Adarsh Library, Jaipur

Apolo Chandra Ke Desh Main

Sharma Shyam Sundar · 2011/01

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अपोलो: चन्दा के देश में रह गया। मेरे यानी थे, थामस पी. स्टेफर्ड, जान डब्लू यंग यूजीन ए सरनन । यह उड़ान आरम्भ हुई १८ मई १९६६ को। केप कैनेड उडान भर यान ने पृथ्वी की परिक्रमा को, फिर वहां से चांद और बढ़ा और जव चांद ११२ किलोमीटर दूर रह गया तोच की परिक्रमा करने लगा। इस दौरान आदेदा-कदा में से चन्द्र यात्री चन्द्र-कक्ष में चले गये और वह कक्ष आदेश-कक्ष से अलग होकर चांद को और बढ़ चला । १५ किलोमीटर दूरी पर ही रुक गया । इतनी दूरी पर चन्द्र-कक्ष ने, जिसमें स्टेफर्ड और सरनन यात्रा कर रहे थे, आठ घंटे तक परिक्रमा की।यात्रियों ने शांति सागर को भली-भांति देखा और उसे मेरे उतरने के लिए उपयुक्त पाया|चन्द्रकक्ष फिर वापिस आकर आदेश-कक्ष से आमिला और बाद में आदेश-कक्ष सकुशल धरती पर आ गया । १२. मेरी चन्द्र-विजय बरसों की तैयारी के बाद अन्त मे १६ जुलाई, १९६६ का दिन आ हो गया जब मुझे चाँद के लिए चल देना था। इस बार मुझे उसको परिक्रमा करके ही नहीं लौटना था। मुझे तो उस पर उतरना था और फिर वापिस धरती पर आना था। इस काम के लिए मेरे यात्री नील आर्मस्ट्रांग, माइकेल कॉलिन्स और एडविन एल्ड्रिन मुझसे ज्यादा उत्सुक थे। यद्यपि उन्होंने पहले जमिनी यानों में अंतरिक्ष-यात्रा की थी, पर चांद पर उतरने, हो चलने तथा वापिस धरती पर आने के लिए उन्हें कई महीने 'प्रशिक्षण दिया गया । शायद तुम्हें मालूम नहीं कि उन्हे थत में रहने, बर्फ पर चलने तथा अपनी नाव - ।

अपोलो
वंदागोदेश में
चन्द्रमा पृथ्वी से कोई चार लाख किलो-
मीटर दूर है । उस तक मनुष्य को
पहुंचने में अनेक बाधाएं थीं। वे बाधाएं
क्या थी ? मनुष्य ने एक-एक करके
उन सब पर फैसे विजय पाई ? उसने
इसके लिए क्व-कब क्या-क्या प्रयत्न
किए? और वह अपने लक्ष्य में कने
सफल हुजा
?
इस पुनक
कहानी अपोतो की जवानी कही गई है।
इसे पढ़कर रिमोर नदन सन्मान का
सा मानन्द प्राप्त करने, बल्कि इन दिन
में प्रामाणिक जानकारी पाने
एक युगांतकारी घटना परनित्री
एक अद्वितीय पुस्तक !

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अपोलो
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चंदा के देश में
श्यामसुन्दर शर्मा
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मेरी पुस्तक और मेरा नाम
मूल्य : एक रुपया अस्सी पैसे ( १.८० )
..
प्रपादाक सुरेशचन्द्र अग्रवाल
वाल बुक बैंक, २६४, डीग गेट,
मथुरा
कापी राइट
: बाल चुक यक,
मितीय संस्मरण : १६७०
मुद्रफ : हितसरन अग्रवाल, सरस्वती प्रेस, मथुरा ।
:

१. में हूँ अपोलो
बच्चो! कौन फूला नहीं
समायेगा, आखिर मेरा भी
दिल है और जब मेरी इतनी
चर्चा है तो मेरा मन करता है,
क्यों न अपनी कहानी स्वयं
ही सुनाऊँ।
सबसे पहले तुम्हे अपना
नाम बताना होगा, नहीं तो तुम
अंदाज ही लगाते रहोगे। मेरा
नाम है 'अपोलो-आदमी को
चांद पर पहुँचाने और वहां से
- वापस धरती तक लाने वाला
यान । अपोलो मेरे अकेले का
नाम नहीं है। मेरे भाई और
यहां तक मेरी पूरी बिरादरी
ही 'अपोलो' नाम से पुकारी
जाती है । तुमने इतिहास में
पढ़ा है कि 'चन्द्रगुप्त' नाम के
बहुत-से राजा हुए थे । उन्हें
अलग-अलग पहचानने केलिये
उनके नाम के पीछे 'प्रथम',
५

अपोलो : चन्दा के देश में 'द्वितीय', 'तृतीय' शब्द लगा दिये गये थे। इसी तरह मेरी विरादरी के सदस्यों को अलग-अलग पहचानने के लिए भी उनके पीछे एक, दो, चार, पाँच, आठ आदि शब्द लगा दिये गये हैं। उनके बारे में बताने से पहले मुझे तुम्हें बहुत-सी बातें बतानी होंगी । तुम्हें तुम्हारे मामा ( चंदा ) की कहानी सुनानी होगी, चांद तक पहुँचने के प्रयत्नों के बारे में बताना होगा और राकेट, उपग्रहों आदि की चर्चा करनी होगी तथा अपने बड़े-बूढ़ों 'मरकरी' और 'जैमिनी' के विषय में कहना होगा तव ही तुम मेरी आत्मकथा समझ सकोगे। बच्चों में अच्छे-अच्छे गुण आयें,इसलिए लोग देवताओं तथा महापुरुपों के नाम पर अपने बच्चों के नाम रखते हैं। वैज्ञानिकों ने मेरा नाम भी यूनानी देवता, जूपिटर के बेटे, अपोलो, के नाम पर रखा । कहा जाता है, यूनानी अपने देवताओं में जूपिटर के बाद सबसे ताकतवर अपोलो को ही मानते थे। कृष्ण की ही भांति अपोलो ने बहुत-से अनोखे और वीरतापूर्ण काम किये थे तो ऐसा नाम पाकर मेरा मन भी स्वाभिमान से भर उठता है। और जव अपोलो ने बड़े-बड़े काम किये तो फिर मैं क्यों न कहें।

२. प्यारे मामा चन्दा तुम सब बच्चों का एक मामा है चंदा। वह सबको प्यार करता है, सब पर अपनी शीतल चांदनी बिखेरता है । मैं इसी चंदा की कहानी तुम्हें सुनाता हूँ। चांद सबको-बूढ़े, बच्चे और जवानों को प्यारा है । उसे आदमी भी चाहते हैं और औरतें भी। दरअसल वह तो तुम्हारे पूर्वजों को भी बहुत अच्छा लगता था। उन्होंने इसके बारे में अनेक धारणाएं बना लीं। कुछ इसे परियों का देश समझते थे तो कुछ देवता । जो इसे देवता मानते थे वे इसकी पूजा करते थे। वे अपने त्यौहार भी चांद के घटने-बढ़ने के अनुसार ही मनाते थे । आज भी हिन्दुओं के कई महत्त्वपूर्ण त्यौहार पूर्णिमा अथवा अमावस्या को ही मनाये जाते हैं, और हिन्दुओं के ही क्यों, यदि ठोक तिथि को चांद नजर नहीं आता तो मुसलमान अपने ईद । आदि के समारोह आगे सरका देते हैं । ईसाइयों के ईस्टर त्योहार का सम्बन्ध भी चांद से ही है। चांद की पूजा कई देशों के प्राचीन निवासी करते थे। मिस्रवासी चांद को 'ओरिसिस' (सूर्य देवता) की वायी आंख समझते थे । अरमानिया वासी 'सिन' और फोनिशियन 'एस्टार्ट' नाम से चांद की पूजा करते थे। आजकल भी कुछ लोग चांद की पूजा करते हैं, पर उनकी संख्या घटती जा रही है। सब प्राचीन वासी, खासतौर से भारतवासी, अंधविश्वासी न थे। उनमें कई बहुत विद्वान व्यक्ति थे। वे चांद को बहुत ध्यान से देखते थे, पर उसे देवता नहीं मानते थे। उन्होंने आज से लगभग २ हजार वर्ष पहले ही पता लगा लिया था कि चाँद एक खगोलीय पिण्ड है जो पृथ्वी की परिक्रमा करता है। उन्होंने - १० अपोलो : चन्दा के देश में धरती से 'हल्का' चन्द्रमा पृथ्वी से भी हल्का है । यदि एकसमान आयतन की चाँद की और पृथ्वी की चट्टानें लें तो चांद की चट्टान समान आयतन के पानी से ३.३३ गुनी भारी होगी और धरती की ५:५२ गुनी । इससे पता चलता है कि चन्द्रमाके अंदरूनी भागों में निकिल और लोहे-जैसी भारी वस्तुएँ नहीं हैं। चाँद उन्हीं पदार्थों से बना है जिनसे पृथ्वी का ऊपरी धरातल । यह तो तुम्हें मालूम ही है कि चाँद पृथ्वी का सवसे पास का खगोलीय पिण्ड है, उससे केवल ३,४८,३१५ किलोमीटर दूर । पर यह दूरी घटती-बढ़ती रहती है, क्यों? क्योंकि चांद जिस कक्षा में एश्वी REP पृथ्वी से चन्द्रमा को अधिकतम व न्यूनतम दूरी पृथ्वी की परिक्रमा करता है वह वृत्ताकार नहीं, बल्कि दीर्घवृत्ता कार है । पृथ्वी से चांद की अधिकतम दूरी होती है ३,८६,६०५ अपोलो: चन्दा के देश में 19 किलोमीटर । चांद इतना पास होते हुए भो, पृथ्वी पर दो स्थानों के बीच की दूरी के हिसाब से बहुत दूर है। यदि तुम चांद तक कार में जा सकते तो ( पर यह असम्भव है, क्यों ? मैं आगे बताऊंगा) ६६ किलोमीटर प्रति घण्टे को रफ्तार से लगातार आगे बढते रहने पर भी तुम्हें वहां पहुंचने में ५ महीने २० दिन लगते। - हवा नहीं-पानी नहीं चांद तुम्हें बहुत खूबसूरत लगता है और तुम अनेक बार सोचते हो, 'कारा ! मैं परियों के देश'-चांद पर जा सकता! परन्तु यदि तुम चांद पर पहुँच जाओ तो ( वैसे मेरे वंशजों को मदद के बिना तुम वहां नहीं जा सकते) स्वर्ग-जैसा सुख पाना तो दूर रहा, वहाँ तुम क्षण-भर जिन्दा भी नहीं रह सकोगे। जीवित रहने के लिये जिस वस्तु की सबसे अधिक जरूरत होती है वह चांद पर बिल्कुल भी नहीं है । तुम जानते हो ऐसी वस्तु है- ऑक्सीजन । चांद पर ऑक्सीजन नाममात्र को भी नहीं है । वहां कोई भी गैस नहीं है। तुम जैसे कुछ तेज बच्चे कह सकते हैं, यदि हम पर्वतारोहियों की भांति चाँद पर अपनी हवा भी ले जायें तब ? तब भी तुम वहाँ अधिक समय तक नहीं रह पाओगे क्योंकि हवा के बाद मनुष्य के लिए सबसे जरूरी वस्तु है पानी । चांद पर पानी भी नहीं है । जब वहां न तो हवा है और न पानी, तो पेड़-पौधों और जोवों के पैदा होने की बात हो नहीं उठती । इस प्रकार तुम्हारे प्यारे चंदा मामा के देश में परियाँ तो क्या, घास, काई और कीड़े जैसे छोटे प्राणी भी नहीं हैं।

१२ अपोलो : चन्दा के देश में चाँद पर आदमी उड़ेगा' जानते हो चाँद पर हवा न होने का क्या कारण है ? आज से लगभग ५ अरव वर्ष पहले जव चाँद 'वना' था उस पर वायुमंडल था। पर चाँद एक बहुत छोटा खगोलीय पिण्ड है । छोटा है इस- लिये उसका गुरुत्वाकर्षण बल (वह वल जिससे एक वस्तु दूसरी को अपनी ओर आकर्षित करती है ) भी बहुत कम है। चाँद के धूमने से हवा दूर छिटकती गई और उसका गुरुत्वाकर्षण बल उसे पकड़कर नहीं रख सका । उस पर विल्कुल हवा नहीं बची। चांद का गुरुत्वाकर्षण वल पृथ्वी की तुलना में केवल छटा भाग है । तुम जितना वजन पृथ्वी पर उठा सकते हो, चाँद पर उससे ६ गुना वजन उठा लोगे। वहाँ वस्तुओं का वजन पृथ्वी की S PICHR - पांद पर आदमी फा वजन कम हो जाता है और वह अधिक ऊँचा उयल सकता है।

अपोलो : चन्दा के देश में तुलना में केवल १/६ भाग ही रह जाता । ३० किलोग्राम का वजनो बच्चा वहाँ केवल ५ किलोग्राम का हो रह जायेगा। यदि तुम धरती पर १ मीटर ऊंचा कूद सकते हो तो वहां ६ मोटर ऊंचा कूद सकोगे । जब आदमो चांद पर (शायद सन् २,००० के बाद) शहर बनाकर रहने लगेगा, उस समय वह पंखों से जरा-सी शक्ति लगाकर उड़ सकेगा । आदमी वहाँ उड़ेंगे अधिक, चलेंगे कम । अत: तुम्हारे उड़ने का स्वप्न पूरा हो सकेगा। वायुमंडल न होने से चांद को कई हानियां हैं । वहां निरन्तर उल्काएं बरसती रहती हैं उल्काएं अंतरिक्ष से आने वाली छोटी- बड़ी चट्टानों को कहते है। ये गिरती तो धरती पर भी हैं पर हवा में बहुत वेग से गुजरने के कारण गर्म होकर जल जाती हैं। कभी-कभी ही तुम्हारी धरती पर कोई उल्का बिना पूरी तरह जले गिरती है। इन उल्काओं ने चांद के सुन्दर चेहरे पर गड्ढे कर दिये हैं । वायुमण्डल उल्काओं से ही पृथ्वी की रक्षा नहीं करता बल्कि सूर्य के प्रकाश की हानिकर किरणों व करणों को भी रोकता है । हवा धरती के विभिन्न स्थानो के तापो के फर्क को कम करने का यत्न करती है । चांद पर मूर्य के प्रकाश की हानि- कारी किरणें और कण पड़ते रहते हैं। वहां धूप और छाया के तापों में बहुत अंतर होता है। दिन और रात के तापों में भी बहुत फर्क होता है । दिन में ताप पानी के खोलने के ताप से भो २०० सें ऊपर अर्थात् १२०° सें० हो जाता है, पर रात में वह पानी के जमने के ताप से ८०° सें० (-८०°) कम हो जाता है। चांद पर हवा और पानी के न होने से वहां की चट्टानें लगभग वैसी ही हैं जैसी उस समय थीं जब आज से ५ अरव वर्ष पहले चांद बना था। उनमे जो भी टूट-फूट हुई वह मुख्य रूप से दो ही कारणों से हुई। धरातल के नीचे से लावा निकलने से या १४ अपोलो : चन्दा के देश में तूफान, वर्षा, उल्काओं के गिरने से। धरती की चट्टानें, आँधी, पानी और कुहरे के कारण हमेशा ही टूटती-फूटती रहती हैं । दिन और महीना वरावर यह तो तुम्हें मालूम है कि चाँद पृथ्वी के इर्द-गिर्द परिक्रमा करता है। परिक्रमा करने की गति लगभग १ किलोमीटर प्रति सैकिंड होती है । जब वह पृथ्वी के निकट होता है तो तेज चलता है । परिक्रमा करने में उसे २७ दिन ७ घण्टे ४५ मिनिट लगते हैं । पर पृथ्वी स्वयं भी तो सूर्य की परिकमा करती है इसलिए जब तक चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करता है, पृथ्वी अपनी स्थिति बदल चुकी होती है। इसलिए चाँद का महीना २७ दिन ७ घण्टे का न होकर २६ दिन १२ घण्टे का होता है। चांद पृथ्वी की भांति अपनी धुरी पर भी धूमता है और उसे एक बार घूमने में २७ दिन ७ घण्टे ४५ मिनिट लगते हैं-उतना ही समय जितना पृथ्वी की एक परिक्रमा करने में । इसलिए परिक्रमा करते समय उसका सदैव एक ही हिस्सा पृथ्वी की ओर रहता है। वह पृथ्वी की परिक्रमा ऐसे करता है जैसे कोई बच्चा एक गोल मेज के इर्द-गिर्द इस प्रकार घूमे कि मेज की ओर हमेशा उसका मुंह ही रहे । इसलिए तुम्हें चाँद का केवल एक ही हिस्सा दिखाई देता है । उसके दूसरे भाग के चित्र सबसे पहले रूसी चन्द्रयान ल्यूनिक-३ ने सन् १६५६ में लिये थे। आदमियों ने सबसे पहले उस भाग को मेरे ही कुटुम्ब के एक सदस्य अपोलो-८ में बैठ- कर दिसम्बर, १९६८ में देखा था। चाँद की धुरी का झुकाव ७° है इसलिए तुम्हें चाँद का कुछ ऐसा भाग भी दिखाई दे जाता है जो यदि धुरी विलकुल ऊर्ध्वाधर होती तो न दिखता। तुम्हें केवल चाँद का ६० प्रतिशत भाग दिखाई देता है।

अपोलो: चन्दा के देश में पहाड़, खाई और विवर जैसा कि मैं ऊपर बता चुका हूँ, चाँद सपाट नहीं है, उस पर पहाड़ है, खाइयां हैं, ज्वालामुखी के विवर हैं और धूल से भरे, बिना पानी के सागर हैं । ये पहाड़ काफी ऊँचे हैं और 'सागरों' के तट पर स्थित हैं। इनमें से कुछ चोटियों की ऊंचाई ४,५०० मोटर से अधिक है । सबसे ऊंचा पर्वत है लिनट्ज ६,००० मीटर ऊँचा। यह दक्षिणी ध्रुव के पास चांद के उस भाग के बिल्कुल किनारे पर है जो तुम्हें दिखाई देता है। चांद के पहाड़ों और चोटियों के नाम वही हैं जो धरती के पहाड़ों के। उदाहरण के तौर पर आल्पस, कार्पोथियन्स, पिरीनीज आदि। चाँद पर जो बनावटें सबसे अधिक पायी जाती हैं, ये हैं 'ऊंची दीवारों से घिरे गोलाकार नीचे मैदान ।' ज्वालामुखी के विवर जैसी दिखने वाली इन बनावटों की संख्या तीस हजार से भी अधिक है। इनमें से कुछ छोटे-छोटे गढ्ढे हैं और कुछ बड़े विवरों के बीच में पर्वत भी हैं । बड़े विवरों को सिरक्यू' कहते हैं उनकी संख्या दक्षिण में सबसे अधिक है । यहाँ ही क्लेवियस सिरक्यू, जिसका व्यास लग- भग २२५ किलोमीटर है और बाहरी दीवारों की ऊंचाई है ३००० मीटर । टायको सिरक्यू का व्यास ८७ किलोमीटर है । इसमें बीच में पहाड़ हैं पर इसका मैदानी भाग बहुत नीचा (गहरा) है । वे इतने बड़े विवर बने कैसे ? कुछ वैज्ञानिक कहते हैं- उल्काओं के गिरने से । पर अधिकांश वैज्ञानिक इससे सहमत नहीं हैं । वे कहते हैं कि चांद की धरती के नीचे से मैग्मा (जव लावा सतह के नीचे रहता है तो मैग्मा कहलाता है) के जोरों से निकलने के फलस्वरूप इनका निर्माण हुआ। चांद पर आज से करोड़ों वर्ष पहले ज्वालामुखी थे और समझा जाता है कि ये अभी ।

१६ अपोलो: चन्दा के देश में तक सक्रिय हैं । १६५८ में, रूसी ज्योतिषशास्त्री एन. ए. कोजयरेफ ने अलफान्सस विवर में ज्वालामुखी की हलचल देखी थी अब जरा चांद के 'बिन पानी के सागरों और महासागरों को भी देखो । यद्यपि इनमें विवर, गढ्ढे और पहाड़ हैं पर मुख्य रूप से ये धूल के सागर हैं । पहले समझा जाता था कि इनमें धूल की गहराई बहुत अधिक है पर विभिन्न रेंजरों, सर्वेयरों और ल्यूना चंद्रयानों ( इन यानों के बारे में आगे बताऊंगा ) से जो सूचनाएँ मिली हैं उनके अनुसार सागरों में धूल की तह कुछ इंच ही मोटी है। सागरों में धूल के अलावा दरारें भी हैं । ये दरारें बहुत लम्बी, १५० किलोमीटर लम्बी हैं। समझा जाता है कि ये दरारें उस समय पड़ी होंगी जव चाँद पर रोज ही ज्वालामुखी फटते थे । चाँद के इन धूल के सागरों के नाम तुम्हें अच्छे लगेगें । जैसे 'शान्ति सागर' (सी आफ ट्रैक्वेलिटी), फुहार सागर (सी आफ शावर्स), वाष्प सागर (सी आफ वैपर्स), मेघ-सागर आदि। इनमें मुझे शान्ति सागर बहुत प्रिय है और मैं पहले-पहल उतरूंगा भी वहीं । सागरों में सबसे बड़ा है तूफान महासागर ( ओशन आफ स्टार्स | जिसका आकार तुम्हारे भूमध्यसागर से बड़ा है । इस महासागर में एक बहुत बड़ा विवर है अरीस्टारस। यह विवर है तुम्हें चांद पर सबसे अधिक चमकदार दिखायी देता है। चमकती धरती तुम्हें धरती से चांद ऊपर दिखाई देता है । वह बहुत सुन्दर चांदनी विखेरता है । पर मैं तुम्हें बताऊंगा कि चांद से अगर तुम धरती को देखो तो वह भी ऊपर दिखाई देगी और उसकी चांदनी बहुत तेज और प्यारी होगी। तुम्हें घरती से चाँद का एक ही हिस्सा दिखाई देता है इसलिए चांद पर से पृथ्वी भी

अपोलो : चन्दा के देश में
स्थिर' नजर आयेगी। हां वह चांद की तरह घटेगी-बढ़ेगी जरूर
और उसके भी कृष्ण और शुक्ल पक्ष होंगे।
चांद से सूर्य और तारे भी दिखाई देते हैं पर सूर्य और तारे
एक साथ ही आकाश में चमकते हुए। तारे वहां टिमटिमाते नही
दिखते-वे तो साफ चमकते हैं । न वहाँ संध्या होती है, न सुबह ।
वहां घुप्प अंधेरे के बाद एकदम चमकता हुआ सूर्य ही नजर
आता है । यह सब हवा न होने के कारण होता है।
चाँद की कलाएं
यह तो तुम जानते ही हो कि चांद में अपना प्रकाश नहीं
FLLI MOON
সুলিন
NEW MOON
अमावस
चांद की कल

१८ अपोलो: चन्दा के देश : , है। सौर मंडल में प्रकाश उत्पन्न करने की क्षमता केवल सूर्य है । चाँद सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है । वायुमंडल के होने तथा अन्य कुछ कारणों से वह उस प्रकाश का, जो उसे प्राप्त होता है, केवल ७ प्रतिशत भाग ही परावर्तित करता है सूर्य चाँद की तुलना में ४,६५,००० गुना अधिक प्रकाशवान है । पूर्णिमा की रात में चाँद उतना ही प्रकाशवान दिखाई देता है जितना २० मीटर पर जलता हुआ १०० कैंडल पावर का बल्व । चांद की तुलना में धरती ३६ प्रतिशत प्रकाश परावर्तित करती है । इसलिए चांद से पृथ्वी अधिक चमकदार नजर आती है । सूर्य से प्रकाश परावर्तित करने के तथा उसके सदैव एक ही भाग के पृथ्वी की ओर रहने के कारण पृथ्वी की परिक्रमा करते समय चाँद तुम्हें 'घटता-बढ़ता' नजर आता है। दूसरे शब्दों में, तुम्हें उसकी कलाएँ दिखती हैं। जब चाँद का दृश्य भाग (वह भाग जो तुम्हें दिखायी देता है) सूर्य की ओर नहीं होता-उस पर सूर्य -उस पर सूर्य का प्रकाश नहीं पड़ता- तो तुम अमावस्या मानते हो । उस रात चांद तुम्हें दिखायी नहीं देता । जव परिक्रमा करते-करते वह उस स्थिति में आ जाता है जहां उसका दृश्य भाग पूरी तरह सूर्य के सामने आ जाये उस समय तुम्हारी पूर्णिमा हो जाती है। एक स्थिति से दूसरी में ने में चाँद को लगभग १५ दिन लगते हैं। अमावस्या और णिमा के बीच चांद का दृश्य भाग अधिकाधिक प्रकाश में आता इता है । इसलिए तुम्हें रोज, रात को चांद 'बढ़ता' हुआ नजर ता है । पूर्णिमा और अमावस्या के बीच इससे उल्टा होता है लिए चाँद 'घटता' जाता है । यहाँ एक बात तुम्हें बताएं कि चाँद नए पूर्णिमा में सही अवसर नहीं है। उस समय चांद के अध्ययन ।

अपोलो: चन्दा के देश में १६ पहाड़ों आदि की छाया बहुत छोटी दिखाई देती है। इसलिये न तो उनकी ऊंचाई का ही सही अंदाजा लगाया जा सकता है और न ही गड्ढों की गहराई का। चांद के अध्ययन के लिये तो अर्द्ध-चन्द्र ही सर्वोत्तम होता है। तुम्हें मालूम है कि पृथ्वी और सूर्य के बीच में चांद के आ जाने से सूर्य ग्रहण पड़ता है और पृथ्वी के सूर्य और चांद के बीच आ जाने से चन्द्र-ग्रहण। सूर्य-ग्रहण सदैव अमावस्या को पड़ता है और चन्द्र-ग्रहण पूर्णिमा को । थल से प्यारा जल तुम में से कुछ बच्चे समुद्र के किनारे रहते हैं। मालूम है कि दिन में कुछ समय के लिए समुद्र की लहरें काफी ऊँची हो जाती हैं और किनारो पर काफी अन्दर तक पानी चला जाता है। दिन में एक ऐसा समय भी आता है जब समुद्र बहुत शांत हो जाता है और उसका पानी किनारों से कुछ दूर चला जाता है। समुद्री पानी के इस चढ़ाव-उतार को ज्वार- भाटा कहते है। ज्वार-भाटे प्रतिदिन आते हैं। पर पूर्णिमा या अमावस्या को तो देखते ही बनते हैं। उस रात तो पानी में इतनी ऊंची लहरें उठती है कि मानो वे चांद को छू लेना चाहती हों। तो क्या चांद लहरों को अपने पास बुलाता है ? हां ! कुछ अर्थो में यह बात सही है । समुद्रों में ज्वार चांद के गुरुत्वाकर्षण बन के कारण आते हैं । यह ठीक है कि सूर्य के गुरुत्वाकर्षण का प्रकार भी समुद्र पर पड़ता है। पर, सूर्य के बहुत दूर होने के कारण चांद की तुलना में बहुत कन। चांद के गुरुत्वाकर्पर काम थल पर भी पड़ता है । परन्तु पत्ल को यह जानकारी २० अपोलो : चन्दा के देश में नहीं कर पाता क्योंकि थल के ठोस पदार्थों के करण बहुत पास- पास होते हैं और उनमें पारस्परिक आकर्षण काफी होता है। पानी के कणों में पारस्परिक आकर्षण अपेक्षाकृत कम होता है इसलिए वह चांद द्वारा आसानी से आकर्षित हो जाता है। वह ऊपर की ओर ( चाँद की ओर ) जाना चाहता है। उसमें ऊंची लहरें उठती हैं। परन्तु बताओ पृथ्वी अपने जल को कैसे भागने दे सकती है ? पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण लहरें फिर धरती पर आ गिरती हैं। चन्द्रमा तुम्हारे 'समुद्रों को अपने पास बुलाता है' पर पृथ्वी ने तो उसके थल को ही अपनी ओर खींच लिया। चाँद के धरातल की विकृतियों का एक कारण पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल भी है। प्रत्येक समुद्र में एक-सी ऊंची लहरें नहीं उठतीं। कहीं कहीं तो वे २० मीटर तक ऊंची उठ जाती हैं और कहीं केवल कुछ सेन्टीमीटर ही ऊंची उठ पाती हैं। कनाडा की फंडी की खाड़ी अपने ऊँचे-ऊँचे ज्वारों के लिए जग प्रसिद्ध है। चाँद कैसे बना अव मैं तुम्हें सुनाऊँ चांद के बनने की कहानी । कहा जाता है, आज से बहुत-बहुत पहले, ५ अरव साल से भी पहले, एक बहुत बड़ा तारा सूर्य के पास से गुजरा था, जिससे सूर्य में बहुत बड़ा विस्फोट हुमा और उसके कई टुकड़े हो गये थे। ये टुकड़े सूर्य से बहुत दूर नहीं जा सके । सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसके इर्द-गिर्द परिक्रमा करने लगे और ग्रह बन गये। कहा जाता है कि पृथ्वी भी ऐसे ही वनी है। कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि बड़े तारे के निकलने से सूर्य लो: चन्दा के देश में में टूटा था, बल्कि उसका जुड़वां तारा टूटा था। जब पृथ्वी बनी तो वह कुछ बेडौल थी। वह न तो अपनी धुरी र ठीक भांति घूम पाती थी और न ही उचित प्रकार से परिक्रमा कर पाती थी। इसलिए पृथ्वी में एक दिन बड़ी गड़बड़ी' मची और उसका एक भाग टूटकर उससे अलग हो गया। पृथ्वी ने इसे अधिक दूर न जाने दिया। यह भाग था तुम्हारा चंदा मामा। वह पृथ्वी का उपग्रह बनकर उसकी परिक्रमा करते लगा। वह भाग जहां से टूटकर अलग हुआ था, आज का प्रशांत महासागर बताया जाता है । इसीलिए कुछ लोग कहते हैं 'चांद पृथ्वी के कोख से पैदा हुआ है धरती का वेटा नहीं, माई अब ज्यादातर लोग ऊपर बतायी गयी बात नहीं मानते। वे कहते हैं कि पृथ्वी कभी सूर्य का हिस्सा थी ही नही और न चांद पृथ्वी का। पृथ्वी और चांद पहले ( ५ अरब वर्ष से पहले) बादलों के रूप में सूर्य को परिक्रमा करते थे। फिर धीरे-धीरे ठोस होते गये और कठोर बन गये। इस सिद्धांत को मानने वाले व्यक्ति चांद को पृथ्वी का उप- ग्रह मानते ही नहीं। उनके अनुसार, पृथ्वी के उपग्रह के रूप में चांद बहुत बड़ा है । अन्य ग्रहों के उपग्रह यद्यपि चांद से बहुत बड़े हैं पर अपने ग्रहों से तुलना में बहुत छोटे हैं । शनि के सबसे बड़े उपग्रह, टाइटन का व्यास शनि की तुलना में केवल ३ है और संहति जवकि चांद का व्यास पृथ्वी का है और संहति । वैज्ञानिक आज चांद और पृथ्वी को एक द्वि-ग्रह-व्यवर मानते हैं । इसे समझने के लिए तुम एक बहुत बड़ा र २२ अपोलो : चन्दा के देश में ? जिसका एक गोला दूसरे से ८१ गुना भारी हो। इसमें बड़ा गोला पृथ्वी होगा और छोटा चन्द्रमा । इन गोलों के बीच का कल्पित दंड गुरुत्वाकर्षण बल है। दोनों गोलों का गुरुत्व-केन्द्र एक ही होगा । इस केन्द्र को 'वेरी-सेण्टर' कहते हैं और यह पृथ्वी में ही स्थित है । पर पृथ्वी के केन्द्र से काफी दूर है । एक विचित्र वात और बताऊँ ? तुम्हारा प्यारा मामा तुमसे रूठता जा रहा है। वह पृथ्वी से धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। पर इतने धीरे-धीरे कि लाखों वर्ष में एक किलोमीटर ही दूर जा पाता है । इस प्रकार वह एक हद तक दूर होता जायेगा। फिर एक दिन ऐसा भी आयेगा कि वह तेजी से पृथ्वी के नजदीक आता जायेगा और इतने नजदीक आ जायेगा कि पृथ्वी के गुरु- त्वाकर्षण बल के कारण टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा। तब ये टुकड़े पृथ्वी के इर्द-गिर्द उसी प्रकार घूमने लगेंगे जैसे आज शनि के इर्द-गिर्द उसका वलय घूमता है। पर तुम्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं । तुम्हारा चंदा मामा जल्दी टूटने वाला नहीं है। ऐसा होने में करोड़ों वल्कि अरबों वर्ष लगेंगे और यह भी शक कि उस समय तक मनुष्य रहेगा भी या नहीं।

+३. चाँद पर जाने वाले पक्षी तुममें से जो बच्चे कठिन परीक्षा में भी अच्छे नंबरों से उत्तीण हो जाते हैं उन्हें अपने ऊपर कुछ गर्व होता है । स्वाभिमान होना बुरी बात नहीं है, घमंड में चूर हो जाने का फल बुरा होता है । आज मुझे भी गर्व है कि चांद पर मनुष्य को सबसे पहले मैं ही पहुँचाऊँगा। पर मुझे इसका घमंड नहीं। मुझे याद है कि मुझे बनाने से पहले आदमी ने चांद पर पहुँचने के लिये क्या-क्या प्रयत्न किये। इन प्रयत्नों के किस्से बड़े रोचक हैं और तुम्हें उन्हें सुनाने का लालच रोक नही पा रहा है। तुमने रामायण पढ़ी है। उसमें तुमने दो भाइयों की कथा जरूर पढ़ी होगी। ये भाई थे दो पक्षी सम्पाति और जटायु । दोनों सूर्य के पास जाना चाहते थे। सम्पानि सूर्य के अधिक निकट पहुँच गया। उसके पंख सूर्य की गर्मी से जल गये और वह समुद्र के तट पर जा गिरा । जटायु तो पहले ही धरती पर लौट आया था। इसी तरह की एक कथा प्राचीन यूनान की है- बादशाह मिनास के जमाने की। मिनास ने अपने एक कारीगर, दिदालस, से एक भूल-भुलैयां बनवाई थी। एक बार किसी बात पर नाराज होकर मिनास ने दिदालस और उसके पुत्र इकारस को उसी भूल-भुलैयां में बंद कर दिया । इसमें से बाहर निकलने का रास्ता दिदालस को मालूम ही नहीं था। वह बहुत सोच में पड़ गया। अंत मे उसने दो जोड़ो पंख तैयार किये-एक जोड़ी अपने लिये और एक जोड़ी अपने बेटे के लिए। दोनों ने मोम लगाकर पंख अपने शरीर से चिपका लिये और क्रीत से बाहर उड़ चले । पंख लगाने से इकारस को घमंड आ गया। वह ऊपर उड़ता हो गया। २३ २४ अपोलो : चन्दा के देश में सूर्य की गर्मी से मोम पिघल गया और उसके पंख गिर गये । वह समुद्र में गिरा और डूबकर मर गया। इकारस की कहानी पर सामोस के लूसियन ने एक कथा गढ़ डाली। इस कथा में नायक शरीर में पंख वाँधकर उड़ा और सीधा चांद पर ही जाकर रुका। उसके पंख सूर्य की गर्मी से नहीं जले । लूसियन ने अंतरिक्ष के बारे में एक और भी कहानी गढ़ी है जिसका नायक पानी की टोंटी से निकलती हुई तेज धारा के सहारे चाँद तक पहुँच जाता है। ये कहानी ईसा से लगभग १८०० वर्ष पहले की है। इन कहानियों को पढ़कर तुम्हें बहुत हंसी आयेगी क्योंकि इस प्रकार आदमी कभी भी चांद पर नहीं पहुंच सकता। पर मुझे यह कहानी अच्छी लगती है । इनसे यह मालूम होता है कि आदमी बहुत प्राचीन काल से ही चांद पर पहुँचने के प्रयत्न करता रहा और अपने विकास के स्तर के अनुसार उसने कल्पनाएं कीं। - मुझे याद है योहान्स केपलर का एक मनोरंजक उपन्यास म्नियम' । तुम पिछले अध्याय में गैलीलियो के बारे में पढ़ चुके हो । इनकी मृत्यु के २५ वर्ष वाद यह उपन्यास लिखा गया था । केपलर वैज्ञानिक थे। उन्होंने यह मालूम किया था कि ग्रह सूर्य की परिक्रमा किस प्रकार करते हैं । उन्हें यह भी मालूम था कि चांद पृथ्वी से कई लाख किलोमीटर दूर है। इस बीच में हवा नहीं है और जब हवा नहीं तो बताओ पंख लगाकर कोई कैसे उड़ सकता हैं । सवसे बड़ी बात यह है कि वह साँस कैसे लेगा? इस लिये उन्होंने सोचा। उन्होंने अपने नायक को चाँद पर दैवी शो केपलर की: के इंग्लैंड के पादरी (विशप) " --

अपोलो: चन्दा के देश में
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अगर तुम पढ़ो तो तुम्हें अच्छी लगी जहरीमान
रखा था 'चन्द्रमा में मनुष्य' । इस पहल का
खटोले में बैठ जाता है और चार हंस के सामान
जाते हैं। तुम कहोगे कि भला हंस रहकर
सकते हैं । विना हवा के वे उड़ नहीं सकते।
कल्पना है । पर गॉडविन ने एक वात विल्कुल शकि
बताया कि धरती से ऊपर जाने पर आदमी का
जाता है।
मुझे एक कहानी जो बहुत अच्छी लगती है वह कहा,
शताब्दी में सिरानो द बर्जेराक ने लिखी यो सिरानोद दगा
फ्रांस के रहने वाले थे । उनको नाक बहुत लम्बी पी ! तुम कर
उस जमाने में होते तो शायद उन्हें 'लम्बोदर' कहकर चिढ़ाने पर
बर्जेराक बड़े अच्छे द्वन्द्व योद्धा भी थे। यह बात सबको मान्न
थी। पर एक बात लोगों को नहीं मालूम थी कि वे अच्छी कहानी
भी लिखते थे। उन्होंने 'चांद और सूरज को यात्रा' नामक कहानी
लिखी। इसमें पहली बार अंतरिक्ष में जाने के लिए रारेट का
इस्तेमाल किया था।
उन्नीसवीं सदी के शुरू तक लोगों को आकार के बारे में
बहुत-सी बातें मालूम हो गई थी। न्यूटन का नाम तुम ममी
तरह जानते हो । सेव के गिरने से उन्होंने गुरुत्वाकर्षण बल का
पता लगाया था। इन्ही न्यूटन ने गति के नियम मी म्होने देर
आकाश के बारे में बहुत-सी नई बातें बताई यो । अब लोगों की
यह मालूम हो चुका था कि हवा पृथ्वी से कुछ भी नीरा
तक हो है । उसके आगे शून्य है।
तुम सोच सकते हो कि इन हालतों में किसी भी बादली की
गप्पें कैसे अच्छी लगती; पर उन्हें कहानी यवश्य चाहिये थी।

२६ अपोलो: चन्दा के देश में में इसलिए १८६५ में जूल वर्न ने 'पृथ्वी से चाँद तक' नाम से जो अपनी पुस्तक लिखी वह ठोस वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित थी। उसमें दैवी चमत्कार नहीं था। पुस्तक लिखने से पहले अपने एक रिश्तेदार से, जो विज्ञान शिक्षक था, उन्होंने बहुत कुछ हिसाब लगाने के लिए कहा। उसने जो हिसाव लगाये उनके आधार पर उसने पुस्तक लिखी। जूल वर्न की इस पुस्तक एक बहुत बड़ी तोप में से एक ट्रेन दादी जाती है । तोप में से निकलते ही ट्रेन का राकेट चालू हो जाता है और वह बहुत तेज गति से, ४०,००० किलोमीटर प्रति घण्टे, अपने यात्रियों सहित चाँद की ओर बढ़ता है । मार्ग सही रखने के लिए यह वीच-बीच में राकेट छोड़ते जाते हैं। इसमें वठकर नायक चन्द्रमा का चक्कर काटकर धरती पर वापिस आ जाता है । वह चन्द्रमा पर उतरता नहीं। यह पुस्तक इतनी मजेदार है कि वहुत-से लोग इसे विलकुल सच्ची घटना समझने । लगे। कुछ लोग तो वर्न की ट्रेन में यात्रा करने के लिए उतावले हो गये। अगर तुम किताबों को पढ़ो तो तुम्हें इसमें बहुत-सी बातें गलत लगेंगी। पर इसमें सबसे सही बात यह है कि धरती के गुरुत्वाकर्षण बल से छुटकारा पाने के लिए किसी भी चीज को २५,००० मील (४०,००० किलोमीटर ) प्रति घन्टे की गति से ऊपर उठना पड़ेगा। दूसरा सही अंदाज यह है कि अंतरिक्ष में दिशा बदलने अथवा अपनी गति को कम या अधिक करने के लिए यान को राकेट ही छोड़ने पड़ेंगे। भाग्य की बात देखो । जूल वर्न की तोप जिस स्थान पर रखी थी लगभग उसी स्थान (केप कैनेडी) से मैं उड़ान भरता हूँ। अब जरा किताब की गलतियों पर ध्यान भी दें। तुम पढ़ चुके अपोलो: चन्दा के देश में २७ हो कि वायुमंडल में से बहुत वेग से गुजरने के कारण ही उल्काएँ जलकर राख हो जाती हैं । अब तुम कह सकते हो कि यदि तोप के मुंह में से ट्रेन ४०,००० किलोमीटर प्रति घण्टे की गति से बाहर निकलेगी तो बहुत अधिक गर्म होकर पिघल जायेगी। दूसरी बात यह कि तोप से जब यह इतनी गति से दागी जायेगी तव इसके अंदर बैठे आदमियों का क्या हाल होगा? उनके तो चिथड़े- चिथड़े ही उड़ जायेंगे। इनके बाद मुझे याद आती है इंग्लैंड के एच. जी. वेल्स के 'चन्द्रलोक में प्रथम मानव' नामक उपन्यास की। यह उन्होंने १६०१ में लिखा था। उन्हें मालूम था कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से छुटकारा पाये विना मनुष्य चांद पर नहीं जा सकता। इसलिए उन्होंने एक ऐसे लेप की कल्पना की जो गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत कार्य कर सकता था। इस विचित्र लेप को अपने गोले की अंदरूनी सतह पर चढ़ाकर यात्री पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल की पकड़ से बाहर निकलकर चांद पर जा पहुंचते हैं। कहानियों इसके बाद भी लिखी गई और आज भी लिखी जा रही हैं । आज अंतरिक्ष की कहानी लिखने वालों में आर्थर सी. क्लाक, इजाक एसीमोर और रे रोडवरी विशेष उल्लेखनीय हैं। तुम में से कुछ बच्चे यह पूछ सकते हैं कि इन कहानियों से वैज्ञानिकों को क्या फायदा हुआ? इनसे वैज्ञानिकों को जो सबसे बड़ी चीज मिली वह है चन्द्र-यात्रा की प्रेरणा। कहते है रावर्ट गोडर्ड ( इनके बारे में मैं तुम्हें अगले अध्याय में बताऊँगा ) को बचपन में जूल वनं की पुस्तकें पढ़ने का शौक था। उन्हें पढकर ही उन्हें राकेट बनाने की प्रेरणा मिली । कहते हैं कि अगर ये किताबें न होती तो शायद मनुप्य अंतरिक्ष यात्रा का विचार ही - न करता।

४. राकेट के बिना चारा नहीं पिछले अध्याय में मैंने तुम्हें चांद यात्रा की कहानियां सुनाई। एक ओर कहानीकार कहानी लिख रहे थे तो दूसरी ओर वैज्ञानिक अपने प्रयोगों में लगे थे। फ्रांस के दो साहसी युवको ने, जो पिलो द रोजिये और द आर्लेन्द ने, २१ नवम्बर, १६८३ को गुब्बारे द्वारा पैरिस के ऊपर साढ़े पांच मील (६ किलो मीटर ) की यात्रा की। बाद में अन्य देशों के साहसी युवक भी गुब्बारे बनाकर उनमें यात्रा करने लगे। इन गुब्बारों में बैठ- कर लोग काफी ऊंचे उड़े भी; पर वे ३०-३१ किलोमीटर से ऊपर नहीं जा सके । इसके ऊपर गुब्बारों में नहीं जाया जा सकता। क्यों ? जैसे-जैसे हम ऊपर जाते है, वायु का दबाव कम होता जाता है । लगभग ५ किलोमीटर की ऊँचाई पर वायु का दाब भूमितल पर पाये जाने वाले दाब से आधा रह जाता है । ८ किलोमीटर तक पहुँचते-पहुँचते दाब घटकर बहुत कम रह जाता है । ३०-३१ किलोमीटर ऊँचाई पर तो वायु इतनी होती ही नहीं कि वह गुब्बारे को और ऊपर उड़ा सकें। जब गुब्बारों की बात चली है तो तुम्हें 'एयर शिप' की बात भी सुनाईं। पहले गुब्बारे रवर के बने होते थे। उनमें हाइ- ड्रोजन जैसी हल्की गैस भरी जाती थी। रवर में से गैस जल्दी रिस जाती थी। इसलिये धातु के गुब्बारे बनाकर उसमें गैस भरी गई । ये धातु के गुब्बारे हवा में ऐसे तिरते थे जैसे पानी में जहाज । इसलिये इनका नाम पड़ा 'हवा का जहाज' ( एयर शिप) । तुम जानते हो, हाइड्रोजन जलने वाली गैस है इसलिये एयर शिपों में आग लगने का बहुत डर रहता है। इस डर की वजह से कुछ लोग उड़ने वाला इंजन बनाने का । २८

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अपोल : चन्दा के देश में . तुमने जिन अग्निबाणों का जिक्र पढ़ा है, वे राकेट के रूप थे। उसके बाद भी भारत में इन बारणों का उपयोग होता रहा है; पर उसकी कहानी मुझे मालूम नहीं है। वैसे प्राचीन यूनानियों भी लड़ाई में राकेटों का उपयोग किया था। मुझे चीनियों द्वारा राकेट के उपयोग की बात याद है। सन् १२३२ में तातारों ( मंगोलिया निवासियों) ने चीन के ऊपर हमला किया था। उनके आक्रमण को रोकने के लिए चीनी सैनिकों ने वारूद से भरे अग्निबाणों ( राकेटों) का उपयोग किया था। उनके राकेट बेलन के आकार के होते थे और उनके मोटे भागों में गनपाउडर भरा रहता था। दागने के लिए इन्हें लकड़ी की एक लम्बी नली में रख देते थे। इनकी पूंछ के पलीते को जलाने पर आग गन- पाउडर में पहुँच जाती। गनपाउडर जलती तो उससे गैसें पैदा होती। वे पीछे की ओर से जव तेजी से निकलती तब राकेट तेजी से सामने भागता । मैंने सुना है कि इन जलते राकेटों ने तातारों के छक्के छुड़ा दिये थे। राकेट चीन से फिर भारत आ पहुँचा । हैदरअली और टीपू के नाम तुमने सुने हैं । मैसूर के इन पराक्रमी राजाओं ने राकेटों का उपयोग करके अंग्रेजों की सेना के पाँव उखाड़ दिये थे । सन् १८०५ में ईस्ट इन्डिया कम्पनी ललचायी नजर से हैदरअली के राज्य, मैसूर को देख रही थी। उसने मैसूर राज्य हड़पने के लिए सेना भेजी। कम्पनी की सेना घमण्ड में उसने समझा कि वह हैदरअली को आसानी से हरा देगी । पर हैदरअली के राकेटों ने कम्पनी की फौज में खलबली पैदा कर दी। हैदरअली के राकेट लोहे की चौड़ी नली के बने थे। यह नली सामने से बन्द होती थी और इसमें वारुद भरी रहती थी। बारूद सहित नली का भार लगभग ५ किलोग्राम होता था। ये घर थी

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अपोलो: चन्दा के देश में . - पहला अंतरिक्ष राकेट अब तक तुमने राकेट के युद्ध-अस्त्रों के बारे में पढ़ा। तुम पूछ सकते हो कि अंतरिक्ष में जाने के लिए राकेट का इस्तेमाल पहले-पहल किसने किया। मैंने सुना है कि चीन में सबसे पहले ऐसा प्रयोग किया गया था। सत्रहवीं शताब्दी में वहाँ एक वैज्ञानिक रहता था वानहू। उसने अंतरिक्ष में जाने के लिए पतंगनुमा दो ढांचे तैयार किये। उन्हें आपस में जोड़कर उनके बीच बैठने की जगह बनायी, फिर पिछले भाग में फिट किये। तब वह स्वयं उस 'यान' पर अंतरिक्ष की सैर करने के लिए बैठा। उसने अपने सहायकों से कहा : एकसाथ सब दाद दो। उन्होंने ऐसा ही किया। भला बताओ, उससे वानहू कितना ऊपर गया और कसे वापिस आया ? वह ऊपर तो गया पर जिन्दा नहीं और धरती पर उसके शरीर की राख ही लौटकर आयो। राकेटों के दागते ही बड़ी तेज आग की लपटें निकली जिन्होंने वानहू को भस्म कर दिया। तीन अध्यापक जहां बच्चों की चर्चा होगी वहाँ अध्यापकों का भी जिक्र आना जरूरी है । जब मैं बच्चों को अपनी कहानी सुना रहा हूँ तो अध्यापकों की चर्चा करना भी आवश्यक है । दरअसल राकेट की कहानी तीन अध्यापकों के बिना अधूरी है क्योंकि आज हम अनंत अंतरिक्ष में जिन राकेटों को जाते देखते हैं उन्हें विकसित करने का श्रेय इन तीनों अध्यापकों को ही है। इनमें एक था रूसी, एक अमरीकी और एक जर्मन । वैसे अध्यापक होते हुए भी इन्होंने कभी बच्चों के कान नहीं खींचे। ये बच्चों को बहुत प्यार करते थे, विशेषरूप से जिज्ञासु बच्चों को।

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अपोलो : चन्दा के देश में
कि प्रयोगों के लिए उसे समय कम मिलता है इसलिये वह रात को
तो देर तक प्रयोग करता ही, सुबह भी बहुत जल्दी उठने लगा
क्योंकि वह दिन में बच्चों की पढ़ाई में कमी नहीं करना चाहता
था। प्रयोग करते समय वह इतना मस्त हो जाता कि एक बार
तेज आंधी का गति मालूम करते वह छत से गिर पड़ा था।
द्रव इधन वाले राकेट
सिओलकोव्स्की ने सुझाया कि राकेटों में अगर ठोस ईंधन
के स्थान पर द्रव ईंधन का उपयोग किया जाये तो वे अधिक
तेजी से और अधिक ऊँचाई तक उड़ सकेंग। हिसाव लगाकर
ईंधन जलने
ईंधन
आक्सीजन प्रदान
करने वाला स्थान
कास्थान
एक साधारण राकेट
उन्होंने सुझाया कि गन पाउडर के स्थान पर राकेट में द्रव
ऑक्सीजन और मिट्टी का तेल मिलाकर जलाये जायें तो राकेट की
गति बहुत बढ़ सकती है । साथ ही राकेट की गति को काबू में
भी रखा जा सकता है। उनका अनुमान था कि बहुत वेगवान
राकेटों में द्रव हाइड्रोजन का इस्तेमाल करना पड़ेगा। उन्होंने
यह पता लगा लिया था कि अंतरिक्ष में जाने के लिए कई खण्डों
का राकेट बनाना होगा। राकेट का निचला खंड जब पूरी गति
पर होगा तो ऊपर वाला राकेट (खंड ) जल उठेगा। यों छोड़े
जाने से ऊपरी खंड के राकेट की गति पहले खंड से बहुत तेज हो

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३६ अपोलो : गन्दा के देश में बनायेगा जिसे देखकर दुनियाँ दंग रह जायगी। अपने निश्चय को पूरा करने के लिए वह गरिणत और भौतिक शास्म का अध्ययन करने लग गया। क्लार्क विश्वविद्यालय में पढ़ने के दौरान उसने राकेट बनाने के प्रयोग किये और सिगोलकोरको की भांति यह पता लगा लिया कि द्रव हाइड्रोजन और प्रय ऑक्सीजन राकेट लिए सबसे अच्छे ईधन हैं। १६१२ में क्लार्क विश्वविद्यालय में ही शिक्षक बन जाने के बाद खाली समय में वे राकेट बनाने के बारे में पढ़ते और प्रयोग करते । १६२० में स्मिथसोनिन विश्वविद्यालय ने उन्हें प्रयोगों के लिए ५००० डालर दिये । अब तो ये राकेट बनाने में जीजान से लग गये और १६ मार्च, १६२६ को चाची इफी के खेत में पहला राकेट दागा । यह पहला राकेट था जिसमें द्रव धिन भरा गया था। वह ४१ फुट (१२.४ मीटर) ऊँचा उड़ा और ५६ मीटर दूर जाकर गिरा। पर इसे देखकर दुनिया दंग नहीं हुई। लोगों ने शिकायत की कि गोडर्ड के रावोट बहुत शोर करते हैं । साथ ही उनसे खेतों और जंगलों में आग लगने का खतरा है । अखबार पालों ने उनगी जी भरकर खिल्ली उड़ाई । १६२६ में नाची इफी के खेत में उनके एक राकेट से इतना शोर उत्पन्न हुआ कि पुलिरा गा गई । गुरुक • लोगों ने एम्बुलेंस और आग बुझाने वाले दस्तों को भी बुला लिया। अखबार वाले तो चिढ़े हुए थे हो। उन्होंने लिख दिया 'गोडर्ड का रायोट चन्द्रमा से फेवल २,३८,८६६३ गोल दूर रह गया' । इन शिकायतों से इन्हें अपने प्रयोग बन्द गार देने पड़े। अगर इनके प्रयोग हमेशा के लिए बंद हो जाते तो गादाचित मेरा जन्म भी न हो पाता । क्योंकि राकेट वैज्ञानिकों के अनुसार आज जो भी द्रव इंधन वाला राकेट उड़ता है वह गोर्ट के राबोट अपोलो: चन्दा के देश में । का सुधरा रूप है । कल चाल्त लिंडवर्ग को, जिन्होंने हवाई जहाज में प्रयम मंध महासागर पार किया था, गोडर्ड वहृत होन- हार मालूम दिया। उन्होंने अपने मित्र डेनियल गुगेनहोमसे गोडर्ड को ५०,००० डालर दिलवा दिये। गोडर्ड इससे एक बार फिर अपने प्रयोगों में लग गये। अब गोडई न्यू मेक्सिकोचले आये । न्यू मेक्सिको में रोजवैल के निकट एक जगह उन्होंने राकेट छोड़ने के लिए अधिक उपयुक्त पाई। यहां वे अपनी पत्नी और सहयोगियों के साथ बड़े-बड़े राकेट बनाने लगे। उड़ान के दौरान राकेट की दिशा सही रखने के लिए उन्होंने जिरोस्कोप का आविष्कार किया। राकेट को दागने के पहले वे उसके हर कल-पुर्जे की जांच करते थे। इसे वे 'काऊंट-डाउन' कहते इस काऊंट-डाउन के बारे में मैं तुम्हें आगे बताऊँगा क्योंकि मेरे अभिन्न सहयोगी, सटर्न-५ राकेट के काउंट डाउन में कई दिन लग जाते हैं )। मजेदार बात यह है कि राकेट बनाने के लिए वे और उनके सहयोगीकवाड़ियों की दुकानें छानते रहते और टूटी-फूटी घड़ियां, प्यानों के तार, मोटर के स्पार्क, प्लग-जैसी चीजें भी खरीद ले जाते। हर 'सफल' राकेट-वह जो उड़ान भर लेता--को ढूंड मचती और उसके टूटे-फूटे अंगों से नये राकेट बनाये जाते । वह दृश्य देखने लायक होताजव गोडर्ड अपने राकेटों को क दागने की जगह तक अपनी पुरानी कार से खींच लाते गोडर्ड ने बाद में जो राकेट बनाये वे लगभग जर्मनी वी-राकेट । जानते थे कि राकेटों को युद्ध. में इस्तेमाल किया जा सकता है । उन्होंने इस ओर सरकार का ध्यान भी दिलाया था। पर उसने परवाह १६४५ में उनकी मृत्यु हो गई। उसके बाद अमरीका का ३८ अपोलो : चन्दा के देश में ने १० लाख डालर देकर उनके सारे पेटेन्ट खरीद लिये और उनकी यादगार में उपग्रहों के डिजाइन तैयार करने के लिए बासिंगटन के निकट गोडर्ड अंतरिक्ष उड़ान केन्द्र स्थापित किया। ओवर्थ जर्मनी के रोमानिअन हरमन ओबर्थ भी शिक्षक थे। इन्होंने त्सिओलकोव्स्की की तरह बहुत-सी पुस्तकें नहीं लिखीं और न ही गोडर्ड की तरह राकेट बनाने के बहुत-से प्रयोग ही किये। ओवर्थ ने १९२३ में एक छोटी सी पुस्तक लिखी थी 'अंतरग्रहीय आकाश में राकेट' । इसमें ऊँची उड़ान वाले राकेटों के डिजाइन ही न थे वरन् कृत्रिम उपग्रह और अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की चर्चा भी थी। ओवर्थ ने साहसी युवकों को अंतरिक्ष यात्रा सोसायटियाँ बनाने की प्रेरणा दी। जगह-जगह अंतरिक्ष यात्रा सोसायटियाँ बनने लगीं। इनके सदस्य राकेट बनाने की चर्चा ही नहीं करते वरन् उन्हें बनाकर दागते भी थे। जर्मनी की अन्तरिक्ष यात्रा सोसायटी के प्रधान थे ओवर्थ । उनके राकेट बनाने की कहानी इतनी मजेदार है कि मैं तुम्हें सुनाये बिना नहीं रह सकता। ओवर्थ के एक मित्र, फ्रिट्ज लांग, 'चन्द्रमा पर लड़की' नाम की एक फिल्म बनाना चाहते थे। उस फिल्म के लिए उन्होंने ओवर्थ से एक राकेट बनाने के लिए कहा। राकेट तो पूरा बन नहीं पाया; पर फिल्म पूरी बन गई । इसी फिल्म के दौरान फ्रिट्ज लांग ने 'काऊन्ट डाउन' का आविष्कार किया था। जर्मनी की अन्तरिक्ष यात्रा सोसायटी में जर्मन सेना के एक इंजीनियर कैप्टिन वाल्टर डोर्नवर्गर बहुत दिलचस्पी लेते थे। उन्हें राकेटों में जितनी दिलचस्पी थी, उससे कहीं अधिक शी

अपोलो : चन्दा के देश में
६
सोसायटी के एक होनहार सदस्य में। यह सदस्य उस समय
विद्यार्थी ही था, पर उसके 'पात चिकने' थे। उसका नाम था
वर्नर फान ब्राउन । बाद में डाक्टर डोनंवर्गर ने उसे जर्मन सेना
में भरती होने के लिए राजी कर लिया।
यही वह फान ब्राउन था जिसने वी-राकेट के निर्माण में
बहुत महत्त्वपूर्ण भाग लिया। द्वितीय महायुद्ध के बाद वी-राकेट
के बारे में रूस और अमरीका ने जो लूट मचायी उसमें वह
अमेरिका के हाथ लगा। और आजकल अमरीका में इसके
निर्देशन में ही अंतरिक्ष राकेट बन रहे हैं ।
५. वी-२ और अन्तरिक्ष राकेट
पिछले अध्याय में तुमसे वी-राकेट की कहानी सुनाने का
वायदा किया था । जैसा तुम्हें मालूम है द्वितीय विश्वयुद्ध
के दौरान जर्मनी ने ये राकेट युद्ध अस्त्र के रूप में बनाये थे।
इनकी मार ने इंगलैंड के निवासियों में आतंक फैला दिया था।
पहले इनका नाम था 'ए-४ क्योंकि राकेट इंगलैंड से बदला
लेने के लिए बनाये गये। इसलिये इनका नाम पड़ गया
'वेरगेल्टुन स्वाफ-'बदला लेने वाले अस्त्र ।
४७ फुट लम्बे, १४ टन भारी राकेट ५० मील (८० किलो-
मोटर ) ऊपर उठकर ३६०० मील ( ५७६० किलोमीटर ) को
गति से बढ़कर ये राकेट अपने लक्ष्य पर मार करते थे। इनमें
लगभग एक टन विस्फोटक होता था। जिस समय ये इंग्लंड पर
उड़ते हुए आते लोग घबरा उठते । क्यों? उन्हें हवाई जहाज की

४० अपोलो : चन्दा के देश में तरह तोप से मारकर नहीं गिराया जा सकता था। ये ध्यानमस्त योगी की तरह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते ही जाते थे। इन्हें उसी समय रोका जा सका था जब इनके छोड़ने के स्थान पर कब्जा कर लिया गया। युद्ध अस्त्र के रूप में ये बहुत खतरनाक थे। पर अंतरिक्ष राकेट के रूप में बहुत उपयोगी । गोडर्ड के भी द्रव इंधन वाले राकेट थे। पर गोडर्ड के राकेटों से कहीं अधिक ऊँची उड़ान करने वाले। दरअसल इनसे पहले इतने ऊँचे लाने वाले राकेट बन ही नहीं सके थे। इसलिए अच्छा होगा कि इनको जरा वारीकी से देखें। इनको बनाने में फान ब्राउन को १९४४ में दो सप्ताह की सजा भी हो गई थी। उसके मुंह से एक दिन अचानक निकल गया था "मेरा विचार वी-२ को अंतरिक्ष राकेट बनाना था युद्ध अस्त्र नहीं। मुझे बहुत दुःख है कि उनका इस्तेमाल युद्ध-अस्त्रों के रूप में हो रहा है।" इसकी खबर जर्मनी की खुफिया पुलिस के प्रधान को लग गई। झट से उसने फान ब्राउन को कैद कर लिया। फिर बड़ी कठिनाई से जनरल डोर्नवर्गर ने उन्हें छुड़वाया। अच्छा बताओ वी-राकेटों में कौन- सा इंधन इस्तेमाल किया जाता था ? वैसे राकेट इन्जन में कोई भी चीज, जो जल सके और साथ ही अपने जलने के लिए आक्सीजन भी दे सके, इस्तेमाल की जा सकती है। वी-२ राकेट में ऐल्कोहल और पानी के मिश्रण को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता था ( तुम्हें मालूम है, यह ऐल्कोहल सड़े आलुओं से प्राप्त की जाती थी) पर ऐलकोहल को जलने के लिए आक्सीजन चाहिये । इसलिए राकेट में आक्सीजन भी रहती थी। जगह कम घेरे इसलिए

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४२ अपोलो : चन्दा के देदा में वह कुछ भी वजन नहीं उठा सकेगा। इसलिए वैज्ञानिकों ने और उपाय सोचे। उन्होंने ऐल्कोहल की जगह द्रव हाइड्रोजन ली और लॉक्स के स्थान पर 'फ्लॉक्स'-द्रव फ्लोरीन । राकेट के खोल को अंडे के खोल की तरह, बहुत हल्का बनाया (अंडे में भरे द्रव का भार खाली अंडे की तुलना में २० गुना होता है), पर राकेट की गति १२,८०० किलोमीटर प्रति घंटे से आगे नहीं बढ़ी। अब क्या हो ? लोगों को सिओलकोव्स्की की बातें याद आई। बहुखंडी राकेट बनाये जायें। आजकल जितने भी अंतरिक्ष राकेट बनाये जाते हैं, वे बहुखंडी राकेट हैं । जैसा मैं तुम्हें बता चुका हूँ, इनमें पहला खंड जव पूरी गति से आगे बढ़ रहा होता है तो दूसरा जल उठता है और पहले से तेज गति में आगे बढ़ता है । इसी भांति तीसरा खंड दूसरे से तेज गति से आगे बढ़ता है । वहुखंडी राकेट में अधिक वजन का उपग्रह ले जाया जा सकता है। इनमें इतनी शक्ति होती है कि लगातार कई महीनों तक चलते रहकर, ये कई करोड़ किलोमीटर की यात्रा कर सकते हैं। कुछ राकेटों ने शुक्र और मंगल ग्रह तक यात्रा कर डाली है। राकेट की कहानी काफी बड़ी हो गई । तुम ऊबने लगे होगे इसलिए अव इसे समाप्त करके उपग्रहों की चर्चा करेंगे। ६. आदमी ने चाँद वनाये मेरा अभिन्न सहयोगी सैटर्न-५ भी एक राकेट है । वी-२ और सैटर्न-५ में बहुत अंतर है तथा वी-२ से सैटर्न-५ तक पहुंचने में वैज्ञानिकों को कई वर्ष लगे। इन वर्षों में उन्होंने नये-

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४४ अपोलो : चन्दा के देश में उससे तुम सहज ही अंदाज लगा सकते हो कि रूसी सरकार अंतरिक्ष अनुसंधान में बहुत दिलचस्पी लेती थी। मुझे पूरी तरह मालूम नहीं कि रूस में किस प्रकार के राकेट बनाये गये । पर मुझे याद है कि १९५५ में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष फेडरेशन के छठे सम्मेलन में रूसी अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रधान एल. सेदोव ने कहा था कि "रूस कृत्रिम उपग्रह छोड़ेगा" और दो साल के अन्दर उसने वादा पूरा कर दिखाया। स्पूतनिक-प्रथम के बारे में कुछ कहने से पहले कृत्रिम उपग्रह के बारे में कुछ बता दूं। कृत्रिम उपग्रह को कितना वेग चाहिए वैज्ञानिकों ने गणना और प्रयोगों से यह पता लगा लिया था कि किसी वस्तु को विरल वायु में, धरती के समानांतर ८ किलो- मीटर प्रति सैकिंड के वेग से छोड़ दिया जाये तो वह धरती के चक्कर काटने लगेगी, गिरेगी नहीं । तुम कहोगे--पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण बल से उसे अपनी ओर क्यों नहीं खींच लेती ? -'अपकेन्द्र वल' के कारण । इस बल को तुम भी अच्छी तरह अनुभव कर सकते हो । रस्सी के एक सिरे में एक ढेला बाँध लो, और दूसरे सिरे को पकड़कर ढेले को बहुत जोर से अपने इर्द- गिर्द घुमाओ । तुम्हें ऐसा लगेगा कि कोई चीज टेले को बाहर की ओर खींच रही है । यह 'चीजें ही अपकेन्द्र वल है जो वृत्ता- कार मार्ग में बहुत तेजी से घूमती हुई वस्तुओं को बाहर की ओर धकेलती हैं। मजेदार बात यह कि वस्तु धरती से ऊपर छोड़ी जायेगी उसे कृत्रिम उपग्रह बनने के लिए उतनी ही कम गति चाहिए । १७०० किलोमीटर ऊपर छोड़ी गई वस्तु को उपग्रह बनने के लिए ७ किलोमीटर प्रति सैकिण्ड की गति चाहिए। ६४०० किलो- अपोलो : चन्दा के देश में मोटर ऊपर छोड़ी गई वस्तु को ५.५ किलोमीटर और ३५,७०० कि० मी० ऊपर छोड़ी गयी वस्तु को केवल ३.४ किलोमीटर । एक- वात और बताऊँ कि पृथ्वी से ३५,७०० किलोमीटर ऊपर घूमता हुआ उपग्रह २४ घण्टे में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करेगा। पदि पश्चिम से पूर्व की ओर ( जिस दिशा में पृथ्वी घूमती है ) 'ह परिक्रमा करे तो ऐसा लगेगा, मानो वह स्थिर हो। अमेरिका और रूस में राकेट छोड़ने की होड़ लगी हुई थी कि एक नया 'वर्ष' आरम्भ हुआ। यह वर्ष बहुत विचित्र था और इसका नाम भी तुम्हें शायद अटपटा लगे-अंतर्राष्ट्रीय भूभौतिक वर्ष । दरअसल यह वर्ष धरती, उसके वायुमंडल और समुद्रों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम था। इसमें संसार के लगभग हर देश ने भाग लिया था। जुलाई, १९५७ से दिसम्बर, १९५८ तक चलने वाले इस वर्ष में अमेरिका ने भी कृत्रिम उपग्रह छोड़ने की घोपणा की थी। स्पूतनिक आखिर रूस ने अपनी घोषणा के अनुसार ४ अक्तूबर, १९५७ को धरती का पहला नकली चांद-स्पूतनिक-प्रथम-स्थापित कर ही दिया । इस समाचार को सुनकर दुनिया दंग रह गई लोगों ने दांतों तले उंगली दबा ली। अमरीका में वैज्ञानिकों को हले यह विश्वास ही नहीं हुआ। क्योंकि उनकी समझ में नहीं या कि ८३.६ किलोग्राम वजन को अंतरिक्ष में ले जाने के लिए स ने कितना बड़ा राकेट बनाया होगा जबकि एक किलोग्नाम न को अंतरिक्ष में ले जाने के लिए १० टन भारी राकेट की रत होती है । मैं अमरीकी हूँ पर मुझे यह कहते हुए संकोच है कि रूस ने अंतरिक्ष की दौड़ में अमेरिका से वाजी मार । । स्पूतनिक-प्रथम के बाद तो हजारों उपग्रह, जिनमें ।

४६
अपोलो : चन्दा के देश में
अनेक के तो नाम भी नहीं थे, छोड़े गये और अंतरिक्ष-यात्रा के
क्षेत्र में बहुत-सी महत्त्वपूर्ण घटनाएं हुईं । पर स्पूतनिक-प्रथम का
उनमें अत्यन्त विशिष्ट स्थान है।
॥
-
पहला चाँद जिसे आदमी ने बनाया
जव पहला स्पूतनिक आकाश में भ्रमण कर ही रहा था कि
स ने एक और चमत्कार दिखाया। उसने ३ नवम्बर, १९५७ को
- दूसरा उपग्रह छोड़ दिया। ये पहले के मुकाबले में
तो था ही, उसमें अन्य उपकरणों के अलावा एक प्राणी भी
। वह थी एक कुतिया-'लाइका' । लाइका सवसे पहली
रक्ष-यात्री थी। इसके छोड़ने के लगभग एक सप्ताह वाद
का दम घुटने से मर गई और अंत में १४ अप्रैल, १९५८ को
वहुत

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अपोलो : चन्दा के देश में आरम्भं करने की इतनी जल्दी नहीं थी। पर सोचो, अगर इतना शक्तिशाली इंजन न वनता तो मेरा साथी सैटर्न-५ कैसे तैयार होता ? उसमें ऐसे एक-दो नहीं, पांच इंजन हैं। जैसा मैंने ऊपर बताया कि १९५८ से अमेरिका और रूस में उपग्रह छोड़ने की होड़ शुरू हुई, वह अब भी चल रही है। यद्यपि कभी-कभी फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देश भी उसमें आ जाते हैं पर बेचारे इनके सामने टिक नहीं पाते । अब तक अमेरिका एक्सप्लोरर, पायोनियर, टिरास, ईको, डिस्कवरर, अली-बर्ड, सिन्कोम, टेलस्टार आदि नाम से सैकड़ों उपग्रह, रेंजर, सर्वेयर जैसे अनेक चन्द्रयान तथा मेरिनर-जैसे मंगलयान भेज चुका है। उसने अंतरिक्ष में बन्दर, चूहे आदि प्राणियों को अपने मरकरी और जैमिनी कार्यक्रमों के अन्तर्गत भेजा । कहा जाता है कि नमेरिका कुल मिलाकर अब तक ४००० अंतरिक्ष यान भेज चुका है। इनमें से चन्द्रयानों और मरकरी तथा जैमिनी कार्यक्रम का उम्बन्ध सीधा मेरे से है, इसलिए इनके बारे में मैं तुम्हें आगे वस्तार से बताऊंगा। रूस ने स्पूतनिक, कास्मॉस, ल्यूनिक, मेचता, ल्यूनिक, ल्यूना आदि नाम से कई सी उपग्रह भेजे। मनुष्य ने जो 'चाँद' छोड़े उन्होंने बहुत महत्त्वपूर्ण काम किया । टिरोस, निम्बस, जैसे मौसम उपग्रहों ने मौसम के बारे में ऐसी सूचनाएं दी, जो पृथ्वी पर काम करने वाले यंत्रों से कभी प्राप्त नहीं हो सकती थीं । इको, टेलस्टार, रिले, सिकोम जैसे प्रसारण उपग्रहों ने रेडियो और टेलिविजन-प्रसारण में नया युग शुरू कर दिया। उनकी मदद से टेलिविजन से बहुत दूर-दूर तक चित्र प्रसारित किये जा सके। इसी प्रकार हर उपग्रह अंतरिक्ष यात्रा के बारे में नई जानकारी दी। इन सब में मुझे -

अपोलो : चन्दा के देश में
चांद पर उतरने वाले अथवा उसके बारे में जानकारी भेजने
वाले उपग्रह बहुत पसंद है,क्योंकि उनका मुझसे सीधा सम्बन्ध है।
७. चाँद पर राकेट उतरा
चांद पर राकेट पहुँचाने की सबसे पहले कोशिश की अमेरिका
ने। १९५८ में उसने 'पायोनियर-प्रथम' चांद की ओर
भेजा। पर उसकी गति थी केवल २३,४५६ मील (३७,५२९
किलोमीटर ) तुम भी बता सकते हो कि वह चांद पर पहुँच
हो नहीं सकता था, क्योंकि उसकी गति कम थी। वह केवल
१,१४,१०० किलोमीटर ऊपर तक ही पहुँच पाया । इसी भांति
'पायोनियर-तृतीय' भी बीच रास्ते में रह गया ।
चला था चाँद पर, बन गया ग्रह
तुम्हें मैने बताया कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से
छुटकारा पाने के लिए राकेट की ४०,००० किलोमीटर प्रति
घण्टे की गति चाहिए। पर एक विचित्र बात है कि कभी-कभी
इससे भी कम गति पर चलने पर राकेट अन्तरिक्ष में जा सकता
है। कय ? जब उसकी गति मे पृथ्वी के घूमने की गति जुड़
जाती है। यह इसी प्रकार होता है जैसे बहुत तेज चलती हुई
गाड़ी में से हल्के-से गेंद फेकने पर भी गाड़ी की गति जुड़ जाने से
गेंद बहुत तेजी से आगे बढ़ती है। इसीलिए राकेट छोड़ते समय
हमेशा पृथ्वी की गति को ध्यान में रखा जाता है । वैज्ञानिकों
ने हिसाब लगाया है कि यदि एक राकेट को ३८,२५० किलो

५० अपोलो : चन्दा के देश में ? मीटर प्रति घण्टे की गति से छोड़ा जाय तब भी वह चाँद तक पहुँचकर वापिस पृथ्वी पर आ सकता है, बशर्ते उसके अन्तिम वेग और दिशा में तनिक भी अन्तर न आये। यदि अन्तर आ जाये तब ? उस समय वह 'वहक' कर चाँद से दूर, सूर्य के आकर्षण क्षेत्र में, चला जायेगा। यही हाल हुआ पहले रूसी चन्द्र राकेट, ल्यूनिक-प्रथम का । २ जनवरी, १९५६ को छोड़ा गया यह राकेट चांद से ७,४०० किलोमीटर दूरी से गुजरता हुआ सूर्य का ग्रह बन गया और अनजाने ही सूर्य के नौ ग्रहों की संख्या बढ़कर १० हो गई। कुछ वच्चे यह जानना चाहेंगे कि जब यह चाँद के पास से गुजरा तो चाँद का ही उपग्रह क्यों न बन गया ? पृथ्वी से कम सही, पर चाँद का गुरुत्वाकर्षण बल इतना तो है ही कि वह अपने उपग्रह बना सके । तुम्हें मालूम है, पृथ्वी से दूर होते जाने पर उसके गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव भी घटता जाता है। पर चाहे लाखों किलोमीटर दूर चले जायें उसका कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य रहता है। उसके वावजूद भी पृथ्वी से ३८,००० किलोमीटर ऊपर एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ वस्तु पृथ्वी के गुरुत्वा- कर्षण बल से 'प्रभावित' नहीं होती, क्योंकि वहाँ पृथ्वी और चाँद के गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को संतुलित करते रहते हैं। ल्यूनिक जब इस क्षेत्र में से गुजरा, उसकी गति इतनी थी कि वह आगे बढ़ता रहे । जव वह चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के क्षेत्र में आ गया उस समय भी उसकी गति २.४ किलोमीटर प्रति सैकिण्ड थी। इतनी गति उसे चांद के गुरुत्वाकर्षण बल से छुटकारा दिला सकती थी। इसलिए वह सूर्य की ओर बढ़ता ही गया । सूर्य का यह पहला कृत्रिम ग्रह ४५० दिन में सूर्य की एक परिक्रमा करता है।

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५२
अपोलो : चन्दा के देश में
गया था। वह चाँद की भूमि पर गिरा तो सोडियम वाष्प ने
उसकी सूचना दी।
इस सफलता के लगभग ३ सप्ताह बाद ४ अक्तूबर, १९५६
को रूस ने तीसरा चन्द्रयान छोड़ा-ल्यूनिक-तीन । इसका काम
था चाँद की परिक्रमा कर, पुनः धरती की ओर आ जाना और
इसने यह काम बखूबी किया। पृथ्वी से रवाना होने के लगभग
ढाई दिन बाद जव यह चन्द्रमा के केन्द्र से ७,८०० किलोमीटर दूर
था, ठीक उसी समय उसे पृथ्वी से संकेत मिले जिससे ल्यूनिक.
तीन के राकेट के अन्तिम खंड ने अन्तरिक्ष खंड को अपने से
अलग कर दिया । अन्तरिक्ष खंड अव चाँद की ओर बढ़ा।
उसने बाहरी ओर से चाँद की आधी परिक्रमा की और धरती
की ओर लौट चला । वापिस आने के दौरान यह घने वायुमंडल
में से गुजरा । वहाँ वायु ने इसके मार्ग में बाधा दी । इस पर
सूर्य और चाँद दोनों के गुरुत्वाकर्षण बलों ने विशेप प्रभाव
डाला। इससे चांद की परिक्रमा करते-करते यह धीरे-धीरे
पृथ्वी की ओर खिसकता आया । इससे पता है क्या हुआ ?
११-१२ चक्कर काटने के बाद वायुमंडल के घने स्तरों में आ
गया और जलकर नष्ट हो गया।
ल्यूनिक-तीन ने पहली बार तुम्हें चन्द्रमा की 'पीठ' ( वह
भाग जो तुम्हें कभी दिखाई नहीं देता) दिखाई । जब यह
चन्द्रमा की परिक्रमा करता हुआ उसकी पीठ की ओर से
गुजरता, इसके कैमरे उस भाग के चित्र ले लेते थे । पृथ्वी से भेजे.
जाने वाले रेडियो संकेतों के अनुसार वे चित्र स्वतः ही धुलते
और टेलिविजन पर सम्प्रेपित हो जाते थे।

मनुष्य को चांद को पीठ दिसाने वाला ल्यूनिक-३ ५४ अपोलो : चन्दा के देवा में । अमेरिका को भी सफलता मिली मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि अमेरिका के पहले चन्द्रयान असफल रहे थे। उसने ४ मार्च, १९५६ को एक और यान पायो- नियर-४ भेजा । पर वह ल्यूनिक-प्रथम की भांति चन्द्रमा से ६०,००० किलोमीटर दूरी से गुजरता हुआ दूसरा कृत्रिम ग्रह वन गया। इसकी भांति ही रेंजर-३ भी चन्द्रमा से बहककर ग्रह जा बना। इसके बाद अमेरिका के रेंजर-चार, पाँच और छः भी असफल ही रहे । पर तुम्हें मालूम है कि वैज्ञानिक असफल होकर भी अपने कार्य को छोड़ देने वाले जीव नहीं हैं। वे उस समय तक प्रयत्न करते ही जाते हैं जब तक पूरी सफलता नहीं मिल जाती। अन्त में रेंजर-७ से अमेरिकी वैज्ञानिकों को सफलता मिलनी शुरू हुई तो उन्होंने दो और रेंजर यान, कई सर्वेयर और चाँद की परिक्रमा करने वाले 'ऑविटर' यान भेजे । जुलाई, १९६४ में छोड़े गये रेंजर-७ ने टकराने से पहले चांद के लगभग ४००० चित्र पृथ्वी पर भेजे । रेंजर-८ और रेंजर-6 यानों ने भी चांद के कई हजार चित्र अमेरिकी वेधशालानों को भेजे । इन चित्रों से पता चला कि चन्द्रमा के 'सागरों' में बहुत अधिक धूल नहीं है । इससे वैज्ञानिकों ने यह नतीजा निकाला कि चांद पर आदमी को ले जाने वाले यान को किसी सागर में हो उतारना पड़ेगा। पर इसके पहले उन्हें बहुत-सी और बातें मालूम करनी जरूरी थीं। धीरे उतरने वाला यान-ल्यूना-६ तुम्हें मालूम है कि यदि वायुयान बहुत जोर से नीचे उतरे

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अपोलो : चन्दा के देश में बाद ये वापस पृथ्वी पर लौटकर आये। तुम पूछ सकते हो कि ल्यूना-३ से लेकर रेंजर, सर्वेयर, ऑबिटर सवने चाँद के कई हजार चित्र लिए। आखिर इतने चित्रों की जरूरत क्या थी ? मैं तुम्हें बताऊँ, इन यानों ने चन्द्रमा के हर भाग के चित्र लिए हैं। आज वैज्ञानिकों के पास चाँद के इतने चित्र हैं जितने शायद पृथ्वी के नहीं । तुम जानते हो, आदमी संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु है और उसे चाँद पर उतारने से पहले वैज्ञानिक चाँद के बारे में हर दृष्टि से अधिकाधिक जानकारी चाहते थे। इसलिए उन्होंने चाँद इतने चित्र लिए । पर मनुष्य की लालसा कभी समाप्त नहीं होती। वह तो बढ़ती ही जाती है। अब वैज्ञानिक चाँद की मिट्टी के बारे में जानना चाहते थे और आदमी को वहाँ भेजे वगैर मिट्टी आ नहीं सकती। चाँद पर आदमी को भेजने के पहले उसे धरती से कुछ सौ किलोमीटर ऊपर उड़ाना जरूरी था। इसलिए जहाँ एक ओर चाँद पर मानव-रहित यान भेजे जा रहे थे, वहाँ दूसरी ओर मनुष्य को अन्तरिक्ष में यात्रा कराने के प्रयत्न भी जारी थे । इन अन्तरिक्ष यात्रियों का वर्णन अगले अध्याय में दिया गया है। ८. अन्तरिक्ष में मनुष्य मेरो यात्रा के बारे में सबसे पहले १९६१ में अमेरिका के राष्ट्रपति श्री कैनेडी ने घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि 'अमेरिका का उद्देश्य १९७० में चांद पर आदमी उतारना है और

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अपोलो : चन्दा के देश में वायु के घने स्तरों में प्रविष्ट हुआ । यहाँ यह हवा की रगड़ से गर्म होकर लाल हो गया। पर उसमें ऐसा प्रवन्ध था कि उसके अन्दर बैठे गागरिन को कुछ भी अड़चन नहीं हुई। धरती के निकट आने पर केविन का यात्री-कक्ष भी अलग हो गया और पैराशूट के सहारे धरती पर उतर आया । उतरते समय उसकी गति केवल ३२ किलोमीटर ही थी। सव रूसी अंतरिक्ष यात्री इसी भांति ही धरती पर उतरते हैं । गागरिन के बाद ६ अगस्त, १९६१ को वोस्तोक-२ में मेजर तितोव अंतरिक्ष में गये और २५ घण्टे में धरती के १७ चक्कर लगाकर सकुशल धरती पर लौट आये। यात्रा में उनका 'जी घवराया' पर इसके अतिरिक्त उन्हें कोई अड़चन नहीं हुई। इससे यह मालूम हुआ कि आदमी लम्बे समय तक भी अंतरिक्ष में रह सकता है। इसके बाद तो रूसी वैज्ञानिकों ने वहुत-से करतब करके दिखाये । दो अंतरिक्ष यानों, वोस्तोक-३ और वोस्तोक-४ को एक ही कक्ष में केवल २० किलोमीटर के अन्तर से घुमाया गया। इनकी सफल उड़ानों के बाद १४ जून, १९६३ को वोस्तोक-५ छोड़ा गया। उसमें वाइस्कोवस्की यात्रा कर रहे थे । अभी वाइस्कोवस्की अंतरिक्ष में विचरण कर ही रहे थे कि १६ जून को वोस्तोक-६ संसार की प्रथम महिला अंतरिक्ष यात्री को लेकर उड़ा । यह वोस्तोक-५ की ही कक्षा में घूमने लगा और दोनों यान इतने पास आ गये कि उनके यात्रियों ने आपस में बातें भी की। अंतरिक्ष यात्रा करने वाली प्रथम महिला थी वेलेनतिला तेरेशकोवा। उसके बाद आज तक किसी भी स्त्री ने अंतरिक्ष यात्रा नहीं की। १२ अक्तूबर, १९६४ को वोस्खोद-१ यान में एक साथ तीन

अपोलो चन्दा के देश में
५६
यात्रियों ने अंतरिक्ष यात्रा की । ये ये कर्नल कोमारोव, वैज्ञानिक
फैओक्तिस्तोव और डॉक्टर येगोरोव । पृथ्वी की १६ परिक्रमाएँ
करके लगभग २४ घण्टे बाद ये सकुशल घरती पर उतर आए।
लेकिन १८ मार्च, १६६५ को अंतरिक्ष यात्रा में एक नए चरण का
आरम्भ हुआ । उस दिन वोस्खोद-२ के यात्री लिओनोव ने अपना
विशेष सूट पहने हुए यान से बाहर सुले अंतरिक्ष में यात्रा की।
लगभग २० मिनट तक वे यान के साथ-साथ भारहीनता की
अवस्था में तैरते रहे । इसके पहले किसी ने ऐसा करतव नहीं
दिखाया था।
अमेरिका भी पीछे नहीं-मरकरी योजना
यूरी गागरिन को अंतरिक्ष यात्रा के तीन सप्ताह बाद ही,
५ मई, १९६१ को अमेरिका ने अपनी मरकरी योजना के अंतर्गत
पहला मानवयुक्त विमान भेजा । इसे प्रक्षेपित करने से पहले
४
१-
१, कार्बन डाइ थॉक्साइड सोखने वाला यन्त्र २. ऑक्सीजन
३. वायु-अनुकूलन ४. यात्री-केबिन
मरकरी पान

६० अपोलो: चन्दा के देश में १४ परीक्षण किये जा चुके थे। इन परीक्षणों में से कुछ में अंतरिक्ष में बन्दर भेजे गये थे। इनके सफल रहने पर ही मानवयुक्त पहला यान 'फ्रीडम-७' ( मरकरी-३) प्रक्षेपित किया गया। अपनी योजना के अनुसार वह ३०२ मील (४८३ किलोमीटर) दूरी तय करके १५ मिनट बाद अंध महासागर में जा गिरा। इसके यात्री एलेन बी. शेपर्ड सकुशल रहे । अमेरिका का दूसरा समानव यान 'लिवर्टी बैल-७' ( मरकरी-४ ) जो २१ जुलाई, १९६१ को छोड़ा गया था, अंतरिक्ष में स्थापित होने से पहले ही, १६ मिनट बाद, समुद्र में आ गिरा। इसके यात्री थे जिल आई. निशम। अंत में अमेरिका का तीसरा यान 'फ्रेंडशिप-७' ( मरकरी- ५) पृथ्वी की परिक्रमा करने में सफल रहा । २० फरवरी, १९६२ को छोड़े गये इस यान ने पृथ्वी की ३ परिक्रमाएँ की और ४ घण्टे ५६ मिनट बाद अपने यात्री जॉन एच. ग्लेन के साथ । सकुशल धरती पर उतर आया । पर इसकी संपूर्ण यात्रा सकुशल नहीं थी। यान जैसे ही अपनी कक्षा में पहुँचा, उसकी स्वचालित नियंत्रक व्यवस्था ने 'गड़बड़ी' करनी शुरू कर दी। बाद में यान की इलैक्ट्रानिक चेतावनी व्यवस्था ने बताया कि गर्मी रोकने वाली परत ठीक कार्य नहीं कर रही है। इसका मतलब था कि यान का यात्री-केबिन, जिसमें ग्लेन बैठा हुआ था, वायुमंडल में पुनः प्रवेश करते समय जल उठेगा। इसके बावजूद भी ग्लेन सकुशल धरती पर उतर आये । उन्हें बाद में मालूम हुआ कि वास्तव में यान की चेतावनी व्यवस्था 'गड़बड़' कर रही थी, न कि गर्मी- रोधी परत । इसके बाद मरकरी योजना का हर यान सफल रहा । फ्रेंडशिप-७ के बाद २४ मई, १९६२ को 'अरोरा-७ ( मरकरी-६ ) प्रक्षेपित किया गया। इसके यात्री थे स्कॉट ।

अपोलो: चन्दा के देश में कारपेंटर। इन्होंने पृथ्वी की ३ परिक्रमाएं की और सकुशल घरत. पर आ गये। फिर वाल्टर शिर्रा ने 'सिग्मा-७' (मरकरी-७) में ६ घण्टे १३ मिनट में पृथ्वी के ६ चक्कर काटे मोर गार्डन कूपर ने १४ मई, १९६३ को 'फेथ-७' में २२ । उस समय तक किसी अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री ने पृथ्वी की इतनी परिक्रमाएं नहीं की थीं। कूपर को भी अपनी यात्रा के दौरान काफी कठिनाइयां उठानी पड़ी। पहले उनका अंतरिक्ष सूट थोड़ी-थोड़ी देर में ही काफी गर्म हो जाता था। उसे उन्हें वार-बार ठंडा करना पड़ता। फिर यान को जल-व्यवस्था ने 'विद्रोह' कर दिया और अन्त में यान की स्वचालित नियंत्रण- व्यवस्था ने भी कार्य करना बन्द कर दिया। इसके बावजूद भी कूपर सही सलामत अंध महासागर में आ उतरे । एक बात में तुम्हें बता दूं कि हर अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री वापिस समुद्र में ही जाकर गिरता है । अपनी यात्रा के दौरान उन्होने पृथ्वी के कुछ बहुत सुन्दर चिन लिए । कूपर की यात्रा के साथ ही मरकरी योजना समाप्त हो गई। मरकरी यान का आकार फनल (चाड़ी) के समान था, नसकी ऊंचाई २.८५ मीटर थी और वजन १५०० किलोग्राम । त्री-केबिन के बाहरी ओर २५ मि० मी० मोटी ग्लासवूल और लेपित रेजिनों की तह चढ़ी थी। इससे ऊपरी तह ८००० सें. गर्म हो जाने पर भी यात्री-केबिन के अन्दर का ताप ३८० से अधिक नहीं होता था। पर यात्री के सूट के अन्दर का २६० ही रहता था। ती योजना और मरकरी योजना के बीच में जैमिनी एक अत्यन्त अपोलो : चन्दा के देश में ६२ महत्त्वपूर्ण कड़ी थी। अप्रैल, १९६४ से नवम्बर, १९६६ तक चलने वाली इस योजना का वर्णन करने से पहले मुझे चाँद पर आदमी पहुँचाने और वहाँ से सकुशल वापिस लाने के तरीकों के बारे में तुम्हें कुछ बताना पड़ेगा। उस चाँद पर मनुष्य तीन तरीकों से उतारा जा सकता है। पहले तरीके में, जिसे 'सीधी उड़ान' भी कहते हैं, एक बहुत बड़े राकेट से अपोलो यान को चन्द्र-कक्ष सहित सीधा चाँद पर भेजा जा सकता है। इस तरीके में अपोलो-यान चाँद पर उतरता और वहाँ से राकेटों की मदद से पुनः पृथ्वी पर वापिस आ जाता। दूसरा तरीका है एक सैटर्न राकेट से अपोलो-यान को (चंद्र कक्ष सहित) पृथ्वी की परिक्रमा में स्थापित करना। फिर एक अन्य सैटर्न राकेट भेजकर उसकी मदद करना । यह दूसरा राकेट पहले को आवश्य ईंधन सप्लाई करता, जिससे पहला राकेट-यान-सहित चन्द्रमा की ओर बढ़ जाता । तीसरे तरीके में एक बहुत बड़े राकेट से यान प्रक्षेपित किया जाता । चाँद पर उतरने से पहले वह चाँद की परिक्रमा करता । जिसके दौरान उसमें से चन्द्र-कक्ष अलग होकर चाँद पर उतर जाता । चाँद पर से प्रक्षेपित होने के बाद चन्द्र-कक्ष परिक्रमा करते हुए यान से पुनः जुड़ जाता और यान वापिस पृथ्वी पर आ जाता। इन तरीकों के बारे में वैज्ञानिकों ने बहुत अध्ययन और प्रयोग किये । पहला तरीका प्रयोग की कसौटी पर खरा नहीं उतरा । पर दूसरे और तीसरे तरीके के बारे में वैज्ञानिकों में आपस में बहुत मतभेद था। दूसरा तरीका तीसरे से सरल था और १९६१ में कुछ दिनों के लिए वैज्ञानिकों ने उसे ही अपनाया।

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अपोलो : चन्दा के देश में ६४ पहला जैमिनी यान छोड़ा गया ८ अप्रैल, १९६४ को। उसमें कोई आदमी नहीं भेजा गया था। यह ४ दिन तक पृथ्वी के चक्कर काटता रहा। फिर घने वायुमंडल में आकर जलकर नष्ट हो गया। १६ जनवरी, ६५ को छोड़े गये जैमिनी-२ में भी कोई आदमी नहीं था। इसका उद्देश्य यह जानना था कि अंतरिक्ष में परिक्रमा करने के बाद यात्री-कक्ष जब फिर से वायुमंडल में प्रवेश करेगा तो उस समय उसकी गर्मीरोधी व्यवस्था ठीक कार्य करेगी अथवा नहीं। अंतरिक्ष में विचरण करने के बाद वह अंध महासागर में सकुशल आ गिरा जैमिनी-२ की सफल यात्रा के बाद उड़ा जैमिनी-३, २३ मार्च, १९६५ को । उनके यात्री थे वजिल आई० निशम और जॉन डब्लू० यंग । ४ घण्टे ५३ मिनट तक अंतरिक्ष में विचरण करने के वाद, जिस दौरान उन्होंने पृथ्वी की तीन परिक्रमाएं की, वे सकुशल लौट आये। मरकरी यानों की भाँति यह भी अंधमहा- सागर में उतरा था । यात्रा के दौरान यान ने राकेट छोड़कर अपनी कक्षा बदल ली थी। इसके बाद छोड़ा गया जैमिनी-४,३ जून, १९६५ को। इसके यात्री थे जेम्स ए० मैकडिविट और एडवर्ड व्हाइट । इस यात्रा के दौरान उन्होंने पृथ्वी के ६२ चक्कर काटे । तीसरे चक्कर में व्हाइट ने पेपोलोव का करिश्मा दुहराया। वे सूट पहनकर यान से बाहर चले गये और २१ मिनट तक पृथ्वी से १६६ किलोमीटर ऊपर, खुले अंतरिक्ष में, तैरते रहे । खुले अंतरिक्ष में चलने वाले ये पहले अमेरिकी थे। -- अंतरिक्ष में मिलन युग्मन २१ अगस्त, १६६५ को छोड़े गये जैमिनी-५ ने ७ दिन २२ घण्टे ५६ मिनट अंतरिक्ष की यात्रा की, उसके यात्री थे गोर्डन

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अपोलो : चन्दा के देश में गति इतनी धीमी कर ली कि वह जैमिनी-७ यान के विल्कुल पास आ गया । मैं यहाँ तुम्हें एक बात बताना चाहता हूँ; अंतरिक्ष यान की गति मोटरकार की भाँति व्रक लगाकर धीमी या एक्सीलरेटर दबाकर तेज नहीं की जा सकती। ऐसा करने के लिए राकेट ही छोड़ने पड़ते हैं । गति धोमी करने के लिए जो राकेट छोड़े जाते हैं उन्हें रीट्रो राकेट कहते हैं। जब जैमिनी-६ की चाल जैमिनी ७ की चाल के बिलकुल वरावर हो गई तव दोनों यानों ने साथ-साथ पृथ्वी के दो चक्कर.. काटे । इस दौरान उन्होंने एक-दूसरे के अनेक चित्र लिये। यह युग्मन पृथ्वी से २६५ किलोमीटर ऊपर किया गया था। इसके बाद जैमिनी-६ धरती पर (१६ दिसम्बर को) उतर गया । पर जैमिनी-७ घूमता ही रहा । वह तो अंतरिक्ष में सबसे अधिक समय तक रहने का रिकार्ड स्थापित करके ही धरती पर उतरा। इसने १३ दिन १८ घंटे ३५ मिनट में धरती की २०६ परिक्रमाएं लगाई। इस बीच इसने ६० लाख किलोमीटर की दूरी तय की और यह मिद्ध कर दिखाया कि आदमी लगभग १४ दिन तक लगातार अंतरिक्ष में विचरण कर सकता है। इसके बाद १६ मार्च, १९६६ को छोड़े गये जैमिनी-८ के यात्री थे नील ए० ऑर्मस्ट्रांग और डेविड आर. स्कॉट (नील ऑर्मस्ट्रांग ही चाँद पर उतरने वाले पहले मनुष्य हैं । ). इन्होंने १० घण्टे ४२ मिनट में पृथ्वी के ६ चक्कर लगाये । इस दौरान उन्होंने एगेना राकेट से युग्मन किया । यह राकेट जैमिनी-८ से लगभग एक घण्टे चालीस मिनट पहले छोड़ा गया था। इस उड़ान के दौरान भी यान में गड़बड़ी पैदा हो गई थी, पर यात्रियों ने उसपर काबू पा लिया। ३ जून, १९६६ को छोड़े गये जैमिनी- के यात्रियों को

अपोलो : चन्दा के देश में
काम करने थे। पहला था, पहले से छोड़े गये एक-राकेट-खंड
को ढूंढकर उससे युग्मन करना और दूसरा था खुले अंतरिक्ष में
काफी समय तक विचरण करना । इसके यात्री थॉमस स्टेफर्ड
और यूजीन सरनन को अपनी ३ दिन २० मिनट की यारा में,
पहिले काम में सफलता नहीं मिली; पर सरनन यान से बाहर
निकलकर २ घण्टे १० मिनट तक लगातार विचरण करते रहे।
जैमिनी ने एक और रिकार्ड बनाया। उसने परिक्रमा के
लिए जो कक्षा चुनी थी वह पृथ्वी से ७६० मील ऊँची थी।
इतनी ऊंचाई तक उस समय तक कोई भी ऐसा यान नहीं
पहुँचा था जिसमें मादमी यात्रा कर रहे हों।
- इसके बाद १८ जुलाई, १९६६ को छोड़े गए जैमिनी-१०
तो कमाल कर दिया इसके यात्री थे माइकेल कॉलिन्स और
जॉन यंग। इसने पहले से छोड़े गये एक राकेट एगेना-१० के
साथ युग्मन किया और उसके साथ सम्बद्ध हो गया। दोनों ने
जुड़ी हुई दशा में ३६ घण्टे ४० मिनट तक उड़ान की। इस दौरान
वे एक अन्य उपग्रह, एगेना-८ के निकट जा पहुंचे ( एगेना-८
१४ मार्च, १९६६ से अन्तरिक्ष में घूम रहा था ) अब माइकेल
कॉलिन्स नाइलान की रस्सी की सहायता से यान से बाहर
निकले और एगेना-८ पर रखे हुए एक ववस को, जिसमें
अन्तरिक्ष धूल इकट्ठी हो रही थी, उठाकर वापिस यान में
आ गये। जैमिनी-१०७० घण्टे ४७ मिनट की यात्रा के बाद
सकुराल घरती पर उतर आया। बाद में मेरी ग्यारहवीं उड़ान
में माइकेल कॉलिन्स ने भाग लिया)।
जैमिनी-११ के यात्रियों, चाल्स कोनराड और रिचार्ड गोर्डन
ने २ दिन २३ घण्टे अन्तरिक्ष में रहकर एगेना र
किया और गोर्डन ने खुले अन्दर
यामः

६८ अपोलो : चन्दा के देश में आखिरी जैमिनी यान, जैमिनी-१२, ११ नवम्बर १९६६ को छोड़ा गया। उसके यात्री थे जेम्स लावेल और एडविन एल्ड्रिन । इन्होंने पृथ्वी की ५६ परिक्रमाएँ की और एगेना राकेट से संगमन किया । एल्ड्रिन ने खुले अंतरिक्ष में भी विचरण किया। उन्होंने यान की खिड़की से बाहर निकलकर सूर्य-ग्रहण और बादलों के चित्र लिए। ६. मेरा वाहन सैटर्न जैमिनी योजना के सफलतापूर्वक समाप्त हो जाने के बाद मुझको अंतरिक्ष में भेजने की योजना पर कार्य होने लगा। यह मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि मरकरी और जैमिनी मेरे पूर्वज थे । मेरा जन्म १९५८ में ही, नासा की स्थापना के बाद हो चुका था । २५ मार्च, १९६१ को राष्ट्रपति कैनेडी के कांग्रेस (अमेरिका की संसद को कांग्रेस कहते हैं) के समक्ष यह बता देने पर कि अमेरिका का लक्ष्य चांद पर आदमी उतारना है, मुझे बनाने में हजारों वैज्ञानिक जी-जान से लग गये। वैज्ञानिक ही क्यों अमेरिका की हजारों कम्पनियों ने मेरे अभिन्न सहयोगी सैटर्न और मेरे यान के पुर्जे बनाने आरम्भ कर दिये । मेरा सोना गर्व से फूला नहीं समाता, जब मैं यह याद करता हूँ कि मेरी तैयारी में २४ अरब डालर से अधिक खर्च हुआ है । एक डालर तुम्हारे लगभग साढ़े सात रुपये के बरावर होता है। तुम्हें मालूम है कि सैटर्न राकेटों के विना मैं अन्तरिक्ष में जा ही नहीं सकता । अन्तरिक्ष में जाने के लिए मुझे उनके 'सिर' पर अपोलो : चन्दा के देश में सवार होना पड़ता है । इसलिए मैं तुम्हें सैटर्न राकेटों के बारे में पहले बताऊंगा। मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि जर्मनी की लूट में अमेरिका के हाथ सबसे अनमोल रत्न लगा था, वर्नर फॉन बाउन । फॉन ब्राउन ने ही जुपिटर- सी राकेट बनाया था और उसके निर्देशन में ही सैटर्न राकेट बने। राकेट का काम है वायुमंडल के घपंण और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण वल को हराकर यान को अन्तरिक्ष में भेज देना। यह वात तुम भी बता सकते हो कि यान जितना भारी होगा और उसे जितनी दूर भेजना होगा, राकेट को उतना ही शक्तिगाली बनाना होगा। मेरा वजन है ४५,३६० कि०ग्रा० और पहुँचना मुझे चांद पर है, तब तुम सोच सकते हो कि मेरे साथी का कितना शक्तिशाली होना जरूरी है। दरअसल सैटर्न-५ संसार का सबसे शक्तिशाली राकेट है। इसकी ऊंचाई ८५ मीटर से भी १, संटनं-५ राकेट २. अपोलोया । अधिक और जब इस पर मेरे यान, अपोलो यान, को वैठा दिया जाता अपने वाहन संटनं-५ पर सवार अपोलो

७०
अपोलो : चन्दा के देश में
है तो ऊँचाई हो जाती है ११० मीटर । तुम्हारी कुतुब मीनार
से डेढ़ गुनी अधिक।
इतने बड़े राकेट को धीरे-धीरे बनाया गया था। यह 'थोर'
और 'टाइटन' राकेटों से, जिनसे मरकरी और जैमिनी यान
प्रक्षेपित किये गये थे, बहुत बड़ा और शक्तिशाली है।
सैटर्न माला के राकेटों में सबसे पहले बनाया गया सैटर्न-१।
इसका वजन ५०० टन था और कुल ऊँचाई ५७ मीटर । यह
केवल ३ टन माल चांद तक पहुँचा सकता था। १९६५ तक
इससे १० परीक्षण किये गये। इसके बाद बनाया गया सैटर्न-?
बी जिसे 'आपरेटिड सैटर्न' भी कहते हैं । यह ६८ मीटर ऊंचा
और ५८५ टन भारी था। इसे पहली बार छोड़ा गया था--२६
फरवरी, १९६६ को।
इन दोनों ने सैटर्न-५ बनाने में बहुत मदद दी। सैटर्न-१ के
पहले खण्ड को कुछ अधिक शक्तिशाली बनाकर सैटर्न-१ वी
का पहला खण्ड बनाया गया। इससे यह पता चला कि एफ-२
किस्म के इंजन राकेट के लिए उपयुक्त होते हैं । सैटर्न-१ वी
का दूसरा खंड बना सैटर्न-५ का तीसरा खंड । इसने यह बताया
कि द्रव हाइड्रोजन ईंधन के रूप में बहुत उपयुक्त रहती है ।
सैटर्न-५ राकेट के तीन खंड होते हैं। पहले खंड की ऊंचाई
है ४२ मी० और व्यास १० मीटर तथा वजन २२,४२,००० किलो-
ग्राम । पर इसमें अधिकांश वजन इंधन का ही है। इसमें
८,१०,००० लिटर मिट्टी का तेल और १३,११,००० कि० ग्रा० द्रव
ऑक्सीजन होती है। इसमें लगभग पांच एफ-१ इंजन बड़ी तेजी
से ईंधन फूंकते हैं । उड़ान भरते समय १६० सैकिण्ड में ही ये
सारा ईंधन फूंक डालते हैं।
राकेट का दूसरा खंड व्यास में पहले खंड के बराबर होता
है पर ऊँचा होता है २४.५ मीटर । इसमें जे-२ किस्म के ५ इंजन
।

अपोलो : धन्दा के देश में होते हैं । ये मिट्टी का तेल नहीं जलाते वरन् द्रव-हाइड्रोजन इस्तेमाल करते हैं । द्रव हाइड्रोजन बहुत ठण्डी होती है । जिस ताप पर पानी जमता है, द्रव-हाइड्रोजन उससे भी २५३ सें० अधिक ठंडी होती है । इसको जलाने के लिए द्रव-ऑक्सीजन रखी जाती है । जे-२ किस्म के इंजन भी तेजी से इंधन फूंकते हैं पर एफ-१ इंजन से धीमी गति से । ये इंजन उड़ान के दौरान ६ मिनटों में ४,४१,००० किलोग्राम इंधन ही फूंक डालते हैं। पहले और दूसरे खंड एक के बाद एक जलते जाते हैं । इनके इंजन पूरी तरह जल चुकने पर ही काम करना बन्द करते हैं । इन खंडों का काम होता है-यान को पृथ्वी से लगभग १८४ किलोमीटर ऊपर भेज देना । तीसरा खड वैसे दूसरे खंड का ही छोटा रूप होता है। उसमें एक जे-२ किस्म का इंजन होता है। उसके दो काम होते है - यान को पृथ्वी की परिक्रमा में स्था- पित कर देना और बाद में उसे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण वल से छुटकारा दिलवाकर चांद की ओर भेज देना। इसलिए यह बाद में ही पूरी तरह नहीं जल जाता । कुछ देर जलने के बाद, जब यान पृथ्वी की परिक्रमा करना शुरू कर देता है, तब यह बन्द हो जाता है । ठीक अवसर पर अंतरिक्ष यात्री इसे फिर से चालू करके ४०,००० किलोमीटर प्रति घंटे की चाल से चाँद की मोर चल पड़ते हैं । तीसरे खंड का वजन होता है-१,१२,००० किलोग्राम और ऊंचाई ६ मंजिले मकान के बरावर । तीसरे खंड के ऊपर राकेट का 'दिमाग' होता है । इसकी ऊंचाई कुल एक मीटर होती है । इस सबसे छोटे खंड में ही सारे यंत्र लगे रहते हैं । ये यन्त्र राकेट की गति को घोमा-तेज करते हैं और उसको उड़ने को दिशा

७२
अपोलो: चन्दा के देश में
ठीक बनाये रखते हैं। इसके ऊपर ही अंतरिक्ष यान लगा
रहता है।
.
उल्टी गिनती-काउंट डाउन
राकेट को छोड़ने से कई दिन पूर्व एक लाउडस्पीकर बहुत
जोर से उल्टी गिनती गिनने लगता है। पर इसकी गिनती
तुम्हारी उल्टी गिनती से अलग होती है । अगर तुम इसे सुनो तो
यह तुम्हें बहुत विचित्र लगेगी। यह इस प्रकार है-'टी घटा (ऋण)
६३ घण्टे', 'टी घटा ६२ घण्टे ५६ मिनट,''टी घटा १२ घण्टे ५८
मिनट' आदि । यह उल्टी गिनती ही काउंट डाउन कहलाती
है।
तुम जानते हो, राकेट और अंतरिक्ष यान में बहुत-से पुर्जे होते
हैं । अपोलो-११ में ६,००,००० पुर्जे थे। उड़ान से पहले इन
सबको खूब अच्छी तरह जांचा जाता है । जांच करते समय ही
यह गिनती गिनी जाती है । जैसे-जैसे जांच पूरी होती जाती है,
गिनती घटती जाती है। यदि जांच में कोई पुर्जा खराव पाया जाता
है तो गिनती रोक दी जाती है। वह उस समय तक रुकी रहती
है जब तक उस पुर्जे को ठीक करके फिर से नहीं लगा दिया
जाता । 'टी' क्षण वह होता है जब राकेट दरअसल छूट जाता
है । इसलिए गिनती 'टी घटा' करके गिनी जाती है।
यह गिनती राकेट छोड़ने के कई दिन पहले से ही शुरू हो
जाती है । मैंने अपनी ग्यारहवीं 'उड़ान' १६ जुलाई की शाम को
७ बजकर २ मिनट पर छोड़े गये राकेट से की थी, पर मेरा
काउंट-डाउन १० जुलाई के सुबह ५ बजकर ३० मिनट पर शुरू
हो गया था।

१०. मेरा यान मेरे बारे में तुम जैसे बच्चों को बताते समय किसी ने कहा था: "अपोलो के लिए ३ की गिनती याद रख लो।" मैं सोचता हूँ कि उसने यह बात कितनी सही कही थी।३ के साथ मेरा गहरा सम्बन्ध है। मेरे सहयोगी सैटर्न-५ राकेट के तीन खंड हैं, मेरे यान में तीन कक्ष होते है, मेरे यान में तीन यात्री ही यात्रा कर सकते हैं और मेरी यात्रा के उद्देश्य भी तीन हैं-चाँद पर पहुँचना, वहाँ खोज करना और वापिस धरती पर आना। सैटर्न-५ के बारे में तो तुम सुन चुके हो । अव मैं अपने यान के बारे में बताता हूँ। मेरा यान एस्केप टावर सहित २५ मीटर ऊंचा और ४५,३६० किलोग्राम भारी है। यान को दो भागों में बांटते हैं---मुख्य यान और चन्द्र-कक्ष । मुख्य यान वह हिस्सा है जो चाद को जाते समय और पृथ्वी पर आते समय वायुमंडल से गुजरता है । इसलिए इसका आकार ऐसा होता है कि वह हवा को आसानी से काटकर तेजी से आगे बढ़ सके और बहुत गर्म हो जाने पर भी सुरक्षित रहा आए । उसके दो अंग होते हैं : आदेश-कक्ष (कमांड मोडयूल) और सेवा कक्ष (सर्विस मोड्यूल) । आदेश-कक्ष में ही अंतरिक्ष यात्री बैठते हैं इसलिए पहले उसका ही वर्णन करना ठीक रहेगा। आदेश-कक्ष यह कक्ष मुख्य यान के ऊपरी भाग में होता है । इसे चन्द्रमा के बहुत करीव लगभग ११२ किलोमीटर तक जाना पड़ता है और वहां से लौटकर धरती पर आना पड़ता है । इस यात्रा में इसे दो वातों का सामना करना पड़ता है बहुत तेज झटके और ७४ अपोलो: चन्दा के देश में वायुमंडल का घर्षण । इसलिए इसे लगभग तिकोने आकार का बनाया जाता है । ( इसका आकार शंकु के समान होता है ) इसका बहुत मजबूत और साथ ही हल्का होना भी जरूरी है। वायुमंडल में से गुजरते समय यह गर्म होकर लाल हो जाता है, पर ऊपर अंतरिक्ष में यात्रा करते समय इसका ताप बहुत कम (वर्फ के ताप से भी १००° सें० कम) हो जाता है। इससे अंतरिक्ष-यात्रियों की रक्षा करने के लिए थर्मस फ्लास्क की तरह इसकी 'दोहरी दीवारें बनाई जाती हैं। तुम जानते हो कि थर्मस की दोहरी दीवारें गर्मी को फ्लास्क में न अन्दर आने देती हैं और न उससे वाहर जाने देती हैं । आदेश-कक्ष की बाहरी दीवार स्टेन- लेस इस्पात की एक जाली (हनीकूम्ब) से बनाई जाती है । यह बहुत हल्की, पर मजबूत होती है । धरती पर आते समय, वायु- मंडल के घर्षण के कारण यह बहुत अधिक गर्म न हो ( जव आदेश-कक्ष वापिस धरती पर आ रहा होता है तो ऐसा लगता है मानो आग का गोला आ रहा हो), इसलिए उसपर एक ऐसे पदार्थ की तह चढ़ा दी जाती है जो कुचालक हो । वह खुद जल जाये, पर आदेश-कक्ष को गर्म न होने दे। ऐसे पदार्थ को 'एबलेटिव' कहते हैं । इस एबलेटिव पदार्थ के ऊपर कार्क की भी एक परत चढ़ा दी जाती है। कक्ष की अंदरूनी दीवार एल्यूमीनियम की एक मिश्र धातु की चादर से बनाई जाती है। यह चादर बहुत पतली-सिगरेट की डिब्बी की चांदी के समान पतली होती है । दीवार बनाते समय इसकी दो तहों के बीच में एल्यूमीनियम की एक जाली रखी जाती है। इससे यह बहुत मजबूत हो जाती है । यह झटकों और बहुत अधिक दाव को भी आसानी से सह जाती है । साथ ही वहुत हल्को रहती है। .

अपोलो : चन्दा के देश में ७५ +--२ ३ मादेश-कक्ष के भी तीन भाग होते हैं । अगले भाग में सब यंत्रों के स्विच होते हैं, पैराशूट रखे जाते हैं तथा चन्द्र- कक्ष से युग्मन करने के यंत्र होते हैं। निचले भाग में 'झटका सहन' करने वाले उपकरण और ऊपर उठते समय यान पर काबू रखने के यंत्र लगे होते हैं। वीच के कक्ष में यात्री बैठते हैं। इसके अन्दर इच्छित दाब रखा जा सकता है । यहीं रेडियो प्रसारण-यंत्र, टेलीविजन कैमरे, यात्रियों के लिए खाना तथा अन्य यंत्र होते हैं। इतना सब होते हुए भी इसमें काफी जगह होती है । इतनी जगह कि यात्री अच्छी तरह सो सके और आराम कर सकें। तुम्हें मालूम है कि अपोलो ८, ६, १० और ११ की यात्राओं में सव यात्री खूब सोये थे। सेवा-कक्ष अपोलो-यान के हर अंग को कार्य करने के लिए विजली की जरूरत होती है। विजली पैदा करने के लिए यान में मोटर की बैटरियां तो रखी नहीं जा १. प्रक्षेपण निकास टावर सकती क्योंकि वे बहुत भारी होती २. आदेश-कम ३. सेवा- हैं, इसलिए उसमें इंधन (फ्यूल) सेल रखे जाते हैं । ये ऑक्सीजन और (मेरे यान के विभिन्न कक्ष) १ भिमा कक्ष४. चन्द्रकक्ष ७६ अपोलो : चन्दा के देश में हाइड्रोजन को मिलाकर पानी बनाते हैं। इस क्रिया के दौरान बिजली पैदा हो जाती है। इस प्रकार फ्लू सेल से यंत्रों को चलाने के लिए बिजली और यात्रियों को पीने के लिए शुद्ध पानी मिल जाता है। ये ईंधन सेल यान के सेवा-कक्ष में रखे जाते हैं। इनके अलावा सेवा-कक्ष में अन्य महत्त्वपूर्ण यंत्र होते हैं। इनमें एक प्रमुख यंत्र है ६,१०० किलोग्राम प्रघात पैदा करने वाला इंजन । इस इंजन की मदद से यान की दिशा ठीक की जा सकती है। सेवा-कक्ष में १६ थस्टर राकेट तथा हीलियम, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैसों के टैंक होते हैं । आदेश-कक्ष के नीचे स्थित सेवा-वक्ष वेलन के आकार का होता है, जिसकी लम्बाई होती है साढ़े छह मीटर । यह २३ सेंटी- मीटर मोटी एल्यूमीनियम की जालीदार चादरों से बना होता है । क्योंकि उत्तरते समय यात्री इसे अंतरिक्ष में ही छोड़ आते हैं इसलिए इसके ऊपर एबलेटिव की परत नहीं चढ़ाई जाती। चन्द्र-कक्ष मेरे यान में केवल चन्द्र-कक्ष ही चांद पर उतरता है । मुख्य यान चाँद के ११२ किलोमीटर ऊपर ही रहकर परिक्रमा करता रहता है । चन्द्रमा पर उतरने के लिए यात्री आदेश-कक्ष में से चन्द्र-कक्ष में चले जाते हैं। पहले चन्द्र-कक्ष सेवा-कक्ष के नीचे रखा रहता है; पर वाद में, यान के पृथ्वी की परिक्रमा करने के दौरान, अलग होकर आदेश-कक्ष के ऊपरी हिस्से से जुड़ जाता है । चन्द्र-कक्ष को कभी वायुमंडल में से नहीं गुजरना पड़ता, इसलिए उसके ऊपर कोई एवलेटिव-तह नहीं चढ़ी होती। मेरे यान का चन्द्र-कक्ष देखने में बहुत बड़े मकड़े जैसा अपोलो : चन्दा के देश में - लगता है । अपोलो-११ के चन्द्रयान का नाम है 'ईगल' (गिद्ध)। इसके दो हिस्से हैं । ऊपरी हिस्से में यात्री बैठते हैं । चन्द्रमा पर उतरने के बाद भी यात्रियों को अपना अधिकांश समय इसमें ही विताना पड़ता है, इसलिए इस हिस्से को लगभग वैसा ही बनाया जाता है जैसा आदेश-कक्ष का यात्री-केबिन । इसमें वेतार के यंत्र, टेलीविजन कैमरे, यान चलाने के यंत्र, यात्रियों के लिए भोजन और १,६०० किलोग्राम प्रघात पैदा करने वाला एक राकेट इंजन होता है । वाहरी ओर १६ श्रस्टर लगे रहते हैं, जिनकी मदद से कक्ष को चांद पर उतरने में आसानी होती है । चन्द्रमा से वापिस लौटते समय कक्ष का केवल यह हिस्सा ही ऊपर उठता है, इसलिए इसमें आदेश-कक्ष से जुड़ने के लिए उपकरण होते हैं। चन्द्र-कक्ष का निचला हिस्सा बाद में चांद पर छूट जाता है। उसमें चांद पर उतरने का राकेट, भूकम्प मापने के यंत्र तथा अन्य उपकरण, जो वैज्ञानिक चाँद पर ही छोड़ देना चाहते हैं, लगे रहते हैं । नीचे के हिस्से में चार पर होते हैं, जिनको मदद से वह चांद पर आसानी से उतर सकता है। पूरा चन्द्र- कक्ष ७ मीटर ऊँचा और १५,११० किलोग्राम भारी होता है मेरे यान के बनाने वाले मुझे आदमी को ऐसी जगह पहुँचाना था जहां वह कभी नहीं गया था। मेरे मार्ग में बहुत-से खतरे थे और मुझे अपने यात्रियों को उनसे बचाना था। इसलिए मेरे हर पुर्जे को अत्यन्त सावधानी से बनाया गया। बनाने के बाद हर पुर्जे को बहुत बारीकी से परखा गया। पर वैज्ञानिकों को इस जांच-परख से पूरा संतोप नहीं मिलता इसलिए वे हमेशा ऐसा प्रबन्ध रखते हैं

७८
अपोलो : चन्दा के देश में
कि एक व्यवस्था के गड़बड़ होने पर दूसरी व्यवस्था अपने-आप
कार्य कर सके।
जैसा मैं तुम्हें ऊपर बता चुका हूँ, मेरे यान को बनाने में
अमेरिका की २० हजार से भी अधिक छोटी-बड़ी कम्पनियों ने
भाग लिया है-वैसे मेरे आदेश और सेवा कक्षों को बनाने
वाले हैं-नाथं अमेरिकन राकवैल कारपोरेशन । चन्द्र-कक्ष के
निर्माता हैं--ग्रमैन एयरक्राफ्ट एण्ड इंजीनियरिंग कारपोरेशन ।
इन यानों तथा राकेट के पुजों को जोड़ने का काम 'साफ कमरों'
में किया जाता है। इन साफ कमरों में किसी भी प्रकार से धूल
नहीं आनी चाहिए, क्योंकि रेत का एक बहुत छोटा कण भी
यात्रा को असफल कर सकता है।
११. मेरी यात्राएँ
अपनी अनोखी यात्राओं का वर्णन करते समय मुझे बहुत गर्व
है। मैंने (अपोलो-११) अब वह कर दिखाया है जो आज
तक कोई नहीं कर सका । मैंने आदमी को चांद पर विजय
दिलाई । २०-२१ जुलाई, १९६६ की रात को १ बजकर ४७
मिनट पर मेरा चन्द्रयान आदमी को लेकर चांद पर जा उतरा!
इसके बाद सुबह ८ बजकर २७ मिनट पर सबसे पहले आदमी
ने चाँद पर कदम रखा । चाँद पर उतरने वाले सबसे पहले
मनुष्य हैं अपोलो-११ अभियान के नेता नील आर्मस्ट्रांग । उसके
२० मिनट बाद उनके साथी एल्ड्रिन उतरे ।
जहाँ मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने आदमी को चाँद पर
पहुँचा दिया, वहाँ मुझे इस बात का दुःख है कि मेरी, आदमी
को अन्तरिक्ष में ले जाने वाली पहली यात्रा की तैयारी में तीन
अन्तरिक्ष यात्री शहीद हो गए । २७ जनवरी, १९६७ को वजिल
A

भोतो: चन्दा के देश में
७६
ग्रोशम, एडवर्ड व्हाइट आर० रोगर, बो. शेपो यान में आग पग
जाने के कारण मृत्यु को प्राप्त हुए। जिस समय आग लगी,
यान धरती पर ही था। ये तीनों यानी उसके लगभग सीन
सप्ताह बाद उड़ान भरने वाले थे। इस घटना से गुश पहरा
दुःख हुआ और मेरा कार्यक्रम कुछ ढीला भी पड़ गया। पर
शीघ्र ही वैज्ञानिकों ने उन दोपों को दूर कर दिया जिनके कारण
आग लगी थी।
अब तक कुल मिलाकर ११ उड़ाने कर गुफा है जिनमें से
तीन अग्निकांड से पहले की है । इन उड़ानों में कोई यानी नहीं
था और उनमें कोई परेशानी नहीं हुई । अग्निकांड के बाद मैंने
तीन और बिना मानव को उड़ाने की। इसके बाद सातयी,
आठवीं, नौवीं, दसवीं तथा 'चन्द्रमा-विजयी' ग्यारहवीं उद्यान में
प्रत्येक में तीन-तीन यात्री थे।
चौथी उड़ान
अपनी चौथी उड़ान मैंने संटर्न-५ राकेट री ६ नवम्बर,
६७ को की । इस उदान में संटनं-५ ने आशातीत काम किया।
मैंने पहली बार १,२६,२४१ किलोग्राम वजन (आदेश-यक्षा बोर
सेवा-कक्ष) को पृथ्वी से १८४ किलोमीटर ऊपर एक यक्षा में
स्थापित कर दिया। उस समय तक इतना घजन अंतरिक्ष में नहीं
भेजा गया था। परिक्रमा करते समय यान के सवा-काने स्वतः
ही कक्षा बदली और आदेश-कक्ष को उतनी गति से धरती की
ओर फेंका जितनी गति से यह चन्द्र-यात्रा से वापिस बाता।
आदेश-कक्ष सही सलामत घरती पर या पहुँचा।
पांचवीं उड़ान
ममी तक मेरे दो ही कक्षा थे। पांचवीं उड़ान में मेरे

अपालो : चन्दा के देश में
चन्द्र कक्ष भी जुड़ गया। इस उड़ान का उद्देश्य ही चन्द्र-कक्ष
तथा सैटर्न-१ बी राकेट के एस-४ वी खंड की क्षमता
परखना था।
२२ जनवरी, ६८ को की गई उड़ान में वही सैटर्न-१ वी
राकेट प्रयोग किया गया जिसमें एक साल पहले आग लगी थी।
उड़ान के दौरान चन्द्र-कक्ष के ऊपरी और निचले, दोनों
भागों से पृथ्वी की कक्षा में वही कार्य कराया गया जो वे चाँद
पर करते हैं । यह उड़ान ७ घंटे ५० मिनट की थी।
छठी उड़ान
यान में आदमी बैठकर अंतरिक्ष में भेजने से पहले वैज्ञानिक
राकेट तथा यान के सब अंगों को भली-भांति परख लेना चाहते
थे । मेरी छठी उड़ान इसी उद्देश्य से की गई थी। इसमें सैटर्न-५
राकेट इस्तेमाल किया गया । उड़ान के कुछ सैकिण्ड बाद राकेट
के दूसरे खंड के इंजनों के ठीक कार्य न करने से पूरी सफलता
तो नहीं मिली, परन्तु वैज्ञानिकों को बहुत-सी नयी वातें मालूम
हुई।
सातवीं उड़ान
११ अक्तूबर, १९६८ को सातवीं उड़ान आदमियों को चाँद
पर ले जाने का पहला अभ्यास था। इसमें आदेश-कक्ष में वाल्टर
कनिंघम, वाल्टर शिर्रा और डान आइजल नामक ३ यात्री
सवार थे।
११ अक्तूवर, १९६८ को आरम्भ की गई इस यात्रा में मैंने
पृथ्वी की १६३ परिक्रमाएँ की और ७२ लाख कि० मी० की दूरी
तय की।
तीसरी परिक्रमा के दौरान राकेट का दूसरा खंड जलकर

अपोलो : चन्दा के देश में ८१ गिर गया। शिरी ने यान से बाहर निकलकर इस जले हुए भाग को पकड़ने की कोशिश की । वे उस भाग के २१ मीटर पास तक पहुँच गये। इस प्रयास में यात्रियों को मुख्य यान की गति को दो बार घटाना-बढ़ाना पड़ा। जले हुए भाग से सफलतापूर्वक संगमन करके और यान की गति को नियंत्रित करके यात्रियों ने यह दिखला दिया कि चन्द्र- यात्रा के दौरान कुछ गड़बड़ी हो जाने पर, मुख्य यान चन्द्र-कक्ष की मदद कर सकता है। बस, उड़ान के दौरान पहली बार यात्री अपना अंतरिक्ष सूट उतारकर आनन्द से झूलने वालो खाट पर सोये । उन्होंने टेलीविजन से पृथ्वी तथा बाहर के दृश्यों को पहली बार पारेपित भी किया। ११ दिन अंतरिक्ष में घूमने के बाद, २२ अक्तूबर को यान सकुशल अंध महासागर में उतर आया । आठवीं उड़ान सात उड़ानों में सफलता प्राप्त करने के बाद आठवीं उड़ान में वैज्ञानिकों ने मुझे चन्द्रमा के अधिक निकट भेजने की सोची। यह उड़ान मैंने २१ दिसम्बर, १९६८ को शाम के ६ बजकर २१ मिनट पर की। इसमें मेरे यात्री थे—फ्रेंक बोरमैन, जेम्स लावेल और विलियम एण्डर्स । बोरमैन नेता थे, लावेल आदेश-कक्ष के पायलेट और एण्डर्स चन्द्र-कक्ष के पायलेट । इस उड़ान में मेरे यान को चन्द्रमा की कक्षा में स्थापित होकर उसकी परिक्रमा करके वापिस आना था। यह मेरी ग्यारहवीं यात्रा (चन्द्र-विजय-यात्रा) का पूर्वाभ्यास था। सटर्न-५ राकेट से छोड़े जाने पर यान १६० किलोमीटर ऊपर जाकर पृथ्वी को ८२ अपोलो : चन्दा के देश में परिक्रमा करने लगा। वहाँ से पूर्व-निश्चित समय पर अपनी गति बढ़ाकर चाँद की ओर बढ़ चला। रास्ते में उसने अपनी गति इतनी कम कर ली कि वह चांद से ११२ किलोमीटर ऊपर रहकर उसकी परिक्रमा कर सके । इस यान ने चाँद की २० परिक्रमाएँ की और छः दिन तीन घंटे विचरण करने के बाद सकुशल धरती पर आ गया। यात्रा के दौरान यात्रियों ने टेलीविजन से चाँद और धरती के चित्र लिये और धरती पर संदेश भेजे। नौवीं उड़ान नौवीं उड़ान में मैंने धरती के इर्द-गिर्द घूमकर ही वह कर दिखाया जो चन्द्रमा की यात्रा के समय करता। इसमें मेरे यात्री थे जेम्स मैकडिविट, डेविड स्कॉट और रसेल श्वेकार्ट । ३ मार्च १९६६ को आरम्भ की गई १० दिन की इस उड़ान में मेरे यान के तीनों कक्षों-आदेश-कक्ष, सेवा-कक्ष और चन्द्र- कक्ष ने भाग लिया। इसमें चन्द्र-कक्ष को आदेश-कक्ष से मुक्त करके अंतरिक्ष में घुमाया गया और उसे फिर से मुख्य यान से मिलाया गया । चन्द्र-कक्ष में यात्री थे मैकडिविट और श्वेकार्ट। मुख्य यान के पास आते समय श्वेकार्ट ने खुले अंतरिक्ष में दो घंटे तक विचरण किया। दसवीं उड़ान मेरी दसवीं उड़ान आखिरी अभ्यास था। इसमें मैंने वह सब काम किया जो चन्द्र-यात्रा के दौरान करता। केवल चांद पर उतरा नहीं। इसका उद्देश्य चन्द्र मार्ग निश्चित करने के साथ- साथ उस स्थान को देखना भी था जहां मैं चांद पर उतरता । इस उड़ान में मेरा चन्द्र-यान चाँद से केवल १५ किलोमीटर दूर

८४
अपाला चन्दा कम
का भी अभ्यास कराया गया। प्रयोगों के लिए बनाई गई 'चांद
की भूमि' पर उन्हें कई वार उतारा गया, वैसे ही, जैसे वे असल
चाँद पर उतरते।
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4
अपोलो-११ के तीन यात्री
वाए से दाए :
१. नील आर्मस्ट्रांग २. माइकेल कॉलिन्स ३. एडविन एल्डिन
इन यात्रियों में नील आर्मस्ट्रांग अभियान के नेता थे। कॉलिस
आदेश-कक्ष के पायलट और एल्ड्रिन चन्द्र-कक्ष के पायलट । इनमें
से आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन को ही चाँद पर उतरना था। कॉलिन्स
को आदेश-कक्ष में ही चाँद की परिक्रमा करनी थी। यात्रा से
पहले सैटर्न-५ और मेरे यान को कई-कई वार परखा गया।
६ जुलाई की शाम को मैं केप कैनेडी पर पूरी तरह लैस खड़ा
था। अगले दिन, १० जुलाई को, सुवह ठीक ५ बजकर ३०
मिनट

अपोलो: चन्दा के देश में पर मेरा काउंट-डाउन शुरू हुआ। यह मेरे प्रक्षेपण से ६३ घर पहले शुरू हो गया था । वैज्ञानिकों ने इसमें ४० घंटे का समन पुजों की मरम्मत के लिए (यदि वह जरूरी हुई तो) रखा था काउंट-डाउन के दौरान मेरे एक छोटे-से पुर्जे में मामूली खरावी पाई गई। वह शीघ्र ही ठीक कर ली गई और १६ जुलाई की शाम को मैं चन्द्र-यात्रा के लिए हर तरह से तैयार था। मेरे यान में तीनों यात्री बैठे हुए थे। लाखों दर्शक मेरी उड़ान देखने के लिए खड़े थे। करोड़ों आदमी अपने घरों में ही टेलीविजन पर मुझे देख रहे थे । संसार के हर देश में, हर कोने में बस मेरी ही चर्चा थी । ठीक ७ वजकर २ मिनट पर मेरा काउंट-डाउन समाप्त हुआ और मेरा वाहक संटनं-५ भयंकर गर्जना करता हुआ तथा लम्बी लपटें निकालता हुआ मुझे ऊपर ले उड़ा। संटनं-५ का प्रक्षेपण (परती छोड़ते हुए)

८६
अपोलो : चन्दा के देश में
शुरू में मैं ६६०० किलोमीटर प्रति मिनट के हिसाब से ऊपर
उड़ा । पर शीघ्र ही मेरा वेग २८,००० किलोमीटर प्रति घंटा हो
गया और फिर ४०,००० किलोमीटर । राकेट के छूटने के १२.
मिनट के अन्दर ही मैं धरती से १८४ किलोमीटर ऊपर उठ
चुका था और सैटर्न राकेट के दो खंड जल चुके थे। यान अव
धरती की परिक्रमा करने लगा। अभी तक अन्तरिक्ष यात्री
रेल के यात्रियों के समान बैठे थे । अव उन्होंने भी कुछ कार्य
करना शुरू कर दिया। ठीक अवसर जानकर उन्होंने राकेट के
तीसरे खंड के इंजन को फिर से चालू किया और मैं पृथ्वी की
परिक्रमा करना छोड़ चन्द्रमा की ओर तेजी से ( एक घंटे में
४०,००० किलोमीटर के वेग से ) बढ़ चला। उस समय रात के
६ बजकर ४६ मिनट हुए।
।
Roman-amanav
X
wom
अपोलो-११ चांद की ओर
चाँद की ओर बढ़ते हुए यात्रियों को एक जरूरी काम करना
था । चन्द्र-कक्ष को सेवा-कक्ष से अलग करके आदेश-कक्ष
ऊपर जोड़ना था। यह काम बहुत सरलता से हो गया। मैं अब

अपोलो: चन्दा के देश में ८७ पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल की पकड़ से बाहर निकलता जा रहा था। राकेट के इंजन बन्द कर दिये गये । इससे मेरी गति कम हो गई; पर मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ा जा रहा था। बीच-बीच में स्वचालित यंगों की मदद से यान का मार्ग ठीक करते रहने और नियत समय पर प्रक्षेपण स्थल के वैज्ञानिकों से बेतार यंत्रों द्वारा वातचीत करने के सिवाय यामियों को कोई खास काम नहीं था। इसलिये ये १७ और १८ जुलाई को काफी देर तक सोये। आसिर १६ तारीस को रात को १० बजकर ५६ मिनट पर उड़ान शुरू होने के ७५ घटे और ५४ मिनट बाद, में चांद की कक्षा में जा पहुँचा। रेट्रो राकेट छोड़ कर मेरी गति कम की अपोतो-११का चन्द्र की कला में प्रवेश गई और मैं चांद से केवल ११२ किलोमीटर कपर रहकर चाँद की परिक्रमा करने लगा। १९-२० को रात को एल्डिन ने चन्द्र कक्ष की जांच की और वे पुनः मादेग-कक्ष में लौट आदे।।

अपोलो: चन्दा के देश में पर उतरते समय यात्रियों को विल्कुल स्वस्थ रहना था। इस लिये २० तारीख को वे दिन-भर सोये और आराम किया। उस दिन शाम को आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन चन्द्र-कक्ष में पहुँच गये। चाँद पर आदमी उतर गया २०-२१ जुलाई की रात को ११ बजकर २० मिनट पर उन्होंने चन्द्र-कक्ष को आदेश-कक्ष से अलग कर दिया और फिर चन्द्रयान मुख्य यान से अलग होकर चाँद की ओर १२ वजकर ४४ मिनट पर चन्द्र-कक्ष चांद की ओर चल पड़ा। १ घण्टे ३ मिनट चलने के बाद वह ठीक १ बजकर ४७ मिनट पर ( २०-२१ जुलाई की रात को ) चाँद पर जा उतरा ! जैसा मैं तुम्हें बता चुका हूँ, मुझे शांति सागर बहुत प्रिय है । मैं वहीं उतरा। उतरते समय एल्ड्रिन ने बहुत सावधानी बरती । जहाँ चन्द्र-कक्ष को उतरना था वहाँ उन्हें एक बड़ा विवर दिखाई देया। उन्होंने झट से यान को दूसरी ओर मोड़कर ठीक सतह अपोलो: चन्दा के देश में चन्द्र-यान चांद पर सकुशल जा उतरा पर उतार दिया । उतरते ही यात्रियों ने टेलीविजन कैमरे चालू कर दिये । हर देश मै घर बैठे लोगों ने टेलीविजन सैट पर उन्हें देखा। यह तो में बता हो चुका हूँ कि वे धरती पर बैठे वैज्ञानिकों से परावर बात कर रहे थे और आदेश कर रहे थे। अब आर्मस्ट्रांग और एल्डिन चांद पर थे और चाहते तो चाँद की भूमि पर एकदम उतर आते । पर बहुत उतावले होते हुए भी (आर्मस्ट्रांग और एल्डिन के दिल उम समय बहुत तेजी से धड़क रहे थे) पहले उन्होने अपने कक्ष के पुजों की जांच की, क्योंकि उन्हे उसी कक्ष मे बैठकर वापिस आदेश-कक्ष तक पहुंचना था। जांच करने के बाद उन्होने कुछ देर आराम किया और सुबह ८ बजकर २७ मिनट पर आर्मस्ट्राग ने चांद की भूमि पर अपना पर रखा। उन्हें चांद की भूमि पर रेत मिला । पर उसके नीचे हो कशेर भूमि या| उना पहला कदम किमो भो मनुष्य का चांद पर पहला कदम था। कहते है उसके निशान लाखो वर्ष

अपोलो : चन्दा के देश
तक बने रहेंगे क्योंकि चाँद पर न तो रेत उड़ता है और न ही
पानी बरसता है।
.
चांद पर चहलकदमी
[ इस चित्र में एडविन एल्ड्रिन चांद पर चलते हुए
दिखलाई पड़ रहे हैं । उनके सिर पर लगे हुए लोहे
के टोप के सामने वाले हिस्से में एक दूसरा चित्र
भी दिखलाई पड़ रहा है। वह दूसरा चित्र एल्ड्रिन
के सामने खड़े हुए आर्मस्ट्रांग व उसके कैमरे के
प्रतिबिम्ब का है।]

अपोलो: चन्दा के देश में ६१ - चाँद पर चहलकदमी आर्मस्ट्रांग के उतरने के २० मिनट बाद एल्ड्रिन भी चांद पर उतर आये। फिर ये दोनों चांद पर चले और कंगारू की तरह उछले । वहां इन्होंने अपने साथ लाया हुआ अमेरिका का झंडा गाड़ा, ७० देशों के शांति-संदेश रखे, एक विशेष प्लेट छोड़ी, लेसर उपकरण, टेलीविजन कैमरे, भूकम्पमापी तथा अन्य यंत्र रखे। वहां इन्होंने एक-दूसरे के चित्र खीचे । जब ये चांद पर ही थे कि अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन ने रेडियो टेलीफोन द्वारा इनसे बातचीत की। चांद पर ये जो भी हरकतें कर रहे थे, पृथ्वी पर लोग टेलीविजन द्वारा सब देख रहे थे। ये स्वयं भी चाद का 'आँखों देखा हाल' लोगों को ऐसे बता रहे थे जैसे क्रिकेट मैच का हाल बताया जाता है । उन्हें चांद उजाड़ होते हुए भी बहुत सुन्दर लगा । यद्यपि वे चन्द्र-कक्ष से दूर नहीं गये थे, पर फिर भी उन्होंने एक ऊंचा पर्वत देखा। चांद पर ये मुख्य रूप से वहां की मिट्टी का नमूना लेने गये थे, इसलिए उन्होंने लगभग १०-१० किलो के मिट्टी के दो ऐसे नमूने इकट्ठे किये जो काफी हद तक प्रतिनिधि थे । ये दोनों यात्री चांद की भूमि पर लगभग २ घंटे रहे । आर्म- स्ट्रांग २ घंटे १५ मिनट रहे और एल्ड्रिन १ घंटा ५० मिनट । फिर अपने चन्द्र-कक्ष में वापिस आ गये। इसके उपरान्त रात को ११ बजकर २३ मिनट पर चन्द्र-कक्ष उन्हें ले उड़ा । जैसा मैं बता चुका हूँ, चन्द्र-कक्ष का केवल ऊपरी हिस्सा ही ऊपर उठता है, निचला हिस्सा वहीं रह जाता है । चन्द्र-कक्ष कुछ देर बाद भादेश-कक्ष से आ जुड़ा। चन्द्र यात्रा में सबसे बड़ी कठिनाई है चन्द्र-कक्ष का आदेश- कम में जुड़ना । इसके लिए पहले चन्द्र-कक्ष को उसी कक्षा में

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अपोलो: चन्दा के देश में
इस यात्रा में चन्द्र-वक्ष के जुड़ने में थोड़ी दिक्कत अवश्य
हुई थी, पर यात्रियों की सूझबूझ के कारण यह कार्य जुलाई
२१-२२ की रात को ३ बजे भली-भांति सम्पन्न हो गया । चन्द्रयान
जुड़ने के बाद आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन आदेश-कक्ष में आ गये।
फिर चन्द्र-कक्ष को फेंक दिया गया । अब यात्रियों को पृथ्वी को
ओर बढ़ना था । यह कार्य भी लगभग उतना ही मुश्किल है
जितना पृथ्वी की पकड़ से निकलकर चांद की ओर बढ़ना ।
इसके लिए आदेश-पक्ष की गति, जो इस समय ५८०० किलो-
मीटर थी, बढ़ाकर ८८५० किलोमीटर प्रति घंटे करनी जरूरी
थी। गति बढ़ाने के लिए सेवा-कक्ष में लगे राकेट दागे गये
और २२ तारीख को सुबह १० बजे आदेश-कक्ष पृथ्वी को ओर
चल पड़ा।
.
अपोलो-११ को पृथ्वी की ओर वापसी
यान ने चांद से धरती का मार्ग लगभग उसी तरह तय किया
जैसे चांद की ओर बढ़ते समय तय किया था। इस बीच भी
यात्रियों ने यान का मार्ग ठीक किया और आराम किया। यान

६४ अपोलो : चन्दा के देश में का वजन कम करने के लिए यात्रियों ने अंतरिक्ष में हो सेवा- कक्ष को गिरा दिया । २४ जुलाई की रात को १० वजकर ८ मिनट पर यान ने वायुमंडल में पुनः प्रवेश किया। उस समय थोड़ी देर के लिए पृथ्वी के वैज्ञानिकों से उनका सम्पर्क टूट गया था। पर वह शीघ्र ही ठीक हो गया । यात्रियों ने पैराशूट खोले और कुछ मिनटों बाद ही १० बजकर ३० मिनट पर यात्रा आरम्भ करने के लगभग १६५ घंटे १८ मिनट २० सैकिण्ड वाद यान प्रशान्त महासागर में, हवाई द्वीप समूह के लगभग १००० किलोमीटर दूर, सकुशल उतर गया । मौसम खराव होने के कारण पहले से तय किया गया उतरने का स्थान बदलना पड़ा था । पहले से इंतजार करते हुए गोताखोरों ने उन्हें कीटाणु- नाशक दवाइयां और कपड़े दिये । यात्रियों ने अपने ऊपर कीटाणु- नाशक दवाइयां छिड़की और अंतरिक्ष सूट उतारकर दूसरे कपड़े पहन लिये। फिर गोताखोर उन्हें विमानवाहक पोत 'होरनेट' में ले गये । इस पोत पर राष्ट्रपति निक्सन उनके स्वागत के लिए तैयार थे, पर निवसन उनसे मिल नहीं पाये। उन्होंने उन्हें दूरबीन से ही देखा । अंतरिक्ष-यात्रियों को होरनेट' के एक विमान में बने विशेष कक्ष, संघरोधो ( क्वारन टाइन ) कक्ष में रखा गया। जहाँ जल्दी से उनकी स्वास्थ्य-परीक्षा की गई और फिर विमान द्वारा ह्य रटन अंतरिक्ष केन्द्र के विशेष संघरोधी कक्ष में १२ अगस्त, १९६६ तक के लिए फिर से बन्द कर दिया। इस विशेष कक्ष में किसी भी तरह के कीटाणु प्रवेश नहीं कर सकते। कुछ वैज्ञानिकों का मत था कि चाँद पर विशेप किस्म के कीटाणु मौजूद हो सकते थे। यदि वहाँ कीटाणु थे तो वे यात्रियों के सूट आदि पर चढ़कर धरती पर आ सकते थे।

अपोलो: चन्दा के देश में संघरोधी कक्ष में इन सम्भावित कीटाणुओं पर नियंत्रण किया गया। अच्छा बताओ, इस यात्रा में मैं कितना चला? ८,००,००० किलोमीटर । तुम कह सकते हो, चांद तो धरती से ३,४०,००० किलोमीटर दूर है; फिर मुझे ८ लाख किलोमीटर क्यों चलना पड़ा?-चांद और पृथ्वी, दोनों ही अपनी कक्षा में आगे बढ़ते रहते हैं। १३. चांद की मिट्टी जैसा कि मैं ऊपर बता चुका हूँ, अपोलो-११ के यात्री अपने साथ चन्द्रमा की २० किलोग्राम मिट्टी और चट्टाने लाये थे। इनमें ७.५ किलोग्राम पत्यर और १२.५ किलोग्राम बारीक धूल है। तुम पढ़ चुके हो कि मेरो बारहवीं यात्रा का एक उद्देश्य वहाँ की मिट्टी लाना था, इसलिये मिट्टी के परीक्षण के लिये हाऊसटन शहर में पहले से ही एक विशेष प्रयोगमाला-स्थापित कर ली गई । इस प्रयोगशाला को अंतरिक्ष किरणों से बचाने के लिये विशेप प्रवन्ध किया गया है। इसमें अनेक देशों के विशेषज्ञों ने चांद की चट्टानों और धूल के परीक्षण किये । इन परीक्षणों से चांद के बारे में बहुत सी नई जानकारियां प्राप्त हुई हैं । चट्टानों और धूल पर उल्काओं के निरन्तर गिरते रहने के स्पष्ट चिन्ह हैं । वे उन चट्टानों जैसी हैं जो पृथ्वी पर लावा से बनी हैं। कुछ चट्टानें काफी भारी पाई गई। उनमें जिन खनिजों को बहुतायत है, उनके नाम तुम्हारे लिये कुछ अटपटे से हैं, पर ये सब पृथ्वी को चट्टानों में पाये जाते अपोलो : चन्दा के देश में हैं । ये हैं-वलीनोपाइरोक्सीन, प्लेजिओक्लेज इल्मेनाइट, ट्रोइलाइट आदि। चांद की धूल में ये सब खनिज तो हैं ही,कांच की मात्रा भी बहुत अधिक है। धूल का लगभग आधा भाग कांच ही है। कांच का नाम पढ़ कर तुममें से अधिकांश बच्चे इस पेशोपेश में होंगे, जव वहां कोई भी जीवधारी नहीं है तो फिर कांच के कारखाने कैसे खुल गये और इतना कांच कैसे बन गया कि वह धूल में भी मिल गया हो । मैं तुम्हें बताऊँ कि भूगर्भ-शास्त्रियों के अनुसार 'कांच' लावा के जमने से बनने वाली ऐसी चट्टानें हैं जिनमें मुख्य रूप से सिलीका ही होता है, और यह ही चांद की धूल में मौजूद है। तुममें से बहुत से वच्चे, खास तौर से वे, जो विज्ञान के विद्यार्थी हैं, जानते हैं कि नीलाथूथा, हीरा कसीस, धोवन सोड़ा जैसे बहुत से रवेदार पदार्थ रवे बनाते समय पानी के कुछ अणु ग्रहण कर लेते हैं । पानी के इन अणुओं पर ही उस पदार्थ का रंग और रवे बनाना निर्भर होता है। इस पानी को रवों का जल कहते हैं। कुछ खनिज पदार्थों में भी रवों का जल मौजूद होता है । चांद की चट्टानों और धूल में जो खनिज पाये गये उनमें रवों का जल नहीं है। इससे वैज्ञानिकों ने यह अनुमान निकाला है कि चांद पर से पानी २ से ४ अरब वर्ष पहले ही, जव ये चट्टानें बनी थीं, गायब हो गया था। चांद की चट्टानों के बनने के तरीके भी पृथ्वी की चट्टानों के बनने से भिन्न हैं। तुम्हें मालूम है,धरती के सव पदार्थ ६२ तत्वों से बने हैं। इन ६२ तत्वों में से चन्द्र चट्टानों और धूल में वैज्ञानिकों को ६० तत्व ही मिले हैं । इनमें कई ऐसे हैं जो पृथ्वी पर बहुत अधिक मात्रा अपोलो: चन्दा के देश में में हैं पर चांद पर बहुत कम । वैसे चांद पर सोना और चांदी जैसे तत्व घरती के मुकाबले में बहुत थोड़ी मात्रा में हैं। चट्टानों को जांच करके वैज्ञानिकों ने जो नतीजे निकाले हैं उनमें से एक महत्वपूर्ण नतीजा यह है कि-'चांद के बिना पानी के सागरों में ज्वालामुखी नहीं फटते।' जीवाणु नहीं चट्टानों और धूल के परीक्षणों से यह मालूम हुआ है कि चांद पर किसी भी किस्म के जीवाणु नहीं हैं । वहां किसी भी प्रकार का जीवन नहीं है। धूल में जब मछली, चूहे और अन्य जीव रखे गये तो उन पर कोई भी असर नहीं पड़ा। इसका यह मतलब नहीं कि अगर चांद की मिट्टी में ठीक मात्रा में पानी और पोषक पदार्थ दिये जायें तब भी उसमें पौधे नहीं उग सकते । उसमें पौधे जरूर उग सकते और पनप सकते हैं। चांद को मिट्टी और चट्टानों के बारे में मैंने तुम्हें कुछ बताया। वैसे उनकी जांच अभी जारी है। मैं अपनी १२ वीं यात्रा में जो मिट्टी के नमूने लाया हूँ उनको जांच अधिक विस्तृत पैमाने पर की जायेगी। संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि मैं संसार की सबसे कीमती वस्तु चांद की मिट्टी लाया था। आज उस मिट्टी का एक कण पाने के लिये हर देश और हर वैज्ञानिक लालायित है। यह संसार को सब से मूल्यवान वस्तु है। जनता के सामने प्रदर्शित करने के लिये अमेरिका के स्मिथसोनिन संस्थान में एक टुकड़ा रखा गया है।

१४. चाँद पर दूसरी उड़ान मंरी ग्यारहवीं उड़ान पूरी तरह सफल हुई। मैंने आदमी को चाँद पर पहुँचाकर वापिस सकुशल पृथ्वी पर ला दिया। कुछ बच्चे कह सकते हैं कि अब मेरा काम समाप्त हो जाना चाहिए था । पर मैं तो हमेशा आगे बढ़ना चाहता हूँ। हमेशा प्रगति करना चाहता हूँ। मैंने आदमी को चाँद पर पहुँचा दिया है, पर अभी मनुष्य को चांद पर पूरी तरह विजय पानी है। उसे वहाँ रहना है और वहाँ से अंतरिक्ष यान प्रक्षेपित करके सुदूर ग्रहों और तारों को जाना है । इसलिए मुझे अभी कई बार चाँद की यात्रा करनी पड़ेगी। मेरी अगली नौ यात्राओं के कार्यक्रम तैयार हो रहे हैं। कहा जाता है कि अब हर वर्ष में तीन बार चाँद की यात्रा किया करूँगा । इस प्रकार वीसवीं उड़ान १६७२ में होगी। अपने इस कायक्रम के अनुसार मैंने १४ नवम्बर को अपनी बारहवीं उड़ान भरी। उस दिन रात को ह बजकर ५२ मिनट पर मेरी यात्रा आरम्भ हुई। यद्यपि उस समय मौसम ठीक नहीं था, आकाश में बादल छाये थे और वर्षा हो रही थी, पर मैं इन कठिनाइयों से नहीं घबराया और मैंने पहले से निश्चित समय पर ही उड़ान आरम्भ की। इस बार मेरे यात्री थे चार्ल्स कोनराड, रिचर्ड गोर्डन और एलन बीन । इनमें कोनराड अभियान के नेता थे, गोर्डन आदेश कक्ष के चालक और वीन चन्द्र कक्ष के । इससे पहले कोनराड जैमिनी-५ और १८

अपोलो : चन्दा के देवा में
६६
३. एलन वीन
अपोलो-१२ के चन्द्र यात्री
बांए से दाए:
१. चाल्स कोनराड २. रिचर्ड गोर्डन
जैमिनी-११ में अंतरिक्ष यात्रा कर चुके थे और गोर्डन उनके
सहयात्री थे। इस बारहवीं उड़ान में मेरे आदेश कक्ष का नाम
था 'यको क्लीपर' और चन्द्रयान का नाम 'इन्ट्रपिड' ।
मेरी चन्द्र विजय की प्रथम यात्रा के बारे में बहुत से लोगों
ने कहा था कि उसमें बहुत कम वैज्ञानिक परीक्षण किये गये थे।
इसलिये इस यात्रा का कार्यक्रम इस प्रकार बनाया गया था
जिसमें अधिक से अधिक वैज्ञानिक परीक्षण कर सकू। इस बार
मेरे चन्द्रयान को तूफान महासागर में उस स्थान के निकट
उतरना था जहां अप्रैल १९६७ में सर्वेयर-तीन उतरा था।
यहां यह बता देना चाहूँगा कि शांति सागर से १२०० किलोमीटर

Apolo Chandra Ke Desh Main

Author
Sharma Shyam Sundar
Title
Apolo Chandra Ke Desh Main
File name
Apolo Chandra Ke Desh Main
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2011/01
Publisher
Mathura,saraswati Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
98
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
546791
Barcode
4990010025288.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
Rights
Copyright permitted
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75F4tdCcBm2
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