Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Shuktisudhakar

2011/08

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८३11 ॥ श्रीहरिए। सूक्तिसुधाकर (सानुवाद) ३३६ चर्म - प्रकाशक- गीताप्रेस, गोरखपुर

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श्रीहरि विषय-सूची विषय पूठ-मस्या प्रथमोल्लास .. १-ब्रह्मसूक्ति द्वितीयोल्लास ... २-श्रीशिवसूक्ति तृतीयोल्लास .. ११ ३-श्रीविष्णुसूक्ति ४-श्रीलक्ष्मीसूक्ति चतुर्थोल्लास ... ५-श्रीरामक्ति ६-श्रीसीतासूक्ति ७-श्रीहनुमत्सूक्तिः पञ्चमोल्लास ... ... ... ... ... ८-श्रीकृष्णसूक्ति -श्रीनन्दादिगोपसूक्ति १०-श्रीयशोदासूक्ति ११-श्रीरापासूक्ति १२-भीवजाइनासूक्ति १३-श्रीमुरलीसूक्ति १४-श्रीवृन्दावनसूक्ति ... ... १२० १२३ १२५ ... पष्टोल्लास ... १५.श्रीहरिहरसूक्ति १६-सूर्यक्ति ... १२७

ពុជាធំ។
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भाग
4.
...
...
...
...
...
२४-गि
२५-मेगा.
मपम काम
२१-मरिगति
२७-प्रेमगर
२८-गाजि.
२९-शानियति
१०-गुरुसूक्तिः
दराम उल्लास
२१-विविषमूक्ति
एकादसा उल्लास
२२-सदुक्तिसंप्रह
उपसंहार
अकारादिलोकानुक्रमणिका
...
...
...
...

श्रोहरिः
चित्र-सूची
.
(यहुरंगा)
यानयोगी ध्रुव
४०
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लका नृत्य
की मधुर गोद
वधा-भकि
याममयी-संसार
)
)
१९३
२१३

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ܘܢ݈ܝܺܪܺܝܩܳܪܳܘܢܶܐܺܝ
ܝܐܝܫܝܐ
ܐܳܟ݂ܗܙܝܝܬܙܚܬܵܐ
܀
ܚܛܳܝܳ
AMܣܪ
rammimmܗܕܐܕ݂

= wীম দঃ
জুনিঃীয়
मयमोल्लास
(দঃ)
কাগ্য নিৰ ধৰি নিৰে গৰ।
লিশ গমনুষৰয় গণনা গণ সদাই
নমা যা ব্লাকাবাব না বিপাশাপখান।
সমানালিরা নমল মাৰিনাম্বাৰা
(}*** ৪৭ : ৯ (।
পাপন •! । - -
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प्रासूक्ति ३ जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतवार्थेप्वाभिज्ञः खराट तेने ब्रह्मा हुदा य आदिकवये मुबन्ति यत्सूरयः। तेजोवारिमृदा यथा विनिमयो यत्र निसर्गोऽमृपा धानास्पेनसदानिरस्तकुहकं सत्यं परंधीमहि(मा०११।१) ब्रह्मा दक्षः कुवेरी यमवरुणमरुद्वद्विचन्द्रेन्द्ररुद्राः शैला नद्यः समुद्रा ग्रहगणमनुजा दैत्यगन्धर्वनागा। द्वीपा नक्षत्रतारा रविवसुमुनयो व्योम भूरश्विनौ च संलीना यस्य सर्वेधपिसभगवान पातु नोविश्वरूपः।।८।' अम्भोधिः स्थलतां स्थलं जलधितां धूलीलवः शैलतां मेरुर्मुत्कणतां तृणं कुलिशतां वजं तृणमायताम् । पहिः शीतलतां हिमं दहनतामायाति यस्येच्छया लीलादुर्ललिताद्भुतव्यसनिने देवाय तस्मै नमः ॥९॥ अन्वय-व्यतिरेकसे जो जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयके कारण सिद्ध है। सर्वज्ञ हैं, स्वप्रकाश हैं, जिन्होंने आदिपुरुष ब्रह्माको वेदोपदेश दिया, जिनको जाननेमें विद्वान् भी मोहित होरहे हैं, जिनके सकाशसे पृथ्वी, जल और तेज- मय संसार सत्य-सा दीख पड़ता है, ऐसे अपने तेजसे अज्ञानको नाश करने. वाले परमार्थ-सत्य परमेश्वरका हम ध्यान करते हैं।७॥ जिस विश्वरूप भगवान्के शरीरम-प्रसा, दक्ष, कुबेर, यम, थरुण, वायु, अग्रि, चन्द्र, इन्द्र, चिय, पर्वत, नदी, समुद्र, महा मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व, नाग, बीए, नक्षत्र, तारा, सूर्य, वसु, मुनि, आकाश, पृथ्वी और अश्विनीकुमार आदि सभी लीन है, वे हमारा कल्याण करें ।।८। जिसकी इच्छा- मात्रसे समुद्र स्थलरूप और स्थल समुद्ररूपं हो सकता है, धूलिकण पर्वतसदृश और मेरुपर्वत धूलिके तृणरूपमें परिणत हो सकता है दाइकहो. RECE + ५...

द्वितीयोल्लास (श्रीशिवसूक्तिः) जय जय हे शिव दर्पकदाहक दैत्यविघातक भूतपते दशमुखनायक शायकदायक कालभयानक भक्तगते । त्रिभुवनकारकधारकमारक संमृतिकारक धोरमते हरिगुणगायक ताण्डवनायक मोक्षविधायक योगरते ॥१॥ शिशिरकिरणधारी शैलबालाविहारी भवजलनिधितारी योगिहत्पमचारी । शमनजमयहारी प्रेतभूमिप्रचारी कृपयतु मयि देवः कोऽपि संहारकारी ॥२॥ हे मदनदाहक ! दैत्यकदन! भूतनाय! हे दशशीश-स्वामिन् ! है [अदुनको] धनुर देनेवाले ! कालको भी भयभीत करनेवाले ! है मनोंके आभय ! हे त्रिलोकीकी उत्पत्ति, सिनि और संहार करनेवाले ! १ अगदरचयिता पौरपी महादय ! हे हरिगुणगायक ताण्डवनायक मोय. प्रदायक योगरायन शंकर! आपको जय हो जय हो!!||१|| जो चन्द्रा कलाको धारण किरे, पानी-रमग सारसमुद्र से पार करनेवाले हैं, योगियों के हरयता कमरमें विहार करने वाले हैं, मृत्यु भयको दूर बोपूर्ण सदस्योडरमागरतः । . G ॐ श्रीशिवसूक्ति यः शङ्करोऽपि प्रणयं करोति स्थाणुस्तया यः परपूरुपोपि । उमागृहीतोऽप्यनुमागृहीत पायादपायारस हिना स्वयम्भूः॥३॥ (श्रीजयनारायणतर्कपञ्चाननस्य कणादसूत्रविवृतेः) मूर्द्धप्रोद्भासिगङ्गेक्षणगिरितनयादुःखनिश्वासपात- सायन्मालिन्यरेखाछविरिव गरलं राजते यस्य कण्ठे । सोऽयं कारुण्यसिन्धुः सुरवरमुनिमिः स्तूयमानोवरेण्यो नित्यं पायादपायात्सततशिवकरः शङ्करः किङ्करं माम् ।४। (श्रीताराकुमारस्य शिवशतकात्) कि सुप्तोऽसि किमाकुलोऽसि जगतः सृष्टस्य रक्षाविधी किंवा निष्करणोऽसि नूनमथवा क्षीवः स्वतन्त्रोऽसि किम् । करनेवाले तथा स्मशानभूमिमें विचरनेवाले हैं; वे कोई सृष्टिसंहारकारी देय मुझपर कृपा करें ॥२॥जो मुक्तिदाता होकर भी प्रेम करता है, जो परमपुरुष होनेपर भी स्थाणु (निष्क्रिय ) है, जो उमासे गृहीत होकर भी अनुमा (अनुमान या उमाभिन्न) से गृहीत होता है, यही स्वयम्भू शकर हमारी मृत्युसे रक्षा करें ॥ ३॥ मस्तकपर सुशोभित हुई गंगाजीको देखकर पार्वतीजीका शोकोच्छवास पड़ने के कारण बढ़े हुए मालिन्यकी श्यामल रेखाके समान मानों जिनके कण्ठम गरल-चिह शोभित हो रहा है, बड़े-बड़े देवता और मुनि जिनकी स्तुति करते हैं, जो पूजनीय तथा सदैव कल्याण करनेवाले हैं वे दयासागर शंकर मुझ दासको नाशसे बचावें॥४॥ आपको क्या हो गया? क्या आप सो गये? क्या आप अपने बनाये हुए जगत्की रक्षाके काममै व्यस्त है! क्या बिल्कुल ही निष्करुण बन बैठे- दयाको बिल्कुल ही तिलाञ्जलि दे दी ! क्या (न्याय-अन्यायकी) • मुनिसुधाकर कि या माध्यनिःशरण्यकपणामाग्पडोयागसि स्वामिन्यम मृणोपि मे पिलपितं यमोगरं यच्छसि ।।५।। (श्रीजगदरमस्य रतिरामुमाली) करे धृतव्यप्रकरणाचालं तृतीयनेत्रोदयभव्यमालम् । पदारविन्दप्रणतातिकालं कपालमालं शरणं व्रजामः॥६॥ (भीमसिलानन्दकः रानावनधर्मपिजपा) सुन्दइन्दुदरगौरमुन्दरम् अम्बिकापतिमीष्टसिद्धिदम् । कारुणीककलकालोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम् ॥७॥ (श्रीनुमगादास रामचरितमानसात् ) मूलं धर्मतरोविवेकजलः पुर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं धधधनधान्तापहं तापहम् । कुछ भी परवा न करके उन्मत्त अथया स्वतन्य बन गये ! या मेरे सदृश निवारण जनके अभाग्यसे आपकी वाणी सम्मित हो गयी !-आप जड़वत् हो गये ? हे स्वामिन् ! मेरा बिलाप फिर आप क्यों नहीं सुनते और क्यों मेरी यातोंका उत्तर नहीं देते ? ॥ ५॥ जिनके हाथमें चकित मृगशाषक है, तीसरे नेत्रके उदयसे मालदेश मव्य हो रहा है, जो शरणागतके दुःखहारी है, ऐसे मुण्डमालाधारी शंकरको हम शरण लेते हैं ॥ ६॥ कुन्द-फूल, चन्द्र और शंखके समान गौरवर्ण एवं सुन्दर, पार्वतीके पति, मनोवाञ्छित देनेवाले, करुणासे मरे सुन्दर कमल-से नेत्रोंवाले और कामदेवके नाशक शंकरको नमस्कार करता हूँ|| ७J धर्म-वृक्षके मूल, विवेक-सिन्धुको आनन्द देनेवाले पूर्णचन्द्र, वैराग्य कमलको प्रफुलित करनेवाले और पापतापके घनायकारको सूर्य, अशानके यादलोंको उड़ा देनेवाले पवनरूप, 4.

श्रीशिवसूक्ति मोहाम्भोधरपूगपाटनविधी थासं भवं शङ्करं वन्द प्रयकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम् ||८|| कदा द्वैतं पश्यन्नखिलमपि सत्यं शिवमयं महावाक्यार्थानामवगतसमभ्यासवशतः गतवैताभावः शिव शिव शिवेत्येव विलपन् मुनिर्न व्यामोहं भजति गुरुदीक्षाक्षततमाः ॥९॥ जाता यत्र न कश्चिदस्ति चिपमे तत्र प्रहर्नु पथि द्रोग्धारो यदि जाग्रति प्रतिविधिः कस्तत्र शक्यक्रियः। यत्र स्वं करुणार्णवस्त्रिभुवनत्राणप्रवीणः प्रभु- स्तत्रापि प्रहरन्ति चेत् परिभवः कस्यैष गविहः॥१०॥ अज्ञानान्धमान्धवं कवलितं रक्षोभिरक्षाभिधैः क्षिप्तं मोहमदान्धकूपकुहरे दुर्हभिराभ्यन्तर । कल्याण करनेवाले, संसारके कारण, ब्रह्माके पुत्र, कलंकके मिटानेवाले और श्रीरामके प्यारे शिवजीकी यन्दना करता हूँ ॥ ८॥ महावाक्योंके तात्पर्यायके अभ्यासदारा, सारे संसारको सत्य और शिवरूप समझता हुआ, अद्वैततत्वज्ञाता होकर शिव-शिव-शिव इस प्रकार रटता हुआ मुनि, किस समय गुरुदीक्षासे अज्ञानरहित होकर, व्यामोहमें नसेगा जिस भयङ्कर मार्ग में कोई रक्षक नहीं, उसमे यदि शत्रु सतानेको तैयार हो, तो वहाँ उनका क्या प्रतिकार किया जा सकता है ! पर जह पर आप-जैसे दयासिन्धु त्रैलोक्यकी रक्षा करने में कुशल स्व' विराजमान हैं, वहाँपर यदि वे (काम, क्रोधादि शत्रु) प्रहार करें यह किसकी निन्दा और अपमान है ? ॥१॥ मैं अचानसे अन्धा हूँ, बन्धुविहीन हूँ, इन्द्रियरूप राक्षसोंसे मक्षित होरहा हूँ, अपने, • श्रीतुलसीदासस्य । + श्रीजगदरमहस्य स्तुतिकुसुमाअली ।

८ निगुधाकर मन्दन्तं गरणागतं गानि सर्वापदामास्पद मा मा मुत्र महेश पेगलमा समासमाथासय ॥११॥ (श्रीजगदरमस्य निकुगुमानली) कदा बाराणस्याममरतटिनीरोघसि वसन् वसानः फॉपीनं शिरसि निदधानोऽअलिपुटम् । अये गौरीनाथ त्रिपुरहर शम्भो त्रिनयन प्रसीदेत्याक्रोशन निमिपमिय नेष्यामि दिवसान् ॥१२॥ (मदरेवराग्यमातकात को.८७) वाराणस्यां विमलतटिनीतीरपुलिने चरन्तं भूतेशं गणपतिभवान्यादिसहितम् । अये शम्भो स्वामिन् मधुरडमरूवादन विभो प्रसीदेत्याक्रोशन् निमिपमिव नेप्यामि दिवसान १३ (भिभुकस्य) शत्रुओंद्वारा मोह और मदरूप अन्धकूपमें डाल दिया गया है। ऐसे आपत्तिप्रस्त, अधीर, शरणागत और रोते हुए मुझको, हे मद्देवघर ! मत भुलाओ, शीघ्र ही अपनी सुकोमल कृपादृपिसे मुझ भयभीतको ढाँढस बंधाओ ।। ११ | काशीपुरीमे देवनदी श्रीगंगाजीके तटपर निवास करता हुआ, कौपीनमात्र धारण किये, अपने मस्तकपर अञ्जलि बाँध करके, 'ह गौरीनाथ ! त्रिपुरारि त्रिनयन शम्भो !! प्रसन्न होइये-ऐसा कहते मैं अपने दिनोंको क्षणके समान कब बिताऊँगा ! ॥ १२ ॥ काशीजीमें श्रीगंगाजीके परम पवित्र तीरपर, गौरी और गणेश आदिसहित घूमते हुए भगवान् भूतनाथको 'हे शम्भो ! हे स्वामिन् ! हे मधुर-मधुर डमरू बजानेवाले सर्वव्यापक प्रभो! प्रसन्न होइये- ऐसा कहते हुए अपने दिनोंको क्षणके समान कय विताऊँगा ! ॥ १३ ॥ कल्पान्त ही जिनकी दुर्ललित लीला है, जो दक्षयज्ञको विध्वंस - श्रीशिवसूक्तिः कल्पान्तकरकेलिः क्रतुकदनकरः कुन्दकपूरकान्तिः कीडन्कलासकूटे कलितकुमुदिनीकामुकः कान्तकायः। कङ्कालक्रीडनोत्कः कलितकलकल कालकालीकलत्रः कालिन्दीकालकण्ठः कलयतु कुशलं कोऽपिकापालिका की॥१४॥ स्फुरत्स्फारज्योत्स्नाधवलिततले वापि पुलिने सुखासीनाः शान्तध्वनिषु रजनीपु घुसरितः । भवाभोगोद्विनाः शिव शिव शिवेत्यार्तवचसा फदा स्थामानन्दोद्गतबहुलवाप्पाप्लुत्तदृशः ।।१५।। (भर्तृहरेवैराग्यशतकात् श्लोक ८५) यस्ते ददाति रवमस्य परं ददासि यो का मदं वहति तस्स दमं विधत्से । करनेवाले हैं, जिनके शरीरकी कुन्द या कर्पूरकी-सी कान्ति है, जो कैलासपर्वतके शिखरपर क्रीडा कर रहे हैं, चन्द्रकलाको धारण करनेवाले हैं, कान्तिमय शरीरधारी हैं, कङ्कालोसे क्रीडा करने में उत्सुक है, कल- कलवनि करनेवाले, कालरूप और कालीकान्त है तथा कालिन्दी (यमुनाजी ) के समान जिनका श्यामल कण्ठ है। ये कोई कपाल- मालाधारी कापालिक इस पृथिवीतलपर हमारी कुशल करें ।।१४॥ निःशब्द रात्रिके समय चार चन्द्रिकासे धोये हुए श्रीजाह्नवीके धवल तटपर मुख- पूर्वक बैठे हुए, सांसारिक सुखोसे सन्तप्त होकर दीनवाणीसे 'शिव ! शिष!! शिव !'--ऐसा कहते हुए आनन्दोद्गत प्रचुर प्रेमाश्रुनोसे मेरे नेत्र कब मरेंगे १६१५ ।। (हे शङ्कर!) जो तुम्हें रख देता (स्तुति करता) है, उसे तुम (रवका उलटा) वर देते हो; जो (मूर्ख आपके सम्मुख) मद प्रकट करता है, उसकी खबर आप दम (दण्ड, मदका

सूक्तिसुधाकर
इत्यक्षरद्वयविपर्ययकेलिशील
किं नाम कुर्वति नमो न मनः करोपि ॥१६॥
(श्रीजगद्धरभट्टस्य स्तुतिकुसुमाञ्जली)
(श्रीपार्वतीसूक्तिः)
अहो पापादापामरमनधिगत्यापि
शरणं
सरन्तं त्वत्पादाम्बुरुहमभिवीक्ष्याग्रहिणि माम् ।
न तचित्र यहागभिपतसि पातुं विनयने
विचित्रं त्वेतद् यत्रिदशपरिवार अपयसे ॥१७॥
(श्रीमदुमापतिशमद्विवेदस्य कविपतेः शिवास्तुती)
उलटा दम) से लेते हैं। इस प्रकार अशरदयको उरट-फेर करनेका
रोल आपको बहुत ही पसंद है ! तो फिर मेरे नमः कहनेपर,
(मेरी तरफ नमाका उलटा) अग्ना मन क्यों नहीं फेरते ॥१६॥
है मतों उदारार्थ आह रखने वाली त्रिनयना पार्वती देवी ।
अधिक पापके कारण [बड़े-बड़े देवताभोंमे लेकर ] नीचतकके यहाँ भी
निमे आभय नहीं मिला, उसी मुश पापको अपने चरणारविन्दकी और
भावे देखकर जो तुम नुरान मेरी रक्षाके लिये दौड़ पड़ती हो, या
कोई आप नहीं है, आपकी रात तो यह है कि मेरा उमार
करके गुम ममम देवरियारको मत्रित कर रही हो योंकि ये लोग
मीरशमे में मोर गुरु मे] !॥१७॥

तृतीयोल्लास
(श्रीविष्णुसूक्तिः)
शुक्लाम्बरघरं विष्णु शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेन् सर्वविमोपशान्तये ॥१॥
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठयं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् ।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा समञ्जस त्या विरहय्य का ॥२॥
(श्रीमद्भा०६१ ११ १ २५)
खन्छ वस्त्रधारी, चन्द्रमाके समान शुक्लवर्ण, चतुर्भुज, प्रसन्न-
वदन विष्णुका सर्व विनोंकी शान्तिके लिये ध्यान करे ॥ १ ॥
हे समदर्शिन् ! आपको छोड़कर मुझे न तो स्वर्गकी, न ब्रम-
लोककी, न सार्वभौम-साम्राज्यकी, न पृथिवीपतित्वकी, न योग-
सिद्धियोंकी और न जन्ममरणसे छूटने की ही हन्छा है ॥ २ ॥

सूक्तिसुधाकर अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः। प्रियं प्रियेव व्युपितं विपण्णा मनोरविन्दाक्षदिक्षते त्वाम् ॥३॥ (श्रीमद्भाः ६ । ११ । २६) यन्मूलि मे श्रुतिशिरस्सु च भाति यस्सि- नसन्मनोरथपथः सकला समेति । स्तोष्यामि नः कुलधनं कुलदैवतं तत् पादारविन्दमरविन्दविलोचनस्य ॥ ४ ॥ तत्त्वेन यस्य महिमाणवशीकराणुः शक्यो न मातुमपि शर्वपितामहाचैः। कतुं तदीयमहिमस्तुतिमुद्यताय मह्यं नमोऽस्तु फवये निरपत्रपाय ॥५॥ बिना पल्लोयाले पक्षिशायक जिस प्रकार अपनी माताके लिये उत्सुक रहते हैं, भूखे बछड़े जैसे दूधके लिये व्याकुल रहते हैं तथा विरहिणी स्त्री जैसे व्यथित होकर अपने प्रवासी पतिकी बाट देखती है। कमलनयन ! मेरा मन भी उसी प्रकार आपके दर्शनों के लिये लालायित हो रहा है ॥३॥ कमलनयन भगवान् विष्णुके जो चरणारविन्द मेरे मम्तकपर तथा वेदोके शिरपर मुशोभित होते है और जिनमें मेरे मनोरथोंके सभी मार्ग मिलते हैं तथा जो मेरे कुलधन और कुलदेवता हैं, उनकी मैं वन्दना करता हूँ॥४॥ जिनकी महिमारुप समुद्रके छोटे-से-छोटे जलकणका भी मान पतलानेको शिव और ब्रह्मा आदि देवता भी समर्थ नहीं है, उन्हींकी महिमाका सघन करनेके लिये उद्यत हुए मुझ निलंज कविको नमस्कार ! (मला में उनकी महिमा क्या ना !)॥५॥ -भीमालबन्दारस्टोर लगे.,१.

ॐ श्रीविष्णुसूक्ति यद्वा श्रमावधि यथामति चाप्यशक्तः स्ताम्येवमेव खलु तेऽपि सदा स्तुवन्तः । वेदाश्चतुर्मुखमुखाश्च महार्णवान्तः को मजतोरणुकुलाचलयोर्विशेषः ॥६॥ किञ्चप शक्तयतिशयेन न तेऽनुकम्प्य: स्तोतापि तु स्तुतिकृतेन परिश्रमेण । तत्र श्रमस्तु सुलभो मम मन्दयुद्धे- रित्युद्यमोऽयमुचितो मम चाब्जनेत्र ।। ७॥ नावेक्षसे यदि ततो भुवनान्यमुनि नालं प्रभो भवितुमेव कुतः प्रवृत्तिः। प्रथया, असमर्थ होनेपर भी अपने परिश्रम और बुद्धिके अनुसार मैं तुति करूँगा ही, क्योंकि सदा स्तुति करनेवाले वेद और ब्रह्मा आदि (वता भी श्रम और बुद्धिके अनुसार ही स्तुति करते हैं, (पूरी-पूरी तुति उनसे भी नहीं हो पाती, फिर मुझसे उनमे कोई विशेषता नहीं) भला, महासागरके बीच डूबते हुए परमाणु और कुल- पर्वतमि क्या अन्तर है ? ॥ ६ ॥ हे कमलनयन भगवन् ! कोई भी स्तुति करनेवाला अपनी शक्तिकी अधिकतासे तुम्हारी दयाका पात्र नहीं होता, बल्कि स्तुति करते-करते जर थक जाता है, तो उसकी थकायटके कारण आप उसपर दया करते हैं ! ऐसी दशामे ब्रह्मा आदि तो अधिक शक्ति- मान् होने के कारण जल्दी नहीं थक सकते, पर मैं तो भन्दबुद्धि हूँ, मेरा शीघ्र ही थक जाना अधिक सम्भव है, अतः ब्रह्मादिसे पहले मैं ही आपका कृपापात्र बनूंगा! इसलिये स्तुति करनेका यह मेरा उद्योग उचित ही है ॥७॥ हे भगवन् ! यदि आप इन लोकोंकी ओर दृष्टि न डालें तो इनकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती, फिर प्रवृत्ति तो हो ही कैसे सकती है ! श्रीआलवन्दारस्तोत्रात लो११, १२ - नि:TIITTE সানায়া গান শন মায়া যায় না। प्रियं प्रिय म्युपितं विषण्यामनारमिन्दादिरशने खाम् ।।३।। (श्रीगना १२६) पनि मे श्रुनिमिरम्मु म मागि यमि नमान्मनोरथपयः गाला ममेति । स्तोम्यामि नः फुलधन कुलदेवनं सन् पादारविन्दमरविन्दविलोचनस ॥४॥ तच्चन यस महिमार्णवनीकराणुः शक्यो न मातुमपि पितामहाः। करें तदीयमहिमस्तुतिमुद्यताय मयं नमोऽस्तु कवये निरपत्रपाय ॥ ५॥ बिना पोवाले पधिशावक जिस प्रकार अपनी माताके लिये उमुक रहते हैं, भूखे बछड़े जैसे दूध के लिये ग्याकुल रहते हैं तथा विरहिणी मी जैसे व्यथित होकर अपने प्रयासी पतिकी बाट देखती हे कमलनयन ! मेरा मन भी उसी प्रकार आपके दर्शनों के लिये लालायित हो रहा है ॥ ३ ॥ फमलनयन भगवान् विष्णुके जो चरणारविन्द मेरे मनकपर तथा वेदोंके शिरपर सुशोभित होते है और जिनमें मेरे मनोरयोंके सभी मार्ग मिलते है तथा जो मेरे कुलधन और कुलदेवता हैं, उनकी मैं वन्दना करता हूँ ॥४॥ जिनकी महिमारूप समुद्रके छोटे-से-छोटे जलकणका भी मान बतलानेको शिव और ब्रह्मा आदि देवता भी समर्थ नहीं है, उन्हींकी महिमाका स्तवन करनेके लिये उद्यत हुए मुझ निर्लज कविको नमस्कार है! (भला मैं उ.

& थीविष्णुसूक्ति यद्वा श्रमावधि यथामति वाप्यशक्तः स्तौम्येवमेव खलु सेपि सदास्तुवन्तः। वेदाश्चतुर्मुखमुखाश्च महार्णवान्तः को मजतोरणुकुलाचलयोर्विशेपः ॥६॥ किश्चैप शक्तयतिशयेन न तेऽनुकम्प्य: स्तोतापि तु स्तुतिकृतेन परिश्रमेण । तत्र श्रमस्तु सुलभो मम मन्दयुद्धे. रित्युद्यमोऽयमुचितोमम चाजनेत्र ॥७॥ नावक्षसे यदि ततो भुवनान्यमूनि नालं प्रभो भवितुमेव कुतःप्रवृत्तिः । अथया, असमर्थ होनेपर भी अपने परिश्रम और बुद्धिके अनुसार में स्तुति करूँगा ही, क्योंकि सदा स्तुति करनेवाले वेद और ब्रह्मा आदि देवता भी श्रम और बुद्धिके अनुसार ही स्तुति करते है, (पूरी-पूरी स्तुति उनसे भी नहीं हो पाती, फिर मुझसे उनम कोई विशेषता नहीं) भला, महासागरके बीच डूबते हुए परमाणु और कुल- पर्वतामें क्या अन्तर है ? ॥ ६॥ हे कमलनयन भगवन् ! कोई भी स्तुति करनेवाला अपनी शक्ति की अधिकतासे तुम्हारी दयाका पात्र नहीं होता, बल्कि स्तुति करते-करते जब थक जाता है, तो उसकी थकावटके कारण आप उसपर दया करते है ! ऐसी दशाम ब्रह्मा आदि तो अधिक शक्ति- मान् होनेके कारण जल्दी नहीं थक सकते, पर मैं तो मन्दबुद्धि हूँ, मेरा शीघ्र ही थक जाना अधिक सम्भव है, अतः ब्रह्मादिसे पहले मै ही आपका कृपापात्र व गा! इसलिये सुति करनेका यह मेरा उद्योग उचित ही है ॥७॥ हे भगवन् ! यदि आप इन लोकोंकी ओर दृष्टि न डालें तो इनकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती, फिर प्रवृत्ति तो हो ही कैसे सकती है ! tमीआलवादारस्तीवाद श्लोक ११, १२ ६० सूक्तिसुधाकर अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः । प्रियं प्रियेव व्युपितं विषण्णा मनोरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम् ॥३॥ (श्रीमद्भा० ६ ॥ ११ ॥ २६) यन्मूनि मे श्रुतिशिरस्सु च भाति यसि- नसन्मनोरथपथः सकला समेति । स्तोष्यामि नः कुलधनं कुलदैवतं तत् पादारविन्दमरविन्दविलोचनस्य ॥४॥ तत्त्वेन यस्य महिमार्णवशीकराणुः शक्यो न मातुमपि शर्वपितामहाद्यः । क तदीयमहिमस्तुतिमुद्यताय मद्यं नमोऽस्तु कवये निरपत्रपाय ॥ ५ ॥ बिना पहोवाले पक्षिशायक जिस प्रकार अपनी माताके लिये उत्सुक रहते हैं, भूखे बछड़े जैसे दूषके लिये व्याकुल रहते है तथा विरहिणी स्त्री जैसे व्यथित होकर अपने प्रयासी पतिकी बाट देखती है हे कमलनयन! मेरा मन मी उसी प्रकार आपके दर्शनों के लिये लालायित हो रहा है ॥३॥ कमलनयन भगवान् विष्णके जो चरणारविन्द मेरे मम्नकपर तथा घेदोंके शिरपर मुशोभित होते है और जिनमें मेरे मनोरथोंके सभी मार्ग मिलते हैं तथा जो मेरे कुलधन और कुलदेयता है, उनकी मैं यन्दना करता हूँ॥४॥ जिनकी महिमारूप ममुद्रके छोटे-से-छोटे जलकणका भी मान बतलानेको शिव और ब्रह्मा आदि देवता भी समर्थ नहीं है, उन्हींगी महिमाका मवन करने के लिये उपत हुए मुश निलंन कविको नमसरार है। (ममा में उनकी महिमा क्या मानूं)॥५॥ • श्रीमासदारोवान रणे.१,१.

• धापिष्णुसनि. कोऽन्यः प्रजापशुपती परिपाति फस पादोदकन स शिका स्वशिरोधृतेन ||११|| कस्सोदरे हरमिरिचमुखप्रपशः को रक्षतीममजनिष्ट प फस्स नामः । फ्रान्त्या निर्यि पुनरुद्भिरति त्वदन्यः कान चैप परवानिति शाक्यरायः ॥१२ri त्वां शीलरूपचरितः परमप्रकृष्ट- सत्येन सात्विकतया प्रवलय शास्त्रः। प्रख्यावदेवपरमार्थविदां मतश्च नेवासुरप्रकृतयः प्रभवन्ति योद्धम् ॥१३॥ उल्लपितत्रिविधसीमसमातिशायि- मम्मायनं नव परिघहिमस्वभारम् । प्रमा और महादयजीका भी पालन करता हो; तया में प्रसिद्ध महादेवजी भापरे अतिरिक्त अन्य किसका चरपोदफ ( गंगाजल) शिरपर धारण करके, शिव (कल्याणमय) कहलाते हैं ! ॥ ११ ॥ भला, भापके सिया और किसके उदर शिव, मझा आदि यह सारा प्रपत्र स्थित है, फोन इसदी रहा करता और किसकी नामिसे या उत्पन्न होता है ! आपको छोड़कर कौन इसे अपने पैरोंसे मापकर (प्रलयकालमे) निगल जाता और पुनः सष्टिकालमें ] बाहर प्रकट कर देता है। यह प्रपत्र किसी दूसरेके अधीन है-ऐसी का भी कौन कर सकता है ! ॥ १२ ॥ आमुरी प्रवृतियाले मनुष्य आपके लोकोत्तर शील, रूप, चरित्र, परम उत्तम सत्वगण और सायिक स्वभावदारा, आपको प्रबल शास्त्री तथा देवसम्बन्धी परमार्थ (रहस्य) को जाननेयाले विख्यात पाराशरादि महर्षियों के सिद्धान्तों मी, ययावत् नहीं जान सकते ।। १३ । परन्तु आपमें अनन्य भावना रसनेयाले कुछ भक्तजन आपके ऐश्वर्यको-जो देश, काल और श्रीमाटवदारस्तोत्राव मो.१६,१७,१८ , जिसुधाकर एवं निगराइदि खगि राजन्नो: मामिन्न नियमिदमाश्रितवत्मलत्वम् ॥ ८॥ सामाविकानवधिकातिगयेशिवत्वं नारायण स्वपिन मुपनि यदिकाका महा शिवः मतमम्वः परमः सराडि त्यतेऽपि यस महिमाणयविग्रुपस्त ॥ ९ ॥ फः श्री: धियः परमसच्चममाश्रयः कः फा पुण्डरीकनयना पुरुषोत्तमः का। फस्सायुतायुतशतककलांशकांश विश्वं विचित्रचिदचित्तविभागकृतम् ॥१०॥ वेदापहारगुरुपातकंदत्यपीडा- धापद्विमोचनमहिष्टफलप्रदानः । इस प्रकार समस्त प्राणियोंके स्वाभाषिक मुहद् आपमें अपने आश्रित- जनोंके ऊपर वत्सल (सदय ) होनेका गुण रहना आधर्यकी बात नहीं है ॥ ८॥ हे नारायण ! कौन ऐसा वेदवेत्ता पुरुष है, जो आपके स्वाभाविक निरवधि और निरतिशय ऐश्वयंका सहन न कर सकता हो! क्योंकि ब्रह्मा, शिव, इन्द्र और बड़े-बड़े आत्माराम मुनि भी आपकी महिमारूप महासागरकी छोटी बूंदोंके समान हैं।॥ ९॥ आपके अतिरिक्त- लक्ष्मीजी की शोमा कौन है ? शुद्ध सत्यका आधार कौन है ? कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाला कौन है ! पुरुषोत्तम नाम किसका है ! तथा किसकी अनन्त करोड़ कलाओंके एकांशके भी अंशमें, यह बड़-चेतनरूप विचित्र संसार विभागपूर्वक स्थित है ॥ १० ॥ मगवन् ! आपको छोड़कर दूसरा कौन है, जो वेदोके अपहरणसे, ब्रह्महत्यासे और दैत्योदारा दिये गये कोंसे प्राप्त हुई आपदाओंको दूर करके तथा महान् वरदान देकर *श्रीमालवन्दारस्तोत्राद इलो० १३, १४, १५ श्रीविष्णुसूक्ति कोऽन्यः प्रजापशुपती परिपाति कस्य पादोदकेन स शिवः शिरोधृतेन ॥११॥ कस्सोदरे हरविरिश्चमुखप्रपञ्चः को रक्षतीममजनिष्ट च कस्य नामे। क्रान्त्वा निगीर्य पुनरुद्दिरति त्वदन्यः का केन चैप परवानिति शक्यशङ्कः ॥१२॥ त्वां शीलरूपचरितैः परमप्रकृष्ट सत्वेन सात्त्विकतया प्रवलैश्च शास्त्रैः। प्रख्यातदैवपरमार्थविदा मतव नैवासुरप्रकृतयः प्रभवन्ति धोद्धम् ॥१३॥ उल्लपितत्रिविधसीमसमातिशायि- सम्भावनं तव परिवढिमस्वभावम् । बझा और महादेयजीका भी पालन करता हो; तया वे प्रसिद्ध महादेवजी आपके अतिरिक्त अन्य किसका चरणोदक ( गंगाजल) शिरपर घारण करके, शिव (कल्याणमय) कहलाते हैं ! ॥ ११॥ भला, आपके सिया और किसके उदरमें शिय, प्रझा आदि मह सारा प्रपञ्च स्थित है, कौन इसकी रक्षा करता और किसकी नाभिसे यह उत्पन्न होता है ? आपको छोड़कर कौन इसे अपने पैरासे मापकर (प्रलयकालमें) निगल जाता और पुनः [ सृष्टिकालमें ] बाहर प्रकट कर देता है। यह प्रपञ्च किसी दूसरेके अधीन है-ऐसी शंका मी कौन कर सकता है ? ॥ १२॥ आसुरी प्रकृतियाले मनुष्य आपके लोकोत्तर सील, रूप, चरित्र, परम उत्तम सत्वगुण और सात्विक स्वभावद्वारा, आपको प्रबल शास्त्रों तथा देवसम्बन्धी परमार्थ (रहस्य) को जानने वाले विख्यात पाराशरादि महर्षियोंके सिद्धान्तोंसे मी, यथावत् नहीं जान सकते ॥ १३ ॥ परन्तु आपमें अनन्य भावना रखनेवाले कुछ भक्तजन आपके ऐश्वर्यको-जो देश, काल और * भीमालवदारस्तोत्रात इलो, १६, १७, १८ 1 सूक्तिसुधाकर मायालेन भवतापि निगुरामानं पश्यन्ति केचिदनिशं त्वदनन्यभावाः ||१४|| यदण्डमण्डान्तरगोचरश्च यद्दशोत्तराण्यावरणानि यानि च । गुणाःप्रधानंपुरुषः परम्पदंपरात्परं ब्रह्म च ते विभूतयः१५५ वशी वदान्यो गुणवानृजुः शुचिर्मदुर्दयालुमधुरः स्थिरः समः । कृती कृतज्ञस्त्वमसि स्वभावतःसमस्तकल्याणगुणामृतोदधिः। उपर्युपर्यजभुवोऽपि पूरुपान् प्रकल्प्य ते ये शतमित्यनुक्रमात् । गिरस्त्वदककगुणावधीप्सयासदास्थिता नोद्यमतोऽतिशेरते। वस्तुकी सीमासे रहित तथा अपने समान या अपने से अधिकको सम्मावनाये पृथक् है-निरन्तर देखते है, यद्यपि उसे आप अपनी माया बलसे छिपाये रखते हैं ॥१४॥ हे प्रभो! अण्ड, ब्रह्माण्डस्थित सर्ववस्तु, दश ऊपरके आवरण, तीन गुण, प्रकृति, पुरुष, परमपद और परात्पर ब्रह्मा, ये सब आपकी ही विभूतियाँ हैं ||१५॥ हे प्रभो ! आप सबको वशमे रखने. थाले, उदार, गुणयान , सरल, पवित्र, मृदुल स्वभाश्याले, दयालु, मधुर, अविचलसमद, तात्य और मृतश है। इस प्रकार आपसभावहीसे समस कल्याणमय गुणरूप अमृत सागर है।।१६ हे प्रभो! पेवाणी आपके गुणमिसे एक एकका भी अन्त लगानेकी से प्रजापति ब्रमाके भी ऊपर-ऊपर पुरुषोंकी कल्पना करके 'ते ये शत प्रजापतेरानमा म एकोप्रमाणः'यादिरूपसे सदा परिगणना करती रहती है, या कमी उपोगमे मुँह नहीं मोड़ती फिर भी पता नहीं पाती।] ॥१७॥२रण्य!] आपके आधिाजगों को प्रगत् की उत्पत्ति, *MATलेली. १९.१.२९,२५ + - धीविष्णुगति त्वदाश्रिवानां जगदुद्भवसितिप्रणाशसंसारपिमोचनादयः । भवन्तिलीलाविषयश्च वैदिकास्पदीयगम्भीरमनोज्नुसारिण नमो नमो वाङ्मनसानिभूमये नमो नमो वाङ्मनकभूमये । नमो नमोऽनन्तमहाविभूतये नमो नमोऽनन्तदर्यकसिन्धये । न धर्मनिष्टोसिन घात्मवेदी न मक्तिमांस्त्वशरणारविन्द । अकिचनीजन्यगति शरण्यं वसादमूलं शरणं प्रपद्ये ॥२०॥ ननिन्दितं कर्म तदस्ति लोक गहलो यम मया व्यधायि । सोऽहं विपाकापसरे मुकुन्द मन्दामि सम्प्रत्यगतिस्तवाग्रे २१+ निमजतोनन्तभवार्णवान्तधिराय मे कुलमियासि लन्धः । त्वमापिसन्धं भगवनिदानीमनुत्तमं पात्रमिदंदपाया। स्थिति, प्रलय तथा ससारसे मुक्ति-ये सत्र लीलामान होते है और वैदिक विधियों मी आपके मतों के गम्भीर मनको अनुमरण करनेवाली होती है ॥ १८॥ मन और याणीके अगोचर शारको प्रणाम है, [पमा भी भक्तजनांक ] मन-याणीके एकमात्र विश्रामम्यान आपको नमस्कार है। अनन्त महाविभूतियोंसे समन और अनन्त दयाके एकमात्र छागर आपको प्रणाम है, पारंबार मगाम है ॥ १९॥ मैं न घनिष्ठ न आत्मशानी हूँ और न आपके चरणों में मतिमान ही हूँ मैं तो अकिदन हूँ, अनन्यगति है, और शरणागत-क आपके चरणकमलोंकी शरण पाया हूँ॥ २० ॥ संसार, ऐश कोई निन्दित फर्म नहीं है, जिसको हजारो यार मैंने न किया हो, ऐसा में अब फलभोगके समयपर विवा (अन्य साधनहीन) होकर, हे मुकुन्द ! आपके आगे बारंबार रोता--कन्दन करता हूँ॥२१॥ अनन्त महासागरके मीतर डूबते हुए मुझको आज अति पिलमसे आप तटरूप होकर मिले है, और हे भगयन् ! आपको भी आज यह दयाका अनुपम पाप मिला है ! मामास्वारस्तोत्रा लो २३, २४, २५, २६, २० २ - निशुमार अभूतपूर्व मम माथि किया गयं गई मे माजहि गम् किन्तु वदनेगरमागताना परामवी नायन रोन्नुरूपः।२३। निरागकसापि न नापदरमह महंग हातुं ना पादपङ्कजम् रासानिरम्लोपिनिगुम्तनन्धयां न जातुमातभरणीजिहामति नयामृतमन्दिनि पादपङ्कजे नियमितात्मा कयमन्यदिन्छति वितरविन्द मकरन्दनिमरे मधुमनों ने रकं हि धीशन२५ स्वदधिमहिन्यफदापिकनविग्रयानया यापि मारतोओ नदेय मुणात्यशुमान्यशेषतः शुमानि पुष्णानि नजातु हीयते उदीर्णमंसारदवाशुधणि क्षणेन निर्याप्य परां च नितिम् ॥ २२ ॥ [ अब इस समय यदि आप मेरा दुःख दूर नहीं करते तो] में लिये तो यह कोई नयी बात नहीं है, मैं तो सब सहन कर दंगा, क्योंकि दुःख तो मेरे साथ ही उत्पन्न हुआ है, किन्तु आपके मामने धारणागतका पराभव झोना आपके योग्य नहीं है-आपको शोमा नहीं देता ॥ २३ ॥ हे महेश्वर ! थाप त्याग देंगे तो भी मैं आपके चरणकमलों के परित्याग करने का साहस नहीं कर सकनाः क्रोधवश गोदीले अलग किया हुआ भी दूध पीनेवाला शिक्षा, अपनी माताके चरणोंको कभी नहीं छोड़ना चाहता ॥ २४ ॥ जो पुरुप आपके अमृतवर्षी चरणकमलों में दत्तचित्त है, वह किसी और पदार्थकी इन्छा कैमे कर सकता है ? मधुसे भरे हुए पकजपर बैठा हुआ भ्रमर, ईक्षुरक ( तालमखानेके पुष्प अथवा ईसके रस) की और क्या दृष्टिपात करता है ॥२५॥ आपके चरणों के उद्देश्यसे, किसी भी समयमै, किसी ने भी, जैसे-तैसे एक बार भी हाथ जोड़ दिया, तो वह (नमस्कार)उसके समस्त पापोंको हर लेता है, पुण्यराशिको पुष्टि करता है और उसका फिर कभी नाश नहीं होता ॥ २६ ॥ आपके युगल चरण- रूपी अरुण कमलके अनुरागसे उत्पन्न हुए अमृत-सिन्धु (गंगाजी) का श्रीमालवन्दारस्तोनात् हो० २८, २९, ३०, ३१ * 'नेचुरसं' इति पाठान्तरम् । .

श्रीविष्णुमति प्रयच्छति त्वभरणारुणाम्बुजवयानुरागामृतसिन्धुशीकरण बिलामविकान्तपरावरालयं नमस्यदार्तिक्षपणे कृतक्षणम् । धनं मदीयं तव पादप कदानुसाक्षात्करयाणि पशुपा कदा पुनः शारपाकल्पकध्वजारविन्दानुशवबलाञ्छनम् । त्रिविक्रम त्वचरणाम्बुजद्वयं मदीयमुनिमलकरिष्यति २९॥ विराजमानोज्ज्वलपीतवासमं सितावमीमूनसमामलच्छविम् । निममनामि तनुमध्यमुमतं विशालवक्षःस्पलशोमिलक्षणम्।। चकासतं ज्याकिण: शुभमर्मिराजानुविलम्बिमिर्मजः। प्रियायतंसोत्पलकर्णभूपणालयालकायन्धविमर्दासिमि:३१॥ जाकण बढ़े हुए समार-दायामिको एणमात्रम शान्त वरके परमानन्द देता है ॥२०॥ लीलामाप्रसे ही पर अपर सर लोकोंको (वामनरूपमें) नापने वाले और प्रगतको पीदाको हरनेमें ही अपना प्रत्येक शश सगार्नयाले मेरे परमपन आपके पादपङ्कनको, नेवासे मैं कर प्रत्यक्ष देगा? २८॥ हे वामन ! आ चक, कल्पवृक्ष, वजा, कमल, अश, पत्र आदि शम चिहावाले आपके चरणयुगल, मेरे मम्नकको कर अलात करेंगे?॥२॥ जिनके अनार निर्मल पीतामर शोमा पा रहा है, जिनकी अमल श्यामद कान्ति मलित अतमी-पुष्पके समान मुन्दर है, जिनका देह ऊँचा, नाभि गम्भीर, कटिदेश ( कमर ) सूक्ष्म और विशाल वक्षःस्थल श्रीवत्सचिदसे मुशोभित हो रहा है [ऐमे आपको में कब अग्नी सेनाद्वारा प्रसन्न करूँगा] ॥ ३० ॥ जो प्रियतमा लक्ष्मी- के शिरोभूषण, कमलदलादि कर्णभूषणों तथा शिथिल अलकबन्धके विमर्दकी सूचना देनेयाले हैं,[अति कोमल होते हुए भी] शाङ्गधनुषकी प्रत्यञ्चाके चिहोंसे कठोर हो गये हैं, ऐसे आजानुलम्बी सुन्दर चार भुजदानों से मुद्योभित होनेवाले आपको [में कब प्रसन्न कर सकूँगा !]॥३॥ मालवदारस्तोत्रा हो. ३२, १३, १४,३५, ३६ -- २० ® सूतिसुधाकर उदग्रपीनांसविलम्बिकुण्डलालकावलीबन्धुरकम्युकन्धरम् । मुखश्रिया न्यकृतपूर्णनिर्मलामृतांशुविम्बाम्बुरुहोज्ज्वलश्रियम्। प्रवुद्वमुग्धाम्मुजचारुलोचनं सविभ्रमभ्रूलतमुज्ज्वलाधरम् । शुचिसितं कोमलगण्डमुन्नस ललाटपर्यन्तविलम्बितालकम्।। स्फुरकिरीटाङ्गदहारकण्ठिकामणीन्द्रकाचीगुणनू पुरादिभिः । रथाङ्गशङ्खासिगदाधनुर्व रैलसत्तुलस्या बनमालयोज्ज्वलम् ।। चकर्थ यस्सा भवनं भुजान्तरं तव प्रियं धाम यदीयजन्मभूः। जगत्समग्रं यदपाङ्गसंश्रयं यदर्थमम्भोधिरमन्थ्यवन्धि च॥ स्ववैश्वरूप्येण सदानुभूतयाप्यपूर्ववद्विस्सयमादधानया । गुणेनरूपेण विलासचेष्टितैः सदा तवैवोचितया तव श्रिया ३६ उन्नत और पुष्ट कन्धोपर लटकते हुए कुण्डल तथा अलकोसे जिनकी शंखसरा (उमत) ग्रीश मनोहर मालूम होती है। जो अपने मुखकी शोभासे निर्मल पूर्णचन्द्रविम्ब तथा श्वेत कमलकी कान्तिको तिरस्कृत कर रहे हैं, खिले हुए सुन्दर पत्र के समान जिनके मनोहर नेत्र , विलासमयी माह है, अमल अघर है, मधुर मुसकान है, कोमल कपोल, ऊँची नासिका और भालदेशमें लटकी हुई अलके है [ ऐसे आपको मैं कल आनन्दित करूँगा !]|३२-३३ ।। प्रकाशमान किरीट, भुनन्द, हार, कण्ठी, अदाऊ रनोंकी किरिणी और नूपुर आदि आभूपोंमे, श, चक्र, गदा, राष्ट्र और धनुष आदि दिग्य आयुधोसे तपा तुलसीमयी पनमालासे आप भुशोभित हैं।॥ ३४॥ आपने अपनी भुजाओंका मध्यभाग (उदय)ही जिसके लिये निधास-मन्दिर बनाया, जिमकी जन्मभूमि (धीरसागर) दी आपका प्रिय पासस्थान है, सारा संसार जिमरकटायो माभितरे सपा जिसके लिये आपने समुद्रका मन्यन और सम्पन प्पिा, जो विशम्पमे मापके द्वारा सदा अनुभूत होनेपर मी नूतन-मी निम्मय उत्तम परती, जो रस, गुण और पिलाम-रेाभोंके बीमारस्तोतारो..,1,१९,.,. - धीषिप्शुसूक्ति * तया सहासीनमनन्तभोगिनि प्रकृष्टविज्ञानयलकधामनि । फणामणिबातमयूखमण्डलप्रकाशमानोदरदिव्यधामनि ३७५ निवासशय्यासनपादुकांशुकोपधानवर्यातपवारणादिभिः । शरीरभेदैस्तव शेपतां गतैर्यथोचितं शेष इतीरिते जनै३८ दास सखा वाहनमासनंध्वजोयस्त वितानं व्यजनं त्रयीमयः। उपस्थितं तेन पुरोगरुत्मतालदधिमकिणाकशोभिना । त्वदीयभुक्तोज्झितशेषमोजिना त्वया निसृष्टात्मभरेण यद्यथा। प्रियेण सेनापतिना निवेदितं तथानुजानन्तमुदारवीक्षपौ:४०५ हृताखिल शमलैः स्वभावतस्त्वदानुकूल्यैकरसैस्तयोचितः । द्वारा केवल आपके ही योग्य है ॥ ३५-३६ ॥ उस लक्ष्मीजी के साथ आप अनन्त फणोंसे विशिष्ट शेषनागकी शय्यापर विराजमान रहते हैं, जो कि समयानुसार निवास, शय्या, आसन, पादुका, वस्त्र, तकिया और शीत- वर्षादिनिवारक छादिरूप नाना शरीरभेदोंके द्वारा आपके शेषत्व (अङ्गभाव) को प्राप्त होने के कारण लोगोंसे 'शेष' कहे जाते हैं और फोंकी मणियोंके किरण-जालसे अपना उदररूप दिव्य-धाम प्रकाशित किये रहते हैं तथा जो उत्तम ज्ञान और बलके एकमात्र आश्रय हैं ।। ३७-३८॥ वेदत्रयी जिनका स्वरूप है, जो [ अकेले ही समय-समयपर ] आपके दास, सखा. वाहनः आसन, ध्वजा, वितान (चाँदनी) और चंवरका काम देते हैं, सवारीके समय आपके पैकी रगड़से बने हुए चिहद्वारा जिनका अंग मुशोभित है वे गरुडजी आपके सामने हाथ जोड़कर खड़े है ।। ३९ ।। जो सदा आपकी प्रसादीमात्रको ही भोजन करनेवाले हैं तथा जिनपर आपने अपना सारा भार रख छोड़ा है ऐसे प्रिय सेनापति (तया प्रधान मन्त्री विप्यासेनजी) के निवेदनका आप अपनी उदार दृष्टिमे अनुमोदन करते हैं ।। ४० ॥ स्वभावसे ही जिनके क्लेशरूप मल नष्ट हो चुके हैं तथा आपको अनुकूलता की जिनके लिये एकमात्र रस है ऐसे + श्रीमालवन्दारस्तोत्रात् शे० ४२,४३, ४४, ४५ - ૨૨ निशुपाकर गृहीतततत्परिपारसाधनैनित्यमाणं सनिर्यथोचितम् ।। अपूर्वनानारसमायनिर्भरप्रबुद्धया मुग्धविदग्धलीलया। क्षणाणुत्थितपरादिकालया प्रहर्षयन्तं महिपी महाभुजम् ॥ अचिन्त्यदिव्याहुतनित्ययापनस्वभावलावण्यमयामृतोदधिम्। श्रियाश्रियं भक्तजनकजीवितं समर्थमापत्सवमर्थिकल्पकम् । भवन्तमेवानुचरनिरन्तरं प्रशान्तनिम्शेपमनोरथान्तः। कदाहमैकान्तिकनित्यकिङ्करः प्रहर्षयिष्यामिसनाथजीवितम् धिगशुचिमविनीतं निर्दयं मामलजं परमपुरुष योऽहं योगिवर्याग्रगण्यः । सचिवगण आपके योग्य छत्र, पखा एवं चामरादि यथोचित उपचारोंको लेकर आपकी सेवा कर रहे है ।। ४१ ।। जो नित्य-नूतन नाना प्रकारके [शृङ्गारादि] रसों तथा [विलासादि] मायोमे परिपूर्ण एवं विकसित हैं और जिनमें ब्रह्मादिकोंकी आयु भीक्षणमात्र कालके अणुभागके समान बीत जाती है ऐसी चातुर्यपूर्ण मोहिनी लीलाओंसे अपनी महारानी लक्ष्मीजी- को आनन्दित करते हुए, आप विशाल बाहुओंसे युक्त होकर शोभा पा रहे हैं ॥ ४२ ॥ जो अचिन्य, दिव्य, अद्भुत और नित्य यौवनयुक्त (सदा षोडशवर्षीय) हैं, खभावसे ही लावण्यमय अमृतके समुद्र है, लक्ष्मीजीकी भी शोभा हैं, भक्तजनोंके मुख्य-जीवनरूप है, समर्थ हैं, आपत्तिकालके सखा हैं और याचकजनोंके लिये कल्पवृक्ष हैं ॥ ४३ ॥ ऐसे एक आपका ही निरन्तर अनुसरण करता हुआ अन्य सब मनोरयोंसे सर्वया रहित और आपका ही ऐकान्तिक नित्य-दास होकर मैं इस जीवनको सनाथ मानता हुआ कय आपको सन्तुष्ट करूँगा ११४४॥ हे परम पुरुष ! मुझ अपवित्र, अविनीत, निर्दय और निर्लजको धिकार है, जो स्वेच्छाचारी होकर भी मैं मुख्य-मुख्य योगीश्वरों तथा ब्रह्मा, शिव और +श्रीमालबन्दारस्तोत्रा सो४६, ४७, ४८, ४९ 9 श्रीविष्णुसूक्ति २३ -k विधिशिवसनकायैातमत्यन्तरं तव परिजनभावं कामये कामवृत्तः॥४५॥ अपराधसहसमाजनं पतितं भीमभवार्णवोदरे। अगतिं शरणागतं हरे कृपया केवलमात्मसात्कुरु ॥४६॥ अवियेकघनान्धदिङ्मुखे बहुधा सन्ततदुःखपिणि । भगवन् भवदुर्दिने पथः स्खलितं मामवलोकयाच्युत ॥४७॥ न मृपा परमार्थमेव मे शृणु विज्ञापनमेकमग्रतः । यदि मे न दयिष्यसे ततो दयनीयस्तव नाथ दुर्लभः ॥४८॥ तदहं त्वते न नाथवान्महते त्वं दयनीयवान्न च । विधिनिर्मितमेतदन्वयं भगवन् पालय मा स जीहपः॥४९॥ यपुरादिपु योऽपि कोऽपि वा गुणतोऽसानि यथातथाविधः । सनकादिक ध्यानमें भी न आ सकनेवाले आपके दुर्लभ परिजन-भावकी कामना करता हूँ ॥ ४५ ॥ हे हरे ! हजारों अपराध करनेवाले, भयङ्कर संसार-समुद्र में पड़े हुए और निरामय मुह शरणागतको आप केवल अपनी कृपासे ही अधीन कर लीजिये ||४६॥ हे भगवन् !ह अच्युत !! जिमने अविवेकरूपी यादलोदारा दिशाओंको अन्धकाराच्छन्न कर दिया है और जिसके कारण निरन्तर दुस्वरूपी वृष्टि हो रही है उस ससाररूपी दुर्दिनमें मागसे गिरे हुए मेरी ओर आप निहार लीजिये ||४७॥ है नाथ! इस मेरे एकमात्र विज्ञापनको आप पहले सुन लीजिये, यह झूठी यात नहीं है, सत्य ही है--यदि आप मुझपर दया नहीं करेंगे, तो फिर आपको पापात्र मिलना कठिन ही रे ॥४८॥ हे भगवन् ! तुम्हारे बिना मैं नायवान् नहीं हूँ और मुश दीनके बिना आप दीनदयालु नहीं हो सक्ते लिये विधि-निर्मित इस सम्बन्धको आप निभाइये ! इसका त्याग न होने दीजिये ॥४॥ नाथ! शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण और बुद्धि आदिमें में जो कोई भी होऊँ, गुणके अनुसार [ भला-बुरा] असा +भीमावदारलोशार को. ५०, ५१,५२, ५३, ५४ २२ तिसुधाकर गृहीततचरपरिचारसाधननिपन्यमागं सचिवैर्ययोचितम् ॥ अपूर्वनानारसमावनिर्भरप्रबुद्धया मुग्धविदग्धलीलया । क्षणाणुवक्षिप्तपरादिकालया महर्षयन्तं महिपी महाभुजम् ॥ अचिन्त्यदिव्याद्धतनित्ययौवनस्वभावलावण्यमयामृतोदपिम्। श्रियः श्रियं भक्तजनकजीवितं समर्थमापत्सवमर्थिकल्पकम् । भवन्तमेवानुचरनिरन्तरं प्रशान्तनिरोपमनोरथान्तरः । कदाहमैकान्तिकनित्यकिङ्करः प्रहर्पयिष्यामि सनाथजीवितमा धिगशुचिमविनीतं निर्दयं मामलजं परमपुरुप योऽहं योगिर्याग्रगण्यः। सचिवगण आपके योग्य छत्र, पंखा एवं चामरादि यथोचित उपचारोंको लेकर आपकी सेया कर रहे हैं ।। ४१ ॥ जो नित्य-नूतन नाना प्रकारके [शृङ्गारादि ] रसों तया [विलासादि] भावोंसे परिपूर्ण एवं विकसित हैं और जिनमें ब्रह्मादिकोंकी आयु भी क्षणमात्र कालके अणुमागके समान बीत जाती है ऐसी चातुर्थपूर्ण मोदिनी लीलाओंसे अपनी महारानी लक्ष्मीजी- को आनन्दित करते हुए, आप विशाल बाहुओंसे युक्त होकर शोभा पा रहे हैं ॥ ४२ ॥ जो अचिन्त्य, दिव्य, अद्भुत और नित्य-यौवनयुक्त (सदा घोडशवर्षीय ) हैं, स्वभायसे ही लावण्यमय अमृतके समुद्र है, लक्ष्मीजीकी भी शोभा है, भक्तजनोंके मुख्य-जीवनरूप है, समर्थ है, आपत्तिकालके सखा हैं और याचकजनों के लिये कल्पवृक्ष हैं ॥ ४३ ॥ ऐसे एक आपका ही निरन्तर अनुसरण करता हुआ अन्य सब मनोरयोंसे सर्वथा रहित और आपका ही ऐकान्तिक नित्य-दास होकर मैं इस जीवनको सनाथ मानता हुआ कच आपको सन्तुष्ट करूँगा !||४४॥ है परम पुरुष ! मुझ अपवित्र, अविनीत, निर्दय और निर्लजको धिकार है, जो स्वेच्छाचारी होकर भी मैं मुख्य-मुख्य योगीश्वरों तथा ब्रह्मा, शिव और + श्रीमालवन्दारस्त्रोत्राद को. ४६,४७, ४८,४९ श्रीविष्णुसूक्ति २३ विधिशियसनकायैातुमत्यन्तरं तव परिजनभावं कामये कामवृत्तः॥४५॥ अपराधसहस्रभाजनं पतितं भीमभवार्णवोदरे। अगतिं शरणागतं हरे कृपया केवलमात्मसात्कुरु ॥४६॥ अविवेकयनान्धदिङ्मुखे बहुधा सन्ततदुःखपपिणि । भगवन् भवदुर्दिने पथः स्खलितं मामवलोकयाच्युत ॥४७॥ न मृपा परमार्थमेव मे शृणु विज्ञापनमेकमग्रतः । यदि मे नदयिष्यसे ततो दयनीयस्तय नाथ दुर्लभः॥४८॥ तदहं त्वदृते न नाथवान्मदृते त्वं दयनीयवान च। विधिनिर्मितमेतदन्वयं भगवन् पालय मा स जीहपः॥४९॥ वपुरादिपु योऽपि कोऽपिया गुणतोऽसानि यथातथाविधः । सनकादिके ध्यानमें भी न आ सकनेवाले आपके दुर्लभ परिजन-भावकी कामना करता हूँ ॥४५॥ हे हरे ! हजारों अपराध करनेवाले, भयङ्कर संसार-समुद्र में पड़े हुए और निराश्रय मुझ शरणागतको आप केवल अपनी कृपासे ही अधीन कर लीजिये ।।४६|| हे भगवन् ! हे अभ्युत !! जिसने अविवेकरूपी पादोदारा दिशाभोंको अन्धकाराच्छन्न कर दिया है और जिसके कारण निरन्तर दुःखरूपी वृष्टि हो रही है उस ससाररूपी दुर्दिनमें मार्गसे गिरे हुए मेरी ओर आप निहार लीजिये ॥७॥ है नाय ! इस मेरे एकमात्र विज्ञापनको आप पदले सुन लीजिये, यद भूठी बात नहीं है, सत्य ही है- यदि आप मुझपर दया नहीं करेंगे, तो फिर आपको दयापात्र मिलना कठिन हो ॥४८॥ हे भगवन् ! तुम्हारे रिना मैं नाथवान नहीं हूँ और मुझ दोन रिना आप दीनदयालु नहीं हो सरते रसलिये विधि-निर्मित इस सम्बन्धको आप निभाइये ! इसका त्याग न होने दीजिये ॥४९॥ नाय! शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण बुद्धि आदिमें में जो कोई भी होऊँगुणके अनुसार मग.. श्रीमानकदारलोकाएको..."

२२ सूक्तिसुधाकर गृहीततत्त्परिनारसायनैम्पेिन्यमाणं सचिवर्ययोचितम् II अपूर्यनानारसभावनिर्मरप्रयुद्धया मुग्धविदग्धलीलया। क्षणाशुवक्षिप्तपरादिकालया प्रहर्षयन्तं महिषी महाभुजम् ॥ अचिन्त्यदिव्याद्भुतनित्ययौवनस्वभावलावण्यमयामृतोदधिम्। श्रियः श्रियं भक्तजनकजीवितं समर्थमापत्ससमर्थिकल्पकम् । भवन्तमेवानुचरनिरन्तरं प्रशान्तनिदशेपमनोरथान्तरः। कदाहमैकान्तिकनित्यकिङ्करः प्रहपयिष्यामि सनाथजीवितम धिगशुचिमविनीतं निर्दयं मामलज परमपुरुप योऽहं योगिवर्याग्रगण्यः । सचिवगण आपके योग्य छन, पंखा एवं चामरादि यथोचित उपचारोंको लेकर आपकी सेवा कर रहे हैं ॥४१॥ जो नित्य नूतन नाना प्रकार के [शृङ्गारादि] रसों तथा [विलासादि] भार्थोसे परिपूर्ण एवं विकसित हैं और जिनमें ब्रह्मादिकोंकी आयु भी क्षणमात्र कालके अणुभागके समान बीत जाती है ऐसी चातुर्थपूर्ण मोहिनी लीलाओं से अपनी महारानी लक्ष्मीजी- को आनन्दित करते हुए, आप विशाल बाहुओंसे युक्त होकर शोभा पा रहे हैं ॥ ४२ ॥ जो अचिन्त्य, दिव्य, अद्भुत और नित्य-यौवनयुक्त (सदा षोडशवर्षीय ) हैं। स्वभायसे ही लावण्यमय अमृत के समुद्र है। लक्ष्मीजीकी भी शोभा हैं, भक्तजनोंके मुख्य-जीवनरूप है, समर्थ हैं, आपत्तिकालके सखा हैं और याचकजनोंके लिये कल्पवृक्ष है ॥ ४३ ।। ऐसे एफ आपका ही निरन्तर अनुसरण करता हुआ अन्य सब मनोरयोंसे सर्वथा रहित और आपका ही ऐकान्तिक नित्य दास होकर मैं इस जीवनको सनाथ मानता हुआ कय आपको सन्तुष्ट करूँगा ||४४|| हे परम पुरुष ! मुझ अपवित्र, अविनीत, निर्दय और निलंजको धिक्कार है, जो स्वेच्छाचारी होकर भी मैं मुख्य-मुख्य योगीश्वरों तथा ब्रक्षा, शिव और श्रीलवन्दारस्तोत्रात को. ४६,४७, ४८,४९ - - दिनमें मार्गसे गिरे हुए मेरी ओर आप निहार लीजिये ॥४७॥ हे त नही है, साथ ही है-यदिभार मुशारर दया नहीं करेंगे, तो फिर पएको दयापात्र मिलना कटिन ही३॥४८॥ १ भगवन् ! तुम्हारे बिना पतेःमरिये विधि निर्मित इस सम्बन्धको भार निमारये! मराराम नाथवान् नहीं है और मुझ दीनके बिना आप दीनदयादुनहीं होने दीजिये ॥४॥२ नाप! परीर, इन्द्रिय, मना कर और श्रीविष्णुक्ति २३ विधिशिवसनकायैानुमत्यन्तरं तव परिजनभावं कामये कामवृत्तः॥४५॥ परायसहस्रमाजनं पतितं भीमभवाणयोदरे। गतिं शरणागतं हरे कृपया फेवलमात्मसात्कुरु ॥४६॥ विवेकपनान्धदिङ्मुखे बहुधा सन्ततदुःखयपिणि । बावन् भवदुर्दिने पथः सवलितं मामवलोकयाच्युत ॥४७॥ मृषा परमार्थमेव मे शृणु विज्ञापनमेकमग्रतः। दि मे न दयिष्यसे ततो दयनीयस्तव नाथ दुर्लभः ॥४८॥ दहं त्वदृते न नाथवान्महते त्वं दयनीयवान्न च | धिनिर्मितमेतदन्वयं भगवन् पालय मास जीहपः॥४९॥ पुरादिपु योऽपि कोऽपि वा गुणतोऽसानि यथातथाविधः । नकादिके ध्यानमें भी न आ सक्नेवाले आपके दुर्लभ परिजन-भावकी सामना करता हूँ ।। ४५ ।। हे हरे ! हजारों अपराध करनेवाले, भयङ्कर भार समुद्र में पड़े हुए और निराश्रय मुझ शरणागतको आप केवल पनी कपासे ही अधीन कर लीजिये ||४६॥ हे भगवन् ! हे अन्न !! सने अविवेकरूपी पादोदारा दिवाओंको अन्धकाराच्छन्न कर दिया और जिसके पारण निरन्तर दुःखरूपी वृष्टि हो रही है उस ससाररूपी प! इस मेरे एकमात्र विज्ञापनको आप पहले सुन लीजिये, यदी आदिमें में जो कोई भी गुपके अनुसार- +बीमालादारस्पद..., 8 सूतिसुधाकर तदयं तव पादपायोरहमव मया समर्पितः ।। ५० मम नाथ यदस्ति योऽस्म्यहं सकलं तद्धि तवैव माघ । नियतसमिति प्रयुद्धधीरथया किन्तु समर्पयामि ते ॥५१॥ अयोधितवानिमा यथा मयि नित्यां भवदीयतां स्वयम् । कृपयेवमनन्यभोग्यतां भगवन् मतिमपि प्रयच्छ मे ॥५२॥ तव दास्यसुखैकसङ्गिनां भवनेयस्त्वपि कीटजन्म मे । इतरावसथेषु मा स भूदपि में जन्म चतुर्मुखात्मना ॥५३|| सकृत्वदाकारविलोकनाशया तृणीकृतानुत्तममुक्तिमुक्तिमिः । महात्मभिर्मामवलोक्यतां नय क्षणेऽपि ते यद्विरहोतिदुस्सहाय न देहं न प्राणान्न च सुखमशेपाभिलपितं न चात्मानं नान्यल्किमपि तवशेषत्वविभवात् । भी होऊँ, मैं तो आज ही अपनेको आपके चरण-कमलों में समर्पण कर चुका ॥ ५७ ॥ हे प्रभो ! स्वयं मैं और जो कुछ भी मेरा है, वह सब आपका ही नियत धन है, हे माधव ! यही मेरी बुद्धिमें आता है ऐसी दशामें मैं आपको क्या समर्पण करूं? ॥५१॥ है भगवन् ! जिस प्रकार आपने मुझे अपनी नित्यस्थित भवदीयता (मैं आपका हूँ इस भाव) को स्वयं जनायाइसी तरह कृपा करके मुझे अपनी अनन्य भक्ति भी दीजिये ॥५२॥ आपके दासत्व-भावका ही सुखानुभय करनेवाले सजनों के घरमें तो मुझे कीट-योनि भी मिले, पर इससे भिन्न तो मुझे बझाकी योनि भी प्राप्त न हो यही मेरी प्रार्थना है ]|५३!! जिन्होंने आपके स्वरूपको एक बार देखने की इच्छासे उत्तमोत्तम भोग और मुक्तिको भी तृणयत् त्याग दिया है तथा जिनका क्षणभरका भी वियोग आपको अत्यन्त असह्य है ऐसे महात्माओंके दृष्टि-पथमें मुझे डाल दीजिये ॥५४॥ हे नाथ ! आपकी दासताके वैभवसे रहित होनेवाले देश, प्राण. सुख, सय कामनाएँ, अपनी आत्मा तथा अन्य जो कुछ भी हो उसे क्षण- मीनालन्दारस्तोत्राद सो ५५, ५६, ५७,५८,५९ श्रीविष्णुसूक्ति २५ हेर्भूतं नाथ क्षणमपि सहे पातु शतधा पिनाशं तत्सत्यं मधुमथन विज्ञापनमिदम् ॥५५॥ न्तस्यानादेरपरिहरणीयस्थ महतो विहीनाचारोऽहं नृपशुरशुभस्यास्पदमपि। रासिन्धो बन्धो निरवधिकवात्सल्यजलथे तव सारं सारं गुणगणमितीच्छामि गतभीः ॥५६|| नेच्छन्नप्येवं यदि पुनरितीच्छन्निव रज- स्तमश्छन्नश्छअस्तुतिवचनभङ्गीमरचयम् । पीत्थं रूपं वचनमवलम्ब्यापि कृपया त्वमेवैवंभूतं घरणिधर मे शिक्षय मनः ॥५॥ । त्वं माता त्वं दयिततनयस्त्वं प्रियसुह- त्वमेव त्वं मित्रं गुरुरपि गतियासि जगताम् । भी नहीं सह सकता हूँ, चाहे ये सैकड़ों प्रकारसे नष्ट हो जायें; धुसूदन ! यह मेरा विज्ञापन सत्य है ॥ ५५ ॥ हे दयासिन्धो! हे बन्धो !! मैं दुराचारी, नर-पशु, आदि-अन्तरहित और अपरिहरणीय न् अराभोंका भण्डार हूँ, तो भी हे अपारवात्सल्य सागर ! आपके गों का स्मरण कर-करके निर्भय हो जाऊँऐसीइच्छा करता हूँ!॥५६॥ रणीघर ! यद्यपि मैंने रजोगुण और तमोगुणसे आन्धन होकर, तरूपसे वस्तुतः इच्छा न रखते हुए भी, इच्छुफकी भौति, कपटपुक्त -वचनोंका निर्माण किया है। तथापि मेरे ऐसे वचनोंको भी अपनाकर, ही सपा करके मेरे मनको [ सधे भायसे स्तुति करनेयोग्य होनेकी] 1॥५७॥ हेहरे! आप ही जगत के पिता-पता, प्रिय पुष, धारे tीमालबन्दारस्तोत्रात् दरो० ६०,११,६२ -स्वमेव माता च पिता त्वमेर समेव पन्धुश्च सहा समे। स्वमेव चिया रिण स्वमेव त्वमेव सर्व मम देवदेव।।

स्वदीयम्वनमृतस्तर परिजनम्बदतिरह प्रपत्र सन्यामपि तवैवामि हि मरः ॥५॥ अमर्यादः क्षुद्रप्रतमनिरपपाप्रमभूः कृतमो दुर्मानी मारपरक्यो यमनपरः । नृशंसः पापिष्ठः कपमहमितो दुमजलधे. रपारातीर्णतय परिवरयं परणयोः ।।५० रघुवर गदमस्त्वं तारको वायगस प्रणत इति दयालपण अद्यम कृष्ण। प्रतिभवमपराधुर्मुग्प सायुज्पदोभू- 4द किमपदमागस्तस्य तेऽस्ति क्षमायाः ॥६० मुहृद्, मित्र, गुरु और गति है, में आपका ही सम्बन्धी, आपका दास, आपका ही परिचारक, आपको हो [एकमात्र ] गति माननेव- और आपकी ही शरण है, इस प्रकार अब आपढीपर मेरा सारा । है ।। ५८॥ भगवन् ! मैं तो मर्यादाका पालन न करनेवाला, नी पञ्चलमति और गुणोंमें मी दोष-दमनरूप] अस्थाको जन्म हूँ, साथ ही कृतान, दुष्ट, अभिमानी, कामी, टग, क्रूर और महापापी मला, मैं किस प्रकार इस अपार दुःख सागरसे पार होकर आप चरणोंकी परिचर्या करूँ ? ॥५: ।। हे रघर ! जब कि उस का [रूपधारी जयन्त ] के ऊपर, यह सोचकर कि, 'यह मेरी शरण आया है' आप वैसे दयालु हो गये थे, और हे अन्दर कृष्ण जो अपने प्रत्येक जन्ममे आपका अपराध करता आ रहा था, उ शिशुपालको भी जब आपने सायुज्यमुक्ति दे दी, तो अर को ऐसा अपराध है, जो आपकी क्षमाका विषय न हो ! ॥६० श्रीमालवन्दारस्तोरात श्लो ६३,६५, ६६ श्रीविष्णुसूक्तिः ननुप्रपन्नासकृदेव नाथ तवाहमसीति चयाचमानः । तवानुकम्प्यासरत प्रतिज्ञा मदेकवर्ज किमिदं व्रतं ते ॥६॥ (४ संख्यात आरम्य ६१ संन्यापर्यन्तं सर्वे श्रीमद्यामुनाचार्य- म्वामिप्रणीतालबन्दारस्तोत्रात्) विपदो नैव विपदः सम्पदो नैव सम्पदः । विपद्विम्मरणं विष्णोः सम्पन्नारायणस्मृतिः ॥६२॥ मधुमर्दि महन्मनु मन्यं मतिमदामहम् । मन्येऽमलमदोऽमन्दमहिम श्यामलं महः ॥६॥ (पाण्डेयरामनारायणदत्तशास्त्रिणः) नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचौरः कथितः पृथिव्याम् । अनेकजन्मार्जितपापमञ्चयं हरत्यशेष सरतां सदैव ॥६॥ हे नाथ! एक बार मी जो आपकी धरणमें आकर मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कह- कर याचना करता है यह अपनी प्रतिभाको सदा स्मरण रखनेवाले आपका कृपापात्र बन जाता है, परन्तु क्या आपकी या मतिशा एकमात्र मुझको ही छोड़कर प्रत होती है !॥६॥ विपत्ति सधी विपत्ति नहीं है और सम्पत्ति भी सपी सम्पचि नहीं है, अपि तु विष्णुका विस्मरण ही विपत्ति है और नारायणाका स्ररणा ही सम्पति १६२|| मतिमान् महात्माओंके पन्दनीय, मधुदत्यका मर्दन करनेवाले, महनीय, मनोहर और उत्तर महिमाघारी निर्मन श्यामल तेजको हो मैं अपना आराध्यदेय मानता हूँ॥६३ ।। मनुष्यों में नारायण नामका एक पुरुषविशेष रे, जो संसारमें प्रमिद घोर पहा जाता है, क्योंकि यह स्मरण करते ही अनेक जन्मोदी मापी हुई सभी राशिको मदीप +मापदारस्तोगार.. • परगनाथाम् को. ४ सपी निदान। भव सोयो परादेव मम ॥ (म. रामा• १५

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श्रीविष्णुसूक्ति ननुप्रपन्नासकृदेव नाथ तवाहमसीति चयाचमानः । तषानुकम्प्यासरत प्रतिज्ञांमदेकवर्ज किमिदं व्रतं ते ॥१॥ (४ संख्मात आरम्य ६१ संख्यापर्यन्तं सर्व श्रीमद्यामुनाचार्य- स्वामिप्रणीतालबन्दारतोत्रात्) विपदो नैव विपदः सम्पदो नैव सम्पदः। विपद्विस्मरणं विष्णो: सम्पनारायणस्मृतिः ॥६॥ मधुमर्दि महन्मञ्जु मन्यु मतिमतामहम् । मन्येऽमलमदोऽमन्दमहिम झ्यामलं महः ॥६॥ (पाण्डेयरामनारायणदत्तशामिणः) नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचौर कथितः पृथिच्याम् । अनेकजन्मार्जितपापमयं हरत्यशेपं मरतां सदैय ॥६॥ हनाध! एक बार भी जो आपकी शरण में आकर मैं तुम्हारा ऐसा कह कर याचना करता है यह अपनी प्रतिज्ञाको सदा स्मरण रखनेयाले आपका कृपापात्र मन जाता है, परन्तु क्या आपको यह प्रतिशा एकमात्र मुझको ही छोहपर प्रवृत्त होती है !॥६१॥ विपत्ति सघी विपत्ति नहीं १ और सम्पत्ति भी सची सम्पत्ति नहीं है, अपि तु विष्णुका विस्मरण ही विपत्ति है और नारायणका स्मरण ही सम्पत्ति १ ॥६२।। मतिमान् महात्माओंके पन्दनीय, मधुदैत्यका मदन करनेवाले, महनीय मनोहर और उलट महिमाशाली निर्मन श्यामल तेको हो में अपना आराध्य देष मानता हूँ ॥६३ ॥ मनुष्यों में नारायण नामका एक पुरविशेष है, जो ससार में मामद चोर कहा जाता है, क्योंकि वह म्मरण करते ही अनेको जन्मों की समायी हु सभी पापराशियो सहार बाभासदारस्कार... • पानीमायाम् की. ४ इस प्राव निभायो। सभामटे यो देश मम (n..

सूक्तिसुधाकर मेषश्यामं पीतकोशेयवासं श्रीवत्सा कौस्तुमोद्भासिताङ्गम् । पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णु चन्द सर्वलोकैकनाथम् ॥६५% स्वकर्मफलनिर्दिष्टां यां यां योनि प्रजाम्यहम् । तस्यां तस्यां हषीकेश त्वयि भक्तिद्वास्तु मे ॥६६|| आर्ता विषण्णाः शिथिलावभीताघोरेषु व्याघ्रादिपु वर्तमानाः! सङ्कीर्य नारायणशब्दमा विमुक्तदुःखा:सुखिनो भवन्ति६७४ अहं तु नारायणदासदासदासस्स दासस च दासदासः। अन्येभ्य ईशो जगतो नराणामसादहं चान्यतरोसिलोके ६८* ये ये हताचक्रधरेण राजवैलोक्यनाथेन बनार्दनेन । ते तेगता विष्णुपुरी प्रयाताः क्रोधोऽपि देवस वरेण तुल्यः ६९* मजन्मनः फलमिदं मधुकैटभारे मत्प्रार्थनीयमदनुग्रह एप एव । जाता है ॥ ६४॥ नवीन मेधके समान श्यामसुन्दर रेशमी पीताम्बरधारी, श्रीयत्सचिह्नाङ्कित, कौस्तुभमणिसे देदीप्यमान अगोवाले, पुण्यात्मा कमलनयन और सम्पूर्ण लोकोके एकमात्र स्वामी श्रीविष्णुभगयानको प्रणाम करता हूँ ॥६५॥ हे इन्द्रियोंके सूत्रधार! अपने कर्मों के अनुसार होनेवाली जिन-जिन योनियों में मैं जाऊँहर एकमे तुमसे मेरा अटूट प्रेम बना रहे ॥६६॥ घबराये हुए, विषादयुक्त, दीले पड़े हुए, मयभीत हुए, भयङ्कर वाघ आदिके चङ्गुलमें फंसे हुए मनुष्य भी 'नारायण' नाममात्रका उच्चारण करते हो दुःख- से छूरकर मुसी हो जाते हैं ।। ६७ ॥ मैं तो नारायण दासके दासका अनुदास और उसके भी दासानुदासका दास हूँ, मानय जगत्के राजालोग दूसरों के लिये हैं, इसलिये संसारमें उनसे मैं अलग ही रहनेयाला १६८॥ हे राजन् ! त्रैलोक्यपति चक्रधारी जनार्दनके द्वारा जो लोग मारे गये वे सभी विष्णुलोकको चले गये। इस देवका क्रोध भी बाकी तरह ही मल्याणप्रद है ॥६५॥ हे माधर!हे लोकनाथ मेरे जन्मका यही फल है, मेरी * श्रीगण्डवगीतायाम् सो०५, १०, १९, २०, २१ धीविष्णुसूक्ति २९ -*-*-*-*-*- स्वभृत्यभृत्यपरिचारकमृत्यमृत्य- मृत्यस्य भृत्य इति मां सर लोकनाथ ||७||* यझेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव । कृष्ण विष्णो हपीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥७॥ तत्रैव गङ्गा यमुना च वेणी गोदावरी सिन्धुसरस्वती च । सर्वाणि तीर्थानि वसन्ति तत्र यत्राच्युतोदारकथाप्रसङ्गः।।७२||* नाथ योनिसहस्रेषु येषु येषु प्रजाम्यहम् । तेषु तेषचला भक्तिरच्युतास्तु सदा त्वयि ॥७३||* या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी। त्यामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु ॥७४|| नित्योत्सवस्तदा तेषां नित्यश्रीनित्यमङ्गलम् । येपां हृदिस्थो भगवान्मङ्गलायतनं हरिः॥७५||* प्रार्थनासे मुझपर होनेवाली दया भी यही है कि, आप मुझे अपन भृत्यका भृत्य, उसके सेयकका सेयक और उसके दासका दासानुदासरूप. से याद रखें ॥ ७० ॥ हे यज्ञोंके स्वामी ! अन्युत, गोविन्द, माधव, अनन्त, केशव, कृष्ण, विष्णु, हुपीकेश! तुम्हें नमस्कार है ।। १ ।। गङ्गा, यमुना, त्रिवेणी, गोदावरी, सिन्धु, सरस्वती और अन्य सभी तीर्थ वहीं निवास करते हैं, जहाँ भगवान्की उदार कथा होती रहती है || ७२ ।। हे नाथ ! जिन-जिन हजारों योनियों में जाऊँ हर एकमे तुम्हारी अचल भक्ति मुझे प्राप्त हो ॥ ७३ ।। मूद लोगोंकी जिस प्रकार विषयों में नित्य प्रोति बनी रहती है, उसी प्रकार तुम्हारा बारंबार स्मरण करते हुए मेरे हृदयमें भी यही प्रीति हो ।। ७४ ।। जसे जिनके हृदयमें मङ्गलधाम हरि बसने लगते हैं, तभीसे उनके लिये नित्य उत्सव, नित्य लक्ष्मी और नित्य मङ्गल है।।७५॥ • श्रीपाण्डवगीतायाम् . २४, २९(वि. पु.।।१३),३८, ४१-२(विष्णुपु. १।२०।१५-१.४ ७ स्क्तिमुधाकर नमामि नारायणपादपङ्कजं करोमि नारायणपूजनं सदा । पदामि नारायणनामनिमलं मरामि नारायणतत्त्वमव्ययम्०६४ नारायणेति मन्त्रोऽस्ति यागस्ति यशवर्तिनी। तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम् ।।७७॥* आलोच्य सर्वशास्त्राणि विचार्य पुनः पुनः । इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥७८॥* आकाशात्सतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् । सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति ॥७९॥* (६४ संख्यात आरभ्य ७९ संख्यापर्यन्तं श्रीपाण्डवगीतायाम् ) श्रीवल्लभेति चरदेति दयापरेवि भक्तप्रियेति मवलुण्ठनकोविदेति । नाथेति नागशयनेति जगन्निवासे- त्यालापिनं प्रतिदिनं कुरु मा मुकुन्द ।।८०॥ (मुकुन्दमालायाम् श्लो. २) मैं नारायणके चरणारविन्दोका नमस्कार करता हूँ, नारायणहीकी नित्य पूजा करता हूँ, नारायणके निर्मल नामका उच्चारण करता हूँ और नारायणके अव्यय तत्यका स्मरण करता हूँ ॥ ७६ ॥ नारायणरूप मन्त्र और वाणीके स्वयश रहते हुए भी, लोग नरकमें गिरते हैं-- यह बड़ा आश्चर्य है ! ॥ ७७ ॥ सभी शास्त्रोका मन्थन करके, तदनुसार वारंवार विचार करके, यही सार निकला है कि--सदेव नारायण- होकर ध्यान करना चाहिये । ७८ ॥ जैसे आकारासे गिरा हुआ शल अन्तमें समुद्र में ही जा मिलता है, उसी प्रकार सभी देवों के प्रति किया हुआ नमस्कार भगवान् केशव के ही पास जा पहुँचता है ॥७९॥ हे मुकुन्द ! मुझे ऐसा बनाइये कि मैं-हे रमानाथ ! हे वरदाता ! दयापरायण, भक्त- प्रेमी, आवागमनको छुड़ाने में चतुर, नाथ, दोपशायी, जगदाधार ! इस • श्रीगण्डवगीनाथाम् शो ५०,६३, ७३ (नरसिंहपु. ६४१७७),८.

श्रीविष्णुमूक्ति नाहं चन्द तव चरणपोईन्द्रमद्वन्द्वहेतोः कुम्भीपाकं गुरुमपि हरे नारकं नापनेतुम् । रम्या रामा मृदुतनुलता नन्दने नापि रन्तुं भावे भावे हृदयमवने भावयेयं भवन्तम् ॥८॥ नास्था धर्मेन यसुनिचये नैच कामोपभोगे यद्यद्भव्यं भवतु भगवन्पूर्वकर्मानुरूपम् । एतत्याध्यं मम बहु मतं जन्मजन्मान्तरेऽपि स्वत्पादाम्भोरुहयुगगना निश्चलाभक्तिरस्तु ।।८।। दिवि या भुविधा ममास्तु वासो नरकेचा नरकान्तक प्रकामम् । अवधीरितशारदारविन्दी चरणी ते भरणेऽपिचिन्तयामि।८३|| भवजलधिमगाधं दुस्तरं निस्तरेयं कथमहमिति चेतोमा स्मगाः कातरत्वम् । प्रकार निरन्तर योरता रहूँ ॥ ८॥ हे हरे ! मैं आपके चरणयुगलमे इसलिये नमस्कार नहीं करता हूँ कि मेरे द्वन्द नीलोपादि) नाम हो, कुम्भीपाकादि बड़े-बड़े नरवोंगे श्चा रहे, और नन्दनयनमें कोमलाही अप्सराओके साथ रमण करूँ: अपितु इसपिरे कि में सदा हाय मन्दिरमें आपकी ही भावना परता रहूँ ॥ ८१ ॥ हे भगवन् ! मैं धर्म, धन-संप्रद और कामभोगको आगा नही रसता, पूर्व कर्मानुसार जो कुछ होना हो सो हो जाय, पर मेरी पही पार-बार प्रार्थना है कि जन्म-जन्मान्तरों में भी आपके चरणारविन्द-युगदमें मेरी निश्चल भक्ति यनी रहे ।। ८२ ॥ है नरपनाशक ! मैं मग, पृषी या नरकमें ही सो न रहूँ, गिरनारीन कमरको तिरपत परयात आरके चरण-युगलको मरते समय भी याद करता रहूँ ॥ ८३॥ मन ! म अयाद और दुसर मयसागरोसे पार बा !- चिन्तामे पातर मनो। tीमाथाम् को ६, ७, ८ ३२ मूक्तिमुधाकर सरसिजशि देवे तावको भक्तिरेका नरकमिदि निपण्णा तारयिष्यत्यवश्यम् || कृष्णातोये मदनपवनोदधृतमोहोर्मिमाले दारावर्ते तनपसहजग्राहसवाकुले च। संसाराख्ये महति जलधामअतां नखिधामन् पादाम्भोजे वरद भवतो भक्तिमा प्रदेहि।।८५|| पृथ्वीरेणुरणुः पयांसि कणिकाः फल्गुः स्फुलिङ्गो लघु- स्तेजो निश्वसनं मरुत्तनुतरं रन्ध्र सुसूक्ष्म नमः । क्षुद्रा रुद्रपितामहप्रभृतयः कीटाः समस्ताः सुरा दृष्टा यन स तापको विजयते श्रीपादधुलीकणः ॥८६॥t आम्नायाभ्यसनान्यरण्यरुदितं वेदवतान्याहं मेदश्छेदफलानि पूर्तविधयः सर्व हुतं भस्मनि । क्योंकि कमललोचन देवमे जो तुम्हारी ऐकान्तिकी भक्ति बनी हुई है वह नुम्हें अवश्य ही पार पहुंचावेगी 11 ८४ ॥ हे सर्वव्यापी ! हे वरदाता ! तृष्णारूपी जल, कामरूपी आँधीसे उठी हुई मोहमयी सरङ्गमाला, स्त्रीरूप मॅचर और भाई-पुत्ररूपी माहोंसे भरे हुए इस संसाररूपी महान् समुद्रमें डूबते हुए हमलोगोंको अपने चरणारविन्दकी भक्ति दीजिये ।। ८५ ॥ जिसमें सारी पृष्यी परमाणुरूप, जर छीटेके समान, तेज तुच्छ चिनगारीके सदृश, वायु मन्द निवासमात्र, आकाश क्षुद्र सुरासके सहश और शिव-ब्रह्मादि देवता तुच्छ कीड़े के समान दीख पड़ते हैं, ऐसे आपके श्रीचरण-रेणुके कणकी बलिहारी है ।। ८६ | जिस भगवानके चरण-युगलोंका स्मरण किये बिना वेदाभ्यास अरण्यरोदन, व्रत शरीर- शोषणमात्र, कर्मकाण्ड भस्ममें दी हुई आहुतिके समान और श्रीमुकुन्दमालायाम् को १७, १८, १९ 4 ® श्रीविष्णुसूक्ति तीर्थानामवगाहनानि च गजलानं विना यत्पद- द्वन्द्वाम्भोरुहसंस्मृति विजयते देवः स नारायणः ॥८॥ भवजलधिगतानां द्वन्द्ववाताहतानां सुतदुहितकलत्रत्राणभारार्दितानाम् । विषमविपयतोये मतामश्वानां भवतु शरणमेको विष्णुपोतो नराणाम् IIcart आनन्द गोविन्द मुकुन्द राम नारायणानन्त निरामयेति । वक्तुं समर्थोऽपिनयक्ति कविदहोजनानां व्यसनानिमोक्षे८९॥ क्षीरसागरतरासीकरासारतारक्तिचारुमूर्तये भोगिमोगशयनीयशायिने माधवाय मधुविद्विपे नमः ॥१०॥ तीर्थस्नान गजस्तान के समान ही निरर्थक रह जाते हैं, ऐसे नारायणदेयकी चलिहारी ॥ ८ ॥ जो संसारसागरमें गिरे हुए हैं, [मुख-दुःखादि] दरूपी घायुसे आहत हो रहे हैं, पुत्र, पुत्रो, श्री आदिके पालन- पोषणके मारसे मात हैं और विषयरूपो विषम जनराशि शिना नौका हर उन पुरुषों के लिये एकमात्र जहाजरूप मगवान् विष्ण रण हो । ८८॥ आभयर कि लोगोंको मोडकी और जाने याधाएँ उपस्थित होती है, जो कि योगने में समय होनेपर मी कोई आनन्द,गोविन्द, मनुद, गम, नारायण, अनन्त, निरामय-इस प्रकार नही पुकारते ॥८॥ क्षीरमागरकी तरहोंके हीटी की पांसे जिनकी श्यामल मूर्ति ताराभोंसे भारत हु-मो भायन्त सुन्दर प्रतीत होती है तथा जोपना शरीररूपी पार पनपते २, उन मापन भगवान् +श्रीमान सिनामामालासा..., ३४ ॐ सूक्तिमुधाकर 4 प्रमो वेङ्कटेश प्रमाभूयसी ते तमः संछिननिप्रदेशे शेपे । अहो मे हदद्रेणुहागूढमन्धन्तमो नैति नाशं किमेतन्निदानम्।९।। (स्वामिनोऽनन्ताचार्यस्स वेङ्कटेशवमानोत्रात्) कदा शृङ्गः स्फीते मुनिगणपरीते हिमनगे दुमावीते शीते सुरमधुरगीत प्रतिवसन् । क्वचिद्धयानासको विषयसुविविक्तो भवहर स्मरस्ते पादानं जनिहर समेध्यामि रिलयम् ॥१२॥ (स्वामिब्रह्मानन्दस्य विष्णुमहिम्नः मनोत्रात्) यनामकीर्तनपरः श्वपचोऽपि नूनं हित्वाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति । दग्ध्वा ममाघमखिलं करुणेक्षणेन दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ।।१३।। (स्वामिब्रह्मानन्दस्य दीनभवष्टकस्तोत्रार) माधवको नमस्कार हो । ९० ॥ हे वेङ्कटेश्वर स्वामिन् ! आपको प्रचुर मात्रामे फैली हुई प्रभा सारे संसारके अन्धकारका नाश करती है; किन्तु आश्चर्य है कि मेरे हृदयाचलकी गुहामे छिपा हुआ अन्धकार नष्ट नहीं होता है, इसका क्या कारण है ? ॥ ११॥ हे संसारतापहारिन् ! हे पुनर्जन्मसे छुड़ानेवाले ! [ ऊँची-ऊँची] चोटियोंसे बड़े प्रतीत होनेवाले, वृक्षोसे घिरे हुए, देषोंके मधुर संगीतसे सुशोभित और मुनिगणोंसे सेवित उपदे हिमालयमें निवास करता हुआ कहीं विषयोंसे विरक्त और ध्यानमें मग्न होकर, आपके चरणारविन्दोंका स्मरण करता हुआ मैं तन्मय हो जाऊँगा!॥९॥ जिनके नाम-कीर्तनमें तत्पर चाण्डाल मी अपने समन कलिमल का नाश करके सम्पूर्ण संसारको निश्चय हो पवित्र कर देता है, धे दीनबन्धु हमारे सभी पापोंको अपनी दया-दृष्टि से भस्म करके, मेरी ॐ श्रीविष्णुमक्ति *-* सर्ववेदमयी गीता सर्वधर्ममयो मनुः। सर्वतीर्थमयी गङ्गा मर्वदेवमयो हरिः ॥१४॥ वेदे रामायणे चैव पुराणे मारते तथा । आदी मध्ये तथा चान्ते हरि सर्वत्र गीयते ॥(महामारते १८६६।९३ नेदं नमोमण्डलमम्युराशिनताश्च तारा नवफेनमगा। नापं शशी कुण्डलित फणीन्द्रो नायं कलङ्कः शापितो मुरारि ९६ (चौरकाविरुदणस्य) अरे भज हरेनीम क्षेमधाम क्षणे क्षणे । चहिस्सरति निवासे विश्वास का प्रवर्तते ९७ (गुरुकीमुद्याम्) फदा प्रेमोद्गारः पुलफिततनुः साश्रुनयन: समुचैः प्रीत्या शिथिलहृदयो गद्गदगिरा। अये श्रीमन् विष्णो रघुवर यदत्तंस नृहरे प्रसीदत्यामोश निमिपमिव नेप्यामि दिवसान्॥९॥ आँखों के सामने प्रकट हो ॥ १३ ।। गोता सर्वदेवमयी है, मनुस्मृति सर्वधर्ममयी रे, गज्ञा सर्वतीपमधीरे और भगवान् हरि सर्वदेवमय हैं ॥ १४॥ रामायण, पुराण और महाभारत-न भीके भादि- मप और भन्तमें सर जगह भगवान्हीमा गुणानुवाद ॥ १५ ॥ यह आकाश नहीं, समुहै। ये तारागण नी, समुद्र पेनके कण यह चन्द्रमण्डल नहींकुशलाकार पेठे दोरमी हैं और (चन्द्रविम्बर) ये पथ्ये नही, सोये हुए विष्णु ।। ९६॥ अरे ! उस प्रेम-धाम हरिशा नाम भन, [षण-आण ] रार निकन्टनेवाले भासर का सिशास।।। ९७।। मेमोतारोसे पुफ्तियरी, एजलनयन और प्रेमगे विशिलहर दोकर गहराणीमे, १ श्रीमन् विष्णो! पुपर रे पपंचभूषण ! शिद ! मघ्र हो'-ऐसा उपचार करता हुमा, म भरने दिनोको शो समान र रिताउगा!९८|| गनियुषार सपन्न तापः प्रपतन्तु पर्वतादटन्तु नीयोनि पठन्तु पागमान् ! यजन्तु यागविंवदन्तु पार्दहति विनानैव मृनि तरन्ति (भीमास्य) अमिमानं सुरापानं गौरवं रोग्वं ममम् । प्रतिष्ठा करीविष्ठा प्रयं त्यक्त्या हरि मजेत् ॥१०॥ मंसारसागरं घोरमनन्तं प्लेगमाजनम् । स्वामेय शरणं प्राप्य निस्तरन्ति मनीषिणः (महापुरुषविद्यायाम) न ते रूपन पाकारोनायुधानि नचास्पदम् । तथापि पुरुषाकारो भक्तानां त्वं प्रकागसे (मदापुरुषविद्यायाम) किपाधं पदपङ्कजे समुचितं यत्रोद्भवा जावी किंवाय मुनिपूजिते शिरसि ते मक्कथाहतं साम्प्रतम् । किंपुष्पं त्वयि शोभनं ब्रजपते सत्पारिजाताचिठे किं स्तोत्रं गुणसागर त्वयि हरे केनाचयेत्वां नरः।१०३।। चाहे कोई तप करे, पर्वतोंसे गिरे, तीर्थो भ्रमण करे, शास्त्र पढ़े, यज- यशादि करे अपघा तर्क-वितकोंद्वारा विवाद करे, परन्तु श्रीहरि (की कृपा) के बिना कोई भी मृत्युको नहीं पार कर सकता ।। ९९॥ अमिमान मद्यपानके समान है, गौरव (बड़प्पन ) रोरबनरकके तुल्य है और प्रतिष्ठा (मान-बड़ाई ) सूकर-विष्ठाके सहश है; अतः इन तीनोंको त्यागकर हरिका मजन करे ॥ १०॥ शानीजन आपकी ही शरण लेकर, इस अपार दुःखमय भयङ्कर संसार-सागरसे पार हो जाते हैं ॥ १.१ ।। षस्तुतः आपका कोई रूप, आकार, आयुध और स्थान नहीं है, जो भी भक्तोंके लिये आप पुरुषरूपमे प्रकट होते हैं ।। १०२।। जिन चरणोंसे पुण्यसलिला भागीरपीका उदय हुआ है, उनको पाद्यरूपसे स्या देना उचित है ? जिस आपके मस्तकका मुनिजनोंने पूजन किया है, अब उसपर भक्तिपूर्वक अय किसका दें। और है ब्रजराज ! कल्पतरके सुन्दर पुष्पोंसे पूजित आपको पुष्पाञ्जलि किसकी दें ! तया हे गुणों के सागर हरे!आएका स्तवन भी कैसे करें ? तो फिर फहिये, मनुष्य आपका

श्रीविष्णुसूक्ति
माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः।
बान्धवा विष्णुभक्ताब खदेशो भुवनत्रयम् ॥ (चाणक्यनीतेः)
केचिद् वदन्ति धनहीनजनो जघन्यः
केचिद् वदन्ति गुणहीनजनो जघन्यः ।
व्यासो वदत्यखिलवेदविशेषविज्ञो
नारायणसरणहीनजनो जघन्यः।१०५) (श्रीधरस्य प्रजविहागन )
खमेव माता च पित्तात्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्व मम देवदेव॥१०६॥
(पाण्डवगीतायाम् २८)
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुमाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिमिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकनाथम् ।।१०७॥
पूजन किस प्रकार करे ! || १०३।। मेरी माता श्रीलक्ष्मीजी है, रिता
विष्णु भगवान् है, बन्धुबन भगवदक है और सपूर्ण त्रिभुवन मेगा
स्वदेश २॥ १०४५ोई सो धनहीन मनुपको नीच कहते हैं और
बोई गुणरीनको नीच एताते : किनु सम्पूर्ण पेदोंके विशेष हाता
श्रीवेदापासली सो हरिम्मरणीन गुरुपको नीच कहते है ॥ १० ॥
हे देवदेव ! तुम ही मेरी माता हो, म ही तिा हो, दुमही बन्धु हो,
नम हो सका हो, तुम ही विधा हो, नुम हो पनरो भोर तुम ही मेरे
सर्वस्वो ॥ १०६ ।। सर्वपकोंके एकमात्र स्वामी भषमयहारी
भगवान् विष्णुपी दना करता हूँ जो तस्वरूप शेरचायी है।
अमरनाम भोर मुरेश्वर विपके पार, आकारके समान निप
मेपण भोर मुन्दर शरीराले तपाओसरमोगी आनन्द
र मननयन और योगिरा पानसम्म ॥१.७॥

9 सूकिसुधाकर ७ k- सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्खं सरसीरुहेक्षणम् । सहारपक्षास्थलकौस्तुमश्रियं नमामि विष्णु शिरसा चतुर्भुजम् ।। जले विष्णुः स्थले विष्णुर्विष्णुः पर्वतमस्तके । ज्वालामालाकुले विष्णुः सर्व विष्णुमयं जगत् ॥१०९।। (ब्रह्माण्डपुराणे विष्णुपन्चरस्तोत्रात्) यं ब्रह्मावरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै- वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय वस्मै नमः ॥११॥ कैचित्स्वदेहान्तईदयावकाशे प्रादेशमात्रं पुरुष वसन्तम् । चतुर्भुजंकअरथाङ्गशङ्खगदाघरं धारणया सरन्ति ॥११॥ उन चतुर्भुज भगवान् विष्णुको मैं शिरसे प्रणाम करता हूँ, जो शल-चक्र धारण किये हैं, किरीट और कुण्डलोंसे विभूषित है। पीताम्बर ओढ़े हुए हैं, सुन्दर कमल-से जिनके नेत्र हैं और जिनके पापलमें वनमाला- सहित कौरखममणिकी अनूठी शोमा है ॥ १०८ ॥ जनमें, सलमें, पर्वतशिरोम और ज्यालामालाओं में सर्वत्र विष्णु विराजमान हैं, समस्त जगत् विष्णुमय है ॥ १०॥ प्रहा, यरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्रण मिनका दिव्य मोरोसे मवन करते है, सामगान करनेवाले लोग भद्र, पद, कम और उपनिषदोंके सहित वेदों से जिनका गान करते हैं। म्यानमम एवं सलीनचित्तौ योगी जिनका साक्षात्कार करते है और जिना पार पुर और असुर कोई भी नहीं पाते उन भगवान्को नमस्कार है।॥ ११॥कोई-कोई अपने देहके भीतर विचाकासमें विराजमान मादेशमार (रितामर) पग पुगो, जो पहा घा, गा और - धारण किये हुए हैं, पारणातारा म्मरण करते हैं ।। १११॥ पानाम-भाग- ११५ श्रीविष्णुसूक्ति प्रसन्नवक्त्रं नलिनायतेक्षणं कदम्पकिञ्जल्कपिशङ्गकाससम् । लसन्महारत्न हिरण्मयागदं स्फुरन्महारनकिरीटकुण्डलम्११२१ उन्निद्रहत्पङ्कजकर्णिकालये योगेश्वरस्थापितपादपल्लवम् । श्रीलक्ष्मणं कौस्तुभरनकन्धरमम्लानलस्म्या वनमालयाश्चितम् विभूषितं मेखलयाङ्गुलीयकर्महाधनैर्नु पुरकङ्कणादिमिः ! स्निग्धामलाकुश्चितनीलकुन्तलैर्विरोचमानाननहासपेशलम् । अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्मभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् । ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयावतिष्ठते११५॥ प्रसादाभिमुखं शश्वत्प्रसन्नवदनेक्षणम् । सुनासं सुभ्यं चारुकपोलं सुरसुन्दरम् ।।११६|| जो प्रसन्नवदन हैं, कमल के समान विशाललोचन हैं, कदम्ब केसरके सदृश पीताम्बर ओढ़े हुए हैं, जिनके रनखचित स्वर्णमय भुजबन्द सुशोभित हैं तथा बहुमूल्य रत्नमय किरीट और कुण्डल देदीप्यमान हो रहे है, जिनके चरण कमलोंको योगीश्वरोंने अपने हृदयरूप खिले हुए कमल- कोपमें स्थापित कर रखा है, जो श्रीवत्सचिहको धारण किये रहते हैं, कौस्तुभमणिसे जिनकी ग्रीवा मुशोमित हो रही है और जो अभन्द बान्तिमयी धनमालासे सुशोभित होते हैं।। ११२-११३ ॥ जी मेखला अङ्गुलीय (अँगूठी), महामूल्प नूपुर और कङ्कणादिसे विभूषित हैं. अत्यन्त चिकने, स्वच्छ, सुंघराले, काले काले बालोंसे जिनको माग मुसकानयुत मधुर मुख शोभा पा रहा है ॥ ११४ ॥ उदार लीलामर्य मुसकान और चितवनके द्वारा उसित भ्रमझीसे जिनका मार अनुग्रह भूचित हो रहा है, ऐसे ध्यानमय प्रभुको तबतक देखते रहन चाहिये, जबतक पारणाके द्वारा चिच स्थिर न हो।। ११५ ।। जो सद कृपा करनेको उद्यत रहते हैं, प्रससमुख और प्रसननयन है जिनकी नासिका, भौंहें और कपोल अतिसुन्दर और समस्त देवताओं +(माग. ३।२।१,१०,११,१२) (भाग. ४141४५) " निगुमार सम्म गमगीयाङ्गमम्मोसगाधरम् । प्रणतागण नृम्णं गाणं करणार्णनम् ॥१.१७110 श्रीवरगाझं मनम्मामं पुरुष पनमालिनम् । शागकगदापरमिगतनानम् 121011 किरीटिनं कुण्डतिनं कदरवनमालिनम् । की'तुमामरणग्रीवं पीतकांगेपवासमम् ।।११९|| फागोकलापपर्यस्नं लमत्काशनपुरम् । दर्शनीयतमं गान्तं मनोनयनपर्धनम् ॥१२०१३ पदम्पो नग्पमणियारिलमदम्यां समर्थताम् । हत्याकर्णिकाधिष्ण्यमाक्रम्यात्मन्यबस्थिनम्।।१२१॥ मयमानमभिप्यायरसानुरागावलोकनम् । नियतेनकभूतेन मनमा मनमा घरदपमम् ॥१२२ को मनोहर है ॥ ११६ ॥ जो तरुण, कमनीषकलेवर , जिनके ओष्ठ, अपर और नत्र अरण, जो शीश झुकानेवालों को आश्रय देनेवाले है, मनुष्यों के शरणदाता और करुणाके सागर ।। ११७ ।। जिनके पास में भीवत्सनिक है, जो धनस्याम है, परमपुरुष है। चनमालाधारी है, शर, चक्र, गदा और पप्रयुक्त जिनकी चार भुजाएँ हैं ॥ ११८॥ जिन्होंने किरीट, कुण्डल, केयूर, बनमाला, गलेमें कौस्तुम- मणिरूप आभूषण तथा रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा है ॥ ११९ ।। जो काञ्चीकलाप ( करधनी ) से परिवेष्टित हैं और जिनके सुवर्णमय नूपुर सुशोमित हैं तथा जो अतिशय दर्शनीय, शान्त, मनोरम एवं नयनानन्दः वधन हैं।। १२० ॥ जो नखरूप मणिमालासे शोभायमान चरणोदारा अपनी पूजा करनेवाले भक्तोंके हृदय-पुण्डरीकके स्थानको आकान्त- कर उनके विनमें विराजमान हैं।१२१ । उन अनुराग भरी दृष्टिवाले, हँसमुख, वरदायक भगवान्का संयमपूर्वक एकाप्रचित्तसे ध्यान *(भाग. ४८४६,४७,४८,४९,५०,५१) .

ध्यानयोगी ध्रुव

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श्रीविष्णुसूक्ति महामरकतश्याम श्रीमद्वदनपङ्कजम् । कम्युग्रीवं महोरस्कं सुनासं सुन्दरभ्रुवम् ॥१२३॥ श्वासैजदलकाभातं कम्युश्रीकर्णदाडिमम् । विद्रुमाघरभासेपच्छोणायितसुधासितम् ॥१२४॥ई. पद्मगर्भारुणापाङ्गं हृद्यहासावलोकनम् । वासजद्रलिसंविग्ननिम्ननाभिदलोदरम् ॥१२५॥ चाङ्गुलिम्यां पाणिभ्यामुन्नीय चरणाम्बुजम् । मुखे निधाय विप्रेन्द्रोधयन्तं वीक्ष्यविलितः॥१२६॥ भगवान् सर्वभूतेषु लक्षितः खात्मना हरिः। दृश्यैर्बुद्धयादिभिर्द्रष्टा लक्षणैरनुमापकैः ॥१२॥ ।। १२२ ।। जो महान् मरकतमणिके समान श्यामवर्ण हैं, जिनका लके समान मुख शोभायमान है, जिनकी ग्रीवा शङ्खके समान, स्थल विशाल और नासिका तथा मौहैं सुन्दर हैं । जो वायुसे हिलती अलोंसे सुशोभित हैं, जिनके शङ्खसदृश कानोमें दाडिमके फूल हैं, के समान अरुण अधरोंकी कान्तिसे जिनकी सुधामयी मुसकान कुछ लिमा-सी लिये हुए है ।।१२३-१२४!! कमलके भीतरी भागके समान अरुण नके नेत्रोंके कोने हैं, जिनके हास्य और अवलोकन अति हृदयहारी है र श्वास लेते समय जिनका त्रिवलीयुक्त तथा नीची नाभिवाला उदरदेश पायमान हो रहा है ॥ १२५ ॥ ऐसे बालरूप भगवानको सुन्दर हुलियौवाले दोनों हार्थोसे अपने चरणकमलको खीचकर, मुखम र पीते हुए देखकर द्विजवर मार्कण्डेयको रड़ा आश्चर्य हुआ। १२६॥ -- शifa ४२ *-*-*-*- क्तिसुधाकर तमात्सर्यात्मना राजन्हरिः सर्वत्र सर्वदा। श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च सर्तव्यो भगवान्नृणाम् ॥ १२८॥ * यत्कीर्तनं यत्सरणं यदीक्षणं यद्वन्दनं यच्छ्षणं यदहणम् । लोकस्य सयो विधुनोति कल्मयंतस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः१२९* तपस्विनोदानपरा यशखिनो मनखिनोमन्त्रविदः सुमङ्गलाः। क्षेमंन विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमोनमः१३०* किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुलकसाआभीरकका यवनाःखशादयः। येऽन्ये च पापायदुपाश्रयाश्रयाः शुभ्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ग्राहग्रस्ते गजेन्द्रे रुदति सरमस तार्क्ष्यमारुह्य धावन् व्याघूर्णन् माल्यभूपावसनपरिकरो मेघगम्भीरघोपः । अतः हे राजन्! भगवान् हरि मनुष्यों के द्वारा सर्वथा सर्वत्र सर्वदा श्रवणीय, कीर्तनीय और स्मरणीय है ।। १२८ ॥ उस कल्याणकीर्ति भगवान्को नमस्कार है, जिनका कीर्तन, स्मरण, दर्शन, चन्दन, भवण और पूजन लोकके उरकट पापोंका भी धीय यंस कर देता है ॥१२९॥ जिनको अर्पण किये बिना मझलमय तरस्यो, दानी, यसखी, मनस्वी और मन्त्रवेसा किसी मुसको नहीं पास कर सकते, उन कल्याणकीर्ति मगवान्को नमस्कार है।॥ १३० 11 किरात, हण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुस्कस, आमीर, कहा पवन और लश तथा अन्य पापीजन मी जिनके आभयमे शुभ हो जाते हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।। १३१॥ प्राइसे र होकर गजेन्द्र के रोनेपर हायोंमें घर पर तलवार, अमय, बाम, लाप, माल और कौमोदकी गदा धारण करके मेधकोसी गम्भीर गर्जना करते हुए जो गहएर पदर प्रतासे दौर पहेभीर उस समय जतायाटीके (भाग १।।१४।१५,१.१८) . - श्रीविष्णुसूक्ति आवित्राणो रथाङ्गं शरमसिमभयं शङ्खधापी सखेटौ हस्तैः कौमोदकीमप्यवतु हरिरसावंहसां संहतेनः ॥१३२।। मकाक्रान्ते करीन्द्रे मुकुलितनयने मूलमूलेति खिने नाहं नाहं न चाहं न च भवति पुनर्मादृशस्त्वादृशेषु । इत्येवं त्यक्तहस्ते सपदि सुरगणे भावशून्ये समस्ते मूलं यत्प्रादुरासीत्स दिशतु भगवान मङ्गलं सन्ततं नः ॥१३॥ शैचाः समुपासते शिव इति ब्रोति चेदान्तिनो औद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटयः कति नैयायिकाः । अर्हन्नित्यय जैनशासनरताः कर्मेति मीमांसकाः सोऽयं नो विदधातु वाञ्छितफलं त्रैलोक्यनाथो हरिः॥१३४॥ (हनुमन्नाटकात्) यत्र निर्लिप्तभावेन संसारे वर्तते गृही। धर्म चरति निष्काम तत्रैव रमते हरिः॥१३५।। (ताशकुमारस्य कारण जिनके हार, भूषण, कमरबन्द आदि तितर-बितर हो गये थे, भगवान् विष्णु हमारी पापसमूहसे रक्षा करें ।। १३२॥ जब गजेन्द्र ग्राहो द्वारा आक्रान्त हो आँखें मीचकर दुखी हो 'विश्वके मूलाधार : [ मेरी रक्षा करो इस प्रकार पुकारने लगा, उस समय 'तुम्हारे जैसे महाविपन्नोंकी रक्षा करनेको मैं नहीं! मैं भी नहीं !! और मैं म नहीं समर्थ हूँ' ऐसा कहकर सहसा सब देवता हाथ छुड़ाकर मावशून्य हो गये तब जो सर्वमूलाधार प्रकट हुआ वह हाँ- हमारा निरन्तर मङ्गल करे ।। १३३ ।। शैव जिप्सकी शिवरूप उपासना करते हैं, वेदान्ती अक्षरूपसे, बौद्ध युद्धरूपसे ओ प्रमाण-कुशल नैयायिक जिसको का मानकर पूजते हैं, जैन जि अईत और मीमांसक फर्म बतलाते हैं, वह त्रैलोक्याधिपति भगवा- तुमको धाछित फल प्रदान करे ।। १३४ ॥ जहाँ ग्रहस्थ पुरुष संसार निर्लिप्तभाषसे रहता हुआ धर्माचरण करता है, वहीं श्रीहरि विह

गिराधाकर
कि गोकर वीक्ष्य हाहाकारसमाहुलम् ।
गोमन रे तमाहिष्णो परमं पदम् १३६ (ताराकुमार
पो जन्पा शिल्पं गतमपि मुद्रारिनना
तिः प्रादशिश्यक्रमणमदनान्याहुनविधिः ।
णाम: गंगा मफलमिदमारमार्पणविधी
पर्यापापमय भवतु यन्म पिलगितम् ॥ (भीमरानायल)
(भीलदमीमस्तिः)
श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मालपत्य
रस्त्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणाश्रयाये ।
शक्त्यै नमोस्तु शतपत्रनिकेतनाये
पुष्टय नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥१३८||
(स्या. शङ्करामायंस्य कनकधारास्तवात् )
करते है ।। १३५ ।। हे चित्त ! इस लोकको शोकसन्तत और हाहाकारसे
व्याकुल देखकर, भगवान विष्णुके उस छोकहीन परमपदको मज ।। १३६ ।।
हे भगवन् ! मेरा बोलना आपका जप हो, सब प्रकारको शिल्प (मायकी
कारीगरी) मुद्रा रचना हो, चलना-फिरना प्रदक्षिणा हो, भोजन करना
हवन किया हो और शयन करना प्रणाम हो इस प्रकार मेरी सभी
चेष्टाएँ आत्मार्पणविधि आपकी पूजारूप ही हों ।। १३७ ।।
ঘয়ামি কম দকী মাইকী পরিকহিলী,
की आभयभूत रतिरूपिणी कमलवासिनी शक्तिरूपिणी और पुरुषोत्तम
विष्णुको प्रियतमा धुधिरूपिणी लक्ष्मीको बारम्बार नमस्कार करता हूँ॥१३८॥

धीलक्ष्मीसूचि मम न भजनमक्तिः पादयोस्ते न रक्ति- ने च विषयविरक्तिर्ध्यानयोगेनशक्तिः । इति मनमि सदाई चिन्तयनायगत रुचिरवधान पुष्परचनं संचिनोमि ।।१३९॥ (स्वामिनः पराचार्यसमगवतीमानसभामाशान्) मरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्धमात्य शोमे । भगवति हरिवल्लभ भनी निस्वनभूतिकरि प्रसीद मसम्(भाग. विष्णुपनी क्षमा देवी माधवी माधवप्रियाम् । विशषियमावों देवों नमाम्पत्युतवल्लभाम् १४१ (भागूमान् ) सर्वमहलमाङ्गल्ये शिवं साधमाधिक। शरण्ये त्र्यम्बके गौरिनारायणि नमोस्तुते (माकंडेयपुराणात) ₹ भादिन । म न भाषा भान, न माग, न भोपाल में मरमपि पावर और पानी की २-नमें पहलीबार में रामपुर बनना पुचोगे होभापती पूजापान॥११॥कम रो जिनो निवामान दिने में मारण ,भपन गया और. मराभिन विगेशन परमेवारी सुन्दरी भगा! मेरेमोरिषीपानी, THREETRelan frotilaenो भी मेरी भामा ११. मग मानानेपानी, मी, मानापोली aresmeri रासायी नेपदी, मोगरा, नारायण- Pati 3A चतुोल्लास (श्रीरामसूक्तिः) सर्वाधिपत्यं समरे गभीरं सत्यं चिदानन्दमयखरूपम् । सत्यं शिवं शान्तिमयं शरण्यं सनातनं राममहं भजामि ॥१॥ (सनत्कुमारसंहितायां रामसपराजस्तोशात् ) चन्द शारदपूर्णचन्द्रवदनं वन्दे कृपाम्भोनिधि वन्दे शम्भुपिनाकरखण्डनकर बन्दै स्वभक्तप्रियम् । वन्दे लक्ष्मणसंयुतं रघुवरं भूपालचूडामणि वन्दे ब्रम परात्परं गुणमयं श्रेयस्करं शायतम् ॥ २॥ (पं० श्री अषस रामगीतगोविन्दात् ) सबके स्वामी, युसकुशल, सचिदानन्दमयरूप, কাগলি, হানিফ, শ্যনৰনাম সরক ॥१॥ जिनका शरत्कालीन चन्द्र के समान मुरा-कमर, जो दया- सागर, शिव भतुषको तोड़नेपाल, भाने ममोंके प्यारे, गमाओं के सिरोमण, परसम्वरूप, महान महान त्रिगुणमय और कल्याण परनेशले : लक्ष्मण के सहित उन सनातन पुरष भीरघुनायकी में सर्यदा सन्य, श्रीरामसूक्ति बने चरामो वसुचाहरामो नदीतरामो न भयंसरामः । इति ध्रुवन्तोऽपि वने किराता मुक्तिं गता रामपदानुषङ्गात् ।।३।। चिदाकारो पाता परमसुखदः पावनतनु- मुनीन्द्रयोगीन्द्रयतिपतिसुरेन्द्र हनुमता सदा सेव्यः पूणों जनकतनथाङ्गः सुरगुरू रमानाथो रामो रमतु मम चित्ते तु सततम् ॥ ४॥ (करमरदासस्य रामचन्द्राष्टकस्तोत्रात ) श्रीरामतोमध्यमतोदि योन धीरोनिशं पश्यतीपराहा। द्वारावती वश्यवशं निरोधीनयोदितीमध्यमतोऽमरा श्री॥५॥ (देवशपण्डितसूर्यस्य रामकृष्णविलोमकाव्यात् ) आसुरं कुलमनादरणीयं चित्तमेतदमलीकरणीयम् । पारम्बार वन्दना करता हूँ ॥२|| वने चरामः (वनमें विचरण करते हैं) घस्वाहरामः (पधिको धनकोनटकर ले आते हैं), नदीं तमः (नदीको तेरकर भाग जाते.), न भयं स्मरामः (हमें किसी भयकी माद भी नहीं रहती) इस प्रकार वनमें बातें करते हुए किरात लोग भी मुखसे बारम्बार रामशब्दका उच्चारण हो जानेसे मुक्तिपदको प्राप्त हो गये ।। ३ ।। बड़े-बड़े मुनियों, योगिराजों, यतिवर्ल, देवेश्वरों और हनुमानजीसे सदा सेव्य, चिरस्वरूप, लोकपालक, परमानन्ददाता, पवित्र शरीरवाले, पूर्णस्वरूप, देवगुरु, जानकीवल्लभ रमापति गम मेरे चित्तौ सदा रमण करें ॥ ४ ॥ जिसने सीतापति रामचन्द्र के और अपने बीच में प्रकरित प्रपद्धको विस्तीन कर दिया है अथवा चित्तको संसारमे हटाकर द्वारिकावासी कृष्णमें निरोष कर दिया है, बदी धार है। क्योकि सीसे मोश-समीकी प्राप्ति होती है ॥५॥ दुष्ट जनोंकी उपेक्षा गनिमुपार. रामधाम शरणीकरणीयं सीतया मजलं तरणीयम् ॥ ६॥ अहो विपि तवराम गेष्टितं मनुप्यमान विमोहितं जगन् । पलमजसं धरणादिवजित सम्पूर्ण आनन्दमयोऽतिमायिक गरपादपहजपरागपवित्रगात्रा भागीरथी माविरभिमुग्णान्पुनाति । माक्षारस एव इग्विषयो यदास्ते किं पर्यते मम पुरातमागधेयम् IIta मारतारे मनुजाकृति हरि रामाभिधेयं रमणीयदेहिनम् । धनुर्धरंपमविशाललोचनं भजामि नित्यं न परान्मजिष्ये ॥९॥ यत्पादपङ्कजरजा श्रुतिमिश्रियं यन्नाभिपङ्कजमाः कमलासनया करनी चाहिये, इस चित्तको निमल करना चाहिये, रामके प्रभावकी शरण लेनी चाहियो इस प्रकार अनायास ही भवसागरको पार करना चाहिये ॥६॥ (अहल्या कहती है Jहे राम! आपकी लीला विचित्र है, संसार आपको मनुष्य समझकर मोहित हो रहा है। आप पूर्ण आनन्दमय और अत्यन्त मायावी है। क्योंकि चरणादिसे रहित होकर भी सदा चलते रहते हैं ।।७।। जिनके चरण कमलोको धूलिसे पवित्र अङ्गवाली गद्गा, शिव-ब्रह्मादिको पवित्र करती है, साक्षात् वही राम मेरी आँखों के सामने उपस्थित हैं, इसलिये मेरे पूर्वसचित सीमाग्यका क्या वर्णन किया जाय ॥८॥ मत्यलोकके अवतारोंमें मनुष्यका रूप धारण करनेवाले, सुन्दर शरीरवाले, धनुषधारी, कमलके समान विशाल नेत्रवाले, राम-नामधारी हरिका ही मैं नित्य भजन करूँगी, दूसरोका नहीं ॥ ९ ॥ श्रुतियोंद्वारा जिनके चरण कमलकी रज ढूंदी जाती है, जिनके नाभि-कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए *(अध्यारमरामायणे १।५ । ४४,४५,४६) श्रीरामसूक्ति यन्नाममाररसिको भगवानपुरारि- स्तं रामचन्द्रमनिय हृदि भावयामि ।। भक्तिमुक्तिविधायिनी भगवतः श्रीरामचन्द्रस हे लोकाः कामदुधाछिपद्मयुगलं मेवध्वमत्युत्सुकाः! नानाजानविशेषमन्त्रवितति त्यक्त्वा सुदूरे भृशं राम न्यामतनु मरारिहदय भान्तं भजध्वं युधाः । तर दामस्स दासानां शतमख्योत्तरस्य वा। दामीत्येनाधिकारोस्ति कुतः माक्षात्तवैव हि । जानन्तु राम तत्र रूपमपदेश- फालाधुपाधिरहितं पनचित्प्रकाशम् সমন্বয় मम गोचरमेतदेव रूपं विमातु इदये न परं विकाझे. गान र मिनक नाम-साय के प्रेमा, उन श्रीरामधाम दम मायना करती ॥१॥ हेागो : भगवान राम की म दनेवाली रविवामधेनु के समान उन परणारविन्द पूर्वक मेदा विहानो नाना प्रसार गान भोर मन्त्रों दामे मगर, महादरमहा प्रमाशित होनेवाले र रामा बसपार मजन को ११ [शाने पहा- मादाम दामोम मरोमी भारी दासका नही माण मारतीचमी मोरा सरनी ! हे राम! भनन म भोर का भारी उपाधि विमानापना TEमी अनासपर में भानाभापा ही गणार •{mat.nt 10.111..।' (0.0.00 सूक्तिसुधाकर त्वत्पादपद्मार्पितचित्तवृत्तिस्त्वन्नामसङ्गीतकथासु वाणी । त्वद्भक्तसेवानिरती करीमे त्वदङ्गसङ्गं लभतां मदङ्गम् ॥१४॥ वन्मूर्तिभक्तान् स्वगुरुं च चक्षुः पश्यत्वजस्रंस भृणोतु कर्णः। त्वजन्मकर्माणि च पादयुग्मंबजत्वजसंतब मन्दिराणि|१५|| अहं भवन्नाम गृणन् कृतार्थो वसामि काश्यामनिशं भवान्या। मुमूर्षमाणस विमुक्तयेऽहं दिशामि मन्त्रं तव रामनाम ||१६|| नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽसदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। भक्ति प्रयन्छ रघुपुद्गव निर्भरां में कामादिदोपरहितं कुरु मानसं च ॥१७॥ ( श्रीतुलसीदास रामचरितमानसे ५१२) हो, मैं औरकी आकाक्षा नहीं करता ॥ १३ ॥ मेरी चित्तवृत्ति आपके चरण-कमलों में लगे, याणी आपके नामसंकीर्तन तथा फया-वार्ता में लगे, हाय आपके मनोगी सेवाम लगे रहें और मेरे अन्न आपके अमाका सन प्राप्त करें ॥१४॥ हे भगवन् ! मेरेर आपके स्वरूप ओर आपके भक्तोंको तथा अपने गुरुदेवको देसा करे, कान आपके जन्म और कर्मकी लीलाओंको सदा मुने तथा पैर सा आपके मन्दिर और तीयों में भ्रमण करें ॥ १५॥ [शिवजी ने कहा--हे राम! ] मैं आपका नाम जाता हुआ यतार्थ होकर, पातीके साथ सर्वदा काशी में निवास करता हूँ और मरते हुए लोगोंको मुक्ति के लिये, आरके राम-नामपीतारक मन्त्रका उपदेश परता रहता हूँ॥१६॥ हे एनाथ ! मेरे हृदयमें दूसरी अभिलाषा नहीं है, में भारी सत्य कर रहा है क्योकि मार मर भन्सारमा सुध! मुझे पूर्ण मनि और मेरे चित्तको काम माहिदोशमेरित कर दें ॥१७॥ (R• . ४१०९१-५५५/) ++ धीरामसूक्ति कोशलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ । जानकीकरसरोजलालितौचिन्तकस भनभृङ्गसङ्गिनौ ।।१८||* ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलमध्यसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरं संशोभितं सर्वदा । संसारामयभेपनं सुमधुरं श्रीजानकीजीयनं धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम् १९% नीलाम्बुजश्यामलकोमला सीतासमारोपितवामभागम् । पाणी महासायकचारुवानमामि रामं रघुवंशनाथम् ॥२०॥ सान्द्रानन्दपयोदसीभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणी पाणशरासनं कटिलसतूणीरभारं वरम् । कारटेन्द्र भगवान् रामचन्द्र के सुन्दर चरणरूपी कमल कोमल ₹, ब्रमा और शिव उनकी वन्दना करते हैं, जानकीजीके कर. कमलों से उनकी सेवा होती है और मौके मनरूपी भौर, उनपर सभाये रहते हैं ॥ १८ ॥ जो प्रक्षरूपी समुद्रसे उत्पन्न हुआ है, कलि- फल्मपका भ्वंस करनेवाला है, अव्यय है, सदा श्रीमहादेवजीके मुन्दर मुराचन्द्रमें मुघोभित है और संसाररुपी रोगको महीपधि है, आयन्त मधुर है, तथा श्रीजानी जी का जीवनाधार है, उस राम-नामरूपी अमृतका जो निरन्तर पान करते हैं, ये मुक्तीजन धन्य ॥ १९ ॥ जिनका नील कमलके समान अतिसुन्दर श्याम सागर है, जिन्होंने वाम भागमें भीसीता. जीको विटा रस्सा है तथा जिनके हाथों में महान् धनुए और सुन्दर वाण १, उन रघुवंशनाय श्रीरामको प्रणाम करता हूँ॥ २०॥ लिम्घ आनन्द- पयोदके सहा जिनका मनोहर बार है, जो मुन्दर २, पीताम्बर धारण किये हुए हैं, जिनके हाथों में धनुर-बाण और कमरमें भुन्दर तरकस .(मीनुसासन रामचरितमानसे) मतिसुधाकर राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन मंगोमितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथि गतं रामामिरामं भने।।२१॥ केकीकण्ठामनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाजचिद्धं शोभाय पीतयवंसरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्। पाणीनारायचापं कपिनिकरयुतं बन्धुनासेव्यमानं नॉमीय जानकीशं रघुबरमनिशं पुष्पकारुढरामम् २२* ध्येयं सदा परिमभमभीष्टदोह तीर्थास्पदं शिवविरश्चिनुतं गरण्यम् । भृत्यातिहं प्रणतपाल मवान्धिपोतं वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम् ||२३|| (भाग० ११।५।३३) मुशोभित है, जिनके कमलके समान विशाल नेत्र हैं, जो जटाजूट धारण किये शोभायमान हैं, सीता और लक्ष्मणके सहित अन्य पथपर चल रहे हैं, उन अति अभिराम रामको भजता हूँ ॥२१॥ मयूरकण्टके समान जिनका नील शरीर है,जो देवेश्वर हैं जिनके स्वास्थलमे विमवर भृगुका चरणचिह्न मुशोभित है, जो शोभाशाली हैं, जिनके पीत वत्र है, कमल-जैसे नेत्र हैं, जो सदा प्रसन्न हैं, जिनके करकमलोंमे धनुष और वाण हैं, जो वानरोंकी सेनासे घिरे हुए और श्रीलक्ष्मणजीसे सेवित हैं। उन परमस्तुत्य पुष्पकारूद,जानकी- नाथ रघुनाथजीको नमस्कार है ॥ २२॥ हे शरणागतरक्षक महापुरुष ! आपके उन चरणारविन्दोको नमस्कार है, जो सदा ध्यान करने के योग्य, अनिष्ट करनेवाले एवं इच्छित फलदायक है, तीयोंके आधारस्वरूप हैं, शिव-ब्रह्मादिसे चन्दित हैं, शरणागतवत्सल हैं, अपने दासोंका दुःख दूर करनेवाले तथा संसारसागरके लिये नौकारूम हैं ॥ २२ ॥ (मोतुलसीदासस्य रामचरितमानसे) ॐ श्रीरामसूक्ति त्यपत्वा सुदुस्त्पजसुपितराज्यलक्ष्मी धर्मिष्ट आर्यवचसा यदगादरण्यम् । मायामृग दयितयेप्सितमन्वधाव- द्वन्द महापुरुष ते चरणारविन्दम् ॥२४॥ (भाग. ११।५। ३४) पेयं पेयं श्रवणपुटकं रामनामाभिराम ध्येयं ध्येयं मनमिसततं तारकं ब्रह्मरूपम्। जल्पअल्पन प्रातिविकृती प्राणिनां कर्णमूले पीच्या वीभ्यामटति जटिलःकोऽपिकाशीनिवासी २५ (स्कन्दपुराणे काशीगण्डे) इदं शरीरंशतसन्धिनाजरं पतत्यवम्यं परिणामि पेचरम्। किमीप लिम्याम मृढ दुर्मते निरामयं रामरमायनं पित्र॥२६॥ पल्याणानां निधानं फलिमलमयनं पारनं पावनानो पाययं यन्मुमुक्षोः मपदि परपदप्राप्तये प्रथिनम् । भगमन महा! मैं पा उन परायोको नमस्कार करता हादुर रस और दराभोवार यानि पिलाती आगामे हार नको ग और प्रिया मासाहारा मिामायामग. पी :॥ २४ ॥ कानीमे मार गम नामका भरण परो और मन गदा म रामान रो, इस पर सारे विमाका प्रक्षे मी पुष वानों ने सी. मार) महोदी की-गली में पारमारा। धोने जा रणामी और कमरमर m, inte!! किन पर पापा नगर रामबासना पास ॥ो आयात ( रामसरनोभीपाननानेवादा २. परमाणात वरती मुरापुरका पर, मुनिसुधाकर विश्रामस्थानमेकं कविवरणचसो कविवरवचसा जीवन सअनानां चीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतो भूतये रामनाम ॥२७॥ अहल्या पापाण: प्रकृतिपशुरासीन् कपिचमू- गुहोऽभूगाण्डालखितयमपि नीतं निजपदम् । अहं चिनाश्मा पशुरपि नवाचादिकरणे क्रियाभिचाण्डालो रघुवर न मामुद्धरसि किम् ।।२८|| नदों तरामो वसुधां हरामो गोभिवरामः सुपथं मरामः । इति ब्रुवन्तः खलु रामनाम मुहुर्मुहुर्मुक्तिपदं प्रयामः ॥२९॥ बामे भागेजनकतनया राजते यस नित्यं भ्रातप्रेमप्रवणहृदयो लक्ष्मणो दक्षिणे च । कवियोंकी याणीका जो एकमात्र विश्रामस्थान और सरपुरुषों जीवनस्वरूप है। ऐसा धर्मवृक्षका बीजरूप राम नाम आपके ऐश्वर्यका सापक हो ।] २७॥ हे राम! अहल्या पाषाण थी, वानरसेना स्वभावसे ही पशु थी और गुह चाण्डाल था. पर आपने इन तीनोंको ही अपने परमधामकी प्राप्ति कराई; मैं भी अपने चित्तसे तो पाषाण हूँ, आपकी पूजा-अर्चा आदि करने में पशु हूँ और अपने कर्मोसे चाण्डाल हूँ, तो भी हे रघुवर! आप मेप उद्धार क्यों नहीं करते? ॥ २८ ॥ (अरण्यवासियोंने कहा-) नदीतरामः (हम नदी पार करते हैं ), वसुधा हरामः (पृथ्वी जोतते हैं ), गोभिश्वराम: (गौओंके साथ चलते हैं), सुपथं सरामः (सुन्दरमार्गसे जाते हैं), इस कार बार-बार राम-नाम लेते हुए हम मुक्तिपदपर पहुंच जाते हैं ।।२९॥ जिनके वाम भागमें नित्य श्रीजानकीजी विराजती है, दाएँ भागमें, जिनका हृदय भ्रातृ-प्रेममें सना हुआ है वे, श्रीलक्ष्मणजी सुशोभित हैं और जिनके +चरपुरिस्वामिनः 'भवभूतेः' इति केचित् । - (रहीमको) श्रीरामसूक्ति *-* पादाम्भोजे पवनतनयः श्रीमुखे बद्धनेत्रः साक्षाद्ब्रह्म प्रणतवरदं रामचन्द्रं भजे तम्॥३०॥* आदी रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं वंदहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम् । पालोनिग्रहणं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनं पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननं चतद्वि रामायणम् ॥३१॥ चा साकते विमलसरयूतीरपुलिने चरन्तं श्रीराम जनकतनयालक्ष्मणयुतम् । अये राम स्वामिनकतनयावहम विभो प्रसीदेत्याक्रोशनिमिपमिव नेष्यामि दिवसान् ॥३२॥ रणकमलों के पास पवनपुत्र श्रीहनुमान्जी भीमसमें एकटक दृष्टि लगाये ए बैट है। उन भूर्तिमान बहामनवरदायक रघुनायककी मैं स्तुति करता ॥ ३. || प्रथम श्रीरामचन्द्रजीका तरोवनादिमें जाना, फिर कनक- अंग मारीचका मारा जाना, तदुपरान्त सीताजीका हरण, जरायुका मरण, मुग्रीवसे चातालाप, बालीका वध, ममुद्रोलाइन, सङ्काका दाह और सबके पश्चात् रावण पुम्भकरणादिवा मारा जाना-बस, इतनी ही रामाषण ३॥ ३१ ॥ साकेनोक ( अपोया ) में सरयूके अति कमनीय क्टपर, भीजानकी और जीवित रहलते हुए भगवान् भीराम्मे हे राम! सामिन् !हे देशीवाद विभो । सन होये-ऐसा करते हुए निमिरको तरह दिनोको फसविताऊँगा ! ॥३२॥ भीपूर्णनाद्रस्यहरमागरमः श्रीमदमिशस रामायणे । मरहेको कोरिणम्', 'कालोनिरस्तम्' ' पीपस्य को यो एपोरगादि रामायणम्' रवि पुलवानरे पारमेशः।

*২# না ।।
* * * * শশানা
* ? ? ? :
কালী নাৰী: মিশাণ।
নাম ন দাদা? গামা ||
নাখারি: খাৰিাগিনাশাপাশি
5াধগণ শা: রুনTTানঃ।
Tাশিমালামালোনিমানিগনি
খায়। * fণখ : 03

श्रीसीतासूक्ति, श्रीहनुमत् सूक्ति বয়লাভূক্তির: ण्यराशिरिख मैथिलप्रभो रामलोचनचकोरचन्द्रिका । पितार्चिरिव रक्षसांसदा जानकी विजयतां यशोधना॥३७॥ (पाण्डेयरामनारायणदत्तशास्त्रिणः) श्रीहनुमतूसू क्तिः सिवा क्षारपयोनिधि क्षणमथो गत्वा श्रियः सनिधी दत्वा राघवमुद्रिकामपशुचं कृत्वा प्रविश्याटवीम् । मकत्वाऽशेषतरुन्निहत्य बहुशो रक्षोगणांस्तत्पुरी इग्वादाय मणि रघूत्तममगाद्वीरो हनूमान्कपिः ॥३८॥* अतुलितबलधाम स्वर्णशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् । सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिवरदूतं वातजातं नमामि ॥३९॥ मिथिलेशके पुण्य-गुञ्ज-सी, श्रीरामचन्द्रजीके लोचन-चकोरोंको आनन्द देनेवाली चन्द्रिका सी और राक्षसोंके लिये जरती हुई आगकी वाला-सो, यशस्विनी जानकोजीकी जय हो ।। ३७ वीर श्रेष्ठ कपिवर हनुमानजी क्षणमात्रमें ही समुद्रको लाँघ,सीताजीके पास पहुँच, उन्हें श्रीरामकी मुद्रिका अर्पण करके दोकहित कर, फिर अशोकवनमें घुसकर सभी वृक्षों को तोड़, बहुतसे राक्षसों को मार, तथा उनकी पुरी लङ्काको जला सीताजीकी चूडामणि ले श्रीरामजीकी सेवामें आ पहुँचे ॥ ३८॥ जो अनुलित बलके आगार, मुमेरुके समान शरीरवाले, दैत्यकुलस्प वन के लिये अग्निके समान, ज्ञानियों में अप्रगण्य, सर्वगुणसम्पस, वानरोंके अधीश्वर और श्रीरघुनाथजीके श्रेष्ठ हैं, उन श्रीपवननन्दनको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३९ ॥ मीजयदेवस्य रामगीतगोविन्दात् । न तुलसीरामस्य ।

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रमित मारnt at anant १२॥
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मार हो जाने बाण मामी ant
रोगाय हो रहे हैं. ओ भादnिt, TRान
दू, मोसको र मेरो उन इमार मात्रा में

छ धानुमान गारगमयकमनं करणारगरपरिनापागम् । जीवनमामागे मलमहिमानमयनामाग्यम् ॥४४॥ वरपेरिणरानिगम मुजदलरिमूलनोरनीदारम् । युगलमनिनादिष्टं रिम्नलिना मेरुमानबार५१० कनीताविः प्रकटीकृत राममनिः । नियमगतीनि:पुरनो मम मातु हनुमनोमुनिः४६० रनिगराप्रधंदानवालामुदाशिकमध्यम्। নানা গনমানুষ ২৩}} पवनगुपनो या पति परमाम्यम् । 'मिनिनितान्मोगान्बयाधीराममत्तिमामयनिक परे गोपि मोर l मेरे मामा. मन(Ruriरर Mentiste Trir are for Trtantra है.rrrrr र GE. Trritr wr rrarat mere rest Emira germ. - ।

पंकगोल्लास परिवरितः एकंगारा देवकीपुत्रगीतमेको देवी देवकीपुत्र पत्र । एकोमन्यन्तस्य नामानि यानि कर्माप्तस देवस्य संवारा लापण्यामृगरन्या मधुरिमलहरीपरीपाकः। फारुण्यानां हृदये कपटकिगोरः परिस्फुरतु ॥२॥ (भीमयानन्दस्य पधारती संग्रहात) श्रयसो कुवलयमक्ष्णोरसनमुरसो महेन्द्रमणिदाम । वृन्दायनरमणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥३॥ मात्र एक गीता ही जिमको कि देवकीनन्दन श्रीकृष्णने गाया। देय भी एक देवकीसुन कृष्ण ही मन्त्र मी बस उनके नाम ही हैं और कर्म मी केल उनकी सेवा ही है ॥१॥ लावण्यमय अमृतकी बादमें माधुर्वकी लहरोंसे प्रकट हुआ मायाकिसोर कृष्ण सकरुण पुरुषोंके हृदयमें प्रकाशमान हो॥२॥ जो वृन्दावन की रमणियोंके कानोंका नील-कमल, आँखोंका अञ्जन, वचःस्थल के लिये इन्द्रनीलमणिका बना हुआ हार एवं समस्त आभूषणरूप है उस भगवान् कृष्णकी बलिहारी है ॥३॥ * (श्रीरामानुजाचार्यस्थ) (कविकर्णपूरस)। ५

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प्रभा नय
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नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः

* प्राप्गनि. गणू गपि कौतुकर्म नन्दनिकेनाइने मयारष्टम् । गोपलियमराजी नयति वेदानमिदान्नः ॥४॥ ঘণধবহুবিদার্থবিােনর গান घणमपिकपया कमान्वयानि । শানিঃ মােগা ननु तर मुग्वमिदं ट्रमेते स्परन्ति ॥५॥ (ोगमा) শাবানুমণাৰ নিধি गगमनलागिरफारिकामसुन्दरम् । पमानिगरास्किान्दयन्दिनं नौलागिनिगागमाघरे ॥६॥ पुनापार at rnt IA, RA RAI are krter iternment Effer Miratी hin tertainmen wra tre Re repreer rrr-1 ६२ सूक्तिमुधाकर - किं पिबन्ति मम पदरसं मुनयः सुधां विहाय । ज्ञातुमिदं बालो हरि खपदं मुखे निनाय ॥ ७॥ (विप्रचन्द्रस्य- यमुनापुलिने समुत्क्षिपन् नटवेषः कुसुमस्य कन्दुकम् । नपुनः सखि लोकयिष्यते कपटाभीरकिशोरचन्द्रमा:।।(शङ्करकवे= प्रझमत्र पुरद्विपा सह पुरः पीठे निपीद क्षणं तूष्णीं तिष्ठ सुरेन्द्र चाटुमिरलं वारीश दूरीभव । एते द्वारि मुहुः कथं सुरगणाः कुर्वन्ति कोलाहलं हन्त द्वारवतीपतेरवसरो नाद्यापि निप्पद्यते ॥९॥ ये मुक्तावपि निःस्पृहा प्रतिपदप्रोन्मीलदानन्ददा यामास्थाय समस्तमस्तकमणि कुर्वन्ति यं स्वे वशे । मुनिजन अमृतको भी छोड़कर मेरे चरणोंका रस बार-बार क्यों पीते हैं। यह जानने के लिये ही बालगोपालने अपने चरणके अंगूठेको अपने मुखमें दे रक्सा या १७ ॥ हाय ! सरिस, यमुना किनारे फूलोकी गेंदको उछालते हुए नटवररूपधारी मायामय गोपकिशोर कृष्णचन्द्रकी यह हॉकी अब फिर देखनेको न मिलेगी॥८॥ [कृष्ण-सुदामाके प्रेमालापके समय द्वारपर उपस्थित दर्शगामिलापी देवगणोंसे द्वारपाल योले- 'हे बनन् ! आप महादेवजीके राहित कुछ देर सामनेकी चौकीपर बेटे,हेन्द्र ! चुप रहो, पापभूमी करना व्यर्थ है,हेयरुण!दूर हटो, ये देयगण द्वारपर क्यों कोलाहल कर रहे हैं।"[सर देवगण उकनाकर योले- 'आ, क्या करें, द्वारकानाथको अभीतक मिलनेकी फुरसत ही नहीं| मुक्तिकै रिषयमें भी निगरानेवाले ओ मत, पद-पदपर भानन्द देनेवासी,जिरामनिकामामय लेकर, किन सबके चूडामणि मननिय श्रीहरिको अपने बामे कर लेते हैं; उन मन, भक्ति और धीमगरानी में निरन्तर वन्दना भोर सम्पयंना करता Hin धीरुणमूक्तिः तान मतानपितां चमक्तिमपितं मत्तप्रियं श्रीहरि चन्द मन्ततमयेऽनुदिवस नित्यं मारण्यं भजे ॥१०॥ (freणुपुरीम्यामिनो मनिवारस्याप्टीकायाम् ) है कण कण मगपन् मम चित्तभृतो थापाद कदापि भवतचरणारविन्द । देवादिपुप्पपिरतः कृपया সর্না पोक्षस यामनयनेन निज पदाजम् ॥११॥ परिधावमिह पनितो रोदिप्यम्याकरायलम्बाय । पतितोद्वारणसमये किम सरमि त्वमात्मानम् ।।१२।। विहाय पपरनं हनीचरा ममाशिराजीवरम पिपन्नि किम् । इवि सपादाम्बुजपानकाकी मगोपाल धियमातनोतु नः१३ समा शरण नेपाले उनीभीको भनाई 1.1 गगन दिशानन मेमो कोलार रभारी परमपम झाप, मी समरमा मनी मापी मामले भाने पाणी ओर in ऐसा शास्त्र बद्रम्प गगे मोग पापमय र पागा पोर मन. भर mran ॥२. कमेचा ऐर म ल ARE सारो ये HT TH MAR 3. 17 सभी को पानी मे दम Terint भीमाग भार]1 १६ ॥ अमूलगायो Aru मेरे पास Formनागौ-रोरा पर पाक टासन, स मूक्तिमुधाकर अयि दीनदयाई नाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे । हृदयं त्वदलोककातरं दयिनमाम्यति किं करोग्यहम् ।।१४।। (माघवेन्द्र पुरिस्वामिनः) न प्रेमगन्धोऽस्ति दरोऽपि मे हरी मन्दामि सौभाग्यभरं प्रकाशितुम् । वंशीविलास्याननलोकन विना विभर्मि यत्प्राणपतङ्गकान वृथा ||१५||* न जाने सम्मुखायात प्रियाणि वदति प्रिये । प्रयान्ति मम गात्राणि श्रोत्रतां किमु नेत्रताम् ॥१६||* प्रिय इति गोपवधूभिः शिशुरिति वृद्धरधीश इति देवैः । नारायण इति भक्तब्रह्मेत्यग्राहि योगिभिर्देवः ॥१७॥ नवनीरदसुन्दरनीलवपुं शितिकण्ठशिखण्डितमालशुभम् । हमारा कल्याण करे ॥१३॥ हे दीनदयाई प्रभो !हे मथुरानाय! आपका दर्शन कब होगा ? प्यारे! आपने देखे बिना मेरे कातर हृदयमें चक्कर आ रहा है, उफ! अब मैं क्या करूँ ? ॥ १४ ॥ वंशीविलसित मुखार- बिन्दके दर्शन बिना भी यदि मैं इन प्राणपखेरुओंको व्यर्थ धारण करता हूँ तो यह सत्य है कि मुझमें न तो श्रीहरिके प्रति थोड़ा भी प्रेम है और न उनका कुछ भय ही है । अपना सौभाग्य प्रकट करने के लिये ही मैं उनके लिये रोता-चिल्लाता हूँ॥ १५ ॥ जर प्यारे मेरे सामने आकर अपनी प्यारी यातें सुनाते हैं तो मैं नहीं जानता कि मेरा शरीर श्रोत्ररूप हो जाता है या नेत्ररूप॥१६॥भगवान् श्रीकृष्णको गोपाजनाओने प्रिय, वृद्धोंने बालक, देवताओंने खामी, भक्तोंने नारायण और योगियोंने ब्रह्म समझा था ॥१७॥ जिनका शरीर नीले मेघ के समान अतिसुन्दरनीलवर्ण है । मस्तक मयूपिन्छसे *(भीकृष्णपैतन्यस्य) " श्रीकृष्णनिक कमलाश्चितस्वजननेत्रपुगं तुलसीदलदामसुगन्धयाम् । जगदादिगुरुं प्रजराजगुतं प्रणमामि निरन्तरधीरमणम् ॥१८॥ नीतं यदि नवनीतं नीतं नीतं किमेतेन । आतपदापितभूमी माघर मा धार मा धाय ।।१९।। पादाश्रितानां च समनचौर श्रीराधिकापा हृदयस्य चौरम् । नीलाम्बुजश्यामलकान्तिचीरं चौराप्रगण्यं पुरुष नमामि॥२०॥ ধন্য तपनवनयातीरवानीरजे गुअन्मभुम्रमरपटलीकाकलीकेलिभाजि । आमीरीणां मधुरमरलीनादसम्भोहिताना मध्ये ग्रीडमयतु सततं नन्दगोपाललालः ॥२१॥ कमिकमादिकाता गमरमविकराल प्रेमापीमराला। एमोकिर, नेच पुगन कमरोप है सममान हपा मादायी मगमे पागधादिगुरु उन रमारमण भीगनपदनो सिर मसरदार हा १८ दिने माया मोगिया गाभा। परनुमानमर मी ही भूमिर तोर मर भाग भाग १९॥ को भरने परको भाभिन बनाम भी भर भी आमाको परामरे, उन पगमा पुरुषको ममार॥२.दारनमे Fairyार करोए मार मे पार पसार में grammनो मुख मेरी र मोर. पुमा rineetin गुमर at em पप और wit, न मिपाकर मनकसहितभाववियूला मालनिगमसार: कोपि लीलावतारः। सिनसुखकारी बेलधारी मुरारित परिकलितरमादो महलं नस्तनोतु ॥३१॥ कदा पदारण्ये विमलयमुनातीरपुलिने परन्तं गोविन्दहलघरगुदामादिसहितम् । अये कृष्ण सामिन् मधुरमुरलीवादन विमो प्रसीदेत्याक्रोशनिमिपमिय नेष्यामि दिवसान्॥३२॥ (कृष्णलहरितोत्रात) नन्दनन्दनपदारविन्दयोः स्यन्दमानमकरन्दविन्दवः । सिन्धवा परमसौख्यसम्पदानन्दयन्तु हृदयं ममानिशम्।।३३॥ (कविराजमिश्रस्य पद्यावलीसंप्रहात्) तत्कशोरंतच वक्त्रारविन्दं तत्कारुण्यं तेच लीलाकटाक्षाः। तत्सौन्दर्य सा च मन्दस्मितश्री सत्यं सत्यं दुर्लभं दैवतेषु॥३४]] (लीलागुकस्य १ १ ५५) सुनहरे रशके वस्त्र धारण करनेवाला, मनोहर मोर-मुकुटधारी, सकल शास्त्रोका सारभूत, कोई लीलावतारी त्रिभुनसुखदाता गिरिवरधारी चक्रपाणि मुरारी हमारा मङ्गल करे ॥ ३१ ॥ वृन्दावनमें, यमुनाजीके पावन तट पर भया बलराम और सुदामादि सखाओंके साथ घूमते हुए गोविन्दसे 'हे कृष्ण! हे खामिन् ! हे मधुर मुरली बजानेवाले ! हे विभो ! प्रसन्न होहये'- ऐसा कहते हुए कब अपने दिनोंको पलक मारनेके समान व्यतीत करूंगा ।। ३२॥ प्यारे नन्ददुलारेके चरण-कमलोंसे नूती हुई मकरन्द- परम सुख-सम्पदाओंकी समुद्र ही हैं, वे सदा मेरे हृदयको आनन्दित करें ॥ ३३ ॥ यह किशोरावस्था, वह मुखारविन्द, हा दयालुता, वे लीला-कटाक्ष, वह सौन्दर्य और वह मन्द मुसुकानकी शोभा ! सचमुच, ये सब देवताओंमें भी दुर्लभ है ।। ३४ ।। बिन्दुएँ मानो A &धीकृष्णमूक्ति हस्तमृरिक्षप्य यातोऽसि पलान् कृष्ण किमद्भुतम् । हृदयायदि निसि पारुषं गणयामि ते ॥३५॥ (टीपारस्य ३.९६) गोपाल इति मत्वा त्वां अनुरक्षीरवाया। धितो मातुः स्तनक्षीरमपि लम्धुं न शकुयाम् ॥३६॥ धीरगारमपहत्य शरया सीकृतं यदि पलायनं स्वपा । भानसे मम पनान्यताममे नन्दनन्दन फन लीयसे ।।३७॥ रमाकरता गृहं गृहिणीपपमा किंदियमनिमयते जगदीघराय आमीरवामनयनाहतमानमापदसंमनो यदुपते कृपयागृहापा (मानसानाभामामीमरः) आनीता नटवन्मया तब पुरः श्रीकृष्ण या भूमिका प्योमाकाशवाम्माधिवमवस्त्यावीतपेयावधि । पर पागो, गमे गरीब भारतीतानी मैं मानेगा जामोदरममे परे जागे १३५|| उम गोगना मानाने पीनेस मा gm भाभय निशा पा, बिन भरतो मो म मनोका भी दूध मिना भगाना होगा! (अनमोगरा)। [भासामे मानसरे भारने भागनाकार रिपोलोरेनदनादन ! महान् भन्सारमय मेरेमनाना फोटरीमती पोन भाrm! ||100मर (EMEE) सोमारा पर २,TRभारमा iithamand पाnिaut for नाय! मरिचीने मामले HTARIETभरनामोजाग से भगा कारनामा, (नि) ने सर सनिसुधाकर प्रीतो यति वा समीक्ष्य भगवन् त माञ्छितं देहि मे नो घेहि कदापि मानय पुनर्मामीटशी भूमिकाम्॥३९॥ (खानखानाश्रीमदुलरहीमकका) शरीरं रूपं ततो यै कलत्रं यशथारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम् । यशोदाकिशोरे मनोये न लमं ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् नभोगेन योगे नवा वाजिराजोन कान्तामुखेनैव वित्ते' चित्तम् यशोदाकिशोरे मनो वैनलमं ततः किंततः किंततः किंततः किम् पडङ्गादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या कवित्वादि गचं सुपचं करोति । यशोदाकिशोरेमनोवैन लग्नं ततः किं ततः किंततःकिंतताकिम् रे चित्त चिन्तय चिरं चरणी मुरारी पारं गमिष्यसि यतो भवसागरस । उनको देखकर आप प्रसन्न हैं तो मेरी मनोकामना पूर्ण कीजिये, और यदि प्रसन्न नहीं हैं तो साफ कह दीजिये कि अब फिर ऐसी कोई लीला मेरे सामने मत करना *।। ३९ ।। सुन्दर शरीर हो, सुरूपा स्त्री हो, सुन्दर एवं विचित्र यश हो तथा मुमेरु-तुल्य धन हो, किन्तु यदि यशोदानन्दनमें मन नहीं लगा तोउन सबोंसे क्या लाभ है!॥ ४० ॥ भोगमें, योगमें, घोड़ोंमें, कामिनीके वदनमें अथवा घनमें, की भी चित्तकी आसक्ति भले ही न हो किन्तु यदि यशोदानन्दनमें मन नहीं लगा तो उससे (भी) क्या लाभ है ! ॥ ४१ ॥छहों अौसहित वेद और शास्त्रों को पढ़ा हो, सुन्दर गद्य और पद्यमय काव्यरचना करता हो, किन्तु यदि यशोदानन्दनमें मन नहीं लगा तो उन सभीसे क्या लाम है!॥४२॥ अरे चित्त ! तू निरन्तर श्रीकृष्णके चरणोंका स्मरण कर, * इस प्रार्थनामें दोनों तरहसे लाभ ही है, यदि मनोवान्छित वर मिल गया तो भी मुक्ति होगी, और चौरासी लाख योनियोंकी लीला न करनेका आदेश होगा तो भी मुक्ति ही है।

श्रीकृष्णकि । पुत्राः कलाभितरे न हि ते सहापा: सर्व विलोकय सखे मृगणिकामम् ॥४३॥ नन्दनन्दनपदारविन्दयोर्मन्दमन्दमनुजायतां मनः । मुश्च मुश्च विषयेपुवासना किश किश्चतदुदीर्यतां वचः ॥४॥ अहकार कापि प्रजजिन हे मात्वमिह भू- रभूमिर्दोगामहमपसर त्वं पिशुन है। अये क्रोध स्थानान्तरमनुमरानन्यमनसा त्रिलोकीनायो नो हदि वसतु देवोहरिरसी।४५(शान्तिशतकस्य) काचिन्ता मम जीवने यदि हरिविश्वम्भरोगीयते नोचेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निम्सरेत् । इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलं त्वत्पादाम्बुजसेवनेन सततं कालोमया नीयते ॥ (श्रीचाणक्यस्य) जिससे कि भवसागर के पार जा सकेगा, कला, तथा अन्य कोई भी तेरे सहायक नहीं है मिशन सयको मृगतृष्णाक स्य ममह ॥४॥ भीनन्दनन्दन परणारविन्दों में धीरे धीरे मनको गा दे, और विषयों में पासनाका नुरन्त याग कर दे तथा वाणीसे धीरे-धीरे उठी (भगवराम हरी) का उपारण कर ॥४४॥२ भाद्वार कहीं ना जा, भरे पार ! सरदार, अरमान रहना, अरेनि(पूटनीति)मी दो पौषि भव में अभिमानस पार न रहा, रेोष भी यहाँसे अब और कही अपना यहाल, धारसे हम अनन्य मित्तबाटोके पर ये मगवान् पिरोकीनापरिनिवास करें।॥४५॥ माह मगरान्तरका नाम विशम्मर गिर रसोरि मुझे अपने जादनकी पराचिन्ताशनरी तो (परिदिपा पान करते हो) श्रीपतरापं मावा मनी मे निकालना ऐसा पारंपार सोनार रेपो !हमारते क्षार भाप परण पमान मेपन में ७२ गमिगुषाकर पा पिता भूपि पुत्रपत्रिभरणयापारसम्मापये मागिन्ता धनधान्यमोगयमा लामे सदा जागते । मा भिन्नता यदि नन्दनन्दनपददन्दारविन्द धणं फा गिन्ता यमराजमीमगदनद्वारप्रयाणे प्रमो ॥४७॥ जीर्णा गरि सरिदियं १ गमीरनीरा नकाला पाति यापुरतिप्रचण्डः। तार्या नियम शिवम तय गृद्धाः तत्कर्णधारसुजयोलमाश्रयामा ॥४८॥ सिन्युपिन्दुमदो प्रयच्छति न हि स्वरी च धारापरत सल्पेन विना ददाति न कदाप्यल्प कल्पद्रुमः। स्वच्छन्दोऽपि विधुः सुधावितरणे सप्रिन्दिवापेक्षते दाता फोऽपि न स्यते विनियमं श्रीकृष्णचन्द्रबिना ||४९|| (भीषनश्यामदासस) निरन्तर अपना समय बिता रहा॥६संहारमै पुत्र-पौत्रीके भरण-पोषण, म्यापार और यातचीत करनेकी जितनी चिन्ता रहती है, तथा धन- धान्य, भोग और यशकी प्रासिके लिये जितनी चिन्ता सर्वदा होती है। उतनी चिन्ता यदि क्षणभर मीनन्दनन्दनके चरणारविन्दोंके विषयमें हो, तो प्रभो फिर यमराजके भयानक घरके दारतक जानेकी चिन्ताही क्यों रहे? ॥ ४ हमारी नौका अति जीर्ण है, मकरादिसे परिपूर्ण यह नदी बड़ीगम्भीर है और अति प्रचण्ड पवन चल रहाखी, मालक और वृद्ध सबको पार करना है। इसलिये हम उस कर्णधार कृष्णके भुजबलका आश्रय प्रहण करते हैं ।। ४८ । समुद्र तो एक बूंद भी किसीको नहीं देता, मेघ भी अपने मनका है, कल्पवृक्ष बिना सङ्कल्पके किसीको थोड़ा- सामी कदापि नहीं देता, चन्द्रमा (दिनमें) भी अमृतदान करनेमें स्वच्छन्द है तो भी उसको राभिकी अपेक्षा रहती श्रीकृष्णचन्द्र के बिना अनियमित- रूपसे देनेवाला तो और कोई भी नहीं दिखायी देता ! ।। ४९ ॥

श्रीकृष्णसूक्ति तस्प्रेममावरसभक्तिविलासनाम- हारेषु चेत् खल मनः किमु कामिनीमिः। तलोकनाथपदपजभूलिमिश्र- लिस वपुः किमु पृथागुरुचन्दनायः ॥५०॥ (पपुराणपातालवण्डात् अ०८१६९) मुहीका रसिता सिता समशिता स्फीतं च पीतं पयः वर्यातेन सुधाप्यचापि कतिधा रम्भाधरः खण्डितः । सत्यं ब्रूहि भदीयजीव भवता भूयो भने भ्राम्यता कृष्णेत्यक्षरपोरयं मधुरिमोद्गारः कचिल्लक्षितः ॥५१॥ (पण्डितराजजामायण-समद्भापरात् ) चूडाचुम्बितचारुचन्द्रकचमत्कारग्रजभाजित दिव्यं मझुमरन्दपश्जमुग्यनृत्यदिन्दीवरम् । भगवान मेममाया रसामकि क्लिाम और नाममालाओं में यदि मन लग सारी रिकार्मािनरी (केन प्रेमादि मायो)से क्या प्रयोजन है। उस लोकनापती पदपत्र लिने यदि शरीरमरित हो रहा है तो सिर सपी भगुरुनानादि लेखनमे क्या लाभ ॥५॥ऐ मेरे जीव! गुमने पास सादन किपा, मिश्री तापी और ममाधिप থবা, যার সুমধুৰ মান্ধা গণ भी पुरन किया होगा, परनुसन-सन ताओ मने पुनः पुनः समारमें पूमो हुए, 'ग' नाम दो अक्षरों में जो भाका उद्धार है, ऐसा रही और मी सारे।॥५॥जीविरपर नोएर मुदर मोरपीपमा र कान्तिपुरम मासिक, जिन मधुर मल्ल मुसाधिदर भीपी मुनीरामल नायरबिनदिम ७४ सूक्तिसुधाकर रज्पद्वेशुकमूलरोकविलसद्विम्बाधरोष्ठं श्रीवृन्दावनकुञ्जकेलिललितं राधाप्रियं प्रीणये ॥५२॥ (गोस्वामिगोपालमट्टस्य कृष्णकर्णामृतटीकायाः) वृन्दाबन्दमरन्दबिन्दुनिचयस्पन्देन सन्दीपिता- इन्धाधस्य सनन्दनादिरमृतानन्देऽपि मन्दादरः। मोक्षानन्दथुनिन्दिसेवनसुखखाच्छन्द्यसंदोहदं तद्वन्देमहि नन्दनन्दनपदद्वन्द्वारविन्दं मुहुः ॥५३॥ (श्रीहरिमोहनप्रामाणिकस्य कोकिलदूतात्) वन्दे नवधनश्याम पीतकौशेयवाससम् । सानन्दं सुन्दरं शुद्धं श्रीकृष्णं प्रकृतेः परम् ॥५४॥ (श्रीनारदपाञ्चरात्रे कृष्णस्तोत्रात्) काननं क नयनं क नासिका कश्रुतिःकचशिखेति केलितः। तत्र तत्र निहिताजुलीदलो वल्लवीकुलमनन्दयत्प्रभुः ॥५५॥ (गोस्वामिरधुनाथदासस्य पद्यावलीसंप्रहात) प्रमा है, जिनका विनाधर वंशीके छिद्रके सम्पर्कसे शोभित एवं रागयुक्त हो रहा है, ऐसे वृन्दावनके निकुओं में लीला करते हुए सुन्दर राधा-यलमकी आराधना करता हूँ॥५२॥ जिन चरणों की तुलसीमारी मकरन्द-बिन्दुओं- की धारा फेलती हुई मुगन्ध पाकर सनकादिमुनि महानन्दको भी तुम्छ। सा समझने लगे, जो मोशमुखको भी तिरस्कृत करनेवाले भरने सेयन- अन्य आनन्द-सन्दोहकी स्वच्छन्दता प्रदान करता है, उन श्रीनन्दनन्दन दोनों धरणारविन्दोंकी यारंगार बन्दना करता हूँ॥५३॥ नवीन मेपके सस्य श्याम, रेशमी पीताम्बर धारण करनेवाले, आनन्दमय, ति मुन्दर, गुरस्वरूप तथा प्रतिमे अतीत श्रीकृष्णचन्द्रकी पन्दना करता हूँ ॥५४॥ [यालगोपालसे नय गोपियाँ पूछती थी- बताभो तो पण ! तुम्हारा मुँह कहाँ हैभाँप कहाँ नाक और चोटी कहा। तारस के उपर लीलावंक उन-उन मोर अंगुलियॉरखकर भगवान् - -1 * श्रीकृष्णसूक्ति मधुरमधुरमेतन्मङ्गलं मङ्गलानां सकलनिगमवल्लीसत्फलं चित्खरूपम् । सकृदपि परिगीतं श्रद्धया हेलया वा भृगुवर नरमानं तारयेत्कृष्णनाम ॥५६॥ (स्कन्दपुराणात) गोविन्दं गोकुलानन्दं गोपालं गोपवल्लभम् । गोवर्द्धनधरं धीरं तं चन्द गोमतीप्रियम् ।।५७|| (बलिराजेन्द्रस्य हरिनाममालायाः) हे गोपालक हे कपाजलनिधे हे सिन्धुकन्यापते है. कंसान्तक हे गजेन्द्रकरणापारीण हे माधव । हे रामानुज हे जगत्त्रयगुरो हे पुण्डरीकाक्ष मां हे गोपीजननाथ पालय परंजानामिन त्यांविना ॥५८॥ (रामानुजस्तोत्रात्) इमो धनश्रेणिमियोन्मुखःशिखी चकोरका कार्तिकचन्द्रिकामिव रथाङ्गनामा तरणेरिव विपं कृष्णविवीक्ष्य नकाप्रमोदते५९ गोपियोंकी आनन्दित करते थे ॥५५॥ हे शौनक ! मधुरसे भी मधुर, मङ्गलों का भीमङ्गलरूप, समस्त ध्रुतिलताका फलस्वरूप, चिन्मय यह कृष्णनाम भदा अथवा अनादरसे एक बार भी उच्चारण करनेपर मनुष्यमात्रका उद्धार कर देता है .५६ ।। गोकुलके आनन्दस्वरूप, गौओंके पालक, गोपोंके प्रिय, गोवर्धनधारी और गोमती-प्रिय धीर श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ॥५७.! हे गौओंका पालन करनेवाले, हे दयासागर, हे लक्ष्मीपते, हे संस-विनाशक,हे गजेन्द्र के लिये परमकरुणामय, हे मायापते, हे बलगमानुज, हे त्रैलोक्यगुरो, हे कमलनयन, हे गोपियों के स्वामी! आप मेरी रक्षा करें; मैं आपके सिचा दूसरेको नहीं जानता ॥ ५८ ॥ मेघपतियोंको देखकर जिस प्रकार मोर नाच उठता है, शरद् ऋतुके चन्द्रमाकी ज्योत्स्नाका दर्शनकर जिस प्रकार पर तिल उठता है, सूर्य-किरणों को देखकर चकवा जैसे हर्षित होता है। उसी प्रकार कौन रस कृष्णसरिको देखकर हर्षित नहोगा।५९ ॥

नापार २ मेर: कमयामि से हिनमिदं गन्दावने गारपन् अन्दै कोपिगया नामुदनिमी पन्युन कार्यालया। गौन्दर्यामतमदिरहिरमितः समोर मन्दलित- रेग त्यो तर पाहाम विषपाना धर्म नभ्यति ॥३०॥ एवं फरविणीव फरविणीव फोकपटलीवाम्मोजिनीवल्लम मेयं पालकमग्दतीय मधुपयेणार पुणग्रजम् । माकन्दं पिकसुन्दरीय रमणीयारमेघरं प्रोषितं तोपिरियं सदा प्रियकर त्वां द्रष्टुमुत्कण्ठने ॥६१॥ इन्दीवरदतम्याममिन्दिरानन्दकन्दनम् चन्दारुजनमन्दारं वन्देऽहं यदुनन्दनम् ॥२॥ यावनिरअनमज पुरुष जान्त सश्चिन्तयामि हृदये जगति स्फुरन्तम् । रेचिरा! मैं यह तेरे हितको यात कहता किन्दावनमें गौओको चराने- पाले किसी नयीन मेपके समान क्यामपुरुषको मिशन बना लेना; क्योंकि वह सौन्दर्यात परसानेवाले मन्दहापसे सर प्रकार मोहित करके, तुझे और तेरे प्रिय विषयों को शीघही नष्ट कर देगा ॥६॥ जिस प्रकार युभदिनी चन्दमाके लिये, चकवा चकवीका समूह सूर्य के लिये, चातक-मण्डली मेपके लिये, भ्रमरगण पुष्पोंके लिये, कोयल मान-मञ्जरीके लिये तथा मुन्दर स्त्री अपने प्रवासी पति के लिये उत्सुक रहती है, उसी प्रकार हे प्यारे ! तुम्हारे दर्शनके लिये हमारी चित्ति उत्कण्ठित हो रही है ॥६॥ नीलकमल. दलके समान श्यामपर्णवाले, लक्ष्मीको आनन्द देनेवाले और प्रणत जनों के लिये कल्पवृश्चके समान, भगवान् यदुनन्दनकी मैं वन्दना करता हूँ ॥६२] जब मैं हृदयके मीतर, जगत्में प्रकाशमान, निरअन, अज, पुराण(बूढ़े) --

• श्रीकृष्णसूक्ति
तापदलात्स्फरवि हन्त हृदन्तरे मे
गोपस्य कोपि शिशुरञ्जनपुअमञ्जः ॥६३॥
करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् ।
घटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा सरामि ॥६॥
(पुष्टिमायिस्तोत्ररत्नाकरात्)
गोविन्दं गोकुलानन्दं वेणुवादनतत्परम् ।
राधिकारञ्जनं श्यामं वन्दे गोपालनन्दनम् ॥६५॥
निरुद्ध बाप्पान्तः कथमपि भषा गद्गदगिरा
हिया सद्यो गूढा पथि विघटितो वेपथुरपि ।
गिरिद्रोण्या वेणी ध्वनति निपुणैरिगिवनये
तथाप्यूहां चक्रे मम मनसि रागः परिजनैः ॥६६॥
पुरुषका चिन्तन करता हूँ तो बड़े आश्चर्यकी बात है कि कोई कजलके समान
श्यामसुन्दर गोपबालक हठात् मेरे हृदयमें प्रकाशित होने लगता है ॥६३॥
अपने कमलोपम हायसे चरणकमलको मुखकमलमें लगाते हुए पटके पत्तेपर
सोये बाल-गोपालका मैं मन-ही-मन स्मरण करता हूँ॥६४॥ जो गोकुलके
आनन्दस्वरूप, येणु-वादनमें तत्पर और श्रीराधिकाजीका मनोरञ्जन करने
वाले हैं, उन गोपकुमार श्यामसुन्दर भीगोविन्दकी वन्दना करता हूँ ॥६५॥
गोवर्धन-गिरिकी पाटीमें बेशु गजाते समय यद्यपि किसी भी तरह मैंने
ऑमुऔको भीतर ही रोक लिया, गदद वाणी भी लज्जासे तरकाल छिपा
टी, चटते समय देह-कापनको भी दवामा, वो भी मनोभाव ताइनेमें
परदेसियों ने मेरे मनकी प्रेमदशाका अनुमान कर ही लिया ॥६६॥

७८ फरनगरीशिता ललाटपटले यसपने कौतुर्म ना धामीकिकरणले येशुः करे कपणम् । राबहिरिन्दनं गुलतिनं फलेष समारली गोपनीपरिवेष्टितो विजयते गोपालगडामगिः ॥६७|| निमितमपनलक्ष्मीनित्यलीलासदायो फमतविपिनपीपीगगपंपाम्याम् प्रणमदमयदानप्रीटिगाढोठाम्या किमपि यातु घेत रुष्णपादाम्युजाम्याम् ॥६८|| प्रणयपरिणताम्या प्रामवालम्बनाम्या प्रतिपदललिताम्या प्रत्यहं, भूतनाम्याम् । प्रतिमुहरधिकाम्यां प्रस्नुबालोचनाम्या प्रमवतु हृदये न प्राणनाथः किगोरः॥९॥ जिनके मलकपर फस्तीमा तिलक है, यशायरमें फौरनुमणि है, नासिकायमै अति मुन्दर मोतीको धुलासरे, करत में पंशी है, हायोमें कण दे, सम्पूर्ण शरीरमें हरिचन्दनका लेप हुआ है और कण्ठमैं मनोहर मोतियोंकी माला है, प्रजागनाओंसे घिरे हुए ऐसे गोपाल- चूडामणिकी बलिहारी है ॥ ६७ ॥ संसारमात्रको लक्ष्मीकी लीलाके नित्यनिकेतन, कमलवनकी वीथीमें विराजमान समत कमलोंके गवंहारी, आश्रित जोको अभय देने में सर्वपा उद्यत, मोकृष्णके चरणारविन्दसे मेरा मन कोई विशेष नाता जोड़ ले ॥६८ ॥ प्राणाधार किशोरमूर्ति श्रीकृष्ण अपने मेमपूर्ण, आश्रयदाता सदा सुन्दर, नित्यनूतन, क्षण क्षण खिलते हुए, आनन्दवर्षी नेत्रोंसे हमारे हदयको वशीभूत कर ले ।।६।। * विस्वमङ्गलापरनामधेयस्य श्रीलीशशुकस्यकृष्णकर्णामृतार (३।१० १।२०।१३) -- AND श्रीकृष्णसूक्ति लीलायवाणं रसशीतलाम्यां लीलारुणाभ्यो नयनाम्बुजाम्याम् । आलोकयेदद्भुतविभ्रमाभ्यां काले कदा कारुणिका किशोरः ॥७०11* त्रिभुवनसरसाम्यां दीप्तभूपापराम्या इशि शिशिशिराम्यां दिव्यलीलाकुलाम्पाम् । अशरणशरणाम्यामद्धताम्यां पदाम्या- मयमयमनुकूजद्वेशुरायाति देवः ॥७॥ बह नाम विभूषणं बहु मतं वेपाय शेपैरलं वक्त्रं दन्तविशेषकान्तिलहरीविन्यासधन्याधरम् । शीलरत्पधियामगम्यविभवः भृङ्गारमझीमयं चित्रं चित्रमहोबिचित्रमहहो चित्र विचित्रं महः ।।७२||* परम कारुणिक नन्दकिशोर अपने लोलायुक्त विशाल, मेमरससे शीतल, कुछ-कुछ लाल, अद्भुत विलासयुक्त कमलनयनोंसे मुझे कर देखेंगे !!!७०॥ त्रिभुवनके प्रति सरस (सदा सानुराम रहनेवाले), देदीप्यमान आभूषण- धारी, प्रत्येक दर्शकके नेत्रओंको शीतल करनेवाले, दिव्य लीलाओसे परिपूर्ण, अशरणशरण और आश्चर्यमय सुगरचरणसे ये भगवान श्रीकृष्ण बंशी बजाते हुए भा रहे हैं।।७१।। जिनकी पेपरचनाके लिये अन्य भूपीका क्या काम, मोपी पति , जिनका मुख दाँतोंकी विशेष कान्तिमयी झिलमिलाहट- से मुोभित भोटोवाला है,अल्पबुद्धियों द्वारा समझमें न आनेवाले वेभयभरे धरिसे युक्त उन भगवानका शृङ्गारमनीमय तेज क्या ही अद्भुत है।॥७२॥ •कीलीकाकस्प (१।४५, १०८.१।५८)

सूक्तिसुधाकर
माधुर्यादपि मधुरं मन्मथता तस्य किमपि कैशोरम् ।
चापल्यादपि चपलं चेतो मम हरति किं कुर्मः ॥
प्रेमदं च मे कामदंच मे वेदनं च मे वैमचं चमे।
जीवनं च मे जीवितं च मे दैवतं च मे देव नापरम् ।।
उपासतामात्मविदः पुराणं परं पुमांसं निहितं गुहायाम्
वयं यशोदाशिशुवाललीलाकथासुधासिन्युपु लीलयामः ।
ते ते भावाः सकलजगतीलोभनीयप्रभावा
नानासृष्णासुहृदि हदि मे काममाविर्भवन्तु ।
वीणावेणुवणितलसितस्मेरवक्त्रारविन्दा-
नाहं जाने मधुरमपरं नन्दपुण्याम्बुपूरात् ।।
पर्याकलेन
नयनान्तविजृम्भिवेन
वक्त्रेण कोमलदरालितविभ्रमण ।
श्रीकृष्णकी किशोरावस्था, जो कि मधुरसे भी मधुर और कामदेवस्वरू
मेरे चञ्चलसे भी चञ्चल चित्तको चुरा रही है। अहो ! मैं क्या र
१७३|| हे देव ! आपके सिवा मुझे प्रेमदान देनेवाला, मनोरथपूर्ण
याला, मेरा अनुभव, ऐश्वर्य, जीवन, प्राणाधार और देवता अन्य कोई
है|७४।। बड़े-बड़े आत्मज्ञानी किसी गुफामे छिपे हुए परम पुराणपुष्
उपासना करें, हमलोग तो यशोदापुत्रकी बाललीलाके कथामृत-सा
ही श्रीडा कर रहे हैं । ७५ ॥ नानातृष्णायुक्त मेरे हृदयमें, जगन्मा
टुन्ध करनेवाले प्रभावसे युक्त अनेक पदार्थ भले ही उपस्थित हो
वंशीधानसे लसित मधुर मुसकानयुक्त मुखकमलवाले नन्दजीकी पुण्या
कृष्णसे वदकर दूसरेको मैं मधुर नहीं समझाता !!७६१ चपल कटाक्षविला-
हास-बिलासके समय जिसके कोमल कपालों में कुछ गदेसे पद जात
* मानीलामुक्स (१ । १४,१।१०३, २।५५,३।७)

धीरयानि - मन्द्रेण मन्जुलनरेण च जरिपतन नन्दस्य इन्न तनयो हृदयं धुनोति ॥७७१३ सोलाटोपाठायनिर्मपरिवारमाधिक- प्रीत रीतिविमगमगरलमद्वेषप्रणादामन । राधालोचनलालिनस्य सलिनस्मेरे मुरारेमंदा माधुकरसे मुग्वेन्दुकमले ममं मदीयं मनः ॥७॥ विहाय कोदण्यभरात्महतं गृहाण पानी मणिचागुम्। মানুষ নিত্ৰাঘমা গীসাথবা সার্মিঘ)। कालिन्दीपुरिने समालनिविडजाये पूरः ममर- पोप नापजपप्रपायनिहितं दम्पसममाति यः। एमे मुतोम-रामे मापद नामो मेरे शहर का मारी भाषामा दुरगामार याददन और A. रोगी .tortoist writing at: सुषमinranti MER rrrrr karna Notifiemeg re tv, rat sh: cs có sa # Imran Pratiri.. REETITीप पुन Harita uthtum mrani Amr ..

शिक्षाका
पामे पाणितले निधाय मार घेणु विराण कटि-
मान्ने गाम विलोकयन् प्रतिपलं यालमालोकये 11८०॥
भार मा यस मदीपमानस माधयकनिलंगे परन्छया ।
हरमारमण यार्यताममी का गहन निनयमलानम् १८१
अयं धीराम्मोधः पतिरिति गर्वा पालक इति
थितोऽमाभिः क्षारोपनयनथिया गोपतनयः ।
अनेन प्रत्यूहो
व्यरचि सततं येन जननी
स्तनादप्यमाकं मादपि पयो दुर्लभमभूत् ।।८।।
नखनियमितरुपन् पाण्डवस्यन्दनाचा-
ननुदिनममिपिश्चनलिम्यः
पयोमिः।
अक्तु विनतगामस्तोत्रमंस्यूतमालि-
र्दशनवितरम्मिदेवकी पृण्यराशिः 11८३1
और सायें हाथमें मधुर पंशी तथा कमाने को रावकर प्रतिक्षण
इधर-उपर गार्योको भी देखते है ऐसे बालकृष्णकी झांकी में देख
रहा हूँ ।। ८० ॥ ओ मदन ! मायके एकमात्र निवासस्थान मेरेमानसमें
मत शुस, और हे रमानाथ ! आप भी इसको मना करें, मला, कौन
अपने घरपर दूसरेका अधिकार सर सकता है ? ॥ ८१॥ हमने तो यह
सोचकर कृष्णकी शरण दी थी कि ये क्षीरसागरके स्वामी, गायोंके पालन
करनेवाले और गोपपुत्र हैं, इसलिये मनचाहा दूध पीने को मिलेगा, किन्तु
इन्होंने तो ऐसा विघ्न डाला कि हमें एक बार माताके सनका मोदूध मिलना
दुर्लभ हो गया १८२ जो मुकुटमें चाबुक खोसकर, दाँतोंसे लगाम पकड़कर
अर्जुनके रयके घोड़ोंको अपने नखोसे खुजन्याते हुए फैलाये हुए शरीरसे
अञ्जलि भर-भरके प्रतिदिन स्नान कराने में मुस्तैद है। वे देवकीकी पुण्यराशि
* भीलीलाशुकस्य ३१८१,९९, ९५,२ ४७

• श्रीकृष्णसूक्तिः भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा भगवन्यदि स्या- देवेन नः फलितदिन्यकिशोरपे । मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलि सेवतेऽसा- धर्मार्थकामगतयः समयप्रतीक्षाः ||८|| अङ्गनामङ्गनामन्तरे माधको माधवं माधवं चान्तरेणाङ्गना। इत्यमाकल्पिते मण्डले मध्यगःसंजगी वेणुना देवकीनन्दनः ।। पालिकातालिकाताललीलालयासंगसंदर्शितभूलताविभ्रमः । गोपिकागीवदत्तावधानःस्वयं संजगी वेणना देवकीनन्दनः।- मध्येगोकुलमण्डलं प्रतिदिशं चाम्भारपोजम्भिते प्रातदोहमहोत्सरे नवयनश्याम रणन्नूपुरम् । माले बालविभूषणं कटिरणत्सत्किङ्किणीमेखलं कण्ठे व्याघनखं च शैशवकलाकल्याणकारस्य भजे ॥८७|| पार्यसारथि कृष्ण हमारी रक्षा करें ॥ ८३ ॥ हे भगवन् ! यदि आप दिन्य किशोरवेषम सीमायसे हमारी भक्ति स्थिर हो जाय तो मुक्ति स्व- हाथ जोड़कर सम्मुस खड़ी रहे और धर्म, अर्थ, काम आदि मी आशा प्रतीक्षा करने लगेंगे ।। ८४ ॥ दर एक गोपीचे याद एक कृष्ण भी हर एक कृष्णके बाद एक गोपी इस प्रकार रचे हुए रासमण्डलके बीचों खदे होकर कृष्ण बंशीद्वारा गान करने लोटा गोपियोंकी तालीदार साल देनेशी लीला और काय के अनुसार भ्रूलताओंकी मंगी दिखाते हु- उनके गीतमं स्वयं तन्मय होकर देवकीनन्दन वंशीवाय गान करने लग ॥८६॥ प्रातःकाल गोरोदनमहोत्सव के समय जब चारों ओर गायरामा यो, तर सिरपर यायोचित आभूषण पहने हुए कमरमें बजती हुई मुन्ट परपनी और गले में पापके नात पहने हुए गायोंरे गीच सहे वार- शाारसे पूर्णतया विभूषित नवधनापामको भजता हूँ HI .. ..

& सूक्तिसुधाकर काम सन्तु सहस्रशः कतिपय सारस्य धौरेयकाः कामं या कमनीयतापरिणतिस्वाराज्यबद्धग्रताः । नैवैतैर्विवदामहे न च वयं देव प्रियं महे यत्सत्यं रमणीयतापरिणतिस्त्वय्येव पारं गता ||८|| यां दृष्ट्वा यमुनां पिपासुरनिशं व्यहो गा गाहते विद्युत्वानिति नीलकण्ठनिवहो यां द्रष्टुमुत्कण्ठते । उत्तंसाय तमालपल्लवमितिच्छिन्दन्ति यां गोपिका: कान्तिः कालियशासनस्य वपुपः सा पानी पातु नः ॥८९॥ फुलेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं पवितंसप्रियं श्रीवत्साझामदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् । हे देय हजारोंकी संख्या में कुछ लोग भले ही किसी अन्य सार पदार्थको दोते रहें, अथया परमकमनीय आत्मराज्यकी प्राप्ति के लिये संकल्प बने रह हम न तो उनसे विवाद करते हैं और न आपसे मुखदेखी मीठी पाते ही करते हैं, जो सच है यही कहते हैं, कमनीयताकी चरम सीमा तो एकमात्र आपही में समाप्त हुई है ॥ ८८ ॥ यमुना समहाकर प्यासी गायोंका समूह निमकी ओर दौड़ा जा रहा है, श्यामपटा समझकर मोरसमुदाय जिने देसनेको उत्कण्ठित हो रहा है, तमालपत्र समशकर गोपियोंका समूह जिमे कर्णफूल बनाने के लिये लालायित हो रहा है ऐसी कालिपदमनकारी भोकष्ण शरीरको पवित्र [यि एवं अनुत] कान्ति हमारी रक्षा करे ।। ८॥ जिनका मुखनन्द्रविकगित कमलके पाश है, जिनको मोर मुकुट अति प्रिय है, जिन्होंने बतायपर भीयरस घिद भीर मुन्दर कौस्तुभमणि धारण किये है, जो पोताम्बरधारी एवं गुग्दर, श्रीकृष्णसूक्ति गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसद्धावृतं गोविन्द कलवेणुवादनपरं दिव्याङ्गभूपं भजे ॥२०॥ परमिममुपदेशमाद्रियध्वं निगमयनेषु नितान्तवेदखिना। विचिनुत भवनेषु पल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निषद्धम्।।९१||* तमसि रविरिवोद्यन्मजतामम्धुराशी प्लव इव तृपितानां स्वादुवर्षीव मेघः। निधिरिय निधनानां दीर्घतीयामयानां मिपगिय कुशलं मे दातुमायाति शारिः ॥९२||* चिकुरं बहुलं विरलभ्रमरं मृदुलं वचनं विपुलं नयनम् । अधरं मधुरं ललितं वदनं चपलं चरितं च कदानुभवे ॥९॥ गोपासनाओंके नयनकमली से जिनका मुन्दर शरीर सम्पूजित है, गौ और गोपियोंके समूहसे आत हैं उन मधुर मुलिका बजाते हुए दिव्य भूषणभूपित गोविन्दको मैं भजता हूँ ।। ९० ॥ वेदके जङ्गली- में भटकते हुए, अत्यन्त खेदसे खिन्न होनेवाले लोगो ! मेरे इस उत्तम उपदेशका आदर करो; उस उपनिषदर्थ ( परमहा कृष्ण) को तुम गोपियों के घरों में खोजो, वा यहाँ भोखली में बँधा हुआ है ॥ ११ ॥ भगवान् शौरि (कृष्ण) अंधेरेमें उगते हुए सूर्यके समान, समुद्री डूबते हुएको जहाजके समान, प्यासे पुरुषोंके लिये मुस्वादजलवी मेघके समान, निधनौके लिये निषिके समान और पुराने असाध्य रोगियों के लिये धन्वन्तरिके समान हमारे हित के लिये आते हैं ।।९२॥ [कृयाकेघने और बुछ-कुछ पराले केसीका, मीठे-मीठे शेलका, विद्याल नेशेंका, मधुर अघरोंका, मनोहर मुखका और चचल चरित्रका में कर अनुभव करूंगा। ॥ १२ ॥ • भोलीलारस १ । ८४,२।१८।१४, १५.

सूक्तिसुधाकर मुग्धं स्निग्धं मधुरमुरलीमाधुरीधीरनादैः कारं कारं करणविवशंगोकुलव्याकुलत्वम् । श्यामं कामं युवजनमनोमोहनं मोहनाङ्गं चित्ते नित्यं निवसतु महो वल्लवीवल्लभं नः॥१४॥ सन्ध्यावन्दन मदमस्तु भवते भोस्लान तुभ्यं नमः भोदेवाः पितरश्च तर्पणविधौ नाहं क्षमा क्षम्यताम् । यत्र क्वापि निषद्य यादवकुलोतंसस्य कंसद्विपः स्मारं स्मारमपं हरामि तदलं मन्ये किमन्येन मे ।।९५|| देवकीतनयपूजनपूतः पूतनारिचरणोदकधूतः । यद्यहं स्मृतधनञ्जयसूतः किं करिष्यति स मे यमदूतः९६५ जोमनमोहन एव स्नेहमय है, अपनी मनोहारिणी मुरलिकाको मन्द रसीली तानसे, गोकुलको इन्द्रियविवश तथा व्याकुल कर रहा है जो श्यामला, सुन्दर, युवकोंका चित्त चुरानेवाला और मनोहर रूपवाला है वह गोपियोंका प्रियतम तेज हमारे चित्तमे नित्य निवास करे ।। ९४ ॥ सन्ध्यावन्दन! तुम्हारा भला हो, हे स्नान! तुमको भी नमस्कार हे देवताओ! और हे पितृगण ! क्षमा करना, अब मैं आपको सन्तुष्ट करने में असमर्थ हूँ। मैं तो अब जहाँ कहीं भी बैठकर यदुकुल-भूषण, कंसनिादन भगवान कृष्णचन्द्रका स्मरण करता हुभा अपने पापोंका मशालन करूँगा इतना ही बहुत समझता हूँ, मुझे और किसीसे क्या ! ॥ १५ ॥ यदि देवकीनन्दनके पूमनसे में पवित्र हो गया हूँ तग पूतना निपूदनके चरणोदकसे मैं धुल गया है और पार्यमारपिका मैंने सम्पद स्मरण किया है तो बेचारे यमत मेरा क्या करेंगे ! ॥ १६ ॥ • श्रीसीतापुरुस १५.,..." - थीकसूक्तिः अंसालम्बितबामकृण्डलवरं मन्दोबतचूलतं किशिलचितकोमलाधरपुटं साविप्रसारेक्षणम् । आलोलाहुलिपल्लवमुरलिकामापूरयन्तं मुदा मूले करपतरोखिमाललितं ध्यायेजगन्मोहनम् ॥९७ हे देव है दयित है भुवनकवन्धो है कृष्ण हे चपल है करणेकसिन्धी । है नाथ हे रमण है नयनाभिराम हाहा कदा नु भरितासि पदंशोम ||९८१ वन्द मुकुन्दमरविन्ददलायताक्षं कुन्दन्दराङ्गदशनं शिशुगोपवेपम् । इन्द्रादिदेवगणयदितपादपोटं बोपन्धेतक हमने हुए गुन्दर पण घरण किये हुए हैं, जिनकी भारि-रता उरमी ओर सनी रे, निनिमिएए अत्यन्न कोमल अपरपुर, औरणा रे तथा बोल्पनीने सरेप भरना मुकामम भैगुलियोगोपीरे-धीरे किराते हुए प्रमुख बशीमा उन मिस अगम्मान समुन्दरमा पान करना मारिए रतिमाएपमा अगमण! पण! पाणामार! माप! रमण ! मायाम ! भाग ने नाम- मm RRP पाडो मा लास- गोगा मादिरा राशि परपोषी पापा और ... ra- -di---- गतिगार मन्दानालगमई वगुदेवानुम् ।। ९९० जि कीर्तयम मुररिपुं गतो मज श्रीपरं पानिल रामयान्युताय श्रोपद्वय त्वं गृणु। लोकय हागनदयहरेगन्छाहपुग्मालयं जिन प्राण मान्दपादतुलगी मर्दनमापोरानम्।१००१ लोकाः मृगृत प्रमतिमरणग्यामिकिरमामिमा गमाः समुदादरन्ति मुनयो यो यामवलम्यादयः। स्न्तग्योंविरमेयमेकममृतं कृष्णालयमापीयतां पोतं परमाप, पितनुते निर्वाणमात्यन्तिकम् ॥१०॥ चुच्छेदैकमन्न सफलमुपनिपटाक्यसम्पूज्यमन्त्रम् सारोच्छेदमन्त्रं ममुचिततमसः सहनिर्याणमन्त्रम् । दत है, उन पदापननिवासी वसुदेवनन्दन मुकुन्दको मैं वन्दना ता हूँ ॥ १९ ॥ हे जिहे ! केशवका कीर्तन कर, नित्त! मुरारिको न, युगल हस ! श्रीधरकी अर्चना करो, दोनों कानो ! नुम अच्युत- फमा भषण फरो, नेत्रो ! कृपया न करो, युगल चरणो ! भगवत्- नौमें भ्रमण करो, अरी मासिके ! मुकुन्दचरणसेविता तुलसोकी गन्ध और है मस्तक! मगवान् अधोक्षज के सामने एक ॥ १०॥ लोगो ! जन्म-मरणरूप व्याधिको इस चिकित्साको सुनो, जिसे जवल्ल्यादि योगवेत्ता मुनिजन बताते हैं, अन्तःकरणमें प्रकाशित वाला जो कृष्ण नामका एक अप्रमेय एवं अनामय अमृत है उसका . करो, वह परमौषधि, पान करते ही आत्यन्तिक शान्तिका विस्तार की है ||१०१॥ शत्रुओंके विनाशका एकमात्र मन्त्र, सम्पूर्ण उपनिषद् योंमें पूज्य मन्त्र, भव-वन्धनका उच्छेद करनेवाला मन्त्र,अज्ञानान्धकार- * श्रीकुलशेखरस्य मुकुन्दमालागाम् १,२०, १५ ॐ श्रीकृष्णसूक्ति सवैश्वर्यकमन्त्रं व्यसनमुजगसंदष्टसंत्राणमन्त्रं जिह्वे श्रीकृष्णमन्नं जप जप सततं जन्मसाफल्यमन्त्रम् ॥१०॥ व्यामोहनशमीप, मुनिमनोवृत्तिप्रवृत्यौपचं दैत्येन्द्रार्तिकरौप, त्रिभुवने सञ्जीवनकौषधम् । भक्तात्यन्तहितीप, भवभयप्रध्वंसनकोप, श्रेयाप्राधिकरौपचं पिब मना श्रीकृष्णदिव्यौपधम्।१०३।* शृण्वजनार्दनकथागुणकीर्तनानि देहे न यस पुलकोद्गमरोमराजिः । नोत्पद्यते नयनयोविमलाम्बुमाला धिक् तस्स जीवित्तमहो पुरुषाधमस्य ।।१०४॥*- अलमलमलमेका प्राणिनां पातकानां निरसनविपये वा कृष्णकृष्णेति वाणी। के समूहको भगा देनेवाला मन्त्र, सम्पूर्ण ऐश्वयों का एकमात्र साधक मन्त्र, जन्मको सफल कर देने वाला मन्त्र, व्यसनरूप साँसे ढसे हुएको रक्षाका मन्त्र मोधीकृष्णमन्त्र है उसको अरी जि !न् सदा जपा कर ॥१०२॥ मोह- का नाश करनेवाली धूटी, मुनियोंकी मनोवृत्तिको प्रवृत्त करनेवाली बूटी, दैत्यराजोंके लिये दुःखदायिनी यूटी, त्रिभुवनके लिये एकमात्र सञ्जीवनबूटी, मतोंकी परमहितकारिणी बूटी, संसारके भयको हरण करनेवाली और कल्याणकी प्राप्ति कराने वाली जो भीकृष्णरूपी दिव्य बूटी है उसको भरे मन नित्य पोता रह ॥ १.३ ।। भगवानकी कथा, गुण और कीर्तनादिको सुनते हुए जिसके देदमें रोमाञ्च नहीं होते और ऑसोंसे निर्मल अश्रुधारा नदीवरती ऐसे अधम पुरुएके जीवनको धिक्कार है ! ॥१०॥ श्रीयोंके पापोंको भगाने में कृष्ण ! कृष्ण ! पेसा एक बार बोलना ही पयांत में निराधाकर पदि भवति मान्दै मतिरानन्दसान्द्रा फरतलकलितासामोधसाम्राज्यलक्ष्मी॥१०५|| कृष्ण त्वदीयपदपजपरान्तं अयेत्र में विगत मानमराजहंमः । प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्त काठावरोधनविधी सारणं कुतस्ने ।।१०६|| कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां मरति नित्यगः । जलं मिच्वा यथा प नरकादुद्धराम्यहम् ।।१०७|| सत्यं ब्रवीमि मनुजाः स्वयमूर्ध्वबाहु- र्यो मां मुकुन्द नरसिंह जनार्दनेति । जीयो जपत्यनुदिनं मरणे रणे या पापाणकाष्ठसदृशाय ददाम्यभीष्टम् ॥१०॥ -फिर यदि भगवान्में आनन्दघनमयी प्रेमकि हो जाय तो मो. म्राज्यलक्ष्मी हथेलीमे ही आ जाय ॥१.५॥ हे कृष्ण ! मेग मनरूपी जहंस आपके चरणारविन्दरूपी पीजड़े में आज ही प्रविष्ट हो जाय क्योंकि Tणविसर्जनके समय कफ, वात, पित्तादिसे कण्टके रुक जानेपर सापका स्मरण भला कैसे होगा !॥१६॥ जो मुझको 'कृष्ण! कृष्ण ! ष्ण !'ऐसा नित्य स्मरण करता है उसको मैं नरकसे ऐसे निकाल देता हूँ से जलका भेदन करके कमल अछूता निकल जाता है ।। १०७ ॥ हे अनुष्यो ! मैं स्वयं हाथ उठाकर सत्य-सत्य कहता हूँ; जो जीव मुझको मुकुन्द ! नरसिंह ! जनार्दन! इस प्रकार मरणसमयमें या रणमें भजता . पाषाण अथवा काष्ठसहश हुए भी उसको मैं अभीष्ट फल दे -भीकुलशेखरस्य मुकुन्दमालायाम् ५१,३३ ।।मीपाण्डवगीतायाम् १५,३७॥ - -- थ्रोशप्णमूति गोकोटिदानं ग्रहणेपु काशीप्रयागगङ्गायुतकल्पामः। यतायुतं मेरुमुरर्णदानं गोविन्दनानान कदापि तुल्यम् १०९५ वासुदेवं परित्यज्य ऐऽन्यं देवमुपासते। इपिता जाहवीतीरे कृपं वान्छन्ति दुर्भगाः ॥११॥ विदेणु जठरपटयोः शृङ्गात्रे च कशे वामे पाणी ममणकवलं तरकलान्यहुलीपु । निष्ठन्मध्ये स्वपरिगुहदा हामयनममिः स्वः मर्ग लोक मिपति युभुज यममुग्यालरलिः ॥११॥ नॉमीय तेऽमरपुष नखिदम्बराप गुआवतंसपरिपिच्छसमन्मुपाय । दा॥ १.८ ॥ ममे परोपी गापान, की, माग आदि तीयोंमें गाय तरपर मामा वर्षात काम करना हमारी पर परना, मेरक परामर गुपया दान बरना भी गौकिक नामरमरणो परीकीरोनारे ११.१ ओभगवान रामुकर दूसरे देवनागरी उगलना बारेमानी पानोरा तere भागोलारे ॥११. पप गमुकामगार in भोर कोसरेरामा पनि नेपाल रे भोर दाहिने अपने भालोमे उ मालिक माने मिती र रकम पानी में उनसे गाल पो भोगा भगवान् समीर सोए मोमन ॥ १११॥ माना! भारम नाम Artiater पर, Prot rent धारामा एलरे, ९२ सूक्तिसुधाकर वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणयेणु- लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय ।।११२। तावद्रागादयः स्तनास्तावत्कारागृहं गृहम् । तावन्मोहोऽधिनिगडो यावत्कृष्ण न ते जनाः॥११॥ समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशो मुरारेः । भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद्विपदां न तेपाम् ।११४॥ बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कणिकारं विभ्रवासः कनस्कपिशं वैजयन्ती च मालाम् । रन्धान्वेणोरधरसुधया पूरयन्गोपवृन्दै- वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः॥११५|| आप वनमालाधारी हैं, कलेया, लकुट, नरसिंहा और बाँसुरीके चिहाँसे मुशोभित है-ऐसे कोमलचरणवाले गोपालनन्दन आपको नमस्कार करता हूँ। ११२ ॥ रागादि तभीतक चोर हैं, घर तमीतक कारागार है और मोह सभीतक पॉवोंमें बेड़ी डालनेवाला है जबतक है कृष्ण ! ये मनुष्य आपके नहीं होते ॥११३|| जो मुरारिके पावन यशवाले पादपालव. मयी नौकारूप महापदके आश्रित है, उनके लिये संसार-समुद्र गोखुरके सहश हो जाता है, परमपद प्राप्त होता है और पद-पदपर आनेवाली विवियों नहीं रहती ॥ ११४ ॥ जिनके शिरपर मोरमुकुर, जिनका घेष नटपर है जो कानों में कनेरके फूल पहने है, मुवर्णसाश पीतवस्त्र धारण करते हैं, जिनके गलेमें वैजयन्तीकी माला है, जिनके विमल यसका गोपियोंने गान किया है ऐसे भगवान् येणुरों को अपनी अपर. मुपासे पूर्ण करते हुए गोपसमूहके साप अपने चरण-चिहाँसे रम्य प्रतीत दोनेवाले वृन्दावनमें प्रविष्ट हुए ॥ ११५ ॥ अहो!इस अगाप्पो पूतनाने • माग...१४.१,११,५८१.१५ श्रीकृष्णसूक्ति अहो धकीयं स्तनकालकूट जियांसयापाययदप्यसाची । लेभे गति धान्युचितांततोऽन्यंकंवा दयालु शरणं ब्रजेम ११६* आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्द योगेश्वरैहदि विचिन्त्यमगाधबोधैः । संसारकूपपतितोत्तरणावलम्ब गेहंजुपामपि मनस्युदियात्सदानः॥११७॥ अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्या पशूननु विवेशयतोर्वयस्यैः। वक्त्रं ब्रजेशसुतयोरनुवेणुजुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ॥११॥ नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोनाह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥११॥ अपने स्तनों में लगाये हुए कालकूटको जिसे मारने की इच्छासे पिलाकर भी घात्री के लिये उचित पदको पास किया उस परमदयालुके अतिरिक्त हम और किसको शरणमें जाये ११११६॥ [ गोपियों ने कहा---] हे पदनाम ! पूर्ण ज्ञानी योगेश्वरों के द्वारा हृदयमै चिन्तन करने योग्य आपका चरणारविन्द, जो संसारपमें गिरे हुए जीवोंके उसारका सहारा है, घरपर रहती हुई भी हमलोगोंके हदय सदा प्रकट हो ।। ११७ ॥ हे मखियो । नेत्रवारोंके नेप्रका हम इससे बढ़कर कोई फल नहीं जानती, जिन्होंने ग्यालबालोंके साय गौओंके पीछे जानेवाले दोनो मजराजकुमारोंके वेणु बजाते हुए प्रेमपूर्वक कटास करने वाले बदनको सौन्दर्यमुनाफा पान एवं सेवन कर लिया है।॥ १९८॥ विपकुलपालक और गो-ब्रामण-हितकारी देवको नमस्कार है, जगत्-प्रतिपालक गोविन्द श्रीकृष्णको बारंबार नमस्कार • माग.१.२२११.८२४९१२११७.१५ গি गोविन्द ढारिफायामिन कृष्ण गोपीजनप्रिय ! फोरः परिभूना मा कि न जानामि केव ॥१२०॥ শায় ; দাগ সাবিনায়ন। कारवार्णयमा मामुदरम्य जनार्दन ॥१२शा भियः कान्ताः कान्तः परमपुरा कन्पतरको द्वमो भूमिभिन्तामणिगणमयी तोयममृतम् । कथा गानं नामांगमनमपि यंशी प्रियसी चिदानन्दं ज्योतिः परमपितदाखायमपि च॥१२२॥ यस्यकनिन्धसितकालमथावलम्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाया। विष्णुर्महान्स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं मजामि ॥१२॥ है॥११॥ [द्रौपदीने कहा- हे गोविन्द ! द्वारकाके रहनेवाले, हे गोपी- पल्लम श्रीकृष्णचन्द्र ! क्या आप मुझे कौरवों के द्वारा अपमानित होती हुई नहीं जानते ! ॥१२०॥ नाय ! हे लक्ष्मीपते ! हे दुःखदलन ब्रजराज! हे जनार्दन ! इस कोरयोंकी समारूपी समुद्र में डूबती हुई मुहको बचाओ!॥ १२॥ गोलोककी समन गोपियाँ लक्ष्मी-सी पतिरूपमें पुरुषोत्तम कृष्ण है, सभी वृक्ष कल्पद्रुम हैं, भूमि चिन्तामणिमयी है, जल अमृत है, यार्तालाप गान है, चलना-फिरना भी नृत्य है और वंशी, प्रिय सखियाँ तथा ज्योति आदि समी चिदानन्दमय, उत्कृष्ट और आस्वादनीय ही हैं ।। १२२ ॥ जिसके एक श्वास लेनेतकके सपयमें ही लोमकूपसे उत्पन्न हो समस्त लोकपाल जीवित रहते हैं वे महाविष्णु भी जिनकी एक कलाविशेष हैं, ऐसे आदिपुरुष गोविन्दका मैं मजन करता हूँ ॥१२३|| * महा सभा.३७.४१,४२,४३ हिम०५/५६,४८ + श्रीकृष्णसूक्ति सान्द्रानन्दपुरन्दरादिदिविषद्वन्दरमन्दादरा- दान कुटेन्द्रनीलमणिभिः सन्दर्शितेन्दीवरम् । स्वच्छन्द मकरन्दसुन्दरगलन्मन्दाकिनीमेदुरं श्रीगोविन्दपदारविन्दमशुभसन्दाय चन्दामहे ॥१२४॥ राधामुग्धमुखारविन्दमधुपवलोक्यमौलिस्थली- नेपथ्योचितनीलरतमवनीभारावतारक्षमः । खच्छन्दवजसुन्दरोजनमनस्तोपपदोपश्चिरं कंसध्वंसनधूमकेतुरवतु त्वां देवकीनन्दनः ॥१२॥ वेदानुद्धरते जगन्ति वहते भूगोलमुद्रिभते दैत्य दारयते अलि छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते । अत्यन्त आदरसे साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए, घन आनन्दमें निमग्न इन्द्रादि देवगणों के द्वारा उनके मुटके नीलमकी प्रभासे जो नीलकमलके समान दीखते हैं तथा मकरन्दसमान गङ्गासे भीगे रहते हैं उन गोविन्द के चरणारविन्दोको अपने अशुभके नाश ( कल्याण प्राति) के लिये हम स्वेच्छासे प्रणाम करते है ।। १२४ ॥ जो श्रीराषिकाजीके मनोहर मुखार- चिन्दके भ्रमर, तीनों लोकों के मस्तकी आभूषणोचित नीलमणि, भूभार हटानेमे समर्थ, स्वच्छन्द प्रजबालाओके मनको सन्तोष देनेवाले सायंकालरूप और कसको नाश करनेमें आमस्यरूप है ऐसे देवकीनन्दन तुम्हारी रक्षा करें ॥ १२५॥ [ मस्त्यरूप कर ] वेदोका उद्धार करनेवाले, [कच्छप होकर ] ससारका भार दोनेवाले, [धाराह होकर] पृभ्योको पाताल से लानेवाले, [नृसिद होकर] दिरण्यकशिपु दैत्यको मारनेवाले, [ वामन होकर ] लिको छन्टनेवाले, [परशुराम होकर] शत्रियों का नाश करने वाले, [राम होकर ] रावणको +भीजापति सूकिसुधाकर लस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्यते उच्छान मूर्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुम्यं नमः। से चञ्चलतां गतस्य ललनावृन्दस्स मध्ये हरी जत्येप कथं भवेदुपमितिस्तादृङ् न मावो मुवि । त्याच्चञ्चलता गता विपुलता विद्युत्सु संनतनं मध्ये जलदस्य नर्तनमतिः शोभा भवेत्ताशी ॥१२७॥ कृष्णस्य मनोज्ञनादमुरली विम्बाधरं श्रीमुखं म्पूर्णाकृतिमच्छशाङ्कललितं हृत्कौस्तुभाध्यासितम् । दौ नूपुरम शिञ्जितनमत्कैवल्यनिन्दाक्षम- नादौ तप्तसुवर्णकान्ति वसनं साक्षात्कारप्ये कदा ॥१२८॥ तनेवाले, [बलराम होकर ] हलको धारण करनेवाले, (बुद्ध होकर) रुणाका विस्तार करनेवाले तथा ( कल्कि होकर) म्लेच्छोंका नाश रनेवाले इस प्रकार दश अवतार धारण करनेवाले आपकृष्ण भगवान्को मस्कार है ।। १२६ । रासक्रीडामें नृत्य करती हुई अत्यन्त चञ्चल मणियों के बीच ये मगवान् कृष्ण [ नृत्य करते हुए ] शोमा पा र है, नकी उपमा कसे दी जाय ! संसारमें ऐसी कोई यस्तु नहीं है जिससे पमा हो], यदि आकाशमें कुछ देर चालताको छोड़कर बिजली सिर - और उसके बीचमें श्याममेघ [अनेक रूप धारण करके ] नृत्य करे येसी शोमा हो सस्ती है ।। १२७ ॥ श्रीकृष्णकी मधुर स्वरभरी यंशी, पके समान माल ओटीवाला और पूर्णचन्द्रकी कान्तिी युक्त मुन्दर मुख, रितुभमणिसे चमरवा हुभा वायर, नूपुरीकी मथुर हानकारसे दरते र मोदरदको भी फीका करनेवाले स्वादमे युक्त चरणयुगल और नाये सोनेगी कान्तिके समान पीनाम्बर-इनका में का प्रायश जयदेव गागोनिया..मारमतस्य औरणा लिया। -

& श्रीकृष्णसूक्ति
श्रीकृष्ण श्याम राधाषय यदुनृपते यामुनप्रान्तचारिन्
धृन्दारण्यकवासिन्मधुरशशिमुख लिग्धमूर्ते प्रजेश ।
चंशीयायोचित सम्मरपरिमलयुक्षिधसङ्क्रान्तचूड
प्रत्पङ्गश्रीनिवास प्रदिशा मनसि मे स्वीयमक्तिप्रकाशम् ।१२९६
कालिन्दीकुलकेलि कलितमुदिनीकान्तकान्ति कृपालु:
केशिकान्तागुकी पकडुलकलना कालियाकालनोत्कः।
काव्याङ्ककान्तका कुरुकुलकपणा कालकण्टीकताः
कृष्णा कारुप्पकर्मा भवतु मयि कपादृष्टिरलिष्टकर्मा।१३०
इदानीमहमक्षालि
रचितं चानुलेपनम् ।
इदानीमेर ते कृष्ण धूली सरितं वपुः ।।१३१॥
दन काँगा ।। १२८॥ श्री रामसुन्दर, राधावल्लम,
मानाप, यमुनातीविहारी, एकमात्र राषनमें निवास करने वाले,
মামৰ শ মন মুশা, নি বা রং! ধী
टेने मग्न, मालाओबी भुगन्धो चुभ, मोरपंतने आ उन मनपाले
और भारत में मामी के शिवासभूतो भीमेश्यमें भरनी मस्ति-
का कारये ॥१२॥ यमुनातीरपर परनेवाले, मादमान्ति-
शुष,
दापोल और प्राणीयोरनेवाले, पटके मारा:
मारिषनागको उत्साह देनेवालेकाम और मारकोने वर्णित
परितमाले, कौरवोट ime, गिरवरूप, रमापूर्ण परगने
भोर मनासान मारमा
[भपा सोश पोरी-] मरेका अमीदोलान परावर पदनादि-
anभरभमीमामी सेयर पारितोमा १५॥
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मतिसुधाकर नाई विप्रो न प नरपतिनापि भ्यो नमूद्रो नाई वर्णी न च गृहपतिनों यनस्सो यति । किन्तु प्रोयनिखिलपरमानन्दपूर्णामृताब्धे- गोपीमतुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः ॥१३२ कृष्ण त्वं पठ किं पठामि ननु रेशावं किम ज्ञायते तत्त्वं कस विमोः स कनिमुवनाधीशय तेनापि किम् । ज्ञानं भक्तिरयो विरक्तिरनया कि मुक्तिरेवास्तु ते दम्यादीनि भजामि मातुरुदितं वाक्यं हरेः पातु वः॥१३३१ नवनीलमेघरुचिरः परः पुमानवनीमवाप्य धृतगोपविग्रहः । महनीयकीर्तिरमरैरपि स्वयं नवनीतभिक्षुरघुनासचिन्त्यते ॥ न में ब्राह्मण हूँ, न क्षत्रिय हूँ, न वैश्य हूँ और न शूद्र ही हूँ मैं न ब्रह्मचारी हूँ, न गृहस्स हूँ, न यानप्रभ्य हूँ और न संन्यासी है किन्तु सम्पूर्ण परमानन्दमय अमृतके उमड़ते हुए महासागररूप गोपीकान्त श्यामसुन्दरके चरणकमलोंके दासोका दासानुदास हूँ ॥ १३२ ॥ [यशोदा भैया बोली- १ कन्हैया ! तू पदा[कृष्ण-] 'क्या पर्दू ''अरे! शास्त्र पढ़', 'उससे क्या जाना जायगा'तत्व', 'किसका!' 'परमात्माका', 'वह कौन है ? "त्रिभुवनपति है', 'उससे क्या लाभ होगा ! 'शान, भक्ति और वैराग्यको प्राप्ति होगी', 'इनसे क्या होगा ?' 'मुक्ति', 'तब तो यह तेरी ही हो! मैं तो दही-रोटी ही लेना चाहता हूँ' माताके प्रति इस प्रकार कहे हुए भगवान् कृष्णके वाक्य आपकी रक्षा करें ॥ १३३ | जिसने पृथ्वीतलमें आकर नवीन नील मेधके समान श्यामसुन्दर गोपवेष धारण किया और जिसकी कीर्ति देवताओद्वारा भी प्रशंसित हुई उसी माखनको याचना करनेयाले परमपुरुषका मैं इस समय ध्यान करता हूँ ॥ १३४॥ + सार्वभौमवासुदेवभट्टाचार्यस्य । विस्वमङ्गल्नीचरणानाम् ।

श्रीकृष्णसूक्ति युगायितं निमेपेण चक्षुपा प्रावृषायितम् । शून्यायितं जगत्सर्व गोविन्दविरहेण मे ॥१३५|| अयि नन्दतनूज किङ्करं पतितं मां विपमे भवाम्बुधौ । कृपया तर पादपङ्कजस्थितधूलीसदृशं विचिन्तय ॥१३६।। वंशीविभूषितकरानवनीरदामात् पीताम्बरादरूणविम्बफलाघरोष्ठात् । पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ११३७ ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तनिर्गुणं निष्क्रिय ज्योतिः किञ्चन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते । असाफ तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाचिरं कालिन्दीपुलिनेषु यत्किमपि तन्नीलं महो धावति ॥१३८॥ गोविन्दके विरहसे आज मेरे लिये क्षण युगके समान प्रतीत होता है आँखें पायस मनु-सी अश्रु-वर्षा कर रही है और सास ससार सूना-स जान पड़ता है ।। १३५ ।। है नन्दनन्दन ! इस विषम ससारसागर गिरे हुए मुझ दासको अपने चरणारविन्दोपर पड़ी हुई धूलिके सह- जानकर कृपया मुधि लीजिये ॥ १३६ ॥ जिनके करकमल वंशी विभूषित हैं, जिनकी नवीन मेघकी सी भाभा है, जिनके पीत वस्त्र अरुण विम्बफलके समान अधरोष्ठ है। पूर्णचन्द्र के सदृश सुन्दर मुख मैं कमलके से नयन है ऐसे भगवान् श्रीकृष्णको छोड़कर अन्य किसी तावको मैं नहीं जानता।। १३७ ॥ ध्यानाभ्याससे मनको खवा कर योगीजन यदि किसी प्रसिद्ध निर्गुण निष्किा परमज्योतिको देखते हैं वे उसे भले ही देख परन्तु हमारे लिये तो भीयमुनाजीके तटपर [कृष्णानामवाली ] वह अलौकिक नील ज्योति दौड़ती फिरती है, व चिरकातक लोचनौशे चकाचौघमें डालने वाली हो । १३८ गनिमुधाकर चिदानन्दाकारं जलदरुचि सारं श्रुतिगिरी प्रजनीणां हारं मवजलधिपारं कृतषियाम् । विहन्तुं भूमारं विदधदयतारं मुहुरहो महो बारम्बारं भजत कुशलारम्भकतिनः ॥१३९॥ चयत्यनिशं मर्म मम मायानिशाचरी। कासि हे पूतनायाविन मायाकुहकनाशक ॥१४०nt त्वं पापितारका कृष्ण भवसागरनायिका । प्राहि मां भवभीमाब्धेस्तव शरणागतम् ॥१४॥ किं करोमि व गच्छामि कं वा शरणमाश्रये। विमुखे त्वयि गोविन्द हा हा पापी हतो हतः ॥१४॥ हे कल्याणमय आरम्म करनेवाले कार्यकुशल लोगो! जो चिदानन्दस्वरूप है, मेधके सदृश कान्तिवाला है, श्रुतियोंका सार है, मजबालाओंके गले. का हार है, बुधजनों के लिये संसारसमुद्र के पार करनेका एकमात्र साधन है और पृथ्वी के समस्त भार हरण करने के लिये जिसने वारंवार अवतार धारण किये हैं उसी परमात्मतेजका बारंबार मजन करो ॥ १३९ ।। हे मायाछविनाशिन्, पूतनानिपूदन, कृष्ण ! तुम कहाँ हो ? यह माया रूपिणी निशाचरी रात-दिन मेरे मर्मस्थानोंको चबाये डालती है ॥१४॥ हे कृष्ण ! तुम पापियोंके तारनेवाले हो और भवसागरके चतुर नाविक हो। अब तुम्हारी ही शरणमें आये हुए मुझे संसाररूप भयङ्कर समुद्रसे पार करो॥१४१॥ हे गोविन्द ! हा! आपके विमुख होनेके कारण मैं पापी नष्ट हो रहा हूँ | अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? किसकी शरण ~ ॥१४२॥ श्रीमधुसूदनसरस्वतीस्वामिनः । श्रीताराकुमारस्य ।

श्रीकृष्णसूक्ति रे रे मानसभृङ्ग मा कुरु मुधा झझारकोलाहलं निःशब्दं हरिपादफुल्लकमले माध्वीकमास्वादय। तमिन् सर्वपापहारिणि चिदानन्दे मरन्दे सक- निष्पीते क नु ते प्रयास्यति लयं साहतिकृतिः।१४३।* येषां श्रीमधशोदासुतपदकमले नास्ति भक्तिर्नराणां थेपामाभीरकन्याप्रियगुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा । येषां श्रीकृष्णलीलाललितरसकथासादरौ नैव कौँ धिक्ताधिक्तान्धिगेत्तान्कथयति नियतं कीर्तनस्थो मृदङ्गः । जीर्णा तरी सरिति नीरगभीरधारा बाला क्यं सकलमित्थमनर्थहेतुः । अरे मनमधुप ! पर्थ शङ्कारमय कोलाहल मत कर, मौन होकर हरिके चरणरूपी विकसित कमलके मकरन्दका आस्वादन कर । सबकी प्यास बुसानेवाले उस चिदानन्दमय मकरन्दका एक बार भी पान कर लेने पर तेरी यह अहङ्कारसहित झनकार न जाने कहाँ विलीन हो जायगी ? ||१४३॥ जिन मनुष्योंकी यशोदानन्दनके चरणकमलों में भक्ति नहीं है, जिनकी रसना गोपकुमारियोंके प्राणाधार (श्रीकृष्ण ) के गुणगानमें अनुरागिणी नहीं है और जिनके कर्ण अति ललित श्रीकृष्णकथामृतके प्यासे नहीं हैं। उनके लिये कीर्तनमें बजता हुआ मृदङ्ग 'धिक तान् धिक् तान् धिगेतान्' (उन्हें धिक्कार है ! धिक्कार है !पिककार है!)-ऐसा कहता है ॥१४॥ नौका जीर्ण-शीर्ण है, नदीकी जलधारा बड़ी गम्भीर है, हम मी अभी बालिकाएँ ही हैं- इस प्रकार ये सब अनर्थके कारण हैं, इस समय हम * श्रीताराकुमारस्य । tोधरस्य अजविहारात कपाचिन्म अयं शेक: श्रीवाणेश्वर विद्यालझारस्य।

तिसुधाकर विधासपीजमिदमेव कशोदरीणी यन्माधयस्त्वमसि सम्प्रति कर्णधार ११४५|| श्रीकृष्णनामा जयवीह गश्वद कम्भित्स मशिन्मयनीलिमा में। यमानुरक्तं धवलत्वमेति स्थैर्य चचिरामलिनं चलंच॥१४॥ नमस्तस्मै परेशाप कृष्णायाद्भुतकर्मणे धूलिधूसरितालाय नमस्तैजसमूर्तये ।।१४७ नमः श्रीद्वारकेशाय गाध चारयते नमः। राजराजेश्वरायाथ पार्थसारथये नमः ॥१४८॥ नमोऽस्तु भीष्मभीष्माय प्रहादाहादकाय च। पर सहसपत्नीमिः सेविताय जितात्मने ॥१४९|| अबलाओं को केवल इतना ही मरोग कि है माधव ! हमारे कर्णधार आप हैं ॥ १४५ ।। सत् और चिद्रूप नीलिमा ही जिसका स्वरूप है ऐसा श्रीकृष्ण नामक कोई विलक्षण वर्ण इस जगतमें सदा विजयी हो रहा है, जिसमें अनुरक्त होने ( रंग जाने) पर मेरा मलिन और चञ्चल मन भी उज्यल एवं स्थिर हो रहा है ।। १४६ ।। जिन नन्दनन्दनके अङ्ग धूलि- धूसरित होते हुए भी परम तेजोमय हैं उन अद्भुतकर्मशाली श्रीकृष्ण भगवान्को नमस्कार है॥१४७॥ द्वारकाधीश होकर भी जो गौवोंके चराने- वाले हैं, तथा राजराजेश्वर होते हुए भी जो पार्थके सारथी बने हैं [उन अगुवकर्मा ] परमेश्वर भगवानको नमस्कार है ॥ १४८ ॥ बड़े-बड़े वीराके भी दिलको दहलानेवाले [ नृसिंहरूप } होकर भी जो दालक प्रहादको आनन्दित करनेवाले हैं तथा सोलह हजार पत्नियोंसे सेवित होनेपर भी जो जितेन्द्रिय हैं ऐसे [ अद्भुतकर्मा ] भगवान कृष्णको * भीषरस्य व्रजविहाराद पाण्डेयरामनारायणदत्तशास्त्रिणः ६ मीशिव- प्रकाशस्य कृष्णाद्भुतस्तोत्रात् ।

श्रीकृष्णसूक्ति १०३ A कार्य क्षुद्रमतिर्दास व स्वामी गुणवारिधिः । मुहुर्मुहुनिमग्नं मां क्षमस्व करुणानिधे ॥१५॥ शुद्धधति हि नान्तरात्मा कृष्णपदाम्भोजभक्तिमृते । वसनमिव क्षारोदर्भक्त्या प्रक्षाल्यते चेतः ॥१५॥ यद्वत्समलादर्श सुचिरं भसादिना शुद्ध। प्रतिफलति वक्त्रमुच्चैः शुद्धे चित्ते तथाज्ञानम् ॥१५२||* स्थूला सूक्ष्मा चेति द्वेधा हरिभक्तिरुद्दिया । प्रारम्भे स्थूला स्यात्सूक्ष्मा तस्याः सकाशाच ॥१५३॥* स्वाश्रमधर्माचरणं कृष्णप्रतिमार्चनोत्सवो नित्यम् । विविधोपचारकरणहरिदासः सङ्गमः शश्वत् ।।१५४॥* कृष्णाकथासंश्रवणे महोत्सवः सत्यवादश्च । नमस्कार है ।। १४९ ॥ भला कहाँ तो यह तुच्छ बुद्धिवाला दास, और कहाँ आप सरीखे गुण सागर स्वामी ? हे दयानिधे ! आपके गुण-समुद्र में बार-बार गोता लगानेवाले मुझ किङ्करका अपराध आप क्षमा करें ॥१५०॥ श्रीकृष्णचरणारविन्दौकी भक्तिरूपी अमृतके बिना चित्त शुद्ध नहीं होता। भक्तिसे चित्त उसी प्रकार स्वच्छ हो जाता है जिस प्रकार क्षारयुक्त जटके द्वारा घोनेसे वस्त्र ॥ १५१ 11 जिस प्रकार भस्म आदिके द्वारा चिरकालतक शुद्ध किये गये निर्मल दर्पणमें मुखका प्रतिविम्ब स्पष्ट दिखलाई देने लगता है उसी प्रकार शुद्ध चित्तमें ज्ञानका प्रादुर्भाव होता है ॥ १५२ ॥ हरिकी भक्ति दो प्रकारकी कही गयी है- स्थूल और सूक्ष्म | प्रारम्भमें स्थूल होती है और फिर उसीसे सूक्ष्म हो जाती है ॥१५३ ।। अपने वर्णाश्रमधर्मका आचरण, अनेक उपचारोंसे नित्य श्रीकृष्णप्रतिमाका पूजनोत्सष और इरिजनोंका निरन्तर सङ्ग करना, श्रीकृष्णचन्द्रकी कथाके श्रवणमै महान् उत्सप मानना, सत्य-माषण, ६श्रीशिवप्रकाशस्य पादतस्तोवाद - मीरराचार्यस्थ प्रपोधमपाकरात् १६७,१६८,१७१,१७२ ।

१०४ * सूक्तिसुधाकर परयुवती द्रविणे वा परापवादे पराङ्मुखता ॥१५५||* ग्राम्यकथारद्वेगः सुतीर्थगमनेषु तात्पर्यम् । यदुपतिकृयावियोगेव्यर्थगतमायुरिति चिन्ता।।१५६॥ एवं कुर्वति भक्ति कृष्णकथानुग्रहोत्पन्ना । समुदेति सूक्ष्ममक्तिर्यस्या हरिरन्तराविति ॥१५७|| स्मृतिसत्पुराणवाक्यैर्यथाश्रुतायां हरेर्मूतौं । मानसपूजाम्यासो विजननिवासेऽपि तात्पर्यम् ॥१५८॥ सत्यं समस्तजन्तुषु कृष्णसावस्थितेानम् । अद्रोहो भूतगणे ततस्तु भूतानुकम्पा स्यात् ॥१५९||* प्रमितयदृच्छालामे सन्तुष्टिर्दारपुत्रादौ। ममताशून्यत्वमतो निरहवारत्वमक्रोधः ॥१६॥ मृदुमापिता प्रसादोनिजनिन्दायां स्तुती समता। सुखदुःखशीतलोष्णद्वन्द्वसहिष्णुत्वमापदोन भयम्१६१५ रत्री, परधन और परनिन्दासे विमुख रहना, विषयवार्ता में उग, थियात्रामें तत्परता, 'भीकृष्णकयाके बिना व्यर्थ इतनी आयु चली यी'-ऐसी चिन्ता इस प्रकार मक्तिका साधन करते-करते भीकृष्ण- पाकी कृपासे यूपमा भक्तिका उदय होता है, जिसके भीतर भीहरिका देश होता है ॥१५४-१५७॥ स्मृति और सत्पुराणोके वचनोंसे भीहरिकी नी मूर्ति मनी है, उसकी मानसाका अभ्यास, निर्जन स्थानमें रहने -मगन, सत्य, गर माणियों में भीकृष्णकम्पितिका मान और जीवोके न निरता-इन मापनोंसे प्राणियोर दयामाय उपम हो जाता । १५८.१५९॥ थोडेमे यहम्छालाममै सन्तोन, श्री.गुर आदिमें वाका अमाप, निरहंकारता, अनोप, मृदुभाषण, समता, भपनी दा और निमें समानता, मुमदुःख एवं Tritणादिन्द्रों में राइन- •णरावास प्रयोषमुपासराव १.१, १0४, १५, १६, १.. TAN श्रीकृष्णसूक्ति निद्राहारविहारेबनादर सझराहित्यम् । वचने चानवकाश कृष्णसरणेन शाश्वती शान्तिः।१६२। केनापि गीयमाने हरिगीते वेणुनादे वा। आनन्दाविर्भावो युगपत्याधृष्टसाचिकोद्रेकः॥१६३॥ तसिननुभवति मनः प्रगृह्यमाणं परात्मसुखम् । स्थिरतां याते तसिन्धाति मदोन्मत्तदन्तिदशाम्॥१६४।। जन्तुपु भगवद्गाभगवतिभूतानि पश्यति क्रमशः एतादृशी दशा चेत्तदैव हरिदासवर्यः स्यात् ।।१६५|| यमुनातटनिकटस्थितवृन्दावनकानने महारम्य। कल्पद्रुमतलभूमौ चरणं चरणोपरि स्थाप्प ११६६|| तिष्ठन्तं घननीलं खतेजसाभासयन्तमिह विश्वम् । पीताम्बरपरिधानं चन्दनकर्पूरलिप्ससर्वाङ्गम् ॥१६॥ धीलता, विपत्तिमें निर्भयता, निद्रा तथा आहार-विहारादिमें अनादर, भासकिदीनताव्यर्थ वचनके लिये अनवकाश ( समय न मिलना), भीकृष्णम्मरणसे स्थिर शान्ति, किसी पुरुपने श्रीहरिका गीत गाया हो या मुरली रजाई हो तो उसे सुनते ही उत्क्षण आनन्दका आविर्भाव और साषिक हर्षका उल्लास-ऐसे अनुमवसे मन अब परमात्ममुखको प्रहण करके स्थिर हो आता है तर [प्रेमवश उसकी दशामदमत्त गमराजकी- सी हो जाती है, और यह सब जीवोंमें मगवद्भावको और कमसे भगवान्में सब जीवों को देखता है। जब ऐसी दशा हो जाय तभी वह भेष्ट हरिदास होता है ॥ १६०-१६५ ॥ यमुनातरके निकट स्थित दावनके अति रमणीय किसी काननमें कल्पके तले चरणपर घरण रखकर पृथ्वोपर मेटे हुए जो मेषो समान मामवर्ण है, अपने तेजसे विश्वको प्रकाशित कर रहे हैं, पीताम्बर धारण किये हुए २ पन्दनकपूरसे जिनका सम्पूर्ण र लिप्स हो सा है- •ौरहराचारस्व बोधगुराकराव १८०,१०१,५८२,१८१,९८४१०५ - मुक्तिसुधाकर आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डलयुगमण्डितश्रवणम् । मन्दसितमुखकमलं सुकौस्तुभोदारमणिहारम् ॥१६८।।* वलयाहुलीयकामानुज्ज्वलयन्तं खलङ्कारान् । गलविलुलितवनमालं स्वतेजमापास्तकलिकालम् ।१६९।* गुजारवालिकलितं गुआपुआन्विते शिरसि । भुक्षानं सह गोपः कुलान्तरवर्तिनं हरि सरत ॥१७०|| मन्दारपुष्पवासितमन्दानिलसेवितं परानन्दम् । मन्दाकिनीयुतपदं नमत महानन्ददं महापुरुषम् ।१७११ सुरभीकृतदिग्वलयं सुरमिशतेरावृतं सदा परितः। सुरभीतिक्षपणमहासुरभीमं यादवं नमत ।।१७।।* जनके नेत्र कानोतक पहुँचे हुए हैं, दो कुण्डलोसे जिनके दोनों कान भलंकृत्त है, जिनका मुखकमल मन्दहाससे युक्त है, जो कौस्तुभमणिसे युक्त न्दर हार पहिने हुए हैं, जो अपने प्रकाशमे कङ्कण, अङ्गठी आदि सुन्दर नाभूषणोंको सुशोभित कर रहे हैं, जिनके गलेमें वनमाला लटक रही है, पने तेजसे जिन्होंने कलिकालका निरास कर दिया है, गुञ्जापुञ्जसे युक्त जनके शिरपर भ्रमर गुजार कर रहे हैं, किसी कुञ्जके अन्दर बैठकर गोपोंके Tथ भोजन करते हुए ऐसे श्रीहरिका स्मरण करो ॥१६६-१७०॥ जो ल्पवृक्षके पुष्पोंकी गन्धसे युक्त मन्द पवनसे सेवित है, गगाजी जिनके रणकमलोंमें स्थित है, जो महानन्दके दाता हैं, ऐसे परमानन्दस्वरूप महा. रुपको नमस्कार करो ॥१७१|| दशों दिशाओंको जिन्होंने सुरभित कर स्या है, सुरभि (कामधेनु) सदृश सैकड़ों गायोंने जिन्हें चारों ओरसे घेर सा है, देवताओंके भयको दूर करनेवाले और महान् असुरोको यदायक उन यदुकुलनायक श्रीकृष्णको नमस्कार करो ॥ १७२ ॥ * मीशङ्कराचार्यस्य प्रबोधसुधाकरात १८६, १८७,१०८,१८,१९.। 74 .

श्रीकृप्पासूक्ति १०७ कन्दर्पकोटिसुभगं वाञ्छितफलदंदयार्णवं कृष्णम् । त्यस्त्वा कमन्यविषयं नेत्रयुगं द्रष्टुमुत्सहते ॥१७३॥* पुण्यतमामतिसुरसां मनोऽभिरामा हरे कथा त्यक्त्वा । श्रोतुं श्रवणद्वन्द्वं ग्राम्यं कथमादरं वहति ॥१७४॥* दौर्भाग्यमिन्द्रियाणां कृष्णे विषये हि शाश्वतिके। क्षणिक पापकरणेष्वपि सजन्ते यदन्यविपयेषु ॥१७५||* भूतेप्नन्तर्यामी ज्ञानमयः सचिदानन्दः । प्रकृतेः परः परारमा यदुकुलतिलकः स एवायम्।।१७६।।* साक्षायधैकदेशे वर्तुलमुपलभ्यते स्ववित्रम् । विश्य प्रकाशयति तत्सवः सर्वत्र दृश्यते युगपत् ॥१७७॥* जो करोड़ों कामदेयोंसे भी मुन्दर है, पाञ्छित फलके दाता हैं, उन दयासागर भीकृष्णको छोड़कर ये युगल नेत्र और किस विषयका दर्शन करने को उत्सुक हैं ॥१७३॥ अति पवित्र अति सुन्दर और सरस हरिकयाको छोड़कर, ये कर्णयुगल ससारी पुरुषों की चर्चा सुनने को क्यों मा प्रकट करते हैं ! ॥ १४ ॥ सदा विद्यमान श्रीकृष्णरूपी विषयक होते भी पापके साधन अन्य क्षणितविषयोंमें जोइन्द्रियाँ आशक्त होती हैंषदइनका दुर्भाग्य ही है ॥ १७५ ॥ जो शानस्वरूप, सचिदानन्द, प्रकृतिसे परे, परमात्मा, एवं सर्वभूतों का अन्तर्यामी है, यही में पदुकुलतिलक (भीण) १॥ १७६ ॥ जिस प्रकार सूयंका गोलाकार मण्डल साक्षात् एक देश में ही देखा जाता है, पर वह समस्त विश्वको प्रकाशित करता है और एकही कालमें सब जगह सय पुरषोंको दिसलाई देता है, [उसी •मीशहराचार्य प्रमुधाररात् १११,१२,१९१,११५,१५९।

समकिसुधाकर यद्यपि साकारोऽयं वयेकदेशी विभाति यदुनाया। सर्वगतः सर्वात्मा तथाप्ययं सचिदानन्दः ॥१७॥ ब्रह्माण्डानियहूनि पङ्कजमवान् प्रत्यण्डमत्यद्भुतान गोपान्वरसयुतानदर्शयदर्ज विष्णूनशेषांश्च यः। शम्भुर्यचरणोदकं स्वशिरसा धने च मूर्तित्रयाद् कृष्णो वै पृथगस्ति कोऽप्यविकृत सञ्चिन्मयो नीलिमा||१७९||* कृपापात्रं यस त्रिपुररिपुरम्भोजवसतिः सुता जहोः पूता चरणनखनिर्णेजनजलम् । प्रदानं वा यस त्रिभुवनपतित्वं विभुरपि निदानं सोऽसाकं जयति कुलदेवो यदुपतिः ॥१८०॥* बायाहस्तेऽर्पयित्वा भरणकृतिकृते मोहमूलोद्भवं मां तः कृष्णाभिधाने चिरसमयमुदासीनभावं गतासि । कार ] यद्यपि ये श्रीयदुनाथ साकार और एकदेशी प्रतीत होते हैं, थापि ये सवंगत, सर्वात्मा और सच्चिदानन्द हैं ।। १७७-१७८ ॥ जिसने झाजीको अनेक ब्रह्माण्ड और प्रत्येक ब्रह्माण्डमें पृथक्-गृथक् अति विचित्र झा, गोवत्सोसहित गोप और अनन्त विष्णु दिखलाये, तथा जिसके रणोदकको शिवजी अपने शिरपर घारण करते हैं, वह श्रीकृष्ण मूर्तित्रय ब्रह्मा, विष्णु और महादेव) से पृथक् कोई सचिन्मयी निर्विकार लिमा है ।। १७९ ॥ शिव और ब्रझा जिसके कृपापात्र हैं, जाह्नवी सके चरणनखकी घोवन है, त्रिलोकीका राज्य जिसका दान है, हम के आदिकारण, व्यापक और कुलदेव, उस यदुनाथ भीकृष्णकी य हो ।। १८० ॥ मोहरूपी मूलनक्षत्रमैं उत्पन्न हुए मुझ पुत्रको पालन- वण करने के लिये मायाके हायमें सौंपकर, हे कृष्णनामधारिणी मातः! तू *श्रीशङ्कराचार्यस्य प्रबोधसुधाकरा २.०, २४२, २४३ । m - धीशमानि मारकापिरामे मकदापि पदनं नवसे वं मदीयं नरम न फर्नुप्रभवसि भपनी किं नु मूलस मान्निम् ।।१८।। उदागीन: नमः गननमगुणः सङ्गरहितो मपानातः फानः पामिह भीषनगतिः। अफसादमाकं यदिन पुरले म्नेहमय नद पमय मीयान्तविमलजठरे मिन्पुनरपि ॥१८२|| सोसाधी स्वयी विमिनिमाया येदना माधिनानां गोगः परमाना लिमिा गदित मगले घण्टरम्मः । मोगापूजिताना मरति रविनगा फगामेदयन् बन्मे नंगनु नुनपतिं निर्विनं मे ॥१८॥ INITीनाराणामार मात्र FEMALE मोनम THEM.AmaAtewanatime आRIAur.far Rana पानाMRITrirat भANAMAHattest PurNetrietar ॥ से सीना rinkitainarami Nairm Paritram at Printerem.

लमकिशुमार
पाति।
निरमानन्दरामानिरधिगता गनिमेषः मता.
मारकाठमप्रलप्रमानमाराकातो
विमानागमतं निजानोपारामिरारादिदं
तमानक गेन याम्यगि मृगामान्तीगि गुप्तोऽगिकिम् १८४०
पेतमालां विराय पुरतः गंधाय कोटिद्वयं
तपय निधेहि गर्यविषयानन्यम प श्रीपतिम् ।
विधान्तिस्तिमप्पो फनु सपोर्मध्ये तदालोच्यता
पुस्त्या पानुमयेन यत्र परमानन्दन तत्सेव्यताम् ।।१८५||
पुत्रान्पनिमय नियोऽन्ययुपतीपिंचान्पयोऽन्यद्धनं
भोज्पादिधपि तारतम्पवशतो नालं समुत्कण्ठया ।
नित्यागरूपी भनके गमुद्रमे गर पुरुषों की उत्कष्टारूपी प्रपन वायुके
द्वारा खीच लाया हुभा मुन्दर नीटमेघ सेरे निकट ही अपने वचनको
पारा (धीगीता) से महुत विशानामृत की वषां कर रहा है। अरे चित्तरूपी
पपीहे ! यदि उसे था ही नहीं चाहता [तो इसमें कारण क्या है !]
क्या तुझे किसीने पकड़ लिया है अथवा न सो रहा हैteil अरे चित्त,
चञ्चलताको छोड़कर सामने तराजूके दोनों पलों में से एकमें सब विपर्योको
और दूसरेमें भगवान् भीपतिको रस्त, और इसका विचारकर कि दोनोंके
वीचमें विधाम और हित किसमें है ! फिर युक्ति और अनुमवसे
जहाँ परमानन्द मिले उसीका सेवन कर ॥ १८५॥ पुत्र, पौत्र,
स्त्रयाँ, अन्य युवतियाँ, [ अपना ] धन, परपन, और भोज्यादि
नदार्थोमें न्यूनाधिक भाव होनेसे कभी इच्छा शान्त नहीं होती;
* भीशङ्कराचार्यस्य प्रदोषसुधाकरा २४७, २४८।
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ॐ श्रीकृष्णसूक्ति नैतादृग्यदुनायके समुदिते चेतस्यनन्ते विभौ सान्द्रानन्दसुधार्णवे विहरति स्वैरं यतो निर्भयम् ।।१८६॥ काम्पोपासनयार्थयन्त्यनुदिनं चित्कलं स्वेप्सितं चित्स्वर्गमापवर्गमपरे योगादियज्ञादिभिः। असाकं यदुनन्दनाधियुगलध्यानावधानार्थिना कि लोकेन दमेन किं नृपतिना स्वर्गापवर्गश्च किम् ॥१८॥ आश्रितमात्रं पुरुषं स्वाभिमुखं कर्षति श्रीशः । लोहमपि चुम्बकाश्मा संमुखमात्रं जडं यद्वत् ॥१८॥ अयमुत्तमोऽयमधमो जात्या रूपेण संपदा वयसा । श्वान्योऽश्लाघ्यो वेत्थं न वेति भगवाननुग्रहावसरे ॥१८॥ किन्तु जब घनानन्दामृतसिन्धु विभु यदुनायक श्रीकृष्ण चित्त प्रकट होकर इच्छापूर्वक विहार करते है तब यह बात नहीं रहती, क्योंकि उस समय चित्त स्वछन्द एवं निर्भय हो जाता है ॥ १८६ ।। कुछ लोग प्रतिदिन सकाम उपासनासे मनोवाञ्छित फलकी प्रार्थना करते हैं, और कोई यशादिमे स्वर्ग और योगादिसे मोशकी कामना करते हैं। किन्तु यदुनन्दनके चरणयुगलोंके पानमें सावधान रहने के इच्छुक हमको लोक, दम, राजा. स्वर्ग और मोक्षसे क्या प्रयोजन है। ॥ १८ ॥ श्रीपति (श्रीक्ष्ण ) अपने आश्रित पुरुषको अपनी ओर से ही खींचते है जैसे सामने आये हुए जड़ सोरेको चुम्बक अपनी और सींचता है ॥ १८८11 कृषा करते समय भगवान् यह नहीं विचारते कि जाति, रूप, धन और आयुसे यह उपम है या अधम ! स्तुर है या निन्ध ! ११८९ ।। भराचार्य १.५।

सुतिसुधाकर *-*-*-*-*- अन्तःखमावमोक्ता ततोऽन्तरात्मा महामेघः। खदिरश्वम्पक इच या प्रवर्पणं किं विचारयति ॥१९० यद्यपि सर्वत्र समस्तथापि नृहरिस्तथाप्यते। भक्ताः परमानन्दे रमन्ति सदयावलोकेन ॥१९॥ सुतरामनन्यशरणाः क्षीराद्याहारमन्तरा यद्वत् । केवलया स्नेहशा कच्छपतनयाः प्रजीवन्ति ॥१९२॥ पद्यपि गगनं शून्यं तथापि जलदामृतांशुरूपेण । चातकचकोरनामोदृढभावात्पूरयत्याशाम्, ॥१९३।।* द्वद्वजतां पुंसां दृग्वाङ्मनसामगोचरोपि हरिः। रुपया फलत्यकसात्सत्यानन्दामृतेन विपुलेन ॥१९४॥* सह अन्तरात्मा (श्रीकृष्ण) रूपी महामेघ आन्तरिक भावोंका ही भोक्ता मेघ क्या वर्षाक समय इस बातका विचार करता है कि यह बदिर (खैर) है अथवा चम्पक (चम्पा) है १ ॥१९०॥ यद्यपि भगवानु हरि सर्वत्र समान है, तथापि भक्तजन उनकी दयाधिसे परमानन्दमें मण करते हैं ।।१९१॥ जिस प्रकार कि जिनका कोई सहारा नहीं होता ऐसे कधुरके यच्चे दूधके बिना ही केवल माताकी स्नेहदृष्टि से ही जीयन धारण करते हैं।। १९२॥ यद्यपि आकास शून्य है तथापि धावक और चकोरकी दमायनासे षद मेघ और चन्द्रमाके रूपमें समस्त दिशाभीको पूर्ण कर देता । उसी प्रकार पाणी और मनके अगोचर मी श्रीहरि शरणागत पुरुषको ना कारण ही सत्यानन्दरूपी अमृतसे भर देते ॥ १९३-११४॥ • नीचरायंस प्रभाकरार १५१,३५४,१५५,२५५,२५॥ १ - * श्रीनन्दादिगोपसूक्ति লম্বিয়ায়ূচ্ছি। श्रुतिमपरे स्मृतिमारे भारतमपरे भजन्तु भयभीताः । अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परं ब्रह्म ||१९५||* दोहा प्रायो न भवति गवां दोहनश्वेन पाक: क्षीराणां स्यात् स यदि घटते दुर्लभ तधित्वम् । दभः सिद्धौ क खलु मथनं मन्यने कोपयोगः तक्रादीनामिह गविरभूदद्य गोधुरगृहेषु॥१९६॥ अहो भाग्यमही भाग्यं नन्दगोपनजौकसाम् । यन्मित्रं परमानन्दं पूर्ण ब्रह्म सनातनम् ॥ १९७॥ चरिभाग्यमिह जन्म किमप्पटव्यां यदोकुलेऽपि कतमाधिरजोऽभिपेकम् । संसारसे भयभीत होकर भले ही कोई भूतिको, कोई स्मृतिको और कोई महाभारतको भनें, मैं तो एक नन्दबाबाको ही भजता हूँ जिनकी देहलीपर साक्षात् परब्रहा विराजमान है ॥ १९५ । [उद्धवने कहा- श्रीकृष्ण !] पृन्दावनमें प्रथम तो प्रायः गोदोदन ही नहीं होता, दोहन भी हो गया तो दूध नहीं उबाला जाता, यदि उभाला मी गया तो उसकादही जमाना काटन है, यदि दही मी जमातो उसका मन्यन कॉऔर मन्धन भीहो जाय तोतादिका का उपयोग हो। [आपके न होने] गोपों के घरोंमे आजकल ऐसी दुर्दशा हो रही है ११६॥ महो! नन्दगोप और उन प्रजवासियोंका राही सौभाग्य है जिनके मित सनातन परमानन्दमय पूर्ण ना परमेश्भर हैं ।। १९७ ।। इस प्रज भीतर इन्दावन या गोकुलमें कहीं भी जन्म शेना बड़े सौभाग्यकी रात है, क्योंकि ऐसा होनेसे घडकि किसी भी निवासीकी चरणरजसा मोरवाया। TIT गतिसुधाकर यजीवितं तु निसिलं भगवान्मुकुन्द- स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव ॥१९८|| श्रीपशोचालूक्तिः यद्रोमरन्ध्रपरिपूर्तिविधायदक्षा बाराहजन्मनि बभूवुरमी समुद्राः तमाम नाथमरविन्ददृशं यशोदा पाणिद्वयान्तरजले सश्याम्बभूब यशोदया समा कापि देवता नास्ति भूतले । उलूखले यया पद्धो मुक्तिदो मुक्तिमिच्छति ॥२०॥ किं घूमस्त्वां यशोदे कति कति सुकृतक्षेत्रवृन्दानि पूर्व गत्वा कीविधानः कति कति सुकृतान्यर्जितानि त्वयैव । नो शको न खयम्भूनच मदनरिपुर्यस्य लेभे प्रसाद तत् पूर्ण ब्रह्म भूमी विलुठति विलपन कोडमारोढुकामम्।।२०१।। अभिषेक प्राप्त हो सकता है। अहा! इन गोकुलवासियोंके तो जीवनसख भगयान् कृष्ण ही हैं जिनकी पादरेणुको आज मी श्रुतियाँ हूँद रही हैं ।।१९८॥ वाराहावतारमें वे [ सारे ] समुद्र जिनके रोम कूपको भी भरनेमें समर्थ न हो सके उन्हीं कमलनयन श्रीकृष्णको मैया यशोदाने अपनी अअलिभर पानीसे नहला दिया! ) १९९) संसारमें यशोदाके समान कोई भी देवता नहीं है, जिसके द्वारा ऊखलमें बाँधेजानेपर [मुमुक्षुओंको] मोक्ष देनेवाले भगवान् कृष्ण भी मोक्ष (छूटने) की इच्छा करते हैं ।।२००॥ अरी यशोदे ! तुझसे हम क्या कहें, अकेली तूने ही न जाने कितने पुण्यक्षेत्रोंमें जाकर किन-किन विधियोंद्वारा कितने-कितने पुण्य कर्म किये हैं ! सरी ! जिसकी कृपाकटाक्षको इन्द्र, ब्रह्मा और महादेव कोई भी नहीं प्राप्त कर सके, वह पूर्णब्रह्म (श्रीकृष्ण ) तेरी गोदमें चढ़ने के लिये रोता हुआ पृथ्वीपर लोट रहा है ! ॥ २०१ ॥ • भाग.१०।१४।२४ मीलीलाशुकस्स २ । २०

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श्रीराधासूक्ति -* श्रीरापासूक्तिः घेकां नौमि नीलाम्जमदमोचनलोचनाम् । नन्दनन्दनप्रेमवापीखेलन्मरालिकाम् ॥२०२ ॥ दकुञ्जममुं पश्य सरसीरुहलोचने । ना कुन्दकुञ्जन सखि मे किं प्रयोजनम् ।। २०३॥ मरकृष्णे मधुपुरगते निर्मला कापि बाला पी नीलोत्पलनयनजां पारिधारां वहन्ती। निव्याप्ता शशधरनिभं धारयन्ती तदास्यं प्रीतिच्युतिकृतजरा निर्भरं कातराभूत् ।।२०४॥ ने नयनोंमे नीलकमलके मदका मर्दन करनेवाली और श्री. की प्रेममयी बावलीम खेलनेवाली राजहंसी श्रीराधिकाजीको मैं करता हूँ ॥२०२॥ [ सखी-] 'हे कमललोचने राधे ! इस कुन्द- 'राषा-]"हे सखि ! इस कुन्द-कुलसे मुझे क्या काम [यहाँ राधाकी बातचीतमें गूढ अर्प है। सखी राधाको मुकुन्दकी याद कहती है कि 'अमुम्'-'मु' से रहित कुन्द कुझको देख, सखीके पको समझकर राधा कहती है। हमें अमुना'-'मुसे रहित कुन्द- काम १ अर्थात् मुझे तो 'मु' सहित कुन्द यानी मुकुन्द-कुलकी रकता] ॥२०॥ कृष्ण के मधुपुरीको विदा होने के बाद कोई । गोपवाला अपने नयनरमलसे अभुधारा बहाती हुई हो, प्रिय कृष्णके मुखनन्द्रका चिन्तन करती हुई, गाद प्रेमके पाशङ्कासे शिथिल एवं अत्यन्त कातर हो गयी ॥२०॥ पूर्णचन्मयो दरमागरमः । सभातरजा । मीरामदबादार- ।

गनिमुनाकर पृन्दारण्यान्मधुपुरमिते माधये तस पया- दायासामि त्वरितमितियाग्नीजसम्भूतमेकम् । आशावृक्षं नयनरालिले सिधती पद्धयन्ती राधा पाधाविवशहदया यापयामास मासान् ॥२०५|| गोपीमात्रं "घुणलिपिनयान्माधवप्रेमपात्रं मत्वा याचामनतिशयिनी दृष्टिरग्रे ममासीत् । क्षन्तव्यं तद्विधिविधिसुतव्योमकेशान्धिपुत्री- मृग्यः पाशे पशुरिव तव प्रेम्णि पद्धो यदस्ति ॥२०॥ धन्येयं धरणी ततोऽपि मधुरा तत्रापि वृन्दावनं तत्रापि प्रजवासिनो युवतयस्तत्रापि गोपागनाः । तत्राचिन्त्यगुणैकधामपरमानन्दात्मिका राधिका लावण्याम्पुनिधिखिलोकरमणीचूडामणिः काचन ॥२०७॥ वृन्दावनसे मधुपुरीको जाते समय जो माधवने यह कहा था कि 'मैं शीघ्र ही लौटकर आऊँगा' इस याणीरूपी वीजसे उत्पन्न हुए एकमात्र आशावृक्षको नयनजलसे सींचती और बढ़ाती हुई [विरह से] व्यथितहृदया राधा किसी प्रकार उन महीनोंको काटती थी॥२०५॥ हे राधे ! तेरे महत्वको न जानकर पहले जो मेरी यह धारणा थी कि तुम कोई साधारण गोपी हो और धुणाक्षरन्यायसे कृष्णमें भी तुम्हारा हो गया है, इसे क्षमा करना; क्योंकि ब्रह्मा, ब्रह्मपुत्र (सनकादि), शिव और लक्ष्मी आदि भी जिसकी खोजमें ही लग रहे हैं, यह कृष्ण तुम्हारे प्रेमपाशमे मृगकी तरह फंसा हुआ है ।।२०६|| यह पृथ्वी धन्य है !उसपर भी मथुरा, वहाँ भी वृन्दावन, उसमें मौजवासी, उनमें भी युवती गोपियाँ और उनमें भी अचिन्त्य गुणों की खानि, परमानन्दमयी, सौन्दर्य की निधि एवं तीनों • लोकोंकी स्त्रियों में शिरोमणि कोईराधा नामकी गोपीही धन्य है ! ।।२०७॥ * बोइरिमोहनप्रामाणिकस कोकिलदूताए । ' श्रीमाधवभट्टाचार्यस जस्वदूताद । भट्टमाधवस दानलीलायाः ।

श्रीराधासूक्ति या पूर्व हरिणा प्रयाणसमये संरोपिताशालता साभूवपल्लविवाचिरात् कुसुमिता नेत्रामधुसेकैः सदा । विज्ञातं फलितेति हन्त भवता तन्मूलमुन्मूलितं रे रे माधवदूत जीवविहगः क्षीणः कमालम्बते ॥२०॥ आनम्रायों माय माय निजमुखालोकलक्ष्मीप्रसाद खेदश्रेणीविरचितमनोलाघवायाविधेहि सेवामाग्ये यदपि न विभो योग्यता में तथापि सारं सारं तय करुणतापूरभेवं ब्रवीमि ॥२०९।। असितावयवस्य या प्रजेन्दो सितशोभैव पृथक्कृतेव माति । प्रणयातिशयेन तां तु राधा भवत्राधाविनिवृत्तये नमामः॥२१०॥ पहिले मधुरा जाते समय भगवान् हरिने जिस आशालताको लगाया था वह हमारे अश्रुमलसे निरन्तर गीची जाकर बहुत दिनों के बाद पल्लवित और पुष्पित होरही थी हम जानती थी कि अब उसमें पाउ सानेहीवाले हैं कि अरे!माधव के दूत उस्य! तूने उसे बदसे उखाद डाला! न जाने, ये दुर्बल माणपसेरू अब किसका आश्रय लेंगे ! ।।२०८।। दुःखके भारसे वे हुए मेरे इम हदयको हलका करने के रिये मुग विनीताको अपने मुसार- चिन्दकी शोभाको निहारने का भमाद दो विभो ! यद्यपि आपकी सेवा सौभाग्यकी योग्यता मुहर नहीं है तथापि आपकी करुणाराशिको या- परके मैं ऐसा पहती हूँ ॥२.१॥ जोश्याम शरीरयाले प्रजचन्द्र श्रीकृष्ण या की हुई श्वेत कान्ति-सी ही भासित हो रही हैं। उन भीषिका भकरपाकी नित्ति के लिये हम अत्यन्त प्रेम प्रणाम करते हैं ॥२१॥ • सन्देशात् ।। पाषरामनारायणराषिणः ।

किमुपार संविधाय दशने पूर्ण विभो प्रार्थये अजमहेन्द्रनन्दन । अस्तु मोहन तवातिपालमा जन्मजन्मनि मदीघरी प्रिया २११७ यो ममरुद्रमुकनारदमीममुरम्परालयितो न सहसापुरुषस तस्स सोवशीकरणपूर्णमनन्तशक्ति तं राधिकाचरणरेणुमनुस्मरामिा श्यामेति सुन्दरवरेति मनोहरेति कन्दर्पकोटिललितति सुनागरेति । सोत्कण्ठमद्वि गृणती मुद्राकुलाक्षी सा राधिका मयि कदानुभवत्प्रसन्ना ।।२१३|| कृष्णः पक्षो नवकुवलयं कृष्णसारस्तमालो नीलाम्मोदस्तव रूचिपदं नामरूपंच कृष्णा । हे नाय ! हे ब्रजराजनन्दन ! मैं दाँतोमै तिनका लेकर (अति दीनतासे) विनती करता हूँ, कि हे मोहन ! तुम्हारी अत्यन्त प्रियतमा श्रीराधिकाजी ही जन्म-जन्ममें मेरी प्रिय म्वामिनी हो ॥२१९l. जिरा महापुरुषको ब्रह्मा, शिव, शुक, नारद, मीम आदि मी सहसा न जान सके, उसी कृष्णको तत्काल वशमें करनेवाली ओषधिरूप अनन्तशक्तिशालिनी श्रीराधिकाजीकी चरणरेणुको मैं स्मरण करता हूँ ॥ २१२ ।। 'हे श्याम ! हे सुन्दरवर ! हे मनोहर ! हे कोटिकामसे भी अधिक रमणीय ! हे नटनागर !' इस प्रकार उत्कण्ठापूर्वक दिनमें बारम्बार श्रीकृष्णकी टेर लगाती हुई व्याकुल नेत्रोंवाली श्रीराधिकाजी मुझपर कब प्रसन्न होगी ? ॥ २१३ ।। जब तुम्हें कृष्ण पक्ष, नवीन नीलकमल, काला मृग, श्याम तमाल, नील मेघ, तथा नाम और रूप दोनोंहीसे कृष्णा है वह यमुना-ये * मीबिटुलेश्वरस्य राधाप्रार्थनाचतुःश्लोकीस्तोत्रात् । + गोसामिनो मोहित- हरिवंशस्य राधासुधानिधिलोत्रात् ।

धीराघासूकि कृष्णे कसात्तव विमुखता मोहनश्याममूर्ता- वित्युक्त्वात्त्वां प्रहसितमुखी किन्नुपश्यामि राधे।२१४॥ ध्यानस्तं शिखिपिच्छमौलिमनिशं तमाम सङ्कीर्तयन् नित्यं तचरणाम्बुजं परिचरंस्तन्मन्त्रवर्य जपन् । श्रीराधापददास्यमेव परमाभीष्टं हृदा धारयन् कर्हि स्यां तदनुग्रहेण परमोद्भूतानुरागोत्सवः ॥२१५|| राधाकरावचितपल्लववल्लरीके राधापदाकविलसन्मधुरथलीके। राधायशोमुखरमत्तसगावलीके राधाविहारविपिने रमतांमनो में ॥२१६॥ - सब काले ही प्यारे हैं, तो फिर मोहिनी श्याममूर्तियाले श्रीकृष्णसे हो तुम क्यों रूठी हुई हो ! [ मेरे ] इस प्रकार ताना मारनेपर, हे राधे ! तुम्हें मुसकाते हुए मैं कब दे गा ! ॥ २१४ । सर्वदा मोरपंखका मुकुट धारण करनेवालेका ध्यान, उनके नामोंका कीर्तन उनके चरणकमलों की नित्य सेवा तथा उनके मन्त्रों का जप करते हुए और मन-ही-मन श्रीराधाचरणोंके दासत्वको ही अपना परम इष्ट समझते हुए उनकी कृपासे प्रकट हुए निरतिशय प्रेमानन्दमें मैं कब निमग्न होऊँगा ! ॥२१५॥ जहाँके पल्लव और मञ्जरी श्रीराषिकाजीके हाथों से चुने गये हैं, जहाँकी मनोहर भूमि श्रीयधिकाजीके चरणचिहोंसे सुशोभित हो रही है, जहकि पक्षीगण श्रीराधिकाजीके यशोगानमें ही मस्त है, ऐसे श्रीराधिकाजीके कीडायन(वृन्दावन) में मेरा मन विचरण करे ॥ २१६ ॥ * गोवामिनो श्रीइितहरिवंशस्य राधासुधानिधिस्तोत्रात् ।

१२० 9 सूक्तिसुधाकर জিমন্যাঙ্কিঃ धीतासङ्गाः शयनवसनलानपानाशनादौ गायन्त्यस्त्वचरितगुणिता सन्ततं गीतगाथा:) औदासीन्यं किमपि सकला बन्धुबुन्दे वहन्त्यो गोप्यो लीलाक्षितिपु भवतोयोगिनीवद्ममन्ति ।२१७* तन्मनस्कास्तदालापास्तद्विचेष्टास्तदात्मिका: तद्गुणानेव गायन्त्यो नात्मागाराणि ससरु ।।२१८ या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप- प्रेहनाभरुदितोक्षणमार्जनादौ । गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो धन्याग्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः॥२१९॥ [ उदयने कहा-] ' कृष्ण ! समम्न गोपियाँ शयन, बसन, स्नान, पान और भोजन आदि ममम्त विषयोंसे आसरिक हराकर, निरन्तर भाप ही चरिधागे मरे हुए गीतोको गाती हुई, अपने परनों के विषपमे अपूर्व उदामीनवा धारणार आपकी लीलाभूमि (दापन) में योगिनीकी तरह भ्रमण कर रही ॥२१७ ।। दे गोली उन श्रीनामें ही मन लगाकर, उनकी ही बात करती भानी गा चेटाएँ उनी में भर्पण कर और नमीन होहर उसी को गाली हु, भाने परकी या भूम गी ।। २९८॥ जो दूप दुरने, ने, दही मथने, नीरने, मंटने वालों से धोने भोर ने भारि ममप भी अपूर्ण र, गदगद काट और अनुर. इंटिगे मनवादा ही पशोगान कानी ये भगवान में हो ना मन लगारे नेपाली मनाएँ धन्य ।। २१९।। .REARRATHI.in.tots श्रीवजागनासूक्ति १२१ गते गोपीनाथे मधुपुरमितो गोपभवनाद् गता यावद्धुली रथचरणजा नेत्रपदवीम् । स्थितास्तापल्लेख्या इव विरहतो दुःखविधुरा निवृत्ता निष्पेतुः पथिषु शतशो गोपवनिताः ॥२२०॥* श्रुतयः पलालकल्पाः किमिह वयं साम्प्रतं चिनुमः । अहियत पुरैव नयनराभीरीभिः परं ब्रह्म ॥२२१॥ मुक्तमुनीनां मृग्यं किमपि फलं देवकी फलति । तत्सालयति यशोदा प्रकामधि भुज्यते गोप्या ॥२२२॥ मक्ता मय्यनुरक्ताच कति सन्ति न भूतले । किन्तु गोपीजनः प्राणाधिका प्रियतमो मम ॥२२३।। नन्दगृहसे गोपीनायके मधुपुरी चले जानेपर, जस्तक उनके रथके पहियोंसे उठी हुई धूलि आँखोंसे दीख पड़ी, तबतक तो वे विरहदुःखसे कातर हुई चित्रलिखित-सी खड़ी देखती रहीं, पीछे जब उसका दीखना बन्द हुआ तो सैकड़ों गोपाङ्गनाएँ [सुध-बुध भुलाकर] मार्गमें गिर पड़ीं ॥ २२० ।। श्रुतियों पुआलके सदृश [ सारहीन हो चुकी ] हैं, इनमें हम अब क्या खोजे ! [क्योंकि ] इनमें निहित परब्रह्म- (कृष्ण) को तो गोपाङ्गनाओंने पहले ही मेवोंसे हर लिया है ॥ २२१ ।। नित्यमुक्तः मुनिजनोंका वाहनीय कोई फल देवकी में तो फलता है, यशोदाके यहाँ पालित होता है और राजमें गोपियों उसे यथेष्ट भोगती हैं।। २२२ ।। मुझमें अनुरक्त संसारमै कितने भक्त नहीं हैं। किन्तु मुझे प्राणाधिक प्रियतमा तो गोपवालाएँ ही हैं ॥ २२३ ॥ श्रीलम्बोदरबधस्य गोपीदत्तात् ।

गनिसुधाकर यं चंद वेदविदपि प्रियमिन्दिराया स्तभामिनीररुदगर्मगृहो न घाता। गोपालवालललना पनमालिनं तं गोयूलिपसरगरीरमरीरमंन्ताः ॥२२४।। शीर्णा गोलमण्डली पमुकुलं शम्पाय न स्पन्दते मूका कोकिलमंहतिः शिखिकुलंन व्यालं नृत्यति । सर्व त्वद्विरहेण हन्त नितरां गोविन्द देन्यं गताः किन्वेका यमुना यमुना कुरङ्गनयनानेत्राम्बुभिर्वर्धते ॥२२५|| कस्मै कि कथनीयं कस मनःप्रत्ययो भवति । रमयति गोपवधूटी कुअकुटीरे परं ब्रह्म ॥२२६।। न तथा मे प्रियतमो प्रमा रुद्रश्य पार्थिव । नच लक्ष्मीन चात्माच यथा गोपीजनो मम ॥२२७॥ वेदोके तत्वज्ञाता और उन्हींकी नाभिसे उत्पन्न हुए कमलमें निवास करनेवाले ब्रह्मा भी जिन ओपतिको न जान सके उन्हीं बनमालीको, जिनका शरीर [ धैशवावस्थामै ] गोधूलिसे धूसरित रहता था, [गोदीमें विठाकर ] गोपरालाएँ खेलाया करती थीं ।। २२४ ॥ [ ब्रजसे लौटकर उद्धवने कहा-'हे गोविन्द ! [आपके बिना ] गोपवालकोंकी मण्डली तितर-बितर हो गयी है, गौएँ अब घासके लिये भी चेटा नहीं करती, कोयलोंने बोलना छोड़ दिया है और व्याकुल हुए मयूर अब नाचते ही नहीं हैं। इस प्रकार तुम्हारे विरहसे सभी दोन हो गये हैं। किन्तु एक यमुनाजी ही मृगलोचना व्रजाङ्गनाओंके आँसुओंसे बढ़ रही हैं' ।। २२५ ॥ किससे क्या कहा जाय ? [सुनकर भी] किसके मनको विश्वास होगा? अहो! पर्ण-कुटीमें एक गोपी (श्रीयशोदाजी) साक्षात् परब्रझको [गोदर्मे लेकर] खेला रही है ! ॥ २२६ ॥ हे राजन्! ब्रह्मा, रुद्र, लक्ष्मी तथा स्वयं मेरी आमा भी मुझे उतनी प्रिय नहीं है, जितनी कि गोपियाँ हैं ।।२२७॥ * श्रीविस्वमङ्गलठाकुरस्य । + भादिपुराणात् ।

श्रीमुरलीसूति মুন্নি अयि मुरलि मुकुन्दस्मेरवक्त्रारविन्द- श्वसनमधुरसज्ञे त्वां प्रणम्याद्य याचे । अधरमणिसमीपं पासवत्यां मवयां कथय रहसि कर्णे भदशानन्दसूनो ना२२८॥ लोकानुदरयञ्श्रुतीर्मुखरयन क्षोणीहान्हर्पयञ्- छैलान्विद्रवयन्मगाविवशयन्गोवृन्दमानन्दयन् । गोपानसम्ममयन्मुनीन्मुकुलपन्सप्तस्वराजम्भय- मोकारार्थमुदीरयन्विजयते वंशीनिनादः शिशोः ॥२२९॥ मुखारविन्दनिस्यन्दमरन्दमरतुन्दिला ममानन्दं मुकुन्दस्य सन्दुग्धां वेणुकाकली ॥२३॥ मुकुन्दक मुसकानयुक्त मुखकमलसे निकलते हुए श्वासके मधुर रसको माननेवाली अरी मुर्गलके आज मैं प्रणाम करके तुझसे एक याचना करता हूँ। कि जब भगवानकी अधरणिके पास पहुंचे तो एकान्तमें उस नन्दकिशोर- के कानमें मेरी दशा भी कह देना ॥ २२८ । लोकोंका उबार, भूतियोको सदायमान, तरुवरीको पुल्लित, पर्वतीको द्रवीभूत, मगोको वियश, गोदको आनन्दित, गोपोको विस्मित, मुनियोंको आमोदित, सप्त खरोंको प्रकाशित और मणार्थको उपोषित करनेवाले बालगोपाल के पंधीनिनाद की बनिहारी॥ २२९ ॥ मुन्दके मुखकमलसे निकले हुए, मकरन्द. विन्दुमाँसे भरी हुई पीकी गुजार मेरे आनन्दकी रिपरे ॥ २३ ॥ • मोमीर मीरूपगोस्वामिनी शुभागमा ।

१२४ सूक्तिसुधाकर मुरहर रन्धनसमये मा कुरु मुरलीरवं मधुरम् । नीरसमेधो रसतां कृशानुरप्येति कृशतनुताम् ॥२३॥ ध्यानं बलात् परमहंसकुलस्य भिन्दन निन्दन सुधामधुरिमानमधीरधर्मा । कन्दर्पशासनधुरा मुहुरेव शंसन् वंशीध्वनिर्जयति कंसनिपूदनस्य ॥२३२।।* भिन्दन्नन्बुभृतश्चमत्कृतिपदं कुर्वन् महुस्तुम्बुरु ध्यानादन्तरयन सनन्दनमुखान्संस्तम्भयन् वेधसम् । औत्सुक्यावलिमिलि विवलयन भोगीन्द्रमापूर्णयन् मिन्दन्नण्डकटाहमितिमभितोषनाम वंशीध्वनिः॥२३३||* हे मुरारे ! भोजन पकाने के ममय आप मुरलीका मधुर व न किया करें, क्योंकि उससे ये सूखी लकड़ियाँ सरस हो जाती हैं और अग्नि भी मन्द पड़ जाती है ॥ २३१ ॥ जो परमहंसों के ध्यानको यापूर्वक मा करती है, मुधाके माधुर्यको फीका यताती है, धैर्यका अपहरण करना जिसका मुख्य धर्म हो रहा है, जो बार-बार फन्दपले शासनका मार अपने सिर से रही है। उम भगवान् कंग-निदनको यंशीयनिकी बलिहारी ! ॥ २३२ ।। मेघमालाको डिन भिन्न कर [अपर पहुँच गन्धर्वगन तुम्पुर- को आधर्यमें हादसा हुआ, रानन्दनादि योगियोंको ज्यान विचलित कर प्रधाजीको माप करता हुआ और [नोही भोर पाताल पहुँन] राजा बलिको अयन्त उत्कष्टाचा फरमागराज अनन्तदेयको परित करता हुभा, भगवानका येशुनाद बाराक्षको दीगर पेप. पर मब और अमीम अनन्तम पा॥ २३ ॥ • स्पभानु भनी ।

छ श्रीवृन्दावनसूक्ति श्रीवृन्दामा सूक्तिः वृन्दारण्ये चर चरण दृक् पश्य वृन्दावनश्री- जिह्वे पृन्दावनगुणगणान् कीनय श्रोत्रदृष्टान् । वृन्दाटव्या भज परिमलं प्राण गात्र त्वमसिन वृन्दारण्ये लठ पुलकितं कृष्णकलिस्थलीषु ।।२३४||* कदा नु वृन्दावनकुञ्जमण्डले भ्रमम्भ्रमं हेमहरिन्मणिप्रभम् । संस्मृत्य संस्मृत्य तदद्भुतं प्रियं द्वयं द्वयं विस्मृतिमेतु मेऽखिलम् कदानुवृन्दावनवीथिकासह परिभ्रमञ्यामलगौरमद्भुतम् । किशोरमूर्तिद्वयमेकजीवनं पुरस्फुरद्वीक्ष्य पतामि मूर्हितः२३६५ है चरणो ! वृन्दावनमें चलो, हे नेत्रो! दापनकी शोमा निहारो, बिहे ! कानोंसे सुनी हुई वृन्दावनी गुणावलीस गान कर, हे माण! वृन्दावनकी सुगन्धका अनुभव कर और हे शरीर इस दावन के भीतर कृष्णाके कीटारथलों में पुलकित होकर पारंवार लोट ॥ २३४ ।। वृन्दापन के निर्धामे घूम-घूमकर स्वर्ण और हरितमणिके समान कान्तिवाली [ श्रीराधा-माधवकी ] अति अद्भुत और प्यारी युगल जोडीको याद कर-करके मैं फर सर कुछ भूल जाऊँगा ? ॥ २३५ ॥ भीन्दावनकी गलियों में विचरता हुभा किशोर और विशेषकी अति अद्भुत श्याम-ौर, वर्णपाली एकमाणमयी दोनों मूर्तियों को सम्मुस देदीप्यमान हुई देसकर में कर [ प्रेमावेसे ] मूर्मित रोकर पृथ्वीर गिर पाँगा ! ॥२३६ ॥ •बोल्दारनगरा।

पठोल्लास श्रीहरिहरसूक्तिः हरिरेव हरोहर एव हरिन हि भेदलयोऽपि तयोः प्रथितः। इति सिद्धमुनीशयतीशवरा निगदन्ति सदाविमदा सुजनाः १* भीमाकृतिं वा रुचिराकृति वा त्रिलोचनं वा समलोचनंवा । उमापति वाथ रमापतिका हरि हरं वा मुनयो भजन्ते ॥२॥ सचित्वरूपं करुणासुकूपं गीर्वाणभूपं परधर्मयूपम् । संसारसारं सुरुचिप्रसारं देवं हरिं वा भज भो हरं वा ॥३॥ विष्णु ही शङ्कर हैं और शङ्कर ही विष्णु हैं, इन दोनों में लेशमात्र भी भेद नहीं है, इस प्रकार सिद्ध, मुनीश्वर, अभिमानशून्य सजन और बड़े-बड़े यति सदा कहा करते हैं ॥ १ ॥ मुनिगण भयङ्कररूप या सुन्दर रूपवाले, त्रिनेत्र या द्विनेत्र, पार्वतीपति या लक्ष्मीपति, शिव अथवा विष्णुको भजते हैं॥२॥ सचिरस्वरूप और दयानिधान, देवादिदेव और सद्धोंके आधार, प्रेमका विस्तार करनेवाले संसारके सारभूत भगवान् शङ्कर या विष्णुका, हे लोगो ! भजन करो ॥ ३ ॥ * श्रीमच्युनावमस्य हरिहरस्तोत्राव ।

ॐ सूर्यसूक्ति हरिरेव बभूव हर परमो हर एष बभूव हरि सरमः । हरिताहरता च तथा मिलितारचयत्यखिलं खलु विश्वमिदम्४३ गोविन्द माधय मुकुन्द हरे मुरारे शम्मो शिवेश शशिशेखर शूलपाणे । दामोदराच्युत जनार्दन चासुदेव त्याज्या भटा य इति सन्ततमामनन्ति ॥५॥ মুক্তি यसोदयास्तसमये सुरमुकुटनिघृष्टचरणकमलोऽपि । कुरतेजलिं त्रिनेत्रः स जपति घानां निधिः पूर्यः॥६॥ श्रीहरि की सर्वश्रेष्ठ महादेव हुए हैं और श्रीमहादेवजी ही लक्ष्मीजीसहित भगवान् विपाए हैं। इस प्रकार वैष्णयी और थी दोनी शक्तियों सम्मिलित होकर इस सारे विश्वको रचती है ।। ४॥ [धर्मराजने कहा- जो लोग गोविन्द, भाषष, मुकुन्द, हरे, मुरारे, शम्भो, शिव, ईश, शशिशेखर, शूलपाणिदामोदर, अन्युत, जनार्दन, वासुदेव! इस प्रकार निरन्तर उधारण करते रहते हैं, हे दूतो। उन्हें (दूरसे ही ] स्याग देना ॥५॥ देवताओंके मुतोंसे भारंबार नमवार किये जाने के कारण } निरे परप-बमल घिरा गये है, शिवजी भी जिन्हें उदम और भस रोते समय आप जोहते ,उन तेजोमा मूक्तिमुधाकर भावनाध्यमालिः स्फुरदधररुचा रअितथारुकेशो भावान् यो दिव्यतेना करकमलयुतः सवर्णप्रमामिः । विधाकासावकाशग्रहपतिशिखरे मावि यथोदयाद्री सर्वानन्दप्रदाता हरिहरनमितः पातु मां विधः ॥७ মূখিন मातर्गङ्गे तरलतरङ्गे सतत पारिधिवारिणि सझे। मम तव तीरे पियतो नीर 'हरिहरि जपतः पवतु शरीरम् ।।८ नमस्तेऽस्तु गङ्गेत्त्वदङ्गप्रसङ्गाभुजङ्गास्तुरङ्गाकुरङ्गा प्लवङ्गा अनङ्गारिरङ्गाम्ससङ्गाशिवाङ्गाभुजङ्गाधिपाङ्गीकृताङ्गाभवन्ति जो अत्यन्त चमकीले रनोंका मुकुट धारण किये हुए हैं, जगमगा हुए लाल ओठोंसे सुशोमिन हैं, सुन्दर केशधारी हैं तथा जो प्रभामय ए दिव्य तेजसे सम्पन्न हो हाथों में कमल धारण किये हुए अपनी सुनहर्ल कान्तियोंसे उस उदयगिरिसर सुशोभित होते हैं जो कि अपने शिस्तरपर विश्व, आकाश और प्रहपतियोको स्थान देता है, ऐसे सर्वानन्ददाता विष्णु-शिवादिसे नमस्कृत जगत्के नेत्ररूप सूर्य हमारी रक्षा करें ॥७॥ Www- चञ्चल तरङ्गोवाली और सदा समुद्र के जन्टमें मिलनेवाली मातः गङ्गे ! तेरे तीरपर तेरा जल पान करते हुए और 'हरि हरि' जपते हुए मेरा शरीरसात हो॥८॥ हे गङ्गे! तुम्हारे शरीर के संसर्गसे साँप, घोड़े, हरिण और बन्दर आदिमी कामारि शिरके समान वर्णवाले, शिके सली और [ उन्हींके समान ] कल्याणमय शरीरवाले होकर, अनमें मुजराजोको लपेटे हुए सामन्द विचरते हैं; अतः तुमको नमस्कार है ।।९।। • मविप्यपुराणे भादित्यहृदयस्तोवाद मालिदासस गटकार!

• गङ्गासूक्ति यत् ॥१०॥ कत्यक्षोणि करोठयः कति कति द्वीपिदिपानां त्वचा काकोला कति पन्नगा: कति सुधाधानवखण्डा कति। किं च त्वं च कति त्रिलोकजननि त्वद्वारिपूरोदरे माअन्तुकदम्बकं समुदयत्येकैकमादाय शुभतरकृतयोगाद्विश्वनाथप्रसादाद् भवहरवरविधा प्राप्य काश्यां हि गङ्गे। भगति तर तीरे नीरमारं निपीय मुदितहृदयकुओ नन्दसूनुं भजेऽहम् ॥११॥ १त्रियोकमाता! तेरी जम्पारा, आँख, नरमुण्ड, व्याप तपा साथीके एमालाल, सपं और चन्द्रमाके टुकड़े कितने हैं। यात् भी कितनी २१ ओकिनुर दुरी लगानेवाले सभी जीर, इनमें से मायेर बको साथ लेकर बाहर निकलते हैं अर्थात शिवस्पोकर मतकस्य आतtton भगति ग! अपने शुभमकि योग और विध. बापणी अनुपमे संसारसे पार करनेवाली उत्तम विचाको करके पाची गुहारे तीर गर] सारा को पीता हुभा में अपने भानन्दमय परामें नामनन्दन को मना ॥ ११ ॥ • AATRARARRERATER ܐ ܒ ७ गणेशसूक्ति मावर्देवि कलिन्दभूधरसुते नीलाम्बुजश्यामल- स्निग्धोद्यद्विमलोमिताण्डवघरे तुम्यं नमस्कुर्महे । स्वं तुर्याप्यसि यत्प्रिया मुररिपोतद्वाल्यतारुण्ययो- लीलानामवधायिकान्पमहिषीवृन्देषु वन्द्याधिकम् ॥१५||* হাষ্টি: गौरीश्रय केतकपत्रमामाकृष्य हस्तेन ददन्मुखाये। विमं महाकलितद्वितीयदन्तप्ररोहो हरतु द्विपास्यः ॥१६॥ योगयोगविदां विधूतविविधव्यासङ्गशुद्धाशय- प्रादुर्भूतसुधारसप्रसमरध्यानास्पदाप्यासिनाम् । नील कमलके समान श्यामल सिष निर्मल उत्ताल तरीका ताण्डय धारण करनेवाली, कलिन्द पर्वतकी कन्या, माता देवि यमुने ! हम तुम्हें प्रणाम करते हैं। तुम तुरीया मी हो, क्योंकि मुरदैत्यके शत्रु भगवान् कृष्णको मियतमा हो और उनके बचपन तथा यौवनकी लीलाऔकी अधिष्ठात्री एवं अन्य पटरानियों में सबसे अधिक वन्दनीया हो॥१५॥ पार्वतीजीके कानमें पहने हुए केतकपत्रको सूइसे खींचकर मुखके अप्रभागमे लगावे समय क्षणभर के लिये जिनके मुखसे द्वितीय दाँतका अङ्कर-सा निकलता जान पड़ा, वे भगवान गजानन मेरे विनको हर लें ॥ १६ ॥ जो नाना भौतिकी आसक्तियोंसे रहित विशुद्ध अन्तःकरणमें अमृतरसको प्रकट करनेवाले दीर्घ ध्यानमें * ময়লুধিৰিবিষমুছা।মীমমার মুরুষছিলাম:। ।

-- --- Am-var+mkee-mah तिसुधाकर -- आनन्दप्लवमानबोधमधुरामोदन्छटामेदुर तं भूमानमुपास्महे परिणतं दन्तावलासात्मना ।। माम्यन्मन्दरपूर्णनापरपणशीराब्धियोचिच्छटा- सन्छायायलचामरव्यतिकरश्रीगवसायाः । दिक्कान्ताधनसारचन्दनरसासारा श्रयन्तां मनः स्वच्छन्दप्रसरप्रलिप्तवियतो हेरम्बदन्तत्विषः॥ मुक्काजालकरम्वितप्रविकसन्माणिक्यपुअच्छटा- कान्ताः कम्युकदम्ब चुम्बितवनामोगप्रपालोपमाः। ज्योत्लापूरतरङ्गमन्थरतरत्सन्ध्याक्यसाचिरं हेरम्बस्स जयन्ति दन्तकिरणाकीर्णाः शरीरविपः ॥१ तत्पर हुए योगियोंके योग (मासव्य) हैं, आनन्दमें तरझायमान जन्य मधुर आमोदकी छटासे स्निग्धवर्ण हुए गजाननरूप में परिणत उन (पूर्ण) परमात्माकी हम उपासना करते हैं ।। १७ ।। [समुद्रमन समय ] मन्दराचलके धूमनेसे क्षुब्ध हुए क्षीर सागरकी लहरोंके स जिसकी उज्ज्यल कान्ति है, जो चश्चल बँवरकी शोभाका गर्व करनेवाली है जिसके स्वच्छन्द प्रसारसे आकाश लिप्त हो रहा दिगङ्गनाओंके शरीरपर धनसार और चन्दनरसकी वर्या करनेव वह गणेशजीके दाँतोंकी प्रभा मेरे हृदयमें प्रकाशमान हो ॥ १० मोतियाँसे मिले हुए विकसित माणिक्य पुजकी-सी जिसकी कमन कान्ति है, जिसकी उपमा राखसमूहसे चुम्बित बनके नूतन पल्लवोंसे रही है । जो धनीभूत चाँदनीकी तरङ्गोमे मन्द-मन्द तैरती हुई सन्ध्य समान शोभा पाती है, दाँतोंकी किरणों से व्याप्त हुई गणेशजीके शरीर यह प्रमा सर्वदा विजय पा रही है।॥१९॥ -- - 11 *श्रीराघवचेसन्यविरचितमहागणपतिस्तोशार १,६, ७ सरस्वतीसूक्तिः সুযোনীঃ रविरुद्रपितामहविष्णुनुतं हरिचन्दनकुङ्कुमपङ्कयुतम् । नियन्दगणेन्द्रसमानपुतं तव नाभिसरसतिपादयुगम्।।२०।।* या कथिबुद्धिहीनोऽप्यविदितनमनध्यानपूजाविधान कुर्याद्यद्यम्ब सेवा तव पदसरसीजावसेवारतस्य । चित्रं तस्सासमध्यात्प्रसरतिकविता वाहिनीवामराणां सालकारा सुवर्णा सरसपदयुता यसले विनय ॥२१॥ सेवापूजानमनविधयः सन्तु दूरे नितान्तं कादाचित्की स्मृतिरपि पदाम्भोजयुग्मस्य तेऽम्य । हे मातः सरस्वति । सूर्य, शिव, बना, और भगवान् विष्णु निगार मस्तक एकाते हैं, जिनपर हरिचन्दन और समका अनुग हुआ है और मुनिशेका समूह तया गणेशजी जैसे देषता जिनका सेवन करते हैं उन तुम्हारे दोनीचरणीको मैं प्रणाम करता k॥ २०॥ २ जननि ! नमन, ध्यान और बाकी विधिको न जानने पाला पोई तीन पुष भी यदि वम्हारी मेगा करने लग जाय तो आभयो कि तुम्हारे चाणकमोंकी सेवामें तत्पर हुए उम मक्तके मुगले थोड़ा भी यन किये गिना ही देषनदी गनाको तरह भरद्वार, मुन्दर पभीर ससमे मुक्त कविता होने टगता ॥२१॥ मातः मेया, पूजा और नमको विधिों तले अपन दूर रहे, आपके पुगत परणापिनों की कमी कमी को स्मृति भी गंगेको पारति •मुसारे रितसरतीचा । अगाम्नमिह- मानीसाframani लक्तिसुधाकर # रडू फलयति सुराचार्यमिन्द्रं च वाचा । म्यालोको न च कलयते तो कलेः किं हिदास्थ्यम् ।।२२||* हिशन्दे किमु मुख्यवृत्त्या स्थिताहमेवेति वियोधनाय । मासि हंसे जगदम्बिके त्वमित्यसदीये हृदये विमाति॥२॥ को प्राविचारसारपरमामाया जगद्वयापिनी गापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् । ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिता दे तां परमेश्वरी भगवतीं पुद्धिप्रदां शारदाम् ॥२४॥ देकर बृहस्पति बना देती है और दरिदको लक्ष्मी देकर इन्द्र के समान कर देती है। संसार स्वयं वाणी या लक्ष्मीको नहीं प्राप्त कर सकता। [आपकी कृपा होनेपर ] कलिकी दुष्टता क्या कर सकती है !॥ २२ ॥ हे जगदम्ब ! क्या तुम यह सूचित करने के लिये ही हंसपर मुशोभित होती हो कि 'मैं मुख्य वृत्ति (अभिषा शक्ति) से हंस शब्द [ के वान्य शानी परमहंसजनों ] में ही स्थिर रहती हूँ।' मेरे हृदयमें तो ऐसा ही मान हो रहा है ॥२३॥ जिनका वर्ण श्वेत है, जो ब्रह्मविचारकी परम सारभूत हैं,आदि शक्ति हैं, सारे संसारमें व्यापक हो रही हैं, वीणा और पुस्तक हायोंमें धारण किये हैं, मूर्खतारूपी अन्धकारको नाश करनेवाली हैं। हायमें स्फटिककी माला धारण किये रहती हैं, कमलके आसनपर विराजमान हैं, उन बुद्धिदायिनी परमेश्वरी भगवती सरस्वतीको में वन्दना करता हूँ॥ २४ ॥ - * जगद्गुरुनृसिंहभारतीस्वामिविरचित शारदापट कात् । + श्रीमदमिना- नृसिंहभारतीस्वामिविरचितशारदास्तोत्राद ।

ॐ
सामोल्लास
धर्मसूक्तिः
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुविन्हि मानवः ।
इह कीर्तिमवामोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ १ ॥
श्रुतिस्तु वेदो विघ्नेयो धर्मशाखं तु वै स्मृतिः।
IPL से सर्वार्थप्यमीमांस्ये ताम्यां धर्मोह निर्वभौ ॥ २ ॥
मनुष्य बेर और स्मृति को हुए धर्मा पालन करता
दुश्मरस संसारमें यश प्राप्त करता है और भरपर परम उत्तम
मुग पाता है ॥१॥ घेदको भुति और धर्मशानको स्मृति जानना
पारे । सभी विषयों में न दोनोको रिना विचारे ही मान
देना चाहिये, क्योकि इनसे ही पर्म उपर हुआ है ॥२॥

ननिष्ठनिगा पूजा नोगाने यत्र पभिमाम् । स शूद्रपदविका सामाग्निकर्मगः ॥१५ अनम्मान मेदानामागारमा ग वनात् । आलम्पादनदोगम मृगस्प्रिाप्रियामनि ॥१५ न हायनेने पलित विवेन न पन्युमिः। प्रायझिरे धर्म गोनूगानः स नो महान् ॥१६॥ नित्यं सात्या शुचिः कुरियपिपितृतर्पणम् । देवताम्पर्णनं पेर समिदापानमेव च ॥१७॥ यदुम्तरं यदुरापं यदुर्ग या दुफरम् । संयंत तपसा सामं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥१८) जो मनुष्य न तो मानमोगरान करता है और में मा सम्योपासन करता है या शूदके समान सपूर्ण दिनकोसे बाह निकाल देनेयोग्य ॥१४॥ येका अम्याम न करने से, आवा. छोड़ देनेसे, आलस्यसे और अमके दोगसे मृत्यु द्विजीको मारना चाहत है ॥१५॥ न बहुत श्योंसे, न पके हुए रेल बालोसे, न घनसे, और न भाई-बन्धुओंसे ही कोई बड़ा होता है। पियोंने यह धर्म निश्चय किया है कि जो अनासहित वेद पढ़नेवाला है वही हम लोगों में बड़ा है ॥१६॥ प्राचारी नित्य स्नानसे यश होकर देव ऋपि-पितृतर्पण और देवताओंका पूजन तथा अग्निहोत्र करे ।। १७ । जो दुस्तर है, दुःखसे प्राप्त होने योग्य है, फठिनतासे गमन करनेयोग्य है, और दुष्कर है वह सब तपसे साध्य हो सकता है, क्योंकि तपका कोई उपचन नहीं कर सकता ॥१८॥ * मनु०२।१०५२।१५४,१७६११ ।२३।।

धर्मसूक्ति अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ।।१९।। मातापितम्यां जामीभिर्धात्रा पुत्रेण भार्यया । दुहित्रा दासबर्गेण विवादं न समाचरेत् ॥२०॥ आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः। नार्तेनाप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन विशेषतः ॥२१॥ यं मातापितरौ क्लेशं सहते संभवे नृणाम् । न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥२२॥ तयोनित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस च सर्वदा। तेप्येव त्रिपु तुष्टेषु तपः सर्व समाप्यते ॥२३॥ सः तस्याहता धर्मा यस्यैते त्रय आहताः। अनारतास्तु यस्यैते सस्तिस्साफलाः क्रिया:॥२४॥* जिसका प्रणाम करने का स्वभाव है और जो नित्य वृद्धोकी सेवा करता है उसकी आयु, विद्या, यश और बल--ये चारों बढ़ते हैं ॥ १९ ॥ माता, पिता, बहन, भाई, पुत्र, स्त्री, बेटी और नोकर-चाकर-इनके साथ वाद- विवाद न करे ॥ २० ॥ आचार्य, पिता, माता और बड़ा भाई-इनका दुःसी मनुष्य भी अपमान न करे और विशेषकर ग्रामण तो कभी इनका अपमान न करें ।। २१ ॥ मनुष्यकी उत्पत्तिके समय माता-पिता जो परेश सहते है उसका बदला सौ योंमें भी नहीं चुकाया जा सकता ॥२२॥ इसलिये नित्य ही उन दोनोंका और आचार्यका मी सर्वदा प्रिय करे, इन तीनों के तुर होने पर सर तप समास हो आता है ॥२३॥ जिसने इन तीनौका आदर किया उसने सब धोका आदर कर दिया और जिसने इनका अनादर किया उसके सब काम निष्फल है || २४॥ • मनु.२।१२.१.१२ २१,२२७, २२८, २१४॥

सूक्तिसुधाकर 44AAAA- -- -- भूना गृहस्थस ही पेषण्युपस्करः। कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन् ।।२ अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पित्यवस्तु तर्पणम् । होमो देवो पलिभाँतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ।।२६ पञ्चैतान्यो महायज्ञान हापयति शक्तितः। स गृहेऽपि वसन्नित्यं सूनादोपर्न लिप्यते ॥२७ नापृष्टः कस्यचिद्व्यान्न चान्यायेन पृच्छतः । जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेद ॥२८ अनारोग्यमनायुष्यमस्वयं चातिभोजनम्। अपुष्यं लोकविद्विष्टं तमात्तत्परिवर्जयेत् ॥२९ सत्यं यात्प्रियं घूयान्न भूयात्सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयादेप धर्मः सनातनः ॥३०॥ गृहस्थ के घरमे चूल्हा, चकी, बुहारो, ओखली और जलका पड़ा-ये पाँ- हिंसा के स्थान है इनको काममें लाने गृहस्थ पापमें बंधता है ॥ २५॥ पढ़ाना नायज्ञ है, तर्पण पितृ-यज्ञ है, इयन देव-यश है, बलिवैश्वदेव भूत-यर है और अतिथि पूजन मनुष्य-यश है ॥ २६ ॥ जो निज इन पाँच महायशेको शनिभर नहीं छोड़ता है यह घर में रहता हुभा भी नित्यकी [पाँच ] हत्याके दोपसे नित नहीं होता ।। २७॥ पुद्धिमान पुरुषको चाहिये कि बिना पूछे और अन्यायमै पूछने पर कोई उसर न दें । पर जानता हुआ भी लोकमें मूढके समान आवरण करे ॥ २८ ॥ अधिक भोजन गरना आरोग्य, आयु, खां और पुण्यका नाशक तथा लोकनिन्दित इलये उसे त्याग दे॥२९॥ ऐमी साय बान बोले जो प्यारी लगे और जो सत्य तो हो किन्तु प्यारी में लगे ऐमी पान न दे, और जो यारी बात घटी रो उमे मीनको--यही गनातनधर्म ॥३०॥ -, धर्मसूक्ति सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मयशं सुखम् एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ।। विपादप्यमृतं माझं पालादपि सुमापितम् अमित्रादपि सद्धृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् । लोटमर्दी तणच्छेदी नखखादी च यो नरः स विनाशं बजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव च । अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः । ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः महान्ति पातकान्याहुः संसर्गवापि तः सह पराधीन सब कुछ दुःखरूप है और स्वाधीन सब सुखरूप संक्षेपसे सुख-दुःखका लक्षण जानना चाहिये ॥३॥ विपसे भी = पालकमे भी सुन्दर वचनको, वैरीसे भी सुन्दर आचरणको औ अगइसे भी सुपर्णको ले लेना चाहिये ॥ ३२ ॥ जो मनु- टेलेको मलता है, मृण तोहता है, नसोको चबाता है, चुग- है और अपवित्र रहता है वह शीघ नष्ट हो जाता है ।। ३३ ।। लिये ) संमति देनेवाला, काटनेवाला, मारनेवाला, सरी वाला पकानेशला, लानेवाला और खानेवाला में घातर ॥३४॥ ब्रह्महत्या, मद्यपान, सुवर्ण अदिकी चोरी, गुरु और इन चारोंका संसर्ग- [पाँच ] महापातक है * मनु. ४११६.२।२३५४६ ७१५१५१११ १५३ ल निसुधाकर सामेव सौगानामर्थशानं परं स्मृतम् । योर्थ शुचिर्हिस शुचिर्न मृदारिशुचिः शुचिः॥३७ वणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सन्ता। एतान्यपि सा गेहे नोन्छियन्ते कदाचन ॥३८ शत्रं द्विजातिमिाझं धर्मो यत्रोपरुध्यते । द्विजातीनां च वर्णानां विप्लवे कालकारिते ॥३८ स्त्रीधर्माः चाल्ये पितुर्वश पितुर्वशे तिछत्पाणिग्राहस यौवने । पुत्राणां मर्तरि मेते न मजेत्स्त्री स्वतन्त्रताम् ॥३९॥ सब शुद्धियोंमें धनकी पवित्रता ही श्रेष्ठ कही है क्योंकि जो धन शुद्ध है यही शुद्ध है; मिहो और जन्दकी शुद्धि, शुद्धि नहीं का जाती--[भाव यह है कि जो पराया धन नहीं हरता न्यायसे धनोपार्जन करता है वह शुद्ध है और जो अन्याय द्रव्य घरता है, किन्तु मिट्टी लगा-लगाकर स्नान करता है व पवित्र नहीं है ] || ३६ ॥ [ अतिथि सत्कार के लिये ] तृणमय आसन बैठनेकी भूमि, जल और चौथी मीठी वाणी-इनकी कमी सज्जनोंके घर कमी नहीं होती है ॥ ३७ [1 जब द्विजातियोंका धर्म रोका जाय अपव समयके प्रमावसे वर्णविप्लव होने लगे उस समय द्विजोंको भी शस्त्र ग्रहण करना चाहिये ॥ ३८ ॥ 1 स्त्री बाल्यावस्थामै पिताके वशम, यौवनावस्था पतिके वशमें, और पतिके मरने के बाद पुओंके पशमें रहे स्वतन्त्र कभी न रहे ॥ ३९ ॥ * मनु०५।१०६३11000३४५।१४८ ॥

धर्मसूक्ति सदा प्रहृष्टया भाग्यं गृहकार्येषु दक्षया । सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया ॥४०॥* नास्ति वीणां एथग्यझोन व्रतं नाप्युपोपणम्। पति शुश्रूपते येन वेन स्वर्गे महीयते ॥४१॥* अर्थस्स संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् । शौचे धर्मेऽनपस्त्यांच परिणाह्यस्य वेक्षणे ||४||* पानं दुर्जनसंसर्गः परया च विरहोऽटनम् । स्वमोऽन्यगेहवासश्च नारीणां दूपणानि पट् ॥४३॥* चलन्ति तारा रविचन्द्रमण्डलं चलेच मेरुविंचलेश्च मन्दिरम् । कदापिकाले पृथिवी चलेचच चलेन धर्मः सुजनस्य वाक्यम् ४४ खीको चाहिये कि सदा प्रसन्न चिच रहे, घरके कामोमें कुशल हो, परकी सामग्रीको अच्छी तरह रखे और हाप रोककर खर्च करे ॥४०॥ स्त्रियोंको पति-सेवाके सिरा] अलग यश, व्रत और उपपास करनेकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि स्त्री जो पतिकी सेवा करती है उससे स्वर्ग में आदर पाती है ।।४१ धन-संग्रहाव्यर, शरीर आदिको शुद्धि, प रसोई बनाना तथा घरकी सामग्रीकी देख-भाल-इन कापामें ही स्त्रियों को लगाये ॥ ४२ ॥ मद्य पीना, दुर्जनाका संसर्ग, पतिका विरह इधर-उपर धूमना, इसमयमें सोना और दूसरे के घरमें रहना-पे स्त्रियों के ए: दोष हैं।॥४३॥ ताराएँ, सूर्य, चन्द्र, भेक, मन्दराचल और किसी समय षिषी भी विचलित हो सकती है, परन्तु धर्म और सुजनोंके वाक्य कभी नहीं विचलित होते ॥४॥ .

& सूक्तिसुधाकर , अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः । नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥ ४५ ॥ নিমূঙ্কিঃ विद्वत्वञ्च नृपत्वश्च नैव तुल्यं कदाचन । स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥ ४६ ।। पण्डिते च गुणाः सर्वे मूर्खे दोपा हि केवलम् । तसान्मूर्खसहस्रम्यः प्राज्ञ एको विशिष्यते ॥४७॥* परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् । वर्जयेत्तादृशं मित्रं विपकुम्भं पयोमुखम् ।। ४८॥ शारीर अनित्य है, धन मी सदा रहनेवाला नहीं, मृत्यु सदा पास ही रहती है, इसलिये धर्मका संग्रह करना चाहिये ॥ ४५ ॥ वित्ता और राजाद-इन दोनोंकी तुलना कदापि नहीं हो सकती रामा अपने ही देश आदर पाता है, किन्तु विद्वान् सर जगह आर पाता है ॥ ४६॥ पण्डितोंमें सर गुण ही रहते हैं और मूसाम फेयल दोर हो; इसलिये एक पण्डित हजार मूखोंगे भी उसम १॥४॥ जो ऑल ओट होनेर काम विगारे और राम्मल होनेपर मीठी-मीठी बात बनाकर कहे ऐमे मित्रको गुम्बार दूप तथा मीटर विषमे मरे पो समान स्याग देना चाहिये ||४|| .

* नीतिसूक्ति रूपयौवनसम्पमा विशालकुलसम्भवाः विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ।। ४९॥ ताराणां भूपणं चन्द्रो नारीणां भूपणं पतिः । पृधिन्या भूपणं राजा विद्या सर्वस्य भूपणम् ॥ ५० ॥ कोऽर्थः पुत्रेण जावेनयो न विद्वान् न भक्तिमान् । काणेन चक्षुषा किं वा चक्षुम्पीडव केवलम् ॥५१॥* लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् । प्राहे तु पोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ।। ५२ ॥ एकेनापि सुक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना। वासितं सादु धनं सर्वे सुपुत्रेण कुलं यथा ॥५३॥ जो विद्याहीन है ये यदि रूप और यौवनसे सम्पन हों तथा उप कुल में उत्पन्न हुए हो तो भी गन्धहीन टेसूके फूलको तरह शोभा नहीं पाते ||४|| ताराओंका भूषण चन्द्रमा, स्त्रीका भूषण पति और पृथिवीका भूषण राजा है, किन्तु विद्या सभीका भूषण है ॥५०॥ जिसमें विद्या और भक्ति नहीं ऐसे पुत्र होने से स्या लाभ है कानी आँखके रहने से क्या लामा उससे तो केवल नेत्रकी पीड़ा ही होती है ॥५१॥ पाँच वर्षको अवस्थातक पुषकी लालना करनी चाहिये, उसके बाद दस वर्ष [अर्थात् पाँच वर्षसे पन्द्रह वर्षकी अवस्था तक उसे ताड़ना देना चाहिये और जब वह सोलह वर्षको अवस्थामें पहुंचे, तो उससे मिरके समान बर्ताव करना चाहिये ।।५२॥ जैसे एक ही उचम क्ष विकसित होकर अपनी सुगन्धसे समस्त बनको सुषासित कर देता है, वैये ही एक सुपुत्र समसा कुलको यशका भागी बनाता है५३॥ चाणक्यनीते।

किरणोंसे वञ्चित नहीं रखता से ही सजन पुरुष गुणहीन प्राणियोपर शत्रु उत्पन्न होते हैं ।। ५७ || दुष्ट व्यकि मीठी बातें करनेपर भी विश्वास करनेयोग्य नहीं होता, क्योंकि उसकी जीमपर शहदके ऐसा दुष्ट व्यक्ति विद्यासे भूपित होनेपर भी त्यागने योग्य है। जिस पर मणिपाकर एकन शुकावेग दममानन पहिना। दाने हि यनं गर्व कुपुत्रेण कुलं यया ॥५४ निर्गुगेपपि सच्चेष दयां कुर्वन्ति साधकः । न हि संहरत न्योत्सा चन्द्रमाण्डालमनि ।। ५५ रिया मित्र प्रयासण माता मित्रं गृहेषु च । ध्याधितसाधं मिनं धर्मों मित्रं मृतश च ।। ५६ नफश्रित कस्यचिन्मित्रं न चित् कस्यविद्रिपुः। व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपबस्तया ।।५७ ॥ दुर्जनः प्रियवादी घ नैतविश्वासकारणम् । मधु तिइति निहारें हृदये तु हलाहलम् ।। ५८॥ दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालकृतोऽपि सन् । मणिना भूपितः सर्पः किमसीन भयङ्करः ॥ ५९॥ जिस प्रकार एक ही सूखा वृक्ष स्वयम् आगसे जलता हुआ समन वना जला देता है, उसी प्रकार एक ही कुपुत्र अपने बंशके नाशा कारण होता है ॥ ५५ ॥ जैसे चन्द्रमा चाण्डालके घरको अपने भी दया करते हैं ।। ५५ ॥ परदेशी विद्या मित्र है, घर मावा मित्र ! रोगीका औषध मित्र है, और मृत व्यक्तिका धर्म मित्र है ॥ ५६ ॥ कोई किसीका मित्र नहीं और कोई किसीका शव नहीं है । बर्तावसे ही भिन्न और मिठास होता है परन्तु हृदयमै हलाहल विष मरा रहता है ॥ ५४॥ मस्तकपर मणि होती है, यह क्या भयङ्कर नहीं होता ! ॥ १९ ॥ * चाणक्यनीतेः।

धर्मसूक्ति सदा प्रहृष्टया मायं गृहकार्येषु दक्षया । सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया ॥४०॥* नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञोन व्रतं नाप्युपोपणम् । पति शुश्रूपते येन तेन स्वर्गे महीयते ॥४१||* अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैत्र नियोजयेत् । शौचे धर्मेऽन्नपक्त्यांच परिणामस्थ वेक्षणे ॥४२॥* पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोष्टनम् । स्वमोज्यगेहवासश्च नारीणां दूपणानि षट् ॥४३॥* चलन्ति तारा रविचन्द्रमण्डलं चलेच्चमेरुविचलेचमन्दिरम् । कदापि काले पृथिवी चलेच चलेन धर्मः सुजनस वाक्यम् ४४ स्त्रीको चाहिये कि सदा प्रसन्न विस रहे, घरके कामों में कुशल हो, घरकी सामग्रीको अच्छी तरह रखे और हाय रोककर सर्च करे ॥४०॥ स्त्रियोंको (पति-सेवाके सिश] अलग यस व्रत और उपकास करने की आवश्यकतानहीं है। क्योंकि रत्री जो पतिकी सेवा करती है उससे स्वर्गमें भादर पाती है ||४|| धन-संप्रह, व्यय, शरीर आदिको शुद्धि, धर्म, रसोई बनाना तथा घरकी सामग्रीको देख-भाल-इन कार्योंमें ही स्त्रियों को लगाये ॥ ४२ ॥ मय पीना, दुर्जनोंका संसर्ग, पत्तिका विरह इधर-उपर घूमना, कुसमयमें सोना और दूसरेके घरमें रहना ये स्त्रियों के दोष ॥४३॥ ताराएँ, सूर्य, चन्द्र, मेरु, मन्दराचल और किसी समय पृथिवी मी विचलित हो सकती है, परन्तु धर्म और सुजनोंके वाक्य कभी नहीं विचलित होते ॥४॥ - गमिसुधार अनित्यानि शरीराणि विमो व शाग्रतः । नित्यं गमिहिनो मृत्युः कर्नम्यो धर्मगंग्रहः ॥ ४५ ॥ नीतिसूक्तिः विद्वान नृपत्वमा नेय तुल्यं कदाचन । संदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥ १६ ॥ पण्डितेच गुणाः सर्वे मू दोषा हि केवलम् । तसामूर्खसहस्रम्यः प्रात एका विशिष्यते ।। १७ ॥ परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् । वर्जयेत्तादृशं मित्रं विपकुम्मं पयोमुखम् ।। ४८॥ शरीर अनिःय , धन मी सदा रहने वाला नहीं, मृत्यु सदा पास ही रहती है, इसलिये धर्मका संग्रह करना चाहिये ॥४॥ विद्वत्ता और राजपद-इन दोनोंकी तुलना कदापि नहीं हो सकती राजा अपने ही देशमें आदर पाता है, किन्तु विद्वान् सब जगह आदर पाता है ॥ ४६॥ पण्डितोंमें सब गुण ही रहते हैं और मूखोंमें केवल दोष ही, इसलिये एक पण्डित हजार मूखसि मी उत्तम है ॥ ४॥ जो आँखके ओट होनेपर काम विगाड़े और सम्मुख होनेपर मीठी-मीठी बात बनाकर कहे ऐसे मित्रको मुखपर दूष तथा मीतर विषसे मरे पड़े के समान त्याग देना चाहिये ॥४८॥ * चाणक्यनीदे।

ॐ नीतिसूक्ति रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्मवा। विद्याहीना नशोमन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥४९॥* ताराणां भूपणं चन्द्रो नारीणां भूपणं पतिः । गृषिव्या भूपणं राजा विद्या सर्वस्य भूपणम् ॥ ५० ॥* कोर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान् न भकिमान् । काणेन चक्षुषा किं वा चक्षुःपीडेव केवलम् ।। ५१ ॥ लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् । प्राप्ते तु पोडशे वर्षे पुत्रं मित्रपदाचरेत् ॥५२॥ एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना । वासितं स्याद् वनं सर्व सुपुत्रेण कुलं यथा ॥५३॥ जो विधाहीन है ये पदि रूप और यौवनसे सम्मान हो तथा उच्च कुल में उत्पन्न हुए हों तो भी गन्धहीन टेसू के फूलकी तरह शोभा नहीं पाते ॥४९॥ ताराओंका भूषण चन्द्रमास्त्रीका भूषण पति और पृथिवीका भूपण राजा है, किन्तु विद्या सभीका भूषण है ॥५०॥ जिसमें विद्या और भक्ति नहीं ऐसे पुत्रके होने से क्या लाभ है। कानी आँखके रहने से क्या लामा उससे तो केवल नेत्रकी पीड़ा ती होती है ॥५१॥ पाँच वर्षकी अवस्थातक पुत्रको लालना करनी चाहिये, इसके बाद दस वर्ष [अर्थात् पाँच वर्षसे पन्द्रह वर्षकी अवस्था] तक उसे आइना देना चाहिये और जब वह सोलह वर्ष की अवस्था में पहुँचे, तो उससे पत्रके समानराव करना चाहिये ।।५२|| जैसे एक ही उत्सम वृक्ष विकसित कर अपनी मुगन्धसे समस्त वनको सुवासित कर देता है, वैसे । एक सुपुत्र समस्त कुलको यशका भागी बनाता है ॥ ५३ ।। पाणपनीले।

१४६ सूक्तिसुधाकर एकेन शुष्कवृक्षण दह्यमानेन पहिना। दझते हि वनं सर्व कुपुत्रेण कुलं यथा ॥५४॥ निर्गुणेष्वपि सत्त्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । न हि संहरते ज्योत्स्ना चन्द्रश्वाण्डालवेश्मनि ॥ ५५ ॥ विद्या मित्रं प्रवासेपु माता मित्रं गृहेषु च ) व्याधितस्योपचं मित्रं धर्मों मित्रं मृतस्य च ॥५६॥ न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं न कश्चित् कस्खचिद्रिपुः। व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥५७ ॥ दुर्जनः प्रियवादी च नैतद्विश्वासकारणम् । मधु तिष्ठति जिह्वाने हृदये तु हलाहलम् ।। ५८ ॥ दुर्जनः परिहर्चव्यो विद्ययालकृतोऽपि सन् । मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः ॥ ५९॥ जिस प्रकार एक ही सूखा वृक्ष स्वयम् आगसे जलता हुआ समस्त बनको जला देता है, उसी प्रकार एक ही कुपुत्र अपने वंशके नायका कारण होता है।। ५४ ॥ जैसे चन्द्रमा चाण्डाल के घरको अपने किरणों से यथित नहीं रखता; येसे ही सजन पुरुष गुणहीन मागियोपर मी दया करते हैं ॥ ५५ ॥ परदेशमें विद्या मित्र है, घरमें माता मिन, रोगीका ओपष मित्र , और मृत म्पतिका धर्म मित्र है॥५६॥ कोई wिीच मित्र नहीं और कोई किसीका या नहीं है । पायले ही मित्र और शत्रु उत्पन होते हैं ॥ ५७॥ दुष्ट ग्यक्ति मीठी बाते करनेपर भी विश्वास करनेयोग्य नहीं होता, क्योंकि उसकी जीमपर शहदके ऐसा मिठास होता है परन्तु हायमें हमाइल विप मरा सतारे॥५८॥ दुष्ट म्पत्ति विद्यारी भूषित होनेपर भी त्यागने योग्य है जिस सपके मनकार मगि होती है, पर क्या भयर नही रोता ॥ ५९॥ --

नीतिसूक्ति
सर्पः क्रूरः खल र सात् करतरः खलः ।
मन्त्रीपधिवशः सर्पः खलः केन निवार्यते ॥६
धनानि जीवितश्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
सनिमित्ते बरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥६
आयुपा क्षण एकोऽपिन लम्यावर्णकोटिमिः।
स चेनिरर्थक नीतः कानु हानिस्ततोधिका ॥६
शरीरस्य गुणानाच दूरमत्यन्तमन्तरम् ।
शरीरं क्षणविचसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः ॥ ६
धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यश्च पञ्चमः ।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते तत्र वासं न कारयेत् ॥६
साँप निठुर होता है और दुष्ट भी निठुर होता है। तथापि दुष्ट पुरुष
अपेक्षा अधिक निदुर होता है। क्योंकि साँप तो मन्त्र और।
चशमें आ सकता है, किन्तु दुष्का कैसे निवारण किया जाय ॥
बुद्धिमानीको उचित है कि दूसरेके उपकारके लिये धन और जीव
अर्पण कर क्योंकि इन दोनौका नाशतीनिधय दी है, इसलिये
इनका त्याग करना अशा है ॥६१ ॥ जीवनका एक क्षण में
वर्णमुद्रा देनेपर नहीं मिल सकता, वह यदि वृथा न हो
इससे अधिक हानि क्या होगी॥६२॥ शरीर और र
दोनोंमें बहुत अन्तर है, शरीर थोड़े ही दिनातक रहता है पर
मलयफालतक बने रहते हैं ।। ६३ । जहाँ धनी, वेद जाननेवाला
राजा नदी और पैन-ये पाँची न हो, वहाँ निवास नहीं करना चाहि
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•चाणक्यनीते।

१५८ गनिमुपागर भूखो यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र गुगनितम् । दम्पत्यो कलहोनास्तिता श्री स्वयमागता ।। ६५ अस्ति पुत्रो वशे यस मृत्यो मार्या तथैव च। अमारेऽप्यतिरान्तो वयोशी महीतले ।। ६६ । माता यस्य गृहे नास्ति मार्या पात्रियवादिनी । अरण्यं वेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम् ।। ६७ । फोफिलानां स्वरो रूपं नारीरूपं पतिव्रतम् । विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ।। ६८ ॥ गुरुरमिद्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वसाम्यागतो गुरुः ॥ ६९ ॥ हाँ मूर्ख नहीं पूजे जाते, जहाँ धान सञ्चित रहता है, जहाँ पति शीमें कलह नहीं रहता, वहाँ लक्ष्मी स्वयं आ जाती है ॥६५॥ i, पुत्र और नौकर जिसके वश में हैं और जो अभावमें भी अत्यन्त सन्तुष्ट हता है, वह पृथिवीपर भी रहकर स्वर्गका सुख भोगता है ॥६६॥ जिसके में माता नहीं [ अर्थात् जिसकी माता मर गयी है ] और जिसकी । कटुवचन बोलनेवाली है, उसको वनमें जाना ही उचित है, क्योंकि सके लिये जैसा वन है वैसा ही घर भी है ॥ ६७ ॥ कोयलोंकी दरता स्वर है, स्वीका सौन्दर्य सतीत्व है, कुरूपका रूप उसकी द्या है और तपस्खीका सौन्दर्य क्षमा है ।। ६८ ॥ अग्नि द्विजाति आहाण) का गुरु है, ब्राह्मण सब वर्गों का गुरु है, स्त्रियोका मात्र पति ही गुरु है और अतिथि सबका गुरु है॥६॥ * चाणक्यनीते।

* नीतिसूक्ति स जीयति गुणा यस्य धर्मो यस्य च जीवति । गुणधर्मविहीनस जीवनं निष्प्रयोजनम् ॥ ७० ॥ दुर्लभं प्राकृतं मित्रं दुर्लभः क्षेमकृत् सुतः। दुर्लभा सदृशी भार्या दुर्लभः स्वजन नियः ॥७१॥* साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः । तीर्थ फलति कालेन सद्यः साधुसमागमः ॥ ७२ ।।* सत्सङ्गः केशवे भक्तिर्गङ्गाम्मसि निमज्जनम् । असारे खलु संसारे त्रीणि साराणि भावयेत् ।। ७३ ।।* शान्तितुल्यं तपोनास्ति न सन्तोपात् परं सुखम् । नहष्णापाः परो व्याधिन च धर्मो दधासमः ॥७४||* अन्नदाता भयत्राता विद्यादाता तथैव च । जनिता चोपनेवा च पञ्चैते पितरः स्मृताः ।। ७५ ॥ जिसके गुण और धर्म जीवित हैं यही वास्तवमें जी रहा है, गुण और धर्मरहित व्यक्तिका जीवन निरर्थक है ॥७०॥ स्वाभाविक मित्र, हितकारी पुत्र, मनके अनुकूल स्त्री और प्रियतम कुटुम्बी मिलना दुर्लभ है ।।७१11 साधुओं का दर्शन पावन पौकि वे तीर्थखरूप होते हैं, तीर्थका फल तो देरसे मिलता है परन्तु साधुसमागमका फल तत्काल प्राप्त होता है।॥७२॥ इस असार संसारमें साधु. सङ्गति, वर-मक्ति और गला-स्नान-इन तीनों को ही सार समझना चाहिये 11७३ ॥ शान्तिके समान तर नहीं, सन्तोषके समान सुख नहीं, लोभके सहा रोग नहीं और दयाके समान धर्म नहीं है ॥ ७४ । अन्न देने बाला, भवसे बचाने वाला, विद्या पदानेवाला, जन्म देनेवाला और यज्ञोपवीत शादि संस्कार करानेवाला-ये पाँच पिता कहे जाते हैं ।।७५॥ पाणवयनी।

गनिसुधाकर आदी माता गुरोः पनी मामणी रानपनिका । घेनुर्धात्री तथा पृथ्वी ससेना मातरः स्मृताः ॥ ७६ ॥ आपदा कथितः पन्या इन्द्रियाणामसंयमः। तअयः सम्पदा मार्गो मेनेष्टं न गम्यताम् ।। ७७ ॥* समुद्रावरणा भूमिः प्राकारावरणं गृहम् । नरेन्द्रावरणो देशश्चरित्रावरणाः खियः॥ ७८ ॥ परोपकरणं येषां जागतिं हृदये सताम् । नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदः स्युः पदे पदे ॥ ७९ ॥ नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः। नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ।। ८० ॥ पादपानां भयं पाताद पमानां शिशिराद्भयम् । पर्वतानां मयं वाद साधूनां दुर्जनाद्भयम् ।। ८१ ॥ अपनी जननी, गुरु-पत्नी, ब्राह्मण-पत्नी, राजपनी, गाय, धात्री (दूध पिलानेवाली दाई) और पृथ्वी-ये सात माताएँ कही गयी हैं ॥ ७६ ॥ इन्द्रियोंको वशमें नहीं लानासन विपत्तियोंका मार्ग बतलाया गया है और इनको जीत लेना सब प्रकारके सुखोंका उपाय है। इन दोनोमें जो मार्ग उत्तम है उसीसे गमन करना चाहिये ।।७७॥ पृथिवीकी रक्षा समुद्रसे, गृह की रक्षा चारदिवारीसे, देशकी रक्षा राजासे और स्त्रीको रक्षा उत्तम चरित्रसे है ॥७८॥ जिन सजनोंके मनमें सदा परोपकार करनेकी इच्छा बनी रहती है, उनकी विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और उन्हें पग-पगपर सम्पत्ति प्राप्त होती है।।७९|| विद्याके समान नेत्र नहीं, सत्यके समान तप नहीं, [संसारकी वस्तुओंमें ] आसक्तिके समान दुःख नहीं और त्यागके समान सुख नहीं है ॥८॥ वृक्षोंको आँधीसे, कमलोको , पर्वतीको वनसे और साधुओंको दुर्जनसे हर है ।। ८१॥ 1 नीतिसूक्ति सुभिक्षं कृपके नित्यं नित्यं सुखमरोगिणः । मार्या भर्तुः प्रिया यस्य तस्य नित्योत्सवं गृहम् ॥ ८२॥ प्रथमे नार्जिता विद्या द्वितीये नार्जितं धनम् । तृतीये मार्जितं पुण्यं चतुर्थे कि करिष्यति ।। ८३ ॥* क्षमया दयया प्रेम्णा सूनृतेनार्जवेन च । वशीकुर्याज्जगत् सर्व विनयेन च सेवया ॥ ८४ ॥ अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थश्च चिन्तयेत् । गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ।। ८५॥% अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस दर्शनम् । सर्वस्य लोचनं ज्ञानं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥८६॥* जो पिकर्म करता है उसके अन्नका अभाव नहीं रहता, जो नीरोग है बह सदा सुखी रहता है और जिस स्वामीकी स्त्री उसको प्यारी है उसके घरमें सदा आनन्द रहता है ॥ ८२॥ जिसने प्रथम अवस्था (लड़कपन) में विद्या नहीं पदी, दूसरी (युवा) अवस्थामें धन नहीं कमाया और तीसरी (प्रौद) अवस्था धर्म नहीं किया। यह चौथी अवस्या (बुदापे) मैं क्या फरेगा ११८३१ क्षमा, दया, प्रेम, मधुर वचन, सरल स्वभाव, नम्रता और सेवासे सब संसारको वध करना चाहिये ।1८४ || बुदिमानको उचित है कि अपने को अजर और अमर समझकर विद्या एवं धनका उपार्जन करे और मृत्यु के पकड़े खड़ी है--यह सोचकर धर्म करे ॥ ४५ ॥ जो अनेको सन्देहीको दूर करनेवाला और परोक्ष अर्थको दिखानेवाला है, वह शन सभीका नेत्र है, जिसमें शान नहीं यह निरा अन्धा १॥ ८६ ।। .माणवयनी।।

& सूक्तिसुधाकर मनस्यन्यद् वचस्सन्यद कर्मन्यन्यद्दुरात्मनाम् । मनस्येकं वचस्येकं कर्मन्येकं महात्मनाम् ॥ ८७।। प्ररिचार्योचरं देयं सहसा न वदेव कनिन् । भयोरपि गुणा प्रासादोपास्त्याज्यागुरोरपि ।। ८८ १० इसस भूरनं दानं सत्यं कण्ठस भाणम् । फर्गस भाग भाग भूगः किं प्रपोजनम् ।। ८९॥ त प्रतिदा मर्गनृगं शूरस जीरितम् । बिनाम वर्ग मारी निम्माम वर्ण जगत् ॥९॥ पानं मुबहाना केरल सिर्जनम् । उनी मोगा प्रोपाप न मानये ॥११॥ Ta, THER #NATimit. reakiktiramanthamstate Karenuntryia aft * भज है। Imamta .

श नीतिसूक्ति पड् दोपाः पुरुपेणेह हातव्या भूविभिच्छता। निद्रा तन्द्रा मयं मोघ आलस्यं दीर्घसूत्रता ।। ९२ ।।* उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी- देवेन देयमिति कापुरुपा बदन्ति । देवं निहत्य कुरु पीरुपमात्मशक्तथा यले कृते यदि नसिध्यति कोत्र दोपः ।।९३ ॥* परदारान् परद्रव्यं परीवाद परस्य च। परीहासं गुरोः स्थाने चापल्यं च विवर्जयेत् ।। ९४ ॥ पृथा राष्टिः समुद्रेषु वृथा उप्तस भोजनम् । पृथा दानं समर्थप पृथा दीपो दिवापि च ॥ ९५ ।।* ना, तन्द्रा, भय, बोध, आलस्य और दीपात्रता--ये ए. दोष, इस संसारमें ऐश्वर्य प्राय परमेकी सा रखने वाले गुपको छोड़ ने पाहिये ॥ १२॥ उद्योगी वीर पुरुषको परमी मिली, पापर हा करते हैं कि [जो मिलता है यह ] 'मापसे मिलवर २१ भाग्यकी बात छोइसर अपनी प्रतिमे पुरुषार्थ परो यत्न करनेपर भी यदि कार्य मरन होतो हममें दो ही क्या है ! १३ ॥ परस्त्री, पर धन, निश, परिस और के सामने बहरवा-ना माग करना चाहिये ।। १४ । समुद्र में पति भरपेट पाये एरको भोजन, परिमानदान भोर दिन दौरस-पोरोवे ॥१५॥ .रानी सूतिसुधाकर त्यज दुर्जनसंसर्ग मज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरानं मर नित्यमनित्यताम् ॥ ९६ ॥ दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं यस्त्रपूतं जलं पियेत् । सत्यपूतां वदे याचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ ९७ ।। सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः। सत्येन वायवो वान्ति सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम् ।। ९८ ॥ कोऽतिभार समर्थानां किं दूरे व्यवसायिनाम् । को विदेशासविद्यानां का परः प्रियवादिनाम् ॥ ९९।।* शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च। दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥१००||* खलका सङ्ग छोड़, साधुको सङ्गति कर दिन-रात पुण्य किया कर, संसार अनित्य है- इस प्रकार निरन्तर विचार करता रह ।।१६।। देख-भालकर पैर रखना चाहिये, कपड़ेसे छानकर पानी पीना चाहिये, सच्ची बात कहनी चाहिये और जो मनको पवित्र जान पड़े वह आचरण करना चाहिये ॥९॥ सत्यने ही पृथ्वीको धारण कर रखा है, सत्यसे ही सूर्य तपता है और सत्यसे ही वायु चलती है, सब कुछ सत्यमें ही स्थित है ॥९८॥ शक्तिशालीके लिये अधिक बोझ क्या है, व्यापारीके लिये दूर क्या है ? विद्वान्के लिये विदेश और मधुरमाषीके लिये शत्रु कोन है । ॥ १९॥ मूर्खको प्रतिदिन सैकड़ों भयके और हजारों शोकके मौके आ पड़ते हैं, पर विदानको नहीं ॥१०॥ - * चाणवयनीते नीतिसूक्ति द्रिताधीरतया विराजते कुरूपता शीलतया विराजते। नोजनं चोप्यतया विराजते कुबखताशुभ्रतया विराजते १०१* मा चतुर्भिः कनक परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताउनैः । याचतुर्मिः पुरुषः परीक्ष्यते श्रुतेन शीलेन कुलेन कर्मणा १०२* अनम्यासे विपं विद्या अजीर्णे भोजनं विषम् । वि गोष्ठी दरिद्रस्य भोजनान्ते जलं विपम् ॥१०॥ मात्वत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् । आरमवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥१०॥ दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेनमानेन शुद्धिर्न तु चन्दनेन । मानेन तिनतु भोजनेन ज्ञानेनमुक्तिनतु भण्डनेन१०५* रिद्रता धीरजसे कुरूपता अच्छे स्वभावसे, कुभोजन भी गर्म रहनेसे और पुराना कपड़ा भी स्वच्छहोनेसे शोभा पाता है ||१०|| जिस प्रकार घिसने, काटने, तपाने और पीटने-इन चार प्रकारों से सुवर्णकी परीक्षा होती है उस प्रकार विद्या, कुल, शील और कर्म इन चारोंसे हो पुरुषकी परीक्षा होती ३।१०२॥ विना अभ्यास किये पढ़ी हुई विद्या, बिना पचे ही किया हुआ भोजन, दरिद्रके लिये [निकोकी ] सभा और भोजनसमाप्ति के समय जल पीना--ये सब विषके समान हैं ॥ १०३ ॥ जो पर-त्रियोंको माताके समान, पर-धनको मिट्टी के देलेके समान तथा समस्त प्राणियोंको अपने ही समान देखता है, वही वास्तव पण्डित है ||१०४॥ दान देनेसे ही हाथकी शोभा है, गहनोंसे नहीं; स्नान करनेसे ही शुद्धि होती है, चन्दनसे नहीं; सम्मानसे नृसि होती है, केवल भोजनसे नहीं और शानसे की मुक्ति होती है, केवल वेष-भूषा धारण करने से नहीं ॥ १०५॥ चापाक्यनी।

गनिराकर फाफालाकानि मियागिको दंगकीम्ययागौ। फमा काम में शक्तिरिति गिन्य मुहः ॥१०६|| अत्यन्तको कदुकान याणी दरिद्रमा च सजना वरम् । नीनाराहाबलहीन या निहानिदेह नरकसिनानाम् ।१०७१ धनधान्यप्रयोगेषु विद्यामंग्रहणे । आधारे व्यवहारे च सतलजः सुखी भवेत् ॥१०॥ गुणेरुत्तमा याति नोमरासनसंस्थितः। प्रासादशिखरस्योऽपि काकः किं गरुडापते ॥१०९||* प्रियवाक्यप्रदानेन सर्व तुप्यन्ति जन्तवः । वसातदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥११०॥ समय कैसा! मित्र कौन है देश कौन सा है ! आय और स्य कितना है। मैं किसका हूँ। और मेरी शक्ति कितनी है। इसका बार- पार विचार करना चाहिये ।। १०६ ।। अति कोष, कटुपचन, दरिद्रता आत्मीय जनोंसे वैर, नीचौकासन और नीचकी सेवा-ये नरक में रहने घालोंके लक्षण हैं ॥१०७|| अन्न-धनके उपयोग, विद्योपार्जनमें, भोजनमें और व्यवहारमें लजाको त्याग देनेवाला सुखी होता है ।। १०८॥ पाणी गुणों से उत्तम होता है, ऊँचे आसनपर बैठकर नहीं, कोठेके फैगरेपर बैठा हुआ कौआ, क्या गरुह हो जाता है । ॥ १०॥ मधुर वचनके बोलनेसे सब जीव सन्तुष्ट होते हैं, इस कारण वैसा ही बोलना चाहिये, पचनमें क्या दरिद्रता है ! ॥ ११ ॥ चाणक्यनीते।

नीतिसूक्ति पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम् । उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम् ॥१११||* सन्तोपत्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने । त्रिपु चैव न कर्तव्योऽध्ययने जपदानयोः ॥११॥ विप्रयोर्विप्रयवयोश्च दम्पत्त्योः स्वामिभृत्पयोः। अन्तरेण न गन्तव्यं हलस वृपभस्य च ॥११३॥* पादाभ्यां न स्पृशेदनि गुरुं ब्राह्मणमेव च । नैव गां च कुमारी च न वृद्धं न शिशु तथा ॥११॥ आप्तद्वेषाद्भवेन्मृत्युः परद्वेषाद्धनक्षयः। राजद्वेपाद्भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेपात्कुलक्षयः ।।११५||* सदा प्रसन्नं मुखमिष्टयाणी सुशीलता च स्वजनेषु सख्यम् । सतांग्रसङ्ग कुलहीनहानं चिह्वानि देहे त्रिदिवस्थितानाम् ११६ जो विद्या पुस्तकों में ही रहती है और जो धन दूसरों के हाथोंमें रहता है, काम पड़ जानेपर न वह विद्या है और न वह धन ही है ।।१११॥ अपनी स्त्री, भोजन और धन-इन तीनोंमें सन्तोष करना चाहिये । पदना, जप और दान- इन तीनोंमें सन्तोष कभी नहीं करना चाहिये || ११२ ।। दोबामणोंके ग्रामण और अग्निके, पति-पत्नी के स्वामी तथाभृत्यके एवं इल और बैल के बीच से होकर नहीं जाना चाहिये ।।११३॥ अग्नि, गुरु, माझण, गौ, कुमारी, वृद्ध और बालक-इनको पैरसे न दूना चाहिये । ११४॥ बड़ों के द्वेषसे मृत्यु, शत्रुके विरोघसे धनका क्षय, राजाके द्वेषसे नादा और माणके देपसे कुलका क्षय होता है ।। ११५ ॥ सदा प्रसन्नमुख रहना, प्रिय बोलना, सुशीलता, आत्मीय जनोंमें प्रेम, सजनोंका उड्ग और नीचोंको उपेक्षा स्वर्गमे रहनेवालोंके लक्षण हैं ॥११६ ॥ * चाणक्यनीते।

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नीतिसूक्ति केपूरा न विभूषयन्ति पुरुष हारा न चन्द्रोज्ज्वला न मानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः । वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाभूपणं भूषणम् ॥१२०॥ विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं विद्या भोगकरी यशसुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः । विधा बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं देवतं विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ११२१।। रे रे चातक सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयता- मम्मोदा बहवो वसन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः। पुरुषको न तो केयूर (बाजूबन्दन चन्द्रमाके समान उज्वल हार,नशान न उबटन, न फूल और न सजाये हुए बाल ही सुशोभित कर सकते हैं। पुरुष यदि संस्कृत वाणीको धारण करे तो एकमात्र वही उसकी शोम' बढ़ा सकती है, इसके अतिरिक्त और जितने भूषण हैं वे तो सब नष्ट है जाते हैं सच्चा भूषण तो वाणी ही है ।। १२०॥ विद्या मनुष्यका एक विशेष सौन्दर्य है, छिपा हुआ सुरक्षित धन है, विद्या भोग, यश और सुखको देनेवाली है, विद्या गुरुओंकी भी गुरु है, वह परदेशमें जानेपर खजनके समान सहायता करनेवाली है। विद्या ही सबसे बड़ी देवता है राजाओं में विद्याका घी सम्मान होता है धनका नहीं, विद्याके बिन तो मनुष्य पशुके समान है ॥ १२१ ।। अरे मित्र पपीहे ! सावधान मनसे जरा एक क्षण सुन तो ! अरे, आकारामें मेष तो बहुत हैं किन् सब एक-से ही नहीं है, कोई तो अपने दर्शनमाप्रसे ही पृथ्वीको गील Nagarm फेनिवाटिभिगाईयन्ति वार्ता गर्जन्ति पिशाणा गंमं पायगि राम सम्म पुरतो मा महि दीनं बनः॥१२॥ मानान्मुकः प्रायनामाइलो जन्मको या शृष्टः पार्ने पनि सदा दतमागमः। धान्या भीदिन सहने प्रागनी नामिजातः रोवाधर्म: परमगइनो योगिनामप्पगम्यः ॥१२शा गुणपदगुणयदा पुर्यना कार्यमादी परिणतिरबधार्या यातः परिहतेन । अतिरमसहताना फर्मणामाविपत्ते. भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः ॥२४ करनेवाले और कोई व्यर्थ ही गते हैं। जिस-जिसको देखे उसी उसके सामने दीन पचन मन योग ॥ १२२ ।। मनुष्य चुर रहनेसे गूंगा, चतुर पता होनेसे चारस या यकवादी कहलाता है, इसी प्रकार यदि पासमें बैठे तो दीट, दूर रहे तो दम्बू, धमा रसे तो डरपोक और अन्याय न सह सके तो प्रायः पुरा समझा जाता है। इसलिये सेवाधर्म यहुत ही कठिन है, इसे योगी भी नहीं जान पाते ॥ १२३ ॥ अन्डा या धुरा किसी भी कामका आरम्म करनेवाले विद्वान्को पहले ही यन- पूर्वक उसके भले-बुरे परिणामका निश्चय कर लेना चाहिये क्योंकि बहुत जल्दमें किये गये कर्मोंका दुष्परिणाम मरनेवक मनुष्य के हृदयमें जनन दा करनेवाला और शूलके समान चुमनेवाला होता है ।। १२४ ।। + भर्तृहरेः। -

नीतिसूक्ति
ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य वाक्संयमो
ज्ञानसोपशमः श्रुतस्य विनयो वित्तस्य पात्रे व्ययः ।
अक्रोधस्तपसः क्षमा प्रभवितुर्धर्मस्य निर्व्याजता
सर्वेपामपि सर्वकारणमिदं शीलं परं भूपणम् ।।१२५||
दाक्षिण्यं वजने दया परजने शाठ्य सदा दुर्जने
प्रीतिः साधुजने नयो नृपजने विद्वजनेष्वार्जवम् ।
शौर्य शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता
ये चैवं पुरुषाः कलासु कुशलास्तेप्येव लोकास्थितिः ॥१२६||
साधुस्त्रीणां दयितविरहे मानिनो मानमझे
सल्लोकानामपि जनरवे निग्रहे पण्डितानाम् ।
अन्योनेके कुटिलमनसां निर्गुणानां विदेशे
भृत्याभावे भवति मरणं किन्तु सम्भावितानाम् ।।१२७।।
ऐश्वर्यकी शोभा सुजनता है, शूरवीरताको शोमा कम बोलना है, शानकी
शान्ति, शास्त्राभ्ययनकी नम्रता, धनकी सत्पात्रको दान करना, तपकी
अक्रोध, समर्थकी क्षमा, धर्मकी दम्महीनता और सबकी शोमा सुशीलता
है, जो सभी सद्गुणोंकी हेतु है ।। १२५ ॥ आरमीय जनोंपर उदारता,
दूसरोंपर दया, दुष्टोसे शठता, साधुओंसे प्रीति, राजाओंसे नीति,विद्वानोंसे
सरलता, शत्रुओंपर वीरता, बड़ौपर क्षमा और खियोंसे चालाकी रखना-
इन सब गुणों में जो निपुण है, उन्होंपर लोकमर्यादा निर्भर रहती है ।।१२६॥
प्रियतम पतिके वियोगमें सती स्त्रियोंका, सम्मान-मन होनेपर प्रतिक्षित
पुरुषोंका, लोकापवाद होनेपर सत्पुरुषोंका, शास्त्रार्थ में पराजय होनेपर
पण्डितोंका दूसरोंका उत्कर्ष देखकर कुटिल हायवालोंका, विदेशमें
गुणहीन मनुष्योंका और नौकर न रहनेपर अमीर लोगोंका भरण-सा
• मरिशतकार।

ॐ सतिसुधाकर कचिद्रुष्टः कचित्तुष्टो रुटस्तुष्टः क्षणे क्षणे । अव्यवस्थितचित्तस्य प्रसादोपि भयङ्करः ।।१२८||* अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः स्वकार्यमुद्धरेत्प्राज्ञः कार्यध्वंसो हि मूर्खता ।।१२९।।* देवे तीर्थे द्विजे मन्ने दैवज्ञे भेपने गुरौ । यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ॥१३०॥ नागो भाति मदेन के जलरुहः पूर्णेन्दुना शर्वरी शीलेन प्रमदा जवेन तुरगो नित्योत्सवैर्मन्दिरम् । जाता है ।। १२७ ।। जो कभी सट होता है, कभी प्रसन्न होता है। इस प्रकार क्षण-क्षणमें कष्ट और प्रसन्न होता रहता है उस चञ्चलचित्त पुरुष की प्रसन्नता भी भयकर ही है।॥ १२८ ॥ अपमानको आगे कर और सम्मानकी ओर दृष्टि न देकर बुद्धिमानको अपना कार्य-साधन करना चाहिये। क्योंकि काम विगाहना मूर्खता है ।। १२९ ॥ देयता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, औषय और गुरुमें जिसकी जैसी भावना रहती है, उसे यैसी ही सिद्धि प्रास होती है ।। १३०॥ गजराज मदसे, अम कमोंसे, गवि पूर्ण चन्द्रसे, स्त्री शीलसे, घोड़ा धेगरी, मन्दिर नित्य के उस्मयोंसे, याणी याकरणसे, नदी ईसके जोडेसे, समा पण्डितोसे, कुल • परपरस्प नीतिमारा It बापस भविष्कार।

.. गी व्याकरणेन हंसमिथुन द्यः समा पण्डितः पुत्रेण कुलं नृपेण वसुधा लोकत्रयं विष्णुना ॥१३॥ क्षीणफलं त्यजन्ति विहगाः गुप्कंसर सारसा: संपर्युपितं त्यजन्ति मधुपा दग्धं यनान्तं मृगाः । ईव्य पुरुष त्यजन्ति गणिका भ्रष्टश्रिय मन्त्रिणः : कार्यवशासनोऽभिरमते फस्याक्ति को बल्लमः ।।१३२।। खन्छवया रिपुं नययल ग्धं धनैरीचरं णि द्विजमादरेण युवतिं प्रेम्णा समन्धिवान् । (ग्रं स्तुतिभिर्गुरुं प्रतिभिर्ख कथाभियुधं भी रसिकं रसेन सफलं शीलेन कुर्यादशम् ||१३|| से, पृथ्वी राजासे और त्रिलोकी भगवान् विष्णुसे सुशोभित होती :२१॥ परी फल न रहने पर रसको सोर देते हैं, सारस जल सूस र सरोवरका परित्याग कर देते है, भरि पासी पूलको, मृग दग्ध या निधन पुष्पको तया मन्त्रीगण भीहीन रामाफोटोर देते लोग अपने-अपने सापंपही प्रेम करते हैं,वामय में कौन किसा ||१३२॥ मित्रको स्वच्छता (निष्कपट हृदय ) से ओवे, धुको से, सोभीको पनसे, स्वामीको फायसे, आपको आदरसे, हो प्रेमसे, बन्धुभीको समभावसे, अपन्त मरेपीको एलिसे, विनयसे तो बातोम, बुद्धिमानो विपासे, सिर तसे और ममीको मुखलवारे पशीभूत रे ॥ १५ ॥ •समपार मAR मारमार, मान सनि- VETERAT: राशिरोपर स्थानिमसिस -- - +amantritainin निगुनार गुणिगणगणनारम्भे न पतति फटिनी गुगम्भमाग्रस । सेनाम्पा यदि गुतिनी पद पाया कीरजी नाम ।।१३।। परं मान कार्यनयननमुक्तं यदन्तं परं शोभ्यं घुमा न च परफलमामिगमनम् । परं प्राणत्यागो न च पिशुनवायेपमिनि 4 मिशाशित्वं न च पाचनासादनसुखम् ॥१३५।। पठतो नाम्ति मूर्खत्वं जपतो नास्ति पातकम् । जाग्रतस्तु मयं नास्ति कलहोनास्ति मानिनः ।।१३६॥ मातेर रक्षति पितेव हिते नियुङ्क्ते कान्तेव चाभिरमयत्यपनीय सेदम् । गुणीजनोंकी गणना आरम्भ करते समय जिसके लिये लेखनी शीघ्रतासे नहीं चलती, उस पुत्रसे यदि माता पुत्रवती कही जाय तो कहो बन्ध्या कैसी स्त्री होगी?॥१३४॥ चुप रहना अच्छा है पर मिग्या वचन कहना अच्छा नहीं, पुरुषका नपुंसक हो जाना अच्छा है परन्तु परस्त्रीगमन अच्छा नहीं, प्राणपरित्याग कर देना अच्छा है परन्तु चुगुलौकी बातों में रुचि रखना अच्छा नहीं, और भिक्षा मागकर खा लेना अच्छा है परन्तु दूसरोके घनके उपभोगका सुख अच्छा नहीं है।।१३५ ।। जो विद्याध्ययन करता है उसमें मूर्खता नहीं रह सकती, जो जप करता है उसके पाप नहीं रह सकते, जो जागरित है उसको कोई भय नहीं सता सकता, और जो मौनी है उसका किसीसे कलह नहीं हो सकता ॥ १३६ ॥ ल्पलताके विद्या संसारमें क्या-क्या सिद्ध नहीं ? माताके समान वह रक्षा करती है, पिताके समान * हितोपदेशे। - समान नीतिसूक्ति लक्ष्मी तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्ति कि किन साधयति कल्पलतेच विद्या ||१३७॥ "उदारस्य तुणं वित्तं शूरस्य मरणं वणम् । विरक्तस्य तृणं भार्या नि:स्पृहस पूर्ण जगत् ११३८॥ ललितान्तानि गीतानि कुवाक्यान्तं च सौहृदम् । प्रणामान्तः सतां कोपो याचनान्तं हि गौरवम् ॥१३९॥ खगृहे पूज्यते मूर्खः स्वग्रामे पूज्यते प्रभुः। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥१४०॥ अर्थातुराणान गुरुर्न बन्धुः कामातुराणां न भयं न लजा। विद्यातुराणांन सुखं न निद्राक्षुधातुराणां न रुचिर्न वेला|१४॥ , स्व-हितमै नियुक्त करती है, स्त्रीके समान खेदका परिहार करके आनन्दित करती है, लश्मीकी वृद्धि करती है और दिशा-विदिशाओं में कीर्तिका विस्तार करती है ॥ १३७ ॥ उदारके लिये घन, शूरवीरके लिये भरण, विरक्त के लिये स्त्री और निस्पृहके लिये जगत् तिनकेके तुल्य है ॥ १३८ । गानका समसे, प्रेमका कटुपचनसे, सजनों के कोषका प्रणाम करनेसे और गौरवका याचना करनेसे अन्त हो जाता है ।। १३९ ।। मूर्स अपने घरमें, समर्थ पुरुष अपने गाँवमें, राजा अपने देशमै और विद्वान् सर्वत्र ही पूजा जाता है ।। १४०॥ अर्थातुरौं (खार्थियों) को न कोई गुरु होता है न बन्धु, कामातुरोको न भय रहता है नलजा, विद्यातुरों (विद्याप्रेमियों) को न सुख रहता है न नींद तथा क्षुधातुरों के लिये न वाद होता है न भोजन करनेका कोई नियत समय ही ॥१४१ गिरागार "नशा समायाममन्ति पाशाद्वान मेन पदन्तिधर्मम् । धों नये या मनानिग गत्यं न गाछलनानुपिदम्।१४२। “मायारामं नास्ति शरीरपोपर्णपिन्तासमं नालिगरीरशोपणम् । मार्यागमं नास्तिहारीरलोणं विद्यारामं नालिशरीरमूपणम् ।। सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापर्दा पदम् । पुणते हिनिमृश्यकारिणं गुणलब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥१४॥ विधातीर्थे जगति वियुधाः साधयः सत्यतीर्थ गगातीय मलिनमनसो योगिनो ध्यानती। पारातीर्थे धरणिपतयो दानतीर्थ धनाच्या लझातीर्थे कुलयुक्तयः पातकं पालयन्ते ॥१४५।। जिसमें वृद्ध न हो यह सभा नहीं, जो धर्मोपदेश नहीं करते वे वृद्ध नहीं, जिसमें सत्य न हो यह धर्म नहीं और जो छलयुक्त हो वह सत्य सत्य नहीं ।। १४२ ।। माता के समान शरीरका पालन-पोषण करनेवाली, चिन्ताके समान देहको सुखानेवाली, स्त्रीके समान शरीरको गुस देने- वाली और विद्याके समान अंगका आभूषण दूसरा कोई नहीं है ॥१४॥ हठात् कोई कार्य न कर बैठे क्योंकि नासमझीसे भारी विपचियाँ आ पड़ती हैं, और सोच-विचारकर करनेवालेकी और उसके गुणोंसे मोदित हो सम्पत्ति स्वयं दौड़ आती है ॥ १४४ । संसारमें बुद्धिमान्जन विद्यारूपी तीर्थमें, साधु सत्यरूपी तीर्यमें, मलिन भनवाले गङ्गातीर्थम, योगिजन ध्यानतीर्थमें, राजालोग पृथ्वीतीर्थमें, धनीजन दान-तीर्थमें और .कुल-स्त्रियाँ लजा-तीर्थमें अपने पापोंको धोती है. ॥ १४५ ॥ * मारके।

नीतिसूक्ति १६७ सुलमाः पुरुपा लोके सततं प्रियवादिनः । अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥१४६॥ सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः सुशासिता स्त्री नृपतिः सुसेवितः। सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं सुदीर्घकालेऽपि न याति विक्रियाम् ॥१४॥ उपकारः परो धर्मः परार्थ कर्म नैपुणम् । पात्रे दानं परः कामः परो मोक्षो विवष्णता ॥१८॥ इस दुनिया में मोटी मोटी बाते मनानेवाले बहुत पाये जाते हैं पर कड़वी और हितकारकपाणी के कहने तपा मुननेवाले दोनों ही दुर्लभ है ।।१४६ ॥ असी प्रकार पचा हुआ अम, मुशिक्षित पुत्र, मली प्रहार शासनके अन्दर रखी दुई स्वी, अछी तरह सेवित रामा, विचारपूर्ण भाषण और रामहराकर किया हुआ फर्म-न सरमें बहुत काल बीत जानेर भी दोष उत्पन्न नहीं होता ॥ १४ ॥ उपकार की परमधर्म , दूसरों के लिये किया हुआ फर्मी चातुर्य रे, सपा दान देना ही परम काम (लाम्पा) और सम्मादीनता ही परम मोश है !! १४८॥ •TARोगा। परे।

अटमोल्लास सत्संगसूक्तिः कल्पद्रुमः कल्पिवमेव सूते सा कामधुकामितमेव दोन्धि । चिन्तामणिचिन्तितमेव दत्ते सतां हि सङ्गः सकलं प्रमते ॥१॥ तृष्णां छिन्ते शमयति मदं ज्ञानमाविष्करोति नीति सूते हरति विपदं सम्पदं सञ्चिनोति । कल्पवृक्ष केवल कल्पित वस्तुएँ ही देता है, कामधेनु केवल इन्छित भोग ही प्रदान करती है तथा चिन्तामणि भी चिन्तित पदार्य ही देती है। किन्तु सत्पुरुषोंका सङ्ग सभी कुछ देता है ।। १ || सज्जनोंकी साति पुरुषों के लिये दोनों लोकोंमें शुभकी प्राप्ति करानेवाली है, दुःख-दलनमें दक्ष है, भला, यह कौन-सा निर्मल फल नहीं सत्सकसूक्ति १६९ पुंसां लोकद्वितयशुमदा सङ्गतिस्सजनानां किं वा कुर्यान्न फलममलं दुःसनिर्णाशदक्षा ॥ २॥ तुलयाम लवेनापि न स्वर्ग नापुनर्भवम् । भगवत्सनिसशस्य मानां किमुताशिपः ॥३॥ नरोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च । न स्वाध्यायस्तपस्त्याग इष्टापूर्त र दक्षिणा ॥ ४॥ व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः। यथावरुन्धे सत्सङ्गस्सर्वसंगापहो हि माम् ॥ ५॥ न तथा सघवान राजन् पूर्यत तपआदिभिः । यथा कृष्णाप्तिप्राणस्तत्पूरुपनिपेक्या ॥६॥ दे सकती ! वह चित्तकी तृष्णा और मदको शान्त कर देती है, ज्ञानका आविर्भाव करती है, नीतिको जन्म देती है, विपत्तिका क्षय और सम्पत्तिका सञ्चय करती है ॥ २॥ यदि भगवानमें आसक्त रहनेवाले संतोंका क्षणभर मी सङ्ग प्राप्त हो तो उससे स्वर्ग और मोक्षतककी तुलना नहीं कर सकते, फिर अन्य अभिलषित पदार्थों की तो बात ही क्या है । ॥ ३॥ समस्त आसक्तियों को दूर करनेवाला सत्संग जिस प्रकार मुझे वशीभूत करता है वैसा न योग, न सांख्य, न धर्म, न स्वाध्याय न उप, न स्याग, न इसापूर्त, न दक्षिणा न मत, न यश, न बेदन वीर्य और न नियमादि ही कर सकते हैं ॥ ४५ ॥ हे राजन् : पासी पुरुष तपस्या आदिसे बैसा पवित्र नहीं हो सकता जैसा कि भगवान् कृष्णमें मन लगाकर उनके मत्तोंकी सेवा करनेसे हो सरता •अमिनगमागते ११८१९१७११।१२।१२:११५ निगुमाकर रहगणेतरापमा न पाति न गेन्गया निर्वपणादग्रहादा । नयन्दगा नैव जलाप्रिय- बिना महत्पादरजामिकम् ॥७॥ जाध्य थियो हरति मिशनि याचि सत्यं मानोपनि दिगति पापमपाकरोति। नेता प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्ति सरसङ्गतिः कपय किं न करोति पुंसाम् ।। ८r यदा किभिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवं तदा सर्वज्ञोऽमीत्यमवदलितं मम मनः। यदा किश्चित्किश्चिद्रुधजनसकाशादवगतं तदा मूर्योऽसीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः॥९॥ है ॥६॥ हे रहूगण ! महान् पुरुषोंकी चरणरजका सेवन किये बिना इस पदपर न तपसे पहुँचा जा सकता है, न यज्ञसे, न दानसे, न येदसे और न जल, अमि अथवा सूर्यसे ही पहुँचा जा सकता है ।। कहिये, सत्संगति पुरुषोंका क्या उपकार नहीं करती ! वह बुद्धिकी जड़ताको हरती है, वाणीमें सत्यका सञ्चार करती है, सम्मान बढ़ाती है, पापको दूर करती है, चित्तको आनन्दित करती है और समस्त दिशाओं में कीर्तिका विस्तार करती है ।। ८॥ जब मैं थोड़ा-सा ज्ञान प्रासकर हाथीके समान मदान्ध हो रहा था उस समय मेरा मन 'मैं ही सर्वश हूँ' ऐसा सोचकर घमण्डमें चूर था । परन्तु जब विधानोंके पास रहकर कुछ-कुछ शान प्राप्त किया तो 'मैं मूर्ख हूँ' ऐसा समझनेके कारण ज्वरके समान मेरा दर्प दूर हो गया ॥ ९ ॥ *श्रीमद्भागवते ५।१२।१२। भर्तृहरेनीतिशतकाद।

सरसङ्गति तत्वं चिन्तय सतवं चिचे परिहर चिन्तां नश्वरविचे। क्षणमिह सजनसङ्गतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका {{१०॥ परिचरितव्याः सन्तो यपि कथयन्ति नो सदुपदेशम्। यास्तेपो स्वैरकथास्ता मन्ति शास्राणि ॥११॥ भक्तानां मम योगिनां विमलस्वान्तातिशान्तात्मनां मत्सेवामिरवात्मनां च विमलज्ञानात्मनां सर्वदा । सईया कुरुते सदोधतमविस्तत्सेवनानन्यधी- मोक्षस्तस्य करेस्थितोऽहमनिशंम्यो मनान्पया||१२॥ नि निरन्तर साचिन्तन करो, नाशवान् पनकी चिन्ता योद राजनीती एफ सी समानि भी ससारगागरसे तेरने के लिये नौकाम से बासी ॥१०॥ संत सोई उपदेशन भी करेंस मी उनी से करनी हो भाकियो उनको स्वेटमा पाने होती मी या हो॥११॥जो तत्परता सामेयामें अनन्य पुदि रला मेरे मनोरा, निर्मल और शान्त निषाने पोगियोकामेरी सेवा पूर भनुरागररानेपामा पानिपनियोका सागरतारको उहरातार और भानिए उसी पिस सो उगदसे में रन नहीं ला ॥ १२ सूचिसुधाकर kx भाग्योदयेन बहुजन्मसमार्जितेन सत्सङ्गमेव लभते पुरुषो यदा वै । अज्ञानहेतुकृतमोहमदान्धकार- नाशं विधाय हितदोदयते विवेकः॥१३||* धियेकसूक्तिः परस्त्री मातेष कचिदपि न लोमः परधने न मर्यादामङ्गः कचिदपि न नीचेष्वमिरतिः । रिपो शौर्य धैर्य विपदि विनयः सम्पदि सदा इदं वच्मो भ्रातर्भरत ! नियतं ज्ञास्यसि मुदे ॥१४॥ लब्या विद्या राजमान्या ततः कि प्राप्ता सम्पद्वैमवाढया ततः किम् । बहुत सन्मके पुण्य-पुञ्जसे माग्योदय होनेपर जब पुरुषको सत्सनकी हो प्रासि होती है तभी अचानकृत मोह और मदरूपी अन्धकारफा नाश करके विवेकका उदय होता है ॥ १३ ॥ [भगवान राम करते है-Jहे भाई भरत! परस्त्रीको मातृवत् समझना परधनका कमी लोमन करना, मर्यादाका कमी मत न करना, नीचौकी संगतिम कमी प्रेम न करना,पत्र के प्रति थरता प्रदर्शित करना, वित्तिमेपैर्य रखना तथा सम्पचिमे पिनीत होना-ये राय प्रसमता निश्चित हेतु, ऐठा मानो।१॥ जिसने अपने मामाका धारकार नहीं किया उसने यदि राजमान्या विद्याका उपार्जन कर लिया तो क्या विचित्र वेमपयुक्त विवेकसूक्ति १७३ भुक्ता नारी सुन्दराजी तव किं येन वात्मा नैव साक्षात्कृतोऽभूत् ।।१५।। यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच दूरे जरा यावचेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुपः । आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यःप्रयत्नो महान् प्रोद्दी भवने च कूपरखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ॥१६||* भज विश्रान्ति त्यज रे भान्तिं निश्चिनु शैवं निजरूपम् । हेयादेयातीतं सञ्चित्सुखरूपस्त्वं भव शिष्टः ॥१७॥ कदाहं भो स्वामिनियतमनसा त्वां हदि भज- नभद्रे संसारे घनवरतदुःखेऽतिविरतः। सम्पत्ति प्राप्त कर ली तो क्या ! और सुन्दरी स्त्रीका उपभोग भी कर लिया तो क्या ? ॥ १५॥ जबतक कि यह शरीररूपी घर स्वस्थ है, वृद्धावस्थाका आक्रमण नहीं हुआ है, इन्द्रियोंकी शक्ति क्षीण नहीं हुई है और आयु भी ढली नहीं है, तभीतक विद्वान्को अपने शुभके लिये प्रयत्न कर लेना चाहिये, नहीं तो घरमै आग लग जानेपर कुआँ खोदनेका प्रयत्न करने से क्या होगा! ॥१६॥ विश्राम ले, भ्रम छोड़, महण-त्यागसे रहित अपने कल्याणमय स्वरूपका निश्चय कर, त् सचिदानन्दस्वरूप है। अरे तू सत्पुरुष बन ॥१७॥ हे स्वामिन् ! स्थिर चित्तसे तुम्हें हृदयमें स्मरण करता हुआ, निरन्तर दुःखमय और अमालरूप इस • भतुंहरेराग्यशतकात । सामिकृष्णानन्दकाशिष्टस्तोत्रात् । - - 9 मुक्तिसुधाकर लमेयं तो शान्ति परममुनिमिर्या अधिगता दयां कत्सा में त्वं वितर परशान्तिं भवहर ॥१८॥ कदाई हे स्वामिअनिमृतिमयं दुःखनिविडं भवं हित्वा सत्येऽनयरतसुखे स्वात्मवपुपि । रमे तस्मिन्नित्यं निखिलमुनयो प्रारसिका रमन्ते यसिंस्ते कृतसकलकत्या यतिवराः ॥१९॥ कदा मे हत्पने प्रमर इव पये प्रतिवसन् सदा ध्यानाम्यासादनिशमुपहूतो विभुरसी। स्फुरज्ज्योतीरूपो रविरिव रमासेव्यचरणो हरिप्यत्यज्ञानाजनिततिमिरं तूर्णमखिलम् ॥२०॥ सारसे अत्यन्त विरक्त होकर महामुनियोद्वारा प्राप्त की हुई परम घान्तिको मैं कब पाऊँगा ? हे भवभयनाशक ! दया करके आप मुझे वह परम शान्ति दे ॥१८॥ हे स्वामिन् ! जन्म-मरणमय दुखोसे परे हुए इस संसारको छोड़कर, जिसमें ब्रह्मामृतके प्रेमी सभी मुनि और तकृत्य यतिवर निरत रहते हैं, उस सत्यस्वरूप एकरस आनन्दमय अपने आत्मस्वरूपमें मैं का नित्य रमण करूँगा ॥१९ ।। सूर्य की तरह दीप्यमान ज्योतिःस्वरूप, लक्ष्मीसे सेवित चरणोषाले, तथा अनवरत. ध्यानाम्याससे नित्य आवाहन किये हुए वे भगवान् विष्णु मेरे हृदय-कमलमें भ्रमरके समान रहते हुए, अशानसे उत्पन्न सम्पूर्ण हृदयान्धकारका कब शीघ्रतासे नाश करेंगे । ॥ २०॥ +स्वामिग्रमानन्दकृतपरमेश्वरस्तुतिसारात् ।

विवेकसूक्ति न रम्यं नारम्यं प्रकृतिगुणतो वस्तु किमपि प्रियत्वं यत्र सादितरदपि सग्राहकवशात् । रथाङ्गाह्वानानां भवति विधुरङ्गारशकटी- पटीराम्माकुम्भः स भवति चकोरीनयनयोः ॥२१॥ धन्यानो गिरिकन्दरेनियसता ज्योतिः परं ध्यायता- मानन्दाश्रुजलं पिबन्ति शकुना निम्शयमकेशयाः। अस्माकं तु मनोरथोपरचितप्रासादवापीतट- मोडाकाननकेलिकौतुकजुपामायुः परिधीयते ॥२२॥ जिह्वेलोचन नासिके श्रवण हे स्वर चापि नोवार्यसे सर्वेभ्यस्तु नमस्कृताअलिरहं सप्रश्रयं प्रार्थये । कोई भी पलु स्वभावतः अम्ली या बुरी नहीं है, जहाँ पर प्रिय है या से उसको मरण करनेवाले अधिकारीके भेदसे यह अप्रिय भी मारम- होती है, चकयोंके लिये चन्द्रमा जलती हुई अँगीठी है और पट्टी चोरीके लिये शीतल अरसे मरा पदाहे ।। २१ । गिरि-कन्दरामें नियामकरनेवाले परका पानमें मनर, पन्य पोगीजनोंके आनन्दाभोंको गोद में थेठे हुए पागण निकर पीते हैं, पर हमलोगों की आयु तो मनोरथमय महलके सरोवरतट पर सित वितर-बिरिनमें आमोद-प्रमोद परतेरीमतीत हो जाती है ॥२२॥ो जित, नेत्र, नामिके, गं और रखपाभो ! में दुर्गा रोवता नही है, पर तुम सभीको एप जो प्रणाम करके हाधिनप प्राधना करता कि परिवानी मात होती रायला चिसुधाकर युप्माकं यदि सम्मतं तदधुना नात्मानमिन्छाम्यहं होतुं भूमिमुजां निसर्गदहनचालाकराले गृहे ॥२३शा- माताये मगिनि कुमते हे पितर्मोहजाल च्यावर्तध्वं भवतु भवतामेष दीर्को वियोगः । सयो लक्ष्मीरमणचरणम्रष्टगङ्गाप्रवाह च्यामिश्रायां सुपदि परमब्रह्मदृष्टिमवामि ॥२४॥ धर्म भजस्व सततं त्यज लोकधर्मान सेयख साधुपुरुषाअहि कामतृष्णाम् । अन्यस्य दोपगुणचिन्तनमाशु मुक्त्वा सेवाकथारसमहो नितरां पिर त्वम् ।।२५।। नन्दन्ति मन्दाः श्रियमप्यनित्या परं विपीदन्ति विपद्गृहीताः। अब मैं राजाओकी स्वाभाविक अपमानामिकी लपटोंसे भयङ्कर घरों में अपनी आहुति नहीं देना चाहता ॥ २३ ॥ अरी माँ माया ! ओ बहिन कुमति ! हे पिता मोह ! अब तुम लौट जाओ, भगवान् करें अब हमसे आपलोगोंका सदाके लिये वियोग हो जाय ! मैं अब शीम ही रमानायके चरणकमलोंसे निर्गत श्रीगङ्गाजीके प्रवाहमें पड़ी हुई शिलाके ऊपर (बैठकर) परनझका ध्यान करनेवाला हूँ ॥ २४॥ निरन्तर धर्मका ही अनुशीलन कर, लौकिक धोको छोड़, साधु पुरुषों- की सेवा कर और कामतृष्णाका सर्वथा त्याग कर तथा तुरन्त ही अन्य पुरुषोंके गुण-दोका चिन्तन छोड़कर भगवत्सेवा और भगवत्कथा- की माधुरीका पान कर ॥ २५ ॥ मन्दमति पुरुष अनित्य धनादिसे आनन्दित होते हैं और विपत्तिप्रस्त होनेपर अत्यन्त विषाद करते हैं, किन्तु *श्रीशिहनामिभस्य शान्तिशतका ।

छ यिषेकसूक्ति विवेकदृष्टया चरतां नराणां थियो न किनिविपदोन किचित् ॥२६॥ अधीत्य चतुरो घेदान् च्याकस्याष्टादश स्मृतीः । अहो श्रमस वैल्पमात्मापि कलिनो न चेत् ॥२७॥ इतो न किचित्परतो न किश्चिद्ध यतो यठो यामि ततो न किञ्चिन् । विचार्य पश्यामि जगन फिशिन् सारमाश्योपादषिकं न किशिम् ॥२८॥ पुरागान्ते स्मशानान्त मैथुनान्ते च या मतिः । सा मतिः सर्वदायेन म्यान फोनमुच्येत पन्धनात् ।।२९ नास्ति फामममो प्याधिनास्ति मोहममो रिपुः। नास्ति झोधसमो पसिनास्ति मानापरं मुग्यम् ।।३० यिक पालनेवाले पुरोविन पनादिमीरनगि 11चारीको पदकर भोर भगायों रतियोगी पार पर भी परि भारमान नहीं हुआ पभम पार Ansm, उपरी, माँ-गांना मीनही पिनारासोपामा भीमरायो पाकर पुरा भी नही ११८ पुसत्या मोरमेन नेमलती re रानीपोनापनमे सुननरोग२॥ ITA पोरोगन, मेरे ममान गरा, चोपणे = कोई मरी भरो नाग मही- -+- सूतिसुधाकर "शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोपात्परं सुखम् । न तृष्णायाः परो व्याधिन च धर्मो दयापरः ॥३१॥* न च विद्यासमो वन्धुन मुक्तः परमा गतिः । न वैराग्यात् परं भाग्यं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥३२॥ 'न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविपा कृष्णवर्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥३३॥ अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम् । शेपाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥३४॥ असिन्महामोहमये फटाहे सूर्याग्निना रागिदिनेन्धनेन । शान्तिके समान कोई तप नहीं है, सन्तोष बदकर कोई मुसनहीं है, वणासे पदी कोई ग्याधि नहीं है और दयाके समान कोई धर्म नहीं है।॥ ३१ ॥ विद्याके गमान कोई बन्न नहीं है, मुक्तिसे यहकर दूसरी गनि गी है, गग्यभे पदार माग्य और त्यागसे पदकर गुप्त नहीं है ॥१२ ।। कामनाओंको छ उपभोगसे कमी शान्त नहीं होती, भगिण पीने माग ममान यह उपभोगबारा और मदती ही भागी प्रति दिन और यमराज पर जा रहे है, तो मी अप लोग यहाँ ग्पिर रहना चाहते हैं, इममे याबरक्या माधय ||३४|| कालपी रमजा महामोगी कामे माग और रसपी रममै उप* मारन मनु .४11 मारना विधेकसूक्ति १७ * मास दीपरिघट्टनेन भूतानि कालः पचतीति वातों ॥३५॥ मुक्तिमिच्छसि चेचात विषयान् विषयत्यजे। क्षमार्जवदयाशौचं सत्यं पीयूपयत् पियः ॥३६॥ लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धोरः । तूर्ण यतेत न पतेदनुमृत्यु यार- निश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥३७॥ स्त्रीणां स्त्रीसङ्गिनां सङ्गं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान् । क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रितः ॥३८|| पथल करके रात और दिनरूपी इन्धन सूर्यरूपी अमिद्वारा समीजी को पका रहा है, यही यथार्य बात है ॥ ३५ ॥ भाई । यदि तुझे मुक्ति इन्छा है तो विषयोंको विषके समान त्याग दे तया श्चमा, सरलता, दर पवित्रता और सायको अमृत के समान प्रहण कर ॥३६॥ अने जन्मोंके उपरान्त इस परम पुश्यार्थके साधनरूप नर-देहको, जो अनि होने पर भी परम दुर्लभ है, पाकर धीर पुरुषको उचित है जबतक वह पुनः मृत्युके बगुलमें न फस, तबतक शीघ्र ही अ निःश्रेयस- (मोक्ष) प्राप्ति के लिये प्रयक्ष कर ले, क्योंकि विषय तोस योनियों में प्राप्त होते हैं [इनके संग्रह करनेमें इस अमूल्य अवसर न खोवे ] ॥ ३७॥ [ भगवान कहते हैं--] विवेकी पुरुषको चाहिये वह स्त्री और स्त्रीसङ्गियोंका मज दूरसे ही त्यागकर निर्भय और नि एकान्त स्थानमे बैठकर आलस्वरहित होकर मेरा चिन्तन करे ॥३॥ * महामारते वनपर्वणः। अष्टावक्रगीतायाः। श्रीमद्भागवदे ११ । ।

@ सूकिसुधाकर x न तथास्य भवेत्लेशो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः । योपित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ।।३९|| হযূেয়ুষ্টিঃ दान्तस्य किमरण्येन तथादान्तस्स भारत । यत्रैव निवसेदान्तस्तदरण्यं स चाश्रम ॥mont गृहे पर्यन्तस्थे द्रविणकणमोपं श्रुतवता सवेश्मन्यारक्षा क्रियत इति मार्गोऽयमुचितः । नरान्गेहाद्गेहात् प्रतिदिवसमाकृष्य नयतः कृतान्तात् किं शङ्कान हि भवति रे जागृत जनाः ॥४॥ किसी अन्य के सबसे इस (मुमुक्ष) पुरुषको ऐसा मेश और पन्धन नहीं होता, जैसा कि स्त्री अथवा उसके सङ्गियोंके संगसे होता है ॥३९॥ जोधपमी है उसे वनकी क्या आवश्यकता! और जो असंयमी उसे बनमें आनेसे हम क्या ! संयमी जहाँ भी रहे उसके लिये वही वन है और यही आभम है ॥४०॥ पड़ोगके घरमें चोरी होनेकी यात मुनकर अपने घरका प्रबन्ध किया जाता है, यह उचित ही है किन्नु पर-परसे प्रतिदिन मनुष्यों को पकड़कर ले जाते हुए कालमै क्या पछ भी भय नही होता ? अतएव है मनुम्यो ! भा भी शायधान हो .नीमा ११।।.. महाभारते सिनमियत बनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणों गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः । अकुत्सिते कर्मणि या प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥४२॥ हस्तौ दानविवर्जितोश्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणी नेत्रे साधुविलोकनेन रहिते पादौन तीर्थ गतौ । अन्यायाजिंतवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुङ्ग शिरो रेजम्बुक मुश्च मुश्च सहसानीचं सुनिन्धं वपुः॥४३॥ सेवध्वं विबुधास्तमन्धकरि'मा क्लिश्यतान्यश्रुते यसादत्र परन चत्रिजगवित्राता सएकाशियः। माओ||४|| रागीको बनमें भी दोषोंकी जाति हो जाती है और घरमें रहकर मी पाँचों इन्द्रियों का संयम किया जाय तोमह तप ही है। जो निदौंप कर्ममें प्रवृत्त होता है उस विरक्त पुरुषके लिये घर भी तपोवन ही १ ॥४२॥ [एक मृत मानव-शरीरको खाने के लिये उचत्त हुए किसी गीददको आकाशवाणीने सावधान किया] अरे गीदम इस अति निन्दनीय नीच शरीरकोशीम ही त्यागदे[स्योंकि इसके हाथ दानविर्जित है, कर्ण शाबद्रोही है, नेत्र साधुजनों के दर्शनोंसे रहित है, चरणोंने कभी वी-गमन नहीं किया उदर अन्यायार्जित धनसे ही पाला गया है और यह शिर सदाही गर्वसे ऊँचे उठा रहता था ।। ४३ ॥ विद्वानो। महादेव- जीकी सेवा करो, अन्य शास्त्रों में देश न उटाभो, क्योकि यहाँ-वहाँ और तीनों लोकों में एकमात्र से ही रसक हैं [विधार परोकिदेवात् *बीचाणक्यस्य गिगुपार आयाने नियतेवंशान गविषमे कालान् करालागी सुत्र व्याकरणं फतकलाकाव्यश्रमः कापियामास मेको धावति तं च धापति फणी सपं शिमी धापति घ्याम्रोधापति केकिन पिषियमा व्याधोऽपितं धापति। स्वखाहारविहारसाधनविधी गर्ने जना व्याकुलाः फालस्तिष्ठति प्रातः कपघरः केनापि नो दृश्यते ॥४५|| बासिन्युनीरेऽपविघातवीरे पाहत्समीरे करलम्यनीरे। यसन्कुटीरे परिधाय चीरे करोम्यधीरे न रुचिं शरीरे ॥४६॥ यस्या पीजमहकृतिगुरुतरं मूलं ममेतिग्रहो भोगस्य स्मृतिरकर सुतसुताज्ञात्यादयः पल्लवाः । विकराल कालसे विषम भय उपस्थित होनेपर कहाँ व्याकरण, कहाँ तर्कशास्त्रका विवाद और कहाँ काम्यरचनामें परिश्रम करनेका अवसर है ॥४॥ मेंढक दौड़ता है, उसके पीछे सपं दौड़ता है, सर्पके पीछे मयूर, मयूरके पीछे सिंह और देवान् सिंहके पीछे व्याध (शिकारी) दौड़ रहा है, इस प्रकार अपने भोजन और विहारकी सामग्रियोंके पीछे सभी व्याकुल हो रहे हैं; पर, पीछे जो चोटी पकड़े हुए काल खड़ा है उसे कोई नहीं देखता ॥ ४५ ॥ जहाँ शीतल वायु बह रही है, अञ्जलिसे ही जल पीनेको मिल जाता है। ऐसे पाप नाश करनेमें धीर गङ्गातीरपर, वस्त्रोंके दो टुकड़े पहिन कुटियामें निवास करता हुआ मैं इस क्षणमङ्गुर शरीरसे प्रेम नहीं करूंगा ॥ ४६ ।। जिसका बीज अहङ्कार है, 'यह मेरा है। इस प्रकारका आग्रह ही गुरुतर मूल है, अङ्कुर विषयचिन्तन है, पुत्र, पुत्री, जाति * राजानकलोलकस्य ।

पैराग्यसूक्ति
स्कन्धोदारपरिग्रहः परिभवः पुष्पं फलं दुर्गतिः
सामेनाविभावनापरशुना कृष्णालताल्यताम्
निस्योवष्टि शतं शती दशशतं लक्षसहस्राधिपो
लक्षेश क्षितिपालतां क्षितिपतिश्चक्रेशतां वाञ्छति
चक्रेशः सुरराजता सुरपतिब्रह्मास्पदं वाञ्छति
ब्रह्मा शैवपदं शिवो हरिपदं शाशावधि को गतः।
रात्रिर्गमिप्यति भविष्यति सुप्रभातं
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजश्री
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे
हाहन्त हन्त नलिनी गज उजहार ।।
आदि पत्ते हैं, स्त्री-संग्रह स्कन्ध है, अनादर पुष्प है, और प
है, वह मेरी तृष्णारूपिणी लता ब्रह्मविभावनारूपी परर
हो।॥४७॥ जिसके पास कुछ नहीं है यह सौ रुपये चाहत
रुपयेवाला सहस, सहलवाला लक्ष, लक्षपति पृथिवीका 3
पृथ्वीपति चक्रवती होना, चक्रवर्ती इन्द्रपद, इन्द्र ब्रह्मपद, ना
और शिव विष्णुपदकी इच्छा करते हैं । फिर बताओ,
सीमाको किसने पार किया है ? ॥४८॥ कमलवनमें मकरन्दका
करनेवाला एक भ्रमर जब कमल बन्द होने लगा तो उसमें बर
तब वह मनसूबे गाँठने लगा-] रात बीतेगी, सुन्दर प्रभ
सूर्य उदित होंगे और कमलकी कलियाँ विकसित होंगी [तः
खन्छन्द विचरूँगा इस प्रकार जब वह कमल-कोशमें बैठा विचा
या, खेद है कि इतने हीमें हाथीने कमलको उखाड़ फेंका
+काम्यसंग्रहात

वा सूक्तिसुधाकर भोगा न मुक्ता चयमेव भुक्ता. स्तपो न तसं वयमेव तप्ता। कालो न यातो वयमेव याता- स्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ||५||* भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्यं मौने दैन्यभयं पले रिपुभयं रूपे जराया भयम् । शास्त्रे वादमयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं सर्व वस्तु भयावहं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ।।५१||* कृशा काणः खञ्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलो व्रणी पूक्लिन्ना कृमिकुलशतैरावृततनुः। हमने भोगोंको नहीं मोगा, भोगोंने ही हमे भोग लिया, हमने तप नहीं किया, स्वयं ही तप्त हो गये, काल व्यतीत नहीं हुआ, हम ही व्यतीत हो गये और मेरी तृष्णा नहीं जीर्ण हुई हम ही जीर्ण हो गये ॥५०॥ भोगों में रोगका भय है, ऊँचे कुलमें पतनका भय है, घनमें राजाका मौनमें दीनताका, पलमें शत्रुका तथा रूपमें वृद्धावस्याका भय है, और शास्नमें धाद-वियादका, गुणमें दुष्ट अनफा तथा शरीरमै फालका भय है, इस मकार संसार में मनुष्योंके लिये सभी परतुएँ भयपूर्ण है, भयसे रहित तो केवल वैराग्य ही है ॥५१॥ जो दुईस है, काना, लंगड़ा है, कनफटा है, उसे हीन है, जिसका सारा अंग पावोंसे मरा और पीवमै मीगा मा २, सैकड़ो कीड़ोंसे जिमका शरीर परिपूर्ण है, जो भूखमे ग्याबुल और जरामन तथा जिसके गले में मिहीके •मारेराम्यानमार। ८ पैराग्यसूक्ति क्षुपाक्षामो जीर्णः पिठरजकपालार्पितगल: शुनीमन्वेति वा हतमपि च हन्त्येव मदन गगातीरे हिमगिरिशिलाबद्धपद्मासनस्य ब्रह्मध्यानाम्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य किं तैर्मान्यं मम सुदिवसयंत्र ते निर्विशङ्काः सम्प्राप्स्यन्ते जरठहरिणाः शृङ्गकण्डविनोदम् आशा नाम नदीमनोरथजलावणावरङ्गाकुला रागग्राहयती विचर्कविहगा धैर्यद्रुमपंसिनी भोहावर्चसुदुस्तरातिगहना प्रोत्तुङ्गचिन्तातटी तस्याः पारगता विशुद्धमनसोनन्दन्ति योगीधन घड़का कण्ठ फंसा हुआ है ऐसा कुच्चा भी कुत्तीके पीछे दो ओर। यह कामदेव मरे हुएको भी मारता ही है ॥५२॥ ऐसे शुम दिन आयेंगे। जब भीगनाजीके तटार हिमालयक अपर पधासन लगाये हुए, प्रारचिन्तनका प्रयास करते करते (समाधि) के प्रास होनेपर पर मग निराश होकर मेरे शर सीग खुजमानेका आनन्द लंगे ।। ५३ ॥ आशा नामकी एक नदी, जिसमें मनोरपापी जल है, दुष्णारूपी तर, है। संकल्प विकल्परूपी पसीऔर जो धैर्यरूपी सर पर देनेगली सपा जिसको मति गम्भीर और दुसर मोह ₹, सपा जिसके चिन्तारूपी ऊचे ऊँचे करारे २, उसके गरे हुए विविध योगीवर ही मानन्दित रोते • भवरापार ।

सूक्तिमुपाकर करणामेभ्यमध्ये नियमिततनुमिः सीयते गर्ममध्ये फान्ताविश्लेषदुःखव्यतिकरविषये यौवने विप्रयोगः । नारीणामध्यवज्ञा विलसति नियतं पदमावोऽप्यसाधुः संसारेरे मनुष्या यदत यदि सुखं सल्पमप्यस्ति किश्चित् ५५* गानं सहुचितं गतिविंगलिता भ्रष्टा च दन्तावलि दृष्टिनश्यति वर्धते यघिरता वक्त्रं च लालायते । वाक्यं नाद्रियते च वान्धवजनो भार्या न शुश्रूपते हा कष्टं पुरुषस जीर्णवयसः पुत्रोऽप्यमित्रायते ॥५६||* उत्खातं निधिशक्ष्या क्षितिवलं माता गिरेोतको निस्तीर्णः सरितां पतिर्नृपतयो यत्तेन सन्तोपिताः । गर्ममें अति दुन्धिपूर्ण स्थानमें बड़ी कठिनतासे शरीर सिकोड़कर ठहरा जाता है, स्त्रीके वियोगजन्य क्लेशसे मिश्रित जिसके विषय हैं उस युवावस्थामें भारी वियोगका कष्ट उठाना पड़ता है तथा जिसमें त्रियाँ भी अयशा करें, वह वृद्धावस्था भी अति दुःखमयी है, अरे मनुष्यो! 'यदि संसारमें थोड़ा भी कोई सुख हो तो बताओ।॥ ५५ ॥ शरीर शिथिल हो जाता है, चला जाता नहीं, दाँत गिर जाते हैं, आँखोंसे सूझता नहीं, बहिरापन बढ़ने लगता है, मुखसे लार टपकने लगती है, बान्धवलोग बातका आदर नहीं करते, स्त्री सेवा नहीं करती और पुत्र भी शत्रुता करने लगते हैं, हाय ! बूढ़े मनुष्यको बड़ा ही कष्ट होता है ॥ ५६ ॥ धन-प्राप्तिकी आशङ्कासे मैंने पृषी खोद डाली, पर्वतके घातुओंको फूंका, समुद्रको पार किया, नाना उपायोंसे राजाओंको सन्तुष्ट किया और मन्त्राराधनमें तत्पर रहते * भर्तृहरेवैराग्यशतकात् ।

वैराग्यसूक्ति
१८
मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाः
प्राप्त काणवराटकोऽपि न मया तृष्णे सकामा भव ।।५७।।
आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितं
व्यापाहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते ।
दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते
पीत्वा मोहमयी प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥५८१८
अजानन्दाहात्म्यं पतति शलभो दीपदहने
स मीनोऽप्यज्ञानाद्वडिशयुतमन्नाति पिशितम् ।
विजानन्तोऽप्येते वयमिह विपजालजटिला-
न मुश्चामः कामानबह गहनो मोहमहिमा ।।५९॥
हुए श्मशानमें रात्रियाँ बित्तापी, किन्तु अभीतक एक कानी कौड़ी
नहीं मिली, अरी तृष्णे ! अब तो तू सफल हो ! ॥ ५७ ॥ सूर्यके उस
और अतसे जीवन क्षीण हो रहा है, विविध कार्योंके भारसे गुरुतर प्रत
होनेवाले नाना मकारके व्यापारोंसे समय जाता मालूम ही नहीं पड़
जन्म, जरा और मरणको विपत्तिको देखकर भी चित्तमें भय नहीं होता
संसार मोहमयी प्रमादरूमा मदिरा पीकर उन्मत्त हो गया है।॥५८
पता दीपक के दाहक स्वरूपको न जाननेके कारण ही उस
गिरता है, मत्स्य भी अज्ञानवश ही मांसखपहको निगलता
किन्तु हम कामनाओंको विपन्समूहसे संकीर्ण जानकर भी उ
नहीं त्यागते, अहो ! मोदकी महिमा भी बड़ी ही प्रबल है॥५९
* भामेराम्याडका ।

-
Manus
गमिसुधाकर
आयुःकालोललोले कतिपयदिवसस्यायिनी यौवनश्री.
रः सङ्कल्पकल्पा पनसमयताडिदिनमा भोगपूराः ।
फण्ठाश्लेपोपगडं वदपि च नाचिरं यत्तियामि प्रणीतं
प्रझपासक्तचित्रामवत मनमयाम्मोधिपारतरीतुम् ॥६०!
जीर्णा एव मनोरयाः सहृदये यात जरा यौवनं
इन्ताङ्गेषु गुणाध पन्ध्यफलतां याता गुणज्ञपिना ।
किं युक्तं सहसाम्युपैति बलवान्कालः कृतान्तोऽक्षमी
याज्ञातंस्मरशासनाधियुगलं मुक्त्यास्ति नान्यागविगा।
नायं ते समयो रहस्यमधुना निद्राति नायो यदि
स्थित्वा द्रक्ष्यति कुप्यति प्रभुरिति द्वारेषु येषां वचः ।
आयु तरङ्गकी तरह चञ्चल है, यौवनकी शोभा मी कुछ ही दिन ठहरनेवाल
है, धन केवल सङ्कल्पमात्र है, भोगसामनी वर्षाकी बिजलीकी तरह
चमकती है, प्रियतमाओंका प्रेमालिझन भी चिरस्थायी नहीं, इसलिये
संसार-सागरको पार करने के लिये ब्रझमें ही चित्तको लीन करो ।।६।।
सभी मनोरथ मनमें ही जीर्ण हो गये, यौषन बुढ़ापेमें परिणत शे
गया, खेद है कि गुणप्राहकों के बिना गुण भी शरीरके अन्दर ही निष्फल
हो गये, क्षमा न करनेवाला बलवान कालरूपी यम सइया आ रहा है,
अब क्या करना चाहिये ? हाँ अब समझने में आया, शिवजीके चरणोंको
छोड़कर अन्य गति नहीं है ॥६१।। अभी तेरी मुलाकातका
समय नहीं है, इस समय गुप्त विचार हो रहा है, और स्वामी
अभी सो रहे हैं, यदि उठकर तुम्हें (खड़ा) देख लेंगे
तो मालिक नाराज होंगे, इस प्रकार जिनके दरवाजेपर द्वारपाल
* मर्तृहरेवैराग्यशतकात् ।

धैराग्यसूक्ति
चेतस्तानपहाय याहि भवनं देयस्य विश्वेशितु-
निंदीवारिकनिर्दयोक्त्यपरूपं निस्सीमशर्मप्रदम् ॥६२||
रे कन्दर्प कर कदर्थयसि कि कोदण्डटकारित
रेरे कोकिल कोमलैः कलरवैः किं त्वं वृथा जल्पसि ।
बाले स्निग्धविदग्धमुग्धमधुरैलोलैः कटाक्षरलं
चेतम्बितचन्द्रचूडचरणध्यानामृतं
वर्तते ॥६३||
अहो वा हारे वा पलवति रिपौवा सुहृदि वा
मणी वा लोटे या कुसुमशयने वा सुपदि था।
तुणे वा स्त्रैणे वा मम समदृशो यान्तु दिवसाः
कचित्पुण्यारण्ये शिव शिव शिवति प्रलपतः १६४॥
करते हैं, अरे चित ! इनको त्यागकर उस विश्वेश देवके घर चर
जहाँ न कोई द्वारपाल है और न निर्दय कठोर वचन सुनने पड़ते
और जो असीम सुख-शान्ति देने वाला है ।। ६२ ॥ अरे काम ! अप
घनुपके रसोरसे हाथों को क्यों थकाता है । अरी कोयल अपने कोम
कलरवोसे वृषा क्यो बक-चक कर रही है। ओ बाले! तुम्हारे इन अ
स्निग्ध, चातुर्यपूर्ण, भोले-भाले, मधुर और चञ्चल कटाक्षोंसे भी अब
नहीं हो सकता । अब तो मेरा चित्त चन्द्रशेखर श्रीशंकरके चरणसरोका
प्यानरूप अमृतका आस्वादन कर चुका है ।। ६३ । सर्प और पुष्पहार
बलपान् शत्रु और मुहद्में, मणि या मिट्टी के देलेमें पुषशय्या और शिल
तया तृण और तरणीमें, समदृष्टि रखते हुए किसी पुनीत कानन
"शिव ! शिव ! शिव !' ऐसा जरते हुए मेरे दिन व्यतीत हो । ६४
• भर्तृहरेवैराग्यशतकात् ।

१९४ सूक्तिसुधाकर मातुलो यस्य गोविन्दः पिता यस्य धनंजयः। सोऽपि कालवशं प्रातः कालो हि दुरतिक्रमः॥६ देहेस्थिमांसरुधिरेभिमति त्यजस्व जायासुतादिषु सदा ममतां विमुच । पश्यानिशं जगदिदं क्षणभङ्गनिष्ठं वैराग्यरागरसिको भव भक्तिनिष्ठः ॥६६ आनन्दमूलगुणपद्धवतत्त्वशाखा- वेदान्तमोक्षफलपुष्परसादिकीर्णम् । चेतोविहङ्ग हरितुगतलं विहाय संसारशुष्कविटपे पद किं करोपि ॥६७ तरन्ति मातङ्गघटातरङ्ग रणाम्बुधिं ये मयि ते न शूराः। जिसके मगवान कृष्ण तो मामा और अन पिता है, पर अभिमन्यु मृत्युको मास हुभा, सच है कोई भी कालको लाँप नहीं सकता ॥६- दस आस्ति, मांस और अधिरके पुन अपवित्र शरीरका अभिमान छो स्त्री-पुत्रादिकी मी ममता त्याग, इस जगतको अहर्निश क्षणमार, देख देयम्पसका रसिक होकर मजिनिर यन ॥ ३६॥ निराकी भानन्द बारे, तीनों गुम ए ३, चौपीरा तय शाखाएँ है, येशत की पुष्प और मोशी फल है। मो मनपशी! उसपी विशाल एवं सर को छोड़कर इस संसारम्पी पैडर या करार। ||५७ पिपौडी पटा-(स)रुपी तरीकाले पुर-सागरको नो पार कर जा ये मेरे मानने में पर नहीएर सो ये हैं जो मनरुपी सरनों F- .

छ घराग्यसूक्ति शूरास्त एवेह मनस्तरङ्गं देहेन्द्रियाम्मोघिमिमं तरन्ति ॥६८|| इमान्यमूनीति विमावितानि कार्याण्यपर्यन्तमनोरमाणि । जनस्य जायाजनरञ्जनेन जवाजरान्त जरयन्ति चेतः॥६॥ विद्राविते शत्रुजने समासे समागतायामभितथ लक्ष्भ्याम् । सेव्यन्त एतानि सुखानि याव- तावत्समायाति कुतोऽपि मृत्युः ॥७॥ पुनः पुनदैववशादुपेत्य खदेहमारेण कृतोपकारः। युक्त इस देहेन्द्रियादिरूप समुद्रको पार करते हैं ।। ६८ ॥ ये और वे-इस प्रकार सोचे हुए परिणाममें अहितकर कार्य, स्त्रियों में राग उत्पन्न करते हुए, मनुष्यके चित्तको बीघ ही जराजी कर देते हैं ।। ६९ ।। शत्रुओंको पराजित करके और सर्वतोमुखी लक्ष्मीको प्राप्त करके, जबतक इन सब मुखोंके भोगनेका समय आता है, अशे ! तबतक मृत्यु अचानक कहाँसे आ पहुँचती है ।। ७० !! जिस संसारमें देववश प्राप्त अपने शरीर और फलपुष्पादि अवयोंसे चारंवार उपकार करनेवाला वृक्ष भी योगवासिमहारामायणे।

गनिसुधाकर विन्दयते या तरः कुठार- राधाराने ताहिक प्रसङ्ग घपुः कुक्षीभूतं गतिरपि तया यष्टिशरण विशीर्णा दन्तालिः श्रवणविकलं श्रोत्रयुगलम शिस शुक्लं पस्तिमिरपटलरायतमह मनो मे निलंअं तदपि विपयेभ्यः स्पृहयति कचिद्विगोष्ठी कचिदपि मुरामत्तकलहः कचिद्वीणावाद: कचिदपि च हा इति सदितम् कचिदम्या रामा कचिदपि जराजर्जरवनु- ने जाने संसार किममृतमयः किं विषमयः कुठारोंसे काटा जाता है, ऐसे कृतन संसारसे उपकारको र है । ||७१॥ शरीर कुबड़ा हो गया। चलते समय छड़ी टेकनी दॉल टूट गये, दोनों कान भी यहरे हो गये शिर श्वेत हो अन्धकारसमूहसे आवृत हो गये, फिर भी मेरा निर्लज मन विषय करता है ॥७२॥ इस संसारमें कही विद्वानोंकी सभा है, मदिरा पीनेवालोका कोलाहल हो रहा है, कहीं वीणाका मधुर र कहीं रोनेका हाहाकार हो रहा है, कहीं मुन्दर स्त्रियाँ हैं, तोष जर्जरिल शरीर देखने में आते हैं, नहीं जान पड़ता यह संसार है या विषमय १॥७३॥ योगवासिष्टमहारामायणे।

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अकालभियन्दने करियनिस्निग गर्नुन: राधारमनिोदने निरभवणातिरंगो परम् ॥ २॥ निगम्य कर्माणि गुगानतुन्या वीर्णागि लीलातनुभिः कनानि । पदानिहोत्पुलकाधुगगदं प्रोत्लष्टमहापरिनि नृत्यति ॥३॥ शृण्वन्यमद्रागि रथागपाणे- जन्मानि कर्माणि च यानि लोके । गीतानि नामानि तदर्यकानि गायन्विलो विचरेदसः ॥ ४ आत्मसमर्पणम राजा बलि विशिष्ट हुए ! मगवान् श्रीकृष्णकी प्रासि ही इन समीका परम लक्ष्य था ॥२॥ आपके अनुपम गुण और कोको तथा आपके लीलामय विप्रहके दाग किये हुए विचित्र चरित्रोंको सुनकर जब भक्त अत्यन्त हसे पुलकित हो आँखों में आँसू मर गदाद एवं उप स्वरसे गाता, रोता और नाचने लगता है (तो यही आपकी भक्तिको अवस्था है) ॥३॥ श्री. भगवान् चक्रपाणिके जो लोकमें मंगलमय जन्म और कर्म होते हैं, तथा उनके जो दिव्य नाम करे गये हैं, उन्हें सुनकर, निःसंकोच- भावसे गाता हुआ असंग होकर विचरण करे ॥४ + माग० ७ । ७ । ३४, ११।२ । ३९ ।

® भक्तिसूक्ति नामैव मम तरवः किं न जीवन्ति भत्राः किं न श्वसन्त्युत । न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामपशवोऽपरे ॥५॥ श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पुरुषः पशुः। न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः॥६॥* कीर्तनम् हरेन मैव नामैव जीवनम् । कलौनास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥ ७॥ नाहं वसामि चैकुण्ठे योगिनां हृदये न च । मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ॥ ८॥ गीत्वा च मम नामानि विचरेन्मम सनिधौ । इति ब्रवीमि ते सत्यं क्रीवोऽहं तस्य चार्जुन ॥९॥ क्या वृक्ष नहीं जीते हैं, धौंकनी क्या श्वास नहीं लेती, और अन्यान्य प्राम्यपशु (शूकर-कूकर आदि) क्या भोजन और मल-मूत्र नहीं करते हैं ॥५॥ अरे ! जिसके कर्णकुहरों में कभी भगवान कृष्णचन्द्र के नामने प्रवेश नहीं किया, वह मनुष्य तो कुत्ता, दिल्ली, शूकर, ऊँट और गोंसे व्यर्थ ही श्रेष्ठ बतलाया गया नरपशु ही है॥६॥ मेरा जीवन तो बस एफ केवल हरिनाम ही है, इसके अतिरिक्त कलियुगमें और कोई गति है ही नहीं ॥७|| हे नारद! मैं न तो थैकुण्ठ में रहता हूँ और न योगियोंके हृदयमें ही रहता हूँ, मैं तो वहीं रहता हूँ, जहाँ प्रेमाकुल होकर मेरे भक्त मेरे नामका कीर्तन किया करते हैं ॥८॥जो मेरा नाम-संकीर्तन करता हुआ मेरी सन्निधि- में रहता है, हे अर्जुन ! मैं तुझसे सच कहता हूँ, मैं उसके हाथ विकारहता हूँ। श्रीमद्भागवदे २१३।१८-१९it पाण्डवगीतायाम्५४। मादिपुराणे। - A सूक्तिसुधाकर फलेदोपनिधे राजन्नस्ति झेको महान्गुणः । कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं ब्रजेत् ||१०||% कृते यद्ध्यायतो विष्णु त्रेतायां यजतो मखैः । द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ॥११||* तदेव रम्यं रुचिरं नवं नवं तदेव शश्वन्मनसो महोत्सवम् । तदेव शोकार्णवशोपणं नृणां यदुत्तमश्लोकयशोऽनुगीयते १२* नयद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशोजगत्पवित्रं प्रगृणीत कहिंचित् । वद्ध्वाङ्गतीर्थन तु हंससेवितं यत्राच्युतस्तत्र हि साघवोऽमला* हे राजन् ! यह कलियुग यद्यपि सब प्रकार दोषमय है, फिर भी इसमें यह एक महान् गुण है कि केवल कृष्णके कीर्तन करनेसे ही मनुष्य निःसंग होकर परम पदपर पहुँच जाता है ।।१०॥ सत्ययुगमें जो फल श्रीविष्णुभगवान्के ध्यानसे, त्रेता यशादिसे और दापरमें हरिसेवासे प्राप्त होता है, कलियुगमें वह केवल हरि-नाम-संकीर्तन करने से ही मिल जाता है ॥१९॥ पुग्यफीति भगवान के सुयशका जो गान किया जाता है, वही मनोहर, अति सुन्दर, नित्य नूतन, निरन्तर मनको प्रकृलित करनेवाला तथा मनुष्यों के शोकरूपी समुद्रका शोषण करनेवाला रोता ॥१२॥ जिस पाणीके द्वारा संसारको पवित्र करनेवाला हरिगुण कभी नहीं गाया जाय, उसमें चाहे विचित्र वर्णविन्यास भी हो, तोभी काकतीय (भयानक स्मशान) के नुरुप दी है, राजहंस सेरित मानसरोवरसहश नही, क्योंकि निर्मल साधुजन तो यही रहते हैं, जहाँ भगवान् अम्युत विराजते हैं ॥ १३ ॥ •भोमागवले ११११५१.५% ११।५।९.५.।

8 भक्तिमुक्ति स वाग्विसों जनतापसंप्लवो यसिन्यतिम्लोकमबद्धवत्यपि । नामान्यनन्तस्स यगोङ्कितानि य- च्छृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः॥१४॥ तृणादपि सुनोचेन तरोरपि सहिष्णुना । अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥१५॥ कमलनयन वासुदेव वासुदेव विष्णो धरणिघराच्युत शहचक्रपाणे। मव शरणमितीरयन्ति येथे त्यज भट उतरेण तानपापान् ॥१६॥ मरणम् (ध्यान) मगवत उरविक्रमादिशाखा- नसमणिपन्द्रिकया निरस्ततापे । परनु सराणा जिसके प्रत्येक मोककीरचनाचिपिलीयानो,मनुष्टी. के पास करनेवाली होतो, यदि उसमें भगवान् मनन्त के नाम पाल मोक्योंकि साधुन तो उनको मुनते, गाते और होते हैं | तिनमे भी नीना होकर शसे मी सानपीस होकर, दूसरोका मान करते हुए भोर सपं मानव रोस सदा हरिका नाम- सवाचन ॥१५॥ अमराव पाने १-]रे दूटो ! जो मेरे समहनरन रेनुकरे रिमोरे जा! मप्र !" सपागणे ! मारी रा रो, ऐसा उपारण करते हैं, उन निमार पुतीको से तीर मा ॥१॥ मान नरामा मयान पीरिपुरे परमोद मलमलमपरी रेषा गक्तिशुपाकर हदि फयमुपसीदताम्पुनः स प्रमयति मन्द्र इवादितर्कतापः॥१७॥ ते समाग्या मनुष्येषु कतार्या नृप निश्चितम् । सरन्ति ये मारयन्ति हरेन म कलौ युगे ॥१८॥ कृष्णे रताः कृष्णमनुसरन्ति रात्री च कृष्णं पुनरुत्थिता ये। तेऽमिनदेहाः प्रविशन्ति कृष्णे हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशे ॥१९॥ ये मानवा विगतरागपरावरना नारायणं सुरगुरुं सततं सरन्ति । ध्यानेन तेन हतकिल्विपचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥२०॥ चन्द्रिकासे तापरहित हुए हृदयमै, चन्द्रोदयके समय सूर्यसन्तापके समान दुःख कैसे ठहर सकता है । ॥ १७ ॥ हे राजन् ! कलियुगहें वे ही भाग्यवान् और कृतार्थ है, जो श्रीहरिका नामस्मरण करते और कराते हैं ॥ १८ ॥ जो कृष्णमें अनुरक्त हुए कृष्णहीका स्मरण करते हैं, और रातमें [ सोकर ] तथा उठनेपर मी कृष्णका ही स्मरण करते हैं, वे शरीर छूटनेपर इस प्रकार श्रीकृष्णमें सायुज्य प्राप्त करते हैं। जिस प्रकार मन्त्रपूर्वक हवन की गयी हवि अग्निमें वद्रूप हो जाती है ॥१९॥ जो मनुष्य वीतराग एवं पर-अपरके शाता होकर मुरगुरु भगवान् नारायणका सर्वदा स्मरण करते हैं, वे उस ध्यानके द्वारा पार्कोसे छूटकर पुनः माताके स्तनोंका दूध नहीं पीते [अर्थात् वे जन्म-मरणसे रहित हो मुक हो जाते हैं ] ॥२०॥ * श्रीमद्भागवते १११३ । ५४ प्रापुराणे ६८ । पाण्डवगीतायाम्।

३ भक्तिसूक्ति सकृन्मनः यैरिह। पादसेवनम् कृष्णपदारविन्दयो- निवेशितं तद्गुणरागि न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान् स्वप्नेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः॥२१॥* श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्वकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम् । यसाः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास- स्तद्वद्वयं च तव पादरजाप्रपन्नाः ॥२२||* तापत्रयेणाभिहतस्स पोरे सन्तप्यमानस्य भवाध्वनीश । पश्यामि नान्यच्छरणं तवाघिद्वन्द्वातपत्रादमृताभिवत् २३* जिन्होंने एक बार भी श्रीकृष्णचन्द्र के चरण-कमलों में, उनके गुणों में अनुराग रखनेवाला, अपना मन लगा दिया है, वे निष्पाप हो जानेसे फिर यमराज अथवा पाश लिये हुए यमदूतोंको स्वप्नमें भी नहीं देखते ॥२१॥ [गोपियोंने कहा-] जिनकी कृपाकटाक्ष अपने ऊपर होने के लिये अन्य देवता प्रयत्न करते रहते हैं, वेश्रीलक्ष्मीजी आपके हृदयधाममें स्थान पाकर भी तुलसीजीके साथ आपके भक्तोंद्वारा सेवित जिस चरणरजको चाहती हैं उसी चरणरेणुकी शरणमें आज लक्ष्मीजीकी ही माँति हम भी आयी है।॥ २२॥ हे प्रभो ! इस घोर संसार-मार्गमें तापत्रयसे आहत एवं सन्तप्त हुए अपने लिये मैं आपके चरणयुगलकी सुपावर्षिणी उपायाके अतिरिक्त और कोई आभय नहीं देखता हूँ ॥ २३ ॥ • भीमद्भागरते ।।१।१०।२९।२७११1१।९।

मूतिसुधाकर মনম नरके पच्यमान यमेन परिमापितः। किं त्वया नानितोदेवः केशवः क्लेशनाशनः ॥२४॥ एप निफण्टकः पन्या यत्र सम्पूज्यते इति। कुपयं वं विजानीयाद्गोविन्दरहितागमम् ॥२५॥ यन्दनम् खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतीपि सर्वाणि दिशो द्वमादीन् । सरित्समुद्रांच हरेः शरीरं यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः ॥२६॥ एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेघावभृथेन नरक-यातना भोगते हुओंसे यमने कहा कि 'तुमने क्लेशहारी केशव भगवान्- का पूजन क्यों न किया ॥२४॥ निर्विप्न मार्ग यही है जिसमें भगवान्की पूजा की जाती है। और भगवन्नामरहित शास्त्रोंको कुपथ ही समझना चाहिये ॥ २५ ॥ आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, समस्त नक्षत्र, दिशाएँ, वृक्ष, नदियाँ, समुद्र तथा और भी जो कुछ भूतजाव हैं; वे सब हरिका ही तो शरीर हैं, अतः सभीको अनन्यभावसे प्रणाम करे ।। २६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णको किया हुआ एक प्रणाम भी दय अश्वमेघाभिषेकके समान है, उनमें भी दश अश्वमेष करनेवाला * नृसिंहपुराणे ८।२१।महाभारते । श्रीमद्भागवते १२॥२॥१॥ तुल्यः।

• मक्तिसूक्ति *-*- २०१ दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ॥२७॥ सर्वस्वनिवेदनम् कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा युद्धथात्मना वानुसृतः स्वमावाद । करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत् ॥२८॥ भक्तिसामान्यम् शृण्वन गृणन संस्मरयंश्च चिन्तयन् नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते । क्रियासु यस्त्वचरणारविन्दयो- राविष्टचेता न भवाय कल्पते ॥२९॥ विपदः सन्तु नः शश्वतत्र तत्र जगद्गुरो। भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥३०॥ तो फिर जन्म लेता है, किन्तु श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला फिर जन्म नहीं लेता ।। २७ ॥ शरीरसे,वाणीसे, मनसे, इन्द्रियसे, बुद्धिसे, भारमासे, अपया स्वभावसे जो भी मनुष्य करे पर सब परमपुरुष नारायणको समर्पण कर दे ॥ २८ ॥ आपके मंगलमय नाम और रूपको मुनता, पाता, स्मरण करता और चिन्तन परता हुआ जो आपके परोम दत्तचित्त होकर क्रिया पार गता है, वह रि संसारमें जन्म नहीं लेता ॥ २९॥ (पुन्तीने का-) हे अगदुरो। यत्र-तत्र सभी स्थानों में हमपर विपत्तियाँ आतीही रोशिससे उस समय पुनभन्मका नाश करनेवाला, आपका दर्शन मिला परे ॥३०॥ •सामारखे सानिरणि ४.९९ +बीमागसे ११०१।७.५॥

२०२ ॐ सूक्तिसुधाकर वाणी गुणानुकथने श्रवणो कथायां हस्तौ च कर्मसुमनस्तव पादयोनः। स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्प्रणाम दृष्टिः सतां दर्शनेऽस्तु भवत्तनूनाम्।।३१॥* श्रेयासुति भक्तिमुदस्स ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये । तेपामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद्यथा स्थूलतुपावघातिनाम् ॥३२॥* आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे । कुर्वन्त्यहतुकी भक्तिमित्थंभूतगुणो हरिः ॥३३॥* न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव । न वाघ्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥३४॥ वाणी आपके गुणानुवादम, श्रवण आपके कथाश्रवणमे, हाय आपकी सेवामें, मन चरणकमलोंके स्मरणमें, शिर आपके निवाणभूत सारे जगत्- के प्रणाम करनेमें तथा नेत्र आपके चैतन्यविमा संतजनों के दर्शनमें सगे रहें॥ ३१॥ विभो! आपकी कल्याणदायिनी भतिको छोहार जो लोग केवल दोपके लिये ही कष्ट उठाते हैं, उन्हें थोथे तुप (भूसी) पूरनेवालों के समान केयल क्लेश ही याकी रहता है, और कुछ नही ॥ २२ ॥ मगयान्के गुण ही ऐसे हैं कि आरमाराम और असम मुनि अन मी उनमें अहेतुकी भक्ति करते ॥५॥ उमष ! जैमा में अग्नी निकट भक्ति से प्राप्त होता, वैसा न योगसे, न सांस्यसे, न धर्ममे, न स्वाध्यायसे, न बरगे और न यागमे मिलता हूँ॥ १४ ॥ . -गामाAIT.

9 भक्तिसूक्ति २०३ कुर्वन्ति शान्तिं वियुधाः प्रहृष्टाः क्षेमं प्रकुर्वन्ति पितामहाद्याः । स्वस्ति प्रयच्छन्ति मुनीन्द्रमुख्या गोविन्दभक्ति वहतां नराणाम् ॥३५॥ शुभा ग्रहा भूतपिशाचयुक्ता ब्रह्मादयो देवगणाः प्रसन्नाः । लक्ष्मीः स्थिरा तिष्ठति मन्दिरे च गोविन्दभक्ति वहतां नराणाम् ॥३६॥ गदागयानैमिपपुष्कराणि काशी प्रयागः कुरुजाङ्गलानि । तिष्ठन्ति देहे देहे कृतभक्तिपूर्व गोविन्दभक्ति वहतां नराणाम् ॥३७॥ गोविन्दकी भक्ति करनेवाले मनुष्यको देवता मी हर्षित होकर शान्ति देते हैं, ब्रह्मा आदि रक्षा करते हैं, बड़े-बड़े मुनिगण कल्याण प्रदान करते हैं ॥ ३५ ॥ गोविन्दकी भक्ति धारण करनेवाले मनुष्य- पर भूत, पिशाच आदिके सहित सभी ग्रह शुभ रहते हैं, प्रक्षा आदि देवगण प्रसन्न रहते हैं, उसके घरमें लक्ष्मी स्थिर रहती है ॥३६ ।। गोविन्दकी भक्ति करनेवाले मनुष्य के शरीरमें, गंगा, गया, नैमिषारण्य, पुष्कर, काशी, प्रयाग और कुरुक्षेत्र भक्तिपूर्वक निवास करते हैं ॥३७॥ पिपुराणे। - - २०४ मनिसुधाकर सकलापनमणे निर्घनास्तेऽपि धन्या नियमति ददियां श्रीदरेमक्तिरेका। हरिपि निजलोकं मर्ययातं विहाय प्रविगति हदिनपो मक्तिमोपनदः||३|| भक्तिमेवामियान्यन्ति त्वद्भक्ताः सारयेदिनः । अतस्त्वत्पादकमले मक्तिरेव सदास्तु मे ॥३९॥ नोमुत्य स्पृहयामि नाथ विभवः कार्य न सांसारिक: किं त्वायोज्य करी पुनः पुनरिदं त्वामीशमम्पर्भये । खमे जागरणे स्थिती विचलने दुःखे सुखे मन्दिरे कान्तारे निशि वासरे च सततं भक्तिर्ममास्तु त्वयि ॥४०nt समस्त संसारमें परम निधन होकर भी ये धन्य हैं जिनके हृदय में एक भगवद्भक्तिका वास है, क्योंकि मगवान् हरि मी उनके भकिसूत्रसे वध. कर अपने लोकको छोड़कर उनके हृदयमें प्रवेश करते हैं ॥ ३८ ॥ आपके तत्ववेचा मक्तजन आपकी भक्ति ही चाहते हैं, अतः मेरी भी सदा आपके चरणों में मक्ति बनी रहे ॥ ३९ ॥ हे नाप ! मुझे न तो मुक्तिकी इच्छा है और न सांसारिक वैमवसे ही कोई प्रयोजन है। हे ईश ! मैं तो हाथ जोड़कर आपसे बारंबार यही माँगता हूँ कि सोने, जागने, खड़ा होने, चलने, सुख, दुःख, घर, धन, रात्रि और दिनमें, सब समय आपमें ही मेरी भक्ति बनी रहे ॥ ४०॥ - * पम० पु. खं०६।१९१७४ अध्या. रा.१।२।२०-२१॥ वाग्मटव ।

ॐ भक्तिसूक्ति २०६८ - नानाचित्रविचित्रवेपशरणा नानामतभ्रामका नानातीर्थनिपेवका जपपरा मौने स्थिता नित्यशः। सर्वे चोदरसेवकास्त्वमिमता वादे विवादे रता ज्ञानान्मुक्तिरिदं वदन्ति मुनयो मुफ्त्यापि सादुर्लभा|४१ वरमसिधारा तरुतलवासो वरमिह भिक्षा वरमुपवासः । वरमपि घोरे नरके पतनं न च हरिभक्तर्विमुखःसङ्गः॥४२॥ विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे । हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥४शा- व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च ययो विद्या गजेन्द्रस्य का कुब्जायाः किमु नामरूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनम् नित्य ही अनेक तरहके वेष धारण करनेवाले, अनेक मतोंमें भ्रमण करने- वाले, नाना तीर्थोकी सेवा करनेवाले, जपपरायण और मौनव्रती-ये सभी उदरपूर्चिके निमित्त वादविवादमें लगे हुए जान पड़ते हैं । मुनिजन तो शानसे ही मुक्ति बतलाते हैं, और भक्ति तो मुक्तिसे मी दुर्लभ है ॥४१॥ तलवारकी धारके समान कठिन व्रत करना, वृक्षके तले पृथ्वीपर रहनाभिक्षा माँग लेना, अथवा भूखा रह जाना अच्छा है, तथा घोर नरकमें पढ़ना भी अच्छा है किन्तु भगवद्भक्तिसे विमुख रहनेवाली संगति अच्छी नहीं है।४२|| भलीभाँति निश्चित की हुई बात मैं आपसे कहता हूँ, मेरे वचन अन्यथा नहीं हैं, जो मनुष्य भगवान्का भजन करते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर संसारसागर- को तर जाते हैं ॥ ४३ ।। व्याधर्मे क्या सदाचार था । ध्रुषकी अवस्था ही कितनी थी ! गजराजमे ऐसी कोन विद्या थी! कुन्जामें ऐसा कहाँका सौन्दर्य था! सुदामाके पास क्या पन या विदुरका कौन-सा उथ •तुलसीदासस्य रामायणे।

8 सूक्तिसुधाकर वंशः को विदुरस्स यादवपतेरुग्रस्य किं पौरुषं भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधयः॥४४॥ भक्तस्य लक्षणं माहात्म्यं च सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येप भागवतोत्तमः ॥४५||* त्रिभुवन विभयहेतवेऽप्यकुण्ठ- स्मृतिरजिवात्मसुरादिभिर्विमृग्यात् । न चलति भगवत्सदारविन्दा. वनिमिपार्धमपि यास वैष्णवाग्रयः॥४६॥* विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघोषनाशः । कुल था ! अथवा यादवपति उग्रसेनमें कहाँका पुरुषार्थ था। भगवान् तो भक्ति के प्रिय हैं, वे केयल मकिसे ही सन्तुष्ट होते हैं, गुसे नहीं ॥४॥ जो समस्त प्राणियोंमें अपना भगवास्वरूप देखता है, और सर माणियोंको अपने भगवत्स्वरूपमै देखता, वही उत्तम भक्त है।४५|| त्रिभुवनकी सम्पत्ति के लोमसे मी जिसके स्मरणमें किचित् साधा नहीं पड़ती भौर अजिठारमा देयगणोंसे खोजे जानेवाले भगयभरणारविन्दौसे जिसका चिस माधे राणके लिये मी चचल नहीं होता, वही मगपतमि उत्सम है॥४६॥ोमगयान विवश होकर उचारण किये जानेपर भी प्रत्याही पापसमूहको पंस कर देते है वहीमाभात् जिम मेहदयको कभी नहीं छोड़ते, •मीमा ११।३.४५, ५६ ॥

भक्तिसूकि २०१ प्रणयरशनया धृताधिपाः स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥४७॥ कचिट्ठदन्त्यच्युतचिन्तया कवि- सन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः। नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजं भवन्ति तूष्णीं परमेत्य निर्वताः ॥४८॥ न नाकपृष्ठं न च सार्यमौम न पारमेष्टयन रसाधिपत्यम् । योगसिद्धीरपुनर्भवं चा चान्छन्ति यत्पादरजन्यपन्नाः ॥४९॥ न चै जनो जात्तु कथञ्चनायजेन्मुकुन्दसेव्यन्यवदङ्ग संसृतिम् । सारन्मुकुन्दा थु पगृहनं पुनर्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहोयतः५०* तया जिसने अपने प्रेमरूपी डोरीसे उनके चरण कमलोको बाघ रखा है, वही भगवद्भक्तों में प्रधान कहा गया है ।। ४७ ॥ भक्तजन कभी भगवान् अच्युतका चिन्तन करके रोते हैं, कभी हँसते है, कभी प्रसन्न होते हैं, कभी अलौकिक अवस्थामै पहुँचकर भगवानसे वार्ते करते है, कभी नाचते, गाते और भगचिन्तन करते हैं, तथा कभी परमेश्वरको पानेसे विभान्त होकर मौन हो जाते हैं ।। ४८|| जिन (भगवान् ) की चरणरजसे प्रसन्न [ मत ] न स्वर्गकी, न साम्राज्य- की, न ब्रह्मापदकी, न पातालके आधिपत्यकी,नयोगसिरिकी और न मौसकी ही इच्छा करते है ।। ४९॥ हे मित्र ! मुकुन्दकी सेवा करनेवाला मनुष्य अन्य (सकामकी) पुरुषों की तरह आवागमनको प्राप्त नहीं होता; मुकुन्द-चरणारविन्दोके आभ्यन्तरिक रसको स्मरण करता हुआ यह (जीव) फिर उन्हें छोड़ने की इच्छा नहीं करता, क्योंकि यह जीव रस (परमानन्दरस ) का ग्रहण करनेवाग है ।।५।। •भीमनागवडे ११।२१५५११।३।१२१. ।११।३७७ ' मनिसुधाकर निरपेयं यनि शान्तं निवरं समदर्शनम् । अनुमजाम्यई नित्यं ध्येयेत्यधिरेशमिः ॥५१॥ सालास्यसासिामीप्यसारूप्यकत्वमप्युत । दीपमानं न गृहन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥५२॥ अई मक्तपराधीनो पसतन्य व द्विज । साघुमिर्पस्तहदयों मकर्मक्तजनप्रियः ॥५३॥ भवदुग्यपरटेन पिप्यन्ते सर्वमानवाः। दुःखमुक्तः सदानन्दः कृष्णभक्तो हि केवलः ||५४ाई वासुदेवस्स ये भक्ताः शान्तास्तद्तमानसाः। तेपो दासस्य दासोऽहं भवे जन्मनि जन्मनि ॥५५॥ (जो) निरपेक्ष, निर, उमदी और शान्त मुनिजन है, उनके पीछे- पीछे सदा ही में इसलिये गिरा करता हूँ कि ( उनकी) चरणरजसे पवित्र हो जाऊँ ।। ५१ ॥ मेरे भक्त मेरी सेवाके अतिरिक्त तो सालोक्य, सायुज्य, सामीप्य, सारूप्य अथवा कैवल्य किसी प्रकारकी मुक्ति भी दिये जानेपर ग्रहण नहीं करते ।। ५२ ॥ [सुदर्शनचकसे व्याकुल हो शरणागत दुर्वासा ऋषिसे विष्णुभगवान् कहते हैं-'हे द्विज! मैं पराधीनके समान भक्तों के घशमैं हूँ। मुझ भक्तवत्सलका चित्र मेरे साधुमक्तोंने बाँध रखा है। ॥ ५३ ॥ संसारके दुःखरूपी चकीमें समस्त जीव पीसे जा रहे हैं, केवल नित्यानन्द-स्वरूप एक कृष्णभक्त ही इस दुःखसे बचे हुए हैं ॥ ५४॥ जो वासुदेव दत्तचित्त हुए उनके शान्त भक्त हैं, जन्म-जन्म में उनके दासोका दास होऊँ॥ ५५॥ • श्रीमद्भागवते ११ । १४ । १६३ । १९।१३: ५। । । १२ ॥ 1 सीताराकुमारस्य । पाण्डवगीतायाम् २१॥

प्रेमसूक्ति २०० ते मे भक्ता हि हे पार्थ न मे भक्तास्तु मे मताः। मद्भक्तस तु ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मताः ॥५६॥ सदा मुक्तोऽपि बद्धोसि भक्तेषु स्नेहरजुमिः । अजितोऽपि जिवोऽहं तैरवशोऽपि वशीकृतः ॥५७||* प्रेमसूक्तिः विधाप्येक सदागम्यं गम्यमेकप्रभेदने । प्रेम प्रेमी प्रेमपात्रं त्रितयं प्रणतोऽस्म्यहम् ।।५८॥ अहो साहजिकं प्रेम दूरादपि विराजते । चकोरनयनद्वन्द्वमाहादयति चन्द्रमाः ॥५९॥ हे अर्जुन ! ना केवल मेरे ही भक्त हैं वे मेरे वास्तायेक भक्त नहीं। मेरे उत्तम भक्त तो वे ही है जो मेरे भक्तोंके भक्त है ॥ ५६ ॥ सदा मुक्त हुआ भी में भक्तोंमें (उनकी) प्रेमरूपी डोरीसे बंधा हुआ हूँ, अजित हुआ भी उनके द्वारा जीता जा चुका हूँ और अवश हुआ भी उनके वशमें हूँ ॥ ५७ ।। प्रेम, प्रेमी और प्रेमपात्र ये तीन होकर मी एक ही है, ये सदा ही पहचानमें नहीं आते, इन्हें एक रूप ही जानना चाहिये ॥ ५८॥ अहो ! जो स्वाभाविक प्रेम होता है, वह दूर होनेपर भी मुशोभित होता है, देखो चन्द्रमा [ कितनी दूरसे ] चकोरके नेत्रोंको आहादित करता है ।। ५९ ॥ * आदिपुराणे।

मुक्तिसुधाकर दर्शने स्पर्शने चापि श्रयणे भाषणेऽपि वा। हृदयस्य द्रवत्वं यचत्प्रेम इति कथ्यते ॥६०॥ प्रेममादुभांयक्रमः आदी श्रद्धा ततः समस्ततोऽथ भजनक्रिया । ततोऽननित्तिः स्थाचतो निष्ठा रुविस्ततः ॥६॥ अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाम्युदश्चति । साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भाव भवेत्क्रमः॥६||* रागात्मिका मतिः इष्टे स्वारसिको रागः परमाविष्टता भवेत् । तन्मयी या भवेद्भक्तिः सात्र रागमिकोदिवा ॥६३||* अनुमावा क्षान्तिरव्यर्थकालत्वं विरक्तिर्मानशून्यता। आशावद्धसमुत्कण्ठा नामगाने सदा रुचिः ॥६॥ देखते या छूते, सुनते अथया बोलते समय हृदयका पिघल जाना ही प्रेम कहा जाता है ।। ६० । पहले श्रद्धा होती है, फिर संग, तदुपरान्त भजन, उससे अननिवृत्ति, फिर निष्ठा और उससे रुचि होती है। रुचिसे आसक्ति, उससे भाव और तदनन्तर प्रेमका प्रादुर्भाव होता है । साधकोंके प्रेमके उदय होनेमे यही क्रम है ॥६१-६२॥ अपने प्रियमें खा- भाषिक प्रेम: पूर्ण आवेश और तन्मयतायुक्त जो भक्ति हो, उसे रागालिका भक्ति कहते हैं ।। ६३ ।। क्षमा, व्यर्थ समय न सोना, वैराग्य, मानशून्यवा, भाशामरी उत्कण्ठा, निरन्तर नामसंकीर्तन मे प्रेम, प्रियतमके गुणों की चर्चामें - - मोरूपगोस्वामिनः।

प्रेमसूक्ति आसक्तिस्तद्गुणाख्याने प्रीतिस्तद्वसतिस्थले । इत्यादयोऽनुभावाः स्पुर्जातभावारे जने ॥६५॥ सात्त्विका मायाः से खेदस्तम्भरोमाशा स्वरभेदोऽथ वेपथुः । वैवर्ण्यमच प्रलय इत्यष्टौ सात्त्विकाः स्मृताः॥६६॥ सर्वेषां मावानुमायानां संकीर्णान्युदाहरणानि बद्धनाक्षलिना नवेन शिरसा गात्रैः सरोमोहमः कण्ठेन स्वरगद्गदेन नयनेनोद्गीर्णवाप्याम्बुना । नित्यं वचरणारविन्दयुगलध्यानामृतास्वादिना- मसाकं सरसोरहाक्ष सततं सम्पद्यतां जीवनम् ॥६॥ चन्द्रोदये चन्द्रकान्तो यथा सद्यो द्रवीभवेत् । कृष्णमक्त्युदये प्रेम्णा तथैवात्मा द्रवी भवेत् १६८॥ आसक्ति तथा भगवान्के निवासस्थानोंमे प्रीति इत्यादि अनुमाव, जिस पुरुषमें मावका अंकुर स्फुटित होता है, उसमें होते हैं स्तब्ध हो जाना, स्वेद, रोमाश, स्वरभेद (गदगद हो जाना) कम्प, विवर्णता, अश्रुपात और सुध-बुध भूल जाना-ये आठ सायिक भाव हैं ॥ ६६ ॥ है कमलनयन ! हाथ जोड़कर शिर नवाकर पुलकित शरीरसे गदादकण्ठ हो नेत्रों में आँसू मरकर आपके युगलवरणाके ध्यानामृतका आस्वाद लेते हुए, हमारा जीवन व्यतीत हो ॥ ६७ । चन्द्रमाके उदय होनेपर जिस प्रकार चन्द्रकान्तमणि स्वयं द्रषीभूत हो जाती है, उसी प्रकार कृष्णमत्तिके उदय होनेपर चित्त प्रेयसे पिघल जाता है ।।६८॥ * पोरूपगोस्वामिनः । श्रीकुलशेखरस्य मुकुन्दमालायाम् । सीतारा. कुमारस्य ।

२१२ सूक्तिसुधाकर *-*-*-*-*-*- तदश्मसारं हृदयं यतेदं यद्गृह्यमाणैरिनामधेयः। न विक्रियेताथ यदा विकारो नेत्रे जलंगावरुहेपु हर्षः॥ एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो दुवचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकयाह्यः ||७०|| यदा ग्रहग्रस्त इव कचिद्धस- त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम् । मुहुः श्वसन्वक्ति हरे जगत्पते नारायणेत्यात्ममतिर्गतत्रपः ॥७॥ जिसमें हरिनामके उच्चारणमात्रसे कोई विकार नहीं होता था हृदय नहीं, पत्थर है। जय विकार होता है तो नेत्रोंमें बन और दारीरमें रोमात्र हो आता है ॥ ६९ ॥ ऐसा न रसनेयाला अपने प्यारेके नामसंकीर्तनसे प्रेमवश द्रुतचित्त होक अलौफिक अयस्थामें पहुँचकर पागलकी भाँति कभी जोरोसे हंस है, कमी रोता है, कमी गुनगुनाता है, कमी गाता है और कभी नाचा है ॥७. ॥ जिस समय महान (प्रेतपीडित) के समान कभी हंसे, कर्म रोये, कभी ध्यान करे, कभी प्रणाम करे और यार-बार दीपं नियम देता हुमा निःसंकोच होकर यात्मदिसे हे रे! अगरफ्ते ! नारायण!' कहे [तब मक्तिका उद्देश हुमा आनो] || ७१ • श्रीमद्भागवत ३१२४११३ १४.५

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1 त्रिभुवनमपि नन्मयं विरद्धे प्रेमसूक्ति पञ्चत्वं तनुरेतु भूतनिवहाः स्वांशान विशन्तु प्रम धातस्त्वां शिरसा प्रणम्य कुरु मामित्यद्य याचे पुन तद्वापीपु पयस्तदीयमुकुरे ज्योतिस्तदीयाल व्योनि व्योम तदीयवमनि धरातत्तालवृन्त निलम संगमविरह विकल्पे वरमिह विरहो न सङ्गमस्तस्य सङ्गे सैव तथैकत्रिभुवनमपि तन्मयं विरह नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गदरुद्धया गिरा पुलकनिचितं वपुः कदा तर नामग्रहणे भविष्या हे प्रभो! मेरा शरीर पञ्चत्वको प्रास हो जाय, पा अपने-अपने अंशों में मिल जाये, पर हे विधातः ! शिर करके तुमसे बारंबार यही प्रार्थना करता हूँ कि (मेरा अंश) कृष्णकै क्रीडा सरोवरमें, तेज उनके दर्पणमें, आकाश उनके र भूमि उनके मार्गमें और वायु उनके पंखेमें (मिल जाय) संगम और विरह इन दोनोंमें सगमकी अपेक्षा विरह क्योंकि संगममें तो अकेला वही (प्रिय ही) रह जाता विरहमें सम्पूर्ण जगत् ही तप हो जाता है ॥७३॥ नामसरण करते हुए मेरे नेत्र अश्रुधारासे, मुख गन्द्र और शारीर पुलकापलिसे का पूर्ण हो जायगा ।। •कालजलदस्य + शिक्षाकार ।

२१४ १ मुक्तिसुधाकर * इन्दुः कवच सागर कचरविपनाकरः कस्थिता कानंवा क मयूरपङ्क्तिरमला कालि कयामालती । मन्दाध्वक्रमराजहंसनिचयः कासी क या मानसं यो यस्साभिमतःस तस्य निकटे दूरेऽपि या वल्लभः ।।७५|| আত্মেনিছুর चित्ताहादि व्यसनविमुखं शोकतापापनोदि यज्ञोत्पादि श्रवणसुखदं न्यायमार्गानुयायि । तथ्यं पथ्यं व्यपगतमदं सार्थक मुक्तवादं यो निर्दोपं रचयति वचस्तं बुधाः सन्तमाहुः ॥७६।।* कहाँ तो चन्द्रमा है और कहाँ समुद्र ! कहाँ सूर्य है और कहाँ कमलवनकी स्थिति ? कहाँ बादल हैं और कहाँ मयूरॉकी विमल पंक्ति ! कहाँ मौरे रहते हैं और कहाँ मालती ? कहाँ मन्द-मन्दगामी राजहंसोंके कुण्ड हैं और कहाँ मानसरोवर ! [इन सबमें इतना अन्तर रहते हुए भी परस्पर कितनी प्रीति है १ सच है ] जो जिसको चाहता है, वह उसके पास रहे या दूर, प्रियतम ही है ॥ ४५ ॥ जो पुरुष चित्तको प्रसन्न करनेवाला, व्यसनसे विमुख, शोक और तापको शान्त करनेवाला, पूज्यभाव पढ़ानेवाला) कर्णसुखद, न्यायानुकूल, सत्य, हितकर, मानरहित, अर्थगर्मित, विषादरहित और निदोष यचन बोलता है, उसे ही घुधजन संत कहते हैं ।।७६॥ ममितगो।

• साधुसूक्ति २१५ कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा पुण्यवती च तेन । अपारसंबित्सुखसागरेऽस्मिल्लीनं परे ब्रह्माणियस चेतः॥७॥ शान्ता महान्तोनिवसन्ति सन्तो वसन्तवल्लोकहितंचरन्तः। तीर्णाःवयं भीमभवार्णवं जनानहेतुनान्यानपि तारयन्तः७८)* साथयो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं महम् । मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेम्यो मनागपि ॥७९॥ सन्तोऽनपेक्षा मञ्चित्ताः प्रणताः समदर्शिनः । निर्ममा निरहङ्कारा निन्द्रा निष्परिग्रहाः ॥om जिसका चित्त इस अपार चिदानन्दसिन्धु परब्रह्ममें लीन हो गया उसका कुल पवित्र हो गया, माता कृतार्थ हो गयी और पृथ्वी उससे पुण्यवती हो गयी || ७ || इस भयंकर संसार-सागरसे स्वयं तरे हुए शान्त और महान संतजन निस्वार्थ- बुद्धिसे दूसरे लोगों को मी तारते हुए [ इस संसारमें ] वसन्तके समान लोकहित करते हुए निवास करते हैं ॥ ७८ ॥ साधुजन मेरे हृदय हैं और मैं साधुओंका हृदय हूँ; वे मेरे सिवा कुछ भी नहीं जानते और मैं भी उनके सिवा और कुछ तनिक भी नहीं जानता ॥७९॥ संतजन किसी प्रकारको इच्छा नहीं करते, वे मुझमें ही चित्त लगाये रहते हैं, तथा अति नम्र, समदर्शी, ममताशून्य, अहंकार- हीन, निन्दू एवं सञ्चय न करनेवाले होते हैं॥८० ॥ * विवेकचूडामणी ३१ । श्रीमद्भागवते ९.४१६८ ११ । २६ । २७ ।

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झानिसूक्तिः २१७ साशिसूक्तिः ध्यानजले मानदे सर्वपापभयापहे। यास्नाति मानसे तीर्थेस याति परमा गतिम् १८४||* क्वचिन्मूढो विद्वान् कचिदपि महाराजविभवः कचिद्धान्तः साम्यः कचिदजगराचारकलितः। कचित्पात्रीभूतः कचिदयमतः छाप्यविदित- धरत्ये प्राज्ञः सततपरमानन्दसुखितः ॥८॥ चिन्ताशून्यमदैन्यभैक्ष्यमशनं पानं सरिद्वारिषु खातन्त्र्येण निरङ्कुशा स्थितिरमीनिंद्रा स्मशाने बने। अपने मनरूपी सीर्य में ज्ञानरूपी सरोवरके ध्यानरूपी सर्वपापहारी जलमें जोस्नान करता है वही परमगतिकोमास होता है॥४॥शानी कही मूदके समान दिखायी देता है, कही गमा-महाराजाओंके ठार चाटसे पुस्त. दीरा पड़ता है तथा कहीं प्रान्त-सा, कहीं मोम्पमूर्ति और कही अजगरवृत्निसे एक ही स्थानपर पड़ा रहनेवाला देसा आता है। वह कहीं सम्मानित, कहीं अपमानित और कही अगतरूपसे रहता है। इस प्रकार निरन्तर परमानन्दमें मग्न हुआ पर विचरता रहता २॥ ८५ ॥ शानियों के लिये चिन्ता और दोनतासे रहित भिवामी भोजन रोता है, नदीम मरो पीने के लिये रोता है, स्वतन्त्रतापूर्वक पारनहित स्थिति होती मान अपना बनमें नियनिदा होती , धोने-मुरसानेसे गति दियाएँ हो पत्र होती है, मी ही . •मामालिका

२१८
& सूक्तिसुधाकर
वलं क्षालनशोपणादिरहितं दिग्यास्तु शय्या मही
सञ्चारो निगमान्तवीथिपु विदांक्रीडापरेवाणि।।८
तनुं त्यजतु काश्यां या श्वपचरस गृहेऽथवा ।
ज्ञानसंप्राप्तिसमये मुक्तोऽसौ
मुक्तोऽसौ विगतारायः ॥८७.
यस्य कस्य च वर्णस्य ज्ञानं देहे प्रतिष्ठितम् ।
तस्य दासस्य दासोऽहं भवे जन्मनि जन्मनि 11८.
स्नातं तेन समस्ततीर्थसलिलदत्ता च सर्वावनि-
यज्ञानां च कृतं सहस्रमखिला देवाश्च सम्पूजिताः।
संसाराच समुद्धृताः खपितरस्त्रैलोक्यपूल्योऽभ्यसो
यस्य ब्रह्माविचारणे क्षणमपि स्थैर्य मनःप्रामुयात् ।।८९।
शय्या होती है, वेदान्तवीयियोंमें ही वे विचरण करते हैं। इस प्रकार विद्धान
की परनामें ही कीड़ा होती है ।। ८६ ॥ जिसकी कामना दूर हो गयी
यह चाहे काशी में शरीर त्यागे या चाण्डालके घरमें, यह तो शान
मासिके समयसेही मुक्त हो जाता है ।। ८७॥ जिस-किसी भी वर्णरे
शरीरमें शानका उदय हुआ हो, मैं जन्म-जन्म उसीके दासोंका दास
होऊँ॥८॥ प्रक्षाविचारमें जिसका चित्त एक क्षणके लिये मी स्थिर
हो जाय, उसने समस्त तीयोंकि जलमें स्नान कर लिया, सापूर्ण पृथ्वीका
दान दे दिया, सहसों यश कर लिये, समस देवताओका पूजन कर
लिया, तथा अपने पितरों को संसारसागरसे पार कर दिया और स्वयं तो
यह त्रिलोकीका हो पूजनीय हो गया ।। ८९॥
•वमयोपाद।
+गोरक्षाका

गुरुसूक्ति गुरुसूक्तिः ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति द्वन्द्वातीतं गगनसदृशंतत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्। एक नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुंतनमामि॥९०॥* अज्ञानतिमिरान्धस्स ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥९॥ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥९॥ - जो मानन्दस्वरूप, परम सुखदाता, केवल ज्ञानभूति, इन्द्रोसे पृषक, आकाशके समान निलेप, तत्वमसि आदि. महावाक्यका लक्ष्यार्यभूत, एक, निस्य, निर्मल, कूटस्थ, समस्त बुद्धियोंके साक्षी और मावोंसे अतीत हैं उन त्रिगुणसे रहित सद्गुरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९॥ अज्ञानरूपी तिमिररोग (रतौंधौ ) से अन्धे हुए मनुष्यकी आँखोंको जिन्होंने शानरूपी अञ्जनकी शलाकासे खोल दिया है, उन गुरुदेवको नमस्कार है ॥ ११ ॥ समस्त चराचररूप ब्रह्माण्डको जिस परमेश्वरने व्याप्त कर रखा है उनके पदका जिन्होंने साकार कराया है उन गुरुदेवको नमस्कार है ॥ १२ ॥ +शुकरहस्ये। + गुरुगीतायाम् ।

२२० * सूक्तिमुपाकर * गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥९॥ अखण्डानन्दपोषाय शिष्यसन्तापहारिणे । सचिदानन्दरूपाय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥९४|| गुगरीमा, गुरु हो विष्णु और गुरु ही भगयान मोखर तथा गुरुजी साक्षात् परब, उन गुरुदेवको नमस्कार ॥९॥ असारमा भोपाल, शिप्नोंके समाहारी और सचिनाररूप गुरुदेलको नमरकर

दशम उल्लास
पिपिपमृतपः
रिमनि
दररोष जगअगदर परि.
रिलो अगला नार भिमननुः ।
पर मकि परमागतिः
म नंगे मरमागरमशति १०
संगमाग्ने गदा मरे ।
नागरपारा २
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२२२ ० मूक्तिमुधाकर भोजनाच्छादने चिन्ता यथा पुर्वन्ति येणया। योगी विश्वम्मरो देवः स भक्तान किमुपेक्षते ॥ ३॥ शरीरं च नवच्छिद्रं व्याधिग्रस्त कलेवरम् । औषधं जावीतोयं वेद्यो नारायणो हरिः ॥ ४॥ • लाभस्तेषां जयस्तेपां कुतस्तेषां पराजयः। येपामिन्दीवरश्यामो हदयस्थो जनार्दनः ॥५॥ शियमद्विमा प्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च। रुचीनां वैचित्र्याजुकुटिलनानापथजुपां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥६॥ कर ॥२॥ वैष्णवजन भोजनवलकी चिन्ता व्यर्थ ही करते हैं, जो भगवान् सारे संसारका पेट भरनेवाले हैं, क्या वे अपने भक्तोंकी उपेक्षा कर सकते हैं। ॥ ३ ॥ यह शरीर नव छिद्रोंसे युक्त और व्याधिप्रस्त है इसके लिये गंगाजल ही औषध और भगवान् नारायण दी वैद्य है ॥ ४ ॥ जिनके हृदयमें नीलकमलके समान श्यामसुन्दर भगवान् जनार्दन विराजमान हैं, उनका ही लाभदै, उनकी ही जय है, मला उनकी पराजय किससे हो सकती है ? ॥ ५॥ हे शिव ! वैदिक मत, सांख्य, योग, पाशुपत और वैष्णव इत्यादि परस्पर भिन्न मागोंमें 'यह बड़ा है, यह हितकारी है' इसप्रकार रुचि-वैचित्र्यसे अनेक प्रकारके सीधे या टेढ़े पंथको अपनानेवाले मनुष्यों के लिये आप (ईश्वर) ही एकमात्र स्थान हैं, जैसे जलमात्रके लिये समुद्र है ॥६॥ * पाण्डवगीतायाम् ७६, ७५, ४६ | पुष्पदन्ताचारय। प्राप्तव्य 8 विविधसूक्ति २२३ सतां महत्त्वम् पिबन्ति नद्यः खयमेव नाम: स्वयं न खादन्ति फलानि पृक्षाः । धाराघरो वर्षति नात्महतो परोपकाराय सवां विभूतयः ॥७॥ "सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा । शान्तिः पत्ती क्षमा पुनः पडते मम बान्धवाः 11८ff विरला जानन्ति गुणान् विरलाः कुर्वन्ति निर्धने स्नेहम् । विरलाः परकारिताः परदुःखेनापि दुःखिता विरलाः ॥९॥ - नदियाँ स्वयं अल नहीं पीती, वृक्ष स्खये फल नहीं पाते तथा मेघ अपने लिये नही परसतासिनोको सम्पत्ति तो परोपकार के लिये ही होती है| सत्य मेरी माता है, सान पिता है, धर्म भाई है, दया मित्र, शान्ति स्त्री और घमा पुत्र है, ये एही मेरे बान्धव ॥ ८॥विरले ही गुणों को समझते हैं, बिरले ही निधनौसे मेम करते हैं। दूसरों के कार्यसाधनमें तत्पर भौर परदुःलसे दुसित होनेवाले भी विरले ही होते हैं॥९॥ ------ -बागचनी।

मकिपाकर धमा साकरे यस दुर्जनः किं करिष्यति । अवणे पतितो बहिः स्वयमेयोपशाम्यति ॥१०॥ साघुस मार्गे मार्गे जायते साधुसहर सङ्गे सङ्गे श्रूयते कृष्णकीर्चिः। फीता कीची नस्तदाकारत्ति- वृत्ती सचिदानन्दमासः ॥११॥ महत्सेवा द्वारमाहुर्विमुक्त- स्तमोद्वारं योपितो सङ्गिसङ्गम् । महान्तस्ते समचित्ताः प्रशान्ता विमन्यवः सुहृदः साधयोऽपि ॥१२॥* जिसके हाथमें धमारूपी तलवार है, उसका दुर्जन क्या कर सकते है। तृमरहित स्थानमें गिरी हुई अग्नि खयं ही शान्त हो जाती है ॥ १० ॥ मार्गमें सजनोंका संग प्राप्त है, प्रत्येक सत्संगमें कृष्णका कीर्तन सुना जाता है, प्रत्येक कीर्तनमें हमारी तदाकार वृत्ति होती है और प्रत्येक वृत्तिमें सच्चिदानन्दका अनुभव होता है ।॥ ११॥ महान् पुरुषोंकी सेवाको मुक्तिका द्वार कहा है और स्त्रीलम्पटोंका संग ही नरकका द्वार है। तथा महान् पुरुष ये ही हैं जो समानचित्त, शान्तारमा, क्रोधीन, हितकारी और साधु हो ॥ १२॥ * श्रीमद्भागको ५/५/२॥

8 विविधसूक्ति क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ताः पुरा तेऽखिला: क्षीरे तापमवेक्ष्य तेन पयसा खात्मा कृशानी हुतः। गन्तुं पावकमुन्मनस्तदभवदृष्ट्वा तु मित्रापदं युक्तंतेन जलेन शाम्यति सतां मैत्री पुनस्त्वीदृशी॥१३॥ योगी कृतार्थी पितरौ तेन धन्यो देशः कुलं च तत् । जायते योगवान् यत्र दत्तमक्षयता ब्रजेत् ॥१४॥ भेदाभेदी सपदि गलितौ पुण्यपापे विशीणे मायामोही क्षयमुपगती नष्टसन्देहवृत्तेः। दूधने अपने पास आये हुए जलको पहले अपने सभी गुण दे डाले, जलने भी दूधको जलते देखकर अग्निमें अपने को भस्म कर दिया, मित्रपर ऐसी आपत्ति देखकर आगमें गिरने के लिये दूध उछलने लगा, फिर जब उसमें जल आ मिला तब शान्त हो गया, सजनोंकी मित्रता ऐसी ही होती है ।॥ १३ ॥ जहाँ कोई योगी उत्पन्न हो जाता है उसके माता-पिता कृतार्थ हो जाते हैं, वह देश और कुल धन्य हो जाता है और उस (योगी) को दिया हुआ अक्षय हो जाता है ।।१|शब्दातीत त्रिगुणरहित तत्वबोधको प्राप्तकर जिसकी सन्देहति नष्ट हो गयी है उसके भेद और अभेद तत्काल गलित हो जाते हैं, पुण्य और पापोंका नाश हो जाता है, तथा माया और भर्तृहरे। भी वझवैवर्तपुराणे।

२२६ सूक्तिसुधाकर शब्दातीतं त्रिगुणरहितं प्राप्य तत्त्वावयोधं निखैगुण्ये पथि विचरतः को विधिःको निषेधः ।। कसात्कोऽहं किमपि च भवान् कोऽयमन प्रपन: स्वं स्वं वेद्यं गगनसदृशं पूर्णतत्त्वप्रकाशम् । आनन्दाख्यं समरसवने बाह्यमन्त्रविहीने निस्वैगुण्ये पथि विचरताको विधिःको निषेधः ॥१ धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिविरं गहिनी सत्यं नुरयं दयाच भगिनीमाता मनःसंयमः । शय्या भूमितलंदिशोऽपि वसनं ज्ञानामृतं भोजन- मेते यस्य कुटुम्बिनो पद सखे फसायं योगिनः॥१ मोद क्षीण हो जाते है, त्रिगुणातीत मार्गमें विचरनेयाले उस योग लिये क्या विधि और क्या निषेध है। ॥१५॥ मैं कहाँसे आया कौन ! और तुम कौन हो ? तथा यह प्रपच क्या !प्रा सरको अरने आकासमा पूर्ण समय आनन्दस्वरूपको पर प जानना चाहिये। इस बार मन्त्रणाभासे शून्य रामरस बना त्रिगुणातीत मागेर विचानेवाले मारपके लिये क्या विधि और का निरोध ११ ॥ १६ ॥ भनिसका पिता है, क्षमा माartit शान्ति खीर, सत्य पुर, दया भगिनी या मनगंयम भाता है भूमिवर ही जिसकी भुकोमल सेम, दिशाएंधारी हानामृत ही मिमा भोजन है, जिसके पीई !ि उन योगीको किससे मर से सहता ॥ १७ ॥ tore.

यसूक्ति गीतागौरवम् यदि जयति मुकुन्दस्मेरवक्त्रा स्वदमलमरन्दानन्दनिष अविरतमिह गीता ज्ञानपीयूषा कृतमय भवतापरत्र मजन्तु दिशति मतिमपापां मोहविध्वंसद हरति निखिलतापाच्छान्तिमादि नयति परममोक्षं परममोक्षं सचिदानन्दमा किमिव न फलमेपा कल्पवल्लीय यदि दधति न गीतामात्मसंजीवनाय विषयविपधरालीदष्टनष्टात्मबोधाः यदिभगवान कृष्णके मन्द मुसुकानयुक्त वदनारविन्दसे निकले रूप आनन्दद्रवसे प्रकट हुई शानामृततरङ्गिणी गीता इस जग प्रवाहित हो रही है तो संसारके ताप क्या कर सकते है ! संतजन हुबकी लगाया करें॥१८॥ यह गोता मोहका नाश करने में सम- बुद्धि देतो है, आधिदैविक आदि सभी तापोको हर लेती है, शान्तिभावका आधान करती है और सच्चिदानन्दरूप परम में पहुँचा देती है, मला, यह कल्पलताके समान कौन-सा फल नहीं ॥ १९॥ विषयरूपी विषधरोंसे डैसे जाने के कारण जिनकी सुध-बुध हो चुकी है, घे मनुष्य यदि आत्मसंजीवनके लिये गीतारूप औष मेवन नहीं करते तो अमृतके पड़े लेकर सामने आयी हुई अमा पाण्डेपरामनारायणराषिणः । - शानामृत ही जिसका भोजन है, जिसके ये सप पदम्बी, कही २२६ सूक्तिसुधाकर शब्दातीतं त्रिगुणरहितं प्राप्य तचावयोधं निस्वैगुण्ये पथि विचरतः को विधिःको निषेधः ॥१५॥ कसारकोऽहं किमपि च भवान् कोऽयमत्र प्रपञ्चः स्वं स्वं वेद्यं गगनसदृशं पूर्णतत्त्वप्रकाशम् । आनन्दाख्यं समरसवने बाह्यमन्त्रविहीने निस्वैगुण्ये पथि विचरतः को विधिःको निपेयः ॥१६॥ धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्विरं गहिनी सत्यं सूनुरयं दया च भगिनीभ्राता मनःसंयमः। शय्याभूमितलंदिशोऽपि वसनंज्ञानामृतं भोजन- मेते यस्य कुटुम्बिनो वद सखे कसाभयं योगिनः॥१७॥ माह क्षीण हो जात है, त्रिगुणातीत मार्गमें विचरनेवाले उस योगी लिये क्या विधि और क्या निषेध है ? || १५ || मैं कहाँसे आया हूँ। कौन हूँ। और तुम कौन हो ? तथा यह प्रपञ्च क्या है ? इस प्रकार सबको अपने आकाशसदृश, पूर्ण तयमय आनन्दवरूपको प्रय पृथक् जानना चाहिये । इस बार मन्त्रणाओंसे शून्य समरस धनमें त्रिगुणातीत मार्गपर विचरनेवाले महापुरुषके लिये क्या विधि और मा निषेप है। ॥ १६ ॥ धैर्य जिसका पिता है, क्षमा माता है, निरय शान्ति स्त्री है, सत्य पुत्र , दया भगिनी है तथा मनःसंयम भाता भूमितल ही जिसकी मुकोमल से दिशाएं ही यय हैं और - मित्र ! उम योगीको किससे भर हो सकता है । ॥ १७ ॥ काया विविधसूक्ति २२७ ** गीतागौरवम् यदि जपति मुकुन्दस्मेरवक्त्रारविन्द- स्रवदमलमरन्दानन्दनिष्यन्दजन्मा । अविरतमिह गीता ज्ञानपीयूपसिन्धुः कृतमय भवतापरत्र मजन्तु सन्तः ॥१८॥ दिशति मतिमपापां मोहविध्वंसदक्षा हरति निखिलतापाच्छान्तिमाविष्करोति । नयति परममोक्षं सचिदानन्दभावं किमिव न फलमेपा कल्पवल्लीव सूते ॥१९॥ यदि दधति न गीतामात्मसंजीवनाय विषयविषधरालीदधनष्टात्मबोधाः यदि भगवान कृष्णके मन्द मुसुकानयुक्त वदनारविन्दसे निकले हुए, मकरन्द- रूप आनन्दद्रवसे प्रकट हुई शानामृततरङ्गिणो गीता इस जगत्में निरन्तर प्रवाहित हो रही है तो संसारके ताप क्या कर सकते हैं। संतजन अब इसी में डुबकी लगाया करें ॥१८॥ यह गोता मोहका नाश करने में समर्थ पावन बुद्धि देती है, आधिदैविक आदि सभी तापोंको हर लेती है, [हृदयमें ] शान्तिभावका आधान करती है और सच्चिदानन्दरूप परम मोश्चतक पहुँचा देती है, भला, यह कल्पलताके समान कौन-सा फल नहीं देती ? ॥ १९॥ विषयरूपी विषधरोंसे से जाने के कारण जिनकी सुध-बुध नष्ट हो चुकी है, वे मनुष्य यदि आत्मसंजीवन के लिये गोत्तारूप औषधका सेवन नहीं करते तो अमृतके घड़े लेकर सामने आयी हुई अन्नपूर्णा- • पाण्डेयरामनारावगद सशखिणः। - २२८ शक्तिसुधाकर न अमृतकलशपूर्णामभामुपेक्ष्या- शनविरहकशानां हा हतं मागधेयम् ॥२०॥ इह जगति दयेयं देवदेवस्य गीता निजमरणमुपेतुं प्राणिनः प्राजुहोति । चिरयत संदेवानाधविद्यालेन ननु पिहिवशाज्या बन्धनोन्मोचनाय ॥२||* भ्रान्ता मवे कति कति प्रतिलम्म योनी: श्रान्ता जनाः किल मुमुक्षत चेच्छृणुध्वम् । गीतामिमां भगवती मजतापरास्ति संसारसिन्धुमसमं न तरी तरीतुम् ॥२२॥ देवीकी उपेक्षा करके अरके बिना सूखनेवालों की तरह उन बेचारोंका माग्य ही मारा गया है ।। २० । इस जगत्में भगवानकी दयारूपिणी यह गीता [ सर्वधर्मान् परित्यज्य आदि वचनोंके द्वारा ] अपनी शरण आनेके लिये प्राणियोंको पुकार रही है । सदा ही अनादि अविद्याके आवरणसे ढकी हुई आँखोंवाले ऐ अन्य (अज्ञानी) पुरुषो! इस समय अपना बन्धन-मोचन करने के निमित्त देर न लगाओ।॥ २१ ॥ ऐ लोगो! यदि संसारमें कई-कई योनियों को पाकर मटकते हुए थक गये हो और अब मुक्त होना चाहते हो तो सुनो, हम भगवती गीताको ही मजो, विषम संसार-सागरको पार करने के लिये गीता के सिवा दूसरी नौका नहीं है ॥२२॥ * पाण्डेयरामनारायणदत्तशारिणः ।

क्रियासिद्धिः सचे भवति महतां नोपकरणे ||२५|| पन्नादपि कटोरागि मृदूनि कुसुमादपि। लोकोत्तराणां चाति को विविज्ञातुमर्हति ॥२६॥ फचिदमी शय्या फचिदपि च पर्यशयनं कचिच्छाकाहारी फचिदपिच शाल्योदनरुचिः। कचित्कन्याधारी कचिदपि च दिव्याम्बरधरी मनस्वी कार्यार्थी गणयतिन दुःखं न च सुखम् ॥२॥ नेन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् । सम्पुटमें रख लिया तो यह सत्य है कि महात्माओंकी कार्यसिद्धि किमें रहती है, साधनों में नहीं ।। २५ ॥ लोकोत्तर महापुरुषोंके कौन जान सकता है, वह वनसे कठोर और कुसुमसे भी कोमल ॥ २६ ॥ मनस्वीजन अपने कार्यकी सिद्धि के लिये सुख-दुःखका हीं करते । वे कभी तो भूमिपर और कमी सेजपर सोते हैं, काहार और कभी उत्तम भोजन करते हैं, कभी गुददी और [ल्य वस्त्रोंको धारण करते हैं ।। २७५ नीविज्ञजन निन्दा करें दुति, लक्ष्मी रहे अथवा जहाँ चाहे चली जाय तथा मृत्यु आज वलोचनस्य । ॥ भवभूतेः। मरेनीतिशतकाद। ---- --- 14.111.4.11.4 . -- . छा सजनसङ्गमे परगुणे प्रीतिगुरौ नम्रता नयां व्यसनं स्वयोपिति रतिलोकापवादाशयम् । थनिणि शक्तिरात्मदमने संसर्गमुक्तिःखले यत्र बसन्ति निर्मलगुणास्तेभ्यो नरेभ्यो नमः ॥२९॥ पृष्टं पुनरपि पुनश्चन्दनं चारुगन्ध नं छिन्नं पुनरपि पुनः स्वादु चैवेक्षुकाण्डम् । पं दग्धंपुनरपि पुनः काञ्चनं कान्तवर्ण पान्तेऽपि प्रकृतिवितिर्जायते नोत्तमानाम् ॥३०॥ र अथवा युगान्तरमें, धीर पुरुष न्यायपयसे एक पग भी पीछे ॥ २८ ॥ सत्सगकी अभिलाषा परगुणभवणमें प्रेम, गुरुजनोंके वा, विद्याका व्यसन, केवल अपनी ही सीमें प्रेम, लोक- य, भगवान् विष्णु भनि, मनःसयमको शक्ति और कुसंगका निर्मल गुण जिनमें हो उन नरयोंके लिये नमस्कार है॥२९॥ जितना विशो और अधिक मुगन्ध देता है, गन्नेको जितना जाओ और अधिक मोटा होता है तथा मुवर्णको जितना- या आय उतना से अधिक चमकता ३ उत्तम पुरुषा कस्यों नहोजाय उनके स्वभावमें कोई अन्तर नहीं पड़ता॥१०॥ অলৈানিয়া। ५ २३२ सूकिसुधाकर सज्जनदुर्जनविवेका विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय । खलस्य साधोविपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥३१॥ एके सत्पुरुषाः परार्थघटका स्वार्थान् परित्यज्य ये सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये। तेऽमी मानवराक्षसाः परहित स्वार्थाय नियन्ति ये ये तु भन्ति निरर्थक परहितं ते के न जानीमहे ॥३२॥ अनार्यता निष्ठुरता करता निष्क्रियात्मता। पुरुष व्यअयन्तीह लोके कलपयोनिजम् ॥३३॥ तुटकी विद्या विवादक लिये, धन मदके लिये और शक्ति दूसरों को कर देने के लिये होते हैं और सजनके इससे विपरीत ही विद्या शान, पन दान और शक्ति रक्षा करने के लिये होते हैं ॥ ३१॥ एक तो सत्पुरुष ऐसे होते हैं कि सार्थको स्यागकर भी दूसरों के कार्य साधते है, दूसरे साधारण जन ऐसे होते हैं जो स्वार्थको न बिगाइते नारा करते हैं ये मनुष्यरूपी राक्षस है, पर जो बिना स्वार्थ के भी दूसरी हितका नारा करते हैं, वे कौन या समर्शमैं नहीं आता ॥ १२॥ असनया, निधरना, करवा और विदित कर्म न करना-ये बाते मोमें वकीनं जारि मनुष्यको कर कर देती ॥३३॥ हुए दूसरों के कार्य में तत्पर रहते है और जो सापके लिये परहितका भुजङ्ग शिखर शाखा विहङ्गः कुसुमानि भृङ्गः। व्यते दुष्टजनैः समस्तै- नं चन्दनं मुञ्चति शीतलत्वम् ॥३४॥ काञ्चनपिञ्जरे नृपवरैनित्यं तनोर्मार्जन खादुरसालदाडिमफलं पेयं सुधाभ पयः । i संसदि रामनाम सततं धीरस्य कीरस्य भी हन्त तथापि जन्मविटपिकोडं मनोधावति॥३५॥ धजलसञ्चारी विकारी नैप रोहितः। पजलमात्रण शफरी फर्फरायते ॥३६॥ लमें सर्प रहते है, शिखरपर बन्दर रहते हैं, शाखाओपर पक्षी : भ्रमर रहते हैं, इस प्रकार वह समस्त दुष्ट प्राणियोसे सेचित्त तु फिर भी अपनी शीतलताको नहीं छोड़ता ॥ ३४॥ सोनेके ना, राजाके हापोंसे शरीरका नहलाया जाना, स्वादिष्ट आम, । भोजन करना, अमृत-सा जल पीना और सभाओंमें -नामको रहना, इतना होते हुए भी अहो ! धीर शुकका उदास होकर, अपने जन्मस्थान वृक्षके कोटरकी ओर ही ॥ ३५ ॥ अगाध जलमे रहनेवाला रोहित नामक महामत्स्य (को प्राप्त नहीं होता किन्तु चुल्लूभर पानी में रहनेवाली मछली कदकती रहती है [ इसी प्रकार महापुरुष महान् विभूति उद्धत नहीं होते किन्तु छोटे आदमी थोड़े से धनसे ही मर्यादासे

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७ सूकिसुधाकर
विवेका
सोपानभूतं मोक्षस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् ।
यस्तारयति नात्मानं तसात्पापतरोध का ॥३७॥
विलक्षणं यथा घान्तं लीयते भानुतेजसि ।
तथैव सफलं दृश्यं ब्रह्माणि प्रविलीयते ॥३८॥
यच्च कामसुखं लोके यच दिव्यं महत्सुखम् ।
वृष्णाक्षयसुखस्यते नाईतः
पोडशी
कलाम् ॥३९||*
नीतिज्ञा निर्यातज्ञा वेदज्ञा अपि भवन्ति शास्त्रज्ञाः।
ब्रह्मज्ञा अपि लभ्याः स्वाज्ञानज्ञानिनो विरलाः ॥४०॥
बाहर हो जाते हैं ] ॥३६॥ जो पुरुष मुक्तिके सोपान (सीढ़ी) रूप
अति दुर्लभ मनुष्य-शरीर पाकर भी अपनेको नहीं तारता उससे बड़ा
पापी संसारमें कौन है ।। ३७ ॥ सूर्यका प्रकाश होनेपर जिस प्रकार
अन्धकार विपरीतधर्मी होता हुआ भी उसमें लीन हो जाता है, उसी
प्रकार सम्पूर्ण दृश्य भी ब्रह्ममें लीन हो जाता है ॥ ३८॥ संसारका
विषयानन्द और परलोकका महान् दिव्यानन्द, ये तृष्णाक्षयके आनन्दके
सोलहवें भाग भी नहीं हो सकते ॥ ३९ ॥ संसारमें नीति, भविष्य,
वेद, शास्त्र और ब्रह्म सबके जाननेवाले मिल सकते हैं परन्तु
अपने
अशानके जाननेवाले मनुष्य विरले ही हैं ॥४॥

पा ममकारकत सपथ करा. 100 रानं यदि निन्दति स्वात्मानं स्वयमेव हि । यदि निन्दति सहायास्ते जना मम ॥४२॥ -न्दया यदि जनः परितोपमेति नन्वप्रयलसुलभोऽयमनुग्रहो मे। ऽर्थिनो हि पुरुषाः परतुष्टिदेतो- दुःखार्जितान्यपि धनानि परित्यजन्तिlief सुलभदैन्ये निःसुखे जीवलोके यदि मम परिवादात् प्रीतिमाप्नोति कश्चित् । । बिल्कुल छोड़ दे और यदि न छोड़ सके,(ममत्व करना ही हो) २।।४१॥ यदि कोई पुरुष मेरे आत्माको निन्दा करते हैं तो स्वयं माकी ही निन्दा करते हैं, और यदि इस निन्दनीय शरीरको के हैं तब तो मेरे सहायक ही है ।। ४२ ॥ मेरी निन्दासे यदि न्तोष होता है, तो बिना प्रयनके हो मेरी उनपर कृपा हुई। के इच्छुक पुरुष तो दूसरों के सन्तोषके लिये अपने कष्टोपार्जित परित्याग करते हैं ।। ४३ ।। इस दुःखमय जीवलोकने, जिसमें रता ही सुलभ है, यदि किसीको मेरी निन्दासे सन्तोष । बह चाहे मेरे सामने चाहे पीछे मेरी यथेष्ट निन्दा करे; पग्यदीक्षितस्य । शान्तिशतकात् ।

8 सूक्तिमुधाकर
परिवदतु यथेष्टं मत्समदं तिरो वा
जगति हि बहुदुःखे दुर्लभ प्रीतियोगः॥४४॥
धिक्कुलं धिक्कुटुम्यं च धिग्गृहं धिर सुतं च धिक् ।
आत्मानं धिक् शरीरं च श्रीगोपालपराङ्मुखम् ॥४५॥
कुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्गमीना हताः पञ्चमिरेव पञ्च ।
एका प्रमादी स कथं न हन्यते यःसेवते पञ्चभिरेव पञ्च॥४६॥
द्रव्याणि भूमौ पशवश्व गोष्ठे नारी गृहद्वारि जनादमशाने ।
देहवितायां परलोकमार्गे धर्मानुगो गच्छति जीव एकः ॥४७॥
नवच्छिद्रसमाकीर्णे शरीरे पवनस्थितिः।
प्रयाणस्य किमाश्चर्य चित्रं तत्र स्थितेमहत् ।।४८||
क्योंकि इस दुःखमय ससारम प्रसन्नताकी प्राप्ति बड़ी दुर्लभ है ||४||
जो गोपालसे विमुख है उस कुलको, कुटुम्बको, घरको, पुत्रको, आत्मा-
को और शरीरको धिकार है ! धिक्कार है !!॥४५।। मृग, हाथी, पतंग, मत्स्य
और हरिय थे पाँच जीव पाँचों (विषयों)मेंसे एक-एकसे मारे जाते हैं,
फिर जो प्रमादी अकेले ही अपनी पाँचों इन्द्रियोंसे पाँचौ विषयोंका
सेवन करता है यह क्यों न मारा जायगा ? || ४६ ॥ मनुष्यकी
मृत्युके पश्चात् उसका धन पृथ्वीमें गड़ा रद जाता है, पशु
गोष्ठमें बंधे रह जाते हैं, स्त्रो घरके द्वारपर छूट जाती है और परिजन
श्मशानतक तथा शरीर चितातक साय देता है, परलोकके मार्गमें
केवल धर्मको साथ लेकर जीव अकेला ही जाता है ।॥४७॥ नव
छिद्रोंसे युक्त इस शरीरमें वायु रहता है, उसके निकल जानेमें क्या
निन्त्रिता तो उसके ठहरनेमें ही है ॥४८॥

विचिंधसूक्ति २३७ बहु वेदशास्त्रं चेतोहरा युवतयः सुहृदोऽनुकूलाः सद्वान्धवा प्रणयगर्भगिरश्च भृत्या। गर्जन्ति दन्तिनिवहास्तरलास्तुरङ्गाः सम्मीलने नयनयोन हि किश्चिदस्ति ४९* अनन्तपारं स्वल्पं तथायुहवश्व विघ्नाः। सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ॥५०॥ पुत्रा इति दारा इति पोल्यान्मूलं जनान्ते । अन्धे तमसि निमजनात्मा पोप्य इति नाति ॥५१॥ अति मनोमोहिनी स्त्रियाँ हैं, मित्र भी अनुकूल हैं, बन्धुजन मी बड़े सुयोग्य है, सेवक भी प्रेमपूर्ण रोटी बोलनेवाले हैं, कितने ही पी चिद रहे हैं और वेज पोहे हिनहिना रहे हैं किन्तु ऑस मदते ही कोई अपना नहीं रहता ॥४९॥ वेद-पास बहुत और अपार , आयु बहुत थोड़ी है और विम अनेक है। अतः इंस जिस प्रकार जलमसे दूषको निकाल लेवारे उसी प्रकार बर्थ विसारो त्यागकर ठारका महण करना चाहिये ॥५०॥ मूसंजन पुत्र, ती शदियो रक्षणीय करते रहते हैं पर अन्धकारमे हनी अपनी आरमाके उतारका विचार भी नहीं करते ॥५१॥ --- •रिकमारित्वरण मारमा गतिमुधाकर पाटकाः पठितारम चान्ये शासचिन्तका: सर्प म्पनिनो मूर्खा या क्रियावान् स पण्डितः ।।५२।। गुरा मत्स्याः पशोमांस द्विजातीनां बलिस्तथा। धूतः प्रवर्तितं यत्रे नेतद्वेदशु कथ्यते ॥५३॥ कापायग्रहणं कपालभरणं कंशावलीञ्चनं पारखण्डनतमन्सचीवरजटाधारित्वमुन्मतवा नमत्वं निगमागमादिकवितागोष्ठी सभामण्डले सर्व चोदरपूरणार्थनटनं न श्रेयसां कारणम् ॥५॥ गुरुन स स्यात् स्वजनो न स स्वाद पिता न स स्पाजननी न सा स्यात् पदन-पढ़ानेवाले और दूसरे जो शास्त्रचिन्तनमें लीन हैं वे सभी व्यसनी और नासमझ है, पर जो क्रियावान (आचरण करनेवाला) है, वही वास्तविक पण्डित है ॥ ५२ ॥ मय, मत्स्य पशुका मांस तथा द्विजातियोंद्वारा बलि-इन चीजोको धूताने ही यथने प्रवृत्त किया है, इसका वेदमें विधान नहीं है ।। ५३ ।। गेरुए वस्त्र पहिनना, कपाल धारण करना, केयोंका नोचना, पाखण्डवता मला कौपीन, जया आदि धारण करना, उन्मच हो जाना, नंगे रहना और सभाओंमें वेद, शास्त्र, कविता आदिकी गोष्ठी करना, ये सब केवल उदरपूर्तिके लिये नृत्य हैं, वास्तविक कल्याणके कारण नहीं हैं ।। ५४॥ जो समीप आयी हुई मृत्युसे नहीं छुड़ावा [अर्थात् चोपदानके द्वारा अमरपद * महाभारते शान्तिपर्वणि २६५।।

• विविधसूक्ति *-*- देवो न स सान्न पतिश्च स स्या- मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम् ॥५५|| धर्म यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुधर्मकः । अविरोधी तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम ॥५६॥ सङ्कीर्णानि लोभश्वेदगुणेन कि पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः सत्यं चेत्तपसा च किं शुचिमनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् । सौजन्यं यदि किं गुणैस्तुमहिमायद्यस्ति किं मण्डनैः सद्विद्या यदि किं धनैरपयशोयबस्ति किं मृत्युना १५७* आपद्गतं हससि कि द्रविणान्धमूद लक्ष्मीः स्थिरान भवतीति किमत्र चित्रम् । की शशि नहीं कराता ] वहन गुरु है, न स्वजन है, न पिता है, न माता है। न देव है और न पति है।॥ ५५ ॥ हे सत्यविक्रम ! यो धर्म दूसरे धर्मका बाधक हो वह धर्म नहीं कुधर्म है। धर्म तो वही है जो किसी दूसरे धर्मका विरोधी न हो ॥ ५६ । लोम है तो अन्य दोपोंकी क्या आवश्यकता है। पिशुनता है तो दूसरे पागेसे क्या लेना है । सत्य है वो उपस्याको क्या जरूरत! मन पवित्र तो तीयोंकी क्या आवश्यकता । सुशीलता है तो अन्य गुणों से क्या लाभ ! मुन्दर यश है वो गहनोंसे क्या ? मुविचारतोपनले ११और अपयश हे वो मायुसे क्या करना है।॥७॥ धनान्म भूद ! किसी आपचिपसको देखकर क्यों हंसता है। इसमें आपसा है, लक्ष्मी को स्थिर थोड़े से रती है। अरे। इस • भोरेनौविस्तार

२५०
सक्तिमुपार
पश्यति घटाअलयन्त्रक
रिक्ता भवन्ति भरिता भरिताभरिकाः ॥५८||
मन्ये लक्ष्मि त्वया साध समुद्रावधूलिरुत्थिता ।
पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति श्रीमन्तो धूलिलोचनाः ॥५९।।
हेयं दुरखमनागतं ध्येयं ब्रह्म सनातनम् ।
आदेयं कायिकं मुखं विधेयं जनसंचनम् ॥६॥
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्तामनोहारिणी
सन्मित्रं सुधनं स्वयोपिति रतिः सेवारता सेवकाः ।
आतिश्यं सुरपूजनं प्रति मिष्टानपानं गृहे
साधो सङ्ग उपासनाच सततं धन्योगृहस्थाश्रमः ॥६१॥
षटीयन्त्र ( रहट) के घटोको नहीं देखता है जो खाली हैं वे भरते
जाते हैं, जो भरे है वे खाली होते जाते हैं ॥ ५८ ॥ हे लश्मि !
मुझे ऐसा मालूम होता है कि समुद्र से निकलने समय तुम्हारे साथ धूलि भी
आ गयी थी, जिसके आँखों में पड़ जानेसे धनवान् पुरष देखते हुए भी
नहीं देखते ॥ ५९ ॥ दुःखके आनेसे पूर्व ही उसे रोकने का उपाय करे,
निरन्तर सनातन ग्रहाका चिन्तन करे , शारीरिक सुखको स्वीकार करे
और जनताकी सेवा करे॥६०॥ वह गृहस्थाश्रम धन्य
जिसमें
आनन्दमय घर, विद्वान् पुत्र, सुन्दरी स्त्री, सधे मित्र, सात्विक धन,
खपनी में प्रीति, सेवापरायण सेवक, अतिथि सत्कार, नित्य देवपूजा,
मधुर भोजन, सत्संगति और उपासना-ये सर्वदामास होते रहते हैं ॥३१॥

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& विविधसूक्ति
२४१
तद्वक्ता सदसि नीतु वचनं यच्छृश्यतां चेतसः
प्रोल्लासं रसपूरणं श्रवणयोरक्ष्णोविकासश्रियम् ।
क्षुनिद्राश्रमदुःखकालगतिहत्कार्यान्तरापस्मृति
प्रोत्कण्ठामनिशं श्रुतौ वितनुते शोकं विरागादपि ॥६२||
सभामें बत्ता इस प्रकार वचन बोले जिससे श्रोताओंके चित्रों
आनन्द बढ़े, कानोंमें रस भर जाय, आँखें खिलकर सुशोभित
हो जाय, भूख, नीद, थकावट, दुःख, समय, चेष्टा तथा अन्य कार्यों की
याद न रहे, सुननेकी रातदिन उत्कण्ठा बनी रहे और न सुनने
दुःख मालूम हो ।। ६२ ।।

एकादश उल्लास
सदुक्तिसंग्रहः
१ अङ्गीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति ।
२ अतथ्यस्वथ्यो वा हरति महिमानं जनरवः ।
३ अतिपरिचयादवज्ञा सन्ततगमनादनादरो भवति ।
४ अति सर्वत्र वर्जयेत् ।
५ अधिकस्याधिक फलम् ।
६ अनन्तपुण्यस्य मधोहि चूते द्विरेफमाला सविशेपसगा।
(कुमारसम्भवे)
७ अन्तःसारविहीनानामुपदेशो न विद्यते ।
८ अपि धन्वन्तरिद्यः किं करोति गतायुपि ।
९ अल्पाविद्यो महागी।
१० आपत्सु धीरान् पुरुषान् स्वयमायान्ति सम्पदः।
(कथासरित्सागरे,

१ सदुक्तिसंग्रह
२४३
११ आपदि स्फुरति प्रज्ञा यस धीरः स एव हि ।
(कथासरित्सागरे)
१२ उदित परमानन्दे नाहं न त्वं न वै जगद ।
१३ उत्सवप्रियाः खलु मनुष्याः ।
१४ उत्साहवन्तोहि नरानलोके सीदन्ति कर्मखतिदुष्करेषु।
१५ एको हि दोपो गुणसनिपाते
निमजतीन्दोः किरणविवाङ्कः ।
(कुमारसम्भवे)
१६ कण्ठे सुधा वसति वै खलु सजनानाम् ।
१७ कलौ वेदान्तिनो भान्ति फाल्गुने बालका इव ।
१८ कलौ भक्तिः कलौ भक्तिभक्त्या कृष्णः पुरस्थितः ।
१९ कालस्य कुटिला गतिः ।
२० किञ्चित्कालोपमोग्यानि यौवनानि धनानि च।
२१ किमज्ञेयं हि धोमताम् । (कथासरित्सागरे )
२२ कुतः सत्यं च कामिनाम् ।
२३ कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ।
२४ कुपुत्रमासाद्य कुतो जलाञ्जलिः।
२५ कशे कस्सास्ति सौहृदम् ।
२६ गतं न शोचामि कृतं न मन्ये ।
२७ गुणा: पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः।
२८ चौरे गते वा किमु सावधान्यम् ।
२९ छिद्रेप्वना बहुलीभवन्ति ।
३० जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ।
(युवंशे)

.
सूक्तिसुधाकर
३१ जलविन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।
३२ जितक्रोधेन सर्व हि जगदेतद्वितीयते ।
(कथासरित्सागरे)
३३ ज्ञानस्याभरणं क्षमा।
३४ तत्कर्म इरितोपं यत्सा विद्या तन्मतिर्यगा । ( भागवते)
३५ त्रासं विना नैव गुणाः श्रयन्ति ।
३६ दारिद्रयदोपो गुणराशिनाशी।
३७ दुग्धेन दग्धवदनस्तकं फूत्कृत्य पामरः पिपति ।
३८ दुर्लभः स गुरुलोंके शिष्यचिन्तापहारकः ।
३९ देवो दुलपाठक।
४० दैवी विचित्रा गतिः।
४१ दोषोऽपि गुणवां याति प्रमोर्भवति चेकपा।
४२ दोपक्षयोऽग्निद्विच व्यायामादुपजायते ।
४३ धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः । ( मनुस्मृती)
४४ न धर्मदेणु क्यः समीक्ष्यते । (कुमारसम्भवे)
४५ न भवति मद्दतां हि फापि मोघः प्रसादः।
(हरिविता)
४६ न हि सिंहो गजास्कन्दो भयाद्विरिगुहाशयः।
(एवं)
४७ न हि मुतस्य सिंहस्य प्रविशन्ति सखे मृगाः।
४८ नमूला प्रतिदिन
४९न यथार्वमुपैति यद्दतम् ।
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8 सदुक्तिसंग्रह
*-*-*-*-*-*-*-
५० निपातनीया हि सतामसाधवः ।
५१ निरस्तपादपे देशे एरण्डोपि दुमायते ।
५२ निम्सारस्य पदार्थस्य प्रायेणाडम्बरो महान् ।
५३ नीचैगच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ।
(कालिदासस)
५४ नैकत्र सर्यो गुणसन्निपातः ।
५५ पञ्चभिर्मलितः किं यजगतीह न साध्यते ।
(नैपधीयचरिते)
५६ पदं हि सर्वत्र गुणनिधीयते ।
(रघुवंशे)
५७ परोपकारार्थमिदं शरीरम् ।
५८ परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ।
५९ परोपदेशवेलायां शिष्टाः सर्वे भवन्ति ।
६० पश्यन्तु लोकाः कलिफौतुकानि ।
६१ पापप्रभावानरक प्रयाति ।
६२ पिण्ड पिण्डे मतिभिमा।
६३ पुष्पं पर्युपितं त्यजन्ति मथुपाः।
६४ पूज्यं चाक्यं समृद्धस्य।
६५ पूर्वपुण्यतया विधा।
६६ प्रत्यासनविपचिमूढमनसा प्रायो मतिः धीयते ।
६७ प्रवप्रसादो हि सदन कस्य । (कुमारसम्भवे)
६८ प्रायेण साधुश्चानामस्वापिन्यो विपचयः।
६९ प्रायः समनसङ्गती घ लमते देशानुरूपं फलम् ।
७० प्रायः ममासमविपचिकाले लिपोप पुंमा मलिनी
भवन्ति।

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.
र
• सतिसुधाकर
७१ प्रारम्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति । (मनहरेः
७२ प्रायो गच्छति यत्र भाग्यरहितस्तवापदां भाजनम् ।
७३ प्रियेषु सौभाग्यफला हि चारुता।
(कुमारसम्मवे
७४ प्रिया को नाम योपिताम् ।
(मागवते
७५ फलं भाग्यानुसारतः।
७६ चली बलं वेति न वेत्ति निर्वलः।
७७ बलीयसी केवलमीश्वरेच्छा।
७८ बहुरत्ना वसुन्धरा।
७९ वहाचर्या हि मेदिनी। (कथासरित्सागर
८० बुभुक्षितः किन्न करोति पापं क्षीणा जना' निष्करुप
भवन्ति ।
८१ वुद्धिः कर्मानुसारिणी।
८२ Qवते हि फलेन साधवो न तु कण्ठेन निजोपयोगिताम
(कथासरित्सागर
८३ भईमार्गानुसरणं स्त्रीणां च परमं व्रतम् ।
(कथासरित्सागरें
८४ भवति महत्सु न निष्फल प्रयासः। (शिशुपालवधे
८५ भवितव्यता बलवती। (अभिज्ञानशाकुन्तले
८६ भक्तया हि तुष्यन्ति महानुभावाः।
८७ भक्तयोपपत्रेपु हि तद्विधानां प्रसादचिहानि पुर फला
(घुवंश

(कुमारसम्भव
१ यिधिरहोपलवानिति मे मतिः।
२ विविचित्राणि विचेष्टितानि ।
३ विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ।
अविवेकपाराशतधौतमन्तः सतांन कामः कलपीकरोति।
(नषधीयचरिते)
५ शत्रोरपि गुणा याच्याः।
६ शरीरमायं खलु धर्मसाधनम् । (कुमारसम्भवे)
७ शुभस्य शीघ्रम् ।
श्रीकृष्णस्य पालयो यदि भवेत् का कं निहन्तुं क्षमा)
१ सतां हि चेतःशुचितात्मसाक्षिका । (मैषधीयचरिते)
सतां हि सन्देहपदेपुवस्तुपु प्रमाणमन्त करणप्रवृत्तयः।
(अभिज्ञानशाकुन्तले)
१ समानशीलव्यसनेषु सख्यम् ।
२ समीरणो नोदयिताभवेति व्यादिश्यते केन हुताशनस्य ।
(कुमारसम्मवे)
३ सर्व सावधि नावधिः कुलभुवां प्रेम्णः परं केवलम् ।
४ सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ते ।
(मर्तृहरे)
५ सत्यं शिवं सुन्दरम् ।
६ सतां सद्भिःसङ्गः कथमपि हि पुण्येन भवति । (भवभूतेः)
७ सदोभूषा सूक्तिः।
सा विद्या या विमुक्तये।
१ साधुः सीदति दुर्जनः प्रभवति प्राप्त कलौ दुर्यगे।
.
।

8 सदुक्तिसंग्रह
२४९
*-*
१३० सानुकूले जगन्नाथे विप्रियः सुप्रियो भवेत् ।
१३१ सारं गृहन्ति पण्डिताः।
१३२ सुलभा रम्यता लोके दुर्लभं हि गुणार्जनम् ।
(किरातार्जुनीये)
१३३ संसर्गजा दोपगुणा भवन्ति ।
१३४ सङ्कटे हि परीक्ष्यन्ते प्राज्ञाः शूराश्च सङ्गरे ।
(कथासरित्सागरे)
१३५ संसारो नास्ति ज्ञानिनः ।
१३६ स्तोत्रं कस्य न तुष्टये ।
(कुमारसम्भवे)
१३७ खियचरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवोन जानाति कुतो मनुष्यः।
१३८ स्वदेशजातस्य नरस्य नूनं गुणाधिकस्यापि भवेदवज्ञा।
१३९ स्वयमेव हि वातोऽग्नेः सारथ्यं प्रतिपद्यते । (रघुवशे)
१४० स्वस्थे चित्ते बुद्धयः सम्भवन्ति ।
१४१ स्वसुखं नास्ति साध्वीनां तासां भईसुखं सुखम् ।
(कथासरित्सागर)
१४२ स्वस्था को वान पण्डितः।
१४३ हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः। (किरातार्जुनीये)
१४४ हृदे गमीरे हृदि चावगाढे शंसन्ति कार्यावतरं हि सन्तः
(नेषधीयचरित)

उपसंहार एवं श्रीश्रीरमण भवता यत्समुत्तेजितोऽहं चाश्चल्ये या सकलविषये सारनिर्धारणे वा। आत्मप्रज्ञाविमवसदृशस्तत्र यत्नर्ममतः साकं मक्तैरगतिसुगते तुष्टिमेहि त्वमेव ॥१॥ (विष्णुपुरीस्वामिनः) हेश्रीरमाकान्त !हे अशरणशरण मेवालचापल्य अथवा सर्व विषयों- सार सञ्चय करने में जो आपके द्वारा उचेजित किया गया हूँ उसमें ने दुदिवैभवके अनुसार किये हुए मेरे प्रयत्नों [ के फलस्वरूप इस सुधाकर ] से अपने भक्तजनोंके सहित आप ही सन्तुष्ट हों। एप स्यामहमल्पबुद्धिविभवोऽप्येकोऽपि कोपिध्रुवं मध्ये भक्तजनस्य यत्कृतिरियं न स्यादवज्ञास्पदम् । किंविद्याः शरघाः किमुज्ज्वलकुलाः किंपौरुषं के गुणा- स्ततिक सुन्दरमादरेण रसिक पीयते तन्मधु ॥२॥ (विष्णुपुरीस्वामिनः) हो सकता है कि मैं एक अल्पबुद्धि और तुच्छ व्यक्ति ही होऊँ, मी आशा है कि प्रेमी भक्तजनों में मेरी इस कृतिकी उपेक्षा न होगी, नोकि (तुच्छ) मधुमक्षिकामें कहाँकी विद्या है ? कौन-सा उत्तम ल है ? क्या पौरुष है ! और कौन-से गुण है ! तो भी उसके द्वारा गृहीत स्वाभाविक मधुर मधुका, क्या रसिकजन आदरपूर्वक आस्वादन ही करते !

श्रीहरिः सूक्रिसुधाकरे संगृहीतश्लोकानाम- कारादिक्रमेणानुक्रमः लोकाः पृष्ठाकाः शोका. पृष्ठाका [अ] अनभ्यासेन वेदानाम् १३८ अनभ्यासे विषं विद्या अखण्डमण्डलाकारम् अनन्तपारं बहु वेदशास्त्रम् २३७ अखण्डानन्दबोषाय २२० अनारोग्यमनायुष्यम् १४० अगाधजलसञ्चारी २३३ अनार्यता निष्ठुरता २३२ अङ्गनामङ्गनामन्तरे माधवः ८३ अनिच्छन्नप्येवम् अचिन्त्यदिव्याद्भुतनित्य २२ अनित्यानि शरीराणि अजरामरषत् प्राज्ञः अनुमन्ता विशसिता अजातपक्षा इव १२ | अनेकसंशयोच्छेदि अजानन्दाहात्म्यम् अन्तःस्वभावभोक्ता ११२ अञ्जनानन्दनं वीरम् अन्नदाता मयत्राता अतुलितबलधाम अपराधसहनमाजनम् २३ अपमानं अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी १५६ पुरस्कृत्य अयासक्तिस्ततो भावः अपूर्वनानारसमावनिर्भर २२ अभिवादनशीलस्य अदीनलोलाइसितेक्षणोलसत् ३९ अभिमानं मुरापानम् १३७ अभूतपूर्व मम मावि किंवा अधीरय चतुरो वेदान् १७७ अमर्यादः शुशलमति. अध्यापनं ब्रायशः १४. ] अम्भोषिः शलताम् अपमेणेधते तावत् ३ उपसंहार एवं श्रीश्रीरमण मवता यत्समुत्तेजितोऽहं चाश्चल्ये या सकलविषये सारनिरिणे वा । आत्मप्रज्ञाविभवसदृर्शस्तत्र यत्नर्ममतः साकं भक्तरगतिसुगते तुष्टिमेहि त्वमेव ॥१॥ (विष्णुपुरीस्वामिनः) हे श्रीरमाकान्त ! हे अधरणशरण ! मैं बालनापल्य अथवा सर्व विषयों- 7 सार सञ्चय करने में जो आपके द्वारा उचेजित किया गया हूँ उसमें अपने बुद्धिवैभवके अनुसार किये हुए मेरे प्रयत्नों [ के फलस्वरूप इस उक्तिसुधाकर ] से अपने भक्तजनोंके सहित आप ही सन्तुष्ट हों। एप सामहमल्पबुद्धिविभवोऽप्येकोऽपि कोऽपिध्रुवं मध्ये भक्तजनस्य यत्कृतिरियं न स्यादवज्ञास्पदम् । किंविद्याः शरघाः किमुज्ज्वलकुलाः किं पौरुष के गुणा- स्तरिक सुन्दरमादरेण रसिक पीयते तन्मधु ॥२॥ (विष्णुपुरीस्वामिना) हो सकता है कि मैं एक अल्पबुद्धि और तुच्छ व्यक्ति ही होऊँ, तो भी आशा है कि प्रेमी भक्तजनोंमें मेरी इस कृतिको उपेक्षा न होगी; क्योंकि (तुच्छ ) मधुमक्षिकामें कहॉकी विद्या है? कौन-सा उत्तम कुल है ? क्या पौरुष है ? और कौन-से गुण हैं । तो भी उसके द्वारा संग्रहीत स्वाभाविक मधुर मधुका, क्या रसिकजन आदरपूर्वक आखादन नहीं करते।

श्रीहरिः सूक्तिसुधाकरे संगृहीतश्लोकानाम- कारादिक्रमेणानुक्रमः २३३ । अनार्यता निष्ठुरता । सीका पाहाः शेकाः [अ] अनम्यासेन वेदानाम् अनम्यासे विष विद्या १५५ अखण्डमण्डलाकारम् अनन्तपारं यह वेदशास्रम् २३० अखण्डानन्दवोपाय २२० अनारोग्यमनायुभ्यम् अगाषजयसवारी २३२ अङ्गनामङ्गनामन्तरे माधः ८३ ' अनिन्छन्नप्येवम् २५ अचिनदिण्यातनिरय २२ ' अनिस्यानि शरीराणि अजरामरवन् प्रायः अनुमन्ता विसिता अजातपाइप १२ अनेकसंशयोछेदि अजानन्दाहारम्यम् १८७ अन्तास्वभावभोत्ता ११२ अअनानन्दन वीरम ५८ अनदाता भयधाता अतुलितबलधाम अपराषसहसमाजनम् २३ अरपन्तकोसका नवाणी १५६ भावनानारसमावनिभर ૨૧ अधासक्तिनतो भाव अभिवादनशील अदीनटोलासितक्षपोरसत्.३९ अभिमानं मुरारानम् १३७ अभूतपूर्व सम मावि किया अपारय घरो वेदान् १७. अमोर दमलति. अप्पारनं १४. भम्भोपित पताम् । अपमान पुरस्कृत्य भरणपणे तारत ३ . गणी गुर योग: गमरमाम मगन 10.. मा नागरे मम् PALI भमानापमानावयम् Tiger १२. मानतिमिरापन Monary: ginta [आ] म ३५ मारणानेत्रम् संग मैनाम् १४ | आशापतितं सोयम् भागारः परमो धमः मालमेका आनाधरिता विवानिमाम् मारमारामाममुनयः २०२ कपनादिरमुने २३ मारमानं यदि निन्दन्ति। पियवस आदित्यस गनागतः शुषो यो यस १४८ आदौ रामतपोवनाधिगमनम् ५५ महामोहमये कटारे १७८ आदी माता गुरोः पत्री १५० फाषित ७१ आदो प्रदा वतः समः २१. पापापाण: आनम्रायां माय पनि भूतानि आनन्द गोविन्द मुकुन्द राम ३३ पा सत्यमस्तेयम् १३६ । आनन्दमूलगणपलव वकीय सनकालकूटम् ९३ । आनीवा नटवन्मया माग्यमहो माग्यम् आपदां कथितः पन्थाः पायादापामर २३९ १. आपदतं हससि किम् विचित्रं तव राम चेष्टितम् ४८ | आसदेषान्मृत्यु: साहजिक प्रेम २०१ आविमाणो स्थाङ्गम चा हार वा १८९ | आनायाम्यसनानि ३२ तुनारायणदासदास. २८ मतपराधीनः २०८ । आयुः कलोललोलम् भायुषः क्षण एकोऽपि १८८ लोकाः भावां विषाणाः ०८ उनिद्रहपमाणिशालये थायोडर मशाग्नागि ३. उपप्पयंसमोर भामा नाम नदी मनोरया १८ उपकारा परोपमः १६. आभिनमात्र पुरुषम् उगमतामात्मविद पुराणम् ८. थानमादाणाल्याने उापित विपमीमा मामुपुममनादरणीयम् [.] आमतेनमिननाम [.] करयो दीगया दमोनविलीन [प] १७ सानीमनमामि पसर पर र मरम् ५. एकनारमाधण दीसम्म रेनपान पाय. एकपमाग tr पिर मापनीत freferन १९१ सय कमियोन्मुस एका होरोगमा मासनगर रम् vie Im:ना " Entert EAR: पार [ . . kving १६. THEIrrrr १८ पुwerm wrrierper तं पश्यन् ७ ४० ८४ [क करHinvir णि करोटयः कस्मात्कोऽहं किमपि चोमवान्२६ कस्मै कि कयनीयम् १२२ वाराणस्याममरतटिनी कस्योदरे हरविरिचमुखप्रपञ्चः १५ ८ द्वाराणस्यां विमल का चिन्ता मम जीवने यदि ७१ ८ काञ्चीकलापपर्यस्तम् सुना शसस्थानकल्पक० १९ शृङ्गैः स्फीते काम सन्तु सहरूशः मेमोद्गारैः काम्योपासनवार्ययस्यनुदिनम् १५१ वा साकेते कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा २०१ गीताशोकत्रिशिखजलदम् ५८ कालिन्दीपुलिने तमाल. वृन्दारण्ये कालिन्दीकुलकेलिः नु वृन्दावनकुञ्जमण्डले १२५ कायायमहणं कपालमरणम् २३८ । किञ्ष शक्त्यतिशयेन तुवृन्दावनवीपिकाखाम् १२५ ४२ भो स्वामिनियतमनसा १७३ किरातहूणान्धपुलिन्द मे हत्पझे भ्रमरः १७४ किरीटिनं कुण्डलिनम् हे स्वामिनिमृतिमयम् १७४ किं करोमिक गन्छामि कि पाय पदपजे समुचितम् ३६ रुचिदुल ६८ किपिन्ति मम पदरसम् पंकोरिमुभगम् किं नमरत्वां यशोदे दमयन यामुदेव विष्णो १९७ किंवा मानिारय ६ चिन्दन पदारविन्दम् किं मुमोऽसि किमाकुमोऽमि ५ ६ घृत्तव्यप्रकुराला ६ । कुन्दान्दुदरगौर १९६ कुन्दप्रम पश्य द्रुमः कस्पिनमेव सूने १६ रनमातात. 'मन्तऋरकेलिः कुर्यन्ति शान्नि विधामा irगाना निधानम् ५५ । कुल पवित्र जननी ताओं २१५ " मोनिधे राजन् शोकाः शोकाः पृछाकाः कन्छणामध्यमध्ये १८६ | क्वचिन्मूढो विद्वान् २१७ कृते यद्यायतो विष्णुम् १९६ | क्वचिदमौशय्या २३० कताथों पितरौ तेन २२५ | काननं क नयनं कनासिका ७४ कृपापात्रं यस्य १०८ कार्य क्षुद्रमतिर्दासः १०३ शः काणःखजः १८४ [ख] उष्ण त्वदीयपदपङ्कजा खं वायुमगि सलिलं महीं च २०० ष्ण कृष्णेति कृष्णेति उष्ण त्वं पठ किम् ९८ [ग] ष्णकथासंश्रयणे १०३ | गङ्गागयानैमिषपुष्कराणि णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति १९८ | गङ्गातीरे हिमगिरिशिला० १८५ -ष्णः पक्षो नवकुवलयम् ११८ गते गोपीनाथे मधुपुरम् -कीकण्ठाभनीलम् ५२ गानं सङ्कुचितं गतिः चिद् वदन्ति धनहीन. ३७ | गीत्वा च मम नामानि चित्स्वदेहान्तहंदयावकाशे ३८ | गुञ्जारवालिकलितम् नापि गीयमाने १०५ / गुणवदगुणवदा कुर्वता यूरा न विभूषयन्ति पुरुषम् १५९ गुणिगणगणनारम्भ किलानां स्वरो रूपम् गुणेरुत्तमतां याति १४८ तिभारः समर्थानाम् गुरुरमिर्दिजातीनाम् १५४ १४८ ऽर्थः पुत्रेण जातेन १४५ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः २२० शलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुली गुरुन स स्यात् स्वजनः २३८ गृहे पर्यन्तस्ये द्रविण कालः कानि मित्राणि १८० गोकोटिदानं ग्रहणेषु श्री धियः परमसत्त्व गोपबालसुन्दरीगणावृतम् चिद्गुष्टः कचित्तुष्टः चदिदगोष्ठी १९२ गोपीमात्रं धुणलिपिनयात् ११६ चद्रुदन्यच्युतचिन्तया २०. गोविन्दं गोकुलानन्दम् . १६२, गोपाल इति मत्वा त्वाम् - TER म * : १६. पनी यात्री "fairTTA TERR १७ विगतम मामलों पर १६ ममा गजननी२२६ पनि प्राकाम * নবাগান म न बार पामम समेवाम पापमंजिमि. ११. बीतनपानासा मदा परिभराममी. ५२ तोत्रे [न] पातुदामोदन यासपिरे नधित् स्वनिम्मिन् १४६ या दोया प्रमात नकाशान्ते बरीन्द्र प्रायोन भपति गयाम् ११३ नरानियमिताइन् पांग्यमिन्द्रियाणाम् न च विद्यासमो बन्युः न्याणि भूमी पशवम गोठे २३६ न जाने सम्मुवायाते [] न जातु कामः कामानाम् ঘনঘাট न तथा मे प्रियतमः १२२ नानि जीविताचव न तथा पचान राजन् निकः भोत्रियो राजा न तथास्य मवेलेशः यानां गिरिकन्दरे १७५ / न तिष्ठति तु यः पूर्वाम् येयं धरणी ११६ । न ते स्पंन चाकारः म एव तो हन्ति १३७ । नदी तरामो वसुधाम् ८२ १८० - लोकाः 4871T: लोकाः पृष्ठाझाः न देईन प्राणान् २४ नरोधयति मां योगः न धर्मनिधोऽस्लि १७ | नवनीरदसुन्दरनीलवपुम् न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठयम् ११ नवनीलमेघरुचिरः न नाकपृष्टं न च सार्वभौमम् २०७ नवच्छिद्रसमाकीणे २३६ न निन्दितं कर्म तदस्ति लोके १७ न लनो जातु कथन ननु प्रपन्नः सहदेय नाथ न सा सभा यत्र १६६ नन्दनन्दनपदारविन्दयोः स्यन्द०६८ न साधयति मां योगः नन्दनन्दनपदारविन्दयोमन्द०७१ न सीदपि धर्मन नन्दन्ति मन्दाः प्रियम् न हायनैन पलितः १३८ न प्रेमाघोऽस्ति दरोऽपि ६४ नागो भाति मदेन न भोगेन योगेनपा नाप योनिसहलेषु नमस्ते सते ते जगत्कारणाय नानाचित्रविचित्रवेष. १ नमस्तस्मै परेशाय १०२ नाम्या स्पृहा रघुपते नमस्तेऽस्तु गहे त्वङ्ग. नापृष्टः कस्यचिद् भूयात १४० नमामि नारायणपादपङ्कमम् ३० नामुत्र हि सहायार्थम् नमामि यमुनामहम् नाय ते समयो रहस्यमधुना १८८ न मृपा परम्पर्थमेव में २३ नारायणो नाम नरोनराणाम् २७ नमो नमो वाहमनसातिभूमये १७ নারি স্বীনি नमो ब्राण्यदेवाय नावेधसे यदि ततः नमोऽस्तु भीमभीष्माष १०२ नाम्नि श्रीणां पृथग्यशः नमोऽस्तु यमुझे सदा नास्ति निवासमा भाभीवारदाय नास कामसमो ग्याधिः यथित्रपद रेय नाम्या धर्म न वसुनिये मन गलभिषारया २१५ गाई बन्द तब नरणयीन १ रस, नाश्यम् नाई वियोन च नरपतिः के पापमान २०० नाद वगम बेटे (१२) १३२ , माधुर्यादपि मधुरम् । । । मधुमर्दि महन्मञ्ज - शेका पापा मोकाः (भेको घावति तं च धातिफणी १८२ माता च कमला देवी भेदाभेदी सपदि गलिती २२५ मातापितृभ्याम् भोगान मुक्ता वयमेष भुक्ताः १८४ माता यस्य गृहे नास्ति १४८ भोगे रोगमयं कुले न्युतिमयम् १८४ | मातुलो यस्य गोविन्दः भोजनाच्छादने चिन्ताम् २२२ . मातृवत्परदारेषु भ्रान्ता मवे कति कति २२८ । मातेव रक्षति पितेव भाग्यन्मन्दरघूर्ण ८० १०८ मायाहस्तेऽर्पयित्वा [म] मार मा वस मदीयमानसे ८२ मजन्मनः फलमिदम् २८ मार्गे मागें जायते साधुसङ्गः २२४ २७ । मधुरमधुरमेतन्मङ्गलम् मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणम् १६६ मित्रं स्वच्छतया रिपुम् मध्ये गोकुलमण्डलम् ८३ मुक्तमुनीनां मृग्यम् मनस्यन्यद् यचस्यन्यत् १५२ मन्दारपुष्पवासित मुकिमिच्छसि चेतात मन्निन्दया यदि जनः १२३ मुखारविन्दनिःस्यन्द. मन्ये लश्मि त्वया साघम् २४० मुग्धं स्निग्धं मधुरमुरली. ८६ मम नाथ यदस्ति मम न भजनमक्तिः मूकं करोति वाचालम् मावतारे मनुजाकृति हरिम् ४८ मूखो यत्र न पूज्यन्ते १४८ महत्सेवा द्वारमाहुविमुक्तः २२४ महामरकतश्यामम् मातर्मेदिनि तात मारुत सखे मातगने तरलतरने मातदवि कलिन्दभूधरसुते ११ | मृदुमाधिता प्रसाद मातमाये भगिन कुमते । . १०६ । मुक्ताजालकरम्बित. २४ मुरहर रन्धनसमये . ४१ मूर्खप्रोद्भासिगळे २ मूलं धर्मतरोविवेकजलधेः १२८ मूलं भुजङ्गैः शिखरं सवा २३३ मृदीका रसिता सिता (१३) यत्कीर्तनं यत्स्मरणम् . --- होवाः पहा शोकाः छाकाः 'मेघश्यामं पीतकोशेयवासम् २८ । यस्ते ददाति रवमस्य मोनान्मूकः प्रवचन यस्य कस्य च वर्णस्य २१८ यस्था बीजमहकृतिः १८२ [य] यस्यकनिःश्यसित यच कामसुख लोके २३४ । यस्योदयास्तसमये यत्र निर्लिप्तभावेन यत्पादपङ्कजरारा ४८ यशाच्युत गोविन्द यत्पादपङ्कजरजा ४८ या चिन्ता भुवि पुत्रपौत्र ૭૨ यथा चतुर्भिः कनकम् या दोहनेऽवहनने यदादमण्डान्तरगोचरं च यत् १६ या पूर्व हरिणा प्रयाणसमये ११७ যা কিন্দ্রিয়ী या प्रीतिविवेकानाम् २९ यदा प्रहप्रस्त इस कचित् २१२ । यावत्स्वस्थमिद कलेवरगृहम् १७३ यदि जयति मुकुन्द २२७ | यावनिरञ्जनमज पुरुषम् यदि दधति न गीताम् २२७ यां दृष्ट्वा यमुनाम् ८४ यद्दुस्तर यदुरापम् १३८ । युगायितं निमेषेण यद्यपि साकारोऽयम् १०८ ये मानषा विगतरागपरावरशा:१९८ यद्यपि सर्वत्र समः ११२ ये मुक्तावपि नि:स्पृहाः ६२ यद्यपि गगनं शून्यम् ११२ ये ये हताश्चक्रघरेण यद्रोमरन्ध्रपरिपूर्ति ११४ । येषां श्रीमद्यशीदासुतपदकमले १०१ यद्वत्समलादर्श १०३ येषां न विद्या न तपो न दानम् १५८ या श्रमावधि यथामति १३ योग योगविदा विधूत. यन्नामकीर्तनपर: यो रक्षकद्रशुकनारदमीप्यमुख्यैः ११८ यमूर्मि मे भुतिशिरस्तु মন্না ইমর यमुनापुलिने समुक्षिपन् ६२) यं मातापितरो क्लेशम् यमुनातटनिकट. १०५ य वेद वेदविदपि प्रियमिन्दिराया:१२२ यशोदया समा कापि ११४ शेवाः समुपासते शिष इति ४३ .

पृष्ठान कोकाः २२. ८१ १२३ (१५) पृछाया: शोकाः यः कश्चिद्बुद्धिहीनोऽपि १३३ । लामस्तेषां जयस्तेषाम् यः शङ्करोऽपि प्रणयम् ५ लालयेत् पञ्च वर्षाणि लावण्यामृतवन्याम् लीलायताभ्याम् रघुवर यदभूस्त्वम् २६ / लीलाटोपकटाक्षनिभर रक्षाकरस्तव गृहम् ६९ लोकाधीशे त्वयोशे रविरुद्रपितामहविष्णुनुतम् १३३ | लोकानुदरयन् रसने त्वं रसजेति लोकं शोकहतं वीक्ष्य रहूगणैतत्तपसा न याति १७० लोमश्वेदगुणेन किम् राजा धर्ममृते द्विजः १५८ | लोष्टमी तृणच्छेदी रात्रिगामध्यति भविष्यति १८३ राधाकरावचित. [व] राधामुग्धमुखारविन्द ९५ वज्रादपि कठोराणि राधिका नौमि ११५ | वने चरामो वसु चाहरामः रामनाम जपताम् ५६ / बनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रासे चञ्चलताम् वन्दे शारदपूर्णचन्द्र. रूपयौवनसम्पन्ना १४५ बन्दे नवधनश्यामम् रे कन्दर्प करं कदर्थयसि किम् १८९ वन्दे मुकुन्दमरविन्द रेचित्त चिन्तय चिरम् चेतः कथयामि रेरे चातक सावधानमनसा १५९ वपुः कुब्जीभूतम् वयं त्वां स्मराम: रेरे मानसमुनमा कुरु सुधा १.१ घरमसिधारा तरुतलवास: [ल] वरं मौन कार्यम् लन्या विद्या राजमान्या १७२ | पलयाकुलीयकाद्यान् लम्वा सुदुलममिदम् १७९ यशी पदान्यो गुणवान् ललितान्तानि गीवानि १६५ | वसुदेवसुतं देवम् ७४ ८७ २३ वपुरादिषु योऽपि २ + होकाः पृष्ठावाः शोका पृष्ठाका पहिस्तस्य जलायते १५८ । विष्णुपनी क्षमाम् वाञ्छा सजनसङ्गमे २३१ । विसृजति हृदयं न यस्य साक्षात् २०६ वाणी गुणानुकथने श्रवणो २०२ विहाय पीयूषरसम् वानरनिकराध्यक्षम् ५९ । विहाय कोदण्डशरान्मुहर्तम् ८१ वामे भागे जनकतनया ५४ चीताखिलविषयेच्छम् ५८ वासुदेवं परित्यज्य वीतासङ्गाः शयनवसन. वासुदेवस्य ये मताः २०८ वृक्ष क्षीणफलं त्यजन्ति वासः काञ्चनपिञ्जरे शृथा वृष्टिः समुदेषु विजेतव्या हवा चरण २२९ वृन्दारण्ये तपनतनया. विद्या मित्र प्रवासेतु वृन्दावृन्दमरन्द. विद्या नाम नरस्य रूपमधिकम्१५९ । हदारण्यान्मधुपुरमिते विद्यातीय जगति विबुधाः १६६ सुन्दारण्ये चर चरण विद्या विवादाय धनं मदाय २३२ वेदापहारगुरुपतिकदैत्यपीडा १४ विद्राविते शत्रुजने समाते १९१ वेदानुदरते जगन्ति वहते विद्यावञ्च नृपत्वञ्च १४ वेदे रामायणे चैव विनिश्चित वदामि ते २०५ चेदः स्मृतिः सदाचार: विपदो नैव विपक्ष २७ वशीविभूषितकरानव. विपदः सन्तुनाशश्वत् स्याघस्याचरणं भुवस्य च वयः२०५ विपद धैर्यमथाम्युदये समा २१६ व्यामोनिशमौषधम् ८. विषयोर्विप्रपदापोभ १५. प्रतानि पहरउन्दांसि विभूषिनं मेरालपा [२] विरल्या जानन्ति गुणान् ২ ঘশ্ববিয়াসিম विगजमानोवलपीतवाससम् १५ शी गुरु ततः विरक्षण पथा वान्तम् २३४ उरीरस्य गुणानाय दिलासविक्रान्तपरावरालयम् : वीरं बनवन्दिम् १४१, शदिजाविभिखम् : विवादप्यमन ग्रासम् लोकाः (१६) भोकाः माझा शत्रुच्छेदैकमन्त्रम् ८८ श्रीयल्लमेति घरदेति शान्ताकारं भुजगशयनम् ३७ | श्रीवत्साई धनश्यामम् शान्ता महान्तोनिवसन्ति सन्तः२१५/ श्रीविष्णोः श्रवणे शान्तितुल्यं तपो नास्ति१४९, १७८ ! श्रुतयः पलालकल्पा: शिशिरकिरणारी ४ श्रुतिमपरे स्मृतिमपरे शीर्णा गोकुलमण्डली १२२ श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मम् शुक्लाम्बरधरं विष्णुम् ११ । श्रुतिस्तु वेदो विजेयः शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमाम् १३४ श्रतिविमिन्ना स्मृतयो विभिन्नाः२२९ शुद्धति हि नान्तरात्मा १०३ | श्रत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफल. ४४ शुभतरकृतयोगात् १२९ | श्रेया सुति भक्तिमुदस्य २०२ शुभा ग्रहा भूतपिशाचयुक्ताः २०३ श्वविड्यगहोष्ट्रखरैः शृणु सखि कौतुकमेकम् ६१ / श्वासैजदलकामातम् शृण्वन् गणन् संस्मरयंश्च २०१ [प] शृण्वन्सुभद्राणि रथाङ्गपाणेः १९४ पडङ्गादिवेदोमुखे शृण्वज्ञनार्दनकथा. शोकस्थानसहस्राणि घड् दोषाः पुरुषेणेह श्यामेति सुन्दरपरेति [स] ६० सकलभुवनमध्ये निधनास्तेऽपि २०४ श्रवणं कीर्तनं विष्णोः १९३ | सकृत्वदाकारविलोकनाशया २४ श्रियः कान्ताः कान्तः सकृन्मनः कृष्णपदारविन्दयोः ११९ श्रीकृष्णस्य मनोज्ञनादमुरलीम् ९६ / सङ्गमविरहविकल्पे २१३ श्रीकृष्ण श्याम राधाधव ९७ | सचिरवरूपम् श्रीकृष्णनामा जयतीद शश्वत् १०२ | सजल जलदकालम भीमकृष्णे मधुपुरगते स जीवति गुणा यस भीरामतो मध्यमतोदि यो न श्रीयंपदाम्बुजर जश्चकमे सत्यत्रतं सत्यपरम् अवसोः कुवलयम् ४७ सततसुलमदैन्ये (१७) लोकाः पृधागा शोकाः पृष्ठाका सत्येन पार्यते पृथ्वी १५४ - साध्वो हृदयं मह्यम् सत्यं ब्रवीमि मनुजा ९० साधुस्त्रीणां दयितविरहे सत्यं समस्तजन्तु १०४ | साधूनां दर्शनं पुण्यम् सत्यं ब्रूयातिपय यात् १४० ( सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः २४० सत्यं माता पिता ज्ञानम् २२३ । सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुम् ५१ सत्सङ्गः केशव भक्तिः १४९ | सान्द्रानन्दपुरन्दरादिदिविषद ९५ सदा प्रष्ट्या माध्यम् १४३ । सालोक्यसार्टिसामीप्य २०८ सदाप्रसन्नं मुखमिष्यवाणी १५७ । साक्षाद्यथैकदेशे सदा मुक्तोऽपि बदोऽस्मि २०९ । सिन्धुर्विन्दुमहो ७२ सन्तोपत्रिषु कर्तव्यः १५७ । गुजोर्णमग्नं सुविचक्षणः सुतः १६७ सन्तोनपेक्षा मचित्ताः २१५ । सुतरामनन्यशरणा: सन्ध्यावन्दन भद्रमस्तु मरते ८६ । सुभिक्ष कृषके नित्यम् समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवम् १२ । सुरभीकृतदिग्वलयम् समुद्रावरणा भूमिः सुरा मत्स्याः पशोमासम् २३८ सरसिजनिलये सरोजहस्ते सुलमा पुरुषा लोके सर्पः फरः खलः क्रूर १४७ । सेवच विबुधास्तमन्धक १८१ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये ४५ : सेवापूजानमनविधयः सर्वभूतेषु यः पश्येत् २०६ । सोषानभूत मोक्षस्य सर्ववेदमयी गीता ३५ सविधाय दशने तृणं विभो ११८ सर्व परवशं दुःखम् १४१ संसारसागरं धोरम् भर्वाधिपत्यं समरे गभीरम् स्त्रीणां स्त्रीमङ्गिनाम् सर्वे तस्याहता धर्माः १३९ स्थूला सूक्ष्मा १०३ सर्वेषामेव शौचानाम् १४२ नातं तेन समानतीय २१८ स वाग्विसगों जनतापसंप्लव १९७१ फुरस्कारज्योत्स्ना. सशचक्र सकिरीटकुण्डलम् ३८पुरस्किरीटागद. सहसा विदधीत न कियाम् १६६ । सयमानमभिध्यायेत् + h . - - । २१ (१८) शोका। 28 सोका पृषा বিবিসি ६६ देय हे दायत है स्मृतिपुराण १०४ देनाथ हे रमानाथ रपकनिदिधाम् २८ हेयं दुःखमनागतम् स्वगहे पूग्यो पूर्ण १६५ । हे लोकाः शृणुत रपयेण रादानुभूतया २० से दिशन्दे किगु मुख्यतया १३ লাবিদ্যাথগিন্ধায় ফাগবি [१] सारामतीरेपिपासवीरे १८२ क्षमया दयया प्रेग्णा धमा लगाकरे यस्य २२ क्षान्तिरस्यर्थकालत्यम् इसलिलशमला २१ क्षालयामि तय पादपङ्कजे हसमरिक्षष्य ६९ क्षीरसागरतरदसीफरा० সে যুগ ধান १५२ धीरसारमपदस्य शश्या ६१ सीदानविधर्जिती १८१ । क्षीरणात्मगतोदफाय हरिरेष हरीहर एष [1] हरिश्ष अब इस १२७ दरिय जगजगदेव २२१ । प्रयी सायं योगः २२२ नाम नामेष पाता यत्र न कधिदास पुणण भगवा १३ विधाप्येक सदागम्यम् देगोपालकदे पागनिधे ७५ त्रिभुषनसरसाभ्याम् हेरिरासारशे २२१ | मिषनविभपतयेऽप्यकुण्ठ २०६ - - । श्री

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Shuktisudhakar

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Not Available
Title
Shuktisudhakar
File name
Shuktisudhakar
Text
OCR done
Citation
1936
Published
2011/08
Publisher
Gorakhpur, Geeta Press
Language
Sanskrit
Pages
296
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310961
Barcode
99999990314398.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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