Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Nal Daman
Front matter
No text on this page.
नल दमन
प्रधान संपादक
डा० विश्वनाथ प्रसाद
संपादक
ग. वासुदेव शरण अग्रवाल
भी घोसतमाम ग्याल
०
164
हिंदी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ
प्रागरा विश्वविद्यालय
प्रकाशक
संधान
क. मुं. हिन्दी तपा भाषाविज्ञान विद्यापीठ
पापरा विश्वविधामम प्रापरा।
प्रथम संस्करण १९५१.
मूल्य)
मुरका
पारा मिस्रीिस
प्रागपा
नलदमन
मनुक्रमणिका
.
पृष्ठ
१
प्रासपा
૨
प्रतिपावित्र
३
पंपकी प्रतिया
१-१२
मतरमन
१ ममानुभमविकत
No text on this page.
प्राकथन संस्कृत के पप महाकाम्म में कोमसदेव के रामा मस पौर निपपदेश के रामा को कन्या रमपन्ती की रूपा पिठ विस्तार प्रौर मालिश्य के साप पनिठहै उसका पोड़ नहीं । यो मत-नमयन्ती का पारमान मारत में पनेकपों में इतना प्रषिक प्रचलित है कि साधारण से मापारम पन भी नम की कपा को पहने-सुनने में समवा है। पप की कपा-मापुरी से भाकर्पित होकर ही फंसी ने उसका फारसी में अनुवाद किया था। फैशी का मा-ममम्ती-बप्ति प्रपन समय में दो बार से पा मुना बाता पा। फास-प्रवाह है पाम उसकी पर्सा भी नाम ऐप एगई है। फैगी की बारा पर मारे पसार सबन मुरराम ने मप्त-दमन मामा काम्प की रचना पूरी भाषा में की। पपन रेप में, बाने कर है पा परिपाटी बसी पा रही है कि वहाँ मौकी ज्योति पई कि 'मूरपास' की उपाधि मिती । पोर फिर मितने मी मूरपास मिने, यदि उनके नाम से कोई पता मिमी है तो बिना किसी सोच-विचार के पर तुरंत प्रसिर पप्पापी मूरदास के बाप मोर दी गाती है। यही कारण है कि इस समय सूरसापर के रचयिता मत गिरोमणि भुरराम को जीवनी का सही मोर निकासना महो मया है। पही घटना इस प्रेप के मेसा सूरशम साप भी घटी । इनका पप तो नागों के सामने पापा नहीं। च की माममार की वर्षा से मोर्मों में यही समझा कि ग्मी रिम्मात सूरदास ने त रमन नाम की रचना की है। इसी प्रारूपम पर मोतोकशाप्ती माता पिरे पपने कपिरपननुपा मामक पत्र में इस पंप को पोर निकासपाते को एक हमार रुपये का पुरमार देने की पापणा कर पी। परन्तु किसी भी प्रकार म ममय इस संप मा पता नहीं पस सका । किपरतीक प्राचार पर सौप पी परामराम जी ने अपने मूरघाट के पारमारित में लिप रिया fr"मुररात पी में मत-रमपम्पी नाम का एक काम पप भी बनाया था पर बह मप्राप्य है।" यह किलाठी कोरे प्रम पर ही परमदित पी गो कमो पा रेसी पमी तर पता पा रहा है । हरपारप्टपोरापनपपप टन का पोष थप 'मूर की मापा' (रो साहित्य मंग, गंगाप्रसार रोड, नरमऊ, सन् १९१०.) पृष्ठ ११. हम प्रमका निपकरण प्राम बम बमा पाकिस. १९०५ की मापरी प्रचारिणी परित वर्ष ४१, माप १९५२ में प्रिंस पाफ रेस्स म्यूमियम के महाप्परा ग. मोतीचन ने राम के मनामन की मस्तामीर पहरों में सिखी प्रति का सिरप प्रापित किया। * गेला नाम है जिस मवे कपा-पोत का प्रथम, रस रस्तुब मत की काही पाई पाती। tfdस कारन या प्रेम कहानी पर मापा रिस मानी।"
२ इस बम की रचना बन सूरबास ने सन् १.१८ हि०-१६५७६० में की थी। प्रम में उन्होंने प्रपमा परि घाईगम्त का पूरा परिषय पिया है तथा सूफियों की मसनगी परति का पूरा निर्वाह करते हुए इस हकीकी का बड़ा बारीकी के साप कपन दिया है। काग्र-सापर्य वीमे उनकी कमम से पड़ता है, विपकी गानयी रसम पाठक स्थान-स्थान पर पार्यमे । मैं अपनी पोर से उसके प्रास्वादन में म्पवमान उपस्थित करना पित नहीं समझता। पंचकी प्रतियों और काम्पगत निक्षपतामों की पी मुरिश सम्पादकों से अपने कपन में लिपप से किया है । मैं समझता हूँ कि उनकी इस भूमिका है पाठकों को रचना पा पूरा मर्म समझने में किषित् भी कठिनाई नहीं होगी। उपर्युक इस्वसिपित प्रतिमो के मिश्रित रूप को सट करने के लिए रोना प्रतियों के मारिपार पन्त के पर्चा के फोटो इसमें प्रकाशित फिमे चा पेहै, बिमर्स उमा वास्तरिक रूप सामने पा सकेमा। संच का परिचय तो सम्पारों में भिमा ही है । मेरा कर्तम्म उन मोर्यों का पागार करला पिहोंने अपनी बहुमूस्म सामग्री कर हमें इस प्रथ के प्रकाशन का परसर दिया है। उनमें सर्वप्रथम हम ग. मोतीकण के प्रति अपनी पोर से पा समस्त हिंपी बम की मोर का शापन करते है, जियोने म सिर्फ अपनी बोषित प्रति पौर का पहानय की प्रति की प्रतिनिपि प्रगान की है परन् मूम के दो पृष्ों को प्रकासित कले की अनुमति भी दी है। इसके अतिरिक्त मुनि शान्तिसागर बी ने अपने बारा संगृहीत पाप हस्तलिखित प्रति को विद्यापीठ को रेकर चित सदारता का परिचय दिया है, रस मिए हम उनके बहुत ही प्रामारी है। यह ममता की प्राप्त सूचना अनुसार नागरी प्रमरों में मिली हुई एकमात्र प्रति है। रिवारस.मासूदेव शरण प्रप्रयास में पस समस्त सामग्री का उपयोग करके पो माराम घुमाम के साहाय से इस मंच की सम्मानित छिपा है जिससे एकचिरकालिक प्रमार की पत्ति हुई है। इसके लिए वे भूरिभूरि पापुषार के पाल। पानरा मेरम राबमय पप्ट मापी मूरपारा की पमन्ती का पापोगम कर रहा है। पायोग मनुसार उनका परमस्साम यही मागरे के पास पास का साही बाब है। मतपम इस प्रकार पर विद्यापीठान भडनमी पुरास की मह सपना प्रकाशित करके उस पापोरन में अपना कर पोयराम रे रहास पर प्रसाधन से * नाम पर मटकने वाले पोपकामों को यही मार्म- पन होया ऐसा मेरा विरास। विसमाप प्रसार म.हिदी तपा मापाविहान रियापीठ, मापपरिचामय माप। पार गुदीरा . २.१८. संपामक
मत-पमन
का प्रति
जास्वस्तिश्रीसर्बज्ञायनमायनल
मनसरदासकृतमारस्पतासुम आदि
नादजुकोडीग्रादिअंतिपुनिएकै सोडा
जादिनबनिरूपनरका प्रगतिशत
असेषबदुषारासिथलनच्पलबमा
नछोटात्तसगनबूढालघानमाटाब
तनपाडासचानपूटामिलानबिबरन
राननढागाड्याँकुछल्पाकामांववतोय
गालोवजुधरैधरीतिहिनाचूंगपानाउधता
तिधिनस्करगुरणहोईजोनिगतिहिनी
उनकोटीवाला पक्षीजोकै सजा
कतिपरराषतंजावाजावाहन
रुपवाकोअनकहाविचनचलेतही
थकिरयागजिलाबच्नकहिगवन्न
होडीतहीकोगबिधबकोटीहोस
राधापनबनानबनबिनाप्रापनबनाव
नावराज्यासाबनात्यादीबनाकक्षितलब
नवनावणजद्यपिपोत्यांकजजाईपेयी
टोघटरयासमाईजहानवोदिसौर
नकोडीचौरवारमएकैसाड़ीघापुनछेद
मुनि काम्तिसापर की प्रति का अपम पूर्ण
४ को प्रति मस-दमन पुस्तक निविधखानायगोने मिन्नतराम लिमार ruarunaamaneshant पवेनानायवभागसहासानोरा मरिह। थकानभमानास कातोश्रीवचितग्राकार मारक्षरमसोन महोतीकालरातलमों अतिमिटमा दोषामलावरीयत्तस्वदेश जाभला किसन वनजधिपषरामदेवशारअनीत विका काहियेक्वनदानदायगय भोजमवतजार लेमिहिमंत्रापारकद्वतवाहतुमुधमान मत नबरतकरतनधाना माहारानतुलनतिजा दानशाजापनपत्यालनकान्हा तुनौलमत्तल नर्दिाना मामाकमदमातभुलाना उस्तसतत हादानदियाला अधममधारधनमानपाला सोमायसुनभईनमोराजाकारनमेनुममतासामा यायनचलकेमानीनोकराआयादाविजानी कामनिदानपरानुलतानानप्तरामीलानदी समिमोस्तरकन्धानजाउलसोश्रामधार रनमा दोषाकरस्तुततमराजनिविदाप्रयोगदि पाश्मनायाहोजमहम्को सातादापरायाजा पीक्यामसुनायेमरकोरीयावेआत्म मानकपण्यकतिनिपिडितहदेनेलही कह न्यौमुत्यावहतविनानम्हरिक्यामुनातवाहतकि स्पानकमास्फत्तयोगमकबवाहनानोपरम लसाम्ननिमाईयहमाचे अत्तरलमालयन यावेत निरसोरेम्पयस्विमिततावाआमालपाने हिदाममहगीरम्पुरमीतनिदानामवतारपत्र अर्ने ज्ञानकोपाकैपावैपदनिरचान। घर्षमादामागल्प अनि कानिमारकी प्रतिमा प्रतिम पृष्ठ
ममनमन
اسم او بیر کر کے کاروان کی کوئی
من میمیری عنایت کی
سرمایادا
دیدگاه ما
عمل کر جدوار
تورکستان کے
،بریتو کم کنم
و وریو پواکو در کار به قیمت کیا
جهان امریکہ اور میری بات کرن بن
به مدد
من عدم
عایق اژایرن کنت مودم رای لطافت امیم
ساری توانائی اس وقاده اما
درع جہلم پر امریکی من در میان ارما ساده والی
البدر محمد اطاع سواں برسم وتمام داشت
دعوت دیروت لو مهران منعومان دلیریان دابینت
مقامیارمدا سانولی سید میاہ الی الی
محمد کی درموری و پرستار اس مہندی اور کی سالم
ساده با راه عاری علمانی که ما داده میام
هاککرالی داکار سورہ
نے کے کیا کرتے کہ
پورت کو مریشرو
ههه
اموالف انار کیاری
پرسیاری در
را اندوم
الرومای
بلی
عده
प्रिम पापोम्म धिपम पानी प्रति का परिणम १०
ग्रन्थ की प्रतियाँ प्रस्तुत सपारन की रो प्रतियों के पापार पर हुपा है । प्रपम वि सभा (कामो मागरी प्रचारिणी सभा दारापसो) की है जिसका संकेत 'स० है र दूसरी प्रति जयपुर के भो मुनि कातिसागर भी की है जिसका सदेत 'हा है। .' मति बम्बई के प्रित प्राफ बस्स म्यूमिपम टी पारती प्रति को नापरी महरों में । गई महम है और यह टेलित है। रात म्यूजियम के पूरेटर ग• मो मोतीबाजी प्रस्तुत पंप के विषय में रवि मरगत Fत मनामन दाम्प' शीपक से मारी पारिलो पत्रिका (वर्ष ४५-स. १९६५, नवीन संपारण भाम १९-मक २) में पापा । म लेख में फारसी प्रति के साथ में गहोंन इस प्रकार तिमा है पर चब से मई के प्रिंस माफ येस्स म्यूजियम का स्यूरेटर नियुमत हमा, के बहाँ को वहाव पारसी पुस्तकों को विस्तृत सूची बनाने का प्रबसर मिला। न पुस्तकों में मनामन' नामक एक चित्रित पुस्तक मी पी जिसे पहने की बी मैं (चीकारने मान मनामन' की परमोरे रखो पो । पहले तो मेने समय हि वापर मोल्स नमरमयंती-बारिश का पह कारती पनुवार हो गरि प्रकार पारी रियो का बनाया मनामन' प्रत्यात है। पर म्यूमियम रे मातरमन काम के एक पमे पसरते ही मुम पता नप पया कि यह मातरमन नाम का प्रेमाराम काप्प प्रबपी में पास मामक रूपिका मिमा हुमा है। इस सूरपास का सबप मरसापर । रचियता सुरात से रूप मी, मही, बेसा पाप पता नपपा । गान पड़ता है, पास के नाम-साम्प के कारन नरम की रचना मरतापर के पास के जिम्मे पर प। प्रस्तुत पुस्ता फारती लिपि में नियो हरे है। इस पुस्तक में १५५ सम पृष्ठ है। जिन पर गिर नहीं बने है रन पृष्ठों पर १५ सतरं है। पूरे पृफ की नाप १३ ४१५ तवा सिवित भाप को माप 01 xrहै। जातिय र पृष्ठ-संस्थाएँ नहीं है, बार में किसी ने पतित ते भर है। बहुमा वित्र पूरे पेटके नहीं है। । एणों के बीच में पा निबने भाप में एक पूरे पापम पर फिर पारिए पए है। 'पुस्तकाती के तुगर मस्तासीर पमरों में तिमोह है। पृष्ठ के दोषों र हारिया पूरा हुमा बिस रोगों मोर पाठरित है। पाठ को हर मुमा मात पाने माने तपा मुनहरे से बाप दीपा है। हे नुनहरे मरों में बीच में पड़ो पहियों में, निवेहए है। पुस्ता पीरमादारी कसमार को शिर में रेपी २ मत-नमन 'पुस्तक प्रत में इस प्रति के मेसक का माम बाबुस्ता पार मुहम्मरमा रिया हुपा है। इस प्रति की मकान हिमरो सन १११. यानी बापमाह मोरपनय राग्यकाम के पर्व वर्ष में समाप्त हुई। यह प्रति मियां सिरनामक सोसा के लिए तैयार की गई पी। पेरिसर कौन इसका ठीक-ठीक पता नहीं चलता पे मौरंगने के प्रसिर सिपहसालार रिसरही हो सकते क्योंकि हमही मुत्स सन् १९८२ यानी इस किताब के मिले जाने के सोमह वप पहने हो पुकी पी। चिों की पमी से यह पुस्तक पराबाद ही निजी मासूम होती है और मायर मिया रिसेर हामही के कोई रामरामा रस रहे होंपे । 'पुस्तक का प्रारमिक पृष्ठ सुम्बा समान और सोने के पुगरे से प्रति है। तीन तरफ हाधियों में बापस्म की बेमें मीने मात सपा युतायो रंगों से बनी हैं मारम बिसमिरमह रहमानर्रहीम होता है। बार में हम प्रार्थमा पुन होती है। समा की रित प्रति पास्केप प्राकार के प्राथमिक स कापन पर है। भाकार है-१५३ ४१ । म्पर से इस पर सादी बिर भी है। इसमें प्रपारंम का ग्रंप विमिरमाह एमाहीम' है। पुष्पिकान्ति नही हुई है। मूल प्रति के प्रस्त होने की उपना अपाम बी पी है। इसमें समस्त ११ पर है। प्रथम पत्र में २१ पश्तिा है और वो परे में ४ वक्तिमा। पेप पों में किसी में २० प्रतिमा है पौर सिसी में २६। इसमें रोहे की संख्या १८३१ तथा प्रत्येक बोहे के सामीपाइयों को र पलिया है। प्रति कर सकत हुई इसका रमेश नहीं किया पया है पर 'प्रताप पोर विपरम' (T.ना.प्र.स.) के मबार पर पह सन् १९४१ के सपनमा टक्ति। बाम पाती है । म पोन विवरण (पृष्ठ २) मराका सामेम है। 'का. प्रति नापरी प्रमरों में है और वह पुराने बेसी कापर पर लिया है। में समस्त १२४ पो प्रति है परन्तु पिनने पर १२५ निभाते है। यह प्रबिस्त है जिस पर माल पा ममा है। शिव पब ममय हो गई है। ऐसा विपित होता है कि इसकी दो बार मिारी हई । तरोबार गिर से प्रसप हए पत्रों को टोक हिमा नपा। पोका पाकार ३४६३तिक्षित प्रा का प्राकार Ext लिखित प रसके दोनों पोर (महिने और बाएं) हाशिया पोड़कर पानी पी मातापाही की दो-गो सामों से मरारित है। प्रत्यक पत्र के पृष्ठ के नीचे पाहिनी पोर हापिए पर पत्र संख्याएँ प्रेरित है । प्रति पृष्ठ में २१ स्तिया है। इत समस्त १६० रोहे ह और 'स. प्रति की भाति प्रत्येक दोहे से सापौपाइयों की पति ह । हे पीर पीपापों को संपादित करने का आम हो रहा पा, पर बह प्रपम बोहे तक ही सीमित रहा। प्रापे रसा निर्वाह महो ससा प्रति सबत १८१५ को निपी है। पारमाश इस प्रकार ॥६॥सति पो सर्वहाय मम ॥ प्रप मम रमन सररास रुत मारायवे ।। मुमा प्रारि मनार कोई। प्रारि प्रति पुनि एईसीई ॥१॥ बाहिर गर्म कपन रेसा । प्रबपति पति प्रमप यह पा ॥२॥ .
मसमन पुष्पिका निम्नमिचित रूप में है- 'संवत १८१५ सत्र पर्षे महा मांगस्य मासे । बा मासे झुक्म पो तिपो १२ पुर रिम मि• मिम चेतराम मिपार त्यो पुग्म मारमा इपि बी म मस्तु ममत रातः पुस्तक मिपि विद्याना बोप पसेते ॥ यह प्रति मी किसी पारती प्रति की महत है प्रपना उसकी बहनों को परपरा में है। प्रने सम कारसी लिपि के कारण पर रूप में नहीं है। कहीं कहीं तो कुछ पुष हो गए है जिनके पुरम्पका पता समाना ही कठिन हो जाता है। बाहरण रिए जाते है १-सिपित म चपास पाचोटा । तरपना सपा म मोटा ।। -मोहा ॥१॥ इसमें वपत्त को पंचम' होना चाहिए। इससे बौपाई की मात्राएं पूरी १५ हो जाती है। कहना नहीं होगा कि फारसी प्रति में चम' के 'म' प्रमर को ठीक ठीक पाने में प्रम , हो सका और प्राप' प्रशर को पे पा मिपा ममा। इससे प्रर्प तो ठीकठा, पर मात्राएँ गामा हो गई। २-बहुत म बोमा समान फूटा । मिता विधरा राम दूरा ॥४॥ - इसमें 'सा' भयकई प्रर्ष नहीं रखता। होमा पाहिए, 'सबा लिखने वाले मे धीम' को 'पा मिया पौर सिख रिया 'सचा' । इसी प्रकार 'विएरा' को 'विपरा' कर रिपा, मोंकि पेम' बिल का पता म लगा । -राता पिरप करे बिन पाता । ति पात कर पा राता ।। -मोहा ॥६॥ यहाँ रतर पर होना चाहिए-निपात करे बह राता।। ४ो रसमा सत होतिहि रूपा । मिहि तो गुरु मत होतिहि ससा ।। मुम्म प्रकास कापर हम होई । सरबर भी मिस सामर सोई॥ बम भव तरबर तिम गरा । तो गु मिपिन पार विस्तारा ॥ -मोहा ॥११॥ बाक्ति पर परसौ सिपि के कारण मास पर लिए पए । चौपाया पुरप में इस प्रहार है- को रसमा सब होहि कपा । यह मी कर सब होहि सिपा ॥ गुरप्रकार सर होई । सरबर प्रौ सापर मसि सोई॥ मेलनिसबतया तिन भारा । सो सितिन पाइपिसतारा ॥
मतनमन विषय स्पष्ट करने के लिये इतने ही बाहरप बहुत है। कहने का तात्पर्य कि प्रति इस प्रकारको प्रमुरियों भरी पड़ी है जिससे उसके पारसी प्रतिको ना होने का पूरा प्रमान मिलता है। प्रतियों में भर प्रस्तुत प्रतियों में मेर है। कां.' प्रति उस प्रति की परंपरा में है जिसका प्रचार पिता रारबना समाप्त होते ही हो पपा । '• प्रति इस प्रति की परंपप में है मिसमें पिता अपने बीवनपर्यन्त मोपन परिपर्सन करता रहा । इसलिये पह मोपित परिसित प में है पपि पारसी प्रति को नाम होने के कारण इस पाठों को भी बहोरभाई मो 'को प्रति के पाों की है। प्रस्तुत संपायन में इस परिवरित प्रेश पचास्मान पार रिप्पषियों में लिए गए हैं। प्रक्षिप्तमही है। प्रतिया एक दूसरो की पूरक दोनों प्रतियां एक सरी को बहुत प पूरक केस में है । परिममें से एक ही प्रति प्रापार पर संपावन थिया जाता तो बह निशित पसे प्रसाल तिर होता। इसका यह वारपर्य नहीं कि प्रस्तुत संपारन सब पप थे गुर है और उसमें मूने नहीं है । प्रमिप्राप यह है कि एक प्रति में बो पाठ प्राव निकता र तामारणतणसरी मति में पा तो भुग पाठ के रूप में प्राप्त हुमा अपना TES पाठ भूत पिक निकट पाया गया मितते मुसंमत पाठ मिषित करने में सहायता मिमी। यहां पो से बाहरण कां. स. पौर स.' (प्रस्तुत संपावन) केपम से लिए माते हैबोवहाँ के अनुसार है. हो.॥२॥ प्रो पुन र मेर कप नाही । सिमट समाप या सब माही ।। (१०) मदिन पर हर माही । मत समाप रहा सब माहीं ॥ (.) मौ पुनि परमेष रूप माही । सिमिट समाह हा सब माहीं।। (सं.) पोहा ॥३॥ तिहि तन दिन होई । 4 करतूत म सागै कोई ॥ (०) निहन्ति दिन पाम होई । 4 करतूत , माप कोई ॥ (1) तिहि पेतन दिन पहोई - सापै कोई ॥ (6.) ॥८॥ माहरणा प्रनका । कारपट एक को एका।। (का.) एक ना होर फा प्रकार एक को एका॥ (स.) एक कमक होर हा पहा । फारम दर एक को एग ॥ (म.) .
मस-नमन X रो॥१७ (स.)। १६ (क) में मंमत मोहन * मांगा । तिम्हपन फिर प्रातिनि मपि मापा ।। (को०) प मंपत * मापा । मिह बन फिहि रतनय मांगा। (स.) में मंगत तोक्न * मापा । सिरह पन महि तम नग मोपा ।। (०) रो० ॥रही। मगत पनर रसे । सो पर पप हरे दिन गेम ॥ (न.) मंपत पन पर पर रोने । सो दर पग , पर बिन से ॥ (म.) बा मंपत नमरोस । सो पर पग न पर रिम रोस । (4.) रो.॥२१ (स.)॥ २० (१०) पौष महेब पाठ सो पुटी । बा वेतन हो जबर टूटी ।। (क.) कहा और मोह पाठ सोपी । बा चेतन हित बैबर दूटी ॥ (म.) के पीक महर पाठ सो पो । गा चेतन हत बार री ॥ (स.) सत बोहा इस प्रकार है माया मोहि मिताप सौ बीर मपो रपि सति गुरु फेरि मपान मन पराडि रिपायो पार ॥२०॥ (को) मापा मही मिताप स्यों पिपरो भयो रविसीय । संकर परि मपान मन कार रेखा यह पौष ॥ (स.) माया मही मिताप स्पो पिरस मपर रपि मोर। सतगुग करि मयानि मन काहि रिलायो पीर ॥ (स.) प्रयोशात प्रतियो मंप्रति पंपकी बार प्रति माह इनमें से एक तो बंबई प्रिस पाप-बेरस ग्पूनियम को पारसी प्रति है और रो (इसरी-तीसरो) उसी को भारी प्रसरों में की पर प्रतिपा है जिनमें से एक पायो मागरी प्रबारिमो सभा में मुरक्षित म.' प्रति (tha) है सपा सरी पत म्यूजियम के पूरेगर स.पी मोतारबो को प्रति है। मी का.' प्रति पी भूमिकाविवागर बी को प्रायोम रातिपित बनापरी प्रति है In. मो मौतारमो की प्रतिभा भी पोहाय उपयोग रिया पपा है। प्राभार प्राराम सारिपारपतिमा बाम है मतदमन संबप में सबप्रथम सिनोप प्रमाला प्रप पो. ग. मोहोर बोको है । रगोन प्रपरेविषय में एक मन भी मापरी प्रचारिणी पत्रिका में पाया । रस मप से प्रस्तुत संपारन में सहायता लेना मतनमन पत्वामाषिपात होती । प्रतएव उसके प्रेम का इस रतम में बरण सहित उपयोप किया पया है । वनकी निया मकाम की हमति से भी पौड़ी बात सहायता की गई है। इसके लिये हम उनके विक्षप अनुग्रहीत है। भीममि बाविसापरबी की तो महती कपा हुई कि नहोंने मातरमन को अपनी प्रति प्रमित समय तक निमें प्रदान कर दी। बास्तव में इस प्रति के मित्त बाने से ही प्रस्तुत पारन संभव हुमा है । इसके लिये हम पर भात्यंत तिस है। इस प्रति हो सर्वप्रपम भी बासुदेव भरप बी मे जयपुर में भी मुनि कान्ति सापर भी के पास रेखा पा और तमी यह इच्छा प्रकट की भी किसके पापार पर 'ममममन' का सम्पाबम हो जाना चाहिए। भो भूमिग्री में वारतावा इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और अपनी प्रति न केवल सम्पायम फार्म के लिये ही मुनम करी परिक अपवान बी के भरोष को स्वीकार करते हुए रस प्रति को प्रागरा हिन्दी रियापीठ के संग्रहालय के लिये प्राम कर रिया । प्रम सम्पावन कार्य के समाप्त हो बाने पर यह मति हिप्पी विद्यापीठ पागरा में मी मुनि काम्ति सापरबी ही भोर से बम्पबार पूर्वक सुरक्षित करवाएगो । कामी मापरी प्रचारिणी सभा का सम्मान करते हए उसके प्रभान मभी रा.पी रामदतीनो परिप भार पुस्तकाभ्यम पी पिच बी पास्त्री के प्रति मानारी है निम्होंने सपा में सुरक्षित पंप की मति देकर इस कार्य में हमारी बड़ी सहायता की। फदि परिचय पहने या बम-मुति मी कि महाकवि पास (पूर तामर के रचयिता) मेनन बमयंती' नाम से भी काम्य रचना की। भी राबाहम्णरास में एक्त बनपुति का उम्मेव महाकवि पास की बीवनी में मिमा पौर माता बाबूमो हसिया ने कविचम पुरा' में काम को बोम निकालने के निमित्त एक हजार रुपए पारितोषिक को पोपमा की। परतु भाग्य का पता न पाता । बन मूति का सपन कृष प्राचार होता प्रवास है। इस बात को ध्यान में रपते हए मप यह कहा जा सकता है कि प्रस्तुत मिसरमन' काम्प ने ही रात मरभूति को बाल गिया । इसके पिता मुरबास को भ्रम है महाकमि पुरमास समम लिया गया । वास्तव पे मरणास महाकवि पुरमास से नितांत भिन्न प्रफी विचारपारा से प्रभावित करि है । अब त बम रो हिम् कमि ऐसे निरित हुए है, बिहान सूफी विचारों से प्रभावित होकर प्रेमारपानक काम्प एथे। इनमें से एक जमहल जिन्होंने स. १५२६ में पापाति" की रचना की और प्रसरे है प्रस्तुत कम सूरदास । प्रस्तुत कर पूरबास ने अपना दो पुत्त रिया है उसके पनुधारनके पिता का माम मौर्यगास (गोरपनरास। पा। ये कयो गोत्रीप और माणित (मूपम!) माति प। इमले पुरणे पतानार (पुपासपुर पंगाप) में रहते पबहाँ से इनके पिता पूरब को पार पत्ते गए और पात समय तक रपर ही है।इमा बम सबनम हमानिसको हाहाने व समान सुपर बताया है। कलानौर ये भी नहीं पए। पपपि में परोरा में हो एवं पे तो भीमतानीरज निरप प्रति स्मरण करते पा संभवठा स्मरण माहारम्प के अनुसार विश्वात पाकिमपमान भी न कभी इनकी पसानीर १-मेतिए काशी नाम प्रचारिणी सभा नारा संपारित भोर किरण (सन् १६१-४॥ में रिपा, १.३) पता को एसबी प्रति समा में है।
ममममम देखने की प्रमितापा पूरी करेंगे । पह प्रामा इनकी प्रापे पूरी हुई कि नहीं पह बामने का कोई सब इस समय उपसाप नहीं मुबास निज माई बताई । गोरपनास पितार माई ॥ कम् पोत मापिन ताम् । कमानूर पुरणम र बाम् ॥ वात हमार वहाँ सों पापा । पूरब रिसा कोक शिन पाबा ।। मपर गहना वा सो पाम् । पिर ठोर बाट समानू ॥ बनम मह हा मम । कतार कई महिं गप ॥१॥ बपि ही प्रबई परसा । पं नित प्रति सुमिरी सो रेसा ।। पैसे पभी सराई । मई दिवस हा तिन्ह माई ॥ मारि ठौर बिसरा में नही । सोई सरा रहे मन माहीं ॥ मुमिरन करों नाम हर स्वाप्ता । माबो विपि पुरष सो प्रासा ।। . बिन निम या पात के, देस म पहुँमा बाय । बब लग सोई बह गहि तो पहुँबाप ॥२४॥ पप और गुरु परपरा इन्होंने पवित पंप का उत्तर दिया है जिसके ये अनुयायी ये पुर पबित हो पंप मग बाबत तरनी नाव ॥ पचन हार बो पारको, सो रात तह पार ।। पुर परंपरा इस प्रकार है प्रचित प्रमु>रंगबिहारो>स्थामायात >मुपात रंगबिहारी कामाही गितमाम विवरण दिया है। गहें प्ररित प्रभ सिट पुष्प उम्स में मिसे थे। प्रतएव पंप बाप्तरिक प्रवर्तक रही (रंपरिहारी) में। लाहौर के रहने पाते। बाति के करमा । चार मा य जिनमें वही सबमे । मिगुपन से ही ये मपावान पुश्प प पीर सार सिरों की सेना में प्रपिड मन समाते पे। पएचएमी पोरोपात में । प्रति रिम मुरिय होते हो नही में स्नान करते और कुपनमय तक प्रणा में बालों की पुस्ती (सरी) रेसका मन बहताते ५। निरय प्रति माताको रित पाने को देते थे। दाता रिस पाकर बहुत प्रसम्म एते और पपिडापिड कौतु रिसार उन्हें भी तरा प्रसम्म रखते । एक रिम पर *मह रेषत पण मुमत 'पून' है । प्रापी में मिमा प्रर्य होता है बनेको भिगोई 16A - मसनमन पातकों का सेम देख हे पे तो उन्हें एक सिर पुग्प पाते विलाई रिए । सिर पुम्प का परत भेष पा । न पी ही पे पोर न सेवा ही । सन्यासी मी नहीं रहेगा समवे बमचारियों कोसी पति भी नहीं पाई जातो पी। बयम और बोभियों में से भी कोई महीं ये । पारसमी प्रपना बियोमा वैखों का मेवमी मही पा । माथे पर तिनक और हाव में अपमाता दी तथा पत्ते में सोनी एवं कपि पर मुगपाता पी पी। पमई नहीं भगवी पी, सरोर पर मषिधमा नहीं बैठती थी, अंग ही परिषाई मी नही पाती पी पौर परती से ऊपर (मभर में) ही पाच ते थे। उन्होंने देखते ही सिर पुग्प को बान लिया। सिर पुस्प के प्रति उनके हरय में प्रीति उत्पन्न हई और गोर से निग्न (भीपे हुए बने) निकाम कर सिट पुष्प को रिए । सिट पुष्प ने हसहर विग्न से लिए कृष प्रपने मुंह में रखे और बो बचे रहें उनके मुंह में गत रिमा । सिर पुष्प का हाप उनके मुंह में पड़ते हो उनकी पति के पाट पुन मए । जैसे ही सिर पुष्प मामबहे से ही ये भी पोप-पीछे बात रिए । नाम पूछने पर सिर पुष्प ने अपना नाम प्रचित बताया और पनका नाम 'बहोरा' (परेमू नाम) बनाय रंगबिहारी रखा। सत्ताचात् सिय पुरष बहा के तहाँ मुप्त हो पए । प्रस्तु रपबिहारीको सिट पुरुप का पुष्प में इतना हो मामाकार प्राप्त हमा। परन्तु मारमान को पम्हें उसी समय उपम्पि होगई और पीपे सिर महात्मा के रूप में भी प्रसिरहए:- प्रब पुरेप कर पुम गाई। रमबिहारी बिनकर नाई। x x बाप्त पारि नगर महोर मिहिं नाई । बनम भूमि उम्ह विहिं ठाऊ ।। पत्री कहाए । मम्मा चारहि भमे रिसाए । पहत कहिपत मांग बहोरा। सन बहोरे नाम पहोरा ।। पोरी स बहुस मति पर । सिर साम् + सेवा कर ।। पार्वत एखो।देस म सई पास्मा मूखी ॥ परमी परम पंप पय मुने विचार॥ पनि भगत सो काम् । मुमिरन करे सरा हरि माम् ॥ साप सिख संगत कर साप्न सों मोहार। सुन न एकहि समुभा वह प्रातम रूप पारे । कपा पिधार॥ नित प्रति प्रात & पस मानू । माइ सहित प्रसार प्रसनान् । बातर वहाँ सतें पुनि पेस । सिपाहि मिरहि र मिति पेसे ॥ तिम्ह कौतुक दिन मम बिहरावहि । नित प्रति सिरह बात नियाहि । बस पाइ बामछ मुख पाये। पिको कौतुक कर रिपरा ॥ ए नि रेसत हो तमासा । सिर एक मावा रन पासा ।। परभूत अवगती । मुफी प्री में सेवा बती ।। सम्पासी पुनि पहा , माई। बमबरन गति पार न पाई। प्रपन , पाइ म बोयो । पर बरसन सौ मेत पियोपी ।। भप पर मन-मन मा तिनका हाप अपमामा । सांगो गरे काप मुमघाला ॥ मन मूरति पिर सौ नागी । प्रम मिटि पा सका सब भागो । पमक म माम प्रोटिन, मागे निट न पाह। पो न अंग परिचाहिम, प्रपर मुई सौ पार ॥ स यह पुरस निम्टि माँ पाना । येशत सिट पुषण पहिचाना । सिर पुष्प रह सन पुनि पेसा । मई परस्पर तरदम रिम पोर सौ कार । ताके सनम्स भए ठार ।। हंस के पुम्ब हाप गह सोन्हे । ने एक प्रपने मुख बीमहे ।। कर बो हमके मुस गरे । गरत बुद्धि कियार पारे । कमा बस भय गुठ मागे । ये गुर पीप रठि मागे ।। पूमी बबन बो ममा पाई । ही कहो तुम मापन नाऊ ॥ कहा प्रचित नाम मुन मोरा । रंग बिहारी रानी तोरा ॥ कह सो बबन पुनि रिस्टिन मावा । पुरक वहाँ कर वहाँ समारा ।। रमही परी पा मई, मा करी पक्ष । पातम प मला प्रगट पान प्रतर भेव ॥ x x x मापति कमा भी अपमानी । रंगबिहारी सिट बमामो ॥ सिम बम बो कहे सो होई । प्रनित बबन न मिचम कोई॥ X पर अपपि ते पाप समाने । सिमट मोति मिति प्रपरि हिराम । 4 पुरबप विन्ह को बो बानी । पीर मा हराए पपानी ॥ सो मुन संत पंप में प्रारं । मो मा सो ममर पर पार्य ।। प्रतापत रपियारा । जिहन पहा तो हा नपारा ।। गुरु मषित को पनप बहु पत तरमी भाव । पहुंचनहार को पार को सो राम तह पार ।। स्यामायास बाति के भरमापर कापस्प प । उन्हें पारावस्पा में ही बारे मार मरे,रंपरिहारी का मुर मंत्र प्राप्त हमा। साय हो साप गएँ भक्त होने का प्रामोधर भी मिता- सिंह के सिप कापन भरमामर । स्पामायाम प्यान गुन सागर । गोर हते पर बास प्रपान । तबही सौ रिप्पा मह मामे ॥ भाचे पुरु देवा । मति पा सगाई सेवा ॥ पापमु मा पहि मिषत हमारा । होइ है मपत प्रपत पनिमारा ॥ ते पर महापुरुष विग्यानो । मम सर म्यान मिपि बानी ।। हि को नाम लिए पुरा बाही । रतन दिन पाप पराही ॥ परा m नसनमा कर सबर सुनाव । ताहि तेहि पिम प्रमख मया ॥ मोहि तिम्है यह पंव सपाया । पा कीम्ह गुरु बाप सिमाना । भूमै भरके बोह गहि, मारप विमो मया ॥ मोहा मंचन के लियो, पारस पग परमार॥ यह निश्चित पता नहीं चलता कि स्मामरमात कहाँ के एने पाम कर भी अनुमान से बान पढ़ता है कि पूरब के होमममम या उसके प्राप्त पास ही के निवासी थे। सूरदास मखमझ में होएते में पंजाब की प्रोर बाम का महान को रस्मत नहीं मिा, इसलिये बहुत पुष समारना इसी बात की है कि उन्हें सच में ही स्पामरपाम से पुरु मंत्र प्राप्त हुमा। पूरपास न मातरमन' की रचना साहनहाँ बारमाह के राममहाल (सं. १९०४- १.१५ मि) की समाप्ति के एक वर्ष पूर्व संवत् १७१४ कि. (सन् १०७ हिजरी) में जारभनी- एक सहस सतसठ सन महा । संवत सतप से बोया ॥ * परम बसानी । कीरही प्रयह प्रेम निषि बानी ॥ तब कमा बारशाह की प्रशसा शाहहाँ की पहोंने बड़ी प्रशंसा की है। उसके तेज, पन बम-विषम बमब प्रभाष बाममीलता करणा रपा पाप प्रियता रामनीति और पुर संचालन प्रारिका प्रोबपूर्ण भाषा में काही मम्म बनम है। पुप प्रेम ग्वत किया जाता है- साह वहाँ मुमताम बकत्ता । मानु समान राम पत्ता ॥ रिती पवा मुरब रबिमारा । वहाँ पोर बस किरण पसारा ।। राजन के मुम रहा । पानी । मनी पनि रहि तेच पुरानी ।। हते वो गा मेर न्वी माहे । कार नपार नीर - काहे ॥ पे ममान सर्व प्रभिमानी । मान घौड़ प्रब करहि किसानी ॥ हीरा नाइ पा तो बाबा । जो कसा सो काल मुप लांचा ॥ एहा म त बुर कर मानू । प्रत कि होइ बैठा मुमतानू ।। पप्रपार बो कहाए । ते गृहार को बार न पाए । पर है राम । हत जोर कर पाऊ ॥ के रामा तरवार पर पटक देत ई तार । होर तोर तरबार कह फार गडाए बड़ाई । महि मरत हप मय होरबाई ॥ पातहि पर 50 प्रौरा । मेपन प्रनी कीम्ह मग बोरा ॥ मन पिन सेन बार म पार । महि पई महिनामा सो भार । की पनि मेड पप्त माई । महि प्रानि पनी कठिनाई ॥ बामुहि नै होई समाती । पर पतात सोष सनबसी । पत्री कार।
मसनमन पिछते रुपा पूर हो माही । प्रसम मसत हौर पर उड़ाही ॥ मोक प तो पूरी । पार उपमै तिमि पूरी॥ मुरब प्रकास मरे चिाई । बासर प्राधा महोबाई॥ बन र एट ह मिन बाही । सरयर मापर सतित मुसाहीं।। प्रपने उग्मम बात पि पिछले बार पानि । समे तर पाये से पानि ॥ प्यार मीत यो पुरामन गाई । सो पमीपति के रिसराई। पार पिसाए । राब रक सर , रिसराए । x राता कहिपत एई सोई । ता सरवर पहें और न कोई। एक गर तिहि सौ बिन मामा। पुनि भर जनम का पमा । मांगा । तिम्ह पन-हिरे रतन भय मोगा ।। या मंगत पन पर पर रोल। मोरा पगन पर मि शेत। गफ सिप एक x Y मे सपत दून K x x सहनहीं पर पतार पुरा. रपि मुकता तो ना पर एमा तुटा । भापा विचार - '०' प्रति (का.ना.प्रा० स. में पुरमित) से निरित होता है कि मनरमन की माषा संप में कुष पिबार बस पड़ा पा। पह रिवार पंजाबी पोर पापीको कराना । पुराणारा पंगाली में प्रत प्रोडापियों रा के प्रति बिगप रोप पहा होपा । हो सस्ता है यह भाषा बिवार मीर रूप में प्रतीपता से मार हा हो, परंतु तम तीवता भी प्राय । इसलिय भूपास से पहना पड़ा- 'फिराह' (प्रेस रिहरप पूरणी भापा (मनिया) में मेरी प्रांत प्प रो पड़ी है। परतु इसे पूरबी बतकहा (बत्तहा) मात्र बामों। महोतका देशा पूरब है पर इसमें प्परत मिया गया मत (मनहर) पंजाबी हो है। मुझे अपनी भापा का मय पाप है और मैं उसे मुमतामता पर पहबानता है। मापा के बीच-बीच में पोरमा सरते है पर मेरी म पागको में रेपो है (तिय दुसरी भाषा पर सनदी पोर मेरी प्रवृत्ति नहीं ह)स प्रकार प्रपनी भाषा पर जवान में (पहति) बनी तो ममा है पर उसे स्वचार करने में रिमा समेत (पूरब की मापा में है। दिपा पाता है। बस रहमें मिहिन प्रयास पनि को अपने ह तो एसप मर्म (महम) हो होने हैं। इस प्रकार नमे समे उससे भी नहीं पराबाना । (२) पंसारी पौर और भाषा नहीं मानने । रालों म पारती ही एनों को मान सकता है। उपर सरको भाषा (पूरणी पापा प्रापो) के ममः (मदरम) है। (उनमें ) जो कोई परगावही माता समझया। इसलिये यह प्रम हानी पर माया में मिली।
१२ ममममम बाप बगौपा ही पम्पा होता है बिप्पम सबका साना हो। इसी तरह पानी भी यही बोमनी प्रामी है जिसे सब कोई समम सके- या रोगा यह क म प्रतिया । प्राफ किराफ पूरबी भनिया ॥ मत बान यह पूरब बतहा । पूरब बेस पसाबो मतदा ।। ही अपने भाषा मम बानो । नुकता नुकता सब पहिचानो । पारसि मापा बच पार पोरी । प्रह हकीकत माल मेरी ॥ प्रस अपनी माता व बानी । बनी तो पै कोष सकरानी ।। कम दो पूर्व। बस कस तासौ बाय नवर्ष । पंचामी होर म मानी। रतन पारसी रतन समानी ।। उत भाषा महरम सब कोई। पर बो मतमा समम सोई।। तिस कारम पह प्रेम कहानी । पूरबी भाषा विष पानी ॥ पोष मरमह बाम पीपा सो ममा यो सबही सामा हो। बानी तस भाले मती मिन्ह सममें सब कोई ॥ पूरपास को मत स्वण में भी इसका भान मही पा कि उनकी कृति को लेकर मापा रिवार भी रहेगा । उनको प्रति तो पास हीडी में रंगी पी। समझे पुरष पहें अपना हकीकी' म्पका करना वा त्रिसके लिपे किसी उपयुषण मापा पुमनेक पनहे साममे कोई प्रवन नहीपा । पाम से ही पापी प्रांत में हमे के कारण पर्प उनकी प्रपमी भाषा पी। इसलिए भाभी में रमा करना उगो सिये स्वामाविका। इसके अतिरिका अपपीराब मर्मम । 'रत मापा महरम सब कोई से मह स्पष्ट होत है।स एष्टि से उनका एप्टिकोन पक्षपात रहिस और संतोचित पा। फिर भी अपपी में निमन ति ग्नको मुफो विचारपारा में भी उन्हें प्रेरित म्मिा ऐसा मान पा सकता है । मो समय तक र पए समी सूको काम प्रपपी में। पापी में सूर्फ काम्म रपमानों को विशिप परंपरा ही बस निकप्ती पो। पतएव सररास म परंपरा विपिन मही हो सकते थे। फता म्होंने अपना प्रेमात्यानक काम प्रापी में रपा । मा पूर्व में कहा जा सका है भाषा समीरिवार का रस्मेन पिम . प्रति में है। यह भी सामंत में । यह प्रति प्रस्तुत संपारन में संचापित परिवरित । में मानी गई है। इससे रिरित होता है हि भाषा विवाद का सामना सूरपास को पीt करना पड़ा पर मनी इस हि का प्रचार हो गया। गएँ संप्नोपर परिवर्डन करा समय इरा रिवार के निरामरमरन की समी। प्रतएव उपप रत पतस्प लिया प्रो हाप ही साप यह शिगान के निये कि मोदण्य में पंचायीक प्रति पूर्ण सम्मान है पर पप्प में रंगारी ही पुर भी रो- निग पारम यह प्रेम कहानी। पूरब को माता पिव पानी ।
काव्य-कथा बमा पीप सिपा पाएका है नातरमन मुफी प्रमास्यानक काप्य है। इसकी रचना प्रबधी भाषा में प्रम्प मुफो प्रमारगना कार्यों के प्रकरण पर हुई है। इसमें मी बिना सोपा अम्मार्यों के उपयोग किए कथा का बनम है। प्रपारम में परमात्मा की स्तुति की गई है फिर समसामपिक शासक म्हनही बारगाह की प्रसंसा है पीर तस्पाचात् गुरु और पिपरिचय दमित है । शासक पौर पुरका सविस्तर रस्लप 'कमि परिष' स्तंभ में हो रहा है। कला का प्रापार महाभारत बताते हर काम्प रचने कारण इस प्रकार प्रकट किया है एक रिवर मोरे मन पाई। भारत साग बित माई ॥ तेहि के पास परत कर पाना । मन की या ताँच हिय नारा ।। मुना यो पर मारी कर पेमू । बितरा ए मेह एस नम् ॥ मुनि मनगर पात फल प्रापा । विए एम रहन अनु मावा ॥ विकत भपी तन पट कमाई । बिपर रस सहर बन पाई । मन मोरं तर मुष सोई । माँ भार मम्त पर सोई॥ तमा सिरान र माप मीरा । मूल प्रपार बैठ हो तोरा ।। पारक पुन ममा तन मोरा । पेम पान पर पर मफमोरा ।। गिह के पेम रुपा म पारा । पन ते बिह मेती सो मारा ॥ कपा भगिम हो हिय परी बरे ईम्पों ह । म गरते हितो गरि पह ॥२॥ प्रेम न मन म पुनि माई । यो प्रमिनि यह वो मपाई ॥ पेम रमारा पौर तो बाई । बार विरह माती पृत गर । प्रपट कई गाता मा बान । मो प्रमी मुनि के मुप्त माने ॥ पम पौर में पीप बगाई। रम्त सोषियमपारिपना ॥ प्रनान परम पुरुप पर प्रति पेमी जन तिगहिरिभाई ॥ एतिय पैम मान हिम प्रोम् । प्रदिप प्रमोत गोत नय तो ॥ लिए बानो मम पान् । सानि प्रेम सौ पेम पान् ।। पो र माटी मर पेम बाई । मत रुपा मुनत है सास ।। ऐना पैम मपी मप सरी । गागों सिमा पेन मप गारों ॥
१४ मतनमन - मुकता पा मा तन मापि बान परि मोई । प्रम भामत को दुख महोई ॥ निम्ह बात चार उपमा बोसनकाई सो उन कहि होई गाव।। पेम पौतहार चासत बिन पकि बाहि । एक पिपाता फिरि पिर्व भर दोहि पाहि ॥२६॥ बीमप में कया का वर्णन यों है मत बामन का पेम बचाना। मया मिताप सोमेबर हाना ॥ कमग मम सों जुगाबेलामा । मन हा बमबारा देवावा ॥ मी बन मै लिएरे नर नारी । पुनि मिसाप भए एक हारी ।। बुगा लेन गोता पुनि रानू । प्राइ पुरा सब बहै समाबु ॥ मारप में जो पपा बमानी । मागि प्रेस वानी मह पामो ।। पात पात मै मुमति बनाई। सपा पुराम मय * विचराई । सूफी मर्म (प्रकटाई के साप-तार गुप्ता के प्रति मी समेत दिया है बहुत और निज परष पुरावा । सब कार 4 बार न पाया । बहुत लोग बोहित बड़े पपि पर मा नाहि । माबिमा बसि पो ता माहि ॥२७॥ कपा इस प्रकार है राम नराग्न में पम्प करता था। वह पत्रपति रामा पा । पनेक राने राब सिर मवाकर पसकी प्रामा का पासम परते । उसका तेज सूर्य के समान । सरप पीर गति पसमें गिरायमान हतो पी । रामकाम परते समय सरप पीर पर्म का पूरा विवार पता मा । पर्म की रमा तो मापपप से करता था। वह बड़ा पुर्मिमान, परित, पारमा वर्षग सपम, परमभूर पार तेग एवं व्या का सरोवर पा । वह प में भी प्रतिम पा। संसार में कोई सकेप को होगकरने वाला नहीं पा। उसके स्वमार पीर पानी से प्रेम वतामा । सब प्रेम मार्ग का अनुसरण करतापा। पिसी को प्रेम में दुली देत स्वयं भी बड़ा एसौ हाता पा । मोप उसके प्रेमपूप ममा प्यबहार से मुण हो जाते थे। राप रम को पोर वह मपिर पचि रखता पा। रात दिन पुगियों को पाषा करता पा । एक गुपी माता तो दूसरा पाता पा। उसकी तमा गिानों कबिपों, संपीतको पानिपो पोर पाय प्रोफ पुपियों से मरी पतो पी । उसमें सरा प्रमर पीर पर्व पर विचार पिम बता ररता पा। एक रिन रामा बरसमा में बैठा मा पा प्रौर पुमी तोग पपने-अपने गमो का प्ररर कर रहे तो परमात् मम की पर्चा बा निकमी जिसके समस्परपस्प पर रिवार घिy पर । प्रान हमा 'तोसह पता पूर्ण उगम्पस परित घी में होता है और यह कहा पाईनाती है? सबने एक स्वर से उत्तर पिया हि ऐसा सपिनी स्त्रियों में ही संभव है पोर पदिमी प्रिया सिपत होप में होती है। वैसे रामा पौर रंक में कोई भरमही इसलिये पर परको जिमों को भी पपिनो सदा ही समझना भक्तरमन हिए। उनका प भी अनुपम है। सभा में एक भाटिन भी कही से प्राकर बठी पी। { पायन में निपुण (पतुर) और प्रनूष पो । वह भी ठकर पिनयमक दोमो महाराज | यह सस्प है कि सिपस हीप में ही पपिनी स्त्रियां होती है। परंतु भपपान् मीना पारंपार है। यह पाई तो ताल तलैया में मी मोती उत्पन कर सकता है। दीप में मी पमिती स्त्रो नियमान है । यह बात म मुनी हुई नही, रेपो रे कहती हूँ। हने मने मी मुना ही पा और उस पर विकास नहीं दिया था। परंतु जब पापों से बा तब विपास हमारामिण विसा में बह कम्पास में है। संयोग से सजे योग्य मीतक कोई पर महों मिमा । वही रामपुर नाम का अनुपम मपर है।म समस्त द्विीप में फिर पुकी हूँ और उसके बेस रेम प्रौर मगर नगर से प्रापी वह परिचित { परातु रस पैसा नपर मैंने कहीं नहीं पाया। कुछ के विषय में बता तुना पाता है, बहनपर सबमुष बसा ही रमणीक है। यहां के राजा नाम भीमसेन है। यह परपति रामा है और उसके समान गत मंरत में पीर कोई राणा नहीं। उसी रागा को पुमो पपिनी है। एक सिद्ध पुष्प के राम से रसका माम हुमा । उसमें एक विशेष बात यह है कि पपिनी से बह एक बसा बढ़कर है। उसकी हाय की पतिपों में अमृत है । हे पोकर मृतक के मुख में देने से बह तस्वात बी रहता है। विपाता में मानो रसे ही प्रमुख में सान कर बनाया हो और फिर उसके समान दूसरो स्त्री नबना सत हो । रसको मुखकी ज्योति के विषय में तो कुण कहते ही महीं बनता। पार पूर्णिमा की पाति से भी कही गा ग्योतिष के समान पहन्पोति है। महारार सचमुच यह पमिनी पारपर्यबना है मंसी भी कहीं मेरे सुनन में नहीं पाई है । उसी मुभात तोनों मोगों में भर पा पार सारा संसार मौरा बनहर उसको प्रामा से महरा पा है। उत्तरी सीमा में सबको सुभा लिया है। पाने वह किस माग्मशाती हाय तम्ती यह मुनते ही राया की रठा बड़ी और उसने माटिम से कुंमपुर मगर, भीमसेन रामा पीर रामपुत्री रे सम्म प्रारि का विस्तार पूर्ववर्मन काननिय कहा । मारिन मेयरनुमार पहले नगर के एस तारी पमी तात सरोभर दुमा वादी, मम्मिर भान, पट्टासिका स्त्री पुष्प नगर से घर मेन्या, हार, नागार, चौक, प्यापार, प्पसाप, ठम पानीबेरपाठी बाम ग्योतिपी, स्वीप-नरय नारा बन पड़ो-यूटी साप, सपैरा चिपकार, बाल-मन, बेटा मार रिषिपदातियों का विस्तृत वर्णन किया। तत्पश्चात् राब दुर्ग, हापी, मोरामार, रामसमा और रामा भीमसेन तपा एमसी पारानी रारपती हा रस्तरा करते हुए समा में रामपुषी का सविस्तर मनोमापकारीगन कर रामा को मुनापा । रासपुत्री रेसम्म रेविषय में बताया कि -रामा भीमसेन कोई संतान नहीं पी मिस मिप ये सब वितित हत। एक दिन रमन वि स राग्य में प्रार तपस्या करन नगे। रामा में गुना तो मो मरे निमित्त पए अपि प्रसम्म होकर रानो दो मिताने निपे रामा पार पड़े जरिए और कहा कि उनके प्रभाव से रमकी प्यारी पूर्ति होगी। निरान समय पान पर रमही रानी रामती परमे पार ततानमा वीर पुम पीर एक पुत्री -सत हए । साबर भाग्य पाती धिमान ताप, मुमौत और बर्मन है। पुषी स्त्रियों में प्रष्ठ पचिनो के समान है और वहानामपर्मतो (मपम्ती) है। रासायह मुनते हो प्रमरेमा होमपा। वह साठ मत-मन हमे समान दिन को राजकाम में मन लगता और न रात को मार प्रातो । समय से मी बित्त सा गया। रसे कहो मो का नहीं परने मनो हर समय मावत पहले मगा। अपने मन का भेर भी किसी को नहीं बताता। उसकी भूख प्यास बोनों चार हो । वह प्रेम विरण में पुतने मगा । ये शिम प्रतिदिन पुर्वत होने तमी मिससे वह पीना पर यया । भाचियम्सकी यह बता रेख बहुत दुखी हए ।ससे रोम पूरने मवे; परन्तु यह कप नहीं बताता । इससे सम हैरान हुए । फिर भी उपचार पारम्म हुमा और पाप प्रांति के निमित्त पुराण पर जाने लगे। पैच और प्रोझा मी पुनाए मए। उनसे अपनी-अपनी समम के अनुसार रोम पहबानते हुए राबा को माननता मत करन के निमित्त उपचार करत के लिये कहा गया। पहले रेप ही रोग परीक्षा के मिस मया । उसने राजा की मारी देखो तो उससे रोप का मिरान कपन हो सका । दूसरी बार माई पकाने बड़ा तो राजा नष्ट हो गया। उसने 2 से स्पष्ट कह दिया कि प्रेम का रोपी है, पम्म रोप उसे कुछ मही। पंच सौर पया और उसने सबको रामा का पपा रोग बत रिया तथा इस सम्बम्ब में शो से तीन उपाय करने के लिय कहा । यह बानकर राम प्रमान प्रहत्तसेन तुरगत राबा के पास प्राया और रामा को भर्य बातेहप उसके प्रेम के विषय में पूषा । रामान भी अपने प्रेम का मर्म सब सोन पिपा और कहा कि पार गोन ही प्रिय मिना नहमा तो उसका बीवित रहना प्रत्यम्त कठिन हो पाएगा। मंत्री में बिनय की 'महाराण ! बियोप में मैर्य पारन करना प्रथम कर्तव्य है। प्रेम में स्वयं भगवान् सहायक होते है । सन्चा प्रेम एक ही भोर नहीं पहला बरन् यही मी पचता है जिससे प्रेम होता है। बब प्रेम अन्तिम अवस्था तक पहुंच जाता है तो इसमें सम्रेय नहीं कि वह परीक्षा की ही होती है। ऐसा कौन है जो प्रेमी को एनमें रेप उसकी गुपि न में। इस प्रकार ममी ने राग को पर्म माने का प्रयास किया परस्तुरामा को पाति महीं हुई। रसे वियोग एपने बैग से सताने लगा। र्य की बात से पौहाने नगी । प्रत व उसका प्रेम प्रताप मोर पस्मार की परस्पा तक पहुंच गया । हम्पीयन, प्ट मित्र पौर सो सम्बन्यो सय पाए पीर सममाने लगे। उन्होंने रसके प्रिय की या मानविषय में प्रयत्न करने का भी बबन दिया पर रामा पर मके समभाने का रूप भी प्रभाव नहीं पड़ा । सब हार मान कर पप हो गए। उस्से हो रामा प्रताप की पा में गहें सममाने ममा। पर रारा मत को यह ला हुई और उपर उसकी बिपोयाग्नि को लपट एपली तक पहुंकी का भी लि को ताफा मनपी। उसके बम को मम दुसरेम मगा जिससे उसकी मिना पाहता रही पार से पिता ने मा परा। रात उसमे पार म फटती । तारे गिनते पिमत प्रात होने सपा । एक रात पसने मात कात्रि मागता मिसे समियों के सो बामे पर एक देखती प्रौर प्रेमा बहाती। रात रिल प्रिय पान म माम रातो । रातो मूस प्यास बाती हो। पत मत मेगा ग्मा मा पोता पा गया। बहु प्रत्यंत दुर्दम हो पई और उठने बैठने में हो से पमोना घन मगा। मविपी को प्रमो तक उसरा यह भेर विरित नहीं हमा। यह प्रम्र में उनसे इसने सेमन सी बात करती परम्तु मन हो मन रोती एती । त मस-मम में एक नि रमयत्री का पाप उतरे पास प्राई और उसने उसको अधुपात फरसे बेस तिया । यह पाव बकित हई। उसन एकांत में रम यती से दुर्वस होम और रोने का कारण पूषा, परंतु एमपतो म पर उबर की बातें मिताफर पाम को विश किया। पाय बतुर मौर अनुमदी पी। रसमे बमयंती ही पा का वर्णन रानी से पाकर पर दिपा । रानी यह सुनकर बहुत रहिन हुई । वह तुरत रमयंती के पास पाई और उसस पुल होने का कारण पूषा। साप ही पाप यह भी पूछा कि कहीं यह स्वप्न में गरी तो नहीं । बमयंती में माता को सर रिया हि से न तो कोई कप्ठ होहमा प्रौर म से किसी रोम का ही पता चलता है। स्वप्न में उरने की भी कोई बात नहीं क्योंकि पा पारमा पर विकास करती है और हर समय प्रारमाराम में मीम एती है। फिर भी, सह निपारमार्य उपबार पिया पा सस्ता है। रानी में तस्कान वच, प्रोमा पौर सत्र मंडबामहार एताए । सबने प्रपमा प्रपना अपचार फिया पर कोई नाम नहीं हुपा । बमयंती दिन प्रति दिन मियोम में पुमन मपी। परंतु उसकी सखिया पर साषामो से उसकी देखरेख करने ममी और पतलाप एक रात उनमें से मे उसे मन का बिसिपे रोती रेप लिया ।बात रमा गई। रमयमोन भी उससे परमा गुप्त भर प्रष्ट कर रिया । उस सदी ने रामपंतो को रखमीय रता देख रानी को सूचित किया। रानी पहले तो प्रस्पंत सग्नित प्रौर पुग्प हई परंतु तिर पर्प पारप पर मपती के पास गई । उसने रमती को प्रेम से सममाते हुए कहा पुत्री | तुम्हारे पिता पर पति रामा है। पारी पोर समका नाम है । परि तुम्हारे प्रेम की बात कही बाहर फैत पोतो बह प्रपया का कारण होमा। रस प्रपनो प्रतिष्ठा परेपो और बग ग्यबहार विगामा। मते ही तुम्हारा प्रेम रामा नत से हो पया है फिर भी तुम्हें पेप पारण करमा पाहिए। धमप माने पर सब ठीक हो जाएगा। मेरामा से कहकर तुम्हारा स्वयंबर रपाईमी । उसमें रामा मस मी पाएंगे रिसे तुम हम्पानुसार पति बप में परप कर सकोपी। इस प्रकार तुम्हें ममानुएल पति मित्त गाएपा मोर को बुरा भी , मानमा । परंतु मयंती होपर्य महीपा। उसने माता से अपनी प्रत स्पिति का पूरा पपन कर रिया । रमयंती का रत्तर पार रानी बहुत वितित । वह सीपे रामा के पास गई और गहें रमयंती सारा समाचार सुनाया तपा पोर से शोर पसका स्वयंबर करन का पराममरिया। रामा स्वयम प्ट मित्र सम सर्पपी और मंपियों की समति मेकरमती सबर की तैयारी करने की प्रामारी। देश के रामामा पास स्वयंबर में प्रामे हा निर्माण भरा पपा । रामा मत को मा निमंत्रम में मिला तो वे प्रसप्त चित्त हो या समय के साम करनपुर की और पसे । परतु प्राप । मार्ग से ही उनके मन में न हई वितई ने नये । गहें मर इस मा म परा - बस्तिष में रमतो उन्हें पति के रूप मेंपरप कोगी या नहीं। इससे उनका रित फिर । प्रगत होनेनमा और इसी पात स्थिति में गपुर पहुंभ। एग्नपुर की सीमा पर हैं नाटिन का कपन सरप प्रतीत हमा। ग्न्होंने स्वार और प्रगाप बसपूग सरोपर फिमारे सातासमती में नाम के प्रापमान का समाधार मुना तो बहुत समरसता मुरम्मया मा मुमकमान के समान सिंत रखा पार पड राममहत पता परमार मत गरेको प्रोर देपने सगीरममनोहर पपरे मन है स १८ मसनम में बह मेरा प्रिपरम है ऐसा कहने सो । दाम में नत के पास गार बाने की प्रापमा तुई। वापारी को धरह किसे पी पीर बिमसी के समान तरफार मिरने की प्रमितापा का सपी। इसी समोरपि नार पृम्बो के कौतुषों को देखते हुए कहास की पोर बाद पे। माम में मिल गए। पूषने पर नारर ने भूमेशप्त का समाचार वह मुनापा पौर दमयंती केस सापर्य और उसके सर्पचर का भी बम किया। रहोंने को बताया कि स्वर्ग के समस्त पिता स्वर्पर देखन के मियरमपुर गए हुए है। मेवा कि सचमुच वर्ष में एक भी बता नहीं रियाई देता तो पम, कुबेर और पाप सीकर भी रामपुर के लिये बस परे। तम्मा समय चारों बता राजा नस के रेकी मोर निम्म । रामानस ने अभिवारन का मा सरकार किया। रेषता यही ठकर मुसताने लग। पोड़ी देर पश्चात् ने रामानम से इमर्मती के पास जाकर से सरसा मे के सिपे कहा कि यह देवताओं में से किसी को अपना पति पुने । एमा मस नेमेसा मुना तो मोवाक एपए । रमको न्यानों पर मानों पार पात हुमा । पाहोंने हार बोर पर बिमय की कि "यह भी मन में समयटी की मितम-प्राप्ता परेइए है पीर परिह सरिसा कर बाएमा तो उसे पहम ही निराम होना पड़ेगा। पिर मयेतो पान की अपनी प्रमिनापा पूरी होते जानवे सा मेबान के लिये तैयार हए बस मार्ग की महिनाई पापा बताई। इंद्र ने रहें एक मंत्र देकर कहा "परि तुम चाहो तो मम पस मंत्री सहामता से रमती के पात निविप्मता पूर्वक ना सकते हो । रामा मस सरसा मेकर पत परे और मरी सहायता से रामासार में प्रवेसमा रमतो पाता पहुंचे। उन्हें रेलवे ही बमर्मती प्रौर उसकी सखियां बहुत तरिम । परंतु रममता में चीन ही अपने को संभाला । वह अपरिचित पुरुष को देखकर विचारने तयो हिपह कौन है और कठिन पहरे के प्हते पहा पो धौर कैसे बना प्रापा । पा पद मनप्प है या पूर्व जमाना कोई बता । रसने तिर रामा नाम की मोर एकटक होकर मा तो गन्हें पहपान लिया । पहर की पौर बमुप होर गरों पर पिरी । पामत में सिर पमर मर्पती को रगया। इस प्रपन मिमन में दोनों को अपार मानर हमा । हर्ष ६ प्रान मिस्त पड़े मोर का विमोपनुस पाता रहा । पश्चात् रामा गत ने समर्मती दोरमतरसा मुनापा । समतो संदेसा सार मानरामा हो गई। पसने की मी मरतना की। साथ ही साप रामा मत पर बिनाकर बोतो हे प्रापमान में तुम्हारे प्रसिपे सारे संसार रो सातीन बनी हूँ। तुम्हें तन मन पन प्रर्पन र एकी है। पर तुम लोगो का रिशा तेर मेरे पात पाए है! म बन तुमो पोर पम्य मिती को पति नहीं बना सकती। परि तुम्हे संकोच हो तो मे का सबर में तुम्हें पिपरयो । गा पार पर और माय रामाधी के सामने तुम्हें परमाता पहना मोरसमे उन्हें कोई रोपी नहीं बहेपा पौर प्राना होने पारगा मुझे भी ताप तोरसतेमगी प्रसन्नता हुई पीर उता रहा सहा सोह माता हा । पर पर प्रामा पोरा मर्पतो तातमावर पो कारयों न पमही हा पोरगा पाप यहाँ से बाल ाि । इतरे तिन सयामा। . महीमा।
मतमम राण प्रारि पारों देवताों न यह मानकर किरमयतो मस पर प्राप्तपत है और उसी की चपमाला पहनाएगी तो समा में रत के पास उसी का म्म पारम कर पठ गए। बमर्यती बबनर को बरमाला पहनाने तो उसे कई मत रिवाई लिए। बह बड़ो रिया में पड़ी और सोषले ममी कि किस प्रकार रामानन को पाचाम करे । रसे यह भी पिता हुई कि मरिसमा को उसकी दिपिपा का पता चम मया तो बह रह पापमो पीर बसको मत का मिमना फिर एर्सम हो पाएमा । यह बहुत स्मात हुई।बर कोई उपाय नहीं सूझा तो भगवान के शरण में गई । उसने तन्मय होकर भगवान की स्तुति की जिसके फत साप प्रासाप मामी दिन पूर्वक तीन तप से परीक्षा मने पर मत की महपान होनाएगी। बोमन का म्प पर हए है रसके एक तो पर नहीं पाती, सरे पानी को पस नहीं लगती और तीसरे गम पार पाती से अपर प्रभर में रहने है। समर्पती मेमा किकवत एक पुष्प ऐसा है निधर्म प्राहासमागो रे अनुसार क्षण नहीं परी । रसने मन को पाबान लिया और उसे परमाता पहना रो। इस प्रकार दोनों की मनोकामनाएं पूर्ण हुई और रनडे मान का ठिकाना न रहा। गारिक धारों रेपलानी को पहले तो बड़ा प्रापर्य हमा हिरमती में नम को से पहबाना पर फिर मम मयंती के मिभम हो जाने से बो प्रसन्न हए । राजा नल के पास गए पोर मपुर सपनों से रहें संतुष्ट दिया तगा बररान रिया। सामिहीर विणा प्रदान की पमरे सौ वर्ष की मापसे पौर रहा कि पनि सरा भागाकारी बनकर रहेगी । बाम नेपा करते ही जरा प्रस्तुत हो जाने का पर दिया। इस प्रकार परान कर देता दिइए । तत्पश्चात् नस रमतो का शिपम्ह एमा । रारा मम प दिन पासपुर में एफिर रमयंती को हर परम पते पाए पीर उसके साप मुख पृषक रहमे ममे। प्रारिता गर अपने-अपने पानों को राहे पे तो रहें मार्ग में हापर के साप हतियुग मिसा । बातचीत होने पर कलियुग को पता पसा किमती मे नमको जयमामा कर पाना पति म मिया ! बह भो उसे पाने की इम्पा से स्वर में पा हामा सलिये उसे बड़ा कोप प्रापा प्रौर तरकात मत को मापना पाहा। इसमें इसियुप को पाकारा और बेतावनी पिता करन से ग्से महापाप समेगा जिसके पनप से नरक भोगमा पगा। यह कह गरेताओं सहित पते मए । कलियुग मेमस को पाप नोनही रिया पर ापर सामन महिमा हो किबह मत से और ठाणा और पोररए रेणा। सेए पर पम पाम पीर रारपार से रहित करेगा तपा बन बम पुमा त में समर्मती से सो प्रलप रोमा। हटौर की तहमा के पास मया पौर रसे पर्म प्रप्ट करन की पात्र में एने सपा । बाप्प पर्व भार से मत हो पर्म अप्ट करने का प्रासर मिता । एक नि:प्पा काम में पा र्म से गित होते ही मत हो नीर भाई और बह बिना पर पोए सो पया । समिपम में इतम हो गतके शरीर में कर सही मति को कर दिया। परमात यह मस माई पुकर पास गया और उसे मत के साप ममा पेलने के लिये गाया। रतन पुष्परको पपनी सहायता का पवन रिया । सत' मस पोर पर Carter मनवमम के लिये पहुत पगित पिपा पर वह नहीं माना। उनके दो बाम (पुत्र और पुत्री) बेगमती नेदुए का रंग ऐप उन बामों को मैहर भेज रिया । प्रत में घुमा समाप्त हमा पौर नल पन-संपत्ति सहित रामपाट हार पया। पुकर ने राज पागाने पर मत रामपंती को राम्य से बाहर कर दिया पीर साहें प्रापय म मे के मिय राग्य भर में पोषमा करी। नत पमपती बम बन पूमने लगे। पुष्कर केर पिसी में भी पाहें प्रामप नहीं रिया । गहें मृत प्यास सताने मपी। मन में पापानि लपी एने के कारण साच कग मी दुप्पाप्प पा। तीन दिन पाचात् एक स्थान पर सोने का पनी रिपाई रिया गित पान के सिपे नम ने पोती उसी। परंतु बह पनी कलियुप चा मोती मेकर ग गया। प्राकारा से उसने अपनी करतूत का वर्णन किया। मन पोतोके बमे पाने से पहत पूरी हपा। उसे मई पापराने पेरा। समतो सपने तो उसे बहुत रिचमित किया । उसमें गमयंती को महर बामे के लिये समझाया परंतु बमर्वती न उसे विपत्ति में पोकर पाना स्वीकार नहीं किया। फलत रोगों धूप प्यात सहते हम फिरने सगे। मार्ग में ही फस फम भोर सागपात मिन पान पर थोड़ी बहुत सपा पति कर लेते। इस प्रकार पूमते रिते एक मरी के तट पहुंचे। यहां भरपेट पानी पीकर प्यास पति को पीर पोथी र विभाम किया। बबरठे तो मोबम के रूप में मनापारा दो मममियो पही मिस पई । ना मे ग्म मपनियों को उठा सिमा पार गम्हें समर्मती को रेकर स्प नहान पमा पपा । रमपती में गनिमी को पीनना प्रारंभ स्यिा तो उसको गसिपो प्रमात मसिया बोषित हो गई और हाथ से फिसप्त कर मी में पतो। रमयंती ठमो सी रह गई। महार वापरा पाने पर मपनियों की नरेश गस में समझा कि पर सपा से पीड़ित होकर रमतीने पम्हें सा लिया । प्रस से संतोप प्रा और सही मूब भी बाती रही। परंतु पर बातविकार दिरिस हुई तो भाग्य को कोराने सगा। रि मूस पेट माग पहें। रापि को एक गांव में पाकर रिके। बमयंती के सो जाने पर नप्त जापता रहा। उसे महान् शिता मताने सगी । पपती र कम से बहुत विकास किया। विपत्तिषी से धोम एरकारा पाने को भी कोई प्रासा मही रिजाईयो। राई हामने ममी का कपट पिट रामस्मा रेप में उपस्थित प्रा । यह पाया था किमती रुप लि नहर पाकर रहे पर बहुत राममाने वमाने पर भी रमनी ने माना परवीकार प्पिा । रते यह भी पाया नही हो हिसाप रहो रमतो कभी गो पाती। प्रतएव पात सोचने विरल परमात् रपम रमनी को ही सोतो पौरहर परे जाने का पिप रिया जिसके पासा पमपती उसे न पाकर स्वत रितगृह बतो पाएपी और उसका पा पर माकने तप पिर जाएगा। ण निश्चयानुमार दह पीर से रहा और रमती को पार चला गया। पासो गमप पोरन पहनने के लिये समयंती की साड़ी पौरबार पापी प्रापी पार त मया । प्रात मान र समतो नापी तो नमको नरेगार मन पनि। पा रमेपर पर ने सगी पर पद ही नहीं रिपाई रियागत हो भान पर भी पर नाम नहीं प्रापा तब गाय प्यान मा पार पार दोपोर मया । गहे पर उसे निगमा हिबह मे पोहार पमा पया। ग्राम मरमा बता पर सिर करती हुई राने सनी । पामत को पोर में पानी पोर - २१ बत पड़ी। उसे तन पान की अप सुप नहीं रही नात नत पुकारतो हई बम बम फिरने मगी। फिरसे फिरते बह एक प्रजपर के सामने मा निकमी जिसने भपत कर उसे नीत तिया । एक बात मे, मार से देख रहा पा तत्काल रोड़कर तसार से प्रमगर का पेट पीर बमयंती को बाहर निहाम रिया। परंतु बमयंती रेप को अन्य बाता उस पर मासात हो पया पोर पकाने के लिय उसकी पोर बड़ा। बमपंती मेगामे की डिठाईस से प्राप दिया जिससे उसकी तुरंत मुरम हो गई। यहाँ से मागतो भौर विमाप करती हुई बमपती पापे बड़ो। चमते पमते बह एसे घोर पियावान बन में पहुंचो नहाँ सिंह, हापी बीते रोप और अनेक हिंसक पशुपमियों फा निवास पा। एक सिंह अपनी गर्यमा से मारे बम को रहला रहा था। बमपती सीप उसके सामन पा । उमे जीवन का मोह नहीं फा। मत के रिना र ससार निस्सार प्रतीत हा मार भीमम कोणा के बाप से मृत्यु की पाई। परन्तु रस पिरहिनो की रिमोगाग्नि के सामम बह सिंह प्तियार की सह भाग पपा । पह रेत रमतो को फिर विए सताने लगा। वह परपन प्याहुमहई। उसके सिप न तो माप ही प्रातो और न रिह ही उसे बा देता । म फिर मन का नाम ने मकर प्राप बसी। रास्ते में पपिहों से नप्त के विषय में पूषतो पर कोई ष म बताता। अंत में एक नमी के तौर पहुंभी वहां उसने प्रनक मुनियों को रेहा। मुनियों ने पमपता को अपने पास बुलाया और उसका परिचय पूपा । बमयंती , गणे प्रपती विपति की सारी कहानी कह मुनाई। उन्होंने बमयंती को सांत्वना देते हुए कहा 'पह विपत्ति पात प्ररित है इसतिय इसमे परकारा पाना बा की बात नहीं है। परतु पर यह बहुत पोरे दिनों के लिये है। परवातु तुम सेरा पति मित पाएमा उसरे हाय का रानी हागो । पन सपत्ति और रामसमान भी पहले मैसा हो पाएमा । इमतिये निषित ए बिता न कर । तेरी सब रिसाए शोर पर हा बापी। मुनियों को बात सुनकर रमपी पहत तो विस्मित हुई, पर पोष यह समर कि ममि बम सरप पोतत ह उसे एप पीरज पा । बह वहाँ से कतपतो पितपती मागे पड़ी। रास्ते में बनमारोंग भर मिता। जयारों के नाप न परिचय पाठर उसे परेरी बसम के सिय कहा । उसने समर्पती को समाया जिबन बगाय बस्ती में पपिक रात दिन मात्र पाते रहते ह । रमहारा र पर की पर एका दीसह रपरता है इमसि पनाय करते रहन पर उनसे कमी न कमी नस को तार मित पाएपी । मर्पतो नाप से सहमत होकर उसके साप बाम । परंतु अपरिन पाचाल पन बन में निवास करते हुए प्रप राशि समप बमगारों रेमरको अप्सो हाथियों न रोगमा ! सब राप मारे गए। पर्पती पोर से पार मिपारी पाझप बबई। रमर्पतो बनगारों की माप अत्यंत दुपी पौर स्पर्म मरण का कारण समम मिय शितल कर रोने तयो । पाहापों ने उसे अमनमारमान पिा पार अपने साथ में लिया । दमयंती रनो साप परेरी पहुँको।री में पहा तो पटरानो में रमे रेणापौर प्रपने पाम बनाकर रममा परिषप १पा। रमने परिचय के पि में पत इसना हो रहा कि 'बह हरिनाकी मारी"। पटरानी में रिसा नहीं पा पर उमप ममम - २२ मनमद - पारिवह कोई राजरानी है । रसन उसका स्वागत सत्कार किया और गारिका म टिकन तस्पान दिया सपा प्रपनी पुत्री को साथ रहने के लिये भेज रिया । पपर मम समर्पती को पोपहर पना तो पया पर समर्पती का विरह से सताने समा। मरे बिना यह प्पाहत होकर गिरमे तया । फिरते फिरते ऐसे पन पहा नाबानि ममी हुई पो । यहाँ कोई उसको पुकार पुगर कर कह हा या पमारमा, गुमो और नामी हो परा मेरे पास मार एक नाव सुन मौ । मम ने यह सुनकर अधिोकाई तो एफ सर्प को बो रसका माम पुकार फा पानावाग्मि में पड़ा रेमा । उसकी बात मानकर वह उसके पास पया। सर्प ने हा म पापी हूँ। मुझे अपने पमा पोर पासन के माप से यह पति मिमो है। मैने एक बाग को पकारण रसा पा मिसने मुझे एक ही जगह पर रिपर रहने का बाप दिया। इसलिय म हिल हुन मही सस्ता। इपर यह पग्मि काल त्य होकर मेरी मोरबा हो है। भाप मुझे इससे बचाइए पौर सुरमित स्थान परममा कर रस रोमिए । परि पारने इस बार मुझे बचा लिया तो मैं सरा के लिये अमर हो बाईपा। नारे एप में सर्प के प्रति रया परपमहापौर चसन उसको उठाकर ममि से बाहर कर रिपा । बय पीड़ना चाहा तो सर्प ने बरा काम गिनते हुए बसकर घोड़ने लिये पहा। मस में पता ही ब्मिा, परंतु पत' कहने पर तर्प ने उसे रस सिया। सप रसने से मस के सारे परीर में पिय प्याप पया और पतका बकाता पा गया। मप्स ने कारण पूषा तो स ने कहा 'मन प्रारक साप पोपा नही किया है। इस समय माप दिनों के फेर में परे है। पौर पहना कुप रिनों तक बनी एमी । भाप रामा है पीर सारा संसार पापको जानता है। कोई पर इस रिबति में मापठोमरे सकता है। इसमिप मेरे प्राप म्पको पिपा सिपा है जिससे कोई भापको पहचान सके। पर पाप करित दमनाएगे तो पापके स्मरण करमे पर म प्रकट हो पाईगा पौर अपने पिप का पोपप कर तुंगा। पाप का रंग फिर पयों का त्यों हो पाएगा। इस प्रतिरिक्त यह पिप पापसी रमापरेगा। इसके प्रभाव से प्रापरे निकट , तो कोई सा पाएपा पौरन पुर में कोई पापसे जीत हो सकेगा । प्रब पाप प्रपमा माम बाहर सीप रामानुपम पारा पयोप्या पत पाए । रामा एतुपर्ण बुबा प्रेसने की विधा मानते हैं। पाप उनको सेवा र बह रिण प्राप्त करें। गंगा का मर्म माम सने पर रि उसी तारापाप अपना पपा हुपा राग्य पापस पाएं और पह दुम्स पिर पापो तिये स्वप्न हो जाएगा। यह हकर उसने मत को मिपा पानपृषक रमन निये पौर हानि पमपि स्परप है। समय पाने पर उसके दिम को पहम बसा परमे। मस सके परेशानुसार सीप भपोप्या पपे पौर यहाँ रामा प्रनुपर्ष के सारपीबनका हम नये। दुमपुर में परमात मयंती के बनवारा का समाचार प? तो रामा भीमसेन और रामी रामतो बहुत पोहए। गहोंने गोम ही नस मतो की यार करने पिपारा मोर सपनों घोर मारों को मारामा मत रायता सोपमा पर सहरेष मानापारी राजमहत में पर्यतो को रेप लिपा । बात प्ररट हो मत-गमन २ । ग्ने पर परीकी रामो समयंती से प्रेम पूषक मिनी । उसने दमयंती को बताया कि उसकी सा और बह सगी बहनें है इमतिये बह उसकी पुत्री के समान है । वह बमयंती के एप देखकर बहुत दुखोई मोर उसे उसकी इच्छानुसार राम साम हे साम रमपुर मरिया । रमतारामपुर पहुँच माने पर सबहो गड़ा हर्ष प्रा पर दमयतो को ससे कुछ मुल नही मिना । बहनत के पिए में पुतने मपी। उसके रस को देखकर मा पोर रानो महत चितित हप । उगोंने नम को रे मिये बालों का निपुक्त या । वामग पहम नमपत्ती से मिले । रमपती मे उन्हें मात के चिह बताए पौर फटी पर रिपार नन के काम का परिचय दिया। उसने कहा, वहाँ वहाँ बापो यहाँ-वहाँ हना कि "एक पुरुष दुपसे राप स्थी को संग में सोतो पाकर पता गया। उसकी Tर को मी मापी पारकर में गया । ऐसा मिठर कि परा भी वित महीं हुमा । उसके म, मन और हरप को बस्त्र की ही तए पीर पर पता पया ।" रसम पहा रिबन मों से महारेरा गमे हितो पुरुष का पता बसे तो समम ना हि वही बनपासो मयुर नम है बाहों के हाय में भी रमपती को पीड़ा से यही कामा रत्पन्न हुई। इसका मर्ममयी संदेस कर बस पार उसे पन-वन गपर-समर कहते हुए मन को (इनप । उनमें से एक मासा प्रपोपा भी पना पीर पर पर पती-गपी नही मात गुनाने मगा। बह फिरते फिरते यहाँ निकता वहाँ मत रहवा पा । मत बाह्मय मुम : मर्म रिस मुनते ही मूर्विस हो गया । र पतग्य हुपा तो पासमको प्रेम से नाकर बेठाया पीर इस प्रकार पहन लगा हे मित्र । बही पतिवता स्त्री हैनो पति से मन्त्री प्रीति करती है। भने हो पति सेवा में रसे गुज मिमे फिर भी उसकी सेवा में प्रपिहापिक मन मगाती है। पति को सर तरह से मना सममती है और कष्ट का कारण पन होकी को बताती है उसे पति के सब काय हितकारक बार पाते हैं। उसके प्रहित पूर्ण काया को वह मन में नही परती और प्रामक दृषि रसको पानी नहीं पाती। और मुनो, उस पी में रे सब बातें पो बो रसके पति को भाती पी। वह मार गाव में पी इसलिये उसके गुज को मा पति नहीं रेप सबा ता पोड़कर रखा गया। परंतु इस संसार में रेरिसी स्त्रियाँ पुल पाकर मी तुला नहीं होती । पतिव्रता वही है भो पति के पष्ट हो जाने पर पप्ट नहीं होती प्रामुत पसके पर होने पर उन्हें उसी में रस माता है। बाद में मत का कवन संरेम गत्तर म्प में पापा । बामन को प्ररने स्पान पर में पपा और उसका परिचप पूपा । मसन कहा "मेरा नाम बाहर है। यहाँ राजा की सेवा में रहता हूँ। में शामिहोन रिया मानता है इसलिये रामा ने अपने पोड़ों की रेप रेप पीर सम्हात करने के सिम मुझे नियम किया है।इसके अतिरिक्त राबा पिता को चित्रण करना सिपाता हूँ पर पाक रिया में प्रवीन होने के कारण रामा निप भनक प्रकार की रसोई तयार करता हूं। रामा मेरी सेना से प्रप्तम पता है और मुमसे प्रम करता है। पाझम सराहा रत्तर पार पीपरनपुर प्रापा मोर रामा तपा रमपनो को उसने समस्त पत्तांत मुनापा। रमती ने बाहर का रंग के बिसय में पूछा तो पासप ने रम बहुत ही कामा बनाया पौरम्हा हिसंमत वियोमाणि में मत रह सा हो पपा है। मयंती को मिरान हा हि बाहर ही रामा नाम है। यहो शानिहोम विधा मानता है मौर २२ मनमन - तुम गई कि यह कोई रारानी है । रसन रसका स्वामत सत्कार पिया पोर वाटिका म रिफन का स्थान पिया रापा प्रपनी पुत्री को साप रहने सिप पिया। उभर मम मयंती को पोरकर पता तो मपा पर मर्पती का विरह से सत्ताने समा। उसके बिना मह प्यास्त होकर फिरने मगा। फिरते फिरते ऐसे पन में पहुंचा यहाँ पनि समो हुई पी। वहाँ कोई उसको पुकार पुकार कर कह दावा पास्मा, मुनी मोर मानो हो, परा मेरे पास प्राकर एक बात सुमती । नस न यह सुनकर दुधि गोलाई तो एक सर्प को जो उसका नाम पुकार हा पा-मायाति में पड़ा देगा। उसकी बात मानकर बह रसके पास गया। सर्प न पहा, म पापी है। मुमें अपने कर्मा भीर मामन के पाप से यह गति मिती है। मेमे एक माम को प्रशारण रसा पा जिसने मुझे एक ही जगह पर स्थिर रहने का माप दिया। समिये म हिम दुन महीं सकता। पर यह प्रति हाल रुप होकर मेरी पोर पा रहो है। पाप मुझे इससे बचाए और सुरमित स्थान पर में जा कर रखपोमिए । परि पारने इस बार मुझे बया मिया तो मैं सरा के लिये प्रमर हो पाया। नाम हरय में सर्प के प्रति या पत्तम हुई और उसने उसको रठाकर मि से बाहर कर रिमा । नप पोरना चाहा तो सर्प २ बस काम पिनते हुए बमकर पोरने के मिये कहा। मन में बसा ही किया, परंतु बस' कहने पर सर्प ने उसे रस लिया। सर्प रसने से नस के सारे परीर में विष प्याप पमा और उसका रंगकामा पर गया । मम मे कारण पूषा सर्प में कहा "मैने पार क साब पोता नहीं किया है। इस समय प्राप परियों के फर में पहै। पौर यह नया प दिनों तक बनी रहेगी। प्राप राया है और सारा संसार मापको मानता है कोई मत्र इस स्थिति में प्रापको पुस । सकता है। इसलिये मैने पापम्पको बिसा लिया है जिससे कोई पापको पाचान न सके। पर मापके एरिन टम बाएँगे तो प्रापरे स्मरण करने पर में प्रकार हो जाना और अपने विप का पोपण कर दूंगा। भाप का रेप फिर यो का त्यों हो पाएगा। इसके अतिरिक्त पह विप पापको रमाबरेमा। इसके प्रभाव से प्रापरे निकट न तो कोई मा पाएगा और मुख नमो मापसे पोत ही सडेगा । प्रब पाप प्रपमा नाम बापती रामा पर्ष के पास प्रमोम्मा पते पाए। राधा नपर्न पुगा मेलने की विधा मानते है । पाप नमकी सेवा करने बह विधा प्राप्त करें। बुबा का मर्म बान तने पर फिर उसी सारा प्राप अपना पपा [मा राज्य बापत पाएंगे और यह कुल हिर प्रापके लिये स्थल हो पाएगा।" यह कहकर उसने नाम को दोबुलियां पत्नपूर्वक पने लिये और कहा कि प्रति सम्म है। समय पाने पर उसके रोग को पहले जैसा परस्पे। मन सर्प के उपोशामुधार घोचे प्रमोम्पा पछि पार पहा रागा पर्व के सारपी बन कर एनेसमे। मुंगनपुर में अब नन समर्मती के बनबास का समाचार पहुंचा तो राजा भीमसेन पौर रानी परमती बहुत बोकाकुताए। ग्रहोंने प्रीम होनस समर्मती कीबोन करने ये चारों ओर हासों प्रौर मारों को भेजा । राजा नल का पता तो न पता, पर तहदेव नामक बाहान ने पीरी राबमहन में समर्पती को देन लिया। बात प्रकट हो मानमन २ - - जाने पर पीरी की रानी दमयंती से प्रेम पूर्वक मिमी । रसने रमपंतो को बताया उिसकी माता और बह सगी बहनें है इसलिये वह उसको पुत्री के समान है। यह समर्मतो कत्र कोरेगार बहुत दुखी हुई और उसे उसको इण्यानुसार राम पात्र साप हुंरमपुर भेज रिपा । रमयंती के इंग्नपुर पहुँच माने पर सबको बा हर्ष हुप्रा पर रमपती को उससे कप मुख नहीं मिला। बहनत के पिए में पुतन सगी। उसके सोरेसकर रामा और रामो बहुत बिति हर गहोंने मन को दान के लिये बालों को नियुक्त पिया। बासम पहम बमयंती मिस । एमर्पतो में रहेंमत के बिल बताए पार पटी भारर रिपार मम के शाप का परिचय रिया। उसने कहा महो यहाँ बानो यहाँ-वहाँ कहना दिएर पुरष से एप स्त्री को सग में सोती पोहकर चला गया। उसकी पारर को भी प्रापी फारकर ले गया। ऐसा निठर किरा मी रित नहीं हुमा । उसके म मम पीर हाय को बाप ही ही वह पीर करता मया ।" रसम यहा परिन बातों से ही रेरागते कितो पुष्प का पता पाते तो ममम ममा कि ही बनवासी मिठर मत है। बाहों के बय में भी मयंती की पीड़ा से बचो का उत्पन्न हुई। सहा मर्ममेरो सोश मेंटर बस और उसे बन-बन गयर-नपर रहते हुए मन को ने भए । उनमें से एक बासम प्रोप्रा भी गा और परपर गमो-गनी गीत सुनाम सगा बह फिरसे फिरते वहाँ निजता यहाँ मत पापा। मन मान मुख से मर्म परेश मुमते ही मूषित हो गया । पर तय हुमा तो बाह्मण को प्रेम से बुलाकर मंटाया पीर इस प्रकार कहने लगा हे मित्र ही पवित्रता स्मी है दो पति से सन्चो प्रीति करती है। माने ही पति सेवा में उसे दुल मिमे फिर भी उसी सेवा में प्रपिछापिक मन लगाती है। पति को सब तरह से मसा सममती है पौरप्ट का कारण पपने पुरे कर्मों को बताती है उसे पति के प्रब काम हितकारए बाम परते ह । उसले पहित पूर्व कापा को वह मन में मही परती और भामह इपि रसको पापी मही गयटी । पौर मुनो रत स्त्री में सबमा पोको उसके पति को भाती पी। वह मामार गाल में पी सरिये उस न हो पा पति मही रेप सहा तो पोगरवता पपा । परंतु इस संसार में वे रिती स्त्रिा है भोप पाकर भी दुखी नहीं होती। पतिव्रता हो हैबो पति के एप्प होपान पर पर नहीं होती प्रायत उसके का होने पर उन्हें रती में रस प्राता है।" बाझप में मत का कयन सरेशरताप में पापा ।बह मतको प्ररने स्थान पर सपा और उसका परिषप पृथा । मत महा "मेरा माम बाहुक है । यही रामा की सेवा में पता हूँ। म आतिहास निण जानता हूं इसतिय रामा ने अपने पोड़ों को बस रेप पीर सम्हास करम के लिये मुझे निवृत्त शिपा है। इसके प्रतिक्षित राशिकारों को चित्रण परमा लिपाता हूँ पीर पारू विया में प्रवीप होने के कारण राणालिय पना प्रसार की रसोई संपार परता। रामा मेरी सेवा से प्रसन्न हता है और मनमे प्रेम करता है। पापण सरेका रत्तर पार तो एमपुर प्रापा प्रौर रामा तपा मयतो को उसने समस्त वृत्तांत गुनापा। अमर्वती ने बाहुए मरंग रिप में प्रपा दो बासप रम बहुत ही पसा सवापा और हालिममत पियोगाग्नि में बत पर पह बसा हो गया है। समर्पती कोरिमास प्रालिबाट हो रामा मत है। रहो मानिहोर विधा मानता है और २४ नसनमा . चित्र समा रसोई मनाने की मा में भी यह प्रयोग है। उस पर रंगन उसको पि भ्रमित प्रवाश्म किया, पर ग्राम सिवास गिा नहीं। राम दाम उससे मितन के तिम दिन हो उठा ।बह माता पारा पा प्रौर सही संमति से उतने मन को कान पुर माने का उपाय सोचा। उसन सहरेप बामगको जताया और उसे प्रमोम्पा मार रामातुपर्ण को यह समाचार मुनान ३ मिमे कहा 'मत सो गया है उसका नही पता मही ममा । इसलिये उसकी स्त्री इसरा विवाह करना चाहती है । विवाह महत पार ही है। वो पाम ग्नपुर पहुंचेमा सो बमयती पति के रूप में परेगी । पराम सहदेव को अपनी पोजना बताई और कहा कि परि मम सरगुप रामा अतुपर्ष के यही हीपा तो एक ही दिन में रप सरामपुर पापपा । सहरेर ने प्रपोमा पाकर राना अतुपर्ष को उमस समाचार सुनाया। राजा समाचार मुना तो सादग्य में समयंती को प्राप्त करने की प्रबल पम्या जमी। पर पीन से जीन रमपुर पहुँचने की तारसी करने लगा । उसने तुरंत बाहर को साया और उसे पनपती के विवाह का समाचार मुना रिन खने के पहले ही रपरामपुर पहुचाने के लिये कहा। बाहर इमपत्ती के निणय को सुनकर पहने तो हसा पाहा रह गमा पर रि यह समसफर कि समस्त उसमे पसे होगुनाने का उपाय रखा है उसका मयंती पर फिर विश्वास बमा। उसमे तुरंत सम्हन कर राजा से कहा कि वह रित बजे से पहले पहें चाय करमपुर पहुंचा देगा । उसनेम पाने पोहोको रष में बीता और राजा को बिहार परम पुर की भोर में बसा । उसो होकने से पोहे पान बेम समाम बम पो और रब से मेव पर्व को सी पनि उत्पन । रामा को बड़ी प्रसमता हो और ये मन की प्रशंसा करने समे । रही समम रामापे से पहा बिसकार नीचे गिर पड़ा। गुपट्टा पिरमपा हकर तुरंत रमहराने का मारेम रिपा । बराहक ने पढेरे सात कोस पर पाबाने की बात बताता महामारे पास पटारा दिया । राबाको बबरम को गति रिक्ति ह तो बाहर से पोसे बाहुए। इसमें संदेह मही कि तुम बरे पुषी हो; परंतु मे भी प्राप्त एप कामी । तामने बो पहेले काम विचाता है पसमें बितने पर पत पार पत्ति है तथा मितने परे अपक्के फल है एवं उनमें से मितने बमीन पर मिरे ए है मै बन सवा मतग-ममप मेजा बना समता है। पाक पहचानने के लिये बका बरहमा और उसम रामा से मेघा पुष । रामाने सबका मामग-मसन तथा बतला दिया। बाकस पशावर पपना की तोपा सरप पापा । उसमे रामा से बह पिता उसे सिमा रेने और गाने में उससे मासिहोम रिता मने की प्रार्थना की । राया मे पसे अपनी रिहा सिबारी । इस विद्या को प्राप्त करने के पहने बाको पूत विद्या सौपनी पड़ो। इसलिये से ही वह विधा प्राप्त से ही उसे परिमुग मिलाई रिसा । कलियुग मात के सामने हार बोरकर परा हुमा और ससो ममा याचना के लिये अनुनय विनप परमे समा । उसने कहा कि उसे एणमा का कर मिन मया । पतिव्रता पमपती ने पुषिन में पाकर उसे इस प्रकार साप दियाचा "निसने मेरे साप मारम ऐसार ठाना है और मेरे पति को गा गत भिमा है, मह भी है विपाता ! तुब की बाया में 48 सा भी पहम बाय, बह मस-दमन बलबास को पार का मुख मंदिर पर परती में मित बाय।" कलियुग मे कहा बिरस मात्र का प्रमाव उस पर प्राप्त हो पया है। उसकी प्रापिठोर नप हो गई है। शिस बहो के एस पर बह एका रहा, वह ग्तके शारापकर परामापी हो गया और बह पूर्वससे उसके मन में है । नम को कतिपय पर या माई और उसमे उसको क्षमा पर रिया : पाबात् पतिपुर मोबा त्याप रपमा पया मोर नम मी रामापन सहित तीसरे पहर रपमर रमपुर बा पहुंचा। रप को प्रापाव मुमकर रमपती पति को रेसने के लिये राजमहल की पत पर गई । परतु सर RAT पटित होने पर भीम को नरेश मह मन को बाहर भेप में नहीं पहचान सकी। उसके सामने पह घमस्या भरपतीपम में पस्मित हुई और वह भ्रम में पर। रवर रामा भीमसेनको बारामा तुप पाने का समाचार मिसा तो उन्होंने रमा हारत रिया पार गर्दै ममतार में लाया । रामा पर्व में रेकर कि यहाँ विरह की भी पारी नहीं हो हो है तोपराए पौरा विचार में परे। रामा भीमसेन को पद विरित हा हि रामा भनुपर्व रसा दिन प्रपोया से बने हो प भी साथ में पा । गहोंने रामा प्रनुपर्ष से पीघ्रता से पाम का कारण था। रामा बतुप रे मुख पर पहले संबोष पौर भग्मा के वित मसो, परंतु सुरत प्रपरको सम्हाम र तर रिमा जिरे हेपत गनों से लिपे पाए । । रामा भीमसेन मेस पर राहता प्रसको और रमना हा सरबिया । रमती ने नम का समाचार मानने के लिये पुष्पवर मना पौर स्वये पर पर से काम नपायर तुमने सपी । पर ने बाहर रखका पार उसके सापिमा माम पूर्ण तवा र मामा के विषय में बनाने को कहा बनेकहा “रपति प्रपोमा मरे" परा अनुप ईमपंती के द्वितोप पर परम करने समाचारपार पाए है। मेरा मान बाहुबह पौर में राजा कासारपी हूँ । मागियों के नाम पमान बारमुतो और जीवन के सामान ही रेत करते है।" बर में बारमुतो से, दो पहने मत हा सारीमापौर रसके पुत्र पुषी को दुग्मपुर पहुँचाकर पसीम्या बला मया पा, मत समाचार इपा । परम्तु बारसुतो के पहने फ पहन ही बार दोम का। "मी सी बाह रहती है। यह बात यह तोप बानमा पाइने है इसलिए अफताई।दिर मारनुसो निस मार को देखता है वहाँ मत परम होमा। इस समाज में वह बाहर नहीं है। परि है तो इसी रस में है। बह बिसके। में हवा है वही रतको पहनाम सता है। एप के बम को सफर पसे पम पमप माता पाने । गो गो (भास्वविय) वर्ष में देखना चाहेगा बहराकर पकाएपा पर रमेमही पाया मर्म समझनेहएको मोर मरेगा यह पाएगा। दो बात- पास में रमेना पानता है यही उस पुस्प को पहचान पता है।'परमे बाकी मर्मी परिबासी समन से सिराहा हि यह यादो पर्व मत है अपशबर माविण्य में पानता है। उसने बाहुक से पत पुष विषय में भी अपनी जानकारी वासि पृषा भित्रने भपोम्या में पूनवे हए रम बासरमा की पी मोहता किरता कि दीन पुष्प है जिसने पतिता रमी हो रही बाहो पार बार - उसने - भानमन पीर पर तय रिया । वह गाही मिटर उपे परा भी पीड़ा मही हुई। यह निर्रय उस सोती हो घोड़कर बसा पपा ।" इस गत में नाम के हाय को मानो पोर रिया । उसमें पहत कीबोरार भी पह नई होकर फिर पीडा रेम समी। प्रमामि ने पस पाम को फिर रोकना प्रारम्भ किया। हसता हुमा मुप रसते हुए भी उसकी पनि माम होगा पीर पसे प्रभूपाराएँ निकल पड़ी। पह नि पोला, हे मित्र मुम यह पुस्प मोहमी में है। यह मा तो मै हूँ या ए मेरे संग ही है। दूसरी पमह कही मही है । इतना सुनते ही पह पर सीधे दमय ही दे पाय पापा और उससे माहक की सब बातें प्योरेबार कह मुनायीं। पर मे रमपम्ती से महा 'हम को ही प्रीतम सममो। में उसके हरम में प्रम भी पी पाता है। पण विरहाग्नि मरी हुई है। पर से देह फाती पड़ने का कारण यह है कि यह विरहाग्नि से पाप हो चुकी है। उसके गोममे में प्रति की सप ऐसी निकमतो हे मानो उसका मुत्त मपम होकर पनि भी महीन मुम योगा हो। यह बुमने मासे प्रथम कहता है और उसरा मन तुम्ही में तमा रहता है । पम्त में गा तुम्हारा माम गुना तो उसकी पानी से पिर ही पाराएँ यह पाती । पर निाचय ही तुम्हारा पति है । समय हो रस पहबान पो। सो धर्म माने पर फिर रोता होया। रमपनी ने कहा हे मा! मैने भी बात सुनकर प्रियतम को पहचान लिया है । परन्तु प्रम को सम तह सेर कर देना प्रापा है जिससे पीपे पछताना न पड़े। इसलिए मोवन की सामग्री और रोते परे मारबारे पास मानो। परि पाह मस होना तो बिना बाम पार पनि रसोई तैयार कर मेमा । नापते ही वाली परे पानी से भर बाते है और उसके स्मरण करते ही प्राीन मी गमी माती है। जन प्रतिरिक्त एक सुपापमुक्त फूल लेगार उसके हाथ में देना। यदि हाप से मानने पर पूम यों के यो प्रस्तान पीर मुन्धिपुस्त बने रहें वो बाहर निसन्देह नमरे मतिरिणत पौरको महीं।' वह मनुष्य सत्काल पूल बातरहित पा पार रसोई का सामान नकर बाकर पास गया। पार गरें देखते ही या प्रसमामा । उसमें समम तिया शिवह सब पसभी परीक्षा के लिय ममा पया है। उसे प्रिय का मिलन नित रिवाई रिया । बसने पहले फूतों को मार हाब से मना तो पन वन रंग और मुबात में और पनि हो पई । रेने पात पाश्चर्य करने मपे । फिर उसने बानी परे पोपोर देण, मह पानी से भर पया। तत्पश्चात् बरतन के मन में नमक बन गत पार मुबास का संचार कर उसे हाथ में लिया तो तत्काल उफान पाकर नोमन भी tपार हो पण । पमतः मह परीक्षा सब तरह रमठो सामी बन गई । यह मनुष्य मोमन रतन को मेकर समपातो के पास बापत प्राया और एसे बरतन देकर दो मरेगा यह मन कर सुनाया । पमपम्ती में पाने भोजन को तुपा पौर फिर प्रेम से उसे पाया तोपसमें नुपनि रस पौर मिठात भारि सब वैसे ही पाए से मत बनाए भोवन में एते । इस पर उसे नियम हो गया कि पाठक उसका पति ने अपने बासनी को नौ रसके पास मन्त्राबाप ने उन्हें पीपर बसे तमा निमा और रोने तमा । राजा पर्व पर रहे थे। उन्होंने बाक से ल बामडों का परिचय प्रका। बाबरेहा 'महाराज हाही बातों के समान मेरे को पातक वे बिना मरण पर रोका । समयम्ती ने पर इसका भी परचा पाया तो उसे बाहर के पति मतमम २७ - होमे में पूर्व मिस हो गया और यह तुरंत माता के पास गई। उसमें माता को पति के पाने का समाचार रिया और मिस मित प्रकार पतिकी परीक्षा की वह मी सानुमाया। माता मे गती मग पर भेजार पाक को बताया । रमपेती बकरे सामने पाकर सोपी जारी हो गई । नमका पृष्टि से ही यमपती की दृष्टि से मिनी बह रोग सगा। उसके पास निहनते समय मास रिपाई दिए और गिरते समय सफेर। यह मस में वियप बात पी। मयंती ने मा मह भा भी पाया तो यह भोर से रो उठी।बह पोती, प्रियतम । मुमा में घोरकर तुमने मेधा विमा सा कोई नहीं करता। संग रहते मेर सरपन किया और मिम मिलन की सरा या एती है उससे अलग हो गए। भी होते है वो परीक्षा महीं होती। विषहए मिलन हो पाने पर हिर यमे सावे ६ सपमुष, मै स मिलन के काम मारी गई। मैं तुमसे हुई भी, पर तुममें पनप किया। सुना है परी मोग मिलन में भी ममम रहते है। हेत! तुम्हें मा मने सा ही ऐसा । वतामो कोमसा गित सोबरुर पहम भूमि पर विपीना विधाया और मुमे पर से नया मुसापा फिर मुनिया में दो विमोह किपा । श्या पित्तन में कोई ऐसा करता है। पी में जानती हि मुझे पट से सुमार तुम लय प्रमम हो रहे तो रिस नि सोतो पौर हिप्स तिमे तुम से एक को पोती। तुमने मुझे कठ से सपलर मुलाया, पर मन में गांठ परे रहे। फिर भी बात से बह बात पीत मा । पर तो मितो । बमा पर भी वह गांठ नहीं घोड़ोस ।' नम ने हे सुपरी। यह पर मारप बम हमा। प्रारण कमो महा मिरता। ग्ता भोप काला पड़ता है। यो पच्यिा प्रारम्यिा। अती ने पारप केस में पतियुमीप में समा जिससे सिपाह एमा बलि कि नोट पाए है। वह कतिपम मित्र बन गया है। पास्तु तने तन के लिये रिपोर मामा महो तो में तुझमें ही समापा हमा। पप मर के लिप भी नुमते मातम नहीं हुमा, मूम से हरे ही मन में प्रम रत्पन्न हमर है। तूने ही अपन मन में गांठ गती है जिसके कारप मुममे संबंप पिण्याकर रेह से धमाप बोका है। यह मून के लिए तुम मुभ मुसा रिया है पौर पर मुताभार वरण किए हएको सो मिाह रमती रो रेह पति मुनी पुष्प है, पर में तरे हाय का स्वामी हूँ मनिपेहको तह प्रपना दरय भी मुम प्रेम कर।" एमपंती मना र गुनकर बहुत किन हुई और योमी 'सामी में तुमसे सम्माय नहीं तोड़ा है परम् सब गाठीम होगर तुमसे ही नाता जोड़ा है।हमा मुस में अप नहीं मिलती। प्रपना तन मम पीर प्राप सरमप तुम्हाँको समाती हूँ। माने के लिये ही प्रार का प्रापोरन दिपा रिन में सो पोरन की गति से रय पसाने की कमा रेया तुही चारते हो। हतिय पह सोकर पिरिम पयोप्या में हो तो रारा एक ही नि में यहाँ पहुँचोगे। तिमी, परि तुममे अपने मन में ऐसा ही समझ मिपा है वो पर पीर पनमा सानी भरेंगे सपा मेरी हर समी- पृषी पवन प्रति प्रौर बाम मी मा निवारण रंग।" इमर्पती एशा रहते ही तसार पनि, पान पर सतह सहित प्रम हुए दोन रस एस सी सामोरा। इमी ममको परम संतोष हमापीर उसने रमतो होशंगार परिप रहा ।
२८ नसनमन - स्वयं भी उसने सर्पामरम पिया । सर्प तत्कास प्रहर हुमा पौर उरान एसका विप ग्तारा तथा चुसी पहना पर उसे पूर्व कप में प्यों का स्पों पर रिपा। तत्पश्चात् मस पौर मर्यती पातम पूर्पक मिले। राजा जनुपम को बम नम बमयंती के मिसनमा समाचार मिमा सोध रती समप मम के पास गए और उसे अपनी प्रज्ञामता के लिये सामा मांगी। मत में राजा अतुपर्म की प्रभया को पीर उनकी मारता प्रप्ति इतमता प्रश्ट करते हुए उन्हें मामिहोत्र पिया सिपाई । रामा प्रतुपर्ण कप रिन नामक साग प्रम पूर्वक हर किर प्रयोप्मा बने गए । तत्पश्चात् नम शीघ्र ही रामा भीम से वसा पन और हानी, घो रप तवा सेना मेहर कानपुर रगमन प्रापा । उसमे पुष्कर में प्रपना राग्य बापत म सिपा और फिर रमती के साथ प्रानमपूरहने ममा । महामारस को पा से प्रसर महाभारत में पहपर प्रपि पार पपिष्ठिर संसारकप में मात दमयंती की फरा मन पर्ष के अन्तर्गत प्रगति प्रमार्यो (५२-७६) में जनम की नई है। इससे प्रस्तुत कपा में कई स्पत्तों पर पम्तर पापा नाता है प्रारम्भ का तो मनिकाप (पमयम्ती के सबर की पर्चा बसन तक) कम्पित है। इसमें पहमी बात तो यह है हितों को कोई स्पाम नहीं दिया गया है। महाभारत में इस नन बमपन्ती के बीच प्रेम संबसा पहुंचाने का कार्य करते है और तस्साचात सुप्त हो पाते है । प्रस्तुत कथा में हो रे मान पर भाटिन की योजना की मां है। भाटिन रूप में मनूप और गायन में मिपुष एवं प्रपूर्ण है। हनन की सभा में प्रारंभ में ही प्रष्ट हो जाती है और पचिमी के पिषम में चर्चा बिते ही प्रमुख वक्ता का स्थान प्रहप करता है। उसकी प्रपरम बारुमति प्रापे सारे समासर निस्तेज होताते हैं। पमिती के परिचय से प्रारम्भ कर ग्नपुर नप, एबा भीमसेन रानी राबमती पग्निी स्वरूपा रामकुमारी समयम्ती और हस्तिनी पाचिनी चिनी एवं पपिनी नामक पिया ३ विक्षम बर्तन बारा बह मान को मुम्प करतो हुई पसको सुप दुषो से प्रम पर पर पाम करती है ।पके पाचात् हमों की तह पसका मो गई पता नहीं चलता। इससे स्पष्ट होता है कि स्वामाविकता जाने के लिय मारिन रा प्रस्तुत किया गया विस्तृत विवरण कमि को अभिप्रेत बा। हतों रा ग्मने पमी होने के कारण, पैसा बर्मन करना सम्मबन बा एवं यह भस्वामाविक होता। इसरो पात यह है कि पमपम्ती बोपपिनीम में चित्रित किया प्रपामीर गमको पहियों में प्रमः बताया पया है जिसके पापार पर बा में मपनियों के बौबित होने की कया की गई है। महाभारत में ऐसा कुछ नहीं है। पहा पमपाती को पत्यम्त म्पबती बताया है मृतक मपतिया रेबीपित होने की का। उसमें नहीं है। तीसरा परिवर्तन या किया है कि रमन पति को रामपानी से चार कोस पर मन में तपस्या करते हुए रिवाया पया है । राजा भीमसेन महा न गर्मन हेतु पाते हैं पीर मानोपोम के अनन्तर कम प्राप्त करते है जिनके प्रमप से रानी के गर्भ से सन्तान गपन होती है। महामारत मानुसार २९ सामन बपि रामा केही पर पर पाते हैं। बीमा परिवर्तन यह है कि यमयाती के हाप में नाम का प्रेम सहसा उत्तम होता है। यह प्रेम का माहात्म्य रिखाने के लिये किया पया है। फस्पिताश २ पामात मृत वा में प्रमुख रूप से निम्नसिमित अन्तर पाए बाते है- १-मारे सब पण पुमा और यम रमपुर पाते है। महाभारत में बास्थान पर परिम का रस्मत है। इसी तप इनके द्वारा मत को परवान ने में भी हेरफेर है। २-देवतामों के स्वरेप में रममगती २ भवन में पहुँचने पर मल को रमपम्ती में पहचान लिया जिससे उसके प्रेम ही महत्ता प्रकार होती है । महामारत में ऐसा नही है । वही मत अपना परिचय देता है। -ममम्ती मत का प बारम किए हुए देयतामों को पहचानने में प्रप्तमर्य होम पर प्रति प्रम को सरम में जाती है। महामारत में रमयन्ती देताना से ही अपना पास्तरित पवारण करन के लिय प्रार्थना करती है। ४-बनवारीस्वामी के ममामे भाने पर दमयन्ती सतावरी चमती है। महाभारत में दमयन्ती स्वतः ही बाजारों स्वामी के साप परिरी चलती है। ५--गल का रामा तुपर्ण को मारनपुर पहुचाने पर रमपम्ती में उसका समाचार सामने मियपर मेगा और उसकी परीक्षा निमित्त उसी पर हाप पूम बमरहित प्रा और मोवन की सामग्री भेगो । महामारत में कतिनो नामक वृतो मत का सामाचार ताने क लिपे मेसो बातो है। उसमें पृत, भगा और भोगन सामग्री भनने का रस्तेन नहीं है । ६-त परारा ताए जान पर बब बममती सामने पहा हा हो रोने तपा। रत पास पासों में सात पीर गिरते समप सर रिवाई रेत । महा भारत में ऐसा पप महो तिमा है। तको वास्तविकप में कल के नियटिक सर्प उपस्थित होता है पीर रस पारीर से पिप का घोपर करता है तमा रसे दो हुई पसी पहनता है। महामारत में कोको पाने का रास्ता नहीं है बल पुती पहन कर ही नस प्रपने महत सही प्राप्त करता है। इतके प्रतिषित धोठे-छोटे प्रतर बहुत है पर ये मपम्य है। प्राचीन (एतिहासिक पा पौराभिः) बापों को अपनी मतानुसार काम्प रप देने में कनिमोग स्तब है राम समेहमही । परंतु एक स्थान पर मिकी मारला विश्य है । रमपती की गसिपी 4 प्रमत होन को कापमा मात मिषित है। स प्रमुख कोसा ना रममतो ने म पाने कितनी बार सपा ऐमा मिसे गहें प्रमर हो जाना चाहिए था। इसके पविरिष: मरे हए बयारों के समूह को भी गोरित प्यिा पा सरतापा। इन बातों मसनमन को दृष्टि में रमर करिको कुपन इष सामगत्य पठाना पाहिए पा। कहने तारपप यह है कि यह कापना प्रम्पाप्ति रोप से प्रसित है। सफो विचारधारा प्रस्तुत काप्प में सूफी विचारीका अनुकरनयो तरह से किया गया है। एक ती रचना प्रकार को लेकर मोरपूसरा प्रेम सापना को मेकर । पही इमका कम से उम्मग दिया जाता है। - रचना प्रकार १-सपी प्रेमारयानों को तप प्रस्तुत काम्प मी प्रमपी में है। इसकी एबमा मी रोहें चौपाई परों में हुई है और इसमें भी प्रम्यायों या सर्यो का उपयोप नहीं छिपा गया है। २-पी मोम पारे पहने परमारमा की स्तुति समसामयिक भासक की मासा पैमबर की पदना और पुर (पोर)का वर्णन करते है। इसमें भी ऐसा ही टिपा गपा है । समसामयिक पासक (माहनही) पार गुप का वर्णन पोप किया मा पुटर है। परमारमा की स्तुति बेल के प्रापार पर है। उसमें रात पर स्पित प्रम्प सर्मनिक विचारों पिमिपात मेगाभेर पौर प्रांत का भी पसोप मिलता है.- बो कोर को चस हो ताको । एक रूप मेरो प्रय पालो ।। तिहि प्रपनो से मानो। मिरमत भमत प्राप भी मामी ॥ -विमिष्यात को कोर ढीठ हे ही सोई । मो पर पाम मेन ॥ बत सुप मान । अंतर मेटि प्रास सौ साने । x निय समुमो तो एको सोई । माहब सेवा मेर म कोई॥ बा तर मतर पुनि नाही । सबै समाा पता माही। भयो बल माहि पुष बरामयेक मन माप मौर होई पएम ॥ प्राषि -प्रांत [बोहा- साहब (मोहम्मर शहर) मर्म का मी गनेत मिलता है सोती सब * मा । वाहिही सेवक जाने । -] पंबर (मोहम्मद साहब) को परना मी पूची रचनाओं में एनी है। पद्मावत में मोहम्मद साहब को परमात्मा द्वारा निर्मन ज्योति के रूप में गत किमा पया पतामा पपा है । प्रस्तुत काम्प में मी इसका अनुगमन करते हुए मोहम्मर साहब का तो नहीं, पर निर्मल पोति का मनम है। इसका मीत' प्रम में भी उस्मेख है जिसके गुण पाकवि कपन पता है- वापर रीति x x - इस-मन पह प्रय 'धुन' कपन 'मौत' करी । मिह * प्रेम प्रताप निप्तरी ।। प्रपर मोहि निसितारे । रन एवे के निस्तारै ।। प्रपम 'निरमात राह बोति' पाई । तिहरे प्रीप्त सब सिटि बमाई ॥ रसम एक प्रस्तुति गा मेवा । सिन सो को नाहिन बघुमना मारे पेम हिम यह मामति । वा प्रीत प्रपमै गिराते॥ पापों । निगह प्रताप प्रम रसन पानी ।। भी प्रेम बिन मुक्ति न होई । मिन भूतो मटको मत बोई॥ [हा-१२ परंतु इस म्योति को मुक्ति में स्तिमित स्पोति समममा पाहिए.- 'तसेयोऽसमत रास में भी परमडोति' केप में इस ज्योति का पर्पन किया है. प्रपमहि प्रमर पेम मय 'परम मोति' बो माहि । पापाचन 'रूप लिपि' निति कहत हैवाहि स्य मंवरी मो० तुमतीरात मी ने ममवान् राम को महास म' और प्रशासनिधि कहा निर्मन पोति' से भिन्न नहीं- सहन 'प्रान स्प' भयवाहा । महि तई पुति निशान बिहाना । x प्रपा पुरप सिब प्रकार निपि, राम ममि मम म्यामि सोई, परापर मायरमाय॥ पहि सि कहना है, पही ज्योति प्रेम का विषय है और इसके प्रेम बिना मुरित हेमामहीं। जिसके हरर को यह ज्योति प्रम में मतदाता बनाती है या बनाना बाहती हैरह पहने प्रीति में पता है। परमों की प्रेमा भक्ति की काही ठिपों का पह है। रात मी प्रेम शाराही मगवान् का सापिम्प प्रा करते है:- परिप्रयम ते अपम प्रति नियम कहत है बाहि । बपि रिमीने प्रेम' दैनिपर निकर प्रभु पाहि ।। - - तुमसी मानों के प्रेम हारम प्रमुन (पिएन) म सपन (सहर मातम भगवान् राम) होना बताते है.. अपुन पचप प्राप पर गोई । भमत प्रम बस सपन तो होई ॥ बही बातम्या पहनेतमाल यह है कि यह निमत्त मोति पामापत में अमित मोहम्मर मन की बोति वे निम है। हो बिना प्रहार है कि इस प्यायाम मोहम्मर सारण मनमन की नाम पर मा है। इसका कारण मूफियों बिपत परमावत के रचना प्रकार का पमुरप करना। परमावत में मोहम्मद साहब बीना इस प्रकार है: कीरहेसि पुस्प एक मिरमरा । मारें मुहम्मर पूनिउँ रा।। प्रधान मोति मिपि तेहि सानो । भो हेहि प्रीति सिस्टि उपरानी ॥ दीपक मेसि जमत कह रहा । मा निरमन बग मारग पीरहा ॥ कोन होत प्रत पुरुष रग्यारा । मूभिन परत पंच प्रपियारा ॥ सर ठप ई पोर नि । भए परमी बो पाहित शिले ॥ भयत बसोठ पोई कीम्हे । और जग तराना मोहि नोहे ।। बाहि तौरह परम सो नाई । ताकई कीम्ह नरक मह हाई।। गुम प्रबम विधि पृषत होइहि मेज पर बोप । मोह बिनय प्रापे होड करर बगत कर मौर ॥१॥१२॥ प्रेमसाघमा सूफियों का मत मनग्य प्रेम द्वारा परमारमा को प्राप्त करता है। प्रमस्त संसार बोन परमात्मामय रेखते है । गम इस सियत का मापार मत मूमा सरमबार है जिसके पागे न तो विश्वास ही टिकता है और न मंप परंपराएं ही एहती है तोक लम्बा के लिये भी कोई रचान नहीं पता। की प्रेमाम्माम बाप्पा में पह प्रति भूमर प्रेम भावना प्रप्रकट रूप में रहती है। प्रेमाच्यानों से भिन्न नापारमा ती में लिये पए सभी कामों में एकातिक प्रेम की गात संबना पाई जाती है।हियो में मिरबा महम्मरबान की 'प्रेमनीमा 'इस विषय को सुगर इति है। उसमें बांसुरी बारा प्रियतम (परमात्मा) का मिह पापा नमा है । बाँसुप बनमारी विषय पर विपात्र में रो रहती है ।सका रोमा सुनते ही बराबर सुष्टि में नमबती मब जाती है । सब मोह निमा से बगते हैं और राबडो प्रियतम की स्मृति होती है । ताप सब मी पिक के विरह में रो रहते है। बांसुरिया विधुरम मा भारी । बिपुरन पुस मा रो पुजारी ॥ जब बह रोज पिपुर बमबारी । अनि सुन रोपे पुरप पर नारी ॥ बन सौ विसरि भपरिया रो । मेरो मिसन परि कार होई॥ मेरो।रोत परे संम समारो॥ मिति तौर सों बाहर पड़ी । सन उमटी बम पूषी गो ॥ तापर सौ मिमि पाती महो। पौष की मारी बत व पट्टी ॥ लिए वियोप किमि बान कोई । पापर बीते तोई ।। अपने प्रीतम में मिनि मिotपनि कोई। पिरम पुष तो बालहि मो कोर किरा हो । पार रिप्पो- १ उमीनदांबोग सिरप (बा नाम ७) संध्या १२० ।
मतमम पची को पमि का संबंध नार से है। मार को हिंा मास्त्रों में बम (कार) का सम माना है । प्रनार (कार) से मनाहत (मुम्मनार) और पाहत (स्पूमनार) रसम्म हुए। माइत नार से दो प्रकार के मार निकलेगीय सम्म (म्म) पौर बागम्य (म्बनि) तपाइन प्रस्पक के प्रमपुर पौरमपुर करके दो से मेर है। इस प्रकार पीब की तरह बंधी म्पनि भी बनवारी (मम बम, झार) से बिणी ई है, ऐसा भी समझना चाहिए । प्ररपमिका पपने पर वह रो रही है। कहते है गोपियों के प्रति प्रमि मान रिचाने के कारण पोपण की बसी को भी उनसे प्रमप होना पड़ा।लामी हित हरिवंश बी को पीहम की बंशी का मरतार बताया जाता है। ऐसे ही पौर भी कई पासी के प्रमतार कहे जाते है। मूफी मोप प्रपने 'प्रेम संपीत' की भी बांसुरी से उपमा फिर धनुराप 'बासुरी' बागी । प्रभिमान स्वात पपरागी ॥ - अनुराम बाँसुरी पाणब भक्ति साहित्य में पीकृष्ण की बंशी को प्रतिधि तो है हो, सतों के परबफ साधन पिया में भी इसका रमेश मिलता है। परंतु यहाँ कान्हा के हारा बनने कारम मह मन को 'भपान' बनाकर निहाम कर देती है। विकुटी से कुछ पर की सापना किपा में प्रवृत्त होते ही मी की पनि मुनाई देने मपती है.- सोची सोपी मनूमा रहम मुखमाइ । पहि अबसर शाह मुरती नबा ॥ मुरतीही पुनि सुनी मन मैनापूसिमास । एहनो मीपूल बनु मेमो मुम्रपास ॥ पुनो सनी मनुमा पर पती मेम । तहबा देपन एक प्रापूर पेत ॥ बौना रबी सप्तौ ताहा होता परिमार । रोमी मोमी मोतीमा बरीसु बमबार ।।* - महराई पोसाईनीबाट प्रस्तु प्रस्तुत काप्प में भी करिने बहुत से स्वतों पर प्रपना (पास्तषिक) पिपाया है वो सब किसी से नही पापाबा सकता। बहुत से तोप समुद्र को बहानों द्वारा पार करते है परंतु मोदी मोबने बात सा में ही पंसते हैं- बात और मिग प्राप पुरावा । सब का पै माम पाया। बहुत लोग पोहित परेपपि पर भाष बाहि । मरनिया पति दोन ता मोहि ॥२७॥ इस काम में मारमयंती के प्रेम के प्रतिरिक्त ज्ञान और प्पबहार धर्म का प्रति पारम है । प्रथम अनुसार मत सिप रमतो पोर बमती रेसिपे मत प्रेमस्पस्प परमारमा के रूप में है। दोनों के बप में पर एक दूसरे के प्रति प्रम प्रष्ट होता है तब दोनों मिलने के लिये प्याकुल हते हैं। परंतु तोक को प्रमेह पठिनाइयों पार टिप्पपी-- प्राहा खोर विवरण (का.मा.प्र.स.), संरया ११४।
मसनमन - कारण तरलता से मिल नहीं पाते । इसलिय विरहाति में तपमे सपते ह । यही पिरहामि पनकी सापना साप है। उसी पिा प्रपमे-अपन विषयों से मिरत ही बाती है। न तो भार ही माती है और न भूम प्यात हो जाती है। राप रंग से मन हट माता पार विरतों की तरह संसार से काई नाता नहीं रह पाता । मकी पिस-पतियां एक यूसरे में एकाप हो जातो ह । तन (सायिक गुम प्रधान) प्रेम में उनकी इस एकाप (प्पान पारमा पार समापि मुमत) रिपति का तापप गीता के निम्नसिषित सोक के संयमो में मिलता है पा निशा सब भूतानां तस्यो मापति सममी । पायो भापति भूतानि मा निगा पापतो मुन ॥ इस प्रकार पिए तोगबग के कारण प्रताप की स्पिति में रोमो अपने-अपन प्रम को एक दूसरे के प्रति जिस प्रकार परत परत है उससे प्रेम की सीमिता प्रसौतिकता की पोर बातीसशित होती है। यही प्रमीकिम्ता प्रस्ताव कपि का मुप्ताप है । इसमें प्रेम को प्रमौकिकता साच-साप हस्यमय सत्ता के प्रति मोरपित रहता है। कुप ग्राहरप लिए जाते है मत का विरह [प्रममा प्रमौगिक वमन पौर परमारमा भी पोर सकेत] हीबामा तोहि लागि मावत । तोहि सुमन मार ति मावत ।। हो मै भवर मना वैरागी। सरोग सुप पर प्रमुरागी ॥ हो जातक पिर पिर रट मोरे । तू स्वाती भार्य महि होरे ।। पो मन बित बोर बिन ये । हो कर तोर पहि मे ॥ मौ पति ज्यों मघरी बिन पानी । अपने पानी अभिमानी ॥ [बोहा-१२२ x मो सों बिनती पै बन पाव । हो सो बहे बो पिरीमा ।। x x भी पुनि यही बात का नाही । सब बम बीब है तो माहीं ॥ भाकों हमा एघि र रेसि । ताही के बराह मिरसि ॥ गोहा-१२॥ x पेम मना पाह प्रपारा । हा परेको पाउन हारा ।। भी समाइ पाइ एक पोरा । का सिख पर विहि बोरा ॥ ४ x x x पेम पहार प्रकास पचाही। सिख योता ना मसर ताही ॥ [ोगा-१२ मत-समन प्रम साधना-पय सो तो ममत तुमहि हेसा । मिहन मपो पेम हर मेता ।। उपग न हि बिह राम् । भयो म प्रगवहं 2 पिछतागू ।। तिन पा सगम परिवाना । मिह कर पेम पंप मन मामा ॥ ही सिप्प सीस घरन पर पाई ।ग पंग यहीं न बीच रेन रिन चस् । तौगि गौ तमि मीतहिं मिस् ॥ ग्यो यो प उमम स्पो होई । पैम पंप पर पॐ म कोई॥ भो तन हार है तमि बाऊँ । मन पग पिर मप सोन डिगा ॥ पेम पंच मोहि पति मुमम, मुरा प्याप्त र माहि । कारही, मौर प्रगान माहि ॥१२६॥ इसक x x सोस एक पेम सा पोर है गर । तब ईमोर प्राा पम पारे । पेम देत मह मा दामी । सो रोम बो इह पर रानी ॥ यह पो पुनि प्रवरर रीता। गो हार माना तिन बीता ॥ प्रपार प्रति माहि मोर महि पोर । बो सोई तिरं यह पैम रपि पोर ॥१२॥ सांसारिव भोगों से विरक्ति हो प्रत रामम मम मनाई । मिहि सुन रमिमीत बिसराई ॥ जो सिर माझ मिसे पिर सोई। तो यह राय दुसरा होई ॥ माहित पेम पपिन तर बारी। भूरे राज बनम का हारी ॥ बनम रामा पमे, गए रपार निसान । गोते नई परं गुम पेम माम ॥१२॥ [समोर सम्मा की उपेक्षा] पुनि तुम यह सिम्मा मुख पानी । बस रेस महं हास कहानी ॥ त ४ X x . परी महास संर सों, यो प्रेम है मन माहि । पहि प्रोम् परबह मत रित करु ठहराहि ॥१२॥ पुनि तुम यफ यो सिप बानी। रामह मह हो है प्रपमानो। x x मूर मान ए मान सब सनमान। माग प्पिो मैं मान मौसम पेम प्रपनाम ॥१३॥ x y ममनमन [प्रिय गोघ (मिमन) की पटिनाई] दो रनाई मष दुसरा । सब कर तहाँ हा पैसारा॥ काहि हारपासक कठिनाई । प्रायम् विना पहन कराई। के सो बाहि नो पाता होई । मिहि प्रो रामहि भेर म होई । प्यातहि सात पटक रूप नाही । को पर अपने पर बाही।। * सो बाहि चिहि पाप युताय । पेम पसीठ होर पारा ॥ बपि पहुंच रसोई तो पाचन पुनि रातटिन होई॥ हेरि म पह नाइ हिराई । तिहि मिम पापा पाई ॥ है कठिन सोम पिर रेरा। कोर गिरा मिनहि मुह हेरा ।। काहि पठा पीर पर को हो नि को हो । एक पीर के ह दिन पीर म पाव कोर ॥१५॥ [प्यान मी एकाग्रता और प्रदत स्वरूप दर्शन] सांची प्रीत न है पुरानो । बिम बातो माई तिन बानी ।। तन यह रिस्ति मात्र माँ पारा । तो एका बो बानम हारा । भी पुनि प्रचत प्रोत पब होई । तब तिनहू मह भेर न कोई ।। अंतर तीनो देर रिता । गौमी मै बीच पाई। तनम मएम प्रम्तर कोई । तन श्री मान सा एक हो । तम सब ताहि प्रातन मई मतम सन माह । भयो पतन पुतिय पुति माहे ॥१३॥ प्पान को एकप्ता सिटहो पा तो प्रेम पाबना भी सिस हो । फलस्वरूप प्रियतम का पर्मन या तो उसी समय हमा समभिए और परि नहीं तो उसमें नाम मात्र का निमंग सममना चाहिए । बा पति प्रबत प्रवस्या हो जाती है तो बरपा हीमे में कोई मगह ही एमाता- बब प्रति प्रबत अवस्था होई । तब बाबा संगहनोई॥ का को दुलो बो पेम दुरु बिन मुपि पिय मा मेह । 47 लिये प्रीवर निम पौर बिना कह ॥११॥ इसीलिये मन की प्रेम पापना अंतिम सीमा तक पहुंच गई तो उसे स्वर में बाने का निर्माम मिला। बमयंती का पिए [प्रेम सापना की गंभीरता तुरत प्यान पिर सो पदरागी । पाते करे बिरह बरामी ॥ प्रातम सुरत करति पयों न मोरी । सब अब बर्षि महतोरी ॥ प्रय हमि पिए दान मै सहे । रोमहि रोम पैठि तन रहे। अब ना तो धाव मा । सिर प्रमाणे तन स्पा ॥
ममममम बपि बीर तम स्पामि क, बेग मिर्ष तोहि मार ॥ मन बाय कि तो मत बीर तो माहि समाइ ॥१५॥ पिच मितो जिन का मही । मोहि मिर को संसा का माहीं ॥ यह पब सब तो सों मिल रहा । प्रगई पनमिन बाइ म कहा ॥ मिम मिय पाम प्रतम तन तोरा । यह मम भूत कह भिर मोरा ॥ गिनती हो करौं । हा हा पाइ सीप र परी ॥ तम पोहि तागि बहुत पापा । स रंग रस सहि पीरा ।। तिन कारम x x x बिरह रोम सिर पत भाग ।ताह 4 गित कर सपाया ।। प्रीतम मि तू तन मनम, सबा है तुब पाप्त । विरह मास दुस तन सहे सोई सा निरास ॥१५॥ [परमात्मा की पोर समेत] पंप सत्रु हो एकती धूमा ही इन महि । माड़ पर पिर तोहि मई, नो रामो महि बोह ॥११॥ हाँ पनाम का होय म मोसौं । बो पर होत नाय सब तोों। मोसों यह पेम पुष भरना । नाई तिहारो सुमिरन परमा यह पत नाहि कि तुम पह प्रा । मिति तन को तपत युमा । तुमही प्रपर होहु जो पाई। पापा प्रान ये हिरा॥ तबही पिर परसम हो पा । इन सत्रु सों पाप छाा ।। महाराम तुमी सब होई । तुम कई बरमनहार न कोई ॥ तुम अपने सनबरता । सबकरि सके माप बो करता ।। जो तुम पार का बट फेरा । कहो तुम्हें कौने पो पेरा॥ पोहा-१६२ x प्रौदह में कछोप्त म मोरा । बो कहकर सो बह षित बोरा॥ दिन पिन पाय पाप पर माव । रिस्टि प्रपोपर बान पसाप ।। मानक बहै पनुक पुनि सोई। पापहि बान पोर नहिं कोई ॥ पाहि मि पाप रमापहि तहाँ मोन हो । दोहा-१९९ [संसार मोर लोग सग्गा का त्याग] प्रीतम सुरत करसि पो न मोरी । सब मप पाविमा हो तोरी॥ रोहा-२५ प्रोतम काय माय मसोई रो रो मुदन सरपोई ।। x को पिर नामि मात्र पाई । मा निमय मोरे प्रमुताई ॥ [बोहा-१५१ x x X ३८ मसमम - तमाप्ता ।। मत पमपंती का या सापनारमक प्रम पत्तीपत और पातिवाय पर्म के रूप में सामने प्राता है। वास्तव में ऐसे ही स्त्री पुरुषों का प्रेम नोक रंजक साप साप लोक कस्यानकारक होता है। ये एक दूसरे को परमात्मामय ही बसते है। इनकी पहनी पहनी पुर सात्विकता लिए हुए होती है। इममें सत्तियों का पूर्ण विकास पाया माता है जिनसे पम्हें प्रमुखत्व प्राप्त होता है। अपने प्रहनिम भप र व्यवहार से ये सब को मोह मेते है । बीप तुओं के प्रति सम्म रहते हैं। संसार का सारा पैमय प्राप्त होने पर भी पे विकार प्रसित नहीं होते। ये मोह मर्यारा के पापक पौर पालक होते हैं। समान इनको अनुकरण करता है । भरनारी इमसे प्रमाणित होकर अपने मपने चरित्र का निर्माच करते है। इस प्रकार संसार इनसे हरय हरम होता है। ऐसे स्त्री पुष्प बरे भाग्यमामी और गम संस्कार पक्त होते है। चे सरंय पौर सपम मुमम नहीं होते । कमी कमी हो संसार में सम्म लेते है। परंतु मर जाम मेते है तो संसार इसकी पाति मुन इन्हें देखने के लिये जानायित ही रखता है मामे भगत पका सुनि सोमा । कौतुक कह सब कर पित नोमा ।। x कोर पर मिसन मन प्रासा । कोस मा बह [ोहा-01 सर अपनी अपनी मारनामों के अनुम्म इनके रूप पानिप' प्यासे हो जाते है। इस एप्ति से इनकेप को म्याप्ति में पाकिस्ता पा जाती है। हम सके सामने संसारकप का मान नहीं होता। सूरज और चार मग्बित हो पाते है। की तपास पर घर में पाप्त हो जाता है। नाराने समयंती पसंबंप में से ऐसा ही कहा:- चौर मुरम तिहि देखि माहो । हा न प मान बग माहीं ।। मसम्म तिहि प अ पर पर पा समार। बिन हेरा सिह हरि पषि, पापा वीण हिरा ॥१४॥ x इंग्मपुर पए । तिहि 'पानिप' के प्मा भए । नारा से ग्राममानी इस म में ग्राम्प का ही गर्मम करते है। भले मोम पाहने तो काम से मोहित होते है, पर सब वर्ग से पर्व (स्त्री पुष्प का उत्तम बोगा) मिल पाता है तो प्रसम्म होते है। शारिक देवता पौर राधा पर्व के विषय में ऐसी ही बात है कि बता दमयंती की पुगि प्राने पक पर प्रौ पुनि इमाविक । इहि परिष पनित नए तक ॥ इन पबना ये मत बाना । कौम भित्र पुरत पहिचाना ।। पुनि प्रसम्म मन सब बोले । अंत होय बो बिन्ह के सोन ॥ मनी मा नारी मत पापा । विममा बालहि परन मिनाया । [गोहा-२.५ x x मसभमन ३९ रामानुपम नम से ममा माप इए कहते हैं पुनि ऋतुपरन मरम बह पाना । सिनहिं पास नस पह रठि मारा ॥ बोना बहुत मा मोतों । मोपी रहस मही में सोसों ॥ म पाना । प्रब सहि मरम बहुत पपिताना ॥ तू राजा मोरे पर माहीं । में प्रयान तोहि माना काही ।। [ोहा--१६० दुमन सोम प्रत निराम होते है माता र मन कहं मामा । चमी पौर मोपन र साता ॥ अपने र सो सात रतारा । सोई पुरबन बम हिप गरा ॥ समिनि दोष रमंती मई। मोमन पटा रम हिय मा ।। सपरी पमा सुर बन भागो । दिप भय बिरही पैरागी ॥ चातक पो बिमहतो जो पासा । मिटी पो पिक माँ भी निरासा ॥ [ोहा-२०६ 'राम चरित मानस में इस जगभावना का बहुत ही उत्तम पर्पन दिया पमा है। वियों ने पुरपोत्तम राम को विराटमय रेखा, योपियों ने परम तत्तमप, पुरवासियों ने सोचममुनापक पौर परमों में भयानक मिन्ह - फो भावना असो । प्रमु मूति तिम्ह येसो तसो । - x x पिरह प्रम विरार मप पीसा । बहु मुस कर पग मोचन सीसा ।। x x बोगिह परम तत्तमय माता । मति मुट सम सहर प्रकासा ।। हरि भगतरह रेवे होठ भाता । इष्ट देव ब सब सुख पाता ॥ x x x x पुरवासिरह देले दोर माई । मर भूपन तोरन x रेरित नृप प्रभहि निहारी । मन भयानक मूति भारो॥ x y x y - सीताबो की तोरिस राम राम से बस पूबरपोम समा बाहते प तब तिय रेपि भूप मिलाप । पर पृत मूग मन मा ।। x x महणार चीप कह फोर । परि बापटप पाता हो। तात्पर्य यह है कि प्रेम तापना में पपकर एमे स्त्री पुष्पों में मतोरिकता प्रामाती है और नीमनीष भूमिका पर स्थित हो पाते हैं। यही रहें कोई पराभूत नही कर सध्यावरि पराताप पर रन पर विपत्ति भी पाती है तो त में हिरमप प्राप्त करते ४. नमसमम है । इस प्रकार उमझा प्रेम प्रमा हो पाता है। प्रेम का तरप यही है। इसी से 'प्रीति रस होता है। माग पुरषोत्तम राम में हममान को मानो रेसिपे पो रिय रिया पा नसमें इसी प्रेमतस्य का गर्भन होता है.- कहे। राम पियोग तब सीता । मो कह सकत भए पिता ॥ मबतर हिसमय मन तानू । काम निसा सम मिति रासि मानू ॥ पुनय विपिन ईत बम हरिसा । गारिप तपत सेन बन गरिसा ॥ के हित रहे करत तेइ पीरा । परम वास सम निविप समीरा ॥ बहेर कप पुस परि हो । काहि व्ही यह बाम कोई ॥ 'तत्व प्रेम कर मम पर तोरा । बायत प्रिया एक मनु मोरा ।। सो मन सरा हत तो पाही । बान् 'प्रीति रमु पतनहि माही । इस प्रेम संवम ने अपना प्रभाव इस प्रकार प्रकट किया कि यहां मारकी पारक में बमने की तैयारी कर ही पी वहाँ इसन पनकी सारी मुपयुष यो गम् मम में मग्म कर पिया प्रमु संबसु तुमत हो । मगर प्रेम तन मुपि महि हो । फमता र मृत्यु से बच पां और मिना होने तक राम के प्रपमित प्ररयाचारों को सहन करती ह भी निार पौर परिप बनी रही। राम रहें मारना चाहता था, पर मार नहीं सका। प्रस्तु यही कारण है कि नोट में मि-पार्वती, राम सीता सावित्री सत्यवान पौर नरमयंती के प्रेम को पारर्भ रूप में अपनाया। ये महान विभूतियाँ मोड मारा को रसक पौर तोक बीबर को विकसित करने वाती हुई। गहस्य धर्म (: (प्रवृत्ति मार्प) इन्ही मार्ग पर चलने से 'प्रीति रस पुक्त होता है। गुप्ता के संबंध में पह भी अनसनीम है कि यह मितना पूर (पाम से मेहर दमयंती के स्वयंबर की पर्चा पमने तक) में पापा जाता है उतना रतरम में नहीं उत्तर में कहानी अधिकार प्रत स्म में बनती है इसका कारण यह है कि कपि पूर्वाव में प्रेम और मान का प्रतिपारन पगला बहता है और गत्तर में मोहम्मबहार काविसका संपत राजा मौमसेन प्रति बमम अपि के उपरेस में मिलता है मिसमें इपि राजा को पहमे परमात्मा पौर प्रात्मा के गाला उपदेश करते है पौर परतर प्पबहार धर्म का- परमास्मोपदेश मिस कहा रामा मुम मोमों । मिव मह मरम कहाँ हो तोतों ॥ जो सुमि समुझि पात पर पारेधि । प्रथम बस्तु कई सुपम निहारेसि ॥ साई एक पहे Bाम् । सुन ताके तोहि चिन्ह गुना ॥ स्थिर नियुप प्रमेपा ।परम पिस्टि सौगारमा। पर ताण परकाया । पो सक्ति सब मर्ष पासा ॥ पर प्रौपर अंतर सा नाही । तिमा सना हा सब माही ।। सब प्रतम मत-गमन बधी को पार का संप मार है। मार को हिंा मानों में रह (प्रकार) का मम माना है। प्रसार (कार) से प्रवाहन (मुममार) और पाहा (स्ममार) उत्पन्न हुए । पाहत नार से रो प्रहार : नार पिकते-मीर मम्प (सम) और बागम्य (पानि) तपा इन प्रत्येक प्रमपुर मौरमपुर करणे रो रो भाइस प्रकार मीच की तपो पनि मी बनवारी (पार बम, हार) से रिपी हुई है ऐमा मी सममना पाहिए । प्रस्पमिमा बमन पर बह रो रही है। कहते है पोपियों प्रति प्रमि मान रिखाने के कारण मीम की बसी को भी उनसे प्रसप होना पड़ा। स्वामी हित हरिका बी को पोहरम की बंदी का प्रसार बताया जाता है। ऐसे ही पीर भी कई बमी भरतार कहे जाते है। मुभी सोय प्ररने प्रेम संपीन' की मी बोमुरी से उपमा हिर अनुराग 'डौमुरी' बाबी । प्रमिसान शन्त परामरी ॥ अनुराम बांसुणे बापर मस्ति साहिरप में भोरम की बसो को प्रमिति तो है हो सत्तों के परष सापन म्यिा में भी इसका रस मिलता है। परंतु यहाँ हाम्हारे बारा बनने कारप पह मन को 'भपात बाहर निहात कर देती है। विटी से कुप म्पर की सापना भिा में प्रवृत्त होने हो बोकी पनि मुनाई देन नपती है सोची सोचो मनमा एत मुहमार। एहि प्रासर काह मरती रहा। मुरमो को भूमि सुनौ मन भैमा पुतिमार। हनी मीपूछ बनु मनो मुप्रपाम ।। पुमी सुमी मनुमा रपर रमी येत । वहा रेपत एक पापुर पेत ॥ बोना पी ससो ताहा होता रविपार । रोमी प्रेमी मोतीपा बरोस बनपार ।।* -महा गोमाई परमारास प्रानु प्रस्तुत काम में भी कवि ने बहुत से स्पों पर प्रसा (वास्तरिय) पर्य पिपापा है यो सब रिसी से म्ही पापा जा सकता। बहुत से लोप समा को बहानाहारा पार करते है परंतु मोती जोग्ने बारे समा में ही पंसते हैं- पार बहुत और मिट प्राप पुराना । बर का प बार, पापा ॥ पास लोप दोहित , रपि पर पार माहिं । मरमिया, पसि ता मोहि ॥२०॥ हमाम्म में मातरमयतो हे प्रमद्धिरित मान और महार पर्मनाप्रति पाल है। प्रपम रेनुसार मतरे लिये सपनो पोर इमपती तिय मत प्रेमासम्म परमारमा रेप में ह । रोनी के में बब एक मोप्रति प्रम प्रष्ट होता है तब दोनों हितने तिचे पान होते हैं। परंतु हे की परेर ठिमागे पार रिपत्री- प्राए मोर विवरण (न.मा.प्र. स.), मस्रा ११४ । .
मसनमम है। इस प्रहार गमका प्रम अमर हो जाता है । प्रेम का तरच मही है। इसी से 'प्रीति- रस' होता है। मांग पुष्पोतम राम में हनमाम को पानको केमिमे यो संगरिया पा उसमें इसी प्रेमतत्व का गम होता है- को राम वियाग तब सीता । मो रहे सकाम भए विपरीता ॥ ममता सिमय मना सान् । काम निता सम मिसि ससि मानू ॥ दुबमय विपिन बुत बम सरिसा । बारिर तपत देस बनु बरिसा ।। मे हित रहे करत ते पीरा । परप स्वास सम प्रिपिप समोरा ॥ कहे ते दुख परि होई । काहि कही यह जाम मकाई ॥ 'तस्व प्रेम' कर मम पद तोरा । बानत प्रिया एक मन् मोरा ॥ सो मन मरा हत तो पाही । बानु 'प्रीति रम् एताहि माहीं ।। इस प्रेम तरणने अपना प्रभाव इस प्रकार प्रा टिपा कि हाँ बानको पायक में बनने का तपारी कर होगी वही इसने ग्मको सारी सुपचुप पो रहे प्रम में भाग कर दिया - प्रभु संरेम मुमत बगेही । मयन प्रेम तन मुपि नहि हो । पमत मुत्यु से बच गई और मिसन होने तक रापन प्रापित परयापारी जो तान करती हुई मी निरा पौर परिय बनी रही। रापन पाहे मारना चाहता पा पर मार महाँ सड़ा। मस्तु यही कारण है हिनीक ने शिव-पार्वती राम सीता पारिणी सत्यवान पौर नसम्मती के प्रेम को पार कप में अपनाया। पे महान् विमूतिया मोफ मारा की तक और तो बीवन को विकसित करने वाली हुई। प्रहरप पर्म (प्रवृत्ति माम) इन्ही के मार्ग पर चलने से 'प्रीति रत' युक्त होता है। चुप्ता के संबंप में यह भी पल्लेखनीय है कि यह मितमा पूर्वार (पारंम से मेकर मवीपर्यबर की पर्चा बमने तक) में पाया जाता है उतना उत्तर में नहीं उत्तर में कहानी प्रपिकतर महत म्म में चलती है। इसका कारण यह है कि मि पूड में प्रेम और मान का प्रतिपादन करना चाहता है और उत्तर में लोरम्पहार का। इसका संकेत रामा नौमसेम के प्रति मन पिके उपयेम में मिलता है जिसमें बपि राणा को पहले परमात्मा पौर प्रात्मा के साल का ग्परेम परत परततर पबहार बर्मका:- परभास्मोपदेश सिरहा रामा सुन मोसा । निब यह मरम म्हो ही पोतो ।। श्री मुनि सममि बात पर मारेसि । मबम बस्तु कह सुषम निहारेसि ।। साई एक मम । सुन ताके तोहि पिन नाई॥ रिसर निम प्रतम प्रभेषा । परम मिति तोबाइभरेगा। मत र बर तह परमाता । यो रेसप्ति प्रब गर्ष प्रवासा ।। र पौषर वर का नाही । सिमा समाइ पा सब माही ।।
मतमम १५ पी की पनि का संरप नार से है। नार को शि मामों में बम (Oकार) कालम माना है। प्रमसार (कार) से प्रवाहन (सममार) और पाहत (स्पृतनार) रस्पन्न हुए। पाहत मार से दो प्रकार कनार निकले-जीर अन्य (साम) और बारम्य (पनि) तराइन प्रत्येक प्रमपुर और मपुर करके दोरो भेर है। इस प्रकार बीर की तए सो पनि भी बनवारी (मार बह्म, Bार) से गिी हुई है, ऐसा मी ममममा शहिए । प्रस्पमिया अपमे पाए रो रही है। कहते है गोपियों के प्रति प्रमि मान जिनके कारण पान की मेमो भी रखसे प्रमप होना पहा । स्वामी हित हरिबंध भी हो भोरप्याशी का प्रातार बताया जाता है। ऐसे ही पीर मौकई रणे भरतार कहे पाते है। मुडी लोप प्रपन प्रेम संगीत' को भी बीमुरी से उपपा फिर अनुराम गोमुरो' हामी । सं अमिताव स्वाम्त उपरानी ॥ -अनुराग बासुरी पप्पा मक्ति साहित्य में मोम की बसो टो प्रसिमि तो है हो सं परवा पापन प्रिया में भी सा मह मिलता है। परंतु हा काहा के बराबर कारण यह मन को 'पास' बनाकर निहाल कर देती है। रिटी से एप म्यर को साना किपा में प्रवृत्त होते ही बसी को अनि सुनाई देने सपही है.- सीबी सोलो मनमा रहन माया । एक मबसर माह मुरली मार।। मुरमीको इनि सुनो मन ममा पुसिमाह । रहता भीड बन भैनो भूमपात ॥ पुनो सुनी मनुमा पर बनी पेन । एमा रेपम एह परपूर पेन ॥ बीमा रबी ससी सहा होता रत्रिपार । रोमी मामी मावीमा बस मनपार ।।* -महाई गोसाई पानीरास प्रस्तु प्रस्तुत लाम्प में भी कवि ने बहुत से स्पतों पर प्रपना (पास्तरिक) पर्य पिपामा है बो तर सिौ से नही पापाबा पवाव से माप समा को बहानों द्वारा पार करते है परंतु मोवो बोगने वाले ना में ही पठते हैं। बात और मिस परप रा । यस काहू 4 बार पारा॥ बहत लोग बोहित बोरपि पर प्राव बहि। मुमता मारिपा, पति बोर हा माहि ॥२०॥ इस काम में मातरमयंती : प्रम में प्रतिरिक्त कान और पाहार पम का प्रति पावन प्रकारे प्रसार मसति इमपती पार पमती हेलिपे मत प्रेमस्थल परपारपा के प में है। रोगों से हरप में या एक दूसरे के प्रति प्रम प्रस्ट होता है तब दोनों मिलने के लिये पास होते हैं। परंतु मोर को पना कठिनाइयों पार रिपथी- प्रठापाचोरपिर........ * १४ मसरमम के कारण सरसता रो मिस नहीं पाते। इसलिमये पिरहानि में तपने मपते है । मही मिहानि रमकी सापना स्वाप है । उनी यो प्रपने-अपने रिपो से पित हो पाती है। पहेमतोमार हो पाती है और न भरा पास ही ममतो है । राप रम से मम र पाता है और पितों की तरह संसार से कोई नाता नहीं रह पाता । पनकी पित्त-वृत्तिा एक दरारे में एबाप हो जाती ह। राप (साविर पुग मपान) प्रम में रमको इरा एप (प्मान पारगा और समापि यत) रिपति का साराम मीता के निम्नमिसित मोफ के संयमो में मिमता है मा निगा सब भूताला तरयो मामति सयमी । पायो चापति भूतानि सा मिना पापतो मने ॥ इस प्रकार विए तोप पगारम प्रताप की स्थिति में दोनों प्रपने-अपने प्रेम को एक दूसरे प्रति जिस प्रहार ग्यत करते उसमे प्रेमी सीरिकता प्रसारिता की मोर पाती हुई मसित होती है। यही पसौफिषता प्रस्तुत पिका पुफाप है। इसमें प्रेम की मीसिताके ताप-साप हापमय सत्ता के प्रति भी रमित रहता है। रूप गहरण रिए पाते है मम का विरह [प्रम पामलोमिप पणन भौर परमात्मा की मार समेव] हीबातोहि सामि मापत । तोहि तर ति पारत ॥ हो में मर भनों रागो । सरोज तुप सर अनुरापी ॥ ही बता पिउ पिर रट मोरे । स्वाती भाये महि तोरे ॥ मो मन चित पोर बिम देरी । सो बंद तोर महिं तय ॥ मो गति ज्यो मपरी बिन पानी । तू अपमे पानी प्रभिमानी ॥ [ोहा-१२२ x मो सो मिनती 4 बग पाप । हो तो वह बो पिर की माये ॥ x x x पौ पुनि पही पात का, माही । सब जग बोर है तो माही ॥ बातो हा इपि कर हरसि । ताहो म ह निरति ॥ [ोहा-१२३ x हारा॥ पम समा प्रवाह मपारा । ता पर ही गान भी समान मा एक प्रोरा । का सिद्ध कर तिहि मोरा ॥ X x पेम पहार प्रताप रचाहाँ । सिम रोता मा म्पर तही ॥ [हा-१२ मसनमन १५ प्रम साधना-पप मो तो मूमल सुमहि ऐना । दिनहूँ म मयो ऐम कर मेसा ।। उपम न हि विरह पराएँ । भपी र प्रगबह है पिचमा ।। तिम यह प सगम करिबाना । रिम्ह हर पैम पंप मन मामा ॥ हो सिप सीत परन कर पाई। पैग पर बौ न बीब रन नि पर्नु । ती नगि मी मपि मीतहि मित् ।। ग्यो ग्यों नातं उमंग स्पो होई । पेन पंप पर दो हम हार रहे तशिवा । मन पग पिर मग सों न frगा: ॥ पैम पंच मोदि प्रति सुगम, भूप पास र माहि । को कारही मीर १. मान माहि ॥१२॥ म समा तीसै एक पौर रा । तब इई पोर पार पा पारे । पेम पैर मह मा गरी । सो मोह पर रामी । पह देदो पुति प्रबरम रीवा । मो हार जाए तिन बीवा ।। अपार प्रति माह पोर महि पोर। गो सोई तिर पहे पेम बपि मोर ॥१२॥ सांसारिक मागास विरक्ति हो स रामन पर में ना हि पुराभिमात विसराऊं ॥ बोरि मोम मिसे पिरसोई। तो यह राम कुसम हो । माहिल पेम प्रति वर मारी। मुरे राम बनम का हरी ॥ हार बमम मा पर्ने, गए र निसान । पर म पैम मंगान ॥१२॥ [माक मया की उपेक्षा] पुनि तुम यह सिण्या मुल प्रामी । पत रेरा मह हाल कहानी ।। x बिहार क साँ, भो पेम रहे मन माहि । दहिया परवाह अप्स, रित फरक कहाहि ॥१२॥ पनि तुप यह बोले सिप गाली । राम्ह मह हो है अपमानी।। x x मूठ मान ए मात्र बाया. पुनमार। म मान सौ रीम बम प्रमाण १५॥ x x भान रिपो x मसनमन [प्रिय घोष (मिसन) बी पठिनाई] बी रमाई मंच दुपारा । सव का सही ही पंथारा॥ करहिरपासक हिमाई । भायमु बिना परन न राई सो बाहिको पाता होई । मिहि प्रो राहि मेर महोई ॥ प्पातहि पात पटक कप माहाँ । को पारी प्रपन पर बाही। *सो बाहि मिहि भाप मुताय । पेम पसोठ हो पहुँबाये ।। मो बपि पर पतकोई । ती प्रावन पुनि पEिR होई ।। स्प बह बाद हिराई । तिहि मिन पापा ए माई ॥ है कठिन सोप पिउ केरा। कोरम फिरा मिनहि मुष हरा ।। काहि पहा पीर पह, को को गित यो हो। एक पीर के बिन, पोरन पा को ॥१५॥ [प्पान को एकाग्रता मोर मत स्वस्पदम] साची प्रीत न र पुरानी । बिन बासौं ना तिन बानी । तन यह रिस्टि मार मो मारा । सो एका मो जामम हारा ।। मौ पुनि प्रथम प्रीत बर हो । तब तिनई माह मे कोई ॥ अंतर तौलों रिलाई । भीमों में पीप चाई ।। भए प्रम्तर कोई । म प्री मान सो एक हो । तन धब ताहि मतम मई प्रतन सर तन माह। बहे पतन तब मै मयो प्रतम दुतिय पुनि मह ॥१५॥ म्यानको एकपता सिरहो पा तो प्रेम सापना भी सिर होगई। फनसम्म प्रियतम कार्मन या तो पसी समप हमा समभिर और पनि नहीं तो उसमें नाम मात्र का बिष समाना चाहिए । बब 'मति प्रबत प्रवस्था हो जाती है तो बरसा होन में कोई सरह नहीं पाता:- बब प्रति प्रगत प्रवास्पा होई । तब बरपा सरह कोई ॥ का को कुचो बो पैम दुब, मिन मुधि पिय मा मह । लिये मौचर निकठ, पौर बिना ॥११॥ इसीलिये मलको प्रम सापना प्रतिम सीमा तक पहुंच गई तो उसे स्वयंबर में बार्यका निर्मदप मिता। मयंती का विह [प्रेम सापना की गंभीरता] दुत प्यान पिर तो अनुरायो । बाते पर बिरह पी ॥ प्रीतम मुफ्त करसि क्यों न मोरी । सबबम पनि बतोरी ।। प्रब लपि पिए पान मै मारे । रोम रोम पठि वन रहे ।। अब ना तो पाप 4 सापै । बिउ मलाइ बहे न पापै ॥
पापि पीर दर स्थापिग मिम तोहि बार ॥ प मापाप तो प्रश, बोर तो माहि समार ॥१५॥ पिरसित तो निकम नहीं । मोहि विरको संसा कप नहीं । या बात हो सो मिम हा । पर अनमित बाइ म करा ।। निय बिय पाम प्रम कम सोरा। पह मम मूस कई जिउ मोरा ।। जिन कारन बिनती हो करौं । हा हा हा पीत हुई परी । हन तोहि मामि बहुत दुरापावारूप प रस सर्हि गामा ।। x y y दिएह रोग सिर बहुत भाग। साडू प नित करे सबापा। प्रोतम मितूतन प्रमग, सरा हे तुम पास । लिए मास दुख हन सह सोई मार निरास ॥१५॥ [परमारमा को पार मीत] पंच सा ही एकती , पूमन ही इम महि । पार पर पिउ तोहि म बो रातो गहि बहि ॥११॥ हाँ पनाम ए. होप म मोसोबोरुड होइ माय सब दोसों। मोतों मई म पुष भरमा ! माई निहारी गुमिरम करमा ॥ पहबार माह किम पई भाई मिति धन की तपसमा " तुम्ही प्रपर हो पाई। पापा पान हरिपरा ॥ शाही पिर परसन हो पाई। इन सन सों प्राप पाई। महाराब तुमसों सर हो। तुम कई परमनहार न पाई। मुम अपर सतरता । सामरिसके पाप पोहता। यो हुन पाए बर पेरा। हो तुम्हें कौने परा दोहा--१६२ मोइहि में परोस , मोरा । गो एक सोपहरित बोरा ।। पिन दिन पार पार पर शादै । रिस प्रमोबर वान पता। पाना बई पर पुनि सोई। पापहि पाल और महिं कोई ।। प्रारहि बमि पार पाहि तहाँ लोग हर पर। रोहा--१६९ मिसार पार साफ सग्मा का स्वाग] प्रोत्रम मुरत परमि रो र मोरो। सब पापी हो वोरो॥ हा-१५ पानम भार तास में सोई । रोरा प्रमुगल सब माई ॥ गौरि सापि मात्र माई । गए निमा मोरे net . x y - x x x मसमम - है। इस प्रकार उमका प्रम ममर हो पाता है। प्रेम का तरद पहो है। इसो से प्रीति- रस' होता है। मर्यारा पुरुषोत्तम राम में हनुमान को बानको लिये भो परेमरिया पा उसमें इसी 'प्रेमवरच का पर्मन होता है बहेर म बियोप तब सीवा । मो कई सझम मए विपरीता ॥ मवता शिप्तमय माह सानू । कात मिसा सम निष्क्षि सति भानू ।। दुधमय पिपिन दुत बन सरिता । बारित तपत ऐन बमु बरिया ॥ हित हे करत ते पीरा । परम स्वास तम त्रिपिप समीरा ॥ कहे ते कप दुम पटि होई । काहि कही यह बान म कोई ॥ 'तत्व प्रेम' कर मम पर तोरा । बानत प्रिया एक मन् मोरा ॥ सो मन सा एव तो पाही । पान 'प्रीति रमु एतन हि माही ।। इस प्रेम सरेरा ने अपना प्रभाव इस प्रकार प्रकार किया कि यहाँ मानकी पायक में बसनेको तयारी कर पी बिहाँ इसमें उनकी सारी सुपएप को पन्हें प्रम में मग्न कर रिया प्रम संविसु सुनत गोही । मगन मेन तन मुधि माहितही ॥ पसता व मृत्यु से गा मई और मित्तम होने तक राम के प्रममित परमाबारों को शान करती हुई भी निर और मटिग बनी ही। रापन पाई मारना चाहता पा पर मार नहीं सका। पातु, यही कारण है हिमोकन लिम्-पार्वती राम-सीता त्रिी सत्पमान पौर नमसमर्पती के प्रेम को प्रारम में अपनाया। पे महान् विभूतिया मोड माग की पीर तोर बीपन को विकसित करने वाली हुई । गृहस्थ पर्म (प्रवृत्ति मार्प) म्ही मार्ग पर चलने से प्रीति रस पृषत होता है। गुप्ता के संबंध में यह मी पस्नेखनीय है कि पह जितना पूर्वार (नाम से मेकर बमती के समर की पर्चा बसने तर) में पापा जाता है रतना उत्तर में नहीं तर्रार में कहानी अधिकतर प्रस्त रूप में बसती है। इसका कारण पह है कि मि पूर्वाश में प्रेम पीरमान का प्रतिपादन करना चाहता। प्रौर तराई में मोहम्पहार का। इसका संकेत रामा भीमसेन के प्रति बमन प्रपिके उपरेसचे मिलता है निवमें अपि राजाको पहले परमात्मा मौर मात्मा के मामा उपरेम करते है और तरनतर बहार वर्मा- परमात्मोपदेश सिया रामा मुन मोसौं । निज यह मरम कहाँ हो वोसों ॥ दो मुनि समृमि बात र पारेसि । मगम पस्तु मह मुपम निहारेति ॥ साई । सुन ताके प्रोहि चित सुनम् ॥ स्थिर निर्गुब अमेपा । परम रिसि पोहानशा॥ परकाता। पावनि सब कार्य प्रकासा ।। पर प्रोपर पंतर एमाही । तिमा माइ पा सब माही ।। तर सोई सब प्रेता और समी प्राप प्रदेसा ॥ यह देस पी हि रिवाई। चेतन सा मह रहा समाई ॥ ता दिन पाणी कपू. होई । पुन प्रारम विग्ह मर्ग नदोई ॥ एसे सब रंगन मुना, पै यह अपने रंग । बो मित्र पाहो निरपरप, ताों भपो म प्रग ॥९॥ मास्मोपदेश पर बोहि मोरो पति समझाऊँ । समा रेमि मिस रहे सुनाः ॥ को यह एक सिमट समाना । पर प्रौपर ता बिन नहि माना ।। रयों होरे भात पनि होई । मिस रे मित्र पौरन मोई॥ बो वह सो सिमट समाया । ममान उपा ममा म प्राया ॥ बो तू पारि पत पुनि सोई । मन ररापि म माना कोई ॥ यो यह सो सिमर समाया । मुमा म उपना मान पाया ।। बो तू पारि त पुमि होई । मन पापि म माना कोई ॥ पर पापि माप को वितारपि । भूत प्रौर को पौर निवासि ।। पादि प्रमर पर मिरता हो । वोर कुमत हाल में ही ॥ तोहि यह मिया भरम को भया । औरहि ते पाह है पर । पों पनाइप मापा अधिकारी । सपने महेहीमा निसारी ॥ माया निसि सपना मत, और मरम सो at समय सरल, पाने कर म निशान ॥५॥ प यह काम प्राय तोहि नाही । रमा पादे तिन माहीं ॥ तोरे मिय परतात म मा । मन ममीन पंडा उपमा । मारत * बम पी परराना । मारणबत ग्यी हो हिरामा ॥ पररे पत माही । बिना पिराने मत माही ॥ तमो मो तोरे यह रपमा । मुनसरबार सोहि सिम्पपा ।। प्रथम मनि मन परपन काई । तब मिरमात पारिजाई । सय स्वात सबर यसकता । सहहि बाप रैन नि बसा ।। तामों सरसोई मन मात्र माग ग्याम मन तिपत्र । पपर ग्यान हिप हो । हैरत रदम हो सोई॥ मगत होर प्रसव पर मुर्म । सहर्ष सात मरण तप पूर्ण । दुरिपा पवन पपान मन, तर मात्र रोष । मर्प नही मामा मिनि मोटो हो l म्यबहारमोपरंग मा मोहार परम मुन मोनों । बानि मुपार ही हो तो । दीहि वात रोहरा । तोहि पल का गाकर राम ॥
भानमन रात्रामा पीरहरू पसि परम पा पार । रामगि मत मग पिारे । हो म चुपी राम महे कोई । राप रप गुम मानहि ।। मियाब पर प्रार्य । सीप परि त ति ॥ है जाने । समरिभ पामो मिन पाम ।। रामहि यह हि तिहि पारा । करा निपाम कोहेशि सारा ।। जो महि बरियार राताब । तिह पसटे रामा बुत पार्य । राप र मिह र ग्परामा । तिरह कर सकतत ॥ रंप परया राई रामा सरर गोर। यह सपन राम 4 मपरी चिन को l मानमोपों को प्रस्तुत प्रास्याना कपूर पोर तराई में कतारमक रंग मे कमाय हिया मया है। प्रथम मान हा विषय निम ब्रा है पर दरारे मान का विषय म्पहारपर्म ।सार प्यबहार पपरेस पाप (राणा) के अनुसार रामपर्म रिप में हुपा है। परंतु रागा भीमरोन को किया ममा मह उपोरा प्रस्तावना रप में गोरा उपरे सममना चाहिए । सम्पत्र यह पतिा समित परेश के प में बहामी के शाम पाहमा है। कपि में एक बात और बीमती बनम में उसने परमममा को प्रम(प्रेमामृत) करप में चिमित किया है और मस के पन महान म्प में। यह गम सिम मे कारण है जो स्वापारित है। परमारमनस्व रोगों में एक ही है । बोना मुट सास्पिक वृत्ति के होने के कारण वह तब उममें पूर्व प्रकार आप में मास नपता है। रंगहीन पर कांच की बोतल में से पास रिमाईता है ऐसे हो गरे निगुम मत रहित मुख तारण में परमाम मी माम मनमकने सपता है।स प्रहार गरें भिरा प सब का निर्माण होता है वह मनुपम दुलम और पतारिक है। उसके पास स्यप (बगरप) का मानकीका पर जाना नबित होस रबि से इस रूप की उपमा रेसिपे नम होए पाताई पीर ऐता ही फषि ने किया है। यह भी बात है कि कहानी ब्रह्म की प्रारगिल करती पसती है। मन के सौर्य का न केवल कहानी के प्रारम्भ में है और एकदिरामा है ।समती तार का बम मार्टिन पारा तीन पार और कवितारा उत्तरार्थ में रोबार किया गया है। यहाँ पिय पप पले लिये रनले पारमिप सौरर्प का एक एक गाहप रिया बाता है। पम्ही में समस्त भेर नुन माता- मम का सौदर्य मह (रम पी मा) समयस वर्ष पासा ! मानो काम में (पामामा माम काम' भी सतिपे परमप्रमापी काम में) परतार लिया हो। बिसरे मुख से हुमा पमा, वही उस रूप को सुबर (भारत' पा। मत है मुप माय भ्प (अमर म्मान कोई नही कर सकता पा। मानो विधातासमपापर पर-पत में परम्प के समान (बसन्चोति) के समान मसनमम ५ नहीं पाती थी । सूर्य को देखने से प्रारों की स्पोक्ति बम जगती है और ये ताशीतप्त होती है पर हिग रेसने को मिलता है। परंतु माल को रेसमेने पर सूर्य को देखने के निमे कोई सातापित नहीं रहता था। जो नत को रेस नेता पा, वह उसमें सूर्य का (पूसरा पर्व समाप का) बर्थन करता पा । सूर्य को देखने से प्रांतों की को गति (बसने की गति) होती है वही गति मम पी सूर्य को बण भर अपने से होती थी (अर्थात् ममापी वान सूर्प प्रज्ञानविहार मुक्त प्रांतों को आप मर में बमा देता मा)। पुरप अपना स्त्री वित मी चित में बह रूप (सम्प) मतक पड़ा फिर पर सम्म भर उतहे चित्त से नहीं रता। वह म संसार हरम में समापा हुमा मैसा पा। जिसने ग्स म्पको बेला उसने अपने को राप्ती में हिरा विमा (तसरा पर्ष निसने उस बाप रूप का पर्मन किया बह भी बममय हो पपा)। मितने रामा अविवाहित पे उन्होंमे से ही नमरेप के विषय में सुना पैसे ही उन्हें राय रत्पन्न हो पपा (राष्प इसतिपे कि ससार की सुबरी मस को पोड़ गहें नहीं बरेगी)। अग्नि बनयुक्त मत यम क कारण पारित में बतने मगे। सरा पर्व मोरमोगगी (मर सात्विक गुम से प्रयुक्त) के रस मानसप के विषय म सुमते ही विरक्त (सांसारिक भोगों से प्रत्तग) हो गए। और सामाग्नि में तपे (नसके सदाय) शुर सारिमा परम्मम वर्ग प्राप्ति के निमित्त मी प्रपने रजोगम को मानानि में जताने लगे। जानोपदेश यह निपामा चुका है कि परिकहानी क सास-साप मानोपोग भी करमा चाहता है । नत इस रूप बर्सन में शामरामा प्राप्ति का उपोदा है- अझ ही वास्तविक वस्तु है।वही काम है । उसका प अनुपम है। भगह पौर सबरप में नही रप प्राप्त है । उसक रूप की मसक मात्र मिमने से नाम वम् प्राप्त होते है और मान प्राप्त होते हा ब्रह्म प्राप्त हो पाता है। शाम को प्राप्ति सिपे नियमों (सत, रम तम) को सम्स नए करने पर साविक इति प्राप्त परनी पड़ती है पारि । पहामी के रप में यह ज्ञान रसारमा पती में वणम स्मिा पया है- प्रो प्रति हात रजियारा । मामो काम तोह भरतारा ॥ मिह मप प कह मिहि नोरा । नत प प प मप पीडा ।। करे , और एप सरि तातं । पट बनु पर मिलिरोह निपात ।। परमी मय बौती । सरह मुप बोति म प्रोती ।। मैनहि बोति परै रवि च । मीतत होहि हम तर पे ॥ पूरह पि मौमार न कोई । म्ह दे सो परसन होई ॥ गो गति ममन ही रविता ! मो पति दिन हाई मत पाक ॥ मर राति ४४ मसनमा पुष्प नारि जाम बित परा । पिरिभरिपनमम धितोहा॥ होय रामाना । मिह रेसा सो तिहिरामा ॥ पार प्रन पर मुनि सो मा पैराण । प्रनत पण नाम बरन मग परम कर्म हो माग ॥२६॥ दमपतीपा सौंदय पह (प्रमामृत स्वरपा गमती) बमत की सर्वपाठ यो पपिनी की प्रदा ए कतासकर है। उसकी हार को समतियों में प्रमृत भराई सिमका पोपन मृतक । मुप में देने से वह तरकात पी रखता है (प्रेमामुत्त पाम करने से पीय तरकात मृत्यु मुमसे पट पर प्रमर हो जाता है)। मानो रिपाता म उसी को अमुत में पापका बनाया हो और हिर उसके समान दूसरी पी न बना सका हो । बह एक ही पग्रिमी ऐसी है बो पमृत से भरी है (परमारमा एक ही है और वहीं अमृत है) माने या रिसके लिये प्रवतरित है।हे महाराज ! तक मुमकी पोति का मौरर्प देखते हो बनता है। कहते नहीं। माह पावन पूर्णिमा के पासे मी. कही गय पोति बरे समान है। निचय ही बह पमिनी पावर पूर्स है। ऐसी ममीतक कहीं मुनने में नहीं पाई । गा कमस को मुमपि तीनो मोनों में पहुंच गई है। धारा संसार भौरा बनकर उस मुषि की माला में अमन कर रहा है। उसकी धीमा २ सबको मुमा लिया है मणाने बह किसके हाथ नमती है। संसार रन (अमृत रन) के बोर में है पर बह पनिमी प्रेम सा की मुरता पी अमृत रल है।माने कौन से पाकर समा (संतार समा) पार करता है और कोन पसी में (तार समा में हो) सूबा एकर प्राम देता है। उपदेश रमतीस तौरर्य वपन के साप साप प्रेम पर प्राप्तिका उपदेश मिमता है- प्रेम ही से अमृत पी परमात्मा पा प्रानर रायिनी मपित प्राप्त होती है। प्रेम ही अमृत है (परमारमा का नाम अमृत की है) परमात्मा सी प्रेमामृत पान करने से बीपबम्म मरमपन से मुकर प्रमरानर प्राप्त करता । प्रेम समुा में की ममान से बह प्रेमामृत पी मक्ति रस्न मिलता है जिससे बीर संसार वा से बा पमिनि पाहिबार एकरा । कर प्रपुरिहि अमृत रस मरा ॥ को परमार मिरतक मुखपामहि । बी पठि ठाड़ होड तत्तातहि ।। बनु विवि प्रमी पाप कर गरी । म सबै सरि इतर मारी। र पद्मिनी पो प्रमुख भरी । बो मिहि बोप र प्रमतरी ।। महाराव मुग बोति निकाई । कहि न पाहोचत मि माई ॥ बन प्रसौष पुम्पों ससि वा । तातों मंच मंति पर दुषा ।
४५ मनमन पद प्रारर पि पुमिमा । महागार प्रनो मरि मुत्री ॥ पुर मा । अपना भोर मई मितिमासा ।। मुनि सामा र बर सोमाना । पो कार्ड र निराना ।। बामनिया पेम एपि, ममण्न मा नकी पारं रिपुर १ जीव ४ (यहाँ रमली की रंगठियों में समा बाहोरा जाप में ही रमलार पदा रता है परंतु प्रालार्य में रंगा ए किा गाना - हार्मरम्म मी रमर्यो राति प का मी ६ मा दाम दिया बना दिममें मोपकारेशर एप और रितीका शिला में पर मानेर ण रिमा प मकारों को मारोगाजीमा मो रसमा- मा पर चार रा रन प्राई । बल प्रदाम राम रिय॥ रेश पोन पुपों ममि पा । म पीर पर पगरा ।। बहे मा मोबन मन पग म्पाम र प्रम। पर प्रपर मो राप पि, बग का कई कर्मक 112॥ पीडी परमानं । निमा तहि मा परात ॥ मिरहम हिम नारी रशियारी । पर भयो हम पारन पारी॥ x x प रह पर मा पोतरा। रहे है स्प *रा॥ तारी पनि दौन रहान । प्रोहि कहे को परस सो बान ।। हि माप मारी मां स प निहिं । कप स्परपम पहा मर रूप प्रदूप । और मो- मेरे गान तिहूँ पुर माहीं । तारे कप और पनि माहीं । दुनिय नास्ति एको पप माम् । कहि म जाप तिहि प बनान् ।। y मोभूमि का प्रमाम ते हो सर्व रेप हो तिता मिरा आहे तर राइ Intun महानोरे प्रामारम पा रोगार निधार करें तो भाटिम पता बतानवापी कोई मुभीजन पा पाती पूती अपरा मे मान्यता प्रमार मुएली है। मम मानो पार रसठी पमा । झान २ प्रकार प्रणि पौर मूप है और प्रमुत्र कर प्रम पार । बाम पार पपिनी (म्मप) श्री प्राप में अमन पनर मिन्हें मोर म ममममा गरि ।
४५ मतगमन हान पोर ममा रोना ही पधप है- पान स्वप्रकाश पिगमा पर ज्योति रसो। सो बाप नापारी मति तुम सारिप जान से अमृत समग नहीं है। को मान है वही प्रमृत है। मान साप साप प्रमृत की सिटि भी स्वत हो जाती है। पीय बिना रापस्य में किए नानामृत पान र पारमानको होता है। ऐसे ही पर पारिस सम्परम प्रेम से प्रमा होता है। ही की कमान निवृत्ति मार्ग पौर प्रवृत्ति मार्म कहते हैं। पहमो स्पिति विषय पातमापों रो पर हम फे सिम संसार का सपा स्पाय करमा पसा है मी दूसरी स्पिति में समरस बराबर पुष्टि की परमारमामय (तुमी र मो में मिय राम मम ) रामझते हुए उसके पाप संपत्यापित करने की प्राबासमता रहती है पही दूसर। रिति गहस्य पर्म का मर्म है। गृहस्थापम में ही फबिता कामिनी प्रथम प्रपम मब गंगार स्पा मीर उस प्रपम महाकाप्य को मम रिमा जिससे समस संसार मीहिक प्रीति रस से सिपाहुमा । सभापम का मूम मेघ निश्पन प्रेम है निापसता (पस सारिपस्ता) में मान है पीर प्रेम में प्रमुस । जान का प्रतीक बसा पर कहा मा पुरा है सूर्य है और प्रमृत का बा। पूर्व की रत्पत्ति महत्पुष्प पी पोप सेहोरामा को उत्पत्ति उसके मम से- घामा मनसो जातश्चमो सूर्योऽप्रजापत इसमे पह सिर हमा कि निरयस (म सारिवक) प्रेम परमात्ममय है और वह मौत और मन से होता है। प्रांतों में प्रियतम को बसाना पड़ता है, और मन उसको देना पाता है। बिहाता पमयंती महती है:- रिह पगिम पर कीम्ह प्रकासा । प्रापिन निस्ट त कर बाता । x यह पपिक नस कोपा ताबा । मन पंपी प्रवेत परभाषा ।। हो अपने मन को भरी भो नसमा परमा। राब कफ नात जो कोम मन मोहि ह मया ॥१६ सचिवर प्रसार' मी सोपा में मामिलाते है विप्रेम पिए मिमन में सुधमुप प्रति और मन काम प्रेसते हुए मागे- मानव जीवन बेरी पर परिमय है बिरह मिसन। सुख पुष दोनों ना हम प्रॉसौ मम का ॥ प्रस्तु, कषि ने नम को 'वाम' म्प में और समयंती को 'प्रमत 'म में चित्रित कर स्त्री-पुरुष की तमामता के सिवान्त की भी पुधि की है। यह भारतीय विचार परमी का प्रायमन करना है। मार्य धर्ममानों अनुसार मी पापिनी है । स्त्री-पुरुष दोनों ही बराबर के बीवन सापी है । एक ह य मष्टि रखने मिति पुरए हों में रिमा एमा । यी शक्ति पाई और पुरष शिवस- सप्दयप मारमनी र्प मर संग्रा नि । मा मापठ थी पुमानितं मात ॥१॥ निब प्रपान पुग मिार परमा गि। मिर पाएमई 10 मोपितम्मनः परमि मा महाराज म पर परम् । -मा। मामार भपाती मग दुप पर प्रम् भूरा प्रम स्याहार्यों में प्रयाम्पमान कामा परभाषिता या मी मपन्नता का मम नी पि पिया गया है।हानी प्रस्थर बन्नुम पर पोप इन गान आम मुर्मा पर पुन पर पनी, ना माग मार निवासी पनिहारिकर, सिमाम दुप पान पीर हामी पोई पारिबममा र रनम प्रमा सारया मचा है। परमार की रपमा मलाई धारकाना है कि मानिस सही प्रपद नातिक मोपहर प्यार में भी पो पाd मार मम त प्रमा बसों कोतए बमन में यामीन हारप्रियतम पार प्रेम में गाx मी प्रम म्यान में एक पप में पड़े है। सरा प्रमाणि मागासोट बना देने वामी परमापौर उमड़ी प्रमोम्ममा मात्र पनि है गो ग प्रमाणिम अनुचित नमीन हॉपले प्रान करता है। मपी प्रेमाग्नि में अपहें है म बप मा सारा वन भी संपन हो जाता है। मी मानाप्रमापो में मुमामि हाने ममते है। पह माने पर वे पिर पार है परना प्रम दारा नहीं पाता । ये सरा एक ही पामिप (प्रेमात मी परमाना गम) - प्यास एस ई परहित के लिये तरा महते है। (तर) मानों बह रहे हो कि सार में गिरमे ही हैबो वर्ष जेठ पुष हरपूसरे पापा मगाम करते है- दो बह नगर निपर के भाई । पूमि पेम मय ग शिवा ॥ प्रन परमर्वत परमान् । तहि भाति पर्व हर सान् ।। महाँ ए. सिस्टि तिर म माप । सोई नाग बिरिष नर बहुँ पाना । वन पेमी बन पिप के पैम परे हो । तिम्ह ही ध्यान एक यो यो पेम प्रगिन तन जाएं । पतमा ४८ पास पों स्पो हाहि पेत्र मरमाते । गाई पात न T- यो पनि परे बरि तन मरे । गर र पनन पर पाके पाकि पाकि तब पिरं तर म पम ग पाल एक पागिप हो गई । पर पास टि तार मा इनि मह व हिरण उपरेल स्टार । सीर भूप प्रापमा मतमन पनपट का सप तो गाहो परस पीर पमाफार पूर्ण है। पनिहारिनों को पारित मुनियों को पारित की तरह है। जैसे बड़े मुनि पोटे मुनियों को उपदा र है पसे ही पनिहारिनोंता भी उपरेश पाता है। पे एक दूसरी को पत्रों की पोर एप्ति रस घट को मोर पान में का ग्रेग देती है। बाकी दृषि सोपो कर मेन सिर में मोम और बार रपरीती होने की पेतावनी दी गाती है पारि। यह पारा उपरे। मान सापना की पोर भी रित करता है जैसे-मन को एकाप मा पाहिए। घट स्पीशरीर में हो परमारमा पी मारमा है उसमें प्यान सगामो । परस्पी गरीर पम्पो बोम है। मानमार्ग एरम है मम के पंचम होन पर उस मार्ग से प्यूत हो पाना पाता है। रितो साब नबीम पारीर मिसमा मोर का परमात्मा की कृपा होमी- पनिहारी रेणी मृम मी । पर पामिमि मौकोपिन नी ।। पहिरबीर सो मोतन मोती । समुमिहिको यो प्रस पाती ।। मे पात बई पा हामं । मह पानो बसमा मा ।। निपर माम तो प्रावहिं बही । पान पिस्टि सुरत पट माहीं । को कोई रापी मेख ग पर । पूपी रिस्टि बार है॥ मिस सब सतो ताहि सम्माहि । बम परदेसिन पंप बताहि ॥ बार बेतह पर मई मन । बाकी तिर सूप कर मर ।। रपटीमी । रपट परे दुर होर फ्योमी ।। जो पट जोरि चाहि पर पूजा का पुनि कई सके पूर्व ॥ रपर फोरि पर पोर बम बिन पानी बितसाहिं । पुनि बी कब पापा पा का मुम्हार कई बाहि ॥४२|| रममती प्रेम संबंप में थोड़ा सा स्पप्टीकरप करना बित होपा । मन क्या में इस मत-समर्पतो के बीच प्रेम सा तेबाने का काम करते है जिससे दोनों में पुल भामारा पूर्वानुराम रत्पन होता है। मम बमन में कषिन इस स्पान पर भाटिम को पोयना की है। परंतु मारिन डेबस मत को ही बमयंती का पता देती है मोर तत्पाचात् नप्त हो जाती है। समयंती को मनरे विषय में पता मे पाता कोई नहीं । कवि ने यह काम 'प्रेम' से मिया है और इस प्रकार यह प्रेम का माहात्म्य रिसाना चाहता है । पसा कहना है कि प्रेमी मौर मेमिका के बीच दूत का काम प्रेम ही बाद मिता बोचहै पीर मोतो पम करो पर नेम । प्रेमी प्रीतम मिसमी बीच बसीठ सो मेम ॥१०॥ प्रेम का पालन ऐसा है किबो बिसरप में पता है वह भी रसके मर में मत्त हो पाता है।बो बितको चाहता है हमी उसको चाहने तक्ता है। रोनों एक ही प्रेमामि ताप ते तप्त होते है। दोनों पोर प्रेम हो त संबंध बनाता हुमा दोनों को सुरति गेरी से बोरे रखता है। मन्त्री प्रीति बिपाने से नहीं पिपती । तन तो बात देखने माम कलिये पाय है। वास्तव में बह एकमात्र प्रेम म्पी परमात्मा ही सब वह ज्याप्त है। पर प्रेम पचन हो जाता है तब दोनों में कोई मेर नहीं रहता। मा ने रक्त नर-मन महाया ही पा कि मजनू की प्रांतों से यह मिकत पड़ा। इसलिये प्रतर तब तक हो शिवाई देता है जब तक मैं प्रौर की कमाई बनी हुई एती है। प्रेम में तन्मय हो जाने पर तम प्रौर प्रान एक हो जाते है। तम उसी प्रतन रूपी परमात्मा में है और बह प्रतम भी समस्त तन में व्याप्त है। इस प्रकार मान होने पर दोनों प्रेमी प्रतनमय होकर मै म एकोहं हितोमोनास्ति' हो जाते हैं। मही प्रेमास्यानक काम्यों का मांत सिबत है मोकविका वास्तविक प्रभिप्राय है रंग रमी । मोर पुनि ताई मर मत ।। जो मिहि है बहै तिहिं सोम् । एकहि तप तपे मिति पो॥ पम बसोठ एक ई पोरा । बहै सुरत गरी कर बोरा ॥ सांनी प्रीत मए पुरानी । मिन बासौ ताई तिम मानी ।। तन यह रिस्टि माता पारा । तो एका बो बामनहारा । मी पनि भवत प्रीति बब होई । तब तिनहू महं भा , कोई ।। तेनं हा बो रफत माया । बहो मजनू के माहि प्राथा ।। r रिचाई। मौनों में तनमै भएन पम्तर कोई। तन प्रो प्रान सो एक होई ।। तनतम ताहि प्रतन मई प्रतन सब तन माई । वह प्रतन तब में भमो प्रतन पुतिय पनि माई ॥१८॥ पर निशाता पूरी तरह शांत नहीं होती। परमामा के सर्वप में भी पहने से हो मुनामुनापा या संस्कार के रूप में, उप म एपमान बना रहता है। जब तक यह माम नहीं है तब तक भान मार्ग का अनुसरण करना बेकार सा ही है। जब प्रापार हो नहीं तो प्रापेप कहां से होपा। इससे विरित होता है कि रमपती को नाम के एप खोर का पता पहले से मनाया। पुराम बमाने में राजकुमारों और रामकुमारियों केकि मिकिया भारान प्रान एक राग्य से दूसरे राग्य में बराबर हताना । म चित्रों का परिचय मी रिमा माता पा । सो प्रापार पर मह कह सकते है किमती को रस के विषय में पूरी जानकारी दी। यही नहीं उसके हसप में मात के म की बिनपारी पाको पी। काम्म निम्मसिमित हो ग्यरषों में इस मत के हत मिलते है पर नाम चित्र बनाया । सहर मुम ताके रंग भावा । चिसो प्रगत पर निपारा । परा हता हिपरं हिमपारा ॥ पब मपि प्रेम पवन सो बामा । मुतया हिया गरम तम तागा ॥ (हा-१४. इसमें परहता हियर रिलमारा पतसाता है कि दमयंतीहिरप में मतका प्रेम विनयाप में पहने ते पाहमा पा। पूसरा रारम- बन रागा ओ व्हावा । बारा तास बित तापा । मुनिबत मनात बम मियारा । तिहि कर भरप नगी परम्परा ।। 4 ५. मसनमन पह वाह हिपर मह परा । संका है प्राग र परा ॥ तिहि . प दिन एक चीता । वह राम के नाम सौता ॥ निशि शिन है पेम अनुरागी । पोट होर तही बरामी ॥ रोय मनग मित्र मई कति यह ति। बिहि को एसो बिन यह, तो पी सो मित्र ॥१॥ इसमें सुनियत से पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि सखियों ने मस' 'प्रनतबरप होने विषम में सुन रहा भा। प्रतएव रमयंती के दाम में मत क प्रति गो प्रेम रत्पन्न हुमा बह गुम पग चित्र और स्वप्न बर्तन से हमा। कमि मे मुफियों की रो पग्य बातों की प्रोर भी प्पान रिया है। उनमें से एक तो है 'मपुप्पाता और दूसरा है 'विप्र विधान। मपुप्याता के दो पखरण रिए जाते है। पहसा- प्रो र भाग मर पेम चुपा । नम का नुसती माई ॥ पेसो पेम । बासों रिया पेम मप बारी ।। मपी म x पेमो पोरनहार चालत पिम पकि बाहि । एक पिमाता हिर पिवं इमर रेहि पाहि ॥२६॥ - वित्र मुराही मम पिपाता । मा वह मीत पिवं यह बाता ॥ चित्र विधान का एक सरस प्रकार है- नरपि तोर मित्र मोह पाहाँ । रात रिस पितो तिहि माह ।। चाला ती तातो पिरमा । मन चल पा न रहा। सो तो मूरत चाहे । पाप है प्रो सन राई॥ जिस निय तत्त रूप पर दूधा । तिहि र यि रिपाबत मा ।। यह बात पह चित्र नबी । मिय को जोर प्रान सो पौऊ ।। इसमें चित्र विपान के साथ साप मान और प्रेम सापना का चित्र मोबीच रिया म्पवहार मर्म पैसा पहले लिखा जा चुका है, विमान पौर प्रेम के साफ-साप पबहार धर्ममा मी प्रतिपारन करना चाहता है। इसीनिये साम्य रत्तराई में (समयंती स्पर से लेकर अंत तक) कहानी प्रषिष्तर नौकिकम्प में बनती। मिस पर्म का महत्व परसामा मया है। लोक पबहार धर्म पर प्रामारित होना चाहिए और धर्म सत्य पर। सरप पूर्वक पबियन करने से मनुष्य को कोई नहीं सता पता। धर्म पसका सहापा होता है और जिसका नर्म सहायक है उसको बहनोक एवं परतोक का कोई भय नहीं मत-मन - पता । यों तो पास पहले से ही सरप और पर्ष पर बनता पा, परन्तु प्रमसामना में कहकर और मयंती बसी स्त्री रान मिल पाने पर उसके बस पौषष, रासह पौर उत्तपापिय में प्रति महोपा। इस प्ररमो कृष प्रपरिपूर्णता पी यह तब माती ही पार यह पूर्ष मानव में परिवर्तित हो गया। रिम्ममापुरी संपल तिमोक सुरी को प्राप्त कर सेने पर भी यह बात मोमों में लिप्त नहीं हुमा। यह पर्म मार रामनीति के अनुसार काम करने का वितसे प्रभा को पहने सपी और पारी मोर पर्म कापलगाता हो गए। हरिम्मरम के बिना कोई काम नहीं होता था। वह सरा पवित्र हता पा पौर नित्य भतुन बाम तामा पित नत बाम पंच पप पर। राजनीति परमो तस करें। परबा सुनी परम र रायू । हरि सुमिरल दिन मीर म माम् ।। सा पवित्र म रिम है। राम प्रथए भी मित है ॥ ऐमो परमवंत हो । माई नि म्याप को । व्ही हि परम सहाई । जहाँ सस्म हो पाप बाई ।। परम तहार कोटि पुष गरे । परम सा संताप नियरे ॥ समय परम मय पुरसबो को सिहि सो सताइ । मोर को भव हो, माई परम सहा ॥२४॥ पसे पप्प परामय तयारी और पर्ममाम राजाको संसारमा ऐश्वर्य स्वतः ही प्राप्त हो जाता है। इसलिये कवि में मरमती के सुमनोम का भी पूरा - होर माग पुनि सा दावा । रिपिता सुन बोम बनाना ।। भोम विमाम पर मिति बोस । राहि प्रौस महरिघोस । पेम माते । प्रमहकरण र प रस्ते ।। रोमन मिनि गो होहि त म तिहि तुका रपमा बोला। पी पर राग मोम कर साम् । माप कोनों सर्व समान ॥ से पर्ने । पूनम को गुरास रंग समे ।। लिन पोइ त है। मौ अनी । रेन होहि मिति एई रती ।। मिला करम मार कर बोरा । मेर सरोपर महि हिनीरा ।। मगर समा म माई है। सो मिमिट भरकर पहे. ।। पोर पापे पैम रस हि पिमाप तास । रात पौष सहि रहे, पद रितु साह मास ॥२५॥ सम्पत्र हा मा पुका है कि तत्वबारी और पश्मिा पम्पों के पर पर विपत्ति प्रातो है तो उसका कारण प्रारा समममा पाहिएसिपुपरेकोप से मतामती पित्ति में तो का कारण परिने प्रारम्प ही बताया है- परिपारा । तो कार र सारा॥ एप मुम होगहार से हो । निहिं ईपतन हं हो तो।। मि म परासरप हर भो । पर्यो होना पोहोर संगोपू ।। ।
१२ मातरमन परम पवित्र पिन मठ, मोसा । परालयप बस बम बम शेता।। मम पास परम मा दोहा । पराप्तस्य सती तिन कीरहा ।। करम आतप मामी संमोगी । मोर पराताप 2 मोगी। परासयप बोपी पाया। प्रातम बीप भयो मिप्ति मापा ।। यह सब परामराम कर वसा । तेही पीरह तप्त पुन मेता ॥ परामप मिति भए एक पारे । परातबल होर है पुनि पारे । पराराप दुख मुगप सिन माहि मिनभाई। हरप सोक सिसा मन मित रह साई माहि ॥२४॥ इसमें गरिने पावागमन (झिन पावहि मिन माहि) का परम प्रारम्प बताया है, जो भारतीय विचारपारा है। प्रस्तु परंतु प्रत में पर्म पी सिप होती है। कतिपय परास्त मापौर मम समर्पती में विजय प्राप्त करते हुए मेप मोल यानुसार मुसपूर्ण प्यतीत किया इस प्रकार में पर्म, प्रेम पौरमान का प्रतिपादन किया है। धर्म से प्रेम (मपित) गत्पम होता है और प्रम (भक्ति) से नान । भान प्राप्त हो जाने पर मोल प्राप्त हो जाता है। पार्वती हिमालय से कहती है- मानात संगायो मुवितरित नाय कारणम् । पति तापते भक्तिपम्मो पसारिको मतः । तस्मामुमुमुर्पा ममेर पपापपेत् ॥ महा मापबत मपबतो पीता प्रथम प्रम्पाय धर्म (यहारि झम) पौर प्रेम (मक्सि) का वास्तमित क्षेत्र पहावामम है । मान के लिये हम्बामम (संसार) स्याप परमा पड़ता है। प्रवृत्ति मागी प्रमावस्या में इस माग का प्रवचन करते है । कवि रमतो की मृत्यु हो जाने पर मत से भी पहवामम डाया- हमें बन बम वि प्रगोस । ह तत्रि मीत सार तरोत ।। मोम र रोषत सब स्पापा । पूग मोह मौत मन सापा ॥ मन तिहि तन तुरत गाई । प्रान तिनहि में पा समाई ॥ उपप प्रमाम हिराना । बत वियोग संबोप समाना ।। मुमिरन मबन बितर सम गपेठ । बाको भये सो प्रब भये ।। मुमिरम मगन रेह मित हो । सो तम मिय तो प्रपत विछो । मगिर ग्यों तन बहना बाना । पेतन पुरण समय पहिचाना ।। बपि तिहि काया यह स्यामी । वह है पापितों नगी । प्रापि भवपि पूरन बब मई ।पो बम्त बिचात तर पई॥ अपपि बिरतनको तमत तोमम तवं परीत । बार रिकोर, तब पार्थ परतीत ॥७॥ पापटिप्पनो १ रेभिर व प्रति प्रेत मे चोड़ा और उसकी पीपारण।
No text on this page.
मसनमम हुमा काहि सौ राम समान । मान प्राा प्रमटा पहसार। तरा पबितर एं। ताते मुमम महें ह॥ मे दम पहप भरें परता । सो कोटी तर तोनि माग ।। ताती ताप सपे सन गरे । श गी पूरितीस पर पो॥ पप गाहन दुतको ठक 4 पहि रवि पूप । पर बार पौरोत मह। बता पार मत भूप ॥२४॥ रामप्ट रामा मत पाता है । पुपरका कस्प गीपन है । मया भोर समर्पतो कारन मनुभाष है । विपार, पिता मारि संचारी भाव है। [षघु मा] मत तिहि सो सौस महं मारा । भूख हार माई तन पारा॥ पन पा कर मारो । पहिर पार मनन , रिपोर्ट । मैनन प्रपिन सपर मत का। पाप परा मौरहि गरगहे। बम को पर मोव्हें बम भपक । प्रम पर सो सराप होर मये।। तरह मिहि दिन र दोहा । सापकत पार " पर पुनि नारी प्रतिपाना । सो तो महति प्रान ग्याँचाना ।। मो तो मरे जाकर निरता। मम निर में मरमम।। मरम यहाँ पे मरम न पाबों । सुमिरन करों हारवी माों। पांच बरव पर प्रान बिहना । तन लिहि मापि निया तो पूमा ।। मे रिमापर निरो भी मिमताय । बहे 2 मरे, मो नमन मान सम्म ॥१॥ रममंती की माम माना है। उसकी पतिमस्ति पारि पुन-मरम गोपन है।मन का रोल भौरब निरा मनुभाव है। निर मोह स्मृति पार प्रतापापि प्रभुत रस स्वामी भाव-विस्मय । प्रायम-प्रतापित पीर प्राश्चर्यजनक बस्तु और कार्प- बो सेतो र मस । नत विन व्यों नसबत बामे ।। मो पुनि मत ता हिप बो समाना । बो देखा सो नत * मामा ॥ एविएं पड़ी सोच बिम करे । विष किहि भांति बानि पिर परे । मोबन भर ो । पाश पीर हार तो गोर॥ एहिं समा माई पीर बी पागा । वो पामा पुगि हाप म मावा ॥ कौतुक एवम प्रभा यह पाई । मौ अब बिना माहि रहिवाई ।। x --और-२.. बामहि निषित होइ मापा । तर तिन पर प्रषित भरावा ॥ पर मंतरवामी । बट मोपर समान विसरामी ॥ x गमनमन घर राती ॥ x मूर्स पंप बवाचन हारे । संष्ट पर पावन हारे॥ तुम बानो मिहि मर हाँ माती । बाले पैम रंग सपा कप मोहि बह मिताबह । पह मो पर सिल पाहि छ । प्रसरण सान तरन पर पई । तब प्रकास पानी तिहि मां ॥ [ोहा-२०४ x x सुन प्रकास बानी र पारी । तर प्रघर पर निरति निहारी ॥ देवं शिगुन प्रसग तिन माहीं । एक पुरुष गुगा फोर माही ॥ बहे प्रमात रा पिर पा । और प्रपर ईमाई ॥ एक सो पुरत निरनि पहिचाना । मिरा भरम मन मिहर्ष पाना ॥ बिहेसि कहति पहे तो पौर । मिहिने पापा मापन बोझ ॥ पातम अपनाया। बमाला पहिरारा॥ पर पर यह परी पी। बाकी है ताहि के भी। [हा-२०१ गह मेग x x x प्रो पुति पगारिक काहि परिण बस्ति भए तर ॥ गोहा-२.. बावित नाम का रिमा पौर का मौका होना पावन । मा को परम परम का एक मात्र प्रबसर पंबर समा ही होना गीपन । प्रार्पना करना पाहारा नापी का होना और मस कोपरग करना प्रावि रोमांच स्पप्त करन पान कार्य संचारी । बितानों को विस्मय होना मर्मत रत है। गतिरस स्पापी मार- नियादाम । प्रासंबन-प्रमिय संसारी मिस्सारता कामान मा परमात्मा बितन । यह रस एमयंती की मृत्यु के पश्चात् मन को निर होन पर यमित होता है- राय काय सों भर रासी । पह तषि या वह बनाती ॥ तेन तो तारा । निर पापन लिहिं बरन मुमारा ॥ प्रापन सम् । भौगो का सब राज समापू ।। महि भूमि मुनि व्हावा । पारठि सिर पर परावा ॥ मोहि प्रा पर रिह मया । राम पार को सिमरठ पय: ॥ राम मरिर पर भय प्रणें । बाप र मिमा इस सौह ॥ पारानात होरे पापारीहर हर प्रपि पिलमारी ॥ मन त गा हो कार। रिसर म बाट ग्यों ।। मोहिमा मसम रे ग पाता । ए मार अपन कर पाना । x परसोई मोहि ना रे मलम बोल यिो मह । मन माता माता रों, पाना सात सौ रेह ॥॥
x y पन्ह ये थमन, बात हि प्रगोसे । प्रह तिमि मीर सकार गोल ॥ मोग कुरष रोपत पब स्याणा । एरा मोह मोत मन तामा । मन तिहि तम गुरत परो । मान तिमाह में रहा समा॥ प्रमान हिराला । पात पिपोय रांगोग समाना ॥ [रोहा- x 'नात रमन में पुरा प्रसंग न होने के कारण पीर रस का प्रभाव है। परंतु बहुत से लोग 'पीर' और 'पर्म वार को भी बीर रस प्रतर्गत मानत है। मस में वे दोनों बातें पाई जाती है। इस दृष्टि से महाँ महा एसे प्रसंग पाए है वहाँ यह रत मी माममा चाहिए। भपाल रसासर पाए है बसे-मयंती के हिंसक पम्मो से पुरत पन में पहला महा सिह रहा, पहा है पीर पो हापियों हारा सार्पवाहों के मारे पापी पाना होगा परंतु न जाने कपि ने पो म पसते परत रस का परिपाक महीं होने दिया। होसमता है प्रेम सापमा मार्ग पषिकोंगो भयानर का अनुमान होम बना ही माम कारन हो । यही बात से और पीमरस तो सर्वम में भी सममना पाहिए । सापना दामों को कोप और पुमा से पा माता । हा हारम रस बह से ही मम्मकालीन हिरी बिपी रा उपेक्षित असलिये मस्तुत करने मी पससे विशप संबंप नहीं रखा। फिर भी मत बमपंता के प्रथम मिसन प्रयतर पर सबियों के दूध में इस रस की पोपी सो महक मिलती है। प्रसकार पतकारों का भी गा रमनीय विमान लिया गया है। मनक प्रकार के प्रसंगारों की योजना पाई जाती है। प्रेमा पठ मोर प्रतिश्पीति निमेष रूप से प्रस्ताए है। अनुप्राों के घर में कपि गाव नहीं पड़ा। परंतु वहाँ व्ही पाए है तो मत्येत मापारिकप में। कम प्रहारों गहरम रिए बम्ले है। - अधिक तप्य पक भुरे पर पार मा बसु माई । बोर मकाम बन्द सिरा ॥ और बोस पुप्पी पति परा । त यह पौर र परमा रोहा- मयंती पर उपमेय को बस मह पौर र परगा पर पारा पपमानामा मिन बहा गया है या 'पापो सप्सिबढा' पनाराप पपमान से बाहर हो जाता है। इसलिये प्रपिक तय है। प्रमेव स्मक [सावयप एक देश विवति] निरखत और मेष परि माए । विष्ठ सिन् हिम तो बनाए ।
मन
बरत साग
परन ८ पट पर पह लियो । तम मिस क्यों रिन हिय इमि भयो ।
ममोर मोरी। नंबर भीग चुमा होई मोरी ॥*
(दोहा-100
परेरी में सहदेव वामपके मिममे पर मयतो रोने लगती है। उसकी प्रमुपारा
का पर्वा से पक बापा पपा है । नयन मेष रूप होकर ना पाए ह । हरप विह सिपु
है वहाँ से मेप पत में गए है। परनपामा रूप है और पट पटाम्प मिसमें परन पी
हमा पिप पपा है [रमयंता रोते समय मुत को परम से एक मेती है इसलिये वस्त्र को
पटा रूप कहा गया है] यि मी रिम रात्रि मी तम में परिणत हो ममा है। प्रम्
पीप ए रह कर होने मपी है। बता मांग कर प्रोरी (चप्पर का रतुगी भाग)
स्प हो चूम लगा है। इसमें सब प्रवपदों का पर्यो रा मन किया पपा है, परतु
पर्वा रुपमाम मिप्त प्रम् प्रम का प्रारोप है उस प्रभु का प्रसारा कपन नहीं किया
गया है । बम प्रप बम से जाना जाता है। इसतिय 'सावयव एक बेस गिति ममेर
माला स्प भिन्न शम्ब परपरित स्पक
बन पावक कह ना पिट स्वाती । रिपोर कहं पन सप्ति राती ॥
पन पो मोन पाबा पिर पानी । पिर प्रति पर प्रबुद्ध परपानी ॥
पन कुमुरिनि प्रीतम सहि पाना । पिर पतंग बन दीप तुमाषा ।।
पन महिनी पिर मेह मुमापू । पिर सारण कह पम पम राम् ॥
पन सीपी पाबा पिर बम्ती । पीर मूब भोजन पन राती ॥
रोहा-१९
बमयंती में चातक प्रापि प्रारोपका कारण मम में स्वाती प्रारिका पारोप किया
माना है । रमपंती में सति मीन कमम प्रारि बहुत से प्रारोप मिन मिग्न हाम्रो हारा
नए पए है। ऐसे ही नम में मी किए गए हैं। जैसे-हो, पानी प्रति प्रारि।
पवएर माता म्प मिल प्रम परपरित पई है। परंपरित पर में एक प्रारोप दूसरे
प्रारोपका कारण बनता है।
एक प्रांग रूप का भी बाहरण रिया बाता है को काम्प का भी उत्तम
पहिरे पौर सुहागा । तिहि प्रकार रवि रिसिभ प्रादा ॥
बिहरम मुख पति हो करा । मन पसर माह मनु बोगा ।
रन पबम बि मन पाका । ममा ऐ बालाई रप वाफा ॥
बना यो सीपम रमिपारा । पा मित्र मिल गलत संबारा
तुर ति सारणी पाताहर प्रो प्रतम बिरा॥
तोहे एमन बो मन नागा । माना नापि प्रिगन मुप्त बागा ॥
"तुतनीय-चरम मपा मोरि ममोरी । मोरान पुष बस प्रोपे ॥
पपावत् ॥४१॥
मातरमन रानी ।तरीम सप तुर मनुरापी ॥ x x कोम भापानी । पापु प्रापरा प्राहि पानी ॥ x x x भापा करिने तो मापसी को हठ प्रामीण प्रापी काही प्रयोग दिया है पौरम रामचरितमानस की संस्कृत गमित काही । उसने दोनों के बीच का रास्ता पकता है। उसने महामारत और पुराम साहित्य का भी पारायन छिया पा- मारण में बो पा बपानी । प्रारि त बानी मह पानी ।। बात बात मै बमति बनाई । 'पा पुराम मय सिराई । तात्पर्य मह हि महाभारत पाने २ पाचात् उसने प्रस्तुत पंपकी रचना की। पूसरी बात यह है कि उसने गित गान ना प्रतिपादन किया है वह सूरी न हो भारतीय है बो उसने भारतीप व (नागि) से प्राप्त किया। इस पुष्टि से यह संस का पिान सिर होता है । इसलिये मम मन' में उपर्युक्त पंपों की भाषा का संतुी म्स एप्ठिपोबर होता है। परंतु कपि मे ऐसी भाषा मानबूझकर प्रयुक्त नहीं की इसका निर्माण उसकी योग्यता के अनुसार स्वतःही हो गपा । बह प्रतिमामामो कमि इसलिये उसमें मारा का मापुर्ष पुगतपम, भाव पूर्ण महावरेगर एक रस पीर प्रमा पूर्ण होना स्वामाषिक है।बहीही बो प्रवर शिवाई देता है पह उसके भान प्राम। [fसे वह 'गुप्ताप बहता है] रिमेप प्रमितापा के कारण है। वहाँ भाषा साप्य रिहा होकर मन भास्त्र की भाषा मात्र होकर रह जाती है। इसके रुप नगरपरिए जाते है- पिर बोमा पारी तुन मोो । निज मन मरम बहीही ठोसौ ।। मै बबसों तो मह मिसरा । तबसौं भाष परी न बिहारा ।। पिन बिम सुरत सैम तय तोरी । मन ही मै रा पोरी ।। से मिरप मन मा । मो प्रतिम बास ग्याँ पा ।। चातक स्वाति प्रासा । मिस बिम चित प्रकासा ॥ त्यों तोतों में लगन समाई । पुरी और पों सुख मिनाई ।। निस दिन सोच हा मोहि तोरा । सरत सूत पिन बोर, तोरा ॥ एसि पर लपी मन मोरे । प्रो पिर मोर पंतनु तोt॥ हो अपनी सत भाव कहि मब चूमत हो तोहि । पौ पेम स सुनो, किमि बोन्पा मन मोहि ॥२१॥ बी तुम पुनि पृषी मो पाहा । बिनी सुनी सरबम महा। में बरौ पिरसों गिर मावा । तब ही तो प्रापा पिपरवा ।। वन मापन सो मिरापन बोम्हाँ । निरनकारि पौर महे दीन्हा॥ बिर पनि बदपिर तो मिति मया । जिप ठीर बीर पिठ मा ।। बिर पिर प्रन्टर मेर भुलाना । मम निच पोर पार कर पाना ।।
महरमन - रोहिं प्रेम हा रम पम । मोर पार मा हो निरजी ।। हता को मन में में अभिमाना । सो पति प्रीतम माहि समाना॥ मन पनि पीर मिता ल्यों पीर । तो प्रब बहन तागि हाँ पीर ।। मन गिर मैटि पीर मा यहाँ । हो होई प्रो मार नही ।। जैसे दिनहर हिरन मिति तम प्रसत होई बा। वैसे प्रेम प्रहात मह ही हो पई हिराइ ॥२२॥ वे प्रारम सर्पबर हो जाने पर ना मयंती रे मितन अवसर अपने अपने प्रेम का पन करते है। मा प्रेम बर्मन में दो विस्व है, परंतु रमयंती पिने प्रेम का रिप्त प्रकार वर्णन करती है उस काम्प न होकर शान्त बोस पहा है। में करिका सा मुप्ताहर महसा हो गया है । उममें बीर (ोष) पौर र (तीच परमारमा) काही विषप प्रपान होकर बत पड़ा है। बोर (मीर) पीर सौर) में मिलकर एक हो पपा है और ही हो पमिमान है मह मप्ट हो गया है। इस प्रकारबीर (पीर) पार पीर (परमात्मा) ही प्रस्तता तिय की गई है। प्यान देने की स्त है जिनमनमा और 'ते'-उत्तम और मप्यम पुष्प दोनों है । परंतु मयंती प्रम पपन में प्रपम प्रदर्शनी के 'तुम को पोड़कर पितका बास्तविक पर्मन से कोई संरंप नहीं रत्तम पुरुष क 'हो' अतिरिक्त मप्यम पुस्पबाचक सरों का प्रभार है। प्राण पतकर पह हो' भी 'मेम प्रकास में विलीन हो पाता है। वास्तविक बात यह है किमान भनेकता को मिग कर एक (परमात्मा) को सिंद करता है और काप्प एक की भनेर चिना करता है। यहाँ तह अनेकता में एक की रेसने (एकरी मेजना करने का प्रान है यहाँ तक तो काप्य मानस साय देता है और यहाँ काम में भनेता को मिटाना ही प्रारंभ किया तो यही काप्प दान का साम पीता है। पही पही गाव है। समयंती तत्र एसी ही रहती हो यह बात नहीं है। स पवरप तो गिरत है। हहा ,'' प्रयोग बराबर करती है और यहाँ भाषा सरस काम्प की मापा जैसे- कहति त पाँt महो। म्या तहाँ बन माहि विछोई ॥ संग मिमें प्रेतर शरा । मिने माम होगपति मिरारा॥ होतसि पर होत परेसा । पर मिले रिएत सहा ।। है मिसन मसत हो मारी । पुरी मिती ह निपारी ।। सफ्टी मुना मित मई म्यारा । सो प्रीतम टू मग हारा ॥ विहि हित सो मुई सेन बनाई। परं मा सुम नीर मुगाई । सुम मुरार पनि होम्ह रिपोक । ऐतो २ मिनं महं पर। को मानों पट सोगति । मोहि मुगा प्रापा छिरानि ॥ तो हो हि काल तर सोई । तो सो उन मोर माई यो । 8 सपा मुसा हंप, पाउ परी मर माहि । तो बानी पाई मिनी गांड दोरि होना | .
पहा मान की गई ता-मांक नहीं है। परंतु बहाँ गाल प्रने में पाई
परमारमा का बनतासा कि पहले रहा पाएहा है, वहां भी भापा कवित
को सिमेहए है या-
हो मैं मर भी पैरामी । सरोग सुख सर अनुरामो ॥
हो पाता पिर पिर रट मोरे ।। स्वाती माय महि तोरे ।
मो मन ति पीर बिगते । सो र तोर महिनेले ।।
मी गति पर्यों मपरी बिन पानी । अपने पानी पमिमामी ।
पहाँ ग्यार्म के अनुसार हो जीप परमात्मा को सरोग, स्माती, पर
पार पामी भारि मना पातुपों में रेरा रहा है । इसलिये भाषा भावमय हो गई है। यहाँ
एक बात निरोप प से पृष्टि गोचर होती है। वह यह कि यहाँ मन साप तिमी
माया है । मारतीप पाती मन पौर रित को प्रमग-प्रसग मानते है इसलिये कषि
पर भारतीय मामान का पूर्ण प्रभार होना यह भी एक प्रमाण है। मात, पापा
के संबंध में एक बात यह है कि यह पापीका समसामयिक रूप है। प्रपत्र प्रमों से
बह मुस्त है। परंतु साहिरिया करिका नितांत स्पाप नहीं मिा है। ऐते हम भी
उसमें प्रयुक्त हुए है निमत प्रपोप साहित्य में बहुत पुराने समय से होवा पा रहा है
से-पाहि (प्रपेक्षाहत) मौर बाग (पोर र पा बिमा) पम । परंतु ये पम
मपिन बार प्रयुक्त नहीं हए है । एक दो स्पात ऐसे भी है वहाँ कवि विधीयता नामा
मन वहाँ भो रफत पापा । हा मजनू रे मनहि पापा ।।
प्रार-
मौलाना मिमान गित ताने । पर निमावहि पहि पाएं ।
इसते यहाँ नापा में मात्मामारिकता मा पा है।
घर विपान
सूरवार का पर विपान सीवा सापा है । प्राय पुत्रियों की तरह पम्होंने भी दोहे
चौपाई घरों में रखमा की है। पाइयों को भेर किए हैं। एक में सोमह मात्राएँ
और गुसरे में पाह मालाएँ रखी है। बोहे में पिसेप परिवर्तन नहीं पाया जाता पर
कहाँ-कहाँ मानाऐं पर पाप हो पाई।
सूक्तियाँ
दरबास को नितयों से भी या प्रेम है। ऐसे बहुत कम दोहे है जिनमें कोई
उस्ति या तो मुक्तिरेस में मनवा मार बना रेप में न माई हो । विगाहरण
रिए बाते है । मत विदय को सूक्ति रेसिए -
ग्वान हता मो बत बसा, कौन समैटे गार ।
फैस र सब
बाहिम, हां मेल र बाद ॥२५॥
इप पम्प तस्य विपया सूक्तियां भी वो बाती है-
प्रस्तुति निरा पत प्रपत सर्व काप्त पर हो ।
रबत सूर मपमा नये, अपरत मरे नको ॥२५॥
x
x
तप्ती चात
बत बने, सफात कर पात ।
कात पाल , माप, पाप हारिये कात ॥२६॥
x
हो मंगोठ रे ग क्यों, प्राटि मिली तोहि संप ।
एततकात रपा पता, से रंप पतग ॥२६॥
x
x
भीत पिएर मोबीमिप का कार्य तेहि दाग ।
सबन विधाह मकोधिपे, बोर बाप तो बाप ॥२३॥
x
x
x
से मुल में नेक दुख नही बहुत दुष रो।
वैसे दुख में नह मुख बहुत मान मन मा ॥२६॥
एक ग्राहरप माष पंचना का मी रिपा पाता है-
पप बाहन पुल कोमल, पत्र पाह रवि पूप ।
पन चार बागेस मह बता पार नस भूप ॥२४॥
मुहावरेबार मापा मिलने में तो कवि गोर है। यहाँ त एक ग्राहरण
रिपाबाता है जिसमें पता सोचता' मुहावरा प्रमुश्त मा है-
पतिनग हिपो कठोर मन तोर मोह को गोर।
पता हो पता भासद मुमकियो तिहि पोर॥२५॥
से हारे पोहे को ही भाषा मुहावरेगार है।
दोप
'मस मन' में दो युरिया लिपप से सामने प्राप्ती है। एक तो प्रप्यात्म
जस भावग्यसता मे प्रपिा प्रतिपादन करना है रिमसे पह ही-हाँ होरा पानशास्त्र
काप पारण करता है । इमरा परमाता प्रहरप है जिसके अनुसार कामगार
में स्तिमित पपिनी गिनी गिनी पौर हस्तिनी नामक पार प्रसार को पित्रों का
रुपा मोना गंमार और बारह सामानों के नामों पर करना है मी काम्प की
प्टिकई माग नहीं गते । राम शरणमे पारो प्रयोग भी बापसी रेपन
करपर हुए है। एक स्पान पर तो हमारे प्रपोप गनर बन पोहबसे-
पम नौला पिर राम मनु पिएर मपी संयोग ।
मार्गति नमन रान हना रिपोप ॥३॥
मस-यमा पानी म बात सन प्रेमा बन मन मै पुनि माई ।सरी पगिनि यह रियो' मगाई। पेम उसास पौम सो बाई । बार विरह पाठी मत गर॥ प्रपट कई बामा पा पाने । यो प्रमी' मुनि के मान । पेम बीर मै पौष मगा। रफत सीप पुनपारि बनाऊ॥ पावन पुरप उपगार्ड । मसि पैमी' बन विम्हहि"रिमार्ज। एहि पिपिपेम वान हिमपाम् । पविप प्रमोम पोम मम ताम् ॥ पान् । सानि प्रेम सौ पेम बबाम् ॥ मोर माठ मर' पेम पृपाऊ । मम के का मु मम माऊ ।। ऐसो पेम मपी मए गर्ल' । बासी दिपा पेम मग बारी ।। या उन सामि बान परि पाई। प्रम पामत की दुख न होई ।। मिराह उपनाये । यो सन पर सो उन काहि होर पाने । दोहा-पमी पोरनहार", पावत खिन पछि मोहि एक पिसाता फिरि पिन इमर देहि माहि ॥२६॥ एक सहस सतसठ पहा । संबट राव परम तब पपा बसानो । कीरही प्रगट पेम मिबि बानी ।। मम दामन का पैम बहाना । मया मिनाप ,सोपवर ठामा ।। फसर नल खों पदा पेमावा । धन हरा बनवास वाया ।। पौ गम मै पिएरे मर मारी । पूनि मिनाप * भए एक ठारी ।। जीता पुनि राम । मार पुरा सर पई समान् ।। मारम मै पो मा बसानी । प्राधि प्रत बामी मा पानी ॥ बात बात मैं गति बनाई । चा पुराण मय र सिराई ॥ गगन ठौर निष परण दुरामा । सब' मा." बार म पागा ।। पोहा-बहुर नोर बोहित परे पनि पर प्राय माहि मुकता पार्य मानिमा बसि। सो वा माहि ॥२७।। पोहा २५-१–स (क)। २-बोई (को०) 1 -प्रेम (को०)। ४- पवन (को०)।-पामी (क )।-प्रपर (स यो प्रमाण (स)। पम सिंक (स )।-पानी ()। १ प्रेमी (को)। ११-ति (को १२. बहि (क ) । १५-मिम (को) । १४-कपा (क)। (क)। १-पया (स)। १"बोम् (स ) । १- (क)। १९ (सकी प्रति में नहीं है)। २ –मभि (का.)। २१-पारी (को०)। २२- (ग)। २५–पीवनहार (क )। २४-मर (को ) । २५-दोऊ बहुरि प्रमा (स)। दो २७-१-मेयी (क )। २–पुनि (क )।-पामनि (को ४-र (क )। -मयो (को)। ६-हेराइ (1.)1-मई (स ८-पी (स )। -की (स)। -ना (का.) । ११–पर (क ) । १२- पर पुरानोहि पान्द (स.)। " -मुक्त सो पाया मरगिहा (स.)। १४–ो पस (का.)। ८- । १५-गि - मस-यमन २१ पाट सीवता. सत परम पाऊ ।। रमनार पारम माऊ' । बसी सुनो सो परनि सुनाई। कहत' हि पहा पारपति रारा । अप मिहि पागा ॥ राया मत प्रगटर बग नामपर उन ठा ॥ विहि मरत तस पोर न हो। घर पाट" पतिर एकी सोई।। राना राब मीस सव मापन मानकर सीस बसा ॥ पापी मह मुराही । परहिए हपरहि॥ धाही ॥ सूर समान न प माना- सना समाना" सोपा सांव सरम पार । यस विचार ॥ भरम विचार न घाई काऊ । रासत परम सीस दोहाको परम लिपि एमा पति सब पुन पुर । ठेग पा र सर पर सऊदान पति मुर ॥२८॥ पौर पति मर्मत रशियारा । मानी नीम्ह पदवारा ॥ बिह' मुखम्प कई 'विहि मौका । मत मुह स्प समुह फीका ५ ॥ करम को समरि तान पर बन पट मिति दिपा ॥ मूर नोति बरनी' मुनु जोती। 4 मृण मुख जोति मोठी ॥ जनहिर पोति परे रवि देव । सीतसोहि पेर॥ मूग ति मोमार न कोई । इन्ह' व सो मोतिनम की रवितासो पति पिनाताई। मुख पाई॥ पुरुष मारि पापित परा । फिरि भरि बनम म पित सो टप ।। बाप बग होप समाना । विह देगा सो हिराना । बोहा--- रजबारे पन गरें मुनि" सोमा राप ॥ पमान बरल मम परन मम परत मर्ग"हो" प्राग ॥२॥ रो. २८-कान (स.)। २–से सुन (स.)। मुवर्ण (को०)। x-कहा कि(t.)।-पात (स.)। ६ मिह (स.) । B-माहा (स.) । पहचौरा को प्रति में नहीं है। यह पौराई स. पति में नहीं है। ८-बानो (ate)। -बानो (at)। १.-चिन्ह (४०) । ११-पति (स.)। १२-1 (को०)। १५-होई (at०)। १४-माई पुरुह पाही (स.) 1 १५–पर ()।१५-हपर पुनि (st.)। १०-चामा (t.)। १८पमा (म.) । १५-सिवान (का.)। २.-मर (म.)। २१-मारे (स.) २२-- रापन (स.) । २५-धि (मा.) । २४-पर सबर (.)। २५-दाम पण (म.)। • २९-१- (स.)। २-गिहि (को०)। ३-कीरह (को०)।४- विहि (गो.)। १-टीचा (स.)। कोई (स.) । बाढ़ (म.)। ८-पर चिन नट (स.) । १-मरने (स.)। १.सर (को०)। ११-ऊती (स.)। १२-चनही (t.)। १५-होम्ह मसमपठि (स.)। १४–ति ()। १५--- परती (न)।१५-राठि (४)। १७ देग (म.)। १८-गव (स.)। 16-- इन (1.)। २.-पाक (ना.) । २१-सा (को०)। • यह पौराईका. प्रति में पाठी है। २२-माके (f.)। २१-किर (म.)। २४-होये (स.)। २५--- वे रत्रिपारी मुनि पमुठ (स.)। २९-गिन सोना बराग (को०)। २०–सपी (को०) ! २६- (t.)। ऐम-हिम पर पामापत १ २२ नस-दमम व रामा पम पेमी पेम पंच पम रा पर सर पेम बग मुम' मार्ग ॥ पैम पिया देखे मिहिरा वर पतंग होम पाई परा॥ पमै पो पम एम वाता । गुन गिन पोर होर गिन राता । मोमी' बाठ पा मम में मात्र । फिर फिर वारंवार पहाग ।। मुनि पिघनो पमिन कपा । ताहि' मुम एक होर पपस्पा ।। म पुनि करे । विस हो तर" मुंद पूमि परे । बिचमान पमी पाई। या पेमहिये समाई ।। राम गौ प्रपि पियार । मिस रिम मन परषा म्योहार ।। एक मुमी माहित एक माही । एक सेवा मद सदाही ।। मातम दिन पेम गुम पूमा । मर न गी मप प्रमर म सूझा ।। रोहा-पंडित परिता गनी प्रमेछ। पार बिपका ॥ एक धमा बैठ एव' पगा । गुमी बनन * पर समावा ।। संपति सभा परित सब प्राए । पापन मपरप बहुवर बोलाए । ते राब सेवा मह" बेटे । पी मूवम (म) पाए पनि ते ।। गुनिये- पापन मुन काग । मा रस मबन पमा रापाडा ॥ तिम्ह' मा पेम बात चमि परी । बमिनार स्म पर परी॥ स्प होर रनियारी । सोरह। कता संपूरण नारी ॥ बिसेपा । सिंगल रीप फही बिगह देवा ।। सप्तरीप महार पोर म वा । सिपमरीप रूप परि पूना ।। मोहि दीप मा पदमिनि होई । पहि" प्रपती सुनी न कोई ।। बोहा-पी पुनि क पर नहीं, कि राय" का भूप । पर परमिमी पो पुनि म अतूप ॥११॥ गोहा -मम () : २-चिन्ह (स )।-तिहि (का.), ४-रा (स)। पर (क ) । तन (का) । मिस बियम (स ) । -प्रेमहि (1) 11-वाह पर एक होर (को ) । —मार्य भने सदन (स )। ११-तरफा न (स )। १२-रोश () १३-सीय मै पाइ ()।१४-बाप (क ) । १५-मा (क)। १९-र (को०)। चौपाई का प्रति में नहीं है ।१८-गीता नित कपा (को )।१६-पाइम (का)। २.-प्रमेक (स )। पोहा. ११-१-ठिमत (स ) । २-परी (को०)।-संगन (.) । ४–स ()।-एती (स.)। –मै बिते (को)-किने (क)। -पुनीयम (को०)।-विहि रस (क )। १ –बसि पुनि (1) 11-श्री हिति (क )। १२-सोरई किरण संपूर्ण (की ) । १५-सहि पहा कि (को॰) । १४-संगत (स )। १५-कही (को०)। १५ में (का.)। १०-सहन (स १५-रस (क )। १५-उमाह (स.) । २.-पदमन चो होइ (क.)। २१. बहिनी (०) । २२-सन (क )। . 5 - मस-मन ૨ माई ॥ । माटिम एक अनूप' मुहाई । पायम चतुर ठिन' उठि दिनो' कीन्ह मिरमागे । गोगो सपन पैम रस पारी ।। महापण निसरं यह बावा । मदिन गाइ बात निर पाता ।। सिंगल रीप हाई परमिनी । मौर दीप' उपना नहि मुनी ॥ 4 करता गो सिरवन हारा । नाका' गति प्रति पो सिरमा पाई यह साई । मिरवं मुमता हास उमाई ॥ दिन करतार एक परमिनी । मिन प्रगन' परनत" कपि पुनी ।। बंदू रीप माहे पयाई । मुनी न हो" देखि ही माई ॥ प्रयम मह" मुनि सोप लगानी । पर सो परि" परमी तब मामी ॥ प्रपरपारा ॥ दोहा-विषमान पगई पो गहि प्रया पग्नि माहि। बर संयोग प्रामु साँ पीर पुनि माहि ॥१२॥ पुग्नपुर नाई। पपठ' माम' उपमा बिहि सा ॥ महारा मैं एही मेघा । पं दीप सरप' फिी देखा ॥ रेस रेस को गधि हो बानी । मपर नपर को म बखानी ।। पे पम पप र नमर मुहामा । दूमा पौर विस्टि महिं मापा ।। मिह' सोमा बाठ पखामा । वहीं' मगर एही" ग्नमामा" ॥ एपिर' और पनी बिसेदो । महे" म बमव बन का रेपी । भीममेन विह" नगर मरेमू । सो रागा यह ताकर म्॥ पापार लिहि मंस सोई । वा सरवर कर पौर न कोई ॥ ताके पर उपत्री मो' बारी । विपना पामिनि ३७ पौवारी॥ दोहा-पो पुनि बाके बनम के कपा ही विस्तार । मिर पुरुष * पनमा माताकर मौतार ॥२॥ - राहा. १२-१-माप (ना.),। २-वह उप (स.) । -विन (का)। ४-मुर (स )।-बावननिर पावा (को०)।-देस (म.)। -वाकी (1.) ८-सो (को०) १-पाग (1.) । १.वरन (ना.) । ११- (म.) । १२-मई (को०)।१५-मोमिन रेडी (st.) । १४-परी बिन नाहि (को०)। रा• ११-१-म (म.) । २-प्रनिष्ट (स.)! ३-शि (म.) 1- वो म्ह पा (म.) । -मई ( ) - (भ)। ७-मनपा (म.) । ५-लित (म) -बिम्ह (म.) । १०-वह ()। ११-तिनहीं (म.)। १२-पनमाना (म.) । ११ उपर (प.)। १४-पीना (स.) । १४-मेगी (st.)। १६ बन ले गति बिन रेगी (स.) । १७ दिन (म.) । १८- विह (म.) । १५-नासर माह (म.) । २.- (म.) १२१-को (म.) । २२- (को०)। "-4हा (को०)।२४-मया (म.) ।
२४ मसनमम मुस पोति तीय। पमिमि चाहि' बार एक करा । कर प्रमुरिहि प्रमृत' रस भरा। यो पखार मिरवर मुग पामहि ।बी उठि माह हाद पतामहि । मनु विपि प्रमी पाप कर गरी । है म राके सरि दूसर मारी ॥ एक पदमिनि घर परिस भरी । पौकिहि योग प्रमतरी | महाराय निमाई । पहिबापत पनि माई। पन'। प्रसौष पायी पसि हवा । तासौप प्रति पर पा॥ मह भवरल बह पदुमिनी । महाराज प्रवमी मरमुनी ॥ कंबल तिर पुर बामा । बग मा"भोर भई विहि पापा ।। सुनि" सोमा सबै पमत मीभाना । पार' कार कर बी निवामा । रोहा -जमत माविमा पेम रपि" मुक्ताहम' मो बाँकी पान तिर को पीय ॥३४॥ धन' मुस सपि पोत गोरा । रामा.. मन मपो' पोरा ।। बास मगुर पा पाई । परपण' चाई मन तिीिया सुनत' सिनोमा । गाह माँ बौना ॥ यह मगर गुहावा । तब मैं बो प्ररिस्ट बताया ।। रुप यह मगर रिसेवा । मो मामु काति पप रेवा ।। ठौर कैसा प्रस्थान कर मोसी विष नगर बसान ।। पो. यह मीमसेन रागा । कम मनुम्म कप राय समागा॥ वाके पर कही बारी । रूप सस्प पदमिनी वाकी बनम से । बस सुनी परनि" निब से ।। बोहा-चोप दि भाटिन पतुर पोम उठी प्रबाही नयर कमा कहाँ मुनो राग पिवमार ॥१५॥ कप पॉप कह माहिन भारी ।। रोहा १४-१-बाह (स ) । २-पए (स ) --पार (स.)। ४-गिन (स )। ५-काम (स ) । ६-मिन (स ) ।-री (का) । ८-प्रो (क)।-न (स.) । १.-न्ह स)। ११वा (स)। १२-गवर (स.) । १३ बात (स.)। १४-पमु (स ११५-ठामों (स.)। १५-पा (को ) । १ (क) । १८–भया (स । १५-मुर (स)। २०-विन्द (प )। २१-सुनि (को ) । २२ वह (स 1 २१- (प.) दषि-समुद्र । २४-मुक्ताराइ सो पौर (को ) । २५-- (स.)। २६ वर (स । २७ बरे (स.)। २८–बीब (को )। पोहा १५-1-न (को०)।२का (क ) 11-पया (प)।४–पबर राह (को) 12-दिन (1) 11-सुनै कहि (को०)।-- माहि मास (at) ८-सांच कर मिस पिपि ते (को०) । १-से (स.) । १ -स (प.) । ११-पौष (को )। १२-बिस (को०)। १५-चर्म (क )। १४-बरनू (क)। १५-4 (क )। सुन (स ) ।
नम-दमन २१ प्रस पो बह ममर मिसर' के प्राई । पुहमि' पेम मम दे' रिसाई। परमर्वत मस्मान् । सबहिं' जाति उपरे हर ध्यान ॥ यहाँ ए सिसि रिस्टि में प्राप । सोई बनु उपदेश बता॥ मा' पिरिष नगर पहुं पासा । जनु पेमी बन रासा॥ पियर के पेम गोए होए गाड़े । तिरह ही' भ्यान एक पम ठार ॥ पयों पों पेम भगिन कुन पार के परमार ठूठ स्यों त्यों होहि पेम मपमाते । कारे पात प्रपिन रंग को पुनि पर बहुमान मरै"।गर गर फनगा फुत परे । पा पाकि पाकि५ सय गिर न पेम सारा सों टर। पानिप को बहै । पर कामे नित ने ई०॥ गरे॥ तते । सका दोहा- तबर मनु इमि कहे हे बिरसे पण माहिए । सौउ पूप प्रापुम" सर कर पार पर" पाहि ॥१॥ रोहा ११-१-मेरमा (को०)।२-मीम (प.)। ३-हि (क )। ४- सेरत गात (स.)। -हरि (का )।-मागे गा बिरण (स.)। ७-पान पेमी बमन उदासा (को०)।-मुमुक (स.)। -रे (को०)। १.-हूँ (1.)। ११-होहे (स.) । १२-फूत (को०)। १५-फर (t.)। १४-फर (को॰) । १५–माग (स.) । १५-दर (प.) । १७ टूटहि पम परा सो टर (.)। १८-चिम (क )।१६-रने (1.) 1२.-माई (स.) । २१-पापान (स.)। २२–परि (को०)। यह चौपाई केपन का• प्रति में है। • प्रठि में यह पौपाई मही है। ने-मुकेहए।
मम-दमन फर तिनके पिरिष पुनि पसे । तेक उपदेसी पारि पम बिन प्रब सारे । रब' म झोप मरण हमापारे । कटहर' को पि' पिर बोही• 1 दिये ग्यान कोमा' जिम्ह' होही ।। पहार कहहिमरम"हिन पाना। मपुर ममम पिन मेप म माना ।। मरियर सपिर सोई । मो' न ममप मिरी"निय होई॥ पामुमा मरन और पामन" । लामो मिटरमहराजामन॥ मामा एपम दिया रोई । मात "माह मय यह पत' होई॥ निरनी कई र पह" पिरती । पेटोपबहुत पसरी सोकरमी॥ भमती मोहिमपुपममी' । पागि मीद मेटी" पिर सो मिमी ।। रोहा- लिप नियकारी फगे वो देखीए बन माहि। कह। यो गर मीच में प्राम" कहाँ मो हानि ॥७॥ - रोहा-१-निरख (स )। २-उपमै (स )।-उपे बिन बह मंगर सारी (स.) 1४ग न करो गर्व (का.) । 1-हिमगारी (स.) । कपर (स ) । -पेपिठ (स.)। ७-उनही (स.) । यहिं (स.)। -पोवा (स ) । १.-गिहि होहिं (को ) । ११–बपित (स ) । १२-कहति (स ) । १५–मर्म (को०)। १४–कहे (प.) । १६-पिव (का.) । १५-चो (स )। १८-फर वन (स.) । ११-वामन (को०)। २. पर (स ) । २१-बामन (का.) । पामन- चम्म मैना । २२–मवी (स.) । २३ कप (को ) । २४ मै (क ) । २५-चामनु (को)। गा मम-गिसका मन । २१-बामह (स ) । २०–माति (को)। २८-मोहि (का.) । २१-दहि (क )। -गति (क ) । १- ( )। १२--वम (स.)। 1-नगर (को॰) । १४-री (st.)। १५-परनी (को०)। -बनी (को०)। १५ मा (1.)। १८-प्रमझौ (क)-मीठी में प्रमही (क )। ४ -बिग बिम () । ४१-देस दिन (स ) । २–कहो (को०)। -प्रेस (क )।
२७ नम-यमम गुर बैठ पछी विहि' साखा । योसहि' सबै पम' रस माता ।। पाकर पेम बन गहरा । एक बग' एहैदू रट मा पाक ' प्रीसम में मीक । निस बासर ५ पिठ पोल ।। पोवहिपौर वचन म मुहाई 1 मीहि मीटहि रटिना माई ।। महरिबो पैम पाह दहाही । तिहि दुस सदा पुकारत ही। मारहि' निपट पेम दुनदाई । निसि रिन मुए- मुए विस्ताई।। फोषित दिए" परी भई कारी । गुह सब दिवस" पुकारी। समुष्टि पर कई बस सूबा । पोंम को बम सेंबर पाए। सति मबार मना मुचना । पै" को वही" प्रभु मैना ॥ पार । रोहा-पौर" भने पंपी वा पिनत का माँ छही कहपेम'' सो मह'' पनी को'' बाळ ॥१८॥ - दोहा ३८-१-तन (म.) । २ -बोसह (प.) । ३-सबहिं (स.) । ४.- प्रेम (1) 12-पाठक (f.)।-आहिस (को०) 10-कहरा (स.)। E-पक (t.) It-एक (1.) 1१० (को०)। ११-मई (स.) । १२-काई (स.)। १३- तिन (म.) | १४---मुकाए (प.)।१५-है तो नहीं बह रट माए (स.) । १५-मिर (st.)! १७-१ (5t.), १८--ही (स.)। १९-विन (1.)। २०-पुकार रही (म.)। २१-मोरो (स.)। २२--यो म्याँ बिमाई (को॰) । २३-विद (4.) 1 २४-ईई (.) । २५-धोए (को०) 1 २६-समझ (को०) । २७ मारा (स.) । २५-पीन्ह (स.) । २९-दूबा (का.) । ३.-बाई (स.) 111-मिन (स.) । ३२--पह पर (स.) । ३-और कई (1.)1१४- यहाँ (स.)। २५-ब (11.)। यहाँ (स.) ।10-प्रोरम (को०)। ३८-भही (1.) र (को)।
२५
ममयमन
तारा
भरे गरोदर तमापा । पहिल माइप विद बनाता ।।
पामत पमी पेम विपापैम मदापा पर लिया।
मन उसम निर्मस बनु' मोदी । पहि समार र मोती ।।
प्रति पंभीर पाहy माही । मन र मरम' दुरा मन मोही।
परिसि' पाकी" पार बनाई । पास पैम पन मिटी कपाई ।।
अपपि पैम हिसोर उठाये । उमंग भस्बम एनम पारे ।।
पेम रंग राखे । पुर्वरो बर" मौत मदमाते"
यो पनि कही गगिर्ने । नीरज प. म बरजत बरें ।
पित पनि परसन चाप बी मऊ । एष पन मी मई हो' नपर
॥
पोहा-~ो पुनि वहाँ गोर बसस्मिान सोप" तिन पाए ।
पाया मम नहीं पा रहें. बस मा |
दोहा २६-१-भाइ (छ)।२-तिहि (स )।-मान (का.)।--
सिवामह (स.)
।-बार (.)। बस (क ) । ७-हिसे समार
पीकेह मोवी (को॰) । -वाह (प.)18-मम (st.)। -विस
(क)11-की (को०) । १२-पीसो (स ) । १५-माप (स ) ।
१४-रल ()। १५पर (स)। १६~ममाठे (st )।-
हुई (को०)।१~ सन न (क.)। १~-पिय घर परम पार पर
भयो (को०)। २. (क ) 1 २१-पयो (st.) । २२-५(को)।
२१- (का.) । २४---सिवाई न यार (०) । २१-पास (०)।
२१-बीए (स.) । २-६ (st.) । २९- माहि (st.) ।
-
नम-दमन
२६
मा' मंत्र साये पर पासा । वहाँ मिब पाप' कर बासा ॥
त्रि तारी प्रनपनि । बली को बनमती
गोपी मम कर बिसरामा । मूफी
सन्यासी दम मामा ॥
उपा
पारा- कोक पा सप तप सार्प ॥
फोट प्रष्टीम' नाम मै" उरम । कोड उरमि पाइ निर मुरम ॥
कोट" विमानी। पुरुप संगोमा । कोठ मान सार बियागी ।
दिनकर दरसना गाइ बिन पाया । धनु
१९ पठसठ वीरप मारा ।।
मन मिसरा रिमन हो गई। पारि
पषमताई ॥
बम बमा सो मंच का गाने । और पार्हि बंध * मान ।
सब
दोहा-गो विवानि मृय कमप मुमन' रिपसार ।
पापुन 'परम गुन मान र मुम पाहि" .in
स्यौ
हा ४ -१–मप (म.)। २–मारे (म.)। -साफ (स.)।४-
पो यो मनि पन (1t.)।-विसामा (म.)।-अपह (स.)।-पार पह
(स.) । ८--तरन (1.)।--मापा (म ) । १.-प्रपामग (३०) । ११ महि
(स.) । १२-र (स.)। १५-कोई (1t.)। १४-विमान (म.)। १५-
परम (2.) १५-उन पाटा (म.)। १७-हार (स.)। १८-भीम (at.)।
११-पन मूरप को समम (म.)। २.-पो पुनि रिसार (स.)। २१-सदों
(म.) । २२-मापन (t.) । २५-चौर ()।• मह पौधाई का. प्रति में
-
*
मप्पामीन मारिप में मगमम पाम टीपों की संख्या प्रमित हो गई थी
(पिरपमा ६४१२) ।
भनन्दमम पा' उठ 4. पैर पर गाई । मति माई पार पाई॥ मो तिनार' भमू । पानk कर परम गरेम् ।। बोस पर निपरे पाई । माग र मो रे माई ॥ हममी पत्पिरता मन मामई । जि पमिमान "तन साना ।। मापा रह" जिन पाप । मारप" पोहि परउ भगरा ।। पापा पा" सिग्दा परे । हम पस ग्पो भए पटकमकी। ज्यों ग्यों को बरे स्पा" पानी । परम' पोत उम पठिगामी" ।। गंपायम" होई । पिपा" पिया मोर" सब कोई ॥ बिन" मई बिनसि" पार को कापा । मारी मांस मिमै पस माया। पन रोहा-मि मापा सर पम" टमा ताहि म सो कोर। पहि पामे नीर व्यों बाई पटक" म हो॥४॥ दोहा ४१-1-पैर ( ) । २–पा (स ) । ३–भास ( )। ४-बटा (4.) सभी की प्रति में यह सम्म नहीं है। -बाएं घ)। (-विहिकर (क )। - जागा कप (स ) । -उठा (स )।-पर (को ) । १०-पानी (स.) ११-पेह () । १२-हि. (क ) । ११-मार्म (1.) । १४-धोड (क )। १५-पोड (स.)। १६ मा (प.) | सौ (स.) । १८-धर्म (को॰) । ११-प्रमय (स ) । २ -प्रविमानी (को ) । २१-गान (t.)। २२-महापहा (क ) । २१-बोन () । २४-मैं (ना.) । २५-पास (स.) । २५-बस (क) । २५-न (स) २८–बगप का (स ) । २९--माएषको पुनि सोइ (स.) । 1.-चपा मार ज्यों (स.) । ३१-पतक () ।
मस-यमन देखी मृग मार्च ॥ पनिहारो मैनी । गग गामिनि प्रो कोफिम नी ।। पहिरै पीर सोमा माती । ए मुनिहि' की न्यौ प्रस पांचौ ।। ने पात न बा हाथै । नैनन्द पानी फससा निपट भाग सौं पाहि' बाही । पाइन' पिष्टि' सुरत पर माहीं।। पो कोई सती नैक एग फेरै । सूपी' रिष्टि मोक' मिस सब सही ताहि समुपहि" । बनु" परमेसिन" पंप बवाहि" ।। बन वापर मा" मन मेह" । बाँकी रिष्टि सूप कर" ह ।। बोम रपटीसी । रपट परे पुरु होइ पीसी ॥ बो पट फोरि पाहि" पर एथे। का पुनि कहे" त" पूर्षे ॥ बाट रोहा [-पट फोरि भट बोर बा, बिन पानी बिससाहि। पुनि पी कर पाया पर य कुमार कहर बाहि ॥४२॥ - रोह ४२-१- (स.) । २– सो मवि मोती (1t.)। 1-मोनेसन के (स.) 1* यह पौ• 'का में नहीं है। -प्राय (t) । ५–पायन (स.) । -- इप्ट (स.)। - सूप्त (को ) । ५-नीक (स.)। सूफी (स.)। १.-बग (स.) 1११-समुपगह (स.) । १२-न (स.)। १५-प्रबंपी (को०)। १४- मवायम्ह (स.)। १५–घेतो (को॰) ।१५- (को०)। १५–ही (को०)।१८- एए (स.)। १९-+ (का.)। २०-हो (को॰) । २१-गाह (प.) । २२-कहा (स.) । २३त पर पूष (स.) । २४–विसमाह (मो.) । २१- । बाई (t.)। । - ३२ ममयमन मपूर प्रमी पेमी फरी' फरपारी' । फर फर मटकिमाई' निहि' गरी ।। विम' के पति का वर्णन म बाई । सब पर उपरेसे मुपदाई ॥ बिम सोई । फार पांक पाकर हिस होई ॥ पा विधार" दरार प्रनारा । सो पेमी वा हिये। पराप ॥ नि" से ब" प्रमु सोई । पाई" सेप" रात मुप होई ।। मी"1" गुरस" पट माही । पापा काट दिनु माही ।। बिस्तासा । फिर फरकी परीपासा ।। पर यह देर , पायर" 1 मिनि प्रापा कर्टि" उरभावह" ।। किसमस की पनाम पर । मारे करमपी' पीपन सम्" ।। पोर-म" गम कई यो' पिर" बिह", मन" गस पाम देह । सोई पन पिय" यस मिमै रमै रसाते मेह ॥४॥ दोहा --फिर (स.) । २-भरबार (स )।-फिर फिर (स.)। ४- मटकनयम (स.) । ५–तय गर (स.) । -विहिं के (का )।--! (का.)।-पिर (स ) 11-परेपी (क )। १० दिनमा (स.)। ११- पुजाप (को॰) । १२-१ (स)। १३-बिनाह (प.) १ १ को (घ) ! १५-बाकी (घ ) । १९ गेषा (स ) । १७-निर् (क)। १८-कही (पा.)। १९-सरप (4i.) १२ –पिह (क ) २१-फिर मेरो (स)। २२–पायो (क )। २१-काटी (प)। २४-उरमानो (क.) । २५-प्रपामऊ (1)।' २५–कर्म (क ) । २–पी (स ) । २८-पेरठ (स.) । २१--पुप्त गुम (स )।" २.- (क ) । १-पिव (का ) । १२-विर (को०)।५-पस गुरु काप्ती । (स.)।१४-पिग्मुम (स ) ।
मममन
मगर निकट पुसी फुत्तरारी । बम मासी दिन साँप संबारी ॥
मनु' सब पुहप पेम अनुरागी । परागी' उपदेस' बिरामौ ॥
मंठ पो मरना । बिम हरि भवन पंप सब करना |
की सियार
हार इन पारा । का सिंपार भर' प्रावसि हारा ॥
मा को समुभि हो हमा । हो न प्रनयेते' हि' बसा ॥
मई सास सूना"। पेम दाग" उर" दाम बिहूना ।।
सोसन है मग ' पर मीये 1 समु" मोसनी सोमन महिए" ॥
पर मेगारो सो" पि" प्यारी । बिन सा तमि नींद निवारी ॥
सोई
सुदरसन को । सेवा सम्म" सा ररसन महे ।।
बात
पोउ ।
दाहा-पम्प
चमनी करहा कह दूरि महि"
कि मन' हम बास ग्यों पर पट मोई गाउ ||४||
रोह ४-१-पिन (स.)। २-राप (क )।-उपरेपहि (का.)।
४-रापी (को०)।-पहिराबस (को०)। १-समम (का.)। ७- (म.) ।
८-गहो (t.)-प्रसनी (.)। १.पा (स.)। ११–साना (स.)।
१२–दार (म.) । १५-चोर (.)। १४-ममम (का.)। १५-क (को) ।
१९-याम पुरन सिर (को०)। १७-भई (का )।१८-मू (का.)। १५-पीप
(का.)। २.-मृगाम (क )। २१-4 कि (को०)। २२-- (st.) ।
२१-पीब (को०)। २४-महि (क )। २५-पीन (st.) ।
४ नस-गमन और नक जारी। परम' प्रपम काम बहुवे" पुन पुमि' मा ममर दिस्टि महे' पारा । गुबह बमा पो मीर मुहागा ॥ उ' मान् कैतामा । मदिर मामु प्रशासा ।। ई गिसाप पिस्टि महि पापा । पब पर उग्मम पून मगाना ॥ सेत संत दीमहि एर सारी । होइ गुन्हया' निसि पंपियारी ॥ मानो स्पे वि पहारी" | कोर कोर सर छोत सारा । विहि' पौगार पटारी । रिस्टि पमार म बाहि" निहारी ॥ मारोत बने पर पामा । 1 पर ठन" की भामा ॥ अप पटाम संगारा । पनु प्रकाम मम मिपि तारा ॥ मदिर" भेया । बनु राम र उपरेसा ॥ बगहा- मंदिर देखि" मन पनि मिर"" गुमान । धार र री , रो निदान ॥४॥ भीतर गमर पो देवा । मानुस' रामहि मिनिष सो रेसा ॥ प्रबमा' प्रति मोमो' उनिमारी । ममी मन पोर्च पब परमी सोग पाहार । ना भबरम' परम अधिकार पर भर प्रतिमा सेवा पूरा । पूजा तब दूगा। सुषि सों सपा पवित्र हाही । परम कति पाई मुख माही । पुग्म होई । पर पर सुपी पी पर कोई ॥ टोल टोम मह" बनी भाइ । परम सपटी' एदि सराई ॥ परित पहि पुन । बरसहि प्रातम म" गियान ।। बैठा प्रार विज्ञानी । समझ' सुन" र बस दामी । दोझ हाम सबन " मुमिरनी सरा मबन सौ काम । मो पो मितवाणे" को सुमिरो सापो" राम ४|| पोहा-४-१-यो (स.) । २-को (क)। ३-4 (क ) । निसारो (स.)। ५-* (को)। -पी (st )। --बान (स)। 5- feसाई (स )।-मेत समेत देहि कसाणे (को )। माई (क)। ११-माह (घ) । १२-कीरि (को) । १५-पहाड़ी (स.)। १४-विला (G)। १५-को बार (स ) ! १५ चाहे (प.)। "-तिनहि (का)। १८- ये (को०)। ११-बैठे (का.) । २०-कर (स)। २१-निस (स.)। २२-मा (t ) । २५-बम (स )। २४-हि (को ) । २५-परहें (स.)। २६-पिट (क)। २५-विम (का) । २८-बीय (क ) । २१-करो (Rt.)। 10- ( कन (क)। दोहा---मानसर्ग () । २-भबमो (को)।-सोम (को)! ४-अनु (की ) 12-मोक (को )।-धर्म (st )।- --मार (स)।-पधर्म (a)-प्रवाह (स)।१-सेवा किप (स.) । ११, पनि बान (क ): १२-4 (क)। ने मठाही (स)। १४.-नीपी (को)। १५--सराई (को)। -ठिय ()। १---पो (को०)। १८-म गमान (स ) । ११- (क )। २ -समुमि (स)। २१–सना (स) । २२-पन् (ग)। २१-कह (स ) । २४-१ (को)। २५–मिन (t.) । २५- कासों (..) । २७--सानाम (स )। * पाई-म्म । । ।
12
मपर मोहि ठी' पुर्मि' साकार करि पिर रिमापन मपा ।।
पारी मुरम हरी र भोगी । पति नो बानह उर मामी ।
प्रगट कंपन' पुष देहि विधाई । मिरपठ" मन ममुकर बै"माई ।।
मुमन घर पर" सॉ भीनी" | बाप" मृति" मन परम प्रबोनी ॥
प्राभूपन पुनि बने
। श्रम प्रग पनि मार" रिमा
मामा
पर पति मीठी । मोहन म" ब" विन" रीठी ।।
दो ति ६ vिat" बन मोही ।
रिपोर महिमिहि पाही ।।
ठिन म उरमि" पने पेठ सोरा । पौ" " सोस हाय पुमि रोग ॥
मिने मोहि" मापा अधिकारी हाप मी"होर" पर मिवारी' ।
हानाटी बेस्वा" या यो' कहर माया पो म कार ।
सपन" बिप अपत है, मयो भाब नोह You
रोदा ४0-1-पा (स.)। २-4ठे (स.)। - (st.)। ४-
रर (स.)। ५--मर (st.)। ६-मानी (स.)। --चारो (स.)।
५-अपट (स.) 12-मम (t.)। १.ीम (स.)। ११-रेवर (at.)।
१२-दोर (स.)। ११-पो (स.)। "सोर (म.) । १५-हिप पहनी
(स.) । १६-नार (प.)। १०-निरठ (स.) । १८-- (st.)। १९-
भरा (म.) । २. (का.)। २१वस (t.)। २२-जन (4.) ।
२५-ए पर रह पाहा (1.)। २४-मित चितवन (स.) सिंगित (rt.)।
२१-बोद सिन्ह पाहो (स.) । २९-उतीर (1.)। २७--भिव (10)
२८-~प्रो (4.)। २६ (स.)। ३. (म.)। ११-माय (स.) ।
१२--मार (..)-उठि (4.)--स () १५-विवारी (st.)
१६-तप सा प (स.)। १५--इमि (20) । १८-माया दो (म )-
पाही रो रिपि मत (म.) 1४ -कपी गम मंठ (म.) ।
नस-यमम या सेगा पर समान ।। प्रमाय' मूर पाय ॥ पर पूफ्नहार - बमव मागे बमि रसी हाटा ।' रिसि हाट पीप बर बाटा' ।। विही' बाट पा गाई । हाटन हो। बिसाह- शिकई॥ एक बनौटा मामै । एक पनी बार पहाँ बनौटा हाटा । पनो बढ़ उपर" पाटा ।। सौता हो. सो" सब सिरा मेt", हाट उठ' मेखा रसा को नई साम पा । का पाहि पारे" परणारा । प्रपन गहर" क" म्पोपारा"|| दिन' म कोई । बनी पतोटा पापह" सोई ।। हाटर र जन बा । पापा मार करम" पति मा॥ रोहा-कर्महित नोटा पनी' मु जानी मान । फापा बाट मु' प्रापन बाम ।।४।। हाटम सार दिस्टि इमि पाई। म्पो' प्रषियता बगत पवा। प्रबम जो दक्षि' पौहरिल माही । नाति बिना एकी मप मा।।। धर मी जो ठि परसिया । पार एक घमेक मैया ॥ यहाँ मुनापटा' साचन एकौ किनक विषा ।। पर परी' पामरन" । एकहि हुन सब भर परे। पुनि बो पसरहट भाप निहारी । हाट हाट मह" सारी ॥ पुनि सार" पर जो दोठी । एक" का हाट सब मोठी ।। मापे पनि बगार यो ह । एक बस्न परे॥ पुनि यो पिस्टि मी तिन" होई । बिन सुबासमा यस्त" न कोई ॥ दोहा-२खि फुलहटी" य" मान गिर" प्रगटि दुरा म बास यो पट पट ए सोई ॥४il दोहा ४-१-दोर्ड (स ) । २-बासा (क )11-तिनहि ( )। ४–पाने (स )।५-बिसाहि (का ।-विका (स.)।.-नीता (स )।-नीता (मरगाह (को) टि (स) । ११ की बाटा (को) । १२– म मोह सिवि (का.)। १५-मेऊ (प.)। १४-ठी (क )। १९ काहि (प.)। "कोईई (को०)। कोई (को)। ग-मभागी (को॰) । १६ पापन (स)| २. बोरे (स.) । २१–सहिब (क )। २२-कर (क )। २५- मोहारा (at.) ! २४.-तिहि कहि (का) । २५–मापहि (st ) । २१–स (को०)।२०-कर्म (का ) । २८-र (क ) । २९-करमठ (स ) । ३.--पर सा (स ) 11-नाम (स ) । १२-र (स )। ५-म (कॉ.) । बनौटा-बनिपुण हा ४१-१-अनो। एकता (का ) । २–नार (का.)-रे (को )। ४-ठ परविमा (का)। ५–प (को) । सुनारपता (स ) । तिम (ख)। ८–एक (क )।-पति (को ) । १. परियम (स )। ११-अमरल (स)। १२-एच (स )।११-मैं (का)। १४-18 (को०)। १५-सा (स)। १५-पुरि (को )।१०लो (स की प्रति में नहीं है)।१-एहि (को०)। १९म (स) । २ हेरी (स ) । २१–गा (स ) । २२-न (का) । सो बासना (स.)। २४ मत (स०) । २५ मती (स )। २१-- (t.) । २०ीय (को॰) 1 २५–प्रपटि (स ) । २१- (.)।
मस-दरन ३० मानिक पीक पाई' को देखा । पई मोर कौतुक बह' पेवा ।। उपारा । कई पपरिया पर पारा ।। कर मार होई । कतई स्वाम बनारा कोई॥ बना टी" । क्त गलिया" बहि" बड़ो"। गारक मंत्री । क्वई " बगावहि बनी ॥ लिये संपहरा" । कतई विर" मिप 43 चितेरा ॥ कहूँ मनाहि" पर निकारी । कई प्रसया' प्रसर्व गरी॥ पवई ठपनि ठगाने कोई । कतई परहट पार होई। म्त पेटक मी हो । मवई मट' नाटक पुन" कीन्हो ।। साप मन पोहा- कौतुक बन" इमि र मन' तिन रंग न च । हममी पबही प्रस्त" सागि यह" मौष ॥२०॥ रोहा १०-१-मानक (7.) । २–चाप (स.)।-रह (का): x- होने (स.) । -रा पारा (म.)। —पडई (स.) । पुमाए (क ) । -मनमाना (प.) । -बनाई (म.) । १.-बरी (.)। ११--रंपा (का.) । १२१ (t.) । १५-बोकार रा (म.)। १४–रिय बनाई रिमा (का.) १५-सपिय (स.)।१५-विपी र (1.)। १-कान पूरी ()1 १८-प्रसिपा पमइप (म ) १९–पारी (म.) । २.-पिए (म.) । “१- नित (स.) 1 २२--पन (स ) । २३-मिमि (rt.) । २४-दिन मन पर (4.)। २५–पबही पारख (st.) ।२६-ह नाप (क ) । * ममाया-प्रामेबरने माता नन प्रयाने पना - पर भी गाते है । प्रमिपा-पामेर मूल पा । सपने पर वारपापा।
१८ मम-पमम मगर मे' पर भीतर रागपढ़ पारा' । पम् पहाइ बई पिस गरि काम ।। प्राधि माम सौ पूरा । मैं पास पर परे पूरा ।। सईयर' मन की' सिमा मगाई । पी मापरि मिहिकार पाई। वरहर पोय पोह पम बीरहा । पीय वर्ष मनि म पीन्हा ।। राप्त पतार सोत पनि" काता । निकगि नीर ऊपर माँ बारा । पारी पंगरि दुपारा । विम्हहि मागि पुनि नोह कियारा ॥ र एमसहि" मरे पर माहीं । उमरि" मौर' हमरोगगाही ।। पसग मगा " कछ माही । ग्पों प्रातम काया मर माही ॥ पा" तिन्ह ममे बप कर पोमा । पनौ' पय पर माग पितोता"।। पर सि रोहा-मनु"गर कह कि ममझ" मर । मापति मह नाहि"। यों मोर्यो गढ़पति प्रमम" पपपि" मोहो" माही ॥११॥ पोहा २१-१-कासा (स ) । २–पा (का.)।। पमन पुरा माग साँ पूरा () । ४–र (स.)। ५-सहने (स.) । १- (स ) । ७-पई (१०) । —मा परि पाड़ (स ) । 1 मोह सोह मस बना (स)। १ -तम बरसन बन बना (स ) । ११–चिन (st०) । १२-समीपन (स.) 11-प्रमद (स.) । १४-- (को०)। "-तिहि (को) १५-पही (स.) । १४-पो (स ) । १८-ठिहिं (t ) । १९पमै (1 ) । २०-बिन (स )। २१-कमोना (स ) । २२-- बन (प ) । २१–समृमि (स ) । २५–माहि (प )। २५–मरा (स ) । २५-मानत (t ) 1 २५–मोहिये (स.) ।
मसनमन बड़ी' पबरि पर अंध पुमाय' । लिहि' अर बान परियारा। वेतन पुष्प बैठ परियारी । परी परी तिन साप उतारी॥ पस छिन प्रवर होन म पारे । पहि' मर हि परकाये ॥ मार फिर मे पर। एकहिं मरी माझ पुनि मरे ।।* मार मरियार पुकारे । मुममहि"परी फिर" खिन मार। तो ती कुसम" जाँ परी , पूनी । पर पूरी तर बात न दूगी॥ मार मरी" परी मों पाऊ। मीत बेत देतो रे बटाऊ॥ गिन गानों" हि परी या टरी । यह गाना परतों नहि मरी ॥ परी एक दो टरी । पै' निदान 4 गा" भरी" ।। नियरा । मुमिरन कि कए काम न पा ।।* यह समै रोहा-पग मौ" बन पाया परी' प्रौप परी" सो पाप । विहि छिन त म परम पाय ॥५२॥ रोहा ५२-१-को पार (1.)। २~-पारा (को०)। -मिन्ह (म.)। ४–परणारा (स.)12-ठ परवारी (स.)।-जन (म.):-(म.)" -वित (का.)।१-जब (को) । यह पौराईम. प्रति में नहीं है। कार (स.)। ११–ममा (म.) । १२-भरण (म.) । गुमर (म.) - पख (को॰) । १५-मोरगीत विठ उर बताऊ (म.) | गाय (म)।१५सही पिन एवं मरी (२०), १- () 1 R- (4.) । २ -पुनि (को॰) । २१ को (to): (: " प्रति में यह पौराई नहीं है । २३ वह (म.)। •४.- ()कार (म.) 1 २६-सी (म.) 1 --पई सनम मम-यमन ॥ माया 1 राम पुकार' प्राई' यो रेसा । यो भूप माहिन' या गर भारे 1 बरण स्पाम कार कारे। बाबा कोर न पत्त' बोक मरमता ।। पारों मोर स्टि इमि पाई। पानी कारे उना।। भो म " मेर मम गरहि" । गा पेमहि" से' मा उपारहि ।। महि तसर" ' मूर उघारे" । पूर्यह" र मारि मुन गई"।। सापुर" सूपे " खोटे । माते रम" सौ होहि " मोटे ।। पास पुनि पावे कहि" लाई । पाप कोस मी मनुप बाई ।। पांग " कप पान" म मानहि । परमी देत" फन कर पाना" । पोहागाई" बनुमान सों, मरे बहर में रह । मन" इमि कई बुमान का पो निपान न ह ॥१॥ दोहा-~-१-१-मार (st.) । २-जाम (स.) । 1-नाहि (स.) । ४-~ बरे (स.) ५-4 ()।-मारी (1.) 10 (का.) सी ()। t-पंत (स.) । १.कारी (स.)। ११-पटा (स ) । १२+रे (t.)। ११-वार्य (स.) ।१४-पौतह (स.)।-नम पारहि (t.)।१- काहि (स )। १-परमर (का.)। १- (.)। १बाई (स.) । 11-पुण्ह (.) । २ -बार (t ) । २१- (स.) । २२---धायर (स.)। २५-एम (स.) । २४--रसाई (५०) । २५-महिं () । २१-यो (स.)। १५-रहि (क ) । २८-हवाई (स.)। २१-सम्मुख को भाई () 11 की (st.)।-मनहिन भाई ( )। ३२-फन बेन एट ब (को)। १५-हामा (स ) ।।४-पाना (स.) । ५-रे (t.)।-फिरन फाहियो ()।---चन (st.)11-ift (को॰) ।
मम-रमन
२४
स
माना
गा।
दुरी' पो समए तिराई' एक हसा । मह पि दिला।
रंमा मा
पौर वहाँ
पर भार बमा गम' मfe death |
मघर हे मु"
पास गई।
सास नव मानो' समि" पादाबाद' ला Kri |
बिन विचार्य कौतुक माम मान ।
पोया" ग्रामहिम ' मा मात्र ।
बमा । न " From
नै निरोम" गन" निह" मै मा ''
रोहा-पन तु" ti, arerit 111
mi"", H1 1111
।
रोहा ५-1-1 (HAT HE (16) 11 Aanti
(4.) -4 (1.) {m (164 117 (514) 15 में
निन म गाई, महिला (10) 16 रन (H+) ||(116) (11)
(म.) 1 ११-71 (10)1" at (म.11१५ मी (H-11111244111
(2.)।" गान I A1 (1.) ittal (1150 (114)|
१५-1 (6) Fair (1.) 1 1 114 (114)
In 1414)|
२२-IKit (10) Til (410) 14 (41) "
(t)। १९ tha (tir) yri (nir)) + (41)
२१-Ah (10) मा (म.)| HH (or)
(1.)
४२ ममम्मन मम रामा समा अगर पाट पहाय ॥ नीति बैठ जो गई। पुरी कपहरी' सिस्टि उमा ।। पग पर य योग' ह' हो । संती निई सोई॥ पर प्रेस मिमि मिठ' र पणा । दिन' को" मंदम काई" मामा । मा" निरार' " महिं परा । सम दुमर' या' अपने पप ।। निर मूरण " मंपर कीन्हा । पिर' मई गरि पापु न बीम्हा ।। रार नाम गिन" दीम" पिसारा । भयो भूम मग पामामारी ॥ मिर मर। समठ" मापन "पाई ॥ बापा" यदि मिह मई रा। मेमा गर" मोह परिपारा" ।। दिन दिन पर होइ नहि पुरा । गृह कीम नीकर फूटा ॥ रोहा-सवहरी को पमन इह सिधा गिय हो । प्रारना ताल म बाप कोई ॥१॥ देखी उनियारी । जन् संपारी ।। बसाम कस्तुरी । सुमारा सासम पूरी ॥ मीप पबर गरा । बैठे वहाँ गुहारि ॐ पन पाट रवि धागा । ई पर 48 प्रामपति' मा ।। पी पुनि निकटपरत यु हारे । मन बच कम सेमा मन' मा ।। भीतर गुहा सोई । बाहर पड़े और कोई ।। सेगा सम्पुर सोई पियारा । कार वहाँ ना पैसारा ॥ तिरह पर गिनती बिनय करिये । पापसु हो सो पो कुप होर सो पायम होई । गिन पायम कर मन कोई ।। दोहा- (--राब समा गति रवि, यह धान निर शेष। जो सेबम सेवा सगम, सदा हरी" सोर ॥५॥ रोहा-५५-१-मेनी (क )। २-नौब (स.):-हरी (11.) । ४-पष्टि (सं.)। -केट (को०)। -विहि (क ) -सरी (प.)। --एमा (स.)। ~ी (को)। १ –तिह (को०)। ११-की (को॰) । १२ किमाई (1)! १५-मम (स )। --मिरवासा (को ) । १५-र (at.)।लिहि (को०)। पर (क ) । १८-म (स ) १९- मपट मन कीना (क)। २०--हिप पर गरबा पासो म चाहा (स.) । २१ गिम (स.) ! २२-ह (स.) । २५-मुनि (को ) । २४-माप (स ) । २५- पापम् (स.)। २५–परी (को०) । २० बपि पांच वर्ष में गरा (क ) । २८ करहि मोहि (क )। २९- पाण(स.)11.-मर (म.)।१-को (स )। दोहा-६-१-रष साबा (स ) । २ -मीमपत (1.)11-पिठ (स ) | ४-होई (को०)। ५-बन (1)। -हो (at.)। ---पटकाहि (को॰) । १-नौब यहीं (स)। १ ते पागा रे वय करई (स)। ११- मार्ग चिन सोह ()। - नस-दमन माप बरे गर मन्दिर पति मोमें । चित्र स्टार को हर साम ।। गरा । कहि न बार शाहि कर नाऊ ।। ए रखनन मुबारा । पर पौ तारा ॥ उहाँ न पारिता न हो । परमर सिम की मुब कोई ॥ मन्दिर मार दरसना । दरसन पाहि पा बोमना ॥ होड पौवना । कोड सतपन बहु' रिषि बना ।। नही वाट' में भर मई मानी । ई उतर पिरें' मा पानी ॥ पो रेखी निम्ह पर प्रमनाई। भरा फुलवाई। मुमन मुग विमान रोहा- मोदर तु मि का ' साप निवास । पर तु सरह मास ॥१०॥ मुशामा 1 जानों व पार्य मुत्प पान भरि এদ पानी । भारत प्रो मति परमानी ॥ मर मिर रार पई माई । सौर न पौर सास लिहि हाई॥ भीम नार dिt' स निराई र है मोति मगा॥ छो 'पदन कमेन पर पूर्व । पृरी भार उसन' पनि भूने। परमग गणी । र भारी सरसर का पणी ॥ प्रति मामार' पर तर भार । परनाम " माया मुमन यो परी । पर उठी" म मा"ti" | पानी ही मुमति पम पौ ।र गरेप परप सब करे।। पो पहिला सि मा' गीऊ । वाहू पार पनि पीड । पहा-रेति मुविधा मारि की, इहि मनि" पार पीट । पनि र पार गौ पनि, देर तर पार पोट रोहा-13--1 (nt.) | मारि (सं.)। ४-- (म.) । - (it.)। {-६ (tt.)-पान निर्मित पए ( Ex- मूरिख पाय (st." रोहा-५८~-पा (को०)। शिम (म.) :-ान (1.)। ४--भुगही (को) | Twidti t.) । - (म.) । (क)मा (म) It~(rhition (et.),12- (i०) । १२-4 () Sta) 1 ) - में (मो.) । १५-पादन स्टिक fate {म.) (..):- हित (.)। १९पनियता नापार (स.)। -- (म.)। - नम-दमन प्राई । पाहू पाव पलाई। तक पान मुपरी पर मेसी कोस ठाउँ। बन में यहाँ न मानुन माऊँ। वीर मी बनाई। बमम रिणीमर वहाँ बसाई। प्रासा ना है तीरा' । बगर भाइ मा ति मीरा ॥ पाम बिना सिम कार म कोई । जीगि पाची हारेसि पोई ।। प्मानहि प्पान ह सुपि पोई । माप हिराइ रमा हो? सोई॥ मौनी है पदा पर बोल । मो वार्म तो म्पान निपि पोमै ।। पासह रिस्टि कर हेरे । जनम पनम + रोख निरे । दरसन लिए' पाप सब पाही । पग" परसै संसार विमाही ।। पोहा-प्रमटे पाप करा करम", पाप करे पुनि" पाहि । पाप करें इन' पुस्प है, प्रमर म होहिं विमा॥१५॥ राहि मुनि यह बाव मुहाई । कहा' पसो परसन' कर पाई। ऐो सिर पुरुष पो मुनी । उनहि' समं चम परसा की। दिनही काम मन माई' बो'माई । पमा पतरपति कीन्ह पगई। बम तिहि नरी निसर' अब पापा । रामा चम मोगऊ ट बैमरा । बाहन या पार मम पारा 10 रोउ सेवा मोहसि सम ताई। सममुख" मी ठार मा" नाई।। सिय पुस्प रि बैठ पकना । पापहि गुम पापति पैसा ॥. तारै जा रहा मन" माही । मुरत न फोऊ पोर' पुन माही ।। बीवी बारा । प्रालि होस तब सहब निहारा It दोहा-नेत पिम" पणा मपरि" पाइ" महे मिर ना ।। सिर पुष्प पुनि पा करि" मापा मौन। उमा॥६॥ दोहा १-१ मौकी (स ) । २-हाई (को ) । -जीरा (स.)। ---- पूर (क.)। होइ ( )।-वीरा (स ) । कोई (क )।-प (4.)।- (1.) । १.-मिर (स.)।११-पापहि है पर पाप हिराहि (Rt.) । १२-सः प्रति में इस स्थान पर कोई पाठ नहीं । १५–बिन (t)। १४-घर म प्रपट (को॰) । रोहा १४-१-कमा दि (क ) । २-पर्ष (का.)। ३-कार (का.)। ४-से (स.)।—प्रयाय दिनों (क )।-निहिं (क )।-- (को॰) । -कए (क)-पौर (स )।१. चोर परपावा (को०)।११- सम्मुख (स.),१२-भयाई (स ) ।-न (1.) I४-मामे पाही (क ) ! १- हिन (को०)। १५–मपक (का.) । "पाप (स )। १८+ (स.)। १६ मिमै (स ।०ा चोपाई की• में नहीं है। यह पौपाई 'स' में नहीं हो- या चौपाई 'स• में नहीं है। जब टार नस-दमन माया मन रावा ॥ रागा प्रवीनता । कीन्हसि मया' विसर रिले । पावर बैठक मि दीनी' । पौ मनुहार बहुत बिषि कीनी ।। रामा रिलि पास बाना । बाना विनय'चन मुख माना ।। माम काम गति होइ हमारी । साई पो नहि नै चिनहारी ॥ पुरुष कतार । मिन गिन रोक कीन संसार॥ का विहं रूप कहाँ तिहबासा । हम सा पूर कि हम ही' पासा ।। पी पुनि का प्रपनी मुगि माहीं । पो" इम फित माय पित नाही । पादि" है हर पर मपे । जीरन हुने कि उपये नये ॥ कम समृमि परं नि मा' । मही मी पोहा-हम में सूमा" मरमिया कित गम' बम माहि। मामा ही मर ममन, नाप मार्च मर पाहि॥२॥ सिस कहा राणा मुन' मामा । निज पह मरम हो हो हो । को मुनि ममुमि बात उर भारमि । पपम पस्तु' कह' मुमम निहारेमि ।। साई ठाऊ । मुन ताके ताहि पिम् सुनाई। पिर प्रर्भपा । परम शिमि सौ बार म देसा ॥ मुन'म पर मन परामा । यो ऐयमि' मा ठोग पर पोपट प्रबर का माही । मिमः' ममार रहा मग माहीं ॥ कर सेमा । पौर ममी से बह राम गो देहि दिलाई । पात मुख हा ममा ग" मिन करनी' करून हई । मुन मोमम निग" मग न कोई ॥ रोहा-एस' मा रमन मुना ६ प्रम को निर बाकी निगरंग ठामों मपा निप्प भटामा " सोई मर प्रार पोमा । रंम। श्रम ॥६६॥ म पाहा १५-१-परम्पा (t.) 12-माग (को०)।-की (5.) 17-- ही (स ) 12-निग्गु (11.) । लि (f.) । -निब (म.) 14-- हरी (4.) 11- पन यादि (म.) 1.-माँ (म.)। ११-पुन (म.) । २-मा (स.)।११-दादर (म.) ११४ रन हाल (म.)।"-पाता म.) । १५-माने पर (म.) । १७-पार (म.)।ौर (म.) । राहा १६-१ला (म) 12-ना (it)--गम (म.)। ४- है एक (म.)।-पान (t), मणि (म.)। -मिर र मम्म (st.)। ।-दाप मी हि मुन पास (1) E-पुनि (म.)-मन मम ममान म.)। १.-4 (1)।११-दह (1.)।१ प ( )। १-बा 1 )।१४-दाम (स.) । १५-पर (म.)। - ४८ मतदमन पर तोहि तार' मति समुभाई । समम पि मिज है सुनाळ ॥ वो बह ए सिमर' समामा । पट प्रौपट वा दिन नहि पाना ॥ यो' तोरे' पर तू' पनि साई । निरखि रेस निग पार न होई ॥ यो बह सो सिमट' समापा । मुमा , उपा ममा म माया ॥ पो तू पारित पुनि पोई । मन' उापि न माना कोई॥ पहै उपापि यो पाप विसारसि । भूम पार को' और रिपारसि ॥ पाहि पमर पर मिस्तक होई । तोर मद" कास में ठोही ।। वोहि पर मिप्या भरम यो" भयऊ । मौरहिं ठे पोह ६ गपऊ ।। म्यो" पनाय' माया अधिकारी । सपने मह" होर पार मियारी ।। रोहा-मामा निसि सपना जमत नीर मरम प्रशान। मोर मां" समा' सबन', जाम" कए, मिवाम ॥७॥ 4 यह मान पार' तोहि नाही । परमा' मा तिन माही । पोरे जिय परतीत म माये । मम ममीन संका उपनाये ॥ मारण ज्पी गहरामा । माग बम ब्योहोर मीराना ॥ रखन दुरा' गरे मम माहीं । बिना पिरार्म' मूमन नाही ॥ ताते पो पोर यह चिपा । सुन उरपार देत तोहि सिम्पपा ।। मपम मार मन परपन काई । वर भिरमम पनि रिसाई॥ सो सांस सदा मसकपा । साराहि पाय रे दिन पमा । ताम नग सोई मम मार। माम' म्बान बन दिम पनि। उपर' मन प्यान हिस होई । हैन पस हाह सोई॥ मुक्त होर प्रसह पा मू । सहरी सम्म मरम तब मे 10 दोहा-पिपा पवन मबाम मन तन मटकी बघि बीब । म" मही माया निकसि पहो" रझो होइ भोर ॥६॥ बोहा --सोरी (का )।२-एको (स )।-घमत (स.) । ४- तो (स.)। ५ तेरे (को०)।- (स.)। -पासा (1)। -समत (७.)।-मम्म उपाय करत चिन (st.) १.-म (1.) । ११- मुक्ति १२-गिय (का) । १३-चो (स )। १४–पम्माष (स.) या (क) । १५-मे (क ) । १९- साम (को॰) । १७-सपना (को०)। १८-समझ (को)।१५-चाका (स.)। दोहा -1-प्रध (का । २-ठी (स.)। पा रा()। ४-तन ( )।-राकररी (प.)।–ठरा (का.)।-मुप (को )। प--पौहों (प.) सोई (का.) 18-माम (को०)। प्राय (स)।११- मबन (1)! -होरी (स )। "पा चौपाई गन 'का.' में 10 चौपाई गत 'स• प्रति में है।
re मा" पोहार करम मुन मोमौ । बानि मुराध का' होतोमा । हि पाम बा गन् । वाम पाबन कर ॥ चोदा" पति परम पप पारे । रेमि सत्र मरिपारे । और श्री राम" मा" गई । राप मुनु मानहि ॥ निया भाई। सौप पारक सन विार । सबर बान । मभूमि ए पानी निर पान । पर यह भी सहि" बारा । हम नियाप" हम समाए । परिपार महा । M" पम रारा दुध पार्य ॥ र चिन्ह र सपना' । चिन्ह" म र वस" रारा ॥ जप सब कर मो भार। पर सपा के पर M गरम करो जिन काई MELI धमीय' मुगाई । पूमि का निर पर मन भा॥ इममि हाप भारी में परे । बार मुर' मरस निपारे । दीन मगरम अमीरे । पति मुर रस मरे सारे । गरे पनि यो । रक्षा भा पोरे॥ मंडरगामी । न दाम सपटकर सामी ॥ ४ परतीन निज पानी' । पन रिप मा नि' पाना । नो वा" परा पर पार।" पर पाहि मिर्म म सार पीन पुष गोपा मारी बारी बमठ निमारी॥ पागें मामा । सा मुमौर परम पनुमा । बराहा--परमारप सारस सहि मिद मुपार पनि परेम नि fram", त्यो कम" शिवार 0 १५-पा (1.)। १४ (st.)। १५-ह पर (प.)। १५-गिरि (प.) ~म (म.)। १८च (st.)। ११-में (1)। २.--पहि वोहि पूर्व (.)108-विम (म.) । २२-म्पारन (प.)। २१ गन (म.) 1 २४- परम (1.)। २५-पारग (म.) । -तिह (1.) । २:- (स.) । २-की (स.)। २६-पर (म.) । सा-70-1-4हित (म.)। २~~नी (म ..) । - (6.) Ir-मार () । १-गील (1.) हमि (म.) । म -गर (प.)। प्राई (m.)। १.में भाई (t.)-पिता (1)। १२-३ हिर (म.)।१नपा (म.) १४-पार (म.):.-~पा (म.), १६-मेर (ri.)। संवार।
नस-दमन पर म पटा' पुढे बाहर मी पिकगि पर भावा । फट' साप सम्मुप' पागा । पर फर मह फरहिरा उठाय | गर तुरंग मुग भासन पाये ॥ रहम पैरा पाऊ । पड़ा मिर' बरा पिव पाऊ ॥ भाग भरा अंग प्रमाई । दूना पग रहे कीरह' कमाई ॥ रम प्रस पीति मगर कई पमा । पौगुन गई रूप परि कमा । प्रार बार कीम्ह उरा । नत धन बाद मंदिर पा पारा || माया पटयनी । बिईसा' पसि नहीं विहंसानी ।। मोरे मह माए । पो विग" " गुण बरन मुमाए ।। सुनि रानी बिमसी गुण गायर । रतन मिस मय भस" उगावर ।। पोहा--मिग मिष मिस्वास पर कीरहसि रहस पहार' । ममा" पुष पाहि भमा मग बाजा" पित पार ॥१॥ जब रानी मा गुम पपिकार । उठि मंजन " फीम सिंमार सचि राह सोह पनि बनी । सुपर अधिक स्प रंग सनी ।। मई मिस समो मि पर मपऊ । बिहसत त सेप पर गया ।। मर मंबन कंठ मगाई। पस पसा पन बोर रिसाई ।। चपनी माय । मिप्त भए एक उपनयोग ।। प्रमगम' दूर ममा यह परी । पिर नी चातक रट करी।। मोर हमाही । पुत्रपट मीनर झमकाही ॥ पौन हिमार ਬਣੈ मामा । भूमहि दोर नि हिगेरा ।। मानह' प्रकट चौमामा । पुमा का" भए पार पासा ।। रोहा-तमी बोबन समुर मह मामि सीप सिंह भात । हिर में सात IN२॥ रोहा-.१-१-निकम (प.)। २-तक (स.)। ३-मोहित बैठाया (स )। ४-फिर हर नार पिप (म.)। १-पान (म )।-निरालय (स ) । ७–को (क )। -फिपस समाई (७०) । -विहस (क)।१ - मे (को)। ११-~-विह (को॰) । १२-कर (स.)। ११-साहिस (क )। १४-पार (क ) । १५-बामा (का)। १५-विम माग (का )। गोहा-०२-१-मयो (म )। २-का' में नही। का (स.)।-कीस (स.)। ४-तिस (क )। बीग (स.)। -पा (स.)। ७–प्रमि बस ममम ममा सिंह पर (1)।—पिन पाये नी भाग रट कर (क ) पम बेनी पावर रति परी (म)। -पार कंठ (स.)। १०-माम (स.) । ११- पायो (म०) । १२-मितहि पर है (क ) बंबत पर मए (स.) । १३- रंस (स )। भाव स्वाति भामा ।
मसरमन पनिक प्राइम । मोनार । विमरे सीपी स्वाति दूर पावा । बिपना अस माँ माधि गापा ।। गनी गर्मति सुनौ । मानः म हुममि' सब दुनी । पुनि पूरन भए म मामू । पुष दहा हमामू।। मा परि मिमि मपी यमाई । भारहि माति निछावर पाई। मार सा' परी निगरो । है गर अधिकारी ।। होर माग सुन रएम' बावा । परि' निमार मार सुगम ।। टीका मैं प्राग पहिगा' पठा मई पुनि घरी पराबा माऊ तेई' निम पाला मा काउ" पार सब साग गिमाए । पुनि सा' पार नार म पाए । दाहा-राब भू हिदू' बिन मा मै गावही' फनक गाऊ पार ॥६॥ दुमरे बरप बहुरि फिर राना । परमर्वद मा सबही दस माम पुवर मा' प्राण । भा' स पम को पहम माना ।। पुष गाम पुनि मोहा । तमोर मामद तिम्हार' कीहा ।। जो होने । वीमों मुन्दर मरस' बाप बनी पाऊ। पर्म देखि दारी पाऊ॥ दुसरी बात हे प्रति मीठो । हिया सराय पर पौठी ॥ मममा पर पर" पावै । पृ" या रे सुरम उपगर ॥ माहका" परा पारमे भूर्म । मानव हा देग मन पहा पा पर बिन पर प्रपिपारा पा पान्ह प्रम मा उरिमाण ॥ दोहा-राम गिरह मुराम मया गया कप्तस सब" र। यह' पाम' मुख मा हुनी यहाँ दान विधि पूर ॥४॥ 1-1-1-मा (म ) । २-देय महि (को०)। - निरमस (ग )। ४-तह (1), पनाह (म.) । ५-मु (nt.) । -र (म.)। ७-रहिम (1.)। ८-र (स.)। पाप (स) । ११-ौरे (ग) । १२-र (का.) । ११-म (पा )। १४.-हता (म.) । १५-बाबा (का.)। १६-प्राइममा (क ) 110-पारही (vt. ग.)|16-तन (1 )। पा-४-१-पार (t.) १२- (ग.) - (स ) | ४-म (at.)12-तिहि (प.)। मप हुने 7 (4t.) । ७-पर (1) 15- सजिप (1) 11-मरिता (ग.) । १ -पार (1) ११-पटनिया (7 ) । १२-कान पान (5)।११हा पर (1) हि (1)। १४- (m.) । १६-दुग (म) । १७-ही (st.) १-गानिक (ग)। १४-4 (1.) । २०-हम (म.) । साने ।
१२
मसन्दमम
गरमयत भा रानी । भा' बन कनक दुमास बानी ।।
मस्त्र' प्रोट रोप पत्' बारा । मा' इमि भात गाठ गियारा ।।
धीन पटा' उपो
गुरव
समाई । घटा
समोन
पिपराई॥
मरम मांस या पारो । मा विही पोति मात निमारी ॥
ग्यों ज्यों पर पिकह दिन बाई । पर्यों रो पंग गोद" दुति कार ॥
पर दिन पूग बनम मा ताम् । निस मह" भयो दिवस परकाम् ॥
रिया योति देखत मन मई। बनु रवि किरम प्रकास भई ।।
भु" पर पार या बनु मा । मोत काम सम्ह दिसराई ।।
दस पोत पूम्या समि पटाकर यह
पौर पर
परगा ॥
स्पाम
उर
मंग
रोहा---हे सोष सोपत भगत" परा
पगई प्रपट सो पाप हिस बम" गो को
Irom
,
रोहा--01-1-मम (स ) । २-विस्तर उक्त पोप (स.) ।-पस माह
(का.)। ५–मय (स )। -भीने पट (को ) | –d (स.) । -दिप
(का )।-तिन्ह (प) । १ -दिन (st ) । ११-योति विम्य (1 ) ।
१२–ह (rt.)। १५-~में (स ) । १४-मुक्त (का.) १५-चपत माहित
(को)।
बीती
ममममम
पानी
पारी ॥
परमावे । निम्मा सहि' हुता रंग राखें ।
निरस सिन बारी उमिनारी । पीर मपो म पाख
विहि की सटा मार भी माने । पम निस' तर मो' गत ठान ।।
महन कौन पुष पर । रवि यह प मुख' "क" ॥
रेवत" स्माम केम लिहि' सासा । कीम्ह बह गनु तिहि की रोमा ।
सम" का समार खिाय । यो देख पहन सा ॥
पर पहन तैसों" पनि हो । यह" रोम रेट गिन कोई ।।
मा निहिं म सा " राहू । गा पास
पौवरा" । है" म पंच
शासी परि ए कौर बवाने । पोहि यो परम मो जान ॥
प
रोहा-पाहि मम्म
पारी ई सर
कर रह गम यह वा
विहि रूप ।
मुन
ममूप ॥७
पोहा-७-१-परमाती (st.) । २-4ठ (t.)। -प्रम (t.) ।
४-परी पारी (म.) । -नई (म ) ! -नियम (म.) । ७ सौषत
(1.) 15-गामहं हम (म.) । -परी (1 )।---सरम (स.) । ११--
पित्र (म) । १२-- (म.) । ११-देगी (म ) ! १४-विरह (म)।१५-
लिमई (म.)। १५- (म.) । १७-पारयो मप (स.) । १५-मा
(क ) | १९-एम (म) । २०-मो' (rt.) । २१-पाहि (1.) । २२---
में गिर (म) । २३-दिहि राहू (rt.)। २४-म (7.)। २५-पपवारा
(rt.)।२६-- (t.) । २०ी मारा (1 )।
"पर पोग क• पति में नहीं है।
२४ नस-दमन बारी॥ परी रैम भा' घठी पाया । मौए' दिवस पृमि मा परापा । बस म ति दामिनि परा । ' व ना दमसी परा। सेवा है पाद पारी । सीपहिं पूप राय को यो यो नई चांद सों बारी । स्पी रपी होइ पपिर रिपारी ॥ भई पर' पाप बरण मह' पारी । सुदिन बिपार पान सारी ।। वरित कतिय दिनन' पारा । पूनि बिन पड़ा भरप सब मागा। पति वै माई हागि गरप अपर" भरपाई॥ पुनि रित निम्ह" परप न पावै । लोग शाम" सो ताहि पवाय ।। परित पटा मा' पटमारी" । गु" हर उसर पढावा पारी॥ दोहा--पर ऐसी परित मई, म पंरित तिहि देस । पछि युरि ता मारि की सबन" दीन पारस 1000 महाराम सोई बारी । नारंप परी होर रतवारी ।। पी पस भाग माग किसी मामा' नारय प्राय पिन' हापा ॥ मा संबोग तानि है पाई 1 उपर पूज पूयो दिवराई॥ पूरम भई सोरहो करा । प्रम बोन्ह पुति मा रिमरा ॥ निरसत नैन सिमराही । सखि मुन' प्रमी सुपरम माही ।। पर समि पह' सर बाय म करी । बह तो बसकी यह निरमरी ।। पो ससि दिवम एक निस' होई । यह बम प्रह सरबरा सोई॥ पुनि यो गह गसिर दृवदाई । सो ग' के नित सरन रहाई।। प्रमावस हिप" ससि रे । सो भन" यहि पाय तर परै ।। दोहा-एही' मार सबार मन मा" पूम्यो ससि चीन । में तो तुर राप रिपु ते या' पाबीन I७८ रोहा--00-1-म ((स )। २–ई () । ३-सो माम (को)। ४-परा (को ) । ५-+ (म.) । (का )।-मै (मा.)। 4- पेसारी (at.) । 1-वर्ष (का ) । १. सो पारा (स ) । ११-पुनि (स.) । १२- परी (स.)। १५ मिहि (का)। १५-गुवाई (का.) १५-हि पपमा विग मामि सुताये (को ) । १६ पिता (स ) । १५-मया (स )। १८-पितसार (स) । १९-करहर (ग) ।. -मारी (भा )। २१–तिम्ह (स.) । २२– सहि (को)। वोहा -34-१ हाता (स ) । २-पान (स ) -बिहि (का)। ४.-पई सु (को )।--एकति मत पसि (t)। ६-मनु (स )।- (क)। ८--एक पोग (को) । १-तम (स ) । १.-उपार मिससरण (को०)। ११ बोन (को) । १२-ममे (का ) ।-इहि ()! १४ नही (स.)। १५--मनु (क)! १-ममो (स ) । १७ –मान (का.) । १८-का.' में नहीं है।१५-पाके (का.)। ।
नस-दमन
मन
मेरे ति पुर माही । ताके का प्रौर
पनि माहीं ॥
दुतिय मास्ति' एका बग प्रानू । कहि न पाय तिहि' स्प पखान् ।।
इयर' प्रादि विनई
अपहरा । सबको
ताई मन हरा ॥
मैन समुर रतन मित हेरा । हो। मम मीन' मप चिन्ह मेरा ॥
को पुनि पार मोर सौ हेरे । कटिया परसि छूट पिम्ह' केर ।।
रिस्टि बडी तो दौर' बन पीनोमि" । मपाठ 'पता और पुनि नीन्हेमि ।।
मनपसि" बस्ती हरी गिधाई । मियत मुए पुनि फूट न पाई ॥
तरफ तरफ पिठ पीन तपाना" । ए बारापर पहाँ छुटामा' ॥
को पस गौन हरि पुनि" देरा । प्राप हिरावा सो गिम हरा ।।*
दोहा-मो पुनि कबहु' प्रकाम ते" हरे मैन
फि ।
सर्व महा किमफिमा मिरा" पहे" वह राह Inven
रोहा-०१-१-नामत (म.) । -विह (म.) । –मोर रिहि की
(1.) । —तिहि को (गो.) । --समद्राहि बन गिन (को॰) । म बिहस
तिहि (1.)। ७-फर मर (को०)। ८-frला (ना.) महरा (प.)।
१.~-दो पन (का.) । ११-दीनस (ना.) । १२-भारत (nt.) मात
(स.)।१५-त्राहिम (1) 11- बरामन पाई (.) ४-पाई (t )।
१५–निबाना (म.) । १४-बारी (स.)। १८-पिताना (स.)। १९-फिर
पारा (t.)। *मिन हरा सो पाप हिरापा (क ) 10.-रिपी (को०)। २१-
दिन (म.) । २२-करा (म)। प्रघ टहरा (को०)।
-
नस-दमन बरा ॥ 다. ताके हाच पी निन विरमा स्प मितनह पर पापा । भूमा मयत देश मुन प्रापा । पग म मौर म बानो कोई । पप बिन जीउ जोर एक सोई॥ समा समा मह बई कहानी । मुस मुख ही प्रेम पुनि बानी ॥ नमत पर बाई परा । यहाँ बन दीपक पगत' पास राब मन माही । पी किहि * पू" किहि" नाहीं ॥ निदान पाये। यह" कोई । पिहिमगम' ससे पुनि साई।। प्रम प्पाना । पाँ" कर देह करै मतवाना ॥ पाकी रीम 4 बाने । पी' केहिका" मापन कर' माम ।। मिमयो॥ हाप * माही । सोई मिसै मह गिन" पाहीं ।। पोहा-परत करन ताकर पा वापर स्यामा समौ" पर प्रापन रे माम ||८०॥ माटिन पा पारस यह कहा । मुनि राना मोहिव होए पहा ।। पौ मुनि नारि प कर मार । मापसि पैम बाम तर पास पहिनिग पटक पटक मिस परी । मम उर' मारि गोप होइ परी ॥ मन पंथी रमा पोहि मासा । उन' चि बार रहा विहिं पासा ।। सुना निकाई । मिस हो मिम फिर बाट बनाई ।। माटिन मोमों । चतुर बान झन' ही वोसों ॥ है सो नारि परमिनि क्यों जानी । कौन कौन पनि पहिचानी।। का नब सिंह सिंपार सम' पाका । मिहिमति पौन अंग है ताका ।। जीना मिन म मुनी । तीमा मन मरमा न पठी ।। दोहा -भाष जो मनरम को रपी', मौ" स्थापि पनि छोड़। सोच सममै बिना मन" परतीत न होई ॥१॥ रोहा-८ -१-विम्हा (स ) 1 २--वर पट (का.)।-(4t०) । ४–ट (स) । ५ (क ) - (स )। —पस (को ) । दुनि (स.)।--किन (म ) । १ -पहप (को ) । ११-मित (स.)। १२–पाइहि (को ) ।१५ सो (ग )।१४-पिता की (प)। १५- निर मिखनी (क)। १५-मागे (प ) । १५ बुनि (छ)।१८-पुनि (स.)। १९–विहिं का (क) का कहं (म ) । २. + (का )। २१-मिमाय (क )। २२-रह (क ) । २१ समै (फा )। पोहा १-१-भप (स ) । २-प्रो (को०)।।-मन तनि (का) । ४- पूषा (को॰) । ५–प्रकन (स ) । ५-पौ (फा ) । जिम (प.)। ८–चो महि (को) ।सो (क )। १ –र (का)। ११-यो (का) । १२--तो मुनिर (को ) ।-चीम (क )। बाव पड" नम-दमन १० पदमनी ॥ . परै । पुष्प संक महाराण हिस दान मिटाचारी मारि सुनाऊँ। एक हस्तिनी सहना । एक चित्रनी पहले हस्तिनी मारी । मा मह हस्तिन' + गति सारी। मम ममर पीवा मति छोटो । हमा मो निपट कई टि' मोटी ।। प्रा मयद यासू । मो मम सोट पर बिस्वासू ।। महार बहुन पुनि बाई । पदबाई गड गारम पाई। गर मठि चाप डाल पुनि ताहीं । बसत पंप विवर्ष पहुं खासी ॥ पिउ रति सेतोड पराए पर पित्त' भरै ॥ र पा मार म मन महे' पाने । बिन प्राकृम गए सक माने ।। रोहा-बो हठी हठ तर व या प्रतिम सर बाद । मोर मरे न मुम बचन ए हस्तिनी मुभा ॥२॥ यहाँ मंसिनी भारी । सिम सुभारत मान उतारी॥ कोपनी । पोज ताही पति बनी। बिसम पो प्रमा पहारी। पत सिप ग्यों पान पर्व पिस्टि नया ठराही' । म बन ईमत मुरा नाही ।। मोगन मांस सरि मान । प्राम मुका प्रान॥ बमार्य गापू । में गत तिन परि मामू ।। रोपो होहि पाप तर सी' । म म पर परब बम म सह रोम" पनि पना । अपने सिर पर पीरम यना ॥ पिर" उर देसि समै मत मारे । रमहू मै रिम रोस पना"।। रोहा-पर पिगार पुशी मिपनि बों गुरराह। प्रपन हो मुष मों" ममन ए संखिनी मुमार ॥८॥ दर तर कति सुसर कह' परारी ॥ परीती ।। - दोहा--८२-१-दहि ( ) 12-में (1 )।-सा की (क )।- कर पर मारपरी (म.)।-यान (ो ) । पद (म.)। -माही (ना.) । ८-प्रति मुहि (Rt.) 18-ठि (म.)। १.में (को )। रोहा १-१-मुबारी (d ) । २–पनि ममर (म )।-सीम (को॰) । ४-सारनी (म.)। ५-पराही (1) 14-तडी (को॰) । ७–परा (1)-मति (न.) 16-मुख (म.)। १.-या मुग (1)।११- सी (सं.)। १२-मग मकर मंरर ममी (को) । १३-त्रोप (4.)। १४-कोना (t.)। १५-पार उर ममै नप पाये (प.)।१-रिपा (म.)। १०-4 (t.)।
५८ मस-यमन रा॥ प्रय । ती पिषमी' नारी । गमिम" पंग मां बनु तारी॥ ये मंग गोन गत' गन । गर हाहि नाही पिप समे ॥ बरन पव तनमा निमाई । सी प्राधा पस अपवाई॥ महा भरी । बोमत रसमा मीठो परी ॥ देशि सौ मराम मनाही । मौने भार होम' पार बाही॥ छिमात रिस रोग म जाने । ईमत मुभी सबन मन माने ।। मोगन प्राप दोर बारा । पा पाप सोपं रपि पतित राशि कर पिर सेगा । पिउ परमेमर" पर महि मेवा ।। परमिनि सो रोई मुन पटि होई । पौर बनाय भाष सब सोई॥ पोहापिनि" पुषिमि के परम प्रय" मनामना पदमिनि राती' पर्वम" क्यों न सुवास प्रमि संग ॥४॥ पवमिनि नारी । परम पुसंध पूर' उशिपारी ॥ करम' बल पर कोमम अंगा । वारा सुबुप होगदि ममि संमा ।। मा प्रति पातर मा पति मोगा । मप्प भाप सुटि' नाब न पोटी ।। काति अनु पूग्यों पर दुति मंदा।। ससि मों सोए कमा' संपूरी । पै समि माहि कसम भपूरी।। ससि मह" पोरह कना बवानी । पमिन सोरह प्रेमनि पार पंग दीरव मपुरी पारी । धार सुमर पहु" बीन" सबारी ।। पमै पी नाम मुहाई । बोमै पिक नौ लिये मिठाई ।। प्रो पति पतुर त पित चोरे । रोया सौ मनु" काई न मोरे ।। रोहा-मन सूषा" भृकुटी कटिल मन पप गति मीन । इन मंगनि देखी' सो पनि सो" पपमिनि परवीन ॥५॥ रोहा ८४-१-बतरनी (को ) ।२-ममम (को०)।-पंग (4t )।- स (स.)।-बने (प.) 11-योति कमाई (को॰) । म (का.)।- से (को) । १-दोनह (स ) 1१ –हस्ता (को ) । ११-पराए (का.) । १२- चतुर (st ) । १५-प्रो निवासना (स.) । १४–रानी (को ) । फोमत (क )। समिल - सुकुमार। पोहा ५५-१ सोय (क) । २–कमन (क )।-पो (क)| ४--- कॉपस ()।-होइ न (ग )।-सों (मो.) । " कीन्ह (को)।- मुख (को )।-करान (बा ) । १. सतान हि (स.)। ११–मै (को०)। १२—ाधि (स ) ।१३-ौ (rt ) | १४ को (प.) । १५--मन मैक (क ) १५ पुगा (क ), सोवा (स ) 1 १७-चन (स ) । १८- (को॰) ।११- मक (स.)। पानी ॥ .
११ मा-दमन - मुमर पोस सुमर निलंब मतप सोरह प्रग वेऊ । पौरा ही सुनौ नर पेठ ।। प्रपम केस दौरष प्रति मापो । मो' दीरप प्रेरि छवि हापा ॥ प्रोग तर सोहै । परष मैन मैम मन मोहे ।। सप सिमार दिया ससि मोती । प्रो सप इसन दिपई यस मोती ।। पुनि नपु पुष मरि' उनमाना । मप नामा मृग योग समाना ॥ रस मरे । मुभर मुगा पनि अनु' बर।। मन मोभा । मुभर गम लिमि' मी गोमा । माक्षिक हीन बदन पर बामा । सीन' प्रपर बन कागर पीना ॥ वीन" पेट पावर पनु" पाता । बान ' मंक म्पो सिप बनाना ।। रोहा-परमिनि पहिलानी था' में इन पंगा' पर" बरनो हि भंग' म पंप म ॥८॥ एमगरे । हारे पाय' पर मति कारे॥ कोमल' टिम मरन सटरो' । मकपाहि नाम बिमारे ॥ पानो पंग पर परे । मुरहि' मापू मह महरिल मरे । मार्ग' सहि उऊ प्रान' महीं । पहें निहारि सोग" मी दही ।। परे । तर" उमि तक' मन मरे । पपर टारिस ग मार । निहि प्रधा गप दीपक बार ॥ दीपक मार पनु परा । मिमटि प्रपेरा पाये पी" पूमी देगुव मंभिचारी । उके पटै तो पैसारी ॥ पर" यह पपट रहि पग । नि" दुल रो पुपारेमि तटा" पोहागपो" बम गारिन पर भवर पुर " पार । रहिम सात रस रिपिदे रह मुभा मुमार ॥८ दोहा ८५-१-और पुरुष (स.) । २-मरई (म.)। पीरप कर पुन रेल तर (स )। ४ (मी) 1 -बिन (स ) । मन (को०)। ५-र (स.) 15-प्रवीना ( ) है (.)। १०--पीना (को॰) । ११- (स.)। १२-बस (म.)। १५-- (स.)। १४. (.)। १५---मंगनरो (st.) । १६-पार (को॰) । तिन (Rt.) । रा (स.)। राहा -१ पाई नि परिहि निगरे (4.)।२कोरम (स.)। १-मुठारे (म.)।-मुलपकाहि (ati) | मिमे (म.) । -भारहि (11):1-4 (.)-हरे (ग ) । -माn (म.) 11.-मराह कटनी (म.) ११- पीयम (ग ) । १२-मारगर (म.) १५-निहि (म.) मिह (को०) । 11-पक (मा.)। १५--ममत (ग) १६-बोह (st.) । १५--यह भी पटी म राि बिमारो (1.)। १लप (म.)। ह-दिन (म.) ।२०-सारण (को०)।२१-टा (म.) । २२-रई (म.) । २१- (म.) । २४-उबद निमा (म.) । परा ॥ " १२ मम-यमन बान ठाडे भय पापा । जौने मुमा मगा। बरनी बनी पनियारी । बनी पनी पारी' करारी ॥ फूमे कंबम होर रसवारी । शिर' बई पार गर' भये पारी ॥ काम बषिक बन तुगन परे । तीचा ठाठ कीह पहुं फेरे । पूना' प्रनी चूम बनु पोषा' । साभि पो मन तहा पाए सो में । म मुसे कोठ बात' न मूमे ।। पार निपराई । वाकर रिस्टि बानि पर पाई ।। कोर' निया बस्ती मिन्ह दीठी । पर उर" पान " मि" पीठी ॥ मोरी कार माग जो बाना । ' पनि प्रकार की म प्रामा ।। तन सौ मिस" पाहि पनि प्राना । उ म निकस प्रान ।' पाना । रोहा-वेसे पीपत पकन" का", मुनि श्रीमा" संसार । सो निप रहा पाहि न गार विस्तार ॥१२॥ मासिक पीन' है पारा । मन तिहि परत हो यो फारा ।। पति पर चप कमी बतु राखी । ममय' पाप पोई' का सासो । पुनि पहर पराऊ । कहि न पा का लिहिकर माऊ ।। सुमटा प्रपर विध तमि वा । ध्यान रहगारी सुमा ठोर वामू । बहम' बास यह पहप सुबाम् । बपि मुगा' ठोर प्रति मोनी । ठार न विहि सर होनी ।। पाप है प्रति कोममताई ।। मन बन सुवा फिरै तप' सार्थ । मरि मुदि पाचिन पत्ता पप । नासिक मरण ठौर महु' हाई । पौर या' मपो काट पुन सोई॥ पोहा--मनी प्रकासक पर, इमि मासिक पित पोर ।। पमी स्माद मनु" ससि कुतुर कौर" निकासी ठौर ||६|| दोहा २२-१-कनी (स ) । २–पुरमों (का )।-वान (का )। ४–नारी (को )।-तीय (का )।--प्रोबा (स ) । -पोपा (का ) बोमा (स ) । -भये (का )। ग्याप (स.)। १ -कोर म चिया परी निहि (क ) । ११–पर (को ) । १२-~-मपै () । २३--बम (स ) । १४--(को ) । में नही है। १५-पार (स) । १५–पाह प्रीमी (को॰) । में नही है । १.--(का)। में नहीं है। १५—सो (का) । १५-- कान (क ) । २ मा (क ) 1 २१मा (क ) पा (स ) । रोहा--१५-१-- (स )। २-तिनका (क), ममिम (प)।-- (स ) । ४-तिनकर (स ) । ५-सा मैन मारे मन (स )। निवास तिह (क )।--सोह (स.) । ८-तब (स.)। १-गम ( )। १.सर मुपर पत दिखा (का ) । ११--चन ( ) । १२-पिप (क ) । १३--सूबा (को०) । बनाई। पापड मस-दमन प्रपर मो प्रमी भरे रस' रासे 1 मिन बोस रंग सुरम पुपाते ।। कुसुम रंग सर कान्हम पाई । कहाँ मनीठ प्रोप मस पाई॥ बिब समान बाइ बन' फरे' । विद्युम मछुषि समुद महिं दुरे ॥ बस रबि न होई परमाता । पाहू से प्रपरम रंग राता ॥ पातर निपट पाम वे कीन्हें । फूस होंहि पालन रस मीने ॥ पर बिक रेस मुगाइ म पाई । बनों गम सौ पौरि बनाई ।। पतु जिम रारा । पौ बोरा' सो रही विषपारा ॥ बीनी मीक माय पस' देखा । कमर पत्र पर पुर रेसा ॥ बोमत प्रपर मान राइ नाही" । नाहित विधि" चारे" मम् माहीं । दोहा -बदन सार बिधि" पति पनि, परपा बिरा बस बाद । मूमि मया प्रपरम मनो, पीर म सपपो बना ॥४ यौहर' गुरण स्याम परनि , बार मन दुति माउ । लिपि' परिया पन् परै पराऊ । हीरा छोम बाम पड़े। रंगे मोल रतन रप रेखा । पिच विष सीप सो बने बिसेसा ॥ बिम बितान' रतन मिमि पहरै । काम जौहरी पाहि पर। बोलत नदु मा रेहि दिखाई । विविध चमक चित महि पुराई । विहमत होर उजियारा । बनु मसि मार कॉप माकारा ।। पापी रिति परी यह नपा । मैनम मामि है जिन्ह' पापा ।। पाहन रवन हाहि सा' पाती । हाहि सगोत म पोत गो मोती । निमि जब पोप । मई मा बपता है" राम । रोहा-नि दमन दुति रखन दुरि पाहन विहीं मार मा मा निकमत" पो पि गार ॥१२॥ मेरे मान समार। राहा-१४-१-प (म.) । २--मिन् (स ) । ३-पहरे (स.) । ५--परे (st.) 12-गौराई (स ) 11 -निम्ह (प.) । ७-पो बह गुरा मो हि विष धारा (स.) । यहीं () । १-दमि (म.)। १.वरना (स.)। ११–माही (को०)। १२-बिन (स ) । १५-पार (को०) । १४–पा (म.) । १५--कियो ()। पारा-१५-१-पा (ग.) । २- (t.) । ३-चोमा (स.)।---सेत (..) 12-मा पर तनु मरे (को ) । मरे ( ) | 0-मामत (स.)। ८-विनई (का)। -यह (भा ) । १.-ति ( )। ११-मन (म.) । १२-तिहि (को०)।-निकम ना (को॰) ।
६४ मस-रमन मुनन' पाय " मुन रमना मरप है पीसी । पौ योमत का मपुर सीमा ।। बीन तार तिहि गुरहिं म पूगा । उपमा जाग पौर को गा॥ बेद परप मरपाई । गुल्ला मरबन सदा ई पाई ॥ सरवन' पन प्रमी हार परदी । राम रोम वम मौतन करही ।। मुरमी बेन पो मिमि' पानी । त्याँ बन पुमकि उठे मुनि बानी ।। रग मा। निकट मिरग होइ उतरे नैना ।। पिक सुनि बैन माग भर स्पामा । मीरह नगर परि त पिसरामा ।। पाती बोस म मगानी । बन मई कुहा सौस या बानी ।। पकि पति पद हारी मही पाई । तर निशन मारहिं पपि गाई॥ राहा-सात दूर लिय' पात मिटी पियास । सबन सीप पबतरे, महाँ" पास हि मात ।।१।। म पोम गोस प्रति बने । बिम' तुपर सीमा पुति समे ।। बममाहि र तिराई । पित वह पमत रपट में पाई ॥ परपन पोश माग परे। तर लाम' पमत मठि परे । पों बस बम में बनाई । एए म पोउ प्रणव मय वाई ।। को मामबंद दुनियाही । सिह कारन मत प्रयवाही ॥ सेब सुरंप प्रेम रस भरे । मनु राहिम फतसो मिमि फरे ॥ विस कपोस बार पुनि परा । तिन दिन त तिमम दिन परा ॥ जिन विम स परा तममी । विस विम तमफत बारम घेती ।। कहि न पार तिम रूप रिमना । कंगम बभि उरका पमि घांना ॥ रोहा-दिन कपोन पर कोटि पनि कहि न बाद विस्तार । मान रीप' पनि पतम मन देवरा मै धार ॥९॥ पोहा-११-१-पुरतन (स ) म (०) । २-जन (स )।-पों (स.)।-फम (को०) पुमद (स.) । ५–सुन (का.)। अस (1) -मीना (का.)। प-मग परतरे निकाय बीमा (को)। -मगार (1)। - उत्तर पर की. में मही है। १ -विह (को०)। १-47 (st.)। १२- हो म तिम्ह (स.)। रोहा-१०-१-समम (स )। २-पोमित (ए.)। -प्रतम पता सुति र दिसाई (को॰) । ४-चितवत (फा.) । -धून पाहत बीकम खरे (प.)। राई (t.)। -ह (स.) । दुनिया पवता (t.)।--मुपोप (क ) । १.--बरनम मनो (का.) 1 ११-परत पदय (को॰) ।
7
भरमन सी बन् का मार दिदी म बार बार ॥
समि बत् ५ एप में दिया ।
रिपन नमन किया ।
yि ' पगा परे । पारि हिर रोट र ॥
खनन ब्रमममा
पा । पत्ता
पर हिमपि भार कोष मार॥
मनि परफास गरी ररियारी ।बनी नप रण मन् गरी
बो मन' वही रिमि मिन मया 13मा मा मात्र बम भपका
हनीपर
मुहार । ममि की रकम मिमि" भार"
ठोपी पनि म मुन जाती तू निपाट सर पर माती ।।
मारा-माता" नटी मा परी कपन मीरियर मार ।
नप कम" म" मर मिले मा" नाप IIEI
दोहा-~-मुत्र पैर रस की (का.) 12-पाट (म.)। परी
(4.) IrMir (10)13-बी (स.) मा-पपई (.)। १-वारा
(का.) हरे (म.)। अमकार (म.) । ८-पुटरी (rt०) | E-यन् पाई
(1.) 11.-म (.)। ११-नाम (स.)। १२-पोक (म.)। ११को
(२०)। दुह (6.) पी लाहि (si.)। १५---पषित कि (स.)
प्रपिता (4.)। १६-ती मार न मया हि मोठी {st.), १.यो
(स.)। १५-यो बरे (मा.)। १-पाप यह (4.)। २.वन (म.) ।
२१-मा (स.) । २२ जतन (स.) । २५~-पार (स.) ।
नम-दमन - भूमि' का बरनी पियुक रिठौना । मिन मिम रीठ फेर नहीं माना ॥' पिन' बह देखि सो ऐति हेरामा । पगि पापा fof माहि समाना । सहर सुमार मबम' बिन' बना । यो' बरपा त्यो पार न मना । एम भनेक होइ रमा । बह बानिक' कपिणा नकमा ।। पामह रीप रबिमारा । विहिवर सिमट रहा मषिमारा । को राह" एकत" सि पाया । कार करेज पार तर राना॥ कम मंदसा माहीं । कि पति धान परा मुपि मारी ।। बों रूप प" रस पासा । पम दाम मन बना" पिपासा ।। पेम पासा राक । तिहि बम पिउt का पाऊ ।। रोहा-पिक नार पनि निषि सरन पसि पर तारण तोर । ठिन" पा"मास' मनोग मन पस्यो" रसिक पितमोर ॥१६ सरप पि भायन' अस काही । मुमर' पुधार मई बनु पारी ।। मनु क बाग तुरी पी नीना । रामपुर में सबा प्रस कीन्हा ।। हिया बनु मा परेवा । सुरु सपि भयो फर मैगा ॥ प्रेम मर मरी मुपही । पहि' मबार रस सो' पाही ।। समाई की तटक पो होई । मोट पर 24 को कोई॥ यह गए। प्रौर' मान अवधरा ॥ नि" तिहि पाग परी वर रेषा । टत पीक प्रष्ट सब चा॥ न्हां मुफत" सर पप गो होई। सरक" मरम एवं पर कोई ॥ पो गरि पीन पर माई । सो बनाय निम पानि म पाई ॥ पोहान मपर पहि पाहि पलक " विम" हिमपार । परबतपुर पूजा करम पमा" भेंट मै हार ||१..॥ पोहा-११-१-पल बरलू पर (को०)। कामें उत्तर पाही। २-चिहियो (क)।-प्रपन (को०)। ४-एन (को०)। ५-- (स)। ६-मा (स.)। पान (st.)। प-विन (स.)। --समत (स.)। १.-काल (स.) पहन (क.) । १९ाह (का । १२-रक्त (का. १५-कोप (८०) १४-मा (स.) । १५-वासा ()। १५/१-पो (को॰) । १५-पम (स.) । १७-विद (को०)। १५-यात (का.) १९-बित (स.) । २.-रसोर (स.)। पोहा-.-१करयों (स)। २-नोटा (कt.) ।-संभर पारि (को) 1+बम् तुरी माग (को०)। --प्रचक (ए)। पाही (क ) | -सममहिनी (०)। पर ग्बो (स.)। १. पुति (1.)||१-मिका महरा (का.)। १२-जन (प.)। १५-रे (प.)। १४- मृगक (को०)। १५-२प टप (क ) १ (को॰) । मनु संपीत प्रामा ।
नै मन मुख मोति मुपर मुश पर्व उनु परे ।कुत फार' मीन मनु पहरे ॥ दो देहि पति सामा । पान' इमि पदसी बस मामा ।। पोनार करन मामा है "बह मन हिप दासी । विहिदुत निसि रिम प्रा पुधार । मापु पापुन मुग पंप हमारं । राते मनो पहिर मर्मों पोर ।। माँ पूरी घर पहिर माही । रिन पहिर न पिपत प्रमाही । पुनि पारे समि नक्षत पनी । गनु' पापक राममि पर मूठी ।। मा मिठ कार हाप पर त । सो गिन हापन रिस्टि करे ॥ मनोन । रामा बह से पति मोन ॥ पुकार हार ॥ पार टार रोहा-मेखि समानी रतन गनि गा गेत वाह" साहि गो पोम प्रा'गि बम गमहि" पो म बाहि ॥१.१ हिम सरबर पूष प्रेम करे । संपुर करे निस्सत किरन म ममि । निपट कठोर सदुप होई' गई। कार स्माम मरिफ पनि आई । प्रमि छौन र ग पाई। पर मग दोर भर बिसौना । ऊपर मगार ठिाना ।। माँ मनोग पिटिया पर वापी । फिरी दुहाई वन मामी ॥ गोवन गार पात हिस पाहि । मातु म नहि पगार नाहि ॥ निपर प्रनीति पर पर मागी । बपि मन सीन्ह पर मातापन निमाई । बोल मंगीर परे मन' गा पानिर मी पारी | मारंग पर मई निरमारी ॥ पांसी ॥ पापाई ॥ दादा-पमठ पम चौगानाँ गिया' सारं वहां मनु पठि' - निमान ॥१.२॥ मरान । दोहा-१.१-१-मारी (11.) । २-रा मानो भारी (rt.)। 1- (st.) | जली की पम (ना.) 11-मिर ममार पर (st.)। पार पीठ मैन (1.) । --उरम (का.) १.) 11-मानो रिण पार की गे (t.) १.हरई (rt.)। ११-नाहिं )।१२-पग पषिक र (1.) । १५-चोमि गामि न जाहि.)। रोहा-१.२-१-गीत (ना.)। २-कौन (11.) । ३-ठाहि प्रपाई | ४-माई (m.)। -पर गाने (स.)। -प्रमी पनी सोपी । 0-पमा (1.)। Hr (म) । १-पार (म.)। यदि मम-बमन पर विपन' पान पावर मुईया । मौ' पानी बन को पार ॥ देपत सबन सपिकनि सामा । मन पत्त रपट पर सोभा ।। रपटा चिन' सुमुबंगम पारी । रोमाबसी हरपारी ॥ ता विप पुनि मिया न कोई । यो सम रसा बया पर सोई ।। पा जयापि मामिन पी भाषा ।वी ठक स्प दसि विहिनीषा ।। जाने महि विषमी बाडी' । उमर मर पापर पाटी । ठि रहे तिहिं सादि पिसासी । मिपरे हे मागिन नमवापी' । गरि पसी मार । माभि पुमा गहिर" गहि गरे । बहन हनी" पुप सरह" म हारी । ग्यास , वहाँ' हाव गटपारी ॥ रोहावामिती रोमायसी विवसी पोपट पाट। मामि भबर मन परपो तह कह निकस किहि बाट ॥१०॥ कर मु' रोठ पीठ पुनि पापे । मेरित' उसट पमी बनु ाचे ।। परी पीठी । पिर पीठ दरसी तिन दौठी ।। जो देप सो पीठ के पामै । पीठ सस्प पीठ जग मान ।। बेनी पुनि पो पीठ 4 परी । कासिरी गिर' सों अनु' ग्ये ॥ न' मसय बास तिहि पासा । माग पार' मिपटे लिहिं पासा ।। मिने मूस' माया पम मासी । सदा सो माप है फन कारी ।। सा ताके भूप" माही । गम" पर वहा केमि रही । निरहि सोनी माग निकाई । माम पतार पुरै सब पाई॥ बपि फनहि मादि पिचारा । कर गई पाई ।। पोहा-पिप प्रमार" मोहन लिये मनि" मान?"हरि बीन । भर सो, स सरल बनु दीन १.४॥ महिनी बोहा-101---मापाती (स )। २–काहन सुभूकान (1)। इस (को०)। ४–पकि (को०)। ५-चिन्ह (स )।-बो (क )। --साही (स.)। ८–मेन (स.)। १ ग बासी (क ) - पुन पुर फासगी गरे (t.)।११पर पर प (स.)।१६ ही (1.)। १५-पुष न सिंभारी (को )। १४-र (.)। १५-पारी (को॰) । पोहा-१ ४-१-मीर (को०)।२-यह पु (स )।-प्रपपरा (1)। ४.-करे बेठि (स.)।-कर (स.) 1 -मनु (स.) 1 ---की तिन मिमें (स.) सा सौ मसा विसरीसा (म०) 12-मोष माना मन बाप (स ) । १ -पंचव के (को॰) । ११–मन (स )। १२-योहा (स.)। १५-पार (क ) । १४–मन (को स.)। १५-मापे (का.)।
नम-मन बनातहतम मकदा । कार पनि ठ बन' सा॥ बमा म पूर' सिर मा गाना । सामि बिग बन्द' पर पाना । मारी करि प्रहार निस र । नि ष गिरह दुम दहे' । मा न रोम गेम बिर मा । तिर भागन' मानुम' पर प्सा ।। पमा म सबके दिन मामा । तु दुइ प्रपदी नि मामा ।। मन भूमि रिए । अमर मन र निर॥ निपर बीत" " बरनि म बाई । मम मूठी मह रहा मनाई। जान मीन र या । निर पर की गरिमारन पाई। नान मोई । पामिम मि समन गिम हाई ।। नहा-दिषि मरी कर रोगों नहीं परों गुम यह मार । मार यह पारा र पोक ॥१२॥ प पाप मा जोबन मनुर मामि मी निर सार क ठोऊ । ही पबमा कहि मांति पाई। गुरा । मारा यहाँ सार * परी॥ मिरग पोर रमा ति र । ' काई कहि न हो ।। मारि निरि माही । स्वाति र रम पामि नाहीं॥ मिह' हा निम स्वाति कर दुपा । टिप' र प्रगा मधुर मूरा।। ती + मुख रेखा । मुख बाप निामी गि स्पा ॥ माँ का मरर माग का बसी । पारिन सिम मो कमी ।। भी को मार पीपि रस माने । गोपन चनम मुरूम में गानं ।। पनि सुगम ग्पो पर न बामा । पार पास प्राणि भये मासी ॥ रोग-का' पी कमागी रह मि उमर मार हा मूल । पीक १ ॥१.६॥ पर, म पा-१०-१-मा (स.)। २-गर (म.)।-मेप (म.) 1४- मई (म )।- (म.) 1-पान (म.) 10-मानमः (t.) 1८-पर (म.)। १- (म.) । १. गर्म पाम (H)11-गति (.) । १२ (म.) । १३-प्राचीर पर मरम (st.) । १४-40 (11.) पहरि (म.) । १५-मारवादी (.) । रोग-१.-1ा पाप (1)।-frाहन तर काकी (म.)। नहरि गई (को०)। ४RY (7.)। ५-साम (म.)।-ति (1) - (म.) । १-मुश्मन (1.) ।
मसदमन मूमर निय पान सो कोमल परे । ममियागिरि ताँ करि बरे॥ सामित अप मत पनि सी । ऊपर सुमर परारी' भनी । तिन्ह म पूपिय करगी गामा । यो मिर पाइ कीम्ह पोका मा ।। मराम देसि परासे । वसती पाणि सरोबर बसे। पर बन' मरहिं बिमूरि बिमूरी । पुहिं सीस पो गर्जा पुरी। चरम या कोमम पति रो।राने ग्यों मेंहदी रम सने । मंजन समि मम मह पर परे । पान जर जावक प्रस परें ।। पे पटमर पर दिम राठी । सो प्पान रागन' की पाती। बम पनवट नोनी । सुन विधिपनि पनि मोहि मानी ।। रोहा--विम् परनन उरमा पमत हा भास निम सार। यो पुनि पीपा पर परे रीम म पानी" पार ॥१०॥ मुम ससि रूप मूर मन बमा । प्रेम मारे पर गसा।। केस मुप्रीम पार ह परे । प्रम कर परि मारि मटर ।। कोर परि पापा । मौस' पमी गो प्रबर बताया। मुनि दुखिया ससि उपा मिमाट् । तिन ररसन कारन भा माटू" ग्याँ गहे कटारा । मागि हि मा भय मासिक पर पान उर कीमा । प्री मुस मोन मोग निहि वीरहा ॥ वसन भाव बरना पस कोपा । माई साग गहा पित पीपा ।। पी मोटम मन कीहा । भौह मनाय' पाक मिट पीना ।। बर' में परे। गो कठोर कठिन " परे ।। सारा॥ मटक रोहा-बानि बान मकुटी पनु तिन दीपे सब पह। विचमान पीस" प्रगट रोम रोम मह" बोह।।१ रो -१.७-१-रे (प)। २-मिमे कार ईराकर (स )। कति (स.) । -रारे (स )।-सोमा (ो ) -नौ गोमा (फा )। -मुनि (क ) । पिएर पो पर (st.) । -रामहि (t ) । १.पीही (स.) । ११-या (स.) । १२-पानि नहि (क)। रो०-१-१-पूर मा तर (स)।२-प्रपिरपर (स.) । ३-मम् (को॰) । ४-1 (स.) । ५-रमन (को )।-रचाहिं हि (को॰) । स चौपाई के परबा (स ) प्रति में १३ चौपाई और एक बोरा अधिक है। चौपाई और बोहा पाएँ पृष्ठ पर पिए है रूपया ठीक करने । •-मुत्र (का.)।-मबार (को)।- वम्बर (प) 11.-मै गरे ।११-मह स (स.) । १२-उन (को॰) ।
मन्दमन ११ पदा प्रबन प्रेम बम मवत । अस्विर मन उदास हो गया ।। रार कार नि किन न ताग । निमि निदा बिनु परं न मागे । सिना विहि मा कारे । हिनन छिन पुसरी के सारे ।। मौर' भाप विरह मम रागू । पाा घिमि पर मप रियाम् ।। मन राम रस मई माये । निगा न ममें पम भरमा॥ पर पाएम रहे। कार मा मरम म कई॥ मोचा माप दिन राती । म रियो रिया पप्पा' ही होम पोमू 1 नि दिन परे नाग नन मामू॥ मा पर पिपर रात को मा' । मूएर बन पान मनु' पहा ।। म मन * बानी ।। न पाहा-मिह' बट" बामा पम को तिन" बट रफत माम। पाठ उफनन' पर' निक्मे हा प्राम ॥१६॥ मामिन वर बपि मौनी पार बमाई । सोमाँ राममि पगिन दुरा।। 4 निशान मनपासा । बी अमिम उर कीम्ह प्रकापा । भा' तन भार पर मनोर टूट पोर पा॥ पनमानी । मीन त बिन पानी ।। तर पिए रोग माया । बन' मिरम 4 म भागा ।। उनु र बपित परबा रारा । * मोटन गहि मुर वारा ॥ पनि ग्राम छिन मन पार ! पम पम पर प्रबम हार पार ।। मन उमाम निमें दम तापी । मनमग हार गरे मिन्ह पाती ।। प्रमुग्न पर मात्र । मनों बुनपर पून एम्भव' ।। -गुन मन पनि पारस पिए, पिन न हो। बिमाम । मा" उमाम सपन मा मदिरा भयो हमाम" ।।११.11 रा.-१.t-2-पुनि (को०)।-रिहि (गा )।-पोफ मम (st.)। -पता है (रा.}-पिपा (म.प(5.)10-माटि मा (म) 16--प्रग (म.)।- (०)11.-मिह (०)।११-उन (म.) । १२ दिन (t.) ! १- (म.) प्रोपर (t.)।१४. मय र (..) (4t.)। रोग-१ -1-प्रमामा (पा.) १२-पप बननो मनु (स.)। पर - (1.)-डरा (.)। १- (म.)। 1-1 (st.)। .-मोति (7.) 16-मागे (n.) । -विदाई (..)। १.-मन (1.)।११-पपट (न.) । १२-माम (म.)।
नमनगमन काई मिरर से बात मपेत हो पाई। मालो' महर पररा माई ।। रिमनि ग्सा । बापा पिव सो एट परगमा । पार मंग पहरामहि । मेर करहि गी उतर , पाहि ।। तिम बारे मागिन कर पाना । पर म ३६ फेन मुछ पाया। पन् प्रगत रोक वन स्वामा । मन में पपो प्राम पासा।। काया गहर' भाप माँ पारी । पहा मगाय शिरि सो पारी ॥ पा तन माँ रघु पा न माता । मन न वाम मीत रंग पवा ।। बहा' मोग परान संभारा' । यह मुमन सब सरग पगारा॥ पो पापा विन काया पूजी । इम"ह" मरी" ठी' पो।। दोहा--मन पर पणा मीत सा प न मों कय माहि। भाष मोटो मुर परा, मात्र मग्या माहि॥११॥ पुनि गो कार मई पात्रा । बनि कार गुर र बौराना' । भा पन' पीन पापम' की कप । रेब मुरग ते पाठी परा॥ का प्रम का साई। जाना मूरति पित पुनि नठि 48 तक बई मोरी । गागर स्पान मम पस' होरी ।। मेन बानो" पिपकारी" । स गुमाम पंस" कवारी' ॥ मपट ठसी ही पर मासा । बमु होरी माई पई पासा ।। मूठी मरें पूर" महि मेमे । विही विप पुरवर्ग' बम ।। सीम पने पपिताही । मना नाम मनि टि गाई ।। दुहिमोग नाह" गहि माता । तर न दो पेम मश्मावा।। दोहा—मा उरमा उस पैम पदण्टे हो पर सुप मा। न" मूना पिप पौष ६ ॥११२॥ दोहा-१११-१-कर (प.) । २बामा (को०)।कार (स.)।४- भये (क.)। –र प्राबई (स )। 1-1 (को०)। ---समुफ (स.)। ८-चाने (का.)। -परा (स.) । १.मारा (स ) । ११-पम (को॰) । १२--हिय (स ) १५-घर (स.)।१४-मरी (स.) । पोहा-११२-१-पुर (का.) । २-पुरावा (स.) । ३- मनॊ (स.) 1४-ह (स.)। –मों (का.) । -हिम (को०) । मरत (का.)। 5-8 (को०)। 1-पों (का.)। यो मह (स.) । ११–चाहिं (स.) । १२-पुषकारे (स.)। १३- सोक (स )। १४. कटारे (स )। १५-पम (ना.)। १६-चार (स) । "वंगी (का )। १८-पूचे (बा.)। १९–नापा (को ) । २.--बट (को०)। ।
नम-दमनं ७ ठाबा प्रम पहन ब गापा । जग मई अपार { राण । मा मान मुख माहीं । नया निार मुर पपिताही । प्राई। पो पुतिक साई॥ मुना मयाम । मगर मा प्राम॥ सई ममुनि विचार' रामू । विहिं मगराम मा बन बियाग ॥ कनी पित प्रषिकाई । मिहिरन मा मापवाई॥ परी कोमा । दानव बम कार म्हो । + पनि पुरप रवि पति माना पाहू नारि माह घटाना ॥ ताई मम तान' न गरी मा पागा १ पोका बटपारा ॥ पाहामारी रेमि दबार कर, दिया पार ममि रिपा ठहार निर ताकर प्रसा"। उमर १३ प्रपम रारा पहं पारा । मास मुम्मावा ॥ पनि गहि एप निहारिस मारी । परम' पोर दूपन' माँ ग्यारा ॥ रेसठ र पकित होर या । टिन रोग रय गार ना ।। मारी पर पड़ी । मनर' मान प्रम पार वर प्रनारी। फिर फिर का समिर नारी ।। मन मई मन पग मारी । महे निहार' मा राई' निहारी ।। माहित उठ का मर भगवमि।बरती प्रपिन नम का मामि॥ पीय नह पापा । गाई मरण पान कर परा-मू किरकिर मारा गामि मार मना न पामो पार का नारी उर में दनि उचाप ॥११॥ 11.-११-१-रवि रोचन कापर (म.) । २-विर (म.) ।३-चान पमहुवा मा गई (म.) नावत (म.) 11-देपाह (t.) 18-ममम (ना.) । Vाहि (स.)। -मीमा (ii) IEमा (म.)। १.- गरे (:)। ११हो (.) । १२-प्रमपार (म.)। पा-११४-१-२ (.)प्प (१०) इपन (म.) । }-पान मन (८०)1 1-1 (म.)। -वारि (m.)।गाह (म ) 10- काम मराराम (स ) -म पापम (क )।
१८ अप्स-रमन मनाया ॥ मनि यह परम र रठि प्रापा । पप जनन पह' पान प्रम 4g माही । मिराह बान मा उर माही ।। विहि के पीर पन हरि मीम्हा । मौतर' बस मन पापा कीगा ॥ काम बानि पी पटे । गेम रोम सगरे फरे ॥ पार विसंब, माबर । रागा रहं यह मीत मिसाबा ।। माहित कठिन पेम + पीरा । दिन रार में पति पर पीरा ।। पेम प्रमिन पोमे पट पर। तम मन पार गीर सौ परे । पार कर पिट' त मिलाये । पिउ मुग पामिप पान , पार्य । पासा' सिराई। मी म पटै मित होर समाई ॥ पोहा पेषि समाए पूर्षि कर रामा तन मन से। पम पिन प्रेगरी नीर म्यौं घीगत है तन मेहु ।।११।। ततवन प्रहर सेन परपानू । माया' तपत हुवा मा मान् ।। प्राइमपाइ सास भा ठाडा । समै रिचार बचन मुख कारा ।। परताप प्रवरित रामू । मम बोधिव' पुर लिपि का ॥ परा नगी हमारे । पप' बोती तुम्हरे' उजियारे ।। पो' प्रपिमीपति दुप पापा । पा' पस पान नगर' मह पाया ।। तुम्हरी विका नगर पह" मापी । मपर कि मनु" सब मिस संतापी ।। पापो मन मर रस्त पर होई । जगत" पिपर' रेप सब कोई ।। काह के तन मह पीर माही । मिठ सबको यि माही ॥ रोहा--ग्यो बसूपा" सूत सुरति कई गोपी" स्यों तुम सुब पूष स्वाति नषि सीप भए बम" पर्यन । मंग ॥११॥ रोहा-११५-1-क (को॰) । २-पास रेप (को )।-पेम (प )। ४- सौनहि (क.) यो तह (स )।-पौन (का ) पर (स.)।-तीनहि (क ) पो तह (स.) । ७-पस (स.) । ८–मेहि (को०)। दोहा-११-१- परहत (का ) परपट (स.)। २–पार (क.) मा (स.)। -पावर (स.)। ४--पा मबो (स.)। ५-पह (को॰) । तुम ए (स )।-चपत (स ) । ८-उपमा (को०) मनता (ग ) । - पगत में (को)।--मै (को ) । ११~मग (को०)। १२--परमपान (स )। १५-प्रपा बबत (स ) । १४–पीरो (स)। १५ वसुधा पु सूरति कह (को ) रासत सरप पर (स.) । १६-कोपे भमे (स ) 1१0--नम होन (स )।
ममममम २१ म विला होसो परपट की । पुरै रोम बाई तन पी॥ पी पुनि रोग मो ममाहि समाना । कई बिना छु बार, बाना ॥ कही मरम प्रापन गस प्राही । बस सों दराबा पाहो ॥ बो कोम्पों मामनि पित परी । कहो मंगार पौ' इहि परी ॥ महाराम प्रायस् यग मागे । कई प्रस पीप बो रामे' माम || काह रावा * बारी । पोरे देस सुनी उनियारी ।। पाको म्प सुनत चित गहा । हो मगम रुप परि न पा ॥ पावी मिलि म रेगि पठाऊ । ज्यों के पो पृषि सोषि मंगाऊँ ।। को पपपरा लिप्टि मह पाई । मपर सक्ति सों ॐ मपाई॥ दोहा-पार एम परताप मसदम दोई करी जमत माब। हाच ॥११॥ तिहि उत्तर राबा र बीता । रिए मरम पोपा गर तीसा ॥ मन परान कहाँ तो पाहो । जैसी का बौठी पिर' मा ।। यह ए एक भारिम ' माई । शिन परमिनि के कपा मनाई ॥ मोई कपा पगिन हो' परी । बसों सुमग सुतम सब परो॥ पर तो बीरव संग पहुंचाया । वो वन पह बोम उठाया। पब यह नीरज दूरि मुा परा । हम निम निरसन होप उरा'" वाते पर ही कहाँ ईकारी' । बिरह गत माहि मारी ॥ गो पर बगि होइ महि मेमा । तो जीरन पति' निपट दुहना ।। यई नियन मा निपरावा । देह पार मिसापा ॥ रोहा-पान बम पनि मौत पर पिनन पान हन प्रान । मो' पामा रिहि पिन घुट तिहि पिन मल निदान ॥११॥ रोहा-११-१-मेर (स.)।२-रातम (म.)11 (त)। ४- निहि (मा.)11-गारा (१०)1 - रोहा~११८-१-पाहि (4.) ।२-11)। पर (ज.) महारा (प.) 12-मन (1) 11-उस (म.) 10 कारी (स.) 12- पाहि (.)।-गुनि (1) १. सीमा (म.)। - मम-दमन प्रह' सेन बिना कर पोरं । प्रथमीपति गिनती सुन मोरे ॥ जिन रिपना तनु पिपा उपाई । तिन भोपद पुझि प्रगम बनाई ॥ मिन सी पुष्मा' उपमा । जिगह मी भोजन रम' मंपियारा । तब मार दीपक उनियारा ॥ दुस बियोग मह पौग परी । ता पपास कह भास पौ इह पेम एक मन बानहु । वा गई पहुंचामा । पेम ताही पे राई । पाको पीउ पिरीत सो पाहे ।। निर पिठ पाहू पेम एप मानहु । पेम एष छ पोर न माना ॥ पर प्रति प्रबम प्रयस्पा' होई । तब बरसा सम्बहन कोई॥ पोहा-कह को दूपी रो पेम एस गिन' सुभि पिप ना सह । द लिये प्रीवर निपट" पीर बिना का ॥११॥ प्रहतसेन प्रति पौर पाया। राह बिन न , मारा।। प्रेम प्रपन मन पर बोए । पीब रिये बारे प्रति पीरा ।। लिहा म्पाप भयो गित सेगा । तर पि' यो बमा परेगा । परपि मैन मैप मर नाहिं । भामु पीर पर नदी बाहि ।। सबपि पित पाठक न सिराई । प्रो' तिहि स्वाति र तप नाई ।। दिन मो त्यो दुख पर उगारी । बिरह रैम पूमर प्रति भारी ॥ रापा पूर दिन मा निसि माहीं । मीरव मैन न मुंवाही ।। मन मा मपर भर पहुं मोरा । पक मावनि ग्यों महि मोरा ।। तपत्र मस्बोसा । बड़ी पेम मब पौर पियासा ।। बोहा-रागा पर * यह गत मई म्पों बसी ममि मीन । तप पौर प्रापीम ।।१२।। बोहा-११-१-पपी (को०)। २-कपिया (स.), पुपा (को०)।- पास (t.)। ४-मई (स.)। ५–ही (को०)। कर (का ) I--- पनिमा (स.)। ८–पुरषामि (को०) । १-किहिं (को०)। १.-ता (को॰) । ११- (स.)। दोहा–१२.-१-यों (को ए)। २-परमार (को०) नो बमा (स.)। -दिन (11.)। ४-मई (१०)। ५-निहिं पर प्राप्त (को)। -विनर्स (का.)-सी । तरफ कई में प्रे (को ) । कोई मुरत (को॰) । प.
मम-यमन मर' पति मरे नई प्रो रोयै । पौरन सोरन देय म सो ॥ पोहि बियोग यह गति मा मोरी । तर प्रतहि ठितो पहि गोरी ॥ राग वम मा दुर जानी । इस ददन सुख रेन बिहानी ।। पार घाई सूरन हो गई। राग पाट मा पापक मई॥ पनिन सा हि भा होरा । तहाँ परा वाहित वन मोरा ॥ उपर्ट' मपट महर बहु पासा । मनी पर सब भुई पपासा ॥ सोह पचन होइ मो। पौर भगिन रास क्यों रहे ।। मम उरमा सकिर मई परा । उपस न सही जाही' परा ॥ पुमि पाये किहि काम समारा । पा" पर देह महोर पाए । दोहा- पहि" पर गाऊ किम दह" माहि सोच म कोर। सकियो' निमः ममि, साहि" ममा म होइ ।।१२।। मुनियत ही एक पंग प्रीठी । सो दला हमही पर बीती ॥ हो पापी ताहि मागि रमावत । वाहि मुल चैम नींद पित' पाबत ॥ हो भर बैरागी । तू सरोब' मुत सर पनुरागी ।। हो पातक पिर पिउ' रए मोरे । तू स्वाती महि पारे । मो मन गित पपार बिम देन । तू मा र तोर महिं मरा ॥ मो मति पर्यों मपरी बिन पानी । तू अपने पानी प्रमिमानी ॥ को पेम परसर लागे । यो मिहिमग सो विहि नम बाम । सो म मांग यह मृग कहानी । मोगन भूर सोप है मानी ॥ होर वा पेम विसासी । दोडू उपर हाइ तन पामी ॥ माय पोहा-+ मनु पोरे पेम पुरा पेमो तोहि राइ । असा फार रन फर्श, र सा निकट , कार ।।१२२॥ दोहा-१२१-१-एक (का.)। २-1 (म.)। -रिता जीवा पही (1.)। ४-दिन नि (4.)। ५–पारर (म.)। ६.-पपई (स.)। पनो (t.)। ८-योहम (को०)। -चार (सं.)। १.-राही (स.) पराई (.)। ११-पा (म.)। • इम पौराई पापा 'स• प्रति में यह सभी पौराई पर है -'उन पर पार होर पापा । रसन पार मित बिउ में रे॥ इस प्रशिण समझना चाहिए। पंप में नियमत नो पार्यो क पापात राहा पाता है। १२-पर (ज)। ११-नहस (स.)। १- (.)। १५-वाहि (1t.) पाह(म)। पहा-१२२-१-परों (म)। २- भारत (म.)।-भरत (मा.) । v-पर (गो.)। १- यहि कर (.)। -चामो (सा)। -प्रपर (प.)। -निमी (४०) । (-मनग बार पेरम (स.)। - ६२ मो मो पिमठी 4 हम भाई । होइ सो ६ मा पिती भार । ही पचीन पनि दमता' पई। मिट में हाप पार पर पर। प्राम मोर । सो कीमो योधार तोर ।। ठोर पेम ग्राम पो पाई। तो पासों पुनि कहा जमाई ॥ में मापा' दाप गौम । पब तोहि' बने पोकर मीता ।। मो कोड मा नगि पिठ । ताकी सुधि सोऊ पुन म ।। पो पुनि यही बात न माहीं । सब गम बीच पूमाही ।। पाको परा दृष्टि कर हरसि । वाही के दुख पाह नियासि ।। बाव गावा । पई' सो पाहिए माता n तोर पोहा-आप मान बार भयो माप पाप ए बातें सब भीत सो कहा सुरति पति तार ।।१२।।' जग की मांति गित मको पगा । योमै माम' बघा पनि नामा ।। सोप दुहेब मीव अनुरागे" । बई पास समन्वयन राजा तुम समान सपान । परिवान पंरित बम बाने ॥ कौने मति तुम कर सिब दी। जीप पराकी ।। पेम पंच सूहेमा । पौर निवारत निपट रोना ।। जिन पनि मरो राग पुस मानो । कौने कार रेह दुर साना । पहा पेम वा मूग , प्पासा । अगा भोग सो कर रासा'। रेस महं हास कहामी । राबम मह होर हो अपमानी ।। परी मन जिन मरमानी । बन पणा पिर' छोप मगायो ।। बामह रोहा-विय वाय' तर मूप के ताकी मिसन उपार । पौष पवन गो स्मों सून, साथै बार पर पाप ||१२|| पोहा–१२३-१-दीपा (स.)। २-मायो (स.)11-जाहि (को॰) । Y-गोरप (को०)। ५–म (f.)। -बिय (स.) । * इस रोहे की नीचे की पंक्ति की. प्रति में पहले है। । रोहा–१२४-१-जोग (को०)। २-पर भापे (को॰) । (ग)। ४-प्रस को मोई (का.) । ५-निरासा (f.) 1 -विवि (को०)।
मसनमा रामा सिप भवन दुपारी । प्रेम पपिन पिनमी' मुख मारी ।। का मोरि मिस्प मीस' सिमरामहि । परत प्रपिन तेन गिन नापहि ॥ पेम ममुह प्रवाह मपारा । वह परे को मारन हारा ॥ मरी समा इक मोरा । मिम बुर कर लिहिं पोरा ॥ पेम पमम से माई । मंगम पर घिरफ म सिराई॥ पेम पहार महाम उपाही । मिम दोना ना ऊपर वाही ।। प्रो तुम पेम रस नहि मा । मा न प्रग: पेम कर मा ।। पेम नम मरम म गानों । मूठे मीट रुहिर म पानों ॥ पमा मीप' दग माई । मपिन बरा मन मिराई। मीत V रोहा-मोरे मन भर पिउ राऊ मुरत कर मेह। मेर" स्वास तन पेम तम सो तुम काले रेहु ।।१२।। में तुम म मीण मोहि देहू । बम कतर मेह॥ मई तुम प्रपम कहै हो हेना । पम पंप गाना म मुरेना ॥ सो वो मूमन तुमहि मा । जिनह न भया पेम कर मेमा' ।। हिरे रिए रायू । नयो , अपमा के पिपनाग ॥ दिन पह पंप सुगम परि गाना । मिह कर पैम पंर मन' माना ।। हो सिख मीस परल कर पाई। पै पंप बाई॥ बा म बीर रैन नि पम् । दो मगि यो मपि मी हि मिम् ।। ग्यों ज्यों पर उमप स्पो होई । पेम' १प पर पर न कोई ॥ गो न हार है पर जाई । मन पग पिठ मप मोमणि ॥ रोहा-पेम पंप मोहिपति मुगम, मुख पाम र माहि। परेर कारही मीर' मु मैगन' माहि ॥१२॥ रोहा-१२१-१पा (स.) ।२-मिर्गह (का.) सोसा (म.)। 1-- पापो (t. - (R०)! -सिपाहि पम उपई ई (rt.)11-तम (2.)।.-हर (स.)। -मई (म.)। १-fम (1.)। १.-मन उरमा पा मीत' (.)। ११-मति पार (1.)। १२-निबग (म.) । हा-१२-'समपुरकी प्रति में इस दौराई पाप पटरी लाई है - सित सौम--- 11-4ता (st.) । २-प्रहिको (क)-मा (स.)। ४-रेप रेप कर (क )।-१८ माय बडि (म.) ! -मपि माई (म.)। - (..)। -चाण्ही (म.) । १-हीन माँ (म.) । १. नपर्ने तिन पुनि तुम का पेम पप हेसा । पौर निवाहत निपट दुहेसा ॥ पैम 4 मई मौर न कोई। तर पिठ' पोर घोर मा सोई॥ पैमी पेमहि भोर न पाहे । नेम' महि मोर निगई । पेम समा माम पा परै । पार पोर कर पाम न पर। पाहे पोर सो' पापन पारा । मोर मास तब भी पिर पोरा ।। मों होई । मम पसारम तो सोई ।। तीसे पोर गरे । तब र भार प्राइ पग पार ॥ पेम सेम मा माये बागी । सो तम जो इह पर पनी ।। या देखो पुनि प्रभाव रीता । ना हार गाना तिन पीता । . . दोहा-पेम जे समुद्र अपार प्रति माहि" मोर महि पार । पर" साई दिरं यह पम दपि" पार ॥१२७।। पुमि मोहि ह सिच्या मह मान । अनि पपि मरा राम मुए माना । मिहि रिपि होइ राब मुस भाई । जो म मिमं पीएम मुबरा ॥ तुम्हरे रिस्टि राग जा' मावा । सो म राग यह घरे परावा ॥ दुष समूह तुम मुग माना । रेयो का यह पमत मुनाना ॥ पा सम्मति यो समार । विम्ह कह' भूम कही' गिन राम् ॥ पूर्ण बाहि निमामा । विहि पर निउ परी माना ।। हो मस राग , मन में मा । मिहिं मुसरमि मीठ बिसपः ।। पो गि' माम मिमे पिउ सोई। तो पा राम हुसन पे होई ।। माहित पम पमिन तम गारी । मूठे राग का हारी ।। सपन पोहा-हार बनम बीते रामा पर्ने गए पर पूक उमार पेम निसान । मेवाम ॥१२॥ ब दोहा--१२७-१-प्रेमा मोर हर पुनि (का.), नर पिर मोर प्रब (प.) । २---प्रेम कहि (का )।-पौर घर की पास म (को)।४-बाही (प.) । 2-पौर सही पोरा (का.)-प? बोरा (का.) * (को॰) । प्रति में यह पौगई मही है । --सी (को०)। (को॰) । प्रति में इस चौपाई पाचात् पा चौपाई है -प्रेम ही मार न मांगो कोई । मौमी का पर प्रेम न होई। रणो (स ) प (को०) । -पपरर है (को०)। १ या तन (t.) । ११-~- माहि (का)। १२-(.)।११-विधि (स.)। रोहा-१२८-१-पोह (स.) । २-शाहि (क )।-६(क) ..- बामा (का.) । ५--पहि (क )। (--महो (क )। निहिं (सं.)।- पने (को०)। पर (को)।
मारमन पुनि तुम यह सिप' बमन बजानी । काने काय ह दुख सानी ।। का यह र प्रमर तुम पाती । गा मपि भयो' पैम अपमानी ॥ देह निपान पा माई । म पा पेम पम मह माई ।। जोरम बग' पेम बिहूना । प्रपा प्रान उन पर सूमा ॥ मुख तुम पह का माहा । काटिक' बनम तुमहिं इन वाहा ॥ मर प्रोवरई । याही देह मोह के परी ॥ पात पे तुम पानी । मगह समयो रे प्रमानी ॥ भीतर म्याप । से तुम यह पर ममाग 1 मूत मोहि मुलाया । पम पर देह मह' साह ।। अपनी पट प्रपना रोहा-ना पीतम है पम सौ मीठी होती देह । सती" पेम मगि की बार, करती ह ।।१२।। पृमि तुम मोहि मात यह भासा । यहाँ पेम वहाँ भूब म प्यासा ॥ मोरे पैमहि भूर पियासा । पम पारि पूरी महि भासा ॥ भोरम पिपास पानी । ए माई मुक्ति' पेम रुपि मानी ॥ इहै भुग मोहि पौर म कोई । पेम मूह इह मन न होई ।। पाए मैं वो बड़ा तन मोनू । सो वन पैठ होइ पुनि नापू ।। मै मन मत ₹ परा। तन सो मिस पेम पिर परा॥ पड़ी भूल जगत सर भागा । पेम मेम सब कर मिसरारा॥ का मुछ होर गो मूब न होई । भूत समान मनु नहिं कोई ॥ सा तुम मूग मार' के पानी । पेम कमा कए मनहि न पानी ॥ अपना रोहा-की यह पे क्लिास सो, मुख ममी निषि हो । पौम रोष मम्मामी भए । गरं पोर ॥१५॥ रोहा-१२१-१-मुर (स.) । २-~पर (प.)।- (स.) । ४- पाको (स.)। ५-पर (को०) 1 ६-म (स.)। ह ह (स.)। - कौतुर (म.)।-मपा (st.) । १.-मन (it.)। ११-नीकी (८०)। १२-मरने (म.)। रोहा-.-1-4 (n.)। २-प्रम न भूधमप्पास (1.)।-प्रति (म.)।४-- हिमामा (तो.) मन प्रा नाम (म )।-मा (मा.) । - मुर (का.)10-मिशाद (०)।
जसदमन जीनदि पुमि तुम कहा पेम पहं रामा । मत मून सौ परे सवासा बिम' गंगाग मोम का होई । एस बिमोग' मह मुपा म कोई ।। मिस म पातम पीऊ । बीषम मुर पीठ यौऊ ॥ सहि यह को होर तम' माग । मोम , जनम पनम कर रोग ।। पर पिर मिमि तम' मप होर पाई । विहिं पुरा पापा हिराई । तब सुप मोग मिहत पूरा नाही। सुप पीठ पेम 'दय माही ।। मा मई मीत मिसन पासा । मो मन सरा' हे पिर पासा । पीठ मिन दिन पाँ म पेम् । केसे वी कीरह 'मे मू ।। * पीतम सम बोर गबाऊ । बिउ' को गिउ पीट भी पाई ॥ रोहा-चमठ रोग" मप"भोग"जो गौ नग मिमें पीस । वो सप हा पिर पैम सो मेन टाये जीऊ ॥११॥ पुनि तुम यह सिन्धा' मुन पानी । पते देस मह हास हानी ॥ मम नाम माई हसे बो कोई । पोपा पेम पों पों बाग मेष रह इसे । त्यो पों ता पेम परपसै ॥ ही रोके । पम पर पेम' मौत म विपाई ॥ मेमह रोए सुम पारे । तिहिं काल रोक्न मोहि माये ॥ पो बिल मैननि' भीर नरै । म मीत सा मंतर पर । जिप पिउ पह' पिट पैम गो प्राना । यही बाप पर मरम भिरामा ।। सपने सुनी हसत मम माही । विहि रोक सपने पग माहीं ।। सपन वन' सर पायम होई । ये रे सदि रोग पुनि सोई ।।. बोहा-री न हास कर्मक सौ पा पेम है मन माह। भी माम' परवाह गप्त, पित ठाराहि ॥१२॥ रोहा-१५१-१-निरासा (को॰) । २–पुन (का.)। पौनक (प )। ४-प्रीतम मिमम पौड़ (को०)। ५--यो (स.)।-उन मा (को०)। बहुत (को०)—पाही (स.)। -पुभि ई सरा विहि (7)1.नि पोनू (4.)।११-भोग (का) । १२-मह (स ) । ११-चौब (+t.)। १४–पौर (स.) । १५– (क )। दोहा--११२-१-पमिया (स ) । २-पेम न मीत (स.)।३-न (स.) । ४-परै (स )।-पप ( ) ।-रोए (स.)1 इसके पापात् 'स प्रतिम निम्ननिचित चौपाई हैयाको प्रति में नही है पन को मैन पेस मग रोबह । प्रस्मत मुक्ता माम पिराबह ॥ क्षेपक है। -हि स्मास (को०) या गो पास (स )।--राके (स ) ।
नम-मन पुनि तुम यह बोसे सिप बानी । रामह मई होर है अपमानी ।। यह है अपमानी म' मानी । यही प्रपट मै पत कर पानी ॥ पौर न मान मान मोहि सोई । पेम मान प्रमान म होई॥ पेम मान मामा अपमानू । सो प्रपमान मार पमिमाम् ।। माप्ती हो पेम समाना । सो प्रपमाम मान मैं माना । मी लिहि कर हो अपमान । रिट गिा कर तिहिं माह समानू ॥ मुनी रह री। विहि के मान कौन पत मेरी ॥ देह मान तिनही प माना । मिय मन पेम ग्यान महिमानो । का दहि वे मान मुमाबहु । पेम मान प्रपमाम न पाना ॥ सनमान। दोहा-भूरु मान ए मान मत्र पा मान छियो में मान सौ रीम पेम अपमान ॥१३॥ पुनि तुम मोहि यह सबम मुनाबह । पौर पर मन बिन भरमाबहु ।। पा पवन फिर फिर मुख मामो । कहा कर पिन' मिम मम रायो । पीग पन मीठो मोहि सा । याते पेम ममिन उर पाप ॥ ग्यो ग्यों पमिन होय मई है। वो त्यो पम सामि' मन रो॥ विहि कारन माहि पमिन सोहाई । भरती मगिन पेम सिपराई ॥ में ' गरी पीर सुन बना । तर सावन होइ बराह नैना ॥ न' अपर पो पाई' झण्हीं । दगप गरी पहुं दिसि उमड़ाही ॥ मपट उसाम सो पबन हिमोरा । बाई मह प्रगिन कर जोरा ।। पाखिन सामी रहे बमायत । दामिन होर हिय चमक रिसावत । रोहा-पार पन मोहि पनि पाहि सुनि हिय होहमास । उमगि पेमदन पारमन' मे पिठ पास ॥१४॥ राहा-११-१-तुहि (1t.) २-पहि (को०)।-नो परमाती (को०)। ४-पपमानो (t.)।-दोर (t.)। बीतो तिरिरहा समाना (ना.)। -हेरी (t.) । —मान मर मान ए (st.)18 में (स.)। रोहा-५४-१-णि गाम , (म.) । २-मपा (म.)। -मावन पर (rt.) १५-भादों ()।-पन (म.)।-पाग (म.) ।७-माम (st.) । -मन (.)।-गार (म.) 11-जन (स.)।
No text on this page.
नम-मन पुनि तुम' यह बोले सिप बानी । राह मई होइ है अपमानी ॥ यह है मामानी में' मानी । यही पपत में पत पर बानी ॥ पौर म मान मान मोहि माई । पम मान परमान पेम माम माना प्रपमानू । सा परमान मोर मिमान् ॥ मामी होर पेम मम्मामा । सो पपमान मैं माना । पो रिहिं पर हो अपमानू । हिउ मिह कर' लिहि माह समानू ।। मूनो देह परी । डिहिंई मान कौन पत मेरी ॥ देह मान विनहीं 4 माना । मिन्द मन पेम म्यान महि पाना । का हि एघे मान मुमाबडु । पम मान प्रपमान म पानह ।। के सनमान । हा-मुठ मान ए' मान मा काया मान कियो में माम मोर राम पेम प्रपमाम ॥११॥ पुनि तुम मोहि महसन मुनाबह । धीर पण मन बिन भरमाबह ॥ पहचन फिर फिर मुख मानो । कहा पण दिन' गिय मम राखो । पीर बबन मीठो मोहि मार्ग । पाते पैम पपिन र पाये ॥ ज्यों ग्याँ पगिन होय मई रहे।रों त्यो पम नागि' मा हे। विहि कारन माहि भगिन सोहाई । बरती मगिन पेम सिपराई॥ म दो' बरौं घोर सुन बैना । तब सावन हो परहि मैना ।। पन' मुरार यो पा' मुण्हीं । दगप नही पई पिसि उमाही ॥ सपट माम मो पपन हिमोरा । बाई मेह पपिन कर गोरा ! मान्दिन मायो प रमागत । पामिन होइ हिप पमक दिखावा ।। रोहाबीर पवन पोहि पनि हि मुनि हिय हो इसाम । नमपि पैमसन पार' मन मे पर पिर पाम ॥१४॥ रा-११-१-गुमहि (१०) २हि (.)।-हो मरमानी (+t.)। ४-पासाना (d )।--होर है ( )।-वीडो तिहि रहा समाना (1.)। 0-20 (1.) । मान मर मान ए (t.)।1में (म.) । पा-११४-1-पिन पीम(म.) 12-मदा (स.) । -मावन पर (rt.)। 2-माग (मो.)12-मन (म ) 1-पाम (म.) 10-माम (1.)। -मन (स.)।-पार (म.) ।१.न (t०)।
C ममम मार TIER HIT IN Irrr माग ॥ दुसरासर नो र माप HTTE ाि । प्राय' fon पर, एई ॥ + गो पार को rment तिर पो पर परदा ॥ पगा।" प्राम पा नाही गो पारिरि पाना । हो दो परिसर सोनी पार पुनि ॥ ग nिt ITE हिर है। " " न गार' Prum fo हि ॥ रो-हिरवीर पई" airn । " र tr रिणवीर' का रारा ' गमहाहि । पेस गमा पार मी पाहि ॥ ग तर पा प्रमा महर रारा है॥ पर रंगा । मा भा भरम धनुरापा ॥ गेम परप पाई ॥ मीग मिपावन गा । पप पा पेनी भए । मा पन रण। गही ग्राम पप गो॥ परीती रिमर सब गई। पम सोप नई॥ मी पाण्या परन् । रोगी मुहि मार मन पान ॥ सबा हो हो । प्रय प्रवाह मी त रही। गुन मी म ममूह ए-पाई गमुम्बन पए, पाए ममुम पाग पुरि सेम पो पुमि मिति परि रार Ital रोहा-११५-१-4 (1.) 12-~मएम (1.)-परा (5.) मिह उर मग (म.)। --गादि (स.)। -चात प्रना (स.) 10-गिन् । (.) 15-मन (स.)।-सही पण (40) १. (प.), मुर (1.)। ११-परा (t.) । १२-री (1.)। १३-~io मुनि (.)। रोहा-११-१गि (1.)।२-माही मीम राणी (4.)। ऐतो (म.),(ना.) । ४-ना पेर (म.)।
मतदमन वि पहि परन प्रगिन मा बैम् । मूमा म देह मे ॥ पतहि रिस है रागा । या तन सुरल पेम मन सागा ॥ राग कार सब रह बिमारी । मीन पेम कह' पाजारारी ॥ बित तित पीत पियारा । वाही हमें संमारा ॥ पापा रिसर बही' होर रहा । ऐसे गहन' पेम मन गहा ॥ सोई बाप प हर स्वामा । प्रौर धादि राम्हसि सब पो कए बाठ पा मुख चाहा । बात कहत पर मुरत निमाहा ॥ पोपी गुरो होर मनु हाई । एको सांस परेछ का मा क गो पेम कहानी । ऐको पम पगे' तब बानी' ॥ पासा ॥ रोहा-मिमा यो पाई पीऊ सों, तो" पेम परो मह" मेम। प्रेमी" प्रीतम' मिलन बमीठ सो पेम ॥१७॥ योग ॥ पाहे रंग रातै । सोऊ पुनि ताके मर मा । पा मिहि पहे पद निहिं होऊ । एकाहिं ताप प मिति रोऊ ॥ पेम बपीठ एक नई भोरा । बहै मुत मेरी कर मोषी प्रीत म एनो । गिन पालो माई तिन पानी ॥ सम यह मिति मात्र माँ मारा । मा बानम' हारा ॥ पौ' पुनि पपन प्रीत बहोई । तर तिमई मह मा म काई ।। मैन हो गो रक्त ममा । यहाँ मगन है मैनी माग ॥ मंतर ठौमा र पिचाईपीसी तममै भए म पन्तर कोई । उन पो प्रान सो एक होई॥ कपाई॥ दोहा-न' मर वाहि" पान मा प्रवन सर्व वन माह । यो पतन तब मैंभयो पतन इठिय पुझि" माई ॥१३॥ रोहा-१३-१-की (.) । २-4ह (म.)। महन (स.)। ४. चोई (व.) ।श (को०)।-सी (स.) 10-जिन (म.) *' प्रति में मौरे की चौपाई पासे है।५-माप पो प्रेम (को०)। १- (st.) १.- मामी (स.) । ११- (it.) । १२ नाहि (t )। १५-प्रमं (म.) । १४.- प्रेम (को॰) । बोहा-१३८-1-सो (1.)।२-गाबिन (म.) । ३-ौर (म.)।४- गां मैन (st.)। 2-4 (t.) 11- नीहि (1.)10-पम्त (म.) । ८-नहीं ( )।-सोई (म.)। १.-ब (को०)। ११-पाए (म.) । १२-न (1.) १५-दनिय हर माई (म.)।
.. अम-पन पर तिमतिर मामा । nirma' रणा गरगि एमा1117 गार्भ नि पान frm मा टास गार निम ।। मर रस गरे । न म' मा तार ॥ मग सा । मागि निर पसा गिरा। म" निगरे । मामा' पानी साता ri" परम पा बामा । मालिलि' बापा पह पापा। सिर" पमा चरिपारा । गरिसरा॥ मही मानि निग ता । पर ना ग पोर नाई॥ परं॥ हस रोहा -म पर गौरा ग्रामग, ना पारिलि मादि। पिमा पार पोर माह ॥३॥ मम निगा प्रथम बगाग । गार पमु' ताो ' पारा।। मनन बाम गरिपारा । परा मा fat बिनपारा।। पर मगि पौन पान गा गागा । गुमगा दिया पान न लामा ।। पनि पिा मन गाा नी । ग्यों सौ दुरभिर पा मारी। रादि गणी ar प्रारी। मन र पिर मारी ।। हाप में सी ममा । मन मन' पहा मिना ।। मुरा राग पुरि रोपे । ममम मीर रिपो । रामि ८ मा मुरग का' गन् । पाप न नित पर रिहान् ॥ मी की गई गो पिर" मा माई । पारमिा मार" फिर' पाई। दाहा--मीर निराम" पार कौन ठौर उदण। मैन पी मरर मार वह पिर रहा समा ॥१४॥ - पोदा-1-1-4हा (प.) । २–पाहि (.)11-पर (को०)! ४--सानी (rt.)।-पारस (स.) । (-ताती (प.)। ७-मौतुम (स.) । -पक्षी (८) ।का. प्रति मही। १.--मा यहि (को०)। ११-कोर (1.)। १२--गानों (का.) । १५-पापदि (प.) 1१४- (म.) ।१५-हिसर (प.)। १५-ठावी (स)। दोहा-.-1-पन (.) । २-कर (.) । (१०) । न (ग.)। सो (क) 11-काली (म.) 10- (स.)।--मनाई (1.)। १-पीन पोषन र म मा (ग) र (को०)।११-हर (st.) । १२- ई (t०) ।११-पंग (.) 11-मर (प.)।१५-सी पाई (क) । - मसनमन काप निस रिल रहे पैम मनुयपी । सुपा पटी हिरण पनि गागी ॥ पेम सबर' (सबस) मा वन भा होना । माग वाम र प्रति भीमा ।। पा पिपर विरारा ! पनु पिड पेम गहन मह पाया। प पमा । प्रगई सडओ , पानहिं मऊ। एम पर बोनी चिन्ह पाहाँ । रोइ रोइ भरपं मन माहो ॥ प्रमूि नियरि' वह पर रेप' अस मरा॥ रहि मिस पोमु सर पर से। पट छुपी है ॥ गौन विहि पमुपा र गाईको प्रारम मिस ने रेसी कौन परी मोहि पानी । प्रालिन र संभाइन पानी ॥ बमाई ॥ पाहा--गिए दुरा निर्णनी गिम बानों कि मगाइ । वी" अमिन सीपर" है, तु" सीन' हा गार ॥१४॥ पनि पार गोर वा परा । ममि यह मरम की मारा। महा सत बह से । उाद मूग पापर सब देते॥ कौन डेम यो निम्ह भाई रा । गुरु मिसार कौर ३ पमा । 42 रन कमि कम बारी । पूनो मसि पूमर सरिया।। पहर' पौग कौन' पह रहा' । रिन प्रशाम राम पम रहा। पिया पोरन मित्र' मग । पारन का पूमर सिंई परा। प्रह पम पौमामा । पिस पाना निहिं हर उमा । पाव मैप मैन मर । चिहि बंधान' प गंत पर। मोहि तुम कि प्राना । मोमो महा भरम निर पाना" ॥ साय हा-मोहि तुमारे मुनमुख, पो तुम्हरे दुरा दुषण। मेर" को रेवा परमनी मी मन नाही मुरुम ।।१४२॥ रोहा-१४१-१- (.) २-पाती (म.) । 1-3हिर (स.)। --ौर (1.)।५-नर बम परा (म) 1- (घा.)।--या गरी () :- (क )।--निवाई मीम (स.) । 1.- (म.)।११- गर्म (म.)। १२-मोटारी (a ) ।-गेन (स ) । १४-पिमन (1.)। रोहा-४२-१-पुर मुर (म) । २-गौर (म.)-भग (स.)।- दिन ( ) 1 (स )।-पग ( ) । -म (t.)। पार (110) 18-पिो (t.)।१.गर (म), ११- पारा (म)।"- ए (स.)।
मम-बमम पर पति पैम बषिक मल गया' । उतई पोंचा हिय पर' मा ।। तरफ तरफ मिस ठे' दमागत । मल साम निा पत प्रावत ।। मीर पोट पिस्ता मा ठाटी' । बाडी रैन बाम किमि काटी ।। हवन मैन फार मन् परे । नूतन' बमें सातरफहि परे ।। बपि मनस पुबारा । माहि मन ति िपक्षक कियारा ॥ वीन H निपट रे | माना। कोपा भरम बगत बांधा । नाहित किस' बांधा मह पाषा ।। पिपर होत अंधियारा । तार पिने पार सरिया ॥ हनही मोति पाम निस बोई । मम पाने पुस पोर , कोई ।। परै॥ पोहा-पेम बधिक सोपा सो नल, हना ताकि हिम मादि। मिमा पाच तास रकत थानत कोळ नाहि ॥१५॥ प्रथम पत्र मन मित्र बमावा । सहम इसुम' ठाके रंग' प्रामा।। देखि सो मनम परन बिमारा । परा हा हिस' विनगारा।। प्रय मगि पौन पबा सो पाया । मुमगा हिया परन तन नागा ।। कठिन विषा मुब बार काठी । मो न्यों पुरै मभिक त्यो'बागी' ।। पतहिं सनी पोर पर बाही । उठ 3 मन + पिठ माहीं।। हाप से टकी सगावै । मैन हौ मन' ही मिना ॥ पुनि रोक न मम' नीर बियो । समिकर सरा सुरष को' म्मानू । बाम न मित कर मिहान् ॥ नीर पो मई को फिर" ना पाई । प्राई" उभिम भाक" फिर"माई ॥ सुरत गरी दोहा-नीर मिरासै मैन पो मदर मार के कौन ठौर ठामा नीर वह पिठ रहा समार ॥१४.।। 1 रोहा-१२४-१-हा (स.) । २–गदि (स.)।-पर (को०)। ४-मानी (को॰) । ४–पापत (स.) । -वी (स.)। -मौतुम (स ) । –ममी (काम)11-का• प्रति में नहीं है। १०–ना यहि (4.) । ११–ीस (को । १२–वानों (क ) । १५-पापहि (प.) । १४–ना (स ) ।१५–हियरे (का.)। १५–ताती (स.)। वोहा-१४०-१-कसन (स)।२-कर (स०) 11हरे (स.) । कपन (स.)। ५--सो (t.) 11-नाही ()।- (स ) 14-ममई (को॰) । --पौल भोरम पहन सा (स.)। १ कर (को०)। ११-बार (st.) ! १२-- रोई () ११-पान (१०) 1१४-भर (स.)। १५-निसी पाई मह (को०)।
ot निस नि है पेम मनुरामी । सुपा पटो तिरसा प्रति गापी। पेम सबर (सरल) मा तम मा हीना । ताम दाम पीर पति भीमा । पता बत पियर विराबा । धन्' पिउ पेम गहन मह पाना ।। देटि पमऊ । प्रहं मलो न मानहि मऊ।। एम रइस योनी तिम्ह पाहाँ । रोइ रोइ मुरवं मन माहो ॥ भामू निसरि बहे पर उरा । मुब मोरे देप' पत मरा॥ ही मिस पोमु गर सर । रहर परी छुपी २ ॥ मौन विम्हहि प्रमुपा र बाई ' प्रारम मिम सा माई ॥ कोन परी मोहि पानी । पाखिन र माइन पानी ॥ पाहा-विर पुराने विहिनी पिन गानों कि सार। दी" पगिन भीपर" है " वीन' हार गार ॥१४॥ ठण IN नि पार गोर गई परी । मशि पह मरम नीक मा खरो। महा सम बर ने । उरद मूप पापर सब ॥ कौन सेम पो चिन्ह नहिं पेपा । पुर विमार कीन्ह २ पहा ।। कहसि कम बारी । नौ मसि पूमर रपिपारो॥ भएर' पौन कौन' मह बहा' । हित मस रहा। चिमा पोवन घि भरा । कारन का पूमर मिहि गरा।। न पाह पेम पौभाषा । पितु पाठक बिहि होर उमा ।। भिप मन कम' मा । किहि बंधान ए मन परे।। मोहि तुम कि प्रानां । माो पहा मरम निग पाना" प्रसाम राम भाग पर ॥ हा-मोहि तुम्हारे मुनमुख, मी तुम्हरे दुग श्य। मेपो रेली पनमनी मी मन माही मुगु १४२॥ । दोहा-१४१-१- ( ) 12-पानी (म.)।'-उहि पाम (गो.)। ४-नीर (.)11-7 में सम परा (1) - (t.)। -रग परी (म.) । (1 )।-निगई मीम (स.)। १.-रा (म.)।११- पाने (.) । १२-पीटारी (त.)। १५-गुम (म) । १४-मिन (1.)। हा-१२-1-पर मुर (म.) ! २-पार (म.) 11-मग (1) It- रिर्म ()।- (t.)। -पग (प.) !-म (7.)। पसिन (H):--ति (ri.)11 पर (म)। "- गाना (म.) । २- परी (ना.)। C-
No text on this page.
मत-दमम पर दिन दु' र पुम्मिानी । बम वर्मन बेन बिनु पानी ।। पो परी ममै हे । पानर' मूर पेम गुन मूटी ॥ संप सभी मुख गोरन मापी । बारी पर वियोग रामी ॥ है हो पप तुमरे मन पापा । मा बसि म' यह मरम न पापा ॥ कए तो पहे दार मह पाप । मारे मनई" परा उफमारा ॥ पहल बिहमाहीं । भव' नतिमा तेल र नाही ।। भर पो रहे दुरै दुख परी । है कारन रिहि कार्य गरी । म म तेई माता । हाईक" मर्ग का पाना पर मि" इन" म्योहारा । रेसो तेम रोन के बाप ॥ रोहा-हस"तुम्हार" किसान" ५ का मय" मीम्ह मा यूट । भोर पर बानिय बैठे कैट ॥१४॥ निमि पायो वापर एक सुखी । तिन यह मरम बम्त सर मनी ॥ मार। मय' लिसि पर रिया बा बारे।। सौपा मीच प होर गाती । मिट म प्रीतम तेन संपाठी ।। बिमत साल पुमर होग हा । पमर वाति हिपरा' पं रहा। पाप पन माड़ी । पामू पैम प्रभाह बहा ॥ पाहिन है बह गिर म हारे । पिए भी सो पि निहारे ॥ मन रत गाहा मित्र पीऊ । और चित्र महं हर दिन बीक। उडन मुनि सो मी पुकारी' । काहे ठिटी तुम बारी॥ मी यह कौन चित्र तुम पाए । चित्र मई पिरत मिहि' माहाँ ।। दोहा-पि तुम्हारो गत गिर पा मो पिर निरजीत" । रीम पाप पर पापों पाप हए" पिन पीठ ॥१०॥ रोहा-१४-१-न (को०)। २-प्रारि पल मोही मब पूर्व (स.) । ।-पानन (8.)। ४-सी (१०)।-पही (स.)। -हिपमह (स.) । -ता (1.) । म (प.)। 1मिन (ना.)। १०-भूतावा (को॰) । ११-महिल (Rt.) । १२-पसारा (30)। ११-सी ही माही (म.) । Pr-उन (म.), पन (स.)। १५-हानिर (स.) । १५-रो (ग.)।१.- प् (स ) । १८-बाय (स.)। १५-सपाद (स.) । २ -कौन्द (का.)। २१-एक (मा.) । २२-माहिम (म.): 04-सार (..)। २४-पिमान (म.)। १५-1 (6.)। २९-fहि पाहि (मा.)। २–पर मो 4 (म.) । ~१५.-१-रयिाम नि पारी (प.)। २-मा गि (.)। 1-होरा (पा.)। ४-एक (म ) 12-मत्र (म.) । -पनुपन (1t.)। -- (7.)! -मारी (न)। १.-शिप (1.) । ११-परिवार (को०)। १०-होीि (1.)।
नम-दमन सपने मन रघु मरम माता मिसि गरी । ना दिन ऐधि घराबा परी ।। पर पर पाहि यो रो कर पाने । उर बागी सो घंवर ठाने ।। मोहि तामिन जो दिसे समाना । रिस्टि म पर कतई का माना ॥ यो सपने देसी पाई । सापर ता पनि मौर म कोई ॥ मोरा एकहिं रंग रावा । मिन भरमक पाना मोहिं माता ।। पंग विपा पुनि बामि न पाई । काया काहे पिया ॥ म पाना । जो पानी तो कसम बखानी ।। मोरे पान निषा क माहीं । देषों सममि बुझ मन माहीं । पो दुटक तुमहि पिन होई । भी मुनी मारह कोई॥ रोहा-पैमी पीवम को मरम कह न कार पाहि । पाने वाह बनाइये सोमन सो कए नाहि ॥१४॥ मावा परित गुमाए । भौ सब पुनी गार पाए । पौर पाई। बोनि मारी बिसराई॥ सो बैद नारी नारी । कह' पारोब' हि मा प्रनारी ।। तापत बंग मत्र पाए । _वस' परसन दिया गपए ॥ पहा पचन प्रोमा प्रमु'माई । गुनी गारस मंग पाई।। मौलाना' मिसान चिन्ह तामै । पर हिमा महि पाहि पाएं ॥ सर्व" मुनी प्रापन गुन कीहा । पै निज मरम , कार बीन्हा ।। सही कहा विपा कए नाही । चिन चिंता भाना मन माहीं । तिहि" सो विमा बिहिं कोउ म पाने । मी ननि प्रपने मुह म बसाने दोहा-मोझा रहि उपाइ" मिसि मुस्मा पौ बाद । मा नम" मिमै म क प से पार' हराइ ॥१४॥ रोहा--१४-१-माता को (कt.)।' को प्रति में यह भोपाई नहीं है। २-एक (का.)। ३-पई (स.) देहि (को०)। ४-मन की (का )।-मोती (1.)। पुनि (को०)। पोह-१४-१-नारि (स.)। २--सरा (4t.)। रोग (4.) । r-माउत (स.)। –पर (प.)। ५-उमरस विरहन (को०)। ---माम बर्ष (को०)। ८-अब पाही (क ) ।-लात पिना पाएगाह (को०)। १ -पूक्त है बहुत पछताई (को०)। ११ । (स.)। १२-इहि (का )। पापा • प्रति में निम्नलिखित नौपाई बोका में मही । निम मन मरम बान पिठ प्यारा । यो विउ सो पस मिल नही पाय । १ से भषिक होने के कारण प्रक्षिप्त है। १५ पुषा (क ) । १४-मित परी म प्रेति को (क )। १५-- पाप मुंग प्रमगार (का.)। । • इसके मस-दमन . पाना ॥ उफमारा ॥ पर दिन दु' हे पुम्हिलानी । मैं कान म दिन पत्रिी' म है पी। प्रामद' मूर पेम एम यूटा ॥ संप सी मुन गारत मामी । बारी विराग मी ॥ हे हो पप सुमो मन पारा । ना बनि म' यह मरम में पारा ॥ पए वो पहे पार मह काप । मोरे माह" परा पर्स ईमै रिहयाही । पर इन दिनम्ह वेम का नाही ।। तो र दुरै हुन मरी । है कारण मिहि कार्य गरी ।। हेन न तेरे माता । हाईक" मम पर ना ॥ पर रिल" इनक- माहारा । हो मैन + पारा॥ पाहा-"तुम्हार 'रिमान" मा मयमीम को दूट । पोर" पर मानिस रिहि कर 8 * ॥१४॥ निमि गामी हम मुबी । जिन यह मरम बाट सब नसी ।। बैठी मन मार। मब' मिमि पर दिया या बारे । साली मीच 4 होर राखी । निष्ट म पागम तेन मपाती ।। दिमन बदन पूमर होर पा । पसर गति हियरा' 4 पा ।। पाप पित्र मित्र मन माहीं । प्रांमू' पेम प्रगह पोडिग है वह मित्र , टारे । वि मा सो शि निहारे ॥ मन रु पार ए रितु पी । बम ति मह उन दिन बीऊ ।। जनन गरि माँ हमी पुकारी'काई रठि टी तुम गरी । पो यह कौन यि तुम पहिरी । पिप तिल मिहि" माहा ।। हा-पि तुम्हारा मा रिड पर मो xि गिराउ" , ऐम पार पर पापनों पार ए" नि पार ॥१५॥ पाहा-१06--न (प.) । २-प्रालिका काही मर (स.)। ३-पानन (म.)। ४ग (सं.)। 1-पही (11.), ६-हिपमह (म.) । ---मा (.) । -यात (स.)। १-मिन (को०)। १.सावा (स.)। ११-इनहिप (t.) । १२-रारा (स.)। १२-मी ही माती (म.)। -ज (.), पन (+t.)। १५-हानिह (5.)। १५+रा (स.)। १.- पर (म.) । १-पान (.)। ११-पह (१०) । ३.कौन्द (स.)। २१-ए (स.)। २२-नाहिम (म.)।२१-सार (म.), Ev-गिमान (स.)। २१-को (5.)। २९-शिहि पाहि (ना.) । २ नर मो ये (.)। पल-.---पर दिया मै लिहारी (ta) --माहि (1.) । 1-हाण (m.)1-एस (म.)। १-पंप (स.)।--मुरल (स.)। 1- (.) । -- (.):.-रिप (Rt.) १५-परि नीर (प.)। १.पी (m.).
No text on this page.
t पनि मान शिव मत दिनी गुन पोरी तो रिस समति' मुनि मोरी ।। मन' मुर पर मन मि" प्रामा । म ग्यों पुररु गरि प्रामा ॥ तन वरई परा । ग्र्यो पछी र गनु गिरा ।। मा जित निकम माइ म है। सीवा भीती मई वन रहे । रापि वार विष मो पाई । राल सिम पियो मिहिं माहा ॥ मंखिया टो हार्मो विरमाऊ । मन पर प्रा र उहा॥ वारे मूरख पाई। प्रार रहे मी मन " राई । गि निर मत" प पर भुना । निखिकर षि शिवायर कना॥ बह गान यह धिम" बीउ । रिय" को 7 प्रान मोपाऊ॥ रोहा-" म्यम प्रीतम रिनो मन दुल मन प्रफमार। मो" इन दुन बोनी नई पीर मिल फिर" गार ॥१५॥ प्रीतम पपार दृश द्वारा । उ महर पर नहर हिमारा।। तम बोलि मा बगर माना । गम राम पुष नार ममाना । बपि म रनिहि हा मोठा । ऊ मो नीर हार न मा ॥ मगार सन' पर भारा । महि ताहि बिन कार ठीर ममा ।। बा पर गि पनि होर पामि । पहि पाम मै नार मगामि ॥ ठी बर्ष नाहित नि प्रामा । पौर नमन उमर ामा ।। प्रीतम बार परे मुष गई। कारमान मुग मी माहि मोरे । पिउ तन मन गारन प्रिय तारा । या पन म ए नाति मारा ।।* ग्नि मा। पार पटा परि म रोहा-श्रीतम मिन नरनि मपि परी प्रम रपि माहि । उमटे पर ममी तरी ही माहि ॥१५॥ - रोहा-१५-१-निरट निकट मति (1)।२-निम्ह भ (म.)। ३- (म ) 1-परित ()-पामा (1)-मरमा (म) । -नाई (t.)16--पन (स)|t-नी (स.)...-निना )।११-रिवाज (Rt.)। १२- करन (स.) । १:---पर (HI1-जन (it) -तुन (1t.)।१-यहि पहि ()। १०र (म.) ! राहा-१५६-१-गि (म)। २-ना (7.)। ३न (1.) । ४. माहि (क)-नाहि ()गा (म.) पर माई 'म• प्रवि में नही है।मिरे पास 'म. प्रति में पर को-सि बिग कोर पार परापारा और हो पात nिt" -कोह (न)।
मसनमन हिसरा' कुषा । इक दिन विय दाह रही । बैठ इत बगा' रही । पापी माप और महीं कोई । हिमें पब पूना' संग होई॥ उर्मग होरहा । मन एम रहिट' होह यहा' ।। मुख मात सिमा तेई हरी । कोटिक पार मरें। मररी॥ हवा मो हौद सीप सों भरा । फिर र नीर बिमारिल परा ।। सुरत प्मान पिठ पौ पमुरागी । बाद विय रामी ॥ पीतम करसि भयो", मोरी । सब बम घाडि भई हाँ ठोरी ।। भर मयि बिरा पान मै घो । रोमहि रोम पैठि" तन" ।। प्रब सा सो पर माग | मिउ प्रकुमार को तन पाम || पोहा-नरपि पीट न स्यागि म" मिमै बोहिबार । पै मन पाव" कितम प्रघत भी तो मांहि समाह ||१५ पित पित्ता' सुन कन' नाहीं । मोहि गित को संसा' ए माहीं । यह सब तब वोसों मिल पा । प्रबई मनमिन बार कहा ॥ निग जिय बाम प्रतन वन तोरा । यह मा भूम करें पिर' मोरा ।। तिन कारन बिनती ही करी । हाा पार सीस मुई परी ॥ तन होरि मगि बात पुस पारा । प रंभ रस सबहिं बाबा ॥ पिए पगिन तरनी हम शप । सूब पा होर बाप ॥ रहा न रक्त न मास न मनकी । हार मुराद है हो किनकी ॥ म सो ऐंठ तात होर मां । वे प्रब टूरै कर" मा॥ विप प्रग सर बहुत पापा । पाई नि" कर समापा ॥ पोहा-मौतम पिर" "न प्रथम परा पं तुम पास । लिए नास" दुस तन सह, सोइ निरास ॥१५॥ पहा-१५५----पुन (1)।२-एक ही (को ) । मा (स.)। ४-सोई (स.)। -हिम को इन उमंग मर (स ) । -पत (स )।-मया (का.)। 5-माम (को०)।१ में परी (क )। १ –परी (स )। पयपुर की प्रति में यह पौपाई कार की चौपाई (मुरतमाव मंसिया ) २ पहने मी मिसी पर ई फोर पाका उपर १ स प्रकार है-भर कर गौर पर पर। ११-foग (म)। १२-बई (स.) । १५ोर (स ) १४-14 (4.) १५-पार (स )।१-बाउ (का) । पोहा-१५-१-चोसो (को० स ) । २-समयाही (को०)। —मांसा (स.) । ४--तिहिं (को) । ५-1 (.) । मम (स.) । ७–नारा (1)। मारा (स )।- घोर (स ) 11 पर (क)। ११-पीति करे सो माला (t.)। १२-चो (का.), यों (स.)। १३- (1.)। १४-निरास (स.)। 1 - प्रति माहुल पिर' मपन दिनो मुन पोरी । वो दिन बनति' मुमति न मोरी ॥ सम' मुर पर मन फिर" प्रकासा । प ग्यों मुग गरि मामा । तम तर परा । ग्यों पंघी गई अनु मिरा ॥ मा गिर निकम पार न रहे।ा मीची मई तन है। मापि तोर त्रि मो पाहा । रात दिवस रितमी तिहि माहा ।। भेखियो तो वार्मो निरमाई मन पर पार्ष म उहाऊ ॥ पोरे मृत पाई । माप रहे भी हम निय' निर नत" प कर ममा । निहिं र पिप दिमावत बा ॥ पहचान यह चित्र " गीऊ । गिय" को गीर पान तो पीऊ॥ रोहा-" पाम प्रीतम दिना, नन' दुस मन" प्रकमाइ । सो" न दोनों कर पीठ मिन फिर' गार ॥१७॥ रम प्रीतम बि पपार दुर तोरा । उठ सहर पर महर हिमोरा॥ धन बोलि मा अगर पाना । राम राम दुप मोर ममामा॥ पपषि निग' नियहि होर मोना । तर मो मोर' र न रीता ॥ मगाइ राम' पाया । महि वाहिरिन काठ तीर पगावा ।। को पर पगि पौन होइ माग । परि पास में मार मगामि ॥ माहित तिति' प्रामा । मोर जान उपम , उरामा । प्रीतम बार पर मुष की। काहि काम मुख मों माहि मी ॥ पिर तम मन पोरन गिय द्वारा । या पन में पषु नाहिन मोरा ।।* पानी प्राप किन नह। कास पठार कीम्ह पम देऊ॥1 पर पोहा-प्रीतम मित नरनि मगि परी प्रम रपि माहि। प्रा ममी तरी ही माहि ॥१५॥ उमटे पन । दोहा-१४-१-निपट मिार मार (4.)।२-निना भै (म.)। ३-भये (4)|-प्रपित (म.)।-पामा (t.)। -परमा (म.) वार्ड (t.i-मन (स )11-या (11.)...-finiti.)।११-पिवार (110) १२---ौरन (t.) । १५-यम (.)। १४-मन (1t.)। "तन (t) | १६-हिपछि (१०) । १७-(म.) । राहा-१५८-1-निप (म.)। २-4 (1.)। ३ाम ()। ४-मोरि (at.)।५-चोहि (स.)। नी (म) । "यह पौवाई 'म. प्रति में महीनो पा . अनि में पर पौराई - बिल कार पार पाई। पारावार को पति nिt" -मोरी हो (स.)। -