Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Narendra Mohani

Babu Devakinandan · 2011/03

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बाबू देवकीनन्दन खत्री उपन्यास माला-2
नरेन्द्र-मोहिनी
न

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हिदी के सुप्रसिद्ध एव बहुचर्चित उपन्यास
बाबू देवकीनन्दन खत्री विरचित
नरेन्द्र-मोहिनी
-
शारदा प्रकाशन, नई दिल्ली-110002

सस्परष 1990
मूस्य
3500
मुडप
हिदुस्तान प्रिटम यामाएर राह दिन्न
विजयदेव शारी
शारदा प्रकाशन
16/एफ-3, असारी रोह,
दरियागज, नई दिल्ली- 110002
Narendra Mohini (Novel) by
Devki Nandan Khatrı

१ ३ "इस वक्त यह जगल सा भयानक मालूम पड रहा है । इस चादनी ने तो और भी रग जमाया है। पेडो में से छन कर जमीन पर पड़ी हुई दूर तक रिसाई देती है । बीच-बीच म पटे हुए पेडो की युनिया निगाहो के सामने पड कर मेरे दिल के साथ क्या काम करती हैं इसे मैं ही जानता हूँ |1" धीरे धीरे यह कहता हुआ बीस बाईस वप सिन का एक युवा बडे भारी और डरावने जगल मे इधर से उधर घूम रहा है। गोरा रंग, हर एक अग साफ और मुडौल, चेहरे से जवामी और बहादुरी बरस रही है, मगर साथ हो इसके पित्र और उदासी भी इसने खूबसूरत चेहरे से मालूम पड़ रही है। पूमते घूमते इस नौजवान बहादुर के कान म एक रोन की ददना आवाज आई जिसे सुनते ही वह चौंक उठा और इधर-उधर ध्यान लगा कर देखने लगा मगर दूसरी बार वह आवाज सुनाई न पडी । यह ददनाक आवाज ऐसी न थी जिसे सुन कर कोई भी अपन दिल को सम्हाल सकता । हमारा यह बहादुर नौजवान तो एकदम ही परेशान हो गया क्योकि यह जितना दिलेर और ताकतवर था उतना ही नेक और रहमदिल भी या। आवाज कान मे पड़ते ही मालूम हो गया था कि यह किसी कमसिन औरत की आवाज है जिस पर जरूर कोई जुल्म हो रहा है । आखिर इससे रहा न गया और यह आवाज की सीघ पर पश्चिम की तरफ चल निकला। पोडी ही दूर जान पर फिर वसी ही ददनाक आवाज इस बहादुर के बाई तरफ से आई जिसे सुन यह बाइ तरफ को मुडा और थोड़ी ही देर मे उस जगह जा पहुंचा जहा से पत्थर जसे कलेजे को भी गला कर बहा देने वाली वह मावाज आ रही थी। वहा पहुँच कर इसकी तबीयत और भी घबडाई खौफ, ताज्जुब और गुस्से से अजय हालत हो गई और कलेजा धन-धक करने लगा क्योंकि उस जगह पर एसा ही दृश्य नजर आया।

६ नरेद्र-मोहिनी जिस जगह यह जवान पहुँच कर खड़ा हुआ उसरे सामने ही एक बहा-सा पीपल का पेह था। आधी रात के इस सनाटे मे हवा लगो स उस पेड की पत्तिया खडखडा रही थी। उसी पेड की एक मोटी हाल के साथ एक लाश लटर रही थी जिसके पर मे रस्सी वधी हुई थी और सिर नीचे की तरफ था। इसी लाश को देखकर हमारे नौजवान बहादुर की वह दशा हुई थी जसा कि हम ऊपर लिख चुके हैं। उस लाश को देखकर नौजवान ने म्यान से तलवार खैच ली जो उसके कमर मे बधी हुई पी और आगे बढ़ा । पास जाने पर मालूम हुआ कि वह लाश एक औरत की है। साडी उसकी जमीन पर लटक रही थी और कई जगह से बदन नगा हो रहा था दोनो हाथ भी नीचे की तरफ लटक रहे थे। वह बहुत गोर से उस लाश को देखने लगा। इतने म ही हवा का एक तेज शटका आया जिसके सबब से पेड की तमाम छोटी-छोटी डालिया हिल हिल कर झोंका खाने लगी। वह डाली भी जो भद्रमा की रोशनी को उस लाश तक पहुँचने नहीं देती थी जोर से एक तरफ को हट गई और चद्रमा की रोशनी बहुत थोड़ी दर के लिए उस लाग के अपर पडो । साथ ही नौजवान के बिल्कुल रोगटे खडे हो गये क्योंकि उस औरत का चेहरा जो पेड के साथ बहोश उन्टी लटक रही थी उस चाँद से किसी तरह कम न था जिसकी रोशनी ने क्षण भर के लिये उसके बदन पर पड़ कर उसकी हालत नौजवान को दिखलाती थी। नौजवान का पाद की इस रोशनी मे एक बात और भी ताज्जुब को दिखाई पडी । वह उल्टी लटकी हुई औरत विल्कुल नहाक जेवरों से लदी हुई थी और इस बात को देख कर नौजवान के ग्वयाल कई तरफ दौडने लगे। वह जल्दी से उस लाश के पास जाकर देखने लगा कि इसम कुछ दम है या नहीं। नाक पर हाथ रक्खा, सास चल रही थी जिससे मालूम हुआ कि यह नाजुक औरत अभी तक जी रही है। अब इसकी तबीयत कुछ खुश रई और इसने इस बात पर कमर बाधी कि जिस तरह भी हो सकेगा इसे उतार कर इसकी जान बचाऊ गा और उस शतान के बच्चे को पूरी सजा दूगा जिसने इसके साथ ऐसी बुराई की है। यह सोच कर वह बहादुर नौजवान पेड़ पर चढ गया और बहुत होशयारी साथ उस रस्से को खोला जिससे वह औरत लटक रही थी। उसे धीर धीरे नरेद्र मोहिनी जमीन पर छोडा और तब आप भी नीचे उतर आया और उसके पर से रस्सी खोल उसे सीधा कर पेट के साथ खड़ा कर दिया, मगर हाथ से थामे रहा जिसमे उसके बदन का तमाम खून जो बहुत देर तर उल्टे रहने के सबब स सिर की तरफ उतर आया था लौट कर तमाम बदन में फल जाय । कुछ देर बाद उस औरत न आख खोली और बठना चाहा । बहादुर नौ- जवान ने धीरे से पेड के सहारे उसे बठा दिया और पूछा ' अब मिजाज कैसा है " जिसके जवाब में वह कुछ न बाली, हा आख उठा कर च द्रमा की तरफ देखा फिर सिर नीचे करके बहुत धीरे धीरे बोलने लगी। औरत आपने मेरी जान बचाई। इसका बदला में किसी तरह पर नहीं दे सकती। अगर जम भर आपने जूठे बतन मांजू तो भी पूरा नहीं हो सकता। नौजवान इसके कहने की कोई जरूरत नही, मैंने तुम्हारे साथ कोई नेकी नहीं की बल्कि मैंने अपनी भलाई की वि अपन को पाप का भागी होने से बवाया । मैंने अपनी जान लहा कर तुम्हारी जान नहीं बचाई, राह चलते इस जगह आ पहुँचा और तुमको इस हालत में देख कर जो कुछ हो सका किया । मैं तो क्या कोई पत्थर के कलेजे वाला भी इस जगह आकर तुम्हारी-सी औरत को ऐसी दशा मे देखता तो बिना बचाये भला कही जा सकता था? तिस पर जो जरा भी जानता होगा कि ईश्वर कोई चीज है उससे तो स्वप्न में भी कभी ऐसा न होगा इसलिए मैंने अपनी ही भलाई को कि अपने को राक्षस कहलाने से बचाया। इस बीच मे कई दफे हवा के झोंके आये जिहोंने उस पीपल की डालियो को हटा हटा कर चद्रमा की रोशनी को उन दोनो तक पहुँचने दिया जिससे एक को दूसरे ने कुछ अच्छी तरह देखा 1 हर दफै उस नाजुक औरत ने मीठी- मोठी बातें कहत उस नौजवान की सूरत को देखा मगर देख देख सिर नीचा कर लिया तथा बात खतम होने पर यह जवाब दिया औरत मुझे इतनी बुद्धि नहीं है कि आपकी इन बातो का जवाब दू । क्योकि आखिर तो औरत हूँ, ही में इतना जरूर कह सकती है कि आपने मेरे । साथ जो कुछ किया उसे मैं ही जानती हूँ, पहने की सामथ्य नहीं और बहुत बातें करने का यह मौका भी नहीं क्योंकि अगर हम लोग यहा देर तक रहगे तो जरूर ही हम तीनो ही की जान बुरी तरह जाएगी। है ८ नरेद्र मोहिनी नौजवान (ताज्जुब से) महा पर तो सिवाय हमारे तुम्हारे तीसरा कोई भी नहीं है । तब तुमन यह कसे कहा कि हम तीना की जान जायेगी? औरत (ऊ ची सास लेकर) हाय 1 मेरी बहन भी इसी जगह है। नौजवान (चौंक कर) हैं यहा पर तुम्हारी बहन भी है । कहा है 'जल्ली बताओ जिसमे उसके भी बचान की फिक्र की जाये । औरत (हाथ से बतला कर) इसी जगह गडी है । नौजवान अगर जमीन मे गडी है तो वह कब की मर गई होगी। औरत (चद्रमा की तरफ देख कर) नही नहीं, उसे गडे बहुत देर नहीं हुई है, मुझको लटकाने के बाद बदमाशो ने उसे गाडा है। सिवाय इसके वह एक बहुत लम्बे चौडे सदूक म रख कर गाडी गई है, अस्तु जरूर अभी तक जीती होगी। इतना सुनते ही वह नौजवान उठ खडा हुआ और उस औरत की बताई हुई जमीन को खजर से सोदने लगा, वह नाजुक औरत अपन हाथो से वहा की मिट्टी हटाने लगी। सदूर बहुत नीच नहीं गाडा गया था इसलिए उसके ऊपर वाला तख्ता बहुत जल्द निकल आयो । सदूक में ताला नही लग था। नौजवान ने आसानी से उसका पल्ला उठा कर किनारे किया और तब दानो ने मिल कर उस औरत को सदूक से बाहर निकाला जो उसके अदर बहोश पड़ी हुई थी। इसके बदन के भी जहाक थे और सोडी भी बेशकीमती थी। चेहरा साफ नजर नहीं आता था तो भी कुछ कुछ पडती हुई चद्रमा की रोशनी उसकी खूबसूरती को छिपा रहने नहीं देती थी। सन्दूक बाहर निक्लन और ठण्डी हवा लगन पर दो घडी के बाद वहीं जाकर उसे होश आया। तब तक यह नौजवान और वह नाजुक औरत अपने रूमाल और याचल से उसके मुह पर हवा करते रहे । होश मे आते ही उस औरत ने चौंक कर उस नौजवान तथा उस नाजुक औरत की तरफ देखा और धीरे-से बोली, 'बहिन, मेरी यह दशा कसे हुई उसने जवाब दिया ' यह वक्त इन सब बातो के पूछने का नहीं है । इस ममय हम लोगो को यही चाहिए कि सिवाम भागने के और कुछ न करें बल्कि जब कुल गहने 7 रेद्र मोहिनी ह के दूर न निकल जाएँ बात तक न करें, हा जन्म ईश्वर हम लोगो को किमी हफाजत की जगह पर पहुँचा देगा तब सबकुछ वह सुन लेंगे।" इतना सुनते ही वह उठ कर वठ गई और इधर उधर देखकर फिर बोली, 'बहिन, क्या हम लोग एसी जगह आ पर है कि सिवाय भागन के और कुछ भी नहीं कर सकते ? अगर ऐसा हो तो मैं भागन व । तैयार हूँ मगर कम से म इतना तो बता दो कि यह नौजवान जो तुम्हारे पास वठा है कोन ह और रे बगल में यह गडहा कसा है जिसम स क स दिखाई पड़ता है ? ' ओरत मैं जाप ही नहीं जानती कि यह बहादुर जिसने हम लोगो की जान बचाई कौन है, हा इस गड है और स दूक का हाल जानती हू मगर इस पमत सिवाय भागने के मुझे और कुछ नहीं सूझता। अगर तुम्हारे म भागन की ताकत न हो तो बोलो उठा कर तुम्हारे यहा निकाल ले जाने की फिक्र की दूसरी औरत नहीं नहीं, अब मैं बखूबी तुम लोगो के साथ चल सकती हूँ लो चलो मैं तयार हूँ। यह कह पर वह उठ खड़ी हुई और चलने को तयार हो गई। २ तीनो उस जगह में धीरे-धीरे रवाना हुए। उस नौजवान औरत ने जो पेड पर से उतारी गई थी कहा, 'मुझे आगे चलने दो क्योकि मै बहुत जल यहा मे निकल चलने का रास्ता जानती है, और तुम दोना चुपचाप मेरे पीछे पीछे आओ।" नौजवान औरत आगे हुई और सौपे पश्चिम की तरफ चल निकली, ये दोनो भी चुपचाप उसके पीछे पीछे जाने लगे। लगभग घडो भर चलने के बाद ये तीनो एक नदी के किनारे पहुँचे जिसका पाट बहुत घौडा न पा मगर इतना कम भी न पा मिक्मिी का फेंका हुआ पित्थर या ढेला उस पार पहुंच सकता। छोटी छोटी दो खूबसूरत किश्तियाँ किनारे पर खूटे से बंधी हुई दिखाई 'पही जिन पर सेने के लिए हलके हलके डाँडे भी पडे थे। वह नाजुब औरना 'उसी जगह सड़ी हो गई और अपन पोछे आने वाले दोनो से बोली, 'जल्ली इन म से किसी एक किश्ती पर सवार हो ना, देर मत करो।" यह सुन नौजवान नरेन्द्र मोहिनी अकेली। ने वहा पहिले तुम दोनो सवार हो लो फिर मैं भी सवार हो जाऊँगा।" यह कह अपने हाथ का सहारा दे दोनो औरतो को किरती पर सवार पराया मगर जब खुद चढने लगा तब उस नाजुक औरत ने रोका और कहा पहिले उस दूसरी पिरती को किनारे से खोल पर इस किश्ती के साथ बांध लो तब तुम सवार हा क्याकि उस किश्ती को भी मैं अपने साथ लेती चलूगी।" नौजवान दूसरी किश्ती को इसके साथ गांघ पर ले चलना वेफायदे है और हमारी विश्नी उसके साथ बघने से उतनी तेज न चल सकेगी जितनी औरत नही, जो मैं कहती हूँ उस करो, इसका सबब तुम्हें मालूम नहीं। बस अब देर रन मे हज होगा। जल्दी उस किश्ती को भी इसके साथ बाप भर तुम सवार हो जायो। नोजवान ने यह सोचकर कि शायद इसमे कोई भेद हो उस दूसरी किश्ती को किनारे स खोल अपनी किश्ती के साथ बांधा और खुद सवार होकर विश्ती किनारे से हटाने के बाद डॉड लेकर सेने लगा। औरत अब मेरा जी ठिकाने हुमा और जान बचने की उम्मीद हुई । यह सब आप को बदोलत है। अब आप इस तरफ आकर बैठिये, मैं किश्ती खेकर से चलती हूँ। नौजवान वाह । मैं बटू और तुम विश्ती खेओ। यह भी खूब कही' बस तुम दोना चुपचाप बठी रहो देखो मैं क्तिन तेज इसे ले चलता हूँ। तुम लोगो के तो जभी तक होश भी ठिकाने नही हुए होगे। हां यह तो बताओ कि अभी तक तो मुझको तुम तुम' कह कर पुकारती रही मगर जब से किश्ती पर सवार हुई हो आप कह के पुकारने लगी इसका क्या सबब है ? तुम्हारी बातचीत से साफ मालूम होता है कि तुम पढी लिखी हो। अगर ।सा न होता तो मैं इस बात का खयाल न करता और कभी तुमसे यह सवाल न करता। उन दोनो औरतो ने इसका जवाब कुछ न दिया बल्कि मुस्कुरा कर सिर नीचा कर लिया। नौजवान भला किसी तरह तुम दोनो के चेहरे पर हंसी तो दिखाई दी। औरत हम लोग काफी दूर निकल आये हैं। अव अगर यह किश्ती जो हमारी किश्ती के माय वधी हुई चली आ रही है हुवा दी जाय तो लोग हम ।

नरेद्र मोहिनी ११ पूरे तौर पर निश्चित हो जाए। नौजवान इस दूसरी किश्ती को अपने साथ लाने का सबब अब मैं बखूबी समझ गया, जहा तक हो इसे जल्द डुबा ही देना चाहिये और सो भी इस तीब से कि हमारी विपती को कोई नुक्सान न पहुंचे। यह कह नौजवान ने डाड खेना बद कर दिया और अपनी विस्ती से उतर कर उस किश्ती पर गया जो पीछे बधी हुई थी। इसने अपनी कमर से खजर निकाल एक हाथ जोर से उसकी पेंदी मे मारा जिससे सूराख होकर उसमे पानी आने लगा इसके बाद नौजवान ने अपनी किश्ती मे आकर उसे खोल दिया और धीरे से खेकर अपनी विश्ती कुछ आगे बढा ले गया । देखते देखते उस दूसरी किश्ती म जल भर आया और वह डूब गई । अब नौजवान ने अपनी किश्ती खूब तेजी से आगे बढाई । नदी का जल विल्कुल ठहरा हुआ मालूम होता था जसे किसी ने फश विद्या दिया हो । चन्द्रमा भी अपनी पूण किरणो से साफ आसमान म उठा हुआ था। ये तीनो विश्ती पर बैठे चले जा रहे थे। तीनो नौजवान, तीनो खूबसूरत तीनी नाजुक्बदन, आपुस मे देख-देख कर खुश होते मुस्कुराते और डाडे चलाये चले जाते थे। नाजुक औरत ने हस कर हमारे नौजवान वहादुर से कहा, "बस अब हम लोगो को किसी का डर और खौफ नही है, विश्ती को धीरे धीरे बहने दीजिए और मेरे पास आकर बलिए।" नौजवान भी यही चाहता था कि इन दोनो के पास बैठ कर बातचीत से मालूम करे कि ये दोनो कौन हैं, क्योकि अब बात करने का मौका बहुत अच्छा है, अस्तु उसने डाह खेना बन्द कर दिया बल्कि उसे उठा कर विश्ती मे डाल लिया और खुशी खुशी उस जगह आकर बठ गया जहा वे दोनो औरतें बैठी हुई थी। ३ किस्ता धीरे धीरे बहने लगी। नौजवान ने दोनो औरतो की तरफ देस कर कहा, "अब हम बिल्कुल देखौफ हैं, मुझे तो किसी का हर न था मगर तुम लोगो के सबब से डरना पडा। अब तुम दोनो का हाल जाने बिना जी बहुत १२ नरेद्र मोगिनी ही वेचन हो रहा है और इससे अच्छा समय भी बातचीत करने का न मिलेगा।" नाजुक औरत पहिले आप कहिय कि आपका या नाम है, पहा के रट्न वाले है और उस जगल म—(काप कर) ओफ याद करत बलेजा दहलता है -आप कसे पहुचे। नौजवान पहिले तुमको अपना हाल कहना चाहिए क्योकि तुम्हार पूछन के पहिले ही मैं यह सवाल कर चुका हूँ सिवाय इनके मेरा कोई विचित्र हाल भी नहीं है, हा तुम दोनो की हालत जब याद करता हूँ तो जरूर बदन के रोगटे खडे हो जाते हैं । हाय, उसका कसा कलेजा था जिसने तुम दोनो के साथ ऐसा सलूक किया। दूसरी औरत (जो जमीन से निकाली गई थी) हा बहिन, पहिले तुम ही अपना हाल कहो क्योकि मरी तबीयत भी यह सुने बिना बहुत ही घबडा रही है कि मेरी वह दशा किसने की थी। नाजुक औरत अच्दा पहिले मैं ही अपनी रामकहानी कहती हूँ। (नो जवान की तरफ देख कर) आप और कुछ हाल न कहिये तो कम से कम अपना नाम तो बता दीजिये जिसम बात करने या पुकारने का सुबीता हो । नौजवान इसम कोई मुजायका नही, सुनो मेरा नाम नरेद्र है । बस अब जब तर तुम दोनो का पूरा हाल न मालूम होगा मैं और कुछ न कहूँगा। नाजुक औरत हां हा अब आप दिल लगा कर मेरा हाल सुनिये, मैं बरती हूँ। इन लोगो ने विश्ती खेना ब द कर दिया था और एक-दूसरे की बात म "तना तीन हा रहे थे कि इ है विश्ती की चाल और बहाव का कुछ खयाल न रहा था जिमस वह बहती हुई कुछ किनारे की तरफ हो गई। अभी नाजुक औरत न अपना किस्सा कहना शुरू नहीं किया था कि इन लोगा की विश्ती एक धने पीपल के पेड के नीचे पहुची जो नदी के किनारे ही पर था। इन लोगो की किश्ती उस पेड के नीचे पहुची ही थी कि ऊपर से आवाज भाई, भला नरेद्र ले जा भगा के । अब यारा की फित्र क्यो होगी । मगर हम भी तुम्हारे ओस्ताद ही निका रास्ता ही आकर बद कर दिया । भला अव आये बढ़ो तो सही देखें कितना हौसला रखत हो ।।

नरेद्र-मोहिनी पटा गा ? आवाज इस आवाज क मुनन नी व नाना औरतें टरी मगर हमारा बहादुर नौजवान एक्टम नमपा जिमम दाना जोग्ना का बड़ा ताज्जुब हुआ क्योकि उम आवाज का मुनकर व घबा ग थी। उनका पूग विश्वास हो गया था कि कोई हम नागा काश्मन जा पहुँचा और टर व मारे उनका वदन कापन लगा था, मग मार बगटर नोजवान नरद्र का हसन देख उन दाना को विचित्र हालत हा गट औ- व उनक मुह वा नरफ देखन लगी। नरेन्द्र न हम कर कहा- घवाला मत दादा म दम अपनी किश्ती पर बुलाता हूँ।" इतना कह उस पेड की नरफ दग्वा बार बार- अब भूतन अब पेर म उतरेगा भी कि ऊपर ही ना मिनार पर ।।। नग अब म नीच नी आन का, जामा विश्ती ल जाओ।हि हिहिनि बिस्ती न जाना क्या दमी टटटा है । सू , ता एसा मत्र पढ़ दिया कि सिवाय किनारे गान व इम किश्ता को तुम आग ल जा ही नहीं सकते। बचाजा, तुम ता पूर जान बचा व भाग य पर अब कहा जामागे ? तीन दिन का भूखा प्यामा में नाज तुम नीना का ग्वाय बिना थाडे ही छोडूगा !" नरेद्र (किश्ती किनार लगा कर) अवे उतग्गा कि दू मिर्च की धूनी। आवाज जगर मिच व खेत म भी आग लगा दाता कुछ नही होगा। नरद्र अच्छा मरे भाइ, अब तो उतरा। आवाज जी हा म ऐसा वसा भून नही हूँ कि जल्दी उतर जाऊँ। नरेंद्र अवे उतरता है कि नहीं। आवाज जाता है कि नहीं। नरेंद्र राम राम, इसन तो दिक कर डाला ! भला यह तो बताओ तुम उतरत क्यो नहीं? आवाज भाई जान तुम रज क्यो हो गए? जानते ही हा कि मैं कितना फक फूक कर पर रखता हूँ। नरेद्र तो इस दक्त तुम्हे किस बात का डर है ? आवाज यही कि कही नजर न लग जाय । नरेद्र क्सिकी नजर? आवाज ये दोनो औरतें मेरी जवानी और पहलवानी पर नजर लगा देंगी।

नरेद्र मोहिनी इतना सुनते ही नरेन्द्र एक्दम खिलखिलाकर हस पडा बल्कि वे दोना औरतें भी जो अभी तक डर के मारे काप रही थी हस पडी, मगर फिर सोचने लगी, "यह कौन है ? क्या सचमुच कोई भूत है ! अगर यह भूत है तो नरेद्र भी कोई पिशाच ही होगे ! नही नही, ऐसा नही सोचना चाहिए। नरेद्र बहादुर और लासानी आदमी हैं, और फिर अगर भूत-प्रेत या पिशाच होते तो इनकी पर छाही जो चद्रमा की रोशनी से इस किश्ती म पड रही है न पडती होती और इनके माखो की पलकें भी नीचे न गिरती ! खर यह सब तो ठीक है मगर वह कौन है जो पेड पर चढा हुमा बोल रहा है और नीचे नहीं उतरता !" नरेद्र ने बहुतकुछ कहा मगर वह शैतान पेड के नीचे न उतरा। आखिर नरेद्र हसते हुए किश्ती से नीचे उतरे और पेड के पास जाकर बोले, ' उतरता है या काट डालू पेड को?" यह कह एक हाथ तलवार का उस पेड पर लगाया साथ ही इसके पेड के ऊपर वाला शतान चिल्लाया, 'हो हो हो हो ! ऐसा काम कभी मत करना । पेड मत काटना नहीं तो मैं गिर कर मर जाऊगा ! लो मैं आप ही उतरता हूँ तुम दिक मत करो"" नरेद्र अच्छा तो फिर उतर जल्दी। आवाज उतरता हूँ, घबडाते क्यो हो ? क्या जल्दी में गिर कर जान दे ? दू आग्विर धीरे धीरे शतान नीचे उतरा और नरेद्र ने उसका हाथ पकड के किश्ती पर ला बैठाया, इसके बाद किश्तो को किनारे से हटा गहरे जल में ले जाकर बहाव पर छोड दिया। नरेद्र ने जब से उस शतान को विश्ती मे लाकर बैठाया तभी से उसकी शक्ल देख देख दोनो औरतों की अजब हालत हो रही थी। मारे हमी के लोटी जा रही थी, क्योकि पेड पर से वह जिस दिलावरी और डरावनी आवाज से बोलता था नीचे उतरने पर वह वसा न पाया गया बल्कि उसकी सूरत ऐसी थी कि जो कोई देखे जरूर हसने लगे। पचीस तीस वप का सिन, नाटा कद, छोटे छोटे हाप-पैर, सीतला मुह दाग, एक आख गायब, लाल रंग की धोती, लाल ही रग का कुरता टोपी जिसम गोटा टका हुआ या काये पर एक अगोछा, बगल मे एक बटुआ, हाय मे भाग घाटन का डण्डा, भाग पीसने की कूडी टोपी के नीचे । और .

7 ? नरेद्र-मोहिनी ऐसी सूरत देख पर भला किसे हसी न आवेगी दोनो औरतों ने मुश्किल से हसी रोक पर नरेन्द्र को हाथ के इशारे से अपने पास बुलाया और धीरे से पूछा "यह कौन हैं जिसे वही चाह से तुम इस किश्ती पर लाये हो?" नरेद्र यह हमारा लड कपन का साथी है। औरत क्या तुम्हारा ऐसे ही लोगो से साथ रहता है नरेन्द्र नहीं नही, हम तो दिल बहलाने के लिए इसको अपने साथ रखते रहे हैं बडा खरखाह है और जान से ज्याद हमको मानता है। कुछ थोडा-सा बेवकूफ तो है मगर बाज दफे इसे दूर की सूझती है । अब तो यह साथ ही है, इसका बानी हाल तुमको रास्ते मे मालूम हो जायगा। औरत इसका और तुम्हारा साथ क्व झूटा नरेंद्र में तो अकेला घर से निकला था, यह शायद मुझे ढूढता हुआ आ पहुचा । देखो में इससे हाल पूछता हू, आप ही सब मालूम हो जायगा । औरत इसका नाम क्या है? नरेद्र इसका नाम सभी ने बहादुरसिंह रक्खा है। बहादुरसिंह का नाम सुनकर फिर उन दोनो को हसी आ गई। बहादुर० क्यो जी नरेन्द्र, यह दोनो औरतें घडी-घडी मुझको देख-देख कर हसती क्यो हैं ? कही मुझे भी गुस्सा आ जाय तो क्या हो? नरेद्र भला इसमे रज होने की कौन सी बात है ! जो कोई तुम्हे देखकर खुश हो उससे रज होना क्या मुनासिब है ? बहादुर० नहीं, मैंने कहा कि शायद अगर इन दोनो को किमी बात की शेखी हो तो मैं अभी तयार हूँ आ कुश्ती लड के जी का हौसला मिटा लें। नरेद्र थाह, औरता ही से कुश्ती लडवर पहलवानी दिवाओगे? बहादुर जी हा कल के लडके हो, कभी औरतो से पाला नहीं पडा है। सुन और मेरी नसीहत याद रक्खो, दस मरदो से लड जाना कोई मुश्किल नहीं मगर एक भी औरत का मुकाबिला करना टेढी खीर होता है । नरेद्र सच है सच है, लेकिन भला यह तो कहो कि तुम इस जगल मे कहा से पैदा हो गए। बहादुर० तुम तो चुपचाप घर से निकल भागे समझे कि बस हो चुका अब पता कौन लगाता । मगर इसको भूल ही गये कि मैं चालीस कम सौ ? -- १६ नरेद्र मोहिनी , कोस से तुम्हारी बू पा लेता हूँ। खोजता खोजता आखिर आ ही न पहुचा । मैं तो डरा (स्क कर) राम राम डरा काहे को मैं तो किसी से कभी डरता ही नही कहन की कुछ मुह से निकलता है कुछ । दोनो औरते (हस कर) क्या डीग की लेते है, शेखी किए बिना न मालूम क्या बिगडा जाता है ! अजी ऐसे जगल बियाबान मे जहा हजारो डाकू घूमत रहते हैं बडे बडे डर जाते है, अगर तुम डरे तो कौन सी बात है । बहादुर० सच तो कहा, मगर मैं तो यही डरता ही नही, हा यह तो वहो क्या सचमुच इस जगल में डाकू घूमा करते है ? नरेद्र वेशक, अभी हमी से डाकुओ से मुठभेड हो गई थी, बारे किसी तरह बच गये। बहादुर अफसोस, हम नहीं हुए, नही एक को भी जीता न छोडते, हा यह तो बताओ के डाकू थे? नरेद्र यही कोई चालीस-पचास । बहादुर बस इतने ही । इतनो से भला क्या डरना अच्छा इन सब बातो को जाने दो और मेरी सुनो। अब सवेरा हुआ चाहता है, यह किनारे वाला जगल भी बडा ही रमणीक है चलो किश्ती किनारे लगाओ, मैं भग पीसता हूँ तुम भी पीओ और इन दोनो को भी पिलाओ। यह भी क्या याद करेंगे कि किसी के हाथ को भग पी थी। बस इसी जगह दिसा फरागत, स्नान- पूजा से छुटटी पाकर फिर जहा चाह चलना । "अच्छा चलो" कहर नरेद्र न डाड उठाया और किश्ती का मुह किनारे की तरफ फेरा ही था कि किनारे से गीदड के चिल्लाने की आवाज आई। बहादुर बस बस नही नहीं इधर नही और आगे चलो। यह जगल पिसी काम का नहीं चपट है आग धन जगल म ठीक रहमा इत।। सुनत हा दोना औरतें खिलखिला कर हस पडी और नरेद्र ने भी मुस्कुरा दिया। बहादुर वस बात तो साचा नहीं और हम दिया। क्या तुम लोगो ने समझ लिया कि बहादुरसिंह गोदड की आवाज सुन कर उर गय? ऐसा ही डरन तो तुमका खाजन क्या निकलत' मुझको आज रास्ते म ऐस एमे जगल पचासो पड इक्टठे एक से एक सटे और चिपके दिखाई पड़ते थे।

7 नरेन्द्र मोहिनी १७ बहादुरसिंह को इस बात ने तीनो को और भी हसाया। नरेद्र तो जनाते ही ये कि बहादुरसिंह बडा डरपोक है । मगर बात बनाने से नहीं चूकता । यह तो उनकी मुहब्बत मे घर से निकल पडा नहीं तो कभी अकेला दूर जाने वाला थोडे ही था। नरेद्र बस जो असल बात थी तुमने खुद कह दी। यह भी मालूम हो गया कि तुम बडे-बडे घने जगलों को मार करते हुए मुझसे मिले हो उस छोटे जगल मे नहीं पहुँचे जहा मैं फसा था। बहादुर जी हा, इसमे भी कोई झूठ है। अरे अरे, फिर तुम किनारे ही पर किश्ती लिये जा रहे हो । सुनते नही मैं क्या कहता हूँ !" नरेद्र (झु झला कर) अजब उल्लू है | क्या संक्डो कोस तक जगल ही मिलता जायगा जगल कब का पीछे छूट गया यह भी कोई जगल है ? दस- बीस बेरी के पेड देसे और कह दिया जगल है । अब कौन-सा धना जगल मिलेगा? देखता नही आगे बाल ही बालू दिखाई देता है !! बहादुर वाह, मृझी को उल्लू बनाने लगे, मैं तो खुद ही कहता हूँ कि आगे किसी जगल के किनारे नाव लगाओ यहा मदान है। नरेद्र बस बस, आगे यह भी नहीं मिलेगा। नरेद्र ने बहादुरसिंह की वकवाद पर ध्यान न दिया और किश्ती किनारे पर लगा कर बहादुरसिंह से उतरने के लिए कहा मगर वह न उतरा, कहने "मैं इसी किश्ती पर भग बना लूगा तब उतरू गा, और तुम भी बैठो, जल्दी क्या है, अभी तो अन्छी तरह सवेरा भी नहीं हुआ।" औरत अच्छा इनको यहा बैठने दो, चलो हम लोग नीचे उतरें। नरेद्र अच्छा चलो। मरेद्र ने लग्गी गाड के किश्ती माघ दी, तब हाथ का सहारा दे दोनो औरतो को किनारे पर उतारा और उनके बठने लिए अपनी कमर से चादर खोल जमीन पर बिछा दिया । जब से नरेन्द्र ने इन दोनो औरतो को फासी और कब्र से बचाया और किश्ती पर सवार होकर पूरे चन्द्रमा की रोशनी मे इनकी सूरत देखी तभी से इन पर जी जान से आशिक हो गये थे। उधर वे दोनो औरतें भी पूरी मुहम्बत की निगाह से इनको देखने लगी बल्कि इनको पाकर अपनी बिल्कुल तकलीफ लगा, . नरेद्र-मोहिनी भूल गई और सोच लिया कि अब जम भर इनका साथ कभी न छोड़ेंगी। तीनो किनारे पर बठे, नरेद्र ने कहा, "उस भगेडी मसखरे की बातचीत मे तुम दोनो का हाल भी न सुना ।" एक औरत मया हज है लौडी तो साथ मे हई है, जब चाहे इसकी राम- कहानी सुन लेना, पर अब तो हाल कहने का मौका है नहीं। नरेद्र अच्छा, हाल किसी दूसरे वक्त सुन लेंगे मगर अपना नाम तो इस वक्त बता दो। एक औरत (जो पेड पर से उतारी गई थी) जी, मेरा नाम तो मोहनी है और इसका नाम गुलाब है जिसे आपने जमीन से निकाल कर बचाया। नरेद्र मोहनी । अहा क्या सुदर नाम है ।। इतने मे दूर से कुत्ते के भूकने का आवाज आई जिसे सुन नरेद्र ने मोहनी की तरफ देख के कहा, ' मालूम होता है यहा पास ही कोई गांव है क्योकि कुत्ते सिवाय आबादी के और कही नही रहते । अच्छी बात हो अगर हम लोग आज का दिन इसी गाव मे का? मयोकि दिन की धूप इस खुली हुई छोटी किश्ती मे नही बर्दाश्त होगी। मोहनी आपका कहना सच है मगर हम लोगो का किसी छोटे गाव मे रहना उचित नहीं, इससे तो दिन भर की धूप सह कर भी इसी विश्ती पर सफर करते रहना ठीक होगा। गुलाब (इधर उधर देख कर) देखो वह एक नाव का मस्तूल दिखाई देता है । (उठ के और गौर से देख कर) वाह वाह यह तो बडी भारी छप्पर दार नाव है अगर इसे किराये पर लिया जाय तो बहुत अच्छा हो । इसी पर सफर करते हुए हम लोग किसी शहर में बड़े आराम के साथ पहुच जायगे। नरेद्र (खडे होकर और उस नाव को देख कर) हा ठीक तो है । मोहनी बस तो फिर देर क्यो उसी नाव को ठीक कीजिए, चलिए इसी विश्ती पर बठ कर वहा चर चनें। नरेद्र अभी तुम लोगो को वहा ले चलना ठीक न होगा । कोन ठिकाना वह नाव खाली है या क्सिो का माल लदा है अगर दूसरे के किराये म होगी तो मुझे क्स मिल सकेगी? तुम दोनो अच्छे कपडे और गहो पहिरे हो कोई देखेंगा तो क्या समझेगा? कोई एसी तर्काव भी नहीं हो सकती कि तुम दोनो ।

चलू । -- नरेद्र-मोहिनी को छिपा कर वहा तक ले चलू और अगर नाव भरी न हो तो उसी जगह किराये कर लू । इस तरह बहुत आदमियो के बीच मे तुम दोनो को कैसे ले, गुलाब चलिये नाव खाली हुई तो सवार हो लेंगे नहीं तो आगे चल कर वहीं ठहरेंगे और आज का दिन डोगी मे ही बिता देंगे। नरेद्र आगे दूर तक बालू ही बालू दिखाई पडता है, कही पेड का नाम- निशान नहीं है, कहा ठहरेंगे? मोहनी तो फिर आपकी क्या राय है ? नरेन्द्र मैं चाहता हूँ कि तुम दोनो यहा ठहरो बहादुरसिंह भी तुम्हारे पास हैं, मैं बहुत जल्द जाकर उस नाव को देख आता हूँ। अगर खाली होगी तो तुम लोगो को ले जार सवार कराऊगा नहीं तो इस जगह लौट कर हम लोग दिन बितायेंगे और रात को फिर चलेंगे। भोहनी नही नहीं, अब मैं तुम्हारा साथ न छोडू गी, क्या जाने तुम कही नरेद्र वाह, मैं कहा चला जाऊगा'बात की बात मे लौट के आता है। मोहनी (आख डबडवा कर) मैं क्या नरेद्र ने मोहनी की माखो मे आंसू डबडबाते हुए देखा। जी बेचन हो गया, हाथ थाम कर बोला, "हैं यह क्या ? यह आंसू कसा?' मोहनी का जीपूरे तौर से उमड आया, आसुओ की तार बध गई, हिचकी लेकर बोली, "न मालूम क्यो मेरा कलेजा काप रहा है, खुदवखुद राने को जी चाहता है, बस तुम मत जाओ इसी जगह दिन काटो, जो कुछ होगा देखा जायगा।" खर किसी तरह नरेन्द्र ने बहुत तरह से मोहनी को समझा-बुझा कर इस बात पर राजी किया कि वे जा कर नाव का हाल दफ्त कर आयें। हमारे बहादुरसिंह अभी तक भग घोट रहे हैं । दीन दुनिया की कुछ खबर नहीं, यह भी नहीं मालूम कि नरेद्र, मोहनी और गुलाब म क्या-क्या बातचीत हुई। दोना परो से भग पोसन को कूडो पकड़े हुए नीचे के होठ को दातो से दवाय भी बाई तरफ, कभी दाहिनी तरफ सोंटा घुमा घुमा मग पीस २० नरेद्र मोहिनी नरेद्र ने पुकार कर कहा "अजी ओ बहादुर भगी। अभी तक तुम्हारी भग तैयार नहीं हुई ? देखो इघर खयाल रक्खो हम जाते हैं। बहादुरसिंह ने गुस्से की निगाह से नरेद्र की तरफ दप कर कहा 'वस खबरदार । हमको भगी का कहना इतना बुरा न मालूम हुआ जितना तुम्हारे इस कहने का र ज हुआ कि हम जाते हैं । क्या मजाल जो तुम कही जा सको एक क्या दस करोड नरेद्र बन कर आओ तव तो जाने ही न दू । एक दफे तुम्हें अकेले छोड के फल पा लिया, अब क्या मैं उल्लू हूँ जो घडी घडी ऐसा ही करू" नरेद्र अबे कुछ सुनता समझता भी है कि अपनी ही टाय टाय किये जाता 1 बहादुर बस बस, मैं सब सुन चुका और समझ गया दठो सीधे होकर। नरेन्द्र अजी में नाव किराये करने जाता है और वही नहीं जाता। बहादुर नाव । नाव कैसी? यह क्या छकहा है ? नरेद्र (हस कर) यह भी नाव है मगर में बडी नाव छप्पर वाली किराये करने जाता है। ? 7 बहादुर कहा है छप्पर वाली नाव नरेद्र (हाथ से इशारा करके) वह देखो। बहादुर हा है तो (सोटा रख पर) मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ। नरेद्र (मोहनी और गुलाय को बता कर) तो इनके पास कौन रहेगा बहादुर तुम। नरेद्र और तुम किसके साप जाओगे ? बहादुर नरेद्र के साथ । बहादुरसिंह की इस बात ने सब को हसा दिया। मोहनी जो उदास बठी पी वह भी एक्दम हस पडी। बहादुर हसने की कौन बात है । (कुछ सोच कर) हा हा ठीक है, मुझसे गलती हुई मैं भूल गया अच्छा जाओ सीधे उस नाव की तरफ चले जाओ। मैं देख रहा हू इधर-उधर ही नहीं कि मैंने डण्डा फेंककर मारा। अच्छा यही सही ।" यह कह पर नरद्र उस वडी नाव की तरफ रवाने हुए । मोहनी और रहादुरसिंह की निगाठ बराबर नोट की तरफ पी।

नरेद्र-मोहिनी हमारा बहादुर नौजवान इन तीनों को उसी जगह छोड उस नाव को तरफ चला और यह इरादा कर लिया कि उसे किराये करके आराम से अपना सफर तमाम करेगा। पाठक, इतना तो मालूम ही हो गया कि उसका नाम नरेद्रसिंह है, अस्तु अब हमको भी इसी नाम से इस उप यास मे लिखना ठीक होगा। देखने मे वह नाव बहुत पास मालूम देती थी मगर नरेंद्रसिंह के बहा पहुचते-पहुचते पहर भर से ज्यादा दिन घढ आया। पास पहुँच कर उन्होंने किसी आदमी को उस नाव के ऊपर न देखा, इस सबब से नाव के पास जाकर अन्दर की तरफ झाका । यह नाव बहुत बड़ी थी और इस लायक थी कि हजार मन से ज्यादा बोझ लाद सके । फूस का छप्पर उसके ऊपर था और चारा सरफ टिटयो से घेरा हुआ था। दो चार खिडकिया भी दोनो तरफ इस लायक थी कि भीतर बैठा हुआ आदमी बाहर की तरफ देख सके। नरेंद्रसिंह को प्राक्ते देख एक बादमी अदर से बाहर निकल आया जिसकी सूरत देखने से मालूम होता था कि यह मल्लाह है । उसने इनसे पूछा, "आप क्या चाहते हैं ?" नरेद्र क्या यह नाव किराये पर हो सकती है मल्लाह हाँ हाँ आप जरूर इसे किराये पर ले सकते हैं। नरेद्र इसका मालिक कौन है ? यह सुनकर मल्लाह ने अदर की तरफ मुह कर "विहारी, बिहारी ।" करके आवाज दी। आवाज के साथ ही एक दूसरे मल्लाह ने बाहर निकल कर पूछा, "क्या है?' पहिला मल्लाह सर्कार नाप किराए किया चाहते हैं। दूसरा (नरेद्रसिंह की तरफ देख पर) कुछ साल लादा जायगा? नरेद्र नहीं, हम दो-तीन भादमी हैं जो इस पर सवार होकर सफर मिया चाहते हैं। Mod मल्लाह यहाँ तक नाइएगा? रेद्र हम लोग पटने तक जाएगे।

रेद्र-मोहिनी 7 मल्लाह तो आपके और साथी सब कहां हैं ? नरेद्र (हाथ का इशारा करके) उस तरफ थोडी दूर पर हैं, तुम बात- चीत कर लो तो बुला लावें। मल्लाह सवारी जनानी भी है या सब मर्दाने ही हैं नरेद्र हो, जनाने भी हैं। मल्लाह अच्छा आइये यहा आकर भीतर से नाव को देख लीजिये। जनानी सवारी के सुबीते को भी जगह इसमे बनी हुई है। यह कह मल्लाह ने एक काठ की सीढी नीचे गिरा दी और नरे द्रसिंह का हाथ पकड कर ऊपर चढा लिया, तब अपने साथ छप्पर के अदर ले गया। नरेद्रसिंह न अन्दर लगभग पदह-बीस मल्लाहो को बठे पाया जिनमे पाच छ तो बडो भयानक सूरत के थे। उनकी काली-काली सूरत और बडी-बडी आखें देखने ही मे डर मालूम होता था। एक तरफ कुछ थोडी-सी कुल्हाडिया गडासे नेजे और तलवारो का ढेर लगा हुआ था और दस-बीस गडिया भी ऐसी पडी थी कि जो देखने से किसी सौदागर की मालूम होती थी। इन चीजो को देख नरे द्रसिंह के जी मे कई तरह के खुटके पैदा हुए और इस नाव को किराये करने का मन न किया। मल्लाहो की तरफ देख कर बोले, "हम लोग सिफ चार आदर्मी हैं । नाव बहुत बडी है और सफर भी बहुत दूर तक का है। यह नाव मेरे काम की नहीं है।" बिहारी ने कहा, "एक नाव बहुत छोटो और पटी हुई हमारे पास और भी है, अगर उस पर आप सफर करें तो सिफ एक ही मल्लाह आपको पटने तक पहुँचा सकेगा क्योकि वह नाव चलने में बहुत सुबुक है । अगर जरा-सा आप यहा ठहरें तो उस नाव को यहा लाकर दिखला हूँ। नरेद्र वह नाव कहा पर है ? विहारी पास ही है बस वही जहा इस नदी का मोड धूमा है। नरेद्रसिंह को इस बात का शक तो जरूर हुआ कि ये लोग डाकू है मगर बिहारी की यह बात सुनकर कि एक नाव और भी है और एक ही आदमी उम पर पटने पहुँचा देगा सोचने लगे कि इसमे हमारा कोई हल नहीं अगर एक यादमी डाकू भी होगा तो हमारा कुछ न कर सकेगा। बिहारी से कहा, जागो उस नाव को ले आओ, मगर जल्द आना।" बिहारी ने अपने साथियो की तरफ देख कर कहा- तुम लोग भी बाओं 'भन्छा, . A मरेन्द्र-मोहिनी हो उस नाव को जल्दी सच लावें। अपने कुछ साथियो को लेकर बिहारी नाव के नीचे उतरा और पोडी दूर तक दरिया के किनारे-किनारे जाकर पास के जगल मे गायब हो गया। बिहारी को गए घण्टा भर से ज्यादा हो गया। नरेद्रसिंह बैठे-बठे धबड़ा उठे और दूसर मल्लाहो से जो उस नाव मे थे बोले, 'तुम्हारा बिहारी बाब लेकर अभी तक म आया, हमारे साथी घबहा रहे होगे, हम तो जाते हैं।" इसके जवाब मे एक मल्लाह ने कहा, "चढ़ाव की तरफ नाव लाने में से लगती ही है, आप जरा और ठहर जाए, भाता ही होगा।" मण्टे भर तक नरेन्द्रसिंह और ठहरे मगर नाव न आई। परा दे। मोहनी की तरफ जी लगा हुआ था। मल्लाहो की बात पर ध्यान म दिया। नाव से नीचे उतर आए और उस तरफ चले जहा अपने सापियों को छोड़ा आते वक्त भी उतनी ही देर लगी, यहा तक कि दोपहर हो गया जब उस ठिकाने पहुचे । मगर अफसोस, बेपारी मोहनी और उसकी बहिन मुलान को वहा न पाया और न अपने लड़कपन के दोस्त बहादुरसिंह को ही वहां देखा जिसे भग पोटते छोड गए ये, हा किश्ती ज्यो की स्यो वहा ही बंधी पी1 - मोहनी, गुलाव और अपने दोस्त बहादुरसिंह को न देखने से नरेद्रसिंह को कितना ताज्जुब, अफसोस, तरकुंद, फिक्र, गम और सदमा हुआ यह पही जानते होगे । घबहा कर चारो तरफ देखने लगे, जब किसी को न देखा तो बोले, 'हाय, मैं उसे अवे ने क्यो छोड गया । मेरे सिर कसी कम्बस्ती सवार यो जो दूसरी नाव किराए करने गया । हाम जिस किश्ती ने बेचारी मोहनी और गुलान की जान बचाई और जिस किश्ती पर बठकर हम लोग हसते- खेलते यहा तक पहुँचे, उसी को छोडना पाहा । परमेश्वर ने इसी की सजा दो। हाय, कम्बख्त दिल । उस वक्त घूप को सूसी । बेचारी मोहनी धूप का कुछ खयाल न करके इसी किश्ती, पर सफर करने को तयार थी मगर तुझे गर्मी सतान लगी। यब उसकी जुदाई को आग मे न जाने कब तक तुझे जलना पडेगा । हाय, वह कहाँ चली गई। क्या मौका पाकर भाग तो नहीं 2 २४ नरेद्र-मोहिना गई । नहीं नहीं, उसे छिप कर भागने की जरूरत ही क्या पी! मैं तो उसे उसके घर तक पहुंचा ही देने वाला या, मैंने उसका क्या बिगाहा था कि छिप कर भागती। फिर बहादुरसिंह कहा चला गया। वह तो मेरा साथ छोडने वाला न था! क्या कोई दुश्मन पहचा जिसके सबब से बेचारी मोहनी और गुलाब को फिर दु ख भोगना पड़ा? कहीं उस नाव वाले मल्लाहों की तो बदमाशी नहीं । सूरत ही से वे लोग बहे दुष्ट और डाकू मालूम होते थे। वे किश्ती लेने नहीं गए, घूम-फिर धोखा दे जरूर यहा आए और तीनों को ले भागे, क्योकि पहिले ही उन लोगों को मुझसे मालूम हो चुका था कि हमारे साथ औरतें हैं और उन्होंने पूछा भी पा कि कहा हैं ? हाय । मैंने क्यो इशारे से बतला दिया कि इस तरफ हैं | जरूर उही लोगों की शैतानी है ! खैर, जब मोहनी ही नहीं तो अब मैं जी कर क्या करूंगा? इससे तो अब यही बेहतर है कि उन लोगो से लड कर अपनी जान दे दूं, और कुछ नहीं तो दो चार की जान तो जरूर ही ले लूगा यह सोचते सोचते हमारे बहादुर नरेद्रसिंह को बेहिसाब गुम्सा चढ आया, बड़ी बड़ी आँखें सुख हो गई , बदन कापने लगा, घडी घडी तलवार के को पर हाथ जाने लगा। थोडी देर तक इस हालत मे खडे रह कर कुछ सोचते रहे, इसके बाद तेजी के साथ उस नाव की तरफ चले । पहिली दफे नरेन्द्रसिंह जब उस किश्ती की तरफ गए थे तब इनको रास्ते मे बहुत देर लग गई थी मगर अबकी दफे घण्टे ही भर में ये उस नाव के पास जा पहुंचे। अबकी मतबे नाव के ऊपर जाने के लिए काठ की सीढी नहीं लगी थी, ममर बहादुर नरेद्रसिंह ने इसका कुछ खयाल न किया, झट म्यान से तलवार निकाल ली और उछल कर नाव के ऊपर चढ गए, मगर वहा किसी को न गाया। उन शैतानो मे से एक भी वहा न था जिहे पहिली मतबे देखा था। हा पुछ गठडिया और दस-पाच कुल्हाडियां इधर-उधर जरूर पड़ी थी। बहादुर नरेद्रसिंह इस गम को बर्दाश्त न कर सके । उनका सिर धूमने रगा और नगी तलवार हाथ में लिए हुए बदहवास होकर उसी नाव पर धम्म 1 गिर पड़े। - नरेन्द्र मोहिनी । . एक छोटी सी कोठरी मे आले पर चिराग जल रहा है, तीन तरफ दीवार है और एक तरफ लोहे के मोटे-मोटे छह लगे हुए हैं जिसमे एफ छोटा-सा दरवाजा लोहे की सीखो का बना हुआ लगा है जो इस समय बन्द है और उसमे बाहर से ताला बद है जिसके पास ही एक आदमी बैठा हुआ है, शायद पहरेवाला हो। यह मकान हर तरफ से बद है, कही से अस्मान दिखाई नहीं देता। आजक्ल शुक्ल पक्ष है मगर पद्रमा की रोशनी भी कही नही दिखाई देती जिससे मालूम होता है कि शायद यह जमीन के अदर कोई तहखाना है जहा दिन और रात का भेद कुछ नही जाना जाता। इसी कोठरी के अदर बहादुरसिंह बठा हुआ धीरे-धीरे कुछ बोल रहा है "हा, कहते थे नालायक से कि मुझे मत सता । मैं ब्राह्मण हूँ, मेरी आह पड़ेगी तो जल के भस्म हो जाएगा । मगर सुनता कौन है ? अपनी बहादुरी के नशे मे यह मानता किसको है ? दौलत के घमण्ड मे वह किसी को समझता ही क्या है । खूबसूरत पाच औरतें क्या मिल गई कि दिमाग आस्मान पर चढ़ गया ! रहो बचा, दो औरतें तो छिन गई बाकी की तीनो भी छिनी जाती हैं । और जगल मे गडी हुई तेरी दौलत भी तेरे हाथ से निकल जाय सब मेरा कलेजा ठण्डा हो। नालायक, मैंने तेरा क्या विगाहा था कि मुझे राह चलते पकड लिया और साल भर से मुफ्त मे अपनी खिदमत करा रहा है, जान भी नहीं छोडता । हाय । मेरे मां बाप, लडके-बाले, जोरू जाने क्या कहते होग, मुझे कहा-कहा दूढते होंगे । सर, उनको तो कुछ पर्वाह नहीं मेरा तो शरीर ही सरट म पड गया था दिन मे बीस-बीस मतबे गदहे को भग पोस-पीस के पिलानी पडतो थी। चलो उससे तो छुट्टी हुई । मेरा क्या को मिलता था, यहा भी मिलेगा, घोडे को कोई ले जाय खाने को घास तो देहोगा। मेहनत से जान बचो, अब इसी कोठरी में बठे डण्ड पेलेंगे, वाह रे महादुरसिंह । तू भी किस्मत का बड़ा ही जबर्दस्त है ।। कोठरी में बाहर बठा हुआ पहरेवाला अपनी गदन नीचे दिए हुए बहादुर- सिंह की यह भनभनाहट सुन रहा था। जब बहादुरसिंह अपनी बात समाम चुका तब उसने इनकी तरफ सिर उठा कर देखा और कहा-" ? वहा भी खाने नरेगा-मोहिनी , है आपका नाम बहादुरसिंह है।" बहादुर (चौंक कर) है यह आपने इसे जाना पहरे० आपकी बातों ही से मालूम होता है। बहादुर हमारी कौन सी बातें? पहरे० अजी, अभी तो तुम कह रहे थे कि "वाह, बहादुरसिंह, तू भी किस्मत का बड़ा ही जबदस्त है बहादुर हाँ ठीक है, मेरा नाम बहादुरसिंह है। पहरे० आप बडे लापरवाह मालूम होते हैं । बहादुर हा भाई साहब, लापरवाह तो हई हैं, और फिर आप ही सोनिए कि मेरे जसा आदमी अगर लापर्वाह न होगा तो और दुनिया में होगा कौन ? जात का ब्राह्मण हूँ कहीं रहूँ, कोई खाने को दे, मुझे ले लेने मे कोई शम नहीं। मा कर खाने को फिक्र नहीं । जोरू के पास कुछ रुपए हैं, वही अपना सौदा-सुसफ बाजार से लाती है, पकाती है, खिलाती है, महीनों तक पीने के लिए भग भी वही बेचारी ला देती है, मैं मजे मे घोंटता हूँ और पोता है। फिर मुझे फिर काहे की? हा पोडे दिन इस नालायक नरेद्र रे साथ रहना पण तो असब कुछ फिक्र ने आ घेरा था, जब जरा आराम से बैठे बस हम हमा, 'भग पीसो ।' यहां तक कि दिन-रात भग पीसते-पीसते जी पारा गया पा, पर अब उससे भी बेफिक्र हूँ । यहाँ तो काम-काज कुछ करना ही नहीं है बठे-बैठे लाना है हो भग को तकलीफ वहीं न हो जाय, सो पर, आपकी वृपा होगी तो भग भी पीन को मिल जायगी। माज मैं अपने हाप बी बूटी पिलाऊँगा । देखो तो उसके भाग स्वय नुप मालूम पड़ता है और सबसे भारी भात तो यह है कि मुझे कुछ मामय नहीं । मालध के नाम ही से मैं होमों भागता है नहीं ता नरेद्र की साखों रुपए की सम्पत्ति का मेरी आमों के मामने सगी है मे सेता और मजे म रामा बन बठता गरम तो सोचता मिस राग गहगार में बार गली स में अपनी जिदगी काट रहा है तरी सामा एस्टोर पर अपने आर पम्बग्ती मे 11 पर. सब है सच है ! (मन म) यह दुध पागत भी मासूम होता है। मगर मोतमिह का गाना हमें मानम है तो समारता मे मा को पो मही है।

- नरेद्र-मोहिनी बहादुर क्यो भाई तुम भग भी पीते हो कि नहीं? पहरे० मुझे तो भग पीएं बिना किसी दिन चन नहीं पड़ता बहादुर (खुश होकर) वाह वाह वाह, बड़ी खुशी की बात तुमने सुनाई, तब तो हम-तुम दोनो एक हैं, बस आज से हमारी-तुम्हारी दोस्ती हो गई। मालूम होता है तुम भी ब्राह्मण या क्षत्री हो। पहरे. हा मैं क्षत्री हू। बहादुर आहा हा ! फिर क्या कहना है, आमओ जरा गले तो मिल !! पहरे० (मन मे) अब क्या है, इससे नरेद्रसिंह की दौलत का पता लगाना बहुत सहज है, अगर वह दौलत मिल जाय तो मैं जम भर कमाने से छुट्टी पाऊँ और अपने साथियो को अगूठा दिखा किनारे हो जाऊँ! बहादुर बस अब सोचते क्या हो ! आमओ दोस्त, जल्दी गले मिलो, अब जी नहीं मानता !" पहरेवाले ने ताला खोला, सुशी-खुशी अन्दर गया और बहादुरसिंह से खूब गले-ाले मिला। बहादुर (मन मे) फासा साले को, अब क्या है !! पहरे भाई बहादुरसिंह, अब तो हमारी तुम्हारी दोस्ती हो ही गई, मगर इस दोस्ती को छिपाये रखना चाहिये, क्योकि अगर हमारा सर्दार जान गया कि इन दोनो में दोस्ती हो गई है तो झट मुझे यहां से हटा देगा और किसी दूसरे को महाँ पहरे पर बैठा देगा। बहादुर० उसकी ऐसी तैसी ! सभी मालूम तो होगा नही कि इन दोनो में दोस्ती है, जब वह आवेगा तो घडी भर तक नुमको गालिया ही दिया करूगा, तब से समझेगा? पहरे० हा ठीक है, ऐसा ही करना मैं भी ऊपर के मन से तुम पर सख्त पहरा रक्खूगा । अब उसके आने का वक्त हुआ है, मैं फिर ताला बद करके बाहर जा बैठता हूँ। वहादुर जरूर जरूर । बहुत जल्दी ! पर भला यह तो बता दो कि तुम्हारा नाम क्या है? पहरे. मेरा नाम भोलासिंह है। बहादुर० बाह भाई मोलासिंह, हकीकत मे सुम बड़े ही भोले हो ! बल- नरत-मोहिनी वपट जरा भी तुम्हारे चित्त मे नहीं है । पहरेवाला भोलासिंह बहादुरसिंह से दुरारा गले-गले मिस के बाहर बठ गया, साथ ही वहादुरसिंह उससे धीरे धीरे बातचीत भी करने लगा। बहादुर० क्यो दोस्त भोलासिह । क्या कभी सूरज या च द्रमा का दशन न कराओगे? इस अघरे मे बैठे-बैठे तो कई दिन हो गए। भोलासिंह दोस्त, घबराओ मत, बन पहा तो आज ही तुम्हें इस तहखाने के बाहर ले चलूगा ! बहादुर वाह-वाह, तब तो बहा ही मजा ही जाएगा। भोला क्यो दोस्त, क्या ही अच्छी बात हो अगर नरेद्रसिंह यी गाही हुई दौलत हम-तुम दोनो निकाल लें और जाम भर खुशी से गुजारा करें।। बहादुर नहीं नहीं नहीं, ऐसा न होगा ! मैं लालच को अपने पास भी वभी न आने दूंगा | हो तुमको अगर जरूरत हो तो चलो बता दू जितना मर्जी हो निकाल लो, मगर मैं एक पसा न ऊँगा। भोला अच्छा हमी को बता दो। बहादुर आज ही पलो, भला पह कौन सी बड़ी बात है। और फिर यहां तो इतनी दौलत है कि कोई लास दो लास निकाल ले तो भी कुछ पता न लगे। भोला ओफ ओह अच्छा तो फिर आज ही मौका पाकर हम-तुम निकल चलेंगे बहादुर तुम्हारा अफसर तो अभी तक नहीं आया। भोला हा आज देर हो गई अब उसके आने की कोई उम्मीद भी नहीं १ बहादुर तो चलो फिर बाहर ही की हवा खाएं। भोला घडी भर और ठहरो तब तक अगर न आया तो फिर आज न आवेगा हा यह तो कहो नरेद्र की दौलत गडी वहाँ पर है बहादुर जहा उसका मकान है उसके दो कोस पूरव हट के मगर मुश्किल यह है कि मैं कमजोर आदमी न मालूम क दिन मे वहाँ पहुँचूंगा । भोला नहीं नही, मैं जाकर दो घोडे ले आऊँगा। हमारे सरदार के यहा जितने घोड़े हैं सभी तेज चलने वाले हैं, सभों मे से चुन कर दो घोर त - नरेद्र-मोहिनी भाऊंगा। कोई अगर हम सोगो का पीछा करेगा तो भी न पकड सकेगा। मगर तुम घोडे पर बैठ सकते हो किनिहो ? - बहादुर हां हा, भला पोहे पर चढना मुझे न आवेगा?. पोड़ी देर के बाद भोलासिंह उस तहखाने के बाहर निकला और आषी रात जाने के पहिले ही कसे-कसाए दो उम्दै घोडे लिए आ पहुँचा । दोनो भोडों को तो बाहर एक दरस्त के साथ बाधा और आप तहखाने मे गया । बहादुरसिंह को कैद से निकाल कर बाहर ले आया और दोनों आदमी घोहे पर सवार हो पश्चिम की तरफ रवाना हुए। दो दिन तक दोनों जगह-जगह पर टिकत मार दम लेत बरावर चले गए। तीसरे दिन ये दोनो एक छोटी-सी नदी के किनारे पहुँघे जिसके दोनो तरफ घना जगल और किनारे पर बडे-बडे साखू के दरस्त थे । यहाँ पर बहादुरसिंह ने अपना घोडा रोका और भोलासिंह से कहा "बस अब हम लोगों को इससे आगे न बढ़ना चाहिए । नरेद्र की जमापूंजी इसी जगह से हाप लगेगी।" मोला कहा पर है? बहादुर पहिले यह बताओ कि जमीन कसे खोदोगे? कोई फरसा या कुदाली है? भोला फरसा या कुदाली तो साथ लाए नहीं । बहादुर फिर माये क्या करने ? यहा तो आठ-नो पुरसा जमीन खोदनी पडेगी ।। भोला वहा कहते तो हम यह भी साथ ले लिए होते। बहादुर क्या मैंन नहीं कहा था कि जमीन खोद के दौलत निकालनी पडेगी? भोला हा कहा ता था, खैर अब क्या किया जाए? बहादुर क्यिा क्या जाए बस इस जगह (हाप से पता कर) खोदो। भोला यहा से शहर भी तो पास ही मालूम होता है, कहो तो जाकर कुदाली ले माऊँ? बहादुर अच्या जाओ, ल आओ । मगर सुनो तो, या मुझे अकेल छोड पाओगे भोला जैसा बहो।

. नरेद्र-मोहिनी पाठक, बहादुरसिंह इस दुष्ट भोलासिंह को धोखा देकर यहां तक तो ले आये। अब ये दोनो अपनी अपनी चालाकी में लगे हैं। भोलासिंह सोचता है, कही ऐसा न हो कि बहादुरसिंह घपला देकर चलता बने । पीछे हम किसी भापक न रहेंगे, हमारी मण्डली वाले भी बेईमान समझ कर फिर अपने साथ न मिलावेंगे। मगर लालच ने उसे पूरे तौर से फसा लिया था और वह कुछ बेवकूफ भी था। उधर बहादुरसिंह सोचते थे कि इस नालायक को यहां तक तो ले आये और हम हर तरह से भाग के जा भी सकते हैं, मगर असल काम तो उन दोनो औरतो का इन हरामजादो की कैद से छुडाना है। अगर यह लोट कर फिर वहां चला जायेगा जहा से आया है तो मुश्किल होगी, अपन साथियो से कह-सुन कर उन औरतो को किसी दूसरी जगह हटवा देगा तो बडा तरदुद होगा, जिस तरह हो इसे यही गिरफ्तार करना चाहिए । लेकिन असल मे बहादुरसिंह इसे अपने कब्जे में ले ही आये क्योकि इस वक्त जहाँ दोनो खडे हैं यह वह जगह है जहां नरेद्र के छोटे भाई घोडे पर सवार होकर रोज आया करते हैं और यहाँ से नरेद्रसिंह का मकान भी बहुत करीष है। बहादुरसिंह और भोलासिंह खडे बातचीत कर ही रहे थे कि सामन से एक सवार हाथ मे नेजा लिए आता हुआ दिखाई पडा जो बहादुरसिंह को देख तेजी के साथ लपक कर इनके पास पहुंचा और बोला, "बहादुर' तू कहा चला गया था और यहाँ खडा क्या कर रहा है? कुछ भाई नरेद्र का भी पता लगा ?" यही नरेद्रसिंह के छोटे भाई जगजीतसिंह हैं। उम्र इनकी अभी अठारह वष की है। खूबसूरत और नाजुक होने पर भी यह अपने शरीर को बहुत मजबूत बनाये रखते हैं । घोडे पर चढने, हर्बा चलाने और शिकार खेलने का शोक लहक्पन ही से है । इसके सिवाय हर तरह की विद्या में अपने को निपुण बनाये रखने का भी बहुत ज्यादे ध्यान रहता है । यह शौकीन भी बहुत थे मगर जब से नरेद्रसिंह चले गये हैं तब से इनको अपन शरीर का ध्यान ही जाता रहा। अच्छे-अच्छे कपडे पहिरने, शिकार खेलने, घूमने फिरने बल्कि दुनिया से भी ये उदास हो गये। दिन रात यही सोच है कि भाई नरेद्र मुझे को छोड गये! क्योंकि इनकी और नरेन्द्र की मुहब्बत को जो कोई देखता वह यही कहता कि इससे बढ के भाइयो मा प्रेम दुनिया में न होगा। इस समय वह पोरे पर नरेन्द्र-मोहिनी सवार होकर हवा खाने या शिकार खेलर नहीं आए हैं। यहां से पास ही एक बनदेवी का स्थान है, उनके नित्य दशन करने की इन्होंने प्रण गामा हुआ है। मुष दिन से घोडे पर सवार हो अपने घर से दो कोस पल कर रोज बनदेवी के दर्शन करने आते हैं । जब तक घर रहेंगे नेम न टूटेगा, चाहे पानी बरसे, पत्पर पहे, आफत आदे, मगर यह बिना दर्शन किये न रहेंगे। यही सबब है कि उन से मुलाकात होने की उम्मीद में बहादुरसिंह उनके रास्ते पर आ जमा है। बहादुरसिंह ने कहा, "हां हा पता जानते हैं, (भोलासिंह की तरफ हाप से इशारा करके) मगर पहिले इस दुष्ट को पकडो जिसकी बदौसत नरेद्रसिंह सकट में पड़े हैं। बहादुरसिंह की बात सुनते ही वह नया बहादुर भोलासिंह को ओर झुका । अब भोलासिंह को मालूम हो गया कि बहादुरसिंह उसके साप चालाकी खेल गये, धोखा देकर यहा तक ले आये और अब फसाया चाहते हैं । उनको अपनी तरफ लपकते देख भोलासिंह ने अट म्यान से तलवार खींच ली और इस जोर से उनके ऊपर चलाई कि अगर वह चालाकी से पैतरा बदल कर हट न जाते तो साफ दो टुकडे नजर आते । मगर इसके बाद उहोने भी अपने नेजेको पुमा कर बड़ी खूबसूरती से एक बार भोलासिंह की टाग पर किया जिसके लगने से वह सहा न रह सका और फौरन जमीन पर गिर पड़ा। जमीन पर गिरते ही उसे कद कर लिया और कमरबद खोल उसके हाथ-पैर क्स एक पेड के साथ बांध दिया। इसके बाद बहादुरसिंह से बोले, "हां, अब कहो क्या हाल है 'हमारे नरेद्र भैया कहां हैं और तुम उनसे कैसे मिले ?" बहादुरसिंह ने कहा, "नरेद्रसिंह के घले जाने के बाद उदास होकर बिना सर्कार से कहे मैं भी उनकी खोज मे निकला। कई दिन तक खोजता फिरता एक नदी के किनारे पहुंचा । दूर से एक छोटी-सी किश्ती आती दिखाई पडी, डर के मारे में एक घने पेड़ पर चढ गया जो उसी नदी के किनारे पर पा । जब वह किश्ती पास आई तब मालूम हुआ कि हमारे वे नरेद्रसिंह दो खूब- सूरत और जवान औरतो को जो सिर से पर तक जडाक जेवरों के साथ सदी ईह थों साथ बैठाये हसते-बोलते चले आ रहे हैं। देखते ही मेरी तबीयत खुश हो गई । मैंने पुकारा, जब वह किनारे पर भाये, मुलाकात हुई, मैं खुशी-खुशी उनके साथ हो लिया।

३२ नरेन्द्र-मोहिनी "सवेरा होने पर किश्ती किनारे लगाई गई। मैं भङ्ग पीसने लगा, उन दोनो मौरतो को मेरे सपुद कर नरेद्रसिंह दूसरी नाव किराये करने चले गये जो बडी थी और वहा से दिखाई दे रही थी। "नरेद्रसिंह के आने से बहुत देर हुई, इधर कई डाकुओ ने आकर हम लोगों को गिरफ्तार कर लिया और हमारी आंखो पर पट्टी बांध अपने पर वे गये। यह तो मालूम नही कि उन दोनो औरतो को कहा कैद किया और उन पर क्या गुजरी, हाँ मुझे एक जेलखाने मे कैद कर दिया और पहरे पर इस नालायक को बठा दिया । वह नरेद्रसिंह की दौलत लेने मेरे साथ आया है, पूछो हरामजादे से कि इससे मुझसे कब की मुहम्बत थी जो बेचारे नरेद्रसिंह की दौलत मैं इसे दे देता ।। इसके बाद भोलासिंह को धोखा देने का हाल बहादुरसिंह ने सुनाया निसे सुन जगजीतसिंह बहुत ही हंसे । भोलासिंह पेड के साथ बधा हुमा सुन-सुन चिढ़ता और जी ही जी मे गालियां देता था। जगजीतसिंह ने भोलासिंह से पूछा, "तुम कौन हो, तुम्हारे सगी-साथी कहीं रहते हैं, और उन दोनो औरतों को कहा कद कर रक्खा है ?" मगर सिवाय धुप रहने के भोलासिंह एफ बात भी न बोला, एकदम गूंगा बन बठा । पूछते- पूछते पक गये मगर अपनी बात का कुछ भी जवाब न पाया बल्कि गुस्से में आकर भोलासिंह को कई लात भी लगाये मगर उसका कोई भी नतीजा न निक्ला । आखिर लाचार होकर बहादुर से बोले, तुम इसी जगह ठहरो, मैं इस नालायक को ले जाकर कदखाने मे डाल आता हूँ और खाने-पीने के सामान के साथ दो-चार साथियो को भी ले आता हूँ, तब नरेद्र भाई का पता लगाने और उन दोनो औरतो को डाकुओं की कैद से छुडाने के लिए चलू गा।" बहादुरसिंह ने कहा, "बहुत अच्छा ।" शाम होते-होते अपने दो-तीन साथियो के साथ कुछ खाने-पीने का सामान मिए और सफर की तयारी किए हुए जगजीतसिंह फिर आ पहुँचे । बहादूर सिंह भी भूख से दुखी हो रहा था। उसे भोजन कराया इसके बाद उससे कहा, सुम अब घर जाओ और हम लोग नरेद्रसिंह की खोज मे जाते हैं क्योकि तुम न ता हम लोगों के साथ ही चल सकते हो और न लडने भिड़ने में ही साथ में सरते हो।"

नरद्र-मोहिनी बहादुरसिंह ने कहा, "इसमें कोई शक नहीं कि मैं औपके बराबर नहीं चल सकता और लडाई से तो सौ कोस भागता हूं मगर नरे द्रसिंह को खोकर मुझसे घर पर न बैठा जाएगा, तुम लोग अपना काम करो, में भी चुपचाप इधर- उपर धूम कर उन्हें खोजू गा।" उन्होने जवाब दिया, "सर जो मुनासिब मालूम हो करो मगर मुझे ठीक- ठीक पता दो कि उहें तुमने कहा छोड़ा है और तुम कहाँ कंद रहे ?" बहादुरसिंह जगजीतसिंह को पूरा पूरा पता बता कर वहाँ से दूसरी तरफ रवाना हो गया। आधी रात का वक्त है । पांदनी खूब खिली हुई है। इस खूबसूरत और चे मकान के पिछवाडे वाली दीवार पर चांदनी पडने से साफ मालूम होता है वि इसमे तीन बडी बडी दरीचियां हैं और बीच वाली दरीची (खिडकी) मे दो औरतें बैठी आपस में बातें कर रही हैं। नीचे की तरफ एक पाई बाग है जिसमे के खुशबूदार फूलो की महक ठण्डी-ठण्डी हवा के साथ मिल कर इस दरीची मे आ रही है जहां वे औरतें बठी बातें करती हुई घडी घडी उस बाग की तरफ देखती और ऊची सांस लेती हैं। इन दोनो मे से एक की उम्र तेरह चौदह वष के लगभग होगी । चदि सा गोरा मुख देखने से यही मालूम होता था कि उस मामूली चांद के अनावे यह दूसरा चाँद इस मकान की दरीची से निकला चाहता है। वह दरवाजे के साथ ढासना लगाये अपना दाहिना हाथ दरीची के बाहर निकाले है जिसमें अनमोल हीरे को जहाऊ चूडिया और अंगूठिया पड़ी हुई हैं। बात-बात मे ऊँची सास लेती और आंसू टपका-टपका कर अपने ठीक सामने की तरफ बठी हुई उस दूसरी औरत से बातें कर रही है जो खूबसूरती और गहने-कपडे के लेहाज से इसकी प्यारी सखी मालूम होती है । कुछ देर तक दोनो चुप रहो, इसके बाद उस चद्रमुखी ने अपनी सखी की तरफ मुंह करके कहा, "सखी तारा अब मैं क्या करू?" तारा प्यारी रम्मा, तुम तो नाहक जिद्द करती हो अगर अपने पिता का कहना मान लो तो कोई हल नहीं है।

नरेन्द्र-मोहिनी रम्भा नही बहिन, ऐसा न होगा। पम तो विगहें होगा ऊपर से इसमें बदनामी भी यही होगी। दुनिया क्या कहेगी कि रम्भा की शादी नरेद्रसिंह से लगी, तिलक घढ चुका या, पारात निक्स घुरी थी, मगर नरेन्द्रसिंह ने म्याह न किया, वागत म से भाग गये, तब रम्मा की दूसरी शादी की गई। क्या मैं दो गादी वाली न कहलाऊंगी? तारा सुनते हैं, नरेद्र तुम्हारे सायक पा भी नहीं, बटा ही बदसूरत और एक टाग से लगडा भी था, फिर क्यो उसके लिए जिद्द करतो हो? रम्भा सखी, जो हो, सगडा लूला, बघा, कोदो चाहे जसा भी हो, आखिर तो मेरा पति हो चुका अब मैं दूसरी जगह शादी नहीं करने की । पण्डित सोग लास कसम खायें कि इसमे कोई दोष नहीं मगर मैं एक न सुनूंगी। ज्यादे जिद करेंगे तो बाप मा माई इत्यादि सभी को छोड़ कही पली जागी या अपनी जान ही दे दूगी। तारा सखी, सच पूछो तो बात तो सही है, जिसरे हुए उसके हुए, मगर अफसोस तो यह है कि नरे द्रसिंह कहते हैं कि मैं बमभर शादी हो न करूगा, चाहे जो हो। रम्भा अगर उनकी ऐसी मर्जी है तो क्या हज है, मैं भी उनके नाम पर जोगिन बन जम गवाऊँगी मगर मुझे निश्चय है अगर मेरा सामना नरेन्द्र- सिंह से हो जावेगा और मैं हाथ बाँध अपने को उनके परोपर डाल दूगी तो वह मुझको कभी न त्यागेंगे। मगर क्या करू? कहा दूलू? मैं तो उसे पहिचा- नती तक नही। तारा बहिन, अब मुझे निश्चय हो गया कि तुम अपनी जिद्द न छोडोगी, अपने धम को न बिगाडोगी । खर, तो फिर मैं भी बाप-मा को छोड तुम्हारे दुख-सुख की सापी बनूगी, क्योंकि अब यहा रहना ठीक नहीं है । रम्भा (रो कर) प्यारी सखी, तुम मेरे साथ क्या अपनी जिदगी बिगा डती हो? तारा (रो कर औरहाय नोड कर) बहिन, क्या तुम समझती हो कि तुम से अलग होकर में सुखी रहूँगी? रम्भा नहीं मैं तो खर तुम्हारी जसी मर्जी।। तारा मैं कभी तेरा साथ नहीं छोड़ सकती।

मरेद्र-मोहिनी
रम्भा मैं तो माज ही इस शहर को छोड देना चाहती हूँ।
तारा अच्छा है, तो चलो फिर, मैं भी तयार बैठी हूँ।
रम्भा भला यह तो बताओ मुझे किस भेष मे यहां से निकलना चाहिए?
तारा इन जेवरो और कपडो को उतार देना चाहिए जो हम लोग पहिने
हुए हैं और मैली धोती और एक चादर ले यहा से चल देना चाहिए।
रम्भा मेरी समझ मे एक एक पोशाक मर्दानी भी साप रख लेना मुना
सिव होगा।
तारा जरूर ऐसा करना चाहिए, कुछ दूर जा कर हम लोग मर्दाने मेसे
में सफर करेंगे।
रम्भा तो अब देर करना मुनासिब नहीं है, चलो फिर ।
सारा मगर मेरी समझ मे आज चलना ठीक नहीं होगा।
रम्भा क्यो?
तारा ईश्वर की कृपा से अगर नरेन्द्रसिंह कही मिले भी तो हम लोग
उनको कसे पहिचानेंगे? अगर न पहिबाज सके और वह मिलकर भी फिर
जुदा हो गये तो बिल्कुल मेहनत बर्वाद जाएगी और दौड-धूप ही मे जिन्दगी
बीत जाएगी।
रम्भा फिर क्या करना चाहिए ?
तारा । तुम्हारी मां के पास नरेद्रसिंह की तस्वीर है, किसी तरह उसे ले
लेना चाहिए।
रम्भा ऐसा । मगर मुझे कुछ नहीं मालूम कि वह तस्वीर कब आई और कहा
तारा तुम्हारी शादी पक्की होने से पहिले ही वह तस्वीर तुम्हारे पिता
साये ये जो अभी तक मां के पास है।
रम्मा तो उसे किस तरह लोगी?
तारा कल जिस तरह बनेगा उस तस्वीर को मैं जरूर गायब करूगी, हो,
एक काम और भी करना चाहिये ।
रम्भा वह क्या?
सारा एक नामी खानदान की लडकी का इस तरह यकायक अपने घर से
बाहर निकलना ठीक नहीं है, इसमे बडी बदनामी होगी। चाहे तुम कितनी ही

1 नरेद्र मोहिनी नैक और पतिव्रता पयों न बनो मगर कोई मी तुम्हारी नेरपसनी को न मानेगा, यहां तक कि नरेन्द्रसिंह को भी ताना मारने की जगह मिल जाएगी, इससे जहर किसी मद को साथ ले सेना चाहिए । रम्मा ऐसा कौन है जो मेरे पिता से बरखिलाफ होकर ऐसे वक्त मे हम लोगो का साप देगा और जिसके साप बाहर जाने में बदनामी भी न होगी तारा तुम्हारा पचेरा भाई बज नसिंह अगर साप चले तो अच्छी बात है, उसके सङ्ग जाने में किसी तरह की बदनामी नहीं हो सकती। सिवाय इसके वह दिलेर और बहादुर भी है दस-बीस दुश्मनों का मुपावसा ना सके लिये अदनी बात है, और वह साप चलने पर राजी भी हो जाएगा योकि तुम्हें बहुत मानता है और तुम्हारी इस दूसरी गादी की बातचीत से उसे भी रहर है, क्योकि वह नहीं चाहता कि तुम्हें किसी तरह से दुख हो । रम्भा बात तो बहुत ठीक कही, मुझे आशा है कि अर्जुनसिंह अवश्य मेर साथ देगा, अच्छा फल सवेरे जब वह मामूली समय पर मुझसे मिलने आया तब मैं उससे बातें करूगी, वह नरे द्रसिंह को पहिचानता भी है मगर तुम यह तस्वीर लेने से न चूकना और जिस तरह यने कल दिन मे उसका बोबस्त जरूर करना। तारा ऐसा ही होगा। इसके बाद वे दोनो उसी कमरे में अपनी-अपनी पारपाई पर सो रही। तारा को तो नीद आ गई मगर रम्भा की आख बित्युल न लगी। रात भर घडियाल की आवाज गिना की और अपने जाने को तयारी तथा दूसरी दूसरी बातें सोचती रही। सवेरा होते ही वह चारपाई से उठी, तारा को भी जगाया। हाथ मुंह धो कर बठी और अपने भाई अजुनसिंह के आने की राह देखने लगी। थोड़ी ही देर बाद अज नसिंह भी आ पहुँचे। रम्भा को रोज से ज्यादे उदास दख बोले- बहिन आज तुम बहुत ज्यादा उदास मालूम होती हो इसका मतलब तो मैं जानता ही है । क्यों पूछू तो भी कहता हूँ कि सब करो और घबहाओ मत, देखो ईश्वर क्या करता है।" क्या करू भैया अब तो मैं अपनी जान देने को तयार हो चुरी। पिता मानते नही, मां कुछ सुनती नहीं तुम कुछ मदद करते ही नहीं फिर जो ही में क्या (आसू बहाती है।

नरेद्र मोहिनी 7 7 अजुन (अपने रुमाल से रम्भा के मासू पोछ कर) बहिन, मैं तो कई दफे मना कर धुका हू मगर लोभी पण्डितो के फेर में पड के कोई सुनता ही नहीं तो क्या करू अब जो तुम कहो मैं करने को तयार हूँ। अपने जीते जी किसी तरह की तकलीफ तुमको न होने दूंगा। रम्भा क्या मेरा कहना तुम मानोगे ? अजुन जरूर मानूगा। रम्भा अच्छा मुझे इन सभी से दूर चुपचाप काशी पहुँचा दो, मैं वहा विश्वनाथ के चरणो मे अपना पातिव्रत निबाहूगी और देखूगी कि माई अन पूर्णा मेरी कुछ सुनती है या नहीं। अजुन क्या हज है, चलो तुमको आज ही यहा से ले चलता हूँ, कहो तो किसी और को भी साथ लेता चल रम्भा तारा मेरे दुख सुख को साथी होकर चनेगी और किसी को साथ लेना मुनासिव न होगा। अजुन (तारा की तरफ देख कर) क्यो क्या तुम चलोगी? ताग जरूर चलूगी। अजुन अच्छा तो फिर सवारी का क्या बदोवस्त किया जाय? रम्भा तुम जानते ही हो कि हमलोगो को घोडे पर चढने का खूब मोहावग है, फिर भागने के लिए इससे बढ कर और कौन सवारी होगी? अजुन अच्छा तो फिर घोडे का ही बदोबस्त हो जाएगा। अब मैं जाता है क्योकि इस वक्त से फिक्र करनी होगी। तारा तुम्हारे पास नरेद्रसिंह को तस्वीर भी तो होगी? अजुन हा है तो। तारा मुझे दो। अच्छा मेरे साथ आओ मैं तुम्हें दू। arn (भौहें मरोड कर) | वाह तुम्हारे साथ वहा मर्दो मे चलू।। अजुन (हस वर) अच्छा मैं अपन साथ लेता चलू गा रास्त में ल लना । पारा सो हो सकता है। अजुन अछा तो मैं जाता हूँ, अब आधी रात को मुलाकात होगी। अजुनसिंह वहा स रवाना हुए और अपने घर जाकर छिपे छिपे सफर की अजुन ८ चाहिये। अदाज से मालूम होता है कि मुसाफिरो के टिकने का स्थान अर्थात) नरेद्र-मोहिनी तैयारी करने लगे। शाम होते ही रम्भा और तारा ने भी अपनी तयारी इस तरह पर बर डाली कि किसी लौडी तक को मालूम न हुआ। इसके बाद कुछ खा-पीकर सोने के कमरे मे जा अपने-अपने पलग पर सो रही। पर नींद काहे को आती थी, यह साच रही था कि अजुनसिंह आवें और हम लोग यहा से चलते बनें। आधी रात के बाद बाहर से किसी के पैर की चाप मालूम हुई। दोनों उसी तरफ देखन लगी । अजुनसिंह सामने आ खडे हुए जिनको देखते ही दोनो उट बठी और तारा ने पूछा, 'क्या आप तैयार हो आये " इसके जवाब म अजुनसिंह ने कहा, "हा सब दुरुस्त है अब देर मत करो।' रम्भा यहाँ आती समय पहरेवालो ने तो जरूर टोका होगा और जाती ममय भी टोकेंगे। अज न क्या पहरे वालो की इतनी मजाल हो गई कि मुझे आते जाते रोक-टोक करें ? हा जाने के बाद जिसका जो चाहे शिकायत करे । अच्छा अब देर मत करो जल्दी चलो। रम्भा और तारा दोनो को साथ लेकर अज नसिह घर से बाहर निकले और पदल ही मदान की तरफ चले । थोडी दूर जाकर इन लोगो को एक पुराना बड का पेड मिला जिसके नीचे तीन साईस कसे-कसाये घोडे लिए अजुनसिंह के आने की राह देख रहे थे। तीनो आदमी पाडे पर सवार हुए। अजुनसिंह ने तीनो साईसो को कहा, 'अब तुम लोग अपन घर जाओ, जब हम आगे तब बुला लेंगे। घर बरे तुम लोगो के खाने को पहुँचा करेगा।" तीनो साईस सलाम कर विदा हुए और इन लागो ने पश्चिम का रास्ता जब तक रात रही तीनो घोडा फेंके चले गए। जब आसमान पर सफेदी दिखाई देने लगी तब अजु नसिंह ने घोडे की बाग रोकी और रम्भा की तरफ देख कर कहा 'बहिन, अब हम लोगो को यहां कुछ देर के लिए रुक जाना चट्टी (पडाव) अब बहुत करीब है मगर हम लोग आगे चलकर किसी दूसरी पकड़ा।

नरेद्र-मोहिनी घट्टी में डेरा डालेंगे, यहाँ न ठहरेंगे, इसलिए ईसी जगह रुक कर बोडो को ठडा कर लेना चाहिए। तुम दोनो औरतों के बदन के लोग्ने मुदती पौशा भी मैं लेता आया हूँ जो तुम लोगो ने घोडोंची जीन के साथ असबाब मैं पीछे की तरफ बंधी हुई है, मुनासिब है कि तुम दोनो भी अपनी मर्दानी सूरत बना लो।" अजु नसिंह की घात रभा और तारा ने भी पसन्द की और घोडे से उतर पही। जीन खोल घोडों को ठडा होने के लिए छोडा और खुद भी जनानी पोशाक उतार मर्दाने कपडे पहिर कर तयार हा गई । तीनों आगमी चार जामा बिछा कर पेड के नीचे बठ गये। कुछ देर के बाद रम्भा का इरादा पा तारा ने अर्जुनसिंह से कहा, "आपने वादा किया था वि नरेद्रसिंह की तस्वीर मुझे दिखावेंगे" अज नसिंह ने कहा, 'हां हां, मैं नरेद्रसिंह की तस्वीर लेता आया हूँ लो देखो।" यह कह अपनी जब से तस्वीर निकाल तारा के हाथ मे दे दी और आप घोडो को कसने लगे। तारा ने रम्भा के हाथ मे तस्वीर देकर कहा, "देखो बहिन, ऐसे खूबसूरत और दिलावर नरेद्रसिंह के बारे में लोगो ने कसी कसी गप्पें उडाई हैं!!" तस्वीर देखते ही रम्भा की जाखें डबडबा आई और जी बेचैन हो गया। अपन को बड़ी मुश्किल से सम्हाला और तस्वीर तारा के हाथ मे देकर बोली, "देखना चाहिए इनकी बदौलत मेरी क्या गति होती है ।" अजुनसिंह दो पोडो पर जीन कस चुके, जब अपनी सवारी का घोडा कसने लगे तो यकायक कुछ देख कर घोडा भडका और अज नसिंह के हाथ से छूट मदान मी तरफ भागा। वे भी उसके पीछे दौडे। रम्भा और तारा यह देख उठ खडी हुई और उस तरफ लेखन लगी जिधर घोडे के पीछे-पीछे अजुनसिंह दौड गये थे । घोडा चक्कर लगा लगा कर दोहता और कभी खडा होर पोछे की तरफ देखता जब अज नसिंह उसके पास पहुचते तो फिर तेजी के साथ भागता था। दिन बहुत घढ आया मगर वह घोडा अजु नसिंह के हाप न लगा, यहाँ तक कि देखते-देखते वे इन दोनो की नजरों से गायब हो गये । आखिर पदहा भर रम्भा और तारा दोनो घोडो पर सवार हुई और उसी तरफ को चली ४० - नरेद्र मोहिनी जिधर घोडे के पीछे अर्जुनसिंह गए थे, मगर इनमा मतलब सिद्ध न हुआ, दिन- भर भूखे प्यासे दौडने पर भी अज नसिंह से मुलाकात न हुई और दोनो एक बड़े भयानक मैदान मे पहाडी के नीचे पहुँच कर रुक गई । लाचार दोनो औरतें घोडो से नीचे उतरी। घोडो को पीठ खाली कर लम्बी बागडोर लगा पत्थर से अटका चरने के लिय छोड़ दिया और खुद एक चिक्ने पत्थर पर बैठ रोन और अफसोस करने लगी। रम्भा देखो बहिन, बुरी किस्मत इसे कहते हैं तारा परमेश्वर की मरजी न मालूम कसी है । इस वक्त हम लोग कसी विवश हो रही है रम्भा अजुनसिंह के हाथ अगर घोडा लग भी गया होगा तो वह उस ठिकाने जाकर हम लोगो को न देख कितना घबडाये होंगे। तारा लेकिन अब हम लोगो का वहा तक पहुचना मुश्किल है । रम्भा मालूम ही नहीं कि घूमते फिरते पहा आ गये । अब भूख के मारे जी वचन हो रहा है। ताग मुझे विश्वास है कि जीन की खुर्जी में थोडा बहुत मेवा अजुनसिंह ने जरूर रखवा लिया होगा। रम्भा देखो तो कुछ है कि नहीं? तारा न उठ कर दोनो घोडो के जीन की तलाशी ली लगभग दो सेर के मेवा दोनो म पाया जिसमे वह बहुत खुश हुई और पुवार कर रम्भा से बोली, हम सानो दुखियो के खाने लायक बल्कि चार पांच दिन तक जान बचाने लायक मेवा इमम है।' रम्भा कही पानी मिले तो पहिले मुह हाथ धो लेना चाहिए इस पहाड की सब्जी की तरफ देख कर मैं समझती ह कि इसके ऊपर पानी का चश्मा जरूर होगा। रम्भा अभी तो दिन भी बहुत है चलो पहाडी के ऊपर चढ चलें। रम्भा और तारा नानो ने मेवा साथ लिया और पहाडी के ऊपर चढने लगी। थोडी दूर उपर जाकर पानी के कई सोते इनको मिले । एक झरने के पास वठ कर इन लोगो न मुहें धोया और किफायत के माथ थोडा मेवा सा कर जी ठण्डा दिया जिसके बाद फिर पहाडी पर चढन लगो, यहा तक कि तारा d नरेद्र मोहिनी प्रस्तुगेरे शाम होते-होते चोटी पर जा पहुंची। पहाड के ऊपर कई खूबसूरत और पने जगली पेड़ थे जो इस समय हवा के पेटो से हिल-हिल कर मौके खा रहे थे, और एक तरफ छोटा-सा दालान भी बना हुआ था। शाम हो चुकी थी ये दोनो पकी हुई एक पत्थर पर बैठ चारों तरफ देखने लगी । दक्खिन की तरफ एक सूबसूरत इमारत और उसके पास ही दाहिनी तरफ हट कर कोस भर की दूरी पर एक छोटा-सा शहर भी निखाई पडा । रम्मा ने कहा, "बहिन तारा हम लोग इस शहर मे चल के नरेद्रसिंह को जरूर दूंगे । देखो लोगो ने उनके बारे में क्या-क्या गप्प उडाई थी कि लगडे, सूले, काने और बड़े ही बदसूरत हैं। लेकिन अगर वसे भी होते तो क्या था? मेरा सम्बन्ध तो उनसे हो ही चुका था, मेरे पति कहला ही चुके थे, लिए परमेश्वर वही है, चाहे जैसे हो। तारा उन लोगो की जुबान म साप इसे जिहोने नरेद्रसिंह के बारे में ऐसा पहा पा । मै तो कह सकती है कि ऐसा खूबसूरत और बहादुर दुनिया- भर मे न होगा। तुम बडी स्मितदार हो रम्भा आज की रात इस पहाड़ पर काट कर कल उस शहर मे जरूर चलना चाहिए। तारा ऐसा ही करगे। रम्भा मैं समझती हूं कि इस मर्दानी सूरत के बदले हम लोग फकीरी हालत में रह कर अपने को इससे ज्यादा छिपा सकेंगे। सारा इसमे तो कोई शक नहीं, कल उस शहर कपडे खरीद कर फकीरी ढग की पोशाक दुरुस्त करा लूंगी। ये दोनो बैठी हुई बातें कर रही थी कि आसमान म काली घटा घिर आई । चारों तरफ अधेरा छा गया, पानी बरसने लगा, बिजली चमकने और गरजने लगी जिसवीररावनी आवाज पहाडो से टक्कर खा-खाकर दसगुनी होकर इन दोनों बेचारियो के जी को दहलाने लगी। दोनो उठ कर उस दालान मे चली गई जिसका हाल ऊपर लिख चुके हैं। रात भर पानी बरसता रहा भोर रे दोनो उसी दासान में बैठी अपनी- अपनी किस्मत को शिकायत करती रही । जब सवेरा हुआ, पानी बरसना वर चलकर बाजारसे . ।

नरेद्र-मोहिनी हुआ और धूप निकल आई। वे दोना भी उठी और सवेर के जरूरी कामो से घुटटी पा एक चश्मे म हाथ मुह धो कुछ मेवा खा कर शहर की तरफ चलने की तैयारी कर दी। ताग ने कहा, "कुछ मालूम नही हमारे दोनो घोडो पर क्या गुजरी रात भर पानी मे दुख उठा मर गये या जीते हैं।" रम्भा वे घोडे वहां न होगे, विसी पेड से तो वह बंधे नहीं थे, जब बदन पर पानी पडा होगा किसी तरफ भाग गए होगे । फिर हम लोगो को भी तो अब घाडो की जरूरत नही है, पैदल ही चलना ठीक होगा, जह' मन मे आया गए जहां चाहा पडे रहे मगर हाँ पहाडी के नीचे चल कर उन घोडो को एक बार देखना जरूर चाहिए। अगर अभी भी बंधे हो तो खोल देना ही उचित होगा। नारा मेरी भी यही राय है । वे दोनो पहाडी के नीचे उतरी मगर घोडो को वहां न पाया। रम्भा ने कहा 'सखी मैं कहती थी कि दोनो घोडे भाग गए होगे। चलो अच्छा ही हुआ बखेडा छूटा, अब यहा ठहरने की कोई जरूरत नहीं इसके बाद वे दोनो शहर की तरफ रवाना हुई । हाय आज तक जो बडे लाड और प्यार से पली थी उसको धम के पठिन रास्ते का दुख भागना पडा। अभी तक जिसको जमान की गम सद हवा सू नही गई थी उसको आंधी और लू के झपेटे बर्दाश्त करने पडे । चन्द्रमा की कडी चांन्नी से जिसके सर मे दद होता या उसे कड़ी धूप मे मावन से भी कोमल बदन को पिघलाना पडा। गो कभी दस कदम भी जबदस्ती से नहीं चलाई गई थी आज वह कोसों मिटटी फॉकने के लिए मजबूर की गई । जो भोजन करने के लिए दिन भर मे दस दफे पूछी जाती थी उस काई मुटठी भर अन देने वाला भी न रा ! जिसकी आख डबड्याई हुई देख कर लोगो का जी बेचन हो जाता था उसके आसू पोछने वाला आज कोई नही जो हो नरेन्द्रसिंह की बदौलत रम्भा का आज यह सब दुख भोगने पडे । मगर ध य है बिचारी तारा को जो ऐसे समय में भी अपनी प्यारी सखी का साथ नहीं छोडती । यह सब प्रेम की बात है नहीं तो कौन पूछता है । थोडी थोड़ी दूर पर धूप से घबडा कर किसी पेड के नीचे टहलती दम चरती, आंसुओं से अपने चेहरे को तर करती दम-दम पर हाय यह . में नरेद्र-मोहिनी जी के बुखार को निकालती हुई दिन ढलते-दलते अपनी सखी तारा को साथ लिए हुए रम्भा उस शहर के पास जा पहुँची जिसे पहाडी के ऊपर से देखा पा। शहर की बाहरी हद्द पर एक सुन्दर पहाडी थी जिसके नीचे हायो म लटठ लिए बदमाशी ठाठ के पई आदमी दिसाई पहे। तारा ने चाहा कि किसी से इस शहर का नाम पूछ मगर वे सब के सब बिना कहे इन दोनो के पास पहुचे और इन दोनो से तरह-तरह की बातें पूछने लगे। कोई कहता है "क्यो साहव ! आप किसके यहां जाएंगे। हम लोग गया- वाल के नौकर हैं। यहा आपका पण्डा कौन है ?" कोई कहता है, "लाल जी मया के हम आदमी हैं, हमारे साथ चलिए ।" कोई आपस ही में चिल्ला कर रहता है-"अजी यह पुरविये हैं, हमारे जजमान हैं, चलो हटो तुम लाग झूठे बखेडा मचाये हुए हा।" कोई इन दोनो के बहुत पास आ के कहता है कि "आप मेरे यहा घलिए वहा टिक्ने का बडा आराम है और हम यात्रा पिण्डा भी बहुत अच्छी तरह करा देंगे, आइये यह रामसिला है पहिले इसी वा दशन करना चाहिए नहीं तो यात्रा सुफल न होगी।" कोई कहता है, "अभी तो यह आप ही लडके हैं, पिण्डा क्या देंगे।" इसी तरह उन लोगो ने चारो तरफ से रम्भा और तारा को घेर लिया और अपनी-अपनी वरवाद करने लगे। तारा ने उन सभी से कहा कि यात्री नहीं हैं सौदागर के लडके हैं।" मगर वे लोग कब मानने वाले थे इन दोनो को यहाँ तक तग किया कि दोनो की आँखो मे आसू डबडबा आये और तारा ने झुझलाकर बहा, "तुम लोग बडे शैतान हो थात नहीं मानते और वैफायदे तग कर रहे हो। हम लोग मुसलमान होकर पिण्डा सिण्डा क्यो देने हम लोग लगे?" मुसलमान का नाम सुनकर वे लोग पीछे हटे और बेहूदी बातो के साम आवाजें क्सने लगे। ये दोनों आगे बढी, तब तारा ने कहा "देखो बहिन, ये लोग यात्रियो को कितना दिक्क करते हैं । अगर हम लोग अपने को मुसलमान न बनाते तो इन लोगो के हाथ से बहुत तग होते, तिस पर भी देखो अब ये लोग गालियां देने पर उतारू हुए हैं।" रम्भा ने कहा, 'चुपचाप चली चलो, नालायको को बक्ने दो। अब मालूम नरेन्द्र-मोहिनी 1 - हुआ कि यह गयाजी है, ताज्जुब नहीं वि यहाँ नरेन्द्रसिंह से मुलाकात हो जाय।" इतना कह रम्भा ने फिर पर देखा तो उही संतानो म स दो आदमियों को पीछे पीछे आता पाया । यह देख रम्भा बहुत पवहाई और तारा से बोली, 'अभी दुष्ट लोग पीछा किये चले ही आ रहे हैं वही मुशिल हुई । इन लोगों के मारे कही यह भेद न खुल जाय कि हम लोग औरत हैं और मर्दानी पोशाक केवल अपने को छिपाने के लिए पहिने हैं। अगर ऐसा हुआ तो इज्जत परमा बनेगी और अपने हाथो अपना गला काटना पड़ेगा।" तारा बोली 'सर, कदम बढाये चलो। राम मरे सो होय वही सराय में चल कर डेरा डालेंगे, फिर देखा जायगा।" पहर भर दिन भाको था जब ये दोनों शहर में घुस कर सोजती फिरती एक सराय के दरवाजे पर पहुँची। भठियारी आग आकर इन लोगों को खातिरदारी के साथ सराय मे ले गई एक अच्छी साफ कोठडी इन दोनो को रहने के लिए दी, और पारपाई तथा विद्यीन का इतजाम करने पूछा, अगर कुछ बाजार से लाने की जरूरत हो तो ले आऊ? ' तारा ने कहा "नहीं, इस वक्त किसी चीज की जरूरत नहीं है ।" यह सुन भठियारी वहां से हट दूसरे मुसाफिरो की टोह मे सराय के बाहर चली गई मगर इन दोनो के पास कोई अमबाब न देखकर हैरान थी। गयावाल पण्डे के दोना आदमी जो रम्भा और तारा के पीछे पीछे आ रहे थे इन दोनो को सराय के अदर जाते देपकर बाहर फाटक पर अटक गये । जब भठियारी इन दोनो को डेरा दिलवा कर फिर सराय तब वे दोनों आदमी भठियारी से धीरे धीरे कुछ बातचीत करने लगे, इसके बाद अपनी कमर से कुछ निकाल कर भठियारी के हाथ मे दिया जिसे लेकर उसने कहा 'आप बेपरवाह रहिये में सब बदोबस्त कर दूंगी।" ६ रम्भा और तारा ने वह रात उदासी और तकलीफ के साथ बिताई। सवेरा होत ही बुढिया भठियारी उन दोनों के पास गई और सामने बैठकर बातचीत करने लगी, कहिए, रात को किसी तरह की तकलीफ तो आप लोगो को नहीं हुई। फाटक पर गई नरेद्र-मोहिनी ४५ - तारा नही हम लोग बड़े आराम से रहे । भठि. यहाँ आराम तो हर तरह का है मगर आपको तकलीफ जरूर भई होगी क्योकि मद का भेप बना कर अपने को छिपाने के तरदुद में आप लोगो ने कुछ खाने-पीने का भी इतजाम नहीं किया, न बाजार ही से जाकर कुछ सौदा लाये। तारा ( (ताज्जुब और घबराहट से रम्भा की तरफ देख कर) लो सुनो धीमी मठियारी को हम लोगो पर कुछ और ही शक है ।। भठि (हस कर) अभी आप इस लायक नहीं हुई कि मुझे धोखा दें। इसी शैतानी में मैंने जम विताया, अपने लडकपन और जवानी के समय में मैंने कसे कसे ढग रचे कि अच्छे-अच्छे चालाको की नानी मर गई, अभी आप लोगो की उम्र ही क्या है? तारा डर कर जी मे सोचने लगी, "यह बुढिया तो हम लोगो को पहि- चान गई, कही ऐसा न हो कि कोई आफत लावे ।" यह ख्याल करके अपने कमर से एक अशर्फी निकाल उस भठियारी के हाथ मे रख कर बोली 'माई, तुम्हें इन सब बातो से क्या मतलब है । हम लोग किसी तरह मुसीबत के दिन काट रहे हैं। दो चार रोज इस शहर मे भी रह कर और कही का रास्ता लेंगे। इज्जतदार हैं. आवारे और बदमाश नहीं हैं । तुमको चाहिए हर तरह से हमको छिपाओ और हमारी इज्जत का ध्यान रखो।" बुढिया अशर्फी पाकर खुश हो गई और बोली, "नही नही भला यह कसे हो सकता है कि हमारे सबव स आप लोगो को किसी तरह की तकलीफ हो। क्या मजाल कि किसी को आपका भेद मालूम हो जाय ।।' इतनी बातें हो रही थी कि सराय के अन्दर घोडे पर चढा हुआ एक लडका बीस बाईस वप के सिन का खूबसूरत और बेशकीमत भडकीली पोशाक पहिरे आता दिखाई पडा जिसे देखते ही भठियारी उठ खडी हुई । रम्भा और तारा की निगाह भी उस पर पड़ी। देखा कि हाय मे लम्बे लम्बे लट्ठ लिए कई आदमी भी उसके साय हैं जिनम वे दोनो आदमी भी हैं जो पल उन दोना के पीछे पीछे आये थे और भठियारी से बातचीत करके उसके हाथ में कुछ दे गये यह देखते ही तारा और रम्भा का माथा उनका । तरह-तरह के शक नरेद्र-मोहिनी उनके दिल मे पदा होने लगे और डर के मारे क्लेजा कांपने लगा। वह सवार बराबर वहा तफ चला आया जहा रम्भा और तारा कोठरी के दरवाजे पर बैठी थी। वह सवार इन दोनो की तरफ गौर से देख कर भटियारी से बोला, 'मुझे टिकने के लिए कोई जगह दो।" भठि० आपके रहने लायक जगह इस सराय मे कहा ? चलिए कोई उम्दा निराला मकान आपके रहने के लिए हूँ। भठियारी उनको साथ ले सराय के बाहर चली गई और घण्टे भर तक न आई। जब भठियारी फिर सराय मे लौटी तो सीधे रम्भा और तारा के पास चली गई और बैठकर कहने लगी, 'यह बहुत बड़े आदमी है, साल मे दो-तीन दफे हमारे यहाँ आकर टिका करते हैं, अमीरों और रईसो के टिकने के लिए मैंने कई मकान भी बनवा रखे है जिनमे सजा हुआ कमरा और हर तरह का सामान भी दुरुस्त रहता है, उही मकानो में से किसी में इहें टिकाया करती हूँ। यह जब तक रहते हैं एक अशर्फी रोज देते हैं। तुम भी किसी आली खान दान की लडकी मालूम होती हो, अगर कहो तो तुम्हें भी एक अलग मकान टिकने के लिए हूँ और बाजार से सौदा वगरह लाने के लिए क्सिी हिदू मज दूरनी का भी बदोबस्त कर दू, क्योकि इस जगह आप लोगो को हर तरह की तकलीफ होगी और भेद खुलने का खौफ भी बराबर बना रहेगा, आखिर सवेरे सवेरे आपने मुझे एक अशर्फी दी है उसी की बदौलत एक और अमीर का भी डेरा मेरे यहा आया, सो मुझे भी चाहिए कि जहा तक बने आप लोगो के आराम के साथ रहने का बदोबस्त करू ।" तारा ने कहा "इस सवार के पियादो मे कई आदमी ऐसे हैं जिहे मैं पहिचानती हूँ क्योकि कल शहर के बाहर पहाडी से यहाँ तक वे लोग हमारे पीछे-पीछे आये थे।" भठि. हां, वे गयावाल पण्डो के नौकर है, उनका काम ही है कि शहर के बाहर की उस पहाडी के नीचे जिसका नाम रामसिला है बठे रहते है, और जब कोई मुसाफिर आता है तब उसे अपने मालिक का जजमान बनाने के लिए कोशिश करते हैं । इह अपना जनमान बना आज इन्ही के साथ वे लोग आये नरेद्र-मोहिनी होंगे जिहें कल आपने देखा या तारा खर, अगर हम लोगों के लायह, कोई उम्दा-मकान हो तो दो यह सुनकर भठियारी वहां से उठ समय के बाहर चली गई औरत भर के बाद फिर लौट कर तारा से बोली "चलिए सब दुरुस्त कर आई हूँ।" तारा और रम्भा को साथ ले भठियारी सराय के बाहर हुई और थोडी दूर जाकर एक सुनसान गली मे घुसी। कई मकान आगे बढ वह एक छोटे-से मकान के बन्द दरवाजे पर खडी हो गई और चाभी से उसका ताला खोला जो उसके माचल के साथ बधी हुई थी। दोनो के लिए हुए मकान के अदर घुस गई। वह मकान अदर से भी बहुत साफ और सुपरा था, कुल चीजें जरूरत की इसमे मौजूद थी, एक कमरे मे कई शीशे लगे हुए थे, जमीन पर फ्श और उसके ऊपर दो घारपाइयो बिछी हुई थी जिनके बिछौने की चादर सन्ज रेशम की डोरियो से खूब कसी हुई थी। रम्भा और तारा को ज्यादे चीजो की जरूरत न थी मगर इस मकान को देख कर खुश हो गई । तारा ने भठियारी से कहा, ' मकान तो तुमने बहुत अच्छा दिया, अगर एक हिदू मजदूरनी का भी बदोबस्त कर दो तो पानी बग- रह का भी इतजाम हो जाय और वह दो चार जरूरी वतन भी बाजार से खरीद कर ले आवे।" मठियारी दौडी हुई गई और योड़ी ही देर मे एक हिंदू मजदूरनी भी ले आई जो गले मे तुलसी की कण्ठी पहिने हुए थी। भठियारी चली गई। जिन जिन चीजो की जरूरत थी सब मजदूरनी की मारफ्त बाजार से मगवा लो गई । इस मकान मे कू आ न था इसलिए पानी भी बाहर से ही मगवाना पड़ा। दोनो ने स्नान किया, इसके बाद खाना बना कर भोजन करने के बाद मकान का दरवाजा बद कर पलग पर जा लेटी। नीद आ गई। जब थोडा दिन बाकी रह गया तब उठी । रम्भा न तारा से कहा, "बहिन, आज रात को मर्दाने भेष मे घूम कर नरेद्रसिंह की टोह लगानी चाहिए।" तारा ने कहा, 'जरूर आज रात को हम लोग घूमेगे । हाथ मुह धोने के लिए पानी की जरूरत पडी, मजदूरनी को पुकारा, वह मौजूद न थी । तारा ने रम्भा स वहा, "देखो, हमन उस नालायक से कह दिया नरेद्र-मोहिनी था कि बिना पूछे बाहर न जाइयो मगर वह चली गई, मैं पहिले जाकर दर- बाजा बदकर आक।" यह कह तारा नीचे उतरी। दरवाजा खुला हुआ था। दरवाजे के बाहर ल लिए हुए कई आदमी दिखाई पडे जिनमे वे दोनो भी ये जो रामसिला पहाडी से रम्भा और तारा के पीछे पीछे आये थे और दूसरी दफे सवार के साथ साथ सराय में दिखाई पड़े थे। तारा इन सभी को दरवाजे पर देख कर घबडा गई और कई तरह की बातें सोचने लगी। अदर से दरवाजा बद करना चाहा मगर न हो सका क्योकि वह जजीर टूटी हुई थी जिससे दरवाजा पहिली मत बद किया था। अब वह और घबडाई, इतने मे दरवाजे के बाहर बढे हुए कई आदमियो मे एक ने कुछ हस कर कहा, "अब यह दरवाजा भीतर से ब द नही हो मक्ता !!" यह सुनकर तारा के होश जाते रहे। दौडी हुई ऊपर आई और रम्मा बोली, "लो बहिन, गजव हो गया । इज्जत बचाने की कोई सूरत नजर नहीं आती । हरामजादी मठियारी ने पूरा धोखा दिया । अब हम लोगों को चाहिए कि अपने को कैदी समझे और जान से हाथ धो बा" रम्भा ने पबडा कर पूछा, क्यो, क्यो, क्या हुआ " इसके जवाब में भवडाई हुई तारा ने जल्दी से सव हाल कहा जिसे सुन रम्भा का कलेगा धक- एक बापने लगा और दोना आँखो से आंसुओ को बूदें टपाटप गिरने लगीं। तारा ने इस पर कहा 'बहिन, अब रोने से कोई काम न चलगा, जान बचाने की कोई फिक्र करनी चाहिये ।' रम्भा जान बचाने की फिक्र क्या की जाय? तारा जहाँ सा हो खर चिल्लाना चाहिए जिसमे इधर-उधर से बहुत से आदमी इक्टठे हो जाय और हम लोगो को अपना दुख कहने का मौका मिले । रम्भा यह मकान ऐसी गली ग है कि सहर तक आवाज भी न जाएगी। तारा तो भी पडौस ये कुछ आदमी तो इकटठे हो ही जायगे । रम्भा दरवाजा तो इस लायक उहोंने नहीं रखा कि बद दिया जाए मगर सीढ़ी को विवाडियों का क्या बिगता है । कहें तो बन्द कर दो फिर रोनेचिल्लाने की सोचना । 'हां, यह तो मुझे याद ही न रहा।" यह कहती हुई तारा पौड़ी गई और नरेद्र-मोहिनी ४६ - सीढी के विवाह खूब मजबूती से बद कर आई। इतने ही मे धमधमाते हुए कई आदमी नीचे के चौक (आगन) मे आ पहुँचे । तारा ने झांक कर देखा कि वही गयावाल पण्डा जिसे सराय मे देखा या कई और आदमियो को लिए जिनम वे दोनो भी थे जिन्होने रामसिला पहाडी से रम्भा और तारा का पीछा किया था आ पहुंचा है और सभी को नीचे छोड आप ऊपर चला आ रहा है । सीढी के किवाड बद थे इसलिए वह यकायक इन लोगो के पास न पहुच सका और जजीर खोलने के लिए आरजू-मि नत करने लगा। यह देख रम्भा और तारा मकान की छत पर चढ गई । इस मकान के साथ ही सटा हुआ एक दूसरा मकान देखा जिसकी छत इससे नीची न थी। ये दोनों उसी मकान में कूद पड़ी। १० दोपहर का समय है। एक छोटे-से जगल मे घने पेड के नीचे आठ दस आदमी बठे आपस मे कुछ बात चीत कर रहे हैं। ये सब कौन हैं इसके लिए साफ ही वह देना ठीक है कि ये लोग वे ही मल्लाह हैं जिनसे नरेद्रसिंह से उस समय बातचीत हुई थी जब वे मोहनी, गुलाब और बहादुरसिंह को छोटी विश्ती के पास छोड बडी नाव किराये करने गये थे। इन लोगो मे एक बहुत बुडहा है जिसे नरेद्रसिंह ने पहिले नही देखा था, शायद यह उन सभों का सरदार हो। एक बड़ी भूल तो यह हो गई वि नरे द्रसिंह को न पकड लिया। दूसरा हाँ, अगर उनको भी गिरफ्तार कर लेत तो बस चारो ही को ठिकाने पहुँचा देते, फिर कोई पूछने या पता लगाने वाला भी न रहता, अब तो एक चिता सी लगी रह गई। बूटा अजी ईश्वर ने अच्छा क्यिा जो उस समय तुम लोगो को नरे द्रसिंह से पकड़ने का हौसला न दिया नहीं तो एसी हालत में जवकि हमारे साथी को भुलावा देकर यहादुरसिंह ले गया है बड़ी मुश्किल होती। हम लोगो को खौफ तो इस समय भी बहुतकुछ है क्योकि नरेदसिंह का बाप बड़ा ही जालिम है, भोला और बहादुरसिंह जरूर उसस जाकर सब हाल कहेगे और हम लोगो का पता देंगे।

नरेद्र मोहिनी ५० 7 चौथा इसमे तो कुछ भी शक नहीं । फिर क्या करना चाहिए पांचवां हम लोगो को तो जमा-पूजी से मतलब था, सो दोनो औरतो के गहने उतार ही लिये, इतनी भारी रकम जमसे आज तक हाथ न लगी थी, अब उन दोनों को जमीन अदर पहुँचाइये, बस हो गया। बूढा न मालूम तुम लोगो की बुद्धि कहा चरने चली गई दोनो औरतो को मार कर क्या अपनी जान बचा लोगे? नरेद्रसिंह तुम लोगो को छोड देगा? नहीं जानते कि उसके यहा कैसे कसे बेढब पता लगाने वाले जासूस मौजूद हैं? नरेद्रसिंह को उतने गहनो को परवाह नहीं है जो हम लोगो ने उन दोनो औरतो के उतार लिये हैं, मगर उनकी जानो पर आफत आते ही हम लोगो को जड-बुनियाद तक बाकी न रहेगी इसे खूब समझ लेना । पहिला तब फिर क्या किया जाय ? बूढा बस इस वक्त यही मुनासिब है कि वे दोनो औरतें छोट दी जाय घूमती फिरती आप ही नरेन्द्रसिंह को मिल जायगी, उनके मिलने पर फिर वे हम लोगो को इतनी खाज भी न करेंगे। इसके साथ ही वह मकान भी हम लोगो को खाली कर देना चाहिए, उसे अब उजडा ही हुआ समझो। तीसरा हम लोग तो हुक्म के मुताबिक काम करेंगे, नफा नुक्सान आप समझ लीजिए। बूढा हम खूब सोच चुके, इस काम मे अब दर करना अच्छा नहीं है । इसके बाद सब उठ कर एक तरफ को रवाना हुए। ११ मल्लाहो का पता न लगने से मोहनी और गुलाब के गम मे नरेद्रसिंह बेहोश होकर गिर पड़े। घण्टे भर के बाद उहें होश आया । उठ कर तलवार म्यान मे की और नाव के नीचे उतरे । मोहनी गुलाब और बहादुरसिंह के लिए तबीयत बेचन थी, वहां से धीरे धीरे एक तरफ को रवाना हुए मगर यह नहीं जानते थे कि किस तरफ जा रहे हैं और आगे जगल मिलेगा या शहर। जगली फलो पर गुजारा करत हुए कई दिनो के बाद वे एफ घने जगल के किनारे पहुँचे । विना कुछ ख्याल दिए यह उस जगल मे घुसे । जसे-जसे आगे जाते थे जगल रमणीक और सुहावना मिलता जाता था, यहां तक कि शाम मरेद्र मोहिनी होते होते वे एक ऐसे ठिकाने जा पहुंचे जहा जगल को लम्बा-चौडा बाग ही "हना मुनासिब है। साखू, आसनतेंद, पारजात वगरह खुदरी (आप से आप उगने वाले) दरख्तो के अलावे कायदे से हाथ के लगाये हुए खुशबूदार फूलो के पेठ भी दिखाई पड़े और जमीन भी वहा की साफ और सुपरी नजर आई। दाहिनी तरफ कुछ दूर पर पेडो की झिलमिलाहट म एक सफेद इमारत भी दिखाई पड़ी। इस जगह पहुँच कर हमार नरेद्रसिंह अड गये और कुछ गौर करने लगे। इतने ही मे इनकी निगाह बाई तरफ जा पडी। देखा कि कुछ दूर पर कई कमसिन औरतें खूबसूरत लिबास पहने अठखेलियां करती इधर-उधर टहल रही हैं । कभी धीरे-धीरे चलती हैं, कभी दौडकर एक-दूसरे को पकडती या पक्का देती हैं, कभी कोई सीटी या ताली बजा कर खूब जोर से हस देती है। ऐसे दुख की अवस्था मे भी नरेद्रसिंह का जी उस तरफ जा फसा । गौर के साथ देखने लगे, चाहा कि उपर न जाय मगर जी न माना, धीरे धीरे उसी तरफ बढे । जब उन लोगो के पास पहुचे तो रुक गये । इतने मे उनम से कई औरतो की निगाह नरेद्रसिंह पर जा पडी। वे सकपका कर इनकी तरफ देखने लगी यहा तक कि कुल औरती ने इहें ताज्जुब की निगाह से देखा और आपस मे इशारे से बातचीत करने लगी जिससे नरे द्रसिंह को भी मालूम हो गया कि उनके आने पर सभा को आश्चय है । इन सभो में से एक औरत चाल-ढाल, पोशाक्-जेवर और खूबसूरती के हिसाब सभो म सरदार मालूम होती थी । यो तो सभी धञ्चल और खूबसूरत थी मगर उसके मुकाबिले की एक भी न थी जिसने उदास और गमगीन नरेद्रसिंह का दिल भी अपनी तरफ खैच लिया क्योकि नरेन्द्रसिंह को मह धोखा हुआ कि यह मोहनी है। मोहनी का खयाल बंधते ही नरेन्द्रसिंह उसकी तरफ लपके जिससे उन औरतो को और भी आश्चर्य हुआ। इहोंने जल्दी से पास पहुच कर पूछा, "क्या मोहनी, तुम यहा कसे पहुची ? मैं कब से तुम्हारी खोज में परेशान हो रहा उस औरत ने इनकी बात का कोई जवाब न दिया और अपनी हमजोलियो की तरफ देख कर सिर नीचा कर लिया। नरेद्रसिंह ने फिर पूछा, "क्यो चुप । ।

१२ मरेद्र-मोहिनी क्यो हो वह फिर भी कुछ न बोली पर आखो से आसू की बूदें टपाटप गिराने लगी। ऐसी दशा देख नरेद्रसिंह और भी बेचन हो गये और बोले, "पया सबब है जो तुम अपना हाल कुछ नहीं कहती और रो रही हो। तुम्हारी वह सूरत नही रही, चेहरे में भी फर पड गया, मालूम होता है वर्षों बाद मुलाकात हुई हो, मारे गम के तुम्हारी जवानी भी तुमसे रज होने लगी। मैं तो समझता पा मुझसे मिल कर तुम खुश होगी मगर तुम्हें रोते देख जी और बेचन हो रहा है-कहो गुलाब तो अच्छी तरह है, वह तुम लोगो के साथ दिखाई नहीं देती, कहा है ॥ गुलाब का नाम सुन कर वह और भी रोने लगी बल्कि उसकी सहेलियो की भी थावं डबडबा आई जिसे देख नरेद्रसिंह को विश्वास हो गया कि जरूर गुलाब किमी आफत में फस गई या जान ही से गुजर गई। नरेद्रसिंह के कई मतबे पूछने और जिद्द करने पर वह अपन आचल से आंसू पोछ कर बोली, सब कुशल है, गुलाब भी अच्छी तरह से है बाकी हाल मैं इस समय न कहूँगी। जल्दी क्या है आप भी यके मादे आए है, चलिए मकान मे आराम कीजिए जो कुछ कहना है निश्चित्ती मे कहूगी, लेकिन पहिले आप जरा देर इसी जगह ठहरिये मैं अपनी सखियो को एक काम सौप लू तब आपके साथ चलू ।' इतना कह वह नरेद्रसिंह को उसी जगह छोड इशारे से अपनी सग्वियो को बुला कर एक किनारे चली गई और आधी घडी तक मापुस म कुछ बातें करती रही, इसके बाद फिर नरेद्रसिंह के पास आई और बोली चलिय मकान में क्योकि अब अधेरा हो गया और यहा ठहरन का मौका नहीं रहा ।" नरेद्रसिंह को साथ लिये हुए वह उसी मकान मे गई जिसे उहोने कुछ दूर पेडो की आड म चमकता हुआ देखा था। इस मकान के दरवाजे पर कई सिपाही नगी तलवार लिए पहरा दे रहे थे जो एक नये आदमी के साथ अपने मालिक का आत देख उठ म्बड हुए । नरेन्द्र सिंह का हाथ पक्डे हुए मोहनी मकान के अदर गई, पीछ उसकी सखिया भी पहुची।

नरेद्र मोहिनी फाटक के अदर जाकर एक लम्बे चौडे बाग में पहुचे जिसकी विश निहायत खूबसूरती के साथ बनाई हुई थी हाही और जगली फूल-पत्तियो के इसावे खुशबूदार फूलो के पेड भी बेशुमार लगे हुए थे जिनकी खुशबू से तमाम बाग गमक रहा था। सामने ही एक लम्बा चौडा दोमजिला मकान बना हुआ नजर आया। मरे द्रसिंह का हाथ पकड़े हुए मोहनी उसे उस मकान के ऊपर वाले खण्ड मे से गई और एक सजे हुए कमरे मे ले जाकर बठाया। नरेद्रसिंह को इस वक्त बडी ही खुशी थी मगर साथ ही इसके गुलाव को देखे बिना जी बेचन था । बठते ही पूछा, "क्यो मोहनी गुलाब कहा है ? उसे जल्द बुलाओ में देखूगा।" मोहनी आज आप उसे नहीं देख सकते । नरद्र क्यो? मोहनी इसका सबब फिर आपसे कहूगी। नरेद्र अच्छा यह तो बताओ कि तुम्हारी सूरत ऐसी क्यो हो गई। मालूम होता है कि सात-आठ वष के बाद तुम्हें देख रहा होऊ । मोहनी (कची सास लेकर) एक तो तुम्हारी जुदाई, दूसरे बहिन के गम ने मेरी यह हालत कर दी। नरेद्र क्या गुलाब के सिवाय और भी तुम्हारी कोई बहिन थी? मोहनी जो नही। नरेन्द्र फिर किसका गम हुआ मोहनी उसी गुताब का। नरेद्र (चौंक्कर) गुलाब को क्या हुआ? यह कहा गई मोहनी (आसू गिरावर) बैकुण्ठ चली गई। गुलाब के मरने का हाल सुन नरेद्रसिंह की अजब हालत हो गई । बहुत देर तक रोते रहे। नरेन्द्र अफसोस, अभी तब तुम्हारा कोई हाल भी नहीं मालूम हुआ कि तुम कौन हो और क्सि सबब से तुम्हारी वह दशा हुई थी। मोहनी नया इतने दिन अलग रहकर भी आपको मेरा हाल कुछ मालूम ? . नहुमा १४ नरेद्र-मोहिनी नरेद्र कुछ भी नही। मोहनी अच्छा तो में जरूर अपना हाल कहूगी। नरेद्र भला इतना तो बता दो कि उस विश्ती पर से तुम लोग कहा गायब हो गए और बहादुरसिंह कहा चला गया ? मोहनी इसका हाल भी अपने हाल के साथ ही कहूगी, इस समय आप कुछ भोजन करके आराम कीजिए क्योकि आपके चेहरे से थकावट और सुस्ती बहुत मालूम होती है। नरेद्र तुम्हारे मिलने ही से थकावट और सुस्ती विल्कुल जाती रही मगर अफसोस, बचारी गुलाब इतना कहते कहते फिर उसकी आखो मे आसू आ गए । मोहनी ने बहुतकुछ समझाया और कुछ खाने के लिये जिद्द की मगर नरेद्रसिंह ने कुछ न सुना! लाचार उनको चारपाई पर लिटा और उनसे विदा हो वह नीचे उतर आई और एक दूसरे कमरे में गई जहा उसको सखिया बठी उसको राह देख रही थी और शराब से भरी हुई कई बोतलें भी उस जगह रक्सी हुई थी जिनमें से थोड़ा थोडा गिलास में डालकर वे सब पी रही थी। मोहनी को आते देख वे सब उठ खडी हुई और हसकर बोली, "मुबारक हो, ईश्वर ने तुम्हारे लिए क्या खूबसूरत जवान भेज दिया ।" मोहनी (हस कर) देखिए । जब रह जाय तब तो। एक तेरे पजे मे फसा हुआ कब निक्ल सकता है हा तू खुद निकाल वाहर करे तो बात दूसरी है ! मोहनी नही नहीं इसके साथ कभी वसा न करू गी जसा दूसरो वे साथ किया है क्योकि ऐसा खूबसूरत और बहादुर जवान अभी तक मुझे कोई भी नहीं मिला था । मुझे तो मालूम होता है यह जरूर किसी राजा का लडका है । एक इसमें कोई शक नही ! आओ बठो कहो क्या-क्या बातचीत हुई मोहनी इस वक्त कोई विशेष बातचीत तो नही हुई, सिफ गुलाब का हाल पूछा सो मैंन कह दिया कि मर गई। यह सुन बहुत रोये पोटे फिर पूछा कि तुम अपना हाल बताओ कि तुम्हारी वह दशा कसे भई थी, किश्ती पर से बहा ची गई और बहादुरसिंह वहाँ गया । इसका जवाब भला क्या देती' मुझे कुछ मालूम तो था ही नहीं, और न मैं वहादुरसिंह को ही जानती थी कि ?

नरेद्र-मोहिनी वह बौन बला है, आखिर यह वह रे टाल दिया कि कल वहूँगी। दूसरी उनको यह पूरा विश्वास हो गया कि मोहनी तुम ही हो। तीसरी इनकी शक्ल-सूरत भी तो मोहनी ही को सी है, फक इतना ही हैं गि उससे यह उम्र मे सात वप बडी हैं। मोहनी अब मुझे यह फिर है कि कल अपना क्या हाल पहूगी ? एर पेड से लटकी हुई मोहनी और जमीन मे गड़ी हुई गुलाब की जान जरहोंने बचाई है या इनसे उन दोनो को किसी तरह मुलाकात हो गई - दूसरी जरूर ऐसा ही हुआ है लेकिन उमसे क्या, जो जो म आवे बना पर अपना हाल यह देना। तीसरी अगर मोहनी पहिले अपना हाल कुछ कह चुनी हो तब मोहनी नही मोहनी ने अपना हाल कुछ नहीं कहा, क्योकि बात ही बात में यही दरियाफ्त करने के लिए मैंने पूछा था कि मुझसे जुदा होकर भी मेरा हात तुमको नहीं मालूम हुआ? जिसरे जवाब मे वे वोले कि 'बुछ भी नहीं।' इसके इलावा पहिले ही उहोने कहा था कि मुझे अभी तक यह नहीं मालूम हुमा दि तुम कौन हो' इन सब माता को पयाल पर मैं समझती हूँ कि मोहनी अपना हाल कुछ पहने न पाई और फिर इनमे अलग हो गई। पर तुम्हारा सोचना बहुत ठीक है। माहनी मुझे तो इनका नाम भी नहीं मालूम दूसरी पल तुम उनसे कहना कि तुमने भी तो अपना ठीक-ठीक नाम और हाल अभी तक नहीं बताया, तब वे खुद ही कहेंगे कि मेरा नाम ठीक फलाना ही है और अपना हाल भी बुध पुछ रहेंगे। इतने में एक सखी ने शराब का गिलास भरकर मोहनी के हाथ में दिया और कहा, "लो आज बडी खुशी का दिन है रोज से दूनी पोनी चाहिए, पोयो और हम लोगो का भी कुछ ख्याल रक्यो। ईश्वर न इनका यहाँ भेज दिया है तो ऐसा न हो कि इनके आन वा सुम अकलो तुम ही लूटो।' इम जवाब म मोहनी ने हसकर कहा 'क्या मैं तुम लोगो को रोक्ती हू' इसमे मेरा बस है या उनका थोडी देर तक हंसी-खुशी की शैतानी दिल्लगी रही दम बाद लोरिया नरेद्र-मोहिनी खाने-पीने का सामान उस जगह ले आई, सब मिल कर खाने और शराब पीने लगी, यहा तक कि नशे मे मस्त हो उसी जगह सब की सब बेहोश होकर जमीन पर लेट गई और किसी को तनोबदन की सुध न रह गई। मोहनी की इन सखियो मे दो ऐसी थी जो शराब को हाथ से भी नहीं छूती थी और हर तरह से नेक और दयालु थी। दिन रात का ज्यादे हिस्सा ईश्वर के भजन और ध्यान ही में गवाती थी। यह शंतान मण्डली उसे भली नहीं मालूम होती थी मगर क्या करें लाचर होकर साथ रहना पड़ा था। इनका नाम श्यामा और भामा था। मोहनी तो अपनी सखिया के साथ शराब के नशे मे ऐसी बेहोश पड़ी कि पहर दिन चढे तक तनोबदन को सुध न रही मगर बेचारी श्यामा और भामा कुछ रात रहते ही उठी और जरूरी कामा से छुटटी पा नहा-धो, साफ कपडे पहिर नरेद्रसिंह के पास पहुँची और दिलोजान से उसकी खिदमत करने लगी। मोहनी की सूरत में पक क्यो पड गया सूरत ही नही बलि चाल चलन, निगाह चितवन बातचीत सभी दूसरे ढग की नजर आती है ।' आखो मे उतनी हया भी नहीं है । सिवाय इसके शहर छोड जगल म रहना इसने क्यो' पसन्द क्यिा? और दाज से यह भी मालूम होता है कि मुझसे जुदा होकर इसने मेरी खोज बिल्कुल नही की। नरेद्रसिंह ने इसी सोच और खयाल में वह दूसरी रात बिता दी और घडी-घडी उठ कर देखते रह कि सवेरा हुआ या नहीं। अभी अच्छी तरह आसमान पर सुफेदी नही फली थी यद्यपि एक तरह पर सवेरा हो चुका था। नरेद्रसिंह पलग पर लेटे-लेटे दरवाजे की तरफ देख रहे थे कि हाथों में जल वा लोटा लिए श्यामा और भामा यहा पहुची । उसी रास्ते से होकर दूसरे कमरे में चली गई और लोटा रखकर लोट गई । थोड़ी देर बाद मुह हाय धोने के लिए पानी, दतुअन मजन और धोती-गमछा इत्यादि कुल सामान लेकर आई और उसी कमरे मे जिसम जल का लोटा रस गई थी इन चीजो को भी रक्खा इसके याद नरेद्रसिंह के पलग के पास पहुची। इनको पास आत देख नरेद्रसिंह न जान बूझकर आखें बदकर तो और अपो को सोता हआ-सा बना लिया।

नरेद्र-मोहिनी श्यामा पर दबाने और भामा पसा झलने सगी। थोड़ी देर बाद नरेद्रसिंह उठ बैठे और उहोंने पूछा, "सवेरा हो गया ?" श्यामा जी हाँ, उठिये मुह-हाप धोइए । नरेद्र (उठ कर ) मोहनी कहाँ है ? प्रयामा मोहनी कौन? नरेद्र तुम्हारी मालिका ज्यामा जी हा, वह अभी तक सोई हुई हैं। नरेद्र बहुत देर तक सोया करती हैं। श्यामा अब उनके उठने का समय हो ही गया है, तब तर आप चाहें तो स्नान-सध्या से छुटटी पा सकते हैं । नरेन्द्र में भी यही चाहता हूँ। इतना कह नरेद्रसिंह पलग के नीचे उतरे। श्यामा और भामा दोनो दिलोजान से खिदमत करने पर मुस्तैद हो गई । इनको होशियारी और फुर्ती रे साथ काम करने के सबब से नरेद्रसिंह जरूरी नामो से छुटटी पाकर दतुमन- कुल्ला, स्नान-सध्या इत्यादि से बहुत जल्द निश्चित हो गये, किसी बात को जरा भी तकलीफ न हुई। श्यामा और भामा जिस प्रेम के साथ उनकी खिदमत कर रही थी उसे देख यह दग हो गए और सोचन लगे कि ऐसी सलोने वाली वहया तो आज तक मैंने नही देवी । सिवाय इसके इन्हें लौंडी कहते भी सकोच मालूम होता है। चाहे इनकी पोशाक बेशकीमत न हो फिर भी बातचीत और चाल-ढाल से ये छोटे दर्जे को औरतें नहीं मालूम होती । इन दोनो कार" सांवला है तो क्या हुआ मगर इनके रूपवान होने में कोई शक नही, तिसमे यह एक जो अपना नाम श्यामा बताती है परम सुदरी है और लक्षणा से मालूम होता है कि अभी कुआरी है । अहा । क्या ही सुदर मुख और कैसी बडी रतनार आंखें हैं । अभी तक मैंने इसको सुदरता पर ध्यान नहीं दिया था मगर अब जो गौर करके देखता हूँ तो यही कहने को जी चाहता है कि यह श्यामा सूब- सूरती में किसी तरह भी मोहनी से कम नहीं है बलि गुण और शील मे उससे बढकर है। इसे तो सामने से जाने देने का जी ही नहीं चाहता न मालूम मयो इसकी तरफ मेरा चित्त खिचा जाता है । मोहनी आवे तो पूछ नरेद्र मोहिनी दोनो कोन हैं। इसी तरह की बातें सोच रहे थे कि इतने ही म नीद से जाम जमुहाई लेती हुई मोहनी भी आ पहुंची। इसवा सुमार अभी तक उतरा न था, आते ही नरेन्द्रसिंह के पास बठ गई और गले म हाथ डाल पर बोली, "श्या अभी सोकर उठे हो ? स्नान न करोगे?" मोहनी के मह से शराब की ऐसी बुरी भभक निकली कि नरेद्रसिह का जी बिगड गया । मोहनी का हाथ अपने गले से निकाल हट उठ खड़े हुए और बोले मैं तुम्हारी इन दोनो होशियार लौंडियो की बदौलत स्नान पूजा आदि सब चीजो से छुटटी पा चुवा हूँ। तुम शायद अभी सोकर उठी हो।" मोहनी को अपना हाथ गले मे से निकाल कर एकाएक इस तरह नरेद्रसिंह का उठ जाना बहुत ही बुरा मालूम हुया और वह लाल-लाल आँखें पर नरेन्द्र सिंह की तरफ देखने लगी। नरेद्रसिंह भी अपने दिल म सोचने लगे कि मोहनी को यह क्या हो गया। यह तो बातचीत से बहुत नेक और शरीफ खानदान को लडको मालूम होती यो मगर इसका रग-ढग बिलकुल बदला हुआ देखता हूँ। जब मैंने गुलाब का हाल इससे पूछा तो बोली कि 'वह मर गई। लेकिन अभी मुझसे इसका सग छूटे पद्रह दिन भी नही हुए, तो क्या इसी बीच मे गुलाब के मरने का गम इसरे दिल से जाता रहा और यह हसी-तुशी मे दिन बिताने लगी? क्या किसी शरीफ खानदान की कुआरी लडकी का ऐसा करना मुनासिव है ? यह तो बिल्कुल असभ्य और कुलटा मालूम होती है। अगर इसकी चालचलन ऐसी ही है तो मैं इसकी मुहब्बत से बाज आया। मैं ऐसी बदचलन औरत से बात भी करना पसन्द नहीं करता । वाह ! मेरे गले मे हाय डालते इसे जरा भी शम न मालूम हुई। थोडी देर तक दोनो अपने अपने मतलव की सोचते रहे, आखिर मोहनी से न रहा गया । बोली, 'क्यो साहब आपने तो मेरी बडी बेइज्जती की !! नरेद्र वह क्या माहनी • मै आपकी मुरब्बत से आपके पास आकर वळू और आप इस तरह मुझे दुतवार कर उटजाम क्या इसी को सभ्यता कहते हैं ? मरेद्र अगर औरतें सौ दपे इस तरह के नखरे करें तो कोई हज नहीं नरेद्र मोहिनी मगर मर्द एक ही दफे के खरे मे खराब समझा गया !! बस नरेद्रसिंह के इतना ही कहने से मोहनी का खयाल बदल गया और वह हंस के बोली "खैर तो आइए बैठिए।" नरेद्र मेरा कायदा है वि नहामे के बाद मैं उस आदमी के पास नहीं बैठता जो बिना नहाया हो। मोहनी क्या छूत लग जाती है ? नरेद्र चाहे छूत न लगे तो भी ऐसा कायदा रखने से बहुतकुछ फायदा मोहनी (उठ पर) खर साहव में जाकर नहा आती हूँ। नरेद्र हा, इसके बाद फिर हमसे बातचीत होगी। मोहनी (श्यामा की तरफ देखकर) मैं नहाने जाती हूँ तब तक तुम इनके खाने पीने का कुछ बदोबस्त करो। श्यामा बहुत अच्छा । मोहनी चली गई, इसके बाद श्यामा ने हाथ जोड वर नरेद्रसिंह से कहा, "मुझे मालिक का हुक्म हुआ है कि आपके वास्ते खाने-पीने का बदोबस्त करू मगर मेरा जी यहा से जाने को नहीं चाहता क्योकि आपसे एक बात कहनी बहुत जरूरी है। अगर मैं यहा से जा कर आपके भोजन का बदोबस्त करू तो फिर बात करने का मौका न रहेगा क्योकि तब तक यह फिर आ जाएगी और मेरी बात ऐसी है कि सिवाय आपके अगर कोई दूसरा सुन से तो मेरी जान जाने में कोई शक न रहे । नरेद्र वह कौन-सी बात है, कहो । इस तरह मैं नहीं कहने की, हां आप इस बात की कसम खाएँ कि किसी दूसरे से न कहेंगे तो मैं जो कुछ गुप्त भेद है उमे वह डालू । गुप्त भेद का नाम सुनते ही नरेद्रसिंह चौंक पडे। वह वात कौन-सो है जिसके लिए श्यामा क्सम खिलाया चाहती है, यह जानने के लिए जी बेचन हो गया। कुछ गौर करने के बाद नरेद्रसिंह ने अपनी तलवार म्यान से निकाल ली और श्यामा से कहा "देखो मैं क्षत्री हूँ मेरे लिए इससे बढ के कोई कसम नही है। इसे हाथ मे से मैं क्सम खाता है कि तुम्हारी बात कभी किसी मे न श्यामा ६० नरेन्द्र-मोहिनी श्यामा बस बस, मेरा जी भर गया, पर फिर भी मैं आपसे एक वादा और कराया चाहती है। नरेद्र वह भी कहो। श्यामा अगर मेरी बात सुनकर आप यहां से भागा चाहें तो हम दोनो को भी यहा से निकालने की फिक्र करें नहीं तो आपके जान के बाद हम लोग विसी तरह बच नहीं सकेंगी। नरेद्र (ताज्जुब से) ऐसी कौन-सी बात है जिसे सुन मैं यहा स भाग जाऊंगा? श्यामा वह ऐसी ही बात है। नरेन्द्र सर मैं इस बात की भी कसम खाता हूँ कि अपन माय तुम दाना को भी यहाँ से बाहर करूंगा। हाँ पहिले यह कह नो कि क्या मर लिए तुम अपने मालिक का साथ छोडोगी। श्यामा ईश्वर न कर एसी बदकार औरत की नौकरी कभी करनी पर्ने न मालूम मैंने कौन स एसे पाप किए हैं जिनके बदले कई दिन इसके पास रहने का दु ख परमेश्वर न मुझे दिया। मैं इसकी लौंडी नही हू मगर वक्त को क्या करू ? यह सब आपकी इतना कहते कहते आखा से टपाटप मासू की बूदें गिरन लगी कण्ठ भर आया और आवाज बद हो गई। नरद्र (हाथ थाम कर) हा हो, यह क्या । राती क्या हा ? मैं वादा करता हूँ कि जहाँ तक होगा तुम्हारा दुख दूर करने से बाज न आऊँगा। श्यामा आपने तो जरा सा निगाह ही कर देने से मेरा जम भर का दुख दूर हो जाएगा, नही मरी हुई तो हुई हूँ। नरेद्र इसके लिए भी में वही कसम खाता हूँ कि अगर मेरे किए तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा तो मैं कभी मुह न फेरूंगा। श्यामा (आसू पोछ कर और अपने को खूब सम्हाल कर) अब घ्या देवर सुनिए । पहिले तो यही बता देना ठीक होगा कि यह मोहनी नहीं है जिसे आप मोहनी समझे हुए हैं। नरेद्र (चौक कर) हैं । क्या यह मोहनी नहीं है ? श्यामा नहीं।

नरेद्र-मोहिनी नरेद्र हाय हाय इस नालायक ने तो पूरा धोखा दिया । पहिले ही मेरा जी इससे खटका था। औरतें भी क्या ही आफत होती हैं । ऐसी ही की शतानी और बदकारो किताबो मे देख देख कर और लोगो से सुन-सुन कर मने दिल मे निश्चय कर लिया था कि कभी शादी न करूंगा। इसी सबब से मने अपना देश छोडना मजूर क्यिा, फिर भी मोहनी की मुहब्बत मे फस गया और दु ख उठाना ही पडा । श्यामा नहीं, आपका ऐसा सोचना मुनासिब नहीं है। सभी औरतें ऐसी बदकार आर नालायक नहीं होती, एक के सबब से सौ को बदनाम करना धम- नरेन्द्र खर यह सब जाने दो और यह बताओ कि अगर यह मोहनी नहीं ता कौन है ? क्या यह अपनी सूरत बदले हुए है। श्यामा यह मोहनी की बडी वहिन है। नर द्र इसके बारे मे जो कुछ तुमको मालूम है खुलासा कहो। श्यामा सुनिए मैं सबकुछ कहती हूँ। इही कई दिनो मे जब से मैं यहा आई इन लोगो का पूरा इतिहास जान गई हूँ। इसका नाम केतकी है । गुलाब मोहनी और केतकी तीना एक ही मा के पेट से पदा हुई हैं । गुलाब की सात महीने की छोड इनकी मा मर गई थी। ये तीनो अपने बाप के बडे लाड- प्यार से पली हैं जिसका नाम हजारीसिंह था और जो गया के बहुत बड़े जमी- दाराम गिना जाता था। नरेद्र अच्छा फिर ? श्यामा केतकी जब जवान हुई तब इसने बदचलनी पर कमर बांधी जिससे इसके बाप को बहुत रज हुआ और उसने एक अच्छे खानदान के लडके से इसकी शादी कर दी, मगर इस हरामजादी ने उसे जहर देकर मार डाला। यह देख इसके बाप को और भी रज हुआ और उसने केतकी को मार डालने का पूरा पूरा इरादा कर लिया। यह खबर केतकी को लग गई और उसन रसोई बनाने वाले ब्राह्मण से मिल कर जिसके साथ यह फंसी हुई थी अपने बाप को जहर दिलवा दिया और उसके मरने बाद कुल जायदाद की मालिक बन बठी। नरेद्र ईश्वर ऐसी औरत से बचाये अच्छा फिर क्या हुआ?

६२ नरेद्र-मोहिनी 7 श्यामा कुछ दिन में मोहनी और गुलाब भी होशियार हुई और इसकी चालचलन देख देख चिढ उठी। मोहनी और गुलाव दोनो बहुत ही नेक और सूधी थी। दोनो मे प्रेम भी बहुत था, इसलिए दोनों ने अपने बाप के माल मे से अपना अपना हिस्सा अलग कर लेना चाहा नरेद्र क्या और कोई इनका बडा बुजुग नही था ? श्यामा कोई नहीं। नरेद्र अच्छा तब श्यामा हिस्सा देना केतकी को बहुत बुरा मातृम हुआ । कई बदमाश से मिल कर वह मोहनी और गुलाब दोनों को धोखा देकर जगल म ले गई जहाँ सुनते हैं कि दोनो को फांसी देकर मार डाला, मगर ताज्जुब यही है कि अगर वे दोनो मर ही गई तो आपने उहे कसे देखा ? नरेद्र मौत से उहें मैंने ही बचाया था । श्यामा ठीक है खैर, यह मेतकी अपने बाप की बेहिसाब दौलत को ऐयाशी मे उडाने लगी। यह मकान उसके बाप ही का बनवाया हुआ है। अब यह ज्यादेतर इसी में रहा करती है, यहां इसने कई आदमियो का साय किया और योडे थोडे दिन के बाद सभी की जान लेती गई। बस इसके सिवाय और कुछ नही जानती । हा, आप मोहनी का हाल महिए कि वह क्योकर बची ? नरेद्र मोहनी का हाल कहने के पहिले मुझे अपना हाल भी रहना पडेगा कि घर से क्यो बाहर निकला। प्रयामा नही वह तो मैं जानती हूँ कि आप शादी के खिलाफ होकर ठीक बारात वाले दिन भाग निकले थे। नरेद्र (ताज्जुब से) यह तुम्हे कैसे मालूम हुआ श्यामा मेरा घर भी उसी शहर में है और उस दिन मैं भी आपके समु राल मे ही थी। बदकिस्मती से यहा तक की नौबत पहुँची। अच्छा, अब आप मोहनी का हाल कहिये। नरेन्द्र म घर से भागा हुआ जगल जगल घूमता फिरता रात के वक्त घहाँ पहुचा जहाँ एक पेड के साथ मोहनी उलटी लटको हुई थी । उसे उतारा, जब होश मे आई तब उसी की जुबानी मालूम हुआ कि गुलाब भी उसी जगह गाडी गई है अस्तु उसे भी निकाला । सदूक मे रख कर वह गाडी गई थी ?

नरेद्र मोहिनी इसलिए बच गई । वहाँ से पास ही एक नदी थी, और एक किश्ती भी किनारे मौजूद पी। हम लोग उस पर सवार होकर वहां से रवाने हुए। सुबह होने पर मैन विश्ती किनारे पर लगाई । वहाँ पर मेरे लडक्पन के एक साथी बहा- दुरसिंह से मुलाकात हुई । वहां से कुछ दूर पर एक बडी नाव दिखायी पडी, बहादुरसिंह को मोहनी और गुलाब की हिफाजत के लिए छोड में वह नाव किराये करने गया मगर वहाँ से जब लौटा तो तीनो मे ले किसी को भी न पाया, न मालूम वे सब कहाँ गायब हो गय थे । वहीं को खोजता खोजता यहा तक आ पहुँचा है। इससे ज्यादा और कुछ बात न होने पाई क्योकि उसी समय केतकी आ पहुँची जिसे देख नरेद्रसिंह ने अपनी कहानी का सिलसिला तोड दिया और मुस्करा कर केतकी से कहा, 'आइये, मैं आप ही की राह देख रहा हूँ केतकी क्या बात है जो श्यामा और भामा सवेरे से ही आपके पास अडी - 1 नरेद्र ये दोनों बेचारी बडी नेक हैं और दिल से मेरी खिदमत कर रही हैं इनके रहने से मुझे बडा आराम मिला । तुम्हारे जान के बाद अवेले बैठा क्या करता, इही से बातचीत करता रहा। बेतकी तो क्या आपने अभी तक भोजन नही क्यिा? नरेद्र भोजन करने की इच्छा नहीं हुई इसीलिए मना कर दिया । वेतकी और ये दोनो भी आफ्त की मारी चुप हो रही नरेद्र तो क्या करती। मुझो को भूख न थी तो इनका क्या दोष ? केतकी (श्यामा की तरफ देखकर) जाओ भोजन ले आओ। श्यामा बहुत अच्छा। नरेन्द्र नही नहीं, मैं अभी कुछ न खाऊगा । केतकी यह तो न होगा। नरेन्द्र मेरी तबीयत आज ठीक नहीं है । तुम्हारी खोज मे बहुत दूर तक पदल घूमना पडा । आदत तो थी नही इससे परो मे बहुत दद है और कुछ- कुछ पट भी दुस रहा है। इस समय अगर मैं कुछ भी खाऊँगा तो जरूर बीमार पड़ जाऊँगा । तीन चार घण्टे मुझे और छोट दो, जब थोडा दिन बाकी रह जाएगा तब में जर भोजन करूंगा। तुम मेहरबानी करके इन दोनो को ६५ नरेद्र-मोहिनी . हुक्म दो कि जल्द भोजन कर आवें क्योंकि मैं अपनी त के लिए इन्ही दोनो को पसन्द करता हूँ। केतकी जसी मर्जी आपकी। (श्यामा और भामा रफ देखकर) अच्छा जाओ, तुम लोग जल्टी अपनी छुटटी करके आओ। श्यामा और भामा भोजन करने चली गई । अब केतकी और नरेद्रसिंह में बातचीत होने लगी। नरेद्र हा मोहनी, अब मोका बहुत अच्छा है, अब अपना हाल कहो। मोहनी नहीं, पहिले आप ही अपना हाल कहिए। नरेद्र नही नहीं, पहिले तुम्ही को कहना पडेगा। हा बोलो जगत मे মুম্বী সান কিষণ না ? केतकी (कुछ मोचकर घूमने-फिरते एक साधू जगल मे आ गये। उन्ही की बदौलत मेरी जान बची इसके बाद मापसे मुलाकात हुई। अब तो जो कुछ योडा-बहुत शर नरेद्रसिंह के मन में या वह भी जाता रहा । फिर केतकी से कोई सवाल न किया, केतकी के पूछन पर कुछ झूठ-सच अपना नाम-पता आदि बता कर ऊपर के दिल से घण्टे भर तक उससे वात- चीत करते रहे। तब तक श्यामा और भामा भी आ गई । तब नरसिह उठ घर चारपाई पर चले गये। केतकी चारपाई के नीचे उनके पास जा बठी, श्यामा पर दवाने और भामा पखा झलने लगी। नरसिंह थोडी देर तक केतकी से हसी-दिल्लगी करते रहे इसके बाद सो रहे । नरेद्रसिंह ने जान-बूझ कर आंखें बद कर ली। केतकी समझी कि इहे नीद आ गई। थोड़ी देर बठ कर चली गई, तब इहोंने अपनी आँखें खोली और हस कर श्यामा की तरफ देखा। श्यामा (मुस्कुरा कर) आपको तो खूब नीद आई । नरेद्र क्या कहें, उससे तो बात करन को भी जो नही पाहता, भय तो मुझे भागने की फिक्र पडी है। श्यामा होशियार रहिये, केतकी को अगर जरा भी शक हो जायगा कि आप भागना चाहते हैं तो बिना आपकी जान लिये न छोडेगी। वह हमेशा से ऐसा ही परती भाई है न मालुम क्तिने बेचारे इसी कमरे में अपनी जान दे धुके हैं।

49 नरेट-मोहिनी नरेन्द्र उसके उस्ताद को तो पता सगेगा ही नहीं। श्यामा देखिये मेरा खयान रखिएगा । कहीं ऐसा न हो कि आप मुझे यही बोड जाय और मैं पीछे कुत्तो से नुचवाई जाऊं।। नरेद्र वाह वाह । क्या तुमने मुझे ऐसा बेमुरीवत समझ लिया है- श्यामा आपके बेमुरोवत होने में क्या कोई शक है ? नरेद्र (जोश मे आकर) क्या दो ही घण्टे की जान-पहिचान मे मुझे तुमने बेमुर्गवत भी समझ लिया। श्यामा जी नहीं, मगर मैं भापकी तारीफ सब सुन चुकी हूँ। मेरी मौसी आप ही के शहर में रहती हैं और उनकी चिटठी-पत्री बराबर आया करती है, इस सबब से आपका कोई हास मुझसे छिपा हुआ नहीं है। नरेद्र तो क्या तुम्हारी मौसी ने लिखा है कि नरेद्र नालायक है ? श्य मा नही मगर उन्होंने रम्भा का हाल पर लिखा है। नरेद्र रम्भा कौन है ? श्यामा जिससे आपने शादी की है। नरेद्र मेरी शादी तो हुई ही नही | मैं तो बारात में से ही निकल भागा 7 प्रयामा आप जो पाहे समझ मगर आपके निक्ल भागने से होता ही क्या है । रम्भा तो समा चुकी कि आपके साथ उसकी शादी हो गई, अब क्या वह दूसरी शादी करेगी। नरेद्र क्या उसका बाप उसकी दूसरी शादी न करेगा? श्यामा उसके बाप ने तो बहुत कोशिश की थी कि उसकी दूसरी शादी वरे मगर रम्भा ने साफ इकार कर दिया और कह दिया वि 'मेरे पति तो नरेद्र हो चुके ।। नरेद्र फिर क्या हुआ? श्यामा उसके बाप ने बहुत कोशिश की और कई आदमियो से उसे कह- लाया कि नरद्र बडा ही बदमाश और बदसूरत था, क्या हुआ जो चला गया पण्डित लोग कहते है दूसरी शादी करने में कोई हर्ज नही, मगर रम्भा ने एक न मानी और बोली कि नरेद्र चाहे कसे ही खराब से खराब क्यो न हो मगर मेरे लिए बहुत अच्छे हैं । जब लोगो ने उसे बहुत तग क्यिा तव वह अपनी एप नरेन्द्र मोहिनी सखी और चचेरे भाई अजुनसिंह को साथ ले आपको सोजने निक्ली। भवन मालूम वह कहाँ कहाँ टक्कर मारती और मुसीबत झेलती होगी। उस औरत को देखिये कि अपने धम का उसे कैसा खयाल रहा और बिना देखे आपके प्रेम मे क्सी उलझ गई, इसके खिलाफ आप अपने को देखिये कि कहा तो यह शेखी कि शादी ही न करूंगा कहा मोहनी को देख एसा मस्त हुए कि बस उस रंग- ढेग का किसी को देखा मोहनी ही समझ लिया और इश्क का पिशाच आपके सिर पर सवार हो गया । अब कहिये आपके बैमरोवत होने म कोई शक है । आप मेरी बातो से खफा न होइयेगा, मुझसे साफ-साफ कहे बिना नहीं रहा जाता, क्या करू नरेद्र नहीं नहीं, खफा क्यो होने लगा, मगर श्यामा, तुम तो गजब की औरत हो। न मालूम कहा-कहा की बातें तुम्हे मालूम हैं। अगर सचमुच रम्भा ने एसा किया जसा तुम कहती हो तो जरूर मुझे उसके माग शमिन्दा होना पड़ेगा। श्यामा जी हा, मैं जो कुछ कहती हूँ बहुत सही कह रही हू । अब उसके बाप ने बहुत से आदमी उसकी खोज में इधर-उघर रवाना किये हैं। मेरी मौसी ने जब बेचारी रम्भा का हाल लिखा तो पड कर मुझे बडा हो रज हुआ। मैंने अपनी मौसी से उसकी तस्वीर माग भेजी। उसने बडी कोशिश कर के उसकी तस्वीर उसके घर से लेकर मुझे भेजी है, उसी के साथ आपकी तस्वीर भी आई थी, अभी परसो हो तो वह तस्वीर मुझे मिली है। हाय, उसके देखने मे कितना रज होता है। नरेद्र उसकी तस्वीर कहा है, मुझे दिखाओ। श्यामा उसको देखकर आप क्या कीजियेगा, आपको तो औरतो से नफरत ही है। नरेद्र भला देखें तो सही कि वह कसी है जिसने मेरी इतनी कदर की। श्यामा खर उसने जो मुनासिब समझा किया आपको तो उसकी गरज ही नहीं है फिर तस्वीर देखकर क्या कीजियेगा । नरेद्र तुमने उसका हाल मुझे ऐसा सुनाया कि मेरे रोगटे खड़े हो गये। मैं तुम्हारा बडा ही अहसान मानू गा अगर तुम उसकी तस्वीर मुझे दिखा नरेद्र-मोहिनी ६७ दोगी। 1 श्यामा (भामा की तरफ देखकर) अच्छा बहिन, रम्मा की तस्वीर लाकर इहें दिखा दो। भामा वहां से चली गई और बहुत जल्द रम्भा की तस्वीर ले कर आई। घबराहट के मारे नरे द्रसिह ने खुद उठ पर बल्कि वुछ आगे बढ़ कर रम्भा की तस्वीर भामा के हाप से ले ली और एक निगाह उस पर डाली। वह तस्वीर थी या कोई आफ्त कि देखते ही नरेद्रसिंह की हालत बदल गई, चारचाई पर बैठना भूल गए और उसी जगह जमीन पर बठ तस्वीर देखने और आंसू बहाने लगे। तब कई सायत के बाद बोले, 'ओह ' क्या यही वह रम्भा है जिसको मैंने एकदम त्याग दिया और जिसके साथ शादी करने से इन्कार कर दिया। हाय, इस दुनिया से कोई भी येरे ऐसा कम्बस्त न होगा जिसने आती हुई लक्ष्मी को लात मारी | अहा, यह खूबसूरती । इतना चढा- बढ़ा हुस्न । ऐसा दिमागदार चेहरा । तिस पर इतनी नेक और पतिव्रता !! हाय । बदनसीब नरेन्द्र । तने बहुत ही बुरा किया जो ऐसी को सताया। जरूर इसी पाप का फल भोग रहा है । बिना देखे और जांचे किसी की बेकदरी करना वही भारी भूल है। क्या ऐसी गुणवाली औरत तुझे और कही मिल सकती है ? हाय । अगर मेरी आँखो मे शील और मुरोवत और हृदय मे दया होती, तो इसके सामने किसी का कभी नाम भी न लेता । मगर नही, उसका खयाल अगर दूर कर दूगा तो पक्का बेईमान और बेमुरोवत कहलाऊंगा और दुनिया मे मेरी कुछ भी कदर न रहेगी । मगर क्या मोहनी को रम्भा ऐसी नेक' औरत की खिदमत करने में कुछ उच्च होगा? कभी नहीं खर जो कुछ होगा देखा जाएगा, अब तो रम्भा को खोजना ही मेरा पहला याम हुआ अच्छा अगर वह न मिली तो मैं क्या क्रू गा? इसके कहने की कोई जरूरत नहीं, किसी दूसरे का नहीं तो अपनी जान का तो मैं आप मालिक हूँ इसी तरह की बातें घण्टो तक नरेद्रसिंह कहते तथा बकते, शकते, रोते- वलपते और अपसोस करते रहे। दूर ही से श्यामा और भामा इनकी दशा देख देख मुस्कराती रही। मगर आखिर श्यामा स न रहा गया, जो उमड आया, बड़ी मुश्किल से अपन को सम्हाला और नरसिंह के सामने आकर बोली, "आप यह क्या कर रहे हैं । बिल्कुल बनी-बनाई बात विगाडा चाहते 1 - नरेद्र-मोहि हैं । कहीं केतकी आ जाय और इस तरह पर आपको देखे तो कहिए क्या हो । अब उसके आने का वक्त भी हो गया है, लाइए यह तस्वीर मुझे दीजिए। लेकिन आप घबराइए नही, मैं वादा करती हूँ कि आपको रम्भा से मिला दूगी। मैं उसका बहुतकुछ हाल जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि इस समय वह कहां है।" नरेद्र (सिर उठा के श्यामा की तरफ देख कर) हैं | क्या तुम जानती हो कि इस समय रम्भा कहां है और तुम वादा करती हो कि मुझे उससे मिला दोगी? श्यामा हाँ, हां, मैं जानती हूँ और वादा करती हूँ कि आपको रम्भा से मिला दूगी मगर इस शत पर कि जो कुछ मैं कहू आप उससे इन्कार न कीजिए । नरेन्द्र मुझसे कसम ले लो जो मैं कभी तुम्हारे कहने के खिलाफ चलू । हाय इस वक्त तुम भी मुझको भली मालूम होती हो क्योकि 'तस्वीर देख कर) रम्भा की बहुत सी बातें तुममे पाई जाती हैं। श्यामा (भामा की तरफ देख कर और मुस्कुरा कर) बहिन, जरा इनकी बातें तुम भी याद रखना। भामा मुझे तो यही डर है कि कही केतकी न आ पहुचे । नरेद्र केतकी भला मेरा क्या कर लेगी? क्या मैं मर्द हो कर औरत से डरूंगा? केतकी की मजाल है जो मुझे रोक सके ।। श्यामा राम राम, ऐसा न कहिए चाहे केतकी आपका कुछ न कर सके मगर उसका ब दोबस्त ऐसा है कि आप ऐसे दस को भी वह कुछ नहीं समझती। इसका हाल तो मैं जानती हूँ । लाइए यह तस्वीर मुझे दीजिए और चारपाई पर आकर लेटिए । अब तो में इस बात का बीडा ही उठा चुकी हू कि आपको रम्भा से मिला दूंगी, फिर क्या है अगर आप मेरी बात नहीं सुनते तो लीजिए फिर मैं जाती हू, बाप जानिए आपका काम जाने । रेद्र नहीं नहीं, तुम जो कहोगी मैं वही करूगा, लो तस्वीर लो, मगर फिर जब मैं मागू तब दे देना। श्यामा हा यह हो सकता है। नरेद्रसिंह ने रम्भा की तस्वीर श्यामा के हाथ म दे दी और पलग पर 7 नरेद्र-मोहिनी आकर लेट रहे मगर उनकी क्या दशा थी यह वही जानते होंगे। थोड़ी ही दर में सीढी पर चढते हुए क्सिी आदमी के आने की आहट मालूम हुई । तीनो की निगाह दरवाजे पर जा लगी, देखा तो केतकी आ रही 1 मगर इस समय केतकी का ग बदला हुआ था । गुस्से के मारे उसका गोरा मुह सुख हो रहा था आर लाल नजर आती थी, और बदन कांप रहा था । प्राते ही वह कडक कर बोली क्या रे श्यामा । क्या तूने मुझको छोकडी समझ लिया है ? अरे तेरे जसे पचास को चरा के रख दू, तू क्या मुझसे चालाकी खेलेगी? वाह री लौडी' अच्छा खिदमत करने के बहाने मुझ पर बिजली गिराने लगी। वह दिन याद नहीं कि वही बठन का ठिकाना तुझको नहीं मिलता था? मैंने अपने यहाँ रख लिया यह क्या तरे साथ कोई बुराई की ? मगर पाच ही सात दिन मे तेरे गुण जाहिर हो गए । मैं नहीं समझती थी कि तू आस्तीन की नागिन बन जाएगी | अरे शतान की बच्ची । तुझको जरा भी मेरा डर न हुआ क्या तू नहीं जानती थी कि मैं कौन हू! क्या तुझे यह खयाल न हुआ कि केतकी अगर कही छिप कर सुनती होगी तो मेरी क्या दशा करेगी? अरे, मैं तो पहले ही ताड गई थी कि इनके पास तेरा बैठना- उठना और खिदमत करना बेसबब नहीं है, जरूर कुछ दाल में काला है। अगर हिप के सब बात न सुनती तो मुझे भला क्या मालूम हाता कि ते जहर की बुक्षी भटारी है यह खूबसूरती और यह क्साईपन | अरे मैंन तो समझा था कि यह किसी बडे खानदान की नेक लडको है किसी आफ्त ये सबब मारी- मारी फिर रही है इसे रख लो, मै क्या समझती थी कि तू मरे लिए ही काल हो जाएगी। अच्छा तेने तो मेरा भण्डा फोड ही दिया अब ले तू भी क्या याद करेगी कि किसी से काम पडा था।" इतना कह पुर्ती स नरे द्रसिंह की बगल से तलवार उठा ली और श्यामा के ऊपर चलाई मगर नरेद्रसिंह ने झपट कर उसकी क्लाई थाम ली और इतना उमठा कि तलवार का कब्जा उसके हाथ से छूट गया इसके बाद एक लात ऐसी मारी कि वह दूर जाकर धम से गिर पड़ी और बडे जोर से चिल्लाई। वेतकी के चित्लाते हो पचासो सिपाही नगी तलवारें हाथो म लिए हुए इस तरह आ पहुचे मानो वे लोग सोढी पर तयार ही थे जोर देतवी भी नरेद्र मोहिनी आवाज की राह भर देख रहे थे। इनको देखते ही नर सिंह ने झट तलवार उठा ली और देखने लगे कि ये लाग क्या करते हैं। उन सिपाहियों में से दस ता पयामा और भामा की तरफ झुके और बाकी नरेद्रसिंह के अगल-बगल हो गए । जव श्यामा और भामा की मुश्के कसी जाने लगी तब श्यामा ने-आँखो मे आंसू भर कर नरेद्रसिंह की तरफ देखा और कहा "प्राणनाथ | अब तो मैं जाती हू, लेकिन आप रम्भा की खोज मे दु ख न उठाइएगा, क्योकि आपकी दासी वह कम्बख्त रम्मा मैं ही हूँ और प्यारी सखी तारा यही मेरे साथ है। मैं चाहती थी कि किसी अच्छे मौके पर अपना भेद खोलू मगर हाय विधाता, तेने कुछ करने न दिया ।" इतना सुनते ही नरेद्रसिंह को जोश चढ आया। गरज कर जवाब दिया कि 'क्या मजाल है किसी की जो मेर जीते जी रम्भा को सता सके । इतना कह उन दसो सिपाहियो पर टूट पडे जो रम्भा और तारा (श्यामा और भामा) की मुश्कें बाध कर उठा ले जाया चाहते थे। पुर्ती से दो आदमियो का सिर घड से अलग किया, इतने में सबके सब नरे द्रसिंह पर टूट पडे । इस समय नरे द्रसिंह की बहादुरी देखने लायक थी। जैसे शेर बकरियो के झुण्ड मे उछलता हो वही हालत इनकी थी। इनके वदन मे कई जरूम लगे मगर उहोने देखते देखते दस बारह आदमियो को काट के गिरा दिया जिससे कुल सिपाहियो के हौसले पस्त हो गए । मगर इतने ही मे गिरी हुई एक तलवार उठा कर केतकी ने पीछे से नरेद्रसिंह की पीठ पर मारी जिसके साथ ही नरेन्द्र सिंह ने पीछे फिर के देखा। उसी वक्त एक सिपाही ने ऐसी तलवार इनके सिर मे मारी कि यह ठहर न सके और चक्कर खाकर जमीन पर गिर पडे । १२ रम्भा के भाई अर्जुनसिंह क्या हुए ? रम्भा और तारा गयाजी से यकायक इस शतान की बच्ची केतकी के यहाँ कसे आ पहुची? नरेद्रसिंह की अब क्य गति होगी। बहादुरसिंह इस समय कहां और किस फिराक में हैं ? बेचारी मोहनी और गुलाब कहा टक्कर मार रही है ? रम्भा जब घर से निकल पार्थ जो रवाना हुई तो उसके घर मे क्या धूम मची? नर द्रसिंह के भाई जगजीत सिंह रनको खोज मे निक्ले थे वह कहाँ गए ? इत्यादि बहुत-सी बातें जानने नरेद्र-मोहिनी के लिए इस समय पाठक उत्कठित हो रहे होंगे इसलिए हम नरे द्रसिंह, रम्भा, तारा और केतकी को इसी दशा मे छोड दूसरी तरफ झुकते है और पहले जगजीतसिंह की कथा सुनाते है। जगजीतसिंह ने भाई की खोज म जाने के पहले ही बहादुरसिंह से सब हाल पूछ लिया था और उस तहखाने का भी पता मालूम पर लिया था जिसमे बहादुरसिंह बंद थे। बहादुरसिंह से जुदा होकर जगजीतसिंह कई आदमियो को साथ लिए बन- देवी के मंदिर मे पहुचे और माई का दर्शन कर बडी देर तक प्रार्थना करते रहे । इसके बाद मदिर के बाहर आ अपनी मामूली पोशाक उतार दी और साधुओ के कपडे जो घर से लेते आए ये पहन लिए। वदन म सिर से पर तक विभूति मल ली, लगोटा कस कर एक छोटी सी दुनाली पिस्तौल गोली भर कमर म छिपा ली और कुछ गोलीबारूद अलग भी रख लो। ऊपर से गेरुए रग लम्बा लवादा पहिर हाथ मे एक बडा-सा चिमटा ले लिया और अपने साथ दो बहादुरो की भी ऐसी ही सूरत बना उनकी कमर म भी एक-एक पिस्तौल और छुरी छिपा ऊपर से गरुआ लम्बा अगा पहिरा उनके हाथ मे भी एक-एक भारी चिमटा द दिया । तब सिफ इन्ही दो आदमियो को साथ ले बाकी सभी को घर की तरफ लौटा पदल वहाँ से रवाना हुए और पहिल उसी तहखाने की तरफ चले जिसमे बहादुरसिंह कंद था। कुछ रात जा चुकी थी जब ये तीनो आदमी बनदेवी के मदिर से रवाना हुए । च द्रमा निक्ल आया था, उसको सुन्दर चांदनी चारो तरफ फल गई थी। मास्मान पर छोटे-छोटे बादल के टुकडे मद माद हवा के झोको से धीरे-धीरे दौड रहे थे। कभी योडी देर के लिए परमा वादलो म छिप जाता भगर तुरत हो उस टुकडे के हट जाने से फिर निकल आता था। एक पहर रात जाते-जाते ये तीनों आदमी उसी नाले के किनारे पहुचे जहाँ बहादुरसिंह से मुलाकात हुई थी। जगजीतसिंह ने दोनो साथियो का नाम जयसिंह और हरीसिंह था। ये दोनो दहे वहादुर और लडाई ये फन म यक्ता थे। नरेद्रमिह वाप उदयसिंह के दरबार में इन दोना को अच्छी पदर थी और लडाई भिडाई वाम म इन दोनो से बराबर राय ली जाती थी। जय- सिंह की उम्र पचास वष में ऊपर थी मगर हरीसिंह अभी पचीस वष का दिलावर ७२ नरेद्र मोहिनी होनहार बहादुर था। जयसिंह ने कहा, "देखिए आसमान पर बदली गहरी होती जाती है, थोडा देर मे पानी जरूर बरसेगा। ऐसे समय दूर का रास्ता पक्डना मुनासिब नहीं है, पास ही आपकी शिकारगाह है, वहा चलिए। शिकार खेलने का तहखाना भी आज साफ है उसी में डेरा दें। अगर पानी बरसा तो रात उसी जगह काटेगे नही तो चादनी निकल आने पर उधर का रास्ता पडेंगे जहाँ जाने का निश्चय कर चुके हैं। जगजीतसिंह ने इस बात को पसद क्यिा और रात उसी तहखाने में काटी। पानी भी सवेरे तक खूब बरसता रहा। दूसरे दिन सवेरे पानी खुलने पर ये लोग वहा से रवाना हुए । जगजीतसिंह ने सोचा कि पहिले उस ठिकाने चलना चाहिए जहा बहादुरसिंह कद था जरूर कुछ न कुछ पता लग ही जाएगा। जगजीत सिंह को इस बात का डर न था कि वहा डाकुओ को मण्डली भारी होगी और हम लोग फुल तीन ही आदमी हैं क्योकि एक तो यह तीनो अपने साज सामान और ताकत के ऐम पूरे थे कि दस वीस आदमियो १ भगा देना इन लोगो के सामा कोई बड़ी बात न थी, दूसरे जगजीतसिंह अहडा की तरह सिफ दो ही आदमी साथ लकर नरेन्द्रसिंह की खोज मे नहीं निकले 4 बलि उहोने बहुत कुछ सामान अपन लिए करते तब घर से बाहर पैर निकाला था। उन्होने और क्या सामान किया था इसके कान की अभी कोई जरूरत नहीं समय पडा पर आप ही मालूम हो जाएगा। रास्ते में कोई घटना नहीं हुई और चौथे दिन दोपहर का ये तीनो उस तहखान के पास पहुँच गए जिसम बहादुरसिंह वद था। इस जगह कोई इमारत न थी न कोई मकान ही था, कोई ऐसा निशान भी नही दिखाई देता था जिससे मालूम हो कि दहा जमीन के अदर काई तह साना है हा बहादुरसिह न तहमाने की पहचान जगजीतसिंह को बता दी यो इसलिए इनको मालूम हो गया कि यही यह तहखाना है जिसमे बहादुरसिंह मद था। इस जगह एव निहायत उम्दा बहुत वहा सगान कृआ दपन मे आमा जिरायी वुर्सी जमीसे तीन हाथ ऊची थी। कुए के उपर जाने के लिए धारो तरफ पत्थर की सीढ़ियां बनी हुई थी।

नरेद्र मोहिनी ७३ जय हरी यही वह कुआ मालूम होता है। जगजीत० इसमे कोई शक नही कि यह वही कुआ है जिसे बहादुरसिंह ने तहखाने का दरवाजा कहा था। चारो तरफ की सीढियो को अच्छी तरह देखो, किसी सीढी के नीचे बगल मे दरवाजा होगा । जम० (चारो तरफ देखकर और एक सीढी के पास खडे होकर) दर- वाजा तो कोई नहीं है मगर यहाँ दरवाजा होने का एक निशान जरूर मालूम होता है, आप जरा इधर आइये और देखिए । जगजीत० (जयसिंह के पास जाकर और देखकर) क्या निशान है? जय० यह जमीन नम (गोली) मालूम होती है, मैं समझता हूँ डाकुओ ने यह जगह छोड दी और इंट से यह दरवाजा बद कर चूना चढा बराबर कर दिया है । (चिमटे से खोद और एक ईंट निकाल कर) देखिए अब साफ मालूम होता है। जगजीत. छोड दो, अब इसका खोदना व्यथ है। खोदना व्यथ न होगा, चाहे डाकुओ ने यह जगह छोड दी हो, मगर हाल चाल लेने के लिए कोई न कोई डाकू यहा जरूर आता होगा क्यो कि उन लोगों को भोलासिंह के फस जाने से बहुत कुछ डर पदा हो गया होगा। मेरी राय है कि दरवाजा साफ कर दिया जाय और इसी कुए पर हम लोग डेरा डालें । जब डाकुओ में से कोई पता लगाने के लिए यहा आएगा इसको खुदा हुआ देख उसे जरूर शक होगा। उस समय हम लोग उसका सूरत और आकृति ही रो पहिचान जाएगे कि यह डाकू है । जगजीत. बात तो ठीक है अच्छा ऐसा ही करो। हरीसिंह और जयसिंह ने मिल कर अपने बडे-बडे चिमटोसे खोद कर वह दरवाजा साफ कर डाला । चौखट, किया और बाद ताला भी निकल आया। यह दरवाजा बहुत बहा न था बल्कि ऐसा कि बिना अच्छी तरह झुके काई उसने अदर नहीं जा सकता था। जयसिंह ने ताला तोड डाला । जगजीत. चलो इसके अन्दर चल कर देखें कि क्या है ? ऐसा भूल से भी न कीजिएगा। हरी० क्यो? जय० हम लोग इसने अादर चले जाए, उपर कोई डाक यहा आवे और जय० नरेद्र-मोहिनी जय० शक करके बाहर का दरवाजा वन्द कर दे तो बस हम लोग इसी के अन्दर ही सडा परें । यह कोई बुद्धिमानी नहीं है। जगजीत० यही सव सोचने के लिए तो तुम्हे साथ ले आए हैं । हरो० अच्छा आप दोना आदमी खडे रहिए, मैं जाता है। बिना रोशनी के भीतर जाकर क्या देखोगे ? इस समय रहने दो फिर देखा जाएगा। शाम हो गई। तीनो ने उस कुएं पर आसन जमाया और अच्छी तरह सलाह कर ली कि अब क्या करना चाहिए । अभी अघेरा नहीं हुआ था कि एक देहाती उस कुएं के पास पहुंचा और जगजीतसिंह को झुक कर सलाम करने के बाद हरीसिंह और जयसिंह को सलाम करके पडा हो गया। जगजीत० कहो क्या हाल है ' तुम्हारे और साथी सब कहा हैं ? देहाती सब इधर-उधर फैले हुए हैं जब किसी को कुछ हाल मिलेगा तब वह आपके हुक्म मुताबिक इसी कए पर पहुचेगा। जय० तुम्हें क्या कोई हाल मिला है जो यहा आए हो? देहाती दो बातें मेरे देखन मे आई हैं । जय० वह क्या ? देहाती आप लोग तो चक्करते हुए इधर आए और मैं सीधा गयाजी चला गया। वहा से फल्गू पार हो पूरब की तरफ चला। लगभग तीन कोस जाने के बाद जगल में एक भारी इमारत नजर आई में उसी तरफ मुडा और वहा पहुच कर उसके इद गिद धूमने लगा। फिर? देहाती जब रात हुई तो बहुत-से मादमी उस मकान से बाहर निकले और सीघे दक्खिन का रास्ता लिया । मैं भी चक्कर दे उस भीड मे मिल गया। देखा कि वे लोग गई लाशो को उठाए लिए जा रहे हैं । मैंने सोचा कि बिना कारण एक्दम इतने नहीं मर सकते, इस मकान के अदर जरूर कुछ न कुछ खून खराबा हुआ है । आखिर यही बात निकली । वे लोग आपस में धीरे धीरे बातें करते जा रहे थे। कुल बातें तो मेरी समझ में न आइ हा इतना मालूम हुआ कि उस मकान म जिप्सम से वे लोग निक्ले ये गया के जमीदार उसी जय०

नरेद्र-मोहिनी
७५
हजारीसिंह की लड़की रहती है जिसने हाजियो की लडाई मे आपके पिता को
मदद दी थी और वे सब आदमी हमारे नरेद्रसिंह के हाथ से मरे हैं जिनकी
लाशें वे लोग उठाए लिए जा रहे थे।
जय० खाली बातो से तुमने कैसे निश्चय कर लिया कि वे सब नरेद्र
सिंह के हाथ से मरे थे?
देहाती जी हाँ, उही में से एक बोल उठा, "आखिर नरेद्रसिंह बिहार
के प्रताप) और बहादुर राजा उदयसिंह का पुत्र है, वह अगर मैदान पाता तो
और भी कितनो ही की जान लेता'" यह सुन दूसरा बोला "नरेद्रसिंह का
गिरफ्तार कर लेना भी केतकी के हक में ठीक न होगा, खर यहा तक तो नमक
को शत अदा कर दी, अब ऐसे की नौकरी कभी न करूंगा!" इसके सिवाय
और भी बहुत सी बातें सुनने मे आई जिससे मुझे निश्चय हो गया कि वे सब
नरेद्रसिंह के हाथ से मरे हैं, मगर इतनो को मारने के बाद आखीर मे वे खुद
भी गिरफ्तार हो गए।
जग० पिताजी को यह खबर कहला भेजनी चाहिए ।
जय० कोई जरूरत नही मालूम होती।
देहाती ताज्जुब नही कि उहें यह खबर लग गई हो।
जय० मैं यही ख्याल करता हूँ, क्योकि उनकी चाल और नीति भी बडी
ही टेढी है।
जगजीत० अच्छा तो अब यहां ठहरना ठीक नहीं है।
जी हा चलिए हम लोग भी उसी तरफ चलें । (देहाती की तरफ
देख के) हरी, देखो हम तुम्हें दो-तीन काम सुपुद किए देते हैं, जहां तक हो
उहें जल्दी करना।
हरी जो हुक्म ।
ने देहाती को जिसका नाम हरी जासूस था, कई बातें समझाई
और इसके बाद तीनो आदमी वहा से उठ कर केतकी के मकान की तरफ
रवाना हुए।
जय०

नरेन्द्र मोहिना अब म फिर नर सिंह और केतकी का हाल लिखते हैं। जब उनको वेतको वी शतानी का हाल मालूम हुआ तब यह सोच कर दि गुलाब मोर मोहनी वे दुमका कारण यही है, उह उसके ऊपर बहुत ही गुस्सा आया । उसी समय स्यामा और भामा की जुबानी रम्भा के प्रेम का हाल सुन उनकी और ही दशा हा गई और उस रम्भा मे मिलने का शौक हद्द से ज्यादा पता हुआ। जब गिरफ्तार होती समय श्यामा ने कहा कि मैं ही रम्भा हूँ तब तो उनको आसाम खून उत्तर आया और अपनी जान से हाथ धो बैतको के बाद मियो स लड गए, मगर क्या हो सकता था, यह अकेले और व बहुत थे आसिर कई आदमियो वा मार कर सुट भी गिरपतार हो गए। हरामजादी केतकी नरे द्रसिंह, रम्भा और तारा के खून को प्यासी बन चंठी । उसन तीनों को कदम डाल दिया मगर कई दिनो तक नरेद्रसिंह को समझातो और कहती रही कि मोहिनी, गुलाब और रम्भा का ध्यान छोड मेरे साथ शादी कर लो बल्लि मेरे सामने अपने हाय स रभा का सिर काट डाला तो तुम्ह कद से छुटटी मिल जाएगी, मगर नरेद्धसिंह इसे स्व मजूर करने लगे, जवाब म सिवाय चुप रहने के वे और कुछ भी न बोले । आखिर लाचार हा वतगी ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि आज रात को अपने हाथ नरेद्रसिंह, रभा और तारा का सिर काट क्लेजा ठण्डा करेगी। या केतकी लइक्पन ही वी शतान थी। इसी तरह इसने कई आदमियो वो फ्मा फसा कर अपने हाथ मे मार डाला था। इसने पहिले तो सोचा कि थोडे दिन तक और भी नरेद्रसिंह को कद रख कर समझावे-चुझावे । मगर यह खयाल रखे कि यदि यह भेद राजकमचारियो को मालूम हो गया तो बड़ी मुश्किल होगी उसने ज्यादा दिनो तक इनको कद रसने का हौसला न किया। एक दिन चादनी रात में वह छत पर बठी बाग की बहार देख रही था उसकी सखिया भी पास ही वठी हुई थी और नरेद्रसिंह की खूबसूरती पर रहम खा उहे छोड देने के लिए समझा रही थी। मगर इस सगदिल का दिल नरम न हुआ और इसन मुशला कर कदी, नरेन्द्रसिंह को हाजिर करने का हुक्म स दिया।

नरेद्र मोहिनी यह मकान, जिसमे वेतको रहती थी शहर से बहुत दूर था । यहा से गया जो लगभग तीन धार कोस वे हागी, पास में और कोई दूसरा शहर या कस्बा न था। इस मकान के चारा तरफ कोसो तक जगल ही-जगल था । यहाँ तक कि किसी आदमी के पहुंचने का बहुत कम मौवा पडता, इसीलिए वह यहाँ बहुत ही स्वत प्रता से रह कर बेखौफ अपने दिन ऐयाशी म बिताया करती थी। नरेद्रसिंह केतकी के सामा लाये गये। उसने अपने हाथ में तलवार ले ली और उन्हें धमकाना शुरू किया। मगर उसी समय पूरब तरफ मे शोरगुल की आवाज आतो सुन वह ठिठक गई और सडी होकर देखने लगी। मालूम हुआ कि सैकडो आदमी गरजते हुए इसके मकान की तरफ ही चले आ रहे है। रेखते-ही-देखते उन सभी ने जो अदाज म पांच सौ से कम न होगे पास पहुच पर चारो तरफ से इस मकान को घेर लिया। वेतकी के सिपाहियो ने इहें रोकना चाहा मगर ऐसा कब हो सकता था वे पचास से ज्यादा न ये और घेरा डालने वाले पाच सौ से भी ज्यादा थाखिर आए हुए आदमियो के हुक्म से उह फाटक से हट ही जाना पड़ा। लगभग सौ आदमी नगी तलवारें लिए कोठी पर चढ गए । जो कुछ माल असबाब या हों उस मकान में पाया सब लूट लिया, एक पैसे की जमा या छटक भर लोहा उस मकान म न छोडा, यहाँ तक कि कतकी और उसकी सखियो के बदन से भी कुल जेवर उतार लिए और जाते समय रोती चिल्लाती रभा और तारा को भी लेते गये, मगर रस्सियो स जबडे हुए नरेद्रसिंह को ज्यो का त्यों छोड गए। इन सभी के मुह पर नकाब पड़ी हुई थी इसलिए कुछ भी जान न पडा कि ये कौन थे, कहा से आए थे या केतकी के साथ इनकी क्व की दुश्मनी थी। १४ हम ऊपर लिख आये हैं कि केतको के मकान पर बहुत-से आदमी चढ़ गए और सब-कुछ लूट लिया, यहां तक कि जाते समय रम्भा और तारा को भी लेते गये। इन लुटेरो के पहुँक्न और इस तरह की वारवाई करने से केतली की अजीब हालत हो गई। जान बची इसी को उसने गनीमत समझा और वहीं ७९ नरेद्र मोहिनी फिर वे लोग पहुच कर कुछ और दुख न दें इस खौफ से वहा ठहर भी न सकी । नरेद्रसिंह को उसी हालत मे छोड नीचे उतर आई और यह कहती हुई मकान के बाहर निकल गई कि 'जिसको मेरा साथ देना मन्जूर हो चला जावे, अब मैं इस मकान मे एक सायत भी नहीं टिक सकती।' उसकी कुछ सखियो और दो चार सिपाहियो ने तो साथ दिया, बाकी सभो ने अपना अपना रास्ता लिया क्योकि इसकी चालचलन से सभी नाराज थे, मगर उन लोगो को लाचारी थी जिनको कल के लिए खाने का ठिकाना न था और तनखाह भी कम पाते थे, इस लिए ऐसो ही ने इसवा साथ दिया । थब सिफ नरेद्रसिंह इस मकान मे रह गए सो भी इस हालत मे कि न कही जा सकते हैं और न कुछ कर सकते हैं क्योकि हाथ पैर कदियो की तरह बधे हुए थे । चारों तरफ जगल के बीच मे यह मकान तो था ही तिस पर इस स नाटे ने और भी गजब किया ऊपर से रम्भा की जुदाई ने तो मौत की ही सूरत दिखा दी जो उनके (नरेद्र के) देखते देखते जबदस्ती माल असबाब की तरह उन लुटेरो के हाथ मे पड गई थी। क्या वे लोग डाकू थे? नहीं, अगर डाकू होते तो सिफ माल असबाब लब रखते, रम्भा और तारा को उठा ले जाने से वास्ता ? शायद औरतो को भी उहोंने माल ही समझा हो और उन्हें भी बेच कर रुपये वसूल करने की नीयत हो ? नहीं नहीं, अगर ऐसा होता तो केतकी को क्यो छोड जाते ? केतनी के सिवाय उसकी कई खूबसूरत सखिया भी तो इस मकान मे थी उनको भी ले जाते । बेशक रम्भा और तारा के ले जाने का कोई खास मतलब है । हाय, रम्भा के सच्चे प्रेम ने तो मुझे और भी दुख मे डाल दिया। उस बेचारी ने मेरे लिए कितनी तकलीफें उठाई । बाप-मां को छोडा, तनोबदन को सुप भुला दी, अपने देश और बांधवो को लात मार मेरी खोज में चल खडी हुई। किसी तरह मुझ तक पहुची भी तो हाय विस्मत ने एक नया ही गुल दिखाया । आज उसकी मुसीबत का क्या कुछ ठिकाना होगा !! इही बातो को सोच-सोच कर नरेद्रसिंह आंसू बहा रहे थे। थोड़ी-थोडी देर पर लम्बी सासो से कलेजा ठण्डा करना चाहते थे मगर क्या हो सकता । ज्यो-ग्यो भासमान के तारे घसके जा रहे ये त्यो त्यो इनके जिगर की चिनगारियो मे भी चमक बढती जा रही थी, यहां सब कि सुबह की नम उडी मत ?

नरेद्र मोहिनी ७६ - और खुशबूदार हवा चलने लगी । आफत के मारे बेचारे नरेद्रसिंह के सर पर से अब तारो ने भी अपना साया हटा लिया और गम की फोज का लाल झण्डा पूरब तरफ के आसमान पर दिखाई देने लगा। अभी सूय अच्छी तरह नहीं निकला था कि फिक्र के दरिया मे गोते खाते हुए नरेद्रसिंह को किसी आने वाले के परो को आहट ने सहारा दिया। मुह फेर कर देखा तो तीन साधुओ पर नजर पडी जिनमे एक की उम्र बहुत कम थी। इस कम उम्र साघु ने दौडकर नरेद्रसिंह के हाथ-पैर खोले और गले से लिपट कर रोने लगा । नरेद्रसिंह के आंसू भी न रुके क्योकि खून ने जाश मे आकर कह दिया कि यह तेरा छोटा भाई जगजीतसिंह है जो तेरी खोज मे न मालूम कब से और कहाँ-कहाँ घूम रहा है। थोड़ी देर मे दोनो अलग हुए और बातचीत होने लगी- जग० भाई, आपने तो एकदम ही हम लोगो से मुह फेर लिया । नरेद्र क्या कहें, अफसोस, बडी भूल हो गई ! खर अब घर चलिए। नरेद्र अब हिम्मत और मर्दानगी के साथ साथ किसी की सच्ची मुहब्बत ने मुझे इस लायक ही नही रक्खा कि घर जाऊ । जब तक तुम मेरा हाल न सुन लो मेरे बारे में कुछ राय नही दे सकते । जग० मैं वहाँ तक आपका हाल सुन चुका हूँ जब बहादुरसिंह और दो औरतों को दरिया के किनारे छोड आप दूसरी नाव किराए करने चले गए थे। आगे का हाल मुझे कुछ नही मालूम । नरेद्र वह हाल तुमसे किसने कहा? जग० बहादुरसिंह ने। नरेद्र क्या बहादुर घर पहुँच गया? तो वे दोनो औरतें भी उसके साथ जग० होगी? जग० जी नहीं । वे दोना औरतें और बहादुरसिंह डाकुओ की कैद मे फस गए थे । बहादुर तो निकल भागा मगर उन दोनो का हाल कुछ नहीं मालूम । अब आप घर चलें, किसी न किसी तरह उन दोनो का भी मैं पता लगाऊंगा।

नरेद्र मोहिनी नरेद्र अगर सिफ उही दोनो औरतो का खयाल रहता तो मैं बेशक तुम्हारे साथ चला चलता मगर मुझे तो उस सायत ने मार डाला जिस सायत मे मैं रज हो कर घर से निकल भागा था। मै नही जानता था कि रम्भा पतिव्रता कहाने में एक ही होगी। जग० बेशक रम्भा ऐसी ही थी। आपके बारात से चले जाने के बाद उसके बाप ने दूसरे के साथ उसकी शादी करनी चाही मगर उसने मजूर न क्यिा और जबदस्ती के खौफ स न मालूम कहा निकल भागी, अफसोस । नरेद्र यही तो रञ्ज है। रभा मेरे लिए घर से निकल भागी और मुझ से मिली भी, मगर किस्मत को कोई क्या करे । इसके बाद नरेद्रसिंह ने अपना कुल हाल जगजीतसिंह से कहा जिसे सुन उहें भी जोश चढ आया और वे बडे गम्भीर भाव से बोले, "भाई, मैं जान गया वि बेचारी रम्भा पर जुल्म करने वाला कौन है । मुझे यह भी मालूम हो गया कि इस वक्त रम्भा कहाँ होगी। अब मै आपको यह न कहूँगा कि घर चलिए और न मै खुद ही घर जाऊगा जब तक रम्भा को दुष्टो हाथ से न छुडा लूगा । क्या हमारी जिन्दगी रहते रम्भा को कोई दूसरा ले जायगा ? मैं उसी दिन अपने को मद और दुनिया मे मुह दिखाने लायक समझू गा जिस दिन अपने घर मे रम्भा का 'भाभी कह के पुकारू गा। अब आप उठिए और मेरे साथ चलिए, इस बारे मे जो कुछ मैं जानता या समझता हूँ रास्ते मे कहूंगा। माप यह न समझिये कि मैं सिफ (हाथ का इशारा करके) इही दोनो जयसिंह और हरीसिंह को साथ ले कर घर से निकला हूँ। मैं अपने पूरे बदोबस्त म हूँ और जो कुछ कर सकता हूँ या करूंगा वह आपसे कुछ छिपा न रहेगा।" अपन छोटे भाई की यह बात सुन नरेन्द्रसिंह को बहुत ढाढस हुई और वे फौरन उठ खड़े हुए। इस देतकी के मकान के साथ अस्तबल भी था जिसमे अच्छे-अच्छे कई पोहे मौजूद थे। नरेद्रसिंह, जगजीतसिंह, जयसिंह और हरीसिंह चारो आदमी पोहो पर सवार हुए मोर जगजीतसिंह की राम के मुताविक जी के साथ एक तरफ रवाना हुए।

नरेद्र मोहिनी ११ १५ पटने से पूरब सालिग्रामी नदी के उस पार किनारे ही पर हाजीपुर आबाद है । इस समय तो वह एक कस्बे की तरह मालूम होता है मगर हम जब का हाल लिख रहे हैं उस जमाने में यह एक छोटे से मगर खूबसूरत शहर की तरह रोनक पर था। इसी तरह गण्डक के किनार ही एक छोटा मगर सगीन और मजबूत किला भी था जिसमे वहां के राजा दौलतसिंह रहा करते थे । पहिले वे हाजीपुर के नामी जमीदारो मे ये मगर अपनी चालाकी और बहादुरी से अब वहा के राजा बन बठे थे। इही के लडके प्रतापसिंह से नरे द्रसिंह के चले जाने बाद रभा की शादी होने वाली थी जिसके खौफ से वह बेवारी अपने चचेरे भाई अजु सिंह और तारा को साथ ले घर से बाहर निकल गई थी। इन सब बातो को जगजीतसिंह जानते थे और इसीलिए इहें यकीन हो गया कि केतकी का मकान लूटकर रम्भा और तारा को ले जाने वाले वेशक राजा दौलतसिंह के ही आदमी होंगे। घोडे पर सवार जाते-जाते रास्ते में जगजीतसिंह ने यह सब हाल मुख्तसर मे नरेद्रसिंह स कहा और अपना खयाल जाहिर किया। मरेद्र तुम्हारा खयाल बहुत ठीक है। मुझे भी विश्वास होता है कि यह काम सिवाय दौलतसिंह के दूसरे का नही, मगर ताज्जुब इस बात का है कि उसे पता कैसे लगा? जग० पिसी तरह मालूम हो गया होगा अपने जामूस चारा तरफ दौडा दिए होगे । और फिर यह भी तो सोचिए पि सिवाय दौलतमिह दे इस तरप ऐसा जबदस्त दूसरा और कौन है ? नरेद्र वेशा यह उसी का काम है। जग० इसीलिए हम लोग हाजीपुर की तरफ चल रहे हैं, अभी वे लोग बहुत दूर न गए हागे । धारा आदमी दोपहर तक बराबर घोड़ा वे चले गये । जब धूप बहुत तेज हुई वहीं ठहर कर सुस्ताने और घोडा को ठडा करने का इरादा किया और चारा तरफ निगाह दोडा बर दराने लगे । सडक के दाहिनी तरप कुछ दूर पर माम भी एक बाडी पो जिसमे बहुत से पोशो आदमी उतर हुए । पापोडो ? ८२ नरेद्र-मोहिनी पर चढ हुए इधर उधर घूम फिर भी रहे थे। पेडो म से छनकर ऊपर की तरफ उठते हुए धुएं से मालूम होता था कि वे सब रसोई बना रहे हैं । जगजीत- सिंह ने कहा, 'बेशक वे लोग इसी बाडी में उतरे हुए हैं जिनकी खोज मे हम चले आ रहे हैं।" नरेद्र तुम तीना आदमी साघुओ की सूरत बने हुए हुई हो, एक आदमी घोडा छोड कर चले जाओ और पता लगाओ। जग० (हरीसिंह की तरफ देखकर) घोडा इसी जगह छोड दो और जाकर देखो वै ही लोग हैं या दूसरे हरी० बहुत अच्छा। सड़क के किनारे पीपल का एक पेड था। तीनो आदमी उसके नीचे खडे हो गए । हरीसिंह ने अपना घोडा पेड के साथ बांध दिया और बडा सा चिमटा हाथ में हिलाते हुए उस बाडी की तरफ चले गए। थोड़ी ही देर बाद लौट माकर वे बोले, "हाँ वे ही लोग है और दो डोलियां भी उनके साथ हैं जिनके अन्दर से रोने की आवाज आ रही है।" नरेद्र (जयसिंह की तरफ देखकर) अब क्या इरादा है ? जयसिह बिना लडे भिडे काम चलेगा नही और हम लोगो के पास कोई हर्षा नहीं, तीन आदमियो के पास सिफ बड़े बड़े चिमटे हैं जिहें साधुओ का भेप बनाने के लिए रख छोडा है, और आपके पास वह भी नहीं । केतकी के मवान म इन लुटेरों ने कोई हर्बा छोडा ही नहीं जो साथ ले लेते, इसलिए अपना सामान दुरस्त करने के लिए हमको एक दिन अर्थात क्ल तक और सन्न करना चाहिए। नरेद्र कल तक क्या बदोबस्त कर सकोगे? जग० बदोबस्त होना कोई मुश्किल नहीं । हमने अपने बहुत-से फौजी आदमियो को निशान बता कर चारो तरफ फैला दिया है जिनम से थोडे-बहुत जरूर इकट्ठे हो सकते हैं। नरेद्र अगर ऐसा है तो फिर तरदुद ही क्या है ? जग० जयसिंह, तुम बस घोरा दौडाय चले जाओ और अपने सिपाहिया को बटोर लाओ। वह टीला यहा से बहुत दूर भी तो न होगा जहाँ एक अरडा हमने कायम किया है।

नरेद्र-मोहिनी - जयसिंह तो भी आठ कोस से क्या कम होगा । इसी खयाल से मैंने कहा या कि कल तक सय करना चाहिए। अब आप एक काम कीजिये । मैं तो यह सब बदोबस्त करने जाता हूँ और आप तीनो आदमी लुवे छिपे इन लोगो के साथ-साथ चले जाइए। कल इन लोगो को पुनपुन नदी पार करनी होगी जो इनके रास्ते मे पडेगी। आजकल उस नदी में पानी ज्यादा है, बिना नाय के पार उतरना मुश्किल है, इसलिए ये लोग जरूर कल रात को वहां डेरा डालेंगे और सवेरा होने पर पार उतरेंगे। वहाँ सिफ एक ही नाव होगी, ये लोग जल्दी किसी तरह नहीं कर सकते। जग० बस ठीक है मैं समझ गया । तुम अपना बदोबस्त करके उसी जगह पहुँच जाओ, हम तीनो आदमी धीरे-धीरे चलते हैं । (हरीसिंह की तरफ देखकर) क्यो हरीसिंह, वे लोग कितने आदमी हागे जिहे अभी तुम देखे आते . । - । हरी० पांच सौ के करीब होगे। नरेद्र जयसिंह, अगर तुम्हे पचास आदमी भी मिलें तो तुम लेकर चले आओ । देख लेना हम लोगो की एक-एक तलवार दस-दस का सिर काट के दम लेगी। जयसिंह इसमे क्या शक है । जगजीत खैर जो भी मिलें ले आओ, यो तो हमारे और भी बहुत से आदमी फले हुए हैं पर वक्त पर जो मिल जाय वही ठीक है । जयसिंह अच्छा तो मैं जाता हूँ। जग० जाओ। १६ *पुनपुन नदी के किनारे ही मदान में यह लश्कर पड़ा हुआ है जिस पर नरेद्रसिंह और जगजीतसिंह आज छापा मारने वाले हैं । इस लश्कर को यहाँ पहुंचे अभी आधा घण्टा भर नहीं हुआ है इसलिए रात की पहिली अधेरी छा जाने पर भी लश्करी भादमी निश्वित नहीं है । सभी को खाने-पीने की फिक्र पुनपुन बांकीपुर से चार कोस दक्खिन गयाजी के रास्ते पर की एक + छोटी नदी है।

नरेद्र मोहिनी पही है कोई जमीन खोद कर चूल्हा बना रहा है, कोई इधर-उधर से सूखी मूखी लकडिया बटोर रहा है थोडे आदमी जलावन की फिक्र में गाव की तरफ चले जा रहे हैं, कुछ आदमी बनिये की खोज मे दौड रहे हैं । इस जगह सिफ एक ठीकेदार मल्लाह की मडई पड़ी हुई है, बनिये की कोई दूकान नहीं, हल वाई का नामनिशान, नही खाने पीने की कोई चीज मिल नहीं सक्ती, नदी के पार कुछ दूर पर गांव है उसी गाव मे खाने पीने का सामान मिलगा इसलिए सभो को उस पार जाने की जल्दी पडी है। बरसात का मौसम होने के कारण इस बरसाती नदी मे पानी भी खूब आया हुआ है मगर सिवाय एक छोटी सी नाव के पार उतरने का कोई सहारा नहीं है इसलिए घाट पर एक मेला मा लगा हुआ है और कद कर लोग नाव पर पहिले चढने के लिए उतावले हो रहे हैं । पांच सौ आदमियों की भीड कुछ कम नहीं होती। इतने आदमिया के खाने पीने का सामान गांव के दो एक बनियो से पूरा होना बहुत मुश्किल है इसलिए गाव मे भी हर तरफ हुज्जत हो रही है। जमीदार और किसाना के मकान पर लोग घूम मचा रहे है । "आटा हो भाटा ही दे दो, चावल हो चावल ही दे दो, चना हो चना ही दे दो, जो चाहे दाम लो मगर दो नही दोगे तो हम जबदस्ती लूट लेंगे ।" ऐसी ऐसी बातो को सुन-सुन कर जमीदार ठाकु/ लोग भी बदहवास हो रहे है । जिससे जो बनता है देता है और हाथ जोडी है मगर कोलाहल किसी तरह कम नहीं होता। दो घण्टे रात जाते-जाते तक इन पांच सौ आदमियो मे से अपनी-अप पिक मे चार सौ आदमियो के लगभग पार उतर गये और आसपास के गांव मे फल गये और सिफ एक सौ आदमी उन डोलियो का धेरै रह गये जिनमे बेचारी रम्भा और तारा अपने दुख की घडियां गिन रही थी। इन लोगो के खाने पीने का सामान इनके सगी-साथी ले आवेंगे डोली की हिफाजत कम न होने पावे इसीलिए जरूरी समझ कर ये मो आदमी छोड दिए गए हैं पर इस हुल्लड में यह कुछ भी मालूम नहीं होता कि इन पांच सौ आदमियो का सर्दार कौन है। क्या नरेद्रसिंह और जगजीतसिंह इसी सोच म ये कि इन पांच सौ आदमिया में से अपनी-अपनी फिक्र मे बहुत से इधर उधर टल जाये तो यकायक बचे हुए सिपाहिया पर छापा मारें ? बेशर दे इसी फिक्र म थे । वह देखिए चालीस सवारो मरेद्र-मोहिनी को साथ लिए दोनो भाई दक्खिन तरफ से घोडे फेके चले आ रहे हैं जिन्होंने बात की बात मे डोली के पास पहुच कर तलवारो को खून चटाना शुरू कर दिया। बेसरोसामान निश्चित बठे हुए सो आदमी ऐसी हालत मे भला क्या कर सकते थे? आधी घडी मे आधे से ज्यादे मारे गए और बाकी बचे हुओ को सिवाय भागने के दूसरी बात न सूझी। देखते-देखते मदान साफ हो गया और सिफ वे दोनो डोलियां रह गई जिनके लिए इतना खून-खराबा मचाया गया था। डोलियो मे से दोनो औरतें बाहर निकाल ली गई , एक को नरेन्द्रसिंह ने अपने घोहे पर और दूसरी को जगजीतसिंह ने अपने घोडे पर बैठा लिया तया जिधर से आये थे उपर ही को जाते हुए दिखाई देने लगे। हमे इससे कोई मतलब नहीं कि इस खून खराबे के बाद उन लोगो की क्या दशा हुई और उन चार सौ फैले हुए आदमियो ने बटुर कर क्या किया था किस धुन मे लगे? हमे तो इस समय रम्भा और तारा ही का हाल लिखने में मजा आ रहा है, मगर अफसोस, कुछ दूर निकल जाने पर नरेद्रसिंह सिंह को मालूम हुआ कि इन दो औरतो म रम्भा नहीं है, एक तो तारा है और दूसरी गुलाब ।। मगर हैं । यह गुलाब कहा से आ पहुँची । और रम्भा कहा चली गई। १७ अब हम अपने पाठको को एक घने जगल मे ले चल कर पत्ता का झोपडी मे फटे कपडे पहिरे और तमाम अग मे भस्म लगाये जलती हुई धूनी के पास उदास सर मुकाए बठी हुई एक योगिनी से मुलाकात कराते हैं। चाहे इसकी अवस्था कसी ही खराब क्यो न हो मगर फिर भी इसकी जवानी, खूब- सूरती और अगों की सुडौली देखने वालों के दिल पर कुछ एसा असर करती है कि बिना घण्टो तक देसे जी नहीं मानता, योगिनी कहते क्लेजा कापता है और सूरत देखते ही जी बेचैन होकर इस सोच मे डूब जाता है कि दुनिया से हाथ धो इस अवस्था म पहुँच कर भी यह अपनी आँखो से आंसुओ की धारा क्यो बहा रही है। आसमान गहरे बादलो से घिरा हुआ है, पानी अच्छी तरह बरस रहा है, पछमा हवा के झपेटो ने पेड-पत्तो से बगावत मचा रखी है और उही के कारण यह झोपड़ी भी जड-बुनियाद से उखड कर किसी दूसरी ही जगह जा ८६ नरेद्र-मोहिनी पहने को तयार है । यह मालूम ही नहीं होता कि सुबह है या शाम । झोपडी के अदर वठी सर्दी के मारे आग सेकती हुई उस बेचारी योगिनी के लिए यह समय और भी टु खदायी हो रहा है । वह रह-रह कर ऊँची सासें लेती और कभी कभी फट फ्ट कर रो देती है, मगर किसी तरह भी उसके जी की वेचती नहीं होती। जचाना इसी समय क्सिी मुसाफिर ने झुक कर झोपडी के अदर झाका जिसकी सूरत से साफ मालूम होता था कि इस आधी-पानी से दुखी होकर यह कोई आड पी जगह ढूंढ रहा है । योगिनी कौन है ? चले आओ कोई हज नही, क्यो पानी मे जान दे रहे हो यह तो उस गरीदिन की कुटी है जो दिन रात दूसरों के ही हित का ध्यान खती है। मुसाफिर हामाई आता हूँ, आपकी कृपा से जान बच जायगी नहीं तो म तुफान ने तो बस मार ही डाला है । मुसाफिर झापडी मे आकर बठ गया बल्कि दो चार दम लेकर बदहवास ग तरह भाग के पास लेट गया, मगर वह योगिनी इस तरह उसकी तरफ देखने नगी जम उम पहचानती हो । इस मुसाफिर के कपडो पर कई जगह खून के नाग थ और चेहर पर के दो चार निशान यह भी कहे देते थे कि आज ही कल म इमन रही सलवार की चोट खाई है । घटे भर बाद उसका जी ठिकाने हुआ और वर उठ बठा । योगिनी ने उससे बातचीत शुरू कर दी। यागिनी क्या क्सिी डाकू का मुकाबला हो गया था। ये जरूम कसे लगे। मुमा० जी, एक बहादुर के हाथ से मेरी तरह कई सिपाही जरमी हुए। योगिनी वह कौन बहादुर था मुसा नर सह। नरे द्रसिह का सुन योगिनी ने एक लम्बी सास ली और सिर नीचा कर लिया । योटी देर बाद कुछ सोच कर उसने पूछा, 'तुम लोगो को नरेद्र- मिह स लटन की क्या जररत जा पडी?" मुमाफिर -म लोगा का उनम लड़न की कोई जरूरत न थी, मालिक ने उन्ह गिरफ्तार करन का हुक्म दिया था इसी से उनसे लडना पडा, मगर वह पहादुर यकायक क्यो हाप आने वाला था। ?

- 7 नरेद्र-मोहिनी योगिनी तुम तो केतकी के नौकर हो न? मुसा० (चौंक कर) जी हाँ, लेकिन आप केतकी को नयोकर पहिचानती योगिनी में कई दफे घूमती फिरती ऐशमहल' तक पहुँच चुकी हूँ 1 मुषे खूब याद है कि वहाँ तुम्हे पहरा देते देखा था। मुसा० (गौर से कुछ देर तक योगिनी की सूरत देखकर और पैरा पर गिर कर) वाह वाह क्या खूब, क्या मैं ऐसा अया हूँ कि इतने पर भी अपने मालिक को न पहिचान सकू गा? बेशक आपका नाम मोहनी है। लेकिन इतने दिनो तक आप कहाँ थी ? केतकी न तो होरा उडा दिया था कि रात के समय मोहनी और गुलाब चुपचाप न मालूम कहाँ निकन भागी । मोहिनी केतकी तो मेरी जान को दुश्मन हो चुकी थी और मुये मार डालने में भी उसने कोई कसर न छोडी थी मगर उसी वचारे नरेद्रसिंह की बदौलत मेरी जान बची जिसके हाथ से तुम जख्मी हुए हो । खैर अपना खुलासा हाल में फिर किसी समय कहगी, इस समय तो तुम यह बताओ कि नरेद्रसिंह केतकी के मकान पर कैसे पहुचे और वेतको यो उनसे दुश्मनी क्या पदा हुई। जसी वह कुचाल है उस हिसाब से तो बल्कि उसे खुश होना चाहिए या फिर ऐसी नौबत क्यो आ पहुँची? मोहनी देखो लालसिंह, हमारे यहा तुम सब सिपायिो के जमादार और अफसर थे, हमारे पिना तुम्हें कितना मानते थे इसे तुम भूल न गए होगे। तुम खूब जानते हो कि केतकी कितनी खराब औरत है बाप का नाम उसन मिट्टी मे मिला दिया और मुझको तथा गुलाब को अपने हिसाब मार ही डाला। मुझको अब उसयो कुछ भी मुहब्बत नहीं है बल्कि जहा तक मैं समझती हूँ तुम भी उसे बुरा ही समझते होगे । लालसिंह बेशक मैं उसे बहुत बुरा समझता हू मुझे नरक मे रहना क्यूल है मगर उसके साथ रहना मजूर नही । "ऐशमहल" उसी आलीशान मकान का नाम था जिसम नरेन्द्रसिंह और केतकी की मुलाकात हुई थी या जहाँ रम्भा और तारा उनमे मिली नरेद्र-मोहिनी मोहिनी ठीक है, तब मैं यह भी उम्मीद करती हू रितुमको उसका जो कुछ हाल मालूम है साफ-साफ कह दोगे और मैं जो उस हरामजादी से अपना बदला लिया चाहती हू उसम मेस साय ही नही दोगे बल्कि मेरी मदद करोगे। 7 लालसिंह मैं हर हालत मे आपका साथ दूगा और जो कुछ हाल कतको का मुझे मालूम है कुछ भी न छिपाऊंगा। मोहिनी अच्छा तो फिर कहो कि नर द्रसिंह और केतकी म तकरार होने की नौबत क्यो आ गई? लालसिंह नरेद्रसिंह तुमको खोजते हुए अकस्मात एशमहल तक जा पहुंचे और केतकी को देख उहें धोखा हुआ कि यह मोहनी है शायद तकलीफ के सबब से उसकी सूरत इतनी बदल गई है । उस समय केतकी मदान में टहल रही थी, नरेद्रासह बेघडक उसके पास चले गए और 'मोहनी' कह कर पुकारा। मोहनी केतकी के तो मन की भई होगी। लाल. जी हाँ, बातचीत होने पर उसने भी अपने को मोहनी हो यतलाया और जाल फलाने में कोई बात उठा न रक्खी। मोहनी फिर क्या हुआ इस बात के कुछ ही दिन पहिले धमती पिरती दो कमसिन और खूबसूरत औरतें भी वहा आ पहुची थी जिनको केतकी ने अपनी सखियो में भरती कर लिया था। मोहनी वे कौन थी? लाल. हा सुनिए मैं सब हाल कहता है । वे दोनो औरत नरेद्रसिंह को खूब खिदमत करने लगी। केतकी का और तुम्हारा हाल हम लोगो से मिल- जुल कर उन दोनो ने अच्छी तरह मालूम कर लिया था। मोहनी तब तो उहोन जरूर नरे द्रसिंह को भडकाया होगा? लाल० हो ऐसा ही हुआ । उन दोनो ने जिनका नाम श्यामा और भामा था, केतकी का, आपका और साथ ही अपना हाल ठीक-ठीक नरेद्रसिंह को वह सुनाया जिसे केतकी ने छिप कर अच्छी तरह सुन लिया बलि धीरे-धीरे हम लोगो को भी मालूम हो गया। मोहनी तभी केतकी बिगडी। लाल. ।

मरेन्द्र मोहिनी सास० जी हां, मगर एक बात और भी हुई। मोहनी वह क्या ? लाल. आपको यह तो मालूम ही होगा कि नरेद्रसिंह अपने घर से क्यो निश्ल भागे थे? मोहनी बिल्कुल नही । उनसे बातचीत करने की तो नौबत भी नही आई और हम लोग अलग हो गए। लालसिंह मैं नरेद्रसिंह को पहिले से पहिचानता था और थोडा बहुत उनका हाल भी जानता था क्योंकि तुम्हारे बाप की जिन्दगी म बई दफे उनके घर जान की नौबत पहुंची पी, मगर फेतकी ये खोप से कुछ बोल न सकता था। मोहनी तब तो और भी खुलासा हाल मुझे मालूम होगा। लाल० सुनिये में सब कहता हूँ। नरेद्र बिहार के राजा उदयसिंह के सहके हैं। उनकी शादी पटने ये नामी जमीदार गुलायसिंह की लड़की रम्भा से पपकी हुई, मगर नरेद्रसिंह कहते थे कि मैं जम भर शादी न करू गा । खर, उन्होंने चाहे जो कुछ भी कहा सुना हो पर उनके बाप ने उनकी एक न मुनी और शादी ठीक हो गई। तिला चढ गया और बारात दर्वाजे पर जा पहुँची, उस समय नरेन्द्रसिंह को मौका मिला और वे घोडा भगा किसी तरफ को निकल गए। मोहनी वाह वाह । अच्छा तब ? लाल. आखिर रोते-बलपते सब लोग लौट आये। उसके बाद गुलाब- सिंह ने दूसरी जगह रम्भा की शादी ठीक की, मगर यह बात रम्भा को मजूर न हुई। लोगो ने बहुत-कुछ समझाया-बुझाया यहां तक कहा कि नरेद्रसिंह लगडे हैं, बदसूरत हैं, बदमाश हैं, दूसरी शादी कर लेने में कोई हल नहीं, मगर उसने एक न मानी। बोली, "मधे, लगडे-सूले चाहे जसे भी हों मगर मेरे पति तो हो घुये।" मोहनी शाबाश, खूब दिया ! नास० रम्भा ने जब देखा कि अब उसके साप जबरदस्ती की जायगी तो अपनी सखी तारा को साथ ले घर से निकल भागी। मोहनी वाह रे हौसला | घम का ध्यान इसे कहते हैं ! मगर खैर मागे कहो।

Eo नरेद्र-मोहिनी लाल० लाल० घूमती फिरती वे दोनो केतकी के यहां आ पहुंची, उहाने अपना नाम श्यामा और भामा बनलाया, और मौका पाकर उन्होने नरे द्रसिंह से सब हाल कहा। मोहनी (रग बदल कर) गजब हो गया, तब कोई मामा रसना नादानी है ! सर तब? केतकी ने जब देखा कि उसका पर्दा खुल गया बस विगड बैठी। नरद्रसिंह, रम्भा और तारा को पकड़ने का हुक्म दिया, मगर नरेद्रसिंह यका यक क्या हाथ आन लगे ये ! हम लोगो को जख्मी होना पडा । अत मे घोसा देकर पीदम उन पर वार किया गया तब गिरे। माग्नी (चौर पर) क्या मर गये? लाल' नहीं नही, दो ही रोज मे सम्हल गए, मगर पंद मे डाल दिए गये । इसके कई दिन वाद न मालूम कहाँ के चार पांच सौ आदमी ऐशमहल पर चढ आये और अच्छी तरह उस घर को लूटा, बल्कि जावी समय रम्भा और तारा को भी पकड कर लेते गए। यह हाल देख हम लोगो ने भी केतकी का साथ छोड दिया और वह नरेद्रसिंह को हाप-पर बधा उसी मकान छोट सखिया को साथ ल डरती वापती गया जी की तरफ भाग गई। यह सब हाल सुन थोडी देर तक मोहिनी चुप रही और बडे सोच मे डूब गई। उसका रग दम दम में बदलता रहा, मगर धीरे धीरे गुस्से की निशानी उसके चेहरे पर आने लगी बल्कि थोडी देर म उसका तमाम बदन कोष से वोपन लगा। पानी बरसना बद हो गया था, हवा ठहर गई थी। मोहनी ने लालसिंह से कहा ' मुझे प्यास लगी है, पीने के लिए साफ पानी कही से लाओ।" लालसिंह के पास लोटा होरी मौजूद थी, वह पानी लाने के लिए कुटी के बाहर हो एक तरफ को रवाना हुआ। जब मोहनी अकेली रह गई तब आप ही आप सोचने और धीरे धीरे बुद बुदान लगी-"बेशक रम्भा ने बड़ा काम किया। इतना जानकर भी बहादुर नरद्रसिंह उसे किसी तरह नही छोड़ सकते है अगर छोडें तो उनसे बढकर बमुरोवत कोई भी नही । मगर मैं अब किसका पल्ला पकई ? क्या मैं नरेन्द्र सिंह को जी से मुला दूं? नही नहीं, मुझसे कभी न होगा। तो क्या रम्भा ।

नरेद्र-मोहिनी ६१ . की सोत बन कर रहूँ? कभी नही, मुझसे सौत का मुंह न देखा जाएगा । और इसम भी शक नहीं कि नरेंद्रसिंह रम्भा से जरूर शादी करेंगे । तब फिर मेरी क्या दशा होगी सिवाय मरने के दूसरी बात नहीं सूझती ! मगर वाह मरन क्यो लगी | अभी तो मुझे केतकी से बदला लेना है । तो फिर लगे हाथ रम्भा की भी सफाई क्यो न कर डालू ? बेशव ऐसा ही करूंगी, अब तो वह मेरी सात हा चुकी न मुयसे सौत के साथ रहा जाएगा और न नरेद्र- सिंह का ध्यान भूलेगा तब जरूरी है कि मैं अपनी आदत बदल दूं' हाँ हाँ, मैं एसा ही क्रूगी ! अपना काम साधती समय वही मेरा कोमल क्लेजा दहल न जाय, इसका बदोबस्त क्या ? वस यही कि जो कुछ करना है उसके लिए कसम खा लू । (आग को तरफ हाथ उठा कर) हे अग्निदेवता 'तुम साक्षी रहना, मैं क्सम खाती हूँ कि आज से अपनी आदत बदल दूगी अच्छी से बुरी हो जाऊँगी, नेक' से बद बनूगी औरत से मद बनने की कोशिश करूंगी, सूधा- पन बिल्कुल छोड दूगी, अपने मोम ऐसे दिल को पत्थर बना डालगी, एक चिउँटी को तकलीफ देते जी हिचकता था पर अब खूबसूरत से खूबसूरत प्रामी का सर काटते न हिचकूगी, चाहे वह मद हो या औरत । जितनी मैं ने दी उतनी ही बद बनूगी जो काम न कर सकती थी उसे बेधडक यरूगी, कुन-धर्म- मर्यादा को एक्दम तिलाजली दे दूगी, मगर जाहिर में अपनी हालत न बनी, देखन मे सूधी, नेक और धर्मात्मा ही बनी रहूँगी, पर अलर में रंग और गुस्सेवर नागिन की तरह रहूंगी। चाहे जो हो पर यपना छ भी न उठा रखूगी, हाँ मैं ऐसी तभी तक बनी रहेग सदा बोर रम्भा का नाम निशान इस दुनिया से न उठा समीर मरण पर नरेद्रसिंह की हालत मेरे लायक न रहेगी टीन टपाऊँगी और उस समय नेक और पतिव्रता वन rh ऐसी क्सम खाते-खाते मोहनी attram nारण गुस हो गया, गुस्से से थरयर मापने गगन अपने क सभाला और कुटी के बाहर wिw, गायने नमी। ।। थोड़ी ही देर मे माणिनी पी बरस हाथ धोया और युथ टागान करन लालसिंह, तो तुम मच गhrrrr" ६२ नरेद्र-मोहिनी लाल जी जान से में आपको खिदमत करने को तैयार हूँ । आपको मैंने गोद मे खिलाया है, आपकी नेक्चलनी मेरे दिल मे बैठी हुई है, ऐसा मालिक भला मैं वहाँ पाऊँगा? मोहनी अच्छा तो फिर एक काम करो। इस समय ऐशमहल जरूर सुन सान पडा होगा मैं उसी मे चल कर डेरा डालती हूँ। तुम मुझे पहुँचाकर उन उन सब आदमियो को बटोर लाओ जो हमारे पुराने नौकर हैं और जिहें केतकी ने निकाल दिया है । इसके बाद मैं केतको से समझ लूगी । यह न सम- झना कि मेरे पास दौलत नहीं है इस हालत में भी में एक बड़े खजाने की मालिक हूँ जिसका हाल किसी को भी मालूम नही है । लाल० आप इस बात का तरह द न करें मैं, अपने पास से खाकर वर्षों तक आपको खिदमत कर सकता हूँ, बस अब आप यहां से चलें। मोहनी चलो में तैयार हूँ। १८ कई दिनो के बाद आज ऐशमहल को हम फिर रौनक पर देखते हैं । पहिले की तरह कई सिपाही पहरे पर मुस्तद हैं, बाग भी रोनक पर है और दस-बीस लोडियां भी इधर-उधर घूम रही हैं । मकान के अदर कमरे मे मसनद के ऊपर मोहनी बैठी कुछ सोच रही है। पोई दूसरी औरत उसके पास नहीं है। शाम हो गई, मौंडियों ने रोशनी का इतजाम किया और हुक्म पा कर फिर इधर-उधर फल गई । मगर न जाने क्या-क्या सोचती हुई मोहनी अकेली ही बैठी रह गई। यकायक ही वह उठी और यह कहती हुई नीचे उतर आई कि "माज जरूर उस खजाने को देखूगी जो मेरी मां खास मेरे वास्ते छोड गई है।" नीचे उतर कर मोहनी ने कुल दर्वाजे अन्दर से बद कर लिए जिसमे कोई माफर यह न देख ले कि वह क्या कर रही है । इसके बाद वह एक छोटे कमरे मे पहुँची जो अच्छी तरह सजा हुआ था और जहां रोशनी खूब हो रही थी। उत्तर तरफ दीवार में पांच अलमारियां बनी हुई थी, उसने विचली अलमारी खोली जिसमे दस-पांच तलवार-खजर और कटार आदि रखे हुए थे। एक बटार उठा लिया और दक्खिन पूरब के कोने मे पहुची। पश उठा कर कटार नरेन्द्र-मोहिनी से जमीन खोदना शुरू किया। जब लगभग दो हाथ के जमीन खुद चुकी, एष छोटी-सी डिबिया हाय मे आई जिसे देखते ही वह खुशी के मारे उछल पड़ी और बोली, "शुक्र है नि मेरी दौलत अभी तक ज्यों को त्यो रसी है, किसी ने भी हाप नहीं लगाया ।" मोहनी ने डिब्बिया ले ली और गढढे में मिटटी भर जमीन बराबर कर ऊपर स फश जैसा था उसी तरह विद्या दिया । इस काम से छुटटी पा उसने चारों तरफ के दवजि सोल दिए और कार के कमरे में चली माई जहाँ वह पहिले बठी हुई थी। गद्दी पर बैठ कर शमादान के सामने डिग्री खोली जिसम सोने की एक अंगुल को एक विचित्र चाभी रखी हुई थी। मोहनी ने चाभी निवाल पर घूम ली और धीरे से बोली, 'आज आधी रात को मैं अपनी जमा-पूजी अच्छी तरह सहेज लूंगी।" थोडी देर बाद मोह्नी ने भोजन किया और निश्चित होकर सो रही मगर लोडियो को हुक्म दे दिया कि आज इस मकान मे अकेली ही सोऊँगी, मकान के बाहर बहुत-सी फोहिया और दालान है, तुम लोग उसी में जाकर आराम करो। आधी रात का सनाटा होने पर मोहनी उठी और नीचे उतर कर फिर उसी कमरे में पहुची जिसमे से जमीन खोद कर हिल्बी निकाली थी। चारो तरफ के दर्वाजे बद करने बाद उसने पुन वही अलमारी खोली जिसमे से जमीन खोदने के लिए क्टार निकाला था। यह अलमारी खूब लम्बी-चौडी थी यहाँ तक कि इसके अदर दो आदमी बखूबी खडे हो सकते थे। मोहनी ने धीरे धीरे उस आलमारी को खाली किया जिसमें असमान रखने के लिए तीन दर्जे बने हुए थे। नीचे वाले दर्जे की जमीन भी लकड़ी की और ऐसी साफ बनी हुई थी कि यह गुमान भी नहीं हो सकता था कि यह नीचे से पोली होगी। इस लकही पर पीतल के बहुत मे फूल-बूटे पच्चीकारी के काम के बने हुए थे जिनम चारों तरफ धार कमल के फूल बने हुए थे। इनमे से एक फूल को मोहनी ने अगूठे से दबाया, साथ ही एक पीतल का टुकडा ऊँचा हो गया और उसके नीचे ताली लगाने की जगह दिखाई देने लगी। उसने वही ताली लगाकर घुमाया। वह लकही फा तख्ता कुछ ऊपर उठ आया जिसे मोहनी ने निकाल कर अलग कर दिया। अब नीचे एक तह- खाना नजर आया जिसमे उतरने के लिए सीढियां बनी हुई थी। हाथ में मालटेन लिए हुए मोनी आलमारी मे घुस गई और उसी जीने की राह नीचे नरेद्र-मोहिनी उतर गई। नीचे बीस हाप लम्बी और इतनी ही चोडी एक कोठडी नजर आई जिस के अदर वह पहुची। यहाँ बोचावीच म चादी का एक पलग या जिस पर दुशाला मोढे कोई आदमी सोया हुआ मालूम पडा। चारो तरफ बडे-बडे चांदी के देग सरपोश से ढके हुए नजर आ रह थे । मोहनी ने पहिले उन बडे बडे देगो को एक एक परके सरपोश उठा कर देखा । अफ्यिो से भरा पाया । इसके बाद पलग के पास आई और उस सोये हुए आदमी को देखने के लिए उसके बदन पर से दुशाला हटाया । यह एक लाश थी जिसके बदन पर चमडे और गोश्त का नाम निशान न था, सिफ हडडी वा ढाचा सिर से पैर तक दुरस्त रखा हुआ था। इसे देख मोहिनी घण्टो तक सही रोती रही। आखिर उसी तरह दुशाले उसे ढाप दिया और एक देग मे से थोड़ी-सी अशफियां ले उस तहखाने मे से बाहर निकल आई। आलमारी वगरह को जसा पहले था उसी तरह दुरुस्त कर दिया और कपर चली गई। १६ आज हाजीपुर में खूब धूमधाम मची हुई है। जगह जगह बाजे बज रहे हैं। हर एक आदमी खुश और हसता हुआ दिखाई दे रहा है। बाजारो में दुकानदारो न दुकानें सज-सजा कर दुरुस्त कर रखी हैं। राजक्मचारी धारो तरफ दौडते हुए दिखाई पड़ रहे हैं । इही मे अगल-बगल निगाह दौडाते सुख पोशाक पहिरे बगल मे झोला लटकाये और हाथ मे भग घोटने का डण्डा लिए हमारे रगीले जवान बहादुरसिंह भी धीरे धीरे मस्तानी चाल से चलते दिखाई पड़ रहे है। हाजीपुर की धूम धाम दख ये ताज्जुब कर रहे हैं और इनकी अनोखी चाल और सूरत देख बाजारी लोग भी मुस्करा रहे हैं। बहादुरसिंह दूवानो की सर करते हुए एक दफे पूरब से पश्चिम जाते हैं और फिर पश्चिम से पूरब लोटते हैं। शामत की मार कोई भला आदमी इनसे पूछ बठा कि-'क्यो साहब, आप किसे ढूढ रहे हैं ।" बस इतना पूछना था कि आप मुझला उठे और बोले, "वाह इसी अकिल पर दुकानदारी करते हो और कहते हो कि हम नरेन्द्र मोहिनी आदमी है। मेरी सूरत से भी नही पहिचानते कि मैं घूम घूम कर बाजार देख रहा हू पा किसी को दूढ रहा हू । विजया देवी ने दोनो आँखें दे रक्खी हैं, बस शेषो मे ऐंठे जा रहे हैं ! मेरी तरह से एक आँख जर्राह ने पवाई होती वो दुनिया की कदर जानते और समझते कि इस बेचारे के पास एक ही आंख की तो पूजी ठहरी, एक दफे इधर से उधर जाता है तो एक ही तरफ की दुकाने दीस पडती हैं, दूसरी तरफ की दुकानो पर नजर डालने के लिए लाचार बेचारे को फिर लौटना पडता है । वाह वाह वाह ! क्या इस शहर मे ऐसे ऐसे ही बुद्धिमान यसते हैं । मगर क्यो न बसें । इतनी दूर घूमे मगर अभी तक भग की दूकान एक भी नजर न आई, हमारे मुल्क अब तब एक हजार एक सौ एक दूकानें भग की दिखाई दे गई होती ।" बहादुरसिंह की बातें ऐसी न थीं कि कोई रज होता। इधर-उधर के कई आदमी इनकी बात सुन हस पडे और एक सुशदिल बजाज खुश हो अपनी दूकान से उतर इनके पास आकर बोला "आइए आइये, आप मेरी दूकान पर बठिये, बहे भागो से आप ऐसे सत्पुरुपो के दशन होते हैं ।।" बहादुर बस रहने दीजिए, मैं ऐसे आदमी के पास नहीं बठता जो भग न पीता हो। बजाज यह आप भला कैसे जानते हैं कि मैं भग नहीं पीता? अजी मैं तो इतनी भग पीता हूं कि आप भी न पीते होंगे । दुनिया मे भग से बढकर भी भला कोई पीज है? बस इतना सुनते ही बहादुरसिंह खुश हो गये और उसकी दूकान पर जा डटे। बजाज ले अब हुक्म कीजिए तो मैं भग बनाऊँ ? बहादुर० नहीं नही, इस समय तो मैं सिद्धी पी चुका हूँ, अब सध्या को दोहरया छनेगी। (कमर से एक रुपया निकाल और बजाज की तरफ फेंक कर) बस एक रुपये का गुलाब जामुन मगवाइए तो मैं खाज , बडे जोर की भूख लगी है। बजाज अजी इस रुपये को रहने दीजिए, मैं आपके लिए अभी खाने को भगवाता हूँ। बेहादुर (दोनो हाथ हिलाकर) नहीं-नहीं, ऐसा कीजिएगा तो मैं भाग ६६ नरेद्र मोहिनी जाऊँगा, आपको भग ही की भारी कसम है जो इस बारे में फिर बोलिए, बस इसी रुपये का मगवाइये। बजाज अच्छा अच्छा, आप इतनी बडी कसम न दीजिए, मैं इसी रुपये का मगाता हू बल्कि खुद जा कर लाता हैं, हां यह तो कहिए कि एक रुपये का मॅगा कर क्या कीजियेगा? बहादुर० (चमक पर) अजी तो क्या एक रुपये का मन दो मन मिल जाएगा हम और तुम दो आरमी खान वाले भी तो है। बजाज नही मैं न खाऊँगा, अभी रसोई जैव चुका हूँ एक रुपये का पांच सेर गुलाबजामुन मिलेगा। बहादुर० (ताज्जुब से) बस ! कुल पांच सेर । यहां बहा महगा सौदा मिलता है ।। खैर आप न खाइये मैं ही कुछ जलपान करवे रह जाऊँगा, पात्र सेर से होता ही क्या है ? बहादुरसिंह की यह बात सुनकर बजाज हैरान हो गया कि यह बिते भर का आदमी कहता है कि पांच सेर से होता क्या है। खर लाओ तो सही देखें क्यो- पर खाता है । बजाज जरा खुशदिल और दिल्लगीबाज था। अपने नौकर को हलवाई की दुकान पर भेजा । वह दौडा हुआ गया और पांच सेर गुलाबजामुन एक छितनी मे लाकर बहादुरसिंह के सामने रखता हुआ बोला "पानी एक घडा लाऊ या दो घडा" नौकर की इस बात को सुनकर बजाज भी हस पड़ा। बहादुरसिंह ने कहा, "अजी नही, बस आप पाव जल पीने के लिए और सेर भर हाथ धोने के लिए। जल ही पीकर पेट भर लेंगे तो खायेंगे क्या?" अब बहादुरसिंह सामने पत्ता रख गुलाबजामुन छीलने लगे। पांच सेर गुलाबजामुन को छीलछाल के कुल एक छटाक भर भीतर का दा निकाला और उसे खा पानी पी नौकर को हाय धुलाने का इशारा किया। बस खा चुके । और इतना मुफ्त में बर्वाद किया । बहा० और नहीं तो क्या तुम चाहते हो कि छिलके समेत खा जाता और पेट में दद होता तो परदेश में वैद्य ढुढता फिरता । वाह अच्छी सलाह देने लगे। (नौकर की तरफ देखकर) इसे लेजा कर क्सिी बल के बाग बजाज जीवाहा मरेद्र-मोहिनी 1 बजाज क्या आप रोज इसी तरह खाते हैं बहादुर नही तो क्या साल में एक ही दिन खाते हैं बजाज ऐसे तो आपके खाने मे बहुत खच पडता होगा। बहादुर० अजी हजारो रुपये महीने का भोजन करता हूँ, इसके इलावे भग बूटी का खच कहाँ तक बताऊँ । सच पूछिये तो मैं राजे महाराजो की तह- थील खा जाता हूँ । मेरा पालना कुछ हसी ठटठा योडी ही है। अब देखिए यहा आया ही हूँ आपसे जान पहिचान हो ही चुकी है, सब कुछ मालूम हो हो जाएगा। बजाज अच्छा यह तो बताइए आपका नाम क्या है ? बहा० (छाती ची करके) बहादुरसिंह बमाज और रहते पहां हैं ? बहा० लका मे। बजाज (ताज्जुब से) लका मे ! बहा० हाँ जी हां लका मे । बजाज कौन लका? बहा० बडी लका। (हस कर) वडी लका कौन है और छोटी कौन है ? बहा. छोटी लका वह जहां शिवभ्यत रहते हो और बडी लका वह शिव और उनके भक्त हो- अब समझे या कुछ और साफ- साफ समझाऊँ? बजाज जी हो, जरा खुलासा समझाइये । बहा० छोटी लवा वह जो सोने को थी और जहा रावण रहता था। बडी लका 'काशी' जो रत्न जडित है और जहाँ श्रीविश्वनाथ माई नपूर्ण और उनके भक्त लोग रहते है । अगर अब भी न समझो तो हम जाते हैं, ऐसे नासमझ के पास रहना मुनासिब नही। बजाज : (हस कर) नही-नही, आप खफा न होइये, मैं सब कुछ समझ गया, आपने पहले ही क्यो न कह दिया कि मैं काशीजी रहता हूँ साफ-साफ तो यात थी। बहा० क्या साफ साफ कहना है, अजी कवि लोग बिना घुमाय फिराये बजाज . नरेद्र मोहिनी कभी बात कहते हैं 7 बजाज क्या आप कवि भी हैं ? बहा० जी हा, बल्कि कपि भी हैं। इस 'कपि' के कहने पर खुशदिल बजाज तथा और भी कई आदमी जो बहादुरसिंह की सूरत देखने और बात सुनने के लिए आ गये थे हस पडे । बजाम ने फिर कुछ पूछना चाहा, मगर बहादुरसिंह जोर से बोले, "बस बस-बस, अब मुंह मत खोलिये ! ऐसा न होगा कि जम भर तुम ही सवाल करते जाओ और मैं कुछ भी न पूछू।" बजाज अच्छा-अच्छा आपको जो कुछ पूछना हो आप भी पूछ लीजिये। वहा. यह बताइये कि आज इस शहर मे धूमधाम कैसी है, लोग दुकाना और मकाना की सजावट मे क्यो लगे हैं ? मैं तो कई दफे पहिले आ चुका हूँ मगर ऐसा तो कभी न देखा। बजाज मजी हमारे कुअर साहब की शादी न होने वाली है। बहा० हो । कब कब? बजाज यही आठ दस दिन मे। बहा० बारात कहाँ जायगी? बजाज बस इसी शहर मे घूमे फिरेगी। बहा० सो क्या? राजो के लडको की शादी तो किसी राजे ही की लडकी या बड़े तोद वाले जमीदार की लडकी से होनी चाहिए, फिर शहर ही में किसकी लडकी से शादी होगी? बजाज जी वह एक जमीदार की ही लड़की है मगर लूट कर लाई गई है इसलिए इसी पाहर मे वल्लि महल ही में उसे रक्सा गया है और वहा ही शादी भी होगी। यहा. यह पिस कम्बस्त की लडकी सूटी गई है ! क्या यह देने को राजी नहीं होता था? बजाज अजी राजा महाराजो रे घर की बातचीत है, इस तरह माम सर पर नहीं नहीं जाती, अल्लि इस बारे म ज्यादे रहना-मुनना भी मुनासिब बहा. जी पहना-गुनना तो जरूर है अगर आम सा सपास हो नरेन्द्र मोहिनी RE तो चलिए कोठडी मे घुस चलें। बजाज (हसकर) खूब कही। बहा० अच्छा उस लडकी के बाप का तो नाम बताइयेगा या वह भी नही? बजाज इसमे क्या हज है सुनिए, वह पटने के जमीदार गुलाबसिंह की लडकी है और उसका नाम रम्भा है । क्या तुम उसे नहीं जानते ? अरे वही जिसके लिए बिहार के राजा उदयसिंह के पुत्र नरेद्रसिंह से फसाद मच चुका बहा. वाह वाह | उन लोगो को मैं खूब जानता हूँ और लडकी की तो नस-नस से वाफिक हू । (गदन हिला कर) लेकिन बुरा हुमा, अगर यह नरेद्र सिंह के घर जाती तो अच्छा होता, उस शैतान की चाहे जो दुदशा होती हम कुछ रज्जन था, मगर यहा तुम्हारे राजा के लड़के से ब्याही गई तो ठीक न होगा। हाय । अव तो गई बेचारे बच्चे की जान । बुरा हुआ, बहुत ही बुरा हुआ रम्भा का हाल ता बहादुरसिंह से छिपा ही नहीं था, वह नरेद्रसिंह के लिए घर छोडकर निकल गई थी सो भी यह बखूबी जानते थे । आज वही बेचारी रम्भा इस मुसीबत मे आ पड़ी इसका बहादुरसिंह को बहुत ही रञ्ज हुआ मगर वे अपनी चालाकी से कब चूकने वाले थे | कोई न कोई तर्कीव सोच ही तो ली। बहादुरसिंह ने जब विचित्र मुद्रा से गदन हिला कर कहा कि 'हाय, अब तो गई वेचारे बच्चे की जान बुरा हुआ, बहुत ही बुरा हुआ बेचारे बजाज और वहाँ बठे हुए आदमी सभी घबडा गये कि आखिर यह कह क्या रहा है । हमारे राजा के लडके की जान भला क्यो जाने लगी ? आखिर बजाज से न रहा गया उसने बहादुरसिंह से पूछा, "सो क्या, इसम जान जाने की कौन-सी बात है बहा० अजी यह राजो के घर की यातचीत है, इस तरह दस आदमी के बीच मे नही कही जाती । लो अब मैं जाता हू, अब इस शहर में रहना और सिसक कर किसी को मरते देखना मुझे मजूर नही । (उठने की तैयारी करने लगे। 11' तो वह १०० नरेन्द्र-मोहिनी बजाज (हाय पकडकर) अजी बंठो तो, पत्रडा क्यो गये, मुझे अभी तुमसे बहुत काम है। बहा० राम-राम, काम से तो मैं कोसो भागता है। बजाज अच्छा ठहरिये तो। बहा० अच्छा दो बात मानने का वादा कीजिये तो जरा-सा क्या दो तीन दिन तक ठहर जायें। बजाज फहिए कहिए, मुझे पहिले हो से मजूर है, ऐसा कौन होगा जो आप ऐसे खुशदिल आदमी से अलग होना चाहेगा? बहा० अच्छा तो फिर वे बातें कह डालू ? बजाज हाँ हाँ पहिये और बहुत जल्द कहिये । बहा० एक तो यह कि मैं तुम्हार यहां दो-तीन दिन तक .॥ लुगा और भग घोट घोट कर पीऊंगा, डरो मत, खाने-पीने में मैं अपने पास से खर्च वरू गा तुम्हारे रुपये बर्बाद न होने दूगा। बजाज अजी, अब जल्दी पहो भी, कि लगे मुर्गी की टांग तोडने ! मैं इतना कगाल नही हूँ कि दो-चार महीने तुम्हारी दावत न कर सकू ! खाओ न कितना गुलाब जामुन छील-छील कर खाओगे, दोरुखी हार मानो तो सही। बहा० अच्छा खर तो मेरी दूसरी बात भी तो सुन लो। बजाज उसे भी कह डालो। बहा० वह यह है कि जो बात तुम मुझसे पूछ रहे हो उसके जानने की इस समय जिद्द न परो, निराले मे रात को या कल सब कुछ मुझसे सुन लेना अनी मैं 7 लोक्य का हाल बता सकता है यह तो मामला ही क्या है । मैं बडे काम वा आदमी हूँ, मरने के बाद भी मेरी एक-एक हडडी दो लास की नीलाम होगी। बजाज क्या बात है आपकी । वहा० नही नहीं, क्या बात किसी दूसरे की होगी मेरी बड़ी बात है। बजाज अच्छा साहब मुझे यह भी मन्जूर है। थोडी देर तक और मसखरेपन की बातचीत होती रही बहादुरसिंह की बाता से सभी हसते लोट-पोट हो जाते थे। दोपहर को बजाज ने दुवान बन्द नरेन्द्र मोहिनी की और बहादुरसिंह को साथ ले घर गया। बहादुरसिंह ने उसके घर डेरा डाला और थोडी देर आराम करने के बाद घूमने फिरने के लिए बाहर निकले लेक्नि बाजार का रास्ता छोड किले की तरफ रवाना हो गए। किले को एक खिडकी ठीक गण्डक नदी के किनारे ही पडती थी और उस राह से बहुत से आदमी गण्डक किनारे आते-आते थे, कई सरकारी लौंडियाँ भी उसी राह से जल भरने के लिए जा रही थी। बहादुरसिंह चाहे कितना ही बडा मसखरा और बेवकूफ क्या न समझा जाय मगर असल मे वह बडा ही चालाक और धूत था । वह बखूबी जानता था कि रम्भा जीत जी सिवाय नरे द्रसिंह के किसी दूसर से शादी न करेगी। उही के लिए ता वह जान पर खेल कर घर के बाहर निकल गई थी पर न मालूम किस तरह इन दुष्टो वे हाथ लग गई । अब वह यह साच रहा था कि कोई तर्कीब एसो करनी चाहिए जिसमे यहा से उसकी रिहाई हो जाय । इसी धुन म डूबा हुआ वह एक किनारे बैठ गया और किले के अन्दर से आते जाते औरत-मर्दो का तमाशा देखने लगा। जसे-जसे दिन बीतता जाता था लोगा की आमदरफ्त बम होती जाती थी यहाँ तक कि शाम होते-होते सिफ दो लोडियो को साथ लिए हुए एक बूढी औरत घाट पर रह गई और चारो तरफ सनाटा हो गया। इस बूढ़ी औरत की उम्र साठ साल स कम न होगी तो भी यह बदन मे बहुत से सोने के गहन पहिने हुए थी और इसके साथ वाली दोना लौंडियों का बदन भी सोन के गहना से खाली न पा । बहादुरसिंह न समझ लिया कि यह बुढिया वेश रानी साहेबा की खास लोडी बल्कि लोडियो की सरदार होगी। वह बहुत देर तक छिप छिपे इन तीनों को देखता रहा । जब बुढिया नहा चुकी और साडी बदल दोनो औरतो को साथ ले क्लेि म जाने के लिए सीढियां चढने लगी तब बहादुरसिंह दौडवर उसके पास पहुँचा और पर पर गिरकर रोने लगा,'हाय मां, तू वहां चली गई थी। मैंने तेरा क्या बिगाडा था जो मुझे अकेला छोड कर चली गई । अब तेरी-सी माँ मैं वहाँ से लाऊँ । तू दिन मे चार चार पांच-पांच दफे मुझे प्यार करके और जिद्द करके खिलाया करती थी, अब कई दो दफे भी खिलाने वाला न रहा ! खुद अपने हाथ से चूल्हा फूकता और खाने को पकाता है। इसन सन्देह नहीं कि तू लाखो रुपये मेरे लिए घर मे छोड गई, मगर अब १०२ नरेद्र-मोहिनी - वह किस काम का है । तेरी पतोहू भी मर गई, अब वह सब धन कौन भोगेगा! मैं जानता हूँ कि तू मेरे बाप से लड और लाखो रुपये और जडाक गहनो पर लात मार कर चुपचाप चली गई थी, मगर अब तो बाप राम भी चल बसे, घर में सिवाय मेरे और दूसरा कोई न रहा । मा, मुझसे इतना धन-दौलत सभाला नहीं जाता, जिमीदारी का बन्दोबस्त विसी तरह नहीं होता, मां, अब मैं न मानू गा, जरूर तुझे घर ले चलू गा मां, मैंने तो तेरा कुछ नही बिगाहा था, फिर तू मुझसे क्यो खफा हो गई हाय मां, हाय मां 11 अब जीते जी मैं तुझे कभी ग छोडगा। तेने जिद्द करके मेरे लिए जो सिकरी बनवा दी पी ले में उतार कर तेरे आगे फेंक देता है, अब इसे कभी न पहिरू गा । (गले से सिकरी निकाल कर और उसके आगे फेंककर) तू अगर न चलेगो तो मैं सब धन दौलत फीरो को बाँट साधु हो जगल मे चला जाऊंगा। मैं तेरी खोज मे वर्षों एक शहर से दूसरे शहर मारा फिराहूंगा, तू कही न मिली । आज राम ने तुझसे मिलाया, अब मैं तुझे कभी न छोड़ गा चाहे जो हो, और बिना घर ले गये कभी न मानूगा । मैंने सुना था कि मेरे दो तीन भाई-बहिन भी ये जि हैं तू अपने साथ ले गई थी, हाय ! अब वे कहां हैं ? मुझे जल्द दिखा, जो कुछ दौलत घर में है मैं उनके हवाले करूगा। वे ही गांव गिराव का भी बदोबल्त किया करेंगे, मुझसे अब किसी बात से सरोकार नही। मुझे धन- दौलत को परवाह नही, में तो दिन रात भग मे मस्त रहना चाहता हूँ, बस पाव भर भग और आधा सेर चीनी पाहिए और कुछ नही। मां, अब तुझे घर चलना ही होगा, मैं किसी तरह न मानूगा !!" इसी तरह की बहुत-सी बातें कहता हुआ बहादुरसिंह देर तक बुढ़िया का पैर पकडकर रोता और गिडगिहाता रहा । पहिले तो बुढिया घबडाई कि यह पहाँ की बला पीछे पड़ी मगर जब येशुमार धन-दौलत और गांव गिरांव का नाम सुना तो मुह म पानी भर आया। सोचने लगी कि यहां जितना माल दस जम में पैदा करूंगी उतना एक्दम बात की बात मे यह पगला देने को तैयार है । मालूम होता है कि इसकी मां ठीक मेरी सूरत शक्ल की थी। यह कहता है मेरी बहिन और मेरे भाई को भी तू लेती गई थी चलो यह भी अच्छा ही है, मेरी एक लड की और एक लडका तो हई हैं वही इसके भाई-बहिन बनें। पिर इतनी दौलत छोड बैठना नादानी नहीं तो क्या होगा? मेरी समझ में तो 7 नरेद्र-मोहिनी यही आता है कि इसके साथ घली चलू , मगर इस बारे मे पहिले अपने लड़के से सलाह लेना मुनासिव है। इसी तरह की बातें बुढिया बड़ी देर तक सोचती रही । दोनो अपने-अपने मतलब की धुन मे पे । आखिर बुडिया ने कहा, 'खैर अब तू कहता है तो मैं तेरे घर घलू गी मगर पहिले तो तेरे भाई से सलाह कर लू।" बहा. क्या मेरा भाई भी इसी शहर मे है ? वह क्या काम करता बुढिया महाराज के यहाँ सवारों मे नौकर है। बहा० और बहिन? बुढिया तेरी बहिन तो अपने ससुराल मे है। बहा० हाय तो मैं उसकी सूरत आज न देख सकगा। मां, हजार-दो हजार रुपया उसके पास भेज दे और घर चल के तुरत अपने यहा बुलावा भेज, भाई को भी साथ लेती चल, मैं उसकी अपने राजा से मुलाकात कराऊगा। बुढिया तेरा राजा कौन है ? बहा० उदयसिंह । बुढिया कौन उदयसिंह ? बिहार का राजा ? बहा० हाँ वही। बिहार के राजा उदयसिंह का नाम सुन बुढिया थोडी देर तक कुछ सोच मे पड गई मगर फिर सम्हल गई और बहादुरसिंह से बोली, "अच्छा अब देर हाती है, इस समय तो मैं जाती है लेकिन कल इसी समय इसी जगह तू मुझसे मेलियो, फिर जैसी राय होगी करू गी।" बहादुर राय वाय में कुछ नही जानता, तुझे चलना ही होगा। धुढ़िया हाँ हाँ मैं चलूगी । बहा० अच्छा यह सिकरी तू लेती जा मेरे भाई को दे दीजियो। बुढिया (सिकरी उठाकर) खैर जिसमे तू खुश हो मैं वही करू गी। दो चार बातें और करने बुढ़िया वहाँ से चली गई और बहादुरसिंह भी अपना काम हो जाने की खुशी मे मस्त झूमते हुए अपने नये दोस्त बजाज के यहां पहुंचे जिसने अपने घर मे रखकर इनकी वही खातिरदारी की। बहा! सिंह ने भी अपने मसखरेपन से बजाज को बहुत ही खुश दिया बल्कि अपना दोस्त बना लिया। .

१०४ रेद्र-मोहिनी दूसरे दिन बुढिया से मिलने के लिए वहादुरसिंह फिर उसी जगह पहुंचे। आज बुढिया के साथ उसका लडका भी या जो बहादुरसिंह से खुशी खुशो सगे भाई की तरह गले मिला और देर तक बातचीत करता रहा। बहादुर सिंह को निश्चय हो गया कि अब मेरा काम अवश्य हो जाएगा। आसिर धीरे धीरे बहादुर ने अपने मतलब वाली बात छेडी। बहा० अच्छा मां बता अब घर कब चलेगी? बुढिया जब कहो तब चलू । वहा० (अपने बनौए भाई अर्थात बुढिया के लडके की तरफ देख कर) भाईजान मैं तुम्हे चिट्ठी देता हूँ। उसे तुम बिहार के राजा उदयसिंह के पास ले जाओ। हमका वह अपने भाई की तरह मानते हैं । हमारा बहुत-सा रुपया उनके यहाँ जमा है हमारे घर की ताली भी उही के यहाँ है वह तुमको हमारे घर को ताली और दस हजार रुपया नकद देंगे और हमारे नौकरों को बुलाकर तुम्हे सहज देंग और वह देंगे कि वह बहादुरसिंह जवहरी का भाई है। फिर वे लोग तुम्हारा हुक्म मानेंगे । तुम पर का इतजाम करना और आज के ठीक पद्रह दिन घर में से चादी वाली पालकी और सोलह कहारो को लेकर शहर के पांच कोस इधर चले आना जिसमे हम माताजी को इज्जत के साथ ले जाय । (कमर से एक चिटठी और दस अशी निकाल कर) लो यह चिटठी राजा साहब को देना और यह अफियां रास्ते में खच करना । एक घोडा किराया कर लो और हौका हांकी चल जाओ। बुढिया के लडके रामदास ने यह कह कर कि 'क्ल सरकार से छुटटी ले कर मैं जरूर चला जाऊँगा बहादुरसिंह के हाथ से अशर्फी और चिटठी ले ली। इसके बाद अपने अपने ठिकान चले जान के लिए तीनो बादमी खडे हो गए। बहादुरसिंह ने अपनी माताजी की तरफ देखकर पूछा, 'मां यह तो बताओ यहाँ लोगो ने तुम्हारा नाम क्या रखा है। बुढिया चमेला दाई। बहा. राम राम, अच्छा भला नाम बदल कर षया बुरा नाम रख दिया । बस चले तो सभी की नाक काट डालू ! अच्छा इस वक्त ता जाता है लेकिन रस जरूर पहा हो मिलना किसी से डरना मत । पमेला० लो मैं डरने क्यो लगी । अपने लडके से मिलती है इसम भी 2.

मरेद्र मोहिनी १०५ पिसी का इजारा है ।। बहा० (पर टूबर) अच्छा तो अब जाता हूँ। २० हाजीपुर ने राजा दौलतमिह का लडवा प्रतापसिंह बहा ही उजडड था। उसे पढ़ने लिखने का शोक बिल्कुल न था यहा तक कि सिवाय दस्तखत करने के अपने हाथ से एक चिटठी भी नही लिख सकता था। दस-बीस गपोडी और बात-बात मे तारीफ करन वाले साथियो के साथ हाहा-ठीठी मे दिन बिताया करता था हो कविता का कुछ शौक इसे जरूर था। इन दिनो तो यह शादी होने की खुशी मे फूला हुआ है । रमा जब से इसके घर म आई है छिप कर दो दफे उसकी सूरत देख चुका है और अपने साथियो के बीच म बठकर उसकी खूबसूरती की तारीफ किया करता है । इसे भग और गांजे का बहुत शौक है, दिन मे तीन-तीन दर्फ बूटी छना करती है और दिन रात नशे मे चूर रहता है। बहादुरसिंह ने इसके चाल चलन का पता अच्छी तरह लगा लिया था। इसलिये सध्या को बूटी पीने का समय, विचार वह उसी नजरबाग के दरवाजे पर पहुंचा जिसमे नित्य प्रतापसिंह बूटी पी पहर रात गए तक गप्प उडाया करता पा । पहरेवाले से कहा, "कुमार को बहुत जल्द खबर करो कि एक 'विजया के सिद्धजी' तुमसे मिलने आये हैं !" पहरेवाले सिपाहियो को बहादुरसिंह की सूरत शस्त पर बडी ही हसी आई। यह समझ कर मि हमारे कुभर साहब ऐसी सूरत देख बहुत ही खुश होंगे- एक सिपाही दौडा हुआ बाग के अदर गया और कुअर साहब को सलाम कर बोला 'सरवार आज एक विचित्र मारमी सरकार से मिलने के लिये आया है जिसकी सूरत देखने से मारे हसी के दम निक्ला जाता है । उसने अपना नाम 'विजया के सिद्धजी बतलाया है। हुक्म हो तो आने दिया जाय।" कुमार० हाँ हाँ उहें बहुत जल्द हमारे सामने लाओ। सिपाही हुक्म पाते ही लपका हुआ बाहर गया और बहुत जल्द बहादुरसिंह को लिए हुए कुअर साहब के सामने हाजिर हुआ। पाठक महाशय यह न समझे कि बहादुरसिंह को जिस सूरत मे पहिले देख १०४ नरेद्र मोहिनी दूसरे दिन बुढिया से मिलने के लिए बहादुरसिंह फिर उसी जगह पहुंचे। आज बुढिया के साथ उसका लडका भी था जो बहादुरसिंह से खुशी खुशी सगे भाई की तरह गले मिला और देर तक बातचीत करता रहा। बहादुरसिंह को निश्चय हो गया कि अब मेरा काम अवश्य हो जाएगा। आखिर धीरे धीरे बहादुर ने अपने मतलब वाली बात छेडी। बहा० अच्छा मां बता अब घर कब चलेगी? बुढिया जब कहो तब चलू । वहा० (अपने बनौए भाई अर्यात बुढिया के लड़के की तरफ देख कर) भाईजान मैं तुम्हें चिट्ठी देता हूँ । उसे तुम बिहार के राजा उदयसिंह के पास ले जाओ। हमका वह अपने भाई की तरह मानते हैं । हमारा बहुत-सा रुपया उनके यहां जमा है हमारे पर की ताली भी उही के यहाँ है वह तुमको हमारे घर की ताली और दस हजार रुपया नकद देंगे और हमारे नौकरों को बुलाकर तुम्ह सहज देंग और वह देंगे कि वह बहादुरसिंह जवहरी का भाई है । फिर वे लोग तुम्हारा हुक्म मानेंगे। तुम घर का इतजाम करना और आज के ठीक पदहवें दिन घर मे से चादी वाली पालकी और सोलह कहारो को लेकर शहर के पाच कोस इधर चले आना जिसमे हम माताजी को इज्जत के साथ ले जाय । (कमर से एक चिटठी और दस अशी निकाल कर) लो यह चिट्ठी राजा साहब को देना और यह अफियो रास्ते मे खच करना। एक घोडा किराया कर लो और हांका हाँको चले जाओ। बुढिया के लडके रामदास ने यह कह कर कि 'कल सरकार से छुटटी ले जरूर चला जाऊँगा बहादुरसिंह के हाथ से अशर्फी और चिटठी ले ली। इसके बाद अपने अपने ठिकाने चले जान के लिए तीनो आदमी खड़े हो गए। वहादुरसिंह ने अपनी माताजी की तरफ देखकर पूछा, ' मी यह तो बताओ यहाँ लोगो न तुम्हारा नाम क्या रक्खा है ? ' बुढिया चमेला दाई। बहा० राम राम, अच्छा भला नाम बदल कर क्या बुरा नाम रख दिया ! बस चले तो सभी की नाक काट डालू ! अच्छा इस वक्त तो जाता हूँ लकिन पल जरूर यहा ही मिलना, किसी से डरना मत । घमेला लो मैं डरने क्यो लगी । अपने लड़के से मिलती है इसमे भी .

नरेद्र-मोहिनी १०५ रिसो का इजारा है ।। बहा० (पैर छूकर) अच्छा तो अब जाता हूँ। हाजीपुर में राजा दौलतमिह का लडका प्रतापसिंह बडा ही उजडड था। उसे पढ़ने लिखने का शौक बिल्कुल न था यहा तक कि सिवाय दस्तखत करने के अपन हाय से एक चिटठी भी नही लिख सकता था। दस-बीस गपोडी और बात-बात मे तारीफ करने वाले साथियो के साथ हाहा-ठीठी मे दिन बिताया करता था, हा कविता का कुछ शोक इसे जरूर था। इन दिनो तो यह शादी होने की खुशी मे फूला हुआ है । रभा जब से इसके घर म आई है छिप कर दो दफे उसकी सूरत देख चुका है और अपने साथियो के बीच म बठकर उसकी खूबसूरती की तारीफ किया करता है । इस भग और गांजे का बहुत शौक है, दिन मे तीन-तीन दफे बूटी छना करती है और दिन रात नशे में चूर रहता है। बहादुरसिंह ने इसके चाल चलन का पता अच्छी तरह लगा लिया था। इसलिये सध्या को बूटी पीने का समय,विचार वह उसी नजरबाग के दरवाजे पर पहुँचा जिसमे नित्य प्रतापसिंह बूटी पी पहर रात गए तक गप्प उडाया भरता था । पहरेवाले से कहा, "कुमार को बहुत जल्द खबर करो कि एक "विजया के सिद्धजी' तुमसे मिलने आये हैं।" पहरेवाले सिपाहियो को बहादुरसिंह की सूरत शक्ल पर बड़ी ही हसी आई। यह समझ कर कि हमारे भर साहब ऐसी सूरत देख बहुत ही खुश होंगे-- एक सिपाही दौडा हुआ बाग के अदर गया और कुअर साहब को सलाम कर बोला 'सरकार आज एक विचित्र आदमी सरकार से मिलने के लिये आया है जिसकी सूरत देखने से मारे हसी के दम निकला जाता है। उसने अपना नाम 'विजया के सिद्धजी बतलाया है । हुक्म हो तो आन दिया जाय । कुमार० हाँ हो उहे बहुत जल्द हमारे सामने लाओ सिपाही हुक्म पाते ही लपका हुआ बाहर गया और बहुत जल्द बहादुरसिंह को लिए हुए कुअर साहब के सामने हाजिर हुआ । पाठर महाशय यह न समझे कि बहादुरसिंह को जिस सूरत मे पहिले देख १०६ नरेद्र-मोहिनी चुके हैं आज भी उसी सूरत-शक्ल मे देखेंगे । नही, नहीं आज वह एक नए ही ढग का बाका जवान बना है। सिर के पैर तक अपने को सिंदूर से रग खासा महावीर बना हुया है, धोती-कुरते या टोपी स कुछ वास्ता नही जॉपिया कसे और भांग का झोला बगल मे लटकाये हुए हैं, हाथ मे भग घोटने का उहा और टोपी की जगह भग पोटने की बडी सी फूडो सिर पर औंधे हुए है। कुबर साहब के सामने पहुंचते ही बहादुरसिंह ने आशीर्वाद में यह दोहा पढा महादेव की परम प्रिय, सिद्धन की सिघि जोय । आवनहार अनिष्ट सुव, टारहिं विजया सोय ।। भगेही के सामने जब भग की तारीफ की जाय तो वह बड़ा प्रसन्न हाता है। बहादुरसिंह के दोहे से कुअर साहब बहुत ही प्रसन्न हुए और समझ गये कि इसे विजयादेवी का इष्ट है मगर साथ ही इसके दोहे के तीसरे चरण से उहें खुटका भी हुमा लेकिन यह समझ कर कि सिद्धजी कही जाते तो हैं ही नही, फिर पूछ लिया जायगा कि इस दोहे का तीसरा चरण आपने ऐसा क्यों कहा, इस विषय मे कुछ न पूछा। कुअर (हंसते हुए) आइये आइये सिद्धजी, यह आसन बिछा हुआ है बठिये, कहिये कुशल तो है ? सिद्ध देहि विजय सुमको सदा, सो विजया परदानि । नित हम लहि जाकि कृपा, रहत अभय सुखमानि । कुअर वाह वाह सिद्धजी, क्या बात है ! विजया ऐसी ही वस्तु है । सिद्ध. इसमें क्या सदेह, अन्नदाता देखिये देत अमन्द अन द दद दुख दूर बहाव । भामिनी भोजन और दुचन्द चाह उपजाव ॥ सप्त दीप को वर महीप छिन माहि बनावै । अष्ट सिद्धि सुख अनुभव बिनहि प्रयास कराव ॥ नदन बन क्लाश अरु स्वग विभव दुलभ जिते । परति मुलभ अपनी कृपा करत देखि विजया तिते ।। कुअर वाह वाह वाह, क्या बात है सिद्धजी! विजया देवी की महिमा अस्थनीय है ! कहिए आपका मकान कहाँ है ?

नरेद्र मोहिनी १०७ . सिद्ध० मेरा मकान तो कही भी नहीं है, मेरे बाप का मकान काशी था सो अब नहीं है। कुअर (हंस कर) सो अब नही है इसका क्या मतलब क्या बाप के मर जाने से मकान भी टूट जाता है ? सिद्ध० जी नहीं, मरने से तो मकान नही टूटता मगर वह तो काशी मे मर के मोक्ष हो गये इसलिये मिलने की अब कोई उम्मीद न रही, दादा का मकान दरभगे था मो उनकी भी गया किए आ रहा हूँ इसलिए अब वह भी गया गुजरा हुआ। हाँ परदादा का मकान मुलतान या, सो गयाजी जाने पर भी मैंने उनके नाम का पिण्डा न दिया, आखिर अपने बुजुर्गों मे से किसी का पता- ठिकाना तो रहने देना चाहिए सिद्धजी की बेसिर पर की बातो पर सभी हँस पडे और कुअर साहब ने फिर पूछा, 'क्या गयाजी में तुमने अपने परदादा का पिण्डा नही दिया इससे उनका मकान मुलतान म बचा रह गया? सिद्ध. आप समझे नही, मकान उसी को कहते हैं जहां कोई रहे पाहे जीता-जागता रहे या मरने के बाद भूत होकर रहे, जब मैंने गया मे उनके नाम का पिण्डा नहीं दिया तो आखिर भूत होकर तो वहां रहेंगे ! पिण्डा दे देता, उनकी भी गति हो जाती तो फिर मकान से उनका रिश्ता न टूट जाता। कुअर तो क्या आपको निश्चय है कि वह भूत होकर वहाँ हैं सिद्ध. जी हा, मुझसे कई दफे मुलाकात हो चुकी है। कुअर फिर किस तरह मुलाकात हो चुकी है? सिद्ध० बस किसी के सिर पर आकर दो चार बातें कर गये मुलाकात हो गई जसे गुलाबसिंह की दादी। कुअर कौन गुलावसिंह की दाद? सिद्ध० (हाथ उठा कर) अजी यही पटने के जमींदार गुलाबसिंह की दादी, मगर वह तो बडी ही बेढब है, खाली अपनी परपोती रम्भा के सिर पर आया करती है। कुअर (चौंक पर और डर कर) तुम्हें कसे मालूम कि रम्भा के सिर पर उसकी परदादी आया करती है ? सिद्ध० मैं स्वय देख चुका हूँ और दुख भाग चुका है।

१०८ नरेन्द्र मोहिनी कुमर क्या रम्भा के सिर पर उसकी परदादी को आते खुद दख चुके हैं ? सिद्ध० जी हाँ कहा तो देख चुका हूँ और दुख भोग चुका हूँ। कुमर आपको क्या दुख भोगना पडा ? सिद्ध० सो न पूछिये, बडी लम्बी चौही कया है। कुअर भला कहिये तो सही। सिद्ध० आप जिद्द करते हैं तो सुनिये मैं कहता हूँ । रम्भा की परदादी के साथ और भी बहुत सी चुडैलें है । जब वह रम्भा के ऊपर आती है और रम्भा क्सिी के सिर पर हाय रख देती है या धोखे से हाथ पह जाता है तो कोई न कोई चुडल उसके ऊपर भी आ जाती है और उसकी हडडी-हड्डी हिला देती है। एक दिन मैं इसी तरह पटने मे गुलाबसिंह के यहाँ गया हुआ था। शाम होते होते महल मे खूब गुल शोर मचा जिसे सुन गुलाबसिंह घबडा गए । मैंन उनसे डरने का सबब पूछा । वे बेचारे सूघे आदमी साफ-साफ बोल उठे कि हमारी लड़की पर हर अमावस्या के दिन चुडेल आती है सो आज अमावस्या है मालूम होता है कि वही बखेडा फिर महल मे मचा है । शामत की मार मेरे मुह स निकल गया कि मैं भूत उतार सकता हूँ मुझे ले चलिए । बस साहब, वह मुझे अपने जनाने मे ले गए। मैंने देखा कि रम्भा पर चुडेल सवार है और वह खूब हाथ पर मार रही है। मैंन जाते ही ललकारा, 'बस खबरदार ।' इतना कहना था कि वह बिगडी और झट मेरे पास आकर मेरे सिर पर हाथ रख ही तो दिया। बस फिर क्या पूछना है, उसी समय में बदहवास हो गया । न मालूम मेरी क्या दुदशा हुई, दूसरे दिन जब होश आया तो अपने को गगा किनार बालू पर पड़ा हुआ पाया। हाय हाय । वह दिन मुझे कभी न मूलेगा । पद्रह दिन तक मेरा बद बन्द दुखता रहा ! मरते-मरते बचा । अब जो मुझे कोई कहे कि तुम्हें लाख रुपये दूगा तुम पटन चलो तो बस जाने वाल की सात पुश्त पर लानत भेजता हूँ, अब तो यह भी सुना है कि उहोने लाचार होकर रम्भा का घर से निकाल दिया और बहाना कर दिया कि वह खुद कही माग गई। सिद्धजी की बातें सुन कर कुअर साहब ता बदहवास हो गए। बदन के गगट खडे हो गए क्लेजा धक धक करन लगा सोचन लगे कि हाय उसी रम्भा से ता मेरी शादी होने वाली है । वही सिद्धजी की बात सच हुई तो 1 मरेद्र-मोहिनी मुफ्त मे जान गई । वही मेरे भी सिर पर हाप रख देगी तो बस में गया गुजरा। लेकिन वही सिद्धजी गप्प न उडाते हो-यह सोच कर कुअर साहब ने पूछा, "क्या सिद्धजी आप यह सच्च कह रहे हैं ? मुझे तो विश्वास नही होता।" सिद्ध० नही विश्वास होता तो मेरी बला से | अगर आपको सच-झूठ मालूम करता है तो पता लगाइये कि रम्भा कहां है, फिर अमावस्या के दिन उसके पास चलिए और देखिए तमाशा । कमर रम्भा का पता तो मुझे मालूम है । सिद्ध० तो बस जिस शहर में वह हो वहां जाइये और अमावस्या की शाम को उससे मिलिये । कुमर रम्भा इस समय इसी शहर मे है और अमावस्या को भी थोडे ही दिन हैं । सिद्ध० (चौंक पर) क्या रम्भा इसी शहर मे है ? कुअर । जी हाँ बल्कि हमारे ही मकान मे है । हाय हाय । बडा गजब हुआ । हे परमेश्वर ! मैंने तेरा क्या बिगाडा था जो तू मुझको इस शहर मे ले आया । अब जान बचा ।।" यह बता हुआ बहादुरसिंह वहां से भागा। कुअर साहब पुकारते ही रह गए कि हाँ हा । सिद्धजी, सुनिए तो सुनिए तो ।' मगर सुनता कौन है यह तो कूडी-सोटा तक फेंक के भागे । दर्वाजे पर पहरेवालो ने रोका तो यह जमीन पर लोट गए और "मार डाला, मार डाला । मरे रे मरे रे ।।" वह कर चिल्लाने लगे। लाचार सभी ने छोड़ दिया और बहादुरसिंह हांफते हुए वहां से भागे। कुअर साहब के दिल की क्या हालत थी यह तो वे ही जानते होगे। सिद्धजी के भागने के बाद वह घण्टो तक परेशान रहे और तरह-तरह की बातें सोचते रहे । शादी की खुशी गम के साथ वदल गई। यहां तक डरे कि मां से मिलने के लिए भी महल में जाने की हिम्मत न रही। आखिर डरते डरते अपने एक दोस्त को साथ ले बाप के पास पहुचे और सिर नीचा कर चुपचाप बगल मे बठ रहे। उदासी का सबब बहुत पूछने पर कुअर साहब के दोस्त ने विजया के सिद्धजी का सब हाल कहा। राजा दौलतसिंह सुन कर चुप हो रहे लेकिन कुछ देर सोचने के बाद बोले, "ओफ, यह सब वाहियात बात है । हम नहीं मानते 7 नरेद्र-मोहिनी भूत प्रेत कोई चीज नही, सब ढकोसला है । तुम्हें लडका समझ के बहका दिया होगा । फिर तरददुद की बात ही क्या है ? अमावस्या को छ -सात ही रोज तो बाकी हैं, बस तुम्हारे दिल से शक दूर हो जाएगा।" २१ पुनपुन नदी के किनारे पडे हुए लश्कर पर छापा मार जब नरेन्द्रसिंह और जगजीतसिंह दोनो औरतो को छीन लाये तो योडी दूर पहुँचने बाद मालूम हुआ कि इन दोनो में रम्भा नहीं है। तारा और गुलाव को पाने से एक तरह की खुशी हुई मगर रम्भा के हाथ न लगने से वह खुशी नरेद्रसिंह की बढती हुई उदासी को किसी तरह कम न कर सकी। नरेद्रसिंह ने तारा से पूछा, साथ ही तो रम्भा भी पक्डी गई थी, वह कहाँ है ?" तारा हम दोनो को जबदस्ती ले जाने वाले डाकुओ ने जब नदी के किनारे डेरा किया तो सब लोग अपने अपने काम की फिक्र में पडे । मेरी और रम्भा को होली एक ही जगह रखी हुई थी, उस समय रम्भा ने मौका पाकर रात की पहली अधेरी मे डोली से उतर कर मैदान का रास्ता लिया और न मालूम कहां चली गई। मैंने भी भागने की कोशिश की मगर न हो सका क्योंकि रम्भा के भागत ही पहरे वालो को मालूम हो गया और "खोजो खोजो, घरो पकडो" की आवाज चारों तरफ से आने लगी, बल्कि थोड़ी ही देर बाद यह आवाज पारो तरफ से आने लगी मिल गई, मिल गई है। मुझे विश्वास हो गया कि रम्भा भाग न सकी, पकडी गई। उसी के थोडी देर के बाद आप लोग आ पहुँचे और लडभिड कर हम लोगो की जान बचाई, मगर अब मैं अपनी प्यारी रम्भा के बदले किसी दूसरी ही औरत को देख रही है। जगजीत० (गुलाब की तरफ देखकर) तुम कसे फस गई ? गुलाब मैं आफत की मारी अपनी बहिन मोहिनी के साथ मारी-मारी फिर रही थी, इत्तफाक से उसी नदी के किनारे पहुची लडाई-दगा हुआ है। मैं पानी पीने के लिए नदी किनारे गई यकायक कई आदमी मेरे पास पहुचे और यह कह कर कि "मिल गई मिल गई, यही है यही ।' मुझे पकड लिया। मैंने बहुत कुछ कहा-सुना मगर सुनता कोन है | हाय, मेरे पकडे जाने पे बाद न मालूम बहिन मोहिनी की क्या दुदशा हुई होगी !!

नरेद्र-मोहिनी नरेद्र मालूम होता है वह बच के निक्ल गई। जगजीत० मुझे तो उम्मीद नहीं कि वह बच के निकल गई होगी । हम लोगो से लड़ने के बाद भागे और फैले हुए दुश्मनो के हाथ उसका फिर से फस जाना ताज्जुब नहीं है। नरेद्र० शायद ऐसा ही हुआ हो, फिर अब क्या करना चाहिए? जगजीत. मेरी राय तो यही है कि घर चलिए, वहीं से जो कुछ होगा बदोबस्त किया जायगा। नरेद्र नही मैं ऐसी हालत में घर तो नही जाऊंगा। जगजीत आप बड़े हैं, मैं ज्यादे कुछ तो नहीं कह सकता, मगर इतना कहे बिना भी न रहूगा कि आप जरूर घर चलें, मैं आपको घर छोड कर खुद उसकी खोज मे निफलूगा और वादा करता हूँ कि बिना पता लगाये आपको अपना मुंह न दिखलाऊ गा। नरेद्र० बेचारी मोहनी भी भारी दुदशा मे फस गई होगी। जगजीत० (अपने मन मे) भाई साहब ने तो इश्क के दो टुकडे कर डाले ईश्वर ही बचावे । (जाहिर मे) अपनी अपनी किस्मत का भोग सभी भोगते हैं, इसका ख्याल कहां तक कीजियेगा। जगजीतसिंह की आखिरी बात नरे द्रसिंह को बहुत बुरी मालूम हुई । माये पर बल पड़ गए, रगत बदल गई, आंखो मे सुर्सी आ गई। होठ बिचका कर बोले, "अगर यही खयाल है तो रम्भा या मोहनी का पता खूब ही लगाओ।" आखिरी बात मुह से निकल जाने पर जगजीतसिंह को भी बहुत कुछ अफसोस हुमा और भाई को मनाने के लिए उन्हें दूनी मेहनत करनी पड़ी। आखिर हर तरह से समझा-बुझा कर उहें घर ले ही गए । गुलाब और तारा भी साथ में गई । नरेद्रसिंह के बाप उदयसिंह अपने सडके के घर लौट आने में बहुत ही खुश हुए मगर जब अपने छोटे लडके जगजीतसिंह की जुबानी सम हाल सुना तो कई तरह की फिक्र पदा हो गई । यह तो उहोने निश्चय कर लिया कि जिस तरह हो रम्भा का पता लगाना बल्कि उसे लाकर नरेद्रसिंह के साथ च्याह देना पाहिए चाहे इसके लिए सवस्व जाय तो जाय, मगर साथ ही इस के यह भी सोच लिया कि भरसक मोहिनी का पता न लगने देंगे और अगर शायद , ११२ नरेद्र-मोहिनी वह यहाँ आ भी जाय तो घुसने न देंगे, क्योकि आखिर वह बदमाश और मक्कार केतको की बहिन है, कहाँ तक खोटी न होगी। इस बात के सुनने से उहें बहुत रञ्ज हुआ कि नरेन्द्र का दिल रम्भा और मोहनी दोनो ही की तरफ खिंचा हुआ है। उदयसिंह ने जो कुछ सोचा या खयाल किया था उसे किसी पर जाहिर न क्यिा मगर अपन छोटे लडके जगजीतसिंह से छिपा रखना भी मुनासिब न समया क्योकि जगजीतसिंह बहुत ही गम्भीर और नेक बद को अच्छी तरह समझने वाले थे यहा तक कि मुश्किल से मुश्किल विषय मे इनके पिता इनसे राय लिया करते थे और इनकी गय बहुत ही भली समझी भी जाती थी। गुलाब को देख कर जगजीतसिंह उस पर मोहित तो हो गए मगर अपने दिल को हाथ से जाने न दिया । उन्होने अपना यह इरादा अच्छी तरह कर लिया कि चाहे गुलाब के इश्क मे जान चली जाय मगर साथ न करेंगे, हा अगर हर तरह से आजमान पर वह अपनी बहिन केतकी के रग-ढग की साबित न होगी तो कोई मुजायका नही लेकिन तभी जब साथ ही इसके यह भी जाहिर हो जाय कि वह मुझस' मुहब्बत रखती है। रम्भा का पता लगाने के लिए बहुत से आदमी चारो तरफ भेजे गए योठे दिन बाद यह खबर मालूम हुई कि वह हाजीपुर मे है । सुनत ही जगजीत- सिंह अपने बाप से विदा हुए मगर घर से बाहर न निकलने पाये थे कि बहादुरसिंह की वह चिटठी वहां पहुंच गई जो उस मसखरे ने अपने बनावटी भाई के हाय भेजी थी। २२ हाजीपुर के राजकुमार प्रतापसिंह को डरा धमका कर हमारे बहादुरसिंह जो भागे तो फिर किसी को पता भी न लगा कि क्हा गए और क्या हुए मगर भगेडी महाशय धूम फिर कर अपने दोस्त बजाज की दुकान पर पहुच ही गए। कई दिनो की सोहबत म गोपालदास बजाज उनका दोस्त तो हो गया था मगर अपने काम की तरफ खयाल कर के और यह सोच कर कि हमारी वजह से बजाज बेचार पर कोई आफ्त न आवे बाद मे बहादुरसिंह ने उसके यहाँ का रहना भी छोड दिया और अब कोई भी नही कह सकता कि यह कहा रहता है या क्या करता है।

११३ नरेन्द्र मोहिनी सेक्नि बहादुरसिंह चाहे जहाँ भी रहता हो मगर वह चमेलादाई स रोज ही मिल कर मां के रिश्ते को मजबूत करता रहा । पांच चार दिन की मुलाकात म भी बहादुरसिंह ने चमेलादाई से अपन मतलब की बात न छेडी जब तक कि उसे यह निश्चय न हो गया कि चमेलादाई का लडका रामदास हाजीपुर से चला गया बल्कि बहुत दूर निकल गया होगा। एक दिन दोपहर 2 सनाटे मे चमेलादाई अपने सपूत लडके बहादुरसिंह को उस घर म ल गई जिसम उमका कम्बख्त लडका रामदास रहा करता था और बहुत सी अच्छी-अच्छी माने की चीजें बहादुरमिह के आगे रवी जो रनवास से छिपा लुका के इसी काम के लिए लाई यो । बटेर के बराबर साने वाले बहादुरसिंह न भोजन करना शुरू किया और समय पाकर अपने मतलब की बात भी छेड दी। बहा० सुना है कि तुम्हारे राजकुमार की शादी होने वाली है ? चम० हाँ बेटा शादी तो जरूर होने वाली है मगर लडकी बडी ही कमवस्त है। वहा० चमे० यही कि दिन-रात रोया-पीटा करती है। बहा० वह पटने के जमीदार गुलाबसिंह की लड़की है न? चम० हाँ गुलाबसिंह को लडको है वहा० उसकी शादी तो हमारे राजकुमार नरे द्रसिंह से होने वाली थी ? चम० सो तो नहीं मालूम कि किसके साथ होने वाली थी मगर इतना देखती हूँ कि वह दिन रात नरेद्र-नरेद्र कह कर रोया करती है और यहां होने वाली शादी को बिल्कुल पसद नही करती। बहा० मां अगर तुम अपने साथ उसे अपने घर पर ले चलो तो बडा ही मजा हो। हम उसे अपने राजा के यहाँ भेज दें और बहुत सा-रुपया इनाम सो क्या 7 मिले। चमे० अरे राम राम, ऐसा खयाल भी न करना | जिस रोन ऐसा सोचेंगे उसी रोज हमारी तम्हारी दानो की जान चली जायगी। वहा. हम तो अपनी जान रात-दिन हथेली पर लिए रहते हैं मगर अफसोस है कि तुम बुढिया हो कर मरने से इतना डरती हो?

११४ नरेन्द्र-मोहिनी चमे तो क्या तुम मुझे मारने ही के लिये यहां आये हो और इसीलिए बेटा बने हो। बहा० उमर मेरी बहुत कम है तो क्या हुआ मैं कभी किसी का बेटा नही बनता, अगर बनता भी हूँ तो घस पांच-सात दिन, नहीं हमेशे सब का बाप ही बना रहता हू, आज तुम्हारा भी बाप बनने का जी चाहता है। बहादुरसिंह की बात सुनकर बुढिया घवहा गई बल्कि बहना चाहिये कि बदहवास हो गई और समझ गई कि महादुरसिंह बहा भारी मक्कार और घूत्त है। बहुत देर तक बहादुरसिंह का मुंह देखती रही, आखिर बोली, तुम भारी बदमाश मालूम पडते हो? बहा० शाबाश, तुमने खूब पहिचाना । अब तुम भी मेरे साथ सुच्ची व मक्कारा बनो तो काम चले। चमे० खबरदार लोंडे, मह सम्हाल पर बात कर, मक्कार कही का निकल जा यहा से, नहीं तो कान पकड कर उखाड लूंगी 11 बहा० बेशक, मगर मुझमे एक बडा भारी गुण यह है कि जिससे मैं कोई काम लेना चाहता हूँ पहिले उसे अपने कब्जे मे पर लेता हूँ जिसमे नाकर नूकर करने म पावे । इसी तरह तुम्हें भी मैंने पहिले ही अपने कब्जे में कर चमे० मैं क्योकर तेरे कब्जे मे आ सकती है। मैं जब चाहू तुझे फांसी दिला हूँ। बहा० (हस कर) मैं तो फासी पह नही सकता मगर कही तुम्हारा लडका ही फांसी न पड जाय ? मैं सच कहता हूँ कि तुम्हारी नकेल मैंने अपने हाथ में कर ली है । अब तुम झख मारोगी और मेरा काम करोगी। चमे० ते पागल तो नही हो गया है ।। बहा० क्या यह पागलों का काम है कि अस्सी बरस को खनास बुढिया को काबू में कर ले? चमे० फिर यही बके जाता है । बहा० अब तो तुम्हें साफ-साफ कह के समझाना पहा । सो सुनो मैं कहता हूँ-पहिले तो मैंने तुम्हें जो सिकरी दी है उसे बस कोरी जजीर ही समझना, और दूसरे जो तुम्हारे सडरे को बिहार भेजा है सो यही समझना उसे यमलोक भेज दिया, अब वह फिर लौट कर नही माता । हा जब सुम लिया है।

नरेन्द्र मोहिनी मेरा काम कर दोगी और मैं एक चिटठी अपने हाथ से लिखा कि उस लह को छोड दो तब उसकी जान छूटेगी नही तो बस उसकी खोपडी एक दिन किसी अपोरी के हाथ में दिखलाई देगी। बहादुरसिंह की बातो ने तो बुढिया को मुर्दा कर दिया। वह अपने किये पर परताने लगी और समझ गई कि यह दुरी फस गई और अब किसी तरह बहादुर सिंह के हाथ से जान नहीं बचती झखमार के इसका काम करना ही पडेगा नहीं तो लहरे की जान बेशक चली जायगी। पहादुरसिंह ने जब बुढ़िया को हर तरह से अपने कब्जे में कर लिया तो अपना नाम निकालने की जा कुछ तोब यह कर चुका था या किया चाहता या बुढिया को कहा और साथ ही इसके काम हो जाने पर बहुत कुछ इनाम दिलान पा भी वादा किया, और इसके बाद यहां से रवाना होकर मदान की तरफ चल पहा । बहादुरसिंह सरी राय के मुताविव बुद्धिया ने क्या-क्या काम विमा पह तो तभी मालूम होगा जब रम्भा के सिर पर भूत आवेगा हाँ इतना हम अभी कहे देते हैं कि अपनी मदद के लिये दुढिया ने कई एक जवान औरतो को रख लिया और कारवाई शुरू कर दी। २३ हाजीपुर के राजा न रम्भा के सिर पर भूत आने का हाल जिस समय अपने सहके की जुबानी सुना तो बहुत ही हैरान हमा। जाहिर मे तो उसने अपने लड़के से कह दिया कि यह सब कोई बात नही है मगर उसके दिल में तरददुद बना हो रहा ! रात के समय जब वह अपने महल मे गया तो उसने अपने लडके की जुबानी जो कुछ सुना या अपनी रानी से कहा । वह बेचारी सुनते ही कांप गई और बोली ' राम-राम, मैं कभी ऐसी लडकी के साथ व्याह करके अपने बच्चे की जान पर आपत नही ला सकती, मैं आज ही उसे घर से बाहर निकाले दती हूँ, जाय अपने मा-बाप का घर तबाह करे।" दौलतः घबडाने की कोई जरूरत नहीं। रानी भडाना कसा, मैं तो प्रेत के नाम से फापती हूँ। मुझे यह सब बसेडा मजूर नहीं ! दोलत० जल्दी क्यों करती हो? पहिले यह भी तो देख लो कि उस दिन नरेद्र-मोहिनी उस पर चुडल आती है या नहीं, कही उस भगेडी ने घोखा न दिया हो। रानी उस बेचारे को भला क्या पडी थी कि धोखा देता? दौलत० बदमाश लोग अक्सर ऐसा किया करते हैं । तुम इस बात को अपने दिल मे रक्खो किसी से कहो मत, और देखो कि उस दिन क्या होता है, अगर यह बात सच निकली तो उस लडकी को निकाल देना कोन बडी बात है। रानी खर ऐसा ही सही, मगर मेरा कलेजा तो अभी से डर के मारे कांप रहा है। दौलत० डरने की कोई बात नहीं है, देखो तो क्या होता है । डरते-काँपते वह पांच सात दिन तो निक्ल ही गए मगर अमावस्या के दिन सवेरे ही से रानी के पेट मे चूहे उछलने लगे। चमेलादाई अपनी सधी हुई लौंडियो के साथ रम्भा के ऊपर मुस्तद थी ही उसके इलावे और भी तीन चार लौंडियो को रानी ने मुस्तद कर दिया मगर वह भूत आन वाला हाल किसी के ऊपर जाहिर न किया। ग्रानी तो डर के मारे दिन भर उस कमरे मे न गई जिसम रम्भा रहा करती थी मगर शाम होते होते चमेलादाई दौडी दोही रानी के पास आई और हांफते हॉफ्ते बोली, महारानी ! रम्भा का तो अजब हाल है 11 रानी (डरकर) सो क्या? उसका चेहरा लाल हो गया है और बडो-बडी आंखें खोलकर चारो तरफ देख और झूम रही है। रानी उससे तन कुछ पूछा भी? चमे० मुझे तो उसके पास जाते डर लगता है । दूर से जब मैं पूछती हूँ तो लाल आँखें निकाल पर मेरी तरफ देखती है और दांत पीस पीस के कहती है कि मैं इस घर भर को खा जाऊँगी। रानी (हाथ उठाकर) हे परमेश्वर, तू ही बचाने वाला है । हाय न मालूम कहा की आफ्त आई थी जो लोग उस लड़की को इस घर मे ले आये। चमे० (हाथ जोडकर) मुझे तो मालूम होता है कि उसके ऊपर कोई जिन्न आया है। रानी नहीं जिन नहीं है, जो है उसे मैं जानती हूँ, जरा चल तो सही में देखू क्या हाल है। चमे० नरद्र मोहिनी चमे० भगवान के लिये आप न जाइये, कही एसा न हो कि कोई नया बसेडा मचे। रानी वह जो कुछ यखेडा मचा मरती है सो भी मैं जानती हूँ। में उसके पास जाने वाली नहीं हूँ दूर हो से तमाशा देखू गी। चमेला दाई के साथ रानी साहवा उस कमरे के पास गई जिसम रभा थी । रम्भा के पास जाना तो दूर ही रहा उहोने चौखट के अदर भी पर न रक्खा दूर ही से शौक के देवा। रम्मा उस समय खूब झूम रही थी और आग्ने पार पाड़ पर श्त की तरफ देख रही थी। रानी चमेला, मिमी को कहो ता सही उसके पास जाय और बाजू पर पर हिलाये। चमे० बहुत अच्छा। चमेला कमर ये अदर गई और सधी हुई एक लौडी से जिसका नाम परमसरी पा रम्मा रे पास जाने लिए कहा । परमेसरी गम्भा के पास गई और उत्तमा याजू पकड के हिलान लगी। रम्भा (गुस्से भरी आँसें दिखाकर) भाग जा भाग जा, नही तो सा जाऊँगी। - लाडा तुम कौन हो, अपना नाम तो बताजी। रम्भा तनमानेगी न मानगी दिखाऊँ तमाशा नौटी बजी हो ता सही तुम कौन हो ? रम्भा फिर बक्ती है। तेन मानगी ? अच्छा तो देख तमाशा । 'अाठा ताप तमाशा | "बहार रम्भा ने उसके सिर पर हाथ रख ही ता दिया। यम च क्या था। परमेरारी लौंडी तो लगी नाचने और बिस्लान ! चारों तरफ घूम घूम कर चिल्लाने और लोडियाको चिनोटी काटन लगी। कुल लाहियां जो उम परम बटी भी माफ "रके बाहर निकल आई , परमैसरी भी बाहर निकल आई और यूब उदलने फूदने लगी। यह हाल देखते ही रानी के तो होश उड़ गए। वह कांपती हुइ वहाँ से भागी और अपने कमरे में आ धमी । एक लोडो को वहा जल्दी जा और महा राज का युला ला आरर देखें रम्भा का हाल, और उसदे पास आकर अपने सिर पर भी हाय र सो दिन बहती थी कि इस पुल को आज - नरेन्द्र-मोहिन ही निकाल दोन माना, अब भोगें बैठ के " लाडी दौडी हुई बाहर गयी और धोबदार को मोरफत राजा दौलतसिंह को खबर कराई । राजा साहब पहिले ही से इसी सोच में पडे हुए थे कि देखें रम्भा के सिर पर आज उसकी परदादी आती है या नहीं। खबर पाते ही पवहा कर उठ खडे हुए और हरते-डरते महम में गए। देखें तो रानी साहब घुस कर अपने कमरे मे बठी हैं और भीतर से किवाड लगा लिया है तथा परमेसरी दाई सूम चिल्ला रही है और इधर से उधर नाच रही है । उसे अपने तनोबदन और कपडे तक को कुछ सुध नहीं है। बस समझ गए कि रम्भा की परदादी मा पहुँची । महाराज लौट कर उस कमरे के दरवाजे पर गए जिसके अदर रानी थी और केवाड खुलवाया। रानी देखा घर मे क्या बखेडा मचा हुआ है दौलत. बेशर वह बात सच निकली, भव क्या किया जाय रानी बस आज ही उसे घर से बाहर निकाल देना चाहिए। दौलत. इस समय तो उसके पास जाना आफत है, क्या जाने सिर पर हाथ रख दे तो बस रानी ईश्वर आज का दिन कुशल से मितावे तो कल उस नानी से सम- ? 7 झूगी। इतने में एक लोही और उस कोठडी में गई जिसमे रम्भा थी। रम्भा ने उसके सिर पर भी हाथ रक्खा और वह भी परमेसरी की तरह उछलती-कूदती बाहर निकल आई । अव तो महल मे वही भारी घूम मच गई । जितनी औरतें महल में थी सभी अपनी अपनी जान बचाने की फिक्र मे लगी सभी को यह खयाल हुआ कि कही रम्भा अपनी कोठडी मे से निकल कर हम लोगो के सर पर हाथ न रख दें। महाराज दौलतसिंह अपनी रानी से बातचीत कर ही रहे थे कि एक लौंडी ने आकर अज किया, डेवढी पर एव डोली आई है। रानी उस पर कौन है ? लौंडी उहोने अपना नाम तो नही बताया मगर किसी रईस की लहकी मालूम पड़ती हैं। रानी क्या यही माना चाहती हैं ।

। Hunt मरेद्र-मोहिनी सोडी पी हो, वह हाजिर हुमा पाहती हैं और कहती हैं कि रम्मा के बारे म महारानी साहया को बिलकुल धोखा दिया गया है, उसका असल भेद सिवाय मेरे और कोई नहीं जानता। रानी (महाराज की तरफ देखर) यह कुछ दूसरा ही समाशा नजर माता है । मैं कैसे विश्वास करू ? सब कुछ तो अपनी आँखो देख चुकी हूँ। लौंडी वह कहती हैं कि अगर इस समय रम्भा के सिर पर घुईल मौजूद हो तो अच्छी बात है मैं बहुत जल्द सब एक मिटा दूगी। एक चिट्ठी भी उहोंने दी है। रानी सा कहाँ है चिट्ठी ? लोंटी ने रानी साहबा के हाथ मे चिट्टी दी। राजा दौलतसिंह ने बढे गौर से उस चिटठी को पढा । यह लिखा था, रम्मा सिर पर भूत प्रेत मा सुहेल का माना सब भूठ है । यह फिसाद यहादुरसिंह भगेडी का मचाया हुआ है। वह नरेद्रसिंह का दोस्त है और आपकी लोडियो को उसने मिला लिया है । बाकी हाल हाजिर होकर कहूगी।" दौलत० देखिए, मैं कहता था न कि यह सब धोखा है । अब उसे जल्द बुलाकर पूछना चाहिए। महारानी का हुक्म पाते ही लौंडी दोही-दोही गई और डोली पर से सवारी चतरवा लाई। 1 - मोहनी ने अपने जी मजा कुछ ठान लिया है उमे हमारे पाठक अन्यी तरह जानते हैं । इससे पहिले जो कुछ हाल लिखा गया है उसके पढन से तो आपको यही मालूम हुआ होगा कि इस सप यास पात्राम केतकी बडी ही बदवार और युरी नायका है मगर अब हम कुछ कारवाई मोहनी की दिखाना चाहते हैं जिसे इस उप पास का असल पात्र फहना बहुत ही मुशासिब होगा। श्यामा और भामा (रम्मा और तारा) के छिन जान और मकान के सुट जाने के बाद जय केतकी भागी तो सीधे अपने जमस्थान खास गयाजी मे पहुची और एक लोटे मकान में जिसमे कभी उसका याप रहा करता था रहने मगी। पहिली सी भीड भाड अब उसके यहां नहीं है, सिफ पांच-सात आदमी १२० नरेद्र मोहिनी जो उसका साथ किसी तरह छोड नही सकते थे मौजूद हैं । रुपये-पसे की तरफ से चाहे उसे किसी तरह की तकलीफ न हो मगर फिर भी उसका दिल किसी तरह खुश नहीं है । यह जानकर कि मोहनी और गुलाब की जान नरेद्रसिंह को बदौलत बच गई, उसे बडा ही कष्ट हुआ। उसने समझ लिया कि अब मेरी जान निसी तरह नहीं बन सकती, क्योकि मोहनी और गुलाब बदला लिये विना कभी न छोड़ेंगी। दिन रात इसी सोच में पड़ी रहती है कि अब क्या किया जाय । थोडे ही दिन बाद उसे जब यह खबर मिली कि मोहनी ऐशमहल में पहुंच गई तो वह और भी घबडाई और अपनी दो-तीन सखियो को पास बैठा कर सलाह करने लगी मगर इस बात का निश्चय किसी तरह न कर पाई कि मोहनी के साथ क्या वर्ताव करना चाहिये जिस मकान मे देती रहती थी उसके पीछे एक बाग था । आज वह चाहे मसी ही बुरी अवस्था म नयो न हो मगर उसके बाप की जिन्दगी में यह बाग बहुत ही दुरुस्त रहता था । इस ब ग के बीचोबीच म एक छोटा मा गला भी था जो इस समय वेतकी वा बठक बन रहा था । अपने समय का बहुत ज्यादे हिम्सा इसी बगले मे अकेल वठ कर वह बिताती थी। इस बगले म किसी तरह की सजावट न थी, सिफ फश विद्या हुआ था और एक तरफ ऊची गद्दी पर गाव तकिये के इलावे कई छोटे-छोटे तपिए भी मौजूद थ । कोन म चौकी के ऊपर जल से भरी गगाजमनी सुराही और चांदी का गिलास हर वक्त मौजूद रहता था। आज आधी रात से ज्या- बीत जाने पर भी केतकी अकेली उस वगले म गद्दी पर लेटी हुई कुछ मोच रही है । थोडी थाही देर पर उसास न ले पर और आखिर मे ओफ करके रह जाती है । बगने के चारो तरफ वाले माग मे एक दम स नाटा है । अधेरी गत को स्याही न पूरी तरह ज्पना दखल जमा रखा है। थकायम सामने का दरवाजा सुता और मर्दाने ठाट म कमर के अर आती हुई एक औरत दिपाई पडी जिस पर नजर पहत ही बेतरी न पहिचा लिया और वह पार कर उठ बैठी। यह औरत मोहनी थी जो हाथ मे एव वडा सा धमयता हुमा छुरा लिये पतवी सामैने जा रही हई और बोली, "अब क्या इरादा है ?"

नरेद्र मोहिनी इस समय माहनी को भयानक सूरत देतवर घेतकी या काजा धष ध करने सगा। पुराने पाप ने उसको रग-रग ढीली कर दी। डर के मारे चारा तरफ देखने लगी और यहाँ तर पबहाई कि मोहह्नी को वात वा कुछ भी जवाय न दे सकी। मोहनी ने फिर ललकार पर पूछा, 'क्यो, चुप क्यो है । कुछ बोल तो सही । तेने क्या सोचकर मुझ पर इतना बडा जुल्म क्यिा था ?" केतकी कुछ भी जवाम न दे सकी और सिफ एकटक मोहनी के हाथ में मौजूद पुरे की तरफ देखती रही। आखिर मोहनी यह बहती हुई कि 'देस अब मेरी बारी है सभल बैठ।" उसके पास जा पहुंची और छाती पर सवार हो पुरा उसने कलेजे में भोक दो-तीन दफे अच्छी तरह हिलाया। दस-पांच बार हाथ-पर पटक कर तिरी ने दम तोड़ दिया और उसकी सुदर देह मुदी की गिनती मे गिन जाने लायन हो गई। माहनी ने छुरा उसके कलेजे से निकाल लिया और उसी को साडी से पोछ पर यहाँ से घस खही हुई। बगले के बाहर निकर वह बाग से पूरब और दक्विन कोने की तरफ गई जिधर की दीवार कुछ टटी हुई थी और पर अड़ा कर पार हो जाने का सुबीता था। वह बेसरके दीवार के पार हो गई और वहाँ अपने वफादार सिपाही लालसिंह को दो घोहो की बागडोर थामे मौजूद पापा । मोहनी को देखते ही लालसिंह ने पूछा, "काम हो गया ?" "हो' कहकर मोहनी एक पोई पर सवार हो गई और दूसरे घाडे पर सालसिंह पर बहा। दोनो ने तेजी के साथ मदान का रास्ता लिया। सुबह होने के घण्टे भर पहिले ही दोनो आदमी ऐशमहल में जा पहुँचे जिसे मोहनी का पर कहना चाहिए । घर पहुचकर भी मोहनी न माराम नहीं किया बल्कि सीधे नौच के उस कमर में पहुँची जिसमे तहखाने का रास्ता था और जिसके बार हम अपर खुलासा लिख आये है। यहा आकर उसन चारो तरफ से दरवाजे बद कर लिया। मोहनी ने वही अलमारी खोली जिमे तहयान या दरवाजा कहना चाहिए और हाथ म राशनी लेवर नीचे अर्थात तहमान म उतरी । पहित पोड़ी दर तक उस लाश के पास यही रही जो उस तहखान म मौजूद थी और जिसका पुछ जिक्र हम कर चुके है । इसके बाद उसने सिरहान की तरफ से विसावन का कोना उन्टा और लपटा हुमा कागज या एक मुटठा जो उसके पी रय मे १२२ नरेद्र मोहिनी हुआ था निकाला । सरसरी निगाह से उलट-पलट कर उसे इसलिए देखा जिससे विश्वास हो जाय कि यह वही मुटठा है जिसे वह चाहती है। इस मुटठे में कई बद कागज भी नत्यी किये हुए थे जिनमे सुख रोशनाई से कुछ लिखा हुआ था। मोहनी ने उस कागज के मुटठे को अपनी कुरती के अदर रस लिया और फिर से उन देगा का मुह खोल खोल कर देखने लगी जिनमे अफियां भरी हुई थी । एक बग में से थोडी सी अशफिया निकाल ली और तहखाने से बाहर निकल कर उसका दरवाजा ज्यो का त्यो बाद और दुरुस्त कर दिया । इसके बाद उसने दूसरी अलमारो सोलो और उनम से सादा कागज और कलमदान निकालकर गद्दी पर जा बैठी। इस क्लमदान म स्याही रोशनाई थी जिसमें उसन एक मादे कागज के दोना तरफ कुछ लिखा और तहखाने के अदर लाश के सिरहाने से लाये हुए कागज के मुटठे को कुरती के अदर से निकाल वर उसी म अपने लिखे हुए इस कागज को भी नत्थी कर दिया फिर कुछ सोच कर उसने अलमारी म से मोमजामे का एक टुकडा निकाला और उसी में उस कागज के मुटठे को लिफाफे की तरह बद कर जोड पर मोहर पर दिया और उस लिपाफे का फिर अपनी कुरती के अदर रख लिया। मोहर और चपडा भी उसी कलमदान म मौजूद था। जब तक यह सब वाम मोहनी करती रही तब तक उसकी आंखा स बरा बर आमू जारी ५। कुछ मोचने के बाद उसन वह माहर उठा ली जिसम लिफाफा व द किया था और मर के बाहर निक्स आई रा समय भी उसने अपन सिपाही लालसिंह को दरवाजे के बाहर टहलते पाया । माहनी को बाहर निकलत दपकर लालसिंह न पूण 'अब क्या करना "ठहरा म आती है" इतना वह कर,मोहनी वाग के पूरब तब पली गई और एक कुएं म उस मोहर को कवर तुरत लौट आई । मपरा हान के पहले मोहिनी न इन सब कामा स छुटटा पा ली और इसके बाद वह लालसिंह क पास जाकर खड़ी हो गई। लालसिंह देखिए सुबह की मुफ्त्री निती आती है। मोहनी मुझे भी अब कोई काम करना वाली नहीं है। दाना पोडे तयार नरेन्द्र मोहिनी १२३ लाल जी हाँ (हाथ का इशारा करके) उस पेड़ के साप बघे हैं । मोहनी (मफियो लालसिंह को देकर) दिन को जो कुछ राय हो चुकी है उसी मुताबिक इन अशफियो को बांट दो और सब आदमियो को समझा- बुझा कर तुम जल्द आओ, तब तक मैं आगे बढती हूँ। घोडे पर सवार होकर मोहनी उस हाते से बाहर निकल गई। २५ दा कोस निकल जाने के बाद मोहनी एक पेड़ के नीचे अटक वर लालसिंह की राह देखने लगी। थोड़ी ही देर बाद लालसिंह भी आ पहुँचा। मोहनी ने पूछा, "समो को अच्छी तरह समझा-बुझा आये" लाल. जी हा। मोहनी अब वे लोग उस ठिकाने पहुँच जायगे ? लाल. बेशक पहुँच जायगे । मोहनी अच्छा तो फिर चलो। लाल. यहाँ से दोनो तरफ जाने के लिए रास्ता है। मोहनी अगर तुम्हें विश्वास है कि नरेद्रसिंह बिहार ही मे मौजूद है तो वहाँ ही चलने मे हमारा काम ठीक होगा। लाल. इसमे तो कोई शक नही कि नरेद्रसिंह विहार में हैं मगर एक दफे मैं आपको जरूर समशाळगा और कहूंगा कि इतने बड़े काम पर आप कमर न बांधे और मुफ्त म अपनी जान देने पर मुस्तैद न हो। मोहनी लालसिंह, मैं जो कुछ इरादा कर चुकी हूँ उसे किसी तरह तोड नही सक्ती मगर तुम क्यों घबडाते हो? तुम्हारे लिए बहुत दौलत रक्से जाती है जिसे तुम और तुम्हारी औलाद दस पुश्त तक आराम से बैठे खायगी तो भी किसी तरह की कमी न होगी। यह ठीक है कि आप मेरे लिये बहुत दौलत रख जाती हैं मगर आप ऐसा मालिक फिर में कहाँ से पाऊगा? मोहनी यह तो दुनिया का फायदा ही है, कोई अमर होकर नहीं आया, आखिर एक दिन मरना ही है, फिर मैं अपने दुश्मनो को भाराम करने के लाल १२४ नरेद्र माहिनी लिए क्यो छोड जाऊ? म जो कुछ प्रण कर चुकी हूँ उस अवश्य पूरा करूगा। देसो लालसिंह, अब इस बारे म तुम मूझ भी न टोक्ना, अपन वादे क मृता- विक चलो नहीं तो पछताओग । ला. मैं जो कुछ वादा कर चुका हूँ उसक खिलाफ कभी नहीं र सकता। सर अब न टोकू गा। तीसरे दिन मोहनी विहार पहुँची, एक सुदर मवान किराय पर लेकर उसम डेरा डाला, तथा अपने जरूरी काम का कुल सामान बाजार से भगवा कर प लेने के बाद लालसिह के हाथ एक पुर्जा मरेन्द्रसिंह के पास भेजा। नरेद्रसिंह यह खबर पावर कि माहनी यहाँ पहुँच गई है बहुत ही खुश हुए और अपनी इज्जत का खयाल कुछ न करके उसी समय बेखटक उस मकान म चले गए जिसम मोहनी ने अपना डेरा जमाया था। हम ऊपर लिख आय हैं कि जब स तारा और गुलाब को लेकर नरे द्रसिंह अपने शहर म आए है तब से बहुत ही उदास रहा करत है। रम्भा और मोहनी दोनो ही का इश्क उनके दिल को मसोस रहा था और दानो ही के साच मे दिन रात उदाम रहा करते थे। पर आज ही बहादुरसिंह को भेजी हुई चोठी उनके पास पहुँची है जिसकी खुशी म वह फूले नही समाते । बहादुरसिंह के लिसे मुताविक चमेला दाई के लडके को कैद कर लिया और अब अमावस्या र पहिल ही हाजीपुर पहुँचन की फिक्र कर रह थे कि मोहनी की चौठी लिए हुए लालसिंह पहुचा और एका त म मिल कर उनके हाथ म चोठी दी। मोहनी + आन की खबर पाकर और भी खुश हुए और बेखटके उस हरामजाती के मकान पर चले गए। इनको घर मे आते देख मोहनी खूब हो रग लाई । दौड कर उनके गल में लपट गई और देर तक रोती रही। नरे द्रसिंह ने उसे बहुत कुछ समझा-बुझा कर चुप क्यिा और देर तक बातचीत करते रहे । मोहनी ने अपना हाल बना पर इस तरह कहा कि उसकी मुहब्बत उनके दिल म और भी ज्याद हो गई यहा तक कि थोडी देर के लिए बचारी रम्भा का भी ध्यान उनके दिल से जाना रहा । बहुत कह सुन कर आसिर मे मोहनी ने पूछा, "अब क्या हुक्म होता नरे द्रसिंह तुम हमारी हो हम तुम्हारे है मपर हाथ जाह क हम तुमसे नरेद्र मोहिनी पांच सात दिन की छुट्टी मांगत है, इतने दिन तर तुमे इसी मकान में रहो, हम बहुत जल्द लौट आवेंगे। मोहनी सो क्या कह जाने का इरादा है ? नरद्र० हाजीपुर। मोहनी सो क्यो? इसके जवाब म नरेद्रसिंह रम्भा का कुल हाल रत्ती रत्तो कह गए आर मत म बोले, "अब रम्भा हाजीपुर मे है और यह सब खबर मुझे उसी मसपरे ने भेजी है। उसन वहा पहुच कर बडा ही रग वाधा है । रानी की एक दासी चमेला दाई को उसने मिला लिया है और राजा दौलतसिंह के लडके प्रतापसिंह में मिस पर उसके दिल मे यह बात जमा दी है कि हर अमावस्या को रम्भा के सिर पर उसकी नानी या दादी चुडैल बनकर आती है और उस दिन वह जिमके मिर पर हाथ रख देगी उसके ऊपर भी भूत आ जाएगा। प्रतापसिंह के साथ रम्भा की शादी होने वाली थी पर वे लोग अमावस्या की राह देख रहे है । अगर उस दिन रम्भा के सिर पर चुडेल आई तो उसे निकाल देंगे और इसम कोई शक नहीं कि उस दिन उसके सिर पर चुडल अवश्य आवेगी मयोकि चमेलादाई बहादुरसिंह से मिली हुई है, वह सब बदोबस्त कर रखेगी।" यह हाल सुनते ही मोहनी का काध चौगुना हो गया मगर उसन अपन का सूब सभाला और दिल का हाल जाहिर होने न दिया । मोहनी अगर चमेलादाई बहादुरसिंह की मन न करे तब ? वह पक मारेगी भोर मदद करेगी । यहादुरसिह ने धोखा देवर उम बेदम फसा रक्खा है । न मालूम क्या समझा-बुझा कर उसने उसने लड़के यो मेरे पास एक चीठी दे कर भेज दिया है जिसमे लिखा है कि इस लड़के को पद करके रखना। अब वह चमेलादाई को जरूर कहेगा कि अगर तू मरी मदद न करेगी तो तरा लडका जान स मारा जाएगा, और भला चमेलादाई पब पाहेगी कि उसका लडका मारा जाए मोहनी वशक उस वान (बहादुरसिंह) न खूब ही धोखा दिया है नरद्र. इसीलिए माज में हाजीपुर जाने वाला हूँ। अगर काम निक्त गया तो अच्छा ही है, नहीं फौज लकर राजा दौलतसिंह स लहाई परनी नरेद्र० एगी।

नरेद्र मोहिनी मोहनी आप जरूर जाइये, जहाँ तक मैं समझती हूँ आपका काम अवश्य हो जायेगा, ईश्वर करे बेचारी रम्भा यहाँ आ जाए में उससे मिल कर बहुत ही खुश होऊंगी। नरे द्र० तुम्हारी बहिन गुलाब को मैं तुम्हारे पास भेज देता हूँ। मोहनी नहीं-नही वह आपके घर में है तो मुझे किसी तरह की चिता नही है मैं इस समय उससे मिलना नही चाहती क्योकि जब तक आप हाजी पुर से लौट कर न आवेंगे तब तक मैं इस शहर मे गुप्त भाव से रहूँगी। आप भी किसी से मेरी चर्चा न कीजियेगा, आपको मेरे सर को कसम है। नरेद्र० (हस कर) जसी तुम्हारी मर्जी । और दो घण्टे तक बातचीत होती रही। इस समय मोहनी ने बनावटी मुहब्बत जतान म किसी तरह की क्सर रटने न दी। आखिर नरेन्द्रसिंह मोहनी से बिदा हो कर घर चने आये और बहुत जल्द तयारी करणे बीस पच्चीस आदमियो को साथ ले हाजीपुर की तरफ रवाना हो गए । हम ऊपर लिख आये है कि हाजीपुर में राजा दौलतसिंह के महल म पहुँच कर एक औरत न इस बात को जाहिर कर दिया कि रम्भा के सिर पर भूत चुद्ध न या जि न कोई नही आता यह सब उसका पासण्ड है। उस औरत ने महारानी के पूछने पर अपना नाम 'सुदर' बतलाया था। महल म पहुँच कर उसने रानी को समझा दिया कि रम्भा के सिर चुडल नही आनी और यह सब उसका नसरा है । यह जान कर रानी बहुत खुश हुई और सुटर से बोली तुमन मेरे साथ बडी नेकी की मैं उम्मीद करती हूँ कि तुम खुद यह सब हाल महाराज से कह पर उनके दिल का शर भी दूर कर दोगी क्या इसम कोई हज है ।" सुदर नही हज क्या है। रानी तो मैं महागज को बुलवाऊँ। सु दर हा हां आप महाराज को वुलवावें मुझे उनके सामने मातचीत बरन म विसी तरह का खौफ नहीं है वह राजा हैं मैं उनकी लडवी हैं, मैं उहे समझा दूगी कि इस मामले म आपको धोया दिया गया। रानी ने महाराज को बुलाने पे लिए उसी समय लाँडी भेजी और जावे आ गए तो वहा "लीजिए सब भेद खुल गया, रम्भा के सिर पर चुघल-परी नरेद्र मोहिनी कोई भी नहीं आती, यह सब घोसा है।" गजा हो । तुम्हें व मे मालूम हुआ? रानी (सुदर की तरफ इशारा र) इहोंने कहा । राजा (मुदर स) तुम्हारा नाम क्या है ? मुदर सुदर। राजा मकान नहीं है। सुदर पटने। रानी तुम्हें क्स मालूम हसा कि रम्भा नवल वरती है ? मुदर नरसिंह के दोस्त बहादुरसिंर न यहाँ पहुँच कर यह सब बसेडा मचाया है। उमी ने आपके लड़ने का सिद्धजी बन कर धोखा दिया उसी न जापपी चमेलादाई पो मिना लिया और स पापण्ड का बटोग्त कर लिया कि रम्भा के उपर चुडल आती है। उमन सोचा था कि आप जब यह हाल मुनेंगे और जानेंगे तो उस निकाल देंग और तब रम्भा उन लोगों के पास पहुच जायेगी जो इतना उद्योग कर रह हैं। आपरी चमनादाई का लडका इन मब बातों की खबर पहुँचाने महाराज उन्यसिंह व पास विहार गया है, गम्ते म मुझसे मुलाकात हुई। वह मुझे अच्छी तरह पहिचानता था, समी की जुबानी यह सब हाल मैन सुना है और अव इनाम की लालच में आप पास राजा यशव यह इनाम का काम है। (लौंडिया को नग्प दगवर) चमला दाई कहाँ है ? जल्द हमारे पास बुना लाओ। हुक्म पाते ही यई लौडिया चमेलादाई का वुनान के लिए दौड़ गई मगर चमेलादाई क्व हाथ आन वानी थी। वह इन सब बाता को सुनगुन पान हो वहां से निकल भागी। लाचार लौडिया ने वापस मावर जज विया वि 'चमेला दाई तो भाग गई। चमेलादाई के भागने की खबर सुन कर महाराज को मु दर की बाता पर विश्वास हो गया। महल के बाहर चले आय और चमेलादाई के लड़के भी खाज की, पर उसका भी पता न लगा। प्राध के मारे मगराज या शरीर कापने लगा। अपने लडके को बुला कर सब हाल रहा । धीर धीरे यह बात माम शहर म 7 गई।

नरेद्र मोहिनी २६ हाजीपुर से कास भर की दूरी पर आम की एक बाडी म कई आदमियो को साथ ले नरेन्द्रसिंह टहल रहे है । इनके साथ जितने आदमी हैं सभी घोडो पर सवार हैं केवल नरे द्रसिंह पदल टहल रहे है और इनके सवारी के घोडे की लगाम एक सवार के हाथ मे है । चांदनी अच्छी तरह छिटकी हुई है मगर इस आम को धनी गाछी मे उसका बहुत कम हिस्सा जमीन तक पहुंचता है, हो पत्तो म से छनी हुई चांदनी नही कहीं जमीन पर पड कर सुफेद बुदकियो की सी दिखाई दे रही है। नरेन्द्रसिंह को धीरे-धीरे टहलते और सोचते हुए दो घण्टे बीत गए । यह अपने विचार म यहां तक लीन थे कि इस बात का ज्ञान बिल्कुल जाता रहा था कि वे कहां हैं या किस लिए आये हैं लेकिन यकायक घोडो के टापो की आवाज न इह चौका दिया सर उठा कर उस तरफ देखने लगे जिधर से कई सवार आ रहे थे। नरेद्रसिंह के साथी एक सदार ने कहा, "आप भी घोडे पर सवार हो जाएँ, क्या जाने में आने वाल सवार हमारे दोस्त हो या दुश्मन नरेद्रसिंह अपने घोडे पर सवार हो गए और साथ ही एक आवाज हल्की विगुल की सुन कर बोले, ये तो हमारे ही आवमी मालूम पड़ते हैं, शायद हमी नोगा को दूर रह हैं।" सवार जी हाँ हम लोगो को भी विगुल का जवाब देना चाहिए। नरेद्र. अवश्य । इधर से भी विगुग की हलकी आवाज दी गई जिसे सुनते ही वे लोग तेजी में साथ नरेन्द्रसिंह ने पास आ पहुच और बहुत जल्द मालूम हो गया कि नरेद्र- सिह के छोटे भाई जगजीतसिंह सवाराको साथ समर आये है। नरद्र० तुम क्यो आ गए १ जगजीत. पिता जी की आभा से । नरद्र० दर हो जान के कारण उह पिता हुई ? जगजीत. नही बस्ति विश्वास हा गया कि जिस काम में लिए आप अये। उपम विघ्न पर गया।

नरेद्र मोहिनी १२६ 7 नरेद्र० बेशक ऐसा ही हुआ। जगजीता तो क्या बहादुरसिंह से मुलाकात नहीं हुई नरेद्र० बहादुरसिंह मे तो मुलाकात हुई बल्लि रोज ही होती है मगर महल मे एक दुष्ट औरत ने पहुच पर बिल्कुल काम बिगाड दिया। उसने बहादुरसिंह और चमेलादाई की कायवाई का हाल बोल दिया। न मालूम उस हरामजादी को कसे पता लग गया। डर के मारे चमेलादाई भी वही भाग गई, बहादुरसिंह की खोज हो रही है । एक हिसाब से काम विगड ही गया। जगजीत० फिर आप यहाँ क्यो अटके हैं ? अब तो घर चलना चाहिए और लडाई वा सामान दुरुस्त करना चाहिए। नरेद्र बहादुरसिंह भी आता ही होगा जग उससे राय मिला ली जाय। जगजीत. हमारी समझ मे तो अब इस तरह की कायवाइयो से काम न चलेगा। नरेद्र० क्या कहें, बना बनाया काम बिगड गया ।। थोड़ी देर तक बातचीत होती रही, इतने में बहादुरमिह भी आ पहचे । देखते ही नरेद्रसिंह उनके पास गए और व्याकुलता के साथ पूछा क्हो कुछ काम होने का रग है ?" बहादुर० जी नही अब हम लोगो को यहां से जल्द भागना चाहिए, आपके आने की खबर यहां के राजा को हो गई। गिरफ्तारी के लिए फौज आती ही होगी। (जगजीतसिंह की तरफ देख बर) अच्छा हुआ जो छोटे कुमार भी जा गये । नरेद्र० तो क्या क्षत्री हो कर डर के मारे भाग जाएँ । बहादुर० जी बस इस वक्त बहादुरी को तो रहने दीजिए । ऐसे मौके पर क्षत्रीपना नहीं दिखाना चाहिए । बहादुर आपसे भी ज्यादे वहादुर है मगर मौका देख के काम करता है जगजीन वहादुर भाई का कहना ठीक है, ऐसे मौके पर अटकना न चाहिए। बहादुर० अभी घर चत कर तुरत फौज ले कर लौटेंगे । देखिए तो क्या होता है, हाजीपुर के राजा को सुख की नीद कभी जो सोने दिया तो बहादुर १३० नरेद्र माहिती नही ।। ? नरेद्र० बस शेखी की बातें रहने दीजिए, आप लोगो से न कुछ हुआ है न होगा, आप लोग जहाँ जी चाहे जाइये, मै नही जाना। जगजीत० (हाय जोड कर) इस समय ठहरने का मौका नहीं है, आप बस यह एक बात मरी मान लीजिए। नरेद्र (कुछ सोच कर और लम्बी सास लवर) खर ।। य लोग वहाँ से बिहार की तरफ रवाना हुए और सुबह होते होत दस बारह कोस के लगभग निकल गए। इसके आग रास्त ही म एवं सुदर तालाब देखकर नरेद्रसिंह ने स्नान ध्यान से छुटटी पान का इरादा निया, आखिर दो घण्टे के लिए वहाँ ठहरना पड़ा। उसी जगह मौका मिलन पर एका त म जगजीतसिंह ने वहादुरसिंह स हाजापुर का हाल पूछा। बहादुर० (चारा तरफ देस कर) कोई सुनता तो नहीं जगजीन० कोई नही सुनता आप कहिए। बहादुर० बडा ही गजब हुआ । जगजीत (चौंक कर) सो क्या वह दुर० बस कहने लायर बात नहीं है, देवे नरे द्रसिंह अब अपना क्या हाल करते है। जगजीत. तुम्हारी बातें तो होलदिल पदा करती है, ईश्वर के लिए परद वहो क्या हुआ बहादुर० अभी हमे उस बात पर पूरा विश्वास नहीं है। जगजीत ता भी कहने म देर न करो। बहादुर० एक औरत ने महल म पहुच कर काम बिगाड दिया यह हाल तो आपने सुना ही होगा? जगजीत० हा भाईजी ने कहा था। वहादुर० हाय मुना है कि उम औरत न वचारी रम्भा का काम ही तमाम कर दिया और भाग गई। जगजीत० हाय यह क्या गजब हुआ वहार० अभी हम इस बात पर पूरा विश्वास नही होता मगर महा .

नरेद्र मोहिनी एक लाश निकाल कर गगा किनारे जलाई गई इससे विश्वास भी करना ही पडता है। यह बात नरेन्द्रसिंह से अभी मत कहियेगा नही तो गजब हो जाएगा। जगजीत० हाय, बुरा हुआ । मगर तुमने कसे सुना? बहादुर० हमारा दोस्ती वहां के एक बजाज से हो गई है, राजदर्बार स उमका घना सम्बध है, उसी की माफत यह सब बातें मालूम हुई हैं। बहादुरसिंह की बातें सुन कर जगजीतसिंह के चेहरे पर उदासी छा गई और आँखो से आसू की बूदें गिरने लगी मगर इस ख्याल से दि नरेद्रसिंह को पता न लगे उन्होने बहुत जल्द अपने को सम्हाला और मुह हाथ धोकर दुरुस्त हा गए। नरेद्रसिंह अपन पर पहुंचे और फोज दुरुस्त करके हाजीपुर पर चढाई करन की फिक्र म पडे । मगर यह बात मुश्किल थी, क्योकि जगजीतसिंह और' । वहादुरसिंह न रम्भा के मारे जाने का हाल महाराज से कह दिया था। महा- राज को भी इसका भारी गम हुआ खुल कर कुछ कर या कह भी नहीं सकते थे क्योकि इस बात का सयाल था कि अगर नरेद्रसिंह सुनेंगे तो अपना बुरा हाल करेंगे और उनसे छिपाया भी जाय तो क्व त ? नरेद्रसिंह लडाई की तयारी क्यिा चाहते है, उहे रोका जाय तो क्याकर ? क्योकि जब रम्भा ही न रही तो लडाई किसके लिये ? इत्यादि बहुत सी बातो को सोचते हुए महाराज बहुत ही विकल हो रह थे साथ ही इसके बहादुरसिंह का यह कहना भी अजब तरह का खुटका पदा कर रहा था कि अभी रम्भा के मरने का हम निश्चय नही कर मक्त, ताज्जुब नही कोई चालबाजी की गई हो। चाहे कितनी ही कोशिश क्या न की जाय मगर जिगर में घाव करने वाले गम की हालत पिसी तरह छिपाय नहीं छिपती । रम्भा के मरने की खवर अभी तक यहाँ सिफ तीन ही आदमी जानते हैं और तीता ही उस खबर को छिपान की कोशिश कर रहे हैं मगर दासी उनके चहरे का साथ नही छोडती जिसे देख देख नरे द्रसिंह भी बेचन ता रहे हैं लविन उदासी का सबब उह किमी तरह में लूम नहीं होता। रात व समय नरे द्रसिंह मोहती स पिलन के लिए उस मन मे गए जहा पहिले उससे मिल थे । इह देख मोहनी बरत खुश हुई और बड़ी सातिर और . १३२ नरेद्र-मोहिनी मुहब्बत से पेश आई। मोहनी० आप तो कह गए थे कि बहुत जल्द लौटेंगे। नरेद्र० हो उम्मीद तो ऐसी ही थी मगर दर हो गई। मोहनी० रम्भा को ले आये? नरेद्र० नही। मोहनी. सो क्यो? नरेद्र. वह तीव जो वहादुरसिंह न की थी दुरुस्त न उतरी, अव फौर लेकर जाना पड़ेगा। बहुत देर तक इन दोनो में बातचीत होती रही। जहाँ तक हो सका मोहनी ने मुहब्बत जताने मे मोई बात उठा न रखखी । अपने हाथ से कई चीजें खाने वी बना नरेद्रसिंह को भोजन कराया और नित्य मिलने का वादा करा के विदा किया। २७ आधी रात से ज्यादे जा चुकी है । एक मु दर सजे हुए कमरे मे पलग के ऊपर बचारे नरे द्रसिंह बीमार पड़े हुए हैं। महाराज उदयसिंह और कुवर जगजीतसिंह सुस्त और उदास उनके पास बठे हैं । वहादुरसिंह भी एक तरफ बठ रो रहे है । कई हकीम और वद्य भी दवा इलाज को फित्र में लगे हुए है मगर बीमारी क्या है इसका पता ही नहीं लगता। जाहिर मे तो पेट और क्लेजे में जलन की शिकायत करते हैं । चेहरा जद पर गया है घटे घटे बाद के होती है मगर सिवाय खून के और कुछ नहीं निकलता। सभी के चेहर पर उनासी छाई हुई है। लोग दौड धूप कर रहे है । इस समय किसी के आने जाने की रुकावट नहीं हैं जिसका जी चाहे आवे-जाये कोई कुछ नहीं पूछता। ऐसी ही अवस्था मे लोगों ने देखा कि हाथ म कागज का एक मुटठा लिये हुए मोहनी उस कमरे में घुस आई और राजा उदयसिंह के हाथ म कागज का मुटठा देकर दूर खडी होकर बोली 'मुझे ऐसी अवस्था म इस ढग स यहा पहुँचे हुए देख आपो आश्चय होगा मगर मैं इसका सबब और इसके अतगत जा जो बातें छिपी हुई हैं जुबानो न कह पर यह कागज का मुटठा आपके हाथ मे देती है । इसे किसी ऐसे के हवाले कीजिये जो शुरू से आखीर तक कवी नरेद्र मोहिनी आवाज में पढ़ के सुना ८ । मैं पुकार पर लोगो से कहे देती है कि सर लोग ध्यान देकर सुनें कि इस कागज मे क्या लिखा है और मालूम करें कि माहनी कौन थी और इस दुनिया मे आकर उसने क्या किया | अफसोस, आज वह दिन है कि हमारा आदमी रोयेंगे और मोहनो को अति मुझको गालिपा देंगे। खर मैं इसी को गनीमत समझती हूँ क्योंकि ये सब काटे मेरे ही बोये हुए हैं और सब से पहिले इसका फल भोगन व लिये मैं तयार हूं।" इस समय मोहनी की अभीब सूरत थी, सर के बाल विसरे हुए थे, आसें मुख हो रही थी और वोलत समय होठ कोप रहे थे पर उसकी विचित्र बातो ने समा का ध्यान अपनी तरफ सैच लिया। राजा उदयसिंह, नरेद्रसिंह, जगजीत- सिंह और बहादुरसिंह के दिल म इस समय क्या-क्या बातें पैदा हो रही थी उनका समझना मुश्विल है। राजा उदयसिंह न वह कागज का मुटठा मोहनी के हाथ से ले लिया और पहिले स्वय सालकर देखा । यह मुट्ठा बहुत लम्बा और न मपत्री के तौर पर लपेटा हुआ था। इसम कई बद लिखे हुए कागज के गोद से नवरवार विप- काय हुए थे। इसम पहिला बद कागज का जो सब से ऊपर था स्याह रोश नाई स और इसके बाद कई धद लाल रोशनाई से लिखे हुए थे। राजा उदय- सिंह ने वह कागज का मुदठा मुभी के हाथ मे दिया और ऊचे स्वर से पढने के लिये कहा । मुशी न पढना शुरू किया। पहिले जो कुछ स्याह रोशनाई से लिखा हुमा या यह था "इस कागज के पढने से आप लोगो को मालूम होगा कि मैंने इस राज्य के साथ बडी भारी बुराई की है। ऐसी अवस्था मे आप लोगो को पहिले यह मालूम होना चाहिये कि मैं किसकी लडकी हूँ और मेरे वाप ने इस दुनिया मे अपनी करतूतों का क्या बुरा फल उठाया था। इसके बाद आपको मातूम होगा कि मैंन औरत होकर क्या-क्या किया । मेरे बाप ने अपनी जिन्दगी का हाल स्वय लिखा था, उसके बाद जो कुछ कसर रह गई थी उसे मैंने पूरा किया और उसी में अपना हाल भी मिला कर यह मुठ्ठा पूरा किया। इसमे जहाँ नक लाल रोशनाई से लिखा हुआ है वह मेरे पिता के हाथ का लिखा है और पहिल उसी को पढना मुनासिब होगा, तथा उसी ढग से मैंने इस लेख का सिलसिला दुरुस्त भी या है।"

। नरेद्र-मोहिनी लाल रोशनाई म जो कुछ लिखा था वह यह था "मेरा नाम हमारीसिंह है । मैंने अपनी करनी से जो कुछ तकलीफें उठाई सक्षेप में लिख कर एक ठिकाने रख देना चाहता हू । इसमे सदेह नहीं कि इस फागज के पढने वालो पर मेरो बुराई पुल जावेगी और मैं बदनाम हो जाऊगा मगर यह समझ पर कि मेरे इस हाल को पढ पर लोगो को नसीहत होगी और वे वस काम न करेंगे जिनकी बदौलत मैंने तकलीफें उठाई और अभी तक जान का खौफ बना ही है में ऐसा महसूस करता हू । मैं नहीं कह सकता कि मेरी जिन्दगी का आखिरी दिन आज होगा या कल । मेरे पिता मेरे लिये पचास हजार की आमदनी की जमीदारी और बहुत कुछ दौलत छोड गए । मेरी शादी उहोने अपनी जिदगी ही मे कर दी थी, मगर मरी औरत बदसूरत थी इसीलिये मैं उससे मुहब्बत नहीं करता था। मरी कवस्था उस वक्त बीस वप को यी जब मैं अपने बाप को दौलत का मालिक ।हुआ। मेरे यहाँ कई लोडियां थी जिनम से एक लौंडी जिसका नाम शिवकुअरी या बहुत ही खूबसूरत और हसीन थी। मैं उसे बहुत प्यार करता और यही सबन था कि मेरी बदौलस उसे गहने कपडे की परवाह न थी। "शिवकु अरी किसी दूसरे शहर या इलाके की रहने वाली थी। हमारे यहा वह केवल अपनी बूढी मां के साथ आई थी और रहती थी। जब उसकी मां मर गई मैं बहुत खुश हुआ और शिवकु अरी को अपनी जोरू के समान मानने लगा । हाँ यह कहना भूल गया कि शिवकु अरी भी मुझसे मुहब्बत रखती थी और हरदम मेरी खुशी के सामान मे लगी रहती थी। "शिवकु अरी का हाल सुन कर मेरी स्त्री को बड़ा ही रज हुआ और उसने मुझे यह कह के धमकाया कि अगर तुम इस लौंडी को यहाँ से न निका- लोगे तो मैं बिरादरी मे तुम्हारी करतूत का हल्ला मचवा दूंगी। मेरे लिये यह धमकी बहुत भारी थी क्योकि मैं अपनी विरादरी का पच था । 'शिवकु अरी की मुहब्बत मैं किसी तरह कम कर नही कर सकता था। मैं चाहता तो अपनी स्त्री को जहर दिलवा कर तय कर देता मगर ऐसा करने से जव बिरादरी वालो को मालूम होता कि मेरी स्त्री मर गई है तब जबदस्ती मेरी दूसरी शादी कर दी जाती जो मुझे मजूर न था। मुझे तो शिवकु अरी ही को अपनी औरत बना कर रखना था इसलिये यह कारवाई न कर सका, । मरेन्द्र-मोहिनी हाँ तीथयात्रा का बहाना करके अपनी स्त्री को बाहर ले गया और एक ऐसे ठिकाने सपा आया कि किसी को खबर न हुई और तब उस नेक औरत की जगह मैन हरामजादी शिव अरी को दे दी । कई तरकीबें ऐसी की गई कि बिरादरी वालो को मेरी औरत के मरने का हाल मालूम नहीं हुआ और वे लोग बिल्कुल न जान सके कि मेरे पर मे मेरी व्याहता पत्नी है या कोई दूसरी । मगर अफसोस, पोडे ही दिन याद कम्बस्त शिवकु अरी ने जहर उगलना शुरू किया और अपनी बदचलनी का तमाशा अच्छी तरह दिखाया जिसका हाल में आगे चल कर लिखता हूँ। "गयाजी से थोड़ी दूर पर अपनी अमलदारी में मैंने एक बाग और एक मकान बनवाया और उसका नाम 'ऐशमहल' रख कर उसी म शिवकु अरी के साथ खुशी-खुशी दिन बिताने लगा। 'सात वष ये अदर शिव अरी से तीन लडकिया पदा हुई । बढी का नाम केतकी, मझली का नाम मोहनी, और सबसे छोटी का नाम गुलाब रक्खा गया। धीरे-धीरे शिवकु बरी को बुरी चालचलन मेरे दिल मे खटकने लगी और मुझे मालूम हो गया कि यह कई नीच लोगो मे मुहब्बत रखती है जिसका हाल खुलासे तौर पर यहा लिखना मैं पसन्द नहीं करता। "शिवकु अरी को भाजमाने के लिए एक दिन देहात पर दौरे जाने का बहाना करके मैं घर से निकल गया और रात को बेमालूम तौर पर लौट आया ! नौकरों म अपने आन की पर्चा न होने दी। सीधा मकान के अंदर चला गया और सीढी पर धीरे धीरे पर रख ऊपर की मरातिव को चला। यकायक, मेरे कानो मे किसी के साथ बातचीत की आवाज आई जिसे मैं अच्छी सरह समझ नहीं सकता था। धीरे-धीरे कदम दवाये हुए ऊपर पहुँचा और कमरे के पास जिसका दरवाजा बदया जा कर खडा हो कान लगा कर सुनने लगा। अब साफ मालूम हो गया कि शिवकुअरी किसी से बातें कर रही है। पहिली बात जो मैंने सुनी यह थी "जो कुछ तुमने कहा मुझे मजूर है, मैं खूब चिल्लाऊगी जिसम मुझ पर कोई शुबहा न हो फिर तुम्हारे साथ इसी महल में ऐश करूंगी 'इससे ज्यादे मैं कुछ सुनने न पाया--गुस्से से कांपने लगा एकदम किवाड मोल अदर जा घुसा और अपने पलग पर एक आदमी को लेटे और शिवकुअरी 14 नरेद्र मोहिनी को उसके सर मे तेल लगाते देखा । मगर मैं उस दश्य को अच्छी तरह देख न सका । मैं नही जानता था कि मेरे लिये यहाँ बहुत कुछ सामान इक्टठे हो चुके हैं। चौखट से अदर पैर रक्खा ही था कि पीछे से आकर किसी ने मेरे गले मे कपडा डाल दिया और एक झटका देकर इस तरह खंचा कि मैं बदहवास होकर पीठ के बल गिर पड़ा । घबराहट और चोट के सदमे से एक्दम बेहोश हो गया और जब होश मे आया तब अपने को एक तहखाने मे बद पाया । मैं नही कह सकता कि वह समय रात का था या दिन का । इस तहखाने की दीवारें सगीन थी और इसकी महराबी छत बहुत नीची थी। एक तरफ आले में चिराग जल रहा था। मेरे हाथ-पर खुले थे। मैं घबडा कर उठ खडा हुआ और धीरे धीरे टहलने लगा। इस कोठरी म दो तरफ दो दर्वाजे थे खि हे खोलकर बाहर निकलने का इरादा किया। पहिले एक दर्वाजे की तरफ गया और खोलने की कोशिश की, मालूम हुआ कि बाहर स बाद है क्योकि अदर की तरफ कोई जजीर या सिटकिनी बर वरने के लिये न थी । लाचार लौट आया और दूसरे दर्वाजे की तरफ गया। "यह दर्वाजा अदर से बद न था जिससे मैं आसानी से खोल सका मगर उस तरफ झांकने से बिल्कुल अघेरा पाया, लाचार फिर लौटा और हाथ मे चिराग लेकर उसके अदर गया। छोटी-सी कोठडी नजर पड़ी जिसमे नीचे उतर जाने के लिए सीढिया बनी हुई थी। मैं नीचे उतर गया मगर वहाँ की कफ्यित देख एक-दम कांप उठा और थोडी देर के लिए बदहवास हो दीवार से हासना लगा ये बठ गया। थोडी देर बाद अपने को सम्हाल कर फिर उठा और घूम घूम कर देखने लगा । यह कोठडी बहुत लम्बी-चौडी थी, चारो तरफ हडिडयो के ढेर लगे हुए थे, बीच मे एक मगममर का चबूतरा या जिसके ऊपर लोहे की एक मूरत आदमी के कद से बडी बनी हुई थी। उसके दोनो हाथ अन्दाज से भी ज्यादे लम्बे थे। यह मूरत बडी भयानक थी। और इसके चेहरे की तरफ निगाह करने से हर मालूम होता था। इस मूरत के तमाम पदन मे दोहसे धारवाले नुकीले चाकू लगे हुए थे और आगे वाला हिस्सा तो चाकुओं से एक दम भरा हुआ था। 'इन चमचमाते हुए चाकुओ और मूरत के सिवाय चारो तरफ हडिडयो और मुर्दो के ढांचो को देख मैं कांप गया, दिल मे तरह-तरह की बातें पदा नरेद्र मोहिनी होने लगी ठहरने की हिम्मत न पडी, डरता और कांपता हुआ वहां से भागा और उसी कोठड़ी मे आकर बैठ रहा जिसमें बेहाशी दूर होन के बाद अपने दो पाया था। "मुझे विश्वास हो गया कि यह जरूर ऐसी जगह है जहाँ आदमी बडी बेदर्दी के साथ मारा जाता है । इस खयाल के साथ ही मेरा सिर घूमने लगा और मैं सोचने लगा कि क्या मैं भी यहाँ इसी लिए लाया गया है | वेशक ऐसा ही होगा । इसमे कोई शक नही कि यह काम शिवकुमरी के लगाव से किया गया है । इसके साथ ही में उस समय की बातो को सोचने लगा जब अपने मकान पर जबदस्ती और बेबस करके गिरफ्तार किया गया था। "इहीं सब बातो को बठा सोच रहा था कि सामने वाला दर्वाजा खुला और दो आदमियो के साथ शिव अरी आती हुई दिखाई पड़ी। उन दोनो आदमियो की सूरत से बदमाशी और बेदर्दी साफ मालूम होती पी। उनका काला रग, स्याह चढी हुई मू, मुख आँखें और उलझे हुए घने बाल उनकी दुष्टता का परिचय दे रहे थे। ऊपर लिखी बातो के सिवाय क्मर का जांघिया और हाथ की भुजाली उ हे साक्षात् कान रूप ही बनाए हुए थी। "मगर आश्चम यह है कि ऐसे समय मे उन दोनो आदमियो के साथ रहने पर भी शिवकु अरी में चेहरे पर डर, घबराहट या उदासी का कोई निशान नहीं पाया जाता था बलि वह एक तरह पर खुश मालूम होती थी । तीनो आदमी मेरे सामने भावर बठ गए और शिवकु अरी मुझसे बातें करने लगी। शिव० अफसोस कि मैं आपको ऐसी अवस्था मे देख रही हूँ। मैं मगर तुम्हारी सूरत से किसी तरह का रख्न नहीं पाया जाता है । शिव० ठीक है, मैं आपको इस कंद से छुडा सकती हू, मगर एक शत पर। मैं यह क्या शिव तुम्हारे बाप का लिखा हुआ जो वसीयतनामा है वह मुझे दे दो और अपन हाथ से एक वसीयतनामा दूसरा मेरे नाम वा लिख कर मुझे दे दो जिसके जरिए मैं तुम्हारी कुल जायदाद की मालिब बन सकू, क्योकि तुम्हारे बाप ने जा वसीयतनामा लिखा है उसके जरिए से तुम्हारे बाद तुम्हारा बहका 7 १३८ नरेद्र मोहिनी और अगर लडका न हो तो तुम्हारा चचेरा भाई मालिक बन सकता है, तुम्हारी औरत या तुम्हारी लडकी को सिवाय खाने पीने के और कुछ नही मिल सकता। मैं (त्रोध से) क्या तुमने इसी मतलब से मुझे ऐसी हालत मे डाल दिया है ? शिव० बेशक। मैं हाय मुझे तुझसे ऐसी उम्मीद कभी न थी । मैं तुझे अपना समझता था । अफसोस 11 शिव० रडियो या सुरतिनो को अपना समझना बिल्कुल नादानी है और उनसे किसी तरह की भलाई की उम्मीद रखने वाला पूरा बेवकूफ है । मैं (जोश मे आकर) चाहे मेरा सिर काट लिया जाय मगर मैं ऐसा कभी नहीं कर सकता । साथ ही अगर जिदगी है तो जरूर तुझसे इसका बदला शिव. (हसकर) अभी जिन्दगी की उम्मीद तुम्हे बाकी है । मेरा कहना न मानकर तुम कभी जिदा नहीं रह सकते। इसके साथ ही उन दोनो आदमियो मे से एक ने मुझे डपट के कहा, 'यह न समझना कि तुम सहज ही मे मार डाले जाओगे, तुम्हारी जान बडी तकलीफ से ली जाएगी । अच्छा देखो मैं तुम्हें मौत का मजा दिखाता हूँ।।' "इतना कहकर उन दोनो ने मुझे मजबूती से पकड लिया और घसीटते हुए तहखाने में ले जाकर उस तेज चाकुओ से भरे हुए मूरत के सामने सडा कर दिया जिसका हाल मैं ऊपर लिख चुका हू और जिसे मैं तहखाने का दर वाजा खोल पर खुद ही देख आया था। उन दोनो ने कहा देखो, एक पेच घुमाने स इस मूरत मे इतनी ताकत आ सकती है कि तुम्हें दोनो हापा से अपनी छाती के साथ लगा से और ये सब तेज चाकू तुम्हारे बदन म घुस जायें । हम लोग ऐसा कर सकते हैं और करेंगे कि तुम्हें उसी हालत म छोडकर चले जाय और तुम इम मूरत पे साथ लगे हुए तहप-तड़प कर मर जाओ। कोई तुम्हारे पिल्लान की आवाज भी नहीं सुन सकता । अब तुम्हीं सोच सो कि अगर तुम मारे जाओगे तो क्सि तकलीफ स तुम्हारी जान जायगी!!" "मैं यह बात सुनकर बदहवास हो गया और घोडी देर तक अपने मन नरेन्द्र मोहिनी १३६ रहा, लेकिन यकायक मुझे एक बात याद आ गई जिससे मेरी बदहवासी जाती रही और मुझे अपनी जिदगी की कुछ कुछ उम्मीद हो गई । मैने कहा खैर जो कुछ तुम लोग कहोगे मैं वही करूंगा।" इतना सुन वे लोग कुछ खुश हुए और मुझे फिर उसी कोठडी मे ले आए जहाँ मैं पहिले था। शिव० अच्छा अब बताओ तुम्हारे बाप का लिखा हुआ वसीयतनामा कहाँ है ? उसे पाने के बाद मैं कागज, कलम दवात लेकर तुम्हारे पास आऊगी और तुम दूसरा वसीयतनामा लिख देना, बस फिर तुम छोड दिये जाओगे । मैं वह वसीयतनामा मेरे पुराने खिदमतगार रामदीन के पास है, तुम उससे ले लो। शिव० वह मुझे कभी न देगा जब तक कि तुम एक पुर्जा उसके नाम वा न लिख दोगे। तुम उसे कहना कि वह वसीयतनामा दे दो जिसके साथ तीन सौ तेसीस रुपये तेरह आने की थैली तुम्हारे सुपुद की गई है । शिव० अगर इतना कहने से भी वह न दे, तब तो जो चाहे मेरी सजा करना। शिव० अच्छा आखिर मेरे कब्जे से निकल कर कहाँ जाओगे यह भी मैं करके देख लेती हूं' मिला। "इसके बाद वे तीनो वहा से चले गए और दरवाजा बद करते गएं । भूखे प्यासे मुझे फिर उसी तहखाने मे रहकर सोचने और खयाल दौडाने का मौका "मैंने सोच लिया था कि अगर वमीयतनामा न दू गा तो बेशक बेदर्दी के साथ मारा जाऊगा और वसीयतनामा देने और दूसरा लिख देने पर भी ये लोग मुझे जीता न छोड़ेंगे क्योकि बिना मुझे मारे वे लोग वसीयतनामे का सुख नही भोग सक्ते यही सोच कर मैंने दूसरी चालाकी खेली थी कि शायद इस तीन 'रामदीन खिदमतगार मेरे पिता ने समय का था। वह बहुत ही नेक, होशियार और दूरअदेश था। मेरे पिता उसे बहुत ज्यादा चाहते और मानत थे। अपनी जिदगी मे मेरे पिता ने उसे एक भेद समझा रक्खा था । उस भेद अथवा इशारे की बदौलत कई दफे पिताजी की जान बच चुकी थी क्योकि भारी से जान बच जाय ।

१४० नरेन्द्र मोहिनी जिमीदार और अमीर होने के सबब उनके बहुत से दुश्मन थे। वही इशारा रामदीन ने मुझे समया रक्खा था और ताकीद कर दी थी कि तुम्हारी चाल- चलन अच्छी नहीं है और मेरी नसीहत भी नहीं मानते हो ताज्जुब नहीं कि कभी किसी आफ्त मे फस जाओ। ईश्वर न परे अगर ऐसा मौका पड़े तो तुम भी अपने बाप की तरह हमार साथ उसी इशारे का बर्ताव करना । वही बात मुझे याद आ गई जिसस जिदगी की कुछ उम्मीद हुई और वही तौब मैंने की। साथ ही यहाँ मैं यह भी लिख देना चाहता हूँ कि रामदीन मेरा सब हाल जानता था और किसी समय भी मेरी तरफ से देफिक्र नही रहता था। "इसके बाद शिवकु अरी और रामदीन से जो बातें हुई और रामदीन ने अपनी कार्रवाई का जो कुछ हाल मुझसे कहा वह लिखता हूं 'जब मैं इलाके पर जाया करता था तो शिवकु अरी अक्सर तीन-तीन चार चार घण्टे तक सिफ दो-तीन लौडियो को साथ ले ऐशमहल के आस पास जगल और मैदान मे घूमा करती थी । अबको दफे भी मैं हसब मामूल इलाके पर गया हुआ था मगर मेरे चुपचाप लौटने का हाल किसी को मालूम न हुआ और यकायक शिवकु अरी के जालिम पजे म फस गया। मैंने शिवकु अरी को (जब ऐशमहल में रहने लगा या) घोडे पर चढना अच्छी तरह सिखाया था क्योकि वहा एका त में और मण्डली या बिरादरी से दूर उसे घोडे पर अपने माथ लेकर घूमने-फिरने में कोई हज नही समझता था। मेरी गैरहाजिरी मे शिवकु अरी घोडे पर सवार हो हवा खाने के लिए बाहर गई और सात घण्टे के बाद लौटी। उसका यह काम रामदीन को बहुत ही बुरा मालूम हुआ सो भी ऐसी हालत म जबकि वह बराबर ही उसस बुरा मानता था और उसे मेरे लिये एक क्लक समझता था । "मुबह के वक्त शिवकु अरी अपने कमरे मे बठो कुछ सोच रही थी । योडी देर बाद उसने लौडी भेज कर रामदीन को बुलवाया और उसे अपने पास बैठा पर इधर-उधर की बातें करने लगी। योड़ी ही देर में एक लोडीन अज किया कि सरकार का एक आदमी देहात पर से आया है और एक खत लाया है मगर मुझे नहीं देता है। शिव० (रामदीन से) तुम उसके हाथ से खत ले लो। रामदीन बहुत अच्छा।

नरेन्द्र-मोहिनी रामदीन बाहर गया और सरसरी निगाह से उस आदमी को सिर से पैर तक देखने बाद चिट्ठी से कर शिवकु अरी के पास आया । शिव भरी ने चिठी पढकर रामदीन से कहा, सरकार ने हम वही बुलाया है । राम. यहाँ बुलाने की क्या जरूरत थी? शिव० क्या मालूम | और तुमसे एक चीज लेते आने के लिये भी लिसा राम० वह कौन-सी चीज? शिव० यसीयतनामा, जो उनके पिता ने लिखा था। राम. वह वसीयतनामा उही के पास है । मुझे उन्होने कब दिया जो मागते है ।। शिव• नही तुम्हारे ही पास है। लो चिटठी पढो, देखो उन्होंने लिखा है कि तीन सौ तेतीस रुपये तेरह आने को थली के साथ जो वसीयतनामा रामदीन के पास है सो उससे लेकर चली आओ। 'तीन सौ तैतीस रुपये तेरह आने' का नाम सुनते ही रामदीन काप उठा और एक दफे गौर से शिवकु अरी की तरफ देखकर बोला, ' अच्छा ठहरो मैं वसीयतनामा लाकर तुम्हे देता हूँ मगर यह चिट्ठी मुझे दे दो जिसमे सरकार यह न कहें कि हमने वसीयतनामा नही मगाया था ।" शिवकु अरी ने चिटठी रामदीन को दे दी, चिटठी लेकर रामदीन बाहर आया और उस आदमी को जो चिटठी लाया या साथ लेकर एक तरफ चला गया । "दो घण्टे बीत गए मगर रामदीन न आया । शिवकु अरी न उस आदमी लाया पा अपने पास बुला लाने के लिए लौंडी भेजी। लौंडी वापस आकर जवाब दिया कि वह आदमी बाहर नहीं है, रामदीन उसे अपने गया । यह सुनकर शिवकु अरी कुछ सोच मे पड गई और देर तक गौर करती रही आखिर कमरे के बाहर निकल आई और एक लौंडी को हुक्म दिया कि बहुत जल्द घोडा सा कर ले आ| लौंडी घोडा क्सवाने के लिए चली गई मगर बहुत जल्द वापस आकर बोली, साईस का तो आज दिमाग हो नही मिलना, वह कहता है कि मैं इस समय घोडा कसकर न लाळगा । शिव० (लाल आँखें करके) क्या उसकी इतनी हिम्मत हो गई !" को जो चिट्ठी साय लाडी जी हां।

१४२ नरेद्र-मोहिनी १ शिव० अस्तबल के दारोगा को तैने इस बात की इत्तला की थी? लोडी की थी मगर वे भी कुछ नहीं सुनते, कहते हैं कि बिना हुक्म राम दीन के घोडा नही कसा जा सकता। शिव० (दांत पीस कर) रामदीन कौन है जो "इतना कहते कहते वह रुक गई जसे उसे यकायक कोई बात याद आ गई हो। शिवकुअरी दूसरे कमरे में चली गई और हवाखोरी की पोशाक पहिन, कमर में खगर छिपा मुह पर नकाब डाल एक लोंडी को साथ ले हाते के बाहर चली, मगर दरवाजे पर रोक दी गई । वे ही आदमी जो उसका हुक्म मानते थे और उसके नाम से कांपते थे इस समय मुकाबला करने को तयार हो गए और साफ कहने लगे कि आप इस फाटक के बाहर नहीं जा सकती। लाचार शिवकुअरी वहां से लौटी और अपने कमरे मे आकर बठ गई। थोडी ही देर बाद एक लपेटा हुआ कागज हाथ मे लिये रामदीन भी आ पहुंचा। राम० वसीयतनामा तो मैं ले आया हूँ। शिव० (हाय बढाकर) मेरे हवाले करो। मैं आपके साथ चलता हूँ अपने हाथ से सरकार को दूगा। शिव० क्या मेरा एतबार नहीं है ? राम नही बिल्कुल नही । (कुछ सोचकर) खर बात बढाने की कोई 'जरूरत नहीं, अब साफ-साफ बता दो कि सरकार कहाँ हैं ? शिव० (कुछ घबडा कर) मैं क्या जानू सरकार कहाँ पर हैं ? रामदीन ने जोर से ताली बजाई जिसकी आवाज उस ऊचे छत वाले कमरे मे गूज गई और इसके साथ ही हाय मे कुछ लिए दो आदमी उस कमरे में घुस आये जिहें देखते ही शिवकुअरी ने पहिचान लिया कि ये दोनों रामदीन के लडके हैं। रामदीन (शिवकुअरी से) देखो अब साफ-साफ बता दो नहीं तो तुम्हारी दुगत की जायगी । तुम यह न समझना कि तुम इस घर की मालिक हो। मैं बखूबी जान गया कि तुमने मेरे मालिक को धोखा दिया है। जो आदमी खत लाया था उस मैंने कब्जे में कर लिया और सजा देकर सब हाल मालूम कर लिया।

" मरेन्द्र मोहिनी शिव० रामदीन । मालूम होता है तुम पागल हो गये हो।। इतना सुनते ही रामदीन ने अपने दोनो लडको को कुछ इशारा किया। उन दोनो ने शिवकुअरी को मुश्क बाँध ली और बेंत से मारना शुरू किया। 'मैं अपना हाल बहुत ही मुख्तसर से लिखा चाहता है इसलिए इतना ही लिखना बहुत है कि शिवकुअरी और उस नकली चिटठी वाले आदमी को मारपीट कर रामदीन ने मेरा कुल हाल मालूम कर लिया और जिस तरह बना मुझ उस कद से छुडाया। 1 "मैं उस तहखाने मे क्सम खा चुका था कि अगर यहा बच कर किसी तरह निक्ल् गा तो शिवकु अरी से वतरह समझू गा। घर पहुच मैंने अपनी पसम पूरी की। "ऐशमहल मे मैंने एक तहखाना बनवाया था जिसम अपना खजाना रक्षा करता था । शिव अरी को उसी तहसाने मे ले गया और कुत्तो से नुचवा कर उसे यमलोक की तरफ रवाना किया। साफ करा कर उसकी हडिडयो का ढांचा उसी तहखाने में रखवा दिया जो उम्मीद है कि बहुत दिन तक रहेगा और किसी न किसी को मेरे हाल की खबर देकर कुलटा स्त्रियो से बचन के लिए नसीहत करेगा क्योंकि यह कागज भी मै उसी के साथ रखता हूँ।" यहाँ पर मोहिनी के बाप वा हाल जो उसने अपने हाथ मे सुख रोशनाई से लिखा या समाप्त हो गया। अब उस लेख का यह हिस्सा पढा जाने लगा जो स्याह रोशनाई से मोहनी ने अपन हाथ से लिखकर पूरा किया था और अब चिपकाया था। इस जगह महाराज ने उस मुशी को जो पढ रहा था दम लेने के लिए कहा क्योकि हजारीसिंह के विचित्र हाल ने उनके कोमल कलेजे को दहला दिया था। नरेद्रसिंह भी पलग पर पडे-पडे इस अनूठे किस्से को सुन के बहुत परेशान हुए । मोहनी की तरफ से उहें नफरत हो गई यहा तक कि मुह फेर लिया और दूसरी तरफ देखने लगे । वह तकलीफ से बहुत ही बेचैन हो रहे पे, दम दम भर पर दवा दी जा रही थी मगर नन्ज कमजोर ही होती जाती थी, फिर भी उहोने म शी की तरफ दखकर आगे पढने का इशारा किया और "मेरा नाम मोहनी है । मैं हजारीसिंह की मझली लडकी हूँ। मेरी बही मुशो ने पढना शुरू किया १४४ नरेद्र मोहिनी बहिन का नाम केतकी और छोटी का नाम गुलाब है। यो तो मां के मिजाज का असर हम तीनो बहिनों पर पहा मगर केतकी उन ऐबो से अच्छी तरह भरी हुई थी जो दुनिया मे भले लोगो के हिसाव बुरे गिने जाते हैं। हमारे बाप हजारीसिंह को भुनासिब तो यही था कि हमारी मां के साथ-साथ हम तीनों बहिनो को भी मार डालता क्योंकि बुरो की औलाद और हरामी पैदाइशों से किसी तरह की भलाई की उम्मीद नही हो सकती, मगर हमारे बाप ने हम लोगो पर रहम किया और परवरिश कर के बडा किया । योहे ही दिन बाद केतकी जवानी पर आई और उसकी शादी की गई, मगर उसकी चालचलन ने हमारे बाप को होशियार कर दिया और उसने निश्चय कर लिया कि इन तीनो लडकियो से भी सिवाय बुराई के भलाई को उम्मीद किसी तरह नहीं हो सकती, इन तीनो को भी खपा ही देना चाहिये । "न मालूम किस तरह से अपने बाप का इरादा केतकी ने मालूम कर लिया और वह अपनी जान बचाकर उनकी जान लेने पर मुस्तद हो गई, मगर यह समझ कर कि उनके मरने बाद जायदाद का मालिक उनका भाई या भतीजा होगा, रुकी और पहिले उही दोनो की जान लेने पर मुस्तद हुई । आखिर उन लोगो से मेल और दोस्ती बढाकर जिस तरह हो सका एक ही दफे जहर दिलवा र उन दोनो का काम तमाम किया और इसके दो ही चार दिन बाद अपने खसम को मारा, तथा तव रसोइये ब्राह्मण से मिल के अपने बाप की जान ली। हम तीनों बहिनें अपने बाप की जायदाद की मालिक हुई, मगर केतकी अरेली ही सुख भोगना चाहती थी इसलिये हम छोटी दोनो बहिनो का रहना भी उसे नापस द हुआ और उसने बदमाशो के हाप यह काम सुपुद किया। मेरी और गुनाव की जान नरेद्रसिंह ने बचाई उसके लिखने की काई जरूरत नही क्योकि यह बात बहुत मशहूर हो रही है और महाराज भी उस अच्छी तरह जानते होगे। नरेद्रसिंह का अहसान मुझे मानना चाहिए था मगर नहीं, अब में उनका महसान नही मान सकती और उहैं किसी तरह माफ भी नहीं कर सकती। अपनी बडी बहिन से तो बदला ले ही लिया और उसे जहनुम मे पहुँचा ही दिया मगर नरेद्रसिंह को भी अपनी प्रोखो के सामन दम तोड़ते देखा चाहती हूँ।"

नरेद्र-मोहिनी १४५ मुशी ने यहा तक पढा था कि सभी की हालत बदल गई, क्रोध के मारे बदन कापने लगा, मांखें सुख हो गई तलवारो के कब्जा पर हाथ जाने लगे और दांत पीस-पीस कर मोहनी की तरफ दखने लगे । बडी कोशिश करके महाराज ने अपने को सम्माला और आगे पढने के लिये मुशी को इशारा किया। मुशो ने फिर पढना शुरू किया। नरेद्रसिंह की मुहब्बत देख कर मुझे उम्मीद थी कि मैं उनके साथ ब्याही जाऊगी क्योंकि मैं भी उन पर जी जान से मरती थी मगर जब मैंने सुना कि वे रम्भा के लिये मर रहे हैं तो वह उम्मीद जाती रही क्योकि मैं अपने साथ किसी सौत का होना पसद नही करती और न मुझे यह मजूर ही है । जब मैं स्वय नरेद्रसिंह से मिली और बातचीत की नौबत आई तो मुझे निश्चय हो हो गया कि ये अवश्य रम्भा से ब्याह करेंगे, लाचार मुझे भी क्सम खानी पडी कि रम्भा और नरेद्रसिंह दोनो ही वो इस दुनिया से उठा दूगी। अपनी बडी बहिन केतकी से बदला लेकर और उसे जान से मारकर जब मैं बिहार में अर्थात यहा आई तो गुप्त रीति से नरे द्रसिंह से मिली । उन की बातचीत से यह तो जरूर मालूम हुआ कि वे मुझे भी चाहते हैं और मुझसे शादी करने पर राजी है, मगर साथ ही इसके यह भी निश्चय हो गया कि पहिले वह रम्भा से ही शादी करेंगे और तब मुझसे । खैर मुझे अपनी कसम पर मजबूत रहना पड़ा। "नरे द्रसिंह की जुबानो मालूम हुआ कि रम्भा हाजीपुर में कैद है और बहादुरसिंह भी हाजीपुर में विराज रहे है और वहाँ उहोंने चमेलादाई पर अपना कब्जा करले गप्प उडाई है कि रम्भा के सिर पर चुडैल आती है- इत्यादि जिसमे वहां का राजा रम्भा को निकाल दे और वह सहज ही मे नरेद्रसिंह के हाथ लग जाय । जब नरेद्रसिंह रम्भा को लेने गए तो मैं भी भेष बदल कर हाजीपुर पहुँचौ । अपना नाम सुदर रख कर महल में गई और बहादुरसिंह और चमेला दाई का भेद खोल दिया । वहाँ मेरी बडी खातिर हुई और रम्भा के बगल ही एक कोटडी मुझे रहने को मिली। महल भर की लौडियो पर मैरी हकूमत कायम की गई जिससे मुझे अपना काम करने का बहुत कुछ मौका "रात के समय में अपनी कोठडी से बाहर निकली महल को १४६ नरेद्र-मोहिनी सोता पाया । रम्भा की कोठडी में घुस गई मगर वहाँ बिल्कुल ही अधेरा था। टटोलती हुई रम्भा की चारपाई तक पहुंची और उसे नीद मे बेहोश पाकर खजर से उसका काम तमाम किया। यह खबर उसी रोज चारो तरफ फल गई बल्कि बहादुरसिंह ने भी मुना हो तो ताज्जुब नहीं।" "मुझे महल से बाहर निकलने मे किसी तरह की तकलीफ न हुई। मैं तुरन्त वहां से निकल भागी और नरे द्रसिंह के पहिले यहां आ पहुची। जब नरेद्रसिंह यहां आये तो मुझसे मिले। मैंने अपने हाथो से कई चीजें खाने की बनाई और उहे खिलाया जिनमे ऐसा जहर मिलाया हुआ था कि जिसका असर किसी तरह और किसी भी दवा से दूर नहीं हो सकता। मेरी मुराद पूरी हुई नरेद्रसिंह भी घण्टे-दो घण्टे मे इस दुनियां को छोडा चाहते हैं, अब मैं भी मरने के लिए तयार हूँ जिस तरह चाहे मेरी जान ली जाय कुछ परवाह । नहीं।" इति इस आखिरी लेख पढने और सुनने पर सभी का अजब हाल हो गया। जितने लोग वहां मौजूद ये सभो के मुंह से हाय हाय को आवाज निकलने लगी और सभी के मुह पर उदासी और मुदनी छा गई। महाराज ने अपने दोनो हाथ सिर पर मारे और 'हाय वेटा नरेद्र।" कह के बेहोश हो गए। जगजीतसिंह की आँखो से आंसुओ की नदी बह चली। दीवान, मुत्सद्दी और मुसाहब लोग जो वहां मौजूद थे सभी रोने और चिल्लाने लगे। सब तरफ हाहाकार मच गया। बिजली की तरह यह बात चारो तरफ फल गई। हर तरफ से रोने और चिल्लाने की आवाज आने लगो। धीरे-धीरे नरे द्रसिंह के चेहरे पर भी मुदनी छाने लगी। और नाही ने जगह छोड दी। पाठक, यह मौका बडे ही रंज और गम का है। ऐसे किस्सो का लिखना मुझे पसद नही और न मेरे कलेजे मे इतनी मजबूती ही है। इस समय जो हालत है मैं अपनी कलम से किसी तरह नही लिख सकता तो भी उम्मीद है कि यह भयानर समा अवश्य पाठको की आँखों में घूम जाएगा और वे जान जायेंगे कि यह कसा नाजुक मौका है । बहुनो को दुखान्त नाटक और उपन्यास पसद आते हैं। उन लोगो से प्राथना है कि बस इसके आगे न पढ़ें और इस उपन्यास को दुखात ही समझ कर इसी जगह छोड दें। मगर उन लोगो के लिए जो कोमल कलेजे रखते हैं, जिहें दुख की कहानी नरेद्र मोहिनी १४७ पसद नही, घोडा और लिख देता हूँ। आधे घण्टे में बाहर-भीतर सभो मे यह बात फैल गई और सायत-सायत मे 'हाय हाय' की आवाज बढती गई। महाराज होश मे आये और छाती पर दुहत्या मार मार रोने लगे। नौकरो ने मोहनी की मुश्क बाँध ली और राह देखने लगे कि जरा सा इशारा हो और इसकी वोटी बोटी काट कर कुत्तो को खिला दें। इसी समय दो आदमी सिपाहियाना ठाठ से ढाल-तलवार और खञ्जर लगाये मुह पर नकाब डाले बेघडक भीड को चीरते हुए वहां जा पहुचे जहां नरेद्रसिंह की आखरी हालत देख-देख लोग चिल्ला और रो रहे थे। इन दोना मे से एक ने अपने दोनो हाथ उठाये और चिल्ला कर कहा, "आप लोग चुप रहें, किसी का गम न करें, पौर विश्वास रखें कि नरेद्रसिंह किसी तरह नहीं मर सकते । मैं आ पहुंचा है। आप लोगो के देखते ही देखते रहें आराम करूंगा और थोड़ी ही देर मे यहां खुशी के बाजे बजते होंगे।" इस आदमी के यकायक पहुचने और इस तरह चिल्ला कर ढाढस देने से सभी चौकन्ने हो गए। एक तरह की उम्मीद की झलक सभों के चेहरों पर मासूम होने लगी। महाराज उठ खडे हुए और ताज्जुब के साथ-साप उम्मीद भरी निगाहो से उस आदमी की तरफ देखने लगे । इस समय मोहनी की मुश्कें बधी हुई थी और यह हर तरह से बेबस एक कोने मे खड़ी थी मगर किसी तरह की परेशानी उसके चेहरे से मालूम नहीं होती थी। इस नये आए हुए आदमी के मुंह से निकली हुई बातो को सुन कर वह हँस पड़ी और बोली, "अगर ब्रह्मा भी उतर कर आये तो नरेद्रसिंह को आराम नहीं कर सकते । दुनिया मे ऐसी कोई दवा ही नहीं जो मेरे जहर को दूर कर सके ।" मोहनी की इस बात ने फिर सभी को परेशान कर दिया । जो बुध पोडी- सी उम्मीद बंधी थी यह भी जाती रही, महाराज दोनो हापों से क्लेगा पाम "हाय 1 " करसे बठ गए और आंसू भरी आँखों से उस आदमी यी सरप देखने सगे । उस आदमी ने फिर हाथ उठाकर कहा, 'आप सोग मोहनी गरी यात मुन पर निराश न हो और दिल सगा बर मुनें कि मैं क्या कहता हू। एष समय राभा और उसकी ससी तारा को बेतवीरे यहाँ रहने का अवसर मिना पा। मेनको इन लोगो से हिल मिल गई थी कि उमन अपना रप्ती रप्ती - २४८ नरेद्र मोहिनी कह दिया था। केतकी की एक सखी की जुबानी रम्भा को मालूम हुआ कि केतकी को एक वद्य ने एक विधि ऐसे जहर के बनान की बता दी है कि जिस. के खाने से आदमी किसी तरह नहीं बच सकता। कोई दवा उस जहर के असर को दूर नही कर सक्ती थी, मगर साथ ही इसके उस वद्य ने यह भी कह दिया था कि अगर उस आदमी की जिसे जहर दिया गया हो आराम करने की जरूरत पड हो जाय तो उसे एक रत्ती सखिया खिलाना चाहिए । जरूर है कि इस उल्टी तीब से लोग हिचकेंगे मगर उस जहर को दूर करने के लिए दुनिया में सिवाय इसके और कोई तकीव नहीं है । मुझे यह हाल खास रम्भा की जुबानी ही मालूम हुआ है। मोहनी केतकी की बहिन है, यह उस दवा को बखूबी जानती होगी और इसने बेशन वही जहर नरेद्रसिंह को खिलाया होगा । अव आप बेधडक इहें एक रत्ती सखिया खलावें। इसम कोई शक नहीं ये आराम हो जायेंगे। जव इनकी तबीयत कुछ ठहर जाएगी तो मैं रम्भा का भी हान आप लोगो से कहूगा जिसके मारने मे मोहनी ने धोखा खाया। इतना सुनते ही मोहनी का रंग उड गया उसके चेहरे पर मुदनी छा गई और उसने चीख कर कहा 'हाय ! अब नरेद्रसिंह के मरने की उम्मीद नहीं । अब मुझे अपने मरने का बेशक गम होगा।" उसकी इस बात के सुनने से लोगो को बहुत कुछ उम्मीद हो गई । महाराज ने कहा, "आखिर तो मेरा बच्चा हाप से जाता ही है। अब इस बेचारे नेकमद के कहे मुताबिक तखिया खिलाने में मैं किसी तरह का हज नही सम झता ।" नरेन्द्रसिंह मे बोलने की ताकत न थी मगर आँखें बद किये पडे पडे सब कुछ सुन रहे थे। हुक्म की देर थी। सखिया लाकर नरे द्रसिंह को खिलाया गया। उसने तो अकीर का काम किया। पेट में जाते ही नरेद्रसिंह की आँखें खुल गई मोर नब्ज भी उभड आई । उहोंने घूम कर उस आदमी की तरफ देखा और चाहा कि उसके मुह से अब रम्भा का हाल सुनें जिसका उसने वादा किया था मगर बाप के लिहाज से खुल पर कुछ पूछ न सके। महाराज जिनकी निगाह बरा वर नरेद्रसिंह के चेहरे पर पड़ रही थी इस भाव को समझ गए और उस मादमी की तरफ देख कर बोले, 'तुमने मुझ पर जो कुछ अहसान क्यिा उस का बदला मैं किसी तरह नहीं चुका सकता। मैं अपना राज्य, अपना घर और - नरेद्र-मोहिनी .१४६ अपने लड़कों को भी तुम्हारी नजर करने पर सन्तुष्ट नहीं हो सकता क्योकि तुम्हारा एहसान इससे भी बढा-चढ़ा है। अब उम्मीद है कि रम्भा का हाल भी कह कर तुम रहे-सहे तरदुद को भी दूर करोगे।" इसके जवाब में उस आदमी ने एक दफे अपना सर झुकाया और तब इस तरह कहना शुरू किया, "नरेद्रसिंह जब केतकी के यहां गये थे तो उसे मोहनी समझ कर भुलावे में पड़ गये थे क्योकि दोनों बहिनो की सूरत-शकल एक ही सी पी। यह हाल वहाँ रहने के सबब रम्मा अच्छी तरह जानती थी। जब हाजीपुर राजमहल मे मोहनी पहुंची और रम्भा को निगाह उस पर पड़ी तो वह तुरत पहिचान गई कि यह केतकी की बहिन है । इसके बाद मोहनी ने जो कुछ वहां किया उससे तो रम्भा को उसकी दुश्मनी का और भी पूरा-पूरा सबूत मिल गया। जब मोहनी का डेरा रम्भा के बगल वाली कोठडी में पड़ा तो रम्भा चौंकी और उसने सोचा कि यह जरूर कोई न कोई उत्पात करेगी। रम्भा के घर मे दो चारपाइयां थी, एक पर रम्भा सोती थी और दूसरी पर एक दूसरी औरत जो असल मे रम्भा की निगाहबानी पर छोडी गई थी सोती थी। रात के समय जब रम्भा की निगाहबान औरत सो गई तो रम्भा ने अपनी चारपाई धीरे-धीरे से उठा कर एक कोने मे खडी कर दी और दिया बुझा कर आप उस चारपाई के नीचे जा पडी जिस पर उसकी निगाहबान औरत सो रही थी। यह काम रम्भा ने मोहनी के डर से किया था। रम्भा को आंखो मे नीद न पी और वह बरावर जागती रही।" उस आदमी ने यहां तक कहा था कि मोहनी चिल्लाई और बोली, "हाय- हाय । बेशक धोखा हुआ । मेरे हाथ से दूसरी ही औरत कत्ल की गई और हरामजादी रम्भा चारपाई के नीचे छिप कर बच गई अफसोस, मेरी बिल्कुल कार्रवाई मिटटी हो गई, और जीते जी मुझे अपने कर्मों का फल भोगना । पड़ा !" इसके जवाब मे उस आदमी ने मोहनी की तरफ मुह करके कहा, 'बेशक ऐसा ही हुआ और तेरे पीछे-पीछे रम्भा भी महल से निकल भागी जिसके लिए वह तेरा एहसान मानती है । (महाराज की तरफ देख कर) अब थोडा सा हाल और कहने को रह गया है मगर उसे मैं इतने आदमियों के सामने नहीं कह सकता। उम्मीद है कि आप कुअर जगजीतसिंह, बहादुरसिंह और मोहनी को १५०- नरेन्द्र-मोहिनी छोड कर और समों को यहां से बाहर चले जाने का हुक्म देंगे।" यह सुन महाराज ने समो की तरफ देखा । इशारा पाते ही सब लोग बाहर चले गये और बहादुरसिंह ने भीतर से दर्वाजा बर बर लिया। अपनी इच्छानुसार निराला पाकर उस आदमी से मुह पर से नकाब उतार दूर फेंक दिया और दोडकर महाराज के कदमो पर गिर कर बोला, "मेरा ही नाम रम्मा है । वह कम्बख्त में ही है और मेरे साथ यह मेरा चचेरा भाई अर्जुनसिंह है जो अकस्मात् हाजीपुर म महल से बाहर निकलने पर मुझे मिला था। महाराज, नरेन्द्रसिंह, जगजीतसिंह और बैरवाह बहादुरसिंह की खुशी का भी अब कुछ ठिकाना न था पह सब हाम सुनते ही मोहनी ने इस जोर से अपना सर दीवार पर मारा कि दो टुकडे हो गया और उसको आत्मा अपने पतित देह को छोडकर नरक की तरफ रवाना हो गई। मन्त मेहतमा और मह देना मुनासिब है कि यह हाल सुन कर महल मे गुलाब ने मी छत पर से कूद कर अपनी जान दे दी। चारों तरफ खुशी के बाजे बजने लगे और दो ही चार दिन मे बड़े धूमधाम से मरेद्रसिंह की शादी रम्भा के साथ हो गई। ...

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Narendra Mohani

Author
Babu Devakinandan
Title
Narendra Mohani
File name
Narendra Mohani
Text
OCR done
Citation
1953
Published
2011/03
Publisher
Sharda Prakashan Driyaganj New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
156
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551078
Barcode
4990010031855.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
76YLf0Nd4vz
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