Kumarappa Institute Of Gram Swaraj, Jaipur
Manvghad Ka Santri
Front matter
श्रीमान् मुनिश्री हंसवीजयजी महाराज.
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दीक्षा १९३५
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दिवामाका दिन.
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CIWDIMZODIAFIMDIR 0000000000oC ००००००० श्री हसविजयजी जैन फ्रीलायरी अयमाला पुष्प ११ वा मांडवगढकासन्त्री- - अथवा पेथडकुमारका परिचय ०००००००००००००००००००००००y... संयोजक. न्यायांभोनिधि जैनाचार्य श्रीमद्विजयानन्दसूरीश्वरगिज्य पडित वर्य श्री लक्ष्मीविजयजीमहाराजके शिष्य श्रीमान सविजयजी महागज. मस्कारक वकील झमकलालजी रातडीया. प्रकागक श्री हंसविजयजी जैन फ्री लायनेरी वडोदा. 0000000 ०००००००० प्रथमावृत्ति वीर मवत विक्रम मं. १९७९ { प्रत १००० २४४९ मूल्य ४ जाने अमदावाद धी कानाम प्रिन्टिग यसमा मा मोरनार नीमनाने अन्य ००० 00 DWUNADWO SIDWESTENDE आभार. 85608-8000 इस पुस्तकके प्रसिद्ध करने में जिन समि भाईयोंने अपना पुण्योपार्जित लक्ष्मीका सदुपयोग किया है उनका उपकार माने विना हम नहीं रह सकते. अमरावती नि- वासी श्रीयुत फतेचन्दजी फलोधिया, कि जिन्होने अम- रावती में श्री जिन मन्दिर वनवाकर बडे समारोहके साथ प्रतिष्ठा महोत्सव किया, और वहांपर यात्रालु लोगोके लिए एक धर्मशाला वनवाई है और उद्यापन करके अपना जीवन सफल किया और कररहे हैं उन श्रीमान्की धर्मपन्नि श्रीमती अमृतवाईने २५०) रुपये दिये हैं तथा जयसिंह- भाई उगरचन्द दलाल अमदावादवाले जिन्होने उद्यापनादि में अच्छा धन खर्च किया और कर रहे हैं उन्होंने २०१) रुपये दिये हैं. तथा सूरत निवासी झवेरी भूरियाभाई जीवनचन्दने २५) रुपये तथा कालियावाडीवाले नेमचन्द भाई फकीरचन्दने २५) रुपये दिये हैं इसलिए हम उपरोक्त सद्गृहस्थोंका अंतःकरण पूर्वक उपकार मानते है कि जिन्होने परमपूज्य श्रीमान् हंसविजयजी महाराजके बनाये हुए ईस धर्म परिपूर्ण ऐतिहासिक पुस्तकके प्रगट करनेमें मदद दी है। श्री हंसविजयजी जैन फ्री लायनेरी के मोटी वडोदा (स्टेट) --
श्रीयुत वालमीचन्दर्जा कणावत.
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अवमान म. १.
80
श्री जिनेंद्राय नमः
(अर्पण पत्रिका)
श्रीमान् स्वर्गीय श्रावकवर्य बाबुसाहेब
लक्ष्मीचंदजी कर्णावत.
आपने इस संसारमें उच्चकुल व सर्वोत्तम धर्म
पाकर श्रीसिद्धाचलजी तथा श्रीसम्मेन शिखरजी तथा
श्रीपावापुरीजी वगेरे नीर्थयात्राके साथ देवगुरुस्वधर्मो-
की भक्ति करके अपने आत्माका कल्याणकिया और
अपने सुपुत्र श्रीयुन हनुमानसिंहजी कलकता निवा-
सीको संसारमें छोडकर स्वर्ग सिधार गये
श्रीमान् तुम्हारे पुत्रादि परीवारने भी श्री सि-
द्धाचलजी उपर सेठ मोतिशाहको टुंकमें देहरी लेकर
श्रीमुपार्श्वनाथजी आदि परमात्माकी ५ मृनियां
स्थापनकी जिनका स्तवन निचे रोशन कियाई इसी
तरह देवगुरु ज्ञानकी भक्ति तनमन धनसें करके अपने
द्रव्यका सदुपयोग कियाई और कर रहे हैं नया
हमारी संस्थाके प्रथम वर्गके मेंबर होकर सहायता
दीहै अतएव इस पुस्तक की आदिमें आपका फाटु
देकर यह ग्रन्थ आपको सादर समर्पण कर आपके
आत्माको अखंड शांति प्राप्त हो यह चाहते हैं.
आपका सहधर्मी बन्धु
प्रकाशक.
مردم
-
उपर दर्शाया हुवा श्रीसिझाचलजीका स्तवन काफी नेमि निरंजन ध्यावो वनमें तपकीनो यह चाल. MARA an- 4 स्वामोमुपार्श्वजिणंढारे, दिये परम आनंदा ए प्रांकणी. गांन वदन शीतलना अर्प। जमे गगनमें चंदारे ।। दिये० (१) सिद्धावलपर समवसरणमें। सेव मुरनर इंदारे ॥ दिये० (२) तसे तुमारी सेवा कारण । मृत्तिं ठवे सानंदारे ।। दिये० (३) मोनि शाहको ढंक मनोहर काटे कर्मका कंदारे ॥ दिये० (४) कलकनाके निवासी कर्णावन । हरवा भवोभव फंदारे। दिये। (५) लक्ष्मीचंदजी मन हरमानसिंह । हर्प धरीअमंदारे ॥ दिये० (६) हंस कहे वहां पांच प्रभुकी। प्रतिमा पूजो भवि बंटा।दिये०(७) no + ---- -samom
(सूचना)
जिस महान नररत्न का परिचय इस पुस्तक में
कराया गया है उसके जीवन चरित्र की तुलना करके
और उसका अनुकरण करके मनुष्य अपने जन्मको
सफल कर सकता है । पेथडकुमारने अपनी दरिद्रा-
वस्था में किस प्रकार से धैर्य रक्खा और अपनी
उन्नतावस्था में अपने द्रव्य को किस तरह सन्मार्ग में
खर्च किया और धर्म की किस प्रकार सेवाकी यह
सब बातें पाठकोंको इस छोटीसी पुस्तक से अच्छो
तरह मालुम हो जायेंगी। मुकृतसागर काव्य में पेधड
कुमारका चरित्र वर्णन किया गया है उसपर से भव्य
जीवोंके हितार्थ संक्षेप में यह पुस्तक परमपुज्य शान्त
मृति हंससमनिर्मल भातःस्मरणीय श्रीमन्मुनि श्री
हंस विजयजी महाराज साहवने लिखो है अतएव हम
आपका अन्तःकरण पूर्वक उपकार मानते हैं ।
प्रस्तुत वृतान्त इस्वी सन् १२०० के साल के
लगभग अर्थात् १३ वीं सदी में बना है। इसके साथ
यह ऐतिहासिक वृत्तान्त अपनी जैन समाज को भो
उपयोगी होना सम्भव मालुम होता है । उस समय
* "मांडवगढनो मंत्री पेथडकुमार से उद्धृत
-प्रकाशक.
दिल्ली के तख्न पर खिलजी वंश का अलाउद्दीन खूनी बादशाह राज करता था जिसने इस्त्रीसन् १२९७ में कर्णधला के पास से गुजरात सर किया वही अलाउदीन वादशाह अपने वृत्तान्त के समय में होगा ऐसे आसपासके संयोग देखने और इतिहास का अवलोकन करने से मालुम होता है । और अपने इस वृत्तान्नमेंभी एक जगह ऐसा सुबूत मिलता है- कि अलाउदीन खिलजी से सन्मानित पूर्ण नामक 'श्रावक जूनागढ आया हुवा था और अपने वृत्तान्त का नायक पेघडकुमार भी वहां गया था। वहां उनका समागम और वादविवाद हुवाथा इस पर से भी अ- नुमान हो सकता है कि वही अलाउदीन बादशाह होना चाहिये । ऐसेही गुजरान की गद्दीपरभी भीम बाणावली के वंश परम्परा से अनुक्रम से कर्ण, सिद्धराज, कुमारपाल, भोलाभीम वगेरे हुये । उस भोले भीमके वक्त में दिल्ली की गद्दी पर पृथ्वीराज चौहान या उसके पास से शाहबुदीनगौरीने राज्य ले लिया। यानि दिल्ली की गद्दी शाहबुद्दीन के हाथ में आई, उसके पास से तुगलकवंश और वहां से खिलजी वंश में गई। अपने वृत्तान्त के समय में खिलजी वंश का अलाउदीन यादगाह था और भोल भीम में अनुक्रम में कालान्तर में गुजगत की गद्दी ३ [ कर्णवाघेला हुवा जिसके पास से अलाउदीन दिशाहने गुजरातका कन्जा लिया और एक वक्त । राना जंगल मे भटक भटक कर मर गया। जिस सिंमें दिल्ली और गुजरात के भाग्य चक्रका चम- कार हो रहाथा उस वक्त मालवा प्रान्नान्तर्गत डवगढ नगर वडा स्मृद्धिशाली था और उस वक्त हां परमार वंशीय मालवे का प्रख्यात राणा जयसिंह- व राज्य करता था। उस वक्त माण्डवगढको स्थिति मध्यान्हकाल नैसी थी परन्तु दैव की गति विचित्र है। काल की गति भिन्न है इससे वह भी काल के चक्कर में पड गया और उसकी बहुतसी निशानियें नष्ट हो गई। इस वक्त वहां एक छोटा सा गांव है उस वक्तका मनोहर किला पृथ्वी ने अपनी गोद में छिपा लिया है। वर्तमान में गॉव के प्रवेशद्वार पर एक पत्थर का तोरण और पृथक २ स्थानों पर प्राचीन मंदिर व खंडरों के चिन्ह दिखाई देते हैं। वहां पर वर्तमान में श्री शान्तिनाथ भगवानका जिनालय है और उसमें स्थित श्रीसुपार्श्वनाथ भगवानकी प्रतिमा महासनी सीता के शील के प्रभावसे वनभूत हो गई यो जो इस वक्त मौजूद मानो जाति है । बहुनसे जैन लोग वहां यात्रा करने के लिये जाते हैं तब वास्तव में प्रा- चीन छटा का उनको प्रत्यक्ष भान होता है।
४ ईस्वीसन् १२०० की सदी में पेयडकुमार का जोवन जगत् को उपयोगी हुवा है उसके गुरु उस वक्त सुप्रसिद्ध श्रीमद् धर्मयोप सूरीश्वरथे उनके लग- भग २०० वरस के पीछे उनका चरित्र लिक्खा गया हो ऐसा मालुम होता है क्यों कि उनके पाट पर- म्परा पर श्री सौमसुन्दर आचार्य हुवे जो लगभग श्रीमद् देव मुन्दरसूरि और ज्ञान सागरमरि के समय में हुवे हों ऐसा मालुम पडता है। उनके पीछे उनके पटधर मुनि सुन्दरसूरि हुवे और उनके पटधर रत्न- सागरसूरि हुवे उनके शिष्य श्री नन्दी रत्नगणी और उनके शिष्य श्रीरत्न मंडन गणी हुवे जिन्होंने मुकृत सागर काव्य उपकारार्थ बनाया। वे प्रायः रत्नशेखर सरिके वक्त में हुवे हों ऐसा विदित होता है । रत्न- शेखर मूरि का जन्म संवत १४५२ में हुवा, १४६३ में दीक्षा ली, १४८३ म पण्डित हुवे, १४९३ में उ- पाध्याय हुवे, १५०२ में आचार्य पदवी प्राप्त की और :५१७ में स्वर्गस्थ हुचे। उस समय में यानि लगभग २०० बरस में यह वृत्तान्त लिक्खा गया हो ऐसा अनुमान होता है। आशा है कि इस वृत्तान्त को पढकर पाठकगण उचित शिक्षा ग्रहण करेंगे।
प्रस्तावना. वन्दे वीरमानन्दम् । दैव्यैर्जिनमन्दिराणि रचयत्यभ्यर्चयत्यर्हत- भक्त्या यतिनां तनोत्युपचयं वस्त्रानपानादिभिः । । पुस्तकलेखनोद्यममुपष्टनाति साधर्मिकान् , भ्युद्धरणं करोति कलयत्येवं सुपुण्यार्जनम ॥१॥ Reks ş स अगाध संसार सागरमें अनेक जी. EXCISMA वात्मा एक भवावनारी हैं, अन्य दो भवों सार पार होने वाले हैं, कीननेही जीव तीसरे में अनादि कालकी डगमगाती हुई अपनी नय्या- पार लगानेका शाही परवाना ले चुके हैं । एवं संख्य जन्मों में और कई असंख्य जन्मों में मोक्ष पाने के अधिकारी बन चुके हैं। इतनी शीघ्रता ( आसानीप्ते जीवात्मा धम सामग्रीको सेवनासे हो अपार संसारसे पार हो सकता है । धर्मको सा- में कतिपय अंग वह हैं जिनका कि नामनिर्देश र किया गया है। मतलब कि कई भव्यात्मा जिनमंदिरोंके वनवा- तथा उनका उद्धार कराने से संसार पारगामी हैं, अर्थात् सुलभ बोधि होकर उत्तरोत्तर उन्नत ६ दशाको माप्त होते हुए मोक्षाधिकारी हुए हैं। यया संप्रनिनरेश। कइ पुप्यात्मा त्रिकाल जिनपूजन करके निज मनको शुभयोगमें स्थिर कर संसारसे उत्तीर्ण हो गये है यया नागकेतु अनेक उच्चात्मा सद्गुरुओंकी सेवासे ही स्वकार्य साधक हो गये हैं। जैसे कि, परदेशी राजा और चौलुक्य चुडामणि कुमारपाल भूपाल । अनेकोंही उदाराशय महानुभाव श्रीजिनागमोंके लेखनादि क्रियाद्वारा उद्धार करने करानेसे जगत्में प्रसिद्धि के पात्र और जन्मांतर सद्गतिके भाजन हो गये हैं। जैसेकि, भगवान श्री देवर्डिगणि क्षमाश्र- मण और स्कंदिलाचार्य प्रभृति साधुमहोदय तथा गृहस्थोंमें संग्रामसिंह-सोनी आदि सज्जनवृंद । साधर्मिक पुण्यात्माओंके बहुमानसे स्वयं बहुमानके पात्र बनने वाले उच्चामा नो श्री जिनशासनमें गण- नानीत हो चुके हैं, जिनमें श्री संभवनाथ स्वामी तीसरे नीर्थकर भगवानका उदार चरित विशेप उल्ले- खनीय पर्व मननीय और अनुकरणीय हैं ? आपने पूर्व भवमें अति दुर्भिक्षके समय साध. मिक लोगोंका पालन निजामाके समान किया था, जिसके प्रभाव आप अगले भवमें देवद्धिका उपभोग । इस अवसर्पिणीमें इसी भरनक्षेत्रमें वर्तमान चतु. शतिके तीसरे तीर्थंकर त्रिलोकी नाथ हुये। दीनात्माओंके उद्धारकोमें तो अन्य उदाहरणों- । आवश्यकता नहीं मालूम देती है। भगवान् तीर्थ- र देवका हीदृष्टांत पर्याप्त है । पशुओंके आनंदको नकर उनको दया विचार उन दीन दुःखी पशुओं- को मुक्त कराकर विरक्त हुए हुए विवाहके रथको रत पीछे मोडलेने वाले वालब्रह्मचारी प्रभु श्री ने- मेनाथ कुमारकी कुमार कथाको, एक विपधर-मर्प को घोर पापसे बचानेके लिये उसके दृष्टि विप और ष्ट्रा विप-डंकको सहन करके पंदरह दिन तक भूखे यासे एक ही स्थानमें उस आत्माके उद्धारार्थ ध्यान- स्थ खडे रहने वले चरम तीर्थंकर प्रभु श्री वीर पर- मात्माकी वीरचर्याको, मेघरथ राजाके भवमें कवूनरकी रक्षाकी खातर शरणागत वत्सल क्षात्र धर्मके लिये जान कुरवान करने वाले सोलमे तीर्थंकर श्री शांति- नाथ प्रभुके धैर्यको, एवं यज्ञमें हवन किये जाने वाले एक घोडेको बचानेके लिये और उस गिरी हुई आ- के उद्धारकी खातर एकदम साठ योजनका विहार करके आने वाले वीसमे भगवान् श्री मुनिसुव्रतस्वामी नीर्थकरके उस परोपकार रूप सुव्रतको कौन भूल सकता है । -*- ८ Eccccrees ६२६२ मांडवगढ और पेथडशाह H कवि कालिदासने एकठिकाने लिखा है कि- यात्येकतोऽस्तशिखरं पनिरोपधीना- माविकृतोऽरुणपुरस्सर एकतोऽर्कः। तेजोदयस्य युगपद्व्यसनोदयाभ्यां, लोको नियम्यत इवात्मदशान्तरेषु ॥२॥ वह १२ योजन लंबी और ९योजन चौडी अयोध्या जिसमें भरत और सगरजैसे पट खंडाधि- पति, हरिश्चन्द्र, और दधीचि जैसे सत्यसंध, राम लक्ष्मण जसे प्रजापालक नरपति हो गयें आज किस हालतम है ? जहां शांतिनाथ, कुंथुनाथ, और अरनाय जैसे तीर्थकर सम्राटोंके जन्माभिषेकादि कल्याणकोंके ममय देव देवेंद्रोंका आगमन हुआथा, आज वह हस्तिनापुर किस गिनतीमें है ? जिसको आबाद फरक चित्रांगद राजाने भादेश किया था कि, यहां फरोटपनिक सिवाय और किसीको स्थान न मिलेगा? आखीर करोडपतियोंमें नमाम जगह भरजानेसे लक्षाधिपनियों के लिये तलहट्टी पर हजारों मकान
९
नाने पड़े थे आज वह चित्रकूट (चितौड) नाम और
था शेपके सिवाय और किस बातका अस्तित्व
खता है ?
और सुनिये । राजग्रही कि जहां श्रेणिक राजा
श्रेणिवद्ध हाथी झूला करते थे, जहां धन्ना-शालि-
जैसे दिव्यभोगी श्रेष्टिनंदन रहते थे। नालंदा
डा कि जहां-भगवान् ज्ञातनंदन श्रीमहावीर प्रभुक
दह चौमासे हुये थे, और कुछ अरसेके वाद जहां
द्ध धर्मका महाविद्यालय ऐसा विशाल बना था कि
समें चीन तकके विद्यार्थी पढनेको आया करते थे।
जि वह नगरी देखनेको भी कहीं है ? हां खंडहर
। पडे हैं।
सारनाथ जो स्थान बुद्धदेवके प्रथम उपदेशके
रण संसार भरमें प्रसिद्ध था, अशोक जैसे महा-
जाओंने जहां गगनचुंबी मंदिर बनवाये थे, आज
स स्थानमें दिनमें भी भय लगता है।
काश्मीर देशके प्रख्यात शहर श्रीनगरके निकट
ल नदीके किनारे जहांगीर बादशाहने जो महल
वाया था उसमें काश्मीरकी कुल आमदनी खर्च की
ती थी। इसके इलावा एक करोड दस लाख रुपया
१० बादशाही खजाने से भी खर्च किया गया था। इस महलके आसपास नसीम, नशान और शालामार नामक नीन बागीचे लगाये गये थे। जिन्हें देखकर मनुष्य उन्हें स्वर्ग और मुमेरु समझ लेने थे। जिनमें बादशाह जहां के प्रेममें मशगूल होकर दोनों ज. हानांसे वखवर फिरा करताथा । आज उस महलका नामोनिशान नहीं रहा है, वागीचोंमसे केवल एक बागमें कुछ साधारणसे पंड (वृक्ष खड़े हैं। इधर बम्बइ कलकत्ता जैसे भारतके मुप्रसिद्ध गहरकि, जहां कुछ समय पहले थोडे थोडे झापडे पडे- थे आज उनमें लाखों मनुप्योंकी बस्ती है। इससे मिद्ध है कि, आज जिसका उदय है कालांतग्में उस- का अस्त है और आज जो मूखा पडा है कालांतर याखिलंगा। परिवर्तन रूपही तो संसार है। किसी कविन टोकहो कहा है:-" नीचंर्गच्छ त्युयरि च दशा चक्रनेमिक्रमण." इसी प्रकार आज जो मांडवगढ वीरान उजा- टमा पड़ा है, वही पांडवगढ इस दगामें या कि, जहां के रहने वाले मेट-भमागाहनं करोड़ों रुपये ग्वर्चके गनगन देशके व्यापारियों को नीचा दिग्वाया था ? पर कया जनसंपदा शिक्षा आदि भाषाग्रंथमिभी ११ खी गई है। प्रायः बहुतसे जैन लोग इसवातसे व परिचित हैं। वही मांडवगढ है कि, जहां के रहने वाले संग्रा- सिंह-सोनीनं अपने धर्माचार्य श्री ज्ञानसागर- रिके प्रवेश महोत्सबमे ७२ लाख द्रव्य खर्च किया । ६६ हजार अशर्फियां-सोनामोहरों से ज्ञान न कर श्रीगुरुमुखसे पंचमांग-श्रीभगवतीमूत्रका ख्यान सुना था। प्रसंग वश संग्रामसिंहकी उदारताका और स- पारनाका कुछ परिचय दिया जाना अनुचिन नहीं जायगा. एक दिनका जिकर है कि, संग्रामसिंहने गुरुम- जिके चरणोंमें प्रार्थना की कि, प्रभो ! आप जैसे गर्थ गुरुओंका योग बडे पुण्यसे मिलता है इसलिये कृपा करें, व्याख्यानमे प्रभावशाली श्री भगव- त्र सुनावे, ताकि आपसे सद्गुरुका मिला योग ल होवे। गुरुमहागजने समयानुसार योग्य श्रोता जको देख शुभ मुहूर्तमें श्री भगवनीमूत्रका व्या. न शुरू कर दिया । सोनीजीको सुनने में इतना और उत्साह आया कि, गुरुमहाराजके मुनानेमें भगवतीसूत्रके पाठम जव जव गोयमा यह पद
१२
आता या नव नव सोनीजी एक एक सोना मोहर
तान पृजामें भेट करते थे अर्थात् ज्ञानपर चहाते थे ।
श्रीभगवतीमूत्र में गोयमा शब्दका प्रसंग ३६ हजार
वार आता है उसमुजिब ३६ सहस्र मोहरें तो खुद
सोनीजोने ज्ञान पर चढाई । प्रति प्रश्न इसी प्रकार
आधी आयो मोहरके हिसासे २८ हजार मोहरें सो
नीजीकी धर्म पत्नीने चढाई और चतुर्थीशके हिसा-
वसे ५ हजार पुत्रवधूने चढाई । एवं कुल ६३ हजार
मोहरं समझ लेनी। कहते हैं कि इस रकममें एक
लाख पैतालीस हजार मोहरें और मिलाकर इन कुल
२ लाख ८ हजार मोहरें ज्ञान-पुस्तकों के लिखवाने में
खर्च करदों । संग्रामसोनोंक लिखवाये सुनहरी चि
त्राम और मुनहरी ही अक्षरोंक कल्पमूत्र मृल-जोकि
चारां मौ के नामसे जैन समाजमें प्रसिद्ध है, प्रायः
बहुत से जन भंडारों में उपलब्ध होते हैं ।
उदारताके माय आप सदाचारी-ब्रह्मचारी-
स्वस्खी मतापोभी परले दर्जक थे। एक वक्तका जि.
कर है-
बगीचकी मर करते हुए वादगाहने नमाम आम
फले हुए देखे. किंतु एक आम ऐसा देखा कि जि-
: पंसी प्रतियां बटोदा मानमंदिग्में महागन
धो हमयिजयजी पुस्तक मंग्रहम मौजुद हैं।
१३ का फल फूल कुछभी नहीं था। वाहशाहने वाग- नसे पूछा, इस वृक्षकी यह दशा क्यों ? मालीने हा-जहांपनाह! यह वृक्ष वंध्य है। वादशाहने कहा, | फिर इसके रखनेसे क्या लाभ ? इसे कटवा दो। समें सोनीजी भी खडे थे, आप राजमान्य भी थे। पने अर्ज करदी कि, वराय महरवानी आप इसे डा रहने दें, मैं इसको समझा दूंगा । मैं उम्मीद रना हूं यह वृक्ष एक सालके अर्समें फल देगा! वा- वाहने सोनीजीके विनयको मान लिया। अब सोनीजी रोज वागमें जाकर स्नान करते हैं र अपनी धोतीका पल्ला उस आमके वृक्षकी जडमें चोडते हैं । साथमें हाथ जोडकर प्रार्थना करते हैं , हे वनदेवतामहाराज! मैंने जन्मसे लेकर आज त परखीका संसर्ग नहीं किया है, अपने ब्रह्मचर्यको गोसेभी अधिक प्रिय मानकर सुरक्षित रखा है। यदि ब्रह्मचर्यका सच्चा प्रभाव है तो यह वृक्ष फल दे। मा भो यही-दूसरे वर्प सव वृक्षोंसे पहले उस वृक्षके प आया तथा सबसे प्रथम ही फल भीआये । वा- नने कुछ फल वादशाहको भेट किये, और सर्व त सुनाई। बादशाह बहुत खुश हुआ और सोनी. को वडे आदर सत्कार पूर्वक हाथी परवंटा मार रमें वाजे गाजे के साथ फिराकर राज दरवारमें १४ ला उतारा और पारितोपिक व पोशाक इत्यादिसे यथोचित सत्कार कर उन्हें उनके घरकी ओर विदा किया। इस घटनाका समय विक्रम संवत् १५२० की आसपासका है । विशेष परिचयके लिये लघुपो- गालीय गच्छ पट्टावलो और संग्रामसोनीकृत बुद्धि- सागर ग्रंथ देख लेना ठीक है । इस पुरुप रत्नकी उत्पत्ति इसो मांडवगढमें थी ?। सहस्रावधानी आचार्य श्रामुनिमुंदर मूरिजोके प्रशिष्य आचार्य श्रीलक्ष्मीसागर मृरिजीने जिन ११ मुयोग्य मुनियों को अपने हायसे आचार्य पदवी प्रदान की यो। उनमेंसे एक आचार्य महाराजका नाम था साथुरत्नमरि । ये आचार्य वडे वैराग्यवान थे, इन. का जीवन चरित्र वडा ही रोचक आर हृदयद्रावी है। ये मूरि महाराज अपने परिवारसहित मांडवगह पधारे । इनके धर्मोपदेशकी नगरमें बडी धूम मचगई- थी, कई धर्मात्मा लोगोंने अनेक धर्म कृत्यों द्वाग अपना अपना जीवन सफल किया। दमो नगरमें जावडशाह नामा एक श्रीमाली माहकार रहता था। उस समय उसकी बराबरी कर- नेवाला अन्य कोई श्रीपाली वहां नहीं था। इसी लिये जावटगाह-'श्रीपालभूपाल' और 'लघुगालिभद्र' इन दो उपनामांसे संबोधित किया जाना था । दम , १५ आचार्य महाराजश्रीक नगर प्रवेशोत्सवमें शुभ कार्याने एक लाख रुपयोंका व्यय ऋषभदेव, धीशान्तिनाथ, श्रीनेमिनाथ, श्री और श्री महावीर स्वामी इन पांच नीय- 'च मंदिर बनवाये। एक ११ सेर सोनेकी और सेर चांदीकी एवं दो श्री जिननिमा वन- न सब मंदिरोंकी और प्रतिमाओंकी प्रनिष्टा हने इन्ही पूक्ति आचार्य महाराजसे करवाई- प्ठामें उदार दिलके जावडशाहने ११ लाख य कियाथा। हरे ! मांडवगढ ! तुझे नगर कहिये कि पु- या स्वर्ग कहिये ? तिम प्रमाण हमें पट्टावलियों द्वारा यहां नक है कि, जहांगीर बादशाहक राजकालनक रीकी ध्वजा खूब फहरानीयो । उक्त बादशा- नगरमें श्री विजयदेव सुरिजीको महानपा स्वी दी थी। स घटनाका समय विक्रम संवत् १६७४ है । अभीतक जिन महापुरुषोंका अर्थात् मंग्रामसिंह जावडशाह और श्री विजयदेवमूरिजीका अन्य - ऊपर किया गया है, वह क्रमसे सोलहवी और सता- रखी सदोके नररत्न थे। अपने चरित्र नायकका समय उनसे भी दो सदी पहलेका होनेसे उस वक्तका मां- डवगह तो और भी ऋद्धि वृद्धिमें चढना था। पेथड- गाहने जो करोड़ों रुपये धर्मकार्यों में खर्च किये, इसमें एक आर भी कारण था। पेथडशाह व्यापारमें निपुण था इतना ही नहीं, बल्कि उसके पुण्पके प्रभावसे यह, मांडवगढके नायक राजा जयसिंहका मंत्री भी था। इसके इलावा उसका पुण्य ऐसा जबरदस्त था, जिधरको वह हाथ डालता चारों हाथों से मानो लक्ष्मी देवो उसका सत्कार करती थी। "पेधडशाहके प्रसिद्ध कृत्योंका दिग्दर्शन." १ आचार्य श्री धर्मघोपमूरिजीके पास परिग्रह प्रमाण ५ लाख टंक रखा था। २ गुरु महाराजसे सम्यक्त्व स्वीकार किया उ- सके उत्सव निमित्त एक एक लहु और एक एक टंककी एक लाख पचीस हजार अपने साधर्मिक भाईयों को प्रभावना दी थी। ३ राजा जयसिंहक मांगनेसे चित्रायल और का- मकुंभ जो उसके पास थे राजाको भेंट कर दिये थे। ४ एक ही रोजमें १६ योजनका पंथ करके गुरु महागजके आगमनकी-(पधारनेको) खबर लाने वाले १७ दमीको वधाईमें एक सोनेकी जीभ-(जवान) और स हीरेके दांत वनवा दिये थे। ५ बहत्तर हजार सोनामोहरें गुरु महाराजक न. प्रवेशमहोत्सव में खर्च की थी। ६ गुरु महाराजकी देशनाको सुनकर १८ लाख खर्च कर७२ देवकुलिका सहिन “शत्रजयावतार" नामका वडा भारो श्री जिनचैत्य मांडवगढमें च. याथा। * ७ सवा करोड रुपया दानशालओं में खर्च किया। ८ हरएक मासकी द्वितीया, पंचमो, अष्टमो, दशी, और चतुर्दशी इन दशदिनों में सातही व्य- निषेधकी राज्यकी तर्फसे मुनादी-(उद्घोपणा) राजा जयसिंहको समझा कर व्यसनोंसे बचाया। १० बत्तीस वर्षकी भर जवानोमें स्त्री सहित वत-ब्रह्मचर्य व्रतका स्वीकारकिया और याव- -(ताजिंदगी) विशुद्ध हृदयसे उसका पालन वाकी अन्य नैनमंदिर कितने बनवाये उनकी लि देनेके लिये अवकाश न होनेसे इतनाही ना पर्याप्त है कि इस कार्यको संख्याफे लिये महोदय " सुकृतसागर" काव्यका चतुर्थ तरंग स्तुत हिन्दी ग्रंथ देख लेनेकी कृपा करें।
, १८ ११ प्रतिदिन प्रातः और सायं. दोनों समय प्रतिक्रमण करनेका नियम। १२ त्रिकाल प्रभुपूजा करनेका नियम । कुछ विशेष-ज्ञातव्य यातें." संसारमें मसिद्ध बात है कि, "जैसा आहार वैसा इकार" मनुप्यके अंत:करणके भाव उसके कार्योसे जाने जाते हैं। मूल ग्रंयमें पेयह मंत्रीके ब्रह्म- चर्य व्रतका वर्णन किया गया है, उसमें खास एक बात बडे मारककी है जो नीचे लिखी जाती है। ताम्रलिप्ती नगरीके भीमसिंह-सोनीने ब्रह्मचर्य व्रत स्वीकार किया उसकीखुशी अनेक ठिकाने समान धर्मवाले ब्रह्मचर्य व्रतधारी धर्मात्माओंको पोशाकेंभेजीं। शासन प्रभावक समझकर पेघडशाहको भी एक पोशाक भेजी। पेयडगाइने आदर पूर्वक वह पोशाक लेली परंतु प- हनी नहीं। पेथडशाहको इस बारेमें कुछ उदासीन देख कर उनकी धर्मपत्नीने पूछा कि, आप इस पो- शाकको उपयोगमें क्यों नहीं लाते ? शेटजीने उत्तर दिया-प्रिये ! ब्रह्मचारिकी दी हुई वस्तु ब्रह्मचारीको ही शोभा देती है, मेरे जैसे कायरोंको उन पुरुपसिं- होंका पेश नहीं शोभना ! हां यदि ने अनुमति दे नो मैं भी ब्रह्मचर्यवन लेकर उन उत्तम पुरुषोंकी पंक्ति में दाग्विल हो सकता है। मैं संसारक विपय मुग्बोंको १९ हलविप समझता हुआभी तेरे आग्रह और लि- जसे भोगी बना हुआ हूँ ! मेरी इच्छाती विरक्त नेकी ही है। स्त्रीने सविनय प्रार्थना की,माणनाथ! तो पत्यनुगामिनी'-पतिव्रता सती स्त्रोका धर्म है जो पति देव कहें सहर्ष उनकी आज्ञाका पालन । आप बडी खुशीसे अपना मनोरय सफल करें, साथमें हो तैयार हूं। वस फिर देरी ही क्या । बडे आनंदसे उत्सव पूर्वक ३२ वर्षकी युवाव- । दंपतिने विधि सहित गुरुमहाराजके समक्ष यव्रत ले लिया। धन्य है ऐसे धर्मधन पुरुप को!! उपकार स्मरण और गुरुनक्ति.” ऊपर श्री धर्मघोषसरिके प्रवेशका संकेतमात्र कियाजाचुका है इस लिये पुनः लिखना पु- है, नो भी एक वात खास वर्णनीय है । वह -जब कभी शाह गुरुमहाराजके अपने पर हुए को स्मरण करता तब उसका दिल भर आता, गद होजाता, हाय जोड कर परम विनीत पत्यक्ष वा परोक्षमे उसके मुखसे जो जो निकलते, उनका लेश मात्र ‘दिग्दर्शन मुकत नामा ग्रेयमें ग्रंथकर्त्ताने कराया है। उनमें से २० वाचकोंके विनोद एवं आनंदके लिये एक काव्य यहां पर उमृत किया जाता है। प्रक्षाल्याक्षतशीतरश्मिमुधया गोशीर्पगाढव- लिप्याऽभ्यर्य च सारसौरभ मुत्य प्रसून सदा। त्वत्पादौ यदि वाहयामि शिरसा त्वत्कर्तृकोपक्रिया- माग्भारात्तदपि श्रयामि भगवन्नापर्णतां कर्हिचित् ॥२॥ भावार्थ-हे भगवन् ! यदि मैं पूर्णमासोके अखंड चंद्रसे निकली सुधा-अमृनसे आपके चरणोंको मक्षा- लन करू, गोशीर्प नामा उत्तम वावना चंदनसे विले- पन करूं, उत्तम मुगंधवाले कल्पवृक्षके पुष्पोंसे पूजन करूं, इस प्रकार प्रक्षालित-विलिम्पित-पूजित आ- पके उत्तम चरणोंको सदा अपने मस्तकोपरि उठाये फिरूं, अर्थात् आप उपकारीको मैं सदा अपने शिर पर लिये फिरूं, तो भी हे गुरु देव ! आपके ऋणसे कवी भी किसी प्रकार भी मैं .अनृण नहीं हो सकता हूं! सत्य है! सच्चे गुरु भक्तोंके गुरुओंमति ऐसे ही- हार्दिक भाव प्रकट होते हैं ! । फैजी नामा शायर फारसींक कविने भी एक स्थान पर ऐसा ही भाव प्रकट करते हुए गुरुकृपाक संबंध लिखा है। पहाए रवेश मेदानम् , बनो में जो नमे अर्जद ।
२१ ला नजर शाजद, बहाए वे वहा गर्दद -“हे स्वामिन्! आपकी कृपांक विना जो जितनी भी नहीं है। और यदि आप है तो मेरे जैसा धनवान् भो कोई नहीं तो मैं वादशाहोंका भी वादशाह त्व के प्रथम अंक में विवर्य मुनि ने एक प्रशस्तिका विवेचन करते हुये पेपर- का वर्णन लिखा है, संभव है कि वह पेयड कि जिसका उल्लेख इस ग्रंथमें है । इतना अनुपान हो सकता है कि, प्रशस्तिमें लिखे श्यमें भोलाकर्ण पालक या। तब भोला लिक होना पेथडशाहके अस्तित्वका समय सारंगदेव पेयडका समानकालोन या। स्य विक्रम संवत् १३३० से १३५१ तकका देवका उत्तराधिकारी भोला कर्ण था, । में गादी पर बैठा था और ६ वर्ष १० दिन तक गुजरातका छत्रपति रहा या। एक पर्यालोचना- नेक लोग शंका करते हैं कि, इतना धन नहीं ? उन महानुभावोंको समझना चा- २२ हिये कि, सदाकाल किसी भी मनुष्यकी या देशको परिस्थिनि एक जैसी नहीं रहती है। आज सुनते हैं कि, पश्चिम देशमें दश करोडका मालिक एक सामान्य हालन वाला कहा जा सकता है। तारीख ९ अगष्ट १९२३ के जैन पत्र (भावगनर-काठियावाड ) से पना चला है कि, अमेरिकन जॉन डेविड्सन शेक फॅलरकी आमदनी आजसे वीस वर्ष पहले वार्षिक दश करोड डॉलर थी! आज तो न जाने कितनी बढी या घटी होगी ?। आज काल हिन्दुस्तानके पोछे दुर्व्यसन थोडे नहीं लगे हुए हैं ! हिंदुस्थानको तो प्रायः व्यसनाने ही नष्ट भ्रष्ट कर दिया है ! कुछ महीने पहले लाहौर (पंजाब)के एक उई पत्र में लिखा मुना था कि, हिन्दुस्थानी लोग गत ११ वर्षोंमें डेढ अरबकी शराब पी गये ! कहिये वह डेढ अरब रुपया हिंदका ही स्वाहा हो गया न ? ऐसी तो फ- जूल खरची इतनी बढ़ गई हैं कि, जिसके उल्लेखका एक वडा भारी पोया सा.बन सकता है ? दिग्दर्शन मात्र देखनेको इच्छा होवें तो "भारतदुर्भिक्ष" नामा पुस्तक देख लेना, आशा है उसके पढनेसे योटी घनोनो बुभ करणकी नींद अवश्य खु- लेगी!
" २३ रचनाका परिचय और उपसंहार' इशाहका वर्णन यद्यपि श्रीमुनि मुंदरमरिकन में, श्री रत्नमंदिरगणिकन उपदेश तरंगि- डेत सोम धर्म विरचित उपदेश सप्ततिमें, साल में, झांझण प्रबंधमें, तथा गुर्जर काव्यसंग्रहमें भी मिलता है* तथापि इसका र पुस्तकका नाम " सुकृतसागर" है, स्कृतमें है । जिसके रचयिताका शुभ नाम श्री रत्नमडनगणि है। इन महात्माका य इस मुजिव निर्णीत है । जन्म-विक्रम ५७ । दोक्षा १४६३ । पंडिन पद १४८ः । उपाध्याय) पद १४९३ । आचार्य पद १५०२ वास १५१७ । इसलिये चरित्रनायक पेय- समयके साथ इस ग्रंयकी घटना बहुत निकट तो है। र लिखा जा चुका है कि, पेयडयाह मंत्रीके चार्योंने एवं पंडित महानुभाषोंने अनेक न उद्धारक पुरुपके सुकृत्योंका वर्णन किया ल मांडवगढका वर्णन देखने घालोंको आ. परी और तवारीख मालया आदि उई-फा- स्तकें देखलेनी योग्य है।
२४ है, परंतु वह मर ग्रंय संस्कृत भाषामें होनेसे आज- कालके संस्कृत विद्याके प्रायः प्रतिपंथिरूप ज- मान में सर्व साधारणको उपकारी नहीं हो सकते हैं। इसी वास्ते इसको गुजराती मापामें किसी प्रकार मिहनत परिश्रम उठाकर-विक्रम संवत् १९७० में अहमदाबाद निवासी श्रद्धालु धर्मात्मा शेठ मोहनलाल मगनलाल होरोने किसीकी मारफत लिखवा कर प्रकाशित कगया है । बेशक ! सेठजी साहवने गुज- रान देशवासी एवं गुजराती भापाके प्रेमियोंको तो पेयडशाहके चरित्रामृतका पान कराया, परंतु इस गु- जरानो भापाके अनभिज्ञ संस्कृनशून्य इतर भाइयोंके लिये तो वही बारांवरसी कालवाला ही हिसाववना रहा ! तथापि " बहुरत्ना वसुंधरा" " परोपका- राय सनां विभृतयः" के हिसाबसे लब्ध प्रनिष्ठ- ख्याति पात्र-स्वनाम धन्य-ग्रान्तमृति मुनिमहाराज १०८ श्री हंसविजयजी महाराजने हिन्दी भाषा मेमियोंके उपकारार्थ यह मुश्लाघ्य उद्यम किया है। आपको सच्चारित्रना, सदाचारकर्त्तव्यपरायणता, विरक्तता, उदारना, उपकारिता आदि अनेक गुणोंसे भरी हुई जीवनोको पढनेसे अवश्य आनंद प्राप्त होना है। आपकी जीवनी हंसविनोद नामा पुस्तकको इसी लेखककी लेखिनीसे लिखी गई है। का इस लघुतम धर्मबंधुपर प्रथमसेही धर्म है और इसी लिये प्रसंग पाकर निजकृत मुझ नाचीजको भी हिस्सेदार बनानेकी रहते हैं। प्रस्तुत पुस्तकको प्रस्तावनांक रह सविनोद पुस्तककी प्रस्तावनाका लाभ इसी सेवकको दिया है। आपने अपनी { अपने नामके साथ सेवकको मिलाकर । जो उपनि, कीहै इस बातका सेवक ऋगी है। अंतिम वक्तव्य. { लघु परंतु अत्युपयोगी आपके लिखे इस प्रस्तावना लिखनेको आपकी आज्ञाको शि- समझकर मैंने यथामनि यथाशक्ति उस पवि- की जीवनोपर कुछ प्रकाश डालनेका उद्यम है । सज्जन गुणग्राहियोंका धर्म है मेरो भूल धृष्टताका ख्याल न कर वह अपनी प्रकृतिक ही कार्य करें। पेयडशाहकं पुत्ररत्न झांझण- एके लिये मूल पुस्तकमें काफी जिकर आचुका स लिये इनके संबंध मैनें यहां कुछ नहीं लिखा ठिक महाशय मूलपुस्तकको देखनेकी हो कृपा करें। पयडशाहक संबंध भी यात्रादिक प्रसंगों पर कुछ विशेप विचार करना चाहाया परंतु स्थान और समयके मंकोचसे इतनेसे ही संतुष्ट होकर विशेप ।ज- ज्ञासुओंको मुकनसागर ग्रंथक देखनेको सूचना करता हुआ संक्षिप्त रुचिवालोंको इसो ग्रंयको साधन्त पह- नेकी प्रार्थना करना हुआ अपनी स्खलनका मिथ्या दुप्कृत देता हुआ पुनरपि ऐसे शुभ कार्यके करनेकी अभिलाषा रखता हुआ पाठक महोदय क्षमा कीजिये मैं आपसे विदा होता हूँ। निवेदक- मुप्रसिद्ध जैनाचार्य १०८ श्रीमद्विजयानन्दमूरि (आत्मारामजो) शिप्यरत्न स्वनामधन्य श्री लक्ष्मी- विजयजी शिप्यमुनि महाराज श्री हर्षविजयजी शिष्य प्रसिद्ध विद्या प्रेमो मुनि श्री वल्लभविजयजी शिष्य पंन्यास मुनि ललितविजय. होशियारपुर (पंजाव.) विक्रम १९८० श्रावण शुक्ला द्वितीया।
28 मितिलकसूरिपादेविरचितं श्रीमंम्पपुर्ग- । पृथ्वीधर (पेथमकुमार) साधुकारित- चैत्यस्तोत्रम् *- बीधरसाधुना सुविधिना दीनादिपु दानिना जयसिंहभूमिपतिना स्वौचित्यसत्यापिना । क्तिपुपा गुरुकमजुषा मिथ्यामनोपामुपा ठादिपवित्रितात्मजनुपा मायामणश्यदुपा ॥१॥ सौपधशालिकाः मुविपुला निर्मापयित्रा सता त्रविदीर्ण लिनविनश्रीपार्थपूजायुजा । लिसुपर्वनिर्मितलसद्देवाधिदेवाव्हय- ततनूरुहमतिकृनिस्फ़र्जसपर्यासना ॥ २ ॥ ले जिनराजपूजन विधि नित्यं द्विरावश्यक पार्मिकमात्रकेऽपि महती भक्ति विरक्तिं भवे । न मुपर्वपौपधवना साधर्मिकाणां सदा विधायिना विदधना वात्सल्यमुच्चीदा
२८
श्रीमत्मप्रनिपार्थिवस्य चरितं श्रीमत्कुमारक्षमा-
पालस्याप्ययवस्नुपालसचिवाधीशस्य पुण्याम्बुधः।
स्मारं स्मारमुदारसंमदसुधा सिन्धर्पिपूनमज्जता
श्रेयः काननसेचनस्फुरदुरुपादभवाम्भो मुचा ॥४॥
सम्यङ्न्यायसमर्जिनोजितधनैः मुम्यानसंस्थापित-
ये ये यत्र गिरौ तया पुग्वरे ग्रामेऽथवा यत्र ये।
प्रासादानयनामाइजनका निर्मापिताः शर्मदा.
स्तेपु श्रीजिननायकानभिधया सार्दै स्तुचे श्रद्धया ॥५॥
पञ्चभिःकुलकम
श्रीमविक्रमनत्रयोदशशतेवदेवतीतेप्वथो
विंशत्याभ्यधिकेप मंडपगिगै शत्रुञ्जयभ्रातरि ।
श्रीमानादिमिनः शिगजमिनः श्रीउज्जयनापिते
निम्बस्थरनगेश्य नत्तलभुवि श्रीरार्थनाथः ३ श्रिये ॥६॥
जीयादु..यिनीपुरे फणिशिराः ४ श्रीविक्रमाख्ये पुरे
श्रीमान्नमिजिनोरजोनौमुकुटीकापुया चपा दिमौ ७ ।
महिः सोयहरोस्तु चोधनपुरे ८ पार्थस्तथाशापुरे ९
नामेयो वनयोपकीपुरवरे१०शान्तिर्जिनोऽर्यापुरे११ ॥७॥
श्रीधारानगरंयवर्द्धनपुरे श्रीनेमिनाथः पृथक् १२, १३
श्रीनाभेयजिनीय चन्द्रकपुरोस्याने १४ सजीरापुरे १५ ॥
श्रीपार्थो जलपट्टा दाइडपुरम्यानद्वये १७ मंपदं
दयावीरजिनामलपुरे १८ मान्धात्मूलेऽनिन:१३ ॥८॥
-- २९ 'धनमातृकाभिधपुरे २० श्रीमङ्गलाख्ये पुरे २१ करोऽथ चिक्खलपुरे श्रीपार्श्वनाथः श्रिये २२ । जयसिंहसंज्ञितपुरे २३ नेमिस्तु सिंहानके २४ जिनःसलक्षणपुरे २५पार्थस्तथैन्द्रोपुरे २६ ॥९॥ आन्तिजिनोस्तु ताल्हणपुरे२७ऽरो हस्तनाग्रे पुरे २८ करहेटके २९ नलपूरे ३० दुर्गे च नेमोश्वरः ३१ । उथ विहारके ३२ स च पुनः श्री लम्बकर्णीपुरे ३३ केल कुन्थुनाथ३४ऋपभः श्रीचित्रकुटाचले३५॥१०॥ विहारनामनि पूरे ३६ पार्चश्व चंद्रानके ७ दिजिनोऽय३८तीलकपुरेजीयाद्वितीयोजिनः३१॥ गिपूरे४०ऽय मध्यकपुरे श्रीअश्वसेनात्मजः ४१ तिकापुरेऽष्टमजिनो४२नागरदे श्रीनमिः४३ ॥१२॥ वलकनामनगरे ४४ श्रीजीर्णदुर्गान्तरे ४५ वरपत्तने च फणभृलक्ष्मा ४६ जिनो नन्दतात् । पुरे जिनः ४७ सचरमः सौवर्तक १८ वामन- मिजिन:४९शशिममनिनोनासिक्यनाम्न्यांपुरि५० (पुरे५१ऽथ रूणनगरेऽ५२योरुङ्मलेऽ५३य प्रति- जिना५४ शिवात्मनजिनः श्रोसेतुबन्ध२५ श्रिये। वटपद्र५६नागलपुरे५७४कारिकायां ०८ तथा धर५९देवपालपुरयोः६० श्रीदेवपूर्वेगिरौ ६१ ॥१३॥ गलाञ्छनो जिनपनिदरनेमिःश्रिये देगते ६ः रे ६४ऽजितोवुकपुरे ६५ मलिश्च कोरण्टके ६६ ।
पार्थो दोरसमदनीति ६७ सरस्वत्याव्हये पत्तने कोटाकोटिजिनेन्द्रमण्डपयुन ६८ शान्तिश्च शत्रुञ्जये६९॥२४॥ श्रीतारापुर७०वर्द्धमानपुरयोः ७१ श्रीनाभिभूसुव्रती नामेयो वटपद्र७२गोगपुरयो७३श्चन्द्रमभः विच्छने ७४ ओंकारेऽभुत तोरणं ७५ जिनगृह मान्धान रित्रिक्षणं ७६ नेमिकिननाम्नि ७७ चेलकपुरे श्रीनाभिभू७८र्भूतये ॥१५॥ इत्यं पृथ्वीधरेण प्रति गिरिनगरग्रामसीमं जिनाना- मुच्चैश्चैत्येषु विप्वहिमगिरिशिखरैः, स्पर्द्धमानेषु यानि । बिम्बानि स्थापिनानि, क्षितियुवतिशिरः, शेखराण्येप बन्दे तान्यप्यन्यानि यानि,त्रिदशनरवरैः,कारिताऽकारितानि१६
अनुक्रमणिका.
विषय
७
डिकुमार का परिचय
रत्न की प्राप्ती
डिकुमार अपने घर पर पहुंच गया
भक्ति
१३
मचर्य व्रत
२०
२३
२४
३०
ર
ज्य के अंदर सात व्यसनों का निषेध
डिकुमार की तीर्थयात्रा
नभक्ति और ज्ञानमंदिर
डिकुमारकी प्रभुभक्ति
लशारोपण
डकुमारका स्वर्गवास
झन कुमार मंत्रीकी तीर्थयात्रा
रंगदेव राजाका मन्तव्य
गावती में प्रवेश और ९६ राजाओं का
रन मुक्त होना
४८
४६
४८
३२
बदेश में शुभागामन
मांडवगह में ग्रन्यकारो की उत्पनि ५०
कविवर मंडन और धनदराजका ग्रन्यागार ५०
श्री विजयदेव मुरीश्वरको मांडवगढ पधारने
के लिये जहांगीर बादशाहका आमंत्रण
जहांगीर बादशाह से मुलाकात
५८
मंडप दुर्ग में महात्माका चातुर्मास
श्री सुपार्श्वनायकी प्रतिमाकी उत्पत्ति और
इसतीर्थकी प्रख्याति
६०
मांडवगढ मंडन श्री मृपार्थ जिन स्तवन ६१
मांडवगढनोर्थका दूसरा स्तवन
मांडवगढ मे श्री प्रमद पार्श्वनायका मंदिर ६४
न्तिनाय प्रभोः पादपझेभ्यो नमः ॥
ant
ॐ
हागिरंपृथ्वी',घरोऽथ पृथु-पुण्यधीः
ताद्यतीर्थश,दा सप्तनिजिनालयम्
वताराख्यं, रदंड कलाशांकितम् ।
दश लक्षाभि,मंडपान्तर चीकरत्
60-
गढकामन्त्री
पेथडकुमार का परिचय:
সা
.
T
परिचय
जोकके समान अवन्ति प्रदेशमें
के अन्तर्गत नान्युरी नामक
थी जिसमें ऊर्ध्व केशीय (1-
वंशका एक देदाशाह नामक
पेयडकुमार. २ सुवर्ण.
E
--
पेय डकुमारका परिचय. गृहस्थ रहता था, जप्तको अवस्था उस समय दारिजय पीमित होनेसे दयाजनकथा जब वह किसी तरह अपनी दरिमावस्था को नहीं मिटा सका तो उसने जंगल में नटकना शुरु किया, कहते हैं कि समय सदैव ए- कसा नहीं रहता, उसके नाग्यचक्र ने पलटा खाया और देवयोगसे उसे 'ना. गार्जुन नामक योगीराज के दर्शन हुए । जब उस महात्माने उक्त देदा. शाह को देखा तो वह प्रसन्न हुया योर उसके चिन्होंसे परोपकारी पुरुप सुवर्ण सिकि" की क्रिया वनलाई । देदाशाहने तदनुसार सुवर्ण बनाया और उस महात्मासे याझा लेकर अपने घर लोट याया। जानकर उसको पर मांडयगदकामन्त्री - + RE न को आज्ञानुसार देदाशाह क्रियाले सुवर्ण बनाता और दीन पुखियोंका मुख र सदैव तत्पर रहता था। उसकी दया और परोपकारिता राबू फैलने लगी और राजा प्रजा झूम हुथा कि देदाशाइ सुग्व रहता है और उसके पास व- अव्य है तब किसी बहानसे जाने देदाशाह को कैद कर- ! जिससे उसको सुपरिन विमला से उसका वियोग हुया, परन्तु जिन पार्श्वनाथ के ध्यान के प्र. { वह आफत शीघही नष्ट हो प्रौर देदाशाह व उसकी पत्नि ल "विद्यापुर" चलेगरे। . - ३ 1. , ८ पेथडकुमारका परिचय. एकसमय किसी कार्यवश देदाशाह देवगिरि “ दौलताबाद” गये, वहां शुन नावसे कर्मों की निर्जरा के लिए उपाश्रयमें जाकर सर्व मुनिराजों का वन्दना करता हुया यह चिन्तवन क- रने लगा कि धन्य है ऐसे मुनिवरों को जिन्होंने संसार को असार जान- कर वोमदिया और मोक्ष की प्राप्ति के लिए ऐसी कठिन तपस्या कर रद्द हैं इसी तरहकी अनेक प्रका- रकी शुन नावनाएं नाता हुआ देदा सेठ श्रावकों के पास जा वेठा । उस समय वे श्रावक लोग एक पोपधशाला वनवाने का विचार कर रहेथ, देदासठ विचार करने लगा कि पोपधशाला बनवाने से महान् पुण्य होता है, क्यों
मांडवगढकामन्त्री
साधुओं की कमी कान गीनी
हे वहां जाकर नव्य प्राणी व्रता
या करते हैं । देवासेठ ने श्रा-
प्रार्थना की कि कृपया यह पी-
ता वनवानेकी मुजे याज्ञा दी.
इसपर श्रावकोंमेंसे एक श्रावक
। कि सेवजी! तुम्हारा कहना
है परन्तु यह पौपधशाला तो
। वनवाना चाहता है अतएव
ही को आदेश नहीं मिल स.
यह सुनकर देदासेठ बहुत
ग्रह करने लगा, इस पर एक
ने कहा कि शेठजी, अगर
का ऐसा ही आग्रह है तो सुवर्ण
पधशाला बनादो ! लेवने इस
को शीघ्र ही स्वीकार करती.पर
PAN
IN पेयडकुमारका परिचय. गुरु महाराजने कलिकाल की विषमता दीखाकर समझाया कि सुवर्ण की पोपधशाला वनवाना उचित न होगा। उसी समयम शहरम एक व्यापार केशर के ५०॥ थैले विक्रयार्य लायाथा उनको कोई लेने वाला नहीं मिलता- था इससे उक्त व्यापारी वमी चिन्ता में था उसको सन्तुष्ट करने व नगर को अपयशसे बचाने के लिए देदासेठ ने केशर के सब थैले खरीद लिये और उनमेंस ए थेले केशर के नरे हुए चूनेमें मलवा कर सुवर्ण मयो पौषध- शाला बनवादी और १॥ थैला केशर का परमात्माकी पूजन के लिए तीर्थो में नेज दिया। देदासेठ की ऐसी उ- * २०॥ गुपयो.
मांढयगढकामन्त्री दखकर सबलोग आश्चर्य क- [ जव यह समाचार राजाने [ वह नी वमा खुश हुआ और देदासेठ का सम्मान करके बहुत के वस्त्रालंकारसे उसको सुशो- किया। *3.83 पुत्ररत्नकी प्राप्ती कस्मत के आगे. फसीकीकुछ नहीं चलती। व हो तेरे होते, के जब तकदीर है फिरती ॥१॥ सौजाग्यवश विमलासेगनीको पुत्र को प्राप्ति हुई। माता पिताने जन्म १९५ ८ पेयडकुमारका परिचय. महोत्सव करके पुत्र का नाम “पेथम कुमार" रक्खा। जब पेयमकुमार योग्य वय का हुआ तो उसको व्याकरणादि की उचित शिक्षाएं दिलाई गई, वह अपने बुझिवलसे कला कौशल्य में निपुण होगया तब उसका विवाह ब- न्धन एक सेठ की पद्मिनी नामक कन्यासे करवाया गया । पेथमकुमार व पद्मिनी आनन्दपूर्वक रहने लगे इनके संयोगसे "मांजनकुमार” नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। एक समय ऐसा था कि देदासेठ पुत्र विना तरसता था अव तो पुत्र क्या, पोत्र का नी सुख देदासेठ को प्राप्त हो गया । फांऊन कुमार की लघु वयमें ही चम- लत बुद्धि देख कर उसके पितामह मांडयगढकामन्त्री को समग्र शास्त्रीय शिक्षा दि. प्रारंन किया। कांफनकुमार शिक्षाएं पाकर विछान हो पोमे ही समयमें अपने कुटुम्ब कर देदासेठ व उसकी विमला स्वर्गस्थ होगये। मकुमार के माता पिता के पर- स हो जाने के बाद पूर्व स गप कर्मों के उदय से उसकी क स्थिति दिन बदिन गिरने द्यपि उसके पिता सुवर्ण सिकि च्या जैसी संपत्ति उसको दे गया किन जाग्य चक्र के फिरने से । वह क्रियानीनष्ट हागई! ऐसी । में जो पेयमकुमार अत्यन्त धैर्य 'करके और अपने धर्म पर कटि- SHIRSANEELINESS 10 पथडकुमारका परिचय न वक रहकर धर उधर मजदूरी कर अपना उदर पोषण करने लगा। एक समय सूर्य समान तेजस्वी तपगहाधिपती श्रीमौनाचार्य श्रोध- मघोपसूरीश्वर विद्यापुर म पधार और व व धनाढय लोगों को धर्मोपदेश देकर परिग्रह परिमाण व्रत धारण करान लगे, उस वक्त पेथमकुमार को गुम्वन्दन करते हुवे देख कर वहां बैठे हुवे श्रावक लोग उसकी हालत पर हंसने लगे और सूरिजो से प्राथना करने लगे कि स्वामीनाथ! “लाख वर्षे लदाधिपती और क्रोमवर्षे कोटो- ध्वज" ऐसे पेथमकुमार को परिग्रह परिमाण व्रत क्यों नहीं देते? इस पर गुरुमहाराज ने कहा कि हे नाग्यवानो! REVIE-HTTER क भाइयगढकाम-धी ~-- का गर्व कली नहीं करना चा. घोंकि लक्ष्मीका स्वताव स्थिर यह चंचलास्त्री के समान एक कर दूसरे के पास जायाही है इस लिये अपने वैचवका मद को नहीं करनाचाहिये ऐसा र गुरुमहाराजने पेथमकुमार को के नाई! तुम पञ्चम अणुवत. ण करो यह बत तुमको इस और परलोक में हितकारी होगा ।। यह उपदेश सुन कर पेयम- वीसहजार रुपयों का परिमाण लगा तब उसके हाथ में यही रेखाएं दिखपमने से आचार्य [ज ने पांच लाख रुपयों का परि- व्रत करवाया और कहा कि हे HINA INE पेथडकुमारका परिचय. श्रावक! तू किसो तरहका खेद मत. कर, ये हंसने वाले लोग अज्ञानी लक्ष्मी क्षण नर में राजा को रंक और रंक को राजा बना देती है तेरा जाग्य चक्र तुझको शिघ्र ही अहो अवस्था में लाने वाला है ऐसा वचन सुन कर पेथमकुमार गुरुमहाराज को वन्दना कर कर हर्पित होता हुवा अपने घर- की तरफ जाने लगा और कहने लगा कि संसार सागर में फंसे हुये प्राणियों को ऐसे सद्गुरु महाराज हो तार स- कते हैं ऐसे निःस्वार्थ गुरुकी जगत् में बहुत ही आवश्यकता है कितनेक अनिमानी मनुष्य गुरु को नहीं मानते परन्तु वास्तव में ऐसे प्राणी, दया के योग्य हैं इत्यादि विचार करता हुवा सर ६५ मांडयगढकामन्त्री sar मार अपने घर पर पहुंच गया। 5 व । देशान्तर गमन. नि मुत्सृज्य गडन्ति । हाः सत्पुरुपाः गजाः ।। व निधनं यान्ति । काः कापुरुपा मृगाः ॥१॥ ह सत्पुरुप और हाथी एक स्थान गगकर स्थानान्तर चले जाते हैं विचार करके पेथा लेठ सपरि- मालवा प्रान्त में जाने के लिये ॥ होगया, कितनेक दिन बाद उधर घूमता हुवा वह मांगवगढ रवाजे पास जा पहुंचा शहर की ।। देखकर उसको वहुत यानन्द । हुवा और शुल शकुन लेकर न- YGESARITRINTENT पेयमारका परिचय. - गग्में प्रवेश किया व व्यापार निमित्त पुकान खोल कर धंधा करने लगा। एक दिन घो बेचनेवाली उसकी पुकान पर आई और नाग्यवश उससे उसको चित्रावेल की प्राप्ति हुई उसके प्रताव से पेथम सेठको दुकानमें अ. बृट घी नरा रहने लगा यह कौतुक देख कर वहां के राजा ने पंथम कु- मार व उसके पुत्र जांझन कुमार को मंत्रीपद देदिया। एक वक्त राजाको याज्ञा लेकर पे- थम कुमार सपरिवार तोर्ययात्रा करने के लिये चला, पहले जीगवला पार्श्व- नाथ की यात्रा करके याबूके पद्दाम पर चढा वहांपर श्रीयादिनाथ नग- वान की यात्रा कर के योपधियों की
मांडयगढकामन्त्री
के लिये जंगल में घूमने लगा
रकार उसको एक बूटी की प्राप्ति
ने उसका मनोरथ सफल हुवा ।
टी के प्रत्ताव से वह लोह का
वनाने लगा जब उसने
बहुतसा
बना लिया तो उस सुवर्ण को
पर लदवा कर अपने स्थानमां-
इ को नेज दिया और फिर श्री
'देव लगवानके मंदिर म जाकर
र करने लगा कि सुवर्ण के लोन
पटकाय
जीवोंकी जो विराधना
है उसके लिये मुजे धिक्कार है,
। स्वार्थ के लिये निरपराध त्रा.
की हिंसा करना महान् पापबन्ध
कारण है खैर जो होना था सो
गया अब मैं अपने सब सुवर्ण को
ने
METARIA
中保平安中路 पेयडकुमारका परिचय. तियोंझार व गरीबों के वास्ते खर्च काँगा इसी प्रकार के विचार करता हवा पथमकुमार अपने घर पर आ कर गरोवोंको दान देने लगा। गुरु भक्ति। एक समय माधव नाम का नाट पथमकुमार के पास या कर बधाई देने लगा कि हे स्वामिन् ! इस लोक और परलोकमें सुख देने वाले जिन सशुरु महाराज का आपने आश्रय लिया है वे ही गुरु महाराज श्री धर्मघोषसूरि थोमे दिनों में यहां पधारेंगे यह स- माचार सुनकर पथमकुमार को बहुत ही यानन्द प्राप्त हुवा, ओर ऐसी व. HERE मांटयगढकामन्त्री ARLIER ने वाले उस माधव ताट को जोन, व हीरेके दांतों की बहुमुल्य वख, पांच घो, और च्छा गांव पारितोपिक में दिया, वाद वहत्तर हजार अव्य खर्च गुरु महाराज का वमा नारी महोत्सव कराया। क वक्त पेयमकुमार हाथ जोम- राचार्य महाराजसे प्रार्थना करने कि हे स्वामिन् ! मैने जो या. ससे परिग्रह परिमाण व्रत ग्रहण है उससे मेरे पास बहुत अधिक हो गया है उसको किस कार्य में ना चाहीये कि जिससे मेरा क. । हो । उसकी यह प्रार्थना सुन गर्य महाराज फरमाया कि ANTASTER ने NOTES पेयाडकुमारका परिचय. मंत्रीवर ! वह लक्ष्मी स्थिर नहीं रहती इसकी तीन गति अवश्य होती है यानि दान, लोग और नाश । अतएव इसको मंदिर और प्रतिमाए बनानेमें व स्वधर्मीवात्सल्य में व्यय कर देना उचित है क्योंकि इन कार्यों में जो पुण्योपार्जन होता है वह केवलज्ञानी नगवान हो जान सकते हैं । इत्यादि समुपदेश सुनकर पेथमकुमारने मांग- वगढ में अट्ठारह लाख रुपये खर्च कर कर देरियों सहित श्री आदीश्वर नगवान का मंदिर बनवाया और न- सका श्री शत्रुञ्जयावतार नाम रक्खा योर पृथक र स्थानों पर न्३ जिनालय बनवाए उनमें से कितनेक के नाम इस प्रकार है १ श्री सिकाचलपर श्री शां-
मांडयगढकामन्त्री
१९
स्वामीका मंदिर. २ योंकारपुर
शारदापत्तन में. ४ तारापुर में
वती में. ६ सोमेशपत्तन में 9
ता में. Gधारानगरी में. ए ना.
में. १० नागपुर में. ११ नासिक
१ चमोदे में. १३ सोपारक में १४
पुर में. १५ कोरमागांव में. १६
तीर्थ में.१७ चंडावती में.चि.
में. १ए चारूप में. २० ऐन्छीपुर
दौर) में. १ चिखल में. २५ वि-
में. २३ वामनस्थली में. २४ जेपुर
१६ उौन में. २६ जालन्धरनगर
२७ सेतुबंध में. पशुसागर में.
प्रतिष्ठानपुर में. ३० वर्धमाननगर
३१ पर्ण विहार में. ३२ हस्तिनापुर
३३ देवालपुर में. ३४ जोगपुर में,
ना
पेगडकुमारका परिचय.
३५ जेसंगपुर में. ३६ लिम्बपुर में. ३७
म्युगदरि मे. ३० सलक्षणपुर में. ३ए
जीणगे (जुनागढ, में. ४० धवलपुर
(धोलका) में.४१ मंकोडीपुर में.४२ वि.
ऋमपुर में. ४३ देवगिरी (दौलताबाद)
में. इत्यादि अनेक स्थानों में सुवर्ण के
कलशध्वजा दएम सहित जिनालय व
नवाकर पृथ्वी को वितपित को उस
लमय उन वे जिनालय पर फाकना हुई
ध्वजा पताकाए अपने हाथों से भव्य
जीवों को स्वर्ग लक्ष्मी प्राप्त करने के
लिय यामन्त्रण कर रही थीं।
20000.00
0000000
एकदिन पंथमकुमार अपनी बीको
कहने लगा कि प्रिया !इस दुनिया
ब्रह्मचर्य व्रताः
मांढयगहफामन्धी २१ वित के समान दूसरी वस्तुओं ली तार नहीं है इसके प्रत्ताव पको करानेवाले नारदपी हेमा वारण कर सोक्ष पालके, सुद ठ की सूलीका सिंहासन होग- इस लिये इस अपार संसार समुज रने के लिये यह व्रत नीका स- है इसके प्रत्नाव से देवता जी कार करते हैं । व्यपना जीवन है इस लिये तेरोइला हो तो लत्रत धारण करूं । एसा नुनकर पवित्र हृदयाने प्रार्थना की किहे मिन् ! आप यानन्द से यह उत्तम अंगीकार करा में अंतगयनालने ती नहीं हैं। पती पत्नी की शंका वारण होनेपर योन्न रूपी पदार
पेयडकुमारका परिचय.
को गकर मार कर और परस्पर के प्रेम
स्नेह को तिलाञ्जली दे कर बत्तीस वर्ष
की युवावस्था में दोनों महानुनावों में
चतुर्थवत अंगीकार कर लिया। और
इस व्रत का एसी सुन्दर रीति से पा.
लन किया कि उनके वचन से तो रोक
लेकिन पेथमकुमार के वस्त्र के प्रजात्र
से ही लीलावती राणीका महान रोग
नष्ट हो गया जो कि लाखों रुपये के
खर्च करने और अनेक मंत्र जंत्र जमो
यूटी आदि विविध उपचारोंसें जी नष्ट
नही होताथा । एसे ही राजा का
पटदस्ती पिशाच लगने से मृत्यु तुल्य
होगया था वह नी मंत्री के वस्त्र -
ढाने से अच्छा होगया इस यनुत च.
मत्कार को देखकर राजाने पांच वन
मांडवगढकामन्त्री २३ तद अव्य से मंत्रीश्वरका स. केया और इसले संत्रीश्वर के महिमा सारे शहर में फैल ADRAGONDA के अन्दर सात व्यसनां का निषेध। panepanarayaparesamayan HiKIRMIRE च मांसं च सुरा च वेश्या धिश्चोरी परदारसेवा ॥ नि सप्त व्यसनाति लोके पति घोरं नरकं नयंति ॥ १ ॥ एक दिन मंत्रीश्वरने राजा से प्रा- की की आप अपने देश में उ. दिखलाए हुवे व्यसनों का लेवन वालों को वें तो बहुत उपकार होगा और त करके इन सात व्यसनों की म हुकुस के जरिये रोक
पेयरकुमारका परिचय.
राक पर्व तिथियोंकोतो अवश्य ही
होनी चाहिये यानि उज, पंचमी,
अष्टमी, एकादशी, और चतुर्दशी के
गंज सप्तव्यसनका कोई सेवन न करे
ऐसा आज्ञापत्र प्रकट होना चाहिये
क्यों कि व्यसन सेवन से नल राजा
तथा पाएमव जैसे महान पुरुषों को
नी
बहुत दुःख हुवा है। यह प्रार्थना
सुन कर और इसको उचित समज
कर राजा जयसिंह देव ने घोषणा द्वारा
सप्तव्यसनों का सेवन बन्द करवा दिया।
पेथदकुमार की तीर्थयात्रा.
एक समय पेथमकुमार विचार क.
रने लगा कि जगत में मनुष्य जन्म
मांढयगढसामन्त्री अखूट लक्ष्मी सम्पादन की कुठ कल्याण नहीं हुवा, न जाने स्या होने वाला है इसकी कुछ नहीं पड़ती। मिट्टी के वर्तन इस देह का क्या नरोमा है य- मनुष्य जन्म सार्थक करने के तीर्थ शिरोमणि श्री सिझाचल- की यात्रा करनी चाहिये । एसा य करके पेयमकुमार ५२ देरासरों त बमा संघ निकाल कर यात्रा । चला । वहां पहुंच कर श्री नर- देव स्वामी के दर्शन पूजन जन्म सफल किया और खूब दान प करके श्री गिरनारजी जा पहुचा । पर योगिनीपुर निवासी. अक्षा. दीन वादशाह से सन्मानित पूर्ण RECE ...HATTEN. .............: से अ- में সমৰ বিষ, नामक अग्रवाल दिगम्बर श्रावक बझा संघ लेकर आया हुवा था। दोनों संघ के लोग पर्वत पर चढ़ने लगे उस स- मय दोनों के आपस में तीर्थ के वायत वाद विवाद होने लगा। एक पद अपना तीर्थ होने का प्रमाण बतलाने लगा तो दूसरा पद जी अपनी नजीरें देने लगा। तब एक वयोवृद्ध पुरुप ने क्वेश निवारण का एक तीसरा रा. स्ता दिखला कर कहा कि तुम दोनो संघ पती साथ साथ पर्वत पर चढी और इन्छ माला पहनने के वक्त सु- वार्ण उच्य की वालोबोला जो यधिक सोना देवे उसो का यह तीर्थ जाय गा। यह वात दोनो संघ पतियों ने मंजूर करलो क्यों कि शूरवीर पुरुष श समका RECTOR मांडयगढकामन्त्री - -- न, मित लोग शाम से, कायर से, स्त्रियां गालियों से और वैश्य पैसे से लमा करते हैं । इस फै- से सब लोग बसे दर्द से रेवन पर चढ़ने लगे और बाल ब्रह्म- चक्रचूमामणि श्रीनेमिनाथ ज- { को ढूंक पर पहुंच कर दर्शन [का लान प्राप्त किया। जब इ. ला पहिनने का समय निकट IT तब लोग इस दृष्यको देखने लये उत्सुक हो गय। पहले पहल श्वर पेयमकुमारने पांच धमी सोने गोली वोलना शुरु किया फिर पर- वोली बढाते वढाने पेधमकुमार न धमी सुवर्ण देने को तैयार हो I, उस समय दिगम्बर संघवीको MAKINGREDITIHATARPRAKISTRI पेयडकुमारका परिचय. अधिक बोली बोलने की हिम्मत नही हुई। तव सबने मिल कर इन्द्रमाला पंथमकुमारको पहिनादी और उक्त तीर्थ श्री श्वताम्बर संघ का स्वीकार कर लिया। मंत्रीश्वर ने इन्धमाला से अपने कंसका अलंकृत करके अपना जन्म सफल माना सर्वत्र मांगलिक वाजेव- जने लगे और सबके हृदय हर्य से आनन्दित हो गये। अन्तमें पेथम- कुमार जन्म जरा की पीमाको मि- टाने वाली आरती उतारकर और गिरनार तीर्थपर श्वेताम्बर संघका स्वतंत्र अधिकार सिक करके पर्व. नसे नीचे उतग और यह वि. चार करके कि देवाव्य चुकाने में माढयगढसामन्त्री २९ व करने से बहुत दोप लगता है अपनी प्रतिज्ञानुसार ठप्पन सोना नाएमारमें देकर देवगुरु तक्ति पूर्वक स्वधर्मी वात्सल्य क- वाद तपस्याका पारणा किया। समय इसरे धम्मोन्नतिके निमित्त ११ लाख रुपये १ वहापर पेयम- र व्यय करके माएमवगढ जान के । रवाना हो गया। -RTHATARNATHERIT (1) "मांडवगढनो मत्री पेघटकुमार" नामक रातो पुस्तकमें "वलीरूपाना टकाओनी ?? व डिओं पीजी पण त्यां सरचना हुवा" माफिक छपा हुवा है यह भूलर लिया गया ऐसा मालुम होता है। (लेखक)
पेयडकुमारका परिचय
ज्ञानभक्ति और ज्ञानमंदिर ।।
MIRMIRE
एक समय बहुमूल्य वस्त्रालङ्कारोसे
विनूपित प्रातःकाल के वक्त मंत्रीश्वर
पेथमकुमार घोमेपर सवार होकर व
यागम्बर से गुरु वन्दना करने के लिये
पोशधशाला में गया। नक्तिपूर्वक गुरु
महाराज
को नमस्कार करके गुरु म.
हाराजका व्याख्यान सुनने लगा, उस
समय गुरुमहाराज जगवती सूत्रका
कथन कर रहे थे उस कथन में वारं
वार श्रीगोतमस्वामी का नाम सुनकर
पेथमकुमार कहने लगा कि हे स्वामिन्!
मेघमाला देखकर जैसे मोर नाचता-
है वैसे ही श्रोवीर प्रजुकी पवित्रवाणी
सुनकर मेरा मन बहुत ही रञ्जित
HASHAILERANA
忠; माढयगढकामन्त्री है अतएव में इसको सम्पूर्ण 1, एसी प्रार्थना करके पांच दि. सम्पूर्ण श्रीनगवती सूत्र (विवाह ति) सुना उसमें श्री गौतमस्वा- । नाम ३६ हजार वक्त आया न- एक एक करके ३६ हजार सुवर्ण रचढाकर ज्ञानको अपूर्व नक्तिको सी तरह नृगूकच्छ (जरूंच) यादि ii में वमे बमे सरस्वतीनएमार [ कर उनमें अनेक ग्रन्थोंका सं. करदिया। TIMIRMIRMIRMITHILIMITESHI पेयमारका परिचय. TERIसा KAKK**KKRIkk* पेधडकुमारकी प्रभुभक्ति। ***K********** धर्मशिरोमणि सुश्रावक पेथमकुमार जैसे राज्य कार्य में तथा व्यापार कार्य में निमग्न है वैसेही परमात्मा की त्रि. काल पूजन करने में नी कनी प्रमाद नहीं करताथा । एक वक्त मध्यान्ह स- मय, केवलज्ञानरूपो लक्ष्मी के कोमा- गृह समान, गृह चैत्यालय में उक्त मं. त्रीश्वर प्रनु पूजन करके अङ्गरचना कररहा था, इतने में सारङ्गदेव राजाकी फोजके मांगवगढ पर चढयाने के समाचार मिले, उसी समय जयसिंह देव राजाने मंत्रोको बुलानेके लिये एक मुनटको नेजा परन्तु मंत्री नहीं मिला तव राजाने इसरा सुनट नेजा
म
माटयगढकामन्त्री
-A ---
[ मंत्री की पत्नोने कहा कि अन्ना
घर देवपूजन में रुके हुवे दें इतने
र तोसरा आदमी पाया और
दासीके साथ प्रार्थना करवाई
सी समय अत्यन्त यावश्यकीय
आजानेसे मंत्रीश्वरजी को महा.
याद फरमा रहे हैं इस पर पद्म.
अमृत जेप्ले वचनोंसे उतर दिया
लाई अली तो दोघमीको देर है।
जाकी याज्ञाका मंत्रीश्वरने पा-
नहीं किया और प्रनु नक्ति में
लीन रहा मगर इस पर राजा कुछ
हुवा और चढाई करनेका मुहुर्न
रुट होनेसे राजा स्वयं मंत्रोश्वरक
पर यागया उस समय देव विमान
। सुन्दर मन्दिर में पंथमकुमार श्री
44
.
KISMATRIKATRITRAKARTY
पेगदकुमारका परिचय.
पाश्वनाथ प्रजुकी अंग रचना कररहा
था योर एकमाली पेथमकुमारको अङ्ग
रचना के लिये पुप्प देता जा रहा
था।जस मालीको जग कर राजा, धी.
रेसे मालीकी जगहपर बैठकर मंत्रीको
फूल देने लगा परन्तु प्रजुनक्ति में मन्न
होनेसे मंत्रीश्वरको कुन नी खबर नहीं
पमी । लेकिन अनुक्रमसे जैसे चाहिये
वैसे फूल न मिलने से प्रधानने मुंद
फिरा कर देखा तो राजा साहब दीख
पमे ! मंत्रीकी देव नक्तिसे प्रसन्न हो
कर गजान कहा कि घबरामत स्थिर
चित्त से पूजा करी में नीचे बैठता हूं
ऐसा कहकर राजा उचित स्थानपर
बैठ गया। मंत्री पेयमकुमार नी अङ्ग
रचनाका कार्य सम्पुर्ण करके राजाके
म
मांडवगढकामन्त्री रहुंचा और नमस्कार करके न. आसन पर बैग्गया। यद्यपि न मिलने में मंत्रीको वमी देर तो नी राजा नाराज न होकर होकर कहने लगा कितुम्हारी नक्ति देखकर मुजे अत्यन्त या- हुवा। यह सव पुन्य का ही प्रत्नाव है मे जी कहा है कि प्रीतिपात्र का, चतुर मित्रका, निलोनो सेव- 1, और निरन्तर प्रसन्न रहे ऐसे मीका मिलना विना पुण्योदय के हो सकता है । अव राजा तथा । विचार करने लगे कि शत्रुने जो ईकी है उसका मुकाबला करना संधि करना इस बात का निर्णय PRATIKHABARTIMIRK
पैगरकुमारका परिचय.
.sunsan
हो जाने के बाद, लमाई की तेयारी
करके फोजको रवाना करदी। थोमे
ही वक्त में शत्रु
सैन्यको पराजय कर
कर जयसिंहदेव की सेना, विजयपताका
फरकानो हुई वापिस आई।
FPER
कलशारोपण।
५२
उपदेश सप्तति नामक ग्रन्थके पे.
यम अधिकार में लिखा है कि सु-
विख्यान पंथमकुमार मंत्रीने श्री मंझप
धर्ग (मांमवगढ) जिनालयोंपर अपने
प्रताप जैसे उज्ज्वल सुवण के ३००
कलश चढाये.
मादयगढकामन्त्री ३७ श्री मंम्प पुर्गस्थ न चेत्य शतत्रये ॥ स्थापय स्वर्ण कुम्लान् प्रतापानिवो ज्वलान् ॥२॥ ENTER PADOSANEEKTARAPXg पेथडकुमारका स्वर्गवास । rancoraemocramerecard यमकुमार अपने शरीरकी अब. देखकर अपना अन्तिम समय ट समझकर शान्तताले परमात्मा यान करने लगा, संसारकी असा- विचारने लगा । वास्तवमें यह र पाणी के परमोटे के समान न- है इस लिये किसी के साथ वैर इन रख कर सर्व जीवोले क्षमा ना करके श्री अरिहंत जगवानका 43 HIKRIT पेयकुमारका परिचय ध्यान करता हुवा, समाधियुक्त, इस असार संसार को ठोमकर स्वर्गलोक को पेयमकुमार प्रयाण करगया। SOHOURS झांझन कुमार मंत्रीकी तीर्थयात्रा। TOPINTEREIFE पिताजी के वियोगसे फांऊनकुमार अनेक प्रकारके विलाप करने लगा। वमंत्री अमीर उमराव तथा राजा, वि विध प्रकार से जांजनकुमार को शोक निवारण के लिये आश्वासन देते थे पर जिसका हृदय पिताके विरह से विन्टल हो गया है ऐसा कांजनकुमार व्याकुलताले अपने दिन व्यतीत करने लगा। इस असें में एक समय कांऊ- मांडवगढकामन्त्री अपने चित्त की शांति के लिय राजके पास उपदेश श्रवण के लिये वन्दना करके बैठ गुरुवर्य नेली समयोचित उप- ना प्रारम्न किया इसस कांफन का शोकरूपी दावानल शान्त । तव गुममहाराज ने फरमाया मंत्रोश! संघको नक्ति करनेसे वि निर्मल होता है इतना ही किन्तु इससे तीर्थकर नाम कर्म । वन्धन होता है ऐसे संघ का पती होना बमा पुर्बन है लेकिन एय के उदय से ऐसा सुयोग सकता है इत्यादि गुरु महाराज उपदेश ले जांजनकुमारने विक्रम । १३४७ माघ सुदी ५ के रोज THATARIALISARMIRMIRITERARY যক্ষা বলি, शुन्न मुहुर्त में तीर्थयात्रा करने के लिये साढाइ लाख मनुष्योंके साथ प्रयाण किया। उस वक्त अनेक वाजिन्न वजने लगे चारों तरफ हाथियों की गर्जना होने लगी,बो हिनहिनाट करने लगे, नाट चारण विरदावलो वोलने लगे, यात्रियों की ललनाए धवल मंगल के गीतगाने लगी। इसी तरह अनेक प्रकारका संघ में आनन्द होने लगा इतनेमें तपागहाधिपति श्री धर्मघोष सूरि महाराज नी सपरिवार संघमें पधार गये। राजान जी रक्षा के लिये सुलट आदि संघके साथ नंजे थे। ऐसे उ- त्तम जलूसके साथ संघ यानन्दपूर्वक रवाना होकर करहेमा गांवमें पहुंचा। HINERY
मांडवगढकामन्त्री
देत्रपाल के उपञ्चको हटाकर
लय का जिणांकार कराकर सात
लवाला जिनश्वर देवका प्रासाद
या। वहां से अनुक्रमस नघ
राज पहुंचा । संघवी ने मोनियों
वस्तिक
प्रमुख
से जिनश्वर देवको
ककी। आवकी यात्रा करके पालन.
, पाटन, यादि नगरों में ही कर
तने क दिनों में संघ निर्विघ्ननाले
| शत्रुञ्जय तीर्थको देखने लगा यानी
से गिरीराज के दर्शन करने लगा।
स रोज वहींपर पमान माल कर मं-
श्वर ११ मूढा गेहूं को (लाल रंग को)
"माण्डवगहनो मंत्री नामक पुग्नक . २..
पृष्ट में " मंच अहिलपुर पाटन में भाया.
हां यात्रा कर, अनुमाम में गभर पर्दन पर
गया, वहां एक ददा यामी गत्यल्प रिग
पंगनुमा का परिचय.
लापसी वनवाकर संघ में बांटने के
निमित्त से तीर्थदर्शन का आनन्द
प्रदर्शित कराने लगा।
यहां से रवाना हो कर पवित्र श्री
संघ वाजिन्नादि नादयुक्त नाटक और
धवत मंगल के बमे ताउके साथ पा-
लोताने जा पहुंचा। वहां श्री सिक
गिरीको ब आनन्दसे यात्रा करके
श्री गिरनारजीकी यात्राकी। कांऊन
कुमार ने सिफाचलजी से रैवत गिरी
तक ५६ धमो सोनेको लम्बी ध्वजा
१. मुंडा गेहूं की लापसी वनाई-अनेक प्रकार की
मन गमती ग्मोर्ड में मयको जिमाए.भाव पूर्वक
यात्रा करके पालोताने आया" इम पकारसे जो
लिक्खा है वह सम्भव मालुम नहीं होना क्यों
कि ?? मृहा लापमो में २॥ लाग्ब मनुष्य नहों
जोम सकने (देखो मृल ग्रन्य)-लेखक.
मा
ATE
प THAN मांडयगढकामन्त्री । इसी प्रकार नाना प्रकार के शुन से अपना जन्म सफल करकं वहां वाना होकर वणश्रलो होते हुवे वती के पास सुकाम किया। २९.९%ati सारंगदेव राजाका मन्तव्य BADRI कर्णावतीके राजा सारंगदेवन अप- नगरी के पास मांसवगढ के संय वकी रचना तथा संत्री के उदार त का वर्णन एक जाट के मुंद मुंह से कर संघके मुकाम पर जाने का वार किया। तदनुसार गजा रवाना कर संघके पमार को तरफ गया। गोश्वरको राजाके शुनागलन को ग्य- : मिलने से अपने पनाव को वाक्टे SXEY.१८.. XEY.HIN:
पेयदकुमारका परिचय. तारण आदि से श्रृंगार कर स्वयं रा. जाको पेशवाई में गया और बमे स- न्मान के साथ राजा को अपने तम्बू में पदार्पण करवाया उस वक्त मंत्रोको पत्नी ने राजाको मो तयों से वधा कर सिंहासन पर बैठाया । राजा, कांफन- कुमार आदिका स्नेह नाव से आनन्द मंगल पूठने लगा इस अवसर पर संघ के बम बमे श्रावकों ने राजा को लद अव्य को लेट की। " तृणं लघु तृणाजुलं तृलादपि हि याचकः” इस वाक्य के अनुसार वह राजा यपना हाथ, किसी के हाथ के नोचे नहीं रखनाथा इस कारण से मंत्री जब गजाको ताम्बुल देने याया तय गजाने उसके हाथ से वोमा ऊपट
मांडयगढकामन्त्री
वह देख कर मंत्री चकित हो
मंत्री ने राजाका अन्तिप्राय स.
कर लोगों को दृष्टि के सामने
नाकर एक दम राजा की पसली
खा पर्यन्त नर दी। कपूर गि-
|गा तब राजा ने अपना हाथ
किया उसी दम लोगों का जय
शब्द होने से सामन्तों के साथ
नी हंसपमा इस कौतुक को
कर सब लोग मंत्रीश्वर के धर्य
चुकि बल का यशोगान करने लगे
कार्य किसी ने नहीं कियाथा योर
1 ने कर दिखाया इससे राजाने
न्न हो कर शहित वस्तु मांगन के
ये मंत्रीश्वरको कहा, तव मंत्रीन
र्थना की कि आपकी आज्ञानुनार
SARAN
TITITIANE
पेयमारका परिचय.
N-.
याप जसे कल्पवृक और अविचल
वचन पालन वाले स्वामोसे किसी न.
चित मौके पर अर्ज करूंगा।
कर्णावती में प्रवेश और राजा-
ओं कबंधन मुक्त होना।
KERALASEARELATE-RECE
उपरोक्त घटनाओं के पश्चात् राजा
सिंहासन से उठ कर सर्व संघवियों
को हाथियों पर विठा कर महोत्सव
पूर्वक अपनी नगरी में ले गया।
एक समय मंत्रीश्वर को मालुम
हुवा कि सारंगदेव राजान ए राजायों
को कैद किये हैं यह जानकर उनको
वन्धन मुक्त कराने का निश्चय किया।
उचित अवसर पाकर मंत्रीश्वर ने
HEATRAILERYSTESHAYA
माडवगढकामन्दी ... को या- प्रार्थना को कि मुज | वचन दिया है वह पूग करने ये अब में याचना करता है जाने फरमाया कि खुशो से कहो। ने कहा कि मैं इतना हो मांग- कि कारागृह में जिन ए६ गजा- जो आपने कैद कर रख हैं उनको कर दिये जाएं । यह सुन कर र राजाकी वा उनको नामने को तो नी मंत्रीश्वर की प्रार्थना कार कर उनको नाम दिये। सर्व राजाओं को कांफन कुमारने एक घोसा और पांच पांच वन्न ण कर के अपने अपने नगर को कर दिये । इस कारण से पूजा र महाजन ने मिल कर मंत्रीधर xxxARMIKATix पेयमारका परिचय 4-..- .... .-4... को “राजबन्दी ठोटक" इस नामकी उपाधी प्रदान की। -७००००० स्वदेश में शुभागमन। Goooooo कितनेक समय तक सारंगदेव रा. जाकी शीतल ठाया में रह कर याज्ञा प्राप्त करने के बाद संघ स्वदेश की तरफ रवाना हुवा । अपने अनुन कार्यों से सब को आश्चर्य चकित करता हुवा और अव्य को वृष्टी वरसाता हुवा संघ पती ताम्रावती (खम्नात) आदि न- गरों में श्री स्थंजन पार्श्वनाथ महा- गजयादिजिनेश्वर जगवान की यात्रा करता हुवा मांमवगढ पास जा पहुंचा।
मांडवगहामन्त्री
जा तथा नगर निवासियों ने
के शुनागमन को खबर सुन कर
पर तोरण पताकाए बंधवाई यार
यानन्दके साथ प्रवेश महोत्सव
या गया। सवारी में राजा के साथ
। पर चढ कर मंत्रीश्वर हर्पनाद
त संघयुक्त अपने घर जा पहुंचा
अन्त में सब काजवित सत्कार
सवको अपने अपने स्थान पर विदा
पा और मामवगढ के सर्व झाति
दोगो को नोजन कराकर और लं.
जक्ति करके राजा का उत्तम स.
र करने के बाद याद्यनार मान
मंत्रीश्वर अपने दिन धर्म ध्यान
व्यतीत करने लगा।
ARMYSTERY RHYMNNARIYAR
पगडमारका परिचय. RE मांडवगढ में ग्रन्थकारों की उत्पत्ति। श्री विज्ञप्ति त्रिवेणो को प्रस्तावना में ग्रन्थकारों की बावत निम्नानुसार लिक्खा है- DARA (३८६.cceeeeeeeeeeee८ ८८९९ कविवर मंडन और धनदराजका ग्रन्यागार। Ferrareverest.es मालवा प्रान्त में मांमवगढ (मंग- पर्ग) इतिहास प्रसिझ स्थान है यह शहर औरंगजेब के समय तक तो वमा यावाद यार मगहर था परन्तु याज नो उसक वैसी ही दशा दे जैसीकी भ मादयगढयामन्त्री त प्रान्तके गन्धार बंदर को।मां पा मांसू जिस समय उन्नति के र पर चढ़ा हुवा या उस समय पर जैन धर्मकी नीवमी उन्न- । उस समय यह स्थान जैन में मालवा प्रान्त का कन्डगिना | था। वसे २ धनाढ्य और ल. धकारी जैन वहां पर रहा करने कहते हैं कि वहां पर उस समय यों की कई लाख को संख्याध।। त से क्रोमपती योर लझाधिपनी इस शहर की शोला को बनाये। हा जाता है कि उस समय इल गदर एक जी गरीब श्रावक नही था। 'कोई दारिपीडित जैन बहार से शहर के श्रावक लोग KRAM.C1C1UHI1-1. ताथा तो 12 पेयकुमारका परिचय. एक एक रुपया उसे सहा यतार्थ देते और इससे आगन्तुक मनुष्य अ- ही सम्पत्तिवाला बनजाता था। जैन इतिहासके देखने से पता ल- गता है कि मंत्री पेथम, जांऊन, जा. वम, संग्रामसिंह आदि अनेक श्रावक यहापर हो गये हैं जो विपुल ऐश्वर्य और प्रन्नूत-प्रनुता के स्वामी थे। इस प्रकरण के सिरे पर जिन दो जाताओं का नाम लिखा हुवा है वे नो ऐसे ही श्रावकों म सेथे, ये श्री. माली जाति के सोनोगिरा वंशके ये। इनका वंश बमा गौरवशाली योर प्रनिटित था। इनका सम्पूर्ण वर्णन करने का यहां स्थान नहीं है। मंत्री मंमन और धनदके पितामह का नाम , ANA माइयगढकामन्त्री ::, ................ य ए था। इसके १ वाहम. वादन हरू. ४ पन. ए याददा. ६ पाहु क व पुत्र थे इनमें से देवन योर तो मांगवगढ के तत्कालीन वाद- बालमशाह के दोवान थे और के अन्यान्य व्यवसायों में व्यग्र- । इन ठ लाश्यों के बहुत नन थे (जनमें से ममन और धनदराज प प्रसिक थे। मंमन बाहम का टोटा पुत्र या योर दराज देहम का एक मात्र सनका ।। इन दोनो चचेरे लाश्यों पर. ल. सरी देवी को जैसी प्रसन्न दृष्टिधी वनी सरस्वती देवो की ली पूर्ण कपाधी : निये जेसे बने नारी श्रीमान से ही उच्च कोटिक विछाननी । थे
पेयकुमारका परिचय.
,
मंझन ने व्याकरण, काव्य, साहि-
त्य, अलङ्कार और संगीत आदि निन्न
२ विषयों पर मंमन शब्दावित अनेक
ग्रन्थ लिक्खे ह । इन ग्रन्थों में से
यार नौग्रन्थ तो पाटन के नपरि
जल्लिखित-वामी-पार्श्वनाथ के नं-
मार में मंगन ही के (संवत १५०४
में) लिखवाये हुवे विद्यमान हैं। इनके
नाम इस प्रकार हैं-१ काव्य मंगन
(कौरव पाएव विषयक).२ चम्पू मंगन
(जीपदी विषयक). ३ कादम्बरी मं.
मन (कादम्बरी का सार). शृंगार
मंगन. ५ अलंकार मंगन. ६ संगीत
मंगन. ७ उपसर्ग मंमन. सारस्वत
मंगन (सारस्वत, व्याकरण पर विस्तृत
विवेचन) और ए चन्द्रविजय प्रवन्ध ।
मांडवगहामन्त्री मन के जीवन चरित्र के विषय के मित्र महेश्वर नामक कोने मनोहर नामक लात लगा का छोटासा काव्य लिग्वा उनमें के पूर्वजों का योर मनन का में जीवन वृत्तान्त उल्लिम्बिन है। को नी दो प्रतियें संस्न कीलिम्ब हुई एक ही लेखक की लिग्बी उक्त नाएलार में विद्यमान हैं। मंगन की लांति धनदराज या घ. नी वमा अच्छा विहान था। नदत्रीशती" नामक एक प्रन्ट ग- नर्तृहरोकी "शतक बरी का अनु. रण करनेवाला, उसका लिया हवा । यहां पर इसका विशेष उल्लेख नही । व्याजाताहै तो जी इतना अपर EXCY.
पेयडगुमाग्या परिचय कह देना चाहिये कि इन प्रथों में इनका पाएिकत्य और कवित्व अच्चो तरह प्रगट हो रहा है। CENTREAKIN + श्री विजयदेव सूरीश्वरको मांडवगढ पधारने के लिये जहांगीर बादशा- हका आमत्रण. अकवरके पोठे उसका लमका ज- हांगीर बादशाह देहली में तख्तनशीन हुवा' और पगाव डालकर मांझवगढ़ में रहता था। उसने फरमान लिख * मुम्बई के श्री अध्यात्मज्ञान प्रसारक मंटल की तरफ से गुजरानो लीपी में छपी हुई जन पनिहासिक राममाला प्रथम भाग की ममालो. चना के २६ व पृष्टपर श्रीयुत् मोहनलाल दलो नंद दमाई पो. ए. एल. एल. बो. ने लिखा है उससे उधृन । लेखक प्राम म 434 मांग्यगलकामन्त्री श्री विजयदेवसूरीश्वर महागल यपने पास बुलवाया । उस वक्त विजयदेव सूरिजी ग्वम्ञान में बि. मान थे। फरमान पढ़ कर उन रेजी मांगवगढ़ जाने के लिये रवाना । और नेमिसागर को राधनपुरसे गाय । नेमिसागरजी अपने साथ रसागर, नक्तिसागर,प्रेमसागर, शु. सागर, श्रीसागर, शांतिसागर. गाण गरयादि शिष्यों सहित राधन- रसे मांगवगढ जाने के लिये निकले। व वहाके संघने कहा कि मार्गम हनपुर पहामी गांव याना है और ले नाम तेले गुणवाली नापिनी. मालिनी नामक नदियां यानी इस लिये बनी सावधानीले पधारना। ना ........... .........., धर्म पगढकुमारका परिचय. प्रजावसे सब अच्छा होगा ऐसा कहकर गुरुवर्य अहमदावाद होकर बमोदे प- हुंचे । वहां श्री जिनेश्वर देव के दर्शन किये और विगयका त्याग कर आ. बिल; नोवी, यादि तप करते श्री मांमवगढ पहुंचे। जहांगीर बादशाह से मुलाकात מקננגגגגגגגגגגגגממנגנגנגר मांमवगढ पहुंचकर सब मुनिजनोंने श्री विजयदेव मूरिजी को वन्दन किया । सूरिजो की बादशाह के साथ मुला- कात हुई और वार्तालाप से खुश होकर श्री विजयदेव सूरीश्वर को “ सवाई महातपा" नामक उपाधि प्रदान की। श्रावक लोग प्रतिदिन महोत्सव करने HERE NIRTHI माटयगढयामन्त्री ८९ । फिर नमिसागर नपाध्यायजी गीर बादशाह को मिले वहां परबाद । उसमे जीतनेसे बादशाहने सागरजी को " जगजीपक "ना. विरुद दिया। मंडप दुर्ग में महात्माका चातुर्मास उक्त गसमाला की समालोचना के तीस वें पृष्ट में लिख्या है कि संबन ३१६ में जो महाशय श्री हीर विज- सूरीश्वर के हस्त दिक्षित हुयेथे ये कल्याण विजयजी उपाध्याय श्री रुपाचल धर्गको यात्राकरन को पधार- प्रे और चातुर्मास तो वहीं किया। ४.४.१ . ::.:.................
58 पथदमारका परिचय 0000000000 2000 श्री सुपार्श्वनाथकी प्रतिमाकी उत्पत्ति और इसतीर्थकीप्रख्याति । 200 boone 00000 उपदेश तरंगिणी में लिखा है कि वनवास में श्री लक्ष्मणजीने सीताजी के पूजन के लिये सातवें श्री सुपार्श्व- नाथ नगवान की मूर्ति बनाई उस मृति के सबब से इस तीर्थ को प्रग्व्याति और चैत्यवन्दन में नीचे लिखे माफिक कहने में आया। " मांझगढनो राजियो, नाम देव सुपास। ऋपम कहे जिन समरतां, पहुंचे मननी श्रास ॥" .
FA मांदपगढयामन्त्री मांटवगढ मंडन श्री सुपार्च 4 जिन स्तवन णपुर में पान जिनन्द त्याग || वाल ॥ । फाग। विगढ में सुपार्श्व प्रनुजी, प्याग वि० ॥ए अंचली ॥ वास में लक्ष्मणजीनए, पजाया जिन विंबलारा मांमव. ॥१॥ ता सतीको पूजन ग्यातर, | जनमन मोहन गारा मांझव.॥२॥ ल प्रजावे वन मय मृर्ति, गई तेजे जोसा तारा मांमय. ॥३॥ जुत महिमा अखंम प्रनुका, कट सब फेटण हारा. मांडव. ॥४॥ सवाहना हिंदोले जिव्दापर. जो जिन गुण गायन कारा.मांकन॥ ... .....::YEAR.25 पेण्डकुमारका परिचय. मांडवगढतीर्थका दूसरा स्तवन। BreastercsnesaHRESReal ॥ जावी जावो नेमि पिया, थारी गति जानो रे-ए देशी. तोरथ पवित्र मांगवगढ, मनी हागरे. आंकणी. तोहां शोने शांतिनाथ, सातमा सुपार्श्वनाथ । विजयानन्द सूरीश्वर, मृतिरूप प्यारा रे ॥ नीरथ. ॥ १ ॥ गमचंड लक्ष्मण वीर, सीतासती यति धीर । प्रज पूजा शिव सुग्वकारा रे। तीरथ.॥३॥ प्रमद पारस प्रज, जगतना एतो ऋतु। M करी हां, -- पर मांदयगटकामन्त्री वल तमनु तुं, जीवन याधारा। नीरथ. ॥३॥ ते पार्श्व प्रतुनु कोधु, स्तोत्र जिन चंझे लिधु। संसार दावानी सम- स्यायकी प्रचारार ॥नोरथ. ॥४॥ पेथम कुमार मंत्री, फांऊनकुमार तंत्री। संग्राम सिंहजेन योहा, पुण्यना मागरे ॥तीरघ. ॥ ५ ॥ मोटा मोटा ग्रंथकार. ज्ञानकोशना नरनार । मंगन का धनदराज, जैन सारा रे ॥ नीरत्र. ॥६॥ रतन बाई साथे यावी. शिवकोर चाई संघ लादी। २२.५ ::.1:.:.:..
যমান্ধা যদি, ओगणी से तांतर, साल उदारा रे ॥ तोरथ.॥७॥ गुरु लक्ष्मी विजय सारा, हंस विजय स्तवन कारा। यात्रा करी मेरु तेरस, दिन रविवारा रे । तीरथ. ॥७॥ ENERATARASIKARK मांडवगढ़ में श्री प्रमद पार्श्वनाथका मंदिर। Pranamamaraat " संसार दावानल दाहनोरं" इस स्तुति की समस्या पूर्ति वाला प्राचीन स्तोत्र उपलब्ध होता है इससे सावित है कि पेइतर इस मामवगढ में श्री प्रमद पार्श्वनाथ का जिनालय था। उक्त स्तोत्र निम्नानुसार है- ॥श्रेयोदधानं कमला निधानं, पार्श्व स्तुवेहं प्रमदानिधानं ।
माइयगढकामन्त्री इत जुष्ट दोपं । प्रेयसं श्रीसहकार की बार दावानल दाद नीरं ॥१॥ डूंत दोपं कृतधर्म पापं. मुक्त योपं कंवल श्री रमणेक वी, मोह धूली दरण समीरं. ॥ २ । निंद्य विद्या बदनं वदान्यं. व स्तवीमि त्रिदशेन मान्यं । म क्ष्यादाप्तत्तवाब्धि तीरं. पाया रसादारण सार सीरं ॥३॥ यमंद मंदार सुदाम दिव्य. प्रसून सारे महितं हि पाये। स्फूर्ज द्यशस्तर्जित हारही नमामिवीरं गिरिमार धीरं ॥४॥ निःशेष लेखबररेख नरेणु काम. दानंददान महिमादनुतनाग्य धेय । RRITAMARITTER पेयडकुमारका परिचर. श्रीपार्श्वदेव जयजन्म जरा पहेन. लावावनाम सुरदानव मानवेन ॥५॥ निःमंग रंग गरिमादि गुण प्रधानि, निचिन्न उद्मतिमिराणि मनोहदानि। शक्ति प्रणम्र नर नायक नागलोक, चूला विलोलकमलावलिमालितानि॥६॥ कल्याण कारणतराणि गतापदानि, संपत्पदानि दितनि ममतानि । निस्सीमनोमनवनीति विनेदकानि संपूरिता तिनत लोक समोहितानि ॥ वामय गंयगुण मानविगान मुक्त, पद्मावती धरणराज वर प्रयुक्त । यजन्मसंयममुखानि शिवंकराणि, कामं नमामि जिनराज पदानि तानि ।। तापाच्छदं दिशदनुदिन प्राणिनां ना- वुकानां, सिकंयस्यामृतरसमयं तुम कुंमात्प्रवृत्तं ॥ जात्यईस्ते सुवचन सरः मा मांडायामन्त्री पंकापट्टारि, बोधागाधं सुपदपदयों पुरानिरामं ॥ ए॥ वाताव हिमल ला नर्मदा शर्मदापिकासोः कानी पहरिणी तुंगनातिलजा ॥ तुंगा । जिनमतसरी नातमतः पवित्रं. वाहिंसा विरललहरी सगमागाह ॥१०॥ नोनोजव्या यदि शिव ! मोक्षालदमीवुनुक्षा, सिहांताब्धिं मनुसरत प्रोतसन्न्याय । निर्णि तः परम गरिमा गारमानंद हेतुं.. वेलं गुरुगममणी संकुलं दूरपारं ।।११।। होह क्षितिम्हसमुन्मूलनेदम्तिह- तं, प्रोद्भिदंतं परमतरजः पुंजमुन्नत शस्तं ।। संसेव्यंश्री जिनजनगा: का. मदंसंश्रितानां, सारंवीरा गमजतनिधि सादरं साधुसेवे ॥१॥ नक्तिप्रतारनम्रा VERY पेयमारका परिचय. मरवर निकरे निर्जर निर्मिनायत् । पादाधस्ताहिदाग बसर मवनियु- ध्यप्रबुद्धस्यनेनुः॥ उत्तप्त स्वर्ण वर्णानव नव कमल श्रेएयनुश्रेण्यवाधा, या. मुलालोलधूली बहुलपरिमला लोढ लोलालिमाला ॥१३॥ नावोग्नुनप्र- मोद प्रजुत विनतिनि भूरि नक्तिं वि- धत्ते, यापार्श्वशक्रमाब्जे तव विपुल रमा प्राज्यराज्येन सार्ध । तस्य स्थर्य नजेत प्रगत चपलता संततं पट्पदाली, ऊंकारागवसारा मलदलकमला गार भृमीनिवास ॥ १४ ॥ यस्मिन् गर्ना- वतीर्ण गवति धनदः प्रत्नरत्नः सु. चलः, कल्याणैर्दिव्यवर्ण रनणु मणि गण गंधवासर्ववर्प । श्रुश्रूषां कर्तुकाम त्रिदशवरगिग सुंदर मंदिर बै, वाया "MARGE
HTTE
मायगदकामन्त्री
रसारं बरकमलकर तान्द्रागन्नि.
।। १५ ।। पंकोत्पन्नंग्जबि प्रव.
र जमा संग मुचे विहाया, ईवना
निवासं निरूपम परमं याव्यधादना
त्वं । श्रयो लक्ष्मी विलास जगवन
दे चंचंड प्रत्नाव. वाणीनंदान
ई नवविरवरं देहिम देवि नारं
१६ ॥ इत्यत्री पार्श्वदेवविलवन
जयी जैन नमहिलेवः, श्रोनिकांन
जोहिनयनतमुनिजनचन्द्रो वि.
न्छः। श्री मन्नोमानपप्रा-गृदय
गरिशिरो सामनं जीवगजी. राजीव
वास हेतुः प्रदिशतुकशा श्रेयने श्री
विलासम् ॥१७॥
शुद्धि पत्रक. पंक्ति अमृद्ध फलामांकितम ६ २४ ५ १२ हागह मपधार कोय मंदिग्म तारापुरम पश्मागरम वधमान होगय संव १४ १२ शुद्ध पृष्ट कलशांफिनम् ? झाहग्ने होगा में पधारे १० तीर्थ मंदिग्में १५ तारापुरमें १९ पशमागरमें १९ वर्धमान १२ होगये सबक शहरो है? पाव मोनियोंसे ४२ राजाओंका ४६ घटना आभार उसकी ५० श्रावकॉमेसे ५२ श्रीमान् ५३ लिखे शहरा ३४ मानयोंसे राजाक घटना आद्यभार ६ श्रावकोम श्रीन लिखे १३ १२ ११ १५ ४ 37 RETRETCREEN हंस विजयजी जैन फ्री लायचे. रीमा मळनां पुस्तको. -- . पुस्तकनुं नाम. कीमन. नीतिदर्पण 0-1-0 १,७ माणोशकार भंट हंमविनोद स्नात्रपुजा नवनवमंक्षिप्त नार नर्मदामुदगे या भेट गोलवनी कया भेट १,१७ तिथि नए माणियमाला ०-१-० २,१३ गईली संग्रह श्री नेमिनायनो पृना हीरपन १९ अष्टापद पूजा न शुकरानक उपाय, ८.११. होरप्रश्नावली লাইন लणमागडो मोटो पोर-अमदावाद GORAVEER - १० धर्मविधि प्र० प्रश्नोतर पुष्पमाला श्री सविजयजी जैन की सायत्र- रोमां मळतां पुस्तको. भेट UNY पुस्तकनुं नाम. कीमत. १ श्री कावितीर्थ म्नवनादि मंग्रह २ श्री मंगद्रुम कंदलो भेट १ श्री गली मंग्रह भेट ४ तत्वामृत भाषान्तर सहित ५ लाहोरमें श्री विजयसेनमूरिकी पधरामणी 0-2-० ६ सजन मदपदेश भेट ७ श्री समेतशिखरादि तीर्थयात्रा प्रवास ८ गिरनार मंटन श्री नेमिनायजी- की अष्टोत्तर शतनकारी पृजा ०-८-० लायंत्ररीनो प्रचार केवा प्रका- रनो होवो जोडग. भेट १० श्री लोकतन्त्र निर्णय ग्रंय भाषान्नर मदित ०-८-० ठे, लहेरीपुरा, बडोदरा. KY M M USY
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