Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Shri Madavsyakniryouktideepika Part-iii
Front matter
आवश्यक
नियुक्ति
दीपिका।
सादर
विज्ञप्ति
॥ १ ॥
वांचकोने सादर विज्ञप्ति
>
श्रीद्वादशांगीना प्रणेता श्रीगणघरभगवंत रचित श्रीआवश्यकसूत्रनी नियुक्ति युगप्रधान श्रीमद् भद्रबाहुस्वामी महाराजे अने
चूणि श्रीमद् जिनदासगणिमहत्तरे करेली छे. ते नियुक्ति उपर विस्तृत टीका चौदशे चुम्मालीस ग्रन्थना प्रणेता आचार्य श्रीमद्
हरिभद्रसूरिजी महाराजे करेल छे. आ चूर्णि तथा दीकाना आधारे नियुक्ति उपर श्रीअश्चलगच्छना आचार्य श्रीमेरुतुगसूरिजीना
शिष्य आचार्य श्रीमाणिक्यशेखरसूरिजी महाराजे दीपिका रचेल छे. नियुक्ति, चूर्णि तथा टीकामां कोई पण स्थळे पोताना गच्छनी
मान्यतानो नामनिर्देश पण नहि होवा छतां सदरहु दीपिकामां पोताना गच्छनी मान्यताओनी जेवी के मुहपत्तिने बदले वस्खनो छेडो,
पर्वदिवसे ज पौषध, पौषधमा आहारनो निषेध वगेरेनी पुष्टि करवाने कल्पित चर्चाओ उपस्थित करीने तेने सिद्ध करवा प्रयत्नो
करेला छे. हरकोई ग्रन्थकारने पोताना स्वतंत्र रचेल ग्रन्थमा पोतानी अगर पोताना गच्छनी जे जे मान्यताओ होय तेने शास्त्रीय
प्रमाणोथी सिद्ध करवाने मादे स्वतंत्र चर्चाओ उभी करी तेने सिद्ध करवानी छूट होय छे, परंतु मौलिक प्रन्थो उपर टीका, चूर्णि
वगेरेना आधारे ज्यारे लखवार्नु होय त्यारे तेमां आवी विकृति करवी ते कोई पण रीतिए हितावह नथी. आ ग्रन्थ छपावती वखते
तेमनी मान्यताओनुं खंडन टीप्पणीओ करवाथी थई शके तेम होवा छतां पण तेज ग्रन्थमां तेज प्रन्थकारनी मान्यतानुं खंडन
करवु उचित नहि लागवाथी सदरहु ग्रन्थमां तेवं कई पण करवामां आवेल नथी, परंतु जेवो ग्रन्थ छे तेवोज छपाववामां आवेल
॥१॥
है. माटे मुझ वांगकोए एटलो ग्याल राखयो के ज्या ज्यां सामायिक, पौषध, मुहपत्ति आदि स्थळोमा तपागच्छनी मान्यता विराट माय ते अनळगच्छनी मान्यता मुजब जणावेल छे भने समज न पडे त्यांना स्थळो माटे टीका, चूर्णि तथा प्रवचनपरीक्षादि प्रन्यो जोई लेवा. अन गाय, लीव लि. सशोधक मि. २..५, भागो शुद ५. मानविजय. प्रकाशकीय निवेदन. भ or से श्रीआवश्यफनियुक्ति दीपिका प्रन्यनो १ लो तथा २ जो भाग सदरहु ग्रन्थमालाना ग्रन्थांक नं. १६ तथा नं. २९ तरीके बहार पासवामां आवेला छे तेना बीजा भागनुं मुद्रण केटलाक अनिवार्य संजोगोने लीघे संघ राखवामां आव्युं तुं, परंतु अधूरूं रदेल कार्य कोई रीते पूर्ण करयु जोईए ते हेतुथी तथा बीजो भाग क्यारे बहार पडशे एम बन्ने भागना ग्राहको तरफथी वारंवार साब आवश्यक नियुक्ति दीपिका। प्रकाशकीय निवेदन ॥ २ ॥ पृच्छा थवाथी पूज्यमहाराजश्रीने अमोए गई सालमां दीपिकानुं बाकीर्नु काम पूरं करी आपवा विनंति कंरी अने अमारी विनंतिने स्वीकारीने पूज्य महाराजश्रीए चालु सालमा ते कार्यनी शरुआत करी पूर्ण करी ऑपवाथी अमो ओ श्रीआवश्यकनियुक्ति दीपिकानो चीजो भाग सदरहु ग्रन्थमालानी अन्यांक नं. ४२ तरीके वाचकजनोना करकमलमां रजु कैरवी भाग्यशाली थेयां छीए. आ त्रीजा भागने छपाववामां पूज्य पंन्यासजी महाराज श्रीतिलकविजयजी गणिवरना उपदेशथी वीरमगामना रहेवासी सुश्रावक हठीसंग तेजपाल द्वारा मळेल रु. ३५१ त्रणसो एकावन तथा पहेला तथा बीजा भागना वेचाणनी आवेल रकमनो उपयोग करवामां आवेल छे. तथा पू. पंन्यासजी महाराज श्रीमानविजयजी गणिवर तथा पू. पंन्यासजी महाराज श्रीकान्तिविजयजी गणिवरे प्रूफो वगेरे तपासी आपवामां पोताना अमूल्य समयनो भोग आप्यो छे. तथा जे साधर्मी बंधुए पूर्व पुण्यना योगे मळेला द्रव्यनो श्रुतझाननी भक्ति करवा द्वारा आ अन्थने छपाववामां सहाय करेली छे ते बधाोनो आ संस्था तरफथी अत्यंत आभार मानवामां आवे छे. अने आवी रीते तेओना तरफथी संस्थाने लाभ मळतो रहे एवी आशा राखवामां आवे छे. सदरहुं ग्रन्थना की माटे प्रस्तावनामा यथायोग्य दर्शाववामां आवेल छे एटले अत्रे लखवामां आवेल नथी. गोपीपुरा-सुरत • लि० श्रीविजयदानसूरीश्वरजी जैनग्रन्थमाला वि. स २००५ भादरवा सुद १५ १५. व्यवस्थापक -मास्तर हीरालाल रणछोडभाई । ॥ २ ॥ SSC प्रस्तावना reOR वि. सं. १९९४ गां मचारित्रचूडामणि सिद्धान्तमहोदधि आचार्य श्रीमद् विजयप्रेमसूरीश्वरजी महाराजा पोताना बहोळा शिप-शिष्य ममुदाय माथे मुंबई लालबाग जैन उपाश्रयमा चातुर्मास विराजमान हता. ते वखते पोतानी देखरेख नीचे छेदसूत्र निविर्णिना संशोधन- कार्य पोताना साधुओ द्वारा चालतुं हतुं. ते दरमियान कारणवशात् पायधुनी उपर आवेल श्री- गाग्निनाथजी महाराजना देरामरना मकानमां आवेल श्रीसागरगच्छ प्रवचन पूजक सभाना हस्तलिखित भंडारनुं लीस्ट जोता नेमा श्रीमानश्यक नियुक्ति दीपिकानुं नाम वांचता ते प्रति जोवा माटे मंगावी. जोतां एम लाग्युं के साधु अने साध्वीओने उभय टंक प्रतिक्रमणमां गोलवाना आवश्यक सूत्रोना अर्थज्ञान माटे पू. श्रीहरिभद्रसूरिमहाराजनी तेमज पू. श्रीमलयगिरि- महागजनी पिस्न अने कठिन टीकाओ वंचावता पूर्वे आ दीपिका जेवो सामान्य अन्य वंचाववामां आवे तो प्रथम सामान्य बोध मलदीची धार अने पड़ी विस्तृन टीकालो पण महेलाईथी यंचावी शकाय अने समजावी शकाय. वळी आ ग्रन्थ अद्यावधि अमुद्रित . आ हेतुी आ दीपिका अन्य छपाचवानी एगोश्रीनी इच्छा थई अने ते कार्य मारा वडील गुरुवन्धु पू. मुनि श्रीतिलकविजयजी महाराज ( हाल पं. श्रीतिलकविजयजी गणिवर ) तथा मने सोंपवामां पायं. त्यार पछी आ मन्थनी वीजी प्रतिओ मेळववा माटे कोशिश करता फन एकल प्रति पूनाना श्रीभांडारकर इन्स्टीट्युटगांयी मळी आयी. आ प्रमाणे मळेली कुल ने प्रतिओ उपरयी प्रेम कोपी गार रापयामां आवी अने से पेस कोपी को प्रतिओ साथै नेळवीने शुद्ध करवा माटे बनतो पयास करवामां आव्यो.
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
॥ ३ ॥
आ रीते प्रेस कोपी तैयार थया पछी छपाववा माटे द्रव्यनी जे सहाय जोईए ते पूज्य श्रीतिलकविजयजी महाराजे अवरनवर
उपदेशद्वारा भाविक आवको पासेथी अपाववानुं स्वीकार्यु अने आ ग्रन्थ छपाववा माटे प्रेस साथे गोठवण करवी प्रूफो शोधवा
वगैरेनुं बाकी- तमाम कार्य में स्वीकार्यु. आम आ ग्रन्थ छपाववा माटे परमोपकारी पूज्यपाद आचार्यदेवनी प्रेरणाथी अने अमारा
बन्नेना सहयोगथी आ श्रीआवश्यकनियुक्ति दीपिका नामनो ग्रन्थ त्रण विभागमां संपूर्ण बहार पाडी शकायो छे.
स्वर्गीय पू. आचार्यदेव सकलागमरहस्यवेदी श्रीमद् विजयदानसूरीश्वरजीमहाराजश्रीना पोताना उपरना अनहद उपकारथी
प्रेराइने मास्तर हीरालाल रणछोडभाईए एओश्रीना पुनित नामथी अंकित ग्रन्थमाला वि. सं. १९९४ मां शरु करी हती. अने
केटलाक ग्रन्थो ते संस्था तरफथी बहार पण पडी चूक्या हता. बीजा पण अपूर्व ग्रन्थो आ संस्था द्वारा बहार पडे तो सारं एम
मास्तर हीरालालनी इच्छा होवाथी तेमणे अमोने ते कार्य माटे विनंति करवाथी आ प्रन्थ पण सदरहु ग्रन्थमाला के जेनी साथे
अमारा परमपूज्य परमगुरुदेव स्वर्गीय आचार्यदेवतुं नाम जोडवामां आवेल छे ते ग्रन्थमालाना १६-२९ अने ४२ मा ग्रन्थांक
तरीके सदरहु ग्रंथना त्रण विभागो बहार पाडवामां आवेल छे.
सदरहु ग्रन्थना कर्ता ग्रन्थनी प्रशस्तिमा जणाव्या मुजब अंचलगच्छमां थयेल श्रीमहेन्द्रप्रभसरिजीना पट्टधर श्रीमरुतुंग-
सरिजीना पट्टधर श्रीमाणिक्यशेखरसूरि छे. तेमनुं आखं जीवन तपास करवा छतां पण उपलब्ध थई शक्युं नथी. तेमज तेओ
क्यारे थया १ क्या जन्या ? क्यारे दीक्षा लीधी ? ए बधी विशिष्ट हकीकतो पण मळी शकी नथी छतां, पण जे कई तेमना
संबंधमां प्राप्त थयुं छे ते नीचे मुजव आपवामां आवे छे-
॥ ३ ॥
१ प्रोमीनो गत्ताकाळ पंचरमी सदी होबानो संभव छे. भीजैन सत्य प्रकाश मासिकोमा पू. मु. श्रीन्यायविजयजी महाराज तपायी पाल सालमा पीजीरावला तीर्थना शिलालेखो संबंधी लखाणो आवे छे. तेमां ता. १५-८-४९ ना अंक ११ मां सनबर ३१ नो शिलालेख आपकामां आवेळो छ, तेमां लखेल छे के 'संवत १४८३ वर्षे प्रथम वैशाख शुद १३ गोपीगतगरभीमेगतुंगसूरीणां पट्टोभरेण श्रीजयकीर्तिसूरीश्वर सुगुरूपदेशेन...श्रीजिराउला पार्श्वनाथस्य चैत्ये देहरि (१) कारागिता........'. मा श्रीजराकीर्तिसरिजी महाराज अंचलगच्छेश श्रीमेरुतुंगसूरिजीना शिष्य छे अने सदरहु ग्रन्थना कर्मा भीमाणिकगशेयरसहि पण तेगना शिष्य छे. एटले बने गुरुभाई होवानो संभव छे अने श्रीजयकीर्तिसूरिजीए सं. १५१५ गोरोनी प्रतिष्ठा करावेल छे. ते उपरथी उपरतुं अमारं अनुमान सिद्ध थाय छे के आ ग्रन्थना कर्ता श्री. माणिपगशेयररिती पण रोज सामीमा यया होता जोईए. तदुपरांत आ अनुमानना अनुसंधानमां मने त्रीजा भागना संशोधन पासो पनिur साहिरापेमी मुनिराज श्रीपुण्यविजयजी महाराज तरफथी जे बे प्रतिओ मळेली छे तेमां एक वि.सं. १५५० पाथीभी जि. . १९६५ मां लगायेली ले अने पथम मुंबई तथा पूनानी जे प्रतिओ मळेली तेमां तो लख्या संवत है । दि. पोगता सत्ता भावना अनुमाननी पहेलानी लखायेली कोई प्रति मळती ज नथी अने सत्ताकाळना अनुमान पीना पानी परोउ प्रतिमो गळेली छे. ए उपरथी पण अमारुं अनुमान साचु होवानो सभव छे. Hit Trt जापतागो भावली पनाकारनी पशस्तिमा पन्यकारे (१) श्रीआवश्यकनियुक्ति दीपिका (२) श्रीदशवकालिक- Frida पिका (३) iीपि निर्गति दीपिका (४) पीओपनियुक्ति दीपिका (५) भीउत्तराध्ययन दीपिका अने (६) श्रीआचार प्रस्तावना आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। ॥ ४ ॥ दीपिका नयतत्व विचारणा एम छ ग्रन्थो रचेल होवार्नु जणावेल छे. ज्यारे श्रीजैनश्वेताम्बर कोन्फरन्स तरफथी छपायेल श्री- जैनग्रन्थावलीमा (१) श्रीआवश्यकनियुक्ति दीपिका (२) श्रीपिण्डनियुक्ति दीपिका (३) श्रीदशवैकालिक नियुक्ति दीपिका अने (४) श्रीओघनियुक्ति दीपिका एम चार ज ग्रन्थो सदरहु ग्रन्थकारे रचेला होवार्नु जणाववामां आवेल छे. बाकीना बे उपलब्ध थता नथी. सभव छे के अद्यावधि अप्रसिद्धावस्थामा रहेल भंडारोमां ते बे अन्थो होय अगर विच्छेद पण पाम्या होय. आ रीतिए अन्थकारना संबन्धमा जेटलं साहित्य मळी शक्युं तेटलु उपर मुजब जणाववमा आव्युं छे. उपर जणान्या मुजब सदरहु ग्रन्थना संशोधन कार्यमा प्रथम बेज प्रतिओ प्राप्त थयेली अने ते उपरथी ज प्रेस कोपी तैयार करवामां आवेली. बन्ने प्रतिओ जोईये तेवी शुद्ध न हती, बन्ने प्रतिओमां पण परस्पर पाठफेर आवता हता छतां पण बन्नेनो सम- न्वय करीने शक्यता प्रमाणे प्रेस कोपी शुद्ध करीने ग्रन्थ छपाववामां आव्यो छे. तोपण केटलेक ठेकाणे अर्थदृष्टिए त्रुटिओ रहेली छे, परंतु निरुपाये ते एमने एम ज राखीने बे भागो बहार पाडवामां आव्या. त्यार पछी त्रीजा भांगर्नु कार्य अनिवार्य संजोगोंमां बाकी रही गयु. तेटलामा लडाइ शरु थई, पेपर उपर कन्ट्रोल आव्यो, कागळ मळवानी मुश्कीलता थई, मोघवारी पण वधी अने छपा- मणना चार्ज पण घणा ज वधता गया. आवा कारणोना योगे समय पलटाय अने सोंघवारी थाय एटले बाकी काम पुरुं करीए ए आशाए छ सात वर्ष नीकळी गया. छेवटे गइ साल मास्तर हीरालालनो आ काम पूर्ण करी आपवा माटे आग्रह थवाथी आ कार्य पूर्ण करवा चालु सालमां शरु कयें. ते वखते मारा लघुगुरुबन्धु पंन्यास श्रीकान्तिविजयजी गणिवर मारफत साहित्यप्रेमी. विद्वद्वय पूज्य श्रीपुण्यविजयजी महाराज पासेथी पूज्य श्रीहंसविजयजी महाराजना शाखसंग्रहमाथी चे 'प्रतिओ एक वि.सं.१५५०मां लखाएली 15 -- नया पीजी गि. सं. १५६४मां सवाली मळी मावी. सेनी साये ग्रीजा भागनी प्रेस कोपी मेळपीने ननती विशेष शुद्धि करीने मा गोलो माग अपायवामां भाष्यो छे. के प्रतिओ पण अतिशुद्ध न हती छतां पण सेमाथी केटलुक अगत्यनुं सुधारवा लायक मळी ग. पारीते गे मागो शुद्ध उपायवा माटे बनता प्रयासो करवामां आव्या छे. छतां प्रतिओनी अशुद्धताने योगे, अर्थदृष्टिए पाठंनी अटिना गोगे तया छतास्थताना योगे मारी समजफेरना कारणे जे भूल रही जवा पामी होय अथवा प्रेसदोषयी तथा प्रूफ सुधारवामां पग भनुपयोगयी जे केई भूल रही जवा पामी होय तेने विद्वान वांचको सुधारी लेशे एवी आशा छे. मदरह प्रन्यनी प्रतिमो पूरी पाडनार संस्थाओने तथा साहित्यप्रेमी पूज्य मुनिराज श्रीपुण्यविजयजी महाराजने तथा जीजा भागना प्रुफो वपामवामा मने पूर्व सहाय मापनार मारा लघुगुरुयन्धु पं. श्रीकान्तिविजयजी गणिवरने याद कर्या वगर रही काय तेग नयी. एज शुभेच्छा. अन उपाय, लींच. वि. सं. २००५ पासो मुद् २ -- लि. संशोधक मानविजय शुद्धिपत्रकम् आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। शुद्धि- पत्रकम्। पृष्ठम् पतिः पतिः अशुद्धः शुद्धः ॥ ५॥ १/१ शुद्धः पृष्ठम् माणिक्य | २/२ २४१ ३ रूपत्वात् २ १२ रूपत्वात् १५५५ १५५६ २४५ १/२ २ २४१ अशुद्धः माणेक्य १५५१ १५५१ १५५२ १५५३ १५५२ १५५४ " ४ २४२ १२ १५५७ SCIENCE २४३ ३/१ २४६ २४६ १ १५५७ २/१ २४२ ४ १५५८ १५५८ w ग २४४ " ६ १५५१ १० १५५४ २४४ ८ १५५९ १५५२ १२ १५५५ २४५ १० १५५९ १५५२ २/२ २ ॥ १५५६॥ ॥ १ ॥ (प्र०) " " १२ १५६० १५५३ पशि २ अधुरा पतिः २ १३ ३ ३/२ ८ ४ २ १२ शुर. ६/१ १५५३-५४ १५५५ ६/२ मझे। ७/१ १५५५ ८/२ १५५६ ११/२ १५५६ १२/२ ११ २ ४/१ ९ ३ १ कि तभेद संकल्पजः छवि ५ भङ्गाः किं तवेद संकल्पज छवि नमुत्थुणं जनास्था वृद्धि० १५६०-६१ १५६२ मरे १५६२ १५६३ १५६३ १५६४ १५६४ १५६५ १५६६ १५६७ ८ ८ नमुत्थु णं or ४ १३ or ११ २ १३/१ १९/१ २१/१ १ ३ १/२ करितो १२ जनास्थावृद्धि करितो ईरिया० पोरिसि mr ३ २१/२ इरिया० पोरिर्सि ५ ४ २२/१ ७ ५ or A or ६/१ N
पतिः
पतिः
अंशुद्धः
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आवश्यक
नियुक्ति
दीपिका
पृष्ठम्
२४/१
२५/१
शुद्धि-
पत्रकम् ।
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८
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८
निस्पृहः
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गुणे रसे
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रसे गुणे
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अशुद्धः
शुद्धः
पृष्ठम्
'निवृत्तं
निवृत्तं ।। ३७/१
कर्हि
कहिं ।। ४०/१
साहूमूले साहू(हु)मूले
सघरंगणओ सघरंगणओ|| ४१/१
साहूणो
साहू(हु )ो
अन्योन्नति वैम० अन्योन्नतिवेस०
महत्ववान्
महत्त्ववान् || ११/२
तपो निर्जरैव० तपोनिर्जरैव
४३/१
स्यापथा
स्यात्तथा (तथा)
२
2
८
२.६/१
२७/१
२७/१
२८/१
२९/२
३३/१
५
४
Ander 14.
कि
हिंसा
कलप्यं
कि
हिंसा
कल्प्य
२
४
15RSESCRIVE
॥ ६ ॥
किंमत भेट १-०-० भेट मेट " श्रीविजयदानसूरीश्वरजी जैन ग्रन्थमाला-सुरत, मायांक सन्यनुं नाम किंमत ग्रन्यांक ग्रन्थनुं नाम १ गौन कादमी गं. पर ०-१-0 ४१२ जिनगुणगान अमीधारा गुजगती २ श्रीरामणि कमा सं. पद्य ०-१-३ »१३ विविध प्रश्नोत्तर भा. २. * ३ उपमान विधि गुजराती मेट ४१४ श्रीसुत्रतत्रापि कथा प्राकृत ५ शीशीशलनग्त्रि सं. १ १५ श्रीलघुपाचनसारोद्धार मूल ५ ५ भागामायिक विधियहिन प्राकृत १६ श्रीआवश्यकनियुक्ति दीपिका भा. १ ५ ६ श्रीनिर चूर्ण ना. १ ५१७ प्राचीन सम्झायकर्णिका गुजराती ४१८ स्वाध्यायदोहन संस्कृत मा. ३ ४१९ प्राचीन सज्ाय पद सग्रह मा. १ गुजराती २. पतिकमणमून पति सम्कन ०-६-० ५२० जिनेन्द्रस्तवफर्णिका ४१० गीगोगमा मूल भेट २१ सिद्धाचल महातीर्थ स्नानावली गुजराती ११ रोपिए 'विगदि-मूल गरिन स. टीका १-१२ ० ४२२ मुरमुन्दरी राम ०-२-० १-८-० ०-१२० भेट M ०-६-० भेट आवश्यक नियुक्ति दीपिका। ५ ६ " ग्रन्थांक ग्रन्थy नाम किंमत | ग्रन्थांक ग्रन्थनुं नाम ४२३ श्रीनिशीथ चूर्णी भा. ४ मेट ३३ पर्युषणाष्टाहिका व्या० श्रीउदयसोमसू० x२४ ४३४ प्रकरणमाळा मूळ ४२५ ३५ पंच प्रतिक्रमण-विधि सहित गुजराती ४२६ युगादि देशना स. पद्य १-०-० ३६ जिनेन्द्र स्तवनादि काव्य सन्दोह ४२७ आराधना सार भाषान्तर सह भेट ३७ तपविधि सग्रह ४२८ प्रतिमापूजन ३८ प्रकरण दोहन ४२९ श्रीआवश्यकनियुक्ति दीपिका भा. २ २-०-० ३९ तत्त्वार्थ उषा ४३० प्रकरण स्तोत्रादि सग्रह ०-१०-० ४० सामायिक चैत्य-गुरुवन्दनादि ४३१ देववन्दनमाला मेट ४१ तीर्थङ्कर गणधर आगम वर्णन ४३२ श्रीपिण्ड विशुद्धि अनुवाद गुजराती ४२ श्रीआवश्यकनियुक्ति दीपिका भा. ३ प्राप्तिस्थानः-श्रीविजयदानसूरीश्वरजी जैन ग्रन्थमाला, व्य. मास्तर हीरालाल रणछोडभाई-गोपीपुरा-सुरत. ४ चोकडीवाळा प्रन्यो सपो गयेल होवाची मळी के तेम नथी किंमत मेट ३-०-० २-०-० ३-०-० ०-६-० १-८-० -*-4-2 ---- ०-८-० ०-४-० ०-२-० मेट " ॥ गईम् ॥ श्रीमन्माणेक्यशेखरपूरीश्वरविरचिता आवश्यकनियुक्तिदीपिका-तृतीयो विभागः अथ पष्ठं प्रत्याख्यानाध्ययनम् । अथ प्रत्याख्यानाध्ययनं, पायात्याध्ययने व्रणचिकित्सोक्ता, इह तु मूलोचरगुणानां धारणा प्रोच्यते, इत्यस्याधिकारः । अस्य नवागनुयोगदाराणि मप्रपञ्नानि वान्यानि यावन्नामनिष्पन्ने निक्षेपे प्रत्याख्यानाध्ययनमिति, अस्य द्वारगाथा- पञ्चक्खाणं पच्चक्खाओ, पञ्चक्खेयं च आणुपुबीए । परिसा कहणविही, या फलं च आईइ छन्भेया ॥ १५५० ॥ प्रत्याख्यायदे निषिध्यते यम्वनेनेति प्रत्याख्यानं १, प्रत्याख्याता तस्य कारको गुरुः शिष्यश्च २, प्रत्याख्येयं प्रत्या- रयानगोचरं यस्तु ३, आनुपूा परिपाट्या वाच्यं इति शेषः । तथा पर्पद् वक्तव्या यथा ईदृशः पर्पदः कथ्यं ४, कथन- विधिमा ५ वक्तव्यः । नया फलं चास्य ऐहिकामुष्मिकफलं कथनीयं ६, आदावेते पइ भेदाः ॥१५५०॥ प्रत्याख्यानमाह- नामं ठवणादविए अइच्छपडिसेहमेव भावे य । एए खल्लु छन्भेया पच्चक्खाणंमि नायवा ॥१५५१॥ Cam तृतीयो आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। विभागः। नामप्रत्याख्यानं १ स्थापनाप्रत्याख्यानं २ द्रव्यप्रत्याख्यानं ३ दातुमिच्छा दित्सा न दित्सा अदित्सा, सैव प्रत्या- ख्यानं (अदित्साप्रत्याख्यानं ४), प्रतिषेधप्रत्याख्यानं ५, भावप्रत्याख्यानं ६ ॥ १५५१ ॥ नामस्थापनाप्रत्याख्याने सुगमे, द्रव्यप्रत्याख्यानमाह- दवनिमित्तं दवे दवभूओ व(उ)तत्थ रायसुआ। अइच्छापञ्चक्खाणं बंभणसमणा अइच्छत्ति ॥१५५२॥ अमुगं दिजउ मज्झं, नस्थि ममं तं तु होइ पडिसेहो । सेसपयाण य गाहा, पञ्चक्खाणस्स भावमि ॥ १५५३ ।। द्रव्यनिमित्तं प्रत्याख्यान वखादिद्रव्यार्थमित्यर्थः, तथा द्रव्ये प्रत्याख्यानं यथा भूम्यादौ व्यवस्थितः करोति । तथा द्रव्यभूतोऽनुपयुक्तः सन् यः करोति, तुशब्दाद् द्रव्याणां द्रव्येण चेत्यादि ज्ञेयम् । तत्र राजसुताकथा यथा एकस्य राज्ञः सुता भर्तरि मृते पितुर्ग्रहमागता । धर्मार्थिनी पाखण्डिनां दानं दत्ते । अन्यदा कार्तिको धर्ममास इति मांसं प्रत्याख्याय तत्र मासे मांसं नाहरति पूर्णे च मासे पारणे नैकेषां नानाविधानि मांसानि स्वयं ददति, अन्यदा साधून् न्यमन्त्रयत् तैर्भक्तं लात्वा मांसं निषिद्धम् । सा प्राह किं वः कार्तिको न पूर्णः ? तैरूचे यावजीवं नः कार्तिकः । ततो मांसदोषोच्या सा बुद्धा दीक्षिता। एवं तस्याः प्राग् द्रव्यप्रत्याख्यानं पश्चाद्भावप्रत्याख्यानं जातम् । अदित्साप्रत्याख्यानं हे ब्राह्मण! हे श्रमण! अदित्सेति न मे दातुमिच्छा, न तु नास्ति यत् त्वयाऽयाचि । ततश्चादित्सैव वस्तुनः प्रतिषेधात्मिकेति कृत्वा प्रत्याख्यानम्
॥ १५५२ ।। प्रतिपेपप्रत्याख्यानमाह अमुकं धृतादि ममं दीयताम् । इतरस्त्वाह नास्ति मम तदिति न तु दातुमानिन्छा।
मतोऽयं प्रतिष एवं प्रत्याख्यानं प्रतिपेधप्रत्याख्यानम् । ५। भावप्रत्याख्यानमाह 'सेम' शेषपदाना आगमनोआगमे-
त्यादीनां मावादिहानुक्ताना प्रत्याख्यानानां गाथाव्याख्याप्रतिष्ठा स्वयं कार्येति शेषः । इह भावमिति भावप्रत्याख्यानं
पद वक्ष्यमाणम्-
तं दुविहं सुअनोसुअ सुयं दुहा पुव्वमेव नोपुवं ।
पुवसुय नवमपुव्वं नोपुव्वसुयं इमं चैव ॥ १५५४ ॥
तद्भावप्रत्याख्यानं द्विविधं, श्रुतप्रत्याख्यानं नोश्रुतप्रत्याख्यानं च । प्रत्याख्याननामकमेव तं श्रुतप्रत्याख्यानं,
प्रत्याख्यानारुयश्रुतादन्यद् नोश्रुतप्रत्याख्यान, तत्र श्रुतप्रत्याख्यानं द्विधा पूर्वश्रुतप्रत्याख्यानं नोपूर्वश्रुतप्रत्याख्यानं च ।
नत्र पूर्वश्रुतप्रत्याख्यानं नवमं प्रत्याख्यानाख्यं पूर्वश्रुतप्रत्याख्यानं, पूर्वश्रुतादन्यत् इदमेव प्रत्याख्यानाध्ययनं आतुरप्रत्या-
स्यानादि च ॥ १५५४ ॥ नोश्रुतप्रत्याख्यानमाह-
नोसुअपच्चक्खाणं मूलगुणे चेव उत्तरगुणे य ।
मूले सव्वं देसं इत्तरियं आवकहियं च ॥ १५५५ ॥
तृतीयो आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। विभाग। ॥ २ ॥ - मूलगुणा वि य दुविहा समणाणं चेव सावयाणं च । ते पुण विभज्जमाणा पंचविहा हुंति नायव्वा ॥ १५५६ ॥ नोश्रुतप्रत्याख्यानं मूलगुणा उत्तरगुणाश्च । मूलगुणाः प्राणातिपातविरत्यादयो विरतिरूपत्वात् प्रत्याख्यानम् । तथो- तरगुणाः पिण्डविशोध्यादयोऽप्यशुद्धाहारादिविरतिरूपत्वात् प्रत्याख्यान, उत्तरगुणविषयं वाऽनागतादिदशधाप्रत्याख्यानम् ॥१५५५ ॥ मूलगुणप्रत्याख्यानं द्विधा सर्वेमूलगुणप्रत्याख्यानं देशमूलगुणप्रत्याख्यानं च । सर्वमूलगुणप्रत्याख्यानं पञ्च- महाव्रतानि । देशमूलगुणप्रत्याख्यानं पञ्चाणुव्रतानि । एवं उत्तरगुणप्रत्याख्यानमपि द्विधा सर्वोत्तरगुणप्रत्याख्यानं देशोत्तर- गुणप्रत्याख्यानं च । तत्र सर्वोत्तरगुणप्रत्याख्यानं 'दशविधमणागयमइकतं' इत्याद्यग्रे वक्ष्यते । देशोत्तरगुणप्रत्याख्यानं सप्तविषं, त्रीणि गुणव्रतानि चत्वारि शिक्षाव्रतानि । पुनरुत्तर( गुण )प्रत्याख्यानं द्विधा इत्वरं, साधूनां किञ्चिदभिग्रहादिः श्रावकाणां तु चत्वारि शिक्षाव्रतानि, द्वितीयं यावत्कथिकं तच्च नियन्त्रिताख्यं प्रत्याख्यानं यद् दुर्भिक्षादिष्वप्यभनं स्यात् । श्रावकाणां त्रीणि गुणव्रतानि ॥ १५५६ ॥ सर्वमूलगुणप्रत्याख्यानमाह- पाणिवहमुसावाए, अदत्तमेहुणपरिग्गहे चेव । समणाणं मूलगुणा, तिविहं तिविहेण नायव्वा ॥ १५५७ ॥ प्राणा इन्द्रियोच्छ्वासाद्या दश, तेषां वधः, प्राणवधादिषु विषयभूतेषु श्रमणानां मूलगुणा आद्यगुणात्रिविधत्रिविधेन ॥ २ ल
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योगकरणत्रपाम्यां नेतम्या प्रामाः । श्रमणः प्राणातिपातादिविरतस्विविधत्रिविधेनेत्यर्थः ॥ १५५७ ॥ देशमूलगुणप्रत्या-
ज्यानं भावकाणां म्यादिनि तदर्ममोपत आह-
सावयधम्मस्स विहिं वुच्छामी धीरपुरिसपन्नत्तं ।
जं चरिऊण सुविहिया गिहिणो वि सुहाई पावंति ॥ १५५८ ॥
शृणोति यतिभ्यो धर्ममिति श्रावकः प्रपन्नमम्यक्त्वादिगुणः, धीरा अहंद्गणधराः, यं धर्म चरित्वा सुविहिताः सुक्रिया
गृहिणोऽपि मुखानि (प्राप्नुवन्ति) ॥ १५५८ ॥
साभिग्गहा य निरभिग्गहा य, ओहेण सावया दुविहा ।
ते पुण विभजमाणा, अट्ठविहा हुंति नायव्वा ॥ १५५९ ॥
नत्र महाभिग्रहलोत्तरगुणरूपेषु मर्वेष्वेकस्मिन् वा व्रतादौ नियमवन्त इति मामिग्रहाः, निरभिग्रहाः केवलसम्यग-
दर्गनिनः कृष्णश्रेणि कादयः । ओघेन मामान्येन ते पुनर्द्विविधा अपि विभज्यमाना अटविधाः स्युः ।। १५५९ ॥ यथा
दुविहतिविहेण पढमो दुविहं दुविहेण वीयओ होइ ।
दुविहं एगविहेणं एगविहं चेव तिविहेणं ॥ १५६० ॥
तृतीयो विभागः। आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। एगविहं दुविहेणं इकिकविहेण छ?ओ होइ । उत्तरगुण सत्तमओ अविरयओ चेव अट्ठमओ ॥ १५६१ ॥ कश्चनाभिग्रहं लाति, सझेब लाति, द्विविधं त्रिविधेनेति प्रथमो भेदः १। कोऽर्थः द्विविधं इति योगविशेपणं त्रिविधेनेति करणविशेषणम् । तत्र योगाः करणकारणानुमतिरूपा व्यापारा, करणानि योगसाधकानि मनोवाकायरूपाणि, ततोऽयं अर्थः। प्राणा जीवास्तेषां अतिपातं विनाश, द्विविधं करणकारणरूपं, त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन प्रत्याख्यामि इति १ । एवं द्विविधं द्विविधेनेति, कोऽर्थः१ द्विविधं कृतकारितादिरूपं द्विविधेन मनोवाग्-मन:काय-बाकायरूपेण प्रत्याख्यामि २। द्विविध योगं एकविधेन मनसा वाचा कायेन वा करणेनेति तृतीयः ३ । एकविधं योगं कृतं कारितं वा त्रिविधेन करणेनेति तुर्यः ४। एकविधं योग द्विविधेन करणेनेति पञ्चमः ५। एकविधं योगं एकविधेन करणेनेति षष्ठः ६ श्रावक भेदः, श्राद्धस्यानु- मतिनिषेधाभावात्रिविधं योगमिति भङ्गो नोक्तः, यदा मनसा वाचा निपिद्धः तदा कायेन शून्यतया करोति, यदा तु वाचा कायेन निषिद्धः तदा मनसा हिंसकः, यदा मनोवाग्भ्यां ( मन:कायाभ्यां ) निषिद्धः तदा शून्यतया हिंसकवाग्भापीत्यादि. भगा ज्ञेयाः । अनुज्ञा तु त्रिभिरप्यस्तीति सर्वत्र भाव्यम् । तथा कोऽपि उत्तरगुणानां मध्ये कमप्यभिग्रहं लाति, एष सप्तमो भङ्गः ७ । कोऽपि नियमानणादविरतोऽष्टमो भेदः ८॥ १५६०-६१ ।। 45
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पणय चउकं च तिगं दुगं च एगं च गिण्हइ वयाई।
अहवा वि उत्तरगुणे अहवा वि न गिहई किंचि ॥ १५६२ ॥
कोऽपि पाणुव्रतान्यादत्तेऽन्यः ४-३-२-१ इति पञ्चमेदाः, द्विविधं द्विविधेन प्रत्याख्यामीति प्रागुक्तः षड्भर्गुणि-
तासिंगनेदाः स्युः। अथवा कोऽप्युत्तरगुणमध्ये नियम लाति ३१, कोऽपि कञ्चन नियमं न लानि सम्यक्त्वेवक्तव्येव)
स्यान् ३२, एवं ३२ श्राद्धभेदाः ॥ १५६२ ।। स तु श्राद्धः सर्वोऽपि निश्चलमम्यक्त्व(वी) एव स्याद्यतो मूलोत्तरगुणानामा-
घार: मम्यत्वं तत आह-
निस्संकिय निकंखिय निवितिगिच्छा अमूढदिट्टी य ।
वीरवयणमि एए बत्तीसं सावया भणिया ॥ १५६३ ॥
पीसचने श्रीवीरगामने निःशङ्किताः शङ्कारहिताः, निष्कासिताः कासारहिताः, निर्विचिकित्सा विचिकित्सारहिताः,
शादयोऽग्रे वक्ष्यन्तेऽमूहदृष्टिः (एयः) विचारेषु न मूढा दृष्टिरान्तरा मतिरूपा येषां ते । एते द्वात्रिंशदपि श्रावकमेदा:
मम्यग्दर्शनिनो भणिताः ॥ १५६३ ॥
सीयालं भंगसयं पच्चक्खाणंमि जस्स उवलद्धं ।
सो खल्लु पञ्चक्खाणे कुसलो सेसा अकुसला उ ॥१५६४॥
आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। तृतीयो विमागः। यस्य पुंसः सप्तचत्वारिंशदधिकं मङ्गशतं विशोध्यं प्रत्याख्याने उपलब्ध ज्ञातं स्यात् ॥ १५६४ ॥ सीयालं भंगसयं गिहिपञ्चक्खाणभेयपरिमाणं । तं च विहिणा इमेणं भावेयत्वं पयत्तेणं ॥१५६५ ॥ तिन्नि तिया तिन्नि दुया तिन्निकिका य हुंति जोगेसुं। तिदुइकं तिदुइकं तिदुएगं चेव करणाई ॥ १५६६ ॥ पढमे लब्भइ एगो सेसेसु पएसु तिय तिय तियं ति। दो नव तिय दो नवगा तिगुणिय सीयाल भंगसयं ॥ १५६७ ॥ सप्तचत्वारिंशं भङ्गशतं गृहिणां एकैकवतरूपे प्रत्याख्याने भेदपरिमाणं, तच्चानेन वक्ष्यमाणेन विधिना भाव्यं, यथा त्रयस्त्रिकास्त्रयो द्विकास्त्रय एकका योगेषु भवन्ति, त्रीणि द्वे एकं त्रीणि द्वे एकं त्रीणि वे एकं च करणानि । प्रथमं त्रिविधं त्रिविधेनेति मङ्गे एको मेदो लभ्यते । शेषेषु भङ्गेषु त्रिकं त्रिकं चेति भेदा लभ्यन्ते । तथा त्रीणि नव नव त्रीणि नव नव च एवं सर्वे लब्धमेदाः ४९ भवन्ति । ते च कालत्रयेण गुणितास्निगुणिताः सप्तचत्वारिंशं भङ्गशतं स्यात् । स्थापना स + सामायिकाध्ययने एते ४९ मेदाः स्पष्टाः कृताः मन्ति । तत्र गृहिणो ३.३३,२२/२१.११योगा: दीक्षार्थिनः एकादशी प्रतिमा प्रपन्नस्य (स्व)विषयवाह्यारम्माहारादीनामेव १.३.२१३२.१ करणानि त्रिविधं त्रिविधेन नियमः स्यान्नान्येपाम् । एते च १४७ भेदाः पञ्चवतानां स्युः । ततः पञ्चगुणाः ७३५ भेदाः स्युः, यद्वा ३२ श्राद्धभेदा एवं 'पंच- १३३/३९/९३/९/९/ लन्धमेदाः हमणुवयाण, इकगदुगतिगचउक्कपणएहिं । पंचगदसदसपणइकगे य संजोग कायवा ॥१॥ पञ्चानां अणुव्रतानां एकयोगे पत्रभङ्गाः, कोऽर्थ:? कोऽप्यायं एकमेयोचरति १, अन्यो द्वितीय एकमेव २, एवं तृतीयादिध्वपीति ५ मेदाः। ततः द्विवतयोगे १०, त्रिव्रतयोगे १०, चतुत- योगे पश्च, पञ्चवतयोगे १ भेदः, यथा (कोऽपि) प्र०, कोऽपि द्वि०, एवं तृ० च० ५०, एवं पञ्चमङ्गाः। द्वियोगे यथा कोऽप्यायं वतं द्वितीयं व्रतं चादत्ते १, कोप्याद्यतृतीये २, कोऽप्याद्यतुर्य ३, कोप्याद्यपञ्चमे ४, एवं द्वितीयतृतीये ५, द्वितीयतुर्ये ६, दिनीयपत्रमे ७, तृतीयतुर्ये ८, तृतीयपश्चमे ९, कोऽपि चतुर्थपञ्चमे १० लाति । त्रिकयोगे यथा प्र० द्वि० तृतीयानि कोऽपि लाति, परः प्र० द्वि० तुर्याणि २, एवं प्र० द्वि० पं० ३, प्र० ४० च० ४, प्र० ० ५० ५, प्र० च० पं० ६, द्वि० १० न० ७, द्वि० ४० पं०८, द्वि० च० पं० ९, ४० च० पं०१०। चतुर्योगाः प्र० द्वि० ० च १, प्र० द्वि० १० पं० २, १० वि० च० पं० ३, प्र० ० च० पं० ४, द्वि० ४० च० पं० ५ । पञ्चयोगस्यकः प्राणातिपातादीनि पश्चापि कोऽप्या- दन महः १, एवं मेटाः ३१, अथवा कोऽपि कचिनियमं प्रपद्यते, एवं ३२ श्राद्धभेदाः । अत्रैकयोगे पञ्चमेदाः दुविह Chi 5 । आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। तृतीयो विभागः। तिविहेणं पढमो, इत्यादि ६ भङ्गैर्गुणिता जाताः सर्वेऽपि ३० भेदाः, द्विकयोगे तु थूलग पाणाइवायं पञ्चक्खामि धूलगं मुसावायं पञ्चक्खामि दुविहं तिविहेणं १, तथा थूलगं पाणाइवायं पचक्खामि दुविहं तिविहेणं थूलगं मुसावायं पञ्चक्खामि दुविहं ति(दु)विहेणं २, एवं आद्यं दुविहं तिविहेणं द्वितीयं दुविहं एगविह(हेणं) ३, तथाधं तथैव द्वितीयं तु एगविहं तिविहेणं ४, आय तथैव द्वितीयं एगविहं दुविहेणं ५, आय तथैव द्वितीयं एगविहं एगविहेणं ६, एवं भङ्गाः ६ पटू एकेनाद्यव्रतस्थेन दुविहं तिविहेण पदेन लब्धाः, तत आयं व्रतं दुविहं दुविहेणं द्वितीयं दुविहं तिविहेणं १, पुनराधं दुविहं दुविहेणं द्वितीय दुविहं दुविहेणं २ आयं तथैव द्वितीयं दुहिं एगविहेणं ३ इत्यादिभङ्गाः ६ आयव्रतस्थेन दुविहं दुविहेण पदेन लब्धाः एवं भङ्गाः १२, तत आधं दुविहं एगविहेणं द्वितीयं तु दुविहं तिविहेणेत्यादि ६ भङ्गा दुविहं एगविहेण लब्धाः, एवं भङ्गाः १८, तत आयं एगविहं तिविहेणं द्वितीयं तु दुविहं दुविहेणं इत्यादिषइभङ्गैः सर्वे २४ भङ्गाः । तत आधवते एगविहं दुविहेणं पदेन द्वितीयव्रतषड्भङ्गैः ३० भङ्गाः, तत आद्य एगविहं एगविहेणं द्वितीये तु पड्भङ्गपरावर्तिते ३६ भङ्गा जाताः, एवं आद्यद्वितीयव्रतद्वयरूपे प्रथमे द्विकयोगे ३६ श्राद्धभेदा जाताः । यतः कोऽपि आधभेदेन कोऽपि द्वितीयभेदेनोचरतीत्यादि। एवं शेषाणां द्विकयोगानां नवानां ३६ भङ्गाः स्युर्जाताः ३६० एते एव भेदास्त्रिकयोगे पड्गुणाः २१६० भेदाः स्युः, यतो ये द्विकयोगे भङ्गाः सन्ति त एव तृतीयेन पइभिङ्गैः परावर्तितेन गुण्यन्ते । तत्र परावर्तवत्कार्य पश्चिमानुपूज्यैव यथादौ अन्त्यव्रतं पहमङ्गैर्गुण्यते । तावत्प्रथमद्वितीयव्रतयोरेकमेव दुविहं तिविहेणं पदं स्थाप्यते । ततो द्वितीये दुविहं दुविहेणं कथ्यते । आये च दुविहं तिविहेणं पदं अन्त्यव्रते च पड्भङ्गाः प्राग्वत् । ततो द्वितीयं द्विविधैकविधादिमङ्गाः क्रमेण क्रियन्ते । एवं ३६
भः कृतैराये दुविहं दुविहेणं म्याप्यते, एवं यावत् प्रथमस्थाने एगविहं एगविहेण पदं स्थापितं, एवं २१६ भङ्गा जाता:
गरे दशगुणा २१६० मेदाः । गतस्नियोगः, चतुर्योगे यथाऽन्त्ये पड्गुणाः ततः पाश्चात्यपरावर्ते ३६ ततोऽपि पाश्चात्यपरावर्ते
२१६ प्रामत् । तत आद्यस्य पइभिर्भर्गुणने १२९६ भेदा एकैकस्मिन् चतुर्योगे लब्धा ईदृशाः पञ्च चतुर्योगभेदाः सन्ति
नेन पधमिर्गुणने ६४८० मर्वभेदाः । गतवतुर्योगः, अथ पञ्चयोगः, तत्रान्त्ये पट् पाश्चात्ये ३६ ततः पाथात्ये २१६ ततः
पायात्वे १२९६ ततः पाश्चात्ये ७७७६ भेदाः । तत्र सर्वसतथा पञ्चव्रतानां लिख्यते । एकयोगे ३० द्वियोगे ३६० त्रियोगे
२१६० चतुर्योगे ६४८० पञ्चयोगे ७७७६ । मर्चे त्रिंशदादिभङ्गा एकत्र मीलिताः १६८०६ तथा उत्तरगुणान्
दिग्वतादीन कोऽपि लाति कोऽप्यविरत एव । एवं १६८०८ श्राद्ध मेदाः । अत्र गाथाः
वयमिकगसंजोगाण हुँति पंचण्ह तीसई भंगा।
दुगसंजोगाण दसण्ह तिन्नि सट्ठा सया हुंति ॥१॥
संजोगाण दसण्ह भंगसयं इकवीसई सट्टा ।
चउसंजोगाण पुणो चउसट्ठिसयाणिऽसीयाणि ॥२॥
सत्तुत्तरिं सयाई छसत्तराइं च पंच संजोए।
उत्तरगुण अविरयमेलियाण जाणाहि सव्वगं ॥३॥
आवश्यक तृतीयो विभागः। नियुक्ति- दीपिका। सोलस चेव सहस्सा अट्ठसया चेव इंति अट्ठहिया । एसो उवासगाणं वयगहणविही समासेणं ॥४॥ ४८ ३४२ | कालत्रयेणेतभेगस्निगुणितेनागतमाह-' पन्नाससहस्साई, चत्तारि सयाई तह य चउवीसा। काल- २४०० तियगुणियमेयं अणुबयाणं छभंगीए ॥ १॥ एष संक्षेपव्रतग्रहणविधिः । तथात्र षड्भङ्गादयो विक- १६८०६ । पाश्चत्वारः स्युस्तत्र षड्भङ्गयां आयव्रते षड्भङ्गाः, आद्यद्वितीययोस्तु प्रत्येकोचारे १२ संयुक्तोचारे ११७६४८ तु ३६ भङ्गा एवं ४८ भङ्गाः । आद्यद्वित्रियोगे प्रत्येक ग्रहणे १८ द्विसंयोगे ३६ त्रिगुणाः क्रियन्ते १०८ ८२३५४२ जायन्ते यतः प्राणा० मृषा०, अद० मृ०, प्रा० अद०, एवं त्रियोगे २१६ भेदाः सर्वे ३४२ एवं द्वादश- ५७६४८०० व्रतैरपि ज्ञेयाः। इह सामायिकपौषधसंविभागेषु पड्भङ्गथादि तदतीचाराणां न करोमीत्यादिप्रकारो ४०३५३६०६ ज्ञेयः, अन्यथा वा स्वधिया भाव्यं, सामायिके वा बहुसो सामाइयं कुजा मध्यस्थो भूयादिति युक्या २८२४७५२४८ | पौषधे नियमरूपपौषधयुक्त्या वा चिन्त्यम् । सर्वसङ्ख्यैवं इह आद्यव्रते ६ भङ्गास्ततो द्विकादियोगेषु १९७७३२६७४२ पाश्चात्यः पाश्चात्योऽङ्कः सप्तगुणः षड्युतश्च क्रियते । एषा स्थापना चैवम् । १३८४१२८७२० षड्भङ्गीप्ररूपणा ॥ ॥६ RE अथ नामही यथा । मणेणं न करेमि १ वायाए न करेमि २ कारणं न करेमि ३ मणेणं न कारवेमि ४ वायाए न कार. ५ कायेप न कार० ६ मणेण नाणुजाणामि ७ वायाए नाणुजाणामि ८ काएणं नाणुजाणामि ९ एवं नवमगाः एकिकरने, ततो द्वादशवतेषु स्थापना यथाधे एको नवकः, व्रतद्वये ९९ द्वौ नको, व्रतत्रये ९९९ त्रयो नवकाः यावद् द्वादशवतयोगे द्वादशनयकाः । एवं नवमङ्गी । अथ पड्भङ्गथा भेदे २१ भेदाः , अत्रायमर्थः दुविहं तिविहेणभेदे १ एको मतः । दुविहं दुविरुणभेदे त्रयो भङ्गाः, यथा न करेमि न कारवेमि मणेणं वायाए १, न क० न का० मणेणं कारणं २, नक० न का वायाए कारण ३ | तथा द्विविधं एफविधेनेत्यत्रापि ३ भङ्गाः। न करेमि न कारवेमि मणेणं १, न क० न का आयाए २, न क० न का० काएणं ३ । तथा एगविहं तिविहेणं मगद्वयं यथा मणेणं वायाए कारणं न करेमि १, मणेणं वाया कारण न कारवेमि २। एगविहं दुविहेणं मझा ६ यथा मणेणं वायाए न करेमि १, मणेणं काएणं न करेमि २, वायाए कारण न करेमि ३, मणेणं वायाए न कारवेमि ४, मणेणं कारणं न कारवेमि, ५ वायाए कारणं न कारवेमि ६। एगविहं एगविणं मगा ६ यथा मणेणं न करेमि १, वायाए न क० २, कारणं न क० ३, मणेणं न का० ४, वायाए न का० ५, कापणं न कारवेमि ६, एवं एकविंशतिभवाः । अत्रेकद्विकादिसंयोगसंख्यागाथा 'एगाईवयतुल्ला, उबरुवरि पक्खिवे चरमवऊं। छ धनागगुणिया गुणकारा ते ठवह अग्गे'। एकट्यादयो व्रतमाना अक्षा ऊचं ऊर्ध्व स्थाप्यन्ते । तत्र ५ व्रतस्थापना यथा । ततो- जन्यावर्ज पाभान्योऽहोऽने मील्यते । एवं ऊर्चीर्घानिवृत्त्या पूर्वपूर्वाहोऽग्रे योज्यः, इति एकद्वयादिसंयोगसाया स्यात् , सा नगइमनाया पद्गुणपद्गुणवृद्धाकम्य गुणकाररूपा ज्ञेया तद्गुणः पद्गुणाः क्रियते इत्यर्थः, एवं भङ्गकसहया स्यात्। सा चाग्रे
,
श्रावक
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
व्रत-
भङ्गाः।
लेख्या यथा एको द्विके क्षिप्तो जातस्त्रिका, स (च) त्रिके क्षिप्तो जाता: पडित्यादि यावदन्त्यं पञ्चकं मुक्या पश्चादश जाताः।
अथ एकविंशतिभङ्गैः सर्ववतभेदा लिख्यन्ते । तत्राद्यव्रते २१ ततस्त एव द्वाविंशतिगुणा एकविंशतियुक्ताश्च सर्वव्रत-
संख्या क्रमात् , स्थापना । एकोनपञ्चाशद्भङ्ग्यां एकत्रते ४९, व्रतद्वये २४९९, व्रतत्रये १२४ ततो नवकत्रय, व्रतचतुष्के
६२४ नवकचतुष्कं एवं ३१२४ नवकपञ्चकं, १५६२४ नवकपट्कं । एवं व्रतवृद्ध्या लिखिताङ्केभ्यो नवकवृद्धिशैंया यावद्
द्वादश(मे)व्रते द्वादश नवकाः । ७८१२४, ३९०६२४, १९५३१२४, ९७६५६२४, ४८८२८१२४, २४४१४०६२४ ।
२१
४९
निविहं तिविहेण ३३ । १
२३।१
४८३
२४९९
तिविह दुविहेण ३२ । ३
२२ । ३
२०६४७
१२४९९९
तिविहं एगविहेण ३१ । २
२३४२५५
६२४९९९९
२१।३
५१५३६३१
३१२४९९९९९
दुविहं तिविहेणं २३ । ३
११३३७९९०३
१५६२४९९९९९९
दुविहं दुविहेणं २२ । ९
१३ | २
२४९४३५७८८७
७८१२४९९९९९९९
दुविहं एगविहेणं
५४८७५८७३५३५
३९०६२४९९९९९९९९
१२।६
१२०७२५९२१७७९१
१९५३१२४९९९९९९९९९
एगविहं तिविहेणं १३ । ३
११।६ २६५५२९२२७९१४२३
९७६५६२४९९९९९९९९९९
एगविहं दुविहेणं १२ । ९
५८४३१८३०१४२१३२७ ४८८२८१२४९९९९९९९९९९९
एगविहं एगविहेणं ११ । ९
एवं २१
१२८५५००२६३१०४९२१५ २४४१४०६२४९९९९९९९९९९९९
एवं ४९ भङ्गाः
॥ ७ ॥
तत्र यस्मात् श्रावकः धर्मस्य मूलं मम्यक्त्वं तत्त्वार्थश्रद्धानरूपं उपसम्पद्यतेऽतस्तद्विधिः- तत्ध ममणोवासओ पुवामेव मिच्छत्ताओ पडिक्कमइ, सम्मत्तं उवसम्पनइ, नो से कप्पड अनप्प- भिई अन्नउत्थिा वा अन्नउत्धिअदेवयाणि वा अन्नउत्थियपरिग्गहियाणि अरिहंतचेइयाणि वा वंदित्तए या नमंसित्तए वा पुचि अणालत्तएणं आलवित्तए वा संलवित्तए वा तेसिं असणं वा पाणं वा स्वाइम वा माइमं वा दाउं या अणुप्पयाउं वा, नन्नत्थ रायाभिओगेणं गणाभिओगेणं बलाभिओगेणं देवयाभि- ओगेणं गुमनिग्गहेणं वित्तीकंतारेणं, से य सम्मत्ते पसत्थसम्मत्तमोहणियकम्माणुवेयणोवसमखयसमुत्थे पसमसंवेगाहलिने सुहे आयपरिणामे पन्नत्ते, सम्मत्तस्स समणोवासएणं इमे पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियचा, तंजहा-संका कंखा वितिगिच्छा परपासंडपसंसा परपासंडसंधवे ( सूत्रम् ) नत्र श्रमणानां यतीनां उपासकः श्रावकः पूर्वमेवादावेव श्रावको भवन् मिथ्यात्वात्तत्वाश्रद्धानरूपा प्रतिक्रामति निवर्त्तते। सम्यक्त्वमूप मामीप्येन सम्पद्यते स्वीकुरुते । से तस्य नो कल्पते नो युज्यते । अद्यप्रभृति सम्यक्त्वप्रतिपत्तेरारम्यान्यतीर्थिकां- तापमादीन अन्यतीर्थिकदैवतानि रुद्रादीनि अन्यतीर्थिकपरिगृहीतानि वार्हचैत्यान्यहत्प्रतिमारूपाणि महाकालवीररुद्रादीनि बोटिकानि वा वन्दितुं स्तोतुं नमस्कत, वा समुच्चये, न कल्पते इति सम्बन्धः। तद्वन्दनादेर्मुच्यर्थिनामप्रयोजनात् मिथ्यादृशा स्थिरीकरणादेव । तथान्यतीथिकैः पूर्व अनालप्तेन सता तान् आलप्तुं सकद्वादयितुं वार्ता कर्तुं संलप्तुं पुनःपुनर्वादयितुं, गतम्ने मारम्माः स्युः, वादिताथ गृहागमादिप्रसङ्गमारम्भं च कुर्युः, शिशूनां च विकथादिप्रसङ्गस्नेहौ स्याताम् । तेपामशनादि आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। सम्यक्त्वा- धिकारः। ॥ ८ ॥ दातुं सकृत् अनुप्रदातुं असरदातुं च नो मम कल्पते, किन्तु अन्यत्र राजाभियोगाद्याकारेभ्यः राजाभियोगादि विनेत्यर्थः । राजाभियोगादौ ददद् धर्म नातिक्रमते । तत्र राजाभियोगो राजाग्रहः, गणो जनवृन्द, बलाभियोगो बलात्कारः, देवता- भियोगो देवताग्रहः । गुरुनिग्रहो गुर्वादेशः। वृत्तिकान्तारं दुर्भिक्षम् । तत्र राजाभियोगे कार्तिकश्रेष्ठी दृष्टान्तः, स नैगमाष्टस- हस्रमुख्यो हस्तिनापुरे गृहीतसपरिवारजितशत्रुराजाग्रहाल्लिङ्गिनो मास(क्षपण)पारणे स्वयं परिवेषकोऽभूत् , लिङ्गी च तदाङ्गुलिं चालितवान् कथं ते सम्यक्त्वमिति तेन निदेन नैगमाष्टसहस्रयुक् श्रीसुव्रताईत्पार्श्वे प्रव्रज्य चतुर्दशपूर्वी द्वादशसमपर्यायः सौधर्मे शक्रत्वं प्राप्तो लिङ्गी च तेनाभियोगेनैरावणोऽभूदिन्द्रं दृष्ट्वा नष्टो गृहीतः शक्र आरूढः द्वे शीर्षे कृते शक्रावपि द्वौ जातौ । एवं यावन्ति शीर्षाणि करोति तावन्ति शक्रोऽपि रूपाणि । ततो नश्यन् वजाहतः स्वस्थोऽस्थात् । गणाभियोगेन वरुणो स्थमुशले युद्धे प्रवृत्तः । एवं श्राद्धोऽपि गणाभियोगादन्यतीथिकानां ददाति । देवताभियोगे कोऽपि नवश्राद्धो जातः। पूर्वगोत्रजादिव्यन्तराण्यत्यजत्, सुर्या तद्गावः सुतचापहृताः श्राद्धं च वक्ति किं मां त्यजसि ? श्राद्धेनोक्तं अर्ह- त्पतिमान्ते तिष्ठ तत्रार्चयामि । ततः सुरी तत्र स्थिता गाः सुतं (च) आनयत् । ३ गुरुनिग्रहे बौद्धः श्रावकपुत्रीं छद्मना परि- णेतुं कपटश्राद्धो भूत्वा सम्यग् निविष्टे श्राद्धो जातः, छमालोच्य श्रेष्ठिनोद्वाहितः । पृथग् गृहं कृत्वा स्थितः। अन्यदा पितृभ्यां बौद्ध भिक्षुभ्यो भक्तं विधायाग्रहेणाबानाय प्रेषितः । तैरभिमन्त्रितफलदानेन परावृत्तो गृहमेत्य प्रियामूचे भिक्षुभ्यो भक्तं दद्मः श्राविका नैच्छत् । तत्सेवका भोज्यं कत्तुं प्रवृत्ताः । श्राविकया गुरुभ्य ऊचे । तैर्योगप्रतिभेदो दत्तः, स तया- ऽभ्मसा तस्य दत्तः । बौद्धव्यन्तरा नष्टाः । स भावुके जातेऽवक् किमेतद्भोज्यम् ? । ततः प्रियोक्त्या ज्ञात्वा तत्प्रासुकं माघम्यो ददौ । वृत्तिकान्तारे सौराप्टिकः भादोऽवन्त्यां दुर्मिक्षे यान् शम्बलत्रुटौ चौद्धशम्बलं निहाय वदन् तैर्निर्वायते मोऽतिमारामृतस्तरन्ते बरक्ताम्मरेष्टयित्वा त्यक्तः । म नमस्कारेण मृत्वा वैमानिकदेवो जातः । स्वं मवं वीक्ष्यमाणो नयमाच्छादितदेहं दृक्ष प्राग्भवे स्वं चौद्धं मन्यमानो बौद्ध भिक्षुणां भक्तिं चक्रे । भिक्षाकाले भूपितकरेणाकाशस्थेन तेभ्यो मिक्षा दते । नेन बौद्धोननिर्जाता । श्राद्वैर्गुरूणामागतानां ज्ञापितम् । गुरुभिरुचे । देवस्य कर लात्वा भणत 'नमो अरिहं- ताण सुजन गुन्मगा'। नैस्तथाकृतं देवः मम्मुदो नत्वा लोकमचे । बौद्धषु न धर्मः, जैनधर्मः सत्य इति म श्राद्धोऽभूत् । गन्यतीथिकाणां तद्भक्तानां च दाने मिथ्यात्वस्थिरीकरणं, भक्तदाने तु सम्यक्त्वलाञ्छनं आरम्भदोपश्च, दयागोचरत्वं प्राप्नानां तु दद्यादपि यतः ‘मवेहिं पि जिणेहिं दिसड (दुजय) जियरागदोसमोहेहिं सत्ताणुकंपणट्ठा दाणं न कहिं व (महिनि) पडिमिदं ' । तथाऽईन्तोऽप्यनुकम्पया सांवत्सरदानं ददति । अत्र क्षेपकं पदं । ' से य सम्मत्ते पसत्थेत्यादि । नन्यम्यां किमुच्यते इत्याह प्रशस्ता उजवलीकृता मिथ्यात्वपुद्गलास्ते सम्यक्त्वमोहनीयकणिव उच्यन्ते तद्वेदनसमुत्थं आधुनिककाले वर्तमान क्षायोपगमिकसम्यक्त्वम् । तथा मम्यक्त्वाणूपशमसमुत्थं प्राग्वर्णितं औपशमिकं सम्यक्त्वम् । तथा गम्यक्त्या गुवयममुन्धं वायिकसम्यक्त्वम् । एते द्वे अधुना न स्तः। परं सम्यक्त्वं सर्व प्रशमसंवेगादिलिङ्गः प्रशमसंवेगादिलक्षणं शुभ आत्मपरिणामः प्राप्तोऽर्हता। एतावता शुभपरिणामस्तत्वत्रयश्रद्वानरूपः सम्यक्त्वं स्यादित्यर्थः। 'सम्मत्तस्स' श्रमणो- पागकेन धान केणेमे पञ्च, 'अतिचरति' सम्यक्त्वं यात्येभिरित्यतिचाराः दोपा ज्ञातव्याः श्रद्धानज्ञानाम्यां न तु समाचरित. व्याः । तमधेत्युदाहरणोपन्यासे । शङ्का मतिदौर्बल्याजिनोक्तेषु संशयः शङ्का, सा द्विधा देशतः सर्वतश्च, तत्र देशतः किं जीवो ARRENCE
'
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका
--
त्रीणि
शतानि
त्रिषष्यधि-
कानि
पाख-
ण्डिनः।
॥ ९ ॥
देहमात्रो विश्वमात्रो वेत्यादिरूपा । सर्वतः किं जीवोऽस्त्यहन्नभून्नवेत्यादि । तत्र सर्वाईदाज्ञा प्रमाणमेव कार्या। 'पयमक्खरं
पि एक जो य न रोएइ यो न रोचयति न श्रद्धत्ते सुत्तनिद्दिढ । सेसं रोयन्तो रोचमानो वि हु मिच्छा(च्छ)द्दिट्ठी मुणेयब्चों' ।।
इह संशयोऽपि मिथ्यात्वमेव ।११ कासा परदर्शनेष्वभिलाषः । सा च द्विधा देशतः सर्वतश्च । देशतः सौगतं दर्शनं कासति ।
सर्वतः सर्वदर्शनानि काशति । अथवैहिकामुष्मिकफलानि कासति, तदपि न युक्तं समयनिषिद्धत्वात् , मुक्ति विनान्या
कासा न कार्या २ । विचिकित्सा पुण्यफलं प्रति सन्देहः । यद्वा विदो विद्वांसस्तेपां जुगुप्सा विजु(ज्जु)गुप्सा साधूनां निन्दा
यथा 'अस्नाना एते' इत्यादि ३ । परपाखण्डानां परमतानां प्रशसा स्तुतिः। तानि यथा ' असीइसयं किरियाणं अकिरिय-
वाईण होइ चुलसीई। अण्णाणी सत्तट्ठी वेणइयाणं तु बत्तीसं। १ । कालो १ सहाव २ नियई ३ पुवकयं ४
पुरिस कारणे पंच । समवाए सम्मत्तं एगंते होइ मिच्छत्तं' । २। अत्रैकान्तवादिनां मतं लिख्यते । कालवादी वक्ति
कालेन विश्वमुत्पद्यते कालेन वर्द्धते, कालेन जरामेति, कालेन विनश्यति । अतः काल एव विश्वोत्पत्तिहेतुः । १ । स्वभाव-
वाद्याह- स्वभावेन सर्वविश्वोत्पत्तिः स्यात् । कः कण्टकान् तीक्ष्णान् करोति, को मोरं चित्रयति, कोऽब्जानि सुरमयति
इत्यादिकं सर्व स्वभावेन निष्पद्यते । नरस्य नृस्वभावः, स्त्रियाः स्वीस्वभावः इत्यादि ।२। नियतिवाद्याह-नियतिर्मवितव्यता
कथ्यते । सा यत्करोति तद्भवति । यद्भावि वर्तते तदिन्द्रेणापि न रक्ष्यते । यद्भावि नास्ति तत्केनापि न भवति । यद्वस्तु
यदा भाव्यस्ति तत्तदैव भविष्यति किं स्यात् बहूपक्रमैरपि । तथा प्रसूति भूत्वा कपर्दानि क्षिप्तानि एकानि समानि पेतुः
अन्यान्यधोमुखानि पेतुरित्यादौ नियतेरेव प्रमाणम् । इह नियतिर्नाम द्रव्यक्षेत्रमा विशिष्टः कालभेदः ३। कर्मवाद्याह
॥ ९ ॥
. गत्कर्म करोति तदेव म्यात् अन्यत्मचं वृथा ४ । पुरुषकारवायाह आत्मोपक्रमेणैव विश्वं निष्पयते । आत्मा विश्वं सृजति आरमा पालयति आत्मा संहरति । यावदेते पचवादिनः स्वीयं स्वीयं मतं स्थापयन्ति तावन्मिथ्यात्वं चेत्समवायेन पश्चापि कालादीन् मन्यन्ते तदा सम्यक्त्वं स्यात् । यो भार एकेन द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिरनुत्पाट्यः सन् पञ्चभिर्जनरुत्पाटितः स्यात् म चेदेकेनोपारितः कथ्यते तर्हि मिथ्या, पश्चभिरुत्पाटितः कथ्यते तर्हि सम्यक् । तथा विश्वं पश्चभिर्निष्पाद्यमानमस्ति । तंत्र स्थाप्यते तन्मिथ्यात्वम् । ममवायो यथा केनापि जीवेन स्थानाद्युपक्रमं कृत्वा वृक्ष आरोपिता, जीवयोगात् कालेन बर्दितः, म्वभावेन मधुरादिरसो जातः, कम्मतश्विरस्थायी भूतः, भवितव्यतया यथासतयं पत्रफलशाखादिवा(मा)नजनि । इत्यं मस्मिन जीवाजीवरूपे विश्वे पश्चापि वचांसि ज्ञेयानि । तथात्र नवतत्वेऽशीतिशतक्रियावादिन इति नाम्ना पाखण्डिनो भवन्ति, मणन्ति च जीयोऽस्ति क्रियां च करोति । तत्रैके आहुः अस्ति जीवः स्वतो नित्यः कालतः १ । एके आहुः अस्ति जीवः पतोऽनित्यः कालतः २ । एके आहुः अस्ति जीवः परतो नित्यः कालतः ३ । एके आहुः अस्ति जीवः परतोऽनित्यः कालतः ४ । स्वत इति आत्मस्वरूपेण । परत इति घटादिपदार्थापेक्षया इस्वत्वदीर्घत्ववदिति । एवं जीवपदं चतुर्की काल- पायाह । इत्यमेव म्वभाव २ नियतीश्वरात्मवादिनः पश्चापि चतुर्की चतुर्द्धा वदन्ति । एवं विंशतिर्जीववादिनो जाताः । एवं अजीवपुण्यपापाश्रयसंवरनिर्जराबन्धमोक्षेषु प्रत्येकं प्रत्येकं विंशतिर्वादिनो भवन्ति । एवं सर्वेऽशीतिशतक्रियावादिनो भवन्ति । तमेवरो नैयायिकर्मन्यते । मीमांसकैः सर्वत्रैक एवात्मा मन्यते । तथाऽक्रियावादिनः 'सर्व क्षणे क्षणे विनश्यति प्रतः कारणात् कोऽपि क्रियां न करोति ' ईदृशं वदन्ति । ते चतुरशीतिभेदाः स्युः । तत्रैके इत्थमाहुः नास्ति आत्मा स्वतः - 15
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
त्रीणि
शतानि
त्रिपथ्याधि-
कानि
पाख-
ण्डिनः।
॥१०॥
कालतः १ । एके आहुः नास्त्यात्मा परतः कालतः २ । इत्थं जीवमाश्रित्य कालवादिभेदद्वयेन भवति । इत्थं स्वभाव २
यदृच्छा ३ नियति ४ ईश्वर ५ आत्मवादिनो भेदद्वयेन भवन्ति । एवं जीवमाश्रित्य वादिनां द्वादशभेदाः स्युः। तत्र
यदृच्छा सा कथ्यते यत्किञ्चिदकस्माजायते, सा नियतेरेव भेदः। उपक्रमे क्रियमाणे न टलति सा नियतिः स्यात् । अथवा
यदृच्छा सा कथ्यते या न नियतित्वेनोत्पत्तिः यथेदृशं नास्ति यद्गोधूमा गोधूमेभ्य एवोत्पद्यन्ते किन्तु वंशादिकेभ्योऽप्युत्प-
धन्ते इत्यादि । इत्थं पुण्यपापे वर्जयित्वा अजीवादिपट्तत्वानां द्वादश द्वादश भेदैर्वादिनः स्युः एवं सर्वे चतुरशीतिभेदाः
अक्रियावादिनाम् । ये आत्मानं न मन्यन्ते ते पुण्यपापे तत्त्वमध्ये पृथक् न गणयन्ति । तथा सप्तपष्टिरज्ञानिनः, ते जीवादि-
नवतचानां सोत्पत्तीनां भेदैः स्युः। यथैके आहुः जीवोऽस्ति इत्थं कोऽपि वेत्ति कोऽपि न वेत्तीत्यर्थः, किं कार्य तेन ज्ञातेन
१ । के आहुः नास्ति जीव इति को वेत्ति किं कार्य तेन ज्ञातेन २ । के आहुः जीवोऽस्ति नास्ति च देशकालविशेपेण
पुनरित्थं को जानातीत्यादि । के आहुः जीवोऽवक्तव्यः, इत्थं को वेत्ति किं कायं तेन ज्ञातेन ४ । के आहुः जीवः
सदवक्तव्यः, इत्थं को वेत्ति किं वा तेन ज्ञातेन ५ । के आहुः जीवोऽसदवक्तव्यः, इत्थं को वेत्ति किंवा तेन ज्ञातेन ६ ।
के आहुः जीवः सदसदवक्तव्यः, इत्थं को वेत्ति किं वा तेन ज्ञातेन ७ । इत्थं सप्त वादिनो जीवे जाताः । इत्थं के आहुः
अजीवोऽस्ति को वेत्ति किं वा तेन ज्ञातेन इत्यादि सप्त वादिभेदाः । इत्थं शेषेषु तत्वेषु ज्ञेया:, एवं सर्वे त्रिपष्टिर्भेदाः ।
तथा के आहुः उत्पत्तिरस्ति को वेत्ति किं वा तया ज्ञातया १। के आहुः नास्ति भावोत्पत्तिः को० २ । के आहुः
अस्ति नास्ति भावोत्पत्तिः को० ३। केप्याहुः उत्पत्तिरवाच्या को०४, इत्थं ज्ञानं मन्यन्ते । एवं चतुर्मिरुत्पत्तिमेदवादिभिः
॥ १० ॥
सह मतपष्टिरमाननादिनो मेदाः स्युः । अत्रोत्पत्तिवादिनयतुर्मिरेव भेदैः स्युः, सदवक्तव्यादिमेदत्रिकं न स्यात् । तथा दाधिमदिनयवादिनो बैनयिकाः स्युः । तत्र आहुः देवानां मनसा विनयः क्रियते १ केप्याहुः वाचा क्रियते २ केऽपि कायेन ३ केऽपि दानेन क्रियते ४, देवविषये चत्वारो विनयवादिभेदाः। इत्थं राज २ यति ३ ज्ञाति ४ वृद्ध ५ प्रनास्तिक ६ पितृ ७ मात ८ विषये मनोविनयादिकचतुमेंदे विनयवादिनो भवन्ति, एतानष्टौ चतुर्गुणान् कृत्वा द्वात्रिंश- नयिक मेदाः म्युः । एवं १८०-८४-६७-३२ । एवं सर्वे एकान्त( एकत्र )स्थापने त्रिशतानि त्रिपष्टिश्च पाखण्डिनः । यतः पक्रियावादिनः आहुः अस्त्येव जीवः तन्मिथ्या, ययेकान्तेन जीवः सन्नेवास्ति तर्हि यथा जीवो जीवत्वेऽस्ति तथा जीवोऽजीवत्वे स्यात् पुनरित्यं न स्यात् । अतो जीवादिकं सदसद्वाच्यं स्वरूपेऽस्ति पररूपे नास्तीत्यर्थः। यदेकान्तेन नित्यमनित्यं च म्याप्यते तन्मिथ्यात्वम् । यदि जीव एकान्तेन नित्य एव स्यात् तर्हि कथमुत्पद्यते विनश्यति च । गधनित्य एवं म्यात् तर्हि को बध्यते को मुच्यते ? तपःक्रियास्मृत्यादिव्यवहारोछेदश्व । परं जीवो द्रव्यत्वेन नित्यः देवनगदिपर्यायपगवर्नेनानित्यश्च स्यात् । इत्थमजीवादिकमपि ज्ञेयम् । यजीवोऽस्ति पुनः कालतो नित्यः स्वभावतो नित्य इत्यायेकान्तस्थापनेन पाखण्डिनो भवन्ति । परं जीवाजीवादिकं स्वभावादेव नित्यानित्यमस्ति । तत्र कालमवितव्य- तादिमहकारिहेतयो नेयाः । तथा जीवो नित्यानित्यः सचान्यथानुपपत्तेः व्योमवत् । तथा वस्तु समुदायेनैव स्यात् सहका- रिमापेक्षत्वात् पटवत् । तथाऽक्रियावादिनो जीवादिकं सदपि नास्तीति वदन्ति ततः पाखण्डिनः । अज्ञानिनो ज्ञानममन्यानाः १ अपमः इति हारि० वृत्तौ पृ. ८१७१२ आवश्यक नियुक्ति दीपिका। सम्यक्त्वा- तिचाराः॥ ॥ ११ ॥ पाखण्डिनः । तथास्त्यनन्तज्ञानं तारतम्यवत्त्वात् परिमाणवत् यथा तयोग्नि स्थितं तच्चैदं जिनैः (प्रोक्तं)। वैनयिकाः पात्रा- पात्रविचारणानिरपेक्षत्वेन विनयं मन्यमानाः पाखण्डिनः । तथा विनयः पात्रे कार्यः सत्फलत्वात् दृष्टिवत् । तत्र सम्यक्त्ववतै- कान्तो न स्थाप्यः किन्तु सर्वे द्रव्यतो नित्यं पर्यायतोऽनित्य च, पुनः स्वरूपेणास्ति पररूपेण नास्ति । इत्थं नित्यानित्यं अस्तिनास्तिरूपं मान्यम् । ज्ञानवादी केवलं ज्ञानमेव स्थापयति, दर्शनवादी तु दर्शनं, चारित्रवादी चारित्रमेव । परमेकेन ज्ञानादिना मुक्तिर्न स्यात् । ज्ञानदर्शनचारित्रेषु मिलितेषु मुक्तिः स्यादिति ज्ञेयम् ४ । परपाखण्डिनां संस्तवः परिचयो गृहागमैकत्रवासभोजनादिरूपः ५। तत्र शङ्कायां दृष्टान्तः । द्वौ सुतौ लेखशालायाः शीताशनायायातः, मात्रा पेयायां माषाः क्षिप्ताः । एको मक्षिकाधिया पिबति, तस्य वल्गुलीव्याधिरुत्पन्नो मृतश्च । अन्यो मन्माता मक्षिका न दत्ते इति (पिचति) जीवितः । कालायां राजामात्यश्चाश्वहृतौ चने क्षिप्तौ । क्षुधा फलान्यत्तः । वलमानो राजा दध्यौ । लड्डुकादि बह्वमि । तत एतेन सूपकारोऽभाणि, यल्लोके ख्यातं तद्भव्यं राघ्यम् , ततो राद्धे सर्व इदं भव्यमिदं भव्यमिति बहु बुभुजे शूलेन मृतः। मन्त्री यत्तद् भुञ्जानो भोगभाग जातः २ । श्राद्धो नन्दीश्वरद्वीपगमनं दिव्यगन्धो देवसंघर्षण जातः । मित्रप्रश्नं विद्यादानं, तया विद्यया कृष्णचतुर्दश्यां श्मशाने चतुःपादशिक्यकेनाधः खदिराङ्गारेषु अष्टशतं वारान् जपित्वा पादपादछेदने नम उत्पातः । श्राद्धेन मित्राय दत्ता । स साधनाय शिक्यारूढः संशयानश्चौरेण लोप्तयुतेन राजनरमारणभयाद्वादित इत्यादि लोप्नं दत्त्वा, विद्यात्ता चौरः शिक्यारूढः साहसाजापादनु छेदे उत्पतितः । साधकेन सेत्स्यति नवेति विचिकित्सया दत्ता। चौरेण श्राद्धेनास्य दत्तेति ततः शुद्धेति निश्चलचित्तेनात्ता । ततश्चौरेण राजनृभ्यः साधकोऽश्मपातान्मोचितः तस्यापि विद्या मिझा दावपि आदौ जातौ ३ । यद्वा विदां माधूनां जुगुप्सा विजुगुप्सा विदुगुंछा, साघवोऽस्नानात् प्रस्वेदजल क्लिमा मलिनत्वाद् दुर्गन्धाः स्युः । तत्र एकः श्राद्धः प्रत्यन्ते वसति । तत्पुत्रीविवाहे साधूनागतान् पित्रुच्या प्रतिलम्मयन्ती मल- गन्धं जात्वाऽईना भन्यो धर्म उक्तः, परं शुद्धजलेन स्नाने को दोपः ? इति दध्यौ । तयानालोच्य मृत्वा राजगृहे वेश्यासुता जाता दुर्गन्धत्वाद त्यक्ता अणिकेन दृष्टेत्यादि पृच्छा । सा तदैव तत्कर्म वेदित्वा गन्धहीना आमीर्या वर्द्धिता यावत् १२ वर्षाणि श्रेणिकपत्नी जाता । पृष्ट्यारोहेण श्रेणिकेनोपालक्षि ततो दीक्षिता । अन्ये आहुः वणिकुले आयाता परं गर्भस्थायां अरतिदेतत्वात्पातनानि कृतानि । ततो जाता त्यक्ता । अष्टवर्षाणि राज्ञीत्वं । परपाखण्डप्रशंसायां चन्द्रगुप्तेन भिक्षुवृत्ती हनायो मिक्षवस्तस्य धर्म जगदुः, राजाऽतुष्यत् चाणिक्यं पश्यन् तदप्रशंसातो न दत्ते । भार्याप्रेरितचाणाक्यः सुभाषित- मिति जगौ। राता सान्या च वृत्तिर्ददे । द्वितीयेऽति चाणिक्येन राजोक्तः किं त्वया दत्तं ? सोऽवक युष्मत्प्रशंसातः । मोऽवर (न)मयेत्युक्तं । अहो सर्वारम्भिणो रञ्जनाय कुर्युरिति । ततो राजाऽस्थात् ततो न शंस्याः । संस्तवे प्रागुक्तः सौराष्ट्रः श्राद् एव ५ । एभिरतीचारै रहितः सम्यक्त्वोऽणुव्रताधर्हः स्यातदाह ॥ थूलगपाणाइवायं समणोवासओ पञ्चक्खाइ, से पाणाइवाए दुविहे पन्नत्ते, तंजहा संकप्पओ अ आरंभओ अ, तत्थ समणोवासओ संकप्पओ जावजीवाए पचक्खाइ, नो आरंभओ, धूलगपाणाइवाय. वेरमणस्म समणोवासपणं इमे पंच अइयारा जाणियचा, तंजहा-बंधे वहे छविच्छेए अइभारे भत्त- १ पाणबुच्छेप १ (सूत्रम् ) ।। 1%
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
प्रथमव्रत-
स्वरूपम-
तिचाराच।
॥१२॥
स्थूलः सवलोकसिद्धो द्वीन्द्रियादिः, तस्य प्राणा इन्द्रियाद्याः, तत्र पञ्चेन्द्रियाणि ५ उच्छ्वासनिःश्वासः ६ मनोवलं ७
वाग्वलं ८ कायबलं ९ आयुः १० प्राणास्तेषां मध्ये एकेन्द्रियेषु स्पर्शेन्द्रियोच्छासायुःकायबलाख्याश्चत्वारः प्राणाः, द्वित्रि.
चतुरिन्द्रियेषु क्रमात् षट्सप्ताष्टप्राणाः रसनेन्द्रियायेकैकेन्द्रियाधिक्यस्य वाग्बलस्य चाधिक्यात् । असंज्ञिपञ्चेन्द्रियेषु मनोबल-
हीनत्वानव, संज्ञिषु समनस्त्वाद्दश प्राणाः, प्राणानां अतिपातो विनाशस्तं श्रावकः प्रत्याख्याति त्यजति । प्राणातिपातो
द्विविधः संकल्पज आरम्भजश्च । संकल्प्य मनसा ज्ञात्वा हिंसा संकल्पज । आरम्भे हलखननादौ जाता हिंसाऽऽरम्भजः ।
तत्रैकेन्द्रियाणां संकल्प्यैवारम्मः स्यात्तेनैकेन्द्रियारम्भं न प्रत्याख्याति । त्रसहिंसा तु संकल्पतो निरारम्भो यावज्जीवं
प्रत्याख्याति । परं सापराधसापेक्षान् मुक्त्वा । एवं सपादविशोपकोऽनर्थदण्डत्यागिगृहिणः स्यात् । अस्यातीचारा:-बन्धो
रज्वादिना, वधो दण्डादिना, तत्र गाढ बन्धवधौ अतिचाराय, छविर्देहस्तस्य छेदः पाटनं अङ्कनकर्णकल्पनादिः, अतिभारः
अतिभारारोपः, भक्तपानव्यवच्छेदः स्पष्टः ५ । एतान् समाचरन् प्रथमव्रतं अतिचरति लोकनिन्धश्च स्यात् । तत्र श्राद्धस्य ते
पशवो घटन्ते ये बन्धं विना अल्पेन वा तिष्ठन्ति । कारणे दययाश्ववालादीनां बन्धवधादिषु रोगिलचन्नादौ च स्वल्पो दोषः।
एषां दोषाणां त्यागेन भोगान्तरायादि जयति । तथा हिंसायां दोषदृष्टान्तः कोकणस्य, यथा तेन प्रियामृतौ नवपत्न्या
लामायेपुणा सुतो हतः। हिंसानिवृत्तौ गुणाः साप्तपदिकः सामायिकाध्ययने व्याख्यातः। 'सत्तवईए कुंकणगदारए' इत्यादौ ।
तथाऽवन्त्यां श्रावकसुतो मालवकैहत: सूपकृता क्रीतो जीवान् जहि । सोऽहन(न)न् सूपकृत्कुचितः। तारं रुदन् नृपपृष्टी
यथास्थम्चे। राज्ञोऽपि किं न हंसीत्युक्तेऽप्यनन् स इभधर्षणाभयं दर्शितस्तथाप्यनन् स्वाङ्गरक्षो विहितः कालेन स्थविरान्ते
.
RAL
॥ १२ ॥
दीधितः । पाटलिपुत्र जितमयुगवः क्षेममन्त्री स नृपमान्यो दयी धर्मी राज्ञो हित इत्यन्यराइभिस्तदुदयासहै। क्षेमजनै- वत्रापैः परावामिमरजीत राजा क्षेमोपरि कोपितः । क्षेमो निगृहीतोऽवगहं सर्वसन्चानां क्षेमकरः किं पुना राजः ? नथापि राजा वध्य आजप्तः । तत्र रानोऽशोकवनिकायामगाधा सोत्पलपमा पुष्करणी परं मकरग्राहेर्दुरवगाहा स्यात् । कोऽपि नत्पपान्युच्छेत्तुं नालम् । यो वध्यः स्यात् स पमानयने प्रेर्यते । क्षेमस्तत्र नीतो 'नमुत्धुणं अरिहंताण' भणित्वा यद्य- इ निमन्तुस्तदा मुरी सानिध्यं करोत्विति साकारं भक्तं प्रत्याख्यात् सुरीसान्निध्यान्मकरपृष्टिस्थो बहुपमान्यानीयोत्तीर्णः । गया रटेन क्षमयित्वोपगूढः । वैरिणो निगृह्योक्तः कं वरं ददे ? गाढाग्रहोऽपि तेन दीक्षावरोऽयाचि आत्ता च । एवमिह- लोकगुणाः परत्र मुदेवनृदीर्घायुस्त्वादि नेयम् । थूलगमुसायायं समणोवासओ पचवाइ, से य मुसावाए पंचविहे पन्नत्ते, तंजहा-कन्नालीए गवा- लीप भोमालिए नासावहारे कूडसक्खिज्जे । धूलगमुसावायवेरमणस्स समणोवासएणं इमे पंच अइयारा जाणियन्वा, तंजहा-सहस्सम्भग्वाणे रहस्सभक्खाणे सदारमंतभेए मोसुवएसे कूडलेहकरणे २॥(सूत्रम्) मृपावादो द्विधा, स्थूलः सूक्ष्मश्च । तत्र स्थूलः स्वान्ययोर्महाक्लेशहेतुः, सोऽर्यादनाद्वा न वाच्यः । स्थूलश्वासौ मृषा- पादति गमासः, तत्र म्धूलः कन्यालीकादिः, कन्याग्रहणाददोषलघुप्रौढकुमारवराणामपि कूटं कथनं कन्यालीकं १, तत्र १ ' मारपृष्टिस्यः पमानि लात्योत्तीर्णः, राज्ञा त्रिः क्षामितः विपक्षनिप्रहं कृत्वोक्तः किं ते वरं ददे ? म निरुध्यमानोऽपि प्रामा' इति पाठोऽन्यप्रती। DH
नावश्यका
नियुक्ति-
दीपिका।
द्वितीयव्रत-
स्वरूपमति-
चाराश्च ।
॥१३॥
कन्या कदापि द्वेषात् कूपादौ पतेन् । गोरुपलक्षणात् पशूनां सदुग्धत्वादिमृषावदनं गवालीकं २ । भूम्यलीकं स्वां भुवं परां
वक्तीत्यादि, ऊपरां भव्यां वक्तीत्यादि, बहुधान्यामल्पधान्यामित्यादि ३ । न्यासो द्रव्यस्थापना तदपलापो न्यासालीकं ४ ।
कूटसाक्षिः स्पष्टा ५ । एतैरन्तरायाणां बन्धः स्यात् । सूक्ष्म अलीकं कूटक्रयादेरितरत् । सहसाऽभ्याख्यानं त्वं चौर इत्यादि
१ । रहस्याभ्याख्यानं कस्याप्या (कांश्चिदा) लोचयतो वक्तीदं अयुक्तं विमृशन्तः सन्तीत्यादिकथनं २ । स्वदारेत्युपलक्षणा.
स्वकलत्रमित्रायुक्तस्य मन्त्रस्येति रहस्यस्य भेदोऽन्येभ्यः कथनं ३ । मृषोपदेशः कूटवार्तादिकृतिः कूटोपदेशश्च ४ । कूटलेखः
कूटलेखस्य लिखनं कूटलेखलिखनम् । न्यासापहारे पुरोधा दृष्टान्तो नमस्कारे । मृषोपदेशे परिव्राट् नरमूचे किं क्लिश्यसेऽहं ते
निषण्णस्य धनमर्जयामि यथा याहि व्याकुलं वणिजं मार्गयोच्छिन्नं जनदानग्रहणाकुलत्वे कालान्तरे पुनः पुनः मार्गयेः।
मां साक्षिणं कुर्याः। स तथायाचत तेनादत्ते गाढमवक् मम द्रव्यं न दत्से ? इयन्मानं च । एवं वारत्रयं याचितोऽददत्करण
नीतस्तेन परिबाजा साक्षिणा जितोऽधनायादात् । मृषाऽभाषणे गुणः । कोकणः श्राद्धोऽत्र उक्तः । अश्वं नश्यन्तं हन्धि ? तेन
हतो मृतश्च । अश्वेशा करणं नीतः पृष्टः कस्ते साक्षी ? अश्वेशाऽस्य सुतो मे साक्षीति पुत्रः पृष्टोऽवक् सत्यमेतत्तुष्टं करणं
तमपूजयत् । लोकोऽशंसत पितापि मुक्तः । अभ्याख्यानादौ स्वान्यमृत्याद्या दोषाः स्युः हास्यादिनाप्यनृतं न वाच्यम् ।
मृषातो मुखविगन्धत्वादिदोषः ५।
थूलगअदत्तादाण समणोवासओ पचक्खाइ, से अदिन्नादाणे दुविहे पन्नते, तंजहा-सचित्तादत्ता-
दाणे अचित्तादत्तादाणे अ। थूलादत्तादाणवेरमणस्स समणोवासएणं इमे पंच अइयारा जाणियब्वा,
.
॥ १३ ॥
तंजहा-तेनाहडे तक्करपओगे विरुदरजाइकमणे कूडतुलकूडमाणे तप्पडिरूवगववहारे ३ ॥ (सूत्रम् ) अदत्तम्यादानं ग्रहण द्विधा स्पूलं यक्ष्मं च । तत्र स्प्लं चौर्य गृहारण्यमार्गक्षेत्रादिपु न कार्यम् । सूक्ष्मं वणिग्वृत्यादानम् । म्यूलमक्ष्मे अपि द्विधा मचिनविषये अचित्तविषये च । तत्र सचित्तं मजीवं वस्तु, अचित्तं निर्जीवं, अन्यवस्तुनो धनिकानुक्या- दानेननादानमेव । स्तनाचौरास्तैराहतं आनीतं स्तेनाहृतम् । चौरैर्विक्रयायानीतं ज्ञात्वा लातोऽतिचारः। श्राद्धन हि चौरस्थानेषु न वस्तव्यं न प्रविश्यं हिंसोपकारि न देयम् १। तस्करप्रयोगः, स्तेनानां शम्बलादिसाहाय्यं २ । विरुद्धस्य नृपस्य राज्य विरुद्धराज्यं तत्रातिक्रमोऽपगमनं लोभाव वैरिराज्ये विक्रयार्थ गतिरित्यर्थः ३ । कूटतुलाकूट मानकरण तत्रोनं ददतोऽधिकं न लातो दोपः ४ । तत्प्रतिरूपकमिति अन्यं भव्यं वस्तु दर्शयित्वाऽन्यमर्पयतीति तत्प्रतिरूपकव्यवहारः ५ । तत्र घृतादौ लादियोगः त्रीयादिपु लखीक्षेप इत्यादि च तत्प्रतिरूपकं उच्यते । अत्र दोषा राजदण्डाद्याः । द्यूतिनः श्राद्धयुताः स्थविरी- प्रकरणे जनैः सह गताः । जने गते तैर्गृहं मुष्टं वृद्धा मायया तेषां क्रमयोः प्रत्येकं वारणाय पतन्ती मोरपिच्छेन तत्पादान- नियत् । प्रातर्नृपायोक्तं राज्ञा कथं ते ज्ञेया इत्युक्ते पादाङ्कितास्तयोक्ताः । पुरागमे अङ्केन ते उपलक्षिताः सर्वे धृताः एकः श्राद्धोऽवग् न हराम्यन्यम्वं नातितश्च । स्तेनैस्थोचे एपोऽमन्तुः मुक्तः । अन्ये शिक्षिताः। एवं श्राद्धेन द्यूतगोष्ठ्यामपि न प्रवेश्यं चेत्प्रविशति तदापि हिंसादि न दत्ते न स्तेनमन्त्रे तिष्ठति परभवे धनहीनछिन्नाङ्गादिदोषाः ॥३॥ परदारगमणं समणोवासओ पचक्खाति सदारसंतोसं वा पडिवज्जइ से य परदारगमणे दुविहे पन्नत्ते, जहा-ओरालियपरदारगमणे वेउब्वियपरदारगमणे सदारसंतोसस्स समणोवासएणं इमे पंच अइयारा १
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
चतुर्थव्रत-
स्वरूपमति-
चाराचा
॥१४॥
जाणियचा, तंजहा-इत्तरियपरिग्गहियागमणे अपरिगहियागमणे अणंगकीडा परवीवाहकरणे काम-
भोगतिवाभिलासे ४ ॥ (सूत्रम् )
परदाराऽपरकलत्रं तत्र गमनं आसेवनार्थम् । ततः श्राद्धः प्रत्याख्याति स्वदारेषु सन्तोष वा प्रपद्यतेऽयं भावः परदार-
गमननिषेधको थासु परदारशब्दः प्रवर्त्तते तासां नियमं कुर्यात् । स्वदारसंतुष्टस्तु एकानेकस्वदारान् मुक्त्वा सर्वासां निषेधकः।
तत्र औदारिकपरदारागमनम् नृतिर्यस्त्रीगमनं । वैक्रियपरदारागमनं देवाङ्गनागमनम् । इत्वरपरिगृहीता कालशब्दलोपादि-
त्वरकालपरिगृहीता भाटी(टि)प्रदानेन कियन्तमपि कालं दिनमासादिकं स्ववशीकृता तस्यां गमनम् १ । अपरिगृहीता वेश्याऽन्य-
सत्कागृहीतभाटिः कुलस्त्रीर्वाऽनाथा तस्यां गमनम् २ । अनङ्गानि मैथुनाझं विनाऽन्यानि कुचकक्षोरुमुखादीनि तेषु क्रीडन-
मनङ्गक्रीडाऽथवाऽनङ्गक्रीडा कृतरतस्यापि स्वलिङ्गेन तुल्यैर्दारुलेप्यमृत्तिकाचर्मादिघटितगुयैः फलेन वा योषिदुपस्थासेवा
३ । स्वापत्यानां विनाऽन्यापत्यानां परेषां विवाहकरणं कन्याफलेच्छया स्नेहेन वा, यतः केऽपि श्राद्धाः स्वापत्यानामपि
विवाहं न योजयन्ति । कन्या पत्या मिलतु पण्डो गवा मिलत्वित्यादि भाषापि न कल्प्या ४ । कामाः शब्दरूपगन्धा भोगाः
रसस्पर्शास्तेषु तीव्राभिलाषोऽत्यन्ताध्यवसायस्तस्माचेदं करोति । समाप्तरतोऽपि योषिन्मुखोपस्थकर्णकक्षान्तरेष्वतप्ततया लिङ्गं
क्षिप्त्वा मृत इवास्ते महती वेलां दन्तनखादिमिर्वा मदनमुत्तेजयति वाजीकरणं वोपयुते । योपिल्लिङ्गं वा मृद्नाति । इहाद्यौ
अतिचारौ स्वदारसन्तुष्टस्य स्यातां न तु परदारत्यागिनः । शेषा द्वयोरपि । तुर्याणुव्रतपालिनो मातृगमनादयोऽपि दोषाः
स्युः। यथा गिरिनगरस्त्रियश्चौरहताः पारसदेशे विक्रीता वेश्या जाताः, तासां पुत्रा लघवोऽभूवन् वृद्धा मित्रीभूतास्तत्र व्यव-
॥ १४॥
KALCCIA । मायं गताः। तत्र देने वीन्विा माटी(टि) दवा स्थिताः, द्वाभ्यामकृत्यं कृतम् । एकः श्राद्धत्वाम चक्रे । पृष्टवान् स्त्रीदेशं यावद् बाता माता । शम्यां मृतिर्दथ्यो । पारिणामिकीमुख्या प्रयः साधुपार्श्वे प्रावजन् । तथा कापि मर्ता मगर्भपल्यां गतः सुता जाना । अन्यपुरे दत्ता संवलमान आयान सुतापुरे वर्षास्थितः सुतया सह संगतः, वर्षातिक्रमे स्वपुरं गतः । सुतामाना- यितवान् , मुता तं दृष्ट्वा लजिता नित्य मृताऽन्यः प्रावाजी । पुनरविरत्या दोपः । एका वेश्या प्रस्ता युग्मम् । ततो मा नोकां मार्टि लमे इति द्वे अपत्ये सुतसुतारूपे पुरः पूर्वपश्चिमद्वारयोस्तत्याज । तदा तत्र वणिग्भ्यां मिथो मित्राभ्यां ते द्वे गृहीते, तत्प्रतिचारकदास्यौ गते स्थानं, ततस्ते प्रौढे जाते मिथो विवाहिते । तावता पुत्रो वेश्यायां लग्नः प्रियां नेहते । परं मा माता तेन न जाता तस्याः पुत्रोऽभूत् वधूस्तु वैराग्यात् प्रव्रज्योत्पन्नावधिभिक्षां भ्रमन्ती गता गणिकागृहम् । तत्स्व. रूपनापनाय वेश्यापुत्रं गृहीत्वा परावर्तयत् जगाद च भ्राता पुत्रो देवरो मम त्वम् । यस्त्वत्पिता स भर्ता पिता भ्राता, या ते माता मा मे माता अश्रूः सपत्नीति । ततः स मर्त्ता सम्बुद्धो दीक्षितः । यद्वा कोऽपि सोमिलो वणिम्, तत्रान्यवणिग्गृहं प्रतिवेश्म । तत्र सोमिलस्तस्य सौधे काप्टेनारुह्य तत्स्नुपया सह वसति । एवं काले याति अन्यदा प्रातिवेश्मिकेन जज्ञे । यं घृष्टम् । नून काठेन कोऽप्यारोहति ततश्चटन् धृष्ट्वा वर्च कूपे क्षिप्तो मलं भक्षयति मूत्रं पिचति । मेघपृष्टे जलमृताच कृपाजलमार्गेण क्षालेन स्वं गृहं गतः विगन्धो वैद्यैः पूर्वरूपः कृतः ततः पुनः पुनः तामेवेच्छन् । एवं श्रीन् वागन् , तुर्यवारायां मलबद्धो वर्चःकृपे क्षिप्तो मृतः। तथाऽन्येऽपि दोषाः । यथा क्वापि पत्यौ वाणिज्ये गते प्रियाऽन्येन लगा, पतिः कतिवरायान् प्रियास्वरूपजप्त्यै भिक्षुकवेषेण गृहं गतस्तावत् सा भव्यभक्ष्याणि कृत्वोपपति ANGREATOR
मावश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
पञ्चमव्रत-
स्वरूपमति-
चाराचा
॥ १५॥
यान्ती तं भिक्षुकं भव्याहारैर्लाभयित्वा तेन भारं (वाहयित्वा ) वने जारान्तिकेऽनयत् । स तत् प्रियास्वरूपं ज्ञात्वाऽ-
ज्ञापयन् महर्या गृहमायातो विनयात्पत्न्या सत्कृतो रात्रौ वनगमनवृत्तान्तमपृच्छत् । सा भिक्षुकत्वेऽसाविति निश्चित्य
लजिता मृता सोऽदीक्षिष्ट । तथा माता लोला सुतः कुगोष्ठीमिलितः। सुतप्रिया पतिमूचे माता भ्रमन्त्यस्ति । सोऽश्रद्दधानो
मात्रा गोठ्या सह निशि देवकुले तमसि रेसे । मातृपुत्रयोर्वस्वविपर्यासे प्रिययोक्तम् । कस्याः स्त्रिय आच्छादनवस्त्रं त्वयात्तम् ?
ततो मातुर्ज्ञात्वा नष्टो दीक्षितः। भवान्तरे दोषाः क्लैव्यकुरूपवियोगाद्याः, गुणा इह यथा आनन्दपुरे द्विजो मूलेश्वर उप-
वासांश्चक्रे । अहं भक्तं ददे पात्राय देवेन वारद्वयं उक्तम् । कच्छे आभीराभीयौँ श्राद्धे तद्दानेऽक्षयं फलम् । स तत्र गत्वा ताभ्यां
मक्तं दक्षिणां च दत्त्वाऽप्राक्षीत् । किं युवयोस्तपः १ येन सुराय॑ता, ताभ्यामूचे एकान्तरं ब्रह्मवतमात्तम् । विवाहे द्वयोरन्यो-
न्याहब्रह्मणो (व्रत) जातम् । ब्रह्मण्येव वार्द्धक्यं जातम् । कुमारत्वे द्विजः सुबुद्धोऽर्हद्धम्म ललौ प्रेत्य स्वर्गसुनृत्वादि ॥ ४ ॥
अपरिमियपरिग्गहं समणोवासओ इच्छापरिमाणं उवसम्पज्जइ, से परिग्गहे दुविहे पन्नत्ते, तंजहा-
सचित्तपरिग्गहे अचित्तपरिग्गहे य, इच्छापरिमाणस्स समणोवासएणं इमे पंच अइयारा जाणि-
यव्वा, तंजहा-खित्तवत्थुपमाणाइक्कमे हिरन्नसुवन्नपमाणाइक्कमे धणधन्नपमाणाइक्कमे दुपयचउप्पयपमा-
माइकमे कुवियपमाणाइक्कमे ५॥ (सूत्रम् )
अपरिमितोऽपरिमाणः स चासौ परिग्रहोऽपरिमितपरिग्रहः तं श्राद्धः प्रत्याख्याति । इच्छापरिमाणं सचित्तादिगोचरेच्छा-
परिमाणम् । क्षेत्रवास्तुप्रमाणातिक्रमः। तत्र सस्योत्पत्तिभूः क्षेत्रं क्षीयतेऽत्र बीजमिति व्युत्पत्तेः। तच्च सेतुकेतु मेदाद् द्विधा,
॥ १५ ॥
तत्र सेतुक्षेत्रमरघट्टादिसेस्य, केतुक्षेत्रं त्वाकामपतितोदकनिष्पाद्यम् । उष्यतेऽप्रेति वास्तु गृहम् । तत्रिधा खातं उत्सृतं खातोत्सृतं च। तत्र खातं भूमिगृहादि । उत्सृतं प्रासादादि । खातोत्सृतं भूमिगृहोर्च प्रासादः । एषां क्षेत्रवास्तूनां प्रमाणातिक्रमः प्रत्या- ख्यानकालगृहीतप्रमाणोलहनम् १ । हिरण्यसुवर्णप्रमाणातिक्रमः तत्र हिरण्यं रजतमघटितं घटितं च द्रम्मादि, एवं सुवर्णमपि । नयोः प्रमाणातिक्रमः मार्यादीनामायत्तताकरणेन २। धनधान्ययोर्लभ्ययोः स्थाप्यकरणेन समर्पयोर्वा सत्यकारदानेन । वर्षांव- घिप्ती अग्रेतनं मुदकेषु वा व्यापृतेषु ग्रहीष्ये इति चिन्तया सुवर्णग्रहणाद्यपि ज्ञेयम् । धनं गणिमं पूगादि १ धरिमं मजिष्ठादि २ मेयं घृतादि ३ परिच्छेद्यं च मण्यादि ४ । धान्यं स्पष्टं ३ । द्विपदा दास्याचा मोराद्याश्च चतुष्पदाः ४ । कुप्यमासनशयन- भोजनपरिवेपणस्नानाद्युपभोगहेतुवस्तुजातं वस्त्राणि च तत्प्रमाणातिक्रमः। यथा प्रागन्यद्रम्मैः कुप्यं चिन्तितं स्यात्ततो धनद्धी द्रम्मपरावर्त कुर्यात स्थालादीनां वाऽन्यनामतां कुर्यात् ५। एतान्यणुव्रतानि ॥५॥ अणुव्रतानां पालनाय गुणकारीणि गुणव्रतान्युच्यन्ते, यथा- दि सिवए तिविहे पन्नत्ते उद्बुदिसिवए अहोदिसिवए तिरियदिसिवए, दिसिवयस्स समणोवासएणं इमे पश्न अइयारा जाणियचा, तंजहा-उद्बुदिसिपमाणाइक्कमे अहोदिसिपमाणाइक्कमे तिरियदिसिपमा- णाइएमे वित्तवुड्डी सइअंतरद्वा ६॥ (सूत्रम् ) प्रतं नियम उच्यते, ऊर्ध्वदिग्वतं एतावती दिगूर्य पर्वताद्यारोहणादवगाहनीया न परत इत्येवम्भूतम् १ । अघोदिग्व्रतं एतापनी दिगधः वाप्याद्यवतरणादवगाोति २ । तिर्यदिगवतं इयती दिग् पूर्वेणावगाहा इयती दक्षिणेनेत्यादि न परत इति ARCH बावश्यक नियुक्ति- दीपिका। सप्तमवत- स्वरूपमति- चाराचा ॥१६॥ ३। अस्मिन् व्रते आते तिर्यगदिगबहिस्थजन्तूनां हिंसा न स्यादिति गुणः । एषां नियमानां प्रमाणातिक्रमो नियमित व ऊर्च चलने । तत्र ऊचं स्वमानगिर्यारूढो द्रुफलानि पक्ष्यात्तभूषादि स्वतः पतितं लाति न तु यत्नं कुर्यात् । क्षेत्रवृद्धिरि- त्येकतो योजनशतं नियमित परतो दशयोजनानीति । तत्र कार्योत्पत्तौ विस्तीर्णदिशो योजनानि संकीर्णदिशि क्षिप्त्वाऽगात् ततः समं क्षेत्रं करोति ४ । स्मृतेरन्तर्द्धानं भ्रंशः स्मृत्यन्तर्धानम् । यथा के मया नियमा आत्ताः सन्तीति स्मृतेरकृतिः । स्मृ- तिमूलं च नियमानुष्ठानं ततः स्मृतिमङ्गे नियममङ्ग इत्यतिचारः ५। यद्वा सति लामेऽन्तर्द्धानं स्वगोपनेन परेण देशान्तर- गमनम् । बहुलोमे दोषः लोभनन्दिवत् । गुणे एकाकिनी स्त्री भर्तरि गते क्षुधिता रत्नानि विक्रीणती श्राद्धेन बहुमूल्यानि दृष्ट्वा अनात्तेषु परेण यथेच्छमात्तेषु पत्यावैते रत्नमूल्यायूचे स नृपायोचे कूटमूल्यकृदयमिति स राज्ञा हतः श्राद्धोऽपूजि । द्वितीयं गुणव्रतमाह- उवभोगपरिभोगवए दुविहे पन्नत्ते, तंजहा-भोअणओ कम्मओ अ। भोअणओ समणोवासएणं इमे पञ्च अइयारा जाणियब्वा, तंजहा-सचित्ताहारे सचित्तपडिबद्धाहारे अप्पउलिओसहिभक्खणया दुप्पउलिओसहिभक्खणया तुच्छोसहिभक्खणया । कम्मओ णं समणोवासएणं इमाइं पन्नरस कम्मा- दाणाई जाणियव्वाइं, तंजहा-इंगालकम्मे वणकम्मे साडीकम्मे भाडीकम्मे फोडीकम्मे दंतवाणिज्जे लक्ख- वाणिजे रसवाणिजे विसवाणिज्जे, केसवाणिज्जे जंतपीलणकम्मे निल्लंछणकम्मे दवग्गिदावणया सरदहत- लायसोसणया असईपोसणया ७ ॥ (सूत्रम् ) ॥ १६ ॥ - ५ उपत्रम्दः सकदर्थेऽन्तर्मोगे घ, तत उपमोग आहारादेः। परिशन्द आवृत्तौ पुनः पुनरर्थे पहिमोगे वा ततः परिमोगा वमादेः, दरोपिय उपमोगपरिमोगवतम् । तत्र भोजनत उत्सर्गेण श्राद्धोऽपि निरवद्यप्रासुकमोजी अन्नक्तौ सचित्तवर्जको वा म्याद, अपवादतोऽनन्तकायबीजपृथ्वीकायतुच्छौषधितुच्छफलविवर्जकः स्यात् । अशनेऽनन्तकायं आर्दकमांसादि, पाने रसकं मघादि, स्वादिमे उदुम्बरादिफलादि, स्वादिमे मध्चादित्यजनम् । उपपरिमोगे 'उल्लणविहि दंतणविहि अन्मंगणवि० फलवि. तिल्लवि० उमलणवि० मजणवि० वत्यविलेवणभूसणपुष्प(फ)ध्वमोयणपिजखजगअनेहमाहुरसागाजेमणपाणिय- महवासइत्यादिनियमाश्रिन्त्याः । 'उल्लणं' क्लिमागरूक्षणवत्रं गन्धकापायादि 'उवलणं' पीठिकादि, सूपो दालिः, जेमनं वटकादि, तत्रानाभोगादिना सचित्तादिभोगेऽतिचार।। अथ कर्मतः कर्म व्यापारस्तदाश्रित्य, असावधव्यापारेण समयतो मान्यं अशक्ती महासावद्यत्यागः कार्यः । तत्र मोजनतो मोजनमाश्रित्य सह चित्तेन जीवेन वर्तते इति सचित्तः स चासावाहारश्च सचित्ताहारः नियमाधिकस- विचादानं १। सचित्तेन प्रतिबद्ध आहारो यथा वृक्षप्रतिबद्धो गुन्दादि पक्कफलानि वा २ । अपक्कोषधयश्च नखदलिक- कणिकाधा अपरिणतास्तासां भक्षणताऽचित्तधिया ३। दुष्पकौषधयोऽर्द्धपक्वफलिकापृथुकशाकादिरूपाः ४ । तुच्छौषधयो महाफल्याचा अमारास्तामां भक्षणेनाहारः, कापि राजाश्ववाहनिकां गतो नरं फलिका अदन्तं गच्छन् आयांश्च दृष्या अहोऽध्येयत्कालं खादने कियन्मध्ये सारमभूदिति परीक्षायै जनैस्तत्सुन्दमदारयदुग्धफेनमेवाद्राक्षीत्ततो येषां फलिकाकोमल- एकादीनां मक्षणे घना विराधनाल्पा च तुष्टिः तत्तुच्छफलम् । तथा 'पुष्फफलेहिं रसेहि य बहुतसपाणेहि अजयहाणेहि ।
सप्तमव्रत-
-
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
स्वरूपम-
तिचाराचा
३३ १७॥
मजेहिं य मंसेहि य विरमेजा अत्तहियकामो ॥१॥ जत्थथि सत्तपीला उबमोगो थोवओ य तहियं तु । कुजा नाइपसंग
सेसेसु वि सत्तिओ निउणं' ॥ २॥ शेषेष्वपि श्राद्धाचीर्णष्वप्यारम्भेष्वतिप्रसङ्गं न कुर्यात् ।
अथ कर्मतः, कर्मादानानीति अन्यारम्भेभ्यो बहुज्ञानावरणादिकर्मबन्धहेतुत्वादादानानि कर्मादानानि । अङ्गार-
कर्म अग्निज्वालनोत्थव्यापारी लाभार्थम् १ । वनकर्म वनस्पतिकायवृक्षदारुवंशकटादिवणादिफलपुष्पपत्रच्छेदविक्रय-
कणदलनाद्यारम्भो लाभार्थमिति सर्वत्र ज्ञेयं २। शकटेन जीवनं शकटाङ्गविक्रयः शकटकर्म उपलक्षणाद्यानपात्राङ्गादि-
विक्रयश्च शकटकने ३ । भाटकार्थ शकटाश्वगवादिदानं भाटकेन वस्तुवहनं शकटादिना भाटककर्म ४ । हलखेटनभूस्फो-
टनाश्मघवनादिना धृत्तिः स्फोटकर्म ५। आकरे दन्तकेशमुक्तानखादिजल्पनं तद्ग्रहणं दन्तवाणिज्यं ६ । लाक्षामनःशिलादि-
वाणिज्यं कृम्यादिघाताय ७ । म्रक्षणादितापनं मधुमद्यादिविक्रयो रसवाणिज्य ८ । विषशस्त्रहलहरितालादिजन्तुघातकवस्तु-
विक्रयो विषवाणिज्यं ९ । द्विपदचतुष्पदविक्रयः केशवाणिज्यं केशशब्देन पञ्चेन्द्रिया ज्ञेयाः १०। अरघट्टकादिकरणं यन्त्र-
पीडनकर्म ११ । पशूनां शोभाद्यर्थ दाहवेधादिकृतिनिलाञ्छनम् १२ । धान्यायथं दवदापनं १३ । सरोहदतटाकानां धान्याद्यर्थ
चैरिसन्यदुःखार्थ शोषणं सारणिवाहनं सरोइदतटाकशोषणता १४ । असती घोटकादिका तासां पोषणं घोटकाद्यर्थ एवं
दास्यादिपोषः तथा गृहरक्षायै श्वादिपोषः क्रीडाद्यर्थं शुकादिपोषः एतदप्यसतीपोषशब्देन ज्ञेयं १५। एवं पञ्चदशानां कथ-
नादन्येषामप्येवंजातीयानां बहुसावध कर्मणां त्यागः कार्यः ॥ ७ ॥
अणत्थदंडे चउविहे पन्नत्ते, तंजहा-अवज्झाणायरिए पमत्तायरिए हिंसप्पयाणे पावकम्मोवएसे,
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॥ १७ ॥
4 अणस्थदंडवेरमणस्स समणोवामएणं इमे पश्च अइयारा जाणियव्वा, तंजहा-कंदप्पे कुक्कुइए मोहरिए संजुत्ताहिगरणे उवभोगपरिभोगारेगे ८॥ (सूत्रम् ) अर्थः कार्य गृहिणः क्षेत्रवास्तुधनधान्यदेहादिविषयम् । तस्मै आरम्मो भूतोपमर्दोऽर्थदण्डः । अनर्थोऽकार्यो(य) भूतानि दण्डयते हिनस्तीत्यनर्थदण्डः । यथा मत्तस्तरं प्रहरति तत्स्थजन्तून् हन्ति इत्यादि । तत्र अपध्यान दुर्व्यानं वैरिघातऋद्धि- प्रार्थनादि तम्याचरितं आचरणं १ । प्रमादो मद्यादिस्तेन तस्य वाचरितं २ । हिंसाहेतुशस्त्राग्निविषादिदानं हिंसाप्रदानं ३ । पानयति दुर्गताविति पापकर्म तस्योपदेशो यथा कृष्यादि कुर्वित्यादि, अलं पासायखभाणं इत्यादि च ४ । कन्दर्पो विषय- रागात प्रहाममिथं मोहोद्दीपकं नर्म, यतः श्राद्धोऽदृट्टहासं न कुर्यात् ईषद् हसेत् कार्ये सति १ । कौत्कुच्यमनेकधा मुखा- विपदप्रभृतिचेष्टापूर्विका हासादिजनिका भण्डक्रिया २। मौखर्य धार्य प्रायमसत्यमसम्बद्धप्रलापित्वम् ३ । संयुक्ता- धिकरणे मुशलोदृखलादिसंयोजनम् । संयुक्तं च तदधिकरणं चेति समासः ततः संयुक्तानि शकटादीनि न धार्याणि ४ । उपमोगपरिमोगयोग्यद्रव्याणामाधिक्यकरणम् । यतः श्राद्धः स्नानताम्बूलाद्यवस्तूनि तावन्ति न लायाद्यावन्त्यन्योऽप्यादाय प्रमादि विराधयति । पुष्पादीन् वसांश्च त्यजेत् ५ । निषिद्धानर्थदण्डस्यैतेऽतिचाराः॥८॥ उक्तं तृतीयं गुणवतम् । अथ नत्वारि शिक्षावतानि । शिक्षा नाम पुनः पुनरभ्यासः, यतः सामायिकदेशावकाशिकादीनि पुनः पुनः क्रियन्ते । सामाइ नाम सावजजोगपरिवजणं निरवजजोगपडिसेवणं च । सिक्खा दुविहा गाहा उववायठिई गई कमाया य | यंचंता वेयंता पडिवजाहकमे पंच ॥१॥ सामाइअंमि उ कए समणो इव सावओ २८
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
नवमव्रत-
स्वरूपमति-
चाराच
॥ १८॥
हवइ जम्हा । एएण कारणेणं बहुसो सामाइयं कुजा ॥२॥ सव्वं ति भाणिऊणं विरई खलु जस्स
सव्विया नत्थि । सो सव्वविरइवाई चुक्कइ देसं च सव्वं च ॥ ३॥ सामाइयस्स समणोवासएणं पञ्च
अइयारा जाणियव्वा, तंजहा-मणदुप्पणिहाणे वइदुप्पणिहाणे कायदुप्पणिहाणे सामाझ्यस्स.सइअकर-
णया सामाइयस्स अणवडियस्स करणया ९॥ (सूत्रम् )
सावद्यः सपापः योगो व्यापारः तस्य परिवर्जनं सावधयोगपरिवर्जनं कालावधिनेति, निरवद्ययोगानां निरवद्यव्यापाराणां
परिसवनं आसेवनं च । समो रागद्वेषवियुक्तो जन्तुस्तस्य आयो लाभः प्रतिक्षणं वर्द्धमानानां ज्ञानदर्शनचरणानां समायः।
समाय एव कार्यमस्येति सामायिकं । तं सावएण कहं कायचं ? इह सावगो दुविहो इड्डिपत्तो अणड्डिपत्तो य, ऋद्धिप्राप्तः
अनृद्धि(प्राप्त)श्वेत्यर्थः । जो सो अणड्डिपत्तो सो चेइयघरे साहुसमीवे घरे पोसहसालाए वा जत्थ वा वीसमइ अच्छइ निवावारो
'सवत्थ करेइ सवं चउसु ठाणेसु नियमा कायवं । अत्र सर्वशब्देन सर्व षडावश्यकं इति वृद्धा व्याख्यान्ति । चेहयघरे साहुमूले
पोसहसालाए घरे आवस्सयं करेंतो त्ति । यदि धरणादिमीः स्यात्तदा साधुसकाशे न करोति । वाहे घरे चेव सामाइयं काऊण
उवाहणाओ मोतूण सचिचदत्वविरहिओ वच्चइ । तत्रानुक्तोऽपि श्रीभगवत्यायुक्तः श्राद्धस्य साधुपार्श्व गमे पञ्चविधाभिगमो ज्ञेयः।
पंच समिओ तिगुत्तो । ईरियाए उवउत्तो जहा साहू भासाए सावजं परिहरन्तो.एसणाए कट्ठ लेटु वा पडिलेहेत्तु पमजिउ,
एवं आयाणे निक्खेवणे खेले सिंघाणे न विगिचति विगंचंतो वा पडिलेहिय पमन्जिय थंडिले, जत्थ चिट्ठइ तत्थ गुत्तिनिरोह
करेइ । एयाए विहीए गन्ता तिविहेण नमिऊण साहुणो पच्छा साहुसक्खियं सामाइयं करेइ । अत्र श्राद्धस्य शालागमसाधु-
॥१८॥
MAN रन्दनादौ मुद्रा चिन्त्या। करेमि मंते ! मामाइयं सावअंजोगं पचास्वामि दुविहं तिविहेणं जाव साहू पज्जुवासामि ति काऊणं । अत्र दुविहं तिविहेणं ति पदविपर्यासं पुरःसंक्षेपनधिया सावजंजोगंशन्दविशेषणज्ञापनाय घटते तवेवं पाठः । जा नेइमाई अस्थि तो पढमं वन्दद, अत्र प्रथमशन्दाचैत्यामावे पश्चाच्चैत्यानि वन्दते इति वृद्धाः । साहूणं सगासाओ स्यहरणं निम का मग्गइ, अह घरे तो से उग्गहियं स्यहरणं अस्थि तस्स असइ पोत्तस्स अंतेणं । अत्र रजोहरणमार्गणं अथ च ग्जोहरणाभावे पोतस्य वस्त्रस्यान्तेनेति यदुक्तं तत्किमयं ? भूप्रमार्जनार्थ वा धर्मध्यानकरणार्थ वाऽन्यहेतवे वा तचिन्त्यम् । नया रजोहरणशन्दोध मोरपिच्छरजोहरणार्थो घटतेऽन्यधर्मध्वजदारुदण्डादि चिन्त्यमानं न सङ्गतिमङ्गति । पच्छा ईरियावहियं पडिकमइ पच्छा आलोएत्ता वन्दइ । आगमनं आलोच्य द्वादशावर्त्तवन्दनं दत्ते इति वृद्धाः। आयरियादी जहारायणियाए यथाज्येष्टमित्यर्थः । पुणो वि गुरुं वंदित्ता पडिलेहित्ता निविट्ठो पुच्छइ पढइ वा, एवं चेइएसु वि । अत्र त्यधपीत्यतिदेशः सम्यक् चिन्त्यः, असइ साहुचेइआणं पोसहसालाए सगिहेव सामाइयं आवस्सयं वा करेइ । अत्र वाशब्द आर्थे । यदा अगक्तः केवलसामाइकदण्डकं उत्क्वा तिष्ठतीति वृद्धाः। तत्थ भणइ जावनियमं समाणेमि परमयं पाठो न गते । जो इविपत्तो सो एंतो सनिदिए एह तो जणस्स अस्था होइ, अनेन वाक्येनैवं ज्ञायते यथा जनास्था वृद्धिस्तथा न टोपः । आढिया य साहुणो सप्पुरिसपरिग्गहेणं । साघवः सत्पुरुषपरिग्रहेण सत्पुरुषाणां वन्दनाद्याग्रहेण आहताच जनमान्याः म्यूस्नेन पाद्वैगुरूणां अभिग्रहादिमावद्रव्यस्तवः क्रियते तद्युक्तं इति वृद्धाः । जइ मो कयसामाइओ एइ ताहे आसहत्थि- माइणा जणेण य अधिगरणं पवत्तइ । ताहे न करेड़ । सामायिकं गृहे कृत्वा नायातीत्यर्थः। कयसामाइएण पाएहिं
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
सामायिक-
ग्रहण
विधिः।
॥१९॥
आगंतव्वं । तेण न करेइ । कृतसामायिकस्योपानच्याग एव लोकाद्विशिष्ट उक्तः न तु प्रावरणमोचनादि । अत्र
सामायिकनिषेधोऽपि दोपाय न गणितः व्यवहारादिनयप्रामाण्यात् । आगओ साहुसमीवे करेइ । जइ सो सावगो तो न
कोइ उठेइ । अह अहाभद्दउ ति पूया कया होइ त्ति । अथ भद्रक एवास्ति राजा तेन पूजा कृता वीक्ष्यते । ताहे पुबरइयं
आसणं करेइ । गुरूणां पूर्वरचितं आसनं क्रियते । आयरिया उडिया य अच्छंति । उत्थितास्तिष्ठन्ति । स सामाइयं काऊण
पडिकतो वंदित्ता पुच्छइ । अत्र वन्दित्वा कृतिकर्मणेति घटते । सो य किर सामाइयं करितो मउडं न अवणेइ मुकुटं नाप-
नयति न मुश्चेत् । कुण्डलाइनाममुई पुप्फतंबोलपावारगमाइ वोसिरह । अत्र प्रावारकादीनिशब्देन अप्रतिलेख्यवनपश्च-
कमध्यस्थं पल्हवि(वी)कोयव(वि)पावार इति प्रावारनामकं झीलाच्छाटडाप्रभृति त्यजति यथा साणीपावारपिहियं । अत्र
प्रावारशब्दार्थः न तु प्रावार इत्युत्तरासङ्गः, यतः सिद्धान्ते प्रावारशब्देनोत्तरासङ्गः कापि न व्याख्यातः । अन्ने भणन्ति मउडं
पि अवणेइ । एसा विही सामाइयस्स । अत्र सामायिकशब्देन सर्वावश्यकनिगमनं ज्ञेयम् इति वृद्धाः, नो चेदमुना विधिना
सामायिकं कोऽपि कुर्वन्नन्यगच्छेषु नोपलभ्यते । सवं चउसु ठाणेसु नियमा काय ति । यदा पूर्वोक्तस्थानपञ्चकमध्याच्चै-
त्यादिषु चतुर्दा स्थानेषु सामायिकं करोति तदा नियमादावश्यकं सर्वमपि पद्विधमपि करोमीति । ननु सर्वमिति विशेषणं
तस्य चावश्यकं विशेष्यत्वेन कथं लभ्यते ? उच्यते केवलस्य श्रावकसामायिकस्य सर्वमिति विशेषणस्यासम्भवात् । उत्तरत्र
चानन्तरमेव आवस्सयं करितो त्ति इत्यादिनावश्यकविधेर्वक्ष्यमाणत्वादावश्यकमिति विशेष्यं संगच्छत एव । आवासयं करितो
॥ १९॥
नि आवश्यकशन्देन केवलमेव सामायिकमिति न वाच्यं, यतो निरुपपदेनावश्यकशन्देनाध्ययनपट्कमेवोच्यते, तथाहि 'आवम्मयं अवस्सकरणि धुवनिग्गहो विसोही य । अज्मयणछकवग्गो नाओ आराहणामग्गो' ।। अनुयोगद्वारे । 'आवास काऊणं । आचा० नियु। यदा प्रथमादिविशेषणमावश्यकस्य तदैकैकं लभ्यतेऽन्यथा तु पदकमेवेति। तथा 'आवासयं करितो ती'त्यत्र इतिमन्दः प्रस्तावनार्थः यथा ' कहं वयामो त्ति तत्थ उबया'। ओघ० नि० । 'मित्ति मिउमद्दवत्ते' गाथाद्वये म्यानपदके इतिमन्दाः प्रस्तावनार्थाः। 'आव०' अत एव चउसु ठाणेसु नियमा कायवं इत्यादिपदानां श्रीमदमयदेवसरिभिर- प्येवं पदयोजना कृता तद्यथा चतुर्पु स्थानेषु पुनर्नियमात्करोति चैत्यगृहे साधुसमीपे पौषधशालायां स्वगृहे वावश्यकं कुर्वाण- म्ता यदि साधुममीपे करोति तत्रायं विधिरिति प्रथमपश्चाशकः । तथावश्यकं कुर्वाणस्ता यदि साधुसमीपे करोति तत्रायं विधिरित्येतेन वाक्येनास्य उत्तरग्रन्धेन सह सम्बन्धं कुर्वतोऽस्यायमाशयो लक्ष्यते । पुनः कश्चिदाह नन्वस्मिन् दण्डके मामायिकस्य प्रस्तुतत्वात् पर्यन्ते च 'एसा विही सामाइयस्स' इति भणनाच्च कथमन्तरा षडावश्यकमापतितमिति चेदुच्यते 'मां उसु ठाणेसु नियमा कायवमि' त्यादिवाक्यात् यदि च सामायिकमेवात्र केवलं निर्वाण(घ) स्यात्तदा 'जत्थ वा वीसमइ अच्छा वा निवाचारो करेई' इत्येतत्पदानन्तरं 'तत्थ जइ साहुसगासे करेइ तत्थ का विही इत्येवं पठितं स्यात्, न पुनः 'सवं पउसु ठाणेसु इत्यादिकं आवस्सयं करितो त्ये' तत्पर्यन्तं मध्यवाक्यमिति । अपरं च सामायिकस्य प्रस्तावना 'तं सावएण कहं M कागामि'त्यनेनव पदेन कृता, तत् किं पुनरपि तस्यैव प्रस्तावनायै 'आवस्सयं करितो त्ति' पठ्यते? तस्मादेते(तेन) पडावश्यक- मेव प्रस्ताव्यत इत्यवयुध्यते । किश्च यद्यत्र सामायिकस्यैव विधिः स्यान्न पुनः पडावश्यकस्य ततः 'ताहे घरे चेव सामाइयं
ॐ
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
सामायिक-
ग्रहण
विधिः।
॥१९॥
आगंतव्यं । तेण न करेइ । कृतसामायिकस्योपानत्याग एव लोकाद्विशिष्ट उक्तः न तु प्रावरणमोचनादि । अत्र
सामायिकनिषेधोऽपि दोषाय न गणितः व्यवहारादिनयप्रामाण्यात् । आगओ साहुसमीवे करेइ । जइ सो सावगो तो न
कोइ उठेइ । अह अहाभद्दउ त्ति पूया कया होइ त्ति । अथ भद्रक एवास्ति राजा तेन पूजा कृता वीक्ष्यते । ताहे पुवरइयं
आसणं करेइ । गुरूणां पूर्वरचितं आसनं क्रियते । आयरिया उडिया य अच्छंति । उत्थितास्तिष्ठन्ति । स सामाइयं काऊण
पडिकतो वंदित्ता पुच्छइ । अत्र वन्दित्वा कृतिकर्मणेति घटते । सो य किर सामाइयं करितो मउडं न अवणेइ मुकुटं नाप-
नयति न मुश्चेत् । कुण्डलाइनाममुई पुप्फतंबोलपावारगमाइ चोसिरइ । अत्र प्रावारकादीनिशब्देन अप्रतिलेख्यवस्त्रपञ्च-
कमध्यस्थं पल्हवि(वी)कोयव(वि)पावार इति प्रावारनामकं झीलाच्छाटडाप्रभृति त्यजति यथा साणीपावारपिहियं । अत्र
प्रावारशब्दार्थः न तु प्रावार इत्युत्तरासङ्गः, यतः सिद्धान्ते प्रावारशब्देनोत्तरासङ्गः कापि न व्याख्यातः। अन्ने भणन्ति मउडं
पि अवणेइ । एसा विही सामाइयस्स । अत्र सामायिकशब्देन सर्वावश्यकनिगमनं ज्ञेयम् इति वृद्धाः, नो चेदमुना विधिना
सामायिकं कोऽपि कुर्वनन्यगच्छेषु नोपलभ्यते । सर्व चउसु ठाणेसु नियमा कायवं ति । यदा पूर्वोक्तस्थानपञ्चकमध्याच्चै-
त्यादिषु चतुर्पु स्थानेषु सामायिकं करोति तदा नियमादावश्यकं सर्वमपि षड्विधमपि करोमीति । ननु सर्वमिति विशेषणं
तस्य चावश्यकं विशेष्यत्वेन कथं लभ्यते ? उच्यते केवलस्य श्रावकसामायिकस्य समिति विशेषणस्यासम्भवात् । उत्तरत्र
चानन्तरमेव आवस्सयं करितो ति इत्यादिनावश्यकविधेर्वक्ष्यमाणत्वादावश्यकमिति विशेष्यं संगच्छत एव । आवासयं करितो
॥१९॥
कन्यां च इत्यमेर व्याख्यातं, तथाहि 'गिहिणो वि सबवजं दुविहं तिविहेण छिन्नकालं तं । कायबमाह सो को दोसो ? ममए णुमई।१। माष्यं । गृहस्थेनापि मता तत्सामायिकं छिन्नकालं द्विघटिकाकालमानोपेतं सर्ववर्ज सर्वशब्दोचारणरहित जिवि विवियन कर्त्तव्यमेवेति वृत्तिः । नाइ चेहआई अस्थि तो पढनं वन्दइ । अत्र प्रथममिति भणनात् सामायिक कृते पश्चादपि चैत्यवन्दना कार्येति । अन्पचा जइ चेइसाइ अत्यि तो यन्दइ इत्युक्तमेव स्यात् । तथा चैतत्सामायिकं सर्वकालमपि स्यात् । मुहर्ताधिकं च न गालदा कयं सामायिकं कृत्वा साधुपार्थ याति ? स्तोककालात् कृत्वा पारयित्वा च किं न याति ? तेनैवं ज्ञायते प्रातः मायमेकैकमेव बहुकालं यावत्सामायिकं स्यात्ततश्वगुरुसाक्ष्युचरति । चेत्परम्परागतः श्राद्धावश्यकविधिरेवमभविष्यत्तदा ज्ञायते सिद्धान्तोकोऽयमिवि । रयहरणं निसिझं वा मग्गइ, भूप्रमार्जनाय मयूरपिच्छादिमयं दंडासनाख्यं रजोहरणं निपद्यां वा यानने इति । अन्य युक्तिस्तु प्रारु मुखव स्त्रिकाधिकारे सर्वा समर्थितास्ति । तथा पच्छा आलोइत्ता वन्दइ त्ति, आगमनं 'आलोच्य द्वादशाव-वन्दनं ददाति । वन्दतेशब्देन आगमे द्वादशाव-वन्दनमुच्यते इति प्राग् दर्शितमस्ति । 'मामाइगं आरम्मयं वा करेड़ त्ति' इह तावत् 'सवं चउसु ठाणेसु नियमा कायवमित्यादिना' आवश्यकविधानस्थान- संगई करया ततस्तस्यैव तेषु चतुपि स्थानेषु विधीयमानस्य 'आवस्सयं करितो ती' त्यादिना 'एसा विही सामाइयस्म' एतत्पर्यन्तेन ग्रन्थेन ममग्रोऽपि विधिरुक्तः। तत्रापि जइ साधुसगासे करेइ इत्यादिना पुच्छइ पढइ इत्यन्तेन माधुमूले विधीयमानस्यामूलचूलं विधिरुक्तः, ततम्तस्यैव साधमावे चैत्यगृहे विधीयमानस्य ‘एवं चेहएसु वि' इत्यन्तेन पूर्वप्रदर्शित हर
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका
सामायिक-
ग्रहण-
विधिः।
॥ २०॥
काऊण' एतावतापि पूर्वकालमणनेन सामायिकानुष्ठानस्य समर्थितत्वात् , तदुत्तरग्रन्थोक्तस्तु विधिः किमर्थ इति ? अथ गुरुभ-
क्तिप्रतिपादनार्थ इति चेत् तदपि न, यतोऽयमेवानुष्ठानविधिश्चैत्ये पौषधशालायां गृहे वातिदेक्ष्यत इति। तथा यच्च पर्यन्ते 'एसा
विही सामाइयस्य' इत्युक्तं तदपि न षड्विधावश्यकस्य वाधकं यतो यथा कायोत्सर्गनियुक्तो कायोत्सर्ग प्रस्तूयान्तरा च
प्रसङ्गागतं साधूनामावश्यकविधिमभिधाय पुनः कायोत्सर्गस्य निर्वाहः कृतस्तथाऽत्रापि सामायिकवते व्याख्यायमाने
प्रस्तावात्
सामायिकादिकं श्रावकस्य पडावश्यकमभिधाय पुनः सामायिकस्य निगमनं कृतमिति सम्भावयामः । तथा ' ताहे
घरे चेव सामाइयं काऊणं ति' साधूपाश्रये गच्छतो मा कालातिक्रमः सामायिकस्य भवत्विति हेतोर्गृह एव एकमेव सामा-
यिकसूत्रमुच्चार्य शेषानुष्ठानं तत्रैव करिष्यामीति विचिन्त्य साधूपाश्रये व्रजतीति सम्बन्धः । अथ सर्वमप्यनुष्ठानं गृहे कृत्वा किं
न गच्छतीति[चेत् ] उच्यतेऽत्र साधुमूलानुष्ठानस्य प्रस्तुतत्वात् । गृहानुष्ठानमार्ग(मग्रे) चतुर्थस्थाने वक्ष्यति। अतोऽत्र सामा-
यिकसूत्रमात्रोच्चारणमेवावबुध्यते इति । ' करेमि भंते सामाइयमित्यादि
ननु आचरणां विना कुतः श्रावकसामायिकसूत्रं लभ्यते ? उच्यते यतिश्रावकयोः सामायिकसूत्रमेव, केवलं सर्व-
मिति, जावजीवा इति, तिविहं तिविहेणं ति, करंतं पीत्यादि विशेषाश्चत्वारः, ते च चूर्णिकृता 'करेमि मंते ! सामाइयं,
सावज्जं जोगं पञ्चक्खामि, दुविहं तिविहेणं जाव साहू पज्जुवासामी'त्येवं भणता त्रयः साक्षादेव दर्शिताश्चतुर्थोऽपि
दुविहं तिविहेणं' ति भणनाल्लन्ध एव । ततश्चैतद्विशेषचतुष्टयविशेषितं यतिसामायिकसूत्रमेव श्रावकोऽपि भणतीति । अयं
चार्थ:-' सावजोगपरिवजणट्ठा सामाइयं केवलियं पसत्थं ' इत्यस्या नियुक्तिगाथाया व्याख्याने भाष्यमहोदधिना वृत्ति-
HOS
है
॥२०॥
विकल्पितमेतदिति । यतः श्रीअभयदेवमरिणाप्ययमेव 'पडिकंत' इतिशब्द इत्थमेव व्याख्यातस्तथाहि एवं मामायिकं
कत्वा ईपिथं प्रतिक्रान्तो वन्दित्वा पृच्छति पठति वा । प्रथमपनाशके । तथा पुष्प(फ)तम्बोलपावारगमाइ वोसिरद त्ति,
अत्र पावारगम देन दुष्प्रत्युपेक्ष्यो वनविशेषो ज्ञेयो न पुनः सामान्येन प्रावरणमित्यपि प्राग मुखवस्त्रिकाधिकारे निर्णीतमस्ति ।
'खरडो तह बोरठी(बोरुट्ठी) सलोमपडओ तहा हवइ जीणं । सदसं वत्थं पल्हविमाईणमिमे उ पजाया' ॥१॥ इति प्रवचन
मारोद्वारे । यद्यत्र दण्डके प्रत्याख्यानं साक्षात्रोक्तं तथापि विधिवादचरितानुवादाभ्यां श्रावकस्यापि प्रत्याख्यानाधिकारित्वात् ,
'आवस्मयं करितो त्ति' इत्यादिना च पड्विधावश्यकस्य प्रस्तुतत्वात् प्रत्याख्यानमपि विधेयमेव । तथा चावश्यकस्य चूर्णी
संकेयं नाम केतमिति गृहस्याख्या गृहवासिनां प्रत्याख्यनमित्युक्तं भवति । तथा सावओ पोरिसिं पच्चक्खाइत्ता खित्तं
गओ इत्यादि । तथा एलकाक्षोत्पत्तौ साचिगा एगस्स मिच्छादिट्ठियस्स दिना । वेयालियं आवस्सयं करेइ पचक्खाइ य ।
आव०सूर्णी । तस्मादत्रानुक्तमपि प्रत्याख्यानं ज्ञेयं । प्रत्याख्यानान्ते च देसावगासियं उपभोगपरिभोगं पञ्चक्खामीति व्रत-
द्वयमुचार्यम् । देशावकाशिके च पूर्वगृहीतसर्वव्रतप्रमाणानि स्मृत्वा संक्षेप्याणि । उक्तं चावश्यकचूर्णौ देमावगासिगाधिकारे
एवं सबबएस जे पमाणा ठविया ते पुणो दिवसे उस्मारेइ । एवं 'एगमुहुत्तं दिवसं राई पंचाहमेव पक्खं वा । वयमिह धारेउ
ददं जावइयं उस्सहे कालं' 1१। इत्यादि । व्रतप्रमाणस्मरणे च व्रतानां शोधनार्थ श्रीउपासकदशासूत्रावश्यकादिनियुक्त्यादियुक्या
मम्यक्त्वमूलद्वादशव्रतसंलेखनातीचाराः पञ्चाशीतिरालोचनीयाः, आनन्दादिभ्यः श्रीवीरेणैपामतीचाराणामेवोक्तत्वात् । तत
एवं पड्विधावश्यकं कृत्वा 'पाणिवहमुसावाए अदिनमेहुणपरिग्गहे चेव । सयमेगं तु अणूणं उस्सासाणं भविाहि ॥१॥
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
सामायिक-
ग्रहण.
विधिः।
॥२१॥
एव साधुमूलविहितविधिनिरवशेषोऽप्यतिदिष्टः। ततोऽपि तस्यैव साधुचैत्ययोरभावे पौषधशालायां वा स्वगृहे वा विधीय-
मानस्य असइ साहुचेइआणमित्यादिना जावनियम समाणेमि इत्येतदन्तेन पुनरपि स एव साधुमूले विहितविधिरति-
दिष्टः। केवलमत्र विशेषत्रयं, तच्चेदं पूर्व हि गृहे केवलमेव सामायिकमङ्गीकृत्य ततः साधुमूलचैत्ययोः समागत्य
तत्साक्षिक सामायिकोचारणपूर्वकं सामायिकादिकं सर्वमप्यावश्यकं कृतवान् । इह तु सामायिकमप्यावश्यकमपि
एकत्रैव करोति, इह वाशब्दद्वयस्यापि समुच्चयार्थत्वात् १ । तथा पूर्व सामायिकं कृत्वा साधुमूले गतोऽत्र गमनं नास्ति २ ।
तथा पूर्व जावसाहु त्ति मणितवान् अत्र तु जावनियममिति ३ । अत एवाह ग्रन्थकारः 'सामाइयं आवस्सयं वा करेइ १'
नवरि तत्थ गमणं नत्थि २ । भणइ जावनियमं समाणेमि ३ तथात्र वाशब्दानां समुच्चयार्थत्वमागमे स्थाने स्थाने
प्रसिद्धमेव, तथाहि 'सुहुमं वा बायरं वा, तसं वा थावरं वा' इत्यादि व्रतषटकेऽपि वाशब्दाः। विकल्पार्थव्याख्या
पुनर्नावबुध्यते यतोऽयमिति देशे व्याख्यायमानोऽस्ति स च पूर्वप्रदर्शितस्यैव विधिः । पूर्व वात्र सामायिकावश्यकयोः
समुदितयोरेव विधिर्मणितो न पुनरेकैकस्य पृथक पृथगिति । ततो विकल्पार्थेन वाशब्देन को द्वितीयो विधिः
प्रदर्शितः १ इति । 'पच्छा सो इड्डिपत्तो सामाइयं काऊण पडिकंतो ति वंदित्तेत्यादि' अत्र कश्विदाह पडिकतो त्ति
वंदित्तु सबसिद्धेत्यादि प्रतिक्रमणं कृतवानिति तदयुक्तं यतो यदेव प्रतिक्रमणं सर्वमिहैवानेनैव चूर्णिकृताऽनृद्धिप्राप्तमाश्रि-
त्योक्तमृद्धिप्राप्तस्यापि तदेव युज्यत इति । तच पूर्वोक्तमिदं 'पच्छा इरियावहियाए पडिक्कमइ पच्छा आलोइत्ता
वन्दइ इत्यादि, तत इहापि 'पडिकंत' इति ईर्यापथं प्रतिक्रान्तवानिति व्याख्या युक्तिमता । न च वाच्यं स्वमनीषिकया
॥ २१॥
आदमाप्योरैर्यापधिक्यां कथं ममोच्छ्यामाः १। उच्यते समितगुप्तयोद्धयोरप्येवंशुद्धेर्देनसर्वविरत्योः प्रपत्या सम्यक्त्वबलात् मापये महाभीनः, अममितयोस्तु योरप्यन्यछेदपदैर्नवापि संयमस्थान मेदानां श्राद्धगुणानां च तारतम्येन वृद्धिहान्योरस- हमपरवात , तत आवश्यक माम्यमेव इति श्रावकयोग्यपडावश्यकविचारः । ननु कतमामायिकः श्राद्धो गुणैः माधुरेव । स कस्मादित्वरं सामायिकं सर्वसावधयोगं प्रत्याख्यामीति नोचरति ? सर्व मावनिरनेरगारिणोऽयम्भवात् आरम्मेष्वनुमतेरव्यवच्छिन्नत्वात् कनकादिषु चात्मग्रहानिवृत्तेः साधुधावकयोश्च प्रपत्रेन मेदामिधानात् तथा चाह- सिकाया दुविधा गाहा उववातठिती गती कसाया य । यंधता वेदेन्ता पडिवजाइक्कमे पंच ॥१॥ शिक्षाकतः साधुश्रावकयोमहान् मेदः। शिक्षा द्विधाऽऽसेवनाशिक्षा ग्रहणशिक्षा च। शिक्षाऽम्यासस्तत्रासेवनाशिक्षामाश्रित्य मम्पमिव चक्रपालसामाचारी सदा साधुः पालयति । श्रावकस्तु आचाराङ्गोक्ता सामायिकेऽपि पूर्णा न पालयत्यज्ञानादसम्म गाग । ग्रहणशिक्षा वाश्रित्य साधुर्जघन्येन सूत्रतोऽर्थतश्वाष्टौ प्रवचनमातृरुत्कृष्टतस्तु बिन्दुसारपर्यन्तं गृह्णाति । श्रावकः सूत्रतोऽ- धनश्र जघन्येनाष्टप्रवचनमातृरुत्कृष्टतः पइजीवनिका मणति व्याख्यानयति च । अर्थतस्तु पिण्डैषणां आचाराङ्गोक्तां शृणोति नया गाथासूत्रप्रामाण्याग, यत उक्तं 'सामाइयंमि उ कए०'अत्र सामायिके श्रावका श्रमण इव स्यादित्युक्तं न तु श्रमण एवेति पधाऽधिवतडागः। शेष प्राग्व्याख्यातमेव । तथोपपातस्यापि भेदः श्राद्धस्योत्कृष्टोपपातोऽच्युते, साधोस्तु सर्वार्थसिद्धौ जगन्येन द्वयोरपि मोधर्मोपपातः । स्थितेरपि भवान्तरे मेदः श्राद्धस्य जघन्या स्थितिः पल्यमुत्कृष्टा द्वाविंशति सागराणि । -
आवश्यक
नियुक्ति
दीपिका।
सामायिक-
ग्रहण-
विधिः।
॥ २२॥
इति आवश्यकनियुक्तिवचनात् कुस्वप्नकायोत्सर्गः साधुवत् श्राद्धस्यापि युज्यते यथा ईर्यापथकायोत्सर्गः साधुश्राद्धयोस्तुल्य
एवेति । तथा 'सो उस्सग्गो दुविहो चिट्ठाए अभिमवे य नायबो । मिक्खायरियाए पढमो उक्सग्गभिजुजणे वीओ' ॥१॥
इत्यादि गाथा। ततः सामायिके कृते द्वितीयोऽभिभवकायोत्सर्गोऽपि युक्तः, यथा चन्द्रावतंसकराजादिभिः कृत इति ।
किश्वेष आवश्यकविधिः स्वल्पोऽपि पूर्वश्रुतधरामिहितत्वात्तत्प्रमाणमेव । यदि च समधिकमपि विधि सूत्रभाष्यचूर्णिचिरन्तन-
वृत्त्यादिभिः श्राद्धमाश्रित्य कोऽपि दर्शयति तदा सोऽपि प्रमाणं नात्र कोऽप्यभिनिवेशोऽस्ति यतः 'से नूणं भंते ! तमेव सच्चं
नीसंकं जं जिणेहिं पवेइयं, हंता गोयमा! तमेव सचं नीसंकं जं जिणेहिं पवेइयं ' भगवत्यां, स्थानकेष्वपि 'आगम आयरंतेण
अप्पणो हियकंखिणा । तित्थनाहो गुरू धम्मो सवे ते बहुमन्निया' ॥१॥ अतः सिद्धान्तोक्तविधिः श्रद्धेयः । पञ्चमे क्षेत्रखलादौ
सामायिकस्थाने कदाचित्सम्पूर्णमपि पडावश्यकं कदाचिदसम्पूर्णमपि कदाचित्केवलमपि सामायिकं भवति । तथाहि यदि चिरं
स्थास्यति निर्यापारश्च भूमिरपि निषद्या रुयादिसंघहोद्योतिकादिवर्जिता मिथ्यादृष्टयादिसागारिकाभावश्च तदा सर्वमावश्यक
कुर्यात् , कारणे तु सामायिकरहितमप्यावश्यकं, विशेषकारणे तु केवलं सामायिकं कृत्वा नमस्कारादि परावर्त्तते । सामा-
यिकवेलाया अभावे त्वभिग्रहविशेषरूपं ग्रन्थ्यादि यावत् सावधप्रत्याख्यानं कुर्यात् । यतोऽत्रैवाने चूर्णी 'अंगुट्ठमुहिगंठी चि'
व्याख्याने 'ताव न जेमेमि जाव न मुट्टि मुयामीत्यादि । न केवलं भत्ते अन्नेसु वि अभिग्गहविसेसेसु । ततोऽभिग्रहविशेषाः
सर्वार्थविषया भवन्ति । तथा 'वंदित्तु सबसिद्धे' इत्यादि प्रतिक्रमणनामरूढं सूत्रं नियुक्ती नोक्तं, तथा श्राद्धानां पाक्षिक-
प्रतिक्रमणसूत्रे च भिन्नेन क्षामणानि च । ततोऽयमावश्यकचर्युक्तः संक्षिप्तोऽप्यावश्यकविधिश्चिरन्तनश्राद्धानां ज्ञेयः। ननु
-
SRO
॥ २२ ॥
दिया गौ वा प्रमाणेन वा कुनै इति देशतः। अहोरात्र व्रम पालयामीति मर्वतः ३। अमुकं मानवव्यापारं न करिष्यामीनि देशतः, गवं न कुर्ने इति मर्वतोऽव्यापारपोपधः ४ । अत्र देशतः पोपधशब्दो देशावकाशिकवाची घटते नवनीचारप्रतिबद्धपोपधवनवाची, यतः जुर्गों 'तं सत्तिओ करिजा तवो य जो वणिओ समणधम्मे । देसावगासिएण 7 जुनो मामादपणं ' ॥ १ ॥ तपथ एवार्थे द्वादशधा श्रमणधर्मे यद्वर्णितं तच्छक्तितः कुर्यात् देशावकाशिकेन युक्तो देवापोगवधान तपः कुर्याद , सामायिकेन वा युक्तः सर्वपोपधवान् तपः कुर्यात् । परं देगावकाशिकवान् श्राद्धः मदा स्यात् तेन देशपोषधोऽन्त्येव, परं स पोपधराव्दो सहिं न लभते यथाऽविरतानां सामायिकं, उक्तं चेत्थं ' मवेसु जालपोमु पसन्यो(त्य) जिणमए तवो जोगो । अट्ठमिपन्नम्सीसु च, नियमेण हविज पोसहिओ' ॥ १॥ सर्वेषु कालपर्वसु प्रतिपदादिए जिनमते तपो योगः प्रशस्तः, परमष्टमीपञ्चदश्योर्नियमारपोषधिको भवेत् । अत्र सर्वपोषध एव घटनेऽन्यथा विशेषाभिधानं कयम् ? तपसि देशपोपधम्यायातत्वादेव तथा यो देशपोपधं करोति स सामायिकं करोति न वा करोति । यः गरपोषधं करोति म नियमाकरोति । अत्र सामायिकं करोति न वा करोतीतिशब्देन पोषधसम्बद्धं सामायिकं न घटते हिन्यापयतकाले करोनि न ना । अथ पोषधविधिः-' त कहिं ? चेइयघरे साहूमूले घरे वा पोसहसालाए वा उम्मुकमणि- गुमलो पढन्तो पुलयं गाएइ, धम्मज्झाणं झाएइ, जहा एए माहुगुणा अहं असमत्यो मन्दगग्गो धारिउं' इत्यादि । एवं पोषधो पोर्णितः ग सर्वपोषध एन घटते । तत एव पृत्तिकदाह-इदमपि शिक्षापदव्रतं निरतिचारं पाल्यम् । 'पोसहो' पोपघोपवासस्य पोषपापम्यानम्य पश्चानीचागः । अप्रत्युपेक्षितदुष्प्रत्युपेक्षितशय्यासंस्तारौ शम्या फलकाद्यास्तीर्यते शयनाय पोपधिना इति, * KC
पोषधो-
आवश्यक-
नियुक्ति-
दीपिका।
स्वरूपम-
तिचाराश्च।
॥२४॥
पोसहे, पोसहोववासस्स समणोवासएणं इमे पञ्च अइयारा जाणियव्वा, तंजहा-अप्पडिलेहियदुप्प-
डिलेहियसिज्जासंथारए अपमजियसिजासंथारए अप्पडिलेहियदुप्पडिलेहियउच्चारपासवणभूमीओ अप्प-
मजियदुप्पमजियउच्चारपासवणभूमीओ पोसहोववासस्स सम्म अणणुपालणया ११ ॥ (सूत्रम् )
इह पोषधशब्दो रूट्या पर्वसु वर्त्तते । पर्वाणि चाष्टम्यादितिथयः। पूरणात्पर्व, धर्मोपचयहेतुत्वादित्यर्थः। अत्र पोषध-
शब्दो रूढ्या पर्वस्विति चिन्त्यं, ये पोषधा अविरतैर्भरतादिभिर्दिनत्रयमिहलोकार्थं कृताः ते पोषधव्रतमध्ये न घटन्ते
आशंसारूपत्वेन निष्फलत्वात् । नामग्रहण एव यदि ग्राह्यस्तदा सामायिकशब्दोऽपि सम्यक्त्वसामायिके वर्तमानत्वात्
'बहुसो सामाइयं' इति कथं ? यावजीवं सामायिकं इति किं न ? पोषधशब्दश्च नियमभोजनतपोमुख्यार्थेषु सिद्धान्तशैल्या
दृश्यते । परं व्रताधिकारे सर्वपोषध एव युक्त्या दृश्यतेऽतीचाराश्च तस्य । स च पर्वसु रूढो भवति । तथा पर्वाण्यष्टम्या.
दय इति, पञ्चम्यादयो द्वितीयाद्या वा कि नोक्ताः । पोषधे उपवसनं पोषधोपवासः । नियमविशेषाख्यानं चेदं ।
पोषधोपवासश्चतुर्विधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-आहारपोषध आहारनिमित्तं धर्मपूरणं पर्वेति भावः । एवं शरीरसत्कारविषय
धर्मपूरणं शरीरसत्कारपोषधः । तथा ब्रह्म कुशलानुष्ठानं चर्य समाचरणीयं ब्रह्म च तच्चयं चेति समासः । एवं अव्यापार-
पोषधो हि सावद्यच्यापारत्यागः । तत्राहारपोषधो द्विधा देशतः सर्वतश्च । देशे विकृत्यादिसंक्षेपाचाम्लैकाशनद्विर्भक्ता-
दिरूपः, सर्वतः अहोरात्रं चतुराहारत्यागः १ । तथा शरीरसत्कारपोषधः स्नानोद्वर्त्तनविलेपनपुष्पगन्धताम्बूलवस्त्रा-
भरणादीनां मध्यादमुकं शरीरसत्कारं न करिष्यामीति देशतः, सर्व स्नानादि न कुर्वे इति सर्वतः २ । एवं ब्रह्मचर्य
॥ २४॥
- ErX दिशा गनो नाप्रमाणेन वा कुर्वे इति देशतः। अहोरात्रं ब्रह्म पालयामीति मवतः ३। अमुकं मावद्यव्यापार न करिष्यामीति देशतः, म न कुर्वे इति सर्वतोऽव्यापारपोपधः ४ । अत्र देशतः पोषधशदो देशावकाशिकवाची घटते नगीनारप्रतिपदपोषधवनवाची, यतः चूर्णी ‘त सत्तिओ करिसा तयो य जो चण्णिओ ममणधम्मे । देसावगासिएण 7 जुलो मामाइएणं ना' ॥ १ ॥ तपश्च एवार्थ द्वादशधा अमणधर्म यद्वर्णितं तच्छक्तितः कुर्यात् देशावकाशिकेन युक्तो देशपोपयवान् तपः कुर्याद, सामायिकेन वा युक्तः सर्वपोपधवान् तपः कुर्यात् । परं देशावकाशिकवान् श्राद्धः सदा गान् तेन देशपोपधोऽन्येव, परं म पोपधशब्दो रूढिं न लभते यथाऽविरतानां सामायिकं, उक्तं चेत्थं ' मवेसु कालपोमु पसन्यो(त्ये) जिणमए तवो जोगो। अट्ठमिपन्नरसीसु च, नियमेण हविज पोसहिओ' ॥ १॥ सर्वेषु कालपर्वसु पानिपदादिए जिनमते तपो योगः प्रशस्तः, परमष्टमीपञ्चदश्योनियमात्पोपधिको भवेत् । अत्र मर्वपोपध एवं घटतेऽन्यथा रिपाभिधानं कथम् ? तपसि देगपोपधस्यायातत्वादेव तथा यो देशपोषधं करोति स सामायिकं करोति न वा करोति । यः गरपोप, कगेति म नियमाकरोति । अत्र सामायिकं करोति न वा करोतीतिगदेन पोषधसम्बद्रं सामायिकं न घटते किन्याश्यककाले करोति न था। अब पोपविधिः-तं कहि ? चेइयघरे साहूमूले बरे वा पोसहसालाए वा उम्मुकमणि गवन्नो पदन्तो पुत्थयं पाण्ड, धम्मज्झाणं शाएइ, जहा एए साहुगुणा अहं असमत्थो मन्दभग्गो धारिउं' इत्यादि। एवं पोपधो गो गर्णितः ग सपोपध पा घटते । नत एव यत्तिकदाह-इदमपि शिक्षापदव्रतं निरतिचारं पाल्यम् । 'पोसहो' पोषघोपवासस्य पोपचापयानस्य पन्नातीनागः । अप्रन्युपेशितदुष्प्रत्युपेक्षितशय्यासंस्तारौ शय्या फलकाधास्तीर्यते शयनाय पोषधिना इति, . - आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। ॥ २३ ॥ प्रपद्य साधोर्जघन्या स्थितिः पल्यपृथक्त्वं उत्कृष्टा त्रयस्त्रिंशत्सागराणि । गतेर्भेदः साधुः सुरगतो मोक्षेऽपि श्राद्धश्चतसृष्वेव । साधु- कपायाद्भेदः साधुः कषायोदयमाश्रित्य संज्वलनचतुस्त्रित्येककषायोऽपि स्यादकषायो वा, श्रावकोऽप्यविरतो द्वादशकपायी श्रावकयो: देशविरतस्त्वष्टकषायी । बन्धाद्भेदः साधुमूलप्रकृत्यपेक्षयाऽष्टविधवन्धकः सप्तविधवन्धकः पड्विधबन्धक एकविधवन्धको वा शिक्षादि- श्राद्धस्त्वष्टविधवन्धको वा सप्तविधवन्धको वा । वेदनामेदः साधुरष्टानां सप्तानां चतसृणां प्रकृतीनां वेदकः। श्राद्धस्त्वष्टाना कृतभेदः मेव । प्रतिपत्तिभेदः साधुः पञ्चमहाव्रतानि समकं प्रपद्यते, श्रावकस्तु एकमणुव्रतं द्वे इत्यादि । अथवा साधुः सकृत्सामायिकं सामायिक- सर्वकालं धारयति श्रावकस्तु पुनः पुनः प्रपद्यते । अतिक्रमाद्भेदः साधोरेकव्रतातिक्रमे पञ्चव्रतातिक्रमः श्राद्धस्य त्वेकस्यैव । व्रताति- तथा 'सवति सर्व सावध इति भणित्वा यस्य विरतिः सर्वा नास्ति अनुमतेनित्यप्रवृत्तत्वात् स सर्वविरतिवादी देशविरतिं सर्व- चाराश्च । विरतिं च भ्रश्यति । 'मण' मनोदुष्प्रणिधानं मनसा गृहव्यापारादिसावद्यध्यानं १ । वाग्दुष्प्रणिधानं सावद्यासभ्यवादिताऽसमि तेन च वक्तृत्वम् २ । कायदुष्प्रणिधानं अनिरीक्ष्याप्रमृज्य करांझ्यादिन्यासः स्थानादेर्वा करणम् ३ । सामायिकस्य सम्बन्धिनी या स्मृतिरुपयोगस्तस्या अकरणम् । यथा प्रमादान्नैव सरत्यस्यां वेलायां मया सामायिकं कर्त्तव्यं कृतं न कृतमिति वा, यतः 'न सरइ पमायजुत्तो जो सामइयं कया उ कायई। कयमकयं वा तस्स उ कयं पि विफलं तयं नेयं ।१।४। सामायिकस्या- नवस्थितस्य करणं । अनवस्थितमल्पकालं करणानन्तरमेव त्यजति, यथा 'काऊण तक्खणं चिय पारेइ करेइ वा जहिच्छाए । अणवडियसामाइयं अणायाराओ असुद्धं तु।१। करोति वा यदृच्छयाऽव्यवस्थितत्वेन ५। दिसिब्वयगहियस्स दिसापरिमाणस्स पइदिणं परिमाणकरणं देसावगासियं, देसावगासियस्स सम- ॥ २३ ।।
. गोवासगणं इमे पश्न अड्यारा जाणियव्या, तंजहा-आणवणप्पओगे पेसवणप्पओगे सदाणुवाए रूवा- गुवाए पहिया पुग्गलपक्खेवे १० ॥ (सूत्रम् ) दिग्यतमध्यगृहीतस्य यावजीवसम्बन्धिदिपरिमाणस्यैव प्रतिदिनमित्येतत् प्रहरमुहूर्ताद्युपलक्षणं प्रमाणकरणं दिनादि- गमनयोग्यदेशस्थापनं प्रतिदिनप्रमाणकरणं देशावकाशिकम् । देशो दिग्वतप्रमाणस्य विभाग उपलक्षणात्प्राणातिपातादिवता- नामपि यावीपसम्बन्धिपरिमाणनियमानां दिनादिविपये देशतः सर्वतो वा आरम्भत्यागेन संक्षेपणं देशस्तस्यावकाशो गत्यादि. टशवन्धो देशागकाशस्तेन निवृत्तं देशावकाशिकं, यतः ‘एगमुहुत्तं दिवसं राई पंचाहमेव पक्खं वा । वयमिह धारेउ ददं जापडगं उन्हे कालं' ॥ १ ॥ देशावकाशिकवतं दृढं धारयेत् यावन्तं कालं उत्सहेत शक्नुयात् । आनयनप्रयोगः नियमित- भृयाशास्तुनः परेण नरेण सन्देशादिना वा आनयनाय प्रयोजनं व्यापारणम् । एवं दिननियमे सावधानतया स्थेयं । स्वयम- गरछना परेणापि नानेयम् । बलाद्विनियोज्यः प्रेष्यस्तस्य प्रयोगोऽन्येन नियमितभूवहिःकार्यकारणं नियमितभूवो बहिः कार्यकारणाय शुरकामगन्दानुपातैः परस्य ज्ञापनं शब्दानुपातः ३ । एवं स्वरूपदर्शनं परेपां रूपानुपातः ४ । नियमितभुवां पहिः कर्करादिपुद्गलप्रक्षेपः ५। इह देशावकाशिकं प्राणिहिंसारक्षायै गृह्यते, अन्यप्रेपणे च प्राणिहिंसा कारितैव । ततः कृत- कारितगोर्न कोऽपि फल भेदः । किन्तु रवयं गतौ ईर्याशुद्धिः स्यादन्यगतौ त्वदक्षत्वादयतनैवेति भावः । तथा नियमितभुवो चहिः गन्दादयोऽपि विपयतया नानेयाः ते आसन्ने आयान्ति तदा भव्यं अहं वा आसन्नो यामीत्यादि न चिन्त्यम् । पोमहोवचामे चउचिहे पन्नत्ते, तंजहा-आहारपोसहे, सरीरसकारपोसहे, बंभचेरपोसहे, अव्वावार-
पोषधो-
पवास-
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
व्रत-
स्वरूपम-
तिचाराश्च।
॥ २४ ॥
पोसहे, पोसहोववासस्स समणोवासएणं इमे पञ्च अइयारा जाणियव्वा, तंजहा-अप्पडिलेहियदुप्प-
डिलेहियसिज्जासंथारए अपमजियसिज्जासंथारए अप्पडिलेहियदुप्पडिलेहियउचारपासवणभूमीओ अप्प-
मज्जियदुप्पमजियउच्चारपासवणभूमीओ पोसहोववासस्स सम्म अणणुपालणया ११ ॥ (सूत्रम्)
इह पोषधशब्दो रूढ्या पर्वसु वर्त्तते । पर्वाणि चाष्टम्यादितिथयः । पूरणात्पर्व, धर्मोपचयहेतुत्वादित्यर्थः । अत्र पोषध-
शब्दो रूढ्या पर्वस्विति चिन्त्यं, ये पोषधा अविरतैर्भरतादिभिर्दिनत्रयमिहलोकार्थं कृताः ते पोषधव्रतमध्ये न घटन्ते
आशंसारूपत्वेन निष्फलत्वात् । नामग्रहण एव यदि ग्राह्यस्तदा सामायिकशब्दोऽपि सम्यक्त्वसामायिके वर्तमानत्वात्
'बहुसो सामाइयं' इति कथं ? यावजीचं सामायिक इति किं न ? पोषधशब्दश्च नियमभोजनतपोमुख्यार्थेषु सिद्धान्तशैल्या
दृश्यते । परं व्रताधिकारे सर्वपोषध एव युक्त्या दृश्यतेऽतीचाराश्च तस्य । स च पर्वसु रूढो भवति । तथा पर्वाण्यष्टम्या.
दय इति, पञ्चम्यादयो द्वितीयाद्या वा किं नोक्ताः । पोषधे उपवसनं पोषधोपवासः । नियमविशेषाख्यानं चेदं ।
पोषधोपवासश्चतुर्विधः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-आहारपोषध आहारनिमित्तं धर्मपूरणं पर्वेति भावः । एवं शरीरसत्कारविषय
धर्मपूरणं शरीरसत्कारपोषधः। तथा ब्रह्म कुशलानुष्ठानं चर्य समाचरणीयं ब्रह्म च तच्चयं चेति समासः। एवं अव्यापार-
पोषधो हि सावधव्यापारत्यागः। तत्राहारपोषधो द्विधा देशतः सर्वतश्च । देशे विकृत्यादिसंक्षेपाचाम्लैकाशनद्विभक्ता-
दिरूपः, सर्वतः अहोरात्रं चतुराहारत्यागः १ । तथा शरीरसत्कारपोषधः स्नानोद्वर्तनविलेपनपुष्पगन्धताम्बूलवना-
भरणादीनां मध्यादमुकं शरीरसत्कारं न करिष्यामीवि देशतः, सर्व स्नानादि न कुर्वे इति सर्वतः २। एवं ब्रह्मचर्य
॥ २४॥
दिया गयो पाप्रमाणेन या कुत्रे उनि देशतः। अहोरात्रं नम पालयामीति मर्वतः ३। अमुकं सायद्यन्यापारं न करिगामीनि देशनः, गर्व न कुर्वे इति मर्मतोऽव्यापारपोपधा ४ । अत्र देशतः पोपधशब्दो देशावकाशिकवाची घटते नसनीनारप्रनित्र पोपचवनवानी, यतः चू! 'सत्तिओ करिजा तवो य जो वणिओ समणधम्मे । देसारगासिएण 7 जुनो मामाइएणं ना' ॥ १॥ तपश्च एयार्थे द्वादशधा श्रमणधर्म यद्वर्णिनं तच्छक्तितः कुर्यात् देशारकाशिकेन युक्तो देशपोवान् नपः कुर्याद, मामायिकेन वा युक्तः सर्वपोपधवान् तपः कुर्यात् । परं देशात्रकाशिकवान् श्राद्धः सदा गान् लेन देगपोपयोऽस्त्व, पर म पोषधशब्दो रूटिं न लभते यथाऽविरतानां मामायिकं, उक्तं चेत्थं 'सवेमु कारपोमु पमन्यो(न्य) जिणमए तयो जोगो। अहमिपन्नरमीसु च, नियमेण हविज पोसहिओ' ॥ १ ॥ सर्वेपु कालपर्वसु पतिपदादिगु जिनमने तपो योगः प्रगस्तः, परमष्टमीपञ्चदश्योनियमात्पोपधिको भवेत् । अत्र सर्वपोषध एव घटतेऽन्यथा विशेषाभिधानं कथम् ? तपसि देशपोषधस्यायातत्यादेव तथा यो देशपोपधं करोति स सामायिकं करोति न वा करोति । यः मापोप करोनि म नियमाकरोति । अत्र सामायिकं करोति न वा करोतीतिगन्देन पोषधसम्बद्धं सामायिकं न घटते हिन्याश्यककाले करोति न । अथ पोपधविधि:-'तं कहिं ? चेइयघरे साहूमूले घरे वा पोसहसालाए वा उम्मुकमणि- तुरनी पहन्तो गुत्थयं पाएइ, धम्मज्झाणं झाएड, जहा एए साहुगुणा अहं असमत्थो मन्द मग्गो धारिउं' इत्यादि । एवं पोषधो यो पर्णितः म गर्नपोषध पर पटते । नन एन यत्तिकृदाह-इदमपि शिक्षापदव्रतं निरतिचार पाल्यम् । 'पोसहो' पोषधोपवासस्य पोपचा रम्यानस्य पञ्चानीचाराः । अप्रन्युपेक्षितदुष्प्रत्युपेक्षितशय्यासंस्तारौ शय्या फलकाद्यास्तीर्यते शयनाय पोपधिना इति,
आवश्यक-
नियुक्ति-
दीपिका ।
एकादश-
व्रतस्वरूप-
मतिचा-
राश्च ।
}} २५ ॥
संस्तारः दर्भकम्बलीवस्त्रादिः, प्रत्युपेक्षणं चक्षुषा निरीक्षणं, प्रमार्जनमासेवनकाले वस्त्रोपान्तादिना, न प्रत्युपेक्षितौ दुष्टप्रमत्ततया
प्रत्युपेक्षितौ वा १, न प्रमार्जितौ दुष्टप्रमार्जितौ वा शय्यासंस्तारौ २, न प्रत्युपेक्षिता दुष्टप्रत्युपेक्षिता वा, न प्रमार्जिता दुष्टः
प्रमार्जिता या उच्चारप्रश्रयणभूमयः, उच्चारो विट् प्रश्रवणं मूत्रं तयोर्भूमयः, उच्चारादिशब्दोपलक्षणानिष्ठचूतस्वेदमलादित्याग-
भूमिः, अप्रत्युपेक्षितदुष्ात्युपेक्षितोचारप्रश्रवणभूमयः [अप्रमार्जितदुष्प्रमार्जितोच्चारप्रश्रवणभूमयः ३-४] । एत्थ पुण सामा-
यारी कडपोसहो नो अपडिले हियसेन्जं दुरूहइ आरोहति, संथारंगं वा दुरूहइ, पोसहसालं वा सेवइ, इब्भवत्थे वा भूमीए संथ-
रेइ, काइयभूमीओ आगओ पुणरचि पडिलेहइ, अनहाइयारो, एवं पीठगाइसु । तथा पोषधोपवासस्य सम्यक् प्रवचनोक्तविधिना
निष्प्रकम्पेन चेतसाऽननुपालनं अनासेवनम् ५। इत्थं भावना- कयपोसहो अथिरचित्तो आहारे ताव सर्व देसं वा पत्थेइ
विइयदिवसे पारणगस्स अप्पणो अट्ठाए आढत्तिं करेइ कारावेइ वा, इमं इमं वत्ति करेह । तथा सरीरसक्कारे सरीरं उच्चट्टेइ ।
दाढियाओ केसा वा रोमाई वा सिंगाराभिप्पाएणं ठावेइ, दाहे वा सरीरं सिंचइ । एवं सवाणि सरीरभूसाकारणाणि[ण] परिहरइ।
बंभचेरे इहलोइए परलोइए वा भोगे पत्थेइ संवाहेइ वा । अहवा सद्दरूवरसफरिसगन्धे वा अभिलसइ कइया बंभचेरपोसहो
पुरिहि इति । अव्वाबारे सावजाणि वावारेइ कयमकयं वा चिन्तेइ । एवं पंचाइयारसुद्धो अणुपालियन्वोत्ति । इह युक्त्या सर्वपोषध
एवेयं युक्तियुक्ता न देशे, पोपधनामापि सर्वस्यैवोच्यते न तु देशस्य यतो वृत्तिकृता 'कयपोसहो अथिरचित्तो' इत्याधुक्तं नतूक्तं
'कयसबपोसहो अथिरचित्तो' इति । तस्मात्पोषधः सर्वपोषध एव । ततो यत्केऽपि सूरयो निशीथभाष्यगाथार्थात्पोषधे आहारं
ग्राहयन्ति तन्न ज्ञायते, यतः तत्रेय गाथा 'जे भिक्खू असणाई दिजा गिहि अहब अन्नतित्थीणं । सो आणाअणवत्थं
॥ २५ ॥
a - मिछत्तविराहणं पावे ॥ १॥ जुत्तमदाणमसीले कडसामाइउ होइ समण इव । तस्समजुत्तमदाणं चोदग सुण कारणं तत्थ ॥ २ ॥ कामी मघरंगणओ थूलपइण्णा से होइ दट्टवा । छेदणभेदणकरणे उद्दिकडं पि सो भुंजे ॥ ३ ॥ पंच विसया कामेइ नि कामी, मह गृहेण सगृहः, गङ्गाना स्त्री सह अगनया साङ्गनः । थूलपइण्णा देसविरत इति । वृक्षादिछेदने पृथिव्यादिभेदने च प्रवृतः मामायिकमावादन्यत्र जं च उदिट्ठकडं तं कडसामाइओ वि भुंजइ । एवं सो सबविरओ न भवति । एएण कारणेण नम्म न कप्पइ दाउं' । नि० मा० च्० उ० १५ । अत्र यत्सामायिके उद्दिष्टकृतभोग उक्तः स वस्त्रपट्टकाद्युद्दिश्येति वृद्धाः। अथागनादीनिशब्दस्पष्टत्वेऽशनादिभोग एवं घटते, उच्यते यद्यशनादिभोगस्तदा कथञ्चित्सामायिके स भविष्यति परं पोषध- बने कथं घटते ? आहारादिनिषेधादेव । सामायिके चाहारग्रहणं गच्छाचरणया प्रायो न दृश्यतेऽतोऽत्र बहुश्रुताः प्रमाणम् । पर मुझेशन्देन भोजनार्थः सामायिके कया रीत्या सङ्गतस्तचिन्त्यं, कायचिन्तादौ उद्दिष्टकृत इव भोगो घटतेऽपि ॥ ११ ॥ अनिहिसंविभागो नाम नायागयाणं कप्पणिज्जाणं अन्नपाणाईणं दव्वाणं देसकालसद्धासकारकमजुरं पराा भत्तीए आयाणुग्गहवुद्धीए संजयाणं दाणं, अतिहिसंविभागस्स समणोवासएणं इमे पंच अइयारा जाणिपन्या नंजहा-सचित्तनिक्खेवणया मचित्तपिहणया कालइक्कमे परववएसे मच्छरिया य १२ ॥ (सूत्र) भोजनार्थ मोजनकालागतोऽतिथिरुल्यते । तत्रात्मार्थ निष्पादिताहारस्य गृहिव्रतिनः साधुरेव मुख्योऽतिथिस्तस्य संवि- भागो दानं अनिधिविभागः। संविभागशब्दात्पश्चात्कादिदोपपरिहारो ज्ञेयः। नामशब्दोऽलङ्कारार्थः । न्यायागतानन्यायो दिनक्षत्रियोश्यादीनां स्वपत्यनुष्ठान तेनागनानां प्राप्तानां अस्त्यैन्येन व्यवहारशुद्ध्यागतानामित्यर्थः । कल्पनीयानामुद्गमादि-
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
द्वादशव्रत-
स्वरूपमति-
चाराश्च ।
॥ २६ ॥
?
दोपोज्झितानामित्यर्थः । अन्नपानादीनामादितो वस्त्रपात्रौषधभेषजादिग्रहः अनेन हिरण्यादिव्यवच्छेदः । देशकालश्रद्धासत्का-
रक्रमयुक्तम् । तत्र शाल्यादिनिष्पत्तिभार देशः, सुभिक्षादिः कालः, शुद्धचित्तपरिणामः श्रद्धा । अभ्युत्थानासनदानवन्दनानुव्रज-
नादिः सत्कारः, पाकस्य पेयादिपरिपाट्या प्रदानं क्रमः। यद्वोत्कृष्टानुत्कृष्टवस्तूनां परिपाटिः क्रमः। एभिर्देशादिभिर्युक्तम् । अनेन
विपरीतक्रमव्यवच्छेदमाह । परया भक्त्या परया तत्त्वबुद्ध्या, तथात्मानुग्रहबुद्ध्या न तु यत्यनुग्रहबुद्ध्या यतयश्वात्मन्यनुग्रहपराः
स्युः। संयतेभ्यो मूलोत्तरगुणसंपन्नेभ्यो दानम् । एत्थ सामायारी-सावएण पोसहं पारंतेण नियमा साहूण दाउं पारेयध्वं । अन्नया
पुण अनियमो, दाउं वा पारेइ पारिए वा देइ, तम्हा पुव्वं साहूणं दायव्वं । कहं ' जाहे देसकालो यदा प्रस्तावः ताहे अप्पणा
सरीरस्स विभूसं काउं। परं विभूषा किमर्थमुक्ता ? उच्यते, अलङ्कतो धर्ममाचरेदिति व्यवहाररक्षाय, साहुपडिस्सयं गंतु निमंतेइ
भिक्खं गेण्हह त्ति । साधूणं का पडिवत्ती? साधूनां का प्रतिपत्तियुक्तिः ? ताहे अन्नो पडलं अन्नो मुहणंतगं अन्नो भाणं पडिलेहेइ
माअंतराइयदोसो ठवियगदोसो य, अन्तरायदोषः स्थापनादोषश्च मा भवत इति साधवः पात्रकप्रतिलेखनां विभिन्नाः कुर्युः
सो जइ पढमाए पोरिसीए निमंतेइ अस्थि नमोकारइतगा तो घेप्पइ, अह नत्थि न घेप्पड़, तं वहियव्वयं होइ । जइ घणं
लगिजा ताहे घेप्पइ संचे(चि)क्खावे(वि)जइ । जो वा उग्घाडपोरिसीए पारेइ पारणइत्तो अन्नो तस्स दिजइ । पच्छा
तेण सावगेण समगं गम्मइ । संघाडगो वच्चइ एगो न वट्टइ पेसेउं साहुणो पुरओ सावगो मग्गओ घरं नेऊण आसणेण उव-
निमंतिजन्ति । जइ निविट्ठा तो लट्टयं । अहवा न निविस्सन्ति तहावि विणओ पउत्तो, ताहे भत्तं पाणं सयं चेव देइ । अहवा
१ णमोकारसहिताइतो' इति आव० हारि० वृत्तौ, 'नमोकारसित्ता' इति आव० चूर्णौ ।
॥ २६॥
माणं परेड मला देह। अहया ठियो अच्छइ जाव दिनं, माह वि सावसेसं दन्यं गेहन्ति पच्छाकम्मपरिहरणट्ठा, दाऊण बंदिउ विमोइ अणुगन्छ । पन्छा मयं भुजः । जं च किर साहूणो न दिन्नं तं सावगेण न भोत्तन्वं । जइ पुण साहू नत्थि नाहे देमकालवेलाए दियालोओ सायव्यो । विसुद्भावणं चिंतेय । जइ माहवो होता नित्यारिओ मि होतो त्ति इत्यादि । अभ्यानीचागः । अनादरदानयुद्धया सचित्तेपु निक्षेपणं मायया ११ तथा एवं सचित्तेन पिधानं स्थगनं सचित्तपिघानं २ । एवं कालानिमः । उचितो यो गतिभिक्षाफालस्तमतिक्रम्यानागतं वा निमन्त्र्य मुझे ३ । एवं साधोः पोपधोपनासपारण. काले मिक्षागतम्य प्रन्टमनादि पश्यतः पादो वक्ति परकीयमिदमन्नं नास्माकीयं तेन न ददे इति परस्य व्यपदेशः छलं परव्यपदेशः परं व्यपदिशति यदा अन्यस्य जीवतो मृतस्य वा पुण्यं भवत्तिति ४ । एवं मात्सर्य इति याचितः कुप्यति पदपि न दत्ते नया अन्योन्नति वैमनस्यं मात्मयं स्यात्तेन यदि द्रमकेण याचितेन दत्तं किमहं ततोऽपि न्युनः ? इति मापदत्ते । मकायचित्तस्य वा दाने मात्मयम् ५। समाप्तं चतुर्थ शिक्षापदव्रतम् ॥१२॥ श्राद्धर्म निगमयन्नाह इत्य पुण ममणोवासगधम्मे पंचागुन्बयाई तिनि गुणव्वयाई आवकहियाई, चत्तारि सिकवावयाई पत्तरियाई, एयस्म पुणो समणोवामगधम्मस्स मूलवत्युं सम्मत्तं, तंजहा-तं निसग्गेण वा अभिगमेण या पंचयारविसुद्धं, अणुव्ययगुणव्ययाई च अभिग्गहा अन्ने वि पडिमादओ विसेसकरणजोगा, अप- च्छिमा मारणंनिया संलेदणामसणाराहणया, इमीए समणोवासरणं इमे पञ्न अइयारा जाणियव्वा- उस्लोगासंसप्पओगे परलोगासंसप्पओगे जीवियासंसप्पओगे मरणासंसप्पओगे कामभोगासंसप्प-
आवश्यक-
नियुक्ति-
दीपिका।
दश-
विधप्रत्या-
ख्यानव्या-
॥ २८ ॥
ख्यानम् ।
सागारमणागारं परिमाणकडं निरवसेसं ॥ १५५८ ॥
अनागतं पर्युषणादौ गुरुवैयावृत्यादेस्तपोऽन्तरायभावादाक् तत्तपःकरणं अनागतम् १ । एवमतिक्रान्ते पर्वणि तपोऽ-
तिक्रान्तम् २ । कोट्यौ अन्तौ मिलितौ समानौ यत्र तत्कोटीसहितं आद्यन्तयोश्चतुर्थादितुल्यप्रत्याख्यानमित्यर्थः ३ । नितरां
यन्त्रितं नियन्त्रितं यथा अमुकदिने कारणेऽकारणे वा एतत्तपः कार्यमेव ४ । सहाकारैः साकारम् ५। अविद्यमानाकार
अनाकारम् ६ । दत्त्यादिपरिमाणात् परिमाणकृतम् ७ । सर्वाहारत्यागरूपं निरवशेषम् ८ ॥ १५५८ ॥
संकेयं चेव अद्धाए पच्चक्खाणं तु दसविहं ।
सयमेवणुपालणियं दाणुवएसे जह समाही ॥ १५५९ ।।
केत चिलु अङ्गुष्ठादि सह केतेन वर्तते इति सङ्केतम् ९ । 'अद्धाए'त्ति पौरुष्यादिकालमानम् १० । प्रत्याख्यानं दशविधं
इदं स्वयमेवानुपालनीयं न तु प्राणातिपातादिप्रत्याख्यानवदन्यकारापणेऽनुमतौ चा निषेधः । दाने कृतोपवासस्यान्येषा-
माहारदाने उपदेशे अन्यदानोपदेशे च यथासमाधि स्वेच्छया करोतीत्यर्थः ॥ १५५९ ॥ दशविधप्रत्याख्यानं व्याख्याति
होही पज्जोसवणा मम य तथा अन्तराइयं हुज्जा।
गुरुवेयावच्चेणं तवस्सिगेलनयाए वा ॥ १५६० ॥
A
॥२८॥
मविष्यति पर्युषणा उपलक्षणाचतुर्मासकादावपीदं ज्ञेयम् । तत्र पर्युषणायां विरुष्टतपः कार्यम् , तत्र यदि सर्वविकृष्ट कर्तु न मनोनि नदापि जयन्यविकटं अष्टमं करोति, एवं चतुर्मासे पष्ठं पाक्षिके उपवासः । तथाऽन्येष्वपि स्नात्ररथयात्रादिप्वपि यथाशनाया नपः कार्यम् । तदा पर्व मम गुरुवैगावृत्येन तपस्विपारणेन स्वस्य ग्लानतया च अन्येन वा ग्रामगमनकार्यादिना जोपमासस्यान्तरायं भवति ।। १५६० ॥ सो दाइ तवोकम्म पडिवज्जे तं अणागए काले । एयं पञ्चक्खाणं अणागयं होइ नायव्वं ॥ १५६१ ॥ स हटानी अनागते काले तत्पर्युपणासम्बन्धि तपःकर्म प्रतिपद्यते तदनागते काले एतत्प्रत्याख्यानमनागतं ज्ञातव्यम् ॥ १५६१ ।। अतिक्रान्तव्याख्यामा तवं जो खलु न करेइ कारणजाए। गुरुवेयावच्चेणं तवस्सिगेलन्नयाए वा ॥ १५६२ ॥ पपणागां यस्तपो न करोनि कारणजाते सति तदेवाह गुर्वादिययावृत्त्येन तपस्विग्लानतयाऽन्तराय च ॥ १५६२ ।। सो दाइ तबोकम्म पडिवज्जइ तं अइच्छिए काले । पजोसवणाइ
श्राद्धधर्म-
निगमनम्।
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका
॥ २७॥
ओगे १३ ।। (सूत्रम् )
पंचाणुव्रतानि त्रीणि गुणव्रतानि यावत्कथिकानि सकृद् गृहीत्वा यावजीवं पाल्यानि । शिक्षापदव्रतानीत्वराणि, शिक्षाऽ.
भ्यासस्तस्याः पदानि स्थानानि तान्येव व्रतानि । तत्र प्रतिदिवसानुष्ठेये सामायिकदेशावकाशिके पुनः पुनरुच्चार्ये । अत्र
सामायिकमपि देशावकाशिकवत्कालद्वयमेव कार्य इति वृद्वाः । पोषधोपनासातिथिसंविभागौ तु प्रतिनियतदिवसानुष्ठेयो न
प्रतिदिवसाचरणीयौ । अत्र प्रतिनियतशब्देन पर्वदिने इति वृद्धाम्नायः । यत्सुबाहुनाऽष्टमेन पोपधादि कृतं तत्र द्वादशं पौषध-
व्रतं किं न घटते ? तस्य पर्वदिनानुष्ठानत्वात् श्रीविजयादिना पोषधदृष्टान्तेन यद्वा त्रयोदश्यामुपवासं कृत्वाऽन्ते चतुर्दशी-
पश्चदश्योः पोपधद्वयमिति, यद्वा नियमविशेपे वाऽष्टमतपसि पोषधशब्दः । अत्र यद्वचनविरुद्धं स्यात्तच्छुतज्ञान क्षमयामि ।
'एयस्स०' एतस्य द्वादशविधस्य धर्मस्य मूलवस्तु मूलभूतं सम्यक्त्वं प्रशमसंवेगनिर्वेदानुकम्पास्तिक्यस्वरूपम् । तन्निर्सेगण वाऽ-
धिगमेन वा स्यात्तत्र निसर्गः स्वभावोऽधिगमो गुरोः शास्त्राद्वा यथार्थवस्तुज्ञानम् । यद्यपि मुख्यतः सम्यक्त्वं क्षयोपशमाञ्जायते
तथापि निसर्गाधिगमो सहकारिणौ भवत एव । इदं च शङ्कादिपश्चातीचाररहितं पाल्यमिति शेपः। तथाणुव्रतानि गुणवतानि
निरतिचाराणि पाल्यानि । अभिग्रहा लोचकृतघृतदानाद्याः श्र(शु)दा भङ्गायतिचाररहिताः पाल्याः, अन्ये च प्रतिमाद्या विशेषण
करणयोगाः पुण्यव्यापारा आदिशब्दादनित्यत्वाद्या भावनाः पाल्याः । तथाऽपश्चिममारणान्तिकी संलेखनाजोपणाराधनाऽति-
चाररहिता सम्यक् पाल्या । तत्र पश्चिमैवापश्चिमा मरणमेवान्तो मरणान्तस्तत्र भवा मारणान्तिकी । संलिख्यन्ते कशीक्रिय-
न्तेऽनया देहकपायादीनि [इति ] संलेखना तपोविशेषरूपा तस्या जोपणं सेवनं तस्याराधनाऽखण्डपालनं चः समुच्चये । एत्थ
॥ २७॥
मामायारी-आरोपियगिहिधम्मेण किल सावगेण पच्छा निक्खमियत्वं । एवं सावगधम्मो उजमिओ होइ । न सका ताहे भत्तप- गावाण काले संथारसमणेण होयचं। अत्रेद विचार्यते । यदि संस्तारदीक्षाप्यवश्यं श्राद्धै ह्या इत्यस्ति आनन्दादिभिश्च सामग्यो नाना, नतः केवलचरितानुवादमात्रेणैव न स्थेयं किन्तूक्तबलादपि विधेयम् । तेन ग्रन्थि बवा सामायिकवद्यत्पालयन्ति मायधनियमं तत्र दोरो न घटते। 'इमीए' इत्यादि, इह मरणकाले इहलोकाशंसाप्रयोगः इहलोको मनुष्यलोकस्तस्मिन्नाशंसा- भिलापनम्याः प्रयोगो यथा इह भवे महत्ववान् स्यामिति १ । एवं परलोको देवलोकः २। जीविताशंसा मरणसमयेऽपि पुग्नकानादिपूनाबहुपरिवारलोकश्लाध्यत्वदर्शनादनशनिनोऽपि जीवितेच्छाकरणम् ३ । मरणाशंसाप्रयोगोऽनशने न पूज्यत्वे पनिटापर्यादिना शीघ्रं प्रियेऽहमिति चिन्तनम् ४ । कामभोगाशंसा जन्मान्तरे चक्री स्यामित्यादि ५ । व्याख्यातं दिग्व- नादिदेशोनरगुणप्रत्याख्यानम् । सर्वोत्तरगुणप्रत्याख्यानमाह पञ्चक्खाणं उत्तरगुणेसु खमणाइयं अणेगविहं । तेण य इहयं पगयं तं पि य इणमो दसविहं तु ॥ १५५७ ॥ प्रन्यायानं उत्तरगुणेषु उत्तरगुणविषयं प्रकरणात्माधूनामिदं क्षपणादि उपवासादि, तेनैवात्र सर्वोत्तरगुणप्रत्याख्यान- प्रहगे प्रकनमुपयोगः, तदपि चेदं दशविघं मूलभेदापेक्षया ।। १५५७ ।। अणागयमइकंतं कोडियसहिअं निअंटिअंचेवं । हूँ
आवश्यक-
नियुक्ति-
दीपिका।
दश-
विधप्रत्या-
ख्यानव्या-
ख्यानम् ।
॥ २८ ॥
सागारमणागारं परिमाणकडं निरवसेसं ॥ १५५८ ॥
अनागतं पर्युषणादौ गुरुवैयावृत्यादेस्तपोऽन्तरायभावादाक् तत्तपःकरणं अनागतम् १ । एवमतिक्रान्ते पर्वणि तपोs-
तिक्रान्तम् २ । कोट्यौ अन्तौ मिलितौ समानौ यत्र तत्कोटीसहितं आद्यन्तयोश्चतुर्थादितुल्यप्रत्याख्यानमित्यर्थः ३ । नितरां
यन्त्रितं नियन्त्रितं यथा अमुकदिने कारणेऽकारणे वा एतत्तपः कार्यमेव ४ । सहाकारैः साकारम् ५। अविद्यमानाकारं
अनाकारम् ६ । दत्त्यादिपरिमाणात् परिमाणकृतम् ७ । सर्वाहारत्यागरूपं निरवशेषम् ८ ।। १५५८ ॥
संकेयं चेव अद्धाए पच्चक्खाणं तु दसविहं ।
सयमेवणुपालणियं दाणुवएसे जह समाही ॥ १५५९ ॥
केत चिह्ण अङ्गुष्ठादि सह केतेन वर्तते इति सङ्केतम् ९ । 'अद्धाए'त्ति पौरुष्यादिकालमानम् १० । प्रत्याख्यानं दशविधं
इदं स्वयमेवानुपालनीयं न तु प्राणातिपातादिप्रत्याख्यानतदन्यकारापणेऽनुमतौ वा निषेधः । दाने कृतोपवासस्यान्येषा-
माहारदाने उपदेशे अन्यदानोपदेशे च यथासमाधि स्वेच्छया करोतीत्यर्थः ।। १५५९ ॥ दशविधप्रत्याख्यानं व्याख्याति
होही पजोसवणा मम य तथा अन्तराइयं हुज्जा ।
गुरुवेयावच्चेणं तवस्सिगेलन्नयाए वा ॥ १५६० ॥
॥२८॥
** मनिप्यति पर्युषणा उपलक्षणाचतुर्मासकादावपीदं ज्ञेयम् । तत्र पर्युषणायां विकष्टतपः कार्यम् , तत्र यदि सर्वविकृष्टं कर्तु न मनोनि तदापि जपत्यविक्रष्टं अष्टमं करोति, एवं चतुर्मासे पष्ठं पाक्षिके उपवासः । तथाऽन्येष्वपि स्नात्ररथयात्रादिष्वपि यथाशक्तया तपः कार्यम् । तदा पर्व मम गुरुवैयावृत्येन तपस्विपारणेन स्वस्य ग्लानतया च अन्येन वा ग्रामगमनकार्यादिना गोपनासम्यान्तगयं भवति ।। १५६० ॥ सो दाइ तवोकम्म पडिवजे तं अणागए काले । एयं पञ्चक्खाणं अणागयं होइ नायव्वं ॥ १५६१ ॥ म इटानी अनागते काले तत्पर्युषणासम्बन्धि तपाकर्म प्रतिपद्यते तदनागने काले एतत्प्रत्याख्यानमनागतं ज्ञातव्यम् ॥ १५६१ ।। अतिक्रान्तव्याख्यामाह पज्जोसवणाइ तवं जो खलु न करेइ कारणज्जाए। गुरुवेयावच्चेणं तवस्सिगेलन्नयाए वा ॥ १५६२ ॥ पयुषणायां गस्तपो न करोनि कारणजाते सति तदेवाह गुर्वादिवेयावृत्त्येन तपस्विग्लानतयाऽन्तराय च ॥ १५६२ ॥ सो दाइ तबोकम्म पडिवज्जइ तं अइच्छिए काले ।
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
कोटी-
सहित-
प्रत्याख्या-
नम् ।
॥२९॥
एयं पच्चक्खाणं अइकंतं होइ नायव्वं ॥ १५६३ ॥
'अइच्छिए' अतिक्रान्ते काले ॥ १५६३ ।। तत्रानागतप्रत्याख्याने विधिः-पर्युषणायां गुरूणां गोचरवैयावृत्य कार्य तदा
तेऽसहत्वादुपवासासहा अन्या वा काप्याज्ञप्तिः स्यात् , ग्रामान्तराद्वा किञ्चिदानेयं स्यात् , देहवैयावृत्तिर्वा । उपवासी तु
गुरुवयावृत्यायसहः । ततः क्षमः उपवासवैयावृत्त्ये कुर्यादन्यो वोपवासासहः कुर्यात् , यद्वान्यो विहर्ता नास्ति अस्ति वा
परमलाभोऽज्ञो वा विधौ, ततः स एव पूर्वमुपवासं कृत्वा पर्युषणायां भुङ्क्ते, यद्वा तपस्वी क्षपकस्तस्य पर्युषणायां पारणं
समेतं गोचराक्षमश्च । असहं तपस्विनं ज्ञात्वा पर्युषणायां पारापितः ततस्तपस्वी चेत् क्षमो मनागपि तदा आसन्नगृहेषु
हिण्डते आसन्ने वा न गृहाणि योग्यं वा न लभ्यते ततः स एवेत्यादि प्राग्वत् । तथा ग्लानतां स्वस्य वेत्ति यथा तद्दिनेऽहं
असहः स्यां, वैद्याद्वा वेत्ति, वैद्येनोक्तं अमुकदिनेऽगदं कुर्याः, यद्वा गण्डादिपीडाऽसहत्वं स्वस्य तदा वेचि, ततः प्राग्वत् ।
तथा कुलगणसंघाचार्यगच्छहेतून् वा पर्युषणायां वेत्ति । तेनानागतं प्रत्याख्याति । तदा च भुङ्क्ते, पर्युषणातपो निर्जरैव
तस्य एवमनागतप्रत्याख्यानमप्येभिः कारण यम् । कोटीसहितमाह-
पट्टवणओ अ दिवसो पच्चक्खाणस्स निट्ठवणओ अ ।
जहियं समिति दुन्नि वि तं भन्नइ कोडिसहियं तु ॥ १५६४ ॥
प्रस्थापकश्च तपःप्रारम्भकश्च दिवसः प्रत्याख्यानस्य निष्ठापकश्च समाप्तिदिवसश्च यत्र प्रत्याख्याने समेतः तुल्यप्रत्या-
॥ २९॥
च्यानत्वेन मिलतः द्वावपि पर्यन्तौ तद्भण्यते कोटीसहितम् । यथा प्रातरावश्यकेऽभक्तार्थः कृतः ततो द्वितीयेऽलयपि । दिवं द्वितीयोपचासस्य प्रस्थापनाऽऽद्यस्य तु निष्ठापनेति द्वौ कोणी मिलितो, एवं आयम्बिलनिधियएगासणएगहाणाण वि । अष्टमादिषु उगयतः कोटिः यतो द्वितीयप्रत्याख्यानाहोरात्रान्त एवोपवासो मिलितः । आद्योपवासाहोरात्रान्त एव च द्वितीयं प्रन्यायानं मिलितमिति । यद्वोपवासान्ते आचामाम्लं पुनरुपवासाचामाम्ले इति, एवं एकासनादिष्यपि संयोगः । निर्वि- कन्यादिवपि प्रत्याख्यानेष्वपि सदृशेषु विसदृशेषु च संयोगः कार्यः ॥ १५६४ ॥ नियन्त्रितमाह- मासे मासे अतवो अमुगो अमुगे दिणंमि एवइओ। हटेण गिलाणेण व कायवो जाव ऊसासो॥१५६५ माये मानेऽमुकममुक चतुर्थादितपः, एतावन्मात्रं संग्ख्यया, अमुकदिवसे दृष्टेन नीरोगेण ग्लानेन वा कार्यम् यावदामो गाादायुः ।। १५६२॥ एयं पञ्चक्खाणं नियंटियं धीरपुरिसपन्नत्तं । जं गिण्हंतऽणगारा अणिस्सि(भ)अप्पा अपडिबद्धा ॥ १५६६ ॥ नियन्त्रित पद् गृहन्ति जनगारा अनिश्रितान्मानोऽनिढाना वृद्धा अप्रतिवद्धा देहक्षेत्रादिपु ।। १५६६ ॥ चउदसपुबीजिणकप्पिएमु पढममि चेव संघयणे । पयं विच्छिन्नं ग्ब थेग वि नया करेमी या|१५६० साकार- आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। प्रत्याख्या- नव्याख्या- नम् । ॥ ३०॥ चतुर्दशपूर्विजिनकल्पिकेषु प्रथमे एव वज्रऋषभनाराचसंहनने एतद् व्युच्छिन्नम् । स्थविरा अपिशब्दादन्येऽपि तदा कार्युः ॥१५६७ ॥ साकारमाह- मयहरगागारेहिं अन्नत्थ वि कारणमि जायंमि । जो भत्तपरिच्चायं करेइ सागारकडमेयं ॥१५६८॥ अयं महानयं महाननयोरतिशयेन महान् महत्तरा आकाराः प्रकारास्तैर्महत्तराकारैः प्रभूतदशाकारख्यापनार्थ बहु- वचनम् । अतो महत्वराकारैर्हेतुभूतैरन्यस्मिंश्चानाभोगादौ कारणे जाते सति भुजिक्रियां करिष्ये अहमित्येवं यो भक्तपरित्याग करोति, साकारकृतमेतत् । यथा साधुनाऽभक्तार्थः प्रत्याख्यातः । गुरुभिरूचेऽमुके ग्रामे गम्यं स ऊचे ममोपवासः । ततश्चे- क्षमस्तदा याति अशक्तौ अन्यो याति । नास्त्यन्यस्तत्कार्याक्षमो वास्ति ततो गुरुस्तं प्रेषयति तस्य भुञ्जानस्यानभिलाष- स्योपवासनिर्जरा स्यात् गुरुनियोगेन, एवं पारिष्ठापनिकाकारोऽपि युक्त्या ज्ञेयः। एवं ग्लानकुलसंघकार्येष्वपि ॥१५६८॥ अनाकारमाह- निजायकारणंमी मयहरगा नो करति आगारं । कंतारवित्तिदुब्भिक्खयाइ एयं निरागारं ॥ १५६९ ॥ निश्चयेन यातमपगतं कारणं एकवारेणैव दचाहारैः यस्मिन्नसौ निर्यातकारणस्तस्मिन् साधोमहत्तराः प्रयोजनविशेषा- स्तत्फलाभावात् आकारविशेषं न कुर्वन्ति । कान्तारवृत्तौ भिल्लपल्ल्यादिकान्तारपतने दुर्मिक्षतायां दुर्मिक्षभावे चशब्दा- ॥३०॥ Hin दुनाहारनिधिते च अत्र यक्रियते एतत् प्रत्याख्यानं निराकारम् , मावार्थस्तु भोज्यलाभाभावादनाकारं प्रत्याख्याति यहा न जीवामीति वात्वाऽनाकारं प्रत्याख्याति । तत्राप्यनाभोगसहसाकारौ भवत एव । कदाचित् शलाको काष्ठमलिं मा मुरो विपदनामोगेन सहमा वा ॥ १५६९ ॥ परिमाणकृतमाह- दत्तीहि उ कवलेहि व घरेहिं भिक्खाहिं अब दवेहिं । जो भत्तपरिचायं करेइ परिमाणकडमेयं ॥१५७० ॥ दत्तिमिरेकवारेणैव दत्ताहारा कवलै| गृहै; भिक्षाभिः संसृष्टादिभिरथया द्रव्यैरोदनादिभिराहाराय सप्रमाणैर्यो भकत्यागं कुर्यात् , तत्र दत्तिरेकवारेऽन्नपातः, कृतपरिमाणं प्रत्याख्यानमेतत् ॥ १५७० ॥ निरवशेषमाइ- सवं असणं सत्वं पाणगं सबखज्जभुजविहं । बोसिरइ सवभावेण एवं भणियं निरवसेसं ॥१५७१॥ अगनं प्राकमासमप्तदशधान्यानि, एवं पानं खण्डपानादि, खादिम फलादि, स्वादिमं दन्तपावनमधादि। सर्व खाद्यभोज्याधी पाये इ खण्डादि भोज्यं मर्वतः स्वायं तयोबिंधी प्रकारौ सर्वप्रकारेण सर्वतो व्युत्सृजति । 'एयं' निरामेसं निगकारं पार्यनेऽपि, इदं तु न पायते इति विशेषः ॥ १५७१ ॥ संकेतमाह- RECENTERV ---
पावश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
E
संकेतप्र-
त्याख्यान-
व्याख्या-
नम् ।
अंगुट्ठमुट्ठिगंठीघरसेउस्सासथिबुगजोइक्खे ।
भणियं संकेयमेयं धीरेहिं अणंतनाणीहि ॥ १५७२ ॥
अङ्गुष्टमुष्टिग्रन्थिगृहस्वेदोच्छ्वासस्तिबुकज्योतिष्कान् चिह्नं कृत्वा यत्क्रियते प्रत्याख्यानम् । अयमर्थः पूर्णेऽपि पौरुष्यादि-
प्रत्याख्याने साधुः श्राद्धो वा यावन्न भुङ्क्ते तावत् किश्चिचिह्नममिगृह्णाति न युज्यतेऽप्रत्याख्यानिनः स्थातुं इति । ततोऽङ्गुष्टं
यावन्न मुञ्चामि ग्रन्थि यावन्न छोटयामि यावद् गृहं न विशामि यावत् स्वेदो न शुष्यति यावदेतावन्त उच्छ्वासाः पानीयम-
ञ्चिकायां यावदेतावन्तः स्तिबुका बिन्दवोऽवश्यायपृषतो वा यावज्योतिष्कशब्देन दीपो गृह्यते ततो यावदेष दीपो चलति
तावदहं न भोक्ष्ये । एतत्तु प्रत्याख्यानं संकेतं भणितं धीरम(रैर)नन्तज्ञानिभिः । न केवलं भक्तऽन्येष्वप्यभिग्रहविशेपेषु
संकेतं स्यात् । तेन सामायिकतुलनया ग्रन्थिसहितमपि प्रत्याख्याति श्राद्धः ॥ १५७२ ॥ अद्धामाह-
अद्धा पच्चक्खाणं जं तं कालप्पमाणछेएणं ।
पुरिमडपोरिसीए मुहुत्तमासद्धमासेहिं ॥ १५७३ ।।
अद्धा काले प्रत्याख्यानं यत् तत् अद्धाप्रत्याख्यानम् , तत् कालप्रमाणछेदेन स्यात् पुरिमार्द्धपौरुपीभ्यां पश्चिमार्द्धन
च तथा मुहूर्त नमस्कारसहितम् । एवं एकाशनोपवासदिवसद्वयादि यावत् मासा मासैः षण्मासैः स्यात् ॥ १५७३ ।।
अथ निगमयति-
॥३१॥
NAL भणियं दसविहमेयं पञ्चक्खाणं गुरूवएसेणं । कयपञ्चक्खाणविहिं इत्तो वुच्छं समासेणं ॥ १५७४ ॥ आह जइ जीवघाए पच्चक्खाए न कारए अन्नं । भंगभयाऽसणदाणे धुव कारवणे य नणु दोसे ॥ १५७५॥ कनं प्रत्याख्यानं येन स तथाविधस्तस्य विधि इतः समासेन संक्षेपेण वक्ष्ये ॥ १५७४ । 'आह' अत्र पर आह यथा जीपपाते प्राणातिपाते प्रत्याख्याते सति असी परेण जीवघातं न कारयति प्रत्याख्यानभङ्गभयात्, एवं कृतप्रत्याख्यान- ग्याशनादिदाने ध्रुतं कारणादि जायते इति ननु दोपो लगति प्रत्याख्यानमगारूपः ॥ १५७५ ॥ अतः नो कयपञ्चक्खाणो आयरियाईण दिज असणाई। न य विरईपालणाओ वेयावच्चं पहाणयरं ॥ १५७६ ॥ नो तिविहं तिविहेणं पच्चक्खइ अन्नदाणकारवणं । सुद्धस्स तओ मुणिणो न होइ तभंगहेउत्ति ॥ १५७७ ॥ हनप्रत्याख्यानः कृतोपपास आनार्यादिभ्योऽशनादि न दद्यात् । न च विरतिपालनाद्वैयावृत्त्यं गोचरचर्या प्रधानतरं आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। प्रत्याख्या- नविषये चालना- प्रत्यव- ॥ ३२ ॥ स्थानम् । स्यात् ॥ १५७६ ।। गुरुराह 'नो' त्रिविधं करणकारणानुमतिरूपं त्रिविधेन मनोवाकायेन योगेन न प्रत्याख्याति आहार- विषये तेन अन्यदानरूपं कारण शुद्धस्य आशंसारहितस्य मुनेस्तद्भङ्गहेतुः प्रत्याख्यानभङ्गाहेतुन स्यात् यस्तु लौल्यादन्यस्मै दत्ते मया न भुक्तं एष भुङ्क्ते, तस्य प्रमाददोषो लगति ।। १५७७ ॥ किञ्च-- सयमेवणुपालणियं दाणुवएसो य नेह पडिसिद्धो। ता दिज उवइसिज व जहा समाहीइ अन्नेसि ॥ १५७८ ॥ स्वयमेव प्रत्याख्यानं अनुपालनीयं इति नियुक्तिकारेणोक्तम् । शक्तौ आत्मनाऽऽनीय दानं अशक्तौ यतीनां श्राद्धकुलादि- कथनं तौ द्वौ इह न प्रतिषिद्धौं । तस्माद्दद्यादुपदिशेद्वा यथासमाधिनाऽन्येभ्यो बालादिभ्यः ॥ १५७८ ॥ अमुमेवार्थमाह- कयपच्चक्खाणो वि य आयरियगिलाणबालवुड्डाणं । दिज्जासणाइ संते लाभे कयवीरियायारो ॥ १५७९ ॥ लामे सति कृतवीर्याचारोऽशनादि दद्यात् । सत्यां शक्तो अन्यो न प्रेष्यः वैयावृत्यं स्वयं कार्यम् । 'दाणे 'त्ति गतम् , उवदिसिज वाऽलामे सति ॥ १५७९ ॥ हि भाष्यकृत् संविग्गअण्णसंभोइयाण देसेज सडगकुलाई । अतरंतो वा संभोइयाण देजा जहसमाही ॥२४७ ॥ ॥ ३२ ॥ r संदिग्नान्यमाम्भोगिकानां तूपदिशेत् ययैतानि श्रादालानि संखडिं च श्रुतां दृष्टां वा दर्शयेत् नानीय दद्यादित्यर्थः । अतरमशक्नुवन् मामोगिकानामपि दिशेत् न दोपः । सति सामध्ये साम्भोगिकानां एकमण्डलीकानां ज्ञातेभ्योऽज्ञातेम्यो या कुलेम्या संखया बानीय लम्धिमान् स्वयं दद्यात् । 'उवदेसो'ति गतम् , यथानमाधिर्नाम यथा यथा साधूनामात्मनो वा ममाधिः स्यानधा प्रयतितव्यम् । अक्षमध्यान्यमण्डलीसत्कस्याप्यानीय देयम् । 'समाहि 'त्ति गतम् । प्रत्याख्यानशुद्धिमाह सोही पञ्चक्खाणस्स छबिहा समणसमयकेहिं । पन्नत्ता तित्थयरेहिं तमहं बुच्छं समासेणं ॥ २४८ ॥ श्रमणममयकेतुमिः माधुगिदान्तघजरूपैरर्हद्भिः प्रजप्ता । यथा ध्वजः सर्वोचस्तथाऽईल्लोकोत्तरः । पड्विधतमेवाह सा पुण सद्दहणा जाणणा य विणयाणुभासणा अणुपालणा विसोही भावविसोही भवे छट्ठा ॥ १५८० ॥ मा शुदिरेयं पविधा प्रदानशुद्धिः १ जाननाशुद्विः २ विनयशुद्धिः ३ अनुभाषणाशुद्धिः ४ अनुपालनाशुद्धिः ५ भाव- शुद्धिः ६ ॥ १५८० ॥ भाष्यम् , अदानशुद्धिमाह- पच्चक्खाणं सबन्नदेसिअं जं जहिं जया काले । तं जो सदहइ नरो तं जाणसु सद्दहणसुद्धं ॥ २४९ ।। चेव । REACT
प्रत्याख्या
आवश्यक
नियुक्ति
दीपिका।
नस्य पडू
विधशुद्धिः।
॥३३॥
पञ्च महाव्रतानि द्वादशधा श्राद्धधर्मः दशधोत्तरगुणप्रत्याख्यानमिति सप्तविंशतिः 'यत्' सप्तविंशति विधस्यान्यतमत्
प्रत्याख्यानं ' यत्र' जिनकल्पादौ चतुर्यामादौ श्राद्धधर्मे वा ' यदा' सुभिक्षादौ दिवा रात्री वा पूर्वाङ्गेऽपराह्ने वा 'काले
इति मरणे कर्तव्यं स्यात् । तत्र सप्तविंशतिभेदा एवं पञ्चविधं साधुमूलगुणप्रत्याख्यानं दशविधमुक्तमुत्तरगुणप्रत्याख्यानं
द्वादशधा श्राद्धप्रत्याख्यानं चेति तद्यो नरः श्रद्धत्ते द्वा० १॥ २४९ ॥
पच्चक्खाणं जाणइ कप्पे
कप्पे जं जंमि होइ कायचं ।
मूलगुणे उत्तरगुणे तं जाणसु जाणणासुद्धं ॥ २५० ॥
यस्मिन् कल्पे चतुर्यामपञ्चयामरूपस्थितिकल्पे जिनकल्पादिके वा मूलोत्तरगुणविषयं कर्तव्यं स्यात् द्वा० २॥२५०॥
किइकम्मस्स विसोही पउंजई जो अहीणमइरित्तं ।
मणवयणकायगुत्तो तं जाणसु विणयओ सुद्धं ॥ २५१ ॥
विनयतो विनये(येन) शुद्धं प्रत्याख्यानकाले कृतिकर्मणो वन्दनस्य विशुद्धिं निरवद्यकरणक्रियां अन्यूनातिरिक्तां द्वा०३।
अणुभासइ गुरुवयणं अक्खरपयवंजणेहि परिसुद्धं ।
पंजलिउडो अभिमुहो तं जाणणुभासणासुद्धं ॥ २५२ ॥
कृतकृतिकर्मा प्राञ्जलिपुटो योजितहस्तोऽभिमुखः प्रत्याख्यानं कुर्वननुभापते गुरुवचनं लघुतरेण शब्देन भणतीत्यर्थः
॥ ३३ ॥
A -- 1 अक्षपदष्यन्ननः परिशुद्रम् । नवरं गुरुः पञ्चक्खाइ बोसिरह त्ति वक्ति । प्रत्याख्याता पचक्खामि वोसिरामि त्ति, शेपं सदृश- मेरद्वा०४ ॥ २५२ ।। कंतारे दुभिक्खे आयके वा महई समुप्पन्ने । जं पालियं न भग्गं तं जाणणुपालणासुद्धं ॥ २५३ ॥ कान्लारेऽरण्ये महत्यान के रोगे वा यत् पालितं न भग्नम् , अन कान्तारादिष्वपि द्विचत्वारिंशद्भिक्षादोषान्न भनक्तीति मारः वापमादे यतनया सेवयाप्यमग्नमेवाऽन्यथापवादच्छेदः द्वा० ५॥ २५३ ।। रागेण व दोसेण व परिणामेण व न दूसियं जं तु । तं खलु पञ्चक्खाणं भावविसुद्धं मुणेयत्वं ॥ २५४ ।। गगेण मुनादिमोहेन द्वेपेण क्रोधादिना यद्वा रागेण स्वपूजाहेतोः द्वेपेण परेषां अपूजाहेतोः तथा परिणामेन इहलोक- निहिादिना कीर्याचन्नपानगृहवस्तुशय्यादिहेतुना वा स्तम्भादिना वा वक्ष्यमाणेन न दूषितं यत् तत् भावशुद्धं प्रत्या- व्यानं ना०६॥ २५४ ॥ एएहिं छहिं ठाणेहिं पच्चक्खाणं न दूसियं जं तु । तं सुद्धं नायब तप्पडिवक्खे असुद्धं तु ॥ २५५ ॥ 11 R
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
नमस्कारस
हितप्रत्या-
ख्यानम्।
॥ ३४॥
पदभिः स्थानकैः श्रद्धानादिभिः पालितैः प्रत्याख्यानं न दूषितं यदेव तच्छुद्धम्, तत्प्रतिपक्षेऽश्रद्धानादौ अशुद्धम्
॥२५५॥ परिणाममाह-
थंभा कोहा अणाभोगा अणापुच्छा असंतई।
परिणामओ असुद्धो अवाउ जम्हा विउ पमाणं ॥ २५६ ।।
स्तम्भाद्र्वात् स्वगौरवार्थ १, क्रोधात् वृद्धनिर्भत्सनादेः २, अनाभोगाद्विस्मृतेः प्रत्याख्यानमज्ञात्वा वा भुङ्क्ते भोजनादनु
स्मृतं प्रत्याख्यानं तेन भग्नं ३, अनापृच्छया स्वेच्छया गुर्वनुज्ञां विना भुङ्क्ते चेत्प्रक्ष्यामि तदा वक्ष्यन्ति उपवासस्त्वया कृत इति
४, असंततिरसम्पत्तिस्तया यथात्र किञ्चिन्नास्ति ततो वरं प्रत्याख्यानम् ५, तथा इहलोकाद्यर्थं परिणामतोऽशुद्धं ६, एवं न
कल्पते । तथाऽपायानिष्कासनादिभिर्यो यत्कुरुते तदप्यसाधु तस्माद्विद्वान् क्रियायुक्तः प्रमाणम् । स जाननन्यथा न करोति
तस्य शुद्धं स्यादित्यर्थः ॥ २५६ ॥ इयता 'पञ्चक्खाणं पच्चक्खाओ' इत्याद्यगाथायाः प्रत्याख्यानपदं व्याख्यातं अत्राऽन्तरे-
sध्ययनशब्दः प्राग्वत् । सूत्रालापकनिष्पन्ने निक्षेपे सूत्रम्-सूरे उग्गए नमोकारसहियमित्यादि यावत् सहसागारेणं वोसिरइ-
सूरे उग्गए नमोकारसहियं पचक्खाइ चउविहं पि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं, अण्णत्थऽणा-
भोगेण सहसागारेणं वोसिरह ।। (सूत्रम् )
वर्ये उद्गते नमस्कारसहित मुहूर्तादिना नमस्कारकथनादाक् प्रत्याख्याति । चतुर्विधमप्याहारम् । ' अशू' भोजने,
अश्यते इत्यशन मण्डकाद्रकादि ( मण्डकौदनादि)। पीयते इति' पानं जलादि । 'खाह' भक्षणे, खाद्यते इति खादिमं
॥ ३४ ॥
फरमुग्नमक्षिकादि । सद आस्वादने स्व(स्वा)यते इति स्वादिमं गुडदन्तपावनसंमुखशक्यादि (गुडताम्बूलपुगफलादि)।
पर प्रनामोगा अत्यन्तविस्मृत्या अन्यत्र सहसाकारः सहसाऽजानतो मुखक्षेपस्तस्मादन्यत्र । अनामोगसहमाकारौ मुक्त्वाऽन्यत्र
चतुरादारं प्रत्यास्यातीत्यर्थः, एवं व्युत्सृजति चतुग़हारान् । अत्र सूत्रस्पर्शिनियुक्तिः
असणं पाणगं चेव खाइमं साइमं तहा।
एसो आहारविही चउविहो होइ नायवो ॥ १५८१ ॥
आहारविधिराहारप्रकारः ॥ १५८१ ॥ निरुक्तिमाह-
आसुं खुहं समेई असणं पाणाणुवग्गहे पाणं ।
खे माइ खाइमं ति य साएइ गुणे तओ साई ॥ १५८२ ॥
आशु शीघ्र शुधं शमयतीत्पशनं १ । प्राणानामिन्द्रियादीनामुपग्रहे उपकारे यद्वर्तते तत्पानं, खमित्याऽऽस्याकाशं तत्र
मानीति खादिमं । सादयति गुणान् मरसाहारान् जारयति स्वादयति संयमं भक्षते वा तत्स्वादिमं सर्वत्र निपातात् सिद्धम्
॥ १५८२ ।। चालनामाह-
सबो वि य आहारो असणं सबो वि वुच्चई पाणं ।
सबो वि खाइमं ति य सबो वि य साइमं होई ॥ १५८३ ॥
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
अशनादि-
चतुराहारे
चालना-
-
}} ३५॥
स्थानम् ।
यद्यनन्तरोक्तपदार्थापेक्षयाऽशनादीनि स्युस्तदा सर्वोऽपि चतुर्दाप्याहारोऽशनं सर्वोऽपि वोच्यते पानं इत्यादि, कथं ?
अन्वक्यात् , यतः यथैवाशनं क्षुधं शमयत्येवं पानं क्षीरपानाद्यपि क्षुधं शमयति । यथा पानं प्राणानुग्रहे वर्तत एवमशनादी-
न्यपि । तस्मादयुक्त एवं भेदः ॥ १५८३ ॥ अथ प्रत्यवस्थानम् , गुरुराह-यद्यप्येतदेवं तथापि रूढितो नीतितः प्रयोजनं च
संयमोपकारकमस्त्येवं कल्पनयाऽन्यथा दोषस्तथा चाह-
जइ असणमेव सवं पाणग अविवज्जणमि सेसाणं ।
हवइ य सेसविवेगो तेण विहत्ताणि चउरो वि ॥ १५८४ ॥
यद्यन्वर्थाश्रयादशनमेव सर्वमाहारजातं गृह्यते ततः शेषाणां लोकरूढानां पानकादीनां अविवर्जनं स्यात्, भवति च
शेपविवेकोऽस्ति च शेषाहारभेदपरित्यागो न्यायोपपन्नत्वात् । स चेह विदुषां सम्भवति । तेन विभक्तानि चत्वार्यप्यशनादीनि
॥१५८४ ॥ एवं तु सामान्यविशेषभेदनिरूपण सुखज्ञेयं स्यात् सुखश्रद्धेयं च स्यात् । अन्यथा द्विविधं त्रिविधं चतुर्विध-
मायाहारप्रत्याख्यानं न घटते, तदाह
असणं पाणगं चेव खाइमं साइमं तहा।
एवं परूवियंमी सदहिउं जे सुहं होइ ॥ १५८५ ॥
श्रद्धातुं 'जे' पादपूत्य, सुखं स्यात् । उपलक्षणाद्दीयते पाल्यते च सुखम् ॥ १५८५॥ आह मनसाऽन्यथा चिन्तिते
॥ ३५ ॥
प्रत्याच्याने त्रिविधिस्य पौरुष्या वा प्रत्याख्यानं करोमीति वागन्यथा निर्गता चतुर्विधस्य पुरिमार्द्धस्येति, गुरुणापि तथैव दत्तमा का प्रमाणम् ? उच्यते शिष्यस्य मनोगतो भाव इति, यतः अन्नत्थ निवडिए वंजणमि जो खलु मणोगओ भावो । तं खलु पञ्चक्खाणं न पमाणं वंजणच्छलणा ॥ १५८६ ॥ अन्यत्र इति द्विविघं प्रत्याख्यामीति स्थाने त्रिविधं चतुर्विधं वा प्रत्याख्यामि इति व्यञ्जने शब्दे निपतिते सति यः मलु मनोगतो मात्रा प्रत्याख्यापयितुरधिकतरसंयमयोगाक्षिप्तचेतसो न तु प्रमादात् तत् खलु प्रत्याख्यानं प्रमाणम् । पतेनान्तरालम्पसक्ष्मविपक्षानिषेधमाह । निश्चिताशयस्यैव प्रामाण्याधिकृतत्वात् व्यञ्जनं शिष्याचार्यवचनं न प्रमाणम् , यतः ललनामो व्यानरूपा ॥ १५८६ ॥ प्रत्याख्यानपालनमाह- फासियं पालियं चेव सोहियं तीरियं तहा । किहिअमाराहिअं चेव एरिसयंमी पयइयत्वं ॥ १५८७ ॥ पृष्टं प्रत्याख्यानग्रहणकाले विधिना प्राप्त १ । पालितं पुनः पुनरुपयोगप्रतिजागरणेन रक्षितं २ । शोभितं गुर्वादिप्रदान- शेषगोजनासेनेन ३ । नीरितं पूर्णऽप्यपधौ यत्किञ्चित्कालावस्थानेन ४ । कीर्तितं भोजनवेलायाममुकं प्रत्याख्यान पूणेमि- युगारणेन ५। आराधितमेभिरेस कारणैः सम्पूर्ण कृतं ६ । ईदृशि प्रत्याख्याने प्रयतितव्यम् । अत्र क्षेपकगाथा 'उचिए .
प्रत्याख्या
नगुणाः।
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
॥ ३६॥
काले विहिणां जं पत्तं फासियं ति तं ( फासियं तयं) भणियं १। तं पालियं जमसयं ( तह पालियं च असई) सम्म
उवओगपडियरिब २॥१॥ गुरुदचसेसभोयणसेवणयाए विसोहियं ( य सोहियं) ३ जाण । पुण्णे वि थेवकालावथा(स्था)णा
तीरियं ४ होइ ॥२॥ भोयणकाले अमुगं पच्चक्खायं ति भुंजओ किंचियं ५। आराहियं पयारेहि सम्ममेएहि निहिव(वि)यं ६
॥३॥ निष्ठापितं पूर्णीकृतं ॥ १५८७ ॥ प्रत्याख्यानगुणाः तथा विस्मृत्या' सहसा वा नमस्कारेऽकृते मुखे क्षिप्तं स्यात्,
स्मृते यत् मुखे क्षिप्तं स्यात् स्मृते यत् मुखे तत् खेलमल्लके यद् हस्ते तत्पात्रे मुक्त्वा नमस्कारं कृत्वा भुङ्क्ते एवं न भग्नम् ।
यत एवमप्याहारानिवृत्त इति ।
पच्चक्खाणंमि कए आसवदाराई हुन्ति पिहियाई ।
आसववुच्छेएणं तण्हावुच्छेअणं होइ ॥ १५८८ ॥
प्रत्याख्याने कृते आश्रवद्वाराणि कर्मागमद्वाराणि पिहितानि स्युः, आश्रवव्युच्छेदनं स्यात् । तृष्णा विषयेच्छा ।
तण्हावोच्छेदेण य अउलोवसमो भवे मणुस्साणं ।
अउलोवसमेण पुणो पञ्चक्खाणं हवइ सुद्धं ॥ १५८९ ॥
अतुलोपशमो मध्यस्थ भाव: स्यात् ॥ १५८९ ॥
" तत्तो चरित्तधम्मो कम्मविवेगो तओ अपुवं तु । तत्तो केवलनाणं तओ अ मुक्खो सयासुक्खो ॥ १५९० ॥ तनः प्रत्यान्यानात् शुदनारित्रधर्मः स्फुरति । ततः कर्मविवेकः कर्मनिर्जरा । ततः क्रमेणापूर्वकरण । छमस्थाऽध्यातपूर्व- माध्यमायः । नतः श्रेणिक्रमेण केवलनानं । ततश्च मोक्षः सदासौख्यः ॥ १५९० ॥ इदं च प्रत्याख्यान दश विधं स्या- दामा मह गृहाते पाल्पते न, तदाह- नमोकारपोरिसीए पुरिमडेगासणेगठाणे य । आयंविल अभत्तद्वे चरमे य अभिग्गहे विगई ॥ १५९१ ॥ नमस्कारमादिते १ पौरुन्यां २ पुरिमा ३ एकाशने ४ एकस्थाने ४ च ५ आचाम्ले ६ अभक्तार्थे ७ चरमे च ८ अगिरहे ९ पिकनी १० गथामायमेते आकाराः ॥ १५११ ।। दो छच्च सत्त अट्ठ सत्तटु य पंच छच्च पाणंमि । चउ पंच अट नव य पत्तेयं पिंडए नवए ॥ १५९२ ॥ तौ १ पद २ मत ३ अष्टौ ४ सप्त ५ अष्टौ ६ पञ्च ७ एते नमस्कारादिषु सप्तप्रत्याख्यानेषु क्रमेण तेयाः, पानकै च 4 --X
आवश्यक
प्रत्येक-
प्रत्याख्या-
नियुक्ति-
दीपिका।
नाकार-
॥ ३७॥
कथनम् ।
पट, सामान्याभिग्रहे च चत्वारः पञ्च वा, निर्विकृतौ विकृतौ च अष्ट नव वा । तत्र निर्विकृतिर्द्विधा लेपाक्तं अलेपाक्तं च ।
अलेपाक्तनिर्विकृती द्रवविकृतिप्रत्याख्यानेन 'उक्खित्तविवेगेणं ति पदं नोचार्यते अतोऽष्ट नव वेत्याकाराः । प्रत्येकमेवमाकारा
ज्ञेयाः । पिंडके समूहवचने च नवैव आकाराः कथयन्ते । यथा सामान्याभिग्रहे ४, ' अवाउडत्तं' पञ्चक्खामीत्यभिग्रहे ५
द्वयोर्मीलने ९। समूहवचने निर्विकृतौ विकृतौ च नवेति कथनं विशेषव्याख्या वाग्रे तथाकारेत्याद्याऽन्यग्रन्थासंमतपिण्डको
द्रवविकृतिरूपः नवको नवाकारवान् स्यादित्यर्थः । पिण्डकः समूहो नवकः नवसङ्ख्याक इति । जीवाः त्रयोदशक्रियास्थान.
वर्तित्वात् त्रयोदशभेदाः एवं द्वाविंशतिसङ्ख्या जाता, एतावन्तः सर्वे आकाराः स्युः। यथा अन्नत्थणाभोगेणं ४ चत्वारः
आकाराः, पच्छन्नकालेणं ३ त्रय आकाराः, लेवालेवेणंसुख्याः ५ पञ्चाकाराः, सागारियागारेणंमुख्याः ३ त्रय आकाराः,
तथा चोलपट्टागारेणं १ अधिकः, लेवाडेणवामुख्याः ६ पट आकाराः, एवं सर्वे प्रत्याख्यानाकाराः २२ जायन्ते । अत्र
लघुवृत्तिव्याख्या नवकेति ९ आकारेत्याद्यान्यग्रन्थासंमतौ च मूलवृत्त्यादीनां च ॥ १५९२ ॥ व्यक्क्याह
दोच्चेव नमुक्कारे आगारा छच्च पोरिसीए उ।
सत्तेव य पुरिमड्ढे एगासणगंमि अद्वैव ॥ १५९३ ॥
सत्तेगट्ठाणस्स उ अटेवायंबिलंमि आगारा ।
पंचेव अभत्तटे छप्पाणे चरिमि चत्तारि ॥ १५९४ ॥
॥३७॥
- पंच चउरो अभिग्गाह निबीए अट्ठ नव य आगारा । अप्पाउराण पंच उ हवन्ति सेसेसु चत्तारि ॥ १५९५ ॥ आकार: प्रत्याख्यानापवादहेतुः । द्वावेवाकारौ नमस्कारसहिते यथा 'सूरे उग्गए नमोका० अन्नत्थणाभोगेणं सहसागारेणं २ इति । व्याख्या मर्ये उगने मति नमस्कारसहितमिति नमस्कारभणनोपलक्षितकालसहितं प्रत्याख्यामि त्यजामि स्वीकुर्वे पतुधिमप्पाहारं शेष प्राग्यन् । इदं चतुर्विघाहारस्यैव । मुहूर्तात्परतो भोजनकाले वा नमस्कारोचारेण ' मत्थएण वंदामो पमा मगणो णमोसार पारेमि त्ति पार्यतेऽन्यथा मूर्यास्तमनेऽपि न इति वृद्वाः। पौरुपी द्विविधाद्याहाराऽपि स्यादिति वृद्धाः नम्यां पट् । इद गर्न 'पोरिमिं पचक्खाइ उग्गए मूरे 'क्यादि- पोरिसिं पवाद उग्गा सुरे चउव्विहं पि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अण्णत्थडणाभोगेणं सटसाफारेणं पच्छन्नेणं कालेणं दिमामोहेणं साहुवयणेणं सव्वसमाहिवत्तियागारेणं वोसिरामि (सूत्रम् ॥ दिनचतुर्भागमानकालेन पुरुषप्रमाणछायया निवृत्ताऽद्धा पौरुपी उच्यते, तां यावत् चतुर्विधाहारं प्रत्याख्यामि अत्यना. भागेन महमाकारणेति प्राग्रत् । तथा ' पच्छन्नेणं कालेणं' रजोवृष्टयनादिना सूर्य स्थगिते प्रच्छन्नेन कालेनेति तृतीया पसम्पये प्रच्छनकालादन्यवेत्यर्थः । प्रच्छन्नकाले सवेलमपि पारणे मा भङ्गः । अत्रापि भुञ्जानस्य पौरुष्यपूर्णताज्ञाने मुखस्थं मेममात्र करम्थं पाने मुक्त्वा मिथ्यादुष्फत दचा काले पूर्ण मनसा पारयित्वा मुझे। दिग्मोहात पूर्वी प्रति पश्चिमायुया .
आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। पौरुष्यादि- प्रत्याख्या नानि। ॥३८॥ शीतकाले वा दिग्मोहः स्यात् । साधुवचनेन यथा साहुणो भणन्ति उग्घाडपोरिसी ततः पारयित्वा भुञ्जानः केनाप्युक्तः सकाल इति ततः स्थातव्यं । सर्वसमाधिप्रत्ययाकारात्समाधिप्रत्ययादेवापवादादन्यत्राहारान् व्युत्सृजामि स्वस्यान्यस्य चार्त- रौद्रध्यानपरिहारेण समाधिकरणहेतोराहारमपि गृह्णामि अन्यथा तु प्रत्याख्यामीत्यर्थः। समाही नाम तेण पोरुसी पच- क्खाया आसुकारियं दुक्खं जायं, गाढपीडा तस्स अन्नस्स वा तेण किं काय ? ताहे तस्स पसमणनिमित्तं पाराविजइ उस्स(ओस)हं वा दिजइ वैद्यादिर्वाऽऽगाढग्लानसारकः पौरुष्यां कृतायां पौरुष्यामपूर्णायामपि भुङ्क्तेन भङ्गः। अर्द्धभुक्तो वा ग्लाना(न)समाधिमृती श्रुत्वा शेषानं त्यजति। सप्तैव पुरिमार्दै आद्ययामद्यप्रत्याख्याने 'सूरे उग्गए पुरिमढे पञ्चक्खाइ चउविहं पि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्न० सह० पच्छ० दिसा० साहु० मह० सब० ' । अर्थः प्राग्वत् । साधुवचनेनेति केनापि भव्यपुंसा उक्तं यथा पुरिमार्के जात इति । महत्तराकारो लाभविशेषाका: महत्तरं प्रत्याख्यानपालननिर्जराधिक- लामहेतुं अन्यनरासाध्यं ग्लानचैत्यसंघादिकार्य तदेवाकारः प्रत्याख्यानापवादस्तस्मादन्यत्र । सा पौरुषीप्रत्याख्यानं पौरुषी- वदिति प्रकरणानि । एकाशने अष्टैवाकाराः एकाशनं स्थिरोपविष्टपुताचालनेन भोजनम् , सूत्रम्- एकासणं पञ्चक्खाइ चउन्विहं पि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अण्णत्थऽणाभोगेणं सहसा- गारेणं सागारियागारेणं आउंटणपसारणेणं गुरुअब्भुटाणेणं पारिद्वावणियागारेणं महत्तरागारेणं सव्व- समाहिवत्तियागारेणं वोसिरामि ॥ ( सूत्रम् ) एकाशनं एकस्थानाहारं प्रत्याख्यामि स्वीकरोमि 'चउ० अन्न० सह० सागारियागारेणं' सह आगारेण वर्तन्ते इति मा ॥ ३८॥ SG गागारिकाः, हाधिकागत्याधूनां गृहिणः श्राद्धानां वान्दिकायाः तैः आगतैः आकारात् अपवादकारणात् अन्यत्र प्रत्या- ल्यानं । नागारियं अदसमुहिसियस्स आगयं जइ वोलेह पडिच्छइ प्रतीक्ष्यते, अह थिरं ताहे सज्झायबाघाउ त्ति उठेउं अमत्थ गण ममुहिम्मइ । बाउं० आशनं पादादेराकर्पणं, प्रमारणं पादादिप्रलम्बकरणं ताम्यामन्यत्र । इन्थं वा पायं वा सीसं या पमाग्जिन गई । गुरुभन्भु० पायरिया पाहुणगो वा आगओ अन्भुट्ठयई तस्म । एवं समुदिट्ठस्स उहियस्स पारिट्ठावणिया नद होज कपः । पारिद्वा० परिष्ठापना त्यजना तया संसृष्टः पारिष्ठापनिकोऽधिकारादाहारस्तस्याकारादपवादादन्यत्रेत्यादि मिरामि व्युत्मृजामि आहारं । मप्नकस्थानस्य तु । एकस्थानं नाम प्रत्याख्यानं यथा 'एगाणं पच०' एगट्ठाणए जहा अंगोग ठीयं नेण तहाठिपण चे समुद्दिसिया । अत्र आउंटणपसारणं नस्थि शेपमेकाशनवत् । अष्टैवाचामाम्लम्या- काराः । इदं चाग्रे 'गोणं नामं तिविई' इत्यादिना ग्रन्थेन व्याख्यास्यते । सूर्योद्मादनु भक्तार्थस्य, भक्तेनार्थी भक्तार्थः न भक्तार्थ अमक्तार्थ उपपास इत्यर्थः, प्रत्याख्यामि सूर्योद्मादित्युक्तौ भोजनादनु प्रत्याख्याननिषेधः, तस्य पश्चाफाग:- 'गरे उग्गा अमत्तटुं० अन्न० सह० पारि० मह सब० । जह तिविहस्स पचक्खाइ तो विगिचणया कप्पड़ । जड़ चउवि. इम्प पशाखाउ पाणगं च अहिगं नस्थि तनोऽकल्प्यं जइ पाणगं वि उपरियं ताहे से कप्पड़ । सर्वप्रत्याख्यानानि चतुर्विधा. हारत्यागेन क्रिगन्ने । जड तिविहस्म पाक्साइ नाहे मपाणगस्स छ आगारा कीरन्ति । पानस्य पट् आकाराः 'लेवाडेण । देपयुक्तेन द्रामाजलादिना नक्रादिपतनेन मलेपेन जलेन च । 'अलेवाडेण वा' लेपचोपडितभाजनादिजलस्यागालयित्वा संपकं तं नेन । अन्छेन निर्मल कालिकादिना, वहलेनायामगुडि(गडु)लघावनजलेन । ससिक्थेन सिक्थपतनेन तन्दुलादि-
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
पौरुष्यादि-
प्रत्याख्यान
नानि ।
॥३९॥
सद्भावेन च । असिक्थेन वा सिक्थापनयनेन, वाशब्दाः समुच्चयार्थाः । अत्र प्रकरणगाथा 'लेवाडदक्खपाणाइ इयरसोवीरम-
च्छमुसिणजलं । बहलं धावणमायाम ससित्थं इयरसिथविणा' ॥१॥ इत्याकारार्थः । एवंविधेन पानकेन विनाऽन्यं त्रिविध-
माहारं व्युत्सृजामि रात्रौ पानकाहारप्रत्याख्यानं न स्यात् सर्वजिनैर्निशाभोज्यस्य निषिद्धत्वात् , रात्रिभोजने च मूलव्रत-
विराधनाभावात् । श्राद्धानामपि यद्रात्री जलपानं तदप्युत्सर्गतोऽकल्प्यं, तेन निर्विकृत्यादिषु तपोविशेषेषु निशासु जलं न
पिवन्ति । पानकाकारेषु त्वशनादिलेपोऽस्ति अशनखादिमे च श्राद्ध रात्रिभोज्यनिषेधे निपिद्धे । तदा तु पानकाकारा नोक्ताः
किन्तु दशाकारा राजाभियोगाद्या उक्ताः । तेन श्राद्धा रात्रौ सानलेपं नीरं न पिबन्ति । अपवादे तु दिनगलितालेपोत्कालि-
ताम्बु उत्कटरक्षाक्षेपणपरिणतगलिताम्बु च पिवन्ति । मुख्यतः सचित्तत्यागो निशाभोज्यत्यागादन्वेव युक्तः प्रतिमासु तथा-
दर्शनात् । ततः केऽप्यशक्त्याऽम्बु पिबन्ति परं पानकाकारा नोक्ता एव । चरमे चत्वार इति, चरमं द्विधा दिवसचरमं भव-
चरमं च । द्वयोरपि चत्वारः-अन० सह० मह० सव० । भवचरमं यावजीवं स्यात् । दिवसचरमं द्विविधादि स्यात् । भव-
चरमं त्रिविधायेवेति वृद्धाः । ततो नमस्कारस्मरणादिचतुर्विधप्रत्याख्यानं क्रियते तत्पारयित्वाऽनशनी पानं पिवति । पञ्च
चत्वारश्चाभिग्रहे । तथा निर्विकृतौ अष्ट नव चाकाराः। तत्राभिग्रहेपु अप्रावरणेऽप्रावरणाभिग्रहे पञ्चाकाराः । यथा कोऽपि
अवाउडत्तं पञ्चक्खाइ। तत्र अन्न० सह० चोलपट्टागारेणं मह० सव० । शेषेष्वभिग्रहेषु दण्डकप्रमार्जनादिषु ग्रन्थि-
सहितादिषु च चोलपट्टाकारं विना चत्वार आकाराः। अप्रावृत्तत्वे नियमिते सागारिकागमे चोलपट्टं गृह्णाती.
त्यर्थः । निर्विकृती अलेपसंज्ञे द्रवविकृती वाष्टाकाराः। अन्यस्मिन्निर्विकृती विकृतिप्रत्याख्याने च नव । तत्र दश विकृतयः।
॥ ३९॥
वीरं दघि नपणीयं घयं तिल्लं गुलो मधु मजं मंसं ओगाहिमं च १०। तत्र विगईओ पञ्चक्खामीति प्रमाणकृतशेषा पिकतीः प्रन्यास्यामि त्यजामि । 'निविगइयं पचक्खाइ' निर्विकृतिकं विकृतीनां निषेधं प्रत्याख्यामि स्वीकुर्वे । 'प्रा(प्राय)विलं पचकग्वाइ' आयामं अवश्रामणं, अम्लं तुर्यो रसस्ताभ्यां निष्पन्न आयामाम्लं प्रत्याख्यामि स्वीकुर्वे । अन्न० सह० शालेयेणं, लेपो मानने निषिद्वविकृतेलंगनं यद्वा निर्विकृतौ विकृतिलेपः तस्मिन् दूरे कृतेऽन्यभक्तं अलेपमिव स्यात् ततो लेपालेप उच्यते । तम्माल्लेपालपादन्यत्र निर्विकृतिकं प्रत्याख्यामि । आयामाम्ले चेत्पात्रे लेपवदात्तं समुद्दिष्टं संलिखितं च तेन राउन पनि निर्लेप ततो न दोपः । 'उत्क्षिप्तविवेके आयामाम्लाहें विकृत्यादि पतितमुत्क्षिप्य विविच्यते विभिन्नं क्रियते मा गलतियति । अन्गदप्यानाम्लान उद्धतुं शक्यं तदा कल्पते नान्यथा । ' गिहत्थसंसटेणं ' गृहिणा स्वार्थे निपिद्धविकृतिः लोहादिना गंमृष्टा कृसणिताऽस्ति । एप आकारो निस्पृहयतेरेव स्यान्न तु श्राद्धस्येति वृद्धाः । इह चेद्गृही कुसणादिना तल्लेपयुग्- ओपात्रादिना दने तदा फलप्यं यदि रसो दृश्यते ततोऽकल्प्यं । एप गृहस्थसंसृष्टाकार आचामाम्लादन्वने नियुक्तिकृता गाग्याम्पते । 'उक्खित्तविवेगेणं' उत्क्षिप्ते विकृतिद्रव्ये पोलिकादिगते पृथक्कृते सति विवेको विकृतिपार्थक्यं तमादन्यत्र, गया पोलिकायां शीत(त) गावस्त्यानघृतं पिण्डगुडो वा कठिनं गलितं दधि वाऽभूत्तद् दूरीकृतं ततो लेपो न ज्ञायते एप उनिप्पणियेकः । 'पचमक्खिएणं' प्रतीत्य ज्ञात्वा सर्वक्षमण्डकादिकमपेक्ष्य सौकुमार्योत्पादनायेपत् स्नेहेन प्रक्षितं न तु गादं स्नेहसाभापाद्यन्नक्षिताभाममित्यर्थः, पोलिकादि धारां विना गृहिणा स्वार्थ अङ्गुल्याऽऽज्येन तैलेन पा प्रिनीत्यमशितं तग्मादन्यत्र । पारिष्ठापनिकाकारात् परिष्ठापनार्ह विकृत्याकारादन्यत्र । तत्र बन्नाप्तौ चेत् स्तोकं T
आचामा
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
रूपम् ।
॥ ४० ॥
वृद्धं तदा नमस्कारपौरुपीवतां देयं पारणकवतां वाऽसहानां वा देयं, यथा पारिष्ठापनिकाहारः कल्प्यः तदने वक्ष्यते । विकृतिके
निर्विकृतिके च अद्रवविकृतिषु नव द्रवविकृतिष्वष्टाकारा ज्ञेयाः । शेष प्राग्वत् । अष्टनवाकारयुक्तिं वक्ति-
नवणीओगाहिमए अद्दवदहि(व) पिसियघयगुले चेव ।
नव आगारा तेसिं सेसदवाणं च अट्ठव ॥ १५९६ ॥
नवनीते अवगाहिमके अद्रयदनि गालिते इत्यर्थः, पिशिते मांसे घृतगुडे चैव, अद्रवत्वं सर्वत्र ज्ञेयं । अमूपा
विकृतीनां नवाकारा स्युः । शेपद्रवाणां शेषाणां द्रवाणां विकृतीनां विलीनघृततैलद्रवगुडादीनामष्टावाकाराः उत्क्षिप्तविवेको
न स्यादित्यर्थः ॥ १५९६ ॥ अथाचामाम्लं-
गोण्णं नाम तिविहं ओअण कुम्मास सत्तुआ चेव ।
इकिकं पि य तिविहं जहन्नयं मज्झिमुकोसं ॥ १५९७ ॥
आयामाम्लमिति गौणं नाम । आयामोऽवश्रामणं आम्लं चतुर्थरसः ताभ्यां निवृत्त आयामाम्लं । इदं चोपाधिमेदा-
विधा-ओदनः धवलधान्यमित्यर्थः, कुल्मापाः काष्टद्विदलमित्यर्थः, सक्तवो लोद्द इत्यर्थः, ओदनादीनधिकृत्य स्यादिति ।
आचामाम्ले पक्वधान्यं निखिकमप्यकलप्यं मरीचजीरकादियुक करीरादिफलानि च धान्यस्थानीयानि, पृथग् लवणं
चाकल्प्यं उत्सर्गेऽनुक्तत्वात् । एकैकं ओदनादि त्रिविधं स्यात् । जघन्य मध्यमं उत्कृष्टं स्यात् ।। १५९७ ॥ कथमित्याह-
॥ ४० ॥
. दवे रसे गुणे वा जहन्नयं मज्झिमं च उक्कोसं । तस्सेव य पाउग्गं छलणा पंचेव य कुडंगा ॥ १५९८ ॥ इध्ये गुणे रसे च । द्रव्यं गुणं रसं चाश्रित्येत्यर्थः । किं जघन्यं मध्यमं उत्कृष्टं च ? तथा तस्यैवाचाम्लस्य प्रायोग्यं । नपा छलना नधा पजैन कुडंगा वक्रबादित्वभावा वक्तव्याः । तत्र आचामाम्लयोग्यं द्रव्यमुत्कृष्टं शालिगोधूमल्मापादि गयस्मै रोगते, रम उत्कृष्टः शाल्यादिवश्रावणादिना, गुणो निर्जरारूपः स तदा जघन्यः स्यात् । जघन्यं द्रव्यं रालक कोद्रादिः, रमो जपन्यो यद्यस्मै नेष्ट उप्णाम्भो वा, तेन गुण उत्कटो निर्जरारूपः। मध्यमद्रव्यरसयोर्गुणो निर्जरा माया गान् । अयायं वृद्धाम्नाय:-आचाम्लं नाम सप्तधा शालिकूरादिद्रव्यं तद्भेदाय । तेनाचाम्लं क्रियते उपचारात्त. दप्याचाम्नमुक्तं, इदं गोरकष्टत्वात्यायो न गृपत एव । आचामाम्लप्रायोग्यं तन्दुलकणिकापिष्टपोलिकामण्डकादि, अस्य च निरपपादनायता प्रायोग्यत्वमुक्तम् । एवं कुलमापाया आचामाम्लप्रायोग्यं तुपमिश्रितकणिकादिसक्तवो जवादीना[माचा]- माम्नप्रायोग्ग धान्यमण्डकादि । आनामाम्लेऽपकतन्दुलादि प्रासुकमप्यकलप्यं ओदनादीनामेवोक्तत्वात् । फलिकाः पलि- भन्यवान्मदेशागताः किं पुनगचामाम्ले ?। तत्र कलमशालिको द्रव्यत उत्कृष्टं द्रव्यं तत्सत्केनायामेन रसत उत्कृष्टं गुणतो अपगम् । ग पर कोऽन्येपामायामन्यत उत्कृष्टो रसतो मध्यो गुणतोऽपि मध्यः, यदोष्णाम्बुना तदा रसतो जघन्यं गुणतो गापमा । जौन(नण्ड)लोदना द्रष्यतो मध्यमा कालिकेन रमोत्कृष्टा आयामेन रममध्या उष्णोदकेन रसजघन्या एते प्रयो - आवश्यक- नियुक्ति- दीपिका। आचामा- म्ले कुडगा। ॥४१॥ - गुणेन मध्या मध्यमद्रव्यत्वात् । रालगादितणकूरा द्रव्यतो जघन्याः, ते कालिकायामाभ्यां रसोत्कृष्टमध्या गुणमध्या उष्णो- दकेन तदा जघन्यं द्रव्यं रसो जघन्यः गुण उत्कृष्ट इत्यादि । अहवा उकोसोकोसं, उक्कोसमज्झिमं, उकोसजहन्नं । कंजिय- आयामउण्होदएहिं जहन्ना मज्झिमा उक्कोसा निजरा । एवं निष्वपि ज्ञेयं । तथा छलना इयं, यथा कोऽप्याचाम्लं प्रत्याख्याय विकृतीर्मोक्तुं उपविष्टः । गुरुरूचे कथमेवं ? स ऊचे यथा हिंसां प्रत्याख्याय सा न क्रियते एवमाचाम्लं प्रत्याख्याय तत्कथं क्रियते ? इति छलना। गुरुराह भो ! प्रत्याख्याननियमव्रतादिशब्दाः प्रवृत्तिनिवृत्त्यर्थास्ततोऽत्र प्रवृत्त्यर्थः प्रत्याख्यान- शब्दो ज्ञेयः ॥ १५९८ ।। अथ कुडङ्गाः- लोए वेए समये अन्नाणे खल्ल तहेव गेलन्ने । एए पंच कुडंगा नायबा अंबिलंमि भवे ॥ १५९९ ॥ केनाप्याचामाम्लं कृत्वा संखडि दृष्ट्वा संखड्यां पक्वान्नायटित्वाचार्यभ्योऽदर्शि । गुरुरूचे त्वयाचामाम्लं प्रत्या- ख्यातमस्ति । स ऊचे मया कापि लोके लोकशास्त्रेषु तथा वेदे तथा समये चरकादिसिद्धान्ते मयाचामाम्लं नादर्शि ततः किं आचामाम्लं ? एवं त्रयः कुडङ्गाः मायाभेदाः । तथाऽज्ञानेऽहं न जाने कथमाचामाम्लं क्रियते, मया ज्ञातं घृतेन भक्तमार्दीकृत्य भुज्यते इति ४ चतुर्थः कुडङ्गः । तथा ग्लानोऽहं शुलं समेति न क्षम आचामाम्लं कर्तुं पञ्चमः कुडङ्गः ५ ॥ १५९९ ।। निर्विकृतिकाधिकारशेषमाह- NER ॥४१॥ NROERESEARS पंचेव य खीराइं चत्तारि दहीण सप्पि नवणीता। चत्तारि य तिल्लाइं दो वियडे फाणिए दुन्नि ॥ १६०० ॥ पण क्षीराज्यजोष्ट्रीगोमहिन्येडिकानाम् , तथा चत्वारि दधीनि उष्ट्रीणां दध्नोऽभावात् , तथा चत्वारि सपीपि घृतानि, गन्यारि नवनीतानि । चत्वारि तैलानि तिलातसीलङ्कासर्पपाणां विकृतयः, शेपाण्यविकृतया लेवाडाणि तु स्युः। विकटे मये काष्ट पिएनं च । फाणिती गुडौ द्वौ द्वगुडः पिण्डगुडश्च ॥ १६०० ।। महुपुग्गलाई तिन्नि चलचलओगाहिमं तु जं पक्कं । एएसिं संसटुं वुच्छामि अहाणुपुवीए ॥ १६०१ ॥ मधृनि त्रीणि कौन्तिकं भ्रामरं माक्षिकं च । त्रीणि पुद्गलानि मांसानि जलचराणां स्थलगानां खगानां च । यच्चलचलेति- पन्देन पर्फ मफेनं अवगाहेन स्नेहनोलेन निवृत्त अवगाहिम, दशमा विकृतिः। तत्रायद्वितीयतृतीयवारावगाहिमं विकृतिः। माणि म जोगवाहीणं कापन्ति । जड़ नजइ यथा एगेण चेव पूयएण तवगो भरिओ बीयं चेव कप्पइ निविगइय- पापाणलगस्म लेगार्ड तु होइ । एतेनेति स्पष्ट ज्ञायते पूपकाद्यप्यवगाहिमविकृतिरेव । एतेषां विकृतिभेदानां संसृष्टं गृहमंमृटाकारं आनुपूच्या पक्ष्यामि ॥ १६०१ ।।
आवश्यक-
नियुक्ति-
दीपिका।
गृहस्थ.
संस्पृष्टाका.
रव्याख्या
॥४२॥
खीरदही वियडाणं चत्तारि उ अंगुलाई संसटुं ।
फाणियतिल्लघयाणं अंगुलमेगं तु संसटुं ॥ १६०२ ॥
क्षीरेण मिश्रितः कूरो लभ्यते तत्र तस्य कुण्डकस्य ओदनाचत्वार्यङ्गुलानि दुग्धं स्यात्तदा निर्विकृतिकस्य कल्पते,
पञ्चममारब्धं तदा विकृतिः। एवं दधिविकटयोरपि । फाणिततैलघृतानां मिश्रिते यद्यङ्गुलमुपरि ततः कल्पते परतो न॥१६०२॥
मधुपुग्गलरसयाणं अद्धंगुलयं तु होइ संसहूं।
गुलपुग्गलनवणीए अद्दामलयं तु संसटुं ॥ १६०३ ॥
मधुनः पुद्गलरसकल्पश्लथमांसस्याङ्गुिलेन संसृष्टं स्यात् । पिण्डगुडस्य पुद्गलस्य नवनीतस्य चाामलकमात्र
संसृष्टं । आर्द्रामलकशब्देन निम्बमुकुरः, यदि बहून्येतन्मानानि तदा कल्पते एकमपि वृद्धं न कल्पते ॥ १६०३॥ पारिष्ठा-
पनिकाकारे कीदृशस्य पारिष्ठापनिकं देयं ? गुरुराह-
आयंबिलमणायंबिल चउथा बालवुड्सहुअसहू।
अणहिंडियहिंडियए पाहुणयनिमंतणावलिया ॥ १६०४ ॥
पारिष्ठापनिकयोग्याः साधवो द्विधा आचामाम्लवन्तोऽनाचामाम्लवन्तश्च । अनाचामाम्लवन्त एकाशनाद्यष्टमतपो यावत् ।
PRESORROREGORIALSAS
06**OS
॥ ४२ ॥
- SS दशमादिनामां पारिष्टापनि न कल्पने तेषामुष्णपेयाग्रहत्वात् सूर्यधिष्ठानान । केऽप्याचार्या अष्टमादितपो विकष्ट केऽपि दामादि शिष्टं वदन्ति । तत्र ये अष्टग वि(अवि)कष्टमाहुः तेषामष्टमं यावत् पारिष्ठापनिकं कलप्यं । तत्राचामाम्लकचतुर्थ- मक्कयोमणे नतुर्थतो दयं, गोऽपि द्विघा गालो युद्धश बालाय देयं, सोऽपि द्विधा सहोऽसहा असहाय देयं तत्रापि हिण्डिनाय देयं न साहिण्डिताय । तत्रापि प्राघुर्ण काय देयं मुख्यतो न तु वास्तव्याय । एवं चतुर्थभक्तो वालोऽगहो हिण्डितः प्रा पारिष्ठापनि मोज्यते १ । तदभावे पालोऽमहो दिण्डितो वास्तव्यः २ । तदभावे बालोऽसहोऽहिण्डकः प्राघुर्णका ३ । दमा वालोऽमहोऽहिण्डको वास्तव्यः ४ । एवमेतेन करणोपायेन चतुर्भिः पदैः पोडशभङ्गाः स्युः । स्थापना- एवं क्रियमाणे यावदन्त्यभङ्गे देयं । ततोऽपि वही परिष्ठाप्ये सर्वम्यो देयं । यथाचाम्लिकचातु. र्थिकयोमध्ये चातुर्थिकाय देय मुक्तं तथाचाम्लिक- पानामोरपि १६ मतः । ततोऽष्टमक ( तयाचाम्लिकाष्टमतपसोरपि) १३ भङ्गाः । आचाम्लनिर्विकृत्योरपि १६, ना(यानाम्लाने देयं । तथाचालकस्थानयोभन्दाः १६ आचाम्लबते देयं । आचामाम्लैकाशनयोः १६ आचाम्लवते देगं । प भानामरेन चतुर्थपठाष्टमनिकित्येकस्थानकाशनमस्कैः पोडशभिर्भः सर्वे पण्णवति भागाः । चतुर्थपष्ठतपसोः पोडश पहने देणे, गतुर्थाष्टमगक्तयोः १६ अष्टमतपसो देयं । एकस्थाननिर्विकृत्योः १६ एकस्थाना(निका)य देयं । एकस्थान. ( हागन) निफित्योः १६ एसस्थानाग ( एकागनिकाय ) देयम् ॥ १६०४ ॥ परिष्ठापना कथं स्यात्तत्र विधिमाह- - ISS !" - पारिष्ठाप- नाविधिः। आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। MS ॥४३॥ विहिगहियं विहिभुत्तं तह गुरूहि जं भवे अणुन्नायं । ताहे वंदणपुवं भुंजइ से संदिसावेउं ॥ १६०५ ॥ विधिनाऽलुब्धेन निर्दोषं गृहीतं ततो विधिना वृद्धानां प्रदर्यानुज्ञाप्य क्षुल्लादिनिमन्त्रणया कटप्रतरच्छेदसिंहखादना- दिना ओघनियुक्त्युक्तेन मण्डल्यां भुक्तम् । ईदृशं उद्वरित अधिकं जातं गुर्वनुज्ञातं पारिष्ठाप्यं ज्ञात्वा यदा गुरुर्वक्ति आउँदै पारिष्ठापनिकमिच्छाकारेण भुव, तदा तस्य चन्दनं दत्वा संदिश्य भोक्तुं कल्प्यम् ।। १६०५ ।। चउरो य हुंति भंगा पढमे भंगमि होइ आवलिया। इत्तो अ तइयभंगो आवलिया होइ नायबा ॥ १६०६ ॥ चत्वारो भङ्गाः स्युः । विधिगृहीतं विधिभुक्तं १ विधिगृ• अविधिभुक्तं २ अविधिगृ० विधिभुक्तं ३ अविधिगृ० अविधिभुक्तं ४ । प्रथमे भङ्गे पूर्वोक्तावलिकानां भोक्तुं कल्प्यं । द्वितीये परिष्ठाप्यते । अविधिभुक्तं नाम काकशृगालादिरीत्या भुक्तं, तत्र यद्वर्धते तदुल्झ्यते । दाने छर्यादिदोषः । ईदृग् यो दत्ते यश्च भुङ्क्ते द्वयोरपि विवेकः क्रियतेऽपुनःकारेण वोप- स्थितयोः पञ्चकल्याणं दीयते । तृतीयभङ्गेऽविधिगृ० स्वभोजनार्थं स्निग्धादिबहुलाभं लात्वा विधिना भुक्तं रात्निकेन सह मण्डल्या, तदुद्वरितं आवलिकानां कल्प्यं । अविधिगृहीतं अविधिभुक्तं अकल्प्यम् । तथा यद्वाऽसंस्तरणेऽशुद्धं गृहीतं ततो मण्डल्यां वृद्धादेशाद्विधिना भुक्तं । तत्रावलिकया न कल्पते ।। १६०६ ॥ व्याख्यातं आद्यगाथोक्तं प्रत्याख्यानद्वारं । प्रत्याख्यातारमाह- ॥४३ ।।
पच्चक्खाएण कया पच्चक्खावितए वि सूआए(उ)।
उभयमवि जाणगेअर चउभंगे गोणिदिटुंतो ॥ १६०७ ॥
प्रन्याम्याता गुरुम्तेन द्वारगाथोकेन प्रत्याख्या(ख्यापयि)तर्यपि शिष्ये सूचा कृता ज्ञेया तौ च वाच्यौ । न हि प्रत्याख्यानं
प्रायो गुरुमिप्यौ पिना स्यात् । उमगोरप्यत्र ज्ञातरि अज्ञातरि च चतुर्भङ्गः तत्र चतुर्भङ्गे गोदृष्टान्तः॥१६०७॥ भावार्थ स्वयमाह-
मूलगुणउत्तरगुणे सो देसे य तह य सुद्धीए । पञ्चक्खाणविहिन्नू पञ्चक्खाया गुरू होइ ॥१६०८॥
मूलगुणेपुनरगुणेषु च मर्यतो देशतय तथा च शुद्धौ पद्विधायां श्रद्धानादिरूपायां प्रत्याख्यानविधिज्ञः प्रत्याख्याता गुरुः
पान ।। १६०८॥
किइकम्माइविहिन्न उवओगपरो अ असढभावो अ ।
संविग्गथिरपइन्नो पञ्चक्खाविंतओ भणिओ ॥ १६०९ ॥
कति कर्मादिविधिनी गन्दनादिविधिज्ञः प्रत्याख्यानाकारप्रकारज्ञः उपयोगपरः संविग्नो मोक्षार्थी स्थिरप्रतिज्ञः प्रत्याख्या-
पगिता गिष्णो गणितो जिनाद्यः॥ १६०९ ॥
इत्थं पुण चउभंगो जाणगइयरंमि गोणिनाएणं ।
सुद्धासुद्धा पढमतिमा उ सेसेसु अ विभासा ॥ १६१० ॥
प्रत्याख्या
आवश्यक
नियुक्ति
दीपिका।
इप्रत्या-
ख्यापयि-
त्रोःचतु.
भगी।
॥४४॥
अत्र प्रत्याख्यातृप्रत्याख्यापयितृभ्यां चतुर्भङ्गी। जानतीतरस्मिश्च गोदृष्टान्तेन । प्रत्याख्याता गुरुः प्रत्याख्यापयिता
शिष्यः। शुद्धाशुद्धौ प्रथमान्त्यो शेषयोभङ्गायोर्विभाषा विभागः कार्यः । यथा नमस्कारपौरुष्यादिकं विधि जानन् जानतः
प्रत्याख्यानं कारयति आयो भङ्गः शुद्धः, अजाननजानतः कारयति तुर्यो भङ्गोऽशुद्धः । अत्र ज्ञातेन दृष्टान्तेन गावो ज्ञेयाः
यदि गवां प्रमाणं स्वामी वेत्ति गोपोऽपि वेत्ति तदा स्वामी सुखं वृत्तिं दत्ते गोपालश्च लाति । एवं शुद्धाशुद्धौ प्रथमान्त्यभङ्गो
स्याताम् । शेषयोभङ्गयोर्विभापा । स्थापना यथा गुरोर्जानतः शिष्यस्याजानतो द्वितीयभङ्गः । इह तत्कालं शिष्यं संक्षेपतः
प्रबोध्य प्रत्याख्यानविधि ज्ञापयित्वा गुरोः प्रत्याख्यानं ददतोऽयमपि शुद्धः, अन्यथा त्वशुद्धः। गुरोरजानतः प्रत्याख्याने
तृतीयः । यथा सामान्यमाध्वादिपार्श्वे प्रत्याख्यानाकारादिज्ञः श्राद्धः प्रत्याख्याति, अयं कारणे शुद्धः, अकारणेऽशुद्धः ।
यथा प्रभुर्गवां प्रमाणवेत्ता व्यग्रः सन् सन्दिशत्यज्ञस्यान्यस्य ततः स सन्दिष्टोऽज्ञस्य गोपालस्य तदुक्तमात्रेण वृर्ति दत्ते,
असन्दिष्टो न दत्ते । एचमज्ञो गुरुसन्दिष्टः प्रत्याख्यापयिता शुद्ध एव । एवं प्रभुसन्दिष्टादिषु विभाषा ॥ १६१० ॥
उक्त प्रत्याख्याताद्वारम् , प्रत्याख्यातव्यमुक्तमप्यध्ययने द्वाराशून्यार्थमाह-
दवे भावे व दुहा पच्चक्खाइवयं हवइ दुविहं ।
दवांम अ असणाई अन्नाणाई व भावंमि ॥ १६११ ॥
द्रव्ये भावे प्रत्याख्यातव्यं स्यादिति द्विविधं ज्ञेयं । द्रव्ये प्रत्याख्यातव्यमशनादि । अज्ञानादि तु भावे द्वा० ३ । अथ
॥४४॥
पढिारं, पर्वदिति प्रत्याभयानाईमव्य श्रेणिः मा द्विधा उपस्थिताऽनुपस्थिता च । उपस्थिता श्रोतुं आगता, अनुपस्थिता श्रोतु- मनागना। उपस्थितापि द्विधा सम्पगुपस्थिता च मिथ्योपस्थिता च । मिथ्योपस्थिता कपटागता गोविन्दाचार्यवत् । सम्यगु- पमिता विधा माविताऽमारिना न | माविता द्विधा विनीताऽविनीता च । विनीता द्विधा व्याक्षिप्ताऽन्याक्षिप्ता च । व्या- विना गा सीपनादिकर्मपरा, अव्याक्षिप्ता द्विषा उपयुक्ता अनुपयुक्ता च । तत्रोपस्थित १ सम्यगुपस्थित २ मावित ३ विनीत ४ अन्याक्षिप्नो ५ पयुक्तायाः ६ पर्षदः प्रत्याख्यानं वाच्यं, उपलक्षणादन्यदावश्यकादि सर्व श्रुतं च वाच्यं । एतद्विपरीताया अनुपस्थिनादिविशेषणाया न देयं । एवं षट्पदैः अन्त्यपदादिपरावन प्राक्तनपोडगमङ्गवत् अत्र चतुःषष्टिभगा ज्ञेयाः, पयानु- पूर्गा द्विगुणगुरुलघुकरणे यदा मौलघुः ममैतः तावता मङ्गका पूर्णाः स्युः । अत्रायो भङ्गः शुद्धः शेषा न ॥१६११॥ तत आह- सोउं उवट्ठियाए विणीयवक्खित्ततदुवउत्ताए । एवं विहपरिसाए पच्चक्खाणं कहेयवं ॥ १६१२ ।।- (द्वारम् ) भोतं गम्पगुपस्थितायाः विनीतायाः अव्याक्षिप्तायास्तदुपयुक्तायाः पदः 'एवंविइत्यादि द्वा०४। अथ कथन विधिः- पूर्व मूलगुणाः साधुधर्माः म उच्यते तदशक्तस्य श्राद्धधर्मः । उत्तरगुणेषु पूर्व पण्मासतप उच्यते ततो यावद्ययेन शक्या कां गारते नहेयं ।। १६१२ ॥ अपनाऽयं कवन विधिः- आणागिज्झो अत्थो आणाए चेव सो कहे यहो।
आवश्यक नियुक्ति- दीपिका। कथनविधि- स्तथा फल- द्वारम् । ॥४५॥ ~ दिटुंति उ दिटुंता कहणविहि विराहणा इअरा ॥ १६१३ ॥ (द्वारम् ) आज्ञा आगमस्तद्राबस्तद्विनिश्चेयोऽर्थो विचारोऽनागतातिक्रान्तप्रत्याख्यानादिः सौधर्मादिर्वा आगमेनैवासौ कथयितव्य: न दृष्टान्तेन । रत्नज्ञपित्रा समग्रज्ञापितमूल्यः पुत्रो रत्नानि विक्रीणन् परोक्तमल्पमूल्यं न श्रद्धत्ते ततो मृपा न वदेदिति । तथा दान्तिको दृष्टान्तवाच्योऽर्थों वह्वथादिदृष्टान्तात् ' दृष्टान्तदर्शनात् कथनीयः, यथा आत्मा नित्यानित्यो वस्तुत्वाद् घटवत् इत्यादिदृष्टान्तात् दृष्टान्तेन वाच्यं । यद्वा यथामुकमेवं भवता. ज्ञातं तथेदमपि प्रत्येतव्यमिति कथनेऽयं विधिः, अन्यथा विपर्ययोक्तौ कथनविधेविराधना स्यात् द्वा० ५ ॥ १६१३ ॥ अथ फलं- पच्चक्खाणस्स फलं इहपरलोए अ होइ दुविहं तु । इहलोइ धम्मिलाई दामनगमाई परलोए ॥१६१४॥ इहलोके फलं स्यात् परलोके चेति द्विविधं । इहलोके दृष्टान्तो धम्मिलादिः। यथा धम्मिल्लेनाचामान्लानि कृत्वा फलं प्राप्तं । अत्र धम्मिल्लहिण्डी वीक्ष्या, आदिशब्दात् कफविपुण्मलामदियो लब्धयः स्युः। परलोकफले दृष्टान्तो दामनकः । यथा राजपुरे एकः कुलपुत्रको जिनदासमित्रसंगात् साधुपार्श्वे गतो मत्स्यमांसनियम ललौ । दुर्भिक्षे मत्स्याहारे लोके श्यालकैः बलाद् इदं नीतः। तत्र तेन जालं क्षिप्तं मत्स्यान् दृष्ट्वाऽमुश्चत् । एवं दिनत्रयं बलात्कृतं । एकदा मत्स्यपक्ष्म त्रुटितं ततो निवृत्तोऽनशनाद्राजगृहे श्रेष्ठिसुतो दामनकनामाऽभूत् । अष्टवर्षस्य मार्या कुलं मृतं । तत्रैव सागरपोतस्य गृहे तस्थौ । तत्र साधू मिक्षाया (भिक्षार्थ- माया)तौ । साधूक्तिरेष गृहस्वामीति । गृहेशेन श्रुत्वाऽन्त्यजानामर्पितः, तैरङ्गुलिच्छेदानिर्विषयीकृतः । नश्यन् श्रेष्ठिगोकुल- - ॥४५॥ 5 पनिनाऽनायवाद स्थापितः पुत्रस्थाने, यौवने मागरपोतस्तत्रैतस्तं दृष्ट्वोपलक्ष्य लेखं दत्वा मारणाय राजगृहे पुत्राय प्रैपि चैत्ये मुप्तः क्रमान् विपापरिणयनं । पुनः श्रेष्ठिना मातृदेवीपूजाय स प्रेपि यावत्स श्रेष्ठी जातः । यावत् 'अणुपुखमावह (य)ता वि अणत्या नसा बहुगुणा हुन्ति । सुहृदुक्खकच्छपुढ(ड)ओ, सुखदुःखयोः करणविपये कच्छापुटर कक्षापुटो यस्य स मुपदव कक्षापुटः, जस्म कयंतो वहइ पक्ख'।१। इति गाथा, ततस्तिस्रो लक्षाः ददौ । राज्ञा पृष्टे सम्बन्धं श्रुत्वा प्रमादः कना, ततो बोधिलामो धर्मादेवलोकः आदिशब्दात्सुकुलप्राप्तिमुक्ती ॥ १६१४ ॥ पञ्चकन्याणमिणं सेविऊण भावेण जिणवरुदिई । पत्ता अणंतजीवा सासयसुक्खं लहुँमुक्खं ॥१६१५॥ इदं प्रन्यारुगानं जिनपरोपदिएं, सेवित्वाऽनन्तजीवा लघु शीघं मोक्ष प्राप्ताः। प्रत्याख्यानफलं 'पञ्चक्खाणमि कए स्यादौ सम्पदारंग (णोक्तं, इह तु ) लोकनीत्या उक्तं ॥ १६१५ ॥ उक्तोऽनुगमो व्याख्यारूपः, अथ नया:- नायंमि गिपिहयवे अगिपिहयामि चेव अत्थंमि। जइयवमेव इइ जो उवएसो सो नओ नाम ।।१६१६॥ गृहीनदयेऽगृहीतव्ये चार्थ ज्ञाने एप सति यतितन्य, ततो ज्ञानमेव प्रमाणं न क्रिया ज्ञानं विना साध्यसिद्ध्यभावात् सीवाननमः । श्रय क्रियानयः, गृहीतव्येऽगृहीतव्यं चार्थे ज्ञाते यतितव्यमेव ततः क्रियेव प्रमाणं न ज्ञानं यत्नं विना मानिसमा पनि योनि क्रियानययोर्य उपदेशः, स नयो नाम कथ्यते ।। १६१६ ॥ अथ प्रमाणमाह- सोसि पि नयाणं वहुविवत्तवयं निसामित्ता । तं सवनयविसुद्धं जं चरणगुणट्टिओ साहू ॥१६१७॥ ॥ इति परवाणनिजुत्ती ममत्ता | श्रीभद्रबाहुस्वामिविरचिता श्रीमदावश्यकनियुक्तिः समाप्ता ।।
आवश्यक
नियुक्ति-
दीपिका।
दीपिका-
कार-
प्रशस्तिः।
॥४६॥
सर्वेषामपि नयानां नैगमसंग्रहादीनां ज्ञान( ज्ञानक्रिया )द्वयसंगृहीतानां बहुविधां वक्तव्यतां निशम्य तत्सर्वनयविशुद्धं
सर्वनयसंमतं ज्ञेयं यत्साधुश्चरणगुणव्यवस्थितश्चारित्रक्रियाज्ञानस्थितः स्यात् । यतः पूर्वं ज्ञाते गृहीतव्येऽगृहीतव्ये चार्थे यतित-
व्यमेव पश्चारिक्रयायत्नः कार्य एव ततश्चारित्रं, यतः सर्वनया भावनिक्षेपमिच्छन्ति । भावश्च रत्नत्रयाराधनपरः साधुः ।
इति प्रत्याख्याननियुक्तिः समाप्ता ।
ते श्रीअञ्चलगच्छमण्डनमणिश्रीमन्महेन्द्रप्रभ-श्रीसूरीश्वरपट्टपङ्कजसमुल्लासोल्लसद्भानवः ।
तर्कव्याकरणादिशास्त्रघटनाब्रह्मायमाणाश्चिरं, श्रीपूज्यप्रभुमेरुतुङ्गगुरखो जीयासुरानन्ददाः ॥ १॥
तच्छिष्य एष खलु मरिसचीकरत् श्री-माणिक्यशेखर इति प्रथिताभिधानः ।
चञ्चद्विचारचयचेतनचारुमेनां सदीपिका सुविहितव्रतिनां हिताय ॥ २॥
एषा श्रीआवश्यकनिर्युक्तेर्दीपिका चिरं जयतात् । मुनिनिचयवाच्यमाना तमोहरा दीपिका पिण्डनियुक्तरोपनियुक्ति-
दीपिकादशवैकालिकस्याप्युत्तराध्ययनदीपिके ॥ ३ ॥
आचारदीपिकानावतत्वविचारणं तथास्य । एककर्तृतया ग्रन्था अमी अस्याः सहोदराः ॥ ४ ॥
इति श्रीविधिपक्षमुख्याभिधानश्रीमदञ्चलगच्छाधिराजसुगुरुसुविहितचक्रवर्तिश्रीमन्मेरुतुङ्गसूरीन्द्रक्रम.
कमलमरालशिष्यश्रीमाणिक्यशेखरसूरिविरचिता श्रीआवश्यकनियुक्तिदीपिका समाप्ता।
RSA
॥४६॥
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