Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Mahakvinaye Purane Jhrokhe

Bachan · 2010/12

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नये
भारत
निबंप
सप्रह
सन १२-१ मिक्षित

२की में संगत (बसपा). मोरतो (मनुवार) पुरा और नाकार परती मोरगारे रस्स-उप. । प्रवक्पवित्र । मिलन मिची ११ सारी १२ममा - १४ लास ११ समितीm बचना आम रचनारी २. एकतर १८ निरा निमंत्रण एकनारा. १ मानाm २१ मारपहर २६वामी पगाल्प (मनु) ' समरमान कामाला (अनुपये। १४ मारकरार-पाच मान (AAP) २५ मामिसरनाम्य माग (चित्र) प्रानिहरमाई-वीसमाजावित) शकायत पर अनुषा) सपनसावा (समर) ५४ मोप्रय (समय) २५ माधुनिक(लिन (Pana) ५ किमान ६ (ग्रारित) भातमोडविभिन्न(माप्त रियलकार पर पनमोRA महो।

नये पुराने
सार
GREETIME
बच्चन
राजपान र सन्ज़ दिल्ली-

मूस्य ४०
प्रथम संस्करण
फरवरी १९१२
.
प्रकारक
राजपास एप सम्म विस्ती
कार्यालय प्रस
पी.टी. रोज पाहप रिस्मी
समीरी मेट रिली
.
सुमाम्वर प्रेस रिन पुन रिस्मी

समपण
स्वर्गीय नवीन बी को
तपा
माई भगवतीचरण वर्माको
निनके स्वरों ने एक दिन
मेरे स्वरों को पह दी थी।
बीनबत्मदिन

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७.
अपने पाठकों से
मबीन पी एक संस्मरण
करियर मधीमी
'यह मतमाता-निरामा ११
प्राचार्य चतुरसेन पास्त्री एक संस्मरण
पिरिषर धर्मा परम' एक संस्मरण
प्रेमचंद एकसंस्मरण ८५
किमोरीतास मोस्वामी एक सप्ताह की भेंट
समकालीन विी कविता की गतिविधि
स
भावुनिक हिंसी कविता में पुर १०२
पामुनिक हिरी कविता में राष्ट्रीय मावना
पीठ काम्प की परंपरा परिमापा और हत्प
मेपरचमा-काल १२६
मेरीकरिता सोपान १३०
मैं और मेरी 'मधुपामा' १५
मेरी रचना प्रश्मिा १m
मनुवाद की समस्या ११२
कवि सम्मेलनों कुमाए-मीठे अनुभव १५५
कवि सम्मेमों के कुम और पनुमय ११
प्रपोंबीचो सास
केमिय में विद्यार्थी जीवन ॥
१२४

६
मेरी स्मरणीय बत्तयान-पात्रा १८१
पेरिमपम का प्रदर्राष्ट्रीय काम्प समारोह १६
पौम्म-आपरी साहित्य १९२
विलियम बटर सि १९७
जेम्स वायस मोर यूलिसीर २..
सरवटीर और बाल विकयोट २०१
प्रेमर और पोशल २१.
पंत पौर मा पौर का परि' २१५
हमारा राष्ट्रीय गीत २२७
पांबी-सी २४१
भारत फोफिता सरोजिती माया २४
बापू पुष्पोत्तमरास टंडन एक सस्मरण २४८
ममरलाय २४५
कदमीर मामा एक संस्मरण २५९
फार्म २५

अपने पाठको से भाष पाप हापों में अपनी एक नई पुस्तक रहवे हए में बरी प्रसन्नता का अनुभव कर रहा। नए पुराने मरो मे ममे पिछले मपभम तीस पों में सि पपने निको पार मार्गों का समयन किया है। इनमें से प्राय सभी समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एक रेडियो से प्रसारित हुए है। मेरे गाव मे पानों पार भोगायों की यह स्पा थी कि इन मेवों को एक जगह संपहीत कर दिया जाए। इम सबको ए-होकर रहा करता मुखाने पोका काम मासूम होता पा कि मैं उसे बराबर धमता मा रहा था। पर इस संरंग में मेरे प्रकार का भी प्राप्रहहा है। पुस्तक बिस स्म में मापके सामने है प्राधा समठे पापको संतोष होमा । पपने सच मेडम के विषय में प्रापका प रोचक बाते बताना पाहण। पान तो सोम मुझे प्राय कमि में ही मानते है पर एक समय में सोचवा पाकिम पर ही बनमा पौर अपनी पहली रचना पच की ही प्रकाशित करना पाया मा मुम यार है कि अपने विधार्थी मीन में मुम्दै हिंदी निबंधों पर अपनी बया में सबसे पपिक मेयर मिसा करत। मेर हुप सहपाठियों में मुझे एक बार नियों को पाने की सलाह दी पौर में मेस मी पहा। प्रेस बामे से मने पूछा कि एक कापी की छपाईका क्या नया होगा पा तिरासिक से हिवाय तमा ममा कि एक फितार की साई काम इतमा तो १.. किताओं की माहा बाम विना वा इन 4 में एक किताब पेपी ठो जितने पैसे में पका कर मईया वचने में कितनी किवा इस कमी। पर जब प्रेत गाने प्रार्म पर यम और पौरबाने कागजों की बात करनी मुक को तो म पम पमध पर उसने मुझे ममा विमा-एम्पायर प्रेस मा कम दिनों मेरे मुस्ता पर (प्रभास) पर सबसे निकायब भव। १९५८ २५ सर कीया से रसबोर कायस्थ पाध्यामा प्रयापके मर-अपने करो विद्यार्थी के सपमें मुझे गप-मेधन पम्पास का एक प्रया सुयोम मिल गया। हिषी-उत्साही पानी प्रसाद श्रीवास्तव-मन माम से उनकी एक पुस्तक भी पार को पपी पी-पौर णिमादित्य सिंह के उघोग से पाठसामा में हिवी-समिति की स्थापना हबी। साहित्य-पापना में ममे पो तो रोगों का पायावाद-काम के कवियों एवं माट्मकारों में कम ऊना स्थान म होता । पिपापियों की एक हस्तलिखित पत्रिका निकमती पी-पाप । उसके संपादक माया सिंह पे-हार माम से उनका कहनी-संबह भी पार को प्पा पायर और एकाधिक पुस्तः पनकी निम्मी-पेरे सर्वप्रपम पाम-संग्रह वेरा हार के मामकरण में उसकी प्रेरणा पीहोगी। मेरे पार मोतीपी वह होते थे। पत्रिका के लिए प्राण हए मेसो को एकस्मता देने के लिए मुझे सबको एक भाकार प्रकार के कामों पर सिपने का काम मिमा करता पा । उससे मेरी कसम पर सभी होगी। ऊंची कपा में पहुंचने पर घमौमिक भी नियने मया। हाई चूम तक पहुँचते-पपई मुझे जीवन में अपनी मारु गाहों में जान मिया--जीने पापे कमम पिसना पीरा सोय मीरस मगाम की पोर फिर माए मुस ग. सत्य प्रकार (पायर ग. बार को हुए) पब में पी. ए. में पहुंचा। उनसे परिचय पार्यकुमार समा में हुमा था। उन दिनों में मर्ष कर येथे साप हा विहान' पत्रिका का सपारन भी। मेरा एक रिपप पनपा। उप मपमी प्रतिपय मामुश्ता को संयमित करने के प्पेप में कुष आर्य समाजवर्ष-प्रवर प्रभाव से पर सबसपपि विमाम-प्टि ग. सत्प काम की अंगन में पर्मनी बुनियारी (रेशनलिस्ट) पानिको में विषापित रवि मेने मपा। मपापा पा हेषित की दरिम प्राफर नियस । मरम प्राय पीने सो पुस्तक पर मुमम एक मेस मियने मे पदा। मे दिम पौर मीर' पीक से मग मिया रिस उन्होंने विमान में प्रपाणित .या १९२८ २९ क पूनिपमिटी बरो बिमी मान में। परमी रा नाम पाने पर पो पुगपुरी मेरे प्रपर पी उसकी तुलना में म र मी मण्या । वादी मिमा उगी हापों में मने बिहामनी एकापा पमा री "मेरा भरा पा परिएगा।" इस प्रकार सर्वप्रपम ममापित होने पामा मेय ए निरंप पावन में गुर विषय पर । वसी में पुम पार रोग मिय प्पने पासे १ गमै नो पाव में नष्ट कर पिए पए। १६. प्रारोशन में एम.ए.की पाई बोड़ने के बार उसके हो परने पर १९५१में किसी समय नौकरी की तलाश मे मैं बाद कार्यामय में पा मटका-उसके संचालक पे रामरतसिंह सहगत-हिपी प्रकाशन में पहली बार प्रचार का सिंपार पटार, प्रम-परक्कामाने-मचाने वाले । मेरी बी ए को प्रपम पेशी-एक विपय मेरा हिंदी पा से प्रभावित होकर सम्होमे मुझे चांद के सहायक संपापक केस में समिमा भुकवेष राम रापारक। सहमत मुझे हर सप्ताह कुप किवा देते पार कहवे इनकी सहायता से मेल मिलकर नामो। महीने ग महीने में उन्होंने मुम्स पाये पर्बम मेव निवाए। एक दिन मुझे बुधाया पौर गटना मुक किया पपा मेवा मिखा है मसिर न १८ ममापा म भाव तुम्हारा काम खत्म भयो महीने प्राफर तमस्याहस पाना।"-उनमाह मेरी सायद नामीस रुपये महीने निमत हा पी। एक महीने की नसाह पाम करने के लिए मुझे पाय प्रेस के दीन कम पामीस पार कराने परे। पर सबसे अधिक वोट सब नयी पव पही मेन कस्सित नामों और शिपियों के साथ प्राप मोकेरयों बाद में छपे। एक रोप मुझे पार भी पार है स्वामी रामठी पर पा जिसे पार भी अपमा काते मुझे सग्या न होगी। इल मेनों में इस कल्पना को पपकी दी कि यपि पति तो वह पने योम्म हामा मौर प्रभ्यास करो मेवा-स्म मैं व्यवस्थित हो सकता है। मुझे १६५ की यूनिवर्सिटी हिंदी कहानी प्रतियोमिता में प्रथम पुरस्कार मिरा पुका पा पूसरे पर्पम यूमिसिटी का बाप म रह गया था फिर भी मेरी मामी सम्मेष्ठ समी मईपी पौर प्रतियोगिता पाई गईपी-पपय की पार पीपंक से पह कहामी प्रेमानी ने इस विपाक में दापी एक और कहानी भी मेरी पीपी, पर उसमें प्रेम को हवमा संगोपन करता पापा कि ससे पपना पहले मुझे संकोच हुमा । पारिममिक पुष भी नहीं मिना पा। कुप कामियां प्रौर मिरी एक को 'माधुरी में स्पान मिमा एकाप को प्रम्प परिकार्यों में। पे धनियाँ मते कई वर्षों बार 'प्रारम्भिक रचनाएँ भाग ३ में प्रकाधित राई। निबंध के संबंध में कही पा पाकि बसमें सफलता के लिए सम्म प्रम्पयन और परिपक्व मनुभव की प्रारम्पकवा होती है। नियम पौरन लिए। ।

१२ मए गुपने मरो २१ १२ में साहित्य मबन प्रयाप से एक हास्म पाविक 'मदारी' नाम से निकलता शकुछ महीनों तक में उसका भी सपारक पा । मस्केप पार पाठ-पस पेनों का पूरा मसामा मुझे ही देना होगा । प्रति को शायद १. रुपए मिमते थे। उसके पंकों में एक सय संपारकीय-प्मेनपट पर' पौर भगवतीचरण वर्मा की चित्रमेया' की विस्तृत समानोचना को अपनी कहकर मैं मान भी कुछ पर्व का अनुभव कर सकता । १९५२ में पायोनियर' के गश्ती प्रतिनिधि के रूप में कार्य करखे हुए मैने प्रपुरम चन पोमा 'मुक्त' को एक सम्मा पन मिला तो उन्होंने उसे मुखी मबजारिक माह भीमास्तम को रियाया वो उस समय चार' का संपादन कर ये पे। मुंशीगी को मह पर इतना पसंद पाया कि उसे उम्हनि चदि में पापा अपने स्थामाविक मेपन में मेरा पारम-विश्वास बगा। उसी समय मेरी मिसी पुस्तक-मालोचनाएँ 'सरस्वती' में पपी। १२ में ही किसोरीमाम गोस्वामी की स्मृति में 'माया' का विरोपकनिकसा तो मैंने उनके संबंध में एक यस्मरण मिपा जो अपनी सजीवताकारण उस समय पसर रिया पया-पय संपा सेतों में सबसे पुराना बहो है। इसके बाद वो मुझे मिताकामिनी का मर ऐसा मपा कि पप मुममे छूट ही गया । १२ प्रत में मैं 'मधुपामा के कवि के रूप में 'बरनाम' हो पापा। १९. मपनी पत्नी का इसार कराने को पटना गया वो 'मुस' पी नेपही म 'मिनी' मासिक निकाममे की योजना बनाई । मेरा फिर से पप मपन मी पत्रिरा के लिए मुसहभा। कहानियां वा पापा कई पप पूर्व सिपी प्रकाशित हुई। प्रम्प नममो में प्रमुख पा प्रेमवर-मपी एक संरपाण यो उनकी मृत्यु प्रराशिव हुपा था। इस संप में परमोरिसी' स्यापा दिन मही पप्ती। मामे पच निगने की प्रेरणा मुझे मुम्मा रेडियो पारम मिसी मान फाया स्टेशन १८५६ में स्थापित पा । यहाँ से पवार विभिन्न रिपयों पर पाति प्रमारित परमनिममण पाए। यह कम प्रौरा में माहाबाद में भी हिरो रेएम गुम गया। परपुममें म पपिपिरशी के गर्भ में पहुष मई है। पहले पार्वानों को पाने क पपो अपने पाठकों से नियम कठोर में पार्वा प्रसारित हो पई, बस उसकी मिसित प्रति रेरिया रखनी। मैं इमामों की कोई प्रति अपने पास म रवठा पा-एक बार पार्वा मिखने फिर उसकी साफ़ कापी तैयार करने में ही धीरज इतना ट्र बाठा पा कितीसरी प्रति बमाने की हिम्मत नह पातीपोटाप कपने की मुविधा मेरे पास न पी-विपकर बब उसका पौर कोई उपयोग नपा। स्मत प्रेरित न होने से उन्हें मैं प्रषिक महत्त्व भी न देवा पा-रेरियो द्वारा मिसाई मार्ग का भूस्म पा मकर स्पए में बन पाना। अपर कही मन में उन बाभों के कमी एपित स में रेबमे की बात पी मी तो यह निवास बाकि के सरकारी ताबूत में सुरक्षित है। १९५६ में पहली बार-शायर किमी बाोिं को पुस्तम्स में प्रकाशित देखकर--मेरी यह बच्चा हुई कि अपनी पार्वानों को कम से कम एक मह इक्ट्ठा कर मी दमका प्रकाशन हो सकता है। इलाहाबाद-मबन मेंगों से अपनी बार्तामों की प्रतिमिपियो मांगी तो उत्तर पाया कि रेडियो किसी नियम के प्रवर्मत दीन बों से अधिक पुरानी पामिपिमो को मष्ट कर देता है। १२के पहले की मेरी कोईया उनके पास सुरक्षित न पी पौर १२ से १४तक मैं स्पय विरोध में बा-पानी केवल ५४ ५५ की दो-तीन बाएँ समके पास भी। मैंने कहा पटमघोनामि" और मापे के लिए सतर्क हो गया। तब से बो बाएँ बीमा यो मेवारि मिवे उनकी प्रतिमिपियाँ पपने पास रखवा मया-१९५पार मेलों को टाइप करामे की सुविधा भी मेरे पास हो गई पी। यह वैयार करने का विचार मम में पाया तो कुम पुराने कामद-पतरों की धान-बीन पुरु की। एकाप पुरानी बातामों के प्रपम-पसिन-प्रमेव मिम गप, मिमके भावार पर उमका ग्वार संभव हो सका। इस प्रकार पुष पुराने पौर कुम नए सेखों का यह सपा मारमा। पापा है इसका नए-पुराने मरो' नाम मेरे पाठकों को सार्थक प्रतीत होगा पुराने मेब पोर वार्तामों की स्मृति-प्रतिमानियां मेरे पाठकों मोवानों के रिमाप-कान में स्थिती इसे मैं कैस बवा। मेरे सर के निवों को मोगों ने पसंद किया है और गन्हें संग्रहमप में देखने को इच्छा प्रकट की है। मुमिमा नबन पक्ष से सम्व नियों को मने १६६. में उनकी पप्टिविक अबसर पर कवियों में सौम्प पनाम से प्रशामितकामापारिसका पोस्वायत - मए-मुपने कसे हुमा है, उससे अपने इन नियों को भी प्रकापित कराने को में प्रोत्साहित हुमाई। संग्रह के संबंध में बो-एक बा कहना चाहेगा । पुस्तक प्रारम में जिस अवधि का कित किया गया है उसमें मिले सब निरंप यहाँ महीं है। मैं अपनी पडिमिपियों की पूरी जांच-पावान नहीं कर सका। एकापिस फो मेपों की स्मृति है पर म उमज प्रपम प्रमेन ही मुझे मिला है, म रगकी कतरन ही मेरे पासपोरनीक से यार ही है कि कब-कहाँ प्रकाशित हुए-विक्षेप स्मृति है निराप्तानी पर मिये एकमेव की पो माग से पायसेहपर्प पहने भापर 'संगम' (प्रयाग) में प्रकाशितहमा वा । इसी प्रकार सरोबिनी माया पर मिनी एक मार्ग की याद है, वो उन स्पर्मास पर प्रयाप से प्रसारित हुई थी। बार को भी इन पर मिले निचों से उस प्रमान की छुप पूर्ति हो गई है। सोचना पड़ा निषों का हम क्या हो । न रखनाक्रम में समा गामाता मा पो प्रकार में पुराने से म्मे की मोर मा ममे में पुराने की मोर दोनों ही अपोनिक (मिनिकम) में होते । एपनियों में विपप-धाम्य तोही-कदम तिपिक कारण उन्हें दूर करना नहीं था। इसलिए मैंने दोनों स्ट गिगुपों से कम विताना सुरू किया। पो विषय मेरे पिकनिकट हो मम्छे पे उन्हें मापमिकता दी वोम विपयों तमतमपीन प्राचीन बी पोर हो गया। संग्रह के माम में भी 'मय पहले है, पुराने बाद को पाया है यह बम पापको पर पाएगा। यह निश्चित हो सकारों के प्रत में तिषि निरंट कर रिया पया है। यहाँ तिमि मामे प्रश्नमापक लिम पहा मेन पुप पाये-पीधै का हो मरता है । तिविम्म में ही पाने का प्राह गाय ही मेरे रिसी पाठक को हो पर परिहो तो पम्ने उमर-समटकर ऐना मेमर हो सोपा । पमुदिपा के मिए में पमा माप 1 परमपिम्पर तोम मरासिषास है मेरे निर्धारित स्म से हो मेनों को परेंगे। कोई सिप को मुमाएमा तो उसपर में समापूरक विचार मंगा। मण्हमा मरतन ना पाटक विविधता सिरा पार गर पाता। इन नए-पुराने भरोपों में मापको पिरिपना तो मिलेगी हीरो बोष किसी प्रकार से पता का भी प्रामाम हो- सर मेरी ही मेगनी गने बने।

अपने पाठकों से मेरी कविताएँ भी बातायन-सस्म पो बिनसे पापने मेरे घर में मेरे एप में मम में मस्तिष्क में का। मेरा पर कोई बापू का पर मही मेरे हएय में कोई विपित्र भएका नहीं मेरे मन में को प्रमोवी ठर, मही मेरे मस्तिष में कोई पदमुठ हनयम नही-फिर भी अपना मातामन ममे कमी सूना मही पाया। केवम कापूहम समापी नहीं होता। प्रबननी में बहुत दिन चिनही एवी । मुझे विश्वास है इन सब मेरी काही पानेवाली पीयों में मापने अपने को भी देखा है-पापको मैं बाहरीम्स तक सीमित नहीं करता इसे स्पष्ट परने को वो धायद ही मावस्यकता हो । सबसे प्रषिक इसी विस्वास मे मुझे प्रेरित किया है कि मैं पपना पराय मम मस्तिक साफ, सरम सहन स्वामाषिक एपमे का प्रयत्न करू किपब कोई इनमें कि वो अपमे को देख सके। सीने केगम मुझे ही देखा होना तर निश्चय ही उसका कारण मेरे घर की मंदपी होगी। पूर्णता का दावा कौन कर सकता है ? मैं अपनी अपूर्णवापों से भाषेव मही। मेरी ऐसी पाया कि मे निबंध भी एक प्रकार मालायम सिहोमे । पच में निगम का यही स्माम है पो पर में पीठ का । म मरोबो से पाप मेरे पर में रुप ऐसे कोनों को देख सकगे बो मेरी कविता के वातायनों से पराम ये है। पनरों से पापका कौवहस पास हो कोई पिशासा पृप्त हो किसी धारणा को पपकी ममे प्रापका कुध मनोविमोच हो मापके कोई भाव-विचार समम पूर्व हो-पावायक नहीं कि वे सबा मेरे भनुम हो-प्रो मुझे सतोप होगा। भापकी प्रतिषिमा पानने को मैं उत्सुकमा । निमियन सिमेंट नई दिल्ली-११

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। नवीन जी एक सस्मरण नवीन बी कवि पे पपकार पे साहित्यकार पे रक्ताचे प्रेमयोगी वेदेष प्रेमी पे राष्ट्रनेता में प्रसव-समस्प प प भूपण ये पौर भी बहुत कुछ ये पर मेरी दृष्टि में सबसे पहले और सबक उमर योबारे मौर ये योवा के पमान गिए और योगा के समान मरे भी मुझे विस्ती पाए प्रमी साम भर भी पूरा न हुमा पा कि मेरी पत्नी मीपण रूप से बीमार पर गई और उनका उपचार कराने के लिए मुझे गर्ने मिनिगरान मसिंग होम में रखना पड़ा। तभी मुझे पता चला कि इसी अस्पताल में मबीन भी भी होग से पीमित होकर दाक्षिम हुए है। मुनकर कानो को विस्वास नही पा । पमी कुछ ही दिन पहले उन्होंने गणप-विवस पर होने पामे नाम किले कवि-सम्मेलन का समापतित्व किया था और क्या मस्ती में अपनी कविता मुनाई पी । पर बीवन में प्रसभाम्य क्या है। उन दिनों तो उनसे बाक- चौत करने को भी मनाही थी। हम मोग दूर से उन्हें देखते और नौट माते । रोग का पाला माझमण भी प्रबन पा पर नबीन बी एचदिनों बार मजे हो पस्पताल से निकम पाए । उनका सरीर क्षीण हो गया था चमके परम पर कपरेडीमे हो गए ये उनका रेम पात रप गया पा पर मिस बीच से हम मोयों को सबसे क्या तकलीफ होती थी यह यह थी कि मिस नबीन का सर किसी भी समा-गोष्ठी में सबके मर और सबसे भमग सुनाई पाता था जिस मबीन के पट्टहास से छतों में पपरें परवी-सी पान पड़ती भी बह पर मारो ममा बामगाव भीमे पौर बहुत कम बोलते पार कमी-कमी बोलते-बोसवे उनकी बगान नाबमा जाती । पौर पर ऐसी सभामों काय भावों के सामने कुम भाता जिनमें नवीन बाराप्रवाह बोस ये है और हजारों शानियों की ना महाइट भी नही पाबाज को नहीं जो पा ही है। नियति में नबीन बी के साप कितना बरमप्य किया था।

८ नए-पुराने झरोखे पौर के उमर रोग का प्रारमण फिर हुमा और फिर हुमा । पायरन पीन-साडेतीन बयों में पापी बबन बार वे मस्पताल में दाखिल हुए और बाहर निकाले । पियमी मार्च में भी पीरोज मी ने मुमसे यतसाया कि ममीन बी के फेमो में कंसर हो पया है पोर प्रम में एक महीने से अधिक म पक्ष समे । अप्रेम में कई बार उनसे मिसने को अस्पताल गया। पाखिरी बार मैले उन्हें २० पस को ऐसा । नन्हे पाक्सीजन दिया जा रहा था। एक बार उन्होंने मा सोमी तो पास गरे मोर्मों को पहमानने की पोधिध करणे-से नये । मनमा 'बच्चन प्रणाम करता है।" उनके मुंह से निकला 'दूब पर्पन' दिए मौर उन्होंने फिर मां नरमी । मबीन वो मोगा ये मोर पन्होंने मौत से भी स्टकर भाई की। पतिम बार पर मैं भी चारपाई पास खड़ा का मुझे अंग्रेजी कपि राबर्ट ग्राउनिंग की ये पंक्तियां बरबस गाव होमाई- I was ever a fighter to and fight mort, Tbe bat and the last, I would hate that death bandaged my cres, and forebore And bade me creep pat No I Let me taste the whole of it, care like my peers, The heroes of old Bare the bruns in a minute Payglad lifes arran Of pain, darknemand cold." घनके भावार्य है- तो सरा काही मरता पा सो एकमाई मी, मबम पट्टी बाम मेरे सामरियायवारे या मुन्टो परेकि मेखिका मामी। नही मुझे सारी पावनामों को मेपने से सारे पौँका धामना काने हो। मपने पूर्व पुरुषों * समान अपने सहकर्मियों के समान में भी मौत पी बोरें पो भोईमा मौर एक सण में पीयन मुयों का मूर मामा-- को पूड़ी को पुमार को परार पो महल प्रबन का! माते तो सभी पर एक भरकर मर पाता है और एक मरकर अमर हो पाता है। भर मरने के प्रचारमा २६ पनको रिम्पी में मिलने पपमा परीर पोहा पौरपानपुर में सिमरी पिता पनी लिपिमरमार मर कर पमर हो पपा । स गन्हीस पूपने लिए नवीन पीने सेमिया हमारे नबीन बी एक संस्मरण मिए मिसी भी "कर चुकी है तार तुमको स्या चिता की ज्यान मोहिन । पौर मे पक्तियाँ निया से करने के लिए, "कौन कहता है कि तुमको पर पुक भस्म पारक? पाच वो मैं मम हा तब घटा सब मोर अपमक । पौर रेवनका उत्तर मीदे गए "तुम मममो हो कि पब हो पो हम ममीन प्राचीन ! क्यों भूतो हो कि हम भमर है । हम है मौह परीर || सखी री हम । मस्त फ़कीर !" (प्रपनक) पौर मब नबीन पी का नौह परीर मृत्यु के पारस का परम पावर कंचन की यस काया में परिवर्तित हो एका जिसे बरा-मरण का डिषिव मय नहीं है । उनके पीवन की 'टा की ममकियों को यराबरा पाने का सौमाम्य इन पहियों के सेवक को भी प्राप्त हुमा पा । ऐसे समय में बाकि उनका पार्थिव शरीर हमारे बीच नही रहा या सामायिक है कि मलपियां मधिक स्पष्ट अधिक रजिठपौर पषिक मामिफ हो बार्य। अपनी रश्मि रेखा (१९५१) के प्राक्कथन में मबीन बी सिमा पाकि 'तीस-पंतीस वर्षों से मिल रहा। मदि गम्हनि सपभग १९११२ निवना प्रारंभ किया था। यह वही समम पा पर थी सूर्यकांत मिपाठी निरामा मौर भी सुमित्रानंदन पंत में भी काव्य-रचना भारभ की थी। पवस्था में पंतमी स प्रायः तीन वर्ष पार निरामा पी से सानो सान परे। पंत और निराना बी की रचनाएँ इवामी के तीसरे पपक में पता पीर परिमत नाम से प्रकाण्वि होकर साहित्य क्षेत्र में पर्चा का विषय बन गई पी पर मबीन श्री का पहना काम्प-संग्रह (म) पापे र प्रत में प्रकामित हुमा । १९२५ में परित रामनरेश त्रिपाठी की कविता कोमुरी' (भाग-२) का तीसरा संस्करण प्रकाशित हुमा पा पर उसमें नबीनगी को मही सम्मिलित किया मया वा कौमुरीद में भी नही जबकि उसमें पवनी पौर निरासा बीको पसम-समय स्थान रिपा मया पा। फिर भी सम् .तक पारवे मचते पत्र-पत्रिकामों में प्रकापित अपना करि-सम्मेलनों में पठित पितामों पापा - मए-पुराने मरोये पर मबीन पीकरिस में विस्यात हो गए थे। सन् १९५३ में प्रयाग में पंरित महावीर प्रसार तिवारी के सम्मान में एक भारतीय साहित्यिक समारोह प्रायोजित किया गया जो द्विवेदी मेसा माम से प्रसिराहा। साहिहयकारों का इतना समावना पौर सहयोगपूर्ण उत्सव दूसरा नहीं देखा। उसमें एक कारि-रबार करने का कार्यक्रम बनाया गया पा। नए करियों में नियमा पंत पौर नबीन की भूमिकाएं उपस्पित करने का निएचप हमा । करियर मरेन्द्र पर्मा पंत मी की भूमिका में उतरे से निरामा पी के लिए भी कोई मंगा साबसा बता म्पक्ति मिस पपा बा। पर नवीन पीकेमगम पारकाठी का कोई नौरवान प्रवास में नही मिनापा। राबपि रन पीके मुपुम भी पुरप्रसार टान करि-परमार के संयोग थे। उन्होंने नमीन बी को रेसा पा । उनकी कविता भी मुनी पी उनके सामने पो भी मबबुवक उपस्थित किया जाता उसे रिजेक्ट कर रेते-कोई परीरस भयोम्प सिट होता कोई स्मरस । पुरजी कहते मषीन बनये! मदीन बनने के लिए पारिए 'वृपमठ फेहरि पनि बस निपि मार विधान' । (मगीन जी मे स्पस मपनी मुगामों के लिए मिपा है ये मम मानानु बाग देको पगुमाए (1) उनकी पो कविता मुनपाने के लिए चुनी गई पी या पी-पाकी। "मानी !-मन-पन-नन पिर माए, समझी स्पाम मेपमाला, पब कैसा विमा? तु मी भर भर मा मारी पुन्सामा तन के रोम-रोम पुनषित हो सोपन दोनों माय-बपित हा मसमरा गर मंकार कर उठे एप रिकम्पित हा एमसित हो बन्द गे पाप रहे।-पामी पड़ा हमारा पह प्याना परसा रिसम्म साधी भर भर सादू पपनी हाप्ता।"-मारि (१९११ में रमिता) इस पविनापो में पाहोबो साठ से मना वा पर गरीर में पा में पीमिया पहलवान ! प्रत में हम नवीन पी को पार ले काही निरपरला पहा मुम एक हाती परिधी भूमिका रेसीबई। मुझे याद है न गिरा ' नबीन बी एक संस्मरण मिए मुझे भी मारेलाल मार्पय ने एक सी-पपक प्रान किया था वो मेरे पास कहीं पड़ा है। १९३२ में मेरी कवितार्मों का एक संग्रह प्रेरा दार के नाम से प्रकाशित हो गया था। यहाँ तक मुझे स्मरण पाता है तब तक हामा प्यामा ममुरामा मपुपाता के प्रतीकों के प्रति मेरे मन में कोई पाकर्पणमा। मेरे मन में उस समय को माषनाएं हिमोरे मार रही थी उनके मिए मेरे इम प्रतीकों के पुनाब में ममीन बी के उपर्युक्त गीत ने कितनी बारी होपी इसका ममुमान लगाना मेरे लिए कठिन है। सासर नपीन बी से प्रेरणा से अपना स्वत सम प्रेरित हो पी भगवतीचरण वर्मा भी ऐसे गीप एष रहे --वध मत कह देना भरे पिमानेवाले हम नहीं विमुख हो पापस बामेयामे' । हियरी मेमे के षही महीने बार ममे माइयात समर संपाम' का मनुवार किया और उसके बारही 'माणामा' मोर 'मपुरामा कतिपय गीतों की रचना की। तपाकषित हामागार का मला प्रवर्तन करने के लिए हिरीएटभैये समालोचकों ने मुमे बिहनी पाभिषारी काय उनमें से कुछ ये नबीम बी पीर भगवतीचरण वर्मा के लिए भी मुरमित रखते क्योकि इस मामम में पेसास्ती करने का काम पम्हीं मेरे दोनों प्रमों में किया पा।कामये चातुर्य-मौन मारण किए थे, क्योकि उन प्रतीकों से बो कहा था पापा यह उनकी समझ में न तब पापा पा पौरममय हम पाया है। कही बात चली तो कह दिया यह वो उर्दू की पिटी-पिटाईमेरबानी की माती-मही नाव। पर जनता ने इसे इषय से बन कषितामों का स्वागत किया क्योंकि यह पानती है कि उसकी कौन-सी भावनाएँ इन प्रतीकों में मुखरित हो रही है। इन माननीय माषनामों को दमित नरके इसे स्वीकार कर इनके लिए भवित न हो कर रहें प्यार करके इनपर अभिमान करक, इनको समप्टिमूनक बना करके उन्हें फलामिसममित करके मुबारित करने का काम पड़ीयोनी हि पषिता में सबसे पहस मपीन पी मे बना पारम हिमा इसमें मुझे कोई दिह नहीं है। प्रतीक गौण है। नवीन भी भीवर चहकि पदों में सब निपने के लिए कुछ पुट हुई होगी तो प्राय ही रम्हेनि अपने पूर्ववतियों को अपने समकालीनों को देखा होगा ।हिदी एसपी इतिवृत्तारमा तुरियों से संतुष्ट नहीं थे। तब कहो "पच निरे बाते २२ मए सुराने मरोवे पे किस बात पर इस बात पर कि एक दमिपी महिला का निर्माण पंक्ति ऐसा दिर है जिसमें वह महिमा मरिर में पूजा करने या पी है। मा बसी पर कविता हो पी है । बहसी साड़ी पहने है उसके हाल में कैसा पास है उसमें पंचपात्र या नहीं इन बातों पर तुकारी हो रही है।" उसने अपने पास कानपुर में उन दिनों समस्यापूतियों का बोमरामा पा । ऐतिकामीन परंपरा में कपित रचना गांगों में बन ही पीपी सनेही पी ने बस रसका माप्पम बगमापा से पड़ीयोनी र दिपा पा । सुकषि नाम का पत्र मिस्सना या पौर हर मास की समस्याओं पर सैडो कषि प्रपनी प्रतिमा का पारा पनवे पे । नवीन पो की राय पी “यह समस्पापूर्ति-प्रया नष्ट कर देनी चाहिए। पर एक म्पर्ष की गौ पीर। इससे कोई काम नही होता। तो मन मे या 'कुछ युवी-सा' मैग्यने मगता का यह तो किसी की कविता का विषय ही मही पा । पर ये तो इसके पतिरिक्त पार किसी पर मिरा भी नहीं सकते। किसी प्राचीन के साथ अपना साम्म मरेशकर ही रहनि प्रपना उपनाम नबीन ससा होया। निराला' जी ने भी कुप ऐसी ही परिस्थिति में अपने को 'निराला' पहा होगा । वास्तव में बीसवी सदी के नबनापरण के सार हिरी प. सभी मबसुराफ याणियों में प्रपमे समान में अपने को पानी पाया होगा। मार से प्रपन को ममग परमा चाहा होगा छिमी ने मपा माम मकर, किमी गया स्प बनाएर, बामगार, किमीमे नया परिवान चारण कर। बहफास पर मरे निपना पार्रम पिया पौर पर-उपर से उसका निरोप ना पुरूहमा सब भी मुझे विपास पाहि एक प्रारमी ऐमा हैपो मेरों बार को पासानेपा पौर मुझे याबारेमा मीनबी में मेरी पहनी मेंट पर कानपुर ही सिमी कपि-मम्पेमन में हुई। मने पार ही पलियां सुनाई शिमीम पीछा रहे। "मैं प पोरन पा मार सिप फिरता! फिर भी पीपन में पार मिए फिरला हूँ ररिया रिमी मे मान तिको प्रार में सामोरा वार मिए फिरता है।" नपुरी महरे में पोरबोर मे यह ऐपे माग पोट गापा हुपा लगता है।" के सामने मनोरा तो काही हानामि मह भी मरी र २७-२८ पर्व मबीन बी एफ संस्मरण की होगी पर मेरी काठी कुछ ऐसी है कि मैं हमेशा अपनी उम्र से १० वर्ष कम सगठा पा । मोर 'मधुशाला की स्मार्यो पर नमकी माणानु सबस अवम मुबामों की जो पाप मेरी पीठ पर पड़ी उससे मेरी री प्रकर गई। मोरे पपिता पगड़ी मिलते हो सौ-पचास भी निकासा करो बस्स ! वनी युफे प्रपप बार उनकी कविता सुनने का भी प्रयमर मिमा पापार ॐधी पौर मारी धम-परका उचारण ममग-अभग साफ-साफ पूर्ण पमि पवना राय से ऐसी सदी से कोई पक्का गायक कपिता मुना पा है। नवीन बी प्रास्पनीन होकर कविता मुमाते में पासपी मार, रीड-पर्दन सीपी कर पाठी फूमाकर, जैसे कोई साधक प्राणायाम करने को बेटा हो । जब तक मारक का प्रचार नहीं बना पा पौर हवार पारमी उनकी कविता को मुम्प-मौन होकर मुम रहे थे । गुरुबी कहने के प्रमुसार, नवीन बी सचमुच उपम कोड' चे कामही मानस के दोहे का यह पार्वतर भी मिलता है-गो में अपम कब भी थे। मेरे मुहल्ले में एक यया उस्तार पाकर पे ये कहा करते रे "पाठरपर पाय तम भैरप राम रठारे पानी माठमका बम पते में हो पर भैरण ग गाया मा सम्वा है । रुपि-सम्पदा में पाया बम का एकास होता होमा बसे पश्चिम में हार्स पावर' का प्रयोग होता। मसीन पी का मता भए पप गाने के लिए बना था। मुझे पता मही उन्होंने सपीत पीरा पा पा नहीं उमड़ी कवितामों में कहीं-कही पयों के नाम दिए है। मैं यह भी नही कह सकता शिरकाम्य-मान करते थे तर या संगीत पुरवा पा या नहीं पर उनकी माणी की पोबस्विता रस-सिकता पार उसका स्परमपमन किसी को प्रभाषित किए बार नहीं इसमता पा । एक पार रिल्ली रेरियो के कवि-सम्मेमन में ये तानपूरे के पाप कपिता-पाठ करने कोठे । और साहित्य सम्मेलन (१९२३) में उनका ममा बितरुम बैठा पा चन्होने बताया कि कानपुर की किमी सभा में पापी जी मोम ऐ थे और माइक फेन कर गमा इस पर उनके गले से मारक का काम लिया पयासमोर की यात्रा में मैं उनके साप वा श्रीमठी महादेवी वर्मा पौ पी। हम मोम एक दिन मेदा में भी माननात चतुदी के पहाँ ठहरे थे। वहाँ एक कपि सम्मेलन भी हुप्रा बा तय तक महादेषो पी में कपि-सम्मेलनों में कविता, पाने का महानत नहीं दिया था। मनीम पीने पपने बैठे दो से भी मिता २४ मए पुराने भरोसे सुनाई थी। परी भो पा वह परम दोनचाप्त के महवे में रस पैरा करता मबीन बी का बैठे गमे से भी बों की गुम्ममीर पहर प्रविष्यनित करना महादेवी बी का इपित चातकी से कंठ से तवपूर्ण काम्प-पाठ करना-गाते उन्हें घायर ही किसी ने मुना हो उनकी भमतिन को घोरकर-पार फिर यह मामये की संप्या में मानये हे काम्प-रमिकों के बीच मूमने की बौर नहीं है। इसके बाद मुझे फिर प्रबसर मही मिता कि इन तीनों कवियों को साथ मुन- या रेग्मी। उस समय तक कपि-कप में मेरे माम मागे प्रश्नवाचक चिह्न भपा पा। पों की ष्टि में पामर भाग भी मगा है। पर नवीन जी ने मुझे परि होने की सनद दी। मामपुर साहित्य-सम्मेमन कवि-मम्मेमन सभापति के पर से पो भापण सम्होंने रिया पा उसमें उन्होंने मुझे बड़े स्नेह-मम्मान के साप स्मरण किया था। उस हामा-प्यानाबाप की भी पकामत कीपी पो भव मेरे माम से सबर हो पाता वा पर जिसके पारि भपिप्यताही पे। पप सनका प्रथम काम्प-संग्रह कुम' (१९३६) प्रकाषित हा तर यह भापण उसकी भूमिका केप में दिया गया। सर सम्मेसन के बार मैं अपने बीवन संपपा में इतना मा पाकि पायर ही सभी मबीन बी से मिमने गा मौजा मिप्ता । पर रमपी पोड़ी-मी कवितापों को परपर मोर पो समय तक ही उनके समपान, मैंने उसके पक्ति मौर उनके करि की विधिप्टवा मी पुष मादी पा मी पी। रेटिवषी- कामीम और पापायुमीन दोनों तरह पापियों मे भिम्म पे। वे बीपन भी ठोस अनुसूतियों विदाप भावनार्मों मोतिकारी विचारों सदन सम्पनार्मों भरम पमिम्पषितया से करिये। उन्हें पीएम मनमामी रोने-गाने को बिल्यिा बा । रम्होंने पामी परिता के मेयर में बो परा पा बहो पिनपता परम नही या बह बिनाम माय पा। यहां तर मैरी परिणामा पारम सिर्फ यह पहला चाहना/किम न हो मार बार पाई।बार पोरापा-मा मन में माराम मगना पर पुष पाने की समाहित हो उटगी है।पही प म मारता तागुमी उमे वितुम हो नही पड़ा।म मुझे ग्मों माम मानूस, मगरल-मगा जानता हूँ। वाहम मैरा यह दावा पर मेरे एन टीमे-योमरी " - नवीन भी एक संस्मरण उन्हेमि राष्ट्रभाषा का सिर केमा करने के लिए कविता नहीं विसीम बड़ो गोली हिंदी की प्पणा फहराने के लिए, न साहित्य की सेवा करने के मिएन मापा की कला पातुरी प्रक्षित करने के मिए, पौर न कमियात्राी बनने के लिए अपनी रचनामों के प्रकाशन की पोरसे सायद ही कोई उनसे अधिक उरासीम रहा हो उन्होनि करिता केवल इसमिए मिथी कि बग और जीवन के अनुमों में उनके य में कुछ ऐसी हमचम मचा दी थी ऐसा तूफान उठा दिमा पा उनकी मस-नस मे ऐसी टीस भर दी थी ऐसी पाला बमा पी पी किये निबने को अपने को प्रमिपात करने को विषप्त पे। उन्होने तभी मिसमे के लिए मेवनी उठाई, पप किसी गहन गंभीर, तीन तीस प्रमुभूति ने नरहे विचलित कर रिया। मैं इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता कि ममीन बी मे कमी अपनी कसम को कसरत देने के प्येय से कुछ मिला होगा। उनकी हर कविता के पीछे एक इतिहास है एक घटमा है मनसे-फिरते पक्ति है बीती-मानवी समस्याएँ है, विचारों की फसमा । (इसे पीन बी विचारों का पर्राटा' कहते) माों का व्यापोह है (इसे घायद ये मार्यों का मानाटा' पाते) और एक भाजुक हम पिसे सबसे नपटते झपटते उसमते मवे और मरने-अपने हए गुनगुनाते भी जाना है । नबीन बी में अपनी कविताएँ बिक स नहीं मिली उन्होंने अपने प्रम, स्पेस रफ्त में अपनी मेहनी गाकर लिया है, जिसमें पग का बहुत-सा गर्द-गुबार मी भाकर पा गया है । उचित ही है कि उनकी मिसावट अस्वच्छ है मस्पष्ट पुरवरी। पर यह हर जगह पारमित , पपी है सार्थक है । किसी दिन पाठ्य पुस्तको की सूची बमाने से फुरसत पाकर हमारे समामोचकों को इन कवितामों का पर्प मोबना होपा' पर पहप के कोर में महीं मिभगा बीवन के पोध में मिलेगा। इससे मेरा मवनय क्या है इसे स्पए करने के मिए एक प्रवाहरण कर यह सब समाप्त करना चाहूंगा। १९५६ में नबीम भी काम निकला बिसकी एक प्रति उन्होंने मेरे पास भी मेबीबी। अभी मैं उने पम्पबारका पत्र भी म मिल पाया था कि कानपुर से पिसीने मार समाचार दिया कि किसी तरसी की पोती में मपी पाम गुम्ने प्रयत्म में मगीन पी के रोनों हाप बम पए है। दो-दोन विम गाव में कानपुर बया पौर किसी परिचित की सहायता से भी गलेग कुटीर पहुँचा महाँ नबीम पी - २६ नए-पुराने भरो रहा करते थे। मदीनबी की दोनों हतिर्यो का एक परत मांस बमपर भूम गया पा। नबीन बी पासपी मारे पोनों हाप संप्या करने की मुद्रा में पुटनों पर सवे बैठे पे बैसे प्रमी यह करके हो। उन्हीं से मासूम हुमा गिरसेवकर विपापी की पाकी की साड़ी में पाग नम नई पी रम्हमि मपटकर मुट्ठी से माम मसमना धार्रम कर दिया और इस प्रकार उनके दोनों हार पत पए । पर माकी बम मरने मे बष मई। यह का हो सकता था कि नवीन बी किसी को पाप में पसते व पौर उसे बचाने के लिए उसमें पूरन परें। ममीन पीने माग में सहाईकी पौर उसे परास्त पिया। पाम वही भयंकर होती है। मेरे पड़ौम मै एक माकी बमवर मर गई थी और पाठ मादमी देख रहे थे। पर योगा पौर कापर में पही तो मंतर होता है। मबीन पी निस्क्रिप होकर पे पर पा निदान पनुमर म्पक्त होने के लिए उन हरय-मस्तिष्क को मम रहा था। ये वोमम भी नहीं पर सो पे। पनवे समम सम्होंने कहा 'इग अनुभव से यह विश्वाम हो पया कि पपर पेश मिए कभी पार में पूना पड़ा तो मन हिरोगा नहीं।" उम रिम मन जिता पहीद एक सामान यापन किस पेपरण र - सौरमाया। - म बारमरीन बी की रचनाए-रश्मि रेखा' पामि' परना 'मिनोगा स्तवन उस समय प्रकाठिहर गब में १२0 ४ तर प्रपन पप्पपन के सिमपिप में निय में रहा । सौरपर पस्थित हाने पौर पिपने रो-मीन बों की साहिरिपा गतिरिपि स परिचित होने में मुझे गुप समय मग मया । परमे पपिर प्रसन्नता इस बात पहुई लिमयीन जी ने अपने प्रायनों की पोर दुप तत्परता दियमा पी।मरवाने पूर्व में उ उग्न एक पवि-मम्मेमन में मिसा पा जिमम मापानबापैमाने परस पियर्ममम मिन 'मुमन मैपिपा कानबीनीमपनौरपबारे थे। मैने उनमे प्रामापीपीपेशा स्पसत्रोपमा पार भी मस्ति झेपए, रिता में सुधार लगे रहते। पाप पानी पनाशामन सी पोर मीप्पान होते जिन तरह हंगकर गात रग दोपी उममम पिता प्राधारान गहीमा। भारत नोट परमबीन गोपीरनामों को पुमाकागार मोर कादिगो प्रिय पोरस-गरपार और 'मामा' पान मुनोगे पपोन बी एक सस्मरण २० बनय इमारी कविताएँ पार । ठिठक गया। इन कवितामों के प्रेत में स्पान (पना-तिषि साम दिया गया है-अमिन-बीका काम। यहाँ तक मुझे मासूम -पाच मगम रस बरस इन रपना को प्रकाशित ए हो गए है-किसी मै न इसके लिए निमासा प्रकट की है म पूषा है म इसपर प्रकाश ससा है कि यह "भनि-दीक्षा काम क्या है। पौर नवीन यो मे पायद यह संकेत इसीलिए बोष दिया है कि बिना इस भनि-दीपाका यस्प बाने इस कवितामों का एस्पन पुल सकेगा। मुझे इन कामिकामों को पढते ही पता मम गया कि यह पनि-दीक्षा ही निम्मे भाग जे पपनी फेमियों से फसमकर उन्हेंने एक माता की प्रारण रजा की बी। यह उम्ही की सदात्त प्रकृति की कि उन्होंने उस प्रमुभव को अपने मिए पनि से बीमित होने का पुष्प प्रबसर माना । इस घटना पर उनपरी भावना पौर कपमा किस प्रकार बमी से धानना हो तो उनकी इस काम की रचनाएँ पदिए, "कपा म सुनोपे बिनम इमारी। हुए एबोनों कर, प्रिमबर | पूर्ण हरेक प्रदा तुम्हारी क्या न सुनोगे बिनय हमारी? हमें भान है इस बीपन में प्रपमे हर सव-मत पापोंका इसी वाह मिस तुमसे क्या प्रम्, वाषनी मिली है मारी! मुन सो बिनय इमारी। बोपन के सयम के अपने अब तो मूर्व प कर दो तुम बिससे हो बाए वियप यह सन्त बम गीवन परिधारी क्या न मुनोमे पिनप हमारी? तुम पानो हो पर पेदना के मूने में ममे है हम इतना तो प्रसाद दो जिससे मिट पाए जीवन-प्रोधियारी क्या न सुनोने बिनय हमारी" (पपमा) 'पप-हरप पौर बने हुए पित' का मुहागरा इस्तेमाल करना कितना मासान है। पम भाग' पौर पस्तु भाप में मिरामा प्रदर है। नबीन गो मे प्रपने हार्यों को माप में मुनसाकर यह पंक्ति मिली थी-'हुए परम दोनों कर, प्रियकर, पूर्ण हररूपा तुम्हारी पार बसे हुए हार्यों का इस उम्पस मोर पावन उपयोग २९ गए पुराने भरीदे क्या हो सकता पा कि उन्हें बिनय के लिए बोड़ा पाप उठाया बाम । नपये से जीवन-पषिपारी को दूर कराने और पाह से तापसम बीवन को समिठ बनवाने की मांग करने के मबीन पीही पिकारी थे। इस मावना इस विचार बारा इस पम्पना में मौनमेष निगरामने का पिकार में केवम से दे सकता है वो बमती हुई मपर्टी में पहले अपना हाथ भस्म कर पाए । मी बह बान सहेगा पि इस अनुभव को पमिम्पतिस होती है। दूसरी कविता में ये प्रपना करणे कि एक नव ! विशेष पो के सहारे कैसे पार किया पाय । भाषायकवा है दिपाय उप पोको पाका कर दे। इतनी निर्मीकता से माम को मापन का माह नवीन पीठ से ही । संपकपा सि बिपि मर रहेंतरिक ? प? उस पार सन? कन्या पट, जन संष्ट महर, मेवर, दीप पवन मय है मम पाएगा यह मम तरणोपकरण एम्तर पी नगती है बीवन की तीनपार प्रिय जीवन-मरपार । पदि बाहित करता था जीवन-रस-युक्त पो पहरण भारत भी रव ममि मुरा पर यह हो गया है मेरे बप मुस है उममें तिौर प्रना विषार प्रिय बीवन-मद पार । पहमे हमके कि करो गगन बेणु यापन गुप पहने गम कि परो स्वर पा पाराषन तुम भर पमि-पुर रो पारा रग मारन गुम प्रजाप जिमग महतरण भात भीनि राम, प्रिय बीवन-मद पपार । पर मैंने म रोमामिलामाँ पीरमाता पार मागीलो मुझे गौतहमा मि पाम बीरपी पौर मरिनामों की गोरउपमा रचना को लिपिम होममरी पिता है मो उमम पनि-सा मामा सरेव माही पिया गपा है, रिण पारण ममी पह साता। पर निधि मह दबीनबी एक सस्मरण २१ भनि-पोषा माह की सर्वमेष्ठ रचना है। पीर्षक विदेह । एक माकी की बोती में मगी माग को बुझाने उसकी पोती को उसके परीर से असम करने भाग की विभीपिका के सामने मी उसके मवाने फिर भी मानेबाने की ममत्व पूर्ण निर्ममता निरसता मम्नि-मापनता से ससे नग्न कर देने के भौतिक अनुभव को मनीम जी ने इस कविता में मध्यारम कितने पे पयतम पर चम दिया हैपौर भनि-दोषा काम का क्ति पायद इसलिए नहीं किया कि इसको नीची सुबह पर उतारकर कोई इसका मर-मौड़ा प्र म निकामने मर्ग "पस रवार पंग बस्तर पानी तूषण मर में होगी पिममय पर कैसा पुराम साबम से पूर्ण मा लेय अपविश्य नवमोचमे की नौबी मोम नयन में सहर माल भर रिसमा पपने पीतम को बनम-जनम का पपना निश्चय अबश दूर ही करना होपा मह मंतरपट मह मान्छादन पात्म रमणको तम्मयठा में क्या सम परिरमण परिणय ? या पत्ना यह पर यह मंचन मारभूत हो पाएंगे सब परी। तनिक भामे तो उनकी मावक मुरनी की तय ! पार पक्ष मारे हदि, उर पर बीनाक पर नाबमय नेह सफल तर पान सप्तौनी ! बर हो पाए इस पर का तय पट ही क्या? चन काया भी मधमेमो निह मान से ग्स रिल बब उनके सुपरस से होंगे रोम केटकिय पतिमय (क्यासि) यहाँ पीतम कौन है, मेयसी कौन है पट क्या है जिसका नम पीतम के पूर्ण परि रमण के मिए पायम्यक । यह फसता हमारे साहिय-वर्धन की इतनी म्यापक मानना है कि इसका यस्य बोमना इस कविता कुमारी के साप बनाकार करना होमा । इसक रिपय में में इवना ही कहना चाहूंगा कि ऐसी कविताएँ बनी और स्वाही भीषों से नही सवरती में हृदय की मामा से हो सिसी बावी है। नबीन बी महीनों मेबनी पकाने में प्रसमर्पये अगर उन्होंने किसी को दोचकर । इसको मिबवाया होमा सो प्रमरण गरे उत्पोमासों से ही ऐसी पक्तियाँ निकमी होगी मतो र रवानरसामी में पाप पिए, पनि। में तीन कविताएँ भी पह सिरकरने के मिए पर्याप्ताहियीन बी की

मए-पुराने भरो
।
परी अनुभूतियों के कपि पे। उनके बीवन की बहुत-सी घटनाएं पोरबहुत
सी कविताएँ हस्प * भकार में और पाहुलिपियों के प्रवार में पड़ी।
निश्चय ही परवा एक से दूसरे पर प्रकार महीं माना पाएमा पप तामीन
पीका भीमन पौर काम्य दोनों ही हमारे लिए पनाम पहेमी बने देंगे। पौर में
अपने पदों की पूरी सक्ति पौर प्रपने एप पूरे विश्वास के साप पहना
चाहता है कि ये दोनों गुम्ने योम्प पहेमियां है पौरहें समकर हम बहुत प
पाएम पर बहुत से नेव बाये बीवन रेगह से यज पहवाये क्योंकि ममीन
पो भागीयम उन्हीं रहस्यों की खोज में लगे ऐ
"तप्त प्राणों में निरंतर कौन-सी विपाम भनी?
पितु सभी ही पी फिर भी अभी तक यह पहेमी
ववव अम्बेपण किया है बन पई पीपन-सहेली
(मासि)
देइन पहेमियों को सो के लिए वासी कौन-कौन पूठ मामे माते ।
[पन १६.]
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प्रोग्म-पायरी साहित्य प्रसिद्ध है। क्सपियर पर मिपी उनकी पुस्तक मार मी मान्य है। मारक के मन में पवामी के अंत में मासर बाला (१८५४११.) प्रसिब हुए । प्रापरी ये परंतु उनहोंने मायरी प्रमाओं से मुठ रहने का प्रयल किया था। उनमें दो कुछ पायरी प्रभाव है उनके प्रबचेवन से ही माया जान पड़ता। गनीसरी सबी के प्रत में प्रामर में वो साहित्यिक पुनर्यावरण हपा उमके का तस्पू बी ईट्स (१८५५ १५५१) मामे जाते हैं। कविता माटक निवप-सभी यों में उसकी म्याति समान है। सम्होने ग्पमिन में एबी थियेटर की स्थापना भी की । ससे प्रोत्साहित होकर कई पन्नाटापार भागे प्राप । इनम मेडी मिगोरी (१८५२ १९५२) और थे. एम. सिर (१८७११९०१) परिक प्रसिर। दोनों ने प्रापर के ग्रामीण जीवन की पोर देना । मेडी पिगोरी ने भावुकता में सिंग म पम्प से । रमपू.बी.सि मे कई प्रकार के नाटक लिये। बापान नो माटों से प्रभारित होकर उनहोंने प्रतीकात्मक नाटक मियने में रिसिप्पता प्राप्त की। कविता कक्षेम में पापरी प्रभाव पोम पोड़ते हुए भी अपने समय में प्री प्रतिनिधि कवि माने जाते थे। उनक मित्र बाजे रसेन जो ए.१.नाम से कविताएँ निसते पे बियोसोफिक्त विचारों से प्रमाबित थे। पाबरनामा (१८१५१९५०) मा मत प्रायर के मंबंध में पास्कर पारस साही पा। पर जिस प्रकार का मेम्प सम्हंनि ममकामीन ममाग के हर पल पर किया है बामोई प्रापर ही कर सकता था। मि के समकामीन मेखकों में पार्य मूर (१८५२ १९४५) का भी नाम मिपा पासका। पुछ समय तक पायर के सांस्कृतिक प्रारोमन ये मंबद ये पर पार को मनम हो गए। भानुनि काम में गिम मस ने वारे ममार का पान पत्तिा पौर प्रापरमेरकी पोर मपनी एक रचना से ही सीप मियाम्म पाएन (१८८२ १९४१) । उनके 'भूमिमीर' ने मानव मस्तिष की ऐमी पाणार्यों को पुमा कि सारे नमार के लिए कौतूहम का रिपप बन पा । पाएम ने भाषा पीपतिय प्रभिमननायों की ममावनामों का भी पता लगाया।

मए-पुरान मरोगे
सतत्रता प्राप्ति के बाद प्रायर में साहित्यिक सिविलवा के बिहरियाई
देते हैं। कारण सायद नई प्रेरणा का प्रमाण है। ऐमगत यह भी कि पायर
की मनीपा नेमिक के पुनमार और प्रचार की मोर सग गई है और प्रतिरीके
साप उसका भावारमा सर्वपडीमा हो रहा है।
१९५१]

। विलियम बटलर ईट्स (रेडियो बार्ता) माधुनिक काम में टी. एस. इलियट प्रप्रेणी भापा मबसे बड़े कवि माने पाते हैं, परन्तु उनके प्रसिसि पाने के पूर्व या सम्मान यदि किसी को दिया माता पा तो मिमियम बटमर ईटस को। टी. एस. ईनिपट मे समं पपने एक मेख में मिला था कि यदि मुझसे कोई पूछे कि भाधुनिक समय में अंग्रेजी का सबसे बड़ा प्रतिनिधि कवि कौन है तो मैं निकोच कहूंगा किनिमियम बटमर ईदा । यह बात सर्वमान्य है कि टेनिसन बारही भारी मापारे सबसे कवि हुए। दुध समातोपों का मत तो यह भी है कि मिटर बाद ही गबमे बरे कवि हुए है। परि इसमें कुप प्रतिपयोक्ति हो भी वा उन्हें परंप पौर निसन के कोटि का करि मानने में धायर हो किसी को पापत्ति दिन का परम सन् १८६५ में खसिन में हमा पा। उनकी प्रारंभिक पिसा समेर के पूमा में। इसके पपचार चम्होंने चित्रमा की गिमा मनिन में मी। उनके पिता सर्व प्रसिद्ध चित्रकार थे। परन्तु उनका मान साहिरण की पोर पड़ता पया पौर यपि मागीवन में चित्रकला में अभिनधि रमधे येतो मी सारे समन का क्षेत्र साहित्य ही पा । जाने सममग २. पर्प की प्रपस्या मे काम्य-रचना प्रारम गरी यो पौर पपनी मृत्यु के एक-दो ति पहमे तक रचना करते पर। उनकी मंतिम रचना रनकी मृत्यु के पश्चात् प्रकाशित हुई। उनकी मृत्यु सन् १९ परायणप०४ बप की मरम्मा में हुई।ग प्रकार उनका रचना-काम मगमग १५ वर्ष वा पना। गिम समय उन्हाने रपना प्रारम की उम ममप प्रेगरी काम्प में प्रि-रसार सूम की पविता का बहुत प्रपनन पा पार ईट्न की प्रारंभिक पिवारों में मएसुरान मरोसे इस मून के प्रभाव स्पष्ट है। परतु दिस अपने समय मीर पपने पति प्रति बहुत समय । यहाँ एक पोर बात पमुयायो बमकर संतुष्ट नहीं हो समवे म यहाँ सरी और उन्होनि पपन र के उस पादोमन से भी पति पास की बिमे पायरी पुनमरप करते है और जिसकी पूर्णाहन्ति भावरमापी सवषता में हुई। टिम दुध बों तक अपने रेप की पानिमामेंट के सस्य भी प्रापरी पुनर्वागरण के साहित्य-पक्ष रे मेता ये सपये। साहित्य का पता समपर्व म्यापित करने कमिए बम्होंने नाटक की महत्ता सममी मोर एक माटयमामा की स्पापना कीबो एवी पियेटर के माम से प्रति लिए स्पप सम्होंने नाटक मिसे मोर भपने मित्रों से निपाए । मायरी पुनर्वापरण में एपी थियेटर का मोगरान प्रविषित है। दिय के मारक प्रापरमर में ही नही म्र और ममरीका में पी मे गए और कमा की पिभी वनस्वान गता माना गया है। fम कविताएं लिखी मारक सिके पार निच तिथे । पर पुष्पच्या रे कमि। मा माटकों को काप्प-नाटक हो काला पिठापा। उनके सपने भी परित्व गुण भरे हुए है। ट्सि का मानसिक विकास ऐसे युग में हुमा पर विमान मे ईसाई पास सोगों की मास्पा रिपा दी थी। ट्सि पानीपन धर्म की बोग में पेमेबहन दिना तक पियोसोफिलम सोसाइटी दस्प है। भारतीय जनप्रति भी उनका पनुराम पा। भारत की पौर विशेष प से भापितये। सरोजिनी नापा पार रवीमनाप मपुर से उनकी मंत्री पी। उन्होंने पीतांजलि की पवितामा कमीजी अनुवाद की एप-एक पति मुपारी पोर उसकी भूमिमा भी मियो । उहानि पुरोहित स्वामी की सहायता से दम सामिपरों का अनुरार प्रिया पार उनकी भूमिका मिची । उनी बहुर-गी रचनापों पर भाप्पीय प्रभाग म्पर है। उनि सप सार पिया पाकिम भाटकों का दिल पुगण मम्मत्त माटी से पाया था । राम्होंने कई सय माटों परो अनुमा का प्रम्पपन पियावा। दिन की रचनापो विमाप सि बाते हैपूर्व दिस पार उत्तर दिस । पूर्व दिशा में गुण प्रवाम है मिस रोमाटिक है। भरप 1 चिसियम बटसर दिस १२२ महायुर के पश्चात् सिमी रचनाएं रोमांटिक गुणो से मुक्त हो मई। स्वप्न पौर माभिरपका स्वान बास्तविकता पौर मोबने से मिया। फिर भी दोनों के मर टिम के पतिवमी पाप है। सप्नमाणों में से सबसे ममम स्वप्न इप्टा और सच्चाईरेखमेवालों में उनका सबसे प्रमग प्टिफोश है। यह विपता हम फिर हप देना पाहो है उनके म्यक्तित्व की और उनके देय पी जिसकी परंपरा संतति इतिहास स सनकेय का तनु-सतु भीगा पा । पापग्मेर को मापा वेनिक है पर सैकड़ों वर्षों से अंग्रेजी रसपर इस ठप मावी मई ६ किमह अंग्रेजी को ही अपनी मातृभाषा समम बैठा है। उसके किसने ही साहित्यकारों में प्रमेणी में रन्कोटि की रचनाएं की है। फिर भी स्मता प्राप्ति के बाद गेमिर को फिर से स्थापित करने का प्रबन होपा है। टिम सयं सिता पा कि यदि मैं पनिक में सिखता तो अधिक प्रमा सिमना । परंपरा के प्रभाव में ईट्स मेमिर मे लिखकर संमयत न विसी स पणमा लिप मरते पार न उनकी रचनाों का इतना प्रचार होता परंतु फिर मी ईट्म का इस कदम स उनका अपने देश और अपनी मापा के प्रति अनुराग मम्ट होता है। दस का पौत्र मो मापा बोलता दिस उसे पापर ही समम समते । परिकमी ऐमा हुमा कि पापरमेर से प्रेगो एकदम निकल मातो मापरसैर पपने सबमे यो करिस मपरिचित हो जाएगा। पर पहा वर प्रेगरी पा गबरपजी काम्य म स का नाम समामिए ममर । मने मुमारे किम की फुप कवितापों के अनुवाद पेतिक में पह। म नहीं कह सकता वे कम ए है । उनक प नाटकों के अनुसार मोरोपीय पौर एघियाई भाषामों में रो पुष्पौर पेम भी गए है। हिरी में बहा कर मेरा मान उनसी रविवा मनुवार हमा है और म रनमारकों का। इसके साहित्यमा रिप पप्पयन पर मैंने उनपर रेमिय पूनिसिटी से गफ्टरेट मी। कभी-कभी मापता है कि दिम का पुन पारिप पमुबार स्म में हिसी को लेकर पापिण मुमपर ममर दरा तो कर कि म पारे शुदा कर पाटी-सी उमर में मैं क्या-क्या गुरार! १६५२] - मेम्स उपायस भौर 'यूसिप्तीच' (रेडियो मार्ग) पप्रेजी भाषा पौर साहित्य में मर स्पनेवामा पावर ही कोई ऐसा म्पत्ति हो जिसने बेम्स बापत शिक्षित यूमिहीर' का नाम न मुना हो या नछे उत्रा पस्यम हो पा पान हो । संसारको उपम्पार्मों में इसकी मणना होगी या नहीं पा पार भी विद्वानों में विचार का विषय है। फिर भी बीसपी मदी बिस पुस्तक मे साधारण पादानुषी पर पौर समामाकों का प्यार मबमें पषिक मार दिया जा मूमिधीपी है। मोरोपोप भापार्यो में इस प्रस्थान किसने ही पनुवार हो पुरे पायद बापानी में भी हो पाई।हि प्रपा पाप किसी भारतीय भाषा में 'यूमिसौर' या उसके किसीपपारेम्स तमाम की पम्प पिछी एचना के अनुपात का पता मुझेमही विनापौर माहोपों हाम पर मिपी पुस्तकों की नम्मा पीपार मामोचना-सियों की मरमा पार के सपाय पपगी। ना मानने में पायद ही किसी को पापति हो कि इस पुस्तक प्रकापन के पश्चात् पूरोप की कम से कम अंग्रेरीको उगम्याम पमा नही नहीं प पदबा सत्तके पूर्व दो। बीपी गरी के पम्पासों पर पप्परन परा पनप व पूर्ण मी मममा प्राण्या गप एफ म पु की महा पूरी तपन सममी बाय । अमता तक इसे पहुंचने मार्च में पो बापा पार नदी मी एक स्मो पानी है।सरे सेयर खतिममिवासी पे श्री ११. प्रपनी बाईम पर्प पारमा अपने परिव परिवार कोएना-पिनदिन रोमन संचामिक पर्म मोरपरस्पर-विरोधी रानीतिक दलों में पिसतमान प्रापरमटमाट होकर पौरोप ने पए के नोइटमी कभी गरी भी सिर पोर सभी फीस रहे मौन पापुनिर योरोपीय मापा का गान प्राप्त रिया राणे पड़ी पीवमोगिया मी पगपार पनाने का प्रयक रिमा मिनेमाघर पाता जेम्म मासस पोर 'वृत्तिसीप मार पायोसम में भाग लिया। पेत में पेरिस में शापा के प्रध्यापकस्म में म्पबस्पित गर । साथ ही मेबन का प्यवसाय भी उन्होंने पपनाया । बीमिको- पान के लिपिम्न सापों को भोगने अपनाने छोड़ने के मपों में उन्होंने प्रथम महसमुख के पूर्व का योरोपीय पीयम पा उस पर विचार किया और रस प्रमिपत्ति की। मही विविधतापूर्ण ज्ञान और प्रनुपर बेम्स पायस के साहित्य की पून पीटिका है । 'मिसीर' के प्रकापन से पूर्ण इनका एक कविता माह एक महानी-सह मारनपा-समो में मिला एक उपम्पास भौर मन की मी में सिमा एक माटक प्रकाशित हो पुफा बा। उनके इन प्रमो से मी यह पता पवना पा किसानका झुमार साधारण बीवन की कुत्सित वास्तरिमवामों की पोर मोर मचीनवा के माठ पामोरकों और पाठकों का ध्यान इसकी भोर पाकष्ट हुपा पा 'यूनियोज' मे पोरोप और अमरीका कसिपिव पमान में एक भूकंप ही प्रस्तुत र रिया । पेम्स बापरा मे यह चपम्पास १९१४ में प्रारंम छिपा पौर १४२१ में समाप्त किया । यह पपम महायुर पौर उसके पापात् का संसप पोर परिश्रय मा पमप पा । कभी पेट्रोरट मे रहे, कभी परिण में पार कभी पेरिस में । सात वर्षों में तीन परों में घूम-बूमकर लिया हुमा पा उपरपास एक पाये मनर की कहानी रे बम रसके एक दिन की १८ परे को पास्यविवार मोगह बन १९४२मसिन की। समाप्त होने के पूर्व ही यह परिका के रितिरिमरिम्मू नाम मासिक में निनामान हमा। इसकी २१ मायामों में मामा 'भूमिमीर निकम गा । पाहे किया ऐसा रोखा है पो पक्ति चौर समार की म मुजार्यो की पोर पुरता है निमकी पोर हप्टि करना पर्म सम्मति परपण तिकता सम्म समाज को पाप्तीनता और मापरिक जीवनको म्प ये बतानेराती पानहारिनामे पमित कर पता 1 बापी माप मोई ममता पनी गन्ना उमए वापता हुई उगमता प्रमोला पणित प्रपतीलया। सहने की सीमा पाप?पी समान फेरिदारों के कान मरे हुए गाक पधिकारिममि पर को मंतिम पार गरपाएँ परमी 1 पाय प्रशासन मरमर दिया गया । प्रायः पर मुरमा दायर हुमा प्राररसपर मौसमर का पुर्नामा र रिया पया। उपेपा से पुस्तक का प्रबार उसके गुण-परमुणों पर निर्भर २.२ नए-पुराने मरोगे यता सरकारी निरोप मे उसका विज्ञापन कर रिया पाठक से पाने गाने को देन हो गए। 'गूसिमीर का पहमा परिपूर्ण प्रकरस पेरिस य १९२में प्रकाशित हमा । रोहगार प्रतियाँ पपी पो। सोने की तप इस पुस्तक का सिर भ्यापार हुमा । फुछ पुस्ता सौ गुने दाम पर विकी । उसी वर्ष मरन के मोस्ट मेम मे २.०० प्रतिया का एक संम्परए पापा।३.प्रतियो पो पमरीरा भगी गई प्यूमार पधिकारियों ने बसा हाती १९२१ में मी प्रेस मे... प्रधियों का मस्करण फिर मिकासा पर उपमें से ठियो फोगटन के मुंगी प्रपिचारियो मे पम पर मी । सयभग इस प संमार से सम्प नगरा म च पुस्तक को रसमा पुर्न था। १९५१मैं बी.बी. सौ० ने माधुनिक मयस्वार्ता में पप बेम्स मायत का माम एसा तो संय सम्म म रसका विरोष हुमा। चोरी-छिपे पो सस्मरण साप होसारसी स्टान होने पाएपले बनम स्वाबियों में मंद रोपा समामे पारमता। प्रभिमारियों साहित्यकारो प्रकारको पप्रचारमपीमा एक रोगा के बाद मन् १६॥ म नगएमसी ने अमरीका मस पुस्तक पर में नियंत्रण हटापा मार रातीन वर पाप नो में इस पुस्ता का प्रपम मामालिक मस्करण प्राधित हुमा बिमे सर्वसाधारण यिना रोक-रोक के शरीर पर पापगमार-विरोपी सम्पनियों पागारमा गया पर दोनों पगों में बोलनेमाने स्वाभिमान निशान और पानाचा पे । एप कहता था या पयापि पुस्तक है पिमा गाहित्य है दुनिमा फो मूर्त बनाने का बर मारी पापत्र है। दुसरा करा पा पा पुगातरपारी रखना है पारे मपार फी मिपा पर पम्प है, सपा का पप निम है। पापाप मारोप मेरा पौर मिशान पर पाम पे पारा पार पीर टी एम. नियट । पात्र में मामी ईमानरारीको मगहना की निपट मे नगरो पमा-पुणता पी प्ररमा पी। उमाल पहा मिरन बारपसी मापा का हलमा भान एपनेगाना मरा पमा मही परा उपम्यामपस में इतना मोपपातु यह मुमता स्मारिस kirम पुलको बहानोसा है ? पौरपदानी ही इस पुस्तक में नहीं है। अप पार चिरपनियो को भार कमानी पानगर उपायाता की पो पम्म जायस पार पूनिसीर इस उपन्यास मे विनास पोड़ दिया है। कायरन मनोविज्ञान के एक मए स्वर की पोन की बी। हम जो कुछ करते-कहते है यह एप करिम सामाबिक माचार-विचार से नियमित होने कारण हमारा सन्चा मभिध्ययन नही है। यह हमारा सरी परिपान है माही दिसावा है हम यो एप सोचते है हम जो सना को है यह हमारा पभिसाई और अधिक सन्जाप है। उसको उपरेतन प्रमका प्रबठन की प्रकिया महते है और अब हमारे पर बाहरी पल मही हवा तव हम यही होते है एसी से हमारी क्रिया परि पामित होती है। यब हमारे उपतन भार प्रयतन का अपने अनुरूप पमि प्पक्ति नहीं मिमवी व हमारे भीवन के प्रदर तरह-तरह की विसतियां उत्पन्न हाती जिस व्यक्तियों का समान सामूहिक पिहिमा को पम्म देता है। क्या हमारे साकारों मोर पाहित्यकारा का मह काम्य मही कि इस प्रय पतन का बार बात भीर रसम मद । बहतने दिनों से बर है कि उसक परिक्रमजे की बात को बार की पहले पहबाहर तो निकले। पमी तो इन माना पपने उपनिपकार रेसरम पर मिमाकर कहना है कि सरल का मुरा मोन से सका है मान का तो पो पार माप को प्रष्ट हाने दो। सम्म वायस न माया को प्रपमा गुप मानकर समा प्रादेगो पर पवना की मोहरी मोमी भोर मम्न सरप दुमय पुस्मित पय इसित सत्य बाहर - उहमि वना के विभिन्न स्तरों की बारापो का उम्मुक्त कर दिया। हम हो मही। पो हम बाहाबार हम पर भी है या हमारे मंदर यह भी पा पहा प्रभावित कर रहा था और महाभा में हम परिचासित भी कर पापा । पा इस पनिकाय सत्य का मान ने पसन को प्रषिप सन्चार साप माने में सहायक नहीं हो सकता? पापस ने करपी प्रकार का प्रार प्रपन मामने रपर इस रपम्पास की रचना की है। उन्होंने समय यह दिमाने मा प्रपन किया कियाप एक प्रतिनिधि नगरमापरियों पवम पतन में दिन में सपा-सा महाँ उती-गिरली पोर इमसे ...पृष्ठ भर पा । दिदी परीकी मतक में मिला है कि हम एक दिन में किमा घोरत है या हमार दिमाग में मिनन रिचार प्राते-गात है यदि उनको परिमाण में परिवर्तित किया जा सकतो यह सारा दनार उसमें विनोदी तपतेला २२ नए-पुराने मरोगे पता सरकारी विरोप ने उठका विज्ञापन कर दिया पाठप उसे पाने पाो को बेचैन हो गए। सिसीव का पदमा परिपूर्ण संस्करण पेरिस स १९२म पानि हुमा। हजार प्रतियां पी पी। सोने की तरह इस पुस्तक का सर व्यापार हुपा । पुच पुस्तौ सौ युने राम पर बिनी। उसी वर्ष मदन पोस्ट प्रेम मे २. • प्रतिया का एक संस्कररा छापा। ५.. प्रतिमा पो प्रमरीरा भजी गइ म्याई गफ ममिकारियों में पमा गती। १९२३ में उसी प्रेम मे १.. प्रतियों पा एक संस्करण फिर निकामा पर उसमें से ४५ प्रतियां फोम्पटन रे नी पपिकारियों में पन पर सी सगळग इस वर्ष समारसम्म भगरा म स पुस्तक को रमना गर्म पा। १९५१ बी. जी ने पाधुनिक मवा-यार्वा में पा रेम्स पपापस का माम रहा तो तम हाम्म म उसका विरोध इमा। पोरी-ये जो सेरमरम टाप होते सालो- स्टागन होना पन उमय साथियों ने विपरमगामे मारपब्एि। पपिपारियों पाहित्यकारी प्रमाणको प्रसबारमबीमों एक मोबोहर पार गन् १९३५म पर पूमी प्रमरीमा म स पुस्तक पर से नियंत्रण हटामा पार मके तीन वर्ष मारमर में इस पुस्तक का प्रथम प्रामालिक संस्करण प्रकाधिन पा बिसे मसापारण बिना रोपरोपरीर सप्ठे पपरमरपिरोपी सम्मतियों का प्रचार मग ममा पारदोनों पक्षों में बोलनेरान पानिप्राप्त मिशन पार पासोपापे। पहला मा यह पंगाषिक पुस्तक है. Trtमा मारिप है निमा पो मर्म बनाने का मार्ग पम्परा करना पा यह पुपातरकारी रचना है मारे हमार की विमण पर प्याप है समय का प्रतिक है । पारपारप संसार मेपर पर निशान पास एरा पार पीरटी.एग नियर । पात मै मायमी मानारी की मराहमास इमिपट म रमको मा-पुममता की प्रर्षमा पी। उनीने मा “मिटन मार पी मापा का बना गार पनेमा इमण मामही राहुपा।" उपम्पाम पिप में समा मुन मेने परवान यह उत्तगुम्या स्मारिष firm पुरी महानो पा है। पर हानी हो म पुस्तक में मही है। १प पारिनिरिमो को मेहर महानी कामरान उपमामा की परपरा कौं पम्म लायस और 'मिसीच' २.६ इस उपन्यास ने मिनपुरा का दिया है। फामर न मनोविज्ञान के एक नए स्तर पी माय की पी। हम को कुष कण-कहते है यह एक कृत्रिम सामाबिक प्राचार विचार से नियंत्रित होने के कारण हमारा सम्या पभियवन नहीं है। मा इमारा उमरी परिधान है बाहरी दिमाग है हम बोधोरत है हम को पाना करते हहमारा भपिकसाई और प्रधिक सच्चा पहै। उसको रपवन पथवा प्रयतम की प्रक्रिया कहत है पौर पर हमारे ऊपर पाहरी प्रध मही पता तब हम यही होते है इसी से हमारी किया परि वामित होती है। जब हमारे उपवेतन पीर प्रवचन को अपने पमुप पनि पक्तिमही मिमवी सब हमारे पीबन पं पर वय-नए की विधतियां रत्पन्म होती है। रिक्त पक्तियों का समान सामूहिक विकृतियो को परम देता है। क्या नारे कमामायें पौर साहिपकारो का यह परम्प नही मिस पर चतम कार पोर पोर उसम म । बह इतने दिनों से मर है कि उसके परिपत करने की बात तो बार की है पहले यह बाहर तो निकले। मनी तो न मानो अपने उपनिपार के सर म स्वर मिमाफर पाना है कि सस्व का भुग माम पे कान को वारो पौर मरप को प्रकाशन दो। पेम्म पायम न पायरको पपना गुरु मानकर उसके पादपों पर गतना की नहर की माही मोनी और मान सरप कष्ट मरम इस्सिन सत्य परिपत परम बाहर पूट पड़ा। उम्होंने चेतना के विभिन्न सरों की बारापों को मुक्त कर दिया । हम पही नही है पो हम बाहर-पारर में हम यह भी है या हमारे प्रएर मह मी का यह प्रभावित कर पापा पोरबा पेचा में हमें परिचासित मी कर पापा । या इस अनिवार्य सत्य का मान हमें परने को प्रधिफ सपाईक हाय गमाने में सहायक महीं हो सकता। मापस मे वृष इसी प्रकार का पारर्प प्रपन मामने रखकर इस उपम्पास की रचना की है। उनि रुबस यह दिखान का प्रयास किया है दियोरोप एक प्रतिनिधि मगर नापरियों के वेतन उपचनन में एक दिन में क्या-क्या महाँ उठवी-गिरती है और मसे ८०. पृष्ठ पर गा।किसी प्रमरीमे मेवर ने मिसा कि हम एक दिन में जितना मोरन है पा हमारे दिमाग में गिवने विचार पाठे-बात है यहि रनको परिमण में परिवनित मिया मानके ता पर सारा समार उसमें हिनो को तय वैरता नए-पुराने मरोने २.४ माग पुत्र प्रतीत होया। उपम्याम की सभिप्त परेडा यो है। स्मफेन सिमम एक नवयुवक पेरिए से मोटकर मिन माता है और इस पिता में पूजवा-फिरता है कि मषिप्य में व्यवस्थित होने के लिए यह क्या करें। उसके परिवार में एमबी माता मर गुनी है और यह सबका परिवार-ममार से प्रमप का मत दिनों के पाचात् पाने के बाद यह सब प्रकार के निपंचरणों में मुक मब प्रकार क पप पात से रहित सब प्रकार के उत्तरदायित्व से हीम गर्वपा मटस्म होकर पपने ममर को देखता है। एक पौर मागरिक पो मिमोपोखम्मम उसके एक की मृत्यु हो गयी है पहत पासे उसकी पत्नी है भविष्य दोनों के लिये रिक है पी ऐहै बीते पाना काम है। पर ग्भूम को अपने मनातीय मानव पर्य के प्रति निमासा है मोप पी पे किम भापार पर भी रहे। क्या करने की ये है। धीमती पसूम का पीबम बाहर बानों के लिए पटना बिहीन भगे ही नमे पर उसके उपवेतन में एक पूरी दुनिया है और यह प्रस्थर दिमाग की पिटारी पोमकर मिमेमानी रीसरे समान माराय गाठी है। मिस पोर पाम दवमिन में घूमते है और सम्प प्रति-अप उमक मस्तिक में खनिन के बीवनकी यो छापा पड़ती है उगे हम देखते पाते।मन्त में पीमती गमा मरा रिवा-मण है मोर उमीनार उपन्याम ममाप्त हो पाता। कलाकारिता उपग्याम में पर्याप्त है। पुगिसीर होमर पानायक । यो प्रमणधीन है। मायम में रमूम को मापुनिक युग का यूमिमीर बनाया है। बह मानव के पता में प्रमण करता है। माप पाहे तो मिस को यूमि मीरपुष टेमीमेक्स पार मिमे तूम को यूमिगीर की पली पेनीमापीरा प्रतिष्प-प मान मन !-पपने परपनन के वागों का नाग-बाना फेसाती। सम्पाग १५ मार्यों में प्राय भाग लिन पाकविराग स्यिय करता है एक बियर पीर अपनाता पिपरय ति परीर पिप भंग की गोर मरेलाला एक विशेष रिपोर्श करता। शिष दोनीका प्रतिपादन रता है। पर्म इविहान भापामारत मर्षणात्र बीररिया रणायन पर्व स्पारप माहिएय मीनरी मंगीन रार पेम्म मापस पौर निसीर भीति पित्रकना मंत्र-तब नौ विद्या पिशान यौन शास्त्र-सबबीवर्षी है, और मौमिक ढंग सा उपम्पास साहित्य विकास में बायस का योगदान मुन्मपया दो स्मों में है । तो उन्होंम बतमा की सार को सम्मुत किया। इससे परिण-चित्रणा एक गया उपकरण मिमा । दूसरे, उन्होंने यह सिर किया कि भमिप्पजना की मौमिक मनी हमें बीवन गए अनुमों दो प्रहण करने में किस प्रकार यहायक सिव हो सकती मला पौर साहिस्म के मिए उपतन का प्रमोप कहाँ तक बाचनीय है स पर हम विचार करना होगा । परन्तु इसके पूर्ण हमें कसा पोर साहिय मतिम मम्प को स्पप्ट कर मना होगा । बस पश्चिम की हा-मैना मित्तान से हम टीक परिशों पर न पाच सगे। १९११] सरयेटीज मौर 'डान विवोट' (रेरियो वार्वा) मुझे पार पाना फिजब मैं कालेज में पा रहा बा उम ममम मेरे पम्पापक में एक पिम मुझगे पूछा कि तुममे 'म चिमोट' पाहै? मैंने कहा "मी" मोर उमपर उन्होंने कहा कि चिमन 'गन पायोट' नही पा उसका मापा जीवन म्प मया । पावरा तप कही गई पीकि मेरी उत्सुकता को पारु नयी पौर पीम ही मैंने यह पुस्तक पर रासी । उस समय तो इस पुस्तक से मेरा मनोविनोरनी हुपा पर मार को उसपर विचार करने का प्रबसर भी प्रामा पौर पब मेरी मारणा यानि सिम्सार प्रमोद करिए भी ही मिला मया हो उमरे पदर मानव जीवन एक सम्भीर उत्प पर प्रकाश भीमा गाई पर यही कारण मिह पुस्तक देश मौर कामको सीमा मे निकलकर दुनिया में मभी उमर सोरप्रिय बन गई है और पापर मा ऐली ही बनी रहेपी। 'राम पिट्यो' मेधा मरपटीर चिनका पूरा नाम पा मिभूम मररी मारेगा। गापेटीर में पौर भी बहुत-भूप लिवा पा पर 'गन तिनोट में गे माको पाप निया । भार प्रपनी इमी एक पुस्तक के मेरमाम से प्रनिर। मरवंटीपासम्म सोनम से म मन् १९७ मापापा । उमरी रिया-दीमा मसिपी गो उम मपय स्पेन में रिपाका मुरपापा पारही पर राम्होंने पाने-मिपन का मा राष्यिा पा । उन दिना प्रत्येक शिष्ट मणपुरक को पिपार पारिपताना भी पीपना पड़ता था। मावीर ने नुरी पोर मामा के अप मिटरो में हानेकाम ममुद्री पुर में भाग लिया पा पार समरा यांपाप पट नपा पारातुएम पावर पम्हेनि पोरक पुणे में पाप मिया। मो में मे रिमी में दो बार उगे पांच पर प्रमी सरखेटीर पीर 'रान विकबोट' २.. रिया में बेल काटमी परी । बेम में माने बड़ी छोर पातमाएं सही निकाल भामने के भी कितने ही प्रयत्न किए और पन्त में उनके बिम्ही रिवपियों ने पौर सौभाउन कर पन्हें मुक्त कराया। इस प्रकार इस वर्ष के सनिक नीवनी टु अनुमों को मंत्रोकर सरबटोर ३४ वर्प की परस्पा में फिर स्पेन पहुंचे। झाप उनका पहतेष्टकाबाबजबानी का भोप मी गोपमा पाबंदी-बीवमों, उनको परकर बिमा । इस कारण उन्हाने मन बनगर पीविका कमाने का निश्चय किया । इसके बीज उनके मंदिर के रिलो में ही पापे पोर पुन विधानों की ऐसी राय है कि सरपेटीर अपने मैनिक पीवन में भी कुछ न मुष तिमते यते ये पौरन सिकाट' कष अंग परस्प ही बेन में प्रबर निवे पए थे। स्पेन मारने के तीन बार एक पानी पम्या से उमोमे विवाह कर सिया। पर दहेज की राम होते तीनही बार बर्षों में दादी और पनोपार्जम के मिए नाटक सिपने मये । कहा जाता है कि गम्हनि बीम-सीप नाटक भी मिले पो धमकामीन स्पेन के रेगमप पर पेले गए, परंतु पमंच पर उमकी प्रतिमा विशेष म निपरी । उन्होने प्रारमगही कमिटा मिपम का मी पम्पास किया भाकर पुरसत भी हदेवी पर काम्म दोत्र में भी रहेको विशेष गफ मता म मिमी । मेनती रे बम पर पोविका पमाने में असमय होकर सरगर को सरकारी मापारी भी ली पड़ी जिमके मेगम में दर-दर नप में जाना पाता वा । इन मामामों का साम यह हुआ कि उन्होंने पपने देश समकामोन जीवण पौर उसफ मिमिन पहनुमों को बड़े गौर से रेपा । जीवन के संपा। सही पनि पोम पीपीप पिचास कर रिमा पा होने पो परेना उसे उनकमाकार ने प्राममान कर लिया और रम प्रमावि सनकी सर्व श्रप्ट सपना में मषित कर लिए। 'गत सिसोट का प्रकापन १५.५ में प्रा दूसरा माप १९१५ में निकमा । यह पुस्तक मिमी पुष मो ममपित पी मईपी पर उममे मरवीर को किमी रिचप प्रसार में पुरातन विषा । II सिर को किमी प्रकार के पुरस्कार की प्रावायला ही म पी।बई के पदर समपार सम्परम हए । पर-ग्राम सभी जपा उमड़ी पर्वा न पई। मानमान पिन कम - । २.८ मए पुराने मरोगे पके सभी को उसने मुग्भ कर मिया । साहित्य का जादू सिर पर पाकर विवना बोसता है उतमा काई पौर बाद महीं। 'गन सिकबाट के प्रफायन से यहाँ लेखक की भूरि-भूरि प्रसार यहाँ उसके पिरोपी मी बहुत-से हो गए। अपनी रचना म 'सन सिकनोट' को बमाकर सरयेटीव मे पहन-से समकामीन मार्यो का मपाक जाया था। विरोध मे ममद्रम भी लिया पर सरपेटीर गंभीर यने रहे। उन्होंने कई कहानी-संग प्रकामित किए । एक व्यगात्मक काम्प छहोंने 'बियार रिपारमेसो मामहे मिपा-बिया डिपारनेसो पानी काय माफ की यामा । उसमें उन्होंने पुष की साहित्यिक-दमा पर महरा पंप किया। पर सरयेटीर के म्पम में विनोद की मात्रा मपिक पौर कटुता को म्यूनतम हुमा करती थी। मरीर के जीवन मा उत्तर माप बस मेनका पीवनमा जिसमें बाहरी बहम-पहन कम होती है। उनकी मृत्यु १५१६महु-ठीक उसी दिन जिस दिन मप्रेषी मान माट्यकार मोर करि पेक्सपियर की मृत्यु हई। प्रया मोर-सोसार सरबटीर जिन पंपापा प्रकाशन किया गया। उनकी संख्या पानीम से उपर होपी। पर, सारा सतार उमकी जिस रपना बानता-मानता पाता है वह 'गन सिनो ही है। सरपटीर समय में एक विमप प्रकार के उपन्यासों का बड़ा प्रथमममा जिन्हें रोमास परते थे। तुओं और ईसाइया के समर नामक पुर के पापा समस्त योरोप में यायामों का एक पर्ग बन गया था जिरहे जाटते। मिसी प्रकार के पपर्म अम्पाप के विग्य पदा होना उन नाय का सनियुक्त कार्य पा। रोमामों में प्राय मिमी समनाया बारा किसी गुदरी बदी हानि मौर किसी मार द्वारा उमकी रक्षा की जाने पौर मा में उस मुरारी मार मार परिवाह की क्या होती पो । रारपटौर मे दगा कि रिमसमगनर्यागरण के पापा इस प्रकार के रामाग पुरामे हो गए। पर मेपरपण ऐमीही परि म्पिनियों पर अपनी गना दौडाहर पुल पार करते थे। मरण्टीर रामामारा म्यपरन सिए शान पिसाट की रचना की। सन पिरोता माया का पनेबामा एक साधारण नापरिकारा रोमामा पाने का कौन पापस्सना गति रमपीसीबी। पालेमाते पपर पारी पापों का नायक राममने सगना । मने गोवा मुके सरवंटीपौर मान स्विकयोट २०१ भी पुराने माइटों पी पदरम्पर पहन बोरे पर सवार हो पुष्य के मन पौर गिरीमों की रक्षा के मिए निकलना चाहिए। मह अपने दुषी-पतमे घोरे पर सपारमा उसने अपने ममापादाकाटा-मम सब पहना । नाटके साप स्वापर प्रपात् प्रनुपरके मिए उसने सेकोरा को लिया। करसमा करसी कि कोई रमसोनिया रेम टोबोसो नाम की सुंदरी है जिसके प्रेम का अधिकारी या तब बनेगा पर अपने सों को परावित कर लेगा। रोमसिौ का युप सो बीत पुषामा । पुमनावरण में मोपों की धक्तिमा बीवन के विभिन्न क्षेत्रों की पोर पापित कर ली थी। इस देर-पायर माइट को बहादुरी विधाने का रही अबसर ही म पा। पर उसने फापना हे पनु बनाए और उनसे मी हावापा को पौर से तप-तरह की उपहासास्पद परिस्थितियों में पाकर कष्ट उठाना पड़ा। मत में उसके मित्र संमसन कैपसको नाइट का देस बनाया इस हरामा और उससे पप भर म माने की प्रतिमा कराई। इसी में बीमार होकर साम सिकसोट मर ममा। मरपेटौष मे बोम्पेग रोमोसों पर निमन्य पाहा या बाबीवन पर ही म्मम हो ममा। पपनी प्रतिको सीमा न समम हममें से कितने ही समझने है कि हम न हो तो न जाने क्या हो जाय। हमी पपनी कल्पना पा पास युनते. एनी उनको प्रोडवे हमी प्रपनी पीठ ठोस्से है। हम सब किसी न किसी रूप मेगन सिम्पोट है। मुझे मेरो मिसंपूर्ण राम सिकबोट का हिंदी में कोई मनुवार नहीं है। कोर सम्पन बी पनिप से दवा पनुनार करें दो हिदी के नगर की वृद्धि, १९५०] प्रेमचंद पोर 'गोदान (रेग्यिो बार्ता) बागन' प्रेमचंद की मतिम परिपूर्ण रचना है। यह उपम्पाय सन् १९१६ में रमको मृत्यु के मुघ हो माम पूष प्रकापित हुपा पा से समाप्त करने के कुछ ही दिनों बाद रम्होंने एक दूसरा उपम्यास मिममा पार कर दिया बा जिसका नाम उन्होंने 'मंगल मूम रमवा वा मेपिम मात्र में उनके हाप में मनमी हीन ली और रचना प्रथरी ही परं । प्रमघर की ससनीय बमना मानती थी न बना पानती बी पोर या प्रसरण सत्य है कि प्रती सपम्बासकार स्काट के समान हमि मपनी मेमनी मृत्युवाम्मा पर भी अपने माष रम्मी और तमी घोड़ी अब पमकी समिों में उमे पर रमन की वाय नपई। 'नोगन' पल का पर्व है गाह्मण को गौ का पान करना । हिपुपों में यह एक बहुत पुरानी पौर या पचमित प्रथा है कि मरणासन्न व्यक्ति स पारस को मौका पान कराया बाता है। ऐमा विस्वाम किस प्रकार में रीबई पाय मर हुए पादमी की पारमा की परमो यात्रा में सहायक सिय होती है। 'मोरान' प्रकापित होनबार रिम बार हो प्रेमरको मूरपु हाबाने मेम रपमा को एक प्रतीकारमा महत्व प्राप्त हो गया। पहमद का प्रतिम पंव वा प्रतिम कार्य पा को उन्होंने माहिरप-मंमार से बिन मेने के पूर्व मंपादित किया । वास्तव म माहित्य मंसार में हो मषित माश- पिस्ता प्रषिक मिसनमारी और अधिक स्वमता साप विपरलका। गरीर-फरोत पौर मेन-दन की दुनिया के पिरा मनी । मरले हा पक्किारी मई को समझी पीरमा श्री परमार-याना में सहायक मिर होनी है या नहीं इसे कोई नहीं बता सकता। कम-म-कम में नहीं बचा करना।

प्रेमचंद पार मोशन मेकिन यह निर्षिबार 'गोदान' प्रेमबर को हिंदी के सबसे बरे उपम्पास कार स्म में प्रतिष्ठित करने में महापक सिरमा। अपने बीवन कास में में 'उपग्यास-मप्रार' कहे जाते थे । माया एक बार यह विवाद मी रा पा शिकवि-सपाट की समानता पर नमें 'उपन्यासकार-सम्राट' कहना चाहिए। परि सबपक को पोड़ा पार पाये जाना पनुचित न समम्म पाए तो मैं कहना बाईपा कि यदि प्रेमपर उपन्यास मा उपम्पासकार-मम्राट थे तो 'बोगन' उनका मार-मुकुट पा । 'मोरान' प्रेमर की प्रतिम रचना ही नही उनकी मर्मभेष रचना भी है। पह बात तो प्रेम के साधारण पाठक पर भी पाहिर हुए परम ऐसी कि बोराममान परिव-चित्रण मानमरण प्रपया मेवा के प्टिकोण में कोई ऐसी पीर नहीं है यो बिस्कुस नई कही वा मरे बो पहले कभी नहीं पी मौर बो महाँ पहली बार रखी पई है। पुस्तक हाथ में मेने के समय से मकर पुस्तक ममाप्त कर पर देने के समय तक प्रापको बराबर यह पनुभव होता है कि पाप प्रेमघर की दुनिया में घूम रहे हैं। पापको पुरू से यह पता हना कि नमकी कानी कैसे पाये गोगी पौर समाप्त होगी उसके पास पिस प्रकार का म्पहार पे पोर मे विकसित होप मेवा हमें किम मोर मे पाहा, किनके प्रति यह हमारी संमेरमाएँ जगाने या हानिके प्रति इमारी पण रमारने । 'पोरान' को किसी भी पर्व में हम कोई नया स्वम नहीं कर सकते । पस्तुत 'पोशान' में उसी पानी पौर प्रापर्व की परिपक्वता पौर पुष्टि विसे प्रेमघर मे अपने कलाकार पोर मानव के श्रीपन में गुस्से अपनाया पौर पर रमया बा । ममपत पपने माहित्यिक और साथ ही पपने भौटिमबीवन को पपाप्त करने के पूर्व मन्दनि पपी को पत्रिका में एक उपम्पास में रख देने का प्रयत्न किया पा-अपने कमाकारको यो मानवको भी पौर उमी की परिणति 'गोदाम' में हुई। इम पपग्याम के पामीरप तथा मागरिक पामों की भी में दुमकर-सिनमें 4मिमा परिचित हुमा शिग मने पलाना-मममा भर में किसी फमार पपमा ससानक को नोरने का प्रपल पला । तो म प्रपने-माप को अमन ही पाता है। एक तप में होरी को हम इस उपन्यास का मापार सम्व है। मप्पपस होरी एक ऐसे गांव का स्प। यो एकबोमबार मए-गुराने मरे मात दूर नहीं है। उसके पास बोड़ी-सी पमीन है जिसपर वह अपने परिवार के सदस्यों की पहायता मे काम करता है और पोरसके भरण-मापस का एक- मात्र मापन होरी का पीवन उम मये संपर्व की कहानी है यो ससे अपने परिवार के मामों समान गारों मिण कद मानेकामे पक्तियों मूषधोर पाहकायें पुनिया के कार्यों पष्ट पट पटवारियों पौर पमीर के युग में विसना परवा है-पौर निषम ही गरीयोपिय मी बो भारतीय हिमान का सबस बदा मभिशाप है। सामाविक है कि पि-निर्भर समान में गाय ममूटि मा प्रतीक बन गई। पौर होरी की महत्वाकासाहै पपने पर एक पन्धी गाय रसने की। बह उस पर पाती है परंतु भूप-मरीचिका बनकर पार की ही विरोहित हो पाती है। अपनी मृत्यु-गय्या पर बह बाहख को भी दान देता है यह गाय नही है बह उसका प्रतीक मार है बोड़ा-सा सा मी उगकी प्रतिम बचत है। शिमकी पीठ में सीपी रो महीमही करता। और होरी की पीठ में पारपार निश्चय ही बह पदव मोती है। यह क्या बीर हैबर में विश्वास ? चरित की परिणता? ईमानदारी सचाई। पता ? माघा? या पौर कोई मेसिक गुण यो साधारण उपोपों पीस सूची में स्थान पक्षापमा पर्ममृति की पारम पोपियों में बपाना पाप है? मुझे पामा म्मिा पाप पनि म को कि इनमें से कोई भी नही । होरा सारे काम सिर्फ एक बात में निरिए होते है बस एक पारला पर पापारिख १ मा विचार से प्रेलि! बिमबह मरकापणी को भार उमनी पवार पर पना समतुनो मार सभी नोर्गोपीपीम पर रहता है। नरका प्रत्येक व्यक्ति इमपी ग्यापहवा मिकी मपरियामा सही उपयोगिता से-पामर मोमा में भी है। हर पक्ति को प्राय मतमता होता है पार पप भी कोई पति पानी पिसी दुर्वलता प्रममा पिसी निवार्य परिस्मिनिषा ऐमा करने में प्रगपर्प पताब रस इस बानीमा हवा है कि उसने कुछ ऐसा रिया को गलत है अनुक्ति है पोमन है। पौर मी मम्मर पह मोपने का प्रपल पिया है कि मामले मामय गया ११ इनमे गारो मोप मम गया है। मेरे विचारमा मनमानपी ईसानिमा पारी में शाप प्रेमषद पार पोदान मियत मनुष्य की ममुष्मता मानव की गरिमा । अब कभी होरी कहा है कि पह परमार नहीं है, तब रसका मतलब होता है कि यह मनुष्य को सोमा नहीं रेवा । मनुष्य से बो प्रत्यापित है उसकी एक सीमा है एक स्वर है। उससे बाहर गाने पर नीचे गिर जाने पर मनुष्य मनुष्य नही रह पाता। प्रेमघर बग्म पोर पामन-पोषण गौर में हुमा वा पर उन्होंने भाव प्रवण पि भागी समाचार की रागारमा बिरमा भारतीय किसान पैन्य स मकन्ट, कपट और अपमान म्मानि को देना-समझा। पौर में उस संपर्प भी सामी पे भोपाचन सबके गिर पपने जीवन पर परवा एता है। प्रेमघर में अपनी पांचों से देखा पा हिमारे पौष छोटे मोटे मरण हो गए और इस बात पर पाश्चय किया पादिपब समष्ट भप्ट हो पाप में विमीन क्यों नही हो गए। उन्हें मामास हो कि हमारे मानों से भी दोया हो सब कुछ बोया हो एक बीर उन्होंने मही बोई पी-- मूस्यों में मास्वा मानव-मूस्यों में मास्पा--मान-गरिमा म मास्था-एक धय में मरबार । उनके मन में यह बात पई पी किहोन-दो इसी ने गई पपीत काम में महारा विपापा पार उन्हें विश्वास हो गया था कि पही उन्हें भविष्य में उबारेमी भी । मेरी प्टि म होरी इसी विश्वास पोर इसी भाषा का प्रतीक बनकर हमारे सामने मड़ा है। एक पर का पूसरे पन्त से मतुमित रखमा उपम्मासकार की बड़ी पुरानी सनीय है उपन्यासकार की ही क्यों सभी कलाकारों की मुध मोपका मस्त किनापरिक पार्थों का वर्ग-मेहता पम्मा तनया पिर्श मानती का-बस इसलिए माया मया है कि प्रामीण पानोंरे-होरी मोमा गोर, मातादीन पनिया पौर मुनिया के बय लिए पृष्ठभूमि ा काम दे सके सिगम किमपरीरय से प्रषिक उभरकर हमारे सामने पाएँ । मापरिष पामाबग फा माने में वन रसना देगमा उपन्यासकार के सब उपय मे मनभिग फबाना है,बो ममवा उसके मन में था। माव सोग भीविकाटि मे परीव एपी है मेरिन मानव-मयों में उनकी पाम्दा पपपा के मान-मूपों मे सपत है। शहर के मोम गौतिक प्टि से मपम्न है 34 पास पन की पति पेटिन या तो उनि सागर भूपों में पाया तो दो है प्रयमा उनम मत है विक मूर्यों से मूम्बा मे २१२ मए-गुराने मरोगे बहुत दूर नहीं है । उसो पाम पोड़ी-सी पमीन है जिसपर यह अपने परिवार + सरस्मों की सहायता से काम करता है और वो उसके भरण-पोपण का एक मात्र मामन है। होप का पीएम मो मपर्प की कहानी है पो उसे पपन परिवार के मोर्पो समार के केदारों मित्र कहे जानेवाने प्यक्तियों, सूरसोर पाका पुलिस के कामों कपट-बट पटवारियों और समीबार के मुगा बिना परतापौर निरषय ही परोपी के विषय मी जो भारतीय किसान पा सबसे बड़ा पमिपाप है । सामाविक है कि पि निर्मर मार में पाय मटिका प्रतीक बन गई। पौर होरी की महत्वाकांपा है पपने पर एक पछी माय रखने की। यह उसके पर पाती है परंतु मृग-मरीषिका बनार पौर धीमी हिरोहित हो जाती है । पपनी मृत्यु-गमा पर यह बाह्मण को बा दान देता मह माय नहीं है यह उसका प्रतीक मात्र पोस-या पंचा का उमकी मतिम । जिसकी पीठ कमीच में सौपी नही है यह पर्प नही कर समया। मौर होरी की पीठ में परमार निषय ही वा बहुत पोती है। यह मया पीर है?वर में विश्वास परिष की परिपता! माना? सम्मा! सवा? भाग पा पार कोई मैतिक गुण पो सामारण उपरेपकों कीस मुची में स्थान पाता है परवा पर्म-स्मृति की पावन पोधियों में पाना पाला है ? मुसमा क्रिया बाप परि में कई किनमें से कोई भी नहीं। होरी सारे काम सिर्फ एक बात मे निरिए होते। बस एक पारणा पर पापारित १पमा रिचार प्ररिन बिबाह 'मरमार कहता है जो मगर सनरी पान पर रहना है बस्तुन मो मार सभी मोपों की पीम पर रहा है। पौष का प्रवकम्पत्तिसको म्यापरता इसकी प्रपरिहार्यता सकी उपयोपिता सेनापर गोमा म बीमत है। हर पक्तिरे पापे मतरता होगा पौर पर कभी कोई पति अपनी गिनी दुर्बलता पपवा रिसी दुनिया परिग्यिविषय मा करने में प्रगम एणब म इस बातमी दिनमा हती है कि नो ए ऐमा म्यिा है पो गुमत पषित प्रपोभन । और मन मगर पर मारने का प्रदान यिा है जिस पर मतप्तय क्या ११ ममे गातोग मममी पपा है। मेरे विचार में सामानामान की शानिय पारमा पार प्रेमपर मार 'गोदान' मियत मनुष्य की मनुप्यता मानव की गरिमा । जब कमी होरी कहना है कि यह मरणार महीं सब उसका मतलब होता है कि यह मनुष्य को प्रोमा नहीं देता। मनुष्य से पो प्रत्याशित है उसकी एक सीमा है एक सा है। उससे बाहर गाने पर नीचे पिस पाने पर मनुष्य मनुष्य नहीं पाता। प्रेमका का बाम पार पामम-योपण गांव में हुमा वा भार सम्होंने भाष प्रथग्य हपि भावी माकार की रागारमा संवेरना मे मारतीय किसान पर दुल मन्ट कष्ट पौर पपमान पानि को देखा-समाबा। पर ये उमा समर्प भी साक्षी के मोह उन सबके लिए अपने बीवन भर करता पाता है। प्रेमबर में अपनी प्रायो सेरेला या फि हमारे मार पोटे मारे मर हो गए हैमीर इस बात पर पादचर्य किया पाकिब तक नष्ट सरहा पम्प में विलीन को नहीं हो पप । उन्हें मामास हमा कि हमारे पार्षों मे मी बोया हो सब कुध नोया हो एक पीक उन्हनि नहीं सोईपी-- मूल्यों में मारवा पाना-मूली में प्रास्पा-मानक-गरिमा में प्राग-एक गम्र में मरमार । उनके मन में यह बात बंद यई पी हि हो-ननो इसी में उन्हें पतीत काम में महारा दिया था और पर्ने विश्वास हा मया मा कि यही साइ मषिप्य में उबारेपी भी। मेरी प्पि में होरी इसी निवास पोर इसी भाषा का प्रतीक बनकर हमारे सामने नहा है। पर परा को दूसरे पम से मनुमित रखना उपन्यासकार की बड़ी पुरानी मनीको वाम्मासकार की ही मर्यो ममी कमाकारों को है। कुछ मोगर मम् रिमापरिक पात्रों का बर्य-- मेहता बना नया मिर्गा मामती पास इसलिए माया गया है कि प्रामीण पाऊ-होरी भोपा मोतर, मावादीन पनिया पौर भूनिया के लिए पृष्ठभूमि का काम । मके, नितम किन परीस्प से अधिक परपर हमारे मामन पाएँ। नागरिक पानी पर्म को माने में समलमा रेमना उपग्यापार रे रसबो गप्प मे अनमिन इबानाबो मंभवत उमरे मन में पा । गौर के लोग मीनिक टि मे मरीब बी। मरिन मामप-मूल्यों में रनको मारमा है अथवा मान-स्था के सबताणहर मोम भौतिक रपि में संपन्न हो पाम पन की पति है मेदिन पा तो उन मामा मुप्पों में ग्राम्या पोरी । पपगा नमे प्रचार मैतिक मूम्यों में मुस्यों में २१४ माम् पुराने करोच हो। पहले बर्म के लोग भौतिक सुरिमार्थों को तरस रहे। दूसरेप रे मोन मैविक मूपों का प्रभाव में देन। मामती को तब तक मानसिक प्राति नहीं मिलती पब तक किया मैतिक मुम्यो को नहीं अपना मत । जन सामान के प्रति संरचना दीनों की सेवा असहायों की सहायता पम्ही स उअमन होती है। प्रेमबर के 'मासन में गौर के एक बम का नगर के एक वर्ग से जो मंतर रिखमाया गया है, रह रस महान प्रदरमा प्रतीक मान है पो हम भार के ससार में बहुत बड़े पैमान पर देख रहे है। एक तरफ परिषम है-पम-बाम्य से सपा-पोपालकिन उसम मानर-गम्पों के प्रति भास्था वा प्रभाव है। दूसरी पोर पूर्व है एसिगाविप के मुग का 'समृट पूर्व (रिच ईस्ट) नई गरीबी का प्रतीक---को अपने मौतिक भाषों में भी विश्वास पार पाया साब फाविपय मानप एवं मैतिक ममका बीवन रे भापार-भूव मूम्पों से सिा हुपा है। प समय हुए, में एक पुस्तक पर पाबा रिसकी हाल में परिचय में काफी पर्वा --अमेरिका नोप एन पापियामोजी (अमरीका की सिात की पारयाया है)। एक ओर से प्रतिपनि ही पाई नरिया मीम एम-नसेस' (मारत की पुत्री की मायकवा है) या पक-दूसरे कीमत 'पया पमरे में गेम-रेन मभर है ? और पपनी वारिसेपर से "मोबान' में बो उमपानी की वह पापुनिक संसार पी समस्या है और से प्रश्न पार हर पमह प्रपे मा ऐक्या दुनिया इन प्रश्नों का सरली इस गृमस्या को करेगी। १९५७]] पत और कला और यूला चार मेरो भिमा-दीक्षा कुम इस प्रकार हुई कि मैं कषिता का प्रेमी बन मया । ससार और परिस्थितियों के कारण बीवन के साथ अनजाने मोपीट-पसल माल पाते है या मगा सिए बाते है कभी-कभी उनपर मामे पमकर पछतागा भी होता है। अपने काम्प-नेम के कारण मुझे पपठाने का प्रबसर महीं पाया। उल्ट, पाव मिन दो बातों के लिए मैं परमात्मा को सबसे अधिक पत्पबार रेखा हूँ उनमें काम्य प्रेम का नबर पूसरा है। पहमा न बताउँमा बहुत निगी है। पुणतूने मुझे मपिता का प्रेम रिया । दुनिया में बहुम्से सौर समय के साप पट भी पाते है मेरा पाप-प्रेम नहीं बटा । कमिठा की कोई पुस्तक देवार, में से पाने को सामामित हो उठता बरीकार मापार, पुस- कर । पिचमी पो नौब भी कम नहीं पाई। पौर परमात्मा से मेरी एक पिकायत भी है कि उसने मुझे कभी इतना पैसा नहीं दिया कि कविता की जितनी पुस्तः बासरीद मई और गिनना चाहूँ उतना पूर पी सई। मापायी तो मैं कागजी भर दिमराया वो मैं दूप काही है। कभी-कभी तो ऐसी भाषामों के काम्प मगहों का भी सरीरले का मेरा पी करता है बिहें मैं नहीं समझ समता। दूकान या पुस्तकालय में उनपर शाब केर चुपचाप रख देवा:-यह रस मेरे सिप नहीं है। मेरे विचापीपीवन में शिक्षकों और परीसकों का एक बड़ा घिसा-पिटा विपप बा जिपर निबंध निदाते पे परों में समान रखते पौर मौविक परीयामी में भी प्रश्न करत र योर फेवरिट पोएट! तुमारा प्रिय परपा पर्मब का पपि कौन है ? उस समय ऐसे प्रश्न का उत्तर ने की दोपता मुममै क्या पी हागौ । प्राब अगर ये लोग मुमने यह प्रस्न पूछो तो म पापा भषिक परिपका निणय पोर पारमणिपास साब उनको उत्तर रे सख्दा । मने दिप प्रप्पयन पंपेगी और हिंदी माम्म का प्रिया । मोरी के पुराने २१४ नए-पुराने मरोले ही। पहले वर्ष के लोग कातिक सुविधाओं को तरस है। इसरेप मोप मैतिक मूल्यों क पभाव में देना है। मामी को हर मानसिक गति नही मिमती बर तक कि यह नैतिक मूल्यों को नहीं अपना सेतो । बन साधारण के प्रति सरेरना दोनों की सेवा महायों की सहायता नहीं है उपत होती है। प्रेमर 'मोरान में नाम के एक गानपरकर्म से जो मंतर रिपसाया गपा है, वह उस महान प्रहरी प्रतीक मात्र को इस प्रार संसार में गत बो पैमाने पर रेक ऐ। एक तरफ पश्चिम ई-बन-बान्प से मदा-दा-लेकिन उसमें मानव-मूम्पों के प्रति पापा का प्रमाण है। दूसरी मोर पूर्व है एमिनावप पुन का 'समृर पूर्व हरित न्ट) नहीं सरीबी का प्रदीर-कोमपने भौतिक पमारों में भी विवास पर मामा के साप फविषय मामय एवं मैतिक माया बीवन के माहार व मूल्यों में विपका हमा म एमय हुए, पं एक पुस्तक हापा जिमी हाल में परिम में काफी पाई-अमेरिका मीड्स एन पाश्मिासोगा' (पमरीका सियात की भावसाग) एक पोर से प्रतिप्यनि-की प्राईरिया मौन पक-बध (भारत को पूजी की पागम्यता है) या एक-दूसरे कोमा है? क्या एकमरे में गम-देन ममय है! और मपनी मंतरपि से प्रमाणे 'पोदान' में पो भास्पानी की पापानिए चार मी इमस्या है और यै प्रम पार पर पूधे वा ऐया दुनिया इन प्रश्नों का उतर देसी पप धमस्या कोमपरेपी? १९२०) पत प्रौर 'कसा पोर का चांद' मेरी हिमानीमा दुध इस प्रकार हुई कि मैं कविता का प्रेमी बन पय संस्कार और परिस्थिठियों के कारस पीवम के साप अनजाने बोपीक-सा मम पाते हैमा मपा मिए पाते है कभी-कमी उनपर भाये पार पवार मी हाता है। अपने काम प्रेम के कारण मुझे परवाने का भरसर महीं पाया उस्टे, पार मिन दो बातों के मिए मैं परमात्मा को सबसे पविक बम्बमार देता है उनमें काम्म प्रेम का नंबर दूसरा। पता न यताउँमा बहुत मिली है। मुकदमे मुझे कविता का प्रेम दिया। दुनिया में बहुत-से पार समय के साप पर भी पाते। मेरा काम प्रेम नहीं बटा। कविता की कोई पुस्तक देखकर में उसे पाने को सामापित हो रठमा :-रीरकर मापकर, पुरा कर पिल्सी रोमाय भी कम नही पारा पीर परमात्मा से मेरी एक पिकायत मी है कि उधन मुझे कभी इतना पैसा नहीं दिया कि कविता की गितनी पुस्तके चाहे नरीव महू पौर मितना पाएं उतना इष पी सई । मापायी तो मैं कासगी पर रिमारा तो मैं तुम का ही। कभी-कभी तो ऐसी मापामों के काम्म महा को भी बरीने को मेरा भी करता है जिन्हें मैं नहीं समम समया। पान पा पुस्तकामय म उनपर हाप फेर उपचाप रख देवा-पारस मेरे तिए नही है। मेरे विद्यार्थी-गोपन में प्रिमों पौर परीसों का एक पिसा-पिट मिपमा निसपर नियंचमिवावे पे परलों में बात रखते पे पार मौखिक परीधामों में भी प्रश्न करते समोर फेवरिट पोएट? तुम्झरा प्रिय प्रबमा पराकरिकौन है? उघ धमय ऐसे प्रप्त कारत्तर देने की योग्यता मुममें सपा पी होगी। पार पपर ये मोम मुझसे यह प्रश्न पूछो तो मैं पाप पमिक परिपत मिर्णय पौर प्रात्मविश्वास के साथ उनको स्वर सकता। पनि विरोप पम्पपन पप्रेरी और हिना काम का किया । मरिरीक पुराने मए अपने भो परदा पौर पबिपों में ऐक्सपियर पार माधुनिक करियों में सिपो मार हिंदी पुराने पारियों में तुमीदास पौर पाधुनिक कापियों में मुमित्रानंदन पंत को में पाना परि कविका सकता है। पसद पार 'प्रिय से फेवरिट मुमे कुप प्रषिक मुम्प पर्ष देता है इसी कारण मने इस पद का प्रपोप किया है। फेवरिट' बनाने में किसी परिप-बोटे हाने का प्रदम नहीं उठता हासाफिक्सपियर पौर तुमसोवास यापन के मापे प्रश्न-पत्र कौन पाण्या पंट के बार में उनसे दो माधुनिक कवियों की परपना की पा सकती है। पत दो को प्रथम प्रकापित कति सम्मा' मने १९२२ में परीकी। तप से मान व उनकी सभी नई रुपिया योन प्रकापित होते ही पड़ी। उनकी प्रत्येक रचना में मुझे एक विशेष प्रकार की मीनका पिसी है-भाव-विचारों काकोरमया स्वरबम-जीवनमान प्रति कोई अभिनय प्रतिनिया। पात पार लिमिहीं रचनामों में किसी मन स्थिति कोएकता प्रपया दरार फायण पुष साम्य मी हो-से 'युगवाणी' पर 'प्राम्या' में या पपई किरण' पर स्वरसंपनि' में से पत पी में दराब पी स्पिति अधिक समय तक नहीं रहती। किसी पर्ष में नही सतत प्रयविधीमारी राति नई दिशा पा मप मोह का सरत भने ही म. परमपिर पर पारने का पाव निविवार स्प रो देती है। हमें यह न भूनना चाहिए कि सबन को रिपा पमान ही नहीं होती कर्म पी होती है। मगर कही मागे नसी बड़े तो पर है पोर प्रायः रहनि रोना नाम गाव शिपाय भी बदेसर भी है। "मैं यहाँ पापा पम पम पम पर पार ना"- गम "सर पर भी पारमाही। पंचपी को नीनवम इति 'पसा पौरापार पीरपना गे १९५६ मंत्र में पापित हुई पोर १११.प्रारम में गोगों को पोली। रिला गार में पी २.६ पृयें की इम पुस्तक में पिता है। गुन्तपर रामटते पलटते हो रिस बात का पट पामास होता tet इससीमामा-प्रत्यापित मनवा नहीं पत्रस्यापित मरीनमा प्रापजनक सीनता । ने पामौग बन पाम बीरन में पामी बार उन्होंने लाली नमी में हरिताएं मिती रिममें पायर उहाँने मन एक पति भी नहीं मिपीपी।

पर पार पधर पौर का पार सील परिसठन अपने पाप में एक ही बात है। अपने प्रति ईमानदार और पारमदानी दिपपदा कलाकार में मीका परिवर्तन उसकी बीमनानुमति में परिवर्तन उमड़े भान पषमा रिचार-परत में किसी प्रकार की उपस पुनम पवमा उसकी किमी पांतरिक घोष एबमर प्राप्ति का अनिवार्य मरत है। सैमी स्वनी बाहरी बीर नही मिटमी पाप उसे समझ मिया पाता है उस पैमी में न सिपा इस मेमो में मिथा। कप्य मोर कपम, विषम पौर मोम मास और त्वचा से भी प्रषिक निकट और मूमम सबष है। पर ऐसे कपिकी यमन मारनही हो सकती किमपने उर-जिर मनापमे गामी वासी से सहसा करे कि पपने मन की पायलें उतार होतो. स माप मधीवता पर परिपन पीपे किसी भातरिक मीनताको लोभमझने की भाषयकता होगी। सेमीनमा प्रयोग भी सबकी सीरता का मिडकमाहा है। समीर पाति सजीव भापा मबार साहित्य नए-नए प्रमोम ध्यिा करता है। यह म्पस्थ तभी होवा परोपातरिक रतनमा मभिप्पत्तिमामता है । प्रयोग लिए प्रयोम पार कई पीलिया करती है- पामर अपनी सन प्रवृत्ति की गहरा मता में हो। पुन मा पषिक समन है । रिती मिमी प्रात्रा में हिसी प्रति अनुपरण करने के लिए, एबरा सामरयामोमो का मान पपनी पोर मार करने के लिए अब भी रगेसकी पारपस्या है- पंतपी में अपना संयम तोड़ दिया होसे मैं बही स्वीकार कर समता। पानीम का वाक-मापना करने के पश्चात् काम प्रफनो मानसिक पानी मिलिए, पयों की सहानगृहात कामास की रेमिए पमा । में यह मानवा! किनकी की मई मी उन प्रहर में किमी नहीन प्रस्पुरम का प्रतिफरस है। मेरा अनुमान गिर पापने पासोच्य ति मही सी वो प्रदान सो की बिनामिए पापकी विज्ञासा माग पई होगी। रमित, महाँ मत करना मनुषित न होमा मपी पर घोटी। मधुपर मो ममापियो रमोने मधु (4 नप-मुपन - . कहाँ मनाई? बेकिंग पारबन म सच खिमे फूल जिनकी स्तुड़िया वामियों की तह पनतमलिए गुती राती है। कितने मला स्पप्रष्टा पितकार तूसी से उमा स्पग प्रतिरमाए । में गुणमा कापर पुम्दमाई हार्ट मगाई। स्पर प्याम मयन मधु मही पोण्ड मा पोमानेकी माती तुम मर्मदी मेट स्वर्ग म प्रबनकर हिमामय-म अपन पुत्र मानका भूगित र गई। उन मालिक पुष्पराग चमतपयरों में मा पापा होरफ रश्मियों परा- शिमगार तुम भरमा

पंतपौर मा मौरसाचार
पौन प्रस गंग तुम्हें
कसका मदेश देगा।
पो गीत सबी
ये बोनते पंह मुझे भी दो
बी माते रहते है-
पौर
बामा की गहरी परत
मैं भी
मापारी उड़ान मस्या।
मानवाकी रचना
सुमारे पत्ते-सी हो।
गिसमें मर्ग जनों का मा
युगों के स्पण
मानव वय की
कपा ममता--
मिट्टी की सौपी गंध भरा
प्रेममा पर
पायों पा रस हो !
पाए
पोप
तुम बाहट हो
में प्रथमिमी हो ।
मिममे पर
हमनाम बाट
भरममाऊँ।
हाय रे दुरापा।
मुझम
मामाना
रिच पाए।

२२२
मए-पुरान मरोगे
समकार से मारप्रवण पौर पृत्ति मे ममितिप्रिय होने पारस करिया
साकार इस प्रपतम का माम गा शिकार होता है। माया विकार
माहिम के क्षेत्र में भी बुसे । ममालोचना की मनोविश्मेपणारमा पनि पस
पी। इसमें कोई बस नही कि काया कविता ममझा की एक नई
री माया के विचार पूजन के क्षेत्र में भी पुसे । यहाँ पासे पपरेतन भगवान
मकको पभिम्पति को प्रभावित करता वा पा पानापानसर मपणे
मस्तिष्कको प्रप पुक्षा समावस म पंख मार को मे मस्य पौर सम्म के नाम
पर बहु-मा करीश निकालकर बाहर ने ममा । पारमात्म
ममार और पापाय मसार के प्रभाव में पाए हुए सेमार काम में न
प्रवरेन से निकाला हुमा पल-मा मर-ममामा पार पमबमा पा है। ऐमा
करनेवालों के पास शिशाम काम मरम में यह मे मीर समोर माय
को भाब पाकर देखना होगा। ऐसे ही ममम में पूर्व में एक और तिम
उपमहमा उसका नाम पारिकापरमीचे को मि तो परमार को
उठाया परचेतन को तोर की तो परविर मे पतिपतनकाधारकार
किया। दोष के पातम गे वा बहुत-से कवि पापेन की पोर मोही
कपि पठितम को पोर भी । दिौ में पंत बी ए पार कर
बिन्होंने इस प्रतिवेतन को भगवाहने के लिए गरबा में प्रमान लिया ।
उन्होंने प्रसार गे पुप हो नही मोहा ममका निरोप पी पिया है। उनकी
'मिपी'मसार-महारो परमात् नगरों को जो एक प्रतिमा विपत-गल
युग की गिनती शायरी
पर मिरमानमरी भूवि शिम भर नपुदी'
मानव पूर्ण मागता भाव मूरो।
पुचाय पिन शरोधी न तन
रण पप्पी एण, मौरी मुक्त पानि
मत पाएगा मानम विषमान प्रमा
कोर पापा मम मामा
किमी मनोविपरीप्रनिमा मननी मा-
मोदी-मी मरमान बाम। मन में

पर पौर मा मौर का बाद परचेतनरेपकार म भटग समाजो! मर्म मेणियों घोर चेतना की जो निम्नम निएपेवन में पिपरा पर मानस के स्तर पर उमम पिर्यों में प्रसम्म दिय प्रम पीडित मोबन पामा पात्ममिका पर भवर्मुक- समरे मोटे पोठों में मामसा दवाए ईयों को रेखामों से बर्गर मानन ! पतिपतन की पोर उदने का यह मध्यवसाय मंमगत उन्होंने 'स्वकिरण' की रचनामा धान पार्रम किया था। कमा मौर हावाद' मै उसकी पो मनोमन परिणति हुई। मोबाव पहले मियात पा विधार के रूप में गाईपी यह कवि की कम्पना का माथय पाकर मी बोडी सुप्ता के साप 'स्वर्णकिरण' 'स्वर्णभूमि में प्यक्त हुई। 'उत्तरा' में यह प्रषिक मान-सिक्त होकर पाई। भारपर्य नही पंत बो ने ससे उत्तराको माप-बोपमा भाव ऐश्वर्य की दृष्टि से भरनी रचनामों में सर्वोपरि माना। प्रतिमा' और 'वाणी' महोते ए मा पौर हा चांद' तक पहुंचते-पहुँचते विचार मौर मान सय हो मए, मामानुभूति में पदम पए, जिसे पाप पाहतो महर स्फुरण सहा प्रमा अषमा रिम प्टि फूध मीप सकते है "मो रचने तुमार लिए पास पनि दलाई? काम सम माप मा? मग विचार, सब मूस्म सब पाप भय हो गए। मुभूतियों को एक सीमा पर पम साप नही देते यह मापारम्प अनुभव मा पोर मापार में भी सम्मों की असमर्षता बार-बार पतकी या निरोपामामी पमितिमा पापारी काम से ही हिंदी में मा मई की। पना में उनका प्रयोग मबसे पविकामा । म एक-दूसरे में रपामार हो पाते। पि मौन भी होने को मार है। परो *स मौन से भी अनुभूति प्रनामिम्मत ही ऐगी। 1- २२४ नए-पुराने नरोने 1 सापक अमर कलाकार गिरवी होता है। यह निषप रखा है कि यह लोगों में सेना "मैं शम्दों की पायों को सरकर मरवों में प्रतीकों म योमा। महािहे कवि बोगकोच मिसर में निधन की बोटी म बोले चाहे पोषक तलाउम ए-प्रपतन की निचली--निची सना में बालत रोना है प्रतीकों में ही। जिसे पठन की पिणा कहा बाठा है वह उतनी ही मतीक मधुर है जितनी पश्चेितन की कविता । पावर पावर दाना ती प्रमिपति नलिए पाहिए । पायपदोनों से पन्छी कविता भी मिनो या मम्ती पर पर पिता शाप बीयनको समझने का प्रपत्र पिया गाण्मा जीपम का ररात पनाने की प्रेरणा पी पाणीसा अपवन की पता स्वीकार करते हुए भी निचेतना के पिर परामा होगा। विता बा मनिम पेय पोषन को उपमा ही हो पाता है। पन्ना में पीला गरपोरणा से हुए पाए थे "मोमी मुरता कम्पाणि । माप ऐसयों की मान।" भगा और समाचार' मरे पर स्पर में करते है पिकीलाही सत्य और मुरार है।" प्राचमन देवा मापनप्य पंसानिष्किोण की हार पपना ला समापन पर सरेया। प्रपतन २ मा प्रेस ोि गमिलिमों की धिर कामनुपापी होना पड़ेगा। हमारी पौणिमा का मही मम ममें है। कल में 'सा और द्रा पार ऊपं मयों का काम है। रम मापों पर पर पो स्वण गे मकर गायर एफ मरेप में 'पीमा से मार माहितले पाए, 'पोरसा में मापा र बीमारी में एक दुनिवारी परावन मार दिया था। पंतपी ने पपने साम्प-नारन में भागे भी एन पहारो मे मो बहनहा-धारों में दो उति पत्र पौर 'कमा और पूरा पार २२५ कहा है पायद बहुत-से मोप उसे उनकोटि की कविता म माने~कमा पौर पार में उन्होंने सहा स्फुरण (इनहरमन) से कहा है रिप्पष्टि से कहा -प्रप्टा के प्रारम- विलास से रहा है वैसे हमारे रिक अपि कहते हैं 'राहमेव पुरुष महाव"- (मैं इस महइ पुरप को बानता है) X - x x हिमामय के मुम सेत मौन को मानसपषसे छोटा पापह" X में मूम मेंबा बह स्पग्ध सरोबर निमा () रक्त कमत सा सिता। मेरे प्रेम प्रेम स्वर्ण गुम हो उठे। पठ बी केबस कवि नही हे बहुत बड़े विचारक भी है यह पौर किनिषाको पचवर करता कविता न माना पाए। पप रपमा पर पत पी का इतना परस्त परिवार दि पब में ऐसा सोचने नया कि पापा पपने विचारों को संयमित नियमित संतुलित सेमिप्त सबम और पूर्णत प्रभावकारी (विटी पर स्ट्रेप) रखने के म्पेय ही से दो नहीं रहोंने पमें पपर किया! अपने एप विचारों को उन्होंने पत्र में भी पतकिपारमौर पपम भी। किसी को सिौ दिन इसका प्रम्पयन करना पड़ेगा किविध माध्यम समापि में पोरे में अधिक सारगमित बावह रोपिर्मनीपी तो पतबी रहमे मीथे । कला पौरापार मे सप्टा पहनाने का भी अधिकारी मारिया अपनो मंत्री कविता स्वर्णोरपनायक में पायब उन्होंने अपना हमे का पौर प्रबका पिन प्रक्ति कर दिया है मर-मुरान बरोथे तरण रपीने में गानों के पापक मेव प्टिमारहा विधारक अनमण नायक प्रपेपक घोषक निययुग का माम्प विधायम पर्म नीति न संबन में अपर विनायक ! x x "पहर चेतना स अब उसका एप प्रकापित पावप-सौ वा बिसे म र करती रेरित मैनप यौवन पिपिय, बसत उसी में चित्रित मुभ किरण यह पीवम सपनुप मै सरित में पह मेप इस विकास के साप समाप्त करना चाहता है कि रमा पौर यापार के प्रति मापकी मिनासा दोषी पार पाप से पाना बाईने । पुतुबमीमार की चोटी पर पहुंचन सिए पहुन-सी मीदियो पाली पाती। पंत जी को यह अभिनव कति उनकी घाटी की रचना है। पर पाप पाये रिका रस पाप मे सभापको पीडी-सौड़ी उमर पाना चाहिए- उनी प्रथम रचना बीणा' मे पारम करो। मपना एक पस्प मापको बता पत बी का जब कोई नई सपना मकापित होती है तो में एक बार गुE से सनकी सारी रपमापों पा पारायण कर उसे पाना प्रारंन कला। और भावी पिपनी रचनामी संधर्भ में ही मुनाना है उनसी नासपना पूरा १४५१] हमारा राष्ट्रीय गोत' राष्ट्रीय पीत के संबंध में यो पर्चा बात दिनों से बस पी है उससे भारतीय बनता पमी मांति परिचित है। स्वतंत्र देश के लिए पुष बाहरी प्रतीकों की पावस्यकता होती है जिससे उस देश का मक्तिव दूसरों से प्रता ध्यक्त हो सके। ममें राष्ट्रीय भंग राष्ट्रीय मुहर पौर राष्ट्रीय गीत प्रमुख है। राष्ट्रीय मी सर्वप में निर्णय हो चुका है और वह सबको मान्म भी है। राष्ट्रीय मुहर के लिए प्रशोक स्तम का घिबर पसंद किया गया है और उसका प्रयोप मी हो पाई। परंतु राष्ट्रीय गीत के संबंध में हम अभी तक किसी प्रतिम निर्णय पर नही पनि। मैंने अक्सर सुना है कि राष्ट्रगीत के संबंध में देश के साहित्यकारों पर फबियों को अपनी सम्मति देनी चाहिए यह प्रस्न बम राजनीतिज्ञों पर मही पोड़ देना चाहिए । एप मोग प्रषिक पादेय में पाकर, प्राम' ये सोग पो पंप्रेजी की तुमना में भारतीय मापामों को नगप्प समझते ६ या भी कह उठते है कि राष्ट्र-पापा राष्ट्र-मापा पिस्ताव तो बहुन हो तुमसे इतना भी तो नही हो सका कि एक मन्ये प्रष्ट्र-गीत की एषना कर सको। पहली बात का समाधान तो यो च्यिा पा सकता है कि हमारे देश के साहित्यकार विदेशियों के पासन के समय सही दवने उपेक्षित है कि ग्न्हें इस बात का विश्वास ही मही यमया है कि मो पुष अपनी बुद्धि वा मुषि के अनुसार महगे उसकी कोई का की जायगी। इस कारण ये प्राय ऐने मामनों में तटस्प ही पते है। दूसरी बात के लिए मेरा अपना विचार यह कि राष्ट्रगीत के लिए स्मिी रचना का बहुत उच्च कोटि का होना पावश्यक महीं है। पुर्याम्पमय में अंग्रेजी . पतिरिक्त पम्प मापामोंकि राष्ट्र-पीठ नही मानता । परंतु म पूता चाहना कि पनों के राष्ट्र- बीत में कौन-मा पावित जिसके लिए भेज पाति मनीपियों प्रौर ऋषियों १ (पाप) १५ १६.

२२८ मए पुराने रोने में अपना मस्तिक सपाया है। लेकिन यह यह पीत है कि पहा कही भी पा मापा जाता है हर पीर प्रटेनधन पर पड़ा होकर पामस्म हो जाता है। राष्ट्रगीत जैसा कि मैंने उमर कहा है एक प्रतीक है-एक मूर्वि है मानो तो देबता नही पत्थर । मारी बात मानने की है। यह मानने की बात लिवनी सरम मासूम होती है उनी सरम नहीं है। सारस का देश बिना किसी पोर-जवाब कोरबीर मान में यह कोई साधारण बात नहीं है। उस पीर में उप तो ऐसा होमा ही होगा पो सबके पतर को एसके । एक पीकी रे मान मेने के बाद दूसरी पीड़ी पसे गुम-देवता के समान पूजेगी पार उसी के साप अपनी भावनाएं संबन करती बावमी पर प्रहन को है हमारी बर्तमान पीढ़ी का । हम मगाय ही एक नवीन मारनपी मीर गम , पर हम सब कुछ नया ही नहीं कर सकते । हम अप संस्कार भी माए है। शायद हम नम भूमें वो अपने भविष्य के निर्माण म पनि सतर्क और संतुमित प सही । राष्ट्रगीत के संगम में भी हम प सातार साए । राष्ट्रीय मी संप में भी हमारे संस्कार । हमने मान भारत का मग विमुम मए रूप में नही सका म्यिा । उसके पुराने म्प में है घोड़ा-सा परिवर्तन कर दिया है। अगर मानसम्ता हो तो एकरम नईमीर सानेपा में विरोभी नहीं है परंतु राष्ट्रगीत के सबंप में मैरी धारणाtir हम एकम नया पनही मा सामे। कम से कम पाए इम पर बोग-सा विचार तो कर हो कि राष्ट्र नीव रे माम पर हमारी भावनाएं किन पुिणे पर दिन होती की है। मुझे थमा मिा पाए, यदि मैं प निमत वर्षा भी कहे। मुझे पार पाते है पपन म्यूमिम्पत सूत दिन मम् १९१७-१८कारमाना पर हमारे सूमो म बार्ग पषम पार पपीन मरी की तस्वीर सगी पहा परती पी। उम ममम सिप प्रपमरों पर एक पीन नामा वाता था। हम मम मोम पोहो गाडे परो-एक पद पर पान मा मे पाते। उन पाने की पहली पास मुझे पर वायाप है। "ममन् हमारे भाई गुम को पिरापू पीलिए। हमारे पप्पामा गायन प्रया पार मार ने उसे हमें बाना मीर मुनना निगमाने में । पर हमारी रामनिरपनुस मा पार पानेवाली पीरिया इमारा राष्ट्रीय गीत २२९ ममे ही इस पर पथरण को परंतु हम बिम्होंने अपनी पापी उमर रासता में पाटी है भली भांति उस रबी मनस्थितिमा प्रदारा पर सकते है जिसमें ऐसी पाते समय पी। मम् १९५९ में में कायस्थ पाठमामा में प्राया। यहाँ स्म का काम मुरु होने के पहमे बो हास में सब जमा होने पे पार बरे मातरम् का गीत गाया बाता पा । उत्सव प्रादि पर भी हमारी कार्रवाई को मातरम् के पीत से मुक होती पी पौर इम पय मोग इस गीत का प्रारंभ होते ही पटपट बोहो बाते थे। मही मने मा सीमा कि यह हमारा राष्ट्र बीत है। इस संबंध में मुझे एक पटना पाव है। मन में पो इस मीत को याना ठीक बा पर हमारे बारे ये माहर कहीं पाने में भय का अनुमग करते थे। एक दिन में अपने पर पर बदे मातरम्' गा रहा पा कि मेरे पापा ने मुझसे कहा "मेरे मातरम् इस तप या या पनपाएपा ?" मैं कुछ समझ नही सका बस यही मान माया कि यह पूना मीत बहाँ-वहाँ पाने की पीर मही इसे महा मनीरता से गाना चाहिए । बाद को बम-से मेरा मान बढ़ा मने परे विषय में काफी पाना । तभी से मेरी मारणा पी कि 'बरे मातरम्' ही इमारा राष्ट्र-ान है। स्वतंत्रता प्रारोमनों में कितने ही ममसरों पर सहमों पालों से उठाया गया यह मार कोमी माप-रे मातरम् काम भी मेरे कानों में गंगा है। यही बरे मातरम्' का विझस भौर सस्कार मेरे मन में पा र मनेगान के काम पर मिपित पपनी कविता में उसके विपय में भी मिमा पा "बही पान रेप बिसे पुनकित नेणों से मोठसे परस्पर में कपि मे पाया राष्ट्रगान या मावरम् प्रौदोसन बीमातरम् मुमतास् मुफमाम् मसयर पौतमाम् दास्प याममाम् मातरम् घर मातरम् २२. गए मुराम मरोगे बो भयपति उन्म पिसर से राम कुमारी के पदन तक गिरि-गह पर में बन प्रोवर में मलबमों में मैदानों में पेवों में पौ पमिहाना में गांव-गौर में मगर-मगर में पर-मर में बाहर-वर में स्वतंत्रता का महा मंत्रबन कठ-मंठ से हुमा निमारित कंठ-मंठसे अपर जिसको प्रामापीरमानों ने हमा प्रविम्मानित पिने ही दी मिसा पानी मिट्टी में कासे पाना में कितनों मे हम्मीरियों की मन का पर जिसको पाया पौर मुनामा मनबहमाया पाकिम लिए पए देश प्रेम का पूस्प पुकाने पनि ठोठोर कारापारों में स्तिने ही जिस गिता पर नामा बिना हिरो बिना मिमा सटे-मते कम भए प्रेमी मापन पर हमाप राष्ट्रीय पोत या मोम प्राठिवासाए गोप्सीको गौधारों में।" यह पादि मातरम् का संस्कार मेरे मन पर पायस पाठमाता के दिनों में ही मेरा परिचय बनपस मन' पाले रबीननाथ सापुर के पाठ से हुमा । पर इसके साथ किसी प्रकार के पष्ट्रीय भादोलन के इतिहास की अपरा बनियान की कहानी नहीं पूरी हुई थी। बीच में साम्प्रायिक मनोति बामे पर मुस्लिम नीन केरा पार फिर प्राय सभी मुसलमानों के मुंह से यह बात मुनाई पड़ने पो कि मावरम् में मूर्तिपूजा की पई है पौर मूर्ति पूरना स्माम के पामिक सिद्धांतों के पिसमिए यहाँ यह गाया पाय वहाँ किसी मुसममान का उपस्थित नहीं एमा चाहिए। बार को मुझे भी मासूम हुमा विबर मातरम्' का दो मान हन नोप गाते है. यह सपूर्ख बीतम होकर उसका उपरी हिस्साई पार पामे पमकर ती गीत में दुर्गा की उपासना की पर पूजा के बका रिपाक में दुर्गा तिसार मैंने मह पूरा गीत प्यारेला भी मार तब मन में यह बात मी प्राई कि पुसममान को कहते हैं उममें कुष तई मयाब पचपि यो मेप राष्ट्रगीत केस में स्वीकार कर लिया गया है उसमें किसी देवी देवता की सपासना न होकर भारतमाता की ही पाना है। मैने सम्मिमित बमों में इस पीठ के पारण होने पर मुमनमानों को समा पोस्त भी ऐसा। स्वतंत्रता प्रदान मत्सम पर प्रमेक मुमनमाम मता पम समय समा में पाए, बाबी मावरम्'ापीठ समाप्त हो दुसरा इनमें मिस्टर वनीकसया का नाम पनों में भी पानापा। 'बनगण मन पास पीतलाव आएर के पीत है की एक पासपुर मा । पर पुर समाप्त होने पर भी नुमापबद्ध बोस की पावाब हिन्द फौर की पानी देर में पपीतोषन् २ौषताह बनता में एक गिजनी की सार मा पा पगार हिद, किया था पाहमारे लिए कौवान पोर हम्मान का पिप बन गया। भाजाय हिन्द मारे प में पिटमयबार प यह महावा पारिपारि ली बीच यह बात भी पुती हि पागर हिम्म सरकार ने बनपण मन' को प्रपना राष्ट्र-मीत मान मिया था। पागर हिन्द सरकार ने इस पीत का एक हिन्दुस्तानी स बना निया पा। इस मौत का प्रचार पीमता होना एकहपाप-fied २१२ पए-पुराने मरोरे को कि जैसे पागर हिन्द के शिोर साप हम मा मम्पिति मही 'बनमण मन' का पीत हर पयह गामा जाने भमा पौर दि माता पौर-बीरे पीछे पाने लगा। उसी समय में हमने 'जय हिन्द' का सूट स्मीमार किया। पति महक ने इसपर एक मेस भी लिखा कि 'बरे मातरम् हो पयह पब हम परस्पर मिमने पर 'पप हिन्द काना चाहिए पौर भाम भी चपन समस्त गावणों में 'जय हिम' कहना नहीं भूनते। बताने की पावश्यकता नही कि पय हिमपावाद हिन्द गवर्नमेंट पा संयूट बा । बरे मातरम् को पाकर पी मुमापमान दोस ने 'बनगण मन' को क्यों राष्ट्र-पौत माना इसे समझना कठिन नहीं है। पर मातरम्' के पाप मुसतमान मूर्विपूना का भार बोकाए एसी कोच में जिसमें हिन-मुसलमान सब सम्मिमित हों से रिनी प्रकार करिषद पपणा विरोप सिए यार मये। फिर परमाताम् का गीत सन्तमय पर कठिन भी पा। छहोंने इना ही नहीं किया 'जनगण मन के बेगमा म को हिन्दुस्तानी प भी दिया। ऐसा करने में उस सुन्दर करिता में बहुत से रचना-दोप भी पा गए। पर पान पर ऐसने नाममम पा गाणे की पोर प्यान ने की फुरसत नहीं पी। पीत में मरकी श्रवा समेटो प्पेय मपसमा प्रागाय हिन्द फौरो यो पूर्व परि राष्ट्रगीत के नाम से रिमी भोट पर प्यार पासवा पा दो पारि मातरम्' दीपा। पाव पर माताम् साप जनगण मन' उमका प्रथम प्रसिपी है। दोनों गीतों से पो पापना पुरा उनकी तुलना करना उचित नहीं है। कम परिहनारी या मोर उमंच की हुई है तो इमरी ने हमारा गिर पार भागती पापामा सपना पुरा हुपा है। एक परिदमारा स्याम पोर बमिरान पुशपातो इसरे मे हमारी पक्ति पीर बीरता पुरी हार मातरम्' यौन में परि भारत माया पपने कोटि-कोरिभुरामों में राम मेकर नरी हो ,मो 'नगा पन में गे पर पपने मा को पारित करने के लिए बेग से पर पी एक बिता पा पार पूमरा पनि रानीत दोनों को माय तुमार मापनपषिमपही पापाम पामि। राष्ट्र-मोती से ममय माना भंग वा हे हमारा भी प्यार पाता है। उमा पारसम पोई माम भी नहीं मना । पाराय:

हमारा राष्ट्रीय गीत २१३ माहित्य का ऐसा ही मंत होता है। उसमें कोई कवित्व पुण मी नहीं पा । रचना-चोप भी उसमें बहुत थे। बब मी का पीत पसर किया गया तो दूसरों से अपेक्षित पर पपने से तटस्प हिरी कपिर्यों की राम भी नहीं दी गई। पीत पम पड़ा पार उसने अपना काम किया। कम ही भोगों को यह बात मासूम होगी कि यह मोका गीत मौमिक नही है। मह गीत 'यूनियन बैंक पर मिने मए एक गीत मे मिया गया था। 'यूनियन बैंक पर यह कविता १५२५ की फरवरी की 'सरस्वती' में प्रकासित हुई पी। बना किसी अमन मभाई की मासूम होती है, जिसे अपना नाम देमे में भी पार्म मामूम होती थी सोसे उसने पपमे कत्तमी माम 'सस्कबिवास' से यह कविता पाई भी। १६२ . पसहयोष भादोमन के पश्चात् कबिर्यो म मी कोई इस ममोमृत्ति का पा इस पर मचरब होता है। कौवहन के लिए कुछ पंक्तिया रे यहा। बिसस प्रापको पता हम सके किमी के गीत का मेषक इस 'सत्यापिकासका फित्तमा भूपी 'महति मूति विरमा प्यारा मा ऊँचा ऐहमारा। उमको हवि पनि बामा स्ववों को हपनि वासा उस मरे की पाया में मब पनो साप ही बोले हम मब सर हिंद प्रथा के प्यारे, एं मुनी सम्राट नारे।" गिम मीत मुळे में 'मूनियन बैंक पड़ा हो उसके भुमाए जाने पर पदमा म होने पर मुझे कोई नहीं है। इसके विपय में इतना मिचने की बहरत इसलिए भी कि कुपरिणामों से इसे भी राष्ट्रगीत मानने को कुछ पाबाममीनभी कानो में पहुंची। 'मनपण मन' और 'बीमावरम्' की प्रतिन्निता में चनगण मन को पंरित बबाहरमाप्त मेहर से बम प्राप्त इपा है। उन्होंने सर्व प्रथम इन बात को उठाया दिनी मातरम्' का पीव मर और 'जनगण' का पतिमय है । यह बिनमुत्त ठीक बाबाओं पर इसे बनाने की मुषिमा नए-पुराने मरोने के प्रतिरिक्त समति के इस युग में हमें मतिमय मीच को ही अपनाना चाहिए। माबाद हिम्प कौर के साहसी कारनामों पे परिव मेहर एक समय फार ठे पे और उन्होंने इन्हीं बन पर पेम र पाहर होते ही मन् की मरी-मसती बनवा में गान की बी। यह बात उनके मन में पव हागी कि पाबार हिम्य सरकार में रखको अपना राष्ट्र-मीत माना पा। परमातरम्' को ये नही चाहते इसका कारण प्रभात रेषम यही नही है कि उसकी गति मर है। हमारे देस का एक पंग इतका विरोप अपने पार्मिक सिमी के कारण परता या है। पाकिस्तान बनने के बार पगर पार हिंडू पाहें वो उनकी य भावना की उपेक्षा कर सकते हैं। पर पति हम कभी ऐसा करके मुखी नही हो सकते । संमत देमातरम्' को छोड़ने के पीप उनके मन में मुसलमान पनता की एक भावनामा मो प्यान है। यह पारखा पौर परिपारिमी पति महास के पनुगम पोर से हमारा समर्थन मिराना पादिए । 'बनगण मन को स्वीकार करने की कुप कटिनाइमा भी है। बह अपने सगीत में पूर्ण । मोर पेठ पारि पर गगने के उपयुक्त है। प्रगति पुम में पनिका पानात मी देता है। पर सार हमारी पामारी की पहली किरण का इतिहास भीगा है। पर हर रचना पर मुध पुम की पाप नो है। समय हमारे देवसपाहीररस रिया। पूरे का पूरा सिएनान की सीमा से बाहर पमा गया है। पंवार' और हिसाम पर पाकिस्तान रोनों में। विपान सभा के प्रपम भापति श्री मरिषद सिया ने एक बार निता रा स गीत में मेरे पूरे का (पानी बिहार का) माम ही नहीं ki पपना पटगोठ मानी-कभी पर्चा में कुप मोषों में मिला हिमर पना कार्य पम के म मिसी पापी।फा नो मा दुप सबूत भी उनके पास है या नही । परि ऐगा वोहम अपने पद-गोन साप रोमे मार से पमिमानकर मरते है। फिर माम्प पिपाता' में एप मप्यरातीन प्रति भी पान पाती है। हम माम्यबादी पर बने रंग परम 'माप शिपावा' मरनों पर दो परते रहेंगे। मानेबानी दुनिया में में माय-मरोम म प रण मी काना होगा मारणी बहन- मोगों को वाम विवाना गराएक बात पर भी मिमी #देशप सम्पर कामही मोहमी भूमिका और मदम निसानियों

हमारा गष्ट्रीय गीत
२२१
को । बेस क्या है-बाय सियु पुररात मराठा पारिपारि । निवासी क्या
1- गौर सिक्य न पारसी प्रावि-यादि। क्या हमारा यही सपना
है कि भारत की भूमि प्रोतों में वरीऐ और भारतवासी धर्मों के यस्ते में
निममन है ? यही पर प्रतिीयता पीर सांप्रदायिकता की पर जिसे काटने
को हमारे नेता नगे हुए है। फिर क्या हम प्रत्येक अवसर पर प्रपना यह
राष्ट्र-पीन पाकर अपनी सांप्रदायिकता पौर अपनी प्रातीयता की स्मृति पपाटे
म। हमारा सपना है एक भारत एक मारतीय । यह मौत हमे उस पोरन
मरने देया।
क्या एक सस्त पाति या नही कर सकती कि पुरान स गितुम मुंह मोड़
पर मनाए का निर्माण करे । इस तरह की प्रवृत्ति भी बम ही है।
कानात्त में एप रंगीय हिंदी परिपप है। उसने हिंदी लिए कुछ अच्छा
काम भी किया है। उसने कुप दिन हुए मेरे पाच एक पर्चा मेगा पा विध
इस पान की पपीम की नई पी किफि हिंदी हमारी राष्ट्र मापा है इस
पारण हमारा राष्ट्र-पीतहिनी म होना चाहिए । 'परेमातरम्' पौर 'जनमण मन'
रोगोंडीबमना में है। पौरयह दिली नीव रनि पनामा पीपमकर प्रसाद
भागुण
मानौवे क के एक पीठ को । पीठ बह है
"हिमाद्रि म मम से
प्रमुखपुर भारती
सपन्यथा समुग्मना
स्वतंत्रता पुकारती
पमर्द पीर पुष हो पतिम मोच सो
प्रसस्त पुम्प पंप बरेचमो, बोपतो।
प्रसप्प कीतिरस्मिया
रिकी रिम्म दाह-सी
१ रात में सोने सिने मेरा
मोम और विनादिपरेराप-पन ने किमया दोमान दिया।

२५ मए-सुयने मराय छा मावभूमि के को म पूर साहसी । मराति मैम्प मि में मुपारमाग्नि से समो प्रवीर हो, पपी बनो पोपमो, बोचतो! पम्पापमी क्निष्ट पोर टन्चारण कठिन है। पर मातरम्' पी मामा हम इमलिए निगमने को तैयार है कि उपके साथ हमारे संपर्ष का एक रतिहास पुरा है। पर इम पीठ से कोई विनाम नहीं है। रिपा राष्ट्र-पावन होकर प्रपति-गीत।।हम गो संसार में माति कौस्मापनासा अपने राष्ट्र का मून रिंग और मिशांव मानवे । हर समय पत्र की पत्ता मही करना चाहते । अनु-मनु करवे पना रपरी गरत पपना रमे राणे एले की पाव सोपते रहना कायरता है पपमा मुगपर। पाने का तात्पर्य है प्रसार थी की रचना वा सम्मान करते हुए भी मैं हम पट्र-गीत के रूप में स्वीकार करने की अपनी पप नहीं सरना । परिपन का काम पार पायरे से मचायत्मक रंग पर च्यिा जा रहा है। जाने कितने मोगों के इलारस विपप परमावर प्राण हो मा हॉग पोर पापर रहें मिान सभा के सामने भेगा मौ पाएका परन्तु म प समझदारी मही करमा। इस बीच मप्यात मुख्य मंत्री पी तयार पुल को भोर में रवि हए पर्चा में एक तम्म राष्ट्रीय मान के मप म प्रापित हा पा। मोने कृपणापन' रे पगस्त्री नेमा प्रौर मप्पप्रति प्रिया मंत्री श्रीहरितामा मिष में एक मील की रचना की पौरारियापीत गागात कर में स्त्रीहार कर मिया साप । उनका कपनदियह गीत निमा मारत माम्प-विपातापी मेगा मै म होस् भारतमाता को मेवा में मीन में परमावरम् मौर 'जनगरप मन दोनों को गाममा पार भारतीय मसालि मुप-युग स रिम गिजात को मानती पाई, उमा प्रतिनि। मीत 'जनयण बोपून परम कारण जो मंगीत उमम प्रतिह भी उममें है। मीत पोटा भी। मोर राय-गीत पोय होना भी चाहिए। 'बनपण कधी एकोपर पाए जाते हैं। श्रीमान भी पपने पपूरी कप में नहीं मापा जाता । मीन पर हमाग राष्ट्रीय गीत २. "बनबस्म-यम-अधिवासिनि जय हे महिमगि भारतमाता । हेम-किरीटिनि विप्य-मेखमे उदषि-पौत पदमसे गगा यमुना रेषा प्रणा गोदावरि बम बिमसे विषिष वरपि मणिमस्ते पाव पक्ति सयुक्ते युप-युप अभिनय मावा, बन गण मनेय विनाशिनि जय हे महिमरिण भारतमाता । जय हे जय हे जय हे महिमणि भारतमाता ।" प्रगर हम यह मान में किरपीदनाप ठाकुर के गीठ को परिवर्तित संशोषित कर प्रपने राष्ट्र के लिए हमें मया गीप बनाने का प्रषिकार है तो में इस प्रमास पर बवाई ना चाहता है। इसमें में कोई हानि नहीं पमझता । स्वर पौर एप एम पीके पास है पर गीत अपनी कल्पना में उनके गीत से मनग है। भारत को माता रुप से बने की माकांक्षा सर्व भारतीय है। भारतीय जीवन में माता का मो स्थान है उसपर कुछ कहने की प्राथम्यकता मही है। इससे भारत की समीय एकता प्रकट होती है। प्रोठीयता की मंच मी पाम नहीको माधरम्' से हो समयत यह भारत का मापू स्वम्म स्वीकार किया गया है। महिमारिण' में उसकी 'भुभ पोस्स्ना' ही नहीं 'सारे यहाँ म पाहिदोस्तो हमारा' मी संदेप रप मे मा यया है। इसी प्रकार 'मपिणामिनि मूम पीव क 'अधिनायकी पनि भी समेटे हुए है। हमारा प्पस भी यही है कि प्रान प्रांत का म्यान पोर हम सपूर्व मायामा एपीर चित्र पपने इषय में सरें। इस कविता की प्रथम पहियातही उत्तम मौर पारमित है। प्रवाह मोर सपीव में भी यह पूर्व है । यमक और अनुप्रास पर्ण मधो पार उचारण सारव का तो यह एक नमूना है। पूरी पछि में एक मी बाभर नही पाया। मुझे पता नहीं कि पी रविकर मुक्म को अपने प्रयास मे पिनी सफलता मिनी ममा विधान सभा के कितने मोम मन बीत या कहना चाहिए, भी हारिफाप्रमाद बी मिपके श्रीत का समर्पन करपे। पर बरि इसकी कुप संवारना हो तो मैं महाकवि भी मिप भी की पाशा से मोर समसे क्षमा मांगते हए, उममें कुछ मंगोपन का प्रस्ताव रखना चाहता है। सिी पत्पानि मास पमिक परों में भी पूछ बोले-घटाने की बात भी नहीं सोपता और विष पी - मए-पुराने मरावे ६ सपूर मातृभूमिक एको म पूर साहसी मराति सैम्प सिंपु म मुवाइवाम्म मे पमो प्रवीर हो जपी बमो पोपमो पचमो।" पाग्दापमी विसर पर उन्चारण कठिम है। पर मातरम्' ही मकव हम इममिए निगममे को तैयार है कि उसके साथ हमारे सारे संपर ना एक इतिहास पुरा है। पर इस पीत में कोई इतिहास मही बुरा है। फिर पर राष्ट्र-गात न होकर प्रमति-गीत है।हम जो मसार में मांतिकीम्पापना करना अपने राष्ट्र का मूम मदेश पार मिति मानते हैं हर समय पशु बी बस्पना नही करना चाहते । सनुसा करते रसना उमस ररते अपना रमे रात रहने की बात सोचते रहगा कायरता है मा गुमापन । कहने का तात्पर है रि प्रसार जी की रचना पा सम्मान करते हुए भी मैं इमे राष्ट्रगीत के रूप में पीकार परमेमी प्रपनी राप महीरे गरमा । पौरपद मा काम बहुतार में मचायरमक रंग पर किया जा पाई। म पाने कितने मोपों के हम्मागरम विषय पर पब तक प्राण हो मा हपि मौरपायर उन्हें मिपान सभा फे. मामने भेगा भी पाएपा परन्तु मैं इसे मममरारी महीपा । एम मोर मध्यप्रांत के मुख्य मंत्री श्री रविशकर पुनपी पोरम पनि हुए पत्रों में एक बत्तम्प राष्ट्रीय याम के सब में प्रसामित हुमा पार पाने तपणायन यात्री मेयर और मध्यप्रति पिया मंत्री पीरिमार मिप मे एप मीन की रचना कराई है और बचाव पि यह नील राठ-गात के रुप में स्वीपर पर मिया माय । उनका क्या है कि यह पीत मिमी भारत- भाम्प-विधाता की गैग में महाकर सर्व भारतमाता की मेवा मममीन म यो मातरम्' और 'अनपण मन रोर्मोरे पुणा काममा है और भारतीय मपति पुप-युव में जिस गिशाग पो मानती माई है उमरा प्रतिशत है। गीन जनगण की दयून पा! म कारणानंगीत रमम माता भी उममें है। बीत छोटा भी पौर राष्ट्र-गीन होगा भी पालि। 'रनपण भी एकनो पर गाल पाल को मानरम भी अपने गंपूर्ण मग मी गाया पाना। मीत पर, इमाग राष्ट्रीय गीत चनमस-मम-अभिषासिनि ब ह महिमणि मारवमाता । हेम-किरीटिनि विप्य-मेमसे पषि-बौत पव-ममे गंगा यमुना रेखा कम्पा मोदावरि बम बिमसे विषि वापि प्रविभक्ते पोत सक्ति सपुते सुप-युग प्रभिनव मावा, पन मण क्लेम विनाशिनि बय हे महिमणि भाखमाता। बम है पम हे जय हे महिमणि भारतमाता । मगर हम यह मान से रिपीटनाप प्यार के पौत को परिवर्तित संघोमित करके पपने राष्ट्र के लिए हमें नया मीत बनाने का पधिकार है तो में इस प्रयास पर पाई देना चाहता है। इसमें में कोई हानि मही समझवा । स्वर पौर गुप सम रबी समस्य है पर गीत पपनी कम्पमा मे उनके मीत से प्रसग है। भारत को माता प से देखने की प्राकक्षिा सग भारतीय है। भारतीय बीवन में माता का बो स्थान है उसपर पुष कहने की भाषायावा नही है । इससे भारत की सगाव एकता प्रकट होती है। प्रातीयवा को मंच भी पसफ पाम नहीं है । 'बी मातरम्' से ही समबत या मारत का माद ससम्म सीकार किया गया है। महिमणि' मैं उसकी प्रज्योत्स्ना' ही नहीं सारे पहाँ मे पगमा हिरोस्तो हमारा' मी संक्षेप रूप में प्रा पया है। इसी प्रकार 'भपियामिनि मूम बीत'विनायकी मनि भी समेटे हुए है। हमारा ध्येय मी यही है कि प्रति प्रतिमा म्यान छोर हम सपूर्स मारत का पनीर चित्र अपने एप में रक् । एकषिता की प्रथम पत्ति बहुत ही उत्तम पौर सारगर्मित है। प्रवाह पौर समीत में भी पा पूर्ण है।पमक पौर अनुप्रास पर्स मैत्री और उच्चारण सारस्य का यो पर एक ममूना है। पूरी 45 में एक धी समुन्दासर मही पाया। मुझे पता नहीं कि मी रविशंकर गुप्लमो अपने प्रयास में कितनी सफलता मिनेगी अपरा विधान सभा के कितने मोम मरे मीठ या कहना चाहिए भी रिजाप्रसाद पी मिष मौत का समर्पन करते। पर यदि इसकी पुष नाना हो तो मैं महाभावि पी मिम जी की प्राग से प्रौर समसे पमा मानते मसोबन पा प्रस्ताप एपना चाहता है। किसी पत्पाति मस पारि के परों में भी कुछ मोने-बटाने की बात भी नही सोपता पौर मिश्र की उममें २३८ मप-पुराने रोमे की रचना में सपोपन करने की बात तो इण्या की सीमा सपनाही है। यदि मिपी की यह एपना उनकी पन्य रचना के ममान होठी ता में उसमें पुष परिवर्तन प्रषणा परिवर्धन करने की बात के मोह को माता । परंतु मागीच परि एप्ट-मीठ होने पापा तो मैं अपनी बुद्धि मनुमार उसम कृम परिवतन करना चाहेगा। मुने पापा है कि मेरे प्रागय को समझ मेने पर मेरी पृष्टता सम्प होगी। प्रथम पत्रिका एकनाक प्रसर अपने स्थान पर परम है और उस पर मुषार मही हो सकता। इमरी पंक्ति में करीटिभी पाप मुझे मही प्रण सपा । यह पति मनि-माम्म को विवागता है। इसी प्रकार 'सपषि वीर' में सम में पाते किसका चन्चारण फरमा टिम है। भागे का तभी उसी बर कास पति को मैं यो कर देना चाहना "देम मुम्तमे विप्य मेलने सिंधु नमित पर समसे।" जिसे भी पनि का दुध मोष है यह इस पंक्ति में प्रपिक समीच पौर प्रमाह मेमा । हेमकर हमारे शिव पीसा प्रचलित माम है। पौर दुवात एकही। इसमे होतिष भी स्थापित होता है। कुतम पौर मम्मे में पनि माप पाबाता है। कौनिधी पनि में ऐसया विस्तार भी पभिप्पवित पता है । इसी प्रकार नम पे गिप्प की पानि को प्रति पगित करता है साथ 'उपि पौन' की उम्पारण निता भीमसीय पाती। - नीमरी पंक्ति में कोई परिवतन नहीं चाहिए । विपि तदपि पबिमाने' बान मुरमा पोहा नपाम होते हा मी इममें पर्प-गर्माया। हमारी पुग-युग की मारी गति का एक पडी मरेयात देवरिभारत रे पापान भी पोरोनोग में पता महा मरिन पर पार पर मैं यह मपम्-मा मपाता है। पया पही पात पापीजी में बीमों तए से नहीं नही। मनार मे मैत्री करने की भापभिा पार पमनेगाने हम क्या प्रपत्र को अंगकोही बिनिम्न पौर परम ममम । ' मति गपुसेको मति गतिमपुर ना पाएंगा। गरे म रोना रॉम पाहि पार पति पुनः परा पालिनी गति मे पुल गित गतिमी र मो मुझे कोई प्रापतिमाही।

२३६ हमारा राष्ट्रीय मीत 'युम सुन प्रभिनव माता' में कोई बात नहीं कही गई। रचना-भोप भी 'माता' फिर पाकर 'माण माता का हुक बनता है। रवीइनाय प्रहर पीत में इस पर का तुक प्रमग होता है "विधावा'का 'मावा' पारि। इस पक्तिको में यो कर देना चापा बिपि वाप-तम बाता प्रपनी पनि से विविध विवियकी पनि की पुनति करता है और इस प्रकार उसकी गवात्मकता को मिसका संकेत मन पर किमाछ कम कर देता है । फिर ये बही त्रिविष 'पापा' को 'राम राय नहि काहि प्यापा' । हमारे बापू मराज्य से राम पम्म का सप्न रेखते थे। उनकी पस कम्पना को बोहम इस गीत में स्थान दे तो भग्य होगा। इसी प्रकारको 'मखिम तत', 'विमम' है उसे 'वम' का विनाश करना ही चाहिए। पाप था वो तीन प्रकार कम की कामना भी कर मकते है। फिर 'माया' है, वो 'माता' बार-बार पान के रचना-पोप को बना देता है। अनुप्रास उधारमा-भरवता ना देता है । इसको भयर स्वीकार कर में तो स्पस बिना चिनि' देकार हो जाता है । वाप तो कर ही गुरु । फिर गर्म विनासिनि एक मकारात्मक गुण का काम कराता । इस पक्ति को म यो बाईपा "बनपरण- प्रवाधिनि पय हे महिमपि भारत माता । भुना है अमरीका में सर्वत्रता की मूर्ति के हाथ में एक ममाम है । मारत माता भी स्वत बता की मूवि व पार पन गरस का पर प्रकाशित करें, उन्नति कप पर मे माय । इस पक्ति के बारा भारतमाता की पिर मूति गतिमान हो उठेगी। मेरी प्रार्थना किमपिता के पारखी मरे म मघोषनों पर प्यान पार मगर उनको मुनाई विधान सभा व लोग इस बात को महाँ तक पहुँचायें। परि चनगण परिषधि स पर विचार किया पाय तो मैं बाहेमा कि मेरे इन समोपनों पर भी कुप विचार पिया पाप । राष्ट्रगीत रोज ग नहीं बरते । असे पर करने में हम जिवन भुमे मस्तिष्क में मोच-विचार कर मः वना ही पाया मैप समाप्त करने के पहर मैं फिर भी मिम बी से समा बाईपा। और या मो साकार करना चाहेगा कि उनकी पक्तिों में पाया परिजनन करने २४२ गए राम करो हमाम की पोर पा रहे है। सटी के पाम प्राप्त ही नन्दनि भपने रोनों हाथों में मे उमतिबा पौर मेहर तीर की तए पपने नहाने के कमरे की पोर चले गए। बावे ममय इतना पर गए, 'यो काम मिस यन्त करता है बरला मकरला या साद नावारी है। यह सब इवनी पादी हो मया किम बन पा पिपुर गाम्टी मे गाय म यह किम वर्म हम पर को जन में पायद भय भी पाकिस धीमा-मपटीमेही पर्म पानी बाहर छलकर हापों को न बमा सो बम मा प्रारम वाकर पी गए। किसी तय का सम्हाल्ने मौका हीमरिया। ठराव मारमा मता काहऐ सब बड़े।" बापू ने अपने ममय पर मान किया । हम समय के साप मेल कर समय पर बापू वो पमर कसाब रनावारी नही कर मस्ते । गपय सार यो रमति पारामा पा ससको उम्हाने पूरा किया। उनका हाप बन गया था। माम कोहना वा उसके ममूळे पार तमी पर किमी मर रिम की एका ममी पी। समय की पारी तो महती मिवमा पर अपना हाप नाहरगन माम विनतामा । मौर ऐना fsanाया कि मपना पीय हरप पर राम रिचा। मेरे पौर साथियों के सर उसफा गया प्रमर मा में नही पानता पर मुझे रब दिन से प्रभाव नही माता। "सबमोहिम म्यापी माया।" पर कसा देना पपार पाया है कि मी निरिकन सर पर कोई र कणा यारालाहो लिी बात यश गाने को पीप में साकरगे दालने पापमा देगकले कोरा मन माप महीपर पाया। गुरुवात अमाप पार पानापार मरे गम्ब मेरे कामों में बनेगा। जो बिम बन करवा करना न करता प्रमाण बाबाजीहै। उन दिनों बाकोहि पम्मी सीधीरनो मटर बाली प्रपना ताप प्रापपरगना पेपदों में बीमल महीने सराय बोलवाा ममा पतिबनता पा समरीभाषमा बोमतीबीपौर रमके बोनहार . पारंपाको पहले से लिपदी मममता हाकि परमार दमारारी बापू को मटपटी हिंसी का एक ममूना है। पचा नहाँपया पाना चाहते पे पार हिंदी में रनको यही एप मुलम हो पाए । पर अब मोक्तापू बिस्कुन ही मना पाहवे। पार यो कहना चाहले से उसको दूसरे मम्मों में नही कहा था सन्या बा। एक पब एक माषा से कम में नहीं स्याण में मही। बापू गमिए । पपने बनिरापन पर हें गर्व था। पावर पाहों के मामले में सबसे प्रषित बनिए थे। दोसर योम। मसरत मे स्पारा ममत मम । पौर हर पमसचा परा यथार्थ भय। हम वो उसकले का निश्चय करते है बहसमुच ममय के साथ हमारा बारा हमारा मारा बीवन ही प्रम महाफाप्त पाप एक प्रतिमा है। हम मनमुष दिनानुदिन अपने कार्यों को करायारे को पूरा करते है। मपमे नियों से रिपते है वो समय साप बापा-पिमाफी हाती है। समय स्मा हम ना करेगा इस महान परप लिए। बिम्होंने समस के हाथों पर पापा हो, परा अपने से पूकि ममय में मार रमनि कितनी बारी कीन मूष पमों की माया मिए कुछ मिनट का समय अपर्याप्त है। इससे बापू के सपनों को एक बार फिर पर यह मरता समाप्त करता पोकाय बिम बनाना करना , नरमा के साथ बलाबागी ११] भारत कोरिता सरोनिनी नायडू (रेरियो पार्ता) पार में पर सरारिती माया बारे में सोचता हू वो मुझे सहया प्रगी पारिवानिग पीपतियां यार पाती है दो ननोने पेमी विपस म सिवी बी। निमों का मामार्प यो या तुमने प्रेमी को सापारण मनुष्य के समान पन्ला ? बया र सामने वो हो गए पे पोर रहोंने तुमपे बात की पी पीर क्या तुम भी उनम पुरमहा पापौर पम्हनि उसे सुना पा? यह रिचना पाचगनक समता है पिठना सत्य सपता है।" भार भी बहुत-म मोम मौजूप निराहमि सरोजिनी मा व्यापार मुने उनक मुग से उमरी पविताएं मुनी पी उन पास बैठे मोर उनम बाबी पी । पौर मुझे का रिकाम है जिरे भी ऐसा मुयोग पिता पारे उप मपनी मुषि म मषित पिए हुए और पायर ही कभी वे उस मुना सयममीभाग्यमानों में इन पत्तियों का मपर भी पपने मोरप सपना है।पार तो विज्ञान में यह मंभर कर दिया है कि हम चाहे वो अपने नेवार्को करियों महापुरपों का पर गुरमित रामरतेपरमा यापन समिती मायक गीवन-नाल मेला सार मुखरमही हपापा । पामर उमरा बीमा पौरmमा बल पप मुप पर हसाए पिएमी की नामा में यदि रिती सरनार, माधुर्य पोर पोर पो सदरा पिक मुरुगन ने भी भावापामा पीवो मरोमिती मापने सर की। गि माना में उनसे जमरीमाने को पम्प मान रहे। हमने पानी पानगरी पीयो भाई मही उनो मनानियों में मरोगिनी मापा मरम पाने की निमी।बामगाव में हमारी यह माई रेल पाई नही पी पर भारत र पुनरीपाण भी वा बालपनमा में बर्मता A-..-.-fromपार मिहोपी वहाबी हाइमरी भारत कोकिमा परोधिनो माया पोर कोषिम का मामय भान मी पा । सरोजिनी नापा को Nightingakad India 'दुमयुसेहिब' या 'मारत कोरिमा' हा बाता था। पर या कोकिना ऐसी मही बी बिसने देवम माकर अपने सम्मको इतिषी समममी बी उसने मिहों की यहा से भी होड़नी पी पार पानादी के पों से भी भी थी। Where brave hearta curry the sword of battle, To mme to arry the banner of xong- पही वीरों की तनपार पाती है वही में मीतों की पतासामे बावी।। मैंने इस प्रकार के विचार अक्सर सुने है कि सरोजिनी नाया पपमे मच्ने सप में कमी पौर परिये राबनीति ममट में फैमिनी वा सायद ये साहित्य पौर काम की गत प्रषिक सेवा करती। इस प्रकार के विचारों से मेरी नेयमान सहानुभूति नहीं। निईगों में पड़े बीत गुनगुनाने बाम कषि को म बहुत स्वस्थ नहीं ममम मममा । कवि का मोरुप मुझे मबमे अधिक माता यह सही है- 'भार सिर पर, कठ में स्वर । मुझे गिम बान का भमोम है या यह है कि मरोगिनी मायडू मी प्रतिमा ने अपनी प्रमिम्पनिका माप्पम प्रपनी रेसकी भाषा का पर्यों नहीं पुना । परि उन्हेंनि ऐमा किया होता तो सनकी प्रतिमा का प्रमिक विकास ही न होता की साहित्यिक मपत्ति की वृद्धि होती और उनकी पारमी म पस के परिफ मोनों के लिए प्रेरसापायक मित्र होती। यह तक मुझे मामूम है पिशी काम्म साहित्य के इतिहास में पापर कही ग्नका नामासनही। साम्प मामा म भी पाया ही नहीं उनकी मारिता को स्थान दिया गया हो। मन्चाई तो यह है कि विरंगी मापा इस कितने ही श्रम मापना मे मीर्ष उमम एप सबनामक रे मामा इमारी सामर्दी के बाहर है। हमरे लिए हमारे देश की परिस्थितियां बहुत प नरपायी है। मुनामी की पपस्था में मेरी भापा की मर्यपवा की वापरमपर बिरा वो पीबी। रागिनी नायडू को मिक्षा-वीसा में मेरेगी का बड़ा महत्ता।पुर में पर भी उन्होंने गिमा प्राप्त की थी। पिता में पचिनी।ग्न दिनों सदन में मी.ईम अपने पर पर मोमबार बी पाम को एक माहित्यिक माप्टी पिया करते थे। मरोगिनी देवी भी रममें सम्मिमित होती पी पौर उममें मए पुराने मरोत चहें Little Indian Prinecoहापातापा-मारत की छोटी राजकुमारी। उनकी एक कविता Indun Waren मोर ईस मी एक प्रारमिक कविता में माष पापा कल्पना की बड़ी धमता है और संभव है कि सरोजिनी नाया दिस से प्रेरणा भी हो। पास पास सब सरोगिनी देवी ने कविताएँ मिली सब रहोंने पूरी प्रोपरी परंपरा को अपना सिमा ना--प्रमेडी के पक, प्रागी की नामाभिमति पैसी अंग्रेजी का वातावरण । सौमाम्म से उन्होंने ये कविता उस समय प्रमिड समानोषः एमर गास को दिपमा । मास मे उन्हेगड़ी मयी समाद पीस तय कीमनिवाएँ पाप लिपी पो मनुकरस मात्र होकर रह जामपी माप पनवी में बसभि पर बाताबरल पपने रेस कारें। सरोरिनी रखी को यह सलाह ठीक पी पीर इसका उम्हनि पानीवन पामन म्यिा। महिम उनकी कविता के विषयों को भी देखें तो हम पता मपपा fr भालके जीवन में जो बिसेष प से भारतीय है पिन-मम है रंगीन है उने उनकी पाली में पारिवामी में इम उन्होंने अपनी भावनाओं स प्राप मप पिया पसना समित किमा है। पासपी ग्यनेषाने रमत मायक मारतीय पुमाहे कारारम घटने मधमा, संपरा पक्की पोसनेवाती मेहमी पापता मनी भारताप नगपत-रमबंधी परवानगीन, पस्ने का पोरन पामगर मापदे ममपान र बर्गत पंचमी गुममुहर, परीबेपने माप्ती माग पचमी रापाका पीत पाका पोत दबला या मारी पाम मी नमार मदिर, मदमी इमामबाड़ा पावन का मुरतीपाला मिगारी पमा पंटियो मोती जाती मा इमेव मुनाब पारि। इममिवाची में मिरोबिनी माया मारप्टिकोग्ग रोमानी है या प्री रामनार (Pre-Raphacitc) सून मीनिगम पम पौत पर रिपप बन रिया नाता है। परी न समझने वान भी रम पम्म मनोन मा कुप मार्ग से मरता है। पारागी उठाने राने मौन ने परिपा गुमाए "Lighthy Olgtuy nc bar ber klar She may like a flow in the wind of our pont She kuns like a bird on the form of a team She loau ne u laved from the lips of a dream - भारत फोशिमा सरोधिनी मामा २४. सपना और मारपनियों का ताना-बाना या महाँ गुना गया है यह सिरोजिनी देवी की कवितामों की विशेषता है । बसत पौर प्रेम उनको कविता के ऐसे विश्य है जिनपर उन्होंने कई कारवाएँ निधी है। पर्सत प्राति वर्सन से उठकर देश मौर मामयता नबनामरण तर नाता है उसी प्रकार प्रेम मामयी सबों से म्पर उठकर कहीं नहीं रहस्यवादी बन गया है। रेप का उद्बोधन करनेवामी भी उनकी पारवनाएं है पोर इनमें उनका सरपोजस्त्री हो उठा है Thy future calls thee with a manifold round, To crescent honoun, splendours victoria vast; Waken, slumbering Motber and be crowood, Wbo once wert Emptent of the overazgo Part." 'पषिप्प परने महको से तुझे पुपर हाद।बह भीनपरा पौर विजय से तेरा परिपक परना पाहता है। तु निशा स्यापर रठ पौर अपना वान पान । गया तुझे यार मही किमतीत की महारानी पी।" एमी नपोषनकारी कवितापों म Ankr 'जागों भीष पिता गा १९१५ की मिस म पी पी पी पीर मुहम्मद अली जिन्ना को समर्पित इपी-कविता के पत्र में सब पर्मों में मोम हि मुमतमान ईसाई, पारमी दवा पम्य प्रमावर्मपी भारतमाता को अपनी-अपनी सेवाएँ पपित करने है। उपर उनकी कवितामों को पाते एए मेरा प्यान व नोटस' मानेट पर पया पा मारमा गांधी पर बिममें उन्होंने महारमा पोपी की तुलना उस पस्यमय कमन से की है जिसके पारों मोर मानहा-मार मरि एकत्र हो पर। उनी फविवाएँ पषिक नही है। उनके पीपन-काम में चमके तीन पर पिए । उनका मामन सेप्टो पमूट (Sceptured Flute) के मामले कर दिया गया है। मेरी बड़ी मालिकोई सरोजिनी नापासी समस्त रचनामों सा पगार हिरी में करे । मैंने सब उनको कवितामों का धनुषार मिया मा पर ही मेरे कापद-पतरों में बी पड़ी है। एमाप मैंने पहें मुनाई मी पी पौर में पर माई की। मरोगिनी नापापी पितामों में बारवर भावामरमपी मनिमनिया पार भी माछ मुनाई देती है। फरवरी १९] पायू पुरुषोत्तमघास दरन एप सस्मरण मुझे यह पानकर बरी प्रमग्नता है कि राष्ट्र पोर राष्ट्रभाषा बोर मक बाबू पुरुषोत्तमराम टोन क सम्मान में एक पभिनएन-अप प्रकाशित करने पौ योजना बनाई गई है। साहाबार नगर का निवासी होन के माने माहापाप-निवासी असम बापूगी से अपना एप पिक निकटवा का माता मानकर, गौरवान्वित होने का मुझे अधिकार है "माता अपनी मय-मापा मोकामाहाबाप नयर में। कई महीनों से यह मुन पापानी बहुत बीमार है पस्वस्थता के कारमा रम्हनि राग्मतमा से भी इस्तीफा दिया है। कई बार मन में मिनाहागार गार रनरे पान करपाठ, परम शिमी पस्त जीवन में इसके लिए ममय मिरामना पम-मा नबता है। ऐसी परिस्थिति में पमिदन-पंच के पासोरकों का मेरा पामारी है कि उन्होंने मुझे पंप के लिए पुष मिलने के लिए निमवित रिमा पोर इस प्रकार मुझे यह प्रासर दिया कि पर से ही सही में उनकी मदा में पपने भागों की या पर्याप्ति उपस्थित र मई। एक बात का मुझे मेद भी परिबारी अभियान-अप के गोप्य पदा परिकारी तो पागबान पहपे हो पुरुप पारगमप में उनका सम्मान पार मे गहुत पाने पिवायामा पारिए पा। हम नामों को समय मकाने मारी हो पर है। पममय पिनामों का पहात पार पाता है। मोंगी भन्ने प्रम में समामाग्योर गिमी भी समय उनानम्मान करार सर्व पोरगाम्बित होंगे। पारवा पिर हमारा रममा गम्मान करना उना मम्मानम पी पपिठ हमारा उनके श्याम बमिरान तब सेपा प्रति माता मापन ही। भारत पुनरिणी बैमा मोसाने पारोमन तो परंतु रनमें से 1 बाइपुप्पोटमदास रंजन एक सस्मरण २४२ प्रमुख पे- पद को स्वतंत्र करने का प्रायोमल मौर मरा पद को PE पापा से सुसंमटिंग करने का प्रारोमन । बस्तुग कामक्रम में यह इमरा परिगलन पण उदय मा किसानाविक भी था और मैं काना बाईपाकि पद पहले से मनि म्यापक और महत्वपूर्ण भी पा। म्वा मिलने के पश्चात् सर्वपदा का पदिौरान समाप्त हो सपा पर राष्ट्रभाषा का पालन भाग भी पा पापौर उम समय तक बनवा पपा पर तक किया समस्त वैच एक भाषा के मुबग्ग भूमने पावर नही हो पाता । म पनी विविधता मरिया से एडिडास परमारको म पी हुई एकमूत्रता और अवता लि भीरमार कर पी।पारी रयुगायों पार मनामों मनाकर महामना मही साईपा प्रती घसे तो किती विरिक सूत्र म ही माना होमा-ौर परमूग एक भाषा है-हिरनिए हिदी का है। पवना यह न पपनी सापि पर सामाषिक एषा मही प्राप्त करता बनामको मनाना प्रारी है की स्ववेच पत्ता मस्पष्ट रसीलिए पार गौ म पश्य टली परम पास्वा पौर हरदा के घरों में यह स्मोपणा कर पा , छि राष्ट्रीपटा ही हिनी पौर हिली ही राष्ट्रीयता है। मानसर और रात भर को न मममना अपनी बुद्धि को परिसीरसता एप की मोगला पोर टिकी ममिनवा नाही गबुत देना है। पार र उरके इस रिपत्रम् प्रतिमानित सर+विस धनोपों में काम म रंगमी मी मोर एच मे प्रनिगादीपरों में बोलना पारंम पर रियार हमारा रहें स्मराना उनका सम्मान करना उमरा प्रमिनम्न काना र प्रति अपनी पता मनाला हमारा एक बार फिर, उनकमदिनपी माना कोसीकारमा पौर के पम्प प प्रभावकारी परत निर पनिज पोरगिरना है। बरामीप में पाइपभिनीन-ब दिमी पंच में उनके मताप या विषय बम नरवा है मपा ये निरा-मुनि मान-पपबाम गत आर 3 मेरे पिया जीपन महीमगर प्रनिप्टिन बीन में विस्पात हो पुरेप और मारे मामलिक वीरत में निरीको पुननि म कार्यरहोंने माराम पर रिमा बाहिरी-प्रेमियों को हिरी मां पर मुनम हो गरे लिए अपने पनी मित्र को प्रेरित कराने 'माहिप नरम २२. मप-पुण्ने झरीने की ग्यापना कराई पी गो पाइनर में बार में उनकी बटारे सामने बों तम प्रयाप में हिंदी पुस्तकों की एक मात्र भान पी। मापसी की सर्वप्रमित पुस्तों को पान पर यह मिमकर टैना है कि पाप कोई भी पुका मिनी भी परम पुकान में बैठकर पा सकते है। साहित्य मकान में वह विपर टैमा मो मही था पर परपरा यही पौ। पुस्तक वरीय लिए पंसों प्रभार म मैन म पाने कितनी पिता दहापटसर पीवी पर मेरी पपई नहुन मोग भामा कावे । टन जी को पावर परमी पार ही पिन पा सीमाण्य प्राप्त हपापा। मोपों को मिला ऐपते-गाते व उनकी प्रामा सपो प्रमम्मता कमक उठी दो रसको पाभा में पारा मरी स्मृति का कोई कोनाभी-कभीमा उमा है। एन पी को पहली बार गुमने मी म्पति भी विधापी बीवनमी।सून *लिसी धममे में उन्हे गुलाया गया था। ग पोर मामी मरवार परिवार का मच में मुमने मी पुप पानी-मी माप मुझे बनी हुई है। रनों है शिकी पहत्ता पर बोसे परास्प प मम्मामी पर हिसिपम पर पोला मन । तप कई बार उन्हें सुनने महमर मिता पर प्रमेम कोई होशिदीप प्रचार frवी की महत्तापी प्यास्पान मरहीमकी में प्रम-फिरकर पा ही गती पी पोटि पाहित्य का पल-पारन रिपियो म नित पनि प्रयाग महिला रिचापौर की रपापना दीपोहने यह नमना पहिण लियामा गमयमा गाहिती शिपिणामों में प्रथम पानीबातबाद. उमा मरोपो में उसे मम्मकी भी पामा पीपहरमोरिपर भी नही का पानी पी उपका र काम पूत का पान पोप नसमा पागापा। मग तो मुझे पारको पानिपीट का पानोपा पोग्र विधामदिराम परात में मनमा पा। ग्रामा सुगमा पा नुरा। पाटन भरने के लिए मागीमा भगवान राम का नारा पया पा। पार पर मोगर म पोरर मा अनुभप पलारना म मौरराम पानी सपनि गरिने परिवीगा कि श्री बतिहामि दापणहीर मबमरमर दर में पैग बाबु पुरषोतमास टान एक संस्मरण देवी है। उस दिन म पो ने और भगवानदास जी ने क्या-पाहा इसकी वो मुझे बार नही पर उस पीठ' मा को उनका निमद प्पामा करनी पड़ी पी पौर म प्रम में कभी समुपस्थित जनता ईमो भी पी। टान पी ने किा पर पाप-विभोरकर म्पास्मान दिया था मे पाव-विमोर मन बस पुष मतों को भगवान् का पुणपान करते समय रखा है। यहाँ तक मुझे मालूम हैपी नेत्री करिता दो नहाँकी परंतु उस दिन उनमा भाषण गाम्म वित्र हो थालनमी में सावता विहिरी प्रचार-प्रसार तिए टाल भी में सक्रिय स स जितना किया उमा पायर हो किमो दूसरे में किया । पर उनम प्रतिभा भी कि हम प समारमौर स्मायौ मपति भी दे मात । पर टरन बीमामय पोरन ने पायद यह गाति पौर मुविना कभी मही री यो सगर के लिए पावस्यक होती है। ऐमी प्रतिमापा को दबकर इस कपन की मायना मोष ऐसा किनौबम मादित्य से गम है। टन को परिता म मिनी हो पर मात्र बीवन स्वय काय हारनपो में निवर निबाहा पर उनका बाचन सय मित्र-मंबर रहा है। नो हिली प्रेम का एक उत्तट सादरण मुझे उमसी काया दुमारी, सिमपर देखने को मिमा । हमारे मस्सगे में ससत पर भी प्रतिप्रिय मारे ममान म प्रारसी पाई उर्दू भाई, पनी माई पर गोगमा एक क्षेत्र मेमा पुरोनियस सम्पनी सत्ता को मधम बनाए ऐ। टंडन पी के मन मतिमा पोसणहमरम्मापst भारतीय जीवन के किसी भी घेरा हिली की परिधि से बाहर नहीं समझ सपोपाहबह पिपा का हो या पाया पाहे रामनीति का पापमपा चाहे सरका। महमि मा निराम रिमा दिविवाह में बो भी मत्रालि पा पाते है उमा हिवी में अनुगारर रिपा मापार मसार समय पहिंदी में ही पा पाएँ। छनों परिोंगो पपने सर पर विधकर उन्होंने सब मसान मंत्रों का हिंदी में पनुवाद भगवा मयं भी सहायता ले हे पौर निवा: मंप में मनात हिंदी ही सुनी ब। सा विमान है कि पोवन र छोटे-म-छोटे से मेकर पोसो थेत्र में रामासी रोपावायसना पानी ही अपना दायित्व निमाने में समय या सपण माई चा मरती है। टान गो प्रमू सिव यमाने पौर रपरी भोपसा करने में विमाम नही रक्तामा कुषारले मोम है, जिनमा २५२ गए गुराने रोते साना पाहिए । उमे परफे दिवसाते। यह सम्पक स्प यम हो म, उपप उपहाम पिमा पाए, उमका विरोध किया जाए, इमकी रनको परवाह नहीं है। पृषी पर पगमा है बौना वो बचा इगकी प्रतीमा मही रंगा किया तक उसके पाप मन म हो जाएं तब तक हम मा तयाणा । यह अपने मस्बिर निर्बम समयादेपरमों में भी बनेगा मिया फिर उटेगा पाये बोमा । यो मोग दम प्रवीक्षा में किया दिली ममर्थ हो जाएगीत को जीवन के विपिन क्षेत्रों में समाएंगे ची को पंगु यमाग लने का पापा 1 पारमा गाभी + १९२-२ममत्योप मारापन म सपनी ममी. पमा कामन छोड़कर पड़े नो किनोको पापचय नही हुमा । थारचर्य मनके ऐमामले पर होता । उनका परिवार और गृहस्थी की पी और बारमी के त्याग के कारण परके पोरेगो मलो को कर उठाया पहा उमनेम पाने पिने परिवारों को मामका पार पाया महाए रिया कपा उटापा । मेरा ऐसा पान पिरत पा सामोरा fan Kए रयाग-प्रतिदान मोगों को महम अनुकरणीय मही होते । मेहरा परिवार याम यादा उसमें प्रगामी परंतु गकी मपानना नो दाणको अनुकरणीय बनाने म रहन पाटी पाण पम्पित परतो पी। हम भी पा रमाय ए पप्प पारे पक्तिपापाग पा उमने प्रयामरेमप्पणीय परिवानिए स्माम पौर बलिदान को गहरगाप्य मिर प्यिारसपतामपरेममय पाके लिए गुमरा उठानेपामे त्याग पररामे पाम पारनेराग नागरिकों मिल नवी मवगे रिट पर परिदिन प्रतीक पे मा पाम मे देगते थे पाम मानत पे उन पर पर पर नहीं पा उनके कमर में द्वारपाम नहीं थे। गायापद पादोरा में प...प्रीषियग नेपामैने भी मूनिमिमी पाणीपीको पर्प बार या पानी गर्मा गानो पासपीठोर बारिमना में पूग्ना पारंभ किया। पायनियर' पागें है. प्रपिसारम रेमो मायापम पापावापान मेरे पिराबी पानी पदी। मौमाय गेरे रे माई कोबी पोबारी भौमिम 14 मारे परम गपा शिगिग रिण वर्ग बारिप जानिमादि की निया में पारकर पपन पापो गानो पार या पुस्तोतमदास टान एक संस्मरस ग्वाम पारपियों का परिवार, दो उनमें स बीमारियों के पिकार छोटी बहन पाहने को एक मारी पुकाने को पौर एक मारमी के पर सारा पार । शुधन एकयो में करवा पा पर मैंने निश्चय किया कि कोई नियमित नौकरी पर मैं छोटे भाई का हार बटारमा । काम में ऐसा पाना मा गिसम रेप लिए कुछ करने का अवसर भी रहे पार इतना वेतन भी मिने किपरका कामकार बमता रहे । उन दिनों बागी मामा नाबपत राय बाय स्वास्ति 'सदन पाफ दरिया सोसाइटी के पयरमैन थे। उसमें कुछ ऐसी म्पबम्ना की कि साम्य मोगों को पधाम सवा मासिक पादरपन (भानरेरियम) रिया मावामापीर उनमे पाबीपन देशसेवा का प्रत सिमा जाता था। टेन पी के मुपुष भी मुरप्रमार रंग (इस समय विकोरिया कामेज पामियर में हिदी-विमाप के पप्पक्ष) बी ए. में मेरे सहपाठी थे। उममे पराम करके मैने सासाटी सरस्मता के लिए एक प्रार्यमापत्र दिया । बाबी ने मुझे गुमाया रनोन मरो पात्रों में प्राचासी पौरन पाने क्या उन्होंने उनमे देखा कि मुझे मामाये में मेने में इनकार कर दिया । मुझे मी ए. म प्रपम श्रेणी मिमी की मैंने अपनी पाई थी पी सरकारी प्रवृत्ति चोरी पी पौर उन दिनों मानों में देश के लिए गुर काम भी किया था अपने पुत्र के द्वारा उन्हें मेरी पारिपारिक स्थिति का पता था पर उन्होंने निममतापूर्वर मुम्म प्रा "मुझे मना माय र मह नही तुम्ह अपनी पसाई पूर्ण करके शिक्षा पार साहित्य में अपना विकाम करना चाहिए।" मुमे बड़ी निराण,ग्न पीमि धावन मेरे मन में भावनाएँ भी चटी पर पान मैं पामता कि उम ममम मुममे पपिक गन्होंने मुझे पहचाना या पौर यह मानता है कि समान मामाटी में नमकर मेरे साप उपहार ही किया था। राममोही ममम बार मैं 'मधुमासामीबाहों म पूट परा। ऐसे न परमर मुझे मिमे जब उनके सम्मुल या उनक सभापतित में मुझे कविता मुनाने मौमाग्य प्राप्त हुमा । उन्होंने दरबार मेरी भावों में अपनी प्रा हामी पोर ते मुझे उम पहमी मेंट की याद दिलाई मैंने तुममें बोदेचामा यह पमत नही पा तुम ग्रनीति के जगत के लिए नहीं ये काम्य उपचन भनिए। मेरो तपन बी मेम पाने शिकवे नवयुवकों को जीवन की ठीक रिमा २१४ नए-नपने रोपे रोहोपी को परिपार मेरे ममान मवनी-मुखर हो मुमते वो अपनी-अपनी समता पापित करते । महान पारमानों का दान दोनों रियामों में होता। देस-समार को एक प्यापकान तारही बासे है पसिनसिक रोगन को मौ कृष ममूम्प प्रलम्प प्ररिस्मरणीय रे जाते है । सूर्प समुत्र को पामक मान परता है, पोसविर को भी चमरा देतान सीमित बरषामों की पर्चा प्रतिहास के पृष्ये में नही होती पर समरि के पीवन में इनकी महमा बम मही होवो । टन पी हमारे देश की महान प्रात्मामों में उन्होंने अपने जीपम कर्म रिचार में व्यापक प मे देग को पार सौमित रूपम अनेकानेकम्पनियों को प्रभावित पिया है। रमकी साधना ग्न बीवनकाम में ही पम्मपित-गुणित हुई है। हमारी भगवान में प्रार्थना है कि प्रडेय बापूगी स्वस्थ होकर प्रभीगा दिनों तक हमारे बीच बर्तमान में पार अपनी सापना से पनपती होते भी देखें। इस उमको यह विषयाम दिनाना चाहते कि गिन राष्ट्रीफ्ता । सन नगोने देगा पा उमे माय करने का हम मनत प्रयत्न कसे मि। १११] प्रमरनाथमा (रेडियो वार्ता) इन पनामी के पहले दो दयों में प्रमाग मिक्षित-दीपित नागरिकों में मिनकी पर्चा बो पार-मान से हुपा करवी पी परित मबममोहम मामय पति मोतीनाम इस पर देवबहादुर सप्रू मौर महामहोपामाय परित ममामा मा-मामपीय बी और मेहरू साहब का नाम देव-सवा के क्षेत्र में सामान कामाय के क्षेत्र में पौर महोदय का शिक्षा के दोष में। जमानाम बी म्पोर संगम कालेज में संस्कृत-पाचार्य के पर स उम्नति कर प्रयाग विमरियान उपकुलपति पर पर पहुंचे और उनाने प्राय । बाँ तर विपरिधान की बागडोर ममातार १६५२ में प्रबकाम पहण किया पा। मगरलाप पति मवाना माहितीय पुत्र ५ । उनका परम १८१७ में छपा पौरपरपन में ही अपने पिता के मार दरममा से प्रयाप पते पाए थे। उसकी पियानसंग सहम पर्नमेंट हाई म म्पोर सेंट्रल ममेर में हुई। उरो मायाम और सकी बुद्धिदी प्रहरवा से पवित्रा-वर्ष वने प्रमाणित पिने स्वयं एम. पाते थे तभी बहाने बी.ए.को पाने का काम गर्ने सवा पा। पाये पसार प्रपाप विश्वविधालय के प्राणी रिमाप के प्रपत्र और १६१८ में उपलपति के लिए से पए। पपो म निवासमान पर उस पर पर पे, पाषाद एक वर्ष के लिए कापी विसविधान के उपहुगपति के सबप उत्तर प्रदेश पब्लिक मरिम कमीगत पम्पप पर २ परिहार पनिक मस्तिकमोगा के पप्पच । पकायापमान १९५ पटना में समान सको बारपाकापी पाने पूर्व पसर पोर में सबसे प्रयास माय वाले पर सनी बी एक साथ महीने अधिक मा।

मए-मुण्ने परोपे प्रयाग में बाहर नहीं पा । पौर यह ६ मास की प्रापि भी केबम एकर पईपी पी पर हंगर पए थे। उन्होंने मपाम मदर और प्रयाप निश्चिा मर पी परम्परा को पूरी तए पहण किया था और उसके पर अपनी पूरी पाप भी यकी दी। मा साइम स रा संपई उस समय मा पर में एम. ए. में पहुंचा। उनको बिवा पोर पुटिकी प्रवरा की इतमी मुन पुमा पारिगर बात उनके पास पाना। ये एम. ए. सेमिनार मिया करते थे शिवम देर पिपाको ममग-प्रमग विषय पर मेन सिसने को दिया करते थे। निमिटी में उनका न ममग कमरा पा रोगरे कापावम प्रममारियों के भी टमाटस किताओं से भरी मैन पर भी नई-सेना पुस्त पत्रिकाएँ सामने पुर्मी पर गुरु-मीर मुद्रा में म्य साहस का भारी पिप, मान के भार पा प्रनीत पड़ी-रही पाय जिनसे किसी का मी प्रमान पिपा नहीं रह सकता । माम म मारे उन्हें सोचना नहीं पा पट-सट हर एक को नियंप या नाम विषय ऐ दिया और फिर हर एक को सहायक पुस्तों की भी जा बी-गुम्कामा नाम सबर का माम अपायकामाम पमिका काम तो मा माघ-व। विपयों पर पो पकामा पा समाने ही पहा मी पापपोतमे यूपन की हिम्मत नहीं हुई। क्लाय में निकले तो जैसे किमी मे कानो में कहा है कि साब पास में बैठना तो मिहनत करनी परगी। उन दिनों उसके सा पूरन मेरपर भी कभी-कमी होने थे। म पोई बता पर पशुपते उनके माते ही सम्माटा पा माता उनके पाग्यान पीछ मभीर मम्मपन हाता विपासण्या होती महोता मतुमन होगा। नापान में किसी कमिमी उपकी गोपनी पता भी नही पीपा मनी पी । उरी मांग मरको देवी पनी पी पार गरी पानी पनि मे प्रमारिण परली पी। पपने म्पतिस्प पौर अपने मान बाना मम । मनगगि मिनने गुमने परमर मुरे उन निों मिना पनि विसापामार हो गए प पौर में प्रदेशी रिमा पर पापा मैंने तो विचारीपछि मेगा पाम या मंगपर राम प्रमरणार म्य २१७ - मैं । प्रब या-कदा पर पर भी उनके दर्शन करने का सुपोग मिमा । एक बार में अपगम एक मास उनके मसूरी के सिना काटेर में उनके साथ ठहराया। पौर इस प्रकार उनकी लिवर्मा पौर उनड़ी कार्यविभि से भी परिषय प्राप्त परहका पारा यो वो उनका विशेष विपप प्रमची साहित्य पा पर उनकी रुचि में विवि पता की-बान-पिमान के हर क्षेत्र में उनका पोड़ा-बहुत पसल बा । अंग्रेजी माप्पम से वे विभिन्न योरोपीय साहित्य से भी परिचित थे । मापाएँ की पानवे पे । पसात अंगमा मथिती हिंदो पौर । इनमें भी मो उनकोटि मा साहित्य है, पर उन्होंने पर रखा पा । सत्ता के कितने ही दलोक उनकी पमान पर ये पो प्रमगानुसार में मुना देत पे । रसीमनाप ठाकुर की संपूर्ण बेसमा रचनापनी उनकी मेज पर रम्मी रहती पी। मषिमी उनकी मातृभाषा ही थी। उनके हिरी मेयों का एक संग्रह भी एप पुडा है। उर्दू कवियों पर चन मेल प्राय पों में निकमा करते । अब रमक ऐसे मेवों का मण पर पोएट्स ऐंर पाएट्री' के नाम से प्रकाशित हो चुका है। प्रपनी में कम- पीरियम कामिरी'माम मे रोने एक पुस्तक निती थी। बिहारी के पोहो म परजी पनुवार भी घर में मुझे पता नही कि पना हापमान पापात् सनकी पाहमिपियों का पया हमा। पपने घर पर उनका प्रभिक ममम अपन रामकाधी पुग्नकामप में बीतता। ग्स पुस्तकालय में पत पुन ही नहीं पी पनेक चित्रका के चित्रों और कमावा की मातियों समा मुग्मित पा। पाया ही कोई प्रमिय पत्र परिग ऐसी हो यो उनके यहां न मादी हो । पुम्न तो बराबर पाने ही होप पत्र-पत्रिकाओं में भी मुपपया उनको नगर मे न पापा। या साप मापनी रन मियों और विचारियों लिए मत्ती की। मोग बराबर ना पुस्तकालय मे दिला जाते 1 मी बागपाम पी मयुगामापी भूमिरा निपनी पाहो तो प्रयाय ग पुनसानों म पपि मापपी उम विषय पर मुम मा माहब पुम्नकानप में मिमी। इस प्रसार मा मार मुभमन म्पनिय प्रतीक सम मा । यूनिकमिटी यामपर में रिली मी महितिष प्रबमर पापा उनक पान मारपति नायकलेगा २८ नए मुराने की कमा और संस्कृति के सब प्रसार के प्रायोजनों में पिते थे । चित्र अपनी संबीव-सम्मेमन कपि-सम्ममन माट्य-प्रदान सभी को उनका सह पोप मिलता था। कवि-सम्मेपन पौर मुणपरे उनके पर पर पराबर पा करते थे। प्रपन समकालीन नई पार हिंदी के प्रायः सभी कपियों से उनका पक्तिमत सपईपा। राम बार्य के रोत्र बहुत विस्तृत पौर पिविष पे। छोटी-सी मार्ग में पर पर प्रकाय गममा संभव नही । समुप रप में में प्रयाग विश्वरिपामय के सफ- पुमपति के प में स्मरण किए जाएं। उनका बार उनके प्रत्येक विद्यापी' मिए पुमा पहता पा। ये पहा तक मंभव हा समता पा सबकी बात सुनते पे सबको उचित सलाह देते थे। म पाने पिवने विधानियों कपासन को घनोने यमाया पा । एक पार पूनिमाविटी छोड़कर पो में फिर पूनियासिय में पापा यह रही की प्रेरणा का प्रभार पा। विधापियों से संपर रखना उनको इतना पियपाहिबास समर हो गामे के बाद भी देखना ममय निकाम मते कि दीपिपापियों का एक ममिनार सिपाले पूनिमिय पोड़ने पर भी पपमे विचापियों की तोग-सबर रखते थे। पर भी यामा पर माते विभिन्न स्टेपनों पर अपने विचारियों को सूचना कर गुमावे पौर उनमे निमः। उनकी पत्नी का दागात उनके यौवन-काम में ही हो गया था। मरा पाना कोई पारिवारिक पीबन नही था । उनका परिवार पा उमर मियों का निपापियामा। गुपर पौर गाम का पटे मोर्यों से मिलने-मित्ताने मिm होते पे । नियमिरी से ममम होने पर भी उन परपार में मोग बराबर मा पते थे। पापपता है किनरो एक विना जीवनी मिगा पाप । पभी बहन से मोप पौर बल-मी मामी मिप माती है पोमरिया में सहायर हो मरे। जयन्वर उत्तर भारत के रिच पोर पिपाचारणेपी पक्ष होमी पमानापमापार गैरमग पिया पाण्णा। बमारी मप-पुराने भरोसे निम्न नहीं पान पड़ा-बतरतीबी से बसा हेच रास्ते बाजार भारतुम । सौटते समय हमें मबर को देखने का अधिक समय मिना । नयर के बाहर खुसी जयप पम्ही माखें पौर प्रन्य मंदिर है। सबसे सम्म भवन भूनपूर्ण राजामों का राजमहल है। परमीर विस प्राकृतिक सौरर्म + लिए प्रसिर म्सकी मामर पम्मू में भी यत्र-तत्र देवी जा सकती है। कस्मीर सरकार के प्रपिकारी हमे सम्म मै मिप मए। हमें पम्मू से भीममर भेगमे सपनाम इस प्रकार वा। घाम को जम्मू पट्र पाती। जिनमें सामान बर्मय पाता है। वे ट्रई बहुत र मही पाती। रास्त म वो भी रेर-दर कम है और इस प्रकार से नयभप दो सौ मीस का सफर पोलीस मम्मीस पटे में करती है। हमारे इस म बीस शिपापी पे। हम दोमो करके इन का मैं पाम की सीट पर पिटा दिए गए। हम मोम कोई सात बजे रसाना हुए। पमाहावार से रिम्सी पोर विनोद पानकोर तक हम बीम + बीस एक ही रिब पाए । पठानकोर से जम्मूतक मी एक ही बस म। साप में गावलीत सो-मवाम पा पानामा रहा था पह सहमा सरम हो पया। पर हम बम पो-यो माप ए गए पौर साथ में से प्रपरिपित एक नागर पौर एक पनीमर जिन्हें दम मामा प्रियकर नपा क्योकि मो उनको मारी म पान की मनाहा है फिर भी पारी-छिपे सबारी न पाते है पौर सुप सए बमा मत है। पहमा पार कर नामक स्थान पर हुया। पााँ हम मोम मममम ११ राव पर। बसपा पर ही एक छोय-मा हाटम है। यही हमने गाना पाया पार रोचीन परे पाराम म्यिा। मुबह पार बर बर्मे फिर पम पड़ी। हप पा रहा था पार हमारी बम खराब कयों में हार मुरार हो पी- पीर-पीरे, मभन-मभम। पोर पंगम हमन ममम पर गाम को पार पिया । बाग मीया पोर पापाई। परि-मात ममानतिर गार एमरे पर रिपाई पाठी है।काई बम मोरानीपम काई रचाई पर पापकर एक मुरप पारसलो पाती है पोर मर पारणे ही हम सारी पाये में पर पान । मुरंप अपकार में पारेर एन के पार पासामा पीली पारी र पर पिपास एस्य सामन पाता है यह मम्मी मी सुमामा गा कश्मीर यात्रा एक सस्मरण (रेडियो मार्ता) कामोर माख का मधुमन है पृमी का स्वर्ग है मावि के गमार को पियरी मारि-मादि कवित्वपूर्ण बाममोर के पपप 4 साफपन से सुन पुका था। पर पहली पार करमौर देखने का मुमोम मिमा मुझे १५ म मर्थात् अपनी २ वर्ष की पवस्था में । मेग जन्म पहर में हुमा गमियो में मैं पेला रा मुहल्ले-टोमा म पूमा-फिरा । कृति-प्रेम सस्कार मुमम गाये ही नही । पाव नहीं पाता कि किन्दी स्थान प्राकृतिक सौर्य समापित होकर मैं उसे रेबने मनाई। हर कही पपना मित्र या प्रेमी हो को यहाँ पाने के मततर मेरे लिए दावे है। या यदि कोई मिर या प्रमा हो तो उसक साय पातिक सारक स्थान की पानी की पा सरवी है। इसके प्रभाव में भस्मीर की यात्रा मेरे लिए टमती माई। बनरिमों में महामार यूनिवरिटी में मेरेरी का पम्यापक पाप दिन पासे करमीर एक मेता निसिटी में पाए प मौर बम्होने रिचापिया के एकरस को समीर प्राने पौर यहाँ का जीवन देखने मिए पारित किया पा । रहरे की पुट्टिो म रिचापियों का एक दम इस यामा मिर मार मापौर पारस बस्तर महोदय में उसकी देख-रेय प्रार रखा प्रबन्धका कार्य मुझे संपा। परमीर घरकार की पारसे पप मा पाकिसम्म घमारे सकर, ठहरले पाने-पीने माने रिपाने की सारी जिम्मेदारी कामीर सरकार को होगी। परमार पाने के लिए पठानकोट तिरटयम रेसम स्टेपन है। यहाँ बम्मू लिए बने मिमतो है। दीन-पार पटे का रास्ता है। पटानकोट स यम्मू का रास्ता विपेप पार्दक नहीं। पर प्रपो है। बिम धमय हम लोग चम्मू पाये पप्मा हो पई पी । पाहर ससने से मपर भारत के पम्प नप से २६. मए- भिन्न नहीं मान पहायतरतीबी से बसा, वंग रास्ते पार का पोर-मुस । मोटो समय में मसर को देखने का अधिक समय मिमा । मगर मार गुमी अपहें कुछ प्रमभी इमारतें पौर प्रब्ये मरिर। सबसे मम्म अपन मुखपूर्व रामरामों का राजमाम है। समीर विस भाविक सौरस लिए प्रतिर उसकी शामर पम्म में भी पाराव पेपी गा सकती है। कामीर सरकार के अधिकारी हमे पम्म म मिम गए। हमें जम्मू से पीनार मेबने का माम इस प्रकार या। साम को जम्मू एवं पाती है जिनमें सामामबगए माता । ये बहुत देर नहीं जाती। रास्ते में सती भी और देर बामौर इस प्रकार पमपमम दो सौ मीमा सफर पौवीस मम्मीस पंटे में करती है। हमारे इस में बोस विधा हमरोमो करना में पाप की सीट पर पिस दिए गए । हम मोम कोई मात बजे रवाना हए । माहावार से विस्मी पौर वित्तीय पठानकोट तक हम योम के बीस एक हो रिम में पाए । पठानकोट र जम्मूचक भी एक ही बस में। साब में बातचीत हसी-मजाक में को मानर मा हा पा रह सहसा परम हो गया । मम हम बस रोमो साथ पपए पार साप में रो परिपिठ एक ग्रामर पोर एक स्मीनर मिन्हें हमे मामा प्रियकर नपा याक मा उनको मपारी मे पाने की मनासे किर भी बपोरी-छिपे सबारी म गाते है पोर भूप पए बना मत है। पामा पाप मापक स्पान पर हुमा । यहाँ म मोर मरबग बरे रात पपि। बनाके पर पर ही एक घोटा-मा होटम है। यही हपन गाना माया पौर रो-तीन पटे पागम रिया। मुबह पार पर धर्म फिर पान पी। पुहय पाहा पा पार हमारी बमें सवार पूर्ण में होकर पुखर रही पी- पारेभीरे, मभम-ममत। पोर याम हमने तपम इसे पाम को पार दिया। मातमीपा मार पहा है। पार-मान समापिर मारे एम्भमर मर रिपाई पाती है। कोपिम मोपकोई सीप कोई आर।पाई पर पर एक सुरंग पार परली पाती पोर इमरे पार कर हो इम पामोरबी पारी में पार जात । एम. पवार म पापीर एनेर यो पहमा पौडी पारी दूर पर पहा मान पाया है वह गती नही मुमारा ग सम्पा। - कर्ण (रेडियो नाता) महाभारत के योदामों का स्मरण करते हुए कसं को भूममा समय मही है। के कारणों की भोर से मरे पे पार पंत में प्रर्युन बारा परारित प्रौर परामामी हुए। पहाबमान पौर पराक्रमी पे पर उनके नाम के साप बो विषेपण भुपमा रामबीरका पानानवीर कर्ण पार गोदानीरता समस्त रनले पपरस का कारण भी बनी पी । उनके पम्म के साथ एक ऐसी पटना पुको पो विसक कारण उममें एक हीन-भावना भी पी पिसे प्रारम्म की भाषा में मधोरिमारिटी काम्पसक्स पसे । उनका महंधार भी सो कासरा और उस पापा। उनके प्रति यो म्पबहार किया गया पौर जिस प्रकार पुरम में पारा गया उसमें उनके प्रति म्याप किया गया पबमा नही इसका रचर देना सहर नहीं। महाभारत का दूसरा हो। मूल बात यह है कि कोरलों की पोर पे इस कारण अपर्म की प्रोर पे पौर भगवान प्ण का बम्म धर्म के सम्मुवान पार संस्थापन के लिए हुमा पा। उनके सफेत पोर उनकी प्रेरणा से पो हमा से देखक पहले का दाइस कोन करेमा ? "बतो रुप्पस्वतो पर्मः, पतो पर्नेस्वो वप" महाभारत की पोपणा है। पर हम ना बोपन वृत्ताव मुनें। को हैकुठो मे पपने कौमार्य में पुमा अपि की नगी सेवा की। पपि ने प्रसन्न होकर कृती को यह पापान रिया कि अबस्पा प्राप्ठ हाने पर जिम ऐपता का भी इस्परह करेगा उसमे पुष प्राण कर सकेगी। पनी ने कौवाममय मुनि पचन भी परोसा करने लिए पूर्व का स्मरण म्यिा । मूर्य रमता मनुप्प-क्स में प्रपर हुए पोरनी मते गर्म पाण किया। मारीती + पर्म से रो बाना रतन इमार पई पावासक व ही पिम्प मा पोर यम्प से होम मोर काष पाराम पिए था, को को पमृत से प्रश्न मा पा । इनको पारण करने के नए-पुरन भरा (૨ हो जो बीग का बाजी दाम पानता हो । समीर स्ना-बारीमरी प्रदेष है पोर पर पापा का सप्रेम है वो स्वाभाविक कियपी मापक मन को मोमो। पापारी पास पहबामसा है। प्रमर किसी पीर पर मापकी बीस्त मा मई है तो वह जानता है कि पापस मह मामा राम से सन्तासमोरी बोगी को बनान की हो कमा नही जानत उन्हें बचने की कला भी पानते है। भीमगर पास में देखने की पीपामामार पौर निशात बास-मुमन बारमाहों के बनवाए हुए मान पहाँ ये मानों की पर्मी से बचन मिए पाया करते थे। पम्मा साही में भी एक राम पर पोटी-सी इमारत है। इसका पानी बहुत पमा माना जाता है। भीमपर से बाहर के स्थानों को स्वर के लिए कम्मीर सरकार महम एक बस देवी पी। उसी स हमने पुलमर्म पहमपार मर्मतनाग प्रत्यारत सर भीम और मतन पारिस्पान से। यहाँ बस नहीं जाती थी यहाँ या दोहमपंचन पए या पोड़ों सा विमन मर्य में मौसम सा पापौर नंगापर्यत पासमान में अपना सिर ऊँचा उठाए हुए पहत भप्य मया। मगाय से पंदनपारी सकस पादों पर पए परममाडी म स पुस बन जाता पोर पानी मीप सवा है। पनवनाम में पानीका मोतहोस विवस्वा मपपा भनम निकमती है। समीर पहाडी प्रदेस है कही बस की पारियो रियाई परवाह नही मीसम- बम की मरिया-भरने । पाप ना पनों समवे समीप वा सोस रंपारण। समोर बर है पर भारी मुझे अधिक मपर मम । पिकारावामा स सकर मेएक पार करिया हा बहनों से भरा परिचय हमा। मुरमरि पम भी जाननयास यहाँ महत समस्यामा म मन पिता पाठ किया। पहा से बिमसे परिषय हुमा पा पार कर मरा पप-म्पहारसमीरी मित्र बनाना भोर मित्रता कायम रयमा रामों जाना है। दो वर्ष ए में कामीर फिर बसा पा पर मैं सपरासीर का पातिक सौर्य मुझेरही मही पौष म पापा। मुरमीपपई पीकहाँ कमरे गुप मि माम्बत और पाय भी भी मेरा गाला माता कामीर में परिवारमीरियों प्रति मेरा पारसह मुरेपही मगाया। १९५१] - कर्ण (रेग्यिो बार्ता) महाभारत के योद्धाों का स्मरण करखे हुए कर्ण को मूमना सभर मही है। कौरवों की पोर से मरे पौर मंद में अर्जुन द्वारा पराजित और परामायी हुए पे । कर्ण महाबलवान पौर पराक्रमी थे पर उनके नाम के साप जो विक्षेपण पुडा पहचानवीर का पा-मानवीर कर्ण पौर यही पानीरता संभवतः उनके परामय कारण भी बनी पी। उनके पम्म के साप एक ऐसी घटना दुसरी पी जिसके कारण उनमें एक हीम-भावना भी पी मिसे पाराम की भाषा में इनफीरिपारिटी काम्प्लेक्स कहगे । उनका अहंकार मी रसी का दूसरा पोर रस पहसू पा । उनके प्रति यो म्पबहार किया गया और जिस प्रकार पुर म उन्हें मारा मया उसम उमके प्रति म्याय मिया मया प्रमषा मही इसका उत्तर देना सहर नहीं। महाभारत का तर्क दूसरा ही है। मूम बात यह है कि कर्ण कोररों की पोर पे इस कारण पबम की पारप मौर भगवान कृष्ण का पम्म पर्म के पम्पुत्पान पौर सस्थापन के लिए हमाबा। उसके संकत पऔर उनकी प्रेरमा से गोहमा उसे देठीपने का साहस कौन करेगा ? "पतो इप्पस्ततो धर्मः, यतो मर्मस्तता बय" महाभारत की पोपसा है। पर हम उनका पीपन वृत्तांत मुनें। दो ने अपने गौमार्य में एसा अपि की की सेवा की। अपि मे प्रसन्न होकर ती को यह पलान रिया कि परस्पा प्राप्त होने पर जिस देवता का भी यह स्मरण करेगी उसमें पुत्र प्राप्त कर सकेगी। ती मे कौतूहमपए मुनि न परोया करलक सिए मूर्य का स्मरण रिया । पूर्व रेक्ता यनुप्यक्रम प्रस्टइए पौरती में उनसे गर्भ धारण किया । कुमारीती पम से दो बाम उत्तम हुमा यह यंपा । बामक वो पिम्म पापौर पम्म म सेकुरण पोरस वाराण लिए हए पा पोको पमृत से प्रारमा पा । इनको पारण करने के नए-पुराने भरोरे २१४ कारण वह मृत्युजय पा मोर उसे मानव-नामद-देवतामों में से कोई नहीं मार सकता पा । पर मारो मपने पुत्र को मेकर समाज के सामने स पाती । उसने कर्ण को एक पिटारी में रयकर मरी में प्रवाहित कर दिया। यह पिटारी प्रपिरप में देवी और पका मी। प्रधिरप कर्म से मृत या सारवी पा पार पणा पृतराष्ट्र का मित्र था। उसके कोई संतान न दी। उसने पासकको साकर अपनी पत्नी रापाको दिया बिसने बडेमार-प्यार से उसका पालन-पापण करला मारम किया। इसी कारग्म करर्ष का कमी भी मृतपुर प्रपिरपि प्रपा राप्य भी कहा जाता है। सूर्य का प्रेम होने के कारण कर्ण पपने प्रेज सही दिन-प्रतिरिन मोर पौर पहन मय । उपरहारसाचार्य मे बरपोर पोर पारदों को मस्त्र-गरब की पिया देनी पारभ की तो कर्ण भी उनक साप सुख-कौसम म रप हो मया । रिसेप प्रतिस्सा उसकी प्रचुन साप एती पार पारपिया र सिए भी पर कहना कठिन दाकि दोनों में कार भष्ठ है। एक समय परमारों के समकोगन प्रदर्मन के लिए एकरंगभूमि की रप. र की गई। इसम पईग मे तोर फैन सपनाने प्राविक प्रदर्पन ममारी सभा को रमित कर पिया मोर उनकी सब पोर स प्रर्षमा हाने सगी । कर्णको पर्जुन का मोम्यम पमप हा पया। उमन प्रबुन को चुनौती रीपोर रगभूमि में हो उनमे नानको पार हो गया। उस समय के निपमा क पनुमार रामार परमाणु सही प्रतियाविवा करत । पुरुपर पावार्य ने कर्ण म पपना बंध-परिपय नमिए पहा । करता मारपी का पामित पुरमर पा अपना क्सा परिषप रता रहत मरियम हुमा । दुर्योपन कोर्स एम योग का अपनी पोर कर मन का मग्मा परमर मिमा । उमन उसका मून-बंधीय कमा पान मिएस पपरेम का राजा पापित र रियामी मकरायराज भीपा जाता है। पवुन प्रतियागिता मि पार नहीं हुए पोर मी ममय से कार्प दुर्योधन का मित्र बन गया पोर उमन हरा दुर्योपना माप रेन में प्रतिमा की यह पहला प्रामान पाना करणं को मूताण हाने पारण माना। जमरा पपमान उमारी सररममय हमा। पीसकर म बारपाकीसी पनि मर्म समीकई पी। उसमें मां भी माना।

से अपने प्राण बपाकर मामनेबामे पार भी उसमें ब्रह्मपारी मुनियों के प म गए थे। परतु कर्ण जिस समय मध्यदेव सिए उपख हुमा उस समय बोपदी मे उसके मूद-युष होने के कारण अपमानजनक वपन कहकर उसे बरण करने से इन्कार कर दिया। प्रत म मर्जुन ने सम्योग श्यिा पौर सौपदी मे उनके गले में पयमान राह दी। पाये बनकर इंती के मुख से एक ऐसी बात रिकम पर किया पांचों पामयों को पत्नी मानी मई। पपने समुर पर की सहायता से गर युपिष्ठिर को हस्तिनापुर का राम्य मिसा प्रौर उनाने राजसूय या करने की तैपारी की दरबारों दिखामों के राणामों को पराजित करने और उनसे कर बसूम परमे के मिए युपिष्ठिर * पाएँ माई चार रिमामों में गए। भीम पूर्व में गए जिपर कर्ण का प्रप-बन का राम्प वा । कर्ण पौर भीम का बड़ा पोर संग्राम हुमा परंतु अपनी बान पीरखा के कारण अब पर अपना काम-राम पो पुष्प पायो उस पत्रेय पनाता पारर्ण मे पराजय स्वीकार की पौर राजसूय यज्ञ में प्रग्य रागामा के समान हीमाया। कौरवों मोर परियों का पुर धर्म पोर मधर्म का युर पार कर ऐस परेय योवा को कौरवों की प्रो, प्रवर्म की पोर, पाते देखकर बतामों म पिता का पई ने सोचा किसी न किसी प्रकार कर्म से अमृतोमूत करन-काप मे मेमा पाहिए । एक दिन बामण का बप बनादर कर्ण के सामने पहुँच पया। मन में वापस लिए बड़ा सम्मान पा पौर उसके पास अप भी ऐसा म पागोआपण लिए परेय हा। नप की यह सारखा जानता था उसन इमी काप-मुरतो मापना की। करण ने अपना पुरत पौर अपनी स्वचा सोहए कपको मर्म से काटकर प्रसग किया पोर नामग्य को पान कर रिया । उस मन में न किसा प्रकार का बहुमान पापावाप उस्टे यह पहुव प्रसन्न हुप्रा कि उसने हामण का बन पाती नहीं किया। मरण # उस धारण रान से लगा प्रसन्न हुपा पार उमम कप-पुरम के परम उस शक्ति मामा एक प्रमोप मस्त प्रान किया । उस पर परत एक ही पार छोर सकता था पर जिसपर यह पिरया रसका पवाय ही महारर दमा पाहे वह विना ही पतिवामी पूर या महो। मगर इस पाने, पादप किसी भी मापारण योगा समान प्रपने ही यम-निकम पर निर्भर मए पुराने मरोरे ऐना। वर्ण इस मक्ति को बदे यल स सचित रखता पा सोकि उसने सोश पा किसी दिन वह इसे पर्जुन पर पोडेया। इमी कारस भीम से हार मानकर बा राममूप में माया ता पर भीतर हो भीवर जमता हुमा। राजसूय के घीम बार ही पुधिष्ठिर अपना राज-पाट अपने भाइयों को पौर अपनी पली को भी बुए म हार गए । पायद उस पवसर पर परियों और गोपनी के प्रति भी गिवने ष्टु गमनको उतन किसी पम्य न महो । से रंगभूमि पोर उससे भी प्रतिक मर्यबर में पीपमानजनक रचनों की पारदीपोररों और परीके पास उतरवाने की सलाहसंमेहीमासन को वीपी। उसीने परी को दामी दया उसमे इमरा पति पुनने की बात पीपी। परिव जब वापपप बनवास पोर एक वर्ष के प्रावास के लिए निकम मए तो कर्स को अपनी पक्ति पौर प्रभाव पाने का पूरा मरमर मिना । रसने रिविजय की पौर हस्तिनापुर में रमन का स्वागत-सत्कार हुया। जब परियों के बनवास से वोटने पर महाभारत की पारी होने सनी पौर दोनों रम पपने-अपने पत्र में रामामों को मिमाने मने तब भदवान कृपा का बहुत साम्प्रया पर उतन दुर्योपन का पा पाण करने की रि बनी। उसकी पति वाममोर उसकी कमजोरी भी।पत्यकामी भगवान परियों की पौर माना पाइठे पर यह दुर्योधन से प्रतिमावर हा एका पा। उसने पारपो बनने का कार्य अपने सर मिया था। बरबान मे पापा "तुम कसं सारवी पास बनो, मगर रेपो पर्स वर-मा पम्प योगरामों से अपनी तुलना कर पारमयमार र तुम उसकी में ही सिमाना पर बीच-बीच में या बातेपना किम पर्नुम से पुरानी सभी को भोवर से एरंस बना ली। महामाख पुरम मारह पानामों से परारित हुमा पर उसने अपनी पति पयुन पर धानको मुरधित एपी। भगवान रणब तक पबुन को उस निरपवारसा पुर महीं करने देना चाहते थे खबर पान या पति। रमान पोरमसामना कसरिया। पोलारिमा रसम्म भीनमपुरमा पौर महापरानो पादानव २९७ मायनेषता के रसीद-मंग से सपना पटोला ने संसाम और माम च्यिा प्रारकर्स को समा कि पपने प्राण बचाने को उसे अंतिम पमित का उपयोग करना पड़ेगा। गपति ममत ही घटोत्तपरेर हो गया और कसे नि:सार फिर भी बह पपने पराम से भड़ने को तैयार हुप्रा । बस सीम भार पर्जुन को मोर उसमे मत महरेर युधिष्ठिर समठ ममेकानेक पोरों को परामित किया। मन में पर्युन के साप उसका रिप युर हुमा । मुर करते-करते अचानक उनके रस का पहिया यमीन में प्रेस मया । उसे निकालने +मिए पाप से नीचे उतरा। उसन पन से पनुरोप किया कि पर तक वह फिर से रप पर प्राचीन न हो जाय तब तक वह उसपर बाण न चमाए, परंतु भगवान पण का मारेप ध पौर ही पा। लकी मृत्यु के पश्चात् बर पारणों को उसक साप प्रपना पण मानूम बहुत पुणीहए । यह दो उनका पहोवर माई से पा। पौरों में विभिपछ उसका पामतार किया पार उसकी पली साचो तया रस पामितों की रमा की।ती की बेपना महरों की कल्पना पर ही होना पाहिए । उसके एक पराकमो पुष ने दूसरे पराकमो पुत्र काम किया। पर पम पार पपपुरम ऐसा होना होगा। महामारय म उसका समेत फिकई नएकामुरका परवार पर। मृतु पापात् र्ण सग गाकर मुयदा म मीन हो मया । हिल्सर से प्रसिपवर-अप है। एक प्री प्रामार का मिषा पररा' पौर पराभी रिनारामिता रश्मिरपीपी मम्मीनारायण मिम कई पर एक महाकाय हिल रहे। रसम्म पुष ग्रंप रन्होले पप-करा मुनाया को बा । महावाम का पनपन मायर पनी तकनही हो सका। १९५१

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of मानव-नववा के रम-गोर्य-मंच से उत्पन्न । पटोला मे कर्ण के साप मोर सपास किया पौरखं को समा हिमपने शण चामे को उसे प्रविम पक्वि का उपपोप करना पड़ेगा। वह सक्ति मगते ही बटोलार हो गया और कसं निम फिर भी वह पपने पराकम से सड़ने को तैयार हुपा । रन भीम पार पहुंन को छोड़ रसने मकुछ सहदेव युधिष्ठिर समेत प्रमकानेक पीरों को परारित किया। मन में अर्जुन के साप उसका रिष पुरामा । पुर करको पचानक उन रथ का पहिया उमीन में पंस पया। रसे निकालने के लिए बह रप मीचे उखरा । उसन प्रमुन से अनुरोध किया कि पटक पर फिर से रप पर मासीन म हो गाय दबावह उसपर वारण , पलाए, परंतु मपान रुण का मादेप च पोर हो पा । कर्ण की मृत्यु के पश्चात् पर पाबरों को उसके साथ पपना सर मासूम हमा तो बहुत सीए । रातो रनका सहोदर माई ही बा। प ने विपिरत उसका पाह-मस्कार किया और उसकी पत्नी उस बच्चों तपा उसके पाधिों की रमा की। ती की देरना सहयों की मासमा पर पड़ना पाहिए । रसके एक पराम्मी पुष ने दूसरे पराक्रमी पुत्र का पप किया। पर पम पार पपमपुर में ऐसा होना ही था। महाभारत में चमका समेत कर्म नरामुरका प्रकार पा। मृत्यु के पापा कर्ण साप गाकर मर्पण में मोन हो गया। हिन्दी मे मणके मर रो प्रतिस्परनाम्य । एक पी पानरकुमार का हिमा पराब पीर दूसरामी दिनारा लिखा रस्सिरपीपीसमोनापफ्स्य मिय करी पर एक महाकाय लिख रहेउसम्म पप सम्होने परा-करा मुनाया मो वा । महासम्म का प्रकाधन पायर पभी तक नहीं हो सका।

Mahakvinaye Purane Jhrokhe

Author
Bachan
Title
Mahakvinaye Purane Jhrokhe
File name
Mahakvinaye Purane Jhrokhe
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2010/12
Publisher
Varanasi .hindi Delhi,rajkamal Parkasan P, L,
Language
Sanskrit
Pages
111
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514642
Barcode
4990010022340.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
75BrM8gsYz1
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Mahakvinaye Purane Jhrokhe