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Mukth Dhara
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मुक्तधारा। [ अभिनव नाटक ।] 80- महाकवि श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुरके चंगला नाटकका हिन्दी अनुवाद । अनुपादकर्ता- पण्डित धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री, तर्कशिरोमणि, एम० ए०, एम० आर० ए० एस०, प्रोफेसर मेरठ कालेज। प्रकाशक- हिन्दी-अन्ध-रत्नाकर, कार्यालय, हीरानाग, गिरगॉन, नम्बई। माध, १९८१ वि०॥ फरवरी, १९२५ ई.। प्रथमावृत्ति।] [ मूल्य ग्यारह माने। सजिल्दका १०) प्रकाशक- नाथूराम प्रेमी, मालिक- हिन्दी-ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, हीरायाग, पो. गिरगांव-यम्बई । मुद्रक- मंगेशराव कुलकर्णी, ठाकुरद्वार-बम्बई कर्नाटक प्रेस, प्रारम्भिक वक्तव्य । 'मुकधारा के महत्त्वके विषयमें इतना ही कहना पर्याप्त है कि यह कविशिरो- मणि रवीन्द्रनायकी रचना है और इसके द्वारा उन्होंने 'भारतका सन्देश' वर्तमान जगतके सामने रस्सा है। पाठकोंको इसमें शायद ऐतिहासिक और काल्पनिक नाटकोंकी-सी रोचकता न मिले, परन्तु उन आधुनिक समस्याओंका-जो राष्ट्रीय और व्यक्तिगत जीवनमें उपस्थित हो रही है-ऐसा दार्शनिक और सजीव चिन इसमें अक्षित किया गया है कि वह विचारकोंके हृदयको अपनी भोर आकर्षित किये बिना नहीं रहता। यह असभव है कि इसे पढ़कर विज्ञ पाठक वर्तमान उलझनों को कुछ गभीरताके साथ सुलझानेकी ओर प्रवृत्त न हों । आशा है कि भारतकी राष्ट्रीय भाषामें, इस भारतीयताके भावोंसे भरपूर नाटकका यथेष्ट स्वागत होगा। मई, सन् १९२२ के माहर्न रिव्यू (अँगरेजी मासिकपन ) में यह नाटक- The Water fall नामसे और लगभग उसी समय प्रवासी (भगला मासिक- 'पन ) में 'मुकधारा' नामसे प्रकाशित हुआ था। पहले पहल जब मैंने इसे माहर्न रिव्यूम पढ़ा तब इसके गभीर सन्देशका मेरे हृदयपर इतना प्रभाव पदा कि मेंने उसी समय इसे एक विस्तृत भूमिकाके सहित हिन्दीमें अनुवाद कर डालनेका निश्चय कर लिया और प्रार्थना करनेपर कवीन्द्रने मुझे इसके अनुवाद करनेकी भाज्ञा भी प्रदान कर दी। यह अनुवाद यद्यपि अँगरेजोपरसे किया गया है, परन्तु वगला मुक्तधारामें जो पहुतसे अश अँगरेजीसे अधिक है उनको भी इसमें सम्मिलित कर लिया गया है। अँगरेजीकी अपेक्षा बगलाके गीतों की संख्या भी अधिक है। इस पुस्तकमें उन गीतों का अनुवाद भी दे दिया गया है। इस अनुवादको स्वनामधन्य महामना सी० एफ. एण्ड्रयूजके करकमलों में समर्पित करते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्नता होती है । ये उन गिनेचुने हुए व्यक्ति- योमसे है जिनके जीवन में इस नाटकके सन्देशको झलक विद्यमान हैं, जिनका जीवन अन्तराष्टीय रंगसे रँगा हुआ है, जो जातीय पक्षपातसे शून्य ह और जिनका विशाल हृदय प्रेम और दयाका बहता हुआ झरना है।
. सुना है 'मुकधारा के हिन्दी अनुवाद और भी कई सजनोंने किये हैं और उनमेंसे एक दो शीघ्र ही प्रकाशित होनेवाले हैं, फिर भी मैं समझता हूँ कि मेरा यह अनुवाद अनावश्यक या अनुपयोगी न होगा। क्योंकि इसमें एक विशेषता है और वह है इसकी आलोचनात्मक भूमिका, जिसमें कवीन्द्रके मन्देश पर विस्तारके साथ विचार किया गया है । मेरा विश्वास है कि उक्त भूमिकासे साधा रण पाठक भी इस नाटकके मर्मको सरलतासे समझ सकेंगे। नाटकोंकी भाषा जैसी परिष्कृत और सजीव होनी चाहिए वैसी शायद इस अनुवादकी नहीं हो सकी है, फिर भी यह त्रुटि बहुत अशों तक श्रीयुत नाथू- रामजी प्रेमी ( मालिक, हिन्दीग्रन्थरत्नाकर ) सशोधनसे दूर हो गई है। प्रेमीजीका न केवल इस लिए कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने इस पुस्तकके प्रकाशनका भार अपने ऊपर लिया, प्रत्युत इस लिए भी कि उन्होंने इस नाटकके सशोधन, परिवर्द्धन और भाषाके परिष्कारमें बहुत श्रम किया है। इसके लिए मैं उनका अत्यन्त आभारी हूँ। यदि चिरगॉवनिवासी सहृदय सुकवि श्रीमान् मुशी अजमेरीजी गीतोंका इतना अच्छा अनुवादन कर देते तो यह पुस्तक एक प्रकारसे अपूर्ण ही रहती। उनके प्रति मैं हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। इस अनुवादकी द्वितीयावृत्तिमें मुझे स्नातक श्रीदेवसेन और श्रीसुन्दरलाल चतुर्वेदीसे भा बहुमूल्य सहायता मिली है। अनुवाद पाठकों के करकमलोंमें अर्पित है । यह आजसे लगभग दो वर्ष पहले तैयार हो चुका था, परन्तु भनेक विघ्न बाधाओंके कारण अब तक प्रकाशित न हो सका । कुछ विलम्बसे ही सही, किन्तु मुझे हर्ष है कि अब यह सुन्दर सुपरिष्कृत रूपमें प्रकाशित हो रहा मेरठ-कालेज, १९-१-१९२५ ई० धर्मेन्द्रनाथ है जगत्प्रसिद्ध महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुरके हमारे द्वारा प्रकाशित अन्यान्य ग्रंथ । १ प्राचीन साहित्य-जगत्प्रसिद्ध कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुरके प्राचीन साहित्यसम्बन्धी निवन्धों का अनुवाद। इसमें १ रामायण, २ धम्मपद, ३ कुमारसंभव और शकुन्तला, ४ शकुन्तला, ५ मेघदूत, ६ कादम्बरीचित्र, ७ कान्यकी उपेक्षिता ये सात निबन्ध है और उनमें उफ प्राचीन प्रन्योंकी अपूर्व और विलक्षण मालोचनायें की गई हैं। संस्कृत काव्यके प्रेमियों तथा सस्कृत विद्यार्थियोंके लिए यह एक बड़े कामकी चीज है । संस्कृत न जाननेवारे 'काव्यप्रेमी भी इन्हें पढकर लाभ उठा सकते हैं । मू०४) २ राजा और प्रजा-राजनीतिसम्बन्धी अपूर्व लेख । सब मिलाकर ११ लेख हे-१ अगरेज और भारतवासी, २ राजनीतिके दो रुख, ३ अपमानका प्रतिकार, ४ सुविचारका अधिकार, ५ कण्ठरोध, ६ अत्युक्ति, ७ इम्पीरियलिज्म, ८ राजभक्ति, ९ बहुराजकता, १० पथ और पाथेय और ११ समस्या । हमारा विश्वास है कि हिन्दीके राजनीतिक साहित्यमें यह एक अपूर्व चीज समझी जायगी। ये नियन्ध अध्ययन और मनन करनेके योग्य हैं--केवल पढ़ डालनेके नहीं। इनका अनुवाद बहुत सावधानीसे हुआ है। दूसरी बार छपा है। मूल्य० १) रु. सजिल्दका १॥) रु.। ३ शिक्षा-इसमें शिक्षाविषयक,–१ शिक्षा-समस्या, २ आवरण, ३ शिक्षाका हेरफेर, ४ शिक्षा-संस्कार और ४ छानोंसे सभाषण ये,-पाँच बिन्ध हैं । निबन्ध बड़े ही महत्त्वके है । इन्हें पढ़कर पाठक जान सकेंगे कि हमारी वर्तमान शिक्षापरति कैसी है, स्वाभाविक शिक्षापद्धति कैसी होती है, केसी शिक्षासे युद्धिविकाश और चरितविकाश होता है, अँगरेजी भापाकी शिक्षासे हमारे बचों की क्या दुर्दशा होती है, और अब हमें कैसी शिक्षाका प्रचार करना चाहिए । शिक्षातत्व को समझनेकी इच्छा रखनेवारे पाठशालाओंके अधिकारियों, अध्यापकों और छानोंके मातापिताओंको यह गभीर निवन्धावली अवश्य पढना और मनन करना चाहिए । मु०॥) ४ स्वदेश-१ नया और पुराना, २ नया वर्ष, ३ भारतका इतिहास, ५ पूर्वीय और पाश्चात्य सभ्यता, ६ माह्मण, ७ समाजभेद, और ८ धर्मयोधका - २ दृष्टान्त, ये आठ निबन्ध इस पुस्तकमें हैं । अपने देशका असली स्वरूप समझ- नेवागेको, उसके अन्त करणतक प्रवेश करनेकी इच्छा रखनेवालोंको तथा पूर्व और पश्चिमका अन्तर हृदयगम करनेके लिए उत्कण्ठित विद्वानोंको ये निवन्ध अवश्य पढने चाहिए। हिन्दी संसारने इस पुस्तकका अरछा आदर किया है और इसका प्रमाण यह है कि यह चार घार छप चुकी है। भू०) जिल्ददारफा १) ५ ऑखकी किरकिरी मूल लेसकके चिन, चरित्र और प्रन्यालोचनस- हित । हिन्दीमें तो क्या अंगरेजी फ्रेंच जैसी प्रौद भाषाओं में भी इसकी जोडका कोई उपन्यास नहीं । मनुष्यके आन्तरिक भावचित्रोंका, उनके उत्थान पतन और घात-प्रतिधातोंका इसमें यदा ही सुन्दर वर्णन है । यद्यपि इसका कथानक बहुत ही सीधा सादा है, पान भी इसमें केवल चार पाँच ही हैं, तो भी अन्य- कारमें जो मनुष्य-स्वभावका गभीर ज्ञान है और उस स्वभावके ज्यों के त्यों चिन खड़े कर देनेका जो विलक्षण कौशल है, उससे यह उपन्यास बहुत ही मनोवेधक बन गया है । चौथी बार शीघ्र ही छपेगा। मू. १00) सजिल्दका २) ६ समाजइसमें भाठ निबन्ध है-१ भाचारका अत्याचार, २ समुद्र यात्रा ३ विलासकी फाँसी, ४ नकलका निकन्मापन, ५ प्राच्य और प्रतीच्य, ६ अयोग्य भक्ति, ७ पूर्व और पधिम, ८ चिट्ठी पत्री । ये सब निवन्ध ऐसे हैं कि इनकी उपयोगिता कभी नष्ट नहीं हो सकती। इन निवन्धों के लिए हम यह नहीं कह सकते कि ये पुराने हो गये हैं। इस पुस्तकका प्रत्येक पृष्ठ विचारपूर्ण उपदेशोंसे भरा हुआ है। मनोरमक भी खूब है। हिन्दीमें समाज शास्त्रपर विचार करनेवाली यही एक पुस्तक गणनीय है । मू. 10) मैनेजर, हिन्दी- /-ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय, हीरावाग, पो गिरगाँव, बम्बई ।
७ ८ ९ हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर सीरीज । हिन्दी ससारमें नये ढगके उच्चश्रेणीके ग्रन्थ प्रकाशित करनेवाली सबसे प्रसिद्ध और सबसे पहली प्राथमाला विक्रम संवत् १९६५ से बरावर निकल रही है। नीचे लिखे ५८ अन्य निकल चुके हैं। स्थायो ग्राहकोंको सब अन्य पौनी कीमतसे दिये जाते है । एक रुपया प्रवेश फी ' देनेसे चाहे जो ग्राहक बन सकता है। १ स्वाधीनता २)/२६ ताराबाई (नाटक) १॥) २ जान स्टुअर्ट मिल ॥)| २५ देश-दर्शन ३ प्रतिमा ( उप. ११) २८ हृदयकी परख (उप०) ) ४ फूलों का गुच्छा (गर) ॥) | २९ नव-निधि ( गल्में) m) ५ ऑसकी किरकिरी १०) | ३० नूरजहा (नाटक) १०) ६ चौबेका चिट्ठा =)) ३१ आयलैंण्डका इतिहास १०) मितव्ययता me)| ३२ शिक्षा (निबन्ध) ॥) स्वदेश (निबन्ध) 12) | ३३ भीष्म ( नाटक) चरित्रगठन और मनोवल ) ३४ कावूर (चरित) १) १० आत्मोद्धार (जीवनी) १)| ३५ चन्द्रगुप्त ( नाटक) १) ११ शान्तिकुटीर ०)२६ सीता १२ सफलता m) | ३७ छाया दर्शन १३ अमपूर्णाका मन्दिर (उप०) १) ३८ राजा और प्रजा १) स्वावलम्बन १॥) ३९ गोवर-गणेश-सहिता १५ उपवास चिकित्सा साम्यवाद ३) १६ सूमके पर धूम (प्रहसन)।) ४१ पुष्प लता १७ दुगांदास ( नाटक) १) ४२ महादजी सिन्धिया Ima) १८ वकिम नियन्धावली ma)|४३ आनन्दकी पगडदियाँ १॥) छत्रसाल (उप. ज्ञान आर कर्म ३) २० प्रायश्चित्त (नाटक) सरल मनोविज्ञान १॥) अग्राहम लिंकन 12) ४६ कालिदास और भवभूति १॥) २२ मेवाह पतन नाटक) =)]४७ साहित्य-मीमामा १०) २३ शाहजहाँ राणा प्रतापसिंह (नाटक) १३) २४ मानव-जीवन १०) ४९ अन्तस्तल २५ उस पार ( नाटक) १०)]५० जातियों को संदेश •) Ita) ૨ दृष्टान्त, ये आठ निबन्ध इस पुस्तकमें है । अपने देशका असली स्वरूप समझ नेवारोंको, उसके अन्त परणतक प्रवेश करनेकी इच्छा रसनेवालोंको तथा पूर्व और पधिमका अन्तर हृदयगम करने के लिए उत्कण्डित विद्वानोंको ये शिवन्ध अवश्य पढने चाहिए। हिन्दी ससारने इस पुस्तकका अच्छा आदर किया है और इसका प्रमाण यह है कि यह चार धार छप चुकी है। मू. 12) जिल्ददारफा १०) ५ ऑखकी किरकिरी-मूल लेसकके चिन, चरिन और प्रन्यालोचनस हित । हिन्दीमें तो क्या अँगरेजी फ्रेंच जैसी प्रौद भाषाओं में भी इसका जोपका कोई उपन्यास नहीं । मनुष्यके आन्तरिक भावचित्रोंका, उनके उत्थान पतन और घात-प्रतिघातोंका इसमें वदा ही सुदर वर्णन है। यद्यपि इसका कथानक बहुत ही सीधा सादा है, पात्र भी इसमें केवल चार पाँच ही हैं, तो भी प्रन्य. फारमें जो मनुष्य-स्वभावका गभीर ज्ञान है और उस स्वभावके ज्योंके त्यों चित्र खये कर देनेका जो विलक्षण कौशल है, उससे यह उपन्यास बहुत ही मनोवेधक बन गया है । चौथी वार शीघ्र ही छपेगा । मू. १0-) सजिल्दका ३) ६ समाज-इसमें आठ निबन्ध हैं-१ आचारका अत्याचार, २ समुद्र याना ३ विलासकी फाँसी, ४ नकलका निकम्मापन, ५ प्राध्य और प्रतीच्य, ६ अयोग्य भक्ति, ७ पूर्व और पश्चिम, ८ चिट्ठी पत्री । ये सब नियन्ध ऐसे हैं कि इनकी उपयोगिता कभी नष्ट नहीं हो सकती । इन नियन्धोके लिए हम यह नहीं कह सकते कि ये पुराने हो गये हैं। इस पुस्तकका प्रत्येक पृष्ठ विचारपूर्ण उपदेशोंसे भरा हुआ है। मनोरञ्जक भी खूब है। हिन्दीमें समाज शास्त्रपर विचार करनेवाली यही एक पुस्तक गणनीय है । मू० ॥३) मैनेजर, हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय, हीरावाग, पो गिरगाँव, बम्बई ।
२ ७ हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर सीरीज । हिन्दी संसारमें नये डगके उपधेणीके अन्य प्रकाशित करनेवाली सबसे प्रसिद्ध और सबसे पहली प्राथमाला विक्रम संवत् १९६५ से परावर निकल रही है। नीचे लिखे ५८ अन्य निकल चुके हैं। स्यायो ग्राहकों को सब अन्य पौनी कीमतसे दिये जाते है । एक रुपया प्रवेश फी' देनेसे चाहे जो ग्राहक बन सकता है। १ स्वाधीनता २)/२६ ताराबाई (नाटक) १॥) जान स्टुअर्ट मिल 17)| २७ देश-दर्शन ३ प्रतिभा ( उप.) ११)| २८ हृदयकी परम्व (उप०) me) ४ फूलों का गुच्छा (गल्) 1-) | २९ नव निधि ( गल्प) ॥) ५ आँखकी किरकिरी १०) | ३० नूरजहा ( नाटक) १०) ६ चौयेका चिट्ठा -) ३१ आयलैंण्डका इतिहास १॥a) मितव्ययता ॥३) ३२ शिक्षा (निबन्ध) ८ स्वदेश (नियन्ध ) 12) | ३३ भीष्म ( नाटक) ११) चरित्रगठन और मनोवल ) ३४ कावूर (चरित) १० आत्मोद्धार (जीवनी) १) | ३५ चन्द्रगुप्त ( नाटक) ११ शान्तिकुटीर na) ३६ सीता १२ सफलता ॥) | ३७ छाया दर्शन १३ अन्नपूर्णीका मन्दिर (उप.) १) | ३८ राजा और प्रजा १४ स्वावलम्बन १॥)/ ३९ गोवर-गणेश-सहिता १५ उपवास चिकित्सा m)|४० साम्यवाद ३) १६ सूमके घर धूम (प्रहसन) 1)| ४१ पुष्प लता १) १७ दुगादास (नाटक) १) ४३ महादजी सिन्धिया ita) १८ मकिम निवन्धावली 2) ४३ मानन्दकी पगडदियाँ १॥) छत्रसाल ( उप.) ज्ञान आर कर्म ३) २० प्रायश्चित्त ( नाटक) 1) |४५ सरल मनोविज्ञान १॥) २१ अब्राहम लिंकन 10)|४६ कालिदास और भवभूति ११) २२ मेवाह पतन (नाटक) ma)/४५ साहित्य-मीमांसा १०) २३ शाहजहाँ १)|४८ राणा प्रतापसिंह (नाटक) १॥) २४ मानव-जीवन १०)|४९ अन्तस्तल २५ उस पार (नाटक) १०) ५. जातियों को सदेश " २) ५१ वर्तमान एशिया ५२ नीतिविज्ञान ५३ प्राचीन साहित्य समाज २)/५५ अञ्जना ( नाटक) २१) ५६ मुक्तधारा (नाटक) ॥) 1-)|५७ सुहराय-रुस्तम ॥७) me)|५८ चन्द्रनाथ ( उपन्यास) m) प्रकीर्णक पुस्तकमाला। सीरीजके सिवाय हमारे यहाँसे नीचे लिखी हुई फुटकर पुस्तकें भी प्रकाशित हुई है। ये भी सीरीजके प्राहकोंको पानी कीमतमें दी जाती है। व्यापार-शिक्षा in) | सुगम चिकित्सा युवाओं का उपदेश 1) व्याहीबहू (स्त्रीशिक्षा). शान्ति-वैभव 1) श्रमण नारद कोलम्बस (जीवनी) m)/ सदाचारी चालक मन्तान-कल्पद्रुम १) {दियातले अधेरा पिताके उपदेश ३) भाग्य-चक अच्छी आदतें ३) विद्यार्थीजीवनका उद्देश्य , अस्तोदय और स्वावलम्बन १०) सिंहल विजय (नाटक) देवदूत ( काव्य) 10) पाषाणी देवसभा ( काव्य) 1) कर्नल सुरेश विश्वास (जी० च०) ॥) विधवा-कर्तव्य ॥) जीवन-निर्वाह १) भारत-नमणी (नाटक) 1) भारतके प्राचीन राजवश(प्रथमभाग)३) चूदेका व्याह (काव्य) (द्वितीय) ३॥) प्राकृतिक चिकित्सा 1) | सुसदास (प्रेमचन्दकृत उप०) =) योग-चिकित्सा २) अरवी काव्यदर्शन ११) दुग्ध-चिकित्सा . २) जननी और शिशु नोट- हमारे यहाँ अन्यान्य प्रकाशकोंके भी उत्तमोत्तम अन्य विक्री के लिए मौजूद रहते हैं। सूचीपत्र मगाकर देखिये। मैनेजर,-हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय, हीरागाग, पोष्ट गिरगाव, बम्बई " " .
186EEP
33
समर्पण
मुक्तधारा नाटकका
यह अनुवाद
महामना
श्रीयुत सी एफ एण्ड्यूजके
कर-कमलों में
अनुवादकर्ताद्वारा
सादर समर्पित ।
" " कुछ लोग उसको बहा प्रतिभाशाली बतलाकर उसकी वही प्रशसा करते हैं और यन्त्रकी महिमाका स्तुति गान करते हैं। दूसरे लोग विभूतिको निन्दा करते हैं और इस बातकी याद दिलाते है कि किस प्रकार बॉधको बनानेम हजारों मनुष्योंके जीवन नष्ट हुए हैं। कुछ राजकीय परिवारके लोग विभूतिको प्रेरणा करते हैं कि वह पानीका बाँध पूरा न करे, जो कि शिवतराईके निवासियोंका भयकर स्पसे नाशक होगा । परन्तु इन लोगोंकी प्रार्थनाएँ व्यर्थ जाती हैं। शिवतराईके लोगोंका एक डेपुटेशन भी-जो कि धनञ्जय नामक साधुके नेतृत्वमें राजाके सम्मुख उपस्थित होता है-वाँधके रोकनेमें असफल होता है। परन्तु राजाके सामने सबसे बड़ी वाधा राजकुमार अभिजित्के द्वारा उप- स्थित होती हे । राजकुमार दूरदर्शी और सारी मनुष्यजातिका हितपी है । वह इस विचारको नहीं सह सकता कि शिवतराईकी सारी प्रजा उत्तरकूट राज्यक तात्कालिक लाभके लिए नष्ट कर दी जाय । एक बार राजाने राजकुमारको शिवतराई भेज दिया था। उस समय वह वहाँ वाइसरायके रूपमे कार्य करता था और अपने देशके स्वार्थको अपेक्षा वहाँके लोगोंको लाभ पहुँचानेका अधिक यत्न करता था। उन लोगोंको लाभ पहुँचानेकी दृष्टिसे उसने नन्दीघाटीके एक मार्गको-जो अवतक बन्द था-खोल दिया जिससे कि स्वच्छन्दतापूर्वक व्यापार हो सके । उसके शासनमें वे मार्ग खुल गये जिनसे शिवतराईके पराधीन राज्यको जो बहुत समयसे अकालपीड़ित रहता था, अधिकसे अधिक लाभ हो सके, परन्तु जिनके द्वारा उत्तरकूटके शासनकर्ता ओंकी आर्थिक दृष्टिसे हानि थी। वह भाव जिससे कि राजकुमार यन्त्रराज विभूतिके कामको नष्ट करना चाहता है केवल मनुष्य जातिका उपकार ही नहीं किन्तु उसमे एक गूद रहस्य है । राजकुमार सयोगवश यह सुन चुका है कि वह रणजित्का पुत्र नहीं है । उसने सुन रक्खा है कि वह-जब छोटासा चालक था-मुक्तधारा झरनेके पास पहा पाया गया था। राजाने उसको गोद लिया था। क्योंकि उसमें ससारके सम्राट होनेके चिह पाये गये थे। "राजकुमार अनुभव करता है कि वह मुक्तधाराका पुन है । उसे झरनेमें एक अपूर्व चमत्कार दीखता है। यह विश्वास रखता है कि झरने और उसके घीममें " ॥
३ "एक निकट आध्यात्मिक सम्बन्ध है। मुक्तधाराका प्रवाह और जीवन उसके अपने जीवनके स्रोत हैं। फलत ऐसा प्रयत्न करना वह अपना पवित्र कर्तव्य समझता है कि जिससे सब लोग झरनेके प्रवाहका लाभ उठा सकें। "राजाकी आज्ञासे राजकुमार पन्दी किया जाता है, क्यों कि राजाको विश्वास है कि दण्डित होनेसे राजकुमार सुधर जावेगा । इस बीचमें उत्तरकूटके लोगों में वहुत अशान्ति बढ जाती है । कुछ नागरिक चाहते हैं कि राजकुमारको इस वातका दण्ड मिरे कि उसने अपने लोगों के विरुद्ध शिवतराईके लोगोंका पक्ष लिया। दूसरे लोग उसे मुक्त कराना चाहते हैं। अन्तत आग भड़क उठती है जो कि जान बूझ कर लगाई गई थी। इस प्रकार राजकुमार अपनेको बन्दी- गृहसे मुक्त कर लेता है और वह अपने निश्चित उद्देश्यको पूरा करनेके लिए निकल पड़ता है । वह चुपचाप यन्त्रके भीतर घुस जाता है और उसके पुजाको सोल देता है जिससे कि झरनेका पानी अनेक धाराओंमें फूट पड़ता है और यन्त्र नष्ट हो जाता है । इस वीरतापूर्ण कार्य में राजकुमारकी मृत्यु हो जाती है। वह मृत्यु के लिए पूर्वसे ही तैयार था । झरनेको स्वच्छन्द देख कर राजकुमारको अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त हो जाती है। वह अपनी माता मुकधारा झरनेके गर्मम पुन लौट जाता है।" राजकुमारका दुखमय अन्त सारे नाटकके रूपकको समझनेकी कुली है। मनुष्य जातिकी उनति तभी सभव है जब कि मनुष्य अपनेको सकुचित स्वाथोंसे ऊपर उठा सके । जब कि वे लोग जो कि मनुष्य जाति के निर्वाचित नेता हैं, आदर्शके आगे ससारके सारे ऐश्वर्योका, यहाँ तक कि अपने जीवनका भी, यलिदान करनेमें सोच न करें। एक ओर सीमासे आगे अन्ततक पहुँचे हुए जातीयताके भाव है जो कि दूसरोंको हानि पहुँचा कर अपना क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ पूरा करना चाहते हैं और दूसरी ओर सारी मनुष्य जातिके प्रति भ्रातृत्वका भाव है। इन दोनों सिद्धान्तोंका दम नाटफर्म कई अवसरों पर अच्छी तरह प्रकाश हुआ है। उदाहरणार्य संकुचित देशभकिका प्रतिनिधि एक सलमास्टर अपने विद्यार्थियों सहित रंगमय पर आता है। उसने अपने विद्यार्थियों को राजा रणजिनकी प्रशसा एक प्रभावशाली वाक्य याद करा रपया है । इस उपायसे स्कूलमास्टर- ४ को आशा है कि उसका चेतन बढ़ जायगा। उसने अपने विद्यार्थियों के अन्दर शिवतराईके लोगों के विरुद्ध अत्यन्त घृणाके भाव भर रस्से है और उन्हें सिया रस्सा है कि शिवतराईके लोगों का मजहब बहुत बुरा है। उसने उन्हें बता रक्सा है कि शिवतराईके लोगों की नाक उतनी झुकी नहीं होती जितनी कि उनके समीपवासी उत्तरकूट के लोगोंकी, इसलिए वे लोग अवश्य निष्ट है। वह अपने बढे हुए जोशमे विद्यार्थियों को निश्चय दिलाता है कि इतिहासका एक मात्र उद्देश्य यह है कि उत्तरकूटका वश सारे साम्राज्य पर राज्य कर सके। वह रणजितके राजवराका यह ईश्वरप्रदत्त अधिकार समझता है कि वह दूसरे लोगोंपर अपनी शक्तिभर अत्याचार कर सके । वह समझता है कि यह चात वैज्ञानिक सिद्धान्तोंसे सिद्ध है। साधु धनजय ठीक इसके विपरीत आदर्शको प्रकट करता है। उसकी शिक्षाएँ बहुत सफल नहीं होती और लोग उन्हें समझ नहीं सकते, परन्तु वह यह दिसानेका यत्न करता है कि हमें बुराईको यहाँ तक सहन करना चाहिए कि वह स्वय नष्ट हो जावे । उराईके द्वारा बुराईका नाश करनेसे फिर नई पुराई उत्पन होती है। साधु घनउयका चरित्र भारतवर्षके वर्तमान नेता महात्मा गांधीसे बहुत कुछ मिलता जुलता है । महात्मा गाँधीको अभी कारावास दण्ड मिला हे, परतु स्वय कविने अपनी एक टिप्पणी में लिखा है कि मैंने साधुका चरिन और बहुतसी उक्तियों जो इस नाटकमे आई हे आजसे लगभग १५ वर्ष पहले अपने प्राय- श्चित्त नामक नाटकमे लिखी थीं। रवीन्द्रनाथ टागोरका यह नया बवाली नाटक गम्भीर कथानक और आध्या- लिक रूपसे भरपूर है । गद्यके बीच वीचमें कहीं कहीं गीत भी दिये हैं। भारतकी वतमा राजनीतिक परिस्थितिम यह निश्चय है कि इस मुकधारा नाटकका गहरी रुचिके साथ स्वागत होगा। यह केवल भविष्य बतायेगा फिमच पर यह नाटक कहाँ तक फलीभूत हो सकता है।
दार्शनिक रेसक रोमेन रोरेण्ड ( Romain Relast स्वातन्त्र्यकी घोषणा( Declaration of theirror दासताओंसे स्वतन्त्रता पाई है, परन्तु अब स FE पानी है । यह असम्भव है कि 'एक जाति 'ग' मनुष्यकी आत्मा राष्ट्रकी सारी पुरी भली यात्रा गुलाम बनी रहे । मनुष्यकी इस दासताका पारमान tram आत्माकी स्वाधीनता के इन अर्थाको १९ो. मेजिनी ( Mazzint ) के रेसों में उनकी का? युगकी उपा फूटने पर भी पुरानी रातका-११- शेष है, पर ससारका घटनाचक यतला रहा है। रोलैण्डने अपनी घोपणाके समधनके लिए स: त्रित किया और भारतके 'कवीन्द्र' की भोर बन यूरोपीय दाशकों को युरोपाय महायुद्धका घर कवीन्द्रके रेसों में उस सन्देशका धीजमार है उसे 'रवीन्द्र' अपने निजन निकुशमें बैठे * यह आवश्यक है कि यह भूमिका भार भूमिका । (आलोचनात्मक 1 ) सामान्य विवेचना पीसवीं सदीके साथ साथ मनुष्यजातिके इति होता है। युरोपका विश्व-व्या दम. यीसवीं सदीकी भूमिका थी। रकपातसे उत्पन्न हद नई पुकार । की अरुणिमा यो। तोपोंकी गरम इस नये युगका विजयनाद या। पुरा the Spirit ) करते हुए बताया था कि मनु पर विजय होगी और नया प्रकाश पुराने अवसर है लेखककी स्वतन्न 10 को गामी । चुके तिष ही पुत्र गीता- क अर्थ। युद्धने यूरोपके कानों को कवीन्द्रके सन्देशको सुनने के लिए तैयार कर दिया। यह रहस्य है कवीन्दकी उस 'विजय-यात्रा' का जो उन्होंने पिछले वर्ष युरोपके इस किनारेसे उस किनारे तक की थी। सारे युरोपने उत्सुकता भरी श्रद्धाके साथ इस नवीन भारतीय कविकी पुकारको एक ईश्वरीय दूतके सन्देशके समान सुना। थीसवीं सदीकी वह नई पुकार क्या है जिससे कि मनुष्य जातिका भविष्य एक नये साँचेमें ढाला जायगा? इस चौमुसी कान्तिको एक नई पुकारका शन्दमें प्रकट करना कठिन है। चिनमें सारे पहलू एक साथ माजाते हैं। यह नई भावना सर्वतोमुखी है। राजनीतिक जीव- नको तहमें भी सामाजिक जीवन है। इस समय मनुष्यसमाजका संगठन भिम भिन्न राष्ट्रोंके रूप में है। सारी मनुष्यजाति हिन्दुओंकी भिम भिन्न जातियों के समान भनेक पृथक् पृथक राष्ट्रोंमें विभक हो रही है। १८ वी सदीने इस 'राष्ट्रीयवाद' को जन्म दिया, और २० वीं सदी 'अन्तर्राष्ट्रीय युग' को ला रही है। जिसमें मनुष्यजाति इन अस्वाभाविक विभागों में विभक न रहेगी। उसका सम्पूर्ण रूपसे एक सुसगठित समाज होगा। ससारके इतिहासमें वस्तुत यह कोई नवीन स्वप्न नहीं है। धार्मिक जगत् में बुद्ध और ईसा जैसे महापुरुषोंने 'मनुष्य मानका भ्रातृत्व' सिखाकर इसी तत्त्वका आन्तरिक रहस्य समझाया था। मनुष्य जातिकी इसी सगठित एकताको बाथरूपमें निर्माण करनेका प्रयत्न राजनी- तिक दगपर उन अनेक विजेताओं और सम्राटोंने भी किया था जो सारी मनुष्य जातिको अपने राजछत्र या शामन परिधिके भीतर लाकर एक करना चाहते थे। ऐसे प्रयत्न इतिहासके प्रारम्भसे ही आज तक लगातार होते रहे हैं, किन्तु बीसवी सदीकी विशेषता यह है कि इसमें बाह्य राजनीतिक आदश और उसका आन्त- रिक आध्यात्मिक रहस्य दोनों मिलकर बड़ी ऊँची आवाजसे नये युगकी पुकार मचा रहे हैं । इस नये आदर्श में जहाँ राष्ट्रोंका अन्तर्राष्ट्रीय संगठन होगा वहाँ राष्ट्रोंके भीतर व्यक्तियों के समाजकी भी, अत्युच्च भ्रातृता और समानताके सिद्धा- न्तपर, नई व्यवस्था होगी। इससे भ्रम और पूँजीका प्रश्न और सारी आर्थिक समस्यायें हल हो जायेंगी तथा मशीनरी ( Machinery) या यन्नक्लाके द्वारा गरीबों पर जो अत्याचार होते हैं वे न हो सकेंगे । इसकी धुनियाद भ्रातृत्व और प्रेम पर रक्खी जायगी और मनुष्यजाति 'आध्यात्मिकता' ७ अध्यात्म- कवि। के मन्दिरमें नये सिरेसे दीक्षा लेगी। हृदयशून्य जड़वादका स्थान वाद' प्रहण करेगा और विज्ञानको 'धर्म' की महायता लेनी होगी । इस प्रकार साइन्स और धर्मकी एकता स्थापित होगी। अनेक छिन भिा राष्ट्रीयताओंके स्थानमें एक अन्तर्राष्ट्रीय मनुष्यजातिका सगठन, आर्थिक असमानता तथा उसके साथ लगी हुई श्रम और पूँजीको गहनाके स्थानमें आदर्श, समानतापूर्ण आर्थिक स्थिति, मशीनराके अत्याचारका नाश, धर्मशून्य साइन्सकी अन्धी प्रगतिके बदले उसके साथ धर्मका सहयोग, जड़वादके स्थानम अध्यात्मवाद- का स्थापन आदि कतिपय सिद्धान्त इसी नई पुकारके नाना रूप हे । श्रीयुत रवीन्द्रनाथ ठाकुर 'एशियाके कवि' कहे जाते हैं और अब तो वे शनै शनै 'मनुष्य जातिके कवि' वन रहे है, परन्तु दूसरे नये युगके शब्दोंमे, उचित रीति पर, हम उन्ह 'नये युगके कवि' कह सकते हैं । ससारके सारे महान् कवि एक एक विशेष युगके कवि समझे जाते हैं। वाल्मीकिने भारतके त्रेतायुगका, व्यासने द्वापरका, होमर ( Homer ) ने यूनानी सभ्यताका, वर्जिल (Vergeal) ने रोमन युगका, दान्ते ( Dante ) ने यूरोपके मध्यकालका और शेक्सपीयर (Shakespeare) ने १६ वीं सदीम विज्ञानके नये युगका गान गाया है। इसी प्रकार अन्य कवियोंको भी एक विशेष युगका कवि समझा जाता है। महामना रवीन्द्रनाथ भागामी नये युगके प्रभातमें उसका प्रथम राग सुनानेवाले कवि है। यह गौरवको बात है कि नये युगके महान् कविको इस भारतमहीने ही जन्म दिया है। यह होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि नये युगमा पाठ ससारको भारत ही पढावेगा। पाल रिचार्ड (Paul Richard) जसी आरमार्य ससारव्यापिनी शान्तिको आशासे भारतको ओर ही देख रही ह। नये युगके अवतार महात्मा गाँधी-जिनमें आगामी स्वर्गीय युगका पूर्ण प्रकाश है, जिनके व्यक्तित्वमें सारे आदश चरितार्थ हो चुकी हैं और जो भय, द्वेष, घृणा आदिये भावोंसे परे है-भारतमें ही जन्म तप नये युग 'अग्रगन्ता कवि' (The Herald Poet) भी 'भारत'के ही पुत्र होने चाहिए। वे भारतका सन्देश मारे ससारको सुना रहे है। कवीन्द्रको 'गीना- अलि तथा दूसरी पुस्तकें यूरोपको समस्त भाषाओंमें अनुवादित हो चुकी है। ससारका शायद ही कोई ऐमा विद्वान् होगा जिसको भाल्मागची चोमा इन पुस्तकोंसे न बढ़ रही हो।
८ । मुकधारा नाटकमे कवीन्द्रने अपना सन्देश सुनाया है। इसमें पाश्चात्य सभ्यताकी उन सारी बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाई 'मुक्तधारा'का सन्देश। गई है जिनसे वत्तमान युग पीड़ित हो रहा है। इसमें एक जातिका दूसरी जातिके प्रति द्वेष रसना, अन्य जातियों को नष्ट करके अपना स्वार्थसिद्ध करना, साइन्सकी उनति और उसके फलस्वरूप मशीन- रीका प्रभाव, यत्रालाके प्रसारके कारण गरीबों पर होनेवाले अत्याचार, व्यक्ति- योंका अपने अपने राष्ट्रका सर्वाशमे गुलाम होना, वैज्ञानिकों का एक तरहसे ईश्वरको चैलेंज देना, आदि सभी बातोंकी चर्चा की गई है । इन बुराइयों के साथ साथ इनके विरुद्ध नये युगमा आदर्श भी दिखलाया गया है। यह नये युगकी भावना ( spirit ) हमारे हृदय पर ऐसा गहरा असर डालती है कि हम उसमें बिलकुल रॅग जाते हैं। इस नाटकका भारतकी वत्तमान परिस्थितिसे गहरा सम्बन्ध है। यद्यपि कवीन्द्रका उद्देश्य केवल वर्तमान परिस्थितिको दिखाना नहीं नाटकमें वर्त- है, तथापि एक जाति दूसरी जातिको किस प्रकार पददलित मान परिस्थिति । कर अपनी मुद्दाम बन्द कर रखना चाहती है, यह इसमें बड़ी सुन्दरतासे दिसा दिया है और वह भारतकी वर्तमान दशा पर पूरा पूरा घट जाता है। निस्सन्देह, जैसा कि एक जर्मन समालोचक्ने भी लिखा है 'भारतकी वर्तमान राजनीतिक परिस्थितिम इस नाटकका रुचिपूर्वक स्वागत होगा। अँगरेजीमें जिसे ड्रामा ( Drama) कहते है उसको सस्कृत साहित्य, 'दृश्य काव्य' कहते हैं। उसी दृश्य काव्यके नाटक, प्रकरण मुक्तधारा एक 'प्रकरण' है। भादि अनेक भेद हैं। जब कोई कथानक किसी प्राचीन इति- हाससे लिया जाता है तब वह 'नाटक' कहलाता है और जब वह कविकी कल्पनासे ही उद्भूत होता है तब उसे 'प्रकरण' कहते हैं* । 'मुक्तधारा' का कथानक (प्लाट) स्वय कविको कल्पना है, इसलिए यह 'प्रकरण' है न कि 'नाटक' । परन्तु इस समय हिन्दीमें नाटक शब्द व्यापक रूपसे 'ड्रामा'के नाटक ' और 'प्रकरण' में पात्र आदिका भी भेद होता है, परन्तु, यहाँ दन सयका विस्तृत वर्णन अप्रासशिक समझकर छोड़ दिया गया है। .
लिए प्रसिद्ध हो गया है, अतएव हमने भी 'मुक्तधारा'को नाटक ही मान लिया है। जिन प्रन्योंमें पानोंको कल्पना कुछ विशेष गुणों के लिए होती है, अथात् वे पात्र किसी विशेष गुण ( Virtue ) के प्रतिरूप (Sy- मुतधारा mbol ) होते हैं उन्हें प्रतिरूपक (Allegory) कहते हैं। प्रतिरूपर परतु जहाँ पान केवल गुणों के प्रतिरूप ही नहीं कि तु अपनी Allegory स्वतन्त्र सत्ता रसते है, अर्थात् चे गुणों के केवल प्रतिरूप नहीं है। (Abstract Symbol ) ही नहीं होते प्रत्युत उनकी वास्तविक सत्ता (Concrete existence ) भी होती ह, वहाँ उन्हे यथार्थ कथानक ( Parable ) कहते हैं। उनम गुणों की शिक्षा भी होती है, और उगुणोंको एक जीवित कहानीके द्वारा दिसाया जाता है । इस प्रकार यह नाटक प्रतिरूपक ( Allegory ) नहीं, किन्तु यथार्थ क्यानक (Parable ) है। नाटकके पान और मुख्य मुख्य सिद्धान्त । नाटकके मुरय मुख्य सिद्धान्त भिन भिन्न पात्रोंकी चरित्ररेखाओं के भीतर रेंगे गये हैं। उन्ह पानोसे अलग करके उतनी सुन्दरताके साथ और उतने सजी- वित रूपमें दिखाना कठिन होगा, इस लिए यहाँ सिद्धातोंका विवेचन चरित्र- वर्णनके साथ साथ ही दिया जायगा, पर इसमे इतना वोझ पाठमोसी कल्पना शक्तिपर ही रहेगा कि वे किसी सिद्धान्तका एक अश या एक रूप जो एक पानमें है, उसमें दूसरा रूप दूसरे पानसे मिलाकर पूर्ण चिन अपने मन पटल पर तैयार कर लें। नाटकका नायक युवराज है। नाटकका मुख्य सन्देश इसी युवराज की जीवनी में पाया जाता है । मर्त्यलोकम यदि किसी मनुष्य नाटकमा नायक में सोंच आदश हो सकता है-जिस अश तक मानवीय युवराज। चरित उदात्त और अविनिन्दित हो सकता है तो वह युवराज' के चरिनमें दिखलाई देता है। नाटकका मुरय सन्देश और युवराजके जीवनका मुख्य रहस्य सक्षेपमें स्वच्छ द असीम स्वाधीनता' है । इस नाटकका 'मुकधारा' मुरय सन्देश। अर्थात् ' स्वच्छन्दप्रवाहयुक्त धारा' यह नाम ही इस बातको प्रस्ट करता है। इसमें जिस स्थाधानताका चिन है वह कोई संकुचित स्वाधीनता नहीं है । वह केवल राजनीतिक . .
है निरूपण। नहीं है और न केवल एक व्यक्तिकी परिस्थितिकी परम्पराओं और प्रथा- भोंसे ऊपर उठ जानेहीकी स्वाधीनता है, किन्तु यह सर्वतोमुखी स्वाधीनता है जिसे कवीन्द्र मनुष्य जातिका आदर्श यतलाना चाहते है-जिस स्वाधीनताके चरितार्थ होनेपर इस भूतल पर स्वर्गका राज्य आजायगा और सक्षेपत स्वाधी- नताका जो आशय आगामी युगमें-२०वीं शताब्दिमें- होगा। यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि स्वाधीनताका ऐसा निरूपण अर्वाचीन युगमें किसी दूसरी लेसनीसे नहीं हुआ युवराज अभिजित् 'मुक्तधारा' झरनेके पास पड़ा पाया हुआ गया था। उसने जन्मके साथ 'जन्म घुटी' की तरह झरनेके स्वच्छन्द प्रया नाटकमें स्वा- हका स्वर्गीय संगीत सुना था। उसके कानों में राज भव. धीनताका नका स्वागत सगीत' न पड़ा था। रणजितका चाचा विश्वजित् कहता है "मैंने अपने मनमे सोच लिया कि कोई शक्ति इस बालकको पन्दी न बना सकेगी जिसे एक वनवासिनी माताने-उस मुक्तधारा झरनेके पास जिसका स्रोत अदृश्यमें है-जन्म दिया है।" युवराजने भी मन्त्रीसे कह दिया था- " में ससारमें मागाको खोलने आया हूँ। यही मेरे जीवनका आन्तरिक उद्देश्य है जिसे मुझे अवश्य पूरा करना चाहिए।" फिर युवराज सक्षेपत कहता है कि "मैं इस यातको हृदयमें धारण करके ही इस पृथ्वीपर आया हूँ। मेरा जीवनका स्रोत राजमहलके पत्थरोंको हटाकर स्वच्छन्दतासे चला जायगा । प्रत्येक मनुष्यके जीवनका एक आन्तरिक रहस्य (Inner Meaning ) होता है जिसे उसके जीवनका विशेष उद्देश्य समझना चाहिए आन्तरिक जी- और जिसे वह अवश्य पूरा करता है। यह आन्तरिक बाह्य जगतमें। रहस्य बाह्य जगत्की क्सिी वस्तु या घटनामें लिखा होता । वाह्य जीवन में अपने आन्तरिक रहस्यको पढ़ लेना ही अपने जीवन को समझ लेना है। युवराज सजयसे वहता है -"विधाता प्रत्येक मनुष्यके आन्तरिक जीवनका रहस्य बाह्य जगत्में कहीं न कहीं अवश्य लिस रखता है। मेरे जीवनके गुप्त रहस्यका सकेत मुक्तधाराके झरनेमें “है । जय मैंने देखा कि उसकी गतिको प्रतिरुद्ध करनेके लिए उसके पैरोंम लोहेकी वेदी टाल दी गई तब मैं एकाएक चौक पदा और समझ गया कि यह वाका रहस्य है - विशाल साम्रा उत्तरकूटका सिंहासन ही मेरे स्वच्छन्द प्रवाहको रोकनेवाला घाँध है। में इसीलिए निकला हूँ कि उसकी गतिको बाधारहित कर दूं।" स्वाधीनताके स्वच्छन्द प्रवाहकी सारी बाधाओंको दूर करना उसका उद्देश्य है। वह पार बार कहता है कि जहाँ वाधा है वहाँ सुख कहाँ ? अभिजितके विषयमें एक बड़े भारी भविष्यद्वकाने कहा था कि वह एक विशाल साम्राज्यका शासक होगा। रणजित्ने उस पड़े हुए बालको उठाकर अपना उत्तराधिकारी बनाते समय सोचा था कि यह ज्यका शासर। उत्तरस्टको राज्यसीमाको बढ़ावेगा, परन्तु उसे शीघ्र ही मालम हो गया कि मेरी उक्त आशा व्यर्थ है। चक्रवर्ती सम्रादका अर्थ युवराजके विपयमें वही था जो बुद्ध भगवान्के चक्रवर्ती सम्राट होनेकी भविष्यद्वाणीमें था, अर्थात् युवराज उत्तरकूटको संकुचित सीमाभों में पद न किया जा सकता था। एक राष्ट्र विशेषकी सकीर्णताको उसके हदयमें स्थान न था । वह सारी मनुष्यजातिकी एकताका स्थापक था और इस प्रकार उसमे एक विशाल साम्राज्य के सम्राट होनेके चिह्न थे। युवरान भविष्य युगका सन्देशहर है । वह भविष्य आदर्श युगको देख रहा है । वह गौरीके उच्च शिखरकी ओर देख रहा था। भविष्यका विश्नजित्से उसने कहा कि मैं भविष्यके मार्गोको-जो सन्देशहर। पर्वतके दुर्गम रास्तोंमें अभी तक नहीं बने हे-देख रहा था। वे मार्ग दूरको समीप कर देंगे"। यह अन्तर्राष्ट्रीयताका सन्देश है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्रसे अलग हो रहा है। एक मनुष्य- जातिके रूपमें वे राष्ट्र मिलकर समीप हो जायेंगे। युवराज उन भवि- प्यके मार्गीको देख सकता है। वह विश्वजित्के सामने एक प्रकाशकी लपटके रूपमें प्रकट हुआ। तब उन्हीं मनुष्योंको जिन्ह विश्वजितने अन्धका- रके कारण न देख पा कर चोट पहुँचाई थी अपने आत्मीयोंके समान देखा।" युवराजके प्रकाशसे विश्वजित् उन मनुष्यों को जिह उसने शतु समझा था एक मनुष्यताके रूपमें देख सका । राजकुमार उत्तरकूट राष्ट्रको सीमाको छोड़कर शिवतराईके राष्ट्रको अपनाता है और उसकी कठिनाईको दूर करता है । इस प्रकार वह धृणित और सकुचित राष्ट्रीयताके स्थान पर ' सम्पूर्ण मनुष्यता का सन्देशहर है। .
युवराजने अपने जीवनमा आन्तरिक रहस्य समझ लिया है और उसके उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह अयन्त आतुर है। उसकी आतु. उद्देश्यपूतिमें रता हमें एफरार शेक्सपीयरके युवराज पात्र 'हैम्लेट' की आत्मसमर्पण। याद दिला देती है । वह उसके लिए सारी यन्त्रणाओं को सहने और तपस्यामय जीवन व्यतीत करने को तैयार है। वह इस जीवनके मिठासको जानता है, किन्तु सजयसे कहता है कि "भाई, मधुरका मूत्य देनेके लिए ही कठिनकी साधना आवश्यक है।" किसी प्रकार वह अपने उद्देश्यसे नहीं हिल सकता । उसे मुक्तधाराके बाँधको तोड़नेसे रोकनेके विषयमै विश्व- जित्का सारा प्रयत्न व्यर्थ होता है । वह कह देता है कि आज मुझे न प्रेम रोक सकता है और न क्रोध । अस्तकालीन सूर्यने-जो 'अमिमय पक्षी' है-उसके आगे उसके कर्तव्य का चिन सींच दिया है । वह अपने उद्देश्यकी पूर्तिके लिए अपने जीवनका समपण करना चाहता है । विभूतिके बनाये हुए बाँधमें दो एक कमजोर स्थान है जहाँसे यन्त्र खुल सकता है-परन्तु ऐमा करनेसे खोलनेवालेका जीवन नहीं बच सकता। यह जानकर भी राजकुमार बाँधके समीप जा कर उसे सोल देता है और झरने के प्रवल प्रवाहमे बहकर अपना बलिदान कर देता है और इस प्रकार अपने जीवन के अन्तिम उद्देश्य और अपनी माता---मुकधारा भरने-के मणको चुकाता है। ध्यानसे विचार करने पर स्पष्ट हो जायगा कि युवराजमें क्वीन्द्रकी ही व्यक्ति झलक रही है। कवींदका सन्देश युवराजके जीयनमें चरि- क्वीन्द्रका अ- तार्थ हो रहा है। वह यन्त्रनिर्मित बाधाको दूर करके स्वाधीनता पना स्वरूप। स्थापित करना चाहता है । गतवर्ष युरोपसे भेजे हुए कवीन्द्रके कुछ पन 'माडर्न रिव्यू' ( Modern Review ) में छपे थे। उनमेंसे एकमें उन्होंने लिखा था कि "शान्तिनिकेतनको विश्वमारती- के रूपमें परिणत करते समय जो सगठनकी मशीन तैयार होगी उसके विरुद्ध मेरी फवि स्वच्छन्दता' आघात पहुँचाती है। वह किसी कल्पित धाधाको नहीं सह सक्ती।" इसी प्रकार युवराज भी किसी बाधाको सहन नहीं कर सकता है । युवराजके जीवनमें कवीन्दका सन्देश पाया जाता है। यह उनकी 'आदर्श' - यल्पना है।
. धनञ्जय वैरागीकी व्यक्ति इस नाटकमें कदाचित् युवराजसे कम महत्त्व- पूर्ण नहीं है । धनजयके चरिन चित्रणको देखते ही आधुनिक धनञ्जय । युगके अवतार महात्मा गान्धीका स्मरण हो आना अनिवार्य है । यद्यपि स्वत कवीन्द्र अपनी टिप्पणी में कहते हैं धनञ्जय साधुका क्थोपक्थन और उसका चरित्र भाजसे पन्द्रह वप पहले रिसे गये मेरे प्रायश्चित्त नामक नाटकसे लिया गया है " तो भी धनञ्जय और महात्मा गान्धीको समता इतनी स्पष्ट है कि यही ज्ञात होता है कि मानों क्वीद्रने महात्मा गान्धीका ही चिन खींचा हो । समता किसी एक ही बातमें नहीं है प्रत्युत सारे चरिनमें है। धनजयके चरिनको विवेचना इस बात को भली भाँति स्पष्ट कर देती है। धनजयके चरिना सबसे मुख्यरूप 'अहिंसा' ही है। जहाँ कहीं वह कुछ भी योलता है 'अहिंसा' का भाव वहाँ अवश्य रहता है। किसीको धनञ्जयका चोट न पहुँचाना और सय अपो कार चोट सहना उसके अहिंसा भाव। जीवनके रागका मुस्पद है। वह शिवतराइके लेगों को समसाता है कि "रहरोंपर डाँई मारनेसे लहरें नहीं रुक सस्ती, परन्तु पतधारको स्थिर कर रखनेसे उनपर विजय प्राप्त की जा सकती है"। फिर वह उहं आदेश करता है-"सिर ऊँचा करके ज्याही यह कह सकोगे कि हमें मारकी चोट नहीं लगती त्यों ही मारकी सम्ल टूट जायगी"। महात्मा गाँधीके समान वह उह समझाता है कि उनके अन्दर पृणा और द्वेपका कोई माय न आना चाहिए। धनतय लोगोंसे कहता है हि "तुम मेरे तात्पर्यको नहीं समयते, क्यों कि तुम्हारे नेन क्रोधसे रक्त हो रहे है और तुम्हारी वाणी- में मधुर स्वर नहीं है"। वस्तुत पैरागी मन, वचन और कम तीनों प्रकारकी हिंसा और द्वेष भावके विरुद्ध आवाज उठाता है । उसको हिसा वैसी ही उथ और पवित्र है जैसी बुद्ध भगवान् और महात्मा गाँधीको। एक प्रसिद्ध लेखरके शब्दों में महात्मा गांधी चरित्रका रहस्य यह है कि उन्हें किसीसे द्वेष नहीं और इसीलिए किसीसे हरते निर्भयता। भी नहीं। धनाय कहता है " तुम लोग मा ही मन औरोंको मारना चाहते हो, इसीलिए डरते हो। परन्तु में किसीसे मारना नहीं चाहता चीलिए हरता भी नहीं है। जिसके हृदय में १४ - " " हिंसा रहती है भय उसके पीछे लगा रहता है। परन्तु धनजय निर्भय- ताके बड़े गहरे अथा तक पहुँचता है। उसके विचारसे दूसरोंको चोट पहुँचाना भी एक कायरता है। वह शिवतराईके नागरिकोंसे कहता है- तुम चोटसे यचोके लिए या तो दूसरोंको चोट पहुँचाते हो या भाग जाते हो । परन्तु ये दोनों ही प्रकार समान रूपसे कायरताके हैं। इन दोनोंहीसे पशुता प्राप्त होती है।" धनजय कहता है " में उन लोगोंका चोक्षा सिरपर रसकर नहीं चल सकूँगा जो स्वय डरते और दूसरोको डराते ह । वह शरीरके साथ साथ क्रियात्मक जीवनमें 'आत्मा' और उसकी शक्तिको मानता है । जहाँ शरीरमे चोट आदिकी पीडा पहुँचती है वहाँ आत्मिक आत्मा इन सब कमजोरियोंसे परे है। वह कहता है- शक्तिम " जो वास्तविक मनुष्य है उसके चोट नहीं लगती क्योंकि विश्वास । वह दीपशिसाके तुल्य है । चोट लगती है जानवरको, क्योंकि वह मासपिण्ड है, मार साकर चिल्ला उठता है । धनजय इस शरीरसे परे आत्माकी शकिपर विश्वास रखना सिखाता है। ईश्वरके दृढ़ विश्वासकी आवाज धनजयके प्रत्येक रोमकूपसे निकल रही है। ईश्वरनिष्ठा और वह सब कुछ प्रभुको अर्पण करता है। सारे कष्टोंको वह प्रभु प्रभुको सम द्वारा की गई परीक्षा मानता है और जितने भी कष्ट भाते पण। हैं उनको परीक्षाका अवसर समझ हर्षपूर्वक सहता है और वार वार अपने गीतोंमे प्रभुको सम्बोधन करके कहता है कि जितनी चाहें परीक्षायें लो, मैं विचलित न होऊँगा और दुखोंमें हार न मानूंगा । जब राजा रणजित् कहता है कि तुम्हारे तो कपालमें ही दुख है तो धनजय उसका उत्तर देता है कि जो दु ख कपालमे था उसे मैंने छातीपर रख लिया है और दु खोके ऊपर रहनेवाला उसी स्थानपर निवास करता है।" धनजयका विश्वास है कि जो कुछ हो रहा है वह प्रभुकी प्रेरणासे । हमें अपने सारे कर्म प्रभुके अर्पण कर देने चाहिए। यही भाव है जो कई वार महात्मा गाँधीके लेसोंमें भाया है। उन्होंने इसी समर्पणके आवेशमें लिखा था 'I am Clay in Potter's Hand'-~मैं कारीगरके हायमें मिट्टीके समान हूँ । धनञ्जय समझता है कि मेरी पीडाको भी प्रभु ही सहन करते हैं । शिक्टराईके लोगोंको शान्त करते हुए वह कहता है - "यदि वह प्रभु-जिसे मैंने अपना यह शरीर समपण कर दिया है,-सहन कर लेगा तो तुम भी सह लोगे।" वैरागी उत्तरकूटके लोगोंको चार धार बतलाता है कि "यह जीवन प्रभुका दिया हुआ उपहार है। उस प्रभुका ऋण प्रत्येक पर है जो उसे चुकाना होगा।" धनञ्जय शिवतराईके लोगोंको चार वार कहता है कि में "तुम्हें उस ऋणसे उऋण नहीं कर सकता। ईश्वरका सहारा लेना चाहिए । वही आन्तरिक प्रेरणासे मार्ग दिखायगा।" शिवतराईके लोग राजसिंहासनके लिए दावा करते हैं। उसके विषयमें भी वह कहता है "जब तक तुम इस सिंहासनको उस प्रभुका नहीं समझते तव तक इस पर किसीका भी दावा नहीं चल सकता-राजाका भी नहीं और प्रजास भी नहीं ।" इस प्रकार सब कुछ प्रभुके अपण कर देना और उसमें निष्ठा रखना आदर्श है । धनञ्जय सव साधारणके अधिकारोंका यहा समर्थक है । उसने शिवतराईके लोगोंको राजकर देनेसे रोक दिया है और वह राजाके मामने प्रजाके आधि कहता है कि वह कर तुम्हारा नहीं है-अर्थात् तुम्हारा उस पर कोई अधिकार नहीं । "जो अन्न प्रजाके खानेसे बचता है उसी पर आपका अधिकार है, परन्तु उसके भूखके अन्नको आप नहीं ले सकते।" कर रोकनेकी वात महात्मा गाँधीके खेदेके सत्याग्रहकी घटनाको कैसी अच्छी तरह स्मरण करा देती है। धनजयमें शिवतराईके लोगोंकी असीम भक्ति है । वह भक्ति और श्रद्धा अन्ध विश्वास तक जा पहुँचती है। उसकी समता सर्वसाधारणकी भी महात्मा गाँधी के प्रति सर्वसाधारणकी भक्तिसे भली भांति धनञ्जयमें की जा सकती है। वे प्रत्येक मातमें धनजयके उपर निर्भर है और उसीकी आज्ञाको मानते है । उन्हें धनंजयकी अलौकिक शक्ति पर विश्वास है। उनमेसे एक कहता है कि " धनजयका एक शरीर मदिरमें और एक याहिर है।" उन्हें दृढ विश्वास है कि धनजयके रहते हमें कोई हानि नहीं पहुँचा सक्ता और धनजयको पकडनेकी भी किसी में शकि नहीं। ये पातें भी, महात्मा गाँधीके विषयमें वर्तमान भारतीय जनतारे जो भाव हैं उनकी, समानता करती। कार। । भक्ति।
क्वीन्द्रने इस भक्तिको अन्धविश्वासका रूप धारण किये हुए बतलाया है । वे लोग न तो धनञ्जयके उच्च अहिंसा भावका ही पालन कर धनञ्जयके पीछे सकते हैं और न धनजयके' गहरे तर्कको ही समझते हैं। शिवतराईका बुद्धिशून्य शिवतराईका एक मनुष्य वैरागीसे कहता है कि "हम तो आपको समझते हैं। आपको पातको भले ही न समझें ।" यही कारण अनुसरण । है जो धनजयके लगातार यत्न करने पर भी वे दूसरे राष्ट्र उत्तरकूटके प्रति घृणा और बदलेके भाव दूर नहीं कर सकते। लोगोंमें इतनी भक्ति होते हुए भी धनजयको निराशा होने लगती है। वह लोगों के सामने कहता है -" तुमलोग मुझे जितना ही असफलता पकड़ कर चिपटते हो, उतना ही सीसा हुआ तैरना भूल जाते. आर निराशा। हो और मेरा भी पार होना कठिन हो जाता है। इसीलिए छुट्टी चाहता हूँ और वहाँ जाता हू जहाँ कोई मेरे पीछे न आसके ।" निराशा बढती ही जाती है। धनजय लोगोंसे कहता है-- 'में पराजित हो चुका हूँ। अब मैं विश्राम लेना चाहता हूँ। प्रसन होते हो कि तुमने मुझे पा लिया, परन्तु नहीं समझते कि तुम अपनेको. खो रहे हो।" धनजय अनुभव करता है कि लोग अन्धे होकर उसके पीछे चल- नेके कारण अपनी बुद्धि खो बैठे हैं-यहाँतक कि उन्होंने ईश्वरको भी भुला दिया है, क्योंकि वे धनजय तक ही रुक जाते हैं, ईश्वर तक नहीं पहुंचते। वह कहता है-"मुझे उस समय सचमुच बहुत ही दुख होता है। मनमें आता है कि पृथ्वीमें समा जाऊ। वे अपनी सारी पूजा-जो ईश्वरके लिए थी-मुझ पर ही समाप्त करके एक प्रकारसे दिवालिये हो गये है।" लोगों की बुद्धि परिपक न होनेके विषयमें वह कहता है “मैंने जितना ही उन्हें उत्तेजित किया है उतना ही कम उनकी घुद्धिको परिपक्क होने दिया है।" लोगोंको मानसिक स्वत- न्त्रता दूर हो जानेको धनजयको यहाँ तक चिन्ता है कि वह कहता है कि- "यदि यह सत्य है कि मैंने उनकी मानसिक स्वतन्त्रतामें एक घाँध बाला है तो मुझे डर है कि भगवान भैरव मुझे और तुम्हारे वितिको एक साथ दण्ड देंगे। तुम इस बातसे सकेत। युपराज और धनजय। लोगोंकी मानसिक स्वतन्त्रता और बुद्धि छिन जानेके विषयमें जो कुछ लिखा गया है उसे पदकर स्वभावत ही सन्देह होता है कि इसमें महारमा गौं- कवीदने महात्मा गांधाकी ओर संकेत किया है, विशेषकर धीकी भोर उस दशामें जय कि इस नाटकके प्रकाशित होनेसे कुछ दिवस पूर्व ही वर्तमान आन्दोलन पर कवीन्द्रने यह आक्षेप किया था कि लोग युद्धिशून्य होकर अन्धविश्वासके साथ महात्माजीका भसरण करते हैं। परन्तु वर्तमान भादोलनमें लोग बुद्धिरहित होकर महात्मा- जीके पीछे चलते है या नहीं, यह यात विचारणीय अवश्य है। युवराज और धनजयकी तुलनाके विषयमें यह कहना अत्युक्तियुक न होगा कि जहाँ पहलेमें कवीन्द्रकी व्यक्कि झलक है वहाँ दूसरेमें महात्मा गाँधीका चिन है। दोनोंका भेद इन दोनों व्यक्तियोंसे समझमें आ सकता है। युवराजका आदर्श निस्सीम स्वाधीनता है और धनजयका शुद्ध सार्वभौम अहिंसाधनजयके जीवनमें जो असफलता और निराशा प्रकट की गई है उसे हम भारतीय आन्दोलनके विषयमें अभी स्वीकार करनेको तैयार नहीं हो सकते । एक और भी भेद है । धनजय ईश्वरकी भक्ति और आत्मार्पणमें मस्त है, पर युवराज अदृश्य शक्तिके विषयमें रहस्यमय (Mystic) पातोंकी ओर सकेत करता है। धनजयका ईश्वर विश्वास सर्वसाधारणके लिए उपयोगी है, परन्तु युवराजका रहस्यमय सकेत एक दार्शनिक और कविका है। महत्त्वकी दृष्टिसे नाटकमें तीसरा पान विभूति हो सकता है। वह युवराजका प्रतिद्वन्द्वी है । वह स्वाधीनता का घातक है। उसने झरने- विभूति। के स्वच्छ द प्रवाह पर बाँध लगा दिया है। इसका गहर अर्थ इस बातकी ओर सकेत कर रहा है कि भाधुनिक वितान- से उत्पन्न होनेवाली मशीनरीने मनुष्यकी स्वाधीनता पर बाँध लगा दिया है। विभूति साइन्सके युगमें मनुष्यकी प्रकृति पर विजयका सूत्रपात करता है। वह ईश्वरके कामको अपने हायमें लेना चाहता है। उसे मनुष्यको मस्तिष्क शफि पर भरोसा है । वह ईश्वरसे नहीं डरता । नये युगमें शेक्सपीयर और टेनिसनके समान वह चाइन्सके विजयनादका गीत गाता है और प्रकृति पर मनुष्यके अधिकारकी घोषणा करता है-"मेरा उद्देश्य रेती, जल, और पत्थरों- पर,जो कि मानों मनुष्यको शक्तिके विरुद्ध षड्यन्त्र कर रहे थे।
" । विजय प्राप्त कराना था। " उसे ईश्वरका डर नहीं है। सुले शब्दोंमें वह ईश्वरको चैलेज देता है। सूर्य और तारों के बीच मानों उन्हें चिढाने के लिए उसने अपनी मशीन खड़ी की है। एकवार रणजित् और उत्तरकूट के लोग भी पपड़ा जाते हैं, पर विभूति शिडर है । वह कहता है-" मेरी मशीनने न जाने कितनी माताओंके शाप पर विजय पाई है। जो ईश्व- रकी शक्तिसे लड़ सकता है वह मनुष्य के अभिशापसे नहीं डरता। उसने मशीनके काममें बहुतसे यालकों और युवकोंको लगा कर उनकी जीवनलीला समाप्त कर दी। उसे इसके लिए न दुख है और न डर, क्यों कि वह 'राष्ट्रीयवाद'को माननेवाला है। प्रत्येक व्यक्तिको राष्ट्रके काममें आना चाहिए । यदि कोई व्यक्ति 'राष्ट्रीय ' काममें नष्ट हो जाये तो उसे इसकी परवाह नहीं । लछमन, सुमन, बटुके पुत्र यनवारी आदि पर मशीनके काममें मनमाना अत्याचार. होता है । इस प्रकार कवीन्द्रने यन्त्रकला द्वारा होनेवाले अत्याचारोंकी ओर भी सकेत किया है। अपने 'राष्ट्रीयवाद' के सिद्धान्तके कारण ही वह एक दूसरे राष्ट्र शिवतराईके जलको रोक कर उन्हें प्याससे मार डालने में जरा भी नहीं हिचकता है । एक राष्ट्र के रूपमें दूसरे राष्ट्र पर अत्याचार करना पाप नहीं ममझा जाता । रणजितके चरित्रमें रिसी अशतक स्वेच्छाचारी राजाकी और विशेषकर राष्ट्रीयवादकी बुराइयाँ प्रस्ट की गई हैं । युवराजकी स्वच्छन्द रणजित् । स्वाधीनतामें उत्तरकूटका सिंहासन भी बाधक है । राजा उसे उत्तरकूट तक ही सीमित करके सकीर्ण बनाना चाहता है। वह उत्तरकूटकी राष्ट्रीयताके पोषणके लिए शिवतराई पर सारे अत्याचार करनेको तैयार है। वह समझता है कि शत्रुराष्ट्रको डराकर ही वशमें किया जा सकता है, इसलिए वह अपने मन्त्रीको प्रेमकी नीतिका खण्डन करता है । रणजितके हृदयमें कभी कोई उच्च भाव उठता ही नहीं। वह समझता है कि दूसरे राष्ट्रोंके सताने और उनपर विजय पानेकी योजनाओंमें प्रभु भी साथ है, इसलिए वह यन्त्र बनकर तैयार होनेके उपलक्ष्यमें भैरवका उत्सव रचता है। वह व्यक्तियों- को राष्ट्रका गुलाम समझता है। नाटकके अन्तिम भागमें बनवारी नामक मनुष्य यह कह कर कि "शिवतराईके लोगोंसे मेरा कोई विरोध नहीं है," नन्दीघाटीके द्वारको बन्द करनेमे काम नहीं करना चाहता। उसे रंगरूटोंका भत्ती करनेवाला उत्तर देता है कि-"उत्तरकूट एक यड़ा राष्ट्र है । उसके अशरूप रहकर जो कार्य तुम्हारे द्वारा होगा उसके लिए किसी तरहकी जवाबदारी, तुम्हारे ऊपर नहीं - रहती।" इसमें कवीन्द्रका उस सिद्धान्तकी मोर सकेत है जिसके अनुसार व्यक्ति राष्ट्र के नामपर सप युरे भले काम करते हैं और यदि व्यक्ति राष्ट्रके काममें आजावे तो उसका जीवन सफल समझा जाता है। इसीलिए वह सुमनकी माताको अपने पुधके लिए विराप करते देखकर कहता है कि "पृथिवीमें जो सवकी अपेक्षा चरम दान है, उसे तुम्हारे पुनने पा लिया है।" उत्तरकूट और शिवतराईका सम्बन्ध कुछ कुछ अँगरेज और भारतीयोंसे मिलता जुलता है। उत्तरकूटके राजा और प्रजा दोनोंकी विदेशीय शास- शक्ति शिवतराई पर अत्याचार करो तुली हुई है। दोनों नकी निन्दा। राष्ट्रोंके लोगोंमें परस्पर एक दूसरे लिए घृणाके भाव बढ़ रहे हैं। एक बड़ा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त-भलाई करते हुआ भी विदेशी शासन बुरा है'-अभिजित्की एक उक्किमें दर्शाया गया है। उद्धवने अभिजित्से कहा कि क्या हमारे महाराज शिवतराई पर दया नहीं दिखाते ? उत्तरमें युवराज अभिजित कहता है-" दायें हाथसे कृपणनाके साथ दानका द्वार बन्द करके बॉयें हायसे वदान्यता दिखाना कोई अर्थ नहीं रखता।---- दयाके ऊपर निर्भर रहनेवाली दोनताको मैं नहीं देख सकता। एक मौलिक सिद्धान्त दिखाया गया है। विदेशी राज्य चाहे कितनी भी भला- इयाँ करे, पर अपने अधीन देशको अपने ऊपर निर्भर बनाता है, इसलिए वह हानिकारक है। क्या ठीक यही समस्या हमारे और अँगरेजोंके बीच उपस्थित " यहाँ घस्तुत नहीं है। शिक्षाके द्वारा रणजित् जहाँ स्कूलके अध्यापक तथा विद्यार्थियोंसे मिलता है वहाँ भली भाँति स्पष्ट कर दिया गया है कि किस प्रभार विद्यार्थियों के अन्दर दूसरे राष्ट्रके लिए घृणाके भाव भरे जाते हैं । अध्यापक सम- राष्ट्रीयताके सता है कि राष्ट्रको बनानेका उत्तरदायित्व शिक्षा पर ही है। घृणित भाव। वह विद्यार्थियोंको सिसाता है कि "शिवतराईके लोग घृणित हैं। क्यों कि उनका धर्म गदा है। प्रोफेसरने सिद्ध कर दिया है कि उनकी नाक चपटी होती है, इसलिए वे निकृष्ट जातिके हैं और उत्तरकूटवाले उच्च जातिके हे क्योंकि उनकी नाक नुकीली है। उत्तरकूटके नागरि- का उद्देश्य ही दूसरे राष्ट्रोंपर विजय प्राप्त करना है।" यह शिक्षा उह विद्यार्थी अवस्थामें ही दी जाती है । साथ ही विद्यार्थियोंको बतलाया जाता है कि रण- मन्त्री। कर की जितके परदादाने २९३ सिपाही लेकर दक्षिणी जातिके ३१,७५० सिपाही भंगा दिये थे। यह बात पलासीकी लड़ाई के विपयम अँगरेज इतिहासलेखकों पर भी घटती है जिनके अनुसार लार्ड क्लाइवने बहुत थोड़ी सी अँगरेजी सेनासे नवाब- की बड़ी भारी सेनाको भगा दिया था। ऐसी ही बातें विद्यार्थियोंके अन्दर डाल कर दूसरे राष्ट्रके प्रति घृणा पैदा की जाती है। मन्त्रीका चरित भी अत्यन्त रोचक है। उसे पढते समय भूतपूर्व भारतमन्त्री मि० माण्टेग्यूका स्मरण हुए विना नहीं रहता। यह साधारणतया कूटनीतिका प्रयोग करता हुआ अपने राष्ट्रकी उन्नतिमे लगा हुआ है । वह विभूतिके चाँधको अपेक्षा शिवतराईके लोगोंको वशमें करनेके लिए युवराजका वहाँ भेजना और उसके द्वारा प्रेमका बाँध डलवाना अधिक आवश्यक समझता है और उसकी समझमें यह प्रेमका बाँध विभूतिके वॉधसे कहीं पढ़कर उत्पातकारिणी शक्तिको रोकनेमें समर्थ होता । वह समझता है कि युव- राजके शिवतराईमें रहनेसे वहाँकी प्रजासे जो प्रेमसम्बध बढता वह अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान् होता । प्रत्येक नई परिस्थितिमें वह अपनी सम्मति बदल लेता है । वह दमननीतिके भी अधिक पक्षमें नहीं है । राजा जब धन- जयको पकड़नेकी आज्ञा देता है तो मन्त्री वैसा करनेसे हिचकता है । • वह राजाको समझाता है कि " कुछ लोग ऐसे भयानक होते हैं जिन्हें पकड़नेकी अपेक्षा स्वतन्त्र रहने देना ही अच्छा होता है " । मन्त्रीकी यह सलाह मि. माण्टेग्यूकी महात्मा गाँधीके पकड़नेके विषयकी नीतिसे कितनी मिलती जुलती- हुई है ! मन्त्री युवराजके महत्त्वको खूब अनुभव करता है। वह सजयको युवराजके साथ रहनेकी अपेक्षा उसके उद्देश्यको पूरा करनेमें सहायक होनेकी अनुमति देता है। इस नाटकमें दोनों स्थानोंके नागरिक कई धार प्रकट होते हैं। उनमें कई समानतायें और कई असामानतायें हैं। दोनों ही नागरिक उत्तरकूट और परस्पर घृणाका भाव रखते हैं और एक दूसरेको निकृष्ट शिवतराईके समझते हैं । शिवतराईके लोग उत्तरकूटके लोगोंको 'मांसके नागरिक। लोथडे' के समान कहकर उनकी आधतियोंकी हँसी करते है। वे अपने पूर्व-पुरुषको देवताओंके प्यालेसे छलके हुए अमृतसे बना मानते हैं तथा उत्तरकूटके आदिपुरुषको राक्षसों के खाली प्यालोंके टुकड़ोंसे घना पताते हैं। वे उत्तरकूटके रहनेवालोंके वेषको - . . - २१ । - . भद्दा समझते हैं, क्योंकि वे कपड़ों में ऐसे जकड़े रहते हैं कि यहींसे चू न पड़े और उन्हें केवल परिभमके लिए बनाया गया है। वे समझते हैं कि "उत्तरक- टके लोगोंके अक्षर दीमकके कोषों जैसे होते हैं। उनकी विद्या जहाँ लगी कि खाकर वरपाद कर दिया और वहाँ मिट्टीका देर खड़ा कर दिया। वे अपने हथियारोंसे दूसरों के प्राण और शाखोंसे मन नष्ट कर देते है। ठीक ऐसी ही भातें अँगरेजों, उनकी भाषा और सभ्यताके विषयमें बहुधा भारतवासी सोचते है। दूसरी ओर उत्तरकूट के नागरिक उनके कनटोपों आर चपटी नाकको हँसी उड़ाते हैं। उत्तरकूटके लोग शिवतराईके पानी पर बॉध लग जानेसे प्रसन्न होते है और वे विभूतिकी महिमा गाते हैं । शिवतराईके लोग धनजयके अनन्यभक तथा अनुगामी है और वे उत्तरपूटके राजासे लड़कर अपने अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं। उत्तरकूटके लोगों में अपने राष्ट्रके महत्त्वको स्थापित करनेके भाव भरे हुए हैं। वे राष्ट्रके फाममें, व्यक्तिको चाहे जैसा बुरा काम करना पड़े, उसका उत्तरदायित्त्व उस व्यक्तिपर नहीं समझते । उत्तरकूटके लोग राष्ट्रकी सेवा करते हुए अपने अधिकारको भी अनुभव करते हैं और युवराजसे शिवतराईके लोगोंकी सहायताके कारण क्रुद्ध होकर उसे दण्ड दिलानेके लिए राजाके विरुख भी भगायत करनेको तैयार हो जाते हैं। नाटकमें अन्य भी बहुतसे पात्र है । भूमिका बहुत यह चुकी है। उनका अलग अलग वर्णन करना आवश्यक भी नहीं । सजय राजकुमार नाटकके अन्य युवराजमे वही भक्ति और अनुचर होनेका वही भाव रखता है जो रक्ष्मणजी श्रीरामके लिए रखते थे। गणेश शिवतराईके लोगोकी आवाजको प्रकट करनेवाला नेता है। वह अपना कोई नया आदर्श नहीं रखता, प्रत्युत लोकमतको प्रकट करता है । विश्वजित् रणजित्- फा चाचा है जो किसी समय राष्ट्रीयवादको मानता हुआ कमजोर राष्ट्रोंपर अत्याचार करता था, परन्तु पीछे उसपर युवराजका प्रकाश पड़ा और तप वह सर्वतोभावेन युवराजका सहायक यन गया । युवराजको बन्दीगृहसे छुड़ाने के लिए. यह एक पड्यन्त्र रचता है । इनके अतिरिक अम्बा, फूल वेचनेवाली, पह उद्धव आदि और भी अनेक पान है। पात्र। . कृष्णा त्रयोदशी, फातिक, } धर्मेन्द्रनाथ
नाटकके पात्र।
रणजित्
मनी
विभूति
अभिजित्
उत्तरफूटका राजा
उतरएटका मग्री
राजकीय चीनियर
धनजय
মাযহা
विश्यचित्
उत्तरपूटका युवराज
उत्तरकूटका राजयुमार
शिवतराईका पेरागी
शिवतराईका नेता
रणजिसका चाचा
सुमनकी माता
निमकू, बनवारी,
हुधा
नन्दीपाटीगो बन्द करनेके लिए
पकर गये रेगस्ट।
नरसिंह
} रंगरूट भरती करनेवाले।
फूल बेचनेवाली, भेरव मन्दिरके पुजारी, शिवतराईके नागरिक,
उत्तरकूटके नागरिक, आदि।
नाटका , नागरिक-नहीं, हमारे प्राण बहुत दृढतासे सुरक्षित हैं, इसके लिए आप चिन्ता न करें। पथिक तथापि इस यन्त्रको सूर्यतारोंके सामने इस प्रकार खुला न रखना चाहिए। यदि यह ढेंक दिया जा सकता तो अच्छा होता। देखो न, यह आकाशमण्डल में अड़ा हुआ मानों उसे चिढ़ा रहा है । नागरिक-तो क्या आज तुम भैरवकी आरती देखने न जाओगे ? पथिक-घरसे तो देखनेके लिए ही निकला था। प्रतिवर्ष मैं इसी अवसर पर अपनी भेंट चढाता हूँ, परन्तु इससे पूर्व मैंने मन्दिरके ऊपरके आकाशमें ऐसी निकट वाधा कभी नहीं देखी । एकाएक इसकी और देखकर आज मेरा शरीर कॉप उठा है। इसका इस तरह मन्दिरके मस्तकसे भी ऊंचा होजाना मन्दिरसे स्पर्धा करने जैसा जान पडता है। भेंट तो चढाये ही आता हूँ परन्तु मन प्रसन्न नहीं होता है । (प्रस्थान ।) [अम्बा नाम्नी एक स्त्रीका प्रवेश। एक सफेद चादर उसके सिर और शरीरको ढके है और उसका पहा धूलमें घिसटता जाता है।] अम्बा-मुमन | मेरा सुमन ! क्या मेरा पुत्र सुमन मेरे घर नहीं लौटेगा ? (नागरिकके प्रति ) तुम सब तो लोट आये पर वह कहाँ है ? नागरिक-तुम कौन हो? अम्बा-- -मै जनाई गौरकी रहनेवाली अम्बा है। मेरा सुमन, म्ह मेरी ऑखोंकी ज्योति है, मेरे प्राणोंका निश्वास है, हा मेरा सुमन ! नागरिक-उसका क्या हुआ ? अम्बा–मुझे पता नहीं कि वे उसे कहाँ ले गये ! मैं भैरवमन्दि- रमें पूजा करने गई थी और जब लौटी तो देखा कि उसको ये ले गये हैं।
२
मुक्तधारा।
[ पुजारी मिल कर गाते हैं -
गान ।
जय भैरव, जय शहर,
जय जय जय प्रलयङ्कर,
शङ्कर शङ्कर।
जय सशयभेदन,
जय बन्धन-छेदन,
जय संकट-सहर
शकर शहर।
(पुजारियोंका गाते हुए प्रस्थान । )
[ पूजाके लिए नैवेद्य लिये हुए एक विदेशी पथिकका प्रवेश और
उसका उत्तरकूटके नागरिकसे मिलना 1]
पथिक-आकाशमें वह क्या है ? उसे देखनेसे तो भय लगता है !
नागरिक-जानते नहीं १ मालूम पडता है तुम विदेशी हो । यह
पथिक-यन्त्र ? कैसा यन्त्र ?
नागरिक हमारे राजकीय यन्त्रराज (इजीनियर ) विभूतिने इसके
लिए जो २५ वर्पतक परिश्रम किया था वह आज पूरा हुआ है और
उसीका यह उत्सव मनाया जा रहा है।
पथिक-इस यन्त्रका कार्य क्या है ?
'नागरिक-इसने मुक्तधाराके झरनेको रोक दिया है।
पथिक-बाप रे बाप ! यह तो एक राक्षसकी मासरहित जबड़ों-
वाली खोपड़ीके समान दीखता है । यह तुम्हारे उत्तरकूटके सिराने
टकटकी लगाये खडा है। इसे रातदिन देखते देखते तुम्हारे तो प्राण
भी सूखकर लकड़ी हो जायेंगे !
नाटफ। - नागरिक-नहीं, हमारे प्राण वहुत दृढतासे सुरक्षित हैं, इसके लिए आप चिन्ता न करें। पथिक-तथापि इस यन्त्रको सूर्यतारोंके सामने इस प्रकार खुला न रखना चाहिए। यदि यह ढंक दिया जा सकता तो अच्छा होता। देखो न, यह आकाशमण्डलमें अड़ा हुआ मानों उसे चिढा रहा है। नागरिक-तो क्या आज तुम भैरवकी आरती देखने न जाओगे ? पथिक-घरसे तो देखनेके लिए ही निकला था। प्रतिवर्ष में इसी अवसर पर अपनी भेंट चढाता हूँ, परन्तु इसमे पूर्व मैंने मन्दिरके ऊपरके आकाशमें ऐसी विकट वाधा कभी नहीं देखी । एकाएक इसकी और देखकर आज मेरा शरीर कॉप उठा है । इसका इस तरह मन्दिरके मस्तकसे भी ऊचा होजाना मन्दिरसे स्पर्धा करने जैसा जान पडता है। भेंट तो चढाये ही आता हूँ परन्तु मन प्रसन्न नहीं होता है । (प्रस्थान ।) [अम्बा नानी एक स्त्रीका प्रवेश । एक सफेद चादर टसके सिर और शरीरको ढके है और उसका पला धूलमें घिसटता जाता है।] अम्बा-सुमन ! मेरा सुमन ! क्या मेरा पुत्र सुमन मेरे घर नहीं लौटेगा ? (नागरिकके प्रति ) तुम सब तो लौट आये पर वह कहाँ है ? नागरिक-तुम कौन हो? अम्बा-मै जनाई गॉवकी रहनेवाली अम्बा हूँ । मेरा सुमन, कर मेरी आँखोंकी ज्योति है, मेरे प्राणोंका निश्वास है, हा मेरा मुमन ! नागरिक-उसका क्या हुआ ? अम्बा-~~-मुझे पता नहीं कि वे उसे कहाँ ले गये । मैं भैरवमन्दि- रमें पूजा करने गई थी ओर जन लौटी तो देखा कि उसको वे ले गये है।
मुकधारा। नागरिक-तो निश्चयसे उन्होंने उसे 'बाँध के कामके लिए पकड़ लिया होगा। अम्बा-~मैंने सुना है कि वे उसे इसी मार्गसे ले गये है। उस गौरी पर्वतके पश्चिमको ओर- यहांतक मेरी दृष्टि नहीं पहुंच सकती। मैं उसके आगेका मार्ग नहीं देख सकती। नागरिक-अब रोने और चिन्ता करनेसे क्या होगा? हम लोग भैरव मन्दिरकी आरती देखने जा रहे हैं। हमारे लिए आज उत्सवका, दिन है। तुम भी चलो। अम्बा-ना, ना, उस दिन भी तो मै भैरवकी आरतीमें गई थी। तबसे पूजाके लिए जानेमें डर लगता है। देखो, मै तुमसे कहती हूँ कि हमारी पूजा उस प्रभु तक नहीं पहुँचती। उसे कोई बीचमे ही छीन लेता है। नागरिका-कौन छीन लेता है ? अम्बा-~-वही जिसने मेरा सुमन मुझसे छीन लिया। मै अबतक नहीं जानती कि वह कौन है । सुमन ! मेरा मुमन | मेरा प्यारा मुमन ! (दोनो जाते हैं।) { मन्दिरकी ओर जाते हुए मार्गमें विभूतिको उत्तर- कटके युवराज अभिजितका भेजा हुमा दूत मिलता है । दूत-~विभूति, युवराजने मुझे आपके पास भेजा है। विभूति उनकी क्या आना है ? -आप बहुत दिनसे मुक्तधाराके झरनेका बाँध बनानेमें लग रहे हैं। वह बाध बार वार टूटा, न जाने कितने मनुष्य उसकी नाटका धूल और रेतमें दबकर मर गये और न जाने कितने उसके पूरमें वह गये । अन्तमें आज- निभूति--मेरा बॉध तैयार हो गया। उनके प्राणोंका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। दूत-शिवतराईके निवासियोंको अभीतक यह वात ज्ञात नहीं हुई है। वे इस बात पर विश्वास नहीं कर सकते कि कोई मनुष्य उनसे वह पानी छीन सकता है जो कि उनके लिए ईश्वरका दान है। विभूति-ईसरने उन्हें केवल पानी दिया है, परन्तु मुझे उस पानीको बाँधनेकी शक्ति भी दी है। दुत-बे बेचारे नहीं जानते कि एक सप्ताहके भीतर उनके खेत- निभूति-उनके खेतोंकी बात मुझसे क्यों कहते हो ? मुझे उनके खेतोंमे क्या ? दूत- क्या आपका यही उद्देश्य न था कि जल को रोककर उनके खेतोंको सुखा दिया जाय ? विभूति-मेरा उद्देश्य रेती, जल और पत्थरों पर-जो कि मानों मनुष्यकी शक्तिके विरुद्ध पड्यन्त्र कर रहे थे—मनुष्यको विजय प्राप्त कराना था। मुझे यह सोचनेका अवकाश न था कि किसी अभागे किसान के किसी मकाके खेत पर इसका क्या असर पड़ेगा। दूत-राजकुमारने पूछा है कि क्या अब तक भी आपको इस विषय- पर विचार करनेका अपसर नहीं मिला ? विभूति-नहीं, मेरा मन इस यन्त्रकी महिमाके रिचारमें इना हुआ है।
मुक्तधारा। दूत-क्या आपके उस विचारम भूखोंकी आह बाधा नहीं डालती । विभूति--न तो पानीका वेग मेरे बॉधको तोड सकता है और न भूखोंकी पुकार मेरी मशीनको हिला सकती है। दूत- क्या आपको शापका भी भय नहीं है ? विभूति-शाप! देखो, जिस समय उत्तरकूटमें मजदूरोंका अभार हो गया, उस समय मैंने राजाकी आज्ञासे चण्डपत्तन प्रामके १८ वर्षसे ऊपर अवस्था वाले सब युवकोंको पकड़ बुलाया और उनमेंसे अधि- काश फिर नहीं लौटे। उस समयकी न जाने कितनी माताओंके शाप पर मेरे यन्त्रने विजय पाई है। जो ईश्वरकी शक्तिसे ल्ड सकता है वह मनुष्यके अभिशापसे नहीं डरता। दूत-राजकुमार कहते है कि आपने एक वस्तुके निर्माणका गौरव तो प्राप्त कर ही लिया है, अब उसका विनाश करके और भी अधिक गौरव प्राप्त कीजिए। विभूति----जन तक मेरा कार्य समाप्त न हुआ था, वह मेरा था, पर अब उस पर सारे उत्तरकूटका अधिकार है । मैं अब उसे नष्ट नहीं कर सकता। दूत-युवराज कहते है कि तो फिर इस नष्ट करनेके अधिकारको वे स्वय अपने हाथमें ले लेंगे। विभूति-क्या ये शब्द स्वय युवराजके है ? क्या वे हमसे दूसरे हैं । हममें से ही नहीं हैं । पराये हैं शिरतराईके हैं ? दूत- राजकुमार कहते है कि उत्तरकूटमें केवल यन्त्रका ही नहीं, प्रभुका भी राज्य है और यह अभी सिद्ध करना बाकी है कि उस प्रभुकी M नाटका ७ इच्छा उत्तरकूटकी सरकारके साथ है या नहीं। इस यन्त्रको उस इच्छाके बीचमें न खड़ा करना चाहिए । विभूति-यन्त्रकी शक्तिके द्वारा यह सिद्ध करना ही मेरा उद्देश्य है कि ईश्वरका सिंहासन हमारा ही है। राजकुमारसे कहना कि मेरे इस यन्त्रकी मूठको जरा भी हिला सके ऐसा के भी मार्ग नहीं रहा है। दूत---ईश्वरको जन नष्ट करना अभीष्ट होता है तब किसी बड़े मार्गकी जरूरत नहीं पडती, छोटे छोटे छिद्र ही, जो हमे दीखते भी नहीं, नाशके लिए पर्याप्त होते हैं । विभूति--(चोककर) छिद्र ! उनके रिपयमें तुम क्या जानते हो? दूत-मैं क्या जानता हूँ ! अरे भाई, जिन्हें जाननेकी जरूरत है वे स्वयं जान लेंगे। ( जाता है।) [ उत्तरकूटके नागरिक मन्दिरकी ओर जाते हुए विभूतिसे मिलते हैं। प्रथम नागरिक-इजीनियर साहेब, आप तो अद्भुत मनुष्य हैं ! हमें पता भी न चला कि आप हमसे पहले कर चले आये। द्वितीय--यह तो इसका सदाका स्वभाव है। कोई नहीं जानता कि यह चुपचाप आगे बढता हुआ किस तरह सबको पीछे छोड जाता है। चौबुआ गॉवमें रहनेवाले इस मुडे विभूतिके उस प्रामीण मदरसेमें हमारे साथ कान खिंचा करते थे ! परन्तु फिर भी यह हम सबसे बढ़ कर ऐसा आश्चर्यजनक कार्य कर बैठा है। तृतीय नागरिक- अरे गवरू! हाथमें डलिया ठिये इस तरह मुह फाड़े हुए क्यों खड़ा है ? क्या विभूतिको तूने पहली ही बार देखा है ? ला, हार निकाल, हम इसे पहिना देवें ।
- मुक्तधारा विभूति-नहीं, नहीं, इसकी क्या आवश्यकता है ? तृतीय नागरिक नहींकी क्या बात है? यदि तुम्हारी गर्दन तुम्हारी महिमाके ही साथ साथ बढ़कर ऊँटके बराबर हो जाती, और उसे हम सब लोग जी भरकर मालाओंसे लाद देते, तो बहुत अच्छी मालूम होती। द्वितीय नागरिक हमारा दुलकिया हरीश तो अभी तक नहीं आया। प्रथम नागरिक-वह तो आलसियोंका राजा ठहरा, उसकी पीठ- का ढोल अच्छी तरह बजाया जाता तो- तृतीय नागरिक ढोल बजानेके लिए उसके हाथ हमसे कहीं अधिक मजबूत हैं। चतुर्थ नागरिक-मेरे मनमें एक विचार उठा है कि हम विभूति- को मन्दिर ले चलनेके लिए सामन्तसे रथ मोग लें। परन्तु सुनते हैं कि आज तो स्वयं महाराज भी मन्दिरको पैदल ही जायेंगे । पाँचवा नागरिक-यह अच्छा ही हुआ । सामन्तका रथ क्या है, बिल्कुल दशरथ है । रास्तेमें बातकी बातमें एकका दश हो जाता है । तृतीय ना०-हा हा हा हा ! दशरथ ! हमारा यह लम्बू कैसे मजेकी बात कहता है !-दश-रथ ! पाँचवा ना०-- क्या झूठ कहता हूँ ! मैं अपने लड़केके व्याहमें जव उसे ले गया था, तब जितना उसपर चढा नहीं था उससे कहीं ज्यादा उसे मैंने स्वय खाचकर चलाया था! -अच्छा तो एक काम करो । विभूतिको कधेपर रख कर ले चलें चौथा ना०--- नाटक। . विभूति-नहीं नहीं, अरे यह क्या करते हो? पाँचना नागरिक-नहीं, नहीं, ऐसा तो होना ही चाहिए। तुमने उत्तरकूटकी कॉग्वमें जन्म लिया है, पर आज तुम उसको गर्दनपर चढ रहे हो । तुम्हारा मस्तक सममे उपर निकल गया है । [ कोंपर रकड़ियाँ रखकर उस पर विभूतिको विठा देते ह और सबके सब कहते हैं- 'जय यन्त्रराज विभूतिकी जय' ] गान। नमो यन्त्र, नमो यन्त्र, नमो यन्त्र, नमो यन्त्र तुम चक्रमुखरमन्द्रित, तुम वन यहि-वदित, वस्तुविश्यवक्षदश ध्वंस विकटदन्त। तव दीप्ति अनि शत-शतन्नि विघ्न विजय-पन्थ। लोहगलन शेलदलन अचल-चलन मन्त्र । कभी फाटलोटइष्टक दृढ, धनपिनद्ध काया, कमी भूतल-जल अतरीक्ष- लघन लघुमाया, तव खनि-सनित्र-नस-विदीर्ण क्षिति-विकीर्ण-अत्र, पञ्चभूत-चन्धनकर इन्द्रजाल तन्न। (सब जाते हैं।) [ महाराज रणजित् अपने मन्त्री सहित शिविरसे आते हैं। तव । तव । . मुक्तधारा रणजित्-तुम हमारी शिवतराईको प्रजाको पूर्णतया दवानेमें सदैव असमर्थ रहे । इतने दिनोंके बाद अब विभूतिने मुक्तधाराके झरने- को नियन्त्रित कर यह सब सम्भव कर दिखाया। परन्तु यह क्या वात है कि तुम इसके लिए हर्प प्रकट नहीं करते ? क्या यह डाह है ? मन्त्री महाराज क्षमा कीजिए, यह हमारा काम नहीं कि हम फापडे और कुदालकी सहायतासे मिट्टी और पत्थरसे युद्ध करें ।। हमारा हथियार कूटनीति है । हमारा काम मनुष्यके मस्तिष्कसे है। मैंने ही युवराजको शिरतराईमें वाइसराय बना कर भेजनेकी सम्मति दी थी और वह बॉघ जो इस नीतिके द्वारा तैयार होता, इस वर्तमान बॉधकी अपेक्षा अधिक सुरक्षित रीति पर और अधिक स्थिरतासे बड़ी बड़ी उत्पातकारिणी शक्तियोंको रोकनेमें समर्थ होता । रणजित्-~-तथापि उसका परिणाम क्या हुआ ? उन्होंने दो वर्ष- से कर ही नहीं दिया है । अकाल पडना कोई नई बात नहीं है, पर पहले तो वे कर दिये बिना न रहते थे । मन्त्री-ठीक उस समय जब कि एक करकी अपेक्षा भी अधिक मूल्यवान् वस्तु वसूल की जा रही थी, श्रीमान्ने राजकुमारको वापिस बुला लिया । राजकार्यमें छोटोंकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए। याद रखिए, जब अत्याचार असह्य हो जाता है तब छोटे भी कष्ट सहन- की शक्तिके द्वारा बड़ोंसे आगे बढकर सबल हो जाते है। रणजित्-तुम्हारी सम्मति क्षण क्षणमें बदलती रहती है। मुझे अच्छी तरह स्मरण है कि तुमने बहुधा कहा है कि जो अपनेसे नीचे हैं उन्हें अपने उच्चाधिकारसे सदैव दवाये रखना चाहिए और विदेशी प्रजाओंपर यह दवाव रहना ही राजनीति है | कहा था न' .
नाटका , मन्त्री-हॉ मैंने यह कहा था, परन्तु उस समयकी परिस्थिति और थी। उस समय मेरी मन्त्रणा समयानुकूल थी, परन्तु अन- रणजित्-- राजकुमारको शिवतराई भेजना मेरी इच्छाके प्रतिकूल या। मन्त्री क्यों महाराज रणजित्-प्रभाव दूरसे ही अच्छा पड़ता है। परिचयसे अवज्ञा बढती है। अपनी प्रजाके हृदयों पर प्रेमसे अधिकार किया जा सकता है, पर दूसरोंको भयसे ही वशमें लाया जा सकता है। मन्त्री महाराज, आप भूल गये कि राजकुमारको शिवतराई भेजनेका क्या कारण था। कुछ समय तक हमने उनके अन्दर एक गहरी अशान्तिका भाव देखा और हमें यह सन्देह हुआ कि राजकुमार- को कहींसे पता चल गया है कि वे राजनशमें पैदा नहीं हुए हैं प्रत्युत उस झरनेके स्रोतके समीप पडे पाये गये है, तब उनका मन दूसरी ओर लगानेके लिए- रणजित्-हॉ, मैं जानता हूँ । वह झरनेके स्रोतके पास रात्रिमें अकेला जाकर लेटा करता था। एक दिन अकस्मात् मै जा पहुंचा और पूछा--" यहाँ क्यों आये हो ?" उसने उत्तर दिया कि इस झरनेकी ध्वनिमें मुझे अपनी माताकी वाणी सुनाई देती है।" मन्त्री-एक बार मैंने राजकुमारसे पूछा कि " तुम्हें क्या हो गया है, तुम बहुधा राजमहलसे बाहर क्यों चले जाते हो ।" उन्होंने उत्तर दिया कि "मैं ससारमें मार्गाको खोलने आया हूँ। यही मेरे जीवनका आन्तरिक उद्देश्य है, जिसे मुझे अवश्य पूरा करना चाहिए।" - मुक्तधारा। रणजित्--यह भविष्यवाणी कि "वह एक विशाल साम्राज्यका शासक होगा अव ठीक नहीं मालूम होती। मन्त्री-परन्तु महाराज, वे आपके गुरूके भी गुरु अभिराम स्वामी ये जो विशेष कर इसी सवादको सुनानेके लिए यहाँ आये थे। यह उन्हींकी भविष्यवाणी है। रणजित्--उन्होंने अवश्य भूल की है। राजकुमारने अपनी सब अवस्थाओंमें मुझे हानि पहुंचाई है । उसने अपनी अन्तिम मूर्खता- के आवेशमे नन्दी घाटीके उस प्राकारको तोड डाला, जिसको हमारे पूर्व पुरुषाओंने वर्षोंमें पूरा किया था। और अब शिवतराईकी ऊन और दूसरी पैदावारको हमारे राज्यके वाहरके बाजारोंमें जानेकी कोई रोक न रही । इससे उत्तरकूटमें खाद्यसामग्री और वस्त्रोंका मूल्य बढ जायगा। मन्त्री-आपको स्मरण रखना चाहिए कि वे अभी कम उम्र है और अपने कर्त्तव्यके एक पहलूको ही देखते हैं। उनकी दृष्टिमें हर समय शिवतराईका ही हित रहता है। रणजित्यस, इसीको तो मैं उसका स्वय अपने राष्ट्रके विरुद्ध "विद्रोह समझता हूँ। मुझे निश्चय है कि शिवतराईके उस वैरागी धनञ्जयका-जो हमारी प्रजाको हमारे विरुद्ध भडकाता है.--इस कार्यमें अवश्य हाथ होगा । हमें उसीकी मालासे उसका गला घोट देना चाहिए। उसे (धनञ्जयको) बन्दी करना अत्र आवश्यक हो गया है । मन्त्री-मैं विरोध करनेका साहस नहीं कर सकता, परन्तु मुझे 'निश्चय है कि कुछ पुरुप ऐसे भयानक होते हैं जिन्हें पकड़नेकी अपेक्षा स्वतन्त्र रहने देना ही अच्छा होता है। . , नाटका रणजित्- इस विषयमें तुम्हें चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं । मन्त्री नहीं महाराज, में चाहता हूँ कि श्रीमान् ही इस विषय- में चिन्ता करें। [ द्वारपालका प्रवेश।] द्वारपाल–महाराज, मोहनगढ़से आपके चाचा विश्वजित् महाराज पधारे है। रणजित्-लो, उन्हीं से एक और भी आ गया । यह युवराज- के बिगाडनेवालोंमें सबसे बढकर है । एक मनुष्य जो आत्मीय होकर भी परकीय बना हुआ है, कुबडे मनुष्यके उस कूनड़के समान है, जो सदा ही सग लगा रहता है और किसी प्रकार अलग नहीं किया जा सकता, परन्तु फिर भी उससे कष्ट ही होता है। अरे ! यह क्या हो रहा है ? मन्त्री-भैरवपन्थी लोगोंका दल बाहर आ गया है और मन्दिर- की परिक्रमा कर रहा है। [भैरवपन्थी आते हैं और गीतका शेष भाग गाते हैं तिमिर-दृद्विदारण ज्यलदग्नि-निदारुण, मरुश्मशान-सञ्चर, शकर शकर। वज्रघोप-वाणी, रुद्र, शूलपाणी, मृत्युसिन्धु-सतर शकर शकर। (प्रस्थान।)
मुक्तधारा। M . [रणजितके चाचा विश्वजित्का प्रवेश । उनके बाल सफेद है, वत्र सफेद है और पगड़ी भी सफेद है।] रणजित्-चाचाजी, प्रणाम । मुझे ऐसे सौभाग्यकी कदापि आशा न थी कि आप आयेंगे और हमारी पूजामें सम्मिलित होगे। विश्वजित्--मैं तुम्हें सावधान करने आया हूँ कि भगवान् भैरव तुम्हारी इस पूजाको स्वीकार न करेंगे। रणजित्--आपके ये शब्द हमारे महोत्सवके लिए अपमान- जनक हैं। विश्वजित्-~-उत्सव ? किस लिए ? क्या उस जलप्रवाहको रोकनेके उपलक्ष्यमें जिसे प्रभुओंके प्रभु स्वय भगवान् तृपातॊकी प्यास बुझानेके लिए अपने कमण्डलुमेंसे बोल रहे है ? उस मुक्त जलको तुमने क्यों रोक दिया है ? रणजित्--अपने शत्रुओंको पराजित करनेके लिए। विश्वजित्-क्या तुम्हें स्वयं भगवान्को अपना शत्रु बनाते हुए डर नहीं लगता। रणजित्--हमारी यह विजय उन्हींकी विजय है जो उत्तरकूटके रक्षक देवता है । इसलिए उन्होने स्वत. अपने दिये हुए उपहार- को हमारे लाभके लिए वापिस लेना स्वीकार किया है । वे प्रभु तृपाके त्रिशूलसे शिवतराईका हृदय छेदकर उसे उत्तरकूटके सिंहासनुके तले ला पटकेंगे। विजित्-यदि यह ठीक है तो तुम्हारी पूजा पूजा नहीं किन्तु उत प्रभुको मेहनताना देनेके समान है।
नाटका . रणजित्-चाचा, आप परकीयों ( शत्रुओं ) के पक्षपाती हैं और स्वत अपने आत्मीयोंके विरोधी है । यह आपकी ही शिक्षाका फल है कि अभिजित् उत्तरकूट राज्यके प्रति अपने उन कर्तव्योंको पूरा करनेमें--जो भविष्यमें उसे करने होंगे-अब तक असमर्थ रहा विश्वजित्-मेरी शिक्षाके द्वारा ? क्या एक समय मै तुम्हारे ही दलमें न था ? जब तुम्हारे कार्योंसे पत्तनमें उपद्रव खड़ा हुआ तब क्या प्रजाका सर्वनाश करके मैंने ही उसे नहीं दवाया था ! उसके बाद मेरे हृदयमें बालक अभिजित्ने स्थान ग्रहण किया। वह एक प्रकाशकी लपटके रूपमें प्रकट हुआ। तब उन्हीं मनुष्योंको-जिन्हें मैंने अन्धकारके कारण न देख सकनेसे चोट पहुँचाई थी- अपने आत्मीयोंके समान देखा। चमनी सम्राहक चिह्न देख कर जिसे तुमने अपना राजकुमार बनाया, उसे अब तुम उत्तरकूटके सिंहासनकी सीमाओंके भीतर ही कैद कर रखना चाहते हो ? रणजित्-जान पडता है कि आपहीने उस पर गुप्त रहस्य प्रकट किया ओर आपने ही उसे बतलाया वह मुक्तधारा झरनेके पास पड़ा पाया गया था। विश्वजित्-हाँ, मैने ही यह भेद खोला । टस दिन मेरे महल्में उसका दीरालीका निमंत्रण था । गोधूलि के समय मैने देखा कि वह झरोखेमें अकेला खड़ा हुआ गौरीकी चोटीकी ओर ताक रहा है। मैने पूछा--" क्या देख रहे हो " उसने कहा- "मैं भविष्यके मार्गोको-जा पर्वतके दुर्गम रास्तोंमें अभी तक नहीं बने है -देख रहा था । वे मार्ग दूरको समीप कर देंगे।" जन मैंने उसकी बात सुनी तो अपने मनमें मोच लिया कि कोई शक्ति इस बालक- मुक्तवारा। बोल उठा . को बन्दी नहीं बना सकेगी जिसे एक वनवासिनी माताने-उस मुक्तधाराके झरनेके पास जिसका कि स्रोत अदृश्यमें है-जन्म दिया है । मुझसे रहा नहीं गया, वत्स, जब तुम्हारा जन्म उस मार्गके पास हुआ था तब उस नम्र पर्वतने अपनी गोदमें लेकर तुम्हारी अभ्यर्थना की थी। तुमने जन्मके समयका घरका 'स्वागत सगीत' नहीं सुना था।" रणजित्--ठीक, अब मै सब कुछ समझ गया। विश्वजित्-क्या समझे। रणजित्-अभिजित्ने जबसे तुम्हारे द्वारा यह सराद सुना है तभीसे उसका प्रेम हमारे राजक्शसे हट गया है। इस वैमनस्यको प्रकट करनेके लिए ही उसने पहला काम यह किया कि नन्दी घाटीके प्राकारको तोडकर नन्दी घाटीका मार्ग खोल दिया। विश्वजित्---तो इसमें हानि ही क्या हुई ? वह खुला मार्ग उत्तर- कूट और शिनतराई दोनोंके लिए एक सा है। रणजित्-~-चाचा, आप मेरे घरके हैं, गुरुजन है, इसी लिए मैं अबतक धैर्य धारण कर रहा हूँ। परन्तु अब नहीं सह सकता। आप मेरे राज्यको छोड़ कर चड़े जाइए। विश्वजित्--मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकता, पर यदि तुम मुझे छोड़ते हो तो मै सहन करूँगा। (प्रस्थान। ।) [अम्बाका प्रवेश।] अम्बा-(राजासे) अजी तुम कौन हो ? सूर्य अस्त होनेवाला है, परन्तु मेरा मुमन तो अबतक नहीं लौटा। रणजित्-तुम कौन हो?
नाटका अम्बा मैं कोई नहीं। वह जो मेरा सर्वस्व था, इसी मार्गमें मुझ- से छीन लिया गया। क्या इस मार्गका कहीं अन्त नहीं है ? क्या मेरा सुमन गौरीपर्वतके शिखरके उस पार लगातार पश्चिमकी ओर ही चलता जायगा, जहाँ सूर्य डूब रहा है, प्रकाश डूब रहा है और प्रत्येक वस्तु डूब रही है। रणजित्-(मन्त्रीसे ) ऐसा प्रतीत होता है कि मन्त्री—हाँ महाराज, यह बात उस बाँधके बनानेसे ही सम्ब- न्ध रखती है। रणजित्- ( अम्बासे ) तुम खेद मत करो । मैं जानता हूँ कि पृथिवीमें जो सबकी अपेक्षा चरम दान है, उसे आज तुम्हारे पुत्र- ने पा लिया है। अम्बा -यदि ऐसा होता तो वह उस दानको सायङ्कालके समय मेरे पास अवश्य लाता । क्योंकि मैं उसकी माता हूँ। रणजित्-वह लायेगा । अभी तो वह सायकाल आया ही नहीं है। अम्बा -ईश्वर करे कि तुम्हारा वचन सत्य हो । मैं मन्दिरको जानेवाले इस मार्ग पर उसकी प्रतीक्षा करूँगी । बेटा सुमन ! (जाती है।) [पास ही एक साइकी छायामें कुछ विद्यार्थियोंके साथ उत्तरकूट-- के एक अध्यापकका प्रवेश ।] अध्यापक-परे ! अब मैं समझा कि इन दुष्ट लड़कोंको अच्छी तरह वेतोसे ठीक करना चाहिए । लड़को, खून जोरसे बोलो--'जय राजराजेश्वरकी।" विद्यार्थीगण -जय राजरा-- 1 ।
मुक्तधारा। अध्यापक -(पास सदे हुए एक दो लड़कोंको चपत मारकर)-जेवर! विद्यार्थीगण-जेश्वर ! अध्यापक-श्री श्री श्री श्री श्री,- विद्यार्थीगण-श्री श्री श्री- अध्यापक-- (धक्का मारकर ) पाँच वार । विद्यार्थीगण-पॉच वार । अध्यापक-अरे अभागे बन्दरो, बोलो श्री श्री श्री श्री श्री विद्यार्थीगण-श्री श्री श्री श्री श्री अध्यापक-उत्तरकूटाधिपतिकी जय- विद्यार्थीगण-उत्तरकूटा- अध्यापक-धिपतिकी- विद्यार्थीगण--धिपतिकी- अध्यापक-जय। विद्यार्थीगण---जय। रणजित्-तुम कहाँ जाते हो ? अध्यापक-आज महाराज राजकीय इजीनियरको विशेष सम्मान वितरण करेंगे । मैं उसी हर्पोत्सवमें भाग लेनेके लिए अपने विद्या- थियोंको ले जा रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरे विद्यार्थी उत्तरकूटके किसी गौरवपूर्ण उत्सवमें भाग लेनेसे वञ्चित न रहें और छुटपनसे ही,अपने देशका गौरव करना सीखे। - -- रणजित-क्या ये लड़के जानते है कि विभूतिने क्या किया है।
नाटक।
विद्यार्थीगण-( ताली पाते और कूदते हुए) हाँ, हाँ, हम जानते
हैं कि शिवतराईकी प्रजाके पीनेका पानी रोक दिया है।
रणजित्-उसने पानी क्यों रोक दिया है।
विद्यार्थीगण-उन्हें तग करनेके लिए।
रणजित्-क्यों।
विद्यार्थीगण-कारण कि वे बुरे हैं ।
रणजित्-क्यों बुरे है।
विद्यार्थीगण-ओह, रे बहुत ही बुरे हैं, बहुत ही खरान हैं, यह
सभी जानते हैं।
रणजित्—क्या तुम यह नहीं जानते कि ने क्यों बुरे हैं ।
अध्यापक-हाँ महाराज, ये अपश्य जानते हैं। (विद्यार्थियोंसे )
तुम्हें क्या हो गया ? कूदमगज लड़को, क्या तुम्हें नहीं याद रहा ?
देखो तुम्हारी पुस्तकोंमें-अरे तुम्हारी पुस्तकोंमें-( धीमी पाषाजसे )
उनका धर्म गन्दा है।
विद्यार्थीगण -हो, हाँ, उनका धर्म बहुत ही गन्दा है ।
अध्यापक-और वे हमारे समान नहीं हैं । लड़को । जवाब दो,
क्या तुम भूल गये। ( नाककी ओर संकेत करता है।)
लड़के-हॉ, उनकी नाक ऊँची नहीं होती।
अध्यापक-ठीक, तुम उस सिद्धातको जानते हो जिसे हमारे
गणाचार्य (प्रोफेसर ) ने सिद्ध कर दिया है । अच्छा बोलो तो ऊची
नाक क्या बतलाती है।
विद्यार्थीगण-जातिकी उच्चता।
-
,
२०
मुकधारा।
अध्यापक-ठीक, बहुत ठीक | और उच्च जातियोंका काम.
क्या है ? वे क्या करती हैं ? बोलो, बोलो। वे सारे संसार पर-हाँ
कहो, सारे ससार पर विजय प्राप्त करती हैं। क्यों न ?
विद्यार्थीगण-हॉ, वे सारे ससारको जीतती है ।
अध्यापक-क्या उत्तरकूटका आज तक कभी किसी युद्धमें
एक बार भी पराजय हुआ है ?
विद्यार्थीगण-नहीं।
अध्यापक-तुम सबको पता है कि हमारे महाराजके दादा
महाराजा प्राजित्ने केवल २९३ सिपाही लेकर दक्षिणी बर्बरोंके
३१,७५० सिपाही भगा दिये थे क्यों सच है न ?
विद्यार्थीगण-जी हॉ, बिल्कुल सच है।
अध्यापक-महाराज, निश्चय रखिए कि एक दिन इन्हीं लडकों-
को देख कर वे सब लोग कॉपेंगे, जिन्हें हमारे देशकी सीमासे
बाहर जन्म लेनेका दुर्भाग्य प्राप्त हुआ है । यदि ऐसा न हो तो मैं
सच्चा अध्यापक न समझा जाऊँ। मै उस उत्तरदायित्वको,
अध्यापकों पर है, एक क्षणके लिए भी नहीं भूलता हूँ। हम मनुष्यों-
को बनाते हैं, आपके राजनीतिज्ञ अमात्य तो केवल उनका उपयोग
करते है । तथापि महाराज, आप जरा हमारे वेतनसे उनके वेतनकी
तुलना कर देखिए।
मन्त्री--परन्तु आपके लिए सबसे बड़े पारितोषिकस्वरूप ये
विद्यार्थी तो हैं।
अध्यापक-ठीक, आप विल्कुल ठीक कहते हैं, मन्त्री महाराज ।
सचमुच ये हमारे लिए सबसे बढ़ कर पारितोषिक है, परन्तु आज कल
.
जो हम
नाटका । भोजनसामग्री बहुत मॅहगी हो गई है। उदाहरणके लिए गौके धीका भार, जो एक समय- मन्त्री~-इस चिपयमें अधिक कहनेकी आवश्यकता नहीं है । मैं गौके घीके भारकी समस्या पर विचार करूँगा । अब तुम जा सकते हो । पूजाका समय हो गया है। (अध्यापक अपने छात्रोंसे जयध्वनि कराता हुआ जाता है।) रणजित्-तुम्हारे इस अध्यापककी खोपड़ीमें गायके घीके सिवाय और कोई घी नहीं है। मन्त्री-पञ्चगव्यमेंसे एक तो कुछ ( गोबर । ) है ही । तथापि महाराज, ऐसे लोग बड़े कामके होते हैं। उस पाठको जो इन्हें सिखा दिया जाता है, ये बराबर ज्योंका त्यों दोहराने रहते हैं । यदि इनमें अधिक बुद्धि होती, तो ये 'कल'के समान काम न कर सकते । रणजित्-मन्त्री, आकाशमें वह क्या है ? मन्त्री-क्या आप इसे भूल गये। यह विभूतिके उस यन्त्रका ही शिखर तो है। रणजित्--मैंने इसे ऐसा स्पष्ट कभी नहीं देखा जैसा कि यह आज दीख रहा है । मन्त्री [-आज आँधीके कारण बादल उड गये हैं, इसलिए इतना स्पष्ट दीखता है। रणजित्-देखो न, इसके पीछे सूर्य मानों क्रोघसे लाल हो रहा है, और यह यन्त्र एक देत्यकी उद्यत मुट्ठीके समान प्रतीत होता है। इसको इतना ऊँचा उठाना उचित न था। - २२ मुक्तधारा। । मन्त्री-ऐसा जान पड़ता है कि अन्तरीक्षके हृदयमें किसीने शूल घुसेड़ दिया है। रणजित्-चलो, मन्दिर जानेका समय हो गया है। (दोनों जाते है।) [ उत्तरकूट के नागरिकोंका दूसरा दल प्रवेश करता है। प्रथम नागरिक-देखो न, आज कल विभूति हमसे कितना बचच- कर चलता है । वह इस बातको बिल्कुल उड़ा देना चाहता है कि वह हमारे साथ साथ पलकर मनुष्य बना है। एक दिन उसे पता चल जायगा कि तलवारका म्यानसे बढ जाना अच्छा नहीं होता। द्वितीय नागरिक-तुम कुछ भी कहो, पर यह अवश्य है कि उसने उत्तरकूटके गौरवको ऊँचा किया है। प्र० नागरिक-मूर्खताकी बातें न करो | तुम उसे बहुत बढ़ा रहे हो । वह बॉध--जिसमें उसने अपनी सारी बुद्धि लड़ा दी है- कमसे कम दस बार टूट चुका है। तृ. नागरिक-और यह कौन जानता है कि वह फिर न टूटेगा ! प्र० नागरिक-क्या तुमने बाँधके उत्तरकी औरका वह टीला देखा है। द्वि० नागरिक-सो उसके विषयमें क्या बात है। म. नागरिक-क्या तुम नहीं जानते ? जिसने वह देखा है वही कहता है कि- द्वि० नागरिक-क्या कहता है ? बता दो न भैया ! प्र० नागरिक-ओहो, तुम बड़े भोले हो न, इसी लिए पूछ रहे हो। एक छोरसे दूसरे छोरतक यह बात--और क्या कहूँ। A नाटका २३ द्वि० नागरिकतो भी वात क्या है, जरा समझा कर कह दो न । प्र० नागरिक-~-भाई रजन, तूने तो बस हद कर दी। जरा सा भी सत्र नहीं किया जाता। यह बात स्वय स्पष्ट हो जायगी जब कि एकाएक बिल्कुल-( सकेत के साथ चुप हो जाता है । ) द्वि० नागरिक-उफ ! कहते क्या हो भाई ? एकाएक बिल्कुल ? प्र० नागरिक-हॉ, इस बातको तुम झगडूसे सुन लेना ! वह स्वय नाप जोखकर देख आया है ! द्वि० नागरिक-झगईमें यह सबसे अच्छी बात है कि उसका मस्तक ठण्डा है । जन सब लोग ' बाह्माही ' में उलझ जाते हैं तब वह अपना गज निकालकर ( मापनेके लिए ) वैठ जाता है । तृ० नागरिक—कुछ लोग कहते हैं कि विभूतिका सारा ज्ञान- प्र० नागरिक-हॉ, हॉ, मैं स्वय जानता हूँ कि वेंकट वमसि छीना हुआ है । वह था सच्चा गुणी पुरुप । ओह ! उसका कितना विशाल मस्तिष्क था! कैसी अपूर्व मस्तिष्क शक्ति थी। फिर भी सारा इनाम विभूति ही पारहा है और उस बेचारेको पूरा भोजन भी नसीब न हुआ ---भैंसों ही मर गया ! १० नागरिक-क्या केरल भोजन न मिलनेसे ही ! प्र० नागरिक-अरे भाई भोजन न मिलनेसे भूखों मर गया अथवा किसीके हाथका दिया हुआ साते खाते मर गया, इससे तुम्हें क्या मतलब है । हम जो कुछ बात कर रहे हैं कहीं कोई मुन लेगा तो- इस देशमें अगणित चुगलखोर फैले हुए हैं । यहाँके निवासी दूसरों- की भलाई नहीं सह सकते । द्वि० नागरिक-तुम कुछ भी कहो परन्तु वह-- ,
मुक्तधारा।
प्र० नागरिक-इसमें आश्चर्यकी क्या बात है ? जरा सोचो तो कि
उसका जन्म किस मिट्टीसे हुआ है ! इसी चौवुआ गाँनमें तुम नहीं
जानते कि मेरे पितामहका जन्म हुआ था--हाँ तुमने उनका नाम
तो सुना है।
द्वि० नागरिक क्यों नहीं ? उत्तरकूटका प्रत्येक मनुष्य जानता है ।
उनका नाम है-हॉ, तुम उन्हें क्या कहकर पुकारते थे ?
प्र० नागरिक-हॉ हॉ, भास्कर ! मारे उत्तरकूटमें हुलास बनाने में कोई
उनकी बराबरी नहीं कर सकता था । इस फनमें वे हीये। उनके
हाथके हुलासके बिना महाराज शत्रुजित् एक दिन भी नहीं रह सकते थे।
तृ० नागरिक-ये सब बातें पीछे होंगी । अब हमें मन्दिरको चलना
चाहिए । हम ठहरे विभूतिके ग्रामके रहनेवाले । हम लोगोंके हाथकी
माला पहले पहनाई जायगी, तब दूसरा कोई काम होगा । और हम ही
तो उसकी दाहिनी ओर वैठेंगे ।
[ नेपथ्यके पीछेसे बटु चिल्लाता है।]
बटु
मत जाओ, वन्धुओ मत जाओ! इसी रास्ते लौट आओ!
द्वि० नागरिक--यह तो वही बूढा बटु
[बटु फटा हुआ कम्बल ओढ़े तथा हाथमें टेदी छड़ी लिये प्रवेश करता है।
प्र० ना०-कहो बटु, किधर जा रहे हो ?
बटु--सारधान भैया, सावधान । इस रास्ते मत जाना । अभी
समय है, लौट जाओ।
द्वि० ना०-क्यों भला ?
चटु-बोल दूं? वहाँ वे बलिदान करेंगे--मनुष्योंका वलिदान
करेंगे। उन्होंने मेरे दो पौत्रोंको जबर्दस्ती पकड़ लिया था जो अबतक
.
है
नहीं लौटे हैं।
नाटका
२५
१
तृ० ना०--बलिदान! किमके आगे बलि चढायगे काका
बटु-उसी तृष्णा डाइनके आगे।
द्वि० ना०-यह तृष्णा डाइन कौन है ?
बटु-वह साफर नहीं अघाती यो ज्यों खाती है क्यों त्यों
उसकी भूख बढती जाती है । उसकी सूखी जीभ घृतरिक्त अग्निाशि-
खाकी नाई निरन्तर बढती जाती है।
प्र० ना. -अरे पागल ! हम तो जा रहे हैं भैरवके मन्दिरको, वहाँ
तृष्णा डाइन कहाँसे आई .
बटु-क्या तुमने समाचार नहीं सुना
आज वे लोग भैरवको
सिंहासनसे उतार कर उनकी जगह डाइन तृष्णाको पिठायेंगे।
द्वि० ना०-पागल, अपनी जीभ संभाल ! उत्तरकूटके मनुष्य
यदि तुझको इस तरह बोलते सुनेंगे तो तेरी बोटी बोटी काट डालेंगे ।
बटु-ये मेरे ऊपर धूल फेंकते हैं और लड़के मुझे ककड मारते
हैं। सभी लोग कहते हैं कि तेरे पौत्रोंका यह सौभाग्य था कि उनके
जीवनका बलिदान हो गया।
-ठीक ही कहते हैं।
बटु-~-ठीक कहते हैं। यदि प्राणके बदले प्राण न मिले, मृत्युके
बदले केरल मृत्यु ही प्राप्त हो, तो भैरव ऐसा सर्वनाश न होने देंगे।
सावधान भाइयो, सामान ! उस रास्ते मत जाना । ( जाता है ।)
वि० ना---
-देखो भाई, इसके शब्दोंसे मेरे शरीरमें कोटे उठ
आये है
प्रा० ना० रञ्जू, तुम पडे कायर हो । चलो अब हमें चलना
चाहिए । ( सब जाते हैं।
प्र० ना०
।
२६
मुक्तधारा।
[राजकुमार सजयके साथ युवराज अभिजित् का प्रवेश । ]
सन्जय-मैं नहीं समझ सकता कि आप राजमहलको छोड़कर
क्यों जा रहे हैं।
अभिजित्-तुम इसे पूरी तरह नहीं जान सकते । मैं इस बातको
हृदयमें धारण करके ही इस पृथ्वीपर आया हूँ कि मेरे जीवनका स्रोत
राजमहल के पत्थरोंको हटाकर चला जायगा।
सजय-हम लोग जानते है कि आप इधर कुछ दिनोंसे बहुत
अशान्त हो रहे है । ऐसा मालूम पडता है कि वह वधन जो आपको
हमारे साथ जोडे था शनै शनै ढीला हो रहा है। क्या अब वह
सर्वथा टूट गया
अभिजित्-सजय, गौरीकी चोटी पर सूर्यास्तका दृश्य देखो । मानों
कोई अग्निमय पक्षी वादलोंके पख फैलाये हुए रात्रिकी ओर उड़ा जा
रहा है। अस्तकालीन सूर्यने मेरी इस पथयात्राका चित्र आकाशमें
अंकित कर दिया है।
सजय--युवराज, मुझे तो यह दृश्य बिल्कुल भिन्न रूपसे दीखता
है । देखो, यन्त्रका शिखर सूर्यास्त मेघकी छाती फाड़कर खड़ा है ।
मानों उड़ते हुए पक्षीकी छातीमें बाण घुस गया है और वह अपने
पखे लटकाकर रात्रिके गढ़ेमें गिर रहा है । मुझे यह अच्छा नहीं
लगता । अव मारामका समय है । चलो, राजमहल में चलो।
अभिजित- जहाँ पर कोई 'बाधा' हो, वहाँ आराम कैसे मिल
सकता है?
संजय-राजमहलमें आपके लिए कोई बाधा' है । इतने दिनों के
बाद उसे आपने कैसे जाना।
,
नाटका २७ - . अभिजित्---मुझे 'वाधा' का पता तर रगा जब मैने सुना कि उन्होंने 'मुक्तधारा' को बाँध दिया है। सजय—मैं आपके इस कथनका मतलब न समझ सका। अभिजित्-विधाता प्रत्येक मनुष्यके आन्तरिक जीवनका रहस्य बाह्य जगतमें कहीं न कहीं अपश्य लिख रखता है । मेरे जीवनके गुप्तरहस्यका सकेत 'मुक्तधारा' के झरने में है। जब मैंने देखा कि' उसकी गतिको प्रतिरुद्ध करनेके लिए उसके पैरों में लोहकी बेड़ी डाल दी गई, तन एकाएक मैं चौंक पड़ा और मैंने समझ लिया कि यह उत्तरकूटका सिंहासन ही मेरे जीवनके स्वच्छन्द प्रहको रोकनेराला बाँध है । मैं इसीलिए घरसे निकला हूँ कि उसकी गतिको बाधारहित कर हूँ। सजयतो फिर मुझे भी अपने साथ एक सहचरकी तरह रखिए। अभिजित्नहीं भाई, तुम्हें अपना मार्ग स्वय ढूँढना होगा । यदि तुम मेरे पीछे चलोगे, तो मेरे कारण तुम्हारे जीवनका वास्तविक और सच्चा मार्ग छिप जायगा। संजय-आप इतने कठोर मत बनिए, मुझे चोट लगती है। अभिजित्---तुम मेरे हृदयको जानते हो, इस लिए चोट खाकर भी तुम मुझे समझोगे। सजय-मैं यह नहीं पूछना चाहता कि कहाँसे आपके लिए पुकार आई है और उसे सुनकर आप कहाँ जा रहे है। किन्तु युवराज, अब सन्ध्या हो गई है, और राजमहलके मीनारसे वायुमें तैरता हुआ रात्रिके आगमनका गीत सुनाई देने लगा है। क्या इसकी पुकार कोई पुकार नहीं है। ससारमें कठोरका गौरव हो सकता है, किन्तु जो. मधुर है, उसका भी तो कुछ मूल्य है ?
मुकधारा। अभिजित्--भाई, मधुरका मूल्य देनेके लिए ही कठिनकी साधना आवश्यक है। सजय-प्रात काल जिस आसनपर आप पूजाके लिए बैठते हैं, क्या आपको स्मरण है कि उस दिन आप उसके सामने एक श्वेत कमल को देख कर अवाक् हो गये थे ? किसने आपके जागनेसे पहले ही उमे चुपचाप लाकर वहाँ रख दिया था। उसने नहीं जानने दिया था कि वह कौन है । इस छोटीसी घटनामें जो मधुरता और सरलता भरी है, उसे क्या आप भुला सकते हैं ? क्या उस भीरु व्यक्तिकी स्मृति आपके मनमें बार बार नहीं आती जो अपनेको तो छिपा लेता है किन्तु अपनी पूजाको नहीं छिपा सकता ? अभिजित्अवश्य आती है। और उसीके प्रेमके कारण ही तो मैं इस बीभत्सताको सहन नहीं कर सकता जो इस पृथ्वीके मधुर संगीतको रोककर आकाशमें अपने लोहेके दॉत फाड़कर अट्टहास कर रही है । मुझे देवताओंके स्वर्गसे प्रेम है, इसीलिए में उन दैत्योसे लड़नेको तैयार हूँ जो स्वर्गको बिगाड़ना चाहते हैं। सजयगोधूलिका प्रकाश उस नील पहाड़ीके ऊपर मूछित हो रहा है। उसमेंसे जो एक प्रकारका रोदन निकल रहा है, क्या वह आपके हृदय तक नहीं पहुँचता ? अभिजित्-पहुंचता है और इसीलिए मेरा हृदय भी रोदनसे भर रहा है । मैं कठोरताका अभिमान नहीं रखता । देखो, वह छोटासा पक्षी देवदारवृक्षकी सबसे ऊपरकी डालपर बिलकुल अकेला बैठा है। मुझे नहीं मालम कि वह अपने घोंसलेमें चला जायगा अथवा अन्धकार- मेंसे होकर सुदूरवर्ती अरण्यकी यात्रा करेगा । परन्तु वह इस अस्त- - नाटक। २९ कालीन सूर्यको अन्तिम किरणकी ओर चुपचाप देख रहा है और उसका यह देखना मेर हृदयको एक प्रकारके मधुर विपादसे भर देता है। यह पृथिवी कितनी सुन्दर है ! ससारमें जिन जिनने हमारे जीवनको मधुमय किया है उन सबको ही मै आज प्रणाम करता हूँ। [बटुका प्रवेश ।] बटु—उन्होंने मुझे नहीं जाने दिया, मार मारकर लौटा दिया । अभिजित्-बटु, तुम्हें यह क्या हो गया ' तुम्हारे माथेसे तो खून बह रहा है। बटु-मैं उन्हें सावधान करने निकला था । मैंने उनसे कहा था कि "खवरदार, इस रास्ते मत जाना, लौट जाओ!" अभिजित्- क्यों ? क्या हुआ है ? बटु-राजकुमार, क्या तुम्हें पता नहीं है कि आज ये लोग यन्त्र- की वेदीपर तृष्णा राक्षसीका अभिषेक करेगे और उसके आगे मनुष्योंकी बलि चढाई जायगी। सजय--यह तुम क्या कह रहे हो। बटु-वे इस वेदीकी नीव रखते समय मेरे दो पौरोंका ग्वून बहा चुके है । मैंने सोचा था कि यह पापकी वेदी अपने पापके बोझसे ही गिरकर चूर हो जायगी, परन्तु अब तक तो यह हुआ नहीं । भैरव देव अव भी निद्रासे नहीं जागे। अभिजित्-~-वह अपश्य चूर हो जायगी, अब समय आगया है। बटु-( पास आर कानमें कहता ) तो आपने भैरसका माहान अवश्य सुना होगा । अभिनित्-हाँ, मैंने सुना है । .
- ३० मुक्तधारा बटु---सर्वनाश ! तब क्या आपका बचाव नहीं हो सकता अभिजित्-नहीं, नहीं हो सकता । वटु-क्या आप मेरे घाबसे बहते हुए रक्तको नहीं देखते है मेरा सारा शरीर धूल मिट्टीसे गदा हो रहा है । क्या आप सहन कर सकेंगे, जब आपका हृदय विदीर्ण हो जायगा ? अभिजित्--भैरवको कृपासे मैं सह सकूँगा। बटु-जब सब लोग आपके शत्रु हो जायेंगे और स्वतः आपके इष्टजन भी आपको धिक्कारेंगे ? अभिजित्---सहना ही होगा। बटु-तब तो फिर कोई भय नहीं है। अभिजित्-नहीं, कोई भय नहीं है। बटु-वाह वाह । तब तो इस बटुको याद रखना । मैं भी इसी मार्ग पर चल रहा हूँ। आप मुझे इस रक्तके तिलकसै--जिसे स्वत भैरवने मेरे माथे पर लगा दिया है-~-अन्धकारमें भी पहिचान (बटु जाता है।) [राजाके पहारेदार उद्धवका प्रवेश । उद्धव-~( युवराजसै ) श्रीमन् ! आपने नन्दी धाटीका मार्ग क्यों खोल दिया। अभिजित्-शिवतराईके लोगोंको नित्यके दुर्भिक्षोंसे बचाने के लिए। उद्धव-हमारे महाराज दयाल हैं । वे तो उनकी सहायताके लिए सदा तेयार रहते हैं। . -सकेंगे। -- . ग ran "
नाटका
अभिजित्-दायें हाथसे कृपणताके साथ दानका द्वार बन्द करके
बोयें हाथसे वदान्यता दिखाना कोई अर्थ नहीं रखता । इस लिए मैंने
खाद्य सामग्रीके आने जानेका मार्ग खोल दिया है । दयाके ऊपर निर्भर
रहनेवाली दीनताको मैं नहीं देख सकता।
उद्धव-महाराज कहते है कि आपने नन्दी घाटीके प्राकारको तोड़
फर उत्तरकूटके भोजनभाण्डारकी जड़ हिला दी है।
अभिजित्-मैंने उत्तरकूटको शिवतराईके अन्न पर आश्रित रहनेकी
दुर्गतिसे सदाके लिए बचा लिया है ।
उद्धव-यह आपने बड़े दुस्साहसका काम किया है । महाराज तक
यह समाचार पहुँच चुका है, इससे अधिक मैं और कुछ नहीं कह
सकता । यदि बन सके, तो आप इस स्थानको छोड़ दीजिए । मेरे
लिए यह अच्छा न होगा कि मुझे कोई इस मार्गमें आपसे बातें करते
हुए भी देख ले। (जाता है।)
[अम्बाका प्रवेश।]
अम्बासुमन ! मेरे प्यारे ! क्या तुममेसे कोई भी उस मार्गसे
नहीं गया जिससे कि वे मेरे सुमनको ले गये थे?
अभिजित्-वे तुम्हारे पुत्रको ले गये हैं ?
अम्बा–हाँ, उस पश्चिमकी ओर, जहाँ सूर्य डूबता है और दिनका
अन्त हो जाता है।
अभिजित्— मेरी यात्रा भी उसी मार्गको ओर है ।
अम्बा-तो मुझ दुखिनीकी एक बात याद रखना । जब वह तुम्हें
मिले तो उससे कहना कि माँ तेरी प्रतीक्षा कर रही है।
,
३२
मुक्तधारा।
,
अभिजित्-हॉ, मैं कह दूंगा।
अम्बा--तुम चिरञ्जीवी होओ, सुमन, प्यारे सुमन !
(जाती है।)
[ भैरवके पुजारियों का गाते हुए प्रवेश ।)
जय भैरव, जय शकर,
जय जय जय प्रलयङ्कर।
जय सशय छेदन, जय वन्धन-छेदन
जय सकट-संहर,
शकर, शंकर!
(चले जाते हैं।)
[ सेनापति विजयपालका प्रवेश । ]
विजयपाल-युवराज, राजकुमार, मेरे नम्र प्रणामको स्वीकार
करो। मैं राजाके पाससे आया हूँ ।
अभिजित् उनको क्या आज्ञा है ?
विजयपाल--वह आज्ञा मैं एकान्तमें सुनाऊगा।
सजय-(अभिजित्का हाथ दवा कर ) एकान्तमें क्यों ? क्या मुझसे
भी छिपा कर
विजयपाल-मुझे ऐसी ही आज्ञा मिली है। युवराज, मेरी प्रार्थना
है कि आप एक बार राजशिविरमें पदार्पण करें।
सजय-मैं भी उनके साथ चगा।
विजयपाल-~-नहीं, ऐसा करना महाराजकी इच्छाके विरुद्ध है।
सजय-अच्छा, तो मैं इस मार्ग पर ही खड़ा रह कर प्रतीक्षा
करूंगा।
(अगिजितको लेकर विजयपाल शिविरकी और जाते है।)
नाटका
३
[वैरागीका प्रवेश।]
गान
वह तो अब फिर फिरि है ना रे,
फिरि है ना रे, फिरि है नारे।
परी नाव ऑर्धाके मुखमें-
फेर किनारे भिरि है नारे।
कौन यावरेने धरि टेन्यो,
रोदन पाछे तजि, मुख फेन्यो,
अव वह तेरे बाहुपासते-
घिरि है ना रे, पिरि है ना रे!
[फूलवालीका प्रवेश
फूलपाली-क्यों भैया, उत्तरकूटका रहनेवाला यह विभूति कौन है ?
सजय-क्यों, तुम उसे क्यों ढूंढती हो ?
फूलपाली–मैं विदेशी हूँ और देवतलीसे आई हूँ । सुना है,
उत्तरकूटके सभी लोग उसकै मार्गमें फूल बखेरते हैं । अवश्य ही वह
कोई सन्त होगा । ये फूल में स्वत अपनी वाटिकासे उसे भेट करने
लाई हूँ और उसका दर्शन करना चाहती हू।
सजय--वह सन्त तो नहीं, किन्तु एक चतुर मनुष्य अवश्य है ।
फूलपाली-मला, उसने ऐसा कौनसा काम किया है।
सजय--उसने हमारे शरनेको वाघ दिया है।
फूलवाली क्या यह सत्र पूजा इसीलिए है। क्या झरनेको
बोधनेसे ईश्वरका कोई प्रयोजन सिद्ध होगा।
सजय-नहीं, ईश्वरके हाथों में हथकड़ी पड़ जायगी ।
मुना ३
३४ - , मुकधारा। फूलवाली-क्या इसीलिए उसके मार्गमें पुष्पवृष्टि होती है । कुछ समझमें नहीं आता। सजय-इसको न समझने में ही भलाई है। देवयोग्य फूलोंको एक अपात्र के लिए बरबाद मत करो, लौट जाओ ! जरा ठहरो, क्या तुम वह सफेद कमल मुझे वेचोगी ? फूलवाली-मै इस फूलको-जिसे अपने मनमें एक सन्तको अर्पण करनेका सकल्प करके लाई हूँ-बेच नहीं सकती। सजय-मैं जिस संतकी सबसे अधिक भक्ति करता हूँ उसको ही यह भेट दूंगा। फूलवाली-तो इसे ले सकते हो। नहीं, मैं इसका मूल्य न लेंगी। सन्त बाबाको मेरा प्रणाम कहना, और कहना कि मैं देवत- लीकी दुखिया मालिन हूँ। (जाती है।) [ विजयपालका प्रवेश । सजय-~-युवराज कहाँ हैं ? विजयपाल-वे शिविरमें कैद हैं। सजय-युवराज कैद कर लिये गये ! इतनी बड़ी धृष्टता ! विजयपालदेखिए, महाराजका यह आदेश पत्र है। सजय-यह पड्यन्त्र किसने रचा है ! मुझे एकबार उसके पास जाने दो। विजयपाल-क्षमा कीजिए, आप नहीं जा सकते । मंजय--अच्छा तो मुझे भी कैद कर लो। मैं विद्रोही हूँ।
नाटक। ३५ विजयपाल—नहीं, मुझे ऐसी आज्ञा नहीं है। सजय-अच्छा तो मैं स्वय चलकर उनसे आज्ञा ले लूंगा। ( कुछ चलकर फिर लौट आता है ) हॉ विजयपाल, युवराजको यह श्वेत कमल मेरी ओरसे भेट कर देना। (दोनों जाते हैं।) [शिवतराईके वैरागी धनजयका प्रवेश 1-] गाता है- हम मारके सागरको तरि हैं, चले चाहे जिती विपरीत वयार। भयजर्जर या निज नावहिसों, हम पाय हैं, पाय है, पाय है पार ॥ करि'मामः'शब्द भरोसो भलो, फटे पालसों आपनी छाती फुलाय । तुम्हरे यहि तीरसों जै हे तरी, वटवृक्ष तिहारेकी छायहि छाय ॥ पथदर्सक है है हमारो सोई- जोई चाहत है है हमें मनमाहि। हम निर्भय चित्तसो छो. तरी, करतन्य अह इतनों हम काहि ॥ दिन पूरो भयो हम जानि गये, अब फैस हुँ पायके सागर-कूल । तुम्हरे करनापदमें दुरा द्यामको- आनि चढाइ हं रक्तिम फूल ॥ [शिवतराईके लोगोंका एक दल आता है।) धनंजय--अरे तुम्हारा मुँह तो बिल्कुट सफेद पड गया है। कहो . क्या बात है! *इस नाटकका पान धनजय और उसके कपोपकथनका यहुतसा अंश रवीन्द्र वायूने अपने 'प्रायश्चित्त' नामक नाटकसे-जो लगभग १५ वर्ष पहलेका लिसा हुआ है-लिया है।
0-
,
मुक्तधारा।
पहला नागरिक-बाबाजी, अब हमसे राजाके साले चण्डपालकी मार
नहीं सही जाती । वह हमारे युवराजको भी कुछ नहीं समझता । यह
और भी असह्य है।
धनजय--अरे तुम अभी तक 'मार' को भी नहीं जीत सके । अब
भी 'मार'से दुख होता है ?
दूसरा ना० -राजाकी डेवढी पर ले जाकर मार! यह क्या साधा.
रण अपमान है !
धनजय----तुम अपने मानको अपने पास मत रखो। उसे, तुम्हारे
भीतर जो भगवान् विराजमान हैं, उन्हींके चरणोंके समीप रख
दो । ऐसा करनेसे अपमान वहाँतक न पहुँच सकेगा।
[गणेश सारका प्रवेश।]
गणेश-अब नहीं सहा जाता। हाथोंमें खुजली आ रही हैं । अब
बिना मारे नहीं रहा जाता।
धनजय -तब यह क्यों नहीं कहते कि तुम्हारे हाथ ही 'बेहाथ' हो
गये है ?
गणेश-बाबाजी, एक वार आज्ञा दो, तो मैं इस चण्डपालके डडेको
छीन कर बतला दूं कि 'मार' किसे कहते हैं ?
धनजयः पर क्या तुम यह नहीं बतला सकते कि 'न मारना'
किसे कहते हैं । इसके लिए ज्यादा ताकत चाहिए, क्यों न ? लहरों
पर डाड़ मारनेसे लहरें नहीं रुक सकती, परन्तु पतवार स्थिर कर रखनेसे
लहरों पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
-तो फिर आप क्या चाहते हैं।
-
.
चौथा ना
नाटका- ३७ . . - धनजय-इस 'मार' की जडमें ही कुल्हाड़ी मार दो । गणेश -भला यह कैसे हो सकता है वागाजी ? धनजय----सिर ऊँचा करके ज्यों ही यह कह सकोगे कि हमें 'मार' की चोट नहीं लगती, त्यों ही 'मार'की सकल टूट जायगी। गणेश--यह कहना तो कठिन है कि चोट नहीं लगती। धनजय-जो वास्तविक मनुष्य है उसके चोट नहीं लगती, क्योंकि वह प्रकाशकी शिखाके तुल्य है । चोट लगती है जानवरको, क्योंकि वह मासपिण्ड है। वह मार खाकर चिल्ला उठला है । मुंह फाडे क्यों खडे हो ? मेरी बात नहीं समझे। दू० नागरिक-हम तो आपको समझते हैं। आपकी बातको भले ही न समझें। धनजय-इसीसे तो नाश हुआ है। गणेश—आपकी बात समझनेमें रिलम्ब लगता है और वह सहा नहीं जाता। आपको समझ लिया है, इसीसे हम बहुत जल्दी- सबरे सधेरे-पार हो जायेंगे। धनजय-परन्तु इसके बाद जब दिन ढल जायगा तब देखोगे कि नार किनारेके बिल्कुल पास पहुँचकर डूब गई है । जो बात पकी है, उसको भीतरसे पक्की करनी चाहिए। यदि इसको नहीं समझोगे तो डूब जाओगे। गणेश-बानाजी, ऐसा मत करो। जब तुम्हारे चरणोंका आश्रय पा लिया है तर चाहे जैसे हो हमने तुम्हें सम जरूर लिया है। -यह समझनेमें अब कुछ वाकी नहीं रहा है कि तुम नहीं धनजय-
मुकधारा।
समझे हो । देखो तुमारे नेत्र लाल हो रहे हैं और ( क्रोधके कारण)
तुम्हारा सुर सगीतहीन हो रहा है । अच्छा तुम्हें एक तान सुनाऊँ
2
गीत ।
प्रभो और हू, तनिक और है,
याहि भाँतिते मारो मारो।
अरे कायरो ! तुम चोटसे बचनेके लिए या तो दूसरोंको चोट
पहुँचाते हो या भाग जाते हो । परन्तु ये दोनों ही प्रकार समान रूपसे
कायरताके हैं । इन दोनोंहीसे पशुपति ( ईश्वर ) का साक्षात्कार नहीं
होता।
-
गीत।
लुके छिपे हम इत उत वावत,
भयवस तुम्हरे निकट न आवत,
जो
फछु हे सो सयहि निकारो।
याहि भॉतिते मारो मारो।
देखो बच्चो, मैं मृत्युजय (मृत्युके जोतनेवाले भैरव) के साथ बातचीत
करनेके लिए जा रहा है और उससे कहना चाहता हूँ कि "तुम स्वय
अच्छी तरह जॉच करके देख लो कि चोट मुझे लगती है या नहीं।
ऐसी अवस्था में मै उन लोगोंका बोझा सिरपर रखकर नहीं चल सकूँगा
जो स्वय डरते हैं या दूसरोंको डराते है ।
गीत।
अयकी चार यही निरधारो-करनो होय सोई कर डारो,
हारे हमाहिं कि तुम ही हारो! याहि भातित मारो । मारो!
हाटबाटके हेलमेलमै, समय गयो सब हँसी मेलमें,
कैसे हमें रुवाय सकत हौ, देसहि तो, हाँ, बार तिहारो!
याहि भांति मारो मारो।
नाटक।
सव-धन्य है बाबाजी ! ऐसा ही है ।
कैसे हमें रुवाय सकत हौ, देसाह तो, हाँ, वार तिहारो।
याहि भाँतित माये। मारो!
दू० नागरिक-किन्तु आप जा कहाँ रहे हैं ?
धनजय-राजाके उत्सवमे ।
ती० नाo-बाबा, राजाके लिए जो उत्सर है कौन कह सकता
है कि आपके लिए वह क्या बन जायगा ? वहाँ आप किस लिए
जाते हैं।
धनजय-राजसभामें अपना नाम अमर कर आऊँगा।
चौथा ना०-राजाने यदि आपको हाथमें कर पाया तो नहीं
नहीं, यह नहीं होगा।
धनजय--अरे बच्चो, होगा क्यों नहीं? खूब होगा, जी भरकर
होगा।
पहला ना० -बाबाजी, तुम तो राजाको नहीं डरते, किन्तु हमें
डर लगता है।
धनजय-तुम लोग मन ही मन मारना चाहते हो, इसी लिए
डरते हो। परन्तु में मारना नहीं चाहता, इस लिए डरता भी नहीं हूँ।
जिसके हृदयमें हिंसा रहती है, भय उसके पीछे लगा रहता है ।
दूसरा ना०-अच्छा तो हम भी आपके साथ चलेंगे।
तीसरा ना०-और राजाके दरबार में शामिल होंगे।
धनंजय-राजासे तुम लोग क्या माँगोगे ?
मुक्तधारा। तीसरा नाo-माँगनेको तो बहुतसा है, परन्तु जब वह कुछ देगा तब न2 धनजय-तुम उसका राज्य ही क्यों न मग लो। तीसरा ना० बाबा, आप तो हसी करते हैं। वनजय-हॅसी क्यों करूँगा ? एक पैरसे चलना बडा ही दुःखप्रद है। यदि राज्य केरल राजाका ही हो, उस पर प्रजाका कोई स्वत्व न हो, तो ऐसे एक पैरके राज्यका छलॉगें भर कर चलना देखकर तुम तो केवल चौंक ही पडोगे, किन्तु देवताओंकी ऑखोंसे ऑसू बहने लगेंगे। अरे बच्चो, तुम्हें और किसीके लिए नहीं तो राजाकी ही भलाईके लिए, राज्य पर अपना दाना पेश करना चाहिए। दूसरा ना०. -और जब वहाँ धक्के पडेंगे तब ? धनजय- यदि तुम्हारे स्वत्वके दानेमें कुछ सचाई होगी तो राजाका दिया हुआ धक्का स्वत उसीके ऊपर लौट जायगा । गीत । ( राग हमीर) हम भूल जात हैं फेरि फेरि। तुम निज आसनपै चहत विठावन, नाम हमारी टेरिटेरि॥ बच्चो, क्या तुम्हें यथार्थ रहस्य सम्झाऊँ ? जब तक इम सिंहास- नको उस प्रभुका नहीं समझोगे तब तक सिंहासनपर किसीका दावा राजाका भी नहीं और प्रजाफा भी नहीं । वह छाती तानकर ऐंठके साथ बैठनेकी जगह नहीं है, उसपर तो हाथ जोड़कर बैठना चाहिए। नहीं चल सकता, नाटक। गीत। । म द्वारपाल हमको नहिं चीन्हत, मग वाधा देत। वाहर ठाढ़े है हम, भीतर, काहे टेरि न लेत? हम भूल जात हे फेरि फेरि ॥ द्वारपाल क्या हमें जानबूझकर नहीं पहिचानता ? हमारे मस्तकोक राजचिवपर धूल जम गई है । जन हम अपने भीतरी विकारोंपर शासन नहीं कर सकते, तर बाहरका राज्यशासन कैसे करेंगे । राजा होनेसे राजासनपर बैठा जा सकता है, पर बैठनेसे ही कोई राजा नहीं हो सकता। अपने प्रान समरपित कीन्हें, मानसहित तुर हाथ । रहिये पै हू रहि न सफत वह, मान, मानके साथ- भय, लाज और लोभादिक दिन-दिन, म्लान करत तेहि घेरि धेरि । हूँपि जात धूरिके दूरनसों, पद-दालित होत घट येरि वेरि॥ हम भूल जात है फेरि फेरि । पहला नागरिक-आप कुछ भी कहें, पर हमारी समझमें नहीं आता कि आप राजाके दरबार में क्यों जाते हैं ! धनजय-~-बताऊँ कि क्यों ? मेरे मनमें तुम्हारे विषयमें बहुत बड़ा सन्देह हो गया है। पहला ना० -सो क्या धनजय-~-तुम लोग मुझे जितना ही पकडकर चिपटते हो, उतना ही अपना सीखा हुआ तैरना भूल जाते हो आर तन मेरा भी पार होना कठिन हो जाता है । इसी लिए तुमसे छुट्टी चाहता हूँ और वहाँ जाता हूँ जहाँ कोई मेरे पीछे न जा सके। पहला ना०-परन्तु राजा तो आपको सहजमें छोड़ देनेवाला नहीं है। . AA भाजन
४२
मुकधारा।
धनजय-~छोड़ेगा क्यों । यदि वह हमको वॉध सका, तो फिर
और चिन्ता ही क्या रही।
गीत।
मुझको पकड वाँध लेना ही वस, जिनका साधन होगा
वह क्या ऐसे ही होगा?
मेरे पास बंधेगा आकर, वह मेरा बन्धन होगा
यह क्या ऐसे ही होगा?
कौन भरोसा रखता मुझको, लानेका अपने घसमें ?
वह क्या ऐसे ही होगा?
अपनेको क्यों करैन बस वह, सत्वर इव प्रेम रसमें
वह क्या ऐसे ही होगा।
चाहेगा जो मुझे रुलाना, रोनेका भाजन होगा
वह क्या ऐसे ही होगा?
दूसरा नागरिक-किन्तु बाबा, यदि तुम्हारे शरीरपर उन्होंने अपना
हाथ उठाया तो यह हमसे न सहा जायगा ।
धनजय---मैंने अपना यह शरीर जिसके चरणोंपर निछावर कर
दिया है, यदि वह सह लेगा तो तुम भी सह लोगे ।
पहला ना०-~-अच्छा ऐसा ही सही । तो चलिए बाबाजी, वहाँ क्या
होता है सो सुन आवें और सुना आरें। इसके बाद जो कुछ भाग्यमें
होगा सो देखा जायगा।
धनजय-तो तुम लोग यहीं बैठो और मेरी प्रतीक्षा करो । इस
जगह कभी आया नहीं हूँ, जरा आसपासके रास्ता-घाटोंसे कुछ परि-
चित हो आऊँ। ( प्रस्थान । )
पहला नागरिक-देखते हो भाई, इन उत्तरकूटके मनुष्योंका चेहरा
कैसा है । ऐसा मालूम होता है कि मानों विधाताने एक मॉसका लोथड़ा
,
नाटका ४३ , - लेकर गढ़ना शुरू किया हो, और पीछे उसे पूरा करनेकी फुरसत न मिल पाई हो। दूसरा ना० और देखते हो कि उनका कपड़े पहिरनेका ढग कैसा है। तीसरा ना०-आपको बडलकी तरह ऐसा मजबूतीसे कस लेते हैं कि जिसमें कहींसे कुछ गिर न जाय । पहला ना०-वे मजूरी करने के लिए ही जन्मे है। सात घाटका पानी पीने और सत्रह हाट घूमनेमें ही उनकी जिन्दगी पूरी हो जाती है दूसरा ना०-उन्हें अच्छी शिक्षा नहीं मिलती। और उनके शास्त्र देखो, उनमें भी कुछ नहीं है। पहला ना० -कुछ भी नहीं । देखते नहीं हो, उनके अक्षर टीम- कके कीड़ों जैसे होते हैं। दूसरा ना०-~-ठीक कहते हो । दीमक जैसे ही होते हैं। उनकी विद्या जहाँ लगी कि खाकर वरनाद कर दिया । तीसरा-और यहाँ मिट्टीका ढेर खड़ा कर दिया। दूसरा-वे अपने अत्रोंसे दूसरोके प्राण ओर शास्त्रोंसे मन नष्ट कर देते हैं। पहा-पाप ! घोर पाप ! हमारे गुरुजी कहते हैं कि उनकी छायासे भी बचना चाहिए ! जानते हो क्या ? तीसरा--तुम्ही बताओ न? दूसरा ना०-क्या तुम नहीं जानते ! जन देवता और राक्षस मुक्तधारा। समुद्रसे अमृतका मन्थन कर चुके तब अमृतके कुछ बूंद देवता- ओंके प्यालोंसे छलक कर मिट्टी पर गिर गये । उसी मिट्टीसे शिवतराई- वालोंके पूर्व पुरुपका निर्माण हुआ । और जब राक्षसोंने देवोंके खाली 'प्यालोंको चाट चाट कर नानदानमें फेंक दिया, तब उन टुकड़ोंसे उत्तर- कूटके प्रथम पुरुपको बनाया । यही कारण है कि वे इतने कठोर और थू-इतने अपवित्र होते हैं । तीसरा ना. -ये सब बातें तुमने कहाँसे पाई ? दूसरा ना०---स्वत गुरुजीने ही कही थीं। तीसरा ना०—(श्रद्धासहित गुरुके उद्देश्यसे प्रणाम करके) धन्य गुरुजी! तुम सच्चाईके रूप हो। [ उत्तरकूटके नागरिकोंके समूहका प्रवेश । ] पहला ना०- -आजके उत्सवमें और तो सब कुछ ठीक हुआ, परन्तु उस लुहारके लड़के विभूतिको राजाने एकदम क्षत्रिय बना दिया, -यह कुछ--- दूसरा ना०-अजी, यह अपने घरका झगड़ा है। जब वह लौटकर अपने गॉर जायगा, तब देख सुन लेंगे। इस समय तो हमें। पुकारना चाहिए.--" यन्त्रराज विभूतिकी जय ! तीसरा ना०—जिसने क्षत्रियके मन्त्र और वैश्यके यन्त्रका मिलाप कर दिया, उस यन्त्रराज विभूतिकी जय ! पहला ना० -ओ । हो ! यहाँ तो कुछ शिवतराईके भी मनुष्य " आये हैं। दूसरा नायह तुमने कैसे जाना ?
नाटका
४५
अद्भुत
,
तीसरा ना०
.
पहला ना०-क्या तुम उनके कनटोपे नहीं देखते ? देखो तो वे
कैसे जेचते है ! ऐसा मालूम होता है कि मानों किमीने ऊपरसे
थप्पड़ मार कर उनकी बाढ ही रोक दी हो !
दूसरा ना०-ओर क्यों जी, इतने देश है उन सबमेंसे केवल
इसी देशके लोग क्यों यह कानोंको ढक देनेपाली टोपी पहिनते
हैं ? क्या ये सोचते हैं कि कान बनाना विधाताकी भूल हे ?
पहला ना० -उन्होंने अपने कानों पर एक बोध बाँध दिया है,
जिससे कि थोड़ी बहुत अक्ल जो उनके अन्दर है यह भी कहीं निकल
न जाय! (सबके सब हँसते हैं।
-नहीं, यह इसलिए है कि कहीं कोई समझकी बात
उनके अन्दर न घुस जाय ! ( हास्य।)
पहला ना०~कहीं कोई उत्तरकूटका कान खींचनेवाला भूत
उनका पीछा न करने लगे ! (हमता है।) अरे शिवतराराईके गॅवारो,
तुम कर क्या रहे हो ? चुपचाप क्यो खडे हो ?
तीसरा ना०-
-तुम नहीं जानते कि आज हमारा बड़ा दिन
है। आओ और हमारे साथ पुकारो-" यन्त्रराज विभूतिकी जय ।"
पहला ना० -फिर भी चुप हो ! क्या तुम्हारे गले वद हो गये
हैं ! पुकारो । जान पड़ता है कि गर्दन दबाये बिना आवाज नहीं
निकलेगी। बोलो--"यत्रराज विभूतिकी जय"
गणेश-क्यों जी, विभूतिकी जय क्यों बोलें ? उसने किया क्या है।
पहला ना०- देखो तो यह क्या कहता है-"उसने क्या किया है।
अभतिक विभूतिके अद्भुत कार्यकी खबर भी इन तक नहीं पहुँची।
देसा, यह कान ढेकनेवाली टोपीका ही प्रताप है !
मुक्तधारा। समुद्रसे अमृतका मन्थन कर चुके तब अमृतके कुछ बूंद देवता- ओंके प्यालोंसे छलक कर मिट्टी पर गिर गये । उसी मिट्टीसे शिवतराई- वालोंके पूर्व पुरुषका निर्माण हुआ । और जब राक्षसोंने देवोंके खाली प्यालोंको चाट चाट कर नावदानमें फेंक दिया, तब उन टुकडोंसे उत्तर- कूटके प्रथम पुरुषको बनाया । यही कारण है कि वे इतने कठोर और थू-इतने अपवित्र होते हैं तीसरा ना० -ये सब बातें तुमने कहॉसे पाई ? सरा ना०----स्वत गुरुजीने ही कही थीं। तीसरा ना०-(श्रद्धासहित गुरुके उद्देश्यसे प्रणाम करके) धन्य गुरुजी! तुम सच्चाईके रूप हो। [ उत्तरकूट के नागरिकोंके समूहका प्रवेश।] पहला ना० -आजके उत्सवमें और तो सब कुछ ठीक हुआ, परन्तु उस लुहारके लडके विभूतिको राजाने एकदम क्षत्रिय बना दिया, यह कुछ- दूसरा ना०--अजी, यह अपने घरका झगड़ा है। जब वह लौटकर तब देख मुन लेंगे। समय तो हमें। पुकारना चाहिए-" यन्त्रराज विभूतिकी जय !" तीसरा ना०-~-जिसने क्षत्रियके मन्त्र और वैश्यक यन्त्रका मिलाप कर दिया, उस यन्त्रराज विभूतिकी जय ! पहला ना० -ओ। हो ! यहाँ तो कुछ शिवतराईके भी मनुष्य आये हैं। दूसरा ना०-यह तुमने कैसे जाना ? अपने गॉर जायगा,
नाटक।
४७
गणेश -इन सब फिजूल बातोंको रहने दो । एक दिन तुम
कहोगे कि यह लुहारका लड़का इस टिड्डके डैनों पर सवारी करके
चाँद पकडने जायगा!
पहला उ० कू० ना०-यह इनके कनटोपेकी खूबी है। सुनकर
भी नहीं सुनना चाहते और इसीसे मरते हैं ।
पहला शि० ना०--हमने प्रतिज्ञा की है कि मरकर भी न मरेंगे !
तीसरा उ० कू० ना०--प्रतिज्ञा बहुत अच्छी की है, पर यह तो
कहो कि तुम्हें बचारेगा कोन ?
गणेश -क्या तुमने हमारे देवताको नहीं देखा है ? हमारे धनजय
वैरागी प्रत्यक्ष देवता हैं। उनका एक शरीर मन्दिरमें और दूसरा बाहर
तीसरा उ० ०० ना०—कनटोपे लगाये हुए इन आदमियोंकी
मूर्खता तो देखो । इन्हें मरनेसे कोई नहीं बचा सकता।
(उत्तरकूट के नागरिक बाहर जाते है।)
[ धनजयका प्रवेश
धनजय-मूर्यो ! तुम क्या कह रहे थे? क्या तुम्हें मौतसे वचा-
नेका भार मेरे ऊपर है ? तर तो तुम अपनेको सात वार मरा समझो।
गणेश-उत्तरकूटके लोग हमसे धमकाकर कह गये हैं कि विभूतिने
बाँध बाँधकर मुक्तधाराका पानी रोक दिया है।
धनजय-~बाँध बाँध दिया, ऐसा कहा है ?
गणेश–हाँ, बागा।
वनंजय-उनकी सब बात सुन ली हे न ?
गणेश-वह क्या सुननेकी बात थी हमने तो हैंसफर उड़ा दी।
मुकधारा।
तीसरा ना०---तुम पूछते हो कि उसने क्या किया है । जानते नहीं
कि तुम्हारी प्यास बुझानेवाला पानी उसीके हाथमें है ? यदि वह
दया न करे तो तुम उसी तरह सूखकर मर जाओगे जिस तरह सूखा
पड़नेपर मेंढक मर जाते हैं।
दूसरा शि० नाo-हमारा पानी विभूतिके हायमें है ? क्या वह
एकदम ईश्वर हो गया ?
दूसरा उ० कू० ना०-उसने ईश्वरको उसके कामसे छुट्टी दे दी
है। अब वह ईश्वरका काम स्वय करेगा।
पहला शि० ना०-क्या उसके कामका कोई नमूना दिखा
सकते हो?
पहला उ० ०० ना०-हॉ, 'मुक्तधारा' का वह बॉध मौजूद है।
( शिवतराईके सारे नागरिक जोरसे हँसते हैं । )
दूसरा उ० ०० ना०---क्या तुम इसे मजाक समझते हो ?
गणेश-मजाक नहीं तो और क्या है ? वह बेचारा मुक्तधाराको
बॉध देगा ? जिसे साक्षात् भैरवने अपने हाथसे दिया है, उसे वह
तुम्हारा लहारका लड़का छीन लेगा?
पहला उ० ०० ना०-अरे ! अपनी आँखोंसे ही क्यों नहीं
देख लेते ? वह आकाशमें क्या दिखलाई देता है ?
दूसरा शि० ना
अरे बापरे ! यह क्या है ?
तीसरा शि ० ना ०-- यह तो लोहेका एक बडा भारी ड्डिा
सा जान पड़ता है, मानो आकाशमें छलाग मारने जारहा है!
दूसरा उ० ०० ना०---- वह टिड्डा अपनी टाँगसे तुम्हारे पानी-
को रोक देगा।
नाटका ४ ९ [राजा रणजित्का मन्त्रीसहित प्रवेश ।] रणजित्-किसे नहीं मानते हो? सब-( राजासे) महाराजकी जय हो! गणेश- हम आपके पास एक प्रार्थना लेकर आये हैं। रणजित्-क्या ? सव-हम युनराजको चाहते हैं। रणजित्-कहते क्या हो । पहला शि० ना०-~हो, हम उन्हें शिवतराइ वापिस ले जायेंगे। रणजित्—और तब आनन्दमें मस्त होकर कर (टैक्स ) देना भूल जाओगे। सब-हम तो निना अन्नके भूखों मर रहे है । रणजित्-तुम्हारा सरदार कहाँ है ? दूसरा शि० ना०-( गणेशकी ओर सकेत करके ) यही तो हमारे गणेश सरदार हैं। रणजित्-नहीं, यह नहीं, तुम्हारा वह वैरागी कहाँ है ? गणेश-वे आरहे हैं। [धनजयका प्रवेश ।] रणनित्---तुमने इस समस्त प्रजाको पागल बना दिया है ? धनजय-हॉ महाराज, और स्वय भी पागल हो गया है। गीत- गलियों गलियों हमें घुमाता पागल कर, पागल वह कौन ? मोहन सुरसे, किस समीरमें, बजा रहा है फ्या, यह फोन ? -- I
४८
मुक्तधारा।
धनजय-क्या तुम सबने अपने कान अकेले मेरे ही जिम्मे कर
दिये हैं ? तुम सबके सुननेकी बात भी मुझे ही सुनना होगी?
तीसरा शि० ना०---उसमें सुननेकी बात ही क्या थी!
धनजयः
-क्या किसी
दुरन्त शक्तिको, चाहे वह अन्दरकी हो
या बाहरकी, नियन्त्रित कर लेना कोई छोटी बात है ?
गणेश-पर इसीसे क्या वे हमारी प्यास बुझानेवाले पानीको रोक
देंगे।
धनजय---यह दूसरी बात है । भैरव इसे कभी न होने देंगे। तुम
लोग ठहरो, मैं जाता हूँ और इस विषयमें पता लगाकर आता हूँ। यह
जगत् वाणीमय है। उसकी जिस दिशासे सुनना बन्द किया जायगा,
उस दिशासे ही मृत्युका वाण आकर हमारे ऊपर पड़ेगा।
[शिवतराईसे आये हुए एक अन्य नागरिकका प्रवेश ।
तीसरा शि० ना० कहो विशन, क्या समाचार है ?
विशन-राजाने राजकुमारको शिरतराईसे वापिस बुला लिया है।
अब उन्हें वहाँ न रुखा जायगा।
सब-ऐसा नहीं होगा, किसी तरह नहीं होगा।
पिशन--क्यों नहीं होगा ? तुम क्या करोगे?
सब-हम उन्हें वापिस ले आयेंगे।
विशन-कैसे
अपनी शक्तिसे।
विशन—राजाके आगे तुम्हारी कैसे चलेगी?
सब-हम राजाको नहीं मानते।
2
a
-
नाटक। धनजय-जो दुख कपालमें था उसे हमने छातीपर विठा लिया है और दुखोंके ऊपर रहनेवाला उसी स्थान पर निवास करता है। रणजित्-(प्रजाके प्रति हम तुम लोगोंको आज्ञा देते हैं कि तुम शिवतराईको लोट जाओ और वैरागी, तुम यहीं रहो। सब-जब तक हम लोगोंके शरीरमें प्राण हैं, तब तक यह नहीं , हो सकता । . धनजय---( गाता है-) 'रह' कहकर किसको रक्खोगे? आशा कब होगी स्वीकार? रहनेवालेको होगी क्या-- सींचातानीकी दरकार? राजासाहन, आप खींचकर कुछ भी नहीं रख सकेंगे। जव आपमें रख- नेकी सहज शक्ति होगी तभी यह रखना वन सकेगा। रणजित्---इसका मतलब क्या हुआ ? धनजय-जो सब कुछ देता है वही सब कुछ रख सकता है। जिसे लोभ करके रखना चाहोगे वह होगा चोरीका माल, और चोरीका माल हजम नहीं हो सकता। जो चाहो कर डालो, दैहिक वलसे फर दो मार । होगा जिनके हृदय-चीच उस पीडामा सचार- वे ही असहनीय सह लेंगे, सुन्दर सहनशीलता यार। राजा, तुम यह सोचने में भूल कर रहे हो कि जगतको छीन लेनेने ही, जगत् तुम्हारा हो गया । वास्तरमें वह मुक्त कर देनेसे ही पाया जाता
५०
1
मुक्तधारा।
गई, गई रे। सारी चला।
पागलकी यह फैसी सेला!
आकुल करता है पुकार कर,
नहीं पकड़में आता है।
वन वन उसे खोजते, रोते,
फिस अग्निसे जलाता है।
रणजित्-इस तरहके पागलपनसे तुम असली बातको नहीं दबा
सकोगे | बोलो, कर दोगे या नहीं ?
धनजय-नहीं महाराज, न देंगे ।
रणजित्न दोगे । इतनी बड़ी हिमाकत ?
धनजय-जो चीज आपकी नहीं है, वह आपको नहीं दी जा
सकती।
रणजित्-हमारी नहीं है?
धनजय-जो हमारे खानेसे वचता है, उसी अन्न पर आपका अधिकार
है, हमारे भूखके अन्नको आप नहीं ले सकते ।
रणजित्---क्या तुम ही हमारी प्रजाको कर देनेसे रोकते हो।
धनजय -हाँ। वे लोग तो भयके मारे दे देना चाहते हैं, परन्तु मैं
उन्हें रोक देता हूँ कि अपने प्राण उसीको दो जिसने तुम्हें प्राण दिये हैं।
रणजित्-तुम्हारे भरोसे या ढाढसने ही उन लोगोंके भयको दवा
रक्खा है, परन्तु याद रक्खो कि बाहरका यह भरोसा यदि कहींसे
जरासा भी फट गया, तो भीतरका भय सात गुने जोरसे भड़क उठेगा।
उस समय ये बुरी तरह मरेंगे । देखो वैरागी, तुम्हारे कपालमें दुख है।
-
नाटका धनजय -तव तो मेरी हार हुई समझो। लो, अब मुझे इससे अलग हट जाना पड़ा। सब लोग क्यों बावाजी ? धनजय-मुझे पाकर अपने आपको खो दोगे ? और क्या मुझमें इतनी शक्ति है कि तुम्हारी इतनी बड़ी हानिकी मिटा सकूँ ? मुझे इससे बड़ी लज्जा हुई। पहला ना०बाबाजी, यह आप क्या कहते हैं ? अच्छा, अन आप जो कहेंगे हम वही करेंगे • धनजय-तो मुझे छोड़कर चले जाओ। दूसरा ना०-चले जाकर क्या करेंगे? आप हम लोगोंको छोड़कर रह सकेंगे हम लोगोंपर आपका प्रेम नहीं है ? धनजय- -इसकी अपेक्षा कि तुम्हें प्रेम किया जाय और उससे तुम्हारा गला घोट दिया जाय यह कहीं अधिक अच्छा है कि तुम्हारे साथ प्रेम किया जाय और तुम्हें स्वाधीन बनाया जाय । जाओ, कुछ कहनेकी आवश्यकता नहीं। चले जाओ। दिना०—अच्छा, बानाजी, हम लोग चले, किन्तु- धनजय-'किन्तु ' नहीं, अपना सिर ऊंचा रक्खो और बिल्कुल निष्किन्तु होकर जाओ! सब-बहुत अच्छा, तो हम जाते हैं। (धीरे धीरे जाते है।) धनजय-क्या इसीका नाम जाना है ? जल्दी जाओ ! जल्दी! गणेश-जाते हैं, किन्तु हमारी सारी शक्ति और बुद्धि रह जायगी, यहीं पड़ी दुई। (जाते हैं।) - मुक्तधारा। 4 है । यदि तुम उसे अपनी मुहीमें दबा कर रखना चाहोगे तो देखोगे कि वह तुम्हारे हाथसे निकल गया है। यही सोचते हो, होंगे सब मनचाहे व्यवहार । जैसा नाच नाचाओगे तुम, नाचेगा ससार। सहसा आँख सोल देखोगे- अघटित घटनाका व्यापार। रणजित्---मन्त्री, वैरागीको पकड़ लो। मत्री-महाराज-(चुप हो जाता है।) रणजित्-क्या यह मेरी आज्ञा तुम्हें पसन्द नहीं है । मंत्री-शासनका भीषण यत्र तो तैयार हो गया है, उसके ऊपर यदि आप भय और चढ़ाने जायेंगे तो वह सब टूट फूट कर नष्ट हो जायगा। प्रजाजन--यह हमसे नहीं सहा जायगा । धनजय-(प्रजासे ) मैं कहता हूँ कि तुम जाओ, लौट जाओ! प्रथम शिवरातराईका ना०--बाबाजी, क्या आपने नहीं सुना कि हम युवराजको भी खो चुके हैं। द्वितीय ना०--ऐसी दशामें किसके द्वारा हमारे मनको जोर मिलेगा। धनजय--मेर जोरसे ही क्या तुम लोगोंमें जोर है ? यदि ऐसा कहोगे तो तुम मुझे बिल्कुल कमजोर बना दोगे। गणेश--यह बात कह कर छलना मत कीजिए। हम सब लोगोंका जोर एक आपके ही आश्रित है। आपके ही जोरसे हम जोर- 1 नाटका , मार्ग दिखा कर चला सकता-मेरे द्वारा रोक दिया गये हे मै उन्हा केवल बाह्य शक्तिसे प्रेरित करता हूँ। रणजित्-जब वे राजाका कर देनेके लिए आते है, तर तो तुम उन्हें रोक देते हो, परन्तु जब वे ईश्वरकी भेट तुम्हारे पैरों पर चढ़ा देते हैं तर तुम्हें बुरा नहीं मालूम होता धनंजय-उस समय मुझे सचमुच बहुत ही दुख होता है । मनमें आता है कि पृथ्वी में समा जाऊ ! चे अपनी सारी पूजा मुझपर ही समाप्त कर देते हैं और उनका मन एक प्रकारसे दिवालिया बन जाता है। उनके इस ऋणका उत्तरदायित्व मुझ पर ही पड़ेगा, मे उससे बच नहीं सकता। रणजित्-तो अब तुम्हारा क्या कर्तव्य है ? धनजय-उनसे अलग रहना और यदि यह सत्य है कि मैंने उनकी मानसिक स्वतन्त्रतामें एक बॉध डाल दिया है तो मुझे डर है कि भगवान् भैरव मुझे और तुम्हारे विभूतिको एक साथ हो दण्ड देंगे। रणजित्-तो फिर देर क्या है ? क्यों नहीं अलग हो जाते ? धनजय--मेरे अलग होते ही रे एकदम तुम्हारे चण्डपालकी गर्दन- पर जाकर चढ़ बैठेगे और तर जो दण्ड मुझे मिलना चाहिए यह पढ़ेगा उसकी खोपड़ीपर । अतएव मै अलग नहीं हो सकता। रणजित्-यदि तुम स्वय अलग नहीं हो सकते तो हम ही अलग किये देते हैं। अच्छा उद्धर, वैरागीको इसी समय शिविरमें फैट कर दो। चनजय---(गाता है) हमें तुम्हारी सॉकलका भय, व्याकुल नहीं करेगा। मर्म तुम्हारी किसी मारके मारे नदीं मरेगा।
N
.
५४
मुक्तधारा।
रणजित्--वैरागी, क्या सोचने लगे? चुप क्यों हो रहे हो ?
धनजय-राजन्, उन लोगोंने मुझे चिन्तित कर दिया है ।
रणजित्-किस लिए।
धनजय तुम अपने चण्डपालके डण्डेसे भी जो नहीं करा सके
ये, देखता हूँ कि मैं वही कर बैठा हूँ। इतने दिनोसे समझ रक्खा
था कि मैं उन लोगोंकी शक्ति और बुद्धि बढा रहा हूँ, पर आज वे
मेरे ही मुंहपर कह गये कि मैंने ही उनकी शक्ति बुद्धि छीन ली है।
रणजित्-तुम ऐसा क्यों सोचते है?
धनजय---मैं समझा था कि मैंने उनके विश्वासों और आशा
ओंको परिपुष्ट किया है, पर आज उन्होंने कठोरतापूर्वक मेरे देखते हुए
सिद्ध कर दिया है कि स्वत मै ही उनकी आशा और निसासके लुट
जानेका कारण है।
रणजित्-भला ऐसा हुआ क्यों ?
धनजय-मैंने जितना ही उन्हें उत्तेजित किया उनकी बुद्धिको
उतना ही कम परिपक होने दिया। जिन मनुष्यों पर कर्ज बहुत हो
गया है, उन्हें केवल दौड़ा देनेसे तो वह कर्ज अदा हो न जायगा !
वे मुझे विधातासे भी वडा समझते हैं और सोचते है कि मैं उन्हें
उस ऋणसे मुक्त कर सकता हूँ जो उन्हें ईश्वरको चुकाना है और
इस लिए वे अपनी ऑखें बन्द कर लेते हैं और अपनी सारी शक्तिसे
मेरे साथ चिपटे हुए हैं।
रणजित्-उन्होंने तुम्हें अपना ईश्वर समझ लिया है ।
धनजय-और इसी लिए वे मुझ तक ही आकर रुक जाता हैं,
अपने सचे ईश्वर तक नहीं पहुंच सकते । यह प्रभु-जो उन्हें अन्दरसे
नाटका ५७ उद्धव-यह क्या बात है ? राजा युरराजको बिना देखे ही चले गये। मन्त्री-उन्हें डर था कि कहीं वे अपने दृढ़ निश्चयसे विचलित न हो जावें । वे वैरागीसे इतनी देरतक अपने मनमें इसी द्विविधाको लिये ही बातचीत करते थे। वे शिपिरके भीतर भी न जा सकते थे और शिपिरको छोड़कर जानेके लिए भी उनके पैर न उठते थे। अब चल, युवराजको देख आऊँ। (जाते हैं। ) [दो स्त्रियों का प्रवेश । पहली-क्यों मौसी, वे सबके सब इस तरह क्यों कोधित हो रहे हैं। क्यों कहते है कि युवराजने अन्याय किया है ? यह न तो मेरी समझमें ही आता है और न मैं इसे सह ही सकती हूँ। दूसरी-उत्तरकूटकी लड़की होकर भी तेरी समझमें नहीं आता है । उन्होंने नन्दी घाटीका रास्ता खोल दिया है । पहली-यदि मैं नहीं जानती हैं तो इसमें अपराध क्या हुआ ? पर इस बात पर तो मुझे किसी भी तरह विश्वास नहीं होता कि युवराजने बुरा किया है। दूसरी-तु अभी लड़की है, बहुत दुख पा चुकेगी तन एक दिन समझेगी कि जो बाहरसे बहुत अच्छा मालूम होता है उसीपर ज्यादा सन्देह किया जाता है। पहली-परन्तु युवराज पर तुम्हें क्या सन्देह है ? दूसरी-सभी लोग कहते हैं कि शिरतराईके लोगोंको वशमें करके अब वे उत्तरकूटके सिंहासनको जीतना चाहते हैं और यह उन्हें सह्य नहीं है। 2
मुक्तधारा।
मुक्तिपत्र उनके हाथोंका, लिखा हुआ वह खास ।
रहता है मनमध्य हमारे, यही, प्राणके पास ॥
नहीं तुम्हारा कोई बन्धन, हमको बाँध धरेगा।।
जिस पथसे हम आते जाते उसका पता निशान ।
कहो, तुम्हारे प्रहरी क्या कुछ कभी सकेंगे जान ?
पहुँच गये हम उनके द्वारे।
टोक सकेगा भला कौन फिर हमको द्वार तुम्हारे ?
नही डरेगा प्राण, तुम्हारे डरसे, नहीं डरेगा ।।
( धनजयको लेकर उद्धव जाता है।)
रणजित्-~-मत्री, अभिजित्को बन्दीगृहमें जाकर देख आओ, यदि
वह अपने किये हुए कार्यके लिए अनुतप्त हो तो-
मत्री -महाराज, यह उचित नहीं है। आपको स्वय ही जाकर---
रणजित्-नहीं नहीं, उसने अपने देशवासियोंके प्रति, राज्यके प्रति
विश्वासघात किया है। जब तक कि वह अपना अपराध स्वीकार न
करे मैं उसका मुंह भी न देखूगा। मैं राजधानीको वापिस जाता है, वहाँ
मुझे समाचार भेजना । (प्रस्थान ।)
पुजारियोंका प्रवेश।
गीत--
तिमिर-हडिदारण,
ज्वलदग्नि-निदारुण,
मरु-श्मसान-सचर।
शकर, शकर!
वज्रघोपवाणी,
रुद्रशूलपाणी,
मृत्युसिन्धु-सतर,
शकर, शकर!
,
नाटक। । वे उसके अपराधका न्याय नहीं कर सकेंगे, उलटे हम लोगों पर ही नाराज होंगे। प्र० नागरिक-इसकी कोई परवाह नहीं । हमें जो कुछ कहना है साफ साफ कहेंगे, फल कुछ भी हो । तृ० ना०----इधर तो युवराजने हम लोगोंपर इतना प्रेम दिग्व- लाया, ऐसी आशायें दिलाई कि आकाशका चाँद ही हमारे लिए ला देंगे और उधर भीतर ही भीतर उनकी यह कीर्ति देखनेको मिली ! एका- एक उनके निकट शिवतराई उत्तरक्टसे भी बड़ी हो उठी। द्वि० नाoयदि यह भी हो सकता है तो फिर ससारमें धर्म रहा ही कहाँ ? तुम्हीं कहो भैया! ४० ना० -किसी मनुष्य पर उसकी बाह्य आकृतिसे ही विश्वास न कर लेना चाहिए। प्रथम नागरिक-यदि राजा उसे दण्ड न देगा, तो हम लोग देंगे। द्वि० नागरिक-क्या करोगे? प्र० ना०-उसे यहाँ जगह नहीं मिउ सकती। उसे उसी रास्तेसे निकल जाना चाहिए जो उसने नन्दी घाटी पर खोला है ! १० नाo-~-परतु अभी उस चौबुआ गॉवके आदमीने कहा है कि वह इस समय शिवतराईमें नहीं है और न राजमहलमें ही उसका कोई पता है। - म० नाo-~-तब तो निश्चय उसे राजाने कहीं छुपा दिया है । ०.ना०-छिपा दिया है । हम दीवालोंको तोड़ डालेंगे और उसे बाहर निकाल लावेंगे। प्र० नागरिक हम राजमहलमें आग लगा देंगे।
मुक्तधारा। पहली-उन्हें भला सिंहासनकी क्या जरूरत है ! उन्होंने तो सबके ही हृदय जीत लिये है । जो लोग निन्दा करते हे उनका तो विश्वास किया जाय और स्वय युपराजका नहीं ? दूसरी--चुप रह । कलकी छोकरी, तेरे मुँह से ये सब बातें अच्छी नहीं लगती। सारे देशके लोग जिमे बुरा कहते है, तू एकाएक उसकी- पहली–मै सारे देशके लोगोंके सामने खडे होकर यह बात कह सकती हैं कि- दूसरी-चुप, चुप रह । पहली-चुप क्यों रहूँ ? मेरी आँखें फटकर उनमेंसे जल बाहर निकलना चाहता है । इस वातको प्रकाशित करनेके लिए कि मैं युन- राज पर सबसे अधिक विश्वास करती हूँ मुझसे जो कुछ बन सकता है कर डालनेकी इच्छा होती है। आज मैं भैरवके निकट अपने इन लम्बे वालोंको चढानेकी मानता मानूंगी-कहूंगी-“बागा, तुम वतला दो कि युवराजकी ही जीत है और जो निन्दक है वे सब झूठे हैं" दूसरी-अरी, चुप चुप । कहींसे कोई सुन लेगा। देखती है, यह छोकरी किसी विपत्तिमे फंसाये विना न रहेगी। (दोनों जाती हैं।) [ उत्तरकूटके नागरिकोंका प्रवेश ।] प्र० नागरिक हमें अपनी बात पर दृढ़ रहना चाहिए । चलो, राजाके पास चलें। द्वि० ना०-इससे क्या लान १ युपराज राजाके हृदयका हार है।
नाटका
६१
,
ती० ना.
दू० ना०-नहीं, यह बिल्कुल दूसरी बात है।
तीनाo-~-पर यदि हम कानून तोडें ही तो-
मत्री-यह तो पैरों तलेकी भूमि पसन्द न आनेके कारण शून्यमें
कूद पड़ना हुआ। परन्तु मैं कहे रखता हूँ कि तुम्हें वह भी पसन्द
न आयगा । किसी व्यवस्थाको तब तोडना चाहिए जब उसके स्थानमें
कोई नई व्यवस्था खडी कर ली गई हो।
-अच्छा तो जेलखाने नहीं जायेंगे। राजमहलको जायेंगे
ओर उसके सामने खड़े होकर महाराजका 'जय-जयकार' करेंगे।
प्र० ना०-उधर देखो ! सूर्यास्त हो गया है, आकाशमें अधेरा
होता जाता है, परन्तु विभूतिके यन्त्रकी चोटी अब भी चमक रही
है। ऐसा मालूम पडता है कि मानों वह धूपकी शराब पी पीकर नशे-
से लाल हो रहा है।
दू० ना-और अस्त होते हुए सूर्यके प्रकाशने मानों डूब जानेके
भपसे भेरव-मदिरके त्रिशूलको पकड रक्खा है | देखो, कैसा दिखलाई
देता है ! (उत्तरकूटके नागरिक चले जाते हैं।)
मन्त्री --अब मैं समझा कि राजाने युवराजको क्यों अपने शिविर में
वन्दी किया है।
उद्धव-क्यों किया है ?
मन्त्री युवराजके लोगोंके हाथोंसे बचानेके लिए । परन्तु अवस्था
निगडती जाती है। उत्तेजना प्रतिक्षण भयानक रूप धारण कर
रही है।
मुकधारा
[मन्त्री और उद्धवका प्रवेश []
प्र० नागरिक-(मन्त्रीसे) तुम हमसे लुका-चोरीका खेल तो नहीं
खेलना चाहते ? राजकुमारको बाहर लाओ।
मन्त्री-अरे भैया, म उसे वाहर लानेवाला कौन हूँ।
द्वि० ना०--यह तुम्हारी ही सम्मतिसे हुआ होगा, परन्तु हम
कहे देते हैं कि यह नहीं हो सकता। हम उसे खींचकर बाहर निकाल
.
लावेंगे।
-
-
मन्त्री--तो इस राज्यकी बागडोर अपने हाथमें ले लो और उसे
राजाके कारागारमेंसे निकाल लाओ।
तृ० ना०---राजाके कारागारमेंसे ?
मन्त्री-हॉ, राजाने ही उन्हें कैद कर रक्खा हैं।
सव-महाराजकी जय, उत्तरकूटकी जय !
दू० नागरिक-चलो, हम लोग कारागार चलें और वहाँ-
मन्त्री--वहाँ जाकर क्या करोगे ?
दू० ना०- हम विभूतिकी फेंकी हुई मालाके फूल निकाल कर
उसके तागेको युवराजके गले में डाल आयेंगे।
ती० ना०—गलेमें क्यों, हाथमें । बाँध वाघनेके सम्मानका जो
उच्छिष्ट (गंठन ) है, उसीकी रस्सी मार्ग खोल देनेवालेके हाथमें
पड़ेगी।
मन्त्री-तुम कहते हो कि युवराज अपराधी है, क्यों कि उसने मार्ग
खाल दिया है, परन्तु क्या इसमें अपराध नहीं है कि तुम राज्यके
कानूनोंको तोड़ना चाहते हो।
नाटक।
भीतरसे एक हैं। हमारे युवराजका प्रकाश-आज जहाँ वे नहीं हैं वहीं-
तुम्हारे द्वारा हो।
संजय-मत्रीजी, ये शब्द आपके अपने नहीं मालूम पड़ते। ये तो
युगराजके जैसे लगते हैं।
मत्री-हाँ, उनके शब्द इस नगहके वायुमण्डलमें भरे हुए हैं।
हम उपयोग उन्हींका करते हैं, किन्तु यह भूल जाते हैं कि ये शब्द
उनके हैं।
सजय--आपने मुझे यह स्मरण दिला कर बडा उपकार किया । मैं
उनसे अलग रहते हुए ही उनकी सेवा करूँगा । अब मैं महाराजके
पास जाता हूँ।
मन्त्री-क्यों
सजय-मै उनसे कहूंगा कि मुझे शिवतराईका शासन-भार सौंप
दीजिए।
मत्री-
-परन्तु समय बड़ा टेढा है।
सजय- और इस लिए यही सबसे उत्तम अवसर है।
(प्रस्थान ।)
[ राजाके चाचा विश्वजितका प्रवेश ।
विश्वजित्-कौन है ? क्या उद्धव है ?
उद्धा-हो, महाराज !
विश्वजित्-मैं अँधेरा होनेकी प्रतीक्षा कर रहा था। क्या तुम्हें
मेरा पर मिल गया ?
उद्धर--हाँ।
।
मुक्तधारा। " [सजयका प्रवेश । ] सजय-मैंने महाराजसे अधिक आग्रह करनेका साहस नहीं किया, क्यों कि ऐसा करनेसे उनका सकल्प और भी दृढ हो जाता। मन्त्री राजकुमार, आप शान्त रहिए । पेचीदगियोंको अधिक न बढाइए। वे पहले ही बहुत हैं। सजय-विद्रोह खडा करके मैं भी कैद होना चाहता हूँ। मन्त्री-इसकी अपेक्षा तो यह अच्छा होगा कि आप मुक्त रहकर वन्धन तोड़ने का प्रयत्न करें। सजय-मैं इसी मतलबसे ही प्रजाके निकट गया था । मैं सोच- ता था कि लोग युवराजको अपने प्राणोंसे भी अधिक चाहते हैं और वे उनका बन्दी होना सहन न कर सकेंगे। परन्तु मैंने जाकर देखा कि ज्यों ही उन्हें नन्दी घाटीके खुल जानेके समाचार मिले त्यों, ही वे क्रोधके मारे आगबबूला हो गये हैं। मन्त्री-तब आप समझ सकते है कि युवराजकी रक्षा बंदी होकर रहनेमें ही है। सजय---मैं सदैव बचपनसे ही उनका अनुगामी रहा हूँ, अतएव अब जेलमें भी उनके साथ ही रहूँगा । मन्त्री-इससे क्या लाभ होगा ? सजय--प्रत्येक मनुष्य अपनेमें आधा है। उसकी पूर्णता तव होती है जब कि वह किसी दूसरेसे मिलता है । मैं देखता हूँ कि मेरी पूर्णता युनराजके साथ मिल जाने में है। मन्त्रीपरन्तु जहाँ यथार्थ एकता है वहाँ बाह्य मिलन व्यर्थ है। आकाशके मेघ और समुद्रका पानी परस्पर इतने दूर होनेपर भी 1 नाटका विश्वजित्-क्यों बेटा ? इस समय तुम्हें क्या काम है ? अभिजित्----मुझे अपने जन्म कालका ऋण चुकाना है। शरनेका प्रवाह मेरी धानी (धाय ) है, मै उसका बन्धन तोडूंगा-उसे स्वतन्त्र करूंगा। विश्वजित्--उसके लिए बहुत समय है, आज नहीं। अभिजित्-मैं यह वात तो जानता है कि समय अभी ही आया है, परन्तु यह कोई नहीं जानता कि वह फिर भी आयगा या नहीं। विश्वजित्-हम लोग भी तुम्हारा साथ देंगे। अभिजित्नहीं, यह मेर ही हृदयकी पुकार है जो आपलोगों तक कभी नहीं पहुंची है। विश्वजित्-शिवतराईके लोग-जो तुम्हें प्यार करते हैं---बड़ी उत्सुकतासे तुम्हारे काममें हाथ बँटानेकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्या तुम उन्हें नहीं पुकारोगे? अभिजित्-~यदि यह पुकार उन तक भी पहुंची होती सो ये मेरी प्रतीक्षा कभी न करते। मेरी पुकार उन्हें केरल उल्टे रास्ते ले जायगी। विश्वजित्- वेटा, अब तो अँधेरा हो आया है । अभिजित्-जहाँसे पुकार हुई है उस ओरसे प्रकाश भी आरेगा। विसजित्--मैं तुमको तुम्हारे मार्गसे हटानेकी शक्ति नहीं रखता, यद्यपि तुम अधकारमें कूद रहे हो । मै ईश्वर पर विश्वास रखता हूँ कि वह तुम्हारा मार्गदर्शक होगा। मै तुम्हें उसी प्रभुके हाथोंमें सौपता हूँ। केरल एक आश्वासन-वाक्य सुनकर जाना चाहता हूँ। मुझसे कहो कि हम फिर भी मिलेंगे।
मुक्तधारा। MP - वि० जि०-क्या तुमने मेरी बात मानी ? उद्धव-आपको थोड़े ही समयमें पता लग जायगा परन्तु- विश्वजित्---अपने मनमें सन्देह न करो। महाराज उसे स्वयं छोड़नेको तयार नहीं हैं । परन्तु यदि कोई दूसरा मनुष्य विना महाराजको धताये, किसी उपायसे, उसे स्वतन्त्र कर देगा, तो इस सकटसे वे बच जायेंगे-~-उनकी रक्षा हो जायगी। उद्धव---परन्तु वे उस आदमीको क्षमा न करेंगे जो यह कार्य - करेगा। विश्वजित्---मेर सिपाही तुम्हें और तुम्हारे रक्षकोंको कैद करके ले जावेंगे। उत्तरदायित्व मेरा होगा। नेपथ्यमें---आग, आग। उद्धव----यह लो, हो गया । उन्होंने रसोईके शिविरमें, जो कैदखा- नेके समीप है, आग लगा दी। यही मेरे लिए अवसर है कि मैं धन- जय और युवराजको मुक्त कर दूं। [बाहर जाता है और कुछ ही देर पीछे युवराज अन्दर आते हैं। ] अभिजित्-( विश्वजित्से ) दादाजी ! आप यहाँ कैसे आये ! विश्वजित्-मैं तुम्हें कैद करनेके लिए आया हूँ, मोहनगढ़ चलना . होगा। अभिजित--आज मुझे कोई कैट नहीं कर सकता-न क्रोध, न प्रेम। आप लोग क्या यह सोचते हैं कि मैंने इस शिविरमें आग लग- वाई है ? नहीं, यह आग मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। यह तो किसी न किसी तरह लगता ही । अब मुझे कैदी बनकर रहनेके लिए भर- काश नहीं है नाटका वटु-प्रभो! हमें आशा और विश्वास दीजिए। हम लोग भयभीत हैं । जागो, भैरव भगवान् , जागो । प्रकाश बुझ गया है, मार्गमें अन्धकार है और हमें कोई प्रत्युत्तर सुनाई नहीं देता। हे मृत्युजय, हमारे भयको भय दिखाकर भगा दो ! भैरस जागो, जागो ! [प्रस्थान 1 [ उत्तरकूटके नागरिकोंका प्रवेश ।] प्र० ना०- यह बात झूठ है । वह राजधानीके कारागारमें नहीं है, उन्होंने उसे कहीं छिपा रक्खा है । दू० ना०—हम देखेंगे वे उसे कैसे छिपाये रखते हैं। धनजय-नहीं, वे उसे कहीं भी छिपा कर नहीं रख सकते । दीवा गिर जायगी, फाटक टूट जायेंगे, अन्धेरे कोनोमें प्रकाश घुस आयेगा और प्रत्येक वात प्रकाशित हो पड़ेगी। -अरे यह और कौन है । इसने एकाएक छातीके भीतर- चालेको चौंका दिया। ती० ना०-यह ठीक हुआ। हमें तो कोई शिकार चाहिए। यह वैरागी निल्कुल ठीक रहेगा । इसे बाँध लो। धनजय -जो मनुष्य अपनेको पकड़ा देकर ही वेठा है उसे भला - प्र० ना० कैसे पफदोगे? प्र० ना०-अलग स्खो अपने सन्तपनको, हम यह सब नहीं मानते। धनंजय- - मानना ही तो अच्छा है। प्रभु स्वय हाप पकड़कर तुमसे मनरा रेंगे। तुम लोग भाग्यवान् हो। मै जिन बहुतसे नभागों- को जानता हूँ उन्होंने अपने गुरुको केवल मान मानकर ही खो दिया है।
सकते। मुकधारा अभिजित् --अपने मनमें निश्चय रखिए कि हम अलग नहीं हो ( दोनों भिन्न भिम दिशाओंको जाते हैं।) [धनजयका प्रवेश धनजय-(गांता है-) हमारे भैया अगिन, उदार। करें हम तुम्हरो जयजयकार । ऐसी छिन्न रुसला वारी, मूरति लोहित लोल तिहारी, कब हूँ नैनन नाहिं निहारी, कितनी भीम, कितो सितार! निज कर नभकी जोर पसारे, काके गान भये मतवारे, निरतत अति आनंद उर धारे, इतनी निर्भयता, बलिहार। है है भवकी अवधि समापत, खुलि है अर्गल-द्वार, जादिन हातन-पायनके हद वधन करि है छार। तादिन हमरे अग नाचि है यही नाच तुव सग, सारी दाह दाहसों मिटि है, खूब मचैगो रग- पाय है सय विपदनितें पार ॥ [ घटुका प्रवेश । बटु-बाबाजी, दिन समाप्त हो गया और अँधेरा होता जाता है । धनजय-बच्चो, हम लोगोंने बाह्य प्रकाश पर निर्भर रहनेकी आदत डाल ली है और इसी लिए अन्धकार होते ही हम बिल्कुल अन्धे हो जाते हैं। वटु--मैंने सोचा था कि भगवान् भैरवका नृत्य आज ही प्रारभ होगा, पर क्या यन्त्रराज विभूतिने भगवानके भी हाथ पैर अपने यन्त्रसे बॉव दिये धनजय-भैरवका नृत्य जब प्रारम्भ होता है तब तो नहीं दिखता, परन्तु जब उसके समाप्त होनेकी बारी आती है तब प्रकाशित हो पड़ता है।
नाटक।
धनजय- अच्छी तरह कसकर बाँध लिया है। सहज ही तो नहीं
छूट जाऊंगा।
[ भैरव-पधियों का प्रवेश।]
गाते है--
तिमिर-हदरिदारण
ज्वलदग्नि-निदारुण।
मरुश्मशान-सञ्चर,
शकर, शकर!
बजघोषवाणी,
रुद्र, शूलपाणी,
मृत्यु-सिन्धु सन्तर,
शकर,शकर।
(प्रस्थान 1)
कुन्दन-उधर देखो ! उसे देखो! ज्यों ज्यों गोधूलिका प्रकाश
बुझता जाता है, सन्ध्याका अधिरा होता जाता है, त्यो त्यों वह यन्त्र काला
और काला पड़ता जाता है।
प्र० ना०-दिनमें इसने सूर्यके प्रकाशसे बढ़ जानेका यत्न किया
और अब यह रात्रिके अन्धकारका मुकाबला कर रहा है । यह भूतके
समान प्रतीत होता है।
दु० ना०--मैं नहीं समझता कि विभूतिने उसे इस प्रकारका
क्यों बनाया है। हम उत्तरकूटमें कहीं भी हों उसकी ओर ताके बिना
नहीं रह सकते | मानों यह आकाशको फाड़नेवाली एक विकट चीख
[चौथे नागरिकका प्रवेश ।]
चौ० ना०-~-खबर मिली है कि इस आमके वगीचे के पीछे राजाको
शिविर पड़ा है । युवराज उसीमें रक्खे गये हैं।
६८ मुक्तधारा। उन लोगोंने मुझे इस 'मानने' की मारसे ही देश छोड़नेको मजबूर किया है। प्र० ना०--उन लोगोंका गुरु कौन है ? धनजय-जिसके हाथसे वे मार खाते हैं। प्र० ना०- -तब तो फिर हम लोगोंको भी तुम पर 'गुरु-गीरी' शुरू कर देनी चाहिए। धनजय-~मै इसके लिए राजी हूँ। भैया! मै भी देख लें कि अच्छी तरह सबक सुना सकता हूँ या नहीं। परीक्षा लेना शुरू . कर दो। दू० ना०-सन्देह होता है कि तुम्हीने हमारे युवराजके सम्ब- न्धमें कुछ चालाकी की है। धनजय-तुम्हारे युवराज मुझसे ज्यादा चालाक हैं, उन्होंने मेरे सम्बन्धमें चालाकी की है! द्वि० ना०--देखा न, इसमें कुछ न कुछ रहस्य अवश्य है। दोनोंने ही मिलकर कोई 'जाल' रचा है । प्र० ना० -ऐसा न होता तो यह इतनी रातको यहाँ क्यों घूमता फिरता ' युवराजको भगाकर शिवतराई ले जानेकी फिक्रमें है । अभी तो इसे यहीं बाँधकर रख जाना चाहिए । इसके बाद युवराजका पता लगने पर इससे निबट लिया जायगा । अरे ओ कुन्दन, इसे बाँध ले न । रस्सी तो तेरे पास ही है । कुन्दन-~-तुम्ही ले लोन यह रस्सी, तुम्हीं क्यों नहीं बॉध लेते। द्वि० ना०-~-अरे, तू उत्तरकूटका मनुष्य है। दे, मुझे दे। ( बाँधवे याँधते ) क्यों, अब गुरुजी क्या कहते हैं ?
नाटफ। ७१ तो, यह हमारे अधिकार पर आक्रमण है । हम अपने युवराजको अपने भाप ही दण्ड दे लेते। दू० ना०-इसका सबसे अच्छा उपाय तो इतना ही है कि- समझे न, बड़े भैया- प्र० ना०-~हाँ हाँ, वह स्वर्णकी खान जो उनके राज्यमें है- कुन्दन-ओर मेने बहुत ही विश्वस्त सूनसे मुना है कि कमसे कम पच्चीस हजार पशु उनकी पशुशालामें हैं । प्र०ना०-वे सब हमें गिन गिन करके ले लेना चाहिए तत्र- बडा अन्याय है ।-बिल्कुल असह्य है ! ४० ना०और इसके सिवाय उनके केशरके खेतोंकी वार्षिक आय कमसे कम-~ दू० ना०-~हों, हो, वह उनसे दण्ड स्वरस ले लेना चाहिए। किन्तु यह तो बतलाओ कि अब इस वैरागीका क्या किया जाय ? प्र० ना०-इसको यहीं पड़ा रहने दो। ( ग्थान ।) धनजय-( गाता है) दूर फेंक देनेहीसे क्या पडा रहेगा? जानकार लेनेको प्रस्तुत गडा रहेगा। सोच देस, वह फौन रत्न है, कैसा मागे, होगा क्या निर्णोध, धूलका यह अधिकारी ? उसका पोजाना क्या एक अनर्थ न होगा? फ्या उनका यह दार गुथना व्यर्थ न होगा? ज्ञात नहीं क्या, पोज हुई है उसकी अरतो, यत्र तत्र, मर्वत्र विचरते ई चर तर तो। जिसफा सरने एक साथ अपमान किया है, आदर उसफा अधिक और भी बढ़ा दिया है।
७०
मुक्तधारा।
ती० ना०----इतनी देरके बाद समझमें आया कि वैरागी इसी
रास्तेके आसपास क्यों घूमता फिरता था | अब इसे यहाँ बंधा हुआ
पड़ा रहने दो । तब तक चलो, हम देख आवें । (प्रस्थान । )
धनजय--( गाता है)
कहा तार चाँधेत केवल है है पूरन काज तुम्हार,
गुन गरवीले, गुनी इमार।
बाँधी बीना प्रस्तुत यह धरी रहेगी याहि प्रकार।
गुन गरवीले, गुनी हमार।
तव तो है है हार तिहारी, है है, है है निश्चय हार।
केवल याको बाँधा बॉधी है है तुव करतवको सार!
गुन गरवीले, गुनी हमार।
बंधन पै तुव कर जब लागै, तार तारमें सुर तब जागै,
उठे सुरीली पुनि झंकार।
गुन गरीले, गुनी हमार।
नहिं तो धूरि फॉकि है पीना, लै है सिर लज्जाको भार।
गुन गरबीले, गुनी हमार।
[ नागरिकोंका पुन प्रवेश । ]
प्र० ना०-अरे यह क्या बखेड़ा है ?
दू० ना०- -हमारे महाराजके चाचा, युवराजको उनके रक्षकोंक
सहित मोहनगढ ले गये ! भला इसका मतलब क्या हुआ
कुन्दन मतलब यह हुआ कि उनकी नाडियोंमें उत्तरकूटका रक्त
बहता है। उन्होंने ऐसा इसी कारण किया होगा कि युवराज
कहीं राजासे उचित दण्ड पाये विना न रह जाय ।
प्र० ना०-~यह बड़ा भारी अन्याय है, अत्याचार है । जरा सोचो
2
नाटका
७३
पगली अम्बाकी बातोंसे तो साफ साफ मालूम होता है कि उसने जिसे
देखा है वे हमारे युवराज ही हैं और वे इसी रास्ते आये हैं।
दू०-परन्तु ऐसे अन्धकारमें वे अकेले कहाँ आयेंगे, कुछ समझमें
नहीं आता।
प्र०-रोशनीके बिना हम लोग तो एक पैर भी न चल सकेंगे।
चलो, कोटवालके पाससे रोशनीका इन्तजाम कर लायें ।
(दोनोंका प्रत्यान।)
[एक पथिकका प्रवेश।]
प्र० पथिक-(चिल्लाकर) बुद्धन् ! शम्भू ! बुद्धन! ओ शम्भू-ऊ!
आफतमें फंसा दिया । मुझे पहिले ही भेज दिया और कहा कि
* आकर पकड़ लेंगे, परन्तु यहा उनका कोई चिह्न तक
। अपरको देखकर ) अधेरेमें वह लोहेका काला यन्त्र कुछ इशारा
-
"
७२
मुक्तधारा।
दर्द दिया जिसको उसकी पीडाको ऐसे,
उस दर्दीके प्राण कहो, सह लेंगे कैसे ?
[ कुन्दनका पुन प्रवेश।]
कुन्दन-बाबाजी, मैं आपका वधन खोल देता हूँ--अपराध क्षमा
करना। आप इसी समय अपने घर भाग जानें । क्या जाने आज
रातको--
धनजय-क्या जाने, यदि कहीं आज रातको ही मेरी पुकार हो,
तव धरको कैसे भागा जाय ?
कुन्दन-~यहाँ तुम्हारी पुकार कहाँसे होगी।
धनजय--उत्सबके अन्तमें शायद हो।
कुन्दन--आप शिवतराईके मनुष्य होकर उत्तरकूटके-
धनजय-भैरवके उत्सबमें अब केवल शिस्तराईकी आरती होना
ही बाकी है।
नेपथ्यमें-जागो, भैरव, जागो !
कुन्दन-मुझे अन्छा नहीं मालूम होता, जाता हूँ।
(दोनों जाते हैं।)
[उत्तरकूटके दो राजदूतोंका प्रवेश ।]
प्रथम रा० -अब किस ओर जाऊँ ? नासानुमें बकरियाँ चराने-
वालोंने कहा कि हम लोगोंने युवराजको इसी रास्तेसे पश्चिमकी और
अकेले जाते हुए देखा है।"
दू०-चाहे जिस तरह हो, आज रातको उनका पता लगाना ही
होगा-महाराजका यही हुक्म है।
प्र०-खबर उड़ी है कि उन्हें मोहनगढ़ ले गये हैं, परन्तु उस
नाटक।
हुवा-तुम क्या कहते हो ? हम लोग तीन मुहानेके रहने-
वाले शब्दोंको समझनेमें-जन कि उनका अर्थ स्पष्ट न हो बहुत ही
अयोग्य हैं । दलके लोगोंसे तुम्हारा क्या मतलब है !
पथिक-हम चोबुआ गॉपके रहनेवाले अपना अथ शब्दोंकी
पपेक्षा दूसरे उपायोंसे समझानेमें अत्यन्त चतुर है । (एक ठोकर
"कर) समझे।
हुन्बा-आ ! समझ गया। इसका सीधा मतलब यह है कि में चाहे
या नहीं, मुझे चलना ही पडेगा । परन्तु किस स्थानको 2 कृपया इस
बार अपना उत्तर जरा मुलायम करके देना। तुम्हारे आलापके पहले
ही धकेसे मेरी बुद्धि परिष्कृत हो गई है ।
पथिक-तुम्हें शिरतराई चलना होगा।
हुव्वा-शिवतराईको 2 और अमावास्याकी इस अन्धेरी रातमें :
वहाँ क्या करना होगा?
पथिक-नन्दी घाटीके नष्ट हुए कोटको फिरसे बनाना होगा।
हुन्या--नष्ट हुए कोटको क्या तुम मुझसे बननाओगे ? मेरे प्यारे
मित्र, इसका कारण यही है कि तुम अधेरैमें मेरा चेहरा अच्छी तरह
नहीं देख सकने, अन्यथा तुम ऐसी सरत बात कभी न कहते । मैं हूँ-
पथिक-तुम कोई भी होओ, पर तुम्हारे दो हाथ तो है ।
हुवा--हैं, पर इनके होनेका कारण यह है कि इनका बिल्कुल न
होना भी ठीक न था। नहीं तो-
पथिक-हाथोंके उपयोगका परिचय तुम्हारे मुंहसे नहीं मिल
सकता। समय माने पर हम उसका पता लगा लेंगे। अब चलो ! खड़े
।
हो जाओ!
७४
मुक्तधारा।
लगानेकी जरूरत नहीं थी। वह बिल्कुल जुदा आदमी है । हाँ भैया,
तुम्हारी इस टोकरीमें कितने दीप हैं ? क्या इनमेंसे एक मुझे नहीं दे
सकते ' जो लोग घरके अन्दर रहते है उनकी अपेक्षा बाहर घूमने-
वालोंको दीपकी अधिक आवश्यकता है ।
निमकू-तुम इसका कितना मूल्य देनेको तैयार हो ?
हुब्बा-~यदि मेरे पास कुछ देनेको ही होता, तो मैं जोरसे न
माँगता : अपने मधुर स्वरको क्यों खर्च करता ?
निमकू-तुम तो बड़े हेसोड मालूम पडते हो । (प्रस्थान ।)
हुब्बा-दीप तो नहीं दिया, पर हैंसोडका पद दे गया। यह
भी क्या कुछ कम है ? उसने खूब पहिचाना । 'हसोड में यह
खूबी होती है कि वह गहरे अँधेरेमें भी पहिचान लिया जात
झींगुरोंकी झनकारसे आकाशका शरीर झिमझिम कर रहा है ।
मै सोचता हूँ कि मैं उस दीप बेचनवाले पर अपने हास्यरसका
प्रयोग न करके यदि अपनी शारीरिक शक्तिका प्रयोग करता तो फायदेमें
रहता।
[ और एक पथिकका प्रवेश । ]
पथिक-अबे ओ!
हुब्बा-अरे वावा, पृथ्वीपर चलो ! मुझे डराते क्यों हो?
पथिक-अभी चलो !
हुव्वा-~चल्नेके लिए ही तो घरसे निकला हूँ और मन ही मन
स तत्वको हजम करनेकी चेष्टा कर रहा हूँ कि दलके लोगोंको
छोडकर चल पड़नेसे किस तरह अचल हो जाना पड़ता है ।
पथिक-दलके लोग तैयार हैं, अब केवल तुम्हारी ही कमी है ।
-
नाटका 2 , , ककर-क्यों नहीं जाओगे क्या हुआ झुण्डमेंसे एक हुआ तो कुछ भी नहीं, परन्तु मैं नहीं जाऊँगा। कैकर--नरसिंह, इसका नाम क्या है ? नरसिंह-~-इसका नाम बनवारी है। यह कमलके वीजोंकी माला बनाता है। ककर---अच्छा तो इससे बातचीत कर ली जाय । ( बनवारीसे) तुम क्यों नहीं जाना चाहते, कहो तो? बनवारी- जानेकी प्रवृत्ति नहीं होती। मेरा शिवतराईके लोगोंसे कोई विरोध नहीं है। वे हमारे शत्रु नहीं हैं। फकर-परन्तु कल्पना करो कि हम ही उनके शत्रु हैं । इस पर भी तो तुम्हारा कुछ कर्तव्य है ? बनवारी-मैं किसीके प्रति अन्याय करना ठीक नहीं समझता। ककर---अन्याय वहीं अन्याय होता है, जहाँ न्याय अन्यायके सोचनेका अधिकार या स्वातत्र्य होता है। उत्तरकूट एक बड़ा राष्ट्र है। उसके अंशरूप रह कर जो कार्य तुम्हारे द्वारा होगा उसकी किसी तरहकी जानदारी तुम्हारे ऊपर नहीं रहती। बनवारी--पर एक उससे भी बड़ा राष्ट्र है जिसके हिस्से उत्तर- कूट और शिवतराई दोनों ही हैं। ककर-नरसिंह, देखो यह मनुष्य सवाल जवान करता है। देशके लिए उससे अधिक हानिकारक कोई मनुष्य नहीं जो तर्क करना है । नरसिंह-~सल मजूरीके काममें लगा देनेसे इसकी यह तर्क कर- नेकी आदत मिट जायगी। इसीलिए मैं इसे घसीटकर अपने साथ , लिये जारहा हूँ।
७६ मुक्तधारा। , [ दूसरे पथिकका प्रवेश !] दू० ५०-ककर, लो यह एक और आदमी मिल गया। ककर-यह कौन है ? पथिक-मैं कोई नहीं भैया, मेरा नाम लछमन है । मैं भैरवके मन्दिरमें घटा वजाता हूँ। ककर-यह तो बहुत अच्छी बात है । तुम्हारे हाथ जरूर मज- बूत होंगे । चलो, शिवतराई । लछमन-परन्तु घण्टा ककर-भैरव बाबा अपना घण्टा स्वय बजालेंगे। लछमन--कृपा कर मुझपर दया करो, मेरी स्त्री बीमार है। ककर-तुम्हारी अनुपस्थितिमें वह या तो अच्छी हो जायगी या मर जायगी, और तुम्हारी उपस्थितिमें भी यही हो सकता है। हुब्बा-मेरे साथी लछमन, झगड़ा मत करो। इस काममें खतरा अवश्य है, परन्तु तुम्हारा यह इकार करना भी खतरेसे खाली नहीं है और उसका स्वाद मैं पहले ही चख चुका हूँ। ककर-सुनो । यह तो मुझे नरसिंहकी आवाज जान पड़ती है। [नरसिंहका कुछ लोगोंको लिये हुए प्रवेश। 1] ककर--नरसिंह, समाचार तो अच्छे हैं ? नरसिंह---यह देखो, एक दल जुटा लाया हूँ। इसके सिवाय और भी कई दल हैं जो पहले साना हो चुके हैं। ककर -तो फिर चलो । रास्तेमें और भी कुछ जुटा लिये जायेंगे। मैं नहीं जाऊँगा। - झुण्डमेंसे एक- -
नाटक।
दमन करना भी एक 'काम' है । अभी समय है, तुम इस बातको
अच्छी तरह समझ लो।
हुब्बा-मैंने इतनेमें ही समझ लिया है ।
(ककर और नरसिंह को छोड़कर सब याहर जाते हैं। )
नरसिंह-देखो, ये विभूति आ रहे है । यन्त्रराज विभूतिकी जय !
[विभूतिका प्रवेश।]
ककर-हमारा काम धड़ाकेसे हो रहा है। लोग भी कम नहीं
जुटे हैं। किन्तु तुम यहाँ कैसे । तुम्हारी उपस्थितिमें ही तो लोग
उत्सव करेंगे।
विभूति-मुझे इस उत्सवके लिए कोई उत्साह नहीं रहा।
नरसिंह—क्यों भला
विभूति—मेरी कीर्तिको कम करनेके लिए ही नन्दीघाटीके प्राका-
रके तोड़े जानेकी खबर आज आ पहुँची है । मेरे साथ एक प्रति-
योगिता की जा रही है।
ककर-प्रतियोगी कौन है ?
विभूति-मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता । तुम सब जानते ही
हो । यह एक समस्या खड़ी हो गई है कि उत्तरकूटमें उसका अधिक
आदर होगा या मेरा। और एक बात तुम्हें मालूम नहीं है। अभी अभी
एक पक्षकी ओरसे एक दूत मेरा दिल तोड़ देनेके लिए आया था।
वह इस तरहकी धमकी दे गया है कि वे मुक्तधाराका बाँध
तोड़ देंगे।
नरसिंह-वह इतनी बड़ी बात बोल गया !
।
७८
-
भुक्तधारा।
वनगारी-तब तो मैं तुम्हारे लिए एक बोझा बन जाऊँगा और तुम्हारे
किसी काम न आऊँगा।
ककर-तुम उत्तरकूटके लिए भी एक बोझे हो और हम तुमसे
पिण्ड छुड़ानेका उपाय खोज रहे हैं ।
हुव्वा-~~वनारी चाचा, मालूम पड़ता है कि तुम उस श्रेणीके
मनुष्य हो जो 'बुद्धियुक्त' कहलाते हैं, परतु दुनियामें एक दूसरी
श्रेणी भी है जो 'शक्तियुक्त' या सत्ताधारी कहलाती है। तुम दोनों
श्रेणियोवाले आपसमें सदा टकराया करते हो। सो या तो तुम भी
उनका तरीका सीख लो, या अपनी बात छोड़ दो और चुप होकर
बैठ जाओ।
बनवारी-और तुम्हारा तरीका क्या है भैया ।
हुब्बा---मैं तो गाना गाया करता हूँ, परन्तु इस समय उससे कुछ
होने-जानेवाला नहीं है, इसलिए चुप हूँ, नहीं तो अब तक कभीकी
तान छिड़ गई होती।
ककर--(बनवारीसे) तो अब मुझे बता कि तेरी क्या मशा है ?
बनवारी-मैं यहाँसे एक कदम भी आगे न रक्यूँगा।
ककर-अच्छा, तो तुझे जबर्दस्ती चलाया जायगा। बाँध लो इसे ।
हुमा-ककर दादा, वीचमें पड़कर मैं भी एक बात कह देना चाहता
हूँ, पर मुझ पर क्रोध न करना। तुम इस आदमीके ले जानेमें
जो शक्ति खर्च करोगे, यदि यह बचाकर रक्खी जा सकती, तो एक दिन
काम
फकर -जो लोग उत्तरकूटकी सेवा नहीं करना चाहते, उनका
-
,
'माती।
.
नाटका . नेपथ्यमें-जागो । भैरव ! जागो! [धनजयका प्रवेश । ककर -लो देखो, जानेके लिए कदम बढाते ही यह असगुन सामने आ पहुंचा। विभूति-वैरागी, तुम्हारी तरहके साधु सन्त, अब तक भैरव- को जगानेमें समर्थ नहीं हुए, इस कारण अब मेरी तरहके मनुष्य- जिहे तुम नास्तिक पापण्ड कहते हो उसे जगानेके लिए जा रहे हैं। धनंजय-यह मैं मानता हूँ कि जगानेका भार तुम लोगोंके ही ऊपर है। विभूति--परन्तु हमारा जगाना कुछ और ही ढगका है । हम मन्दिरमें घण्टे घड़ियाल बजाकर या आरतीके प्रदीपोंको जलाकर नहीं जगाते। धनजय-नहीं, तुम उसे (भैरवको ) सफलोंसे बाँधोगे और तब वह उन सकलोंको तोड़नेके लिए जागेगा। विभूति-हमारी सकलें तोड़ डालना इतना सहज नहीं है । उनमें ऐंठ पर ऐंठ, गाँठ पर गाँठ दी गई है। धनजय- -जब कोई बात बहुत ही दु साध्य हो जाती है, तभी उसके लिए योग्य समय आता है। [पुजारियोंका गाते हुए प्रवेश । ] जय भेरव, जय शकर, जय जय जय प्रलयंकर। जय सशय-भेदन, जय बन्धन-छेदन, जय सकट-सहर, शकर!शकर! (प्रस्यान ।) - ६ ८० - मुक्तधारा। ककर-और तुमने उसे सहन कर लिया विभूति ? विभूति-प्रलाप-वाक्योंका प्रतिवाद ही क्या हो सकता है। ककर--परन्तु क्या यह उचित होगा कि अपनेको इतना अधिक सुरक्षित समझा जाय ? एक दिन तुमने ही तो कहा था कि उसमें एक दो कमजोर जगह ऐसी है कि यदि कोई उनका पता पा जाय तो. बहुत ही सरलतासे- विभूति-जिनको उन कमजोर जग)का पता है वे यह भी जानते हैं कि यदि उन्होंने उन स्थानों पर छेड़छाड़ की तो वे भी प्रवाहके साथ वह जायेंगे। नरसिंह-तब क्या यह बुद्धिमत्ता न होगी कि उन स्थानों पर रक्षक नियत कर दिये जायें? विभूति-स्वय यमराज ही उनकी रक्षा कर रहे हैं । मुझे अपने बांधके टूटनेका जरा भी डर नहीं । मैं यदि एक वार नन्दी घाटीको फिर बन्द कर सका, तो फिर मुझे कोई दुख न रहेगा। ककर-आपके लिए यह काम विल्कुल कठिन नहीं है । विभूति-वेशक नहीं है । मेरा यन्त्र तैयार है, परन्तु घाटी इतनी तग है कि वहाँ अनायास ही बहुत थोड़ेसे भी आदमी अड़चनें खड़ी कर सकते हैं। नरसिंह-अडचनें कितनी खड़ी करेंगे ? मरते मरते भी हम चिन- कर तैयार कर देंगे। विभूति-तत्र तो वहुतसे मरनेवाले लोगोंकी जरूरत होगी। ककर-~-यदि मारनेवाले लोग हों, तो फिर मरनेवाले लोगोंकी कमी नहीं रह सकती।
विभूति-परन्तु हमारा जगाना कुछ और ही हंगाम मन्दिरमें घण्टे घड़ियाल बजाकर या भारतीफे प्रतीमा म धनजय-नहीं, तुम उसे (भैरवको) सामेन वैत्रिी और विभूतिहमारी सकलें तोड़ डालना इतना सहज गराउनमें [पुजारियोंका गाते हुए प्रवेश नाटका नेपथ्यमें-जागो ! भैरव ! जागो! [धनजयका प्रवेश । ककर-लो देखो, जानेके लिए कदम बढाने ही यह अमन सामने आ पहुंचा। विभूति-वैरागी, तुम्हारी तरहके साधु सन्त, अब तक मद को जगानेमें समर्थ नहीं हुए, इस कारण अब मेरी तरहो म्नुए- जिन्हें तुम नास्तिक पापण्ड कहते हो उसे जगानेके नि गरे । धनजय- यह मैं मानता हूँ कि जगानेका मार दून मोड ही ऊपर है। नहीं जगाते। तब वह उन सकलोंको तोड़नेके लिए जागेगा। ऐंठ पर ऐंठ, गाँठ पर गॉठ दी गई है। धनजय-जब कोई बात बहुत ही दु साम्य हो दादी है, उसके लिए योग्य समय आता है। " जय भैरव, जय शकर, जय जय जय प्रलयकर। जय सशय-भेदन, जय यन्धन छेदन, जय सकट सहर, शकर!राफर! (प्रस्पान ।) ६ १ , मुकधारा। और निरस्त करनेकी योजना की थी। हममेंसे कोई अवश्य विश्वास- घाती है, जिसने जाकर उन्हें खबर दे दी है। ककर, तुम्हारी मण्डलांक सिवाय तो बहुत ही कम लोग इस भीतरकी बातको जानते थे, फिर यह हुआ ककर--क्यों विभूति, क्या आप हमपर भी सदेह करते हैं ? विभूति-संदेह करनेकी सीमा कहीं भी नहीं है। कंकर-तो फिर हम लोग भी आपपर सदेह करते हैं। विभूति-हाँ, करो । सन्देह करनेका तुम्हें अधिकार है । जो हो, समय आनेपर इसका निर्णय हो जायगा । रणजित्--(दूतसे ) क्या तुम्हें पता है कि वे क्यों आ रहे हैं। दूत-उन्होंने सुना है कि युवराज कैद हो गये हैं, इस लिए उन्होंने प्रतिज्ञा की है कि जैसे बनेगा हम उन्हें खोजकर निकालेंगे। यहाँसे मुक्त करके वे उन्हें शिवतराईका राजा बनाना चाहते हैं । विभूति-हम भी उसे ढूँद रहे है और वे भी । देखना है कि वह किसके हाथ पड़ता है। धनजय--वह तुम दोनोंके ही हाथ पड़ेगा, उसके मनमें जरा भी पक्षपात नहीं है। दूत--यह शिवतराईका नेता गणेश आरहा है। [गणेशका प्रवेश।] गणेश-(धनजयसे ) बाबाजी, उनका पता तो लग जायगा । धनजय--हॉ, लगेगा क्यों नहीं ? गणेश-आप निश्चय करके कहते हैं ? धनजय-~-हॉ, निश्चयपूर्वक कहता हूँ। जरूर लग जायगा। रणजित्-अरे तुम लोग किसे ढूँद रहे हो।
नाटकी
गणेश-लो, ये तो स्वय महाराज ही आ गये । राजन् ,
आपको
उन्हें छोड़ देना पड़ेगा।
रणजित्-किसे?
गणेश-हमारे युवराजको। आपको तो उनकी आवश्यकता नहीं
है, परन्तु हमें बहुत आवश्यकता है-हम उन्हें चाहते हैं। क्या आप
हम लोगोंका सभी कुछ रोक रखेंगे ? उनतकको भी ।
धनजय-अरे मूर्को, तुम मनुष्यको नहीं पहिचानते। उन्हें बन्द कर
रखनेकी शक्ति भला किसमें है ?
गणेश-हम उन्हें अपना राजा बनाकर रखेंगे ।
धनजय-अवश्य रक्खेंगे। वे राजवेश धारण करके आवेंगे ।
[पुजारियोंका गाते हुए प्रवेश ।]
तिमिर-हद्विदारण,
ज्यलदग्नि-निदारुण,
मरश्मशान-सचर,
शकर। शकर!
वज्रघोपवाणी,
रुद्र, शूलपाणी,
मृत्युसिन्धु-सतर
शकर शंकर!
नेपथ्यमें (अम्बा)-मा पुकार रही है, सुमन ! मा पुकार रही है।'
लौट आओ ! सुमन ! लौट आओ !
(दूरसे एक आवाज सुनाई देती है।)
विभूति-अरे वह क्या सुन पड़ता है । काहेका शब्द है :
धनजय-यह अन्धकारकी छातीका भीतरी अंश खिडखिलाकर हँस
पड़ा है।
है मुक्तधारा। विभूति-~~आ, चुप भी रहो। आवाज किस ओरसे आ रही है, बोलो तो? नेपथ्यमें-भैरवकी जय ! जय भैरवकी ! विभूति-( अपने सिरको पृथ्वीको ओर झुकाकर सुनते हुए) यह तो साफ साफ झरनेको आवाज धनजय-नृत्यका आरम्भ हो गया है । यह उसके डमरूकी पहली आवाज है। विभूति-आवाज बढती जाती है । बढती ही जाती है। ककर-यही प्रतीत होता है कि- नरसिंह-ऐसा मालूम होता है कि- विभूति-हाँ हाँ, इसमें सन्देह नहीं है । 'मुक्तधारा' बेगसे बह पड़ी है। उसके बॉधको किसने तोड़ दिया 2.-अरे वह नहीं बचेगा। (ककर, नरसिंह और विभूतिका तेजीसे प्रस्थान ।) रणजित्---मन्त्री, यह क्या मामला है ? धनजय-~~-बॉध टूटनेके उपलक्ष्यमें जो उत्सव होगा, यह उसीमें शामिल होनेके लिए पुकार हो रही है। (गाता है-) वाजत डमरू वाजत झोझ। हिरदे हो, हिरदे माँझ। मन्त्री महाराज, यह तो शायद- रणजित्-हाँ, यह शायद उसीका- मन्त्री--उनके सिवाय और किसीका तो- रणजित्-~-ऐसा साहस और किसमें है ? धनजय-(गाता है) नाचत नाचघरन सहुलास । प्रानन डिंग हो, प्रानन पास ॥ -
नाटक।
८७
,
रणजित्-यदि दण्ड देना है तो मैं दण्ड दूंगा। किन्तु इन सब
उन्मत्त प्रजाजनोंके हायसे-मेरा अभिजित, देवताओका प्यारा अभि-
जित, देवता उसकी रक्षा करें।
गणेश-वाबाजी, कुछ समझमें नहीं आता कि यह क्या हुआ है।
धनजय-(गाता है)
: जागत पहर, पहरुआ दोय।
तारकमडल झिलमिल होय ॥
रणजित्- मुझे मानों यह उसकी पदध्वनि सुनाई देती है ।
अभिजित् ! अभिजित् ।
मन्त्री-मानों वही आरहे है ।
धनजय-( गाता है-)
मरमनि पीर, पीर प्रतिसध ।
टूटत यन्धन, छूटत बध ॥
[सजयका प्रवेश।]
रणजित्—यह तो सजय आ रहा है । सजय, अभिजित् कहाँ है।
सजय--'मुक्तधारा' का झरना उन्हें बहा ले गया। हम लोग उहें
नहीं पा सके।
रणजित्-राजकुमार, तुम यह क्या कहते हो ?
सजय- युवराजने मुक्तधाराके वाँधको तोड़ दिया ।
रणजित्-समझ लिया । उसी मुक्तिके द्वारा उसने मुक्ति पा ली ।
झरनेको
मुक्त करके यह मुक्त हो गया । सजय, क्या यह तुम्हें अपने
साथ ले गया था।
संजय-नहीं, परन्तु मैंने समझ लिया था कि वे वहीं जायेंगे और
इस लिए मैं पहले ही चला गया और अन्धकारमें उनकी प्रतीक्षा करने
.
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