्ता नहीं मिला था । एका-दो लड़के नज़र में आए भी, मगर महमूद की बहन रखसाना ने उन्हें रद्द कर दिया । और फिर रुखसाना ने कहना शुरू कर दिया--- मेरा तो यहां दम घुटता है । वास्तव में उन दिनों पाकिस्तानी मुल्ला लोग औरतों के पर्दे पर बड़ा जोर दे रहे थे । बुरके के बिना गली-बाजार में निकली औरतों पर लोग आवाजें करते थे । रुखसाना की अम्मी तो चादर ओढ़ लेती मगर रखसाना से बुरका नहीं पहना जाता था। उसे आदत ही नहीं थी। उसका जी घबराने लगता । यूं महसूस होता, जैसे किसीने उसे जकड़कर रख दिया हो। उसके सिर पर तो चुनरी भी बड़ी मुश्किल से ठहरती थी। उराकी अम्मी बार-बार उसे टोकती रहती। वार-बार उसे याद दिलाती रहती। उरा दिन तो हद ही हो गई। रुखसाना अपनी चचाजाद बहनों के साथ रावलपिंडी की किसी गली में जा रही थी। उसके बालों की दो चोटियां छाती पर लहरा रही थीं । उसकी चुनरी उसके सिर से फिसल- कर कांधों पर से लुढ़वाती जमीन पर घिसट रही थी। लड़कियां हंस-बोल रही किसी बात का मजा ले रही थीं कि अचानक एक लम्बी दाढ़ीवाला मौलवी, हाथों में कैची लिए उनके सामने आ खड़ा हुआ । "ठहर तो जा कमज़ात !" एखसाना को उसने कंधों से पकड़कर रोक लिया । "तेरी इन दो चोटियों को कतरकर मैं तेरे हाथ में देता हूं-जिनकी तू इस तरह नुमाइश कर रही है।" रखसाना के सोते सूख गए । उसे लगा, जैसे मूच्छित होकर वह गली में ही आँधी जा गिरेगी। इतने में किसीने आकर मुल्ला को बताया, "लड़की परदेसी है, पाकिस्तानी नहीं," तव कहीं वह वापा आया। और जब उसने सुना कि वह भारत से आई है तो उसने जोर से गला साफ़ करते हुए थूक दिया। लाहोल पढ़ता हुआ, 'काफ़िर मुल्क', 'काफ़िर मुल्क' कहता चला गया। रुखसाना ने बड़ी मुश्किल से वह रात पाकिस्तान में गुजारी । अगले दिन गाड़ी में बैठकर वे लोग स्वदेश लौट आए। रुखसाना अत्यन्त सुन्दर लड़की थी। मसूरी कानवेंट की पढ़ी हुई। । ११२/ मन परदेसी म-७.

मजने-संवरने की शौकीन । वह तो अभी स्कूल में ही थी कि उसने नाखूनों को रंगना शुरू कर दिया था । कालेज मे पहुची तो उमका हेयर ईसर के बाकायदा आना-जाना शुरू हो गया । हम-उन लड़कियों ने मिलकर उमने कई शरारतें की थी। मिगरेट को डिविया तो वह प्राय. अपने है. बैग में रखती थी, जैसाकि उन दिनों फैशनपरस्त लड़कियों का तार-तरीका था। पिएं-न-पिएं किसी बहाने बटुआ खोलकर सिगरेट की हिदिया की नुमाइश जरूर कर देती। गाड़ी में बैठी रुखसाना सोचती रही, वह तो पाकिस्तान में कभी नहीं रह मकेगी। पाकिस्तानी फिल्मे एकदम वोर भी। जो कोई ढंग की थी, वे हिन्दुस्तानी फिल्मी की हू-ब-हू नकल थी । पाकिस्तान में रहने का मतलब ही क्या जो सारा दिन कोई हिन्दुस्तानी रेडियो मुनता रहे कभी 'उर्दू मविन' तो कभी "विविध भारती'। पारिस्तान में रहने का मतलब ही क्या जो कोई हिन्दुस्तानी फ़िल्म-स्टारों के फंशन की नकल करता रहे ? पानिम्नान में उन दिनों उसके हाथ उर्दू का एक पुराना रिमाला आ गया । उममें एक कार्टून था। नेहरू क्लास रूम में बैठा सलेट पर सवाल हल कर रहा है, लियाकत अली पीछे बैठा चुपके में नकल टीप रहा है। और सामने लक-बोर्ड पर लिखा है, 'कान्टीट्यूशन'। खमाना को जब उसका ध्यान आता तो उसकी हमी मूटने लगती। वेगम मुजीव ने रुखमाना को देखा और उसकी दीवानी हो गई। उमका जी चाहता कि रात होने में पहले उम लडकी को बहू बनाकर वह अपने घर ले आए। वह हैरान होती रहती कि इतने दिन उम सडको पर जमको नजर क्यो नही पड़ी। लेकिन रुखमाना तो प्रमूरी में पटी थी, होस्टल में रहती थी, अपने शहर कभी-कभार आती थी। उमका अब्बा अग्रेज सरकार का कट्टर पिठू या। फिर लौगियों से उसका याराना हो गया । शेख मुजीब से उमका परिचय तो था, लेकिन उनके घरवालों का बापम में मेल-मिलाप नहीं हुआ था। जेचा अपनी मम्मी की हर कमजोरी को पहचानती थी। इससे पहले कि वह इस तरह की कोई गलती कर बैठे, एक दिन जेबा ने अम्मी को एक तनवीर लाकर दिखाई। किसी फिरंगी लडकी की तमवीर थी। । मन परदेसी ११३ "अम्मीजान ! आप वेकार जाहिद भाई के व्याह के लिए परेशान रहती हैं। भैया ने तो अपने लिए लड़की ढूंढ़ रखी है।" "यह कौन है ?" बेगम मुजीब ने तसवीर को ध्यान से देखे विना नीचे फेंक दिया। "तसवीर को यूं फेंकने से किसीकी महबूवा को उसके दिल से तो नहीं निकाला जा सकता।" जेवा तसवीर को फर्श से उठाकर फिर अम्मी के पास ले आई। "आप इसे देखें तो सही। लड़की कितनी प्यारी है !" जेवा अपने भाई की सिफारिश कर रही थी। "गोरी चमड़ी होगी और वस।" बेगम मुजीव झाग-झाग हो रही "अम्मीजान ! आपको अपने बेटे के चुनाव पर तो एतवार होना चाहिए।" जेवा ने तसवीर फिर बेगम मुजीव के सामने ला रखी। "मुझे नहीं देखनी है । सुन्दर होगी तो अपने घर।" "नाक कितनी तीखी है ! मुखड़ा तो देखो, जैसे कली खिल रही हो ! गालों में गड्ढे । साफ़-सुथरे आसमान जैसी नीली आंखें। बाल कितने प्यारे हैं ! धुंघराले और काले । इस तरह की लड़की को 'ब्रूने' कहते - "हां ! हां ! कुछ पहले भी एक 'ब्रूने' मेरे पीछे पड़ गई थी। तेरे अब्बा की कोई सहेली थी। उठते-बैठते उसका नाम जपते रहते । मैंने ऐसा फटकारा कि फिर कभी उसका जिक्र नहीं आया।" "तो चाहे वही हो।" जेवा हंसने लगी। "वह नहीं तो उसकी कोई बहन-बेटी होगी । यूं लगता है, इस घर में किसी चिट्टी-चमड़ी वाली का आना लिखा हुआ है। इस आंगन में, विल्ली-आंखों वाले, गोरे-चिट्टे बच्चे, गिट-मिट-गिट-मिट अंग्रेजी बोला करेंगे।" "मुझे यह वेकार की बातें अच्छी नहीं लगती।" वेगम मुजीब उठ- कर कमरे में चली गई। अकेली, अपने कमरे में बैठी, कितनी देर से वेगम मुजीव सोच रही थी कि जेवा इसलिए फिरंगिन का किस्सा ले वैठी थी क्योंकि उसकी मां, महमूद की बहन पर रीझ गई है। क्योंकि ज़ाहिद के वास्ते, रुखसाना ११४/मन परदेसी का रिश्ता मागने के लिए वह मोच रही थी। खसाना जैसी लड़की उसके हाथ लग जाए तो वेगम मुजीर का दिल बहता, और उसे कुछ नहीं चाहिए। घर को रौनक होगी। यह कोठी महक उठेगी। ऊची-लंबी, कोमलांगी। फैशनेबल । शाहिद के अन्या को मजने वाली लड़किया अच्छी लगती थी। हमेशा कहा करते-औरत को मीन होना चाहिए। औरत को सजना-संवरना चाहिए। जिन्दगी की खबसूरती को बढाना चाहिए। जैसे कलिया पिलती है, फूल खुशबू लुटाते हैं । औरत को, हर देखने पाली आखो में रौनक भर देनी चाहिए। हर दिल में एक उमग पंदा कर देनी चाहिए । कमाने के लिए मर्द है। मेहनत करने के लिए मदं है। जिन्दगी की तसवीर में रग औरत भरती है। मुमकान औरत लुटाती हैं। खुशबू बिखेरना औरत के हिम्मे मे आया है।" और फिर उसका नाम कितना सुन्दर है-यमाना "खसाना जाहिद ! 'मैं तो किमी फिरगिन को इस घर में कदम नहीं रखने दूगी,' बेगम मुजीय बार-बार अपने मन में कह रही थी। २४ शेष शब्बीर की हालत दिन-पर-दिन विगहती जा रही थी। भला- चगा होता कि अचानक उसे दौरा पड़ना और फिर जो मुह मे आता, बकने लगता । कभी घर वालो को पहचानता, कभी न पहचान सकता। कभी घर में टिका रहता, कभी बाहर निकल जाता । वम एक शुक्र था, कोई बदतमीजी नहीं करता था। किमीपर हाथ नहीं उठाता था । प्रायः अपने-आपको कोसता रहता ( कमी छल-छल आमू रोने लगता। कभी एकदम उसके हाथ-पाव ठडे हो जाते । उम रोज मिया-धोवी घर में अकेले थे । साझ ढल रही थी। हल्का-हल्का अधेरा हो रहा था । कितनी ही देर घर के एक कोने में अकेला वंठा, शेख शब्बीर पटी-फ्टी आखों से इधर- मन परदेमी/११५ - - उधर देख रहा था । किसी सोच में डूबा हुआ। आम तौर पर शाम को इस समय वह बाहर निकल जाया करता था। कभी तोपखाने की ओर, कभी लाल कुर्ती की ओर, कभी खलासी-लाईन की ओर, कभी चांदमारी की ओर । जैसे एकाएक कोई वादल फटता है, उसकी वीवी ने देखा कि शेख शब्बीर की आंखों में से आंसुओं की धार बहने लगी। कुछ भी तो नहीं हुआ था। सारा दिन वह घर पर ही रहा था। न किसीने भला कहा, न दुरा। बस मेरठ से कुदसिया वीवी की चिट्ठी आई थी। सव खैरियत थी। जाहिद लौट आया था । घर भरा-भरा लग रहा था । अब वह सोच रही थी कि ज़ाहिद और ज़ेवा के ब्याह रचा दिए जाएं। दोनों कव के व्याहने लायक हो चुके थे। चिट्ठी में उसने इस बात की ओर भी इशारा किया था कि चाहे सीमा का दोप था या नहीं, वेगम मुजीव का मन अभी तक नहीं मानता था कि उसे मुंह लगाए । बहन-भाई आपस में ज़रूर मिलते थे। उन्हें उसने कभी नहीं रोका था। लेकिन स्वयं उसका अपना मन नहीं मानता था कि सीमा के साथ कोई वास्ता रखे । क्या हुआ जो गुंडे छः थे? उनके साथ मुकाबला करती। लड़ती-लड़ती मर जाती। अपनी इस्मत के लिए, अपने ईमान के लिए औरत जान पर खेल जाती है। "ईमान की बात है ," उस शाम अपनी बीवी को पलंग पर अपने साथ विठाकर, शेख शव्वीर आप-से-आप बोलने लगा, "ईमान की बात है बेगम ! तुझसे निकाह के बाद वस छः वार झक मारी है।" "छोड़ो मुझे । क्या ऊलजलूल बोल रहे हो?" शेख शब्बीर की बीवी वाह छुड़ाकर जाना चाहती थी लेकिन उसके शौहर ने बड़ी मजबूती से उसे पकड़ा हुआ था। "आज तो तुम्हें सुनना ही होगा। आज तो तुम्हें यह आईना देखना ही होगा।" शेख शब्बीर अपनी जिद पर अड़ा हुआ था। "मुझसे कौन-सी बात भूली है ? किसी व्याहता को क्या पता नहीं होता कि उसका शौहर क्या करतूत करके आया है ?" बेगम शब्बीर कह रही थी। "तुम्हें पता है, तुम्हारे हाथों की मेहंदी अभी उतरी नहीं थी कि ११६/मन परदेसी शेख शब्बीर अभी बोल हो रहा या कि उसकी बीवी ने उसे टोककर कहा, "आपने मायके से मेरे माय भाई कनीज़ पर हाय डाला है ।" वैगम शब्बीर मुमकरा रही थी। "हाय ही नहीं डाला था, एक दिन गुमलखाने में जब यह कपड़े धो रही थी, मैले कपड़ों पर उमे गिराकर और फिर पूरा नल पील- ! "आपका मतलब है, तेज-तेज चल रहे नल की वजह से मुझे आपकी आवाज नहीं आ रही थी? शृंगार-मेज के मामने बैठी मैं वालो का धमा जूढा बना रही थी, जमा आप कई दिनों मे कह रहे थे, लेकिन फिर मैंने अपने हाथ को रोक लिया और मादी-सी चोटी बनाकर उठ खड़ी हुई।" शेख शम्बीर टुकुर-टुकुर अपनो वोवो की ओर देखता रह गया। "और फिर तुम्हारी सहेली सजनी के माथ"।" "हा ! हा ! वह तो आपको जूतों में मरम्मत करने को फिरती थी। मैंने ही उसे हाथ जोड़े। उसके कदमो पर गिगे। उममे माफी मागी। वह तो कहती थी कि उसका पुलिस अफमर परवाला कोल्हू मे जुनवा देगा।" "लेकिन उस वक्त तो उसने मुह से आवाज नक नहीं निकाली थी।" "शरीफ औरत शोर करके अपनी मिट्टी पलीद करवाती। एक बद- नामी होती, दूसरा उसका घर टूटता। यही मैंने उमे समझाया था--जी मो हो गया। और उसने सन-शक्र कर लिया । वैचारी हिन्दू औरत । उम माल वह वैष्णोदेवी, अमरनाथ और न जाने कहा-कहा की यामा करने गई और अपनी भूल वशवाती रही।" शेय शरीर को लगा, जैसे उमकी दीवी ने उमरे मुह पर थप्पड दे मारा हो। बार-बार वह अपने गाल पर हाथ लगाकर सहलाने लगता। उस समय तो जमे मजे-मजे में उसने पलक मूद ली थी। लेकिन फिर कभी उनके आगन में उमने पाव नहीं धरा था। और फिर कुछ समय बाद उनकी तब्दीली हो गई। उसका घरवाला बडा बदनाम, वडा बिगड़ा हुआ पुलिस अफसर या । यह तो कुछ भी कर सकता था। "और फिर तुम्हारी चचाजाद वहन अजमन्द के माय?" शेख गब्बीर । होना था, मन परदेमी / ११७ । के सिर पर जैसे भूत सवार हो । पता नहीं, कच के पुराने मुर्दे उखाड़ रहा था। "अर्जमन्द को गिला यह था कि वात आपकी उसके साथ चली और निकाह आपका मेरे साथ हो गया।" वेगम शब्बीर हंस रही थी, "मैंने कहा, वहन, तू भी मज़ा चख ले। सारी उम्र कुंवारी रही और फिर तपे- दिक से मरी।" "क्या सच, तुम्हें मेरी इस करतूत का भी पता था ?" शेख शब्बीर ने परेशान होकर पूछा। "यही नहीं, मुझे यह भी पता था कि किस दाई से आपने उसका हमल गिराया था। वह आपका राज़ मेरे पास वेचने के लिए आई थी। मैंने दे- दिलाकर उसका मुंह बंद कर दिया। सोने की वालियां, जिनके लिए नौकरों को चोर ठहराया जा रहा था, वो उस कुटनी की मुट्ठी गर्म करने के लिए काम आई थीं ताकि शेख साहव का भंडा न फूटे।" अव शेख शब्बीर का दूसरा गाल तमतमा रहा था, जैसे किसीकी पांचों-की-पांचों उंगलियां उसमें धंस गई हों। शेख शब्बीर ने अपना एक हाथ उस गाल पर रख लिया । उसे यूं लगता, जैसे वह गाल लाल-सुर्ख हो रहा हो। वह उसे ढक रहा था। "और ईदन कोठे वाली, जिसका मुजरा हमने करवाया था, वेटे की मुसलमानियों वाले दिन ?" "मुझे पता था, आप और आपके शरावी दोस्त कोई गुल ज़रूर खिलाएंगे। जैसे आप लोग दारू पी रहे थे। जैसे आप लोग उसपर पैसे । लुटा रहे थे।" "तुम तो जाकर सो गई थीं 'यह कहकर कि मैं तो दिन-भर की थकी हुई हूं।" शेख शब्बीर ने उसे छेड़ा । "किसी औरत को क्या नींद आती है जब उसके आंगन में कोई परायी औरत अपने हुस्न के तीर चला रही हो?" बेगम शब्बीर की आंखों में आंसू आ गए। उसकी आवाज़ भर आई : "मैं तो अल्लाह के आगे हाथ जोड़ रही थी, कि वह औरत मेरे घर में कोई आग न लगा जाए । इस तरह की बाजारू औरतों में दस बीमारियां ११८/मन परदेसी होती हैं । मैं तो अपने कमरे को मदर में बंद करके मारी रात सजदं में पढी रही। जब आप.." मेख शब्दीर को लगा, जमे उसके मुह पर किमीने थका हो। उमे अपने-आपसे बू आ रही थी। लेकिन एक पागलपन, यह अपनी जिद पर अड़ा हुआ था, "अच्छा, जब नूरी पैदा हुई तो उसकी नन..." मेन ने मोचा कि उसका यह कारनामा उमकी चीवी को कदापि मालूम नहीं होगा। "वह पाटिन चप्पा-चप्पा वातों वाली? वेहपायो की भी हद होती है । मैं माय के कमरे में जचगी के ददं मे वेहाल हो रही थी, और आप लोग, होठों-पर-होठ, एक-दूसरे को चूम रहे थे। मामने दीवार पर लगे आदमकद आईने में मैं मब कुछ दे रही थी। उस दिन मुझे मदंशात में मस्त नफरत हुई थी।" वेगम शव्दीर फिर भावुक हो उठी, "कोई औरत जान पर मेलकर किमीका वच्चा किसीके लिए पंदा कर रही है, और उनका मर्द, वच्चे का वाप, आधी रात को साय के चेम्बर में उमका हक मार रहा है। और फिर जिनने दिन में अस्पताल में रही, आप उन वद- नमीज औरत के क्वार्टर में जाकर अपना मुह काला करते रहे।" "उसके बाद भी।" शेख शब्बीर की वेवायी की कोई हद नहीं थी। पही नहीं, जिन दिनो में अस्पताल में घी-नूरी के पंदा होने के वाद मुझे बुखार रहने लगा था-आप पीछे घर में अपनी पड़ोमिन के माय रग-रेलिया मनाते रहे । कमजाव औरन अपना मगल-मूत्र उतारकर पराये मई को सेज को मजाती रही और आखिरी दिन, मगल-मूत्र, वैसे- का-बमा तकिये के नीचे मूल गई। अगले दिन मेरे अस्पताल में लौटने पर मुझसे मिलने आई। बार- वार कह रही यो, मेरा मगल-मूत्र कही पर गिर गया है । मैंने कहा, यह तो बड़ी बद-शगुनी है। और फिर अगले दिन उसका मगल-मूत्र मैंने उसके घर भिजवा दिया। मैंने कहलवा भेजा कि मुझे वह गली में पड़ा हुआ मिला था और उसने चुपके में उसे सभाल लिया ।फिर कभी हमारे यहा ॥ .. । नहीं आई।" शंख शब्बीर सुनते-मुनते टडा-यग्र हो गए । वाटो तो जमे लहू की बूद न हो। मन परदेमी/११९ के सिर पर जैसे भूत सवार हो । पता नहीं, कव के पुराने मुर्दे उखाड़ रहा था। । "अर्ज़मन्द को गिला यह था कि बात आपकी उसके साथ चली और निकाह आपका मेरे साथ हो गया।" वेगम शब्बीर हंस रही थी, "मैंने कहा, वहन, तू भी मज़ा चख ले। सारी उम्र कुंवारी रही और फिर तपे- दिक से मरी।" "क्या सच, तुम्हें मेरी इस करतूत का भी पता था ?" शेख शब्बीर ने परेशान होकर पूछा। “यही नहीं, मुझे यह भी पता था कि किस दाई से आपने उसका हमल गिराया था। वह आपका राज़ मेरे पास वेचने के लिए आई थी। मैंने दे- दिलाकर उसका मुंह बंद कर दिया। सोने की वालियां, जिनके लिए नौकरों को चोर ठहराया जा रहा था, वो उस कुटनी की मुट्ठी गर्म करने के लिए काम आई थीं ताकि शेख साहब का भंडा न फूटे।" अव शेख शब्बीर का दूसरा गाल तमतमा रहा था, जैसे किसीकी पांचों-की-पांचों उंगलियां उसमें धंस गई हों। शेख शब्बीर ने अपना एक हाथ उस गाल पर रख लिया। उसे यूं लगता, जैसे वह गाल लाल-सुर्ख हो रहा हो। वह उसे ढक रहा था। "और ईदन कोठे वाली, जिसका मुजरा हमने करवाया था, बेटे की मुसलमानियों वाले दिन ?" "मुझे पता था, आप और आपके शरावी दोस्त कोई गुल ज़रूर खिलाएंगे। जैसे आप लोग दारू पी रहे थे। जैसे आप लोग उसपर पैसे लुटा रहे थे।" "तुम तो जाकर सो गई थीं 'यह कहकर कि मैं तो दिन-भर की थकी हुई हूं।" शेख शव्वीर ने उसे छेड़ा। "किसी औरत को क्या नींद आती है जव उसके आंगन में कोई परायी औरत अपने हुस्न के तीर चला रही हो?" वेगम शब्बीर की आंखों में आंसू आ गए। उसकी आवाज़ भर आई : "मैं तो अल्लाह के आगे हाथ जोड़ रही थी, कि वह औरत मेरे घर में कोई आग न लगा जाए। इस तरह की बाजारू औरतों में दस बीमारियां ११८/मन परदेसी होती है । मैं तो अपने कमरे को अंदर से वद कर सारी रात सजदे में पड़ी रही। जब आप..." शेख शब्बीर को लगा, जैसे उमरे मुह पर किमीने थूका हो। उसे अपने-आपसे बू आ रही थी। लेकिन एक पागलपन, वह अपनी जिद पर अडा हुआ था, "अच्छा, जय नूरी पैदा हुई तो उसकी ननं..." शेन ने मोचा कि उसका यह कारनामा उसको बीवी को वदापि मालूम नही होगा। "वह पाटिन? चप्पा-चप्पा वातों वाली ? वेवायी की भी हद होती है। मैं माय के कमरे में उचगी के दर्द से बेहाल हो रही थी, और आप लोग, होंठों-पर-होट, एक-दूमरे को चूम रहे थे। सामने दीवार पर लगे आदमकद आईने में मैं सब कुछ देख रही थी। उम दिन मुझे मदंडात से मस्न नफरत हुई थी।" बेगम शब्बीर फिर भावुक हो उटी, "कोई औरत जान पर खेलकर किमीका बच्चा किसीके लिए पंदा कर रही है, और उमका मर्द, बच्चे का बाप, आधी रात को साथ के चेम्बर में उसका हक मार रहा है। और फिर जितने दिन में अस्पताल में रही, आप उस बद- तमीज औरत के क्वार्टर में जाकर अपना मुह काला करते रहे।" "उसके बाद भी।" शेख शब्बीर की चेहयायी की कोई हद नहीं थी। यही नहीं, जिन दिनो में अस्पताल में धी-नूरी के पैदा होने के याद मुझे बुखार रहने तगा या-आप पीछे पर में अपनी पडोमिन के साथ रग-रेलिया मनाते रहे । कमजात औरत अपना मगल-मूत्र उतारकर पराव मदं को सेज को सजाती रही और आखिरी दिन, मगल-मूत्र, वैसे- का-वमा तकिये के नीचे भूल गई। " अगले दिन मेरे अस्पताल से लौटने पर मुझसे मिलने आई। बार- चार कह रही थी, मेरा मगल-मूत्र वही पर गिर गया है । मैंने कहा, यह तो बडी बद-शगुनी है । और फिर अगले दिन उसका मगल-मूत्र मैंने उसके घर भिजवा दिया। मैंने कहलवा भेजा कि मुझे वह गली में पड़ा हुआ मिला था । और उसने चुपके से उसे सभाल लिया ।फिर कभी हमारे यहा नहीं आई। शेख शम्बीर सुनते-सुनते ठडा-यख हो गए। काटो तो जैसे लहू की " वूद न हो। मन परदेसी/११६ २५ - - इतवार का दिन था। शेवा, जिराने कुछ दिनों से शहर के एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया था, उसकी छुट्टी थी। पाहिद गी भी उस दिन ड्यूटी नहीं लगी थी। बेगम मुजीब ने महगूद और रखसाना को दोपहर के खाने पर बुला रखा था। मेहमानों को आए हुए बहुत देर नहीं हुई थी गिजेबा रखसानाको लेकर अपने कमरे में चली गई और फिर जब तक मेज पर खाना नहीं लग गया, उनकी कोई खबर नहीं थी। कमरा बंद बारको, गप-पापकार रही थीं, हरा-रोल रही थीं। जाहिद और गहमूद गोल गगरे में अकेले रह गए थे। महगूद को लगता, जैसे उराको साथ धोखा हो गया। यह सोचकर आया था कि गण साना गा साथ होने की वजह से वह पोवा के साथ मिलकर बैठ राणेगा। इतने दिनों से यह खफ़ा थो, दूर-दूर रहती थी। इस तरह उसकी नाराजगी शायद दूर हो जाएगी। जितना उसकी अम्मी उसके नजदीक आ रही थी, जोबा उतनी ही परायी होती जा रही थी। अब तो उनकी बोलनाल तक चंद थी। जाहिद गुश था। उसे अवसर मिल गया था ताकि कुछ देर महमूद को साथ अपोले बैठकर बातें कर सके । उरी हमेशा महसूस होता रहा था कि गहमूद के विचारों में कहीं अटपटापन पारूर था। हर वक्त उसे इस्लाम खतरे में नपार आता। खाग तौर पर भारत के मुसलमानों के लिए उसे चारों ओर अंधेरा दिखाई देता। वह सोचता, रोशनी की एक किरण बरा पाकिस्तान था। पाकिस्तान, जिसे इस्लाम के नाम पर कायग किया गया था। दरलाग को बताए रास्तों, इस्लाग की परम्पराओं को फिर जिंदा - "आप गमा सोचते हैं कि आज से चौदह सौ साल पहले, जिंदगी का जो ठंग पैगंवर ने बताया, उसे आज भी लागू किया जा सकता है ?" "वेशमा !" महगूद में एगा माट्टरपंथी की दृढ़ता थी। "अगर कोई गोरी गरे, तो उसके हाथ काट देने चाहिएं ?" १२०/मन परदेसी " "वेशक! "अगर कोई परायी औरत की तरफ आप उठाकर देगे?" "उमके हाय और पाव दोनी काट देने चाहिएं।" "औरत को पर्दे में रहना चाहिए ?" "वेशक !" और जाहिद की आखो के सामने, अभी-अभी मोटर में गे निाली रखमाना की तसवीर तैरने लग गई । तरबूजी रग को रेशमी गाडगे। अजन्ता स्टाइल के जूडे में महक रही गुलाब की अधगिली पाली, कानी की बालियों में पिरोए हुए झम झम कर रहे गच्चे मोती, लाल-गुर्ग रगे होंठ, माथे पर लाल विदी, एक शोला-मा जमे आपी को चुधिया कर गुजर गया हो। एक नजर, और जाहिद बम उमके मायन जैसे पाय में लाल रगे नाव नो की तरफ देखता रह गया। उसके मेहंदी रचे पाय के तलवो को निहारता रह गया । कब मे जेया उने अपने कमरे में से गई थी, लेकिन अभी तक उसके रूप की छाप वमी-की-वमी महमूम हो रही थी। अभी तक उमकी मुगध मे मारे-का-मारा गोल कमरा महक रहा था। "पंगंवर ने मुमलमान के लिए चार बीविया जायज करार दी हैं। "वेशक, अगर कोई चारों को एक-मा प्यार दे सके। एक नगरगे देश सके। लेकिन साथ ही हजरत ने यह भी फरमाया कि चागे को एक थान से देखना कोई आसान काम नही । एक जमा चारों को हक देना, वडा मुश्किल होता है। इसलिए आदमी को एक ही वीबी के माय गुजारा कर लेना चाहिए। बस, यही मैं कहना चाहता था किदम्लाम को नालीम को टीम तौर पर पेरा किया जाए। पंगवर के बताए राम्ने को ठीक नबर में देया जाए। मुसलमानों को नये जमाने के माय कदम मिलाकर चलना होगा। उधर जैबा के कमरे में, विडकियों के पद गिराकर, दरवाजे को वर करके, जाहिर द्वारा विलायत मे गाए हुए एल० पी० रिवाों की धुनी के माय स्खमाना और जेबा बाहों-मेबाहें हाले, मागे मृद एक नगेनगे में नाच रही थी। धीमा, दहन धीमा म्वर, जमे मुह नक भरी गराब पी बद बोतलें हों। नाच-नाचकर जब पक गई, ना पलंग पर पेटकर मिनरंट " मन परदेमी/१२.

२५ इतवार का दिन था। जेवा, जिसने कुछ दिनों से शहर के एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया था, उसकी छुट्टी थी। ज़ाहिद की भी उस दिन ड्यूटी नहीं लगी थी। वेगम मुजीव ने महमूद और रुखसाना को दोपहर के खाने पर बुला रखा था। मेहमानों को आए हुए बहुत देर नहीं हुई थी कि ज़ेवा रुखसाना.को लेकर अपने कमरे में चली गई और फिर जव तक मेज़ पर खाना नहीं लग गया, उनकी कोई खबर नहीं थी। कमरा बंद करके, गप-शप कर रही थीं, हंस-खेल रही थीं। जाहिद और महमूद गोल कमरे में अकेले रह गए थे। महमूद को लगता, जैसे उसके साथ धोखा हो गया। वह सोचकर आया था कि रुखसाना का साथ होने की वजह से वह जेवा के साथ मिलकर बैठ सकेगा। इतने दिनों से वह खफ़ा थी, दूर-दूर रहती थी। इस तरह उसकी नाराजगी शायद दूर हो जाएगी। जितना उसकी अम्मी उसके नजदीक आ रही थी, जेवा उतनी ही परायी होती जा रही थी। अव तो उनकी वोलचाल तक बंद थी। जाहिद खुश था। उसे अवसर मिल गया था ताकि कुछ देर महमूद के साथ अकेले वैठकर वातें कर सके । उसे हमेशा महसूस होता रहा था कि महमूद के विचारों में कहीं अटपटापन ज़रूर था। हर वक़्त उसे इस्ला ख़तरे में नज़र आता। खास तौर पर भारत के मुसलमानों के लिए चारों ओर अंधेरा दिखाई देता । वह सोचता, रोशनी की एक किरण पाकिस्तान था। पाकिस्तान, जिसे इस्लाम के नाम पर कायम किया था। इस्लाम के बताए रास्तों, इस्लाम की परम्पराओं को फिर कर सकता था। "आप क्या सोचते हैं कि आज से चौदह सौ साल पहले, जिंदगी जो ढंग पैगंवर ने बताया, उसे आज भी लागू किया जा सकता है ?" "वेशक !" महमूद में एक कट्टरपंथी की दृढ़ता थी। "अगर कोई चोरी करे, तो उसके हाथ काट देने चाहिएं ?" १२०/मन परदेसी "वेशक ! "अगर कोई परायी औरत की तरफ आग उठाकर देखें?" "उमके हाय और पाव दोनों काट देने चाहिएं।" "औरत को पर्दे में रहना चाहिए ?" "वेशक !" और शाहिद की आखों के मामने, अभी-अभी मोटर में मे निकली रखमाना की तनवीर तरने लग गई। तरबूजी रग की रेशमी माड़ी। अजन्ता स्टाइल के जूडे में महक रही गुलाब की अग्निली कली, कानों को चालियों में पिरोए हुए झम-झम कर रहे मच्चे मोती, नाल-मुर रंग होंठ, माथे पर लाल विदी, एक शोलामा जने आखो को चुधिया वर गुजर गया हो। एक नजर, और शाहिद कम उनके माखन जमे पाव के नात रंगे नाव नों की तरफ़ देखता रह गया। उनके मेहंदी रचे पाव के तलदों को निहारता रह गया। कब मे उबा उन अपने कमरे में में गई थी, लेकिन अभी तक उनके मन की छाप वनी-बी-4मी महसूम हो रही थी। अभी तक उनकी मुगध में मारे-का-मारा गोल कमरा महक रहा था। "पैगंबर ने मुनलमान के लिए चार वौदियां जायज करार दी है। 'बैंगन, अगर कोई चारों को एक-मा बार दे सके। एक नजर में देख सके। लेक्नि माय ही हजरत ने यह भी फरमाना कि वागेको एक आद में देवना कोई आनान काम नहीं । एक जमा चारों को हक देना. दहा मुकिन होता है। "इसलिए आदनी में एक ही बीदी के माय गुद्वारा कर लेना चाहिए। बम, यही में रहना चाहता था किलाम की नालीम को टोक दौर पर पंग किया जाए। पंगंबर के बताए राने रोग्रेर नजर में देखा गए। ममनमानों को न उनाने माय कृदन मिलाकर चलना होगा। उधर जेबा के कमरे में, खिड़कियों के पर्दे गिनकर, दवाई को बद करणे, जाहिद द्वारा बिनापन मेनार हुए एन पो. खिाडौं को पनो के माय बनाना और अंदा वाहाने-दाहे हाने, आन द एक नगेनों में नाब रही थी। धीमा, दल धीना स्वर, जैन नह नर मरी गराब की बद बोदरें हो। नाव-नाकर व कगई, तो पग पर मंटकर निगरेट 44 F " मन परदनी/१२१ । पीने लगीं, कश लगाती हुई धुएं के छल्ले बना रही थीं। कुछ देर के बाद रुखसाना पाकिस्तान की शायरा परवीन शाकिर की नज्म गुनगुनाने लगी: "जव आंख में शाम उतरे पलकों में शफ़क फूले काजल की तरह, मेरी आंखों को धनक छू ले उस वक्त कोई उसको आंखों से मेरी देखे पलकों से मेरी छू ले-~-उस वक्त' नज्म के बोल ख़त्म हुए और फिर दोनों जेवा और रुखसाना, उदास- उदास, रुआंसी-रुआंसी-सी हो गई। दोनों की आंखों में जैसे आंसू छलक आए हों। कितनी ही देर दोनों वैसी-की-वैसी ख़ामोश पड़ी रहीं। वेगम मुजीव सारा वक्त वावर्चीखाने में थी। पहले खाना तैयार करवाती रही, फिर खाना मेज़ पर लगाती रही। उसे अच्छा लग रहा था, कि ज़ाहिद और महमूद गोल कमरे में बैठे सिगरेट पी रहे, गप-शप कर रहे थे । जेवा और रुखसाना जवान-जहान लड़कियों की तरह बंद कमरे में शिपियां लड़ा रही थीं। कुछ देर यूं लेटी रही । फिर जेवा के मन में न जाने क्या आया कि उसने रुखसाना की साड़ी उतारकर एक ओर रख दी और उसे अपनी मनमर्जी से सजाना शुरू कर दिया। चूड़ीदार पायजामा, डोरिए का कुर्ता, ऊपर महीन बेलबूटों का दुपट्टा। उसका जूड़ा खोलकर सीधी मांग काढ़ी और फिर दो चोटियां बना दी। पांव में पंजावी जूती पहनकर जव रुखसाना ने अपने-आपको आईने में देखा---'उई अल्लाह ! मैं तो और- की-और लग रही हूं, उसके मुंह से निकला। और फिर जेवा ने कैसेट-रिकार्डर पर क़व्वाली का टेप बजाना शुरू कर दिया: 'मेरे दर्द को जो जवां मिले मुझे अपना नामो-निशां मिले'-फैज़ । १२२/मन परदेसी कव्वाली के बोल शुरू ही हुए थे कि दरवाजे पर वेगम मुजीय दस्तक दे रही थी-साना मेज पर लग गया था। रुखसाना को नये कपडो में सजा हुआ देखकर हर कोई उमकी ओर देखता रह गया। वेगम मुजीव अपने कमरे में गई और मोतिया के फूलों का एक गजरा लाकर उसने रखमाना को पेश किया । रुखसाना ने उसे अपनी एक चोटी मे लगा लिया और फिर झुककर जेवा की अम्मी को आदाय किया। खाने के कमरे मे, मेज पर इतना तकल्लुफ देखकर रपसाना के मुह मे निकला, "यू लगता है, जैसे किमी शादी की दावत हो।" "नहीं, दो शादियों की,” महमूद वोला । और फिर सब हमने लगे इनने में बेगम मुजीव हर एक को अपनी-अपनी कुर्मी पर बिठाने लगी। उम दिन सचमुच वेगम मुजीय ने हद ही कर दी थी। तदूरी मुग, येक को हुई मछली, मुर्ग मुसल्लम, विरयानी, मोख-कवाय, दो प्याजा गोन, तिमक, मटर-पनीर, पनीर-साग, दही की चटनी, नान, नदूरी पगटे दो. तीन तरह का मीठा, जिसमे शाही टुकडे शामिल थे । और हर पकवान बेगम मुजीव ने अपने सामने तैयार करवाया था। वम नान बाजार में मगवाए खाना देखकर हर कोई परेशान था, कहा में शुरू किया जा क्या गाया जाए, क्या छोडा जाए "इस दावत मे तुमने क्या तैयार किया है " जेबा की और देवते हुए जाहिद ने पूछा । जेबा ने वैशिक्षक रखमाना की ओर देखा और हर कोई उसकी दाद देने लगा। "स्कूल की लड़की लगती है ।" महमूद ने कहा। "तभी तो मैं साडी पहनती हू," माना कहने लगी "८. कभी भी वारी नहीं आएगी। पता नहीं कितने दिन और नकार पडे।" "वेचारी मारा पाकिस्तान धूम आई है लकिन किमी नवाजा।" महमूद ने चुटकी ली। "वह तो शुक्र है कि मेगे चाटिया नाटक ही पाली थी।" रखसाना ने गदक्ट्रिी?" htी :

याद करते हुए कहा। और फिर जेवा वह किस्सा ज़ाहिद को सुनाने लगी। "इस तरह के मुल्क का क्या होगा ?" जाहिद ने मायूस होकर कहा। "इसमें खरावी क्या है ?" महमूद कहने लगा। "क्या आप अपनी वीवी से पर्दा कराएंगे?" जेवा के मुंह से अचा- नक निकला। महमूद के हाथ-पांव फूल गए। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दे! २६ + राजीव और स्वर्णा सप्ताहांत के लिए मेरठ आए हुए थे। ठहरे चाहे किसी संबंधी के यहां थे, लेकिन सुबह से लेकर आधी रात तक, वेगम मुजीव के घर हंसते-खेलते, खाते-पीते रहते । लगातार ताश चलती। एक के बाद एक बाजी। वेगम मुजीव कभी महमूद और रुखसाना को भी चाय या खाने पर बुला लेती। ताश के साथ लतीफ़ेबाजी, गाना-बजाना, खाना-पीना, छेड़-छाड़ चलती रहती। अनोखा मेल था। महमूद सिगरेट पीता था, शराव को हाथ नहीं लगाता है। राजीव को शराब से परहेज़ नहीं था मगर सिगरेट उसने कभी नहीं पी थी। जाहिद शराव भी पीता था, सिगरेट भी । जेवा लुक-छिपकर सिगरेट पी लेती थी। रुखसाना सिर्फ फैशन के लिए पीती थी। लेकिन मदों के सामने दोनों नहीं पीती थीं। राजीव इतने वरस विलायत काटकर आया था, फिर भी शाकाहारी था। स्वर्णा गोश्त खाना सीख रही थी। कवाव तो खा लेती लेकिन हड्डीवाला गोश्त उससे नहीं खाया जाता था। महमूद सिर्फ सफेद गोश्त खाता था, मछली और मुर्गा । जाहिद को सफ़ेद गोश्त से चिढ़ थी। वह तो बकरे का गोश्त खाता था या वीफ़ । जाहिद को पोर्क पसन्द था। महमूद को पोर्क से नफरत थी। । १२४ / मन परदेसी । दोनो दिन ताश-पार्टी मव जमी। सिवाय इसके कि कुछ देर में महमूद को महमूम होने लगा कि वह लगातार हारता जा रहा था। वारी. वारी वह हर किसीको अपना पार्टनर बना चुका था। लेकिन हमेशा हारला रहा । यस, एक जैया उमके काबू में नहीं आई। आखिर उसने जेवा की और देखा । "न बावा, हने पाकिस्तान नहीं बनना है," जेवा बह- कर टाल गई। वैगम मुजीब पुश थी, बहुत पुग। जमीन पर जैसे उसके पावन लगते हों। इस तरह का वातावरण उसके घर में होता था किमी उमा मे, जब उसका मिया दीवाली के दिनों में ताश को चौकडी जमाया करता थाहर मजहब के उसके दोस्त आते थे। आधी-आधी रात तक उनकी खातिर करती नहीं अपाती थी। शराब पीने वाले शराब पीते, सिगरेट पीने वाले मिगरेट, पान के शौकीनों के लिए वह स्वय पान लगाती रहती। कोई मनाला पसन्द करते, कोई विना ममाला के. पान चबाते। क्सिीको मीठे पान के लिए फरमाइश होती तो कोई मादा पान मागता। किमीकी पसद कुछ, किसीकी कुछ, लेकिन सारे उसके शौहर के दीवाने थे। वह दिन जव परहेजगार हिन्दू वेगम मुजीब के घर धुपके से गोग्न खाने के लिए आया करते थे। रमजान के दिनों में मुमलमान उनके यहा खाना खाने आते । बैठक में चुपचाप बैठे मिगरेट पीने रहते। और तो और, महर का पुलिम-कप्तान, जव भी उसका जी चाहता, शाम को उनके यहा आकर चुस्की लगा लेता । और फिर जब कार मे हुक्म मिलता, चुपके मे दौरे पर निकल जाता और उनके अमले के लोग आकर शेख मुजीब को गिरफ्तार कर लेते । किमीको क्या मजाल जो उसे हयकडी लगाए ! ताश खेलते-गेलते खवरो का वक्त हुआ तो जेबा ने उठकर रेडियो घोल दिया । पाकिस्तान की आर्थिक हालत डावाहोल पी। दिन-प्रतिदिन नाम जरूरत को चोठे महगी हो रही थी। वद और तालाबदी दो घटनाए बढ रही थी। "अव वक्त है कि हिन्दुस्तान से लड़ाई शुरू की जाए।" जाहिद कहा। "क्यो?" महमूद चौंक उठा। मन परदेमी/ १२५ ''आखिर प्रजा का ध्यान किसी और तरफ़ लगाना तो ज़रूरी है।" "और फिर अयूब इतने दिनों से सियासतदानों से वादे कर रहे हैं कि वह पाकिस्तानियों को कश्मीर जीत कर देगा। कब तक वह यूं सज़वाग दिखाता रहेगा ?" राजीव बोला। "आप लोग तो ऐसी बातें करते हैं, जैसे आप सब पाकिस्तान के प्रेजिडेंट की कैविनेट के मेम्बर हों।" महमूद चिढ़ कर बोला । "यह बात नहीं है भाईजान !” रुखसाना उसे समझाने लगी, "आम आदमी की अक्ल भी कोई चीज़ होती है।" "सारी अक्ल तो हिन्दुस्तानियों के पास है।" महमूद ने नाक चढ़ा- कर कहा । इस बार फिर उसके पास बेकार पत्ते आए थे। 'यूं लगता है, जनाव जैसे उस पार से तशरीफ़ लाए हैं !' जेबा ने जान-बूझकर महमूद की टांग खींची। "इनका तो बस जिस्म इधर है, रूह तो सरहद के पार रहती है।" रुखसाना ने महमूद पर चोट की। "यूं लगता है, जैसे महमूद अभी तक पाकिस्तान नहीं गए।" जाहिद ने अनुमान लगाया। "यही तो सारी मुसीवत है।" रुखसाना कहने लगी, "मेरी तरह 'एक बार मज़ा चख लेते तो फिर इन्हें अपना देश इतना बुरा न लगता।" "अंधों में काना राजा।" महमूद ने जैसे ज़हर उगला हो। और फिर पत्ते फेंक दिए । यह वाज़ी भी वह हार गया था। "जव तक जेबा आपका साथ नहीं देती, भाईजान ! आप कभी नहीं 'जीतेंगे।" रुखसाना कह रही थी। लेकिन ज़ेबा कहां थी? शायद वावर्चीखाने में गई होगी। रात काफ़ी हो चुकी थी। वेगम मुजीब सोने के लिए अपने कमरे में चली गई थी। अव जेवा मेहमानों की खातिर कर रही थी। किसीने कॉफ़ी की फरमाइश की थी। बावर्चीखाने में कॉफ़ी बनाते हुए जेवा ने देखा, उसके पीछे कंधे से राजीव कॉफ़ी के प्याले में झांक रहा था । एकदम जैसे वह भौचक्की रह गई। राजीव की गरम-गरम खुशबूदार सांस उसकी गर्दन पर, उसके गले - १२६ / मन परदेसी 1 । के भीतर तक महमूम हो रही थी। वह घबराकर पीछे हटी और राजीव ने उमे अपनी मचलती हुई बाहों में घाम लिया । जेबा की उसकी ओर वमी-की-वमी पीठ थी। उमने अपना सिर उठाकर राजीव की आपों में झाका । अगले क्षण, राजीव के होठ सेवा के होठों पर थे। जमे फूल की दो पतिया धीरे मे एक-दूसरे को छू रही हो। एक गुशबू-गुभबूमी ची। एकदम जमे कोई मदहोग हो गया हो। जेबा राशीव को बाहों में देर हो गई। उसके बाहुपाश मे ममूची घुल गई। जमे मिमरी की डली सुराही में विलीन हो जाती है। महमूद ने फमला किया था कि अगली वाजी वह जेबा को पार्टनर बनाकर मेलेगा। कितनी देर वह इतजार करता रहा । जेवा का बनाया हुआ कॉफी का प्याला कुछ देर बाद राजीव ने लाकर रखमाना की पेश किया। कॉफी की लत वम रखमाना को ही थी। हर दो-तीन घटे के बाद उमे कॉफी की जरूरत महमूम होने लगती। लेकिन जेवा कहा थी कितनी देर में यह कही नजर नहीं आ रही थी। महमूद उसके इंतजार में मिगरेट फूक रहा था। वाकी लोग ताग की बाजी जारी रमे हुए थे। रुखमाना घट-घट कॉफी पीते हुए जीतती जा रही थी। "कमवस्न, जब मेरा माय देती है, मुझे भी हराती है, खुद भी हारती है।" महमूद जल-भुन रहा था। "यही तो बात है भाईजान ! तभी नो लोग कहते हैं कि नाम में बहन-भाई की जोड़ी नहीं निभनी।" विमाना ने महमूद को ऐडा । "मैं जेवा को दूढ़कर लाती हूँ।" स्वर्णा कहने लगी, "यू लगना है, जमे यह मुबह का नाम्ना तैयार करने बैठ गई है।" "मैं बनाऊ?"रममाना कहने लगी, "जंदा अपने कमरे में बिस्तर पर औधी लेटी आममान के तारे गिन रही है।" और स्वर्णा ढूढते-जूढते चैवा के पमरे में गई। मचमुच वह अपने पलंग पर लेटी थी, लेकिन वह तारे नहीं गिन रही यो, वह तोल-न आमू रो रही थी। उसका तकिया जैसे निचुह रहा हो। म्वर्या को अपने कमरे में अकेला देखकर उमरी चीख निरज गई। अपने गले मे मन परदेमी/१२७ टाकर प्यार किए जाती और रोए जाती। स्वर्णा की समझ में कुछ आ रहा था। लेकिन जिस मजबूरी में ज़ेवा रो रही थी, और जिस तरह स्वर्णा को इ प्यार कर रही थी, अगले ही क्षण स्वर्णा सव बात समझ गई। और कर उसने आप-से-आप बोलना शुरू कर दिया, "मैं शर्मिन्दा हूं जेवा नापा! आप उसे माफ़ कर दें। जिस दिन से उसने आपको देखा है, उस- पर तो जैसे जादू हो गया हो। मैंने उसे कई बार समझाया है। कभी यूं भी हो सकता है ? लेकिन उसकी समझ में कुछ नहीं आता। हमारी तो उसने नाक ही कटवा डाली।" "नहीं, नहीं, नहीं !" और जेबा ने स्वर्णा के मुंह पर हाथ रखकर उसे चुप करवा दिया। २७ कोई महमूद हर कोई अभी बहुत दिन नहीं बीते थे कि सचमुच पाकिस्तान और भारत में जैसे लड़ाई की शुरुआत हो गई। सीमा पर घुसपैठ करने वालों की गति- विधियां तेज हो गई। कोई-न-कोई शरारत हर रोज़ हो जाती। उस शाम महमूद वेगम मुजीव के यहां बैठा हुआ था। कुछ दिनों से से दूर-दूर रहने लगा था। शायद इसीलिए वह वेगर मुजीव को और अच्छा-अच्छा लगता। किसी-न-किसी बहाने उसे बुलब भेजती। खास तौर पर जव भारत और पाकिस्तान की कोई समस होती तो उसकी राय जानने की जरूर कोशिश करती। उसका दृष्टिकोण हमेशा दूसरों से भिन्न होता । वेगम मुजीव को सब कुछ उचित प्रतीत होता था। वेगम मुजीव पान बनाकर महमूद को दे रही थी कि जाहिब गया। उसके हाथ में अंग्रेजी की कोई पत्रिका थी। उसे महमूद वढ़ाते हुए उसने कहा, "प्यारे, उस दिन तुम हमसे ख़फा हो गए , की १२८/मन परदेसी गजीव नौर मैंने कहा था कि पाविस्तान को अब कश्मीर का होना फिर खडा करना चाहिए।" "लेकिन उन्होंने तो लडाई को गुरआन भी कर दी है," वेगम मुजीव बोली । उनकी परेशानी जमे उसके चेहरे पर अकिन थी। देवारी का आधा खानदान इधर था, आधा उधर । उसरा जेठ दहा बीमार पड़ा था। देवर इंजीनियर था। देवरानी का गौहर फ़ोन में कर्नल था। अभी- अभी निगेडियर बनाया गया था। और भी तो रितने रिश्तेदार थे। एक बेटी इधर टीक सरहद पर अमृतसर में बैठी थी। चाहे इतने दिनों से बेगम मुजीव ने उसे मुह नहीं लगाया था, लेकिन पी तो उसकी बेटी ही। "हर कोई अपने हक के लिए लड़ता है।" महमूद कहने लगा, "पाकिस्तान की हुकूमत ने चुनाव करवाकर लोगो की राय जान ली "कि भारत पर हमला किया जाए?" वेगम मुजीब ने हैरान होकर पूछा। "नहीं, कश्मीर पर अपना हक जमाया जाए," महमूद ने जरा धीमी आवाज में कहा। जाहिद ने मुना और अपने निचले होठ को काटा, जगे कोई दात पोम- कर रह जाए। इतने मे टेलीफोन वजने लगा। जाहिद ने शुक्र मनापा और गैलरी में फोन सुनने चला गया। मद अंग्रेजी की पत्रिका पढने लगा। कुछ देर उसपर नजर डाल- कर उसने उसे मामले मेज पर पटक दिया। ऐमा लगता था कि जो कुछ उसमे छपा था, महमूद को गवारा नहीं पा । यह देखकर बेगम मुजीब उम लेख को पढ़ने लगी। महमूद ने मिगरेट मुलगा लिया। तब तक जाहिद टेलीफोन सुनकर आ गया था। टेलीफोन मुनते हुए, उमने मन-ही-मन फैसला किया था कि महमूद में इस बारे में बात करनी चाहिए। जो भी उमका पक्ष था, उमे ममलाना चाहिए। "महमूद ! जिम चुनाव को वान तुम कर रहे थे, उगके बारे में तुमने उममें दंगा होगा, सव फर्जी थे।" जाहिद महमूद को समझाने की कोगिरा मन परदेमी/१२६ कर रहा था। "पाकिस्तान में बीस फीसदी लोग पढ़-लिख सकते हैं। इनमें तीन फ़ीसदी औरतें हैं जो पर्दे में रहती हैं। वाकी सत्रह में से सात फीसदी लोगों से वोट देने का हक छीन लिया गया है। इनमें सरकारी नौकर भी शामिल हैं, स्कूलों-कालेजों के उस्ताद भी, और अखवार- नवीस भी।" "तो क्या हुआ? हर पिछड़े हुए देश में यूं ही होता है।" महमूद इस दलील में कोई वज़न नहीं देख रहा था। "और पाकिस्तान के अलवार 'आउटलुक' का वह इल्जाम भी तुमने पढ़ा है कि कराची की कानवेंशन में मुस्लिम लीग ने जनरल अयूब की अगवाई के लिए पचास हजार रुपया इकट्ठा किया और लोगों को भाड़े पर ट्रकों में लादकर हवाई अड्डे पहुंचाया गया।" "मामूली वात है।" महमूद कहने लगा, "इस देश में कांग्रेस करोड़ों रुपये इस तरह के कामों में खर्च करती है।" "और वह भी तुमने पढ़ा होगा कि चुनाव के बाद कराची के जिस हलके में लोगों ने अयूब को वोट नहीं दिए, अयूव के बेटे गौहर अयूव ने अपने गुंडों के साथ उनके घर जलाए । उनकी जवान बेटियों की इज्जत लूटी। कई लोगों को गोली का निशाना वनाया गया और पुलिस यह सब कुछ देखती रही। सितम यह है कि वह महाजरों की वस्ती थी। वे लोग, जो हिन्दुस्तान को छोड़कर पाकिस्तान की 'जन्नत' में गए थे।" "अगर वे उधर न जाते तो इधर उनका यही हाल होता, जो हम- पर बीत रही है । कल राउरकेला में जो कुछ हुआ था.'" महमूद अपनी । वात पर अटल था। "पूर्वी पाकिस्तान में जगह-जगह हड़तालें हो रही हैं। मिलें और कारखाने बंद पड़े हैं। पुलिस बात-बात पर गोली चलाती है। पश्चिमी पाकिस्तान जैसे किसी ज्वालामुखी के दहाने पर बैठा हो। और सरकार ने घुसपैठियों को सिखलाई देकर कश्मीर में भेजना शुरू कर दिया है।" "और चारा भी क्या रहा है ?" महमूद बड़ी वेवाकी से पाकिस्तान का पक्ष ले रहा था। "और महमूद ! तुम सोचते हो, इधर भारत में हमने कांच की चूड़ियां १३०/ मन परदेसी - पहन रखी हैं ? हम उनका मुंह तोड़ जवाब नहीं देंगे?" जाहिद को भाभ तौर पर गुस्सा नहीं आता था, लेकिन जिस तरह महमूद वहम कर रहा था, जाहिद अपने-आपको सयत न रख सका। बेगम मुजीब इतनी देर लेप पड़ रही थी। यदमनी बडती हुई देखकर उसके हाथ-पाव फूल गए । उसकी ममन में कुछ नहीं आ रहा था। इतने में सामने से जेवा आनी हुई दिगई दी। और महमूद अपनी सिगरेट बुझाकर चल दिया। उसका इरादा था कि वह बाहर आगन मे जेवा से अकेला जा मिलेगा। इसमें भी उसे मायूमी हुई। जेवा रिवगा से उतरी। रिक्शावाले को उमने पैसे दिए और मामने लॉन में गुलाब की क्यारो को और चल दी। वेगम मुजीय बड़े धर्य में शाहिद को समझा रही थी कि उसको नजर बाहर जा पडी। जैसे जेवा लॉन की ओर गई मो, उसकी थम्मी को लगा, कि उमने जानबूझकर महमूद को जलील किया था। एक क्षण भर में उमे महमूद को मारी बेहूदगी भूल गई और जेवा पर गुस्सा आने लगा। "यह भी कोई बात हुई।" जन जंबा कमरे मे आई, वेगम मुजीव उस- पर वरम पडी, "यह भी कोई बात हुई, यू घर आए किमोसो जलील करना आदमी को अपना अखलाक तो नहीं भूलना चाहिए।" "अम्मीजान ! क्या हुआ है ?" "महमूद को देखकर तुम लॉन की ओर निकल गई" धेगम मुजीब ने इल्जाम लगाया। "और में मोचता हूँ, वह जल्दी में उठा भी इमलिए था कि जेबा से वाहर मुलाकात हो जाए।" जाहिद हंसकर बात टाल रहा था। "यह हसने की बात नहीं है जाहिद बेटा " बेगम मुजीव सरन राफा थी। "येश! वेशक अम्मीजान !"जेवा बंटकर आराम में बात करने लगी। "मैं अल्लाह की कसम खाती है कि लॉन में जाने से पहले मैंने महमूद को नही देया था। मेकिन अगर मैं उसे देय लेनी तो जरूर सॉन की और चली जाती।" शाहिद जोर-जोर से हसने लगा। मन परदेमी/१३१ "आखिर उसका गुनाह क्या है ?" वेगम मुजीव आज किसी नतीजे पर पहुंचना चाह रही थी। "अम्मी! इसपर पर्दा ही पड़ा रहने दें।" जेवा वात को बढ़ाना नहीं चाहती थी। "कोई नहीं ! जरा-सा रास्ते से भटका हुआ है । ख द ही समझ जाएगा।" ज़ाहिद की राय थी। "जाहिद भाई, आपको मालूम नहीं, यह आदमी आस्तीन का सांप है।" "क्या बके जा रही हो जेवा?" जाहिद जैसे यह सुनने के लिए तैयार नहीं था। "मैं बक नहीं रही। मैं एक हक़ीक़त को बयान कर रही हूं।" जेवा को यह महसूस हुआ, जैसे अव उससे वह भेद छिपाया नहीं जाएगा। कितने दिनों से एक गठरी की तरह बांधकर उसे वह सिर पर लिए फिर रही थी। "जिस तरह वह सोचता है, जिस तरह की बातें वह करता है, भारत के कई नौजवान यूं भटके हुए हैं। यह बीमारी बस मुसलमानों में ही नहीं, सिख भी तो खालिस्तान के नारे लगाते रहते हैं। और हिन्दू तो इनसे दो कदम आगे निकल गए हैं। 'हिन्दू-राष्ट्र' का नारा मेरी नज़र में पाकिस्तान के नारे जैसा ही तो है। कल चीन हमारे मुंह पर थप्पड़ मारकर गया। और आज कई हिन्दुस्तानी चीन के दीवाने हैं। माओ का नाम लेकर राह पाते हैं। "महमूद इन सबसे ज्यादा खतरनाक है।" जेवा के सत्र का प्याला छलक रहा था। "मैं भी तो सुनूं ?" वेगम मुजीव को जैसे अभी तक महमूद के विरुद्ध किसीका आवाज उठाना स्वीकार न हो। "अम्मीजान! आपको याद है कि वह इतवार का दिन था जब महमूद ने आपको आकर बताया था कि अलीगढ़ में फ़साद छिड़ गए हैं ?" । "तब तक अलीगढ़ में फ़साद शुरू नहीं हुए थे। फसाद उससे अगली १३०/A रात शुरूहए।" "क्या मतलब ?" वेगम मुजीव और जाहिद दोनों चौंक उठे। "मतलब, अब आप खद निकाल लें।" उंचा कह रही थी। २८ उम धाम लॉन के कोने मे जंवा गुलाव की पारी की ओर गई थी, यह देखने के लिए कि काले गुलाब को कोई और कली लगी है या नहीं। पिछली बार राजीव ने उम गुलाव की एक अपिली कली नोकर उनके बाली में मजाई थी। मांश ढल रही थी और फिर कितनी देर वे सोन में टहलते रहे थे। जवा या दीवानापन, उमे प्रतीभा रहती कि कब अगली बली फूटेगी, कव अगली कली मिलेगी और वह उसे अपने जूडे में लगा गरेगी? राजीव के माप उनकी मुहब्बत मे काले गुलाब का एक प्रतीक बन गई। उस जैमी मुन्दर । उम जमी मदभरी। उम जनी मुगधित । उस जमी मधुर । और उस जमी काली । जमे धुप-अधेरी रात हो । अकेली बैठी हुई, कभी जेवा को लगता, जैने ठडी-मोठी फुहार पड रही हो। जंगे रिमझिम-रिमझिम वर्षा होने लगे। छल-छल वादन फूट पर्ने हो। चारों और जल-थल हो जाए। अन्दर-बाहर धुन्ना-धुला। टोले. भुरभुरा रहे । गड्ढे भर रहे । निचुह-निचुड़ रहे वृक्ष । नहाई-नहाई टहनिया । कही पलिया आखें गोन रही। कही यानिया अगडाई से रही। कही कलिया गरमाई-गरनाई। कही कलिया मुसकाने नुटा रही । कही कलिया पिलखिल हम रही। राह चलनो को वाध-याध रही। गुगबू. बाबू पारो ओर; भीनी-भीनी लपटें छोड़ रही, फैल रही। एक मादकता, एक मस्ती, एक युमार । एक मौज । एक सहर । एक उन्लामा जमे धरली करवट से रही हो। आवाज दे रही हो। वाहें फैला-फला बाहु-पाग में लेने को मचल रही हो। और फिर जैसे एकाएक काले वादल उभर आए । पारो बोर मन परदमी/१३३ - ई घटाएं छा जाएं। बादल-पर-वादल चढ़ आएं। काल है। काले हाथियों की तरह । काले पहाड़ों की तरह । और फिर बिजली कने लगे, जैसे मस्त नागिन हो । विप घोल रही, फुकार रही, काटने दौड़ रही। बादल गरज रहे। गड़गड़ा रहे। गूंज रहे । आंधी और फ़ान । बौछार जैसे पटक-पटककर फेंक रही। और फिर ओले। करीली वरफ़ । लहू-लुहान कर रही हड्डियां चटखा रही। अंग-अंग घायल कर रही। निढाल अधमरा, वेहोश करके फेंक रही। और ज़ेवा उदास-उदास, दुखी-दुखी, आस-पास से वेज़ार, रुआंसी- रुआंसी, अकेली पड़ी रहती। प्रायः उसका कमरा बंद होता । दरवाज़े को चटखनी लगी रहती। पर्दे गिरे हुए। जितना इस बारे में सोचती, जेवा को लगता, जैसे कोई वंद गली हो, जिसमें वह आ घुसी थी। चार क़दम, और एक पत्थर की दीवार से उसे अपना सिर टकराना होगा। दीवार के कान नहीं होते। दीवार की आंखें नहीं होती । न उसे कोई सुनेगा, न उसकी ओर कोई एक नज़र देखेगा। और उसका दम घुटकर रह जाएगा। न आगे जा सकेगी, न पीछे। जैसे कोई अंधे कुएं में कूद पड़े। नीचे ही नीचे धंसता चला जाए। अंधेरे से और घने अंधेरे में। कीचड़ से और गंदले कीचड़ में, दल-दल से और गहरी दल-दल में। उसकी अम्मी ने अभी तक सीमा को मुंह ही नहीं लगाया था। इतने वर्ष हो गए थे । ढेर-सारा पानी पुल के नीचे से गुज़र चुका था। महात्म गांधी की शहीदी के बाद अपने भीतर भरा हुआ साम्प्रदायिकता का वि वह समूचा उगल वैठी थी। लेकिन अपनी बेटी को उसने अभी तक क्ष नहीं किया था। उससे मिलने को उसका मन नहीं माना था । वहन- आपस में मिलते। वह सुना-अनसुना कर देती। देखी, अनदेखी कर दे न किसीको मना करती, न स्वयं किसीकी वात मानने को तैयार है भीतर-ही-भीतर जहर घोलती रहती। वह मां, जेवा की इस ज्यादव जो कुछ भी करे, वह थोड़ा होगा, वह तो उसे किसी हिन्दू लड़के क नहीं लेने देती। वह तो सुनते ही माथा पीट लेगी। वह तो खान छोड़ देगी। छल-छल आंसू बहा रही, फ़रियाद करेगी । वह तोच १३४ / मन परदेसी खाकर जान दे देगी । अपने-आपको कमरे में बंद कर फूक डालेगी। कुए में छलाग लगाकर डूब जाएगी । वह फिर अपने गौहर की कद्र के चक्कर काटना शुरू कर देगी। घटो सजदे में पडी दुआए मागती रहा करेगी। इस तरह की औरत की वद्-दुआ तो किमीको भस्म भी कर सकती है। इस तरह की विधवा के मुह से निपला शाप किमीको झुलम- कर फेंक सकता है । इस तरह के दुखी-दिल को कराह, कोई बच नहीं सकता। हरी टहनिया मूग्र जाती है। लहलहाते संत मुरझा जाते हैं । फिर वह याद दिलाएगी अपने मिया की नमाजी की। अपने घर वाले की इस्लाम में अकीदत की। उधर राजीव के घर वाले कट्टर सनातनधर्मी थे। अपनी कोठी में उसके मा-बाप ने अपना अलग शिवालय म्यापित किया हुआ था। हवन होते थे । चदन लेपा जाता था। धूप-अगरवती जलाई जाती। घटे-घडियाल बजाए जाते। प्रत और उपवास, नियम और धर्म । राजीव गुद इतने वरम विलायत रहकर आया था, लेकिन फिर भी शाकाहारी था। कैसे भोलेपन से कहता था, “अगर बहुत मुश्किल होती तो मैं भूपा रह लेता।" लेकिन वह अपने धर्म पर वैसे-का-वैमा कायम रहा था। उन दिन उसके होंठो पर होठ, जब वह दीवानों की तरह उगे चूम रहा था, जैसे किसीपर जनून सवार हो, जेवा ने अत्यन्त लाड मे उभे छेडते हुए कहा था, "राजीव । यह होठ तो सारी उम्र मास घा-पाकर पलीद हुए पड़े है।" और राजीव ने एक नजर उसकी आखों में देया पा और फिर उसे अपने वाहुपाश में लेकर चूमना शुरु कर दिया था । मुह पर. माथे पर। पलको पर, पपोटो पर, गले पर, गर्दन पर । उसके अग- अग को, पोर-पोर को दुतराता और चूमता। जया कहती, "राजीव ! तुम कोई बात करो।" वह आप मूर्दै एक वहशत में उसे प्यार करने लग जाता । उसके हाथी पर, उसको वाही पर, उमक कधी पर। जंवा कहती, "राजीव ! मुझे एक बात कही है।" वह उसके होठो पर होठ रसे, उमवी जबान को जैसे ताला समा देता । कितनी-कितनी देर उसकी जीभ इसको जीम पर तैरती रहती। - मन परदेसी/१३५ चा कहती, "राजीव ! मैं अम्मी को क्या जवाब दूंगी?" र वह उसे और भी सीने के साथ चिपका लेता। और भी कलेजे प भींच लेता। जेवा कहती, "मेरा नमाजी अब्बा मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा," और उसे अपनी बांहों में लेकर जैसे समूचा उसे अपनी आंखों में बिठा रहा अपने मन-मन्दिर में जैसे उसकी मूर्ति स्थापित कर रहा हो। कितनी लंबी-लंबी चिट्ठियां लिखता था ! स्वर्णा कहती-विलायत भैया का बस पैसों के लिए केवल आया करता था। चिट्ठियां तो वस धर से जाती थीं। कभी पिताजी की, कभी माताजी की। कभी किसी बहन की, कभी किसी भाई की। और अव एक चिट्ठी उसकी हर रोज़ आती थी। कभीएक से अधिक । कभी चिट्ठी लिखकर टेलीफ़ोन करने बैठ जाता। टेलीफ़ोन करके हटता और चिट्ठी लिखने लगता। एक दीवानापन । कभी यूं भी किसीने किसी- से प्यार किया होगा? कभी यूं भी कोई किसीपर कुर्बान हुआ होगा? जेवा उसे समझाने की जितनी कोशिश करती, जितनी बार कोशिश करती उसे रोकने की, वह स्वयं उसके साथ वह-बह जाती। जितना अपने- आपको रोक-रोक रखती, हवा का एक झोंका आता और वह एक तिनके की तरह एक बवंडर में उड़ने लगती। राजीव को बचाते हुए वह खुद गोते खाने लगती। जेवा को डर था कि उसके ननिहाल की, राजीव के घर वालों से दोस्ती पीढ़ियों से चली आ रही थी। हमसाये मां-बाप के जाये। वे लोग तो घी-शक्कर की तरह कितने दिनों से रहते चले आ रहे थे। वंटवारे के फ़सादों के दिनों, अगर मुसलमानों का जुलूस सड़क से गुज़र रहा होत तो उसके ननिहाल के लोग राजीव की कोठी में जा बैठते । और अग जुलूस जनसंघियों का होता तो राय साहब खुद नौकरों समेत, इन ननिहाल की कोठी में आ जमते । क्या मजाल जो आंखें उठाकर भी के उनके वंगले की तरफ़ देख जाए। उनकी सड़क पर कैसी-कैसी वारत नहीं हुई थी ! कितने घर लूटे गए थे ! लेकिन किसीकी मजाल नहीं कि इन दो पड़ोसियों की तरफ़ बुरी नजर से देख जाए। . १३६ / मन परदेसी वडा शोर मचेगा! बड़ा गंद उछलेगा! बड़ी-यडी बदनामी होगी! जो कोई सुनेगा, उनकी मा को ताने देगा, उमर अग्या को बुरा-भला कहेगा! दीप हर कोई उसकी मा के गिर पड़ेगा ! दोपी हर कोई उमर टहराएगा बेचारी उसकी मा वेिचारे उमके अध्या! अब्बा को २९ . कोई जमाना था कि उनके यहा होली मनाई जाती थी। डेगा को कुछ-कुछ याद था, लेकिन उसके बव्या के गुर जाने के बाद फिर ऐमा कभी नहीं हुआ था । वाम तौर पर वटवारे के फसाद के बाद । सीमा के शादी करवा लेने के बाद तो उसकी अम्मी ने जमे अपने-आपको हिन्दू बहोन-पडोम से, हिन्दू मिलनेवालो से कतराना शुरू कर दिया था। उनमे मिलकर उमे लगता, जमे उन्ही में क्रिमीने उसके घर मेंघ सगाई हो। धीरे-धीरे वेगम मुजीव सिमटती जा रही थी। इस तरह तो किमी दिन वह अपने आपको अपनी कंचुली में समूची ममेट संगी। जेवा कुछ इस प्रकार मोचती थी। उम दिन यू ही बैठे-बैठे जेबा कहने लगो, "अम्मी । घर हमने कभी होली नहीं मनाई" "किसी मुमलमान के घर होली मनाने का कोई मतलब नहीं।" येगम मुजीब के मुह मे निकला, जमे घोडी-गोडी हो। "वेशक नम्मी! पर होली कोई हिन्दुओ का त्योहार पोडे ही है। यह तो कौमी त्योहार है।" वा जानबूझकर अम्मी को है। रही थी। जब से उमे महमूम होने लगा था कि जेरा का राजीव से मेलजोल बढ़ रहा है. बेगम मुजीव हिन्दू मिलने-जुलने वालो विची-गिची रहने लगी थी। "ढोलक और फ बजाना, गीत गाना, नाचना रिसे अच्छा नहीं लगता? होली में क्तिने दिन पहले सोग गा-गाकर, नाच-नापाटे मन परदेमी/१३७ -- होने लगते हैं।" जेवा आपसे-आप वोल रही थी, जैसे किसी किताब में से कोई लिखा हुआ पढ़ रहा हो। और फिर होली से कोई पंद्रह दिन पहले ढाक और टेसू के फूलों को पानी के भरे मटकों में चूल्हों पर चढ़ा देना ताकि उनका रंग पानी में खिल उठे।" "और फिर होली के दिन रंग और गुलाल, रंग और अवीर, कितना प्यारा त्योहार है ! " यूं लगता, जैसे जेवा तूलिका की कोमल नोक से कोई चिन्न उभार रही हो। "इस्लाम में ये सब कुछ हराम है।" वेगम मुजीब ने नाक चढ़ाकर कहा। "अम्मी ! मुग़ल राज में तो होली बड़ी धूमधाम से मनाई जाती थी। बादशाह होली मनाते थे। नाच होता था। जाम उछलते थे।" वेगम मुजीव चुप । जैसे जेबा बेकार वक-वक कर रही हो। "बहादुर शाह जफ़र होली मनाते थे। उन्होंने तो होली पर शे'र भी लिखे थे: क्यों मुंह पर रंग की मारी पिचकारी, देखो कुंवरजी, दूंगी मैं गारी।" वेगम मुजीव जैसे सुनी अनसुनी कर रही हो। "नवाब आसिफ़-उद-दौला बड़े शौक़ से होली मनाया करते थे।" "लखनऊ के नवाबों को तो कोई वहाना चाहिए होता था, रंगरेलियां मनाने का।" बेगम मुजीव ने फिर त्यौरी चढ़ाकर कहा। "इन्द्र के अखाड़े का मंजर पेश किया जाता। पिचकारियां छोड़ी जातीं। गुलाल उड़ाया जाता। जाम के दौर चलते । नाच और गाना। और फिर भूखे-नंगों को दान दिया जाता। भंडारे लगते। सदा बरत सजते।" "सव फ़िजूल।" वेगम मुजीव को जैसे इसमें कोई दिलचस्पी न हो। "अम्मी ! भूखे-नंगों को खिलाना-पिलाना, खैरात वांटना, ये हिन्दू रस्म-रिवाज में पहले नहीं होता था। होली के दिन ऐसा करना, यह मुसलमानों की देन है इस त्योहार को।" - १३८ / मन परदेसी

"तो फिर क्या हुआ ?" वेगम मुनीय अभी तक नहीं भीगी थी।
"यही नहीं, हर फकीर, हर जरूरतमंद को एक-एक रपया हदिया
के तौर पर बाटा जाता था।"
वेगम मुजीब खामोग रहो।
"नजीर अकबराबादी ने लिया है।
मचाते होलिया आपस में ले अयोर ओ गलाल.
वने हैं रग से रगी निगाह होली में।"
बैंगम मुजीब चुप ।
"अम्मी, अगर मुसलमान होनी में दिलचस्पी न रयते होते तो शाह
हातिम जैसा मुमलमान भायर होली का इस तरह का नया कभी भी
नखीच सकता
मुहैया मय है अब अनवाब होली
उठो यारो भरी रगो ने झोली
इधर यार और उधर सूवा एफ-आरा
तमाशा है तमाशा है तमाशा ।
चमन में घूमो गुल चारो तरफ है
इधर ढोलक उधर आवाजें ढफ है
इधर आशिक उधर माशूक की मफ़
नशे मे मम्त या हरेक जाम वर कफ
गुलाल अवरक से भर-भर के झोली
पुकारे या-वकयक होली है होली।"
"लेकिन अम्मी पर आज यह 'रो-शायरी क्यों हो रही है ? यह सब
कुछ मुझे क्यों मनाया जा रहा है ?"
"अम्मी ! हम हिन्दुस्तानी है। हमारी यह मीरारा है।'
"वेशक ! बैशक !" बेगम मुजीव ने जमे निड़कर कहा हो।
"अम्मी, यह बताइए कि हमारे अव्या होली मनाते थे या नहीं ?"
जैसे किसीने किसीके जीवन के अत्यात मुन्दर अध्याय का पन्ना
उलटकर उसके सामने खोल दिया हो। एक पल पकने की देर में
वेगम मुजीव और-को-और हो गई। एकदम पिल-गो गई। उमरो आगों
मन परदेसी/१३६

में कोई सुहानी यादें तैरने लगीं। और फिर एक नशे-नशे में वह जेवा को बताने लगी: "होली की दो यादें मुझे कभी नहीं भूल सकीं।' ।" "कौन-कौन-सी अम्मी ?" जवा ने उतावले होकर पूछा। अपनी अम्मी की निष्ठुरता के किले को तोड़ने में वह सफल हो गई थी। "तव हमारा अभी रिश्ता नहीं हुआ था। मेरे अन्वा और अम्मी लड़के को देखने के लिए अलीगढ़ से मेरठ आए । तेरे दादा के यहां पहुंचे। उनकी बड़ी खातिर हुई। लेकिन लड़का कहीं नजर नहीं आ रहा था। वह होली का दिन था । कितनी देर इंतजार करते रहे। खा-पीकर निपटे तो लड़का आंगन में आन टपका । मुंह-सिर नीला-पीला, वालों में रंग, कपड़े रंग से लथपथ, हाथ क्या, बांहें क्या, गाल क्या, गर्दन क्या, हर अंग तरह-तरह के रंगों से पुता हुआ । जैसे कोई भूत आंगन में आ धमका हो । तेरे दादा-दादी के हाथ-पांव फूल गए। इस रिश्ते के लिए तो उन्होंने वार-वार पैग़ाम भिजवाए थे। और आज जब बात पक्की होने को आई भी, तो लड़का जैसे कोई बहुरुपिया हो, अपने होने वाले सास-ससुर के सामने खड़ा था। तेरे नाना-नानी हंस-हंसकर लोट-पोट हो रहे थे। फिर यह फैसला हुआ कि वे एक रात मेरठ ही रुक जाएं । वाकी सारे दिन लड़के को मल-मलकर नहलाते रहे। तेरी दादी हंसा करती थी, सावुन की कई टिकियां घिसाई गई, तब कहीं जाकर लड़का इस काबिल हुआ कि उसके होनेवाले सास-ससुर के सामने पेश किया जा सके।" "अम्मी! क्या निकाह से पहले आपने अब्बा को कभी नहीं देखा - . । । । 'था?" "देखा क्यों नहीं था ?" अम्मी के गाल लाल-लाल हो गए, “एक वार बात पक्की हो गई तो फिर हमें कोई रोक नहीं थी।" "आपके मां-बाप ने इजाजत दे दी थी?" जेवा ने हैरान होकर पूछा। - "यह बात तो नहीं !" बेगम मुजीव ने शरमाते हुए कहा, "लेकिन हम लोग मिल लेते थे। कभी किसी बहाने, कभी किसी बहाने । कभी किसी- की मदद से, कभी किसीकी मदद से।" १४०/मन परदेसी "और अम्मी, होली को दूमरी कौन-मी मुहानी याद है आपको?" जंया अम्मी को वातों में लगाए रगना चाह रही थी। "उस दिन शहर में होली मनाई जा रही थी। होती है', 'होली है चिल्लाते लोग सड़ओं पर रंग की पिचरारिया छोडते, गुलाल उड़ाते, एक- टूमरे को रगत्ते, नाचते-गाते वेहाल हो रहे थे। मैं घर में अकेली थी। तेरे अन्वा कई महीनों में फिरंगी को कंद काट रहे थे। गिडकी में पडी बाहर होली का हुइदग देशकर और भी उदास हो रही थी, और भी अवेली महमूम कर रही थी कि मैं क्या दंपती हू कि होली मेलने वाली को एक टोली ढोल पीटती, नफोरिया बजाती, रग वी पिचकारियां छोडती, नामनी-गाती, गुलाल उडाती हुई मामने हमारे बंगले में आ धुनी। और मेरी आखें खुली-की-जुली रह गई। उनमें तुम्हारे अब्बा नवने आगे पे पार लोगों ने उन्हें जेल में छूटते ही, रास्ते में पकड लिया था। और वे होली सेलने लगे। होली खेलते-गेलते घर आ पहुचे । यह कोई मानने वाली बात है ?" - ३० फिर बेगम मुजीय से एक गलती हो गई। मामूम-सी गलती, जिसके लिए किमीको अपार कष्ट झेलना पड़ता है। एक सुबह जेवा कहीं बाहर गई हुई थी। हाक में उसके नाम चिट्ठी आई। चिठ्यिा उवा के नाम आती रहती थी, उाहिद के नाम आती पी, स्वय उनके नाम आती थी, उसने कभी किमी और को हार की तरफ नहीं देगा । उस दिन, पता नहीं उनके मन में क्या वह्मत-मी आई कि उसने जैया के नाम आई चिट्ठी की पोलकर पढ़ लिया। चिट्ठी राजीव की पी। ज्यों-ज्यों वेगम मुजीय चिट्ठी पानी जाती, उसके पाव तले में उमीन निक्लती जा रही पो। उमर हापों के तोते उर रहे थे। उसके कानो मे एक अजीव मनगनाहट-मी मुनाई देने मगी। उमपी मन परदेसी/१४१ आंखों के सामने अंधेरे के चक्कर बनने लगे। चिट्ठी पढ़ने के बाद, उसे बस इतनी होश थी कि बेगम मुजीव ने लिफ़ाफ़े को फिर उसी तरह चिपका- कर वाक़ी डाक में रख दिया। अपने कमरे में अकेली पलंग पर पड़ी वेगम मुजीव मन-ही-मन में विप घोल रही थी। वे तो उससे कहीं आगे निकल गए थे, जितना वह सोचती थी। उसे इस बात का भी विश्वास था कि ज़ेवा की इस हरकत में ज़ाहिद की अगर रजामंदी नहीं थी तो हमदर्दी ज़रूर थी। कम-से-कम ज़ाहिद जेवा की इस कमजोरी से परिचित ज़रूर था। वेगम मुजीव सोचती, वह बस अकेली थी कुढ़ने के लिए। वह वस अकेली थी इस भाड़ में भुनने के लिए। अकेली थी वह रोने और फ़रियाद करने के लिए । एक विधवा की सूली पर टंगी जिंदगी । और यह फांसी का फंदा बेगम ने स्वयं डाला था। उसे किसीके नाग आई चिट्ठी नहीं पढ़नी चाहिए थी। यह तो उतनी ही बड़ी ग़लती थी, उतनी ही माफ़ न की जाने वाली गलती, जितनी गलती' शायद जेवा कर रही थी। बेगम मुजीव की मुसीवत यह थी कि वह यह क़बूल भी नहीं कर सकती थी कि उसने अपनी बेटी के नाम आई चिट्ठी चोरी से पढ़ ली थी। अगर चिट्ठी नहीं पढ़ी भी तो उसे वह सब कुछ कैसे पता चल गया था जो उसे मालूम था, और जिसे जानकर वह भीतर-ही-भीतर घुलने लगी थी ? बेगम मुजीव सोचती, अगर वह अपनी पढ़ी-लिखी, जवान-जहान वेटी से खफ़ा होकर उसे डांट कर मना करती है तो जितना आगे वह चली गई थी, जो उसे कल करना था, वह आज कर लेगी। उसके रोके वह नहीं रुकेगी। यह भी वही कुछ कर लेगी जो सीमा ने किया था। यह सोचकर उसका दिल डूबने लगा। वह तो कहीं की भी नहीं रहेगी। न इधर की, न उधर की । उसका तो मुंह काला हो जाएगा। न दीन रहा, न दुनिया रहेगी । उसे न खाना अच्छा लगता, न पीना । छिप-छिपकर छल-छल आंसू बहाती । उसने ऐसा रोग पाल लिया था जिसका कोई इलाज नहीं था। बस, एक ही रास्ता उसे दिखाई देता था कि धीरज और प्यार से किसी प्रकार वह जेवा को समझा-बुझा ले । किसी तरह वह मान जाए तो । . १४२ / मन परदेसी बेगम मुजीव सोचती, वह जेबा को लेकर पाकिस्तान चली जाएगी। ग्नि पाकिम्नानी तो जैसे लड़ाई पर तुले हो । हर रोज नये-नये गोगे रहे थे। यह लडाई तो कभी भी भडक सकती थी। वेगम मुजीय कुछ भी नहीं कर मकी। हर रोज भारी-भरकम नीता लिफाफा आना, हर रोज टेलीफोन मिलाए जाते; कभी इस नरफ गे कभी उन तरफ मे। कितनी-कितनी देर ये गुमर-फुगर करते रहने । बेगम मुजीव के मीने में जंगे धुरिया चल रही हो। उसके अग अग को जगे कोई काट रहा, टुकड़े-टुकडे कर रहा हो। भयमे ज्यादा दुषी वेगम मुजीव तब होतो अब जेवा उमगे पूघ्नी. "अम्मी आपको क्या हो रहा है ? हर वाम बुशी-बुझी-सी, हर यस्त कामी-हामी, हर वक्त उगडी-उपडी-मी" उमे लगता, जमे उसकी छाती पर नड-नड गोलिया चल रही हो । उमका मीना छलनी होकर रह जाता। और फिर जब जेवा या जाहिद राजीव की बातें करने लगते, किननी. कितनी देर उगे अच्छा-उच्छा कहते रहते, उसके गुण गाते जैसे उनकी जबान न थकती हो । उनका रग, उमका रूप, उमका काद-बुन, उमा स्वभाव । क्या मजाल जो कोई मकोणना उसके मन में कहीं हो। हिन्दुओं जमा हिन्दू । मुसलमानो जमा मुसलमान । एक नमूना सच्चे हिन्दुस्तानी का। "अम्मी जरा मोचिए, जो जवान-जहान लड़का इतने वरम विलायन रहार वगे-का-वैसा बंजीटेरियन लौट आया है, उसका किरदार फंना होगा'" जेवा एक में अधिक बार येगम मुजीव को यह गुना धुरी यो। जितनी धार जेबा उमकी याद दिलाती, वेगम मुजीब को पगता जम उमकी मुह पर शिसोने थप्पड दे मारा हो । न यह इधर को पी, न उभर फो। न वह हिन्दुस्तानी थी, न पाकिस्तानो। उमकी ममा में कुछ न आना। कोई उमे आगे पोचता, कोई पौधे। कोई उसे दायें पीवता, कोई वायें। दिन-रात के इस मघपं में यह टुकड़े-टुकड़े होती जा रही थी। चंगम मुजीव भीतर को विधवा लहू के आगू रोती रहती। कभी जो उमका शौहर आज होना, वह अपनी तमाम ममस्याए उमरी सोनी में डालकर आप अलग हो जाती। जो वह उचिन समाता, करता। जो यह मन परदमी/१४३ आंखों के सामने अंधेरे के चक्कर वनने लगे। चिट्ठी पढ़ने के बाद, उसे वस इतनी होश थी कि वेगम मुजीव ने लिफ़ाफ़े को फिर उसी तरह चिपका- कर वाक़ी डाक में रख दिया। अपने कमरे में अकेली पलंग पर पड़ी वेगम मुजीव मन-ही-मन में विप घोल रही थी। वे तो उससे कहीं आगे निकल गए थे, जितना वह सोचती थी। उसे इस बात का भी विश्वास था कि ज़ेवा की इस हरकत में ज़ाहिद की अगर रज़ामंदी नहीं थी तो हमदर्दी ज़रूर थी। कम-से-कम जाहिद जेवा की इस कमज़ोरी से परिचित ज़रूर था। वेगम मुजीब सोचती, वह बस अकेली थी कुढ़ने के लिए। वह बस अकेली थी इस भाड़ में भुनने के लिए । अकेली थी वह रोने और फ़रियाद करने के लिए। एक विधवा की सूली पर टंगी जिंदगी। और यह फांसी का फंदा वेगम ने स्वयं डाला था। उसे किसीके नाम आई चिट्ठी नहीं पढ़नी चाहिए थी। यह तो उतनी ही बड़ी गलती थी, उतनी ही माफ़ न की जाने वाली गलती, जितनी 'ग़लती' शायद जेवा कर रही थी। वेगम मुजीव की मुसीवत यह थी कि वह यह क़बूल भी नहीं कर सकती थी कि उसने अपनी बेटी के नाम आई चिट्ठी चोरी से पढ़ ली थी। अगर चिट्ठी नहीं पढ़ी भी तो उसे वह सब कुछ कैसे पता चल गया था जो उसे मालूम था, और जिसे जानकर वह भीतर-ही-भीतर घुलने लगी थी ? वेगम मुजीब सोचती, अगर वह अपनी पढ़ी-लिखी, जवान-जहान वेटी से खफा होकर उसे डांट कर मना करती है तो जितना आगे वह चली गई थी, जो उसे कल करना था, वह आज कर लेगी। उसके रोके वह नहीं रुकेगी। यह भी वही कुछ कर लेगी जो सीमा ने किया था। यह सोचकर उसका दिल डूबने लगा। वह तो कहीं की भी नहीं रहेगी। न इधर की, न उधर की । उसका तो मुंह काला हो जाएगा । न दीन रहा, न दुनिया ‘रहेगी। उसे न खाना अच्छा लगता, न पीना । छिप-छिपकर छल-छल आंसू बहाती । उसने ऐसा रोग पाल लिया था जिसका कोई इलाज नहीं । - - । था। वस, एक ही रास्ता उसे दिखाई देता था कि धीरज और प्यार से किसी प्रकार वह जेवा को समझा-बुझा ले । किसी तरह वह मान जाए तो । १४२ / मन परदेसी बेगम मुजीब सोचती, वह जेवा को लेकर पाकिस्तान चली जाएगी। लेकिन पाकिस्तानी तो जैसे लड़ाई पर तुले हों । हर रोज नये-नये गोशे छड़ रहे थे। यह लड़ाई तो कभी भी भडक सकती थी। वेगम मुजीव कुछ भी नहीं कर मकी । हर रोज भारी-भरकम नीला लिफाफा आता, हर रोज टेलीफोन मिनाए जाते; कभी इस तरफ में कभी उस तरफ़ मे। कितनी-कितनी देर वे खुसर-कुसर करते रहते । वेगम मुजीब के सीने मे जमे छुरिया चल रही हो। उसके अग-अग को जमे कोई काट रहा, टुकड़े-टुकडे कर रहा हो। मवमे श्यादा दुखी वेगम मुजीब तब होती अब जेवा उससे पूछती, "अम्मी ! आपको क्या हो रहा है ? हर वक्त बुझी-बुझी-मी, हर वक्त कामी-झामी, हर वक्त उखडी-उखडी-मी।" उने लगता, जैसे उसकी छाती पर तड़-तड गोलिया चल रही हो । उमका मीना छलनी होकर रह जाता। और फिर जब जेबा या जाहिद राजीव की बातें करने लगते, कितनी. कितनी देर उमे अच्छा-अच्छा कहते रहते, उसके गुण गाते जमे उनकी जयान न थकती हो । उनका रग, उसका रूप, उमका कद-बुत, उमका स्वभाव । क्या मजाल जो कोई सकीर्णता उसके मन में कहीं हो। हिन्दुओ जमा हिन्दू । मुमलमानों जमा मुसलमान। एक नमूना सच्चे हिन्दुस्तानी का। "अम्मी! जरा मोचिए, जो जवान-जहान लड़का इतने वरम विलायन रहकर वमे-का-बसा वेजीटेरियन लौट आया है, उसका किरदार कंमा होगा'" जेवा एक मे अधिक बार वेगम मुजीव को यह मुना चुकी थी। जितनी बार जेबा उमकी याद दिलानी, बेगम मुजीब को लगता जमे उसकी मुंह पर किमीने थप्पड़ दे मारा हो । न वह इधर की थी, न उघर की। न वह हिन्दुस्तानी घी, न पाकिस्तानी। उसकी समझ में कुछ न आना। कोई ने आगे नीचना, कोई पीछे। कोई उसे दायें खीचता, कोई बायें । दिन रात में इस मघपं में यह टुकड़े-टुकड़े होती जा रही थी। धेगम मुजीब के भीतर की विधवा लहू के आमू रोती रहती। कभी जो उमरा मोहर आज होता, वह अपनी तमाम समस्याए उसकी झोली में डानकर आप अलग हो जाती। जो वह उचित समझता, करता। जो वह , ANP कहता, उसके बच्चे उसी रास्ते पर चलते। किसीकी क्या मजाल जो शेख मुजीव की वात को न माने । घर वाले क्या और वाहर वाले क्या ! हारी हुई औरत, वेगम मुजीव हर दूसरे दिन महमूद को बुलवा भेजती । उसकी खातिर करती रहती। किसी तरह जेबा उसके बारे में अपनी राय बदल ले। ज़ाहिद उसे चाहने लगे। महमूद उनके घर होता तो वे उसका ध्यान रखते, उसे खिलाते-पिलाते। जहां तक संभव होता, कोई ऐसी बात न करते जो उसे पसंद न हो। पिछले कुछ दिनों से जान- बूझकर उन्होंने पाकिस्तान के बारे में वहस करना बंद कर दिया था। लेकिन उधर उसकी पीठ होती, इधर बहन-भाई उसकी हर हरकत की नुक्ता-चीनी करने लगते । उस दिन मां-बेटी अकेली थीं । वाहर लॉन में वैठी धूप खा रही थीं। "अम्मी ! उर्वशी कोई गहना होता है क्या?" जेबा पूछने लगी। "हां-हां, इसे हम धुकधुकी कहते हैं । औरतें इसे अंदर पहनती हैं। छाती के साथ लगा रहता है। मेरे पास है।" "अम्मी ! यह हिन्दू गहना है या मुसलमान गहना ?" "गहने भी कभी हिन्दू या मुसलमान हुए हैं ? यह हिन्दुस्तानी गहना है।" बेगम मुजीव ने सहज ढंग से कहा। "अम्मी ! आरसी भी क्या कोई गहना होता है ?" "एक तरह की अंगूठी होती है जिसमें शीशा जड़ा होता है । औरतें इसमें देखकर अपना रूप संवारती रहती हैं।" "अम्मी ! यह गहना हिन्दू पहनते हैं या मुसलमान ?" "चाहे कोई पहन ले। कभी हिन्दुओं में भी इसका उतना ही चलन होता था जितना मुसलमानों में ।" "अम्मी। टीका तो ज़रूर हिन्दू गहना होगा?" जेबा ने "क्यों ? टीका माथे का जेवर है। मुसलमानों में उतना ही पसंद किया जाता है जितना हिन्दुओं में। हर मुसलमान दुलहन अपने-आपको टीके से सजाकर खुश होती है। मेरी शादी पर मुझे टीके से सजाया गया था।" "अच्छा, रमझोल ज़ेवर क्या होता है ?" ? पूछा। १४४ / मन परदेसी म-8 "यह पाव का गहना है । चादी का।" "यह तो जरूर हिन्दू गहना होगा। नाम मे ही पता चलता है।" "नहीं, मैंने अपनी शादी पर रमझोल पहने थे। कई वार तीज- त्योहार पर पहनती रही हूं।" "मेरी याद में तो आपने कभी कोई गहना नही पहना?" "औरत के गहने उनके सुहाग के माय होते है । तेरे अब्बा जब से अल्लाह को प्यारे हुए, मैंने किसी जेवर को आप उठाकर नहीं देखा।" "यह तो बिल्कुल हिन्दू रिवाज है । क्या नही विधवा का चूडिया तोड देना और कभी जेवर न पहनना?" जेवा जैसे कोई दलील दे रही हो। बंगम मुजीव मव कुछ समझ रही थी, लेकिन जानबूझकर अनजान बनी हुई थी। "मुझे अपने अन्या की कोई वात याद नहीं।" "तुम दस साल की थी। तुम्हें कुछ-कुछ याद तो होना चाहिए।" "एक धुंधली-मो याद है, वस, अम्मी | अपनी जवानी में अश्या निहायत पूवमूरत होंगे? कमे लगते थे?" "हू-ब-हू महमूद मिया की शक्ल के।" वेगम मुजीब के मुह मे अचानक नियला, "एक को छिपाओ, दूसरे को निकालो।" जेबा ने मुना गौर उसके मुह का जायका जहर जैसा हो गया। ३१ लगता, आजरल जाहिद को जब भी अवसर मिलता, यह महमूद को कुरेदने उसको मनोदशा को समझने की कोशिश करता। जाहिद को प्रतीत होता, महमूद भारत में बसने वाले आम मुसलमानों की तरह था। उनकी तरह सोचता, उनकी तरह कुछ सचमुच यो और कुछ काल्पनिक ममम्माओं में घिरा रहता। मन परदेमी/१४५ । महमूद कुछ ज्यादा भावुक था। स्वभाव से कुछ ज्यादा तुनक- मिज़ाज । कुछ ज्यादा ही जोड़-तोड़ करने की आदत । कुछ ज्यादा ही लीडरी का शौक़ । उस दिन वातों-ही-वातों में महमूद ने पिछले दिनों राऊरकेला में हुए फसाद का जिक्र किया था। "फ़साद आजकल की ज़िन्दगी की असलियत है। हमारी दुनिया में फ़साद होते रहते हैं । फ़साद अमरीका में आए दिन होते हैं। ब्रिटेन में होते हैं। गोरे और काले एक-दूसरे को एक आंख नहीं देख सकते ।" जाहिद ने जानबूझकर बात छेड़ी। "उनकी और बात है।" महमूद कह रहा था। "फ़साद पाकिस्तान में भी होते हैं, शिया और सुन्नियों के बीच । महाजरों और गैरमहाजरों के बीच । पंजावियों और बंगालियों में। आए दिन अहमदियों पर हमले होते रहते हैं।" "इसका मतलब यह नहीं कि हम भी इधर मुसलमानों को काटना- पीटना शुरू कर दें। एक तरफ़ हम महात्मा गांधी का दम भरते हैं, दूसरी तरफ़ फिरकापरस्ती पालते रहते हैं।" "हर फ़साद को भी फ़िरकावाराना फ़साद कहना, मेरी नज़र में ठीक नहीं । तेजी से आगे बढ़ रहे हमारे समाज में इन फ़सादों की और वजह भी हो सकती है।" "हर फ़साद की जड़ पर फ़िरकापरस्ती होती है।" महमूद अपनी जिद पर अड़ा हुआ था। "यह वात नहीं। कई वार हालात की असलियत नहीं बल्कि उनकी परछाई हमें गुमराह कर देती है।" "कुछ भी हो, मारे कम-गिनती वाले ही जाते हैं।" "तरक्की का हर कदम, खास तौर पर अगर उसे जल्दवाजी में उठाया जाए, कशमकश पैदा करता है। उसमें फ़साद का वीज पनप रहा होता है।" महमूद इस तरह सिर हिला रहा था, जैसे यह बात उसकी समझ में न आ रही हो। १४६ / मन परदेसी "अब राऊरकेला ही ने लो। अगवारों में जो कुछ पा, उमने जाहिर होता है कि पूर्वी पाकिस्तान में गड़बड शुरू होने की पगह गे हिन्दू मरणार्थी पश्चिमी वगाल मे आना शुरू हो गए । गाम तौर पर बलवत्ता मे। क्योंकि कलकत्ता पहले ही लबालब भरा था, इन लोगो को गाड़ियों में डालकर मध्यप्रदेश में दडकारण्य भेजा जाने लगा। ये ट्रेन राऊरपेला जमे स्टेशनों पर रकती थी। गारा तौर पर राऊरकेला के स्टेशन पर मारणार्थियों को शहर के लोग गाना चिलाते थे। राऊरफेला के सोग मरणार्थियों के माय हमदर्दी जतलाते, उनके साथ हुई ज्यादती की पहा- नियो को बढा-चढ़ाकर शहर में फंसाने लगे। फिरकापरस्ती का बहर बढने लगा। फिर एक दिन किसी मुसलमान की दी हुई रोटी पाकर किमी हिन्दू मरणार्थी को उल्टी आ गई। मारे शहर में यह अफवाह आग वो तरह फैल गई कि मुसलमान शहरी हिन्दू-शरणार्थियों को उहर मिलाकर रोटियां पिलाते हैं । इसमें कोई सच्चाई नहीं थी कि पाने में जहर मिला हुआ था। लेकिन अफवाह को कौन रोग माता है । हिन्दुओं को पहले ही शक था कि मुसलमानों ने अपने घरों में असलहा इट्ठा किया हुआ है । चोरी-छिपे वे लोग ट्राममीटर की मदद मे पापिन्नान में तालमेल बनाए हुए हैं."." "यह बात नहीं जाहिद, मैं गुद उन दिनो राऊरयेला में था। आर. एम० एम० के लोग शरणार्थियों को ट्रेनों को पाना ग्रिलाने के बहाने उनकी मच्ची-झूटी कहानिया लोगों में फैलाने लग गए थे।" "लेकिन आप राऊरकेला पया कर रहें घे" जेवा पता नहीं कहा मे आ टपगी थो। उसने छूटते ही महमूद में पूछा । महमूद के हाय-पाव फूल गए। यगले झापने नगा। "मैं यू ही ग्मिी रिश्तेदार में मिलने गया था।" "वेशक आर० एम० एम० पालो को भी नगग्न होगी, लेकिन मुझे लगता है कि राकरपेला के फमाद की वजर पुछ और ही थी। "लोगों के येगार अदाजे," महमूद नाम वापर कहने लगा। "जयप्रकाश नारायण तो गलन नही हो मयने?' "मव हिन्दू गलत हो मरने हैं जहा न गमेव मुमलमानों का मगत ।

। है," महमूद के हर वोल में जहर भरा हुआ था। "यूं जज़वाती होना वेकार है । इस तरह के फ़तवे लगाने से नुकसान कम-गिनती वालों का ही होता है। आखिर जयप्रकाश नारायण की नीयत पर तो पाकिस्तान ने भी कभी शक नहीं किया।" "जयप्रकाश क्या कहते हैं ?" जेवा ने पूछा। "उनकी जांच का नतीजा यह है कि राऊरकेला के फ़साद की बुनियादी वजह ये हैं-एक यह कि स्टील के इस शहर के लिए इंजीनियर और तकनीकी माहिरों की जरूरत थी। ये लोग देश-भर में मुक़ाबले से चुने जाते हैं । इसलिए सारे ऊंचे ओहदे आम तौर पर बाहर के लोग हथिया लेते हैं । राऊरकेला के असली वाशिंदों को यह बहुत अखरता था। इनमें आदिवासी भी शामिल थे और मुक़ामी हिन्दू भी, और उड़िया मुसलमान भी । ये लोग पिछड़ते गए और बाहर से आए बंगाली और पंजाबी, विहारी और मद्रासी, आंध्र और केरल के लोग कहीं-के-कहीं पहुंच गए। दूसरी वजह यह कि मुक़ामी वाशिंदों में उड़िया मुसलमान ज्यादा खुशहाल होने की वजह से आदिवासियों को हमेशा लूट-खसोट करते थे। आदिवासी उनके चंगुल में परेशान थे। मुक़ामी शहरी बाहर से आए लोगों से खफ़ा था।" "और जैस्सोर में हुए फ़साद एक बहाना बन गए।" जेवा ने अपनी राय दी। "असल में ये फ़साद पिछड़ेपन की निशानी थे। या फिर तरक़्क़ी की राह पर हर किसीको बराबर का मौक़ा न मिलने की लानत ।" जाहिद का यह विश्वास था। "सब कितावी वातें हैं ।" महमूद ने अपनी विशेप सनक में कहा, "जैस्सोर के फ़ौरन बाद कलकत्ता में भी तो फ़साद हुए। उनकी ज़िम्मे- दारी आप किसके माथे मढ़ेंगे ?" "इसका मतलब यह है कि जब-जब पाकिस्तान में हिन्दुओं को परेशान किया जाएगा, इधर भारत में मुसलमानों को इसके दाम चुकाने होंगे?" जेवा ने कहा। "और यह सिलसिला जारी रहेगा, जब तक कश्मीर का फैसला १४८ / मन परदेसी नहीं होता।" महमूद बोला। "यही तो पारिस्तान के विदेगमंत्री मुद्रा माहब फरमाते हैं --भारत और पाकिस्तान में फिरकावाराना फमाद को नहरमीर का तनाता है। जर नकदमका कमला नहीं होता, वाकी मारे समझौते बेकार होंगे।" "इसके मुकाबले में जयप्रकाश फ़रमाते है-अगर भारतीय हिन्दू निकं इनगिए भारतीय मुसतमानों को परेगान करेंगे क्योंकि पारिनानी मुसलमान हिन्दुओं को परेशान कर रहे हैं तो हम दो कोमी को पूरी की तमदीन कर रहे होगे।" "जरप्रकार मागे उन मपने देखता रहा है।" महमूद ने टिप्पजो की। "अमल में नमला इतना कश्मीर का नही, जितना पूर्वी पारिन्नान या है। पश्चिमी पाकिस्तान वाले चाहते हैं कि पूर्वी पारिस्तान में हिन्दुओं मो भगा दिया जाए ताकि महा की बावादी पश्चिमी पारिम्नान में ज्यादा न रहे । और इस तरह वे लोग देन के इम हिम्मे पर अपना दव- दवा बनाए रखना चाहते हैं।" जाहिद को वान में वडा वजन था। "पाकिस्तान के पजावी मुसलमान, पाकिस्तान के बगाली मुमनमानी पर अपनी हुक्मरानी बनाए रगना चाहते हैं ।" या ने शाहिद की हा- मे-हा मिलाई। "और भारतीय मुसलमान आटे में पन की नग्ह पिग जाने है ।" 'अमल में ममना कश्मीर का है।" महमूद अपनी बान पर अग था। 'यह वान नही।" जाहिद उमे समझाने की कोमिन कर रहा पा. "अमल में ममता भारतीय मुसलमानों को 'आइरिटी' या है । जय तर हिन्दुम्नानी मुमतमानी यी नहर पापिन्नान पर लगी है, जब नर अपने देन के लिए उनमें अपनापन पैदा नहीं होता, उनसरी मुमीपने गम नहीं होगी।" "वकरे की जान गई और पाने वाले मोमसा नही आपा," महमूर ने फरतो कमी, "हमारी वफादारीरामाने वडा मयत और परा हो माता है कि हम लोग पारिन्नान नहीं गए !" मन परदेमी/१४९ "पाकिस्तान चाहे नहीं गए लेकिन हिन्दुस्तानी नहीं बन सके।" ज़ेबा ने दो टूक फैसला दिया। "जिस देश में 'हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान' के नारे लगाए जाते हों; जिस देश में आर० एस० एस० जैसी जमायतें अभी तक कायम हों, उस देश को कोई कैसे अपना कह सकता है ?" महमूद ने जैसे जल-भुन कर कहा। "उस देश के मुसलमानों को धुस-पैठियों के साथ मिलकर साजिश करनी चाहिए।" जेबा ने चोट की। "वेशक, अपने हक के लिए कौन नहीं लड़ता?" महमूद बेवाकी पर उतर आया था। "तभी तो जनाब राऊरकेला में अपने रिश्तेदारों से मिलने गए थे?" जेवा ने जैसे उसे दबोच लिया हो। "क्या मतलब ?" महमूद गुस्से में उबलता हुआ उठ खड़ा हुआ। "मतलव यह है कि जहां भी फ़साद होते हैं, कई लोग वहां ज़रूर पहुंच जाते हैं।" जेवा के ये शब्द एक गोली की तरह महमूद के सीने में जा लगे । और वह दांत पीसकर उनके घर से निकल गया, जैसे जले हुए गांव में से योगी निकल जाता है। ३२ "तुझे महमूद को इस तरह परेशान नहीं करना चाहिए।" जाहिद ने जवा को समझाया। जेवा क्षण-भर के लिए स्तब्ध-सी रह गई। घर पर आए किसी के साथ ऐसा व्यवहार करना वदतमीजी थी। लेकिन कुछ अर्से से महमूद उसे, एक आंख नहीं भाता था । उधर उसकी अम्मी थी, जैसे उस लड़के ने उस- पर जादू किया हो। उसकी कोई वेहूदगी बेगम मुजीव को वेहूदगी नहीं लगती थी। उसकी हर कमी को नज़र-अंदाज़ कर जाती ; जैसे कोई देख- %3B १५० / मन परदेसी .. सुनकर मक्शी निगल रहा हो । "इमका तो दिमाग गराय हो गया है।" बेगम मुजीय गोल पमरे में आई । यू लगता कि जब जेदा ऊंची आवाज में बोल रही थी, उसी आमी वाहर गैलरी में गडी मुन रही थी। उनके शानदान की मल्चर, वेगम मुजीय की तरवीयत, जेया अपने-आपर वह मग्जित दी। गरी आवों में मामू आ गए। "यह आदमी यह कुछ पहना चाहती थी कि उसका गला आयेग में रुक गया। और फिर जाहिद और अम्मी दोनों उसपर परम पडे । अम्मी गफा होगर हटी कि शाहिद ने उगे हाटना शुरु कर दिया। जाहिर ग्रामोग हमा नो अम्मी बरसने लगी। जैया मोचती, जाहिद रगमाना पर मोहित है। इसमे तो कोई गह नहीं था कि माना जाहिद की दीवानी पी । विमी दिन भी वह समपंग कर मवनी पी । जिम दिन से रखमाना उगरे जीवन में आई, शाहिद और का और हो गया था। हर ममय रमाना का नाम उमर होठो पर होता। उधर माना थी कि मुबह-शाम उसके टेलीफोन आए रहने । अम्नी ने स्वय अपनी आगों में जेबा और महमूद को अटपटी हालत में देगा था। जवान-जहान सड-नडकी में कोई गलतफहमी हो गई थी, वेगम मुजीब सोचतो, आप-ही-आप मनमुटाव दूर हो जाएगा। महमूद अम्मी की नगरी में जच गया था। उममे उमे अपने मोहर की सलक दियाई देनी पी। एक विधया के लिए, एक नवयुगक यी पमन्दोदगी और क्या हो सकती है और फिर अच्छे घर के मुसलमान लड़के मिलते कहा छ । नमाना के लिए उसके घरवाले माग पारिम्नान Bानकर पाली हाथ लौट आए थे । मयगे बडा अंगा बेगम मुजीब को राजीव मे पा। जिग दिन मे उमने जंवा के नाम गजीव को निट्टी पड़ी यो, आठो पहर उमे एक वेचनी-मी सगी रहनी। कोई गदा सडरा मिल जाए तो यह जेबा ये हाय पीले पर दे। अपनी जिम्मेदारी में मुर्ग हो जाए। और अब जब कि जाहिल और एगमाना गप-मरे रे इतना निरट आ गए प्रतीत होते , इमर्ग बहार अच्छी बात कही मरती थीfr मन परदमी/१५१ । महमूद और जेवा का रिश्ता हो जाए ! दोनों बहन-भाई एक घर से जुड़ जाएंगे। एक-दूसरे के दुःख-सुख को वे बांट सकेंगे । खास तौर पर जेवा, सबसे छोटी होने के कारण बड़े अल्हड़ मिजाज की थी। जाहिद उसके ससुराल का दामाद होगा तो अपनी बहन का ख़याल रखेगा। "आजकल दुनिया भर में नौजवान खफा-खफ़ा हैं।" ज़ाहिद अपनी बहन को समझा रहा था, "हमारे देश में मुसलमान नौजवानों के पास नाराजगी की एक वजह और भी है।" "आए दिन उनकी हक़-तलफ़ी होती रहती है।" बेगम मुजीव वीत्र में बोली। जेवा हैरान होकर अपनी अम्मी के मुंह को देख रही थी। उसे जैसे अपने कानों पर विश्वास न हो रहा हो कि यह शेख मुजीव की बेगम वोल रही थी। "लोक-राज में सवको छूट है कि अपने-अपने हक़ की हिफाजत कर सके। हर कोई अपने हक के लिए लड़ सकता है।" "तुम्हारे अव्वा का कई बार अपने हिन्दू साथियों से मतभेद हो जाता था ।" अम्मी जेवा के पास आकर बैठ गई। "इसमें कोई शक नहीं कि उर्दू के मामले में मुसलमान कम-गिनती के साथ पूरा इंसाफ नहीं हो रहा है।" "मैं तो कहूंगी कि नौकरियों के मामलों में भी मुसलमानों के साथ ज्यादती हो रही है ।" बेगम मुजीव ने ज़ाहिद की हां-में-हां मिलाई। "इसमें रत्ती-भर शक नहीं," ज़ाहिद बोला, "आज १६६५ में इक्कीस सी आइ० ए० एस० के अफ़सरों में बस एक सौ ग्यारह अफ़सर मुसलमान हैं। दो सौ सत्तर फ़ारेनसर्विस के अफ़सरों में सिर्फ १२ असर मुसलमान हैं और इंडियन पुलिस के वारह सौ अफ़सरों में कुल तेंतालिस अफ़सर मुसलमान हैं।" "यही हाल विधानसभाओं और लोकसभाओं में मुसलमानों की नुमाइंदगी का है । मुसलमान देश की आबादी का दस फ़ीसदी है, इसके मुकाबले १६५२ की लोकसभा में ३.६८ फ़ीसदी मुसलमान थे। १६५७ की लोकसभा में ४.२५ फीसदी और १९६२ की लोकसभा में ४.६ फीसदी। । 1 १५२ / मन परदेसी राग्म-गरकारो की विधानसभाओं में तो हालत बिगड़ रही है । १९५२ मे ५.३ फीसदी मुसलमान , १९५७ में ५.३२ फोगी और १६२ में ४.६३ प्रीमदी रह गए थे।" "मेरी ममा में नहीं आ रहा कि आखिर यह मय कुट मुमें मुनाया जा रहा है "जेवा बोली। "इनलिए कि तुम्हारे मोचने का दग मुधर गरे। अगर महमूद में मुसलमान नौजवान प्रोटेस्ट करते है तो उनमा ना करना रिमी हाना जारन है।" "प्रोटेस्ट और चीज है, माजिग और बीज।" या अभी नर नानून को माफ नहीं कर पा रही थी। "नौजवान कभी-कभी भटक जाते हैं।" जाहिर का रवैया नग्म था। 'उनको समझाया जा सकता है ।" वेगम मुजीब यह कही थी। जेवा की ममन में कुछ नहीं आ रहा था। एक झलाहट में वह अपना सिर पकड़कर उठी और चुपचाप अपने कमरे में चली आई। उसने अपना कमरा अदर मे धद कर लिया। कितनी ही देर गुममुम पर अपने पलग पर पड़ी रही। गोत कमरे में अपने बेटे जाहिर के पाम अकेली बैठी येगम मुरीव को भाज मौका मिला था और उमने उनमे अपने दिल की बात कही। उमकी मी थी किवा वा किमी तरह निराह कर दिया जाए। घर- उघर महमूद के सिवाय कोई लडका नजर नहीं आता पा। अच्छे शानदान का था। पढ़ा लिया था। देखने में मुन्दर । और किसी को पाहिए भी क्या? “जेबा को मर्जी के बिना नो छुट नहीं हो सकता," उाहिद मोन रहा था। "उसकी मर्जी गाय है । इनी महमूद के बिना पभी उमरा एर पर नहीं गुजरता या।" येगम नुनीव जाहिर को अपने पक्ष में माने की कोगिन कर रही थी। "इन मामलों में जल्दी नहीं करनी चाहिए।" सहिदकी गर पी। "तो फिर यह भी यही गुल गिलाएगी जो फरतृत इमली यहीएन -31.ua ने की है।" वेगम मुजीव परेशान थी। "जबरदस्ती तो किसीके साथ नहीं की जा सकती।" "क्यों नहीं? मुझसे महमूद की अम्मी कई बार इशारों-इशारों में कह चुकी है। अब, जब उसने ऐसा किया तो मैं वात पक्की कर लूंगी।" "तौवा ! तौवा ! यह ग़लती मत करना।" जाहिद मां को समझा रहा था, "आजकल कोई ज़माना है किसीके जानी मामले में दखल देने का?" "किसी मां को इतना भी हक नहीं है ?" "मां को सारे हक हैं, लेकिन यह हक नहीं। शादी का फैसला शादी करने वाले पर छोड़ देना चाहिए।" "इस लड़की के रंग-ढंग मुझे अजीब लगते हैं । यह तो हमारी नाक कटवाकर रहेगी।" बेगम मुजीव उत्तेजित हो रही थी। "मेरी राय है, आप रुखसाना से बात करें। अगर जरूरत हुई तो वह जेवा को समझा लेगी । आजकल उनकी आपस में बहुत दोस्ती है। वेगम मुजीब को जाहिद का यह मशवरा बड़ा उचित लगा। वह मोचती, रुखसाना उसकी बात कभी नहीं टालेगी और फिर रुखसाना को तो वह मन-ही-मन अपनी बहू बना बैठी थी। किसी दिन वह उसके आंगन की रौनक हो जाएगी। और फिर अगली फुरसत में, जव जेवा स्कूल पढ़ाने गई हुई थी और जाहिद अस्पताल में था, वेगम मुजीव ने रुख साना को बुला भेजा और उससे जेवा और महमूद के रिश्ते की बात छेड़ी। "अम्मीजान ! आपको हो क्या रहा है ?" रुखसाना को जैसे अपने कानों पर यकीन न हो रहा हो, "जेवा और महमूद ! ऊंट के गले में घंटी। महमूद चाहे मेरा भाई है लेकिन जेवा जैसी सुलझी हुई, तरक्की- पसन्द लड़की के लिए वह बिल्कुल मौजूं नहीं। बड़ा बेहूदा है, बड़ा बिगड़ा हुआ है।" "सव नौजवान ऐसे हो जाते हैं । वक्त आने पर संभल जाएगा वेगम मुजीव अपने मत पर दृढ़ "कभी यह गलती न करना अम्मीजान ! महमूद और जेवा की तो थी। ! १५४ / मन परदेसी एक दिन भी नहीं निभेगो । ताश यी बाजी में तो वे पार्टनर बन नहीं माने, जिन्दगी में कमे माथ देंगे?" "कोई यस्त था जब एक-दूगरे के. ..." और फिर बेगम मुजीय के भीतर की मा गामोग हो गई। "वेगवः ! वेशकः ।। मुझे मय मालूम है । लेकिन यह यात सभी या योन चुका है।" रगमाना बेगम को बता रही थी। ३३ । - ग्गमाना के साथ मुलाकात के बाद बेगम मुजीय को ऐगा महमूम होना, जमे कोई माजिश हो। हर कोई इस बात पर तुला हुआ प्रतीत होना था कि जया और महमूद का व्याह न हो। महमूद की यहन गणमाना तो माफ, यह चुकी थी। इघर वेगम मुजीव पी, मानो महमद पर ममूची न्योछावर हो पुरी भी गाते-पीने लोग थे। देर माग जायदाद थी। लड़की गज परेगी। मा-याप का इकलौता बेटा था। फिर रहेगी भी उगी शहर में। जय जी चाहा, मा-बेटी मिल लिया करेंगी। बड़ी बेटी तो उमरी जिदनी गे निग्न चुगी थी। कोई और रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। उस दिन गंगा में माय हुई बदमजमी के बाद महमूद ने उनके यहा आना बंद कर दिया था। वेगम मुजीव को ममा मे न आता, विम बहाने उसे अपने पहा युलाए। उमे चारो ओर अधेरा दिखाई देता। भीतरन्दी-भीनर वह पुतनी जा रही थी। उनकी भूग जाती रही । मागे-माग रात भरवटें बदलती रहनी। नीद नहीं आती थी उमे । फमग वद करने या नो गज में मिर्ग रहती या छम-छम उगके आम यहने रहते। हर माम अपने नोहर ये मार पर जानी। कितनी-कितनी देर वहा यंठो आना दुगहा रोती रहती। पाची यात नमाज पढ़नी। तमयीह फेरती विद करती, मेग्निमही भी मन परमी/१५५ - कोई रोशनी की किरण दिखाई नहीं देती थी। वेगम मुजीब दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होती जा रही थी। हड्डियों का ढांचा-सा लगती थी । जाहिद परेशान था। जेवा परेशान थी। बार- वार उसके डाक्टरी परीक्षण होते । कोई बीमारी नहीं थी। कोई खराबी नहीं थी। फिर भी बेगम मुजीव ने पलंग पकड़ लिया था। जेबा सब कुछ जानती थी। जाहिद भी, दिल से, अपनी मां के रोग को पहचानता था। यह बीमारी, लेकिन ऐसी थी, जिसका इलाज किसी- के पास नहीं था। उनके चहकते हुए घर में खामोशी छा गई थी। अव न पहले-सी पार्टियां होती, न दावतें उड़ाई जाती। लोगों ने इनके यहां आना वंद कर दिया था। इन्होंने बाहर जाना बंद कर दिया था। और तो सब कुछ सिमटता जा रहा था, लेकिन राजीव की चिट्ठियां बदस्तूर आती। भारी-भरकम नीला लिफ़ाफ़ा जब वह देखती, देगम मुजीब के सीने पर जैसे सांप लोटने लगता । एक टीस-सी भीतर से उठती। पर मुंह से कुछ न बोल पाती। हर चौथे रोज़ टेलीफ़ोन आता। एक बार टेलीफ़ोन मिलता तो कितनी-कितनी देर वे खुसर-फुसर करते रहते। ख दा जाने, ऐसी क्या बातें उन्हें करनी होती थीं जो इतनी-इतनी बजनी चिट्टियों में नहीं समाती थीं ! इतने-इतने लम्बे टेलीफ़ोन में नहीं ख़त्म होने को आती थीं! उधर पाकिस्तान में उसके जेठ शेख शब्बीर की हालत और विगड़ गई थी। ख़बर आई कि उसका दिमाग़ पूरी तरह खराव हो गया था। आजकल वह घर छोड़कर किसी दरगाह में जा बैठा था। हर वक्त 'अल्लाह हू', 'अल्लाह-हू' करता रहता। उसने सिर मुंडवा लिया था। दाढ़ी बढ़ा ली थी। नीला चोगा पहने नंगे पांव फिरता रहता । उसके हाथ में एक डंडा रहता था। या तो 'अल्लाह हूँ', 'अल्लाह हूँ' की रट लगाए रहता या फिर जो सामने आ जाता, उसे गंदी गालियां वकने लगतान कभी घर आता, न घर वालों को पहचानता। उधर बाप की यह हालत थी और इधर उसके बेटे कबीर की बीवी उसे छोड़कर भाग गई। दो बच्चे जो उसने पैदा किए थे, उन्हें भी छोड़ गई। कबीर सख़्त परेशान था। दादी बच्चों को पाल रही थी। वेगम मुजीब . 1 १५६ / मन परदेसी पी जेठानी को अपने बेटे का पर फिर से यमाने की चिता मगोपी। आगिर उसके पोतों को भी तो पालने वाली चाहिए। मा वय तक बेटे मा यहा बंटी रहेगी? उसके अपने मियां की हालत यद-मे-यवनर होती जा रही थी। कुछ कहा नहीं जा सकता था कि वह पा कर बंटे। पह दूगरी चिट्ठी आई थी उसकी जेठानी को-'युगिया ! अगर तुम्हारी नजर में कोई लड़की हो तो कवीर या घर बना दो। तुम्हारा एहमान में कभी नहीं भूलूगी,' उमने दुवारा लिया था। पारिम्नान में यह गपाल किया गाता पा कि भारत में मुगलमान सपियों में पार्ने के लिए लड़को की कमी थी, इसीलिए भारतीय मुसलमान परानी की लडकिया अपने लिए सड़की की तलाग में पारिग्नान के पार पानी रहती थी। इस बार अपनी जेठानो को चिट्ठी जय उसने पती तो बेगम मुनीर को कई साल पुरानी, हगी-झी में कही गई एक बात याद आने सगी-- 'फुदमिया ! तुम्हारी जेवा और मेरे फवीर को जोडी फैगी रहेगी?' तव तो ये दोनों बच्चे अभी घुटनों के बल चलते थे। दुनिया ने अपनी जेठानी की बात हनकर टाल दी थी। एक सप्ताह में दूसरी बार उमरी चिट्ठी आई थी। उमणी जेटानी चेहद परेशान थी। घर वाला कई बरसो में बीमार पा। सायो से उसके इलाज पर यचं हो चुके थे। यहू भाग गई थी। बेटी का मोहर हर चयि रोज़ यदतमीजी करता या । पर मे हगामा मचाए रयता भी युनिया लुटाते, हमने गेलते थे लोग मिट्टी में मिल गए थे। कोई पूने वाला नहीं था। भटक रहे थे। बार हो रहे थे। येगम मुजोर सोमानी जेठानी पर बहुत तरम आ रहा था। कितनी भली औरत पी!हर यात गिली-मी रहती। कभी कोई पटिया यान के मुह में नहीं निरलनी थी। जब पुदमिया म्याह पर आई, तो रिननी गातिर पिया परती भी उमकी ! मोई यात मुह से निकली कि वह उसे पूरा कर देती। ममिया के मौहर की इच्छा पो किमिक्ति साइन ही कोटी इन्हें मिस जाए। एक पल भी उमने मायने में नहीं मनाया, स्वयं शहर वाले पर में रहने के लिए राजी हो गई और अपने देवरनिए उसने यमना गाली मन परदेगी। १५७ ? कर दिया। और फिर कुदसिया के बच्चों से कितना प्यार करती थी, जैसे उनमें उसकी जान हो! किसीका माथा गर्म हो जाता तो दौड़ी हुई आती। दो दिन अगर बच्चों से न मिले तो उसे कल नहीं पड़ती थी। हमेशा उसका घरवाला कहता, 'वीवी ! तुम अलग ही क्यों हुई? उन्हें अपने पास रखती, अपने परों के नीचे । देवरानी के बगैर तो तुम्हारा पल नहीं गुज़रता।' दिन में दस वार उसका टेलीफ़ोन आता । 'क्या हो रहा है ? क्या पक रहा है ? क्या खाया जा रहा है ? बच्चे क्या कर रहे हैं? गर्मियों में कहीं उन्हें गर्मी तो नहीं लगती ? जाड़ों में उन्हें ठंड तो नहीं लगती ?' कोई चीज़ उन्हें अच्छी लगती तो पूरा कोस, रास्ता चलकर या तो खुद आती या किसी नौकर को भिजवाती । और फिर जव उसका देवर अल्लाह को प्यारा हुआ, कैसे माथा पीट-पीटकर वह रोती थी! उसके वाद कितनी देर वह इनके यहां ही टिकी रही। ज़ाहिद को विलायत भेजने की तजवीज़ भी उसीकी थी। जव खर्च की बात चली तो नोटों से भरी हुई एक संदूकची उसने जाहिद के सामने ला रखी । यह और वात थी कि वेगम मुजीव को इसकी जरूरत नहीं थी। लेकिन उसने अपनी ओर से कोई कसर ही नहीं छोड़ी थी। वेगम मुजीव हमेशा अपने-आपको जेठानी के एहसानों में दबा हुआ महसूस करती थी। जेठानी क्या थी, वह तो उसकी सास थी ! सास ही की तरह उसकी खातिर करती थी। सास की तरह ही उसके बच्चों को लाड़ करती थी। आजकल जो उसकी मानसिक स्थिति थी, वेगम मुजीव सोचती, क्यों न जेवा का विवाह वह कबीर से कर दे ? अगर वह महमूद के साथ शादी करने को राजी नहीं हो रही थी, अपने ताऊ के बेटे के साथ व्याह करने में उसे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। क्या हुआ जो पहले उसका व्याह हो चुका था ! उसकी बीवी उसे छोड़कर भाग गई थी। इसमें उसका क्या कसूर था? और फिर जेवा होगी तो उसके बच्चों को प्यार से संभाल सकेगी। अगर कोई परायी आ गई तो पता नहीं बच्चों का क्या हाल हो? इस तरह सोचते हुए वेगम मुजीव ने अपना इरादा पक्का कर लिया। वह जेबा को कवीर के लिए राजी कर लेगी। और अगर उसने इससे भी १५८/ मन परदेसी कार कर दिया तो वह इस लड़की को कभी मुह नहीं मगाएगी। कुल ग्राकर मर जाएगी। पुछ दिनों से जंवा हर गाम अम्मी के कमरे में आती और स्तिनी. कितनी देर उमरे पाम वंठी कभी उमया गिर यानी रहनी, कभी उमर याली में तेल की मालिश करती रहती। बार-बार पहनी, "अम्मी. अव आप ठीक हो जाए। जो आए पहेंगी, में मान नूगी। आपरा पहना हरगिज नहीं टालूगी।" उग माम जय जेया ने इस तरह की यान यही, येगम मुजीर ने अपनी जटानी को चिट्ठी उमके मामने ला रयो । या एक नउर पिट्टी गे पढ़ गई। "तो फिर मेरे लिए क्या इसम है ?" जेया ने अपनी अम्मी मे पूधा। "तुम्हारी ताई के मुमपर बडे एहगान है । मैं इन फर्श को उतारना चाहती है। अगर तुम कवीर फे माय..." अभी यह वात उमरे होठी पर ही थी कि जेबा चौरा कर औधी जा गिरी। एक क्षण-मर में यह ती हो गई । उसके हाथ-पाय मुड़ गए। बेगम मुजोर कितनी देर उसमें माय जूसती रही। आखिर जब जेबा को होग आया तो वह जन-धन आम्म बहाती, अपनी मा के कदमो में गिर गई। "मुझे वेगा कोई और मया दे दो, मुझसे मेरी जान से लो, यह जुल्म मुझपर मत ढाओ । म दंग- निकाला मत दो!" वेगम मुजीय वेयम होकर जया की ओर देग रही थी। महमूद से ध्याह कर नूगी," जेधा ने विसयर रहा । और उमणी आपो से आमुओ की बडी लग गई। ३४ या ने अपने-आपको अपने पमर मे वा पर लिया। गारी नाम उसके अविरम आनू बहते रहे । राजीय की मिट्टियों में गिरी समापी मन परदमी / १५६ । भरी हुई थी। एक-एक चिट्ठी निकालकर पढ़ती। उसके दिल में हूक-सी उठती। एक-एक चिट्ठी को पढ़ती और सामने अंगीठी में उसे जलाती जाती। कुछ देर के बाद उसकी मुहब्बत की हसीन दास्तान एक मुट्ठी भर खाक होकर रह गई। एकसाथ जीने और मरने के सारे इकरार, सारे सपने प्यार के एक नये सफ़र के तमाम गीत जो अछूते पड़े थे, अध- खिली कलियों की तरह शूलों से विंध गए, कुचले गए । धूल में मिल गए। फिर राजीव की तसवीरें एक-एक करके जेवा ने अपने एलबम में से निकालनी शुरू कर दी। हर तसवीर को देखती। जी भरकर उसे प्यार करती। सीने से लगाती और फिर सामने अंगीठी में फेंक देती। आखिरी तसवीर राजीव की सबसे ताजा थी। अभी कल ही तो उसने भेजी थी। जेवा ने जी भरकर उसे देखा तक नहीं था। कितनी देर वह तसवीर जेवा के होंठों के साथ चिपकी रही। कितनी देर जैसे उसकी छाती से ही अलग न हो रही हो । जैसे कोई वादल फटता है, इस तरह ज़ेवा के आंसुओं की वाढ़ वह रही थी। उसने अपने सीने से नोचकर उस तसवीर को भी. अंगीठी में फेंक दिया। लेकिन वह तसवीर जली नहीं। लाल-पीली दहक रही अंगीठी के एक किनारे पर जा गिरी । राजीव विटर-विटर जेवा की ओर देख रहा था। एक प्रिय मुसकान मुसकरा रहा था। अंगीठी के दहकते अंगारों के पीछे, एक सुन्दर स्वप्न की तरह सुरक्षित पड़ा था। जेबा की आंखों के सामने । जेबा की पहुंच से दूर । जैसे कोई अग्नि-परीक्षा से निकलकर अपनी मुहब्बत का सबूत दे रहा हो । और फिर जेवा दीवानों की तरह उस तसवीर से मुखातिब होकर आपसे-आप बोलने लगी: 'राजीव, मेरी जान, आज की शाम अपने कमरे में यह अंगीठी मैंने नहीं सुलगाई, यह तो चिता है हमारी पाक मुहब्बत की। तुम्हारी यह जिद कि तुम इसे भस्म नहीं होने दोगे, एक ख्वाब है। जिन्दगी की असलियत कठोर होती है। समाज के बंधन बड़े संगीन होते हैं। मुहब्बत एक चीज़ है, मजहब एक चीज । मैंने वेशक तुम्हें मुहब्बत की है, लेकिन मैं एक मुसलमान घर में पैदा हुई हूं। मुहब्बत मैंने अपनी . १६० / मन परदेसी म.१० नजर में करान मजी ने की, लेकिन मेरी पैदाइश में किसी और ताकत का दास था। उम ताकत के सामने मैंने आज घुटने टेक दिए है। हम हिन्दुस्तानी नौजवान लडके-लडकिया, हिन्दू क्या और मुसलमान क्या, अपनी दिरामत को बटुआ के मारे हुए है । हम यिरम में अलहदगी मिली है, दूरी मिली है। वैर मिला है। मुनसमानो नजल हुआ था । अल्लाह की दी हुई नेमत को चमे-का-वैसा संभालकर रगना होगा । कुरान में जो कुछ कहा गया है, वह हर्फे-आखिर है । चौदह मो माल इस्लाम के इतिहास में, उसमें कोई तब्दीली नहीं हो सकी। इधर हिन्दू, कई सौ वरम मुगलमानो के पडोम में रहकर, कई सौ बरम उनकी गुलामी करने के बाद आज भी उनके छूने से प्रष्ट हो जाता है। उमा घर में से पानी नहीं पी सकता। गूफी अपना सिर पीटफर रह गए। भक्त भगवान का वास्ता दे-देकर चले गए। हिन्दू के लोटे में टोटी नहीं लग सकी। मुसलमान अपने जे को नहीं छोड सका। महात्मा गाधी ने 'ईश्वर अल्लाह तेरा नाम' कहकर इम मगले यो मुलझाने की कोशिश की । गाधीजी ने सोचा, हिन्दू और मुसलमान दोनों में, अंग्रेज की गुलामी से छुटकारा पाने की एक मी लगन, उनको एक पती में पिरो देगी। आजादी आई, लेकिन हिन्दू-मुगलमान को मौतरी पाई वमी-को-बसी बनी रही, बल्कि देश के बटवारे की शक्ल मे, पाकिस्तान की भारत में और भी गहरी हो गई। गाघोजी ने मोचा, भारत के हित मुमनमानों को वह एक मुट्ठी कर देंगे। यह हो सकता था, अगर देश में निर्माण में, देश के विकाम में दोनों कंधे-से-कधा मिलाकर जुट जाते । यह मुमकिन था, अगर हिन्दू और मुरालमान अपने सपने एक्मे परमेते। नेकिन ऐमा नहीं हो सका । इसमे पहले कि देश के वटवारे में गाधी. जी के मोने के घाव भर पाते, वापू के मोने में तीन गोलिया दाण पर उसे गरम कर दिया गया। राजीव, तुम्हे मालूम है कि मेरे अन्या गाधोजी में दोनों में है। मेदिन नमाउ-रोजा के ये हमेशा पो रहे । माधीश भोको माहां थे। जरत इस बात की है कि आदमी अपने शामिा शिानीरो शरीर मन परदनी/११ अलग करके रखे। लेकिन हर किसीके लिए ऐसा कर पाना आसान नहीं होता । मेरे अव्वा यह कर पाए, लेकिन अम्मी से यह नहीं हो सकेगा। और मेरी अम्मी, मेरे अब्बा की निशानी हैं। आज कई साल हो चुके हैं, वे मेरी बहन सीमा को माफ़ नहीं कर पाई। अभी तक उन्होंने उसे मुंह नहीं लगाया। तुम्हारे साथ मुंहब्बत करके मैंने अम्मी को बेहद तकलीफ़ पहुंचाई है । अव उन्हें मैं और परेशान नहीं कर सकती। मैंने सोचा था, इतने बरस आजाद भारत में रह चुकने के बाद एक मुसलमान बेगम वदल गई होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। और मैंने अपनी हार मान ली है। अब मैं और अपने-आपको ग़लतफ़हमी में नहीं रख सकती । अब और मैं तुम्हें धोखा नहीं दे सकती। अव तुम जल जाओ, मेरी जान ! कितनी देर इन दहकते अंगारों का सेंक सहते रहोगे। अव अपने-आपको शोलों के हवाले कर दो। जलने में भी एक मज़ा है । आग के अलाव में कूद पड़ना और फिर लपटों की लाल- पीली-नीली लौ में गुम हो जाना । तुम और यूं विटर-विटर मेरी तरफ़ मत देखो। और यूं मुझे शमिन्दा मत करो। मैं गुनहगार हूं लेकिन मैं मजबूर हूं। मैं अपनी मां को तड़पते नहीं देख सकती। मैं तुम्हें मुहब्बत करती हूं। मैं तुम्हें मुहब्बत करती रहूंगी। आखिर कितने लोगों की मुहब्बत इस दुनिया में परवान चढ़ती है ? प्यार की एक और हार सही। मुहब्बत की एक और मौत सही। तुम जल जाओ । तुम जलते क्यों नहीं ? तुम्हारा मतलब है, आग बुझ जाएगी, शोले ठंडे पड़ जाएंगे, और तुम वैसे-के-वैसे अंगीठी के एक किनारे से मुझे एकटक देखते रहोगे? यह कैसे हो सकता है ? आग में से भी कभी कोई निकल सका है ? आंच से भी कभी कोई वच सका है ? अब तुम जल जाओ, मेरी जान ! यूं मंद-मंद मुसकराते हुए मेरी ओर मत देखो । मैं तो मर चुकी हूं। मरे हुए को मारना ठीक नहीं । हमारी मुहब्बत की कहानी ख़त्म हो चुकी है । मैं अपनी मां के हाथ से जहर का प्याला पी चुकी हूं। अपनी मां के हाथों से अपने अरमानों का गला घोंट चुकी हूं। मैं नहीं कहती कि कोई मुहब्बत परवान नहीं चढ़ती। किस्मत वाले ? ! . १६२/मन परदेसी होते हैं, जो प्यार करते हैं और फिर प्यार को पा भी लेते हैं। क्या मबर, किम जन्म मे वे लोग एक-दूसरे के लिए नडर रहे थे ! किम जन्म में एक- दूमरे का पीछा कर रहे ये ! किम जन्म में एक-दूसरे के इतजार में थे ! हम भी इतजार कर लेंगे उम दिन का, जब इस देश के लोग, पहले इमान हाँग फिर हिन्दू या मुसलमान । जब हिन्दू पानी में मुसलमान पानी अलग नहीं होगा। जब मुसलमान की नजर में हर गर-मुलिम काफिर नहीं होगा । जब किमी मुसलमान की परछाई से कोई हिन्दू भ्रष्ट नहीं हुआ करेगा। वह दिन जब हम भारतीय पंदा हॉग, भारतीय होकर परवान अड़ेगे । वह दिन जब हम भारतीय होकर जिएंगे, भारतीय होकर मरेंगे। जब हम इस्लाम की असलियन को पहचानेंगे। जव हम हिन्दू धर्म की रवादारी को कबून करेंगे।' अचानक जवा को लगा, जैसे अगीठी के शोलों में में झाक रही राजीव की मुमकरा रही तस्वीर खिलखिलाकर हम दी हो। एक नशे- नशे में जैसे मुशिया लुटा रही हो। चारों ओर जमे चमेली की कलिया दिल गई हो। और फिर बाग के शोले मदिम पडने लगे । बुझने लगे। हार-हार-मै दिखने लगे। बाहर, शाम को पराया कब की टल चुकी थी। रात हो रही थी। कदम-कदम अधेरा वहना जा रहा था। पल-पल रात गहरी होती जा रही थी। इतने में मापू को भावाज सुनाई देने लगी। लबी और लबी होती ला रही थी। भयानक और भयानक । जैमे मीने को चीरनी हुई घुमनी चली जा रही हो। और फिर कालू ने आकर उमका दरवाजा सुटसुटाया, "जेवा वीरी ! पाकिस्तान ने हिन्दुस्तान पर हमला कर दिया है। पारिम्नान के हवाई जहाज हिन्दुस्तान के शहरों पर बम गिरा रहे हैं। अपने शहर में लंक-आउट हो गया है।"

३५ "मेरी ज़िन्दगी में तो पहले ही ब्लैक-आउट हो चुका है।" अचानक ज़ेवा के मुंह से निकला । उधर कालू एक-एक करके घर की सारी वत्तियां बुझा रहा था। घोर अंधेरा। चारों ओर मौत जैसी खामोशी। वेगम मुजीव, जाहिद, जेवा, सारे अपने-अपने कमरों में से निकलकर गैलरी में आ गए थे। टुकुर-टुकुर एक-दूसरे के मुंह की ओर देख रहे थे। सहमे-सहमे से। परेशान-परेशान नज़रें। किसीको कुछ नहीं सूझ रहा था कि क्या करे, क्या न करे! इतने में कालू ने रेडियो चालू कर दिया। पाकिस्तान की ओर से हिन्दुस्तान के हवाई अड्डों पर अचानक आक्रमण के समाचार सुनाई पड़ रहे थे। लोगों को हवाई हमले से बचाव के लिए चौकस किया जा रहा था। मेरठ को खास तौर पर खतरा था। एक तो यहां पर महत्त्वपूर्ण छावनी थी, दूसरे दिल्ली से खदेड़े हुए दुश्मन के हवाई जहाज़ यहां बम बरसा सकते थे। "यह भी क्या मालूम कि पाकिस्तानी हवाबाज़ बम तो दिल्ली पर फेंके और जा गिरे वह मेरठ पर!" जाहिद ने व्यंग्य किया । "दुश्मन का हमला !" जेबा ने घबराकर कहा। शहर का भोंपू फिर बजने लगा था। "दुश्मन !" वेगम मुजीव को लगा, जैसे कोई वम उसके सीने में आ लगा हो । इतने में ज़ाहिद अपनी मां और बहन को अपनी बाहों में लपेटे कोठी के बाहर लॉन में ले आया। लॉन के एक ओर इमली के पेड़ के नीचे वे जा खड़े हुए। म्युनिसिपल कमेटी का भोंपू एक सांस वजता चला जा रहा था और फिर दूर तड़-तड़ एंटी-एयरक्रफ्ट गोलियों के चलने की आवाज़ आने लगी। "हमला है दुश्मन का।" "मुकाबला हो रहा है दुश्मन के साथ।" "हम दुश्मन के दांत खट्टे कर देंगे।" बहन-भाई आप-से-आप बोले - १६४/ मन परदेसी जा रहे थे। बेगम मुजीव की छाती पर जैसे गोलिया वरस रही हो । उसका जेठ शेख शब्बीर दुश्मन था। उसका देवर जुबैर दुश्मन था। इस्मत, उसकी ननद दुश्मन थी। इरफान, इस्मत का घरवाला, दुग्मन था जिसका रिश्ता उसने खुद करवाया था । कबीर दुश्मन था, नूरी दुश्मन थी, जिनको वेगम मुजीव ने गोदी में खिलाया था। उसकी जेठानी दुश्मन थी, हमेशा इसे बहू कहकर बुलाती थी। अभी तो कल उसकी चिट्ठी आई थी। "यही इस इमली के पेड के नीचे हम खाई खोद लेंगे।" जाहिद कह रहा था, "जब हमला हुआ, यहा आकर छुप जाया करेंगे।" जेवा सामने गुलाव की क्यारी की ओर देख रही थी। काले गुलाव की अधखिली कली जैसे गर्दन उठाकर उसकी ओर झाक रही थी। जेबा ने उसकी ओर पीठ फेर ली। भोपू लगातार बज रहा था। "दुश्मन का हवाई जहाज गिरा दिया गया है ।" कालू कोठी की छत पर से चिल्ला रहा था। पता नहीं कब से वह छत पर चढकर तमाशा देख रहा था। और फिर भोपू की आवाज बदल गई। कुछ देर के बाद भोपू बोलना बंद हो गया । अव आकाश साफ था। "नामालूम दुश्मन ने कितना नुकसान किया होगा ! कितने हवाई अड्डे वरवाद किए होंगे ! कितने हवाई जहाज नष्ट किए होंगे।" "हमने भी कोई कच्ची गोलिया नही खेली। तुम्हारा क्या मतलब है कि हम दुश्मन के लिए तैयार नही होगे? हमारे लडाकू हवाई जहाज पाकिस्तान के शहरों की चटनी पीसकर रख देंगे।" "कल हमारी फौजें लाहौर में जा घुसेंगी।" शाहिद दात पोसकर कह रहा था। वेगम मुजीव ने सुना और उसके सोते सूख गए । इस्मत लाहौर मे थी। जुवर लाहौर में था। कबीर लाहौर मे था, नूरी लाहौर मे थी। "दुश्मन के हम छक्के छुड़ा देंगे।" जेवा के दात जैसे उसके होठो मे खुभ रहे हो। वेगम मुजीव सोचती, इस्मत का शौहर इरफान उनका दुश्मन था ! मन परदेसी/१६५ - - अव तो वह फ़ौज में ब्रिगेडियर हो गया था। हो सकता है, उसीकी कमान में पाकिस्तान की फ़ौजें भारत पर हमला कर रही हों। उसके छोड़े हुए गोले इस धरती को लहू-लुहान कर रहे हों। उसके बरसाए हुए बम हमारे शहरों को तहस-नहस कर रहे हों। वह मंसूवे बना रहा होगा, हमारे शहरों को लूटने के, हमारे फौजी ठिकानों को मटियामेट करने के। अगले दिन फिर हवाई हमला । उससे अगले दिन एक और। उस शाम जव भोंपू बजना बंद हुआ और वे कोठी के अंदर गए तव टेलीफ़ोन बज रहा था। दूसरी ओर राजीव था। हमेशा की तरह आज शाम जेबा तेज-तेज़ क़दम टेलीफ़ोन सुनने नहीं गई। यह देखकर जाहिद टेलीफ़ोन सुनने लगा। जेवा वैसी-की-वैसी बैठी अम्मी के साथ बातें कर रही थी। कुछ देर के बाद उसे यूं लगा, जैसे उसका दिल बैठा जा रहा हो। उसके हाथ-पांव में जैसे सुइयां चुभ रही हों और फिर वह उठकर अपने कमरे में चली गई। राजीव और ज़ाहिद कितनी देर टेलीफ़ोन पर बातें करते रहे। राजीव ने उनका कुशल-मंगल पूछने के लिए टेलीफ़ोन किया था। बातों- बातों में राजीव ने बताया कि वे लोग लड़ाई के मोर्चे पर घायलों के इलाज के लिए डाक्टर, वालंटियरों का एक जत्था बना रहे थे। पंजाब और कश्मीर की सीमा पर डाक्टरों की आवश्यकता थी। जाहिद ने सुना और वह भी तैयार हो गया। इसके बारे में राजीव उसे और विस्तार से बताता रहा। अलीगढ़ के मेडिकल कॉलेज के कुछ प्रोफेसर और कुछ लड़के इस टुकड़ी में शामिल हो रहे थे। जेवा ने सुना और कहने लगी, “मैं भी चलूंगी। क्या मैं नर्स नहीं बन सकती?" वेगम मुजीव सुन-सुनकर हैरान हो रही थी। यह सब उन सबके साथ लड़ेंगे। एक-दूसरे पर गोलियां चलाएंगे । एक दूसरे को मारेंगे। कोई उसका वेटा था । कोई उसका भतीजा था। भाई भाइयों को काटेंगे। वहनें अपनी बहनों की बेहुरमती देखकर खुश होंगी, पड़ोसी पड़ोसियों की लूटमार करेंगे। यह हो क्या रहा था? दुनिया किधर जा रही थी? क़यामत शायद १६६ / मन परदेसी इमीको कहते हैं । यह थी प्रलय जिसके बारे में लोग कहानियों किया करते हैं। वाप बेटे को नहीं पहबानेगा। भाई वहनो को नहीं पहचानेंगे। यह सब कुछ सोचती हुई वेगम मुजीव, कानों को हाथ लगाने लगी। तांबा-तौबा करने लगी। उसका जी चाहता, धरती जगह दे और वह उममे समा जाए । अव और जो सकना उमके लिए मुमकिन नहीं होगा। अगले दिन सचमुच भारतीय फौजी ने लाहौर पर चढाई कर दी। इघर प्रधानमत्री नै लोकमभा में नये आक्रमण की सूचना दी, उधर खवर आई, भारतीय फौजें लाहौर मे घुम गई थी। शालीमार बाग तक पहुंच गई थी। भारतीय फौज की एक टुकडी बागवानपुरा जा पहुची थी। बड़ी मुश्किल में उन्हें लाहोर के बाहर रोका गया । लाहौर का हवाई अड्डा भारतीय तोपो की चपेट में था। "अब लाहौर की ईट के साथ इंट बजाई जाएगी।" 'लाहौर शहर खाली हो रहा है । लोगों के काफिले लाहौर छोड- कर जा रहे हैं।" "लाहौर पर हमारा कब्जा हुआ तो पाकिस्तान को कमर टूटकर रह जाएगी।" "लाहौर तो पाकिस्तान की नाक है।" "अव पाकिस्तानी कभी भारत को नहीं ललकारेंगे।" "इम वार हम दुश्मन के दात खट्टे करके रहेंगे।" "वह मार मारेंगे कि हमेशा-हमेशा उन्हें याद रहे।" "अमरीका के दिए हुए पैटन टैंको का हमारे जवान इस तरह निशाना बनाते हैं, जैसे वे खिलौने हो।" ' कहते है, पाकिस्तानी चालक पंटन टैको को खाली छोड़कर भाग जाते है । उनको यह खतरा लगा रहता है कि कही टैंक मै आग गई तो वे अदर ही जलकर भस्म हो जाएगे। मुसलमान अगर जल जाए तो कयामत वाले दिन उमे उठाया कैसे जाएगा वेगम मुजीव यह सब सुन-सुनकर दीवानी हो रही थी, कानो में उगलिया दे लेती। क्या तो उसकी बेटी, और क्या उसका बेटा, क्या तो उमके मिलने-जुलने वाले, और क्या अड़ोसी-पडोसी, हर कोई इस तरह , 7" मन परदेसी/१६७ की बातें करता था । समाचारपत्र दुश्मन की कहानियों से भरे होते थे। रेडियो पर पाकिस्तान को बुरा-भला कहा जाता। दुश्मन का मजाक उड़ाया जाता। जगह-जगह दुश्मन की हार की ख़बरें सुनाई जातीं। इतना जहर फैलाया जा रहा था, इतनी गंदगी उछाली जा रही थी, वेगम मुजीव सोचती, इसकी बदबू से तो उनकी अपनी नाक सड़ांध से भर जाएगी। नफ़रत के इस मलवे में वे लोग ख द दबकर रह जाएंगे। ३६ लाहौर पर खुल्लम-खुल्ला आक्रमण देखकर पाकिस्तान ने लड़ाई का वाक़ायदा ऐलान कर दिया। उधर पाकिस्तान के प्रेसिडेंट अय्यूब ने लड़ाई की घोषणा की, इधर भारत में कई लोगों को हिरासत में ले लिया गया। इनमें महमूद भी था। उनके घर पर अचानक छापा मारा गया था और पुलिस महमूद को पकड़कर ले गई । यह भी सुनने में आया था कि महमूद को गिरफ्तार करने के लिए आई पुलिस टुकड़ी ने उनके घर की तलाशी ली थी और ढेर सारा असलह बरामद किया था। इसमें हथ-गोले थे, वारूद था, देसी रिवाल्वर थे "यह सव झूठ है।" उस दिन दोपहर ढलते समय रुखसाना ज़ाहिद को बता रही थी। वैसी-की-वैसी सजी हुई जैसे अभी व्यूटीशियन के यहां से होकर आ रही हो। तंग पायचों वाली शलवार, घुटने-घुटने तक लंबी कमीज़, सिर पर जार्जट का दुपट्टा, पांव में जरी का पंजावी जूता । उसने गोल कमरे में कदम रखा, तो सारा घर जैसे महक उठा हो। "पुलिस ने कव छापा मारा?" ज़ाहिद उसके भाई महमूद की गिरफ्तारी को सुनकर परेशान था। "सुबह-सवेरे आए। अभी हम सोकर भी नहीं उठे थे।" रुखसाना ने साधारण तौर पर कहा । "बहुत बुरी बात है।" ज़ाहिद ने अपने होंठों में कहा । १६८ / मन परदेसी "इममें कौन-सी बुराई है ? महमूद के ढग ही कुछ ऐसे थे। कई बार हम लोगों ने उसे समझाया है, लेकिन उसकी वोपड़ी जमे उल्टी हो।" "इनका मतलब यह है कि अब वह जेल में बंद रहेगा?" जाहिद को जैसे रखमाना की वेरखी पर विश्वास न हो रहा हो। "इस तरह के लोग हिरासत में आराम से रहते हैं।" "फिर भी जेल आखिर जेल है।" "कोई नही, घर से विस्तर चला गया है । दोनो वक्त खाना पहुचा दिया जाता है। पढने के लिए किताबें वह ले गया है।" जाहिद हैरान था, किस लापरवाही से रखसाना इस सब कुछ का जिक्र कर रही थी ; जैसे कोई गर्मियो मे पहाड पर गया हो। "अन्दा कहते हैं, अच्छा है, जेल मे वह बुरी संगत से बना रहेगा।" और रुखसाना आगे बढकर, नौकर की लाकर रखी हुई चाय बनाने लगी। "यह भी कोई बात हुई।" जाहिद जैसे कुछ समझ न पा रहा हो। "इसमें परेशान होने की क्या बात है जाहिद, मेरी जान और फिर कमरे में जैसे एकदम खामोशी छा गई । रुखसाना पहली बार जाहिंद से इस तरह मुखातिब हुई थी । एक क्षण भर के लिए ऐसे लगा, जैसे चारो ओर कलियो के गुच्छे-के-गुच्छे चिटक पडे हो । एक चुधिया देने वाली रोशनी से कमरे मे कोध गई हो। एक शुशबू की लपट जैसे उसे मदहोश कर रही हो । उसकी आखें एक नशे-नशे मे मुर गई हों। अगले क्षण रुखसाना के होठ जाहिद के होठो पर थे। उसके माप दीवान पर बैठी उसने उसे अपने वाहुपाश मे ले लिया था और दीवानो की तरह उसे लाड़ किए जा रही थी। बार-बार उसके बालों में उगलिया फेरती और उसे चूमने लगती, जसे उसका जी न भर रहा हो । उमे चूम- चूमकर वह वेहाल हो रही थी। कितनी देर वे गुत्यमगुत्या हुए दीवान पर पड़े रहे । खसाना पर जैसे एक वहशत-सी छाई हो । जाहिद को अपनी बाहों मे लपेटकर घुम जाती। चूम-चूमकर वेहाल हो रही थी। आखिर जब उसे होग आपा मन परदेसी/ १६६ मामने तिपाई पर पड़ी चाय ठंडी हो चुकी थी। "महमूद का इस तरह गिरफ्तार" जाहिद अभी तक महमूद के वारे में परेशान था। "जाहिद, मेरी जान, इसमें परेशान होने की कोई बात नहीं है। मेरे अच्वा कहते हैं, जब लड़के की मर्जी होगी, हम उसे छुड़ा लेंगे।" "यह कैसे मुमकिन हो सकता है ?" "सब कुछ मुमकिन होता है। कल सरकार को क्या मुसलमानों की वोटों की जरूरत नहीं होगी ? और हमारे इलाके की सब वो मेरे अब्बा की मुट्ठी में हैं।" "पहले भी महमूद एक बार कैद काट चुका है।" ज़ाहिद को जेवा ने यह बता रखा था। "हां, उसमें भी मेरे अब्बा की मर्जी शामिल थी। वह सोचते थे, लड़के को अक्ल आ जाएगी लेकिन महमूद तो बिलकुल विगड़ चुका है। बुरी संगत में पड़ चुका है। दिन-भर भारत के मुसलमानों का रोना रोता' । "लेकिन उसकी बात में कोई वजन तो है।" जाहिद यह देखना चाहता था कि रुखसाना कितने पानी में है। "भारतीय मुसलमानों का मसला उनकी गरीवी है । उनका आर्थिक पिछड़ापन है। और कुछ भी नहीं । उनको नौकरियां दो। उन्हें व्यापार और दस्तकारी में लगाओ। कोई पाकिस्तान की ओर आंख उठाकर नहीं देखेगा। पाकिस्तान का तो बस नाम ही है । मैंने खुद वहां जाकर देखा है। एक हुजरे की तरह वह देश अंदर-बाहर से खाली है।" "जब तक हिन्दू अपना हिन्दूपन नहीं छोड़ते, मुसलमानों को कोई-न- कोई डर खाता रहेगा। इस देश की निजात सेक्यूलरिज्म में है।" जाहिद को राय थी। "मुश्किल यह है कि इस्लाम के हमारे नजरिये में सेक्यूलरिज्म की कोई जगह नहीं।" "और तो और, उर्दू में सेक्यूलरिज्म का तजुर्मा 'लादीनीआत' या 'गैर-मजहवियत' किया जाता है, जो बिलकुल गलत है ।" जाहिद हंस' १७०/ मन परदेसी "अमल में मेक्यूलरिजमका मतलब है, मजहबी जिन्दगी को दुनियादी जिन्दगी में अलग रखा जाए । लेकिन अकसर मुसलमानों को यू लगता है कि इन्लाम इसकी इजाजत नहीं देता।" जैसे रखमाना जाहिद के दिल को बात कह रही हो। वह इम लडकी की मूझबूझ और इसके स्वस्थ दृष्टिकोण पर चकित हो गया, गद्गद हो रहा था। फिर मनसाना वावर्चीलाने में गई और ताजी चाय बनाकर ले आई। और वे गरम-गरम चाय पीने लगे। "मैं जानबूझकर आज इस बत आई हू।" रखसाना ने चाय का घूट भरा और सामने सोफे पर बैठे जाहिद को बताने लगी, "मैं हेयर-ड्रेसर के यहा बैठी हुई थी कि मैंने शीशे मे में देखा, अम्मीनान रिक्शे में बाजार को और जा रही थी। जवा तो इस वक्त स्कूल होती है।" "कोई खाम बात?" जाहिद रखसाना की ओर देख रहा था। जमका यौवन जैसे ठाउँ मार रहा ममुद्र हो । रसोई में चाय बनाने गई नो वह अपने नखशिख को सवार आई हो। सजने की शौकीन। उसकी मुराहीदार गोरी गर्दन पर झुके हुए उसके जूडे में से उनके वालों की एक लट झाक रही थी, जैसे चुम्बन के लिए वैचन हो रही हो। उसको हर नजर जाहिद के कलेजे में जाकर यूं लगती थी, जैसे जिन्दगी में पहले उसने कभी महसूस नहीं किया था। रुखसाना क्षण भर के लिए स्की और फिर जैसे रटे-रटाए चोल उसके होठों से फिसल गए, "मुझे यह पूछना है कि लन्दन में आपका किसीके माथ कोई कोल-इकरार तो नहीं हुआ ?" शाहिद ने सुना और उठकर रखसाना को अपनी छाती से लगा लिया। फिर होठो पर होंठ। फिर एक-दूसरे के बाहुपाश मे। फिर जैसे एक तूफान उमड आया हो । जाहिद प्यार करके हटता और रुखसाना उसे चूमना शुरु कर देती। एक के बाद दूसरा। यू वे बेहाल हो रहे थे कि बाहर एक रिक्शा आन रुकी। जाहिद को अम्मीजान थी। स्खसाना और जाहिद मंभलकर एक-दूसरे के आमने- मन परदेमी/१७१ सामने सोफे पर बैठे चाय पीने लगे। वेगम मुजीव सीधी गोल कमरे में आई । रुखसाना और ज़ाहिद को वैठे चाय पीते देखकर कहने लगी, "बेटी, मैं तो आपके यहां गई थी। महमूद का सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ ।" "इसमें दुःख की क्या बात है अम्मीजान ! कुछ दिन का आराम उसकी सेहत के लिए अच्छा होगा। लीजिए, आप भी चाय पीजिए।" और रुखसाना अम्मी के लिए चाय बनाने लगी, जैसे वह घर उसका अपना हो। ३७ चाय पीते हुए रुखसाना वार-बार कह रही थी," 'कश्मीर' भारत का अटूट हिस्सा है। यह बात तो भारतीय मुस्लिम लीग भी मानती है। 'जमात-उल-उलमाय-हिन्द' वाले भी मानते हैं । शेख अब्दुल्ला के गद्दी से हटाए जाने और हिरासत में लिए जाने के बाद भी मुस्लिम-लीग का प्रेज़िडेंट मुहम्मद इसमाइल अपने इस विश्वास पर कायम है।" "मुझे तो लगता है कि कश्मीर के लिए लड़ते हुए हमारे पड़ोसी कहीं अपना पाकिस्तान ही न गंवा बैठे।" वेगम मुजीब चिन्तित थी। "कम-से-कम पूर्वी पाकिस्तान तो उनके हाथ से जाता रहेगा ।" जाहिद कहने लगा। "अगर भारत चाहे तो दो दिन में पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान से काटकर रख सकता है।" रुखसाना बोली। यूं बातें हो रही थीं । लड़ाई की कोई ताजा खबर नहीं थी। फिर रुखसाना अपने घर को चल दी। कालू उसके लिए सड़क से एक रिक्शा पकड़ लाया था। उधर रुखसाना गई, इधर जेवा की रिक्शा आकर रुकी। गोल कमरे में बैठी बेगम मुजीव हैरानी में बार-बार हाथ मल रही थी । “यह सुनकर १७२/मन परदेसी कि महमूद पकड़ा गया है, मैं खास तौर पर उनके यहा अफ़सोस करने गई।" वह अपने बेटे-बेटी को बता रही थी, "उनके घर में तो जैसे किसी- को परवाह ही न हो।" "रुखसाना को आपने नहीं देखा । हेयर-ड्रेसर के यहा से होकर इधर आई थी।" जाहिद कह रहा था। "यह तो अच्छा ही हुआ कि उसे शुरू में पकड़ लिया गया, नहीं तो क्या पता क्या गुल खिलाता।" जेबा ने नाक चढ़ाकर कहा । "रुखसाना कह रही थी कि उसके अव्वा ने जानबूझकर उसे गिरफ्तार करवाया है ताकि हिरासत में अपनी हरकत से बचा रहे।" "अम्मी ! आप जानती नही," जेवा वेहद परेशान थी, "महमूद तो कट्टर से कट्टर मुसलमानों से भी चार कदम आगे है।" जेवा का दिल जैसे लहू-लुहान हो । किस तरह का लड़का उसकी अम्मी उसके माथे मढ़ रही थी। "इधर वेशक कुछ लोग मानते हैं कि कश्मीर पर पाकिस्तान का हक है, कश्मीर उनको मिलना चाहिए।" "यह नहीं सोचते कि कश्मीर एक ऐसी रियासत है जहा मुसलमान ज्यादा गिनती मे है। अगर कश्मीर पाकिस्तान में मिल गया तो हिन्दु- स्तान मुसतमानो के जैसे हाथ कट जाएगे।" वेगम मुजीब कहने लगी। "अम्मी, महमूद तो जमाते-इस्लामी के मौलाना सदरुद्दीन और ममूद• उल-नदवी का चेला है। वह तो कहता है कि भारतीय मुसलमानो को जिहाद करके हिन्दुस्तान में 'हुकूमते इलाहिया' कायम करनी चाहिए। इसके लिए अगर जरूरत पड़े तो जान पर भी खेल जाना चाहिए।" "यही नहीं, रुखसाना मुझे बता रही थी, वह तो कई गलत किम्म की जमातो के साथ जुड़ा हुआ है। कहो तोड़-फोड, कही दगा-फसाद, कही फिरकावाराना वदमजगी, इस तरह को बेहूदगी मे आम तौर पर उसका हाथ होता है।" सुनते-सुनते वेगम मुजीव उठ खडी हुई। बबरो का वक़्त हो रहा था। उसने रेडियो लगाया । लडाई वैसी-को-वंसी जोरों पर थी। दुश्मन के टैकों को वरवाद किया जा रहा था। शत्रु के फोजी-ठिकानों पर भारतीय हवाबाज़ वम वरसा रहे थे। दुश्मन के कई हमलो को नाकाम कर दिया गया था। - - दुश्मन ! दुश्मन ! ! दुश्मन ! ! ! वेगम मजीव कान लपेटकर बाहर चली गई। इतना कुछ हो चुका था । ढेर-सा पानी पुल के नीचे से गुजर चुका था। लेकिन पाकिस्तान को दुश्मन कहते हुए वह किसीको सुन नहीं सकती थी। 'भाई वेहूदा हो सकता है, भाई वेसमझ हो सकता है, भाई बदचलन हो सकता है, लेकिन भाई दुश्मन तो कभी नहीं होता।' वह अपने-आपसे कहती। एक तो पाकिस्तान को 'दुश्मन' कहते हुए किसीको नहीं सुन सकती थी। दूसरे, महमूद की निंदा करते हुए किसीको सुनकर बेगम मुजीब के मुंह का ज्ञायका विगड़ जाता था। उसे लगता, जैसे हर किसीकी यह साजिश हो । भले-चंगे, खाते-पीते, घर के लड़के को बुरा-बुरा कहकर लोग बुरा बना रहे थे । वह तो उसके आंगन में सेहरा बांधकर आएगा, मन-ही- मन उसने पक्का इरादा किया हुआ था। खबरें ख़त्म हुई तो जेवा किसी काम से रसोई में गई। एक ख शबू-सी उसे महसूस हुई। फिर उसकी नज़र एक कोने में पड़े मसले हुए टिशु-पेपर पर पड़ी। उसीकी ख शवू थी, लेकिन टिशु-पेपर का रसोई में क्या काम ? जेवा ने झुककर देखा, टिशु-पेपर से किसीने अपने होंठ साफ़ किए थे। लिपस्टिक के निशान थे। यह तो रुखसाना की लिपस्टिक का रंग था। 'रुखसाना रसोई में क्या कर रही थी ?' फिर जेबा आप-ही-आप मुसकराने लगी। उसने टिशु-पेपर को उठाकर देखा, उसीके सेंट की ख शबू थी। जेबा को बेहद लाड़ आया। दीवानों की तरह उसने रुखसाना की लिपस्टिक के रंगे टिशु-पेपर को उठाकर चूम लिया। अपने कमरे में लेटी जेवा कितनी देर एक नशे-नशे में डूबी रही। रुखसाना कितनी किस्मत वाली थी ! जाहिद कितना ख शाकिस्मत था ! किसीके मन की मुराद का पूरा हो जाना ! किसीको किसीकी मंजिल का मिल जाना—हाय, उनकी दुनिया कितनी सुरीली होगी ! कैसे उनके दिन होंगे; जैसे रिमझिम फुहार से कोई झूला झूल रहा हो ! ऊपर और ऊपर कोई उड़ता चला जाए ! किसीकी जुल्फें खुल-खुल जाए ! किसीकी चुनरी उड़-उड़ जाए। - १७४ / मन परदेसी । रखसाना इस घर में लाएगी तो यह घर कितना भरा-भरा लगेगा! कितनी गहमा-गहमी होगी ! उसका अपना रग था। अपनी रोता थी। लेकिन तब जेवा कहा होगी यह सोचकर जेवा का दिल बैठने लगा। एकदम उसका चेहरा बुझ गया, जैसे चारो ओर काली घटा उमड आई हो । एकदम उसे आगे-पीने अधेरा-अधेरा दिखाई देने लगा। और फिर उसकी आखों में से छम-छम आमू टपकने लगे। कुछ देर के बाद वह सिसकिया भरने लगी। अकेली, अपने कमरे मे वद वह खून के आमू रो रही थी "राजीव का टेलीफोन है।" वाहर शाहिद उसे आवाज दे रहा था। जेबा ने दरवाजा नहीं खोला । न वह अपने पलग से उठी और न उमने जवाब दिया। जाहिद एक-दो मिनट इतजार करके फिर राजीव से बातें करने लगा, 'जवा । शायद गुसलखाने मे है।" उसने राजीव को बताया। उधर बेगम मुजीव का यह हाल था कि जब से भारत और पाकिस्तान मे खुल्लमखुल्ला जग शुरू हुई थी, आठो पहर ट्राजिस्टर लगाए खबरें सुनती रहती । कभी दिल्ली, कभी लाहौर, कभी वी० बी० सी० लदन । कोई कुछ कहता, कोई कुछ । यह बात निश्चित थी कि धुमपंठियो को कश्मीर में सफलता नहीं मिली थी। इस हकीकत को पाकिस्तानी भी मानते थे। कश्मीर मे मुसल. मानो और हिन्दुओ ने मिलकर आक्रमणकारियो के सारे मसूवे बेकार कर दिए थे। पाकिस्तान हमलावरो का पीछा करते-करते वे तिथवाल और हाजीपुर जैसे महत्वपूर्ण चौकियो पर जम गए थे। वेगम मुजीब को समझ में कुछ नहीं आ रहा था। हिन्दुस्तानी फोन की जीत सुनकर उसे अच्छा-अच्छा लगता है फिर अचानक इस खयाल मे कि पाकिस्तान हार रहा है. उसके मुह का जायका बिगड जाता। कभी उसका जी चाहता कि हिन्दुस्तान जीते, अपने देश पर हमला करनेवालों के दात घट्टे कर दे। फिर उसका मन कहता, पाकिस्तान न हारे। उस देश का अपमान न हो। रेडियो भारतीय फौजों की शानदार जीत की कहानिया सुनने पर, मन परदेसी । १७५ भी उसे लगता, जैसे वह खुद फ़ौज के साथ लड़ रही हो। गोलियां चला रही हो । एक वेपनाह जोश में फ़ौज को आगे-ही-आगे रही हो। फिर एकदम जैसे उसके हाथ-पांव ठंडे पड़ जाते। पाकि- न पर कोई वमन गिरे, उसका अंग-अंग पुकार उठता । पाकिस्तान में सीका वाल भी वांका न हो। हिन्दुस्तान की जीत में उसे लगता, जैसे उसका शौहर शेख मुजीव त रहा था। पाकिस्तान की हार में उसे महसूस होता, जैसे उसके मियां का भाई शेख शब्बीर हार रहा था। किसकी जीत वह मांगे? किसकी हार के लिए दुआ करे ? वेगम मुजीव की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। चक्कर-चक्कर, अंधेरा-अंधेरा उसकी आंखों के आगे छाया रहता। ३८ - ज़ाहिद और राजीव डाक्टरों के जत्थे के साथ लड़ाई के मोर्चे पर चले गए । दोनों के पास विलायत की डिग्रियां थीं। एक-आध दिन दिल्ली में सिखलाई के बाद उन्हें पश्चिमी सीमा पर भेज दिया गया। वेगम मुजीव देखती रह गई । न वह 'न' कर सकती थी, न वह 'हां' कर सकती थी। उसका एक ही एक वेटा पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग लड़ने के लिए चला गया था। चाहे डॉक्टर था, वम नहीं फेंकेगा, वंदूक नह चलाएगा, लेकिन उसपर तो कोई वम फेंक सकता था, उसे तो गोली निशाना बनाया जा सकता था। किसी मशीनगन को थोड़े ही पता हो है कि उसकी वरसाई गोलियां किसकी छाती में लग रही हैं, किसके को होद रही हैं। जाहिद और राजीव एक ही मोर्चे पर तैनात थे। ज़ाहिद के चिट्ठी में राजीव का जिक्र होता, राजीव की हर चिट्ठी में जा कुशल-मंगल का हाल । जैसे दो बुत एक जान हों। इकठे रहते थे, - १७६ / मन परदेसी । काम करते थे । इकट्ठे खाते-पीते । वेगम मुजीच को हर रोज़ चिट्ठी लिखते थे । जाने से पहले इसने उनसे वायदा लिया था। जब जाहिद फारिग नहोता तो राजीव चिट्ठी लिखता । जव राजीव ड्यूटी पर होता, जाहिद चिट्ठी लिखता। दोनो इसे 'मेरी प्यारी अम्मीजान' कहकर अपनी चिट्ठी शुरू करते । दोनों को चिट्ठी 'आपका बेटा' कहकर खत्म होती। प्यादा चिट्ठिया राजीव लिखता । दोनो उर्दू में अग्रेजी का प्रयोग करते। जाहिद कुछ कम, राजीव कुछ अधिक। फिर एक दिन बेगम मुजीव अपने दिल को टटोलती रह गई। पाकिस्तान के किसी स्टेशन पर उसके रेडियो की सूई धूमी और उमने मुना : ब्रिगेडियर मुहम्मद इरफ़ान को छम्व संक्टर मे लासानी वहादुरी दिखाने के लिए पाकिस्तानी फ़ोज का सबसे ऊचा एजाज पेश किया गया था। ब्रिगेडियर इरफ़ान की कमान मे पाकिस्तानी फौजों ने दुश्मन की एक के बाद एक पाच चौकियों का सफाया किया था। दुश्मन के सैकड़ों सिपाहियों को मौत के घाट उतारा था, पूरी-की-पूरी भारतीय रेजिमेंट ने पाकिस्तान को आगे बढ़ रही फौज के मामने हथियार डाल दिए थे। कुछ इस तरह ब्रिगेडियर इरफान की बहादुरी के कारनामे सुनाए जा रहे थे। वैगम मुजीव की ननद इस्मत के मिया ब्रिगेडियर इरफान ने मंकडों भारतीय फौजियों को गोलियो का निशाना बनाया था। एक ही हमले में पाच चौकियों पर कब्जा कर लिया था। कई भारतीय फौजों को कंदी बना लिया था। इस सब कुछ के लिए उसे पाकिस्तान के मवसे उत्तम तमगे के साथ सम्मानित किया गया । बेगम मुजीव की समझ में नहीं आ रहा था कि इस सब कुछ के लिए वह पुश हो या नहीं। उसके देश की हार हो रही थी। उसकी ननद का शौहर जीत रहा था। पाकिस्तानी छम्व मंक्टर मे आगे, और आगे बढ़ते हुए कश्मीर को भारत से अलग कर देना चाह रहे थे । और ब्रिगेडियर इरफान इम मोर्चे पर पाकिस्तानी फौजो की अगवाई कर रहा था। अगर कश्मीर को इस तरह भारत से काट दिया गया तो पाकिस्तानी फौजें रियामन पर कब्जा कर लेंगी। वेगम मुजीब क्या चाहती थी ? 'कश्मीर भारत का अटूट अग है, । मन परदेसी /१७७ । कई वार वह यह कहा करती थी। हमेशा उसका बेटा यह कहता था। उसकी वेटी यह कहती थी। अगर ब्रिगेडियर इरफ़ान की फ़ौज भारतीय चौकियों का सफाया कर सकती है तो वह भारतीय फ़ौज के अस्पतालों पर भी तो हमला कर सकती है। उन्होंने तो मस्जिदों पर भी वम बरसाए थे। और इस तरह के किसी फ़ौजी अस्पताल में उसका बेटा जाहिद था, राजीव था। वेगम मुजीव सोचती, अगर लड़ाई भारत और पाकिस्तान के बीच न होती तो वह इरफ़ान की इस जीत पर उसे तार भेजती । खुद जाकर उसे मुवारकवाद देती। वह तो इसके वेटे की तरह था, स्वयं इसने उसका रिश्ता करवाया था। और फिर इस्मत के साथ इसका प्यार भी कितना था ! इस्मत को वह ननद थोड़े ही समझती थी, वह तो जैसे इसकी बेटी थी। वेटियों की तरह तो वेगम मुजीब ने उसे पाला था, उसका विवाह किया था। वहुत दिन नहीं गुज़रे और वही बात हुई जिसके बारे में बेगम मुजीव सोचती और उसका दिल बैठ-बैठ जाता । एक सुवह उसके नाम तार आया कि ज़ाहिद जंग के मोर्चे पर घायल हो गया था । वेगम मुजीब ने तार पढ़ा और जेबा की बांहों में ढेर हो गई। जेवा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। कोठी के बाहर सड़क पर उसने डाक्टर गोयल को खुला भेजा। टीका लगाकर डाक्टर वेगम को होश में ले आया। अब समस्या यह थी कि जाहिद के बारे में पूछताछ कहां से की जाए। होश में आकर वेगम मुजीव बार-बार जेवा से पूछती, "कितनी चोट आई ? कहां वोट आई ?" जेवा अपनी अम्मी को क्या बताती। बेगम मुजीव को परेशानी में बुखार आ गया। उसका बुखार वड़ने लगा। कुछ देर के बाद उसका शरीर जैसे जल रहा हो। उसका मुंह लाल सुर्ख हो गया। जेबा ने फिर डाक्टर को टेलीफ़ोन किया। डाक्टर ने उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखने के लिए कहा । लेकिन यूं लगता, जैसे बुखार वेगम मुजीव के सिर पर चढ़ता जा रहा हो। कुछ देर के बाद उसने अनाप-शनाप वोलना शुरू कर दिया। "लाहौर पर कब्ज़ा क्यों नहीं करते? शहर के बाहर जाकर क्यों १७८/मन परदेसी रक गए है ?" जेवा पानी में बर्फ के टुकड़े डालकर ठही-ठडी पट्टिया उसके माथे पर रखे जा रही थी। "तुम क्यों नहीं फौज में भर्ती होती? यहा बैठो क्या कर रही हो? दुश्मन ने हमारे देश पर हमला कर दिया है।" जेवा हैरान-मी अपनी अम्मी के मुह की ओर देख रही थी और एक के बाद एक, उसके माथे पर पट्टिया रमे जा रही थी। "यह अंगूठी प्रधानमत्री के फड मे भेज दो। इस दुश्मन को सबक सिखाना होगा।" वेगम मुजोब ने अपने हाथ की उंगली में से हीरे की अगूठी उतारकर जेबा की हथेली पर रख दी। जेबा के अश्रु फूट आए। यह अगूठी वेगम मुजीब के शौहर की निशानी थी । उसे सबसे अधिक प्यारी थी। क्या मजाल है जो कही आगे- पीछे हो जाए। हमेशा उसे सीने से लगाए रहती। इतने में रुखसाना आई। वैमी-की-बसी सजी हुई । ख शबू-ख शबू । एक नजर तार को देखकर उसने मेरठ छावनी एक टेलीफोन किया, दूसरा टेलीफोन किया। शाम तक सूचना आ गई कि जाहिद की दाई टाग पर गोली लगी थी। खतरे की कोई बात नही थी। उसके साथी सर्जन राजीव ने चीरा देकर गोली निकाल दी थी। मरीजको दिल्ली या मेरठ भेजा जा सकता था, लेकिन एक-आध दिन राजीव उसे अपनी देख-रेख में रखना चाहता था। रखसाना का कोई 'अकल' छावनी मे बडा अफसर था। उसने उमसे फरमाइश की कि अगर मुमकिन हो सके तो जाहिद को मेरठ के अस्पताल में तब्दील कर दिया जाए। "यह कोई मुश्किल नहीं होना चाहिए।" रखसाना के 'अकल' ने उसे होमला दिलवाया। रुखसाना ने आते ही वेगम मुजीव को मभाल लिया । बेगम मुजीब का भी जमे रखसाना को देखकर बुखार उतरना शुरू हो गया। रखसाना टेलीफोन कर चुकी तो वेगम मुजीव के सिरहाने बैठ गई। उसने उमर मिर को अपनी गोद में रख लिया और उसमे मीठी-मीठी बातें करने लगी। । मन परदेमी/१७६ "मैं तो हमेशा कहती हूं, लड़ाई वुरी चीज़ है-चाहे छोटी हो, चाहे वड़ी। और फिर लड़ाई अपने पड़ोसियों के साथ, इस जैसी वेहूदगी कोई नहीं। और फिर पड़ोसी भी ऐसे, जैसे भारत और पाकिस्तान। एक परिवार । दो जिस्म, एक जान । मेरी अम्मी पहले खबरें अपने रेडियो स्टेशन को सुनती हैं । पाकिस्तान की हार की कहानी सुनकर फट लाहौर या कराची स्टेशन लगा देती हैं, यह सुनने के लिए कि वे लोग हारे नहीं हैं। यह अच्छी लड़ाई है। पाकिस्तान कहता है, हम जीत रहे हैं, हिन्दुस्तानी कहते हैं, हम जीत रहे हैं।" "और ख़बरें सुनने वाले भी इस तरह के लोग हैं, इधर हिन्दुस्तान में भी और उधर पाकिस्तान में भी जो हाथ जोड़ते रहते हैं कि हिन्दुस्तान भी जीते, पाकिस्तान भी जीते ।" ज़ेबा ने फीकी-सी हंसी हंसते हुए कहा। "नहीं, नहीं, नहीं ! दुश्मन की हार हो ! दुश्मन की हार हो !!" रुखसाना से यूं बातें करते हुए वेगम मुजीव की आंख लग गई। ३९ कुछ दिनों के बाद ज़ाहिद को दिल्ली छावनी के अस्पताल में भेज दिया गया। मेरठ अस्पताल में भेजना संभव नहीं था। जाहिद की टांग में ही गोली नहीं लगी थी, उसको और भी चोटें आई थीं। वास्तव में उसके निकट, कुछ दूरी पर दुश्मन का वम आकर फटा था, जिससे वह बुरी तरह निढाल हो गया था। राजीव ने दिन-रात एक करके उसे बचा लिया था। हर कोई कहता, यह तो चमत्कार है। जगह-जगह पट्टियां, जगह-जगह पलस्तर । जाहिद की एक से अधिक हड्डियां टूटी थीं। जाहिद के साथ राजीव भी मोर्चे से लौट आया । वास्तव में डाक्टरी कोर के अफसरों को इस बात की चिन्ता थी कि जाहिद का केस विगड़ न जाए। राजीव ने शुरू से उसे संभाला था। जब तक कि वह खतरे से १८०/ मन परदेसी बाहर न हो जाए, उसे राजीव को देख-रेख में रखना उचित था। बैगम मुजीव ने अपने बेटे को देखा तो उसका दिल डूबने लगा, जैसे पट्टियों में लिपटा हुआ गुड्डा हो । शरीर का कोई हो अग ऐसा होगा जहां उसे पोट न आई हो। क्या सिर, क्या छाती! क्या वाहै, क्या टांगें ! लेकिन एक राजीव था कि उसे पूरा विश्वास था । वेगम मुजीव को वह ढाढस वधा रहा था, "जाहिद पूरी तरह खतरे से बाहर है।" पट्टियों में लिपटा हुआ चाहिद भी, आखो-ही-साखी से मुसकराकर मा का हौसला बढ़ा रहा था। अम्मी के साथ जेवा थी, रखसाना थी--दोनों हक्की-वक्की-सी जाहिद को देख रही थी। वे तो इसका अनुमान भी लगा नहीं सकती थी कि जाहिद इस तरह गभीर रूप से घायल हुआ था। राजीव कितनी देर तक उन्हे समझाता रहा, चोट कहा-कहा आई थी, चोट की अव क्या हालत थी। टूटी हुई हड्डिया पलस्तर मै थी, और कुछ दिन में वे जुड़ जाएगी। वक्त जरूर लगेगा लेकिन जाहिद ठीक हो जाएगा। वेगम मुजीब, जेबा और रुखसाना राजीव के यहा रुक गई और बारी-बारी से, अस्पताल में जाहिद की देखभाल करने लगी। दो-चार दिन के बाद रुखसाना को मेरठ लौटना पड़ा। महमूद का मामला बिगड गया था। यू लगता, जैसे पुलिस की हिरासत में उससे पूछताछ हुई और पुलिस ने उससे कुछ वकवा लिया था। फिर तफतीश हुई और पता चला कि उसका तो कई गंभीर अपराधो मे हाथ था। भू लगता कि उसे सजा होकर रहेगी। उसके अब्बा का रसूख धरा-वा-धरा रह जाएगा। ज्योज्यो मामला आगे बढता, और-और गद उछलता। महमूद और-और शिकजे मे फसता जाता। अव उसके अम्बा ने बड़े-से-बड़े वकील को मुकदमे की पैरवी के लिए तय कर लिया लेकिन यू लगता कि महमूद को सजा होकर रहेगी। वेगम मुजीव मुन-सुनकर हैरान होती रहती। जैसे-जैसे उमकी करतूतो के बारे में सुनती, जेवा अपने-आपको जैसे जीता हुआ महसूस करती। फिर भी राजीव से जो दूरी उसने तय कर ली थी, उसे बनाए रखती । उधर जब तक जाहिद ठीक न हो जाए, राजीव ऐसी कोई हरकत मन परदेसी/११ । करना नहीं चाहता था जिससे किसी का दिल दुखे। फिर जाहिद को मेरठ के अस्पताल में तब्दील कर दिया गया । कुछ दिन अस्पताल में रहकर वह घर आ गया। लेकिन जितने दिन वेगम मुजीव और ज़ेवा दिल्ली में राजीव के यहां रहीं, उसने जैसे वेगम मुजीव का दिल समूचा जीत लिया हो। कितना प्यारा लड़का ! कितना क़ाबिल सर्जन ! कितना मीठा बोलने वाला ! कितनी कुरबानी ! एक क्षण के लिए उसने कभी यह महसूस नहीं होने दिया था कि ये लोग उसपर किसी तरह का बोझ थे ! जितने दिन ये वहां रहे, राजीव या तो अस्पताल में जाहिद के पास होता या फिर इनकी खिदमत में। जेवा अजीव हारी हुई-सी महसूस करती। अजीव थी उसकी मजबूरी। राजीव को चाहती थी लेकिन अपनी विधवा मां को उससे ज्यादा प्यार करती थी। कभी राजीव के साथ अकेली न होती। कभी नजर उठाकर उसकी आंख-से-आंख न मिलाती। एक छत के नीचे वे रहे, एक मेज पर खाते-पीते, लेकिन उसकी मां का संयम, जेवा ने एक बार भी अपने-आपको . शर्मिदा नहीं होने दिया। एक बार भी अपनी मां को दिए वचन को नहीं झुठलाया। उधर महमूद के मुकदमे की ऐसी भयानक खबरें आ रही थीं। फिर भी जेबा अपनी अम्मी के साथ किए इकरार पर वैसी-की-वैसी स्थिर - - थी। महमूद के अव्या कहते, लड़ाई का शोर-शरावा खत्म हो जाए तो मैं अपने बेटे को छुड़ा लूंगा। रुखसाना महमूद को बुरा-भला कहती, लेकिन इसमें उसे भी कोई शक नहीं था कि उसके अब्बा अपने बेटे को रिहा नहीं करवा सकेंगे। उन लोगों के रहन-सहन, खान-पीन, शान-शीक़त में कोई फ़र्क नहीं आया था । रुखसाना की मुहब्बत का सदका, जाहिद आज और कल और, दिन- पर-दिन अच्छा होता जा रहा था। रुखसाना प्रायः उनके यहां मौजूद रहती। जाहिद का दिल बहलाए रखती। जाहिद चार दिन लड़ाई के मोर्चे पर क्या रह आया था, सारा दिन पाकिस्तान से हुई जंग की कहानियां उन्हें सुनाता रहता। छम-जोड़ियां १८२/मन परदेसी । के इलाके में कभी पाकिस्तान का पलड़ा भारी हो जाता, कभी भारत का । कमे हिन्दुस्तानी फौज मे--मिख, ईमाई, हिन्दू और मुमलमान एक-ज्ञान होकर लडते थे ! कही 'हर-हर-महादेव', कहीं 'अल्लाह हू अकबर', कहीं 'सन श्री अकाल' के नारे मुनाई देते । कैसे पाकिस्तान ने पहले अपने धुम- पैठिए कश्मीर में भेजे । उनका खयाल था कि कश्मीर के लोग फूलों के हार लेकर उनका स्वागत करेंगे । घुमपंठियों ने नोड-फोड की वारदातें की, आग लगाई, पुल वरवाद किए। लेकिन फिर एक वक्त आया जब पाकिस्नान के लिए घुसपैठियों को बचाकर बाहर निकालना मुश्किल हो गया । छम-जोडिया के मैक्टर में पाकिस्तान का इस तरह सिर-घड की वाजी लगाकर लड़ने की वजह यह भी थी कि पाकिस्तानी अपने घुम- पंठियो को जम्मू और कश्मीर में से किमी तरह निकालना चाहते थे। उन्हें डर था कि उनके लोग जगलो मे, पहाडो में भटकते मर जाएगे। जाहिद पर छम-जोडिया के मैक्टर में हमला हुआ था। उस दिन वेगम मुजीब उसके पास बैठी अपने बेटे को ब्रिगेडियर इरफान को मिले तमगे के बारे में बता रही थी। कमरे में जेवा भी बैठी थी और स्खसाना भी। "तो फिर आपके वेटे को चाहे इम्मन फूफी के मिया का ही फेंका बम आ लगा हो।" शाहिद ने कहा और कमरे में जैसे एक स्तब्धता छा गई हो। "क्या मतलब " कुछ देर बाद वेगम मुजीब पूछने लगी। "हो न हो, यह इरफान फूफा का हो वम था।" जाहिद गभीर हो रहा था। "तभी तो तुम्हारा बचाव हो गया है।" जेवा हसने लगी। "इममे हसने की कोई बात नही," रुखसाना का चेहरा दहकने लगा, "हिन्दुस्तान के मुसलमानो को फैसला करना है --कोन हमारा दुश्मन है, कौन हमारा दोस्त है ?" "पाकिस्तान की हुकूमत हमारी दुश्मन है। पाकिस्तान के लोग हमारे दोस्त है।" जेवा ने गढा-गहाया जवाब दिया। "इरफान फूफा का वम मेरी जान भी ले सकता था, जैम उसने मेरे मन परदेमी/१८३ और कई साथियों को मारा।" "जो वम अम्बाला पर फेंके जा सकते हैं, वे मेरठ पर भी गिर सकते हैं।" रुखसाना आग-बबूला हो रही थी। "हमारी पीढ़ी पर खुदा की मार है।" वेगम मुजीव हाथ मलती हुई उठ खड़ी हुई और कमरे में से निकल गई। "वेशक भाई-बहन हैं, पड़ोसी हैं, लेकिन लड़ाई में एक-दूसरे के दुश्मन 1" रुखसाना कह रही थी। "जव सुलह हो जाएगी, फिर वहन-भाई वन जाएंगे।" जेवा के मुंह का मजा जहर जैसा कड़वा हो रहा था। उधर अपने कमरे में कार्नस पर रखी इरफ़ान की तसवीर के सामने खड़ी वेगम मुजीव उससे पूछ रही थी, "इरफान ! तुमने जाहिद को निशाना बनाकर, जाहिद के साथियों को बम से उड़ाकर, जाहिद के देश पर हमला करके तमगा ले लिया है-क्या यह सच है इरफ़ान ? क्या यह सच है ?" हैं।" ४० हर कोई कहता था कि उसे सजा हो जाएगी, लेकिन महमूद के अध्या को पूरा भरोसा था कि वह रसूख से, अपने पैसे से, बेटे को छुड़ा लेंगे। जब कोई इसका जिक्र करता, वेगम मुजीव को जैसे अच्छा-अच्छा लगता। मन-ही-मन वह महमूद को जेवा के साथ जोड़े हुए थी। उधर जेवा थी कि जब भी कोई महमूद का नाम लेता, उसके दिल की कोई धड़कन जैसे गुम हो जाती। जाहिद ठीक हो रहा था। उसने उठना-बैठना शुरू कर दिया था। घर में एक कमरे से दूसरे कमरे तक चला जाता। दिन में, बाहर धूप में जा बैठता । वेगम मुजीव सोचती, जाहिद एक बार ठीक हो जाए तो रुखसाना के साथ वह उसका निकाह कर देगी। उसे तो वस वाकायदा - । १८४/ मन परदेसी पंगाम ही देना था। रुखसाना के घरवाले इसके इंतजार में ये। जेवा के बारे में, अलबत्ता कुछ नहीं कहा जा सकता था। महमूद के घरवालों को समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उनका लड़का भी हिरा- सत में या । अभी मुकदमा चल रहा था। अभी उनका वकील डोर लगा रहा था। अजीब-अजीव कहानिया लोग गढ़ते थे। वेगम मुजीव मुनती और उमका दिल वठ-बैठ जाता। फिर वह सोचती, लोगों को वेकार राई का पहाड़ बनाने की आदत होती है ।और फिर हमारी पुलिस भी तो मच्ची- झूठी बातें जोड़ती रहती है। पिछली वार भी तो महमूद के साथ उन्होंने यू ही किया था। इधर जव मे जाहिद और राजीव, लड़ाई के मोर्चे से लौटे थे, उनकी बातें बेगम मुजीब के दिमाग को जैसे नित्य नई बिडकिया खोल रही हो । राजीव हर सप्ताह जाहिद को देखने के लिए आता था। राजीव और जाहिद उमे बनाते कि पाकिस्तान के बच्चे-बच्चे की जबान पर आजकल यह नारा है । हमके लिया है पाकिस्तान, लडके लेंगे हिन्दुस्तान ।।" "यह तो मेरा भाई महमूद भी हमें मुनाया करता है," रख साना कहने लगी। "महमूद गजनवी ने हिन्दुस्तान को सत्रह वार लूटा, शहाबुद्दीन गौरी ने दस वार हमला किया और फिर कही भारत पर इस्लामी राज कायम कर सका; वावर के पाचवें हमले के बाद यहा मुगल. राज की नीव डाली गई; अहमद शाह अब्दाली आठ बार यहा लूट-मार करके लौट गया। पाकिस्तान भी किमी-न-किसी दिन कामयाब हो जाएगा।" "बीमार आदमी है।" जाहिद ने नाक चढाते हुए कहा । "ये लोग नहीं जानते कि आज का भारत वह पुराना भारत नहीं।" जेबा कह रही थी। "आज का भारत हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई मवका भारत है।" जाहिद ममझा रहा या, "पाकिस्तान के लोग वेशक हमारे 'हम-मजहब' हैं, वे हमारे 'हम-वतन' नही। मजहब को अपनी जगह है, वनन की मन परदेसी/१८५ । अपनी । मजहब की मुहब्बत एक चीज़ है, वतन का प्यार एक ओर । कश्मीर में सबसे पहले घुसपैठियों की खबर सवरोट के एक मुसलमान गूजर ने दी । जोड़िया के एक मुसलमान आबादी वाले गांव ने घुसपैठियों को मुंह नहीं लगाया, गुस्से में आकर उन्होंने जुम्मां के रोज मस्जिद मे नमाज पढ़ रहे लोगों पर वम फेंककर इकावन नमाजियों को भून. डाला । चीमा के मोर्चे पर चौथी ग्रेनेडियर का हवलदार अब्दुल हमीद बजका वाली जीप में जा रहा था कि उसने देखा कि कोई डेढ़ मां गज के फ़ासले पर पाकिस्तान का एक पैटन टैक आ रहा है। एक आंख अपकने की देर में वह एक टीले के पीछे जा छिपा और उसने उम्पात के बढ़ते हुए दैत्य पर गोलियों की वर्षा कर दी। उसके देखते- देखते पंटन टैंक में से शोले निकलने शुरू हो गए । इतने में एक और पटन टक आगे बढ़ा । हमीद ने उसे भी निशाना बनाया। फिर दो और टैंक मामने आए, हमीद ने बिना किसी खीफ़ के, उनमें से एक को नकारा कर दिया । लेकिन चौथे पाकिस्तानी टैक ने हमीद को दबोच लिया। अल्लाह का नाम उसके होंठों पर था, और हवलदार अब्दुल हमीद अपने देश के लिए जान पर खेल गया। हमीद को बहादुरी का सबसे बड़ा मान, परम- वीर चक्र मरने के बाद दिया गया है।" "लड़ाई से कई महीने पहले पाकिस्तान के विदेशी मामलों के वजीर खुल्लम-खुल्ला कहा था कि पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने की । योजना पूरी कर ली है।" जेवा याद दिला रही थी। "और यह स्कीम हमारे भाई महमूद के मुताविक कुछ इस तरह थी, मखसाना कहने लगी, “पाकिस्तानी घुसपैठिए पहले श्रीनगर के हवाई अड्डे और रेडियो स्टेशन पर कब्जा करेंगे। फिर हुकूमत की बाग-डोर संभाल ली जाएगी। चौदह अगस्त, १९६५ का आजादी का दिन पाकिस्तानी जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में मनाएंगे । अगर इसमें कामयावी न हुई तो पाकिस्तानी फौजें छम्ब-जोड़ियां सैक्टर में अंतराष्ट्रीय सरहद पार करके अखनूर और जम्मू पर कब्जा कर लेंगी। और फिर बाकी रियामत पर । और अगर यह भी योजना पूरी न हुई तो पाकिस्तानी फौजें पैटन टैंकों और सेवर-जंट हवाई जहाजों की मदद से पंजाब पर हमला, भुट्टो ने १८६ / मन परदेसी कर देंगी। सात सितंबर को व्यास नदी पर घरनी सइमामे पुल पर कम्जा किया जाएगा। आठ सितंबर को लुधियाना जीता जाएगा। सिनयर को फील्ड मार्शल अय्यूब लाल किले में अपती जीत का नशा मनाएगे।" ये सव सुन-सुनकर बेगम मुजीब के पसीने छूट रहे थे। यू भी कभी हुआ है ! अधेरगर्दी । यू भी कभी पड़ोगी, पडोगियों में गाप मारी है ! "जैसे घर लोगो ने काच की चूडिया पहन रखी हो।" अंधानेपान पीसकर कहा । "यह नो शाबाश है हिन्दुस्तान में मुगलमानो पर कि एक-गयान होकर उन्होने अपनी हुकूमत का साथ दिया," जाहिद ने गाया, "अगर. धारीफ को दरगाह से फरमान हुआ कि हजरत बाजा गरीयमयागमा हर मैदायी जहरत पड़ने पर अपने देश की हिफाजत के लिए अपी-मारका चुर्बान कर दे। जमात-उल-उलमाय हिन्द के जगरण टीमोलागा अनद मदनी ने प्रधानमत्री को नार देकर यकीन दिलाया किभाग मुसलमान पाकिस्तान के नापाक इगदी को कामपान । जमात कश्मीर को भारत का अटूट अग गममनी है और लिए पर हर कुर्वानी देने को तैयार है। दिल्ली के शाही माम ने पाकिमतीन का मुकाबला करने के लिए सरकार को पूरी मदद की गंगा की।" उम शाम, मक्का-शरीफ मे हिन्दुस्तानी मजलिग से ग-अल-त मौलाना मुहम्मद करमअली ने भारतीय मुगलमानी गे अपील की। चौबीम मितवर की जुम्मा की नमाज के बाद अन्नाह या शुभ माना fr वे एक ब इम्तिहान में पूरे उनी है। पाकिस्तान र माmril के दौरान वे अपने देश के प्रनि पूरे यूर असादार रहे थे। यह बर मुन रही वेगम मुत्रीव के गाने पर जम को मार श्रामगा हो। क्या वह भी अपने देश के प्रति पूरी वादारी' या या भी रवादारी और हिन्दू-मुग्लिमाकना की शाहगह पर यार ही योगिर मागे उन उसरा शौहर चलता रहा था' बंगम मुजीब के भीर भंग कान उमइ लामा हो। बैंगन मुजीब आने कमरे में बंटीन रिवारों में इनी नाही या मन परदेमी/१७ . 'कि उसे लगा, जैसे राजीव आया हो । हां, यह उसीकी आवाज़ थी। पिछले कई दिनों से वह जाहिद को देखने आया करता था। रात-भर ठहरकर अगले दिन लौट जाता। वेगम मुजीव को चाहिए था कि उसके स्वागत के लिए गोल कमरे में जाए। लेकिन उसके पांव में जैसे सकत न हो । अपने कमरे में पलंग पर पड़े हुए, उसे लगता जैसे किसी अंधेरे कुएं में वह धंसती चली जा रही हो। चक्कर-चक्कर, अंधेरा-अंधेरा। उसका दिल वैठता जा रहा था। यही नहीं, अगले दिन हमेशा की तरह राजीव शाम की गाड़ी से लौट गया। बेगम मुजीव को वेशक याद था, लेकिन उसके चलने से पहले वह घर लौटकर नहीं आई। किसीसे, वाहर मिलने के लिए गई हुई थी, जहां उसे देर हो गई। रिक्शा से उतरकर, जल्दी-जल्दी वह गोल कमरे की तरफ़ बढ़ी । पर्दा हटाकर उसने देखा कि सामने सोफे पर जाहिद और रुखसाना, रुखसाना और जाहिद'! और फिर आंख झपकने की देरी में पर्दा वैसे- का-वैसा खिसककर अपनी जगह पर आ गया। वेगम मुजीव अपने कमरे की ओर चल दी। जेबा के कमरे के पास से गुजरते हुए उसे लगा, जैसे अन्दर से सिसकियों की आवाज आ रही हो। हां-हां, ये सिसकियां ही तो थीं। जेवा अपने पलंग पर औंधी पड़ी लहू के आंसू रो रही थी। वेगम मुजीव उसके कमरे में गई। अम्मी को देखकर जेवा की चीख निकल गई। "तुझे हो क्या रहा है ?" मां ने पूछा । एक वार, दो बार, और फिर जेवा ने अपने सामने पड़ा हुआ लिफ़ाफ़ा उठाकर उसे पकड़ा दिया। राजीव की चिट्ठी थी। 'जेवा! तेरी अम्मी की अगर यही शर्त है तो मैं मुसलमान हो जाता हूं।' बेगम मुजीव का मुंह खुले-का-खुला रह गया। उसके कलेजे में एक अजीव-सी कसक थी। कितनी देर अपने कमरे में वह पसीना-पसीना-सी हुई पड़ी रही। उससे अपनी बेटी का दुःख और नहीं देखा जाता था।महमूद का कुछ पता नहीं था। राजीव अजनबियों की 1 १८८/मन परदेसी 1 तरह आता था, अजनबियों की तरह शाहिद से मिलकर चला जाता था। आज कितने दिन हो गए थे ! आज की शाम भी ऐसा ही हुआ था। साझ ढल रही थी। बेगम मुजीव चादर उठाकर अपने शौहर के मजार की ओर चल दी। उसकी कद्र के पास पहुंची कि वह वेहाल होकर उसके ऊपर गिर पड़ो। छल-छल आसू बहाती हुई बेगम मुजीव अपने बच्चो के अध्वा से कह रही थी, "मेरे सिरताज ! मेरे सिरताज !! मैं क्या करू ? मैं कहां जाऊ ?"

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Mann Pardeshi

Author
Duggal Kartar Singh
Title
Mann Pardeshi
File name
Mann Pardeshi
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Saraswati Vihar
Language
Sanskrit
Pages
194
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Chemistry
DLI number
552116
Barcode
4990010032841.00
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Digital publisher
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