Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shri Antkritdashang Sutram

Maharaj, Pandit Muni Pyarechandji · 2011/07

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श्री मदन्तकृशांग सून्ना
भी भाचार्य विनवचन्द्र शाल भण्डार
[ पायपधारा टीका सहित]
संपासक
भी पताम्बर स्थायीभाषक संघ, नपुर
अनुवादक
भी जन दिवाकर प्रसिद्धवक्ता पण्डित मनि श्री चौथमलजी महाराज के सुशिष्य गणिवये
साहित्यप्रेमी पण्डित मुनि श्री प्यारचन्दजी महाराज
माचार्य भी विनमचन्द्र ज्ञान भापर, गपुर
सेट मिकामल छाटेलाल फर्म के मालिक सेठ रतनलाल मित्तल, लोहामएसरी भागग
प्रथमावृत्ति १००० ]
[ वीरान्द २४६३ विक्रमाव्द १९६३
मृन्य बारह पाने

निवेदन भगयाम् महापीर स्यामी फ मुखायिन स भापित भङ्ग शामों में यह पाठयाँ मा पम्तएत सूम भी है जिस में माठ पग ६ । वर्षभर में कम से कम पफ पार तो इस मायोपान्त पड़सेना प्रत्येक जैनियों का परम कर्तव्य है। इस में राम महापुरषों का उन है जिन्हों न सम्पूर्ण कमों का अन्त कर मुक्ति प्राप्त की है। इनी महापुरुषों के भावों का अनु फारा करम क लिए इसे भाठ दिनों में पहलेमा परमावश्यक है । मुमि महाराज मी प्रायः स को पपण पर्ष के पाठ पमा में प्रत्पर थातुमास में पढ़ते हैं। परन्तु राय मूल पाठ मीर उस का भाषार्थ शर हिन्दी में छपा हुमाही पर्याप्त नहीं था। इमा सिप प्रातस्मरणीय पूज्पपर भी हुक्मीचन्दजी महाराज के पाटानुपाट शाम विशारद बालग्रह्मचारी पूज्यपर धी मनालासजी महाराज के पहाधिकारी शाला घेययान् पूज्य श्री मूवचन्दजी महाराज के समदायानुयायी अगरमम सन रिपार प्रसिश्यक्ता पपिस्त मुनि श्री पीथमसजी महाराज के मुशिम्प साहित्य प्रेमी गरीषर्य पपिएस मुनि श्री प्पारयन्दमी महाराज न मूल अन्त कृत सूत्र को सशोषन कर उस का सरस सुबोध गम्प हिन्दी में मायाय लिमा है। निमा ममे माझाएपोगी समझ कर अपन निजी खर्च से प्रकाशित कराया है और श्री परि वाचनालय लोहामएसरी प्रागरा पा भेंट फिपा। इस फी मामय भी याचनालय की उप्रति में सहायक हो। इसे पड़फर माप अपना मात्मिक लाम उप्रये में, इमा में मैं मरना सौभाग्य समभंगा। लोहामएही, भागरा भापका प्रथम भद्रय पपय पर्वाधिराज सवत् १९९३ रतनलाल जैन मिसल मांगरोल " " प्याघर श्री जनोदय पुस्तक प्रकाशक समिति, रतलाम जन्म दाता भीमान् जैन दिवाकर प्रसिद्ध वक्ता पतिम मुनि भी यमलजी महाराज श्रीमान् सेठ उवेचन्दजी छोटमलजी सा० मूथा उज्जैन स्तम्भ छोटेलालजी जेठमलजी सा० कनरा ( मेघाप) घामान् घामधीर राय यहादुर सठ पुदनमलजा मोतीलालजी सा० जैन पद लालचन्दजी सा० , सूरजमसजी साहय मषानगिज सठ नेमाघम्दजी सरदारमलजी सा० नागपुर यकीश रतनलालजी सा० सर्राफ उदयपुर , सरूपचम्बजी भागचन्दजा सा० कलमसरा कालूरामजी सा० कोठारी ,, पुनमचन्दजी सुभीमालजी सा. न्यायॉगरी , कुवनमलजी सरूपचन्दजी सा० प्यापर यहादरमल यादगिरी सभी सूरजमखजी सा० देषराजजी सा० सुराना सम्मतमलजी सामागमली सा० माथूलालजी छगमलालजी सा० दूगर मल्हारगढ़ सरचक , ताराचन्दनी शाहजी पुनमिया सादड़ी धेमलमी लालचन्दमी सा० गुलेनगर श्री महावीर जैम नवयुवक मरस, चितौड़गढ़ लाला रतनसासनीसा०मित्तल श्री श्वे० स्था० श्रीसघ, पड़ी सावड़ा (मेषा) " " " प्याघर " " ध्यावर जापरा " " प्रागरा द्वाधरस श्रीमती पिस्तापाई, लोहमारा भागय श्रीमान् सेठ इन्दरमलजी जैन राजीपाई, परोरा सी० पी० मेम्पर मनारपाई, सोहामरी मागरा चन्द्रपतिवाई सम्जी मसी, देहली प्रामान् ममालालजी चौदमखमी श्रीमान् मोहनलालमी सा०वकील उदयपुर पइसालसी हरकचवमी धीमान् सेठ मिभासालनी नापूलालमी सा० घाफमा कोटा गसेशीलालजी चचर , लममीधमजी ससोकधम्दजी सा० मु०मुरार " मुर्गमलजी जैन घेव , चम्पासासजी सा० भलीबार म्यावर , उम्मेदमलजी मैयरलालजी घेद ममीचन्दजी शीकरचन्दजी सा० शिवपुरी मासीलालजी श्रीमारायनमी सा० फूलयदजी सा० जैन कामपुर सेठ रामचन्द्रजी सा० पमीयास जैन ताल नसीरायाद सिवना मालया मांगरोल मांगरोल पेतेड . " गगापुर सीटी " चित्र सिर्फ परिबन के न्येि भीमान् सुपर्मस्वामीजी मी जम्मस्वामी को उपदेश फरमा रहे हैं।

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- श्री मदन्तकृदशाम-सूत्रम् । (पीयूपधारा टीका सहित) प्रथम-वर्ग मूलः तेण कालेण तेण समएण चपा णाम नयरी होत्था, वएणयो। तत्थ ण चपाए नयरीए उत्तर पुरत्थिमे दिसी भाए एत्थण पुण्णभद्दे णाम चेइए होत्था । वणसडे वएणयो। तीसेण चपाए नयरीए कोणिए नाम राया होत्था । महया हिमवत वएणयो। तेण कालेण तेण समएण अजसुहम्मे थेरे जाव पचहि अणगारसएहिं सद्धिं सपरिवुडे पुव्वाणुपुट्विं चर- माणे गामानुगाम वहन्जमाणे सुह सुहेण विहरमाणे जेणेव चपाए नयरीए जेणेव पुण्णभद्दे चेइए तेणेव समोसरिए । परिसया निग्गया जाव परिसया पडिगया। तेण कालेण तेण thattatre घग पहिला समएण अज्जसुहम्मस्स अतेवासी अज्ज जबू जाव पज्जूवासमाणे एव वयासी जहण भते ! भीमदत- समणेण भगवया महावीरेण श्राइगरेण जाव सपत्तेण सत्तमस्स अगस्स उवासगदसाण अय- रसाद मट्टे पण्णत्ते, अट्ठमस्स ण भन्ते 'अगस्स अतगडदसाण समणेण जाव सपत्तेण के अटे सूपम्। पएणचे? भावार्थ -पचप भारे के प्रारम्भ में, श्री भगवान् महावीर स्वामी के प्रथम पट्टाधीश, सुधर्मस्वामी के समय में, 'चम्पा' नामक एक नगरी थी, जो बड़ी सुन्दर और मनोहर थी । इसफी सुन्दरता का सविस्तर वर्णन, यदि कोई पाठक चाहें तो भोपपातिक सूत्र में, अवलोकन करें । इस नगरी के उचर और पूर्व दिशा के मध्यस्थ ठीक इशान्य कोच में, 'पूर्सभन् ' नामक एक मनोहर उपचन, विविध प्रकार के पषों से सुशोभित था । उम 'चम्पा' नगरी में, उस समय 'कौमाक' नामक एक राजा राज करते थे। ये अपने समय के एफ बहुत ही पो राजा थे । अपने राज-कार्य का सञ्चालन वे न्याय, नियम और नीति के अनुसार करते थ । उसी समय, स्थविर आर्य, श्री सुधर्म स्वामी, भरने पाँच सौ 'शिष्यों के परिवार के साथ, नियमानुसार एक ग्राम से दूसरे ग्राम में, सुख पूर्वक - पाप सो विमों के साम'म अभिप्राय माकिरस समय उनके प्राधिकार म ५०० मिम्म पे। प्रर्याद २०० ग्रिप भी सुषम पानी की पाश से विचरते थे। इस म पानी कि०० शिपर समय उनके साथ राते थे।

विहार करते हुए, उसी पूर्व वर्णित 'चम्पा' नगरी के ' पूर्णभद्र' उद्यान में पधारे । श्री सुधर्म स्वामी के पदार्पण का शुम सन्देश पाकर, नगर निवासी लोग स्वामीजी की अमृतमयी वाणी श्रवण करने के लिए उपस्थित होने लगे । स्वामीजी ने धर्म की खूप ही विवेचना की, जिसे सुनकर श्रोता समाज मुग्ध हो गया । व्याख्यान के समाप्त हो जाने के पश्चात्, जनता पुनः लौट कर शहर में भाई । उसी समय, भार्य श्री सुधर्मस्वामी के शिष्य भी जम्यू स्वामी ने अपने गुरु की सेवा में विनयपूर्वक कहा, " मगवन् ! धर्म का उत्यान करनेवाले श्रमण भगवान् श्री महावीर स्वामी ने, जो मुक्ति में पधार गये हैं, उन्होंने सातवें मग उपासकदशाङ्ग का, जो माव फर्माया है वह तो मैंने भापके श्री-मुख से भवण किया, किन्तु पाठवा भन जो ' भन्तगढ़ दशा' है, उसका क्या वात्पर्य है ? अर्थात् उसमें किन-किन बातों का वर्णन है, यह कृपा करके फर्माव।" मूलः-एव खलु जवू ! समणेण जाव सपत्तेण थट्ठमस्स अगस्स अन्तगड़दसाण अठ्ठ वग्गा पएणचा । जइण भते समषण जाव सपत्रेण अट्ठमस्स अगस्सश्रतगडदसाण अट्ठ वग्गा पएणचा, पढ़मस्स ण भते! वग्गस्स अतगडदसाण समणेण जाव सपत्तेण कहइ अज्म- Ft. धीमवन्त- सदशाह घर्ग पदिना सत्रम्। ४ यणा पण्णता ? एव खलु जवू । समणेण जाव सपत्तेण अट्ठमस्स अगस्स अतगड़दसाण पढ़मस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, त-जहा-गोयम समुद्द सागर, गभीरे चेव होइ थिमिते य । अयले कापल्ले खलु, अक्खोभ पसेणती विण्हू ॥१॥ भावार्थ:- जम्बू ! भगवान् महावीर स्वामी ने श्री मन्तगढ सूत्र के भाठ वर्ग फर्माये है। तब जम्प स्वामी ने विनय पूर्वक पूछा, कि 'हे स्वामी ! कपा फर यह फर्मायें कि प्रथम वर्ग के फिनने अध्याय पाये है ? ' तर भी सुधर्म स्वामी ने फर्माया, कि हे जम्मू ! मगवान् महावीर स्वामी ने प्रथम वर्ग के दस अध्याय फर्माये है। उनके नाम क्रमश' इस प्रकार हैं (१) गौतम (२) समुद्र (३) सागर (४) गम्मीर (५) स्थिमित (६) अचल (७) काम्मिन्य (6) अतोम (8) प्रसेन भौर (१०) विष्णुकुमार । मूल.-जइण भते ! समणेण जाव सपत्तेण अट्ठमस्स अगस्स अतगडदसाण पढमस्स वग्गस्स दम अज्झयणा पएणत्ता त जहा गोयम जाव विरह । पढ़मस्स ण भते ज्झयणस्स अतगडदसाण समणेण जाव सपत्तेण के पट्टे पएणते ? एव खलु जवू । तेण कालेण तेण -- । ४ . समएण वारवईणाम नयरी होत्या, दुवालस-जोयणायामा णवजोयण वित्थिरणा धणवइ मइनिम्माया चामीकरपागारा नाणामणिपचवण्णकविसीसगपरिमडिया सुरम्मा अलकापुरि सकासा पमुदिय पफीलिया पञ्चकख देवलोगभूया पासादीया दरिसणिज्जा अभिरुवा पडिरूवा। भावार्थ -हे भगवन् ! श्री महावीर स्वामी ने प्रथम वर्ग के गौतम, विष्णु आदि नामवाले, जो ये दम भघ्याय फर्माये है, इन में से प्रथम अध्ययन में क्या माव फर्माया ? कृपा करके कहिए । "जम्बू ! चौथे पारे में, भरहा मरिष्टनेमि भगवान् के समय म, द्वारिका नामक एक सुन्दर नगरी थी, जिस की लम्बाई पारह योजन और चौड़ाई नौ योजन थी । उस नगरी की रचना कुवेर देव ने की थी। उस का ग्राम-कोट (परकोटा ) स्वर्ण का यना हुभा था । और उसके उपर पञ्च प्रकार के रनों द्वारा जदित करे शोभायमान थे। वह द्वारिका नगरी पुर की नगरी के समान देदीप्यमान थी । देवलोक के समान दर्शकों के चित्त को भाकर्षित फरनेपाली तथा परम सुदर दर्शनीय नगरी थी । दर्शकों का प्रतिविम्व उस नगरी में पड़ता था । और, नगरी का प्रतिविम्ब, निकटस्थ जलाशय में | इस लिए बह द्वारिका नगरी वास्तव में अपने नाम 'द्वारिका' को सोलह भाना मिद्ध कर रही थी। www TH भ मदन्त- हाशाह सूत्रम्। पदना मूलः-तीसेण वारवईणयरीए वाहिया उत्तर पुरच्छिमे दिसीभाए एत्य एं रेवयए नाम पव्वए होत्या, वएणयो।तत्थ ण रेवयए पन्धए नदणवणे नाम उज्जाण होत्या, वएणयो सुराप्पिए णाम जक्खायतणे होत्या, पोराणे, से ण एगेण वणसडेण परिक्खित्ते, यसोगवर- पायवे । तत्थण वारवईणयरीए कण्हे णाम वासुदेवे राया परिवसइ । महया रायवरणयो । से ण तत्थ सप्नुहविजयपामोक्खाण दसरहदसाराण, बलदेवपामोक्साण पचण्ह महावीराण, पज्जुएणपामोक्खाण अट्ठाण कुमारकोडीण, सवपामोक्खाण सदीए दुइतसाहस्मीण, महसेण पामोक्खाण छप्पण्णाए वलवग्गसाहस्सीण, वीरसेणपामोक्खाण एगवीसाए वीर साह- स्सीण उग्गसेण पामाक्खाण सोलसरह राय साहस्तीण,रुप्पिणिपामोक्साण सोलसरह देषि- साहस्सीण, भणगसेणापामोक्खाणं यणगाण गणियासाहस्साण, धरणेसिंच वर्ष ईसर जाव सत्यवाहाण बारवईए नयरीए श्रद्ध मरहस्स य सीमतयाय समत्वस्त याहेवन नाव विहरह।

. मावार्थ - द्वारिका नगरी के ईशान्य कोण की भोर, रैवत-' नामक एक पर्वत था । और उस पर्वत पर 'नन्दन वन' नामक एक उपवन । उस उपवन में, 'सुर-प्रिय' नामक एक यच का बड़ा ही प्राचीन स्थान था। उस स्थान के चा भार एक विशाल वन-सएह था। जिसमें भनेक अशोक वृक्षों की अपूर्व छटा लहरा रही थी। उस समय उस द्वारिका नगरी में, श्री वासुदेव 'कृम्मा' गजा राज करते थे । वे तीन खण्ड के सम्राट थे । वहाँ समुद्र विजय, भादि परस्पर एक दूसरे की समता रखनेवाले उस राजा भौर मी थे । वलदेवजी, मादि पाँच महावीर पुरुप थे। पपुम्न, मादि साढे तीन करोड़ पुमार थे । महासेन,भादि छप्पन हजार साइसिक योद्धा पुरुप थे। वीरसेन, भादि इक्कीस हजार पीर पुरुप थे । उग्रसेन, भादि सोलह हजार माण्डलीक राजा थे । रुक्मणि, आदि सोलह हजार कृष्ण महाराज की रानियाँ धीं । नृत्य-कला में प्राण भनगसेना, आदि वेश्याएँ थीं। और मी भनेक धनाढ्य, सेठ, साहूकारादि लोग यहाँ निवास करते थे। ऐसी महान् समृद्धिशाली द्वारिका नगरी में, श्री कृष्ण महाराज अर्द्ध मरत में वैताठ्य गिरि पर्यन्त, अर्थात् तीन खण्ड में राज करते थे। मूलः-तत्थण वारवईए नयरीए अधगवरहीणाम राया परिवसइ महया हिमवत, वगणयो । तस्सण अधगवएिहस्स रगणोधारिणी नाम देवी होत्था, वएणयो। तत्तण सा- धारिणी देवी थएणया कयाइ तसि तारिसगसि सयाणिजसि एव जहा महब्बले । सुमिणद्द- , . धर्म पदिपा सूघम्। . सण कहणा, जम्म वालवण कलाओ य । जोवणपाणि गाहण, कता पासाय भोगाय ॥१॥ श्रीमदन्त गवर गोयमो नामेण अट्टरह रायवर कन्नाण एग दिवसेण पाणि गेण्हावेति प्रयोदायो। एदशा भावार्थ उस द्वारिका नगरी में, अन्धक विष्णु नामक एक पड़े जगीरदार राजा राज करते थे । उस राजा के 'घारिणी' नामक एफ रानी थी। यह रनी एक दिन शयनागार में सो रही थी। पिछज्ञी रात्रि में एक शुभ स्वम उसे भाया । तदनुसार, पूरे नौ गास और इस दिन पीत जाने पर, एक घालर रन का जन्म उसकी फोख से हुमा। पालक क जन्म, चाम्य-काल, शिक्षा-प्राप्ति मादि का वर्णन, पाठकन्ट महावल की तरह ममझ लें । विशेप पेवल इतना ही है, कि उन का नाम गौसम मुमार रखा गया। जय वे तरुण हुए, उनमा विवाह पाउ पन्यायों के साथ कर दिया गया । वधु-पक्ष की ओर से आठ करोड़ का दहेज उन्हें मिला ।) मूल. तेण कालेण तेण समए ण अरहा अरिट्ठनेमी प्राइगरे जाव विहरइ, चगबहा देवा भागया, कण्हे विणिग्गए । ततेण तस्स गोयमस्स कुमारस्स जहा मेहे तहाणिग्गए, धम्म सोचा णिसम्म ज नवर देवाणुप्पिया । अम्मापियरो या पुच्छामी देवाणुप्पियाण पतिए पव्वयामि, एव जहा मेहे जाव अणगारे जाए इरियासमिए जाव इणमेन निग्गय पावयण ८ पुरयो कायो विहरइ । ततेण से गोयमे अणगारे अण्णया कयाइ अरहो अरिहनेमिस्स तहा ख्वाण थेराण प्रतिए सामाइयमाइयाइ एक्कारस्स अगाइ अहिज्जइ, अहिज्जिचा वहि चउत्य जाव अप्पाण भावे माणे विहरइ । तएण अरिहा भरिट्ठनेमी भएणया कयाइ बारवईयो नयरीयोनदणवणायो उज्जाणाओ पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमइ चा बहिया जणवय विहार विहरइ । भावार्थ -उस समय एक यार भरहा मरिष्टनेमि मगवान् ने गाँव-गाँव विचरण करते हुए, द्वारिका के बाग में पदार्पण किया । शहर में सूचना होते ही, वहाँ की जनता भगवान् के दर्शनार्थ वरसावी नदी की माँति उमड़ पड़ी। भवनपति, व्यन्तर, ज्योतिपी,भौर वैमानिक देव मी उनके दर्शन को भाए। सम्रा भी कम्य महाराज भी पधारे । गौतम कुमार को सूचना मिलने पर वे मी दर्शनार्थ गये । भगवान् का प्रवचन सुन कर,वहीं उन्हें वैराग्य प्राप्त हो गया। तम वे भगवान् से योले-'प्रभो ! मैं अपने माता-पिता से पूछ कर, भाप से दीघा ग्रइस करूँगा।" ऐसा कह कर कुमार घड़े ही हर्प के साप पर पर भाये । माता-पिता से माझा उन्होंने माँगी। माता-पिता ने कुमार को बहुत-कुछ समया; परन्तु उन्होंने किसी की भी एक पात न मानी, भन्त में पड़े ही समारोह से, मेघ कुमार की माँति उनकी मी दीचा हो गई। अब कुमार साधु पन कर इर्या समिति, मादि पाँच समिति, तीन गुप्ति, एव निग्रंथों के प्रवचनों को आगे धीमदत- शशाम सूत्रम्। पग पदिरा रख कर विचरने लगे। उन गौतम अमगार ने अन्न समय में ही भरहा भरिटनेमि भगान् क स्थविर मुनियों से, सामापिस से लगा। कर ग्यारह भग पर्यंत मान सम्पा न कर लिया । साथ ही साथ उपवास से लगा कर, मनेरों भौतिकी नपना करते हुए मात्मानन्द में लीन वे रहने लगे। मगरान् भरिटनेमि एक नि उम द्वारिका क 'नन्दनरन' से पिदार सर, देश-विदेश के मय्य जीवों को उपदेश देते हुए मुक्ति का पथ उन्हें किसान के हेतु, अन्यत्र पधार गपे । मूल.-तते ण से गोयमे अणगारे अण्णया कयाइ जेणेव अरहा रिटनमी तेणेव उना. गच्छइ, उवागच्छित्ता अरह अरिट्ठनेमिं तिक्खुत्तो श्रायाहिण पयाहिण करेइ, करिता वदइ नमसइ २ चा एव वयासी-इच्छामि ण भते ! तुम्भेहिं अभणुगणाए समाणे मासिय भिस्व पडिम उवसपजित्ताण विहरेत्तए । एव जहा खदनो ता वारस भिक्खुपडिमायो फामेइ, फासित्ता, गुण रयण पि तवो कम्म तहेव फासेइ निरवसेसं, जहा सदयो तहा चिंतेइ, तहा आपुच्छइ, तहा थेरेहिं सद्धिं सेत्तजं दुरूहइ, मासियाए सलेहणाए वारस वरिसाइ परिताए जाव सिद्धे।

माया -एक दिन गौतम मुणगार ने भगवान् भरिटनेमि के समीप आ कर, उनकी क्रमशः तीन चार प्रदाचया वथा स्तुति की। और विनयपूर्वक वन्दना कर के निवेदन किया- हे प्रमो ! मेरी इन्छा ह, कि "म' मासिक-भिचु-पदिमा-तप सीकार कर, भाप की मात्रा हो, तो विचरण पर।" इस पर भगवान् ने उन्हें फर्माया, कि " जिस प्रकार भी तुम्हें सुख हो, वैसा करो।" फिर गौतम भणगार ने एक पडिमा से बारह मिनु की पडिमा पर्यत, खन्दक मुनि की माँति घोर तप किया। तत्पश्चात् 'गुमरन' नामक तपस्या भी उन्होंने की । जिस प्रकार खन्दकजी ने सथारा किया था, उसी प्रकार ये भी भगवान् मे पूछ कर भोर स्थविर मुनिवरों को साथ ले, शखय पहाड पर गये । और, वहाँ एक-मास का सथारा पर, अन्तिम समय में, सर्व कर्मों को नष्ट करते हुए मुक्ति में वे पधार गये । मूलः-एव खलु जवू ! समणेण जाव सपत्तेण अट्ठमस्स अगस्स अतगडदसाण पढ- मवग्गस्स पढम अज्झयणस्स श्रयमठे पण्णत्ते । एव जहा गोयमो तहा सेसा वरिह पिया धारिणी माता समुद्दे, सागरे, गभीरे, थिमिए, अयले, कपिल्ले, अक्खोभे, पसेणई विण्हुए एए एगगमा। पढ़मोवग्गो दस अज्झयणा पण्णत्ता। भावार्थ -हे जम्बू ! भगवान् महावीर स्वामी ने भन्तगढ-सूत्र के प्रथम-वर्ग के प्रथम अध्याय में यही पर्थन किया है। इसी प्रकार उनोंने दूसरे अध्याय में समुद्र कुमार का, वीसरे में सागर का, चाँधे में गम्भीर का, पांचवें में सिमित का, छठे में अचल का, सातवें में काम्पिन्य का, माठवें में भताम का, नवें में प्रसेन पा, भार दश में विष्णु का वर्णन, किया है। इन सभी की कथा गौतम कुमार की भाँति ही वर्णन की गई है । इन ववों के पिता का नाम 'परि' और माता का नाम 'पारिणी ' था। इति प्रथमोपः। 3HHHHHH भीमदम्त- परिसा सुभम्। १२ द्वितीय-चग ITH म्। मूल.-जइण भते' समणेण जाव सपत्तेण पढमस्स वग्गस्स अयमढे पएणत्ते । दोच्चस्स ण भते । वग्गस्स श्रतगडदसाण समणेण जाव सपत्तेण कह अज्मयणा पण्णता एव खलु, जबु । समणेण जाव सपचेण अट्ठ अज्झयणा परणत्वा । त जहा अक्खोभ, सागरे, खलु समुद्द, हिमवत, अचल णामे या धरणेय पूरणे विय, अभिचदे चेव अट्ठमए॥१॥ तेण कालेण तण समएण वारवईए पयरीए वरिह पिया धारिणी माया। जहा पढमो वग्गो तहा सव्वे घट्ट अज्झयणा गुण रयण तवो कम्म सोलसवासाइ परियायो सेजे मासियाए सलेहणाए जाव सिद्धे । एव खलु जवू | समणेण जाव सपत्तेण अमट्ठस्स अगस्स दोच्चस्स वग्गस्स ययमठे परणचे ।

प हिमा " मावार्थ:-भगवन् ! भी अनन्तगट स्त्र के प्रथम वर्ग में भगवान महावीर स्वामी ने जो पर्यन रिया या मानन्दपूर्वक मार के श्री स्व से मैंने प्रयास किया । लेकिन, दूसरे वर्ग में कितने अध्याय है भार उनमें रिस भीमदत- विपप का प्रावपादन किया गया है, सो रुपा कर के भव फर्मा । हरयास सूत्रम्। “रे जम्मू ! भगवान् ने दूसरे-वर्य में मधोम, सागर, समुद्र, हिमपन्त, मचल, परण, पूरण, मार अभिचन्द, इन-पाठ अभ्यायों का क्रम पूर्वक-वर्सन किया है । भवः ध्यान पूर्वर श्रवण करो। भी भरहा मरिष्टनेमि भगवान् के समय, ' द्वारिका' में, मन्धक रिपणु नामक ए राजा जागीरदार के रूप में राज करते थे। उनकी प्रारिमी नामक एक पढ़ी ही माज्ञाशरिणी रानी थी। उनके मधाम सागर, मधुर, दिमवन्त, अचल, भरत पूरय भौर भमिचद ये भाट पुत्र रत थे । इन माठों मारों ने भगवान् धीमरिष्ट नमि सदुपदेश से दीपा धारण की । भौर गुग-रन सवत्सर तप, मादि भनेक प्रकार की पड़ी ही पोर तपश्पा की। इस प्रभार सोना वर्ष पर्यन्त चारित्र-पालन कर कर्मों को घर परते हुए ये भी मुशियो मार हुए । पिस प्रहार भी गौतम समार का पर्णन किया है, उसी प्रकार भाठ अध्यायों में इन भाटो रामारों ने भी अपने जीवन पत्रि किया । इस प्रकार हे बम्बू ! भगवान महावीर स्वामी ने मन्तगढ सूत्र के दूसरे वर्ग का पर्शन किया। इति रितीपो वर्ग:

पाप तृताय-वर्ग मूलः-जइण भते ! समणेणं जाव सपत्तेणं अट्टमस्स अगस्स दोच्चस्स वग्गस्स अय- मढे पगपत्ते ! तबस्स ण भते ! वग्गस्स समणेण जाव सपत्तेण के अटे पएणते ? एव खलु जवू ! समणेण जाव सपत्तेण अट्ठमस्स अगस्स तच्चस्स वग्गस्स अतगड़दसाण तेरस यज्झयणा पएणत्ता त जहा- अणीयसेण, अणतसेणे, अजियसेण, आणिहयरिउ, देवसेणे, सचसेणे, सारणे, गए, सुमुहे, दुम्मुहे, कूवए, दारुए, अणादिछी। जइण भते ! ससणेण जाव सपत्तेण अट्ठमस्स अगस्स, अतगड़दसाण तबस्स वग्गस्स तेरस अज्झयणा पएणचा त जहा श्रणीयसेण जाव प्रणादिट्ठी । पढमस्स ण भते अज्झयणस्स अतगड़दसाण समणेण जाव सपत्तेण के पट्टे परणचे।

पर्ग श्रीमदम्त- छदशाह सूपम्। भावार्थ' मगवन् ! श्रमय मगवान् श्री महावीर स्वामी ने भार श्रग रे दसरे वर्ग माटों मप्पापों में, निस प्रकार भाठ अमारों की मुहावस्था का वर्णन किया है, उसे धी-पुर से भानन्द पूर्वर मन भारनिया भर पा कर के, तीसरे नर्गका वर्णन फर्मान । हे अम्म् ! तीसरे वर्ग में, तेर-मध्ययन हैं । उन में भणीपसेन, अनन्तमेन, म तिमेन, अनिदत रिपु. देर सेन, शासन, सारस, गव-सुमार, सुमुख, दुर्मुख, पक, दाहर, भार भनारष्टि इन तेरस समारों या यगन रिमा गया है। मगवन् ! इन तेरह अध्यायों में से भव प्रथम अध्याय का क्या तात्पर्य, मो कृपा पर से मारे। मूल.-एव खलु जवू ' तेण कालेण तेण समएण भदिलपुरेणाम एयर होत्या, रिदि- थिमिय समिद्धे वरणश्रो । तस्स ण भदिलपुरस्स नयरस्स बहिया उत्तर पुरथिमे दिौभाष सिरिवणे णाम उबाणे होत्या, वएणयो जियसन राया । तत्यण भद्दिलपुरे पगरे नागे पाम गाहावई होत्या, अड्ढे जाव अपरिभूए । तस्सण नागस्स गाावइस्म मुलसा णाम भारिया होत्या, सकुमाला जाव सुरूवा। तस्सण नागस्म गारावास से सलसाप भारि- पार पतिपपते।

याए अत्तए थणीयसेणणाम कुमारे होत्था । सुकुमाले जाव सुस्चे पच धाइ पाराक्खिता त जहा-सीर धाई जहा दढपइन्ने जाव गिरकिदर मलाणेव पपगवरपायवे सुह सुहेण परिवड्ढह। भावार्थ -हे बग्य ! शरहा भरिएनेमि भगवान् के समय महिलपुर नामक एक नगर अपनी भट सम्पनि की गुण-गरिमा से मुशोमित था । नगर से कुछ ही दूर पर, ईशान्य दिशा में, अपने नाम को यथार्थ रूप से चरितार्थ करने वाला, समरत उपवनों की जीवित श्री की भाँति श्रीपन ' नामक एक भति ही सुन्दर और सुरम्य उद्यान था। उस समय महिलपुर में राजा जित शत्रु राज करते थे । उसी नगर में 'नाग' नामक एक महान् समृद्धिशाली गाधापति निवास करता था । वह मी भट्ट लक्ष्मी का स्वामी था और, उसके 'सुलसा' नामक एक बड़ी ही सुकुमार परम सुन्दरी धर्मपनि थी। उस 'नाग' नामक गाथापति के पुत्र प्रणीयसेन का, पाँच प्रकार की घार्यों ने दृड प्रतिम (ददपइन्ने की मांसि प्राधि व्याधियों से रचा करते हुए,जिस प्रकार पर्वत की उन्नत गुफाओं में चम्पक पृक्ष मुरादित रह कर हरा-भरा होता है, ठीक उसी प्रकार, उस पुत्र का लालन-पालन किया था । मूल:-ततेण तथणीयसं कुमार साइरेग अवासजाय अम्मापियरो कलायरिय जाव भोगसमत्थे जाए यावि होत्था। ततेणत अणीयस कुमार उम्मुक बालभाव जाणेचा अम्मापि- यरो सरिसियाण सरिसव्वयाण सरिस लावण्णरूवजोवणगुणोववेयाण सरिसेहिं तो कुलेहिं REE A- ALL वर्ग श्रीमदम्त- दशाम सूत्रम् । दीय तो पाणिलियाण बत्तीसाए इभवरकरणगाण एगादिवसे पाणिं गेरहावेइ । भावार्थ:-उस मशीयसेन नामक मार को भाठ वर्ष की अवस्था के पश्चात् एक फलारोपिद के द्वारा योग्य विद्याध्ययन कराया गया । कुमार महतर कलाभों में निप्यात हो गया। यौवनावस्था प्राप्त होने पर माता पिता ने उसक्स विवाह, एक बड़े ही श्रेष्ठ पुल के पास पर्व-पति सेठ की, कुमार के समान अवस्था, चतुराई, रूप धार गुपों में -निपुरा, ऐसी पचीस फन्याभों के साथ-फर दिया। मूलः-ततेण से नागे गाहावई अणीयस्स कुमारस्स इम एयारूवा पीतिदाण दलयइ त जहा-चचीस हिरएणकोडीयो जहा महव्वलस्स जाव उप्पिं पासायवरगए फुट्टमाणेहिं मुड गमस्थएहिं भोग भोगाइ भुजमाणे विहरइ । तेण कालेण तेण समए ण थरहा थरिहनेमी जाव समासढ़े सिरिवणे उज्जाणे शहापडिरूव उग्गह जाव विहरह, परिस्सा णिग्गया। ततेण तस्स अपीयसस्स कुमाररस महया जणसद्द जहा गोयमे तहा नवरसामाइयमाझ्याई चोदस पुव्वाइं अहिज्जइ वीस वासाइ परियायो सेस तहेव जाव सेजे पव्वए मासियाए सलेहणाए जाव सिद्धे । एव खलु जबू! समणेण जावसपत्रेण भट्ठमस्सअगस्सयतगड़दसाण तच्चस्स २८ mmami 十十十十十十十十十十 वग्गस्म पदम अज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते। भागध - विवाद में, प्रत्यय वधु पक्ष की भोर से एक एक करोड़ सोनये दहेज के रूप में प्राप्त हुए । इसका मगिर पणन महापल पे परिव से जाना जा सकता है । मणीयसेन कुमार भी विवाह के पश्चात्, अपने विशाल गज-प्रामाद में, अनेर भाँति पी भटसलियाँ करते हुए, मृदङ्ग की ध्वनि से मत्त यन, अपने जीवन को भामोद-प्रमोद में पीत परन लगे। जीरन के इसी स्वच्छन्द समय में, श्री भरहा अरिष्टनेमि प्रभु उस नगरी के 'श्रीवन नामर प उपान में पधारे । जन मरया दर्शनों के लिए उमड़ पड़ी, यह दृश्य देख कर, अणीयसेन कुमार भी महायल की तरह भगवान् ये दर्शनार्थ 'बीवन' उद्यान में उपस्थित हुए । प्रभु के दर्शन कर, उन्होंने उपदेश अपम दिया । बार, गौतम कुमार की भाँति ही, उन्होंने मी दीचा धारण कर ली। स्वल्प काल में ही, सामायिक मादि पौदद पूर्व पा गान सम्पादन उहोंने पिया । बीस वर्ष तक चारित्र-पाल कर अन्तिम समय में, एक मास पा मन्वारा परते हुए उन्होंन भी मोच पद को प्राप्त किया । हे जम्यू ! भगवान् ने श्री अन्तगढ सूत्र के तीसरे वर्ग प्रथम अध्याय में यही वर्णन किया है। मूलः-एव जहा अणीयसे एव सेसा वि अणतसेणो अजियसेणो अणिहयरित्रो देव- सेणे सगसेणे छ अझयणा एक्गमा,वत्तीसायो दायो, वीसवासा परियाओ, चोदस पुन्वाइ .

4 पज्जासु-पमाणा म्न-वसुर्य उपास सठाणपरिप यावि, आयतस् ठाणपरिणयावि ॥ जरर औ बडुअरसपरेणया, ते वणी काल्बष्ण परिणयावि, नालवण्ण परिणयापि, लोहिअवप्णपरिणयावि, हालिहवण्ण परि- णयावि, सकिल्लवण्ण परिणयावि ॥ गधो सटिभगध परिणयावि, दुभिगध परिणयावि, फासआ करखडफास परिणयावि, मउफाम परिणयावि, गरुअफास परिणयापि, लहुअफास परिणयावि, सीअफास परिणयावि, उसिणफास परिणयाकि, णिद्ध फास परिणयावि, लक्खफास परिणयाचि ॥ सठाणओ-परिमडलसठाण परिणयापि, वट्ट- सठाण परिणयावि, तससठाण परिणयापि, चउरस सठाण परिणयापि, आयतसठाण परिणयावि ।। जे रसआ कसाय रस परिगया तेवण्णओ कालवण्ण परिणयाचि, नीलवण्ण परिणयावि, लोहअवण्ण परिणयापि हाल्दिवण्ण परिणयाधि नमिल्ल- वण्ण परिणयावि, ॥ गपओ-सब्मिगध परिणयावि, दुभिगध परिणयापि ॥ फामआ-परखडफास परिणयावि, मउअफास परिणयाधि, गरुअफाम परिणयावि, लहुअफास परिणयावि, सीअफास परिणयावि, जसिजफास परिपडसावत. सौरमानले. गोय.3 मोरा ++ + प्रथम पनामा पद 3447 भंथ AF- २ 42 मनुवादक-नाप्रममचारी मुनि श्री भमासक भात्री परिणयावि, सीमफास परणयानि उसिणफासपरिणयावि.. मिडमासपरिणयानि, लुक्सपास परिणयावि ॥ सठाणओ परिमडल सठाण परिणयावि, वसठाण परि. णयावि, तससठाण परिणयावि, यउरससठाण परिणयावि, आयतसाठ'ण परिणयावि॥ म रसओ तिचरस परिणया ते वण्णओ-कालवण्ण परिणयावि, नलवण्ण परिणयावि, लाहिअवष्ण परिणयावि, हालिहण्ण परिणयावि, सुकिल्लवण्ण परिणयाधि, ॥ गधओ- सुग्भिगध परिणयावि, दुठिमगध परिणयावि ॥ फासआ-कक्खडफास परिणयाविं, मउअफास परिणयावि, गरुअफास परिणयावि, लहुअफास परणयावि, सीअफास परिणयावि, उसिणफास परिणयावि, गिद्ध फास परिणयावि, लुक्सफास परिणयाधि,॥ सठाणओ परिमडलसठाण परिणयावि,वहमठाण परिणयावि,तमसठाण परिणयावि चउरं हुए न तिक्त रम २० मेद हुए मे ही कटुक, कपाय, बट र मधुर के भी बीस २ भेद कहना' मप मीलाकर पांच वर्ण क... भेद हुए. मा सर्व पाश्री कहते हैं मो कर्कश स्पर्श वाले रे वर्ष से माला, नीला, सास, पीलम व शुक्र वर्ण पाले में, मैप से मुरभिगपर दुरभिगप बासे , रस से तिक दुर कपाय, सम्बद्ध र मधुर म बाले हैं, स से गुरु म, पीत, कृष्ण, निग्य व सा और स्वाम प्रकाशक-रामानहापूर लाला मुमदेषसहायमी बालाप्रसादमी. मर्य .

428 पञ्चदश-पलपणा मुत्र-चतुर्थ उपान 4 पावि, मउअफासपरिणयाधि, गरुअफास परिणयावि, लहुअफास परिणयावि, सीअ- फास परिणयावि, उसिणफास परिणयावि, णिहफास परिणयावि, लुक्खफास परि. याषि ।। सठाणओ परिमडल सठाणपरिणयावि, वसठाणपरिणयावि,तससठाणपरि- णयावि, चउरससठाण परिणयावि, आयतसठाण परिणयावि ॥ जेफासओ कक्ख. उफास परिणयावि वण्णआ कालवण्णपरिणयावि, नीलवण्ण परिणयावि, लोहिअवण्ण परिणयावि, हालिहवण्ण परिणयावि सुकिल्लवण्णपरिणयावि ॥ गधओ सुग्भिगध परिणयावि दुभिगध परिणयावि, ॥ रसओ, तित्तरस परिणयावि कडुअरसपरिणयावि कसायरस परिणयावि, अबिलरस परिणयावि, महररसपरिणयावि, फासओ-गर. अफासपरिणयावि, लहुअफास परिणयावि, सीअफास परिणयावि, उसिणफास परिणयावि गिद्धफास पारणयावि, लुक्खफास परिणयावि, ॥ स्ठाणओ परिमडल सठाण परिणयावि, वहमठाण परिणयावि, तससठाण परिणयाधि चउम्स मठाण परिणयावि, आयत सठाण परिणयावि, ॥ जेफासओ मउयफास परिणया तेवण्णओ ने पीस घोल, लघ में भी से ही तेवीम, श्रीत में सक्षम, अपण में तपोग, निम्न में सीग व कक्ष 4482 प्रयम पनवणा पद 802 भनुपादक राममनगरी मुनि श्री भोसक परिणी - परिणयावि, गिडफास परिणयावि, लुक्वफास परिणयावि सठाण भी परिम डर सठाण परिणयावि, वसठाण परिणयावि, संसर्सठाण परिणयावि, चउरस सठाण परिणयावि,आयत सठाण परिणयावि, ॥जे रसओ अपिलरस परिणयाते वण. आकालवण्ण परिणयावि, नीलवण्ण परिणयावि, लाहिअवण्ण परिणयावि हालिबवण्ण परिणयावि,सुक्किमवण्म परिणयावि॥गधा सुभिगध परिणयावि दुन्भिगध परिणयावि फासओ कक्खडफास परिणयाधि, मठअफास परिणयावि, गरुअफास परिणयावि, लहअफास परिणयावि सीअफास परिणयावि, उसिणफासपरिणयावि, णिडफास परिणयावि, लुक्खफास परिणयावि | सठाणओ परिमडलसठाण परिणयावि, वस- ठाण परिणयावि, तंससठाण परिणयावि, चउरससठाण परिणयावि, आयत सठाण परिणयावि ॥ जग्सओ महुररस परिणया तवण्णओ कालवण्ण परिणयावि,नीलवण्णपरि- णयावि, लाहिअवण्ण परिणयावे, हालिहवण्णपरिणयावि, सुशिल्लवणपरिणयावि ॥ गधओसुम्भिगधपरिणयावि, दुभिगधपरिणयात्रि, || फासओ कक्खडफास परिण. सर्भ में पांच वर्ण, दो गप, पांच रस छ सभ व पांच मस्थान यो २३ बोल पाते हैं, गुरु में मी उक्त • स्काभ-रामावहादुर,मामा सुखदेवसमपनी मालामसाउनी.

१५ मा 67 उसिणफाम परिणयावि,निड फोस परिणयावि लुक्सफाँसपरिणयावि,सठाणओ परिमडल मठाण परिणयापि, वसठाण परिणयावि, तससठाण परिणयावि, चउरसस ठाण परिणयावि, आयतसठाण परिणयावि ॥ जे फासओ लहुअफास परिणयावि, ते वो कालवण्ण परिणयावि, नीलवण्ण परिणयावि, लोहियवण्ण परिणयावि हालिहवाग परिणयावि, सुछिल्लवण्ण परिणयापि, गधओ सुन्भिगध परिणयावि, दुटिमगध परिणयावि ॥ रसआ तिचरस परिणयावि, क्डुपरस परिणयावि, कसायरस परिणयावि, अघिलरस परिणयाधि, महररस परिणयावि, ॥ फासआ कक्खङफास परिणयावि, मउयफास परिणयावि, सीयफास परिणयावि, उसिफास परिणयावि पिदफास परिणयावि, लक्खफास परिणयावि ॥ सठाणओ परिमडलसठाण परि- यावि, बहरूठाण परिणयावि, तसस ठाण परिणयारि, चउरससठाण परिणयावि, आयतसठाण परिणयावि ॥ जे फासआ सीयफास परिणया ते वण्णओ कालवण्ण परिणयावि, नीलवण्ण परिणयावि, लोहियवण्ण परिणयापि, हाल्दिवण्ण परिणयात्रि, रूपान परिणत परमाणु पुद्र व पर्न म काल, नील, पीले, लाल न था वण परिणत हैं गध * + प्रयम पमाणा पद 481980 Ans- . 4 मनुवादनामधारी मुनि श्री भपानक पापभी कालय परिणयावि, नील३गपरिणावि, लाहिजपण्ण परिणयावि हाविष्ण परिणयावि, सुविझवण्ण परिणयावि गधआ समगधरिगयावि, दुनिनगध परिण- यापि ॥ रसओ नित्तरस परिगयावि, बहु नरस परिणयाधि कसायरस परिणयावि, अपिलरस परिणयावि, महररत परिणयावि ॥ फासो गरुअफास परिणयावि, रहअफाम परिणयावि, मअिफास परिणमाथि उसिजफास परिणयाधि णि फास परिणयावि लुक्खफास परिणयात्रि ॥ सठाणआ परिमडल सठाण परिणयाधि, वसठाण परिणयावि, तस सठाण परिणयाधि चउर्रस मठाणपरिणयावि, आयतसठाण परि. गयावि । ज फासा गरुअफासपरिणया तण्णओ कालवण्ण परिणयावि, नील- वष्णपरिणयावि, लोहिअण्ण परिणयावि, हालिदवण्ण परिणयावि, सुकिल्लवण्ण परिणयावि गिधओसुभिगधपरिणयावि,दुनि-गधपरिणयावि रसओ-तिचरसपरिणयावि कडुयरस परिणयावि, कप्तायरसपरिणयात्रि, अविलरसपरिणयावि, महुररसपरिणयावि, फारओ क्क्स डफास परिणयावि, मउवफास परिणयावि, मीयफास परिणयावि, वरीस यो सब मीछकर मठों के १८४ वाल छाते हैं मव संस्थान बाश्री कहने १ को परिमात प्रकाशक गजामहादराला सरवदेवमायनी या मामी 480+ प्रथम पमषणा पद 498 परिमडल सठाण परिणयावि, वट्टसठाण परिणयावि, तससठाण परिणयावि, चउरस सठाण परिणयावि,आयतप्तठाण परिणयाविजे फासओ गिद्धपास परिणयाते वण्णओ कालवण्ण परिणयवि,नीलवण परिणयावि,लोहियवण्ण परिणयाविहालिहवण्ण परिणयावि सुकिल्लवण्ण परिणयावि ॥ गधओ सुभिगध परिणयारि दुब्भिगध परिणयाविरसा तिचरस परिणयावि कडयरस परिणयावि कसायरम परिणयावि अविलरस परिणयावि, महुररस परिणयावि ॥ फासआ-कक्खडफास परिणयावि, मउअफाम परिणयावि, गरुयफास परिणयावि लहुयफास परिणयावि सीयफास परिणयावि उसिणफास परिणयावि सठाणआ परिमहलप्सठाण परिणयावि, बसठाण परिणयावि, तससठाण परिगयावि, यउरससठाण परिमयावि, आयतसठाण परिणयावि॥ जे फासआ लुक्खफास परिणया स वण्णओ कालवण्ण परिणयावि, नीलवण्ण परिणयावि, लाहिय वण परिणयावि, हालिदवण्ण परिणयावि, सुकिल्लवण्ण परिणयावि ॥ गधओ-सुग्भिगध परिणयावि, दुभिगध परिणयावि, ॥ रसओ तिचरस परिणयावि, कडुयरस परिणयावि, कसायरस से कर्कश, मृदु, गुर, लय, भीत, कष्ण, जिग्य व रूम स्पर्श परिणत है यो परिमंडल संस्थान में मा Ags शपणानणा सूत्र चतर्थ उपाय 42 मनुवादनाप्रपारी मुनि श्री भयोमा पिनी + सुपिलवण परिणयावि ॥ गधओ-सुम्भिगध परिणयावि दुम्मिगध परिणयाविरमा तिचरसपरिणयावि, कडुयरसपरिणयावि, कसायरसपरिणयावि, अघिलरसपरिणयावि, महुररसपरिणयावि फासआ-कक्खडफासपरिणयावि, मठअफासपरिणयावि, गरुयफास परिणयावि,लहुयफासपरिणयावि,णि(फासपरिणयावि,लुक्खफासपरिणयावि। सठाणओ परिमडल सठाण परिणयावि, वसठाण परिणयावि,तससठाण परिणयावि चउरस सठाण परिणयावि, आयतसठाण परिणयावि॥ जे फासओ उसिणफास परिणया ते वष्णओ कालवण्ण परिणयावि, नीलवण्ण परिणयावि, लोहिय वण्ण परिणयावि, हालहवण्ण परिणयावि, सुकिल्लवण्ण परिणयावि॥ गधओ-सुम्भि- गध परिणयावि, दुन्भिगध परिणयावि ॥ रसओ-तिचरस परिणयावि, कडुयरस परिणयावि, कसायरस परिणयावि, अबिलरस परिणयावि, महुररस परिणयावि ॥ फासओ कक्खडफास परिणयाधि, मउयफास परिणयावि, गरुयफास परिणयावि, लहुयफास परिणयावि, णिरफास परिणयावि, लुक्खफास परिणयावि ॥ सठाणमओ १परभिगर दुमिगंप परिणत है, रस स विककटुक कषाय, मघट व मधुर रस परिणत है और स्पर्य मापक-रामावादुर लामा मुखदेव सहायणी मालाममादमी - चनश पनवना सम-तुर्य टपाङ्ग वन- लियण्ण परिणयावि, लोहियवण्ण परिणयावि, हालिहरण परिणयावि, सुकिल्लवण्णपरिणयावि ॥ गधअ सुग्भिगधपरिणयापि दुब्भिगधपरिणयावि, ॥ रसओ- तित्तरसपरिणयापि कडअरसपरिणयावि, कसायरसपरिणयावि अबिलरसपरिणयावि, महररसपरिणयापि, ॥ फासओ कक्खडफामपरिणयापि,गउअफासपरिणयावि, गरुअफा सपरिणयावि, लहुअफासपरिणयावि, साअफासपरिणयाधि उसिणफासपणियावि णि फामपरिणयावि लुक्खफासपरिणयावि॥ जे सठाणओतससठाण परिणयात वष्णआ काल वषणपरिणयावि, नीलपण्ण परिणयापि लाहियवण्णपरिणयावि, हाल्दिवण्ण परिणयावि, सुकिल्लयाण परिणयावि ॥ गधओ सुठिमगध परिणयापि, दुभिगध परिणयारि ॥ रसा तित्तरस परिणयावि, कडयरस परिणयावि, कसायरस परिणयारि, अबिलरस परिणयाथि, महररस परिणयाविकासो क्क्खडफासपरिणयाधि,म उयफास परिणयावि, गरुयफास पारणयारि, लहुयफास परिणयावि, सीयफास परिणयावि, उसिणफास परिणयावि, गिद्धफास परिणयावि, लक्खफास परिणयापि ॥ जे सठाणओ चउरस १२ बार गानमा मय मीळकर पांच स्थानक 10. पाल हए यो पी अभीय प्रमाणा में वर्ण क १०. र प्रथम पावणा पा जा + 434 13 भनुराइक पाममचारी मुनि श्री अपाला पिभी - परिणयावि, भपिलरस परिणयावि, महुँग्रसे परिणयावि, ॥ फासओ कक्खड फास परिणयावि, मउयफास परिणयावि सियफास परिणयावि, उसिण फास परिणयावि, गरुअफास परिणयाधि, रहुय फास परणयावि, ॥ सठाणओ परिमहल सठाण परिणयावि, वसठाण परिणयापि, तससठाण परिणयावि, चउरस सठाण, परिणय वि आयत सठाण परिणयाधि, ॥ जे सठाणओ परिमडल सठाण परिणया तेवण्गओ कालयाण परिणयावि नीलवण परिणयावि, लाहियवण्ण परिणयावि हालिहरण परिणय वि, सुकिचवण्ण परिणयावि ॥ गधओ सुठिमगध परिणयावि, दमिगध परिणयावि, ॥ रसओ तित्तरस परिणयावि, कडयरस परिणयावि,कसायरम परिणयानि अघिलरस परिणयावि, महुररस परिणयावि ॥ फासओ कवसड फास परिणयावि, मंउअफास परिणयावि, गरुअफास परिणयापि, लहुअफाम परिणयावि, सीअफास परिणयावि, उसिणफास परिणयावि, गिद्धफास परिणयावि, लुक्खफास परिणयावि वहसठाण परिणया ते वण्णओ कालवण्ण परिणयारि, मीसबर २० बाल से है जैस परि-उल का का वैसे ही वृष, त्र्यस, चौरस व मायात के भी बीस कामकनगमाबहादुर साला मुखदरमायनी मागममादमी जे सठाणआ पञ्चदश-पण्णरणा मूम-पर्प उपाद-4-14 णिडफास परिणयावि लुक्खफास परिणयावि ॥ सेत्त रूपी अजीर पण्णवणा ॥ ७॥ सेकिंत जीव पण्णवणा ? जीर पण्णवणा दुविहा पण्णचा तजहा ससार समावण्ण जीव पण्णवणाय, अससार समावण्ण जीव पण्णवणाय ॥ से किंत अससार समावण्ण जीव पण्णवणा? अससार समावण्ण जीव पण्णवणा दुविहा पण्णत्ता तजहा- अणतरसिह अमसार समायण्ण जीव पग्णवणाय, परपरसिद्ध असार समावण्ण जीव पण्णवणाय ॥ से किंत अणतरसिद्ध असमार समावण्ण जीव पण्णवणा?अणतर प्रशाफ्ना दुवा ॥ ७ ॥ अब जीव मनापना का स्वरूप कहत हैं जीव प्रमाना किमे करत १ जीन महापना क दो भद को है मनार समापनक जीव व अमसार सपापन्न जीव इन में अममार मपापनक मीर के कितने मद कई है । अभमार समापन जीव प्रशापना के दा मेद को । जिन को मिद हुए एक ही ममय एवा है व प्रनतर अससार समापना जीव और जिनका सिद्ध हुए एक विशेष समय हुए वे परपर असनार समापनक सिद्ध अनतर मिद्ध अर्ममार समापन जीव किम कहत हैं ! अनतर अमसार समापन जीप के पन्भरह मेद कहे हैं । तीर्थ की स्थापना हुप पीछे सिद्ध होने सो वीर्य मिद्ध २ नीर्थ स्थापन हुए पाहिले मिद्ध होव मो अतीर्थ मिद, ३ अपमादि तीर्थकर सिद्ध हर सो तीर्थंकर सिद्ध । सामान्य केपली सिद हरे मो अनीयकर सिद' सन. अन्य किमी के उपदेश विना प्रतिपोष 8+ मयम पण्णरणा पद 48 ] - +4 मनुदिरूपामग्रमा भाग पंचिंदिय तिरिक्त जोणिएसु उपचति ॥ असखेबवासाउयवजेसु पबचापजसएम उययजति ॥ {मणुस्सेसु अफम्ममूमग अतरदीयग असखेज्ववासाउयबजेसु पजत्ता पजचएसु उववज्जति ॥ तेज भते ! जीवा कतिगतिया कात आगतिया पण्णत्ता ? गोयमा ! दुगतिया दुआगइया परिचा असखेज्जा पण्णता समणाउसो ॥ सेत सुहम पुढविकाइया॥१३॥सेकिंत वायर पुढधिकाइया? बादस्पुढविकाइया दुविहा पण्णचा तजहा सण्ह वादर पुढविकाइया खरवादर पुढवि काइयां ॥१॥ सेकिंत साह बादर पुढविकाइया? सइ पादर पुढविकाइया सत्चविहा पण्णता तजहा कण्ह महिया, मेदो जहा मनुष्य में ये जीवों नहीं उत्पन हो मन रन जीवों की कितनी गति व आगति है ? उत्तर इन नीपों की दो गति व दो भागति है अर्थात् तिच व मनुष्य इन दा गति में जाते हैं और इन दोसे ही आते हैं सुक्ष्म पृथ्वीकाया के प्रीपों प्रत्येक रोग पसरुपाते को हैं या सूक्ष्म पृथ्वीमाया का सप वा ॥ १३ ॥ अथ पादर पृथ्वी काया का कपन करते प्रश्न नादर पृथ्वीकाया क्या है? पावर गोकाया के दो भेद को १ कोमल बादर पृथ्वीमाया और २ कनोर यादर पृथ्वीकाय प्रश्न कोपल चादर पृथ्वीमाया किसे कातेर-कोमक पावर पृथ्वीकाया केस व मेद कोकासी, परी . प्रकाशक-रामामहादुर कार मुखदेवसरायत्री पाडा प्रसादी तुध-भावाभिगम सुत्र दीप उपाय - काइया दुविदापण्णचा तजहा पजसाय अपजचाय ॥ तेसिण भते! जीवाण कति सरीरया पणचा? गोयमा तउ सरीरया पण्णचा तनहा-ओरॉलिए तेयए कम्मए|जहेव सुहुम पुढवि काइया, मयर थियुग सठिया पण्णता सेस' चेव जाव दुगतिया दुआग- तिया परिसा असलेला पण्णवासेिचसुहुम आउकाइया॥१५॥सेकिं तवायर आउक्काइया? वायर आउकाइया अपेगविहा पण्मचा तजहा-उसा हिमे जावं जेयावन्ने तहप्पगारा सक्ष्म मपूछाया पादर बकाया उनमें से सूक्ष्म मप्कायाले दो मेद को पर्याप्त व अपर्याप्त प्रश्न-न मूक्ष्म मएकापिकभीरों को किसने शरीर उचरनन जीवोंको उदारिक जसप कार्माण ऐसे वीन शरीर इसग सब कपन मुक्ष्म पृथ्वीकापा का हा वैसे ही नानना, परतु विशेषता या कि हम का संस्थान पानी के परपोटे मेसे जानना श्रेप सब पूर्वोक नैसे मानना यावत् दो गति व दो भागति धाले, 'प्रस्पेक शरीर मसंख्यावा ये सूक्ष्य अपकाया के मेद ए ॥ १५ ॥ प्रश्न-बादर मप्काप के कितने मेद का उपर पादरं भपकाया के मोस, मि गो का पानी, आकाश-का पानी, नदी भादिका पानी, हार का का पानी, स्वारा पानी, मीठा पानी, त्रीव, सण पानी वगैरह भनेक प्रकार के पानी के मेद मानना इस संप्रेप से दो मेद को, ह । मपति इसका सब स्पन गादर पृथ्वी काया से मानना 41418 पहिली प्रति पचि - He - - मरति ॥ तेण मते । जीया 'मणतरे उस्वहिता कहिं गम्मद कहि उवयजति' किं. नेरइएसु उपयजति पुछा ? गोयमा 1 नो नेरइएसु उवववति, तिरिक्ख जोणि- एसु उववजाति, मणुस्सेसु उपबंति, 'नो देवेसु उपवजति संपेव जाव असखज वासाउयवजेहितो उवषजति ॥ तेणे भते । जीवा कति गतिया कति आगतिया पण्णचा? गोयमा! दुगतियातिआगतिया पपणचा परिता असोजा • पाणचासमणासोसित गायर पुढधिकाइया सेप्तपुढविकाइया आसेकिंत आउक्काइया आउकाइया दुधिहा पण्णचा संजड़ा-सुहुम आउक्काइया बायर आउकाइया।सुहुम आउ. प्रभ जीवों क्या ममोहवा मरण मरते हैं या नसमोरवा मरते ? उत्तर-समोरता मममोरता रोगों परण परते हैं प्रमाने गोषों पहा से नीसफर का भावे में उत्सम होचर- नरकरदेव में सत्पम न हो परंतु संस्पात वर्ष के मायुष्पवाले विर्चच । अस्पति वर्ष मायुष्य मासे गर्मभूमि के मनुष्य गेरकर विर्यप व मनुष्प में उत्पम पोते प्रम-गन भीगे की सिवनी मति र मावि इन बीयों की मनुष्य विच यो दो गति भौर देव मनुष्य विच पो तीन की मामति पाएर पृष्नीकाना मस्पेड परीरी मटरूपात पापादर पृथ्वी कामाई गापूजी कापा का कन पुजा || ४ अलायो किम करने पर-अप्लोबा रोमेद को सपा प्रकाशनजिागर मंडा मुनदेव सायनी मागसार.

य 48 ताश-नीरामिगम मूम-तमाप उपस in नयरं अपित्यस्य सठिपा दुगतिया दुआगतिया, अपरिचा अणता अवसेस जहा पुढ विकाइयाण ॥ सेत सहुम वणस्सइ काइया ॥ १७ ॥ मे 'क्ति वायर वणस्मइ काइप वादर वणसइ काइया दुविहा पत्नत्ता तजहा पत्तेय मरीर वायर वणस्सा,साहारण सर बायर वणस्सइ काइया। से किंत पय सरीर घायर वगरसइ काइया? पत्तेय सरीर बादरवणस्सइ काइया दुवालसविहा पण्णता तजहा रूक्खा, गुरुछा, गुम्मा, लताय, बल्लीय, पन्नगा येव तण वलय हरित उसहि जलरूह कहणायबाधना ॥ स किंत रुक्खा? पृथ्वी काया भी जानना पिपता या कि इस का सस्थान अनमस्थित है पावत् इस की दो गति । दो आगति है या सधारण अनस काया है. यह सूक्ष्म व स्परिकाया का भेर का ॥७॥ प्रश्न गदर धनहाविकात किससे कहते है ? उत्तर मादर यनस्पनिकाया के दो भेद कह समया- प्रत्येक वरीसी पादर वनस्पतिकाया र साधारण भरीरी पादर पनस्पतिकापा प्रश्न-पत्येक शरीरी चादर इ.सतिकाया के कितने भेद को है। उत्तर प्रत्यक शरीरी यादर पनप विकाया के बारह भेद करे । थप १ थान प्रमुख वृक्षा, २ रिंगनी प्रमुख गुये, ३ नमालती प्रमुख गुरम ४ चम्पकादि सना, हरवून प्रमुख पर्छ, ६ ६तु प्रमुख पर्व, मृण' पहा प्रमुख वमय, ९ समिरना पी माझी ममख त्ति काय, 1 साली प्रमुख माय औषपि, ११ स्मल भमुख नरूक्ष और १२ मे फ डाल वगैरह। Anth पहिली पमिपचि 7 +बनुवादक-नाममचारी मुनि श्री अमोलक प्रश्मिी - ते समासओं दुषिही पण्णचा तजहा पबचाया अपजसाय, तं ये सब, णयर थियुग सठिया, चचारि लेसाओ, आहारो णियमाछदिसिं उववाओ तिरिक्खजोणिय मणुस्स देवेहि ॥ ठिती जहमेण अतोमुहुच उक्कोसेण सत्तवास सहस्साइ, सेस तं चैत्र ॥ जहा वायर पुढवि काइयाण जाव दुगतिआ तिआगीतया परिचा असखेजा पण्णचा समणाउसो । सेत वायर माउकाइया ॥ सेत आउक्काइया ॥ १६ ॥ से किंत वणस्सइ काइया ? वणरसइ काइया दुविहा पण्णचा तजहा-सुहुम घणस्सइ काइया बायर वणस्सइ काइया ॥ से, किंतं त सुहुम वणस्सइ काइया सहुम वणरसइ काइया दुविहा पण्णता तजहा-पजचगाय अपज्जत्तगाय, तहेव परतु इम में इतनी विशेषता है इसका सस्थान पानी के परपोटे मैसे मानना. कृष्ण, नील, कापोत व तमो ऐसी घार लेडेगाओं मानना आहार निपमा दिशी का, विर्यच मनुष्य-प देक में से प्रसन्न रोरे, इन की स्थिति जघन्य अंतर्मुर्न, उत्कृष्ट सात हमार वर्ष की, यावत् इन को दो गाते व दो भागात । ये प्रत्येक शरीरी असंरूपात । यो बादर अप्काय के मेद हुए या, अपूमय का कथन हुआ ॥॥ प्रश्न-पनस्पविकाया,किसको कहते है। रचर वनस्पतिकाया के दो भेद को मूहम बनस्पतिकापा व सादर पन पविकावा पश्न-सुक्ष्म पनस्पतिकाया किसे हारते रत्तर-सूक्ष्म वनस्पवि समद को पर्याप्त प्रकाशक समावाादुर लालामुखदेवसहायनी याला प्रसादनी २. 48 पतुर्दश भाषामिगम मूम-तृतीय उपा फला बहुबायका । सेत रुक्खाएर जहा पण्णवणाए तहा माणियव जाव जेया वण्णे सहप्पगारासेत कूहणा॥णाणासिनह सठाणा रुक्खाण एगनीविया पाणचाखधोविएगजीवा साल सरल नालियरीणं जह सगल सरिसवाण पत्तेयसरीराण ॥ गाहा-जह वातिलस कुलिया गाहा-सत्च पचेयसरीर बायरवणस्सइ- काइया ॥ सेकिंत साहारण सरीर बादरवणस्सइकाइया ? साहारण सरीर वायर वणरसइकाइया अणेगविहा पण्णचा तजहा आलए मलते सिंगबरे हिरिलि सिरिलि सिस्सिरिलि किट्टिया छिरिया, छिरविरालिया, कण्हकदा, वनकदो, सूरणकदो, खल्लूडो, किमिरासि, महमोत्था, वृष का आकार का या वृक्ष का अधिकार हुवा इस का विशेष खुलामा पनवणा मूत्र से जानना यह काणा पर्यंत सप अधिकार का देना प्रश्न वृक्षमें रहे दवे जीवोंका सस्थान कैसा का उत्तर वृक्ष में से जीवों का सस्थान अनेक प्रकार का रहा है पृष्ठ में एक जीव का भार स्कंध में भी एक भीष कहा, वैसे वृक्षों साल, सरेस, नालपेरी प्रमुख प्रश्न-गृतादिक में पृथक् २ अनेक प्रत्येक शरीरी की कैसे रहे । १ उचर-जैसे अनेक सरसव के दाने को गुड में मीलाकर उस का लहु वनावे वह छु एक पिट रूप रखा। इम में सघ सरिसष प्रतिपूर्ण रूप से रे हुए हैं अपनी २ अवगाहना से अलग २ ऐसे ही प्रत्येक शरीरी जीपों का समुह वह अलग २ अपनी २ अवगाहना से रहे हैं ऐसे ही विलों की भी हुई विल पपड़ी एक ही कालाती है, परंतु उस में तिल के दाने पृथक, २ रहे हुने हैं, वैसे ही प्रत्येक 44- पहिला प्रति पति 42-42 २ रुक्खा दुविहि पन्नचा तजहा एकट्ठियाय बहुबीयाय से किंत एका?पाएकट्टिया अनेक विहापण्णचा तजहा-निंबु जबुजाय पुन्नागरूक्खे सीवन्नि तहा असोगेय, जेयावन्ने तहप्प. गारा एतेसिण मलावि असलेज जीविया एव कदाखधातयासाला पत्राला पचा पत्तेय जीवा, पुप्फाइ अणेगजीवाइ फला एगट्ठिया सेच एगट्टिया|सकिंत बहुबीयगा?बहुधीयगा अणेग- विहा पण्णमा तजहा अस्थिय तिदुय उंवर कवितु आमलक फणस दाडिम नग्गोह काउ परीय तिलय लठय लोद्देधते जयावन तहप्पगारा,एतेसिण मूलावि असखेजजीविया जाव गहाण प्रम-वृक्ष के कितने मद को ? उत्तर-वृत के दो भद कहे । तयया एक बीमवाले व पहुत चीनपासे प्रश्न एक धीमराले के कितने मेद को ! एक वीजवाले के अनेक मेद को हैं उघया-निपुर नाम्बु पायत् पुभाग घृत, सीवनी वृक्ष तया मधोक वृत और अन्य भी इस प्रकार के वृक्ष इन के मूल में मसरूपात भीयों को भी कद, कध, वचा, बाल, प्रमाल, पत्र, में प्रत्यक जीवों , पुष्प में अनक मीनों है और फल एक बीजामा होगा। यह एक पीनघाले वृक्ष का वर्णन हुवा प्रश्न वीजवाले वृक्ष के कितने भेद की? वीनाले के अनेक मद को सया-अस्पिक, सिंदुक, उपर, कपिठ, मारसा, फणस दारिम, कदम, नग्रोप, (पर) तिलक, लोध्र, घोर अन्य मी इमप्रकार के बहुत बीमासे वृक्षों में इनके मूल में संरूपात जीपों को दुवे । यावत् पास बहुत बीमप्र में या बीमवाले मलारु रामारहादर मसा मुमदेवसहायमी याममारली. - जाव 4. चतुर्वन नीवामिगम सम तृता +2+ सरीरगा, अणिस्थत्य सठिया, ठिती जहन्नेग अतोमुहत्त उक्कोसेण दसवास सहरसाई दुगतिया, तिआगतिया, परित्ता अणता पण्णता ॥ सच ब दरवणस्सइकाइया ॥ सेत थायरा ॥ १८ ॥ से किन तसा ? तसा तिविहा गया तजहा तउकाइया बाउकाइया उराला तसा पाण||सक्ति तेउकाइया? त उकाइगा दुविहा पगचा तजहा सहमते उकाइयाय बायर तेउकाइयाय ॥ से किंत सहम तेउमाइगा ? गुहुम तठकाइया जहा महुम पुढर्विक इया, गवर सरीरमा सायकलाप सठिया, एकगतिया, दुधागतिया, परिचा, असखेज्जा, पण्णता सेस सस्थान विविध प्रकार का, स्थिति जघन्य अतर्मुहूर्व उरकृष्ट दश हजार वर्ष की यावत् दो गति व तीन भागति है इस में अनन जीयों का यह वादर बनविकाया पा कयन हुमा यो स्थायर के भेद मपर्ण हुए ॥ १८ ॥ मप प्रा के कितो भेद कब? उत्तरा के तीन मेद कहे हैं तथा तेवकाया, यु.पा व भौदारकपा मन नरमाया कि काने ? उत्तर-तेउकाया के दो भेद को हैं.' मूक्ष्म 1361 व घादर वरा या सूझा नउकागा किस करते हैं ? सूक्ष्म से उड़ाया का मूक्ष्म पक्षी. आय नप जानना पतु मिसपा या किस का संस्थान भूचिकन पका है, तेउमायामाले एक तर में ना है और मनुगपनियन यो गति में से पांव है इसमें मसंस्थात नीनों को है। 48 पहिली प्रासपाचं 22 मनुवादक-पारचमचारीमुनी श्री अमलिक मनपी 2 पिंडहलिहा, लोहारिणी हुटे, हुलिभु, भरतकाती, सिंहक्मी, मिठंढी पुसुढी, जयावष्णे तहप्पगारा ते समासआ पुविहा पण्णचा तजहा पजचक य अपजचकाय!! सेमिण मते । जीवाण कइ सरीरंगा पण्णता ? गोयमा ! तओ सरीरंगा पण्णच। जहा ओरालिते, तेयते, पम्मते, तहेव जहा बायर पुढविकाइयाण णवर सरीरो गाहणा जहण्जेण अगुलरस असखजति भाग, उकासेण साइरेग आयणसहस्स जारी बीप वृक्षों में अलग २ रो हुने । पाम में ऐकसी रूप दीखने पर नषों पृषक् २ से हुवे हैं पा भरपा सरी बादर परस्पतिकाया के मेव ए मशर मापारन बनसासिकाया के किराने मेद को उपर साधारन वनस्पतिकापा क अनेक भेद कषय मासू, मूले, अदरख, शिरली, सिरली सिसरली, किया, सिरिया, चिरचिरानिया, कुण कंद, पजाद, सूरणकद, सिमिरासी, मीसीमोष, पिराली, लोरिनी, योग, स्तिमुना, मवानी, किर्णी, सिंहकूटी, व मुदी मोर इस प्रकार की अन्य वनस्पतिकाया को हुई इमक संक्षा से दो मद कह पर्याप्त अपर्याप्त प्रश्न-न एस्पतिकाविक जीवों क कितने शरीर को ? उत्तर इन को उदारिक, तेजस व कार्याग ऐसे हीन शरीर को एसे है। सर बादर पृष्वीकाया मैसे मानना परतु विशेषता यह है कि की शरीर की बागाहना मपन्प गुरु के मसरूपातये माग में पता पापित एक मार बोच शाशक-राजापार लाला मुसदेवमहायजी नामाप्रसादियो खल्लता चतुर्दश जीवामिगन मूत्र तृतीय उपात्र 4 सेसं तचेव जाव एगगतिया, दुयाअगिातया परिचा असखेजा पण्णतासेत तेउकाइया ॥१९॥ सेकित बाउकाइया'वाउकाइया दुविहा पण्णचा तजहा सुहुम घाउकाइया, बायर वाउकाइया ॥ सुहुम वाउकाइया जहा सुहुम तेउकाइया,णवर सरीर पडाग सठिया, एगगतिया दुयागतिया परिचा असखेना पणत्ता,सेत्त मुहम वाउकाइया || सेकित बायर वाउकाइया'बायर वाउकाइया अणगविहापण्णचा तजहा-पातीणवाते,पडीणवाते, एवं जथावण तहप्पगारा, तेसमासओ दुविहा पण्णचा तजहा-पबचाय अपज्जचाय ॥ तसिण भतानीवाण कति सरीरगा पन्नता गोयमा चत्वारिं सरीरगा पन्नचा तजहा वेबकाया का सरू दुपा ॥ ॥ प्रश्न-पायुकाया के कितने भेद कहे हैं। उत्तर वायुकाया के दो भेद कहे। तया-सूक्ष्म वायुकाया व पादर घायुकाया सूक्ष्म वायुकाया का सूक्ष्म तेसकाया जैसे जानना परंतु सूक्ष्म वायुकाया का सस्यान पताका का? यावत् एक गति व दो आगसि है और इस असख्यात जोषों को यह सूक्ष्म वायुकाया का स्वरूप दुवा प्रश्न पादर घायुकाया किसे कहते।' उच्चर-यादर वायुकापा के अनेक भेद कहे हैं तथथा-पूर्व का वायु, पश्चिमका वायु, पों सब पायुकापा के भेद मानना इस का कथन पमाणा सूत्र में कहा सा है इस क सक्षेप से दो भेद कहे हैं सधया- पर्याप्त व अपर्याप्त मग्न-इन भीलों को तिने शरीर को ' सचर-इन जीवों को उदारिक, फ्रेय, 44 पहिली प्रति पाते 8482 . तंचर ॥ सेच सुहम तेउकाइया ॥ सेकित थायर तेउकाइया ? बायर तेउकाइया अणेगविहा पपणचा तजहा-इगाल, जाल, मुम्मुरे, जायपूर,कतमाण, निरिसते जया वणे तहपगारा त समासतो दुविहा पण्णचा तजहा-पज्जत्ताय अपजचाय । सेमिण भेते ! जीवाण कति सरीरगा पण्णसा ? गोयमा । तओ सरीरगा पण्णचा तमहा- ओरालिते,तेयते, कम्मते, सेस तचेव, सरीरगा भूपिकलावसठिया, तिन्निलेसा ॥ ठिते जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्कोसेण तिण्णि राइदियाइ॥तिरियमणुस्सहिंतो उववाउओ, यह मूक्ष्म उकापा का स्वस्थ हुरा,प्रश्न-मादर सेउकाया के कितने भेद कहे है ? उत्तर वादरतेवकापा अनेक भेद को भंगार, माछा, मुमुरे यावत् सूर्यकांत मणि योर से ही अन्य प्रकार के काया के भावों में इन के सक्षेप ते दो भेद को यथा पर्याप्त व अपर्यत प्रश्न-इन जीवों को कितने शरीर को' उचर-न जीपों को उदारिक, सेनस प फार्माण ऐमे वीन शरीर कहे हैं श्रेष सत्र बादर पृथ्वी- गया जैसे मानना परतु विशेषता या है कि इस का सस्थान सू के समुद्र का है, इन जीवों को तीन सेक्श की है, स्थिति जघन्य अवर्मु उत्कृष्ट तीन रानि दिन की, तिपय व मनुष्प में से उताव है, शेर से ही मानना पावत् एस गति म दो मामवि है इस में मसरूपा बीजों को हुए हैं • पकायक राक्षायादुर लाला मुखदेवसहायमी लादी 4. चतुशवभगम सूत्र तृवीय उपाय से कितं वैदिया? बेइदिया अणेगविहा पण्णचा तजहा-पजचाय अपजचाय पुलाकिमिया जाव समुहलिक्या, जेयावण्ण तहप्पगरे,तेसमासतो दुविहा पण्णत्ता तजहा पञ्जचाय अपजताय । तेसिण भते 1 जीवाण कइ सरारगा पण्णचा ? गोयमा ! तउ सरीरंगा पगत्ता तजहा-आरालिते तेयसे कम्मत। तेसिण भत! जीवाण के महालिया सरीरा गाहणा पण्णता ? गोयमा ! जहन्नग अगुलस्त असखेब्बति भाग, उक्के सेण परस जोयणाइ, छेवढ सघयणी, हुडसठिया, चत्तारि कप्ताया, चनारि सण्णाओ, तिष्णि- लेसातो, दोइदिया, तओ समग्घाया वयणा कसाया मारणतियानोसणी असणी|नपुरक उत्तर नदार प्रम प्राणियों के पार मा कहे। मधपा इन्द्रिय, इन्द्रिय, चतुरेन्द्रिय व पचन्द्रिय ॥ २१ ॥ प्रश्नहन्द्रिप किस को काते वक्षर-पान्द्रय के अनेक भेद का तपधा-कृमी, कीरे, गिडोला शस्त्र, कोट, जलो, चदनक, अरसिया, ईलद, फूलग इस्पादि अनेक प्रकार के करे। इन के सक्षेप से दो मद को पर्यत व प्राप्त प्रदर इन पेन्द्रिग मीयों को कितने शरीर कहे? उत्तर इन का नीन शरीर को उदारिक, तेजन व कर्माण प्रक। इन जीवों के शरीर को अवगाहना कितनी कही है ? उत्तर-मघन्य अगुल क अनरुपाने माग उत्कृष्ट वारा यामन की, मघयन छट , मस्थान हुदक, चार पाय, चार संभा, वीन लेश्या, दो इन्द्रिय, वेदना, कपाप व मारणाविक यों तीन समुदस है ये जीवों - पहिली प्रतिपचि २ नपादासनमचारा मुनि श्री यमाला नापमान उरालिने, वउव्येते, तेयते, कम्मए, सरीरगा पडागसठिया, चचारि समुग्धाया पण्णचा तजहा-यणा समुग्घ ते, कसाय समग्घाते, मारणतिय समुग्याते, वेउन्विय समुग्ध ते, ॥ आहारोणियाघारण छ देसि, वाघाय पडुच सिय तिदिसि सिय वउदिति सिय पचहिसि। उच तो देवमणुया, नेरइतेस णत्थिाठिती जहन्नण अतोमुहत्त, उक्कासेण तिण्णिवाससह स्माई, सेस तचे। एगगतिया, दुआगतिया, परिचा असखेजा पण्णचा समणाउसो ? सेत वायर बाउक इय! ॥ सेत बाउकाइया ॥२०॥ से किंत उराला तसा पाणा ? उराला तसपागा चउन्धिहा पगचा तजहा-घइदिया तेइदिया चरिश्या पदिया ॥२१॥ तनस प गर्माग यो चार शरीर को है इन फा सस्यान पताका का है चार समुद्राव-वेदना, पय, पारणांतिक व ग माहार निज्य घात से छ दिशिका और व्याघात माश्री क्वचित् वीन दिशे, चिम् चार दिशी र पाचित् पांच दिशो का आहार कर नरक, मनुष्य व देव में से उत्पन्न न होना है पातु एक वियत्र में से उत्पन्न होणारे स्थिति भवन्य मनमुर्व उत्कृष्ट तीन हजार वर्ष अप सप मेरा जानना यावन् एक गति व एक भागवि इस में असरुवाय मीरों को इए। यह पादर वायुकाया माहा या वायुमाया का सम मा ॥ २२ ॥ प्रया-पवार का प्राणियों के खिने मेद प्रकाशक गजामहार लाला मनवमरायजी मामी 4 चतुदेश-जीनाभिगम एम-मृतीय पान - तिरियमणुस्सेस जेरइयदेव असखेजबासाउय वज्जेसु, ठिती-जहणेण अतोगुहुत्त- उक्कोसेणं बारसमयञ्छराणि, समोहयावि मरति असमोहयाधि मरति, कहिं गच्छति । नेरइय देवअसखेजबासाउअवज्बेसु गम्छति, दुगतिया, दुआगतिया, परिचा असखेजा पण्णचा, सेन्च बेदिया ॥ २२ ॥ सेकिंत तेइदिया ? तेइदिया अणेगविहा पण्णता तजहा-उवझ्या रोहिणीया इस्थिसोडा जेयावण्ण तहप्पगारा ते समासतो दुविहा पण्णत्वा तनहा-पजचाय अपजचाय,तहेव जहा बेइदियाण णवर सरीरोगाहणा उक्कोसेण तिमिगाउयाइ ठिति जहण्णेण मतो मुहत्तउक्कासेण एक्कूणपण्ण राइदियाइ सेस तहेव स्थिति जघन्य मनर्मुहूर्त उस्कृष्ट वारा पर्ष, समोहता व असमोरता दोनों मरण मरते हैं का मारे ? नारकी देष व अरुपात वर्ष के आयुष्य वाले मनुष्य तिर्थच छोड़कर शेप मनुष्य में तिच में भादो गति व दो भागति पे असख्यात जीवों में यों बेन्द्रिय का अधिकार हुना ॥२२॥ मन-इन्द्रिय के कितने भेद ? उत्तर-तेन्द्रिय के अनेक मेद को है तथया पदाइ रोहिणिये, घनेरीये, कान खजुरे, पमछ, यूका पापिलोका, पकोग, इल, दूली, गघड्या, विष्टा के कीडे, कुयो, इत्यादि अनेक प्रकार के सेहनिय नीव नानना इन के दो भेद कहे पर्याप्त व अपर्यत यो सप इन्द्रिय से जानना परंतु इन में शरीर की अवगाइना उत्कृष्ट तीन गाउ की, इन्द्रियों तीन, स्थिति जयन्प अंत 44 पहिली मसिपति वेदका, पमपज्जत्नीओ पचमपजातीओ, सम्मट्ठिीवि मिष्ठविट्ठीवि,नो.सम्मामिछहिट्ठी॥ नो चक्खुदसणी अपक्खुदसणी नो ओहिदसणी नो केरलसणी ॥ तेण भते । जीवा किंणाणी अण्णाणी ? गोयमा ! गाणीवि अण्णाणीवि ॥ जे णाणी ते नियमा दुणाणी तजहा- अमिणिबोहियणाणीय मुयणाणीय ॥ ज अण्णाणी तेनियमा दुअण्णाणी मतिअण्णाणी, सुयअण्णाणीय ॥ ना मनजोगी, वइजोगी कायजोगीति, सागरोवउत्तावि, अणागारोवउत्तावि, ॥ आहारो नियमा छबिसी, उववातो, • प्रकाशक-रामायरादुरशामा मुसदवसापनी मामाता सही नहीं पातु असकी है, उन को एक नपुसक घेद है, पाँच पर्याप्ति व पांच अपर्याप्तिो वे नीरा समाष्टी व मिथ्पारष्टा भी है, चतुदर्भन अबपि दर्भन व कपल दर्शन उन को न है परतु एक अचक्षु दर्भनरे प्रश्न- नीवों क्या हानी है या अज्ञानी है ? उचर मानी व अमानी दोनों में ज्ञान भामिनियोधिक शान पशुवमान यों दोनों प्रकार के मान है और अन्नान में मति प भूत मसानी मन योग नी परंतु पचन योग य काया योग है, पे मारेप योगी १ अनाकारोपयोगी दोनों में भार ए दिशी का ती लते हैं, मनुष्प प विर्यच में से उत्पन्न होते हैं परतु नारकी देव नी परसबहावे मोर मसरूपात वर्ष के मायुवराळे मनुष्य । विर्यच मी नहीं रखना होवे।

4+ चतुरेश-नीरामिंगम एप-तृतीय नपा तिरियमणुस्सैस गैरइयदेव मसखेजधासाउय वज्जेसु, ठिती-जहण्णेण अतोमुहुर्त- उक्कोसेण बारसमबछराणि, समोहयावि मरति असमोहयावि मरति, कहिं गच्छति ? नेरइय देवअसखज्जवासाउअवज्जेसु गच्छति, दुगतिया, दुआगतिया, परिचा असखेजा पण्णता, सेन्च बेदिया ॥ २२ ॥ सेकिंत तेइदिया ? तेइदिया अणगविहा पण्णता तजहा-उवइया रोहिणीया हस्थितोंडा जेयावण्ण तहप्पगारा ते समासतो दुविहा पण्णचा तनहा-पज्जताय अपज्जताय,तहेव जहा बेइदियाण णवर सरीरोगाहणा उक्कोसेण तिन्निगाउयाई ठिति-जहण्णेण मतो मुहत्तउक्कासेण एक्कूणपण्ण राइदियाइ सेस तहेव स्थिति अघन्य अनर्मुहूर्त सत्कृष्ट वारा पर्प, समोहता प असमोरता दोनों मरण मरते हैं वे का जाते हैं ? नारकी देव व असंख्यात पर्प के आयुष्य वाले मनुष्प तिर्यंच छोड़कर शेष मनुष्य में सिर्यध में माने में दो गति पदो मागति है पे असख्यात जीवों । यों बेन्द्रिय का अधिकार हुवा ॥२२॥ प्रम-इन्द्रिय के कितने भेद ? उत्तर तहन्द्रिय के अनेक भेद कहे है तथया उदाइ रोहिणिये, घनेरीपे, कान खजुरे, पट्मल, यूका पापिलोका, मझोग, साल, दूनी, गघड्या, विष्टा के कीडे, कुयवे, इस्पादि भनेक प्रकार के हनिय मीष जानना इन के दो भेद कहे पर्याप्त प अपर्याप्त यो सन्द्रिय जमे धानना परंतु इनमें शरीर की अपगारना उत्कृष्ट सीन गाउ की, इन्द्रियों सीन, स्थिति जघन्य अव 484 पहिली मतिपत्ति +10+ दुगतिया दुआगतिपा परिचा मसबेजा पण्णचा सेत तेइविया ॥ २३ ॥ सेकित चउरिदिया ? चउरिदिया अणेग विहा पण्णता तजहा-अधिया पात्तिया जाव गामयकीडा, जेयावणे तहप्पगारा ते समासतो दुविहा पपगमा तजहा-यजचा अपजचाय ॥ तेसिण भते ! जीवाण कतिसरीरगाय पण्णता? गायमा! तओसरीरगा पण्णचा तहेव, णवर सरीरोगाहणा उक्कोसण चत्वारि गाउयाइ, इदिया पचारि, चक्खुदसणीवि अचो पसणीधि, ठिई-उक्कोसेण छ रामाचा मान माना प्रकाशक गमावर दर लाला मुम्बटर रामी बास मसारनी मुर्व उस्कृष्ट ४१ दिन, जप सर से ही पारस दो गति पदो गति प्रत्येक शरीरी ममख्यात हैं यों तहन्द्रिग का फयन पुरा ॥ २३ ॥ मन-चतुगेन्द्रिय के विभने मद को ? उत्तर-चतुरान्द्रय के भनेक मेर कानिन के नाम-मंपिका पोतिका विष्छू, वर्ग मकडी, म्रपरी, र माक्षिम, दश, मत्सर कसरी य मत् गोषय कीट और मी पतुन्द्रिय गोषों को इन दो में कट, पर्याप्त व अपर्यत प्रया उन नोरों को कितने शरीर को१चर बन जी को तीन शरीर को इसका पयन पूक्ति मैप भानना, परतु इस में शरीर को भरनाना प्रकट पार गाउ, पार इन्द्रियों, क्षु दम भर दर्शन दोनों, स्पिति रतापासी समयमा सेना वापर असंहसास को पार 'मामा, सेस जेहा बेइदियाण नाव असस्खिा पणत्ती, सेत चउरिदिया ॥ ४ ॥ से किंत पदिय ? पर्चेदिया चउनिहा पण्णता तजहा-नरइया तिरिक्खजाणिया मणुस्स दिवा ॥ २५ ॥ से किंत नरइया ? नेरइया सत्तविहा पण्णचा तजहारयण- प्पभा पुढवि नेरइया, जाप अहे सत्तम पुढवी नेरइया ॥ तेममासतो दुविहा पण्णता जिहा पबचाय अपजचाय ॥ तेसिण भते! जीवाण कारे सरीरमा पण्णता गोयमा तमो सरीरेगा पण्णचा, तजहा-घेउन्विते, तेयते, कम्मए । तेसिण मते ! जीवाण tim+ चतुरश-मीरामिगग मूत्र नृतीय उपाय 48 4848 परिली प्रतिपची 4124 चनुरेन्द्रिय का सरूप इवा ॥ २४॥ प्रश्न पचेन्द्रिय के किसने मेद कहे हैं। उत्तर पचेन्द्रिय के चार भेद कहे तथया-नारकी, विष, मनुष्प प देवता ॥ २५ ॥ प्रम-नारकी के कितो भेद कहे ? उत्तर- नारकी के सात मेद में सपया रस्नममा नारकी यावन् सातवी समतम ममा नारकी इन के ससेप से दो मेद को पर्याप्त र अपर्याप्त पन्न-न जीवों को कितने शरीर कहे है । सप्तर-इन नीषों को पक्रय, ते मम म कार्माण या तीन शरीर कहे । २ इन जीवों की कितनी शरीर की अवगाहना है? उत्तर-इन के शरीर की अवगाहना के दो भेद को जैसे भरधारनीप सो जन्म से शरीर हाये धीर २ मचर वैकेप मो अन्य रूप एनामें, इन में से भवधारनीय शरीर की बरगाहना जघन्य अगुपका असण्यातमा माग उत्कृष्ट पाँच सोधनुष्य की भौर उनर कैफे शरीर की प्राग हा जपाय अगुड के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा सरीरोगाहणा पण्णचा तजहा भवधारणिजाय उत्तर येउम्बियाय ॥ तत्थण जास! भवधारणजा सा जइपणेण अंगुलस्स असोबइभाग, उकासिण पचवणुसयाइतत्थण जा सा उत्तरवेउन्निया सा जहण्मेण अगुलस्स सखेजति भार्ग उक्कोसेम धणुसहस्स ॥ तेसिण मते । जीवाण सरीरा किं सघयणी पण्मचा? गोयमाछाह सधयणाण असघयणी, णेवट्ठी वस्थिरा, पाहारु वसघयणमरिय जे पोग्गला अणिट्ठा मक्कता अप्पिया असुभा संरम्पकमा माग उस्कृष्ट एकाजार धनुष्य की, ३ पन्न-न जीवों के शरीर कौनसे सघयनवाले हैं ? रत्तर-इन जीवों को 8 सपयन में से एक भी सघयन ना क्यों कि इन को पहियों, साय, नाक, बगरा कुरा मीना परंतु मो भनिष्ट, मनात, अप्रिय, अशुभ, ममनोह । जमणाम पुढलों ने इन के संपातनपने परिणम है । प्रश्न-न जीवों को कौनसा संस्थान है! रत्तर-इन जीवों के घरीर दो प्रकार के संस्थानबाले । मत्रधारनीय व इतर शेष दोनों के हुक संस्थान है, (जैस पति पति, मरदन के रोम वगैरा नीकासने मे कुरा दीसताइस से भी विशेष भपकर ग्न नेरियों के परीर दीसावे ।) रतर वैकेय को पहन पुदर सपनावे सखाप मशुम मॉम कपादय से मवंत बाम ये हैं. ५ मा पारस पर भगवान (पनि एनसरी •कायक रामसार सालासुसदेवसहायणी या प्रसारक HIM चतुर्दश भावाभिगम सूत्र-तृतीय उपान ++ अमणुपणा अमणामा एतसि सघातसाए परिणमति ॥ तेसिण भते ! जीवाण सरीरा किं सठिया पण्णता ? गोयमा । दुविहा पण्मचा तजहा-मवधारणिजाय उत्तर देउन्धियाय तत्थण जेते भवधारमिजा तेहुए सठिया, तत्यण जेते उचरविउब्धिया तेवि हुडसठिया पण्णता ॥ चचारि कसाया, चचारि सण्णातो, तिणिलेसातो पपइदिया, बचारि समुग्घाया माइला, सण्णीवि असण्णीवि, नपुसकवेदका, छपजीओ, तिविदा दिट्ठिओ, तिन्निदसणा ॥ गाणीवि अन्नाणीवि जेणाणी तेनियमा तिन्नाणी पण्णचा तजहा-आमिणिवोहियणाणी, सुयणाणी ओहिणाणी, जे कापोव सेश्या तीसरी में कापुस व नील, चौथी में नील, पाँची में नील व कृष्ण भौर छठी सापी में कृष्ण सश्या)इन्द्रियों पांच,९समुदयात चार घेदनीय, पाय,मारणांतिक और पैकेया नरकमे सझी असशी दोनोरे (प्रथा नरकमें असमी पचेन्द्रिप मी उत्पम होते हैं, इसलिये वर्ष मातमी होते हैं। वन नपुसक१२पर्याप्ति सा सीन१४दर्भन दीन मेपल दर्शनपारे न १५मानी मी अज्ञानी भी है शानमें मति, श्रुति व अवधि यो वीनसान मोर मझानमें पविष श्रुतिमान ,दो महान जो अप्तमी मपम नरक में उत्सन्न होते हैं उनको अपर्या सावस्था में मति व श्रुति ऐसे दो अमान री पावे क्या मति श्रुति व विमंग शान यो चीन अबान भी। योग तीन १७ उपयोग दो १८ माहार छ ही दिशी का लेवे हैं, सामाविक कारण से पहिली पति पचि - - अन्नाणी ते अत्यंगतिया दुमण्णाणी अत्येतिया तिअन्नाणी, जे दुअनाणी ते णियमा मतिमन्नाणी, सुत अनाणी जे ति अन्नाणी तेनियम मइअन्नाणीय, सुत अन्नाणीय विमगणाणीप ॥ तिविधो जोगो, दुविहो उवभोगो, छदिस माहारो, उसपणकारणं पहुध वाणतो कालाइ जाव माहार माहारति, उपवाओ तिरिय मणुरसेसु, ठिती जहणेण वसवास सहस्साइ उकासेणं तेत्तीस सागरोवमाइ ॥ दुविधा मरेति उवट्ठणा भाणियचा जाता आगता मवर समष्टिमेसु पडिसेहो, दुगतिआ दुआगतिया, परिचा असखेजा पण्णता ॥ सेत नेरझ्या ॥ २६ ॥ सेकिंत पदिय तिरिक्त जोणिया ? पदिय तिरिक्व जोणिया दुविहा पण्णचा सजहा-समुच्छिम पचिंदिय कासे पर्ण के पुगस यापर अन्य मी पके पुरखों का भी आर करने ३, १० नेरीपे मनुष्य प विपंच में से उसमव । २० स्थिति जघन्य दम मार पर्ष की उस्कष्ट तीस मागरोपम की २१ सपाला प असमोइता दोनों प्रकार के परम परते \ २२ मनुष्य तिर्यंच दोनों गति में आते हैं परंतु असल्यान पर्ष के आयुषपवाछे मनुष्य तिर्पच व समूअम मनुष्प में न उत्पन्न होते हैं दो गति व दो भागवि से महरूपात मावों का पो या नारकी का दम ! २६॥ प्रश्न-तिय पंचेन्द्रिय कितने मद करे! उपर-वियर पंदिर के दो मेड को समर्शिम विपि पनिष । • मकायकनामावादमा सम्वदेवमायत्रीपाजा प्रसाद, 4 चतुर्दश-जीवामिगम सूत्र तृतीय उपाय - तिरिक्खजाणियाय गम्भवतिय पचि दय तिरिक्खजोणियाय ॥ से किंत समुम्छिम पदिय तिरिक्ख जाणिया? समम्छिम पचिीदय तिरिक्खजोणिया तिविहा पगचा तजहा--जलयरा, थलयरा, खहयरा ॥ सेफित जलयरा ? जलयरा पथविधा पण्णता तजहा-मच्छगा,कष्छगा, मगरा, गाहा, सुसमा,॥ सेकिंत मम्छा! मच्छा एवं जहा पण्णवणाए जाव जेयावण्णे तहप्पगारा, ते समासतो दुविहा पण्णचा सजहा फ्जताय अपजचाय ॥ तेसिण भते । जीवाण कति सरीरंगा पण्णता ? गोयमा ! तो सरीरया पाणचा तजदा-ओरालिए तेयए कम्मए ॥ सरीरोगाहणा सिर्पच पंचेन्द्रिय प्रश्न-समूचिम तियेच पंचेन्द्रिय के कितने भेद कहे हैं। उत्तर-समूम तिर्यंच पवेन्द्रिय के तीन मैद को १ भलचर २ सालपर और ३ खेचर मन्न-इसमें मे जलचर किमे आते। उचर-मलनर के पांच मेद कहे हैं मत्स्य, कस पगर, गाहा, सुसमारा प्रश्न-पत्स्य किसे कहते हैं? उचर-परस्य के अनक मेहको इस का वर्णन श्री पमाणा मूत्र में कहा हुवा है, इस के सामान्य से दो भेद का पर्याप्त व अपर्याप्त, मन-इन जीवों को कितने शरीर कड़े हैं? उत्तर-इन भीचों को सीन भर र कई हैउदारिक, वेनस व कार्माण, भरीर की भवगामा मयन्य प्रगुल का असख्यातवा 48 पहिली प्रसि-पनि 498 जहण्गेण अगुलरत असखेबप्ति भागे, उक्कोसेणं जोयणसहस्सं, छेवट सघयणी, हुउसीठता,चचारि कसाया,च सारि सपणामो,तमो लेसाओइदियापच,समुग्धाता तिषिण, जो सण्णी असण्णी,णपुसकवेदा,पबत्तीय अपवर्षाओय पचिदमओ, दो दिट्ठिओ दोसणा, दोणाणा दा अण्णाणा दुविहे जोगे दुविहे उवओगे, आहारो छहिसि, उववातो तिरिय मणुस्सेहितो, नो दवहितो, नो नरइएहितो तिरिएहितो असखजयासाउय वजेसु मणुस्स्सेतु अकम्मभूमिग अतरदीवग असखेज्जवासाउय वजेसु, ठिति जहणेणं अतोमुहुत्त, उक्कोसेण पुग्धक डी, मारणतिय समुग्घातेण दुविहावि मरति, भाग उत्कृष्ट एक इमार योजन सघपन एक ऐपटा, सस्थान एक हुंडक, कपाय चार, संझा चार, लेश्या सीन, इन्द्रिप पांचों, पहिली तीन समुदात, संधी नहीं परवु यानी, घेद एक नपुसक पान पाप्ति पाच अपर्याप्ति, दो रष्टि, दो दर्जन दा, मान, ष मन्नान दो, योग दो, उपपोग दो, माइपर दिशी का, विर्यच व मनुष्य में से उत्तम होये परंतु असख्यान वर्ष के आयुष्यमा तिर्यच । मर्म- भूमि व अवरदोष के मनुष्य में से या नहीं उत्पन्न होते हैं, स्पिति अपन्य अंतर्मुहूर्व पता पूर्व कोर, मारणाति समुदात से दोनों मरण मरते हैं, प्रश्न-4 से नीकसकर कहां उत्तमोरे, अमंधी मस्स्स में से नीकसकर नरक, विवंच मनुष्य देव बों पारों गति में पतंग होते हैं मकारक रामायापुर डाला पुसदेवसायमी वामपसारमी.

42 पतुर्दश जीवाभिगम मूत्र-तृतीय उराग 4 मणतर उन्नहिता कहि उपवजेजा ? नेरइएसुवि तिरिक्खजोणि एसुवि, मणुस्सेसुवि, देवेमुवि || नेरइएसु रयणप्पहाए सेसेसु परिसेधो, तिरिपसु सल्वेसु उववजति, सखज- पासाउएसुवि असंखजवासाउएसुविधउप्पएसवि,पक्खीवि,माणुस्सेसु सन्वेसु कम्मभू- मिएसु नो अम्मभूमिएसु,अतरदीवेसुवि, सखेजवासउएवि, असखेजवासाठएसुवि, देवेसु जाव घाणमतरा, चउगतिया, दुआगतिया, परित्ता असखिज्जा पण्णचा ॥ सेत जल- यर समुच्छिम पर्चेदिय तिरिक्ख जोणिया ॥२७॥ से किंत थलयर समुम्छिम पर्चेदिय तिरिक्स जोणिया ? थलयर समुन्छिम पचैदिय तिरिक्खजोणिया दुविहा पण्णता उत्पन्न हो तो रत्नममा में उत्पन्न होवे शेप नारकी में उत्पन्न होरे नहीं, तिर्यंच में उत्पन्न होवे वो सस्यान वर्ष के मायुष्यवाले व भमरूपात वर्ष के आयुष्पवाले सब में उत्पन्न होवे, मनुष्प में उत्पन्न होने तो कर्मभूमि, अर्मभूमि अतरद्वीप व समूम मनुष्य सख्यात वर्ष के आयुष्यवाले व- असंख्यात वर्ष के भावुष्पवाले मब में उत्पन्न होघे देव में उत्पम होवे तो मवनप. व वाणग्यन्तर में उत्पन्न हारे क्यों कि असतो यहां तक ही उत्पन्न होते हैं इस से चार की गति व दो की आगति है ये असख्यात है यह जलचर संपूचिम सियंच पचेन्द्रिय का कथन हुवा ॥२७॥ प्रश्न-स्थलचर समूपि सिर्वच पचेन्द्रिय के कितने भेद कहे रे ? उचर-स्थलचर विपंच पवेन्द्रिय के दो भेद को चसुष्पद स्थळचर समाईम 4. पाली प्रति पति 44 मनुवादक उपचारामुनि श्री ममापा. तजहा-घउप्पद थलयर समुग्छिम पचेदिय तिरिक्व जोणिया, परिसप्प थलयर समुस्लिम पदिय तिरिक्ख जोणिया ॥ सेकिंत थलयर चउप्पय समुच्छिम पर्चदिय तिरिक्खजोणिया ? पलयर चठप्पय समुच्छिम पवैविय तिरिक्वजोणिया चउन्विहा पाचा तंजहा--एकसुरा, कुखुरा, गडीपदा, सण्णपदा जाव जेयाषण्णे तहप्पगारा तेसमासतो दुविहा पन्नता सजहा-पजचाय अपज्जचाय ॥ तओ सरीरा, सरीरो- गाहणा जहणेण अगुलस्स असखबइ भाग उक्कोसेण गाउय पुहत्त, ठिति जहण्ण अतोमुहुन उक्कोसेण चतुरासीति वाससहरसाइ, सेस जहा जलयराण जाव चउगतिया तिपंप पचन्द्रिप व परिसर्प स्थल पर समूम वियर पन्द्रिय प्रश्न-स्थलचर चतुष्पद सममि तिच पपेन्द्रिय के किनने मेद कहे हैं। उचर-पसपर चतुष्पद समूच्छम तिर्यंच पचन्द्रिप के चार भद करो चया १एक खुरवाले अवादि, २ दो मुरवासे गवादि, ३ गडीपद गोल परिचाले इस्ति मादि और समिपद सो पने व नखवाले सिंह च्याघ्रादि इन के पर्याप्त र अपर्याप्त ऐसे दो भेद कोई इन को तीन शरीरा अवगाना पिय अगुल का मतख्यातमा माग उस्कृष्ट प्रत्येक गाउ, (कोस) स्थिति जघन्य अंतर्मुडून उत्कृष्ट पौर सो हमार वर्ष, स मसपर समछम वियंच पवेन्द्रिय असे मानमा पारत् सनकी हार की • प्रकाधक राजाहादुर लाला सुखदेषमायनीमालाममादी- दुआगतिया,परिचा असलेला पण्णता ॥ सेत्त थलयर चउप्पद समुच्छिम पचेदिय तिरिक्वजोणिया ॥ २८ ॥ सेकिंत थलयर परिसप्प समुच्छिमा ? थल्यर परिसप्प समुच्छिमा दुविहा पणत्ता तजहा-उरपरिसप्प समुच्छिमा भुषगपरिसप्प समुच्छिमा सेकिंत उरगररिसप्प समुच्छिमा? उरगपरिसप्प समुच्छिमा घउन्विहा पण्णचा तजहा- अही अयगरा आसालिया, महोरगा ॥ से किंत अही? मही दुबिहा पण्णचा तजहा--- वधीकरा, मठलिणोय ॥ से किंत पन्चीकरा,' दधीकरा अणेगविहा पण्णचा तजहा आसीविसा, जाव सेच दन्वीकरा ॥ सकिंत मउलिणो ? मलिणो अणेगविहा 42+ चतुर्दश-नानिगम सुप्र-तृवीय उपा413 PM पहिली प्रतिपत्ति 48-498 गति ष दो की भागति है वे परिचा असल्यास या स्पलचर चतुष्पद समूछिम सिर्वच पचेन्द्रिय का कथन हुवा ॥ २ ॥ प्रश्न-स्थ रचर परिसर्प संमूग्राम के कितने भेद कहे ? उत्तर-स्थलचर परिमर्प समूछिए के दो मेद कहे हैं । वरपरिसर्प व भुन परिमर्प समाधम प्रश्न-वर परिसर्प संपूछम नियंच के कितने मेंद कहाँ सत्तर-उर परिमर्प सपूधाम वियप पचेन्द्रियके चार भेद कर पाया ' अहि, २ अजगर, ३ मसालिपा, भौर ४ पहारंग प्रस-मदि के कितने मेद कहे हैं। उत्तर-पी के दो भेद को सपाया-- दषिकर भर्यात फणा करनेवाला भोर फण नहीं करने वाला मन-किर के कितने भेद है ? उत्तर-दीकर के अनेक भेद कहे हैं आशीविष, , पारस-पासमारी मुनि श्री बम प्रापभी पण्णत्वा तजहा-दिन्या, गोणसा जाय सेत मउलिणो ॥ सेच अही ॥ सेकित अपगरा ? अयगरा एगागारा पण्णता सेत भयगरा ॥ सेकित आसालिया? मासलिया जहा पण्णवणाए । सेत्तं आसालिया ॥ सेकित महारगा? महोरगा जहा पण्णवणाए ॥ सेस महोरगा ॥जेयाषण्णे सहप्पगारा ॥ ते समासतो दुविहा रहिविष, षिष, मोगविष तपाविप, मालाविप, श्वासविष, काला सर्प एमे अनेक मेद कहे। प्रश्न- मनगर के खिन मेद ? उत्तर-अजगर का एक मेद प्रभ-आसालिया के कितने मेद को ? उचर-स का स्यन पमरणा में है पा एमा का कि आसालिया सर्प मनुष्य क्षेत्रमें उत्पमा गये परंतु इस से पाहिर उत्पन होता नहीं कर्म भूमि क्षेत्र में कर्म भूमि पना प्रसता होये वहां बत्तम होता है चक्रवर्ती, वासुरेष या मालिक रामा के पुण्य क्षीण हो गये होये और उन के नामादिक का विनाश होने का हो तर वहां आसासिया समूहमपने उत्पन्न होता है उत्पत्ति समय उसकी मागाहना अंगूर के असख्यातने माग में होती है परंतु पढते • पारा योजन की मरगाहना माती पर जमीन नीचे उत्पम होता माया उसटता है वहां वडा सशताको मिस से मादि नमर व सेना माहित नष्ट होजावे में इस की स्थिति मंत मुहूर्त की। प्रश्न-पोरग किसे बाते उचा इसका विरोचन मी पभरमा मूध में,₹ महोरग महार दीप से पारि सकता प्रकाशक-राजसपर मग पुसदेव सायमीमागप्रसारकी 4 चतुर्दच-भोगाभिगम मूत्र-मृतीय उपार Hin । पष्णता तजहा पजसाय अपजत्ताय तव गवर सरीरोगाहणा जहण्णण अगुलस्स असखेजइ भाग, उक्कोसेण जोयण पहुत्त ॥ ठिाते उक्कोसेण तेवण वास सहस्साइ, सेर्स जहा जलयराण, जाव चउगतिया, यागतिया, परिता असनेजा पण्णचा ।। सेत उरपरिसप्पा ॥ २९ ॥ सेकित भुयपरिसप्प समुच्छिम थलयरा ? भुयपरिसप्प समुन्छिम थलयरा अणेगविहा पण्णचा तजहा-गाहा, नउलो, जपावण्मे तहप्पगारा तेसमासतो दुविहा पण्णता तंजहा-पजचाय अपजचाय ।। सर्गरागाहणा जहणेण अंगुलस्स असखेजइ भाग उक्कोसणं धणु पुडुत्त ठिति उक्कोसेण इस का परीर उसेप भगुप मपाप होता है या नळ स्पस स स्पान में गमन कर मकता इन पारों प्रकार के घरपरिसर्प स्थलचर समूचिम पचेन्द्रिय के पर्याप्त व अपर्याप्त ऐसे दो भेद को इन का कवन मल चर समछम दियच पचेन्द्रिय मैसे मानना शरीर की अवगाहना नपन्य भैगुम्न का समस्यावा माग उत्कृष्ट प्रत्येक योगन, स्विति भघन्य असमुन उत्कृष्ट सेपन हमार वर्ष की शेष सब जसपर'नस पाय चारकी गति व दो की भागति जानना वे परित असंख्याते को पद उपरिसर्प का कथनहवा ॥२९॥ प्रश्न--भुनपरिसर्प समूहम स्पलबर के कितने मेद कहे ! उत्तर-भुमपरिसर्प स्पलचर सपूपि वियप पंचेन्द्रिय के भनेक भेद कई हैं वषया-गो, नकुल, घुस सूहे, गिगरी भौर इस 44 RH पहिली प्रसिपhिaynity मनुवादक-पासबमबारी मुनि श्री अमोसा अपिनी + बयालीस वाससहस्साइ सेस जहा जलयराण नाव चउगतिया दुर्यागतिया, परिचाअसं खज्जा पाणचा ॥ मेच भुयपरिसप्प समुच्छिमासेत यलयरा ॥३०॥ सेकिंत खहयरा? खइपरा चउब्धिहा पण सातजहा चम्मपक्स्सी,लोमपक्ची,समुग्गपक्षी विततपक्खी ॥ से किंत चम्मपक्खी ? चम्मपक्खी अणेगविहा पण्णचा तजहा वग्गुलि जाय जेया- पणे तहप्पगारा । सेच चम्मपनी ॥ से कित लोमपरखी ? लोमपक्खी अणेग- विहा पण्णचा तजहा-ढका केका जाव जेयावण्णे तहप्पगारा, सेत्त लोमपक्खी ॥ सेकित समुग्गपक्खीसमुग्गपक्खी एगागारा पण्णता जहा पण्णवणाए ॥ एव प्रकार के अन्य सप भुन परिसर्प स्थलचर इन के दो भेद कहे।-पर्याप्त व अपर्याप्त इन के शरीर की परमाना अपन्य भगुल के असंस्पात भाग उत्कृष्ट प्रत्येक मनुष्य स्थिति मपन्य अतर्मुडून उत्कृष्ट २मारवर्ष की, शेष सब मसचर मैस मानना बावत् चार गति व दो आगति या परिता अमरपात है पा भुजपरिसर्प स्थलपर पंथेन्द्रिप का कयन दुपा॥३ ॥ प्रभ-वेसर के कितने भेद को उचर-खेपर के पार भेद को तपपा । धर्म पती धर्मकी परिखवाले, २रोम पक्षी राम (वालोकी पासवाले, समुद्रपक्षो भीती ई पासवासे पौर विवत पक्षी सुल्ली पालपाले प्रश्न-चर्म पक्षी किस को करते है? उत्तर-१ वर्ष पी बनेक-मेर कोषया चमचारी वनागुजी समकार के अन्य भी होते १२ रोम पक्षी के मी प्रकाशक-रानासादर लाला मुखदेवसहायमी आमाप्रसादी + पगारापिगम मूत्र तृवीय पार - वीततासी, जाब जेयावणे तहप्पगारा ॥ ते समासतो दुविधा पाणचा संजहा.. पजचाय अपजचाय, पाणच सरीरोगाइणा जहण्जेग अगुलस्स असखेजइ भाग उकोसेण धणु पुडुत्त, ठिति उकोसेण बावचरि वाससहस्साइ सेस जहा जलयराण जाव चउगतिया दुयागतिया ॥ परिचा असलेला पणचा सेत्त खहयरा समुच्छिमा पदिय तिरिक्खाजोणिया ॥ सेतं समुच्छिम पवेदिय तिरिक्वजाणिया ॥ ३० ॥ सेकिंतं गम्भवतिय पदिय निरिक्वजोमिया ? गमवक्कतिय, पदिय तिरिक्खजो- मिया तिविहा पण्मशा तजहा-जलपरा यलयरा सहयरा ॥ सेकिंत जलयरा? भनेक मेहको-रेक, केक, नौर इस प्रकार के अन्य पक्षी, प्रश्न-३ समुद्र पनी किसे कहते हैं। उत्त, भगुर पसी का एक ही प्रकार है यह पक्षी महाद्वीप की पारिर होता है इस का कयन पमाणा मूत्र में कहा दुसरे और पितत पसीना अधिकार मी पमाणा सूत्र में कहा है इस के मप से मेरको पर्यापपर्याप्त विशेष इन के शरीर की मगाना अपना गुल का असरूपाषा माम उरष्ट प्रत्येक पनुष्य स्थिति प्रपन्य पतर्मुहूर्त उत्कृष्ट ७२ इनार वर्ष पर जघर जैसे वहना यात् चर गवि दो बगलिमानना यह परिता पसरू शाते हैं पा संवर समूपंच पति + ++ पहिली मति पाच दुरादनासामधारयुन्म भयानक तापमा जलपरा एथविड़ा पण्णत्ता सजदा-माछा बच्छया मगरा गाहा, मुसमा सन्वेसि भेदो भाणियन्यो तहेव जहा पण्णवणाए जात्र जपावणे. तहप्पगारा ॥ ते समासतो दुविहा पणता तजहा-पबत्ताय अश्वत्ताय ॥ सेसिम भते । जीवाम कति सरीरगा पण्णता गोयमा ! चत्वारि सरीरगा पण्णता तजहा-ठरालिए, वेठन्विते, सेयए, कम्मए ॥ सरीरोगाहणा जहण्णण अगुलस्म 'असखेजइमाग, उकोसेण जोयण सहस्स, छठियह सघयणी पपणचा तजहा बहरोसमणाराय सघयणी, उसमनाराय। सघयणी, नाराय सघयणी, अहनाराय सा भरिकार पुरा पा सम्म विच पंचेन्द्रिय का कवन दुवा ॥३०॥ प्रश्न-गर्भ में उत्तम होने वाले वियर के कितने मेद रचर-गर्मप्र के तीन भेद को यथा-7 जलचर २ स्वपचर वाखेवर प्रश्न- मसर के रिवन मेद को उत्तर जसपर के पांच भेद को मत्स्य, कच्छ, मगर, गारा व मुसुमार यों सद भेद पचमणा हासेही मानना यावत् इनके दो भेद को पपर्यात अपर्याप्त प्रश्न-इननीयों को कितने शरीर को चरन भीषों पार घरीर को सपा । मौदारिक, क्रेप, तेमस र ४ आप इनके परीर की बनाना अपम्म बगल मसपास पास कामात राजावादर लाम मुस्वदेरमायी महामारी म. चतुर्दश जीपाभिगम मूत्र तृतीय उपास 4 सघयणी, कीलिया सघयणी, सेवट सघयणी ॥ छबिह सठणीया पण्णता तजहा- समचउरस संठिया, नग्गोह परिमडले, साति, खुज, वामणे, हुडे,॥ चचारि कसाया, चचारि सण्णातो, छलेसातो, पंच इदिया, पंच समुग्घाया माइला,सन्नी नो असण्णी, तिविदावेदावि,पजचीतो अपज्जचीतो,दिट्ठि तिविहा, तिष्णि-दसणा जाणीवि अण्णावि, जेणाणी ते अत्यंगतिया दुगाणी अत्यगतिया तिगाणी, जे दुणाणी ते नियमा आमिणिवोहियणाणी, सुयणाणी जे तिण्णाणी ते नियमा आभिणियाहियणाणी सुयणाणी मोहिणाणीय ॥ एव अण्णाणीवि ॥ जोगेतिविहे, उवआगे दुविहे, आहारो छदिसिं, हमार योजन, वम अपम नाराच वगैरह छ संघयन, समचतुस्रादि छ सस्पान, चार कपाय, चार संब, उ लेश्या, पांचों इन्द्रियों पहिली, पचि समुद्रात, सो है परतु अपनी नहीं है, तीनों वेद, छ पर्याप्ति, अपर्याप्ति, हे वीन, केवल दर्शन सिवाय दर्शन तीन, मानी व अन्नानी दोनों हैं -मानी में किननेक दो सानवाले व कितनेक सीन ज्ञानवाले हैं जिन को दो सान हूँ उन को आमिनियाधिक मान 1 श्रुत मान । मौर निन के तीन शनचन को आमिनिवोधिक जान, श्रुत शान व अवपि मान ऐसे तीन न है, ऐसे ही बीन अन्नान का मानना, मन वचन पकाया ऐसे तीनों योग है, दोनों प्रकारक उपयोग हैं, ७ दिशी का माहार करस हैं मगम नारकी में यावत् सानपी नारकी में से, असंह गत वर्ष के aat पडिला-प्रति पास 4 - सरक-पात्रमतरी मुनि श्री भोरपिशी - उक्यातो नरहते हैं नाव महेमचमा, पुढचीसु, तिरक्खोमिएसु सम्पु. असले. जवासाउयरवेमु, मणुस्सु अकम्मभूमग अंतरवीवग, अमखेज वामाउयवब्वमु, देशमुजाव सहरमारा ठित जहाणेण मतोमुहुच उकोसण पुषकोडी,दुविहावि मरति अणतर उपाहिला, मैग्इतसु ाव अहे सनमा तिरिक्त जोगिएसु मणुस्सु, सन्ये देवेसु जाव सहस्सारो॥चतगनिया धउभागतिया,परिसा असजा पण्णचा । सेत जलपरा ॥३मासे किंत यलयरा? थलयरा दुविदा पण्णसातजहा-चउप्पया, परिमप्पया ॥ से किंतं चठप्पया ? घउप्पया ! पठबिहा पण्णचा तजहा-एगखरा, साचत्र मेदो जाव मायुष्पवास विप औरकर शेष मा ति वर्गमूम, अंतर द्वीप । मसंख्या पर्ष के आयुष्याल मनुष्प सर सब मनुष्य और साम्रार देशगर पर्यनमदों में से भासा उत्पन होते स्पिति, मपन्य मंतन उत्कष्ट पके दोनों पाप भरत, पा से मीकलार प्रथम नारकीस सातली नारकी, सब विर्षन, सब मनुष्प सास दामो पर्यंत सब देकमें जाने, पार गति पार भाभावि पारेते बसंरपा पा समपरका सरगम ॥॥ मनसर किसे हाने । पर-स्कार के दो मेरो मनमा । परपरिमर्प प्रभ-तुष्पद के कितने मेर हो। पर-नवारगरपए साल मेले मानमा, वापतू हलके पर बात से • माय राजावाद RIRI PRERमानी ARARE.

.. चतुर्दश-नीसामिगम मुम-तृतीय पान Hin जयायपणे तहपगारे ॥ ते सम्मसतो दुविहा पणचा संजहा-जचाय अपजचाय ॥ यतारि सरोरगा ॥ आगाहणा जहण्गेण अगुलरस असखजइ भाग उफोसेण छ गाउयाइ,ठित उक्कासेण तिमिलिओवमाइ ॥ वर उन्धठिना नेरइएस चउत्थ पुढार्षि, ताव गच्छति सेस जहा जलयराण जाव घउगतिया घठ आतिया, परिचा असखजा पण्णता सच चउपया ॥ से किंत परिसप्पा ? परिसप्प ! दुविहा पक्षणचा तनहा- उरपरि पाय भुजगरिसप्पाय ॥ से कित उरपरिसप्पाय ? उरपरिसप्पाय व आसा लिया पत्रो मेदो भाणियन्बो ॥ घउ सरीरा सरीरोगाहणा जहणण अगुलस्स हो मेर का इन को चार शरीर, अपगारना मपन्य मगुरका असंख्यातवा माग उत्कृष्ट छ गाउ की, स्थिति अपय भेगमपूर्त उम्कप्ट तीन पस्योपम स्पष्टचर मरकर चौथी नारकी तक उस्सम से सकते। पि मर जलमर मै मानना यावत् पार गति र चार जामति मामता परिधा असरूपादे को हर १६ चतुगद का पवन हरा परिर्प के किसने मेद को उपर-रिमर्ष के दो मर कहे। उ परस ३ मुक्त परिमा, बास र परिसर के सिवने मेद कहे। उचर-उर पर में माडिया पर सा मह जानना, इन को कर शरीर, इन की अवगाना जघन्य अंगुल का 4481+ परिली प्रतिचि rat TRA - नुवाक पात्रामधारी मुनि श्री/ मोडक असखेबइ माग उक्कोसेण जोयप सहस्स, ट्रिति-जहएपण अतोमुहुर्च; उपासन पुषकोडी, उन्नहिता नेग्इएमु जाव पचमि पुढवि ताव गछति, तिरिक्खमणुस्सेसु सबसु देवेसु आव सहस्सारा, सेस जहा जलयरापा, जाव चउगतिया, चउ आग तिया, परिसा असखेजा सेत उरपरिसप्पा ॥ ३२ ॥ से किंत भुयपरिसप्पा ? भुयप- रिसप्पा भेदो तहेव घसारि सरीरंगा सरीरागाहणा जहणेणं अगुलरस असखबइ भाग उक्कोसण गाउयपुडुच, ठित-जहणेण अतोमूहुत्त उक्कोसेण पुचकोडी, सेसेमु ठाणेसु जहा उरपरिसप्पा, णवर दोच्च पुढविं ताव गच्छति ॥ सेत भुयपरिसप्पा ॥ अमरूयात्रा माम कष्ट एफ हमार योगन, स्पिति अघन्य अतर्मुर्त उत्कृष्ट क्रोड पूर्व, पर परिसर्प मा नीकला ना पापी नारकी तक जा सकता है, शेष सब अलयर असे वापत् चार गति व पार प्रगति वाले परिचा असल्याने में पा उरपरिसर्प का कथन हुवा पन्न-मुमपरिसर्प के कितने मेद को ? भुन परिसर्प के भेद वगैरह सब पूक्ति अशी प्रेस मानना, यावत् इन के पर्याप्त । अपर्याप्त वैसे दो मेद करे हैं, इन को पार शरीग, शरीर की भवगाना जघन्य अंगुष का बसलवाता माग का पूर्ण कोर, मुमारिस बरकर दूसरी नारसी का भाते में क्षेप घर परिमर्ष से काना पावन् पार मवि से बारे पार पति में प्रकाशक-रामप्रवहादुरशाला मुस्पटवसापयनी नामसारी सेत थलयर ॥३३॥ सेकिंत सहचरा ' सहचरा चउन्विहा पण्णता तजहा चम्मपक्खी तहेव, भेदो भाणिपनी ॥ ओगाहणा जहाणेण भगुलस्स असखेबइ भाग उक्कोसेण धणपहुच, ठिति जहणण अतोमुहुत्त उक्कोसेण पलिओवमस्स असखेजति भागो, सेस जहा जलयराण णवरं जाव तच्च पुढविं गम्छति आव सेत खहयर गम्भवकातिय पर्चेदिय तिरिक्ख जोणिया, सेच तिरिक्खजोणिया ॥ ३४ ॥ सेकित मणुस्सा मणुस्सा दुविहा पण्णचा तजहा-समुच्छिम मणुस्सा, गम्भवतिय मणुस्सा भेदो ? ++ पहिली प्रति पचि digitte - 4. चतुर्दश नीवामिगम मम तृताय नपान माये वे पारता असरूपावे । या मुमपरिसर्प का कथन हुपा ये स्यलयर के मेद हुए ॥ ३३ ॥ प्रश्न- ग्ववर के किमने भेद कड़े हैं ? उत्तुर खेचर के चार मेद कोमिन के नाम-चर्म पसी,२ रोमपक्षी, समुद्र पक्षी व ४ वितत पक्षी वगैरह सम कयन पूर्वोक्त असे मानना अवगाहना अघन्य अगुसका असख्यावा माग उत्कृष्ट मस्पेक धनुष्य स्थिति मघन्य असर्मुहूर्त उत्कृष्ट परपोपमका मसख्यातवा माग शेष सप जलचर मसे मानना, परतु खेचर में से परकर जीव तीसरी पृथ्वी तक ही जा सकता है, यह गर्भज खेचर सिर्यच पचे न्द्रपका कथन हुवा या विर्यच पंचेन्द्रियका अधिकार हुन॥३४॥पन-मनुष्पके कितने भेद कडे उत्तर मनुष्य के दो भेद कह हैं, पथया ' समूछम मनुष्प व गर्भन मनुष्य, इस कासम भेद जैसे पनवणा में को वैसे ही यहां पादचारी मुनि श्री नमोस्क भी भकासकामाबाद माला मुम्बरायत्री मास प्रसारमो. जहा पण्णवणा ते तहा निरवसेस माणियम्ब आव छठमरयाप केवलीया|तेसमासतो दुविहा पण्णता तंजहा पजत्ताय अपजन्याय || सिर्ण मते जीवाण कतिसरीरा पण्णसा १ गोयमा । पयसरीरा पण्णता तंजहा-ओरालिते जाव कम्मते ॥ सरीरोगाहणा नहपजेण भगुलस्स अमजदमागं उकोसेण ति पण. गाठयाइ, छच्चन सघपणी, छचव मठिया ॥ तेण भंते ! जीवा कि कोहकमायी जान लोभकसायी असाथी ? गोयमा ! सम्बनि॥ तण भते । जीवा किं अहारस. पणोवउत्ता जाव णो सम्णोवउमा ? गोयमा 1 सम्वेवि तेज मते ! जीया कि मानना, पारन् श्यप गरी पर्वत काना, इम के सिप से दो भेद को पर्याप्त व मपर्णप्त, प्रश्न- इन जीवों को कितने शरीर को 'चरनन नीयों को पाव भरीर को, मौदारिक, क्रेय, पाहा- रेक, वेनम व काग इन क शरीर की भागना प्रपन्य मंगुल मसरूपातने माग उत्तर जीन गारी, एमपपन, ७ सस्थान, पम-वे जीने का पानी पारत् सो कापीप बापायी र कप पायी भायात् प्रापारी मी, अन्नने जीवों क्या माहार सभी वाव नो REचर पजीबों गाभर भी मी पात्रत् नो मापासे मार, प्रमने मीनों पात्र मेसी वायम् असेशी है? उचाने जीवों पधी यावत् मन्त्री पत्र मी या अमित वापत् बने.

पतुरंच-पाषाभिाप मूष तृतीय भार किन्हलेसा जाव अलेसा ? गोयमा ! सम्बेवि ॥ सइदिओवउता जाव नो होमो घउत्सावि ॥ सत्तसमुग्धाया पायचा तजहा-यमा समुग्घाते जाव केवलासमुग्धाते, ससोवि नो सन्नी नो असन्नीवि ॥ इत्यिदावि जाय अवेदावि ॥ पचपजती पंचअपजा, तिम्हिा दिट्ठी, पचारिदसणा ॥ गाणीति अगाणीषि, जोणाणी अत्यंगतिया दुणाणी, अत्थेगतिया तिणाणी, अत्यगतिया घउणाणी, अत्थगतिया एगणाणी जे दुणाणी ते नियमा अमिणिवाहियणाणीय, सुयणाणीय; जे तिणाणी ते अभिणियोहियमाणी सुपणाणी भोहिणाणणय, अश्या अभिणिवायणाशी सुयणाणी न्दिप है। उचर- भीषों सइन्द्रप भी पात भनेन्द्रिप भी है, उनकीबों को बेदनीय सकेम्प्लीपर्यंत मातों ममदात को भी प्रयो वनो संझी नो असन ने मोदी भी पावत् पोई भी*,तीनौर चार दर्षी मीयों जानी र महानी दानों मोमानॉो रन में कितना को मो शान, शिवनेक गो तीन ज्ञान, किवना को पारन बार किसनेक एक मान मिन को दो शानः । को आभिनि लाधिक व श्रुत शान है विन शानवाल को मामिनि गपित, शुस भपिशान मया आमिनिमोधि अव मनःपर्यवं पान, पार जानवामे पा मिनिमपिक, शुत, भरपि व मन पर्पर शान है। और मासानाठे कोनक पान ऐने दी मशानी में शिवनेक दो मानबारे व तिनेक वीना +4 परिसी प्रतियच 42 बलदक-पायमचारी मुनि श्री बमोगक कपिमी" मणपजवाणाणणय, जे पठणाणी से मियमा आभिणियोहियणाणी सुपणाणी ओहिणाणी मणपजवणाणीय,जे एगणाणी ते नियया केवलणाणी ॥ एव अण्णाणीमि दुअण्णाणी तिभण्णाणी ॥ मण जोगीवि वइजोगीवि कायजोगीवि अजोगीवि, दुविहो उवओगो आहारोउदिसि, उपवातो नेहएहिं महसक्षम बजेहिं, तिरिक्खजोणिएहि, तेउवाउ असलेज वासाउअवज्बेहि, मणुस्सेहि अफम्म भमिग अतरदीयग, असखेजवासा. उयानेहिं. देवहिं सन्नेहि, ठिती जहमेण मंतोमुहुत्त उकासेण तिण्णि पलिओ- बमाइ,, दुविहा विमरति उत्पहिचा नेरइयाइसु जाव अणुत्तरोषवाईएम, भरथेगतिया महानरा पोग में मन योग,पचन योग,कापा योगतीनो योग रासे मीरमयोगी भी है उपयाग दोनों प्रकार का, माहारणी दिमिका, उपपात-सातवी नारकी बोरकर शेष सब नारकी में से,तेउवायु र मसख्यात वर्ष के भायुष्पवासे विर्यप पंचेन्द्रिप गोकर शप सप विपंच, मर्मभूमि, भवर दीप व असंरुपात वर्ग के मायुष्पपाले मनुष्ष छोरार सब मनुष्य में भौर सब देव में से नीकसकर पनुष्य होते? स्थिति मपन्य अंतर्मुन कर वीम परपोपम की, दोनों प्रकार के मरण परते हैं, यहां से नीलकर नारकी यावत् अनुत्तरोपपातिक देश में उत्सम दोवा पोर किवनेक सीबो में, दुसते सन् अप दुखों का पका-रामाबादुर मला मुसदेवमायणी नामसारी 42 चतुर्दश-नीषामिगम राष-तृतीय उपाय - सिम्झति जाव अतकरेति ॥ तेण भते । जीवा कतिगइया कतिओगतिया पण्णता ? गोयमा ! पचगतिया.चठआगतिया परित्तासुखेज़ा पण्णता ॥ सेत मणुस्सा ॥३५ ॥ सेकित देवा ? देवा। चउविदा प्राणचा तजहा-भवणवासी वाणमत। जांइसा वेमाणिया,सेकिंत भवणवासी?भवणवासी वसविहा पण्णत्वा तजहा-असुरकुमारा जाव यणिय कुमारा ॥ सेत भवणवासी ॥ सेकिंतं वाणमंतरा? वाणमतरा देवभेदो सयो भाणियन्वो, जावते समासओ दुविहा पण्णचा तनहा-पजचगाय अपजतगाय ॥ अंव करते हैं, प्रश्न-इन बीचों की कितमी गति व कितनी भागति कही? उचर-इन नीयों को पांच गते र चार आगात है, मनुष्य संख्यावे को यह मनुष्य का कथन दुवा ॥ ३५ ॥ प्रश्न-देव के कितने भेद को ! उघर-देव के चार भेद को भवनबासी, पागल्पतर, ज्योतिपी व वैमानिक प्रश्न-भवनवासी के कितने मेद को ? उत्तर-भवनवामी के दश मेद कहे हैं असुर कुमार पावस् स्तनिस कुमार प्रश्न-पाणम्पयर के कितने मेद को हैं ? उत्तर-पाणव्यतर ज्योबिपी व वैमानिक सर देव का कयन करना यावत् इन के दो भेद पर्याप्त प अप- पर्याप्त प्रश्न-दन मीनों को कितने शरीर को उचर इनजीवों को वैकेय, तेजस प कार्माण एमे तीन 44 पहिली प्रतिपचि 418gira तेसिण मते ! जीवाणं कति सरीरंगा पण्णा गोयमा । तो सरीरगा पण्णता तनहा-वेठगिये, तेयते, कम्मए ॥ उगाहणा दुविहा-मवधारगिजाय, उत्तरवेउ. रियाय, सरयण जासा भवधारभिजासा जहणं मगुलस्स असखेलमाग उकास] सचरयणी, उपर वेठान्धया जहाणे अंगुलस्स सोजति भाग उकासेण जोयण सतसहस्म ॥ सरीरगा छप सपयण असषयणा, पेवट्ठि मेवछिछरा गेवण्हारू ना ju-पासमारी मुनि श्री नमोसम्पपित्री - मरामापार लाहा मुखवसरायमी भावासार अगर को अपनाना दो मेद मनपारनीय पर प्रेय, इस में से माप रनीय भवगाइना जयन्य भगत का प्रमलशनवा मग रसह साव व उचर फ्रेम अपनप भगुर का भमरपासका माग उत्कृष्ट एक साल योमन इन को सपान में से एक भी सवपन नी क्यों कि इस कोकी, शिरा नशे मपान नीर पातु मो इन्टरत बमैरा पुगलों से सपपमपने परिणमसे हैं मन-न जोरों कौनमा मसनो रचर-न बीयों के संस्थान के दो मेदको मापनीय उत्तर पक्रेय उसमें भारम्नीयको ममपतन ससानो और चिर ग्रेस का संस्थान विविध मार कारे, इनको पार पाव, पार मा, मेश्या, परि इन्द्रियों, पाच समुद्नान। मामपतिवापार में सहो गयी दोनों मोर क्योविपी वानिको सही, वेदोरगुलद मरमपति, सपा, मोनिपी 41 चतुर्दश-नीचाभिगम सूतृतीय उपास 49 ण मत्यि, जे पोग्गला इट्ठा कता जीव तेमि सघायताये परिणमति ॥ तेमिण भत ! जीवाण किं सठिया पण्णता? गोयमा! दुविहा पण्णता तजहा-भवधारणिज्जाय उत्तर वेउन्वियायनित्यण जेते भवधारणिज्जा तेण समचउरस साठया पण्णचा, तत्थण जेते वेउब्बिया तेण णाणा सठाण सठिया पण्णता चत्तारि कसाया, बचारि सण्णा छ. लेसामओ, पचइदिया, पयसमुग्धाया, सणीवि असण्णीवि, इत्यिवेदावि पुरिसदावि, नो नपुसगवेदा, पजसापञ्जतीओ पच, पिट्टि तिविहा, तिन्निदसणे॥नाणीवि अन्नाणीविं जे नाणी ते नियमा तिनाणी, अन्नाणी भषणाए, दुविहा उवओगे, तिविहा जोगे आहारो नियमाछहिसिं, उसण्णकारण पडुच्च वष्णो हालिह सुक्किलाइ जाव आहार पहिला दूसरा देश्लोक पया दोनों वेद, आगे एक वेद पांच पर्याप्ति, दृष्टि तीन, फेवल दर्शन वर्ज कर तीन दर्शन, वे जीवों मानी व अज्ञानी दोनों हैं, जो मानी है चे आमिनिचोषिक, ध्रुन व अवधि मानी है, मौर अशानी में उनको मति, श्रुत अमान प विभग सान की मनना (क्योंकि असझी उत्पन्न होते मव जबलग पर्याय पूर्ण नहीं करते हैं सब लग मात्र दो अज्ञान ही होते हैं, दोनों प्रकार के उपयोग, नीनों योग हैं, नियमा छ दिची का आहार करे, सामाविक कारन से वर्ण से पला शुक्ल का यावत म हार करे तिर्यच व मनुष्य में भे पाठने देसलोक सक उत्पन्न होवे, उपर एक मनुष्य ही उत्सन्न होवे, 44 पहिली मते पद H+4 R-मामलरी पनि बापिणी:- माहारति, उववातो तिरियमणुस्सेसु, ठिति जहण्जेणं दमवाससहस्माई उकसेर्ग तेचीसं सागरोवमाई ॥ दुविहावि मरति, उमहिला णा परइएसु गछति तिरियमणु- स्सेसु जहा संभव नो देवेसु गछति, दुगतिया दुआगतिया, परिचा अप्सरखेजा पण्णचा सेतं देवा ॥ सेन्च पदिया ॥ सेस उराला तसापाणा || ३६ ॥ तस्सणं मते । कातिय कालठिती पण्णता ? गोयमा ! जहणेणं अतोमुहुरा उकोसेण, तेची सागरोषमाइ ठिती पण्मता ॥ थावरस्सम मत | केवतिय कालठिती पण्णसा ? गोयमा ! जहण्मेणं अतोमुहुत उकोसेम वावीसवाससहस्साई ठिति स्थिति अपम्प दस मार पर्ष उस्कष्ट नेचीप सागरोपम दोनों प्रकार के परण परवा में नकलकर मारतीय देवों नहीं उत्पन होते हैं, परतु निर्वधर मनुष्य में उत्पम ने पाठवा देनमें से नीकमार विष होते हैं इनकीदा गति पदो भागतिक मर्मरूपाते। यह देवा मेद हुना गोपनिय का कपन ला मोर पा पदारिक बस पापियों का न संपूर्ण दुस-यो अमान् स नीयों की गिननी स्थिति भी पचर मो नौतप! अपन्य मर्मुहगतातेचीस भामरोण स्थिति की वासभामाश्री प्रान की पासापरबी बिना किसी स-सपर पकारनामस्मरमा मुकदेव सापनी मामयनारी.

सतुर्दश-जीवामिगन मब-नृतीय उपान - पण्णता ॥ ३० ॥ तस्सणं भते । तस्सति कालतो केवधिर होति ? गोयमा ! जहण्मेण अतोमुहुन्, उकोसेण असखेजकाल असखेजाओ उसप्पणि उसप्पिणिभो कालतो, खेससो असखेजा लोगा॥थावराण भते! थावरेत्ति कालतो केअधिरं होति? गोयमा ! जहण्णेण अतो मुहुर्त उक्कोसेण अणतकाल अणताओ उस्सप्पिणी ओर सप्पिभीओ, कालतो खेचता अगता लोगा, असखेबा पोग्गल परियहा, तेण पुग्गल परियता आवलियाए असलेजति भागे ॥ ३८ ॥ तसस्सण भते । फेवति काल 448 परिसी महिपत्ति 44 की नपन्य अवसुत उत्कृष्ट पाबीस इनार पर्ष की स्थिति ३७ापन-बहो मगवन!स सपने में कितना पासतारो? उचर महो गौतम ! बस पस में भय बंत मुर्त उत्कृष्ट असल्यास काल, मसंख्यात भरस पैणी उस्मार्पणी, क्षेत्र मे बसस्पात सोकाका प्रमाण हे मन-मो भगवन् ! स्थावर, स्यावर कितना काम कसे? उचर मो गौतम ! स्थापर, स्थावर में नघन्य अंतर्मुहूर्त उत्कृष्ट अनंत कास, भनंत बरसर्पिणी, उत्सर्पिणी, क्षेत्र से मनत लोकाकाश, असख्यात पुदल परावर्त ये पुद्गल परावर्त मापनिका के मसंख्यावे माग समय मिसने भानना ॥ ३८ ॥ प्रश्न महो मगरन ! कार से प्रमा मवर कितना करा' उचर-महो मौषम ! अघन्य अंसर्मुर्स उत्कृष्ट रनसवि फाळ मिना मन- मनुसार प्रामसरी पनि श्री बोस ऋषिकी:- माहाप्ति, उवमातो तिरिपमणुस्सेसु, ठिति जहण्गेणं दसवामसइस्माइ उक्के सेणं तेतीस सागरोवमाई ॥ दुविहावि मरति, उन्मद्वित्ता णा मेरइएस गछति तिरियमणु- रसेसु जहा संमत्रं नो पेवेसु गछति, दुगतिया दुआगतिया, परिचा असखेजा पण्णमा सेतं दवा | सेत्त पदिया ॥ सेक्स उराला तसापाणा ॥ २६ ॥ तस्सणं मते ! करतिय कालठिती पणा? गोयमा | जहणणं अतोमाचं उकोसेणं तेवीसं सागरोषमाई ठिती पण्णचा ॥ यावरस्सण मते । केवतिय कालठिती पणता ? गोपमा 1 जहण्णेणं अतोमुहुस उक्कोसेण घावीसवाससहरसाई ठिति स्विति नपम्प पामार वर्ष स्कट चीप सागरापम दोनों प्रकार के परण मरते वर्ग में नीलकर नारसी देखने नहीं उत्पम होते हैं, परतु तिच र मनुष्य में उस्माते मामा देवलोक में से नीपार विष होते हैं इनकी वा गति पदो बागतिक अर्मरुपाते। यह देखना मेद पुजा नो पेन्द्रिय कारन गा और पा सदारिक बस पापियों का कपन संपूर्ण वाम-मो भगान् स बीयों की गिननी स्थिति की रक्षर से मौतम! अपम्प मत, माचीस सामरोम की स्थितिमी पारमा मामी मानी पम-स्पर की कितनी स्थिीकी रस्सादर प्रकाशनामस्मरमा हालसापनी मासासामी.

ब 1 ht चतुर्दश-जावाभिगम सूत्र-नृतीय आ. + ॥ द्वितीया प्रतिपत्ति.॥ तत्थ जेते एवं माहसु तिविधाससार समावण्णगा नीवा पण्णचा, ते एव माहसु इत्थी परिसा णपुसगा ॥ १ ॥.सेकिंत इत्थीओ ? इत्थीओ तिविही पण्णताओ तजहा तिरिषग्वजामित्थीओ, मणुस्सित्थीओ देवित्थीओ ॥२॥ सेकित तिरिक्खजोणिस्थ'ओ? तिरिक्वजोणिस्थीओति विधाओपणचाओ तनहा जलयरीओ, थलयरीओ, खहयरीओ, सकित जलयरीओ ?'जलयरीओ पंचविहाओ पण्णशाओ' तजहाऔं मच्छीओ जाव सुमुमारीओ, सेत जलयरीओ॥३॥सेकिंत थलयरीओ? थलयरीओ दुविहाओ पण्णताओ तंजहा चउप्पदीओ परिसाप्पिणीओय॥ सकित चउप्पदीओ? चउप्पदीओ चउन्विहामओ जा आचार्य ऐमा कहते हैं कि तीन प्रकार के ससार समापमक जीव हैं ये इस प्रकार कहते हैं तद्यथा- सा, पुरुष व नपुंसक ॥ १ ॥ प्रश्न-स्त्री के किवने भेद कहे हैं ? अत्तर स्त्री के तीन भेद कहे हैं तिर्यच स्त्री, मनुष्ण स्त्री व दव स्त्री ॥ २ ॥ प्रश्न-सियैच खी के कितने भेद कहे हैं ? उत्तर तिर्यंचणी के तीन भेद कहे। जलचरी, स्थलचरी प खेचरी प्रश्न जलचरी के कितने मेद कह ? उसर-जलचरी क पांच मेद कहे ई मच्छी यापत् मुसुपारी या जलचरी के मेद बुए ॥ ३ ॥ प्रश्न स्थलचरी किसे कहे हैउचर स्थल परी क दो भद करे हैं तद्यथा चतुष्पदी व परिसनि मन चतुष्ादी किसे कहते हैं। उत्तर 4426+ दूसरी 'मीमपत्ति 8848 का अनुपादक बासनमपारी मुनि श्री ममोलफ अपीमी + अतर होति । गोयमा ! जहण अतोमुहुरा उकालणं वगरसइ कालो । थावर- रसण मते 1 केवतिय काल मतर होति ? जहा तस्स सचिट्ठणाए ॥ ३९ ॥ एतेसिण मते! तसाणं यावर णय कयरे २ हितो अप्पावा पहुयावा तुलावा विसेसाहियावा ? गोयमा ! सम्बत्योबा तसा, थावरा अर्णतगुणा ॥ सेच दुविहा ससार समावण्णमा जीवा पण्णचा दुविहा पडिवत्ती सम्मत्ता ॥ १ ॥ () () () भो मगमन् ! स्थायर का कितना अवर का ? उत्तर भरे गौतम ! म्यावर का भवर प्रस की स्थिति जितना ॥ ३९ ॥ प्रश्न-पो मगरन् ! इन पस र स्पावर में कौन किस से अला बहुत तुल्य पारत् विशेषाधिक १ महो गौतम ! सब से चोदे प्रप्त उस से स्थावर अनंतगुने अधिक। यह दो प्रकार के संसार समापनक नीषों का वर्णन हुवा या दो प्रकार के मोव की पहिली प्रतिपनि कही ॥२॥ • मकाथक-सभापडादर लाकर सदरमहाग सानी 4. चतुर्दश-नीमामिगप सम-मृवीय पान - खहयरीओखइयरीमो बउबिह पण्णताओतमहा-धम्म पंसीओ जाव सेरा खहयरीओn सेस तिरिक्खजोणिस्यीयाओ॥५॥सेकिंतं मणुस्सस्थियाओ? मणुस्सस्थियाओ तिविहाओ पण्णचाओ तजहा-कम्मभूमियाओ, अकम्मभूमियाओ, अतरदीवियाओ ॥ सेकिंत अतर दीवियाओ? अंतरदीवियामो अट्ठावीसतिविहाओ पण्णतामो तजहा एगरुईओ, मामा- सीओ जाव सुद्धपताओ सेतं भतरदीवासेकिंत अकम्मभूमियाओ?मकम्मभूमियाओ ती. सति विधाओ पण्णासाओ तजहा-पचसु हेमवएमु,पचमुएरण्णवएमु,पचहरीवासेसु, पचसु रमगवासे पचसुदेवाकुरुसु पयसु उत्तरकुरुसु, सेस अकम्मभूमग, मणुस्सीओ ॥ सेकिंतं इस्पादि पर मुन्न परिसर्फ के मेद मानना पन-सेघरी किसे का? सच्चर-खपरी के चार भेद को , तपथार-चर्ष पक्षिणी, २रोम पक्षिणी, ३समुद्र पक्षिणी पिसत पक्षिणी यो पा खेचरी के मेद हुए।५॥ प्रम-मनुष्य स्त्री किसे करावे? उत्तर-मनुष्य सी के तीन भेद को हैं कर्म भूमि की, महर्म भूमि की मेवर दपकी पत्पमई प्रम-वर दीप की सिणे रिमेकावे! सपर अंतर दीप की सियों के अहाइप मेद को तथवा-एक रूप हप की नियों यावत् शुद देत द्वीप की स्त्रियों, पर मंतर दीप की खियों का कवन दुपा प्रश्न गर्म म् मे की सियों किसे काने हैं। उत्तर-मर्म भूमि की सियों के वास भेइका वपया पाच हेमवय,पांच परणवय, पोष हरिपापाप ररूपकास, पर देवकुरुवं पाप +4+ दूसरी प्रसपीच 4ine पावसाबमारी मुनि श्री बमा प्रतिनी पण साओ तनहा एगखूरीओ जाव समापहोसिकित परिसप्पीओ?परिसप्पीओ दुधिहामो पण्णचाओ तंजहा-उरगपरिसप्पीपीओप भयपरिसप्पीणीओय मेकिंत उरगपरिसप्पिण उरग परिसारिणीओ तिविहाओ पण्मचाओ सजहा-अहीओ आयगरीओ महोरगीओ, सेत उरपरिसप्पिणी । सेकिंतं भुजपरिसप्पिणीमो? भुजपरिसप्पिणीओ अगगविहाओ पणशाओ तंजहा-गोहीमो, जठलीओ, सेधाओ, सेल्लाओ, सेरडीओ, सेरिधीओ, साबाओ, स्वराओ, पंचलोइयाओ, पउप्पझ्यामओ, मूमियाओ, सुसुसियाओ, घरोलियाओ, गोहियाओ, जोहियाओ, थिरावलियाओ से भुयपरिसप्पीओ४॥सेफित मारनामासादर लाना पुखदेवमारीमा चतुष्पदी के पर मेह को १ एक खरवासी पोरी इस्पादि २ दो खुरपाली गाय भैस इस्पादि) ३ नसीपदी गोठ परिचाली स्वनी इस्पादि मौर मन्त्रीपही नसबासी मिनी इत्यादि प्रश्न परिलपिनी किमे त! सचर परिसर्पिनी के दो मेद करे। उरपरिमपिनी र मुजपरिमापनी प्रश्न-गर परिसपिन किन कल । उत्तर ठर परिसपिनी क तीन भेद को सपिषी, अगरी र पहोरमी बार परिमानी , प्रभ-मुमपरिसपिनी किसे कहते है ! पचर मुम परिमपिनी के अनेक मेर को मोही, नकुशी, रोदियनी, सल्ल यनी, कापीयों, सेरपियों, सावियों, सारेगों, पाई, दरी, परोजी . चतुर्दश-नीवर्गिय र तृतीय उपान - वाणमतर पेवित्थियाओ अटुविहाओ पण्णताओ तजहा पिसाय वाणमंतर देविस्थियाओं जाव सेत्त वाणमनर दवित्थियाकिंत जोतिसियदेवित्थियामो? जोतिसियदेवित्यि- याओ पचविहाओ पण्णत्ताओ तजहा-चद विमाणजातिसिदेवित्थियाओ, सूरविमाण देविस्थियाओ, गहविमाण देवित्थियाओ, णक्खचविमाण देबित्थयाओ, ताराविमाम नोतिसिय देवित्थियामो, सेत जोतिसिय देवित्थियाओ ॥ सेकित मागिय देवित्थि- याओ ? वेमाणिय देवित्थियाओ दुविहाआ पण्णचाओ तजहा सोहम्मकप्प वेम णिय देवित्थियाआ,ईसाणकप्प वेगाणिय देवित्थियाओ, सेत विमाणिथिओ ॥७॥ इत्थीण 'मते ! केवतिय फाल ठिती पण्णचा ? गोयमा ! एगेण आएसेण जहन्नेण मतोमुहुत्त देव की स्त्रियों या पाणपतर के भेद हुए प्रश्न-ज्योसिपी देव स्त्रियों किसे कहते हैं ? उत्तर-पोसिपी दव स्त्रियों के पांच मेद को सघया १ चंद्र विमान उणेसिपीकी स्त्री २ सूर्य विमान ज्योतिषीकी स्त्री, ३ग्रह, विमान ज्योवपी की स्त्री,नसत्र विमानज्योतिपीका स्त्री,५ व तारा विमान ज्योतिषीकी स्त्री प्रश्न वैमानिक देवकी खियों किसे कहते है। उत्तर-वैमानिक देव स्त्रियों के दोभेद को है वद्यथा- सौधर्म देवलोक के वैमानिक देवकी १२ ईशान दवलोक के पैमानिकदेवकी स्त्री या पैमानिक देवकी लोका क्यन हुवा||श्न अहो मगवन्सी वेदकी कितने कासकी स्थिति कही सर-आओ गौवमाजघन्य अवर्मुहूर्तकी सियंच व मनुष्य सीमाश्री उत्कृष्ट पञ्चायन +8+ दूसेर, को-पति . 4 4 कम्मभूमियाओ ? कम्मभूमियाओ पण्णरसविहाओ पण्णत्ताओ तजहा-पचसुभरहेसु, पचसुररघएसु, पच महाविदेहेसु, सेत कम्मभूमगमणुस्सीमो ॥ सेत्त मणुस्सीओ ॥६॥ सेकित देवित्यियाओ? देवित्थियाओ चउब्धिहाओ पण्णत्ताओ तजहा-भवन- वासिदवी स्थियाओ,वाणमतर देवित्थियाओ जोतिसि देविस्थियाओ,वेमाणिय देवित्थियाओ सकित भवणवासि देविस्थियाओ ? भवणवासि देवित्थियाओ दसविधाओ पण्णताओ तजहा-अमुरकुमार भवणवासि देवित्थियाओ जाव थणितकुमार भवण- वासिदेवित्थियाओ सेत भवणवासिदेवित्वियाओ ॥ सेकित बाणमतर देवित्थियाओ? +नुसादक-नाममचारी मुनि श्री बमोठा अपनी + मकाशक सम्वादुर लालामुखचसहायजी मल प्रसादनी उत्तर कुरु की स्त्रियों यह मर्म भूमि की सिपों का कपन हुवा प्रश्न-कर्म भूमि की स्त्रियाँ किसे कहते 17? उत्तर कर्म भूमि की निर्गक पारए मद को पांच भरत, पाक एरपत र पाच महा विदेष्ठ यह रूप भूमि की स्त्रियों का कथन हुवा या मनुन्यणी का मेद हुषा ॥६॥ प्रश्न देव स्त्रियों किसे काते हैं । उत्तर-देव स्त्रियों के चार मेद कहाँ तपथा ' मवनवासी,२ वाणन्यवर, ३ ज्योतिपीववैमानिक खिपों प्रश्न मानवामीनी किसे कहत है? सवर भवनवासीनी देव त्रियों के दश मेद कहे हैं. अमुर कुपार मवनवासी की स्त्री यावत् स्तनित कुमार मपनवासी की स्त्री प्रश्न वाणपतर देव की सिपों किसे- काते ? उत्तर- वाणपतर दम की सियों के बाल मेद को पिशाच पाणव्यवर देव की त्रिपों प.वत्पर्ष पानपतर -- 42"प-मीयामिमम ममृतीय । प३य काल ठिरपण्णता ? गोयमा ! जहाणेण अतो मुहर उकोसेण पुन्चकोडी एवं भुयपरिसप्पि ॥ सहयर तिरिक्स जोणिस्थीण जहणणे अतो मुहु उक्कोसेप पलिओवमस्स असलेजति भागो ॥ ९॥ मणुस्सिरीण भते !, केवतिय काल ठिती पाणचा ? खेत पहुच्च जहण्णेण अतो मुहुरा, उकोसेफ तिमि पलिउवमाइ धम्मचरण पाप जहण्मेणं अत्तो मुहुन, उक्कोसेण देसणा पून्यकोडी, कम्मभूमग मस्तिथीण भते । केवतिय काल ठिती पण्णता ? गोयमा ! खेत विमी की स्थिति कितनी की है। पर चतुष्पद म्पलधर तिर्यंचली की स्थिति मघन्य अंतर्मुहूर्त पहाटवीन परपोपम की पचन-उरपरिमर्प स्परपर तिर्थपणीकी स्थिति कितनी की सत्तर-मपन्य अंतर्मुर्व उसका पूर्व गोर ऐसे मुझ परिसर्प विर्यपणो की जानना खेचर तिर्यंचनी की मघन्य भव, सह परयोपम का असंस्पावरा माग ॥९॥ प्रश्न-मनुष्य, सी की कितनी स्थिति की? पचर-क्षेत्र माश्री पवन वर्मु उस्कृष्ट तीन परपोपप मोर पर्माचरण भाश्री जघन्य अंतर्नुपूर्व उत्कष्ट कम मोर पूर्व प्रारकर्म भूमि मनुष्प खो की कितनी स्विवेि कही। रपर क्षेत्र भाश्री मपन्य 35+सरी मवि-पाधि 4848 बाद- मसारीपुनि माबोडकीकी उकोसेण पणपन्न पलिओवमाई एकेण आदेसे अहण्मेण अतोमुहुरा उकासेगं गणपलि- मोषमाई, एगेम आदेसणं जहमेणं अंतोमुहुर्ष उकोसेण सत्पलिमोषमाई, ॥ एगेणं भावेसेणं जहणेणं अंतमुहुन्छ उकासेणे पण्णास पलिओषमाइ ॥ ८ ॥ तिरिक्वजोमित्थी मते ! केवतिर्य काल ठिती पणता ? गोयमा,। जहण्ण भतोमुहुर उकाण तिमिपलिमोवमाई ॥ जलयर तिरिक्सजोगिरथीण मते! केवड्य कालं ठिती पण्मचा? गोयमा जहणेण अंतोमहुच उकोसेण पुज्यकोरी॥ चउपदप्पलयर तिरिक्खजोगिरियणं भते ! केवतियकाळ ठिती पण्मचा ? गोयमा ! जहण्येन अतो बाबा-माहारा समदेवसायीनामसारी पस्योपनकी स्थिति धिान देवलोककी मपरिग्रही देवी बाश्री र मादेशमे सपन्य वतर्मुर्त रतावास लापम सौपर्म देवसोक की अपरिग्री देवी माश्री, एक मादेश मे अपम्प समुंडून पताना परयो। पप ईशान देस्सोक की परिवही देवी पाश्री एक मादेश से मपन्य मुहूर्त रकह पात पस्सोषम मौर्ष रोककी परित्री देवी माश्री ॥ ८॥ प्रश्न निरनी की स्थिति कितनी सी।चर- तिरपी की स्थिति बपन्न अंतर्मुहूर्त सा तीन परयापम की प्रश्न-पर विरची ही किसी पर मार वित्तिो की परम्प नर्स 4-मीरामिनम तृतीय पान + मुटु उकोसेम तिणि पलिओषमाइ, उरपरिसप्प थलयरा तिरिक्त जोणिस्थिण मते ! केवइयं कालं ठिरपण्णता ? गोयमा ! जहण्णेम अतो मुद्दल उधोसेणं पुन्यकोटी एवं मुयपरिसप्पि ॥ सहयर तिरिक्स जोणिस्थीण जहण्णणं अतो मुहुस उकोसेण पलिओवमस्स असखेजति भागो ॥ ९ ॥ मणुस्सिरीण भते ! केवतिय काल ठिती पण्णता ? खेत पहुच जहण्जेण अतो मुहुरा, उक्कोसेम तिमि पलिठवमाइ ॥ धम्मचरण पटुप जहण्मेण अंचो मुटुस, उक्कोसेण देसणा पूज्यकोडी, कम्मभूमग मणुस्तिथी मते ! केवतिय काल ठिती पण्णता ? गोयमा ! खेत विपनी की स्थिति कितनी नीचर-चतुष्पद मसपर विर्यवती की स्थिति मपन्य मंतर्मुडून उसाहनीन परपोपम की इन-उरपरिमर्प स्पश्पर विपणीकी स्थिति कितनी कही है। उत्तर-मपन्य अंतर्मुर्व रहर पूर्ण कोर ऐसे है। मुझ परिसर्प विर्य चषो की मानना खेपर तिर्यचनी की मपन्य अवमुर्व उसा पल्पोपम का असंस्थातरा माम ॥९॥ प्रश्न-मनुष्य, सी की कितनी स्थिति की ? उचर-क्षेत्र मानी पर मतमु उस्कृष्ट तीन परयोपप और धर्माचरण भात्री अपन्य अंतमुर्न उत्कृष्ट उप कम को पूर्व पार-कर्म भूमि मनुष्य को की कितनी स्थिति कही है। रघर-क्षेत्र भाश्री नपन्य कामसरी पति-पाति - अनुरादाबामधारीमान श्री ममोडक शामिनी पहुच्च जहण्जेण अतो मुहुच उक्कोसेण तिणिपलिउवमाइ,धम्मवरण पडुच्च जहण्जण अतोमुहुर्च, उक्कोसेण देसूणा पुन्यकोडी ॥ भरहेरवय कम्मभूमग मणुस्मित्थीण भते! केवतिय काल ठीती पण्णता ? गोयमा ! खेत पडुच जहण्णेण अतो महुच 1 उक्कोसेण तिणिपलिओवमाइ, धम्म चरण पहुच्च जहण्णण अतो महुर उक्कोसेर्ण- देसुणा पुन्यकोडी ॥ पुम्वविदेह अवरविदेह कम्मभूमगमणुस्सित्थीण मते ! केवतियं काल ठिती पण्णचा ? गोर्यमा ! खच पडुच्च जइण्णेण अतामुहत्त उकोसेणं पुरुषकोडी ॥ धम्मघर पहुच जहण्णेण मतो मुहुत्त उक्कोसेण देमूणा प्रकाशक-ग्रजापदर लाठा सुखदेवतहायनीज्वालाप्रमादमी अंतर्मुडून उत्कृष्ट वीन पोपम धर्माचरण आश्री जघन्य अतमुहूर्त उत्कृष्ट कुच्छ कमपूर्वकोट मरत व एरवत कर्म मूपिक मनुष्य की स्त्री की कितनी स्थिति की वचर-क्षेत्र माश्री नघन्य अंतर्मुहूर्न उत्कृष्ट तीन पल्पोपप घर्मा- घरण माश्रिय नप प मंतर्मुहूविकट कुच्छकम(पाठवर्षकम)काद पूर्व प्रश्न-पूर्वनिदेव व अपर विदह कर्मभूषिवाले मनुष्पणी की कितनी स्थिति है ? उत्तर क्षेत्र यामी अघन्य अतर्मुहूर्त उत्कृष्ट पूर्व क्रोड, धर्माचरण भाश्री बपन्य मतदूत उत्कृष्ट कुए कम क्रोड पूर्व अकर्म भूमि की पनुष्यणी की कितनी स्थिति कही। उत्तर जन्म भाश्री मपन्प परपोपम का असरूयावा माम कम एक परपोपप रका तीन परपीपम 44+ चतुर्दशीवाभिगम सूत्र तृवीय उपास पुन्वकोहि ॥ अकम्मभूमगमणुस्सिवीण मते ! केवतिय कालठिती पण्णता ?गोयमा जम्मण पडुच्चजहण्णेण देसूण पलिउबम पलिओवमस्स असखेज्वति भागेण, ऊणग उक्कासेण तिण्णि पलिओवमाइ ॥ सहरण पहुश्च जहण्णेण अतोमुहुच उक्कोसेण पसूणा पुवकोडी ॥ हेमबए एरन्नथए जहण्णण देसूण पलिओवम, पलिउवमरस मसखजइ भागे ऊगम, उक्कोसेण पलिउवम, सहरण पडुच्च जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्कोसण ऐसणा पुनकोडी, हरिवास रम्मगवास अकम्मभूमग मणुस्सित्थीण भते । केवइय काल ठिई पण्णचा? गोयमा! जम्मण पडुच्च जहण्णेण देसूणाइ होपलिओवमाइ, पलिओवमरस असखज्वति भागेऊणाइ, उक्कोसेण दोपलिउवमाइ, सहरण पाश्च साइरन आश्री जघन्य मर्मुस उन्कृष्ट कुच्छ कम पूर्व के ड,हेमवय परणायके क्षेत्रकी मनुष्यणीकी स्थिति अघन्य परपोपमा असख्यातवा माग कम एक परयोपम,उत्कृष्ट,एकपल्पोपम साहरन पाश्री जघन्य अवर्मुहूर्त उस्कृष्ट कुच्छ कम पूर्व क्रोड प्रश्न रिवर्ष रम्पक वर्ष अकर्मभूमि मनुष्यणोकी कितनी स्थिति कही? उत्तर- जाम मात्रा जघन्य परयोपम का मसख्यायवा भाग कम दो पल्योपम उत्कृष्ट दो पल्योपम साहरन पाश्री जयन्म अत्तर्मुडून उत्कृष्ट कुछ कम पूर्वफ्रोड प्रम-दवकुरु उच्चरकुरुकी मनुष्यणी की किरनो स्थिति की? उत्तर- जन्म भ में पस्योपम का प्रसख्यानमा भाग कप तीन पत्योपा उत्तए तीन पल्योपम साहरन आश्री 84 दूसरी प्रतिपचि - मुनिश्रीगोत्री अहणे असोमुहुन्न, रक सेम देसूणा पृषकोडी ॥ देवकुरु उत्तरकुरु अकम्म भूमगमणस्सिरीण मताकवतिय काल ठिती पण्णत्ता गोयमा! जम्मण पडच्च जहन्नेण देसूणाई तिण्णि- पलिओषमाइ,पलिओषमस्त असखजति मागेण ऊणगाइ, उक्कासग तिणि पलिभोषमाइ,सहरण पहुच्च जहण्णण अतोमुहुच उकोसेण दस्णा पुन्वकाही अतरदविग अकम्मममग मणुस्सिवीण मते ! केवतिय काल ठिती पण्णता ? गोपमा | जम्मग पहुच जहण्णण देमूण पलिओचम, पलिओवमरस, असखज तिमानणणय, उकोसण पलिओवमस्स ममखतिमार्ग, सहरण पडुच्च जहण्णेण मतोमुहुच उकोसेम वसूणापुत्रकाठी ॥१०॥ देवित्यीण भते ! केवतिय काल ठिती पसा गोयमा ! जहणेण दसवास सहस्साइ उक्कोसेण पणपण पलिओवमाइ, भवणवाति देविस्थाप मते । केवतिय काल ठिती पण्णत्ता गोपता। जहण्जेण दस वाससहरसाइ उक्कोसेणअड पलिमोवमाइ मपम कार्मु पका कुप कम कपूर्व पश्न तर दीपकी मनुष्यणीकी फिनती स्थिति की सचर जन्म मानो परोपम के बसस्पातो माम में कुण्डम और उत्कृष्ट पस्योपका मसंख्यावरा माग साइरन मात्री अपमतमा तापमई कोर॥॥ मन देवी की जितनी स्थिति की सचर बफ दर हमारम५५ समम मानवासी देवीकी कितनी स्थिति कीपर पपपरमार पकाशक रामारादर लासा मुखदरसायनी यासार 48 पध-प्रपाभिगम राम-मृतीय उपान १ एष असुर कुमार भवणचासि देवस्यीयाएवि ॥ नागकुमार भवणवासी देविस्थियाए जहण्ण दसवास सहस्साइ उक्कोसेण देमण पलिओषम, एव सेसाणवि जाव चाणय कुमाराण ॥ वाणमतरीण जहणेण दसवास सहस्साइ, उक्कोसेणं मह पलिओवम । जोतिसीणं जहण्णेण अट्ठभाग पलिओवम उक्कोसेण अपलिओवम पण्णासाए पास सहस्सेहि अज्झतिय, चदविमाण जोतिसिय देविस्थियाए जहण्णेण चउभाग पलिओवम उक्कोसेण तचेव, सूरविमाण जातिसिय देवित्थियाए, जहण्णेण चउभाग पलिआवम, उकासेण अद पलिओवम, पयहिं पाससतेहिं, मशहय, गहत्रिमाण उसष्ट सरे चार पस्योपम की ऐसे ही अमुर कुमार मानवासी की देरी की मानना नाग कुमार भवन वासी देवी की नपन्य दश हजार वर्ष उस्कए कुछ कम पस्पोपम की, ऐसे ही स्वनित कुमार पर्यंत क्षेप मव मुवनपति की देवी की स्थिति कहना ॥ पाणव्यवर देवी की जघन्य दश हमार वर्ष उस्लष्ट भाषा पोपम ज्योतिषी देवी की मपन्य पस्योपम का माठवा भाग उत्कृष्ट भाषा पल्योपम पपास हजार पर्प अधिक, चद्ध विमान देवी की नपन्य एक पत्योपम का चौथा भाग उस्कृष्ट भाषा पस्योपप व पचास पार वर्ष अधिक सूर्य विमान ज्यातिषी देवी की जघन्य पल्योपम का पौया माग चस्कृष्ट भाषा परपोपम । पांच सो वर्ष अधिक, ग्रह विमान ज्योतिषी की देवी की भघन्य पस्योपम का 4- दूसरी. मावाचि 41m मनुवादक-पारनाच रीमुनी श्री अमोलक ऋपिनी जोतिसिय देवित्थिण जहण्णण चउमाग पलिओबम उकासेण अह पाल ओवम पक्ख. चाविमाण जोतिसिदोवित्यियाए जहण्णण चउभाग पलिओवम उक्कोसण साहिय घउभाग प्रलिभोवम, ॥ तारा विमाण जोतिसिय देविस्थियाए जहपणेणं अट्ठभाग पलितोवम, उकोसेण सातिरेग अट्ठभाग पलि मोवम वेमाणिय देवित्थियाए जहण्णेण पलितोषम, उकोसेण पणप, पलिमोवमाइ, सोहम्म कप्पवेमाणिय देविस्थीण भत | केवत्तिय कालठिती पण्णता गोयमा ! जहणेण पलिआवर्म उक्कोसेणं सत्तपलिओवमाइं ॥ ईसाण देविरयीण जहण्णेण सातिरंग पलिओवर्ण उकोसेम णवपलितोवमाइ ॥ ११ ॥ इत्याण मते चौथा भाग उत्कृष्ट पल्पोपम, नक्षम विमान की देवी की जपम्प पस्पोपम का चौथा -माग 'कृष्ट परयोपम के पौधे माग से कुछ भपिक तारा विमान पासिनी देवी की अघन्य पल्पोपम का आठवा माग उत्कृष्ट मापिक परपोपम का माठना माग वैमानिक देवी की जघन्य एक पल्पोप्रम उत्कृष्ट पचायन पत्योपम सौपर्म दरखोफ की देवी की स्थिति मपन्य एक पश्योपम की उत्कृए सात पल्यापप की परिग्रही देवी भाभी शान देवलोक की देवी की स्थिति मपन्य एक परपोएम की उत्कृष्ट नम पत्यापम की और- मपरिको देवी की स्थिति पर मन परपोपम की बागे सियों की उत्पनि नरें ॥१॥ प्रभ भहो भगवन् ! एक नील नोवेद का श्री वेद पने से तो कितना काक करो! प्रकाशक गमाबहादुर लाला पुसटर सायनी मालामसार पतईन भावाभिगम मूत्र तृतीय उपार इस्थिति कालतो केवञ्चिर होति । गोयमा ! एकादेसणं जहण्णेणं एकसमय, उकासेण देसुत्तरं पलिओवमसत पृथ्वकोडी पहुत्त मज्झहियं ॥ एकेणादेसेणं जहण्णेण • एकसमय उक्कोसेण अट्ठारस पलिओवमाइ, पुनकोडी पुहत्तमझाहियाइ ॥ एक्केणा- देसेण जद्दण्णेण एकममयं उक्कोसेण चोदसपलिओचमाइ पुन्वकोडी पुहुत्तमज्झहियाई।। एकणादेसण जहण्णेण एकसमय उक्कालेण पलिओवमसय पुनकोडी पुहुत्तमज्झहिय।। उत्सर मा गौतम ! एक मादेश से जघन्य एक समय ( उपश्चम अणी से पीछे पडता हुवा खावेदी जीव काल करे इम अपेक्षा ) उत्कृष्ट ११० पल्योषम, प्रत्येक पूर्व कोह अधिक, कोई स्त्री वेदी जीव दो भव दूसरे देवचोक की अपारग्रही देवीपने करतो इस के ११० पस्योपम होवे और बीच में मनुष्पणी का मष कर सो अधिक जानना (देवी पहा से चषकर असरणात वर्ष के आयुष्यवाली स्त्री में नीं उत्पन्न होनी है) दो प्रकार मे जघन्य एक सपय उत्कृष्ट भठारा पशोपम प प्रत्येक क्रोड पूर्व अधिक यहां दूसरे देव लाक की परिग्रहोदवी के दो मव और अन्य सिर्यवणी या मनुष्पणी के भय याश्री जानना तीसरे प्रकार से भघन्य एक ममप सत्कृष्ट चौदा पल्पोपम व प्रत्येक क्रोड पूर्व अधिक, पहिले देवलोक की परिग्री देवी भाश्री चैव प्रकार मे अघन्य एक समय, बुस्रष्ट सो पल्योमम प्ररपेक क्रोड पूर्व अधिक पहिले देवलोक को अग्रिी देशी अश्री, पांचो प्रकार से जघन्य एक समय उत्कए प्रतीक पल्योपम च प्रत्येक पूर्ण 42 दूसरी मति पचि I am अनुवादक मीमुनी श्री अमोलक ऋपिनी- जाति सय देवित्थिा जहण्णण घउमाग पलिओवम उकासेण अद्ध पालि ओवम पक्ख. चाविमाण जोतिसिदोवित्थियाए जइपणण चउभाग पलिओवम उक्कोसण साहिय घउभाग प्रलिओवम, ॥ सारा विमाण जोतिसिय वित्यियाए जहष्णेण अट्ठमाग पलितोयम, उकोसेण सातिरेग अट्ठभाग पलि मोवम वेमाणिय देवित्थियाए जहण्णेण पलितोषम, उमोसेण पणप, पलिओवमाइ, सोहम्म कप्पवेमाणिय देविस्थीण मत ! केवत्तिय कालठिती पण्णता गोयमा ! जहणेण पलिआवर्म उकोसेणं सम्पलिओषमाइ ॥ ईसाण देवित्यीण जहणण सातिरंग पलिओवण उकोसेम णपलितोवमाइ ॥ १॥ इत्याण भते । चौथा भाग उत्कृष्ट पत्योपम, नाम रिमान की देवी की अपग्य परपोपम का पोया माग उत्कृष्ट पत्योम के पीये माग से कुए पिक वारा रिमान पासिनी देवी की मपन्प पल्पोपम का माना माग उत्कृष्ट मापिक पल्पोपम का भाग माम मानिक देवी की जघन्य एक पक्ष्योप्रम उत्कृष्ट पधारन पल्पोपम सौधर्म दरखोकी देवी की स्थिति मपन्य एक पश्योपम की उत्कृष्ट सात पत्योपप की परिग्रजी देसी भाभी ईशान देवलोक की देषी की स्थिति नपन्य एक परपोएम की उत्कृष्ट नर पल्यापम दी और अपरिग्ररी देवी की स्थिति परपन परपोपम की बागे सियों की उत्पत्ति ना" प्रभ पो भगवन् ! एक मीर सोवेद का खी वेद पने रोवो जिवना काम करते? मकासक गमावह दर लाला मुखटर सायनी जालामसारनी Nare चतुर्दश भीवामिगम सूत्रनृनीय पास in मणुस्सिस्यीण भते । मणुरिप्तत्थिीत कालतों केवच्चिर होति ? गोयमा ! खेच पडुच्च जहण्णेण मतोमुहुत्त उकासेण तिण्णि पलिओवमाइ पुनकोडि पहुचमज्झहियाइ ॥ धम्मचरण पडुच्च नहण्जेण एक समय उक्कोसेण दसूण पुनकोडी ॥ एव कम्मभूमियावि भरहेरतियावि, णवर खेचं पडुच्च जहण्णेण अतो महुच उक्कोसेण विणिपलिओवमाइ, दसूणा पूचकोडी अम्माहियाइ ॥ धम्मचरण पडुच्च अहण्मेण एक समय उकासेण देसूणा पुनकोडी ॥ पुनविदेह अवरविदह मणुरसखत्त पडुच जहणेण अतो मुहुत्त उक्कोसेण पुनकोडि पहुच॥ धम्मचरण पडुच्च जहण्मेण गन् ! मनुष्पणी मनुष्यणीपने कितना काल ता रहती है । महो गौतम ! क्षेत्र आश्री जघन्य अतर्मुहूर्न उत्कृष्ट पत्योपम व पूर्व फोर अधिक, धर्माचरण आश्री, जयन्य एक समय उत्कृष्ट कुछकम पूर्वकोह ऐसे ही कर्मभूमि व भरत एम्वत का जानना परतु सत्र म श्री जघन्य अतर्मुहूर्त उत्कृष्ट नीन परयोपम व देशऊना फाह पूर्ण अधिक धर्मापरण आश्री मघन्य एक समय उत्कृष्ट कुच्छ म पूर्व क्रोर पूर्व विदेह व अपर विदेश मनुष्यणी की क्षत्र आश्री जघन्य अतर्मुहूर्न उत्कृष्ट प्रस्पेक पूर्व के धर्माचरण पाश्री अघन्य एक समय उत्कृष्ट फुच्छ कम पूर्व फर अकर्मभूमि की मनुप्पणी भकर्मभूमि में कितना काल सम NH दूमरी प्रासपाच +4+ गणे आदेसणं जहण्गेण एकसमय उक्कोसेमं पलिओधमपुहुर्च पुनकोरी पुहुत्तमम हिपा।१२॥तिरिक्खजोणिण भते तिरिक्खजोणित्यित्ति कालतो केवधिरं होइ ? गोयमा! जहण्गेण अंतामुहुच उफासण तिणिपलिओवमाइ पुवकोहि पुत् मज्झहियाइ, जल चरीए जहण्णण अतोमुहच उकोमेण पुरुषकोडि पुहुत मज्झाहिय॥चउप्पदयलयतिरिक्त जहा उहिता, तिरक्खीउरगपरिसप्पि मुयगरिसपिपत्थिण जहा जलपराण ॥ खहयरी जहण्गेण अतोमुहुच उफासण पलितावमरस असखेजतिभाग पुनकोहिपहत्तमाहिय बमुसकपास्यमधारी मुनि श्री अमोहक पत्रिी को कोर मषिक सात भर तिर्थवणी के पूर्व को मायष्प के मोर आठचे मर में देरकूर उत्तर कुरु में सीन पल्पोपम के मायुष्य पात्रो युगलनी होकर सोषर्म देवलोक में मपन्य स्थिति पाली देवी ये ॥ १२॥ प्रश्न-पो मगन् ! तिर्पणी तिर्यंचणीपने कितना काल तक रहती १३ उत्सर मो गौवम ! मपन्य मार्न उत्कृष्ट तीन परयोपम प प्रत्येक कार पूर्व मधिक सात मा पूर्व कोर की स्थिति के करे आठमा भर तीन परपोपप की स्थिति का करे मोर नवा मा पूर्व कोर की स्पिदि का करे नकचरी मसचरीपने रोका जघन्य मंतमर्म उस्कष्ट प्ररपेक पूरे कार, चतुष्पद पलवरी का मापिक मेसे मानना, तर परिसर्प । भुम परिसर्प का बनरी मेस मानना सेपरी का सपन्य म उस परोपमा मसरूपातमा माग व प्रस्म के रपूर्व भाषिक माना॥१३॥व-पो मग- पाशा-रामासादुर माला रूदवसायमी बाबासारनी.

प gar चतुर्दश भीवाभिगम सूत्र-नृतीय उपास 47+ मणुस्सिरीण मते । मणुस्तित्यिति कालतो केवचिर होति १ गोयमा ! खेच पहुच्च जहण्णेण अतोमुहुत्त उकासेण तिणि पलिओवमाइ पुन्वकोडि पहुचमझहियाइ ॥ धम्मचरण पहुच जहण्णेग एक समय उकोसेण देसूण पुनकोडी ॥ एव कम्मभूमियावि भरहेरतियावि, णवर खेत्त पडुच्च जहण्णेण अतो महुत उकोसेण विपिणपलिओचमाइ, दसूणा पूज्यकोडी अग्भाहयाइ ॥ धम्मचरण पहुच्च अहण्णेण एक समय उक्कोसेण देसूणा पुवकोही ॥ पुन्वविदेह अवरविदह मणुस्सखत्त पडुच्च जहाणेण अतो मुहुत्त उक्कोसेण पुनकोडि पहुत॥ धम्मचरण पहच्च जहण्णेण पन् ! मनुष्पणी मनुष्पणीपने कितना काल तक रहती है ? महो गौतम ! क्षेत्र आश्री अघन्य अतर्मुहूर्न उत्कृष्ट पश्योपप प पूर्व शोर मषिक, धर्माचरण आत्री, जघन्य एक समय उत्कृष्ट कुछ कम पूर्वनोद एसे ही कर्मभूमि व मरत एग्बत का नाना परतु सत्र अ श्री जघन्य अतर्मुहू उत्कृष्ट मान पत्योपप व देशऊना झार पूर्व मधिक धर्माचरण माश्री मघन्य एक समय उस्कट कुच्छ म पूर्व क्रोड पूर्व विदेह व अपर विदेड मनुष्यणी की क्षत्र माश्री जघन्य अतर्मुहूर्त उस्कृष्ट प्रस्पेक पूर्व क्रेड धर्माचरण पाश्री अघन्प एक समय उस्कृष्ट कुच्छ कम पूर्व र मर्मभूमि की मनुष्यणो मर्मभूमि में किचना काल तक 498 48 दूमरी प्रातिपरि +4 मनुवादक वाम्ममचारी मुनि भी अपारक ऋपिभी + एक समय उक्कोसेण देसूणा पुषकोडी ॥ अकम्मभूमिक मणुस्सित्थिण, अकम्मभूमए कालओ केवधिर होति? गोयमा जम्मण पहुच्च जहण्णण दसूण पलिआवम पलिभोयमरस असखजतिभागेणऊग उक्कोसण तिण्णि पलितोवमाइ ॥ सहरण पहुच जहण्णेण अनोमुहुच उक्कारेण तिण्णि पलिठवमाइ दमूणाए पुब्धकोडिए अमहियाइ ॥हेमवतर- पणवे अकम्मभूमिमणुस्मिस्थिप भते! हेमवतरण्णवे कालतो केवञ्चिर होइ ? गोयमा ! जम्मण पहुच्च जहणेण पेसूण पलिओषम पलिओवमस्त असस्वेज्जति भागेण ऊणग उकोसेण पलिओवमग, साहारण पहुच जहण्णेण अतोमुहुत्त उकोसेण सनी है ? उत्तर भन्म अ श्री पल्योपप का असरूयासवा माग कम एक पल्पोपम उत्कृष्ट सीन पल्पोपम मारन मानो अघन्प अंसमु उत्कृष्ट तीन पल्पोपम व कुच्छ कम कोर पूर्व अधिक, प्रश्न-डेमण्य एरणक्य की मनुष्पणो रेपश्य एरणाय में किसने काल सक रहती है। उत्तर-मन्म आश्री पश्योपम का समस्पातवा माग कम एक पल्पोपम उत्कृष्ट एक पत्योपम सारन आश्री मघन्य अतर्मुहूर्न पत्कृष्ट एक पन्योपप व कुछ कम पूर्ण कोर अपिर कोई देव कर्मभूमि की स्त्री को हेमण्य एरणय क्षेत्र में सारन करक मारे पर वहां कुछ कम कर का मायुष्प मोगा कर काम कर मापे और सीपमें • प्रकाशक-रामबहादुर लाला मुम्बदवसायमी बामसारी 4. चतुर्दश-भीवाभिगम सम-तृतीय पास 48 पलिओयम देसूणा पुषकोडीए अमहिय ॥हरिवास रम्मवास अकम्मभूमग मस्तित्थीण मते! कालो केवचर होई? गोयमा ! जम्मण पच जहण्णेण देमूणाइ दो पलितोषमाइ पलिओवमस्स असखेजतिभागेणं ऊणगाइ, उक्कोसेण दोपरितोषमाइ ॥ साहरण पडुच जहणेण मतोमुहुत्त उक्कोसेण दोपलिओवमाइ दसूणाइ पुन्चकोडि अभिहियाइ ॥ देवकुरु उत्तरकुरु नम्मण पडुच्च जहण्णेण देसूणाइ तिन्नि पलिओवमाइ पलितोवमस्स असखेजइ भागेणं ऊ गाइ उक्कोसेण तिन्नि पलिओषमाइ,सहरण पडुच्च जइण्णण मतोमुहुत्तउक्कोसेण तिणि पलि ओवमाइ देसूणाए पुज्यकोडीएअभहियाइ ॥अतरदीवा कम्मभूमगमणुस्सि २ जम्मण पडुच्च जहणेण देसूण पलिओवम पलितोवमरस असखेजति भागेण ऊण 4740+ दूसरी प्रतिचि ++++ युगसनीपने उत्तम होये उस आश्री परिवर्ष रम्यक् वर्ष अकर्मभूमि मनुष्यणीकी जन्म आश्री परप का मसरूयासमा माग दो पस्योपम उत्कृष्ट दो परपोपम की साहरन अ श्री जघन्य अंतर्मुर्न उत्कृष्ट दो परयोपम र कुछ कम कोड पूर्व अधिक जानना देवकुरु उत्तरकुरु की जन्म आश्री जघन्य परगोपम का असंसपाता माग कम तीन पल्पोपम उलट सीन पल्योपम मारन आश्री जप य अतर मुहूर्त उत्कृष्ट तीन पल्योपय व कुच्छ कम क्रोटपू अधिक अंतर दीप की देवी का जन्मय आश्री जघन्य पल्पोपम के सूत्र रमनुवादक-वारममपारा मुनि श्री ममोम पीपीs- उकोसेर्ग पल मोबमस्स असखेजतिभाग,सहरण पशुख अहमण अंतोमुटुस, उकोसेनं पालउवमरस असलेजतिमाग देसणाए पून कोडीए अम्महिय ॥१॥ देविस्यीण (देवीणं )मते! देविस्थिति कालओ केचिरहोइ? गोयमा! जच्चव सचिट्ठणा ॥१५॥ इस्योण (इत्थीएण ) मंत! केवतिय काल अतर होति ? गोयमा ! जहण्मेण मतो महुत्त उकासण मनतकाल वमस्सति कालो एवं सव्वार्सि तिरिक्सीण ॥ मणु. मसंस्पात मे माग मे कुच्याम मा पस्पोपम का संस्पातवा भाग साइरन बाश्री अपम्य अंतर रस्कृष्ट पस्पापपका मसरूयावषा मामकृपाबम पूर्व भपि॥४॥मनमो भगान्। देवता की स्त्री देवी पने कितने काम कराती है! पचर-महो गायम । जैप्स देवी की स्थिति की बैसे जानना क्यों की देवी घरकर पुनः देवीपने नहीं उत्पम होती है ॥ १५ ॥ मन-मो भगवन् लोकानपने कितना -वर होतात् सी वेद में से नीकला पुनः कितने समय में लीपाप माह करे ? मो गौतम ! अघन्य अनर्मुर्व उस्कृष्ट मनन काल पनस्पति म श्री इतना सो वेद अंतर मानना पसेपी नियंत्रणी मनुष्यपी का मानना मनुष्य में क्षेत्र माश्री गपन भतर्नु उस्कृष्ट मत काय, पर्यावरण बाश्री नयन एक समप सामर्ष पुहरू परापर्व में दुकामेही पूर्व पहादिसमपर महावित क्षेत्र माश्री बानमा बपि की पनुष्याची अंबिसी अंदर मातार सामा मसारसायमी ग्यास 41 पतुरंप नीवामग सू तृताय पा. स्सिस्यीण मणुस्सिस्थिए खेत पहुच्च नहण्णेण अतोमुहुन्छ, उक्कोसम वणस्सइ कालlll धम्म घरण पहुच जहप्मेण समउ उक्कोसेण अणत काल जाव अवट्ट पोग्गलपरि यह देसूण, एव जाव पुग्ध विदेह अवर विदेहियाओ ॥ अकम्म भूमगमणुास्सरियण भंते ! केवतिय काल अतर होइ ? गोयमा 1 जम्मण पडच्च जहण्णेण दसवास सहरसाति मतोमुहुत्त मज्झ हयाइ उकोसेण वणस्सइकालो, सहरणं पडुच्च जहण्ण अतोमुत्त उक्कोसेण वणस्सइकालो एव जाव अतरदीवियाओ। कहा। उत्तर-जन्म पानी मघन्य दश हजार पर्प अतर्मुर्न मषिक क्यों कि अकर्मभूमि की खी परकर अपम्प स्पिरिपाले देवतापने उत्पनरोवे परदशामासर्प का मायुप्प मोगवकर कर्मभूमि मनुष्यकी स्त्रीपन उत्पन होने से परकर गर्म भूमि में सीपने उत्तम गरे उत्कृष्ट बनस्पति के काल जिवना अनत कास पर पर सारन मानी मपन्य अंतर मुडून उत्कृष्ट अर्नव काल एने । अतर द्वाप पर्यंत काना प्रम अहो मगरन । देवता की सो मरकर पुनः देवता की वोपने उत्सन गवे तो कितना काल का अंतर होरे । उचर-बगो गोतम । मपन्प अंतर मुहूर्त क्योंकि देवी परकर कर्म भूमि में उत्पन्न हो। का पूर्ण पर्याय पाप कर पुनः दयी पने उत्तम होये सस्कष्ट वनम्पति का कास जितना अन्न कस मानना एमेनी मसुरकुमार भवन पति की देवी से ईशान देपलीक की देवी पर्यंत सबका कहना ॥ +4+ दूसरा पति पधि - कामनुगाक पासामधारी मुने श्री भयोगक अषिमा देवित्यिण सन्वेर्सि जहण्मेण अंतोमुहुन उकोसेंण वणरततिकालो ॥१६॥ एतासिण भते! तिरिक्खजोणियाण मणास्सात्थियाण देवित्थियाण कपरा २ हिंतो अप्पावा वहुयावा तुलावा विसेसाहियावा ? गोयमा ? सन्वत्थोवाओ मणुस्सित्यीयाओ, तिरिक्खजोणि- स्थियामो असोजगुणाओ, पेविस्थियाओ सखजगणाओ, ॥ एतामिण भते । तिरि- क्खजोणिरिययाण जलयरीण थलयरीण वहयरीणय कयरा२हिंतो अप्पाओवा बहुया- ओवा तुल्लाओषा विसेसाहियामोवा?गोयमा समस्योवाओ खहयरि तिरिक्खजोगियाओ तिरिक्खजाणियामो सखेज गुणाओ, जलयर तिरिक्ख सखजगुणाओ ॥ एतासिण मते ! मणुस्तिथिम कम्म भूमियाण अकरमभूमियाण, अतरपीवियाणय कयरा २ ॥ १६ ॥ प्रभ-मो भगवन् ! तिर्यंचमी, मनुष्पणी, - देवी में कौन किस से अस्प, बहुत तुल्प व विश्वेषाधिक मो गौतम ! सब से यदी मनुष्य की सी क्यों कि वे सस्पात कोराकोर है, इसमें विपच की खो अस्यागनी, इस से देवियों असख्यातगुती प्रश्न-मा भान् ! तिर्यंचणी में बलवरी स्पलचरी व संचरी में कौन किस से मस पहुन तुरैप व विशेषाधिको? उत्तर-पो गौतम ! सबसे योती लेवरी तिर्येचणी, चप्स से स्थलचरी नियंत्रणी संस्पात गुनी, रस से मापरी तिषणी संस्थान मुनी गभ-महा मगन् ! मू में की खिों, भर्मममि मतर : - - * ७ प्रकाशक-रामाशाटर मना सुखदेयममममी बामसाहन 4. चतुर्दश-जीवाभिगम मूत्र-ननीय उपाय - हितो अप्पावा जाव विसेसाहियावा ? गोयमा ! स्त्थोवाओ मतरदीवग अकम्म भूमग मणुरिसत्थियाओ, देवकुरु उत्ताकुरु अकम्मभूमग मणुस्पित्थियाओ दोषि- तुल्लाओ सखजगुणाओ,हरिव स रम्मगवास अकम्मभूमग मणरिसत्थियाआ दोवितुल्लाओ सखेजगुणाओ, हेमवय हेरण्णवयवास अकम्मभूमग मणुस्तित्थियाओ दोषि तल्लाआ सखेज्वगुणाओ मरहेरवगवास कम्मगभूमग मणुरिसत्थियामओ, दोवि तुझाओ सखेज्ज- गुणाओ,पुनविदेह अवरविदेह कम्मभूमगमणुस्सित्थियाओ दोवि तुल्लाआ सखेनगुणाओ। अल्प यहुन तस प विशेषाधिक है ? अहो गौतम ! सत्र में ये डी अन्तर' द्वाप की स्त्री, इस से देवकृरु उचरकुरु की स्त्रियों परस्पर तुल्य मरूपात गुनी, इस से परिवर्प रम्यक् वर्ष की सियों परस्पर तुल्य सरूयात गुनी इस से हेमवय एरणवय की स्त्रियों परसर तुल्प सख्यात गुनी, इस से भरत एरावत क्षय की मनुष्य त्रिपों परस्पर तुल्य सख्यात गुनी, इस से पूर्व विरह व अपर देश क्षेत्र की खियों परस्पर तुल्य सख्यात गुनी प्रश्न-अहो मगवन् ! देषियों में मानमामी, पणन्यवर, ज्योतिषी व वैमानिक की देवियों में से कौन किस स अल्प पाहत तुल्प प विशेषाधिक है ? उत्तर-पो गौसम ? सब मे योटी वैमानिक की देवियों, क्यों की अगुल मात्र क्षेत्र प्रदेश राशि का दूपरा वर्ग मूल को तीसरे वर्ग मूल से गुनने से जितनी गशि होवे उतने प्रमाण उन को हुई लोक की PORON दूसरी मतिपचि AR , ८३ एतामिण भते । देवरियपात्र भाणवासीण पाणमंतरीणं जोइसियार्ण वेमाणिणीणय कयरे २ हिंसा अप्पावा जाव विसेसाहियावा ? गोपमा । सम्बत्योचाओ वेमाणियाओ देवित्यिपाओ, मवणवासी देहित्यियामो मससे जगुनाओ, वाणवतर देवित्थियाओ असखाजगुणाओ, जतिसिय देवस्थिपाओ सखाजगुणाओ ॥ एतासिण मते । तिरिक्त- जोणिपाण जलयर्गम थलपरीण स्वइयरीण मणुस्सिस्थीयाण कम्मभूमियाण अकम्म भूमियाण, अतरदीविषाणं, दविषयावं, भवषवासिणीण, वाणमतरीण, जोतिसि- प्रवेश प्रति जितने भागध प्रदेश से पचीससे मानदेने से रखने प्रमानमें है, इसमे मौधर्म ईशान देवलेक की देवियों भसस्प त गुनी क्यों कि गुप मात्र क्षेत्र प्रदेश गक्षिका प्रथम वर्ग मूल रमे दूपरे पर्ग मूमे गुने मे मिनी पाषावि गरेइनने पार्षमितने पदेवराधिोये, सेवचीमा मानदे समोप्रपन बारे ममी है, इसमे संवा सकी हरियों बसरूपातमुनी क्यों कि नसल्यास पोजन प्रमाण एकदेषिक पीय मिसनमा एक प्रवर में सोनीपचीस का मानदेने से दो बारे उनी समता सिग्स से पोतिषी की सियों संरूपातबुनी क्यों कि २५६ बुक प्रमाण एक प्राकी श्रेणी बाप र मिलने एक मसर में रोस रचीमा भान रखिरने से बिकनी रस्सी. कापस् ! नितिभापरी, सामनी, ष नियों प्रकाश-रामारादरमग पुससमापनी मासाही पतुश-ग्रीवभिगम सान्तवाय पान 41 पाणं वैमाणिषीणय कयरा २ जाब विसेंसाहिया ? गोयमा ! सम्वत्यो अतरवीक्षा मकम्म भूमग मणुस्सिास्थियाओं देवकुरु 'उत्तरकुरु अकम्मभूमग मस्तिथिगओ दोवितुल्ला सखेजगुणाओ, हरिवाम रम्मगवास अकम्मभूमा मणु स्मरथीयाओ सखजगुणाओ, हेमवतेसवास अकम्मभूमग मणुस्सिारथयाओ दाव अमखज- गुणाओ, भरहेरपयवास कम्मभूमग मणुस्सित्थीओ दावि सखजगुगामा, पुनविदेह भवरावदेहवास कम्मभूमग मणुस्सित्थीओ पावि सखजगणाआ बेमाणिय की, अर्ममूमि पर दीपकी सियों व देवत्रियों में मानवामीनी. आणठयरी, ज्या सिपीनी व मा. मिकिनी देवी सिपो में फोन किम मे अप बहुत सुस्प व विशेष धिको गौतम ! सघ.स योरी मंगदाप गर्म पूमिमाले मनुष्य की सिगर इस स दमकुरु उसरकुरु क्षेत्र में मनुष्य की खिों परस्पर नु मरुयावगुनी, इस से वर्ष रम्पक वर्ष क मनुष्य की सः परस्पर तुर। ख्य नगुनो इम से या एग्णवय की पनुष्यपीयों परस्पर मुख्य सस्य गुनी, इन स मरव एमस की मनप्पणियों - स्प गुले, इस से पूर्व विदा पचम विदा की खियो ५रूपगुी, ३१ से वैमानिक देवता की सियो मसम्यानगुनी, भाकाम प्रदेश राशि प्रमाण होन से, इस में भवन मी दी की सियों अासपातमनी, इस से लेकर तिर्यचत्री मसख्यावमुनी. प्रार क असरुयात माग में रही हुई आशश अपिमत मात्र पदेव राशि प्राण है, इससे स्पलघर विर्यचगी संरूपातगुनी, मवेशप पड़ी +4+ दूसरी प्रति पचि 42 N जनवादक पालनपपारी मुनि श्री अमालक ऋपिनी + पवित्थियाओ असखेजगुणाओ, भवणमासि दवित्थियात्री असंखजगुणाओ, खहयर तिरिक्वजाणिरिश्याओ असखजगुणाओ, थलचरतरिक्खजोणित्थियाआ सखज्वगुणाओ जलयर तिरिक्खजोणित्थियाओ सखजगुणाओ वाणमतरदविस्थियाओ सखेजगुणाओ, नातैसिय देवित्यिपाओ सखजगुणाओ ॥ १७ ॥ इत्थीवेदस्सण मते । कम्मरस केवतिय काल बध ठिती पण्णता ? गोयमा | जहण्गेण सागरोवस्त दिवट्ठा सच मागाा पलि मओवमरत असखेवतिमागण ऊण, उक्कोसेण पण्गरस पतर का असख्यातवा माग उस में रही हुई अलरुपात अणिगत बाकाश प्रदेश राशि प्रमाण है इस से जलनर विचमी मरूपातगुणी अविश्य पहा प्रतर का असरूपानघा माग में रही हुई असख्यात श्रेणिगत पाकाच प्रदेश्व गश्चि प्रमाण है इस मे पाणण्यंतर देव की देवियों सरूपातगुनी, मख्यात योजन केटा काटी पमान एरु प्रदेश प्रण पात्र खंड मितने एक प्रतर में होवे उस में से पपचीमना माग कम करने से जितनी राशी रहे उतनी है इससे ज्योतिपी की देवियों मख्यातगुनी पूर्वोक्त प्रकार ॥ १७ ॥ अर स्रो पेद की स्थिति करते पन-अहो पपवन् । स्त्री द कर्य की कितने काल पर्यंत स्थिति साये ? उचर-महो गौतम ! मधन्य दो सागरोपम व एक सागरोपमका साता माग में परपापम का मसरूपातमा पाग कम क्यों कि सो दादिक कर्म की अपनी • उतष्ट स्थिति और से मिष्यास की उत्तर स्थिति मा सिचर कोराहोर सागरोपम की प्रमान से भाग प्रकाशक-राजारहादर छात्रा समदरमामयी मामममा.

4 चतुर्दशनीवामिगम मप्र नृतीय 23 सागरोवम कोडाकोडीओ, पण्गरस वास सयाइ, अवाधा, अवाहुणिया कम्मठिती कम्मणिसेओ ॥ १८ ॥ इत्थिवेदेण भते । किंपकारे पण्णत्ते ? गोयमा ! फुफ अग्गि समाणे पण्णत्ते ॥ सेत्त इत्थियाओ ॥ १९ ॥ सेकिंत पुरिसा ? पुरिसा तिविहा पाणचा तंजहा-तिरिक्ख जोणिय पुरसा, मणुस्स पुरिसा, देवपुरिसा ॥ २० ॥ सेकिंत तिरिक्खजोणिय पुरसा ? तिरिक्वजाणिय पुरिसा तिविहा पण्णता तजहा-जलचरा थलचरा खहचरा ॥ इत्थि भदो भणियन्वो जाव खहयरा॥सेत्त वहयर तिरिक्वजाणिय पुरिसा ॥ २१ ॥ सेकिंत मणुस्स पुरिसा ? मणुस्स पुरिसा करने में इतनी होती है उत्कृष्ट पभरा कटाड सागरोपम अवाधाकाल पमरह हजार घर्प का कहा १८ ॥ अहो भगवन् । स्त्रियों का विषय कैसे कहा है ? उत्तर-मैते वकरी की मींगनिये की अग्नि जाउ लापान होती हैं और ऐहने से विशेष दीपायपाम हाती है, पैसे ही, नथा काट की धगधगती अगि समान कामानि रे या स्नो वेद का अधिकार सपूर्ण दुवा ॥ १९॥ प्रश्न-पुरुष के कितने भेद करे ? उत्तर-गुरु ा के तीन भेद कहे हैं तथवा तिर्यंच पुरुप, मनुष्य पुरुप व देव पुरुप ॥२०॥ प्रश्न--नियंच पुरुष के कितने मेद को हैं? उत्तर-तच पुरुष के नीन मे को-लचा, स्थलचर, व खेर या स्त्र भेद में जैस' कहा वैसे ही यहां जानना यह तिविक या हुवा ॥ २१ ॥ प्रा-नुकर ह दूरी मसिपीच 4.1 अमुगावामी मुनि श्री योडीनी - तिमिहा पण्णता संजदा-कम्मममगा, अकम्मभूमगा, अंतरदोषगा सेत मणुस्स पुरेसा ॥ २२ ॥ सेकित व रिसा ? देवपुरिसा पउन्विहा इत्यिमेवो मणिय वो जाव समसिदा ॥ २३ ॥ पुरिसस्सम मते ! केवतिय काल ठिती पण्णता ? गोयमा ! पत्र के किने भेद पौ? उत्तर-मनुप्प पुरुष के तीन मेद को-कर्मभूमि, या भूपर मंतर- HT RE पनु-प पुरुष क भेद दुवे ॥ २२ ॥ अपनदेव पुरुष किमने मेद करे ? उचा- पुरप के चार मेद को पों जैसे सी मेह में कहा मे ही मानना पई सार्थ मिद्ध पर्य। ना ॥ ३ ॥ मन-~ो मगमन् ! पुरुष की कितने काम की स्थिति की है ! पर- प्रो तन ! मपन्य भंतमुर्न उत्कृष्ट तेचीम सगरोपम तिर्यच पुरुष प मनुष्य पुरुप का से नस काना व पुरुष की गयन् म सिद्ध देवरों की स्थिति पमाणा में जानना पिता-मानपनि म जसरकमार देवकी प्रघन्य अपामार बसर एक सागरोपम से कुम प्रषिक, नागकुमार नि नामानि के भानगत नपकी मघम्प परमार उस्का कुछ कम दो परपोपम में एणमा देवकी अपार दश हमार की उत्कृष्ट एक पल्सोम की, ज्योतिषी देवकी भाप में अपन्य पाय परशेगम की उत्कट एक पशोपम ए साल पन्द्रमा की बफर पाप परशर की जाए पराम पर मास की, मूर्य की मपम्प भर पस्योपमो पता पोस्मारक प्रकाशक गमारMI PRमरायमी PIसारी जहण्गेण अतोमहत्त उक्कोसणं तेतीसं सागरोधमाई ॥ तिरिक्खजोणिय पुरिमाणं मणुस्म पुरिसाण जया इत्यिम ठिती साचेव भागियन्या ।। दय परिसाणपि जाव + ईश म शामिगग सूप-नन य पात्र .. ग्रा की, जघन्य पव पगोपप को, उस्कृष्ट एक पस्योपरी, नक्षत्र की, जघन्य पाष पस्योप उस्कए भाषा परोपप की, सारा की मपन्य पार पल्योपमी तट पाय पर गेपम में कुछ अधिक मानना यानिक की मोघ जघन्य एक परोपम की उत्कृष्ठ सम सागरापम की, विशेप से- सौधर्म दरलोक के देर की जयन्न एक पत्योपप की स्कष्ट दो सागरोपम की, ईशान दवलोक देश की मधन्य एक परशपसे कुछ अधिक उत्कृष्ट दो सागरोपमम कुछ अधिक, ३ साकुपार देवलोकन देता की मपन्य दो सागरोपर उस सात सागगेपम, ४मान्द्र देवलोक के देवों की नपाय दो मागर कुष्ठ अधिक उत्तए मात सागरापम कुछ प्रपित, ५ ब्रह्मदेवलारुके देवता की मपन्य सात मागगे पप की उत्कृष्ट दस सागरोपम की, व सतह देवमास के देवता की मघन्य दश सागरापम की उलट गोदर गागरापर की, ७ महाशुक देवलोक के देश की मधन्य व.दा साग पपकी उत्कृष्ट सना सागरी पपी, ८ सासार देवलोक के देव की नघन्य सतरह मागरोपम की उस्कृष्ट अठारह गरोपमकी ९ आणत दसला की जपाय अठारा सागरोपमनी उत्कट उनीस मागगेपम की, १०माणावलाफ को जय प रमोस सागरोपम की नस्कर पीस सागरोपम की, "आरण देवलोक के देव की जघन्य • प्रसि-पीच 280 श्रा अमालक अफ्मिी ।" सट्टासद्धाण तार ठिनाए जहा पण्णवणार तहा माणियन्वा ॥ २४ ॥ पुरिसेणे भते ! पुरिसाच कालतो केवञ्चिर होति ? गोयमा । जहणेण अतोमुहत्त उक्कामेण न मागरोपम की उत्कृष्ट कोस स गरापम की, १२ अच्युत देवरोक की जघन्य इझीम सागरोपम की उस्कृष्ट पाश्रीस मागरोपम की (णमोत्पल देव की स्थिति काी) । मद्र ग्रेवयक के देव की जघन्य बावीस मागरोपम की उत्कृष्ट तेवीस सागरोपम की, २ सुभद्र अरेयक के देव की मघन्य तेषीम सागगम की उत्कृष्ट चौबीम मागरोपम की,जात अोयक के दव की जघन्य चौवीस सागरोपमकी उत्कृष्ट पचीस सागरो- पपकी, ४ मिनस अरेयक के देवकी जघन्य पञ्चोम मागरोपम की उत्कृष्ट उनीस मागरोपम की, सदर्भन ग्रोयक के देव की जघन्प छाम सागरोपम की उत्कृष्ट सचाचीस सागरोपम की, मिय के दव की मघन्य सत्तावीम मागरोपप की उत्कृष्ट भठ्ठावीप्त सागरोपम की, ७ मा के दव की जघय अठापीस सागरोयम की उस्कृष्ट गुन सागरोपम की, सुप्रतिमद्ययक के घिन्य उन्नतीस सागर पपकी भौर उत्कृष्ट तीस सागरापम की और ९यशोधायक के देव की जघन्य सागरापम की उत्कट एकतीस सागरोपम को । विजय वैजयत जयंत और अपराजित विमान वामी पकी जयप एक पीस मध्यम वतीस उत्कृष्ट तीस सागरोपम की और सर्वार्थ सिद्ध विमान पासी दवताओं की स्थिति जघन्पोत्कृष्ट तीस ही सागरोपम की ॥२४॥ प्रश्न-हो मगरन् । पुरुषका रूप पने निरतर रहसो किवने का तकरी रसर-मो गौतम ! जघन्य बन्दर मुहूर्त तस्कर मत्या सो प्रकाशक सजावरादुर लाला मुखदेवसरायमी उबाल मसादी.

सागरोषमसयपुहुत्त सातिरेगं ॥ तिरिक्ख जोगिय पुरिसाण मते ! कालतो केवञ्चिर होइ ? गोयमा ! जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्कोसेण तिन्निपलिओवमाइ पुरकोडि पुहुत्व मज्झहियाइ ॥ एवं तहेव सचिट्ठणा जहा इत्थीण जाव वहयरतिरिक्खजोणिय पुरिनरस सचिट्ठणा ॥ मणुस्स पुरिस्साण भते ! कालतो केवच्चिर होति ? गोयमा ! खेत पडुच्च जहण्णेण अतोमहुक्त उक्कोसेण तिणिपलिओवमाइ पुन्नकोडिपुहत्त 4- चतुर्दश जीवामिगम सूत्र तृतीय उपान +2+ सागरोपम कुछ अधिक फिर पुरुष भेद का अवश्य पलटा हा प्रश्न -अहो मगवन् ! तिर्यच योनिक पुरुप तिपत्र पुरुपपने रहे तो कितने काल से ? उत्तर बहो गौसम ! जघन्य अन्तर मुहूर्न उत्कृष्ट सान पल्पोपम ऊपर पूर्ण कोटी पृथक्त अधिक (माय भव पूर्व कोगे आयुष्य वाले तिर्यच के कर्मभूपा के क्षेत्र आश्रिय और एक मष युगल तिर्यंच का तीन पल्पोपम का मानना ] यों जिस प्रकार तिर्यंचनी स्त्री का सचिठन काल कहा वैसा ही जलचर स्थलचर पुरुप का भी मचिठना काल जानना अर्थात् जलचर की जय प प्रामर मुहूर्व उत्कृष्ट पूर्वकोटी पृथक्त, चतुष्पद स्थल चर की जघन्य अनर मुडून उत्कृष्ट तीन परयोपम पूर्वकोटी पृथक्त्व अधिक, उरपरि सर्प की तया मुनपर की जघन्य अतर मुहूर्म उत्कृष्ट पूकोटो पृथक्त्त, खचर पुरुषकी मघन्य अतर मुहूर्त नत्कृष्ट पूर्व कोदी पृथक्व उपर के पल्पोपम का अख्यात माग पूकिटी पृषक्त अधिक सात कर्मभूपी के मवकरे आठवा अन्तरदे पका भवारे) प्रम-मनुष्य का पुरुषपना 4+8दुसरी पति पात्र 1 मसहियाइ ॥ धम्मचरणं पहुच जहण्मेणं अतोमुहुर्ख उकोसेणं देसृणा पुनकोडि, एवं सम्वरप जाव पुनविदेह अवरविदेह अकमभूमक मणुस्स पुरिसाण जहा अकम्मभूमग मणु रमस्यीण जाध अनर दीवगाम ॥ देवारिसाण जश्व ठिती सव सचिटुणा जाव सबमिरगाण ॥ २५ ॥ पुरिसाण भते ! केवतीय काल अतरं होति ? गोयमा । जहण्मेण एग समय उकासेण वणस्सइ कालो ॥ बनुगर बिचारीमान श्री जोड तिने काम को उचर-महो गौतमा क्षेत्री अपेशा अपम्प अंतर्मुनतमीन पर पम पूर्वकटी पास मषिक उक्त प्रकार ही मानना, और पारित्र धर्माचरण आमिग मघा भन्मुंपूर्न उत्कृष्ट दिशा पूर्व कोटी पर्ष यावत् पूर्ण पहा पिदेशका बना बर्मापे मनुष्य पुरुा का जैसा अर्म- सीबीका का पाबन् मरदीप का पुलामी अंतगदी की सापारी काम और देव पु म पुरुषपने का चलतोदरता की स्विी जी रतमाही नसग या किटना पुर(दूसरा) माना नइम लिये सर्वा सिर ना पुरुष वेद का काम सनी गित मारी कामा १५ ॥ प्रभ- मनवन् ! पुरुष को प्राप्त करने का कितना NEIT पर! पर । बक्सरसा(पषी में पाप पर स्यादपुमा पुस •भापक गमापागदुर मात्रा सुतोमानीमालालमारत तिरिक्खजोमिय पुरिसाणं जहणेण असो मुहुत उकोसेण वणरसइ कालो। एव जाव वहयर तिरिक्खजोणिय पुरिसाण ॥ मणुस्स पुरिसाण भते ! केवतिय काल अंतर होति ? गोयमा! खेच पडुष जहणेण अतो मुहुत्त उक्कोसेण वणस्सति कालो ॥ धम्मचरण पहुच जहणेणं एक समय उक्कोसेमं अणतकाल अणता का पसुत्र-जीरामिगम मूत्र तृतीय उपार +++ ममय पार्च सर्वकर तु मृत्यु पापे नस वाप्रिप) और उत्कृष्ट बनस्पति के काल जितना जानना (मस-सी मोर नपुंमक दोनों श्रेणि करते। उनका एक समय का मन्तर क्यों न ? उत्तर- श्रेणिगत मृत्यु पाकर निपमा से पुरुष दरपने ही उत्पन्न होता है परतु देवीपो या अन्य पनि माता म सिवे ) तिर्थ योनिरु पुरुष में विशेषता बताते हैं तिथंच योनिरु पुरुष का मरन्य अंतर्मुन उत्कृष्ट पनसति के काल मितना मरूपर स्थलचर सपरपुरुषका मी इतना अंतर जानना प्रश्न भो मगरन् । पनुष्य पुरुष मरकर पीण पुरुष होपे वो किसना यंतर परे ? उत्तर--महो गीतम! पुरुष का मघन्य से क्षेत्र मात्रिय भंवर मुहूर्त का उस्कृष्ट पनाति का काल निमा और चरित्र धर्म माश्रिय नपम्प एक समय [ परिणाम के परदे बाश्रिय ] उत्कृष्ट रूम पाप मुद्र परागर्वन, इस ही प्रकार मरव एरावत के मनुष्य पुरुष, पूर्व विदेर पमिप विदेर पुरुष का जन्म आश्रिय कर दूसरी प्रमिपति - Rite उत्साप्पिणी सप्पिणी जाव अवई पोग्गले. परियह देसूण, कम्मममकाण जाव विदेहो जाव धम्मचरणे एक्कोसमओ सेस जहित्थीण जावे अतरदीवकाण ॥ देव पुरिसाण जहण्मेण अतामुहुत्त उक्कोसेण वणस्सति कालो ॥ भवणवाप्ति देवपुरिमाण ताव जाव सहस्सारो जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्कोसेण वणस्तति कालो ॥ आनतदेव 42 अनुशदक पालनमपारी मुनि श्री अमोस ऋपिनी " तथा चारित्र र्धम पाश्रिय घप उत्कृष्ट अन्तर मानना ॥ प्रश्न अहो भगवन् ! अकर्म मूभी मनुप्य पुरुष का मन्तर कितने शास्त्रका पता ? उत्तर या गौसम ! जघन्य अन्तर मुहून अधिक दश हजार वर्प का ( अभूमि पुरुष मरकर नघन्य दशमाय वर्ष के आयुष्य घाला देवता होवे यहां मे मरकर कर्म भूमि मे पुरुष पने उत्पम से अन्तर मुहूर्त में मरकर पुनः युगल मनुष्य हो जाये ) और उत्कृष्ट वनस्पति काल जितना अन्तर जानना || भौर सारन आश्रिय जपन्य अपर मुहून [ कोइ देव कर्मभूमि मनुष्य का साहरन कर गर्ममि के क्षेत्र में ले जावे और तुर्न परिणाम पळटने मे पछा कई म के क्षेत्र में रख दे इम माश्रिय ] मोर उत्कृष्ट वनस्पति के काल जितना अवर जानना इसी तरह हेमवय परणस्प मर्मभूमि में मम ओश्रिप तथा सहरण आश्रिय जघन्य तया उत्कृष्ट भंसर कहना क्षेप वादा सा पास के जैसा मानना पावत् भारदीप गार्ममूपि मनुष्य की बकम्पका कहना -काशक रामादुर लामा मुस्पदव सहायजी ज्वालामा रन वागमन LAAN काम चतुच-सीवामिगम गुरु-तृतीय उपार पुरिसाण भते ! केवतिय कालं अंतर होति । गोयमा ! जहण्णण मास पहुसं उकोसेण वणस्सति कालो एवं जाव गेवेज ऐव पुरिसाणवि ।। अणुचरोषवातिय देव देव पुरुष का मतर कहते हैं मन यो मगरन् ' देवता पुरुष वेदी मरकर पीणा देवता कितने काल से होने ? उत्तर-अहो गौतम ! जघन्य अतर्मुहूर्त (देवभर से घरकर गर्मभ्युत्क्रान्तिक मनुष्यपने उत्पन्न होकर अवर्मुहूर्व पाद मरकर पीय देवता होवे इस आश्रिय, उत्कृष्ट वनस्पतिका काल मानना इस प्रकार है अमुरमार जावी के देव मे लगाकर आने सासार देवलोक के देव पुरुष तक जानना प्रश्न-अहो मगरन् ! नववे माणत देवलोक के देव पुरुप मरकर पीछे भापत देवलोक में देवपने उत्पन होवे उस का कितना असर रह गौतम ! आणताप देवका असर मयन्य मर्स पृथक्व । कर्मभूमी मनुष्य गर्भवासमें नप माहिने पूर्ण करके नपवे देवलोकमें उत्पन्न होने जैसे अध्यवसायमे करनी का देवता होवे उस प्राश्रिय इतने आयुष्य विना ऊपर देवलोक में देवता होने जैसी करनी नहीं हो सकती है ] उत्कृष्ट वनसातिके काल गितना अन्वर मानना ॥ ऐसही माणत पारण और अच्युत देवलोक सपा प्रवेयक के ३ पुरुष का अन्तर मानना । मो भगरन् । पार मनुचरोपपातिक देव पुरुप का किसना अन्तर होता है १ बो गौतम ! अघन्य वर्ष पृथकत्व [कर्ममूपी मनुष्य को नव वर्ष की उम्मर में दीक्षा ले इस करनी से अनुचर विमान पासी देर वे सत्कष्ट कुछ पिक सहयात सागरोपम का अन्दर NRN दूसरी मतिपचि 42840 उस्सप्पिणी सप्पिणी जाव अवई पोग्गले परियट देसूण, कम्मभूमकाण जाब विदेहो जाव धम्मचरणे एक्कोसमओ सेस जहित्थीण जाव अतरदीवकाण ॥ देर पुरिताण जहणेण अतामुहुत्त उक्कोसेण वणस्सति कालो ॥ भवणवाति देवपुरिमाण ताव जाव सहस्सारो जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्कोसेण वणस्सति कालो ॥ आनतदेव 42 अनुवादक पालप्रमचारी मुनि श्री अमोसा ऋपिनी त्या चारित्र र्धम आश्रिय जघन्य उत्कृष्ट अन्तर मानना ॥ प्रश्न अहो भगवन् ! अकर्म भूमी मनुष्य पुरुष का अन्तर कितने कालका पता है ? उत्तर मा गौतम ! जघन्य अन्तर मुहूर्न अधिक दश हजार वर्ष का ( अकर्मभूमि पुरुष मरकर जघन्य दश भाव पर्ष के अ युष्प वाला देवता रोवे वहां में मरकर कर्म भूमि मे पुरुष पने उत्पमो अन्तर मुहूर्त में परकर पुनः युगल मनुष्य हो जावे ) और उत्कृष्ट वनस्पति काल जितना अन्तर जानना ॥ और सारन आश्रिय जपन्य अतर मुहूर्त [ कोइ देव व.मभूमि मनुष्य का सारिन कर अर्ममूमि के क्षेत्र में ले जावे और तुर्न परिण म पलटने मे पंछा कभूम के क्षेत्र में रख दे इम मात्रिय ] मौर उस्कए वनस्पति के काल जितना अंतर जानना इसी तरह पत्रप परणपय अकर्मभूमि में नन्म माश्रिय सया पहरण आप्रिया जघन्य तया उत्कृष्ट अंतर काना क्षेप वासा रा पासा बानमा पावत् भागही भाभिमूपि मनु की बकम्पमा काना काशक रामायापुर लाना पटव सहायनी वाला समान चतुश्चमीवामिगम पप-तृतीय उपान म परिसाण भते ! केवतिय कालं अंतर होति । गोयमा ! जहणेण मास पुहुप्त उक्कोसेण वणस्सति कालो एव जाव गेवेज देव पुरिसाणवि ॥ अणुचरोववातिय देव देव पुरुष का अवर कासे हे प्रभो भगवन् ' देवा पुरुष वेदी मरकर पीणा देवता कितने काप्स से होने ? उत्तर-महो गौवम ! मघन्य अतर्मुर्त (देवमप से पाकर गर्मव्युत्क्रान्तिक मनुष्यपने उत्पन्न होकर अवर्मुहूर्त पाद मरकर पीण देवता होवे इस आश्रिय, उत्कृष्ट वनस्पतिका काल जानना इस प्रकार है। अमुरकुमार जाती के देव मे लगाकर आने सामार देवलोक के देव पुरुप सक जानना प्रश्न-महो भगवन् ! नको आमत देवलोक के देव पुरुप मरकर पीछे मामन देवलोक में देवपने उत्पन्न होवे उस का कितना अंतर ? सचर-महो गौतम ! आणतकल्प देवका अतर मपन्य मैस पृषक्त्व । कर्मभूमी पनुष्य गर्भवासमें नर माहिने पूर्ण करके नपये देवलोकमें उत्पन्न होने जैसे अध्यवसायसे करनी कर देवता होवे उस आश्रिय इतने आयुष्प विना ऊपर देवलोक में देवता होने जैसी करनी नहीं हो सकती है ] उत्कृष्ट मनाविक काल रिसना अन्तर जानना ॥ ऐसही प्राणत आरप और अच्युत देवलोक सपा प्रवेपफ के ३ पुरुप का अन्तर मानना ॥ मो मगरन् । चार अनुचरोपपातिक देव पुरुष का किसना अन्तर हना है । बो गौतम । अर्धन्य वर्ष पृथकत्व [मूपी मनुष्य हो नव वर्ष की उम्मर में दीक्षा ले इस करनी से अनुचर विधान पासी देश पर सत्कष्ट कुछ मपिक सहयाद सागरोपम का अन्तर HIR दूसरी प्रतिपचि 4848 उस्सप्पिणी सप्पिणी जाव अवई पोग्गले. परियट देसूण, कम्मभूमकाण जाब विदेहो जाव धम्मचरणे एक्कोसमओ सेस जहित्थीण जाव अतरदीपकाण ॥ देव पुरिसाण जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्कोसेण वणस्सति कालो ॥ भवणवाप्ति देवपुरिमाण ताव जाव सहस्सारो जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्कोसेण वणस्तति कालो ॥ आनतदेव अनुपादक पालब्रह्मचारी पुनि श्री भोसर ऋपिजी - तया चारित्र प्रम माश्रिय मघन्प उत्कृष्ट अन्तर जानना ॥ प्रश्न अहो मगवन् ! अकर्म भूपी मनुप्य पुरुष का मन्तर कितने सालका पता है ? उत्तर महा गौसम ! जघन्य अन्तर मुहूर्न अधिक दश हजार वर्ष का ( अकर्मभूमि पुरुष मरकर जघन्य दश हजार वर्ष के अ युष्य वाला देवता ने यहां में मरकर कर्म भूमि मे पुरुष पने उत्पन्न अन्तर मुहूर्त में मरकर पुनः युगल मनुष्य हो जाये ) और उत्कृष्ट नमस्पति काल मिरुना भन्तर मानना ॥ और संहरन आश्रिय जपन्प मार मुहूर्त । कोइ देर कर्मभूमि मनुष्य का सारन कर अकर्ममपि के क्षेत्र में ले जाये और तुर्न परिण म पलटने मे पंछा कई भूपि के क्षेत्र में रख दे इस याश्रिय ] और उत्कृष्ट वनस्पति के काल जितना अंतर जानना इसी तरसमय परणपप यकममूमि में नन्म आश्रिय तथा सारण आश्रिया जघन्य तथा उत्कृष्ट भंसर काना पवाया पारे पैसा पानमा बापत् मंतरही मार्ममूपि पनुन की वापसा करना काशक रामपुर लाला मुम्पदय सहागजी पालामादी स पतुन-पाभिगम गश्तृवीय उपास पुरिसाण मते ! केवतिय कालं अंतर होति । गोयमा ! जहणण मास पुरन्त उकोसेण वणस्सति कालो एव जाव गेवेज पेव पुरिसाणवि ॥ अणुचरोपवातिय देव देव पुरुष का असर कासे हैं प्रम मो भगान् । देवता पुरुषवेदी मरकर पीछा देवता कितने साल से ले? उत्तर-अहो गौतम ! नघन्य अत्र्मुहूर्त ( देवम से घनकर गर्भव्युत्क्रान्तिक मनुष्यपने उत्पन्न होकर अतर्मुहूर्त वाद मरकर पीण देवता होवे इस आश्रिप, उत्कृष्ट वनस्पतिका कास जानना इस प्रकार है। ममुरमार नाती के देव मे लगाकर आने मामार देवलोक के देष पुरुप तक मानना प्रश्न-महो भगवन् ! नरें मापत देवलोक के देव पुरुष मरकर पीछे पाणव देवलोक में देवपने उत्पन्न होषे उस का कितना अंतर ! उचर-महो गौतम । आणवकल्प देवका अवर मयन्य मास पृथक्त्व । कर्मभूमी मनुष्य गर्भवासमें नव माहिने पूर्ण करके नपये देवखोकमें उत्पन्न होने मैसे अध्यवसायसे करनी कर देवता होवे उस प्राश्रिय इतने आयुष्प विना ऊपर देवलोक में देवता होने जैसी करनी नही हो सकती है ] उत्कृष्ट पनसतिक काल विना अन्वर मानना । ऐसही प्रापत आरण और अच्युत देवलोक सपा प्रेषयक के ३३ पुरुष का अन्तर मानना ॥ मो मगवन् ! पार अनुत्तरोपपाविक देव पुरुप का किसना अन्तर होता है । यो गौतम ! मयन्य वर्ष पृथकत्व [मूपी मनुष्य से नव वर्ष की उम्मर में दीक्षा के इस करनी से अनुचर विमान पासी देव वे सरकर कुछ मपिक मट्यात सागरोपम का अन्तर HIR दूमरी प्रतिपचि 42641 उस्सप्पिणी सप्पिणी जाव अवदूं पोग्गले परियह देसूण, कम्मभूमकाण जाव विदेहो जाव धम्मचरणे एकोसमओ सेस 'जहित्थीण जावे अतरदीवकाण ॥ देव पुरिसाण जहण्णेण अतामुहुत्त उक्कोसेण वणस्सति कालो ॥ भवणवाति देवपुरिमाण ताव जाव सहस्सारो जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्कोसेण वणस्सति कालो | आनतदेव १ अनुनादक नालयमधारी मुनि श्री अयोसक ऋपिनी " तया चारित्र र्धम आश्रिय मघन्य उत्कृष्ट अन्तर जानना ॥ प्रश्न अहो मगवन् ! अकर्म भूमी मनुष्य पुरुष का मन्ता कितने कासका तारे? उत्तर महा गौतम ! जघन्य अन्तर मुहूर्न अधिक दश हजार वर्प का ( अभूमि पुरुष परकर जघन्य दश हजार वर्ष के आयुष्य घाला देवता वे यहां मे मरकर कर्म-भूमि मे पुरुष पने उत्पन्न हो अन्तर मुहूर्त में मरकर पुनः युगल मनुष्य हो जावे ) और उत्कृष्ट समस्पति कास जितना अन्तर जानना ॥ और संहरन यात्रिय जघन्य अपर मुहूर्त [ कोइ देव कर्मभूमि मनुष्प का साहरन कर अकर्मभूमि के सेंप में ले जाधे मौर तुर्न परिण म पलटने मे पंछा कामू प के क्षेत्र में रख दे इस मात्रिय ] भौर उस्कष्ट वनस्पति के काल जितना अंतर मानना इसी तरह हेमवय परणक्य मकर्मभूमि में मन्म आश्रिय सवा सारण आश्रिया जयन्प तथा उस्कृष्ट मंतर काना शेप वाया रा वा के मैसा मानना यावत् भनगदी। सामूपि मनुष्य की यकम्पका कहना काशक रामासादुर लामा पदम सायनी मामाची म चतुश्शीवामिमम एप-तृतीय उपान + पुरिसाण भते ! केवतिय कालं अंतर होति । गोयमा ! जहणण मास पहुत उकोसेण वणस्सति कालो एव जाव गेवेज पेव पुरिसाणवि ।। अणुचरोववातिय देव देव पुरुष का असर कहते हैं मन को ममपन् ' देवता पुरुष बेदी मरकर पीछादेवसाकितने काल से होने ? उचर-मो गौतम ! नपन्य अव (देवभव से पाकर गर्भव्युत्क्रान्तिक मनुष्यपने उत्पन्न होकर अतर्मुर्त पाद परफर पीण देवता होवे इस माश्रिप, उत्कृष्ट वनस्पतिका काल मानना इस प्रकार ही अमुरकुमार जाती के देव मे लगाकर आमे मासार देवलोक के देव पुरुप तक जानना प्रश्न-मो भगवन् ! नवो आपत देवलोक के देव पुरुष मरकर पीछे भाणव देवलोक में देवपने उत्पन होवे उस का कितना अंतरर- गौतम माप देवका अतर मपन्य मर्स पृषक्स्स ! कर्मभूमी मनुष्य गर्भवासमें नर माहिने पूर्ण करफे नववे देवलोक में उत्पन्न होने जैसे अध्यवसायमे करनी का देवता होवे उस आश्रिप इतने मायुष्प विना पर देवलोक में देवता होने जैसी करनी न हो सकती है ] उत्कृष्ट पनसतिके काल बिना अन्तर जानना ॥ ऐसेही माणन आरम और बच्युत देवलोक सपा प्रैवेयक के ३५ पुरुष का अन्तर मानना ॥ मो ममयन् । पार अनुचरोपपाविक देव पुरुप का कितना अन्तर होना । यो गौतम ! मघन्य वर्ष पृषकत्व [मूपी मनुष्य को नप धर्ष की उम्मर में दीक्षा ले इस करनी रो अनुचर विमान पासी देर रेकर कुछ मपिक सस्यात सागरोपम का अन्तर MRI दूसरी प्रतिपचि 40-40 मुगादक-पानमवारी मुनि श्री मोसमी पुरिसस्त जहण्जेणं वास पहुचे उकोसेमं सोजाइ सागरोधमाई, अणुतराण अतरे एको मालावओ ॥ २६ ॥ अप्पाबहुपाणि जडेव इत्थीण ॥ एतेसिणं भते ? मानना [ अनुचर विमान मरकर मनुष्य होकर अप विधानिक देरके तया अनुष्य के मरबरे उस माश्रिय मानना मोर सर्व सिर के देवकी सत्यति तो एक जीपक रोती में मनुष्य हो निमप से मोल नाते, इस लिये वहां का मन्तर न कहा + ||२६|| भर पुरुषों की भरपापात पाय प्रकारसे कात(१) सप से घोरे मनुष्य, क्यों कि सख्यात कोटा- कोटी प्रमाण है, उस मे तिच पोनिक पुरुष असल्यातगुना, पोंकि प्रतर के मसरूयात भाग में गार असंख्यात अणि में रखी हुई मो आकाश प्रदेश की राशि उस प्रमाण है, उस से देव पुरुष समस्याउगुना, क्योंकि मतिशय परा प्रतर के मकवावये माग में सी नो मरूपात श्रेणि मी माकाश मवपकी राधी नवन में विपंच पोनिक पुरुषकी मन्यायात नियंप योनिक बीके मेसाती काहना मोर मनुष्य पुरुष की मरूपापहुत मनुष्प की सियों से काना (४) देव पुरुष की + यहाँ किवनेक भवनपति देव से ईसान देवमेक तक यम भतर्मुहूर्त का, सनाकुमार से सहबार पर्यम्त दिन का, मानव रेवलोक से ममुख रेषानेकवक नब महीने का, ना पर मेर मग विमान काममा पपुस * कामावार मा मुखदेवमहापगी पासमा 29 4. चतुर्दश नीवाभिगम मूम-नृतीय उपार - देवपुरिसाम भवणवासिण वाणमतराण जोतिासियार्ण माणियाण कयरे २ हितो अल्पावास सब से पोरे मनुचर विमान के पुरुष क्योंकि जो क्षत्र परपोपम के असंख्यातने भागमें है। उस में जो भाकामदेष की राशी है उस प्रमान,२ उनसे ऊपर की श्रेया के दव सरूपातगुने क्यों की नो पहत परा क्षेत्र पस्योपम उस के मसंख्यातो माग में रो, जो माफाश प्रदेश उस की राशि जिसने हैं, रिमान की गुत्यवा कर अनुचर विमान पांच ही है और ऊपर के पिक में सो विमान है, उस में प्रत्येक विमान में मछग २ असंख्याव देवता है, ( ऐसे ही आगे में मो २ नीचे २ विमान आगय उन में देवता भी ज्यादा २१ ऐमी कल्पना आगे मी करना,) ३ स मध्य की ग्रेयक के देवत, सख्यातगुना, ४ उस से नीचे की प्रेयक के देवता सरूयातगुने, ५ उस से पारवे अच्युत देवलोक के देवया सख्यातगुरे, ६ उस से ग्यारवे मारण दपलोक के देवता सरूपातगुने,+७ उस से माणत देव लोक के देवता संख्वावगुना, ८ उस से पारस देवताक क देवता सस्यासगुने, उक्त प्रकार से ही को भी काना ९ उस से सासार फरसरामी देन असंरूपातगुना, क्यों कि घनाकार लोक नस की + यथापि अरण और अप्युत पस्प बराबरी से है और उन की विमान की संख्या भी एक्सी है वपपि उत्तर दिशा से दक्षिण में कृष्ण पक्षिा जीव अधिक उत्पन्न होते हैं इस आभिय जानना जिन का अर्थ पुद्गल परावर्त से अभिक मसार भ्रमग होता है वे कृष्ण पक्षी कहे जाते हैं और मी ससारवाले शुरूपक्षी फहे आते मा प्रति , 4 अप्पावा बहुवावा तुल्लावा विससहियावा ? गोयमः सव्यत्योवा वैमाणिया देवपुरेसा मनुसार वामप्रमषारी मुनि श्री भापक सपना- एक मोटकी श्रेणि उसके मसंख्पापे माग में मिमने सामान मदेर्श होतेउसने यार "उस से महाशुक देखल्लोफ देरता प्रमख्यातगुने करों कि मो बहुत परी ऐसी जो श्रेणि एमके मसंसपातवे भाग में नो पामाश पत्र की राशी है उस प्रमान नानना और सासार रूप में छ हमार पिमान है, मा शुक्र में चालीस हबर बिमान है इस लिये, ११ उस से बतक देवलोक के देवता मर्स- रुपातगुन क्योंकि उस से मी घरी मो मेणि उसके असंख्यात भाग में उसका प्रमानौ बम से ब्रह्मदेवलोक के देवता भसख्यातगुने, उक्त प्रकार से भी बात पदी श्रेणि उस के अमस्यातवे माग मो आकाश प्रदेशकी १३ स से माहेन्द्र कप के देरवा मसरूपात गुने, १४ उस से सनस्कुमार के देवता असख्यात गुने, सनत्कुगर में बारळास विमान है मौर माहेन्द्र देवलोक में माठलाल बिपान । इस माप्रिय तथा दक्षिण में कृष्ण पक्षी नीय अषिक उत्पम होने उम माश्रिय [सनत्कुमार से मंगाकर सासार देवलोक तक २ अपने २ स्थान में पिसारने से पन कर सौरसी पिके मसरूपात से भाग में मात्र प्रदेश की राधी? रस के प्रमान इन का समान मानमा क श्रेषिती अमरूपात माम किपेपर इस हिये कि उसके अर्मलात मेह समहार मानी १५ वान रमेक रेसमा समाव प्रसाधक-रामापार साला मुलदेवमायनी मामला मळग भवणवाते देव पुरिसा असखजगुणा, वाणमंतर देवपुरिसा असखेज्जगुणा, जोतिसिय नक चतुर भिगम सूत्र तृवीय उपान +in गुने ( क्योकि मपाण मात्र मेव प्रदेश की राधी का दूसरा पर्ग मूग उमे तीसरे वर्ग मूल के वर्ग से गुना करने से जितनी प्रदेश की राशि हो उतनी संपावाली पाकरे लोक की एक प्रदेश श्रेणि में मितन भाकाच प्रदश होघे उस का जो पचीसा माग उस प्रमान उन का प्रमान) १६ उस से सौधर्म देवलोक क देवता संख्यात गुन (विमान के अधिक पने से सौधर्म में पचीस लाख और ईशान देवलोक में पठाईस लाख विमाम हैं, क्या सौधर्म देवलोक दक्षिण दिशा में होने से वहां कृष्ण पक्षीक जीय अधिक उत्तम होते हैं भोर कार से सम देवलोक में असम्पास गुना का कर या सरूपात गुने ही कहे यह यस्त सभार माना ) ७ वम से भवनपति देषमा अतरूपाच गुन ) क्यों कि भगुल मात्र क्षेत्र की प्रदेश राशि का प्रथम वर्ग मूल दूपरे वर्ग मूर से गिरसे दुवे जितनी प्रदेश राशी होवे उनी सरूपा वाली घर करे रोक की एक प्रदेश श्रेणि उम में मितने आकाश प्रदेश के उम का जो पचीसा भाग इस मान सम का प्रपान आनना ) १८ उन से पाणम्पन्नर देव पुरुप सख्यात गुने [ क्यों कि सरूपात ये नन केट' काटो मम ण की नो एक प्रदेश अनी मा मो उमटे के एक प्रवर में जितने होये उमका ही पस I माग उपपमान न पा मपान है) और उन में व्यानिपी देवता सहयाम गुना क्यों कि में दो सौ सपा अगुल प्रमान का एक प्रदेश श्रेणि मात्र दुहरा उस एकमतर में निवते वे उस के Nata दूसरी प्रतिपचि + * मनुवादक-नास्यायचारी मुनि श्री प्रमोटक पिजी र दवपुरिसा सखेजगुमा ॥ २७ ॥ एतसिण भते!-तिरिक्खजोणिय पुरिसाण जलयराण यलपराण सहयराण मणुस्स पुरिसाण कम्मभूमगाण अकम्मममगाण अतरदीवगाण, देव पुरिसाण भवणवासीण वाणमतराण जोतिसियाण वेमाणियाण सोधम्माण जाव सबसिदगाणय कयरे २ जाव विसेसाहिया ? गोयमा ! सम्बस्योवा अतरदीवग मणुस्त पुरिसा, दवकुरु उत्तरकुरु अकम्मभूमग मणुस्स पुरिसा पोवि तुल्ला सखेज- गुणा, हरिवास रम्मवास अकम्मभूमग पुरिसा दोवि तुल्ला सखजगुणा, हेमवय हेरण• वएवास अकम्मभूमग मणुस्स पुरिसा दोषि सखेजगुणा, भरहएरवयवास कम्मभूमग बचीमरे गाग निसने ॥२७॥ मन मो ममान् ! विर्यच पोनिक के पुरुप तया जलचर खेचर पुरुष तथा कर्मभूमि के पुरुा में कर्मभूमे के पुरुष अपमामि के पुरुष, अतरदीप के, सया देव पुरुप में भवनपतिदेव, परदेव ज्यासिपी देव, वैमानिक देव सौपर्म देव का पुरुष गामद सर्वार्थ सिद्ध के देव इन में कौन २ रुपा ज्यादा यावत् विशेषाधिक ? भो गौतम ! १ सा से पार बतरद्वीप के पुरुष, २ उन से देवकुरु उचामुरु के मनुष्य परस्पर तुल्प सरूपातगुने, परन से हरीबास रम्यास + पुरुष परस्पर तुम संख्यातगुना, । उस स हेमरप एरणरय पुरुप परस्पर तुरप ससपातमुना, ५ ग्न से भरत मेष परसत क्षेत्र के पुरुष सम्पावगुरे, १ पन से पूर्व मा दिए पथिय पझ निको पुस मकाचक-रामावादुरलाला हम्मदेवमहायजी पालामसार.

++ चतुर्दश-भाषामिगम भूप-तृतीय उपाठ 2 मणुस्स पुरिसा दोवि सखेजगुणा पुषविदेह अवरविदेह कम्मभूमग मणुस्स पुरिसा दोवि सखज्जगुणा, अणुत्तरोववाति देव पुरिसा असखजगुणा, उपरिमगेयेज्जग देव पुरिसा सखजगुणा, मझिम गेवेव देव पुरिसा सखज़गुणा, हिटिमगेवेज देव पुरिसा सखज्वगुणा, अध्चुए कप्पे देव पुरिसा सखेजगुणा, आरणकप्पेदेव पुरिसा सस्त्रजगुणा, पाणयकप्प देव पुरिसा सखेबगुणा, आणतकप्पे देव पुरिसा सखेज्जगुणा, सहस्सार कप्पेदव पुरिसा असखेनगुणा, महसुक्ककप्पेदेव पुरिसा असखबगुणा, जाव माहिद कप्पे देव पुरिसा असखजगुणा, सणकुमार कप्पे देव पुरिसा असखबगुणा, ईसाणकप्पे देव मख्यातगुने, . उन से मनुसर पिमान के देवता असंख्यासगुने, ८ सन से ऊपर के अवयक के देवता सरुपातगुने, २ उन से मध्यम प्रोया के देव संख्यातगुने, १. सन से नीरे के रेयक के देवता सरुपाप्तगुने, ११ जन से अच्युन देवलोक के देव सरुपातगुने, १२ सन से पारण देवलोक के देव सरुपातगुने, १३ उन मे माणत कर के देव संख्यासगुने, १४ उनसे आणन कस क देव संसग सगुने, १५ नन ये सहस्रार दवलोक के देव असहवासगुने, उन से माशुक्र कस के देव ममख्यानगुने, १७ उन से लता देवलोक के देव असंरूपातगुना, १८ उन से माहेन्द्र देवलोक के देव असख्यातगुना, १९ तन से सनत्कुमार देवलोक के देव असरूपातगुना, २० उन से शिान देवलोक के देष मसरूयावगुने, +8+ दूसरी मतिपचि * 48+ का अनुवादक-राप्रमचारी मुनि श्री ममोषक अापमो - पुरिसा असोजगुणा, सोधम्मकप्पे देव पुरिसा सखेबगुणा, भवणवासि देव पुरिसा अमखजगुणा, खहयर तिरिक्खजोणिय पुरिसा असखेजगुणा, थलयर तिरिक्ख. जोणिय पुरिसा सखेजगुणा जलयर तिरिक्खजोणिय पुरिसा सखेज्जगुणा, पाणमतर दव पुरिसा सखेनगुगा, जोतिसिय देव पुरिसा सखेजगुणा ॥ २८ ॥ पुरिस घेद- रसण भते!कम्मरस केवइय काल बंठिती पण्णचा ?गोयमा! जहण्णेण अट्ठ सवष्छ. राणि, उकोसण दस सागरोवम कोडाकोडीओ दस वाससयाइ अवाहा अवाथूणिया, कम्महिती कम्मणिसेओ ॥ २९ ॥ पुरिस घेदस्सण भते । किं पगारे पण्णते ? २१ उम से सौधर्मा देवलोक के देव ममस्पातगुने, २२ उन से मवनपवि के देख पुरुा असंख्यातगुना, २३ उन से वे घर नियंच पुरुप असंख्यातगुना, २४ उन से स्थलचर तिच पुरुप सरूयातगुना, २५ वन से जलघर तिर्यंच पुरुष सरूपातगुना, २६ मन से वामध्यंतर देव पुरुप सरुयातगुना, २७ उन से उपोसिप देव पुरुष सरूपातगुना ॥ २८ ॥ भो भगवन् ! पुरुप पेद कर्म बन्ध की स्थिति कितने क स की कमी है? उत्तर-प्रो गौतम! अघन्य से बाठ वर्ष (इस से कमी माई बुरे अध्य- पमाप का अमार) उत्कृष्ट दश सागरोपम कोराकोरी उस में से एक का मो इस का बापा कालो रखना कम मानना, इतनी धर्म पन्य की स्थिति जानना ॥ २मो ममपन् पालक रामायादर लाला सम्बन्धमायमी बाMHARA 4 चतुर्दश-नीशामगप मम तृताय उपा गोयमा ! पणदवग्गिजाल समाणे पण्णचे ॥ सेत पुरिसा ॥ ३० ॥ से कित गपुसगा २ तिषिहा पण्णचा तजहा-जेरइय "पुसका, तिरिक्खनोणिय णपुसका, मणुस्स गपुसका ॥३१॥ से किंत रइय गपुंसका २ सत्तीवहा पण्णता तजहा-रतण- प्पमा पुढवि णेरइय णपुसका जाप अहे सचमा पुढवि णेरइय णपुमका ॥ सेत गेरइय णपुसमासे किंन तिरिक्वजानिय णपुसका? तिरिक्खजोणिय णपुसका पचविहा पण्णचा तजहा एगिदिय तिरिक्खजोमियणपुसका,बेइदिय, तेइदिय चउरिदिय तिरिक्ख. का रिपय किस प्रकार का होता है ? उत्तर-अहो गौतम ! दावानल की माला समान अर्थात् भारम काल में तीन कामामि दाह होता है और फिर कमी पडजावे ॥ ३० ॥ मन-ओ मगवन् ! नपुसक कितने प्रकार के कहाँ ? उत्तर-मो गौतम ! नपुंसक तीन प्रकार के कई में यथा- ' नारकी नपुंमक, २ तिर्यंच नपुसक, मौर ३ मनुष्य नपुंसक ॥ ३१ ॥ प्रश्न-महो मगवन् ! नर 6 नपुंसक के कितने प्रकार को उत्तर-पो गौतम! नरक नपुसक के साच प्रकार को हैं, वे यय रत्नममा पृथ्वी पावत् वमस्वम पृथ्वी या नरक नपुंसक के मेद जानना प्रश्न-अहो ममवन् ! तिर्यच योनिक नपुश्क के कितने मेद को ? उत्तर-महो गौतम ! पांच मकार को रे यया-१ एके- न्द्रिय नपुमक, २ घेइन्द्रिप नपुंसक, ३ वेइन्द्रिय नपुंसक, चौरिन्द्रिय नपुमक, और ५ तिय पंचेन्द्रिय 481M 4दसरी प्रति पत्ति 4848- कामनुरादक-बाबामपारी मुनि श्री ममोगम्ब मुषिमी - जोणिय गपुसका, पदिय तिरिक्सजोषिय गपुसका ॥ सेकित एगिदिय तिरिक्वजो. पिया ? एनिविय तिरिक्खजोगिया अणेगविहा पण्णता सेत एगिंदिय तिरिक्खजोणिय णपुसका सेकित येइदिय तिरिक्खोणिय णपुसका?इदिय तिरिक्खजोणिय णपुसका अणेगविहा पण्णतामेत्तपदिय तिरिक्खजोणियाणपुसका॥एव तेइदियाविचिउरिदिपावि सेकिंत पर्चेदिय तिरिक्खजोणिय अपुसगा ? पर्चेदिय तिरिक्खजोणिया णपुसका तिविहा पण्णचा तजहा-जलयरा, थलयरा, सहयरा ॥ सेकित जलयरा ? जलयरा साचेव इरिथभेदो आसालिय सहितो माणियन्यो । सेत पर्थिदिय नपुंसक प्रभ-महो मगरन् । एकनिय विर्यप योनिक नपुंमक के कितने भेद को उत्तर-महो गौतम! एकेन्द्रिप तिच पोनिक नपुंमक के अनेक भेद को पृथ्वी पानी मान वायु बनसति इति एजेन्द्रिप म'मक के मेड दुवे मम-मो भमान् ! इन्द्रिय नपुंसक के कितने मेद कचर- महो गौतम ! पेन्द्रिय, इन्निय, चौरिन्द्रिय नपुमक मी अनेक प्रकार के को पचेन्द्रिय तिर्वच पोनिक नपुंसक वीन प्रकार के कोपबा-१ असवर तिच नपुंसक, २ स्थलचर तिर्यंच नपुंसका मौर ३ सेपर विषय नपुंमक इन नपुसक विष में बासामिपा भी प्राप करना, क्यों किया अमची होता है उस एक ही मेद है यह निर्वच पंचन्द्रिय अपुंमक के मेद को I. काशक रामावादर डाला अपदसापनी मामलाद * चातुर्दश-नीरामिगम मुम-तृतीय पपार : तिरिक्खजोगिय णपुंसका ॥ सेकित मणुस्स णपुमका ? मणुरस णपुंसका तिविहा पण्णचा तजहा-कम्मभूमगा अकम्मभूमगा अतरदीवका मेवो भाणियन्वो ॥ ३२ ॥ पुसकस्सण भते ! कवतिय कालठिति पण्णता ? गोयमा ! जहण्णेण अतोमुद्दुत्त उकोसेम तेचीस सागरोवमाइ ॥ नेरइय णपुसकस्सण मते ! केवश्य काल ठिती पण्णता ? गेयमा ! जहण्जेणं दसवाससहस्साइ उक्कोसेण तेतीस सागरोकमाइ सम्वसि ठिती भाभियन्या जाव अहे सत्तमा पुढधि नेग्इया । तिरिक्स जोणिय नपुसकस्सम भते । केवइय काल ठिती पण्णता? गोयमा ! जहण्णण अतोमहुस पन-महो मगवन् ! मनुष्य नपुंसक के कितने मेद कहे। उत्तर-आओ गौतम! अनुष्य नपुराक के तीन प्रकार कहे । १ कर्ममूपी नपुंसक, २ मर्ममूमी नपुंसक और ३ अन्तर द्वीप के मनुष्य - ॥ ३२॥ प्रश्न- मगवन ! नपुमकद की कितने काल की स्थिति कही है? उना-भहो नतम ! अपन्य अतर्मुर्त दी नस्कष्ट तेतीस स मरोपम की सातवी नरक की अपेशा जानना प्रन-मो भगवन्! नारकी नपुंसक की स्विति कितने काल की कही? अचर-अहो गौतम ! जघन्य दा ६जार वर्ष की उस्कृष्ट वेंवीस सागर की यों अलग २ सब नारकी की स्थिति अलग २ फहदेमा प्रश्न-अहो मगवन ! विषय पौनिक नपुंसक की कितने काम की स्थिति कही है। प्रचा-महो गौवम ! मप्रन्प अंतर्मुडून चूसरी पतिपति ++ +मारव-पामसवारी मुनि श्री मोगबसपिनी जोणिय पुसका, पविय तिरिक्सजोणिय गपुसका ॥ सेक्षित एगिदिय तिरिक्वजो- णिया ? एमिविय तिरिक्खजोणिया अणेगविहा पण्णचा सेत एगिदिय तिरिक्खजोणिय णपुसका ॥सेकित घेइविय तिरिषखोणिय णपुसका?बेइदिय तिरिक्खजोणिय णपुसका अणेगविहापण्णसामेच पइदिय तिरिक्खजोणियाणपुसकाएव तेइदियाविषउरिदियावि सेक्षित पर्चेदिय तिरिक्खजोणिय णपुसगा ? पदिय तिरिक्खजोणिया णपुसका तिविहा पण्णचा तजहा-जलयरा, थलयरा, सहयरा ॥ सेकिंत जलयरा ? जलयरा साचेष इरिषभेदो आसालिय सहितो माणियन्बो । सेत्त पश्चिदिय नपुंसक प्रभ-महो मगवन् ! एकेन्द्रिय तिर्यंच योनिक नपुंमक के कितने मेद को सचर-हो गौतम ! एकेन्द्रिय विष योनिक नपुंमक के अनेक भेद को?- पृथ्वी पानी आमि वायु बनस्पति इति एकेन्द्रिप मऍपक के मेद हुने मम-प्रो ममवन् ! ईन्द्रिय नपुंसक के कितने मेद कहे। उचर- मो गौतम! पन्द्रिय, इन्द्रिय, चौरिन्द्रिय नपुंमक मी अनेक प्रकार के कहे पचेन्द्रिय विध योनिक नपुंसा तीन प्रकार के कोने पवा-१ बसवर तिच नपुंसक, २ स्थलचर तिच नपुंसक और खेचर वियप नपुंमक, इन नपुसक तिर्यंच में मासासिया मी प्राण करना, क्योंकिपा मममी होता है उसमें एक ही दवा विच पंचम्द्रिय अमुक के मेट को " प्रकाशक रामापरादुर लामा मुलदसावनी सादर * चतुर्दश-त्रीवामिगम मूक-तृतीय पपार - तिरिक्सजोणिय पपुसका ॥ सेकित मणुस्स गपुमका ? मणुरस' पुंसको तिविहा पाणचा तजहा-कम्मभूमगा अकम्मभूमगा अतरदीवका मेदो माणियत्रो ॥ ३२॥ पपुसकस्सण मते ! कवतिय कालठिति पण्णता ? गोयमा ! जहण्णण अतोमुडुत्त उकोसम तेचीस सागरोवमाई ॥ नेरइय गपुसकस्सणं मते ! केवइय काल ठिती पण्णता ? गेयमा ! जहण्मेणं दसवाससहरसाइ उकोसेण तेचीर सागरोवमाइ सव्यर्सि ठिती भाभियन्ना जाव भहे सत्चमा पुढीव नेरइया ॥ तिरिक्त जोषिय नपुसकस्सम मते । केवइयं काल ठिती पण्णचा? गोयमा । जहणेण अतोमुहुत्त मन-मो ममवन् ! मनुष्य नपुंसक के कितने मेद कहे। उधर हो गौतम! मनुष्य नपुगक के सी7 मार को १ कर्ममुपी नपुंसक, २ मार्मभूमी नपुंसक और ३ अन्तर द्वीप के मनुष्य ॥ १२॥ मन-आओ मगवन ! नपुंमक पेद की कितने काल की स्थिति कही उच्चा-अहो Ta!) नघन्य अतमुहूर्त की उत्कृष्ट तेवीस स गरोपम की सातवी नरक की अपेक्षा जानना प्रन-अहो पगवन् नारकी नपुंसक की स्थिति कितने सास की कमी है। उचर-महो मौवम ! नघन्य दश हजार वर्ष की उत्कृष्ट तीस सागर की यो असग २ सब नारसी की स्थिति मछग २ फहदेमा प्रश्न-अहो मगपन ! विन पौनिक नपुंसक की कितने कास की स्थिति की है। उचर--महो गौतम ! मपत्य मतपेपूर्व May # दूसरी मतिपति 4gy मनुपा-मायापारी मुनि श्री ममोसम्वपिभी जोणिय भपुसका, पदिय तिरिक्सजोषिय पपुसका ॥ सेकित एनिंदिय तिरिक्वजो. मिया ? एनिविय तिरिक्खजोणिषा अणेगविहा पण्णचा सेत एगिदियतिरिक्खजोणिय णपुसका ॥सेकिंत घेदिय सिरिषखजोणिय णपुसका?इदिय तिरिक्खजोणिय णपुसका अणेगविहा पण्णचामत्त पइदिय तिरिक्व जोणियाणपुसका|एव तेइदियाविचउरिदियावि सेकिंतं पचेदिप तिरिक्खजोणिय गपुसगा? पचेदिय तिरिक्खजाणिया णपुसका तिविहा पण्णमा तजहा-जलयरा, थलयरा, सहयरा ॥ सेकिंत जलयरा ? जलयरा साचेष इस्थिभेदो मासालिय सहितो माणियन्यो । सेत्त पचिदिय नपुंसक प्रश्न-महो भगवन् । एकेनिय विच योनिक नपुंमक के कितने भेद को ? उचर-ओ गौतम ! एकेन्द्रिप नियंच योनिक नपुंसक के अनेक भेद को। पृथ्वी पानी अनि वायु बनस्पति इति एकेन्दिव नपुपक के मेद हुवे प्रम-प्रो ममनन् । इन्द्रिय नपुंसक के कितने मेद कहे। उत्तर- बडो गौवम ! बेहन्द्रिय, इन्द्रिप, चौरिन्द्रिय नपुमक मी अनेक प्रकार के कहे हैं पचेन्द्रिय तिबंध योनिक नपुंसक तीन प्रकार के कोरे यथा-१ असचर विच नपुंसक, २ स्थलचर विर्यच नपुंसका और ३ सेपर विष नपुमक इन नपुसक विर्वच में मातासिया भी प्राप कर देना, खों किपर बनी होवास में एक ही मेदा विर्यच पंचन्द्रिप मघुमको मेद कहे। काशक रानापापुर छाला समदरसापनी श्वासानसादर चतुरंश मीमिमम मम दुवोय पान +ir तिरिक्स सन्नेति जहण्मेश मंतोमुहुरा कोसणं पुनकोडी ॥ मगुस्स पपुसगरमणे, मते ! फेवतिय काल ठिती पण्णता ? गोयमा ! खर्च पदुश्च जहण्मेण अतो- महुस उकोसेण पुरुषकोडी ॥ धम्मचरण पहुच जहण्मेण अतोमुडुत्त उकोसेण देसाणा पुवकोडी । कम्मभूमग मरहेरवय पुग्दविदेह अवरविदेह मणुस्सणपुसकस्सा तहेव, अकम्मभूमक मणुस्मणपुसकस्सण मते ! केवतिय काल ठिनी पण्णता ? गोयमा ! जम्मण पहुच जहण्मेणं अतोमुहुरा उकासेण अतोमुहुत, साहरण पहुच जहण्येण अतोमुहुच उकोसेण वेसूणा पुवकाडी, एवं जाव असरदीपकाण ॥ ३३ ॥ गपुसएण भते । पुसएति कालसो केवधिर होइ ? गोयमा ! जहणे मगवन् ! मनुष्प नपुंपस की स्थिति कितने काम भी की है। उचर-महो गौतम ! क्षेत्र मात्रिय नघन्य मम्तर मुहूर्व उत्कृष्ट पूर्व बोटीपर्प की और चारित्र धर्माचारन आश्रिप जपन्य अन्तर मुकून उसाट देश कम पूर्ण कोटी वर्षकी युमल नपुंसक नहीं होते; परंतु युगस मनुष्पके उधार प्रसपणादि पउदा स्थान में नो समाधिम मनुष्य होवे हैं उनमें मपुंसक वेद पावा उन की स्थिति बलरमुहूर्त की होती है और सारण बानिय मी भषय भवन की उ देश कम पूर्व कोटी वर्ष कीती मानना ऐसे ही असरदीप मनुष्प वाकईदेना ॥ ३१॥ प्रभ-मो भगान् । नपुंसक 7 नपुंमा दूसरी पासपचि 4 मनुवादा पाटामारीमुनी प्रो भपाठक HI+। उकोसेण पुनकोडी एगिदिय तिरिक्खजोणिय पुसकरसण मते ! केवतिय काल ठिती पण्णता ? गोयमा ! जहण्णेण असोमुहुत उकोसेण वापीस बाससहस्साइ पुढविकाइय एगिदिय तिरिक्साजोणिय गपुसकस्सण भते केवतिय कालीठती पण्णता ? गोयमा । जहण्णण अतोमुहुर्स उकासे बावीस वाससहस्साइ सम्बेसि एगिंपिय गपुंसकाण ठिती माणियध्या ॥ बेइदिय तेइपिय परिदिय णपुसकाण ठिती भाणिपन्वा ॥ पंचदिय तिरिक्खजोणिय णपुंसकस्सणं भते ! केवतिय काल ठिती पण्णत्ता ? गोयमा | जहण्णेणं मतोमुहुन उक्कोसेण पुनकोडी ॥ एव जलयर तिरिक्स, तिरिक्त, घउप्पद थलयर, उरगपरिसप्प, भुयगपरिसप्प, वहयर का उस्कए पून कोटी की मम-मो मगपन् ! एकेन्द्रिप तिपैच योनिक नपुंसक की कितने काल की स्थिति काचर-अहो गौतम ! पन्य अंतर्मुर्त की उस्कृष्ट बावीस इमार वर्ष की, पृथ्वीकाय की उतष्ट पानीस मार सर्प, भाप की सात हमारे वर्ष, काय की तीन महोराषि, वायुकाय काबीन हजार वर्षसी, वनस्पतिकार्य की बाजार वर्ष की, पेइद्रिय की बारा पर्ष की, वेदिर की दिन की, चौरिन्द्रिय की महीने की, पैवेन्द्रिय वियच योनी की कोर पूर्व की युमा तिव नपूसर नहीं होते। इमसिये, और इन विच की अपम्प सिवि सम्मरमुर्व की बामना मनो । प्रकाशक-समाचादर साता सुखदेव सास्त्रीबाससादली.

३ 48 पतुईस जीवामिगम सूत्र-तृतीय पार HAR काणय जहण्णे अतोगुहुस उकोसेण सक्षेत्रकाल पण्णाचा, पदिय तिरिक्खू जोणिय नपुसएण भते ? गोयमा ! अहण्णेण अतोमुहत् उक्कोसेण पुचकोडी पहच, एव जलयर सिरियवउप्पर थलयर उरपरिमप्प, महोयरगाणवि । मणुस्स पपुसकरसम मते ' गोयमा! खेत पहुच्च जहण्णेण मतोमुहत्त उकासेण पुन्यकोडिय पहुच, धम्मचरण पहुच नहण्णेण एक समय उक्कोसेण देसूणा पुषकोडी, एव.कम्म भूमभरहग्वय पुन्वविदह अवरविदेहेसुवि माणिमन्व,अकम्मभूमक मणुस्सणपुसएण मते ! मानना विशेप में पृथच्यादि चारों स्थायर की असंरूपात काल की, वनस्पति की अनस काल की, तिर्यंच पवेन्द्रिप की जघन्य अंतर्मुहूर्त की उत्कृष्ट पूर्व काटी पृषकम की ( पाठ मा पूर्ण कोटी का जानना इस प्रकार ही नलवर, स्वलचर, उरपरकी, मुनपरकी तया महारग लिपप नचुंसक-की स्थिति नानना प्रश्न-पो भगवन् ! पनव्य नपुंक की कायास्थिति कितने-फसल की है - उत्तर-म) गौतम ! म मात्रिय मघन्य अतर्मुन की उस्कृष्ट पू कोटी परत जानना धर्माचरण आधिय जघन्य एक समय की उत्कृष्ट कुछ कम पूर्ण कोटी वर्ष को नानना इसी मार मरस एरवत क्षेत्र में तया पूर्व पश्चिम महानिदेह के मनु नपुसक की स्थिलि मानना प्रभ-प्रो मगवन् ! अकर्मभूमि के मनुष्य नपुमा की स्थिति कितनी है। उधर-पको मौसम ! बघन्य मी अंसमुहूर्त की और उत्कृष्ट मी अत- का दूसरी मसिपचि ptnigh M नुवाकपारीमान श्री ममोडर अपिभी एक समय उकोसेण तरुकालो । नेरइय पुसएण मतेत्ति ? गोयमा ! जहण, दसवास सहस्साइ ठक्कोसेमं तेचीस सागरावमाई, एवं पुढवीआ ठिनी. माणियल्या ॥. तिरिक्खजोणिय असएण भतेति ? गोयमा ! तिरिक्खजोणिय नपुसरण जहणेण अंतोमुहुन उकोसेण यणस्सति कालो, एष एगिदियनपुप्तकस्स, वणस्सइ कायस्सवि एवमेव सेसाण जहपमेणं अंतोमुहुत सकोसेण असखज काल असखेजाओ उसप्पिणिओ कालतो, खेचतो असोजा लोया ।। बेइदिय तेइदिय चउरिदिय नपुस- सेजितने काम करा! चर-यो मौतम ! मपन्य एक समय (उपशम मि से परसाद माग्रिप एक सपप बेद को सर्म मयुष्य पूर्ण करे देव साये इस यात्रिय) मोर उत्कृष्ट पनस्पति का का मानना (भापलिका सत्यापे पान में बो सपथ की राशी? पस प्रमाण पुल परावर्तन को पनस्पति का काम काते) प्रम-बको भगवन् । नरकका मीय नपुंसक नरक के नमकपने रोवो कितना काम रो चर-पो गौतम ! प्रपन्य दर हमार पर्प सा नदीम सामरोम (नरक मरकर पुन नसकका मा न करता इस बाधिक मानना ) ऐसे ही मवस्थिति मिसे साखों मरंका बबन करना बहो ममवन् ! विर्ष योनिक नपुंसक म सकपने .रो हो किने पायो ! परं-बहो मौका ! बन बंई पता पमपनि के नितम् काक पकापनामापार माया सदेव मापनी मासा एष सम्वसि जाय अहे सचमा सिरिषखनोणियणपुंसकस्स जहणणं असोमुहुच उक्कोसणं सागरोषम सतपुहुन सातिरगाएगिदिय तिरिक्वजामिय णपुसकरस जहणेण अतोमुहुत्त उकोसेण दोसागराधम सहस्साइ सखजवास माझाहयाइ,पुढवि माउतेउ पाऊण जहण्णेण अतोमुहुन् उक्कोसेण यणस्सति कालो, वणस्सति काइयाण जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्को- सण मसलेज काले आव असखजालोपा, सेसाण दियादीण जाव खहयराण पतुर्दम-मीमामिगर सूत्र-मगीय पत्र 4RN REदुसरी प्रति पनि पुर्त का रवए कुछ अधिक प्रस्पेक सा सागरोपम ॥ एपेन्द्रिप लियचे योनिक नमक का मघन्य अन्तर मर्न का उत्कृष्ट स्थान पर्ष अपिक दे हमार मागरोपम का [प्रस काय की कायस्थिति इतने काम इस मिये एकेन्द्रिय का इतना मन्चर पर ] पृथ्वी, पानी, घेऊ, पायु इन पार स्पायरों का मपन्य अन्नम्मा की पत्कर बना के काल नितना मानना बनस्पात काय का जघन्प अगर मुहूर्त का उस्का भ रूपात काम का, भौर क्षेत्र से असंख्यात मोकामाक्ष पदसों का समय २ एक प्रदेश एकेक ममप में हरन करत उम में मिवनी सानी भरसापनी मेरे मना बनस्पति क मा से मरकर दूसरे में उस्कृष्ठ इसने काल र.ने का समय है, फिर ससारी भीष नियमा से पनसति में अनवरे पेन्द्रिय सन्दिप चौन्दिर पन्द्रिय सिपंच नपुसकरपा मसपर स्पसचर खेचर पचेन्द्रिय तिर्यंच योनिक मपुमेक का +बनाम-नामपरी मि श्री भयोडर पिषी गीयमा! जम्मग पड व जगेर्ण मतेग्मुहत्त उलोसेमं अतोमुहूस (अंतोमुद्दत्त पाल) सहरण पहुच्च जहण्जेण अंतोमुहुत उकोसेण देमणा पुचकोडी, एवं सम्वेसि जाय अंतरदीवगाण ॥ ३४ ॥ णपुतगस्सणं मते ! केवतियं काल अतर होति ? गोयमा । जहण्णण अंतोमुहुत्त उबोसण सागरोवम सतपुडच सासिरेग ॥ नेरइय णपुंसकरसम भता केवतिय काल अतरै होति ? गो• जहणेण अतोमुहुत्त. उकासेण तरकालों ॥ रयणप्पमा पुनवि नेरइय अपुंसकरस जहण्णेष भतोमुहुन उमोसे सरुकालो ॥ र पुषकरा की, सारन माश्रिप पपन्य अंतर्मु की हर देष कम पूर्व फोटो वर्ष की एसे रेमाप एरपायरीवास रम्पलास देवर रचरकुरु में ममम नपुंमक मनुष्य की स्थिति मानना ॥१४॥ पम-गो मगमन ! नपुसक-पुनकपने को मारकर पी नपुंमक झेरे रसके बीच में जिवना बतर पदे ! रचर-पो गौतम । पन्ध मनमुर्व का उसष्ट कुछ अधिक प्रस्पेक मो सामरोपका पर-हो मनरन् ! मारकी नपुसा परकर पीण नारकी नपुमकोरे समीप लिखना और परे ! सा-गो मौतम ! मपन्य अंतर्मु ( नारकी पर विच या मनुष्य कामा मतपूर्व की स्थिति का रपिा मगरकरे उस भाभिष) र बनस्यति सचिवमा बारपाना . पपर रस्म पारिशमा कपर बाल विका मसमानानादिर साला पुसदमापीमामासारा . L १. पसुपच नीवाभिगम मूमननीय उग म वर्णरसंतिकारी, सहरण 'पहुंच 'जइण्ण अंतीमुहुच उक्कोसेण वणरसतिकालो; एव जाव अतरदीवगति ॥ ३५॥ एतेसिण मते । नेरइय नपुंसकाण तिरिक्वजो. णिय णपुसकाण मणुस्स णपुसकाणय कयर२ हितो जाव विसेसाहियावा ? गोपमा ! सम्बत्योवा मणुस्स गपुसका, नरइय पुसका असखेजगुणा, तिरिक्वजोणिय पुमका अणतगुणा ॥ एतेसिण भते । नेरइय जपुसकाण जाव अहेसत्तमपुढवि नाइयं पुसकाणय कपरे २ हिंतो जाव विसेसाहियावा ? गोयमा ! सन्वस्थोवा कुरु उच्चर कुरु तया अंतरदीप के मनुष्य नपुसक का अंतर मानना, वया सारन आश्रिय भी जघन्य उस्कट तर काना ॥ ३५ ॥ अब पांच प्रकार से अल्पायहुत फाते हैं (१) प्रश्न-मो भगवन् ! नरक नपुंसक, २ विर्यच नपुप्ता, मौर । मनुष्प नपुंसक इन में कौन किस से बराबहुत तुल्य यावत् विवाधिक है ? उपर-प्रो गौतम ! सप से योरे मनुष्प नपुंसक, क्यों कि श्रेणि के अमख्यात माग में वर्तनी मा भाकाश मरेश की राशो उस प्रमाण है, २ उन से नरक नपुसक असरूयातगुना क्यों कि भगठ मात्र क्षेत्र की प्रदेश राशी उस में रहा मो वर्ग मूग उस से गुनाकार करने से मिलनी प्रदेश राधी गये उतने प्रयान में घनाकार लोक की एक प्रदेश की श्रेणी में जितने बाकाश प्रदेश उत्तनी प्रमाणे इस लिय और ई उन से विर्यप योनिक नपुंसक अनवगुने क्योंकि निगोद के मीर अनत है 48 दसरी मतिपचि ..++ महमेण अतोमुहेचे उक्कोसण धनम्सतिकालो मणुस्स गपुमकरस खेच पडुय जहण्णण अतोमुहुच उकोसेण वणस्सति कालो ॥ धम्मचरण पहुच जहणेण एगं समय उकासेण अणतकाल जाव माड पोग्गलपरियट, देसूणं एवं कम्मभूमगस्सवि माहेरषयरस पुन्यविदेह अवरविदेहकस्सवि ॥ अकम्मभूमक मणुस्स गपुसकरसण भते! केवतिय काल अतर होति? गोयमा जम्मण पहुच जहण्णेण अतोमुहुच उकोसण +मनुवादकमायमचारी मुनि श्री बमोडक अपिनी - तया सामन्प मे मनुष्य नऍमस का इन सब के नपुंसक पेद का मंतर जघन्य मतर मुहुर्न का उत्कृष्ट मनंत कारस्पति कास मिहना ॥ फर्मभूमि नपुसक मन्दर मपन्य भन्नग्मुर्व का घरकृष्ट पनस्पति के पास मितना धर्माचरन माश्रिय जयन्य एक समय [ परसाई मानिय ] उत्कृष्ट मनन कास पनस्पति के कास मितना, पापत् देश कम बापा पदम परावर्तन का, ऐसे ही परत पग्वन क्षेत्र, पूर्व महाविद पमिम महाविदेश के कर्मभूपि मनुष्य नपुं- सक का काना मन-मो मगमन् ! मर्ममूपि के मनुष्प नपुसक का कितना मतर पर। चर- मो मौतम ! मन्म माश्रिय नप प भन्तर मुर्म, पका पनस्सादि का मिलना, सारन भामिक वा मन्दर पुर्व रेस्कटपमावि पिता से मर रणव परमादर- .मकायम-रामादुरछामा मुखदेवसमपत्री मासासी का क्षत्र माश्रिय - पतुरंश भीपाभिगम मूषनीय उरा कम यणरसर्तिकारो, सहरण 'पडुच्च जहण्णेण अतोमुहुत उक्कोसेण वणस्ततिकालो, एव जाव अतरदीवगति ॥ ३५॥ एतेसिण भते ! नेरइय नपुंसकाण तिरिक्खजो- णिय पुसकाण मणुस्स णपुसकाणय कयर२ हिंतो जाव विसेसाहियावा ? गोपमा ! सवयोवा मणुस्त गपुसका, नरदय णपुसका असखेजगुणा, तिरिक्वजणिय गपुमका अणतगुणा ॥ एतेसिण मते । नेरइय गपुसकाण जाव अहेसत्तमपुढीव नोइयं गपुसकाणय कपरे २ हितो जाव विसेसाहियावा ? गोयमा ! सम्वत्थोवा कुरु सवर कुरु तथा भवदीप के मनुष्य नपुसक का मंतर मानना, वया सारन आश्रिय मी जपन्य उत्कृष्ट स्वर काना ॥ ३५ ॥ अब पांच प्रकार से अल्पाबहुत फाते हैं (१) प्रश्न-अहो मगवन् ! नरक नपुंक, २ तिर्यंच नपुसक, और मनुष्य नपुंसक इन में कौन किस से असपहुत तुल्य यावत् रिशाधिक दे ? उत्तर-पो गौतम ! सब से यारे मनुष्य नपुंसक, क्यों कि श्रेणि के असंख्यातवे : माम में वर्तमी जा आकाश प्रदेश की राशी उस प्रमाण है, २ उन से नरक नपुसक असरूपानगुना क्यों कि भगठ मात्र क्षेत्र की प्रदेश राशी उस में रहा मो पर्ग पूल उस से गुनाकार करने से जिमनी प्रदेश राशी में उतने प्रमान में घनाकार लोक की एक प्रदेश की अंगी में नितने आकाश प्रदेश उतनी पप ण हैं इस लिए और ई उन से विर्यप योनिक नपुंसक अनंतगुने क्यों किं निगोद में मीर अनंत दूसरी प्रतिपचि ..HM जहणेग अतोमहुंच उकोण बनम्सतिकाली मणुस्स जपुमकरस खेच पडुन जहण्णण अतोमुहुच उक्कोसेण वणस्सति कालो ॥ धम्मचरण पहुच जहणेण एग समय उकोसेअणतकाल जाव माड पोग्गलपरियड, देसूण एवं कम्मभूमगस्मवि माहेरवयस्स पुन्धविदेह अवर विदेहकस्सवि ॥ अम्मभूमक मणुस्स णपुसकरसण भते! केवतिय काल अतर होति? गोयमा जम्मण पहुच्च जहण्णेण अतोमुहुत्त उक्कोसेण मुरादानासमचारी मुनि श्री बमोडक पापिनी तथा सामान्य मे मनुष्य नपुंस का इन सब के नपुंसक मेद का मतर जघन्य अंतर मुहुर्न का उत्कृष्ट ब का-नमस्पति काम जिसना ॥ कर्मभूमि नपुसक का सत्र आश्रिय बन्दर मपन्य अन्तग्मुहूर्त का परफष्ट पनस्पति के काम मितना धर्माचरन माश्रिय जयन्प एक समय [ परवाइ माश्रिय ] उत्कृष्ट मनन काम पनस्पति के कास मितना, पापत् देश कम बापा साप परापन का, ऐसे ही मरत एग्बन क्षेत्र, पूर्व महाविदेश पथिम महाविदेश के कर्मभूपि मनुष्य नपुं- सकाकाना प्रश्न-मो भमयन् ! भकर्मभूमि के मनुष्प नपुसकका कितना मवर परे ! चर- मरो गौतम ! भन्म माप्रिय मपन्य मन्तर पुर्व, पलट बनस्पति कार बितना, सरन भामिन- बनायवर मुन रस्कामाविरबिसा, ऐसे परिपप रीत रम्पर . मकाप-रामायादुरडामा पुसदेवसमस्त्रीपासा प्रसाइय.

जाय विससाहियागोयमा | सन्धरयोवा सहयर तिरिक्ख जोणिय गपुसका, थलयर तिरिक्खजाणिय नपुंसका सखेजगुमा, जलचर तिरिक्खजोमिय पुसका सखेजगुणा, घठरिदिय तिरिक्खजोणिय णपुसका विससाहिय तेइदिय विसेसाहिया, बेइर्विय विसेसा. हिया, सेठकाइया एगिदिय निरिक्ख जोणिया असखेजगुणा पुढविकाइय एगेदिय तिरिक्स जोणिया विसपाहिया,एव माउ वाउ वणस्तति काइया एनिदिय तिरिक्खजोणिय as पतुर्दश-जीवभिगम भूष-नृतीय पान ++ परिन्द्रिप में पन्द्रय तिथंच योनिक नपुंसक में नजर सर लेवर नपुंसक इन में कौन किस से भरा पहन सुरस यावत् निक्षेपाधिकोमो गौवम ! १ सब से योटे खेसर नपुंसक, २ उससे स्पल- पा नपुगक रख्यात्गुने, ३ उससे नउपर नपुंसक रुपात गुने, ४ रस से परिन्द्रिय नपुंसा विशेषार्षिक ५ बम म वेन्द्रप -पुपक विशेषाधिक, ३ असे पेन्द्रिय नर्पस विशेषापिक, ७ उस से उकाधिक एहन्द्रिप नपुनक मसम्यानगुने, ८ सस से पृष्वीकाय एकन्द्रिय नपुप विशेषाधिक, उस से अप्काय एकेन्द्रिय नपुंसर विशेपाधिक, १ उस से वायुकाय एकेन्द्रिय नपुंमक विशेषाधिक, और • उस से पनविकाय एकेन्द्रिप नपुपक अनतगुते हैं मन-पो मगवन् ! कर्मभूमि मनुष्य के नपुंमक, मार्षपूमि मनुष्प नपुंसक, मौर मंसरदीप के नपुमक में कौन किस मे अल्प पहुन तुरप व विशेषाधिक है। रक्षर-बा गौतम ! सस से योरे भवर के समूखिम मनुष्प नपुंपक, २ रस से देव कुरु +II+RA दूसरी प्रतिपधि 4800 42+ अनुवादक-बाबमारीमुनि श्रा भयोग स्त्रिी महेसचमपुढवि नेरइय नपुंसका, छटपुढवि गैरइय गऍसका असखेवगुणा, आव पोच पुढवि नेरइय गपुसका असखेजगुणा, इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए नेरइय गपुंसका असखेजगुणा, ॥ एतेसिण मते ! तिरिक्वजाणिय णपुलका एगिदिय तिरिक्खजोणिय गपुमकाण पुढविकाइय एगिदिय मपुंसकाणं जाव वणरसकाइय एगिदिय तिरिक्ख जोषिय नपुंसकाण, घेइपिय तिरिक्खजोणिय अपुसकाण तेइदिय घउरिदिय पर्चेदिय तिरिक्वजाणिय पुसकाण जलयर थलयर सहयराणय कयरे २ हितो मा महो मगवन् ! नरक नपुसक में रस्तपमा से सगाकर समस्तम प्रमा तक परस्पर कौन २ अस्पात पावर पिक्षपापिको सचर मो गौतम ! सब से योरे मीये की सातरी भरकर नपुसक पाकिर भति पोरी प्रेषिक मसरूपात माम में से थे जो आकाश प्रदेश राधी होने 78 प्रमान उस से छठी नरक नपुंमक मसरूपाठगुने, १ स से पानी के बारुयात गुने, ४ रस से चौथी नाक के नपुमक नपरुपावगुने ५ उसमे बीसरी नरक नपुंसकमसपान गुरे गौर म से दूसरी मरक के नपुंसक संख्यात गुने, उम से मवम नरक नपुंसक मारूवातगुने,इन सातों भरकर्षे पूर्ण परिवार विद्या नेरीवे से दक्षिण दिशा मेरी ममपान मुनीपोंनिपली बीपदामिन दिशाविक सत्ता हो मा-बो ममरम् । सिव पोनिक मयुपक पदम्मादिनी स्वाकर, नियमित • मगर घमारामदुर मात्रा सुसदेसापनीमारी 4 चतुरंश-मीषाभिगम मूष तृतीय पान क्वजाणिय पुसकाण जाव वणस्तति काइय एगिदिय गपुसगाण, बेइदिय तेइदिय परिदिय पंचेंदिय तिरिक्खजोणिय णपुसकाण जलयराण थलयराण सहयराणं मणुम्स । णपुंसकाणं कम्मभूमिकाण मकम्मभूमिकाण अतर दविकाणय कयरे २जाय विसेसाहिया? गोयमा सवत्योवा महेसचम पुढवि नेरइय नपुसका,छ? पुढवि नेरक्य नपुमका असखे- वगुणा जाव दोचा पुढवि नेरइय गपुसका अमखेबगुणा, अतरदीवगमणुस्स णपुसका असखेजगुणा, देवकुरु उत्तरकुरु अकम्मभूमिक दोवि सखेजगुणा, जाव पुन्वविदेह ममे अंतरदीप इन सब में कौन किम से मस्सबहुन तुरुप व विशेपाधिक हैं। उच्चर-महो गौतम! सब से पा सावषी नरक नपुमर, २ उस से छठी के मसख्यातगुने, ३ उस से पांचवी के मरूपातगुने, ४३स से चौथी नरकके मसंख्यातगुन ५ उस से तीसरी नरक के नपुतक असख्यानगुगा, ६ चससे दूमरी नरक के नपुसक मसंस्पातगुने, ७ उस से बसराप के नपुमक सरुपातगुने, ८ उम से देवरु उचरकुरुक समूर्षिछम नमक मनुष्प मसरूयानगुने, ९ उम से हरीराम रम्यवान के समूपिम नपुसक मनुष्य परसर तुरप रूपातगुने, १० उस से हेमवत एरणत्रय के समूछिम नपुंमक मनुष्क परस्पर तुरफ पीछे से संसपानगुने, . स से भरतपरस्त क्षेत्र के नपुंसक मनुष्य परसार नुरप RRHदूसरी प्रति-पाच in अकम्म +2 अनुराकासमबास मुनि श्री मोहीमी . 2} मसका अमतगुणा, ॥ एतेसिणं भंते ! मणुस्स गपुसकाण कामभूमिकाण अकम्म- • भूमिक णपुसकाण अतर दीक्काणय कतरे२जाब विसेसाहया ? गोयमा! सग्वत्योवा मंतरदीवगा अकम्मभूमग मणुस्स पपुंसका देवकुरु उत्तरकर भूमगा दोवितुला सोजगुणा, एव जाय पुन्यविदह अवविदेह. कम्म भूमग मणुस्तणपुसगा दोवी संखजगुणा ॥ ३६ ॥ एतेसिण मते' नेरइय गपुसका रयणप्पमा पुढवी नेरइय अपुंसकाण जार अहे सचमपुढवि नेरइय णपुमकाण तिरिक्ख जोणय गपुसकाण एगिदिय तिरिक्खजोणियाण पुढावकाइय एगिदिय तिR- उचर कुरु के समय नपुंसक मनुष्य परस्पर तुल्य सम्पानगुने, ३ उम से हरषास म्यास के नपुंसक मनुष्य परस्पर तुरप संस्थागुन, ४ उस से रेपरप परणय के मसूर मनुष्य नपुंसक परस्पर तस्य सरूपातगुने, ५ नम से परत एरवत क्षेत्र के नपुंसक मनुष्प परस्पर तुस्य संरुपातगुरे, उम से पूरी महापिदेश के और पश्रिम मा विदेश मनुष्य परस्पर तुल्य मौर मरत -परवा से सरूपातगुने भाषिक ॥ २६ ॥ () मन-मो भगान् ! भारफी नपुमक परममा में सातवी मुमतका तथा तिक योनि नपुंसक एकेन्द्रिय वानिक पृापा से भारम भर पावत् पुनस्मतिकापा र वा बदलिय सेहमिय चारिद्रिय, परेन्द्रिय में पायर स्वसचर सेवर, मौर मनुष्य नपुमक में जर्मभूमि वर्ष- भकाशव-रामायापुर साखा इसवसहापभी पासली INM पतुरंश-जीपाभिगम मुमतीय पास क्खजोणिय गपुसकाण जाव. वणरसात काय एगिदिय णपुसगाण, वेइदिय तेइदिय चरिदिय पंचेंदिय तिरिक्खजोणिय णपुसकाण जलयराण थलयराण खहयराणं मणुम्स णपुंसकाण कम्मभूमिकाण मकम्मभूमिकाण भतर दविकाणय कयरे२जाय विसेसाहिया? गोयमा सम्पत्योवा महेसत्तम पुढावि नेरइय नपुसका,छ? पुढवि नेरइय नपुमका असखे- बगुणा जाव दोच्चा पुढवि नेरइय गपुसका अमखेबगुणा, मतरपीवगमणुस्स णपुसका असखेजगुणा, देवकुरु उत्तरकुर अकम्मभूमिक दोवि सखेबगुणा, जाव पुम्वविदेह ममे अंतरदोष इन सप में कौन किम से मसबहुन तुरप व विश्वेषाधिक हैं ? उच्चर-महो गौतम! सब से पार सातमी नरक नपुमा, २ उस से छठी के मसख्यातगुने, ३ उस से पांचवी के मख्यावगुने, ४ उस से चौथी नरबके असंख्यातगुन ५ उस से तीसरी नरक के नपुतामसरूपातगुगा, ६ चसमे दूपरी नरक के नपुमा असरूपातमुने, ७ उम से अंतराप के नपुसक सरूपातगुने, ८ उस से देवरु उत्तरकुरु क समूछिम नपुंसक मनुष्य मसरूपानगुने, ९ उम से हरीवास रम्पवास के समूपि नपुसक मनुष्य परसर सुरप मरुपातगुने, १० उस से रेमवात एरणवय के समूछिम नपुंमक मनुष्य परसुर तुर पीछे से संस्मानगो, ११. रस से मरतएलस क्षेत्र के नमक मनुष्य परस्सर नुरुप +RRHदूमरी प्रति-पाच dire 3 + अनुरारकामामबासे मुनि श्री अयोगीनी + - मसका अणतगुणा, ॥ एतेसिक भते ! मगुस्स पपुसकाण कामभूमिकाणु मकम्म- भूमिक पुसकाण अंतर दीवकाणय कतरेरजाव विसेसाहिया ? गोयमा सम्वत्योवा अतरदीवगा मकम्मभूमग मणुस्स गपुंसका देवकुरु उत्तरकुरु भकम्म भूमगा पोधितुला सखेजगुणा, एवं जाय पुत्रविदह अवविदेह कम्म भूमग मणुस्तणपुसगा दोवी सनेजगुणा ॥ ३५ ॥ एतेसिणं मते नेरइय पपुसकामं रयणप्पभा पुढवी नेरड्य अपुंसकाण जाध अहे सचमपुढवि नेरइय गपुमकाण तिरिक्ख जोगिय गपुसकाण एगिदिय तिरिक्खजाणियाण पुढविकाइय एगिदिय तिRि- उचर कुरु के समाप मपुंसक मनुष्य परस्पर तुरप सरूपातगुने, ३ म से हरिपास सम्यक्सास के नपुंसक मनुष्य परस्पर तुरुप सरूपातगुने, ४ उस से माय परणवय के मसूप मनुष्य नपुंसा परस्पर तस्प संस्पातगुने, ५ उम से परत एरवत क्षेत्र के नपुंसक मनुष्प परस्पर तुरप संरुपातगुरे, म से पूर्व महापिदहरे और पभिम महा विदेश मनुष्य परस्पर तुल्य मौर मरत परवा से सरूपातमुने भषिक ॥ १६ ॥ (५) भ-यो मनवन् ! नारकी नपुमक र प्रमा मे सातवी मुराण तक तथा तिक योनि नपुंसक एकेन्द्रिय यानिक पृष्णकाया से मारम र यावत् इनस्ततिकाल का वा दिप मियादव, पवेन्द्रिय में पावर स्वापर मेवर, भौर मनुष्य नामक कर्मभूमि पर भकाम-रामा माहादेवसहायनी पाहामारी ++ चतुर्दश भीवाभिगम सूध-नृतीय उपाग 4+8+ वेदस्सणं भते ! केवइकालं ठिति पण्णता ? गोयमा ! जहण्णेण सागरोवमस्स दोणिसभागा पलिओवमस्स असलेबहभागाण ऊणगा, उक्कोसेण वीस सागरोवम कोडाकोडीओ, दोनिय वाससहस्साइ, अबाधा अवाहूणिया कम्मट्टिती कम्मनिसेगो ॥ ३८ ॥ णपुमकवेदेण मते ! किं पकारे पणते ? गोयमा । महाणगरदाह समाणे पण्णत्ते समणाउसो । सेच णपुसगा ॥ ३९ ॥ एतेमिण भते ! इत्थीण पुरिसाणं गर्मुसकाणय कयरे २ हितो अप्यावा जाव विसेसाहिया ? गोयमा ! उचर-शो गौतम ! अवन्प दो सागरोयम के मास माग करे उस में से दो भाग उस में पल्पोपम का असरूयातवा भाग कम जितनी और उत्कृष्ट पीस क्रौराकोट सागरोपम प्रमाण अाधा काल हमार वर्ष का अर्थात् नपुसक घेद मोहनीप कर्म का पन्ध किये वाद उत्कृष्ट दो हजार वर्ष पछे यह नपुंसक मात्र को प्राप्त होता है ॥ ३८ ॥ प्रभ-यहो भगवन् ! नपुंसक वेद का विषय (दोदय का विकार) किस प्रकार का कहा है। उत्तर-अहो गौतम ! जिस प्रकार पहुत बडा नगर आनि कर प्रज्वलित हुआ बहुत साल तक मलित रहता है, वैसे ही नपुंसक का योदय सदेप प्रज्वलित रहता है, प्रश्न अहो अमण आयुष्मन्बो ! पेमा नपुंसक वेदोदय कहा। इति नपुसक वेदापिकार ॥ ३९ ॥ अप बीना घेद के आश्रिय आठ प्रकार से अलगाएत कहते हैं इन प.में में प्रथम सामान्य प्रश्न अहो भगवन् ! खी पुरुष और नपुमक इन में MH H+ दुरी प्रति पति 48. RE नारस-सामरी माने श्री अमोगा ऋषिमा भारविदेह कम्मभूमग ममुस्स मपुंसका दोषि संखेनगुणा, रयणप्पमा पुनवि नेरइय पपुंसका असोजगुणा, खहयर पर्चेदिय तिरिक्खजोणिय पपुसका अमले. जगुणा, थलयर संजगुणा जलयर सस्लेजगुमा, चतुरिदिप तिरिक्सजोषिय गपुंसगा विसेसाहिया, तेइदिय मपुसका विसेसाहिया, बेइंदिय गपुसगा विसेसाहिया, तेउकाइय एगिदिय अपुंसगा असोजगुणा, पुढविकाइया एनिदिय णपुसगा विसेसाहिया, आठकाइया णपुसगा विसेसाहिया, वाउकाइय विसेसाहिया वणस्सइकाइय एगिदिप तिरिक्सजोणिय नपुंसका अर्णतगुणा ॥ ३ ॥ पुसक पीछे से संरूपातगुने, १२स से पूर्व विदेश पभिम विदेश नपुंसक मनुष्य परसर तुरखें संख्यातगुने, "उस से प्रबप मरक मेरी नपुमक बसल्यातबुने, १४ रस से खेपर विच पंचेन्दिर नपुंमक वसंहयानगुने, १५ एस से स्क्यावर तिर नपुमक संस्थातमुने, उस से महपर विर्षन नपुंमक मसंसबातगुने, उस से पौरिन्द्रिा नपुंसक विशेषाषिक,१८सस से तेन्द्रिय मप विशेषाषिक १९ उस से पेन्द्रिय मप विशेषापिक. २. सम से हेमस्कार बसरुवावमुमे, २० से पृथवीकार नपुंसक विभाषिक,२२ असार मसुंसक विशेषाषिक,२५सामने आया पिल- कि-बोरो भाविक ने सो मन कमेचस्मित अपरामादुर बाखदेवसहारमीला ++ चतुर्दश भीवाभिगम सूम-मृतीय उपाय 44 धेर्दस्सणं भते ! केवइकाल ठिति पण्णचा? गोयमा ! जहण्णेण सागरोवमस्त्र दोणिसत्तमागा पलिओषमस्स असतेजइभागाण ऊणगा, उकोसेण वीस सागरोवम कोडाकोडीओ, दोनिय वाससहस्साइ, अबाधा अवाहूणिया कम्माट्टिती क्रम्मनिसेगो ॥ ३८ ॥ णपुमकवेदेण मते ! किं पकारे पण्णवे ? गोयमा । महाणगरदाह समाणे पण्णसे समणाठसो ! सेत्त णपुसगा ॥ ३९ ॥ एतेमिण मते ! इत्थीण पुरिसाणं णपुंसकाणय कयरे २ हिंतो अप्पावा जाय विसेसाहिता ? गोयमा । उचर-भो गौतम ! मघन्य दो सागरोपम के मात माग करे उस में के दो भाग उस में पल्पोपम का असरुपातमा माग कम मिलनी चोर उत्कृष्ट पीस कोटाक्रोड सागरोपम प्रमाण अाधा काल दो (मार पर्ष का अर्थात् नपुसक पेद मोहनीय कर्म का पन्ध किये वाद उत्कृष्ट दो इनार पर्प पीछे यह नपुसक भाव को प्राप्त होता है ॥ ३८ ॥ प्रश्न-बो मगन् । नपुंसक वेद का विषप (वेदोदय का विकार) किस प्रकार का कहा है। उचर-बो गौतम ! निस प्रकार यहुन वा नगर अग्नि कर प्रज्वलित हुआ पहुस काम तक प्राधित रहता है, वैसे ही नपुसक का वेदोदय सदेव मचालित रहता है, प्रश्न अहो श्रमण यायुप्मन्त्री पेमा नपुंसक घेदोदय कहा। इति नपुंसक वेदाधिकार ॥ ३९ ॥ अब पीनों वेद के आश्रिय आठ प्रकार से मनापात कहते हैं इन मठों में प्रथम सामान्य प्रश्न अहो भगवन् ! खी पुरुष और नपुसक इन में At M+ मर्ग मते पत्ति 484R- -- 4. मनुवाद-पाठयमचारी मुनि श्री भयोमम्प मामी सन्वरथोवा पुरिसा, इत्याओं सखजगुणाओ, जपुसका अर्णतगुणा ॥ एतसिणं मंत ! तिरिक्ख जोणिस्यीण तिरिक्खनोणिय, पुरिसाण तिरिक्खजोणिय पुसकाणय कयरे २ हितो जाय विसेसाहिया ? गोयमा ! सन्वरयोवा तिरिक्खजाणिय पुरिसा, तिरिक्ख जोणिस्थीओ सखजगुणाओ, तिरिक्खजोणिय गपुसका मणतगुणा ॥ एससिण मते ! मस्तिस्थीण मणुस्स पुरिसाण मणुस्स णपुसकाण कयरे २ हितो मप्पा जाब विससाहियावा ? गोयमा । सम्बत्योवा मणुस्स पुरिसा मणुस्सित्यीओ मैन २ अरापात पापर विशेषाधिकर महो गौतम ! सप से योटे पुरुष बेदी, उम से स्त्री पेदी सख्यानगुन में, उस स नपुसक वेदी अनतगुने २ (२) महो मगरन् । विच योनिक स्त्री पुरुप और नपुसक में कौन २ कपी ज्यादा विशेषाधिक महो गौतम ! सब से पारे तिर्यंच यानिक पुरुष, २ उस से वियंपनी लीयों ससवातगुनी और ३ रस से विर्यच नधुप अनंतगुने (३) प्रश्न मो भगन् मनुष्प की श्री पुरुष भौर नपुसक में कौन २ पादारूपी विशेषाधिक चर हो गौतम ! सबसे याद पुरुष , २ रस से मनुष्प की नौ संसपावगुनी, सत्तावीसगुण उस से मनुष्य नपुंसर बसरूपातगुन, समूचिप माग्रिप (५) बम-बो मगंपन् । देवकी नीयों पुरुष यौर (देवया में नपुंसक वेदना पावा स्वकिय संरक विकापी) मारकी के सकइन मापस पावर विपकिन • राजापहादुर लाला मुपदेवसदायमी बागवार 17 ant चतुर्दश-मीकामगम मुम मृताय अपाङ्ग , सखेजगुणामो, मणुस्स गपुसका असखज्जगुणा ॥ एतोसण भते ! देविस्थीण देव पुरिसाण नरइय नपुसकाणय, कयरे २ हितो जाव विसेसाहिया ? गोयमा समस्येवा नेरइय नपुसगा, ६य पुरिसा असखजगुणा, देवित्थीओ सखेज्वगुणीओ ॥ एतेसिण मते तिरिक्खजोणिस्यीणं तिरिक्ख जोणिय पुरिसाण तिरिक्ख जाणिय नपुसगाणं, मणुस्सियाण मणुस्स पुरिसाण मणुस्सनपुप्तगाण, देविस्थीण दव पुरिसाण, नेरइय नयुसकाण कयरे २ हितो जाय विसेसाहिया ? गोयमा ! सम्बत्योवा मणुरस पुरिसा, उचर-अहो गौतम ! सब से थोडे नरक के नपुंमक (नरक में स्त्री वेद पुरुप घेद का अभाव है) क्यों के अगुल मात्र क्षेत्र प्रदेश राशी का प्रथम पर्ग मल का ना करन से जितने प्रदेश की राशी होवे उस का पन किया मो लोक उस की प्रदेश अणि में मिलने आकाश प्रदेश होने तने ममाण में उन का नणारे, ३ उन से देव पुरुष भाण्यात गुने, क्यों कि असण्यात योजन के साक्रोडी प्रमान सूची (मनने आकाश प्रदेश हो उसने घनको हुने लोक की एक प्रदेश की श्रेणी में जितो पाकाच पदश होग उस प्रमाण में उन का प्रपान है, और उस मे देवता की सी सख्यातगनी, क्योंकि पचीस गुनी, है (४) नि-अहो भगवन् ! तिथंच योनिक स्त्रीयों पुरुपो या नपुमक मे ही मनुष्य योनिक खी पुरुष तथा पुमको, वैसे ही देवी स्रो नया पुरुषों मौर वैसे ही नारकी के नपुमको इन में कौन २ कमी ज्यादा। in दूसरा प्रति पचि 28 ant की मनुवाक वारसमचारी मुनि श्री मोहक अपि मणुस्तिथीआ संखेंजगुणाओ, मणुस्त गपुसका असखवगुणा, नरदय नपुसका अमखबगुणा, तिरिक्खजोणिय पुरिसा असखबगुणा, तिरिक्खजोणिस्थीयाओ सखेज- गुणाओ, देव पुरिसा असखजगुणा, देवित्थियाओ सखेज्जगुणाओ, तिरिक्खजोणिय नपुंसका अणतगुणा ॥ एतासिणं भने ! तिरिक्खजोणित्थीण जलयरीण, थलयरीण खइयरीण तिरिक्खजोणिय पुरिसाणं जलयराण थलयराण खड्यराण तिरिक्वजाणिय पुसकाण एनिदिय तिरिक्खजीणिय जपुसकाण पुढवि काइय एगिदिय तिरिक्ख. सपा विशेषापित है ! भो गौतम ! , सप से थाटे मनुष्य पुरुप, २ उस स मनुष्य सियों संख्पात गुनी, १ स से मनुष्य नपुंसक मतस्पावगुन, ४ उस से नारकी नपुमक असंख्यातगुने, क्योंकि संस्पात श्रेमिगत आमाछ मदेश की राशी प्रमाण ५ स से विर्यच योनिक पुरुष अमरूयासगुने, क्यों कि मनर के मातरूपास भाग पर्वती मो मसरूपात अणि प्रदेश की राशी उस प्रमाण हैं, उससे तिर्थप पोनिक स्त्री संख्यातगुनी क्यों कि तीन गुनी, ७ उस से देव पुरुष असल्यातमुने वर्षों कि वहुत बढी प्रबर के ममल्यात माग पती मो असंहपात श्रेणि प्रत माकाच पद की राजी उस प्रमाणे हैं, ८ उम से देवीयों सस्पातमुनी क्यों कि पचीसगुनी, ९ रस से विष पोनिक नपुंसक मननगुने, मिमोर माश्रिय (५) प्रभ-मो ममान ! विष पोनिक बीया बहार की प्रशासक रानाबहादुर पुसदेवमायकी भाभRARE w+ चतुर्दशीवाभिगम सूत्र तृवीय पपा 43 जोणिय णपुसकाण जाव वणरसतिकाइय एगिदिय तिरिक्खजोणिय नपुसगार्ण, बेइदिग तिरिक्खजोणिय णपुसकाण, तेइदिय चउरिदिय पइदिय तिरिक्खजोणिय पुनकाण जलयराण थलयराण खहयराण कयो २ हितोजाव विसेसाहिया ? गायमा! सम्वत्योवा खहयर तिरिक्खजोणिय पुरिसा, खहयर तिरिवख जोणित्थियाओ असखेज गुणाओ, थलयर तिरिक्वजाणिय पुरिमा सखजगुणा थलयर तिरिषखजोणिस्थीओ सखेजगुणाओ, जलयर तिरिक्खजोणिय पुरिसा सखेजगुणा, जलयर तिरिक्ख- स्थलचर की तया म्वेचर की लीयों, तैप्से ही तियेच पहों जलचर स्थलचर तथा खेचर पुरुपों, तेसे ही सिय नपुगक एकेन्द्रिय पृथीकाया यापत् पनस्पतिकाया, पान्द्रिय यावन् पचेन्टिग नपुंसक, जलचर स्थलचर खेचर नपुंसक, इन मर में कौन २ अस्पाहुन यावत् विशेषाधिक है ? उत्तर-अहो गौतम !! ' मन मे योहे खर पुरुप, • उस से खेचरनी सरूपातगुनी, ३ उस से स्थलचर पुरुप संख्यात गुने, ४ उस स स्थलचानी सख्यातगुनी, ५ उस से जलचर पुरुष सरुपासगुने, ६ सप्प से जलचरनी सरूयात- गुरी, ७ 7 से खेचर नपुसक सख्यातगुने, ८ उस से स्थलचर नपुंसक सरूयातगुने, ९ उस से जलचर नपुंपक गरुपातगु, १० उम से चरिन्द्रिय विश्प पक, उम से तेइन्द्रिय विशेष धिक. १२ असे इन्द्रिय विशेषाधिक, १३ उस से सेउकापा अपंगातगुरी, १२ उम से पृथकाया विशे 48 दूसरी प्रतिपत्ति १ 42 मनुवादक-मनमचारी मुनि श्री ममोछक प्रापमी - जोणित्यायाओ सखजगुणओ खहयर पदिय तिरिक्वज णिय णपुंसका सखेज्वगुणा, थलयर पर्चेदिय तिरिक्खजोणिय नपुसगा सखजगुणा जलयर तिरिक्खजोणिय पुसका पदिया सखबगुणा चउरिदिय तिरिक्खजोणिय पुसका विसेसाहिया, तेदिय णपुमका विसेसाहिय, बेइदिय गपुसगा विसेसाहिया, तउकाइया एगिदिय तिरिक्व जोणिय णपुमका असखेजगुणा, पुढवि णपुसका विसेसाहिया आठ नपुसका विसेसाहिया, वाठनपुसका विसेसाहिया वर्णप्फइ एगिदिय गपुसका पाधिक, १५ उम से अप्काया विशेषाषिक, १६ उप्त से पायुकाया विशेपाधिक, २७ उस मे वनस्पति- कापा एकेन्द्रिय नपुमा मनतगुने (६) मन-मो भगवन् ! कर्भमूपी मनुष्य पुरुषों, अकर्मभूमी मनुष्य पुरुषों, मंतरदीप मनुष्य पुरुषों, सामान्यपने नपुंभको, मर्मम्पी मनुष्य नपुंमको, अपभूपी मनुष्य नपको, मंतरद्वीप मनुष्य नपुमको, इन में कौन २ अल्प पाहत यावत् मिश्वेप है ? उत्तर-मार गौतम ! मवरदे प के मनुष्य न यो तथा मनुष्य पुरुषों परस्पर तुल्य है और सब मे पोहे क्यों कियुगसिये है, उससे सस उचरकुरु के मनुष्य जी तपा पुरुषों परस्पर तुरुप मसरदीप से सत्यातगुने भपिक, उसे परिवास रम्पज्ञास के मनुष्य सी तया पुरुषों परस्पर तुरा सहपातगुने, ४ रस से रेपर परमाप के अनुगमी पुरषों परस्सर सुरप रूपातगुने, ५ रस से भरत परपस के पनुष्क पुरुषों संहनासमुने, • पम्लय रानावादर माला पुलदेवतापनीबासी चतुर्दश भीषभिगम सूप-तृतीय उपान tath अणतगुणा ॥ एतासिण मते । मणुरिसत्यीण कम्मभूमियाण अफम्मभूमियाण अतरदीवीयाण मणुस्स पुरिसाण कम्मभूमिकाण अकम्मभूमिकाण अतरदीविकाणं मणुरस गपुसकाण कम्मभूमगाणं, अकम्मभूमगाण अतरदीविकाणय कयरे रहिंतो जाव विसेसाहिया ? गोयमा ! अतरदीवक अकम्मभूमक मणुसित्थीयाओ मणरस पुरिसाए एतेसिण दोणि तुम्ला सवयोवा, देवकुरु उत्तरकुरु अकम्मभुमक मणुस्तित्थीयाओ मणुस्स पुरिसाओ एतेसिण दोण्णिवि तुल्ला सखबगुणा, हरियास रम्मकवास अकम्म- ६ उस स मरव एरवत क्षेत्र की स्त्रीयों परस्पर तुल्य और संख्यासगुनी क्यों कि सत्तावीस गुनी : ७ उस पूर्ण महाविदेह पश्चिम महाविदेश के पुरुषों परसर तुल्य मरत एरवय से सरूपात गुने अधिक, ८ उस से पूर्व महाविदेः पश्चि। महाविदेश व यों परस्पर तुल्य उस मे सरूपातगुनी अधिक है क्योंकि सचाइम गुनी है, ९ उस में मर्मभूमि के मनुष्य नपुमा असंख्पासगुने १० उस से देवकुरु उचरकुरुके मनुष्य नपुंसक होनी असलगातगुने अधिक, " उस से रीवाम रम्पक पास के मनुष्य नपुंसकों दोनों परस्पर तुल्य ख्यातगुने अधिक, १२ उस मे हेमवय एरणाय से मनुष्य नपुसकों दोनों परस्पर तुल्य संख्यातगुने, १३ उस से भरतेरावत के मनुष्य नपुसको परस्पर तुल्य सख्यातगुन, १४ धन से पूर्व महाविदेश पश्चिम महाविदेह के मनुष्य नपुंमको परस्सर तुल्प मरतए राय से सरुपातगुने अधिक [७] प्रश्न-भरो भगवन् ! देवता की लीयों सामान्य १ दूसरी मतिपति ++ अ +मनुवाद-पायमचारी मुनि श्री ममोकापनी - जोगित्थीयामो सखबगुणओ खहयर पदिय तिरिक्ख जोगिय गपुंसका सखेवगुणा, थलयर पर्चेदिय तिरिक्खजोणिय नपुसंगा सखजगुणा जलयर तिरिक्खजोणिय पुसका पदिया सखजगुणा चउरिदिय तिरिक्खजोणिय पुसका विसेसाहिया, सेइदिय णपुमका विसेसाहिय, बेइदिय गपुसगा विसेसाहिया, तठकाइया एगिदिय तिरिक्सजोणिय णपुसका असखेजगुणा, पुढवि णपुसका यिसेसाहिया माउ नपुसका विसेसाहिया, पाउनपुसका विसेसाहिया वणप्फइ एगिदिय पपुसका पापिक, १५ उम से अप्काया विशेषाधिक, १६ सप्त से वायुकाया विशेषाधिक, १७ उस से वनस्पति- काया एकेन्द्रिय नपुपक अनप्तगुने (६) मन-मो भगवन् ! फर्ममूपी मनुष्प पुरुषों, अकर्मभूमी पनुष्य पुरुपों, मंतरदीप मनुष्य पुरुषों, सामान्यपने नपुं को, फर्मम्पी मनुष्य नपुंमको, मायभूपी मनुष्य नपुंसको, अंतरद्वीप मनुष्य मपुमको, इन में कौर २ मा यात यावत् मित्रेप ? पचर-सा गौतम ! अतरदेप के मनुष्य न यो तथा मनुष्य पुरुषों परस्पा तुल्य है और सप मे यो क्यों कि युगलिये हैं,२ उमसे दबकुरु उत्तरहरु के मनुष्य खी तथा पुरुषों परस्पर तुल्प अतरदीप से सस्पातगुने मर्षिक २५ से परेवास रम्पवास के मनुष्य सी तथा पुरुषों परस्सर तुरम सरुपातगुने, ४ रस से रेमाप परमारे मनुष्य की पुराणों परसर दुरस सस्पानगुने, ५ रस से मरस एसके मनुष्य पुषी संस्पासमुने, • पसरु रानाबहादुर बाला सदेवसापजीवासातरी 4 चतुर्वष जीपामिगम एप-तृतीय उपास 44 असखेजगुणा, देवकुरु उत्तरकुरु अकम्मभूमग मणुस् णपुप्तका दोवि सखेजगुणा, एव तहेव जाव पुल्चविदेह अवरविदेह कम्मभूमक मणुस्स गपुसका दोषि सखेज्वगुणा ॥ एतासिण भते ! देवित्थीण भवणवासीण वाणमतरीण जोइसिण वेमाणिणीण देवपुरिसाण भवणवासीण जाय वेमाणियाण सोधम्मकाण जाव गेविजकाण अणुत्तरोववाइयाण, नेरइय गपुसकाण रयणप्पमा पुढवि नेरइय नरक के नेरीये असंख्यातगुने, १२ उस से पाठवे सहस्रार देवलोक के देवता अमरख्यातगुने, १३ उस मे सामय माशुक्र देवलोक के देवता असल्यावग्रने, १२ उस से पांचवी नरके गये अतरुयातगुने, १५ उम से छठे सतिक देवलोक के देव असख्यातगुने, १६ उस से चोयी नरक के नेरीये असख्यावगुने १७ उस से पचिव देवलोक क देवता असरूपातगुने, १८ उस से तीसरी नरक के नेरीये असख्यातगुन, १९ उस से चौपे महेन्द्र दवलोक के देवता असख्यासगुने, २० उस से तीसरे सनत्कुमार देवलोक के दवता बातरूपातगुने, २१ उस से दूमरी नरक के नेरीये असंख्यातगने, २२ बस से दूसरे देवलोक के देवना असरूपासगुने, २३ उस से दूसरे देवलोक की देवी सख्यातगुनी, २८ वस से प्रथम देषलोक के देवता सल्यान गुने, २५ उस से प्रयम देवलोक की दनी संस्पातगुनी, २६ उस से मवनपति देवता असल्पात Hit दूसरी मविपचि 843 + मनुवादक-पाखममधारी मुनि श्री अमोग अपिजी १ भूमक मणुस्तिथीयाओ मणुस्स पुरिसाय एतेण दोणिवि तुला सखेजगुणा, हमवते हेरण्णवते अकम्मभुमक मणुस्सित्थीओ मणुस्त पुरिसाय दो वतुल्ला सखजगुणा, भरहेरवत कम्मममग मणुस्स पुरिसा दोषि सखेबगुणा, भरहेरक्य मणुस्सिस्यीयाओ दोवि सखेजगुणा, पुन्यविदेह अवरविदह मणुस्त पुरिसा दोवि सखेजगुणा, पुन्यविदेह अवरविदेह कम्ममूमग मणुरिसरयीओ दोषि सखेजगुणा, अतरपीवंग अकम्मभूमग मणुस्स गपुसका पने, मानपति की सीपों पाणव्य वर की सेयों ज्याविपी की नीयों तया वैमानिक की स्त्रीपों तथा देववा पुरुषो मवनपति से वैमानिक तक सपा सौधर्षा देवलोक से पगाकर सर्मार्थसिद्ध तक, क्या नारकी नपुसको रस्नममा से मासवी नरक तक इन सब में कौन २ कम व्यारा परापर विशेषाधिकार उचर महो गौसम ! " मप से योदे भनुपर विमान वामी देव पुरुषों, २सन से ऊपरकी प्रवेषक के देवता मरुयात गुने, ३ उस से मध्य की अवयक के देवता सस्यातगुने, ४ उस से नीचे के ग्रेवेयक के देवता सरूयातगुने, ६ उम से पारवे अच्युत देवलोक देवता मरूयातगुने, ६ उस से इग्यारवे मारन देवसोर के देवता मरपातगुने, ७ उस से दो माणत देपसोक के देवता संख्यातगुने, ८ उस मे नवरे भापत देपसोको दिशा मल्यातमुना, ९ उससे साली भारती के मेरीपे नपुस मसवातना, " से भी - प्रकाशक-रामायादुरमा मुम्बदेवमहायजीपानामसारी कम पवईश-नीलामिगम झूम-तृतीय पा 4R मसंखेजगुणा, बमलोए कप्पे देवपुरिसा मसखेजगुणा, तचाए पुढवीए नेरइया अस. खेवगुमा महिद कप्पे देवपुरिसा असखेबगुणा, सणकुमारे कप्पे देवपुरिसा सखेजगुणा दोचा पुढविनेरइय गपुसका असखेजगुणा, ईसाणे कप्पे क्षेव पुरिसा असखेजगुणा ईसाणे, कप्रेदेवत्थियाओ सम्वेगुओ सोधम्मे कप्पे देवपुरिसा, सखेजगणा, सोधम्मे कप्पे देवि- स्थियाओं सखेबगुणाओ भवनवासि दवपुरिसा असखेजगुणा, भवणवासि देवित्थियाओ सखेबगुणीओ, इमीसेरयणप्पमा पुढवि नेरइया असखबगुणा,वाणमतर देवपुरिसा अस- मनुष्य की नीयों तथा मनुष्प पुरुषों, कर्मभूमी अकर्मभूमी अवरई के पुरुषों, देवता की स्त्रीयों मवनपति पाणज्यतर उपानिपी क्या प्रथम दूसरे देवलोक की लीयों, तथा देव पुरुषों मवनपते पाणपतर ग्यो तेपी सौधर्म देवलोक पावत् सर्वार्थ सिद सक के देवता नरक के नपुसको तया रत्नममा से यायतू तमस्तमः प्रमा नरक के नेरीये, इन में कौन २ किस से बसपात तुल्य व विशेषाधिकरे ? उचर-महो गौसम ! 'सब से पारे पवरद्वीप के मनुष्य और सोयों परस्पर तुल्य है, २ देवकुरु उत्तरकुरु के मनुष्य स्त्रीया च्या मनुष्प पुरुषों परस्पर तुस्प है और भवरदीप से संख्यात्यने अधिक है, ३ हरीषास रम्यक्वास के मनुष्य सायों भौर मनुष्य पुरुषों परस्पर तुल्य है और कुरु क्षेत्र से सख्यासगुने अधिक है, सोमाय । 44 दूसरी मापिसि 487 विषय योनिकी खीयों नखचर स्थलर और खेचर की नीया , विर्यच योनिर मपुंसकाण जाव अहे सचमा पुढवि नेरइय णपुसमाण कयरे २ हिंतो जाव विसेसाहिया ? गोयमा सन्यरथोवा अणुचरोववातिया देवपुरिसा,उवरिमगेवेचा देवपुरिसा सवगुणा, तहेब जाव आणतकप्पे देवपुरिसा सम्वेनगुणा,अहे समाए पुढविए नेरइय पुसका असरखेजगुणा, छट्ठीए पुढवीए नेरइय नपुसका असोजगुणा,सहरसारेकेप्पे देव पुरिसा असखेबगुणा, महासुक्के कप्पेदेवा असोजगुणा, पथमाए पुढपीए नरड्य नपुं. सका असखेनगुमा, लतएकप्पे देवा असखेजगुणा, चरथीए पुढवीए नेरदय णपुसका H+ मनुपावर-पासमारीमुनी श्रा ममोसम - • प्रकाशक समापा'दुर साला पुसटरसायनी सिमसापकी गुने, २७ उस से मनपति की देवीयो सस्पातगुनी, २८ उस से पहिली नरक के नेरीये असख्यातगुने, २९ उस से पाणव्यन्वर देवता बसरुपातगुने, ३० उस से पाणव्यवर की देवीयों सेरुपातगुनी, " उस स स्याविपी देववा संस्पातगुने, १२ उस से ज्योलिपी की देवी संरुपातमुनी (6) मन-ओ मगरन । स्थलघर और खेचर पुरुष, विषच योनिक नपुंसक पृष्वीकाय--अपकाप-तकाय-बाबुकाय बनस्पछिकाया तिर्यंच योनिक नपुंसक, बेइन्द्रिय इन्द्रिय पौरिद्रिय नपुसक, पचेन्द्रिय तिच बोनिक नपुंसक बस पर स्वळपर मौस्सेबर नपुंसक, कर्मभूमी मनुष्य की कार्यमूपी मनुष्य की बार बार H+ पतुर्दशन्जीवाभिगग मूम-तृतीय उपास 41 खहयराण मणस्सिरीण कम्मभूमिपाणं अकम्मभूमियाण अतरवावयाण मणुस्स पुरिसाण कम्मभूमकाण अकम्मभूमकाणं अनरदीवकाण मणुरम णपुसकाण, कॉमभूमिकाण अकम्मभूमिकाण अतरदीवकाण, देविस्थीण भववासिणीण वाण. मतरीणं जोतिसीण वेमाणिणीण, देवपुरिसाण भवणवासीण वाणमातराण जोतिसि- याण वेमाणियाणे, सोधम्मकाणं जीव गेविजकाण, अणुरोक्वाइपाण; नरइय पुप्तकाणं रयणप्पभा पुढवि नेरइप णपुसकाण जाव अहेसचमा पुढाव नेरक्ष्य जपुसकाण कयरे २ हितो अप्पावा जाव विसेसाहियावा ? गोयमा ! असरदीवक अकम्मभूमिक मणुस्सिस्थीओ मणुसपुरिरसय एतेण देवितुल्ला सख्यासगुने, १३ उन से पारवे देवलोक के देवता संख्यातर्मुने, १४ सन से इग्यारह देवलोक के देवता संख्यातगुने, १५ मन से दशवे देवलोक के देवता सरूपातगुने, १६ उन से नवरे देवलोक के देवता सस्यात्तगुने, १७ उन से सावकी नरक के नेरीचे बसरूपातगुने, १८ मन से छी नरक क नेरीये अस- रुयातगुने, १९ चैन से माठो देवपोक के देवता मसरूपासगुने, २० सन से सातवे देवलोक के देवता असरूपातगुने, २१ टन से पांचषी नरक के नरीवे असल्यानगुने, २२ मन से छठी देवलोक के देपसा मस्य तनुने, २१ रन से चेपी नरक के नेरीचे असंख्याने पर न से पांचो देवलोक के देवता ++ दूमरी प्रतिपत ghat मनुवादक-पाम्पमचारी मुनि श्री प्रमोगक प्रपिनी- खेजगुणा वाणमतरदेवित्थियाओ सखेजगुणाओ,जोतिसिय देवपुरिसा सखेजगुणा,जोति- सिय देवित्थीओ सखेजगुणामोाएतेसिण भते! तिरिक्खजोणित्थिर्ण जलयरीण थलयरीण खइयरीण तिरिक्खजोणिय पुरिसाण जलयराण थलयराण सहयराण तिरिक्खजोणिय णपुसकाण एगिदिय तिरिक्सजोणिय णपुसकाण जाव षणस्सइकाइया एगिदिय तिरिक्त जोणियणपुसकाणं वेइदियतिरिक्ख नोणियणपुसकाण तेइदिय तिरिक्वजोणियणपुसकाण चउरिविय तिरिक्खजोणिय णपुसकाण, पदिय पुसकाण, जलयराण थलयरण मकायक-रामाबहादर मला मुलदेवमहायमी बाबासादमा एरणपय क्षेत्र के मनुष्प खोर्यो मौर मनुष्य पुरुषों परस्पर सुस्प है और वास क्षेत्र से सख्यातगुने भषिक , ५ मरत परवत सत्र के मनुष्य के पुरुषों परस्पर तुल भोर व्य क्षेम से सख्यावगुने मषिक , ६ परत एरवत क्षेत्र के मनुष्य की सोयों परस्पर तुस्यो भौर पुरुषों से समातगुनी मषिक है, . पूर्व विदेश पश्चिम विदेश के पुरुषों परस्पर तुल्य भौर भरत एरपत से संरूपातगुने मपिक है, ८ पूर्व विदेह पश्चिम विदेश कर मनुष्प नीयों परस्सर तुल्प है और पुरुषों से संस्थातगुनी भषिको, ९ उन से मनुचर पिपान के देवता सरूपावगुने, १. सन से ऊपर की विक देवता (सस्पतिगुने, ११ रन से मध्य की विक देववा संरूपातगुने, १२ जून से नीचे की सिके देवता MP पतुर्दश-जीपाभिगम मूम-तृतीय उपास 18+ खेड्यराण मणस्सिस्यीण कम्मभामियाणं अकम्मभूमियाण अतरवीधयाण मणुस्स पुरिसार्म कम्मभूमकाणं अकम्मभूमकाण अतरवीवकाण मणुस्म णपुसकाण, कम्मभूमिकाण अकम्मभूमि काणे अतरदीयकाण, देविस्थीण भववासिणीण पाण- मतरीणं जोतिसीण वेमाणिणीणं, घेवपुरिसाण मवणवासीण वाणमतराण जोतिसि- याण वैमाणियाण, सोधम्मकीण जीव गेविजकाणं, अणुत्तरोषवाइयाण, नरइय पुप्तकाण रयणप्पमा पुढवि नेरदय णपुसकाण जाव अहेसचमा पुढवि नेरइय गपुसकाण कयरे २ हितो अप्पावा जाव विसेसाहियावा ? गोयमा ! अतरदीवक अकम्मभूमिक मणुस्सिस्यीओ मणुसपुरिस्सय एतेण देििवतुल्ला संख्यातगुरे, १३ उन सं पारवे देवलोक के नेता सख्यातर्मुने, १४ चन से इग्यारावे देवलोक के देवता संख्यानगुने, १५ टन से दशवे देवलोक के देवता रूपावणुने, १६ उन से नवरे देवलोक के देवता सस्यातगुने, १७ उन से सावषी नरक के नरीवे असरूपातगुने, १८ उन से छठी नरक क नेरीये असं- रूयातगुने, १९ टन से माठो देवलोक देवता नसरूपातगुने, २० उन से सात देवलोक के देवता मसरुयातगुने, २१ जन से पाचवी नरक के नरीवे मसरूयातगुने, २२ उन से छठी देषसोक के देवता मरस्य समुने, २१ पन से चेपी नरक के नेरीये असरूपाने । न से पांचो देवलोक के देवता दूमरी मसिप'च Aust माता-पायमचारी मुनि भी भाषिनी भवश्वास देवित्यियामो संखेबगुणाओ, इमोसे रयणप्पमाए पुढवीए नेरदय पसका असलेवगुणा, सहयर तिरक्स जोषिय पुरिसा असखेबगुणा, खयर तिरिक्खजोगिरिययाओ सनेजगुणाओ, थलयर तिरिक्खजोणिय पुरिसा सखेजगुणा, यळयर तिरिक्खजोमिरिथयाओ संखेजगुमामो जलयर तिरिक्खजोणिय पुरिसा संखेमगुणा, जलपर तिरिक्खजोणित्थियाओं सखेजगुणाओ, वार्णमतर देवपुरिसा सस्नेबगुणा,वाणमंतर देविस्थियाओ सखेवगुणाओ,जोइसिय देवपुरिसा संखजगुणा जोर- सिय देवित्थियाओ सखेजगुणामओ खहपर पदिय तिरिक्खजोगियणपुसका सखेजगुणा प्रकाशक रामासादर छाला एलायसहायनी बाबासारको ४४ रन से स्वसपर पुरुष सरूपातगुने, ४५ च से स्पलचरनी सख्यातगुनी, ४६ रन से उबर पुरुष मसरूपावगुना, ५७ स से मछचरनी सम्पातगुनी,४८ उस से पाणव्यतरदेव सल्यावगुना, ४९ रन से बागपतर की देवी सरूपातगुनी,५० एन से पोतिषी देव संख्यावगुने, ५१ रन से ज्यातिषी की देसी मरूपानुनी, ५२ पन से खेपर तिर्यप नपुंसक रूपासगुना, ५३ रन से स्पसबर तिर नपुंसक समासमुना, ५४ पम से प्रसपर नपुमक सस्पातगुना, ५५ पन से रिदिप विषम, ५६ गोरोपना चिकि, ५५म से मिप विशेषाधिका समरमा मसक्यावयुमा, चतुर्वमन्त्रीवाभिगम मूम-मृतीय पान थलयर गपुसका सखेबगुणा जलयर गपुंसका संखेनर्गुणा, उरिदिय गपुंसका विसेमाहिया, सेइदिय णपुंसका विसेसहिया, बेइदिया गपुसगा विसेसाहिया, तउकाइय एगिदिय तिरिक्खजोगिय गपुसका मसखेनगुणा, पुढविकाइया गपुसगा विसेसाहिय, आउकाइया अपुमगा विसेसहिया, वाउकाझ्या गपुसका विसेसाहिया, वणस्सइकाइया एगिदिए तिरिक्वजाणिय पपुसका अनंतगुणा ॥ ४० ॥ इत्याण मते । केवतिय काल ठिई पण्णता ? गोयमा ! एगेणं आदेसेणं जहा पुचि भाणिय, एव पुरिसस्सवि गपुसकस्सवि सचिट्ठणा पुणरवि तिण्हपि जहा पुचि भणिया अतर तिण्हपि जहा पुर्दिन भणिय, तिरिक्सजोणित्थियाओ तिरिक्वजोणिय पुरिसेहितो तिगुणामो तिरुवाहियामओ, मणुस्सित्थियाओ मणुस्सपुरिसीहतो सत्तावीसइगुणाओ ५१ उप्स मे पृणीकाया निपावित, ६० उस से अपाया विशेषारिक, ११ उस मे पाउाया विशेषा. पिक, ५२ प स नातिकाया एकेन्द्रिय तिर्यंच योनिक नपुंसक असगु॥ ॥ ४० ॥ भो भगान् ! व वेद की कितने काल की स्थिति है । महो गौतम ! नि महार पहिये एमाले प्रदेश कही (नेस | पहा मी से पुरुष नपुंसक की अलग २ स्थिति का देना तेच ही प्रतर मी कहदेना ॥४॥ 44. दूसरी मति पाच - ममाणक शाफ्जा त तावीसहरूवाहियाओ देविस्थियामा देवपुरिसंहितो घसीसगुणाओ पतीसहरूवापियामो तिविहस होइ मेदो ठिई सचिट्ठणतरपाबाहु वेयाण यधविई देतहकिंपगारय । सेच तिविहा मसार समावण्णगा जीवा पण्णचा।।इति जीवाभिगम वितिओ पडिवचीओ सम्मना वियुचो तिथंच से तिगुनी, मनुष्यणी मनुष्य से सत्ताइसगुनी, और देवांगना देवता से बत्तीमगुनी जानना पर । वेद क मेद, २ स्थिति, ३ संविष्टन, ४ भवर, ५ मरपात, ६ पन्ध स्थिति, ७ और विषय पर सात द्वार कर घेद नापक नीवामिगम पास की दूसरी प्रविपचि सपूर्ण हुई ॥२॥ महाशक-ग्रजापभदुर ठाण सुसदेसापनीबासमारली --- -- L 4 चतुर्दश मीमाभिगम मूत्र-नृतीय उपा ॥ तृतिया पडित्ति ॥ तत्थ जे ते एव माइसु चउविधा ससार समावण्णगा जीवा पण्णता, ते एव माहसु तजहा-नेरतिया, तिरिक्खजोणिया, मणुस्सा, देवा ॥१॥ से किंत नेरइया ? नरइया सचविधा पण्णत्ता तजहा-पढम पुढवि नेरइया, दोचा पुढवि नेरइया, तथा पुढवि नेरइया, चउत्था पुढवि नेरइया, पचमा पुढवि नेरइया, छट्ठा पुढवि नेरइया, सत्तमा पुढवि नेरइया ॥ २ ॥ पढमेण भते । पुढवी किं नामा किं गोता अब तीसरी प्रतिमत्ति करते हैं नो ऐमा काते हैं कि चार प्रकार के ससारी नीवों हैं ऐसा कहते हैं कि नारकी, तिर्यंच, मनुष्य व देवता ये चार प्रकार के जीवों हैं ॥ ॥ प्रश्न-नारकी किसे करते ? उत्तर-नारकी के सात भेद कहे हैं जिन के नाम प्रथम पृथ्वी के नारकी, दूपरी पृथ्वी के नारकी, तीसरी पृथ्वी के नारकी,चौथी पृथ्वी के नारकी, पांचषी पृथ्वी के नारकी,छठो, पृथ्वी नारको घ सातत्री पृथ्वी के नारकी ॥२॥ प्रश्न- अहो मगवन् ' प्रथम पृथ्वी का क्या नाम व क्या गोत्र है ? उत्तर-महो गौतम ! प्रथम पृथ्वी का नाम पम्मा और गोत्र रत्नममा है + प्रश्न-पो भवगन् + मो अनादि कार से अर्थ रहित प्रसिदिमें आये है उसे नाम कहनाः और अर्थ सहित होवे सो गोत्र हे 4 तीसरी प्रतिपत्ति + + प मचा ? गोयमा ! घमा नामेण रमणप्पभा गोत्रेणीविरोधाण भैसे | पुढवी किं नाम किं गोचा ? गोयमा ! वमा नामेण सकरप्पभा गोचेण ॥ एव एतेण अभिलावेण सवासि पुष्छा नामाणि इमाणि सेला तच्चा, मजणा चउरथा, रिट्ठा पेचमा, मघा छट्ठा, माघवती सत्तमा, तमतमा गोषेण पण्णा॥३॥इमाण रयप्पमा पुढवी केवतिया पाहल्लेण पण्गचा ? गोयमा ! इमाण रयणप्पमा पुढधी असीउच्चर जोयण सयसहस्स मनुवाद यात्रामवारी मुनि श्री बमोठरू पिनी •पका-रामादुर माया ससदेवसालयत्री पाम पसार दूसरी पृथ्वी का क्या नाम प या गोचर-प्रो गौतम । दूमरी पृथ्वी का पशा नाम व शार पमा गोप्रो यो इस अभि गप से सब का माना वीमरी पृथ्वी का सेला नाम प बालु प्रभा गोत्र है चौथी का अजना नाम प १०ममा गोत्र, पापी पृथ्वी का रिशा नाम व घूमममा गोप्रो छठी पृणी का पघा नाम व सम ममा गोप्रो और सानत्री पृथ्वी का माधवी नाम प समसपा प्रमा गोली ॥३॥ प्रश्न-प्रो मगरन् ! इस रनमा पृथ्वी का पिम सिवनी मालाइ में रचर-महो गौतम । एक मास अस्सी (मार योजन का नागों ऐसे प्रभाचर मागे भी मानना अर्थात् शर्कर प्रमा पृथ्वी का एक लाख पचीस भार योमन का मारपना, पालाप्रमा का एक सास मठाइस हमार पोमन का पाममा एक मासपीस इचारोमन समारपनर है, या कारसमसारमा पना है, पाहल्लगे पण्णता ॥ एव एतेणं अभिलावणं इमा गाया-अणुगतन्या आसीत पचीस भट्ठावीसं-सहेव वीसच अट्ठारस सोलसग अहुत्तरमेव हेट्ठिमया ॥४॥ इमाण मतं ! रयणप्ममा पुढधी कतिविहा पण्णत्ता? गोयमा! तिविधा पण्णवातंजहा-खरकडे,पकब- हुले कडे, भाव बहुलेकडे ॥५॥ इमीसेम भतेरयणप्पभाए पुढवीए खरकडे कतिविधे पण्णसे ? गोयमा । सोलसविधे पण्णचे तजहा-रयण, वइरे,वे लिए लोहितक्खे, मसारगल्ले इसगमे पुलाए, सोइधिए, जोतिस्से, मजणे, अजणपुलये, रयते, जात पतुईश-जीवभिगम मूष-मृवीय उपान १ H++सरी मनिपचि पोमन का बादपना है,तमामपाका एक लाख सोहलामार योजन का जापना है और सातवी तमस्तमासमा का एक लाख माठ मार पोजन का पृर है ॥ ४ ॥ प्रश्न-पो भगवन् ! रस्तममा पृथ्वी क किनने मेर को है ! उपर-यो गौतम ! रत्नप्रमा पृथ्वी के तीन भेद कहे हैं स्वरकाण्ड, अर्थात् कठिन काण्ड यामो अपनराते है सो बरणा सुदर पृथ्वी का भूमि भागहै यही खरकाण्ड, तरपश्चान् दसरा पा बहुलक पद अर्थ त् इम में कीचा व कचरा पडत होता है और तीमरा असल्या काण्ड अर्थत् इम में पानी की बहुलता विश्वपती ॥ ५ ॥ प्रश्न-पो भगवन् ! इस रत्नममा पृथ्वी के खरकाण्ड के कितने मेद का ? पस... दो गौनप ! इस के सोला भेद को सयपा-१ रत्न कापडत + अनुवादक-मानमवारी मुनि श्री बपोरस पिजी पष्मता ? गोयमा ! धंमा नामेण रनणप्पमा गोणीदोधाण मते ! पुढची किं नाम किं गोचा ? गोयमा ! वमा नामेण सकरप्पमा गोतेण ॥ एव एतेण अभिलारेण सन्यासि पुच्छा नामाणि इमाणि सेला तचा, अजमा चउत्था, रिट्ठा पैचमा, मघा छट्ठा, माघवती सत्समा, तमतमा गोरोण पण्मचा॥३॥इमाण रयप्पमा पुढवी केवतिया पाहल्लेण पगचा ? गोयमा ! इमाण रयणप्पमा पुढधी असीउत्तरं जोयण सयसहरस दूमरी पृथ्वी का पया नाम प पपा गा! उचर-गो गौतम ! दूमरी पृथ्वी का पशा नाम पर प्रभा गोषो यो इस अमिअप से सब का काना वीसरी पृथ्वी का सेला नाम प बाल प्रभा गोत्रो चौथी का भभना नाम प १०ममा गोत्र, पापी पृथ्वी का रिशा नाम च धूमममा गोत्र राठी पृणी का पपा नाम प तप प्रमा गोत्र है और सानत्री पृथ्वी का माघपती नाम प मस्सम प्रमा गोप्रो ॥३॥ प्रश्न-भो मगन् ! इस रस्लममा पृथी का पिण कितनी माडाइ में है ! पचर-प्रो गौतम । एक मात्र मस्सी हमार योमन का मारा ऐसे प्रभाचर मागे मी मानना अपात् शर्कर ममा पृथ्वी का एक साख वीस भार योमन का मारपना, पालकममा का एहसास मठाइस हमार मन को भार पना है, पाममा का एक नाम बीमबार गोवन का बारा, प्रममा समसमगरह मार • मकाराम-रामायादुराका ससदेवसानपणीपाडा प्रसादया.

पाहल्लगे पण्णचा ॥ एव एतेणं अभिलावेर्ण इमा गाया-अणुगतन्वा आसीत पचीस अट्ठावीस-सहेव वीसच अट्ठारस सोलसग अहुत्तरमेव हेट्ठिमया ॥१॥ इमाण झते ! रयणप्पमा पुढधी कतिविहा पण्णता? गोयमा! तिविधा पण्ण नातंजहा-खरकडे,पकब. हुले कडे, आव बहुलेकडे ॥५॥ इमीसेण भते रयणप्पमाए पुढवीए स्वरकडे कतिविधे पण्णते ? गोयमा ! सोलसबिधे पण्णचे तजहा-रयण, वइरे,वे लिए लोहितक्खे, मसारगल्ले इसगम्भे पुलाए, सोइधिए, जोतिरसे, मजणे, मजणपुलये, रयते, जात - पतुईश्व-जीवामिगम मुष तृवीय उपार 418+ 42++सरी प्रमिप चि.84 योमन का बादपना है,उमाप्रपाका एकमात्र सोहनानार योजन का जादपना है मौर सातवी तमतमाममा का एक लाख माठ मार पोजन का भी है ॥ ॥ प्रभ-प्रो मगवन् ! रत्नपमा पृथ्वी कनिने भेर को उत्तर-पो गौवम ! रत्नममा पृथ्वी के तीन भेद को है स्वरक ण्ड, अर्थात् कठिन काण्ड गानो अपनरास सो अच्छा मुंदर पृथ्वी का भूमि माग है यही स्वरकाण्ड, तरपश्चात् दुमरापक बहुल के पद मर्यत् इम में कीचा व कचरा पहुन होता है और तीमरा अपाहुण्य काण अर्थत् इम में पानी को 14 पहुसता विपी ॥ ५ ॥ प्रश्न-मो भगवन् ! इस रत्नममा पृथ्वी के खरकाण्ड के कितने मेहको ? •मो गौतम इस के सोलर मेद को धपा-१ रत्न काण्ड हैं स्वे, अके फरिहे, रिटेकडे ॥ ६ ॥ इमीसेण मते ! रयणप्पभाए पुढवीए रयणकहे कतिविहे पण्णते ? गोयमा ! एगागारे पण्णचे, एव जाय रितु ॥ ७ ॥ इमासेण भते ! रयणप्पमाए पुढवीए पकवहुले कडे कतिविहे पण्णचे ? गोयमा । एगागारे पण्णचे । आव. बहुले कडे कतिविहे पण्णचे ? गोयमा ! एकागारे पण्णचे ॥ ८ ॥ सकरप्पभाएण भते ! पुढवी कतिविहा पण्णता ? गोयमा ! एगागारे पण्णचा, एवं +मनुभदक-प्रसनवी मुनि श्री अमोसा ऋषिमा बाद, दूर्प फाण, ४ लोरितारूप काण्ड, ५ मसारगल काण, ६ ईसगर्भ काण्ड, ७ पुलाक काण्ड, सौगपिकाम, ९ ज्योतिरस्न कार, १० अंगन कार, " अंजन पुलाक काम, १२ रजत कार, १ मातरूप फाण्ट, १४ कार और १६ रिष्ट कार या सोसा भेद खर काण्ड के हुए ॥ ६ ॥ प्रभ-मो भगवन् ! रत्नममा पृथ्वी में पीला रत्न काण्ड कितने प्रकार का ? उत्तर-मो गौतम ! रत्न काण का एकही बासार कारारिष्ट काण्ड पर्यंत सब का मानना ॥७॥ प्रभ-भो मग- वन् ! इस रस्नमपा पृष्नी के पास काण्ड के किसने मेद को ? पत्तर-मो-गौतम ! या एसी प्रकार का प्रभ-महो मगवन् ! गप्पल काड के कितने भेद को रत्तर-भो मौनमः! रस का भी एकही मेद का॥८॥ प्रश्न-मो भगवन' शर्कर प्रमा पनी के कितने समावरादुर छाला मुखदेवसायीवासाप्रसादा 1 चतुर्दश-जीमापिगम मूत्र तृतीय उपा जाव अहेसत्तमा ॥ ९ ॥ इमीसेण मते ! रयणप्पमाए पुढवीए केवतिया निरयावास सतसहस्सा पण्णता ? गोयमा ! तीसं निरयावास सतसहस्पा पण्णचा, एष एतेण अमिलावणं सवासिं पुम्छा ? ॥ इमा गाहा अणुगनव्या-तीसाय पण्णवीसा पण्ण- रस दसेव तिण्णिय हवति पचूण सतसहस्सं पचेय अणुत्तराणरगा जाव अहेसत्तमाए पच अणुचरा महति महालया महाणरगा पण्णचा तजहा-काले महाकाले रोरुए महारोरुए अपतिट्ठाणे ॥ १० ॥ अत्यिण भते ! इमीसे ग्यणप्पभाए पुढवीए अह मेद को है ? उत्तर-मो गौतम ! भर्कर प्रभा पृथ्वी एक प्रकार की यो नीचे की सातवी पृथ्वी सक मानना ॥ ९ ॥ प्रश्न-मो मगवन् ! इस रत्नममा पृथ्वी में कितने नरकावास कहे हैं ? उचर- अहो गौतम ! इस रत्नममा पृथ्वी में तीस लाख नरकावास को यों पर प्रभा में पचीस लाख, घालुकममा में पनर छाल, पा प्रमा में दश लाख, धूम्रममा में तीन लाख, वम प्रभा में एक लाख, मरकावास में पांच कम और तपस्समाप्रमा में पांच नरकापास में ये अनुत्तर, महालय व महा नरकापास है इन के नाम-काल, महा काल, रोरप, महा रोग्य और अप्रतिष्ठान ॥ १० ॥ प्रत्येक पृथ्वी नीचे घोदाघे आदि का सद्भाव है या नहीं इस का प्रश्न करते हैं प्रश्न बो भगवन् ! इस रत्नमा पृथ्वी नीचे पिण्डपुत पानी का समूह रूप घनादाघि, पिण्डमून वायु का समूा रूप धनवान, विरल परिणाम को 442वीमरी प्रति-पचि 41 +नुगदक बमबारीमुनि श्री पोळा पिनी धमोदधितिया घणवाततिका सणुवातेतिवा, उपासतरेतिया ? हता अस्थि, एव जाव अहे सप्तमा ॥ ११॥ इमासेणं मते रयणप्पमाए पुढवीए खरकडे केवतिय बाइलेण पण्णते ? गोयमा ! सोलस जोयणसहस्साई बाहल्लेण पण्णचे ? इमीसेणे मते । रयप्पमाए पुढवीए रयणकडे केवतिय वाहलेण पण्णचे ? गोयमा ! एकजोयण सहरस घाइलेण पण्णचे ? एव जाव रिटे॥ इमीसेण मते ! रयप्पमाए पुढबीए पकबहुले कडे केवतिय याहलेण पण्णत ? गोयमा ! पठरासीति आयण सहस्साइ बाहोण पण्णत्ते ॥ इमीसेण मत। रपण- माप यु के समूर इस नुगाव मौर शुद्ध मागाव का भकाशावर है क्या ? वचरा गौतम ! ऐसी यो सातनी पृषी व जानना ॥१॥ प्रम-~ो भगवन् ! रस्नममा पृषी संधी जो स्वरकाण्ड । उस का जापना रिवना है? उचर-भोगौतम । इस का जापना पोषन का है प्रभ-मो मगवन् ! इस रस्नप्रमा पृथ्वी का रत्नकार कितना नादा है। उत्तर-महो गौतम । एक हजार पोभन का नारपना है यों रिष्ट पर काना प्रश्न-भो मगरम् ! रस्नममा पृषी का पंक पास काम की कितनी बाग है! चर-मो नौतम ! इस का चौरासो मार यमन का मारराना है पम-मो मनान,! मारा काम की सराह कितनी है ! चर- प्रकाशानामारपदुर गा मुसदय मायनी बालासा. सोलह हजार • चतुर्दश-नीमाभिगम सूम तृताय उपाय - पमाए पुढवीए अग्यबहुले कंडे केवतिय बाहल्लेणं पण्णचे १ गोयमा ! असीति जोपण सहस्साइ बाहल्लेण पण्णचे ॥ इमीसेण मते ! रयणप्पभाए पुढवीए घणो- दधि कवतिय बाहल्लेण पामो ? गोयमा ! वीस जोयण सहस्साइ बाहलेण पण्णचे ? इमीसेण भते । रयणप्पभाए पुढपीए घणवात केवइय बाहलण पण्णवे ? गोयमा । असखेजाइ जोयणसहस्सा बाहल्लेणं पण्णचाइ, एव तणुपातेति उवासनरेवि ॥१२॥ सकरप्पभाएण मते ! पुढवीए धणोदधि केवतिय बाहलेणं पण्णवे ? गोयमा ! बीस जोयणसहस्साइ बाहल्लेण पण्णचाइ ॥ सकरप्पमाए पुढवीए, घगवाते केवइए पण्णते? श्रो गौतम ! अस्सी हजार योजन का माहपना प्रश्न-हो भगवन् ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी का घनदापि कितना मारा है। सचर-महो गौतम! बीम इनार यो नन का घनोदधि जादा प्रश्न- भटो भगवन् । इस रत्नममा पृथ्वी का घनपात कितना मादा है। उत्तर-महो गौतम । असख्यात जर योनन का नाडा है, ऐसे ही मनुवात घ माकाशावर का मानना ॥ १२॥ प्रश्न-अहो मगन् ! ती प्रमः पृमी का घनोदधि कितना मारा है। उत्तर-अहो गौनम ! वीम इनार योजन का नह. है पन-मा मगान् ! शर्कर प्रपा पृथ्वी का परवान कितना जाहा करा ? रत्ना-अहो गौतम तीसरी प्रतिपचि में नरक का पहिला उदशा 18- +मनुवादक- सम्रमवारीमुनी ओ ममोलसपिमी - गोयमा ! असखेज इ जोयणसहरसाइ बाहलेण पण्णचाइ, एष तणुएवि उवास- तरेवि जहा सकरप्पभाए पुढर्व ए, एष जाय अहेसत्तमा ॥ १३ ॥ इमीसेण मते ! स्यमापमाए पुढवीए असीउत्तर जोयम सतसहस्स बाइलाए खेतछिचेण छिज्जमाणाए मस्थि पन्चाइ वण्णमओ काल नील लोहित हालिद्द सुकिलाइ, गधतो-सुभिगधाइ दुमिगधाद, रसतो-तित कडुय कसाय अबिल महुराइ, फासओ-कक्खड मउय गरुय लहुय सीत उसण मिड लुक्खाइ, सठाणतो परिमडल वह तम चउरस माययसठाण परिणयाइ, अण्णमण्णबद्धाइ अण्णमण्णपुट्ठाइ अण्णमण्णउगाढाइ असल्यास हजार योमन का है, ऐसे ही तनुवास व भामाशीतर का मानना और एसेही मातवी वमस्वमापृषी पर्यंत काना ॥ १३ ॥ मनमो मगमन् ! इस रस्नममा पृथ्वी का प्रिंट एक साल मस्मीनार योमन का उस के विमान करते हुये उन क द्रव्य क्या वर्ष से काले, नीले, लाल, पीछे व शुक्ल है, गंध से पुरभिगधनासे व दुरभिगमवाय, रस से तिक्त, कटुस, कपाय, अम्बिसव मधुर, स्पर्श से कम, मृदु, गुरु, लघु शीत, ऊष्ण, लिम्वपक्ष स्पर्शवाले हैं, संस्थान से और परिपरल, बर्तु, ध्यस, चौरेसर समगाछो ! भोर क्या ये परस्पर पंपे थे, परस्पर सर्वे एणे, परस्पर मवगारे से, परस्पर मेह से भये - प्रकाशक-रामाबहादुरगळा पुसदेवसमयभीमामासारणी .

+ चतुर्दश-श्रीवामिगम सूप तृतीय पान १ अण्णमण्णासिणेह पहिबदाइ अण्णमण्णघहत्ताए चिट्ठति । इता अस्थि ॥ इमीसेण भते ! रयणप्पमाए पुढवीए खरस्स कहस्स सोलस जोयणसहरस बाहल्लस्स खेत छिएण छिब तचेव जाव 'हता अस्थि एव जाब ग्गुिस्स ॥ इमीसेण भते । रयणप्प. माए पुढबीए पकबहुलस्स कडरत चउरासिति जोयणसहस्स बाइलस्त खेच तथेव ॥ एव आउबहुलस्तवि असीति जोषणसहस्स बाहलरस ॥ इमीसेण भते । रयणप्पमाए पुढवीए घणोदाहस्त वीस जोयणस्ससहस्स पाहल्लस्स खेतछेदे त व एक घणघातस्त असखज जोयणसहस्स बाहल्लस्स खत्त तचेव ॥ सक्करप्पभाए ण भते । पुढवीए बत्तीसुत्तर जोयणसतसहस्स वाहल्लए खेसछेदेण छिजमाणाए हुवे ष परस्पर संघ करके क्या रे हुये? उचर- गौसम ! वैसे ही हैं ऐसे ही खर काण सोनार योमन का है उस का प्रश्न करना और उस के द्रव्य मी पैसे ही यावत् परस्पर पधे हुए हैं ऐसेनी रिष्ट काण्ड पर्यंत काना इमी सरह रत्नमभा पृथ्वीका चौरासी हमार यमनका पक बहुल काण्ड का मानना मौर अस्सी हजार योजन का अप्सहुल क ण्ड का मी जानना रत्नप्रमा पृथ्वी का पीस इनार योजन का घनोदपि असख्यात इमार योजन का घनवाद तनुतात व माकाशतिर जानना प्रश्न-प्रदो भगवन् ! शहर प्रमा पृथ्वी का एक लाख बत्तीस हजार यमन का पृष्पी पिण्ड है उस क तोसरी-प्रविपत्ति में नरक का पहिला दशा ++ वभूमनुमापन-सळपमचारी मुनि श्री भमोलमपिजी - अस्थि दवाइ वण्मतो जाव घडताए चिट्ठति ' इता अस्थि एव वादहिस्स, बीसजोयणसहस्स पाहलस्स, घणवातस्स असखज जोयणसहस्स वाहवरम, एव उवासंतरस्स जहा सकरप्पभाए एवं जाय अहे सत्तमाए ॥ १४ ॥ इमाण मते । रयणप्पमापुढवी किं सठिता पण्णता ? गोयमा ! शरि सठिया पण्णचाइमीसेण भतारयणप्पभा पुढवि स्वरकह कि सठिते पण्णतागोयमा ! झल्लरिसठिते पण्णसे । इमीसेण भने ! रयणप्पभाए पुढवीए रयणकडे किं सठिते पण्णचे ? गोयमा ! झल्लरिसठिते पण्णच, एव जाव रिट्ठ, एव पकबहुले विमाग करते हुवे उन के द्रव्य पर्ण से काले, नीले, पीले, लाल व सफर यावत् परस्पर संबंध करके पा रो दुवे ? उत्तर- गौतम ! मेरो । ऐसे ही शर्कर ममा पृथ्वी के बोस जार योजन का घनोदधि, असंख्यात हजर पोमन का घनवात, दनुवास व भाकाशतिर का जानना और ऐसे ही सावषी नमस्तमा पृथ्वी पर्यंत काना ॥ १४ ॥ प्रभ-अहो मगवन् ! इम रनममा पृषी का सस्यान कैसा है। उत्तर-प्रो गौतम! इपका मस्याम मालर के आकार है अर्थ विस्तीर्ण वलयाकार ? प्रश्न-प्रो मगन ! इस रस्नममा पृथ्वी का खर काण का संस्थान कौनसा है ? उत्तर-मागे गौतम ! मालर का मस्पान । पन्ना मगवन् ! इस रत्नममा पृथी का संस्थान सा है ? • काशक राजामगदुर नाला मुलदेवमापभी ज्वापाप्रसाद in चतुदक्ष जीव भिगम मूध तृतीय उपाय - आठबहुलेवि घणोदधिवि घणवाएवि उवासतरेवि, सो झलरिमठिया पशचा, सघारप्पमारण मते ! पुढवी किं सठिया पण्णता ? गोथमा ! झलरिसठिया पण्णचा ॥ सकरप्पमाएण भने ! पुढयी घगोदधि किं सठिये पण्णचे ? गोयमा ! झल्लरिसठिये पण्णचे एव जाव उवासतरे जहा सक्करप्पभाए वतन्त्रता, एव नाव अहे सत्तमाएवि ॥ १५ ॥ इमीसेण भते ! रयणप्पभाए पुढवीए पुरथिमिमाओ चरिमताओ केवतिय अबाधाए लोयते पण्णचे ? गोयमा । दुवालसहि जोयणेहि उसर-भो गौतम ! मालर का है, एने ही रिच पर्यंत सोला प्रकार के रत्नों का, पक पाल, भप- बहुल काण्ड का, यादधि पात, तनु त प बाकाशातर मष का झलर का सस्थान जानना प्रश्न- मोमान् ! शममा पृथ्वी का क्या संस्थान का उत्तर-प्रो गौतम ! हर का सस्थान का एसे हा शरममा पृथी के घोदधि यावत् आकाशातर पर्यंत कहना असे भरममा की वक्ता की नेसावी तपस्तमःममा पर्य। सरका काना ॥ १५ ॥ पन्न-मो भगान् इस रसमा पृ.गी क दिशा के अन स किवना र लोहा मन(43)हा है? उत्तानो गोतमा दयोन । न च राहा है ऐसे हग, पश्च। उवर दिशा । अठा दूर तीसरी प्रतिपत्ति में नरक का पहिला उद्देशा 48 4 मनुवादक-गामामधारी मान श्री भगोमक श्रापना 12 अगाव लोयते पण्णचे एव दाहिणिल्लातो पुरथिमिलातो, उत्तरिल्लाओ सकर'पभाएण भते ! पुढवीए पुरथिमिल्लातो चरिमतातो केवतिय अयाघाए लोयते पणते ? | गोयमा ! तिमागू गेहिं तेरसहि जोयमेहि अबाधाए लोयते पण्णचे, एर चतुदिसि। वालुयप्पमाएण मते ! पुढवीए पुरत्पमिलाआ पुछा ? गोयमा ! सति भागेहिं तेरसेहिं अबाधाए लायते पण्णत्त, एव चउदिसिपि एव सम्वासिं चउसुविदिसासु पुछियत्न, पप्पमाए चोइसाई जोयणहिं अबाधाए लोयते पण्णचे, धूमप्पभाए तिभागूणेहि पण्णरसहि जोयहिं अबाधाए लोयते पण्णते, छट्ठी सतिभागेहिं पण्णरसहिं मानना पभ-महो मगरन् ! शर्करप्रमा पृथ्वी के पूर्व दिशा के चरिमांस से कितने दूर लोकांत का? उघर-यो गौतम ! एक याजन सीन माग करे वैसा एक भाग कम तेरा योजन लाकात का ऐसे ही चारों दिशा का मानना प्रश्न-मो भगपन् ! वालु प्रमा की पूर्व दिशा से मोडीत कितना दूर का? उत्तर-प्रो गौतम ! तेरा योजन व एक येजन का तीसरा भाग इवना दूर लोका रहा दुसरे पेमे स पालुपमा नारकी की शेष सीनों दिशा का मानना पकममा की चारों दिशाओं से चौदा योजन पर लोकांत रहा हुवा है, धूम्रप्रमा की पारों दिशाबों में पारा यामन में एक योमन का तीसरा माग कम का सोकात रहा हुआ है, मामा की परों दिशामों से महायक पनाया काळा सम्पदेवसापनी मालाममारनी चतुदश नीवामिगम मूत्र-तृतीय उपा:- जोय गेहि अबाधार लायते पण्णत्ते सत्तमाए सोलसएहिं जोयणेहि अवाधाए लोयते पण्णते एव ज न उत्तारल्लातो।। १६॥ इमीण भते। रयणप्पमाए पुढवीए पुरथिमिले चरिमते कतिविहे पणते ? गायमा । तिविहे पपगत्ते तजहा-घणोदधिवलये, घणवायरल्ये, तणुवाय बलये, ॥ इमीसेण मते ! रयणप्पमाए पुढवीए दाहिणिल्ले चरिमते कतिविधे पगत्ते ? गोयमा ! तिविहे पण्णचे तजहा-एव चेव जाव उत्तरिल्ले एव सब्बासि जाव अहेसत्तमाए उत्तरिल ॥ १७ ॥ इमीसण भते ! रयणप्पभाए पुढवीए घणोद- धिवलए कवतिय ब हल्लेण पण्णत्ते ? गोयमा | छज्जोयणाणि बाहल्लेण पण्णचे ॥ पनरा योमन व एक योज। का तीसरा माग छोकांत सा हुवा है और सासषी तमस्तम.ममा से पोलह योजन पर लोकांव रहा दुपा है ॥ १६ ॥ प्रश्न-हो भगवन् ! इस रत्नप्रमा पृथ्वी की पूर्व धरना के परमात के किसने मेद को हैं ? उत्तर-अहो गौतम! इस के तीन भेद कहे हैं घनोदधि पलय, धनधात बलय, व तनुवात वलय प्रश्न-अहो मगवन् ! रस्नममा पृथ्वी की दक्षिण दिशा के परिमांत के कितने मेद कहेउचर पो गौतम ! सीन भेद कहे रे घनोदधि, धनपात ष सुनुवात ऐसे हा सय पृथ्वी को चारों दिशाओं में तीन २ पलय रहे हुचे ई यो सातवी पृथ्वी का मानना |॥ ७॥ मन- हो मगमन् ! इस रलप्रमा पृथ्वी के यसोदधि वश्य की प्राहाइ किसनी की है। उत्तरः- 41 तीमरी प्रतिपचि में नरक का पहिला उद्देशा ++ पर मनुवादक-भारमभचारी मुनि श्री ममोडक अतिमी - सकरप्पमारण मते ! पुढवीए घोधिलए केवतिप याहल्लेण पणते ? गोयमा ! सतिभागाइ छबोयणाइ याहलेण पण्णत्वे ॥ बालूयप्यमाए पुन्छ। ? गोयमा ! तिभागूपाइ सत्तजोयणाइ बाहण पण्णचे, एव एतेण अभिलावेण पकप्पभाए सत्सजोषणाइ पाहल्लेण, धूपप्पभाए सतिभागाइ, सत्तजोयणाइ पण्णते, तमप्पभाए तिभागूणाइ अट्ठजोयणाइ बाहल्लेण पाणचे, महेसत्तमाए अट्ठजोयणाइ वाहल्लेण पण्णत्ते, ॥ १८ ॥ इमीसेण मत ! रयणप्पमाए पुढपीए घणवातवलए कवतिय घाहल्लेण पण्णत्ते ? गोयमा ! अद्धपचमाइ जोयणाइ पाहल्लेण पण्णत्ताइ ॥ सकर- भाो गौतम ! छ योजन की मादाइ की प्रभ-मो भगवन् ! शरप्रमा पृथ्वी के धनोघि वलय की कितनी नादाइ की? उत्तर-भागे गौतम ! छ योजन प एक योनन का तीसरा माग की नादाइ की है पालुप्रमा की पृय ? म त पोमन में मीसरा माग कम की नागा ममाकी सान योजनकी है धूम्रप्रभा की साव याजन प वीसरा माग मधिक की, तमःप्रमा की तीसरा माग कम पाठ योजन की तपस्सम प्रभा की घनोदधि की माठ यानन की माराइ प्रभ-प्रो मगपन् इस रत्नममा पृथ्वी के घनबाट पलप की कितनी बाराइ सी है? उत्तर-भो गौव! चार प्रकाशक वापर करा मुस्मयमा गी रासायमा है पक चतुश-मवामिगम एष-तृतीय उपान 8 प्पमाए पुग्छा ? गोयमा ! कोसूणाइ पच जायणाइ बाहलेण पत्तणाई, एव एएण अभिलावेण बालुयप्पमाए पच जोयणाइ बाहलेण प. पंकप्पमाए सक्कोसाइ पच जोपणाइ बाहमण पण्णचाइ धूमप्पभाए अहछट्ठाइ नोयणाइ, या हल्लेण, पण्णत्ताइ, तमप्पभाए कोसूणाइ छजोयणाइ बाहल्लेण पण्णत्ताइ अहेसचमाए छ जोयणाइ बाहलेण पण्णचाइ ॥ १९ ॥ इमीसेण मत ! रयणप्पभाए पुढवीए तणुवायवलये केवतिय बाहल्लेण पण्णत्ते ? गोयमा ! छक्कोसेण बाहलेण पण्णचे एव एतेण अभिलावेण सकरप्पमाए सतिभाग छक्कासे बाहल्लेण पणत्ते वालुप्पभाए तिभागूणे सत्तक्कोसे याहल्लेण पण्णत्ते, पक्कप्पमाए पुढवीए सत्तकोसे बहल्लेण पोजन की माडाइ है, शरीर प्रमा की पृच्छा, पांच पोनन में एक कोश कम की जादा है, ऐसे ही पालाममा की पांच योजन की, पक प्रमा की पांच योनम व एक कोश, धूम्रमभा की पांच यामन हो कोश (सादे पांच योमन,) तमाममा की एक कोश कम योजन और तमस्तम ममा की छ योजन की मादाइ की है ॥ १९ ॥ प्रश्न-मो मगन् ! रममा पृथ्वी के तनुवात वलयाकार की कितनी मादाइ कही ? उचर-महो गौतम ! र प्रभा के तनुशत की छ काश की जादाइ है, ऐसे ही शर्कर प्रमा के तनुशत की छ कोश तीसरा माग, पालकममा में तीसग माग का सात कोश, पक प्रमा के 4वीसरी मसिपचि में नरका का पहला उशा १३ पर मनुवाक पाझमचारी मुनि श्री मोहक पिन पण्णसे, धूमप्पभाए सतिभागे सत्तकोसे वाहल्लेण पण्णसे, तमाए तिमागणे अट्ठकोसे बाहल्लेण पण्ण , अहे सच्चमाए पुढवीए अट्ठकोसे बाहल्लेण पण्णत्ते ॥ २० ॥ इमीसेण मते ! रयणप्पमाए पुढवीए घणोदधि बरयस्स छजोयण बाहल्लस्स खेत छेएण छिनमाणस्त अत्थिदव्याइ वणउ काल नाव ' इता अत्थि।। सक्करप्पभाएण भते ! पुढवीए घणोदधि वलयस्स सतिभाग छजोयण याहल्लस्स खंचछेएण छजमाणरस जाव हता अरियाएष जाव अहे सत्समाए ज जरस ब हल्ल॥ वनुरात की सास कोष्ठ की नाराइ, धूम्रपमा में साव कोश र तीसरा भाग, सम.पमा में तीसरा भाग कम माठ कोश और तमस्सम प्रमा में भार कोष की माटाइ मानना ॥ २० ॥ प्रश्न-प्रो भगवन् इस रस्नप्रमा पृथ्वी क घनादपि वलय छ योनन का जादा है उस को मंत्र ऐसे उद देने से उन द्रव्यों से वर्ण काळे यावत् परस्पर सपपराले वारे' उत्तर- गौतम ! वैसे प्रश्न-मरो भगवन् ! धर्कर पमा पृथ्वी का मलय की भावाइ योमन एक योजन के तीसरा भाग अधिक की है इम का छेद देने से इस के ठप पर्ण से काले यावत् परस्पर संबंधमालो क्यार- गौतम! मेरी यो साती नरक क स का पाना, इस में पा २ भितना मारपना रखना मानना प्रश्न- ! इस रस्नममा पृथ्वी का घनरात सारेचार वामन मनाशक-राजापधादर लाला मुख देवतापनी पांगम म 4- चतुर्दश गाभिाम मूत्र सृबोप उपाय इमीसेणं भते ! रयणप्पमाए पुढवीए घणवायवलयस्स अद्ध पचजायण बाह लरत खेत छेदेण छिज जाव हता अस्थि, एव जाव अहे सत्चमाए जजस्स बाहल्लेण, एवं तणुवात पलयस्सवि जाव अहे सत्तमा जजस्स बाइल्ल ॥ २१ ॥ इमीसेण भते । रयणप्पभाए पुढवीए घणोदविवलये किं सठिए पण्णचे १ गोयमा ! वहवलयागार संठाण सठित पण्णते, जेण इम रयणप्पम पुढवि सव्यतो मम तास परिस्खिविताण चिट्ठति एव जाव अहे सत्तमाए पुढवीए घणोदधि वलये णवर अप्पाण पुढवि सपरिखिवि. 'चाण चिट्ठति ॥ इमीसेण भत ! रयणप्पभाए पुढवाए घणवात वलए कि सठिते पण्णचे गोयमा ! वटवलयागारे तहेव जाव जेण इमीसेण रयणप्पमाए पुढवीए घणोक-नात उस का छेद करने से उसके दन्प पूर्ण से काल वर्णवाले यावत् परस्पर सवाले क्या? उचर- गौतम! वैसे ही हैं यों सामवी नारकी के घनपात का कहना, परतु जितना जितना जास्पना है उन को उतना नारपना कहना एसे ही धनुषात पलय का सातवी पृथ्वी तक काना ॥ २१ ॥ प्रभ-हो भगवन् ! इस रत्नममा पृथ्वी क धनोदपि का संस्थान कैसा है को गौनम ! वर्तुल पलयाकार (चूदी जैसा ) संस्थान है यह घनोदघि रत्नममा पृथ्वी के च रों वाफ घेर कर रहा हुआ है ऐमे ही साता पृथ्वी के घनोदपि का मानना प्रश्न-इस रत्नममा पृथ्वी का 4 तीसरी मतिपत्ति में रंक का पहिला दिशा 42 9 चिर इमाण भते । 4 भनुवादक-पालवसपारो मुनि श्री माळक को 5 चवलय सनतो सम ताप्त परिक्विवित्ताण चिट्ठर, एवं जाव अहे सचमा९ घणवातवलय । इमीसेण मते । रयणप्प माए पुढवीए तणुवातयलये किं सठिने पण्णचे ? गोयमा ! वट्टवलयामार सठाण सठिए जाव जेण इमोसण भते । रयण- पमाए पुढवीए धगवातवलय सम्वतो सम तास परिसिविताण चिटुति, एव जाव । महेसत्तमाए तणुवात वलय ॥ २२ ॥ इमाण रयणप्पमा पुढवी केवतिय मायामविक्खभेण पण्णता ? गोयमा ! अखेबाइ जोयण सहस्साइ आयामविभेग, असखेजाइ जोयणसहस्साइ परिक्खेवेण पण्णचा एव जाय घरात का मस्पान कौनमा उचर-महो गौतम ! पतल वलयाकार रहा हुवा है इस सरलप्रमा पृपी का घनोदधि चारों तरफ घेराया जा रहा है यो साता पृथ्वी के धनवात का जानना प्रश्न अरे भगवन् ! इस रत्नममा पृषी का तनुपात बमय का क्या सस्थान का! उचर-महो गौसम वर्तु र पलपाकार संस्थान का है इस से रत्तपमा पृथ्वी का धनवाव चारों तरफ से घेराश वा । यो सातों पृथ्वी के अनुपात का मानना ॥ २२ ॥ प्रश्न-भो भगवन् इम रममा पृष्पी की सम्म चौसराइ फिननी and भो गौतम ! मसरुपात योनन की स्माइ चौडाइ की प्रा-मा भगवन् ! इसकी परिधि सिवनी की चरो गौतम! प्रममा गोप्र ins मायक रानापहन्दर लाला मुसहर सापजी भासासारनी +At चतुर्दश-नीशभिगम सत्र मृवीय उपान +8 महे सचमा ॥ २३ ॥ इमाण भते ! रयणप्पभा पुढवी अतेय मझेय सन्वरय समा माइलेण पणचा ? हंता गोयमा ! इमाणं रयणप्पमा पुढवी अतेय मझय सव्यस्थसमा बाइलेण, एव जाव अधो सत्तमा ॥ २४ ॥ इमीसेण भते । रयप्पभाए पुढवीए सन्यजीवा उबवानपुख्या सव्यजीवा उववमा ? गोयमा । इमामेण रयण- प्पभाए पुढवीए सम्बजीवा उवषण्णपुवा, नो पेवण सन्यजीवा उबवण्णा, एव जाव अहे सचमाए पुढवीएइमाण भते! रयणप्पमा पुढवीए सव्वजीवहिं विजढ पुन्ना सन्च सातवी पृथ्वीतक सब का जानना ॥ २३ ॥ प्रश्न-मो भगवन् ! यह रत्नप्रभा पृषी अत में, मध्य में वगैरा सब स्थान मालाइ में क्या समान है? उचर-नां गौतम ! या रस्नप्रभा पृथ्षी अंत में, मध्य में वगैरा सर स्यान भागाइ में समान है ऐसे ही सातों पृथ्वी का मानना ॥२४॥ प्रश्न-महो- मगवन् ! इम रत्नप्रमा पृथ्वी में सब मीनों सामान्याना स स अनुक्रम से पहिले उपम हुने भयंग अथवा सब पीरों समकास में वाम हवे ? उत्तर-मो गौतम ! इस रत्नप्रभा पृथ्वीम काल के अनुक्रम से सम् मीत्रों उत्तम हुए परनु समकाल में सप जीवां नी उत्पम ने क्यों कि सब भव एक ही काल में लामा नारकी में उत्पम रोजावे तो अन्य देव नारकी के मेद का अभाव होने यो सातत्री नारसी म जानना प्रश्न-महो मगमन् ! इस रत्नममा पृष्मी का सब भीपने काल के मनुक्रम 48वीसरी प्रसिपचि में नरक का पहिला उदेसा - 43 अनुवादक पालनमचारी मुनि श्री भमोलक पेमी - नीवहिं विजढा गोयमा!इमाण मते! रपणप्पभा पुढवीए साजीवहिं बिजटपुच्या नो चरण सन्वजीवहिं विजठा, एव जाप अहेसत्तमा॥२५॥ इमीसेण मत! रयणप्पमाए पुढवीए सन्वपोगगला पविट्ठ पुन्वा सव्य पोग्गला पविट्ठा? गोयमा! इमीसेण रयणप्पभाए पुढवीए सन्वपोग्गला पविटुपन्या, नो चषण सम्बपोग्गला पविट्ठा, एव जाव अहेसत्तमाए ॥ इमाणं भते ! रयणप्पभाए पुढवी सव्वपोग्गलेहिं विजढपुन्चा नो चेवण सव्व पोग्गला विजढा ? गोयमा ! इमाण रयणप्पमाए पुढवीए सन्वपोग्गलेहिं विजडमुन्ना नो पहिले परित्याग किया अथवा समकाल में क्या परित्याग किया ? उचर-महो गीत ! इस रत्न. प्रमा पृथ्वी का कालक्रम से सप भीोंने परित्याग किया परंतु एक समय में सर जीोंने परित्याग नहीं किया, ऐसे तो सातमी पृथ्वी सर जोनना ॥ २५ ॥ प्रश्न-मो भगवन् ! इस रत्नममा पृथ्वी में कालानुक्रम से क्पा सघ पुनलोन प्रवेश किया गया समकाल में सप पुनसाने प्रवेश किया। चर- मारो गौतम ! फालानुक्रप से रत्नप्रमा पृथ्यो में पुगलोंने प्रवेश किया परतु एक काल में सब पुराने मरेशन किया यो सातवी पृथ्वी तक काना प्रश्न-पो भगवन् ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी का कालानुक्रम से सब पुद्दोंने क्या स्पाग किया भयमा एकास में सब पुगलोंने स्पाम किया ! उत्तर-भो गौतम ! इस रस्लममा का पानुकप से परिसे सब पुराने स्पाग किपा परतु एक माय शक समावरादुर छाला एखदेवस हायजी नासाप्रसादनी + चतुरश-मीवामिगम मूष तृतीय उपा+ चेवण सव्वपोग्गलेहि विजढा एव नाव महेसत्तमा ॥ २६ ॥ इमाण भते ! स्यण- प्पमा पुढवी किं सासता असासता ? गायमा ! सिय सासता सिय असासता ॥ से केणटेण मते! एव वुच्चइ सिय सासता सिय असासता? गोयमा!दव्यट्टयाए सासतावण्ण पज्जवहि,गधपज्जवेर्हि, रसपञ्जवेहि फास पजोहिं असासता, सेतेण?ण गोयमा! एव वुच्चइ तचेव जाप सिय सासया सिय असासया, एव जाव अहेसचमा ।। २७ ॥ इमाण भते ! रयणप्पमा पुढधी कालओ केवचिर होइगायमा !ण कदायि णआसि,णकदायि 4 तीसरी प्रासपाच में नरकका पहिला उद्देशा १ समय में सर पुद्रलों का त्याग किया नहीं, यो सातवी पृथ्वी पक जानना ॥ २६ ॥ प्रश्न-पहो भगवन् ! या रत्नममा पृथ्वी क्या शाश्वत है या अन श्वन है ? उत्तर-महो गौसम ! स्पात् शाश्वत स्यात् प्रशाश्वत है प्रश्न-अहो मगवन् ! पेमा कैसे हो ? उत्तर-अहो गौतम् ! द्रव्य आश्री शाश्वत है मौर वर्ण, गघ, रस व स्पर्श पर्यव आश्री अशाश्वत है इस से अहो गौतम ! ऐसा कहा कि रत्न प्रमा पुष्षी स्पात् शाश्वत व स्यात् अशाश्वत है यो सातवी पृथ्वी तक करना ॥ २७ ॥ प्रश्न- भगवन् ! यह रत्नममा पृथ्वी काल से कितनी है ? उत्तर-अहा गौतम ! यह राममा पृथ्वी अतीत कलम नही थी वैमा नहीं, पतमान काल में ही है पैसा नहीं और भविष्य काल में नहीं होगी पैसा मनुवादक- पामारी मुनि श्री बमोगर पिमी - गस्थि, पकाइ भारत, मुर्विच भवतिय भविस्सइय, धुवा णितया सासता मक्खया अन्वया भवष्टुिता पिका, एव जाप अहे सत्तमाए॥२८॥इमासेण मते!रयण. प्पमाए पुढवीए उपरिक्षाप्तो चरिमतामो हेडिल्ले चरिमते एसण कवतिय अबाधाए अतरे पण्णते ? गोयमा ! असिउत्तर जायण सतसहस्स अवाधाए अतरे पपणते ॥ इमीसेम भंते! रयणप्पमाए पुढवीए उवरिलतामो परिमतामो खरकडस्स हेछिल्ले चरिमते एसण कवतिय अबाधाए अंतरे पण्णत्ते ? गोयमा । सोलस जोयणसहस्साइ अमाधाए भतरे पणमसे ॥ इमीसेण मते ! रयणप्पमाए पुढवीए उवरिल्लाओ भी न परंतु या अतीत काल में थी, पर्वमान कास में और मविष्य काल में होगी पार, नित्य, पापा, अमप, मन्मय, मस्थित है, यो साती पृषी ठक काना ॥ २८॥ मश्न-मो भगवन् । हम रलममा पृपी के रपर के परिपांव से नीचे के परिमांत वक बापा से विखना मतरफा स्पर-मो गौतम! एका मस्सी हजार रोमन काभवर का प्रबन-मरो भगवन! इम रत्नममा पृथ्वी के गर के परिमांत से हर काम के नीचे के परिमात तक लिखना जर का? महो गौतम ! मोह मार पोजन का मतर मामा-महो मगवन ! रस्तममा पृथ्वी के उपर के परिमात पका-राजारादुर लाला मुसदसराफ्मी मामासानी .

चतुर्दश-जीवामिगग मूत्र तृतीय उपास in चरिमताओ रयणस्स कडस्स हेछिल्ले चरिमते एसण केवइय अवाधाए अतरे पण्णते ? गोयमा । एक जोयणसहस्स अवाधाए अतरे पण्णसे । इमीसेण भत ! रयणप्पभाए पुढवीए उवरिल्लाउ चरिमताओ यइस्स्स कहस्स उवरिल्ल चरिमते, एसण काइय अवधाए अतर पण्णाचे ?गोयमा! एक जोयण सहस्स अवाधाए अतरे पण्णते। इमोमेण मत । रयणप्पमाए पुढवीए उवरिल्लाओ चरिमताओ वइरस्स कडस्त हेट्रिल्ले चरिमते एसण केवइय अबाधाए अंतरे पण्णते ? गोयमा ! दो जायणसहस्साइ अाधाए अतरे पण्णत्ते एव जाव रिटरस ॥ उवरिल्ले पण्णरस जोयणसहस्साइ इटिल्ल चरिमते सोलप्त जोयणसहस्साइ ॥ इमीण मते ! काम तीसरी प्रतिपति में नरक का परिला उद्देशा . ग्रनकाण्ड के नीचे के चरिमति सक में कितना अतर कहा है ? उत्तर-महो गौतम ! एक हजार योजन का अतर कहारे पन्न-पो मगवन् ! इस रस्नम मा पृथ्वी के उपर के चरिमांव से पन रस्न काण्ड के उपर क परिमांत में कितना असर का ' उसर-हो गैसम ' एक हजार योजन का अतर कहा प्रश्न महो मगवन् ! स्लपमा पृथ्वी के उपर के घरमांत से पन रत्न काण्ड के नीचे के चरमोत तक में कितना भवर कहा ? उत्तर ओ गौतम ! दो हजार योजन का असर कहा यों रिष्ट पर्यंत सत्र कहना रिष्ट के कर के चरमौत तक में पमरद पार योजन, नीचे के चरमौर में सोगह इनार योमा * अनुपातकनारमनपारीमुनि आ भमोला मी * रयणप्पमाए पुढीए उवरिल्लाओ चरिमताओ पकबहुलरस कडस्स उचाल्ल पारमत एसण अबाधाए कवतिय अंतरे पपगते ? गोवमा ! सोलस जोयणसहस्साई अवा- हाए अतरे पगत्ते हेट्ठिल्ल चरिमते एक ओयणसयसहस्स आवबहुलस्स उपरि एक जायणसयसहस्स हेटिल्ले चरिंगत असीउत्तर जोयणसय सहरस घणोदधिस्स उवरिल्ले असीठसर जायणसयसहस्स हेडिल्ले चरिमते चरिमते दो जोयणसयसहस्साइ ॥ इमीसण मत ! रयणप्पमाए पुढवीए घणवातस्प्त उबरिल्ल चरिमते दो जोयण सय. सहस्साइ हेट्ठिल्ले चरिमते अमखेबाइ जोयण सयसहस्साई । इमीसैण मते ! रयण- म अतर सहा प्रशा इस रत्नप्रपा पृणा के कर के घरमांत मे पकबहुल काण्ड के ऊपर के चरमान वा भाषा में कितना अतर कहा है। उत्तर महो गौतम ! सोला हमार योमन का अतर कहा है इपरु नीचे से चरान सा में एक लाख योनन का अवाघा से अतर का अपूरल काण्ड के ऊपर के पात सा में एक लाख याजन का असर कहा है और इस के नीचे के चरमौत तक में एक लाख अस्सी हजार योजन का असर कहारे घनोदाधि के ऊपर के परमात तक एक लाख भस्मी हजार योयन का मतर और घनोदधि के नीचेका परमात तक दो लाख योजनका मतर का रत्नममा पृथ्वी के। प्रकाशक-रामासादुर छाला एखदेवताजयभी ज्याला प्रमादनी।

प्पभाए पुढवी तणुवायस्स उबरिले चरिमते असखेबाइ जोयण सयसहस्साइ अवा- धाए अतर पण्णत्ते ॥ हट्ठिले चरिमते असखज्वाइ नोयण सयसहस्साइ, एव, उवास; तरेवि ॥ सरप्पभाएण भते । पुढवीए उवरिल्लाओ चरिमताओ हेट्रिल्ल चरिमते एसण केवतिय अबाधाए अतरे पण्णते ? गोयमा ! बत्तीसुत्तर जोयण सयासहस्स अबाहाए अतरे पण्णत सक्करप्पमाएण भते । पुढीए उवरि धोदधिस्स हे।४ल्ले चरिमते बावण्णुचर जोयण सयसहस्प्त अबाधाए धणवायरस असखेज्जाइ जोयणसय सहस्साइ पण्णचाइ, एव जाव उवासतरस्सैवि जाव अहे सत्चमाए, णवर जीसे ज 418 चतुर्दश जीवामिगम सूत्र तृतीय उपान १ 48 तासरा मसि-पत्ति में नरक का पहिला उद्देशा 48 ऊपर के चरमात से घनवास के ऊपर के चरति सक लास योजन का असर होता है और इस के नीचे के घरमात तक मसरूपात लाख योजन का अतर जानना रत्नममा पृथ्वी के ऊपर के चरमीत सनुगत के ऊपर के चरमांव सक असख्यात लास योमन का अतर है और नीम के घरमांत तम मी घसरूपात लाख योजन का अंतर है ऐसे ही आकाशनिर का मानना प्रश्न-बाहो भगवन् ! शहर ममा पृथ्वी के ऊपर के चरमति से नीचे के परमात तक कितना मतर का? उचर-अहो गौसम ! एक लाख पत्तीस हजार योजन का अतर कहा प्रश्न अहो मगवन् ' शर्कर प्रमा पृथ्वी के ऊपर के घरमाव से थनोदधि के नीचे के चरमात सक कितना अंतर कहा। उचर-श्रो गौतम! एक लाख कहण मते | पुढवीओ पण्णचाओ ? गोयमा ! सत्पुढवीओ पण्णशामओ तजहा- रयणप्पभा जाव अहे ससमा ॥ १ ॥ इमीसण मते | रयणप्पभाए पुढवीए असी उत्तर जोयण सतसहस्स बाहल्लाए उपरिकेवइय मोगाहिसा हेट। केवइय वजेता, मज्झे केवइय केवइया निरयावाससयसहस्सा पण्णता ? गोयमा ! इमीसेण रयणप्प. माए पुढवीए असीउत्तर जोयण सयसहस्स बाहल्लाए उवरिं एग जोयण सहरस कममनुखक पासमचारी मुनि श्री अमोलक पीजी पभ-मो मगरन् ! पृतिओं किवनी कही है? उचर-प्रा गौतम ! सात पृधिओं कही है वयपा-रस्नममा पावत् सापी तमस्तमः ममा ॥ १ ॥ प्रश्न असे मगवन् ! इस रत्नममा पृथ्वी का पिण्ड एक बास बस्मी हमार योमन का है उस में से ऊपर कितना अवगा। दुना है, नीच कितना वर्ना हुआ है बीच में कितना सा हुवा है और कितने नरकापास कहे? उचर अहो गौतम ! इस रत्नपमा पृषी का पिम एक लाख अस्सी हजार योगन का है उस में से एक हमार योजन ऊपर छ फर एक भार योनन नीच छोरकर शेष एक लाख अत्तर हमार यानन की पीच में पोलार। इसमें तीस लाख नरकापास कहे, घे नरकावास मदर से वर्तुलाकार पाहर से नौकून यावत् नरक में मधुम पदना सी दुई। सप पाठकी अपेक्षा से वापछिकागद गोल, त्रिकोन, चौरस र पुष्पावणि वर्षाद मंकासक राजापापुर काला सदवसायमी ज्वालाममादमी उगाहिचा, हेट्ठावि एग जोयण सहस्स वजेचा मज्झे महत्तरे जोयण सय सहरसे एत्यण रयणप्पमाए पुढवीए नेरझ्याण तीस णिरयावास सयसहस्सा भवतित्ति मखाया तेण नरगा अतो वट्टा वाहि चउरसा जाप असुभा गरयेसु वेयणा, एव एएण अभिलावेण उववाजिउण भाणियव्व ठाणप्पयाणुसारेण जत्थ ज बाइल जत्तिया वा नेरइयावास सयसहस्सा जाव अहे सत्तमाए पुढपीए अहे सत्तमाए मज्झे १ चतुर्दश भावाभिगम सूत्र तृतीय उपास विविध प्रकार के संस्थानवाले में नीचे का पृथ्वी तल सुर जैमा कठोर है, वहां सदैव अधकार है, मात्र तीर्थंकर के जन्म प दीक्षा काल में प्रकाश रोता है, वीर्यकर के कल्याण समय में प्रकाश्च होता है वहाँ चद्र सूर्णदि ज्योतिपो का प्रकाश नहीं है, रुघर, माप्त, राघ वगैरह के कीचद से नरक का ममितल लीग हुना है, नरकावास पहुन वीभत्स है, अत्यत दुर्गंधमय है, मृत पशु के कलेवर से भी अधिक दुर्गंधमय । काली अग्नि की चालायर्यो नीकलती है, धगधगती कपोत पर्ण जमे अग्नि की कांनि , पहा का मध रस व स्पर्श अति दु सर व अशुम यह असाता वेपना सप नरक में रहा हुई है सर पृथ्वी में एक हजार पर प एक हजार नीचे उन के जारपने में सनीकालकर क्षेप रहे सो पोलार समजना और परिले कहे सो नरकारास मानना यो नीचे की सातवी पृथ्वी में पा स्थानवाले नरकावास तीसरी प्रतिति में नरक का दूसरा उद्देना :- कइण मते ! पुढवीओ पण्णचाओ ? गोयमा | सरापुढवीओ पण्णशाओं तजहा- रयणप्पभा जाव अहे सत्तमा ॥ १ ॥ इमोसण मते ! रयणप्पभाए पुढवीए असी उत्सर जोयण सतसहस्स बाहल्लाए उपरिकेवइय मोगाहिसा हेट्ठा केवइय वज्जेत्ता, मझे केवइय केवइया निरयावाससयसहस्सा पण्णचा ? गोयमा ! इमीसेण रयणप्प- माए पुढवीए असीउत्तर जोयण सयसहस्स बाहल्लाए उवरि एग जोयण सहरस अनुवादक पासमचारी मुनि श्री ममोलक मापीमी" प्रश्न-महो मगरन् ! पृविओं किवनी कही है ? उत्तर-अहा गौतम ! सात पृषिओं कही है वषया-स्लममा यावत् सातवी तमस्तम. प्रमा ॥ ॥ प्रश्न अहो मावन् ! इस रस्नममा पृथ्वी का पिण्ट एक लाख अस्सी इमार योमन का है उस में से ऊपर कितना अनगारा दुसरे, नीचे फिवना पर्मा दुराबीच में स्सिना रहा हुवा है और कितने नरकायास को ? उत्तर अहो गौतम ! इस रत्नममा पृथ्वी का पिण्ड एक छोस्ख अस्ती हार योनन का है उसमें से एक इनार योजन ऊपर छर पर पकामार योनन नीच छोरफर शेष एक लाख अहत्तर हजार यामन की बीच में पोलारी इसमें तीस सास नरकावाम कहे है, वे नरकावास अदर से वर्तुलाकार पाहर से चौफून यापत् नरक में मशुम पदना ही हुई है सब पीठ की मपेक्षा से मारठिकागत गाय, त्रिकोन, चौरस र पुष्पावरूणि वर्षात माया रानापहारकाला सदवसायना ज्वालाममादमा नर्थ चतुर्दश मोवामिगम मूत्र-ननीय उप- पिहडगसठिया किण्णसुडएसठिया, मुखसंठिया, मुइगसंठिया, गदिमुइंगसंठिया, आलिंगसठिया, सुग्धोससठिया, ददरसठिया, पणवसठिया, पडहसठिया, मेरीसठिया, झल्लरिसठिया- कतुवकसठिया, नलिसठिया, एव जाव तमाए अहे सचमाएण मंते ! पुढवीए नरगा कि सठिया पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पण्णचा तजहा-बय ससाय ॥ ३ ॥ इमीसेण भते । रयणप्पभाए पुढवीए नरया केवश्य पाहलेणं पण्णता ? गोयमा ! तिणि जायणसहस्साइ बासा कुटन (वापस लोगों को रने का स्थान ) मुरज [ मृदंग विशेष ] मृदगं, नदीमुख मृदग, सुघोप (देवलोक की घंटा विशेष ) दर्दर पादिन, पणव चमड का पादत्र, पा. मेरी, अलरी, कुडया व घटिका इस्यादि अनेक प्रकार के सस्यानवाले हैं यो पो उमाममा पृथ्वी पर्यंत कहना मन्न-तमस्तम.ममा पृथ्वी में नरकावास के सस्थान कौनसे को है। उच्चर-अहो गौतम ! दो प्रकार के करे हैं पर्तुलाकार प मिकूनाकारो सातवी पृथ्वी में पांच नरकास वावसिकागतो निस 4 अप्रतिष्ठान नरकावास गोलो मोर शेष पार नरकापास विकून माकारखाछे॥३॥ मा नरकावास का नादपना कहते हैं १ मृदंग से प्रकार की है। मुकुंद १२ मर्दस जो उपर से संकुचिस व नीचे से विस्तार माली है उसे मुकुद कहना मोर उपर नीचे सो समान हे मह मर्दल है. इस स्थान मुकद मुहम ग्रहण करना 42ीसरी मतिपचि में नरक का हमरा इशा 42 केवइए का अणुसरा महति महालया महाणिरया पणत्ता, एव पुच्छियव्य वागरेयव्याप तहेवट्ठी सत्तमामुकाऊ अगणिवण्णा भाणियन्वा॥२॥इमीसेण भतेरयणप्पमाए पुढवीए नरका किं सठिया पण्णता' गोयमा! दुविहा पण्णसातजहा-आवलियप्पविट्ठाय आवलिय बाहिराया।तस्थण जे ते मावलियपविट्ठाते तिविहा पण्णचा तजहा-पहा तसा चठरसा तत्थण जे ते मावलियबाहिरा ते णाणा सठान) सठिया पण्णत्ता तजहा अयका? सठिया पिंड पयणग सठिया, कडूसठिया लोहीसठिया, कढाहमठिया, थालीसठिया अनुभदा मनामधारी मुनि श्री अमोणक ऋषिनी । सब में मनोचर रस्नममा जैसे ही करना यावत् छठी सातवी पृथ्वी में कापोत वर्ण मेमा मामि मानना ॥ २॥ प्रभ महो भमवन् ! इस रत्नममा पृथ्वी में रोहुर तीस लाख मरकापास का कौनसा सस्थान का उत्तर-बहो गौतम ! नरकाबास दो प्रकार के कहे हैं। आपलिकागत अर्थात् श्रेणी में रोये और २ भावविका से बाहिर सम में भाठों दिषि में श्रेमि से रहे हुवे नरकावास के तीन भेद को १ वर्तुशाकार २ विकून व ३ चौकून मोर मो मावलिका से वाहिर आदिवासे पृथक सेसन के संस्थान विविध प्रकारको मिनके माम-कहते हैं, मयकोष्ट-लारेका गोला मेसे, रिष्ट पचमक (मदिरा पकाने के पिये मिस मामन में भाग पापा भावे सा ) नेप्सा, पाक स्थान, रसोइ गृहले माकार से, कडाइ, बारा परा काइका, स्वामी, पकाने की हरी, पिन मिस में बात मनुष्यों के निपे धान्य पापा मारे। पालामाखदुर गण सदर सायमी मागमसादरी 411 चतुचीयामिमम एप-तृतीय उपान - अहे सत्तमाएण मते ! पुच्छा ? गोयमा ! दुविहा पपणचा तजहा- संखेजवित्थडेय, असखेजवित्थडाय ॥ तत्थण जे से सखेजवित्थडे, सेण एक जोयणमहस्स आयाम विक्खभेण, तिन्नि जोयण सयसइरसाइ, सोलस सहस्साई दोणिय ससाघीस जोयणमये तिष्णिकोसे अट्ठावीस धणुसयाइ तेरसय अगुलाइ अडगुलय च किंधि विसेसाहिए परिक्वेवण पण्णत्ते ॥ तत्थण ज ते असमजावित्यहा तेण मसखेजाइ जोयणसयसहस्साइ आयाम विक्खमेण असंखजाइ जाव परिक्खेवेण पण्णचा ॥ ४ ॥ इमीण भते । रयणप्पभाए पुढवीए के सम्मे है। उनकी परिधेि अप्तरुयाव योजनकी है यो तम पृथी पर्यंत कहना सातवी पृथ्वीको पृच्छा, अहो गौतम ! इसक दो भेद कहे कितरेक करुयान योजन के विस्तारवारे में और किसनेक अमख्यास योजन के विस्तारवाले में उस में रुख्यात योनज का विस्तार व ख्यात योजन की परिषिधाला एक अतिष्ठान नरकावास है उसकी सम्बाइ चौदह एकलाख योजनकी है और तीन लाख सोला हजार दो सो सचावीस योजन, वीनगाउ, एकमो अहाइस धनुष्य, साठ तेरह अंगुल से कुय अधिक की परिधि है और मो अमरूयात पोजन क पिस्तारबाले चार नरकावास है वे असख्यात योजन के लम्बे चौटे हैं और मसंख्यात योमन की परिधि है ॥४॥ प्रश्न प्रो मगान ! इस रत्नममा पृथ्वी के नरकावास कैसे वर्णवाल 44 तीसरी निधि में नरक का दूसरा इंशा 44th मनुवादक- पानमवारी मुनि श्री मयोजक अपित्री - पाइलेण पणाचा तजहा हेट्ठिल्ले परिमत घणसहस्स मज्झ झुसिरासहस्स उपि सकइया सहस्स॥ एव जाव अहे सचमाए ॥ इमीसेण भत! रयणप्पमाए पुढधीए नरगा केवइयं आयाम विक्रमेण केवश्य परिक्खेषेण पण्णता ? गोषमा ! दुविहा पण्णता संजहा-सखेजविस्थडाय, असखेबवित्यडाय । तरथण जे ते सखेजविस्थडा तेण सस्नेबाई जोयणसहस्साइ आयमाविक्समेणं, सखजाइ जोयणसहस्साइ परिवावेवेण पण्याचा, सत्थण जे ते असंखेवदित्यला तेण असोजाइ जोयणसहस्साइ आयाम विक्लमेणं, असखेबाइ जायणसहस्साइ परिक्खेवण पण्णचा, एव जाप तमाए । मन-मो भगवन् ! रत्नममा पृथ्वी के नरकागस का मारपना कितना का? उचर मो गौतम ! वीन इमार पोमन का मारपनारे उस में एक हमार योजन की नीचे की पीठिका एक हमार यामन की पालार मौर एक नार योमन का ऊपर का मुघ सकुचित होता हुवा साद यों मर पिपकर सोन हमार योजन का नानना यों सावत्री पृथ्वी तक के नरामास का मानना प्रभ- मा भगवन् ' रलप्रमा पृधी में नरकावास लम्स, पोसाई व परिधि में किसने को पचर-मो गावम! तिनेक संसगत यामन के लम्बे चौरे और कितनेक मसख्यात योगन के सम चौरे मो सस्पात योगनगम पोरे पन की परिपि सम्पाव योमन की है और वो पासपात योजन मराम-राजपादुर सा मुसदेपसाापमी मामासारखी वसर्दश-जी५ मा पुगतीम उप एयारूबे ? णो तिगढे सम?, ? गोयमा । इमीसेण रयणप्पभाए पुढधीए णरगा एसो अणि?तरा चष मकततराचेव जाव अमणामतराचेव ॥ गधेण पण्णता ॥ एव जाब अहे ससमाए पुढवीए ॥ ६ ॥ इमीसण भते । रयणप्पभाए पुढधीए परया केरिसया फासेण पण्णता ? गोयमा । से जहा नामए असिपचेइवा, स्वरपत्तइया, कलबचीरियापचेइवा, कुतगेवा, तोमरग्गेवा, नारायग्गेइवा, मूलग्गेइवा, लउडग्गेया, भिहिमालग्गेतिया मचिकलाएतिया, कवियच्छूइया, विच्छुपकटइवा, गालइवा जालाइवा, मुम्मुरेतिया, भच्चेइवा, मालाएतिया, सुद्धाग- यह वीसरी मविपचि में नरक का दूसरा उदशा में चमत्प दे खापवाला हो उस की दुधि जैसी क्या नारकी की दुर्गंध है । यह अर्थ योग्य न है बहो गोतम ! नरकापास में इस म भी मषिक बनिए, अकत याषत् अमनामकारी दुर्गप हे यों सासषी पृथ्वी १ का देना ॥ ६ ॥ मग स्पर्म का मन करत प्रश्न अहो मगवन् ! नरकापास का स्पर्श केन? महा गौतम ! असे अतिपत्र, पुरपन, कद व वीरिका (तृग विशप ) भाल प्रणी सीर का मग्रभाग, मूल का मग्रमाग, सोये थग्रभाग, का अपमाग, भिटमा का अन माग, मूई के समूह पा अग्रम ग, कवच का मनुवाक वाममसरी मुनि श्री बोस पिना नरया केरिसया वष्णेष पण्णचा ? गापमा ! काला कालाधभासा, गमारा लोमहरिसा भीमा उत्चासणया परमकिण्हा, षण्मेषं पण्णचा, एवं जाव अहे सत्तमा ॥ ५ ॥ इमीसेण भते रयणप्पमाए पुढधीए परका केरिसया गधेणं पण्णता ? गोयमा ! से जहा नामए अहिमबेतिया, गोमडेतिवा, सूणगमडेतिग, मज्जारमडेतिवा, मणुस्म- मंडेतिवा, महिसमडेतिवा, मूसगमठतिवा, मासमठेवा, हत्यिमडइवा, सहमहेइवा पग्धमडेवा, विगडमडेइया दीवयमडेइवा, मयकुहिय चिरविण?, कुणिमवावण्ण दुग्मिगध किमिजालाउलससचे, मसुचिलीणविगय वीभत्स परिसणिज्जे, भवे को। रचर-महो गौतम ! फासे, कालामासवाले, गंभीर सोमावाले, भयकर, प्रास उत्तम फरनेपासप परम कृष्मपर्ण वासेको यो सानवी नरक तक सब काकाना ॥॥ प्रश्न-महो भगवन! इस रस्नममा पृथ्वी में नरकापास कैसे गाने को ? उचर-से सर्व का मूव कलेवर, गाय का, कुपे का, मार्नार का, मनुष्य, का भैस का, यूरेका, पोरे का, पीका, सिंह का उपाघ्र का, विगद का, पिच का मृत फसेपर कि भो त काम से पग दुराहोरे, चिनहरोये, जिस का मांस सरकर विना मना होपे, पिस में बात कीडे पर मपे रोये, मषि पत्र के परिवार का कारनामा कासक राजारादुर साला सुखदेवसहायनी वामद.

44 चतुर्दश भीपाभिगम मूष तृाय उपार - देवेग महिलाए जाब महाणुमावे जाय इणामेव इणामेवत्तिक? इम केवलकष्प जबुदीय दीव तिहिं अच्छराणिवातिहिं तिसच रखत्तो अणुपरिपाहताण हब्वमागच्छब्बा, सेण देये साए उछिटाये तु रताए चबलाए चडाए सिग्याए उड्याए ताए जाणाए दिवाए देवगइये घीईवयमाणे २ जहण्णेण एम'हवा दुयाहवा तियहवा उकासेण छमास वीतिवएज्जा, अत्थेगइए णरगे वीइसमजा, अत्यनइथे गरग नो बीइनएजा ए महालयाण मोयमा ! इमीमेण रयणप्पभाए पुढपीए नरगा पण्गचा, एष जाव महे सचमाए अत्यंगतिय नरग विश्वएना अत्थगइए नाग कुछ अधिक परिधिवाला यह जम्बूद्वीप है ऐसा जम्बूदीप को कोई महर्षिक यापत् मा मात्र देवता श्व सीन चपुटि माये उसने समय में सोमवार पग्भ्रिमण करके बाजाय एपी त्वरिन, चपल, प्रचण्ड, शीघ्र, सथा वटून जयांत दीव्य देवाति से माते हुए जघन्य एक दि, दो दिन तीन दिन उत्कृष्ट छ मास में कितने नरमायास का उलयर सकते। और किम का उल्लघन न पार साते है अहो मौतम ! नरावाम इचने बरे कहे हैं यो सातवी पृथ्वी तक मानना उस में कितनेक रका वास का उलंघन कर मौर कितनेक का उल्लघन नीं करते हैं अप्रतिष्ठान नरकाबास एक लक्ष पाजन का इस से उस का उल्लंघन होते, परंतु अन्य चार असल्पाव योजन के मिस का उलयन 48 तोमरी प्रतिपचि में नरक का दूसग सहसा ममुपादक-मापनयपारी मुनि श्री बमोगकापमी 1 पाएमा, भव एतारूव तया । णा इ"ट्ठ समट्ठागायमा भाए पुढवीए परगा एगो अणिटुतराचेर जाव अमणामतराचे फासेण पण्णचा, एव जाप अहे सत्तमाए पुढवीए ॥ ७ ॥ इमीसेण मते ! रयणप्पभाए पुढवीए नरका क महालया पण्णता ? गोयमा ! अयण जीव दीव सवयीय समुदाण सन्धभतरए सन्यखडाए वहे, तल्लपूत सठाण सठिय वह पुक्खरकणिया सठाण सठिये वह, पडिपुण्ण चद सठाण सठिए, य? रहचकाशल सठाण साठए एक जे.यणसयसहस्स आयाम विक्खभण जाव किंचि विसेसाहिय परिक्खवण फसी का मग्रमाग वृश्धिा का मांग धूम्ररहित अमि, अग्नि की याठा, अनि क कन, अमि से सिम एनी आसा, मला एरा कोयता और मुदामि इस प्रकार का क्या नरक का पर्व है ? बरो गौतम । म से मी मनिहार यावत् ममनापतर स्पर्ध नरकारास का कहा है ॥७॥ पहिले नरकास का विस्तार पवसाया था, इस का विशेष विवरण के लिय पुन उरमा से जानने के लिये प्रश्न कसे प्रश्न-प्रो भगवन् !इम रस्नप्रमा पृथ्वी में नरकाबास केतने घर कहे। उचर अहो गौतम' सर द्वीप समुद्र के मध्य में रहा दुरा सर से छाटय, तल से वला हुवा पुढा समान रय चक्र जैसा गोल भपता कमल की कणिका अया प्रतिपूर्ण चद्र के बाझार जैसा गोल, एक सम योमन का लम्या चोरा यावत् वीन सय बोक्न से उरगेहितो उवववति, इरिथयाहिंतो उववजति, मछमणुरहितो उवयजति ? गोयमा ! मसगिहितो उववजति जाव मच्छमणुएहितो उपयज्जति एव एतेण अभि- लावेण इमा गाहा घोसेयव्या असण्णी खल पढम दोच्च चसिरीसिवा, तनियपक्षी सीहा ज्वति चउत्थी उरगा पुण पचमीजति, छट्ठी च इरिथयाओ, मच्छा मणुयाय सच मिजति जाव अह सत्चमा पुढधी णेरडया णो अस्सणीहितो उववजाते जाव णो इत्थियाहिंतो उववज्जति मच्छमणुएहिता उवववति ॥ १० ॥ इमीसण मते! रयणप्पभाए पुढवीए गेरइया एक समएण केवइया उक्वजति ? गोयमा । + पतुर्दशीवामिगम सूत्र तृवीय पा । dit सीसरी मविपचि में नरक का दूसरा उद्दशा 4.१५ माकर उत्पन्न होते हैं, मत्स्य में से उत्पन्न होते हैं मयया मनुष्पमें से उत्पम होते उत्तर अमनी से यावत् पत्स्य व मनुष्प में से उत्पन्न होत हैं इस का खुलासा निम्नाक गाथा कर काते में असमी पचेन्द्रिय पहिली नरक में जावे, सरिसर्प से गेपा, नकुल प्रमुख दूमरी नरक तक मारे, पक्षी तीसरी वक मान सिंह यानादि चतुष्पद चौधी नरक तक जाते हैं, उरगरिसर्प पांचवी तक मासे, स्त्री छठी में है, और मत्स्य व मनुष्य साववी में मासे में यारत् सातवी पृथ्वी में ममत्री नियच पर्षेन्द्रिय पापत् वी उत्तम नहीं ले परंतु मत्स्य व मनुष्य उत्पन्न होत ॥१०॥ मन-महो मगरन् ! एक समप में रत्नममा पृथ्वी में कितने नारकी रस्सम होते हैं। उत्तर-बो गौतम 1 मपन्य एक दो मनुवादक-पासमारीमुनी श्री अमोसर सतिमी मो वीइवएजा ॥ ८ ॥ ३मीसेण मते । रयणप्पभाए पुढवीए गरगा किमया पण्णता ? गोयमा ! सव्वधाइरामपा पाणचा, तत्यण नरएम वहवे जीयाय पोग्गळाय अवयमति विउक्कमति चवति उश्वजति सासताण ते नरगा दवट्ठयाए, घण्णपजहि, गधपजवाहि, रसपजवेहि, फासपजवेहिं असासया, एवं जाव अहे सत्तमा ॥ ९ ॥ इमीसेण भते ! रयणप्पभाए पुढवीए नेरइया कतो हिंतो उवववति? उवधातो सन्चो मामिउण, ततो पुच्छा किं असणीहिंतो उबव- जति, सिरिसवोहितो उपवजति, पक्खीहितो उववजाति, चउप्पएहितो उपवजात, नहीं कर सकते हैं ॥ ८ ॥ प्रश्न-ओ भगवन् ! रत्नममा पृथ्वी में नरकावार किस बस्तु मय । पर-गौतम ! समाज रस्नमय हो उस में पास सर पादर पृथ्वी काया के जीव र पुद्गल मात पौर नाव परंतु उनका सस्थान एसी रूप सदैव रहता है, इससे द्रव्य से वापत और पर्ण,गप, रस सर्ग पर्यव मे अपायको यो सातरी पृणी ना मानना ॥ ९॥ प्रश्न यो मगवन् ! रस्लममा पृथ्ष में नारी कहां से उत्तम होते हैं ? क्या सही से उत्पन होते. परितर्प अर्थात् मोपा, नकुलादि में से उत्पम हावे, पक्षी में से भाकार उत्पन होते चतुष्पद में से भाकर पसप वे सो में से •धक रानाबहादुर लाला खुपदेवमहामनीमाराममारपी - परर्दश भापामगम भूम मृमीय उपास trait पुढवीए नेरइयाण के महालिया सरीरागाहणा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा सरीरो- गाहमा पण्णता तजहा भवधाराणिजाय उत्तर वेउरियाय ॥ तत्थेण जासा भवधा- रणिजा सा जहण्येण अगुलस्त असखेजइ भाग उक्कोसेण सत्तधणूइ, तिम्गिरयणीओ छच अगुलाइ, नत्पर्ण जस उत्तरवेउत्रिए से जहण्णेण अगुलस्त सखेजइभाग उक्कोसेन पण्मरस धणूइ अड्डाइज्वाउरयणीओ दोचाए मवधारणिज्बे जहण्णए की मापारनीय शरीर की मांगाना मघन्य अंगुस का असरूपातवा माग उस्कृष्ट पमरर यनुप्य अदाइ हाय की है मौरसार क्रेय अपन्य अंगुर का सख्यातना माग उत्कृष्ट एकचीस धनध्य एक हाय वीमरी पालुरूपमा की मधारनीय शरीर की अवगाना जघन्य अगुल का असल्यानमा भाग उत्कृष्ट एकवीम धतुष्प एक सायकी उचर पक्रय जघन्य भगुरू का सस्यावा माग उत्नष्ट पॉमठ धनुप्प दो सय पने मामी नाक पर्यंत सबकी मा घारनीय अघन्य मगुल का यसख्यातका माग व उत्तर फेय मयन्य अगुल का सरुपासवा माग और उत्कृष्ट परममा की मवघाम्नाय ६२ धनुष्य २ आय सत्तर वय १२५ धनुष्य, धूम्र मगा की भव पारनीय१२० धनुष्य उचर वैकेय२५०अनुष्य म प्रमा की मत्र धारणीय २५. पनुष्य व उत्तर वेळेप५० • पनुष्य समस्त प्रमा की मप धारमीय ५.० धनुष्य प उपर वैकय १००० धनुष्य की मर पाया की सस्या कहते हैं पहिली नरक के २१, दूसरी में ११, वीमरी में ९, चौथी में ७, पाचवी - तीसरी प्रतिपचि में नरक का दमरा उदेशा + जहण्णेण एकोवा दोबा तिणिवा उक्कोसेण सखेबा असखेजावा उपजति, एवं जाव अहे सत्तमाए ॥ ११ ॥ इमीमेण मते ! रयप्पणमाए पुढवीए नेरइया समय' समय अवह र माणा २ फेवइय कालेण अवहितासिया ? गोयमा । तेण असखेजा समए समन अवहीरमाणा २ अनखेबाहिं उमप्पिणि ओसप्पिणीहि अवहीरति, नो पवण अवहिता सिया नाव मह सत्तमा ॥ ११॥ इमीसेण भते । रयणप्पमाए 42 मनुवादसनामामारी मुनि भी समाप्रक शपिनी- तीन उत्कृष्ट संसपात असंख्यात उत्पन्न होते हैं ऐसे है। सानवी पृथ्वी तक जानना ॥५॥ प्रम- मो मगरन् ! रस्नमभा पृधी के नारकी बसंख्यात का। उस में से ममय २ में एक २ नीकालवे कितने मयप में सब नारसी पूर्ण हो जाये ? उत्तर-महो गौतप ! नारकी मर्मरुपात को उम में से मरि मपय एक नीकालते अ.. स्यात् अयमपिणी सपिभी पंत नीकाले क्यापि नारकी के भी कमी मोही परोगे मी न६यो सामग्री पृथ्वी तक मानना ॥१॥ मन-मो ममपन् ! रस्सममा पृथ्वी के नारकी की कगर अयगान मिवनी पटो की ? सर-प्रो मौतम! स के शरीर की शरीर की भरगहना भी प्रकार मी कसा, मेधारनीय । उत्चर क्रेय उस में जो मापारमीय परमा- घर मघन्य प्रगूर का अन्तरूपातया माग उरकृष्ट सात धनुष्य तीम पर गुसकी, भार उचर समय अनुलका सहयातमा माग नस्कृष्ट पमरह पनुप्प बसाइ दामीरममा भी माम-रामावादर असा इसवर सायनी मासासारनी धणुसर्य, उत्तरवेउन्धिया अढाइबाइ धणुसयाइ, छट्ठीए भवधारणिज्जे अड्डाइजाइ धणुसयाइ उत्तरविउव्विया पचधणुसयाइ, सत्तमाए भवधारणिज्जे, पचवणुसपाइ उत्तरवेउन्धिया धणुसहस्स ॥१२॥ इमीसेण भते । रयणप्पमाए नेरइयाण सरीरया किं अगुल और तेरवे पाय ७ घनुष्य, वीन हाय ६ मगुपकी या उत्कृष्ट भषधारनीय अवगाहना हुइ उचर पेक्रेय स्थान से दुगुनी जानना इसी तरह आगे नरक में पायडे के नारकी की अषगाहना मानना जिस नरक में निसनी मरगाहना का अधिकपना हाचे समका रस नरक के पायडे से माग देना मो भाग भाव वा प्रत्येक पात्यरे में पाना ॥१२॥प्रश्न-महो मगवन् ! नारकी के शरीरका सघयन क्या 4 चतुर्दश भीयाभिगम सूत्र-मृतीय उगन +20- 4 वीसी पति पति में नरकका दूमरा उद्देशा att १ रत्नप्रमा ८ । पाथठा २ ५ घनुष्य १ हाथ २ सगुल ८॥ १७ ॥१.१८॥ ४ ३ ३ . . ६ ७ २ ४॥ ३२॥ ६ .

अगुलस्स असखेबइमाग, उकोसेण पम्गरस धणूइ माइमातो रयणीओ, उत्तर घेउधिया जहण्णेण अगुलरससंनेयभाग उक्कोसेण एकतीसवणुइ एकारयणी ॥ तचाए भवधाराणिजे, एकतीस धणूइ एका रयणी, उत्तर पेठब्धिया बासद्विधणूइ दोणियरयणीओ ॥ पठत्याए भवधारगिजे वावट्टि धाइ दाष्णिरयणीभो, उत्तरवेठावया पण्णवीस घणुसय, पचमीए भवधारणिज्जे पणवीस ममतारामान प्रा ममासमापना ५ ण्ठी में चीन र सावधी में एक पापी यो सब पीलाकर४९पायरे दुषे इन में मब की मपपारणीय मपगाहना अपम्प अगुवा असंख्यातना माम उचर केय नपन्य अगुल का सस्पातपा माग इस में पीसी नरके प्रथम पापरे की पत्कष्ट अपगाहना तीन हाय की इस के आगे प्रत्यक पायटे में ५६॥ बरते नाना मिस से दुसरे पायरे में एक मनुष्य एक पर सारे गाठ बगुल की हुई, तीसरे में एक पनुभ्य वीन हाय ६ १७ अगुव की पाये पावरे में दो बनुष्प दो हाथ ॥ अंगुल की,पांच पायरे में सीन मनुष्य दस बंगुरकी, छठे पायरे में हीन मनुष्य दो दाग १८॥ अंगुल की, सातये में चार धनुष्य तीन मगुरु की, मामे पापों में चार बनुम तीन पप १॥ भंगुष्ठ की नगरे पायरे पार पनुष्प एक सय २० मगढ की, दशे पायरे में ६ मनुष्य ४॥ भंगु का अम्पारणे पापर १ पनुप्म २ प १५ बमुर की पारणे पाचरे में ७ अनुष्य २१॥ • मकासक-रामायादुरलाग पुसदेवसमपनी पाखामसारमा २१ पतुर्दश जीवामिगग मूत्र-तृतीय उपान + सघयणी पण्णचा ? गोयमा ! छण्ह सघयणाण असघयणी, णेवट्ठी वच्छिरा, णेवण्हारु, णेव सघयण मरिथ, जे पोग्गला आणिला जाव अमणामा ते तेर्सि सरीर सघायचाए परिणमति, एवं नाव अहे सत्तमाए ॥ १३ ॥ इमीसेण भते ! रयण- प्पमाए पुढवीए गेरइयाण सरी। किं सठिया पण्मत्ता गोयमा दुविहा पण्णता तजहा- भवधारणिज्जा, उत्तर घेउब्वियाय ॥ तत्थण जेते भवधााराणज्जा ते हुडसठिया पण्णत्ता ॥ सत्यण जेते उत्तरवेउविया तेवि हुड सठिया पण्णता, एव जाव अहे सत्तमाए ॥ १४ ॥ इमीसण भते रयणप्पमाए पुढवीर णेरइयाण सरीरंगा केरिसया वण्णेण पण्णता ? गोयमा ! काला कालोमासा जाब परम कण्हावण्णेण पण्णचा ॥ कहा है ? उत्तर-हो गौतम ! मघयण में में एक भी मघपण नहीं है, क्यों की उनके शरीर में पतियों, शिरा व स्नायु नहीं है परनु पो पुगर भनिष्ट, अकांतकारी यावत् अमनोज्ञ होते हैं वे रूप से मयंकर शरीरपने परिणम । यो सातवी पृथ्वी ता जानना ॥ १३ ॥ पश्न-भगवन् ! नारकी को कौनसा सस्पान कहा है। उत्तर-प्रदो गौतम! स्पान के दो मेद करतद्यग-मबघारनीय व उचर चक्रेय दोनों शरीर का दुर सस्थान का यो सातवी पृथ्वी तक काना ॥ १४ ॥ मन-मो भगवन् ! इस रत्नप्रमा पृथ्वी में से वे नारकी का कैसा वर्ण का ? उत्तर-अहो गौतम ! काठा, कालामाप + सीसरी प्रतिपत्ति में नरफका ढमरा पहशा 482 मनुवादक पालनामधारी मुनि श्री मोमक पानी २ शर्करप्रमा पापा १ धनुष्य ३ भगत ६ ५ ८ ८ ९ १० १० ११ १२ १३ १४ १४ १५- २ २ २ ३ २ १ १२ १५ १८ २१ . . ३ बालकपमा १ ६ ८ धनुष्य १५ १७ १९ २१ २३ २५ २० २९१ २ २ २ १ १ मंगुस १२ ७॥ ३२२॥ १८ १३॥ . पकप्रमा ७ तमस्तम प्रमा पाया धनुष्य ४ ७ " ३६ ४६ ५२ ५७ ६२ १ २ २ २ ० २० १३.२ ८ २ ३ . . य मंगुम . ५ धूम्रप्रमा ६तम प्रभा २ ३ ४ अनुष्प ६२ ७८ ९३ १०९ १२५ हाप २ मगुरु ०१२ १२५ १८० २५० २ . ३ . . १२ . . Monte ghIbean Male MaNLI-41.

१ चतुर्दश-जीवामिगग मूत्र तृतीय नपान 4th सषयणी पण्णता ? गोयमा ! छण्ह सघयणाण असघयणी, णेवट्ठी वम्छिरा, गेवण्हारू, णेव सघयण मत्थि, जे पोग्गला आणिट्ठा जाव अमणामा ते तेर्सि सरीर सघायचाए परिणमति, एवं नाव अहे सत्तमाए ॥ १३ ॥ इमीसेण भते ! रयण- प्पमाए पुढवीए णेरइयाण सरी। किं शठिया पण्णत्ता?गोयमा दुविहा पण्णता तजहा- भवधाराणिजा, उत्तर वेठब्वियाय ॥ तत्थण जेते भवधााराणज्जा ते हुडसठिया पण्णता ॥ तत्थण जेत उत्तरवेउविया तेवि हुड सठिया पण्णता, एव जाव अहे सत्तमाए ॥ १४ ॥ इमीसण मते रयणप्पमाए पुढवीर णेरइयाण सरीरमा केरिसया वण्णण पण्णचा ' गोयमा ! काला कालोमासा जाब परम कण्हावण्णेण पण्णता ॥ काचर-महो गौतम ! छ सघपण में में एक भी सघपण नहीं है, क्यों की मन के शरीर में हड़ियों, शिरा व स्नायु नहीं है परनु पो पुद्र अनिष्ट, प्रतिकारी यावत् अमनोज होते है वे रूप से मयकर शरीरपने परिणम । यो सासवी पृथ्वी ता जानना ॥ १३॥ प्रश्न-पो भगवन् ! नारकी को कौनसा सस्णन का उत्तर-पो गीतमा स्थान के दो मेद को तय ग-माघारनीय व उचर चक्रेय दोनों शरीर का हुर सस्थान का यों सातत्री पृथ्वी तक काना ॥ १४ ॥ प्रश्न-पो भगवन् ! इस रत्नममा पृथ्वी में रहे हुने नारकी का सा पर्ण कहा ? उत्तर-अहो गौवम ! काळा, कालामाप 8वीसरी प्रतिपत्ति में नरकका दमरा रदशा ++ एवं आव अहेसत्तमा ॥ १५ ॥ इमीसेण मते ! रमणप्पभाए पुढवीए नेरइयाण सरीरया केरिसया गधेण पण्णता ? गोयमा। से जहानामए अहमहतिवा तंचव जाव अहे सचमा ॥ १५ ॥ इससेण मते । रयणप्पभाए पुढवीए नरइयाणे सरीरया केरिसया फासेण पाणचा ? गोयमा ! फुटितत्यधिविच्छविया, स्वरफरसा ज्झाम झुसिरा फासेण पणाचा एव जाव अहे सत्तमा॥ १७ ॥ इमीसेण भंते। रयणप्पमाए पुढवीए नरइयाण केरिसया पोग्गला ऊसासत्ताए परिणमति ? गोयमा । को अनुवाद-पालप्रमषारी मुनि श्री ममोलक पिनी पापक रामापारादर छाला सुखदेवतायनी बाणामसादमी गाला, यापन् परम कृष्ण वर्ण का है यो सातों पृथ्वी के नारकी का मानना ॥१५॥ प्रश्नो मग पन् ! इस ररनममा पृथ्वी के नारसी के शरीर की कैसी गंध की ! उचर-अहो गीतम' मैसमृत सर्प का सेपर बगैरा अमा पारसे नरक स्थान की गय की पैम दी जानना यो साता पृथ्वी के नारकी का नाना ॥ १६ ॥ मन-ओ भगवन् ! इन ग्लममा पृथ्वी के नारकी का कैमा स्पर्श कहा है ? उसर- महो गौवम ! फटी हुई कांति रहित, यति कठिन दग्ध आया व पान छिद्रवाली चपरी उन नेरियों की सी॥१७॥ प्रश्न-पो ममवन् ! इस रत्नममा पृथ्वी के नारकी केसे पुगनें समासपने प्राण करते हैं। उचर-महो गौवय ! पो मानिष्ट, यावत् अमनाम पुदमा रेन को रमासपने ग्राम करते।

- मादा समय से मुनि श्री अमोलक अपिभी 10 गाउयाइ ठकोण चचारि गाउयाइ, सकरप्पभार पुढवीए जहणेण तिण्णिगाउयाइ उक्कोसेण अडुट्ठाइ गाठयाइ एष अगाउयाइ २ परिहारपति जाव अहे ससमाए, जहणेण अहगाउय उकासेण गाठय ॥ २४ ॥ इमीसेण मतेरयणप्पमाए पुढवीए नरतियाण कति समुग्धाता पण्णचा ' गोषमा ! चचारि समुग्धाता पण्णता तजहा- पेदणा समग्घाए कस'य समुग्याए, मरपातिय समुग्घाए, वेठब्धिय समुग्घाए । एच जाब अहे सत्तमाए ॥२५॥ इमीसेण भते! रयणप्पमाए पुढवीए नेरतिया केरिसय खुह- पिवास पचणम्भवमाणा विहरति? गोयमा ! एकमेकरसण रयणप्पमा पुढधी निरइयस्स सार वोन गाव, पालुक प्रमा के नारकी नघन्य अव गाउ उत्कृष्ट तीन गाउ पफ ममा के नारकी जघन्य हो गार उत्कृष्ट अहाइ गार, धूम्रममा क नारकी जघन्प देव गार उत्कृष्ट दो गाउ, सम प्रमाके नारकी मपन्य एक गाट उत्कष्ट देव गाउ भौर समस्तम-ममा के नारकी मघन्प बापा गाउ उत्कृष्ट एक गाउ ॥ २४ ॥ प्रश्न-महो मगन् ! इस रस्नममा पृथ्वी के नारकी को जितनी समुहात की है ! पर- मारो गौतम ! चार समुदाय की जिन का नाम वेदना कमाय, मारणानिक बैक्रय यो सानी पृथ्वी पर मामना ॥ २५ ॥ प्रश्न-महो मगवन् ! रत्लपमा पृषी के नारकी रेसी क्षुषा पिपासा माशा-राजायरादुर शाला पुखदेवमनयमी याला प्रसारनी 41 पतुर्दश नापामिगम सूत्र तृतीय उपा असम्माव पथवणाए सबोदधीवा सन्च पोग्गलेवा मासयसि पक्खिवज्जा णो चेवण से रयणप्यमाए पुढवीए नेरइए वितिचे वासिचापि तण्हे वातिचा, एरितियेण गोयमा रयम- प्पभाए जेणेरइया खुइप्पिवास पञ्चणुब्भवमाणा विहरति एव जाव अहे सत्तमाए ॥२६॥ इमीसेण भते ! रयणप्पमाए पुढवीए नेरतिया किं एकत्त पभू विउविचए पुहत्तपि प विठवित्तए ? गोयमा ! एकत्तपि पमू विउवित्तए पुहुत्तपि पमू विउवित्तए,एगत्त विठन्वेमाणा एगमह मोग्गररूवेषा, 1, मुसुढरूवथा, एव मोगर मुसुढि करकत्त असि भनुभनस हुचे विचरसे है।उ घरमा गौतम! मसत्य कल्पना से मप समुद्र का पानी अथवा सब पुद्गल उ7 के मुस्त्र में दाल दने से थे तृप्त नहीं होते है, तृपा रहित नहीं दासे हैं अहो गौतमारत्तममा पृथ्व के नारकी ऐसी क्षुघा पिपासा का मनुमत्र करते हुवे विचरत । यो सामों पृथी तक मानना ॥ २६॥ भव पक्रेय शरीर की वक्तव्यता कासे हैं प्रश्न-महो मगरन् ' रत्नममा पृथ्नी के नारफी क्या एक रूप की विषणा करने में समर्थ है या अनेक कप की विकुवर्णा करने में समर्थ है ? सचर-बहो गौतम ! एक कप की पिकुर्षमा करने में भी समय और अनेक रूपकी चिकुर्वणा करने मी में समर्थ हैं मय एक रूप की बिकुणा करते हैं तब एक पटा मुद्र, मुसडी, करवत, खह, शक्ति, छ, गदा, मुशल Natीसरी पतिपचि में नरक का दारा उदेका र अमवादकपालमापारी ने भी समोफक प्रापिनी सची हल गया मुसल चकणाराय कुंत तोमर सूल लउड भिडिमालाय जाव भिडमाल रूववा जाव पुडुत्तपि विउन्वेमाणा मोग्गर रूवाणिवा जाव मिडमालरूपाणिवा ताइ सखेबाई नो असखज्जाइ सघद्धाइ नो असबढाइ,सरिसाइ नो असरिसाइ विउन्विचा अण्णमण्णस्त काप अमिहणमाणावेदण उदीरति उज्जल विउल पगाढ कक्कस कहूय, फ्रुस णिहर चह तिव्य दुक्ख दुग्ग दुराईयास एष जाव धूमप्पभाए पुढपीए छ? सचमासुण पुढधीसु नेरइया पभू महताइ लोहिय कुथुरूवाइ वयरामयतुडाइ गोमय प्रकाश रापणदुर लाछा मुखदेव सहायनी ज्वाछामसारी चक्र, बाण, पाठा, तोमर, त्रिशूल, छकुट, मिडियाल के रूप बनाने में समर्थ हैं और बहुत रूप वैक्रेय फरते हुये बहुत मुदूर पापम् बहुत मिरिमाल के रूप की पिकुणा करो में समर्थ है ये सरपात रूप पमा समता,परतु मसरूपासनपना सकते हैं, मपने शरीर की माय सघाले पनासकाचे परतु मपप विमा के नही बना सकते हैं, अपने रूप मेसे रूप पनापे परतु मसदृश का पनाये ना, एमे रूप की पिकुणाकरके परस्पर काया की घाव करते हुए पेदना की दीरणा रे उम्पल, पिपुष्ठ, मगार, कर्कश, कदुक, कठोर, निप्दुर, घर, तीन, दुासकारी, विषम प मतुरस सहन न होसके पैसी पेदना मनुमरते हुने विषरत एमे ही पांमपी धूम्रममा पृथ्वी का मानना पीन सामी पृषी में नारकी हा कुकुरूप बसमय, - त्र पत्तुर्दन-जीवामिगम सूत्र तृतीय उपाल dan कीडसमाणाई विउन्यति कीड समाणाई विउन्विचा अन्तमन्नस्सकाय समतुरगेमाणा २ खायमाणा २ सयपोरगकिमियाइ पालेमाणे २ अतो २ अणुप्पधिगमाणा २ वेयण उदीरयति उज्जल जाव दुरहियास ॥२७॥ इमीसेण भते! रयणप्पहार पुढवीए नेरइया कि सीय वेयण वयति, उसिण घेयण यति, सिउसिण वेयण वैयति गायमा! जोसीय वेयण वेयति उसिणवेयण वेयति, ना सीउसिण घेयण यति अप्पयरा उण्इ- जोणिया एवं जाव बालुप्पभाए, ॥ पकप्पभाए पुष्छा ? गोयमा ! सीयवेयण यति उसिणवेयण वेयति नो सीठासण वयण यति, ते यहुयरगा, जे चिपाले गोमय के कीडे समान रूप की विकुणा करके परस्पर एक दूसरे के शरीर में प्रवेशकर, नीले, भाराहम करे, ममान घोटे मैसे माक्रमण करे, एकर के शरीर का भक्षण फरते हुए पूर्वोक उज्वल यापत् नहीं सहन हा सके पैमी वेदना प्रगट मोगरते हुये विपरवे ॥२७॥ प्रश्न-हा मगप!रत्नममा पृथ्वी के नारकी क्या सीव वदना ये दे , उष्ण वेदना पेदवे या शीसोष्ण पदना पेटते ? उत्तर-प्रो गौतम ! शीत व शीतोष्ण वेदना नह। वेदसे हैं परतु उष्ण वेदना घेदते हैं ऐसे ही शरममा सया घालुक ममा का मानना पकममा की पृष्ठा, अहो गौवम ! शीव घेदना प ऊष्ण घेदना यों दो प्रकारकी घेदते हैं परंतु शीवाष्ण बेदना नहीं भेदत हैं इसमें ऊष्ण वेदना घेदनेवाले बहुत हैं और शीव वेदना घेदनेवाले थे हैं कसरी प्रतिपचि में नरक का दूसरा उदेना ap .

उसिणवेयण धेयति ते थोवयरगा, जे सीयवेयण वेयति ॥ धूमप्पभाए पुच्छा' गोयमा ! सीयपि वेयण बेयति उसणपि वेयण वेयति, नो सीउसिण घेयण यति ॥ ते बहु- यरगा जे सिय वेयण धेयात ते थोवयरका जे ठासण घेयण वेयति ॥ तमाए पुच्छा ? गोयमा ! सीय वेयणा यति, नो उसिण वेयण यति, नो सीउसिण यणा वेयति एव अह सचमाए, णवर परमसीय ॥२८॥ इमीसेण मते! रयणप्पमाए पुढवीए गैरइए केरिसय निरयभव पञ्चणुब्भवमाणा विहरति ? गोयमा ! तेण तत्थ निच्च भीया निश्चवहिया निषतासिया निच्च तत्था निच्चउन्बिया निघउडुया निचपरमसुभमतुल- घम्रप्रभा की पृच्छा, बहो गौतम ' पीस घ उष्ण मेदना वेदवी परतु भीमोष्ण घेदना नीं घेदसे इस में शीत पदना पेदनवाले बहुत जोर और उष्ण बेदना घेदनेराले योटे नीर । तर प्रमा की पृष्ठा बो गौतम ! भीम घेदना वेदसे हैं परंतु अष्ण , शीतोष्ण बेदना नर्श वेदने हैं, ऐसे ही सामषी पृथ्वी में करना परंतु इम में परम शीव वेदना का कहना ॥ २८ ॥ प्रश्न-पो भगवन ममा पृथ्वी के नारकी फैसा नरक भव का भनुम करते हैं? पचर-भो गौतम ! रेप सौप मय मीस पने दुवे, निश्नर काशील, स्वतःही प्रास पाते हुए परमायामी से निरवर प्रास पाये वे निरतर रिदेवराम, निरंतर पदरपाछे, विपिम्मान मुखको नारा प्राप्त करते हुवे बद्ध, बतु र अनुबद्ध + मनुषदक-पालममाम मुनि श्री अमोलक पिभी नर्थ पाक शमानहादुर लाला मुखदेवमायनी पासप्रदिपी. रत्र- पतुदेश मामिगम मूष-सनीय उपाRE मणुपर निरयमई पचणुम्भवमाणा विहरति एव जाव अहे समाएप पुढवाए ॥२९॥ अहे सत्तमाएण पुढयीए पंच मणुतरा मइति महालया महामरगा पण्णचा तजहा-काले महाकाले रोरुए महारोरुए अपइट्ठाणे ॥ तरथ इमे पच महापुरिसा अणुसरेहिं ६समादाणेहि कालमासे कालकिचा अप्पाहाणे निरए नेरइएसाए उपचार संजहा-रामे जमदगिपुसे, पढाउले छापुचे, व उपरिचरे, सुभूमे कोरवे, वभपसे धुलणीसुए, तेष तत्थ णेरड्या जाया, काला कालो आव परमझिम्हा पण्णेण पम्पचा तेण तस्य पेयण व्यति मन का गनुभव करते हुने विचरते । ऐसे ही सावी मरक पर्यंत मानना ॥ २९ ॥ सत्री पृथ्वी में अनुचर पारान महा मारपसारे पनि नरगस को मिन नाम-माल, माकाल, रोरुप, या रोग्य सवातियान इन पाप नरकावास में पविमान पुलों, मनुघर,प्राणीसा करने वाले, र भषयताप सपास के गबसर में काम कर के नसबर मिन के माम-१ अमदामि का पुत्र राम मिस को परशुराम करत है, २ गया पुत्र हावा पमुरामा परिवर वाला मुभम चक्रवर्ती भोर ५पारहमा मसरच पक- पूनी का पुत्र ये पायो यहां अपना मागत् परम कृष्णवर्णवाले नारकीपने उत्पन्न हुए पेपर्स 42वीसरी प्रतिपचि में नरक का मिरा देखा + मनुवादक-मालामधारी मुनि श्री भगोडसपिभी 87 उज्जल विउळ जाव दुरधियास ॥. ३० ॥ उसिण वेयणिज्नेमण भते । नेरइया केरिसय उसिणधेयण पणुम्भवमाणा विहरति? गोयमा! से जहा नामए कम्मारदारए सिया तरुणे पलय जुगव अप्पायके थिरग्ग हस्ये बढपाणिपायपासपिटुतरो परिणए लघणपवणजइण (वायामण) पमहण समत्वे तल जमल जुयल बाहु (फलिह- निमवाहु) घणणिचित वलिय बद स्वधे चम्मेढग दुघण मुट्ठिय समाहय निचिय गायगचे (फायगुत्ते ) उरस्स बलसमन्नागए छेए दरले पट्टे कुसले मेहावि जिउण, सिप्पोषगए एग मह अयपिंड उदगवारसमाण गहाय त ताविय कोटियर उभिदिय २ सन्नस पापत् न सान हो सके पैसी पेदना का मनुमव करते हैं ॥ ३० ॥ मनमो भगवन् ! नारकी (वैसी फष्प पेदना पेदते हैं ? पचर महो मौवम! मैसे कोई वरुण रसवंत, युवान, अल्प रोगवाला, गय का अग्रभाग मि का स्थिर है, हाप, पाप, पीठ, पार्षद नपा मिस की सहै, अतिशय गोल स्वपवाला, चमरे के गोटिवे पण मुख्यादिक से परे हुये गानाशाखा, मतरिक उत्साह वीर्य से युक्त, सहइपपासा, पेतासवृक्ष का युग होये पैसा समान सरख, पमे पुष्ट दो पराला, पति शीघ्र गति परिभप में समय, किसी वस्तु के मर्दन करने में समर्थ, पावर कसा में निपुन, विलय रहित कार्य ग करनेवाला, मझी तरह क्रिया का करनेपाग, अनुसंधान करने में निपुन एसा लोकार का पुन, एक महापरु-रामाबहादुरलाला पुसदेवसमायनी भयानामसादनी. .

ag चतुर्दश-नीपाभिगम मूम सृनीय उपान + बुष्णिय २ जाव एगाहवा दुयाहा तियाहया उक्कोसेण भडमास साहणेजा, सेण स सीयभूय आउमयेण सहासरण गहाय असम्भाष पट्टयणाए उसिण वेयणिज्बेसुय नरएसु पक्खिवेजा, सेण त उम्मिसिय णिमिसिएण णिमिसियतरेण पुणरवि पच्चु- हरिस्सामि तिकटु पविरायमेव फासेज्जा पविलीणामेष फासेज्जा पविद्धत्थमेव फासेजा (पासेजा) नोचेवण सचाएइ अविरायवा अविलीणवा भविद्वत्थवा पुणरवि पच्चुद्ध- रिपए से जहावा मत्तमातगे दुपाए कुजरे सटिहायणे पढम सस्य काल समयसिवा चरिम गटे घरे नेसा लोहे का गोला भमि में सपाकर उसे घन से कूटकर धारवार पनाये या एक दिन, दो दिन पावत् पमरा दिन व उस लोहे के गोले को अमि में पाकर घन से घटे पीछे अच्छी वह उसे ठंडा किये पाद से सहासी से परुड कर मष्ण बेदनापाले नारकी के शरीर में रखे रखते समय ऐसा विचार करे कि में भाष मेपोन्मेष (पलक) में स गोलेको शरीरमें से नीकालूगा परंतु इसने उस गोको चप्स परीरकी पिसे मक्खन जैसे गलता पिगलका हुवा भस्म होता हुवा देखे परतु उसे ऐसाही नकार सके न नरकमे ऐसी ऊष्ण घेदना कहीं है या दृष्टान्त असद्भाव (कल्पिता है इसके विशेष खुलासा किये हमरा रट व काते हैं जैसे पाट पर्षकी वयवाला सरुणप्रथम शरत्कालमें अथवा पग्मिन ग्रीष्म ऋतु(ज्येष्ठ मास)में हैं तीसरी प्रतिपचि में नरफ का दूसरा उद्देशा 42 निदाहकाल समपसिवा, उहामिहर सम्हाभिहर वाग्गजालाभिहए मारे जसिए (मुसिए) पिवासिए दुबले किरते एक मई पुक्खरिणि पासिबा घाउकोण समतीर अपुग्यसुजाय पप्पगमीर सतिल जल सछन (पउम) पचमिसमुणाल बहुउप्पलकुमुय मलिण सुभग सोगाधेय पुडरीय (महापुडरीय) सयपत्त सहरस- पत्त केसर फुल्योवचिय छप्पयपरिमुजमाण कमल भण्ठ विमल सलिल पुग्ण परिहत्य भमत मच्छकच्छम अणेग सठणगण मिहुण घिचरिय (विरइय) सदुलह महुर सरमाइय (तपासइ) पासित्ता त उगाहर उग्गाहिता, सेण तरथ उण्हपि पविणेजातिहपि +4 मनुराम- नामपारी मुनि श्री ममोपक पिनी सापकानपहादुर लामा मुलदेवतायमीनागासामी. कृपया मे दस बना हुवा, तृपा से परिव बना हुवा, दामामि की ज्वामा से रणाया हुवा, भानूर मवस्या दुर, पका हुवा, मदोन्मत्त, मूगर से पानी पीने का इच्छित पेमा इस्ती एक घार बोनारासी, सिमपना गरिस, मनुनाम से नीया मई मया, गमीर बीतम नसबाग पानी से रकाते हुये कमपत्रों पसमबनासपासी (किमी मन में पपरता) पास सूर्य विकासी, पद पिकासी, पैसे की बम्प कमल, पापित कम मत कम छाकमा, वाम समस, सो पांसरो का उमड, केसर प्रगान मस, अमर मातिने यामरे होवे कमलयालमे, स्फटिक ममान निर्म पानी से परिपूर्ण, भविषष मत्स बससे मरी बनेक पतियों के समुपसले पुनस से मुंभावमान पनी ई पापरी ो पर - त्र # नतु यामिगम सूत्र तृवीप सफा पविणजा, खुइपि पविणेजा जरपि पविणेजा दाहपि पविणेबा णिहाएजवा पयलाएजधा मुर्तिवा रतिवा धिर्तिवा उपलब्मेजा, सीए सीयभूए सफममाण २ सायामुक्त बहुले- यावि विहरिजा एषामेव गोयमा ! असम्भावपट्टपणाए उसिण वेयणिहितो मरएहितो नेरइए उवहिए समाणे जाइ इमाइ मणुस्मलोयसि भवति तजहा- अयागराणिया, तबागराणिवा, तउगराणिया, सीसागराणिवा, रुप्पागराणिवा, हिरन्ना गराणिवा, सुवनागराणिवा, कुभागराणिवा, [ कुभारागरागणीवा कुभारगिणीवा ] तमागिणीवा, इयगिणीवा, कोलुयगिणीवा, लोहारबरसिया, जतवाडचुल्लीबा, ह हयलिष्यणिया, सोडेियलिच्छाणिवा, पलागणीतिया, तिलागणीतिघा, कुसागीतिवा उन में बैठे उम में भपनी मा तृपा शास को, पहा हे हुने सल्लक प्रमुख मृण विशेष उस मे अपनी श करे, नलपान से परिताप भी शान करे, सपा तृपा शांत हाने से मुखपूर्व कदिालो, मनला कर और उम म श र सस्य कर, उसपे करन रूप मति माप्त करे, पाय व अंतर से हासिल होणे, निवृति मे सास की प्राप्ति पर, भानि स सस्पन्न हुघा जा दाह सप्त रहित पन सुख भोगवता हुगतिको महा गौतम ! एसेही असदाय फलाना से उष्ण बेदना मोगवे हुए नरक के नरियों को नरक से सालभर इन मनुग मेक में लोड को गोलने का महा मुपा नायक पत्र, ताम्रा गालने का म, साम । नेफा पान, चारी गालने का पाष, सुवर्ण गाठोका पत्र, कुमकार का मिडि, वीसरी मविपत्ति में नरक का दूसरा उदशा 42 . .

4. अनुशक पालप्रमपारी मुनि श्री ममोहक प्राविना तत्ताइ समजाइभूयाई फुल्लकिसुयसमाणाइ उका सहस्साई विणिमुपमागाइ जाला सहस्साइ, मच्चमाणाइ, इगाल सहस्साइ पविक्खरमाणाइ अतोर हुहूयमाणाइ चिट्ठति ताइ पासति ताइ पासिता ताइ उगाहइ ताइ उगाहिता सेण तत्थ उण्हपि पावणिज्जा तव्हपि पविणिज्जा, खुद्दपि पविणिज्जा, जरपि पविणिज्जा दाहपि पविणिज्जा, णिदाएबवा पयलाएब्बवा सइया रइवा धिइवा मर्तिवा उवलम्भेजा सीए सीयम्भूए सकममाणे २सायसुक्ख बहुलेयावि विहरेजा, भवे एयारूवो सिया?णोइणटेसमटे गोयमा! उसिमवेयाणज्बेस नरएसु नेरइया एतो अणि?तारयचेव उसिण वेयण पच्चणुभव इटों पकाने का स्यान, कुंमकार की अमि, तुमा की भामि, इटपकाने की अग्नि, करेलु पकाने की मामि, गोहा तपाने की अपि, पुरम मा गुट मनाने की अपि, स्टो की भग्नि, सौरक मामि, नदामि, दिल की अग्नि तीसरों की आन, इत्यादि सब ज्योतिमून मनी हुई किंशुक पुष्प समान रक्त बनी हुई. हमारी मछे जिस में से नीरळती हावे देसी इमारों ज्वालायर्यो नीकालती हुई, हमारों भगार फेलादी हुई एपी धगधगायमान भनि देखकर उम में नरक के मीप प्रवेश करे तो में नोपों यहां कप्णता, तृपा, क्षा, पर, दार शांत करे मोर इस से या निद्रा लेमे, साता प्राप्त करे, रति, पृति, मवि प्राप्त करे उम मा श्रीव, शीवम्त मानते हुये सुख पूर्वफ रो रो गौतम ! इस से मी मनिष्ठवर ऊष्ण बेदना पफाशक रानाबहादुर लाला मुखदेवमहापभी नासाप्रसादमी - - - चतुर्द मीषामिगम एम-तृतीय उपान Nath मागा विहरति ॥३१॥ सीय वेयणिज्जेसुण भते! नरएस नेरइया करिसय सीयवैयण पञ्चणुभवमाणा विहरति ? गोयमा ! से जहा नामए कम्मारदारएसिया तरुणे जुग बलव जाव सिप्पोवगए एक मह अयपिंड दगवारसमाण गहाय ताविय २ कुट्टिय २ जाव एगाहवा दुयाहवा तियाइवा उक्कोसेण मास इणिज्जा सेण त उसिण उमिणभूय मायामएण सहासएण गहाय असन्मावपट्ठवणाए सीयवेयणिज्जेसु नरएसु पक्विविजा सेय भोम्मिसियनिम्मिसिएण पुणरवि पच्चुरिरसामि तिकटु पविरायमेव पासिज्जा त चेवण जाव णो सचाएज्जा पुणरवि पाचुडरिचए॥से जहा नामए मत मायगेवा तहेव नाव सुक्खबहुलयावि विहरेवा एवामेव गोयमा! असम्माव पट्टवणाए सीयवेयणहितो णेरइए उबटिएसमाणे जाइ इमाइ इहमणुस्स लोए हवति तजहा नारकी के जीप दते ॥३१॥ प्रश्न-अहो भगवन् ! शीत पेदना वेदवे हुवे नारकी कैसी बीस पेदना घेदते हैं। उत्तर-पहो गौतम ' नेमे कोई युवावस्यानासा,पळवत याषत् सप कला में निपुण लोकार एक लोहे का गोलाको आधि में हालकर कुटे. यो एक दिन,दो दिन,तीन दिन यावन् एक मास पर्यंत कूटे,फोर उसे लोकी सदासी से पकटकर नीत पेदना पाळे नारकी के शरीर पर इम विचार से रख कि पेपोन्मेष (पल) मात्र में पीछा ले लेऊगा, परतु यह तत्काल विखर माने से उसे पीछा लेने को समर्थ नहीं हो 40+ सरी प्रतिमचि में नरक का दूमरा उदशा 4th कामपादक-बाध्यममा मुनि श्री ममोखा रिमी- हिमाणिवा हिमपुजाणिवा हिमपहलाभिषा हिमपटलपुजाणिवा तुसाराणिया, तुसार पुजाणिवा हिमकूड णिश हिमवकूडपुजाणिवा सीयाणिवा ताइ पासाइ पासिता ताइ उगाहइ उग्गादिचा से तस्य सीयपि पविणिजा साहपि पविणिज्जा खुद्दपि विणिजा जरपि पवित्रा निदाएबवा पयलाएबवा आव उसिणे डसिणभूए सकममाणे२ साय सुक्ख बहुले तावि विहरजा गोयमा ! सीयवेयणिज्जेसु नरएसु नेरइयातो अणिद्वतरिय चव सियवेयण पवणुममाणा विहरति ॥३२॥ इमीसेण भते ! रयणप्पहाए पुढवीए नेरइयाण केवाय काल ठिई पण्णसा? गोयमा ! जहन्नणवि उकोसेणधि ठिई भाणि. सकता है भया जैस माठ वर्षाला रस्ती पाषन् पावही की पास आकर मुख पूर्वक से पैसे से शीत वेदनावाल गारकी को यहां स नठा कर इम मनुष्प लोक में हिम, हिम का समुर, रिम के पहर, तुपार, सुपारपुन, हिम रे फूट प हिमकूट के समु' में प्रवेश कराये सो पहां उस की शीव, तृस,रुपा । पर शीत रोपे इस से पापा निद्रा र प्रषठा फरे यावत् छष्ण ऊष्णमून पनर सुख मोनता दुवा विघरे महो गौतम ' इस से मी अनिष्ठर शीत पेपना नारकी नीष वेदवे वे विचरते ॥ १२॥ मन-महो मगन् ! इस रस्सममा में नारकी की कितनी स्पिति जी! पचर-पो मौतम! बपन्य दर हमार पर्प पत्कट एक सागरोपम की, र प्रमा २ लपम्प ए सामरोपम एसा नीन सामरोपम, माकसमादुर बला सदरमामा मासामसारणी " ++ पतुर्दश भावाभिगम मूम सवार साल 4 यान्वा जाव भहे सत्तमाए ॥ ३३ ॥ इमीसेण भते ! रयणप्पहाए नेरच्या अणतर बालुरु ममा में जयन्य तीन सागरोपम पत्कष्ट सात सागरोपम, परमया में नपन्य साव सागरोपम पत्कृष्ट दश सागरोपम, धूम्रममा में मपन्य दश सागरांपम उत्कृष्ट सपरा सागगेपम, तमासमा में जघन्य सचरा सागरोपम उस्कृष्ट पाबीम सागरापम भौर सपस्वमम्ममा में अपन्य पापीस सागरोपप उत्कृष्ट पीस सामरोपम मा माधों माफ के ४९ पायरे की पृथक् २ स्थिति का ? रत्नममा पृथ्वी के परिळे पायरे की मपन्य दशमार वर्षे सत्कृष्ट ९० हजार वर्ष की दूसरे में बधन्य दश लाख पर्प सत्कए ९० लास वर्ष, घीसरे में अघन्य ९० लाख वर्षकी उत्कृष्ट पर्व कार वर्षकी, चौधे में मपन्य पूर्व फोट पर्प उत्तर एक सागर के पक्ष माग कर वैमा एक भाग की, पवित्र में अघन्य सागरोपम का दशवा भाग चस्कएको दसा माग, छठे में मपन्य सागरोप का दो दशा माग उत्कृष्ट सीन वषा माग, सासरे में जघन्य सीन दवा भाग उत्कृष्ट पार दनवा माग, माठरे में जघन्य चार दशवा भाग उलट पांच दशना माग, सपने में जघन्य पांच दशनामाग भत्कृष्ट छ दशया भाग, रश में मपन्य ७ दशामाग उत्कृष्ट सास दशा माग, अग्याराव में मपन्य सातदश माग उत्कृष्ट भाठदश भाग पारने में अपन्य माठदश भाग कृष्ट नवदन माग और वेरावे पायमें भघन्य एक सागरोपम के९५श्वे माग, उत्कृष्ट ए सागरोपमकी स्थिति पेसेहा मन्पनरक में मिनी स्थिति ये से निपने पायटेाषे उक्ने से मागकर फिर प्रत्येक पायटे में एक २माग बरा हो सा पायर स्थिति कहना यो मम पृथ्वी में नानना विस का पत्र ॥ ३३ ॥ मरे वीसरी भविपचि में नरक का दू। उदा ८ रत्नममा ११ पापटे २ जघन्य सागर 10वार १०लाख ९. लाल फोट दिमाग वर्ष पर्प पूर्व सागर ९० हमार९. सास फोर पूर्व विधाग पर्प वर्ष . . . . . मनुवादक-पासप्रमचारी मुनि भी ममोह हरिनी '+' - १ प्रकाधक-रामापरादुर काला सुखदेवमहायमी बामप्रसार २ ६ ८ १ २ २ शरममा ११ पायडे संपन्य सागर दिमाग सागर दिमाग . , ७ ८ 7 . ८ , ३ ५ ९ - चतुर्दश-मीमाभिगम सम-मृतीय पपा 4 ३ 11 पालक प्रमा९पाय। सागर ३३ मधन्प दिमाग + सागर ३३ एस्कृष्ट दिमाग 1510 PlPnA ४ S 7 १ : ७ beku पंक प्रमा७पायो सागर विभाग सागर सस्कृष्ट दिमाग |" " VI" v-11 १० 9 . धूम्रपा ५ पापट मपन्प सागर घिमाग सागर दिमाग 1:15 3. 332 . ५ . ६ १ २ ३ २० buys बमापमा३पापरे सागर बिमाम उत्कृष्ट सगर विभाग . -- तमस्समाप्रमा पा. भघन्य सागर २२ उत्कृष्ट सागर ७ २ . -14 48.7 तीसरी प्रतिपत्ति में नरक का दूसरा उदशा मनुवादक-पामामधारी मुनी भो भमोलसपिमी + उम्पहिय कहिं गच्छति कहि उवयमति कि नेरइएस उवववति किं तिरिक्त ओणिएसु उवववति एव उपप्पा माणियठया जहा यकतिय तहा इहपि जाव महे सस्तमाए ॥ ३९ ॥ इमीसेण भते ! स्यषप्पभाए पुढधीए नेरइया केरिसय पुढवी फास पधणुम्भवमाणा विहरति ? गोयमा | अणि? जाव अमणाम एष जाव अई सफमाए ॥ १५ ॥ इमीसेणं भते ! रयणप्पमाए पुढवीए नेरइया फेरिसय माउफास पघणुग्भवमाणा विहरति ? गोयमा ! अनिट्ठ जाव भमणाम एष जाव अहे सतमाए एष आव वपस्सई फास भहे सत्तमाए पुढवीए ॥ ३६॥ इमीसेण भते रयणप्पमा भगवन् ! रत्नपमा नाक से मारकी मीकालकर को मात को उस्म होते?? पचर-पो मौतम! सगनाप्पुमानि(पाणायकी,मेडी पर्वना यांना वो सावची पृथ्वी पर्यंत करना॥१४॥ महो मनवन् ! इस रस्नममा पृथ्वी में नारकी वैसा पर्वका अनुमा करते हुए रिवरसे मो गौतम ! मनिह पावत् सपनाम पम अनुभव करते हुए पिचरते हैं यो साली पृथ्वी तक मानना ॥ २५ मो मगान् ! इस रस्नममा पृनी में नारकी सा नपकाया के सर्ष का अनुभव करते हैं ! पचर- भो गौतम ! भनिष्ट पावत् नमनाम मकापा का पर्व करते। यो सामी पृषी पर्वत काना ऐसे ही बनताविकापास पर्वत नापी गरी वा सर पीनों में बनाया महो मनान् । मकरानागार काबा पुलदेवमहामनीबागपसाद. .

रबर चतुर्दश-जीवामिगग मूत्र-तृतीय पार ARAN पुढवीए दोच्च पुढवि पबिहाय सम्म महुतिया याहल्लेण सच्चस्खुडिया सम्बते' इता गोयमा!इमीण भतारयणप्पभाए पुढवीए दोचपुढविपणिहाए जाव सब खुड़िय सम्वनेसु? इतागोयमा । दोच्चाण भत ! पुढवी तच पुढधी पणिहाय सव्व महतिया वाहलेण पुच्छा? इता गोयमा ! दोघाण पुढवी जाव खडिया सन्यतेसु ॥ एच एएण अभिलावेण जाव अट्ठिया पुढवी । अहे सतमि पुढविं पणिहाय जाव समस्खुडिया सम्बतेसु ॥ ३७॥ इमीसेण मते ! रयणप्पभाए पुढपीए निरयपरिसामतेसु जे पशुविकाइया जाय पणस्सइकाइया तेण भते । जीवा महाकम्मतरा चेव महा सतरा व महावेयण सरा घेव ' हता गोयमा ! इमीसेण रयणप्पमाए पुढवीए णिरयपरिसामतेसु तहेव यह स्लिममा पृथ्वी दूसरी र प्रभा से नाराइ में साबटी है पोराइ में क्या गोटी हां गौतम! से करे, क्यों कि रस्लममा पृथ्वी का एक साल मस्सी इमार पोमन का पृथ्वी पिर, भौर पर- ममात्र एक साल पचीत मार पोमन का पृथ्वी, पिंड है और रलममा पृथ्वी एक रम्नु की छम्पी चोटी है और पारममा पृथ्वी दो रन्जु की लम्बी चौरी यो इस अभिलाप से छठी पृथ्वी का कहना पायत् सातमी पृथ्वी की अपेक्षा छठी पृष्जी सम्बाइ पोलाद में सबसे छोटी ॥३७॥ वो भगवन् ! इस रस्सममा पृथ्वी में भो नीकापिक पावत् समस्पनि कापिक मीयों? क्या महा कर्म महा माश्रय H+वीसरी प्रविधि में नरसका दुमरा,मेशा Hi नपारामारी मुनि श्री ममा कारिणी जाव महाकम्मतरा व महा आसवतरा-घेव एव जाप अहेसत्तमाए ॥ ३८ ॥- इमीण भैसे ! स्यणप्पभाए पुढवीए तीसाए निरयावास सयसहस्सेसु मुकमेकसि निरयावाससि सव्वेपाषा सव्वेमया सध्वेजीवा सन्वेसत्ता पुढवीकाइयचाए जाव घणस्सा काइयत्तार नेरइयत्ताए उवयमपुन्या ' इता गोयमा ! असइ अदुवा अणत खुत्तो, एव जाव भहे सधमाए पुटवी गर जस्य जतिया परक | गाहा ।। पुढवीं उगाहिता नरगा सठाणमेव पाहल्ले विक्सम परिक्खेको वन्नो गधीय फासोय ॥१॥ तेसिं महालयाए कामारामार बाबा एसदेर हामीमामा. मा वेदनापासे क्या है? गौतम ! ये भोपों जैसी है पो सातवी पृषी वक काना ॥ ३८ ॥ भो मगरन् ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी के तीस मास नरकावास में के एक २ मरकापास में मप माण, भून, मीब सस पृषीमापापने यायत् पनस्पतिकायापने क्या पालि उत्तम हुए ? । गौतम' बनेक पार पथमा अनंतार से जीवों सत्पम हुए यो साती पृथ्वी के पृथ्वीमाया यावत् बनस्पतिकापाका मानमा विशेष में बा बिसने भरकावासरे वहां रतने काना, अब गापा का कई बार पृषों जिवनी, पृपी में मामा कर जो नर सान। सो पसाया, नरक का मस्सान, इस का बारपना, सा, पशिषि, वन, गंध, रस, स्पर्ष, माफ स्तिनी ही सो उपमा से दवमार, पोर । फरक म तुर्दष-मीयामिगम सूत्र-तृतीय पास 4 उपमा, देवेण होइ कायन्वा जीवाय पोग्गलावकमति, तहसासया निरया ॥२॥ उपवाय परिमाण, अवहारुचवमेव सघयम ॥ सठाण बन गधे फासे उसास माहारे ॥३॥ लरमा दिट्ठी णाणे जोगुवओगे तहा समुग्धाए ॥ तचीय खुप्पिवासा विउवण्णा यणायभए ॥ ४॥ उपवाओ पुरिताण उवम्म घेपणाय दुविहाय ॥ ठिई उवभा पुढवी उववाओ सन्य जीवाम ॥ ५ ॥ एयाओ सगहाणगाहाओ । वीउद्देसो सम्मचो ॥ ४ ॥ २ ॥ इमीसेण मते ! रयणप्पहाए पुढवीए नेरइया केरिसय पुग्गल परिणाम पचणुभव नरक में उत्पन्न होते हैं, पाश्चत नरकापास,उपपात-एक समय में कितने नारकी उत्पमोवी मोर पहा से उतरे, नरकापाल की ऊंचाइ, नारकी का संपपन, सस्पान, वर्ण, गंप, रस र स्पर्य, भासोवास, भार, मेश्या, रएि, मान, योग, उपयोग, समुदात, क्षुधा, नृपा, निपुणा, पेदना, भप, पाप पुरुषों नीचे सावती नरक में उत्सब हुए उनके दृष्टान्त, दो प्रकार की पेदना, स्थिति, नवना, पृएम्यादिको सर्व भौर सब मीयों का उत्पन्न होना नवनाथन इस पहरे में कहा है। इस सनरको अधिकारका दूसरा मोमा अपूर्ण दुगा ॥२॥२॥ महो मगवन् ! इस रस्लमभा पृषी में नारकी केसे पुद्गम परिणाम का अनुभव करते हुए विपरते? Reवीसरी मविपत्ति में नमक का तीसरा देना 41 , क मनुराक नामचा अनि श्री भगक पीपी माणा विहरति ? गोपमा अपिटु जावअमणाम ॥ एवं जाव अहे सतमाए, एव पेयम्य पुग्गल परिणाम पाहा वेयणाय साय बाम गोएम अरई॥भएप सोगे खडा पिवासाय वाहीय ॥१॥ उस्सासे अणुभावे कोहे माणेय माया लाय ॥ चचारिप समामओ मेरयाम तु परिणामा ॥२॥ एस्प किर अतिवसती नर वसभा केसा जलपराय । रायाणो मडलिया जेय महारमकोईवी ॥ ३ ॥ भिन्नमुहत्तो नरएस तिरिय ममुएमु होइ पचारि ॥ देवेसु अरमासो उकोस विठवणा भणिया-॥ १ ॥ भसुमा विठवणा, खलु नेरइयाणतु होइ सन्वेसि ॥ सठाणं पिय तेसि नियमा यो गौतम ! भनिष्ट बावत् भमणाम पुल का भनुपर करते हुए विपर रो पो सरी पृथ्वी सपना इस वरा वेदना, पेश्या, नामकर्प, गोत्रर्म, भरवि, भय, भोक, धुपा, तृषा, म्पापि, पास, मनुताप, कोप, मान, माया, प्रेम, मार, मेवुन, परिखा, प सप उस में जानना बा सासमा नरक में जो भीर अस्पन होते हैं उनका कपन करते हैं इस नरक में नराम श्रेषण (बामुदेव) मसपर परत मासिक रामा रिमो महाभारम करनेवा, सौगरिक, (साई) कौटुर्मिक, ऐसे पुरुषों नरक में मानव रचर बनेय का काममान का नेरीवका क्रेय दिया अंतमुर्त सारो नियन यमुप्पन पर लिया पार अंतर्मुन सकसे,और देवधरा दिनका रखप रामे काला॥ प्रकारामारादुर लामा समायनी भासदी .

व २०९ अमुर्दशनीपभिगम सूर-तृतीय उपर हड तु गायन ॥ ५ ॥ जे पोग्गला भजिट', णियमा सो तेसि होइ अहारो ॥ ठलिय सरीर असघयण हुडसठाण ॥ ६ ॥ असाओ ( उप्पाओ ) उषवन्नो अरसाओ चेत्र जहा निरयभव ॥ सवपुढवीस जीवा, सव्येमु ठिईविसेसेस ॥ ७ ॥ उपवाण व सासो, नरइओ देवकमणावावि ॥ अझवसाणा निमिच, अहवाकम्माणु भावे ॥ ८ ॥ तेया कम्मसरीरा, सुहुमसरीराप जे अपजचा ॥ जीवण विप्पमुक्का, पञ्चति सहस्ससाभेद ॥ ९ ॥ नरइयाणुप्पामो, उक्कोस पचायण सयाइ । दुखण सप नारकीबो अनुम विकर्षणा की है और उन का सस्यान भी ९टक जानना ॥५॥ भो अनिष्ट पदों वन का आधार नारकी का होता वैश्य शरीर होने से सघयन नहीं है और Pस्थान हुडा मानना ॥ ६ ॥ सप नारकी स्पिती में भीष ममा से उत्पन होये और असाता स नरक मर का त्याग करे ॥ ७॥ कोष नारकी का भीष अपने पूर्व मपके परिचित देव के प्रसग में मुख पाये भया ममाटोरे को बध्यरसाय से मी मुख की प्राप्ति करे. अथवा धर्म के अनुमन से मर्यान् नीयर मन्म दीक्षा, केवलज्ञान इत्यादि कल्याण में प्रकाशाने से नारकी इस का अनुभव करते हैं ॥ ८॥ नरोये के मृत्युकासमें वेनम मौरगर्माण शरीर पिना मो वैफर शरीर या मूक्ष्म नामकर्म उदय स विसर कर समारों मेद (टुकडे) रूपयन बिखर जाता है ॥ ९ ॥ नारकी धन्य एक गार उत्तष्ट पपि सो गाउ पप कने पर नारसी दुःख से मपीक बने हुए है प सरसागम 4. वीसरी पतिपति में नरक का तीसरा वजा 411 न , ? .. मनुवादकपालामपारी मुनि श्री भमोसक शमी मियाम, घेयण सतसगाढा || १० || अछि नमीलियमेत, नस्थिसुहे दुक्खमेव अणुवर ॥ नरए मेरइयाण, अहानिप्त पञ्चमाणाण ॥ ११ ॥ अतिसीय मसिटण्ड, भइतव्हा अहसुहा अइमयच ॥ नगए नेरइयाण, दुक्खसताति अविस्साम ॥ १२ ॥ एत्यय मिनमुटुसो, पुग्गल असुभायहोइ अस्सामो॥ उववाओउपाओ, भत्यिसरीराय नायबा ( बोधश)॥१३॥ सेत नरइयातइओ नारय उद्दसओ सम्मतो ॥४॥३॥ से किंत सिरिक्सजोणिया ? तिरिक्वजोणिया पचविहा पण्णचा तजहा-एगिदिय तिरिक्सजोषिया, घेइदिय तिरिक्खजोणिया, तेइदिय तिरिक्ख जोणिया, चठरिदिय बना सदित है ॥ ॥ नरक के नोपों को चक्षु टपकाये जितना भी इस नी रे में दास में हो रहे से बानिश पचने स॥ ११॥ मति शीत, अति ऊष्णता, अनि तृग, माहि कुरा, मति मप, सब प्रकार के दुय नारकी को सदैव रावे॥१२॥ उक सम माया का सक्षेप में वर्ष पाने के लिये सबाणी गाया करते हैं मिभ मुर्स पुद्गल, अशुम, पैक्रय, ममाता, उपपात और भोलका टमकाना,पों इस उद्दशेकेदागें मानना नारकीकातीसग या सपूर्ण Min४॥३॥ | अन्न-विर्ष के कितने भेद सो! रचर-विच पाच भेदको अपमा-पकेमिम विपर महाशक राशरण लायसहायता प्रसारमा र्य .

4 धतुर्दश नीवामिगम मूत्र-मृतीप रा A8- तिरिक्ख जोणिया पचेदिय तिरिक्ख जोणिया ॥ १॥ से किंत एगिदिय तिरिक्स नाणिया एगिदिय तिरिक्स जोणिया पचविहा पण्याचा तजहा-पुढाधिकाइएरागिदिय तिरिक्त जोणिया जाव वणरसइ काइय एगिदिय तिरिक्खजोणिया ॥ सेकिंत पुढविकाइय एगिदिय मिरिक्खजोणिया? पुढविकाइय एगिदिय तिरिक्वजोणिया दुविहा पण्णता तजहा-सुहुम पुढविकाझ्या एगिदिया तिरिक्व जोगिया, बादर पुढधिकाइया एगिदिय तिरिक्त जोणिया। से किं त मुहुम पुढविकाइय एगिदिय तिरिक्खजोणिया? सुहम पुढविकाइय एगिदिय तिरिक्खजाणिया दुविहा पण्णाचा तंजहा पञ्जचा सुहम पुढधिकाइय एगिदिय मेहन्द्रिय निर्मप, मेइन्द्रिय विर्यच चतुरेन्द्रिय तिर्यंच व पवेद्रिय तिर्यंच ॥१॥ प्रश्न एकेन्द्रिय विर्यच के किसने भेद को उचर-एकेन्द्रिय सिर्यप के पांच भेद कहे पृथ्वीकायिक एकेन्द्रिय तिथंच यायम् धनसतिकापिक एकेन्द्रिप तिर्यंच प्रश्न-पृथ्वीकायिक एजेन्द्रिप लियच क किसने मेद कहे हैं ? उत्तर- पृथ्वीकायिक एकेन्द्रिय विर्यच के दा मेद कहे सूक्ष्म पृथ्वीकायिक एकेन्द्रिय तिर्यंच र पादर पृथ्वीकायिक एकेन्द्रिप विर्यच, प्रश्न--सूक्ष्म पृथ्वीकायिक एकेन्द्रिय तिर्यंच के किसने मेद कहे? उचर-दो मद को पर्याप्त सूक्ष्म पृथ्वीकायिक एकेन्द्रिय निर्यच र अपर्याप्त मूक्ष्म पृथ्वीकायिक दीसरी पति पत्ति में तियच का पदिला उद्देशा मादकपा ममपरी मुनि श्री भमोरपिभी तिरिक्खोणिया, अपबचा मुहम पुढविकाइय एमिंदिय तिरिक्खजोणिया । सेत सुहुम पुढधिकाइया ॥ सेम्ति चादरपुढीवकाइया ? चादरपुढधिकाइया दुविहा पण्णत्ता तजहा पबचा बादरपुढविकाइया अपजत्ता बादरपुढविकाइया से क्षघादरपुढविकाइया एगिदिय तिरिफ्लजोणिया । सेत पुढविकाइया एगिदिय तिरिक्खजोणिया ॥ २॥सेकिंत आकाइया गिंपिय तिरिक्स जोणिया ? आठकाइयाएकिंदिय तिरिक्ख जोगिया दुविदा पाना एवं जद्देव पुढविकाइयाण तहेव चउभेदो ॥ एव जाव वणस्सइकाइपा, सेत वणस्सइ काइया एगिदिय तिरिक्व जोणिया॥२॥ सेकिंत येइदिय तिरिक्खजोणिया? एरेन्द्रिय तिपंप या मूल्य पृष्णागया के मेद हुए प्रश्न-पादर पृथ्वीरायिक एकेन्द्रिय पिच कि कितने मद मे ! उतरना दो भेद को -पर्याप्त पादर पृथ्वीकायिक एपेन्द्रिय व पपर्याप्त पादा पृटीकायिक एजेन्द्रिय या बादर पृथ्वी कायिक एकेन्द्रिय का व्यन का या पृषी पापा एकेन्दिप सावन दुग ॥२॥ मम-मामा परेन्द्रिप सिर्षस करिनने मेद को ? रचर- उस के दो भेद को मेसे पृथ्वीवानापार मेद करो से ही मामा के पार र काना ऐसे ही कापा, माबुकाया वनस्पतिका के मद मानना ॥ ३ ॥ भनिए विपके किसने *मा समाबहादुर लामा मुलदेवसरापी ग्यमानी - MH चतुर्दशनीमाभिगम सत्र तृतीय सपा - बेइदिय तिरिक्खजोणिया दुधिहा पण्णचा तजहा-पजच बेइदिय तिरिक्खजोणिया अपजत बइदिय तिरिक्खजोणिया ॥ सेत्त वैइदिय तिरिक्खजोणिया ॥ एव जाप चरिदिया ॥ ४॥ सेकित पाँचदिय तिरिक्खजोणिया परिदिय तिरिक्खजोणिया तिविहा पण्णता तजहा जलपर पदिय तिरिक्वजाणिया, थलयर पदिय तिरिक्त जोणिया, वहयर पर्चेदिय तिरिक्वजोणिया॥सेकिंत जलयर पर्चेदिय तिरिक्खजोणिया? नलयर पर्चेदिय तिरिक्नजोगिया दुविहा पण्णसा तजहा-समुम्छिम जलचर पर्चेदिय तिरिक्वजाणियाय, गन्भवतिय जलयर पदिय तिारक्खजोणियाय ॥ से कित समुच्छिम जलचर पदिय तिरिक्सजोगिया ? समुच्छिम जलचर पादप भेदको चर-दो भेद को पर्याप्त भइन्द्रिय तिच मोर अपर्याप्त इन्द्रिप तिर्यम पसे है। चतुरेन्द्रिप पंत दो २ मेद काना ॥४॥ मन-तिन पचन्ट्रिय कितने भेद को ? उपर- भी गौतम ! विर्यच पर्चा द्रय के बीन मेद को वषया-मसचर, स्थळपर सेघर प्रभ-जलचर के भने भेद ? उपर-प्रसार के दो मेद का समूर्णिम जलचर वियप पन्द्रिय न गर्मन मलनर विष पवेन्द्रिय समसिम मलचर विपंच पंचेन्द्रिय की पृष्ण, रसर-दो मेद को पर्याप्त सम्म जसपर तिथंच पचेन्द्रिय व मपर्याप्त सममि जसपर वियर ५पेन्द्रिप प्रश्न-गर्भ मळचर कवीसरी प्रतिपाधि सिर का पीला उद्देशा .

+ अनुवारक-प्रसारमचारी मुनि श्री ममोपक अपनी तिरिक्खजोगिया दुधिहा पण्मत्ता तजहा-पज्जत्तम समुच्छिम जलचर पदिय तिरिक्खजोणिया, अपजतग ममच्छिम जलचर पर्चेदिय तिरिक्खजोणिया | सेल समुच्छिम पचइदिय तिरिक्खजोणिया ॥ से किंत गम्भवक्कतिया जलयर पदिय तिरिक्खजाणिया ? गम्भवधतिय जलयर पचेंइदिय तिरिक्वजाणिया दुविहा पण्णता तमहा पजराग भवतिय जलयर पबिंदिय तिरिक्खनोणिया अपजत गम्भवतिय जलधर तिरिक्वजाणिया ।। सेकित थल्यर पर्चेदिय तिरिक्खजोणिया ? थलचर पदिय तिरिक्खजाणिया दुविहा पण्णचा तजहा-चठप्पय थलयर पबिंदिय तिरिक्स. जोमिया, परिसप्प थलयर पपिदिय तिरिक्सजोणिय ॥ सेकिंत चठप्पय थलयर पर्षे. सिर पवेन्द्रिय के कितने मेद की ! पचर दो मेर-पर्याप्त गर्भन नसचर तिर पन्द्रिय र अपal गर्मम अपर तिर्वच पचन्द्रिय पा ममपर नियंत पंचेन्द्रियका भवन दुग प्रभ-स्वसवर तिच पपेन्द्रिय जिसने भेद को ? उत्तर-स्परचर तिर्यंच पपेन्द्रिप के दो भेदोवा-पतुष्पद स्सार तिर्थन वेन्द्रिय र परिभर्प स्थस घर तिर्यंच पचेन्द्रिप मन-चतुष्पद स्वसपर विर्य परेनिया के कितने मेह चर-पतुष्मद समचर लियंच पपेन्द्रिय के दो भेद को, समूगिन पतष्पर स्वापर विष विमिरा और मर्मक स्वसपर विवरचेन्दिर समूयिम स्वाभाविक पन्दिवरो भेद-पर्वात •ाा-रामायादुरगामसमरात्रीपासतारमी दिय तिरिक्खजोणिया ? चउप्पय थलयर पदिय तिरिक्खजोणिया दुविहा पण्णत्ता तजहा-समुच्छिम चउप्पप थलयर पदिय तिरिक्खजोणिया, गम्भवतिय चउप्पय थलयर पपिदिय तिरिक्ख जोमिया,जहव जलयराण तहेव घाउको भेदो,सेत्त चउप्पय थलवर पबिंदिय तिरिक्खजोणिया ॥ से कि त परिसप्प थलयर पचिंदिय तिरिक्ख- जोगिया ? परिसप्प थलयर पचिंदिय तिरिक्खजोणिया दुविहा पण्णता तजहा- उरपरिसप्प थलयर पबिंदिय तिरिक्खजोणिया, नुयपरिसप्प थलयर पबिंदिय तिरि- क्खजोणिया ॥ से कि त उरपरिसप्प थलयर पचिंदिय तिरिक्खजोणिया ? उर. परिसप्पा दुविहा पण्णता जहेव जलयराण तहेव चउक्कओ मेओ,एव भुयपरिसप्पाणवि भाणियवा ॥ सेत्त भुयगपरिसप्प थलयर पचिंदिय तिरिक्खजोणिया, सेत -- पतु ध-भीमामिगम मप्र-तृतीय उपाङ्ग + तीसरी पति-पति विर्यका पहिला नमेशा + 1 समपर्योस ऐसेती मम के दो भेद मीलाकर चार भेद नामना या चतुष्पद स्थलघर का कपन हुषा प्रश्न-परिसर्प स्पसपर तिर्यच पचेन्द्रिय के कितने मद कहे उत्तर-म के दो भेद को-उर- परिसर्प स्वसचर भौर मुम परिसर्प स्थलचर तिर्यंच पचन्द्रिय प्रश्न-उरपरिर्प स्थलचर तिर्यंच पंचे न्द्रिय के किवने मेर कारे! तर-दरपरिसर्प स्पसचर विपच पचेन्द्रिय के दो भेद को समू- . नुवार-aNILनि मा ममोपलो , श्रलयर पपिदिय तिरिक्खजोणिया । सेकित खहयर पचिदिन तिरिस्खजोणिया ? सइयर पचिदिय तिरिक्लोपिया दुविहा पण्णमा तजहा---समुच्छिम सहया पपिदिय तिरिक्सजोणिया, गम्भवतिय सहयर पचिदिय तिरिक्साजोगिया ॥ से किंन समुच्छिम सहयर पचिदिय तिरिक्खजोणिया? समुष्टिम सहयर पपिदिय तिरिक्सजोणिया दुविहा पण्णता तजहा-पजतग समु. छिम खहयर पचिदिय तिरिक्खजोणिया, अफ्जस्त समुच्छिम खहयर पबिंदिय तिरिक्खजोणिया ॥ एवं गम्भवतियादि जाय पजसग गम्भवतिया अप- बचग गम्भवमतियावि ॥४॥ सहयर पपिदिय तिरिक्ख जोणियाण भते । चिम मर्मम इन दोनों के परमपर्याप्त रेसे चार मेद मानना ऐसे ही भुजपरिसर्प का काना यो ससदर तिर पंचेन्द्रिय का कवन एका प्रश्न-पर विपेन्द्रिय कितने भेदोनचर- सर विध प्रक्षेन्द्रिय केदा मेद को-समिम मन प्रभ-समाभिम पर विषय पन्द्रिय नि भेद को पचर-उसके दो भेद को पर्याप्त पति की मम शेषर तिच पेनियमानमा मरेपर हिनाnि nam माकपमायमदुरावा सुसरेसायम्मिानमारबी त्र २५ 48 पतुर्दश-मीशमिगम सूत्रसृतीय उपान - कविहे जोणिसगहे पण्णसे ? गोयमा ! तिविहे जोणिसगहे पण्णसे तजहा महया पोषया समुच्छिमा ॥ अडया तिषिहा पण्याचा तजहा इत्यो पुरिसा नपुसका। पोयया तिविहा ५० त• इत्थी पुरिसा जपुसया ॥ तत्यण जेते समुच्छिमा ते सो नपुसगा ॥ तेसिण भते ! जीवाण कइलस्साओ पण्णचामो ? गोयमा ! छलेस्साओ पण्णचाओ तजहा-कण्हलेस्सा जाव सुकलेस्सा ॥ तेण मते ! जीया किं सम्महिट्टि मिच्छद्दिट्ठि सम्ममिच्छद्दिट्ठि १ गोयमा ! सम्मदिट्ठीवि मिच्छदिद्विवि सम्मामिउदिट्ठीविपतेण भते!जीया किं नाणि अन्नागिरगोयमानिाणीवि मन्नाणीवि, तिन्नि उचर-तीन प्रकार का पोनि सम्रा का है परम भट में से उत्पन होषे २ पोषज येली से सत्पन होरे गोर ३ साउम उन में से बरम के दीन मेद, सो, पुरुष र नपुसक पोवन के सीन भेद स्त्री, पुरुष र नपुसक मोर मो समूमि हो । नपुसक ही मो भगवन् ! उन भावों को शिवनी सिश्यामों कही बहो गौतम ! छलेश्यामों की फष्म, नील पाषत् शुक श्या बहो भगवन् ! विनीयों क्या ममहारी मिपापा समविध्याष्टिी! सर अहोगीलय' समष्टिय सममिथ्या 'तर, भदो भगवत् । बीया क्या शानी या महानी बहो मौष श्रीयों पानी र भवता चासरी मसिपत्ति में तिर्यंच का पीछा रदेशा वाद-मारी मुनि श्री अमोगापिनी- नाणाइ तिमि अन्नाणाइ भयणाए जहा दुधिहसु गम्भवतियाण ॥ तेण भते ! जीवा कि ममजोगी, वयजोगी, कायजोगी ? गोयमा ! तिविहामि ॥ तेण भते । जीवा कि सागारोव उत्ता अणागारोवउवा ? गोयमा ! सागारोवउत्तावि अणागारोवउत्सावि।। तेण भंते ! जीवा कोहितो उपचजति किं नरईएहितो उवषजति तिरिक्खजोणिएहितो उपवजति पुष्छा ? गोयमा ! असोज्वपासाउय अकम्मभूमग अतरदीवग बजेहि उगवति ॥ तेसिणं मते ! जीवाण केवड्य कालठिई पण्णता ? गोयमा ! जमेण मतोमुहुच उनोसेण पलिमोवमस्स असलेजइ भाग ॥ तसिण भते ! जीवाण होनार मान में तीन बान मान में वीन भवानकी ममना महो मगवन् ! ये जीरों क्या मन योगी, पपन योगी कापायोगी महसे मौतम ! तीनों प्रकार के योग को मो भगवन् ! बेनीयों क्या सामारोपयको पाबनाकारोपयुक्त महो गौतम! साकार । भनाकार दोनो उपयोमयुक्त । बहो ममरन् ! ३ नीयों कहां से उत्पन्न होते हैं या नरक में से, विषैच में से बगैरा पृग, भो मौतम! असंहबात के मापुष्य वाले युमकिनेर बाइप के युगासिये बकर मन्द सब गति के जीप उत्पन होवे। भो भगवन् ! सननीयों की जितनी स्थिति कहा 'भो गौतम! सनकी मपन्य मा समासादुर सासा पुसदेव सापनी मालावादमी.

म पतुर्दश मागोमगम सूप्र-तृतीय उपास Hin कइ समुग्धाया पण्णता ? गोयमा ! पचसमुग्घाया पण्णसा तजहा वेयणा समुग्धाए आव तेया समुग्घाए ॥ तेण भते ! जीवा मारणतिय समुग्धारण किं समोइता मरति असमोइता मरति ? गोयमा । समोहयावि मरति असमोइयावि मरति ॥ तेण मसे ! जीवा अणतर डवहिता कहिं गच्छति किं नरइएसु उववजति पुच्छा ? गोयमा ! एव उवणा भाणियन्या जहा धक्कतिए तहेव ॥ तेसिम भते । जीवाण कइ जाई कुलकोडी जोमिपमुह सयसहस्सा पण्णता ? गोयमा ! यारसजाइ कुलकोडि जोगिपमुइ सयसहस्साइ ॥ ५ ॥ भुयगपरिसप्प थलयर पचिंदिय तिरि- मर्मुहुर्य उस्लष्ट परपोपप का अमख्याता माग की स्थिति की महो मगरन् ! उन नीयों को कितनी समुदाय कही। महो गौतम ! पाच समुदात कही तपथा-वेदना, रुपाय, मारपति, पैकेयर नेमस महा मगवन् ! ये क्या सपोडवा मरण पर पा असमोहता परच मरते हैं? बहो गौतम ! सपोहता यमसमोरमा ऐमे दोनों प्रकार के परण परते। महो मगवन् ! ये वहां से नीकलकर का जाते का उत्पन्न होते मी गौतप ! सचि मेमे ईतना काना बहो भगवन् ! उन जीवों की किसनी कुसकोटो कही है। महो नौतम 'मन की बारह घाख योनि प्रमुख कुछ कोडी की ॥ 4HI तीसरी प्रविधि में तिर्यपका परिक्षा तहमा HE का मनुवाफ पासमपारी मुनि भी भमोणक अपि क्खजोणियाण मत ! कहविहे जाणिसंगहे पण्णचे १ गोयमा ! तिविहे जोणिसंगह पण्णचे तजहा- भढ़या प्रोयया सम्छिमा ॥ एव जहा सहयराण तहेव गाणत आइमेण अतोमुहुत्त उफोसेण पुन्चकोडी, उन्नद्विचा दोच्च पुढवि गच्छइ, णवजाइ कुलकाटी जाणिपमुइ सयसहस्सा भवतितिमक्खाया, सेस तहव ॥ ६ ॥ उरग परिसप्प थलपर पचिदिय तिरिक्खजोणियाण भते । पुष्छ। १ जहेब भुयग परि. सप्पाण तहेव णवर ठिई नहन्नेण मतोमुटुत्त, उक्कोसेण पुवकोही उन्वद्वित्ता जाब पथर्मि पुढविं गच्छर, दसजाई कुलकोडी ॥ ७ ॥ चउप्पय थलयर पचिदिय मो भगवन् ! मुनपारेसपं पतुष्पद स्वसपर तिपंच की कितने प्रकार का योमिसा का ? महो गौतम ! तीन प्रकार का योनि संमाका, भरम, पोतम र संमूफिम इस का सप कपन क्षेवर विषय पंचन्द्रिय नैसे करना रिशेप में स्थिति मपन्य भत्त पत्कृष्ट पूर्व कोर पर्ष वहां से नीकसार दूसरी नरफ तक मातर इस की नव डास कर कोरी की ॥ ६ ॥ घरपरिसर्प स्पसपर विच पन्द्रिय का भुमपरिसर्प स्वकवर पंचन्द्रिय मेले काना परतु स्थिति नपन्य अनर्मुर्भ रता पूर्व कोर वर्ष, पा से नीकसार पांचवी नरक व नावे। इस की दम पास कुल केरी की। पकायक राजावादर छाला सुखदेवतायमी प्रसादमी पुत्र -44 २ मृतीय पसुदेश-नीर भिगम म तिरिक्खजोणिधाण पुच्छा ? गोयमा । दुविहा पण्णा तजहा मराऔया समु छिमया ॥ जराओया तिविदा पष्णचा तजहा-इस्थी पुरिसा नपुसका ॥ तत्थण ज ते ममुम्छमा ते सचे पुसका ॥ तेसिक भते ! जीवाण कइ लेस्साओ पन्नत्ताओ? सेस जहा पक्खीण, णाणत ठिई जहण्णेण मतोमुहुत्त उक्कोसेण तिण्णि पलिओषमाइ उव्यहिता, चउत्य पुढविं गच्छति, दस जाई कुलकोडी ॥८॥ जलयर पचिादेय तिरिक्खजेोणियाग मते ! पुच्छा ? जहा भुयगपरिसप्पाण,णवर उबहिचा जाव असत्तमि, पुढविं अद्ध तेरमजाइ कुलकोडी जोणिय पमुह जाव पण्णचा चतुष्पद स्यलचर लियंच पचेन्द्रिप की पृच्छा, ! भदो गौतम ! दो प्रकार का पोनि सग्रह कहा है १ जरायुन जर से उत्पका हाये और २ संमूफिम इस में से मरायुम के सीन मेद स्त्री, पुरुष घ नपुसक और ममूपि सप नपुसक है महो उन का रिवनी श्यामों कही है? बड़ो गौसम ! मंसे खेचरा कहा वैस हो पानना विशेष में स्थिति मघन्य अतर्मुहूर्त उत्कए तीन पस्योपम, वहां से नीलम पापी मारकी सक उत्पन्न बसे। इस की कुमा कोही दश लाख है ॥ ८॥ अलवर सिपा पवेन्द्रिय का भुमपरिसर्प मैसे नानना विशेष में इस सनीमा डा जीव सातवी पृषी तब गा। है माद रह लास कर रही है ॥९॥ भो मगवन् । चारेन्द्रप की कितनी बुध के दी वही daiवीसरी मनिपत्ति में तिपैच का पहिला देशा +4 भगवन् !

मनुवादक-पासमारी मुनी भी ममोसासक पनी म ॥ ९ ॥ चउरिदियाण भने । केइजाइ कुल कोडी जोणी पमुइ सयसहस्सा पणता ? गायमा ! नवजाई कुलकोही जोणिपमुह सयमहस्सा जाय समक्खाया ॥ तेइदियाण पुन्छा ? गोयमा ! अट्ठजाइकुल जाव समक्खाया ॥ बेइदियाण मते ! केइ जाइ पुष्छा ? गोयमा । सत्तजाइ कुलकोडी जोणिपमुह सयसहस्सा ॥ १० ॥ कण मते ! गधगा पण्णचा, कइण भते ! गघसया ? गोषमा! सतगधगा सत्तगधसया ? महो गौनय ' नव साख कुस प्रोटो की है तेइन्द्रिय की पृग, ? महो गौतम । सास उस कोर, पहान्द्रय की कितनी कुछ कोर कही । भागे गौसम ! साल कुन प्रार मही है ॥ १० ॥ बहो भगवन् ! गांग [गप के मग ] किसने को हैं प ग ग ०६ कितने को हैं ? मो यातम ! सात गांग र साव गगवत को भा गर्धाग नादि के मद काते हैं । मूल, स्वधा, ३ काट, निर्याम, ४ रम, ५ पत्र, ६ पुष्प, ७ फछ उम में मूल, अर्थात् मोपासा, २ सपा मर्यान् सुवर्णशास कट भरि घदन मगुरु ४ निर्यास वर्षात कपुर प्रमुख न नना ५ पत्र पति आदि का तमस पत्र, ६ पुप्प सो मियंगु पगरा, मौर ७ फळ सो पाति फळ फकोसादि इन मम को काला प्रमुख पांच वर्ष से गुणा करने से ३५ हो, इसे एक गंप में गुमने से ३५ हीरो इसे पांच रस से गुणने से १७५ होवे फीर इसे मृदु, पु, श्री कृष्ण पेसे पार महाधरु रामायहरवर लाला मुसदेवतारमी माद .

अर्थ 21 घसुदश नीपाभिगम मूम-तृवाय उपाठ 4 पण्ण चा ॥ ११॥ कण भते ! पुष्फ आई कुलकोडी जोगिपमुह सय सहस्सा पण्णचा ? गोयमा ! सोलस पुप्फ जाइ कुलकोडी जोणीपमुह सयसहस्सा पण्णचा तजहा चत्तारिजलयराण, चनारियलयराण, चचारि महारुक्खाण, बचारि महा गुम्मियाण || १२ ॥ कइण भते ! वनीठ कश्वमीसया पण्णमा ? गोयमा ! चत्वारिवल्लीठ चत्तारिवलिसया पण्णत्ता ॥ १३ ॥ कइण भते । लयाउ कइलयसय पण्णता ? गोयमा । अट्ठलयाउ अट्ठलयसया पण्णचा ॥ १४ ॥ कण भते ! स्पर्श से गुणमे से ७.० हो । यो सास सो गंपांग हुरे ॥" ॥ अहो भगवन् ! पुष्प नाति की कुछ क्राट कितनी की' बहो गौतम ! सोसह कास कुछ फ्रार कही निस में चार छाख मछ में सस्पम हो सो, पार कास्स स्वस्ल में उत्पन्न गरे सो, चार लास्न मदे प्रमुख महा वृक्ष के भौर चार लाख जाइ प्रमुख महा गुल्म के ॥२॥ महो मगवन् ! पल्लियों की कितनी जातिकही भौर पालीशस कितने को बहो गौतमाचारमानि की पल्लो चार पाडोशव ॥१३॥ महोभमन् ! रिवनी लताओं पकितनी सतायत की मारो गौतम । आठ समा व पाठ सदाशव की ॥ १४ ॥ महो मगरन् ! शिवनी हरिकाय प कितनी परिकाय शम की है' भहो गौतम ! तीन हरितकाप प तीन इरिसकापशव मानना एक २के सर्वावर सो , मेद से सीन के वीन सो मेद दाते हैं वृत से पभे हुए के हजारों फल वृतांक प्रमुख मोर नाल स 4 तीसरी मविपचि में विषच का पहिला उद्देशा + वीईबाबा अत्यगय बिमाण नो वीईवइजा ए महालयाण ? गोषमा ! ते विमाणा पमया ॥ १५॥ अस्थिण भते ! विमाणाइ अचीणि अचिरावताइ तहेव जाव अग्युत्तर सिकाइ १हता अस्थि ॥ तेषिमाणा के महालया पणता ? गोपमा ! एष जहा सोथिणी णवर एव इयाइ पचउवासतराइ अत्येगइयस्स दररस एके विक्रम सिया सेस तचेय ॥ १७ ॥ अस्थिण मते ! विमाणाइ कामाइ कामवचाइ जाव कामुत्तर विडसगाइ ' हता भत्थि ॥ तेण भते । विमाणा के महालया पण्णता? काममुपादक-पायमचारी मुनि भी ममोपक अपिली एक दिन, दो दिन तीन दिन तर मास में विनेक विमान को वे पलप सकते हैं और कितने विमान को नप सकते हैं महो गौतम ! इसने बडे विमान को ॥१६॥ महो मगमन् ' बाँच, बर्षियावर्त पावत् मधिरावसात विमान में हो गौतम ! बैसे बो मगपन् ! य रिपान किचने पटे को ? भरो गौतम ! विमान स्वस्तिक विमान से मानना परतु इस में पांच भाका पांतर निवना पत्र बनाना ऐसा एक देवता का विक्रम होये ॥१७॥ महो भावन् ! काम, कामावर्न पारत् कामोचरागसक नायक विमान क्या महो मौतम ! वैसे ही विमानों को मगन् । ने विमान बिवने पर कोबो गौतम । नेसें सास्सिक पिमान काकी सेही मानना परतु इस में सात बाबा-रामार लामा पुलदेवमहाभीमासारणी चतुर्दशा-नीवाभिगम मुमतीय पर गोयमा ! जहा सोत्थीणि नवर सचउवासतराइ विक्कमे सेस तहेव ॥ १८ ॥ अत्थिण भते । विमाणाइ विजयाइ वेजवताइ नयताइ अपराइयाइ ? इता अस्थि ॥ तण मते ! विमाणा के महालया ? गोयमा ! जावतिय सूरिए उदेइ, एवइयाइ नत्र उवासतराई सेस तचेव, नो घेवण ते विमाणा पीईवइजा एमहालयाण विमाणा पण्णचा समजाउसो । तिरिक्वजोषिय पढमो उद्देसउ सम्मतो ॥४॥॥ कारिहाण भन ! ससार समावन्नगा जीवा पण्णता ? गोयमा ! छविहा ससार समावनगा जीवा पण्णचा तजहा-पुढवी काइन्वया, जाव तसकाइन्वया ॥१॥ सेकिं मकातिर काना इवना देवता का विझम यह मानना ॥१८॥ो भगवन् ! विमय, मयत मयत, अपरामित क्या विमानों! मो गौतम ! विमानों महो भगवन् ! ये कितने पटे को? मो गौतम ! स्वस्तिक विमान भैसे मानना परतु इस में नय अवकाशतिर नितना क्षेत्र बनाना इतना देश का विक्रम मानना परतु किसी भी विमान को उल्लघ नहीं कर सकते है + पा विर्यप पोनीक नीरों का परिसा उदेक्षा पुरा ॥४॥ मो भगवन् ! Rसार समापन भी कितने भेद को बहो गौतम ' मार के संसार + विमानों पृषीकाया के बने हुए हैं इस से इन का कथन भी इस उद्देशे में लिया है अर्थ तीसरी प्रतिपत्ति में विघका परिसा उशा + ? । बनवादक-पासमारीमुनि श्रा बमोठा अमिमी + पुर्वी, सरपुढपी ॥ ४ ॥ सव्हपुढवीण भते ! केवइय काल ठिई पण्णता ? गोयमा ! जहन्नण अतोमुहुत उकासेष एग वाससहस्स ॥ सुहपुढवी पुम्छा ? गोयमा ! जहण्पण अतामहुत्त उक्कासिण घारसंघाससहस्सा ! पालुयापुढधी पुष्छा गोयमा । जहणेण अतोमुहुत्त उधोसेण चउदसवास सहस्सा ॥ मणोसिलापुढवीए- पुग्छ। १ गोयमा ! जहन्नम अतोमूहुत्त उक्कोसेण सोलसवास सहस्साइ ॥ सकरा- पुढमी पुष्ाीगोयमा! जहण्मेण अतोमुहु उक्कोसेण अट्ठारस वास सहरसाइ ॥ स्वर पुढवि पुन्छ। ? गोयमा ! जहन्नण अतोमुहुत्त उकासेण वावीस वास सहस्माई २ पुर पृषी, ३ बामु पृथ्वी, ४ मनाविला पृथ्वी, ५ अर्कर पृथ्वी भौर ६ सर पृी ॥४॥ भो भगवन् ! सूक्ष्म पृथ्वी की किनी स्थिति की ? महो गौतम ! अघन्य अतर्मुहूर्न उत्कृष्ट एरु बजार वर्गकी, पुर पृथ्वी की पृच्छा ? भपन्य मतमुडून उत्कृष्ट पारा हजार वर्ष पालुक पृथ्वी की पृष्ण मो मौतम ! मपन्य बर्गत स्तर पउदारामार वर्ष, मन शिला पृथ्वी की पृष्णमो गौतम ! सपन्य तपूर्व रता सोडा रबार वर्ष पर पृथ्वी की पृष्णाबो मौतम ! नपन्य वर्मुहूर्व रकम मारामारी, सर पी की पृष्णा मोम'मपम्म हर्स रसह वासाभार • RRIER-मादुर बाला सदरासीमामा सारी 4- अतुल-मीभिगम मप्र-तृतीय नपान ॥ ५॥ नेरइयाण भते ! केवइय काल ठिई पण्णता ? गोयमा ! जहण्णण दस वाससहरलाइ उक्कोसेण तेत्तीस सागरोवमा ठिई, एक सभ्य भाणियन्व जाव सनट्रसिद्ध देवति ॥ ६ ॥ जीवेण भते! जीवेति काला केवञ्चिर होति? गोयमा ! सम्वदा ॥ ७ ॥ पुढविकाइएण भते ! पुढविकाइति कालओकेवञ्चिर होइ ? गोयमा! सन्बर एथ जाव तसकाइए॥८॥पहुपन्न पुढविकाइयाण भते! केवति कालस्स निषा- सिया? गायमा! जहण्यपदे भसखेज्वाहिं उसप्पिणि भोसप्पिणीहि उकोसपए मसखेजाहिं मोसप्पिणि साप्पणिहि,जहण्जदाता उक्कोसपद असस्पेजगुणा,एव जाव पडुप्पन्न वाउक्का- ॥ ५ ॥ महो भगवन् ! नारकी की कितनी स्थिति कही है ? अहो गौसम ' मघन्य दष इमार वर्ष उत्कृष्ट सचीम सागरोपम की स्थिति कही। पों सार्थ सिद्ध पर्यंत सप की स्थिति कहना ॥ ६॥ भो संगमन् ! नीच मीवपने कितना काम कराताt? अहा गौतम ! जीव जीबपने सदैव रावा॥७॥ सो मगवन् ! पृष्ठीकाया पृथ्वी काया किसने काल नक राती है ? बो, गोवम ! सदैव रहता है यो श्रम कागा पनि नानना ॥ ८ ॥ भो भगवन् ! उस्काल की उत्पम को पृथ्वीकायिक मार कितने काल में रिलेस होये? अहो गौतम ! समय में एक २ नीकालवे मधन्य क्या उत्कृष्ट 1 पद असरूपात भवसापणी सत्सनी व्यतीत हो भाषेवो भी उन मीमों का प्रत नहीं होता। ऐसेही अप् तीसरी प्रतिपधि में विपक्ष का दूसरा उदया . - --- त्र मादकपालमपारी मुनि श्री ममोगक ऋपिमी इयापहप्पन्न वणस्तति काइयाण मत! केवति कालस्म निल्लेवासिता गोयमा पटुप्पण्ण वाप्फहकाइया जहण्णपदे अपदा उकासपदे अपदा, पहुप्पण्ण वणरसति काइयाण नत्यि निलेषणा ॥ पडुप्पन्न ससफाइयाण पुण्छा ? गोयमा ! जहण्णपए सागरापम सहस्स एचस्स उक्कोसपदे सागरोपमस्त पुएचस्स जहानपया उक्कोसपए विससाहिया ॥ ९ ॥ अविसुद्ध लस्सेण भते । अणगारे असमोहएण अप्पाणेण अविसुद्धलेस्स पव देवि अणगारिं जाणइ पासइ ? गोयमा ! नो इण? समढे ॥ अविसुद्धले सेण भते ! अणगारे असमोहएण अप्पाणेण विसुद्धलेस्स देव वेषि अणगारे जाणइ पापा तेरकाया पवायुकाया का मानना मो भगवन् ! साल के उत्पम ए वनस्पविकाया किसने काम में निप हो? महो गौतम। दापि निलेप नही होते हैं क्योंकि वे मन भरो मगरन् ! तसाल फ उसम हुए प्रप्त काया के मीनों कितने काल में निप रोवे? मग गौतम अपन्य पद से प्रत्येक इमार सागरोपम उस्कृष्ट पद से दश सो सागरोपम पृषक्त में निप रे ॥९॥ यह मायके वान मनगार होने से मनगार का प्रभ करत । भो भगवन् ! ममुख सेापा (रुष्प, मीठ कालोब) पाण मनमार पेदनादि समुदाय से रहिन अपने शान से समुद सागापाक रेप देवीको पा पाने देने! बहो मौतम ! यह भई समर्थ नही २ महो ममवन् ! बदनाद समुदाय Nानाराका एसपनामापामा न पासइ ? गोयमा ! नो इणढे समटे ॥ अविसुद्धलेस्सण मते ! अणगारे समोहएण अप्पाणण अविसुद्धलेस्स देवदेवि अणगार जाणइ पासइ ? गोयमा । ना इणद्वे मम? ॥ अविमुहलेसण भत ! अणगार समाहरण अप्पाणेण विसुद्धलेस्स एवदेवि भणगार जाणइ पासइ ? गोयमा ! णो इणटे सम? ॥ अविसुद्धलेस्सण भते । अणगार समोहयासमोहएण अप्पाणेण अधिसुद्धलेस्स देवदविं अणगार जाणइ पासइ ? गोयमा ! मो इणढे सम? ॥ अविसुद्धलेस्सेण भते ! अणगारे समे इया समोहएण विसुद्धलेस्स दवदवि अणगार जाणइ पासइ ? गोयमा! Icv अर्ध . चतुर्दश मीचाभिगम सूप तृतीय उपक 48 तीसरी प्रतिपाच में विर्यच का दूमरा उद्देशा रचित अविशुद्ध लेइपावाला अनगार विशट लेदपावाला देव सया देवी को अपने ज्ञान से क्या जाने देखे? भोगौतम ! यह अथ समर्थ नहीं । यो मगरन् ! घेदनाद ममुद्धात सहित अविशद ऐश्यायाला अनगार मविशुद्ध पावाला दव व दवी को क्या नाने दख १ मा गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है, ४ भो मगरन् ' पदनादि समुद्रात सहित भविशुद्ध लेश्याव ला अनगार अपने मान में विशुद्ध लेण्या- वास. देव घ देवी से पा पाने देख ! हो गौतम' या पर्थ समर्थन ५ अहो मगवन्! अघि मुद्ध पाण मनग र वेदनादि समुदाय से सहित अथवा रहित अविशुद्ध लेश्या पाले देव अथवा देवी फो या नाने दखे ? भो गौ ! या पर्ष समर्थ नाई मा भगान् ! नादि मुद्रा रहित +पवाद वामनभचारी मुनि श्री ममालक प्रपिमी पाणपटुप्पम यणस्तति काइयाण मत! केवति कालस्य निल्लेवासिता गोयमा पटुप्पण्ण षणप्फकाइया जहण्णपदे अपदा उकासपदे अपदा, पहुप्पण्ण वणस्सति काइयाण नत्यि निलेवणा ॥ पडुप्पस तसफाइयाण पुग्छा ? गोयमा ! जहण्णपए सागरापम सहस्स पुरसस्स उकासपदे सागरोपमस्स पुदत्तस्स जहन्नपया उक्कोसपए विससाहिया ॥ ९॥ मविसुद्ध लस्सेण भते । अणगारे असमोहएण अप्पाणेण अविसुद्धलेस्स एव पेवि अणगारि जाणइ पासइ ? गोयमा ! नो इण? सम8 ॥ अविसुद्धले सेण भते ! अणगारे असमोहएण अप्पाणेण विसुइलेस्स देव पेषि अणगारे जाणइ काया रकाया र षायुकाया का मानना मो मगरन् ! माल के उत्पम हुए बनस्पविकापा कितने काम निप होये? महो गौतय! कापि निलेप न होते हैं क्योंकि वे अन पो मगरन् ! तरकास क नाम हुए प्रस काया के मीयों किसने काल में निप रो पो गौतम! मपन्य पद से प्रत्येक मार सागरोपम उस्कृष्ट पद से पच सो सागरोपम पृथक्त में निप गरे ॥ या माप के जान मनगाराने से मनगार का प्रश्न करत १ भो भगवन् ! मबुद्ध खेपा (रुण, नीस पापोव) पाला मनगार पेदनादि समुदात से रहिम अपने शान से अनुद सामापारेष देवी को रवानाने देश ? को मौसम ! या मर्ष समर्ष नही २ बो मनवन ! परमादि समदास सायराबाबहादुरगा मुखदेवमात्रीपासप्रसाद सूत्रः 44 पसुर्दश जीपाभिगम सूत्र-तृतीय उपाय - किरिय पकरेइ, सम्मचकिरिया पकरेणसाए मिच्छत्व किरिय पकरेइ, मच्छत्त किरिया पकरेणचाए समच किरिय पकरेइ एवं खल एगे जीवे एगेण समएण दोकिरियाओ पकरेह तजहा-सम्मान किरिय गिछप्च किारय, से कहमेय भते । एव ? गोयमा ! अण्ण ते अन्न उत्थिया एव माइक्रवात एक भासति एव पनर्विति एव पहमिति एवं स्खल एगण समएण दोरियाओ पकरेइ तहेव जाव सम्मच किरियच मिच्छत्त किरियच जेतेएव माइसु तण्णमिच्छा, अह पुण गोयमा ! एवं माइक्वामि जाव पवेमि एवं खलु एगे जीवे एगेण समएण एम फिरिय पकरेइ तजहा-सम्मचकिरियंवा मिच्छत्त. किपा करता उस समय में मिध्यास की क्रिया करता है, और जिस समय में मिथ्यात्व की क्रिया परवा है नस समय में मम्पक्त की क्रिया करता है सम्यक्त की क्रिया करने हुवे, मिथ्याल की क्रिया करतारे और मिपाल क क्रिया से हुए मम्यक्त्व की क्रिया करता है सर? एक समय में एक भीम दो क्रिया करता है वे महो मा । यह किस तरह है ? हा गोगमा अन्य ऐमा कात में यावत् परूपते कि एक समय ६५ जीव सम्यक् च गिध्धा ऐसी दो क्रिया रा चन का कथन मिथ्यारे ओ गौवम ! इस कपन को इस प्रकार कहता हू पावत् प्ररूपता कि एक समय में एक जोर एकरी क्रिया करणारे सूपया-सम्पर क्रिया अयवा मिध्पा किया जिस समय मर्थ 4 सीसरी प्रतिपत्ति में तिर्यंच का दू । दमा +२+ - पदा-वायमचारी मुनि श्री नमो पिनी - नोष? सम? ॥ बिसुद्धलेस्सण भते ! अणगारे अलमोहतण अप्पाणण अविसुद्ध लेस्त व देवि अपगार जाणइ पासइ ' हता जापाइ पासइ, जहा अधिसुद्धलेरण आलावगा एव विसुद्धलेस्मेणवि छ आलावगा भाणियब्वा जाव विसुद्धलेरसेण भते । अमगारे समाहयासमोहएण अप्पाणेण विसुद्धलेस्स प्वदेवि भणगारे जाणइ पासइ ? हता जाणइ पासइ ॥ १० ॥ अन्नउत्थियाण भते ! एवमाइक्खइ एव भासेइ, एव पनवेइ, एव परूबेइ, एव खलु एगे जीरे एगेण समएण दाकिरियातो पकरेइ तजा सम्मत्त किरियच मिच्छत करियच, ज समय समत्त किरिय पकोइ त समय मिष्छत्त किरिय पकरेइ, ज समय मिच्छत्त किरिय पकरइ त समय समत्त पारा सहन मात्रिशुद्ध लेश्या बन चुदवाराने देव मया देवी को क्या माने म्यवादखो पहोगातम यह भय मम -* अप विशुद्ध शा(तनो पन कएल) का वहन है अहो भगवन् विशुद्ध पावाला मनगार के दि समद्धत गति पपने इन मविशुद्ध लेश्यावाले देव जयादेवी को क्या माने देखे। मौतम से माने व दस्से या जो अविशुद्ध लेश्या के छ घालायक करे से विशुद्ध लेश्या के छ आलापक मानना ॥ १० ॥ बो मगन् ! किसना अन्पतीया पेसा करते, यावत् प्ररूप कि एक भीष एक सपप में दो किया करता है सपथा-सम्पर क्रिया व मिथ्या क्रिया, मिस समय में सम्पक्स को मनाशक गनापार लामा पुनदवसायामसाद जी 1 ॥१॥ कहिण भने । समुश्छिम मणुस्मा समुष्छति ? गोयमा ! मतो भणुयखेचे जहा पण्णवणाए जाव खेत समुग्छिम मणुस्सगा।२॥ से किंत गम्भवकतिय मणुस्सा ? गम्मश्चतिय मणुरता तिविहा पण्णचा सजहाफम्मभूमगा अकम्मभूमगा अतरदीषगा ॥ ३ ॥ सेकिस अतरदीवगा ? अतरदीवगा अट्ठावीसविहा पण्णता तजहा एगरुमा, आभासिया, वसाणिया, जागोली, हयकनगा, आयसमुहा, आसमुहा, आसकन्नगा, उकामुहा, घणदता, जाव सुद्धदता ॥ ४ ॥ कहिण भते । मर्थ 48 चतुर्दश-जीमाभिगम सूत्र तृतीय उपान १ H+सरी प्रतिपचि में अतदीप मनुपरक वर्णन हो! संमूर्षिय मनुष्प एक काही ॥ ॥ महो भगवन् ! समूहम मनुष्य का उत्पन्न होने t? बो गौतम ! असे पाणा में सम्मि मनुष्य का भाषिकार का पैसा ही यर्ग मानना याप्त पा समरिम मनुष्य का कपन हुा ॥ २॥ भो भगवन् ! गर्मम मनुष्य के किमने मेद का! महो गौतम ! गर्भभ मनुष्य के तीन भेद को कर्मभूमि के, अकर्मभूमि के २ असरदाप के ॥॥ उस में 2 संवरष्ट्रीप के रिसने मेद को १ अतरदीप के माइम भेद को हैं । एक रूम, २ मामासिक, माणिक, ४.गोलिक, हयकर्ण, ६ मयसमुख, ७ थामकर्ण, ८ उरकामुख, ९ पनदत यार स् मददैव ॥ ४॥ महो पगरन् । दक्षिण दिशा के एक क मनुष्य का एक रूम दीप को कहा है ?

.. अनुवादर-पालप्रसवारी मुनि श्री अमोलक अपनी किारयवा, ज समय सम्मतकिरिय पकरेइ णो त समयमिच्छचकिरिय पफरेइ, ज समय मिश्छत्तीकरिय परेड नो त समय सम्मचकिरिय पकरेइ, सम्मच करिया पकरणत्ताए ना मिच्छच किरिय पकरेति, मिच्छ करिया पकरणत्ताए नो सम्मच किरिय पकरति, एष खलु एगे जीवे एगेण समएण एग किरिय पकरेइ तजहा- सम्मतकिरिय वा मिच्छत्तकिारया । सेत्त तिरिक्वजोणी तठदेसउबीओ ॥ ४॥ २ ॥ सेकित मणुस्सा? मणुस्सा दुबिहा पण्णचा तजहा-समुच्छिम मणुस्साय गम्भवकृतिय मणुस्माय || सेकिंत समष्टिम मणुस्सा ? समुच्छिम मणुस्सा एगागारा पण्णता सम्पर क्रिया करमा म सपय मिथ्या क्रिया नहीं करता है और जिस समय मिथ्या क्रिया करता? उस समय सम्यक् क्रिया नहीं करता है सम्पन क्रिया करने में मिथ्या मिया का समाप रे मोर मिपा फिया करने में सम्यक् लिया का मार है इस सरर एक भीव एक समय में एक ही फिया परवा सधया-म्पक झिया अयना पिणा फ्रिपा या वियर का दूसरा उद्देशा पूर्ण ॥२॥ मम मनुष्य का अधिकार वहते हैं भो मगवन् ! मनुष्प कितने मद को पो गौतम मनुष्पदा मेद को समूएम मनुष्प प गर्मष मनुष्य इम में सरम मनुष्य के कितने मेर पारशक सजावहादुर लाला एखदेवमायनी मामला:

न वणसहण सबमो समता सपरिक्सित्ता ॥ सेणे वणवडे देसूणाइ दो, जोयगाइ पावाल विक्रमेण वेझ्या समए परिक्षेत्रण पन्नचे ॥ सेण पणखडे किण्हे किण्हो मासे एष जहा रायपसेणइबे, वणसहवन्नउ तहेव निरविसेस भाणियन्वं ॥ तणाणय वन्नगधफासो सहो, तणाण वावीओप्पाय पन्वयगा, पुढविसिला पगाय माणियस्वा जाव तत्यण बहवे वाणमतरा दवाय पीभोय मासयति जाव विहरति ॥ ४ ॥ एगुरुय दीवस्सण दीवस्स मतो बहुसमरमणिजे भूमिमागे पन्नत्ते-से जहा नामए अलिंगपुक्खरेइवा, एव सयणीए मामियब्वे जाव पुढषि सिलापट्टगति तत्थण अणन रायममेणी मप्र से पानना इस पधार पेदिका को चारों तरफ जा पनपण्ट हा दुपा है या दो पोमन में कुछ कम गोलाकार चैदाइ में है यह पनवण कृष्ण वर्णमाला कृष्णामासपाला यों इस का सब कथन रायममेणी नूप में जानना वृण प ममिकारण, गप, रस व स्पर्धा पैसेरी यापटिये, पात, व पृथ्वी शिलापट्ट सप कहना वा भनेक वाणव्यार देव र देवियों पैठते यावत् विवरते ॥४॥ उस एक रूप द्वीप की मदर बहुत सम रमणीय ममि माग रहा हुरा है असे मृग का तक, यो श्रेय्या का काना यारत् पृथ्वीशिलाप का करना उस में अनेक एस ईप के मनुष्य ३ मनु- +त चतुर्दश-मीराभिगम सूम-सृीय उपाय 4. सरी प्रति-पचि में बसपाप मनुष्य का वर्णन नर्थ मनुमादक पामय याम मुनि श्री भोषक अपीमी दाहिणिल्लाण एगरुयमणरमाण एगुरुयदीवेणाम दीवे पझते ' गोयमा ! जवृद्दीवे मदरस्म पठायस्स दाहिणेण चुल्लहिमवतस्स वासहरपन्वपस्स उत्तरपुरस्थिमिल्लाओ चरमताओ लपणसमद्द तिण्णि जायण सयाइ उगाहिता, एस्यण दाहिणिल्लाण एगुरुप मणुस्साण एगुरुय दीये नामदीवे पण्णत,तिण्णिजोयण सयाइ आयाम विक्समग एकूगपणे जायणसए किंघि विससूण परिक्खवेण ॥ सेण एगाए पठमवर वेड्याए एगण वणसडण सवओ समता सपरिक्खेत्ता ॥ सेण पउमवर घेड्या भद्धजोयण उउच्चचेण पच धणुसयाइ विक्खभेण, एगुरूय दीव समता परिक्खेवेण पन्नचा नीमेण पठमवर घेइयाए अय-या स्वेवनवासे पन्नते तजहा-वरामयानिम्मा, एस वेतिया, वनओ जहा रायपसेणइए जहा माणियन्ना, सेण पउमवर वेड्या एगेण महो मौतम ! इस जम्मूद्वीप के मेरु पर्वत मे दक्षिण में घुलीमात वर्षधर पर्षद की शिामकून परिमौत से सी7 सो योमन लाण समुद्र में नारे 1 एकरू नाम पा रहा है या तीन सो बोपन का मा पौरा। ९५१ योनन में कुछ कम की परिधेि है उस की चागें परफ एक पावर दीना एक पनामरे या पचवर पेदिका बाषा योमन की ऊंची है, पांच सो पनुपी बोरी और एRE द्वीप को पारों तरफ पर कर रोईर यह पवार पेदि का पा रसाबरे इस्मारिक कासक राजारादुर गया सुमदेव सापनी मामाभादी 4 IF Iादेश-मोजामिपम मत्र मृतीय इपानमा खजुरीवणा जालिएरवणा कुसविकुसा जाब चिटुति ।। ७ ॥ एगरुय दीवेण तत्य ३ पहा तिलयालयआ नग्गोहा जाव रायरुक्खा गदिरुक्खा कुसविकुस जाव चिट्ठति ॥ एगरूप दीवेग . दीवे तत्य बहुओ पंउसलयाओ, नागलयाओ नाव : सामलयाओ निच कुसुमिपाओ एव लयावन्नओ जहा उबवाईए जाव' पहिरूवाओ ॥ एगुरुया दीवेण दीये तस्थ बहवे सिरियगुम्मा जाय महा जाइगुम्मा तणगुम्मा दसवन... “फुसुम कुमुमति जेण वासविहुलग्ग साला एगुरुयदीवस्स बहुसमरमणिज्ज भूमिमाग , मुझपुप्फपुजावयारकलिय करेति, एगुरुपदीवण सत्य २ बहुओ वणराईओ पञ्चचाओ पनाछीरी के धन, पुष्प फराठे यावत् से हुवे हैं ॥ ७ ॥ स एस दोपपतं तिलक वृक्ष के पम-यावत् रायण नदीप्रमुख धर्मादिक से रहित पुष्प फल पाले, यावत् रो हुवे हैं और भी यह माना पाप याममा पुरुष फल पाली रही है इस का वर्णन वा मूत्र में कहा से मानना पावत् मातेकपा है। गौर भी यह बहु सिरिक वृक्ष के गुरुम यापर मामा के गुल्म पाच पूर्ण के पुषों, फों से फलिव इस मा मद घायु चला है जिस से उस निर्मक वृक्षकी शाला पाय मान होती है उस से.एक मादीप के मन मनोहर समभूमि भाग में पुष्प के प्रमुर (ग) होते । भौर मी वीतरी प्रतिपाति में अंमहीप के मनुष्य का वर्णन Rथ न यहवे एगुरुय दीषया मणुस्साय मणुस्सीमोय आसयति जाब विहरति ॥ ५ ॥ एगरूय पीवेम दीवे तस्थ २ देसे २ तहिं २ यह उद्दालका मोहालका कोहालका कतमाला नतमाला महमाला सिंगमाला सखमाला दतमाला सेलमाला णाम दुमगणा पण्णता समणठसो ! ॥ कुसविकुस विसुद्धरक्खमूला मूलमतो कदमतो जाव बीयमतो, पत्तेहिय पुप्फेहिय अछन्न पहिछन्ना सिरिए अईन २ सोभेमाणा उबसोमेमाणा चिट्ठति ॥६॥ एगुरुय दीपेण दीवे तस्थ वहवे हेरुयालवणा, भेरुयालवणा मेरुयालषणा, सेरुयालवणा, सालवणा, सरलषणा, सन्नपण्णवणा पूफ्फलिघणा, प्पणी बैठते हैं यावत् विचरत है ॥ ५ ॥ उस एक दीप में बहुत उद्दालक मोहाल्टक, काहालक, सपास, नवमास, नट्टमास, सिंगमास, पत्रमाल, दतमाल प शेलमाउ नामक पृष्ठों को हमे हैं वे सो फल फुल से सात रे, उन क मूल शुद्ध है, दर्मादिक से रहित , मूल, पद यापत् पोम सहित , पत्र पुष्प मे भाचादित बने हुए है, विशेष पृक्ष की मामासे मती २ शामते हुये सब हैं ॥ ६ ॥ उस पर पोप में सवार वनस्पविन, महतास पनस्सविपन, मेरुवारपनसविन, सेहवामपन- (सविपन, पापी सन, सरसगरेपन, सोपारीम, मानक बन, सहरी • पक ग्रनाबादुर लाला सुखदेसायपिसाबमामी. - सतुप माशीमगम सूत्र तृतीय NEHA विसायण सुपच सोयरसपरसुरा वरसगmnyu... मजाविधीप बहुप्पगारा, तहेव तेमचगयावि दुमगणा अणेग बहुविवि वीससा परि- णयाएमबविहीर उक्या फलेहि पुत्नाविव विसटुति, कुसविकुसविशुद्ध रुक्खमूला जाव विट्ठति ॥ ९॥ एगुरुय दीवे तस्य बहवे भिंगगाणामदुमगणा पण्णचा समणाउसो! जहा से पारगघडकरग कलस करि पायकपणि उल्लूकपडापि सुपट्टकविठ्ठा पारावसगा भिंगाराकरोडि सरग परगपची थालखिल्लग बलिय अयपलगमाल शिचिचवडकमणि 1 diet गिरा बाद मनुष्य का वर्णन प्रकार सेवा ऐसा मामला सामने प्रकार व सपा सीहोरे, परिपासपने परिणम है, फस से परिपूर्ण सरते मा फम पास होकर परोपाते हैं कर इसमें से पद हरतारे व विसारवाडे श्रेष्ठ पद उस के मूल हे। ऐसे शो का रोहुए हैं पापरिला पातगासवृक्षकावर्णन एमा ॥२॥ भोमायुष्पात प्रमालो पात प्रकार कगारक नाम कल्पवृक्षों (मामन के पृशो) मेसे पावट, यसरी, कारनीका, बदानी, सुप्रविष्टक, मिटर, परिषष, पार कोटा, कगरिक, सरक, परक गधी, वास, पलक, पलक, अपर दबारक, पणिप, वक्ता, पोरपिनका, कचनमणि मानन सत्यादिक मनोहर मानना होता मापनों सुपर्ण यषि रनों से विविध से इस क्षेत्र में पूर्वोक तामाम मराईभोदा, हाताला जा The सूपाभो मात्र महात गाणं मुफ्ताओ पासाइयाओ ॥ ८ ॥ एगल्यदीवे तस्य २ बहवे मागा नाम दुमगमा पण्णचा समणाठमो! जहा से चप्पममणि सिलागकर सीध परवाशावि मुजायफल पुष्फयोयणिजा ससारबहुदव्यजुति ससार काल साधय भासपमहुमे रगरिटामदुटुजाइपसन्मनेलगाताओ, खज्रमूदिया सारका कारामासारवासदेसमापी एस द्वीप में बहुत पनपी पनणि कृष्ण पारत् पमोर रस की मग समान पोमा वावर महाप भनि करने पासा, दर्शनीय, बमिरा प्रतिपक ॥८॥ महो वायुप्पट प्रबनो। पहा एक नामक द्वीप में पान मातंग वृक्षों को चंद्र प्रमादिक विविध प्रकार के मच, पर hta पाक्षिा जैसी कांदे, प्रधान लिए पप गिर पान मदिरावारुपी विशेष से र परिसव फस, पापुष निर्माम (रसमार) रस में ररा को मिस में बस इम्मा का जन किया गया है, 'मपनरसबब महा जिस का अनुमान होसेमामब,(दिरा निस) पचारक (पच विधेष) सिरिपायका मरिष्ट रस्न मी काति, दुम्म बेसी । भावि प्रसन पीरा, मनुरी र, दामसार, पसायन, मसी बरा परिपक्स एगा इसरस रेसे बो बादेश बचान संसपी से पास रस का परिचाप, नव निषि पुष सत्र . - पनि चतुर्दश-मीपामिगम एम-वृवीय उपान +2 फदिया तिट्ठाणकरणसुद्दा, तहेव ते तुहियगावि दुमगणा 'अणेग बहुविह वीससा परिणताए ततवितत पण झूमेराए पठान्वहाए आतावविहाए उवधेया पालेहि पुग्णाविध विसति, कुसविकुस विसुद्ध रुक्खमूलामो जाय चिट्ठति ॥ १३ ॥ एगरुय दीये तत्थ बह दीवतिहाणास दुमगपा! पण्णता समणाउसो । महा से मशविराग समए नवनिहिपतिणो वेदीविया चकवाल चद पभूय पट्टिपलि. तज्झणहि विउजालिय तिमिर महए कणगनिकर कसुमिय पारिजाय घणप्पगासे, फषण मणिरयण विमलमहरिह तवणिज्जुज्जलाविचित दहाहिं दीवियाहि सहसा पजा- पादित की माति को प्राप्त करते । नेकी सृटितांग नामफ करप वृक्षों तस, वितत, चाल म बुषिर यो चारों प्रकार के पात्रि के गुणों मे सहित हैं वे पूर्वोक्त वृक्ष पर पुष्प सहित परिपूर्ण हैं, उन के मूळ शुद्ध हैं यह वीमरा त टांग नामक कल्प वृस का ॥ ११॥ अहो आयुष्पन्त अपणो ! एकपक दीप में अनेक मकारक द्वीप शिखा नामक वृक्षों को हुए मैमे सध्या समय में नव निघान क स्वामी चक्रवर्ती राजाके पाएमा दीपक का चक्रासकट करे किमि मे अघकार नष्ट हो मारे, उस की पक्षीपहुत भारी व सेल में परिपूम होती शिघाका पूर्ण काम मैसा हे ता है, उस दीवी को बहु मूल्यवाले मणिरत्नों से अधिक सपर्ग का दर होता है, ऐसी दीनी उचम होती है सदेव म कसी रहती है, रात्रि में हेमांत मोहर तीसरी प्रतिपत्ति में असरदीप अनुष्यमा पर्ण अर्थ 11 पान.1.JULCALL... अनुपातमात्रामारी मुनि श्री भमोर पिनी तहकमिप्रिपखारपिणय , कच गमणिग्यमभत्ति विविचविमायगावदि बहुप्पगारा, तहत तेसि मिग यावि दुमगणा अणेग बहुविविड वीसमा परियणचाए भाषण विहीए उववेया फलेहिं पुण्णा विवविमति, कुमविकुम जाव चिट्ठति ॥१॥ एगख्य पीवेण तस्य बहथे तुरुयगानाम दुमगणा पन्नचा समगाठसो ! जहा मे - आलिंग पणाव दंदर पछह विडिमा भभा तहारम किणिय खरमूहि मूयगं सखिय परिल्लए पश्चगा परिवाणिज्य मन्त्रणुवीगो मुग्योसगनिपचि महति छ तिरिक्तमत कलाली कसाल तालक ससपनाउ' आते यावधीये णिउण गधन्न समय कुमलेहि मामन होता से ही भृगार वृत के समुर ममेक प्रकार के मामन सरिस समार स परिणामित , पुष्प फलासे परिपूर्ण है। य वृक्ष पत्र पुष्पयाले यापत् मनाहर, यह दूमा भृग्राम कस वृत का वर्णन तुला ॥ १० ॥ो मायुप्मत श्रमणो ! बस एक ट्रेप में छुटिमान नामक इस पृत समुह, मेस मलिंगा नापक परी घादित्र, सघुमादल, पणव, पटर, ददर करर्टी, रिम, मेग,परा मेरी,कनिका स्वग्मुखी, मुरम, वेस, परिसिम, परिषांप, सम्बन्धी, वीणा, परविणुरवा, विशेष, मुपा, विपची संत्री, बीमायो, वीणा पिप शततत्री पीणा, रगसीका नामक बाणा, समास, कोस्पना ने पाकि मेदही से गायन पिया में मर्म बादित मावे चदि पवर बलर बिर.पी •मा रामसर सारासदंरम्हायणीमा - सत्रा 4. चतुर्दश मीषामिगम एष सृवीय उपात्र को फदिया तिट्ठाणकरणसुद्धा, तहेव ते तुहियगावि दुमगणा अणेग बहुविह वीससा परिणतार ततवितत वधण झूसराए चउबिहाए आतोबविहाए उववेया पालेहि पुण्माविर विमद्दति, कुसाविकुस विसुद्ध रुक्खमूलामो जाव चिट्ठति ॥ ११ ॥ एगरुय दीवे तत्य वह दीवतिहाणाम दुमगपा। पण्णचा समणाउसो ! अहा से मशविराग समए नवनिहिपतिणो वेदीविया चकवालपद पभूय घटिपलि- तज्झणहि विउजालिय तिमिर महए कणगनिकर कसुमिय पारिजाय घणप्पगासे कचण मणिरयण विमलमहरिह तवणिज्जुज्जलविचित्त दडाहिं दीवियाहिं सहसा पञ्जा- पादिप्र की मावि को माप्त करते हैं वे ही तृटितांग नामक कल्प वृक्षों सप्त, पितत, माल मुषिर यो पारों प्रकार के पादित के गुणों मे सहित हैं वे पूर्वोक्त वृक्ष पर पुष्प सरिस परिपूर्ण हैं, -उन के मूल मुद्ध में यह सीमरा सृ टनांग नामक कल्प वृस कहा ॥१॥ मो आयुष्मन्त श्रमणो ! द्वीप भनेक मार क दीपशिखा नामक वृक्षों को हुए जमे सध्या समय में नव निधान के स्वामी चक्रवर्ती गजाके वएपादपक का चमवासभूकट करेकिमि मे अघकार नष्ट हो जाये उस की पत्नी गहुत चाही तेल मे परिपूर्ण होती शिवा का वर्ण का मैसा हे ना है,उस दीनी को पहु मूल्यवाले मणिरत्नों से मदित सवर्ण का दर होता है, ऐसी दीनी उत्तम होती है सदेव महश करती रहती है, रात्रि में सेमांत मनोहर बावीसरी प्रविपत्ति में असरदीप मनुष्पमा पर्ण व . मर्थ अनुपाद-पायपारीमान भी भोगी लिटल वियदि सेपदिप्पतमिल महगण समय पदाहिं शितिमिरकरक्सर पत्ती उजवधिलिपाई जालाउबलपहसियाभिरामाहिं सोभमाणाहिं सोभमामा, रहेप से सिहावि दुममणा अपेग बहुविधिह वीससा परिणयाए उबोयाविट्ठीएओ चोया फलाई कुसषिकुमजाव चिट्ठति ॥ १२ ॥ एगुरुपदीचे तत्य २ बहवे जोदासया नाम दुमगणा पण्मचा समाउसो ! जहामे चिरुग्गय सरयसूर मडल पडत टको सहस्स दिप्पसावजुजल लहुप बहुनिझुम जालिय निद्वतीय तसतवणिवासुपा .रावासाराम मममी mam दर्दपपान होता है, निर्मला चट्ट सी उसको कविता, भंपकार को नहरा मर्द सरप समार ग्यात करनेवामी होता है, उम दीपी की ज्योति मत प्रामित विस्तारपुक मनोहर शोमनिक काति प्रसती है इस तरा की कातिवामे ई-पश्चिस्तावास बने पिरिष गरम पोष जग्नेपाळ वृक्षों प्रतिपूर्ण पन पुष्प सरित मेदुए पाद्वीप शिखा नामक स्थल का सपना ॥२॥ मो आयुष्यबम श्रमों ! एप में बहुत ज्योतिषी के दो साल मान बीरमों मे देदीप्यमान सूर्य, पिता विप, भाम, माप सब कितामा पार्ष, सिंधुकर पदिन दुपा - 1 ए चतुर्दश-मीवामिमम सूम हनीप पर सोगजासुपण कुमुमविमउलिपपुआ भविश्यणकिरण जहिंगुलय तिरयरुवाइरेगरुश, तहेव सजातिसिहाविदुमगणा अणगबहु विविध वीससा परिणयाए उजायबिहाए उवधेया, सुहलसा मदलसा मदातवलेसा कूडाटाट्ठिया, अनोमसमोगाहाहिं लेसाहिं मररमाए तेएएमे सबओसमताओ भासति उज्जोवति पभामति कुसाविकुसवि जाय चिट्ठति ॥ १३ ॥रगुरुयदीवे तस्थ २ वह चिचगामामए दुमगणा पण्णचा समणा- उसो !जहा से पेच्छाघरेच चितरामेव कुसुमपाममाला कुलबललेसा भासत मुफपुप्फ पुजावयार किलिए विरल्लिय विधिरामल्लसिरि समुदप्पगाम्मे गथिम वेढिम पूरिम पुष्प, पिकापत पुष्पों का समु, मपिरल के कीरप, मात गुरु का साइन अप के रूप से पिक का पाले सरोतिप वृक्ष के ममुर मनक विविधा पोव परित शुम मद मेश्यामा को इन का मस्यान कूटागार परसर मेयारे मेद रहे दु. या प्रदेशस सस विधि में शोमते । उपास करसे कादि करावेयापत् पुष्प फल से छोमनिकापमा पाण्याविप कल्प वृक्ष का उपर हा ॥ १३ ॥ बो संयुष्यरत अपणों एक कप गुन प्रकार के चिर्वाग नामक उपमृतों के समुा जैस प्रेक्षागृा विचित्र समोर रसम पुष्प की मासबो से सयुक्त, देदीप्यमान, समस , विकमिव पाय वर्ण के पुष्पों के पुन सहित है, विचित्र पुष्परामा से सहिद है, प्रवीय, परिम वीसरी मक्षिचि रप के मनुष्य का वर्णन + अर्थ सपयमेण मन्नण छेयसिप्पिय विमागरइएण सम्बओसमता व समणुपडे पविरल लपत विप्पइट्टहिं पचवन्ने कुसमवामहिं सोभमाण) वनमालकतग्गए चेव दिप्पमाणे, तहेव तेचित्तगयाक्दुिमगणा, 'अगेंगबहुविविड़वीससा परिणयाए गलविहीए उववेया कसविकुमावि जाव चिट्ठति ॥१४॥ एगरुपदीवे तृत्य २ वहये चित्तरसानाम दमगणा पण्मतासमणाउसो जहा से सुगधवरकलमसालितदुलीबीसट्ठीणरुवयदुहर साग्यव महमुदुमलिए अइरसे परमन्नेदेवउ तमेगवन्नगधमतेरण्णो जहा वा वि + भनुवारकाममा मुनि श्री भमोहक रिनी पूरीम, सपानीय यों चार प्रकार में निष्पन्न सा दिशाओं में विभाग करके भविरलपने लॅपमान असर सीत पाय धर्म के 'पुष्यों की माला से भी मायमान व वनमालामों से उस के द्वार शोभनीक बन हुने हातोहर या चित्रांग वसमा समुा अनेक प्रकार के समाव मे परिणमा हुवा पुष्प र पुष्पमाण के गुणों से सरित, घे घृत पावत् फल फूल पाले रहते हैं यह चिग ल्प वृक्ष का कपन ना ४॥ प्रय आयुष्यात श्रमणो ! इम एकरुरु द्वीप में नियम कस वृक्ष को हु से इस क्षेत्र में उपम शासि पान्य क धोरम को गाय के दुघ में पार पस में घृत, सहरयरने से नासीर प.गप रिसस रसपत पनवी, पसे . ० सण का स्वामी पीक पिये रसोइ बनाने में निपुष-पुरको रस पाशा गमारादुर लाला हसयमयी बालासादमी- सूत्र १२ APER पक्ष मीरामिगम मू-कृयापन" 'चक्कासिंहोछानिउणेहि सूरयपुरिसेहि, सजिर सूरयपुरिसेहि, सजिर चाउरकप्प ' सेयसितेच उदणे कलमसालि णिवत्तिए विश्वक्के सेवष्फमिउ विस्य सगलसित्थे अणेगसालणग सजुत्ते महवा पडिपुष दबुवरकह सुसक्कार वष्णगधरमफारसच बलविरिय परिणाम इदियबलबद्धणे खप्पिासा सहण पहाणगुलकटिय सहमच्छाउउवणीपबमोयगे, सहसमितिगन्म हवेचा,परमट्ठगसजुचे,तहव तेचित्तरमावि दुमगणा अणग बहुविविह धीससा परिणयाए भायणविहीए उववया कुसविकम जाव चिट्ठति ॥१५॥एगुरुयदीवण तत्यर यहव माणयगा नाम दुमगणा पण्णन समणाउमा जहा से हारहहार बटणग युक्त चार फल्पिा अनेक ममाले महिन" पनावे मे मोदक बयना परिपूर्ण मप द्रव्य मरित, यथायोग्य बति मे पका हुषा, उत्तम पण गूप रम ईं स्पाई युक्त बम पीर्य को पटान पाले शरीर की पुष्टाह करने वाले, शुघा मृषा पोट ने घाले पोदक पराव जम में सच्चपगुट अथपा सकर गले पैमा सिंह सिरो नामक मोदक पर्थ में सुनवाल व सूक्ष्म दर पास के अच्छे स्वाद पाछे होते हैं पस चित्र रम वृक्ष अनेक प्रकार के मन में परिणभिल झोनन देता है बेमोशन विधिराले कस वृक्ष पुष्प फस महित रात में या चित्र रस नामक कक्ष्प वृष्ट वा ॥ १५ ॥ यो मायुष्पवत अमणों ! एकरुक द्वीप में मगिकांग नाम कुरुप पुक्ष, समुद करे हैं. मम्: हार, अर्घहार, उच्चरा, मुटु, टला पामोसा, मनाल 41 तीमरी पारिप च में मनाई। रे मनुष्य का वर्णन मर्थ - Re-ulgमिश्रीबमोडापिभी मउद कुंडलवासुभम हेमजाल मणिलाल कग आलग सतग उचितियकडग खडुयएगा वली कठसुत्त मगर उरत्यगेवेज सोणिमुत्त मचूलामाजिकणग तिलग फुल्लाग सिरस्थिप कण्णवाल ससिमाउसम पगतल भगेय तुढिय हत्यमालगवलख दीनारमालिया पदसूरमालिया हरिसप केयूर पलिय पालय अगुलिजग कमेहला कलार पयर कपाय जास पटव बलिव रयरमाललडिबरनउर वलणमालिया कषगविगल. माछिया कपणमपिरयण मचिपिसव्व भूसण विही बहुप्पगारा तहव ते मनियगा निमगवा भणेग बहुविविहा वीससा परिणयाए भूसविहीए उक्वेया कुसविसति अधिमान, मामा, मूबक, ची, स, पु, एकापसी, उमन्त्रक परीक्षा, रव, मेरा, मागीमा, रामणि भामरण, बनविकर, पुष्प, सरमद कनबारसी, चंद्र पक्र, मूर्य बा. पम पक, हमनक, सरित, हरदमासक, विझप, दीनारमासिका, बद्र मामिका बासिका, कि, यूए, पारवहन, ममे अपने अगुठी कटिपेतम, साप, प्रवरक, पादोबाडा, पुडरमा पलमाबोवर परममाविका, एक समुहकी मानदेसर्व मुर्गचिरल विधिभराव सेकस मरवादि सोसरी पो अभिनन म ने मारे विसमापने भाषाविप . पका-रामायणपुरमा हसबसमापी अप ++तुर्दश भीवा भगा भूप तृतीया - नाव विठ्ठति ॥ गुरुपरीवे २ तत्य महवे गेहागरा नाम दुमगणा पण्या समपाठसो । जहा से पागारहालग चरिया गोपुर पासायागास सलगमस्व एगसालग पाउसालग गम्मधर माइणघर पलभिधर चित्तसालग मालिय भाचिघर बहतस नदियायक्षसठियायत्तफ्टुरतल पुडमाल हम्मिय अहवण धवलहर भरसागह विम्मतसेलदसेलसठिय कूडारग सुविहि कोट्ठग अणेगषरसरणलण आवण विढंग जालथप निव्वूह अपवरक करोतालि बदसालिवि भात्तिकलिसा राते हैं वो मषिकाम र मनन ग ॥१६॥ मो गावापाव अपनों वहां एकाद्वीप में बहुत गाकारतों से दुरी बैस पाकार महासक, परिकाद्वार, प्रासाद, भावावस (चदिनो) मडप, एकठानिया, दो सामिग, नीम दासिया, पार राठिया, गर्मगृा, पठभीगृह, पित्रणालि, मामिक, भमिमा पर्तुगकार मा, वीन नेपाल, भारकूने पास नंदाग, परनस पासे, मुरमास, पर , वर्ष माग गृा, विनम गा, पेस बागर गर, शिलर मामारपाले गृह, भया कोठे नाकारबाले, भनेक गृा. पण, रूपन, पुल, शिप पर निप्प पा, मोरडा, चंदमामीमा, एसे अनेक मकार : रिमिज मनोहर मा भैसे गृप भरत क्षत्र में अनेक प्रकारे होते हैं पैस ही गृहकार वृक्ष के समुह मी अनेक प्रकार बनेकपसार गृहक मुणों से विशेष समाव से पापत् परिण- पद में पस वृक्ष पर मुल पूरिस प्रवर स वृक्ष में सुख से मरेश कर सकते है +बीसरी प्रविधि में भवन्द्वीप के मनुष्य का वर्णन :- मवणविही बहुविगप्पा 1 तहव से गहागारा विदुमगणात अणेग बहुविह विरसमा-- परिणयाए सुहाम्हण सुहोचाराए, 'सुहनिक्खमणपसाए ददरसोपाणपति कलियाए परिसाए मुहविहाराएं मंणाणुकूलीप भवणविहीए उपवेया कुसाविकुसवि जाव चिट्ठति - ॥१७॥एगुरुयदीवे तत्परपहवे अणिगणाणाम दुमगणा पण्णचा समाउसो। जहा से अपग माइग सोम समुप कबल दुगलकोसेज कालमिय पट्टचीण असुतबन्नावरणात वारवाणग पच्छुन्नाभरणचित साहिणग कल्लाणग भिंग महलकजल बहवन्नरपीय साकलमरकय मिगलोम हमप्फरनग अवरचगसिंधु सभदामिलविंग कलिंग । सस में । मुससे नीकल सकते है उसको पक्तियों छगो दुईएका मुखका स्थान पालन रूप से यह मनोर गृा विधि से युक्त पेसे वृक्षों फळाफुलसाले यावत् से हुए हैं यह गृहकार इल्प सावन दुरा ७ मा द्वीप में अनेक प्रकार के नाम एसों को एए. मेसे भार परम पसापाम बस, तृम वसा कमळ, पकुछ, कोसेयक, मृग धर्म, कार मृग यापपुर पिकप सामान पिचित्र, मुस्पाल, कल्याणकारी, भृगजीव वृक्ष ममान हरे, काम समान काठे, __! बोमनीक, ५ वर्षबारे, स्क, पीठक मेन मृग राम के बल परीके रस व उनके बस मारकी स्मति से निधिलाकार, मारी और मी यही इन पत्र में पवन के बारे भूमे सपास भी असोमात्रिी महाक समाजावर सामा सुखदेमरापमा मानना नलिश तुमय भचिचिसा तत्य विहि बहुप्पगारा हवेजवर पट्टणुग्गता वणराम कलिया सहेव ते अणियाणावि दुमगमा अणेग बहुविविह वीससा परिणयाए सस्थ विहीए उववेया कुसाविकुमवि आव घिति ॥ १८ ॥ एगरुयदीपेण भते दी भणुयाम करिसए आगारमावए पहायारे पण्णते ? गोयमा ! तेण मणुया अणतिवर सोमवारुरुषा भोगत्तमा भोगलक्समधरा, भोगसस्सिरिया सुजाय सन्चगसुदरगा। सुइठिय कुम्मचारुचलणा, स्तुप्पलपनमउय सुकुमाल कोमलतला नग जगर मगर मर्थ चतुर्दश भोपामिगम सुम हनीय स्पा देने की पपक नामक वृक्षों समुा मी अनेक प्रकार के परिममे हुये बस विधि सीव फल फुलपा पाप रो हुने है पह दशा गणिकगम नामक करस वृक्ष का व्यन दुा या दस शाति के कस वृक्ष का रुपन किया ॥८॥ महो मगवन् 1 एम् द्वीप में मनुष्य का भाकार कैसा है! को गौतम ! सन मनुष्यों को भसंच सौम्पकारी मनोहर रूप है, मोग सत्प, मोग के लक्षण धारण करनेवाले, मोग में मनोहर, उन + बंग सब अषया में सुंदर मनोहर है, मनोरर सुस्थित कापरे जैसे पाय रकम असे मुकाम: पाक के वो, उमपगत में पर्वत, नगर, समुद्र, मगरना न मृग स्वछता है, अनुकर से अंबर रवि पास की भंगुसिया , पाव की पानी ऊची है, ताम्रर्ण मम वीसी प्रतिपाच में भतरदीप के मनुष्य का वर्णन - अनुनादर-पारममचारी मुनि श्री नमोसा मापनी - सागर पार्षकहरेक लक्षणकियचलणा अणगुन्वसु साहयगलियाउण,नर्णय तबाणि- इणक्खा, सट्ठिय सुमलिट्ठ गुढगुप्फएणी कुरुविधावत घडणुपुत्वजघा, सामुग्ग निमग्ग गुढजाणू,गतससण सुजात सणिभोरवारणमत तल्लाविकम विलासितगनी सुजात घरतुरग गम्भदेसा आइनहतोय णिश्वलेवा पमुइप वर तुरग सीह अहरंग, घट्टियफडी, साहयसाणिंद मुसलदप्पणणिगरित बरकणगछरुसरिस -वर वइरवलित- मज्झा उज्जअसम सहित सुंजाय जच्चतणुकसिगंणि आदेजलंडह सुकुमाल मठप म असे भाकाग्माप्ती पुष्ट ना दीख सके सी पार की घुटी है, परिणी का शरीर मेम गर्नुरा- कार मया मोंएप के टकर जैसे गाल घुटने , इस्वी समान विशाल विसरत गति है, माविरत भश्व सम न गुण देश गुप्त रहा दुगो, म मासियत अधों के गुख माग लीद करत हुन सराबोपन बमे ही युष्ठाये का गुण प्रदश पर करत हुए खराब होता नहीं प्रमुदित मन मया सिंह उस का कटिम अधिक तुकार वाले , बन्न मुशत, मोरिसा, निर्मल सुरमयमा सही मूठ समान रन गि मागी, देर में त्रिवसी परी, फत परिम सरित, उत्तम मातिवंत, सूक्ष्म, सन,सिक, सामाबान्त मनोहर, मुरुम मामाघरमपिक मो परीकी सपरागीममापर्व, सामूप से • शनावरादुर लाला मुस्वदेशमायी मासामसामी . - - - , सत्र रममिज रोमराइ, गगावतय पयाहिणावत तरंग भगुर रविकिरण तरुण 'धिय अकोसा तत्त पउम गभीर विगडणाभी झस विहर्गसजाय पीणकुच्छी ज्झसोदरा मुहकैरणी पम्इ विगृढणामी, सुन्नतपासा, सगतपासा, 'मुंदरपासा सुजातपासा, मितमाइतृ पीणरइत पासा,अकरहुय कप्पगश्यग निम्मल सुजाय निरुवाहय देहधारी,परस्थछेचास लपवणधारा, कणगसिलातलुज्वल पसत्य समतल उवचिय 'विछिन पिहलमच्छा, सिरिवप्छाकत वच्छा, पुरवरफलिह वटिभुयो, भयगी सरविपुलभोग, आयाण फलिह निस कम विकसित होता है बसी नामी है, मच्छ व पक्षी जैपी सुनात कुति, प्रख मत्स्य समान उदर, शव पवित्र शरीर है, पप समान विकट नाभी है, किंचित् नीचे नमते हुए, पनोहर, गुग सहित, प्रमाण मदिन, यगोक्त प्रमाण मान से पुष्ट रचित पास , पसीना दीख सके पैसा कनक समान निमन परीर , चप छचीस सप पारण करनेवाले , मरणशीलतल समान नमस, शस्त, साल वसीम उन के इस्यो, मर पाल की मोगल' समान गोल मलम्ब दो मूभा, कपाड के मोगल मसान लम्बी दो पाहामों है, वे पर सपान मणिको मस्यानपामगे। धन के तल की सपो शुमी लाट मनोहर रिशिएक निकट है पर सरिव पुए, उ मा उसप सक्षमों सदिय छिद्र रादिव उन 48 चतुर्दश भीषामिगम मू-तृतीय उरान सामरी प्रतिपत्ति मत द्वाप के मनुष्य का वर्णन मर्थ -- सार-समाग मुभित्री रोग पिनी अछुनुप इव हु जुगसमिम पाणरक्ष्य का वरपउट सठिय उवाचय यगविर सुपद्ध सुस- लिट्ठ पन्यसाधी, रसतलोबत मउय ममल पसत्य लक्णण सुजाय अछि। जालपाणी, पीवर बहिय मुजाय कोमल वरंगुलीमा, समतलिप सुतिरतिल (रूचिर) निडलक्खा नमा, पदपामिलेहा, मूरपाणिलहा, सत्रयाणिलेहा, चमाराणिलेहा, दिसासोवस्थि. पाणिहा, चंद सुर सस धक दिसा सोवस्थिय पामिलह. मणेगवर लक्खणुतम पसर मुविरहपपाणीढहा, वर माहिस वगहसीह साल उसम जगवर विउल उत्तम वधा, चउरगुलसुप्पमाण रघुवरसरिस गोदा, मट्टित सुविभित मुजातायतमसु स्तनम, पृष्ट पर्नुकाकार व प्रधान मंगुलियों है, नामवर्ष सपान पनि देदीप्यमान मस, येसी में पा, पूर्व, दक्षिणावर्त शस, पक्रातःका-बक, शुम मीचा हातक, इनका भाकार र समोर भन्न पक्षकों स सपूर्ण रचित रन की पत्रियों सीई, असा मीष पा, मूबर, तिल, बार्दूल, महापा, म, एसी समान पन के परे मारे, पार अनुर ममान inी मरदन है, बारस्थित विषय समान मूग, मांस मास सिंह समान पिये (रासे) है, परवाना कि सपान मन मोहन पार पासपान निर्मक र सिपापर्व बस, मीर, मन, मपरका पुग, मामला सामनेवर सी •ारामासादर सासा सदरासायनीनामसारी.

सूत्र . न सुशवरामिगम मूष तृवीय उपास +8+ मसल सष्ट्रिय पसत्य सहल विउल हणुपाओ सवितमिलप्पबाल वियफल सनिभाधरोटा, पडूर ससि सगल विमल निम्मल सख दधिषण गोखीर फेण दगरय मुणालिया धवलदत्तसेढी मरवडवता, अफठयदता, अविरलदता, सुसिभिदता, सुजाइदता, एग पतमेढीय अमेगवता, हसवहनिद्धत धोत तत्त सणिजरत तलमालुजीहा, गलाय सउज्जतगणासा, अवदालिय पोडगेपणयणा, कोकासित धक्सपचलछा, आणामिय चावाल किण्णभराइय सठिय सगत आयत सुजात तणुफसिण निडभमुया, अल्ली. णपम गजुत्त सपणा, सुस्सवणा, पीणमसल कवोलदेसमागा, भइगय बालचद चन के दांत मखर, फटे म संगर रहिर थीमने, माळी तरह रहे दु है दी सने में असा एकदा अनेक दांत रो हुपे हैं, मी से तपाया हरा निर्मम मुपर्ण पेसा छाछ पालु मीपा है, गार पक्षी मेसी नासा का है, विकसित पुंडरीक कमळ समान चक्षुधों रे, विखमित कमल की कीम का समान मपूर, चित् नमाये हुए धनष्य के भागार में माले वर्णवामी पर समान अणे मस्थानवाली मनोहर एम्मी समर पतली फामी भ्रपर वाले हैं, प्रमाण युक्त कर्ण , मास से पुष्ट ऐसे कपोक, मकास का देन हम पाल मूर्य औपा सलाटो प्रतिपूर्ण पूममा के चद्र सपान मुख है, पत्र के भाकार मस्तक है, निपर नारियों से पधा हुषा अधा लक्षणों युक्त ऊचे शिखर ममान नम पीरात शिखर होणे मा मर्य - वासरी प्रतिपत्ति में अतदीप के मनुष्य का वर्णन में - म नवादाबामामधारी मुनि श्री ममारक पिनी र मष्ट्रिय पसत्य विछिन्न समणिहार, उप पाडपन्न सोमवयणा,छत्तागमचिमगदसा घण निधिय समर लक्षणुम्नय कुडागारणिम पिडिय सेरा, हुतवह निद्वतधोय तत्त. तवणिजरत्तकसतकेसभूमि, सामलि. पौडघणणिचिय छोडय मिउविसय पसत्य महुम लक्खण सगध पदर भयमोयग भिंग णीलकज्जल पहभरगणणि णिकरुय णिाचय कुचिय पपाहिणावत मुहसिरिया, लक्षण वजण गणोरया, सुजायमुविमत सुरूवा पाम इया परिसणिया, अमिरुवा पडिरुवातेण मणुया उहसरी हसरसरा" कोचसरा णदिघासा सीहस्सर। सीहधासा मंजुस्सरा मजुधांसा, सुस्सग निग्धोसा पस्सा है, दारिप क पुष्प अथवा पुषण जैनी लाम टट है, सामसी क्ष पुष्प सपान पात मास में उपरित सुकोमल विषय प्रशस्त मूक्ष्म, लक्षणवत, सुगंध से मनोहर कृष्ण वर्ण भसा, कानल का सैमुर भगता भ्रपर में ममुर ममान श्याम चीसो दक्षिणावाले पास पडेन एसे मम्ता काल है, उनका सब शरीर पर्ची मलाण मे सपन है, उनके मग सांग अछे हैं सपन्त दनने योगरे, अभिप प माविको भार भी उनका सा इस क्रोच पक्षी, वीणा व पिंड के सर मपान है ति ममान घोष (गा), मधुर सर मधुर घेपो, मुर सुवेपी, कामि से देदीप्यमान रन का परोर पत्रकाम नारा सपना बासे सपरतुन सस्प नपासजन की पमरी शिकानी व राम रहित राम प्रशसनीयसिको .-रामारादरसामा सतदेवमायभीमान घमारी - . .

चतुश-मीवामिनप गुप्र तृतीय - उपासक छाया उजोइयगमगा, बजरितह नारायमधपणा समचउरस - सठाण सठिया, सिणधी, निरायका उत्तमपसत्य अइसेसनिरुवम तणूजल्ल मल कलक सेयरय दोसधिवाज्नय सरीरा, निरुवमलबा, अणुलोमवाउवगा फकग्गहणी कपोतपरिणामा, सउनि पिठतरुपरिणया विग्गहिय उन्नयकुछी पउमप्पल सरिसगध निस्सास सुरहिवयणा, अट्ठधणुमय अस्सिया तेनि मणुपाण चउठिपिडि करडगा पण्णता समणोउसो ! ॥ तेण मणुया पगइभदया पगइविणीया, पगइउपसता पगइपयणु कोइमाणामायालोमा मिउमदवसपना अलीण भदग्गा विणीया मपिण्छा असणिहि अन्य उपमा नौदेमके त्रैमा शरीर,लघुत पहरी नीतसे हे पवे नहीच प्रदरहित शरीर है, मल प्रमुख उनके शारीर पर AI , अनुकूल बायु वेग ननके शरीर का, कक पक्षी ममान आहार ग्राण करते हैं परावन समान पाचन होना है, मरुन पक्षा समान विहार करते हैं, रोग रहिस का उदर भाग है 20 अया कपल की गप पमान वामावान है उन का बदन मनोहर है भाठसो पनुष्य की कवी काया है, उन को ६८ पोमलिग होती हैं. भो मायुष्पवत श्रमणों' ममुष्यों समाव मे मद्रिम, विनीत सपान शाप मान माया व लोम को पतले रिये हैं, कोमलताप विनीत माष सहित हैं, 'माया ररित भद्रिक स्वभावी गिनीव प्रेम पधन रहिन, पनादिक संचय रहित वृक्षक वर्ग में रहने वाले,पांछित पस्नुकी कमीमरी प्रतिपचि में अतरदीप के मनुष्य का वर्णन कामनुगरकपास मुनि श्री मोसा ऋषीभी सचया अवडा विटिमतरपविसमा जहित्थिय कामगामिणोय तेमणुयग्गा पण्यचा समणाउसो १ ॥ १९ ॥ तेमिण भते । मणुयाण केवति कालरस आहाटे समुप्पजइ ? गोयमा ! चठत्यभत्तरस आहारटु समुप्पञ्चइ ॥ २० ॥ एगुरुयमणईण भत ! केरिसए आगारमावपढोयार पण्णते? गोयमा ! ताओण मणुइ सुजायसव्वा मुदरिआ, पहाणमहिलागुणेहिजुत्ता, अञ्चत विसप्पमाण पउमसूमाल कम्मसठिय विसिठचलणा, मोजमाउयपीवरनिरतर मुसातचलणगलीओ, अग्मण्मय रतियतालिण तषमुसिगिद्दणक्या, तषमुसिणिणक्खा, • रोमरहिय बहलठसठिय पति करने वास युगलनी से, मनो.पारियत काम माग भोगते से विधवेभो मायुष्यात अमनों से मनुष्य के ममुरको ॥९॥ महो भगान् ! उन मनुष्यों को भार की इच्छा स्निने काम वो ही हो गौतम एकादर दिन माहारकी दया उसमरोनी ॥२०॥ो भगान! एक दीपणे सपों का बाकार माप मा का? भो गौतम ! सक्षियों का भाकर मयाब मनोहर रन मा मंग मनोहर है, प्रधान पत्तम सो नौ महिनी, अस्पंत मनोर कम नासर काचो से पर मरम, रोपस पुर मतर रहित वास सहिन परि की अनुमियों है, जो सदापी कोहरे नागरम बाम गर्न के पवित्र विकले नसरे, रोम रहित मगर से पचम महंसनीय मान सरिता पुनरू का रामायदा बाबा सदा साया मामामारी.

पश-मीयामिगग मुत्र-तीय उपास - अनइन्न पसत्य लक्षण अकोप्पजघजुयला, सुणिमियसुगूढ जाणु, मसलसुबह सपा कयलिखभातिरेग संठिया णिवणमुमाल मठय कोमल अविरल समसइत सुजातवट पीवर निरतर रोरुआअट्ठावपदी विपसठिया, पसत्य विछिण्ण पिहुल सोणि पदणायामप्पमाण दगुणिय विसाल मसल सुपर जहण्णवरधारिणि उवज्ज विराय पसत्य लक्षण गिरोदरा, तिवलिय तणुष्पमियझियाउ उजय समसहिय जच्चसण कामणणि आदजलहड सविभक्ष कन सुआप साभत ,रुइल रमणिज रोमराई, गगावचकपयाहणावतारा भगुर रावाकरण तरुण संधिय मकोसायत १३, पण तरह नमते हुए दो घंटम है, मांस स मणी बार पापा पन की संधी है फेसप्तम से भबिक मामारवासी पण सहित सकुमाय मृदु, परस्पर पीनी हुई, पुष्ट पतुलाकार मघा है, मष्टापद नामक परोसा समान प्रशस्त लम्बी पारी माणि (कटो का पूर्णभाम-श्रीचिन ) है मुख का नो प्रमाण पाया भगुनका रोताम मे दुगुनी करते मोशेष सनी मांसल सरिस र शियिपसा गीत पन की चपन रे, नज विकार शीत सदर है, पिनसी पसय कुछ नपे हुए ? सरस मासवत, पतलो काली. चिकनी पनोहर अंतराम सीख रमणिक, मुविभक राबरामी, गगात, दक्षिणाप शल कलाम से गभीर, रदिव-होवे मूर्य समान वेशम सिर पर समान गंभीर विग-नाभी है अचम मांस वाली कुभिर, तीमरी प्रति-पचि में भारद्वापक मनुष्य का वर्णन it मर्थ 1 42 अनुवाद-पासप्रमचारी मुनि श्री नमोसा भपिमा परम गभीर विगडणाभा, अणमड असत्य पीण कुच्छी, सनयपासा सगयपासा सुजायपामा.मियमाईय पीरइयंपासा, अकरहुये कणगरुयग निम्मल मुजाय निरुवहय गायलट्ठी, कचम कलेस पमाण सममहिय मुजायाल? चचय आर्मल जमल जुगेल वहिप अण्णय रतिय सटिग पयोधरराओ भुजंग अणुपन्धतणुय गोपुच्छ ममसहिय मिय आएज ललिय घाड़ाओ, तथा हा, मसलरंग इत्था, पावर काभर वरगुलीओ, गिर पाणिलहा, रविसमि सख चाक सोस्थिय विभत्त मुविरतिय पणिलेहा, पाणण्णय फक्सवरिय पदेसा पंडपुण्णगलकवोलो, “घठरंगुल मुप्पमाण कयुपर 'सरिसगीया, नमपुर धनुष्य समाम मर्यादा महित मनोहर दा पास हैं, उनकी रड़ियों नहीं दोस्ती है, सुवर्ण को कति समान नि गग रित काया । सुवर्ण मश समान प्रमाण सहित धनी म कठिन सन, नबच समणि' में - सा दोनों गोलाकार में सन , सर्प समान अनुक्रम से परली होली गापु क मार झे पती नमती दुई गोमयी वाईसाम्र सपान नसरे, मांस सरि पुष्ट मुोमल शोमनोक पपनी राय की रेखा है, चंद्र, सूर्य, दक्षिणावर्स चमचक्र, स्वस्तिक ममुख की परेसानों, मारी, ऊंची, कुक्षि दय-प बस्ति रूप प्रदेश प्रतिपूर्णी मास पु मर- दिन पार-गुरु मान यस सी ग्रीना, मौसमवि मावासाकी परमी(41) • शक ग्रनामपदुर लाला सुसदेसायनिमा ममी. 1 " - - सत्र । ++ पदमागम सम-ससीय पान १ अर्थ मसलसाठय पसत्थहणुगा, दालिम पुप्फ पगासावर पलभ कुचिय बराघरा मुदराचराष्ट्रा दधि दगरय चिद कुद वासति भउल अछि विमल सणा रत्तुप्पल रत्तमउय ममालतालु जीहा, कणयर मउल - अकुडिल अध्भुग्गय उज्जतुगणासा, सारयनव कमल कुमुद कुवलय विमुक मठल-दलनिगर सरिस लक्खण अंकिय कत नयणा, पचलधवलायततबलायणाओ, आणमित चायकाल किण्डभराइ सठिय संगय आपय मुंजायतणकैसिण निमुमया अमीण पंमाणजुत्त सवणा, 'सुस्सवणा, पीणमट्टरमणिज्जगडलेदा "चउरसपसत्थसमणिडाला, कोमुतिरयणिकरविमल दाटिप के पुष्प ममान सोल वर्ण के सुंदर आए है, दपि, पानी, पांदी, चंद्र, पचम्द के पुष्प, मालनी के पुष्प, अशोक वृक्ष के पुष्प समान वेत वर्ष न्दि गीत, निर्मल दौत आणि है र कमर परक पप समान रक्त वणवालो मृट बिना व मालु है कणर अथवा भशोक वृक्ष समान : मरल मम्मी नासिका है, शरदकाल क उत्पम हर कमल, चंद्र विकासी. कमल, मोहो गौसप ! कमिका समान Rक्षण युक्त मनोहर नयन है, साप मरिच नयन के प्रोम सान और बाहार करती है ? धनुष्य ममान मनोर काळे केश सहित सगत, सुमाव कृष्ण वर्णशसी भृकुटी । श्रमों ! यह मनुष्य पुष्ट मनोहर पोस है, चार भंगुङ प्रमाण पिशास मालाट, कार्तिक पूभिलाद कहा १ झो गौत" * सीमगे पनिपचि में अतरपके मनुष्य का वर्णन

.
समसहिय
Wagesमचारीमान प्रानमा पिर्मा +
जिपपासा सगयपाना
पठिपुतसोमवया, छत्तण्णयउत्तिमगा, कुडिलमुसिगिडील मुजाय मिस्बाहय
जूवथुभदामिणि कमरलुकलस वावि सोस्थिय पहाग जवमन्छ कु. जमल जगल
मुकुपाल अकुत अट्ठाश्य वीई सुपइट्ठ कम्मर
तारणमणि उपधिवर भवगिरिवर आव सलिलयगय उमभसीह चामर उत्तमरो
छचीसलपखणधारीभो, इससीरसगईओ, कोइलमुहुरगिरमुसराउकन्नाओ सम्बर
अमुमयाउ ववगय पलिपलियावग दुवन्नवाही, दामग्ग सोगमुका, भाषचणयनराण
थोषणमूसियाओ सम्भावसिंगारघारुवसा,
सम्भावसिंगारपारुषसा, सगतगतहसिय भणिय चिट्ठिय
को मस्तक समेवी ने वाम प मस्तक,
१२ पमा ३ युग । स्यूम
५ दामनी कमलपत्र पापरी ९ स्वस्तिक मोटी धना ११ भवन १२ मत्स्प ३ काचा
४ १५ मगर समास १७ अबुध १८' महापर १ श्रीराम २० मुमतिष्ठक, .. मयूर
१२२ ममी का अभिषा २१ सोरन २४ पृषी २५ समुद्र २६ दर मान २० वर्मत १८ दर्पन
३९ लात हस्ती ३० वृपम ३१ सिंह और १२ मा इन पचीम मामोंस पुक' 1. इस सपान
माविको मिस समास मार सर, कोर परोसनमा परेका पर्व, दुरेखा
मावि,
रोमा at हा पार कर गीती, समाप से
• शक यजामहादुर लामाI BAERRIमी मामी

सूत्र विलाससल्लावनि-इणजुचोवयारकुसला, । सु.रथ जहणवयणकरचरणजयण लावण- वण्णरुवजोवणविभासकलिया, नदमवणाववर चारिणीउन्ध अछराओ अच्छेरग विच्छणज्जा, पासाइयाता दरिसणिजातो अभिरुवामओ पहिरूवाओ॥ २१ ॥ तासिण भत! मणुईण फेवति कालस्त आहारट्टे समुप्पबइ ? गोयमा ! चउत्थ भत्तस्स आहारट्टे समुप्पबाइ ॥ २३ ॥ तेण मते मण्या किं आहारति ? गोयमा ! पुढवी पुप्फफलाहारा ते मणुयगण पण्णता समणाउसो ! ॥ २४ ॥ तसेण भते ! +4+ चतुदश नावामिगम सूत्र-तृतीय नपा Hin 13 तीसरी प्रतिपचि म अमरदीप के मनुष्य का वर्णन मथ मोठा अंगार व माघार से मनोहर है, पोलना, बैठना, इसना व पिलासपार्ता करना यह सब क्रिया मुरित है, मनोहर निह पृष्ट है, मुंदर सन, मघन, पदन, हाय, पौष घा, लावण्य, रूप प योवन पिलस सहित रे, नद पन में गनेपाली अप्सरा समान रूप से देखने योग्य, अभिप व मतिरूप ॥ ॥ मो भगवन् ! युगल की स्त्री को कितने काल में हार की इच्छा होती है ? महो गौसप ! एकतिर दिन बाहारकी हण स्पन्न होती है ॥२२॥ भो भगवन् ! वे किस वस्तु का माहार करती हैं। महो गौतम ! घे पृथ्वी पर के फस पुष्प का आहार करती हैं अहो यायुष्यषव श्रमों | यह मनुष्य गण का कथन हुवा ॥ २४ ॥ मारो मगवन् ! वा पृथ्वी का केसा आस्ताद कहा ? को गौत- !

सादक-पासमपारी धुनी मी नमोसमापिनी पुढवीए केरिमए अरसाए पनवे ? गोयम ! से जहा नामए गुलइवा खडेइवा सकगइवा मछाडेपाइवा,मिसकंदेइया,पप्पडमोततेतिवा,पुष्फतराइवा, पऽमतराझ्या मन कामियातिया,विजप्तासिवा महाविजयाइया पायसोवमाइया उवमाइवा अण्णोवमाइया घठ- रोगोखीरे चउट्ठाणेपरिणए गुडलडमछडिठवणाए मदग्गिकदिए षण्णेण उचए जाय फासण मोए एतारूबे सिता? नो इण्टे समटे, तीसेण पुढीएएतो इष्टयराए व आव मणामतरा घेध ॥ २५ ॥ आसाएणं भते । पुष्फफलाण करिसए अस्साए पण्णते ? बारामासारखाका देवसापनीता . मेम गुरु, सझा, मदिरा, मुकंद, मोदक, पुष्पाचर या पयोचर, बाकोषिका, बियापार, मा पिगयापार, पिप विधेष, मनुपम गौशीर पार गाय को पीलाना, फीर रन पारों गायों का दुरवीन गायों को पीसावे, फीर हीन गापों का दबदा गायों को पीगये और दो भाग का दुर एस नाव का पीठाये और इस एक माप का पोषो उम में मुर सबर गैर राहार मंद गांव में पकाये पा मार से पन भोप पावत् रूप से वर्णन बोगोरेया पानी पृथ्वी का सार या होता। बो बोय! न.पर्ष समोस इमसे मी सावार सा सार {" २५ ॥ो पारम्परिणाम...

२६. तुश-नीमामिगम पूष-मुली पार मोपमा ! से जहा नामए रमोबाठरत चकवहिस्स कल्लाणपक्रमोयणे सयसहस्स निष्फळे पण्णेम उपए गम उबवेए रमेण उपवेए फासेण उपए मस्सायणिजे धीसायणिजे दीवणिजे दप्पणिजे बाहिणिजे मयणिजे सबिदियगायपल्हायाणिजे भवे तारूवेसिया ? जो इपट समढे, तेसिम पुष्पफलाण तो इटुतराण घेव जाय भस्साएण पन्नाचे ॥२६|| सेण भते! मणुया तमाहारचा कहिवसहि उति ? गोयमा! रुक्सगेहालय ते मणुपगमा पन्नता समणाउसो! ॥ २७ ॥ तेण मते ! रुक्खा किं सठिया पण्यचा ? गोपमा ! कुहागार सठिया, पेच्छाघरसठिया उचागार मत करनेपा पर रामाका परमपाणकारी छालों पस्तुमों के सयोग से बनाया दुग, वर्ण, गंध, रम एसईसेवन बोम्य, सामे पाग्य,दीप्यमान, दर्प योग्य, इन्द्रियों । गानोंको मुख कर्मा मानद sal,ऐसा मोमन सा स्यारोवा? होगौतमायामर्थसपर्य नरें इस से भी इष्टवर यारह मास्वादनीय उन पुष्प र फस का भासाद कहा है ॥ २६ ॥ बहो मगमत् । वे मनुष्य भार के कहां रहते हैं ! प्रो गौवम ! मनुष्य पृत स गृह में रहते हैं महो आयुष्मन्त श्रमणों! ॥ २७॥ अहो ममपन् ! पहा के ससों इस भागारमा को ? मो नेवम ' यकार, प्रेक्षागर, प्रभाकार, घनाकार, 4 नीप। प्रतिपति 7 अप के मनुष्य का वर्णन 312 मुबारक समपारी मुनि श्री ममोसम्ममपिी + सठिया, अयसठिया, थूमसठिया, तोरणसठिया, गापुरमठिया, १ लगसठिया,अदालग साठया, पासायसठिया, हम्मितलसाठया,गवक्खसठिया, वालग्गपतियसठिया, वलभी सठिया, अण्णे सत्य बहवे वरमवणसयपासण सिट्ठ सठाण सठिया, सुभसातल छायाण ते दुमगणा पण्णचा समणाउसो ! ॥ २७ ॥ आस्थण भते ! ते एगुरुय दीवे धीवे गेहाणिवा गेहवणाणिवा ? को इण? सम?, रुक्खगेहालयाण मणुयगणा पन्नता समणाउसो 1 ॥ २८ ॥ अस्थिण मते । एगुरुय दीव २ गामाइया नगराइवा जाव समिसाइवा ? णोइण्टे समटे, जहस्थिय कामगामिणोण तेमणुयगणा पत्ता स्तूप के माकार, तोरण का बाकार गोपुर का भाकार, मकर का भाकार, महालक का मामार, मापाद क भाकार, Hघर के बाकार, गवाल के आकार, बालाप्रपोस के बाकार, वाभि घर माकार, रसाइ पनाने के गृह माफारपास है, भौर भन्य अनेक वृक्ष भान, शैय्पा, मासन के सस्पाना हैं उन की छाया प्रति बीतको महो बायुष्यमन्त श्रमों ! ॥७॥ भो मगन् एन्ट्रीप में गृह वृन अथवा गाया यो गौतमाया अर्थ समर्थ नबोभापुष्पन्त श्रमों यहां के मनुष्यों ग पुसी ग्राम पतमाप ॥२८॥ मो भगवन् ! एकादोष में ग्राम नगर, बापत् समिकथा! मो मौतम! या मर्ष सपर्ष न २ को मायणपत प्रमों! मला रानामगर गाठा लदवसहायनी माSATRI सन समणाउसो! ॥ २९ ॥ अस्थिण भते ! गुरुय दावे असीहवा मसीइया किसीइवा विवणीइवा पणीइवा धाणिज्वाइवा ? नो इणटे ममटे, ववगय असि मसि कसि विधानपणियवजाण ते मणुयगणा पण्णत्ता समणाउमो ॥ ३० ॥ अस्थिण भते । एगरुयदीवे २ हिरण्इव। सुबण्णेइवा कमेच्छा दूसइवा मणीइवा मुत्तिएइवा विपुल- धण कणग रयण मणि मोतिय-सख सिलप्पवाल सतसार सायएजवा? इता अत्यि, णाचेवण तेनि मणुपाण तिन्वममतिमावे समुपज्जा ॥ २१ ॥ अत्थिण मते । एगुरुयदीवे २ रायाइबा जुवरायाझ्या, ईसरेइवा तलवरेइवा माडबिएइवा कोडुबिएइवा मनुष्यों का पूर्वक पिपरनेचाळे ॥ २९ ॥ महो मगवन् ! एकरूप द्वीप में अमी (शस्त्र का व्यापार) मसि ( स्याही कलम का व्यापार) मौर कृषि (खेती का व्यापार ) अयवा सेन देन का व्यापार हे क्या ? मा गौतम ! यह मर्य सपर्य नहीं है अहो भायुष्यरत अपणों ! ये मनुष्यों असि, पसि, कृषि वन दन क व्यापार म रहिस है॥ ॥ अहो मगवन् ! एकरूपदीप में हिरण्य, सुवर्ण, कांस्य, दृष्य, मणि पौक्तिक, व विपुल धन, फनफ, रत्न, मणि, मोती, व, शिल्प, व प्रधान संसापतेय ? स गौतम । वे मप है, पन्तु उन मनुष्यों को उस पर तीन ममतमाव नहीं होता है ॥ ३१ ॥ बहो मग धन् ' ए रुक द्वीप में राजा, युराज, ईश्वर, पलपर, म रविक, कोदुम्मिक, इम, अष्ठि, सेनापति, -- चतुर्दश्च भीपाभिगम सुम-सृतीय 377 4.1 अर्थ Kीसरी प्रतिपत्ति में भतरद्वीप के मनुष्यका वर्णन - क्या . - 4 " अनुशवकनाचमचारी मुनि श्री ममा पनी - इम्मेइमा, सेंट्टीमा, सणावहवा, सत्यवहिश्या ? ने। इण्टे समटे, गय इति सकाराएम ते मणुपगणा पण्णता ? समणासो । ॥३२॥ अत्थिण भते । गुरुयदीवे दासाइग, पेसाइया, सिस्माइबा भयगतिवा भाइलगाइवा कम्मगाराइका भोरापुरिसाइया ? जो इणटुमम?, क्यगय आमोगियाम तेमणुयगणा पण्णता मममाउसो 1 ॥ ३३ ॥ अस्थिण मते ! एगुरुयदीये २ मातातिवा पियावा भाया इशा भयनीहवा भनाइवा पुचाइया धूयाइवा सुण्हाइवा ? हता अस्थि, गोचवण तसिण मणुयाण तिब्बपेजेवधण समुप्पज्जइ, पयणुपजवधणाण त मणुयगणा पप्णता सममाउसो ! ॥ ३३ ॥ अत्यिण भसे ! एगुरुप दीवे२ अरीइघा वेरियइवा घायगा- प सार्यशापा! महो मोनम ! या मर्प समर्थ नसो पो भायुप्यान्त श्रमणों ! ये पनुष्य द सत्कार साय से रहिन रे॥१२॥ो गारन् ! एपदाप काम मेपर, शिष्य, मानक, (माम मनपामा ) पाला [वित्र । सकर, (पोक ) मोग पुरुौपया ! या समर्थन पाकर प्रमुख रहित रे पनुष्यों । ॥ १३ ॥ भो गन् ! एकाद्वीप में माता, पिता, माता, ममिनी, मार्चा, पुष, पुत्री, , पुप्रा । क्या ? मौवम ! पातु मन में उनका प्रेम पपन ना समान से की रमका पर धन पतमा साहै ॥३४॥ भो भवान! एकाहीप में भरि, री, वक, सक, मस्पनीक 04 गमावर मासा PR RIगनी जासातादमी .

सत्र पतुश-भावाभिगम म तृतीय पर इथा वहगाइया परणीहवा पञ्चामिचाइया ? जो इण? समटे, पधगय घेरा- णुधधाम से मणुयागणा पण्णता समणाउसो ! ॥ ३५ ॥ अस्थिक भते ! एगुरुय दीव २ मित्ताइवा वयसाइवा घडियातिवा सुहीतिवा, सुहीयाइवा, महाभागातिवा, सगतियातिवा ? नो इण? समटे षषगय पेमाणुरागाम तेमणुयगणा पण्णचा समणाउसो । ॥ ३६ ॥ अत्थिण भते । एगुरुयदीवे २ आवाहाइवा विवाहाइया जम्नाइया सट्टाइवा थालिपागाइघा पोलोवणतणाइवा सीमतोवणतणाइवा, पितिपिंडनिवेयनाइदा ? नो समटे घवगय आवाइविवाह पशधुपया! या मर्य ममर्यन र क मनुषप रहित ने मनुष्य को ॥ ३५ ॥ बहो मग- धन् ! पररूकदाप में वयस्प, मित्र, समान बने हुए, मदेर साय रहोपाले सला, मा मागवाले व सगतिको क्या! या वर्ष योग्य नहीं या बर्य योग्य नही है क्यों कि मो आयुष्यवम्म अमणों ! व मनुष्य मेमानुगग में रक्त नी॥३॥ महो मगमन् ! एकादीप में बापाप (स्वननों को मामप्रण) विषाद (कम क्रिपा) यक्ष विधि, श्राद्ध क्रिपा, स्पासीपारू, (पकाने की क्रिया) पालक को पस पहिना, घूटामान सस्कार, उपनयन, मस्तक मुंडन का उत्सर, श्रीमत, पितृपिट ५ नैरेपादिक क्रियाओं कावीसरी प्रविचि में भारत के मनुष्य का पर्णन मर्थ इण्टे + बनुमादक पाकामबाग मुनि श्री ममोहक पिनो जन्नसदथालपगि चोलावण सीमतोवणतणपितिपिंडनिवेदणाण ते मणुयगणा पण्णता समणाउसो ! ॥ ३७ ॥ अत्पिण भत्ते ! एगुरुयदीवे २ इदमहाइवा रुद्दमहाइव। खपमहाइवा मिवमहाइवा वेसमणमहाइवा मुगुदमहातिबा नागमहातिधा जक्खमहाइया भूतमहाइवा कूवमहाइवा तलागमहाइवा नदिमहाइवा दहमहाइवा, पन्धयमहाइवा रुक्खमहाइवा, चेतियमहाइवा, थूभमहाइवा ? णो इणटेसमटे, ववनयमहामहिमाण समणुयगणा पण्णचा समणाउसो ॥३८॥ अतिषण भते। एगुरुयदीवेरनडपिच्छाइया गदृपेच्छातिवा मल्लपेच्छातिया मुट्ठियपेन्छाइवा विडवगपच्छातिवा कहकपेच्छातिया या मय सपर्य न पा के मनुष्य पूत मघ फिपयों से राति ॥ ३७॥ अरो भगवन् ' एकरुकष्ट्रीप में इन्द्र महासव, रुद्र महोत्सव, स्वंद पहात्सर, शिष महोत्सव पण यरोत्सन, मुकुंद महोत्सव, नाग पहोरसघ, यस महोत्सव, मून महोत्सव, कूर महोत्सव, तला मारोत्सव, नदि मो सम, दामोत्सम, पर्वत पारसय, वृत्त पोत्सर, चस्प पारोस्सप । स्तूप महोत्सव क्पा ! या मर्य समय मा है पूर्वोक्त सम प्रकार के पप्रेत्सक राति पुरुषों ॥३८॥ मो भगवन् । एकस्कोप में निट के सेल, पररा, मल्ल रा, मुहि युद्ध, पोषक वा करनेवासे, बार्ता कानेपासे, माख्यान कर माएक-रामापापुर लाछा संदररावनीमाभासामी। बर क्या १ - २७ पवगपेन्छातिया मक्खाइगपेच्छातिका लासगच्छातिवालवपेच्छातिषा मखपग्छातवा वणइलपेच्छातिवा,तुबधीणपच्छातिया, कीवपेम्छातिका मागहपच्छातिया,जल्लपिन्छातिवा, कहयापेच्छाइवा ? णो इण? सम? क्यगय कोऊहल्लाण तेमणधगणा पण्णता समकाउसो । ॥ ३९ ॥ अस्थिण भने । एगुरुयदीवे २ सगहाइवा रहाइवा जाणाइया जगाइचा गिल्लीतिवा पल्लीतिवा थिल्लीतिका पदहणाइवा सायाइवा सदमाणियाइया' जो इण? समटे पादचार विहाारणोण तेमणुयगणा पण्णता समणाउसो ! 118 • ॥ अस्थिप भते } एगुरुयदीवे आसाइवा हत्यिइवा उहातिवा नवाले, कुना पापी में कराये, हास्य वचन कानेवाले, अच्छा तुरा गानेवाले, बांध पर चहरर खेलन वाले, विचित्र मत स मिक्षा मांगनेवाल, पीणा पमानाले, मी बजानवाल, क्लीव की क्रीडा, मागपा सो मगलीक वीणा बनानेषाले, कावट उठानेवाले, और स्तोत्र करनेवाले ये पूर्फक्त सप नाटा पां है क्या ? या अर्थ समर्थ नहीं है क्यों कि वन को कौतुरू नाव न रोता है ॥ ३९ ॥ बहो भगवन ! एकरू द्वीप में गाडे, रथ यान, पाली, गिल्ली, पल्ली, थिष्ठा महान, शीविका व सदणि है क्या ? या अर्थ योग्य नहीं है अहो भायुष्पा श्रमणों से मनुष्यों पार से ही चटवे ६ ॥ ४० ॥ मो भगवन् । एकरू द्वीप में 42 पतुर्दश भीवामिगम मूप-तृतीय उRIR तीसरी मनिपत्ति में अतरट्वीप क मनुष्य का वर्णन प्रथ .

मुनि भी भमोसफ ापिनी- गोणाइवा महिसाइषा सराइवा अपाइया एलगाइवा ? इता अस्थि,नो वेवण तेसि ममुयाणं परिभोगमाए इयमागत ॥ १३ ॥ अत्षिण मते। एगुरुपदीये २ 'गाबीचा महिमोइवा, उतिया अयाइवा एलगाया ? इता अत्यि, नो क्षण सेसि मणुयाण परिभोगचाए हवमागछति ॥ १२ ॥ अस्थिण भते ! एगुरुपदीय २ सीहाया वग्याइषा दीवियाइया अस्थाइया परस्सराइका सियालाइवा विहालाइवा मुणगाइवा कोलसुणगातिया कोकतियइवा ससगाइवा दित्तवित्तलाइवा चिटुलगाइवा? इता अत्यि, जो चरण अन्नमानस्स सेसिंघा मणुयाग किंचि आवाहवा विवाहवा उप्पामति-विच्छेपया करेतिया, पगइभद्दगाणं ते सावयगणा पण्णचा समणाउसो ! सपी, पोडे, कट, बैस, परिसर, बनार गार प्रमुख है क्या ! गौतम परतुरेसासने पारे मनुनो माग में नहीं भात ॥४१॥ भो मगान् । एक प माप, महिती, रो, जमा (पी) पानी प्रमुख क्या ? हा पैसे परतु मे मार्ग के मनुष्यों को पमोम नामा ॥५२॥ बो भगवन् । एसीप सिंह, स्थान, दीपिका, गा PEARL मास, विकार, पान, कोसा, रविव, सपा, पवित्रा पिसमातिमा सापरेको पापा पम्प भलिसी प्रकार की पापा, पिपाय राम-रामाादुर बाबा मुसदेव Meet पत्र तिलाइवा ? पर्दप-भी मिग मूष तृतीय उपाई +itr ॥ १३॥ अस्थिण भंते ! एगुरुयदीवे २ सालीइवा बीहीइवा गोहुमाइवा इक्खुइया इसा भरिय नो पेवण तेर्सि 'मणुपाष परिभोगवाए हलमागम्छति ॥ 88 ॥ अत्यिण भंते ! एगुरुयदीये २ गताइवा दरिहवा पाया घसीइया भिगइया उवाएइवा विसमेइया विजलइवा धूलाइवा रेणुतिश पकेइवा वलणीवा ? जो इणटे सम? एगुरुयदीवेण दीवे यहुसमरमणिजे भूमिमागे पण्णवे समणाउसो! ॥ १५ ॥ अत्यण मते ! एगुरुयदीवे २ वाणुइया कटाएइवा हीरएड्न सकराइवा तणकयराइवा सचकपराइषा मसुइया मसुइया पूईयाइथा दुम्भिगधाइया उत्पात व पर्षद करसे क्यों कि वहां बीवों मट्रिक समावदा ॥४॥मो भगवन् ! पराप शारी, प्रीति, गाघुप, सुवतिसक्या ! परंतु प्रन भीयों के उपयोग में नीं भाव में ॥ ४ ॥ मो भगवन् ! एकरुक द्वीप में सहा, गुफा, मयंर स्थान, पपाव का स्थान, विषय स्थान, मम रहिम स्वाम, पूस, रेणु, कचरा व रम विशेष क्या ! पा सर्व पोग्य नहीं है क्यों कि एकक दीप में बहुवासक रमणीक माममास है ॥ ४० ॥ महो भगवन् ! एकरुक द्वीप में स्वीमा (वटा, रममनुस, सर, मृण, स्परा, पान का सपरा, परिण राप प्रमुख. दुष्टगप प मन्य मशुपियासी 4बीसरी मविपचि में भवदीप के मनुष्य का वर्णन है अथ .

मुनि भी भयोलक शापिनी गोपाइवा महिसाइया सराइवा अयाइया एलगाइवा ? हता अस्थि,नो घेवण तेसि ममुया परिभोगचाए इसमागात ॥ ४॥ भत्क्षिण मो। एगुरुपदीये २ ""गावीहवा महिमोइवा, उतिया अयाइवा एलगाया ? इता अत्यि, नो घेवण सेसि मायाण परिभोगवाए हव्यमागछति ॥ १२ ॥ अस्थिण मते ! एगरुषदीय २ सीहाइवा वग्वाइघा वियाइवा अत्याइवा परस्सराइवा 'सियालाइवा विहालाइवा मुणगाइया कोलसुणगातिया कोकतियवा ससगाइवा दिचवित्तलाइवा चिलुलगाइवा इता अस्थि, जो चरण असमन्नस्स तेसिवा मणुयाग किंचि आवाहवा विवाइवा उप्पापति विच्छेया करेंतिया, पगइभहगाण ते सावयगणा पण्णता समणाउसो ! सी, पोरे, छट, बैस, मरिस, पर, बनार गार प्रमुख बा ! गौतम ! परतु ये गाराने पासे मनुष्यों मागामें नी भात ॥ ४१ । बो मगान् । एमा देप में नाय, परिणी, करो, ममा (पारी) प्रारी प्रमुख है क्या? पैसे परतु से पहले मनुष्यों को पमोन नमा ५२ । मो भगवन् ! एकसाहीप में मि, म्यान, दीपिका, बम स्मानाब, विकार, पान, औसा, मोतिपपरा विमा बसिनालिया समोसमा पालिसी कारकी पापा, पिपाय मनापर-रामासादुर पाबा मुसदेपमा मामला - त्र . - सुदंपनी मिग मूप मृठीप उपाय 444 H४३ ॥ अत्पिण भंते ! गुरुयदीवे २ सालीइवा पीहीइवा गोहुमाइया इक्लुइया तिलाइवा ? इता अस्यि नो पेवण तेसिं मणुयाण परिमोगवाए हन्धमागच्छति ॥ १४ ॥ अस्थिप भंते ! एगुरुयदीवे २ गताइवा दरिइवा पाया घसीइया भिगइया उवाएइवा विसमेइया विजलवा धूलाइवा रेणुतिया पकेइया वलणीइवा ? जो इणटे समटे, एगुरुयदीवेम दीवे बहुसमरमणिजे भूमिभागे पण्णछे समणासो! ॥ ४५ ॥ अरियण भते ! एगुरुयदीव २ वाणुशा कटाएइवा हीरएड्का सकाराइया तणकयराइवा सत्तक्यराइबा मसुइया पूईयाइवा दुम्भिगधाइवा उत्पाद प वर्षदी करो । क्यों कि यहां पीवों मट्रिक स्वमायया ॥४५॥ पो भगवन् ! एकप में शारी, बोरि, माधुप, सुवतिया ! सौ परंतु प्रन जीवों के सपभोग में नीं भात ॥ १४ ॥ मो भगवन् । एक दीप श, गुरु, मयंकर स्वान, पपात र स्थान, लिपप स्यान, मारिप स्था, पूस, रेम, कचरा र रम विशेष पा! या मर्य योग्य नहीं है. में कि एकादीप में बना रमणीकामांममासी ॥४८॥ मो भगान् ! एकरुन 45, रणानुस, कपर, तृण, उपरा, पान की रूपरा, परिण राप प्रमु बीसरी मविपचि में भवदीपक मनुष्य का मथ 4. अनुवाक वासामधारी मुनि श्रीमामा अवोक्साइना ? णो इणटे समटे, पवगय खाणुकटक रीसहसमरसण कपवर असुइपूईय दुम्मिगध मचोकस्ववजिएण एगुरुयदीवे पण्णचे समणाउसो ! ॥ १६ ॥ अत्पिण भते ! एगुरुयदीये २ साइवा मसगातिवा पिसुगाइवा जवाइवा लिखा- इवा टिंकुणाइया ? जो इण? समटे, ववगयु दसमसग पिसुते जुवा सिक्ख ढिंकुण परिवजिएण एगुरुयदीवे पन्नाचे समणाउसो । ॥ ४७ ॥ अधिण भते ! एगुरुयदीवे २ महीइया अयगराइया महोरगातिवा? हता मत्थि नो चेवण ते अन्नमन्नरस तेर्सि वा मणुयाग किंचि आवाइवा विवाहवा छविच्छेयवा परेंति पगइ महगाण ते वालगणा पणता समणाहसो ! ॥४८॥ माथिण भते ! एगुरुयदीव २ पस्तुण ? बरो गौमम! या मर्प समर्थ नरे क्यों की मां की भूमि स्वीसा कटफ वगैरह सब अभूचि मप यस्तु से रहित है ॥ १६ ॥ अहो मगवन् ! एररुद्रोप में दश मशक, पिश्शूर, यूका, लिख, भयरा दरण (घटमस) प्रमुख है क्या ! या मर्य समर्थ न बोभायुप्परन्त श्रमणों ! वा दीप पूरोक द मकादि रहित ॥ ४७ ।। बहो मगरन् । एकपदीप में महि, बनमर प मोरंग क्या! " गौतम! परतु ये परस्पर एक दूसरे को स्वर सारे मनुष्यों को किसी प्रकार से पापा पारा भपता पनी पसे। पास बीमों मकान के माद्रेक होते हैं ॥ १८ ॥ भो ममान ! एक * "INS रामासाराम सुवमसामनी मातरम !

गहदहातिया गहमुसलाइवा गहगजियाइवा, गहजुहाइवा गहसघाडाइवा गह सन्वा अम्भाइबा अम्भरुक्खाइवा सज्झाइबा, गधन्वणगराइवा, गजियाई सिस्था, छ "पुरहवर मगर , र पतस भर्य • यश सीमाभिगम मूत्र तृतीय उपाय : से पहल चाया धूमियाइवा महियातिवा रउग्पाषायाइवा चदोयरागाइवा सूरोवरागाइवा पदपरिवेसाइवा सूरपरिवेमाइवा पडिचदाइवा पडिसूराइना, इदधणआइवा उदगमछा- इवा अमाहाइवा कविहसीयाइवा पाईणवायाइवा, पहीणवायाइवा जाव सुदवायाइवा द्वीप में ग्रादह (शिखावाला प्रा का उदय होना) मा मुशल [ पूछनाला ग्रह] ग्रह सपषी गरिख, ग्रा पुद, ग्रामपटक, या अयमन [प्रा का वकमार्ग में उदय होना ) पहछ प्रमुख, वृक्षाकार रोना, पांचवर्ण सपा, गर्ष नगर सो प्रकाश में नगरों का होना, दवा के पामाद, गर्नरव, रिता रमान, दिशादार, (किसी दिशी में पिना मूल से भामि की ज्यालाओं दीखे) निर्धात, रनार भूमिप यस प्रमुख का कोप, धूम्र, धूपर रोघात, चद्र ग्रहण, मूर्य ग्रहण चद्र परिवेप [२६ पीछ पहला भार होने सो ] सूर्य पारपेश ( मूर्य पीछे महलाचार होये सा) प्रतिद्र दो चा दीख, प्रतिपूर्य दो मूर्य दीखे, इन्द्र धनुष्प, उदक मत्स्य [ वर्ग में मस्प का गिरना] पूर्व दिशी का प्रतिकूल वायु, पश्चिम दिशो का प्रतिकूल पायु य बस् मुद राय, ग्राम दाह, नगर दाह पावन् मधिोश दाइ, माणियों का क्षय, म अत द्वीप के मनुष्य का वर्णन + विज्जुयाइया उकापयाइवा दिसादाहाइवा जिग्याइवा पसुविष्टीइया जवाइवा जयस्वालि-सिरियाभि, अनुराहक पापमपास मुनि श्री मोलक मषीनी ? गामदाहाइवा नगरदाह'इवा जाव सन्निवसाहाइवा बाणखय सपरसप कुलक्खय धणक्खय वसणभूतमणारयाइवा ? जो इणटे मगट्ट॥ १५ ॥ अत्यिण मते ! एगरुयदीवे हिन इवा हमराइवा कल्हाइवा बोलाइवा खाराइका घेराइका विरुदरजाइया ? जो इण? सम? वाय डिबडमर करह बारखार वरावरुद्धरजविवायाण त मणुयगणा पण्णचा समणाउसो ! ॥ ५० ॥ आधण भत ! एरुगयदीवे २ महाजुद्धाइवा महासगामाइया महासत्वपडणाइवा महा पुरिसपहामाइया महाधिरपडणाइवा, नागवाणातिया, खलवाणातिया, alमस वाणातिवा, दुःभूइयाइया कुलरोगाइवा गामरागाइया, नगररोगाइवा महलरोगाइया अन्लोक का क्षय, कल का क्षण, घन क्षय, उपसन मभूम एसे दुष्ट उत्सात है क्या' भरो गौतम ' या अय ममर्य न मयात् उक्त कच्छ भी aff ॥ १॥ मरो भान् ! एहम्मदीप में आदम्प-स्वदेश का नाश उमर-म पदशों की तरफ मे हुमा उपद्रव, मेन, दु स्त्रियों का समरसाट परस्सर इर्पा परस्पर हिंसक माप व राज्य विरुद्ध कर्तव्य पा! या सर्व नौ के पनुरूप एक सप पावों स रहित ॥५. ॥ भो भगवन् ! एमाही में 40 पुर परा सत्राम (५३न, परा पुरका परम धरा परना नागपा बाम I LARKARI मा सदर मामRE -- तीसरी मतिपत्ति में सतरदीप , सीसवेषणाइवा, अस्थिवेयणाइवा 'कन्नवेयशाइवा नकवेयणाइवा, दतयणाइवा, कासावा, सासाश्या, जराइवा दाह इवा कत्थूइवा, खसराइवा, कोहाइवा, कुडासिवा, दगोवाइवा, अरिसाइवा, अजिरगाइवा, भगदलाइया इदग्गहाइवा, खदग्गहाइवा कुमारगाहाइवा, नागरगहाइवा अक्वग्गहाइवा भूयग्गहाइवा, उन्वेवगाहाइवा धणुग्गहाइका एगाहियाइव', याहियाइवा, तेयाहिय इवा, चउत्थगाहियावा हिययसूलाइवा, मत्थगसूलाइवा, पाससूलाइवा कुच्छिमूलाइवा, जोणिसृलाइया, गाममारीया जाव सन्निसमारीवा, पाणक्खय जाव वसणभूतमणायरि या १ जो इणटे समटे, वगय गायकाण रोगायकाण तेमणुयगणा पण्णचा व सामस पाण है क्या ? यह अर्थ समर्थ न है अहो भगवन् ' वहां दूसकुल रोग, ग्राम राग, नगर रोम, मडल राग, महा वेदना, आंखों की वेदना, पान की षेदना, मासका की घेदना, दांत की वेदना स्वामी, श्वास, अर, दाह, वनली, खसर, कोद उपरुवाय, मप्ता, अजीर्ण, भगदर, 'इद्रग्रह, कध ग्रह, कमार ग्रा, नाग ना, यक्ष प्रा, मूस ग्रा, उद्ग ग्रा, धनु यु एसर पर, दो दिन के अवर से चर, तीन दिन के असर से ज्वर, चार दिन के अंतर से जर, इदय शूज, मस्तक भूल, पार्थ शूल, कुक्षिशूम, पोनि मूल, ग्राम में परकी यायत समिक्षेत्र में मरकी कि गिर से पाणियों का क्षय यावत् नएसन भूत। 1 चतुाश-जीपीमगप मम तृतीय उपान " मनुष्य का वर्णन .

। 4 धनबादमा-पाठनमपारी मुनि श्री मपाठक अपिभी समगाउमो । ॥ ५१ ॥ अस्थिण भते ! ९गुरुयद वे २ अइयासाइया मासाइका मुबट्ठीइवा, मबुट्ठीइवा उदवाहीइवा पवादाइवा, गुम्भेयाइवा, गुप्पीलाइवा, गामवहाइवा ज व सनियेमवहाइचा, पाणक्खय नाव वसणभृतमणारियाश्या ? नो इण्टे समटे, ववगय गोवधगाण तेमणुयगणा पण्णता समणाउसो । ॥५२॥ अस्यिण भते ! एगुरुय दिव २ आयागराइवा तवागराइवा सीसागराइवा सुबमागराइवा, रयणा गराइया बहरागाग, बसुहामरावा हिरण्णवासाइया, सुवन्नवासावा, रयणवासावा, घारवासावा, आभरणयासाइवा, पत्तवास पुप्फवास फलवास वीयवाम गधवास एकप भनार्य दोषणा! महो गौतम ! यह अर्थ समय नहीं है यहां क मनुप्प राग गरित ॥५ मो मगरन् ! एकरप में अतिवृष्टि मद वृष्टि, सचम पृष्टि, भरस पृष्टि, पानी का प्रवाह (गामी वैसा) यायन् सामोश पवार किजिम से प्रणियों का भय यावत् ८पमनभून दुष्ट मनाई दोष मपापा गौतम ! या अर्प मप न मनुष्यों पानी उपद्रव सरित है ॥ ५० ॥मा ममान् एफसादोप में मारे फे आगर, ताम्मे र बागर, सीसे के भागर, सम भामर, रस्म के नामर, हरे के भागा, पमुभारघन सी वर्षा, चांदी कीपणा, मुबकी, रसीवरेदीवर्ग, भामरण की, १५ कीस, बीम की, पुष्प, कम, मास, मेष, पू, सीकी, रस्वती समायरामासादरान मुखदमात्री सामग.

पश-मीयाभिाग मृप्र-मीय नपान - मञ्जवास वन्नवास चुन्नवास खीरबुट्ठीइ रयणबुट्ठीइवा हिरणबुट्टीइवा, सुवण्ण तहेव जाय चुन्नबुष्टुं इवा सकालाइवा उकालाइवा सभिक्खाइवा दुभिक्खाइवा अप्पग्घाइवा महग्धाइया कयाइवा विक्कयाइवा, सणिहीइवा, मचयाइवा, निधिइवा, निहाणाइवा, चिरपोराणाइवा, पहीणमामियाइवा, पहीणसेउयाइना, पहीणगोत्तागाइ जाइ इम इ गरमागर नगर खेड कपड मडव दोणमुह पट्टणामम सवाह सनिवेससु सिंघाडग तिग च उक बच्चर चउग्मुह महापह महेमु नगरनिडमणेमु सुसाण गिरिकदर सति सलो. पद्धाण भवणगिहसु सन्निखिचा चिट्ठति ? नो इणढे समटे ॥ ५३ ॥ एगुरुय दीवेण वृष्टि, चोदी की पृष्ट मुरर्ण की दृष्टि यावत् चूर्ण की वृष्टि, सुकाल, दुष्काल, मुभिक्ष, दुर्भिक्ष, अल्प मूल्य वाली प पहु मूल्य पाली वस्तु, लेना व देना सग्रा फरना अथवा मना कर बेचना, घन प्रमुख निधान प्रमुख से धन के मे गने वाल का नाश दुरा रोवे उसके गोत्र का भी विच्छेद होये पैसे धन ग्राम नगर, लेड, कट, परप द्रोण मुख, पाटण मघा व मभित्र के भूमाटक के स्थान, तीन रास्ते मीले रेस स्थान, चार रस्ति पीले धेय स्थान, पच्चर, पतर्मुख, राज्य मार्ग नगा मी खाल, स्मशान पर्वत की शीला, गफा व पपन में गरे घनइयादि सब है क्या ? महो गौतग ! यह मर्थ समर्थन उक्त सप रस्तुभों पानी ॥ ५३ ॥ अहो मगवन् ! एकरुप में मनुष्य की कितनी स्थिति कही 4. नीमरी प्रति-पचि में भतरदोषक मनुष्य का वर्णन अर्थ 47 मनुवादकका ग्रहाचारी मुनि श्री अमोलक पिनी - मते ! दीवे मणुयाण केवइय काल ठिई पण्णता? गोयमा| जहष्ण पलिओवमरस असलेजइ भाग असनेजतिभागेण ऊणग, उक्कोसेण पलिवमस्स अखबइमाग ॥ ५४ ॥ तेण मते ! मणुया कालमासे कालकिच्चा कहिं गच्छति काहि उवववति ? गोयमा! तण मणुया छम्मासा सेसाउआ मिहुणाइ पसवति अउणासीइ राइदियाइ मिहुणाई सारक्खति सगोवति सारक्खित्ता उस्तसित्ता हिस्ससिता कासिता छितिचा आकट्ठा अन्यहिया अपरियाविया सुहसुहेण कालमासे कालकिच्चा अण्णयरेस देवलोएस दवत्ताए उववचारो भवति, दवलोग परिग्गहियाण ते मणुयगणा पण्णचा समणाउail है? परो गौतम ! जय प पल्पोपम के असल्यानरे भाग में पल्पोपम का अमख्यातना पाग रुम उत्तर परोपम के अमर शधा मग ॥२४॥ महो भगवन् ! से मनुष्यों काल के भरसर में काल करके का जाने । का सम से ? ? भाो गीत ! मा उनका छ पाप्त आयुष्प शेष रहना है तब उनका पियुनत (पुष व पुपा) का नारा प्रमय ऐसारे ७९ दिन पर्यंत उनकी प्रतिपालना करता,मनारामते रेपों मन्यो नगर रखनेहए व युगल युगलनी श्वासोश्वास लेने हुए स्वामी सात हुए लिपिम्पाय भी बापापीरा रिमामुख पत्रक कार के अवसर में काठ करक मुनपति वाणव्यतरदेव में रस्मो मो मायुष्यर्वत प्रपों ! मकाउकारामासादरम्बाला सम्बदामरायमी पारासादमी ॥ ५५ ॥ काहे भते! दाहिणिलाण आभासिय मणुयाण आमासिय दीवे नाम दीवे पण्णचे ? गोयमा ! जबदीवे २ तहेब चव चलहिमवतस्स वासहरपव्ययस्स दाहिण पुरथिमिल्लातो चरिमताओ लवणसमुह तिनि जोयण सेस जहा एगुरुयाण निरवसेस सब्य ।। ५६ ॥ कहिण भते ! दाहिणिलाण घेसाणिय मणुस्साण पुग्छा? गोयमा ! जबद्दीवे २ मदरस्स पव्वयस्स दाहिणेण चुल्लहिमवतस्स वासहरपव्वयस्म दाहिणपञ्चच्छिमिलाओ चरिमताओ लवणसमुद्दति तिन्निजायणा सेसे अहा एगुरुयाण दवों में उत्पम होने का यह मनुष्य समुदाय का ॥ ५५ ॥ अहो मगषन् ! दक्षिण दिशा के आमा सिक मनुप्पका बामासिक द्वीप कहो रहा है ? यो गौतम ! इस जीप के मेरु पर्वत से दक्षिण दिशा में चुल्लामनन पर्वन राना है, उस के दक्षिणपूर्व ईशानकून क चारमाव स लवण समुद्र में सी7 सो योजन मावे वहां मामापिरुप का प अधिकार पप एकरु दंप जैसे मानना ॥५६ ॥ भा भगवन् । दक्षिण दिशा के पाणिक मनुष्यों का चेपाणि दीप को कहा है ? अहो मौनम ! रु पर्वत स दक्षिणदिशा में चुल्ठहिमवत वर्षधर पर्वत से दक्षिणपश्चिम नैऋत्यकून के परिमांत से सीनसो याजन लवण समुद्र में जावे तो वा वेषाणिक द्वीप रहा हुवा है इस का शेष मा अधिकार एकरूप दंप * चतुदश भीमाभिगम मूत्र मृमीय टग अर्थ + वीसरी प्रतिपचि में अवदेग के मनुप्य का वर्णन काममुकादक-पालनामधारी मुनि श्री मपोगा यीमी - ॥ ५० ॥ कहिण भने । दाहिणिलाण नगोलियमणुरसाण पुच्छा ? गोयमा ! जघुर्दीचे २ मदरस्स पन्चपस्स दाहिणेण चलहिमवतस्त वासहरपवयस्स उत्तर पञ्चपिछमिल्ला चम्मिताओ लवणसमुह तिन्निजोयण सयाइ सेस जहा एगष्य मणुस्साण ॥ ५८ ॥ कहिण भत । दाहिणिलाण इयकण्णमणुस्साण इयत्नदीचे नाम दीधे पण्णत्ते ? गोयमा ! गुथदीस्त उत्तरपुरच्छिमिल्लाओ चरिमताओ लवण समुह चचारि जोयणमयाइ उगाहिता एस्थण पाहिणिलाण हयकन्नमणुस्साग हयन्न दीधे नाम दीवे पण्णत्ते,पचारि जोयणसयाइ आयामविक्खभेण वारससया पन्नट्ठा किंचि १२६ मेमे नानना ॥१७॥ मारो भगवन् ? दक्षिण दिशा के नौगोलिक मनुष्पका नांगोलिक द्वीप का ? मो गौतम! मेरुपर्वतका क्षिण चुलरिमात पतिकी उत्तर पश्चिम पायव्यकून के परमातम तीनमा जे जन समुद्र में मारेकोमा गोलीकाप करा दवा है इसका क्या एम रुकदीप मेमे मानना ॥ ५८ ॥ मा भगवन् ! दक्षिण दिशा के स्य कर्ण मनुप्प का प्य कर्ण द्वीप it! को गौतम ! एकरपके परिपाव से मवण समुद्र में चार मा योगन बारे हा पण दीप पार सो बोनम का सम्पादोरा बारा सो सर यामन में कुछ कम की परिधि की एक पर मेरिका •मस.यह यमायरादुर छाठा मुसदेपमानिसमारी. .

सूत्र विसेसूणाइ परिक्खेवेण एगाए पउमवर वेश्याए अवसेस जहा एगुरुयाण ॥ ५९॥ कहिण भत ! दाहिणिलाण गयकन्नमणुस्ताण पुम्छा ? गायमा ! आभासियदीवस्त दाहिण पुरथिमिलाओ चरिमताओ लवणसमुद्द चत्वारि जायणमयाइ, सेस जहा इयकन्नाण || ६० ॥ एव गोकन्नमणुस्साण पुष्छा ? वेसालिप दीवस्त दाहिण पुरस्थिमिल्लाओ चरिमताओ लवणसमुह चत्वारि जोयणसयाइ सेस जहा हयकन्नाण ॥ ६१ ॥ सुकुलिकन्नाण पुष्छा ? गोयमा ! नगोलियदीवस्स उचरपुरथिमिलाओ मर्थ 416 पतुर्दश मीषामिगम सूत्र तृतीय उपाय 2वी प्रतिपत्ति में अमरदीप के मनुष्य का वर्णन - पनखण्ड साहसी शेप अधिकार एफ्रूकदीप जैसे जानना ॥ ५९॥ भहो भगवन् ! दक्षिण दिशा के गप्रकर्ष मनुष्य का गनरुण द्वाप कहां कहा है ? हो गौरप ' आमासिकदीप अधिकून के परिमांत मे लपण समुद्र में चार सा योजन जावे यो पो गमकर्ण नामदोष सा हुआ है इस का सयन स्पर्ण असे जानना ॥ ६० ॥ मो भगवन् ' गोकर्ण ईप कहां का है ' हो गौतम ! वैशालिक दीप के क्रत्यकूने क चरिमति से चार सो योजम सरण समुद्र में जावे नो वा गारुण दीप रहा हुना। इस का कथन हयकर्ण मेमे मानना ॥६. । सकुलिकर्ण दप की पृष्म, बो गौतम ! नांगोलिक ईप के पायव्यकून के चरिमति स धार सो यामन लाप 4- अनुपादर-हनचारीमुनि पा ममोलक पिनी + चरिमतामो लक्षण समद चत्तारि जोयणसयाइ सेस जहा. हयफ्नाण ॥ ६२ ॥ मायतमुहाण पुग्छ। ' हयकन्नदीवस्स उत्तरपुरस्थिमिक्षाओ चरिमताओ पचजोयण सयाइ उगाहिता इस्थण दाहिमाण मायसमुह मणुस्ताण आयसमुह दोनाम दीवे पण्णत्त, पचजोयणसयाइ आयामविक्खमण आसमहाईण छतया, आसक्न्नाईण सच, उक्कामुहाईण भट्ठ घणदताईग जाय मवजोयणमयाइ, ॥ एगुरुय परिक्खवो नवचेय सयाइ, अउणपन्नाइ बारसबनट्ठ इ हयफन्ना। आमन्नाईण परिक्खेयो आयसमुहाईण समुद्र में नारे यो परी सतीर्ण द्वीप कहा। इम का कथन इय कर्ण दीप जैसे जानना ॥६॥ ओ मगवन् ! भादर्श मुख द्वीप कहां कहा' महो गौतम परुण दीप की शानकून के चरि- atन से सपण समुद्र में पांच सो योमन भाये पहा दक्षिण दिशा के आदर्श मुख पनुप्प का आदर्भ मुख दोष का दुवाया पांचसो योमन का सम्मा चौदा माद मुम्ब, मेघमुख, अनो मुस्लप गोमुस्ल 'पे चार द्वीप पांचमो २ पोषन के लम्बे चौडे , अश्वमुस्त्र, रस्सीमुस्व, मुख र उप घ्र मन ये चारों प सो २ ये मन के मम्मे चौर , अवर्ण, तिसर्ग, पार्ष, म मारण, ये चार द्वीप सावतो २ पोमन के समेबारे, उसका मुख, मप मुत, पिपुन्मुख नियुईच ये चार दीप • RISक राजार दर बारा मुखदेवमामी माRRA ..

सन न । मर्थ 44 पसुदा जीवामिगम मूष तृतीय वपन dot पन्नरसेकासिए जायणसए किंचिविसे साहिए परिक्ववेण,एव एतेण कमेण उववजियर यचा,चत्तारि र एगप्पमाणा णाणत, उगाह विस्खभे परिक्खवे पढमविति ततिय चउ- काण उग्गाहो रिक्खभो परिक्खेतोय भणिओ, चउत्थे चउक्के छ जोयण सयाइ, आयाम विक्खभेण, अट्ठारमत्ताणउए जोयणसए परिक्खेवेण ॥ पचम चउक्के सत जोयण सयाइ मायामविक्खभण, बावीस रसुतरे जोयणसए परिक्खवेण ॥ छट्ठ चउक्क मठ्ठ जोयण मावाम विक्रमेण पणवीस अगुणत्तीसे बाट सो २ यामन क लम्१ चौट है, घणात, प्लष्टदत, गूरग्स व शुदत, ये चार द्वीप नर सो २ योजन के लम्ब घा: मम इन की परोिध का एकरकादि चारों दोप की नव पो गुनपचास योजन की परिधि की, दुमरा पिकांदि चारों तैप की धारासो पंसठ योभन की परिधि तीमग आदर्श गुखादिक चारों दीप की पनाह सा इक्यामी योजन H कुच्छ अधिक की परिधि है, चौथा चौक अश्व गखादिक चारों द्वाप में अठारसो मचाण योजन से कुच्छ अधिक की परियो, पांच मौक अश्वकर्णादिक दपसी पानीम मो सेरह योजन की परिष है, 8 चौक सरकमुखादिक अनदीप के। पचीस मो उनसीम य मन की परिधि है सासवा चौक घनदतादिक घार मतदीप की नय सो योजनका लम्बा चौहा व दो हमार आठतो तालीस यामन की परिधि है, और भी द्वीप की जितनी चौदाई है अपने योजनही . वीसी मतपत्ति में असरदीप के मनुष्य का वर्णन 2 +मनुवादर-पालाचारीमुनि पा ममोसक पिनी + चरिमताभो लक्षण समद चत्तारि जोयणसयाइ सेस जहा हयपन्नाण ॥ ६२ ॥ आयममुहाण पुष्छ। ? हयकन्नदीवस्स उत्तरपुरस्थिमिझाओ चरिमताओ पचजायण सपाइ उगाहित्ता इत्यण दाहियाण आयसमुह मणुस्ताण आयसमुह दीपेनाम दीये पण्णत्त, पचजोयणसयाइ आयामविस्वमण आसमहाईण छतया, आसन्नाईण सत्त, उक मुहाईग अट्ट धणदताईण जाव मवजोयणसयाइ, ॥ एगुरुय परिक्खवो नवचेर सपाइ, अउणपन्नाइ बारसबनट्ठ इ हयकन्ना आमनाईण परिक्खेयो आयसमुहाईण समुद्र में ना हो वा सर्गर द्वीप कहा? इम का कयन इय रणदीप जैसे जानना ॥ ६० आओ भगवन् | आदर्श मुख दीप कहा करा' अहो गौतम । य रुण द्वीप की शानफून के परि- मान से सपण समुद्र में पांच सो योनन मावे घड़ा दक्षिण दिशा के आदर्श मुख मनुप्प का आदर्श मुख द्वीप का दु या पांचसो पोमन का लम्बा चौदा है आदर्शमुख, मेघमुग्व, अजो मुस्त्र व गोमुल पे चार ट्रेप पायसो २ योजन के सम्ले घारे, मश्चमुख, सीमुख, निमुम व व्याघ्र पल ये चारों ७ सो ० योजन के प्रमो चौर, भवार्ण, तिन, स्यकर्ष, कर्ममावरण, पे पार द्वीप सातो २ गोमम के पारेरा मुस, पप मुत, पिपुन्मुख निga ये चार दीप • मा राजा दर सा पुसदवरायजी माRIBE पव्ययस्स उत्तरपुरच्छिमिल्लाओ चरिमताओ लपणसमुह तिन्नि जोयणसयाइ उगाहिचा एव जहा दाइपिल्लाण तहा उत्तरिल्लाण भाणियब, णवर सिहरिस्स वासहरपन्वयस्स विदिसासु, एवं जाव सुद्धदत दीवेति जाव सेत अतरदीवका ॥ ६४ ॥ सेकित अकम्मभूमगा ? अकम्मभूमगा तिसतिविहा पण्णता तजहा-पचाहिं हेमवएहिं एवं जहा पन्नवणापदे जाव पचहिं उत्तरकुराहि ॥ सेत अकम्मभूमगा ॥ ६५॥ से किं त कम्मभूमगा'कम्मभूमगा पण्णरसविहा पण्णचा तजहा पर्चाहं भरहेहि पचर्हि एरवरहि पचहिं महाविदेहहिं । ते समासओ दुविहा पण्णता तजहा आयरिया मिलच्छा, एव पति की शिनकून के चरिमांत से नीन सो यामन लाम समुद्र में मापे सो वहां एकरुकदीप कहा हुवा है यो जैसे दक्षिण दिशा से एकरूपदप का अधिकार कहा पैसे ही उत्तर दिशा के एकरूपदीप का मानना परत यहां शिखरी पर्पस का कथन करमा यावत् शुद्धदव पर्यत कहना यह मसरदीपका कपन हुवा ।। ६४ ॥ महो मगवन् ' अकर्मभूमि के किसने भेद कहे हैं ? अहो गौतम ! अकर्मभूमि के तीस भेद कहे हैं auथा पांच हेमवय, पाच एरपक्ष्य, पांच हरियास, पांच रम्यक्वास, पाच देवकुरु व पांच चरकुरु यह बकर्म भूमि का कयन हुना ॥ ६५ ॥ अहो मगवन् ' फर्मभूमि के कितने मेद को है ? हो गौतम ! कर्म- भूमि के पनाह भेद कह हैं तद्यथा पांच भरन, पांच एरवत्त चपांच महाविदेह इन के सक्षप से दो भेद कहे મર્થ 4. चतुर्वचनीयामिगम एस-तृतीय उपाठ 4 वीसरी प्रविधि में अरुमभि व कर्मभूमि के मनुष्य का वर्णन - अनुवादक वासनमकरी मुनि श्री ममोप्ता अपनी दो जोयमसते परिक्वेवेण ॥ सचमचरके जब जायण सय इ आयामविक्खमेण जोयण सहस्साइ अपमताले जोपणसए परिक्खेवेण, जस्सय जो विक्खमी उगाहो तस्स तचिआषेत्र पढम बीताण परिरतो ऊणो, सेसाण आहउउ, सेसाजहा एगुरुय दीवरस जा सुदत दीव, देवलोग परिग्गहाण ते मणुपगणा पन्नचा समणाउसा ! ६३ ॥ कहिण भते ! उत्तरिक्षाण एगुरुय मणुरताण एगुरुग्दीवे नामदीवे पणचे ? गोयमा । जबद्दीचे दीवे मदरस्स पव्ययस्म उत्तरेण सिहरिस्त घामहर साप समुद्र में मरमाहे हुवे असे भगती से वीनसो योनन लवण समुद्र में प्रथप चौक क अमरदीप सीनयो पाजन के सम्बे चौद, उस से चारसा योनन ळवण समुद्र में ना तो दूमरा चौक के मतदीप पारसो योनन के पो चौरे है पो पावत् छठे चौक से नपसो योजन लवण समुद्र में जाने वर साया चौक के तरदीप नबसो योजना के लमे चो। प्रथम चौक को लवाइ चौडाइ से दूसरे चौक की सम्बाइ चौटाई सो याजन का मषिक, इस से तीसरे चौकसी सो योजन की मधिक यों अषिक २ सब दीनानना २९ सभापकार एकाद्वीप मेस मनुष्य देवलोकनामी पर मरकर देखता में पत्सम ते ॥ भो भवन् ! पचरदिशा के रहर मनुष्य का र दोष का करार मो मो इम सम्पनी III रामपाादुर लामा मुखदेवसहायनी आसामना मानना ये ? : सुर्दश-नीवाभिगप सूम मृगीप उपाय +in कहिण भते । भवणवासी देवा परिवसति ? गोयमा ! इमीसे रयणप्पमाए पुढवीए असीउतर जोयण सनसहस्स बाहलाए एव जहा पन्नवणाए नाव भवणा पासाइया। तत्थण भवणवासीम देवाण सत्तमवण कोडीओ यावचरि भवणवाससयसहस्सा भवति तिमक्खया ॥ तत्थण बहवे भवणवासी या परिवसति, असुरा नाग सुवन्नाय जहापन्नवण्णाए जाव विहरति । कहिण भते! असुरकुमाराण देवाण भवणा पण्णता पुन्छ। ? गोयमा ! एव जहा पचवणा ठाणपदे जाव विहरति ॥ कहिण भते । दाहिणिलाण असुरकुमाराण देवाण भवणा पुष्छा? एव जहा ठाणपदे जाव चमरे तत्थ महो गौवम ! इस रत्नममा पृथ्वी का एक लाख अस्सी हजार योजन का पृथ्वी पिंड कहा है वहां से लगाकर यावर भवनपति भवन उन को रहने योग्य कहे हैं वहां सक सम पभरणा मूत्र अनुसार जानना यह सात फोड पहचर लाख मान करे। इन सप भवनों में असुरकुपार नागकुमार वगैरह दश माति के भवनवासी देव राते है भो भगवर ! अमुरकुमार देव के भवन कहाँ कहे हैं। महो गौतम ! नाणा के स्थान पद में जप्ता कयन किया वह सब या नानना महो मगवन् ! दक्षिण दिशा के असुर कुमार के मान कहाँ कहे है ? हो गौतम ! उसका कथन पणा मारे mmsmms १ तीसरी प्रतिपत्ति में भवन पविदेव का वर्णन 7 अर्थ +4 भनुवारक-पानमधारी मुनि श्री भमोठा अषिनी - जहा पण्णवणापद जाव सेत्त गम्भवकातिया ॥ सेत्त मणुस्सा || १ || १ ॥ सेकित देवा देवा चउन्विहा पण्णत्ता तजहा भवणवासी, वाणमतर, नाइसिया वमाणिया ॥।॥ सेकित भवणवासी ? भवणवासी दसविहा पण्णा तजहा-असरकुमारा जहा पन्नत्रणापदे देवाण भेओ तहा माणियबा जाव अणुत्तरो- ववातिया पचविहा ५० तजदा-विजया वेजयता जाव सम्वतिरगा । सेच अणुचरोववाइया ॥ २ ॥ कहिण भसे ! मवनवासि देवाण मवणा पणता ? मार्य छम्छर यो नैस पावणा पद में कयन किया वैसे ही यह जानना यह गर्भन मनुप्प का कथन हुआ या मनुष्य का कयन हुवा ॥४॥२॥ आओ मगवन् ! देव के स्तिने मेर का ? भो गौतम ! देव के चार भद रहे। भवनवामी, माणपसर, ज्यातिषी व वैमानिक ॥ १ ॥ बहो मगवन् ! मानवाप्ती देष किस को कर है? अहो गौतम' मानवामी देव क दश मेद को सद्यया-अमुरकपार यावत् स्यनित कुमार मंगरा सर पन्नाणा पद में नसे देवता का मद का पैसे ही सम अनुत्तोषपातिक पर्वत काना अनुचरोपपातिक पांच भेद कहे हैं विषय, वैश्यंत, नपत, अपरामिक प सपार्थ लिद या अनुचरोपपादिक का मेद दुवा जो मगम् ! मरमबासी देयके मदन परे ? भोर मरमवासी देव रे INDIES 192121 Pian telet H11 Ent . .

ब ++ धनुर्दश नीवाभिगम सूत्र-नृतीच पान tath बत्तीस देवसाहतीतो पण्णचाओ ॥ ५ ॥ चमरस्सण भते । असुरिंदस्स असुररण्णो अमितरियाए परिसाए कइ देवीसया पण्णता, मज्झिमियाए परिसाए कइ देवीसया पण्णचा, बाहिरियाए परिसाए कइ देवीसया पण्णता ? गोयमा ! 'चमरस्सण असु- रिदस्त असररनो अम्भितरियाए परिसाए मट्ठादेवसिया पण्णता मज्झिभियाए परिसाए तिणि देवीसया पण्णचा, पाहिरियाए परिसाए अट्ठाइजा देवीसया पण्णता ॥ ६ ॥ चमरस्सण मते | असुरिंदस्स असुररन्नो अभितरियार परिसाए देवाण केवइय काल ठिई पण्णसा?मझिमियाए परिसाए देवाण केवइय काल ठिई पण्णता, बाहिरियाए पारसाए देवाण केवइय काल ठिई पण्णता ? मभितरियाए हमारदेव प पास परिषदों में पचीस हजारदेव को हैं॥५॥ महो मगपन्!चमर मामक असुरेन्द्र को बाभ्यवर परिपदामें कितनी देवियों, मध्य परिषदा किसनी देषियों व पाम परिपदा में किसनी देषियों कही हुई ? महो गौतम ! उनको मान्यवर परिषदा में १५० देवी, मध्य परिपदा में ३००देवी गौर व परिपदा में १२५० देवियों कही है ॥ ६ ॥ महो भगवन्! चयर नामस असुरेन्द्र को आम्पनर परिपदा के देवताओं की कितनी स्थिति को मध्य परिपदा के देवो कितने काठ की स्थिति कही और प स परिषदा के देवों कितने बाल की स्थिति कहो! मामवर परिषदा की देवी की कितनी स्यि से कही, माय परिपदा की देवी 4. तीसरी प्रविपचि में मवनपतिदेव का वर्णन मर्थ नामसारी मुनि श्री ममोहक ऋपिनी- असुरकुमारिंदे असुरकुमाररामा परिवसइ जार विहाइ ॥३॥ असुरिदस्स असररन्नो कति- परिसाओ पाणचाओ? गोयमा तो परिसाओ पण्णताओ तजहा समिया चडा, जाया मभितरिया समिमा, मझचहा, वाहिं जाया ॥ ४ ॥ चमरस्तण भत ! मसुरिंदस्त ममुररनो अम्भतर परिसाए कतिदेवसाहसीतो पण्णाओ, मझिम परिसाए फतिदेवसाहस्सीओ पण्णचाओ बाहिर परिसाए कतिदेव साहस्तीतो पण्णमाओ ? गोयमा! चमरस्सण असुरिंदस्स अटिभर परिसाए चउग्रीस देव साहस्तीतो पण्णचाओ माझमियाए परिसाए अट्ठावीस देव साहसीतो पपणचाओ, बाहिरयाए परिसाए यावत् पा मसरकुमार का घपर नामक इन्द्र रहता है यावत् विचरसा है ॥ ३ ॥ भो मगवन नायर असुर का इन्द्र व असुर का राजा को कितनी परिपदा की ? मो गौतम! तीन परिषदा की वषा-सपिता, चहा प माया माभ्यतर परिपदा समिता, मध्य परिषदा घराबास परि- पदा माया ॥४॥ यो मगरन् ' चमर नामक मसुरेद्र असुर रामा की माम्पर परिषदासिने माग देव का मध्य परिपदा के किसने हमार देव को पाप परिषदा के वितन हमार रहो। बोनौतापमर नापक ममुरेन्द्र को भाम्यवर परिषदा में पानीस मार देग, मध्य परिषदाइस 1514 सनासार मग उदेसहायनी SAIRt. चमर , .

सत्र ने न्तुर्दश नीवामिग सूप तृतीय उपाङ्ग र तओ परिसाओ पण्णचाओ तजहा-समिया चढा जाया, मभितरिया समिया मज्झिमिया चहा, बाहिरिया जाया ? गोयमा ! चमरस्सण असुरिंदस्स असुर रनो अमितर परिसा देवाण घाहिता हवमागच्छति णो अव्याहिता,मज्झिम परिसाए देवा बाहिता हन्बमागच्छति अवाहितावि, बाहिर परिसादेवा अवाहिता हबमागच्छति॥ अब्भतरचण गोयमा! चमरे अमुरिंदे असुरराया अण्णयरेसु उच्चवएसु कज्जे कोहुयेसु समुप्पन्नतु अभितरियाए सहि समइ सपुछणा बहुले विहरइ, मज्झिमियाए परिसाए सहिमपय एवघमाण विहरति, बाहिरयाए परिसाए साई पय पचडेमाणे २ विहरइ, पारपदा किम लिये कही निस में मान्यतर समिता, मध्य की चहा घ मास की नाया बो गौतम! चमर नामक अमुरेन्द्र असुर गमा के भाभ्यसर परिषदा के देव पोलाये हुरे बाते हैं परनु विना पोलाये हुये नीं आते हैं, मध्य परिषदापाले घोलाये हुये व विना पोलाये हुवे दोनों तरा आते हैं और पाच परिपदावाले विना पोलाये हुन आसे हैं, दूमरा कारन यह है कि घपर नामक असुरेन्द्र असुर राजा को सचम, + मध्यप कार्य, अपनी राज्यधानी का कार्प, कुदर सघधी कार्य इत्यादि कार्य होने पर घे भाभ्यतर परिपदा के देवों साथ सपति मीलाते हुये और उनको पूछते हुवे रहते हैं, मध्य परिपदावाले देवों को सक्षेप में कह देते हैं और यास परिषदा वास देवों को वात कद्द कर कार्य करने का आदेश अर्थ 8 तीसरी प्रतिपचि में मवनपति देव का वर्णन 9 t: अनुर क पत्रमधारी मुनि श्री अमोलक मापि परिसाए देवीण कक्ष्य काल ठिई पण्णता मन्झिमियाए परिमा0 दवा केवइय काल ठिई पण्णचा, वाहिरियाण परिसाए देवीण क्व३५ कार दिई पण्णता? गोयमा! चमरस्तण असुरिंदरत अनितरियाए १रिसा देवाण असाइबाइ पलिओबमाइ ठिई पगणता, मझिमियाए परिसाए देवाण हो पलिओषमाइ ठिई पण्णता, वाहिरियाए परिसाए देवाण दिवस पलिओवम ठिई पुण्यचा, अभितरियाए परिसाए देवीण दिवट्ट पलिओवम ठिई पण्णता, मझिम- याए परिसाए दवीण पलिओवम ठिई पन्नत्ता, वाहिरियाए परिसाए देवीण अद्धपलि. ओवम ठिई पण्णता ॥ ७ ॥ सेकेण?ण भते ! एवं वुच्चइ चमरस्स असरिंदरस ही किसनी स्थिति करो, र पाच परिपदा की देवी की कितनी स्पिति करी ? यो गीतम! घमर नामक असुरेन्द्र की बाम्पतर परिपदा के देशों की बार पल्पोपम की स्थिति कही, मध्य परिपदा के देवों की दो परपोपम की स्थिप्ति कही व वाप परिपदा के देने की देव पल्पोपम की स्थिति की थाम्पतर परिपदा की देवी की देव पल्योपप, मध्य परिपदा की देवी की एक परपोपपद बास परिषदा को देवी की भाषे परयोपम की स्थिति कही है।॥ ॥ गो मगान् ' पर नापा ममुरेन्द्र की तीन पा रानापासपुर काळा पुत्रदेवमायनी ज्यामलादी .

सून HP चशमा मिाप म्य तृतीय उपाक 47 ताओ चेव जहा चमरस्त ॥ १३ ॥ धरणस्सण भते ! नागकुमारिंदरस नागकुमारनो अभितरियाए परिसाए सर्द्धि देवसहस्सा पण्णचा, मझिमियाए सत्चरिदेवसहरसा पण्णचा, बाहिरियाए असिंति देवसहस्सा पण्णता, मभितर परिसाए पण्णतर देवीसय पण्णत मज्झिमियाए परिसाए पन्नास देवीसय पण्णत्त बाहिरियाए परिसाए पणवीस देवीप्सय पण्णत्त ॥ १४ ॥ धरणस्तण रन्नो अभित रियाए परिसाए दवाण कवइय काल ठिई पण्णता, मज्झिमियाए परिसाए देवाण कवाय काल ठिई पप्णत्ता, बाहिरियाए परिसाए देवाण केवइय काल ठिई पण्णता? अभितरियाए परिसाए ६वीण केवइय काल ठिई पण्णता मज्झिमियाए परिसाए अहो गौतम ! वीन परिपदा कही है इस का सप कयन चमरेन्द्र जैसे जानना ॥१३॥ धरणेन्द्र को आभ्यवर परिपदा में ६० हजार दर, मध्य परिषदा में ७० हजार देव व पाय परिपदा में ८० हजारदेष भाभ्यतर परिपदा में १७९ मध्य परिषदा में १५० व पाप परिषदा में १२५ दवियों कही है ॥ १४ ॥ महो भगवन् ! घरणेन्द्र की बाभ्पतर परिपदा के दषों की कितनी स्थिति कही, मध्य परिषदा की कितनी मिपास कही व पाय परिपदा की कितनी स्थिति की ? मान्यवर परिपदा के देवी की कितनी स्थिवि कही मध्य परिपदा की देवी की कितनी स्पिति कही व वध परिपदा की देवीकी कितनी तीसरी मातिपचि में भवपविदेव का वर्णन अथ मुनि श्री ममोडक प्रापिभी8+ मझिमाए परिसाए तिन्नि चलि मोवमाइ ठिई पण्णत्ता, वाहिरयाए परिसाए अष्टाइबाइ पलिओवमाइ ठिई पण्णता, अभितरियाए परिसाए देवीण अड्डाइबाइ पलिओवमाइ ठिई पण्णचा, मझिमियाए परिसाए देवीण दोपाले. आवमाइ ठिई पष्णाचा, वाहिारयाए परिसाए देनीण दिवट्ट पलिओवम ठिई पण्णता सेस जहा चमरस्स मसुरिंदस्म असुरकुमार रन्नो ॥ ११॥ कहिण भते! नागकुमाराण देवाण भवणा पण्णता ? जहा ठाणपदे जाव दाहिल्लावि पुन्छिया वा जाव धरण नागकुमारिंदे नागकुमारराया परिवसइ जाव विहरइ ॥ १२ ॥ धरणरसण भत ! जागकुमारिंदरस णागकुमार रन्नो कइपरिसाओ पण्णताओ? गोयत तिन्निपरिसाओ •PRINT रानापसादुर छाळा मुखदेवमायणी HIRREER घाहिर की परिपदा के देशों की अदा पत्योपम की याम्पर परिपदा की देवी की मढाइ पल्योपम, मध्य परिषदा की देवी की दो पल्योपम व शाहिर की परिपदा की देवी की देव पल्पोपम की स्थिति की शेप घमर नापा असुरेन्द्र ममुर रामा मैसे जानना ॥1॥ बहो मगवन् ! नागकुमार देवता के मवनों का कह है ? भो गौतम । पनवणा में स्थान पद में जैसा कहा पैसा यह मब मानना पारद दक्षिण दिशा की मी पृच्छा करमा यहां धारण नामक नागकुमार का इन्द्र प नागकमार भागमा राता पारत् विचरता है ॥ १२॥ महो भगवन ! परण नामक नागकुमारन्द्र को शिवनी परिषदा की।

... तन it चतुर्दश भावामिगम सूत्र तृतीय उपाइ ++ फइदेव साहस्सियाओ पण्ण सामो, मझिमियाए परिसाए कइदेव सहरिसायाओ पण्णचाओ, अभितरियाए परिसाए कइ देवीसया पण्मता, मझिमियाए परिसाए फइदेवीसया पण्णसा, बाहिरियाए परिसाए का देवीसया पण्णता ? गोयमा ! भूयाणिदस्सण नागकुमारिदस्स नागकुमाररनो अभितरियार परिसाए पन्नास देव सहस्सा पण्णचा, मझिमियाए परिसाए सर्दुिदेव सहस्सा पण्पता, याहिरियाए परिसाए सप्तरि देवसहस्सा पण्णचा, अभितरियाए परिसाए दो पणवीस देवीसया पण्णता मज्झिमियाए परिसाए दो देवीसया पण्णता, बाहिरियाए परिसाए पण्णचरि देविसय पण्णश्च ॥ १६ ॥ भुयाणदस्सम भते ! नागकुमारिदस्स नागकुमार पहा से पहा नानमा पापस पिचरते हैं महो भगवन् । मूलान नामक नाग कुमार का इन् । नाग कुमार पा राजा को बाभ्पर परिपदा में कितने देव, पथ्य परिपदा में विसने देव व पाम परिपदा में किसने देव को मान्यवर परिषदा में कितनी देरियों, मध्य परिषदा में शिवनी देवियों । पाठ परिपदा में किसनी देवियों कही है? पहो गौसम ! भूमामेन्द्र को मान्यवर पारपदा में ५० हजार मध्य में ६.नार ष यान परिपदा में ७० हजार देव कोई आम्पवर परिपदा २९५, पप्य परिपदा में २०० प बास परिपदा में १७५ देपियों की है ॥ १५ ॥ महो मगमन् ! भूतानेन्द्र के 44मीसरी प्रतिपत्ति में मश्नपति देव का वर्णन मर्थ मुपद-पानमसारी मुनि श्री धपोमपिमी १ देवीण केवइय काल ठिई पण्णता, बाहिरियाए परिसाए देवीण केवइय काल ठिई पण्णता ? गोयमा ! धरणस्सरन्नो अभितरियाए परिसाए देवाण साइरेग अइपलिउबम ठिई पाप्ता, मझिमियाए परिसाए देवाण अहपलिआवम ठिई पण्पत्ता, बाहिरियाए परिसाए देवाण देसूण अहपलिओउम ठिई पण्णचा अभितारेयाए परिसाए देवीण देसूण अद्धपलिओवम ठिइ पण्पत्ता मज्झिमाए परिसाए देवीण साइरेग चलमागपलिओवम ठिई पण्णता, वाइरियाए परिसाए देवीण घउभागपलिओषम ठिई अट्ठो जहाचमरस्स, ॥ १५॥ कहिण भते ! उत्तरिल्लाण नागकुमाराण जहा ठाणपदे, जाव चिहराभूयाणदस्सण मते!नागकुमारस्स णागकुमाररनो अभितरियाए परिसाए स्थिति की! ओ गौतम ! परणेन्द्र के माभ्यवर परिपदा के देवों की साधिक भाषा पल्पोपम, मध्य परिपदा के देवों की भाषा पल्पोपम व पाय परिपदा के देवों की कुछ फम भाषा परपोपम माम्पतर परिषदा की देवी की कुछ कम माया पल्योपम मध्य परिपदा की देवी की सापिक पल्पोपम का गोपा माग पवारि की परिपदा की पौया माग की स्थिति की शेष सब चमरन्द्र से बानमा ॥ ५॥ मो ममरन् ! उत्तर दिशा के नाग कुमार देव का रहते १ पो नौवम ! से स्थान पर काइसरानापारादुर लामा मुखदेवसामयनी बाणारी - चतुर्दश-भीषामिगम सूत्र तृतीय उपाङ्ग Hin घउग्माग पलिओवम ठिई पण्णता, अट्ठो जहा चमरस्स, ॥ १७ ॥ अवसेसाण वेणुदेवादीण महाघोस पज्जवसाणाण ठाणपय वचन्वयाणिरवसेस माणियन्वा, परिसाओ जहा धरणभूयाणदाण दाहिणिलाण जहा धरणस्स उचरिल्लाण जहा भूयाणदस्स परिमाणवि द्वितीवि ॥ १८ ॥ कहिण भत ! वाणमतराण देवाण भवण पण्णता नहा ठाणपदे जाब विहरति ॥ कहिण भते ! पिसायकुमाराण भवणा पण्णचा? जहा ठाणपद् जाव विहरति ॥ काल माहाकालाय तत्थ दुवे पिसाय कुमार रायाणो परिवसति जाव विहरति ॥ कहिण भते ! दाहिणिल्लाण पिसाय कुमाराण जाव विहरति ।। काले यत्थ पिसाय कुमारिंदे पिसाय कुमार राया परिवसति महिडिए जाव देवी की साधिक परपोपम का चौथा गाग कार्य सब घमरेन्द्र जैसे कहना ॥ १७ ॥ शेप वेणुदेवेन्द्र से माधोपेन्द्र पर्यंत सर वक्तव्पसा स्पानपद जैसे जानना परिपदाका अधिकार दक्षिण दिशा का धरणेन्द्रम उचर दिशा का भूताने द्र जैसे जानना यह भानपति का अधिकार हुआ ॥८॥ अहो मगवन् पाणन्यवर देवों के मघन कर कहे है ? बहो गौतम ! पनपणा सूत्र के स्यानपद में जैसा अधिकार है पर सब यहाँ बानना यावत् विचरते । अहो मगवन् ! पिशाच कुमार के भवनों कहां कहे। मो गौवम ! इस का कयन मी पमरणा सूत्र के स्थानपद से मानना यावत् काल व महा काल ऐसे 42 सीसरी प्रतिपत्ति में वाणग्यतर देव का वर्णन +बनवादक समचारी मुनि श्री ममारक ऋषिनी रत्नो अभितरियाए परिसाए देवाण केवड्य काल ठिई पण्णचा, मसिमियाए परिसाए देवाण केवइय काल ठिई पण्णा, बाहिरियाए परिमाए देवाण केवइय काल ठिई पण्णचा, अभितरियाए परिमाए देवीण केवइय काल ठिई पण्णता मझिमियाए परिसाए देवीण केवइय काल ठिई पण्णचा, बाहिरियाए परिसाए देवीण केवइय काल ठिई पणता ? गोयमा । भूयाणदस्सण अभितरियाए परिसाए देवाण देकूण पलिओवम ठिई पण्णता, मझिमियाए परिसाए देवाण सातिरेग अर पलिआवम ठिई पण्णता, वाहिरियाए परिसाए देवाण अपलिओवम ठिई पण्णता अमितरियाए परिसाए देवीण अह पलिभावम ठिई पण्णचा मज्झिमियाए परिसाए देवीण देसूण अदपलिओवम ठिइ पण्णता, बाहिरियाए परिसाए देवीण सातिरग माम्यवर परिपदा के देनों की, मध्य परिपदा के देवों की, पाय परिपदा के देवों की, बागर परिषदा (की देवियों की, मध्य परिषदा की देवियों की व पाय परिपदा की देत्रियों की कितनी स्थिति की? बहो गौतम ! भूतानेन्द्र के माध्यवर परिपदा देवों की कुल कम एक परपोपप की, मध्य परिषदा- बासे की साधिक आपा परपोपम घ पाप परिपदारास की मापा परापम की स्थिति भी थाम्पतर परिपाकी देरी की भाषा परयोपम, मध्य पारपदा की कुल कम मापा परपोपमपात परिसदा की मारामागदरा सदरमहायमी पानामसारमी सत्र AI - चतुर्दश मीषामिमप मूप्र-तृतीप जाग 4 अमितरियाए परिसाए एक देवीसय पण्णत, मझिमियाए पारसाए एक्कदवासय पण्णच बाहिरियाए परिसाए एक देवीसय पन्नत्त ॥ कालस्सण भते ! पिसाय कुमारिंदस्स पिसायकुमाररन्नो अभितर परिसाए देवाण कवतिय कालठिई पण्णत्ता मझिमियाए पारिसाए देवाण केवतिय काल ठिती पण्णता बाहिरियाए परिसाए देवाण केवतिय काल ठिती पण्णत्ता, अभितरियाए परिमाए देवीण केव- तिय काल ठिती पण्णधा, मज्झिमियाए परिसाए देवीण केवतिय काल ठिती पण्णचा, बाहिरियाए परिसाए देवीण केवतिय काल ठिती पण्णता ? गोयमा ! कालरसण पिसाय कुमारिंदस्स पिसाय कुमाररण्णो अमितर परिसाए देवाण अद्ध पलिओवम ठिती पण्णचा, मझिमाए देवाण देसूण अड पलिओवम ठिती पण्णता, की है ? ओ गौतम ! कालेन्द्र को याम्पतर परिपदा के माठ हजार देव, मध्प परिपदा के दश हमार देव व घाम परिपदा के पारह हमार देव को हैं और वीनों परिपदा में मात्र एकसो २ देषियों कही है बदा भगवन् ! काल नामक पिशाच राजा को आभ्यतर परिषदा के देवों की, मध्य परिपदा के देवों की व पाच परिपदा के देवों की, भाभ्यतर परिपदा की देषीयों की, मध्य परिपदा की देवीयों की व पाप परिपदा की देवीयों की कितनी स्थिति कही है ? भहो गौतम ! आभ्यतर परिपदा के देवों की भाष 49 सीमरी प्रतिपत्ति में वाणपतरदेव का वर्णन + मर्थ ---- 4 अनुवादक-नामयमचारी मुनि श्री भमोलक अपिमी र विदति।कालस्सण भतेरपिसाय कुमारिंदरस पिसायकुमाररणो कतिपरिसाओ पण्णत्ताओ? गोयमा । तिष्णि परिसाओ पण्णसाओ तजहा ईसा तुहिआ दढरहा अभितरिया ईसा, मझिमियातुबिया बाहिरिया दढरहा कालस्सण भते । पिसाय कुमारिदस्स पिसापकुमाररण्णो मम्मितरियाए परिसाए कतिदेव साहस्सामोपण्णताओ जाव वाहिरिया परिसाए कतिदवीसया पण्णता? गोयमा ! कालस्सण पिसायकुमारिवस्त पिसायकुमार रायस्स मभितर परिसाए अट्ठदेव साहस्सीओ पण्णचाओ, मज्झिमाए परिसाए दस देव साहस्सीओ पाणचामो, बाहिरियाए परिसाए घारसदेव साइरसीमो पण्णताओ, दो पिचाप कुमार के रामा कहे हुये यापत् विचरते महो भगवन् ! दक्षिण दिशा के पिशाच कुमार के पास का फोस्यानपद त कहना यावत् विचरत है, पर काल नामक पिशापमारेन्द्र पिशाषकुमार रामा है, या मादिक यारत् विचरता है मो भगपत् ! कास नामक विधाम सुमारेन्द्र पिशाच रामा को कितनी परिषदा कहा ! बहो गौतम ! बीन परिपदा कपा, बुटेवा पसरया मिन में मान्यवर ईमा, मध्य बुटिता व पाय खरया भो मगरम् ! का नाम पियामेन्द्र को मान्यवर परिपका के पिटने मार देव को पापत् पाप परिषदा की कितमी रेवियों • मकाधक-रामायादरामासदेवमात्रीपाल प्रसादी + चतुर्दश-जीपाभिगम मूत्र-सृनीय चप सउद उप्पिना सुत्रे जोयणसए बाइलेण एत्यण जोतिसियाण देवाण तिारयमस- खिजा जातिसिय विमाणावास सयसहरसा भवतीति, मक्खाय, तेण विमाणा अद्ध कवि? सठाण सठिया एव जाय जहाठाणपदे जाव चदिम सूरिया तत्थ जोतिसिंदा जोइसरायाणो परिवसति महिड्डिया जाय विहरति ॥ सूरस्सण भते ! जोतिसिंदस्स जोतिसरण्णो कतिपरिसाओ पण्णता ? गोयमा ! तिगि परिसाओ पण्णचाओ तजहा- तुबा तुहियापन्ना, अम्भतरिया तुबा, मज्झिमिया तुडिया, बाहिरिया, पव्वा, मेस जहा कालरस परिमाण, ठितीवि अठो जहा चमरस्म चदस्मति एवचेव ॥२०॥ कहिण भतेदीप समुद्दा के महालयाण मत! दीवसमुदा किं सठियाण भते ! दीपरामुद्दा किमाकार भाव अष्ठि के सस्यानघाले हैं यावर इम का सब कयन स्यानपद मे कष्टना यापन् उन के चद्र व मूर्य दो हर है ये वहां रह हैं यावत् पिचरसे । महो मगवन् ! ज्योविपी केन्द्र पाविपी के राजा सूर्य को तिनो परिपदायों कही है ? अहो गौम ! तीन परिपदामों कही है तुम्बा, तुर्दिया व पर्वा आभ्य वर तुम्बा, मध्य सुटिया व पाम पर्या, अप सब काल इन्द्र जैसे जानना कार्य सप घमरेन्द्र जैते जानना ने मूर्प का कहा पैसे । चद्र का कहना ॥ २० ॥ अहो मगवन् ! दीप समुद्र कहां है, द्वीप समुद्र तीमरी मति-पचि में ज्योतिषी देव का वर्णन अर्थ +भमुपादक-नामसमपारीमुनि श्रा भमोलक पिनी पाहिरियाए परिसाए देवाण सातिरेग चउम्भाग पलि उवम ठिनी पण्णता, अमित- रियाए परिसाए दवाण सातिरेग चठवभाग पलिओवम ठिती पण्णचा मज्झिम परि- साए देवीण चउमाग पलिओवम ठिती पण्णचा वाहिर परिसाए देवीण देसृण चउ- म्भाग पलिओवम ठिती पण्णता, अट्टो जाव चमरस्स एव उत्तरितस्सवि एव निरतर जाव गीयजसस्म ॥ १९॥ कहिण मते ! नीतिसियाण देवाण विमाणा पण्णचा, कहिण जोतिसिया देवा परिवसति ? गोयमा ! उबिदिव समुदाण, इमीसे ग्यणप्पमाए पुढवीए बहुसमरमणिज्जाओ भूमि भागातो सत्तणआतेजोपण परपोपम, मध्य परिपदा के देणे को कुछ कम भाषा परयोपम, प या परिसदा के देगे की साधिक परपोपम का चौया माग माम्पसर परिषदा की देवीयों की माविक पल्योपम का व चौया माग, मध्य परिषदा की देवीयों की चौथा भाग व पाच परिपदा की देवीयोंकी पल्पोपम के चौधे भाग कुच्छ कमकी स्पिति कार्य सम चमरम्द्र मेमे काना ऐसे ही उत्तर दिशा के उद्रका महा यो गीतयश पर्यंत सब इन्द्रों का कानाm२९|| बाो मापन्! ज्योतिषी देव के विमान का कोम्पोसिपी देष का राखे। मो गौतम ! दीप ममुद्र की मपर इस रत्नप्रमा पृथ्वी के समभूमि माग से ७९० योजन ऊसे पाये तक यो ११० यामनगरपन में ही मारुपात गस्त्र उपोतिषी के पिमान को पुरोपिमानों • प्रकाशनानापादुर लाला मुसदवसायजी माणसाची.

, 4 धतुदश-नीषाभिगम मूत्र-तृतीय उपाय Hits ॥ २१ ॥ तत्थण अय जबुद्दीवेणाम दीवे सव्वदीव समुदाण आभतरए सन्व खुडाए बट्टे तेजाप्य सठाण सठिये वट्टे रहचकवाल सठाण सठिये, वटे, पुक्खर कणिया सठाण सठिये बढे पडिपुन्नचद सठाण सठिये, एक जोयणसयसहस्स आयाम विक्खमेण, तिपिणजोयण सयसहस्साइ सोलसहस्साइ दोणियसया सत्तावीसे जोयणसते तिण्णियकोसे अट्ठावीसच धणुसय तेरस अगुलाइ अह अगलच किंचि विसेसाहिए परिक्खेवेण पण्णता सेण एकाए जगतीए सव्वतो समता सपरिक्खित्वे, साण जगती अहजोयणाइ उदृ उच्चत्तेण मूले वारस जोयणाइ विक्खमेण, मझ अट्ठजोयगाइ विक्खभेण, उप्पि चत्तारि जायणाइ विक्खभेण, मूलविच्छिण्णा, मझे पनवर घेदिका मौर एक२ मनस्वण्ड वेष्टित है छोक में स्वयमूरमण समुद्र पर्यंत असख्यात द्वीप व समुद्र है ॥२१॥इन सबकी पीच में सब से छोटा जम्बूद्वीप नामक द्वीप कहा है, यह तेल पूढे के सस्थानवाला है, रय चक्र मेसा मोलाकार, पुष्कर की कणिका जैसा, प्रति पूर्ण घट्ट जैसा सस्थानवाला है एक लक्ष योमन का लम्मा चौटा है वोन पक्ष सोलह हमार दो सत्तावीस योजन तीन कोश, एकसो अह इस धनुष्य व १३॥ अंगुल से कुच्छ अधिक नस की परिधि है इस की चारों तरफ एक गती है यह जगति माषा योजन की ऊची है, मूम में पारह योजन की चौदी, मभ्य में पाठ योजन की चोटी व ऊपर चार तीसरी प्रतिपक्षि में कम्न्दै पकी जगसीका वर्णन a अनुराव रामपारी मुनि श्री भमोक ऋषिनी - पठोयाराण भते ! दीव समुद्दा पण्णता? गोयमा ! जबुद्दीवे दीवा लवणादियासमुहा सठाणया ता एफविहिविहाणा वित्थारतो अणेगविहिविहाणा दुगुणादुगुण पडप्पाए माणा २ पवित्यरमाणा २ ओमासमाणा वीयीया, बहुउप्पल पउम कुमद् गलिण सुभगा सोगधिया पोढरीया महापोडरीय सतपत्त सहरसपत्तय फुल्लके- सरोवयिता, पत्न्य २ पउमवर वेइया परिक्खिता पचेय २ वणसड परिक्खिचा, अमितरियलोए असखेजा दीवसमुद्दा सयभरमण पजवसाणा पण्णचा समणाउसो किचने पर ? दोप समुद्र के सस्यानवाले हैं, ? और उन का कैसा बाकार माष (स्वरूप) कहा है? अहो गौतम । जम्बूद्वीप दे पसरपान द्वीप प लवण समुद्र मादि यसरूयात समुद्र । वे सब एक सस्यानवाला और पिस्तार में अनेक प्रकार के हैं विस्तार में प्रथम दीप से प्रथम समुद्र दुगुना, प्रथम समुद्र से दूसरा द्वीप दुगुना, उस से दूसरा समुद्र दुगुना यो एक प से दूसरा समुद्र दुगुना मौर समुद्र से द्वीप दुगुना विस्तार में रहे हुवे उन में जो समुद्र कल्लोळ से सुनोमिव है मोर दोप में मनेक दर प्रमुख रो हुवे है उन भो तत्पल पन, घट विकासी, सूर्य विकामी, कमल, नसिन, मुमग, सोषिक, पुररीक, मा पुररीक, शवपत्र, सारसपत्र, गैरह कमल, पुष्परा सदिय रे प्रस्पेकहीप को पुर २ •प्रकाधक-यनापपदुर लाला मुखदेवसरायजीन्ससममाएगी उम्र . मम चतुर्दश जीनाभिगमसृनीय उपाय - पउमवर वेदिया अद्ध जोयणाइ उड्ड उच्चत्तेण,पचधणुमायाइ विक्वमेण,सन्वरयणामई जगती समिया परिक्खेवेण तीसेण पउमवरवेदियाए इमेवारूवे वण्णवासे पण्णते तजहा-चयरामया नम्मा रिट्ठामयापतिाणट्ठा बरुलिया मया खमा, सुवण्ण रूप्पमया फलगा, वइरामयी सधी, लोहितक्खमइओ सूईओ नाणामया कलवरा, कलेवरसघाडा, णाणा मणिमया रूवा, रूपसघाडा अकामया पक्खा पक्षवाहामो, जोतरसामयावसा धमकवेल्लुयाओ, एययामयी पहिया, जातरूवमयी ओहाहणी, वईरामयी उवरिं पुच्छणी, सबसेयरययामतेलादणे ॥ २४ ॥ साण पउमवरवेदिया जगती के चारों तरफ घटित हैं,अथात् जगती जिसनी ही घराब है इस पावर पेदिका का वर्णन करते हैं इम की वन रत्नमय नोव है, परिष्ट रत्नमय नीव का ऊपर का भाग है, बैहूर्य रस्नमय स्तम है, सोने चांदी के पटिये है, उस की सघी बज्ररत्न से पूरी हुई है मारिताक्ष ग्ल की उन पटियों की पीच में मूर्यो है, विविध प्रकार के कसेबर व कलेवर के माघे हैं, विविध प्रकार के मणिमय रूप ष रूप सघात है, अफ रत्नमय पक्ष (देव) व पक्ष पाप है, ज्यातिपी रत्नमय वश ष पशषलिका (सुटियों ) , उस पर चांदी की पटरी है, उस पर मुवर्ण का दामन है, उम पर पज रत्न का निवट दक्कन है, उस पर श्वेत चांदी का आच्छादन है ऐमी पावर बेदिका है ॥ २५ ॥ यह पपरर पेदिका एक मर्थ तीसरी पतिपत्ति में जम्बूदी का जगत की वर्णन in ) 1 . मनुवादक-बामसमचारी पनि श्री ममोसा पिमा सविता उषि तणया गोपुग्छ सठाण सठिया,सव्ववइरामया अच्छा सण्डा लण्हा घट्ठा मट्ठा जीरया निम्मला निप्पका णिककडछाया सप्पभा ससिरीया सठजोया पासादीया दरिमणिना अभिरूया पहिल्वा ॥ २२ ॥ साण जगती एकेण जालकडएण सन्यतो समता सपरिक्खिता, सेण जालकहएण अटूजोयण उड्ड उच्चचेण पचधणुसयाइ विक्खमण,सन्वरयणामए, अच्छ सण्हे घटे मट्ट नीरये निम्मले निप्पके निक्काडमछाए सप्पमे ससिरीय सउबोव पासादीये दरिसणिज अभिरुवे पडिरूवे ॥ २३ ॥ तीसेण 4 जगतीए उमि बहुमझदेसमाए एत्यण एगा मह पठमवर वेदिया पण्णचा, साण योमन की चोटी मूठ में विस्तारवाली, मध्य में सक्षिप्त पनी हुई व ऊपर सकुचित पनी हुई है,सयपत्र रस्लमय, सुकुमाछ, घटारी, मटारी, रज रहिन, निर्मल, रज रहिस, कांति की व्यापात रहित, प्रमा महिन, शोमा १ सयोत सरित,मासादिक, दर्शनीय ममिरूप प प्रतिरूप है ॥ २२ ॥ उस जगती की चारों तरफ एक बास फरक (गमास)रे यह अर्थ यामन का कया पांच सो धनुष्य का चौडा । सब गस्लपय, सय, पदु, घटारा, मठारा, रम ररित, निर्मछ, पक रत, निरूपास तिवाला, प्रमा शोमा । पोत सरित, मासादिक, दर्षनीय, भामिस्म । प्रतिसरे ॥ २३ ॥ सम नगती की पप बीच में एक पर विदिशा पर पथार रेदिका भाषा योजन की कपी पाच सो मनुष्य की बारी है, सब रस्तमय मकाएकरासापुर डाळा Bसदर सायमी नामसारी. - 44 ना म चतुर्दशजीनाभिगमतृतीय उपाय - पउमवर वेदिया अद्ध जोयणाइ उस उच्चत्तेण पचवणुसाया विक्समेण, सत्यरयणामई जगती समिया परिक्वेषेण तीसेण पउमवरवेदियाए इमेवारूवे वण्णवासे पण्णते तजहा-वयरामया नग्मा रिट्ठामयापतिाणट्टा बलिया मया स्वभा, सुवण्ण रूप्पमया फलगा, बहरामयी सधी, लोहितक्खमइओ सूईओ नाणामया कलेवरा, कलेवरसघाडा, णाणा मणिमया रूवा, रूबसघाडा अकामया पक्खा पखवाहामओ, जोतरसामयावसा घमकवेल्लुयाओ, एययामयी पट्टिया, जातरूवमयी आहाडणी, वईरामयी उवरि पुच्छणी, सबसेयरययामतेछादणे ॥ २४ ॥ साण पउमवरवेदिया जगसी के चारों तरफ वष्टित में,अपास् मगती जितनी ही घेरावमें है इस पनवर वेदिका का वर्णन करते हैं इम की वन रत्नमय नोव है, परिष्ट रत्नमय नीष का ऊपर का माग है, वैर्य रत्नमय स्सम है, सोने चांदी के पटिये है, बस की सधी वनरत्न से पूरी हुई साहिताक्ष ग्ल की उन पटियों की पीच में सूइयों, विविध प्रकार के कलेवर व कलेवर के माये है, विविध प्रकार के मणिमय रूप व रूप सघात 3, अंक रत्नमय पक्ष (देश) व पक्ष पास है, ज्यातिपी रत्नमय वन व यशवलिका (सुटियों ) , उस पर चांदी की पटदी है, उस पर सुवर्ण का दहन है, उम पर बन रत्न का निवट दकन है, उस पर श्वेत चांदी का माच्छादन है ऐमी पपवर वेदिका है ॥ २४ ॥ यह पद्यपर पेदिका एक 4.तीसरी मविपचि में जम्मूदी का जगत की वर्णन मर्थ 1 मनुवारक वासामवारी मुनि श्री भमोलक ऋष जो एगमेगेण हेमजालेण एगमेगेण खिखिणिजालेण, एव घटाजालेण जाव मणिमालेण, एगमेगेण पठमवर जालेण सम्परयणामएण सम्यतो समता सपरिस्खिचा ॥ तेण जाल तवणिज्जलबूसरा सुवण्ण पयरगमडिया णाणा मणिरयण विविधहार साहित समुदया, ईसिं अण्णमण्णमसपत्ता पुन्वावर दाहिण उत्तरा गतेहिं पाएहिं मदाय मदाय एतिया बतिया कपिता खोभिता चालिया फदिया घट्टिया उदीरिया एतेसि उरालेणे मणुनेण कण्णमन निवृत्ति करेण सद्देण सव्यतो समता मापूरेमाणा २ सिरीए अतीव २ उवसोभेमामा उषसोमेमाणा चिट्ठति ॥ २५ ॥ तीसण पठमवर मुरन की माला, घुघरे की माला, यावर मोतियों की माग, घ कमल की मासा से परियेष्टिमी मासामों सब रत्नमय ? उन मासायों का रक्त सुपर्ण के मूमने है, मुवर्ण का प्रकरक [सूत्र], विषिष प्रकार के मणि, रत्नों के विविध प्रकार के हर वर्ष हार से शोमिव रित् परस्पर मसग २१, पूर्व, पश्चिम, उत्तर व दक्षिन के पदर पायु से पायमान होती हुई, शुम्भ होती हुई, पसित होती हुई. रिचित पसती ई दीरणा करती हुईवे पासामों उदार ममोर वर्ष । मन को प्रियकारी पए से पारों नरफ पूरवी ई मतीब २ घोमती है ॥ २५ ॥ उस पचार रेरिता में स्थान २ पर गुस नाशक रामापरादुर काला मुखदेवसहायत्री मासासादपी 'त्र चतुधि नीवाभिमा मूत्र तृतीय उपाय 41. घेइयाए तत्थनस्थ देसे देसे तहितहिं बहवे हयसघाडा गयसघाडा,नरसघाडा किण्णरसघाडा किंपुरिससघाडा महारगसघाहा गधन्धसघाडा उसमसघाडा सव्वरयणामया अच्छा साहा लण्हा घट्टा मट्ठाणारया निम्मला निप्पका निककडण्छाया सप्पमा सस्सिरिया सउज्जोया पासादिया परिसणिज्जा, अभिरूवा पहिरूवा ॥ २६ ॥ तीसेण पउमवर वेदियाए सत्य २ से १ तहिं २ षहवे हयपतीठ तहेव जाव पडिरूवामओ ॥ एव हयवीहीओ जाव पहिरूबाओ ॥ एष हयमिहुगाइ जाव पहिरूबाइ ॥ २७ ॥ तीसेण पउमवर वेइयाए तत्थ २ देसे २ तहि २ बहवे पउमलयाओ नागल्याओ एवं असोग घपग चूय वाण वसतिय अतिमुचग-कुंद-सायलयामो णिचकुसुमियाओ जाव सुविभत्त घोरे के युगल, गम के युगल, नर के युगल, किमर के युगर, कपुरुष के युगल, मरोग्ग के युगल, गर्व के युगल, में वृपम के युगल से हुवे है व सव रत्नमय स्वच्छ, मृदु, घटार, मटारे, रज रहित, निर्मल, परु रहित, निरुपात छापापा ममा शोमा व सचोत सहित, मासादिक, दर्शनीय, अमिरूप प प्रतिरूप 17 ॥ २६ ॥ उस पपरर येदिका में स्थान २ पर पहुत हय की पंक्तियों यावत् प्रतिरूप है ऐसे ही इय घोधि पावत् मविरुप है सो कहना ऐसी हय मियुन यावत् प्रतिरूप है सा कहना ॥ २७ ॥ उस पयवर पेदिका में स्थान २ पर पहुन पममता, नागलवा, ऐसे ही अशोक, चपक, भाम्र, लता, छण नामक वृक्ष, 4 तीसरी प्रतिपाच में इम्बूदीप को जगती का वर्णन अथ .

अनुवाक वालममचारी मुनि श्री भोलक सीमा विहमजरीवढेमक धरीओ सन्वरयणामतीओ सम्हाभो लण्हाओ घटाओ मट्ठाओ जीरयाआ मिम्मलाओ निप्पकाओ निष्ककम छायाओ सप्पभाओ ससिरियाउ सजा- याओ पासादिआमो दरिसणिज्जामा अभिरुवाओ पडिरूयाओ ॥ २८ ॥ तीसण पउमवर वेदियाए तत्य २ देसे २ तर्हि २ बहवे अक्खया सोत्थिया पण्णता, सन्यरयभामया अच्छा ॥ २९ ॥ से केणटुण भते । एव बुच्चइ पठमवर बेहया ? गोयमा ! पठमघर योदयाए तत्य २ देसे २ तहिं वेदियासु पतियवाहासु वेतियासीसफलएसु वेतिया पुडतरेमु स्वभेसु खमवाहासु खमसीसेसु खमपुड- बासति, मति मुक्त कुदलता व श्यामलनायसप कुमुमित(पुष्पवाली)यारत् मुविमत मपिट मारीरूप शिखर पारन करनेवाली में सघ रस्नमय, स्वच्छ कोमल, घटारी, पटारी, रम रहित, निर्मल, कर्दम रहित निरुपास छायापाठी, प्रमा, शोमा बग्योस सहित मासादिक, दर्शनीय भमिरूप र प्रतिरूप ॥ २८ ॥ उस पप्रपर मादका में स्थान २ पर अक्लय (पापल के ) स्वस्तिो हुए है ये सब रत्नमय स्वच्छ ॥ २९ ॥ महो भगवन् ! पप्रपर पेदिका क्यों मार ! भो गौतम! पभर मेदिका में स्थान २ पर बदिका के पात्र में, पेदिका पटिप केपी में दिशा के पुरीकर में, स्तम में, स्तम पार्क में सम पोप में, स्तम पुर्दावर में, सीमों में, सीमों के मुख में, बीमा पटिप में, सीन के पुटावर में, रुगनाबहादुर लाला सुखस्व आयजी उवास प्रसादमी - - 4 चतुर्वचनीयामिगम राय-तृतीय उपा का तरेसु, सूयीस सूयोमुहेतु सायफलएमु सूर्यिपुडतरेसु, पक्खेसु पक्खवाहास पक्सपरतरेसु बहुय उप्पलाइ पउमाइ जाव सयसहस्पत्ताइ सम्परयणामयाइ अच्छाइ मण्हाइ लण्हाइ घट्ठाइ मट्ठाइ नीरयाइ निप्पकाइ निक्ककडछायाइ सप्प- भाइ ससिरियाइ सउजोयाइ, पासादीपाइ परिसणिज्जाइ, अभिरूवाइ पडिरूवाइ, महया २ वासिकग्छत्त समासाइ पण्णताइ समणाउप्तो । से तेणटुण गोयमा ! एव वुच्चइ पउमवरवेदिया २ ॥ अदुत्तरचग गोयमा पठमवरवदिया २, सासते नामधेज पण्णचे, ज णक्याविणासि जात्र णिचे ॥ ३० ॥ पउमवर वेदियाण मत !कि सासता असासता ? गोयमा ! पक्ष में,पक्षपाहा में, ष पक्ष के परतर में बहुत उत्पल पम पावत् लक्ष पांखदी घाले पुप्प रहे हुवे हैं वे सब रत्नमय, अच्छे, लष्ण, घारे, मठारे, रज रहिस, निर्मठ, पक रहित, निरुपहन कातिगाले, प्रमा, शोमा नयोत सहित प्रासादिक, दर्शनीय अमिरूप व पति अहो आयुष्यन्त श्रमणों ! वे वर्षाकाल में पानी रखने का महा पात्र अथवा छत्र समान है ओ गौतम ! इस लिये पनवर वेदिका शब्द की माप्त हुई है अथवा तो पर वेदिका का शाश्वत है यह अतीत काल में नः यो पैसा नहीं यापत् निस्प है ॥३. ॥ अहो मगरन् । पपवर येदिका क्या शाश्वन है 48 तैसी प्रतिपत्ति में जम्बूद्वैप की जगतो का वर्णन " મ नाम " दक-पास प्रामधारी मुनि श्री ममोष्टम्प पिमी 4 सिय सासता सिय असासता ॥ केण?ण मते । एव वुच्चइ सिय स.सता तिय असासता ? गोयमः ! दन्वष्टुपाए सासया वण्णपज्जवहिं गधपक्वहि रसप- जवेहि फासपजहिं असासता, से तेणट्रेण गोयमा ! एवं वुच्चइ सिय सामता सिय असासता ॥ ३१ ॥ १उमवर वेइयाण मत | कालतो केवचर होड ? गोयमा । पकथावि णासि नकयातिपत्थि नकयाति मभविस्वति । भूविष भवातिय भविस्सतिय धूवा मितिया सासता अक्खया अन्वया अवटिया णिच्चा पठमवर वैदिया ॥३२॥ तीसेण जगतीए सम्मि बाहिं पठमवर वेइयाए एत्थण एगे महवणसहे पण्णते पा ममावत है ? मो गौतम ! स्पातू जापत ५ स्यात् माधम है महो मगमन् ! किस लिये एमा का कि स्यात् सवपन स्यातू अशाचत है? अहो गौतम ! द्रव्य यानिय शाश्वत है और वर्ण, गप, रस प स्पर्श पर्यत्र से भशापट बा गौतम ! इमलिये ऐमा करा कि भावर वेदिका स्पात् शाश्वत व स्पात् अशाश्वतो ॥५॥ पो मगपन् ! पचवर बेदिका का कितना काल तक राने का का ! मारे गौतम ! पहिले नही पी सानी, पर्वमान न सा नमविष्य पानी मा रेसा 6 परतु मतीव काल में यी, पर्तमान में भविष कास में होगी सी पृष, निस्प, कापन, समय अम्पय मास्थित, नित्य पर रेदिका रस नगवी की पर । पर मेरिका से पाहिर पसारकरानाबहादर ळाला सुखदवसरायमी व्यासपी A सत्र - , 4 चतुर्दशनीवामिगम सूप-ननीय उपा 4ttis देसूणाइ दो जोयणाइ चकवाल विक्खभेण जगतिसमये परिक्खेवण किण्हे किण्हो भास जाइ अणेग स्गड रहजाण उग्ग परिमायण सूरम्मे पासादिये सण्हे लण्णे, घटे मढे गीरए निम्मले निक्ककडच्छाए सप्पमाए ससिरिए सउज्जोवे पासादीये दरिसणिज्जे अभिरूवे पहिरूले ॥३३॥ तस्सण वणसहस्स अतो बहु समरमणिब भूमिभागे पण्णत्ते से जहा नामए अलिंगपुक्खगेतिवा मुइग पुक्खरेइवा सरतलेतिवा करयले- तिवा आयसमडलेतिवा चदमडलेतिया सूरमडलेतिवा उरष्भचम्मेतिवा उसम- चम्भेतिवा, बराह चम्मेतिवा, सीहचम्मेतिवा वग्घचम्मेनिवा, विचम्मेतिवा, दीविय- चम्मेतिवा, अणेगसकुकीलग सहस्सचितते आवड पवावड सेढी सोस्थिय सोवस्थिय एक बहा बनवण्ड कहा हुवा या वनस्खण्ड कुच्छ कम दो योमन का चक्रवाल में चौटा है जगदी जितना गोलाकार में या कृष्ण वर्ण घाला यावत् कृष्णामाम है याछत् अनेक शकट रय पालस्वी प्रमुख रहने का स्थान है मणिक,मामादिक,दर्शनीय,बामरूप ध प्रतिरूप है ॥३३॥ उस बनखण्ड में एक घडा रमणीय भूमिमाग से मुरजका तल (बाद विशप) मृदगासल, सलापकासल, करवल, काच का सल, चद्र महल सूर्य महल, मेंदे का चर्म, पम का चर्म, वरामका धर्म, सिंहका चर्म, व्याघ्र का चर्म, छाग हा चर्म व चिका चम ममान तल एक भाकार पाले मानवीलामों को तपाकर टीपने से जिप सपनल वास होता है वैसे ही भावत, प्रत्यावर्त, अणि प्रश्रेणि स्वस्विक, पुष्पमान वर्धमान, मत्स्य, * तीसरी प्रनिपचि में जम्बूद्वैप की जगती का वर्णन + b मथ A पनवादक मानप्रवारी मुनी भो भयोलकावापभी + पुस्तमाण वदमाग मछहक मकरडक जरामरा पुजवाल पउमपत्ता सागरतरग वासति पउमलय भत्तिचित्तेहि सवारहिं सस्मिरिएहि सउज्जोगे नाणाविह पचवणेहि तपहिय मणि हिय उवप्लोभिये तजहा-किण्हेहिं जाव सुकिलेहि ॥ ३३ ॥ तत्थ जे त किण्ठा तणाय मणीय तीसेण अवमयारूचे वण्णावास पण्णचे से जहानामए जीमूनेतिवा अजणेतिवा खजणेतिका कबलेतिवा मसीइवा मसीगुलि- यातिवा गवलतिया गवलगुलियातिवा, कण्हसप्पतिवा, कण्हकेतरे इवा आगासापिग्गलेइया कण्हा सोतेतिवा कण्ह कणियारेतिया काहबधुजीवयेतिवा भवेतारूवे सिया ? जो तिण? समट्ठ, तेसिण किण्हाण तणाण मणीणय रुप, भरामर, पुप्पमेसी, पय, पत्र, समुद्र सरग, पासतिकलना व पपडता के अनेक प्रकार के वियों से सब प्रकार की श्री व उपोत सहित, विविध प्रकार के कष्ण यावत् शुक्ल ऐसे पवि पर्ण पाले तृण पणि मे शोमनिक है ॥ ३३ ॥ इन में कृष्ण पर्ण पासे तृण प पनि में उन का इस सस वर्णन करा नमें मेघ, पटा, अमन, खमन कामल पठी, ममी की गाली, नील, नील, की गाटा, उष्ण सर्प, कृष्ण बाल कृष्ण थकान कम, कमशेष वृत, कृष्ण कपिका, 4 कृष्ण पधु मीर एमा या इसकापर्ण होवा' या मई समर्थ नहरे फल तृण । मणिका पन इस से भी पिक वाम, ११ ममोहर, पंत पकाशक रानापडादर लाला मुबदेवसायजी मामी. .

मूत्र SH पर्दछ जीवाभिगम पूम तृतीय पपास HD एतो इट्टयराएचेर कततराएगेव मणामतराएचव वणेग पण्णचे ॥ ३९ ॥ तत्थण जे ते गीलगा तणाय मणीय तेसिण इमेतारुचे वणवासे पण्णचे से जहानामए भिगेतिबा भिंगरचेतिबा चासेतिबा चासपिच्छेतिवा सुयेतिवा सुयपिच्छतिवा पीलीतिवा, णालीमेदेतिबा गालीगुरियातिवा, सामाएतिका उच्चनएतिवा, वणराईतिवा इलघरवसतित्रा, मोरग्गीवातिवा, पारेवयग्गीवातिवा, मयसी कुममतिवा, वाणकुमुमतिबा, अजणकेमिया कुसमेतिया, णीलप्पलेतिया णीलासो तेतिवा णीलकणवीरेनिवा, णीलयधुजीवेतिवा,मवेयासवेसियाको तिण? समतु, तसिण निलगाण तणाणय मणीणय एता इट्ठयरात्र कततराएंचव जाव वण्णण पण्णत्ते र मणाम 13 11 नीले रण म तृण व मणि का ऐमा पम्प कहा जसे मृग,मृग की पाख नील चाम, नीर धाम की पांच, तोता, नोना की पाल, नीर, नीम वस्तुका मेद, नील वस्तुका समुह, सामा (घान्य पिपदांना कामावर्ण, धनको घटा प्रमुख, घरदेव के मन, मयूर ग्रीवा, पारापत ग्रीवा, अलमो के पुप्प, सम्वृश के पुर, अमनममिका (वृत शिप) उस के पुप्प, नीला कमर, नीला अशोका,नीली कणेर नीखारघु जीव इत्यादि मस्तु सपान स्पा टमका नीसारण ? यर अयं समयं नहीं। इससे मी अधिकतर 4. वीसरी प्रतिपत्ति में सम्पुप की जगती का वर्णन + - अर्थ ar A. पवादक माममवारी मुनी प्रो भमोलकबा पमी + पुस्तमाण वहमाम मछडन मकरडक जरामर। पुजवाल पउमपचा सागरतरग वासति पउमलय मस्तिचिचेहिं सवाएहि सस्क्षिरिएहिं सउवोहिं नाणाविद पचवणेहि तणहिय मणिहिय उवलोमिये तजहा किण्हेहिं जार सुकिलेहि ॥ ३३ ॥ तत्व जे त विण्डा सणाय मणीय तीसेण अयमयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते से जहानामए जीमूनेतिवा अजणेतिया खजणेतिया कबलेतिवा मसीइवा मसीगुलि- यातिवा गवलतिवा गवलगुलियातिया, कण्हसप्पेतिवा, कण्हकेत्तरे इवा आगाप्तथिग्गलेइया कण्हा सोतेतिया कण्ह कणियारेतिया कण्हयधुजीवयेतिवा भवेतास्वे सिपा ? णो तिणढे समट्ट, तेसिण किण्हाण तणाण मणीणय कच्छ, भरापर, पुप्पोस्ती, पय, पत्र, समुद्र तरग, पासतिकलना पछता के अनेक प्रकार के चित्रों सब प्रगर की श्री घ सपोत मरित, विविध प्रकार के कृष्ण यावत् शुक्ल ऐसे पवि वर्ण पाछे तृण व पण मे शो मनिको ॥ ३३ ॥ इन में कृष्ण पण पाल तृण र पणि । उन का इस तर वर्णन करा मे मंघ, घटा, मंचन, खनन, कामल पसी, ममी की गोली, नील, नील, की गुारा, कृष्ण सर्प, कृष्ण राम कृष्ण माका तल, कृष्णमोक वृक्ष, कृष्ण कपिका, व कृष्ण पपु भीष एमा रपा इसका रुणवर्ग वा' या मई समर्थन कृपण तृण 4 पनिकापर्ण इस से पी भषिक श्याम, मनोहर, ति प्रकाशक रानापार लाला मुपदेवसायजी मारी. SM - H+ चतुर्दश भीवाभिगम मूम-तृतीय सपा 4 तस्थण जे ते हालिदगा, राएचेव मणामतराएचे वण्णेग पण्णत्ते ॥ ३४ ॥ पण्यत्त से जहा नामए चपातिय मणीय तेसिण इमेतारूवे वण्णवासे पण्णत्ते से हाभेएतिया हालिबागुलियातिवा, तिवा चासेतिवा चासपिच्छेतिवा सुयेतिवा सुयपिच्छतिषा बिहुरेतिवा, विदुरगरागेति गालीगुलियातिवा, सामाएतिवा उच्चनएतिवा, सुबन्नसिप्पिएतिया, वरपुरिसदे,. मोरग्गीवातिया, पारेवयग्गीवातिवा, मयसी कुहुठिवाकुसमेतिवा, तहउहाकुअजणकेमिया कुसमेतिवा, णीलुप्पलेतिबा णीलासो कुसुमेतिवा सुहिरण्णकुसुम वधुजीवेतिवा, भवेयास्वेसिया?णो तिणट्टे समढे, तसिण रतो इट्ठयराचेव कततराएंचव जाव वण्णेण पण्णचे जो पीले मणि र तृणो उस का वर्णन जैसे पीला वर्ण नीकले पैसा, सदी, इस्लं व मणि का ऐमा स्वरूप कहाँ ? जैसे मृग,भृग की पाख नील चाम, चिकुर रग (द्रमा विशप), चिकुर तयार पांव, नील, नील घस्तुका भेद, नील वस्तुका समुह, सामा (धान्य माभन, पर पुरुष सा घासुदेव के वस्त्र, समुख, घडदेव के वन, मयूर ग्रीवा, पारापत ग्रीवा, अलसी के पुष्प, के पुष्प, तोस क पुष्प, सुवर्ण यूयिका पन विशप) उस के पुष्प, नीला कमल, नीला अशोक वृक्ष नीली कणेर कोरटक क पुष्प, कोरटक के पुष्प की मा उमका नीसावर्ण है? यह मर्य समय नहीं है इस से मी अधिकतर 47ीसरी प्रतिपत्ति में जम्बूदप की जगती का वर्णन अथ JH , अमुवादक-मारमनधारी मुनि श्री ममोहक अपिभी + ॥ ३५ ॥ तस्थण जे ते लोमिकरहक जराम। पुनील पउमपचा सागरतरंग वासात पण्णत्त से जहा नामए एहि सस्मिरिएहिं सउज्जोहि नाणाविह पचवणेहिं गररुहिरतिवा, वराहरुहिरेतिमेये तजहा-किण्हेहिं जाव सुकिलेहिं ॥ ३३ ॥ तत्य तिका जातिहिंगुलएतिवा स्तिीसेण अयमयारूवे वण्णावास पण्णचे से जहानामए मणितिया, लक्खारसएतिवा। खजणेतिबा फजलेतिवा मसीइवा मसीगुलि- तिवा, जासुयणकुममेइवा, लगुलियातिवा, कण्हसप्पेतिया, कण्हकेतरे इवा रचासोगेतिया, रतकणीयारो, सोतेतिवा कण्ह कणियारेतिया कण्हबधुजीवयेतिवा समट्ट,तेसिणलोहियगाण तणोण? समट्ट, तेसिण किण्हाण तणाण मणीणय नीसा यावत् मनोहर है॥३५॥ मग या मुद तरग, यासतिफलना पपलता के अनेक प्रकार के चित्रों शन का घिर, मेडे का रुघिर, मा , विविध प्रकार के फप्प पार शुक्ल ऐसे पवि वर्ण पाछे तृण व इन्द्रगोप भीर, माछ (उदय होता) F कृष्ण पण पाले तृण घ मणि , उन का इम सस वर्णन करा रे अकुर, बोरिसास मणि, लाख का र. मसी, ममी की गोली, नील, नील, की गाटका, कृष्ण सर्प, कृष्ण पुष्प, गुरु पुष्प, प टम के पुष्प वृक्ष, रुष्ण कणिका, रुष्ण पधु भीर एमा क्या इसका जलपर्ण या है। यह पर्थ समर्थ न कण तृण । मनिका वर्ष इस से भी अधिक स्पाम, २४ पनोहर, व पता राजारादर लाला मुपदवसरायजी माणसदबी- । दश-नीषा भेगम सूप तृतीय उपास ++ पोहरीयदलेतिया, सिंदुधार वरमल्लदामेतिवा, सेतासोएतिवा संयकणवारातवा, सय बधजीवतिया, भये एयाख्वेसिया ? जोतिणद्वे समटे, तेसिण सुकिलाण तणाण मणीणय एतो इट्ठतराएचेव जावधष्णोण पण्णचे १३८॥ तेसिण मते!तणाणय मणीणय केरिसये गधे पण्णचे से जहा नामए-कट्ठापुडाणवा पत्तपुडाणवा, चोयपुडाणवा, तगरपुडाणवा, एलापुडाणवा, हिरमेवपुडाणवा, पदणपुडाणवा, कुकुमपुडाणवा, उसीर पुडाणवा, चश्यपुडाणवा, मरुयगपुडाणवा, दमणगपुडाणवा, जातिपुडाणवा जुहिय पुडाणा, मल्लियपुडाणवा णो मल्जियपुडाणवा, वासतियपुडाणवा, केतियपुडाणवा पप, पर्पा का मल, जात पुष्प की माव्य देत आशोक वृक्ष, पेत कणिका व व वधु जीव ऐसा क्या उन का पर्ण है ? यह अर्य समर्थ न इस से अधिक इष्ट यावत् मनामवर उन मणि तृण का श्वेत वर्ण मानना बहो मगवन् ! उन तृम व मणि की गष कैसी ही है ? अहो मातम ! जैसे कोप्ट पुरा, मुगघि पान का पुटा, चोया (गघ द्रव्य विशेष) का पुडा, एलायची का पुडा, नगर का पुटा, पाल खप्तस्वस का पुढा, चदन का पुरा कुंकुम का पुटा, रशीर का पुटा, चपक का पुडा मायका का पुढा, दमण का पुडा, माई का पुटा, जूई का पुरा, मलिका का पुडा, नव मल्लिका का पुटा, व.सवोच्वा का पुडा, केवली का पुडा, कपूर का पुडा, व पपरल का पुडा इत्यादि में से मद वायु पाते तीसरी भसिपचि में जम्यूदीप की जगती का वर्णन अर्थ . - OIR ३ + मुबारक पाम्नमवारी मुनि श्री भमोग मरिमी + तिवा, पीयासोवा पीयकणवीरेतिवा सायबधुजीएतिवा, भवेएयासवे सिया?णोइण? समटे, तेण हालिहा तणायमणीय एतो इट्ठय। चेव जाव वण्णेण पण्णचे ॥ ३७॥ तस्थण ज ते मुक्किलगा तणायमणीय तेसिण अपमेयारूवे वण्णवासे पणत्ते-से जहा नामए अतिवा सखेतिया चदेतिवा कुदेतिया दगरयेतिवा हसायलीतिवा कोंचावलीतिया हारावलीतिघा मलयावलीतिया पदावलीतघा सारतियवलाहयेतिवा धतधोय रूप्पपटेतिवा, सालि पिठरातिया फदपुप्फ रासीतिवा, कुमुदरासीतिवा, सुक्कछि वाडीतिया, पेहुणमिजाइवा, मिसितिया, मुणालियातिवा, गयदंतेतिवा, लवगदलेतिवा, मधु मीर ममान क्या है ? यह अर्थ समर्थ न इन का पर्ण उक्त सप वस्तुओं से भी इष्टनर यावत् मनामनर पीय पर्म में का? ॥३७॥ शुक्ल तृण प मणि का केसा वर्ण पास का मेसे अमरत्न, दक्षिणात शस, चद्र, मुचकुर के पुष्प, पानी के कन, सिपक्षी की श्रेणी, क्रॉच की अमि, माता हारकी श्रेणी, बगळे की श्रेणी, चद्रारमि [पानि में घर पशिविरकी श्रेणी] भरर काम में हो र पाल, मधि से पमा दुला चांदी का पर, तुष दिवस, मवकुद पुष्प का पुम, मोरपीछ का गर्भ, समापन शण मिरी पुल के पुष्प, पचनीकद, रस्सी के दांत, समम पत्र पोररीक महाभा-राजापहादुरगळा मुसदेवसायमी बागमसारनी .

सूत्र पसुर्दश जीपाभिगम मप्र तृतीय उपास अकेसुपइट्ठियाए चदणासार कोणानक्वपरिघटियाए कुसलणरनारि सपग्ग हिताए, पदोसपञ्चतकालसमयसि मदाय २ एईयाए वैईयाए खोमियाए फदियाए घट्टियाए उदीरियाए उरालामणुन्ना कण्ण मणनिन्बुपिक। सब्बतो समता सहा अभिणिस्सवति भवेतास्वेसिया ? नोतिण? सम? ॥ से जहानामए किण्ण- राणवा किंपुरिसाणवा महारगाणवा गधन्वाणवा भइसालवणगयाणवा नदणवणगयाण वा सोमणसवणगयाणवा पहगवणगयाणवा हिमवत मलय मदरगिरिगुहा समण्णा गयाणया एगोसहिताण समुहागयाण सन्निसन्नाण सन्निविट्ठाण पमुदिय पक्कीलियाण नारे तीसरा दृष्टाव कसे-किना, पुरुष, महोग्ग व गर्ष भद्रशालवन, नदन पन, सोमनस धन प पडग पन में अपना हिमवत पर्वत पर, मलयाचल पर्वतपर, मेरुतिकी गुफा में एकत्रित मीलकर यहां सम्पर प्रकार से ममुदित व क्रीडावस बनकर गीतरति नामक गर्व हर्प सहित गध, पध, कथ्य, पदधंद,व' तक को मद २ घर से सप्तस्वर व आठ म सहित, छ दोप रहित, अग्यारह अलफार गुण सहित व १ प्रथम से ही दीर्घ स्वर से गाना, २ मभ्य भाग मे मद २ स्वर से गाना, ३ १ पक्षम, २ रिपम गधार ४ मभ्यम ५ पञ्चम ६ घेयत और निपध यह सप्तस्पर १ शृगार प्रमुख माठ रस है ५१ भाति-अधिक त्रासित मन से भयभास यनते हुए गाना रसृत दोप-त्वरा से गाना, ३उप्पिय दोष आकुल न्याकुल घनकर गाना ४उवाल दोप-सालस्थानको अतिक्रम करके गाना, १ कास स्वर दोष सानुनासिफ गाना ६ अनुनासिक दोष नाक म स स्वर नीकालकर गाना यह सप्तदोप 42 तीमरी प्रति-पचि में जम्बूद्वीप की प्रगती का वर्णन + मर्थ ३ +पादक-वासनामारी मुनि श्री बमोफ पिमी - अचकम्मरस आइण्ण वरतुरग मुसपयुत्स्स कुसल नरत्येय सावि सुसपगहिस्स सरसय वतीसतोण परिमष्टियस्स सककडवसगरस सवावसर पहरणावरण भरिय जोहवुड सज्जस्स रायगणसिवा मतेठरसिवा रम्मसिवा मणिकोहिमतलसिवा अमिक्खण अइटिजमाणस्सवा णियटिज्वमाणस्सवा परूनवरतुरगस्स चडवेगाइ दढस्स ठरालामणुन्ना कण्णमणाणिवुतिकरा सवतोसमता अभिणिस्पति भवेतारूवेसिया ? णो तिण? समटे ॥ से जहा नामए वेयालियाए घीणाए उत्तरमदामुन्छियाए प्रकार क मायुघ, ढाल प्रमुख मारण और योषा को पध करमे योग्य ऐसा युद्धरय है उसे राजा के अगन में मंत पुर में, महेल में, मनोहर मणिपद भूपिताल में, पारंपार अति धग से फोरापे इसका उचम पक्षणवाले अभों से फिरात हुये उस रथ में से मनोमा म सुखकारी सब दिशी में स्पर्भवा हुमा शब्द नीचलता वो मो मगरन् ' ऐसा शम्द उस सृण में से नीकलता है क्या ? भो गौतम ! यह भयं समर्थ नही का दूसरा दर्शन करते जैसे ममात में माल की वीणा, गधार स्वर की मूळ सहित अपने प्रा में मरो तरह रखा हुई चंदन की वीणा, कोई कुशल पुरुष यामी प्रमात काह में पदस्थर से बनाये इस रा मूग प्राप्त करते हुए, दीरते हुए सदार मनोज मुख रस्सम करनेवासा कम सब विधामा सपनारामीकछवार को मावन् ' रस तृण काश्या एसा शब्द होता है। मो गौतमा या मर्प सपर्व मायक राजाादुर लामा सुखदेवसायमीमासाबमापी , सत्र चतुर्दश मामिगम सम-सृतीय उपाय 48 खडख हयाओ वापीओ पुक्खरिणीओ गुजालियाओ दाहियाआ सरपतीओ सरसर विलपती मो अच्छाओ सहाओ रययामयकुलाओ वाग्मय पासाणाओ हाल- मणिफालिय पहलपच्चोयहाउ नवणीयतलाआ सुवण्णसुझरयमणि पालुयाओ सुहोयार मुउत्ताराओ णाणामणि तित्यसुबदामा चाउकोणाओ समतीराओ अणुपुत्र सुजायवप्प गभीर सीयलजलाओ, सच्छण्णपत्तभिसमुणालाओ बहुउपल कुमुयणीलण सुभगसोग- धित पोहरिया महापोडरिय सतपत्त सहस्सप्पचफुल्ल कसरावइयाभो छापदपरिभुज- स्थान २ पर पहन छटो पावलियों, पुष्करणियों, गुनालिकामों, दीपिकाओं, सरपक्तिों, पिलपंक्तिों रही हुई है व निर्मल स्फटिक रत्न जैसी सुकुमाल है उन के किनार रत्नमय है, बजरत्नमय पापाण है जिस स उन के दोनों माग वो , सुवर्णमय सल है, बैडूर्य व स्फटिक रत्नमय तट है, मुषर्ण प चोदी मय पालु है, उन में मुख पूर्वक प्रोच कर सकते व परि नीकल सकते, शिविध प्रकार की मणियों से चारों ने पांष दुए, समान वीर , मल स्थान गभीर है, उन का जल शीवळ, वर्ष मम में माच्छादित कमठ पत्र, कमलकर प कपल नाल, उत्पल कमल, चद्र विकामी रुपस, मुपग, मागपिक, पंडरीक, १४ पुटरीक, शतपत्र, सास पत्र, पुष्प व केपरा सहित वे कमल धार से भागवे हुवे हैं स निर्मल जल से परिपूर्ण है, अनेक प्रकार के मत्स्य का उन में परिम कातीसरी मनिपचि में जम्बद्रप की जगवी का वर्णन अर्थ . . कमल, नपिन .

बनुषार- पानसरोनि का मोगा पिनी + गीयरातिगधव्य हरिसियमणाण गज पब कत्थ गेय पेय देय पापवर उक्विाय पवत्तय मदाय राबियवेसाण सचसरसमण्ण गाय अटरसमुसपउच्च उद्दोसविमुक एकारस गुणालकार अट्टगुणोक्वेय गुजत धस कुहरावगुढ रत्ततित्थाण करणमुह मधुर सम सललिप सहरवसनती तलताल लयगह ससपउत्त मोहर रमठयरि- मिय पयसषार दरमिसमइ अतिरिय चासरूव दिव्य नह सजगेय गीयाण भवेया रूपोसिया ? इतासिया ॥ ११ ॥ तस्सण घणखहस्स तत्थ तत्य देसे २ तहिं २ यहवे माठ गुण मारिस गुमावमान, बामसी समान पूर्गत सम्पपासा सर गुद, फठ शुद व शिर शुद्ध पे तीन प्रकार से पद मधुर सर से मलित, मनोहर मृदु स्वर सहित, मनोहर पद के गीत मस्ति, मनोहर मुनने को मानद होये पैसा उचम मनोहर रूप, वाला देवता सषधी नाटक प सुनने योग्य मायन करे एसा पम तृष का स्वर है क्या ? गौसम ! पेमा उस तृण का शब्द ॥ ॥ उस रनसग ६१ पूर्ण गुन-सार कग से पूर्ण गाना, २ रक्तगुन-गापन करने योग्य राग से अनुरकपने गाना, २ ममान गुन भन्योन्य स्वर विशेष से मसकार बसे शामवा हुवा गाना, । म्यक्त गुन-सहर सर स्फुट कर के प्रगटपने गाना, ५ मति पुर गुम-पिपरीव सर से सपाद रहिव गाना, । मधुर गुन से बसतमास में कोकिस्म का मधुर लर होने वा गामा, समनवास बालगरिक को अनुक गाना, ८ सन्ति गुम-त्रपोलमा से सति फना सहित गाना • मकारु-रानासादर माला सदरमपनी र स्व , निम्मा, रिटामया पतिढाणा, वैरुलियामया खभा,मुवन्नरुप्पमया फलगा, बइरामयासधी सूत्रा लाहितक्खमइउ सूईआ नाणामणिमया अवलवणा अबलवणराहाओ, तेसिण तिसो पाण पहिरूवगाण पुरतो पत्तेय२ तोरणा पण्णता, तेण तोरणा णाणामणिमया णाणा मणिमएसुखभेसु उवणिविट सन्निविट्ठ विविहमुच रोचइता, विविइतारारूवोवइत्ता, इहा- मिय उमभ तुरग नर मगर विहग वालग किण्णर रुरुसभ चमर कुजर वणलय पउमलय भचिचित्ता स्वमुग्गय वइरवेदियाइ, परिगताभिरामा, विजाहर जमल जयल जत जनाविध, मच्चिसहस्स मालणीया रुवसहस्सकलिया भिसमीणा भिज्झसमीणा चक्खन्नायलमा अर्थ विविध प्रकार के अवलम्बनपाहा है, उन घिमोपान के बागे प्रत्येक पकियों पर धोरण है थे विविध मकार के मणि रस्नों के ?, मणिपय स्तंम पर रो हुवे हैं, विविध प्रकार के मुक्त फल से विष्टित है, विविध प्रकार के ताराओं सहित हैं, चाहमृग, वृषभ, अश्व, मनुष्य, पक्षी, मगर, मत्स्य, सर्प, किम्मर रूरू, शरम, चमर, कुजर, वनलता, पद्मरता, इत्यादिक मनोहर चित्रों से चित्रे हुने हैं स्तम पर पनपय वेदिका है, मिस से मनोहर तोरण देखाना है स्तम में सूर्य के तेज से अधिक तेजस्वी रिपावर युगल रे सहस्र कीरणवाला सय समान है सम से देदीप्यमान है, विशेष सेज से देदीप्यमान ५ चश नीवाभिगमतृतीय उपस तीसी प्रसिपत्ति में जम्बूद्वीप की नगती का वर्णन . - समानुपादक बालाघारी मुनि श्री मोलक प्रापानी - माण कमलाओ अच्छ विमल सालेल पुग्णाओ, पडिहत्य भमत मच्छ कच्छभ अणेग सठणगण मिहुण परिवरितामो पत्तेयरपठमवर वेदिया परिक्खित्ताओ पत्तेय२ वणसड परिक्खित्ताओ,अप्पेगतियाओ आसवेदाओ अप्पेगतियामओ करुणोदाओ, अप्पगतिथाओ खारोदाओ, अप्पगनीआ घओदाओ अप्पगइयामो इक्खादाआ, अत्यंगतियाओ पगयातीआ दगरसेण पण्णताओ,पासादियाओ ॥४२॥ तसिण खुडग खुपाण वावीण जाब विळपतीयाण सत्य २ देसे २ तहिं २ जाब तिसोवाण पडिरूवगा पण्णता ॥ तेसिम तिसोपाण पडिरूवगाण अयमेतारूले वणवासे पण्णते, तजहा-बयरामया पण करते हैं, यनक पक्षीयों के समुह घर गस प्रत्येक पावरी को एक २ पावर वोदका है, मौर प्रत्येक को एक २ बनवण्ट है कितनीक वापरियों का पानी चद्रासादिक मदिरा जैसा है, कितनीक का बारुणो समुद्र जैमा ? कितनाक का शीर ममुद्र जैसा है, कितनीक का घृत जैसा है, कितनीक का पनी इस रस नैमा है, किवनीक का पानी अमृत लैमा, मासादिक दर्शनीय अभिरूप । प्रतिस २॥ ४२ ॥ सन गेटी घाटीयों यावत् पिलपतियों में स्पान २ पर विसोपान [ोटे २ पछि न का इस तरा वर्णन करा रे पन पंक्ति की भूमि बजरत्नपप , मरिष्ट रन का मूल 1 रन के समरे, साने चांदी के पटिपेरे, बधान की बंपी, मोरितात गल जी, अाशा रानयादुर छाला मुबारसायनी मारपसारनी २७ निप्पका निककहछाया सप्पमा सस्सिरीया सउज्जोया पासादिया दरिसणिज्जा अमि रूवा पडिरूवा ॥ ४६॥ तेसिण खुड़ियाण वावीण जाव विलतियाण तत्थ २ देसे २ तहिं २ बहवे उप्पाय पन्चयगा, णियति पन्वयगा, जगति पन्धयगा, दारुपन्वयगा, गमडवगा, गमचगा, दगमालगा, दगपासगा,उससरदगा,खडहरदगा भादोलगा पक्वदालगा सयरयणामया अच्छा सम्हा लण्हा घट्टा मट्ठा णीग्या हिम्मला निप्पका जिककहछाया सप्पमा सस्सिरिया सज्जाया पासादिया परिसणिज्जा अभिरूवा पहिरूवा ॥ ४७ ॥ तेसुण उप्पायपन्वतेसु जाव पक्खदोलगेसु वहां स्वच्छ सुकुमाल, घटारे, पठारे, रन रहित, निर्मष्ठ, पक रहिस, निरूत फासिषाले, ममा, पयोत सरित, प्रासादिक, दर्शनीय, अमिरूप व प्रतिरूप है ॥ ४६ 0 उन पापटी यावत् विपक्किों में उस देश विमाग में सस्पास पाव पापर व्यतर देव ष दरियों वैक्रय रूप बनाकर क्रोदा करते हैं वैरे नियति पस, मगति पर्पस, दारु पर्वत स्फोटक रत्न के पहप, स्फटिक के मांचे दग माल, दग मासाद वे थे। परसु सम्बाइप चौगइ में छोट , पहा मनुष्यों का मन आंदोलन होजाये से होने से मोदोसक है पक्षियों प रते है इम से यह पक्षी का मांदोलक है पे सष रत्नपय निर्मछ यारत् पविरूप हैं ॥४७॥ यदा उत्पात पर्वतपर पारत् पक्षादोलक पर पहुन हस के आकार वाले आमन, गरहासन, मार चतुर्दश-जीवाभिगम मूत्र-सूतीप उपार दसरी प्रतिपचि में अम्बूदीपकी जगतीका वर्णन अर्थ .

पनवासामधारी मुनि श्री अमोणक ऋषिमी सुहफासा समिरियरूवा पासादिया॥४३तिसिण तोरणाण उप्पिं वहवे अट्ठ मगलगा पसत्ता सोत्थिय सिरिवच्छ नदियावत्त बहमाण भदासण कलस मप्छ दप्पण सन्दरतना मया अच्छा सण्डा जाव पडिरूया ॥४४॥ सिण तोरणाण उप्पि वहवे कण्डचामर- झया नील चामरझया जाय सुकिलचामरझया अच्छा सहा रुप्पपट्टा वइरडा जालयामलगधिया सुरूवा पाप्तादिया ॥ ४५ ॥ तेसिण तारणाण उपि वहये छचाइछत्ता पढागाइपहागा घटाजुयला चामरजुयला, उप्पलहत्थमा जाव सयसहस्सपचहत्यमा सम्परयणामया अच्छा सम्हा लण्हा घट्टा मट्ठा पारया निम्मला है, पशु को देखने योग्पी, मुनकारी स्पर्धवाला मश्रीक प चित्तका प्रसभकारी है॥४॥उन औरणों पर माठ २ मगलफ को. सधया स्व तक, २श्रीपत्स, ३नदापर्व पर्षमान ५ भद्रासन ६ का ७ मत्स्य यग्म व ८ दर्पण ये सप रत्नपय सछ, सुकुमार यावत् प्रतिस्प ॥ ४४ ॥ उन गेरण पर पान प्रकार की कृष्म घवर की धमा, नील पर की जमा, छाप पार की ममा, पीक पार की घमा, श्वेत चार की धमाके सच्छ, पकुमाष, पांदी पटाव पण रस्न का पानी कमल मपान गप पाली मुस्प र पासादिक ॥ ४५ ॥ न तोरणोंपर पर पभापर पाया, पिंटा गुगल, वर, युगस, अनेक, रत्पस कपस, पावत् सम पर कमी से सब स्लप काश-समासादर आमा समससारमो समसारी . .

त्र (A 4 चतुर्दश्च-नीमिगम मप्र-तृवीय उपा दीया दरिसणिवा अभिरुवा पाढरूवा ॥ १९॥ तेमुण आलिघरएसुजाव आयघरएसु बहूइ हसासणाइ जाव दिसासोवत्थियासणा सधरयणामयाइ जाव पडिरूवाइ ॥ ५० ॥ तस्सण वणसहस्स तत्थ २ से २ तहि २ बहवे नाइमडवगा जहिया- मडवगा मनिया मडवगा जोमालियामडवगा वासतिमडवगा दहिवासुया मडवगा मारील्ल मडवगा, तबोली मडवगा, मुहिया मडवगा, गागलया मडवगा, मतिमत्त महबगा, अफाया मडवगा, अमेत्ता मडवगा, मालुया मडवगा, सामलया मडवगा, निच्च कुसमिया निच्च जाव पहिरूवा ॥५१॥ तेमुण जातिमडवएस जाव सामल या गर्भगृह, प भारिसागृह है चे सप रत्नमय स्वच्छ यावत् प्रतिरूप हैं ॥ ४९ ॥ उन बालिगृह में बहुत सासन पावत् दिशास्वस्तिकासन है ये सप रत्नमय यावत् प्रतिरूप है ॥ ५० ॥ उस बनखण्ड में बहुत जाइ मटप, जूइ महप, मल्लिका के मटप, नषमालिका के मडप, पासति के महप, दधिवासुकी के मंडप, मुग्लिी मदप, नागरवलिके मदप, द्राक्ष के महप, नागलता महप, अतिमुक्त के पहप, आस्फोट महप, भमित्ता वनस्पति के महप, मालुका मंडप व श्यामलता मडप सदैन पुष्प फल वाले यावत् प्रविरूप ॥५१॥ उन जाइ के मटप यावर श्यामलता महप में पदुस पृथ्वी शिला पट कहे हैं वे इस तीसरी मविपचि में जम्बूद्वीप की जगवी का वर्णन . 41 अनुरादासपमधारी मुनि श्री भगोड अपनी हसासमाइ गरुलासणाइ काँचासणाइ उण्णयासणाइ पणपासणाइ दीहातगाइ भद्दासणाइ पक्लासणाइ मयूरासपाइ, उसभासणाइ सीहासणाइ पउमासणाइ दिसासोबत्थियासणाइ, सबरयणामयाइ, अच्छाइ सोहाइ लण्हाइ घटाइ मट्ठाइ जीरयाइ निम्मलाइ निप्पकयाइ, जाव ससिरीयाइ, सउज्जोयाइ पासादियाइ दरिस णिजाइ अभिरूवाइ, पडिरूवाइ ॥ १८ ॥ तस्मण वणसहस्स तत्य २ दमे तहिं २ बहब मालिघरा मालियाघरा कयलिघरगा, लयघरगा, अच्छणघरगा, पेच्छणघरगा, मजणघरगा, पसाहणघरगा, गन्मघरगा, मोहणघरगा सालयघरगा जाल्य घरगा कुसुमघरगा चित्तघरगा गधन्वघरगा आयसघरगा,सवरयणामया अच्छा सहा लण्हाघट्ठा मट्ठा गीरया निम्मला, णिप्पका निक्ककडछाया सप्पमा सस्सिरीया सउज्जोया पासा- काँचान, समतासन, नम्रासन, दीर्घासन, मद्रासन, पशासन, मयूरासन, वृपमामन, सिंहासन, पद्मासन, विश्वास्म स्तकासन पिठे हुवे हैं वे मा रत्नमय, स्वच्छ, कोमल, घटारे, मटारे, रज रस निर्मल, पर रहिर, निरूपात कांति पाले, प्रमा, श्रीष नोव सरिस प्रसन्न कारी, दर्शनोग, भीमरूप र प्रतिस्परे ॥४॥ रस बनसण में स्थान • पर एत मालिनापक पनस्यातगृा, पालिगृह, कदल गृा, सतागृा, मास्थानमा पाचगृा, मनन, प्रसाधनगृा. गर्भगृह मोहनगर, पटवागृह, भाछ गृह, बासा, कुमुमगर, चित्रगृह, पानामासारखा पुसदेवसाजीपाल प्रसाएरी. , 4 चतुईश-नीमिगम मुम-तृतीय उपा 42 दीया दरिसणिज्जा अभिरुवा पहिरूवा ॥ १९ ॥ तेमुण आलिघरएसु जाव आयघरएसु बदर हसासणाइ जाव दिसासोबत्थियासणार सवरयणामयाइ जाव पडिरूबाइ ॥ ५० ॥ तस्सण वणसहस्स तत्य २ दसे २ तहिं २ वहवे जाइमडवगा जहिया- महवगा मजिया मडवगा जोमालियामहवगा वासतिमडवगा दहिवासुया मडवगा मरिल्लि महवगा, तबोली मडवगा, मुहिया मडवगा, णागलया मडवगा, मतिमुत्त महवगा, अफाया महवगा, अमेचा मडवगा, मालुया मडवगा, सामलया मडवगा, निश्च कुसमिया निच्च जाव पडिरूवा ॥५१॥ तेमुण जातिमडवएम जाव सामल या गर्वगृा, व आरिसागर हैं ये सम रत्नमय स्वच्छ यावत् प्रतिरूप ॥४९॥ उन मालिगृह में पहुत रसासन यायत दिशास्वस्तिकासन है वे सप रत्नमय यावत् प्रतिरूप है ॥ ५० ॥ उस पनखण्ड में बहुत माइ महप, जद महप, मल्लिका के महप, नवपालिका के मटप, पासप्ति के मडप, दधिवासुकी के माप, मूरिष्ली महप, नागरपलिके मटप, द्राक्ष के महप, नागलता पहप, अतिमुक्त के पहप, बास्फोट मटप, मपिचा पनस्पति के महप, मालुका महप न श्यामळता महप घे सदैव पुष्प फल पाले यावत् मतिरूप ॥५१॥ उन नाइ के मदप यावत् श्यामलता मडप में पहुव पृथी शिला पट कहे है ये इस के 4. तीसरी प्रतिपचि में जम्बूद्वीप की जाती का वर्णन 2 11 अमुवादक-नासमझवारी मुनि श्री भमोळा पिनी र इसासमाइ गरुलासणाई काँचामणाइ उण्णयासणाइ पणपासणाइ दहाप्तणाइ भद्दासणाइ पक्खासणाइ मयूरासणाइ, उसभासणाइ सहिासणाइ पउमासणाइ दिसासोवत्थियासणाइ, सम्वरयणामयाइ, अच्छाइ सण्डाइ लण्हाइ घटाइ मट्ठाइ पीरयाइ निम्मलाइ निप्पकयाइ, जाव ससिरीयाइ, सउज्जोयाइ पासादियाइ दरिस णिजाइ अभिरूबाइ, पडिरूबाइ ॥ १८ ॥ तस्सण वणसहस्स तत्य २ दमे तहिं २ पदव आलिघरा मालियाघरा कयलिघरगा, लयघरमा, अच्छणघरगा, पेच्छणघरगा, मजणघरगा, पसाइणघरगा, गव्मघरगा, मोहणघरगा सालयघरगा जाल्य घरगा कुसुमघरगा चिचघरगा गधन्वघरगा आयसघरगा,सबरयणामपा अच्छा सहालण्हा घट्ठा मट्ठा जीरया निम्मला, णिप्पका निककडछाया सप्पमा सस्सिरीया सउबोया पासा- चासन, सनतासन, नम्रासन, दीर्षासन, मद्रासन, पसासन, मयूरासन, वृपमासन, सिंहासन, पद्मासन, दिशास्त्र स्वभासन विहे हुवे पे मप रत्नमय, स्वच्छ, कोमल, घटारे, मटारे, रन रित निर्मस, पर सीर, निरुपात कोवि वाले, प्रमा, श्रीष योत सरिन प्रसपकारी, दर्शनाग, भामस्प र प्रतिस्प४८॥ उस बनसण्ड में स्थान पर पहुत भासिनामा पनस्पतिगृर, मालिगृा, कसंगृा, सवागृा, मास्वाना, पानगृह, ममनगर, प्रसाधनगृा, गर्मगृह, मोहनगृह, पटवामगृह, मास गृह, पासागा, कुमुपगृह, विमर, मायरामादरखामा मुसदेवमायती पासमारी। A - . चतुईन-मीपामिगम मुम-तृतीय उपा 41 दीया परिसणिज्जा अभिरूवा पहिरूवा ॥ ४९ ॥ तेमुण आलिघरएसु जाव आयघरएसु यहूर हसासणाइ जाव दिसासोवत्थियासणाहू सवरयणामयाइ जाव पडिरूबाइ ॥ ५० ॥ तस्सण वणसहस्स तत्थ २ दसे २ तहि २ बहवे नाइमडवगा जहिया- महवगा मलिया मडवगा जोमालियामडवगा पासतिमडवगा पहिवासुया मडवगा मारील महवगा, तबोली मडवगा, मुहिया मडवगा, णागलया मडवगा, अतिमुत्त महवगा, अफाया महवगा, अमेचा मडवगा, मालुया मडवगा, सामलया मडवगा, निच कुसमिया निच्च जाव पडिरूवा ॥५१॥ तेमुण जातिमडवएस जाव सामलया गर्भगृह, व आरिसागर है ये सप रत्नमय स्वच्छ यावत् प्रतिरूप ॥ ४९ ॥ उन भालिगृह में पहुत सासन यापत् दिशास्वस्तिकासन है वे सा रत्नमय यावत् प्रतिरूप है ॥ ५० ॥ उस धनखण्ड में बहुत माइ महप, जइ महप, मालिका के महप, नवमालिका के मडप, पासप्ति के मडप, दधिवासुकी के पाप, मृरिछी महप, नागरपलिके मटप, द्राक्ष के मडप, नागलता मडप, असिमुक्त के महप, बास्फोट मटप, मयिचा घनस्पति के महप, मालुका मटप व श्यामळता महप हैं घे सदैव पुष्प फल पाले यावत् प्रतिरूप ॥५१॥ उन जाइ के मदप यावत् श्यामलता ममप में बहुत पृथी शिला पट कहे हैं वे इस के कर तीसरी प्रतिपचि में जम्बूद्वीप की जगवी का वर्णन - मथए तु बहवे पुढवी सिलापटगा पण्णसा तजहा-इसासणा सठिता कोषाप्तणस ठता गलासणा सठिता उण्णयासण सठिता गगासण सठिता, परितासण सठिया, पीहासण सठिया, महासण सठिता, पक्खासण सठिया, चमरासणसठिया, सीहास- पसठिया, पउमासणसाठया दिसासोवत्यियासणसठिया पण्णचा ॥ तत्थ घहवे वरस- यणासणावमिट्ठ सठाण सठिया पण्णचा समणासो ' आईणगरुय दूर णवणीत तूलफास मउया सव्वरयणामया अच्छा सण्हा घट्ठा निम्मला निप्पका निमकहरुछाया सप्पमा सस्सिरीया सउज्जोया पासादिया दरिसणिजा अभिरूषा पडिरूया ॥ ५२ ॥ तत्यण बहो मट्ठा जीरया अनुसार बासमवारी मुनि श्री भमोमा ऋषिमी कारनामसार गणा मुसदेव सायमीवामी सस्थान पाल, गरुडासन के सस्यान पामे, उन्नवापन के सस्यान पाले, नम्नासन, के सस्सनमासे परिचासन संम्यान पाझे दीर्षासन के मस्पान वाले, भद्रासन के संस्थान वाले. पक्षासन सस्थान पाछे, घमरासन पाले, वृपमासन के सस्थान पाने, सिंहासन के स्थान पाय पचासन के सस्थानपालेर दिशा सस्तिमासन के सम्मानपासे गोपायुप्पाम्स प्रमों ! पानासन विशिा संस्थान पाने को रे। इस कार्य पृनवर्ष, पूर बनसति, मासान, बल बता नुसार पप ररममय कणे,पपत् विका.. ५२. पापम्पर y सूत्र 4+ चतुझ मीमामिमव मूष तृतीय उपाइ 41 पाणमतरा देवा देवीओय आसयति सपतिय चिट्ठति निसीदति तुयति रमति ललति कीलयति मोहयति पुरापोराण सुचिन्नाण सुपरकताण सुभाष कप्ताण कल्लाण कम्माण फलवित्तिविसेस पञ्चणुम्भवमाणा विहरति ॥ ५३ ॥ सीसेण जगतीये उम्पि मतो पठमवरवेदियाण एत्यण एगे मह वणसहे पण्णचे, देसूणाइ दो जोयगाइ विक्लभेण घइयासमएण परिक्खेवेण किण्हे किण्होमास वणसहवन्नो तणसहविहणो णेयन्वो तत्थण बहवे घाणमतरा देवा देवीओय आसपति सयति चिट्ठति निसीयति तुयति रमति ललति कीडति पुरापोराणाण सुचिन्नाण सुपरिकताण मुभाण कताण कम्माण कक्षाण फालविनिविसेस फालवित्तिविसेस पचणुभवमाणा विहरति विहति ॥ ॥ जबुद्दी- देव,ष देवियों आते हैं पैठने , सोते है खेलसे, क्रीडा करते हैं, मोहित होते है और पूर्व भष में अच्छी सरह पाचरण किये हुए कल्याणकारी कोंका फल मोगते हुवे विचरते हैं ॥ ५३ ॥ उस जगती के उपर प पमरर वेदिका की बदर एक परा वनखण्ड है यह कुच्छ कम दो योजन का चौड़ा है और वेदिका समान परिधिवाला है यह कृष्ण वर्णवासराव कृष्णामास घगैरह वनखण्डका वर्णन तृण शन्द गदित सव कहना पद पान घाणव्यतर देव घ देवियों वैठते । सोते हैं, वळते .प फेडा करते हैं पूर्व भर में पाचरण किये हुए कल्यापारी शुम कोका फल भोगते पे विचस्से हैं ॥ ६८ ॥ अप में तीसरी प्रतिपचि में मम्बू प की जगती का वर्णन । पथ - 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३ (-बायमचारी मुनि श्री नमोसम रिमी पस्सण भते । दीवास कति दारा पण्णचा? गोयमा! चचारि दारा पण्णता तजहा- विजपे वेजयते जयते अपराजिए ॥ ५५ ॥ कहिण भते । जघुद्दीवस्स दीवस्स विजयेणाम दारे पण्णत? गोयमा जवूद्दीवे दीवे मदररस पव्वयस्स पुरस्थिमेण पणयालीस जोयणसहस्साइ आवाहाए जहीवे २ पुरस्थिमापरते लवणसमुह पुरिच्छिमहस्स पञ्चत्थिमेण सीताए महामदीया उम्पि एत्थण जवुदीवस्त २ विजयेनाम दारे पाणचे अट्ठजोयपाइ उड उच्चस्तेण खुचारि जोपणाई विक्लभेण, तावतिय र पवेसेण म पर रामासार गया सदसहराया साकार मद्रोप क द्वार का भधिकार कासे । मो भगवन् ! मम्मूदीप मामा ट्रीप को किवने दार? महा मोवम! बम्दीप को विमप, पैमयत, मयत र अपरामिव रेसे चार दार को ॥५५॥ भोई मान् ! प्रदीप का विमप द्वार का कामहो मौतम गम्दीप के मेरू पर्वत से पूर्व दिशा में मेर पव मे ४५ स्मार पोमन भवगाह कर भाये पहा 'बदीप के पूर्व के त में बन समुद्र से पूर्व दिया क पत्रिम दिमाग में सीता महा नदी के ऊपर ननदीप फा मिवय द्वार का कर मार पोनम का अंबारपार योगन का दौरा पार योजन का प्रदेष सब का पान नरमप जिसरी पो धारमृग, अपम, नाम, पनुपण मगर, पक्षी, सर्प, किनर नापक पवरदेव, सन चतुर्दच मीपामिगम एष तृतीय उपात्र in सेता वरकणगभियाए ईहामिय उसभ तुरग नर मगर विहग वालग किंनर रुरु सरम चमर कुजर वगलयपउमलयभत्तिचित्ते खभग्गतवइरवेदियाए परिगताभिरामे विजाइरजमलजुयलजचजुतइव अञ्चिसहस्स मालिणीए रुवगसहस्स कलिते भिसमीणे मिझिसमीणे चक्खलोयणलेसे सहफासे सस्सिरियरूवे वण्णो दारस्स तजहा-वयरामयाणिम्मा, रिट्ठामया पतिट्ठाणा, घेरुलियामया खभा जायख्वोवचिता पाईर पचवण्ण मणिरयण कोहिमतले हसगन्ममवे एलए, गोमेजमते इदखीले, लोहित रुस, सरम, चरी गाय, मष्टापद पनठवावपपलक्षा, इत्यादिक चिों से चित्रित है स्समपर उसम पेदिका । यह मनोहर है ये स्तम विधाघर के युगल के आकार सहित है सूर्य के हमारों कारणों के सेज से उस का तेन अधिक है हजारों प्रकार के रूप सहित हैं, विशेष तेजसे देदेप्पिमान चतु को देखने योग्य है, सुखकारी स्पर्श है सश्रीक रूप है बज्ररत्ल की उस की नीव है भोटरलमय प्रतिस्यान है वैदूर्य रस्नमय स्तभ है सुवर्ण वृदि उच्चम प्रकार के पांच वर्ण पाले मणिरत्नों से भूमिकल घना है इसनर्म रस्नमय देहली गोमध्य रत्नमय मनोरा इन्द्र कील-आगेका माग । लोहितास रत्नमय पारसाख है यातिप रत्नमय द्वार के उपर का माग है, बैर्य रत्नमय कमाइ है परनमय सभी है कोहिनास હર્ષ +तीसरी प्रतिमत्ति में जम्बूद्वीप के विनयद्वार का वर्णन + बस्सण मते दीवास कति पारा पण्णा? गोयमा! चचारि दारा पण्णता तजहा- विजये धेजयते जयते अपराजिए ॥ ५५ ॥ कहिण भते । जयुटीवस्स दीवस्स विजयेणाम दारे पणत? गोयमा जवूद्दीषे दीवे मदररस पन्धयरस पुरत्थिमेण पणयालीस जोयणसहस्साइ आषाहार जहीवे २ पुरस्थिमापरते लवणसमुह पुरिच्छिमहस्स पञ्चत्यिमेम सीताए महाणदीया उप्मि एत्यण जवुदीवस्स २ विजयेनाम पारे पण्ण अट्ठजोयणा ठट्ट उच्चत्तेण मुत्तारि जोपणाइ विक्खभेण, तावतिय चेत्र पवेसेण 4 ममुबारक-बारामपारी मनि श्री ममोठक मारिमी मापा राजारहार छावा मुसदवसायमा मावासापा मम्मूदीप कद्वार का पिकार करते हैं मो भगवन् ! जम्मूदीप नामक ोप को किवने दार को महा नौवम ! मम्मूदीप को विमय, मयंत, मयत र मपरामिव देसे पार द्वार की ॥५५॥ बहो गयन् ! नमूदीप का पिमय द्वार का कहा १ महो मौतम ! गम्दीप के मेरू पर्वत से पूर्व दिशा में मेरू पर्वत मे ४५ सधार योधन मरगाह कर ना वहां 'मम्मूदीप के पूर्व के अंत में लवण समुद्र से पूर्व दिशा क पमिम दिमाग में सीवा महा नदी के ऊपर बम्द्वीप का विषय द्वार का यह मार योनन का प्रया पार योमन का पौगो चार योमन का प्रदेश ख वर्ग का प्रधान कनकमप शिखर वा धामृग, ग्राम, पामनुष्य पनर, पक्षी, स, बिसर मामा FARA मन परवा-नीवाभिगम मप्र-तन य उपाय - ल्लपाओ, रयतामयी पटिका, जातरूवमयी उडाहणी, वइरामयी उबरि पुछणी सबसेत रययामयेच्छायणे, अकामए कणगकूड तवणिजथूभियाए, से ते सखतल बिमल णिम्मल पधिपण गावीर फणरययाणिकरप्पगासे तिलगरयणचपचित्ते जाणामणिमयदामाल- किए, अतापहिवसण्हे, तवणिज रुइल वालुया पत्थडे, सुइफासे सस्सिरीयरूवे पासादीये ॥५६॥ विजयस्सण दारस्स उभतोपासिं दुहतो णिसिहताए दादो चदणकलस परिवाडीओ पण ओ, तण चदणकलसा वग्कमलपइट्ठाणा सुरभिवरवारिपडिपुण्णा, चदण शाहान उम पर श्वन चादी का आच्छादन है, भकरत्नमय पक्षांहा है, मुवर्ण का शिखर है, उम पर मापमय भूमिका है, चत दक्षिणावत शख का ऊपर माग, निर्मल दधि का पिंड, गाय का दुध, समुद्र फेन, चादी का पुन समान उस का धन प्रकाश है, तिलक रत्न व अर्घ चद्र सहित अनेक प्रकार से चित्र हैं, विविध प्रकार के रत्न की माला से द्वार का मुख शोभित है, भ्यतर बाय सुकोमल है, उस द्वार में स्वर्णपय पाल है शम स्पर्श है सश्रीक रूपवाला है प्रसन्नकारी, देखने योग्य पापत् मति ॥ ५६ ॥ उस विजय द्वार की दानों पाजु दो २ चबुतो है उस पर चदन मे लेपन कराये हुव दा २५लश है वे कलश उचम कपल पर स्थापा दिये हुये है, मुगधी उचम पानी से परिपूर्ण मरे 43 तीसरी प्रतिपत्ति में जम्बूद्वीप के विनय द्वार का वर्णन ममुरादक-पाटनमचारी मुनि श्री अमोलक मामिला क्खमईठ दारविहाओ जोतिरसामता उंबरा बेरुलेयामया कचाहा,वइरामया लाधीसधी रोहितकम्यम्साआ सूचीओ मानामाणम्या समुग्गया वइरामहअग्गला अग्गलपासाया वइ. रमती आवतणपेढिया अकुतर पासके निरतरित घणकवाडे भिन्चीसुचव मिचीगुलिया छप्पbणी तिष्णि होति गोमाणसीसतिया गणामणिरयण बालरूवग लीलट्ठिय सालभजियाए, घामयारा कूहा रययामए उस्सह सवतवाणिज्जमये उल्लोयेणाणामणि रयणजाल पजरमणि वसग लोहितक्ख पडिवसरयत मोम्मे अकामया पक्ववाहाउ,जानिरसामयावसा वसको * महाशक-राजारादुर गळा मुग्घर रसायमी बालाप्रसाजा । रत्नमय वोटर विविप प्रकार के मणिमय समुद्रको वचरलमय अर्गल है मर्ग का स्थानभी वज्रा लपप है मेरलमप बापतन भररूपमय रन के दो पासे असर रिस नियम अखह कमाई १६८ साने व चपुतर ३, पन पर १६८ सिके विविध प्रकार के माणिमय पासकरूप सीता सहित पुतलियों , बज्ररत्नमप शिखर है, चांदीमय पर की पीठका है सष पुरणपय है विविध प्रकार के पणिमय रल की मास का गपाल, मणिमय उपर का वारे, लोतिाक्षरत्नमय प्रविण , चादीमय भूमिका है अकरस्नमय पक्ष बाह है मौर भन्य भी स्तम है, ज्यातिप रत्नमय पन्न है, ज्योतिष रत्नमय कृपालु है, चांदी को पटो है, सुवर्णमय पता लकरियों है, वजरत्नपय तृण सपान Re- सूत्र in चतुर्दश भीषाभिमम मम तृतीय उपा ग्घारितमबदामकलावा माव सकिलसुत्तववग्धारित मल्लदाम कलावा तेण दामा तव णिजलबूसमा सुवण्णपतरगमडिता णाणामीणरयण विविहहार जाव सिरीये अतीव २ उबसोमेमाणा२चिट्ठति, तेसिण नागदतकाण उबर अण्णामओ दो दोनागदत परिवाहीमो पण्णताओ एतमिण नागदतगाण मुनाजालत भूसिगा तद्देव जान समणासोतिसुण नागदतएसु वहवे रयामपा सिक्कया पण्णता तेसुण रयणामएसु सिक्कएसु बहवे धेरुलिया मइओ धूवघडीओ पण्णताओ ताओण धूवघडीओ कालागुरु पवरकु दुरुक तुरकधूव मघमधतगधद्धताभिरामामो सुगधवरगधियामो गधवटिभूयाओ वचन नागदत में पहुत कृष्ण पर्णपाले याषत् शुक वर्णवाळे सूत्र से पपी ई लम्पी पुष्पकी मालाभों के समुह लगाये हुए हैं, उन मालाओं को सुवर्ण के लुम्बक हैं, वे सुवर्णकी पत्री से माहिस है, वे विविध प्रकार के कमणि रत्नमय व विविध प्रकार के हार से यास्त शोमा में अतीप २ शोमते हुवे राते हैं ॥ ५९ ॥ उन गमदत पर दूसरे दो २ नागदव की परिपाटी कही ये मोतियों की माला से मघोमिस है पगैरर पूर्वपम् एस का वर्णन मानम उन नामदत को पहुव रत्नमय सिमें है, उन सिकें में अति शोमनिक वहूर्य रत्नमय धूप के कुरा पे कृष्णागुर कारुक वगैरह उचम धूप से मघमघापमान प पत्कृष्ट वीसरी प्रतिपचि में जम्मदीप की विजय का वर्णन + अर्थ .

+ अनुवाक कामामधारी मुनि श्री भमोहक ऋषियो फयपचागा माविद्धकठेगुणा पठमुप्पलपिडामा सव्वरयणामया अध्छ। सहा नाव पडिरूवा, महया महिंद कुमसमाणा पण्णता समपाउप्तो ! ॥ ५७ ॥ विजयस्सण दारस्त उममोपासि दुहतो णिसीहियाते दोदा मागदत परिवाडीओ, तेण णागदतगा मुखाजालतरूसया हेमजालगवस जालखिखि णिजाल घटाजाल परिक्सि. इचा, अम्मुग्गता ममिणिसिट्टा तिरियमु सपरिग्गहिता अहेपण्णगहरूबा पण्णगसठाण सठिया सबरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा, महता २ गजदत समाणा पण्णता समणाउसो । ॥ ५८ ॥ तेसुण गागदतएसु यहवे किण्हसुत्तवव हवे , कसर पर पारने पंदन के छीटे लासे दुरे, उसके कंठ में सूत्र के घागे परे हुवे हैं, उन को मस के टकनारे पे सप रत्नमय स्वच्छ मुबोमल यामत मतिरूप, मो आयुष्यपन्त अमणों । पटे मोन्द्र कुम समान है॥५७ ॥ विलय द्वार की दोनों पाजु दो चबुतरे। उन पर दो २ गजदत समान सीले .. उरे गुत मोतियों की माला, लम्बायमान सुवर्ण की पाला, गाल के भाकार से रल की पाला म घरमास प्रमुख लगाइरे, पे गमदत मिचिन्मात्र ऊचे सन्मुल नीकले दुरे, वीः मिचि मदेश में भी ठरा रा दुष, नीचे मर्म सर्प के माकारबासे, वे सा रत्नमय, निमंड यारत् मासिस्मो मो मायुष्यरन्त श्रमणों ! वैसे नामदत हाथी के दांव समान की॥५८॥ प्रकाशक रानाबहदुर खासा सटर सायनी ज्वालाप्रसादमी .

4 पतुर्दश-भीपामिगम मूम तृतीय उपाङ्ग 4 इत्यग्गाहतग्गशालाओं, घल्लितग्गामिरयामो पसत्यलक्खणसवेलितग्गसिरया, इस । मच्छिकहस्तचिट्टितईि, लूसेमाणीतोइत्र चक्खूलोयणलेस्साहि अण्णमण खिज्ज- माणीआइन पुढवि परिणामाआ सासय भावमुवगताओ चरणाओ चदविला- चद्ध समनिडालाओ चदाहियसोमदसणीओ उक्काइवजोएमाणीआ विज्जघणमरीचि सूरदिप्पनते आहियरसनिकासाआ सिंगारागार वारवेसाओ पासाइया तेयसा अतीव २ उपसोभेमाणीमो २ चिट्ठति ॥ ६१ ॥ विजयस्तण दाररस उभओपासिं दुहतो निसीहिताए दो दो जालकहगा पण्णता, तेण पक्षण युक्त वेणि पाले केश हैं, अशोक वृक्ष को चित मीलता हुवा शरीर है बाये हाथ से अशाक वृक्ष की शाखा प्राण की है, किंमत् कटाक्ष से दर प्रमुख के मन हरण करती हुई ५ दखने मे शाप करती रे वैसी पुतलियों पक्षीय शाश्त्रत माव में प्रासअर्यास् शाश्वी सन का मुन्द चद्र समानो चंद्र सपान विलास है, पद्र समान उसाट है, चद्र स मो अषिक सौम्प दर्शष वाली है, चरकापात से प्रमोट करने वाली है, पेपरिषत से देवीपमान, सूर्य से भी देदीप्यमान प्राश पारी सोकह भृगार व भाकार से मनोहर वेष बाली है देखने योग्य यापन पविरूप हैं व जसे, वीपरी विच जपूर्व प क विज दर का वर्णन है अथ 42 मनुमादक परमपारी मुनी भाजपोकसमापिनी ? उरालेण मणुण्णाण घाण मण णिन्वुइकरेण गधेण, तेएपएसु सल्बओ समता आपूरेमाणीओ २ अतीव २ सिरीए जाव चिट्ठति ॥ ६. ॥ विजयस्मण दारस्स उभओ परिस दहतो जिसीहियाए, दो दो सालमजिया परिवाडीओ पण्णचाओ, ताआण सालमाजयाआ लीलट्ठियामो सुपतिट्टियाओ सुअलफियाओ णाणाराग वमणाओ गाणामन्नपिणिडाओ मुट्ठीगेझसु मझियाओ भामेलग जमल अयल घट्टिय, अमुणयपीणरतितसठियपउहरामो रत्तावकाओ असियकेसीओ मिदुवि- सय पसत्यलक्खण सल्लितग्गसिरयाओ ईसि असागवर पायव समुट्टिताओ वाम- गप से मनोहर हैं, श्रष्ट मुगप पाले में गवर्ती मत है उदा मलेश घाण व मन को मानद करने वाली गय से सपशी में चारों अफ पूमी दुइ पावत् अत्पत शोमती ॥ ६० ॥ विजय द्वार की दोन र जु दो चयुत्तरे हैं उनपर दो पूनलियों की पातो पे पूलियों अपनी छीला में रही हुई। बच्छी नरह स्थापन की हुई। अच्छो सरा पलत पनाह विविध प्रकार के पन पहिनापे हुए है, विविध प्रकार की मात्रामों कण्ट में पाहना है, मुष्टिये पतमा करि प्रदेश एकता हुआ , शिखर समान गोल गया पए पाप युक्त पयोधर , नत्र का अर्थ भाग रक है, श्याम वर्णक काळे केश है, कोमल निर्मठ अध्ये • मकायाफ रामापदादुर बाला मदेवाप्सहायणी घालाप्रादी - R धनुश नीवाधिगम मूत्र सृतीप पान सामो सुस्सरामो सुरसरणिघोसामओ ते पदेसे उरालेण मणुण्ण कण्णमणनिबुइकरेण सद्देण जाब चिट्ठति ॥६॥ विजयस्तण दारस्स उमओपासिं दुइभो निसीहियाए दो दो वणमाला परिवाडीओ पण्मचाओ, ताओण वर्णमालामो नाणादुमलय किसलय पल्लव समाउलाओ छप्पय परिभुजमाण कमलसोभत सस्सिरीयाओ पासाइयाओ ४॥ तिपदेसे उराले जाव गधण मापुरेमाणीओ २ जाव चिट्ठति ॥ ६ ॥ विजयस्मण दारस्स उभओ पासिं दहता निसीहिताए दो दो पगठगा पण्णता, तेण पगठगा चचारि जोयणाइ मायामाविवस्वमेण दो जोयणाइ वाहल्लेण सव्यवइरामता अच्छा जाघ पहिरवा ॥ १५ ॥ तेसिण एय ओगाण उवरि पत्य २ तीसरी प्रविधि में जम्दीप की विनय द्वार का वर्णन विमाग उदार मनोज वर्ण को सुन उत्पन्न करे पैसा शब्द से यावत् रहा। दुवा ॥१३॥ विजय द्वार की दोनों पान दो पमुतरे पर दो २ पनमाला की परिपाटी की बन सता विविध प्रकार के वृक्षलवा । मकरों सहित में उनको अपर मोगवे मिठ से मनोहर पदेसने पोग्य यावत् प्रतिस्पोपा का प्रदेष भी पर पारत् गप से पूरखा दुवा यावत् रहता है ॥ ६४ ॥ पिनपदार के दोनों पाणु दो घपुतरे पर दो पारफने बाल पषुपरे ये चार योनन के सम्मे चौरे पदो योषन के बाद समरस्लमव सन्स यावत् प्रविरूप है ॥ ६५ ॥ उन प्रतीक धारकूने ।

अनुवादकबाममचारी मुनि श्री भमोडक अपिली जाल कहगा सन्वरयणामया अभ्यासण्हा लण्हा घट्टा नरिया निम्मल णिकपा निककडम्छाया सप्पमा सस्सिरीया सउज्जोया पासदीया परिसणिज्जा अभिरुवा पहिरूवा ॥ १२॥ विजयस्सण दाररस उभतोपासिं दुहमओ निसीहियाए चोदो घटा परिवाडीओ पण्णचाओ, तासिण घटाण अयमेपारूले वण्णवासे पण्णचे सजहा- जबूणतामती घटाओषहरामतीउलालाओ,णाणामणिमया घटा पसगा तवाणि जमताओ सकलाओ रयथामइठरज्जूओ ताउण घटाओ मोहस्सराआ मेहस्सराओ इसस्सराओ, कोपस्सरमो, यदिस्सराओ, मदिघोसाओ,सीहस्सराओ सहिघोसाओ मजुस्सराओ मजुघो बत्पत २ मुशोमित बनी हुई रहती ॥६॥ निमय द्वार की दोनों बाजु दो चबुतरे हैं निनपा दो पालि कटा-करा के समुह से सब रत्नमय, सास निर्मछ यापत् मतिरूप ॥ ६२ ॥ विनयद्वार की दोनों पास दो पावरे हैं उनपर दो पंग इन का इस तरा पर्णन मनद रत्न की पारे (रज रस्नमय कोशी, विविध प्रकार के मषियों के पास कोई मुरण की कल है, चांदी की रस्सी है, पम पटा व मोघवर है, मेघ समान सरस समान सर , क्रॉप समान सर , नदी मा पोष है, सिरसा पोष है, मिष्टस्वर , मिट घोष है, सुस्तर है. सुयोर है. पहां का प्रकाषक रामाादुर साग मुलदेषमायणी पासायसास्त्री.

३ 4 चतुर्दश भीषामिगम मूत्र-मृतीय सपा 4- पासतीया ॥ ६६ ॥ तेसिण पासायषप्तगाण पत्य २ अतो बहुसमरमणिज्ज भूमिभागे पण्णत्ते सेजहा नामए आलिंगपुक्खरेतिवा जाव मणीहिं उपसोभिए मीण गोषण्णो फासोय यन्वो ॥ तेसिण पासायव सगाण उल्लोया पउमलया जाव सामलया भत्तिचिता सम्यतवणिजमता अच्छा जाव पहिरूवा ॥ ६७ ॥ तेसिण बहुसमरमणिजाण भूमिभागाण बहुमज्झदेसभाए पत्तेय २ मणिपेढियाओ पण्णचाओ ताओण मणिपढियाओ जोयण आयाम विक्खमेण अहजोयण बाहल्लेण सन्न रयणामईओ जाव पहिल्यामो॥ ६८ ॥ तासिण मणिपेढियाण उवरि पचय २ वीमरी मनिपत्ति में विजयद्वार का वर्णन + मर्थ मनोहर रूप बासे, दर्शनीय यावत् प्रतिरूप हैं।। ६६ । उन प्रत्येक मासादापतसकमें पडुस सम रमणीय भूमि भाग। यया द्रष्टांस मालिंग पुष्करनामक प्रादिप्र के तछ समान यावत् मणि से सुशोभित भूमि गाग है इन का पर्ण गंध स्पर्श पूर्ववत् जानना यहाँ प्रासादापतसा में पालता यावत् श्यामलता नामक वनस्पति के चित्रों है ये सम सुवर्णमय निर्मल यावत् प्रतिरूप ॥६७॥ उस रमणीय भूमि भाग के मध्य पीच में पणिपीठिका रही ई पे एक योभन की छमी चौडी बाधा पोजन की नाही है सप रलपप यापत् प्रतिरूप है, । ६८ ॥ प्रत्येक मणि पोरिका पर एक २ सिलसन में इस का वर्णन . मनुपादक पायमचारी मुनि श्री भमोठव पिमी * पासाय वहिंसमा पण्मचा, तेण पासायवडेसगा चचारि जोयगाइ उड्ड उच्चत्रेण, दो जोयणाइ आयामविक्समेण ममुग्मयमूसित पहसिताविष विविहमणिरयण भत्तिचित्ता, वाठदयविजयवेजयती पहाग छत्तातिछत्तकलिता सुगा गगणतल मभिलघमाणसिहरा, जालतर रयणपजर मिलियन मणि कणय थूभियग्गा वियसिय सयवत्तपोहरीय तिलकरयण चदचित्ता णाणामणिमयदामालकिया अतोय बाहिंच सहा तपणिज्जरइल वाळुया पम्छडा सुहफासा सरिसरीयरूवा माळ धमुनरे पर एक २ प्रामादापतमक है, वे चार योनन के अंचे है, दो योमन के सम्बे चौटे हैं सब दिशा में प्रसरी हुए फाति युक्त है, विषिष प्रसार के घद्रकांतादि पणि प फतनादि रत्न की रचना से पावर्षकारी , पायु से कपित पिमय पैनयस नामक धना है, व छत्र उसपर छप इस से सहित, याफाश पन करवे हारे इसने सचे उसके शिखर, मीमो की पालियों में शोभा निमित रल स्यापन किये हैं पंचर में मे पार नाकाले जैसा पर्यात् मैसे किमी दकी हुई वस्तु को खोलने से माप मासी दीसदी से पकानपयो पणि फनमकमय शिखर है पिकमिव सपा प पुररीक तिलक ग्लर अपचंद्र वगैरह से वे बाम्चर्यकारी विविध प्रकार के मणिमय पाला से बळकत है, सदर बाहिर का मासाद का दार सुकोमल है, इस में कास सुवर्ण की राल विद्याइ हुए है, मुनकारी पर्व सीक •प्राधा-रानापहादुर लाला मुखवसहायजीपालाप्रसादी- .

4 चतुर्दश-भीषामिगम सूत्र तृतीय उपस 4+ पासाईया ॥ १८ ॥ सेसिण सीहासण्णाण उप्पि पत्तेप २ विजयदुसे पण्णते, तेण विजयदूसा सेया सख कुंद गरय अमत महियफेण पुजसण्णिकासा, सन्नरयणामया अभ्छा सण्हा लट्ठा मट्ठा जीरया निम्मला निप्पका निकाह छाया सप्पमा सस्सि- रीया सठजोया पासादीया परिसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा ॥ ६९ ॥ तेसिण विजयदूसाण बहुमज्झदेसभाए पत्तेय २ घइरामया अकुसा १०णचा, तेसुण पइरा- मएस असेस पत्तेय पत्त्य कुभिक्षा मुचादामा पण्णचा, तेण कुभिक्का मुचादामा अण्णेहि चउहिं तदडुच्चत्त पमाणमिचिहिं अद्ध कुमिकेहि मुचादामेहि सन्वतो समता सपरिक्खित्ता, तेण दामा तवणिज लबूमका सुवण्ण पयरमडिता जाव स का स्पर्श देखने योग्य यायस् प्रतिष्प है ॥ ३८॥ उस सिंहासन पर अलग २ विजय दूष्य व में पापने का) है यह विजय दृष्य श्वेव शख, मुचकुद, पानी के कन, अमृत, समुद्र फैन इत्यादिक समान वेत वर्ण का सप रत्नमय, निर्मल यावत् प्रतिरूप है ॥६९ ॥ उस विजय दृष्य रख के मध्य भाग में अलग २ वजरत्नमय अकुश को हुए हैं उन अकुशों में कुंम प्रमाण मोति की माछामों कहीं है, कुम प्रमाण मोती की मालाभो की पास अन्य पर्ष कुम प्रमाण मोती की मालाओं पारों घरफ बाये रे मला भी मुवर्ण लुमके पाठी, मुषर्ण के भवर से प्रेरित यारत् रही नीनरी म पचि में विनरद्वार का वर्णन अर्थ 1 + अनुपादर-पासनापारी मुनि श्रीमपोका मो सीहासण. पण,तेसिण सीहोसणाण अयमेयारवेवण्णावासे पण्णचे तजहा-तवणिजमया बाला,रयतामया, सीहा सोवणियापादा णाणामणिमयाइ पायपीढगाइ, जघूणयामयाइ गचाइ बहरामपासधी, नाणामणिमये बच्चे ॥ तेण साहासणा ईहामिय उसम नाव पउलय मन्तिचिचा सुसारसारोबइतविधिहमणिरयणपादपीठा अपछरगमलयमउगमसुरग नवतयकुसत लिवसीहकेसरपब्वछुत्तासिरामा उयवियक्यामदुगुलपट्टपडिप्छणया मुविरति तरयत्नाणा रस सुयसवुता सुरम्मा आतीणगरुयबूरणवणीततूलमउफासा, करते सिंहासन के पास (पाये ) के नीचे का प्रदेश मुवर्णमप है, चांदी का सिंहासन है, मणिमय पापी, विषिष मकार के गलमय पाये का पधन , जम्पूनद रस्नमय गाम , प्रब रत्नमय सपी पूरी हुई है, विविध रस्नमप सिंहासन का तनारे पर सिंहासन स्ती मृग यावत् पालसा के चिों से पितित पचम मार के श्रेष्ट विषिष मणिरस्नों की पाद पीठिका, कोमम ममुरमय, मपसन दर्भ व्या सिंह की केसरी समान सुकोमल पख के माच्छादन से मनोहर दीखता है सुंदर असती कापस, कपास का वृक्ष म रेशम के पन का रममाण (माच्छादन) मोर मी रस्न का मतसीमप पर्ममय उस से सिंहासन भी तरह का हुवा है, वे पर ममखन, बर्फ, तुन, छ समान कोमल प्रकाशवराजासादुर लामा रूस पीपालामसारी.

4R चतुर्दश-भीषामिगम सूत्र तृतीय उपा+ तोरणाण पुरतो दो दो हयसघाडगा जाव उसमसघाडगा पण्णता सम्परयणामया अच्छा जाव पहिरूवा,एव पतीउ वीहीओ मिहुणा दो दो पउमलयाओ जाव पहि- रूयाओ ॥ तेसिण तोरणाण पुरओ दो दो अक्खय सोबत्थिया पण्णचा तेण अक्खय सोत्थिया सन्म त्यणामया जाव पडिरूवा तसिण तोरणाण दो दो दो चदणकलसा पण्णत्ता सेणचदणकलसा वरकमल पतिढाणा जाव सम्वरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा समणाउसो तसिण तोरणाणदोदो भिंगारगाप० वरकमल पट्ठाणाजाव सन्वरयणामया, पण्णच अच्छा जप पडरूना महया २ मत्तगय महामहागिई त समाणा पण्णता समणाउसो!॥७२॥तसिंण तोरणाण पुरतो दो दो आतसगा पण्णता,तेसिण आदसगाण म.गे दो दो घोट के समुह यावत् वृषम के समुह कहे। ये सब रत्नमय निर्मल यावत् प्रतिरूप है यो सत्र पूर्ववत् पक्तियों, दो २ राबदियों, दो मिथुन (स्त्री पुरुष के ) यावर दो पर लताबों हैं पा पत्र काना वे सप पनर नपय निर्मल यावत् मतिरूप है, उन नोरणों के आगे बक्षस स्वस्तिक कहे हैं ये रस्नमय यावत् मतिरूप उन वोरणों के मागे दो कलश कहे हुवे हैं घे घदन कलश श्रेष्ठ प्रपान समस में राहुरे यावत् सा यनरत्नमय, सर यावत् प्रतिरूप हैं बहो मायुष्यवन्त श्रमणों ! वे कलश मदोन्मच इस्वी की मुखाकृति समान है। ७२ ॥ उन खोरणों के भागे दो २ काप के भारीसे कसरी प्रतिपचि में जम्बूद्वीप के विजयद्वार का वर्णन + मर्थ .

"नुपादक-सामग्रमवारीमुनि का भमोगा अमिमी चिट्ठति ॥ ७० ॥ तेसिण पासायडिसगाण उप्पि बहवे अट्ट मगलगा पण्णा- सोस्थियसीहे तहेव जाव छत्ता ।। ७१ ॥ विजयस्सण पारस्स उमओ पासिं दुहमओ मिसीहियाए दो दो तोरणा पण्णचा, तेण तोरणा जाणामणिमया तहेव जाव भट्ट मगलगाया छत्चातिछचा । तेसिण तोरणाण पुरभो दो दो सालिमजियाओ पण्णचाओ जहेव हेट्ठा तहेव ॥ तेसिण तोरणाणं पुरतो दो दो गागदतगा पण्णचा, तेण गागदतगा मुत्ता जालत भूतिया, तहेव ॥ तेसुण णायदतरसु बहवे किण्हसुत्त पट्टवग्धारित मल्ल दामकलावा जाव चिट्ठति ॥ तेसिण हुई।॥ ७० ॥ उन मासादासहसा पर पहुस प्रकार के माठ २ मंगल गोरखस्विक, रामन यापन ण ॥ ७ ॥ उन, पिपपदार की दानों पाशु दो २ पवुवरे को उनपर दो २ वारण है गेरा पामत् मार १ मगस में छप पर एप पर्यंत काना न रणों की मागे दो २ पुतलियों कहा है इन का वर्णन से पूर्वोक्त पुसियों का काा पैसे हो मानना पन वोरों क मागे दो २ नागदत को में मोतिको मात्रामों से मलकव बने हुए हैं वगेरा पूर्वोक मेसे सब मानना उन नागदव को शुरु सत्र से पीई पुष्प की पालामों समुा यावत् रा हु है पर वोरणों •Rकायक रानामरादुर लामा मुखमाजीपालाप्रमादनी - कृष्ण वर्ण ܚܝ + अतुर्दश जीवामिगम सूत्र तृतीय उपास 48+ अग्छोदयपडिहत्याओ णाणाविह पचवण्णस्स फलहरितगरस बहु पडिपुण्णाओ ,विवि- चिट्ठति सबरयणामईओ जाव पडिरूवाओ महया २ गोलिंगचक्क समाणाओ पण्णचा समपाउसो! ॥ ७६ ॥ तेसिण तोरणाण पुरतो दो दो सुपइट्ठगा पण्णमा, तेण सुपतिट्ठगा जाणाविह पसाइणगभडीवरतियाए सम्बोसहिया पहिपुण्णा सबरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा ॥ ७६ ॥ तेसिण तोरणाण पुरतो दो दो मणगुलियाउ पण्णचाओ, तासुण मणोगुलियासु घहवे सुण्णरुप्पमया फलगा पण्णचा, तेसुण सुवण्णरुप्पमयेसु फलये बहवे वइरामया णागदतगा पण्णाचा, तेण नागदतगाणं, पानी से मरी हुई। अनेक प्रकार के पांच वर्ण के फल से प्रतिपूर्ण है रे पात्री सर्ष रत्नमय पावत् प्रतिस है अहो मायुष्यरत श्रमणों वे पात्रियों गाय ममख को पांटा देने के टोपले जितपटी है ॥७५ ॥ उन पोरणों के यागे दो २ मुमतिष्ठा मानन विशेष है ये अनेक प्रकार के पामरण से मरे हो? सब योपधि से प्रतिपूर्ण है सा रत्नमप, निर्मल यावत् प्रतिरूप ॥ ७६ ॥ उन वोरणों के मागे दो मनोगुलिका है सन में बहुत सुवर्णमय रमतमय पविय हे रन पटियों में बहुत पहा रतमय नागदत हैं. उन का कयन पूर्ववत् मानना उन नागदतों में पहुना चांदी के सिके । एन चांदी ++सरी प्रतिपांच में पनपदार क वर्णन 48 मर्य + भनुसादक-वारणमचारी मुनि श्री मोलक पिनी - अयमेयारले वण्णावासे पण तनहा-तषणिजमता पयागा कलियमयाकरहा, पदरामपावारगा, णामामणिमया पलक्खा अकामता मडला अणोग्घसिय निम्मलाए छायाए सततोपत्र समणुपदा पदमहल पडिणिगासा महत्ता २ अहकाय समाणा पष्णचा समणाउसो ! ॥ ७३ ॥ तेसिण तोरणाण पुरतो दो दो वरणामधाला पग्णसा,तेणं याला अच्छतिच्छडिय सालि तदुलणह सट्ठबहु पडिपुण्णा, विवचिट्ठति सबजपूणयामया अच्छा जाव पडिरूवा, महता २ रहचक समणा पण्णता समणा- उसो ! ॥ ७ ॥ तेसिण तोरणाण पुरतो दोदो पातीआ पण्णचाओ, ताभोण पातीमो इस का वर्णन करते । मुबर्ण रत्नमय पठक पीठ विशेप है, पर्य रत्नमय प्रतिरपन है, बसरत्नमय गया,विविध मणि रत्नमप श्रृंला आदि स्प बालपन, मक रत्नमय काच है निस की रिना मामे हो वश श्रीति है, इससे सप दिनी में मनुकंप सहित चंद्रपटस समान घ अर्घमाया समान ३ मारीते करे। ७ ॥ स्न रगों को पागे पन की नामी समान दो पाछ को उन में शुद्ध स्फटिक समान वीनबार अदाकये हुवे वापस मरे रे । पे घामर यास मब भम्बूनद रस्तमप, निर्मळ सावत् वेस है. देर २ रख पक समान है ॥७४ ॥ उन वारणों के मागे दो २ पात्रिको निर्मर प्रकाशनानावरादर मला मुखदनमापनी मागमसारी.

तोरणाण पुरतो दो दो हय कठगा जाव दो दो उसम कठगा पण्णचा सवरयणामया अण्छा जाम पडिरूवा ॥ ७८ ॥ ण हयकठएस दो दो पुप्फचगेरीओ एव मानच गेरीओ गध-वण्ण-चुण्ण-वत्थ-आभरण-चगेरीओ सिद्धत्वचगेरीओ लोमहत्य चगेरीमो सन्नरयणामयाओ अच्छाओ जाव पडिरूवाओ ॥ तेसिण तोरणाण पुरओ दो दो पुष्फ पडलाइ जाब लामहत्थ पडलाइ सयरयणामयाइ अच्छाइ जाव पडिरूवाइ ॥ ७८ ॥ तेसिण तोरणाण पुरता दो दा सीहासणाइ पण्णता तेसिण सीहासणाण अयमेतारूवे वण्णावासे पण्णत्ते तव जाव पासादिया ॥८॥ तेसिण तोरणाण पुरतो दो दो रूपउचाइछता पण्णता ॥ तेणछत्ता वेरुलियामसत आगे दो घोडे के आकार वाले यायस् वृषम के आकार पाले घोहसे हैं वे सघ रत्नमय यावत् प्रतिरूप (२ ॥७८ ॥ यकठ यावत् पृपभ रूठ में दो २ पुष्प की चंगेगे ऐसे ही मासा, गप, पर्ण, चूर्ण, वस्त्र, मामरण, सरस की चगेरी, पुमनी की चगेरी ये सब रत्नमप यावत् प्रतिरूप हैं ॥ ७८ ॥ सन तारणों के आगे दो पुष्प के गुन यापस् पुषनी के पुज रहे हैं वे सब रस्ममय यावत् मतिरूप ३ ॥ ७९ ॥ न वोरणों के आग दो सिंहासन हैं जिन का कयन पूर्ववत् जानना यावत् पसिरप ॥ ८० ॥ न सोरणों के आगे दो चांदी के छत्र में उनको पैदूर्य रल निर्मल दह है, जम्बूनद 4 पदंश भीगाभिगम सूत्र पृवीय उपास H+ सीसरी प्रतिपति में विनपद र का वर्णन 40 अर्थ n + अनुवादक पापनमवारी मुनि श्री ममोठफ पिमी + मुसा जालतरूसिता हेम जाव गयदत समाणा पण्णचा ॥ नेसुण बहरामएमु णागद- तएसु यहवे स्यपामया सिकया पण्णचा,तेसुण रययामएसु सिक्कएस वहवे वायकरगा पण्णत्ता, तेण वायकरगा किण्णमुत्स सिकागछिया जाव सुकिल सुत्तसिक्काग वच्छिता बहवे वायकरगा पण्णता सन्नवेरुलियामया अम्छा जाव पडिरूवा ॥७६॥ तेसिण तोरणाण पुरतो दो दो चिचारयण करडा पण्णता से जहा नामए चाउरत चक्कवहिस्स चित्रयणकरडे वरुलिय मणिफालिय पडलत्थाय डेताए पभाएतपदेसेसवतो समताओ भासइ उज्जोवेइ पमासेइ एवामेश तिविचित्त रयणकरडगा वेशलियपडल पच्छायहा साए पभाए ते पदेसे सम्बतोसमताओ भासेति जाव पभासेति॥७७n तेसिण के सिके में पान गने के पस्ले है, वे पसे कृष्ण यायत् धेव वर्ण के सूत्र से दके हुवे है वे मष वैदूर्य रत्नमय यारन् मतिरूपरे ॥ ७६ रन सौरमों के भाग २ दो २ माश्चर्यकारी रत्न के कररिये है जैमे चारों विधा को विभय करने पराले चरी रामाको माधकारी रलका करहिया होता है मौर उम को मैर्य व स्फटिक रत्न का ढक्कन होता है, अपनी भासपास चारों दिशी में प्रभाव करता है, (बसे । बर्दा माश्चर्यकारी रत्नों के रहिये रनको मी वैदूर्य व स्फटिक रत्न का रहन मौर वे पां चारों तरफ प्रयोग करते हैं, प्रकार, करते हैं यावत् वपते । ॥७॥ उन वोरों के "प्रकाशक-रामावगरमा सदरसायनी वाम प्रसाद .

44 चतुर्दश नीवामिगम मूत्र तृतीय उपाय 48 समुनगा हिंगुलसमुग्गा मणोसिलासमुग्गा अजणसमुग्गा सबरयणामया अच्छा जाप पहिरूबा ॥ ८३ ॥ विजयेण दारेण अट्ठसय चकझयाण मट्ठसय मगरझयाण' अट्ठसयगरुलझयाण, अट्ठसयजुगज्झयाण, अट्ठसयछतज्झयाण अट्ठमयपिच्छ झयाण, अट्ठसयसउणीज्झयाण, अट्ठसयसीहझयाण, अट्ठसयउसमज्झयाण अट्ठसयसेयाण, चउविसामाण नागवरकेऊण एवमेव सपुधावरेण विजयदारे आसीयकेउसहस्स भवति िमक्खाय ॥ ८४ ॥ विजयदारे नए मोम्मा पण्णत्ता खेलक सीसे) कोष्ट के सीसे, पत्र के सीसे, सगर के सीसे, पलास के सीसे, हरताल के मीसे, हिंगुलक के सीस, मनःशिला के सीस व अजा के सीसे हैं घे मष रत्नमय स्वच्छ यापत् प्रतिरूप ॥८३ ॥ विजय द्वार पर एक सो भाठ धजा पक्र के चिनगछी है, मगर के चिन्हवाली १०८ धना है, गरुड के चिनलाली १०८ धनाओं में, घूमरे के चिपाती १०८ धप्राओं है, छत्र के निवाली १०८ समायों हैं, पीछ के भाकार की १०८ धनामों , शकुनी पसी के पासारवासी १०८ ध्वनाओं हैं। सिंह के आकारपाली १०८ ध्वनाओं है, घृपम के बाजारपाली १०८ धमामों हैं, और श्वेत चार देवपाले हस्ती के चिनवासी १०८ वनाओं हैं यों सब मलकर विजय द्वार पर एक हमार अस्सी. समाभो । ऐसा मनत हीथैकरोंने कहा है 11६४ ॥ विजया दार में नव भूमि कही हैं ++ वीसी मविपधि में. यार का वर्णन PPF . सन की भारकामधारी मुनि श्री भोटक पानी : विमलदहा जणय कनिका वइरसधी मुंचा जालपरिगता अट्ठसहस्स वर कवणस- लागा परमलयसुगधी सन्यठय सुरमीसीयल छाया मगल भन्सिचिचा चदागारोवमा छचा ॥ ८१ ॥ तेति तोरणाण पुरतो दो दो चामराओ पपणचाओ ताओण चामराओ गाणामाण कणगरयण विमलमहरिह तवणिज्जुज्जल विचिचदंडामो चिल्लियामओ सखककुद गरय अमयमाहपप्फण पुजसण्णिगासाओ सुहुमरयतदीहवालाओ सन्वरयणामईओ अच्छाओ जाव पहिरूवाओ ॥८२॥ तेसिण तोरणाण पुरमा दो दो तेल समुग्गा कोट्टसमुग्गा पत्तसमुग्गा चोयसमुग्गा तगरसमुग्गा पलाससमुग्गा हरियाल- रन की कणिका है, पन रत्नपय मंघी है, मोतियों की माला से चारों तरफ व्याप्त , एक हमार माठ सुवर्ण शालाका से पने सुने, दर्दर चंदन मया मल्य चदन पैसा मुगपित है, सम अनु मुगप बासी नीतह गया है, माठ मगलिक के पिन चित्रित किये हैं, और बढ़ जैसे पतलाकार ॥ ८ ॥ उन सोरण की मागे दो घमर को पन पमरों को विशिष वासा निर्मल पर मूल्प मुवर्ण का माश्चर्य कारी दव, कास, करन, मुकुंद के पुष्प, पानी के कन, अमृत समुद्र के फैन बेसी कान्तीवासे सबादी के पारो, नरममय निर्मक पारत् प्रतिरूप है । ८२ ॥ न बोरो बामे दोर व मपुर मक राजामहादुर खाला मुखदेरसायनी मासासादमी गि रन 4. चतुर्दश-नीषाभिगम मूम-तृतीय उपा Hit पुरस्थिमेण एत्थण विजयरस देवस्स चउण्ड अग्गमहिसीण सपरिवाराण चचारि भइ सणा पन्नत्ततस्सण सीहासणस्स दाहिणपुरस्थिमेण एस्थण विजयस्स देवरस अभितरियाए परिसाए अट्ठण्ह देवस्स साहस्सीएण अटुभद्दासणसाहसीओ पण्णचाओ तस्सण सीहासणस्स. दाहिणाण एस्थण विजयरस देवस्त माझिमियाए परिसाए दसण्ह देवसाहस्तीण दसभामण साहस्सीओ पण्णचाओ, तस्सण सीहास- णस्स दाहिणपञ्चम्छिमेण एस्थण विजयस्स देवस्त वाहिरियाए परिसाए वारसण्ह देवसाह- स्सीण बारस भहासणसाहस्सीओ पण्णताओ, तस्सण सीहासणस्त पञ्चछिमेण एत्थण विजयस्स देवस्स सचण्ड अणियाहिबईण सत्त महासणा पण्णसा, तस्सण सीहासणस्त पुरात्थमण दाहिणेण पुञ्चत्थिमेण उत्तरेण एत्थण विजयस्स देवस्स सोलस आयरक्स्वदेव साहस्सीण सोलसभहासणसाहस्सीओ, पण्णताआ तजहा पुरच्छिमेण पामर परिपदा के देशों के बारमार भद्रासन को, दक्षिणादिशा में मध्य पम्पिदा के दश हमार देवों के दश इनार मद्रासन को , नैऋत्यकौन में पान परिषदा के पारह मार देव के बारह हमार मद्रामन को हुनस पडे सिंहासन की पश्चिम दिशामें विनयदेव के सात अनिकाधिपतिके सास भद्रासन कडे हुव है, उसका पूर्व,दक्षिण,पश्चिम व उधर या चार दिशामा विजयदेव के सोठा हजार आत्मरक्षक देव के सोलह हमार भद्रासन को हुने पूर्व में रनार, दक्षिण में चार हमार, पश्चिम में चार 4. वीसरी प्रविपचि में विजयद्वार का वर्णन अर्थ मादक-पासामधारा पुनि श्री नमोगल माजी - तेसिण भोम्माण अतो पहुसमरमाणिजा भूमिभागा पण्णत्ता जाव मणीण फासो ॥ तसिं मोम्माण उर्षि उलोया पउमलया भत्तिचित्ता जाय सन्तवीणजमया अच्छा जाव पहिरूबा ॥ ८५ ॥ तेसिण भोम्माण बहुमझदेसमाए जे से पचमे भोम्मे तस्सण भोम्मरस बहुमज्म देसमाए तत्थण एगे मह सीहासणे पण्णत्ते, सीहासण वमठ विजयदूसे जाव अकुसे जाव दामाचिट्ठति ॥ ८६ ॥ तस्सण सीहासणस्स अवरुत्तरेण उत्तरेण उत्तरपुरछिमेण एत्थण विजयस्त देवस्स चउण्ह सामाणिक साहस्सणि, बचारि भदासण साइस्तामो पण्णतामओ ॥ तस्सण सीहासणरस पोच में सम रमणीय भूमिमाग है यापत् मणि स्पर्श पा चपकछवा, पपसता यावत् श्यामलता के विचित्र प्रकार के पिप युक यापत् सुपर्णमय स्वच्छ यावत् प्रतिरूप है ॥ ८५ ॥ उन ना भूमि के माप माग में नो पाचवी ममि है एस के मध्य भाग में एक सिंासन है उस का वर्णन पूर्ववत् मानना यापत् विनय दूष्य से टका गा यापत् भकुश यापत् पुप्प की पाय वगैरह सब पूर्ववत् आनना ॥ ८६ ॥ न सिंहासन से मायम्यकून, उत्तरदिशा ईशानकून में विजय नामदेव के पार हमार सामानिक देष के पार इनार मद्रासन को हु, उस सिंहामनसे पूर्व में पार भग्नपरिपियों के परिवार सहित चार मदासन को हो, सभी भमिकून में दिमम देवता का राजामहारळाला देवसहायमीमाडासारनी एण दारे ? विजेएणदार गोयमा ! विजएणाम देवेमहिडीए जाव महजुपाप जाव महाणुमाये पलिओमठितीये परिवसति ॥ सेण तत्थ चउण्ह सामाणियसाह- रसणीण चउण्ह अग्गमहिसीण, सपरिवाराण तिण्ह परिसाण, सत्तण्ह मनियाण, सचण्ह गयाहिवईण, सोलसण्ह आयरक्खदेव साहस्सणिविजयस्सण दारस्स विजयाएराय- "हाणीए अण्णसिंच बहुण विजयाए रायहाणि वत्थव्यगाण देवाण देवीणय आहेबच्च जाव दिन्वाइ भोगभोगाइ भुजमाणे विहरति, से तेणे?ण गोपमा । एव वुच्चति विजएदारे, मदुत्तर चण गोयमा ! विजयस्स दाररत सासए नामधिज्जे पण्णत्ते जण्ण अर्थ तीमरी प्रतिपति में विजयद्वार का वर्णन 4- + चतुश भीषाभिगव मूम अहो गौतम ! विजय द्वार का विजय नामक देव अधिपति है यह महदिक मा शुसिबत यापत् महा ममाषपाछा प पल्पोपम की स्थितिवालारे बह चार हजार सामानिक, परिवार सहित, चार अग्रमदिपी, प्राचीन परिपदा, सात मनिक, सात मानक के अधिपति व सोलह हजार यात्म रसक देव, विनय द्वार, निमय राज्यपानी और विभय राज्यघानी में रहनेवाले अन्य पहुत देवों व देवियों का अधिपतिपना करता यावत् दाम्य भोग सपभोग भोगता हुन। विचरता है अहो गौतम ! इस छिये विजय द्वार कहा है और दूसरा कारन यह भी है कि पिमय द्वार का शाश्वत नाम है यह कदापि नहीं था वैसा नह।

मनुवादक-पाटनमधारी पुनी श्री अमोटरसपिमी- चत्वारि साहस्सीमी पणत्तामो एव चठमुवि जाय उत्तरेण चत्तारि साइरसीओ मवसेसेसु भामेसु पत्तेय २ महासणा पण्णचा ॥८७ ॥ विजयस्स एवरिमागारो सोलसविहेहिं त्यहिं तवसोभिया तजहा-रयणहिं पइरेडिं, वेलिएहि, जाब रिट्रेहि।। विजयस्तण दारस्स उम्पि बहवे अट्ठमगलगा पण्णता तजहा-सोत्यिय सिरिवन्छ जाव दप्पणा, सबरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा ॥ विजयस्सण दारस्त उम्पि यहये कण्डयामरझया जाव सम्वरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा ॥ विजयस्तण पारस उप्पि बहवे छत्ताइछत्ता तहव ॥ ८८ ॥ सेकेण?ण भते । एव बुच्चति नार व उत्तर में चार हजार, शेष पाठ भूमि में एक २ महामन करे || ८७ ॥ विनय द्वार के सगर का माग सोल प्रकार के रनों से मुशोभित है वषया-केतरत्न पत्र, १ वर्ष, ५ मोटिवाक्ष, ५ मसाल गर्म, ६ सगर्म, ७ पुलर, ८ सोगंधिक, ९ पोसिप रत्न, १० मक, " यमन, १२ रमन, १३ माताप, ४ थमन पुलक, १५ स्फटिसमोर १६ रिए रिजप हार पर माठ २ मगर र स्वस्तिक, श्रीवत्स यावत् आदर्श पे सप रत्नमय निर्मल पापत् माविरूपी विमय द्वार पर कृष्ण चामर की घमा यार रत्नमय निर्मल यावत् मतिरूप है विनय द्वार पर बहुत पत्र पर छम प्रमुख रो दुवे पर सप पूर्वपत् भानना॥८॥मो भगवन् । विनयद्धार ऐसा नाम पो कहा पराइक सनादुर लाला सुखदर सहायनी मालामसादनी. - , - In धतुईश नीवाभिगम मूष सृतीय उपान + विजएण दारे ? विजेएणदार गोयमा ! विजएणाम दवाड़ाए जा मरण जाव महाणुमा पलिओमठितीये परिवसति ॥ सेण तत्थ चउण्ड सामाणियसाह- स्सीण चउण्ह अग्गमहिसीण, सपरिवाराण तिण्ह परिसाण, सत्ताह आनियाण, सचण्ड अणियाहिवईण, सोलसण्ह आयरक्खदेव साहस्सणिविजयस्सण दारस्स विजयाएराय- हाणीए अण्णसिंच बहूण विजयाए रायहाणि वत्थव्यगाण देवाण देवीणय आहेवच्च जाव दिव्वाइ भोगभोगाइ भुजमाणे विहरति, से तेणे?ण गोपमा ! एव बुञ्चति विजएदारे, अदुत्तर चण गोयमा ! विजयस्स दारस्त सासए नामधिबे पण्णत्वे जण्ण A तीसरी मतिपत्ति में विजयद्वार का वर्णन 430 अर्थ महो गौतम ! विजय द्वार का विनय नामक देव अधिपति है पर मादिक महा धूसिवत पारत् महा मभाववाला व पल्पोपम की स्थिविवाला पह चार हजार सामानिक, परिवार सहित, चार अग्रमदिपी, सीन परिपदा, सात अनिक, सात मानक के अधिपति व सोलह हमार आत्म रक्षक देष, विजय द्वार, विजय राज्यपानी और विजय राज्यधानी में रहनेवाले अन्य बहुत देवों व देवियों का अधिपतिपना करता यावत् दीन्य भोग सपमोग भोगता हुवा विचरता है अहो गौतम ! इस लिये विजय द्वार कहा है और दूसरा कारन यह भी है कि विजय द्वार का शाश्वत नाम है यह कदापि नी या पैसा नहीं।

कयाइ णासि णकय इ गरिय, पकयाइण भविरसइ जाव अवट्टिये णिचे विजयदारो ॥ ९९ ।। कहिण भते ! विजयस्सण देवस्म विजया नाम रायहाणी पण्णत्तागोयमा! विजयस्स पारस पुरम्छिमेण तिरियमसखिजे दीवसमुद्दे पाईवइचा, अण्णमि जबद्दीधे २ पारस जोयण सहस्साति उगाहिता, एत्थण बिजयस्त देवस्स विजयाणाम रायहाणी बारस जोयण सहस्साइ आयामविक्रमेण सत्तीस जोयण सहस्साइ णवय अडयाले जोयणमए किंचिबिसेसाहिए परिक्खेवेण पण्णता ॥ साण एगेणं पगारेण सन्यतो समसा सपरिक्विचा, सेण पगारे सचतीस जोयणाइ अट्ठ पण्णचा अनुक पाससमपारी मुनि श्री भमोळा पिका माशा-रामापहादुर लाला मुखदराप्तडायमी भागमसादनी कदापि नहीसा नहीं कदापि नहीं होगा पैसा नही यावत् अवस्थित नित्य शाश्वत रिजप द्वार है। ९९ ॥ध्य विमप देवता का रिमया राज्यघानी काम्यन करते हैं अहो भगवन विषय देष की रिमया राज्यधानी कहां है। महा गौतम ! पिनय द्वार से पूर्व में बसपात द्वीप समुद्र पालुपकर नावे यहां दूमरा भम्बदीप नामक द्विप का उप्स में पारा हमार योभन मापे तप विजय देवता की रिजया राज्यघानी या बारह योमन की रम्बी पोरी है, और सतीम (मार नब सो मरतीस योगन से कुछ अपिक की परिधी उस क चारों तरफ एक प्राकार (कोट) रहा हसा है. यह ३७॥योमन का ऊंचा है,मूल में १२॥योजन का स्त्र +8 पतुर्दश जीयाभिगम सूम-तृतीय सपा Hin जोयण चउद उच्चतेण, मूले अद्धसरस जोयणाइ विक्खमेण, मझे छजे यणाइ सक्कासाइ विक्षभेण, मूलविच्छिण्णे,मझेसखिच,उपि तणुए, बाईि वट्टे, मतो चउरसे गापुच्छ सठाम सठिते, सम्वकणगमये अच्छे जाव पडिरूवे ॥१.०॥ सेण पागारेण णाणाविद पचत्रणेहि कविसीसएहि उवप्लोमिते तजहा-किण्हेहिं जाव सुकिलहिं, तेण कविसीसगा अद्धकोस आयामेण, पवधणुसयाइ विक्खभेण, देसण अडकोस उदु उच्चत्तण,सबमणिमया अच्छा जाय पडिरूवा ॥१०॥ विजयाएण रायहाणीए एकामेक्काय बाहाए पणुवीस २दारसत मवति तिमक्खाय ॥ तेण दारा वीवट्ठी जोयणाइ चौटा है, मध्य में । योभन का चौदा, भौर ऊपर तीन योजन आधा गाव का चौडाई मुल में विस्तारपाला, मध्य में मंचित व ऊपर पतला है बाहिर गोल २ भदर चौकूना गाय पुच्छ के माकाराला है, १५ मुवर्णमय निर्मल यापत मतिरूप है ॥ १०० ॥ यह प्राकार विविध प्रकार के कृष्ण पावत् शुक्ल यो पांच वर्णवाले कपिशीर्ष (कगूरे ) से मुशोभित है ये कारे भाषा कोश के लम्ब पांच सो धनुष्य के चौटे, बापा फोन में कुछ कम के कचे, सघ मणिमय स्वच्छ यावत् प्राविरूप है।...॥ विजया राज्धानी को एक २ बाजु में १२५ द्वारदार ६२॥ योगन के ऊचे, ३१॥ योजना के तीसरा प्रतिपीच में विजपा र उपपानी का वर्णन RI मर्थ सा समनायक रामप्रलमारी मुनि श्री अमोगक प्रपिनी मोम्मा तेसि बहुमझ देसमाए पत्य रसीहासणा पण्णता,सीहासण वण्णओजाव दामा जहा हेट्ठा ॥ एत्थण अवसेसेसु मोमेसु पत्तेय २ भदासणा पण्णता, तेसिण दाराण उचिमगागारा सोलस विहहिं रयणेहिं उबसोमिता तव जाव छत्ताइछत्ता, एवामेव सपुन्वावरेण विजयाए रायहाणीए पचदारसता भवति तिमक्खाया ॥१०६॥ विजयाएण रायहाणीए चउद्दिसि पच जोयण सताइ अवाहाए एत्थण चत्वारि वणसडा पण्णत्ता सजहा–अमोयवणे, सत्तवण्णवणे, चपगवणे, चूतवणे ॥ पुरच्छिमण असोगवण,दाहिणेण सत्तवन्नवणे, पञ्चत्थिमेण चपगवणे, उत्तरेण चूयवणे ॥ तेण मानना यहां शेष मष भवनों में पृथर २ मद्रासन को उस द्वार पर का माग सोला प्रकार के रसों से शोमनीक में या सय कथन परत मानना यावत् छमपर छत्र यो मष मीलकर विजण राज्यधानी के पांचसोद्वार को ऐसा नत सीकरोंन कहा है ॥१.६॥ विमया राज्यघानी चारों दिशी में पांचसोर योमन दूर घार घनखण्ट को जिन के नाम ' मनोफान • सप्तपर्ण पन, ३ धपकनन, भौर ४ बाम्रान , पूदिशा में मोकपन, दक्षिण दिशा में सप्तपर्णवन, विदिशा में पपपन भौर उच्चरदिशा में माम्रश्न र पे बनवण पारा एमार ग्रोनन से कुछ प्रकाशक राजापाादुर लाला मुसदेवसहायभी भासामसादनी ઈ 49 पानीवामिगप एम-समीण जन Mm षणसहा साइरेगाइ दुवालस जोयण सहरसाइ आयामेण, पच ३ जोयण सताइ विक्स्खमणं पण्णचा, पत्तेय २ पागार परिक्विचा, किण्हा किण्होभासा, घणस- डवण्णओ भाणियबो जाव वहवे वाणमतरा देवा देवीभोय भासयति सयति चिट्ठति मिसदिति तयति रमति ललति कीलति कोडति मोहति पुरपोराणाण सुचिण्णाण सुपर- सुभाण कडाण कम्माण फलविति बिमेस पच्चणुब्भवमाण विहरति ॥१०७॥ तेसिण वणसडाण बहुज्मझदसभाए पत्तेय २ पासायवडिंसया पण्णचा, तेण पासाय घडिसगा बावढेि २ जोयणाइ अह जोयण च उट्ट उच्चत्तेण, एकतीस जोयणाइ कोसच आयामविक्खीण, अभूग्गयमूसिया तहेव जाव अतो बहु समरमणिज्जा अधिक लम्चे है, पचिसो योजन के चौटे हैं प्रसक को पृषर २ मामार (कोट ) है, वे कृष्ण वर्ण पाले कृष्णा मास वगैरह पनसण्ड का वर्णन जानना पर पडून देव देवियों बैठते हैं, साते हैं, सड रात है, खेलत है क्रीडा करते हैं, मुग्ध होस व सपने पूर्वमय के सचित किये हुए शुभ कर्म के फल का अनुभव करते हुवे विचरते हैं। १०७ ॥ उन बनखण्टों के बीच में प्रासादावतसक कहे हुए हैं व ६२॥ योजन के कचे ३५॥ योजन के लम्बे चौरे, किंचित् नपे हुए वैसे ही पावत् मदर बहुत रमणीय 43 वीसरी मतिरति में विजयाराज्य धानि का वर्णन . माइक गमनल नारी मुनि श्री भमोडक अपिना भोम्मा तेसि बहुमझ देसभाए पत्तेय रसीहासणा पण्णचा,महासण वण्णओजाव दामा जहा इट्टा ॥ एत्यण अवसेसेसु भोमेसु पर्चय २ भदासणा पण्णता, तेसिण दाराण उत्तिमगागाग सोलस विहहिं रयणेहिं उबसोमिता तचेव जाव छत्वाइछचा, एषामेव सपुवावरेण विजयाए रायहाणीए पचदारसता भवति तिमक्खाया ॥१०६॥ विजयाएण रायहाणीए चउहिसिं पच जोयण सप्ताइ अवाहाए एत्थण चत्तारि घणसहा पण्णमा तजहा-अमोयवणे, सत्तवण्णवणे, चपगवणे, चूतवणे ॥ पुरच्छेिमण असोगवणे,दाहिफेण सत्वन्नवणे, पञ्चात्थमेण चपगवणे, उत्तरेण चूयवणे ॥ तेण मानना या शेष मष भवनों में पृथक् २ मद्रासन को उस द्वार पर का भाग सोलह प्रकार के रत्नों से शोमनीक हैं या सप कपन पूर्ववत् मानना यापत् छत्रपर उप्र यो मग मीलकर विषय रापपानी के पाचसोद्वार को ऐसा नत सीकरोंन का हैं ॥१.६ ॥ पिण्या राज्यपानी के चारों दिशी में पायसोर योजन दूर चार बनलण्ड को जिनके नाम' मनोफान . सप्तपर्ण इन, ३ पपपन, और ४ भाम्रान , पूर्वदिशा में मनोकपन, दक्षिण दिशा में सप्तपर्णवन, समिमदिशा में चपापन मौर उत्तरदिशा में माम्रपनर से पनसण पारए हमार मोमन से कुछ मकाभक-रानापादुर लाला मुखदेवसायमी भासाप्रसादनी AM घश जोराभिगम सूत्र तृतीय उपाङ्ग ++ बहसमरमणिजे भूमिमागे पण्णचे जाव पचवणेोहिं मणीहि उपसोभिए ॥ तणसद्दाव- हुणे जाव देवाय देविओय आसयति जाब विहरति ॥ ११० ॥ तस्सण बहुसमर- मणिब भूमिभागरस बहुमज्झदेसमाए एत्थण एगमह उवारियलणे पण्णत्ते बारस जोयणसयाइ आयामविस्वभेण, तिपिणजोयणसहस्साइ सत्त्यपचाणउत्तेजोयणसते किचिविसेसाहिय परिक्वेषेण, अद्धकोस वाहल्लेण सव्वजवूणयामये अच्छ जाव पडिरूवे ॥ ११ ॥ सेण एगाए पउमपरवेझ्याए एगेण वणसडेण सन्यतोसमता सपाराखतो परमावेतियाए बण्णओ, लणसमियापरिक्वेषेण वणसड वण्णओ जाव विहरति ॥ सेण वणसह दसूणाइ दो जायणाइ चक्कवाल विक्खभण उवरितलेण पांच प्रकार के मणिरत्नों से सुशोभित है, यहां सृण शब्द छोडकर सघ वर्णन करना यहाँ देवता देवियों विश्राम करते हैं यावत् पिचरसे ॥१०॥ उस पदुत सम रमणीय भूमि माग के मध्य में एक पदा उपकारिक लयन (राज्यसमा) कही है यद पारह सो योजन का लम्बा चौटा है तीन हजार सात सो पचागवे योजन से कुच्छ अधिक की पारघि कही है, आषा कोश की जाढाइ है वे सप नम्धूनद रत्नमय स्वच्छ यावत् पावरूप है,उस की आसपास एक पमवर वदिका व एक वनखण्ड है या उस पावर वेदिका व चप्स रानसमा को परिषष्टिव रहा हुवा वनखण्ड का वर्णन पूर्ववत् मानना यह वनखण्ड कुछ 4 तीसरी प्रतिपचि में विजया राज्यघानी का वर्णन न र मनुवादक-नाकामवारी मुनि श्री भमोमक पिनी भूमिभागा पण्णा उल्लोया पठमभनिचिचा भाणियचा ॥ १०८ ॥ तेसिण पासाय वहिसगाण बहुमज्झदसमाए पत्तेय २ सीहासणा पण्णता वणावासा सपरिवार ॥ तेसिण पामाय वहिंसगाण उपि बहवे अट्ठट्ट मगलझया छचाइछत्ता ॥ तत्थण चत्वारि देवा महिड्डिया जाव पलिआवम ठितीया परिवसति तजहा असोए सचिवणे चपए चए, तेण साण र वणसहाण साण २ पाप्ताय वहिंसगाण साण सामाणियाण, साण २ अगहिसाण, २ साण २ परिसाण, साण २ आयरक्खदेवाण आहेवच्च जाव विहरति ॥ १०९ ॥ विजयाएण रायहाणीए मतो मागवाले फड़े हुए उस में चद्रवा पयलसा वगैरह चिनों को हुए ॥ १०८ ॥ उन मासादापतसक के माप माग में पृथक् २ सिंहासन को हुवे , उन का परिवार साइउ सप वर्णन करना पन मातादाम वाक पर माठ २ मगलवमा प माविछत्र यो हुवे पा घार मादिक यावत् परपोपम की वितिगाले देव रहते हैं जिन के नाम-अञ्चोक, सप्तपण, चंपक व मूत वे अपने २ पनरूपमे अपने २ मासादापतसफ में, भपने २ सापानिक, मनपरिषी, परिषदा व भास्मरक्षक देवों का मषिपविपना करते हुए रिचरत १० ॥ पित्रमा रापपानी की मदर बात सम रमणीय भूमिमाम का पावापन् •मकायक रामाबहादुर माला सुखदेवमायनी मामासादनी. - - ॥ १३ ॥ तस्सणं पातायडेसगस्त मतो बहुप्तमरमणिजे भूमिभागे पण्णसे जाव मगि फासा, उझोया ॥ तस्सण बहु समरमणिजे भूमिभागस्त घहु मध्झदेसमाए एका मह मणियेढिया पण्णता, दो जोयणाइ मायाम विस्वमेण जोयण बाहलेण, सवमणिमई अच्छा जाय पहिरूबा ॥ तीसेण मणिपेटियाए उपि एस्थण एगेमह सीहासणे पण्णचे एव साहासण वणो सपरिवागे ॥ सस्सण पासाय घडेसगस्स उप्पि बहवे अट्ठ मगलज्झया छत्चातिछचा, सेण पासाय वढेसए भन्नेहिं चउहि सपदुश्चत पमाणमसेहिं पासायव.सएहिं सव्यतो समतासपरिक्वित्ते, तेण पासाय ॥ १३ ॥ सप्त प्रासादापनमक के मध्य में बहुत समरमणीय भूपिमाग कहा है यावत् मणिस्पर्शपाया है चप्स के मध्य भाग में एक मणिपीठिका है वह दो योमन की सम्बी चौटीप भाषा योजन की भारी सप माणमय यापत् प्रतिरूपी समणि पीठिका पर एक पटा सिंहासन कहा उस का परिवार सहित पर्णन करना उस मामादायससक पर आठ २ मंगलिक मना, छपपरछत्र है उस मामादायतसा की आसपास मन्य उससे बाधी उचाइ के प्रमाण पाठे चार प्रासादापर्वतक कहे है"योजन के ऊचे व पभरह योमन पढाइ कोष के मै पौडे मगन बलको मालम्बन ++ चतुर्दश-मीषामिगम मूम-तृर्व य उम 4 वीमरी मानपीच में विनया रास्यपानी का वर्णन जर्य मनुवादक-पाखामपारी मुनि श्री ममाषक की समे परिक्खेण ॥१॥ तस्सण उवरियालेणस्स चउदिसि चत्तारि तिसोमाण पहिरूषगा पण्णता षण्णभो ॥ तेसिण तिसोवाण पडिरूवगाण पुरत्य पचय २ तोरणा पण्याचा छत्चाइछच्चा ।। ११२ ॥ तस्सण उवरियलेणस्त उप्पि यहुसमर- मणिबेभूमिमागे पण्णत्ते जाव मणिहिं उवसोभिते मणिवण्णओ गधोभासो ॥ तस्सण घहुसमरमणिजस्स भूमिमागस्स बहुमज्नदेसमाए तत्थण एगेमह मूलपासायव.सए पण्णत्ते सेम पासायवडेसए वात्रटुिं जोयणाइ अद्धजोयणच उड्ड उच्चत्तेण, एकतीस जोयणाइ कोसच आयामविकत मेण भव्भुगय मूतिय पहसिते तहेव कम दो योजना के पक्षपाल में चयुतरा समान है।।१११ ॥ उस उपकारिका छयन को चारों तरफ चार पांगये है, पे वर्णन करने योग्य है, उन प्रत्येक परिष के आगे पृथक् २ सोरण यारत् छपाति छत्री ॥ १२॥ उस उपफारिका सपन के ऊपर पात समरपणीप भूमि मागरे यारत् मणि से शोमित यह पण का वर्णन पूर्ववत् नानना गवयास पर्यत काना रस रमणीय भूमिमाम के मम्प पीच में एक पटा मूस मासादापस पा साडी बासठ योगन का करा, सपा पतीस पोगन का सम्मा पौरा बौर मगनसके मरमान करवा दो रेसा र वापिकार पूर्णपत् मानना * काक रामारहादर प्याला सुखदेवसायमी बागमादमी .

त्र 4 सुर्दश जीवामिगम सूत्र तृतीय उपार ++ तेसिण पासायडिंसगाण भतो बहु समरमणिजाण भूमिमाग उल्लोया ॥ तेसिण बहुसमरमाणिज्जाण भूमिभागाण बहुमझदेसमाए पचय २ पउमासणा पण्णता ॥ तेमिण पासायाण अट्ठमगलज्झया छत्तातिछत्ता ॥ तेण पासायवडेंसका अण्णेहि यहि २ तदद्दच्चत्त पमाणमत्तहिं पासायबढेसएहिं सन्यतोसमता सपरिक्खित्वा ।। तेण पासायहिंसका देसूणाइ अट्ठजोयणाइ उड्ड उच्चचेण देसूणाइ चचारि जोयण'इ आयामविक्खभेण अब्भुगत भूमिभागा उल्लोया भहासणाउवरि मगल ज्झया छत्सातिछत्ता ॥११॥ तस्सण मूलपासायडिंसगस्स उत्तरपुरच्छिमेण एत्थेण धमा प छप्रपर छप हैं इन मासादाबनसा के आगे पृथक् २ इस से आधी ऊचाइ के प्रमान पाले अन्य चार २ मासादायससक को पे कुच्छकम पाठ योजन के ऊंचे प कुच्छ कम चार योजन के लम्स चौदे रे, गगन सरु को अगलम्बन करके रहे हुवे होवे पैसे दीखते हैं उन मे पृथक मद्रासन करे उन पर आठ २ मगल, ध्वना व छत्रारछप है यो सप पालकर ८५ प्रासादावसक की पति होती है मूल मदर का एक, उस की भास पास चार, इन चार की मासपात १६ सो ला की आसपास ६. यों सत्र मीलकर ८५ हुए ॥१४॥ उस मूल मासादावताक से ईशान कून में विजय देष र तीसरी प्रतिपचि में विजया र ज्यधानी का वर्णन में वसका एकतीस जोयणाइ कोसच उट्ट उच्चत्तेण अड सोलरस जोयणाइ अड मास्त्रामपरी मुनि श्री मोमक मकारक राजाबहादुर काला मुत्रदेवसायमी गामाप्रसाद मी. पर मेरे बसेस गगन प्रासादायतसक के पदर पात समरमणीय भूमिमाग है उस के मध्य माग पत्ये 'भद्रासन को उन को माठ २ मगठ, ध्वना छपातिमन कहे। इन चार मासादातमा मदारको मागे इन से अर्थ ऊंचाइबाले घार २ प्रामादामवसक का हैं या पारा योमन कोष के ऊषे हैं और कुरूप बाठ योजन मर्यात् सात योजन मवा तीन कोच के सम्म चौरे १० को मालम्बन कर के रो रे पैसे दीक्षाइवे में नमामादारसंसा में पहुत समरमणीय मान सारे इम पम्प पीच में पृषर २ पचासम को दुर. इन प्रासादापर भार २ पमस, 4 कोसच आयाम विक्स्वभण अव्मुग्गय तहेव ॥ तेसिण पासाय वसगाण अतो बहु समरमणिज भूमिभागा उल्लोता ॥ तसिण वह समरमणिज्ज भूमिभागाण बहुमझ देसमागे पक्षय २ भदासणा पण्णचा ॥ तसिण अटूट्ट मगलज्झया छत्चातिछचा ॥ तेण पासाय बढेसका अन्नहिं चउहि तदुश्चत्त पमाणमोहिं पासाय बढेसएहिं कोसच उ उपचण देसणाइ अट्टजोयणाइ आयामविक्खभेण अभूगय तहेव सध्यतो समता सपरिस्विचा, तेण पासायव.सगा अह सोलस जोयणाई अह * चतुर्दश मीषामिगम सूत्र तृतीय उपार NRI रूवग सहस्स कलियामिसमाणी मिझिसमाणि चक्खरोयण लेसा सुहफासा सरिसरिय रुषा कचणमणिरयणभूसियागा ( थूमियागा ) नाणाविह पचवण्ण घटा पडाग पाडमडितग्ग सिहरा धवलामिरीइकवय विणिमुयती लाउन्लोइय महिया गोसीस- सरसचदण दहरदिन्न पचगुलियतला उवधियचदणकलसा चदणघडसुकयतोरण पडि दुधारदेसभागा आसत्तोसत्चविउल पदृवग्धारिय मल्लदामकलावा पचवरण सस्ससुरभिमुक्क कालता कालागुरुपवरकुंदरुकधूव मघमघत गधडुआभिरामा सुगध घरगध गधवहिभूता मच्छरगणसघसविकिन्ना दिन्यतुडिय मधुरसह सपइआ, सुशौमित है, हमारों रूप के मेद से सरिता, सेमसे देदीप्यमान, विश्प देदीप्यमान है, पशु से देखने याग्य है, मुखकारी परे, भोमानिक रूप है, सुवर्ण, मपि व रत्न के उस के शिखर , विविध प्रकारके पौव पर्ण की घंटा पतास धोमनीक इरा शिखर है, प्रकाश करनेवाले वकीरणों उस में से नीकलते , गोमय (गोपर) से उस का माग छीपा हुआ है, गौशीर्ष चदन, रक्त पदन व दर्दर चदन से पांचों मगलियों कछारे लगाये , वहां चदन कलश स्थापन किये हैं, प्रसिद्धार के भागे चदन के घर का तोरण भयो सरा स्पारन रिया , नीचे भूमि पर विस्तीर्ण वर्तुळाकार सम्बी लटकती हुई पुष्पमालाओं का समुा है, पर वर्णसे सुगंधेिनय पुष्प का पुन है, कृष्ण चइन, श्रेष्ट कुरुक्क धूप से कसरी मविपचिपे विप्रया राज्यघानी का वर्णन - अनुवादक- सामचारी युनिश्री भयोगसगिनी - विजयरस देवस्स समाधम्मा पण्णता, अद्धतेरस जोयणाइ आयामेण सका साइ छ जोयणाई विक्समेण णवसोयणाइ उड्ड उच्चरेण अणेग नमसतसनिवट्ठा अम्भुगय मुकय वइवेदिया, सोरणवर रतिय सालिमजिया, सुसिलिट्ठ विसिट लट्ठ सठियपसत्यवेकलियविमलखमा णाणामाणिकणगरयणवइरयउज्जल बहुल बहुसम सुवमत्तिचित्त रमणिज कुट्टिमतला, इहामिय उसम तुरगणर विहग वालग फिमर सरम चमर फुजर पणलय पठमलय भाचिचा खभुय- परवईया रिगयाभिरामा विष हरजमलजुयलजतजुग्गविअधिसहरसमालणीया की सुपर्मा सभा पा १२॥ घोचन की सम्पी भौर । योमन की चौरी , ना योग्न की इंची बने स्तम उस में से दुने मति रमणीय देखनेवासे को सन्मुख दीखसके जैसी समय यदिखा है, या भयो तर पनाप हुए तोरण व पूतालियों , पुषद मनोहर संस्थानवाला , प्रशस्त और रस्कार समरे, उपसभाका विष प्रकार के पणि, कनक,रस्न पारस्नसे बसपचम,निगा भाभ- बारी मनोहर कुहिम भूमि तस बामृग, ग्राम, मन, मनुम्प, ममरमण, पक्षा, सर्प, दिनार नामक मंतर देव, रस, परम, पपर, पी, पनकता र पसारे विषिष प्रसार पियों। स्वम पर रहो पसप पेदिका से चारों दिवि पनोर, विपापरों के युनस से हमारों कवि की मामलों से पानामापरबाइलदेवमहावी नामसारी Im 487 ईश नमामि सुत्रीय उप 4Rra भामभाग वण्णओ ॥ तेसिण मुहमडवाण उरि पत्तेय २ अट्ठ मगलगा पण्णता तजहा सास्थिय जाव मच्छा ॥ तेसिण मुहमडवाण पुरओ पचय २ पेच्छाघर मडवगा पण्णता, तेण पेच्छाघर मडवगा अद्धतेरस जोयणाइ आयामेण जाव दोजोयणाइ उड्ड उच्चत्तेण जाव मणिफासा ॥ ११७ ॥ तेसिण बहुमज्झ देसभाए पत्चेय २ वइरामया अक्खाडगा पण्णासा, तेसिण बहुमज्झ देसभाए पत्तेय २ मणिपढिया पण्णता, ताओण मणिपेढियाओ जोयणमेग आयाम विक्खभेण अद्ध जोयण बाहल्लेण सव्यमणिमइओ जाव पडिरूवा ॥ ११८ ॥ साधिक दो योजन के कचे हैं इन मुस्व महप में अनेक स्वम रहे हुवे हैं यावत् सघ भूमिमाग का वणन करना इन मुख पदप पर स्वस्तिक यावत् यत्स्य के आठ २ मगल कहे हैं इन प्रत्यक मुख महप के भाग पृथक् प्रेक्षाघर महप कहे हैं य मक्षाघर महप याजन के लम्बे दो यानन क ऊचे यावर मणिस्पर्श वाले कई हैं ॥१७॥ पृथक् वज्ररत्न के अखाड को इन की बीच में पृथक माणिपीठिका कही हैं ये मणिपीठिका एक योजन की लम्पो चौडा पापा योजन की नाही है, सच मणिमय यावत् प्रतिरूप हैं ॥ १८ ॥ इन मणिपीठिका पर पृथक् 49 तीसरी प्रतिपत्ति में विजया राज्यपानी का वणन 48 के मध्य में ++ अनुवादक ालयापारी मुनि श्री प्रपाकेक सदरपणामतो अच्छा जाव पाडरूवा ॥ ११५ ॥ तीसेण साहम्माए सभाए तिदिति तओदारा पण्णत्ता तजहा पुरच्छिमेण दाहिणेण उत्तरेण तेण दारा पत्तेय २ दो दो जोयणाइ उल उच्चत्तेणएगजोयण विक्खमेण तावइयचेव पवेसेण सेयावर कणगभियागा जाय वण्णमालादारवण्णओ, तसिण दाराण उाप्पं बहवे अट्ठ मगलझया छत्ताइ छत्ता ॥११६॥ तेसिण दाराण पुरओ तिदिसिं ततो मुहमहवा पण्णचा, तेण मुहमडवा अह तेरस जोयणाइ आयामे छजोयणाइ सकोसाइ विक्खभण, साइरेगाइ दो जायणाइ उड्ड उच्चचेण तेण मुहमडवा अणेग खमसय सन्निविट्ठा जाब उल्लोया पपमपायमान गंध वाली है,सुगधमय श्रेष्ट गघ चाली है, गपवर्ती भूत है, अप्सराओं के समुदाय सहित हो, दीव्य घुटिवादि वार्दिक पधूर शन्द सासरे, यह समा सबनमय यावत् प्रतिरूप है ॥ १५ ॥ इम मुर्मा समा की तीन दिशा में तीन द्वार को पूष दक्षिण व उत्सर में ये दार दो योमन क करे एक पोमन के घोट प एक योजन के प्रश्न पाठ, श्वत श्रेष्ठ कनक के स्तम मापन यनमासा युकरे इन द्वार पर बात माठ २ मगल धमाप छपपरछत्र को ॥१६॥ इन दार कमागे तीन दिक्ष में बोन मुख मंडप कार में मुख माप १२॥ मामन के ममेरे सावन में एक कोश के दौरे .ganga2212291ala FREE Hi चतुर्दश मीवामिगम सूप तृतीय पान सन्नरयणामपा अच्छा जाव पडिरूबा ॥ तेसिण घेइय थमाण उप्पि अट्ठमगलगा बहुकिण्हा चामरज्झया पण्णचा छत्तातिछता ॥ तेसिण चेतियथूमाण घउदिति पत्तेय २ चचारि मणिपढियाओ पण्णताओ ताओण मणिपढियाओ जोयण आयाम- विक्स मेण अद्धजोयण पाहल्लेण सबमणिमया जाव तासिण मणिपढियाण उम्पि पचेयचचारि जिणपहिमामो जिणुस्सेह पमाणमिचाआ पलिंयक जिसण्णाओ थूमामिमुहीओसन्निविखचामा चिट्ठति तजहा उसम बदमाण चदाणण धारिसेण॥१२०॥ सेसिण वतिय थूमाण पुरतो तिदिसि पचेय २ मणिपढियाओ पण्णताओ, ताओण मणिपढियाओदा जोयणाइ आयामीवक्खभण जोयण याहल्लेण सव्वमणिमईओ अच्छाओ कहे हुने एन चैत्पस्तूप की चार दिन में चार मणिपीठिकाओं में यह मणिपीठिका एक योनन की सम्मी चौदी भाषा योजनकी जार, सब रत्नमय यावत् प्रतिरूप है उन प्रत्येक मणिपीठिका पर पृथक मिन प्रतिमा में ये निन शरीर पमान ऊंची, स्तूम के सन्मुख मुख रस रही हुई। इन जिन प्रतिमा के नाम वृषम, वर्धमा, चद्रानन, द पारीसेन ॥२०॥ चैत्यस्तृप के आगे तीन दिशाभों में पृषक २ पपिपीठिकाओं की ये दो योमन की सम्झी चोदी एक योभन की मारी है सीसरी मतिपत्ति में विजा राज्यवनी का वर्णन .

अनुपात पापामारी मुनि श्री अमोलक अपीजी: तामिण मविपठियाम उप्पि पत्तेय २ सहिासणा पण्णचा, सीहासण वण्ण जाव दामा ओपरिवारा ॥ ११९ ॥ तेसिण पंछाघर मडवाण उप्पि अट्ठमगलझया छातिछत्ता ॥ तेसिण पच्छाघर मडवाण पुरतो तिदिसिं तओ मणिपढियाओ पण्णताओताआम मणिपेढियामओ दो जोयणाइ आयामविक्रमेण, जोयण बाहल्लण, सवमणिमइयो अच्छाओ जाव पडिरुवाओ॥ तासिण मणिपढियाण उपि पचेय २ घईय थूभा पण्णता तेण घेझ्ययूमा दो जोयणाइ मायामविक्सभण साइरेगाइ दो जोयगाइ उ उधरोण सेया सरन ककुददगरयअमतमहित फेणपुज सनिकासा FEEIसन हो या पूर्ववत् सिंहासन पर्णन फादेना यावत् पुष्प की माणामों की हुई है ॥१९॥ उन बलापर मरप पर माठ २ मेमस, भमा समातिएम को रे इनकी भागवीन दिशामों में तीन पपिपाठिका ये दा पोमन की छम्मी पाटी व एक पोमन की बारी सब मनिमय सम्म गरन् मतिस्प , इन पर पृषा २ पैत्पस्तूप का है, ये दो पोमन सम्म बोरे चौर माषिक यो योजना के बाद संच, कुदरक, पानी के कन, अमृतपसमुद्र के कन सपान सब निर्मक रमात भारत् प्रतिपान पस्तूप पर बार मनको एक पपपासे पार, अमान माविम्य महाशक-राजाबहादुर साला मुसदयसापनी भाभसारकी .

4. चतुर्द -भीवा भिगम मूल तृतीय उपाय 4. विविहसाइप्पसाहवरुलिय पत्त, तवणिज्य पत्तबेटा,जवुणयरयमय पल्लव सुकुमाल पयाल सोमत वरकुहरग्ग सिहारा,विचित्त मणिरयणसुरामि कुसमफल मरियणमियसाला सच्छाया सपमा ससिरिया सउबोया अमयरससमरसफला अहियणयण मणणिवुत्तिकरा पासादिया परिसणिज्जा अभिरूवा पहिरूवा ॥१२३॥ तसिणचइयरुक्खा अन्नेहि बहहिं तिलयलवय छत्तोबग सिरीस सतवण्ण पहिवण्ण लोद्धव चदण निव कुडय कयब पणस तालतमाल पियात पियगु पारावयरायरुक्ख नादेरुखेहिं सबओ समता सपरिक्खित्ता तेण तिलय जाव नदिरुक्खा मूलवतो कवतो जाव सुरम्मा, तेण तिलया जाव पत्र है, सुवर्णमय पत्र के पीट हैं, जम्बूनद रत्नमय कालवर्णवाले मृदु पनोझ पछव हैं, मुकोमल प्रवाल से सुश्चोमित प्रधान मकुर के अग्रशिखर है, विचित्र प्रकार के मणि रत्नमय गधित पुष्प फल से उन की शाखा नम्न बनी हुई है, छाया यक्त, कांति सहित, सश्रीक, च्यात सहित, अमृत रम समान फलचाले मन प नयन को आनद करनेवाले, प्रसन्नकारी, दर्शनीय, अभिरूप प प्रतिरूप हैं ॥ २३ ॥ इन वृक्षों की चारों सरफ अन्य भनेक तिलक दृक्ष, छत्रोपगय, सिरोप वृक्ष, सरसडा के वृक्ष दधिपर्ण के वृप्त, लोध्र वृक्ष, दव वृक्ष, चदन वृत, कुन वृत, कदव वृक्ष, फणस वृक्ष, वार वृक्ष, समाल घृत, प्रियाल सक्ष, मियगु वृप्त, पारापन वृक्ष, नदीवृक्ष व इत्यादि वृक्ष रहे हुवे हैं वे सिलक वृक्ष यापत तीसरी प्रतिपपि में विजया राज्यधा" - - * मनुगाव-नामममवारीमुनि श्रा ममोसा सापगो + लण्डाओ घटाओ मट्ठाओनिप्पकाओ णीरइयाओ जाव पडिरूवाओ॥१२॥तासिण माण पढियाण उविपचेयरचेतियरुक्खा पण्णता,तेसिण चेतियरुक्खा अट्ट जोयणाइ उदृ उच्च. पेण,अह जायणाइ उन्वेहेण,दो जोयणाइ खधो अह जोपणाइ विक्खमेण छनोपणाइ घि डमा,बहुमज्झदेसमाए अद्ध जोयणाइ आयाम विक्खमेण, सातिरेगाइ अद्ध जायगाइ सगण पण्णचाइ ॥ १२२॥ तेसिण पतियरुक्खाण अयमेतारूचे वण्णवासे पण्णचे तजहा -वइरामयमूल रययसरइठिया सुविहिमा, रिटामय विपुलकदा, कालयरुचिलक्खधीसु जाय वरजाय रूव पढमगविसालसाला, णाणामणिरयण सब मणिमय स्पन, श्लक्ष्ण, घठारी, मठारी, पकहित रम रहित यावत् प्रतिरूप है ॥ १२॥ प्रत्येक मणि पीठिकापर चैत्य वृक्ष में ये चैत्य वृप्त माठ योजन के ऊचे हैं आपा योजन नमीन अदर दो योगन का रूप, माधा योजप्त का स्कन जारपनमें रे, छ योजन सी शाखा है, वा शास्त्रा गोत्र में मारा गबन की भारी हे मोर घे वृत सब मीलकर पाठ योजन से कुच्छ अषिक को ॥ २५ ॥ इन पैत्य वृक्षों का ऐसी वर्णन कहा। इन का पात्नमय मूछ है, चांदी की शाला रिष्ट रस्न के रूप में, पैर्य स्नमव पद है, मच्छी तरह निष्पम हुई मूल से विस्तार युक्त मुवर्णमय पाता है, विविध प्रकार के मणि प रत्तमप विविष प्रकार की प्रासाद प्रति भावारे, बर्य रस्नमय प्रकाशक रामायादुर लाला सुखदवसरायनी मालाप्रसादमी.

4 चतुर्दश-नीवाभिगम सूप तृतीय पर मट्ठ सुपतिट्टिया विसिट्ठा अणेगवर पचवण्ण कुडमिसहस्स परिमाडियाभिरामा पाउडुय विजय घेजयती पहाग छत्वातिछच कलिया, तुगागगणतल ममिलघमाण- सिहरा पासादीया जाव पडिरूवा ॥ १२६॥ तेसि महिंदज्झयाण उप्पि अट्ठ मगल झया छत्तातिछना ॥ १२७ ॥ तेसिण महिंदझयाण पुरतो तिदिसि तओ णदा- पुक्खरिणीओ पण्णचाओ, ताओण पुषखरिणीओ अद्धतेरस जोयणाइ आयामेण, सक्कोसाइ छ जायणाइ विक्खमेण दस जोयणाइ उव्वेहेण अच्छाओ सम्हाओ पुक्खरिणी वण्णओ पत्तेय २ पउमवरवेतियाओ परिक्खिचाओ, पचेय २ वणसड परिक्खित्ताओ घण्णमओ जाव पडिरूवाओ ॥ १२८ ॥ तेसिण णदाण पुक्खरिणीण सुशोभित मनोर , वायु से उडती हुई, विजय, वैजयती नामक पसाका और उन पर छत्र से युक्त गगन तल को उल्लघन करती होगे इतन मन के शिखर ऊचे हैं प्रसन्न कारी यारत् पावरूप हैं ॥ १२६ ॥ इस मोन्द्र बना पर बाठ २ मगळ बजार छप पर छत्र है ॥ १२७ ॥ मोन्द्र पना के आगे वीन दिशा में तीन नदा पुष्करणी। ये सादी रा योजन की लम्बी मपाछे योजन की चौटी व दश योजन की कही है या स्वच्छ, सुकोमल वगैरह सब पुष्करणीका वर्णन पूर्ववत् जानना प्रत्येक वाचदिको एफ २ पावर घेदिका पेटिव है मौर. मत्येक बेदिका को एक २ वनखण्ड है यावत् प६ मनिरूप है तीसरी प्रतिपचि में विजया राज्यघानी का वर्णन दुपारत-पायमचारी युनिश्री पोषक पनीर नदिरुस्खा मोहिं बहुहिं पठमलयाहि जाव सामलयाहि सन्यो समता सपरि- विस्वचा, तामओम पउमलयाओ जाव सामलयाओ निच कुमुमियाओ जाव पहि रूबाओ तेसिण घेइयरुषवाण उणि बहवे अट्ठ मालकाझया छचातिकता ॥ १२ ॥ तेसिम घेतियरुक्स्वाणपुरओ तिदिसिं तमो मणिपेढियामोजोयण मायाम विक्समम मडजायण माहलेण सन्धमणिमयीमो अच्छाभो जाव पढिरुवाओ ॥१२५॥ तसिम मणिपेढियाण उपि पत्तय २ महिदझया अट्टरमाइ जोयणाइ उडु उच्चत्तेण मरकोस उव्वेक्षण अबकास विकसमेण पइरामय बलट्ठ सट्ठिय सुसिलट्ठ पारघट्ट निरी त मूल पारे वापत् सुरम्प इन विमा पृत यावत् नदि इस की मासपास पात पत्राना पावत् सामाkिटी हुई रही , वे पर पता यावत् पामता सदैव पुष्प पारी यावत् प्रतिस्पर स्प यूज पर बार अंगम, भवा र राप्रपरणपो २४ ॥ इन पैस्यमृतों के मागे तीन दिशामो में वीन पिपीटिकामा एक बोगम की समी पोरीपापा पोमन की बारी सामनिव सण बापत् प्रतिरपा ॥ २५ ॥ इन प्रस्पेक पपिपीठिका पर पृषक मोन भया है, या सारे ताव गोपन की भाषा दोषीमापा की चोरी रस्नमय बर्तुगार, सभी पसी हुई, नमाविकी दुई, सतिशय विधिकबौर मी या मोम पमा मनसा सामों मारानापरादुर 8 मुसदेशसापर्माननाममारक - न - चनुश जीयाधिगम मप्र तृतीय उपाङ्ग 4 सधम्माए छगोमाणसीय साहस्सीओ पण्णचाओ तजहा पुरथिमेण दो साहस्सीओ एच पञ्चत्थिमेणवि दो साहस्सीओ, दाहिणेण एग सहस्त एवं उत्सरेणवितासुण गोमाणसीस बहवे सुवण्णरुप्पमया फलगा पण्णचा जाव तेसण वरामएसु नागदतएसु बहवे रयघामया सिकया पण्णचा तेसूण रययामएसु सिकसु बहरे वेरुलियामईओ धुवघडीयाआपण्णचाओ,ताओण धूवघडीयाओ कालागुरुपवरकुदरुकतुरुक्क जाव घाणमण णिन्वुइ करेण गधेण सव्वमो समता आपूरेमाणीओ चिट्ठति ॥ १३१ ॥ सभाएण सुधम्माए अनो बहुसमरमणिज भूमिमागे पणते जाय मणीण फासा उल्लोया पउम- प्रतिरूप हैं ॥ १३० ॥ सुधर्मा सभा में छ गोमानीका-शैय्या रूप स्थानक हैं जिन में पूर्व में दो मार, पश्चिम में दो हजार, दक्षिण में एक हजार व उत्तर में एक हमार इन गोमानसीका में सा चांदी के पटिये हैं यावत् उन वज्ररत्न के नागदान पर चादी के उस चांदी फ सिक पर वैदूर्य रत्न की धूपघटी कहो । उम में प्रधान कृष्णागर, कुदरुक प्रमुख रख हुवे हैं यावत् नासिका में मन को सुख उत्पन्न करे वैसी गध से सघ स्थान पुरा हुवा है ॥ १३ ॥ सुधर्मा समा में बहुत रमणीय भूमे भाग कहा है यावत् मणका स्पर्श है, चंद्रमा व परमता के चित्रों है यावत् सघ मुत्रर्णमय स्वच्छ - तीसरी प्रतिपत्ति में विजया राज्यघानी का वर्णन मनुपादक-नाप्रमचारी मुनि श्री भमोलक सपिभी है पत्तेय २ तिदिसि तओ तिसोमाण पटिरूवगा पण्णचा ॥ तेसिण तिमीमाण पडि. स्वगाण षण्णतो तोरण वन्नओ भाणियवो जाव उत्तातिउत्ता॥ १२९ ॥ सभाएण सुधम्माए छमणगुलिया साहस्सीमो पण्णचाओ सजहा-पुरस्थिगेण दो साहस्सीओ पञ्चत्यिमेण दो साहस्सीओ दाहिणेण एग साहस्सीओ उत्तरेण एग साहसीआ, तासु मणगुलियासु बहवे सुवण्ण रुप्पमया फलगा पण्णाचा, तेमुण सुवण्ण- रुप्पामएसु फलगेसु वहवे वइरामया मागदता पण्णता, तेसुण वइरामएस नागद- तएसु बहवे किण्हमुत्तववग्घाारत मझदाम कलावा जाव सुकिलवश्वग्धारित महदाम कलावा जाव तेणदामा तवणिज लवूसगा जाव चिट्ठति ॥ १३० ॥ सभाएण ॥ २८ ॥ चन प्रत्येक नदा पुष्करणो से तीन दिशा में सीन २ पिसोपान यावत् प्रतिक्ष्य पमा पिसोपान व तारण का वर्णन पित् करना यत् प्रणाविपत्र ॥ १२९ ॥ सुधर्मा समा में छ मनो गुलेका नाम पीठिका (पैठने के पयूतरे ) की मिस में पूर्व दिशा में दो रनार, पश्चिम दिशा दारमार, दक्षिण दिशा में एक प्यार उत्तर दिशा में एक समारो ग्न पीठिका पर सोने दी बहुन पटिपे है, पन पटियों पर पञमय नागदत को इन पञमय नाम दास में कृष्ण परासे पापत् गुरु एमासे मूष से गुगी दुई पुष्पों की मारे समुदाय में इनको गम मुवर्ण के भूरे बापत .मागमारा काला मुरुदेवसहायनी रामारी चतुर शनीवापिगम मन तृतीय उपाइ 42 सुधम्माए छगोमाणसीय साहस्सीओ पण्णताओ तजहा पुरत्थिमेण दो साहस्सीओ एवं पञ्चत्थिमेणवि दो साहसीओ, दाहिणेण एग सहस्स एव उत्तरेणविातासुण गोमाणसीस पहवे सुवण्णरुप्पमया फलगा पण्णत्वा जाव तेसुण पहरामएसु नागदतएसु बहवे रययामया सिक्कया पण्णता तेसूण रययामएसु सिकएसु बहरे वेरुलियामईओ धुवघडीयाआ पण्णताओ,ताओणधूवघडीयाओ कालागुरुपवरकुदरुकतुरुक जाव घाणमण णिव करेण गधेण सम्बओ समता आपूरेमाणीओ चिट्ठति ॥ १३१ ॥ सभाएण सुधम्माए अनो बहुसमरमणिज भूमिभागे पण्णचे जाव मणीण फासा उल्लोया पउम- प्रतिरूप हैं ॥ १३० ॥ सुधर्मा सभा में छे गोमानीका-शैय्या रूप स्थानक हैं जिन में पूर्व में हो हमार, पश्चिम में दो हजार, दक्षिण में एक हमार व चचर में एक हजार इन गोमानसीका में RI चांदी के पटिय हैं यावत् सन वज्ररत्न के नागदात पर चांदी के उस चांदी के सिक पर यहूर्य रत्न की धूपघटी कहाँ ? उम में प्रधान कृष्णागर, कुदरुक प्रमुख रख हुवे है यावत् नासिका के मन को मुख उत्पन्न करे पैसो गध से सप स्थान पुरा हुआ है ॥ १३ ॥ सुधर्मा समा में बहुत रमणीय भूमे भाग कहा है यावत् पणिका पर्व है, चद्रमा व पालता के चित्रों पावत् सघ सुवर्णमय स्वन्छ। तीसरी प्रतिपत्ति में विजया राज्यघानी का वर्णन Al- का मनुवादक-मानमवारी मुनि श्री अमोलक रिमी लय मतिचि जाव सम्व तवणिजमए अच्छे जाव परिरूये ॥ तस्तण बहुसमरम- णिजस्त भूमिभागस्स बहुमझदेसमाए एत्यण एगामह मणिपेढिया पण्णचा, साण मणिपढिया दो जोयणाइ आयामविक्खमेण जोयण बाहलेण सबमणिमई ॥१३२॥ तीसेण मणिपेढियाए उप्पिं एत्पण माणवए णाम चेतिय खमे पगाचे अट्ठमाइ दो जोयणाइ उस उच्चतेष अद्धकोस जाव उन्हेण अदकोस विक्खमेण छकाडिएस्पलेसे छसुविग्गहिए पहरामयवलट्टि सठिते, एव सठिते, एव जहा महिंद- ज्झयस्स वण्णाभो जाव पासादी९ ॥ १३३ ॥ तरसण माणवकस्त चेतियखभस्त उरि छकोसे उगाहिचा हेटावि छक्कोस पाजचा मज्झे अदपचमेसु जायणे सुवण्ण पावत् प्रतिरूप हैं म रमणीय भूमियाग के मध्य में एक मणि पीठिका कही है या दो योजन की समी पोसरी, एक पोमन की भारी यावत् मणिमप ॥ १३२॥ उस मणिपीठिका पर एक माणवक नामक पत्प स्तमो पा साडेसात योमन का ऊंचा, मापा कोश का करा, बापा कोश का चौसारे इस को एकोटि-कून है, इस प सपि, म स्थानक से सुशोमियो पजरत्नमय बर्तुग्राकार राम वगैरा मोन्द्र पाजा सा वर्णन मानना याबस् प्रमभकारी ॥ १३ ॥ इस मापार स्प स्यम कोकोप उपरोशनीचे शेरकर पीच के सारे पार योमन में सोने पदी पटिये काशक राजाहदुर छाला सुखदव पहायजी ज्वालाप्रसादमी।

+ चतुदश भीवामिगम सूत्र नृतीय उपाय 48 रुप्पमयफलगेसु बहवे वइरामयाणाग दता पण्णचा, तेसुण यइरामएसु नागदतएस रययामयासिकगा पण्णता, तेसुण रययामयसिक्कएम बहवे वयरामयगोलवह समग्गका पण्णता, तेसुण पइरामए गोलवट समुगए बहवे जिणस्स कहाओ सनिक्खित्ताओ चिट्ठति,जेण विजयस्स देवस्स अण्णेसिंच यहूण वाणमतराण देवाण देवीणय अञ्चणिज्जाओ वदणिज्जाओ थूयणिज्जाओ सकारणिजाओ मम्माणणिज्जाओ क्ल्लाण मगल देवय चक्ष्य पज्जुवासणिजाओ ॥ माणवकरसण चेतियस्सखभस्स उरि अट्ठट्ट मगलगञ्झया छत्वातिछत्ता ॥ १३४ ॥ तस्सण माणवकस्स पात सरत्न के नागदांव (खटे) को इन नागर्दात में चांदी के सिके को हैं इन रुपामय सिके में समुद्रक (रमे) रखे है उस में मच्छी तरह से जिनदादी रखी हुई हैं विजय देवता, अन्य बहुत चाणज्यतर दव प देवियों को ये दाढा बचना, पदना व पूजा करने योग्य है, सत्कार करने योग्य हैं, सन्मान दने योग्य है, उन को यह कल्याणकारी, मगलकारी, देव सम म, चत्य समान व पर्युपासना करने योग्य है - Eम पाणवक चैत्य स्तम पर पाठ २ मगल ध्वजा व छपपरछप कहे ॥३४॥ उस माणषक ४ यह दावारूप शाश्वत पुद्गल वस्तु मानना परतु वीर्धकर की दादा नहीं है असे इस मनुष्य छोक मे ऐहिक सुख के लिये देवत्यादिक की सेवा करते हैं पैसे ही देवताओं को इन दादा की 48 तसरी माविपत्ति में विजयाराज्यवानि का वर्णन " चतियखभस्स पुरथिमेण एत्थण एमामहमणिपेढिया पण्णचा साण मणिपढिया दो जाय- पाइ आयामविक्खभेण, जोपण बाहल्लेण सन्बमाणमई जाव पहिरूवा। तीसेण मणिपे. दियाए उदि। एत्थण एगेमह सीहासणे पण्णचे सीहासण वण्णगोतस्सण माणवगरस चेतियरस मस्स पुनरियोग एत्यण एगामह मागेपढिया पन्नचा, साण मणिपेढि एग जोयण आयामविक्समेण अद्ध जोयण बाइलेण सबमणिमई अच्छा जाव पढिरूवा ॥ १३५ ॥ तीण मणिपढियाए उपि एत्यण एगेमह दवसयाणिज्जे पण्णते, तस्तण पर मनुषाद पारमच री मुनि श्री अयोलम्बानी •पराक रानाबहादुर लाना सुविश्वमहापमोमासरसादमी चैन्य स्सम से पूर्व में एक परी मणिपीठिका कही है पडदा योजन की लम्बी चोटी एक योजन की मादी माणमय यावत् परिपाई उस मणिपीठिका पर एक पहा तिहामन कहा है उस का वर्णन पवित्र मानना उस मणिय घेत्य स्यम स पश्चिम में एक घटी मणिनीठिका कही है वह एक योनन की रमी चौटो व बावा योजन की मादी प मघ मणिमय यावत् मासिकप है ॥१॥ उस मणिपीठिका पर एक परा देव भपन (देवशयपा) की है इसका इस तरा पणन करते हैं, पिविष मणिमय प्रतिपाठ में सवा पेवच ससार निमित्त है दवसाभा का यह मीत व्यवहार हे भन्य, अमन्य, समपि मिष्पास्वी सब इन का पूजन करते हैं यहां पर दाढा मात्र देवया को ही बने योग्य प्रहण की है देवसयाणिज्वरस अयमेयारवे वण्णवासे पण्णचे तजहा-नाणामाणिमया पेढीपादा, सोनाणियापादा, नाणामाणिमया पायसीया,जबूणदमया सिंगचाइ,वइरामया सधी,नाणा- मणिमयेवेचे, रययामयातूली, लोहियखमया विचारणा, तवणिज्नमयी गडोवहाणीया।। सेण दवसयणिज्बे सालिंगणवहिए दहाविञ्चोयणे दुहमओउण्णये मज्झणये गभीरे गगा- पुलिणवालुउद्दालसालिसये, उपचित्तखोमदुगुञ्जपट्ट पडिच्छपणे, सुविरइरयसाणे रत्तसुयसवुड सुरम्म आइणगरुत बुर णवणीय तृलपात मउए पासादीए ॥ १३६ ॥ 2-23 घन जीवाभिगम एम तृतीय सपान : सुवर्णमय पाद, विविध मणिपय पांव के ऊपर के माग, जम्बूनद रत्नमय चप्स के अग [ईस रुपले ] बज्र रत्नमय सधी, अनेक प्रकार के मणिमय निगर, रत्नमय तलाइ, छोहतास रत्नपय तकिये, और सुवर्णमय गालममूर है यह देव भैग्या शरीर प्रमाण , मम्नक व पाव की पास दो सरिये रखे हैं, मस्तक व of की पास कुच्छ कवी है, और चीच में गभीर है, गगा दा की पाल में पांच रखने स जैसे अघो गमन हाये पैसे ही है विचित्र सौमटुगुर पन,कपासका पन दुकर,पटुकुल से पनाया हुवा वन देव दुष्य से वह आच्छादित हुई है, अच्छी तरह पनाये हुवे रजत्राण व वन सहित है, लाल बस से वा पलग का वाई, मनोहर है, मृगचर्म, पूर, मक्खन, अर्कतल जैसा स्पर्श है देखमे योग्य यावत् प्रतिरूप है॥१३॥ तीसरी मतिपत्ति में विजयराज्यपानी का वणन 4- . - चातयखभरतपुरस्थिमेण एत्थण एगामहमाणपेढिया पण्णचा साण मणिपढिया दो जाय- णाइ आयामविक्खभेण, जोयण बाहलेण सन्माणमई जाव पडिरूवा॥ तीण मणिपे- दियाए उरि एत्थण एगेमह सीहासणे पण्णचे सीहासण वण्णगातस्सण माणवगरस चेतियख मस्स पुनरियमेण एत्यण एगामह मागेपाढेया पन्नचा, साण मणिपेढि एग जोयण मायामविक्खमेण मह जोयण बाहल्लेण सबमणिमई अच्छा जाव पडिरूवा 1 १३५ ॥ तीण मणिपढियाए उयि एत्यण एगेमह दवसयपिज्बे पण्णचे, तरतण प अनुपादक पासमपरी मुनि श्री अमोलवी की चैन्य स्तम से पूर्व में एक परी मणिपीठिका की है परदा योमन की रम्बी घोडी एक योनन की मादी माणपय पावत् प्रतिरूप है उस मणिपीठिका पर एक वटा सिमन कहा है उस का वर्णन पूर्ववर मानना उम मणिया चैत्य स्थम स पश्चिम में एक बडी मणिनीठिका कही है यह एक योनन की लम्बी चोटी ष भाषा योनन की नारी घसघ मणिमय यावत् प्रतिरूप है ॥१॥ उस मणिपीठिका पर एक परा देव भपन (देवशयपा) की है इरा का इस तरह पणन करते हैं, पिविष मणिमय प्रतिपाद में सवा फेवट ससार निमित्त हे देयसाभा का यह बीत व्यवहार हे भम्प, अमन्य, समदृष्टि मिथ्यात्वी सब इन का पूवन करते है पहां पर दादा मात्र देयवा को ही पचने योग्य महण की ह मारासरु राजावरापुर लाना सुखदवसहाय मोमानामसारी चतुर्दश भीवामिगर मूत्र तृमीय उपाइ + पासादिया ॥ सभाएण सुधम्माए उर्दिप बहवे अट्ठमगलज्झया छचातिछत्ता ॥ १३८ ॥ सभाए सुधम्माए उत्तरपुरच्छिमेण एत्थण एगेमह सिद्धायसणे पण्णते अहतेरस जोयणाइ आयामेण छ जोयणाइ सकोसाइ विक्खमेण नवजोयणाइ उड्ड उच्चत्तेण जाव गोमाणसिया वचन्यया जाचव समाए सुहम्माए वत्तव्यया साचेव निरव सेसा माणियवा तहेव दारा,महमडवा, पेच्छा घरमडवा, थूमा,चेइयरुक्खा, महिंदज्झया, णदाउयपुक्खरिणीओ सुधम्मा सरिसप्पमाण, मणगुलिया सुदामा गोमाणसी धूपघडियाआ तहेव भूमिभागे उल्लोपण जाव माणिफास ॥ १३९ ॥ तस्सण सिद्धायतणस्त बहुमज्झदसभाए एयण एगामह मणिपेढिया पण्णचा दो जोयणाइ समा पर माठ मगछ २ धजा व छपरम्ना ॥ ३८ ॥ सुघर्षा सपा की ईशान कून में एक पडा सिद्ध यसन कहा हुवा वा सादे पारह यामन का लम् सवाछे योनन का चौदा, नव गाजन का मचा यावर गोमानसीरु की पत्तपमा काना वैसी सुधर्मा ममा की वक्तव्यता कही या सप निरपशेप यहां काना द्वार, मुत्समाप पक्षाघर महप, स्तूप, चैत्य वृक्ष, महेन्द्र धमा, नदा पुष्करगी, सुवर्ण समान पीठिका, पुष्पदाम, शैय्या, घुपाटे सब पैसे की जानना जैसे ही भूमिमाग में यावत् उपर के भाग में यावत् मणिस्पर्श पर्यंत काना ॥ १९ ॥ उस भिदायन के मध्य माग में एक वही मणिपीठिका कहो. तीसरी प्रतिपचि में विजया राज्यधानी का वर्णन + अनुवादक पालनमपारी मुना प्रा अमोपकास प्रापिनी तस्सम देवसयाणिजस्स उत्तरपुरस्थिमेण मणिपढिया पण्णचा, तेण मणिपढिया जोयण- मेग आयामविस्वभेण, अद्धजोयण बाहल्लेण, सबमणिमयी जाव अच्छा ॥ तसिण मणिपढियाए उप्पि एगे मह खुडमहिंदज्झये पण्णचे भट्ठमाइ जोयणाइ उड्ड उच्चत्तण अडकोस उदोहेण अहकोस विक्खभण वइरामयवदृ लट्ठसठितेतहेव जाव मगलरुया छत्वातिछत्चा ॥ १३७ ॥ तस्सण खुडमाहदरुयस्स पञ्चत्थिमेण एत्थण विजयरस देवरस चुप्पालये नाम पहरणकोसे पण्णच, तत्पण विजयरस देवरस फलिहरयणप- मोक्खा बहवे पहरणरयणा सण्णिक्खिता चिट्ठति, उज्जल मुणीसिय सुतिक्खधारा सप्त देव भैया की दशानन में एक मणिपीठिका है यह मणिपीठिका एक योनन की सम्नी पारी है भाषा योनन की नाही रे सब मणिमय यावत् स्वच्छ है उस मणिपीठिका पर एक परी खुल्लक नाम महा मना है, या सादसात योजन ऊंची, आपा कोश कटी व भाषा कोश चौरी पचरत्नमय, मर्तुला कार मच्छा सरस घोसी एचगेरा मप पूर्ववत् नानना यावत् मगछ रूप ष छमासिछत्री ॥१३७॥ उस क्षुल्लक मा- न्दिधमा स पश्चिम दिशा में विनयदेव का चौपाल नामक मारण सोष शासभरार] है हो विजयदेवता के स्फटिक प्रमुख पात प्रसरत्न रखें है, ये उमर, जयप वीक्ष्मपार पाले मसमकारी में सुधर्मा •पकापाक रामापहादुर प्याला मुखदेवमहायजी ज्यालामसा बी. - . . 48 घतदश जीवभिगम मप्र मृतीय उपान १४ अयमेयारूवे वणवा पण्णते तजहा-सवणिज्जमती इत्थतला, पायतला, अकामयाइ हाइ अतोलोहियक्खपरिसयाइ, कणगामयापादा, कणगामयागोफा, कणगमईओ जघाओ, कणगामयाजाणु, कणगामयाउरु, कणगमईओ, गायलट्ठीओ तवणिजमईउपाभीओ, रिट्ठमईओ रामराजीओ, तवणिजमया चुचया, तवणिजमया सिरिवच्छा, कणगमईओ गीवाओ, रिट्ठामयमसू सिलप्पवालमयाआढा, फलिहमयादता, तवणिजमईओ जिहाओ, तवणिजमया, तालुया, कणगमईओ नासाओ, अतो लोहितक्ख परिसेयाओ, अकामयाइ अस्थीणि, अतो लोहितक्ख परिसेताति, पुला, उस में लाहिवाक्ष रत्नमय रखा है, मुवर्णमय पवि, घूटण, नघा, मानु, रु, गात्र हैं तपनीय की नामि, रिष्ट रत्नभय रोमगनी है सपनीयमय स्तनफे (चचु) अग्रमाग रक्त सुवर्णमय हृदय है, कनकमय ग्रीषा रिष्ट रत्नमय दाढी, मवालमप ओष्ट, स्फटिक रत्नमय दर्शत, रक सुवर्णमय वाटूभा, कनकमम नासिका उस में लोहिसास रत्न की रेखा अक रत्नमय पक्ष जिन में छोरिसाल रलमय रेखा पुलाक रत्नमय दही, रिष्ट ग्लपप ताराओं, मापम प भ्रमर है कनझमय कपाल, कर्ण व ललाट है, वन रस्नमय मस्तक है, रक्त सुवर्णमय फेश की भूमि ( मस्तक की टट) है, रिष्ट रत्नमय मम्तक के केश प्रत्येक निन प्रविमा पीछे छत्र धारण करने वाली प्रतिमा कही है, घे प्रतिमा दिम, मादी, मुचकुद के पुष्प समान तसरी प्रतिपत्ति में विजया र ज्यधानी का वर्णन + मनुवादक-पासबसपारी मुनि श्री अमोलक मानो - आयामविक्रमेण, जोगमाइ माइल्लेण सन्नमणियाए अच्छा ॥ तीसेण मणिपेढियाए उप्पि एत्यग एगेमह देव छदए पण्णते, दो जोयणाइ मायाम विक्खमेण साइरेगाइ दो जोयणाइ उडू उच्चत्रेण सन्नरयणामए अच्छे ॥ तत्थण देवछदए अठसत जिण पहिमाण जिणुस्सेहप्पमाणमेसीण सनिक्खित्त चिट्ठइ ॥१४०॥ तेसिण जिणपडिमाण यादो योमन की लम्बी चौडी एक योजन की नाही सब मणिमय र स्वच्छ, उस मणिपीठिका पर एक पटा देर छदक कहा है या दो योमन का लम्बा चौसा है साधिक दो योजन रुचा है. सप रत्नमय स्वच्छ है उस में एक्सो आठ मिन माविमा मिन शरीर प्रमाण ऊची रही दुइ +१३.॥ न मिन मतिमा का ऐमा वर्णन कहा में रक्त सुरम्पय हाय घ पाय के तल है, अक रत्नमय नखरे, + लेक मरिहवापि चिनो चेप, विनो सामान्य केवला || दर्पोपि जिनाचेय, बिनो नारायणो हरि ॥१॥ अर्प-हेमचन्द्राचार्यकृत हेम नाममाला मे-१ अहन्स २ केवली १ कामदेव व ४ नारायण इन चार को दिन पहे है इस से यह प्रतिमा कामदेव की मानी जाती है, तथा स्थानागनी सूत्र में-१ अवधि झानी, २ मन पपम जानी र ३ फेयक मानी, तीन प्रकार के बिन कहे है जिस से यह प्रविमा उम्वपि पानी चिन की बानी माती है उपनाइनी सूत्र में भीमहामार भगवान के शरीर के वणन में 'च्चू का धन नहीं आया है और यहा चुचु का कपन माया बिस से यह नीपिका की प्रतिमा नहीं है प्रकाशक रामायदादर लाग सहवासापनी पाखाप्रमादमी . . + पशजीपामिगम सत्र-सृतीय सपा म पुज सणिकासाओ मुहमरयतदीहवालाओ धवलाओ चामराओ सलील उहारमाणीओ २ चिट्ठति।तालिण जिणपडिमाण पुरतो दो दो नागपडिमामी जक्खपडिमाओ भूतपडिमाओ कुडधारपडिमाओ विणउणयाओ, जलिउडाओ, सणिक्खि ताओ चिट्ठति, सत्यस्ययामईआ अच्छाओ सहाओ लण्हाओ घटाओ मट्ठाओ णिरयाओ णिप्पकाओ जाव पहिरूवाओ ॥ तासिण जिणपडिमाण पुरतो अट्ठसत घटाण, अटुसत चदणकलसाण, एव भिंगारगाण आयसाण थालाण, पातीण, सुपतिटकाण, मणगुलियाण, वायकरगाण, वितारयण करडगाण, हयकठाण जाव उमभकठाण, पुष्फचगरीण, जाव लोमहत्थचगेरीण, पुप्फपडलगाण, अट्ठसय तेलसमुग्गाण, जाव धूवकडच्छयाण सणिखित्त चिट्ठति ॥ सिहायतणस्मण उपि यहवे अट्ठ मगलगा झया छत्तातिछत्ता, उतिमागारा, सालसविहरियणेहिं उवसो- मठारी, रम प प रहित यायन प्रतिरूप उन जिन प्रतिमा मागे १०८ घटे १०८ चदनफलश, १०८ मृगार, १०८ भरिसा, १०८ स्याल, १०८ पाधी, १०८ मुमतिटक व १०८ मनोगुलिका १०८ पंखे २०८ मनार रल करर १०८ हसकट यावत् १०८ वृपमाठ १०८ पुष्पकी छगरी, १०८ पुष्प के पटल, १०८ रु समुद्र, यावत् १०८ धूप के कुदले रहे हुवे हैं सिदायवन के उपर पशुत भाठ २ मग पमा व उनपर छा उत्तम याकार वाले व मोला प्रकार के रत्नों से धामनिक र व्ययानन कातीसरी प्रतिपत्ति में विजपा राज्य पानी का वर्णन . .

ताआम + अनुराक बाकसमचारी मुनि श्री भमोलक पिन कामइओ दिट्ठीमो रिट्ठामईमो तारगाओ, रिटामयाइ अष्टिपताइ,रिठामइओ भमहाओ, कणगामयाकबोला, कणगामयासपणा, कणगामयानिडाला, वइरामईओ सीसघडीओ, तवणिजमईओ केसत केसभूमिओ रिटामया उवरिमुहया ॥ तासि जिणपडिमाण पाच्छितो पत्चेयर छत्ताधारपडिमामो पण्णचामो तमोण छत्ताधार पडिमाओ हिमरयत कुटुप्पगासाइ कोरिटमल्लदामाइ धरलाइ आयवचाति सलील उहारेमाणीओ २ चिट्ठति ॥ तासिण जिणपडिमाण उभओपास पत्तेय २ चामर धारपडिमाओ पण्णताओ चामरधारपडिमाओ चप्पइयेरुलियणणामणिकणगरयण विमल महरिहतवणिज्जुबल विचित्तदहाओ, चिलीयाओ सखककुददगरय महितफेण ओस्टक पृष्ठभेत पुष्पों पाला छत्र धारण कर लीला सहित खदी र सन प्रत्येक जिन मतिमाओं के दोनों व मु पृयर चापर पारन करने वाली प्रतिमा में मसिमा चद्रममा बेडूय रत्न, विविध प्रकार मणि कनक रस्न पारे निर्मल महा मूल्य पाले सुवर्णमय उत्तम दर पाले अस, मकरत्न, मुचकुद, पारी के कन, अमृत । समुद्र फैन समान समस सुखकारी घोदी के पास वाले श्रेव पामरों सकर मांग करती रही है, इन प्रत्येक प्रतिमा के मागे दोर नाम मतिमा दो भूत प्रतिया, और दो२ दुरापार प्रतिमा पिनष से नमवी ईशापसीईसीसमरस्लमप, सण, साल पुष, पगरी, मसाधरु रानापरादुर लाला हम्मदवसापनी मागसारणी. - ३९९ चतुर्दश जीपामिा सूत्र तृतीय उपाय म 'सेण हरए भह तेरस जोयणाइ आयामेण सकोसाइ छ जायणाइ विक्खमेण, दस जोयणाइ उन्बहेण, अग्छ सण्हे दण्णओ जहेव गदापुक्खरिणीण नाव तोरण वष्णओ ॥ १४३ ॥ तस्सण हरतस्म उत्तरपुरस्थिमेण एत्थण एगामह अभिसय सभा पण्मचा जहा सभामुधम्मा तचेव निरवसेस जाव गोमाणसीओ भूभिभाए उल्लाए, तत्व तस्तण बहुसमरमणिवस्त भूमिभागरस बहुमझदेसमाए एत्थण एगामह मणिपेढिया पण्णचा, जोयण आयामायक्वमेण सबमणिमया अच्छा ।। तीसेण मणिवेढियाए उमि एत्थण मह सीहासणे पण्णचे सीहामण वष्णओ, अप- रिवारो, तत्थण विजयस्त देवरस सुबहुअभिसेक भडेसण्णिक्खिचे चिट्ठति ॥ ट्रा का पह साडी बारह योजन का लम्बा, मया छे योजन का चौडा, दश योजन का ऊंचा स्वच्छ वगैरह वर्णन योग्य है इस का वर्णन नदा पुष्कणी जैसे जानना यारत तोरण का वर्णन फाना ॥१४॥ उस द्रा से ईशानकून में एक वही अभिषेक समा है, इस का वर्णन सुधर्मासमा जैसे गोमानसी भूमि माग पर्यंत काना उस ममि माग के मध्य में एक मणिपीठिका कही है वह एक योजन की लम्बी चौरी यात् सा मणिमय स्वच्छ है उस मणिपीठिका ऊपर एक पहा सिंहासन कहा है वह परिवार रहित है ऐमा वर्णन नानता वहां विजय देव के भमिपेक कराने के मह उपकरण कळशादि रखे हुने । तीसरी प्रतिपति में विजया राज्यधानी का वर्णन ++ अनुवादक- नाममवारी मुनि श्री ममोसा मिया तजहा-यणेहि जाय रिटेहि ॥ १४१ ॥ तस्सण सिद्धायस्सण उत्तरपुर- च्छिमेण एत्थण एगामह उववायसभा पण्णता जहा सुहम्मावा, तत्व जाव गोमा- णसीओ उववातसभाएवि दारा मुइमडवा समभूमिमाग तथैव जाय मणिफासातस्सण बहुसमरमाणजस्स भामभागस्त वहुमझदेसमाए एत्थण एगामह मणिपेढिया पण्णता जायण आयमविक्रमण अहजोयण वाहलेण सव्वमणिमई अच्छा ॥ सीसेण मपिपढियाए उपि एत्थण एगेमह देवसयाणिज्जे पण्णचे तस्मण दवसयणिजस्सवण्णा, उपवाए समारण उप्पिं अट्ठमगलझया छत्चातिछता जाव उत्तिमागारा ॥ १४२ ॥ तीसेण उवधाय सभामु उत्तर पुरस्थिमेण एत्थण एगेमह इरए पण्णत्वे यावत् रिष्ट ॥ १४ ॥ उस सिद्धायतन में ईशान कून में एक पटी सपपात समा है, इस का कथन सुधर्मासमा चेसे यारत् गोमागसीका पर्यंत काना उपपाससमा, दार, मुखमंटप, समभूमिमाग पारत् मणि सापर्यंत बहना उस रमणीय भूमि माग के मध्य माग में एक पटी मनिवाटिका है या एक योनन की रपी पोटी व भाषा योजना की जाती है सब माणिमय । स्वय है उस मनिपीठिका ऊपर एक बरी दर शेया। इस का वर्णन पूर्ववत् जानना उपपाठ समा पर बाठ २ मंगल धमा पर छप को, यारत उत्तम थाकार पाले हैं, ॥ ४२ ॥ स रपपास समा से ईशानम में एक परा पकाचक-रानासादर लाळा सदेवसहायत्री माला पसारनी + चतुर्दश जीवामिगम मय तृतीय उपा 4 सत्थ विजयस्म देवस्स एगेमह पोत्ययरयणे सनिक्खित्ते चिट्ठति ॥ तत्थण पत्थर यणस्त अयमयारूपे वण्णयासे पण्णचे तनह-रिट्ठामईओ कठियाओ, रययामयाइ पत्तकाइ, रिट्ठामयाइ अक्खराइ, तवणिज्जमये दोरे, णाणामणिमयेगठी, वेरुलियमय लिवासणे, तवणीजमई सफला, रिट्ठामये छदणे, रिट्ठामई- मसी, वइरामई लेहिणीधम्मिये सत्थे ॥ ववसियसभाएण उम्पिं अट्ठमगलगा- झया छत्चातिछत्ता, उतिमागारति ॥ १४६ ॥ तीसेण ववसाय सभाएण उत्तर परत्यिमेण, एत्थण एगामह नदा पक्खरिणी पण्णचा, ज चेव पमाण हरयस्स तचव सन् ॥ ११७ ॥ तीसेण नदाए पुक्खरिणीए उत्तरपुत्थिमेण, एत्थण एगे देव का एक पुस्तक रत रहा हुपा है उम पुस्मक रत्न का इस तरह वर्णन है-रिष्ट रलमय पुठे, चादी के लिखने के पम, रिष्ट रत्नमय अक्षर है, सुवर्णमय घागा है, विविध प्रकार के मणि की ग्रन्थी है, बेहप रस्नमय दवाव है, रक्त सुवर्णपप सकल है, विष्ट रत्नमय दपात फा ढकन है, रिष्ट रत्नमय ममी (पाही ) है, बन रत्नमय लेखिनी है,पा शास्त्र पाभिक है अर्थात् कुलधर्म के आचार उसमें लिख हुवे हैं व्यवसाय समा उपर माठ २ मगल धना व छत्र पर छप है उत्तम आकार पाली है ॥ १४६ ॥ उस ७,१साय समा से ईशानकून में नदा पुष्करणी हैं इस का कथन जैम द्रका र हा वैसे नानना ॥१४७॥ कर तीसरी प्रतिपांच में विजया गज्यघानी का वर्णन 448 +बनवापाडयमचारी मुनि श्री ममापक फरिणी अभिसेय समाए ऽपि अट्ट मगलए जाव उत्तमागारा सोलसर्विधेहिं रयणेहि ॥ १४ ॥ तीसेण अभिसेय सभाए उत्तर पुरत्यिमेण एत्थण एगामह अलकारिय सभा पण्णा अभिसयसमा बत्तन्वया भाणियन्वा जाव गोमाणसीओ मणिपढियाओ जहा अभिसेयसमाए उप्पि सीदासण अपरिवार, तस्सण विजयस्त देवरस सबहु अलकारिए भटसनिक्खिचे चिट्ठति, अलकारिय उप्पिं मगलगाझया जाव उचिमा. गारा ॥ १४५॥ तीसेण अलकारिएसमाए उत्तर पुरथिमेण एस्थण एगामह पण्णता अभिसय सभा वत्तवा जाव सीदासण अपरिवार ववसायप्तमा महापरामासादर Bाम BREE मापनीमातारी. - अमिक समा पर माठ २ मंगल का यावत् सचम भाकार पासी है सोला प्रकार के रत्नों युक्त ॥ १४४ ॥ उस अभिषेक समा से ईशानकूनमें एक परी अस कार ममा इमका सर कथन गोमाणसी का विपीठिका पर्पत ममिषा समा मेसे काना उगर परिवार रहित सिंहासन उसपर पिमय देव मसार के लिये समादि मा रख हुने । असकारिक समा उपर बाठ २ मगस घमा .पा एम का पावत् सचम पाकारणाली है ॥ ४५ ॥ उम बठकार ममा से शिानफून में एक परीम. साप समाहै इसका रणन परिवार रहित सिंासन पर्यंत अभिषेक समा मेसेबाना पो पिया ४०३ म चतुरंश भीषामिगम गुत्र तृतीय उप + चिंतिने पत्थिये मणोगएसकप्पे समुप्पज्झित्था किं मे पुब्बिसेय किं मे पच्छासेय कि मे पुन्वकरणिव किं मे पच्छाकरणिच, किं मे पुर्दियवा पच्छावा हियाए सुहाए खमाए णीससाए अणुगामियचाए भविस्तइ तिक्टु एव सपेहेति ॥ ततेण तस्स विजयस्स देवस्त सामाणिय परिसोववण्णगादेवा विजयस्म दवस्त इम एतास्त्र अन्मस्थिय चिंतिय पच्छिय मणे गय सकप्प समप्पणे जागिता जेणामेव से विजएदेवे तेणामेव उवागछित्ता विजय दब करतलपरिग्गाहय मिरसारच मत्थए अजलिं कटु जएण विजएण बहाउँति जएण विजयेण वहार्वित्ता एर पयासी एव खलु देवाणुप्पियाण पर्याप्ति समाप्त होने पर एसा अध्यवमाय सत्पम हुघा कि पहिले मुझे क्या मगलकारी है, पीछे क्या मगलकारी है, पहिल क्या करन योग्य है, पीछे क्या करने पोग्य है, पहिले व पीछे क्या हिव, मुख, क्षमा, निश्रय के लिये व अनुगामी होगा ऐसा वह विजा देवता विचार करने लगा, विजय देवको पेमा सकल्प अध्यवसाय, चिता, प्रार्थना व मनोगत सकल्प उत्तम हुवा जानकर उनके सामानिकदेव व आभ्यतर परिपदा के देव उन की पास बाये और चनोंने विजय देव को हाथ जोडकर मस्तक से आवर्तन करके दोनों हाथ सी अमलि एकत्रकर जय विजय शब्द से घाये, जय विजय शब्द से पधाकर ऐमा घोले आप के बीसरी म विपत्ति में विजय देवता का वर्णन RE .

अनुमादक पाजामधारी मुनि श्री भमोलक झपोनोग महा मणिपेढे पण्णचे, दो जोयणाइ आयामविक्खमेण, जोयण बाहलेण समरयता मपे अच्छे जाव पाडेरूव ॥ १४८ ॥ तेण कालेण तेण समएण विजयदेवे विजयाए रायहाणीए उबदायसभाए देवसयणिज्जास देवदूसतरिते अगुलस्स असखेज भागमिचीये बोदीये विजय देवताये उयवष्णे ॥ तएण से विजयदे अहुणोववष्ण मेचाय पेच समाणे पचविहाए पज्जत्तीए पज्दति भाव गच्छति तजहा आहारपजत्तीए सरी- रपजतीए इदियपज्जन्सीए, आणोपाणपज्जचीए भासामणपजचीए । तएण तस्स विजयस्स देवस्स पचविहाए पज्जतीए पचत्तभावगयस्स समाणस्त इमे एताहवे अन्मत्थिये जमनाशक राजामादुर लामा मुखदेवसरायमी सामनारकी. उप नदा पुष्करणीसे ईशानकनमें एक परी मणिपीटिका है यह दो योजन की लम्बी चौड़ा प एक यामन की नादी सा रत्नमय स्वच्छ यावत् प्रतिरूप ॥४८॥ष विजय देवका वर्णन करते है समकाल उससमयमें विनव नामक देव विनया राज्यधानीकी उपपाससमा देघ शयन के देव दूष्य वस्रके नीचे अगुलके असस्पावणे मामकी भरगााना के शरीर पाला विनय राज्यघानी के इन्द्रपने उत्पन्न हसा पा रिनप देव उत्साह का उत्तम हुरा पांच प्रकार की पर्याप्ति से पर्याप्ति भाव को मात दुरा इन पांच पति के नाम-मार पति, शरीर पर्याप्सि, इन्द्रिय पयाप्ति, वासोवास पर्याप्ति, प मापा पन पर्याप्ति पिमय देश को पाप +4 चतुर्दश-नीवाभिगम मूत्र-मृतीय नपाड़ 48 जाव अणुगामियचा ते भविस्तति तिकटु महता २ जयजय सह पउजति। ततेण से जिये दये तेसिं सामाणिय परिसोवषण्णगाण देवाण अतिए एयम? सोचा णिसम्म इट्ठतढे जाव हियते, देवसयणिज्जाओ अब्भुवित्त दिव्व देवदूसजुयल परिहे देवसमिजाओ पच्चोरुहति देवमयाणिज्जाओ पञ्चोकहिता उबवायसभाओ पुरत्यिमण दारेण निग्गछति २ चा जणव हरये तेणेव उवागछति २ चा हरय अणुपदाहिण करेमाणे २ पुरस्थिमेण तारणाण अणुपविसति २ चा पुरथिमिलेण तिसोमाण पहिरूवरण पच्चसहति २ हरय उगाइति उगाहित्ता जलावगाहण करति जलावगाइण करिता जलमजण करेति जलमजण करित जलकिहकरोति जल्लकिहुं मयोग किया पर विजय देव मामानिक परिपाशाले देशों की पास से एमा सुनकर हृष्ट तुष्ट हुवा, देव पपन में से उठकर दीध्य देव दूष्य युग्म [पन] परिधान किया देव शैय्या में से नीच उतर कर उग्पात सभा के पूर्ण कार से बाहिर नीकलकर नहा द्रा है बड़ा आया उस को प्रदक्षिणा करता हुवा पूर्व दिशा के तोरण से प्रवेश किया पूर्व दिशा के पावपिपे से नीचे उतरवर दर के पानी में पहा पहा जब मजन किया, मष्ठकोटा की, मलकोडा करके स्वच्छ बना उस दइ में से नीकल कर महा अभिषेक तीसरी प्रतिपचि में बना दस्ता का पर्णन । . अनुवादक-पासमचारी मुनि श्री ममोहप प्रापी विजयाए रायहाणीए सिद्धायतणसि अट्ठसत जिणपडिमाण जिणुस्सेह पमाणमत्ताण समिक्खित्त चिटुति, समाए सुधम्माए माणवए चेतियखभे वयरामयेसु गोलबद्ध समुग्गतसु बहुमओ जिमसकहाओ सन्निक्वित्ताओ चिट्ठति, जाओण दवाणुप्पियाण अण्णासि च बहुण विजय रायहाणि वत्थवाण देवाणय देवीणय अचणिजाओ वदणिबाओ उपणिज्जाओ सकारयणिज्जाओ सम्माणिज्जाओ कल्लाण मगल देवय चतिय पज्जुवासणिजाओ एतम देवाणुप्रियाण पुन्विपिसेय एयण्ण देवाणुप्पियाण पच्छाधिप्य एयण्ण देवाणुप्पियाण पुटिव करणिज पच्छ'करणिज्ज एयण्ण देवाणुप्पिया पुटियवा विजया राज्यपानी में मिद्धायतन में दिनभरीर के अपगाहना नितनी १०८ मिन प्रतिमा रही हुई, और सुधर्माममा क मदर माणक चैत्य में वज्ररत्नमय गोल उम्पे में भिन दारा से माप का और अन्य शुत चिमय सम्पपानी के देव दषियों को अर्चनीय, पूज्यनीय, सत्कार समान योग्य, कल्याणकारी, ममरकारी, देव सपघी, चैत्य समान पूजने योग्य में भापको या पहिले मी कल्याणकारी के पीछे मी कल्याणकारी रे, पहिले करने योग्य है, पीछ भी करने योग्य भाप को या परिस पछि हित के लिय यारत् मनुगामी होगा यो काकर परे २ सय २ सम्मका माशाजासादर माला मुसदेवसायमी गागासारखी , का चतुर्दश न पाभिगय सूत्र-मृवीय I tal आणाए विणरण बयण पडिसणेतिर चा उत्तरपुरथिम दिसीमाग अवकमति २ चा वेठब्बिय समुग्धारण समोहणति २ चा असखवाइ जायणाइ दड णिसरति तजहा- रयणाए जाब रिट्ठाण अहाबायरे पोग्गले परिसाउँति २ अहासहुमे पोग्गले परिताययति २ चा दोच्चपि विउन्विय समुग्धारण समोहणति दोचपि घेउन्षिय समुग्घाए समोहणित्ता भटुसहस्त सोवणियाण कलसाण असहस्स रुप्पमयाण , कल साण असहस्त मणिमयाण कलसाण, अट्ठसहस्स मुवण्णरुप्पमयाण कलसाण, अट्ठ सहस्स गुवण्णमणिमयाण कलसाण अट्ठसहस्स रुप्पमणिमयाण कलसाण, रिया फोर ईशान में जाहर वैफय समुदात से अमख्यात योजन का दद किया और रत्न यावत् बरिष्ट रलमय शुभ पुद्गल ग्रहण पिय यथा वादर पुद्गल दुर फिये और सूरूप ग्रहण किये, पुन दुमरी पार मी पेक्रेय समुख्यातकी, दूसरीधार वैकेय समुद्रात करके १००८ सुवर्ण कलश,१००८ चांदी के कलश १००८ मणि के फलश,१०.८ मुवण व धादि के कलश, १००८ सुवर्ण प मणि के कलश, १००८ चांदी प ममि के कलश, १००८ सुपर्ण चांदी र मणि के कलश १००८ मौक्तिक के कलश, मारा) ऐसे ही १००८ भारीसे,१००८ याल,२००८ पात्रो, १००८ पुष्प बगेरी यावत् पूजनी की चगेरी वोमी मानेपोत में विजय देवना का वर्णन 8 - १०.८ भृगारक पारकमाणमचारी मुनि श्री बमोडाकोभी करिचा आयत चोक्वे परमसूइमर हरताओ पच्चुत्तरिता जेणामेव अभिसेयसभा तणामेव उवागच्छइ २ ता अभिसयसभ पयाहिण करेमाणे पुरथिमिल्लेण दारेण अणुपविासाइ र साजणव सीहासण तेणेव उवागग्छति २ चा सीहासणवग्गते पुरच्छभिमुहे सण्णिसणे ॥ तएण तस्स विजयरस देवस्स सामाणिय परिसोयवाणगा देवा अभि- उगिर देवे सहावेति २ चा एव क्यासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! तुम्भे विजय देवरस महत्थ महग्ध महारिह विपुल इदाभिसेय उवट्ठयह ॥ १४९ ॥ ततेण ते अमिओगादेवा सामाणियपरिसोवषण्णए हैं पत्र वुत्ताममाणा हट्ट जाव हिश्या करयक परिग्गहिय सिरसावत्त मत्थए अजलि कह एवं वयासी देवाणुप्षिय ? तहचि मा बी आया उस की प्रदक्षणा करके सप्त में पूर्व दिशा के द्वार से प्रवेश किया और निरासन की पास नाकर उस पर पूर्णमिमुखकर धैठा ॥ नम सपय विनय देवता के मायानिक परिपदा पाले देवोंने ममियोनिक देवो को बुलवाये और कहा कि बो देवानुप्रिय ! तुम विजय देव क लिये पहा अर्थ पाला माध्य, मामूख बाला विस्तीर्ण इन्द्राभिषेक की तैयारी करा ॥ १९॥ सामानिक परिषदा वाले देने की पास से एसा मुनकर ये मामियोगिक देव इष्ट तुष्ट हुए यावत् हाय मोरकर मसक से भापनि पिा मस्तक पर मंगली कर के ऐसा मोठे 'यथावप' यो विनय पूर्वक वन की मात्रा का साकार प्रकाश रामायहादुर लाठा मुबारसापनी मागसमी ४०२ . चमुश भीमापिगम मूत्र सृतीय उपर ain दिव्याए देवगईए तिरिय मसखेबाण दीवसमुदाणमझमझण वाइवयमाणा२ जेणेव खीरोदेसमुह, तेणेव उवागच्छति तेणेव उवागच्छिच्चा वीरादगगेण्हति २ चा जाति तत्थ उप्पलाइ जाब सयसहस्सपत्ताइ गेण्डति गेण्हिा जेणेव पुक्खरोदे समुद्दे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता, पुक्खरोदग गेण्डति पुक्खरोदग गेण्हिता जाति तत्थ उप्पलाइ जाप सतसहस्सपचाति गेण्हति गेण्डित्ता जेणेव समयखत्ते जेणेव भरहेरवयाति यासाइ जेणेव मागध वरदाम पमासाइ तित्थाइ तेणेव उवागच्छतिरचा तित्थोदग गेण्डति, नित्योदग गि हता, तित्थमहिय गेहति तिस्थमहिय गेण्हित्ता जेणेव गगा सिंधु रचा रचवताआ सलिलाओ तेणेव उवागच्छति २ ता, सलिलोग ग्रहण किपे वहां से मनुष्य सप्र में मरत एरवत क्षेत्र के मागध, बदाम घ प्रमास जो तीर्थ यहां बये, वहा से सीयर्योदक व वीर्यकी मृचिका ग्रहण की फोर वहा से गगा, सिंधु रक्ता प रक्तावती नदी थी Fधा जाये वहां उन सरिताओं का पानी लिया, और उन के दोनों किनारों की मृचिका मी ली यहां से चुहिमवत पर्वत व शिवरी पर्वत की पास पाये वहां सब प्रातु के पुष्प, सच कपाय रस, मव पुष्प, सब गध, सब माला, सर गुच्छ। यावत मन मोपधि र सरसप ग्रहण किये वहां से पभद्रह व पुटरीक दहये यहाँ भाये उसमें से पानी लिया और उत्सल पावर लसपत्र कमल मी ग्रहण किये हमे हेगलय पाहा वीसरी मतिमधि में विजय देवता का वर्णन है .

अट्ठसहस्स भोमेज जारकासामुनि श्री भमोरा अपनी अट्ठसहस्त सुवण्णदप्पमणिमयाण कलसाण भोमेज कलसाण अटुसहस्स भिंगाराण एवं आयसगाण, थालाण, पातीण सुपतिट्ठकाण, चिचाम, रयणकरडगाण, पुप्फ बगेरीण जाव लोमहत्थ चगेरीण, पुप्फ पहलगाण जाव लोमहत्य पहलगाण, अट्ठसहस्स सीहासणाण, छत्ताण चामराण, अवपरगाण घटकाण, सिप्पीम, पोरकाण, पीणगाण, तेलसमुग्गाण, अट्ठसहस्स धृषकहछाण दिउन्वति, तेसा मावियए विउन्यिएय कलसेय जाव धूवकहुम्छएय गेहति गेण्डइचा विजयाओ रायहाणीओ पहिनिक्खमति पडिनिस्वमित्ता ताए उक्किट्ठाए जाय उद्धचाए १००८ पुष्प पावत् पूजनीके पटल, १००८सिंहासन,००८ उप्र,००८ चामर 1००८ तेल के गोल हो मौर १००८ धूप र कुदछ का क्रेप परे अब उन स्वामाषिक (शाश्वत) कलश र पिना पासे कषन यावत् भूप के कुरछे ग्राण फर रिमया राज्यपानी में से नीकसकर उत्कृष्ट यायव असून शम्प देषगति से सीर्या मारूपास द्वीप समुद्र का उल्लघन करते हुए मां दपि समुद्र है 4t मारे | माफर रस में से सोरोदर ग्रहण किया और वहां मोर उत्पल यापत् सासपा पने प्राण पां से पुरुषरोदपि समुद्र की पास माये और उस में स ारोदक र उत्प पावत सरासपा काशरामादुर छाला सुखदेवसमायणीमानाबादी -जीवामिगम मूत्र-सुमाय पान 4Rite महाहिमवतपिपवासहर पध्वया तेणेव उवागच्छति उवागन्छिचा सन्त्रपुप्फे तचेव जेणेव महापउमहहा महापुडरीयदहा तेणेव उवागष्छति २ ना जाइ तत्थ उप्पलाइ सचेव, जेणेव हरिवास रम्मगवासीर्ति जेणेव हरिकाता हरिससलिला नरकाता नारीकांसाओ तेणेव उपागम्छति २ ता सलिलोग गण्डति २ ना तचव, जेणव वियडावती गावती वटवेयख पन्वया तेणव उवागछति २ चा सम्म पुप्फेय तवेव जेणव णिसढ णीलवत वासहर पक्वता तणेव उवागच्छति २ सा सचतुवरेय तचेव, जेणेष तेगिछिद्दहकेसरीदहा तेणव उवागष्छति २ चा पहोदग गेण्हति २ चा तचेव जेणेव पुन्वविदह अवरविदेह वासाणि मेणेव सीयासीओयाओ महानईओ जहानई तु पानी र उन नी मृचिका ग्राण की वहां मे पिस्टापति व गघापति नामक वर्तुलाफार पेवाय पर्वस ये मापे पा से सर पुष्प वगेरह लिये फोर पो से निपध नीलगत वर्षपर पर्वस थे वहां माये 4t से सा पुष्प या सरप लिये वहां से निगिच्छद्रह व सरोदर ये वहां आये उस में से पानी और उसळ यास् लक्षामादि प्राण किये पहां से जहां पूर्व महानिदेह प पश्चिम महा विदेश क्षेत्र में मीता सीतोदा महानदियों पी वहां आये यहां का अधिकार भन्य नदियों से कहना वहां से सप पवा विषय में जहाँ मागध, परदाम प प्रमास ये तीन बीथों और अहो सब असर नदियों है तीसरी प्रतिपत्ति में विनय दपता का वर्णन मनुवादक-नामसारी दुनिश्री बमोबक पिनी गेम्हतिराउनयो तटमष्टिय गेष्हति तटमट्टिय गेण्डिचा जेणेव चुहिमवत सिहरिवास घरपव्यता तमय उवागछात २ ता, सन्यतुवरेय सन्यपुप्फेय सव्व गधय सवमलय सम्बोसहि सदस्यएय गेण्डति २क्षा जेमेव पउमदह पुडरीपदह, तेणेव उवाग- छात २ सा रहोदग गण्हात २ चा जाति तरथ उप्पलाइ जाव सतसहस्सपचाइ गेण्इति ताह गोण्डचा अमेव हेमश्य एरणपयाति वासातिं जेणेव रोहिया रोहितसा सुवण्फकूला रुप्पकूलममो सेव उवागम्छति रत्ता सलिलादग गेहति २ चा उभयो तहमटिय गिम्हति २ चा जेणेव सहायति मालवत परियागावश्यड्ड पचता तेणेष उवागछति २ सा सम्बतुक्यरे नाव सम्योसहि सिहत्यएय गेहति २ चा जेणेव परमपपल में, वहां रोहिता रोडिवांसासुरर्णकुत्ला र एक्ला नदी पी वहां आये उन में से पानी उनके दोनों की मिाह प्राण भी पास सदापासि । मारपबन्त पर्तुणाकार वाटप पद मा पा सा तुझ पुष्प पावत् सब मोवापि र सरसर यहा दिवसर पर्वत पर गाये पर सब पुष्प पीरा पूर्ववत् भानना वहां में महा १५ द्वारा पुरकि छापा मारे सा से रस का पानी र पुष्पादि मेरए सिये पा से गिरी, समार्ग में सीता, हरिसन्धित नवा इन बार मदियों की प्रसनये. .nl प्रकाशक रामाबादुर साला पुखदेव सापनी मासामसाइली.

चतुर्दश नीवाभिगम सूत्र सृतीय उपास गोसीसचदण दिव्वच सुमणदाम ददरमलय सुगधिगधिएयगधे गेष्हति रचा,एगतो मिलति २त्ता जबद्दीवस्स पुरच्छिमिलेण दारण णिगच्छति रत्ता ताए उक्किट्ठाए जाव दिवाए देव- गतीए तिरिय मसखेजाण दीवसमुदाण मज्झ मज्झण वीतीवयमाणा जेणेव विजया रायहाणी तणेव उवागच्छति २चा विजय रायहाणि अणुप्पयाहिण करेमाणा २ जेणेष अभि- सेयसमा जेणेव विजएदेवे तेणेब उवागच्छति २ चा करयलपरिग्गहिय सिरसावत्त मस्थए अजुलिकटु जएण विजएण बराति २ चा विजयस्स देवस्स त महत्थ महग्घ महरिह विपुल अभिसेय उवट्ठवेति ॥ १५० ॥ ततेण विजय देव चत्वारि सामाणिय साहस्सीओ चत्तारि अग्गमहिसीओ सपरिवाराओ, तिणि परिसाओ, सचमणिया पूद्वारपे नीकलकर तम उत्कृष्ट यारत् दीव्य देवगति से नीरछे असख्यातदीप समुद्र उष्टयकर विजया राज्याघानी क पाम आये विनया राज्यघानीको प्रदक्षणा करके जहां अभिषेक समाष जहाँ विजयदेव या षां पाये दो साय जोडकर मस्तक से आवर्तन दिया और अमल करके विजय देवता को बघाये इस तरह विजय देवसा का मार्य चाळा माय, प मा मूल्य घाला अमिपेक सैयार किया, ॥ १५० ॥ अब चार हजार सामानिक देष,परिवार सहित चार बाहिपियों, वीन परिषदा, साव मनिक, सास अनिकाषिपछि ,मोला 41 वीसरी प्रतिपत्ति में विजय देवता का वर्णन है र्य दवासमपारा मुनि श्री ममोठक मा जेणेव सवयकावहिविजया जेणेव सत्र मागह वरदाम पमालाइ तित्थाइ जेणेव सत्य- तरणदीओ सलिलोदग गेण्हति २ चा तव जेणव सधवक्खारपन्चता सन्बतबरेय तथव जेणेव मदरे पन्चए जेणेव भइसालवणे तेणव उवागच्छति २ चा सन्तुबरेय जाव सन्योसहि सिइत्थएय गण्हति २'चा जेणेव जपणवणे तेणेव उवागच्छति २ चा समतुवरेय जाव सल्योसहि सिहत्यएय सरसच गोसीसचदण गेण्हति २ ता जेणेव सोमणसवणे तेणव उवागम्छति २ चा सवतुवरेय जाब सम्बोसहि सिद्धत्थीय सरस १ गोसीस चरण दिन्ध १ सुमणदाम गेण्डति २ च। जेणेव पंहगवणे तेणेव उवागच्छति २ चा सतुवरे जाव सन्बोसहि सिद्धत्यएय सरस च पा मापे उन में से पानी घ मृतिका ग्राण की पा से सब पक्षकार पर्वत की पास आये उम सब तु के पुष्प यापत् सरसब ग्रहण किये पास मेरू पर्वतपर महा मद्रासालनयां भाये, इसमें मनु के पुष्प यापत् मगलिक वस्तु प्राण फिय , पह से मदनबन में आपे उस में से भी मर ऋतु के पुष्प मारत रसपत्र ग्राण पिय भौर श्रेष्ठ गोत्रीर्ष चदन, व दीव्य पुष्पों की मासामों ग्राम पास पटापन में माय, चमू से सप रस यारत् सब मौषधि, सरस श्रेष्ठ गोभी पदन, दीप पुष्प माळाभो, दर्दर र मलय से मुमषित बनी एक ग्राम की फोर सब देवता एकविध मीकर समूद्वीप • मकाएक रामाहादुर लाखा सदरसायमी यामममारपी.

सुत्र चतुई श मीमाभिगप मूत्र सृतीय उपार - महपावलेण महयासमुदएण, महतातुडिय जमगसमगपडप्पवादित रषेण सख पणव पडह भेरि झलरि स्वरमुही दुदुहि हुडुक्क निग्घोसणादिएण महतामहता इदाभिसेगेण अभिसिंचति ॥१५१॥ ततेण तस्स विजयस्स देवस्स महता इदाभिसेकसि वट्टमाणसि अत्यंगतियादेवा गच्चोदग णातिमटिय पविरल फुसित दिन्व सुरभिरयरेणुविणासण गधादगयास वासति, मत्थगतियादेवा णिहतरय णहरय भट्टरय उवासतरय पसतरय करेंति, अप्पगतियादेवा विजय रायहागि मम्मितरबाहिारय भासितसम्मजितोव- बाल, भेरी, मलर मृग, दुमि प गोमुख इत्यादि वादिन से नाघेपणा करते हुवे महान इन्द्राभिषेक विनय नायक देवका किया ॥१५॥मिस समय विजय देवता का महा अभिपक होता था उस समय किसनेक देवता विजया राज्यघानी में बहुत पानी नहीं व बहुत मृधिका नहीं ऐसा पानीक फनघाला मेघ पपीवे य, कितनेक दीव्य सुगधित प रमरमु का पिनाश करन पासा मद गपादिक की वर्षा करसे य, किसनेक दक्षता विजया राज्यपानी को रज रहित, नष्ट रम, पञ्चांत रज, उपांत रज पाली करते थे, अर्यात् राज्यधानी में से रज सच करते थे, किसनेक देवता विजया राज्यधानी के अदर प बाहिर पानी का छिटकाव करते ये पुमते ये, लिपते य इसतरह का उमका मार्ग पचित्र पुष्प पमयुक्त करत न्य किवनेक देवता महा माचापर मावा इस तरह पपिसे थे, किचनेक देवता.विजया राज्यघानी को अनेक प्रकार के रगवाली विमय, मैनपती ++ तीप्तरीमतिपचि में षिा देवा का वर्णन 42 समर्थ मनुवादक रामधारी मुनि भी भमोडक पिमी - सपमणियाहिवती सालसमत्तरक्षेदवसाइस्सामा अन्नय यहवे विजयरायहणिवत्यवगा वाषमतरदबाय देवीओय तईि साभाषिते उत्तरवेठब्धितेहियवर कमलपतिढाणेर्हि सुराभवरवारिपडिपुष्पेहिं चदमयपश्चातहिं आधिद्धकठे गुणेहिं पठमप्पलपिहाणेहि करतलसुकुमाल परिगहिएहि असहस्स सोवणियाण फलसाण रुप्पमयाण मणिमयाण जाव अट्ठमहस्स भोमबाण कलसाण सन्बोदएहिं सबमट्टियाहिं सतवरेहि सव्वपुप्फे- जाव सव्योसहि सिद्धस्थएहिं सविडीए सव्वजुचीए सन्ययलण सन्वसमुदएण सन्व- पग्विारेणं सन्वायरेण सव्यविमूतीये समविभूसाए सन्वसभमेण सम्बतोरोहेण सन्चणाड- एहि सत्यपुष्फगधमल्लालकारेण सव्वदीचतुडियाणिणायेण महया इट्टीए महयाजुत्तीए रमार यात्म रक्षकदेव मौर मन्य पान भाषव्यतर देवदेरियों ने स्वामाषिक व उत्तर फेप वाले, श्रेष्ट उपल में स्यापन किये हुए, सुगपित प्रष्ट पानी स परिपूर्ण, पदन से पति, कण्ठ में मूत्र पपा हुरा पभ रत्पन के कान पामे, सुमोपछ (स्तताल में प्राप विप हुए १००८ सुवर्ण कसभा, १००८ सदी के ससस यायत् १८०८ मृतिका कर सब ऋतुकेतुबर पुष्य यावत सपनौषधिले सिहायक(सरसप)से सब ऋदि पति, बस, समुदप, बादर, पिमूतिष,भ्रम मारोह,नाटक,सब पुण,गध,पान सपकार,सप घटेनका निनाद, माद महापुति पापममा समुदप गुरु, मुख देशोंने पापे हुए गाविसमा मकासक राजावहादुर ठाडा मुसदवसायमी ममसदन .

'सन्न 1 चतुर्दश मीचाभिगम एम तृतीय उपा AR. सरसमुराभिमुक्कपुष्फपुजोबयारकलित करेंति, अप्पेगातियादेव। विजय रायहाणि कालाग- रुपवर कुरुक्कतुरुक्कधूव डज्झत धूमधमघत गधहुतामिराम सुगधवरगध गधियगध वहिभूय करेंति, अप्पगातेयादेवा हिरवास वासति,अप्पेगतियादेवा सुवष्ण वार्सेवासति, अप्पेगतिया देवा रयणवास वासति वइरवास 'वासति, पुप्फवास, मल्लवास, गधवास, चुग्णवास-वत्थवास आमरणवास वासति अप्पेगतियादवाहिरण्णविधि भाएति एव सुवण्ण विधि रयणविधि वयरविधि, मल्लविधि, चुण्णविधिगधविधि पत्थविधि आमग्णविविमारात अप्पगातेयादेवा चउविह वातित वादेति तजहा--तत वितत घण झूसिर, अप्पेगतिया करते थे, कितनेक रल की वर्षा करसे ये, किसनेक पुष्प की मासा, गध, चूर्ण, वस्त्र व भामरण की वर्षा करते थे, कितनेक देवता हिरण्य विधि-हिरण्य रूप मगलिक प्रकार करवे य, कितनेक सवर्ण विधि, रत्न विधि, वज विधि, माल्य विधि, चर्म विधि, गध विधेि, सविधि र आमाण विधि करसे थे कितनेक दववा तत, विस्त चण व झूसिर यह चार प्रकार क पादिष पजात थे, किसनेक देवता चार प्रकार के गीत गाये थे, तबया लिप्त सा प्रयम से भारम करना, २मवर्तक मस्ताविक गीत में मना, ३ पदायित मूना सरिस गाना और । रोपिसाबसाउ ययोचित सक्षण से गाना कितनक देवता चार प्रकार के अभिनय पत बात है तथा- दृष्टाविक २ प्राप्तिश्रुसिक ३ सामाविनीपातिक और लोसमपाष 18+ तीसरी पनिपांच में विजय देवता का वर्णन - મર્થ .

श्राममाप्टक न मनुवादक-पालमहामारी मुनि लिन सितसुइसमट्टरत्यतरावणवीहीय करेंति, अप्पेगतियादेवा विजय रायहाणि मचातिमचकलिय करेति, अप्पेगतियादेवा विजय रायहाणं जाणाविहरागरजित उस्सित जय विजय वेजपति पहागानेपहागमहित करेंति, अप्पेगतियादवा विजय रायहामि लाठरलाइयमहिय करेंति, अप्पेगतियादेवा विजय रायहागि गोसीससरस- रत्तचदण दहरदिण्ण पचगलितल करेंति, अप्पेगासयादेवा विजय रायहाणि उवविय चदणघडसुकउतोरण पडिदुवारदसभाग करेंति, अप्पगतियादेवा विजय रायहाणि आसचो सत्व विपुलववग्धारितमल्लदाम कलाव करति अप्पेगतियादेवा विजय रायहाणि पचवण्ण नामक पतासापर पनाका से पढित करते थे, कितनेक देवता विजया राज्यधानीको गोमय प्रमुखमे लीपते थे १५ चद्रुया सहित करते थे, कितनेक देवता गोशेप चदन मीत रक्त चदन सदर्दर चदन मे पांच अगुलीयुक्त छापे देखें ये कितनेक देवता विमया राज्यपानी के प्रसिद्धार के देश माग में घदन चर्चित घटे का वारण करते य, फिटनेक दवसा ऊपर ऊचे से नीचे ताट पेसी सम्बी विस्तीर्ण पुष्प की मामा में विजया रापमानाका कसित करत वे कितनेक देवता पायवर्ण के श्रेष्ठ मुगपित पुष्पों की पुनवाली राज्यपानी हरवे य कितने दबता रुप्मागर उत्तम कुदरुकतुरक पसाकर मुगषमे मघमघायमान करत ये और श्रेष्ठ मगध से गधित गंध गुटिकाभूत करते थे, कितनेक देशवा चांदी की वर्षा करते थे, शिवनेक मुमती महाशक रानाहार छारा मुखवत रायनी मालामसारी सत्र 4. चतुर्दश-नीवामिगम सम-सृतीय उपा म. सरसमुरभिमुक्कपुप्फपुजोवयारकलित करेंति, अप्पेगतियादेवा विजय रायहाणि कालाग-- रुपवर कुरुक्कतुरुक्कधूव डज्झत धूधमघमघत गधहुतामिराम सुगधवरगध गधियगध वहिभूय करेंति, अप्पगातेयादेवा हिरवास वासति,अप्पेगतियादेवा सुवण्ण वार्सेवासति, अप्पेगतिया देवा रयणघास वासति वइरवास 'वासति, पुप्फवास, मल्लवास, गधवास, चुण्णवास वत्थवास आभरणवास पासति अप्पेगतियादाहिरण्णविधि भाऐति एव सुवष्ण विधि रयणविधि वयरविधि, मल्लविधि, चुण्णावधि गधविधि पत्थविधि आभग्णविविभाए।त अप्पगतियादेवा चउविह यातित वादति तजहा-तत वितत घम झूसिर, अप्पेगातया करते थे, कितनेक रत्न की वर्षा करते थे कितनेक पुष्प की माला, गघ, चूर्ण, वन र याभरण की वर्षा करसे ये, किसनेक देवता हिरण्य विधि-हिरण्य रूप मगलिक प्रकार करसे य, फितने वर्ण विधि, रल विधि, वज्र पिधि, माल्य विधि, चर्म पिपि, गप विधि, वन विधि व आमाण विधि का ये कितनेक दववा नत, वितत चण व शूसिर यह चार प्रकार के वादिष पजात ये, कितनेक देवता चार प्रकार के गीत गाये पे, उपया वक्षिप्त सा प्रथम से प्रारम भरना,रमचर्सक मस्ताविक गीत में प्रपना, ३ पदायित मूर्चना सरित गाना और ४ रोवतारसात यथोचित सक्षप से गाना सिखनक देवता चार प्रकार के अभिनय पतकास है अद्यया-हासिक २ माप्तिश्रुतिक ३ सामरिनीपातिक और ४ सोक मध्याव 48 तीसरी मनिपीच में विजय देवता का वर्णन 33+ मर्थ - , समनुपर-पारणमचारी मुनि श्री नमोसन मारनी या पठविहंगेय गायति तजहा-ठाखिचय, पन्यचय, मदय, रोइ, वसाग | अप्पे गतियादवा वठन्विह अभिणय अभिणयति तजहा-विट्ठतिय, पाढतिय, सामतार- णिवातिय, लोगमञ्झावसामिय ।। अप्पगतिया देवा दुत नहविधि उपदसति अप्पेगतिया देवा विलषित, णविधि, उपदसति, अप्पेगतियादेवा दूतबिलवितणाम णविधि उबद- मेति, अप्पगतिया पया अचिय मट्टविधि उबदसेति, रिमिय णविधि उबदसति, अप्पेगतिया देवा अचितरिभित जामदिव णविधि उपदसेति,अप्पेगतियादेवा मारमड नविधि उपसेति, अप्यगतियादया मसोल नहविहिं उपदसेति, अप्पेगतियादेवा मानिक. कितने देवता हुन नामक नाटक बताते थे किन्नेक देवता सिपिठ नामक नाटक बताते थे, विखनेक देवता दुन बितपत नाटक पता के, सिनेकदेव भवित नाटबतलाते थे, कितनक देव रिमित नारस पतमा पिनेक मंषित रिमिव नाटक पवमाते थे, कितनेक मारमट नाटबनसावे ये दिखने मसोस नाटक बसमाते सिनेक बारमट मसोस नाटक बतलाते य, कितने देवा पात इनिपात, परत, सचित, प्रसारित, गपनाममन, मोठ सभ्रांत नामक दीम्प नाटक बसमाते थे, किसनेक देवता वीर पुष्ट पनाते थे, कितने दरमा बूस्कार म बताते थे, कितनेक देवता तारक नृत्य करवे, किचनेक रेखा शास्प स नृत्य करते थे, किसनेक देवता पुष्ट होवे थे, पूस्कार सप बनाने मे, र नृत्य •माधा-रामायरादर खासा सलाबमोमाकासावी.

पर चतुर्दशामिगम सूम-तृतीय उपा4+ मारभड मसोल नामदिव्य नविधि उबदसेति, अप्पेगतिया देवा उप्पायणिवाय पवच सकुचिय पसाग्यि रयगरइय भत समत णाम दिव नविधि उवदति, अप्पेगतिया देवा पाणेति, अप्पेगतिया देवा बुकारेति, अप्पेगतियादेवा तडवेति, अप्पेगतिया देवा लासति अप्पेगतिया देवा आफोडेति, अप्पे गतिया देवा वग्गैति, अप्पेगतिया तिपति छिदति अप्पगतियादेवा अप्फोर्डेति, प्रगति तिवति छिदति, अप्पेगतियादेवा हयहेसिय करेंति, अप्पेगतिया करते थे सास्य रूप करते थे, कितनेक देवता आस्फोट करते थे, किसनेक देवता परस्पर सरन होते थे, फिननेक देवता प्रिपदी छेदते थे, मार कितनेक देवता आस्फोट करना सलम होना पिपदी छेदना ये वीनों करसे , कितनेक देवता अश्व जैस पारव करवे पे, कितनेक देवता हावी मैसे गुलगुलाट करते थे, किवनेक देवता रय जैसे घणघणाट शम्द करत थे, कितनेक देषवा मच जैस हेपारय, हाथी जैसे गुळगुलाट व रय मैसे घणघणाट ये सीनों शन्न करते ये, किसने देखा उचे उपलते थे, किवनेक देवा नीचे गीरते थे, किसनेक देवता कठोर शब्द करते य, पिसनेक देवता को सामना, नीचे गीरना कठोर शब्द करना ये सीनों फरसे ये किसनेक तसरी प्रविधि में विनय देवता का वर्णन म . - बनुशदक पाना मुमी श्री मोर साजिश हत्यिगुलगुलाइय करेंति, अप्पगतियादेवा रहघणघणाइय करेंति, अप्पेगतिया देवा उम्छ,लेति, अप्पेगतियादेवा पच्छोलेंति, अप्पेगतियादेवा उक्कडीओ क्रेति,अप्पेगतिया पवा उच्छालेति पन्छालेति उकटीओ करेंति,अप्पेगतियादेवा साहणाद गदति अप्पेग- तिया देवापादददर करति, अप्पगतियादेवा भूमिचवेहदलयति, अप्पगतियादेवा सीहणाद पाददहरयमिघवेस दलयति,अप्पेगतियादेवा हक्काति,अप्पेगतियादेचा चुकारेंति अप्पग- तिया थक्कारेंति अप्पेगतियादेवा पुक्काति,मप्पेगतियादेवा वकारेंति,अप्पेगतियादेवानामाइ सिंहनाद करत थे, कितनेक पाव मे दर दर पन्द फरसे ये किसनेक भूमि चपटा फरसे थे जिवनेक सानाद, दरदर शब्द म ममि पपेटा ये तीनों साय करते थे कितनक देवता फार शन्द करते ये कितनेक पुरस्कार पद रस ये,कितनेक थपकार सन्द करते थे कितनेक पूत्कार शन्द करके य, किवनेक पकार शन्द करते थे, रितन नाम मे पोलाते थे, कितने कार, वूकार थपकार, पूरकार, वकार शन्द व नाम से योहाना यों सब साथ करते थे, कितनेक कवे उछह वे, किसनेक नीचे गीरते थे, शिवनक तीच गौरते थे,किसनेक छलना, नीचे गीरना पत गारना यों तीनों करते थे, शिवनेक तपते थसिनेक ममते पेनकितनेक प्रवपते, किसनेक सपना, बन्ना प्रपना ये तीनों करते थे, किसनेक ने काशक रानापसादर काला मुखदेवमहायमा बालाप्रसादत्री.

at चतुर्दश जीवामिगम सत्र-सृमीय उप १ साहति, अप्पेगतियादेवा हक्कारेति थक्कारेति वुझारेति नामाति साहति,अप्पेगतिया देवा उप्पन्नति, अप्पेगतियादेवाणिवयति अप्पेगतियादेवा परिवयति,अप्पगतियादेवा उप्पयति परिचयति, अप्पेगइया देवा जलति, अप्पेगतियादेवा तवति, अप्पगतियादेवा पवति अप्पे- गइया देवाजलतितवसिपबति अप्पेगतिया देवा गजति,अप्पेगइया देवा विजयायति,अप्पे- गइया देवावास वासति, अप्पेगइया देवा गज्वति विज्जयायति वासवासति, अप्पेगइया देवा सन्निवाय करति अप्पेगइया देवा वुक्कलिय करेंति, अप्पेगइया देवा कहकहति अप्पेगतिया देवा, बुहह करेंति, अप्पेगतिया देवा दवसण्णिवाय देवउक्वालित देवकह देवदुइदुइक करति अप्पेगतियादेवा वुवोय करेंति, अप्पेगतिया देवा विम्जुचार करैति, अप्पेग- गर्मना करते थे, किसनेक विद्युठ फरसे थे, किसनेक वर्षा करसे थे किसनेक गर्जना, विद्युत प प वानों करते थे, किचक सनिपास करत थे, कितनेक उत्कीलक करवे ये, कितनेक कुह काट करसे ये किसनेक दुरदुआ " करते थे कितनेक सभिपात उत्सालिक का कहार प दुइदहाट करते ये कितनेक उद्योस करते ये रिसनेक विद्युत् की तरह समझा करते थे जिसनेक पत्र की पी फरते थे किवनेक देव योप, विद्युत् सरह समम्म व पल की र्प यों चीनों करके नाटक करते पे नाटक म तीसरी प्रतिपचि में विजया देवता का वर्णन 11 - अर्थ पचौस मेद को इस का वर्णन रायमसेणी मूत्र में विस्तार पूर्वक है परतु पहा इसका चित कयन करके । माठ प्रकार के पगलिकाकार नाटक-२ स्वस्तिक २ श्रीवत्स ३ नदार्ट पर्धमान ५ मद्रासन ६ सय ७ मत्स्य ८ दर्पन, २ मार्त, मत्या, आणि, प्रणि, सस्तिक, पुष्पमान, वर्धमान, मत्मारक, जारगार, पुष्पावसि, पपपत्र, सागर घरग, पासति ठसा, पथरता, इन चित्रों के पालेखना अभिनय प्रकाररूपाकार है ऐमा दूमा नाटक विधि, ३ शास्मृग, अपम, तुरग, नर, पार, निग, व्यास, किमर, समला सरम, भ्रमर, कुमर, वनसवा, पासवा के विचित्र चित्र वासावीसरा नाटक विधि, “एक चक्र दो पक्र.एक पकवाल, दो चकवाल, चकारवी चकवाल एमा बीया नाटक विधि५ भद्रावलि प्रविमति सूर्यावाले प्रविमाक्त, वस्त्रयावसि प्रविमति, नारायसि मधिमक्ति, मुक्तावलि प्राविभक्ति, रत्नावसि प्रविमक्ति, कनकालि मसिमक्ति, रसावसि मधिमक्ति, एकालि मनिमक्ति, यह पांचवा नाटक विधि ६ चद्रोदय प्राविमति, सूर्योद्रम प्रविमक्ति यों दमन मषिमक्कि नामक हा नाटक विधि ७ द्रागपन अपिम के, सूर्यागमन भविमक्कि यो भागमन प्रविमति नामक सासवा नाटक विधि, ८ एटावरण परिमाक्ति, मूर्यावरण प्राविमति, या भाषरण नामक याठवा नाटक पिघि ९ पस्तमन प्रविमति, सूर्यस्तमन प्रारिमक्ति यों अस्तमन प्रविमति नामक नया नाटक विपि १० १द्र महल पवि. मक्ति, मूर्य मदर मरिक्ति, नाग मरल मनिमक्ति, यक्ष मल मतिमक्ति, भूत परल मपिमक्ति, राक्षस 11 म परिमांक, पहोरम पार पावपछि, मपर्व मरत परिमकि, या मास प्राधिमाक्ति नामक दास मना-मनापारी मुनि श्री ममोला पणी + प्रकाशकराजाबहादुर लाला सुखदेवसायजी ज्वालाममादमी . . - . - -अर्थ . + . १ चतुर्नश भीवाभिगय सूत्र तृतीय उप 428 नाटक विषि " अपम महल प्रविमक्ति, सिंह मल प्राविमक्ति, इय विलावत, गम विलपित, हय विल- सित, गम पिलसित, मत इय विलासित, मत्त गा पिछमित, मत्त हय पिलपित, मत्त गज बिलवित और द्रव मिलम्पित नामक ग्यारहवा नाटक विधि १२ शकट पविभक्ति, सागर प्रषिभक्ति, नाग प्रविमति, सामर नाग प्रविमति नामक पारस्पा नाटक विधि १३ नदा प्रविमक्ति, घामावभक्ति, नद। चदा प्रवि- मक्ति नामक तेरहवा नाटक विधि १४ मत्सडक प्रविमक्ति, मकरंडक पविभक्ति, जार पविभक्ति, मार पविभक्ति, मत्सदक, मकरोडक, मार मार प्रविभक्ति नामक चौदहया नाटक विधि, १५ ककार, खकार, गकार, घकार व सकार मविभक्ति नामक पनरहरा नाटक पिषि १६ चकार, छकार, नकार, प्रकार व प्रकार प्रधिमक्ति नामक सोलहवा नाटक शिघ १७ टकार, ठकार, कार, टकार व णकार नामक सतरहवा नाटक विधि १८ सकार, यकार, दकार, धकार, नफार प्रविमति नामक अठारहवा नाटक विधि, १९ पकार, फकार, पकार, भकार व महार पविमति नामक सनीसवा नाटक विधि २० अशोक पठा प्रवि- भक्ति, आभ्र पल्लव प्रविमक्ति, जम्यू पल्ला परिमक्ति और कोशांब पल्ला पविभक्ति नामक पीसवा नाटक विधि २१ पलता प्रविभक्ति, नागलना प्रविमक्कि, अशोक लता प्रषिकि, चपलता माविमक्ति, चूत- लता प्रषिमक्ति बननवा मविभक्ति पासतिलना प्रवियक्ति, अतिमुक्तलता प्रविमक्ति, श्यामलमा प्रधिमक्ति में ता मरिमति नामक इस सवा नाटक विधि है २५ द्रन नामक पापीरूपा नाटक विधि २३ थिलम्पित ॐ नामक सेबीसवा नाटक विघि २४ द्रन बिल मेव नामक चौपीमा नाटक विधि १० अपिन नामक 42 तीमरी प्रतिपत्ति में विजय देवता का वर्णन 21 .

कर अनुवादक-मालामारी मुनि श्री भमोसा प्रापिनी गतियादेवा चेलुक्खव करेंति, अप्पंगतियादेवा बुजोय विज्जुत्तार चलुक्खेव करति, अप्पगतियादेवा उप्पलहत्थगता जाव सहस्सपत्नहत्थगता घटहत्थगता कलसह. स्थगता जाव धूचकहुच्छप इत्थगया हट्टतट्ठा जाव हरिसबसविसप्पमाण हियया विजयाए रायहाणीए सवतो समता आधावति परिधावति ॥ १५२ ॥ ततण पपीरा नाटक विधि २६ रिमित नामक पुग्नीसा नाटक पिषि २७ भचिल रिमिन नामक सचावी सपा नाटक विषि २८ आर्भट नामक महापीसरा नष्ट पिषि २९ मशोल नामक गुनसीमका नाटक विपि १० भरमट मझोल नामक सीसबा नाटक विधि ३१ उत्पात, निपात प्रसक्त, मकुचित, प्रसारित, रचित, सघात नामक इकतीसा नाटक विष बार ३२ श्री श्रमण मगरस पहावीर स्वामी के पूर्व भवका ज्यन करते हुन पहिले के मनुष्प मर, देव भप, चरम देव मन, चरम चवण, भरत क्षेत्र, अवसापणी, वीर्षकर ममाभिषेक, चरप पासमाष, परम योपन, चरम काम भोग, चरम दीक्षा, परम तप का भाचरण परम धान का उत्तम होना, परम तीर्थ पपर्साना व चरम निर्वाण, इन मघ के रूप प्रकाश करे या पत्तीममा नाटक विपि इस तरह पचीस प्रकार के नाटक किसनेक दय करते हैं कितनेक देव उत्पस कमाल गय में मकर यावत् मास पत्र मसहाय में मेकर, कमश राय में लेकर, यावत् धुपारा गय में मेकर हर तुष्ट बने हुने पार से पिनामित हदयवा बनकर रिषया राज्यपानी में चारों तरफ फोरते ॥२५२॥ प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवगायनी मालाममादी ५ मन ४२ धतु शनीषामिा मूष तृतीय उपा 42i. विजयदेव चत्तारि सामाणिय साहस्सीओ चत्वारि अग्गमहिसीओ सपरिवाराओ जाव सोलस आयरक्वदेव साहस्सीआ, अण्णेवि बहवे विजयरायहाणिवत्यन्या वाण. मतरादेवाय देवीओय तहिं वरकमल पतिट्टाणेहिं जाव अट्ठ सहस्पेण सोवाणियाण कलासाण तचव आव अट्टमहस्सेण भामबाण कलसाण सम्बोदगेहि सबमहियाहिं सव्वतुवरेहिं मन्वपुप्फेहिं जाव सब्बोसहि सिद्धत्थरहिं सबडिए जाव निग्घोसणायेण महतारइदामिसयेण अभिसिचति,महयाइदाभसेयेण अभिसिंचित्ता पचेयरसिरसावत्त मत्थए अजलि कटु एव वयासी-जय २ नदा जय २ भद्दा जय २ नदा भद्द ते चार हजार सागनिक देषमा,चार परिवार महित चार अग्रमहिपी यावत् सोलह हजार आत्म रक्षक देव और रिमया राज्यघानी के अन्य बहुत दर घ देषियोंने श्रेष्ठ कमल में रहे हुवे यावत् १००८ सुवर्ण कलश यापत् १००८ मृचिकाके कलश के सप पानी, गृचिका, स ऋतु के पुष्प यावत् सप पार्दन के शब्द से निमय देवता को रद्राभि किया बटा इन्द्राभिषेक किये पाछे मस्तक पर आवरूप अनली करके प्रत्येक एमा माशिर्वचन बोलने लगे जयजय नदा, जय भय भद्र,जयजय नदा भद्र, तुम न जिते हुवेका विजय करो. जिन पर नय किया है उन की महिपालन करो, शव पक्ष कि मिस का जय नहीं किया है तीसरी प्रतिपचि में विजय देवता का वर्णन - કર્થ अनुवादक गाममा मुनि श्री मा बिम आपिय जिणाहि जियपालयाहि, भजिय जिणाहि जियसत्तुपक्ख जित च पालहि मित्तपरस्त, जियमझ साहित दवणिरुवसग्ग इदोइव, दवाण, चदोइव ताराण, चमरो इवमसराण, धरणोइव नागाण भरहो इव मणुयाण, चहूणिपलिओवमाणि बहुणिमा- गरावमाइ बहुणिपलिओवमसागरोवमाणि, चउण्ह सामाणिय साहस्साण जाव आयरक्खदवसाइस्सीण विजयस्तदारस्स विजयाए रायहाणीए अण्णेसिंच बहूण विजयरायहाभिवत्यवाण वाणमतराण देवाणय देवीणय आहेबच्च जाव आणाईसर सेगावच कारमाण पालेमाणे विहरहि तिक्टु महता २ सद्देण जयेण जयसद्द पउजति ॥ १५३ ॥ ततेण स बिजयदेवे महया इशामिसेण अभिसि समाण वस पर विजय करो, विषय किया मिप्र णा भी प्रातिपालना कगे, पिनय किये हुवे देष सपा घR रहित हो देव में इन्द्र समान, सारों में चद्र समान, असुर में चमर समान,नाग में घरणेन्द्र समा', मनुष्य में मरत समान, यस पल्योपम बहुत सागरोपप, बहुत पल्पोपम सागरोपर तक चार हजार सा- मानिक यावत् यात्म रक्षक देव विजयद्वार विजया राज्यपानो,और पिजया राज्यघानीमें रानेराले अन्य कुन याणध्यवर देव प देषियों पर बामा चिरपना र सनापतिपना करते हुए पालते हुने यावत् विचरतेरो यों मास जयावेजयकारी अन्दों पोलने लगे ॥ १५ ॥ विप्रय देव को पान भमिषक दुषे पीछे का अपने प्रकाशक-राजामहादर लाला सुम्वदवमायनी आमासादमी.

पत्र चतुर्टभ जीपा मगम सभ तृनीय सपा ++ सीहासणाओ मन्भट्ठइरचा अभिसेयसभाओ पुरथिमेण दारेण पडिणिक्खमेति रत्चा जेणामव अलकारियसभा तेणेव उवागच्छति २ चा अल कारियसभ अणुप्पयाहिणी करेमाणे २ पुरथिमेण दारेण अणुपविसति २चा जेणेव सीहासण तेणेव उवागच्छति २सा सीहासणवरगते पुरत्याभिमुहे सन्निसणे ॥ तनेण तस्स विजय देवस्स सामाणिय पारमाबवण्यगादवा अमियोगेदेवे सहावात २ चा एव वयासी खिप्पामेव भो दवाणुप्पिया ! विजयस्स देवस्स अलकारिय भड उवणह ॥ ततेण अलकारिय भड जार उवरिति ततेण से विजएदवे तप्पढमयाए पम्हलसुमालाए दिवाए सुरभीए सिंगमन में उठा और अभिषक समा के पद्विार मे नीकलकर अलकारिक समातरफ गया उस की प्रदक्षिणा काक पूर्व के द्वार म उम में मोश किया षटा सिंहासन की पास जाकर उस पर पूर्वाभिमुख से पैठा उम समय मामाानक व भारतर परिपदा पाल देवोंने आमियागो देवों को बुलवाये और कहा कि महो दवानुमिप ! विजय दव के अलकार के भड (करहिये) घ्रमेव ले आषो बनौन अलकारिक भट लाकर रखदिय तक सब से पहिले विजय देवने रोम सहित मुकोमल दीध्य मुगघी कापायित वन से अपने गायको पूछा वत्तश्चात् गाशीर्ष चदन से गात्रों का अनुलेपन झिया, फोर नासिका के वायु से उद्दे 41 दोमरी प्रानपत्ति में विनय देवता का पणन । मर्थ . माफ गगम मुनि श्री मा नान आनिय जिणाहि, जियपालयाहि, मजिय जिजाहि जियसतुपक्ख जित च पालहि मित्तपक्ख, जियमझ साहित दवणिरुवसग्ग इदोइव, दवाण, चदोइव ताराण, चमरो इवअसराम, धरणोइन नागाण मरहो इव मणुयाण, बहूणिपलिओवमाणि बहुणिमा- गरावमाइ यहूणिपाल ओवमसागरावमाणि, चउण्ड सामाणिय साहसीण जाव आयरक्तदवसाहस्सीण विजयस्तदारस्स विजयाए रायहाणीए अण्णेसिंच बहूण विजयरायहाणिवत्यवाण वाणमतराण देवाणय देवीणय आहेबच्च जाव आणाईसर सेणाञ्च कारमाण पालेमाणे विहरहि तिकटु महता २ सद्देण जयेण जयसद्द पउजति ॥ १५३ ॥ ततेम से बिजयदेवे महया इदाभिसेण अभिसित्ते समाण मकाम-राजावादर लाला मुम्बदवसापनी सरसादमी. उस पर विभय करो, विषय किय वे मित्र पक्ष की प्रतिपालना कगे, विजय किये हुवे देव सपा में मर्ग रहित रसो देव में इन्द्र समाम, तारों में चद्र समान, असुर में घमर ममान,नाग में घरणेन्द्र समा', मनुष्य में मरत समान, बहुन पल्पोपम परत सागरोपम, पहुन पल्पोपम सागरोपमा चार हजार सा- पानिक यावत् यात्म रक्षक देव विजपदार विनया राज्यघानी,और विजया राज्यधानी में रहनेवाले बम्यान राणष्यवर देव व देविणे पर माना इश्वरपना र सनापविपना परते हुए पारते हुने गवत् विपरोरो यों का नयावेनयकारी शन्दों पकने लगे ॥ १५३ ॥ पिप्रय देष को परान भमिषा रे पीछे पर अपने ant चतुर्दश मीषामिगम मूत्र तृतीय उपाङ्ग 4 कप्परुक्खयपि, अप्पाण अलकिय विभूसिय करिता ददरमलय सुगधगाधितेहिं गधेहि गायाइ भकूडेति २ चा दिवच समणदाम पिणिधति, ततेण से विजये देवे कैसा- लकारेण पत्यालकारण मल्लालकारेण आभरणालकारेण चउबिहेण अलकारेण अलकित विभसिए समाणे पडिपुण्णलकारेण सीहासणाओ अभट्ठोतिरचा अलकार समाउ पुर- थिमिल्लेण, दारेण पहिनिक्वमति रचा जेणेव ववसाय सभा तेगव उवागच्छति रचा वसायसम अणुप्पदाहिण करेमाणे २ पुरथिमिलण दारेण अणुप्पविसतिरसा जेणव सीहासण तेणेव उवागच्छति २चा सीहासणवरगते पुरच्छामिमुह मणिसण्ण ॥१५॥ तएण तस्त विजयरस देवरस अभियोगियदेवा पोत्थयरयण उवणेतिाततेण से विजए 4. हीसग प्रतिपचि में विजय देवता का वर्णन + अथ कल्प त समान स्वतः को असकृत विभूपित किया तत्पश्चात् दर, घ मलय नामक चदन की मगध से अपन शरीर का सत्कार किया, सत्कार करके दीन्य मनोहर पुष्प माला पहिने, सत्पश्चात यह विनयापन केशालकार, बसालकार, माल्यालकार, थामरणा सार यो चार प्रकार के अलकार से विभूषित बनकर प्रतिपूर्ण अलकार सहित सिंहासन स नीचे उतरा और अळकारिक ममाक दार से नीकल कर व्यवसाय समा के निकट गया था उस की प्रदक्षिणा करके दिशा के द्वार से प्रवेश किया और जहां तिहामन था वहा थापा पा सिंहासन पर पूर्वाभिमुख से पैठा ॥ १५४ ॥ वहा विजय देवता के भाभि मनुरादा-या सहचारी मुनि श्री ममोप्टप प्रापिकी गधकासाईए गाताइ लूहेति २ ता सरसेण गोसीसचदणेण गायाइ अणुलिंपेइरचा तआणतर च ण णासाणीसासवायवोझ चक्खुहर वण्णफरिमजुच हयलारालवाति रेगधवल कणगखचित्तकम्म आकासफार्लह सारसप्पह अहत दिव्य देवदूमजुयल णियसेइरत्ता,हार पीणद्वेइ २ चा अहहार पिणइ२ चा एव एकालि पाणधिता, एव एतेण अभिलावेण मुत्तावाल कणगावलि रयणावलिं कहगाइ तुडियाइ अगयाइ केयराइ, दसमदिवाणतकपि कहि सुत्तगधे कडिसुचक्ख मुरवि कठमुरविं पालवति कुडलाइ धूडामणिचित्तरयकह मउड पिणिधेइ मउड पिणिधिना,गाठम वेढिम पूरिम सघाइमेण चउबिहेण मल्लण कप्परुक्खयपि अप्पाण अलकिय विमूसित करेति सा घस को मनोहर सव वर्ण व स्पर्श युक्त घेटे की लाल से भी अत्यव सकपाल, वेस, सुवर्णमय मार साात, याकाश अथवा स्फटिक रत्न नमी प्रमावा अखरित दीव्य दूप्य बन का युगल पनने पहिना से पस पहिन कर हार, अर्घ हार, एकालि, मुक्तावलि, कनकावलि, रत्नावलि, हार, फर, त्रुटित, अगद च फेयर परिने, दश अगुलियों में दश्च मुद्रिका, कटि मेखला, कठ में भगतिक मूत्र, कुरल, और अनेक रस्त नारित पूटामणि नाम मुकुट पााना, अथीम माला प्रमुख, पेष्टिम विंटे हुवे गेंद प्रमुख, पुरिम atanी सगका समर बनाए हुए मौर समाविम-बोडकर पनाइ हुए एमी चार प्रकार की पुष्प मासा से • प्रकाशक राजाबहादुर लाला स्वदेवमहायमी यामाप्रसादनी - .

पचतुदश भीमाभिगः मूत्र मृतीय उपस 21 जाइ तत्यउप्पलाइ पउमाइ जाय सतसहस्स पचाइ ताइ गिण्हति २ सा णदाओ पुस्खरिणीओ पच्चुत्तरेइ २ सा जेणेव सिहायतणे तेणेव पहारेत्यगमणाए, तएणतस्म विजयस्त देवस्स बचारि सामाणिय साहस्सीओ जाव अण्णे घहवे वाण- मतराय देवावीओ अप्पगतिया उप्पलहत्थगता जाव सत्तपत्त सहस्सपचहत्थगया विजय देव पिट्टितो अणुगच्छति ॥ ततेण तस्स विजयस्त देवस्स वह आभिआगेयादवा देवीओय कलस हत्थगता जाय धूवकूडछुप हत्थगता विजय देव पिठतो अणुगच्छति ॥ ततेण से विजएदेवे चठहिं सामाणिय में से नीकल फर मिदायतन की पाम जान छगा विनय देवताकी पीछे चार हजार सामानिक याषत् अन्य पहुन वापव्यतरदेव व देवियों हाथ में उत्पल कम व लक्षपष कमल लेकर पल तत्पश्चात विनयदेव के पहुन माभियोगिकदर पदवियों हाय में कलश यावत् घूपाहे लेकर उस पीछे के नाने लग अत्र विजय देव चार हमार सापानिरयावन् विजया राज्यधानी के अन्य बहुत वाणज्यतर देव व देवियों की साय परिवरा हुना सच पादिध के शब्द स सिदायत के पास गया वा सिद्धायसन को प्रदक्षिणा देकर पूर्वद्वार से प्रवेश किया मौर जहां देपद रहा हुआ है वहा जिन प्रतिमा को देखत ही प्रणाम किया जिन प्रविमा को मोर A तीसरी महिपति में विजय देवता का वर्णन 448 मई मनवारक वाममारी मुनि श्री भमोरक ऋषिमी ? देवे पोत्थयरयण गिण्डइ २चा पोत्थरयण मुमति २चा पोत्यपरयण विहाडेति २ त्ता पोत्ययरयण वाएइ २ चा धम्मिय पवसायपि गेण्हतिरचा पोत्थरयण पटिनिक्पमति २ का सीहासणातो भन्मुट्ठति २ 'चा वयसायसमातो पुरस्थिगिण दारण पहिनिक्समइ २ चा जेणेव गदा पुक्खरणी तेणेव उवागच्छति २चा पदापुस्खरिण अणुप्पयाहिण कारमाणा पुत्थि मल्लेण तोरणेण मणपविमति २ चा पुरथिमिलगति सेमाणपडिरूवेण पञ्चोकहति २ त्ता हत्थपाद पक्खालेति २ ता एगमह सेत रजतामय विमलसलिल पुण्णमचगप महामुहाकिति, समाण भिंगार पगिण्हति २त्ता योगिक देव पुस्तक रत्न लाये विमय देवयाने पुस्तक रत्न राय में लिया, उसे छारा, फोर उस सोलार पुस्तक रत्न पांचा, अपने कुरुधर्म के व्यवसाय योग्य पदार्य प्राण डिये फोर से नीचे स्पकर रामन से नीचे उतरा मोर व्यवसाय समाके दार से बाहिर नीकलकर नदापुष्करणीके निकट गया वहां उसे प्रदक्षणा कर के पूर्व के तोरण मे प्रवेश किया और पूर्व के त्रिसोपान (पक्किये)स नम में उतरा या रस्तपादन प्रक्षालन किया, एक वटा घेत चांदोमय, निर्मल पानी से परिपूर्ण हाथी के मुखासार समान एक भृगार(सागरी) प्रान दिया, भौर पद मो उत्पल, पप पावत् लक्षपम व उन को मी प्राण-पे, फर नदा पुष्करनी 451 मारaar शारापनी मागबमादमी. नर्थ ।

-11 " Ess तुःश भोपामि गए मूत्र सृसीय : दिन्वाइ पेवदूसजुयलाइ गियसेइ २ चा अग्गेहि वरेहिय मल्लेहिय अच्चेहिय अच्चेहि सा पुप्फारुहण गधारुण चुण्मारहण आभरणारहण करेति २ चा आसतो सच- विठल वटवग्धारित मालदाम कलाव करेति, असचे सत्चविउल ववग्धारित मलदाम कलाव करेता माछाई सण्हेहि सएहिं रएतामएहिं अध्छरसतडुलेहिं जिणपडिमाण पुरनो अट्ठमगलए आलिहति तजहा-सोस्थिय सिरिवच्छे जाव दप्पण, अट्ठमगलगे मालेहिता कयग्गाहगहित करयलपठभट्ट विप्पमुक्केण दसवण्णण कुसुमेण मुक्कपुप्फ पुजोवयार कलित करेति २ चदप्पम पहर कलिय विमल घड कचणमणिर करने जैसे पाय से प्राण करते हुये नीचे गिर रे पुष्पों को छोडकर पांच वर्ण के पुष्पों का पुज किया, चंद्रप्रभा,श्न पडूर्य रत्नमय विपाल ददलाला, कचन मणि रत्न जैसा विषिष प्रकारसे महा हुवा और मनोहर कृष्णागर, कुदरुम तुरुश के धूप से सुगघ पृष्टि करता हुवा वैदूर्य रस्नमय धूपमा करछा लेकर धूप दिया, धूप दकर विशद छदादिक दोष रहित प्रय युक्त महा अर्थवाले १०८ महा वृत्तवाले श्लोक से स्तुति की फोर सास आठ पांव पीछा भाकर पाया जानु खडा रखकर दहिगा जानु नीचे रखा तीन चार मस्तक परणिवस पर लगाया फीर किचित् ऊचा घनकर करे, नुटिन से स्तमित भुमा ऊची • वीमरी प्रतिपचि में विजय देवता का वर्णन - अर्थ - कनुपादक वासनअघारी मुनि श्री अमोठा अमीर साहसीहि जाप अण्णेहिय बहहिं वागमतरेहिं देवेहिय देवीहिय साई सपरिवुडे सविट्ठीए सवजुचीए जीव निग्घोसणाइए रवण जेणेव सिद्धाययणे तेणेष उवागच्छति २ चा सिद्धायतण अणुप्पयाहिणी करेमाणे २ पुरच्छिमिलेण दारेण अणुपविसहरचा देवच्छपए तेणेव उवागछति २ त्ता आलोए जिणपहिमाण पणाम करति २ चा जिणपहिमाओ लोमहत्थएण पमबति लोमहत्थएण पमजिचा सुरमिणा गोदएण न्हाणेइ सुरभिणा गधोदएण हाणित्ता दियाए सुरभीए गधकासाईए गाताइ लूहिते लूहिचा सरसेण गोमीसचदणेण गाताइ अणुलिपइ २ चा जिणपहिमाण अहयाइ सेताइ पीछ को पूजनी से जी, सगति गोदक से प्रसाछन किया, दीप मुगषित गघ कापायिक पन से उन * गायों पुरे, गोशोप चदन से गानों पर मेपन किया, जिन प्रतिमा को अस्खटित श्वेत उज्वल देव दप्य बस्त्र-- पहिनाय, मनउत्तम प्रधान मुगधित द्रव्य प पुष्प की माला से अपनाकर, पुप्प पाये, उत्तम मगंधो पद य चाय, चर्मवाम पाय, बस घराये, मामरण पहाये,ऊचे से पृथ्वी वल पर्यंत सम्मी होती ई पुष्प मालाओं का काप किया शिचित् श्रव सकुपाल चादीमय मत्पन्त निपट भाव (पास) से माठ २ मगाम का आसन पिया, पया ' स्वास्स श्रीवत्स यारत् दर्पण काय ग्राण दिन प्रतिमा को बन पहिनाये है इसलिये यह वीकर की प्रतिमा नहीं है राशक-नाजासादुर घाला मुखदर सरायनी बालाप्रभारी - 44 घमुईश जीवाभिगम सूत्र मृतीय उपाङ्ग 4. तणस्स बहुमझदेसभाये तेणेव उवागच्छति २ था दिवाये उदगधाराए अमु- खेति २ सरसेण गोसीस चदणेण पचगुलितलेण मडल मालिहेचा चच्च दलहता कयग्गाइगहित करतलपग्भट्ट विप्पमुक्केण दसरवण्णेण कुसुमेण मुक्कपुप्फ पुजो- ययार कलित २धूव दलयतिरचा जेणेव सिहायतणस्स दाहिणिल्लेणदारे तेणेव उवागच्छइ लोमहत्यय गाहति दारविग्गयउ सालिभजिआओय वालरूवयेय लोमहत्थयेण पमज्जति २ दिवाए उदगधाराए अन्मुक्खेइ सरसेण गोसीसचवणेण पचगुलितलेण अणुलिंपति चच्चये दलयति २ पुप्फारहण जाव आमरणारहण करेति २ आसत्तोसत्चविपुल जाव मल्लदाम कलाप करेति २ कयग्गाहगहिय जाव पुजोवयार कलित करेति २चा लेकर पारसास्व, सालभिका भौर पाल प्रमुख रूप को पूमे, दीव्य पानी की धारा मे उन का प्रक्षालन किया श्रष्ठ गोधीप चदन से पांचों अगुलियों के छापे से लेपन किया, अर्चना की, यहाँ पप चटाये यापत् बाभरण चढाय नीचे मम्मी खटकती हुई मालाओं का कलाप किया केशकलाप ग्रहण करने भसे हाथ में से गीर गये हुवे पुष्पों का छोटकर पांच वर्णवाले पुष्पों का समुह किया और वहा धूप दिया फोर वहाँ से मुख पदप के मध्य भाग में माया उसको मोरपीछ की पूजनी स स्वच्छ किया, दीध्य पानी की धारा स मक्षालन किया श्रेष्ठ गाशीप चंदन से पांच अगुलीतल से मटल का पालेखन किया, यदन से पर्चा की, यावत घूप दिया फर वर्ग से मुग्व मंरप के पश्चिम दिशा के द्वार के पास म तीसरी प्रतिपत्ति में विजय देवता का वर्णन Rai अर्थ + अनुवादक मानमवारी मुनि श्री भमोठा झापेमी यण भनिचित्त कालागर पधर कुदरुक तुरुकधूवगचधुमाणुविद्ध च धूमवर्टि रिणि- मुयत लियमत कहुन्छुप पग्गहिय पयत्तेण धूव दाऊण जिणपडिमाण मट्ठसय विशुद्धगध जुत्तेहिं महाविचेहि अत्थजुचेहिं अपुणश्तेहिं सथुगइ २ चा सत्त? पयाइ उसरति २ चा वाम जाणु अचति २ चा दाहिण जाणु धरणितलसिनिहद धरणितलसि णिवाडति २ चा तिक्खुत्तो मुद्दाण धरणियलसि णामइ २ इसिं पच्चुण्णमति २ कहयतुडिय यमियाआ भूयाओ पहिसाहरति करतलपरिग्गहिय सिरसावच मत्थये अजलिंकष्टु एव पयासी-णमोत्थुण अरहताण भगवताण जाव सिद्धिगह णामधेय ठाण सक्ताण, तिकटु पदिता गमासचा जेणेव सिडाय- उठाए दोनों गय मोरकर मस्तक से मान किया, मस्तक से यमली फरफ ऐमा पोरा मरिस मात पावत् मिदनति को माप्त मिद मगवान को मरा नमस्कार होघे यों नमस्कार करके सिदायतन क मध्य भाग में मापा पो दीव्य पानी की धारा से प्रसारुन किया, पहा रस मरिस गाशेर्प पापना पदन से पांच मंगुली के छापे दकर मेरस की बालेवना को पर्ण पूजा की केशपाश प्राण करने माप में से पडे हुवे पुष्पों का त्याग कर शेष पांच वर्षपाल पुष्पों का पुन किया और धूप दिया विहाँ से सिद्धापतन का दक्षिण दिशा का द्वार वा पर्ग माया यहां मोर पीछ की पूंमनी हाप में परावर राजारहार काला सुचदेवसहापमी बलप्रसादमी न चतर्द में परम 1 सूत्र-तृय उपा- 2 लोमहत्थएण पमबइ त्ता दिन्वाये उदगधाराये सरसगोसीस चदणेण पुप्फ रुहण जाव आमत्तो कयग्गाह धृव दलयति जेणेव मुहमडवस्त पुरच्छिमिल्ल दारे तचेव सव्व भाणियन्व जाव दारसव्य, भाणियन्त्र, जणव दाहिणिले दारे तचेव पेच्छाघरमड रस्स बहुमझदेसमाए जेणेव वइरामये अक्खाडए जेणेव मणिपेढिया जणव सीहासणे तेणव उगच्छइ २ चा लामहत्यग गेण्हत २ चा अक्खाढग च मणिपढिय च तीहासणच लोमहत्थगेण पमबइ २ ता दिवाये उदगधाराए अभु र पुप्फाम्हण जाव धूव दलयति २, जणव पेच्छाघरमहवपच्चथिमिल्लदारे पारमाणेया, उत्तरिल्लाखभपति तदव, पुरथिमिल्ले दारे पाहिणिल्लेदार तहर, जेणव चेइय थूभे तेणेव उवागच्छइ २ चा लामहत्थग गेण्इति २ ता चेइयथम लोम- मध्य नाग पं पज (ग्मय अख दे पर सी हुई मणिपीठिका का सिंहासन के पास माया उमकी मारपछि री, मना से प्रार्जग की, दोव्य उदक धारा से प्रक्षालन किया, पुष्प चहाचे यावत् धूप किया फीर वहां से वापर परे पाश्चम द्वार के पाम आया या द्वार पूजा का सव स्थन करना यहां से उत्तर दिश' का नम पति की पाम आया यहां भी वैमा ही किया वहा से पूर्व दिशा के द्वार के पाम भाया भी वैसीया, वहां स दाक्षण दिशा के द्वार के पाम पाया वहां मी पैसे ही किया दहा से पेत्य स्तूप की पास माया वहां मोर पछि की पूजा ग्रहण की मोर पीछ की पूजनी तीसरी प्रतिपचि में विजय देवता का वर्णन 49 मनुवादक-बामसारी मुनी श्री मोऽख सपित्री धूर्व दलयति २ जेणेव मुहमडवस्स बहुमझदेसभाए तेणेव उवागम्छइ बहुमझ- देसमाये लोमहत्येण पमजसिरा दिन्वाए उदगधाराए अद्भुखेइति२ सरसेण गोसीस चदणेमं पचगुलितलेण महलग आलिहति चच्चये दलपति २ कयग्गाहि जाय धूव दलयति २ जणेव मुहमडवगस्त पञ्चस्थिमिलण दारे तेणेव उवागष्छइ २ चा लोम- हत्यग गेण्हति २ दारविग्गउभयमालम जियाओ बालरूपएय लोमहत्येण पमज- त २ दिबाए उदगधाराये अन्मुक्खेति २ सरसेण गोसीस चदणेण जाव चचेय पलयति जाव पुप्फारोहण असत्तोसत्कयग्गाह धूवदलयति २ जेणेव मुहमडवगस्त उत्त- रिमाण खमपति तणेव उवागच्छइ लोमहत्थग गिण्हतिरता खभेय सालिमजियाउय मामा, पाा पूजनी छी भौर द्वार, पारसास व पूलियो को पूमनी से पूजी दीठप पानी की धारा से सम की प्रक्षालना की, श्रेष्ट गाशीर्ष बदन से पर्चना की यावत पुप्प चढाये ५ प किया at से मुख महप के उचर रिशी के द्वार की तम पंक्ति की पास भाया पहां हाथ में मार पूमनी लेकर स्तम व शालमिका की प्रमामना की, दोभ्य उदक धारा से प्रक्षालन किया मोनो चान से पांच अगुपितर स मंडल का भालेखन किया पतं पुष्प पहाये सावन् घूरा किया फोर पास मुलपरप के पूर्व द्वार की स्तम पक्ति की पास बाया पt R पनि सब कपन करना, यापन दक्षिण द्वार पर्यंत मरदार कहना फीर यहां से प्रेक्षापर भपकेबान मकायक राजावावर लावा मुखदेनमहायनी भासाममात्री.

1 चम्दश जीवामिमम मूत्र तृतीय उपाङ्ग Er तोरणेय, सालिभजियाओय वालरूपएय लोमहत्यएण पमजति २ दिवाए उदगधाराए सरसेण गोसीसचदणण अणुलिंपति २ पुप्फारुहण जाव धूव दलयति २ सिहायतण अणुप्पयाहिण करेमाणे जेणेव उत्तरिल्लाणदा पुक्खरिणी तेणेव उवागच्छइ २चा तचत्र महिंदझया चेतियरुक्खे चेतियथूमे पञ्चस्थिमिला मणिपेढिया जिणपहिमा उत्तरिल्ला पुरथिमिल्ला दक्विणिल्ला पेच्छाघरमडवस्सवि तहेव जहा दक्खिणिजस्स पच्च- त्थिामिल्लदारे जाव दक्षिणिलाण खमपती मुहमडवस्तवि तिण्हारेण अच्चणिया भाणिऊग दक्खिणिल्लाण खमपती उत्तरेदारे पुरच्छिमेदारे सेप्त तेणेव कमेण जाध चदन स विलपन किया, पुष्पारोपण किया यावत् धूप किया या सिद्धायतन के दक्षिण द्वार की पूजा अय सिदायनन को प्रदक्षिणा करसा हुआ उस के पीछे के भाग से उत्तर दिशा के द्वारपाली नदा पुष्करणी की पाम आपा हा अनुभम मे पोन्द्र धमा, चैत्य वृक्ष, चैत्य स्तूप, पाश्चम दिशा की मणि पीठिका, जिन प्रतिमा, उधर, पूर्व व दक्षिण दिशा की मणिपीठिका व प्रतिमा की पूजा की वा से 4 मेपाघर पहप के पास गया उस का कयन दक्षिण दिशा क मसाघर मैस कहना वहाँ से पश्चिम दिशा क द्वार के पास गया यावत् दक्षिण दिशा की स्तमपक्ति, मुखमंडप के तीनों द्वार की अर्चना कहना यावत् दक्षिण दिशा के प्रेक्षा स्तमपक्ति की अचर्ना की यो क्रमश. सब फरसे हुवे यावत् 41 सीसरी प्रतिपीच में विनय देवता का वणन अर्थ 44 पदक-सामनपारी मुनि श्री ममोलक अपिमो हपएम पमजति २ दिवाए उदगरसेण पुष्फाम्हण मामत्तीसच जाव धृव दलयात २ जेणेव पञ्चस्थिमिल्ला मणिपेढिया जणव जिणपहिमा तेणेव उबागच्छइ २ जिण- पडिमार मालोए पणाम करेति २'। लोमहत्थग मेण्हति २ चा तचव सन्ध जच जिणपडिमाण जाव सिद्धिगइनामधेज ठाण सपताण वदति नमसति, एव उत्तरि लएवि एव पुर थिमिल्लाएवि दाहिणिल्लाएवि, जेणेव चइयरुक्खे दारविही, जेणेव मणिपेढियाविही जणव महिंदज्झए, दारविही, जेणेव दाहिणिलाए नदापुक्खरिगि तेणेव उवागग्छइ २ लोमहत्यग गेण्डति २ चेइयाउयति सोमाण पडिरूवयेय, चित्प स्तूप की प्रमार्जना की दीव्य उदकरस से मसालन किया पुष्प चटाये यावत् धूप किया यहां में पशिम दिशा की मणिपीठिका के पास ना जिन प्रतिमा पीक आया मिन प्रतिमा को देखते प्रणाम रिया मिन प्रतिमा का मो भाषिकार है रा सब या कहना यावत् मिद गति में प्राप्त हुए परिस को नमस्कार होमो यो बदना नमस्कार क्या पसे ही उचर, पूर्व प दक्षिण की मणिपीठिका जिन मतिमा का मानना फोर पर मे चैत्य वृक्ष का पास नाया, पाद्वार विधि मे पूना की पा से मान्द धजा की पास माया उम की मा चेमरी पूना की व से दक्षिण दिशा की नंदा पुष्क- रपी के पास या वा मोर पीप का पूजनी ब्राण की, पेदिका, परिषिय, सोरण पुतली प्पार सफ इन सप की पूजनी से प्रमानना की, दीम्म पानी को पारा से प्रक्षापन दिया, ओ मोजो * मदारक राजावहादुर लाला मुखदवमायनी भावासावी. यावत .

1 - चतुर्दश-भीमाभिगम मूत्र-तृतीय उपाङ्ग र विहाडेइ २ चा जिणसकहा लोमहत्थयेणं पमध्वति २ चा सुरमिणा गधोदएण तिसत्तखुत्तो जिणसकहाओ पक्खालेति सरसेण गोसीस चदण अणुलिपइ , त्ता अग्गेहि बरेहि मल्लेहिय अचणिचा धूव दलयति २ चा वइरामयेसु गोलवह समुग्गयेसु पडिनिक्खमेति, वइरामएस गोलबह समुग्गयेसु पडिणिक्वमित्ता पुष्फारहण जाव आभरणारहण करइ माणवक चतियखमे लोमहत्थएण पमज्जति दिवाये उदगधा- राए अदभुक्खेति २ चा सरसेण गोसीस चदणेण दलयति २ पुप्फारहण जाव आसत्तो सत्तकयग्गाधूव दलयति २ जेणव समाए मुधम्माए बहुमझदसभाए तचे जेणव सीहासणे की, श्रेष्ट गोशीप चदन स लेपन किया श्रेष्ट प्रधान गघ मळा से भर्चना की और धूप किया, फोर पन रत्नमय गोल डब्बे में जिन दादा रखदी और उस पर पुष्पारोपण याषत भामरण का मारोपण किया माणवक चेत्य स्थभ की ममार्जना की, दाव्य पानी की धारा से प्रक्षालन किया, श्रेष्ट गोशीप चदन से लपन किया, पुष्प का पारोपण यावत् पूरा किया यहा से मुधर्मा सभा के मध्य माग में आया पर उस ही मकार भचना की यावत् जहा सिंहासन है यहाँ बाया, वह भाकर अर्चना कर पैसे द्वार की अर्चन कर रह से दय धेय्य के पास भाया वहां स गेटो महन्द्र ममा के पास भाया, वहां से तीसरी तित्ति में विजय दक्षता का वर्णन मर्थ . मवादक-रामा प्रचारी मुनि श्री भपोप फ्रीजी पुरथिमिल्ला णदापुक्वरिणि जेणेव समासुधम्मा तेव पहारेत्थ गनणाये॥ १५५ ॥ ततेण तस्स विजय देवस्स चचारि सामाणिय साहस्सीभो एयप्पभिति जाय सब्बटू- सिद्धेय जाव णाइयरवेण २ जणेव सभासुहम्मा तणव उवागच्छति २ चा सभ सुहम्म अणुप्पयाहिणी करेमाण २ पुरच्छिमिल्लेण दारेण अणुप्पविसति २ आलोए जिसकहाण पणाम करति जेणेव मणिपेढिया जेणेव मणिवय चतियखभे जेणेव वइरामया बोलवसमगका तेणेव उवागच्छइ २ ता लोमहत्थग गेण्हति २ चा घइरामये गोलबद्द समुग्गये लोमहत्यण पमज्वइ २ वइरामए गोलबद समुगगये प में नदा पुष्करणी के पाप्त सुधर्मा सभा में माने के लिये उपत हुभा ॥ १५५ ॥ विजय देवता थे, चार हजार सामानिक यापत् मष द महित यापत् पार्दिप्र के शब्द मे वा विजय देय मुर्मा ममा की पास आया इस को प्रदक्षिणा करके पूर्व के द्वार में इस में प्रवेश किया था कि दादा को देखते ही पणाम किया वहां स पणिपीठिका, मां माणवक पत्य स्तम व ना पजरत्नमय गोल ने चा आया यहाँ पूजनी ग्राण की वज्ररत्नम गोल रमे की पूमनी से प्रपार्ज की, गोस दो बोस दिये पार जिन दादा की पुमनी से प्रमादिना की, सुगधी पानी से निनदादा की इबीस पार प्रक्षासना प्रकाशक-राजापारादुरलाला सदेवसहाथजी ग्यामामासाहमा . - 84 पत्रि-मीषामिगम एक-तृतीय उपाा मन अणुलिपति २ चा अग्गेहिंवरहिं गधेहिंय मलेहिय अच्चणेति मल्लेहिय अच्चणिचा सीहासण लोमहत्थएण पमजति जाव धूव दलयति सेस तहेव नदा जहा हरयस्स तहा जेणब मणिपढिया तेणेव उवागच्छइ २त्ता आभिओगिएदवे सद्दावेतिर चा एष पयासी खिप्पामेव भो दवाणुप्पिया! विजयाए रायहाणीए सिंघाडगेसुय तिसय चठक्कसुय चउम्मुहेसय महापहे पास.एसुय पागारसुय अद्यालयसुय चरियामुय गोपुरे- सुय तारणेसुय वावीसुय पुस्वारणीसुय जाव विलवति, गोमुय आरामेसुय उजाणसुय काणणसुय वणेसुय पणसहसुय वणराईमुय अच्चणिय करद्द करेचा, ममयेमाणत्तिय सीन समा में सिंहासन की अर्चना कहना मार रह की पूजा नवापुष्करणी जसे कहना वहां से व्यवसाय ममा में भाया पो पुस्तक रल मारपीछ की पुजनी म पुजा दीव्य उदधारा से प्रक्षालन किया श्रेष्ट गोपीर्ष पवन से मेपन किया, श्रेष्ठ प्रपान गप र माला से अर्चन किया फीर सिंहासन की पूजनी से प्रपाना को यावर धूप किया थप सम पूर्ववत् जानना नदा पुष्करणी जैसे द्रह का काना पहाँ से मणि पीठिका के पास जाकर भामियोगिक देव को बुलवाये और ऐसा कहा अहो देवानुमिय राज्यामी में गाटक, त्रिक, चाक, चतुर्मुख, महापथ, मामाद, प्राकार (कोट) महाठक, परिका (4) गोपुर, सारण, चावडी, पुष्करणी, यापत् बिल, गोमुख, बगीचा, व्यान, कानन, वन, पनरखण्ड 40+ सीसरी मतिपचि में पिजय देवता का वर्णन 484 मर्थ मुम विजया + मुमारामपारी मुनि श्री प्रमोलान मस्निी :- तेणेव उवागष्छइ २ चा तहेव दारचणिता जेणेव देवसयाणिजे तव जेणेब खुइ महिंदण्झये तचेव जेणेव पहरण कोसे चोप्पाल तणेव उवागच्छति २ च। पत्तय पहरणाई लोमहत्थएण पमबतिरचा सरसेण गोसीसचदणेण तहेव सन्न सेसपि दक्खिण दारपि आदि करेतु तद्देव णेयध्वजाव पुरस्थिमिल्लाणदापुक्खरणी सव्वाण सभाण जहा सुधम्माए सभाए महा अच्चणिया उबवाय समाए णवरि देवसयणिजस्स मच्चणिया,सेसासु सहाणेण अचणिया हरयस्स,जहा णदाए पुखरिणीए अच्चणिया वयसायसमाए पोत्थरयण लोमहत्य. दिव्याए उद्ग धाराए सरसेण गोसीस चदणेण प्रकाशक रानाबहादुर छाला मुसदेसमापनी बाबामसादी। शन कोश बोठ फसानामक फोप है माया यही प्रत्येक पल को मारपीछे की पुमनी से पूमा, श्रेष्ट गोशीर्ष चदन से स्पिन किया, यों सब पूषित् मानना सुधर्मासभा से नदापुष्करणी पर्यंत ऐसे ही कहना सिदायतन जैसे दक्षिणदार मुस्ख मटर, चैत्य स्तूप, पार जिन भविमा, पत्यवृत, मान्द्र धमा, मोर नदापुष्करणी की अर्थना की ऐसे से सुधर्मासमा के उत्तरदिशा क द्वार से पूर्वोक्त की इवनी पस्तु का पूजन किया ऐसे ही पूर्वदिशी का जानना सप समा का सुपर्मा समा गैस कहना उपपाद समा का वैसे ही काना परतु इस में देवपा भी माना और वेष ४८५ A चतुर्दश-नीवामिगम सूत्र तृतीय २५न ततेण से विनये देवे चउहि सामाणिय देवसाइस्सीहि जाव सालसाह आयरक्स देवसाहस्सीहि सविट्ठी जाव णादितण जेणेव सभा सुहम्मा तेणेव उवागच्छ तरचा सम सुहम्म पुरस्थिमेण पारेण पविसति अणपविसिता जेणेव मणिपढिया तेणेव उवागच्छति २ सीहासणवरगते पुरच्छाभिमुहे सणिसणे ॥ १५७ ॥ ततेण तस्स विजयस्त देवरस चचारि सामाणिय साहस्तीओ अवरुत्तरेण उत्तरेण उत्तरपुरस्थिमेण पत्य २ पुषणच्छे मु महासणेसु णिसियति ॥ ततण तस्स विजयस्स देवस्स चत्तारि अग्गमहिसीओ पुरस्थिमेण पत्तेय २ पुरवण्णत्थे महासणेसु णिसीयति॥ ततेण तस्स चार इनार सामानिक यावत् मोला हमार आरमरक्षक देष की साय सघ मदि यावत् वादिन के शब्द से जा मुधर्मा सदा वहां जाने लगा सुधर्मा समा में पूर्व दिशा के द्वार से प्राश्च किया और मणिपी- टिका के पास भाकर सिंहासन पर पूर्वाभिमुख से बैठा ॥ १८ ॥ तत्पश्च त् विजय देयता के चार हमार सामानिक देर बनुक्रम से माय, और ईशानकून में पूर्वोक्त मद्रासन पर बैठे सत्पश्च त् चस की चार अग्रपडिपी पूर्व दिशा में पहिले वर्णन किये हुवे भद्रासन पर घेठी, उस के पीछे ाम्प तर परिपदा के अ ट इन र देर पृथक् २ भ म कौन में मद'मा पर पेठे, दक्षिण दिशा में मद्रासन पर मध्य परिपदा के वीसरी पतिपत्ति में विजय देवता का वर्णन अर्थ AM नुगमनमवारी निश्री नमोसल ऋपिन - खप्पामेव पञ्चप्पिणह ॥ ततेण ते अमिउगियादेवा विजयेण देवेण एव वुत्ता समाणा जाव इट्टतुट्ठा विणएण पडिसुति विणएण पहिसुणेचा विजयाए रायहाणीए सिंघाडगेसु जाव मच्चणिय करता जेणेव विजये देवे तेणय उवागच्छति २ एयमणिय पञ्चप्पिणति ॥ १५६ ॥ ततेण विजयेदेवे तेसिण अभिउगियाण अतिए एयम? सोचा निसम्म इट्ठतुट्ट चित्तमाणदिये जाव हियये जेमेव णदा पुक्वरिणी तेणेव उवागच्छति २ ता पुरच्छिमिलेम तोरणाण जाव इत्थपाय पक्खालेत्ता आयते चोक्खपरमसुइभूय पदा पुस्खरिणीओ पश्चुतरति २ वा जेणेव सभासुहम्मा तणेव पहारेत्यगमणाए ॥१५७॥ रनरामी में माकर उस की मचना करो, इवना करके मुझ परी मामा पीछा दो विजय देवता से ऐसी पाल मुनकर भामियोगिक वसा इष्ट तुष्ट हुए उनके वचन पिनय पूर्वक प्रण फिये, और विजया राज्यपानी में श्रृंगाटा पावत् धनरानी में अर्चना करके उनको उनकी मात्रा पीछी दी ॥१८॥ वाभियोगिक दमको पास मे ऐसा सुनकर गा बिमय दवता इष्ट तुष्ट र आनदित हुना, वा से नदा पुष्करणी के पास आकर पूर्व के तोरण से यावत् हाय पार का प्रक्षालन किया, बाभूचिमय पनकर नदा पुषरणी में से नीपछार मुपर्म सभा की और माने गा, ॥ १७ ॥बा दिमय देव मायक-राजारादुर लाल मुबदेवसरायमी यासाप्रसादमी . उप्पीलिय सरासण पटिया पीणद्धगेवेजबद्ध माविद्धविमलवर चिण्हपहा गाहया उद्दढप्पहरणि तिणयाइ तिमधीणि वइरामय काडिणि घणइ अभिगिज्झपडियाइत कडकलाया तजहा-गीलपाणिणो, पीयपाणिणो, रत्तपाणिणो,चावपाणिणो, चारुपाणिणो चम्मपाणिणो, वग्गपाणिणो, दडपाणिणो, पासपाणिणो, गील-पित रत्त चाव-चारु- चम्म खग्ग-दड पास वग्धरा आयरक्खगा, गुत्ता गुतपालिया, जुत्ता जुत्तपालिया, पत्तेय २ समयविउणट किंकर भूतावि चिट्ठति ॥ १५९ ॥ विजयस्सण मते ! दवस्त केवतिय काल ठिती पण्मचा' गोयमा ! एग पलिओवम ठिती पण्णचा ।। 443 चतुर्दश मीयामिग मूष तृतीय सपा 43 र्थ ऐमा धनुष्य आय में कर संपूर्ण शर कलाप (माये) भरे हुवे, किसनेक के हाथ में हरे वण की उही- पासे धनुष्य , कितने हाथ में पीले वणशाल पनुष्य , कितनेक के पास लाल वर्णवाले धनुष्य किसनेफ के हाय में मनाार भ युध है, कितने साथ में धर्म के कोडे, किसक के राय में स्वर कितने हाथ में दब , तिनेहायमेंशी, ऐसी नीले, पीले, लाल धनुष्पवाले, मन हर आयुधबाले, चर्म, स्वा. दद, पाश धारन करनेवा', भग रक्षक, गुप्त रक्षा करनेवाले, सेवक के गुणों से युक्त, परिवार सति पृथक २ समान मात्रा से नमते हुए किरभून पनकर रहने हैं ॥ १५९ ॥ महा भगवन् । विनय देश की कितनी स्थिति कही महा गौतम ' विमयदेव की एक पल्योपम की स्पिरि तीसरी प्रतिपति में विजय देवता का वर्णन न . - ?

अनुमादकपालप्रमचारी मुनि श्री ममोल र अपमी विजयस्स देवस्सपाहियपुरथिमेण अभिनरियार परिसाए अट्टदेवस हस्तीपत्तेपर जाव णिसीयति एव दक्षिणेण मज्झिमियाएपरिसाए दसदेव साहस्सीओजाय णिसीयति दाहिण पञ्चत्यिमेण बाहिरियाए परिसाए बारस देवसाइरसीमो पत्तय २जाब णिसीयति ॥ ततेम तस्स विजयरस दवस्स पच्चात्थमण सत्तअपियाहिपई पत्त्य २ जाव जिसी- यति ॥ ततम तस्स विजयस्स देवस्स पुरस्थिमेण दाहिणेण पचत्थिमेण उत्तरेण सोलस आयरक्स्वदेवसाइस्सीमा पत्तेष २ पुषणस्थेसु मासणेसु जिसीयति तजहा- पुरस्थिमप चचारिसाहस्सीउ नाव उत्तरण ॥ ततेण आयरक्खा सण्णहवाम्मय कतिया दश मार देष, नेफ्स्यकन में धान परिषदा के बारहहमार देव पृथक् २ सिंहामन पर पेठे, पश्चिम दिशा में उस क साठ मानेमाधिपोत पृयक् • भद्रासन पर बैठे, सोला इनार प्रात्मरक्षा पूर्व, दक्षिण, पधिप व उचर में पूर्व पापस भद्रामन पर पेठे तयया-पूर्व दिशा में चार हजार, दक्षिण दिशा में चार मार, पमिप विधा में चार मार व उत्तर दिशा में पार मार इन का वणन करने हैं, वे मात्म रसा देव मनदाद मायुप से सज्ज बने हुने , काच पारन किये हुये, मरासन धनुष्य की पहा ऊची की, 4 में सामरण पारण किये, विमस उच्चम सुमट क चिन्दपट उन के हाथ में हैं, उन्न मायुत र पारण वरण किये है, सीन स्थान नीष नमे हुवे , वीन सपी है, उन की रञमय सपी • रानामा दुर लाम मुबामायनी पावसादमी, +11 पतु ममामिगम मन्त्र-तृय उपस +ite अर्थ 41 सीसग पविपत्ति में विजय देवता का वर्णन पाहिणेण जाव जयते देवे ॥ २ ॥ कहिण भते ! जबृदीवस्स जयंतेणाम दारे पण्णते, ? गोयमा ! जबद्दीवे २ मदरस्त पमयस्स पञ्चत्थिमेण पणयालीस जोयण सहस्साइ जबृद्दीवे पच्चत्यिमापरते लवणसमुह पञ्चत्थिमदरस पुरथिमेण सीतोदाये मह नर्दय उर्षि एस्थण जबुद्दीवरम जयते नामदारे पत्ते ॥ तचेव सोपमाण, जयते देवे पच्चात्थमण से रायहागीए जान महिड्डीए ॥ ३ ॥ कहिण भते ! जबूहीवस्त अपराजिए णामदार पण्णत्वे ? गोयमा! मदरस्स उत्तरण पणयालीस भगवन ' वैजयत दव की पैनयता राज्यघानी कहां की है ? बहो गौतम ! जम्बूदप से असर यासपा जम्बूद्र प नामक द्वीप में विजया राज्यघानी है इस का वर्णन विजया राज्यघानी जसे मानना रिजयस नामक द्वार व विजयसा राज्यघानी का, विमयत नामक दव का कथन विभय देव जैस नानना ॥२॥ अहो भगमन ' जयत नामक द्वार का कहा है ? अहो गौतम ! जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत स पश्चिम दिशा में नार योनन नावे सप जम्बूद्वीप के पश्चिप के अत में पश्चिम के लपण समुद्र से पूर्व में सीतोदा मष्ठा नदो के कार जम्वृद्ध प का जयव नामक द्वार कहा है इम का सप वर्णन विजय जैसे जानना इस का जयन नामक देष अधिाति है पश्चिम दिशा में राज्यप नी है यावत् पहद्धिक है ॥ ६॥ अहो भगवन् ! नम्बू प का अपराजिन नामक द्वार कहा कहा है ? अहो गौतम ! जम्मूद्वीप के मेरु पर्वत से ४५ .

मादक-मरी पुनि श्री बमोजा पिमी * विजयस्सर्ण भते! देवरस सामाणियाण देवाण केवतिय काल ठिनी पपगत्ता गोयमा एग पलिवम ठिती पण्णता ॥ एवं महिडीए एवमहाजुचीये एवं महघ्यले एवं महायसे पत्र महासुक्खे एव महाणुभागे विजयदयो। १६०॥ कहिण मते जवू हविस्म दीवरस वजय णामदारे पाणती गोयमा ! अबूद्दीचदीवे मदरस्स पबयरस पविखणेण पणयालीस आयणा सहस्साइ भवाहाये जघटोवेदीये दाहिणापरते लवणसमुस्त दाहिणिहस्स उत्तरण एस्थण अबूद्दीवस्म २ वेजप नामदारे प्राणचे जट्ठजोयणाइ उच्चत्तेण सत्यवसध्या बत्तवया जावणिच ॥ १ ॥ कहिणं मते । गयहाणीये रही या भगवन् । विमय देवता के सामानि देव की स्तिनी स्थिति की है। हो गौतम ! एक पस्योपम की स्थिति को विजय देवकी ऐपी महाद, ऐमी पहाति, एमा वळ, एमा पहायश ऐसा परामुल प प्रसा मानुमाग का या विषय देषसा का अधिकार सपूर्ण हुवा ॥१६०॥ महा भगवन् । समूदीप का रेजयत नामक द्वार का ? हा गौसप ' जम्मुदीप के मेरु पर्वन में दक्षिण दिशा में पे परत से ४५ रमार यापन भाषा से मात्र से दक्षिण दिशा के अत में दक्षिण दिशा क लाप समुद्र से उत्तर में नम्मदीप नामक इंप का बैजयत नामक दार है या पाठ योजन का उचा, चार पोमन का पराई इस पी पकल्पना साविभय द्वार जैसी मानना यावद नित्य ॥१॥ भा Hशक राजारहादर लाला समापनी मालाममा - ? ? ॥ ६ 4. चतुर्दश नीराभिगम सूत्र तृतीय उपास ॥ ५ ॥ जबृद्दीवरसण भते ! दीवस्स पदेसा लवण समुद्द पट्ठा हता पुट्ठा, तेण मने । किं जब्दीवे २ लवणसमुद्दे ? गोयमा ! जबूहीण दीव णो खलु ते लवणसमुद्दे ॥ लवण समुहस्स पदेसा जघूदीव दीव पुट्ठा ? हता पुट्ठा, तेण भते किं लवणसमुद्दे जबूद्दीवे दीवे ? गायमा ! लवणाण समुद्दे, णो खलु ते जबूद्दीवे दीवे ॥ जवूद्दीवेण भते ! दीवे जीवा उद्दातिता २ लवणसमुद्दे पञ्चायति ? गोयमा अत्थगतिया पञ्चायति अत्थगतिया णो पच्चायति ॥ लवणेण भते ! समुद्दे वर्णन हुना ॥ ५ ॥ अहो मगवन् ! जम्बूद्वीप के प्रदेश लपण समुद्र को क्या स्पर्शकर रो हुने हैं ? अहो गौतम ' स्पर्श पर रो हुने भहो मगवन् ' व प्रदेश क्या रुम्बई प के . या लवण समुद्र के ' गहा गौतम ! वे जम्बूदीप क हैं परतु लपण समुद्र के नहीं है अहो भगवन् ! मवण समुद्र क प्रदेश क्या मम्बाप को स्पर्श कर रो हैं ! गौतम ! स्पर्श कर रहे हैं बहो मगरन् ! वे क्या लवण समुद्र करे या जम्बूद्वीप के ? अहो गौतम ! वे लवण समुद्र के परतु जम्बूद्वाप के नहीं है ॥ ६ ॥ अहो मगरन् जम्पूद्वीप के एलेन्द्रियादिक जीव परकर छवण समुद्र में उत्पन्न होते है क्या? अहो गौतम ! सिनेक नसान होते है और किवनेक नदी मो उत्पन होवे हैं अक्षा भगवन् ' लवण समुद्र के भीष यहां से 41 तीमरी मनिपचि में जम्बूद्वीप का वर्णन + सूत्र पर नामधारी मुनि श्री भयाटक भी जोयणसहस्स अवाहाए जद्दोष उत्तरापरते लवणसमुदस्त उत्तरदस्त दाहिणण एत्यण जबूद्दीवे २ अपराइए कामदारे पण्णत तव पमाण रायहाणी उत्तरेण जाव अपराईए वे घउण्ह अण्णमि जद्दीवे ॥ ४ ॥जवृद्दीवस्सण भत । दीररस दाररम्य पारस्सय एसप केवतिय अबाहार असर पण्ण ? गोयमा ! अउणासीर्ति जयण सहस्साइ वावगच जोयणाइ देसूणच अद्ध जोयण दारस्त अवाहाए अतरे पाणचे नार योमन अशापास मावे को पा इस से उत्तर दिशा के अस में उत्तरार्ष लवण समुद्र से दक्षिण में कामम्यूद प का परानिम नामक द्वार की इस का सव माण विनय दर जैसे कहना इम की राज्यपानी उत्तर में इस का अपरामित व चारों राज्यपानी अन्य अख्यातघे जम्यूद प में ॥ * ॥ बडो मगषन् । नम्बुद्वीप के एक द्वार में दूसरे द्वार पर्यंत कितना अवर का है ? महो गाना ' गन्पासी इमार मार वाचन योजन १५०१२॥ योजन में कुछम का एक द्वार से दूसरे द्वार पन अनर मा नम्मूदीप की परिधि ३१६२२७ योजन ३ कोश, १२८ पनुप्य, व १३॥ अगुण स वण भधिको उस में से चारों द्वार की चौरा१६ योजन को पारों द्वार के वारसास दो यामन के पों सा पीमाकर १८ योजन परोक्त परिधि में से नीकामना, इस से ३१६२०९ योजन ३ कोश, १२८ पिनु, प १३० अगुल से इस बार भाग करना जिस से दू२०५२ योजन, १ कोष १५३२ पनुपण १२ गुल, ३ पर, पस्यूका, कना एक द्वार से दूसरे द्वार का मार मानना पाबद्रपिक हार का • मश: रामावादर लाला मुलदवसायनी मालासमादमी. . -- भ ५ मर्थ 4 चतुर्दश जीवाभिगम पत्र-तृतीय उपात्र 46 विक्खमेण, तीसे जीवा उत्तरेण पातीण पहिणायये दुहओ वखार पचय पुट्ठा पुरथिमिल्लाप कोडीए पुरथिमिल्ले वक्खाग्पन्धए पुट्ठा, पच्चस्थिमिलाए कोडीए पञ्चस्थिमिज वक्सार पव्यय पुट्ठा, तेवण्ण जोयणसहस्सति आयामेण, तीसे धणुपट्ठ दाहिणण, सट्ठिजोयणसहस्साइ चत्तारियट्ठार मुत्तरे जायणसते दुवालसयएक्कूणवीस तिमाए जायणस्स परिखवण पण्णत्ते ॥ ८ ॥ उत्तरकुराएण मते ! कुराण केरिसए नीलदत पयस की पास चौटी है और पूर्व पश्चिम रम्बी है, दानों वक्षस्कार पर्वत को स्पर्श कर रही है, पूर्व दिशा क पन्त से पूर्व दिशा माल्पत वक्षस्कार पनि को स्पर्शी हुई है और पश्चिम दिशा के मन्सप्से पश्चिम दिशा का गधमादन वक्षस्कार पर्वत को स्पर्शी हुइ है यह निव्हां ५३००० योजन पूर्ण पश्चिम ममी है, (मरु पर्वत से पूर्व पश्चिम भद्रशाल वन २२००० योजन का लम्बा है इस स ४५००० योजन का भद्रशाल पन करा उस में मेरु पर्वत के दशहजार योजन मालाने में ५४००० योजन होने बस में से ५००-५०० याजन के पक्षस्कार पर्वत के १००० योजन नीकालते शेप ५३००० योजन की मिव्हा की) इस की धनुष्य पीठि का ६०४१८ योजन की है अर्थात् अर्घ परिघि है गघ मादन व माल्यरत दोनों ३०२०९ र योजन के सम्मे हैं, इस से दोनों के मीछकर ६ ४१८२ योजन हुत्र ॥ ८॥ अहो मगमन् ! उत्तर कुरु क्षेत्र का कैसा भाव कहा है ? भो गौतम ! वहां पहुन सम नामरी प्रतिपत्ति में जम्दप का वर्णन 1 मनुषादर-दामामधारी मुनि श्री ममोहक अपिजी- जीवा उद्दाइत्तार अबहीवेदीवे पञ्चायति ? गोयमा अत्यंगतिया पञ्चायति अत्थेगनिया- नो पञ्चायति ॥ ७ ॥ से केणटुण मते । एव वुच्चइ जदीदीधे ? गोयमा । जबूद्दीवेदीये मदरस्त पव्ययस्स उत्तरेण नीलवतस्स दाहिणेण मालवतरस वक्खारपन्न यस्त पञ्चति मेण गमायणस्त वक्रवारपवयस्त पुरस्थिमेण एत्थण उचरकराणामकुरा पण्णता पाईण पडीणायता उदीण दाहिण विच्छिण्णा अडचद सठाण सठिया, एकारस जोयण सहस्साति अट्टयवयाले जायणसए दोणिय एकाणवीसति भागे जोयणरत मरकर जम्बूद्वीप में क्या उत्पन्न होते हैं ? महा गौतम ! कितनेक उत्पन्न है किसनेक उत्पन्न नहीं होते। mil भो भगवन् ! जम्मू प नामक दीप एसा नाय क्यों किया ? महो गौतमा जम्बुद्वीप नामकीप में पेरु (पति से उत्तर में, नीलवंत पर्वत स दक्षिण में, माल्पषत चहार पर्वत से पश्चिम में मार गपादन वक्षस्कार परत म दिशा में उचरकुरु नामक कुरुक्षेत्र का हुवा है यह पूर्व पश्चिप लम्बा, उत्तर दक्षिण चौडा विस्तार सला अर्घ चट के मस्यान चासो १८४२, योमन का उत्तर दक्षिण चौटा ( महाविदेड क्षेत्रमीचे र ३३६८४ी इस में से पह पर्षत की। ००० योजन की चौहाइनाले २२६८४१ योजन की चौडाइरहे उसके दो मग करने से १८१२ योजन की पौराह र प्स की भीगा • Rकाशक-रानामागदर छाला सुखदेवसहायनी पासा ममापी उचर ? - चतुर्दश नीवामिगम सूप तृतीय उपाय - तेयली सणिचारी ॥ १. ॥ कहिण मते ! उत्तरकुराए जमगा नाम दुवे पन्यता पपणचा गोयमा ! नीलवतस्स वासहर पन्धयरस दाहिणण अट्टचोत्तीम जोयणसते चत्तारिय सतभाग जोयणसहस्स अवाधार, सीताये. महाणईए उभयोकूले एत्थण उत्तरकुराए कुराए जमगाणामदुव्वे पचता पण्णचा, एगमगेण जोयणसहस्स उड्डउच्चत्वेग अड्डाइजाइ जोयणसयाइ उवेहेण मूले एकमेक जायणप्तहस्स आयामविस्वभण मज्झअटुमाइ जोयण सताइ आयाम रिक्खमेण, उवरिपचजोयण सयाइ आयामविक्खभेण मुलेतिणि जोयण सहस्साइ एक बावट जायणसय किंचिविससाहिय परिक्खेवेण मज्झ दो जोयण सहस्साइ नाम ' पर गधा, • मृत गषा १ बमपा ४ सखा ५ सेपलीय और ६ शनीचारी ॥" ॥यहो भगवन् ! उत्तरकुरु क्षेत्र में जमझ नामक दो पर्वत को को १ अहो गौतम । नीलवत वर्षधर से दक्षिण दिशा २८३४- याजन अपाषा से जाप तो यहां सीता पहानदी के दोनों हिमारे उत्सरफरु क्षेत्र में दो नमरु पर्वत को उन स एक पूर्ण किनारे पर दूसरा पश्चिम किनारे पर पर्वत पफ इनार योजन ऊचे, अदाडमो योमन फ अपीन में कहा, मूल में एक इनार यामन सम्बे चौरे, मध्य में साद साम्रो योजन के लम्म पोरे और उपर पावसो योजन के लम्बे चौदे हैं मूब 48 तीसरी तिपति जम्बुद्धीप का वर्ण। 3 मध नुसारकासमपारी मुनि श्री यमोसा पीजी आगार भाव पडीयारे पण्णते ? गोयमा ! बहुसमरमणिब भूमिभागे पण्णचे, से जहा णामये मालिंग पुक्खरेतिया जाव एव सरुअगदीवे वचन्मया जाव देवलोग परिगाहाण, तेमणुयगणा पण्णचा समणाउसो! णवर इमणाणच छधण महस्समृसिया, दो छप्पन्ना पिटकरडयासय, अट्ठममत्तस्स अाहारटे समुप्पजति, तिणि पलिआवमाइ देतृगाइ पलिओवमस्स सखेबइ भागेण रूणगाइ जहन्नण तिन्निलिओवमाइ उक्कोसेण एक्कूणपण्णा रतिदियाइ अणुपालणा, सेस जहाएगळ्याण ॥ ९ ॥ उत्तर कुराण कुराए छविधा मणुस्सा अणुसब्बति तजहा - पम्हगधा मियगधा अममा सहा रमणीय भूमे मागका, नैसे मालिंग पुष्कर पाधिका तला बगैर सर एकरुक देप जैमी परतव्यचा या मानना यावत् देव गति में नासे पाने का मनुष्यों । विशेषता यह है कि यह छ हजार धनप्य मर्पद तीन कोश की शरीर की बगाना २५६ पससी सीन दिन के अंतर से बार की इच्छा उत्पन होती है, उनका मायुष्य मधन्य तीन पल्यापममें से पस्योपम का असस्थातवा मागम का पूरा तीन परोपम पापर युग मनुष्य अपने मपत्य की प्रतिपालना दिन फरते पमप भापकार एक- सनामा बसरदीप जैसे मानना ॥ ९ ॥ रचरफर में प्रकार से मनुष्य ग्त्सम 7 मिन . माकनानामहादुर माला लक्ष्य महायता मालामाल , ? 4.28+ धतुर्दश भीवामिगम सूप तृतीय उपाय - तेयली सणिचारी ॥ १. ॥ कहिण मते ! उत्तरकुराए जमगा नाम दुवे पन्चता पपणचा गोयमा । नीलवतरस वासहर पबयस्स दाहिणण अट्टचौतीस जोयणसते चचारिय सत्तमाग जोयणसहस्स अवाधाए, सीताये महाणईए उभयोकूले एत्थण उत्तरकुराए कुराए जमगाणामधुव्वे पव्वता पण्णता, एगमगेण जोयणसहस्त उड्डउच्चचेण अड्डाइज्वाइ जोयणसयाइ उवेहेण मूले एकमेक जायणप्तहस्स आयामविस्वमण मज्झअट्ठमाइ जोयण सताइ मायाम विक्खभेण, उवरिषचजोयण सयाइ मायामविक्खभेण मुलेतिणि जोयण सहस्साइ एक बावट्ठ जायणसय किंचिविससाहिय परिक्खेवेण मझ दो जोयण सहस्साइ के नाम । पच गया, • मृन गया । बमपा ४ सवा ५ तपलीय और ६ शनीचा ॥" ॥ अहो भगमन् ! उत्तरकुरु क्षेत्र में मम नामक दो पर्वत को को ! बो गौतम । नीलबस वर्षधर से दक्षिण दिशा ८३४- पाजन अाघा से जाप सोपा सीता पहानदी के दोनों चिनारे उत्तरकर क्षेत्र 4 में दो नमरु पर्वत को। उनमें स एक पूर्व किनारे पर ष दूपरा पश्चिम किनारे पर है ये पर्वत पकामार योजन के ऊंचे, बदाउमो योमन फ अपीन में कर, में एक हजार यामन सम्पे चौरे, मध्य में साद सावसो योजन के लम चौरे और उपर पचिप्सो योजन के सम्मे चोदे हैं मूर 42+ तीसरी मतपति जम्बद्रीप का वर्णन + मर्ष मूल - नुवादक पासप्रमपारी मुनि श्री अमोहक प्रापीनी - भागार मात्र पढीयारे पण्मते ? गोयमा ! यहुसमरमणिव भूमिभागे पण्णते, से जहा पामये आलिंग पुखरेतिवा जाव एव सरुअगदीवे वत्तबया जाव देवलोग परिगाहाण, तेमणुयगणा पण्णत्ता समणाउसो! णवर इमणाणच छधणु सहस्समृसिया, दो छप्पन्ना पिट्ठकरडयालय, अट्ठमभस्स अाहारट्टे समुप्पजति, तिणि पलिआवमाइ देतूणाइ पलिओषमस्स सोबइ भागेण रूणगाइ जहन्नण तिन्निपलिओबमाइ उक्कोसेण एक्कृणपण्णा रतिदियाइ अणुपालणा, सेस जहाएगल्याण ॥ ९ ॥ उत्तर कुराम कुराए विधा मणुस्सा अणुसज्जति तजहा - पम्हगधा मियगधा अममा सहा रमणीय म म माग का, से मालिंग पुष्कर वादियका वला मेरा सा एकरुक देप जैमी पचनाचा या जानना यावत् देव गति में मारे गाने का मनुष्यों विशेषता यह है कि वह हमार धनप्य मत सीन फोष की शरीर की मगाइनारे २५६ पसी सीन दिन के अंतर से बार की स्या उत्पन्न होती है, उनका भायुष्य भघन्य वीन पस्यापममें से पत्यापम का भसख्यातका मागम उतका पूरा तीन पल्पोपम पापर युमस मनुष्य अपने मपस्प की प्रतिपालना ९ दिन करते हैं प सम अधिकार एस. का नाम भारद्वीप मैसे मानना ॥ ९ ॥ रत्तरकुरु सत्र में प्रकार से मनुष्य रसम 7 मिन .मानानामहादुर माला स्वयमापनामामा ४८७ * चतुदश भावामिगम मूम तृतीय उप 47 यण च उड्नु उच्चचेण एकतीस जोयणाइ कोस व विक्खभेण अभूगगतमूसित वष्णो भूमिभागओ उल्लोता, दो जोयगाइ मणिपेढियाओ उवरिसीहासणा सपरिवारा जाब जमगा चिट्ठति ॥ ११ ॥ से केणष्टेण भते ! एव वुच्चति जमगा पन्वया ? जमगा पन्वया गोयमा ! जमगेसुण पन्वतेसु तत्थ २ देसे २ तहिं २ बहखुडियाओ वावीओ जाव विलवतियाओ, तासुण खुड्डा खुडिया जाब विलपतियासु बहुइ उप्पलाइ आव सतसहस्स पत्ताइ जमग प्पमाइ जमग दण्णाइ जमगा एत्थण दो देवा महि. लिया जाव पलि आवमठितीया परिवसति, तेण तस्थ पत्तेय २ घउण्ह सामाणिय जानना दो योजन की मणिपीठिका पर परिवार सहित सिंहासन है यावत् जमक पर्वत रहे हैं ॥ ११ ॥ अहो भगवत् नमक ऐसा क्यों नाम रखा ! अहो गौतम ! ममा पर्वत में स्थान २ पर षात पापि पावर पिलपक्ति उस में पहुस उत्पल यावर लक्षपत्र जमा नैसी ममावाले सब नमक जैसे वर्णवाले रहते हैं और भी वहां नमक नामक दो महधिक पावत् पस्योपम की स्थितिवाले देव रहते ६ चे. वहाँ चार हजार सामानिक यावत् नमक पर्वत व ममका राज्यघानी में रहनेवाले बहुत पाणव्यतर ' देिव व देय का आधिपविपना करते हुने यापत् उन को पालते हुषे विचरते हैं अहो गौतम ! इसलिये 42 वीसरी प्रतिपचि में जम्बूद्वीप का वर्णन 8 अर्थ सपनुरादपनामामपारामुनि श्री ममालक तिग्मिय बायत्तरे जोयणसते किंचित विसेसूण परिवेखवेण पण्णचा, उर्षि पण्णरस एक्कामीति जोयण मते किंधिविसेमाहिया परिक्खयेण पण्णत्ता, मूलविच्छिष्णा मझे सखित्ता उप्पिं तणुया, गोपुछ सठाण सठिता सव्व कणगामया अच्छा सहा जाव पडिरूवा, पत्तेय २ पठमांतया परिक्निचा प्रत्तेय २ वणसह परिक्खिचा षण्णो दोणधि तेसिण जमग पन्चयाण उपि बहुसम रमणिज भूमिभागे पण्णत घण्णउ जाव आसयति बहुसमरमणिबाण भूमिभागाग बहुमज्झ दसभाए पत्तेय २ पासाय बढेसका पण्णता, तेण पासायवर्डसका पावटि जोयणाइ अहजे- में बीन (मार एकसो पासठ योमन से कुछ अधिक की परिधि है, मध्य में दो हमार वहचर योजन से कुछ अधिक की परिधि है, पौर पर पत्नरासो इकासी योजन से कुच्छ अधिक की परिधि है मूल म विस्तीर्ण, मध्यमें सकुचित प पपर पनले । गोपुर सस्थान वाले है सघ सुवर्णमय, सच्छ सुकमाल यावत् पतिरूप में प्रत्येक पर्वतको पपवर घेदिका और पनखण्ड फो। ये वर्णन योग्य इन दोनों जमा पर्वत पर बात रमणीय भूमि माग करा या मी वर्णन योग्य है यावत् पा देवों पठते हैं उस पिभाग के पृयक २ मासादारससकको दशा योमन के ऊचे,'३।। योमन के सम्ये चौटे माकाश सल को भरसम्बन कर रो रोषे पैसे दीमा देते मूमिमाग पर एव पपी हुई है वगैरह सम पूर्ववत् । महारारानाबहादुर लाला सुखदेवससयनी ज्वालाप्रमादी मध्यम . ४५८ चतुर्दशनीमाभिगम मृत्र-तृतीय उपास 48 पन्ययाण दाहिणेण भट्टचोनीसे जोयण सये पचारिसचभागजायणस्स अवाधाए सतिाए महाणईये बहुमझ देसभाए एत्थण उत्तरकुराए नीलवतहहे नाम दहे पण्णत्ते, उत्तरवाहिणायये पाइपडीणवित्थिण्णे एग जोयमसहस्स आयामेण पचजोयण सयाति विक्खभेण दस जोयणाइ उन्हेण अच्छे सण्हे रययामए कूले चउकोणे समतीरे जाव पहिरवे उभयोपासि दोहियपउमवरवेइयाहि दाहिवणसडेहि सन्यतो समता सपरिक्खिचे दोण्हवि षण्णमो नीलवत दहस्सण तत्य २ जाव बहवेति सोमाण पहिरूपका पण्णचा यष्णो भाणियन्वो तोरणेति ॥ १४ ॥ नीलवत 481 तीसरी-प्रतिपीचे में नम्वदीप का वर्णन 48 मर्थ पर्नव से दक्षिण में ८५४ योमन के दूरी पर मीता मानदी के पीच में उपर कुरु का नीसनस नामक द्रा कहा है यह सचर दक्षिण लम्बा व पूर्व पश्चिम चौटा है एक हमार योमन अम्बा पांच सो योमन बौदा ५ दश योमन का है पा स्वर लक्षण है रजसमय किनारे पार सौणवाला, समान सीरवासा यावत् प्रतिरूप है दोनों वाज दो पर बेदिका, दो वनखण्ड थे चारों तरफ घराये हुये दोनों का पर्णन पूर्ववत् मानना उस मीलयत द्रा को प्रितोपान प्रतिरूप उपुकामी वर्णन पूषित् मानना भार सोरण मी है उसका वर्णन मी पूर्ववत नानना ॥१॥ नीळत वारक-पापमपारी मुनि श्रीममा अभिी + साहस्सीण जाव जमगाण पव्ययाण जमगाणय रायहाणीण अणेसिंच वहण पाप- मसरार्ण देवाणय दवीणय आहेषध जाप पालेमाणे विहरात, से तेण?ण गोयमा ! एष बुधइ जमग पव्यया २ अदुचरचण गोयमा ! जाव णिचा ॥ १२ ॥ कहिण भते ! जमगाम देवाम जमगाओ नाम रायहाणीओ पण्णताओ? गोयमा ! जमगाण पचयाणं उत्तराणति तिरिय मसखेज दीव समुह वीतीवतिचा अण्णमि जब्द्दीवे दीधे पारस जोयण सइस्माइ उगाहिचा एत्थण जमगाण देवाणजमिगाओणामरायहाणीओ पण्णचाओ, वारसजायण सहस्साइ जहा विजयस्स जाव महिडिया जमगादवा ॥ १३ ॥ कहिण मते।उत्तरकुराएउत्तरकुराए नीलवतहहे नामदहे पण्णता ? गायमा! जमगाण इन पात्रों का नाम बमा रसाभबना नो गौतम ' इन का पाम्पत नाम ये भूवकास मीसा नही पावत् नित्य ॥१२॥ महो मगवन् ! प्रम देव की ममका राज्यपानो का मो गौतम ! नमक पर्वत से रचर में मसख्यात द्वीप समुद्र गये पीछे मप मम्मदीप नाम दीप माता रस में पारामार योजन गये पीछे भमफ देव की चमक नाम राज्यपानी की या पासमार पोमन की सबी पोरी वगैरह रिनपा रापपानी से पाना उस में मादिक नमक देष शवे ॥५॥ महो मगमन् ! चरपुर क्षेत्र का नाम है! यो मौतम ! मक . • REIरामायादुराका देवसामी नामसान चतुःश नायागय मूष तृताय उपाय - चाइल्लण सव्य कणगामई अच्छा सण्डा जाव पडिरूवा ॥ १६ ॥ तीसेण कणियाए उवरि बहममरमाणज देममाय पण्णत जाव मणीहिं तस्सण बहुसमरमणिज्जस्त भूमि भागस्म बहुमज्झदमभाए एत्थण एगेमह भवणे पण्णत्ते कोसच आयामण, अद्धकासच विक्खभण, दसूण कोस उल्लु उच्चचेण अणेगखभमतसनिविटु, सभा वण्णओ ॥१७॥ नरसण भवणस्त तिदिसि तआदारा १७ गत्ता तजहा पुरथिमण दाहिणण उत्तरेण, तण दारा पचधणुसयाइ उड्ड उच्चत्तेण अढाइबाइ धणुसयाइ विक्खभेण तावतिय चत्र पत्रसण सतावरकणग थूभियागा जाव वणमालाउात ॥ १८ ॥ तस्सण भवणस्स अतो बहुममरमणिज्ज भूमिमागे पणत्ते से जहा नामए आलिंग पुक्खरे- तिमा, जाव मणीण वण्णओ ॥ १९ ॥ तस्मण बहुममरमणिज्जरम भूमिभागस्स की गही मन मच्छ, लक्ष्ण यावत मसरूप है ॥ १६ ॥ बम कणिका उपर बहुत रमणीय भूमि मग का है यह याच माण में सुभामिम है उम भूमि माग के मध्य में एक घटा मान कहा है या OF काश का लम्मा आधा कोश का नोटा कुच्छ मदद कान का ऊना बनक स्थभ घाला इम का पणन उपर मेम करना || १७ ॥ इस मान के न दिशा में त न द्वारा उपया-पूर्व दक्षिण व उत्तर पद र पांव सो धनुष्य के उच, अब इसा धनुष्य के चाई आर उतने ही मवश पाले है सुवर्णमय शिवार यान् वनमा या पर्वत वण, कहना ॥ १८ ॥ उन मन में पहुन रमणीय भूमिभाग है जेस . वीसरी प्रतिपचि में जम्बूद्वीप का वर्णन 42- मथ का मनुवादक-मास्वापारी मनि श्री भमोसा पित्री - पहस्सण दहस्स यहु मज्झसमाए एस्थण एगेमह पउमे पण्णते, जोयण आयाम विक्खभेण त तिगुण सविसेस परिक्ने ण अद्वजोयण शाहल्लेण, दस जोयणाई उब्वेहण पा कोसे उसिते जलतीतो सातिरेगाइ दस जोयणाइ सन्चंगण पण्णत ॥१५॥ तस्सण पउमस्स अयमेतारूवे पण्णवासे पण्णचे तजहा वइसमयामला रिट्ठामये कदे, वेरुलिया मये णाले, वझलियामया याहिरपत्ता, जघृणयमया अभितर. पत्ता, तवमिध्वमया केसरा, कणगामई कण्णिया, नाणामणिमया पुक्खलरियरया, साण कणिया भद्धजोयण आयाम विक्वमेण त तिगुण सविसेस परिक्खेत्रेण, कोस र के मध्य माग में एक पत्र कमलो या एक योनन का लम्बा चौसा और स से तीनगुनी यपिक परिपिर, माना योजन का मारा है दश योजन मडारे, मा उपर दा कोश का ऊचा है मौर सब मीसकर साधिक दश योजन का ॥ १५ ॥ इम पम का इस सस वर्णन करते हैं व रत्नमय मूल है मरिष्ट रस्नपय कंद, पेहूर्य रस्नमय नाल है, वहूर्य रत्नमय बाहिर के पत्र जम्बूनद रत्नमय आभ्पतर के पम , वपनीय मुबपापय केशरा रे फनमय कणिका रे, पिविध मणिमय स्थूमिका रस की कणिका भाषा योनन की समी चोरी है, इस से सोनगुनी से मषिक की परिधि है, एक कोम • मार रानापहार लाला मुखरकमहायमी भासतानी.

4 चतुर्वन-मीवामिगम एप-तृतीय उपाष्ट्र परिक्खेवण, अडकोसे बाहल्लण सव्व कगगामईमो अच्छाओ जाप पाडरूवाओ॥ तासिण कणिया उप्पिं बहुसमरमणिज ममिभागा जाव मणीण षण्णो गधो फासो ॥ २०॥ तस्सण पउमस्त अवरुत्तरेण उत्तर पुरथिमेण एत्थण मिलवत दह कुमारस्स देवस्स चउण्ह सामाणिय माइस्तीण, घसारि पउम साहस्सीओ पण्णचाओ एष सन्य परिवारो नवरि पठमाण भानियव्वो, सेण पउमे अण्णेहिं तेहिं पउम- परिक्खयेण सन्वतो समता सपरिक्खित्वे तजहा-अम्भितरएण मझिमएण बाहिरएण अम्मितरएण पउमपरिक्वेचे पचीस पउम सयसाहस्सीओ पण्णचाओ, मझिमएण पउम परिक्खेयो चचालीस पउमसय साहस्सीमोपण्णचामो बाहिरएण पठमपरिक्खे अडयालीस पउमसय साइस्सीमो पण्णचाओ,एवामेव सपुव्यावरण एगापउम कोडी परिप, मापा कोश की माप कनझमय स्वच्छ यावत् प्रतिरूप है उन की कार्णका पर रमाणक भूमिमाग: यावत् माणिस वर्ण, गप रस व स्पर्ध है ॥३०॥ उस पय कमल के पायव्य आप उपर प ईशान कोष में मील द्रा कुमार देव के चार इमार सामानिक देव के पार हमार पप को यों परिवार के कमल काना मन्य दोन कमकी परिधि से सेंटा हुशी माम्पवर परिपि मध्य परिघि पहिर परिधि अभ्यवर परिधि घोस मास कमा, मध्य परिधि में चालीस लाख कमल मौर वादिर की परिप में अचाळीस लाख HD तीसरी मविपचि में मम्यूद्वीप का वर्णन 41 मर्थ सव पप -- सतेण तदन अनुवादकासमपारी मुनिमी मपोसस पिनी बहुमसदेसमाए एत्षण मणिपढियपण्णचा, पच धणुसताई आयामविक्खमंण मडाइजाइ धणुसयाइ थाहल्लेण सन्न मणिमती॥तीसेण मणिपाढयाए उार एत्यण एगेमइ दबसथाणिज पण्णचे, देव सयणिबस्स वणओ ॥ सेण पउमे अण्णण अट्र चप्पमाणमेचेण पठमाण सबओ समता सपरिक्खिता सेष पठमा अब जोयण आयाम विक्समेण ततिगुण स वैसस परिक्खेवण कोस वाहमण पसजोयणाइ उन्बहण कोस उसिया जलताओ सातिरेगाइ दसजोयणाइ सन्येगेण पण्णचाइ तेसिण पठमाण अयमेतारूवे वण्णवासे पण्णचे तजहा-इरामयामूला जाव गाणाम- णिमया पुक्सलस्थिमया ॥ ताओण काण्णयाओ कोस आयामविक्खमेण ततिगुणस बारिंग कर पावत् मणिका वर्णन मानना ॥ १९ ॥ उस रमणीय भूमिमाग के मध्य में एक मार्ग पालिका वा पाय सो धनुष्य की सम्मी चौरी अदाइ मो पनुष्य की मारी र मन मणिषयो। उस मणिपीठिका पर एक बरा देवपवन । पावापन का वर्णन परत मानना उस पारपाकी पासरफ १०८कपन रस से भापी ऊचा पाले को मापा योजना के मम्मे बारे में तीनगुनी स अधिक परिषि, पर कोशकबर, दस पोमन करे, एक काश पानी से पर, साधिकरण पोगन के सर मासाबर इन का इस रा वर्णन किया परस्नमव मूबी पापत् रिविष मानिरस्त पर पुपर स्युमिका पनकी कणिका एक कोष की मम्मी पौरो रस से दीन गुनो से अधिक • मकानकामासादुरामानुपासमायमीसमम प ४६५ अट्ठावन्न जोयणसत २ वणसड 21 पतुर्दश-जीशमिगम मप्र-तृतीय उपाय 48 विक्समेण उवरिं पण्णास जोयणाइ विक्खभेण, मूले तिण्णि सोले जोयणसए किंचि विसेप्ताहिया परिक्खेवेण, मज्झ दोगसत्तीसे जोयण सते किंचि विसे- साहिता परिक्खेवेण, उरिएग किंचिविससाहिया परिक्खेवेण, मूलेविच्छिण्णा मज्झसखित्ता उप्पि तणुया, गोपच्छ सठ ण सठिया सव्वकचकमया अच्छा, पत्तय २ पउमवरवेतियाइ पत्तेय परिक्खित्ता ॥ तेसिण कचणग पव्वयाण उप्पि बहु समरमणिजे भूमिमागे जाव आसयति, पत्त्य २ पासायवर्डेमगा सद्दा बावर्टीि जोपणिया उट्स, एकतीस आडे, मूल में एक सो योजन के चौहे । मध्य में पचचर योमन के चौटे और ऊपर पचास योजन के चहे हैं मूल में तीन सा सोलह योजन से अधिक परिधि है, मध्य में दो सो सैताम योजनसे अधिक की परािध है भौर ऊपर एक सो अवारन योजन की परिधि है मूल में विस्तीर्ण, मध्य में सकचित व ऊपर पतल हैं गोपुछ सस्थानवाले हैं ये सब कंचनमय स्वच्छ में प्रत्येक को एक २ पावर टिका प एक २ घनखण्ड हैं उन कचन गरि पर्वत पर पहुन रमणिय भूमिभाग है यावत् पान देव बैठते हैं बम कांचनागिरि पर्वत में पृषक २ मासादायससक हैं ये ६२॥ योजन के को है। * तीसरी पतित्ति में जम्बूद्वी का वर्णन 41 मर्थ समुपादा-पामग्रमापारी मान श्री घमाळक शरिन ओ बीतच पउमसत सहस्सा भवति तिमक्खाया ॥ २१ ॥ से केण्टेण भते । एव वञ्चति निलवतहहे ? निलवनबहे गोयमा ! निलवत दहेग तत्थ २ जाव उप्पलाति जाव सयसहस्म पत्ताइ निल्वतप्पमाति निलयत वण्णा भाति निलवत दह कुमारेय, एत्थसोचव गमो जाव णिलवत दह २ ॥ २२ ॥ निलयतण पुरास्थिम पञ्चधिमण दस २ जोयणाति अवाहाऐ एत्थण दस दस कचणग पन्वता पण्णता, तेण क्चणग पवता एगमेग जोयणसत उड्ड उच्चत्रेण पणूवीस २ जोयणाति उहण, मूले एगमेग जोयणस्त विक्खमेण मझे पण्णचरि जोयणाइ आयाम सपल इन तीनों परिधि के एक फोर वीस लाख कमल होते हैं ॥ २१ ॥ अहो भगवन् ! नोलवत द्रा मा नाम क्यों रम्बा ? अहा गौनम ! यहाँ पयकमल यास् साकल है, ये सब नाले पर्णवाले, नाली प्रभाषाले व नीलो कातिवाले हैं यहां नीलत द्रा कुमार नामक नाग कुमार देव राता। इमा ज्यान ममा देव असा मानना यावत् इस लिये नोलवत द्रा नाम दिया गया है ॥ २२ ॥ नीलमत पनि पू िपश्चिम में दश २ योनन के अंतर स बाधापने दश २ कांचनागिरि पति को हुने है ये फायनागार सब मीलसर २ पर्पत हाई ये कांचनगारे पत... यापन के ऊंचे, पस योमन के प्रकाशक रानापहार लाला सुदरमहायनी भाडामादमी 48 पर्दश मीवापिगम मूत्र तृतीय उपास नामाए देवा सन्वेसिं पुराम्छम पञ्चस्थिमेण कषणपन्यता दसरपकप्पमाणा उत्तरेणरायहाणी अण्णमि जयूहीवे चददहे एरावणदहे मालवतबहे एव एकेको णेयन्या ॥२५॥ कहिण मते ! उचर कुराए जवू सुदसणाये जबूपीढे नाम पीढे पण्णत्ते ? गोयमा ! जवूद्दीवे मदरस्स वपन्वयस्स उचर पुरच्छिमण नीलवतरस वासहर पन्बयस्स पाहिजेण, मालवतस्स क्खार पन्ययस्स पचत्यिमेण गधमादणस्स बक्खार पन्ययस्स पुरथिमेण सीयाए महा नदीए पुरथिमिल्लेकूले एत्थण उसरकुराए जवूपेढे नामपेढे पचजोयण सयाइ मायाम विक्खभण पण्णरस एक्कासीते जोयणसए किंचिविसेसाहिए परिक्खेवेण, बहुमझ- य दो ट्राचे ऐसेती पद दूर, एरावत द्रा व माल्यबन्ता का वर्णन बानना इन के अधिपति देव व उन सभी राज्यपानी सप का कपन पूर्ववत् मानना ॥ २५ ॥ भो मगवन् ! उत्तर कुरु क्षेत्र में नम्बू सदर्शन वृक्ष का मम्मू पीठ नापक पीठ का है ? भा गौतम, जम्बूद्वीप के मेरु पर्वध से ईशानकून हमीसपत पक्षस्कार पर्वत से दक्षिणदिशा में पास्पद गमवाकार नामक बसस्कार पर्वत से पश्चिमदिशा में अपमादन/पमदसा बसस्कार पर्वत स पूर्वदिशा में, सीता महानदी के पूर्व किनारे पर सपारकुरु क्षेत्र में जमापीठ नामा पर कहा है यह पचिसो योजन म सम्मा चौडा है पभरसो इसाची योजन स मंपिक परिधि in वीसरी प्रतिपत्ति में जम्बूद्वीप का वर्णन 4th भर्थ म बार-बामपारी धुनी श्री कमोमस सपिभी- जोयणाई कोस च विक्व मेण, मणिपेढिया दो जोयणिया सिंहासणा सपरिवारा ॥ २३ ॥ से केण?ण मते ! एव वुच्चइ कचणग पव्यया? गोयमा । कचणग पब्वया तेसुण पन्यतेसु तत्थ २ वावीओ उप्पलाइ जाव कचण वण्णाभाति,कपणग जाव देवा महिदिया जाप विहरति, उत्तरेण कचणगाण कचणिताओ रायहागीओ अग्णमि जयू तहेव सन्च भाणियन्त्र ॥ २४ ॥ कहिण भते ! उत्तरकुराए उत्तरकुरुइई नामदहे पण्म-वे ? गोयमा ! नीलवत्तस्सदहस्स २ दाहिणण अट्टयोती से जोपणसए एष व गमो पेयन्यो, जो नीलवतदहरस सम्बेसि सरिसके दहसरिस गोवनडेन में मणिपीविका यादों योगन की लम्बी चौटी। परिवार सहित सिंहासन है॥ २३ ॥ बहो मगमन् ! कांचनागरि पर्वत ऐसा क्यों नाम रसा! भो गौतम कोष. मामेरि पति पर सब पापत्य वगैग पापत् कांचन पर्ण मावि यामन् वह पिनग कुमार देव सर अपर रिया में कारनक कुमार देव की पनका राज्यपानी की वगैरा सब पूर्वपत् मानना ॥ २४ ॥ मो भगान् ! उधर कुरु क्षेत्र में प्रचरकरु द्रा का का? भो नौव! मील दा से ८१४९ पोरन दूर पर उत्तरकुदा का है इस का मन यन नीक से कामा इन नाप दर से करना कपनक पति पू पमिम किनारे पर काना पचर विभागवानी? का रामासादुर डाग मुखदेवनानी नागासाकी.

+ पतुर्दश-जीपामिग मूष तृतीय पा3 hr ति आयामीवक्तभेण साईरंगाई बचारि जोपणाइ माहल्लेणं सम्वन्मिई अच्छा सण्डा जाव पहिरूवा ॥ २ ॥ तीसेण मणिपेढियाए उवार एत्थण ९गामह जघूसुदसणा १०चा अट्ठजोयणाइ माइक्षण उइंउघवेण, अहजोयण उध्येहेण, दो ओपणातिखधे भट्ट जोयणं विसंमेण,जोयणाइ विडिमा बहुमझदेसमाए भट्ठजोयमा विश्वभेण, सातिरेगाइ भजोयपाई सव्वग्गेण पण्यचा, पइरामपामूला रयत पत्तिटिया विडिमा, एष चेसियरूपम अण्णमो आप सध्याइ रिट्टामय विठलखमा घेलिरुपहर बधा, सुमायबरनाय रूपपरमगविसालसाला, गाणाममिस्यविषिह साइप्पसाहा रूलिष पापत् प्रतिरूप ॥ २७ ॥ स मपि पीठिका पर एक परा भम् सुदर्षन पोपा माड पोवन का संचा, माषा पोजन का मि में का, दो पोमन का संघ, भार बोमन का पौरा, योगन की शास्वा मध्य भाग आठ योमन पौसा मोर सब पीसकर पद माषिक मा पोनन का इनके बन रत्नमप पूस है, चांदीमय हमतिष्ठित भर परिह रत्नमय कद, बैर्य रत्नपर मनोहर संघ गैरा चस्पवृक्ष के पर्णन भैसा मानना यापत् मुमाव पचम चांदी की धासा, मणि रस्नमय विषिष मनार की भाषा पश्चाता है, वैदूर्य रत्लपप पर है, एक सुपर्णमय पम के पार, जम्मूद रत्नमय +म+वीसरी प्रतिपचि में श्रमदीप का वर्णन ++ भनुपादकालमापारी मुनि श्री ममोहम्न सपि । देसमाए बारसजायणाइ बाहल्लेण, ताण तरच माताए .२ पदेस परिहाणीए सव्वेसु चरमतेसु दोकोसेण बाइल्लेण पण्णचे, सबकवणयामये अच्छे जाव पडिरये, सेण एगार पठमवरवइयाए एगेण वणसडेण सवतो समता सपरिदिखने अण्णओ दोण्हधि ॥ तस्सम जबुपीढस्स चउद्दिसिं चत्वारि तिसोमाणपडिस्नगा पण्णता तहेव जाव तोरणा नाव छत्तातिछत्ता ॥ २६ ॥ तस्सण जवूपढरेस उपि बहुसमरम णिव भूमिभागे पण्णसे से जहा नामए आलिंगपुक्खरेतिवा जाव मणि।तस्सण वहसमर- मणिजस्स भूमिमागस्स बहुमझदेसमाए एत्यण एगामह मणिपेढिया पण्णचा अट्ठजोयण मध्य में पारा योधन का नारा है, सत्पश्चात योदा २ कम ता दुवा घरमांत में दो कोश का मारा रे सप कपनमय स्वरा यामत् प्रतिरूप है इम को एक पपरर पेदिका व एक बनतण्ड चारों तरफ रो हु इन दोनों का वर्णन पूर्ववत् मानना उस नम्पीद के चारों तरफ चार तीसोपान सेतो यावत् तारण व सत्रपर छत्र काना ॥ २६॥ उस नम्यूपीट पर एक ही समरमणीक भूपि । नैम मादा का ता पापत् मषिका स सस रमपीप भूमि माग के पन्य में एक मणि पीठिका की है पर माठ योधन की सनी चौबीसोषिक चार पोमन की बारीकी सप..मणिमय समय सण पारा रानावरार लाना एखदेवमदापनी मात्रामसादी ८७ ॐ चतुश-जीयाभिगप पत्र-तृतीय उपा 1 मालाओ भूमिभागा उल्लोया मणिपेढिया पचणुसइया देवसयांणजे भाणियन्त्र ॥२९॥ तत्थ जैसे दाहिणिले साले से एगे मह पासायवडेसये पत्त कोस उडू उच्चत्तेण अद्धकाम आयामविक्खभेण अभूग्गय मुसिया अतो बहुसमरमणिज भूमिभागा उसाच्च। ॥ तस्मण वह समरमणिज्न भूमिमागस्स बहु मझदेसभाए साहासण सपरिवार माणियन्त्र ॥ ३० ॥ सत्यम जे पञ्चस्थिनिल्ले साल एत्थण एगे पासायव.सए पण्णते तचव पमाण ताईपिसीहासण सपरिवार ॥३१॥ तत्थण जेसे उत्तीरले साले तत्थण एगेमह पासायदडेमएपण्णते तचा पमा तेहिपिसीहासण सपरिशर तत्थण जसे उब- रिम विडिमग्ग साले पत्थण एगेगह सिद्धायतण पण्णत्ते कोस आयामेण अद्धकोस यावस् माला पर्यंत वर्णन पूछन् मानना भूमि माग है, उपर छत है पांचमा धनुष्य की मणिपीठिका और दव शयन है ॥ २९ ॥ जो क्षतिणादशा में शाखा है उन पर एक प्रामादायतसक है यह एक कोच का ऊचा, आधा कान का एम्मा चाहा व गगलत का अवलमान करता हो वैसा है अदर बहुत रमणीय भूमिमाग है या भूमिमाग के मध्य माग में पारपार साहव सिंहासन है ॥३०॥ ए९ि५ दिया हासन पर एक मासा यस है समका प्रमाण रोक मानादापसमा जस ब.६। परख परिवार रहित सिंहासन करनी ॥ ३१ ॥ जा पर दिशा में शाखा है उस पर एक सिद्धायतन है वह पक कोश का लम्ला, बाघा केश का घोसा, कुछ कप देव मोश का कर उप्त में अनेक सम, 48 तीसरी प्रनिपभि में म्यूद का वर्णन अर्थ .

. 411111 - *मनुवादक बासमधारी मुनि श्री अमोलक ऋषीनी + 6.41 पस, सवाणेच पचविटा, जबणय रत्तुमउयसकुमालपवाल पलयकुरधरी विचित्त मणिरयण सुरहिकुसम फलमारनमियसाला, सच्छाया सप्पभा सस्सिरिया सरबोया 'महिय मणाणिन्वइकरा, पामाइया दरिमणिज्जा अमिरुवा पडिरूम॥ २८ ॥ जयुएण सुदसणा ते घठदिसिं यत्तारि साला पण्णचा तजहा-पुरस्थिमेण दक्खिणेण - पचत्यि- मेण उर रेण, तत्थ जे स पुरत्थि मल्ले साले एत्थण एगेमह भवणे पण्णते-कोस आयामेण, अद्धकोसं विक्खौण, पैमण कोस उट्ट उच्चत्तेण, अणेगथभ सयासहरस धाराण तयेव पमाण पचवणुमताति उलउच्चत्तेण अढातिजाइ विक्खभेण 'जार वण्ण- सास मृद्ध सुकोमल प्रयास गपूर है विविध प्रकार के प्रणि रत्नमय सुगघि पुप्प, फल के मार से रम की शाखा नम्न बनी हुई है व छायावत कातियत, 1 श्रोक, उघाववन, अत्यत मन को सुखकारी, समकारी भीमरूप प प्रतिरूप है ॥२८॥ नम्म् मुनि वृक्ष के पुदि चारदिछिमें चार शाखा म्न में से पूर्व दिशा की खापर एक भवन करा पा एक झोक्ष का सम्बा, भाषा कोश का बौदा, म एक कोष का उचाप एक स्त५ वाला इम का वर्णन करना यावत् भवन के द्वार , पर्यंत प रानाहार ठालामपसमापनी भासामसारी नयम पाने चतुर्दश भीमामिगम सूत्र-तृतीय उपाय अटुसरण जबुण तदुच्चतप्पमाण मेवाणं सन्नओ समता सपरिक्खिता ॥ ताओणे जयुमो चचारि जोयणाइ उस उच्चचेण कोस उबेहेण जोयणस्वधे, कोसविक्खमेण तिनिजायणाइ विडिमा बहुमज्झदसमाए बचारि जायणाइ विक्खमेण सातिरेगाइ पचारि जायणाइ सव्वग्गेण वइरामयमला सोपेय घेतियरुक्ख पण्णा ॥ ३४ ॥ जएण सुदसणाए अवरुत्तरेण उत्तरपुरस्थिमेण एस्यण मणाढियस्त देवस्स चउष्ण सामाणिय साहस्मीण चत्तारि जब साहस्सीओ पण्णचाओ ॥ जबूएप्प मुदसमाइ पुरस्थिमेम एत्थण अणाढियस्स देवस्स घउण्ड अग्गमहिसीण पत्तारि जयओ पण्ण तामओ एवं सपरिवारो सध्या पेयध्यो ॥ जघूम जाव आयरक्खाण सुदसणातिहिं जोयणसइएहि इवाले १०८ मम्बू वृक्ष मूठ से व्याप्त में ये चार पोजन के उचे है एक कोश के अंडे, एक कोश का प, एक कोच के चौरे में चीन योमन की शाखा, मध्य में चार पोमन घौडे साँग साफिक चार यामन के। उन का पजग्नमय मूबी वगैरा स्प वृक्ष वर्णन पूर्ववत् मानना ॥३४॥ मम् पदर्शन मे बायन्यकून, चर दिशा शाकून में पनात देशा के पार हमार सामानिक दिया के पार रामार सापानिक मम्मू है, मम्मू सुदर्शन से पूर्व दिशी में परिवार सहित चार अप्रम रिपियों के पाप सोळा इमार मास्म रमादेष के मम्पूतों या मात्र परिवार माना. मसूबलाके बनक 4.+ वीसरी प्रतिपति नम्पदीप का वर्णन अर्थ +पनुवादबासमारीमुनि श्री ममामा मुरिमी विक्समण देल कासं उद्घ उच्चसणं अणेग सप्तन्निविटु वणो, निदि से तोदारा पंचधणुसया अड्डाइअधणुसर्य विस्खमेष,मणिपेदिया पचषणुसइया देश्छदोपवणुसय विक्समो सातिरंगे पंयधणुमयं उद उपण,तस्थण देवळदए अट्टमय जिणपटिमा जिणुस्सेहप्पमाणाण, एवं सम्बमिडायतम वाचव्या भाणियन्या जाव धूबकुडठ्या, उत्तिमागास सोलसविहिं स्याह उवेए तहेव ॥ १२ ॥ जबसदसणामूल बारसाहि पठमपरवपियहिं सम्यओ समता संपरिक्खिचा, ताओण पठमवरवेदिया। मरजो- पण उउयचेम, परधणुसयाइ विक्खभेग वष्णमओ ॥ ३३ ॥ अयूसुदसणा मपण रोग पान योग्य वीन दिशा में शीन द्वार को रे द्वार पांच सो पनुष्य के ऊरे बदाइ पनुपरे पस में एक पविपीठिका पापांच सो पनुरूप की समी पौरी, उस पर देव कसा पापांच सो पनुष्य का पौदा, सापिड पचिसो पनुप का ऊंचा, मख रबिन प्रतिमा बिन प्रमाण पी। इस पर सिमापन की सब कम्मला पूर्ववत् नामना पापत् धूप कूररो हुवेउसका परका मान सोडामहारानो समुशोमित ॥ ३२ मम सुदर्शन मरेमा बाहिर पर देदिका बारों और रामाचा बोजन की की पोचसो बमुख की चोरी पनेरापर्णम युक्त सम्मान र कोचारों बरफ पापी इंचा- पानामासार बाबा अमर मापनी नामसार 1 मग मूत्र तृतीय उप २ निप्पकाओ णीग्याओ जाव पडिरूवाओ वण्णओ भाणियन्वी जाव तोरण छत्ता। तामिण णदापुक्खरिणीण बहुमज्झदेसमाए एत्थण पासापवडेंसक पण्णचे कोसप्पमाणे अद्धकोस विक्खमेण सो चेव से वण्णओ जाव सीहासण सपरिवार, एवं दक्षिण पुरस्थि मण विपण्णाम जोयण। चचारिणदा पुक्खरिणीओ चत्वारि उप्पलगुम्मा णलिणा उप्पला उप्पलुजला तचा पमाण तहेव पसायवढेसको तप्पमाणो, एव दक्षिण, पच्चत्थिमेणवि पण्णास जोयणा गरि भिंगा भिंगणिभा चेव मजणा कज्जलप्पमा चष, सेस तहेव॥ जवूण सुदतणा उत्तरपुरस्थिमे पढम वणसड पण्णास जोयणाइ उग्गाहिचा कटी, छ, कोमल श्लक्ष्ण घठ'री, मठारी, पफ व रज रहिस, यावत् प्रतिरूप है इन का वर्णन वित् मानना पाप धोरण प छत्रपर छप है उन नदा पुष्करणी के पीच में प्रासादावतसक कहे हैं, F कोश के लम्बे, आधा काश क चौदे, पगैरह वर्णन जानना यावत् परिवार सहित सिंहासन कहना " दक्षिणपूर्व ईशानकौन में पञ्चाय योजन जाव यहाँ चार नदा पुष्करणो कही है जिन के नाम- ल गुल्मा, नलिना, उत्पला व उत्पल ज्वाला इन का प्रमाण पूर्ववत् मानना । ऐसे ही दक्षिण पश्चिम ऋित्य कोण में पचास योजन आयें या चार नदा पुष्करणी हैं जिन के नाम-भृगा, भृगणिभा, अमना व कजल प्रमा, शेप स पूर्ववत् जानना जम्बू सुदर्शन से पश्चिमउचर वायन्य कौन में' पञ्चाम 48 तीसरी मतिपचि में जम्मूदीप का पर्णन मन मर्थ - १ - प्रमुपादरु घामपार मनि श्री चमोल पिमी. यमप्तडहिं सवतो समता सपरिक्खिचा तजहा पढमेणें दोचाण तदेण ॥३१॥ ज सुद समाए पुरस्थिमण पदम घणसड,पन्नास जोयणाइ उग्गाहित्ता एस्थण एगेमह भवणे पण्णसे पुरथिमिल्ले मवणे सरिसे माणियब जाव सणिज, एवं दाहिणे 'पञ्चत्यिमेण उचरेणं ॥३६॥ जबूएप्प सुदसणाए उत्तरपुरत्यिमेण पढम वणसह पण्णास जोयणाइ उग्गहित्ता एत्यण चचारि पदापुक्खरिणीओ पण्णचाओ तजहा पठमा १उमप्पमा चेर कुमुदा कुमयप्पमा ॥ ताओण - पदापुक्वरिणीओ कोस आयामेण अडकोप्स विक्खमण पचवणुसयाइ उवेदेणं अच्छाओ सण्हाओ लण्डाओ घट्ठाओ मट्ठाओ पोषन के तीन पनखण्ट चारों सरफ घेष्टित ? प्रथम, द्वितीय व तृतीय ॥ ३५ ॥ म्यू सुदर्शन वृप से पूर्व के मयम पनम्बर में पचाम योजन नारे वप यहां एक पहा मनन कहा है, इस का वर्णन नेमे पूर्व दिशा में की नम्बू सुदर्शन वृक्ष की शाखा पर मयन का कहा वैसे ही जानना यावत् देव शैय्या पर्यंत काना एमेशा दक्षिण, पश्चिम व उत्तर का जानना ॥ ३३ ॥ जन्बू मुदर्शन से ईशाननून के प्रथम पनवम्ट में पचास यामन भाषे धो चार नदा पुष्करणी रही २ मिन के नाम-पा, पपमभा, कुमुदा, च पुदपमा, ये नदा पुष्करपियों एक कोच की स्मो, भाषा कोच की चोरी, पाय सो धनुष्य की कारामासादुर साशा मुखदेवसायनी मालाममावनी ।

। चनुग्मनीषामिगम मूष तृतीय उप COM निप्पकाओणीग्याओ जाव पडिरूवाओ वण्णओ भाणियन्बो जाव तोरण छत्ता॥ तामिण गदापुक्खरिणीण बहुमझदेसमाए एत्थण पासापव.सक पण्णचे कोसप्पमाणे अडकोस विक्खमेण सो चेव से वण्णओ जाव सीहासण सपरिवार, एवं दक्षिण पुरस्थि मण वि पण्णाम जोयण। चचारि णदा पुक्खरिणीओ चत्वारि उप्पलगुम्मा लिणा उप्पला उप्पलुज्वला तयव पमाण तहेर पसायवसको तप्पमाणो, एव दक्षिण, पञ्चत्थिमेणवि पण्णास जीयणा गवार भिंगा भिंगणिभा चेव अजणा कज्जलप्पभा चव, सेस तहेव॥ जबूण सुदतणा उत्तरपुरस्थिमे पढम वणसड पण्णास जोयणाइ उग्गाहित्चा कटी, सय, कोमल श्लक्ष्ण घठ री, मठारी, पफ प रम रहिन, यावत् प्रतिरूप है इन का वर्णन पूवित् जानना यावत् सोरण व छत्रपर छप है उन नदा पुष्करणी के बीच में मासादावसप्तक को , वि एक कोश के लम्बे, आधा काश क चौरे, पगैरह वर्णन नानना यावत् परिवार सहित सिंहासन काना एसे ही दक्षिणपुत्र ईशान कौन में पञ्चाय योजन जाव यहां चार नदा पुष्करणो कही है मिन के नाम- उत्पल गुल्मा, नलिना, उत्पला प उत्पल ज्वाला इन का प्रमाण पूर्ववत् मानना ऐसे ही दक्षिण पश्चिम नैऋत्य कोण में पचास योजन जाये या चार नदा पुष्करणी में जिन के नाम-मृगा, भृगशिमा, अमना प कमल ममा, शेप स पूर्ववत् भानना नम्बू सुदर्शन से पश्चिमसत्तर वायव्य कौन में पचास 4 तीसरी प्रविपत्ति में जम्बूद्वीप का पर्णन कम मर्थ . - - भनुपादक पाउन मुनि श्री मोत प्रपित्री - यणतहाई सवतो समता सपरिस्विचा तजहा पदमेणे दोघाण तक्षेण ॥३१॥ जयू सुद समाए पुरस्थिमेण पदम वणसर,पन्नास जोयणाइ उग्गाहिता एत्थर्ण एगेमह भवणे पण्णसे पुरथिमिले मवणे सरिसे माणियम्व जाव सणिज, एवं दाहिणेण पञ्चत्यिमण उत्तरेण ॥३६॥ जबूएण सुदसणाए उत्तर पुरत्थिमेण पढम वणसह पण्णास जोयणाइ उग्गहिचा एरथण पचारि मंदापुषखरिणीओ पण्णताओ तजहा पउमा पउमप्पमा चेय कुमुदा कुमयप्पमा ॥ ताओण' णदापुक्रवरिणीओ कोस आयामेण अहकोप्स पचधणुप्तपाइ उपेहेण अच्छाओ सण्हाओ लण्हामो घटाओ मट्टाओ योमन के तीन पनवम्द चारों तरफ चेष्टित में प्रथम, द्वितीय व तृतीय ॥ ३५ ॥ जम्यू सुदर्शन वृत से पूर्व के प्रथम बनम्बण्ड में पचास योमन जाये तब वहां एक पहा भवन कहा है, इस का वर्णन मैसे पूर्व दिशा में की नम्बू मुदर्शन तृप्त की शाखा पर मवन का कहा से ही जानना यावत् देव शैय्या पर्पस काना एमे हा दक्षिण, पमिप व उत्तर का जानना ॥ ३० ॥ मम्चू सुदर्शन से ईशानकून के प्रथम पनवम्ट में पचास याजन मावे वहां चार नदा पुष्करणी सी निन के नाम-पपा, पपममा, कुमुदा, मनमा, ये नहा पुष्करपियों एक कोच की स्मो, आषा कोश की चोरी, पांच सो धनुप की काशकराजासादुर साझा मुखदेवसायमी ज्वालाप्रमादमी.

MH चतुर्दष-मीवामिगम मूष-तृतीय उपास 4 स्लेवेण,मूलेविधिमे मम्झे सखिचे उपि सणुए,गोपुच्छ सठाणसठिते सम्व जबुणयामए मछे जाव पडिरूवे, सेण एगाए पउमवरवेश्याए एगेण धणसडेण सन्वतो समता सपरिक्सिचे,दोहवि वण्णओ,तस्सण कुडस्स उरि बहुसमरमणिजे भूमिभागे पण्णते जाव आसयति॥ तस्सण बहुसमरमणिजस्स भूमिभागस्स बहुमझदेसभागे एग सिहाय तण कोसण्पमाण सन्बा सिद्धयतणवत्तव्धया, जबूएण सुदसणाए पुत्यिमस्स भवमस्स दाहिपम दाहिमपुरथिमिस्स पासायवडेसगस्स उतरेण एत्यण एगेमहं कूडे पण्णत्ते तव पमाण सिदायतणच ॥ जवूषण मुदसणाये पाहिणजस्स भवणस्स पुरथिमेण पर पतमे, मोपुंछ संस्थानवाले हैं, सब मनन्दमय सच्य यावर प्रविरूप, सन को एक २ पर बेदिकाप एक २ पनलण्ड चारों और दोनों वर्णन योग्य उन कूट पर पान सप रमणीय भूषिमाग है, पावत्या देव बैठवे में इस भूमिमाम के मध्य में एक सिदापतन कोश प्रमाप का इस मिदापवन की बकम्पना मना बम् सुदर्शन के पूर्व के मान से दक्षिण में प दक्षिण-अमिकोण के मासादासक से उचर में एक परा कूट। इस का प्रमाण प पतम्यता पूर्ववत् मानना पो सिदा- मसन पर करना नमू मुदर्षन के दक्षिण के भान से में और भापिकोण के मामादारसा - तीसरी प्रतिपाद में मम्मू का वर्णन 42 अर्य मनुवारबनासमचारी पनि भी ममाम भापमी एत्थण बचारि गदा पुक्खरिणीओ पण्णचाओ तजहा-सिरिकता सिरिमड़िया सिरिषदा चेव तय सिरिणिलया, तपेव प्पमाण तहेव पामाय पडेंसओ ॥ ३७ ॥ जयूएण सुपसणातो पुरस्थिमिस्स भवमस्स उत्तरेण उत्तरपुरस्थिमिल पासाद बसगस्स पाहिणेम एस्थण एगेमह करे पण्णचे, अट्ठा जोयणाइ उड्ड उच्चत्तेण मूले पारस जोयणाइ आयाम विक्खमेम, मझे अट्ठ जोयणाइ मायामविक्सभेण, उरि यसारि जोयणाइ आयामविक्रमेण,मूले साइरेग सत्चत्तीस जोयणाइ परिक्खेवेग मझे सातिरेगाइ पाणुवीस जोयफाइ परिक्खेवेण, उवरिं सातिरेगाइ पारस जोयणाइ परि- बोबन मारे पहा पार नंदा पुष्करणी रही, उनके नाय, श्रीकांत, श्रीमदिता, श्री चदा श्रीनिलया. इन का प्रमाण भी पैसे नानना, मौर पीच में एक २ मासादासक नानना ॥ ३७॥नम् सुदर्शन मान से उचर में भौर ईशानसून के मान से दक्षिण में एक बाट कहा है, पर माठ पोमन का पारे, मूर में पारा योमन का सम्मा पौराई, मध्य में भाठ मोबन का सम्मा पौगो उपर चार योमन का सम्मा पौरा, मूल में साधिक सतीस योजन की परिधि है, मप में सार्षिक पचीस मेमन की परिधि , मौर उपर सापित बारह पोजन की परिधि मूक विम्बारवाल, मध्य मे सकुलित प्रधानामावरादुर लाछा मुखदरसायनी मामासादमी . + चतुश जीवामिगम सूत्र-नृमीय उपाठ 4 पुत्यिमेण उसरपुररियमिल्लस्स पासायवर्डेसगरस पञ्चत्थिमेण एत्थण एगे मुह कूड पण तथैव पमाण तहेर सिद्धायतणच॥३८॥जधू सुदसणा अण्णेहि बहुहिं तिलएहि लवएहि जाब रायरुक्खेहिं नदी रुक्स्वेहि जाव सव्वता समता सपरिक्खिता। जबृएण सुदसणाए उरि बहवे अट्ट मगलगा पण्णता तजहा सोस्थिय सिरिवच्छ,किण्हा चामर झया जाव छत्ताचिछत्त। ॥ ३९ ॥ जबएण सुदसणाए दुयालस नामघेजा पण्णचा तुजहा- सुदसणा, अमोहाय, सुप्पबुद्धाजसोहरा ॥ विदहा जबू सोमणसा, णीतिया णिच्च मडिया ॥ १ ॥ भद्दाय विसालाय सुजाया, सुमणाविय सुदसणाए, जबूते नामधज्जा दुवा- लसा ॥ २ ॥ ३९ ॥ से कणटेण भत ! एवं वर्चति जब सुदसणा ? गोयमा ! कूट का वर्णन पूर्वपत् मानना सिद्धायउन... कहताः ॥ ३८ ॥ नम्बू सुदर्शन धृक्ष श्री भासपास अन्य बहुत सिल लग यायस् । नदी वृक्षण रई हुवे, जम्मू मुदर्शन पर पटुत माठ २ मगलिक उपया-स्वस्तिक श्रोषस्त, कृष्ण ! चमूर यावन् छत्रातिछत्र ॥ ३९ ॥ * जम्पू-मुदर्शन के बारा नाम को । मुदर्शन,२अमोपा ३ मुभवृद्ध ४ यशोधर ५ पिदेह,६ जयू मोमनसा ८ णियता ९ मुभद्रा, . • विधाला, " समाया, १२ मुदर्शन ॥ १९ ॥ महो मगवन् ! सुदर्शन नाम क्यों कहा? अहो मातम ' मम्मू सुदर्शन पर मम्बूद्वीप का अधिपति भनाधृत नामक मददिक यारत् 42 मीसरी प्रसिपत्ति में जम्बूद्वीप का पर्गन 41 . मर्थ A भनुरादर-पास्त्रमप्रारी मुनि श्री ममोहक ऋपिभी दाहिणपञ्चस्थिमिजस्स पासायबढेसगस्स पञ्चत्यिगेण एस्थण एगे कड़े ॥ जबुए 'दाहिणल्ल गवमस्त भवमरस पचत्यिमेण दाहिणपञ्चत्यिमिल्लपासा, पुरस्थिमेण एत्थेण एगे कुठे पण्णचे ॥ जबुतो पचत्विमिन्नरस भवणस्स. दाहिणेण, वाहिणपञ्चयिमि- लस्स पासायवठेसगस्स उच्चरेण एगे मह कुद्धे पण्णत्ने, एत.चय प्रमाण सिहायतणच जपए पचस्थि भवणस्स उत्तरेण उत्तरपञ्चस्थिमिलस्स पासायबसगस्स दाहिणेण एत्थण एग कूडे पणते तचेव ॥ जम्बए उत्तरिल्लरस ‘भवणस्त पञ्चत्यिमण उत्तर पञ्चत्यि पासायवर्डिसगस्त पुरदियमेण एग मइ कुठेपण्णत्ते तव 'जवु उत्तर मवणल पश्चिम में एक पटा कूट है मम्बू मुदर्शन के दक्षिण दिशा में भवन से पश्चिम में मघापकॉप के मासा- दायवसक से पूर्व दिशा में एक पहा कूट नम्पू सुदर्शन के पश्चिम कमान से दक्षिण में स्प- कौन के मासादावतसा से उचर में एक मरा पूर है जम्बू सुदर्शन में पश्चिम के भवन से ! उत्तर में रायपकौन के प्रासादायवसक से पूर्व में एक घटा कूट का है. जम्मू के उत्तर दिशा के मान से पधिम में प पायव्य कोण , पासादावत सक से पूर्व में एक पहा कूट कहाँ है जम्मू मुदर्शन मुंह से रचर दिशा के मान से पूर्व में व ईशान कौन के प्रासादायकसम से पश्चिम में एक मंदा फूट का है सप प्रकाश राम बहादुर छाना मुबारसायनी पाउाप्रमादी 1 ।

न . 6 घमुईश जीमाभिगम सूत्र तृतीय उप - दीवस्स सासते णामधेचे पण ते जण्मकायापिणासी जाव मिच॥४१॥जद्दीवेण मते! कति चदा पमासिसुवा पभासतिया पभासिस्सतिया, कतिसूरिया तर्विसुवा तवतिवा तविस्तातिवा, कतिणक्वता जोय जोएएवा जोयातिया जोइस्सतिया कतिमहग्गहा चार परिमवा वरसिका चरिरसतिया, केवतिताओ तारागण कोडाकोडीओ सोमेमुवा सोभतिवा सोमिरततिया ? गोयमा ! जघूहीवेणदीवे दो बदा पभासिसुवा ३, दो सरिया सर्विसुवा ३, छप्पण्ण पक्वता जोग जोएसुवा ३, छावत्तर गहसत चार चरिसुवा १, एगध सतसहस्स तेवीस स्खलुभव सहस्साइ णसया नही या रेता नहीं यावत् निस्य है ॥४१॥ सम्बद्वीप में कितने पद्ने माध किया किसने घट काश करते हैं किसने चद्र मकान करेंगे, किसने मूर्य सपे, किसने तपते हैं किसने वगे, कितने, कितने नक्षत्रों ने पोग किया, किसने योग करसे में किसने योग करेंगे कितने गृह घले, कितने चलते परितने चलेंगे, किसने बारामोंने श्रोमा की, किसने मारा शोमा करसे हैं पकिसने सारा घोमा करेंगे। मारो गौषम ! अमाद्वीप में दो पढ़ने मकास निया दो चद्र प्रकाश करते हैं, दो चन्द्र प्रकाश करेगे, दो मूर छ, तपते २ व पंग, ५६ नक्षत्रने योग किया, करते हैं प योग करेंगे, १७६ ग्रह चार घरे, चार परवे पचार चाँगे, एक लास वेनीस इनार पघाम कोडाकोट वारागप बोभिव हवे, शोमते व बांगेंगे यह st वीसरी प्रविपचि में जम्बूद्वीप का वर्णन 8 अर्थ .

+-पापारी मुनिश्री मनोहर पानी अयू सुपसमाते अयूदीवाहिवती भगाढिते नाम देवे महिडिए जाव पलिओ- पम ठितीए परिवमति, सेण तस्थ पउहं सामाणिय साहस्सीण जाव जधुदीपस्स अमृसुदसपाए अणालियाते रापहागीर जाव विहरति ॥४. ॥ कहिण भते । भाटियस्स दबस्स अवाडिया नाम रापहाणी पण्णता ?गोयमा! जबूद्दीवे २मदरस्स पन्वयस्स उत्तरेण सिरि एव जहा विजयस्स देवस्म जाव समत्त रायहाणीए महिहिए अदुचरंचेण गोयमा ! अबूदीवे सवे सत्व २ देसे २ बहवे ज रुक्सा जबूवणा जबू, वणसहा जिव कुसुमिया जाब सिरिए अतीव २ उपसोभेमाणे २ चिट्ठति, से तेण?ण गोपमा ! एव पुषति जपू दीवे दीये । अदुस्तरपण गोयमा ! जमूदीवस्त फसोस की स्थिति वागदेव रावा बार बार सामानिक पावत् पमहीप का बम् सुदर्शन का बनापून रामपानी का अधिपति पमा रमा दुम पावत् विचरता ॥ ४० ॥ महो मगवन् ! मनात देशी बनाव राम्बानी का सीमो मौन' बद्दी मे पर्वव से उचर में वर्गों सबमविकार विमय देवकी विजया रामपानी से नाना पावत् महानिक भवा महो गौतम! पप स्थान २ पर पम् वृक्ष मम्बा सम्पनकर सदैव फसफस पाके यावत् सुधामित बहो मोम इसलिये मम्मूदीप अवमा भवनारदीप का नाम वापसी पर कदापि प्रकाशनाबारमासदेवसरणीमाम प्रसादमी . - । सत्र ४८३ - चतुर्दशनीवामिगद मूष सृतीय उपान ARH सपरिक्सिविचाण चिट्ठइ,वण्णो दोण्हषि,साण पउमवर वेड्या अट्ठजोयण उड्ड उच्चत्तेण, पंचधणुसय विक्व मेण लवण समुह समिया परिक्खेवण सेस तहेवाशातेणवणसहे देषणाइ जाव विहरति ॥४॥ लवणरसणं भते ! समुदस्स कइदारा पण्णसा? गोयमा चचारि पारा पण्णचा तजहा विजये, विजयते, जयते, अपराजिते ॥ जद्दीवे विजयाइ सरिसा ॥ कहिण भते ! लवण समुदस्स विजए णाम दारे पण्णचे ? गोयमा ! लवणसमुहस्स पुरथिमापरते धायइसडे दीवे पुरस्थिमद्धस्स पचत्यिमेण सीमोपाए महानपीए उपि एत्थण लवण समुद्दस्स विजय नाम दारे पण्णत्ते भट्ट मानना पर पेदिका आया योमनकी ऊंची, पांचसो घनुष्यकी चौड़ी और लवणसमुद्रके जितनी परिधि पाली सी हुई है, शेप वैसे ही काना ॥ ३ ॥ पनवण मी कुच्छ कम दो योजन का है यापत् विचरता ॥ ४ ॥ अहो मगवन् !' छवण समुद्र के किसने द्वार कड़े हैं? अहो गौतम ! लवण समुद्र के चार दार कहे हैं यथा-विजय, वैभयत, मयत व अपराजित ये जम्बुद्वीप के विनय सहश है अहो भगवन् ! लवण समुद्र का विमय द्वार को कहा है ? अहो गौतम ! छवण समुद्र के पूर्व दिशा के भत में पाकी खप दीप से पश्चिम में सीतोदा पहा नदी पर लवण समुद्र रा विनय द्वार कमाई' पहभाठ MH तीसरी प्रतिपचि में लषण समुद्र का वर्णन +1+ मर्य - अमुवारक-माणमारी मुनि भी भोक अपिमी- पण्णासा तारागण कोटीकोडीण मोमवा सोमैतिवा सोमिस्सतिया ॥१२॥ जबृद्दीव णाम दीव लवणे नाम समुद्दे वलयागार सठाण सठिते सन्यो समसा सपरिक्खिचाण चिट्ठइ ॥ ॥ लवणेण भते ! समुद्दे किं समयकवाल सठिये विसम पकवाल सठिये ? गोयमा ! समयकवाल साठत नो विसम चकवाल सठिए।॥२॥ लपमेण मते !समुद्दे केवत्तिय चकवाल विक्खभेण केवतिय परिक्खेवेण पण्णी गोयमा । लवणेण समुद्दे दो जोयण सहस्साइ पकवाल विक्खमेण पण्परस जोयणे सयसहस्साह एमाप्ती सहस्साइ मेगाणचचाल मय घठयाप्त किंचि विसेमूण परिक्षेण पण्णने सेण एगाए पउमघर बेइयाए एगेणय घणसदेण सव्यतो समता पम्प अधिकार सपूर्ण हुपा ॥ ४२ ॥ मा छरण समुद्र' का अधिकार करते हैं सम्बद्वीप के पारी वरक माण समुद्र य से माफार मे रहा हमारे ॥॥ भो भगमन् ! सण समुद्र या सबका सस्थान बाला है या विषय पर सस्पान पायो । यो गौतम ! समचक्रवात संसान पामो परंतु विषम वफबाट बाग ना, ॥२॥ महो ममान् ! सवम समुद्र पास में विना बोरा और उसकी परिप किवनी ! भो गौतम ! पण समुद्र दो सास योजन का पागाउ में पौरा गौर पमरा खास कासी हमार एक सो गुनपचास योमन में काम की परिधिौ जिसकी नासपात एक पार मोदिका सपनसमा पारो तरफ परा पारे इन दोनों का वर्णन पत पकाधक रामारादुर काका राजदेवसहायमी बाणमादमी.

3 मन लषणा जहा विजयरायहाणीगमो, उट्ट उच्चतहा ॥ लवणस्सण भते ! समुदस्स दास्तरय एसण कवइय अहाए अतरे पण्णत्ते १ गोयमा ! तिण्णि जोपणसय सहस्माइ पचणउइ सहस्माइ दुण्णिय असीए जोयणसये कोसच दारतरे लवणे जाय अवाहाए भतरे पण्णचे ॥ ७ ॥ लवणतण भते समुहस्स एएसा धाईय सई दीव पुटु। तहव जहा जबूद्दीवे, धायइसडेरि सोचव गम। ॥ ८ ॥ लवणेण भत ! समुद्द जीवा उदाइत्ता २ सोचेव विही एवं घायइ सडेवि ॥९॥ स केण?ण भते ! एत्र वुच्चइ लवणे समुदे ? गोयमा ! लवणेण समुद दिशा में जयंत का काना पो मगवन् ! लवण समुद्र का अपरामिव द्वार को कहा है ? से ही राज्यपानी सचर में मानना और सप कपन पूर्ववत् काना बहो मगवन् ! लवण समुद्र के द्वार २ का कितना असर कहा है ! यो गौतम ! तीन लाख पवान हनार दोसो बम्ती योजन व एक कोश का एक द्वार से दूसरे द्वार तक भतर का है '' ७ ॥ महो मगार ! लपण समुद्र को घासकी सण्ड द्वीप स्पर्शा हुवा है ? यों जैसे जम्बूदीप छवण समुद्र का कहा से है। काना ॥ ८॥ महो भगवन् ! लक्षण समुद्र के नीव वा से परकर घातकी खण्ड में उत्पन्न होने है ? यो जम्बूद्वीप जैसा इस का मी करना ॥ ९ ॥ अहो मगवन् ! लवण समुद्र ऐसा नाम क्यों कहा? अहो गौतम ! करण समुद्र का 4. सशजीपाभिगम सूप-तृतं य उपस अर्थ 43 तीसरी प्रतिपचि में लवणनमुद्र का वर्णन - मुवादक-वासनपारीमान श्री भमोमक अपिजो जोयपाइ उड्ड उच्चतेण चत्वारि जोयणाइ विक्खमण, एवं तर सव्व जवू दीवस्स विजयसारस जाव अट्ट मगलगा ॥ १५ ॥ से केण?ण मते ! एव बुच्चइ विजय दार ? विजयदार जो अट्ठो जवू दीवस्स॥४६॥ कहिण मते ! लवणगस्त विजयरस विजयानाम रायहाणी ? गोषमा ! विजयस्त पुरत्यि तिरिमसखेज अम्मि लवणे यारस्त जडीवग सरिसा वत्तव्यया जाव सम वेजयतपि अप्पणिज्जण गमेण लवणस्स दाणेण रायहाणी, एव जयतेवि, तस्मवि रायहाणि पच्चत्यिमेण ॥ कहिण मत! लवण समुदस्स अपराईए तहव रायहाणी उत्तरेण अपरायस्स देवस्स अण्णम्मि पोमन का मचा, पार सोमन का चौदा यो मा मम्मूदीप क विजय सदृश यावत् माठ २ मगल कहे है ॥ ५ ॥ भो मगमन् ! पिनय द्वार ऐसा क्यों नाम कहा? महो गौतम ! असे नमूदोप के विषय द्वार का कपन किया वैसे ही यहाँ मानना ॥ ६ ॥ महो मगधन् ! छवण समुद्र विमप देव की रिमपा राम्पपानी का पारो गौतम ! विभयहार से पूर्व वीर्ण असल्यात द्वीप समुद्र का उल्लघन करे बहा मन्य सान समुद्र बावा उस में पारामार योजन मवगारकर भावे या विषया राज्यपानी की इस का सब कपन मम्मूदीप की विजया राज्यपानी जैसे काना ऐसे ही पैजयत का काना, ऐसे ही इस सपान वैवपक्षी नामक वष समुद्र की राज्यपानी का कपन दक्षिण दिशा में काना ऐसेर पमिम प्रकाशक-राजारादुर लालामुखदेवमायनी भासामसादजी गर्य 8 चतुर्दश मीषामिगम एप-सृतीय उपास सविसुधा ३ । पारमुसरे पक्खचसय जोएसुवा ३ तिण्णि वावण्णा महग्गइसया चारि परिसुवा दुणिय सयसहस्सा सचट्टि च सहस्सा नवयसया तारागण कोडिकोडाण सोभिंसुषा ३ ॥ ११ ॥ कम्हाण भते! लवणसमुहे चाउद्दष्टुसमुट्ठिा पुण्णमासिणीसु अतिरेगं २ वमृतिवा हायतिवा ? गोयमा ! जवुद्दीवस्सण दीवस्स घउपिसिं घाहिरबातो घेझ्याती लवणसमुह पचाणउति जोयणसहस्साति उग्गाहित्चाएत्थणचचारि महाअलिंजर सठाण सठिया महति महालया महापायाला पण्णता तजदा-वलयामहे केतुबे जये, ईसरे ॥ तेण पाताला एगमेग जोयण सतसहस्स उवेहेण, मूले दसजायण करदे हैं व प्रकाश करेंगे पैसे ही पार सूर्य तपे, सपते हैं न वगे, ११२ नक्षोंने चद्रमादिक के साथ योग किया, करते हैं प करेंगे, सीन सो पावन या क्षेत्र में चार पळे, चलते हैं व चखेंगे, दो लाख सहसठ इमार नबसो मोटा कोटा धार शोमे, शोमते हैं व शोभेगे ॥ १५ ॥ो भगवन् ' एवण समुद्र का पानी चतुदर्शी, मष्टमी, अमावास्या व पूर्णिमा को अत्यत अधिक २ क्यों वृदिपाता है और क्यों कमी होला । अर्थात् मरखी बोट क्यों होता है ? महो गौसम ! जम्बूद्वीप के चारों दिशी में पादिर की विदिका के अवसे पण समुद्र में ९५ हजार २ योजन मापे पर्वा महा मलिंजर (कुम) के सस्यान पाल घार 4वीसरी-प्रदिपीच में उवण समुद्र का वर्णन 42 मर्थ सुभ -- . अर्थ कामनुगदरबारमारी मुनी श्री नमोस पिनी - उदये अविले रहले लवणे लिंसखारए कहुए अप्पेजे बहुण दुप्पय चउप्पय मियएसु पक्खिलरीलवाण णण्णत्यत जोणियाण सत्ताण उठिय, एत्थलवणां हिंबई देव महिटीये।। पलीभोवमठीए सेण सत्य सामाणिय जाब विहरई, से तेणठण गोयमा ! एवं वुधति लषण समुई २ अदुत्तरचण गोयमा! लवण समुद्दे सासये जाप णिच्चे ॥१०॥ लवणेण मते ! समुद्दे कइथदा पभासिवा पभासिंवा पभार्सिस्सतिवा, एव पचवण्हवि पुच्छा ? गोयमा ! लवणसमुद्दे चचारि चदा पमासुिवा ३ पत्तारि सुरिया पानी लाण असा है, निर्मछ नरे, पंक कर्दमपात है, गोपर का रस मैसा, वारा पानी है, तीक्ष्ण पानी है, कटुक रस है, पीने योग्य नहीं है, मृग, पशु, पक्षी, सरिसर्प इन को पीने योग्य नही उस में उत्पन हुवा नीवों को उस पानी का मार है, परतु दूसरे के लिय या बाहर नही है इस लिये इसका सवप समुद्र नाम का है और भो यहां पपणाधिपति महर्दिक यावत् पस्योपमकी स्थितिवाला देव बापी। पा सामानिक देव यापस् पात पापण्यंवर देवरदेषियोंका मषिपविपना करता हुवा विचरा महो गौतम! इस लिये इस का नाम पण समुद्र मयबा पण समुद्र शापत पारत निस्प है ॥10॥ भो में कितने पद्ने प्रकाश पिया, प्रकाश करते। प प्रकाश करेंगे ! यो सूर्य, ग्रा, नक्षत्र र वाराणों की मी पृच्छा करना मो गौवम ! पण समुद्र में चार चद्रने प्रकार किपा, प्रकाश मायक राजापहादुर काटा घुसवमहापभी माममादमी भगता लवण समुद्र .

. EART++ चतुर्दश जीवाभिगम मूत्र तृतीय उपा • मझिालेतिभागे उवरिल्लेतिभागे तेण तिभागे तेत्तीस २ ओयण सहस्साति तिष्णिय सेचीसे जायणसये जोयणति मागच बाहल्लेण, तत्थण जे से हेडिल्लेमागे एत्थण वायकायते सचिट्ठति, तत्थण जे से मझिल्लेतिमागे एत्थण घाउयाएय आउयाएथ सचिट्ठति तत्थण जे से उरिल्लेमागे एत्थण माउयाते सचिट्ठति ॥ १२ ॥ अदुचरण गोयमा ! लवणसमुदे तत्थ २ देसे २ बहवे खुहालिंजर सठाण सठिया खड़पायाला पण्णचा, तेण खष्टा पायाला एगमेग जोयणसहस्स उबेहेण मुले एगमग जोयणसत विक्खमेण, मज्झएगपदेसिया सेढीए एगमेग जोयणसहस्स विक्खभेण, उपि मुइमुले पामेग जोयणसत विक्खभेण ॥ तेसिण खुश प्रभजन इन पातास बसों के बीन माग किये है नीचे का माग, मध्य का माग प ऊपर का माग ए. २ मागचीस हजार तीन सो सेवीम योभन प एक योजन के तीन माग में का एक भाग का मादा है इन में से नीचे के माग में पायुकाप, पीच के माग में वायुझाय व अप्काय साय और ऊपर के माग में मात्र थप्काय रे ॥ १२॥ और भी अहो गौसम ! लवण समुद्र में बहुत छोटे अलि नर क भाकार पाले छोटे पासाल कलम है प एक हार योजन के उड़े हैं मूल में एक एकमो योजन के चौरे हैं पहा से एक २ मदेश परते २ मध्य में एक इभार योमन के चौटे। वहां से एक प्रदेश कम RI वीसरी मतिपचि में लवणसमुद्र का वर्णन 4hre अर्थ 12 मनुरादक-मानवापारी मुनिश्री अमोसस पिनी सहस्सति विक्संमेण, मझे एगपदेसियाए सेढिए एगमेग जोयणसहस्स विक्खभेण, उरि मुहमूले दस जोयणसहस्साइ विस्व मेण, तेसिण महापायालाण कुट्टा सव्वस्थ समा दसदस जे यणसय बाहाला पण्णता, सव्ववइरामया अच्छा जाव पडिरूवा, तस्यण बहवे जीवा पोग्गलाय बक्कमति घिउक्कमति चयति उववजति सासयाण ते कुट्टा पवट्ठयाए घण्णपनवेहिं गधपजवेहि रसपजवेहि फासपज्ववेहि मसासया ॥ तत्थण चत्वारि देवा महिसिया जाव पलिओवमठितीया परिवसति तजहा काले महाकाले चलय पभजणे ॥ तेसिण महापायालाण ततोतिभागा पण्णचे तंजहा-हडिल्लतिभागे मातास फसच कहे हैं, जिन के नाम । पटगमख, २ केतुमुख ३ यूष और ४ ईश्वर ये पाताल कलश एक साल याजन क भल में उर में मूल में दश हमार योजन के चौर , प से एकक प्रदेश की अणि से पढते • मध्प पीच में एकास योमन के घो। पा से प्रदेष कम रोते २ ऊपर दश मार यामन करे। उन की ठोकरी सर्वत्र समान मारपन में हैं, एक मार योनन की जाती है पर मनरत्नमय निर्मल यावर प्रतिस्प है पावन बीव पदल जाते हैं उत्पन्न होते प चरते हैं पाटीकरी द्रव्य से पावती, भार पर्ण, गध, रस प स पर्यप से भशानी महदिक मा समव यामन् परयोपम की स्पिविनाले चार देव र मिन के नाम-कास, महाकास, संग प्रकाशक-रामानगदुर काळा मुखदेवमहायमी बालामसामी. मर्थ .

+ चतुर्दशनीवाभिगम मूत्र तृतीय उपान the अट्ठय घुलसिया पातालसता भवति तिमक्खाया ॥ १३ ॥ तेसि महापातालाण खुशग पातालाणय हिट्ठिम मझिलेपतिभागेसु महवे उराला पाया ससेयति समुच्छति पतति यति कपति खुज्झति धदृति फदति तत भाव परिणमति, जेण उदयउता- हिजति ॥जचाणं तेसिं खुडा पायालाण महापायालाण हेडिल्ले मझिल्लेसु तिमागेसु वह उरालिय पाया सत्यतिसमुच्छति एयति वेयति कपति खुज्झति घट्टति फदति ततभाव परिणमाति,तयाण से उदये उण्णाहिबति२, जयाण ते खुश पायालाण महापायालाणय सब पीसकर नम्बूद्वीप में सात हमार आठसो चौरासी पापाठ कलम कहे हैं ॥३॥ जप पाताल फस के गेटे पासास कमश में पीप का पनीचे का दिमाग में सर्ध्वगमन समाष वाळे वायु काय उत्पन्न * मूसित होते हैं, हिलसे हैं, पळसे , कपित होते हैं, सुब्ध वें है ष सघट होते हैं, परस्पर सर्पपण ते है, और उस भाष में परिणमसे है जर पानी ऊंचा छळसा, और जप पा फलश के वीसरी प्रविपचि में लपणनमुद्र का वर्णन 4 मर्प + चारों बटे कलश के मध्य मे मा २ गेटे कलशों की नव लट है प्रथम ला में २१५, दूसरी में २१६ मा २१७, २१८, २१९, २२०, २२१, २२२, मोर २२३ कलश की नवमी म्ट है इसी तरह चारों का की भासपास सद माना यह सब सरके कमश सामिल करने से पूर्वोक्त संस्सा होती है म्र + अमुपादक-पात्रमचारी मुनि श्री ममोपक मिमी पायालाण कुडा सन्यस्यसमा पसजोषणाइ बाहल्लेण पण्णचाइ, सन्वयारामया मम्छा जाव पहिरूवा ॥ तत्थण बहवे जीवाय पोग्गलाय जाव असासयावि परोय २ भद्धपालओषमठितीयाहिं देयेताहिं परिग्गहिया ॥ तेसिण सुङग पायालाण ततोतिभागा पपण-सा तजहा इदिनमागे मझिलेमागे उपरिले- भागे, सेणतिमागा तिणि २ तेतिस जोयणसत ते जायणतिभाग च बाहल्लेण पण्यचा, तस्थण जे से इंडिल्ले मागे एत्यण वाउयाए सचिट्ठति, मझिल्लेतिभागे धाउयाते माठयातेय उवरिले माउयाए, एवामेव सम्यावरेण लवण समुहे सत पायाल सहस्सा हातेर पर के मुख स्थान एरसो पोजन के पौटे। इन गटे पातास फळशकी ठिकरी सत्र समान इस पोजन की मादी सम प रत्नमय स्वच्छ, यावत् प्रतिरूप हैं पापात भीष व पुल भावे , से पत्र में पागकरी द्रव्य से शाश्वतीस वर्ण, गप, रस र पर्श पर्पर से अशाचती है, वहां भाप परपोपम की स्थिति वाले देव रहते हैं इन छाटे पाताल के सीन विभाग किये। उपर का, मायका नीचे का प्रत्येक माग तीनसो तीदेसी पोमन ए एस योजन के तीन भाग मेसे एकमाग का इस में से सब से नीचे के माम में वायु है, पम्प भाम में वायु पानी मौर पर के मागर्म पानी * प्राधा-रामाबहादुर साळा सुखदेवसहायत्री पानमसादमी. वर्ष FA चतुर्दश-मीमाभिगम सूत्र सृतीय उप 4RH लवणसमुद्दे तीसाए मुहुत्ताण दुखतो अतिरेग २ वट्टतिया हायतिया ? गोयमा ! उदमतेसु पातालेसु वड्डति आपूरतेसु पातालतु हायति स तेणटुण गोयमा ! लवण सीमाए दुक्खुचो अतिरग वकृतिवा हायनिधा ॥ १५ ॥ ल्वणसिहाण भते । केवइय चकवाल विश्वमण कवइय अतिरग बहुतिवा हायतिया ? गोयमा ! लवणसिहाण एसजायणसहस्साइ चक्कबाल विक्खभेण देसूण अजोयण अतिरग वडतिया हायनिवा ॥ १६ ॥ लवणस्सण मते । समुदस्स कतिभागसाह स्सीआ अब्भतरिय खेलधारेति,कइ नागसहस्मीओ बाहिरिय वलधारति, कइ नागह- स्सीओ अग्गोदयधारोते ? गोयमा ! लवणसमुहस्त वायालीस मागाहस्सीओ महो गौतम ! पाताल कलश से पानी वृधि पाके उचा पछता है, वह वायु से पूगना है, छोटे बडे वास सच में हानि पाता है. इस म पो गौतम ! पण समद्र में सीम मुर्त में पानी दो पक पटना है वहीन होता है ॥५॥ अहा भगवन् ! सण समुद्र की शिस्वा झिमनी नाल चौदाइ में है किसनी पदवी व फम होती है ? अहो गौतम ! लनण समुद्र की शिखा ६ हजार योजन चक्रवास चौदाइ में है और भाषा योजन में कुच्छ कप की जिवा पर बेछ घनी घ कम होती है ॥१॥ हो मगवर ! सवण समुद्र की आभ्यतर पसको कितने हमार नागदेव धारते हैं और किमने नागदेव पादिर की पळ पारकर रखते है और कितने नामदेव विसापर का पानी पारकर रसते है। भदो 1 तीमरी पनिपचि में लपणनमुद्र का वर्णन मर्थ . परममुपादक-पाएसमपारी मुनि श्री अमोलम्ब समिती हेछिल्ले मझिल्लेसु तिमागेमु यहवे उराले जाव तंतभाव परिणमति, तयाण से उदये नो उन्नाहिजइ ३ अतरा वियण ते वाया उदीरति अंतरावियाण से उदये अण्णाहिबति ४ अतरावियण ते वाया नो उदीरेति अतराधियण से उद्गेण उण्णाहि- जति भतरावियण से उदगे णो उम्गाहिज्वति एव खलु गायमा ! लवणेण समुद्दे घउद्दस मदिट्टपुष्णमासिणीसु अतिरेगर पडतिवा हायतिव॥१॥लवणेण भतेसमुद्द तीसाए मुदुचाण कतिखुचो अतिरेग घडतिश हायतिया ? गोयमा ! लवणेणसमुद्दे तीसाए मुद्दचाण दुखुत्तो मतिरेग वकृतिया हायतिवा ॥ से केणटेण मते ! जाव लेटे फरश के नीचे पपीच के विमाग पायु र गमन स्त्रमानवत नहीं होते हैं यावत् सस माष में नहीं परिणम पानी कंधे उसलमान इस रा अहोरामि में दो पक घायु उत्पन्न होता है तब पानी दो वक्त ऊचा उमलता है इसी से पोराभि में दो पक भरती पोट होता है भर पाताल कलश में वायु नहीं चस्पन होता है सपा का पानी नहीं उछलता है इससे महो गौतमालपण समुद्र में चतुदर्शी, भी अमावास्या पूर्णिमा को पानी भपिकरपरता है मौर घटवारे ॥१४॥मो भगवन्! छवण समुद्र में तीसगर्वमें कितनी बक पानी परमारकमा होता! भो गौनमादोवार पानी पदता म कमी होसारे महा मगर ऐसा कि सि करा किपर समुद्र में वीस मुहूर्त में दो बार पानी पसायीन होता? महाशक-रामापठादुरलाला मुपदेवसमायमी प्वालामसाहो .

४१ म चतुर्दश-भोपामिगम सूत्र तृतीय पन - लवणसमुद्दे तौसाए मुहुत्ताण दुखतो अतिरेग ३ वदतिया हायतिवागोयमा ! उपमतेसु पातालेसु षडति मापुरतेसु पातालतु हायति स तेणटुण गोयमा ! लवण सीमाए दुक्खुचो अतिरग वडतिया हायतिया ॥ १५ ॥ लवणसिहाण भते ! केवइय चकवाल विचमेण कवय अतिरग वहतिया हायतिमा ? गोयमा ! लवणसिहाण इसजायणसहस्साइ चकवाल विक्खभेण देसण अजोयण मतिरग वडतिधा हायनिवा ॥ १६॥ लवणस्सण मते ! समहरम कतिभागसह स्सीओ अन्भतरिय वेलधारेति,कइ नागसहस्सीओ बाहिरिय वलधारति, कइ नागह- स्सीओ अग्गोदयधारोते ? गोयमा ! लवणसमुहस्स पापालीस नागराइस्सीओ महो गौतम ! पावाल फमश से पानी वृद्धि पाके उर्धा पछता है या वायु से पूगना है, छोटे पढे पताल कमश में हाचि पाता है. इस म हो गौतम ! सरण समुद्र में तीस मुर्स में पानी दो वक्त पदना रहीन होता है ॥५॥ महा भगवन् ! लवण समुद्र की शिखा किमनी नयाळ चौहाइ में है कितनी बहती व कप रोती है ? भो गोठम ! करण ममुद्र की शिला दश हजार योजन चकवाल चौडाइ में है और आधा गोमन में कुच्छ कम की सिखा पर पेठ पहनी य कम होती है ॥१७॥ अहो मगवन् ! सवा समुद्र की भाम्पतर बसको किसने हजार नागदेव पारते हैं और किमने नागदेव पादिर की पेच भारकर रख है और कितने नामदेव शिलापर का पानी पारकर रखते हैं। भो ++ तीसरी पनिपचि में लपण समुद्र का वर्णन ११ भर्ष उन मनुसारक-पासममवारी मुनि श्री भमोमक प्रापिनी अमितरियवल धारैति बपचारि णागसाहस्सीओ बाहिरिय घेल धारेति, सर्टि नागसगहस्सीओ अग्गोदय धारैति, एवामेव वावरेण एगाणाम सयसाहस्सी बावरिंच मागसहस्सा भवतीति मक्खाया ॥ १७॥ कतिण भते । बेलधरणागराया पप्पप्ता ? गोयमा । पसारि बेल्धरा गागराया पण्णचा तजहा गोथूभे सिवए सखे मणोसिलए, एतेसिण मते ! घउण्ड वेलधरा नागरायाण कति आवास पन्वता पण्णता ? गोषमा! बचारि भावास पन्चता पण्णतातजहा गोत्थूमे दमओमासे सखे दग- सीमये ॥३८॥कहिण मते गोथुमरस वेलधर गागररायिस्स गोथूणाम आवसपन्वते मौतम ! ४२ इमार नागदेव हमण समुद्र की आम्पतर बेल पारकर रखते हैं, ७२ हजार नागदेव बाहिर की पेर पारकर रखते हैं, और ३० इमार नागदर मनोदक घारकर रखते हैं सब मीलकर एक लाख पम्मारामार नाम देव होते हैं ॥ १७ ॥ बहो मागवन् । पलघर नागरान रितने को? ओ गौतम अपर नागराम पार को थमा-गोस्तूम शिव, शंख और मनोशिश मो मगवन् ! इन पेनपर नामरामा के कितने बापासत कोयो गौतम ! चार भावास पर्वत कहे सपणा-गोस्तुम दनमास, बल और दगसीमक । १८ ॥ महो मगान् ! गोस्तुम नागरामाका गोस्तुम मापात पवि * मसराम-रामारहादुर लामा मुखवसायमी ज्यानसादमी मर्य ४२५ द चादेश जीवामिगम मप्र-तृतीय नपान - पण्णचे गोयमा! जबूहीवे २मदरस्स पुरथिमेण लवण समुह वायालीस जोयण सइस्तात उगाहिता एत्थण गोथूभस्म वेलधर णागरायिस्स गोथभे णाम आवासपवते पण्णचे, सत्तरस इकवीसाइ जोयण सताइ उन उच्चत्तेण चत्वारि तीसे जोषण सते कोसच उन्हेण मूलेदस बावीसे जोयणसते आयाम विक्व मेण मज्झेसच तेबीसे जोयण सते भायामविक्खमेण, उरि चत्वारि चउवीसे जोयण सए आयामविक्खभेण, मूले तिमि जोयण सहस्साइ दोणिय बचीसुतरे जोयण सए किंचिविसेसणे परिक्वेषेण मज्झ दो जोयण महरसाइ दाणिय चुल मयति जोयण सते किंचि विसेसूणे परिक्खेवेण, कहा कहा ? अहो गोमग ! मेरुपर्वत से पूर्व में लघणसमुद्र से ४२ हजार योजन अवगाहकर जाये या गौस्तुभ घर नागराजा का गौस्तुभ नामक भावास पर्पत रहा है यह सचरह सो इक्षीस योजन का मचा चारतो सावीम याजन गरा ( पाणी में) है मूल मे एक इनार वापीस योजन का लम्या चोदा (गो) है वाच में सात सो वीस योजन का लम्बा चौडा [ गोल] और उपर पारमो पापीस याननका लम्बा चौटा [गो) है मूलमें तीनहजार दोसो पचीस पोजन में कुछ कम की परिधि है, पीच में दो हजार दोसो पै.राची योजन से कुच्छ कम की परिषि है मौर ऊपर एक- + वासरी प्रतिपचि में छवण ममद्र का वर्णन 42 अर्थ ~ नपावरपासनमवारी मुनि भी भमोलख पनी वार एग जायणसहस्स तिष्णिएडयाले जोयणसते किंांचे विसेसूणे परिक्षेवण, मूले विच्छिण्भे, मझेसस्वित्ते, उप्पिं तणुए, गोपुच्छ सठाण सठिते, सन्न कणगामये अच्छ जाव पहिरो ॥ सेण एगाए पठमवर वेदियाए एगेणय घणसटेण सन्वतो समता सपरिक्विचे दोण्हवि षण्णओ ॥ गाथूभस्सण आवास पन्वयस्म उवरि बहुसम रमणिबे भूमिभागे पण्णत्ते जाध आसयति ॥ तस्सण घडुसमरमणिजातो त्यण एगे मइ पासाययडे सटे पण्णचे, यावष्टुिं जोयणघ उद उच्चचेण संचेष पमाण अडू मायामयिकसमेण षण्णमो जाव सीहासण सपरिवार ॥ १९ ॥ से केण?ण मते ! (मार तीनसो इकतालीस योमन के कुछ कम की परिधि मूर में विस्तीर्ण, बीच में सचिन पकार सीनो गोपुंछ संस्थान पासा है सब कनकपप निर्मस यापत् प्रतिरूपी उन की मासपस एक पपवर वेदिका व एक बननद दोनों का वर्णन पूर्ववत मानना गोप्तूम आपास पर्वत पर बात रमणीय मूर्षिमागो यावत् का देवता पेठदे। उस रमणिय ममिमाग के बीच में एक परा प्रासादावसक गापा॥ योमन का संचार योगन का सम्मा चौरा यावत् परिवार सहित सिंहासन का है ॥ १९ ॥ अहो मगवन् ! गोस्तूम नापास पर्पत स्पों कहा? बडो गौतम ! मोस्तूम .प्रकाशराजापहादुर लामा मुखदेवमायमी मारमममादमी सूत्र 48 चतुर्दश-भाषामिगम मूत्र-तृतीय उपाय 40 एव वुधइ गोयूमे आवास पन्वते ? गोयमा ! गोथूम आवाप्त पन्वते तत्थर से २ तर्हि २ बहुओ खड़ा खुडियाओ जाव गोथम घण्णाइ तहे जाव गोथूभे, तत्य देवे महिडिए जाव पलिओवमठितीये परिवसति, सेण तत्थ चउण्ह सामाणिय साहस्साण जाव गोधुभस्म भावास पन्वतस्स गोथूमाये रायहागीए जाब विहरति ॥ से तेगटेण जाब णिच्चे ॥ २० ॥ रायहाणि पुष्छा ? गोथूमस्स आवास पत्रयस्स पुरत्यिमेण तिरिय मसखेजे दीव समुद्दे वीतीवतिता अण्णमि लवण समुह तचेव पास पर्वत पर स्थान २ पर बात छोडी पटी वावरियों हैं यावत् गोस्तूम के पूर्ण जैसे पहन कमल हैं यो सब पूर्ववन् काना यावत् यहां गोस्सूम नामक देवखा राता है पर महद्धिक पावत् परयोपम की स्थिति पाला है वह परी घार हजार सामानिक यावत् गोस्सूम बावाम पर्वत व गोस्सूमा राज्यापानी का अधिपतिपना करता दुवा विचरता है इसलिये इस का नाम गोस्तूम मामास पन का है यावत् बह निस्य है ॥ २० ॥ अहो भगवन् । गोस्तूम देव की गोस्तूमा राज्यधानी कहाँ है ? माो गौवम ! गास्तूम आवास पर्वत से पूर्व में असख्यान द्वीप ममुद्र उम्पकर नाषे वहां अन्य पण ममुद्र में गोस्तूम दव की गोस्तूमा राज्यघानी नहीं है इन का प्रमाण मर्थ तासंग प्रमिपचि में प्रवण समुद्र का पर्णन +18 - प मनुवादक-पानापारी मुनि श्री मोककपिपी- तमाम तहेव सन्ध ॥ २१॥ कहिण मते ! सिगस्त बेलधर णागरायिस्स दगभा- सेणाम आवास पाणते ? गोयमा ! जबुद्दीघेण दीवे मदरस्स पवयस्त दक्खिणेन लवणसमुद्द बायालीस जायण सहस्सात उगाहिता एरथण सिषगरम वेल्धर णागरापिस्स दगभासे नाम मावशम पव्यते पण्णच, तचेव पमाण ज गोथूभस्स पधरि सब अकामय अच्छे जाव पडिरूवे जाव अच्छा भागियन्यो ॥ गोयमा । बगभासेण आवास पन्वये लवण समुद्दे अट्ट जोयाणये खत उदय सन्वता समताओ भासति उबोवेति तवति पभासेति सिवय एत्य देवे महिष्ठिये जाव रायहाणी से गैरा सपकम्यता निमया राज्यपानी मैस भानना ॥ २१ ॥ मो भगवन् ! शिष नामक घेलपर नाग रामा का दगमाप्त पर्वत करा! बो गोठम ! नम्पद्वीप के मह परंप से दक्षिण दिशा में मपण समुद्र में पीयालीस इमार योजन भावे यहां शिव नामक वेलपर नाग राजा का दगमास भाषास पति का इस का सप कपन गोस्तूम बावाप्स पर्वत से काना विशेष में या पर्वत सब अंक- रत्नमय सर पारस् सप भर्य काना मो मगपन् ! दगमास भाषाम पर्वच ऐसा क्यों नाम का मा मातम ! दगमास भागास पर्पत छपप समुद्र के पानी में चारों मोर दीसि करता है, उपोत करवा रे, उपता है, कांति परावा है मौर महा शिव नामक मादिक देव रहता है, इस लिये इस का दगमास मर्थ •प्रकाशक-राजामहादुर छाला सुखदेपसायनी मासाप्रमाद.

सन * चतुर्दशनीशमिगम सूत्र नृतीय उपास Men एक्षिणेण, सिविगादगमासस्स सेण तव ॥ २२ ॥ कहिण भते। सखस्स घलधर गागरायिस्स सखणाम भावास पन्वते पण्णचे ? गोयमा ! जबूढीवे मदरस्प्त पबयरस पत्थिमेण पायालीम जोयण एत्थण सखस्स घेलधर सखेणाम भावास पवते तचव पमाण नबर सवश्ययामये अच्छे ॥ सेण एगाए पउमवर दियाए ९गेण वणसडे जाय भट्टे पहूउ खड्डा खुडियाओं जाव बहुइ उप्पलाइ सखवण्णाइ सखप्पभाइ सखवण्गप्पभाइ सख तत्थ देवे महटिए आव रायहाणी 4 वीस प्रतिपति में रुपण समुद्र का वर्णन 48 मर्थ पर्वत नाम कहा इन की रापपानी दगमाम पर्वत से दक्षिण दिशा में है शेप पैसे ही चानना ॥ २२॥ मा भगवन् ! श्ख नामक पेपर नागरामा का शस्त्र नामक यावास पर्वत का कहा है ? अहो गौतम ! मम्मूदीप के मेरु पर्वत से पश्चिम में लवण समुद्र में बीयालीप्स इनार योनन भावे यहां इस नामक घेळपर नाग राजा का प्रख नामक आवास पर्वत कहा है इस का प्रमाण गोस्तूम जैसे जानना परतु यह सा रूपामय है निर्मल यावत् मतिरूप है इम की भासपास एक २ पपरर वेदिका घ पन मक महो भगवन् ! शख आवास पर्वत ऐसा क्यों नाम रखा ? महो गौतम ! यहां पात पाय- राहियों प्रमुख में यावत् शख असे वर्ण वाले बहुत कम प्रमुख उत्पन्न होते हैं शस्त्र जैसे छावण्य, । A. मनुवादक पात्रभारी मुनि श्री अमोळा पिजी + परियमेण सखस्स आवास पल्लयस्स सखा रायहाणी तचर पमाण ॥ २३ ॥ कहिण भते । ममोसिलकस्स बेलधर जागराइस्स उदगीमयेणाम मावास पन्वते पणते ? गोयमा ! जबदीवे २ मदरस्स उचरे लवणसमुह बयालीस जोयण सहस्साई उगाहिया एत्यण मणोसिलगस्स बेलधर णागरायिस्त उदयसीमय णाम मावासपन्वते पण्णते तंचव पमाण णवर सव्यफालहामये अच्छ जाव अट्ठो, गोयमा ! दागसीमतेण मावास पन्वते सांतासीतायाण महाणदीण तत्थण तासोए पहिहम्मति से तेण?ण नाव मिश्च ।। मणोसिलये तत्थ देवे महिडिए जाव सेण विनती वा शलदेष मादिक याष गाता। इस की राज्यपानी पश्चिमदिशा में है इस का प्रमाण पूर्ववत् मानना ॥ २३ ॥ यो मगपन् ! मनोसाठक रछपर नागराना का दगमीमा नामक आवास पर्षत का का। महो गौतम ! जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत से उच्चर दिशा में लवण समुद्र मे पीयालीस मार योभन भगाकर जाये यहां मनोसीटक नाग राजा का उदासील आपास पर्षत कहास का प्रमाप पैसे पानना विशेष में सा स्फटिक रत्नमय सच्छ यावत् प्रतिरूप है इसका सर अर्य पूपित् वानना मो भगवन् ! दाप्तीमक आवास पर्वत ऐसा क्यों नाय कामा गौतम! मीता सीतोदा पर नदियों का मवाद इस मागास पति पर माता है मौरइस मेगाकर पीण समुद्र में मील मावा •मकामरामारसाक्ष बाला सदव सहायनी मालामा ई 1 पतुर्दश-जीवामिगम मूत्र-तृतीय उपा +gire तत्य चउण्ह सामाणिये जाव विहरति ॥ कहिण मते ! मणोसिलगरस वेलधर णागराइस्स मणोसिलाणाम रायहाणी ? गोयमा | दगसीमस्स आवास पन्वयरम उत्तरेण तिरिये असखेज जाव अण्णमि लवणे एत्यण मणोसिलाणाम रायहाणी पण्णता, तथव पमाण जाव मणोसिलए देवे कणगकेरयय फलिहमया वेलधरा नामावासा अणुवलधर राइण पन्बया होति रयणमया ॥ १४ ॥ कातिण भते । अणुवेलधर णागरायाणो पण्णता ? गायमा ! चत्वारि अणुवेलधर गागरायाणो पण्णचा तजहा ककोडए कद्दमए कतिलासे अरुणप्पभे ॥ तेसिण भते ! चउण्ड कहा यावत् नित्य है अहो मगवन् ! मनोसीस वेरूघर नाग राजा की मनोसीला राज्यपानी का है ! बहा गौतम ! दगमीमा भाषास पर्वव से उधर में तीर्घा असरुपात द्वीप समुद्र उल्लघार आगे पहा मन्य लपण समुद्र में गनोसीला नामक राज्यधानी कही है यावत् वहां मनोसीगण देव राता है पहिला मागास पर्वत कनकमय है, दुमरा आषास पर्वम अक रत्नपय, नीसरा भावास पर्वत चांदीमय और चौथा भाषास पर्वत स्फटेक रस्नमय है॥ २४ ॥ बो भगवन् ! अनुवेलघर माग रामा कितने को ! महो गौतम । अनुदेल पर नाम रामा पार कहे हैं उयया-१ फकोटक, २ कर्दमरू, ३ कैलास अर्थ तीसरी मतिपधि में लवण Rमुद्र का जप Hit ५ मनुसारक पाहमचारी मुनि श्री ममोडक यांनी अणुरेलधर जागराईण कइआवासपन्वया पण्णचा ? गोयमा ! बचारि भावास पन्यया पण्णता तजहा ककोडए कद्दमए कहलासे अरुणप्पमे ॥ २६ ॥ कहिण भते ! ककोडगस्स अणुवेलधर णागरायस्स कक्कोडए णाम आवास पन्चए पण्णते ? गोयमा ! जबुद्दीवे २ मदरस्स पन्बयस्स उत्तरपुरत्यिमेण लषणसमुह पायालीस जोपणसहस्साइ भोगादिचा एत्थण ककोडगरस जागरायस्स ककोडए णाम आवास पन्यए पण्णत्ते सचरस एकवीसाति जोयणप्सयाति तव पमाण ज गोथूभस्स, पवर सन्वरयणामए अच्छे जाव निरवसेस जाव सीहासण सपरिवार और ४ मरुषप्रम मो भगान् ! इन चार मनुवेलपर नाग रामा के कितने आपास पर्षउको ? भो गौतम ! इन पार मापास पातका तयया । कोटक २ पर्दपक लास मोर ४ अरुणपम ॥ २५ ॥ मो ममरन् ! कर्कोटक नामक मणुषलघर नाग राजा का कोटक नामक भाषास पर्वत का! मो गौवम ! बम्बद्रीप मेरु पर्वत से ईशान कौन में बाण ममुद्र में ४२ हजार योमन अवगार कर मारे पा कोटकामाग रामा का कर्कोटक मागास पर्वत कहा है या १७२१ यामन का समाबगैर यो गोस्वम पव का परिमाण का पा सब इस का मानना विशेष में पा रस्नमव है निर्मक पावत् प्रवितो यावत् परिवार सहित सिंहासन बानना. इस का पर्व- पास ये परी पारियों में मकायक रानापहार काला सुखदषसहापमो पायामसादनी मन्त्र पईश-जीपाभिा सूत्र तृगाये उपाय 428+ भट्ठो से महूइ उप्पलाइ, ककोडग पमाइ सेस तचैव मवर ककोडग पच्चयस्स उत्तरपुरस्थिमेण एक्तचेव सव्व कदमसवि सो चेव गमआ अपरिसेसओ पवर दाहिण पुरस्थिमेण मावासो विज्जप्पभारायहाणी,दाहिणपुरस्थिमेण कइलासेवि एक्चर णवर दाहिण पचत्थिमेण कहलासवि रायहाणि, ताएचेव विदिसाए अरुणप्पभेवि अवरु चरेण रायहाणीवि, ताएगेव विदिसाए चत्वारिवि एगपमाणा सव्वरयणामयाय ॥२६॥ कहिण भत । सुट्ठिय लवणाहिवइस्स गोयमदीवे पण्णवे ? गोयमा ! जबुदीमे पीवे मदरस्स पन्ययस्स पथरिथमेण लवण समुद बारस जोयण सहस्ताइ भोगाहिता उत्पळ वगैराहोते कोटा मेसा प्रकाश है, शेष सप सही कहना इसकी राज्यपानी ईशान कौनमें है बदमकका भी रिज़पता रहित यह ममिळाप कहना परंतू पहा मग्नि कोण काना इस की राज्यपानी पियुत्ममा मानना केलासका भी पी जानना परतु यहाँ नैऋत्य कोण में काना मौर इसी दिशामें इसकी 4 रापपानी काना अरुणाम का वैसे तो कहना परतु पायव्य कोण में कहना और इसी दिशा में राम्पधानी भी काता पारों का प्रमाण समान मानना सप रत्नमय है ॥ २६ ॥ महो मगवन् ! लवण समुद्र का मधिपति सुस्थित देवका गौतम ! नापक द्वीप कहां कहा है ' अहो गौतम ! जम्यूद्वीप के मेह पर्व से पश्चिम दिशा में लपण समुद्र में पारदरमार योजन बाचे वहां रण समुद्र का अधिपति 4 सीसरी प्रविपत्ति में लवणममुद्र का वर्णन ++ अर्थ आस-पासमचारी मुनि श्री भमोडक झाली. अणुवेलधर पागराईग कइआवासपन्वया पण्णचा ? गोयमा ! चचारि भावास पन्चया पण्मता सजहा-कफोडए कदमए कइलासे अरुणप्पमे ॥ २६ ॥ कहिण मते ! फकोहगस्स अणुवेलधर पागरायस्स ककोडए णाम आवास पन्चए पण्णचे ? गोयमा ! जवुद्दीवे २ मदरस्स पन्बयस्स उत्तरपुरस्थिमेण लषणसमुद वायालीस जोयणसहस्साइ भोगाहिना एत्यण कक्काढगरप्त जागरायस्स ककोटए नाम आवास पन्चए पण्णचे सचरस एकवीसाति जोयणसयाति तथेत्र पमाण ज गोधूमस्स, णवर सन्वरयणामए अच्छे जाव निरवसेस जाव सीहासण सपरिवार ४ अरुणाम भो भगवन् ! इन चार अनुवेलघर नाग रामा के किवने आवास पर्वतको ! भो गौतन कपार मागास पर्वत को यया पोटक २ कर्दमक ३ लास भौर ४मरुणाम ॥ २५ ॥ मो मगरन् ! फकोटक मामक समुधर नाग राजा का कोटक नामक भावास पर्वत का! मो नौवम ! मम्मदीप के मेक पर्वत से ईशान कौन में साग ममुद्र में ४२ हजार योमन अबगार पर मारे वा बजेट माग रामाकारोंटक मारास पर्पत है या १७२१ यामन का जमावगेरा मो मोस्तुम पर्वत का परिमाण का पा सब इस का मानना विशेप में या रस्नमबरे निर्मक पात् मविरुणो यावत् परिवार सहित सिंहासन मानना इस का पर्व-पार बहुत पिपरी पारियों में मकारक-राजापहार छाला सुखदेपसायमो मामासादनी और पईश मीरामिा मूष तृगाय पा++ भट्ठो से यहूइ उप्पलाइ, ककोडग पमाइ सेत तपेव णवर ककोडग पव्वयस्स उत्तरपुरस्थिमेण एवतवेव सब कदमसवि सो चेव गमआ अपरिसेसओ गवर दाहिण पुरस्थिमेण माशसोविग्जुप्पभा रायहाणी,दाहिणपुरत्यिमेण कइलासेवि एवघर णवर दाहिण पञ्चत्थिमेण कहलासवि रायहाणि, तारचेव विदिसाए अरुणप्पभेवि अवरु चरेण रायहाणीवि, ताएचेव विदिसाए चचारिवि एगपमाणा सव्वरयणामयाय ॥२६॥ कहिण भत ! सुट्ठिय लवणाहिवइस्स गोयमदीवे पण्णते ? गोयमा ! जवुदीवे दीधे मदरस्स पव्ययस्स पञ्चत्थिमण लवण समुद बारस जोयण सइस्लाइ ओगाहित्ता स्पळ पगैरो कोटा पैसा प्रकास है, शेप सप सही कहना इसकी राज्यपानी ईशान कौनमें है कर्दमकका भी विशेषता रहिव पद मिलाप करना परतू यहां भमि कोण कहना इस की राज्यपानी पिपुरसमा मानना केळासका मी पैसी मानना परतु यहाँ नैऋत्य कोण में पाना मौर इसी दिशा में इसकी राज्यपानी काना मरुपमम का वैसे ही काना परसु पायव्य कोण में काना और इसी दिशा में राज्यपानी भी कहना चारों का प्रमाण समान मानना सप रत्नमय है ॥ २६ ॥ महो मगवन् ! लवण समुद्र का अधिपति सुस्थित देवका गौतम ' नापक द्वीप कहां कहा है ' अहो गौसम ! जम्बूद्वीप के मेह पव से पश्चिम दिशा में लपण समुद्र में पारामार योमन नारे यहां पण समुद्र का अधिपति कर तीसरी मसिपचि में लघणममुद्र का वर्णन ++ अर्थ अनुवादक-मालसामाचार्गमुनि श्री अमेसा अपमी - . एस्षण सुट्ठिय लषमाहिवइस्म गोयमा दीवे णाम दीवे पण्णचे, बारस जायण सहरसाइ आयामविक्रमेण सत्चतीस जोयण सहस्माइ नवय अडयाले जोयणसये किंचिविसे साहिये परिक्वेवण, जंबूडीव दीवतण अद्धकृप गणोति जोयणाइ घचालीसच पचाणउति भागे जायणरत ऊमिए जलताता लवणसमुद्दतेण दो कोसे ऊसिए जलतातो सेण एगाए पउमरवदियाए पगण वणमहेण सन्यता समता तहेब घण्णा दोण्हवि ॥ गोयमदीवस्तम दीवरस अतो बहुनमरमणिज्बे भूमिमागे पण्णत सेजहा णामए आलिंग जाय आसयति ॥ तस्तण पहुसमरमाणिज मुस्थित देवका गौतम दीप सारे पापागार योजन का सम्मा चौसरा ३७९४८ पोमन सरा मपिक की परिधि पद्वीप परक ८८५ याजन व एफ योजय के ९५ भाग में के ४० माम पानी मे कया है और सब समुद्र की दिशी में पानी स दो पोस ऋचा है इस के एक पधार दिशा व एकमनल इस भरी सर वित कहना गातमी प के अदर बहुत रमणीय भूमि मामी से मारसा उस वगैरा पूर्ववत् पाना, यापत् पा बहुत दर पेठने । बस रमणीय भूमिमानके पम में समाधिपति मुस्वित नामक देव का एकमरा भारोगास नामक मपि विरार काया ६२॥ पोमन का पायोचना गरे भनेक संमाया पगैरर पर वर्षय काना मकाया-नानासादर मामा ससदेनमगवनीमाल प्रसादमी. - भामिमागरस १५०५ +11 पदंश भागभिगप मूत्र-मृताय उपाय - बहुमझदेसमाए एत्थर्ण सुष्ट्रियस्स लवणाहियइस्स एमे मह आकीलावासे णाम भोमेज विहारे पमसे बावर्टि जोयणाति अजोयर्ण प उड्ड उच्चत्तेण, एकतीसं जोयणाइ कोसच विक्खमेण अमेगस्वभसते सण्णिविट्ट सन्धमोमवण पणो भाणियध्वो ॥ माकीलावासस्सणं मोमजविहाररस भतो पहुसमरममिजे भूमिभागे पण जाव मणीण फासो तरसण पहुसमरमणिजस्स भमिभागस्त बहुमझदेसभाए एस्थण एगे मणिपेठिया पण्णचा, सा मणिपढिया दो ओयणाति आयाम विक्लभेष जोयण पाहल्लेण सन्यमणिमई अच्छा आव पडिरूवा॥ तीसेण मणिपेढियाते उरि एस्थण देवसयणिजे पणते घण्णओसेकेणष्टेण भंते! एवं माझीरापास भूमि विहारमें पहुस रमणीय भूमिमाग रे पावत् मणिका पद पसबहुत रमणीय भूमि माग के मध्य में एक मणिपीठिकाफी या मणिपीठिका दो पोजन की सम्पी चौडो एस्योगन की प्रारी शेष पूर्ववत में इम पणिपीठिका पर एक देवशयन का इस का पर्षन पूर्ववत मानना' बहो मगमन् ! गौतमदीप ऐसा नाम क्यों कहा ! हो मौतपा गौतमीप में बहुत सस्पस क्रमस पावत् गोसप जैसी ममा पाने में इस छिपे ऐसा का पापड मिस्प है बहो माम् ! सामाधिपान सुस्थिव नामक देवकी राज्यामी कहाँ सीसरी प्रविपत्ति में ळवण समुद्र का वर्णन नर्य त्र मनुवादक-पास्त्रमवारी मुनिश्री अमोलसमापिभी कर वुधइ गोयम दीय दीवे 'गोयमा ! गोयमदविण होवे तस्य २ देसे र तहिं २ बद्दइ, उप्पलई जाव गोयमप्पमाई से तेण?ण गोयमा ! जाय णिचे ॥ कहिण सते ! सुट्टियस्स लवणाहिवइस्त, सुष्ट्रियाणाम रायहाणी पण्यचा ? गोयमा | गोयम दीवस्त्र परिधमेण तिरियमसखेजे जाध अण्णमि स्वर्णममुहे घारम जोयण सहस्साति ओगाहिला एव तहेव सब जाव सट्रिएदेवे २ ॥ २७ ॥ कहिण मते ! अयुद्दीवगाण पदाण घपदीया णाम दीया पाणचा ? गोयमा ! जंबुद्दोघे दीये मदरस्त पनपस्स पुरस्थिमेण लवणममुह बारस जोयण सहरसाइ आगाहिता एत्यंण सोभा गौतम गौतम दीपक मे पसिनीला मागाईप सन्द गल्लया जाये या दूगो सामगमुद्र बारा योमन अवमाकर मारे मस्थित देवकी गम्यमानी जी पर सब पर्णा पूर्ववत मानना यावत सुपित देव रामा ॥२७॥ भो भगान् ! अम्मूदीपक पदका चंदाप का कारभा गौतम ! नम्पद्वाप के मरु पर्वत स पूर्व में मपण समुद्र में बारामार योमन अवगाह कर भाषे पो भदीप रेप का पद नामक दिपा पा मम्दापकी तरफ ८८॥ योमन - एक योमन ९५ मान में से ४० मान बिना पानी से काम समुत्र की- बरफ हो कोषका पानी से । प्रकाकागानादुर बाला मुखदेवमारायसी यालामसादनी . अर्थ * पचनीयामिमम एष-मृतीय पान साबुद्दीवगाण चदाण वदीयामाम दीवा पण्णता, जद्दीयं तेण अडेकूणणउत्ति ओयणाति चत्तालीसच पचाणउति भागे जोयणस्स ऊसिया जलतातो लवण समुहतेण दोकोमे ऊसिता जलतातो बारस जोयण सहस्पति आयाम विक्खभण सेस तचेव जहा गोतमदीवस्स परिक्षेवो पउमघरवेइया पचेय२ वणसह परिक्खिचा, दोणविषण्णओ जाव जोइसिया देवा आसयति ॥ तेसिण बहुसमरमणिज्ज भूमिमागाण बहुमज्झ देसभाए पासावसका बावाहूिँ जोयणाइ, बहुमझदेसभागे मणिपाढयाओ दो जायणाओ जाघ मंचा पारा भार योमन का सम्मा चौसा है शेष सप गौतम द्वीप जैसे वर्णन कानना इन को परखण्ड व पर पदिका घेरीइ दोनों वर्णन योग्य है उस पर पहुत मम रमणीय भूमिमाग है यापत् ज्योतिषी देव पाने है इस रमणीय भूमिमाग के मध्य में पामादापतप्ता कहा है पर ६॥ योजन का चाप ११॥ पोजन का सम्मा चौहान सम के मध्य में एक मणिपीटिका है यावत परिवार सहित सिंहासन करना इस का अर्थ की पृरला मी वैसे ही कहना अर्थात् इस का ऐसा नाम क्यों कहा ? असे गैप ! पहा छोटो परी घाबाहयों में बहुत कमल घट्ट समान वर्णवाले हैं, पर समान कालियाले हैं, पड़ा चद्र नाम ज्योतिपी का इन्द्र मादिक यावत् पल्पोपम की स्थितिबाला रहता है यह पत्र पार हिजार सामानिक पायत् छद्र द्वीप व चंद्र राज्यपानी में रानेराळे अन्य ज्योतिपीदेव देषियों का अधिपत्ति 1. पीसरी पनिपीच में सण, समद्र का वर्णन 41 न मनुवाद-नाप्रमचारी मुनिश्री ममोलस प्रापिमी - धुचह गोयम दीव दीवे 'गोयमा ! गोयमदीषण दौथे सत्य २ से २ सहि २ यद्दा, उप्पलई जाव गोषमप्पमाई से तेणटुंण गोयमा ! जाय णिश्च ॥ कहिण मते ! साट्टयस्स लपणाहिवइरमा सुष्ट्रियाणाम रायहाणी पण्णता ? गोयमा । गोयम दीवस्त पञ्चस्थिमेण तिरियमसभेजे जाव अण्णमि लवणममुद्दे पारम जोयण सहस्साति ओगाहिचा एव तत्र सन्त्र जाव सृष्टिएदेवे २॥ २७ ॥ कहिण भते ! जवुद्दीवगाण घाण बंदहीवा णाम दीवा पण्णता ? गोयमा ! जंबुद्दोरे दीरे मदरस्म पवपस्स पुरस्थिमेण लवणममुद्द बारस जोयण सहस्साइ आगाहिता एयण जीभो गौतम गौतम दीपक मे पभिप में नीच्या मागास पसन्द उलघार जारे या दूगी सवममुद्रमें वारा योगन अगाकर जाये यहां मुस्थित देवही रापपानी की बगेर मय पणापरत मानना यावत सुस्थित देव साना ॥२७॥ बो मगरन ! जम्मूदीपक पदका चंद्राप कहां कहा भार गोप ! बम्बूद्वाप रे मेरू पर्वत स पूर्व में प्राण समुद्र में मारामार पोमन अगाड कर मारे पास नदीप के घर का चंद्र नामक द्वीप कहा पा मम्मूदाप की वरफ ८८॥ पोमन । एक पोमन के १५ मान में से १० भाग निवना पानी से सा म समुद्र की तरफ दो कोर का पानी पाक सगासादर छाला मुसदेवरायमी घालामसादनी .

५० मर्थ * पतुस नीषामिगम एष-सृतीय उपास अबुद्दीवगाम चदाण चदौवामाम दीवा पण्णचा, जयुद्दीर्थ तेण अद्वेकूणणउर्ति ओयणाति चचारीसच पचाणउति भागे जोयणस्स ऊसिया जलतातो लवणसमुदतेण दोकोमे ऊसिता जलतातो बारस जोयण सहस्साति आयाम विक्खभण सेस तचेव जहा गोतमदीवस्स परिक्खवो पउमवरवेइया पत्तेय२ घणसड परिक्खिचा, दोणविषण्णओ जाव जोइसिया देवा आसयति ॥ तेसिण बहुसमरमणिज भूमिभागःण बहुमज्झ देसभाए पासावसका बाढेि जोयणाइ, बहुमझदेसभागे माणिपाढयाओ दोजायणाओ जाव कंचा है पारा हमार योजन का सम्या चौदा है शेप सप गौतम दीप जैसे वर्णन कानना इन को बनखण्ड व पपवर पादिका घेरीइ दोनों वर्णन योग्य है उस पर बहुत सम रमणीय भूमिभाग है यावत् ज्योविपी देव परांठ है उस रमणीय भूमिमाग के मध्य में मासादापतसा कहा है पर ६॥ योजन का कंचा प १२॥ योनन का लम्बा चौडा उम के मध्य में एक मणिपीठिका है याक्त परिवार सरित सिंहासन काना इस का अर्थ की पृा मी वैसे री फहना अर्याद इस का ऐसा नाम क्यों कहा ? अहो गैसम ! यहां छोटी पडी बाडियों में बहुत स्पल चद्र समान वर्णवाले हैं, चद्र समान कातिवाले है, पहां चट्र नामा ज्योतिपी का इन्द्र महदिक यावत् पल्पोपम की स्थितिवाला रहा है वह यहां चार हमार सामानिक पापत् पदर दीप व चंद्र राज्यपानी में रहनेवाले मन्य ज्योतिषी देव देषियों का अधिपत्ति म. सीमरी प्रसिपीच में क्षण. समद का वर्णन वर - सत्र बाबाद-पासमपारी मुनी श्री अमोस पिनी सहासमा सपरिवारा भाणियवातईव भट्ठोगोयमा!बहुसु खडा खुश्यिाउ यह उप्प- लाई पदवण्यामाइ पदा इत्य देवा महिदिया जाव पलिओवमठितीया परिवसात सेण तस्य पश्येय घाउण्ह सामाणिय साहस्तीण जाव पदनीवाण चाणय रायहाणीण अन्नार्सि महूइ जोतिसियाण देवाणय देवीणय माहेवध जाव विहरति से तेणटेण गोयमा ! चपदीया जाय लिया ॥ कहिण भते ! जपूदीवगाणं बदगाम बदाणउ णाम रायहाणीउ पण्पधामो ? गोयमा ! वीवाण पुरथिमेणं तिरिय जाय भणमि जयूद्दीवे २ वारस जोयमसहस्सति उग्गाहिसा सचेव पमाण जाव एव माहिडिया पदा देवा २ ॥ २८ ॥ कहिण भते । जयूद्दीवगाम सुराणं सूरदीवणाम दीवा बना करा दुवा विचरता है बहो मौषम ! इस लिये ऐसा नाम का अपराबा दीप बसीव कामे मी का पैसा नहीं पावत् नित्व महो ममयम् ! बद्रीप के घर की पदका नाम राम्पवानी का sit! महो मौतम! चंद्वीप से पूर्व में ही बसल्याव द्वीप समुद्र पहुंघबर बाये वहां अन्य समूहीप में बारासार बोमन पर पदका नाम राबपानी की इस कामपाम से मानना पापत पादिर पर देव ॥ २८ ॥ मो भगान ! बमूदीप का सूरह का ..काकाराबाबहादर नासा ससदवसापनी बाबासारमो.

पण्यचा ' गोयमा ! जवृतीने २ मदरस्स पवयरत पचत्थिमेण लवणसमुह वारस जोयण सहस्साति उगादिचा तचेव उच्चत्त आयाम विक्खभण परिक्षेत्रो घेदिया वणसहा भूमिमामा जाप आसयत्ति पासायवसगाण तत्र पमाण मणिपेढियासीहासण सपरिवार। भट्ठो उप्पलाइ सूरप्पभाति सूराइयइत्य देवा जाव रायहाणीओ, सकाण दीवाम पञ्चत्यिमेण अण्णम्मि जघुद्दीवे २ सेस तचेव जाव सूरादीवा ॥२९॥ कहिण भते ! अमितरे लवणगाण चदाण चपदीया णामदीया पण्णता ? गोयमा! antra चतुर्दश मीनामिगम सूत्र तृनीय पान REP 41 तीसरी प्रतिपत्ति में करणसमुद्र का वर्णन पो गौतप ! मम्मूदीप के पेरू पर्वत से पश्चिम में अषण समुद्र में बारह भार योजन पगाइकर भाषे पहा सूरदीप कहा है इसकी लम्बाई चौडाइ केचर यामत् समपर्णन चंद्र दीप जैसे मानना इस को भी दिका बनवण्ड व भूमिमाग यावत् पा देव रहते। उस में मासादारसंसक है इस का प्रमाण भी पूर्वोक जैसे काना इस में मपिपीठिका, सिंहासन पगैरह परिवार सरिस कहना इस में सूर्य की काति भेमे उत्पळ वगैरा उत्सन्न होते हैं इस में सूग नामक ज्योतिषी का इन्द्र रहता है इस की राज्यधानी उमण समुद्र के सूर्य दोष से पश्चिम में अन्य मम्मूद्वीप में सूर्या नामक राज्यपानी के इस का सब वर्णन पूपिस् मानना ॥ २९ ॥ बहो मगमन् ! पण समुद्र में रहकर मम्मदीप की दिशा में फीरनेपाल बनवादक-समचारी मुनी भी भमोरस प्राषिनी सांहासमा सपरिवारा माणियध्वातईव भट्ठो गोयमा!बहुसु खडा खुडियाउ बहूइ उप्प- लाइ पदवण्णामाइपदा इत्य देवा महिड्डिया जाव पलिमोवमठितीया परिवसात तेण तस्य पत्तेय र घउण्ड सामाणिय साहसीण जाव चददीवाण घाणय रायहाणीण अन्नर्सि बहू जोसिसियाण देवापय देवीणय माहेवध जाव विहरति से तेण?ण गोयमा ! चंददीवा जाब मिया ॥ कहिण मते ! जवूद्दीवगाण बदगाम चदाणउ णाम रायहाणीठ पण्णचाओ ? गोयमा । पदावाण पुरस्थिमेणं तिरिय जाय अण्णमि जंयूही २ पारस जोयणसहस्सति उग्गाहिचा तंत्र पमाण जाव एव महिडिया पदा देवा २ ॥ २८ ॥ कहिण भते । जयूडीवगाण सराण सूरदीवणाम दीवा पना करणारा विचरतारे भी गौतम ! इस पिये पेसा नाम का अपना वादीप बतीय कार में नीचा पैसा नहीं बापत् नित्य महो ममान् ! पद्वीप बाकी का नाम राज्यपानी कहां 1 महो मौसम ! चंद्रद्वीप से पूर्व में वीर्ण बसल्याव द्वीप समुद्र पर माये वहां अन्न मद्वीप में बाराबार योवन पर दका नाब रापपानी की। इसका प्रयानी बानमा वास्तु पादिक मंद देव ॥ २८ ॥ बा ममन् ! बमद्वीप के मूर्या मूर होप को कमरे .कधक रामारहावर लाया ससटेवसायमी बाबानमारमो.

सम 4 तुम भीमाभिगय मूष तृतीय पार पाक उगाहिता एत्थर्ण माहिरि लवणगाण चदाण चददीया पण्णता ॥धायतिसडदौत्र तेर्ण अदेकूणण ओ जोयणाति चचालीस पचाणातमाग जे यणस्म उमिना जलतातोलवण समुह तेण दो कोस उसिचा बारमजायणसहस्स इ आयामविवावगेण पउगवरवेइया वणसहे, बहुममरमणिब भूमिभागा मणिपढिया सीहासमा सपरिवारा सोचा अट्ठो रायहाणीओ ॥ साण दीवाण पुरति प्रमेण तिरियममख अण्णमि लवणसमद तहेव सत्र ॥३१॥कहिण भता बाहिर लवणगाण मूगण सूरदीय नामदेवा पत्ता गोयमा! लवणसमुद्द पच्चाच्छामल्लातो वेतियनाओ लषणसमुद्र पुरथिमेण बारमजीयणसहस्साइ योजन जाये वहां पास लवण समुद्र के पद्रका पद होप का है वह धान की खण्ड क तरफ८८॥ येजन व एक योजन के ९५ भाग में से ४० म ग जितना पानी पर है, मोर लवण समुद्र की माफको कोश ऊचा है पारामार योजन का सम्मा चौदा है वह परावर टिका पवनय घन रमणीय भूमिमाग है, मणिपीठिका, परिवार सहित सिंहासन है इस काम को पृच्छा उपद्रोप स प में सीडी असरूपास दीप समुद्र राज्यपानी है इसका सब पणन पूरवत् मानना ॥३१॥ भो भगवन्' पाहिर क षण समुद्र मूर्यका सूर्यदीप कहाँ कहा है ? यो गौतम ! सवप समुद्र की पश्चिम दिशा की, मेदिना से करण समुद्र में पूरी की तीसरी प्रतिपचि में लपण समुद्र का वर्णन str आप जयूमदरस्स पबयस्त पुरत्थिमेण लवणसमुद्द पारस जोयणमहरसाइ उगाहिचाएत्थन आमतर लवणगाण चदाण चदहीवा णामदीवा पण्णता जहा जबुद्दीवगा चदा तहा भामियन्या, णवरि रायहाणीओ अण्णामि लवणे, सेम तचेत्र ॥ एष अम्भिनर लवण- गाण सूराणवि लवणसमुह वारस जोयण सहरसाति तचे सब रायहाणीओवि॥३०॥ कहिण मते! पाहिरि लायणगाण चदाण चददीव। णाम दीवा पण्णता? गोयमा । लवणसमुदस्स पुरच्छिमिल्लातो वेदीयतातो लरणसमुह पञ्चत्थिमेण वारसजायण महरलाइ भग्रुपाक्षक पामसारी मुनि श्री ममालक अपिना • प्रकाशक-राजारादुर लामामुपदेवसापनी मासाप्रसादमी, प्रर्थ मर्थात् सपण समुद्र के माध्यनर चद्र के घद्रा at १ महोगन ! मम्मूदप के मरु पर्वत से पूर्व में पारा भार याजन मगास्कर मारे पर्श प्रभार तरण समुद्र के चद्र का पीपा असे मम्बूद्वीप के चंद्रदीप वैसे ही करना विशेष में अन्य लाण मभद्र में राजधानी पान) ऐरो अण समुद्र में पारा भार योजन पर भाम्यमर माण मद्र र सूर्य का प्य है पर इस का सप अघि कार पूवित् मानना ॥ ३० ॥ अहो भगवन् ! घोषिर कला समुद्र के चट्ट का चटप को ? मो गौतम ! पण समुद्र की पूर्व दिशा की वेदिका से छत्रण समुद्र में पश्चिम दिशा में बाल हमार १ लपण समुद्र के शिक्षा बाहिर पावती सम्र की दिशा में फीरनेपाले E. 4 तुर्दश मीषाभिगद मूत्र सृतीय उपान कक्ष ठगाहिता एत्थण पाहिरि लवणगाण घाण चपदीचा पण्णचा ॥धायतिसदीय तेणं अद्देकूणणओ जोयणाति पत्तालीस पचाणातभागे जे यणस्म उमित्ता जलतातो लवण समुह तेण दो कोस उसिना बारमजायणसहस्स इ आयामवियोण पउमवरवड्या वणसहे, बहुलमरमणिज्न भूमिमागा मणिपढिया सीहासणा सपरिवारा सोचत्र अटो रायहाणीओ ॥ साण दीवाण पुरत्रिमेण तिरियममख अण्णमि लवणसमद्द तहेव सत्र ॥३१॥कहिण भत! बाहिर लवणगाण सूगण सूरदीया नामदेवा पगत्ता गोयमा! लषणसमुद्द पच्चाच्छामल्लातो वेतियनामो लवणसमुद पुरथिमेण बारमजोयणसहस्साइ योजन जाये पहा पाय लवण समुद्र के चद्रका चद्र दीए फटा है यह धमनी स्वण्ड क नाफ८८॥ ये जन प एक योजन के ९५ भाग में से ४० भ ग जितना पानी पर है, और लघण म्द्र की मफा कोश उचारे बारह हजार योजन का सम्मा चौदा वा पर टिका प प पहन रमणीय मुभिमाग है, मणिपीठिका, परिवार सहित सिंहासन इस काम को पृच्छा ? उम द्वोप स पूर्व में तीही असल्यास द्वीप समुद्र में राज्यपानी में इसका सर वर्णन पूर्ववत् मानना ॥३१॥ बो मगमन्' पाहिर क रूपण समुद्र मूर्यका सूर्यदीप कहो का, है ? भहो गोषम ! सुवम समुद्र की पश्रिय दिशा की पेदिका से करण समुद्र में तीसरी मविपत्ति में लपण समुद्र का वर्णन 48 साथ 4 गमुरादफ-पाप्रापारा भान पायमाठक शनिी- पायतिखंडदा तेषं मढेकूमउति जोयणाति बचालीस व पचाणाउति भागो जायणस्स लवणसमई तेण दो कासे ऊसिया सेस तदेव जाव रायहाणीओ सगाण दीवाणं पचस्टिमेण तिरिय मसखेज लवण क्षेत्र यारसजोयणा सत्र सन्य भागियन्न ॥३२॥ कहिण मते! धायतिम दीवगाणं चदाण चददीया णामदीया पण्णता ? गोयमा ! पायतिसउस्स दीवरस पुरथिमिल्लातो वेदियतातो कालोयण समुद वारसजोयण सहस्साई ठग्गादिसा एत्थण धायसिसडदीवगाण पदाण चददीवा णामदीवा पण्णच सम्बतो समता दाकोसा असिता जलतातो पारसजोयण सहस्साइ दिशा में पारामार पोमन भाये सब पहा मर्यद्वीप कहा पापावकी सण की तरफ ८८॥ योजन एक योजन के ९५ माग के ४० भाग दिखना ऊषा व माण समुद्र से दो गोत्र का पानी से उचा। क्षेप सब राज्यपानी पर्यंत मेहकाना अपने द्वीप से पभिर में भात्यात समुद्र पम्प पर ममुद्र में इस की राज्यपानी ॥१२॥ मो भगवन् ! गावी सदीप के पद के बद्रीप का को है ! भो गौतम ! पातकी सोप की पूर्व की देहिका से कासोद समुद्र में पारा इनार पोमन भाये मा पातकी सण चद्ध का पदोष को पारों और पानी से रो कोष कपा भरा हमार पोवन मासमा पोल से पीने का सही पिफम, परिफि, भूमिमाम. प्रासादा साम-रामायापुर गाहा मुसदवसायमीनामयसापपी. नर्थ त्रा ५ तहेव विक्खभो परिक्षेत्रो भूमिभागो पासादयसयामणिपढिया सीहासणा सपरिवारा मठा तहेव रायहाणीओ ॥ सकाण दीवाण पुरथिमेण अण्ममि धायतिसडेदीवे सेस सहेव व धायतिसहगावि मरादिवावि णवरि धायतिसदस्स दिवस्त पद्यस्थिमिखातो धेयाओ कालोयण समुह वारस नोयण तहेव सन्य जाव रायहाणीओ सूराण दीवाण पञ्चत्यिमेण अण्णमि धायतिसह दीवे सन्न तहेव ॥ ३३ ॥ कहिणं भते ! कालो- यणगाण चदाण चददीचा जामदावा पण्णवा? गोयमा कालोयणस्स समुहरस पुरस्थिमि- +Hit पर्दछ मीचापिगम मूष तृतीय पान 4R- मर्थ बसस, मणिनीठिका र परिवार सहित सियसन है मर्य इस का वैसे ही काना पावत् राज्यपानी की पृच्छा करना अपने द्वीप से पूर्व में मसरुपात द्वीप समुद्र उल्लघार मामे पहा पावकी सम्ट में चंद्रमा राज्यघानी की। पर्णन पूर्ववत् मानना ऐसे है। पातकी खण्ड के सूर्पद्वीप का कहना परंतु पश्चिम दिशा की वेदिका से कालोद समद्र में मारह हजार पोमन भावे वगैरह सर वैसे ही काना राज्यापानी सर्पदोप से पधिप में मारे पहा मन्य पातकी खण्ड में है ॥३३॥ हो भगवन् ! कासोद समुद्र के चद्रका चीप कहा है । महो गौतम ! काळोद समुद्र की पूर्व दिशा की पेदिका से कालोद समुद्र में पत्रिम में पार योभन भाये पहा काभेद पद प्रपदीप का पद पारो भोर पानी से दो कोष का या तीमरी प्रतिपाति में लपण समुद्र का वर्णन - .

4. भगुदफ-पामसमपारी मुनि श्री अमोसप पिभी + खातो पेत्तियताओ कोलायण समुह पचत्थिमेण पारस जोयण सहस्साइ उगादिचा एत्यण कालोयण चंदाण पददीवा सन्वतो समता दो कोसा ऊसिता जलतातो सेस तहेव जाव रायहाणीओ ॥ सगाणा दीवाण पुरस्थिमेण अण्णामि कालोषण समुद्दे व रस जोयण तहेव सब जाव चदा देवा, एवं सूगणवि णवर कालायण पञ्च त्यमिक्षातो पेतियतातो कालोयण समुद्द पुरित्यमेण धारसजायण सहस्साइ उगादिचा तहेव रायहाणीओसगाए दीवाण पञ्चस्थिमेण अण्णमि कालोयण समुद्दे शेपासपसे ही बना राज्यपानी कीपूछा, अपने द्वीप से पूर्व में बारूपान में अन्य काळोद ममुद्र में पारह हजार पामन भाये राम्पधानी। इस का सप कपन परित मानना ऐमे १. सूर्य का काना तुमलोद समुद्र से पमिम की पेदिका से कामोद समुद्र से पूर्व में पारह हजार पोजन के दीपर मूर्य का दीप जैसे ही राज्यधानी व काना, परतु अपने ट्रीप से पश्चिम में जाना पड़ा अन्य कामोद स्मुद्र का काना एने पुष्करपद्वीप के चद्र का काना पुष्करररोप की पत्रिम की दिश पुष्कर समुद्र में पारामार योजन पाने पर चद्रद्वीप है और मन्य पुष्कर द्वीप में सकी राज्यपानी १३ ऐसे ही मूर्यदीप पुष्करद्वीप की मेदिका से पत्रिम में पुष्करोदपि समुद्र में हैं, रापपानी अन्य पुष्करदीप में है पासा द्वीप के को चंद्र सूर्य है रन के द्वीप रस के बामे राहुरे समुद्र में है । उस प्रकाशक-राप्रापारादुरलाछा मुम्बदेवसहायत्री मालापसात भी 48 - नीयभिगम भूध तृतीय उपाय - सहेब सन्न एव पुक्खरवरगाण चदाणं पुनरवरदीवरस -पथिमिलातो घेतिगताओ पुकावरवरसमुह बारमजायण सइस्माइ उगगाहित्ता चदीवा अण्णमि पुस्खरवरेदीवे रायहाणीआ तहेव एव मूगणवि दीवा पुक्खरवर दीपरम पच्चस्थिमिछाउ वेइयताओ पुक्खरोद समद बरस जोयण सहस्साइ उगादित्ता तहेव सव्व जाव रारहाणीउ दीविनगाण दीव समुद्दगाण समुद्दे चेव एगाण अभ्भनर पाते एमाण नाईरएपासे रापहाणीउ दोविल्लगाण दीयेसु समद्दगाण समुदन सरिस णामएसु इमे णामा अणु- गतव्वा ॥ जबुद्दीव लघम धायइ कालोद पुक्खरे घरुणे खीर धयखायणदी में पदोष पूविश्व में है और सूर्गप पनिर दिशा में है सर समुद्र के जा घद्र मूर्य है उस ईप उन । समद्र में ईप चद्र न १ उम से भाग के समुद्र में है और समुद्र के द्र सूप द्वाप चनाममुद्र में उनकी गज्यघानी थप २ गम जमीर, इन में चद्र की राज्यधानी पूर्व दिशा में व मूर्य को गज्यघानी पश्चिम दिशा में है इन के नाम पनुफप से कहतर-जम्बूद प; वम समुष्ट घातकी सदोष, सालोद समुद्र, पुष्कर घरदीप, पुष्कररर ममुद्र, पारुणिवाहीप, घाषण घरममद मोरपरदीप, सौरपर समुद्र, घृतपरदीप, घृतवरसमुद्र, रसुवर हीप, सुपरसमुद्र, नदीम्पद्वीप, नदीपा होमरी प्रनिति में लाणमुद्र का वर्णन कर अर्थ 4. मनुपादक-पाठनमपारी मुनि श्री अपोछाप पिभी + सातो वेतियतामो कोलायणं समुह पञ्चत्यिमेण पारस जोयण सहस्साइ उगाहिता एस्थण कालोयण चदाण चददीवा सन्वतो समता दो कोसा ऊसिता जलतातो सेस तहेव जाव रायहाणीओ ॥ सगाण दीवाण पुरस्थिमेण अण्णमि कालोषण समुहे व रस जोयण तहेव सब जाव चदा देवा, एव सूराणधि णवर कालायण पच त्यमिछातो बेतियतातो कालोयण समुह 'पुरित्यमेण पारसजायण सहस्साइ उगादिचा तहेव रायहाणीमोसगाए दीवाण पञ्चस्थिमेण अण्णमि कालोयण समुद्दे शेप सप पैसेही माना सम्पपानी की पृच्या, अपने दै पसे पूर्व में असरूयान में अन्य काळोद ममुद्र में पारा मार पामन प्रापे को राज्यपानी इस का सब कपन परत मानना ऐमे १. सूर्य का कहना पातु पालोद समुद्र से पश्चिम की पेदिका से कालोद समुद्र से पूर्व में सरह स्वार योजन के दीपर मूर्य का दीप पैसे स राज्यपानी पर्यंत फाना, परतु अपने द्वीप से पश्चिम में जाना १ मन्य कामोद स्मुद्र का करना पने ही पुष्करपरदीप के चद्र शासना पुकारवरदप की पमिम की दिशा पुष्कर समुद्र में पारामार योमन बाने पर पद्वीप है और अन्य पुष्कर द्वीप में उसकी राज्यपानी १६ ऐसे ही मूर्यदीप पुष्करदीप की पेदिका पश्चिम में पुष्करोदीप समुद्र में हैं, रापपानी अन्य पुष्करदीप है बब सब दीप भो पद सूर्य रन के दीप रस मागे रो हुये समुद्र में इस मझासक-राप्रापहादुरगळा मुम्बदेवसरायमी माताप्रसादमा - M No पसई- जीयाभिगम मूत्र सृनीय पान - सब सच एव पुक्खरवरगाण पदार्ण पुक्लरवरदीवस्त पञ्चस्थिमिजातो तिगताओ पुरवरवरसमुद्र यारमजायय सहस्माइ उग्गाहिता पददीश अण्णमि पुक्खरखरेदीवे रायहाणीओ तहेव एव सूगणवि दीवा पुक्स्वरवर दीयस्त पञ्चस्थिमिजाउ घेइयताओ पुक्खरोद समद वारस जोयण सहस्साइ उगाहित्वा तहेव सन्ध जाव रायहाणीउ दीविडगाण दीव ममुद्दगाण समुह चेव एगाण अब्भनर पासे एमाण नाईरएपासे रापहाणीउ दोविलगाण दीयेसु समद्दगाण समुह सरिस णामएस इमे णामा अणु-- गतव्या ॥ जबुदोष लपण धायइ कालोद पुक्खरे वरुणे खीर घयखायणदी पद्री पूदिन में है और मूर्गप पश्मिा दिशा में है सर समुद्र के ना पद्र सूर्य उस ईप उन । समद्र में है परे चंद्र सूर्य दप चम से भाग के Pमुद्र में है और ममुद्र के न्द्र सूर्य द्वाप उनी ममुद्र में है, उनकी गज्यपानी अपने २ गम नमी है, इन में बद्र की राज्यधानी पूर्व दिशा में व मूर्य की राष्पधानी पश्चिम दिशा में है। इन के नाम भनुरुप से काम ?--जम्बूदै प, छपण समुद्र धातकी खण्डद्वीप, कालोद समुद्, पुष्कर घरदीप, पुष्करवर ममुद्र, पारुणिरदीप, राहाण परममुद्र, कोपरदीप, सोरसर समुद्र, घृतपरदाप, धृतवरसमुद्र, सुबरहीप, रसुवरसमुद्र, नदीपरदीप, नदीश्वर 3: बोमरी मतिपत्ति में लपणमुद्र का नर्णन Alt मर्थ 42 अनुवादक-पालप्रसपारी मुनि श्री अमोछार समिी + जातो वेतियताओ कोलायण समुह पचरिथमेण पारस जोयण सहस्साइ उगाहिता एस्थण कालोयण चदाण चदीवा' सव्वतो समता दो कोसा असिता अलंतातो सेस तहेव जाव रायहाणीओ ॥ सगाण दीवाण पुरस्थिमेण अण्णमि कालोपण समुद्दे परस जोयण सहेव सव्व जाव चदा देवा, एव सूराणवि णवर फालायण पच्च थिमिक्षातो बेतियतातो कालोयण समुह पुरित्यमेण धारसजायण सहस्साइ उमाहिचा तहेव रायहाणीमओसगाए दीवाण पञ्चस्थिमेण अण्णमि कालोयण समुद्दे शेप सवैसे ही काना राज्यपानी की पृष्ठा, मपने पसे पूर्व में बारूपान में अन्य काळोद ममुद्र में पारह हजार पामन मारे सम्पपानी। इस का सब फयन पर्वत मानना ऐसे है। सूर्य का कहना परंतु कालोद समुद्र से पश्चिम की पेदिका से काळोद समुद्र से पूर्व में बारह हजार पोजन के दूरीपर मूर्य का दीप पैसे ही राज्यपानी पर्यंत काना, परतु अपने द्वीप से पश्चिम में जाना पहा अन्य गमोद स्मुद्र का करना पनेही पुष्करपरदीप के पद गाना पुष्फरवरप की पधिमकी दिशा से पुष्कर समुद्र में पाराापार योमन पाने पर चद्रद्वीप है और अन्य पुष्कर द्वीप में बस की राज्यपानी है ऐसे ही मूर्यदीप पुष्करद्वीप की मेदिका पे पमिम में पुष्करोदीप समुद्र , सम्पधानी बन्य पुष्करदीप में बब सब दीपमो चंद्र सूर्य है उनके द्वीप रस के भामे रो हुने समुद्र में एस महाशक-रामापरादुरलाछा मुखदेवसहायत्री बालाप्रसादी 24. पत: भीयामिगम म्य मृनीय पान ta सहेब सव्व एव पुक्खरवरगाण चदाणं पुक्लरवरदीवस्त पञ्चस्थिमिजातो ऐतियताओ पुरवरवरसमुह बारमजायय सहस्माइ उग्गाहिता चादीश अण्णामि पुरस्वरवरेदीवे रायहाणीओ तहेव एव मूगणवि दीया पुरवरवर दीपस्त पञ्चस्थिमिलाउ वेइयताओ पुक्खरोद समद बरस जोयण सहस्साइ उपाहिचा तहेव सब जाव रायहाणीउ दीविलगाण दीव समुद्दगाण समुद्दे चेष एगाण अब्भनर पासे एमाण नाईरएपासे रापहाणीउ दोविल्लगाण दीवेसु समुहगाण समुद्दा सरिस णामएम इमे जामा अणु- गतन्वा ॥ जबुद्दीव लपण धायइ कालोद पुक्खर वरुणे खीर घयखायणदी में नद्रौष पूविश्व में है और मुर्गीप पवा दिशा में है सर समुद्र के जा पद्र मूर्य है उस ईप उन १ समद्र में पके चद्र मर्य द्वीप सम से भाग समुद्र में भार मुद्र के न्द्र सूय द्वाप उन राममुद्र में है, उन की गज्यधानी अपने २ गम मी , इन में बद्र की राज्यपानी पूर्व दिशा में व मूर्य की राज्यघानी पश्चिम दिशा में है इनके नाम मनुमप से करत ?--मम्बूद्वैप, म समुद्र घातकी खण्टदोप, कालोद समुद्र, पुष्कर वरदीप, पुष्करवर ममुद्र, पाणिग्दीप, याहाण- घरममुद, सोरघरदीप, सीरवर समुद्र, वृषरताप, पुववरसमुद्र, रसबरहीप, सुपरसमुद्र, नदीवरद्वीप, नदी पर IS वोमरी प्रनिति में लपण समुद्र का वर्णन + मर्थ मरा-भासनमचारी मुनि श्री बपोटा प्रापिभी। चंदाण बदाओ णाम रायहाणीआ पण्णचाओ त चव सव्व एवं सुराणवि गवर देवोदगस्स पच्चत्यिमिक्षातो वतियताआ देवोद्ग समुद्द पुरथिमेण वारस जोयण सहस्साति उगाहित्ता रायहाणीउ सयाण २ पुरथिमेण समुद्द असखजाइ जोयण सहरसाइ एव णागे जम्वे भूतेवि चउण्ड दीव समुदाण ॥ ३५ ॥ कहिण भते ! स्यमूरमणदीवगाण चदाण चदावा णाम दीवा पण्णचा ? गोयमा ! सयभरम- णस्सदीवस्स पुररियामिलातो वेइयतातो सयमूरमणोदग समुद्द बारस जोयण सहस्साइ तहेव रायहाणीतो सगाण २ दीवाण पुरथिमेण सयभूरमणोद्ग समुद्द असखवाइ ni सूप दीप का है मौर दीप से पूर्व के समुद्र में मसख्यात हजार योमन नावे का ननकी मूर्या नामक राज्यपानी परी ऐसी नागडी.नागममुद्र, यादीप, यक्षसमुद्र मनदीप प भूनममुद्र का मानना पे चारों द्वाप समुद्र मान भानना ॥३५॥ो मगवन्! सयंमूरपण द्वीप के घर का चद्र द्वीपांका रेमो गौतम ! स्वयमूरमप द्वीप की पूर्व की पदिका से परमपादक समुद्र में पारा समार इसी प्रमसे राज्यपान पर्पत करना भपन दीमे पूमि स्वयमूरपणोदक समुद्रमें मसरूपात इमार' योमन नारेब को राज्यधानी कही ऐसे ही सूर्य बाबानमा परंतु पा संयंभूरमन समुद्रकी पधिप की. माफ-नाम पहादुर लाला मुखदेषसायमी घाट प्रसाद 4 air चतुर्दश-मीवापिगम मूम-मृतीय उपान 47+ जोयण तहेव एव सूराणवि, सयभरमणस्त पञ्चस्थिमिलातो वेतियतातो रायहाणीओ सकाण २ दीवाण पश्चात्यमेण सयभूरमणोदग समुद्द असखजा सेम तद्देव ॥ कहिण भते! सयभरमणसमुहकाण चदाण चदहीवा पण्ण चा? गोयमा सयभरमणस्स समुहस्त पुरस्थिमिल्लाओ बेइयतातो सयभरमण समुद्द पञ्चस्थिमण बारस जोयण सहरसाइ उगाहित्ता सेस तचेब, एव सूराणवि, सयमुरमणस्स पञ्चाथमिल्लातो बेइयतातो राय- हाणीउ सकाण २ दीवाण पुरथिमेण सयभूरमणोदग समद्द असंखजाइ सेस तहेव ॥३६॥ अस्थिण भते । लवण-मुद्दे वेल्धरातिया णागराया अग्घातिवा सिहातिवा पेदिका से मानना इसकी भी राज्यपानी अपने द्वीप से पश्चिम में सपभूरमण समुद्र में मसरूपात हजार योजन मावे यहां लग कहना थारो भगवन बयरमण समुद्र क चद्र का चद्रद्वीप कहा है ! अहो गौतम ! वयमूरमण समुद्र की पूर्व की बेदिका से बारह हमार योनन स्वयमू रमणसमुद्र में नाव यहाँ चवीप कहा। बगर शेष सब पूर्ववत् ऐसे ही सूर्य का कहना पातु यहां स्वयमूरमणमुद्र की प मम दिशा की पेदिका जानना राज्यघानी अपने द्वीप से पूर्व में स्वयभूरण समुद्र में अस. रूपा पोमन भाये शेष सब पैसे ही कहना यावत् वर्ग मूर्य देव ररत हैं ॥ ३४ ॥ अहो भगमन ! +919 सीसरी प्रतिपत्ति में सुषण समुद्र का पर्णन 43 અર્ધ प मनुवादक पालनमचारी मुनि श्री भोलक अपिमीर विजाति। हा. बड्डतिया ? इता अहै। ॥ जह ण मते ! लवण मुद्दे अस्थि वेल धरेतिया गागरायातिवा अग्घा सिहा दिजातिवा हासवड्डीतिमा तहाण बाहिरएमुवि समुद्दम् अस्थि वेलधरावा गागरायातिवा अग्घातिवा सिहातिवा विजातिवा हासबुट्ठतिवा ? जो तिण्टे सम8 ॥३७॥ लवणेण भते ! समुद्द किं उसितोदगे कि पच्छडोदगे खुभियजले किं अखुमियजले ? गोयमा ! लवणेण समह ऊसितोदगे नो परवडोदगे, खुमिय- जले नो अखुमियजले ।। जहाण मते ! लवण समुद्दे ऊसितादगे नो पत्थेडोदगे में ठंघर, नाग राजा, अग्र, शिखा, नमण, ग्राम, पृद्धि वगैरह क्या है ? गौतम । मी महो भगवन् । मेसे लक्षण समुद्र में खेलधर, नागगना, मग्र, शिखा, नमण, ग्राम, वृद्धि हैं सेही पारिर के ममद्र में पालघर, नागरामा, थप शिखा, नपण ग्रास प वृद्धि है ? भो गौतम ! पा अर्य समय नई ॥ ३० ॥ अहो मगरन् ! लषण समुद्र में क्या कुच्छ ऊचा शिवर वाला पानी। मया रिस्तारवंत हैं, क्या वायु से पानी सन्ध होठा अयवा भयो ? अहो गौतम ! लग्ण समुद्र का पानी ऊचा शिसापाला है, परंतु प्रस्तारपत नहीं है चायु मुन्ध पानी है परंतु मान्य नहीं है मो मगान ! मैसे रवण समुद्र का पानी ऊंचा शिखावत है परतु प्रस्तारवत नहीं है, बायु से क्षुब्ध है परती प्रकाशम-रामावतादुर लाला मुखदेव मायनी शलाप्रभारी पण समुद्र .

? चतुभ प्रीवा मगम सत्र साय नपान पर खु भेयजले ना अक्खभियजले तहाण बाहिरगा समुद्दा किं ऊसितोदगा ना पत्थ डादगा ख भयजला नो अक्खुभियजला गायमा ! बाहिरगाण समुदाण नो उसित दगा पत्थड'दगा, नो खभियजला अक्खुभियजल), पुण्णा पुण्णपमाणा वोल्दृमाणा बोसट्टमाणा समभरधडत्ताये चिट्ठति ॥ ३८ ॥ अत्थिण भत ! लवण समद्द बहवे उराला बलाहका ससेति समुच्छति वास वासति ? हता अस्थि ॥ जहाण भते ! लवण समुद्दे बहवे उराला बलाहका ससेयति समुच्छति वास वासति बाहिरएसु नो तिण? समट्ठ॥ ३९ ॥ से केण?ण भते ! एवं मान्य नहीं है वैसे ही क्या वाहिर के भमख्यात मय का पानी ऊंचा शिखरवन्त, प्रस्तावित क्षुब्ध व अधुन्ध है' मारो गौतम ! वारिस क कालोद समुद्र प्रमुख का पानी ऊचा शिखरमन्त नहीं है, परंतु प्रप्तारयन्स है वायु से सुन्ध नहीं है परंतु अघुध्ध शंत है क्यों कि इन में पाताल कलश नहीं हैं, य पाना स पारपूर्ण मरे हुए पूण प्रमाण भरे हैं, परिपूर्ण घट जमे भर हुचे हैं ॥ ३८ ॥ अहो भगवन् ! ला समुद्र में बहुन अप्ा यरूप मघ उत्पन्न होते है व वर्पते हैं ? हां गौसम ! वैसे है। उत्पन्न होत ३ वर्षा करते हैं जैसे लवण समुद्र में बहुत मघ उत्पन्न होते हैं य वर्षा करते हैं वैसे। क्या पाहिर के समुद्र में गघ उत्पन हावे व वर्षा करते है ? या अर्थ अथ नीमरी प्रतिपाच प लमण समुद्र का वर्णन है हैं ५ + अनुपादक-राहनावारीमुनि श्री मोम पेमी - बुवइ बाहिरगाण समुद्दा पुण्णा पुण्णप्पमाणा बोलहमाणा पोसष्टमाणा समभरघडताए चिट्ठति? गोयमा' वाहिरएसुण समुद्द बहवे उदगजोणिया जीवाय पागलाय उपगत्तागर यक्कमति विउक्कमति चयति उपधज्जति से तेण?ण गोयमाएव वुच्चति वाहिरगाण म्मुडा पुण्णा पुष्णपमाणा जाव समभरघडताए चिट्ठति ॥ ४० ॥ लवणेण भते । केवतिय उन्वेह परिवडिए पण्णचे ? गोयमा ! लवणस्स समुदस्स उमउ पासि पचाण उर्ति २ पदेसे गता पएस उन्वेह परिचड्डिए पण्णचे पचाणउतिं २ वालग्ग'इ गता बालग्ग उव्वेह परिवहिते पण्णसे, एव पचाणउति २ लिंखगता लिख उन्ह लिये ऐपाका कि वारिर के समुद्र परिपूर्ण घदे से मरे हो महो गौतम ! पाहिर के समुद्र में पहुम माग क बीघ मेघ-वृष्टि पिना उत्सम हा चरते हैं, इसलिये ऐसा कहा है कि पारि के समद्र भर हुवे यारत् परिपूर्ण घट समान ॥४०॥ भो मगवन् । लवण समुद्र की गाराह में कितनी वृद्धि होती नाती है। भो गौसम ! पण समुद्र के दा पाजुम (जम्बूद्वीप प घातकी खर) मदर ९५ ९५ प्रदश्व मारे तप एक प्रदेश १५-२५ पालाय मावे तर एक पालाग्र गहराइ दि पाती है ऐसे ॥ ९५-९५ लिख माथे पर एक लिख, एसे ही यूग, पत्रमध्य, मगुली, विस्ति, हाय, कुक्षि अनुष्य, गार, पोजन, सब योजन की मकाधक-राजाराला सुख वसहायनी माला प्रसादमी.

५२१ चतुर्दश मोपामिग सूत्र तृतयि उपाय 42 परिवढिए जूया अवमझ अगुलि विहत्थिरयणी कुच्छि धणु उव्वेद परिषड्डीए गाउय जोयण जोयणसय जोयण सहरमाइ गता जोयण सहस्स उन्ह परिवट्टिए पण्णते ॥ ४१ ॥ लवणेण भते ! समुद्द केव तय उस्सेह परिवडिये पण्णते ? गोयमा । लवणस्सण समुदस्स उभउपस्सि पचाणउति २ पदसे गता सोलस पदेसे उस्सेध परिवुट्टिते पण्णत ॥ लवणस्सण समुदस्स एतेणव कमेण जाव पचाणउति जोयण सहस्माइ गता सोलस जोयण सहस्साइति उस्सेह परिवुड्ढते पण्णत्ते ॥ लक्षणस्सण भत ! समुदस्स के महालये गोतित्थे पण्णत ? गोयमा ! लवणरक्षण समुहस्स उभयो पस्सि पचाणउति २ जोयण सहस्साइ गोतित्थे पण्णचे ॥ लवणरसण भते ! गहराइ जानना ९५ हजार योजन भावे चप एक हमार योजन की गाराइ मानना ॥४१॥ बो भगवन् सवण समुद्र की शिखा किसनी ऊची है ? अहो गौतम ! सवण समुद्र के दोनों वाजु से ९५ ९८ प्रदेश भदर जाये तब २६ प्रदेश शिवा ऊचीसी क्रम मे ९५-९५ हमार याजन मदर जारे तप १६हमार यमन 4शिखा ऊची। महो भगवन् ! सवण समुद्र का कितना गोवीर्य कदा है' ( गोतीर्थ सो पानी का बहाव उतार | महा गौतम ! वम समुद्र के दो पाजु ९५-९५ हजार योजन में गातीर्थ यो भगान् ! अषण समुद्र में गोवीर्य सहित समपानी किवन क्षेत्र में है ? महो गैतम ! दश हजार योजन के चक्रवाल माम वीमरी प्रनिपचि में लषणममुद्र का वर्णन ++ + अनुगदकनाडामारी मुनि श्री ममालस पिभी सन्बग्गेण पण्णचे कम्हाण भंते ! लवणसमुद्दे जवुद्दीवे २ नो उबीलतेि नो उप्पीलेइ नोचेव एकोदग करेइ ? गोयमा ! जब्दीवेण दीवे भरहएरवतेसुवासेसु मरहंत चावहि बलदेवावासुदेवा चारणा विजाहरा समणासमणीओ सावया सावियाओ मणुया पगतिभद्दया पगतिविणीया पगति उवसता, पगतिपयणुकोह माण माया लाम मिउमद्दव सपना अलोणा महगा विणीता तेसिण पणिहाप लबसेसमुहे जरीये नो वीलति नो उप्पलेति नाचेरण एक्कादक फरेति । गगा सिंधुरचा रत्तपईसु सलिलासु श्याउ महिड्डियाए जाव पलिओवर्माठतीयाओ प्रलमय स्पों न बनाता है ? पो गौतम ! मम्मूदीप के भरत एरमत क्षेत्रमें मरिहा, परती बलदेव चामुदव, मपाचारण, विधाचारण, वियापर, साधु, साध्या श्रापक प.धारिका है और दूसर मद्रिक व पिभित पारे, समान से ही काप, मान, माया घमाम पतले करने वाले,मृदमा मपम, पैराग्य सपन संसार में अमित एने मनुष्यों की नेणाय से मम्मूदप में मण समुद्र पानी नहीं डालना है, पीडा न करता प मतपय नही बनाता है और मी गगा सिंधु, रक्ता व रक्तवती नदी के मषिष्टापक देव पादिक यावत् परमोपप की स्थिति वाले राते पन की नप्राय से लपण समद्र का पानी नहीप में न माता पावत् उप्से बलमय नहीं बनाता है और मी पुल्लमियत व शिखरी वर्षपर पर्वत मादिदेव रावे • मकापरू राजारहाएर छालामुखदेवमापनोमाबामसादभी 4 पतुर्दश-भीवामिगम मत्र-तृतीय उपान 41 परिवसति, तासिण पणिहाय लवण समुह जाव नो घेवण एक्कोदय करेति ॥ चुलहिमवत सिहरिसु वासधरपवतेस दवा महिड्डिया तेमि पणिहाय हेमवयएरन्नवएस वामेसु मणया पगति भगा राहिता राहितससुवणकूलरुप्पकुलासु सलिलासु देवयाउ महिावयाओ तासि पणिहाय सदावति वियडावतिवट धेय पव्यतेसु देवा महिडिया जाव पलितोवमठितीया पण्णचा महादिवत रुप्पीएमु वासहर पन्यएसु देवा महिडया जाव पलिउवम ठितीयाय हरिशस रम्मगवासेसु मणुया पगतिभडगा, गधावातिमालवत परितातेसु वहवेयट्ट पवतेसु देवा महिड्डिया णिसढ णिलवतेसु घासहर पवएसु उनकी नेप्राय स लपण समुद्रका पानी नहीं पाता है, हेपथ्य परयवय क्षेत्र के मनुष्य स्त्रमाव से मद्रिक विनीत है इनके प्रभाव स र मुद्र का पानी नहीं पाता और भी रोस्सिा, रोहितसा, सूपर्णकुला । रूपकुरा इन चार नदियों के महर्षिक यावत् परपोपम की स्थिति वाले देव रस है इनके प्रमाव से वरण समुद्र सा पानी नहीं आता। शन्दापति विस्टापानि वृत वैतादय पस में माधिक पायत् पल्पोपम की स्थिति वाल देर राते हैं इनके प्रभाव से लवण समुद्र का पानी जम्बूद्वीप में नहीं आता है महा हिमवत पपी पर्वत पर महर्षिक याप पत्योपम की स्थिति वाले देव रइस उनके प्रमार से झवण समुद्र का पानी मम्मूदीप में नहीं पाता हरिसर्प प रम्यक् धर्म क्षेत्र में युगालये मद्रिक प्रकृति पाळे, 48 सीसरी प्रति चि में उवण सपद्र का वर्णन + . मर्थ - 47 अनुवादक-पार प्रमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी देवा महिटिया सव्वाओ दहदेशदिवीयाउ भाणियवाओ पउमदहाओ तेगिच्छकेसरिदहा घसाणमु दवीयाउ महिडिया तासि पणिहाय पुन्वविदह अवरविदेहेमु वासेमु अरहता चक्कट बलदेवा वासुदेव चारणा विजाहरा समणा समणीओ सावगा, साविगामो मणुयापगभगा तसिं पणिहाय लवणे सीता सीतोदगासु सलिलामु देवता महिडिया । दवकरुउत्तरकुरामु मणुया पगतिमगा मदरे पव्वत देवा महिड्डिया, जवरण मुदसणाए जबुद्दीवाहिवइअणाढिए णाम देवेमहिड्डिए जाव पालभोवमाठतीए परिवसति, तस्स पणिहाय लवणसमुद्द जो उवीलेति जाव नोचवणे एकादग करोन सचिनीत प्रकृति वाले राती उन के प्रमाव से लवण समुद्र का पानी मम्धूद्वीप में नहीं आता है नरकांता नारीकता, हरिकांता व हरिसलिला इन चार नदियों पर मादिक यावत् पल्पोपम की स्थिति वाले दय समें उनके प्रभाव स लपण समुद्र का पानी जम्मूद्वीप में नहीं भाता है, गपापाति ३ मालात मृत वैशाहय पर्वत में मादिक दव सो उनक प्रमाप स बम्द्वीप में लषण समुद्र का पनी की माता है निषष व नीलगत बषपर पर्वत पर पहदिक देव रस्ता उसके ममापसे लवणसमुद्रका पानी नमूदप में नहीं आता है पपद्रा, महापचद्रा, पुररीकद्रा, महापुटरीन्द्रा, नीगिच्छद्र केसरीदर, इन अहो, घृत, कीर्ति, बुद्धि, रक्ष्मी ये छ देवियों महर्दिक इन के प्रभाव स लवण समुद्र का पानी पर शक-रानाहादुर लाला मुग्वदवमरायजी ज्वारामसादजी. १ नापर में - अर्ष ++ पतु जीवामिमम प्रताप ६६+m अदुसरवण गोयमा ! लोगठिीत लोगाणुभावे जब लवणेसमुहे जबडीव २ नो उपीलेति भो उपीला नो वेवण एकोदग करेति ॥ ४५ ॥ इति मदरोईसो समतो ॥ लवणेण सम धापाइसडे नामदीये पट्टे वलयागार सठाण सठिए सओ समचा सपरिखि विचाण चिठति ॥ ॥धायत्तिसडेण भते । कि समयकगल सहिते पिसमयकवाल सठिए ? गोयमा ! समयकवाल सठिए नो मी आता? सीता सीतोदा मा नदियों में महदिकदेखियों रहती, इन के प्रमार से पानी मी भामा है देवकुरु रघर कुरु क्षेत्र के युमरिये मनुष्य मट्रिक मछतियाले यारत् विनीत प्रतिषाले , इन के ममार से पानी या नाता है मे पतिपर महदिकदेव रहते। उनके प्रभाव से पानी नहीं पाता है, जम्बू सुदर्शन वृक्षपर बम्दीप का मापपावे मनाधृत नामक देव रहता है इसके प्रभाव से लपण समुद्र काय पानी ममूदीप में मी माता है, लग समुद्र मम्मूदोपको पीडा नहीं करता है समय नहीं बनाता अपामो गौतम ! एसी लोकस्पिति सोझामुमा किजिम लवण ममुद्र जम्बूद्वीप में पानी की amart,दस को शाम करता है और मापनपनामा समसपुद्र का अधिकार सपूर्ण दुग ॥ ४५ ॥ यावीमरी प्रतिपाधि में सदर नापक नदेखा सपूर्ण हुवा छरण समुद्र की चारों मोर पवकी सण मापाप गर्नु पमपाकार संस्थानपास रस नाहै ॥ १॥ महो मगमन् 4 तीसरी मतिपचि में पातकी समईप का वर्णन rrrr जोषणसते तिम्णिय कोस पारस्मय ५ आव हाये अंतर पण्णरे ॥ ६ ॥ धायद सरस्सण मत! दीपस्स पदेला कालोयण समद पट्टा ? हता पुष्टा । तेण मते ! कि धायइसस पीये कालोपणे समुदे ? गोयमा ! पायइमई मो स्खलु ते कालोयण समुद, एव कालायणस्सवि धायइसरीवे जीवा उहाइचा २ कालोयणे समुदे पचापति ? गोयमा ! भत्येगड्या पचायति अस्येगाया नो पञ्चायति, एव कालो. यणेवि, अस्थगतिया पचापति अस्थगतिया नो पचायति ॥ ७ ॥ से केण?ण भते ! -पादक- पासावारी हान श्री भोप अग्निा • काक्षरनामाबादुर लामामुपदेवानी गासामसादमी बोबन और दान करना तर हा महो मगनन् पतली सण्डहीप के प्रदेश कालोद समुद्र गेला सदर ग! गौतम ' पर्व कर गे? मो मगन ! म पातकी समीप के बाबाद समुद्रमा गौतम रेपीरहप परतु कामेद समुद्र केनर बर्षात् समान पावको समापन कलेद ममुद्र का नहीं है ऐसे ही कामोद समुद्र की पृष्णा करवा सोभगवन् पातकी ममद्वीप के मोबयरकर कामोद समुद्र में क्या उत्पन होते हैं। बहो मौतम! लिखनेर पत्थरो और कितमा न परो ऐमे ती गरोदपि ममुद्र के किनेक भोवपाकी प्रम में रस्म रोव और जिसनेक उत्पनी हो । बझे ममवन् ! पत्की २ समा ५३ एवं बुच्चा धायइसहेदीवे २ ? गोयमा! धायइमडेण वीवे तत्थर देसे २ तहिं २ बहवे घय३ रुक्खा धायइवणा धायइदा णिच कुसुमिया जाव उवमोभेमाणा २ विटुति धायइ महाधायइ रक्खे मु, सदसणे पिपदमणे दुवेदेवा महिलिया जाव पलिओषमा ठिनीया परिवमति, से तणटण गायमा ! एव वुच्चइ, अदुत्तरवण गोयमा ! जाव पिच॥८॥धायइडण मते! दीवे केवति चंदा पहामिy? कप्ति सूरिया तवइ मुवा३, कद्दमहाग्गहाचार परिमुषा३, कइणक्वचाजोग जायमुषा३, महतारागण कोसाकोडीओ वीसरी प्रविपचि में पातकी सरदप का ६पन अर्थ " चतुर्दश नीबाभिगम भूम तृताय उपा खणदीप ऐमा क्यों नाम दिया गया हो गैातम ! पामकी खण्डद्वीप में स्थान २ पर पहुत घातकी पृक्ष, पामकी पन, पातकी बनाएण्ड सदैव कुस पत यावत् राते हैं पातकी खण्ड के पूर्षि में सच्चर कुरुक्षेत्र में घातकी वृक्ष । मौर पश्चिपार्ष उत्त कुरुक्षेत्र में यह घासकी वृक्ष है या जम्मू वृक्ष यावत् शाश्वा सदर्शन न मियदर्शन नामक दो पादक यानर परपोपम की स्थिति वाले देव रहते । भोगौतम ! इसा य इम का नाम पतकी खण्द पकहा है और भी अहो गौतम! इसका नाम शायत ॥ ८॥ भो भगन् ! घनमी खप में कितने पदने प्रकाश किया, मकश करस हैप्रकाश करेमे बिन र पे, सपने में सगे, किसन मह पर चार परे, घरते हैं व घरेंगे, लिसने नसबने .

च . सय- सोभाभिमुवा ३ ? गोयमा ! बारस चदा पभसिमुवा, एव चठवीस, ससिरविणो णक्खत्त सताय तिण्णि छत्तीसा, एगच सहस्स छप्पण धायइ सह अद्वेष सहरसा तिणि सहस्साइ ससयसयाइ धायइसडेदोघे तारागण कोडाकोडीण सोममुदा ३ ॥ ९ ॥ धायइमडेण दीघ कालोदे नाम समई वटै घलयागार सठाण सठिते सघओ समता सपरिस्विविताण चिट्ठइ ॥ कालोदेण भते! समुद्द किं समचकवाल सठाण सठिते विसमचकवाल मठाण सठिते? गोयमा! समचक्वाल सठाण सठिते णो विसम चक्कवाल सठाण साठते ॥ कालोदण भते! समुह केवतिय योग किया, फरत में घ करेंगे, कितने कोसोरतारा शोमे, शोमसे हैं व शोभेग ? अहो गौतम ! माद चढ़ने प्रकाश किया प्रकाश करते हैं प प्रकाश करेंगे पारा मूर्य तपे, सपते हैं व सपेंगे, यों सब मीसकर चंद्र सूर्य २४ हुए तीनसो छचोम नक्षम एक इनार छप्पन गृह, आठ लाख सीन इनार सातसो कोटा कोट तारा शोमित हुये, शामसे पशोभित होंगे ॥९॥ पातकी खण्डदीप की चारों और कालाद समुद्र वर्तुछ पलयाकार सस्याम बाला रहा हुवा हो भगवन् ! कालोद समुद्र क्या समचलाउ सस्पान पासा या विषम चक्रवास सस्थान वाला है ? अहो गौतम ! कालोद समुद्र समचक्रवाल मुस्थान पाता है परतु विषम चक्रवाक सस्थान पाला नहीं है, भो भगवन ? कालोद र्य BP ममुषा समझममधारी मुनि पी भपाठन को रकाशक राजापारादुर काला मुन्देपसायनी मालामादमी A चतई जीवामिगम मूघ तृतीय उपान 480 चकवार विक्खभेणे केवतिय परिक्षेवेण पन्नते'गोयमा अट्ट जोयणसयसहस्साइ चैकावाल विक्खभेण एक्कापति जायणसय सहस्साइ सन्चारमहस्ताइ छच्चपचुत्तरे जोयणसये किंचि विससाहिए परिक्खेवण पण्णचे, सेण एगाए पउमवरवेदियाए एगेण वणसडेणय दोनवि वण्णभो ॥ १०॥ कालायणस्मण मते ! समुदस्स कतिदारा पण्णता ? गोयमा ! चत्तारि दारा पण्णत्ता तजहा विजए विजयते जयते अपराजिए। कहिण भते ! कालोदस्म समुदस्त विजय णाम दारे पण्णत्ते ? गोयमा ! कालोदसमुहस्स पुरच्छिमपेरत पुक्खरवरदीवड्ड पुरच्छिमडरस पञ्चत्थिमण सीतोदाए महानदीए उपि एत्यण समुद्र की कितनी चक्रवाल चौडाइ व चक्रवाल परिधि कही। बहो गौतम ! उम की आठ लाख योजन को चकराल चौदाइ की और पाकनवे लाख, मचाह हजार, छमो पचवर योजन से कुछ अधिक परिधि की है, [ सर भाभ्वरद्वीप समुद्र की मीलकर परिधि जानना ] इपकी चारों ओर परखण्ड व एक पपवर दिका है दोनों वणन योग्य है ॥ १० ॥ अहो मगयन् ! कालाद समुद्र के कितने द्वार का ? बहो गौतम ! कालोद समुद्र के चार द्वार हैं जिनके नाम विजम, पैजयत, जयत व अपराजित अहो भगवन् ! कालोद समुद्र का विजयद्वार का कहा है ? अहो गौतम ! कालोद समुद्र के पूर्व पुष्करपरदीप के पूर्षि से पायम में सीतोदा महानदो कार कालोद समुद्र का विजयदार कहा है यह आव योजन का अच अर्थ 48+ बीसरी प्रतिपचि में लवणसमुद्र का वर्णन H- अनुगम-पारामारी मुश्रिी भोलस अपिमा + कालोपस्स समुरम विजयएणामदारे पण्ण, अट्ट जोयण सधेष प्पमाप जावरायहागीओ कहिण भते ! कालोगस्म समुदस्स विजयत गाम दारे १ण्णचे ' गोयमा | कालोप समदरस दक्षिणा परते पुक्खरचरदीय दक्षिणद्वस्त उत्तरे एस्थण कालोय समुहस्त विजयत पामशरे पपगते ॥ कहिण भने! कालाय समुहस्स जयत न मदारे पण्णचे ? गोयमा ! कालोयममुहरस पञ्चत्यमा पेरते पुस्खरवरदीव पच्चत्थिमहस्स पुरस्थिमेण सीताए महाणदीए उमि जयते नाम दारे पण्ण ॥ कहिण भते ! अपराजिए नाम पारे पमचे ? गायमा ! कालोदय समुदस्स उत्तरद्धा पेरते पुक्सरवरदीयोपरदस्स बनेरा मनदीप के चित्रपदार अमे प्रमाण मेरा मानना यारत् राज्यपानी परत काना मा मगान् ! सो समुद्र का वैजयत नाक द्वार का कहा ! अहो गौतम! कामोद समुद्र दक्षिण दिशा मत में पुष्कबार दक्षिण मे सचर में कालेद समुद्र का बैजयत द्वार कहा प्रो ममान् ! कामोद ममुद्र का नयन झार nt! महो गैहम! साद समुद्र के पधिप पुष्पर दीप के पमिास पूर्ण सीता मा नदी पर नपा द्वारा महो मनान् ! अपरा- मिस पार कर हो गोतमा काले समुद्र से रचर के मन में पुष्कर द्वीप कचरा रनेम में सपरामिड दार कहा और सब पैसे दी काना महो भगान् ' कालोद समुद्र के प्रत्येक मकायरामासादर का मुखदेवमाया पासासा. में 4A पनुश्श मीशामिगम मूब सुनापि उपाय +Hin दाहिणमओ एस्थण कालोयरस समुहस्स अपराजिए नामदारे पण्णचे सेस तेचेव ॥ कालो. दस्तण भते 1 समुदस्स दारस्सयर एसण केवतिय अवाहाए अतरे पण्ण ? गोयमा ! बाधीस सय सहस्सा घामउति खलुभधे सहस्साइ छंच्चसया उत्चाला दारतर तिष्णि कोसाये दाररसय२ भवाहा अतरे पगचे।कालोदस्सण भते ! समुदस्स पदेसा पुक्खर घरदीव तहेव,९३ पुक्खरवरपीवरसवि जीवा उद्द'इत्ता तहेव भाणियन्त्र॥१४॥सेकेणटेण भते ! एव वुचा कालोयणसमुद्दे ? कालोयणसमद्द गोयमा ! कालोपणस्सण समुहस्स उदके मासल मासले पेसले मातरासिवण्मामे पगाए उदगरसेण पगते ॥ काल द्वार का परस्सर कितना भवर का? हो गय! पापीम सास रथ पर सो छियालीस (२२९२६४६) पान तीन कोश का मत्येक द्वार पर बतर कहा है भदो मारन् ! कालोद समुद्र के प्रदेश पुष्करा दीप प्रदेशको स्पर सपा ? वगैरह सम पूषित् बानरा यावत् पुष्कर द्वपके मोर परकर कालोद समुद्र में कितने उत्तम हो । यो सप कान ||श्रो भगवन् ! कालोद है ऐसा कयों का? हो गौतम! बालोद समुद्र का पानी मासादनीय, पुष्ट, वमनदार, मनोहर इस सपूर्ण आग, साद के वर्ण भैसा है... सामाकि पानी के रस समान है इस में मारमा वीसरी प्रतिपत्ति में कालाद समुद्र का पर्णन . બી 4.अनुगदा-रामधारी मुनिश्री भोलस पिमा + कालोदस्स समुइस विजयएणामदारे पण्णचे, अट्ट जोयण सचेव प्पमाप जावरायहाणीमओ कहिण भते । कालोगस्म समुदस्स विजयत माम दारे पण्णते ? गोयमा । कालोय समुदस्स दक्षिणा परते पुस्खरवरदीव दक्खिणदरस उत्तरे एस्थण कालोय समुदस्स विजयत जामशरे पपणत्ते ॥ कहिण भने! कालाय समुहस्स जयते न मदारे पण्णते ? गोषमा ! कालोयममुइरस पचत्थिमा पेरते पुस्वरवरदीव पचत्यिमहस्स पुरस्थिमेण सीताए महाणदीए उधि जयते नाम दारे पण्ण ॥ कहिण भते । अपराजिए णाम दारे पामते ? गायमा ! कालोश्य समुहस्स उत्तरडा पेरते पुक्खरवरदीयोचररस्स गैरा मम्मूदीप के पिनदार नैमे प्रमाण वगैरह मानना पारत् रापपानी परत काना मा मगन् ! कासो- समुहका वैजयंत नाम द्वार का का हो गौतम ! कामोद समुद्र में दक्षिण दिशा मत में पुष्कबाप के दक्षिण घ मे नहर में काले द समुद्र का वैजयत द्वार कहा श्रो भगान् ! कामोर ममुद्र का जपम द्वार ! मा गेम ! साद ममुद्र के पभिम अंग में पुपर हिप के पमिस पूर्ण सीता मरा नदी पर नयन दर का मो भगान् ! अपरा- मिव पर धार का कामहो मौतम! कासद समुद्र से रचर के मत में पुफरवर द्वीप सराप से शेम में अपरामित द्वार का पासा पैसेही काला भो ममान् ' कामोद समुद्र के प्रस्पेक मकाएक-रामासादुर बाा मुखदेवमापी मासासी.

+ चतुश्च नीपनिगम सूत्र सृवाय उपाय +gh वाल सठाण सठिते ॥ पुक्खरवरेण भते ! दीये केवइय चक्कबाल विवस्वभेण, केवइय परिक्खेवेण पण्णते ? गोयमा ! सोलसजायण सयसहस्साइ चकवाल विक्खमेण एगा जोयण कोही वाणउति खलु सयसहस्सा अउणाणउति भवसहस्साइ मटुसया चउणउयाय परिरओ पुक्खरखरस्स,सण पउमघर वेदियाए एकणय वणसडेण दाहवि घणओ, ॥१५॥ पुषस्वरवररमण भत ! कतिदारा पण्णता ? गोयमा । चचारिदारा पण्णत्ता तजहा--विजये वेजयते जयते अपराजिते ॥ कहिण भते ! पाक्खरवरस्म दीवस्म बिजये णामदारे पण्णत्ते ? गोयमा ! पुक्सरवर दीव पुरच्छिमापेरते पुक्खरोप समुह पुरच्छिमहस्स पञ्चच्छिमेण एत्थण पुक्सरवर दीवस्त विजयेणाम सोला काख योमन पफराह चौहाइवाला है एक फोट पाणषे लाख, तेवामी एमार, माठ सो चौरा- पचे योजन की परिधि में यह पुष्करपर झोप एक पपवर वदिका प एक पनखण्ड से चारों ओर लपे टाया हुवा है इन का वर्णन पूर्ववत् जानना ॥ १५॥ अहो मगवन् ! पुष्करपर द्वीप के कितने द्वार कर बहा गौतम ! चार दार कई हैं सपया-विषय, धेनयत, मयत घ अपराजित ।। १६ ।। मा भगवन् ! पुष्करवर दोप का विषय द्वार कहां का है ? महा गौतम ! पुष्करवर द्वीप से पूर्व के मत में पुष्करोद समुद्र के पूर्व से पश्चिम में पुष्कर दोप का विनय द्वार कहा है यों चारों द्वार का 43. तीसरी प्रतिपचि में कालोद समुद्र का वर्णन 4th मर्य .

+मनुवादक पाहमचारी मुनी श्री कमोख प्रापिनी " महाकालायएत्ये दुवे देवा महिदिया जाव पलिओवम ठितीया परिवमति, से तेण?ण गोयमा ! जाव णिच्चे ॥ १३ ॥ कालोयणेण भते ! समुद्देकति चदा १मासिसुवा ३, पुच्छा ? गोयमा ! कालोयणेण समुद्दे घायालीस चदा पभासिमुवा ३, बायालीसच दिणगरादिता, कालोधिम्मि एते चरति सबध लेसगा णक्खता सहस्त एगमग छावत्तर चसयमुणेयन्त्र छच्चसता छण्णउया महग्गहा तिणिय सहस्सा अठावीस कालोदइमि बाराइसतसहस्सा नवसय पण्णास तारागण कोडीकोडी सोम- मुवा ३, ॥ १९ ॥ कालोयण समुद्द पुक्स्वरवरेणाम दीवे वट्टेवलियागार सठाण सठिते सन्नतो समता सपरिक्खता तव जाव समचकवाल सठाण सद्वित्ते णोविसम चक्क- काल ऐसे दो मादिक यावत् परपोपम की स्थितियाले देव सते इस लिये कालोद नाम कहा है यावत् नित्य है ॥ १३ ॥ भो भगवन् ! कालोद समुद्र में कितने पदने प्रकाश किया प्रकाश करने प्रकाश रंग वगैरह सघ पृष्ण करना भो गौतम ! कालोद समुद्र में ४२ चंद्र, ४२ सर्प, १९७६ नक्षत्र, ३६९६ प्रा । २८१२९५० क्रोडाफोर तारागण । ३१४॥ कालोद समुद्रसी पारों मोर पुष्करबर दोष बर्तुर बस्याकार मा एमारे बापत् पा समपवास परतु विषम चक्रवाल नहीं करो मगरन् ! पुष्करपर दोप कितना पक्रवाम चौगइ में है, जिवना पक्राउ परिधि में महागौवम ! माश क राजावहादुर लामा मुसदेवमहापभी पासाममानी ५ परिवसति, से तेणट्रेणं गोयमा ! एव चुच्चति पुक्खरवरदीवे २ जाव णिच्चे ॥१८॥ पुक्खरघरेण मते! दीवे केवइया चदा पमासिसुवा,एव पुष्छा' गोयमा! चोयाल चदसय घउयालचेर सरियाणसय पुस्विरवरमिदीवे चरति, एते पभासेचा, चत्तारि सहस्साइ बचीसचेवहाँति गफ्स्वचा, छच्चसया वावचरमहग्गहा, बारस सहस्सा छण्णउइ सय सहस्सा चम्मालीस भवे सहस्साइ पचारिसया पुक्स्वरवरे तारागण कोढाकोहीण सोभसुधा ३, ॥ १९॥ पुक्खरवरद्दीपस्सण बहुमज्झदेसभाए। एत्थण माणुसु- चारे नाम पन्यते पण्णचे, वढे वलयागार सठाण सठिते जेणेव पुक्खरघरदीव दुहा विभयमाणे २ चिटुति अभितर पुक्खरवरद्धच बाहिर पुक्खरवरद्धच,अभितर लिये पुष्कर घरदीप कहा गया अथवा इस का नाम शाश्वत है ॥१८॥ पुष्करबरोप में कितने चने प्रकाश किया गैरह पृच्छा हो गौतम, १४४ चद्र, १४४ मूर्य ४०१२ नक्षत्र, १२६७२ महाग्रह और ९६४४४० • नोटा मोड सारा पा सोमसे यह पुष्करपरदीपका कथन हुआ ॥१९॥ पुष्कररर द्वीप के मध्य माग में मानुषोत्तर पर्वत पर्तुल वछयाकार सस्थान वाला पुश्कर परद्वीप के दो माग करके रहा हुषा है जिन के नाम माभ्यतर पुष्करवरार्ध और पान पुष्करचराध अहो मगवन् ! आपतर पुष्कराध कितने पकवान चौटाइ में है और कितनी परिधि है ? भदो गौवम ! आठ हजार याजन चक्रपल 4. चतुर्दश जीवामिगप सप्र-सृतीय अर्थ + सीसरी मत्पिति पुष्करपदप का वर्णन 488- पारे पबचे ? तव सन्ध, एवं चत्वारिविवारा सीया सीयोदा जत्यि भाणियन्याोगा पुक्खरवरस्सप भंते। दीवस्स दारस्सय२एसण केवतिय अवाहाए अतरे पण्णते? गोयमा! अत्याल सय सहस्सा बावीस खलु भो सहस्साह अगुणुत्तराय चउरोदारतर॥१६॥ पुक्सरवरस्स पदेसा दोहवि पुट्ठा जीश दोसुवि भाणियन्वा ॥ २७ ॥ से केण?ण मते ! एक बुर पुक्खरवरदीवे ? गायमा ! पुक्सरवरेण दीवे तत्य २ देते२ तर्हि २ बहवे पठमरुक्सा पठमवणसडा णिव कुसुमिता जाव चिट्ठति,पउम महा पउमरक्सेस सत्य पउम पोडरियाणाम दुवे पेवा महिदिया जाव पलिओवम ठितिया साना ना सीवा मीचोदानी कानान पुषरबर- दमकदार का किनार तर का! महो मौतम ! ४८२२४६९ पोमन मितना प्रत्येक द्वार का भवर कहा है ॥६॥ महो मगवन् ! पुमर बादीप र पुगर पर समुद्र दानों सर्वर से क्या गैरा सब पूर्वोत प्रकार काना दोनों मीयों परकर दोनों में परसर सिमरते ॥१७॥मो भगवन् ! पुपर पर ऐसा नाप क्यों का मामो मौतम ! पुपर परदीप में पशुत पच वृक्ष पपनसग सिमित पावत् राते पर 4 पाच पार पच पुटरीक माप मादक पाय पसोपन की स्थिति पाये रो देव रावे। इस मादक-राजारादुरबाडा सरसहापणी लागतारमा धनुर्दश-मीचामि सत्र सनाय नपान + तिमिसया छत्तीसा, च सहस्सा गहग्राहाणतु भदे, सोलाइ दुवेसहस्साइ, अडयाल सयसहस्सा ॥२॥घावीस खलु भवे सहस्साइ दोविसया पुक्खरहे, तारागण कोडीकोडीण ॥ ३ ॥ सोभसवा ३ ॥ २१॥ समयखलेण मते ! केवतिय आयाम विक्सभेण देवतिय परिषेण पण्मचे ? गोयमा! पणयालीम जोयण सत सहस्साइ आयाम विक्स भेग, एगा जोयण काही जाय अम्भितर पुक्याच परिरया से माणियन्या जान अउपपण्ण ॥ २२ ॥ से केष्टुप भते ! एव धुञ्चति ममुसेखेते ? गोयमा ! माणुसक्खण सिविहा ममुस्सा परिवगति तजह'-कम्मभूमगा, अकम्मभूमगा, अतर दीवगा, मे समीण गोयमा ! एवं वुवति माणुस्मक्खत्ते २ ॥ अनुत्तरचण पुष्करर द्वीप ७२ चद्र १२ मूर्य, हामार सो एसीय Rहा प्रा, दो हमार सोहा नक्षत्र, प्रहती लव पापीस हमार द सा कदाकोट पारा॥२०॥ महो मगमन् ! समय क्षेत्र कितना म 1 सिप है। कहा गौतम! समय क्षेत्र ४५सव पाचन मा जम्मा चौराहे पौर र पुष्कराई निको परिधिषामा है मर्यस् । ०२१८२४९ पोबर को परिधि ॥ २२ ॥ अहो मनुष्य सत्र को हार हो गोवम! मनुष्प क्षण में तीन पक रक मनुष्प रहते हैं पश्या-कर्म भूपा, ममे भूपा, मंवर ईप महो मौकम ! इस सिष एसा कहा यावत to वीमरी मतपणि में नष्य क्षत्र का वर्ण ND अर्थ + कानुशास्त्रमचारी मुनि श्रामरोष पुक्खरवरण भते ! केवतिय पकवालग विक्खण केदतिय परिक्खेयेण पण्णते? मयमा ! अट्टजोपण सा गइस्माति चलन ल-पिक्सभेण, कोडोराय लीसा तीस दोहसिया ३ गुपणमा पुक्बरमा गरा *य मे मणमा खत्तस्स परेरपओ॥ स केणटप भते! एवं पचान अभितर पुर पभिर पुम्सरहे गोयमा! मभितर पुक्खरदम मस्तरेण पन्च {प सम्रअ 11 मपरिविम्वत्ते से तेणटेण गोयमा ! अम्मितर पुक्करदे,प्रदुतर वष जाव पिच २. ॥ अधिभतर पुरकावरहेण भते। केवतिया पदा पभासिनुवा३, व पुष्छा जात्र नागगम कोडा केटोओ? गोयमा । बावचरि पदा यावारिमेव विषयरा दित्ता पुनरमग्दी चरति एर पभासेता॥१॥ घोगा पीर पर कोर बबालीम सस वीम हमार ने म. गुपयस रोमन की थाम्पतर पुष्परा परिप बाम्ना इसनी मनुन क्षेत्र की परिप बानना बहो मानन् । प्राभ्यतर भाग एसा क्यों का ! बहो मौष ! नामवर पुरसर के चारों भार मानुषोचर पर्वत रहा हुआ इसरिने पावर पुपा हा पारत् निव॥ २० ॥ भो मग. छन् ' मा पर पुष्कर में कितने पाने असा लिया और पृष्ण को पादप ' भव्यतर .भकारक नापार साला दवसायमा मालामा सूत्र . + चतुर्दशनीवापिगम मूत्र तृतीय सप Athe तारा ज भणिय मणुस्सम्मि लोगम्मिाचार कलबुया पुप्फ, सठिय जोइस चरति॥५॥ रविससि गहनक्खचा, एवइया आहिया मणयलोए । जेसि नामागोत नपागया पणवेहि॥ ६॥छावा? पिहयाइ, बदाइचाण मणुयलोगम्मि ॥ दो चदा दोसूरा हवति एकक्करपिहए ॥७॥ छावा? २ पिडगाइ, नक्सत्ताण मणुयलोगामि छप्पन्न नक्खचाय, हुति इक्किक्कए पिडए ॥ ८ ॥ छावाट्ट पिडगाइ महग्गहाणतु मणुयलोमि, छावत्तर गगहसय होइउ एकाक्कए पिडए ॥ ९ ॥ चत्तारिय पतीओ चदाइचाय मणुयलोगमि, छट्ठीयर होइ एक्कक्कियापती ॥ १० ॥ छप्पण पतीतो, णक्वत्ताणतु मणुयलोगमि॥ इसना तारा समुर कहा ॥ ४ ॥ मनुष्य लोक में जो ज्योतिषी देव के विमान सब कदम्ब पुष्प के सस्य न घासे नीचे मकुचिस व अपर विस्तारवत बाधा फविठ मेसे आफारवाले ॥५॥ सूर्य, चद्रमा ग्रह नक्षत्र व नागों बो मनुष्य लोकमें कहे इनका नाम प गौम प्रगटपने नहीं कर सकते हैं ॥६॥ इम पनुष्य लोक में चद्र म सूर्य के ६६ पिटक को एक २ पिंटक में दो भद्र दो सूर्य है॥ ॥ इम मनुष्य माझ में नक्षत्र के ६६ पिटत को हैं ए: २ पिटक में छप्पन २ नक्षम है ॥ ८॥ मनुष्य लोक में मस प्रा के ६६ पिटक हैं और एक २ पिटक में १७६ महा ग्रा॥।॥ पद व सूर्य की मिलकर चार पत। एक २ पक्ति में ६६-६६ चढ़ प मूर्य ॥ ॥ मनुष्य लोक में नक्षत्र की ५६ पंक्ति aar तीसरी मतिपचि में मनुष्य क्षेष का वनम अन्य मर्थ . त्र धनवादक-पारसमचारी मुनि श्री बमा ऋषिमी 10 गोयमा । समयक्तिचे सासये जाव निचे ॥ २३ ।। मणुस्स खेतेण भंते! कइचदा पभासेसुवा ३, कइसूरा सवइसुवा ३, गोयमा ! पचीस चसय वतीस चेत्र सरियाणसय सयल मणुस्सलोय घरति एए पध्मासेता ॥ १ ॥ एक्कारस सहस्सा, छप्पिय सोला महग्गहाणतु ॥ छच्चसया छण्णठया, णक्खचा तिण्णिय सहस्सा ॥२॥ भट्ठासीह सत सहस्सा, पत्तालीस सहस्समणुयलोगम्मि, सत्त्यसता अणुणा, तारागण कोही कोडीण ॥ ३ ॥ सोमसवा ३ एसो तारापिंडो सो समासेण मणुयलोगम्मि, बहिया पुणताराओ जिणेहि भणिया असखेजा ॥ ४ ॥ एवइय मनुष्य-क्षेष है पयवा मो गौतम ! मनुष्य क्षेप यावत् नित्य ॥ २३ ॥ महो भगवन् ! मनुष्य क्षेत्र में कितने पद्रने प्रकाश किया पगैरा पृच्या ? अहो गौतम ! सब मनुष्प गोफ में ११२ चंद्रव १३२ सूर्य । [२ अम्बूद्वीप, । लषण, समुद्र, १२ पातकी सण्ड, ४२ कालोद समुद्र ७२ पुष्कराप दीपो यो सम मौसकर १३२ हवे ] मग्यारह मार उसो सोल माया, तीन इनार एसो छन्नु नक्षत्र,ठयासी साम्न चासीस हमार सातसो गोरा क्रोर वारागण में पायोतिषी अनुष्प छोक में सक्षेप से मानना और करि मसरूपात वारागण श्री वीकर भगवानने को प्रकाशकराजाबहादुर लाछा सुखदेवमापनी मालाममादजी । र्थ भावन . मर्थ 4. चतुर्दश मीरामिग मूत्र तृतीय x ante भणुस्साणं ॥१३॥ सेसि पविसताप, ताक्खच तु घट्तेणियमा ॥ तेणेव कम्मेण पुणो, परिहायति मिक्समताणं ॥ १७ ॥ तसि कलबुया पुष्फसाठता, होति तारखेच- पहा, मतोसकोडा पाहि वित्यहा पर सूराण ॥ ८ ॥ केण पवति चदी, परिहाणी केजहाति चदरताकालोवा जाण्हावा, केणणुभाषेण चदरस ॥ १९ ॥ किण्ड राहवि- माण, गिच्च पदण होइ अविराहय ॥ चउरगुलमप्पत्त, हेटा चदस्त त चरति ॥२०॥ घावाटुंदिवस,दिवसेतु सुक्तपक्सस्सनिस्यिवड चदो, स्ववति तचेव कालण ॥२१॥ इसके फल की प्राप्त होती है ॥ १६ ॥ चद्र सूर्यादिक पास महल में क्यों ज्यों आभ्यतर मटल प्रवेश करते । स्यों त्यो पापक्षेत्र पहा, मौर दिन मान मी दा है, और वेही चद्र माम्पसर पर से नीकलस त्यो त्यो पाप क्षेत्र कम है पौर रात्रिमान पढता है ॥ १७ ॥ सूर्यादिकका मापसेप दरवृक्ष के पुषके भाकारका शाट मर्य त गाडोक भाकारवाला अदर मेरु पर्वत पास सकुपित मौर बाहिर लवण ममुद्र की पास विस्तारत ? ||१८॥ बो भगान्! किस कारनसे शुक्लरम में द्रमा वृद्धि होता है, किस कारन में कृष्ण पक्ष में छद्रमा न होता, मीर किस कारन मे एक पक्ष कृष्ण प एक पस शुक्ल का? ॥१९॥ महो गौतम! कृष्ण, अमन रत्नमय रामा विमान चद्र पिमान नीचे चार बगुल की दूरी पर पद्मा साप मिह रहित पवा है ॥ २० ॥ पद विपान के ६२ भाग करे पैसे - वीसरी पमिपति में मनुष्य क्षेत्र का वर्णन • . ५ बमुबारक-पासमारी विनीपोपमी छाव? छावटीय होइ एककिया पची ॥११॥ छावर गहाण पतिसर्य होइ मणुयलो गमि ॥ शावट्ठी छावटी होइ एके कपा पंती ॥ १२॥ सेमेरु मणपरियति, पयाहिणा षत मंडळासो, अमट्टिनेहि तेहिं, जोगहि चदसूरा गहगणाय ॥ १३ ॥ क्लस तारागाण, अवट्टिता मंडलमुणेपन्या, तेवियपदाहिणावत मेवमा अणुचरति ॥ १९॥ रपलियर दिज्यराण उड्डेय महेय सकमोनत्यिामडल सकमण पुण अग्भतर बाहिर तिरिय ||१५|| स्यपियरदिणयराण मक्सचाप महगहाणष चार विसेसेण भवेमुह दुक्खचत्र कि.मरकनीक मेंनमो ॥१॥ मनुष्य सोम में ग्रहकी १३ पंक्ति मस्पैक पंक्ति में १६-६६ ग्रह। १२॥ परोक सर पर मेरु पर्वत, पारों भोर प्रदक्षणा करते हैं भयं तू म मे समाव सेमविर में वहां सूर्य प्रा मनस्पित। क्यों की पयायोग्य मे मम्प मरस में मान करते है । और नमम तारापेरस प्रारिया बीत उन मेरल में परिभ्रपण aff परवा हमी बेरकी मामपास पासवा करत १४॥पद्रप मूर्य के पर या नीचे समाविमो परंतु अपने मंशा में की गति पर्वात् भाम्पतर बाहिर रस में वीरा मन ॥५॥ चंद्र, पूर्व प्रापमान में चारों की राशि पीती है तब वो पनुष्य मोक में मुख कामकरानापार शाम मुन्नदरमहायत्री बासा मारी.

Y दीव, पत्तारिय सायरे लवणतोये ॥ धायइ सडे दीवे, बारस चदाय सूराय ॥ २७ ॥ धायइसडप्पमिई, उहिठातिगुणिता मवे चदा॥ मादिल्ल चदसहिता, भणतराणतरे- खत्ते ॥ २८ ॥ रिक्वग्गह तारग्ग, दीवसमुद्दजदिच्छसेणाऊ ॥ तस्त ससीहिंतुगुणित रिक्खग्गह तारगागतु ॥२८॥ यहिरियाओ माणुसनगस्स,बदसूरावाहिता ॥ जोगा चदा मभितीजुत्ता।सुरापुण होति पूसेहि।३०।चदातो सूरस्सय,सूरा चदस्स अतर होति।पण्णास ५४९ मर्थ 48 चतुर्दश मीपाभिगम सूत्र मूसीय उपास 48 चार चद्र,चार सूर्य होते हैं गौर इस से तीनगुने घातकी खण्डमें बारह चंद्र पास मूर्य हैं॥२६॥ घातकी खण्ड के माग कद्वीप समुद्र के घर मूर्य को तीनगुना करके पाहिले के द्वीप समुद्र के चद्र, सूर्य मोलाना मितना आवे नवनी भागेकी सरूपा मानना दृष्टान्व-पावकी खण्ड द्वीप में पारा चद्र व पारह सूर्य में इन के तीनगुने करने से २६ वे हैं उस में प्रथम नम्मदीप क दोष लरण ममुद्र के चार यो ६ चद्र मूर्य मोलानेसे तप ४२ चद्र व ४२ सूर्य होते हैं इसी तरह भागे मी नानना ॥ २७ ॥ जिस द्वीप समुद्र में नक्षत्र ग्रह व तारा जानन की इच्छा हाये उस द्वीप समुद्र के घर मर्य की साय उन के परिवार स गुना करना जैसे रावण समुद्र में चार पद मस्येक चद्र के २८ नक्षय में इम से २८४४-११२ वषण समुद्र में नक्षत्र दुसे ॥२८॥ अप मनुष्य क्षत्र पाहिर घद्र मूर्य का अवर कहते है, मानुपाचर पर्वत से पाहिर चद्रमा प मूर्य अवस्थित हैं 48 तीसरी प्रतिपचि में मनुष्य क्षेत्र राबर्ग 438 नर्य 4. मनुवादक पानापारीमुनि श्री ममाछक ऋषिमी 0 पम्मरसविभागेणय, चदपण्णरसमेव आवरति ॥ पण्णरसविमागेणय, तेणेव कमेण धक्कमति ॥ २२ ॥ एव वति चदा,परिहाणि एव होति चदस्त॥ कालोवा जोण्होत्रा, तणणुमावेष पदस्स ॥ २३ ॥ अतो मणुस्स खेचे, इवति चारोबगाय उववण्णा, पचविहा जोतिसिया पदासूरागह णस्वता॥ २४ ॥ तेणपर जे सेसा, चदाइचगहतार णक्वत्ता ॥ णत्थिगतीण विचारो, अवट्टिता तेमुणेयन्वा ॥ २५ ॥ एगे जबुद्दीवे, दुगुणा लवणे चउगुगा हाति।ालवणग्गायतिगुणिया ससिसूरा धायई सडे॥२६॥दो चदाइह चार २ भाग शुक्ल पक्ष में सुल्ला करता है और ऐमा । चार भाग कृष्ण पक्ष में राहु अच्छादित करता है अपाघास्या के दिन दो भाग सुल्ठे रहते ॥ २१ ॥ चद्र पिमान के पभरह माग करे रस में से एक २ माग मतिदिन कृष्ण पक्ष में उके यो ममामास्या सक सप माग ढक जाये मौर शुक्ल पक्ष में एक २ भाग खुलाफर दर यो पूर्णिया में सब मुक्त हो जाये ॥२२॥ इमें नरा शुक्ल पक्ष बद्रमा दना है कृष्ण पक्ष में न होता है और कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष इसी तरह होते हैं ॥ २३ ॥ मनुष्य क्षेत्र में चद्र, सूर्य ग्रा, नसन व नाग ये पांच प्रकार के ज्योतिषी चलनेमाल ॥ २४ ॥ इस से आगे के द्वीप में पह, सूर्य, ग्रा, नक्षत्र व वारा अपस्थित में इन की गति न है ॥ २५ ॥प दीप समुद्र गत बद्र सूर्यादिक की संकसना नानने का कारन करते है बम्बूद्वीप में दो पर दो मूर्प, इस से दुगुने मवण समुद्र में होने से • मकाधव-राजावाहर वाला हसदेवसाायनी पाठामसादजी -- - त्रि 1 चतुदश जीवामिगम मूत्र-तृतीय उपद्र से केणटेण भते । एष वुश्चति माणुसत्तरे पव्यते ? माणुसुत्तर पवते गोयमा ! माणुसुत्तरस्सण पव्वयस्स भतो मणुया उप्पि सुक्ष्णा वाहि देवा, अदुत्तरचण गोयमा!माणुसुचर पव्यय मणुया ण कयाइ वितिवइसुश वीतिपयसिवा वीतिवयस्सतिवा, जाणत्य चारणेहिषा विजाहरेहिंवा देव कम्मुणावावि, से तेण?ण गोयमा ! अदुत्तर जाव णिच्च ॥ २६ ॥ आवण माणुसुत्रेपन्चए तावषण अस्सि लोएति पचति, जायण वासेतिया वासधरातिया तावचण अरिंस लोएति पबुञ्चति, जावषण गेहाइवा गेहावणातिवा सावधप मरिस लोगेति पञ्चइ, जावण गामाइया जाप रायहाणीहवा तापघण अस्सि लोएति पवुचइ, जावचण है वे दोनों वर्णन योग्य है ॥२५॥ अहो भगवन् ! पानुपोचर पर्वत एसा नाम क्यों कहा ? महो गौसम ! पानुषो सर पर्वत से पदर मनुष्य हैं, उपर मुवर्ण कुमार देव ध पारि देव और पानुपीचर है। स से बाहिर मनुष्य अपनी शक्ति से गये नही, मा सफसे ना है, और भायेंगे भी नहीं, पात्र मघा, पारण, विणा धारप अपरा देव के हरनकरने से मनुष्य पाहिर माते अथवा पा निरप है इसलिये मानुसोत्तर पर्वत नाम का रे ॥ २६ ॥ जासण मानुषोचर पर्पत है पहालग यह मनुष्य छाक है, हाँसम भरनादि क्षेत्र र पदाहिपाताद वर्षभर पर्वत र बहालग यह मनुष क्षेत्र है, महाँग घर दुकान तीसरी प्रतिति में मनुष्प क्षेत्र का वर्णन 44. मर्थ मपादक-बामणमा मुनि श्री बमोखक प्राषिभी पाहिर परिरयेम, एगा जोयण कोडी बयालीसच सतप्सहरसाइ छचीस सहरसाइ सत चोदसोलतर जोयण सते परिक्खवेण, मज्झे गिरि परिरयेण, एगाजोयण कोडी- बयालीस च सयसहस्साइ बोत्तीसव सहस्सा अट्ठय तेविसा जोवणसते परिक्खेवेण उरि गिरिपरिरपेष, एगा जोयण कोडी बयालीसच सयसहस्साइ वत्तीसच सहस्साइ प्पवय बत्तीसे जोयण सत्ते परिक्वघेण, मूलविच्छिण्णे, मज्झ सक्खिते, ठपिं हणुये, अतो सण्हे मझे उपगगे बाहि दरिमणिज्जे इसिमण्णे साहणिस्साइ अवध नाव रासि सठाण साठर सय जबूणयामते अच्छे सण्हे जाघ पडिरूवे ॥ उमयो परिस दोहिं पउमवरवदियाहिं दोहि वणसंडेईि,सन्नतो समता सपरिक्खेिचे,वष्णो दोष्हिवि॥२५॥ नीचे की परिधि ११२३६७१४ योजन कीरै बाहिर की पीच की परिधि १४२३४८२३ बोमन की मौर पर की परिधि १४२३२९३२ योजनकी मूह में विस्तीर्ण, मध्य में सक्षिप्त प उपर मकुचित मदर लक्ष्मी मध्य में कंया र बाहिर देखने योग्य से सामान के दो पत्र सम्बाका प पा के दो पनि सकुचितकर पैठता है पैसा भी यर जैसा संस्थान बाला, मब अम्मूनद रत्नमय पप, वक्ष्म यावत् प्रतिम है दोनोपामु दो पर मेदिका दो पनसप पारों मोर रतुकार कप्रकाशक-राजारादुर लामा पुसदवसापनी आपाप्रसाद मी.

+ चतुर्दश नीवामिग मूपतृतीय उपज से केण?ण भते ! एव वुच्चति माणुसत्तरे पव्वते ? 'माणुसुच्चरे पब्बते गोयमा ! माणमुत्तररसण पत्रयस्स मतो मणुया उप्पि सुषण्णा वाहिं देवा, अदुत्तरचण गोयमा!माणुमुत्तर पन्वय मणुया ण कयाइ वितिषइसुवा वीतिश्यतिवा वीतिययस्सतिया, गण्णस्थ वारणेहिंवा विजाहरेहिया देव कम्मुणाशवि, से तेण?ण गोयमा ! अदुस्तर जाव णिश्च ॥ २६ ॥ आवण माणुसुत्तरेपन्नए तावचण अस्ति लोएति पञ्चति, जावचण वासेतिवा वासधरातिया तावचण मरिंस लोएति पञ्चति, जावचण गेहाइवा गेहावणातिया तापच अस्सि लोगेति पञ्चइ, जावण गामाइया जाय रायहाणीषा तायषण अस्सि लोएति पत्रुश्चइ, आवचण है ये दोनों वर्णन योग्य ॥ २५ ॥ दो भगवत् ! मानुपाचर पर्वत ऐसा नाम पपों का ? महो गौसम ! पानुपोचर पास से मदर मनुष्य , उपर सवर्ण कुमार देष ष पाहिर देखा और पानुपोचर पति से पादिर ममुष्प अपनी शक्ति से गये नहीं है, मा सकते हैं, और जायेंगे भी नही, पाप्र मघा पारण, विधा पारण अपपा देव के रनकरने से मनुष्य पाहिर माते अयवा यह नित्य है इसलिये मानुगोचर पर्वत नाम का है ॥ २६ ॥ मासग मानुपांतर पर्षस है पहलग या मनुष्य लोक है, महलिग मरनादि क्षेप र पहादिपवतादि वर्षभर पर्वत वहांला यह मनुष्प क्षेत्र है, महालग घर दुकान में ११वीसरी मविपचि में मनुष्य क्षेत्र का वर्णन 4.1 - मर्थ मनुमाद-बानमवारी मुनिश्री ममोस पिनी ++ अरहता पवटी वलदेवा वासुदेवा पहिवासदेवा चारणा विवाह समणा समणीओ सावगा साविगाओ मणुया पगति भद्दगाविीता ताव चाण अस्सिलोएति पवुनति जाव घेण समयातिवा वलयातिया आपापाणइवा थोवाइया लवातिया मुहुचातिवा, दिवसाति- पा, महोरतानिया पक्वातिया मासातिया उइतिवा अयणातिवा सबछरातिवा जुगाइया वातातिवा वामसम्मातिवा,वाससहस्सातिवा, बाससयसहस्सातिवा, पुन्वगातिवा, पुवाया, सुडिपगातिय, एव पुन्ध सुदिए अडरे अववे हुहुए उप्पले पठमे णलिए अत्थणि उरे अयुते नओए पठए चूलिया जाव सीसपहेलियगातिवासीसपहेलियातिरा, पलिओधमेतिवा गैर मांसग मनुष्व क्षेत्री मसिम माम यावत् रापपानी है पालिग या मनुष्य हो । माग बारईत, पती पसल, बासुदेव, मदिवासुदेव ममा चारण, पिया चारण, विपापा सापु, साधी, श्रापक, प्राविका मट्रिक प्रकृति पासे मनुष्य । प सम या मनुष्य मेवी मसिन ममय, मासिका वासावास, स्थाव, पड़, मुकून, दिवस, मोरात्रि, पक्ष मास, ऋतु, वन, सबरमर पुग, रस, सोबर्ग, सासवर्ष, बाल पर्ष, पूर्वान, पूर्व, पटियाग, बुदित देने पर, अपर, एप, रतस पत्र, परिन, अस्विचिबुर, अमृत, नपुत, पयुत, चूमिका यावत् बामदेशिका, पस्योपय, साबरोपम, मारामाबहादुर मामा मुखदेवमायमा मासासाst. . .

५ चतव-भीवामिमम मूत्र तृतीय उपाय 41 सागरोवमेतिया भवसापिणातवा उसप्पिणीतिवा, सावण मस्सिलोएति पवुश्चति,जाव पण पादरे विजुकारे वायर थणियसह ताष चण अस्ति लोगेतिवुच्चप्ति जाव चण बहवे उराले पलाहका ससेयति समुन्छति वास वासति ताव चण मस्सिलोए,जाव चण पायरे तेउकाए ताव पण मस्सिलोए, जावचण आगरातिवा नदीओतिवाणिधीतिवासाय चण अस्मिलोएति पयुच्चति, जाव पण अगडातिया गादीतिका साथ वण मस्सिलोए, जाव पण पदोवरागाइतिवा, सूरोवरागाइतिया चंदपरिएसातिवा, सूरपरिएसातिवा, पडियदातिवा, पसिसूरातवा इद धवाउदगमछेड्वा कप्पिहसिताणिवा साव या भरिसलाएति पञ्च: जाव चण पुदम सूरिय गहगण णक्खचताराहरूवेण परिणीय मपसापणी पहा लग मनुष्प छोकर मां मग पादर विपुस प बादर स्थनिस बन्द है भगवान का मालिम पादर मेघ उत्पम हो । प्रलय दावे पर्वा लग या मनुष्य को कहा लग बादर वेशापा है यहां लग यह मनुष्य लोक हैं, जहां लग आगर पनिधि हैं यहां लगाया मनुरुप गोमाग मगड नदी वगेरा है रहों छग या मनुष्य लोक है महालग पद्ग्रहण,सूर्य ग्रहण, पद्र की चागे मोर पुरस, सूर्य की चारो ओर कुछ, प्रविचंद्र, प्रतिसूर्य,, इन्द्रधनुष्य, उदक मत्स्य, व काप सितासन पर मनुष्य होगी जहां मना पद, सूर्य, प्रह, नक्षत्र सारा का गमनागमन, 2ीसरी प्रतिपत्ति में मनुष्य क्षेत्र का वर्णन Hin- .

मनुवादक-पामग्रमवारी मुनि भी भमोलक शामि अभिगमण निगमण बुष्टि निवृद्धि अणवहित संताप सठिती आयजति तावचण अस्सिलोएति पयुधति ॥ २७ ॥ मतोण मते । मणुरस खचरल जे चदिम सूरिय । गहगण पक्सत तारा रूवाण तेण भते ! देवा कि उड्डौवषण्णगा कप्पोववनगा विमाणावषण्मगा थारोवषण्मा चारठितीया गतिरतिया गतिममावण्णगा? गोयमा! तेण देवा जो उड्डोववष्णगा को कप्पोववण्णगा, विमाणोववाणगा, चारोववष्णगा नो चारठीतीया गतिसमावण्णगा, उडमुह कलघुया पुप्फसठाण सठितेहि, जोयण साहस्तितेहिं सावक्षेचेहिं साहस्सिताहिं बाहिरियाहिं वेउनियाहि परिसाहि दि, हानि, बनबस्विवपना, संस्थान को सस्थिति बनेर वहा सग यह मनुष्य क्षेत्र का ॥ २७ ॥ बहो मनवन् । मनुष्य क्षेत्र में जो चट्र मूर्य प्रह, नक्षत्र पसारा वे स्पा कर्ष गति पथम, सोमबार, विमानोत्पमरे, चारोत्पमरे, चार स्थितिया, गति में रक्ष या गति समापन मो गौवम! देव सर्व नविन उत्पम नमस्पोत्पमनी नी सोक में अपने स्याविषयी विमान में उत्पन हो, पारोत्पम वर्षात् चमनेवाले, स्थिरवारी नहीं है, मति में एक, मति समापन रे, बाप मुलगा बदर गुम सस्पानपास बनेकरमार पोमन बापत्र पारिरी • कायक राजामादुर लाला सदेवसहायनी मानी।

मूष तृनाय उपान :- चरश मीरापिगम महता महता णीय वादिय सति तलताल तुहिय घणमुलिंग पडुप्पवादितरण महया उकि? सीइनाययालकलयल सद्देण, विपुलाइ भोगभोगाइ भुजमाणा अस्थ पवयराय पन्चइद पदाहिणावच महलायरमेरु अणुपरियति ॥ २८ ॥ जयाण मते ! तेसि देवाण इदे चयति से कहमिदाणी पकरेंति ? गोयमा बचारि पचसामाणिया तोट्ठाण उबसपबित्ताण विहरति, जाय तस्थ अण्णे इवे उपवण्णे भवति ॥ २९ ॥ इपट्ठाणेणं भते । केवतिय कालविरहते उववातण पण्णाचे ? गोयमा ! जहण्णण एक समय उक्कोसेण छम्मासा ॥ ३० ॥ बाहिरियाण मते ! मणुस्स- रिव परिपदा सहित पहे २ नृत्य, गीत, पावित्र, सस, ताल, तन्तळ, त्रुटित, पन, मुसिर, प. पदह के शब्द से पदेर सिंहनाद भैसा कोलाहल करते हुवे विपुल मोगापमोग भोगते हुये, स्वच्छ निर्मल मेरुपर्वतराज को प्राक्षणा करते हुवे मेरुकी पर्यटणा करते रहते हैं।।२८ामहो मगवन्! अब उनका इन्द्र चवता हैं, सप वे इन्द्र पिना केसे करते ? बरो गौतम! नहीं लग पन्य इन्द्र उत्पन्न हावे नी पहा लग, वहां के चार पांच सामानिक देर इन्दका स्पान अंगीकार कर गरे ॥ २९ ॥ अहो मगवन् ! इन्द्र उत्पन्न होने का स्थान किसन, काम तक मिरहित राना ११ मो गौतम ! मधन्य एक समय उत्कृष्ट छ मास विरहिट राता है ॥ ३० ॥ भो मान ! मनष्य अर्थ तीसरी प्रतिपचि में मनुष्य क्षेत्र का वर्णन se मेर अनुवादक-पायमचारी मुनि श्री भमोकारिन अभिगमण निगमण युढि निबुडि अणवट्ठित संठाम सठितो आघवेजति तावरण अस्सिलोएति पवुधति ॥ २७ ॥ अतोण मते ! मणुस्स खचरस जे चदिम सुरिय गहगण पक्वत तारा रूपाम तेण मते ! देव किं उड्डोवषण्णमा कप्पोचवलगा विमाणाश्यण्णगाथारोवषण्णा पारठितीया गतिरतिया गतिसमावणगा? गोयमा! तेण देवा जो उड्डोपवण्णगा पो कप्पोरवण्णगा, विमागोवरणगा, चारोववष्णगा नो धारठीतीया गतिसमावण्णगा, उडमुह कलचुया पुप्फसठाण सठितेहि, जोयफ साहस्तितेहिं तावक्षेहि साहस्सिताहिं बाहिरियाहि वेउवियाहि परिसाहिं दि, शानि, अनास्थिवपना, सस्यान को सस्थिति बनेरह महा लग यह मनुष्य क्षेत्र का ॥२७॥ महो ममपन् । मनुष्य क्षेत्र में मा चंद्र मूर्य , नक्षत्र पसारा क्या कर्ष गति पती सोसम है, विमानोत्पम , पारोस्पम, चार स्पितिवार , मति में रत या गति समापन ! जब गौतम! देव सर्व मति कसत्पमन, स्पोत्पमनानी सोक में अपने ग्यातिषी कविमान में उत्सम हो, चारोत्पम अर्थात् पपनेपा, स्थिरपारी नहीं है, नतिरक, मति समापन, कर्म मुसबारे कदव पुष्प बसस्थानपाल भनेक मार पोमन वामन पाहिर की • सापक रामामादर माझा सदसरायमी सामागी.

T ॥ सुर्दश-मीमामिमा मून हवीय अपाङ्ग + अण्णाण समोवगाढाहिं लेस्साहि, ते पदेसे सन्यतो समता मोभास उचोवेति, तवेति पभासेति ॥ ३३॥ जहेण भते ! तेसिणं देवाण इंदे चयति से कहमिदाणि पकरेति ? गोयमा ! जाव चचारि पच सामणिया तठाण उवसपजिप्तान विहरति जाव तत्थ अण्णेइदे उवषण्णे भवति ॥ इदट्ठाणेण भते ! केवतिय काल विरहिए उववाएण ? गोयमा ! जहण्णेण एक समय उक्कोसण छम्मासा॥३२॥ पुक्खरवरेण दीव पुषस्वरोदे पाम समुद्दे पट्टे पलयागार सठाणे जाव सपरिक्खित्ताण चिट्ठति ॥ पुक्सरोदेण मते ! समुद्दे केवतिय चकवाल विक्रमेण केवतिय परिक्ले- सेश्या से शिखर पैसे स्थित बने हुयेथे चंद्र सूर्य जन प्रदेशों को प्रकाशित करते हैं, पोस करते हैं, तपसे प्रकाश करते हर्ष स मसाध करते हैं ॥१॥ महो मगनन् ! अब इन का इन्द्र परवा रेप इन पिना क्या करत ! बो गौतम ! यापत् महा लग इन्द्र होये नही पालग पार पांच सामानिक सस स्थान को भगीकारकर विचरते हैं यो मगमन् ! इन्द्र स्थान का किसमा विरह कहा है। बहो गौसम! नधन्य एक समय मास का विरह होता है ॥३२॥ पुष्करपरदीप की पारी भोर पुष्करपसे दपि समुद्र पर्नुछ पलपाकार रा हुवा है महो मगवन् ! पुष्करोदपिः समुद्र किवना पक्रपाल विमपने में कितनी परिपि है! मो गौतम ! सख्यात छाक योजन की पफमार चौतारी और +हरी हिपचि में मनुमा का वर्णन +4 मर्ष बनुवादक-बायकारी पनि श्री भाषिणी + खेतरस जे चंतिम सूरिय गहगण नक्खच तागरूवाण तेण मते ! देवा कि उड्डोषवण्णमा कप्पविषण्णमा विमाणाववण्यगा, चारोववष्णमा, चारठितीया गातिरातिया गतिसमा. वण्णगा? गोयमा! तेण देवा णो उड्डोवषण्णगा णो कप्पोषवण्णगा विमाणोववण्णगा,नो चारोववण्णगा चारठितीया,नो गतिरतिया नो गतिसमावण्णगा,पकिट्ठग सठाण सठितेहि जायण सयसाहस्लिमहि तावक्खेतहिं सय साहस्साहिय पाहिराहिं पेठम्पियाहिं परिसाहि-महया २ महगीय पादितरवेण दिन्वाइ भोग भोगाइ मुंजमाणा विहरति, जाव सुमलेस्सा, सीयलेस्सा मदालेस्सा मदयवलेस्सा चित्ततरलेस्सा कुटाइस ठाणठिता प्रा, नसब धारा स व्योतिषी देवोपर्ष मति सस्पन , कस्सीस्पम, विमानोत्पब, पारोवन 11, पारस्थित गति रक्कोपा गति समीपमाया? हो गौतम देव वर्ष सबसलोत्तम न परतु अपने २ विमान में समरोठे पहने पानी परतु स्थिर , मति में कर गांव समापन नही पकी हुई इंव के सस्थान बाहेर बनेक कास योमन पर्यंत जाप क्षेत्र और हासों गम पारि की विकृषिव परिपदा सरित परे २ नृस्प, मीत वादिन के रम से दीप भोमोपमोम मोमवे से विपरवे । यावत् तुम रेश्या, सीवसेश्या, मैदावावर चित्रावर यादव परस्सर अपमतीस प्रकाश्क-रामायगर सासामुसदेवसरात्री मातामसारनी ५ - पतुर्दश भाषामिगम सूत्र तृतीय उपा ॥३॥वरुण पर, पनि पक्षणोदे ग्राम समुहे वो वलयागार जाव बिट्ठति समकवाल, विसठिति तहेव सव्व भाणियन्व, विक्खभ परिक्खेको सखेजाई जोयण दारतरच पठमवर घणसडे पएसा जीवा. अस्थे• ॥ से केण?ण भत ! एव वुचति वरुणोदे समुद्दे ? गोयमा ! वरुणदस्सण समुदस्स उदधे से जहा नामए चदप्पभाइ। मणसिलागाइवा परासिंधु घरवारुणीवा पत्तासचा पुप्फासवेश्या चोयासवेइवा फलासवेइया मदुमेरएइवा जातिप्पसचाइवा वज्जूरसाइवा मुदियासारड्वा कापिसाइणेइवा सुपक्कए खोयरसेइवा पमतसभारसनिता पोसमास सतभिसय जोग ठविचा निराहत विसिट्ठ दिण्ण कालोक्यारी सुद्धावा उक्कोसगअट्ठ दोपके पारा मोर पारुणोदधिममुद्र बर्मुल पछयाकार यापम् रहा हुआ है या सम मकान मस्यानपाला है चौटाइम परिव सरूपात यागन की काना दार्गवर मी एसे ही काना पावर पेदिका. धनखण्ड, मदप नीयोपरि वगैरह पूर्ववत् नानना महो मगपन्! पारुणोदपि नाप पयों का भरो गौतम' वारु गोदपि का पानी से पद मा मदिरा, पणसिला का मदिरा, प्रधान सिंधु, पचम पारुणी (पप विश्वप) पासा बासम, पुष्पकामासर, चूमा पनस्पमिका मामप, फसका भासप, मधुमेरक, मासर्वन रसका मदिरा, मजूर सार द्राक्ष सार, कापिसायन, बच्यो सरा पकाया हुआ सेंदी का रम सपान मय, पान समार से बना हुआ, पोप मास में रनाने के याग परिव निरूपास पहुस उपचार से पनाइ र मूग, मुभा ममृत 40 सीसरी प्रतिपक में मनुप्य क्षेत्र का वर्णन 4H- अर्थ . .

परिक्खेवेव पनवे, पठमवरवेइया वणसरवण्णमो दारतरेवं पदेसा जीवा सहेर सन्ध सेकेण्टेण भते । १२ बुखद वारुणवरदीवे २ ? गोयमा वारुणवरेणं दीवे तस्थर ऐसे २ सहिं । बहवे खुड्डा खुडियामो जाब विलपतियामओ अछामो पत्थ्य २ पठमवरवेइय! वणसह परिसचा वारणोग प्रडिहत्याओ पासादीयाओ, तासुण खुडा खुडियासु जाव विलपतियासु बहवे उप्पाय पन्चया जाप साइडगा सन्वफलिहामया अच्छा तहेब वरुणवरुणप्पमा ॥ एत्थ दो देवा माहदिया जाव परिव सति. 'स तेणटेण जावामिष,जोतिप्त सन्य ससजगुण जाव तारागण कोड कोटीमी, चार दिवसपनसी द्वार र प्रदेश बीरोन्यचि गैरह सब पर्षवत् जानना महो मनवन् ! विससिये सरकार नाप रसा! मो मौतम ! बाणार दीप में स्थान २ पर चोट परी बारिया यावत् विडियों समपावत् मतिम्प मस्पेकको एक पचवर दिकापचनसण हिम पारनोदब(पदिरापमान पानी) र परिपूर्ण प्रामादिक, दर्षनीय,ममिस्पर विरुप जन गोटी बहरी पारियों पावत् विक पति में बहुत रसातपत वापत् सरस्टों सा स्फदिक रत्तमय सामणमाला वहां परम वापरणामा मापदामादिक देवरावे । इस लिये इस कर परमार नाम का माया पाल मिला है. पोवि सब प्रस्थानमुने जाना वापत् कोमोर वाराणों करना ॥१४॥पारपर मारकापाषादुर सबसहारची नजामतारी.

५ पण उता गधेणं उववेया रसेम उवर्षया फासे उपवेया भवेयारव सिया जो इण? सम? गोयमा ! वारुणोदस्सण समुदस्स उपए इचो इट्टतराए व जाव असारण पण्णसे,वारुणा वारुणिकता इत्ये वो क्या महाडिया जाव परिवसति, से तण?ण आव णिचे, सम्य जोतिस संखेजफेण गातन्य ॥ ३५ ॥ वारुणोण्णएण समुह स्वीरवरेणामदीवे घटे ज पचिट्टति, सम सखेजगविक्खमे परिक्खयोय जाव भाट्ठा बहुओ खुडासहिओवाषीओ जाव सरसर पत्तियाभो खारोगपडिह छाओ पासादियाओतासुण 18+ पतुर्दध-नीवामिनः मूत्र-नृतीय उप- Hin तीसरी प्रतिपत्रि में असरूपान द्वीप समुद्र का वर्णन मर्य बंदर्प पामे हामी, सब इन्द्रिय माप को मवाद करने वाली, पुष्टकारी, मनोहर भुभवर्ण गघ रस व स्पर्श युक्तमुरा रोपे पैमा क्या पानी ! बहो मौतम ! या अर्थ समर्थ नहीं है इस का पानी इस से भी अस्पद मनोहर पायत् स्वाद पाया है और भी वहां पर पानी पारुणीकांव ऐसे दो देव मादिक पाप रहते बरो मौक! इसठिये पारणोदपि नाम रसा पावत् रस का नाम नित्य शाप द्रादिकम्पोतिषी पसंख्यात मुने अधिक जानना ॥ ३५ ॥ रूमादपि के चारों मोर क्षीरोदक नामक द्वीप का पगार ममचतुम्न सस्थान वाला है सख्याव योजन का घकाल पोटासरूयास योभन की परिपिपामार पावत् मर्य साना पर पहुत जरी दी त्र बनुवादकनालयापारी मुनि श्री ममोपक मिमी पिटुपुट्ठा मुखाइतघरकिमदिण्ण कामाकोमपन्ना अच्छा वरवारुणी भक्तिरसा जम्बूफलपि? वण्णा सुजाता इसी उठा पलविणी महिय महुर २ पेजइसीसरत गेला कोमल कबोल करणी जाप आसादिता विसीता मणिहुय सम्बाध करण हरिसपीति जगणी सतोस वियो कहाव विममविलास वेक्ष हल गमल करणी विषण अहियसत्त जणणीय होति सगामदेसकाले कायर नरसमरससरकरणी कहिणाण विज्जयति हिययाग मठयकरणीहोति उववेसिताममाणीगति सलावितेग्गसयलेमि पिसभावुप्फालियासरमग्ग येण सहगारसुरमिरस दिवीया सुगधा आसायणिजा विसापणिज्जा, उप्पणेजा पीणणिज्जा मयणिजा एप्पणिजा सधिदियगाय पल्हायाणिज्बा, आसला मासला पेसला समान तप से अष्ट प्रकार के पिष्ट से बनाई हुई, मुख से बनाइ हुए रुर्दम सपान एलायची प्रमुख पस्तु,से बनाई हुई काठी प्रममकारी निर्पस अपानवत् पारुषी मती रस युक्त जाम्यू फल के पृष्ट भाग समान पर्मराी, ओष्ट के सबसम्पन करनेवाली मत्-िश्रीघ्रमेव नसा पट ऐसी, मधिक मधुर पीने योग्य, तिपित् छाउ चटु पनावे, पोप स्मन कोमा करनेपाली, हित करनेवाली, अनुपम कार्य रने पासी, पर्ष उत्तम करनेामी, साप, विभ्रम, विलास, करनेवाली, मम मन करनेवाली, विशेष अधिक सत्त उत्पन करनपानी, रण सग्राम मूरत युक्कादयशेमस बनानेवाडी, सुपरचित बनाई ई साकारके सुगपित १५ मास्सादनीय, विशेष साद योग्य, परीर का वृद्धि करने वाल, पूष्टि करते गाठी, कंदर्प पयाने पासी, मेसावक-रामाबहादर लाटा सुखदरसडायमी भाडामसादनी .

सत्र 122 पतुश भीवामिनः मूम-तृतीय सप RA वण्मेण उपवता गधेणं उववेया रसेम उववेया फासणं उपवेया भवेयारू सिया जो इण? सम? गोयमा ! वारुणोदस्सम समुदस्स उदए इत्तो इट्ठतराए घेव जाय असाएण पाणचे,वारणा वारुणिकता इत्ये दो दा महाडिया जाव परिवसति, से तण?ण आव णिचे, सव्य जोतिस संखेजकेण गातन्त्र ॥ ३५ ॥ वारुणोण्णएण समुद्द खीरवरेणामदीवे वष्टे जय घिट्टति, समय सखेजगविक्समे परिक्षेवोय जाव आट्ठा बहुओ खुशामुहिमओ वापीओ जाव सरसर पतियाभोलारोगपडिह छाओ पासादियाओतासुण कदर्प पाने वाणी, सम इन्द्रिय गाय को पलाद करने वाली, पुष्टकारी, मनोहर भुभवर्ण गप रस घ स्पर्श युक्त पुरा मा या पानी है ! महो मौतम ! या मर्य समर्थ नहीं है इस का पानी इस से भी अत्यंत मनोहर पापत् सादपासा बोर भी यहां पर पानी पारुणीकांत ऐसे दो देव मादिक पापत् रहसे बो गौतम ! इसरिये पारमोदपि नाम रसा पापस् इस का नाम (नित्य शाश्वव पदादिक योसिपी सब सच्यात मुने अपिड जानना ॥ ३५॥ वरुणोदपि के चारों भोर क्षीरोदक नामक द्वीप कहा पाप महार मपचनुस मस्यान पाला सरूपात योजन का पकार पोटासरूपास पोमन की परिपिराकार यावत् मर्य करना न त गरी नदी सासरी प्रतिपचि में अमरूपान प समुद्र का वर्णन मर्य अनुवादक बालनवाचारी मुनि श्री ममोहक नीनी पिटपटा मुखाइतवरकिमविण्ज कहमाकोमपन्ना अच्छा वरवारुणी अतिरसा जम्बूफलपिट्ठ वण्णा सुजाता इसी उट्ठा पलविणी महिय महुर २ फेजइसीसरच सा कोमल कबोल करणी जाप आसापिता विसीसा मणिहुय समाव करण हरिसपीति जगणी सतोस वियो कहाय विभमविलास घोल इल गमल करणी विषण महियमत जमणीय होसि सगामदेसकाले कायर नरसमरपसरकरणी कहिणाण विज्जुयति हिययाग मठयकरणीहोति उपवेसिसाममाणीगति सलावितेग्गासयलेमि पिसभावुप्फालियासरमग्ग घेण सहगारसुरमिरस दिवीया सुगधा मासायणिजा विसापणिवा, उप्पणेज्जा पीणणिज्जा मयणिजा दप्पणिजा समितियगाय पाहायणिज्जा, आसला मासला पेप्सला सावक-रामाबहादर लाछा सुखदेसहापभी भाडाप्रसादमी समान रूप से भष्ट प्रकार के पिष्ट से बनाई दुई, मुख से बनाइ दुइ कर्दम समान एडापषी प्रमुख पस्तु से पनाई हुई कारी प्रमनकारी निर्मस प्रधानरत् वारुणी नती रस युक्त माम्यू फल के पृष्ट भाग समान पासी, बोष्ट सासम्बन करनेवासी मर्यात्-पीघ्रमेव नसा घड ऐसी, मपिक मपर पीने योग्य, किषित् काम बचपनाये, पास स्पसकोमा करनेवासी, हित करनेराळी, अनुपम कार्य रने पाठी, दर्ष उत्पम करनेवाली, साप,विश्रम, विधात करनेवाली, बछम पन करनेवाली, विशेष अधिक सत उत्पन्न करनामी, रण सग्राम मूरत युक्त, होमम बनानेबाली, उपपश्लि बनाई ईमाकारके सुगधित १५ मास्सादनीय, विशेष स्वाद योग्य, परीर का वृद्धि करने वाली, पूहि करते गाठी, कंदर्प पखाने वाली -- सूत्र चतुर्दश-जीवामिग मूत्र तृनीय पार RH सु उसही मारु पल्लु अजुन तरुण सरपचे कोमल अच्छीयतण पण्डग वरिच्छ पारिणीण लवगपच पुप्फ पल्लव, ककोल्लग सफलरुक्खा बहुसुगुग्छगुम्म कलितो एललट्ठी महुरपऊर पिप्पली फलीतवल्ली वर विविर वारणीण अप्पोदगवीतसइर समभूमिमागनिझाए सुहेसिताण सुपोति सुधाताण रोग, परिवजिताण निरुवातसरीराण कालप्पभवाण वितीयतचीय समपमूताण अजण वरगवेलपवलय जलधरत जञ्च जय रिट्ठ भमर परहुत समप्पभाण गावीण कुडदोह- • तीसरी मतिपत्ति में भारयावदीप समुद्र का वर्णन मर्थ पोटग वनस्पति, श्रेय पारुणो, सग वृक्ष के पत्र, पुष्फ, फल, व कुपळबाळे अकूर, ककोल नामक फल वृक्ष, गुच्छ, गुरम सहित इलायची की सकटी का रस, नेठीमघ प्रचूरपपिरफल की पेल का रस और प्रधान पाहाण मुरा विशेष भैसा स्वाद योग्य होणे, और श्रेष्ट ममि में पिचरनेराली, अल्प उदक वाला सर्दम रहित भष्ट ममि माग में निर्मय से पैठने पासी, रोग रहित, निर्मय स्थान में गाने वाली, पदर 4रवि, असंह शरीरबत फटा से मुख पूर्वक प्रसवपाली, दो सीन बार मम्त दुई ऐमी, वर्णमें अजन समान, पहिप शृग समान, सम्पू, बारिश व भ्रपर समान काली गाय होरे और मिस का दुग्ब राने का स्थान पर कुदा सपान होपे, उमका दुम चार स्थानक से परिणमा हुवा होपे, ऐसी क्याम धर्मवाली माय का दुग्ध .

+बनुसार-पायमचारी पुनिश्री अमोरक मादिमी - सुट्टीयाखुडीतु जाव बिलपाचयासु यहवे उप्पाए पव्ययगासवरयणमया जाव पहिरूया!! पहुंरेय पुष्फदता इस्पे दोदेवामाहिड्डियाजाव परिवंसति से तेण?ण जाय णिचे जाव जोतिस. सव्व सखेज ॥ ३९ ॥ वीरवरेण दीव स्त्रीरोदणाम समुद्दे घंटे बलियागार सठाण सठिए जाव परिक्सिविता चिट्ठति समचकवाल सठिते नो विसमकवाल सठिते, सखेबाइ जोयणाइ सहसरसाइ विक्सभो परिक्खेन्यो सहेव सन्ध आव अट्ठो, गोयमा ! वीरोयस्सण समुदस्सउदग से जहा नामते सीबों पावत् सरसर पत्तियों में दुग्प जैसा पानी भरा पार सन पावडीयों में पात उत्पात पर्वतों सब रत्नमप यावत् मतिरूप पहा पुटरीकर पुष्पदंत नापा मार्षिक दो देव रा हैं इसलिये निस्सा पदादिक ज्योतिषी देव सरूपा को ॥ ३६॥ क्षीरवर द्वीप के पारों मोर क्षीरोदपि नाम समुद्र पर्तुग पसाकार हा दुगा सम चक्रवाठ समान वासरे परतु विषम वयाळ संस्थान पान सरूपात योचन का घमास चौडा सख्यात पोमन की परिपिवाला है सेरी सरकाना पावत् को भगान् ! सीरोद ऐसा क्यों नाम रसा! भो गौतम ! मेमे भर्जुन माम धरुन रस सहित, भोपळ पत्र सहित, गौर मंगेश तृपा पायी औषधि का रस, परित्यु देश विशेष, प्रकाराजारादुर गा सुखदेवसरायमी भासामसादमी पत्र न ५ +in चतुईनीमामिगम सूत्र तृतीय उपाय - खीराद समुद धतवरे गाम दीपे वह बलयाकार सठाण सठिए जाव परिक्ति- विठाण चिट्ठइ समचकवाल णो विसमचकवाले सखेब विक्खम परिधि पदेसा जाव अट्ठो गोयमा ! धतघरेणाम दीव तत्थ २ देसरनहिं यहवे खुशखुड़िया धावीओ जाव घतोदग पडहत्थाओ उप्पाय पठवगा जाव खडखडगा सव्यकच णमया अच्छा जाब पहिरूमा कणग कणगप्पमा इस्थ दो देवा महिड्डिया चदा सम्वेज्जा ॥३८॥ घतवरेण दीव घतोदेणाम समुद्दे पट्टे बलयागार सठाण सठिते जाव चिट्ठति, समचक्कवाल सठाण सठिते तदेव दारा पदेसा जीवाय अट्ठोगोयमा! घयोदय. समचक्रवार है परत पिम घवाल नी सरुयात योजन की पाल चौगद और सरूपास पोजन की परिधि में पापम् अर्य का पृतर द्वीप में बहुत छोटी बडी गपड़ीयो में पानी घृत जमा मरा हुरा उन पर उत्सास पर्वत यापस् स्वटक से हुवे है मष कांचनमय यापत् प्रति रूप हैं या कनक व कनकसम) नामक दो महदिक देव रहसे हैं, इस शिये पृमवर ईप नाम कहा है, चद्रमादिक ज्योतिपी सब अवरूपात हैं ॥ ३८ ॥ पृयर द्वीप के चारो ओर घर्तुर पसयाकार संस्थान वाला प्रमोद समुद्र रहा है या समवक गल सस्पानवानी से ही दार प्रदेश, भौर नीर का मानना इस तीसरी पतिपति में भसंख्यात दीप मुद्र का वर्णन अर्थ +ममनुवादक-बामामधारी अनि श्री बांस कमी- गाण बदल्या जाण रूढाण मधमासकाल समाहित होज पाउरकेवहोज- तासिं, खीर महुरस विग्गिम् बहुरन सपयुते. पयत मवगीसु कडिती भाउचरवह गुढ मच्छरितो वायरलो पाठरत पारितपहिस्स उवविए आपदाणजे विसायणिजे पीपमिजे जाप सावविएगातपल्हामिले जाव पण उबवेए जाय फासेण भवेयारूसिया ? पोतिष? समटे, स्त्रीरोदम्सम से उवगे एको बहतराषेत्र जाय भासापुम पण्णसे, विमल विमलप्पमाए इत्वदोदेवा माहिदिया जाब परिवसति, से तेष?ण सभेजा पदा जाव तारा ॥ ३५ ॥ मधुर रस सचिव होरे से मंदापि से पपाकर उस सर, गुर, मिनी राडकर पातुरंत एकरी के लिये साने योग्य मार पनाये दा स्पा योग्य, शरीर में पुष्टि करनेवासी पावत् सब गाय को मानदकारी रोये, पप बगावत् सई पुको महो ममान् धीर समुद्र का पानी क्या ऐसा है? महो गीतमा पाई सपर्ष मी हीरोद समुद्रका पानी इस से मी नस्संत गारद भास्वाद योग्य है यहां विमा भौर विमक प्रम नाम रोमादिको पावद रात रेस कारन से हीराद समुद्र पेमा नाम सारे इस ससपास ज्योतिषी है ॥३७॥ सरोद समुद्र के चारों मोर पृतार होप गर्नुन बरूपाकार का प्रकाशक-नामावादुर गा मुसदयमापनी नाम प्रसादची ५७ ++ चतुर्दश-नीवाभिगम सम-तृतीय सपा 48 घतोदेण समुद्द खोदवरेणाम दीधे बट बलयागारे जाव चिट्ठति, तहेव जाव अट्ठो ॥ खोदवरेण दीव तथ २ दसे २ तहिं २ खड्डा खुड्डीओ जाव खोदोदग पडइत्थाओ उत्पात पव्वतगा सबवेलियामया जाय पहिख्वा, सुप्पमा महाप्पमा इत्यदोदेवा महिटिया जाव परिवसति, सेतेणटेण सन्ब जोइस तहेव जाव तारा ॥ ४० ॥ खादवरण दीव खादोदेणाम समुद्दे पट्टेवलयागार जाव सखेबाइ जोयणसत परिक्खेवण जाव अट्ठो ॥ गोयमा ! खोउदसण समुदस्स उदये जहासे मासल मासल पसत्ये वीसत निह सुकुमाल भूमिभागेसु छिन्नेसु कट्ठलट्ठ विस? निरुवहय ॥ ३९ ॥ तोद समुद्र के चारों भोर इसुरस नामक द्वीप पर्तुल पळपाकार कहा है यावत् मर्थ पर्यंत काना बो भगवन् ! इसुपर दीप नाम क्यों कहा? मरो गौतम ! इसुवर द्वीप में स्थान २ पर गेटी पटी पापडियों पारत् सुरस समान पानी मरा है, वहां उत्पात पर ये वैडूर्य रत्नमय यात् प्रतिरूप पा समम व मामम नामक दो मादिक देव रहते हैं इस स इक्षुर द्वीप कहा है सब ग्याविपी चद्रादिक सख्यात है ॥ ४॥ सवर द्वीप के चारों ओर इसपर समुद्र पर्तुल वलयाकार रहा हुवा है, यावत् सस्पात योजन की परिपि यावत् अहो मगवन् ! उस का इसुवर नाम क्यों कहा? मा गौतम ! मनोहर प्रश्वस्त, पिनास, स्निग्ध मुकुपाल भामे भाग जहां होघे, पैसा देश में इस स का तीसरी प्रतिपचि में अमरूपात द्वीप समुद्र का वर्णन अर्थ .

परमादक प्रचारी मुनि श्री योक अपि नी + स्मण समुहस्स उदये जहा से जवग्गफुन्जसम्झइ विमुकुल कणियार सरसवसुविसुद्ध कोग्टदाम पिडितरस्सणि गुण तेय दीविय निरुयहत विसिटु सुंदरतरस्ससुजाय दधिमथित तदिवस सगहित प्रवणीय पदुधणाधित सुकदितउहावसवयीसदितस्स, महिय पीयर सुरमिगध मणहर मधुर परिणाम दरसणिज पच्छणिमल्लसुदोष भोगस्त सरयकालग्निहोज गोषयवरस्समह भवेतारूवेसिया ? जो तिण? समटे गोयमा ! घतोदयस्सण समुद्देस्स एतो इट्टतरे जाव अस्साएण पण्णते कते सुकताय इत्थ वो देवा महिाया जाव परिषसंति सेस तहेव जाव तारागण काटि कोडीमा ॥ ३९ ॥ का मथ की पृष्ठा करणे महो मगरन् । घृतवर समुद्र ऐसा नाम क्यों कहा ! भो गौतम ! उसका पानी विकसित कणयर पुष्प व कोरंट वृक्ष क पुष्पमाला समान त पिमवासा, लिम्पपना का गुण सहित, ददीप्यमान, निरुपम, सुंदर ऐमा दपि का मन्यन के पक्खन नीकामे, फोर उस सपाकर घृत नारे, ना गुस सुगंध युक्त, देखने योग्य, प्रशस्त, निर्मर, मुख से भागने योग्य बरताल में मोघृतपिर रोपे दब गौतम स्वामी पृष्ण करते है कि क्या घृवार समुद्र का ऐसा पानी है ? मो गौतम ' पा भय ममय नहीं हैं स से भी अपितर मास्वादने योग्य भौर मी हाँ कति मुझव नामक दो देर रहते हैं स सब वैसे ही जानना चंद्रादि ज्योतिषी सरूपात बावत् सरूयात कोदाकोर वाराभों .प्रकाधक-रामासादुर मात्रा सदा सायमीनामसारी. .

पत्र ++ चतुर्दश भीवामिगम मप्र-तृतीय उपास in किंचियिसाहिए परिक्खवेण पण्णचे,मूले विच्छिन्ना मझेसखिचा उप्पि तणुया,गोपुच्छ साठण सठिया सन्म मजणमया अच्छा जाव पडिरूवा पत्रेय २पउमवर वेश्या परिस्वित्ता, पचेयरषण्णसह परिक्खिचा वण्णमो,तेसिण अजण पन्वयाण उवरिपचेयरबहुसमर- णिज भूमिमागा पण्णता से जहा नामए आलिंग पुक्खरतिवा जा३ सयतितेसिण बहुसमरमणिज्वाण भूमिभागाण बहुमज्झ देसभाए पत्तेय २ सिहायतणा, एगमेक जोयणसय आयामेण पण्णास जोयणाइ विखमेण, वावचरि जोयणाति उह उधण, अणेगखभ सयसन्निविट्ठाण वष्णओ, गोयमा। बेदिका भौर वणवा वे दोनों वर्णन याग्य में उन अमनगिरी पर्वतपर बहुत समरमणिक भूमिभाग है मसे मादलमातल वगैरह यावत् पा बैठते हैं उस पहुस रमणीय भूमिमाग के मध्य में पृथक सिद्धायसन का एक सो २ योमन के समो, पचास • योमन क पोहे, पहचर योमन कंधे है सेकडो स्थम मरिसरे, उन का वर्णन जानना बहो गोतम ! उस सिदायतन, के चार द्वार चार दिशी में कहे हो । बिन के नाम देवदार२ असुरदार : नागदार मौर ४ मुरद्वार उनपर मदिक यावत् पल्पोपम की स्थिति बाल चार देश रहते हैं जिन के नाग-देन, असर, नाग मौर मुर्ण द्वार सोसह वीसगै पम्पिति में अख्यात ईप 6मुद्र का वर्णन - मर्थ . -- अनुवादक-समचारी मुनि श्री भमोटक अपिमी- पचारि अजण पन्यया पण्णचा, तेण अजणग पव्ययगा चठरासिति जायण सहस्ताइ उह उधचेण एगमेग जोयण सहस्स उन्हेण मूले दस जोयण सहरसाइकिं चिविससाहिए आयाम विक्समेण, धरणियले दस जे यण सहस्सा आयामविक्खमेण तताणतरचण माताए २ पदेस परिहायमाणा २ उपरि एगमेग जोयण सहस्स मायाम विषवमेण, मूले एकतीस जायण सहस्साइ छच्चतेवीस जोयणसते किं विविससाहिए परिक्खेवेग धरणियले एकतीस जायसहस्साइ छञ्च तेवीसे जोयणसए देसूणा परिक्खेषेण सिहरितले तिण्णि जोयण सहस्साइ एगच वावट जोयण सत पार.दिशि में पार मेमन मिरि पाव को भग्णगिरि पर्वत ८४ हमार योजन के ऊंचे एक हमार बनके गारे, मूल में दाशार योमन से अधिक सम्बे चौरे, रात में दश हमार योजन सम्म जो सदनतर एक २ पदेश कमहोते २ उपर एकामार योजन लम्मे चौरेरो मूल में इकतीस हजार पोवीस योगन से लिपित् भपिक परिधि, परणितम एकतीस इबार तो वीस योमन में एकर परिधि वितरत में वीन हमार एर सो बासठ योपन से कुए कम परिधि न विस्वारसा बीच में सकुषित र उपर पतसे नोपुर सस्थानबारे स्वाद मते को एक पावर *काशक-रानासापुर डामा मुसदेवसायमी व्यायामाद 48 पर्दश नीवाभिगम सूप-तृतीय उपर पणमसो, तेण पारा सोलस पारा सोलस जोषणाई उदृ . उश्चतण, उच्चत्तण, मट्ठ जोयणाई विक्समेण तावतिय चेव पवेसेण सेस तव जाव वणमालाओ, एव पिन्छाघर महावि तचेव पमाण, जे मुहमंडवाण दारावि तहेव णवर बहुमज्झदेस भाये पेच्छाघरमडवाण मक्खागा, मणिपेढियाओ अट्ठ जोयणप्पमाणातो सीहासणा अपरिधार। जॉब दामा थूमावि चउहिसिं तहेव गवार सोलस जो- यणप्पमाणा, साइरेगाइ सोलसउच्चा, सेस सहेव जाब जिणपडिमाओ चेह- रुक्खा तहेव चाहसिं तचेव पमाण जहा विजयाए रायहाणीए, णवर मणिपे. दार काना मशागृा परम के मध्यभाग में भक्षाटक है उन के मध्य भाग में मणिपीठिका है वह माठ योमन के प्रमाण है उस पर परिवार रवि सिंहासन पावत् दाम-माता है चारों दिशी स्तूप भी पूचित् काना परत घे स्तूप सोला योधन प्रमाण में साधिक सोलह यामन के ऊच शेप- सप घेतेहीम काना-जिन प्रतिमा है, चारों विधी में स्पवृक्ष है वगैरह सप विजया राज्यधानी भैसे काना विशेष में मणिशैटिका सोया इमार योन की ऊंची हैं मन पैत्यघृत के चारों दिशी में चार मणिपीठिकामों हैं २ माठ योमन की पौटी चार योमन की माटी है उस पर महेन्द्रध्यमा ६४ योमन पतीसरी मतिपत्ति में असरूयात द्वीप समुद्र का वर्णन:- मर्थ गिरस वाससमचारी मुनि श्री रमेक मिली तेसिण सिद्धायतणाण पत्तेय २ चउदिसि' बचारि दारा पण्णता 'तजहा-देवदारे, असुरदारे, मागदारे, सुवर्णपदारे ॥ तस्यण चत्वारि दे। महिहिया जाय पलिआषम डिसीया परिवसति तजहा-देवे, असुर,णागे,सुवण्ये ॥ तेणदारा सोलस जोयगाइ उस उचत्रोण अट्ट जोयणाइ विक्समेण,तावतिय पवैसेण सेतावरकमगवण्णो सेसतव जाव घणमाला ॥ तेसिम दाराम पउदिसिं बचारिमुहमहवा पण्णता, तेण मुहमडवा एगमेग जोपण सय आयामेण, पण्णास जोयणाइ विक्समेण, सातिरेगाइ सोलस जोपकाइ उह उच्चत्तेष वणभो । तेसिक मुहमडवाण चउदिसि पचारि चचारिदारा योजन करे पाठ योजन पोर न अपक्ष वी पाठ पोमन बाव बनसमय गैरह वर्णन योग्य पावत् रमी बरती हुई नाला रन द्वार की चार दिवी में पार मुख मरप को। रे एकमो बोमन रेसम पचास बोमन चौरे और साधिक सोपा पोमन के करे यावत बनन योग्य है. जन मुखएकी बार विधी पार दार को पेद्वार सोश पोचन संच पाठ रोमन रे पोरे रखने से प्रवेश पासे सब पनमाज पर्वत पूषित् मानना ऐसही मेक्षागृा माप का वर्णन मानना रस का समान से जाना जैसे मुस मस्परेशर को सही मेस गृह मंटप के *म-रामादुर ताला मुसदवसरायमी मामासादनी.

जापा भागमणिपादया सालस जापणार रत्र 4 चतुर्दश जोपामिगम सूत्र तृतीय पार HA तासिम मणिपेठियाण उपि देवछदगा सोलस जोयण आयाम विक्खमेण सातिरेगाइ सोलस जोयणाइ उडु उच्चत्तेण सन्वरयणमया अट्ठसय जिणपडिमाण सन्यो सोचेव गमो जहेव माणिमय सिद्धायणरस तत्थण जेसिं पुरथिमिलेण अजणपन्वते तस्मण चउद्दिसिं चचारि नयापुक्तरिणीमओ पन्नचाओ तजहा णदोत्तराय णदा आणदाणदिवदणाणताओ णदापुक्स्वरणीओ एगमेग जोयणसयसहरस आयाम विक्ख- भेण दस जोयणाइ उन्हेम, अच्छाओ सहाओ जाव पडिरूवामो पचय २ पठमवरवेझ्या सोला पोमन सम्मा चौसा कहा है और सधिक सोला योनन ऊचाहै सब रत्लाय यहाँ १०८ मिन मतिया में इस का सप पिकार वैमानिक सिद्धायतन का कहा से ही काना यहां नो पूर्व दिशा का अमनक पर्षत है उस की चारों दिशा में चर नंदापुष्करण हैं जिनके नाम, नदो चारा, नदा पानदा भौर नंदीवर्धना या नदा पुष्करणियों एक छात्र योमन की लम्बी चौटी है, दध योजन की ऊपी, स्वच्छ लक्ष्ण है प्रत्येक को पपवर वेदिका बौर पनपा है वहां यापत् घिसोपान प्रतिरूप को हैं, 4 वोरण में उस नदा पुष्करणी के पीच में पृयन २ दपि मुख पर्व है ये दाप मुख पर्षत सीसरी प्रतिपत्ति में असख्यासदीप समुद्र का वर्णन भर्य मनुवाद-नाममचारी मुनि श्री सपोमक प्रापिनी ठियाओ सालस जोयणप्पमाणाभो ॥ तेसिण घेइयरुक्खाण चउहिसिं चचारि मणिपेदिमो अट्ट जीयण मायाम विक्सभेण, चउजोयण माइल्लामओ,महिंदझपाण चउसट्टि जोयणुचा जोयणउन्वेहो जोयणविक्खभा सेस तहेव, एव चउद्दिस चचारि नदा पुषवरणीओ णवर स्वोयरसपडिपुचामओ, जोयण सय आयामण, पन्नास जोयणाइ विक्रमेण,दस जोयणाइ उवेहेण सेस तहेव, मणोगुलिया गोमाणसीया अडयालीस२ सहरसाओ पुरच्छिमेणविसोलससहस्सा, पचस्थिमेणवि सोलससहस्सा, दाहिजेणपि अट्ठ सहस्सामओ,उत्तरणवि अट्ट सहरसाओ,तहेव सेस उल्लायाभूमिभागा,जाव बहुमझदेस भूमि की बीरे एक योजन मारी मीन में एक पोमन की चोरी है शेप बसे। काना, एमे चारों दिशा में चार नद पुकरणीयों हैं, इन में पानी शुरस वैसा भरा, ये एक सो योजन लम्सी है, पाम बोमन चौकी, दश पोनन गहरी शेष सबसे पकाना. मोगुना और गौमाणसीका मस्यासीस मार मित में से सोण मार पूर्व में, सोगामार पधिप में, दक्षिणमें माठ और उत्तर में पाठ हजार से चदुपा भूमिमाग यावत् रस के मध्यभाग में मणिपीठिका, या सोला योजन की नमी पडी र माठ पोषन की मागे न मनिपीठिका पर देश का या . प्रभाकरानारादुर बाला मुखदेवतायनी पाठामसादनी.

सम ५ air चतुभ मीवाभिगम प्र तृतीय उपाङ्ग 480- सुबत्तन्वया निरवसेसा भामियांचा जाव उप्पि अट्ठ मगल्या ॥ तत्थण जेसे पविखणिलेण अजणपन्चए तरसण चउद्दिसिं चारि गदापुक्खरिणीओ पण्णताओ तजहा भद्दाय विसालाय कुमुयाय पुडरिगिणी तचेव प्पमाण तहेव दहिमुह पन्यया तय पमाण जाव सिहायणे ॥ तत्थण जेसे पञ्चत्यिमेण अजणपबए तस्सण चउदिसिं चत्तारिणदा पुक्वरिणीओ पण्णचाओ तजहा गदिसणाय अमोहाय गोत्थुभाय सुवसणा तव सन्ध भाणियन्त्र जाव सिद्धाययण ॥ तत्यण जेसे उत्तरिले अअणपधए तरसण चउदितिं चत्वारि नदापुक्खरिणीओ पण्णताओ तजहा विजया वेजयति मव पर्वत याश्त् मिदायतन वगैग कपन कहना मो पश्चिम दिशा में अमन पर्षत है की चारों दिशि में चार नंदापुष्कर णियों में जिन के नाम-नंदिसेना, ममोघा, गोम्तूम व मुदर्शना इसका भी सिद्धा यनन पर्वत कथन पूर्णवस् जानना उत्तर दिशा में मा म मनक पर्वत हैं, उन की चारों दिशि में चार नदा पुष्करणियों नही: जिन के नाम-विजया, बैजयनी, जपती मौर अपरामिता इन में सिद्धायसन पर्णम सब करन पूषित् मानना या गहुत मानपति पाणपतर, ज्योतिषीप पानिक देर तुर्मासिक १ तमासिक पूर्णिमा म प्रतिपदा तीन र प्रसार महिने की, कार्तिक र फागुन महिने की.. तीसरी प्रसिपत्ति में मसरुयातदीप समुद्र का वर्णन अर्थ - एग जोयण गनुपालनालमवारी मुनिश्री ममोलस कापिनी पत्तय २ घणसट परिस्वित्ता तस्थ २ जात्र तिसोमाण पडिरूवेगा, तोरणा, ॥ तासिक पुस्खरिणीण पहु मनसभाए पत्तेय २ दाहिमुहपधए पण्णः ॥ तेण पहिमुह पचया पउसहि जोयण सहस्साइ उड्नु उथवेण सहस्स उपेहेण समरयसमा पझगसठाण सठिता, दस जोयण सहस्साई विक्स. भेण, इकतीस जोयम सहरसाइ उच्चत्तेवीस जोयणसए परिक्खवेण पणना सम्बर यणामपा अच्छा जाव पहिरूबा, पचय २ पठमवर वेतिया वणसह वण्ण ओ, बहु समरमणिच भूमिभागा जाव मासयति, सिद्धाययण तव पमाण त अजण पचए पौसठामार योमन की एकाजार योभन के जमीन में, सब स्थान समपस्येक संम्यान वाले दश हमार योजनचौरे इकतीस मार सोवीस योजना की परिधि सपरस्नमय, सच्ययावत् प्रतिरूप प्रस्पेककी पारों मोर पवार पेदिका सपणखण्ड में बहुत रमणीय भूमि भाग गायत् मां देव बैठते हैं सिदापतन का प्रमाण वैसे ही मानना यों अमनक पर्वत की पतष्पता काना यावत् कपर बाउ २ ममह को दक्षिण का ममनक पदोस की चारों विवि में पार नदा पुकरणीयों मिन के नाम-भा, विधामा, कुमुदा मोर पुररीकिणी इस का सपणन पूर्वरत् मानना दार पकायक-नानाबादर बाग मुसदामावली पासामसावी.

उन बलयागार सठाण सठिए जाव सम्व तहेव अट्ठो जहाक्खादादगरस जाव तुमस सोमणाय इत्य देवा माइंडीया जाव परिवसति सेस तहेव जाव तारांग ॥ ४३ ॥ नदिसरोद समुद अरुणोनाम दीधे घट्टे वलयागार सठाण सठिए सपरिक्खिचाण विदुइ ॥ अरुणेण मते दीवे किं समचकवाल सठिये, विसमचकवाल सठिए? गोयमा ! समचक्कवाल सठिए नो पिसम चकवाल सठिए केघइय चकवाल? गोयमा ! सखेज्वाइ जोयण सहस्साइ चक्कबाल विक्खमेण, सखेज्वाइ जोयण सहस्साइ परिक्खेवेण पण्णता, उप 44 al पतुर्दश्च-नीवामिगम मूत्र मृतीय सस्यानमाला कहा। इस का सप कथन पूर्ववत् काना इनवर समुद्र जैसे यहां का पानी पपुरस समान में यावत् सुमनस र सोमनस ये दो देष महद्धिक यापत् रहते हैं शेष सब पैसेही जानना यावत् सख्याने चंद्रमादिक ज्योतिषी हैं ॥ ४३ ॥ नदीश्वर समुद्र मासे अरुण नामक नवधा दीप पर्तुल वलयाकार सस्यान पाला है अहो मगपन् ! भरुण दीप क्या सम पक्रवाळ या विषम चक्राल है।मो गोसम ! सम चक्रास सस्यानवाला है परतु विषम चक्रवाल सस्थानमाला नहीं। अहो भगवन् ! अरुण नापक दीप फिसना चौटा है और उनकी किसनी परिधि है। आहो गौतम रूपात लाख योनन चौदा है और सख्याव लाख योमन की परिधि है और मी पर मर्थ वीपरी प्रसिपचि में असख्यासद्वीप समुद्र का वर्णन * ।

र अनुवाद पारी मुनि श्री भपोछा मारमा जयती अपराजिता, सेस तहेक जाव सिहाययणा सन्बो चेतियपरिवरण्णा यन्वा, तत्पण यह मवणवइ वागमतर जाइस वेमाणिया देवा घाउमासिय पडिवएपु सबच्छरेसुय अण्णेसु बहु जिणजम्मण निक्खमण णाणुप्पपात परिणिव्वाण मादि- एसुय देवकज्जयसुय देवसमुह रसुय देवसमतीसुय देवसमवाएसुय देवपउमणेसुय एगत- ओसहिया समुशगया ममाणा पमुदित पकीलिया भट्ठाहियाओ महामहिमाओ कारेमाणा पालेमाणा सुहहण विहरति कयस्सास हरिवाहणाय तत्थ दुवे पेषा महिड्डीया जाव पलिउमठितीया परिवसति से तेणटेण गोयमा ! नाव गिम जोतिस सखज्ज ॥ ४२ ॥णदी सरवरण दीवे मदिरसरवरोदे णाम समुद्दे यह पातिपदा सवत्सर में और अन्य बहुत मिनमगवान के मन्म, दीक्षा, केवल पान, और निर्माण परपाण इस्पावि दिनों में,देव कार्य,देव समुदाय,देव गाष्टिदेव सबंधी समषाय,और देव सपषी जीत पवार के प्रयोजन में देवता एकषित होते हैं वह मानद कीरा, अष्टाधिका महामोत्तम करते हुवे सुख पूर्वक विघर में भोर मी बैलास प परिचाइन नामक दो मदिक देव यावत् पा रहते हैं यो गौतम ! इस लिये नदीवर द्वीप ऐसा नाम कहा यावत् या नाम शाश्वत है ज्योतिषी घद्रादिक सब सरूया पर नदीपा द्वीप का क्यन पुत्रा ॥ ४२ ॥ नदीवर दीप के चारों मोर नंदीवर समुद्र गर्नुछ रूपाकार पकाधक राजापगदर छाला मुसदेवसहायमी मागमसादमी . .

त्र क मूष सृवार्य उपार HD चतुदश भावापिगम सम्म जाय अट्ठो खोदयोदगपडिहत्य मे। उप्पाय पव्ययगा सब बहरामया भच्छा जाव पद्धिरूपा अरुणवर महाभद्दा इत्थ दो देवा महिछिया जाव परिवसति॥४६॥एव अरुणवरो पेवि समुद्दे जाय अरुणवर महाअरुणवरा एत्थ दो देवा, सेस तहेव अरुणवरोदण समुद अरुणवरोमासे नाम दीवे वट्टे जाव देवा अरुणवरामास भदा अरुणवरोयमास महाभद्दा महिडिया सेस तहेव ॥ १८ ॥ एव अरुणवरोभासादेवि समुद्दे परिंदेवा अरुणवरोभासपर भरुपवरो मास महावरा, एत्थ दो देवा महिडीया ॥ १९ ॥ कुडलदीव कुडलमहाय कुडलमहामहाय एत्थ दो वेवा ॥ ५० ॥ वैसेही सब कहना, या की सप पारियों में पानी इसरस समान है, उत्पात पर्पन है, सप पञरस्नमग है साळ यायत् भोवरूप है, मरुणपरभद्र व अरुणवरमामद ऐसे दो दर रहते हैं ॥ ४६ ॥ एसेही अरुणोपर समुद्र का मानना यागत् यहां भरुणार मौर महामरुणपर ऐसे दो देव रासे है शेष 7 ॥ ४७ ॥ अरुणवर समुद्र के पारो मोर मरुणपरमास नामक दीप पर्तुल पलपाकार रहा हुवा है, पारस् मरुमारमासमद्र मौर मरुगारमासमाामद ऐसे दो देव हदिक है, ॥ ४८ ॥ ऐसी भरुणवर माम समुद्र का मानना, परंतु यहाँ अरुणपर मासपर और भरुणवर माममहायर नामक दो देष महाक रहते हैं, ॥ १९ ॥ इम से मनसर पारहना कुलदीप है इस में कुलभ प कुडल मामद 4. नीमरी प्रतिपचि में अमख्य त दीप म्मुद्र का वर्णन अब कमभनुरादक बाउप्रामवारी मुनि श्री मोलम्ब ऋपिना - पउमवर वणसहा दारा दारतराय तहेव, सखिज्जाइ जोयण सहस्साइ दारतर जाप अट्ठी. यावाओ खोतादगपडिहत्थाओ उपाय पन्चयका सन्त्रवइरामया अच्छा जावपहिरुवा असोग धीयसोगा एत्य दुवेदेवा महिड्डिया जाव परिवसति, से तेणटेण जाव सखेज्नग सन्न ॥४॥ अरुणदीव अरुणोदे नाम समुद्दे तस्सवि तहेव परिक्खयो अढेक्खोदो ६ग गरि मुमद्द सुमणमदा एत्थ दोदेवा महिडिया सेसे तहेव ॥४५॥ अरुणोदग समुह अरुण परनामे होवे वट्टेवलयागार सठाण सठिए सेस तहेव सजग पदिका पनसार दार्गतर पैसेही कहना प्रस्य द्वार में सरूपात छास योनन का असर है यावत् अर्थ करते हैं उम में बारियों प्रमुख है, सुरस समान पानी मरा यहाँ उत्तात पर्वत हैं, सब बजरत्नमय it अशोक चौर विनशोक नामक दो माधिक व यहाँ गते । इसलिपे मरुद्रिाप करा सब ध्यातिपी सरुपाते हैं ॥ ४४ ॥ मरुण द्वीप के चारो और अरुणोद नामक समुद्र पर्नुछ पलयाकार रहा है उस की चाराइ सरूपात लाख योजन है परिधि भी सरपात लाल योनन की है अर्थ की पृला ? यहाँ पानी समुद्र के पानी मैसा है इसका सा कथन इसुरस समुद्र मेसा जानना परंतु पहा समण व समणभद्र ऐसे दो मादिक देव रासे । शेष पैसेही काना, ॥ ४५ ॥ मरुणोदक समुद्र प्रति मरुणवर दीप प न पलयाकार रहा दुपा सरूपात योमन का सम्मा चौरा .प्रकाशक राजाबहादुर मात्रा सुखदवसायजी ज्यामाप्रसादमी.

त्र अर्थ 43+ पतुर्दश नीवामिगष मूत्र तृतीय उपान tatra गोयमासमचकवाल नो विसमचकावार रिक्खवेण पण्णते? सबस्थमणोरमाय इत्य देवा सेस तहेव दोदे समुद्दे सखेज्जाइ जोयणसहस्साइ परिक्षेत्रेण दातारा ससघाइ जातसपि सन्च सखेज्ज भाणियन्त्र अट्ठोषि तहेव, खोदोयरस णवर सुमणसामाणसाय यत्थ दो देवा महिड्डीया तहेव रुयगामो माढत असखिज्ज विक्सम परिक्षेवो, दारतरच जोइसय सन्ध असखेज भाणियन्व ॥ ५७ ॥ रुयगोदण समुद श्यगवरे गाम दीवेवटे, रुयगवरभद्द, मो गौवम ! सम चक्रपाछ है परतु विषम पफबाल म है अहो भगवन् ! यह सितना चक्रवाळ चौरा! महो मौसम ! संख्यात योजन का चौहाहै पासर्य और मनोरम ऐसे दो महधिक देव रहसे हैं ॥ ५६ ॥ रुचकोद समुद्र का इसुपर समुद्र नेसे कहना या सण्यास योजन का चौदा है सराव पोजन की परिधि है,मतोफ द्वार का अंतर भी सख्यात यामन का है, मा ज्योतिषी भी सख्यात अर्थ इनुवर समुद्र से कहना यहां सोमनस घ मुमानस पेमे दो देवता रहते हैं पैसे ही काना यों रुचक समुद्र पर्यंत सत्र सरुपाते हैं पत्तश्च न प असख्यात है द्वीप समुद्र की चौदाइ परिधि, द्वार का भवर, ज्योतिषी सध असख्याते ॥५७॥ रुचकवर द्वीप के चारों ओर रुक परभद्र नायक पकार पहारुचकरगढ़ व रुचकार महाभद्र नामक देश है वदनवर रुचकवर समुद्र कहा है यहां रुचकवर पर वीसरी मविपत्ति में अनरूप तदीप समुद्र का वर्णन है मनुवादक बाससमचारी मुनी श्री अमोलख ऋपिमी कुडलोदे समुद्दे चक्रासह चक्खुकताय इत्य दो देवा महिटिया,॥ ५५ ॥कुडलवरदीधे कुंडलवरमहा कुडलवरमहाभद्दा एत्थदो वा महिलिया ॥ ५२ ॥ कुडलवरोदे समुद्दे कुडलवर कुडल महावरा एत्य दो देवा माईदीया ॥ ५३ ॥ कुडलवरोभासे दीव कुटलवरोमासमद्दे कुडलघरोभासमहाभद्दा यस्थ दो पेवा, ॥ ५ ॥ कुडलवरोभासोदे समुदे कुडलवराभासवर कुडलवरोभासमहावरा, इत्थ दो देवा महिदिया जाय पलिओवमठितीया परिवसति ॥ ५५ ॥ कुडलवरो मास समुई रुपगे नाम दीवे पट्टे वलया जाव चिट्ठति।किं समयकवाल विसमचकवाल नामक दो देव राये ॥५०॥ पारामा कुटलोद समुद्र के यहां चक्षुसुम प चाकस नामक दो महर्षिक दररावे हे ॥५१॥ तेरहपा कुंटलपरम द्वीप परिसबरम और कुढलपर महामद नामक दो मार्षिक देवर १५८२॥तत्पश्चात रसवर समुद्र में इसमें कुंडम्पर प कुरखमहावर नामक दो माधिक देव रहते हैं, ॥५१॥ स्तरामास चौदापा द्वीप है यहां मुरसारामासमटू । कुररूपरामाममहामद ऐसे दो माषिक देष राये में वत्सम्यात् कंरसारामास समुद्र पहा कुरम्परामासपर प कुरबरा भास महावर नामक दोदेग महर्षिक पारत् परपापम की स्थिति पासे राखे ॥ ५५ ॥ कुरलपरामास समुद्रक चारों बोर रूपक द्वीप पजयाकार यावत् र दुपा है महो मगवन् ! पर क्या सम पनाम या पिम घास है प्रकाशक-रामावहादुरकाळा पुसदेवसायमी बामसाढली.

यतुदश जीयामिमम मूत्र-तृतीय उपान ++ मर्थ समाहारवर भामवर,हारवरावभाम महावरा एत्यो देवा एव ॥ सर्व तिपडायाराणेयन्या जाब सूरघरो भासोदे समुद्दे दी भहानामा परनामा हति उदहीसु जाव पच्छिम भावच खोतवरादि, सयभूरमणपजतेसु पावीओ खोतोदग पडिहत्थाओ पव्ययगाय सन्च घरामय, देवदीवे दो देवा महिडीया देव भदा महाभद्दा एस्थ दो देवा, देव समहे देवघर देव महावराय एत्थ जाव सयभूरमणे सयमरमणमद सयभूरमणमहामदा एत्थ दो देवा महिड्डिया सयभरमणेण्णाव सयभूरमणोप नाम समुद्दे तहव बढे वलयागार जाव पीसे दीप या समुद्र का नाम छगाना सुपर दीप से स्वयभरमण द्वीप पर्वत मष दीए में पुप्फराणियों - सब में इसरम समाम पानी सब में उत्पात पर्यत । वे सब पज रत्नमप हैं सूर्यवराषभास समुद्र से आगे देव दप यहां देवमद गौर देव महापद्र ऐसे दो देव रहते हैं उस से भाग देवोदषि समुद्र 12 यहां देववर व देष महावर नामक दो महधिक दब है इस मे आगे नाग द्वीप नाग नाम मुद्र, यक्षदीप पक्षसमद्र, मनदीप,भूतसमुद्र,स्वयमृरमपाईपमयमरणममुद्र है इससे आगे द्वीपसमुद्र नहीं है परतु मात्र बोस है सयममणद्वीप में स्वयमूरमण भद्र और स्वयंभूरमण महामद देव है स्त्रयभूरमण द्वीप की चारों मोर स्वयमूरमण समुद्र वर्तुल पलपाकार अरूपात योमन का सम्बा घंटा है मसरूपात योजन की परोप है अहो भगवन् ! सपमूरपण समुद्र ऐसा नाम क्यों कहा? अहो नीदम ! स्वप तीसरी प्रतिपत्ति में अत्यात द्वीप समुद्र का वर्णन - - - मगरकवावगमचारी मुनि श्री भयोगफ प्रपिजा रुयगवरमहाभदाय इत्यदो देवा महिटिया रुयगवरोरे,समुह रुयगवरा स्यगमहावरा, इत्थ दोदेवा महिडिया रुयगवरोभासे पीधे श्यगवरोभास भदे, रुयगवरोभासमहाभादेय इत्थदादया-रुयगवरामासोदे. समुद्दे रुयगवरो भासपुर, रुयगयरोभासमहावरा इत्थ हो देवा ।हारदीवे हारभ६ हारमहामहा इत्य दो देवा॥हारोदे समुद्दे हारवरमहावरा यत्य दो देवा । हारवरेदीवे हारवरमह हारवरमहाभहा हारवरोदे हारवर, हारमहावरा, हारवरवरो'मासेदीवे हारवरवरीभासमा हारवरवरोभास महाभद्दा, हारवरवरोमासादे रुपा महापर माम दो देवर बदनार रुपक परापमास दीपारे यहां रुपकपरामास भद्र मौर परावसास महामद्र देव । तस्यापात् ।रुषकारापमास समुद्र है यहां रुचा 'वरापमासपर मौर रुपक परापमा पाापर ऐसे दो देवर स्पपत्र दीप मा हारभद्र हार महा मद्र देव, वस्प. मात्बार समुद्रो यहारवर पा पारमावर. देव में मात् बाबर द्वाप है यहां पारपर भद्र महारवरमामद्रादेवा तत्समा हारपर समुद्र में इस में हारकर हार मार दो देव । तत्पश्चात गरपराबमास दीप पा हारबराबमासमद्र पहावरापमासमा मद्र देव , वत्पश्चात् हारपराममास धमुद्र में परं हारपरामास्तर और हारबराबमास मार देगा ये सप द्वीप समुद्र के तीन नाम मानना पावत्मारामास परवाना शेप में मद्रय महामद मौर समा बार में मासारव सम रुपक मकाधकानावहादुर लामामुपदेवसहावनी प्रासाप्रसादमी देवोदे समुद्दे पण एव मागे जक्से भूतसयभूरमणे दीवे एगे सयमूरमणेसमुद्दे माय- धेज पम्यते ॥ ५९॥ लक्षणस्सम भते । समुदस्स उदए केरिसए अस्सागक पण्णते ? गोयमा ! लवणस्स उदए माइले रइल कदे लषणे कडुए अपेज बहू दुपय घठप्पय मिग पसु पवित्र सरिसवाण पण्णत्थण, तबोमियाण सन्माण ॥ कालोयस्तण भते ! समुदस्स उदए केरिसए मस्साएण पण्णचे ? गोयमा ! भासले मासले पसले काले मासरात्तिवण्णाभे पगतीए उदगरसेण पण्णचे॥पुक्खरोदस्सण भते! नाम का एक द्वीप, देवोदापि नाम का एक ही समुद्र है, ऐसे ही नाग दीप, नाग समुद्र, या दीप, पल समुद्र, भूतदीप, भूत समुद्र, सयमूरमण दीप, स्वयभूरमण समुद्र के नाम के एक २ दो द्वीप समुद्र ॥९॥ मो भगवन् ! सण समुद्र का पाना कैसा स्वादनासो भो गौतम ! पण समुद्र का पानी परिन, मोमूत्र भैसा, साण जैसा, कटुस, सार युक्त, अपेय, और उसी पानी में उत्पम होनेवाले यस्थ रणदिसिवाय भम्प पशु पक्षी सरिसर्प वगैरह को पीने योग्य नहीं है महो भगवन् कासोद समुद्र का पानी सा सादवाला है ? महो गौसम । पुस्खकारी, प मनोहर वर्ण से श्याम वाला,माज (दि) की राशि सा है,और सामाविक पानी जैसारमादी अहो मगमन् ! पुष्करोद समुद्र का | कैसा पामी है? महोगी। 1 निर्मक, माविषत, हलका २ स्फटिक, समान भत, भौर पर्दष-मीपामिग मूम-मृतीय पास बीसीमतिपरि मसरूपात द्वीप समुद्र का वर्णन अर्थ पानमवारी मुनि श्री बमास शुषिनी - असखजाइ जायण सतसहस्साइ परिक्खेवेग आध अट्ठो ! गोयमा । सयमुग्मोंदे उदये अच्छे पच्छे जप तणुए कालियवाणामे पर्गतीए उदगरसेण पणते, सयभूरमणघर सयंभूरमपमहावरा, यस्थ दोदवा महिडीया, सेस तहेव जाव असखजामो तारागण कोडीओ सोभिमुवा ३ ॥ ५८ ॥ केवतियाण मते । जंबद्दीवे नामधेजेहिं पष्म गोयमा! असखेजा जबूहीवा दीवा नामधेबेहिं पण्णता केवतियाण मालवणसमुहा पल्पसा गोयमासिखेजा लवणसमुद्दा नामधेजेहिं पण्याच॥एवधायति सरवि एष जाव असपेजा सूरदीवानामधजेहिं पण्णत्ते, एगे देवेदीवे पणते एगे रपण मद का पानी निक, सण, पथ्य, निरोगी, गावित, हा स्फटिक पर्ण जैसा, और साभाविक पानी के साद पाया है वा सर्वभूबवर और सपमूरमपमहावा ऐसे दो वार्षिक देर रात में भेष सब से ही पूर्ववत् भानमा बसहयात कोसा बोरी ताराने शोभा जी, माया बसेसोमा करेंम । ५८ ॥ बहो मनवन् ! जम्ही नवाजे कितने द्वीप की। गो गौतम । पम्ही मामले मसंस्कार दीपक बो मनान् ! भान समुद्र विनवे दीपाबो मौतम! साप सबुट नापले मसंस्थान द्वीप बो से ही पालकी सड नाम रे पसरुपात द्वीप पावत् सूर्यपरापमास या बाप को परंतु देव होष नायकराबारादुर गाहा संशमात्री पान प्रसारण सत्र ५६ अर्य 44 चतुच जीरापिगम मूध-नृतीय उपाF Mi+ णो समटे वारुगोदए एतो इट्टतराएचेत्र आसाएण पण्गत्ते ॥ खरोदरमण भते । उदए केरिमए अस्साएणं पण्णते ? गोयमा । से जता न मए रन्नो चाउरत चक्कवारिस च तुरक गोखीरे पयत्तमदग्गिमु कढित आउत्तखहमछडितोयवेते वण्णण उववेते जाव फासेंण उववेए भवतारखे सिया ? णा तिणटे समढे, गोयमा ! स्वीरोयरस एतो इ8 जाब मस्सा- एण पण्णते॥धतोदरसण जहा नामए सारतिक्खस्स गोघयवरस्स मडेसनइ किणियार पुप्पूण्णणामे सुकढत उदार सज्ववीसदिते वण्णण उववेते जाव फासेण उववेते चार स्पान परिणमिस गो का दुग्ध को पद अनि से पाये, उस में उत्तम गुरु सकर बगैरा उलकर च तुम्त चक्रवर्ती के लिये माग याग्य बनावे पावत् पा वर्ग यावर स्पर्शयुक्त होव अहो भगान् । क्या सीगेद समुद्र का पानी एसा स्वादवाला ? मा गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहै इस से अधिक स्वादवामा लागेद समुद्र का पानी । मा मगवन 'घृतोद समुद्र का पानी कैसा स्वादवाला है ? या गोठम ' जसे सलकी अथवा कणपर क पुष समान त बस्छा सरह उष्ण किया हुना स्वच्छ मेघृत वर्ण यावत् सश्यक हवे तप गोतम स्वामी पृच्छा करते हैं क्या एसा घृतोद समुद्र का पानी 137 हो गोतम' या अर्थ समनदा है इस से भी अधिक स्वादवाला मुखोद समुद्र का पानी है महो 'मगान भर समुद्र का पानो कैसा स्वादवाला नातिवन, पका हाने से हरताल जैस पीने २ तीसरी प्रसिपषि में अमग्यान दीप ममुद्र का वर्णन न मनुवादक-गापमापारी मुनि श्री भयोमा पिमी समुदस्स उदए करिसए आसाएण पगचे ' गोयमा ! अच्छे पच्छे जच्चे तणुए फालिययपणामे पातीए उदारसेप पण्ण॥वीरगोदस्सण मत समुदस्त उदए केरिमए मासाएण पण्णते ? गोयमा ! से जहा मामए पत्तासवतिया चायासवेतिया खजरसा- रोतिया मुदियसारेतिवा सपिकखोयरसेतिया, मरतिवा' काविसायणेतिवा चदप्पमातिवा मणोसिल्लागातिवा वरसिंधूतिया परवारुणीतिया अटुपिट्ठ परिनिट्ठियालिवा जवृफल कालियावण्णा घरपसण्णा उकासमदप्पत्ता इसि उट्ठावलरिणी ईसिं तपस्थिकरणी, इसि वोच्छोयकहुई मासेला मांसला पेसला रणेण उर्वता जाव स्वाभाविक पानी समान स्वादपासा है अहो मगरन् ! पारुणोट समुद्र का पानी कैसा स्वादराला रे ? मारो गौतम ! मेसे पप का मामम. पुरुष का मासा, स्वर्जर का मामय, द्राक्षामर, पका हुना हसू का रम, मेरक पपमाति, कालिसापन, चंद्र प्रमा मदिरा विशष, ममतीला का मदिरा, बरमपान सिंधु, उधम बारुणी, मदिरा, माठार पिष्ट परिणत मदिरा, मम्फल सपान कृष्ण पण पाली मदिरा हम रसस, मोह से पाने से किचिन् विलय हाये, घरने से चक्षुषों मास मेरे, आस्वाद योग्य, पुष्पकारी, मनोहर वर्ण युक यापत् संसार युक्तो को भगवन् ! वारुणोद समुद्र का पनी क्या ऐमा स्वाद पाहा! मारा गौतपाका भय समर्ष म पाहणोषि समुद्र का पानी हम स भी मत्सव उकार पारन् स्वाद । महो मगरन् ' सीरोर समुद्र का पानी कैसा साद पाग! गो गौवन ' मेसे • प्रकाशक-रामायरादुर छाला मुखदरसायनी आसाममा " 41 पर्दप-मीवामिगम सूम-सुवीय उपार 4R- गोपमा । चत्वारिसमुद्दा पत्यरसा पण्णत्ता तजहा-लवणे, वरुणोदे, वीरोदे घठदे ॥ कतिण भते ! समुहा पगतीए उदगरसेण पाणचा ? गोयमा ! तओ समुद्दा पगतीए उदगरसेण पण्णता ? सजहा-कालायण पुक्सरोदे सयभूरमणे ॥ अवससो समुद्दा ? अवसेसा समुदा उरसप खोपरसाए पण्णचा समणाउसो!॥६॥कण मते! ? समुहा बहु मछ काछमाइन्ना पणता ? गोयमा ! तओ पण्णवा तजहा- लवणे कालोयणे सयमूरमणे अवसेसा समुद्दा अप्प कच्छमछ भाइन्ना पण्णता लवणेण मते । समुद्दे कतिम छजाति कुलकोहिजोगी पमुह सतसहस्सा पणता ? पृषक २ सादामा ? भहो मोतम ! पार समुद्र का पानी पृषक २ स्वादवाला है जिन के नाप-पत्रणममुद्र, वारुणोदषि, क्षीरोदा मौर मनोदपि, अहो मगवन् कितने समुद्र का पानी स्वामारिक पानी जैसा सापामा है ? मो गोवम ! तीन ममुद्र का पानी समाविक पानी स्वादवाला है जिनके नाम-कासोदपि, पुरोदधि, मौर सायमरमणममुद्र भो मायुष्पर्वत अपभो । ष सप समुद्र का पानी प्राय' इस समान ही है ॥६॥ महो मगमन् ! गात मत्स्य कच्छ पाले कितने समुद्र ! बो गौसम ! ऐसे सीन समुद्र मिन के नाम-करण, कास्मेर और स्वयंममण, थेप व समुद्र अन्य कच्छ, मत्स्य पाले में मो भगवन् वीसरी प्रतिपति मास्यात होप समुद्र का वर्णन - भर्थ भवेतारूपासया ? नो तिम? सम? एतो इटुतराए ॥ सीदोंदगस्त से जह। नामाए उम्छुप जवाप पुडवाण हरियाण पिंजराण भेरुड उच्छृणवा कालपाराणतिभागणिया डियबाहाण बलवगणरजत परिभागालियमिचो जेयरसे होजा वस्थपूते चाउ जातिग सुवासिते अइपत्य लहुए वण्मेण उपवते जाप भवेतारूसिया ? णो तिण? समढे, एतो इट्टतराए ॥ एव ससगणावि समुदाण घढो जाव सयभूरमणस्सवि गरि अच्छे जहा पुखरोदस्त ॥ ६ ॥ कतिण मते ! समुद्दा पचेगरसा पण्णता ? अपवारस-भस्मसारी बुनि श्री बमोटर अपिभी सूके टुकडे होरे गम का प्रपर पनीका माग काटकर मध्य भाग को परपंत पेलो से पलाने के से रस नीकासे, इसे परे मे डानकर तृण रहित बनारे, पुन' रस में दासचिनी एसायी मर की बगरा हालकर सुवासित बनाये अत्यंत पपकारी निरोगी मा भौर वर्ण यायतू स्पर्क से पुत रोपे सपनौतम हामी पृष्ठा करते है कि क्या ऐसा पानी हामहो मोवमा या पर्व समर्ष मी, इम से मी मस्पेत इष्ट में आप सब समुद्र का पानी इस समान मामना पावत् मोदपि समुद्र पर्षद करना यो ममरन् ! सामूरगन समुद्र का पानी सा स्वादमा 'बो मौतम ! सबमूरमक समुद्र का पानी सग जातिगत निर्मल पुरोदपि पैसा ॥६०n को मनान् ? सिमे R का पानी पारनाजारादुर बाला ससानीमामारपीट १ 486 चतुश भीवाभिगम सूत्र मृतीय उपा 4R जोयण सयाइ उक्कोसेण, सयभूरमणे जहण्मेण भगुलस्त असखेबतिभाग उक्कासेण दस जोयण सयाइ ॥ ६३ ॥ कवतियाण भते ! दीव समुद्दा नामधेज्बेहिं पण्णचा ? गोयमा ! जावइया लोगे सुभानामा सुभा घण्णा जाव मुभाफामा एवतिया दीव समुद्दा णामधेबेहिं पण्णा ॥६॥ दीव समुदाण भते! कवतिया उद्दार समएण पण्णचा गाथमा ! जावइया अट्टाइजाइ उद्दार सागरोवमाण उद्धार समया एवतिया दीव समुद्दा उद्धार समएण पण्णता ॥ ६५ ॥ दीव समुदाण भत ! किं पुढवि परिणामा आउपरिणामा जीव परिणामा पोग्गल परिणामा ? गोयमा । पुढवि परिणामावि सयभूरमण समुद्र में मत्स्य के शरीर की कितनी बड़ी अक्माना की' बो गौसम ! जपन्य बगुल का असंख्यावा माग उस्कृष्ट एक हमार यामन की ॥ ६३ ॥ बहो मगन् फितने नाम वाले द्वीप Fसमुद्र बहो गौतम! सोकजितने समनाम,शुभ वर्ण शुभगध झुमरस शुम स्पर्श पाली वस्तु के नाम हैं उतने नाममाले द्वीप समुद्र हैं ॥१४॥भहो मगवन्! दीपसमुद्र कितने भद्धा सम्य जितने ? भो गौतम! उद्धार अदइ सागरोपम के जितने समय होने सपने दीप ममुद्र है ॥ ६५ ॥ बो भगवन् ! द्वीप ममुद्र क्या पृथ्वी परिणाम है, अप् परिणाम है, भीर परिणाम और पुदर परिणाम हैं को गावम ! सत्र द्वीप समुद्र पी सीमापति में असत्यात द्वीप । मुद्र का पर्णन अर्थ गोयमा ! सत्तमच्छ जाति कुलकोटि जोणिपमुह सत सहस्सा पण्णचा ॥ कालो- यण मते! ममुह कतिमच्छ जाति पचा? गोपमा! नवमच्छजाति कुलकोहीजोणी पमह सपसहस्सा पण्णत्वासयभरमण भते !समुह कतिमच्छजाति कुलकोडी पण्णता? गोयमा ! अइतेरस मच्छजाति कुलकोडी जोणी पमुह सय सहस्सा पण्णचा ॥ ६२॥ लवणेम मते समुद्दे मच्छाण के महालया सरीगेगाहणा पण्णता? गोयमा ! जहण्णेण अगुलस्त असखेज्वतिमाग, उक्कोसण पच जोयण सयाइ एव कालोयणे सत्त + अनुराय-पालन पुनि श्री बमेला अतिमी + सरण समुद्र में मत्स्य की किसने लाख कुल कोटि कही १ मा गौतम ! लमण समुद्र में सात लास्व कुल कोटी वही हो मगवनू' कालोद समुद्र में मय की रित्तन लाख कुलकर को भोगौनमः ना लाख कुल्ल कोरा काटो भदो मगधन्' स्वयमूरमण समुद्र में कितने छाख मत्स्य की कुल कोटि कही है' मो गौतम ! सानो पारह लास कुछ कोटि की ॥ ६२ ५ महो मगरन् ! लरण समुद्र में मत्स्य अरोर के मिनी भरगाहना की? गो गौनम ! मघम्प मगुल का असल्यासपा भाग पत्ता पायसो यामन की बो भगवन् ! कासोदघि ममुद्र में मस्स्प के शरीर की कितनी ही बरमाना कही? अहो गौबम ! मपन्य भगुरू का असंखपावरा माग राष्ट सात सो योमुन की बरो गन्! - प्रसाशन रानारादुर छ ! सुखदेवसहायी समाधी 414 . 1 + आपण सपाई उसोसेष सयभरमणे जहण भगुलरस भसमतिभाग उपासण बस ओयक सपा ॥ ६ ॥ तिवाण भत ! पीर समुदा मामलाहिं पण्णचा ? गोपमा माया लोग सुभानामा सुभा पणा जाप मुभाफामा बतिया पीय समुह सामषमेहिं पra 40 पीप ममुराण मंत! फातिमा उकार समर्पण qmvi? गापमा । जापश्या आधारमा उसार सागरीयमाण उदार समपा ज्वाला समुदा उद्धार समण्ण पणा ॥ २५ ॥ पीय समुदाण भत ! mins माउपरिणामा जीप परिणामा पोग्गल परिणामा ? गायमा ५ धरमप समुद्र परम गरी मना लिया भाग उरकर एक मार की भो गीत'मोमिनिमम Hymuyiinue..." FIT YUvo) uncati 1960:romanu (*** in R. AR 4.2 wit, it insta.in. .. पूरा प्राण किये विना और 101 रन राहव काना सी मी पस्य जानने देखन समर्थ नी, क्यों की दीर्घ और हस्व करने की विधि बसही सक्षम है ॥ ६ ॥ बहो मगान् ! चद्र पूर्व के विमान नीचे जो सारा सूर्य Feयोसिपी देवर से पका काति से हीन अथा। तुल्य है चद्र सूर्य के समषिमाग में साग रूप में वे क्या काति से हीन व तुल्य है। और घटसर्प ऊपर सारा पा काविहीन प तुरप ? अहो गौतम ! सारा कांति महान व सुस्प हो भगवन् ! किस करन से चंद्र सूर्य के नीचे जो तारा रूप विमान । ५ काति में होन और गुस्सा है पावत् उपर के सारा कान्ति में हीन व नुस्प है ? आओ Man | Rar . . पोतिष का वर्णन अनुपादक-पाखामार्गमि श्री अमे मा अपिमी + गोयमा ! सत्तमच्छ जाति कुलफोडि जोणिपमुइ सत सहस्सा पण्णता ॥ कालो- यगेम मने! ममुद्द कतिमच्छ जाति पता? गोपमा! नरमच्छजाति कुलकोडीजोणी पमुह सयसहस्सा पण्णतासयभूरमण भते !समुह कसिमच्छजाति कुलकोही पण्णता? गोयमा ! अहसेरस मछजाति कुलकोही जोणी पमह सय सहस्सा पण्णचा ॥ ६२ ॥ लवणेण भतासमुद्दे मञ्छाण के महालया सरीगेगाहणा पण्णता? गोयमा ! जहण्णेण अगलस्स मसखेजतिभाग, उक्कोसेण पच जायण सयाइ एष कालोयणे सच सवण समुद्र में मत्स्य की कितने लाख कुल कोटि रही है? अरा गौतम तपण "समुद्र में सात लाम कुल कोटी करी पो मगवनू कालोद समुद्र में मछ की कितने लाख कुल कर कोमो गीतमा न लाख कुछ कोटा काटी अहो मगधन्'श्यमूरमण समुद्र में कितने लाख मत्स्प की कुल कोटि की आर गौतम ! सानो मारह लाख कुरा बोटि की ॥ ३२ ॥ महो मगन् ' लाण समुद्र में मत्स्य शरीर कितनी बगाहना फरी? को गौनम ! जघन्य भगत का मसम्पासा माम पता पाचप्लो पामन की बो भगवन् ! कासोदपि समुद्र में मत्स्य के शरीर की कितनी परी बरमाना कही बहो गौबम ! मपन्य भगुछ का संरूपातका मान तर सासो पोमन की मोगा! महारराजारादुर र सुखदेवसायमी मामाकी ५२२ चतुर्दश-जीवामिगमा Am परिचामेबारव पक्खिदिय विसएहिवि सुरूवपरिणामे. पुरुवपरिणामेय एव सुम्भिगध परि- बामेव, दुम्मिगध परिणामेयाएव सुरस परिणामेय, दुरस परिणामेय एव सुफासपरिणा- मेव गुफासपरिणामेय ॥२॥सेषण मते!उच्चावए सुसह परिणामेसु, उच्चावएस रूबपरिणा- मेसु, एक गध रस-फास-परिणाममुपरिणममाणा पोग्गला परिणमतिविषचन्मसिया? हता गोयमा उचायएसु सहपरिणामेसु परिणममाणा पोग्गला परिणमति वसलसिया ॥३॥ सेणूण भते ! सुमसहा पोग्गला दुम्भिसहचाए परिणमति, दुभिसहावा पोग्गला सुमिसहचाए परिणमति ? हता गोयमा । सुम्भिसमा दुम्मिसहचाए परिणमति दुरिमसदा सुष्मिसहचाए परिणमति ॥ से पण भते ! सुख्वा पोग्गला ऐसे पोमेद मुरनिगप परिणाम र दुरभिगष परिणाम रस परिणाम के दो भेद-मुरम परिणाम दुरम परिणाम से ही शुभ स्पर्श परिपाम प दुष्ट स्पर्धा परिणाम ॥२॥ भो भगवन् 'पचम मपम सम्द परिषाय, पचम भयप सस परिणाम, पेमे ही गप परिणाम, रसपरिणापर सर्प परिवार में परिणपते हुए पुदर परिणम ऐमा षया कहना ? हां गौसम ! उत्तम अधम शुन्द परिवार में यावद परिषम्ने शले पुल परिणपते ॥३॥ महो भगवन् ! शुभशन के पुद्रम दुष्ट दपने क्या परिपमवे में अब दुष्ट गन के पुल -शुमनद पने क्या परिणमते है १६ गौतम ! शुम अब के कर तीसरी मतिपचि में परसपान दौर समुद्र का सर्व .

मवार-पावसाचारी मुनि श्री नामक पिती - माठपरिणामावि जीवपरिणामावि पोग्गल परिणामाधि ॥ ६३ ॥ दीव समुदाण मते ! सम्बपाणा सन्मभूया सन्यजीवा सव्वसत्ता पुढवि काइयनाए जाव तसका. इयचाए उवष्यपुया ? हंता गोयमा ! असतिं अदुवा मणतखुचो ॥ इतिदीय समुदा उद्देसो सम्मचो ॥ १७ ॥ कतिविहेण मते ! इदियविसये पोग्गल परिणाम पश्यते ? गोयमा ! पचविहे इंदिय विसए पोग्गल परिणामे पन्नचे तजहा-सोइदिय विसये जाव फासिदिय विसए ॥ १॥ सोइदिय विसरण भते ! पोग्गल परिणाम ऋतिविहे पण ' गोयमा ! दुविहे पण्णसे तनहा-सुम्भिसह परिणामय दुम्मिसह पृमी परिणाम,अप परिनाम,बीब परिनाम र पुरब पीणाम इन चारों परिवारमयी मोकापन। द्वीपसमुद्र में सब पाप, भूत, बीब मत क्या पृथ्वीबाबापने वायत् बसकायापने परिणय हा गोय! पार वा मनंत पार को दीप समुद्र का संदेशा सपूर्ण दुसरा ॥ ६ ॥ महो मगरन् ' इमिव पिप स र परिणाम कितने मेदको मा मौतम ! इन्द्रिा विषय पुरा परिणाम के बार मेर करे, मिन के माम-प्रान्तिय का विषय बावत सनिय का विषय. तो ममपन! भोमिय सिपाल परिणाम के कितने मेद साबो मौसम। इसके दो भेद कोरे सपना-मुरमिक्षण परमात मार दुरीमान परिनाम सपषु इमिय विस दो मे पापमपुर सपरिवार • प्रकाश राजामहाराणालयसापनीजामातारपी.

धनुन मीवापिगम मूत्र तृतीय उपाय भर्थ पोग्गलेखिविता पभू तमेव मणुपुरियटिशाणे निहित्चए ? हेता पम् ॥ से फण?णं भत ! एव बुधा देवेण महिडीए जाव गिम्हचा ? गोयमा ! पुग्गल स्वविचे समाणे पुध्यामेव सिम्यगती मषिता,सओ पन्छा मदगती भवति, देवेण माहडीए आव महाणु भागे पुयापिपछापिसोहे सीहगइ व तुरिए तुरियगई वेव, से तेणे?ण गोयमा! एव पुच्चइ आव तमेव अणुपरियाहिताण गिण्हत्तए ॥५॥देवेण भते! महिड्डीए जाव महाणु भागे बाहिरए पुग्गले अपरियाइचाय पुन्वामेव बाल अछेता मभित्ता पभू गढिचए ! पीछे पापाणादि पुद्रस सस और जम्मूदीप की प्रदक्षणा कर उसे पुन ग्राण करने में क्या समर्थ ? गौतमा पर सपर्ध 1 महो मगन् ! ऐसा क्यों कहा कि माधिक देव पापाणादि रासकर यावत् मेने को मर्यो बो गौवम ! मिस पुद्गल का मक्षप किया मावा है ससकी प्रथम श्रीघ गति होती है मौर पंशे मे मद गति होती मौर मादिक पावत् महानुभाग दवको पहिल पीछे शीघ्र स्वरित गति होती है इसलिये ऐसा कहा है पारत् मम्बूद्वीपको परियटना करके उसपनाएको ग्रहण कर सकता है बो भगवन्! पहादिलासा देव यापस् याान मागवान देववा वाहिर से दर ग्रहण किये बिन्धी पहले से पास का छेदन मेदन किये बिना ग्रहण करने में क्या साहो मौसम - तीसरी मविपत्ति में ज्योतिषी का वर्णन +tire ? का अनुसार-मचारी पनि श्री मोडक ऋपिना - दुरूवचाए परिणमति दुरुया पोग्गला मुरूवत्ताए परिणमति ? हता गोयमा ! एवं सुष्मिगधा पोग्गला दुभिगधत्ताए परिममति दुम्मिगधा पोग्गला सुन्भिगधाचाए पारणमति ? इता गोयमा ! एव सुरसा दुरसञ्चाए दुरसा सुरसत्ताए. परिणमति ? इता गोयमा ! एवं सुफासा दुफामा 'चाए दुफासा सुफासत्ताए । इता गोयमा ! || तचेव मते ! सुम्मिसहा पोग्गला दुमिसहचाए परिणमति दुन्भिसहा सुमिसहचाए परिणमति २ इता गोयमा ! एव मुरूवा दुरूया एव गधावि रसावि फासावि सचव सुफासा दुफासा दुफासासुफाचाए परिणमति हता गोयमा ! जाव परिणमति ॥ ४ ॥ देषेण भते । महिडिए जाव महाणुमावे पुवामेत्र पुहम दुष्ट शपने परिणमते है और दुष्ट वन के पुद्गल धुम शब्दपने परिणमते ? अहो मुस क पुल क्या दुष्ट रूपपने परिणम भयया दुष्ट रूपक पुल सुस्प पने क्या! परिगमते । मोतम ! ऐसे ही मुरमि मंघ के पुरा दुरभिगप पने परिणम और दुरमिगध के पुल सुरमिगर पने परिनमी पुरम के पुरन दुष्ट रसपने परिणमते हैं और दुष्ट रस के पदल मुरसपने परिणमते । और शुम सर्भ के पुल दुष्ट स्पर्ध पने मौर दष्ट सबसे पुराल अमस्पर्श पने परिणमते में इस तरा पद म, मेष रस व सर्व का वर्णन मा ५॥ पो मौतम ! बोई मालिक वापत् महानुपागमा देव प्रकाशकानापसादुर बाबा रामदेव महायत्री माठाप्रसादमी सूत्र अभेना पदीही करित्तएका इस्सीकरतएवा? मोतिण? समटे ॥ एष पचारिविंगमा पढम यमगेमु अपरियाइता एगतरियग अछेचा अमेत्ता सेस तहेव तवेषण सधि छउनत्थ प जागति पपासति एव सुहमचम दाही करेजवा हस्सी करेजा॥६॥ अस्थिण भते ! चविम सूरियाण हेष्टुिंपि तारारूबा अणुपि सल्लावि समपि तारारूवा, अणुपि तुलावि उम्पिपि सारारूवा अणुपि तुखावे ? इता आत्थि ॥ सेकेगट्टेण भते ! एष वुचात अस्थिण चदिम सूरियाम आव उपिपि तुल्लावि ' गोयमा ! गौतम ! पा अर्थ पोग्प नींऐसे ही पारगमा काना पहिले दूसरे में प्राण किये बिना और वीसरे चोय माग में छेदन इन रहिव काना सी मोज्यस्य भानने देखन समर्व ना, क्यों की दीर्घ मौर इस करने की विधि धात ही सक्षम है ॥६॥ बहो मानन् ! चद्र पूर्व के विमान नीचे जो तारा सूर्य की ज्योतिषी देवा या कमि से हीन अथमा वक्ष्य है चंद्र सूर्य के समीपमाग में नाग रूप। वे श्या कादि से हीन व सुरय है। और चद्र सर्व कपर बाराव या कामिन नुस्य ? अहो गौसम वे सारा कानिमान व सुस्या हो मगवन् ! किस करन से चंद्र सूर्य के नीचे मो वारा प विपान व झांति पान और सुस्प है पावर उपर के सारा काल में हीन व तुल्प है ? ओ गौतम ! जैसे 40 चतुभ में पापिमा सूत्र तृतीय उपा म वीमरी प्रनिपचि में ज्योतिष का वर्णन - अर्थ बालमपारी मुनिश्री भोसल पिनी + नोतिण? समट्टावेण मते! महिटीए जाव महाणुभागे बाहिरिए पाग्गले अपरियाइत्ता पुब्बामेव वाल छित्ताभचा पम् गच्छित्सए?णो निणटे समढदवाण भत! माहिड्डीए वाहि रए पोग्गले परियाइता पुध्यामेव पाल अछित्ता अभित्ता पभू गहिचए ? णातिणट्रे समट्ठ ॥ वेण मत ! महिड्डीए जाय महाणुमाग बाहिरए पोग्गले परियाइचा पुलामव बाल छेता भेचा पभू गहित्तए । हतापमू ॥ तचेत्रण सधिं छउमस्ये माणति न पासति,एष सुहगषण गढवावण भते! महिडिए पुवामेव घाल अठेचा बार्य समर्प नो महो मसान् ! महाधिक पावत् महानु माग देव पाहिर के पुल प्राण सिये रिना पीने से वासका अन मेर र प्राण करने में क्या समर्थ है ! बो गौतम ! यह मर्य सर्व नहीं बा ममपन् ! बाद यावत् मासुमाग देव बारिश के पुदल प्राणकर बासका पहिले से मन मेदन किये बिना प्रान करने में समर्थ है? मो नौसम ! या सर्व समर्थन मो ममान् ! पापि पावत् बानुमान बाबा दप बाहिर पुन प्राण कर और पास को पहिसे से ऐदन मदन बरसा से प्रान करने में समर्थ गौतम ! सर्व इमको समस्या बम मान सो नगरेसससोपोंकीरात सुमहोती है बहो मनवन्! मादिकमावत् महानुभान गासे देश पीछे से ही पाठदन मेदन किये बिमारी बया इस्त्र करने में क्या है। पकारक रानामादुर लाछा मुरुदेवमानी गागासामी.

+ पत्र प्रवभिप मूत्र सृत य उ +m मिल्लाओ चरिताउ केवतिय अवाहए जोतिस चारचरति ? गोयमा ! एक्कारसहि एकरीसेहिं जोयणसएहिं अहाए जोतिसए चार चति ॥ एव पक्विाणिजाओ पच्चस्थमिल्लाओ उत्तरिल्ल ओ एकारमहि एकवीसेहि जोयण जाव चार चरति ॥ ९॥ लागतातो मत । कवतिय अबाहाए जोतिमए पत्नत्ते ? गोयमा ! एकारसेहिं एक्का- रएहि जोयणसएहि अघाहाए जोतिमे पमत्त ॥ १० ॥ इमीण भते । रयणप्पभाए पुढवीए बहुममरमणिज्जातो भूमिभागातो कवतिय अब हाए सन्वहट्ठल तारास्वेचार परति केवतिय अबाहाए सरिएविमाणे चार घरति केवतिय अव हाए चदविमाणे धार चरति केवइयं अबाहाए सबउवरिल्ले तारारूवे घार घरइ ? गोयम ! इमीसण वास चमत। बड़ो गौतम ! मेरू पर्वत मे १२. पोमन के भार से ज्योतिषी पर है, ऐसे ही दक्षिण, थप मचा दिशा का मानना ॥९॥ अहो मगन् ! छोकान्स से छोक में किसने दूर ज्योतिषी गो! महा गौतम ! १०१ योजन पर ज्योनिपी है ॥ १०॥ मो भगवन् ! इस रलममा पृथ्वी एत मपरमणीय भूमि माग से कितने दूर ऊपर सारे नीचे के सारे पास पलते हैं। कितनी दूर पर का दिम न घालता है किसी दूर पर चंद्र का विमान चछना है भौर कितनी दूर पर उपर तारों सीपान च है ? ग्रहरे गतरारला पृष्मी के पहु। सपरपर्गय समागमे ७२ . र वीसरी प्रतिचि में ज्यानिपं का वर्णन 45 भर्य अनुगार-पासमारी पुनी भी भाउस मनी 8t> जहा अहाण तोस देवाण तवनियम बमचरवासाइ उकडाइ उस्सियाइ मति तहातहाण ससि देवाण एव पण्यायति तजहा अणुएवा तुल्लाया सेतेमद्रुण गोयमा ! अत्षिणं चादेमसारिपाणं आव उपिपि तारारूना अणुपि तुल्लावि ॥ ७ ॥ एगमेगस्सण मते ! चदिम सरिपस्स केवतिओ क्सत्त परिवारो पण्णतो ? केवतिभो महग्गह पारवारो पण्णतो, कातिभो तारागण कोटा कोडीओ परिवारो पणतो ? गोयमा ! एग मेगस्सम चदिम सूरियरस अट्ठासाचगहा अट्ठावीसच होइ णक्खत्ता एग ससीपरि धारो पण्णत्ता,एनो तारागण वोच्छामिछाया? सहस्साइणवचेवसयाइ पचासत्तराई एगससी परिवारो तारागण कोटा कोडीण ॥ ८॥ जबुद्दीवेण भते ! मदरस पव्ययस्स पुरस्थि वारा रुप विमान के भपिष्टाता देवोंने पूर्व मा में सप, नियम, अमचर्य प्रमुख रकर किपा अमेसे देवता प्रति भनिगुणों से तीन र सुस्प होते को गौतम ! इस सिष एसा कहा है कि पद मूर्य मीरे वारा भारत पर के तारा कवि मादिमुषों से हीन व तुल्य है ॥७॥ मगन्! एक पदपार फिलना ननयोका परिवार, किसने ग्राका परिवार बिसने बारामों का परिवार। गो गौममाएकर चंद्र सूर्य का महाती ना हाइस नक्षत्र भारणसठ हमार नबसोपचचर कोरा कोरीवारा का परिवार को मगरर महाप पर से पूर्व र परिमांव से पोतिषी किसने भावर पर रहकर मायक राजामगदुरठाला पुसटसापनी मामामानी.

सूत्र तोण भते ! केवइए अवाहाए चदविमाणे चार चरइ, केवइय सब उपरिक्षे तारारुवे चार चाइ' गोयमा! सुरविमाणातोण असीएहि जोयणेहिं अबाहाए चदरिमाणे चार घरत, जोयणसए अबाधाए स० तवरितारारूवे चार घरति ॥ चदविमाणाओण भते ! केवतिय अवाधार सन्त्र उवग्नेि तारारुव चार चरति ? गोयमा। चदविमाणातोण वीसाए जोयणहिं अवाधार सन्न उवरिल्ले तारारूप चार घराति, एषामेव से पुन्यावरण पसुत्तरसत जोयण बाहले तिरिय ममखेचे जोतिस विसए पगचे ॥ ११ ॥ जबूहीवेण भते ! कयो नक्वचे सबभतरिन तारारूचे चार चारति, कयरे नक्वते सब बाहिरिल्ल दूर ऊपर चद्रका विमान है और कितनी दूरपर उपर के तारारूप विमान है? भो मौतम ! सूर्य विमान से चद विमान ८० योजन ऊपर। और १०० योमन अपर सागस विमान अहो मगर ! पद्र विमान से तारासिमने दूापामो गोतय ! चद्र विमान से ऊपर पीस येजन सारारूपो यो सर मीलकर ११० याजन में नाम माख्यात योजन पक्ष ज्योतिषी के विमान का" ॥ भो मगवन् ! नम्बद्वीप में कौनसा नक्षत्र मघ के अभ्यंतर सारास में चाल पहा है, कौनसा नक्षप सप से पाहिर सारास चाल पता है कौनसा नक्षप सप से ऊपर वारास्प पाल पळसा है और AH चतुर्दश नीवाभिगम मूत्र नृतीय उपाय 4 तीसरी प्रतिपचि में ज्योतिषी का वर्णन *१२ अर्थ A +1 मनुमादक वापसमचारी मुनि श्री अमोलम् अपिता- रयणप्पभाए पुढवीए यह समरमाणिज्ज सत्तहि गउएहिं जोयण सोहि अवाहाए सम्बहेडिल्ले तार रूवे चार चरति अट्टहिं जोयण सतहिं अब हाए मूरश्मिाण चार घाइ, भट्टहिं असीएहिं जोयण सएहिं अवाहाए पदविमाण चारचरइ नहिं जोयण सएहिं अपा- धाए सवठवरिल्ल तारारूये चार चरतिसहिहिलाओण भते ! ताराख्वातो केवतिय अवाहाए पुरविमाण चार चरइ, केवतिय आवाहाए चदविमाणे चार चरइ, केवतिय अघ'हाए सत्य उवरिखे ताररूपे थारं चरति ? गोयमा ! सम्बटिखातोण दसहि जोयणेहि सविमाणे चार घरति, णवएहि जोयणेहि अवाधाए चदविमाणे चार घरति, सुसरे जयणसए अब हाए सन्नउपरिल्ले तारारूवे चार चरति ॥ सूरविमाण पोमन उसे सप योनिपी के न घे तारा मेरस का है, ८०० योमन को सूर्य रिमान घलता, ८८० योजन चा चद्र विमान घरता है, ९०० योभन कचा उपर सारा प विपान पलती हो मगरन् ! सामे नापे के ताग पिम न म कितने दूर पर सूर्य का विमान पता है, जिवने दूर पर बंद का विमान नसता रे मोर शिवम दूर पर उपर के द्वारा प मरस है? महो गौतम ! सब से नीचे के साग रूप विमान से • योनन ऊपर मूर्य का विमान पनताt, ९. मोमन पर पट्रम विमान पसतारे भौर । योबन रचे पर बारा विमान पर मोसमबन मर्प रिमान में दिखनी महाशक गजामहादर माग समत्वमापती बापासमारी।

सूत्र Rषतईश मोशमिमम मूब नृतीय उपार Htt पदविमाणाण मते ! केवतिय आयाम विक्समेण केवइय परिक्खवेण केवतिय पाहल्लेण पणते ? गोयमा ! छप्पन्नएगसटिभागे जोयणस्स आयाम विक्खमेण, त तिगुण सविसेस परिक्खेवेम, अट्ठावीस एगसा?भागे जोयणरस बाहलण पण्णत्ते॥ सूरधिमाणस्स सन्वेष पुग्छ। ? गोयमा ! अडयालीस एगसट्ठिभागे जोयणस्स आयाम विक्रमेण त तिगुण सविसेस परिक्खेत्रेण, चउन्धीस एगसट्ठिभागे जोयणस्त याहलेण पण्णते, एवं गहविमाणेवि मर जायण मायाम विक्खमण त तिगुण सविसेस परिक्सवेण, कोस वाहल्लण पण्णते, ताराविमाणेण कोस आयाम विक्ख- ++ टीसरी प्रतिपत्ति में ज्योनिपी का वर्णन 11 मर्थ ॥ १३ ॥ बहो मापन् 'पद्रपिमान कितना हम्मा चौटा कितना परिषिवाला कितना नाटा १ मा गौतम ! एक योजन के ३१ भाग में मे ५६ माग का लम्बा चौडारे, इस से तीन गुनी से मरिक परेषि भौर एक योजन के एकसठिये भट्ट इस भाग का नाटा है सूर्य विमान की पृचा? महो गौसम ! एक योजन के एक्सठिये असताकीस म गका लम्बा चौर। इससे कुछ अधिक तीन गुनी परिधि और एक साठये २८ मागका बाटा। प्रा बिमान भाषा मापन का लम्मा चंटस है तीन गुनी से अधिक परिपि है, मोर एक कोम नारा बारा रिमान एक कोड का सम्मा घोटा है मुबारक-बापमचारी मान श्री ममोसा सापहर चार चरति, कयर नक्वम्से सन्द उवरिल्ले चार घरति, कयरे मक्खचे सव्व इंडिल्ले तारारूवे चार चरति ? गोयमा! जद्दीवे अमिइ णक्खचे सन्माभितरिल्ले ताराख्थे चार चरति, मूल णक्वत्ते सन्म बाहिरिल्ल तारारूवे चार चरति, साती पक्वत्ते सन्युप्परिल्ल जाव चरति, भरणी पक्वत सत्य हेट्ठिल तारारुवे चार चरति ॥१२॥ चदविमाणेण मत ! किं सठित ? गोयमा! अह कविटु सठाण सठित, सब फालि. सामपे अभूगतमूसितप्पहसिते वण्णमओ, एष सूरविमाणावि, एव गहविमाणावि, नमक्ष विमाणावि, ताराविमाणावि, सन्धे अर कवि? सठाण सठिते ॥ १३ ॥ कौनसा नसत्र सब से नीचे के तागम में पास चलता है ? को गौतम ! गम्दीप में अभिमिन नमम सर से सभ्यतर तारारूप में पास पलसा में मूल नक्षम सब स सरिके ताराकप में पास बसता जाति नक्षत्र मद मे उपर यावत् चाल बसता है मोर मरणि नक्षत्र सब स नीष के हारास्प में पास परसा ॥१२॥ भो मगरन् ! पद विमान का क्या मस्थान का दुरा ! भो गौतम ! बाध पिठ फलक संस्थान है सव स्फटिक रस्तपय रे अभ्यगत कातिवामा मेरा पन सब पत् भानना ऐसे । मूर्य, ग्रा, नक्षत्र व तारा विमान का मानना ये सब वर्ष कपिठ के सस्थान बाजे प्रकाशक रामायादर लाया मुसदवसहायी सामाप्रामी - .

सत्र अर्थ 42 सुश नीवामिमा मूत्र तृतीय उपाय धितगतीण असियसुणिमियमुजाय भफोहियाणगुलाण वयरामय णक्वाण धयरामय पताण वयरामयदाढाण तवणिज जीहाण सवणिज तालुयाण तवणिज जोतगसुजोति याण कामगमाण पीतीगमाण मणोगमाण मगोरमाण मगोहराण अमियगतीण अमिय घलबीरियपुरिसमार परकमाण महय भफाडितमीहनाइय बोल कलयलवण महुरेण मणहरेणय पूरेता अपरदिसाओय सोमयता पत्तारिदेव साहस्सीठ सीहरूप धारिण पेवण पुरिमिछमिक्ष घाह परिवहति ॥ ५ ॥ चदविमाणस्सण दक्षिणेण सेयाण उन की गति गर्यरत है, कम से नीची हासमी हुई उम की पृष्ठा है, पन रस्नमय नख , वन रत्नमय दावा है, रक सुपर्णमय जिन्दा मार ताल है, रक्त मुनर्णमय ओसर से मोते हुये है, इच्छानुमार चलने वाले प्रीसिकारी गमन पाछे, मन जैसे घ्र गविषाले, मनोरम गति पाले, मनोहर मति माले, अमित गति, पम, वीर्य,'पुरुषात्कार व परामय पाठ । घट २ मास्फोटित सिंह नाद कछकल मौर मनोहर शम्द से याकाम को पूरते हुने, दोदिशि को शोभित पास हुने चार हमार देव पूर्व दिशा की पारा उगार असते ॥५॥ चद्रमा के दक्षिण दिशा में चार हजार देर इसी के रूप से विमान सदर स्थी भेत शुमति पाले एस म समान निमम निर्मस दपि पिप,गातार,समुद्र 4. वीसरी मठिपचि में ज्योतिपि का वर्णन 18+ अनुवादक- नाप्रपारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी + भेण त तिगुण सविसेस परिक्खेषेण, पंचधणुसयाइ पाहल्लेण पण्णते ॥ १४ ॥ चरविमामेण मत! कतिदेव साहस्सीओ परिवइति? गायमा! सोलस देव साहस्सीओ परिवहति,चदविमाणस्सण पुरस्थिमेण सेयाण सुभगाण सप्पभाण सखतलविमलनिम्मल दधिधम गेस्वीर फेण रयणिगर पगासाप थिर लट्ठ पउट पीवर सुसिणिद्ध मुतिक्ख- पाढा विडवियत मुहाण रसुप्पल पञ्चमठय सूठमाल तालु जीहाण, पसत्य सलट्ठ पेरुलिय मिसत फडक्वाण विसाल पिवरोरु पडिपुष्णविउल खधाण मिठविसत्य पसत्य मुकुमाल सुडुम लक्खण विछिण्ण केसरसढोव सोभिताण चकमिय लालेत पुब्धिय पवलग- कुछ मषिक तीन गुनी परिपि है, मौर ५.० अनुष्य का नारा है ॥४॥ महो भगवन् ! पद विमानको तिने मार देव बावेमा मोतम ! सोगामार देव चंद्र विमान को ठावे जिन में से चार मार देव सिधा में सिरप पारन पर उठाये है उनका वर्णन करता सुभग प्रभागने शस से विमाप समुद्र, गौदुग्ध,ममुद्रका फेण,चन जैसा मेरे स्थीर मष्ट पवन पुष्ट स्निग्प व गोस वीण दारा सहिम मुखाने मन की निमा और व सुरक कमप जैसा मुकेपाली रन नस प्रचस्प परस्नमय भौर सशक्षण, विस्तीर्ण और पुहरु स्या है, मतिपूर्ण पिपुष रूप, मृदु, पिशद प्रशस्त, सूक्ष्म समणव व विस्तार बाकी केरा का बाप है, पापीवा, पिता, पुब्तिा, मति गौर पारम से • महापक-राजापहादुर छाला सनमायनीभागासामी.

सून चशा मीमाभिगम सूत्र तृतीय उन १ यइरामयतिक्खलअकुस कुभजुयलतारोडियाणं तवणिज्जसुबह तवणिज्जसुबह कछप्पि यघलधराण जबूणयविमलघणमडलवयरामय लालाललियताल पाणा मणिरयण घटपासग रयतामय रज्जुबद्दलबिय घटाजुयल महुर समणहराण अल्लीपमाणजुत्त घट्टियसुजाय लपवण पसत्य रमणिज पालग्गत परिपुच्छणाण उवचिय परिपुण्ण कुम्मचलणलहुविकमाण अकामयणक्वाण तवणिज्जतालयाण तपणिज जाहाण तवणिज्य जातस जोतियाण कामगमाण पीतिगमाण माणोगमाण मणोहराण अमिय गईण अमियबलपिरियपुरिसकार परकमाण महयागभीर गुलगुलाइयरवण महुरेण तिसक से परिमरिसर उन की गरद में अनेक प्रकार के माणिरत्नमय सत्कष्ट मुटुलिव आभूपण हैं हूर्य रस्नमय दर पागनिस पमानमय सीक्ष्ण एट अंकुच्छ कुमम्थल पर रखा। रक्त सुवर्णमय सम्पर का पप जम्मूद रत्नमय निर्मल निवड पडल है बजरत्नमय लोल हैं भनेक मणिरत्नमय पटा पासा है, चांदी की रस्सी से पप वैधे हुये उन पटा युमल के शब्द से मनोहर दीखते हैं लय रहित प्रमागोपेत गोल मपणे भाषण पाठी प्रशस्त रक्त मुघर्षमय मिमा पतालू है रक्त मुवर्णमय मोत से मोये है, उन का गमन इछ नुसार, प्रीतिकारी, मन के अनुसार, व मनोहर है बारीमित गति, वरू, वीर्य, पुरुषात्कार व पराक्रममत, है पडे गमीर गुरु गुट र मोर ++ सीसी प्रतिपचि में ज्योतिषो का वर्णन 48 अर्थ प्पकासाम अनुवादक-नाममपारी मुनि श्री नमोगक ग्रीनी सुभगाण सुप्पमाण समतल विमल जिम्मल दधिषण गोवारफेण रयनियर वयरामयकुंभजुयल सुटित पावरवर पइरसोडविस दित्त सुरत्त. पउमप्पकासमग्भुण्णवमुहाण तवमिन विसाल चल चलत चश्ल कण्ण विमलजुसाण मधषण भिसत मिद्धपिंगलपत्चल विण्णमाणि रयणलो. यणाय मम्भुगतमउलमल्लिया धवल सरिस सठित णिवणदढ मसिए फलियामय मुजाय दत मुसलोवसोभिताण कचणकोसपिविष्ट दतग्ग विमल माणिय रयणमइल्लेप्पेरत चिस्वग्ग विरायाण तपणिजविसाल तिल्लग पमुह परिमाहिताणणाणामनिरयण गुलिये गेवेजक्टगलपवरभूप्ताण वेलिय विचित्त दहनिम्मल फन और पारी समान मापासे परस्नमा भस्पछ के युग में पुष्ट पसरत्नमय सूदादर से देदीप्यमान रक्क पर सपान मुल। रक मुवर्णपर विस्तार पाले अति पयल नेम, मधुर वर्ष मे देदीप्यमान मिग्बदीलता पा पीला सामादिदोष रहित आसपीले पत वर्ण पाले मागिरत्न मव की बात पे कोमात मागपुष्प पैसे भरण, मि रहित व देदीप्यमान स्फटिक रस्नमय मासिनत दो अवस दवशमन दसमूह के मनमान में मुवर्णरबार गरे । मपिरस्न से मनोहर विमान पिरिण स्प से निराकार रक्ष सुवर्णमय विभाग प्रकाधक-रानाबादुर लाप्लामुसदेवसापभी जासासाबमा.

ani चतुर्दश-जीवामिग मूत्र तृतीय उपार - पीवरसुसठितकडीण उलबपलब लक्षण पसत्य रमणिज बालगडाणं समखुर पालिधराण समलिहिततिक्खग्ग गुप्पसिंगाण तणुसुहुम सुजातगिद्ध लोमन्छविवराण उपषित मसल विसाल पडिपुण्ण खधपमुहसुदराण वेरुलिय भिसत कडक्खसु णिरिक्खाणीण जुत्तप्पमाण पधाण पसस्थ रमणिब गग्गरगल, सोभिताण घग्घरग सुपदकठमडियाण,माणामाणि कणगरयण घटिये धेयस्थग सुकय रतिय मालियाणवरघटा गलगललिय सोमत सस्सिरीयाण पउमप्पल सगल सुरभिमाला विभूसियाणं वइरखुराण विविह विक्खराण फलियकामयदताण, तवणिज जीहाण तवणिज तालुयाण तवाणिज्ज प्रतिपूर्ण पिपुर विस्तार पाले कपोह है, किंचिस् नम्न बोष्ट, घण निचित र लक्षण युक्त चक्रमित, ललित पकाठी घपल गति है, पुष्ट गोछ सस्थित कटिमाग है, अपलर मलच ऐसे लक्षण युक्त प्रशस्त रमणिक पुछ है, समधुर है, समान पतीक्ष्ण शृग है, पतली सूक्ष्म माविस सिग्ध रोमराजी है, पुष्ट मोतळ विशाल प्रतिपूर्ण पैडूर्य रत्नमय देदीप्यमान पाठाक्षवाला उन का निरीक्षण है, प्रमाणोपेत प्रधान स्वस्प रमणिक गलकाल है, घुघरमाळ क.म्ठ में घारन किया है, अनेक मणिरत्नोंवाला फच्छ भाभू पण से बनाई हुई वग्याला पारन की प्रधान षष्ट से मुशोमिव सोक हैं पमरर उत्पल कमल की मुगपमाला से विमूपित है, उन के तर पन'नमय , स्फटिक रत्नमय दर है, रक सुवर्णमय निन्दा तीसरी प्रतिपधि में ज्योतिषी का वर्णन मर्थ - मनुवादकनासमपारी मुनि श्री ममोसा पिमी- मणहरेम परिता अबर दिसाओय सोमयता चसारि देव माहस्सीओ गबरूव घाराण देवाण दक्विजिल्ल बाह परिवहति ॥ ६॥ दथिमाणस्स पञ्चरिथमेण सेयाण सुभगाण सप्पमाण पकमिय ललिय पुलिस प्रवल चचल ककुह सीलाण सप्णय पासाण सगयपासाम सुजायपासाम मियमाइत पीणरतिपासाण झसविहग सुजातमुप्छीणं पसस्थ णिहमध गलित मिसत पिंगलनक्वाण विसाले पावरोख्य पडि पुण्मविपुलवधाण वट्ट पहिपुण्ण विपुल कण्णकडियाण, इसिं आणयवसणो यहाण षषणिपित सुषडलक्खणुण्णत चक्रमितललित चलचवल गन्वितगतीण पटिय गपुर मनोर बन्द से माफाश पूर्व और दो दिशी को शमित करते हुए चार इमार देव हावी रूप से दक्षिण दिशा की पाहा पठा* ॥ ६ ॥ चंद्र विमान से पश्चिम दिशा में पार मार देष वृषम के रूप से विमान उठाते हैं वे वृषम वेत, सुभग कान्ति बात उनके पास (पसी) चक्रीमत, अमित पुसित मति से न पसन बामे सप से घोमिती भावे , मुमाव में प्रमाणोपेठ और वानंदकारी इस मा बबा पक्षी जैसी एम को कवि प्रशा मपुसमान पाणी देदीप्यमान मोग बली पन के विस्तीर्ण सपी गोय Hशा-रामानहादुर छाला सुखदेरसहायनी मात्रमादी- अर्थ + पदस बाभिगम स्य तृतीय समाज धारण तिवई गईण सिक्खितगतीण सण्णतपासाण सगयपासाण सुजाय पासाण मितमा- इतपीणग्इयपासाण झसविहगमुजात कुच्छीण पीणपीवर वहित मुसठित कडोण उलब पल्ब लक्खण पत्तत्य रमणिज वालगडाण तणमुहम मुजाय णिलोमच्छवि. धराण मिउचिसय पसत्थ सुहम लक्षण विकिष्ण केसरवालिधराण ललियलास गाललाह वरभृसणाण मुहमहगोपुग्छ घमर घोसग परिमडिय फहीण तवणिज्ज खरा तवणिज्ज जीहाण तणिज्ज जोतग सुजोतियाण, कामगमाण पीतिगमाण मणागमाण मणोहराण अमितगतीण अमिय बलवीरिय पुरिसकार परक्कमेण महया पपली नम्न, सुनात, पारमित, पुष्ट हैं मस्प भया पक्षी जैसी कुक्षि है उस का व पुष्ट फटिभाग गोठ, भवलम्म ऐमे लक्षणोंवाला पुष्ट है पतमी सिग्प पुक्ष्म सुभात रोमरामी है, मृदु सुजाप विशाल लक्ष्म और क्षणोपेत स्कषकेष (देशवासी), ललिख लास नामक प्रचम मापण के प्रारक है, सुखकारी गाय पुश्क चापर और पोषण भामरण विशेष से उन का काट प्रदेशा परिमारित रे रक्त मुरणमय हर है, रक्त मुवर्णपय मिना मौर माल है रक्त सुर्षमय नोन से मा पच्छानुसार सन का गपत्र है मौर भी उन का गमन प्रतिकारी और मन को अनुसरना हुआ है न मेन मान वल, पीय पुरुष कार और पाको घबडे २ पाप अपना किछि महा तीसरी प्रतिपत्ति में ज्योतिषी का वर्णन .

पाहाबारीमुनि मी प्रमाला पनी जोग सुलोतियाण कामगमाण पोतिगमाण मणोगमाणं मोहराण अभियगतीण अमियबलवीरिय पुरि साकार परफमाण महया गंभीरगनियरवेण महुरण महया मणहरेय पुरेसा अबरदिसामओय सोमयता चत्वारि देव साहस्सीमो वसहरूवधारिण देवाण पक्ष- स्थिमित पाह परिवहति ॥ ७ ॥ चदविमाणस्सण उच्चरण सेताणं मुमगाणं सुप्प- भाण जन्माण परमल्लिहायणाण हरिमेलामठल मलियच्छीण घणणिचित सुबह लक्ख गुण्णत पकमितललित पुलिय चल पचल चल गतीण, लघण वग्गण धवण मौर वामूरक मुनर्णमय भोत से बोये हुए , इच्छानुसार प्रीसिकारी मनानुन्छ । पनोहर पन का ममन अमित गति, पर,पी,पुरुषात्कार व पराक्रप युक्तों,पटे गमीर शुष्द से भामर दुवे मधुर मनोहर शम से माकाय पूरते हुरे दमोदिनी में घोमा करते हुव चार बार दर वृतमाम से पश्चिम विधी की गोदा उठाकर पते ॥७॥ पद पिमान स उचर में चार हमार देव मास से विमान उठाकर परते, उनका वर्णन करते देख, पमल, ममग, जातिगत, वरुण परिमला (वनस्पति विशेष) मरिमा पनस्पति उस समान एमसन के मेत्रों में, निरि मादसमे उमत पमित सहित पुडित पर पप गति, गवंता, गगना, दोरना, पणिपष, पसना, विपदी दना ऐसी गति है चन ० प्रशिकराजाबहादुर लामा सुस्तत्वमायनी वालाप्रमादमी +पतुर्दश-मीवाभिगम मूत्र-सृनीय उपा र तुरगरूषधारीण देवाण उसरिल्ल वाह परिवहति ॥ १० ॥ एव णक्खच विमाण स्तवि पुष्छा ? गोयमा । चचार देव साहस्सीओ परिवहति तजहा-सीहरूव धारीण देवाण एगा देव साहस्सी, पुराच्छमिन्न वाह एवं चठदिसिंपि, एष तारगाणधि गरि दो देव साहस्सीउ परिवहति तजहा-सीहरूव धारीण देवाण पचदेवसया पुरम्छिमिल बाह परिवहति, एवं चउहिसिपि ॥ ११ ॥ एतेसिण मते ! पदिम सूरिय गहगण णक्खच ताररूवाण कयरे कयरहितो सिग्धगतीवा मदगतीवा ? गोयमा ! चद हिंतो सूरा सिग्धगती, सूरहितो गहा सिग्घगती, गहेहितो पक्वत्ता सिग्घगति, णक्खत्वे हितो तारासिग्धगती, सम्बप्पगती चदा, सव्वसिग्धगतीमो तारारूवे ॥११॥ एएसिण तीसरी मतिपधि में ज्योतिषी का वर्णन 42 अर्थ दो मार देव उत्तर दिश में अश्व रूप से॥.. ॥ ऐसे ही नक्षत्र पिमान की पृच्छा कहना नक्षत्र विमानको चार इमार देव ठाते है, जिनमें से सिंप से एक हमार देव पूर्व दिशा में, यावत् एक हमार देव उत्तर दिशा में अन्य रूप से हैं ॥ ॥ महो मगपन् ' चद्र सूर्य ग्रह, नक्षत्र और वारामों में से किम की गति मद और किस की गति शीघ्र है ! भो गौतम! चद्र से सूर्य की गति घरे, मूर्प से ग्रा की गति शीघ्र है, ग्रह से नमन की गति शीघ्र है, और नक्षत्र से सारा की श्रीम सप से मद गति पद की भौर सप से शीघ्र गधि धारा की है ॥ ११॥ भो मगपत् ! चंद्र नमुरादक-बाबामधारी मुनि श्री नोखा रिनी हयहेसिय किलकिलाइय रवेण महुरेणय मणहरेणय परिचा भवरविसाओय सौभयता चचारि देव साहस्तीओ इयरूवधारीण देवाण उत्तरिल्ल बाह परिवहति, ॥ ८॥ एवं सूरावमाणस्सवि पुच्छा ? गोयमा ! सोलस देव साइरसीओ परिवहति ॥ ४ ॥ पुवकमण, ॥ ९ ॥ एवं गहविमाणाण मत ! कतिदेव साइरसीमो परिवहति ? गोयमा ! अट्ठदेव साहसीओ परिवहति तजहा सीहरूषधारीण दो देव साहस्सीओ पुरष्छिमिल्ल वाह परिवहति, दाहिणेण गयरूव धारण दो देव साहस्सीउदाहिणिल वाह दो देव साहस्सीओ वसमरूपधारीण, देवाण पथरिथमिल्ल वाहपरिवहति दादेव साइस्सीओ मपुर, मनोहर पद से माकाष पूरते हुने पार हमार देष मश्वास से उचर दिशाके पद विमान की बाँदा उठात में ॥८॥ एसे ही सर्प विमान की पृष्ण करना' भो गौतम ! सोला मार देव मूर्य विमान पठाते में इस का झम मी पूर्वानुसार मानना अर्थात् चार मार देव पूर्व में मिरूप से दक्षिण दिशामें चार मार देव साथी के रूप से, पश्चिम दिशा में चार मार देव वृपप र से मौर रचर दिशा में पारामार देव भव स से है ॥९॥ बो भगवन् ! ब्रा पिमान कोरियने हजार दस सग को गौतम ! माठ मार देव प्रापिमान बताते है बिम में से दो इमार देश पूर्ण हिम से, दो मार देव दक्षिण में रस्सी सप से दो मार देव पश्रिम में पुपम रूप से और प्रकाशक-राजासादर लाला मुखयमायनी मावासादमी उकासण दोगाठयाइ, तारारूवे जाव अतरे पण्णसे ॥३॥ चदरसण भते ! जोतिसिंदस्स जोतिसरनो कतिअग्गमाहिसीओ पण्णसाओ ? गोयमा! चचारि अग्गम- हिसीउ पण्णतामओ तजहा-चप्पमा दोसिणामा अचिमाली पभकरा ॥ तत्थण एगमेगाए देवीए चत्वारि २ देवीए चचारि २ देवी साहस्सीमो परिवारो पण्णता अर्थ पश-मीषाभिगम सम-नृतीय पान माश्री मो अन्तर है मामघन्य२६६ योमने उष्कृष्ट १२२४२ योमन का भवर हैं और निर्याघात गो मघन्प ५०० पनुष्य सस्कृष्ट दो गाउ का अवर है ॥३॥ भो भगवन् ! ज्योतिपी का इन्द्र ज्यो मिपी का रामा चंद्रमा को कितनी भन्न मतिषियों कही है ? अहो गौतम ! चार अग्रपरिपियों कही। जिन नाप-चैद्रममा, दोपिनाभा, अर्चमासी और प्रमंकरा एक देवि को चार २ इमार देवी का + वीमरी मतिपचि में ज्योतिपी का वर्णन Hit १ निषध नीलवंत पर्यत ४०० योजन ऊँचे हैं उपर ५.० योजन ऊंचे कूट है घे मूल में ५.. योजन लम्बे घोड है मध्म में १७५ मोचन और उपर २५० योपन लम्बे चौडे है फटके दोनों पाठ २ गोमन दूर मारामंडल चम्या है इस से २५०+१= २६६ योमन का अंवर रहा. १ दस हजार योजन का मेरु पर्वत चौडा है, इन के दोनों पस ११२१ बोक्न दूर वारा मेडल चस्या है इस तरह तीनों के पजन मील कर १२२५२ योजन से अतर दुवा 48 अनुनाद पाम प्रचारी मुनि श्री मोहन प्रापिमीर मते ! पदिम मरिय जाय तारारूवाण कयरे कयरेहिसो अप्पट्टीयावा महिड्डीपाया ? गायमा ! तारारूवहितो गलता महिड्डिया, परखचेहितो गहामहिड्डीया, गहेहितो सूरामहिन्डीया, सूरेहितो घदामहिड्डीया ॥ सन्यप्पष्टिया तारा सन्नमहिडीया चदा ॥ १२ ॥ जबूईविण भते । दीवे तारारूवरसय २ एसण केवतिय अवाधाए अतरे पणते ? गोयमा ! दुविहे मतर पण्णचे तजहा-वाघातमेय निव्याघातमेय, तत्थण जेसे वाघातिमे से जहणेण दोषिणच्छावटि ओयणसये उकोसण बारस जायण सहस्साइ दोण्णिव पायाले जोयणसए तारारुवस्सय २ भाषाहाम भतरे पाणचे ॥ तत्थण जैसे णिवाघातिमे से जहण्णेण पचवणुप्तपाइ भूय पावत् तारा में से कौन २ बरा द वासे और कौन २ मा दिपाले ! महो गोवर' सारा से नक्षम मा ऋदे बाछे , नक्षम से ग्राम कद पामे, ब्रास सूर्य मानद पासे । मौर सूर्य पद मा प्रदिपाले है मप मस पाले तारा और पाकि चंद 7 ॥ १२॥ यो मापन् ! मम्मूदी में पारा २ में परस्पर पिसना भतर स! मो मोहम भार के दो भद को या म्पापाउ मापी गौर निम्पपात माघी रस में म्यापास मकाक्षस राजापार ाठा सदर यी बामसारी .

NA पतुर्दश नीमाभिगम मूत्र-नृतीय उपान Rin समुरगएसु पहुयाओ जिणस कहाओ चिट्ठति, जामीण चरस जोतिसिदस्स जतिसर! अण्णेसिंच बहूण जोतिसियाण देवाणय देवीणय अञ्चणिजाओ जाव पज्जुषासणिजामो तासिण पणिहाय नापभू चद जोइसराया चदवडेंसए विमाणे सभाए सुम्माएपद सीहासणसि तुहिएण सहि दिन्वाइ भोगभोगाइ भुजमाणे विहरिचए ॥ अदुत्तरचण गोयमा ! पमू घद जोणिसिदे जोतिसराया पदय.सए विमाणे समाए सुहम्माए पदसि सीहासणसि चउहि सामाणिय साहस्सीहि जाव सोलसहिं आपरस्त देव साहस्सीहि भन्नेहिय बहूहि जोतिसिएहिं देवेहिय देवीहिय सहि सपरिवुड समर्थ नहीं है? महो मौवम ! चंद्र नामक ज्योतिषी का इन्द्र ज्योतिषी का राजा को चद्रावतंसक विमान में मुर्मा समा में माणवक वा चत्य है पञ्चरत्नमय गोल सन्चे जिन में मिनदादा है ये मिनदादा ज्योतिषी के इन्द्र व ज्योतिषी के रामा चंद्र यापत् भन्य ज्योतिषी देर ब देवियों को मर्चनीय पूरपनीय यावर मेषा करने योग्य? इस से महो गौतम घट्ट नामक ज्योतिपी का इन्द्र ज्योतिषी का रामा के चन्द्र विमानकी सुपर्मा ममा चंद्र सिंहासन पर रहाधुटिन सख्यातवाली देवियों माप मांग भोगनमें समर्य नहीहै परंतु या पदा बढसक विमान में सुधर्मा सभा में चद्र सिंहासन पर पार हमार सामानिक पारर हीहरी प्रतिपचि में ज्योतिषी का वर्णन - अर्थ 1 मनुवार-पायमचारी मुनि श्री अमोलख ऋषिमी पभूण सतो एगमेगा देवी अन्नाइ चचारि २ देवी साहस्साइ परिवार विउविषय, एवामेव सपुयावरेण सोलस देवी साहसीओ पण्णचाओ सेच सुडिए ॥१४॥ पभूण मते ! चदे जोतिर्सिदे जोतिसराया चदवसिए विमाणे समाए सुधम्माए चासिसीहासणासि तुहिएण सहिं दिव्वाइ भोगभोगाई भुजमाणे विपरित्तए? गोयमा ! णो र? समढे, ॥ से केण?ण मते ! एव वुधइ नो पभू चरेजोइसराया घरवाईसए विमाणे सभाए सुधम्माए चदसि सीहासणसि तुहिएण सर्टि विपुल भोग- भोगाइ भुजमाणे विहरित्तए ? गोयमा । चस्सण जोतिसिंदस जोइसरण्णो पद- घडिसए विमामे सभाए सुधम्माए माणवासि बेतियस्वभसि वइरामतेसु गोलव परिवार पो सोल मार देवी मानना मोर भरपेक अग्रपरिषी चार २ हजार रूप की पिना करने में समर्थ होने यो सब पीटार देवियों का सोखरामार का परिवार दुरा या पुटिव 'सस्पा हुई 11४॥ मो भगवन् ! चद्र नामक ज्योतिषी का इन्द्र ज्योतिषी का राजा पदापसर विमान में सुवर्मा समा में चद्र सहासन पर त्रुटिव साप दिव्य मोमोपमोग भोगते हुने विचरने को क्या समर्थ है। महा मौतम ! यह बर्षसपर्व नवपत् पा मोग मोमने में सपनी बहो ममबन जिस कारन से पंद्र नाप म्योतिषी का इन्द पोसिपी का रामा पंदारसंसा विमान में पापत् बुटिव साप मोन भागने कायक रामावादर बाबा ससदेपसमपत्री वामप्रसादनी त्र जयती, अपराजिता, तेसिपि सहेव ॥ १५॥ चदविमाणेण मत ! दवाण कवातय काल ठिती पण्णत्ता ? एव जहा ठिती पदे तहा भाणियन्वा जाव ताराण ॥ १६ ॥ एसेसिण भते ! चदिम सरिय गह नक्स्वचतारारूवाण कयरे कयरेहिता अप्पावा महुयावा तुल्लाषा विसेसाहियावा ? गोयमा ! पदिमसरियाए तेण दोपणषि तुल्ला सध्वस्खोवा, समेणगुणा मखत्ता, सखबगुणागहा, सखेज्वगुणाओ तारगाओ ॥ जोइस उदमओ सम्मचो ॥ ३ ॥ कहिण भते । धेमाणियाम देवाण विमामा पण्णता ? कहिण भते ! विमा. चतुर्दश जीवाभिगम मूत्र तृतीय उ + वीसरी भतिषधि में ज्योतिषी का वर्णन +8.. अर्थ की चार प्रमोपी काना उपमा-विनया, वैजयति जयंती पौर अपरामिता ॥ १५ ॥ महो मगरन् । च विमानबासीदेव की कितनी स्थिति की बहो गौसम ! जैसे स्थान पक्ष में स्थिति की सही करना यावत् सारा की मानना ॥ १५ ॥ भो भगवन् । इन चंद्र मूर्य, प्रा नक्षत्र मौर ताराओं में कौन किससे बस पास तुस्व और मिसेवाधिक ? अहो गौसम ! चंद्र और सूर्य परस्पर तुल्प और सप से यो, इस से नक्षत्र सरूपास पुने, इस से ग्रह सख्यात नुने और इस से तारा सरूपात गुने भषिक ,यों ज्योतिषी का उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥३॥ भो मगन ! पानिक दब के विमान कार्य करें? और पानिक देव का रहने है? महो .

मनाक पायमधारी मुनि श्री भयो ? महया हय भट्ट गीय पाइय ततीतल साल तुहिय घणमुइग पटुप्पवाइय खेण दिन्बाइ भोगभोगाइ भुजमाणा विहरितए, कैवलपरियार तुडिएण सहिं भोग भोगाइ चोसाढिए (बुद्धीए) नो वेषण मेहुणवतिय ॥ १४ ॥ सूरस्तण भते ! जातिसिंदरस जोतिसरन्नो कति अगामहिसीओ पण्णचाओ ? गोयमा ! चत्तारि भग्गमाहिसीओ पण चामो तजहा सूरिप्पभा, भातयामा, अच्चिमालि, पमकरा ॥ एवं भवसेस जहा पदस्स गरि सूरिवर्डेसकेविमाणे सुरमि सीहासणसि तहेव सम्वेसि पिगहाईण बचारि भागमहिसीमो पण्णचामो तजहा- विजया, वेजयती, सोमाबार भास्मरमर और अन्य पाव ज्योति देव व देवियों के साय परपरा हुमा परे रादिम, वती, तस, तास, बुटिन, घष, मृदम के पद से दाम्य भौगोपभोगता हुवा पिपरता है दरियों के वृक्ष को मात्र द्रष्टि से देखे परंतु मैथून बार्ता करे नी॥ १४॥ अहो भगरन् ' सूर्य नामक पातिषी के इन्द्र म्योतिषी के राम को कितनी मनपहिली कती ? अहो गौवप!, पार अग्रमपरिली भी बिना नाम मूर्व प्रमा, बीममा, ममासीनी और प्रमंकरा व मषिका सब पद्रवत् मानना परंतु इतना विशेष कि सूर्यासक विमान और सूर्य सिंहासन काना. पैसे ही सब प्रादिक पोतिषी • मनाशक राजामहादुर लामा मुम्बदवसायमी बागरसादमी। . नृत्य गीत, A २ " 44 चतुर्दशनीमाभिगर मुत्र तृतीय तपाड़ Hin बारसदेव साहस्सीमो पण्णचाओ मज्झिमियाए परिसाए चौदसदेवसाहस्सीमोपण्णचाओ बाहिरियाए परिसाए सोलसदेव साइस्सीओ पष्णताओ॥ एव देवीणवि पुच्छा गोयमा ! सकस्स देविदरस देवरनो अम्भितरिसाए परिसाए सत्त देवीसया पण्णत्ता, मझिमियाए परिसाए छचदेवीसया पण्णचा, बाहिरियाए परिसाए पचदेवीसया पण्णता ॥ ३ ॥ सफरमण भते देविदास देवरन्नो अभितरियाए परिसाए देवाण केवश्य कालठिइ पण्णा, एव मझिमियाए, बाहिरियाएवि ? गोयमा । सकस्सण देविंदस्स पेवरन्नो देवाण अभितरियाए परिसाए देवाण पचपलिओवमाइ ठिती पण्णमा, मज्झि- आभ्पवर परिपदा में पास हमार देव, मध्य की परिपदा में चौदा मारदेव, और पादिर की परिपदा में सोला मार देव को बहो मगरन् ! नफ्र देवेन्द्र की बाभ्यतर परिपदा में किचनी देवी, मध्य परिपदा में कितनी देवी और वाहिर की परिपदा में किसनी देवी कही है ? अहो गौतामा पतर परिपरा में सामसो देपी, बीच की परिपदा में छ सो देवी मोर पाहिर की परिपदा में पाप सा देषी कही ॥३॥ महो भगवन् 'शक देवेन्द्र की अभ्यंवर परिपदा में देवो की कितनी स्थिति कही, पाचकी परिषदा के दरोकी कितनी स्पितिकही और पाहिर परिषदा के देशों की सिवनी H+ वीसरी प्रतिपचि में पैमानिक का वर्णन 421 अर्थ पर मनुवादक-बाबमपारी मुनि श्री नमोसक सिमी णियादवा परिवसति ! जहा द्वाणपदे तहा सम्म माणियन्त्र, गरि परिसामो भाषियव्यामो जाव सके अण्णेसिंच पहुण सोहम्मफप्पवासीण वेमाणियाण देवाणय देवीणय जाव विहरति ॥ १॥ सपास्सण मते ! देविदस्स देवरणो कतिपरिसाओ पण्णचाओ ! गोयमा ! तमो रिसाओ पण्णताओ तजहा-समिता चहा जाया, अमितरिया समिता, मझिमियाघडा, बाहिरिया जाया ॥ २ ॥ सक्कस्सण भते । देविंदरत दवरन्नो अम्भितरिया परिसाए कतिदेव साहस्सीओ पण्णमाओ?माझिमियाए पाहिरियाग तहेव पुष्छा ? गोयमा । सकस्स देविदस्स देवरनो अमितरियाए परिसाए प्रकाशक-रानापहादुरलाला मुलदवसापनी भाडामसारमा मौतम ! भैसे स्थानपद वर्षन क्रिया मा ही यहां सब बाना विश्व में यहां सीन परिषदा जानना बावत् एक देवेन्द्र और मप पास सौधर्म विमानवासी देव और देपियों का अधिपतिपना करता युवा धावत् विचरता ॥१॥ भो भगवन् ! पक देवेन्द्र की जितनी परिषदा है ? मरो गौतम ! बीन पारपदात्री मिन कमाम-समिठा, चरा और माया भाभ्यंतर की समिता, मध्य बीघा मौर माहिरकी पाया ॥२॥ मो भगवन् ! पकडेवेन्द्र की मापंचर परिषदा में कितने देव राते हैं, मध्य परि- पदा में किसने देश को गौर वाहिर की परिषदा में कितने देवको महो गौतम देवेन्द्र की ६२. ? परिसाए दसदेवमाइस्मीओपण्णत्ताओ मज्झिमियाए परिसाए बारसदेव साहस्सीओ पण्ण- ताआ बाहिरियाए परिमाए बोद्दस देव साहस्मीमो पण्णताओ॥देवीण पुच्छा गोयमा! अभितरियाए परिसाए णव देवीमया पण्णचा मझभियाए परिसाए अट्ट देवीसया पण्णचा, याहिरियाए परिसाए सत्त दतीमया पण्णता ॥ देवाण ठिती गायमा ! अभितरियाए परिसाए देवाण सत्चपलिओषमाइ ठिती पण्णचा, माझ मयाए छपलिओवमाइ ठिई पण्णत्ता बाहिग्यिाए पचपालेओवमाइ ठिती पण्णत्ता ॥ दवीण पुण्छा ? गोयमा । अमितरियाए परिसाए पचपलिओवमाइ ठिनी पण्णत्ता मज्झिमियाए परिसाए चनारि पलिआवमाइ ठिती पण्णचा, बाहिरियाए पारसाए पशनार देष, बीच की परेपदा में बारह मार देव और बाहिर की परिपदा में चौदा हजार देव देसी की पच्छा ? महा गोसप ' आभ्यंतर परिषदा में नव सो देवी, मध्य परिपदा में माठ मो देवी और माहिर की परिदा में सास सोदया। देवों की स्थिति की पृच्छा, ? आपतर परिपदा के देवों की सान परपोपप की, मध्य परिषदा के देवों की, छ पल्योपम और पाकिर के परिपदा के देवों की पांच पल्पोपम के स्पि ने कहा है दायों की स्थिति की पृच्छ,' मनर परिषदा की पांच परयोगमकी मध्य परिषदा की चार Ht चतुर्दश मान भाम मूत्र तृव य उप Hit Rat वासरी प्रतिपचि में वैमा ने का पूर्ण - अर्थ नगद-पासनमवारी मुनिश्री ममोलस पिनी मियाए परिसाए देवाण चारि पलिओवमाइ ठिती पण्णचा, बाहिरियाए परिसाएदेवाण तिाण्यपलिआषमाइ ठती पण्मता ॥ अग्मितरियाए परिसाए देवीण तिन्नि पलिओवमाइ ठिती पण्मचा, मझिमियाए परिसाए पोणि पलिउबमाइ ठिती पण्णत्ता, बाहिरियाए परिसाए एग पाल आषम ठिती पण्णता, भट्टा सोचव जहा भवणवासीण कहिण भताईसाणगापं दवाण विमाणा पण्मत्ता ? तहेव सम्व जाव ईसाइस्थ विद जाव विहरति॥४॥ईसापरसण मते देविदास वरण्मो कतिपरिसाओ पण्णचाओ? गोयमा! सठपरिसाओ पण्णचामो तजहा समिता पडा जाया, तहेव सध, गरि अम्भितरियाए स्थिति कीबो गोवा यह देगेन्द्र के मम्पवर परिषदा, देवोकी पाय परपोपपकी मध्य पारंपदा क देवातीपार पस्पोप की पीर बाहिरकी परिषदा देवों तीन पश्पोपमकी स्थिति है माभ्यवर परिपदा देवी की बीन परपोपम, मध्य परिषदा की देवी को दो पस्योपा मोर वाहिर की परिपदा की देवी की एक पस्योपम की स्थिति कार्प मानावासी देवो की मारपदा के देव जैसा ही मानना, ॥४ मो भगान् ! शान देवेन्द्र देव रागकी विसनी परिषदामो गौतम! तीन परिषदा की जिनके नाम-समिक्षा, पहा मौर बापा इस कारवन सम पूर्वोक मैसे मानना विशेष में भाभ्यंतर पारंपदा • महाशक-राजासादुर लालामुखदेन महावभी मासाप्रसादमी .

+ चतुर्दश जीवाभिगम सूत्र तृतीय सपा 48th ठिती पण्णचा, बाहिरियाए परिसाए अहपचमाइ सागरोवमाइ तिण्णि पलिओवमाइ ठिती पण्णत्ता, अट्ठामोचेव ॥ एव माहिंदस्म तद्देव जाव तत्थ परिसाए छदेव साह- स्सीओ पण्णचामा मज्झिमियाए परिमाए अट्ठदेव साहस्सीओ पण्णताओ बाहिरियाए परिसाए दमदेव साहस्सीओ पण्णचाओ ॥ ठिती देवाण, अमितरियाए परिसाए अपचमाइ सागरोधमाइ, सत्तपलिओवमाइ ठिती पण्णता, मज्झिमियाए परिसाए अद्धपचमाइ सागरोयमाइ, छच्चपलिओवमाइ बाहिरियाए परिसाए अद्ध , पचमाइ सागरावमाइ पचपलिओषमाइ ठिती पण्णता, तहेव सबसि इदाणठाणगमेण बिमाणा देव और पारि की परिषदा में दश हजार देव स्थिति-आभ्यवर परिपदा में साढे चार सागरोपम सात पक्ष्योपप, मध्य परिषदा में सादे चार सागरोपम उपल्योपप, भौर पाहिर की परिपदा में साढे चार मागरोपम पांच पस्योपम की स्थिति है इसी तरा इन्द्रों स्यानपद से जानना या क्रम से परिषद। करते हैं ब्रह्म इन्द्र की तीन परिषदा-पाभ्यतर में चार हमार देव, मध्य में छ हजार देव और बाहिर की परिपदा में आठ हजार देव है भ्यतर पारेपदा के देवों की स्थिति सादे पाठ सागरोपम मौर पांच पल्योपम मध्य परिषदा में साडे पाठ सागरोपम चार परपोपम और पाहिरकी परिषदा में सादे पाठ वीसरी प्रतिपचि में वैमानिक का वर्णन 42 अर्थ , भनुपादक बारपारी मुनी श्री ममोलस पिनी + सिपिपलिओवमाइ ठिती पण्णचा अट्ठो तहेव माणियब्धो ॥ १५॥ सणकुमाराण पुच्छा ? तहेव ठाणपदगमेण जाव सणकुमारस्स तओ परिसाओ समितादि तहेव, गरि मभितरियाए परिसाए अट्ट देवसाहस्साओ पण्णचाओ, मज्झिमियाए परिसाए दस देवसाहारसीओ पण्णतामो, बाहिरियाए परिसाए वारसदेव साहस्सीमो पण्णचाओ ॥ अमितरियाए परिसाए देवाण ठिती मद्धपचमाइ सागरोवमाइ, पचपलिओवमाइ ठिती पण्णता, मज्झिमियाए परिसाए अहपचाइ सागरोधमाइ बचारि पलिओवमाइ परपोपमकी भोर बाहिरकी परिपदाकी देवायों की सीन परपोपमकी स्थिति की कार्य सब मरनपति जैसे सना ॥१५॥ सनत्कुमार की पृष्ठा। इसका सब कयन स्यानपदसे मानना यावत् समितादि तीन परिषदा काना विशेष में याभ्यतर परिपदा माठ रमार देश, मध्य परिषदा में दशरमार देव और पार की परिषदा पासमार देवरे (यहाँ देषियों नहा) आम्पतर परिषदा देवकी सादेवार सागरोपम मौर पर परपापम की स्थिति है, पीचकी परिषदाकी सारे पार सागरापम मोर चार परपोपपदी की है और बाहिर को परिपदा क साद चार सागरोपम मौर तीन पत्योपम की स्थिति की कार्य पूर्ववत् भानना ऐमेश माहेन्द्र देवेन्द्रका काना यापत् पहा माम्पर परिषदा परमार देप, मध्य परिषरो माठ हमार • मगाशक-राजापार काला एखदवसायमीबायाप्रसादली. .

RH चतुर्दश नीवामिगम मूत्र तृतीय उपाय वमाइ सप्तपलिओषमाइ ठिती, मज्झिमियाए परिसाए पारससागरोवमाइ छच्च पलिओषमाइ ठिती बाहिरियाए परिसाए बारससागरोवमाइ पचपलिओषमाइ ठिनी पण्णचा अट्ठो सोचेव ॥ महासुफ पुम्छा ? गोयमा ! जाय अमितरियाए एग देव साहस्सीओ मज्झिमियाए परिसाए दो देव साहस्सीमो पण्णचाओ बाहिरियाए परिसार चनारि देव साइस्सीओ ॥ ठिती अभितरियाए परिसाए अहसोलससागरोवमाइ पथपलिओवमाइ, मझिमियाए अद्धसोलससागरोधमाइ बचारि पलिओवमाइ बाहिरियाए अहसोलससागरोधमाई तिणि पलिओषमाइ अट्ठो सोचव ॥ सहस्सारेपुच्छा जाव मभितरियाए परिसाए पचदवसया, मझिमियाए परिसाए एगादेवसाहस्सीओ, है स्थिति याभ्यटर परिषदा में १५|| सागरोपम पांच पत्योपप, मध्य परिषदा में १५॥ सागरोपम पार पत्योपम मोर पाहिर की परिषदा में १५॥ सागरोपम तीन पल्पापम की कार्य पूर्ववत् सासार की तीन परिपदा आभ्यवर में पांच सो देष, मध्य में एक इनार भौर पाहिर में दो हमार स्थिति मभ्यतर की १७॥ सागरोपम सात परपोपम, पीच की ॥ पागरोपम छ पोपम मौर पारिरकी १७॥ सामरोपम पांच परपोपम की है भापत माणव इन दोनों का एक री इन्द्र होने से इन की बीन परिपदा वीसरी प्रविपत्ति में वैमानिक का वर्णन htt अर्थ . - . समुपादक परमारी मान श्री अमोलक अमिती तन्ना, ततो पन्छा परिसामओ पत्तेय२ वृधति॥ बमस्सवि तओ परिसामओ पण्णचाओ अम्भितरियार परिमाए चचारि व साहस्सीओ,मज्झिमियाए परिसाए छदेव साहस्सीओ, बाहिरियाए अट्टदेव साहस्सीओ ॥ देवाण ठिती अमितरियाए परिसाए अद्धणवमाइ सागरोवमाइ पचपलिमोषमाइ, मज्झिमियाए परिसाए अहणघमाइ सागरोवमाइ, चचारि पलिओषमाइ, वाहिरिपाए अइनवमाइ सागरोवमाइ, तिणि पलिओकमाइ भट्ठोसो चेत्र ॥ लतगस्सवि. जाव तओ परिसामओ जाव अभितरियाए दो देव साइस्सीमो मझिमियाए चत्वारि देवसाहस्सीओ पण्णचाओ, बाहिरियाए छदेव साह- स्सीमो पण्णताभो ॥ ठिती मागियया अमितरियाए परिसाए देवाण बारस सागरो- सागरोपम तीन परपोपम की स्थिति के कार्य पूचित् तक देवेंद्र की तीन परिषदा आम्पतर में दो मार देष, मध्प में चार हमार देव मौर बाहिर सी परिमदा में छमार देव मान्यवर परिपदा देशों की स्थिति बारह सागरोपम सात पस्योपम, बीची परिषदा पारा सागरोपम छ पत्योपम और शाहिरकी परिषदा की पारा मागरापम पांच पश्यापम की कार्य पूर्वपत् महा भुक्र की तीन परिषदा आभ्यतर पारपद। में एक बार देव, मध्य परिपदा में दो हजार देव मौर बाहिर की परिषदा में चार हमार देव पकाशक राजापार काला मुखदरसायमी यामासादमी " सूत्र देवाण तहेक अन्युए परिवारे जाव विहरति॥अचुयस्सण देविंदरस तओ परिसाओ प० अमितर परिसाए देवाण पणुवीस सय, मझिमियाए माइनसया, बाहिर परिसाए पचमया ॥ अमितराय एकवीस सागरोषमाइ सत्तपलिओवमा, मज्झिमियाए । एकवीस सागरोवमाइ छपलिओवमा, बाहिराए एकवीस सागरोवमाइ पचपलिओवमाइ ठिई पण्णचा ॥ कहिण भते ! हिट्ठिम गेविनगाण देवाण विमाणा पण्णता ? कहिण भते ! हिटिम गेवेज्जगा देवा परिवसति? जहेव ठाणपए तहेव, एव मज्झिम गेविजगा उपरिम गेविज्जगा, अणुचराय जाच अहमिंदा नाम ते देवा पण्णचा समणाउसो ॥ पढमो घेमाणियउद्देसठ सम्मचो ॥ ४ ॥ 4 चतुर्दश नीषाभिगम सूत्र तृतीय चपार MS . 48 तीसरी मतिपत्ति में वैमानिका का वर्णन अर्थ पारि की परिपदा में ५०० देव माम्पर परिपदा में २१ सागरोपम सात पल्पोपम मध्य परिपदा में, मागरोपम ६ परयोपम और घाहिर की परिषदा में २१ सागरापम पांच पल्पोपम की स्थिति कही। यो मगवन् ! नीचे के चेयक के स्थान कहाँ को? और कहां रहते हैं, महो गौतम ! मेसे स्थानपद में कहा मे ही जानना ऐमेटी मध्य अवेयक, उपर की वेयक मौर अनुचर विमानका जानना यावत् महमेन्द्र पर्यंत कहना या वैमानिक का प्रथम उदेशा हुश ॥४॥१॥ -- * मनुशारक पायमचारी मुनि श्री भमोठम्न ऋषिमो - बाहिरियाए दो देव साहस्सीओ पण्णताओ॥ ठिती अभितरियाए अस्ट्रारस सागरोधमाइ, सत्तपलिओवमाइ ठिती पण्णता एवं मझिमियाए अट्ठारस सागरो- षमाइ छपलिमोवमाइ, बाहिरियाए अहट्ठारस सागरोवमाइ, पचपलिओषमाइ भट्ठो सोचेव ॥ आणयपाणयस्सवि पुष्छा जाव तओ परिसाओ, गवरि अमितरियाए अदाइजा देवसया, मझिमियाए पच देवसया, बाहिरियाए एगादेव साहस्सीओ ठिती भभितरियाए एगूणधीस सागरोवमाइ, पच पलिओषमाइ, मज्झिमियाए परिसाए एपीस सागरोवमाइ चत्तारि पलिओवमाइ, बाहिरियाए परिसाए एगूणवीस सागरोवमाइ तिण्णि पलिओषमाइ ॥ ठिती अट्ठो सोचेव ॥कहिण भते ! मारणञ्चुयए माम्पवर में २५० देष, च की परिषदा में ५०० गौरवारि की परिपदा में १.०० देव मान्यवर परदा में स्थिति गुमीसप्तागरोपम और पांच परपोपम, मध्य परिषदा में गुमोस सागरोपम चार पत्योपय और बाहिर की परिषदा में रमीस सागरोपम तीन पल्पोपम जीस्थितिकही कार्य पूर्वपत मानना यो मगमन् ! मारण बध्युत का इन्द्र कहाँ राता है? यावत् पिचरता है इसकी तीन परिषदा ह है माम्पवर परिपरा में १२५ देव, पांच की परिपदा में २५० भौर प्रकाशक राजामहादर लारा इसदवसायनी मागप्रसारमा।

अणुत्तरोवधाइया पुच्छ? गोयमा! उवासतर पइडिया पण्णचा ॥१॥ सोहम्मीसाण कखेमु- विमाण पुढवी केवइय बाहलेण पण्णचा? गोयमा । सत्तावीस जोयणसयाड बाहल्लेण, एव पुम्छा? सणकुमार माहिदेस छवीस जोयणसयाइ, बमलतएसु पचीस, महामुक सहस्सारेमु चवीस, आणयपाणय आरणज्युएसु तेवीस सयाइ, गेविजविमाण पुढवी बावीस, मणुत्तरविमाण पुढवी एकवीस जोयणसयाइ पाइल्लेण ॥ २ ॥ सोहम्मीग्राणसुण भते! कप्पेसु विमाणे केवतिय उल उच्चत्तेण पण्णतागोयमा पच जोयण सयाइ उस उच्चशेण,सणकुमारमार्हिदेसु छ जोयणसयाइ,बंमलतएस सत्तजोयण सयाइ गौतम ! बाफ बास्ति कापा के आधार मे ॥१॥ अहो मगवन् ! सौधर्म ईशान देवलोक में विमान की पृथ्वी का कितना जापन ! ओ गौतम! २७०० योजनकी विमान कीनीष का जादपना है, बागमी पृचा करना सनत्कुमार माहेन्द्र में २६०.योजनकी विमानकी नीवका मारपन है, ब्रह्म और लक देवलोक में २५.० योजनका विमानसी नीवका मापन है, माशुभ और सासार में२४०० योजनका जादपना है आणत माणत पारण और अच्युत में २३०. योजन का विमानसीका जाहपता है, या विमानमें २५८० योजन का पृथ्वी का भारपा है और पार अनुचर विमान की पृथ्वी का २१०० योजन का नादपना है ॥२॥ यो मगर ! सौधर्मशान देवसोक में विमान कितने है? अहो गौतम ! पतुदश जपाभिगम सूत्र सृतीय अर्थ - वीसरी प्रविपचि में वैमानिक का वर्णन 8 बनुमादक-पायमचारी मुनि श्री भमोखक अग्निी सोहम्मीसाणेसुण कप्पेम वोणमि पुढवी किं पइठिया पण्णचा ? गोयमा ! घणोदधि पहाट्टया पणता ॥ तणकुमारे माहिदे कप्पेमु धिमाणे पुढवी किं पइट्टिया पण्णचा ? गोयमा ! घणवाय पइट्ठिया पण्णता । बमलोएण भते । कप्पे विमाण पुढवी पुष्छा ? गोयमा ! घणवाय पइट्ठिया पण्मता ॥ लतगेण मते ! पुच्छा ? गोयमा ! सदुभप पइट्ठिया पण्णता ॥ महासुक्क सहस्सारसुवि तदुभय पइष्ट्रिया आणय जाय अच्चएसुष मते । कप्पेसु पुछा ? गोयमा ! उवासतर पहाट्टया पण्णचा । गेविजविमाण पुढवीण पुष्छा ? गोयमा ! उवासतर पइट्ठिया पणचा मो भगवन् ! सौधर्म धान देवमेक में विमान की पृषी किस गधार में सीओ गौतम ! पनोदधि आपार से पृथ्वी रही हैमो मनान ! सनत्कुमार मारेन्द्र देवसोक में पृथ्वी विस मापार सिरसीमो मौतम ! नया माप र से रहीमो मगन् ! ब्रह्म देवोक में विमान की पृषी फिस माप र से हीमो मौतम ! धनबाद के नापार में रही। छवकी पृया, मारो गौतम ! दोनों के माधार से ही महाक मौर सासार में पनादपि गौर धनबात इन दोनों के अपार से ही बात से मच्युत देवलोक विमान भाकावास्तिकापा के मापार से अवेपक ! महो मौतम बाबासास्विकावा मापार से अनुचर विपान की पृष्ण ? महो कायक-राजाबरादुर लामा मुसदेवमहापनी पाबासाहनी P चतुर्दश-मीमामिगम सूत्र-सृतीय उपान 42 ॥ ४ ॥ सोहम्मीसाणेसुण मते ! कप्पेसु विमाणा केवतियं मायामविक्खंभेण केवतिय परिक्षेवण पण्णता ? गोयमा । दुविह! पण्णचा तजहा सखेजावस्थहाय असखेजावित्थडाय जहा नरगा तहा अनुचरोववाइया सखेजावत्थडाय असखे बधित्वडाय तत्थण जेते सखेबवित्थडे से जबुद्दीवप्पमाणा, तत्थ जेते असखज्ज वित्थडा असोजाइ जोयण सयाइ जाव परिक्खयेण पण्णचा ॥ ५ ॥ सोहम्मीसा सुण मते ! विमाणा कतिवण्णा पाणचा ? गोयमा ! पचवण्णा पण्णचा तजहा- किण्ह नीला लोहिया हालिद्दा सुकिला ॥ सणकुमार माहिदेसु घठवण्णा नीला और पम ॥ ४ ॥ महो भगवम् ! सौधर्म ईशान देवलोक में विमान किसने कम चौडे और कितनी परिषिवाले भोगौवपापविमान दोमकार के है सरूयात याजन के विस्तारवाले और अतरूपात योभन के विस्तारपाले, यो नरस का का पैसे ही यहां मानना यावर अनुत्तरोपपाविक सख्याच योजन के विस्तार- पाले में इन में मो संख्यात पोजन के विस्तारपाछे। वे नम्बदीप प्रमाण है, और असरूपात योजन के विस्तारवाले यापत् पसंख्यात योजन की परिधि कही है॥५॥ अहो भगवन्'सौधर्माशान दपलाक में विमान कितने वाले है। हो गौम्म ! पांच वर्षाले को हैं जिन के नाम-कृष्ण, नील, लोहित, हालिद्र मौर मुल सनत्कुमार और पान में चार पर्णनाले विमान है जिन के नाम-लील, लोरिस, हाछिद्र अर्थ तीसरी महिपचि में रैमानिक का वर्णन 49 gul बारामधारी मुनि श्रीममा प्रमिमी महासकासहरसारसुभट्ट,आणय पाणय भारणअचुएसुनव जायगसयाइगिवेबविमाणाण मते ! कवइय उद उच्चचण पण्णसा ? गोयमा! दस जोपणसयाइ अणुचरविमाणाण एकारस जोयणसयाइ उखु उच्चत्तेण ॥ ३ ॥ सोहम्मीसाणेसुण भते। कप्पेसु विमाणा किं सठिता पण्णता ? गोयमा ! दुधिहा पण्णता सजहा-आवलियाए वाहिराय ॥ सत्यर्ण जेते भावालय पविट्ठा ते तिविहा पग्णता तजहा-वहा तसा चउरसा ॥ तत्पण ने ते मावलिय माहिरा तेण णाणा सठाम सठिता पण्णत्ता, एव जाव गवेजविमाणा ॥ अणुउरोक्षातिय विमाषा दुविहा पण्णचा तजहा-बाय तसाय ५०.पोवन हंचे हैं, ऐसे सनत्कुमार और माहेन्द्र...योजन सये ,ब्रह्म मौर सतक..योजना चे,पाक्रमौर सम्सार ८०. गोधन सपे, मानव, मापत, मारण मोरमच्युतमें ९०.योमनसचेना रेप में विमान १००० योजन कर है, और ममुचर पान २१०० योजनकी उपाइलाले । ॥३॥ बो ममान ! सौधर्म ईशान देवसोमो विमान है, ये किम मस्थानबाट है? महो गौतम ! विमानके दो मद भावासका प्रविष्ट सो विषद और भाषाविसापादिर सो पुष्पारकीर्ण इनमें मोबापालिका माविष्ट गर्नु पप्त मौर परंस,पों वीन प्रकार है, और जो मासिका बाहिर विविध प्रकार के सस्यानपा पोषक विमान पर्यत गाना मनुत्तरोपपादित विमान दो प्रकार के गर्नुस मकारक-राजामादुर लाला मुखदवसायमी वामासादमी.

न चतुश नीबामगप मृत तृताय उपाय TER मधु इट्ठतरगा चेव जाव गधग पाणचा, जाव अणुचर विमाणा॥ सोहम्मीसाणे विमाणा करितया फासेण पण्णता ? गोयमा ! से जहा नामए माईणेतिया रूवेइव! तय सयो फामो भाणियब्धा जाव अण तरोववतिया विमाणे ॥ साहम्मीसाणेसुण भते ! विमाणा के महालिया पण्णता ? गोयमा ! अयण्ण जबद्दीवे २ सम्बदीव समुदाण सोचेवगमो जाव छम्मासे वीईवएज्जा जाव अत्येगझ्या विमाणावासा वाइवएना अत्यंगइया विमाणावासा नो वीइथएज्जा जाव अणुत्तरो- 'अनुचर विमान पर्यंत कहना ॥ अहो भगवन् ! सौधर्म ईशान देवलोक में विमान का कैमा स्पर्श कहा है ? को गौसम ! मते मृाचर्म र वगैरह सम स्पर्श का वर्णन करना यावर अनुचरोपपातिक पर्यंत गनना ॥ ८ ॥ो भगवन् ! सौधर्म ईशान देवलोक विमान कितने घडे कठे हैं ? बहो गोनम ! सन द्वाप समुद्र में या जम्यूद्वीप एक लाख योमन का लम्बा चौड़ा है इसकी परिधि ३१६२२७ येना से कुछ अधिक है कोई देवता सीन चिमटि पजाये उतने में इक्काम पार इस की पर्यटना कर थावे ऐमी दीव्य शीघ्रगति से छपाम पर्यंत परिभ्रपण फरेतो मी किसनेक विमानो को पल्लय Rकता है भौर विक विमानों का सहा नहीं माना है यों अनुरोप पाति विमान पपा काइन । + सीसरी प्रतिपति में वैमानिक का वर्णन अनुवादक-पासमपारी मुनि श्री ममोएक प्रतिमी 8 ज्यव मुकिला ॥ एव धमलाग लतपसु तिवण्णा लोहिया जाय सुकिला । महासुका सहस्मारसु दुवण्णा हालिहाय सुक्केिलाय ॥ आणत पाणत आरण अच्चतेस मुधिला, एव गरिवबिमाणेसुवि अणुसराबवाइय विमाणे परम सुक्षिला वण्णे पगता ॥६॥ सोहम्मीसाणेसुण मत ! कप्पेसु विमाणा फेरिसयाए पाए पण्णचा ? गायमा ! णिचालोया णिचुज्जोया सयपमाए पण्णता जाव अणुत्तरोववाइया विमाणा णिशालोया जिग्चुजोया सयपमाए पण्णत्ता ॥ ७ ॥ साहम्मीसाणेसुण भते ! कप्पेसु विमाणा केरिसया गघेण पण्णचा ? स जहा नामए कोट्ठ पुडाणवा एवं जाव एतो भौर शुक्ल पसलोक और लता में रक्त पीत मौर व यों तीन वर्णमाले विमान में मरा शुक्र सहसार में पीत वा पसे दो वर्णध र विमान आणत, माणत, आरण, अप्युन, अरेयक विम न में शुल्ल पण पास और अनुत्तरापातिक विमान परम शुक वर्णवाले को ॥६॥ महा भगवन् ! सौधर्म ईशान दरशेड में विमान केसी प्रमावास महो गौतम ! सदेव प्रकाशवत, उधोनरत और अपनी मगा सदिय । यो अनुत्तर विमान पर्वत कहना ये मी मदैव प्रकाशवत , सदैव उद्योगपत में और अपनी प्रमा सहित हैं ॥ ७॥ मा मगमन् ! सौधर्मे ईशान देवलोक में विपान कैसी गधवाले हैं। महो गौतम ! मैले केष्ट पुटा वगैरह मन्त्र मन पूर्वपत् मानना इससेमी अपिक इष्टवर यावत् गपवाले को यों प्रकाशक रानापसादुर लाला सुखदेव सहायनी घालामतादमी * पतुर्दश मीवाभिगम सूप्र तृतीय उपाय Hit दोवा तिण्णिवा उम्फोसेण सखजवा असोज्वधा उपवनति, एव जाव सहस्सारो|आण यादि गेवेजा अणुत्तराय एकावा दोषा तिमिवा उकासेण सखेजावा उवधाजति॥१२॥ सोधमीसाणेसुण मते ! देवा समये २ अवहीरमाणा २ केवतिय कालेण अवहिरिया सिया ? गोयमा! तेण असखेजा समय २ अवहीरमाणा २ असखेजाहिं उस्सीप्पणी उसीप्पणीहिं अवहीरति नोचवण अवहिरिया जाव सहस्सारो ॥ आणतादिगेसु चउसुवि गेवेज्जसुय समये २ जाव केवतिकालेण अवहीरिया सिया ? गोयमा ! तेण असखजा समये २ अवहीरमाणा २ असखेजखेत पलियरस सुहुमस्स असखेज्वेण में रितने देव उत्पन होते हैं ? अहो गौतम ! जघन्य एक दो तीन सत्कृष्ट सख्यात असख्यात उत्पन्न होते हैं यों सहसार पर्यंत काना आणव से अनुचरापपातिक तक एक दो तीन यावत् सख्यात उत्पन्न होते हैं ॥ १२ ॥ अहो मगवन् ! सौधर्म ईशान देवलोक में से देवताको समय २ में अपहरते कितने समय में अपहरण हो ? महा गौतम ! वे देव असख्या मतिसमय एक २ अपारन करते भरख्यात उत्साणी अपसर्पिणी पीत माय तो मी अपारण नहीं होमा यो सासारपर्यंत कहना थानतादि चार देपोक, नव ग्रेवयक में यावत् किवन काल में अपारन हो ! अहो गौतम ! ये बसख्याय देव है +18 मीसरी प्रतिपचि में वैमानिक का वर्णन अर्थ +मनपादक पायमचारी मुनि श्री ममाठक प्रपिभी। यवाइय विमाणा अत्यंगतिया विमाणा बीइवएज्जा अत्थेगतिया नो वीवएना ॥५॥ सोहम्मीसाणेमुण भते । विमाणा किंमया पण्णत्ता गोयमा! सल्वरयणामया पण्णता, तत्थण बहवे बहवे जीवाय पोग्गलाय वक्रमात विठक्कमति चयति उवयजति सासयाण ते विमाणे दन्ट्रयाए जाव फासपज्जवेहि असासया जाव अणुतराववाया विमाणा ॥ ॥ साहम्मीसाणमुण देवा कओहितो उपवजति उवधातो नेयन्वा जहा वक्कतीर,तिरिएसुमणुएम एव पवेदियेमु समुष्छिमवजेसुउपवाय वक्कतीगमेणजाव मणुचरा ॥३१॥ सोहम्मीसाणेसु देवा एगसमएण केवतिया उववज्जति? गोयमा।जहण्गेण एकावा इसमें कितने का उल्लपन कर सम्म और शिवनेका लघन नही कर सकते हैं अर्याद चार अनुचर बिमान समरूपात यामन है। और सर्वि मिद किमान एक सक्ष योजन का ॥९॥ मो भगवन् सौधर्म ईशान देवलोक में विमान किसके? अहो गौतम ! मन उरलमय हैं वहां बहुत भीष और पुद्व बाते हैं उत्पन्न होते हैं और चाहे वे इष्यते शाश्वत और वर्ष पापस यावत् पर्व पर्याय मशागत ( ग अनुचर वियान पर्यंत मानना ॥ ॥महो मगर सौधर्म ईशान देवोक में भाव कोसे माकर उत्पम मो गीतमायमूर्थिप वर्मकर वियच परेन्द्रिय और मनुष्य में से उत्पन्न होते हैं या सासार देवसोम पर्पत नानना यहाँसे आगे मात्र मनुष्य उस्पच होते॥7॥ो भगवन् सौधर्म ईशानदेवलोक में एकसमय • मकापक-राजाबहादुर काळा मुसदेवसहायमी बागप्रसादमी पर चतुदश जीवामिगम मुमतीय उपाय Mon सखेबति भागे उक्कोसेणं जोयण सतसहस्त, एव एक्कोका ओसारिताण जाव अन तराण एकारयणी, गेविजअणुत्तरेण एगा भधार णिज्जसरीरये, उत्तर वेउविया नत्यि ॥ १४ ॥ सोधम्मीसाणेसु देवाण सरोरगा किं सघयणी पण्णता ? गोयमा । छण्ड सधयणीण असघयणी १०णचा,नवट्ठी नेवच्छिरा णेवण्हारु गवसघषण मत्थ जे पोग्गला इट्ठा कता जाव तेर्सि मघातत्तार परिणमति जाव अणुचरोववातिया ॥१५॥ सोधम्मीमाणसु दवाण सरीरगा किंसठिया पण्णता ? गोयमा! दुविहा सरीरा पण्णता तजह!-भवधारणिज्जा उत्तरघेउब्धियाय,तत्यण जेते भवधाराणजाते समचउरस सठाण हाय की, महाशुक्र सासार में चार हाथ की, भाणस माणत मारणप अच्युत ये चारदेवलोक में तीन हाथ की, नर अवेयक में दो हायकी और पांच अनचर विमान में एक हाय की शरीर की अवगाहना है नय अवयक बार पाच अनुचर विमान में टचर फेय शरीर नहीं करते हैं ॥१४॥ अहो मगवन्' सौधर्म ईशान देवलोक में देवों के शरीर कौनस मघपणाल हैं हो गौतमा छ मघयण में से एक भी मघयण नहीं है क्योंकि उनकाई, शिरा,नस नहीं है परंतु जो इष्ट कात यावत् पनोस पुद्गल चे सघयणपने परिणमत ? यो अनुत्तरोपपातिक पर्यह जानना ||१५॥ अहो भगवन् ! सौधर्म इशान देवलोक में देवों के शरीर का सस्यान कैसा कहा है ? भदा गौतम ! उनके शरीर के दो भेद मनधारणीय और उत्तर वैश्य मन में जो भत्रधारणीप है चीनरी प्रमिपनि मनिक का वर्णन 4 अर्थ . .

की मनुवादफनपालनमाचारामुनि श्री ममाला ऋषिमी 30 कालेज अवहीरति ने चेत्रण अवहरियासिया ॥ अणुचरोववाइया पुच्छा ? तेण अस- म्वना समये २ अबहीरमाणा २ पलिओवम अमखेजति भागमेने अवह रति नोचवण भवहारियालिया ॥ १३ ॥ सोहधम्मीसाणेमुण मते ! कप्पेमु देवाण के महलिया सरीरोगाहणा पण्ण ता? गायमा! दुविदा सरीरोगाहणा पण्णता तजहा भवधाराणज्जाय उत्तरवेउब्वियाय ।। तत्थण जे से भवधारणिज्बे स जहण्णेण अगुल्स असखजति मागे, उक्कोसेण सत्तरयणीओ |तत्यण ज से उत्तर वेउन्धिए स जहणेण अगुलस्त वहां से प्रविममय एक २ अवारते २ सूक्ष्म क्षेत्र पल्यापम के अमरख्यातवे माग सफ अपहरन करे परतु अपहरन होवे नी अनुचरोपपातिक की पृच्छा ? ओ गौतम ! घे असर पात मत्येक समय में एक अपारन करते हुवे पल्योपम के पसख्यास वे माग सक अपहरन करे परतु अपहरन होने नहीं ॥ १३ ॥ भो मगन् 'सौधर्म इमान देवलोक में देवताओ के शरीर की कितनी यवगाहना की है ? महों गौतम ! अरगाहना के दो भेद 7 तण्या-भवधारणीय और उचापक्रय उसमें भवधारणीय मगारना नघप अगुल का मसरूपावा माग उत्कृष्ट सात हाय, सत्तर वैक्रय अवगाहना जघन्य अगुल का सल्यावमा माग उत्कृष्ट एक लाख योजनकी, यो मा एक हाथ कम करते अनुशरोपपातिक बिमानमें एक हाय की मवगाहना नानना पर्यात् सनत्कपार माहेन्द्र में छहाय की, प्रम और संतक में पांव • मशक-रामाबहादुर लाला मुखदेयसहायनी वालाममादमी.

4R पश-भीमामा मप्र मृगोय पान tire साणेसुण भते । कप्पेसु देवाण सरीरमा केरिसया गण पण्णता ? गोयमा ! से जहा मामए कट्ठापुडाणवा तहेव सव्य जाव मणामतरा चेव गधेण पण्णता जाव अणुचरोववातिया॥१८॥मोधम्मीसाण देवाण सरीरगा केरिसया फासेण गोयमा थिरमउय गिद्ध सुकुमाल छबीय फासेण पण्णता, एवं जाव अणुत्तरोववातिया ॥ १९॥ सोहम्मीसाण देवाण केरिसगा पुग्गला उस्सासचाए परिणमति ? गोयमा ! जे पोग्गला इट्ठा कता जाव एतेर्सि उस्सासत्ताए परिणमति जाव अणुचरोववातिया, एव जाव माहारचाएवि जाव अणुत्तरोववातिया ॥ २० ॥ सोधम्मीसाणे देवाण कतिलेसाआ सौधर्म ईशान देवलोक में दों के घरीर की गंध कैसी ही ! महो गौसम ! असे कोष्टपुट पामत् मनामवर गंध की यो मनुचरोपपातिक पर्यंत काना ॥१८॥ बो भगपन ! सौधर्म ईशान देवलोक वि देवो के परीर का फैसा स्पर्श है : महो गौतम ! उन के शरीर स्थिर मृदु सुकोमल घ झिम्प मुकामठ स्पर्शप है, यावत् अनुचर विमान के देव पर्पत फहना ॥ १९ ॥ मो भगवन् सौघर्ष ईशान देवलोक के देव केसे पुल मनासपने प्राण करते हैं ? अहो गौतम ! नो पुरल इष्टकात यावत् सयवासपने परिणपते । यो अनुचरोपपातिक पर्यंत कहना ऐसे ही माहार फलिये पुइल ग्राण करत र यो अनुचरोपपाविक पर काना ॥ २० ॥ महो मगपन् ! सौधर्म ईशान देवलोक में देशों को 49वीसरी प्रतिपचि में वैमानिक का वर्णन 41 भर्थ ? 18 अनुपादन पा प्रभारी मा श्री प्रमाण प्रापिनी 9 ढग देवाण मते । अपजत्तगाण केवइय कालठिई पण्णता ? गोयमा ! जहणणवि अमोमुहत्त उपासणवि अतामहुत्त मन्त्री सिद्धग देवाण भत ! पजत्तगाण केवइय कालाठई पणाचा ? गोयमा ! अजहण्ण मणुकोमण तेत्तीस सागरानमाइ ठिई लाभासी मिन काल की स्थिति कही है ' अहो गौतम ! मघन्य मी अन्तर गुहुर्न की भौर पर भी अन्तर मुई की महा भगवन् ' सर्य सिद्ध माविमना वामी पर्याप्त देवमायाकी किरन मालकी म्पिनि कही ? भरा गीतमा ममपन्य मनुत्कट तेतीप्स मागरोपम में मन्दर मुहुर्त कम रत्तममा पृथ्वी १३ पायरे का मलग २ बायुष्य पायर २] २०ळा-९.लाकार सागर मार वर्षख पर्प नयन्य स पर्प पूर्ण छदक १ २.१ "" • प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी बालाप्रमादजी. . . . . . . ० भाग . ७ ८ . . . . . १०/१०१०१०१०१०१०१०१० . ९.१९०ला च . . . . . . . . उत्कृष्ट { सागर माग छेदक कोर पूर्व १ 8 9 ८९ . . . १०१०१०१०१०१.१000 4865 पञ्चाश-पण्णवगा मनचर्य पान १ धर्मर प्रभा पृथ्वी में ११ परि का भायुष्प पाह ० , , मा० मा. मपन्य 9 २ ८.e ३ ५ , , १ ' मा. मा० २ पत्कृष्ट , ८॥ 9 १११११ . . वालपमा पृथ्वी क ० पायरे का आयुष्य पायडे सा. जषय मा० (छ. RIO . उत्कृष्ट गाल a ट . २ . . २ पकप्रभा के ७ पचिट का यायप्य qयता ATO जघन्य मा. उकृष्ट स० मा० ७ । 48822b late प्रभूममा ५ पाय- आयुष्य ० ० तमस्वममा का एकी पाय: पाटे का थायुम्य सा० १८२०/२२ मा. per सम प्रभा के पाआयुष्य पाथरे २२३ सा०७१८२० मा० सा०1०19२.५ मा० A नपाय जघन्य उत्कृष्ट २२ A उत्कृष्ट सा० मा० ७० hts 4. अनुवादक-बालयमचारीमुनि श्री ममोळक पिमीम AA मकासक राजावादर खान मुखदेवसहायमी पाखामसादमी. भुवनपति के देवता देपी की स्थिति का यत्र उत्थर के देव ममुर कुमार देषी असुर कुपारी नरनीकाय देवता नवनीफाय देवी दक्षिण के नपन्य उत्कृष्ट जघन्य उत्कृष्ट १०००० पर्प ' सागरो०१०००० वर्ष ०१ सागरो अ १०००० पर्ष ३॥ पस्यो। १०००० वर्ष प०४॥ पल्यो १०००० वर्ष 10 पत्यो...... वर्ष ०२ पल्पो १०.०० वर्ष ॥ पल्यो० १०००० वर्ष अ० । पल्यो

वियच पपेन्द्रिय का उत्कृप्टायुष्य
पञ्चदश पमरणा सूप चतुर्ष उपास के
पृथ्वीकायाका आयुष्य
पृथ्वीकया
जघन्य उत्कृष्ट
सून्हा पृथ्वी अन्तर मु० १०००० पर्प
मपा पृथ्वी अन्तर मु०/१०००० वर्ष
पाल पृथ्वी अन्तर मु० १४००० पर्प
मणसिला पृथ्वी मन्तर मु० १६.०० वर्ष
शकरा पृथ्वी भन्तर मु० १८००० वर्ष
खर पृथ्वी मन्तर मु. २२००० यर्प
समूच्छिम गर्भज
जलचर | झोटपूर्व पर्प २ कोड पूर्व वर्ष
स्थलचर ८४.०० वर्ष ३ पल्योपम
खेचर ७२००० वर्ष पस्यका पसंख्या.
Tilak चतुर्थ स्थिति पद tatti
तो माग
घरपर
मुजपर
५३००० वर्ष प्रोटपूर्व पर्प
४२००० वर्ष । कोरपूर्व वर्ष

धम्ममा के ५ पायटे आयुष्य ० . तमस्तममा फा एकही थायुष्य पाटे का ० पाय सा००१२२१४१५ मपाय मा० ६८/०८/26) 01 तम प्रमा के पा० भायुष्य पायडे | २/२, ३ सा० १७०८/२० मा० जधप मा० मघन्य उत्कृष्ट २२ उत्कृष्ट मा० १६ aa 4 भनुरादक पालमपारीमुनि श्री बमोळक पिमीन ८ ८ मकाक्षक रामावहादुर लाण मुखदेवसहायनी बालामसादमी. मुवनपति के देपसा देवी की स्थिति का यम उधर के देव असुर कुमार दी असुर कुपारी नवनीकाय देवता नरनीकाय देवी दक्षिण के जघन्य उत्कृष्ट जघन्य १.००० पर्प १ सागरो० १००००वर्ष ०१ सागरो थ १०००० पर्ष ३॥ पस्यो १०००० वर्ष य० ॥ पल्यो १०००० पर्प १॥ पस्यो। १०००.पर्ष म०२ पल्यो १..०० वर्ष ॥ पस्यो०,०००० पर्ष म०, पल्यो १ अपह ५ लाख प २ विजय ३ लाख वर्ष ३ मद्र 4 पचदश पनवणा सूत्र-चतुर्थ उपान १ १२ पपई का प्रायष्य ९ पलदेव का आयुष्य ९ मासुदेष के मायुष्य मरस समा ८४ साल पूर्व २सागर राना ७२ लाख पूर्व ८५ लाख वर्ष १ त्रिपुष्ट ८४ लाख वर्ष ३ माषा मजा ७• लाल पर्प २ दिपष्ट ७२ लाख वर्ष ४सनत्कुमार। ६५ लाख वर्ष ३ स्वयमू ६० लासपर्प ५ शांत राजा १ लाख वर्ष ४ मुमम ५५ लाख ४ पुरुपोचमा ३० लाख पर्प कुथ राजा ९. हजारर्ष ५ सुनद १७ लाख वर्ष, ५ पुरुष मि.० लाख पर्प ७पर रामा ८४ हजार वर्ष ६ माणद ८५ हजार पुरुप पुर) ६५ हजार ८ मभूम रामा ६0 मार पर्प ७ नद ५६ इमारव ९महापपरामा ३० हजार वर्ष ८ पप (राम) १५ हजार १२ हजार १० हजार वर्ष ९ पल मद १२०० वर्ष ९ कृष्ण २ हजार वर्ष वासुदेव निसनाही प्रतिवासु १२ प्रामदत्त राना ७० घर्ष देवकाका यायुष्य होता है -18+4 चतुर्थ स्थिति पद 484848 ६५ हजार ७दच ८ लक्ष्मण १०रिपश रामा २५ मयचद्र राजा अर्थ

4. अनुरादर मायमचारी मुनि श्री अमोलक प्रापिनी 87
सीकरोका आयुप्प
अपमनापमी ८४ लाख पूर्व
२ अमिलनायनी ७० साल पूर्व
२ समवगामी ६. सावपूर्ण
४ अपिनदननी ५० लाख पूर्व
५ पुपतिनाथमी ४० लास पूर्ण
६ पचममुनी ३० लास पूर्व
७ सपार्थनापजी २० लाख पूर्व
८ पन्द्रमममी
१० लाख पूर्व
९ साचपिनाथमी २ ख पूर्व
१० शीमलनाथजी
साख पूर्ण
" श्रीमनाथजी ८६ लाख वर्ष
१२ घासुपूज्यभी ७२ लाख वर्ष
१३ विमलनायमी 80 लाख वर्ष
.४ प्रनतनायनी १० गत वर्ष
१५ धर्मनायनी ०लाख वर्ष
१६ शानिनायमी
लाख मर्प
२७ कुधनायनी २५ हजार वर्ष
१८ मानाथजी ८४ हमार वर्ष
१९ मल्लिनाथजी ५५ हजार वर्ष
२० मुनिसुनतमी ३० हजार वर्ष
२. नपीमायनी १० हजार पर्प
२२ रिष्टनेमीनी हजार पर्प
२. पार्थनापनी १०० वर्ष
२४ बर्द्धमान स्वामीमी ७२ पर्प
Bybina Lama

8 पञ्चदश-पमवणा सूत्र चतुर्य उपान सौधर्म देवलोक के देशों के १३ प्रवरोंका अगर मायुप्प प्रवर १ ५ ६ ९.१०११११२१३ १ , , मघन्य प प प पपपप प प पाप १ . . १ ० . . उस्कट. सा सा माग ८००१२ छेदक।३.३३३३३३३३.३. उस यत्र में एक सामर के "भाग में के माग ग्रहण करना ८ ६ .." सौधर्म देवलोक की परिपती देवी का आयुष्य का यंत्र प्रतर नघन्य उत्कृष्ट 지 외휘휘히 माग २८ छदक देवीयों के दोनों यत्र में एकपल्प क १३ माग में के माग प्राण करना . ५." ४११० . . . . १ ' सौपर्म देवलोक की अपरिग्रही देवीयों के अध्यका यम प्रतर । ९/१०१११२३ जघन्य ६ उत्कृष्ट ३॥ ७.१.१९.२॥ ०३४७८४२४० भाग मंदों १३.३०३३३३३३३३१३.३012373 १२१० ८ 8 . 48.42be + 4.

ज्योतिषी का मायुष्य भर्म भूपि मनुष्य उत्सविणी में १२० वर्ष उत्तर कुर रीवास रम्पकपास पस्पोपम ३ पस्योपम २ पत्योपम २ पस्योपम परपोपम १ पस्योपम १ पस्योपम असं ये माग जघन्य उत्कृष्ट चंद्रदेव पापपस्य एक पस्य १ लासपर्व चद्रदेवी पारपस्य आधा परय ५० इनार वर्ष सूर्यदेव पापपल्प १ परय नार प्रर्ष मूर्यदेवी पापफ्ल्य भाषा पल्य५०० वर्ष ग्रादेष पापपल्य ग्रहदेवी पापपल्प बाषा पल्य नसप्रदेव पापपरख भाषा पल्य नक्षत्रदेवी पावपत्य पाषपस्प कुछ अधिक वारा देव पापपस्य पावपल्प कुछ अधिक तारादेवी पत्य का पल्प का मारवा माग पाठवा माग , मोर पूर्ण २ परयोपम ३ पल्पोपम कर्मभूमी मनुष्य का मस्कए मायुष्य परिछा मारा ३ पश्योपम मसापणी में दुसरा बारा २ पल्पोपम चौया भारा १कार पूर्व १ परयोपम तीसरा मारा १ पस्योपम पांचया भारा १२० वर्ष पठा बारा २० पर्व एक पल्य यादव कुछ अधिक G अमदेवलाक का आयुष्य प्रतर अघन्य उत्कृष्ट भाग महाशुकदेयका भाग्य प्रवर । जघ सत्त भाग २ ७ . . - |१०११११ यह समत्कुमार देवलोक के देवता को मायूप्यका पन- मतर ११ १२११२ १२१२'१२१२/१२ मारेन्द्र देवगेरु के देवता का भायुष्य फा पत्र सर्प स्थान कुछ अधिफ मानना २१२ छई १६ भाग प्रता जघन्य उत्कृष्ट माग । खोतक देवका आयुष्यका यत्र प्रर जघन्य १.११ उत्कृष्ट माग १. सासारदेन का आयुष्य प्रवर नघ १७१०१७१७, उत्कृ १७१७१७१८ माग M ~ छेद 4: अनुरादक-नामसमपारी मुनि श्री ममासक प्रपिमी + शिान देरलोक के देवता का आयुप्प का पत्र ६ ७ ८ ११२१ मर जघन्य १ १ प० । . . . 0 उत्कृष्ट भाग २ . 10.१२ ५ , इम यंत्र में अंक मो दीये स स कुछ अधिक मायुप्य सर्व स्थान मानना ईचान देवलोक की परिग्रही देनी का आयुष्य का यप्र मसर ३ ३ नय १ ८ उत्त माग . ३१३/१३ १३/१२/२३ २ ईशान देवलोक की अपरिग्रही देवी का मायष्प का यंत्र भवर ९१०"०१३ जम १] १ १२१६/२. ५०९२२३८४०४६५०/८५ भाग ८." छेद १३१३१३०१३ . . - ant FIRE .

पञ्चदश-पत्ररणा सूप-चतुर्य उपाङ्ग 1 ॥ पञ्चम पर्याय पदम् ।। काविहाणे मते ! पजवा पण्णत्ता ? गोयमा! दुविहा पजवा पण्णता तमहा-जीव पजवाय, अजीवपजाय ॥ जीव पजधाण भते । किं सखजा असखेज्जा अणता ? गोयमा ! नो सखिवा नो असखिजा अणता ।। सेकेणटेण भते । एव बुचा जीव पजवा नो सखवा नो अमखेजा अणता ? गोयमा ! असखिजा नेरइया, असखिजा अपुरकुमारा, असखिज्जा नागकुमारा, अमखिज्बा सुवण्णकुमारा, असखिया विज कुमारा, असखिजा अग्गिकुमारा, असखिज्जा पीवकुमारा, असखिज्जा उदधिकुमारा, भर पाचवे पद में उदयिक भाष आश्री सर जीप अनीव के पर्याय में परस्पर नाविक का स्वरूप पता बहो मगरन् ! पर्याय कितनी कही है। हो गौतम पर्याय के दो मेद का भी पर्याय ममीष पर्याय अरो भगवन् ! जीव पर्याय स्या सख्यात, "असल्यास या अनत। भोगौतम जीय (पर्याप पाच असंख्यास नहीं है परतु मनात मीप पर्याप भो मगन् ' किस कारन से ऐमा कहा गया है कि जीव पर्याय मख्यात व अतरूपात नहीं है परन्तु मानव है ? भो गौतम । असंख्यात नारकी, अपस्याप्त प्रमाकुपार, असख्यात नागकुमार, गारुपात सुवर्ण कुमार, अमस्या रिपुत्कुत र, Ki पचम पर्याय पद -- अर्थ का यम १२) ३) प्रतर माणत नपके भायुष्प । पाणव देवका माधुष्प भारणदेवका मायुष्य अप्पुत देवका प्रतर । २ ३) प्रतर १ २ ३ ४प्रतर जघन्य १८१८.१८१८ जघन्य १९१९१९१९ जघन्य २ २०२०२० जघन्य २१/२१/२१२१ उत्कृष्ट १८,१८१८ उत्कृष्ट १९१९१९२. उत्कृष्ट २.२.२.२१ उत्कृष्ट,२१२१२१२२ भाग माग माग माग ३ ४] ४' छद ४ 8 B 8 . D १ पणचा ।। इतिपण्णवणाए भागवईए चउत्थ ठिईय पय सम्मत्त ॥ ४ ॥ की स्थिति की है। शनि माम मममनी का पौधा स्थिति नामक पद समाप्तम ॥४॥ J ३ - 2 पण्णचा ? से केण?ण भते । एव बुधइ मेरइयाण अणता पजवा पण्णता गोयमा ! नेरइए नेरइयरस दवढयाए तुल्ले, परसट्टयाए तुले, ओगाहण ट्ठयाए सीय होणे सिय तुले सिय अभहिए, जाहीणे असखिजाभागहीणना, सखिबइमागहीणेवा, सखिजगुणहीणेवा, अमखिजगुणहीणेवा ॥ अह अमहिए असखेबइमाग मठमहिए सखबइभाग मम्भहिए असखिजगुण मभहिएवा 488 पचदश पनवणा मत्र चतुर्थ उपाङ्ग 48 अनत पर्याय नारी को कही है अहो भगवन् ! किम कारन मे ऐसा कहा है कि नारकी को अनत पर्याय है? महो गीतमा नारकी नारकी मे तुल्प है,क्यों कि सब को एकसाही जीव है,पदेश से सुल्य है क्यों कि मय नीव के लोकाकाश ममान आकाश प्रदेश है, अवगाइना से काचित् हीन, क्वचित् तुल्य व काचित् अधिक है पदि हीन होतो असख्यात माग हीन होवे जैसे नरक के एक जीपकी ५०० धनुष्य की अवगाहना रोवे और दूसर की अगुल के अमख्यातवे भाग की अवगाहना होये २ सख्यात भाग हीन हावे सो एक फी ५०० घनुप्य की अवगाहना होवे और दूसरे की ४९८ धनुष्य की इस म द्रव्पार्थ प्रदेशार्थ तुस्प कहे यह द्रव्य से उदीयक माव पयाय, अप्रगाहना अर्थ कहा यह क्षेत्र से उदीयक भाय पर्याय, स्थिति अर्थ कहा यह काल से उदपिक भाव पयाय, वर्णादि कहा यह भाव से उदीयक मात्र पर्याय और नान दर्शन कहा यह क्षयोपशमिक य क्षायिक भान पयाय या सब स्थान जानना ++ + पचप पर्याय पद 3438 ~~~~ 41 मनुगदर-गवनमचारीमुनि श्री अमोणक ऋपिनी र असाखिजा दिसाकुमारा, असखिज्जा वाउकुमारा, असम्विन्जा भणिय कुमारा ॥ अस- खिजा पुढवि काइया, असखिजा आउकाइया, असखेजा तेउकाइया, असखिज्जा धाउकाइया, अणता बणस्सइकाइया, असखिज्जा बेइदिया, असखिज्जा तेइदिया, असखिजा चउरिदिया, असाखिज्जा पचिंदिय तिरिक्ख जोणिया, असखिज्जा मणुस्सा, असखिज्बा पाणमतरादेवा, असखिज्जा जाइसिया, असखिज्जा येमाणिया, अणतासिद्धा सेण्णद्वेण गोयमा ! एव बुझ्चइ जीव पजया नोसखिज्जा नो असखिज्जा अणता ॥१॥ नेरइयाण भते ! केवइया पज्जवा पण्णचा ? गोयमा ! अणता पजधा मसरुपात भमिकुमार, मसरूपात दीपकुमार, असख्यात उदधिकुपार, असंख्यात दिशाकुमार, मसरूपाव रायुकुमार, भसरुपात स्तमित कुपार, असख्यास पृथ्वीकाया, असख्यात अप्काया, असख्यात वेठकाया, मसरुपात पायुनाया, मनव वनस्पायकाया, असल्यात पेइन्द्रिम, असख्यात तेइन्द्रिय,यसंख्यात चतुरेद्रिय, मर्मस्पात तिर्यंच पचेन्द्रिय, असख्यात मनुष्य असख्यात पाणयंतर देव, असख्यात ज्योतिपि, असख्यात मानिक भार अनस सिद्ध इम से ओ गौतन ! ऐसा कहा गया है कि नीव पर्याय सरुपात असख्यात ना परंतु मनन ॥ ॥ अदा मगवन् ! नारकी का फितने पर्याप्त कही ? महो गौतम ! अब नारकी प्रमुख सब मोवाको अगर टदीपक, क्षयोपशामिक व भाषिक भाउ शाnि m. • प्रकाशक राजावादर लाळा मुखदेव सायजी मालामसादर्भ . . , . ८२५ 48 घनश पनवणा मप्र चतुर्प उपान १ होगेवा, सखिजगुणहीणवा, असखिज्वगुणहीणेवा, अणतगुणहीणेया ॥ अहमम्महिए अणतभाग मम्भहिएया, असखिवभाग मध्भदिएवा, सखिज्जभाग मम्भाहिएका, सखिजगुण मध्भहिएवा, असखिजगुण मम्महिएवा, अणतंगण मम्महिएवा ॥ नीलपण्ण पजयहिं लोहियवण्ण पजवेहिं, पीयवण्ण पनवेहिं, सुशिलवण्ण पनवेहिं, छट्ठाणवहिए ॥ मुम्भिगध पत्रवेहि, दुभिगध पचवेहिय छट्ठाण बडिए ॥ तित्तरस रोच तो असल्यात माग हीन भी हैं जैसे एक नरीये का दश हजार पर्पका आयुष्य है और दृमरेका सपूर्ण तेसोस सागरोपम का आयुष्य है, यह असल्यास भाग हीन सरूपात माग हीन में एक का पीन सागरो पर का भायुप्य है और दूसरे का सेचीस सागरोपम का आयुष्य है, सख्यात भाग हीन एक का सपूर्ण वेत्तीस मागराम का आयुष्य है और दूसरे का दश इमार वर्ष कम का है, यह असख्यात गुण हीन और सभ्यास गुण हीन एक का ३२ सागरोपम झा आयुष्य है मौर दूसरे का तेचीस सागरोपम । आयुष्प है यह सख्यात गुण हीन है यदि अधिक होवे तो असख्यात माग अधिक जैसे एक नेरीये का समोस सागरोपम में दश हजार पर्प कम का आयुष्य है और एक का सपूर्ण वेचीम सागरोपम का आयुष्य है या बसरख्यात माग अधिक हुमा २ सख्यात माग अधिक एफ का ३२ सागरोपम का भायुषण है और एक का ३३ सागरोपम का आयव्य है मरूपाम गुन अपिक पक का मीन गागरोपम का 8 पचम पर्याय पद 4324 . - ममुवादसनामामारी मुनि श्री भगोमा प्रापेमी + अस. सखनगुण म०महिम, ठिइस सिपहाण सियतुल सिय अभहिएवा, जहाण खिजहभागहीगवा, स्खिजहभागहीणेवा, सखिजगुणहीणवा अमखिज गुणहीणेवा, अहम महिए असखिबहभाग मम्महिएका, सखिजइमाग मम्महिएका, सखिजगण मन्महिएबा, असखिबइगुण मन्भहिएवा ॥ कालवण पनवेहि सियहीणे सियतुझे, सिप मम्महिए ॥ जइहीणे अणतभागहीणेवा, असखिज्वमागहीणेवा, साखवभाग मागाहना होने, सल्यान गुना दरीन होप जमे एक की ५०० धनुष्य की भाग हना हावे जा दूसरे की १५ पनुप्प की भगाना होघे, मयमा मसंख्यात गुण हीन हारे गैस एक नरीऐ की ५०० बनुष्य की परगाहना हरोपे और दूसरे किसी नरीये की भंगुरु के असण्यातवा माग को भगाना रोवे या समरपात गुना हीन मानना या चार माग हीन भाश्रिय मानना अर अधिक का काते है सदि पिक होवे वो अमख्यात माग अधिक दावे मे कोई नेरीये की पांच मो पनुप्प में अंगुल का ममख्यासमा भाग कम जितनी भगाना पे मोर दूगर की सपूर्ण पात्रो भनुप्प की मरगाना भाव या असण्या माग भषिक मानना संख्यात भाग मषिक होव-ज किसी को ४९८ धनुष्य की भरगाइना रोष और अन्य की ५०० पनुष्य की अवगााना सारे या संख्यात माग भधिक मानना स्विप्ति आश्रिय स्थान हीन, स्यातू तुल्य २ स्यात् अधिक है, यदि दीन प्रकाशक-रानावर झाला मुनदवसायमी मालाममाठमी.

सूत्र पर्थ 849 पञ्चदश-पभवणा सूप-चतुर्य उपात भूक लुक्खफास पज्जवेहिय छट्ठाणवाहिए ॥ आभिणियोहियनाणपजवेहि, सुपनाणपज्जयहिं ओहिनाण पत्रवेहि, मइअण्णाण पहि, सुय अण्णाण पवधेहि, विभगाण पज्जवहि, चक्ख दमण पज्जवेहिं, अचक्ख दसण पज हिं, ओहिदसण पजवहिंय, छट्ठाण घडिए । सेएण?ण गोयमा ! एवं बुच्चइ नेरइयाण नो सखिजा, गो अस- खिन्ना, अणता पज्जवा पण्णचा ॥ २ ॥ असुरकुमाराण भते ! केवइया पजवा पण्णता ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णत्ता, सेकेणटेण भने ! एर वुच्चइ असुर पास पण पर्यप, शुक्ल वर्ण पर्यव, सुरमिगध पर्यव, दुरभिगध पर्यर, तिक्त रस पर्यव, कदुक रस पर्यव, कपाय रस पर्यव, अम्बट रम पयव, मधुर रस पया ककश स्पर्श पर्यव,मृदु स्पर्श पर्यव, गुरु स्पर्श पर्यष, लघु स्पर्श पयव, नि मर्श पर्यत्र, ऊष्ण स्पर्श पर्यव, निग्ध स्पर्श पर्यव, प रूक्ष स्पर्श पर्यव के साथ अलग पद्गुण हानि वृद्धि करना मे हा आमिनिपाधिक ज्ञान पर्यव, शुत मान पर्यव, अवधि शान पर्पक, मसि भान पर्यव, श्रुन बन्नान पर्यव, विमग मान पर्यन, पशु दर्शन पर्यव, अचक्ष दर्शन पर्यघ, व अवधि दर्शन पर्यव की साथ उक्त जैसे पद्गुन हीन अधिक है इस लिये अहो गौतम ! ऐसा कहा गया है कि नारकी के प्रख्यात ना, असंख्यात नहीं है परतु अनत पर्यव हैं ॥ २ ॥ अहो मगवन् ! अमुर कुमार के कितने पर्यप कहे हैं ? अहो गौसम ! अमुर कुमार के अनंस पर्यय कई हैं अधो 42 पचम पर्याय पद ? - यह मनुरादकमाएननचारा मुान या ममाला पज्जनहि, कडयरस पञ्चबेहिं, कसायरस पजाहि, अबिलरस पज्जवहि, महररसपन्न वेदिय छट्ठाण वहिए ॥करखडफास पज्जवेहि,महयफास पजवेहिं गश्यफास पज्वेहि, लहयफास पनवेहि सीयफास पज्जवहि, उसिण फास पनवेहिं, निहफास पनवेहि, भायुप्य है, और एक का से चीस सागरोपम का आयुष्य है, और । मसख्यात गुन अधिक एक का दशा एजार २५ का भायुष्य एक का सेतीस सागरोपम का मायुष्यो अब भाव से कहते हैं-काला पूर्ण पध से अनसभागहीन, अमस्यात भाग दीन, सख्यात भाग हीन, रुस्यातगुन हीन बसस्यातगुन घ धनतगुण हीन यह पगण हीन कर अप भषिक होवे सो । अनंत माग अधिक २ अमरख्यात माग अधिक मरपात माग भधिक ४ मख्यात गुण अधिक ५ असख्याप्त गुण अधिक घ ६ अनंत गुण अधिक यो पदगुण मषिक काx जैसे कासावर्ण पर्यष का कहा, जैसे ही नील पर्ण पर्यव,रक पर्ण पर्यव, * भनंत मीयों की राशि से माग देते भो रहे सो अनत माग हीन, असल्यात लोकाकाश प्रदेश प्रमाण पशि स भाग देत मा रहे सो असंख्यात भाग हीन और उत्कृष्ट सह्याते कृष्ण पर्यायवाले नारकी से भाग देते भो रहे टस संख्याप्त माग हीन कहना अब गुना अप्रिय कहते है-उत्कृष्ट सह्यातेको मघन्य संरूपात से गुने करते मितने हारे टस भपेक्षा से संख्यात गुण हीन, असंख्यात लोकाफाश प्रदेश की राशि के वर्ण के प्रमाण से गुणा करते मितने होवे यह असह्यात गुणहीन, और अनंस भीषों को वर्ण से गुणा करते मितने हा सो अर्णतगुणहीन * प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादमी ।

48 पञ्चदशा पनरणा मूम चनुर्य उपाद्र 18+ अर्थ - भोहियणाण पज्जवलिं, मइ अण्णाण पहिं सुयअण्णाण पज्जयहिं विभगणाण पबहिं चक्षदसण पन हिं, अचम्खु दसण पनवेहिं, आहिय सण पजयहि, छट्ठाण यदिए। सेएणटेण गोयमा ! एव वुच्चइ अनुर कुमाराण अणता पजवा पण्णत्ता ॥ एष जहा नेरइया जहा असुर कुमारा तहा नागकुमारावि जाव थगिय कुमारावि ॥ ३ ॥ पुढवि काइयाण भते । केवड्या पञ्चवा पण्णचा? गायमा! अणता पज्जवा पण्णचा? सेकेण?ण भते । एव वुच्चइ पुढवि काइयाण अणता पज्जवा पण्णचा ?गायमा!पुढवी भामिनिषाषिक शान पर्यव, श्रुत ज्ञान पर्यव, मवाधि हान पर्यव, मप्ति अशान पर्यव, श्रुत अमान पर्यव, प विभगबान पर्यव, चक्षु-र्शन पर्यव भचक्षुदर्शन पर्यप व अरधि दर्शन के पर्यव की माय पड्गुण पान पिक जानना भोगौतम' इसलिय एसा कहा है कि असुरकुमारको अनत पर्यष का , यो सब नारकी जैम जानना र असुर कुमार का कहा वैस ही नागकुमार यावत् स्तरित कुमार का जानना ॥ ३॥ महा भगवन् पृथ्वीमाया को कितते पर्यव सह ? महा गौसम ! पृथ्वीकाया को मनन पर्यव कहे । १ मा भगवन् ! कि रा पृथ्वीकाया को अनत पर्यच कडे ? अहो गौसम ! पृथ्वीकाया द्रव्य से तुल्य रे, प्रदश मे तुल्य है, अरगाहना से हरीन स्पात् तुल्य व स्यात् अधिक है, यदि हान है तो अमरुयात माग हीन, संख्यात माग हीन, सम्पात गुण हीन व अमरपानगुनान, या पार स्थान है मौर अधिक है तो पचम पर्याय पद Ht .

मायामनारी मुनि श्री अमारक प्रापमी + फास कुमाराण अणता पजवा पण्णता? गोयमा ! असुरकुमारे असुर कुमारस्म दवट्टयाए तुम्न पएसट्टयाए तुले ओगाहणद्वयाए चट्टाण पडिए, ठिइए घउठाण वहिए काल- यण पजवहिं छटाणवडिए एव नालवण्ण पजवहि, लाहियवण्ण पज्जवहिं हालिदवण्ण पवहिं साधालयण्ण पनवर्हि,सभिगध पजयहिं, दुहिमगध पज्जवहिं, तिचरस पज्जवेहि, कहयरस पज्जवहि,कसायरस पञ्चवहि, अविल रस पंजेवहिं महुररस पजवहिं क्कडफास पनवहि भउयफाम पनवेहिं, गक्ष्यफास पज्जवेहि, ल्हुयफास पज्जवहि, सयिफास पजवाह, पजवहि, उमिण पनवेहि, जिडफास पज्जवेहि, लुक्खफास पनवर्हि, अभिाण बाहिय नाण पजयहिं, सुयणाण पनवेहि, भगमन् ! किस माग्न मे ऐमा कहा गया है कि असर कुमार को अनन पर कडे है ? आओ गौतम भनर कुमार मुर कुमार स द्रष्य माश्रिय तुल्य है, प्रदेश मे सुल्य है, अरगाइना आश्रिय चार स्थान नापिक ।' भाल्यात माग हीन २ मख्यात माग हीन, ३ रख्यात गुण रीन और ४ अमरूयात गुणस्थिनि आश्रिय चार स्थान हीनाधिक और फासावर्ण पर्यप स छ स्थान होनाधिक एसे ही मीठ पर्यर रक पर्ण पर्यच, पीत वा पर्यव, शुक्ल पूर्ण पर्यव, सुरमिर्गध पर्यव, दुगभगध पर्यत्र, विक्त रस पपर, नटुक रस पयव, कपाय रस पर्यत्र, अम्मट रस पर्यय, मधुर रस पर्यव, कर्कशं स्पर्श पपर, शीख समर्श पर्पन, उष्ण स्पर्श पर्यव, निग्न सर्व पर्यष व रूस स्पर्श पर्यच मेरी • माशक गनगर सपा मुखदव मायनी वामप्रमानी.

8 पञ्चदश पभरणा मूत्र धनुर्य उपाइ हर . अर्थ ओहियणाण पञ्चपहि, मइअण्णाण पजहिं सुयअण्णाण पखयहिं विभंगणाण पजहि चक्रोदसण पहि, अचक्षु दसण पनवेहिं, आहिय दसण पज्जवहि, छट्ठाण घटिए।। सेएण?ण गोयमा ! एव वुच्चइ अनुर कुमाराण अणता पजवा पण्णत्ता ॥ एय जहा नेरइया जहा असुर कुमारा तहा नागकुमारावि जाव थणिय कुमारावि ॥ ३॥ पुढवि काइयाण भते ! केवइया पजवा पण्णचा? गायमा! अणता पजवा पण्णता? सेकेणटेण भते ! एव वुच्चइ पुढवि काइयाण अणता पजवा पण्णचा 'गायमा!पुढवी भामिनिपापिकान पर्यप, श्रुत शान पर्यव, भवापि ज्ञान पर्यच, मसि पक्षान पर्यव, श्रुत भान पर्यव, व पिभग झान पयव, चक्षुदर्शन पर्यव भचषुदर्शन पर्यवच अवधि मन के पर्यव की साथ पगुण हैन पिक जानना भोगौतम' इसलिय एसा कहा है कि असरकुमारको अनत पर्यव कह। यो सब नारकी जम जानना मम मसुर कुमार का कहा वेस ती नागकुमार यावत् स्तमित कुमार का जानना ॥ ३ ॥ बही भगवन् पृथ्वीमाया को रितते पर्यव का ? पहा गौतम ! पृथ्वीकाया को अनत पर्यव कहे ? बहा भगवन् ! किम रा पृथ्वीकाया को अनत पर्यष कहे ? अहो गौतम ! पृथ्वीकाया द्रव्य से तुल्प है, प्रदेश मे तुल्य है, अागारना से हीन स्पात् तुल्प व स्यात् अधिक है, यदि हानी तो अमरुयास मागहीन, संख्यात माग रीन, सम्पात गुण हीन व अनरुवातगुनीन, या पार स्थान है और अधिक है तो पचम पर्याय पद 480 काइए पुढवी काइयस्स दमट्टयाए तुम्ने पदसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्टयाए सियहीणे तिथ तुने सियभम्भाहिए,जइहाणे असम्बिज मागहिणवा,सखिजभागहीणेवा सखिजगुणहीणवा असखिज्ज गुणहीणेवा, अम्महिए असस्थिज्व भाग मन्महिएवा, सखिज्जभाग मठम- हिएका, सखिज्व गुणमब्भदिएवा, असखिज गुणमब्भहिएगा ठिईए सियहीणे सियतुल्ले सिय मम्महिए, जइहीणे असखिज्न भागहीणेवा, सखिज्ज भागहिणवा, सखिज्ज गुणहीणवा अह अम्माहिएवा असखिज भाग मन्माहिएवा, सखिज्ज भाग मठमहि- 4- मनुपापरामप्रयाग मान श्री ममारक मानी भसरपाय माग अधिक, तरूपाय माग भत्रिक, सख्यातगुण अधिक व असख्यासगुन अधिक, स्थिति माधिप स्पात हीन स्यान तुल्य व स्यान अधिक है यदि हान है मो अमख्यान भाग हीन क्यों कि किमी का पानीस हजार वर्ष वा मपूर्ण आयुष्य है और किम का एक समय कम पावीस हमार वर्ष का भायुप्प, २ सत्यात भाग हीन क्यों कि किमीका पूर्ण पावीम इनार वर्ष का आयुष्य है और किसीका यावहिका कम पानीमा हजार वर्प का आयुष्य है वैसी सरयात गुन रीन किमी का पूर्ण वापीस इमार पप का भायुष्य है भौर किसी का दो हजार पर्प काही भायुष्य है या तीन स्थान पाते है परंतु चौथा स्थान नहीं पाता है क्यों कि एन्द्रिय में सख्याव पर्प काही आयुष्य है २९६ भाषालोका का एक मर, एमे एक मुहून में ३५९३६ मत्र होव हैं यदि भधिक होये तो असख्यात माग भरिक, सख्यात • प्रकाशक राजावादर लाला मुम्बदेवमहायजो ज्यालाममात्री.

पत्र पञ्चदश पनपणा सूप चतुर्य सपान पर एषा, सखिजगुण मम्भहिएका ।। यण्णपज्वधेहि, गधपजोहिं, रसपनवेडिं, फासपनवेहि मइअण्णाण पजवेहिं सुयअण्णाण पजयहिं, अचपखुदसण पजवेहिय छट्ठाणवाडिए । सेतेण?ण गायमा एवं वुच्चइ पुढवि काइयाण अणता पनवा पण्णचा॥४॥आउकाइयाण भते केवइया पञ्जवा पण्णचा ? गोरमा ! अणता पण्णता सेकेणटेण भते । एव वुच्चइ आउकाइयाण अणता पजवा ' गोयमा आउकाइए आउकाइयस्त दव्वट्ठयाए तुझे पएसट्टयाए तुल, ओगाहणट्टयाएं चउट्ठाणवडिए, ठिई तिढाणवहिए, वण्ण-गध- रस फास मइअण्णाण सुयअण्णाणय अचवखदसण पनवेहिए छट्ठाणवहिए से एणतुण भाग अधिक, व सरुयात गुन अधिक है पांच वर्ण, दो गघ पाच रस पाठ स्पर्श की पर्याय से पैसे पति अमान की पर्याय श्रुत अनान की पर्याय व अचक्षुदर्शन की पर्याय मे पदस्थान होनाधिक है ? हो गौसम ! इसलिये ऐसा कहा गया है कि पृथ्वी काया के पर्यव सरूपात असल्यास नहीं परंतु अनव ॥ ४ ॥ महा भगवन् । अप्काया क किसने पर्यव करे है ? अहो गौतम ! अपकाया के अनत पर्यव को अदो भगवन् ! किस तरह अपकाय के अनस पर्यव कई ! बहो गौतम! अपकाया भगाया की साय द्रव्य आप्रिय तुल्प है, प्रदश आश्रिय तुल्य है, अवगाहना भानिए चार स्थान दीनाधिक पृथ्वी जैस स्थिति आश्रिय तीन स्थान हीनाधिक पथ्वीकाया भैसे पांच वर्ण, दो गध, पांच रस, भाठ स्पर्श મર્ય MP पचम पर्याय पद 34332 काइए पुढवी काइयस्स दबट्टयाए तुम्ने पदसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्टयाए सियहीणे तिथ तु सियभमहिए जइहीणे अग्विज भागहिणवा,सखिजभागहीणेवा सखिजगुणहीणवा असखिज गुणहीणेवा, अन्महिए असस्विज भाग मम्महिएवा, सखिज्जभाग मभ- हिएया, सखिज गुणमाहिएका, असखिज गुणमन्भहिएवा ठिईए सियहीणे सियतल्ले सिय मठमहिए, जइहीणे असखिज भागहीणेवा, सखिज्ज भागहिणवा, सखिज्ज गुणहीणवा अह अमहिएवा असखिज भाग मभहिएवा, सखिज्ज भाग मठमहि- 4. मनुवादक-वाहामधारी मुनि श्री ममापक फ्रानी - .भकाशक-राजावहादुर लाला सुम्बदवमायजो बालापमानी . . भसरयाव माग अधिक, सरयाव माग अधिक, सर यातगुण अधिक व अमरुपातगुन अधिक, स्थिति माधिप स्पान हीन स्यान तुल्य व स्यान अधिक है यदि डान है मो अमरुयान माग हान क्यों कि किमी का सीम हजार वर्ष का सपूर्ण मायुष्य है और किम का एक समय कम बावीस हजार वर्ष का मायुप्प, २ सख्यात माग हीन क्यों कि किमीका पूर्ण पात्रीम हनार पप का आयुष्य है और किसीका भापलिका कम पानीम हमार वर्ष का आयुष्य है वैस ही सख्यात गुन हीन किमी का पूर्ण पास मार पर्ष का भायुप्पो और किसी का दो हजार पर्प काही भायुष्य है या तीन स्थान पाते है पर चौथा स्थान नी पाना है क्यों कि पकन्द्रिय में सरूपात वर्प काही आयुष्य है २१६ भावालोका का एक मर, एमे एक मुहूर्त में ३५९३० भव होता है यदि भाषिक होवे तो असख्यात माग भषिक, संग्ल्यात .

पत्र 430 पञ्चदश पनपणा सूप पतुर्य उपाङ्ग at एवा, सखिजगुण मम्महिएका ।। वण्णपजवेहि, गधपबोर्हि, रसपबोर्डि, फासपबहि मइअण्णाण पबहिं सुयअण्णाण पजवेहिं, अचक्खुदसण पजवेडिंय छट्ठाणघडिए । सेतेणटेण गायमा एवं वुच्चइ पुढवि काइयाण अणता पजवा पण्णता॥४॥आउकाइयाण भते केवड्या पञ्जवा पण्णता ? गोयमा ! अणता पण्णचा सेकेणट्रेण भते ! एव चुचइ आउकाइयाण अणता पजवा ? गोयमा आउकाइए आठकाइयरस दवट्ठयाए तुम्ने पएसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणटुयाएं चउट्ठाणवहिए, ठिई तिट्ठाणवडिए, वण्ण-गध- रस फास मइअण्णाण सुयअण्णाणय अचक्वदसण पनवेहिए छट्ठाणवडिए से एणतुण माग अधिक, व सख्यात गुन अधिक है पांच वर्ण, दो गध पांच रस प भाठ स्पर्श की पर्याय से से ती मति अमान की पर्याय श्रुत अमान की पर्याय व अचक्षुदर्शन की पर्याय मे पदस्थान हानाधक हैं। यो गौतम ! इमलिये ऐसा कहा गया है कि पृथ्वी काया क पर्यव सख्यात असख्यात नहीं परंतु मनस * ॥ ४ ॥ महो भगवन् ! अप्काया क कितने पर्यव करे हैं ? अहो गौतम ! अप्काया के अनत पर्यन को भदो भगवन् । किस तरह थप्काय के अनस पयव कहे हैं ? अहो गौतम! अपकाया अपनाया की साथ द्रव्य आश्रिय तुल्य है, मदन आश्रिय तुल्य है, अत्रगाइना माश्रिर चार स्थान होनाषिक पृथ्वी जैस स्थिीत भाश्रिय तीन स्थान होनाधिक पध्धीकाया जैसे पाच वर्ण, दो गध, पचि रस, आठ स्पर्श अर्थ पचम पर्याय पद 43:17 १ + मनुरादापानमारी मुनि श्री ममारक प्रपिनी गारमा ! एवं बुचइ आउकाइयाणं अणताफ्यत्रा पश्यत्ता ॥ ५॥ तेउकाइयाग पुष्छा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णचा ॥ से केणद्वेण भते ! एष दुधइ तेउका- इयाण अणतापज्जवा ? गोयमा ! तेउकाइयाए तेउकाइयस्स दवट्ठयाए तुझे पएस ट्ठयाए सुम्ने, ओगाहणट्टयाए घउट्ठाण वहिए, ठिईए तिढाणवहिए, वण्ण गध-रस फास मइ-अण्णाण-सुयअण्णाण अचक्खुदसण पबवेहिय छटाणवहिए,तेण?ण गोपमा। एव घुच्चइ तेउकाइयाण अणता पञ्जवा पण्मचा ॥६॥ वाउकाइयाण पचत्रा पुष्छा (पति महान, अत महान र पचक्षु दर्शन इन में पदस्थान हीनाधिको महो गौतम । इस लिये ऐसा या गया है कि भप्काया को अनत पर्यव को हैं ॥५॥ भो भगमन् ! लेटकाया को कितने परको गीतप 'उमाया को मनंत पर्यन को अहो भगवन् ! किस कास्न सेरेसा करा गया कि उसका मातम पर्यो ! रो मौतम ! वेरकाया सेशकामा की साप दम्प से नुत्य प्रदेश म वल्ग, भगाना में चार स्थान दीपिक, स्पिति से तीन स्थान नापिक, वर्ष गप, रस पर्स, मनि न,श्रत महान व भचक्षुदर्शन में षट् 'स्पान हीनाधिक! बहो मौतमा इमसिवेरेसा का किसावा को भनव पर्यवरे ॥ ६ ॥ भो भगवन 'पायुकाया को शिवने पर्वर को • प्रकाशक-रामावहादुर लाम मुसदेवसहायणी माला प्रसादमी.

परदश पनवणासूत्र पतुउपाय 4 गोयमा घाउकाइयाण अमता पबचा पण्णता, से केण?ण भते । एवं वुबई बाउकाइयाण अणता पजया पण्णता ? गोयमा! वाउकाइए चाउकाइयस्स इन्वट्ठयाए तुल्ल पक्सट्टयाए तुल्ले ओगाहणट्टयाए घउट्ठाण वहिए, ठिईए तिट्ठाण बहिए, app. गष-रस फास पजवेहिं मइअण्णाण सुयअण्णाण अचक्खुदसण पनवेहिय छट्ठाण पहिए, सेएणद्वेण गोयमा ! एव वुझ्चइ वाठकाइयाण अणतापजया पण्णता ।। ७ ॥ वणस्सइकाइयाण पुच्छा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णता । सेकेणढेण भते । एवं बुध वणस्सइ काइयाण अणता पजना पण्णत्ता? गोयमा ! वणस्सइकाइएवण अहो गौवम ! पायुकाया के अनंत पर कोई अहो भगवन् ! घायुकाया को अनत पर्यप किस तरह को है । महो गौसम ! पायुकाया पायुकाया से द्रव्य आश्रिर्य तुप, प्रदेश भात्रिय स्प, अपगाहना याश्रिय चार स्थान हीनापिक; स्थिति माश्रिय तीन स्थानीनाधिक और पांच पूर्ण दो गर, पांच रस, माठ स्पर्श, मति महान व श्रुव बहानर अचक्षु दर्शन भाश्रीय पदस्यान हीनाधिक है॥७॥महो भगवन्' पनापतिकापा के किसने पर्यव कई हैं ? अहो गौतम ! नस्पतिकाया को धनत पर्यष पाई है अहो मगमन् ! बनस्पतिकाया को अनंत पर्पर किस तरह कहे हुवे है ' अहो गोतम ' वनस्पतिकाया बनस्पति काया से प्रवेम मानीय वस्य मदेश भाश्रीय तुल्य, अवनाहना भात्रीय यार स्थान हानाधिक, स्थिति मर्थ पचम पर्याय पद :- + मनुरादाबानमारी मुनि श्री ममालक पिनी गायमा ! एवं वुचइ आउकाइयाण अणतापचत्रा पथ्यता ॥ ५ ॥ तेउकाइयाग पुच्छा ? गोयमा ! अणता पज्जवा पण्णचा ॥ से केण?ण भते ! एव वुधा तेठका- इयाण अणतापज्जया ? गोयमा ! तेठकाइयाए तेठकाइयस्स न्यट्टयाए तुझे पएस ट्ठयाए तुझे, भोगाहणट्ठयाए चउट्ठाण वहिए, ठिईए तिढाणपटिए, वण्ण गध-रस फास मइ-अण्माण-सुयअण्णाण अचक्खुदसण पबवेहिय छट्ठाणवडिए,तेण?ण गोयमा। एव पुचइ तेउकाइयाण अणता पज्जवा पण्णचा ॥६॥ वाउकाइयाणं पजत्रा पुच्छा ? पति मान, शुत अज्ञान र बचा दर्शन इन में पदस्थान हीनाधिको भरो गौतम ! इस लिये ऐसा बारा गया है कि भपकाया को अनत पर्पर को है ॥ ५ ॥ भो भगान् ! काया को कितने गो गौतम 'उमाया को अनंत पर्यप को बहो मगवन् ! किस कास्न से ऐसा पानवारे किले का मन पर्योमो गौतम ! वेसकाया कापा की साप दम्य से दुरप परेश म सल्य, म-गाना म चार स्थान पीपिक, स्पिति से तीन स्थान होनाषिक, वर्ष गर, रस पठ, मनि मन,श्रत भान व भादर्शन में पद स्थान हीनाधिको गौतम! इसलिये ऐसा का किया को अनत पर्यय में ॥ ६ ॥ बो भगवन् ! बायुमाया को कितने पर्यव को ? • प्रकाशक-राजावादर लाम स्वदेवसरायमीमामा प्रसादमी, ससिबगुणहोणेवा, असखिजगुणहीणेया अहअम्भाहिए असाख मागा सखिजइभाग मम्भाह रवा,सखिजगुण मम्माइएवा,असखज्जगुण मठमहिएवा ॥ ठिईए तिवाण घडिए,षण गध रस फास आमिणिवोहियणाण सुयनाण मइअण्णाण सुयअण्णाण अधक्खुदसण पवेहियछट्ठाण वडिए,सेएणतुण गोयमा! एववुचइ बइदियाण अणसापज- पापण्णतएव तेइदियाणवि, नवरदो दसणा, चक्खुदसणअचखुदसण पजयेहिय छट्ठाणवडिए॥९॥ पर्चिदियतिरिक्स जोणियाण पचया जहा नेरझ्याण तहा भाणियन्वा ॥१०॥मणुस्साण भते! केवइया पञ्जवा? गोयमा! अणता पजवा पण्णतसेकेणरेण यदि भपिकतो असंख्यात भाग अधिक, सरूयास माग अधिक, मख्यातगुन अधिक व भसंख्यामगुण अधिक स्पिति आश्रय तीन स्थान हानाधिक, पांच वर्ण, दो गध, पांच रस, पाठ स्पर्श, भाभिनियोपिक मान, भुतहान, मति अमान श्रुत अज्ञान और अचक्षु दर्शन के पर्यपकी साप पट्स्थान हीनापिक में बहो गौमम! इसलिये ऐसा कहा गया है कि बेइन्द्रियों को अनंत पर्यर कहे हैं ऐसेही नइन्द्रिय का जानना और चतुरेन्द्रिय का भी सही करना परतु दर्शन दो मानना चक्षु दर्शन व अचभु दर्शन इन आश्रिय पस्थान हीना. पिक ॥९॥ वियच पचेन्द्रियक पर्यव मारकी जैसे काना ॥२०॥ अहो भगवन् ! मनुष्य को किसने पर्यव की है? अहा गौसम ! मनुष्य को बनत पर्यनको महो मगान किस कार से ऐमा पहा गया है कि 48 पथदश पभरणा मूब-चतुर्य उपाग 4 का पंचम पर्याप पद 4843 अर्थ - गुगामायागरी पुनि श्री भयोटा पिणी+ स्सइकाइयस्म दबट्टयाए तुले, पएसटुयाए तुझे, ओगाहणटुयाए पउहाण याहए ठिईएसिटाणबडिए, वण्णगधरसफास मइअण्णाण सुयअण्णाण भवरखुदसण पनवेहिप छट्ठाणवडिए, से एणटेण गोयमा । एव वुधइ वणस्सइकाइयाण अणंता पमषा पण्णचा ॥ ८ ॥ बेइदियाण पुग्छा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णचा.॥ सेकेण?ण मते ! एव वुच्चइ घेइदियाण अणता पजवा पणच ?. गोयसा.! मारिया मेइदियस्स पवट्ठयाए तुझे, पएसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्ठयाए सियहीये, सिमतुरे, सिय अन्माहिएया । जइहीणे असखिजइ भागहाणेवा, सखिजाभागहाणेवा माश्रीपदान स्थान नापिक, पांच वर्ण, दो गंप, पांच रम, माठ स्पर्श, मति भमान, भुत महान पर दर्शन माश्रीय पदस्पान हीनापिक हैं हो गौतम ! इस हिये ऐसा कहा गया कि बनस्पति कापा को भनत पर्यप कहे ॥ ८ ॥ मो भगवन् ! इन्द्रिय को कितने पर करे बो गौतम ! चाय को मणत पयय को बहो मगरन् ! किस कारन से ऐसा कहा गया कि मेहन्द्रिय को बनर को महो गौवम ! येइन्द्रिय इन्द्रिय की साथ द्रम्प से सुस्प । प्रदेश से सुख, मामाना भात्रीय स्यात् दीन स्याद तुरय । स्पान अपिक हैं यदि न हैं वो बस- पास भाग दीन, सख्यात माग शन, सरूपात गुण हैन, प असल्याव गुम सिन । महासकामायापुर मा हसदेवसहायमी.माजासादषी.

8- पञ्चदश-पमवणा मूम-चतुर्थ सपान 432 वाडया, वणाईहिं छट्ठाण वडिया ! जोइसिय वेमाणियारि एष चैत्र णवर ठिईए तिहाण घडिया ॥ १२ ॥ जहण्णोगाइणगाण भते ! नेरइयाण केवइया पज्जा पण्णत्ता ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णत्ता ॥ सेकेण?ण भते ! एव घुबइ जहण्णोगाहणगाण नरइयाण अणता पज्जया पण्णत्ता गोयमा! जहण्णागाहणए नेरइए जहण्णोगाहणगस्स नेरइयस्स इन्वट्ठयाए तल्ल पएसट्टयाए तल्ले ओगाहणट्ठयाए तुल्ले ठिईए चउट्ठाण वडिए।वण्णगधरसफास पजरेहि तिहिंनाणेहिं तिहिं अण्णाणेहिं, तिहिं दसणेहि छट्ठाण वाहिए, से तेण?ण गोयमा! एव बुच्चइ जहण्णोगाहणगाण नेरइयाण जानना ज्योक्षिपी वैमानिक का मी पैसे ही कहना परतु स्थिति आश्रिय तीन स्थान हीनाधिक क्योंकि मात्र असरूपात वर्ष की स्थिति है परतु सख्यात चर्प की स्थित नहीं है ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! जघन्य अगाउनाबाले नारकी को किसने पर्यष कह' अहो गौतम ! जघन्य अवमानाल तारकी को अनस पर्यप को ओ भगवन् ! किस कारन से जयय अवगाहनावाले नारकी को अनत पर्यव कहे। हो गौतम ! मघन्य अवगाहनावाले नारकी नबन्ध अवगाहनायाले नारकी की माय द्रव्य से सुल्य प्रदेश से तुभ्य, भषगाइना आश्रिय तुल्य क्यों कि जघन्य अवगाहना सब की एकमी होती है, स्थिति माश्रिय पार स्यान हीनाधिक क्यों कि जघन्य अंगुल के मिसम्यातय माग की अवगाहनासाले 48 पचम पर्याय पद 18+ भर्थ मुनि श्री ममालक नाना P भता एष वुधद मणुस्साण अणता पजवा प.गोयमा! मणुस्से मणुस्सस्स दवट्ठयाए । तुझे, एसट्टयाए तुझे, ओगाहणट्टयाए चउट्ठाण वडिए, ठिईए घउट्ठाण पदिए, वष्ण गध रस फास आभिणघोहियणाण सुयणाण भोहिणाण मणपजवणाण पनवेहिय छट्ठाण वहिए, केवलणाण पञ्चवहिं तुल्ले, तिहिंअण्णाणर्हि, तिहि सणेहिय छट्ठाण घहिए, केवल दमण पज्जवेहिं तुझे, सेएणद्वेण गोयमा एव बुच्चइ मणुस्साण अर्णता पजवा पण्णता ॥११॥ वाणमतरा उगाहणट्टयाए ठिइए चउट्ठाण ममुष्य को मनत पर्यय है ? अहो गौतम ! मनुष्य मनुष्य की साथ द्रव्य से तुल्य , मदेव से तुल्य । भरगाहना भाश्रिय पार स्थान हीनाधिक, स्थिति माश्रिय पार स्थान शिनाधिक प्योंकी ममुष्प में अस- व्यात पका पायुप्प भी है मौर वर्ण गघ, रस, स्पर्श, भामिनियोपिक ज्ञान, श्रुत मान, भवपिमान, मनापर्व वीन भमान, चषु दर्शन, अचक्षु दर्शन और अवधि दर्शन इन आश्रिय पदस्थान रीना पिक, भौर केवर मान केवल दर्शन भाश्रिय तुप रे क्योंकि सब केंपर शान केवलदर्शन मदृश्य होते। उन में किसी प्रकार की मिलता नहीं है बहो गौतम ! इस लिये मनुष्य को अनंत पर्यप कड़े हैं ॥५॥ पाणम्यन्तर का अवगाहना व स्पिति पार स्पान होनारिक हैं और वर्णादि माश्रिय षटू स्वामीन • प्रकाशक-राजापादुर साळा सुखदेवमहायमी बाहामासादी .

48 पञ्चदश-पमरणा मूत्र घसुर्घ उपाय 498 वाडिया, वण्णाईहिं छट्ठाण यडिया ॥ जोइसिय वैमाणियावि एवं क्षेत्र णवर ठिईए तिट्ठाण घडिया ॥ १२ ॥ जहण्योगाहणगाण भते ! नेरझ्याण येवइया पनवा पण्णचा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णचा ॥ सेकेण?ण भते ! एव बुचाइ जहण्णोगाइणगाण नरइयाण अणता पजवा पण्णत्ता' गोयमा! जहण्णागाहणए नेरइए जहण्योगाहणगस्स नेरइयस्स दवट्ठयाए तल्ल पएसट्टयाए तुल्ले ओगाहणट्ठयाए तुल्ले ठिईए चउट्ठाण वडिए॥वण्णगधरसफास पजोहि तिहिनाणेहि तिहिं अण्णाणहि, तिहिं पसणेहिं छट्ठाण वाहिए, से तेणटेण गोयमा! एव उच्चइ जहण्णोगाहणगाण नेरइयाण जानना ज्योतिषी वैमानिक का मी पैसे ही कहना परतु स्थिति आश्रिय तीन स्थान हीनाधिक क्योंकि मात्र बसरुपात पर्प की स्थिति है परतु मख्यात चर्प की स्थित नाहै ॥ १२ ॥ अहो भागवन् ! जघन्य भवगाहनावाले नारकी को कितने पर्यत्र कह' महो गौतम ! जघन्य अवगाहनावाल परकी को अनत पर्यष को भहो भगवन् ! किस कारन में जघन्य अवगाहनावाले नारकी को अनत पर्यप कहे। अहो गौतम ! अघन्य अषगाइनापाले नारकी अघन्य अवगाहनावाले नारकी की माय ट्रव्य से तुल्य प्रदेश से तुल्य, अवगाहना आश्रिय तुल्य क्यों कि मघन्य अवगाहना सब की एकसी होती है, स्थिति आश्रिय पार स्यान हीनाधिक क्यों कि अयाय अंगुल के असहगातत्र 'भाग की अवगाहनापाले NIRT- पंचम पर्याय पद 18+ भर्थ 4 भनुरादाबाममपारी मुनि श्री ममोहक मिमी + मणता पजवा पण्णत्ता ॥ उदोसोगाणगाण भते । नेरइयाण केवइया पजवा पपणचा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णचा ॥ सेकेणट्रेण भते ! एवं बुबह उको- सोगाहणयाण नेरइयाण अणता पज्जवा पण्णचा ? गोयमा! उक्कोस्लेगाहणए नेरइए, उफोसोगाहणस्त नरह्यस्स दयट्टयाए तुल्ले,पदेसट्टयाएतुल्ले ओगाहणट्टयाए तुल्ले,ठिईए, सियहीणे, सियतुझे सिय अम्महिए ॥ जइहीणे असखिवह भागहीणेवा, समिबह भागहीणेवा, अह अम्महिए असखिज भागमभहिएवा, सखिज्ज भागमम्महिएवा ।। घण्ण-गध रस-फास पनवेहिं तिहिंनाणोहि तिअण्णाणेहि, तिहिदसणेहि, छट्ठाण यदिए नारकी की स्थिति जप यदद्यनारपर्पकी उत्कृष्ट तेचीस सागरोपपकी होती है वर्ण,गंध,रम, स्पर्श,तीन शान, तीन महान पतीनदर्शन माश्रिय पद स्थान सीनाधिक बहा गौतम ! इसनिय ऐमा कहा गया किमघन्य मानाना पास नारकी को अनंत पर्यर को अहो मगवन् ! उत्कृष्ट ५०० धनुष्य की आगानागासे निरोकोकिन पर्यर को हो गौतम भनत पर्यप कामो भगवन् ! किस कारन से उलट भरगा- हनापाले रीये को भनत पर्यन को है। महो गौतम ! उत्कृष्ट अवगाहनामा नारकी उत्कृष्ट अवगा- नारा मारकी से ट्रम्प भाप्रिय सुरपा, प्रदेश भाश्रिय मुल्य हैं, बरमाश्ना भाप्रिय है तुरुप क्यों कि . भकाभक राजावादर खासा मुसदेवसायमी बामपसम्पनी ? पञ्चदश-पण्णपणा सूम-चत्य उपान + सेएण?ण गोयमा ! एव वुचइ उक्कोसोगाहणगाण नेरइयाण अणतापज्जवा पण्णता।। अजहण्णमणुक्कोसोगाहणगाण भते ! नेरइयाण केवइया पजवा पण्णता ? गोयमा ! अणता पञ्जया पण्णचा ? सेकेण?ण भते ! एव वुश्चइ अजहन्नमणुकोसोगाहगाण नरइयाण अणता पज्जवा पण्णता ? गोयमा । अजहन्नमणुकोसोगाहणए नेरइए अजहणेमण्णकोसोगाहणगस्स नेरइयरस दवट्ठयाए तुम्ल, पदेसट्ठयाए तुले, ओगा- हणट्ठयाए सियहीणे तुल्ले सिय मम्महिए, जइहीणे असरखेज भागहीणेवा सखेज्ज भागहिणेवा सखेज्जगुण होणेवा, असखेज्जगुण होणेवा अहअठमहिएगा असखे- सबकी उत्कृष्ट भवगाहना एरुमी है, स्पिति आश्रिय स्यात् हीन, स्यात् मुल्य व स्यात् अधिक है जब हीन है सर अरूपान भाग हीन, सख्यात भाग हीन और जब अधिक है वर असख्यात भाग अधिक सख्यात माग अधिक से यहां पर दो स्थान होनाधिक पाते हैं क्यों कि उत्कृष्ट अवगााना पाले की स्थिति पापीस सागरोपम स सेवीस सागरोपम की है पांच वर्ण, दो गध, पांच रस, माठ स्पर्श, चीन ज्ञान, सीन अशा ववीन दर्शन आश्रिय षट् स्यान हीनाधिक हैं अहो गौतम । इस लिये ऐसा कहा गया है कि उत्कृष्ट अवगाहनावाल नारकीको भनत वर्यष कई हैं अहा मगवन् ! अमघन्य अनुस्कृष्ट (मध्यम) भगाहनावाले नारकी को कितने पर्यव करे हैं ? अहो गौतम ! मध्यम अवगाहनाचासे नारकी को Ar40 पचम पर्याय पद 487 अर्थ अनुपादक-गारममचारीमुनि श्री यमोनक पिभी उजभाग मम्माहिएवा,सखज्ज मागमभाईएषा, सखज्जगुण मन्माहिएवा, असखेजगुण मध्भाहिएवा बीईए सियहीणे, सियतुझे सिय मन्महीए जइहीणे असखेज्ज भागहीणेचा सखेज्जमागहीणेवा असखेज्जगुणहीणेवा, सखउजगुणहीणेवा अहः अन्महिए असखेज्जइ भाग भन्महिएषा, सखेज्जइ भाग अग्भहिएवा, सखेज्जगुण अम्महिए, असखेजगुण अब्भहिएमा वण्णगधरसफास पज्जवेहिं, तिहिं णाणेहि, तिहिं अण्णाणेहिं तिहिं दसणेहिं छट्ठाण वहिए ॥ सेतेण?ण गोयमा ! एवंवुच्चइ अजहष्णुकोसोगाहणगाण नेरइयाण अणता पजवा पण्णता ॥ जहण्ठईयाण भते ! मन पर्यय कई मो मगनन्' किस कारन से ऐमाका गया है कि मध्यम अपगाहना पाछे नारकी को भनव पयत्र कोरेमो गौतम! मध्यम प्रवगाहनावाले नारकी मध्यम अवगाहनावासे नारकी की साथ द्रव्य तुल्य, प्रदेश से तुल्य, मरगाना माश्रिय स्यात् हीन, स्पात् तुल्य प स्यात् अधिक यदि हीन हारे मो मसंख्याव माग हीन, सरूयात माग सीन, संख्यात गुण हीन ५ असख्यात गुण हीन हैं और भपिक होर तो अमख्यास माग अपिक, सख्यात माग अधिक, सख्यात गुण अधिक प असख्यातगुण अपिका यो चार स्थाने हीनापिक में म्पिति माश्रिय स्यात् हरीन, स्यात् तुल्य र स्यातू भषिको प्रकासक-रामायहादुर लारा सुखदेवसहायमी ग्वालमप्रसादनी 418 पञ्चश-पपारणा सूत्र चतुर्य पान १ पर्य नेरइयाण केवड्या पज्जवा पण्णता ? गोयमा ! अणता पज्जया पण्णचा सेकेणष्टेणं भते ! एव वुच्चइ जहण्णाठिईयाण नेरझ्याण अणता पज्जश पण्णचा ? गोयमा ! जहणीठईए नेरइए जहणेण ठिईए नेरइयस्स दबट्टयाए तुले, पएराष्ट्रयाए तुझे, आगाहणट्ठयाए चउट्ठणा वडिए,ठिईए तुल्ले, वण्ण गर रस फास पज्जवेहि तिहिनाणेहि तिहिअन्नाणेहिं तिहिंदसणेहि छट्ठाण घडिए,मेएण?ण गोयमा! एष धुच्चह जहण्णठिईयाण नरइयाण मणता पज्जवा पण्णचा ॥ एव उकासाठिईएवि, ९व अजहण्णमणुकोस. जय होन हे तो अमरूयात माग हीन, सख्यान भाग हीन, संख्यात गुण हीन व असंख्यात गुण हीन है पाच वर्ण, दो गंध, पांच रम, व पाठ स्पर्श के पर्यत्र की साय मे ही तीनमान, र तीन दर्शन तीन अमान से पद स्थान हाधिक हैं अटो गौतम! इसलिये ऐमा कहा गया कि मध्यम अरगाहनावाले नारकी की धनत पर्यव कहे हैं बहा भगवन् । जघन्य म्यितिपाले नारकी को किसने पर्यत्र का है ? महो गौसम मनस पर्यन कदे में अहो भगवन् ! किम कारन से जघन्य म्पितिवाले नारकी को अनत पर्यव को?? अहो गौतम ! जघप स्पितियाले नारकी अघन्य स्थितिवाले नारकी की साय द्रव्प भाथिय तुल्य है, मदेव आश्रिय सुल्प है, अवगाहना आश्रिय चार स्थान होनाधिक है, स्थिति आश्रिय तुरप , वर्ण, गंध, रस र सर्शक पर्यय से पैम ही तीन शान, चीन अमान र तीन दर्शन भाश्रिय पट् रधान हीनाषिक 45 पचम पर्याय पद 4832 - ठिईएवि, एव नपर सट्टाणे चउटण वडिए, जद्दण्णगुण कालगाण मते ! नेरल्याण केवड्या पज्जवा पण्णचा? गोयमा ! अणता पज्नया पण्णचा.? सेकेण. टेण भंते!एव वुच्चइ जहण्णगुणकालगाण नरइयाण अणता पजवा पण्णत्ता गोयमा। जहण्णगुणकाला नेरइए जहण्णगुणकालगस्स नेरदयस्स इन्वट्ठयाए तुल्ले, पएसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्टयाए घट्टाणवरिए, ठिइए चउट्ठाणवडिए, कालवण्ण पजवेहिं तुल्ले, पर अनुमादक समवारी मुनि श्री प्रमोसर पिनी + हो गोतम इसलिये मघय स्थितिवाछे नारकीको मनतपयन को ऐमेह उत्कृष्ट स्थिति पासे मारकी का जानना पैसे मध्यम स्पितिवाल नारकीका मानना, परतु स्थिति आश्रिय चारस्थान ीनाधिक मामना बहो भगान' मपन्य कालागुणपाडे नारकी को कितने पद का भोगौतम ! भनत परको। मो भगवन् ' किस कारन से मपप काला गुणवाले नारकी को अनंत पर्पर को है? महो गौतम । अपम्प कारागुणवाल नारकी मपन्य कालागुण पाले नारकी की साय ट्रम्प माश्रिय मुल्प, प्रदेश माश्रिय नुत्य, गाना बाप्रिय पार स्थानहीनाधिक स्थिति माश्रिय चार स्थानहीनापिक,कालापर्णवाभिण मुत्य और चार वर्ण, दो गप, पांच रस व आठ स्पर्श के पर्यव आप्रिय बसे हो तीन शान, जीन भवान वहीन वन भाधिय पद स्पान हीनापिक हैं इसलिये पो गौतम ! नपन्य फासा सुनाईमारती * प्रमावर रागावहादुरावासदेससारमी मास्मसादमी - पभ्नदश-पचरपा -पतुर्य पात्र 428 भवससहि वण्ण गष रस फाम पजवहिं तिर्हि नाणेहि, तिाह अण्णाणाह,, IIIEI पहिय, छट्ठाण बठिए, सेतेण?ण गोयमा! एव वुच्चइ जहण्णगुण कालगाणे नेरयाण अमतापजवा पण्णचा ॥ एवं उक्कोसगुण कालएवि, अजहण्ण मणुक्कोसगुण कालएवि एक्वेव, नघर कालवण्ण पनवेहिंवि, छट्ठाणवरिए, एव असेसा चचारि वण्णा, दो गंधा, पचरसा, अट्ठफासा भाणियव्या ॥ जहण्ण आभियोहियणाणीण भते । नेरदपाणं केवड्या पज्जवा पण्णता ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णचा ? से केणट्टेणं भते ! एष सुखद जहण्णाभिघोहियणाणीण नेरइयाण अणता पजवा पण्णता?गोयमा। जहामि कोत पर्यष का ऐसे ही उत्कृष्ट काला गुणवाले नारकी का मानना मध्यम कामा गुणवाने नारकी का भी पैसे ही कहना परतु काला गुण मात्रिय पद स्थान होनाषिक जानना से काम वर्ग का कार से ए चार वर्ण, दो गप, पाच रस 4 माठ स्पर्म का मानना गरो भमरर अपय बाभिनिषोषिक ज्ञानवाले नारकी को कितने पर्यप कहेमहो मौतम! भनत पदको भो भगवन् । किस कारन मे अनस पर्यय करे? अहो गौतम ! जपन्य मानिखिोपिक वानवाये मपन्य आमिनिबोधितमान वाले के साथ द्रव्य से तुरुप, प्रदेश से तुरख, अवगाहना भौप्रियं पार स्थान हीनाधिक, स्पिीस माश्रिय चार स्थान हीनाधिक, पांच वर्ण, दो गध, पार सबभाउ स्पर्श के भई - पदम पर्याय पर RHAR - - भनाटकायापारी मुनि श्री भोला ऋषिमी+ चोहिम आणी नेरइयए जहण्णाभिबाहिय माणिस्त नेरझ्यस्स दवट्ठमाए तुल्ले,पएसट्ठपाए तुल्ले,आगाइणट्टयाए चउट्ठाणवहिए, ठिईए चउट्ठाणहिए'वष्ण-गंध-रस-मास पनवेहि- छठाणवडिए,आमिाणबोहियणाण पजवैहि तुझे, सुयनाण पनवेहि, मोहिणाण पजदेहि,- तिहिं ईसणेहि छट्ठाणवदिए, अण्णापानत्यि, से नणद्वेण गोयमा ! एवं 'बुधई जहण्णाभिवोहिय पापीण नेरझ्याण अणता पजवा. पणन्ता ॥ एवं उक्कोसाभिणि घोहियनाणीवि,अजहण्णमणुकोसाभिणियेहियणाणिवि,एवं क्षेत्र नवर अभिणियोहियणा पनवेहिं बटणवाहिए, एव सुयणाणिवि, आहिणाणिकि, एव चेव लवर जस्सणाणा तस्स पर्यर की साथ पस्यान होनाघेक, मामिनियोषिक मान-फी सार तुल्प, श्रुत मान अपनि जान नवीन दघर की सार पट् स्थान होनापिको इस में अज्ञान नहीं होने से ग्राम नमीये है बो गौतम इमलिये ऐमा कहा गया है कि नघन्य भाभिनि बोषिक ज्ञान पाले नारकी को. अनव प्रया' को ऐसी तस्कृष्ट मामिनि पोपिक मान का मानना मध्यम बामिनियोधिक धान का भी पैसे ही माना परंतु भामिनिषोधिक जन की माय पदस्थान शिनाधिक काना, पेसेही श्रुतहान भराशिान का काना तीर मान का का बेस ही दोन हार का बना परतु जो शान सोपा अमन नहीं काना। और 1 प्रकासक-रापापहादुर साग मुभव महासभी माछामसादमी .

488 पञ्चदस-पमवणा सूम-यमुर्प उपार 4 अण्णाणा नत्थि, जहाणाणातहा अण्णाणावि भाणियन्वा, णवर जस्स अण्णाणा तस्स- णाणा नभवति ॥ जहण्ण चक्खुदसणीण भते ! नेरइयाण केवइया पनवा पण्णता? गोयमा ! प्रणता पज्जवा पण्णचा सेकेण?ण भते ! एव वुच्चइ जहण्णचक्खु पसणीण नेरइयाण अणता पञ्जा ५०? गोयमा। जहण्णचक्खुदसणीण णेरइए जहण्णचक्खुदसणि णणरसणेरइयरस दवट्ठयाएतुले,पएसट्टयाएतुल्ले, ओगाहणट्ठयाए चउट्ठाणघडिए, ठिईए चउट्ठाणवाहिए,वण्ण गध रस फासपञ्जवेहिं तिहिणाणेहिं तिहिं अण्णाणेहिं छट्ठाणयहिए, चक्खुदसण पजवेहिंतुल्ले, अचक्खुदसण पनवेहिं ओहिदसण पनवेहिं छट्ठाणवाहिए महा अज्ञान होवे वहां मान न कहना हो मगवन् ! जघन्य चक्षुदर्शनी नारकी को किसने पर्यन को ? अहो गौतम ! अनत पर्यन कहे है हो भगवन् ! किम कारन से अपन्य चक्षु धर्मनी नारकी को अनं० पर्यर को है ' अहो गौतम ! जघन्य चक्षुदर्शनी नारकी जघन्य चक्षु दर्शठी नारकीकी साथ दून्य से तुरप, प्रदेश से सुरप, अरगाहना आश्रिय चार स्थान नाषिक, स्थिति पाश्रिय पारस्थान सनापिक, वर्ण, गंप रस व मी वैसे ही सीन शान तीन मामान, मचा दर्शन व भवधि दर्शन की साथ पद् यान हीनाधिक मानना आर प दर्शन की साथ तुल्य करना भहो गौतम । इमरिये ऐसा कहा 28 पचम पर्याय पद 43aath अर्थ - ।

( अनकायमचारी मुनि श्री समोसा पनी + घोहिम नाणी नेरइयए जहण्णाभिहिय नाणिस्स नैरइपस्स दवट्ठपाए तुझे,पएसट्टपाए, तुल्ले,ओगाहणट्ठयाए चउट्ठाणवडिए, ठिईए घउट्ठाणवाहिए'वष्ण-गध-रस-झारा पबवेहि- उहाणवहिए,आमिाणबोहियणाण पजवैहि सुळे, सुयनाण पचवेहि, ओहिणाण पनवेहि, तिहिं दसणेहिं छट्ठाणवदिए, अण्णापानदिथ, से वेण?णे गोयमा ! एवं 'धुश्चई जहण्णाभिबोहिय गाणीण नेरइयाण अणता पजवा. पग्णन्ता । एवं उकोसाभिणि घोहियनाणीवि,अजहण्णमणुकोसाभिणिशहियणाणिवि,एव येव नवर अभिणियोहियणाण पनवेहिं बढणवडिए, एव सुयणाणिवि, आहिणाणिवि,एव चेल जवर जस्सप्राणा तस्स पर्यर की साथ पट्स्पान हीनायिक, भामिनियोषिक शान-की'साय तुस्य, श्रुत मान भवनि वानीनं दघर की साप पट् स्थान हीनाधिक रे. इस में ज्ञान नहीं होने से ग्रहण न कीये महो मीतम रमरिये ऐमा कहा गया है कि मघन्य आभिनि सोधिहान पाले नारकी को- अनत पर्यत्र को है ऐसदी रस्कृष्ट भाभिनि पोधिक ज्ञान का मानना मध्यम प्राभिनियोधिक ज्ञान का मी पैसे की काना परंतु भाभिनिषोषिक शान की माय पदस्थान होनाधिक काना, ऐसेही श्रुतज्ञान भपिशान का कहना वीर-कान का कम से ही तीन मामा करना परंतु नहा हान हाने वो महान ना करना और प्रकासक-राषापहादुर साना सव सदामजी मालाममादली .

सपान + 48 पसदश पभषणा मत्र चतुर्य एव बुच्चइ जहण्णागाहणगाण असुरकुमाराण अणता पनवा पण्णचा ॥ उक्कोसोगा. हणएवि एव ॥अजहण्ण मणुकोसोगाहणएवि, एव चव, णवर सट्ठाणे घउट्ठाणवडिए, एवं जहा नेरइया तहा अमुरकुमारा, एव जाव थणियकुमारा ॥ १४ ॥ जहण्णो- गाहणगाण भत ! पुढविकाइयाणं केवइया पज्जवा पण्णता ? गोयमा ! अणता पज्जया पण्णत्ता, से केणटेण भते । एव वुच्चइ, जहण्णोगाहणगाण पुढविकाइयाण अणता पजवा पष्णता ? गायमा ! जहण्णोगाहणए पढविकाइए जहाण्णागाहण गस्स पुढविकाइयस्स इन्वट्ठयाए तुले, पएसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्ठयाए तुम्ले, सीन दर्शन की साथ पट स्थान होनाषिक, मो गौतम 'इमलिये ऐसा कहा गया है कि जपन्य भव- गाना बाल असुर कुमार को अनत पर्यष को ऐसे ही उत्कृष्ट अवगाहना का काना मध्यम अवगाहना का भी पैम ही कहना परतु स्वस्थान भाश्रिय चार स्थान हीनाधिक करना ऐसे ही शेप सब जैसे नारकी का कहा गे ही करना जैसे असुर कुमार का कहा वैरोही स्थनित कुमार पर्यंत सघ का कहना ॥१४॥अहो भगवन! जघन्य अयगाहनावाली पृथ्वीकाया को कितने पर्यघ कई हैं ?हो गौसम! धनप्त पर्यष कहे भो भगान् ! किस कारन से जघन्य अवगाहनावाली पृथ्वी काया को अनप्त पर्यच कहो। भो गौतम ! जघन्य अवगाहनावाली पृथ्वी काया जघन्य अरगाहनावाली पृथ्वीकाया से द्रव्य से तुल्य, पचम पर्याय पद 48 4 ममुगाम पारममचारी मुनि श्री अपार प्रापिभी है। सेण्ट्रेण गोयमा! एव बुच्चइ जहण्याचक्खुदसणीण नेरइयाण अणता पचवा पणाचा एव उद्योसचक्खुदरणीवि, अजइगमणुकास चम्खुदसणीवि,एर घेव नवर सट्ठाणे छट्ठा पवहिए, एन अचम्खुदमगीवि आहिदसगीवि ॥१३॥जहण्णागाहणगाण भते! असुर- कुमाराण कवइया पञ्जवा पणत्ता? गायमा ! अगता पळवा पणत्तासिके गट्ठग भैत । एवं बुच्चइ गायमा ! जहण्णागाह गए अनुरकुमारे जहा गागाहणगस्त अवरकुमारस्स दबट्ट- पाएतुल्ल,पएसट्टयाएतुल्ल ओगाहणट्टयाएतुल्ले, ठिईए चउट्ठाण घहिए, वरुणदिहिं छट्ठाग चाहिए, तिहिं गाणेहिं तिएि अण्णाणे तिहि दसणहिंय ट्ठाण वहिए,सेते गट्टण गोयमा। गया है कि नप य चक्षुदर्शनी नारकी का अनन पर्यव कहे हैं एन की उरष्ट चक्षुदर्शनी को भी जानना पपमपादशन का वैमारी कहना परंतु चक्षुदर्शन आश्रिय पद स्थान हीनाधिक काना ऐसे ही अयक्षदर्शन अघि नयन का करना ॥ ॥ I भगवन् ! मघन्य भवगाएना पाले असुर कुमार को फितने पपत्र काम गौतम अनन पर्पर का ? भहा भगान् ! किप्त कारन से एसा कहा गया कि नपन्य भागाहना वाले भतर कुमार का अनन पत्र कहे ₹ ? भहो गोठ ! अघन्य अवगाहना से भमुर कुपार नर प अवगाहा पाले ममुर कुमार की साय दृष्य मे तुल्य, प्रदेश मे सुल्प, अवगाहना भाधिप सुरप, स्थिति आश्रिय चार स्थान दीनाविक, वर्ण गणं रस सर्श, वीन मान तीन अन्नान व दीन • प्रकासक राजा घाटर राला मुस्ववसहायजी बारमारजी .

. तुझे ओगम्हणष्टयाए चउढाणपडिए, ठिईए तुल्ले, वण्ण गध रस फास पज्जवहि, मइअण्णण सुयअण्णणय घक्खुदसणपजवहिं छट्ठाणवाहिए, से तण?ण गोयमा ! एव युबह जहष्णठिईयाण पुढधिकाइयाण अणता पञ्चवा पण्णचा ।। एवं उक्कोसठिईएपि अजहण्णमणुकोसाठईएवि, एवं चेत्र, णवर सट्ठाण तिट्ठाणवडिए ॥ जहण्णगुणका- लयाण भते ! पुढविकाइयाण पुष्छा' गोयमा ! अणता पजवा पण्णचा, से केणटेण भते ! एव वुच्चइ जहण्णगुणकालगाण पुढविकाइयाण अणता पज्जवा पण्णता ? गोयमा! जहण्णगुणकालए पुढविकाइए जद्दण्णगुणकालगस्त पुढविकाइयस्स पन्चट्टयाए दम्पसे तुरुप,मदेशमे तुल्य अगाइना माश्रिय चार स्थान हीनाषिक,स्थिति माश्रिय तुल्य पांच वर्ण,दो गए, पाच रस माठ सर्भ दा शान व अचा दर्शन की साय पट् स्थान होनाधिक में हो गोठम ! इस लिये एमा कहा गया है कि नघन्य स्थितिवाली पृथ्वीकाया का धनत पर्या कहे। ऐसे ही उत्कृष्ट स्पिनियासी पृथ्वीकापा का मानना मध्यम स्थितिवाली पृथ्वीकाया का वैसे ही कहना परतु स्वस्थान वाश्रिप सीन स्पान हीनापिक मानना बडो भगवन् ! जघन्य काला गुणवाली पृथ्वीकाया के कितने पर्यप को बहा गौतम ! अनत पर्यव कह रे बहो मगवन् ! किस कारन से अनत पर्यन कहे! अहो गौतम ! मघन्य कासा गुण पाली पृथ्वीकाया जवथ काला गुणवाली पृषीकाया की 48+ पञ्चदप पमरणा सूत्र चतुर्ष नपान 49 पचम पर्याय पद 442 .

पारामुनि श्री भयोम ऋषिमी लिईर तिढाणवहिए, पप्णगधरसफास पजवेहिं दोहि अण्णाण अबक्खुदसण पनवेहिय छटाणवहिए से तेण?ण गोयमा ! एवं वुचइ, जहण्णागाहणगाण पुढवि काइयाण अणता पजवा पण्णता, एवं उक्कासोगाइणएणवि, अजहण्णमणुकोसोगाइ- गएवि, एष घेव, णवर सट्टाणे पठट्ठाणवाहिए ॥ जहण्णे ठिईयाण भते ? पुढवि. काइयाणं केवइया पञ्जवा पण्णता ? गोयमा ! अणना पजका पण्णचा, से केणटेण मत ! एव पुचजहण्याठईयाण पुढविकाइयाण अणता पजवा पण्णता ? गोयमा ! जहण्पट्टिईर पुढविकाइए जइण्णाठिईयस्स पुढविकाइयस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसट्टयाए संदेष से तुस्य, भरगाइना बाश्रिय तुल्य, स्थिति भाश्रिय तीन स्थान रीनापिक, पाप पर्ण, दो गम, पाप रस, पाउस्पर्श, दो भाान, व भचक्षुदर्शन के पर्यप की साय षट्स्याम हीनाधिको इसलिये पो गौतम! अपना गानाराले पृथ्वी काया को अनंत पर्यन कर एसे ही उस्कृष्ट भवगाहनाराले का मानना का भरगाहनायासे पृथ्वी कापा का मी पैसे ही नानना परतु स्वस्थान आश्रिय चार स्थान सीना- विक मानना भो भगान् ! मघन्य स्पितिवाली पृथ्वीकाया को कितने पर्पर कहे ? महो गौतम ! अनंत पपा को पहो भगवन् ' अपय स्थितिराली पृथ्वीकापा का अनंत पर्यष फिस कारन से को भी गौतम' मपाप स्पितिवाली पृथ्वीकाया नपन्य स्थिसियाली पृथ्वीकाबा की साथ प्रकाशक-राजापार कासा मसदेवसहायमीमा पसाबी । - 42 पञ्चदन-पभरणा मूत्र धतुर्थ उपान - दुचा गोपमा । जहण्ण मइअण्णाणी पुढधिकाइयए जहण्ण महअण्णाणिस्त पुढवि काइयस्स दबटुयाएतल्ले पएसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्टयाए चउट्ठाण वहिए,ठिईए तिठाण डिए,वण्ण गध रस फास पज्जवेहि छट्ठाण वडिए, मइअण्णाण पञ्चहि तल्ले, सुयअण्णाण पजवेहिं, अचक्खु दसण पज्जवहिय छट्ठाण वडिए, सेएवढेण गौयमा ! एवं वच्चइ जहण्णमइअण्णाण पुढविकाइयाण अणता पजवा पण्णत्ता ॥ एव उकासमइअगाणीवि, जहणमणुक्कोस मइअण्णाणीवि एव चव, णवर सठाणण छहाण वहिए एवं मुयअण्णाणीवि, अचक्खु दसाणिवि, एव चेब, एव जाव वणराई कहे ? अहो मगरन् ! किम कारन से अनत पर्यत्र कहे गये हैं ? अहा गौतम ! जघन्य मसि अमान वाली पृथ्वी काया जघन्य मति प्रज्ञान पाली पृथ्वी काया की माय ट्रव्य स तुल्य, प्रदेश से नुल्य, अवगाहना भाश्रिय चार स्थान होनाधिक स्थिति भाप्रिय तीन स्थान हीनाधिक वर्ण, गध, रस व स्पर्श पर्यव की साथ पद स्थान हीनाधिक , मति अमान पर्यव की साथ तुल्य, श्रुतभनान पर्यव ५ अचनु दर्शन पयत्र की माय पद स्पान हीनाधिक ो गीतम ! इसलिये एसा कहा गया है कि जघन्य मति अज्ञानवाली पृथ्वीकाया को अनस पर्यय करे हैं एसे ही उत्कृष्ट का जानना मध्यम मति भन्मान का भी वैसे ही काना परतु स्वस्थान आनिय पट् स्थान होनाषिक कहना ऐमे ही श्रुस अज्ञान व अचा मर्थ पचम पर्याय पद 187 C4 मान श्री प्रमारक प्रापिभी + तुले पण्सट्टयाए तुल, ओगाहणट्ठयाए चउट्ठाणघहिए, ठिईए तिट्ठाणवहिए, ॥ कालवण्ण पजवेहिं तले अवससेहिं वणगधरसफास पज्जवहिं छट्ठाणवाडिए, दोहि अण्णाणहिं अचक्खुदसण पनवेहिय छट्ठाणवडिए, से तेण?णं गोयमा । एव वुच्च जहष्णगुणकालगाण पुढविकाइयाण अणता पजवा पण्णधा ॥ एवं उक्कोसगुण कालएवि, अजहण्णमणक्कासगुणकालएवि, एव घेर णवर सट्ठाणण छट्ठाणवहिए ॥ एव पचवण्ण दागध पचरसा अट्टफासा भाणियव्या ॥ जहण्ण मइअण्णाणीण भत ! पुढधिकाइयाण पुच्छा १ गोयमा ! अणता पज्जवा पण्णता, से कण?ण भते ! एव माप द्रव्य मे सुल्प, मदश से तुरुप अगाइना माश्रिय चार स्थानीनाधिक, स्थिति माश्रिय धीन म्यान नापिक, कालापर्ण पर्यत्र की माय तुल्प शेष चार वर्ण, दो गध, पांच रम प माठ स्पर्श की साथ की दो अमान व अचा दर्शन की साथ पट् स्यान नाधिक भो गौतम ! इसलिये मघन्य कासा गुण पासी पृथ्वी काया का मनत पर्यप को ऐसे ही उस्कृष्ट काला गुण पाली पृथ्वी काया का मानना मध्यम काला गुण वासी पृथ्वी काया का भी पैस ही जानना परतु स्वस्थान माश्रिय पद स्थान नापिक पमे पांच पण, दा गध, पांच रस, आठ स्पर्श का काना अघन्य मति प्रधान पास पृथ्वी सपा को लिवन पयर कहाँ ? हो गौतम ! जघन्य मति अमान बाली पृथ्वी काया को अनव पर्यप • प्रकाशक राजावादर लाला मुलदव सहायजी मालामसादमी.

- - वुचइ ? गोयमा । जहण्ण मइअण्णाणी पुढविकाइयए जद्दण्ण मइअण्णाणिस्त पुढवि काइयस्स बबट्टयाएतुम्ले पएसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्ठयाए चउट्ठाण वहिए,ठिईए तिठाण डिए,वण्ण गध रस फास पज्जवेहि छट्ठाण वडिए, मइअण्णाण पजयहि तल्ले, सुयअण्णाण पजवेहिं, अचक्ख दसण पञ्जवहिंय छट्ठाण वडिए, सेएवढेण गोयमा ! एव बुच्चइ जहण्णमइअण्णाण पुढविकाइयाण अणता पजवा पंण्णचा ॥ एत्र उकासमइअण्णाणीवि, जहण्णमणुकोस मइअण्णाणीवि एव चव, णवर सठाणण छट्ठाण वहिए, एव मुयअण्णाणीवि, अचक्खु दसाणवि, एवं चेय, एव जाव वणराई कहे? भहो भगवन् ! किस कारन से अनन पर्यव करे गये हैं ? अहो गौतम ! जघन्य मति अज्ञान वाली पृथ्वी काया नघ य मति प्रधान पाली पृथ्वी काया की माथ द्रव्य स सुल्य, प्रदेश मे नुल्य, अवगाहना आश्रिय चार स्थान होनाधिक स्थिति माश्रिय तीन स्थान हीनाधिक, वर्ण, गध, रस प स्पर्श पर्यष की साथ पद स्थान नाषिक , मति अमान पर्यव की साय सुल्य, श्रुतभमान पर्यव प अचन्नु दर्शन पयत्र की साथ पद स्थान हीनाधिक भदो गौतम ! इसलिये एसा करा गया है कि जघन्य मति भवानवाली पृथ्वीकाया को अनव पचव कहे है एसे ही उत्कृष्ट का मानना मध्यम मति अमान का भी वैसे ही काना परंतु स्वस्थान आनिय पट् स्थान हीनाधिक कहना ऐसे ही श्रुत अज्ञान व अचा अर्थ मह पञ्चदश पनरणा मूत्र धतुर्थ उपाङ्ग 4 पचम पर्याय पद ११ . .

भ 7 मुनि श्री प्रमोद प्रपिमी + . तुले, पएसट्टयाए तुलं, ओगाहणट्टयाए चउट्ठाणवाहिए, ठिईए तिट्ठाणवहिए, ॥ कालवण्ण पजवेहिं तुले, अवससेहिं वण्णगधरसफास पज्जवहिं छट्ठाणवहिए, दोहि अण्णाणेहिं अचक्खुदसण पनवेहिय छट्ठाणाडिए, से तैण?ण गोयमा ! एर वुचई जहष्णगुणकालगाण पुढविकाइयाण अणता पजवा पण्ण चा ॥ एवं उक्कोसगुण कालवि, अजहण्णफणुक्कासगुणकालएवि, एव घेत्र णवर सट्टाणण छट्ठाणवडिए । एष पचवण दागध पचरसा अट्टफासा भाणियन्वा ॥ जहण्ण मइमण्णाणीण भत ! पुढयिकाइयाण पुच्छा ? गोयमा ! अणता पञ्जवा पण्णचा, से केणटेण मते ! एव माप द्रव्य मे सुस्प, मदश से तुरय भरगाहना भाप्रिय चार स्थानीनाधिक, स्पिति पाश्रिय तीन स्थान शिनापिक, कानापर्ण पर्पर फी माय तुल्य शेष चार षण, दा गध, पात्र रम प माठ स्पच की साथ मे ही दो मनान व अचा दर्शन की साथ पट् स्थान नाधिक मो गौसम ! इसलिये मघन्य सासा गुण वासी पृथ्वी काया का अनस पर्यप को ऐसे ही उत्कृष्ट काला गुण पालो पृथ्वी काया का मानना मध्यम काला गुण वाली पृथ्वी काया का भी पैस ही मानना परतु स्वस्थान माश्रिय षट् स्थान नापिक एमे ही पाच वर्ण, दा गप, पांच रस, आठ स्पर्श का काना जघन्य मति भझान वास पृथ्वी सपा को सिवन पर्या का ? असे गौतम ! जघन्य मति अमान पाली पृथ्वी काया को अनव पर्यष प्रकाशक-राजावादर लाला मुस्खदव सहायनी ज्वालाप्रसादमी .

भोगाहणाए चट्टणवहिए। जहण्णठितीयाण मते बेइदियाण पुष्छा' गोषमा! अर्णता पजवा पण्णचा,सेकण?ण भते । बेइदियाण पुच्छा' गोयमा । जहण्णाठिईप बेइदिए जह- पणठितियस्स घेइदियस्स दवट्टयाए तुल्ले,पदेसट्टयाए तुले ओगाहणट्टयाए चउट्ठाण वडिए, टितीएतुले षण्ण गध रस फास पजवेहि वोहि अण्णाणेहिं अचक्खुदसण पञ्चबेहियछट्ठाण वाहिए, सेतेण?ण गोयमा! एव वुच्चइ जहण्ण ठिईयाण बेइदियाण अणतापज्जवा पण्णता एव उकोसठितीवि,णवर दोणाणा अमहिया,अजहण्ण मणुकोसाठिईए जहा उक्कोसठितीए गवर ठिईए तिढाणवडिए॥जहण्णगुणकालयाण येईदियाण पुच्छा? गोयमा! अणता पनवा मानना परतु इन में शान नहीं है मध्यम अवगाहना का भी जघन्य अवगाहना जैसे ही कहना परतु संस्थान भानिय चार स्थान हीनाधिक मानना भो भगवन् ! मघन्य स्थितिवाल पेइद्रिय की पृच्छा, भदो गौतम ! अनव पर्यव को है बो मगवन् ! फिस कारन से भनत पर्यव को है ? अहो गौतम' मपन्य स्पिविषाले पेट्रिय जघन्य स्थितिमाले पेइंद्रिय की साय द्रव्य से तुल्य, प्रदेश आश्रिय तुल्य, भसाइना भाभिय चार स्थान हीनापिक, स्पिति आश्रिय तुरय, पर्ण, गध, रस व स्पर्ष पर्यव वैसे ही दो महान व अघा दर्शन पर्यष की साथ पट् स्थान हीनाषिक मानना अहो गौतम ! इस लिये जघन्य स्थितियाली पेइट्रियकी अनत पर्यव को हैं ऐसे ही उत्कृष्ट स्थिविवाले पईट्रिप का जानना परतू अर्थ 480+ पञ्चदश-पभरणा मत्र-चतुर्य उपान * पचम पर्याय पद 4343498 ।

+ अनुवादबासमवारी मुनि श्री भमोसा ऋपिनी + काइया ॥ १५ ॥ जहण्णोगाहणगाण मते ! वेदियाण पुष्छा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णता से केण?ण भते ! एव वुच्चइ जहण्णोगाइणगाण घदियाण मणता पजना पण्णता ? गोयमा । जहण्योगाहणए बेइदिए जहण्णोगाहणास्स घेइदियरस दवट्ठयाए तुल्ले,परसट्ठयाए तुम्ले, ठिईए तिट्ठाण वडिए, सेतेणटेण गोयमा! एव पुच्चइ जहण्णोगाहगाण बेइघियाण अणता पजवा पण्णत्ता॥ एव उक्कोसोगाहणएवि णवर णाणणत्थी ।। अजहण्णो मणुकोसोगाहणए जहा जहण्णोगाहणए, णवर सट्टाणे दर्शन का मानना जैसे पृथ्वी कायाका का पैसे ही मप्काया यावत् बनस्पविकाया का मानना ॥ १५ ॥ भो मगरन् । जघन्य अवगाहनावाले पेइंद्रिय की पृच्छा, अहो गौवम ! मन पर्यन को। महो मगरन् ! किस कारन से जघय अगाइनायास पाद्रिय को अनस पर्पक का ? अहो गौतम । मघन्य मवगामाताले पष्ट्रिय अघय अवगाहनावाले घेष्ट्रिय की साथ द्रष्य से तुरय, प्रदश से तुरूप, भरगा. ना से तुल्प, स्थिति यात्रिय तीन स्थान होनाषिक, वर्ण, गंध, रस, स्पर्ष, दो शान, दो भन्मान भरा दर्शन के पर्यप की साय पर स्पान हीनाधिक मानना श्री गौतम ! इसलिय ऐमा कहा गया कि मपाप भरनाइनाराले पेइट्रिप को धनत पर्यप कहे हैं ऐसे ही पता बनगाहनाचा ईठिय का प्रकाशक राजारादुर लाम मुनदेवसायबी बाणसादमी.

-४५५ पञ्चदश-पण्णवणा मूत्र-चवर्य उपान tagt पचरसा, अट्टफासा भाणियया ॥ जहण्णाभिबोहियणाणीण भते ! बेइदियाण केवड्या पजवा पण्णता ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णता ॥ से केणट्रेण भते ! एव वुच्चइ जहण्णाभिनियोहियणाणीण बेइदियाण अणतापज्जवा पण्णता ? गोयमा ! जहण्णाभिणिबोहियणाणी बेइदिए जहण्णाभिणिबोहिअण्णाणिस्स बेइदियस्स दवट्ठ- याए तुल्ले, १एसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्ठयाए चउट्ठाण वहिए, ठिईए तिट्ठाण वडिए, वण्ण -गध रस फास पज्जवहिं छट्ठाण वडिए, आभिणिबेहियणाणपज्जवेहिं तुल्ले, सुयणाणपज्जवेहिं छट्ठाण घडिए, अचक्खु दसण पनवेहिय छटाण वहिए, जघन्य गुण काला इद्रिय को अनव पर्यव हैं एमे ही उत्कृष्ट काला मध्यम गुण काला का जानना परतु मध्यम गुण काला में स्वस्थान आश्रिा पट् स्थान होनाषिक करना एसे ही पांच वर्ण, दो गंध पांच रस, व आठ स्पर्श का मानना अहो मगवन् ! जघन्य प्रामिनि पोषिक मान माले केन्द्रिय को कितने पर्यव कहे हैं ? अहो गौतम ' अनत पर्यव कह है ? अहो भगवन् ! किस कारन से अनव पर्यत्र कहाँ ? अहो गौतम ! जघन्य भाभिनियोधिक मान पाले घेन्द्रिय जघन्य पामिनि पोषिक ज्ञान वाले येइन्द्रिप के साथ ठप से सुल्प, प्रदेश से तुल्य, अवगाहना आश्रिप चार स्थान हीनाधिक, स्थिति आश्रिप चार स्थान हीनाधिक, वर्ण गप रम व स्पर्भ पर्यव मेही भुत ज्ञान 4848 पचम पयाय पद Hodae+ अर्थ F 4. मनुवादक-बागप्रमचारीमुनि श्री भमोरा पिमी पण्णा ॥ स केणटेण भते । एच बुच्चइ जहण्णगुण कालयाण वेइदियाण अणता पजवा पण्णत्ता'गोयमा ! जहण्ण गुणकालए येइदिए जहण्णगुणकालयस्स येइंदियस्स ६वट्ठयाए तुल्ले, पएसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्ठयाए चउट्ठाणवडिए,हितीए तिट्ठाणवडिग कालवण्ण पनवेहि तुम्ने अवसेसेहिं वण्ण-गध रस फास पज्जवेहिं दोहिं णाणेहिं दोहिं अण्णाणेहिं अचकखुदसण पञ्जवेहिय छट्ठाणवहिए, से तेणटेण गोयमा ! एव बुच्चइ नहगगुणकालगाण बहदियाण अणता पजवा पण्णता,एव उक्कोसगुणकालएवि,अजहण्ण मणुकोसगुणकालपत्रि, एव चेव णवर सट्टाणे छट्ठाणवडिए, एव पचवण्णा दो गधा, दो पान भपिक काना मध्यम स्पिसिनाले का उस्कृष्ट स्थितियाले मैसे कहना परसु स्थिति माश्रिय चीन स्थान दीनाधिक मानना जघन्य गुणकाला घेइद्रिय की पृच्छा, मो गौतम ' अनव पर्यव कहे हैं मो भगरन् ? मान्य गुण कामा पेद्रिय फो भनस पर्यव किस कारन स को है? अहो गौतम नपन्य गुण कासा पेइंद्रिय जघन्य गुण फाला पेइद्रिय की साथ द्रव्य से तुम्य प्रदेश से तुल्य, अरगाहना माभिप चार स्पान हीनापिक, स्थिति माश्रिय तीन स्यान हीनाधिक, काला पर्ण पर्यत्र आश्रिय तुल्य और शेर चार पर्ण, दो गंध, पांच रस व आठ स्पर्श के पर्यव पैसे दो शान दो अधान व अचा दर्शन सी माय पद स्थान होनाधिक मानना अहो गौतम ! इसलिये ऐसा कहा गया है कि प्रकाशक-राजावादुर लाला मुखदेवसहायगी ज्यालामसादजी * 48 पथदश पभरणा सूत्र-मतुर्य उपास 43 याण केवइया पजवा पण्णता ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णचा, से केणटेण भते ! एव वुच्चइ जहण्णोगाहणगाण पचिंदिय तिरिक्वजणियाण अणता पज्जवा पण्णता ? गोयमा ! जहण्णोगाहए पचिदिए तिरिक्खजाणियस्तए जहणोगाहण. गरस पचिंदिय तिरिक्खजोणियस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसट्टयाए तुल्ले, ओगा- हणट्टयाए तुल्ले, टिईए ट्ठिाणवहिए ॥ वण्ण गध रस फास पजवेहिं दोहिं णाणेहि दोहि अण्णाणेहि दोहि दसणहि छट्ठाणवडिए, से तेणटेण गोयमा ! एव वुच्चइ जहणे जोगाहणगाण पचिदिय तिरिक्ख जोणियाण अणता पज्जवापण्णत्ता,एव उनोसोगाहणएवि, अपय भवगाहना पाले तिर्यंच पचेन्द्रिय को मिलने पर्यष कहे हैं? अहो गौतम ! अनस पर्यव कहे हैं भदो भगवन् ! किम कारन से ऐसा कहा गया है कि जघन्य अवगाहना पाले तियच पचेन्द्रिय को अनस पर्यच का है। अहो गौतम ! जघन्य अवगाहना वाले तिच पचेन्द्रिय जघन्य अवगाहना वाले तिर्यच पचेन्द्रिय की साय द्रव्य से तुल्य, क्षेत्र से तुल्य, मागाहना आश्रिप सुल्प, स्थिति आश्रिप तीन स्थान दीनाभिक अघन्य अषगाइनागाले संख्यास वर्ष के आयुष्पवाले होने से पांच वर्ण, दो गध, पांच रस व आठ स्पर्श पर्यव की साय वैसे ही दो शान दो अन्नान व दो दर्शन की साथ षट् स्थान हीनाधिक, क्यों कि नप य अवगाहनानाले निर्यच में भवधि ज्ञान व निमम ज्ञान नहीं होता है और उक्त दोनों 428 पचम पर्याय पद :- અર્થ - से तणटेण गोयमा एव वुद्यइ जहण्णाभिषेोहियणाणीण, वेइदियाणअणता पज्जवापण्णता एव ठक्कोसोमिाणियोहियणाणीवि, अजहण्णमणुकोसाभिणियोहियणाजीवि एवघेव, णवर छटाणपडिए सट्टाणेण एव सुयणाणीवि,मइअण्णाणीवि,सुयअण्णाणीवि,अबक्खुदसणीवि णवरं जस्थ गाणा तत्थ अण्णाणाणस्थि, जत्थ अण्णामा तत्थ पाणा णस्थि ॥ जत्थ पसण तत्य णाणावि, अणाण्णावि, एवंचेव तेइदियावि, चरिपियाणवि, एव चेव णवर घरखुदसम अम्भहिय, ॥ १६ ॥ जहण्णागाहणगाण मते । पंचिदिय तिरिक्खजोणि +2 मनुवारस-पाकामपारी मुनि श्री अमोमा ऋषिनी " पर्यन र मया दर्धन पर्यप की साय पट् स्थान हीनाधिक मानना और आमनिपोधिक ज्ञान की साप तुस्प मानना भो गौसम ! इसलिये मघन्य भामिनि पोपिक हान पाले इन्द्रिय को मनव पर्पर का १४ एमे ही उत्तर भामिनियोपिक शान पाले का मानना मध्यम भामिनिमोषिक शाम पाळे का भी से परतु सस्पान माश्रिप पद् स्यान हीनापिक आनना ऐसे श्रुतमान का मानना मे भामिनियोधिक मान व अवशान का का पैसी मवि भान र भुत यान का मानन भगा दान का भी वैसे ही फहना परतु भा जान पा महान नहीं और महान सवे वहां ज्ञान और मां दर्शन में यहां शान मान दोनो ही पेसा काना मेसे पेन्द्रिय का का वैसे ही वन्द्रिय का मानना चतुरेन्दिप का भी मे ही कहना परंतु पादर्भन भपिक मानना ॥ १६॥ महा मगरन् • प्रकाशक राजामगदुर लाला मुखदपसहायजी ज्वालापमाजी.

४५९ ठिईए तुल्ले, वण्ण गध रस फास पञ्जयहि, दोहि अण्णाणेहि, दोहिं दसहिं, छट्ठाण चडिए, से तेणतुण गोयमा 1 एव वुश्चइ जहण्णाठिईयाण पचिंदिय तिरिक्ख जोणियाण अणता पजवा, एवं उक्कोसेठिईएवि, एव चेव णवर दो णाणा अभहिया, अजहण्णमणुकोसठिइएवि एवं चेव, णवर ठिईए चउदाण घडिए, तिणि णाणा तिणि अण्णाणा तिणि दसणा ॥ जहण्ण गुणकाल गाण भते ! पचिंदिय तिरिक्ख जोणियाण पुच्छा ? गोयमा अणता पज्जवा १ण्णता से कणद्वेण मते! एव वुच्चा जहण्णगुणकालगाण पचिंदिय तिरिक्खजोणियाण अणता 48 पञ्चदश-पणावणा सूत्र चतुर्य उपाय 48 44 पचम पर्याय पद 484881 अर्थ न्द्रिय जघन्य स्थितिमाले तिर्यंच पचन्द्रिय की साय द्रव्य से सुल्य, प्रदश से सुल्य, अवगाहना आश्रिय चार स्थान हीनाधिक, स्थिति आश्रिय सुल्य, वर्ण, गध, रम व स्पर्श पैम ही दो अज्ञान व दो दर्शन की माय पद स्पान हीनाषिक जघन्य स्थितिवाले तिर्यंच अपर्याप्त होते हैं इस से उस में सम्यक्पना का अभाव हाने से मान न पाता है अहो गौतम ' इसलिये एमा कहा गया है कि जघन्य स्थितिवाले तिर्यंच पचन्द्रिय को अनंत पर्यव कहे। एसे ही उत्कृष्ट स्थितिषाले तिर्यंच पचेन्द्रिय का जानना परतु इस में दो मान अधिक नानना अर्थात दो सान, दो प्रज्ञान व दर्शन होसे है उत्कृष्ट स्थितिवाले युग- लिपे होते हैं उस में दो शान दो अमान निश्चय ही होते हैं मध्यम स्थिति का उत्कृष्ट स्थितिवाले , ग. णवर तिाहणणाह ताह अण्माना पाए गाहणए तहा जहण्णमणुकोसागाहणपि, णवर ओगाहणट्टयाए घउट्ठाणबडिए, ठिईण चउट्ठाणवहिए ॥ जहण्णदिईयाण भत ! पचिदिय तिरिक्खजोणियाण केवइया पबवा पण्णता ? गोयमा ! अनता पज्जवा पण्णत्ता, से केणटेण भने । एव वुच्चइ जहण्णठिईए पचिदिय तिरिक्खजेणियाण अणता पजवा पण्णता? गोयमा । जहण्णठिईए पचिंदिय तिरिक्खजोणिए जहण्णठिईए पचिंदिय तिरि- क्खजोणियस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पदेसट्टयाए तुले, ओगाहणट्टयाए चउट्ठाणवडिए, सदिय जीर तिव में नहीं उत्पन्न हाते में हो गौतम ! इस लिये ऐसा कहा गया है कि मघन्य अवगाहनाराले तिर्यंच को मनत पर्यत्र करे, एसे ही उत्कृष्ट अवगाहनायासे विपंच का नानना परंतु सीन शान, चीन बझान व सीन दर्शन की साथ पट् स्थान हीनाधिक मानना मसे उत्कृष्ट भवगाहना का का वैसे ही मध्यम अवगाहनावाले का जानना परनु मवगाइना माश्रिय पार स्थान सेनाधिक, स्थिति माश्रिप चार स्थान दीनाधिक, अहो मगवन् जपन्य स्थितिवाले तिर्यंच पपेन्द्रिय को कितने पयव कहे हैं ? अहो गौसम' अनस पर्यत्र को ? मो भगान् ! किम कारन से अनम पर्यत्र को है ? भहो गीतम! जघन्य स्पिसिवाल तिपंच पंवे- पर मनुवादक-बाबमपारी मुनि श्री ममोरक ऋपिमी कासक-राजषिदर लाला मुखदयसहायमा नर्थ 43+ पञ्चदश पनपणा सूत्र चतुर्य नपाङ्ग 4 यब्बा ॥ जहण्णाभिणिवाहियणाणीण भते ! पचिंदिय तिरिक्खजोणियाणं केवइया पजवा पण्णचा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णचा सेकेणटेण भते ! एव बुच्चइ जहण्णाभिणियोहियणाणी पचिंदिय तिरिक्खजोणियाण अणता पजवा पण्णत्ता' गोयमा! जहण्णाभिणिबेोहिय णाणी पचिंदिय तिरिक्खजोणिए जहण्णाभिणिबोहियणास पचिं दिय तिरिक्खजोणियस्स इन्चट्ठयाए तुल्ले,परसट्ठयापतुल्ले, ओगाहणट्टयाए चउट्ठाणवडिए, ठिइए चउट्ठाणवहिए,पण्ण गध रस फास पनवेहिं छट्ठाण वहिए ॥ आभिणिबोहियणाण पजयहिं तुले,सुयणाग पज्जवेहि, छट्ठाणवडिए, चक्खुदसण पज्जवेहिं अचक्खुदसण पज्ज- हरीनाधिक जानना महो गौतम ' इम लिये एमा कहा गया है कि जघन्य गुण काला तिर्यच पवेन्द्रिय को अनत पर्यव का एसे ही उत्कृष्ट गुण काला का मानमा मध्यम गुण काला का भी वैसे ही मानना पातु स्वस्थान माश्रिय पद स्थान हीनाधिक जानना एमे ही पांचों वर्ण, दो गप, पांच रस व आठ स्पर्म का नानना अहो भगवन् ! मपन्य भाभिनिषोषिक मानवाले को किसने पर्यष कह महो गौतम! अन पर्यप को बहो भगवन् ! किस कारन से अनव पर्यव कहे हैं? बो गौतम ! जयन्य भामिनिरोधिक मानी जघन्य भामिनियोधिक बानी की काय ट्रव्य से तुस्य, प्रदश से तुरप बरगाहना आश्रिय चार स्पान हीनापिक, स्थिति आश्रिय चार स्पान हीनाभिक, पर्ण 40 पचम पर्याय पद 43+ 420 पर्थ . 42 अनुवादक-मानसमचारी मुनि श्री अमोलक पिनी + पनवा पण्णता ? गोयमा ! जहण्णगुण कालए पचिदिए तिरिक्खजोणिए जहण्णगुण कालयस्त पचिदिय तिरिक्खजोणियस्स दवट्टयाएतुले,पएसट्टयाएतुल्ले, ओगाहणट्ठयाए चउट्ठाणवहिए ॥ ठिईए घउट्ठाणवडिए, कालवण्ण पनवेहिंतुल्ले, अवसेसहि वण्ण- गध रस फास पजवेहितिहिं णाणेहिं, तिहिं अण्णाणेहिं, तिहिं इसणहिं छट्ठाणवडिए, सेतेणगुण गोयमा । एव घुच्चइ अजहण्णगुणकालगाण पचिदिए तिरिक्खजोणियाण अणता पजया पण्णचा ॥ एष उकोसगुणकालएपि अजहण्णमणुक्कोस गुणकालरवि एयचय णवर सट्टाणे छट्ठाणवडिए, एव पचवण्णा, दोगधा पचरसा अट्टफासा भाणि- असे काना परंतु इस में स्थिति आश्रिय चार स्थान हीनाधिक और चीन ज्ञान, तीन महान प तीन दर्शन करना भो भगवन् ! मघन्य गुण काला तिर्यंच पचन्द्रिय के कितने पर्यव को ? अहो गौतम ! मनत पर्या को २ मा भगवन् । किस कारन से ऐमा कहा है कि नघन्य गुण काला विर्यच पचन्द्रिय को अनंत पर्यन कहे हैं ? भो गौतम ! मघन्य गुण काला विर पंचेन्द्रिप मघन्य गुण काला विर्यच पचेन्द्रिय की साथ दुष्प से मुल्य, प्रदेश से तुल्य, मरगाना से चार स्थान हीनाधिक, स्थिति आश्रिय चार स्थान होनाधिक काला पर्ण पर्यव भात्रिय तुल्य मौर शेप पर्ण, गंघ, रम र स्पर्ष, से ही दीन पान, सीन महान प तीन दर्शन भाप्रिय पदस्पान प्रकाशक-गनावहादुर लाला सुखदेवमायनी ज्वालामसादा - " -सूत्र ४०: 48 पंचदश-पनवणासूत्र घसुउपाय - जहणोहियणाणी पचिंदिय तिरिक्खजोगिए जहगोहियणाणिस्स पचिंदिय तिरिक्खजो णियस्स दन्यट्टयाए तुम्ने, पएसट्टयाए तुम्ले, ओगाहणट्टयाए चउढाणवहिए, ठिईए तिद्वाणवडिए, वण्ण-गध-रस फास पबवेहि आभिणिबोहियणाण सुयणाण पबवेहि छट्टाणवहिए, ओहियष्णा पज्ज्वेहिं तुल्ले, अण्णाणणत्थि, चक्षुदसण पज्वेहिं अचस्खु- दसण पजयेहि, ओहिदसण पनवेहिं छट्ठाणवडिए, से तेणद्वेण गोयमा ! एव वुच्चइ जहाणोहिणाणी पदिय तिरिक्खजोणियाण अणत पजवा ॥ एव उक्कोसोहिणाणीवि, अजहष्ण मणुकोसोहिणाणीवि एव चेव, णवर सट्टाणण छट्ठाणवाडिए, जहा आमिणि पचेन्द्रिप नपय अवधि मानी तिर्यंच पचेन्द्रिय की साय द्रष्य से तुल्य, प्रदेश से तुल्य, अवगाहना माश्रिय चार स्थान हीनाधिक, स्थिति माश्रिय तीन म्यान, वर्ण,गघ, रस व स्पर्श से ही आभिनियोपिक मान, श्रुत मान, चक्षुदर्शन, अचक्षु दर्शन व अवधि दर्शन आश्रिय पदस्थान हीनाधिक अवधि मान आश्रिय तुल्य, इस में अज्ञान नहीं हैं, अहो गौसम ! इसलिये ऐसा कहा है कि जघन्य अघि ज्ञान वाले वियंच पद्रिय के अनत पर्यव कहे है एसे ही उत्कृष्ट अवधिमानी का जानना मध्यम भवधि ज्ञानी का भी पैमे ही कहना- परंतु स्वस्थान माश्रिय पद् स्थान हीनाधिक मानना जैमे भाभिनिषोषिक 'ज्ञानी भर्थ पचम पर्याय पद पर - 141 वहिं छट्ठाण यहिए से तेणट्रेण गोयमा । एव वुच्चइ जहण्णाभिणीघोहियणाणीण पचिदिय तिरिक्ख जोणियाण अणता पजवा पण्णता एप उक्कोसाभिणिहियणाणीवि णवर ठिई तिट्ठाण वडि॥ तिण्णिणाणा तिष्णिदसणा,मट्ठाणे तुम्ने सेसेसु छाणवहिए, अजहण्णमणुकोसामिणिबाहियणाणी जहा उक्कासाभिणिबोहियणाणी, णवर ठिईए चढाणवहिए, सहाणे छटाणवाहिए, एव सुयणाणीवि ॥ जहण्णोहिणाणीण मते ! पचिदिय तिरिक्खजोणियाण पुष्छा ? गोयमा ! अणता पञ्जवा ॥ से केणखूण भते ! एवं बुच्चइ जहष्णोहियणाणी पचिंदिए तिरिक्खजाणियाण अणता पज्जचा ? गोयमा ! गंप, रस, व स्पर्श वैसे ही श्रुव मान चक्षुदर्शन प अचक्षु दर्शन आप्रिय पट स्थान हीनाधिक, आभिनि गोपिक मान आश्रिय सुरप, मो गौसम ! इसध्येि एसा कहा है कि नघन्य आभिनिषोधिफ पानी को भनव पर्यव कहे। ऐसे ही उत्कृष्ट आमिनिपोषिक मानी का काना,स्वस्थान माश्रिय तुल्य कहना मध्यम भामिनि प्राधिक ज्ञानी का उत्कृष्ट माभिनियोधिक ज्ञानी जमे कष्टना परतु स्थिवि भाश्रिय चार स्थान सनाधिक मोर स्वस्थान बानिय भी पद स्थान होनाधिक कहना ऐमहा श्रुतमानीका मानना जघन्य अवधि मानी सिपैच पचन्द्रिप की पृचा, अहो गौतम ! मनत पर्यव कह अहो भगवन् अघन्प अमधि मानी नियंच पचन्यि को अनस पपप किस कारन से का है ? महा गौतम ! नपन्ध अपि झानी वियंच 42 अनुवादक पामयनयारी मुनि श्री अमालक प्रापिनी मकाशक-राजावहादुर लाला मुग्नत्वसहायजी ज्वालाप्रसादजी 28 पञ्चदश-पनवणा मूत्र चतुर्य उपाय - सुल्ले, ओगाहणट्टयाए तुल्ले, -ठिईए तिट्ठाणवहिए, वेण्ण-गध रस-फास पनवेहि, तिहिं णाणेहिं दोहि अण्णाणेहिं तिहिं दसणेहि छट्ठाणवाडिए, से तेण?ण गोयमा ! एच वुच्चइ जहण्णोगाहणगाण मणुस्साण अणता पजवा पण्णता, ठक्कोमोगाहणाबि एयचे। णवर ठिईए सियहीणे सिय तुल्ले सिय अम्महिए, जइ हीणे असखिज्जइमागहीणे, अह अठभहिए असखेजइभाग मम्महिए, दोणाणा दोअण्णाणा, दो दसणा, अजहण्णमणु- कोसोगाहणएवि, एवचेव णवर ओगाहणट्ठयाए घउट्ठाणवाहिए, ठिईए चउट्ठाणवीडिए तुल्प, अवगाहना से तुल्य, क्योंकि जघन्प अवगाहनाबाले युगलिये नहीं होने से सख्यान वप का ही आयुष्य होता है वर्ण, गध, रस व स्पर्श के पर्यव वैसे ही तीन मान, सीन अमान प सीन दर्शन की अपेक्षा से षट् स्थान हानाधिक इमलिये अहो गौतम ! ऐमा कहा है कि मपन्य अवगाहनावाले मनुष्य को मनव पर्याय में उत्कृष्ट अवगाहनावाल का भी वैसे ही जानना परतु सिगति माश्रिय स्यात् हीन, स्पात् तुल्य व स्यात् अधिक जानना यदि हीन है तो असख्यात भाग हीन और यदि अधिकतो असख्यात भाग अधिक है दो ज्ञान, दो ममान प्रदो दर्शन होते हैं सत्कृष्ट अवगाहनाराले युगलिये होते हैं. इस लिये उस में मात्र दो भान ऐसे हैं, परंतु अधि सान व अर्थ पचम पर्याय पद :- ? 4- अनुवाहा मगरी पुनि श्री ममोलक प्रापिमी - बौहिपणाणी तहा मइमण्यानी मुयअगाणीय, जहा ओहिणाणी तहा विभगणा- पीय, पक्सुदसणी अचखुर्दमणीय जहा आभिाषियोहियणाणी, आहिदसणी जहा ओहिणाणी, जत्थाणा तत्थ अण्णाणात्थि, ॥ जत्थ दसणा तत्थणा- णावि अण्णाणावि, अस्थिति भाणियन्त्र ॥ १७ ॥ जहण्णोगाहणगाण भते ! मणुस्साण केवइया पनवा पणचा ' गोयमा! अणता पजया पण्णता ॥ से केण?ण मत ! एक बच्चइ जहण्णोगाहणगाण मणुस्ताण अणता पजवा पण्णचा ? गोयमा ! जहण्योगाहणए मणूसे जहगोगाहणगस्स मणुस्ताण दवट्ठयाए तुम्ने, - पएमट्ठयाए का करा से ही मति अमानी प श्रुत मानी का मानना अपपिधानी मसे विमग मानी का कहना पसदनी र मचा दर्शनी का भामिनिपोषिकानी मेसे कहना और अपषि दर्षनी का भवापिलानी से काना परतु इस में माशान या अज्ञान नहर मोर मा अज्ञान है यहां शान नहीं ॥७॥ भो मगरन् ! जप मामाइनापासे मनुष्य के कितने पर्या को को गौवम ! बनत पर्यन को मो भगरन् ' किस कारन से मघन्य अपगाहनावाले मनुष्य को अनंत पर्यव कहे हैं ? महो गांवम ! जपन्य अवगाहनावाले मनुष्य मपन्य भवगाानापाछे मनुष्य की साप ट्रम्प से तुल्प, प्रदेश से • प्रकाशक रामावरादुर लाला एखदेव सहायनी मासासादमी - 48 पञ्चदश पभषणा मूत्र चतुर्थ उपाङ्ग 982- तुल्ले, आगाइणट्टयाए तुल्ले, - ठिईए तिट्ठाणवाहिए, वण्ण-गध रस फास पनवेईि, तिहिं णाणेहिं दोहिं अण्णाणेहिं तिहिं दसणेहिं छट्ठाणवहिए, से तेणटेण गोयमा ! एय बुच्चइ जहष्णोगाहणगाण मणुस्साण अणता पजवा पण्णचा,उकोमोगाहणपवि एक्चे। णवर ठिईए सियहीणे सिय तुले सिय अम्महिए, जइ होणे असखिज्जइमागहीणे, अह अठभहिए असखेज्जइभाग मम्महिए, दोणाणा दोअण्णाणा, दो दसणा, अजहण्णमणु- कोसोगाहणएवि, एवचेर णवर ओगाहणट्टयाए चउट्ठाणवडिए, ठिईए चउट्ठाणवीडए सुल्प, अवगाहना से तुल्प, क्योंकि जघन्य अवगाहनावाले युगलिये नहीं होने से सख्यात वप का ही आयुष्य होता है वर्ण, गध, रस स्पर्श के पर्यव वैसे ही तीन मान, सीनी अग्नान प तीन दर्शन की अपेक्षा से पद स्थान हीनाषिक है इसलिये अहो गौनम! ऐमा कहा है कि जघन्य अवयाहनावाले मनुष्य को अनस पर्याय उत्कृष्ट अवगाहनावाले का भी पैसे ही जानना परतु स्थिति माश्रिय स्यात् हीन, स्पात् तुस्प व स्यात् अधिक जानना याद हानरेगे असरूयात भाग हान और यदि अधिक है तो असख्यात माग अधिक है दो शान, दोभमान दो दर्शन होते हैं उत्कृष्ट अवगाहनाराले यगलिये वे इस लिये उस में मात्र दो मान होवे हैं, परंतु भाधि शान य अर्थ * पचम पर्याय पद 43:22 41 अमुपाठक पालामवारी मुनि श्री ममोलक प्रपिमी चोहियणाणी तहा मइअण्णाभी मुयअमाणीय, जहा मोहिणाणी तहा विभगणा- पीप, अक्खुदसणी अचक्खुर्दमणीय जहा आभिषियोहियणाणी, आहिसणी जहा ओहिणाणी, जत्थपाणा तत्थ भण्णाणात्थि, || जत्थ सणा तत्थणा- गावि अण्णाणावि, अस्थिति भाणियन्त्र ॥ १७ ॥ जहण्योगाहणगाण भते ! मणुस्साण केवइया पजवा पपणचा ? गोयमा! अणता पञ्चधा पण्णता ॥ से केण?ण मते । एक वुच्चइ जहण्योगाहणगाण मणुस्साण अणता पजवा पण्णचा ? गोयमा ! जहण्योगाहणए मणसे जहम्मोगाहणगस्स मणुस्साण दवट्ठयाए तुझे, - पएमट्टयाए का का वैसे ही मति अमानी व पानी का बानना भवपिज्ञानी जैसे विमग शानी का कहना पसुदर्शनी मचा दर्शनी का मामिनियोधिक ज्ञानी मैसे कहना और मनधि दर्शनी का भवापि मानी मस काना परतु इम में महा शान यहां अमान नहीं और नाग अहान है यहां नान नहीं ॥१७॥ मो भगवन् ! नपन्य मरमानापासे मनुष्य के किवने पर्यप को मो 'गौतम ! अनत पर्यन को मो भगवन् ! किस कारन से जघन्य अवगाहनावाले मनुष्य को मनंत पर्या को? महो गांवम ! जपन्य अवगाहनावासे मनुष्य मघन्य अवगारनापाले मनुष्य की साथ द्रष्प से दुल्प, मदेश से • प्रकाशकानावरादुर साला मुखदेव सहायनी मालामसादमी - -- तुल्ले, आगाहणट्ठयाए तुल्ले, ठिईए तिढाणवहिए, वण्ण-गध रस फास पजवेहि, तिहिं णाणेहिं दोहि अण्णाणेहिं तिहिं दसणेहि छट्ठाणवहिए, से तेणद्वेण गोयमा ! एप चुचइ जहण्मोगाहणगाण मणुस्साण अणता पजवा पण्णचा,उकोमोगाइणएवि एबचे। णवर ठिईए सियहीणे सिय तुल्ले सिय अम्महिए, जइ होणे असखिज्जइभागहीणे, अह अम्महिए असखेज्जइभाग ममाहिए, दोणाण। दोअण्णाणा, दो दसणा, अजहण्णमणु- कोसोगाहणएवि, एवचेव णवर ओगाहणष्टयाए चउट्ठाणवदिए, ठिईए चउढाणवीडए 418 पश्चदश-पमवणा मत्र चतुर्य उपाङ्ग १११ अर्थ . तुल्य, अवगाहना से तुल्य, क्योंकि जघन्य अवगाहनावासे युगलिये नहीं होने से सख्यात पप का ही भायुष्प होता है वर्ण, गध, रस प स्पर्श के पर्यव वैसे ही तीन मान, तीन अमान प सीन दर्शन की अपेक्षा से पद स्थान हीनाषिक इमलिये अहो गौनम ! ऐमा का है कि मपय अवगाहनावाले मनुष्प को पना पर्याय में उत्कृष्ट अवगाहनावाल का भी वैसे ही जानना परतु स्थिति माश्रिय स्यात् हीन, स्पात् तुल्य व स्यात् अधिक जानना यदि हीन है तो असख्यात भाग हान भौर यदि अधिकतो असख्यात माग अधिक है दो मान, दोभमान प्रदो दर्शन होते हैं उत्कृष्ट अवगाहनावाले यालिये होते हैं इस लिये उस में माम दो मान होते हैं, परतु बाधि ज्ञान य पचम पाय पद 4313 4 अनुसादक-पालामपारी मुनि श्री ममोक ऋगिनी + आइलहिं घउहिं णाणहिं छट्ठाणवाहिए, केवलणाण जवेहिं तुले, तिहिं अण्णाणहि तिहि दमणहिं छटाणवहिए, कवलदसण पज्जवेहिं तुल्ले ॥ जहण्णाठिईयाण भते ! मणुस्साण कत्रइया पनवा पण्णत्ता' गोयमा ! अणता पजवा पपगत्ता से केपटेणं भते । एव बुच्चइ जहण्णाठिईयाण मणुस्साण अणता पजवा पण्णता ? गोयमा । ज हष्णठिईए मणुस्से जहाणठिइयस्स मणुमस्स दबट्टयाए तुल्ले,पएसट्टयाए तुल्ले, ओ- गाहणटुपाए चउट्ठाणवतिए, ठिईए तुल्ले, यण्ण-गध रस फास पज्जवहिं दोहिं अण्णाणेहि, देहि दसणेहि,छट्ठाणवाहिए,से तेणटेण गोयमा! एव पुच्चइ जहण्णाठिईयाणे मपि दर्शन नसकेर म पम अवगहनावाले मनुष्य का भी येमे ही कहना परसु अरगाइना माप्रिय चार स्थान हीनाधिक, स्थिति भाधिप चार स्थान हीनापिक, पहिले के पार पान, मतिद्वान, मृत बान, भवधिमान प मनापर्यव दान, तीन अमान व दीन दर्शन की साय पट् स्थान होनाधिक मौर रक्स शान, केवल दर्शन की साथ मुल्य बहो मगपन् । मपय स्थितिषाने मनुष्प के कितने पर्यप हैं ? मो गौसम ! मनेत पर्यष कोरे भो भगवन् ! किस कारन से नपन्य स्थितिवशले मनुष्य को भनत पर्यर को! महो गीतम! मपन्य स्थितिवाले मनुष्य मघन्य स्थितियाले मनुष्य की साप व्य ने तुरय, प्रदेश से तुल्प,अवगाहना आश्रिय पार स्थान हीनाषिक,स्थिवि आश्रिय तुल्य वर्ण,गप, रस प्रकाशक-राजामहादुर लाला अम्वदेवसहायजी बालापमादजी । .

मणुस्साणं अणता पजर, १०॥एव उकोसठिईएषि,णवरं दोणाणा अमहिया,अजहण्णम. णुकोसठिईएवि एव,णवर ठिईए चउट्ठाणवडिए ओगाहणट्टयाए पउट्ठाणवडिए,आइलेहि घउहिणाणहि छट्ठाण वहिए,केवलणाणपज्जवेहिं तुल्ले,तिहिं अण्णाणेहिं तिहिं दसणेहि छट्ठाणवाहिए, केवलदस्णपनवेहिं तुझे, जहण्णगुण कालयाण भते ! मणुस्माण केवइया पजवा१ष्णता ? गायमा ! अणता पज्जवा पण्णता, से केणटेण भते ! एवं वुच्चइ जहण्णगुण कालयाण मणुस्साण अणता पनवा पण्णता ? गोयमा ! जहण्णगुग tag पञ्चदन-पनवणा सूम-धतुर्य उपाङ्ग र अर्थ प स्पर्श पर्यर की साय वैसे ही दो अशान घ दो दर्शन की साय पदस्थान हीनाविक अहो गौतम! इम लिये ऐमा कहा गया है कि जघन्य स्पितिवाले मनुष्य के अनन पर्यच हैं ऐसे ही उत्कृष्ट स्थितिबाले मनुष्य का जानना परतु दो मान अधिक कहना, क्यों कि उत्कृए स्थितिवाल युगलिये होते हैं मध्यम स्थिसियाले का मी पेमे ही कहना परगु स्थिति बाश्रिय चार स्थान हीनाधिक, पहिले के चार मान, तीन अन्नान व तीन दर्शन की साय पदस्थान हीनाधिक केवल दर्शन आश्रिय तुस्प अहो भगवन् ! जघन्य गुण काला मनुष्य के कितने पर्यत्र कहे हैं? अहो गौतम । अनत पर्यप कहे 7 अहो भगवन् ! किम कारन से भनस पर्यष को है। अहो गौतम ! जघन्य गुण काला मनुष्य जघन्य गुम काला मनुष्य की पंचम पर्याय पद 484 .

47 अनुवादक-सारसमपारी मुनि श्री ममोरफ मामी आइप्लाहिं बउहिं णाणहिं छठाणवडिए, केवलणाण पचवेहिं तुझे, तिहिं अण्णाणहि तिहिं दमणहिँ छट्ठाणवडिए, कवलदसण पज्जवेहिं तुल्ले ॥ जहण्णाठईयाण भते । मणुरसाण क्वझ्या पचवा पण्णता गोयमा ! अणता पजवा पपगत्ता से केणट्रेणं मते । एव वृञ्चइ जहण्णाठइयाण मणुस्साण अणता पजवा पिण्याचा गोयमा । ज- हठिए मणुस्से जहण्णठिइयस्त मणुसस्स दन्यट्टयाए तुल्ले,पएसट्टयाए तुल्ले, ओ- गाहणट्ठयाए चउट्ठाणवाहिए, ठिईए तुल्ले, वष्ण-गघ रस-फास पज्जवहिं दोहि अण्णाणहि, देहिं दसणेहिं,छट्ठाणवाहिए,से तेणद्वेण गोयमा! एष वुच्चइ जहण्णठिईयाणे माप दर्शन ना ते मध्यम अत्रग इनापाले मनुष्य का मी येमे ही कहना परतु अवगाहना भानिय चार स्थान हीनापिक, स्थिति अप्रिय चार स्यान दीनापिक, पहिले के चार मान, मविधान, श्रुत शान, समाधिज्ञान व पन पर्यष मान, तीन महान प तीन दर्शन की साय पद् स्थान होनाधिक भौर कार मान, केरल दर्शन की साथ मुल्य भो भगवन् ! नपय स्थिचिवाल मनुष्य के किवने पर्य? महो गौतय ! अनत पर्यव को भहो भगवन् ! किप्त कारन से जघन्य स्थितिवासे मनुष्य को मनस पर्यव को १ महो गौवम ! नपन्य स्थितियाले मनुष्य मधन्य स्पिसियाले मनुष्य की साप द्रव्य मे तुरुप, मदेश से तुल्प,अपगारना माश्रिय चार स्थान हीनापिक,स्थिवि माश्रिय तुल्प वर्ण,गंप, रस प्रकाशक-राजामहादुर राला सावदेवसायजी बालाप्रमादजी मणुस्साणं अणता पज्जर ५०॥एव उकोसठिईएवि,गघर दोणाणा अम्भ है या,अजहण्णम. णुक्कोसठिईएवि एव,णवर ठिईए चउट्ठाणवहिए ओगाइणट्टयाए घउठाणवडिए,आइलेहिं चउहिणाणहि छट्ठाण वहिए,केवलणाणपज्जवेहि तुल्ले,तिहिं अण्णाणेहिं तिहिं दसणहिं छट्ठाणपाडिए, केवलदस्णपनवेहि तुम्ने, जहण्णगुण कालयाण भते ! मणुस्माण केवइया पज्जवापण्णता ? गायमा ! अणता पजवा पण्णता, से केण?ण भते । एव वुचई जहण्णगुण कालयाण मणुस्माण अणता पज्जवा पण्णता ? गोयमा ! जहण्णगुण 4887 पञ्चदश-पनवणा सूत्र-चतुर्थ उपाङ्ग र अर्थ घ स्पर्श पर्यय की साय जैसे ही दो अज्ञान व दो दर्शन की साय पट्स्थान हीनाविक अहो गौतप! इस लिये ऐमा कहा गया है कि मघन्य स्थितिवाले मनुष्य के अनन पर्यव हैं ऐसे ही उत्कृष्ट स्थितिवाले मनुष्य का जानना परतु दोधान अधिक कहना, क्यों कि उत्कृष्ट स्थितिवाल युगलिये होते हैं मध्यम स्थितिपाले का भी पेमे ही कहना परनु स्थिति बाश्रिय चार स्थान हीनाघिय, पहिले के धार मान, तीन अमान व तीन दर्शन की साथ पस्थान हीनाधिक केरल दर्शन आश्रिय तुरुप अहो भगवन् ! नपन्य गुण काला मनुष्य के कितने पर्यप कहे? भो गौसम ! अनत पर्यष कई ? अहो भगवन् ! किम कारन से अनत पर्यप को हैं? अहो गौतम ! जघन्य गुण काला मनुष्य जघन्प गुम फाला मनुष्पकी पचम पर्याय पद 498 १ भनाबदर-बाहापारा मुनि श्री ममामक प्रापिगी g कालएमणूस जहण्यगुगकालगमणूसस्त दवट्याए तुल्ले, पदसट्टयाए चउटाणाडिए ठिईए घरद्धाण वहिए कालवण्णपज्जवहिं तुम्ने, अवससेहिं वण-गध रस-फास पनवेहि छटाणवाहिए आइल्लहिं चउहिँ गाणेहिं छटाण वडिए केवलगाण पजवेहि तुम्ने तिहि अण्णाणेहिं तिहि दसणेहिं छटाणवहिए, केवलदसण पनवेहिं तुल्ले, सेतेगट्टेण गोयमा एवं बुच्चइ जहण्णगुण कालगमणूसाण अण्णता पजया पण्गवाएव उफोसगुणकालएपि, अजहण्ण मणक्कीसगुण कालएवि एवचेव, णवर सटाणे साथ ट्रन्य भाश्रिय सुस्प, प्रदेश माश्रिय तुल्य, अवगाना माश्रिय चार स्थान होनाधिक, स्थिति माप्रिय चार स्पान हीनाधिक, कासा वर्ण पयप पाश्रिय तुल्य, अप चार वर्ण, दो गंध, पांच रम व मात स्पथ के पपा से पहिले चार ज्ञान, सीन भन्मान य सीन दर्शन की साप पदस्थान हीनाधिक भौर केरल हान केस दर्शन के पर्यत्र की साथ तुल्य भरा गौतम ! इम लिये एमाला गया है कि जघन्य गुण काला मनुष्य के अनी पर्यत्र हैं ऐसे है। उत्कृष्ट गुण कारा मनुष्य का मानना मध्यमगुण फाला मनुप्प का भी पेमे ही कहना परतु स्वस्थान आश्रिय पद स्पान होनाधिक जानना ऐसे ही पांच वर्ण, दो मंघ, पांच, रस, ए आठ स्पसका मानना अहो मावन् । जपना प्रकाशक-राजावहादर लाला मुम्बदेव महायनी ज्वालाप्रमारजी . .

छटाणवहिए ॥ एव पचण्णा, दोगधा, पचरसा, अफासा भाणियव्वा ।। जहणा- भिणियोहियणाणीण भते । मणूमाण केवइया पजवा पण्णचा ? गायमा ! अर्णता पज्जवा पण्णचा सेकेणद्वेग मत ! श्व वुचइ जहण्णामिणिबोहिय गाणीण अणता पनवा पण्णता ? गोयमा ! जद्दण्णाभिणियोहियणाणी मणुस्से जहण्णाभिणियोहिय गाणिस्त मणूसरस दवट्ठयाए तुल्ले पएसट्टयाएतुल्ले ओगाहणट्ठयाए चउट्ठा- वाडिए, ठिईए चउट्ठाणपडिए, वण्णगधरसफास पजवेहि छट्ठाणवडिए ॥ आभिणि 48 पञ्चदश पनपणा सूत्र चतुर्थ उपाङ्ग 48 484 पंचम पर्याय पद 48431 भाभिनियोधिक शानवाल मनुष्य के कितने पर्यव कहे हैं ? अहा गौसम अनस पर्यव कह है। अहा भगवन् किम कारन से अनव पर्यव कह । अहो गौतम । जघन्य आमिनियोधिक मानी जघन्य, आमिनिवाधिक झानीकी साय द्रव्य से तुलप, प्रदेश से तुल्य अंधगाना आश्रिय चार स्थान हीनाधिक स्थिति आश्रियं चार स्थान होनाधिक, रणे, गप, रस, व स्पर्श के पर्य। आश्रिय पट स्थान हावाधिक आभिनिमोधिक मानी के परी माथ तुल्प श्रुत ज्ञान के पर्यत व तो दर्शनकी साथ पस्थान हानीधिक हो गौतम' इमलिये ऐसा कहा गया है कि नयन्य आमिनियोधिक ज्ञानी के अनत पर्यत रहे हैं एस.' उत्कृष्ट भाभिनियोधिन मानी का जानना परंतु स्थिति आश्रिय तीन स्थान हीनाधि तीन मात व ArazHI IT * 4 मनपादक-बार मामराम मुनि श्री भपोप पिमा हर वोहियणाणपज्जवेहिं तुल्ले, सुयणाण पज्जवेहि दोहिं दसहिं छट्ठाण पहिए ससगटुंग गायमा ! एव वुच्चइजणण्णाभिणिबोहियणाणीण अणता पजव पण्णचा॥एवं उक्कोसा- मिणिबेहियणाणीवि, णवर आभिणिबाहिय नाणपजवाहं तुले ठिईए तिट्ठाणवहिए, तिहिं णाणेहिं तिहिं इसणेहिं छट्ठाणवडिए,अजहण्णमणुक्कोसाभिणियोहियणाणी जहा उक्कोसामि- णिवोहियगाणी, णवर ठिईए चठट्ठाणवहिए, सट्ठाणे छट्ठाणवडिए, एवं मुयणाणीवि॥ जहण्णाहिणापमि भते ! मणुस्साण केवइया पजवा पण्णत्ता ? गोयमा ! अगता पजग पण्णचा ॥ सेकण?ण भते ! एव वुधइ जहण्णोहिणाणीण मणुस्साण प्रकाशक-राखावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी. साय पट् स्थान हीनाघिक कहना मध्यम आमिनियम मानी का उस्कृष्ट आििनशेधिक पानी मसे कहना परसु स्थिति आश्रिय चार स्थानानापिक स्वस्थान माश्रिय पद स्यानीनाधिक जानना ऐम ध्रुतमानका मानना भरो भगान् । नघन्य अवपि वानी मनुष्य के कितन पर्यव का? अहो गौतम ! जघन्य भपिशानी मनुष्य के अनंन पर्यर फरे हैं ? आओ भगान् ! किस कारन से ऐमा फहा गया है ? भो गौतम ! जघन्य अपपि मानी मनुष्य मपन्य मवपि मानी मनुष्य की साय द्रव्य से तुल्य, प्रदेश से तुल्प, भवगारना आश्रिय तीन स्थान हीनाधिक स्थिति भाप्रिय नीन स्यान हीनाधिक, वर्ण, गंध, रस व सारा के पक्ष की साप पट् स्थान हीनाधिक दो ज्ञान आश्रिय पदस्यान हीनापिक, मवधि मान - - 1948 पञ्चदश पनपणा सूप-चतुर्य उपा क अणता पजवा पण्णता ? गोयमा ! जहण्णोहिणाणी मणुस्से जहणाह मणुसस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसट्टयाए तुल्ले, आगाहणट्ठयाए तिट्ठाणघडिए, ठिईए तिट्ठाणवहिए,वण्णगधरस फास पजवेहिं दाहिणाणेहिं छट्ठाणचडिए, ओहिणाण पज्जवहिं तुले, मणपञ्चवणाणपज्जवहिं छट्ठाणबडिए तिहिं इसणेहिं, छट्ठाणवहिए, से तेण?ण गोयमा ! एवं बच्चइ जहणहिणाणीण मणसाण अणता पजवा ॥ एव उक्कोसोहि- णाणीवि, अजहण्णमणुकोसोहिणाणीवि एवचेव ॥ णवर ओगाहणठयाए चउट्ठाण घडिए सट्ठाणे छट्ठाणवहिए, एव मणपज्जवणाणीवि भाणियन्वो, गवर आगाहणट्ठयाए आश्रिय तुल्य, मन पर्पष मान व तीन दर्शन थाश्रिय पदस्थान हीनाधिक ऐसे ही उत्कृष्ट अवधि ज्ञान का नानना मध्यम अवधि ज्ञान का से ही कहना परतु अवगाहना थानिय चार स्थान हीनाधिक और स्वस्थान आश्रिय पदस्पान हीनाधिक जैसे अवधि लानी का कहा वैसे ही मन पर्यव ज्ञानी का कहना परतु अवगाहना माश्रिय तीन स्थान जैस आभिनियाधिक मानी का कहा पैसेही मति अमानी व श्रुन अबानी का कहना अवधि ज्ञानी जैसे विभग पानी का कहना चक्षु दर्शनी व अनक्षु दर्शनी का भाभिनिवाधिक मानी जैसे काना और अवधि दर्शनी का अवधि मानी जैस कहना नहीं मान हैं रहा अज्ञान नहीं है मौर जहां अन्नान है वहा मान नहीं हैं और जहाँ दर्शन है वहां शान छ मज्ञान 788- पचम पर्याय पद - मर्थ 42 अनुमादकपाल ग्रमनारी मुनि श्री ममालर अपिमा * चोहियणाणपज्जवहिं तुल्ले, सुयणाण पज्जवेहि दोहिं दसहिं छट्ठाणवाहिए सेप्तणटुंग गायमा ! एव वुच्चइजणण्णाभिणियोहिपणाणीण अणता पज्जव पाणचा॥एवं उक्कोसा- भिणियोहियणाणीवि, गवर आभिणिवाहिय नाणपजवाहि तुझे ठिईएतिट्ठाणवहिए, तिर्हि जाणेहि तिहिं दसणेहिं छट्ठाणवहिए,अजहण्णमणुकोसामिणिबोहियणाणी जहा उक्कोसाभि- णिबोहियणाणी, णवर ठिईए चउट्ठाणवडिए, सटाणे छट्ठाणवाडिए, एव मुयणाणीवि॥ जहण्णादिणाणणि भते ! मणुस्साण केवइया पज्जवा पण्णचा ? गोयमा ! अगता पजग पण्णचा ॥ सेफेष?ण मते ! एव वुवइ जहण्णोहिणाणीण मणुस्साग साथ पट् स्थानहीनाधिक काना मध्यम मामिनिशीष बानी का उस्कृष्ट आणिनिशेषिक ज्ञानी जैसे काना परतु स्थिति माश्रिय पार स्थानीनधिक स्वस्थान माश्रिय पद स्यान सेनाधिक जानना एमही चैतमानका मानना यो मगरन् । जघन्य यापि मानी मनुष्य के कितन पर्यप कह है ? अहो गौतम ! जपन्य भपिशानी मनुष्य के अनत पर्यप को हैं ? अहो भगवन् ! किस कारन से ऐमा कहा गया है ? अहो गौतम ! नपन्य अवधि मानी मनुष्य मपन्य अरपि मानी मनुष्य की साथ द्रव्य से तुल्प, प्रदेश से सुस्प, मरगाना भाप्रिय तीन स्थान होनापिक स्थिति आभिय मीन स्थान हीनाधिक, वर्ण, गंध, रस व स के पयप की साय पट् स्थान होनाषिक दो मान आश्रिय पदस्थान होनाषिक, अवधि मान प्रकाशक राजावहादुर लाला सुस्वदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी. - - 1 488 पश्यदश-पभरणा मूभ चतुर्य पान - ट्टयाए तुल्ले ओगाहणट्ठयाए चउठाण वडिए, ठिईए तिट्ठाण वाडए, 400-11- फास पञ्चवहिं छट्ठाण वडिए, केवलणाण पज्जवेर्हि केवल इसण पनवेहिं तुम्ने, से तेणष्टेण गोयमा ! एव वुच्चइ केवलणाणीण मणुस्साण अणता पजवा पण्णचा ॥ एव केवलदसणीधि मणुस्से भाणियन्ये ॥ १८ ॥ वाणमतरा जहा असुरकुमारा ॥ एव जोइसिया वेमाणिया, णवर ठिईए तिट्ठाण वडिए भाणियध्वा, सेच जीवपज्जवा ॥ १९ ॥ ॥ अजीव पजवाण भते ! कइपिहा पण्णत्ता? गोयमा! दुविहा पण्णचा तजहा रूवि अजीव पजवाय, अरूवि अजीव पज्जवाय || अरूति शान मिरा भय ज्ञान व केवल दर्शन मिया अन्य दर्शनों का अभाव होने से नही ग्राण कोय है हो गौतम ' इसलिये ऐमा कहा गया है कि केवल नानी के अनत पर्यव को मे केवल ज्ञानी का कहा पैसे केवल दर्शनी का ज नना ॥ १८ ॥ नैमे अमरकुमार का कहा मे ही वाणव्यतर का काना ज्योनिपी व वैमानिक का भी वैसे ही कहना परतु स्थिति आश्रिय तीन स्थान होनाधिक जानना यह नीव पर्यव सपूर्ण हुआ ॥१९॥ अप अजीप पर्पच का वर्णन करते है ओ भगवन् । अनीव पर्यव के किसने भेद का' महो गौतम । मनीय पर्यव के दो मद कई १ रुपी अभीय पर्यप और १३ अरूपी मनीय पर्पर अहो मगरन् ! अरूपी अजीव पर्पत के कितने भेद कहे है ? 843 पचम पर्याय पद 498948 अर्थ १ કર્ષ , 4 -42 अनुगारक वारपामारी मुनि श्री अमालक पिमी १ तिट्ठाणवडिए, जहा आभिणियोहियणाणी तहा मइअण्णाणी सुयअण्णाणीय भाणियन्वा, जहा आहिणाणी तहा विभगणाणीवि माणियन्वो, चक्खुदसण अचक्खुदसणीय जहा आभिणिघाहियणाणी,ओहिदसणी जहा ओहिणाणी,जत्थणाणातत्थ अण्णाणाणत्थि जत्थ अण्णाणा तत्थ णाणाणत्थिा। जत्थ इसणा तत्थणाणावि अण्णाणावि ॥ केवल. णाणीण भत । मणुस्साण केवइया पजवा पण्णता ? गायमा ! अणता पज्जया पण्णता ? से केण?ण भते! एव वुच्चइ केवलणाणीण भत! मणुस्माण अणता पजवा पण्णचा गोयमा! कवलणाणी मणुस्स कवलणाणिस्स मणूसस्स एन्वट्ठयाए तुम्ले,पएस- दोनों में भो भगवन् ! केवल ज्ञानी मनुष्य के कितने पर्यच को ? अहो गौतम ! अनत पर्यव को मा भगवन । किम कारन स अनव पर्यव को हैं ? अहो गौतम 'केवल मानी मनुष्य केपस मानी मनुप्प की माय द्रष्प मे तुल्य, प्रदश से तुल्य, भयगाइना से चार स्थान हीनाषिक ४ स्थिति भाप्रिय तीन स्पान हीनाधिक पयों की मात्र सख्यात वर्ष का ही आयुष्य रोता है, वर्ण, गध, रस स्पर्श पयर में पद स्थान हीनापिक और काल ज्ञान छ कवल दर्शन क पर्यष की साथ तुल्य केवल x अपर्याप्त अवस्था म केवल ज्ञान नही होता है परंतु केवल समुद्घात करते सपूर्ण लोक म्यापी केयरी के प्रश दाने स भम्यान गुनी हीनाधिक होती है सूत्र प्रकाशक-राजामहादुर लाला मुखदेनसहायजी ज्वाला प्रसादमी 48 पञ्चदश-पभवणा मूत्र चतुर्थ उपान १ नो सखेजा, नो असखेज्बा, अणता ॥ से केणटेण भते ! एव वुच्चइ तेण नो सखज्जा नो असखजा, अणता ? गोयमा ! अणता परमाणु पोग्गला, अणता दुपए सियास्वधा, जाव अणता दसपएसियाखधा, अणता सग्विज पएसियाखधा, अणता असखेज्ज पएसियास्वधा,अणता अणत पएसियाखधा,से तेण?ण गोयमा! एव वुच्चइ तेण नो सखजा असखेज्जा अणता ॥ २१ ॥ परमाणु पोग्गलाण भते ! केवइया पजवा पण्णचा ? गोयमा ! अणता पज्जा पण्णता ॥ से केण?ण भते! एव वुच्चइ परमाणु पोग्गलाण अणता पबवा ? गायमा ! परमाणुपोग्गले परमाणु पोग्गलस्स भसरूपास नी परतु अनंत है भो भगवन् ! किस कारन से रूपी मनीष पर्यन अनत है ? अगे गौतम मनत परमाणु पुद्गल, मनव द्विपदाधिक स्कष, यावत् अनत दश प्रदेशिक अनत सरूपात प्रदेशिक स्कंध, भनत असरूयात मदशिक स्रूध व अनत अनतमदेशिक संघ हैं अहो गौतम ' इस लिये एसा कहा गया है कि मुख्यात व असख्यात नही परतु अनंत कपीमजीव पर्यष जानना ॥ २१ ॥ अहो भगवन् ! परमाणु पुल के कितने पर्यव कहे हैं। अहो गौतम । अनत पर्यव को है। महा भगवन्! किस कारनसे अनंत पर्यव को है। महो गौतम ! परमाणु पुदल परमाणु पुरस की साय ट्रम्प से तुल्य, प्रदेश से तुरय, मवगाहना से तुल्य, क्योंकि समान प्रदेशावगाहा होने मे + पचम पर्याय पद 88 - 42 अनुदस-मग्रामचारीमुनि श्री ममालक ऋपिनी के अजीवपनवाण भते ! काविहा पण्णता ? गोयमा ! सविहा पण्णत्ता ?, तजहा धम्मात्थिकाए, धम्मत्यिकायस्सदेसे, धामस्थिकायस्सपएसा ॥ अहम्मत्यिकाए, अहम्मत्धिकायरसदसे, ' 'अहम्मास्थिकायस्स पएस् ॥ आगासरियकाए, आ. गासत्थिकार्यरसदेसा, आगासस्थिकायस्सपएसा, अहासमए ॥ सेत्त अरुवि अजीपजवा ॥ २. सवि अजीव पज्जवाण भते । कइविहा पण्णते ? गोयमा चउत्रिदा पण्णचा तजहा-वधा, स्वधेदेसा खधपएसा, परमाणुपागला ॥ तेण भते । किं सखेजा असखेबा अणता ? गोयमा । मा गौतम ! अरूपी अजीव पयव के दश मेद का , धर्मास्तिकाया का स्कंध सो मपूर्ण विभाग, २ धर्मास्तिकाया का देश सा अर्ष, तृतीयादि विभाग और २ प्रदेश सो निर्षिमागरूप मूक्ष्म खम ऐने ही ५ अधर्मास्तिकाया का घ ५ अधर्मास्तिकाया का देश और ६ अप- मस्तिकाया का प्रदेश ७ भाकाशास्तिकाया का स्कष ८ आकाशास्तिकाया का देश भौर ९ भाकाशा निकापा का प्रदेश भौर १० सल यह अरूपी अजीव पर्यत्र हुए ॥ २० ॥ अहो भगवन् ! सी अनीष पयर के किनने भेद को! अहो गौतम पी अजीव पर्यव क चार भेद को है। स्कघ २ देश ३ प्रदेश • परमाणु पुदल भरो मगवन ! ये क्या मरूयाव असत्यात व मनत है ? अहो गौतम ! सम्पादन प्रकाशक-राजावापुर लाला मुलदेवतापमी मारमप्रसादजी. - . * पञ्चदश-पभवणा मूत्र चतुर्थ उपान - नो सखेज्जा, नो असखेजा, अणता ॥ से केणटेण भते । एष युचइ तेण नो सखजा नो प्रसखज्जा, अणता ? गोयमा ! अणता परमाणु पोग्गला, अणता दुपए सियाखधा, जाव अणता दसपएसियावधा, अणता सविज पएसियाखधा, अपाता असखेज पएसियास्वधा,अणता अणत पएसियास्वधा,से तेणद्वेण गोयमा! एवं वुच्चइ तेण नो सखज्जा भसखेचा अणता ॥ २१ ॥ परमाणु पोग्गलाण भते ! केवइया पज्जया पण्णता ? गोयमा ! अणता पज्जवा पण्णता ॥ से केणट्रेण भते! एव बुच्चइ परमाणु पोग्गलाण अणता पववा ? गायमा ! परमाणुपोग्गले परमाणु पोग्गलस्स भसरस्पात नी परतु अनत है अहो भगवन् ! किस कारन से रूपी अमीर पर्यव मानत हैं ? मो गौतम ' भनस परमाणु पुद्गल, अनत दिसदशित स्कष, यावत् मनत दश प्रदेशिक स्कष अनत सख्यात प्रत्रिक स्कंध, अनत असरूपात प्रदभिक स्कय व अनत धनतप्रदेशिक स्कंध में अदा गौतम ' इस लिये ऐसा कहा गया है कि वे मख्यात व अप्तख्यात नहीं परतु अनंत कपीधजीव पर्यव मानना ॥ २१ ॥ अहो भगवन् । परमाणु पुगल के कितने पर्यत्र कहे हैं? अओ गौतम ! अनव व कोहरा भगवन्! किस कारनसे अनंत पर्यव को है। यहो गौतम ! परमाणु पुदल परमाणु पुदल की साय द्रव्य से तुल्स, प्रदेश से तुरप, भवगाहना से तुल्प, पोंकि समान प्रदेशावगाह मेने में * पचम पर्याय पद 887 अजीवपजवाण भते ! काविहा पण्णता ? गोयमा ! सबिहा पण्णचा ? तजहा धम्मात्थकाए, धम्मस्थिकायस्सदेसे, धामस्थिकायस्सपएसा ॥ अहम्मस्थिकाए, अहम्मत्थिकायस्सदसे 'अहम्मत्थिकायस्स पएस् ॥ आगासत्यिकाए, आ- गासस्थिकायेस्सदसा, आगासत्थिकायस्सपएसा, अन्दासमए । सेत्त अरूवि अजीवपजवा ॥ रवि अजीव पजवाण मते ! काविहा पण्णत्वे ? गोयमा चउबिहा पण्णचा तजहा-खधा, स्वधदेसा खधपएसा, परमाणुपागला ॥ तेण भते ! किं सखेबा असखजा अणता ? गोयमा । - अनुरादक-मचारीमुनि श्री ममारक प्रापिमी * भरा गौतम । अरूपी अजीव पर्यव के दश भेद को हैं । धर्मास्तिकाया का स्कप सो मपूण विभाग, २ धर्मास्तिकाया का देश सा अर्ष, तृवीयादि विभाग और ३ प्रश्न सो (निविभागाप मुक्ष्म खण्ड ऐनेही ४ अधर्मास्तिकापा का संघ ५ अधर्मास्तिकाया का देश और ६ अघ मास्तिकाया का मदेश ७ आकाशास्तिकाया का स्कध ८ भाकाशास्तिकाया का देश भौर ९ भाकाशा निकाया का प्रदेश और १० साल या मरूपी अजीव पर्यव हुए ॥ २ ॥ अहो मगन् । पी अमीष पर्य के किमने मेद को ? अहो गौतम पी मजीव पर्पव क चार भेद कहे हैं। स्कष२ देश ३ मदेशप छ । परमाण पुरस मो भगवन ! ये क्या मख्यात असलयात व अनत हैं ? मो गौतम ! समपानी . प्रकाशक-राजावादर लाला मुखदेवसहायनी पालाप्रसादमी.

फास मम्महिएवा, ससिवइमाग मन्भहिएवा संखिजगुण मन्भहिएवा, असखिनगुण मन्भहिएवा, अणतगुण मठमहिएवा ॥ एव सेसवण्ण गध पजवेहिं छट्ठाणवाहिए, फासाण सीय उसिण गिद्ध लुक्खोहिं छट्ठाणवडिए से तणष्टेण गोयमा ! एव वुच्चइ परमाणु पोग्गलाण अणता पज्जवा पण्णत्ता ॥२२॥ दुपएरासियाण खधाण पुच्छा' गायमा! अणता पजवा पण्णचा॥ से केण?ण भते! एव वुच्चइ दुपरासियाण स्वधाण अणता पजया पण्णता?गोयमा!दुपएसिए दुपएरासियरस पन्चट्ठयाए तुल्ले 488 पञ्चदश-पभरणा सूत्र पसुर्य उपार 421 +8+ पचम पर्याय पद 4428 अर्थ . भषिक, सरुयात भाग अधिक, सख्यात मार्ग अधिक, मुख्यात गुण अधिक, असंख्यात गुण अधिक व अनत गुण अधिक है ऐसे ही शेष पर्ण, गंध, रस प स्पर्श की साथ पट् स्थान दीनाधिक मानना स्पर्शमें शीत, अण, झिम्प ष स ये चार स्पर्भ खेना अहो गौवम । इस कारनसे ऐमा कहा गया कि परमाणु पुरस के अनव पर्यर हैं ॥ २२ ।। अहो भगवन् ! दिपदेशिक स्कंध की पृच्छा, अहो गौतम ! अनंत पर्यप का है बहा भगवन् ! किस कारन से दिनदेशिक संघ के बनत पर्यव कहे है। अहो गौतम दिमदशिक पद्विपदेशिक कप की साय द्रव्य से सुस्य क्यों कि दिमदेशिक सबस्कप समान हैं, प्रदेश से सुल्य ? पों को सब में दो प्रदेश में अवगाहना माश्रिय स्यात् हीन, स्पात् तुल्य प स्यात् अधिक है . . + मनुरादप-बालप्रसपारी मुनि श्री अमोलक पानी में दन्वट्टयाए तुळे , पएसट्टपाए तुल्ले, ओगाहण?ए तुम्ले, ठिईए सियहीणे सियतुल्ले, सियअन्माहिए, जइहीणे असखेजाभागहीणेवा, सखेबइ भागहीणेवा, सखि जगुण- हाणेवा, असवेबगुण होणेवा, अह अम्महिए, असखिजइ भाग मठमहिएवा, सखिज्जइभाग मन्भाहिएवा, सखिजगुण मम्महिएवा, असखिजगुण मन्भहिएया, कालवण्ण पज्जवेहिय सियहीणे सियतुल्ले, सियअम्महिए, जहाणे, अणतभागहीणे, असखबइभागहीणेवा, सखेजहभागहीणेया सखेबइगुणहीमेवा, असखिज्वइगुणही- वा, अणतगुणहीणेवा, जइ अभिहिए, अणतमागे मम्भाहिएवा असखिज्वभाग स्थिति से स्पात सीन, स्यात् तुल्य ष स्यात् अषिक जाहीन है वो पतल्यात माग हीन, सस्यात भाग रीन, सस्पात गुण हीन व अमरूयात गुण हरीन है, परमाणु पहल की स्थिति जघन्य अतर्मुहूर्त उक्त असल्यास कास की रे मब अधिक होता अमरूपात भाग अधिक, सग्ख्यात भाग अधिक, सरूपान गुन अधिक म अरूयात गुण भकिक कासे पर्व पर्यम से स्वाद रीन, स्यात् तुरुप व स्यात् अधिक माहीन है तब मनत माल बीम, असंस्माद मम सन, सहयात माग रीन, सरख्यात गुण शिन, प्रसंस्पात गुन हीन व मानव मुण हीम, यो स स्थान हीन है. ना अधिक है तो बनत भाग • प्रकाशक-राजापहादुर लाला हसदेवसायजी बालाप्रमादनी . . - - ४७७ 49 पञ्चदश-पभरणा सूत्र चतुर्य उपार 42 मम्महिएवा, सखिबइभाग मम्महिएका संखिजगुण मम्महिएवा, असखिनगुण मन्भहिएवा, अणतगुण मठमहिएवा ॥ एव सेसवण्ण गध • रस - फास पर्जवेहिं छट्ठाणवाहिए, फासाण सीय उसिण णिड लुक्खोहि छट्ठाणवहिए से तण?ण गोयमा ! एव वुच्चइ परमाणु पोग्गलाण अणता पज्ववा पण्पत्ता ॥२२॥ दुपरासियाण खधाण पुच्छा' गोयमा! अणता पजवा पण्णचा॥ से केण?ण भते! एवं बच्चा दुपएसियाण खधाण अणता पञ्जवा पण्णचा?गोयमा!दुपएसिए दुपएरासियस्त पन्चट्टयाए तुल्ले अधिक, भेसख्यात माग अधिक, सख्यात मागे अधिक, सख्यात गुण अधिक, असंख्यात गुण अधिक व अनत गुण अधिक है ऐसे ही शेष वर्ण, गंध, रस व स्पर्श की साथ पद स्थान हीनाषिक जानना स्पर्शमें शीस, अप्ण, निग्ध प ये चार पर्थ खेता थहा गौसम ' इस कारनसे ऐमा कहा गया है कि परमाणु पुद्गल के अनंस पर्यव हैं ॥ २२ ॥ महो मगपम् ! दिमदेशिक कंघ की पुरा, अहो गौतम भनत पर्यप कह अहो मगवन् ! किस कारन से द्विपदेशिक स्कंध के अनत पर्यव कहे हैं। बहो गौतम ! दिनदक्षिक संघ दिषदेशिक रूप की साय द्रष्य से तुरुप क्यों कि दिनदेशिक सव कप समान हैं, प्रदेश से तुल्प हैं क्यों को सब में दो प्रदेश में अवगाहना भाश्रिप स्पाव हीन, स्पात् तुल्प य स्यात् अधिक हैं अर्थ 4+8 पचम पर्याय पद 48624282 + 4. मनुगादा-मामामधारी मुनि श्री ममोटक प्रापेनी र दवट्टयाए तुले , पएसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणटुए तुम्ने, ठिई सियहीणे सियतुल्ले, सियसम्माहिए, जइहीणे असखेजहभागहीणेवा, सखेबइ भागहीणेवा, सखि जगुण- हणिवा, असस्वेबगुण होणेवा, अह अमहिए, असखिबइ भागमभहिएवा, सखिजइभाग मध्महिएवा, सखिज्वगुण मम्महिएवा, असखिब्बगुण मन्महिएवा, कालपण्ण पजवेहिय सियहीणे सियतुल्ले, सियसम्महिए, जइहीणे, अणतभागहीणे, असखनइभागहीणेवा, सखेबहभागहीणेया सखेजइगुणहीणेवा, असखिज्जइगुणही- त्रा, अणतगुणहीणेवा, जइ अभिहिए, अणतभागे मन्माहिएषा असखिबभाग स्थिति से स्पात हीन, स्यात् तुल्य र स्यास् भषिका नमकीन है वो मसख्यात माग हीन, सस्यात भाग हीन, सरूपात गुण हीन म असख्यात गुण हीन है, परमाणु, पुद्गल की स्थिति अघन्य अतर्मुर्त उत्तर भतरुयात कास की है जब अपिक हा तर अमरुपात भाग भाषिक, सख्यात माग भधिक, सरुयान गुण अधिक प मारुपात गुण भाषिक काले पर्ण पर्यर से स्मात् हीन, स्यात् तुल्प व स्यात् भषिको मम दीन व सनत मान, प्रसस्वाद माग हीन, सख्यात माग हीन, सरूपात गुण शिन, भसख्यात गुनहरीन, र भनत गुण हीम, यों छ समान हीन है ना अधिक है वो भनत भाग प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी सालापमादमी .

पंपदस-पनपणासूत्र पनुउपाय - बुध १ गोयमा ! सखिजपएसिए सखेजपदेसियरस दयट्ठयाए तुझे पएसट्टयाए सियहीणे सिय तुझे सिय भग्भहिए, जइ होणे सखिज्वभागहीणेवा -सखिज्जइगुण- होणेवा अह अन्भहिए सखेज्वइभाग मम्महिएवा सखेवइगुण मभहिएवा, ओ- गाइणट्ठयाए दुट्ठाणवडिए, ट्ठिईए चउट्ठाणवडिए, वण्णइहि उवरिल्लहि चउफास पजहि छट्ठाणवाहिए ॥ असखिजपएसियाणं पुष्छा ? गोयमा ! अणता पजवा ॥ से केणद्वेण भते । एवं वुच्चइ ? गोयमा! असखिज्जपएसिए स्वधे असखिजपएसियस्स भनत पर्यन कहे हैं मो भगवन् ! किस कारन से सख्यात प्रदेशिक कप के मनत पर्यच का? मो गौतम ! सस्पात मदेशिक स्कन्ध सख्यात मदेशिक स्कन्ध की माय इन्य से तुस्य, प्रदेश से स्यात् हीन, स्पात् तुरय प स्यात् अधिक जानना यदि हीन होने सो सख्यात माग हीन प सल्यास गुण हीन और अधिक हो सो समयाव माग अधिक सख्यात गुन अधिक अवगाहना माश्रिय दो स्थान हीनापिक, स्थिति आश्रिय चार स्थान हीनाधिक, वर्ण, गंध, रस प चार स्पर्श आश्रिय पदस्पान हीनाधिक असख्यात मदेशिककी पृष्ठा बहा गौतम ! अनत पर्यव कहे हैं अहो भगवन् ! किम कारनसे अनत कहे हैं ? अहो गौतम । मसंस्पान मदेशिक कप असरूपात प्रदेशिक स्कंध की साय +ta पचम पर्याय पद 494 मर्थ ४५ . + मनुवादक-माणमवारी मुनि श्री बमोठा ऋषिमी - पएसट्टयाए तुले, ओगाइणट्टयाए सिय होणे, सिय तुल्ल सिय अध्भहिए, जइहीणे पदसहीणे, अहमम्महिए पदेस अम्महिए ठिईए चउट्ठाणवहिए, वण्णाई हिं उवरिल्लेहि चउफासेहिय, पज्जवेहि छट्ठाणवटिए ॥ एव तिपएसिएवि, णवरं ओगाहणट्टयाए सिय होणे, सिय तुले, सिय भष्महिए, जइहीणे पएसहीणेवा, दुपएसहीणेवा, मह अभहिए पएसमभहिएवा, दुपएस मम्महिएवा, एवं जाव दस पएसिए, णवर ओगाहणाए पएसपडिवुड्डीकायब्बा, जाव इस पएसिए, पवर पएसहीणेति ॥ सलिन परासियाण पुच्छा ? गोयमा । अणता पजया पण्णचा ॥ से केणट्टेण भते ! एव बदिन होने वो एक प्रदेश शिन होये मोर भपिक हो तो एक प्रदेश अधिक होरे (दिनदेशिक स्कंप एक भावास मदेशागाही भी होते हैं मोर दो प्रदेशावगाही भी होते ) स्थिति माश्रियपार स्थान हीनाधिक, पगप रस द पार स्पर्श माश्रिय पद स्थान हीनापिक ऐसेही तीन प्रदेशिक का काना परंतु भवगाहना वाश्रिय स्वात् रीन, स्यात् तुल्य व स्पास् भपिक नानना यदि धीन होने तो एक प्रदेश दीन, दो प्रदेश शन हावे मौर भपिक हो वो एक प्रदेश भपिकपदो प्रदेश भक्ति होये ऐसे ही दश प्रदेषिक स्रूप पर्पत काना परतु नेसे एस २ प्रदेश साप में बताते पाये, वैसे ही भवमाहना में भी पाना मारत् दक्ष पदेशिक कप में नव प्रदेश हीन मथवा अधिक जानना संस्पात मदेशिक संप की पृग्गो भो गौवमा • प्रकाशक रामारादुर नासा सुखदेवसहायनी बालापसादगी.

घुघई ? गोयमा ! सखिजपएसिए सखेजपदेसियरस दयट्ठयाए तुझे पएसट्टयाए सियहीणे सिय तुल्ले सिय अग्भहिए, जइ हाणे सखिजभागहीणेवा सखिज्जइगुण- हीणेवा अह अम्भहिए सखेजइभाग मम्महिएवा सखेजइगुण मन्नहिएवा, ओ- गाहणट्ठयाए दुटाणवडिए, टिईए चउट्ठाणवहिए, वण्णइहि उवरिल्लेहि चउफास पज्जवेहि उटाणवहिए ॥ असखिजपएसियाणं पुच्छा ? गोयमा ! अणता पजवा ॥ से केणद्वेणं भते । एवं बुच्चइ ? गोयमा! असखिजपएसिए खधे असखिजपएसियस्स 4. पंचदश-पनपणासूत्र पतुउपाय : 44 पचम पर्याय पद - मर्थ भनत पर्यन करे। मो भगान् ! किस कारन से संख्यात प्रदेशिक कप के भनत पर्यन कर है? आओ गौतम ! सस्यान मदेशिक स्कन्ध सख्यास मदेशिक स्कन्ध की साय द्रव्य से तुरप, प्रदेश से स्यात् हीन, स्यात् तुरय व स्यात् अधिक मानना पदि हीन होये सो सख्यास माग हीन व सरूपात गुणीन और अधिक हो सो सस्यात माग अधिक सख्यात गुन अधिक अवगाहना भाश्रिय दो स्थान हीनापिक, स्थिति माश्रिय चार स्थान हीनाधिक, वर्ण, गंध, रस चार स्पर्श आश्रिय पदम्पान हीनाधिक असंण्यास प्रदेशिकली पृष्ठा बहा गोवप ! अनस पर्यव कहे हैं बसे भगवन् ! किस कारनसे अनंत को हैं। अहो गौतम । असंरूपास मदेशिक स्कष असरूपात प्रदेशिक स्कंध की साथ मनुवारक-बायसवारी मुनि श्री अपामा प्रापिनी + खयरस दषयाए तुम्ले, पएमट्टयाए चउढाणवहिए, आगाहणट्रयाए चउटाण वहिए ठिइए चहटाणवडिए, ॥ वण्णाइहिं उपरिलहिं घरफासेहिं छटाणवडिए भणतपएसियाण पुग्छा ? गोयमा ! अणता पबवा पण्णता ? से केणष्ट्रेण भंते । ए१ वुच्चइ १ गोयमा । अणतपदेसिए खधे अणतपदेसियरस खधत्स दन्वट्टयाए तुल्ले, पदेसट्टयाए छटाणवहिए, ओगाहणट्टयार चउट्ठाणवाहिए, ठिईए चढाणवहिए, यण्णाइहि अट्टफास पनवेहिं छट्ठाणवदिए ॥ २३ ॥ एगपएसोगाढाणं प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदरसहायजी ज्वालाप्रमादमी दव्य से तुल्प प्रदेश से चार स्थान रीनापिक, अवगाहना आश्रिय चार स्थान होनाधिक, स्पिति माश्रिय पार स्पान हीनाधिक, वर्णादि मौर चार स्पर्श की साथ पट् स्थान होनाधिक अनत प्रदक्षिक स्कंपकी पृरणामो गौवय ! भनस पर्यव को मो भगवन्! किस कारन स अन्त पर्यप करे ? यो गौतम ! मनत प्रदेशिक संघ अनस प्रदशिक स्कंप की माय द्रव्य से तुल्य, प्रदेश आश्रिय पद स्थान हीनाषिक, भरमारना भात्रिय चार स्थान नापिक क्योंकि माकाश पोश मसरुयारा में स्थिति माश्रिय चार स्थान हीनाधिरु, कास भी अतरूपात । वर्ण, गप, रस व भाव सर्ष के पर्यव की साथ पद स्थान रोनाषिक ॥ २३ ॥ अब क्षेत्र आश्रिय प्रम करते हैं, भहो भगवन् ! एक प्रदेशारमाही पुल के ४८१ अर्थ 7 पनाम-पगरणा सुप-चदय उपाद्र १ पोग्गलाण पुच्छा ? गायमा ! अणता पनवा पण्णता ॥ से केण?णं मते ! एवं वुच्चइ ? गोयमा ! एगपएसोगाढे पोग्गले एगपएसोगाढस्स पोग्गलस्स दन्वटुयार तुम्ने, पएसट्ठयाए छट्ठाण वहिए, ओगाहणटुयाए तुम्ने, ठिईए चउट्ठाण पडिए, वणाईउवरिल्लचठफासहिय, छट्ठाण वहिए एव दुपएसोगाढेवि, जाव सपएसौगाढेवि ॥ सखिज्ज पएसागाढाण पोग्गलाण पुच्छा ? गोयमा ] अणता पज्जया पण्णता ॥ से केण्टेण भत ! एष वुश्चइ ? गोयमा । सखिज पएसोगाढे कितने पर्याय है! हो गौसम ! अनत पर्याय भरा भगवन् ! एक प्रदेशावगाही के अनत पर्याय किस कारन स कह हैं ? अहो गौसम ! एक २ प्रदेश अवगाही परमाणु पुदल अन्य एक मदेश भरग ही परमाणु पुद्गल की अपक्षा कर द्रव्य की अपक्षा तुल्य है, प्रदेश की अपेक्षा पदस्यान हीना कि क्या कि भमत प्रदश्च भी एक मदश अवगाही होता है अवगाहना की अपेक्षा सुस्य हैं क्योंकि दोनों एक प्रदशावगाही , स्थिति की अपेक्षा चतुस्थान हीनाधिक है वर्ण गंत्र रस और ऊपर फ चार म्पसकी अपेक्षा पदस्थान हीनाधिको यह जैसा एक प्रदेश अवगाही पुद्गलका कथन कहा ऐमाही दिनदे. भावगाही यावत् दश प्रदेशापगाही का कयन करना सख्यात प्रदेशावगाही का प्रश्न ! भहो गौतम ! अनंत पयाय र अटो भगवन् ! किम काग्न से ऐमा कक्षा कि सख्यात मदेश अवगाही पुल के अनत * पंचम पर्याय पद MP4g + अनुमादक-नारामपारीमुनि श्री भोलक प्रापिनी पोग्गल सखिज पएसोगाढस्स पोग्गलस्स दवट्ठयाए तुले पएसट्टयाए छट्ठाण वहिए, भोगाहणट्ठयाए दुट्ठाण वहिए,ठिईए चउट्ठाण वडिए,वण्णाइहिं उवरिने चउफासेहिय छट्ठाण वहिए ।। असखिन पएसोगाढाण पुच्छा ? गोयमा! अणता पज्जवा पण्णचा॥ सेकण?ण भते! ण्व युच्चइ?गोयमा असखिज पएसोगाढेपोग्गले असखिज पएसोगाढस्स पोग्गलस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसट्टयाए छट्ठाण वहिए, ओगाहणट्टयाए चठट्टाटवहिए, ठिईए घठट्ठागवहिए वण्णाईहिं अट्ठफासेहिय छट्वाणवहिए ॥२४॥ एगसमयठितीयाणं पर्याय' महो गौतम | सरस्पात प्रदेशावगाही पुगस अन्य सरुपात प्रदेश ममगाही पुदल की आपेक्षाफर पार्थ पने तुल्य , प्रदेशार्थ पने पट् स्थान होनाषिक , अवगाहना से दो स्थान हीनाधिक है स्थिति भाश्रिय चतुस्पान नापिक है, वर्ण, गंप रस और ऊपर के चार स्पर्श की आपेक्षा पद स्थान हीना- पिक है । मसंख्यात प्रदानगाही की पुग? अहो गौतम ! अनठ पर्याय को २ ॥ किस कारन महो भगवन् ' भनट पर्याय कहे हैं। महो गौवम १ एक असल्याव प्रदेश भवगाही पुद्गल अन्य मर्स- रूपात मदेश भरगाही पुद्गस की अपेक्षा कर ट्राय पने तुल्य है, प्रदेशार्य पने पद स्थान हानाधिक अवगाहना की मपेक्षा चतुस्थान शिनापिक में स्थिति की अपेक्षा चतुस्थान नाषिक है, ५ पर्ण, २ गंप, ५ रस, ८ स्पर्श की अपेक्षा पद स्थान हीनापिक है ॥२४॥ भपकाल माश्रिय कावे ॥ भो प्रकाधक-राजापार गला मुसदेस सहापजी मालामसादमी.

४८३ मर्थ 4 पञ्चदस-पन्नाणा मप्र-चतुर्य उपासमा पुच्छा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णचा ॥ सेकेणद्वेण भते ! एव वुच्चइ ? गोयमा! एगसमयठितीए पोग्गले एगसममठिईयस्स पोग्गलस्स, दवट्ठयाए तुम्ने, पएसट्टयाए छट्ठाणवाहिए, ओगाहणट्टयाए चट्टाणवहिए, ठिईए तुल्ले वण्णगधरसफास पनवेहिं छटाणवहिए|एव जाव दस समय ठितीयाण,सखेबसमयठिईयाण एवचेव, णवर ठिईए छट्वाणवहिए ॥ असखिज्ज समयठितीयाण एवचेव, णवर ठिईए चउट्टाणवडिए ॥२५॥ भगवन् ! एक समय स्थिति पाछे पुदल के कितने पर्याय में महो गौतम ! अनंत पर्याय है। किस कारन महो मगनन् ! एक समय स्थिति वासे के भनव पर्याय करे ? महो गौतम ! एक समय स्थिति पाले अभ्य एक समप की स्थिविपाल पुदाल की साय दृष्यार्य पने सुल्प है, प्रदेशार्य पने पद् स्थान शिनाधिक है, अषगाहनाकी अपेक्षा चतुस्थान हीनाधिक है, स्थिति की अपेक्षा सुल्य है, पर्ण रस गप स्पर्य की भापेक्षा षट् स्थान होनाषिक है ॥ जैसा या एक समय की स्थिति का कहा वैसाही दश समय की स्थिति तक का कहना संख्यात समय की स्थिति पालेका मी ऐसा ही काना जिस में इवना विशेष संख्यास समय की स्थिति के समय द्विस्थान हीनाधिक कहना (पयोंकि संख्याव समयकी स्थिति है ऐसेही असरूयात समयकी स्थितिवालेका मी कहना जिस में इतना विशेष की स्थिति चतुस्थान हीनाधिकरें क्यों कि असंख्याव काल की स्थिति है ॥ २५ ॥ एक गुनकाल 48848 पचम पर्याय पद 8434 ४८ म मनुवादक बाग्ममचारी मुनि श्री मपोएम पिनी ? एगगुणकालगाण पुच्छा ? गोयमा। अगता पबवा पण्णचा ।। सेकेणद्वेणं भते ! एव बुच्चइ ? गायमा ! एग गुण कालेवि पोग्गले एगगुणकालगस्सपोग्गलस्स दवट्ठयाए तल्ले परसट्टयाए छट्ठाण वडिए, ओगाहणट्ठयाए चउट्ठाण वहिए ठिई घउट्ठाण यहिए कालवण्ण पज्जवेहिं तुम्ने, अवसेराहि वण्णइ गध रस फास पजवेहिं छट्ठाण वहिए ॥ एव जाव दसगुण कालए ॥ सखिजगुण कालएवि एव देव।। णवर सट्टाणे दृट्ठाण पहिए ॥ एव असखजगुण कालएवि णवर सट्टाणे चउट्ठाण वडिए ॥ एवं पास पर्याय की पृच्छा ? भरो गौतम । मन पर्याय को है, किस लिप अहो मगवन एक गुना काले पुद्रस की बनत पर्याय कही है ? महो गौसम ! एक गुन काल पुगल अन्य एक गुन काला पुल की अपक्षा द्रव्पार्यपने तुल्य है, प्रदेशार्थपने पटूस्यान हीनाधिक है, अवगाहना की अपेक्षा चतु स्पान होनाधिक, स्थिति की भपेक्षा मो चतुस्यान रोनाधिक है, काल पर्ण क पुद्गल की अपक्षा तुल्य है, अपर आप चार वर्ण दो गप पांच रस आठ स्पर्श की अपेक्षा पट्स्थान टीनाधिक है जैसा यह एक गुण कास पहलों का कहातेमा ती दा गुण दीन गुण यावत् दश गुण काले पुद्रलों का काना सख्यात गुण वाले पुद्रमों का भी एसा ही करना निम में इसना विशेष की स्वस्थान फाले वर्ण की पर्याय का द्विस्थान हीनापिक होवे हैं क्यों कि ससयाव ही ऐसे ही असख्यात गुण काडे पुद्गलों का भी कहना प्रकाशक-राजापहादुर वाला मुखदवसहायमी ज्वालाप्रसादमी नत्र अणतगुण कालएवि, णवर सट्टाणे छट्ठाण वाहिए ॥ एवं जहा कालए वण्णरस पचन्चया भाणियन्वा, तहा सेसाणवि वण्ण गध रस फासाण वत्तव्यया भाणियबा, जार अणतगुण लुक्खे ॥ २६ ॥ जहण्णोगाइणगाण भते ! दुपएसियाण पुच्छा ? गोयमा ! अणता पज्जवा पण्णता, सेकेणद्वेण मते । एव वुच्चइ ? गोयमा ! जहण्णो गाहणए दुपएसिएखध जहण्णोगाहणगस्स दुपएसियरस स्वधस्स दवट्ठयारतुल्ले, पएसट्ट ८२ मर्थ 498 पञ्चश-पणावणा मूत्र चतुर्य उपाय 48 निस में इसना विशप स्वस्थान काले धर्म के पर्याय की अपेक्षा चतुस्थान हीनाधिक कहना, क्योंकि भस- ख्यात हैं ऐसे ही अनंत गुण काल वर्ण की पर्याय का कहना, जिम में इतना अधिक स्वस्थान में पट्स्पान हीनाधिक है यह मिस मकार काले पर्ण पुगलों की पकव्पता की उस ही प्रकार शेप पाकी र चारों पर्ण क पुद्गलों की व्याख्या करनी, भौर ऐम ही दो गंध की पांच रस की भोर आठ स्पर्श की वक्तव्यता कहना यावत् २० चा घोल मनन गुण ऋस पुग़ल सक काना ।। २६ ॥ मा भगवन् ! जयय अवगाहना वाला दिमदशिर मन्त्र के कितने पर्याय है? (परमाणु पुदल अत्यन्त मूक्ष्म हाने से और सदैव एक ही आकार में राने से उम की जघन्य एत्कृष्ट अवगाहना न होती है इसलिये उस का प्रश्न नहीं पूछने दिप्रदेशिक स्कन्ध का मन या पूछा है) भोगीवम ! अनेन पर्याय करे ॥ अहो भगवन ! हिभदेशिक के अनंत पर्याप किस कारन करे ! पचम पर्याय पद 424 या मनुरादक मान्ममगरी मुनि श्री ममोरक अपिनी + एगगुणकालगाण पुण्छा ? गोयमा! अणता पबवा पणत्ता ।। सेकेणट्रेणं भते । एव युच्चइ ? गायमा ! एग गुण कालेवि पोग्गले एगगुणकालगस्तपोग्गलस्स दन्वट्ठयाए तुल्ले परसट्टयाए छट्ठाण वहिए, ओगाहणट्टयाए चउट्ठाण वडिए ठिईए चउट्ठाण घहिए, कालवण्ण पञ्जवेहिं तुम्न, अवसेसेहिं वपणइ मध रस फास पजवहिं छट्ठाण वहिए ॥ एष जाव दसगुण कालए ॥ सखिबगुण कालवि एव देव॥ णवर सट्ठाणे दुट्ठाण यदिए ॥ एव असखजगुण कालएवि णवर सट्टाणे चउट्ठाण वहिए ॥ एव पुदल पर्याय की पृष्ठा महो गौतम ! मनत पर्याय कहे है, किम लिय अहो भगवन ! एक गुन काले की अनत पर्याय कही? अहो गोसप । एक गुन काल पुगस अन्य एक गुन काला पुस की अपला द्रव्पार्यपने तुल्य है, प्रदेशार्थपने पट्स्यान हीनाधिक है, अवगाहना की अपेक्षा चतु स्थान होनाषिक, स्थिति की अपेक्षा भी चसुस्थान हीनाधिक है, काले पर्ण क पुद्गर की अपक्षा तुल्य है, मपर शप चार पर्ण दो गप पांच रस आठ सर्भ की अपेक्षा पदस्थान हीनाषिक है मैसा यह एक गुण कास पुत्रों का कहा वैमादी दा गुण तीन गुण यावत् दश गुण काले पुद्गलों का काना सरुयात गुण पासे पुदनों का भी एसा कहना मिप में इतना विशेष की स्वस्थान काछे वर्ण की पर्याय का द्विस्थान हीनापिक होते हैं क्यों कि सख्यात ही ऐसे ही भसंख्यात गुण कासे पुलों का भी कहना प्रकाशक राजापरादुर लामा मुसदवसायमी ज्यासमप्रसादमी पत्र अणतगुण कालएपि, णवर सट्ठाणे छट्ठाण वहिए ॥ एव जहा कालए वण्णस्स" पत्तन्वया भाणियचा, तहा सेसागवि वण्ण गध रस फासाण वत्तवया भाणियधा, जाव अणतगुण लुक्खे ॥ २६ ॥ जहण्णोगाहणगाण भते ! दुपएसियाण पुच्छा ? गोयमा ! अणता पञ्जया पण्णचा, सेकेण?ण भते! एव वुच्चइ ? गोयमा ! जहण्णो गाहणए दुपएसिएखध जहण्णोगाहणगस्स दुपएसियस्स स्वधस्स दबट्ठयारतुल्ले, पएसट्ट- मर्थ 4882 पञ्चदश-पणापणा मूत्र घमुर्य उपाय 4g निस में इसना विशप स्वस्थान काले वर्ण के पर्याय की अपेक्षा चतुस्थान हीनाधिक कहना, क्योंकि भस- ख्यात ऐसे ही अनंत गुण काल वर्ण की पर्याय का कहना, जिम में इतना अधिक स्वस्थान में पट्स्थान हीनाधिक है यह जिस प्रकार काले पर्ण पुगलों की पकव्यता की उस ही प्रकार शेष पाकी रा चारों पण के पुद्गरों की व्याख्या करनी, और ऐम दी दो गंघ की पांच ग्स की और माठ स्पर्श की वक्तव्पना कहना यारत् २० या बोल अनंत गुण ऋक्ष पुगल सक करना ॥ २६ ॥ अहो भगवन् ! जघन्य अवगाहना वाला द्विपदेशिर समन्व के किसने पर्याय हैं? (परमाणु पुद्गल अत्यन्त मूक्ष्म हाने से और सदैव एक ही आकार में रहने स उम की मघन्य सत्कृष्ट अवगाहना नही होती है इसलिये उस का प्रश्न नहीं पूछने दिपदेशिक स्कन्ध का प्रश्न या पूछी है) श्रो गाव ! अनन पर्याय को ॥ अहो मगवन ' द्विमदेशिक के अनंत पर्याय किस कारन करे ! 448 पचम पर्याय पद 4848 4 भनुवादसमाप्रमचारी मुनि श्री ममोहक अपिनी ? एगगुणकालगाण पुच्छा ? गोयमा! अणता पजवा पणत्ता || सेकेणट्रेणं भते । एवं बुचइ ? गायमा ! एग गुण कालेवि पोग्गले एगगुणकालगस्सपोग्गलस्स इन्वट्ठयाए तल्ले परसट्टयाए छट्ठाण वहिए, ओगाहणट्ठयाए घउट्ठाण वहिए ठिई घउट्ठाण घहिए कालवण्ण पञ्चवेहिं तुम्ने, अवसराहिं वण्णइ गध रस फास पज्जवहिं छट्ठाण वदिए ॥ एव जाव सगुण कालए ॥ सखिज्वगुण कालएवि एव देव।। णवर सट्ठाणे दुट्ठाण घहिए ॥ एव अससज्जगुण कालएवि णवर सट्टाणे चउट्ठाण वहिए ॥ एवं पहल पर्याय की पृच्छा ? भो गोनम । मनत पर्याय कई है, किम लिय अहो मगमन एक गुन कासे पुल की अनत पर्याय कही है ? महो गोसम ! एक गुन काल पुद्गल अन्य एक गुन काला पुल की अपक्षा द्रव्यार्यपने तुल्य है, मदेशार्थपने पटूस्यान हीनाधिक है, अवगाहना की अपेक्षा चतु स्थान होनाधिक, स्थिति की अपेक्षा मी पतुस्थान रोनाधिक है, काले वर्ण क पुद्गल की अपक्षा तुल्य है, अपर थप चार पर्ण दो गप पांच रस आठ स्पर्श की अपेक्षा पट्स्यान हीनाधिक है मैप्सा यह एक गुण कास पुलों का का तमा ही दो गुण वीन गुण यावत् दक्ष गुण काले पुलों का काना सख्यात गुण काले पुद्रों का भी एसा ही कहना मिप में इसना विशेष की स्वस्थान काळे वर्ष की पर्याय का द्विस्थान हीनापिक होवे क्यों कि स्यातही ऐसे ही असख्यात गुण काले पुगलों का भी करना • प्रकाशक राजापहादुर लामा मुखदवसहायमी ज्वालाप्रसादमी. - મ 42 पचदश पभरणा मूत्र-पतुर्य उपान पत्ता ॥ से केणद्वेण भते ! एव वुच्चइ ? गोयमा! जहा जहण्योगाहणए दुपएसिए एष उक्कोसोगाइणएवि, एव अजहष्ण मणुक्कोसोगाहणएवि एषव।।जहण्योगाहणगाण भते । चठपएसियाण पुण्छा ? गोयमा ! जहण्णोगाहणए दुपएसिएतहा, उक्कोसोगाहणए घउप्पएसिएवि ॥ एव अजहण्णमणुकोसोगाहणएवि, चउप्पएसिए मगवन् ! किस कारन ऐमा कहा कि प्रिप्रदेशिक स्कंप के अनंत पर्याय ! अहो गोतम ! जिम प्रकार निदेशिक संघ का कहा वैसा ही प्रिमदेशिक स्कष का काना, पेमे ही उत्कृष्ट अवगाइनायासे प्रिप्रदे- शिक स्कन्ध का कहना भौर ऐसे ही मजघन्य उत्कट अवगाहना वाले प्रिमदेशिक स्कन्ध का कहना क्यों कि मपन्य अरगाइना वाठा त्रिमदेशिक स्कन्ध एक भाकाश प्रदेश को भरमाहकर रहा है, मध्यम भनगाहना पाला श्रीमदेशिक स्कन्ध दो भाकाम मदेश अवगाहकर रहता है ॥ महो भगवन् ! जघन्य अपगाइना पाला पसुमदेशिक स्कन्ध के कितने पर्याय को है बो गौतम । जैसा द्विपदेशिक स्कन्ध का कहा सैसा की चतुष्पदशिक रूप का भी कहना, ऐसे ही उस्कए अवगाहना पाले चनुप्पदेशिक स्फन्म का कहना, और एसे ही अभन्योस्कृष्ट अवगाहना का भी कहना जिम में इतना विशप भवगाहना की अपेक्षा-स्यात् हीन है स्यात् तुल्य है स्यात् अधिक है यदि हीन है तो एक प्रदेश दोन है और यदि अधिक है तो एक प्रदेषा भपिक है क्यों कि मघन्य एक प्रदेश भवगाही और उत्कृष्ट' 18+पचम पर्याय पद 4341 . का अनुरादक पालग्रामपारी मुनि श्री भोला पिनी + याए तुले भोगाहणट्टयाए तुझे ठिईए घउट्ठाणवडिए कालघण्ण पजेवेहि छदागवडिए, सेस वण गधरसफास पनवेहि छट्ठाणवडिए, सीतउसिण णिधलुक्ख फासेहिं छट्ठाण पहिए सेतण?ण गोयमा ! एव वुच्चइ जहण्णोगाइणगाण दुपएसियाण खंधाण अणता पजवा पण्णता , एष उक्कोसोगाहणए वि याण, अजहण्यमणुकोसोगाहणओणस्थि ॥ २७ ॥ जइण्णोगाइणयाण भते ! तिपएसियाण पुम्छा ? गोयमा ! अणता पज्जवा गो गौतम ! एक नघन्य अपगाइनागराला दिनदेशिक स्कन्ध मन्य मय य अषगाहनावाले दीपदेशिक सन्ध पक्षा से द्रध्यार्य पने तुल्य में प्रदेशार्थ पने भी तुल्य हैं, अवगाहना की अपेक्षा मी तुल्य , स्थिति की अपेक्षा चनुस्यान हीनापिफ है, ऊपर के पार स्पर्श की अपक्षा पद स्थान हीनाधिक है इसलिये महो गीतम' ऐसा कहा कि नपन्य बगानाराले दिमदेषिक स्कघ के अनव पर्याय। जिस प्रकार भप प भवगाहनावाले द्विपदाधिक रूप का कहा उसी प्रकार उत्कृष्ट भगानापाले दिप्रदेशिक संप का काना किन्तु दिमदेशिक कंप की ममघन्योत्कृष्ट (मध्यम) अपगाहना नहीं होती है क्योंकि मो दिनदशिक स्कप एक आकाश प्रदेश का अपगाह कर रहा है यह प्रघन्य अवगाहनावासा का माता भार जो दो भाकाश प्रदेश भागार कर सा पास्कृष्ट मगाइनामाला कहा नाता। इसके भंवर में कुछ भी नहीं होता है इस लिये मध्यम भबगाना न होती है ॥ २७ ॥ भो भगवन् ! मघन्य भरगाइनागाल पिपदेशिक रूप क किसने पर्याय को है ? भाो गौवम ! अनत पर्याय का गो • प्रकाशक-रामाबहादुर लामा पुखदेवसहापनी मालाप्रसादजी. - |४८२ 48 पम्पस फ्भवणा सूम चतुर्थ उपा 4202 गाइणगस्सा साखज्ज पएसियस्स दबट्टयाए तुल, एसट्टयाए पट्टाण पाइए, आगाह गट्टयाए तुम्ने, ठिईए चउट्ठाण यडिए, अण्णादि-उपरिक्ष चठफासे पनवेहिय छट्ठाण बदिए ॥ एवं उक्कोसोगाहणएवि अजहण्णमणुकोसोगाहणएवि एवंचव नवर, सटाणे युट्ठाण वहिए ॥२९॥जहष्णोगाहणगाण भते! असंखजपएसियाण पुष्छा ? गोयमा ! अणता पण्णचा ॥ से केणटेण भते ! एव पुचद ' गोयमा ! जहण्णागाहणए अस. खिजपएसिए खधे जहण्णागाहणगरुस असखिजपएसियरस स्वधस्स दन्वट्टयाए सुल्ले, नाकी अपेक्षा तुल्य है, स्थिति की अपेक्षा चतुस्थान हानायक है, पर्ण गध रस और ऊपर के पार स्पर्क की अपेक्षा पट् स्थान वनाधिक है, ॥ असा या संख्या मदेशिक मघन्य अवगाहना का का वैसा उत्कृष्ट भरगाहना का मी काना और अजघन्य अवगाहना का भी ऐमानी कहना, जिसमें इतना विशेप सस्यान अरगाहनाकी अपेक्षा दोस्थान होनाषिक है ॥२०॥ ओ मगपम् ! मघन्य अवगाहनावाले असख्यात प्रदभिषकी पृया ? अहो गौतम । मनत,पर्याय फहे हैं। महो मगवन ! विस कारन अनतपर्वाय को है महो गौतम ! अघन्य अवगाहनावाला एक असल्यास प्रदक्षिक स्कन्ध अन्य असख्यात प्रशिक सरन्य की. अपेक्षा टम्पार्थ पने तुल्य है, देवी पेक्षा चतुरधान वनाधिक है, ५६मा मर्थ 4 मादक-पानमपारी मुनि श्री भमोक पिनी + णवर ओगाहणट्टयाए सिय होणेसिय सुल्ले सिय अन्भहिए जइहाणे, पदेसहोणे, अहमभहिए,पस मध्भहिए एव जावदस परसिए णेयम्व, भवर अजहण्णमणुकोसोगाह- णए पास परिपुष्टी कायन्धा, जाब दसपएसियस्स, सत्तपएसा परिवुद्धिजति ॥२८॥-- जहणागाहणगाण भते । सखिज्ज पदोसयाणे पुच्छा ? गोयमा! अणता पण्णता ॥ से केण?ण भते ! एव वुच्चइ ? गोयमा ! जहष्णोगाहपए सखिजपएमिए जहण्णा- प्रतुप्पप्रदशिक मवगाही और मध्यम दो-तथा तीन, प्रदेश अपगास होता है इसलिये चार प्रदेश भरगाह की भपता एक प्रदेश हीन और एफ मदन अगाा की अपेक्षा दीप्रदेश अबगाही एक प्रदेश भपिक कामाता यों मागे मी मर्व स्थानकाना ऐसे दी यावत् दश मदेश, भषगाही पर्यन्त करना, निम में इतना विशेप कि ममपन्योत्कृष्ट [ मध्यम ] अब के सूम में अवगाहना की अपेक्षा एकल मोश की वृद्धि करना पायस् दश मदेशिक समयन्योत्कृष्ट स्कन्ध में साल मदेश रीनाधिक कहना ॥ २८ ॥ अहो मगवन् ! मघाप भरगाहना पासे सहपास प्रदेशिक स्कन्ध के कितने पर्याय ! महो गौतम ! मनत पर्याप को हो भगवन् । किम कारन भमंत पर्याप-को ? आओ गौतम । -मधन्य भरगाइना बाला सरम्यान प्रदक्षिक स्कन्ध मन्य मपन्य अपगाइना पासा सख्यात प्रदेशिक स्कन्ध की मिस कर सम्प्राथपने तुल्य है, प्रदेशार्थ पने द्विस्थान दीनाधिको प्यों कि सस्याव प्रदेशिक है मनगा- प्रकाशक-राजापाादुर छाला सुखदेवमहायमी यासाप्रसादमी ४२१ , सर्थ 348 पञ्चदश पनवणा सूम-चतुर्य उपाद तुझे, लिईए चउट्ठाणवडिए, वण्णाईहिं उवरित चउफासेहिय छट्ठाण वडिए । उकोसोगाहणएवि एवचेव, णवर ठिईए सुले, अजहण्यमणकासोगाहणगाण भते ! अणतपदेसियाण पुच्छा' गोयमा ! अणता से केण?ण ' गोयमा ! अजहण्णमणुको. सोगाहणए अणतपरसिए खधे, अजहष्णमणुकोसोगाहणगस्स अणतपदेसियस्सखधरस दवट्टयाए तुझे, पएसट्टयाए छट्ठाणयडिए, ओगाहणट्टयाए घउट्ठाण पडिए, लिईए,, घउट्ठाणवडिए, वण्णाइहिं अट्ठफासहिय छट्ठाणवडिए ॥ ३१ ॥ जहण्णटिईयाण भते । परमाणु पोग्गलाण पुम्छा ? गोयमा । अणता पजवा पण्णचा, क्योंकि उलए अवगाहना माला चतुष्पदेशिक समन्ध सर्व लोकव्यापी होते है ये बचत महिमा स्कन्ध मौर केलि समुदाय कर्म स्कन्ध या दोनों ही दो दर कपाट मंथन मन्तर पूर करते चार समयकी स्थिति होती है ध्यादा नही होती है इमलिये स्थिति आश्रिय तुल्प है, अमघन्योत्कृष्ट अवगाहना पाला अनव प्रदेशिक के किसने पर्याय हैं ? भो गौवम् ! अनत पर्याय को हैं ? अहो मगवन् ! किस कारन से ऐसा कहा ? अहो गौसम ! एक अमघन्योस्कृष्ट [मध्यप] अवगाहनावाला अनत प्रशिक स्कघ मन्प अजघन्योत्कृष्ट अषगाइनाबाले स्कष की अपेक्षा द्रव्यार्थपने तुस्य है, मदेशार्यपने पट्स्वान हीनापिक है, भवमाइना की अपेक्षा चतुस्थान हीनाधिक है, स्थिति की अपेक्षा चतुस्थान हीनापिकी, पांच रण, गंध, पाम रस, भाठ स्पर्श की अपेक्षा पदस्थान हीनाधिक है॥३॥ मषन्प स्विसिचारे 48. HOपचम पर्याय पद 4gb + बनादरनामनाममरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी + परसट्टयाए चट्टामवहिए,ओगाहणट्टयाए सुल्ले,ठिईए चउट्ठाणवहिए,कण्णाईहिं उवरिल चउफासहिय छट्ठाण यहिए एव ॥ उक्कासोगाहणएवि ॥ अजहण्णमणुक्कोसोगाइ णाएवि एव चष, णवर सटाणे बउट्ठाण वहिए ॥ ३ ॥ जहण्णोंगाहणगाण भते ! अणत पएसियाण पुग्छा ? गोंयमा ! अणता पजवा पण्णता ॥ से केणटेण मते ! ए युधइ ' गोयमा! अहण्णोगाहणए अमतपरासिएखधे 'जहण्णोगाहणगस्स अण सपएसियरस वधस्स दन्यट्ठयाए तुजे, पएसट्टयाए छट्ठाण पटिए, ओगाहणटुंयाए ना की अपेक्षा तुल्य है. स्थिति की अपला पतुस्थान होनापिकी पर्न गंभ रस और ऊपर के वास की अपेक्षा पदस्पान होनापिको सेती अस्कर ममाहना का भी काना मनपन्योस्कट मनाना की मवेता भी सारी मेहना, मिस में इसना विशेष सम्मान भनाइना की अपेक्षा पास्थान माधिक मानना॥२०॥ भो मगान्! अपम्म अरमाइनानाम अर्नव प्रदेशिक कंपकी पृष्ठालो मोसमा अनंत प्रति सम्म भम्प अनंत प्रदेशी कप की भपसा दम्पर्व पैने तस्य है, प्रधाई पने पदस्थान दिनाधिक t, षिति की अपेक्षा चतुस्थान नापिक है, पर्ण, गॅप, रस पर वार स्पर्श की अपेक्षा पदस्थान मनापिक मेडी नकार भागााना का भी करना मिस में इतना विश सिसहि अपेक्षा तुम बाना * भकाभक रामाबहादुर साला सुखदेवसहायभी ज्यादा पसादगी । धन पर्याय को मिडिय महो ममान !पमा कामहो मौसम ! एक पन्य मारना त्र 48 अर्थ पएसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणपाए सियहीणे सिय तुल्ले, सिय अमहिए, जइहोणे पदेमहीणे, अध्भहिए पएसममहिए, ठिईप तुम्ने, वणाइहिं उवरिटल चउफासेहिय उहाण वडिए ॥ एत्र उक्कासाठईएवि॥ अजहण्ण मणुक्कोसठिईए एवचर, णवर ठिईए चउखाण वहिए ॥ एव जाप सपएसिए णवर आगाहणट्टयाए तिसधिगमएमु पएस परिनडी कायव्वा ॥ जाव दसपएलिए णव पएसा घहिज्जति, जहण्णठिईयाण मते ! सखिज्ज पएसियाण पुन्छ। ? गायमा ! अणता पजवा पण्णत्ता, से केणष्ट्रेण भते । सय की अपक्षा द्रव्यापन तुल्य है, अगाइना की अपेक्षा म्यात् हीन है, स्पाठ सुल्ग है, स्पस् अधिक in यदि तीन तो एक मशहीन है अधिक है तो भी एक प्रदेश अधिक है स्थितिकी अपेक्षा मुल्य है, वर्ण गप, ग्स और कार के चार प्रदशकी अपेक्षा चतुस्यान हीनापिका एमे ही उत्कृष्ट स्थितिवाले द्विपद और भमय-यो कर स्थिति का भी ऐसारी चयन करना जिस में इतना विशप स्थिति के स्थान गर स्थान होनाषिक करना ॥ यो यावत् द मदनी तक कथन करना, निस में इतना विशेष भप्रयाहना की अपेक्षा तीन मूत्र में प्रदेशों की वृद्धि करना यावत् दश पदेशिक सच में नय प्रदेश सक वृद्धि PER ॥ बहो मगरन ! जपय स्थिति पाला मख्यात प्रदेशी स्कन्ध के कितने पर्याय है ' अहो गौतम 14 न पर्याय ई किस कारन अहो मगवन् । अनस पर्याय है ' अहो गौतम ! एक मघन्य स्थितिसम्म - +भत्र गरगा मन नतर्थ उपाङ्ग पचम पर्याय पद 28+ ।

प्राप्मी र 4 भनुसादबबाहामारी मुनि श्री ममालक सेकेणटुण मत ! एव बुच्चइ' गायमा । जहण्गठिईए परमाणुयोग्गल जहण ठिईयरस परमाणुपाग्गलस्स दट्टयाए तुले, पएसटुयाए तुझे, आगाहणट्टयाए तुले, ठिइए तुले, वण्णाईहिं दुफासे हिय छटाण वहिए, एव उकासेठिईएवि ॥ अजहण्ण मणुको सदिइएवि एवंचव णवर ठिईए चउडाणवडिए जहणठिईयाण दुपएसियाण पुम्छा ? गोयमा ! अणता पनवा पण्णसा ॥ से कणखूण भंते ! एवं वुच्चइ ? गायमा ! जहण्गठिईए दुपएसिए जहण ठईयरस दुपएसियस्त वधस्स दवट्टयाए तुझे. परमाणु पुद्गल की पृष्ठा मो गौतम ! अनत पर्याय , महो मगरनू ! मपन्य स्थितिमाले परमाणु मुद्गस के अनत पर्याय किम कारन से है ? अहो गौवम ! एक मपन्य स्थितिमा परमाणु पुद्गल भ.प मपन्य स्पिविरासे परमाणु पुद्गल की अपेक्षा द्रव्यार्यपने सुत्य है, प्रदेशार्यपने भी सुल्य है, पाकि एक प्रदेशी , भरगाहना की अपसा मी तुल्य है, स्पिति की अपेक्षा मी तुल्य है, पर्ण, गप, रस और अपर से स्पिन की अपेक्षा पदस्यान हीनाषिक है, पसे । रतए अवगाना का भी काग भमपम्पाका मरगाना का भी ऐसे ही काना, परंतु जिस म इसना विशप स्थिति की अपेक्षा चतुस्थान नापिक नपम्प स्थिति निमदेशिक की पृच्छा? महो गीतमा भनत पर्याय विस कारन मरो' भगवन! पमा काभोगीपाएक पन्य स्पितिवाला हिमशिक सय भन्य मपन्प स्पिवित्राला मिक्षित प्रकाशक-राजापटादुर लाला सुखदेवसापूजी ज्वालाप्रमाद नी.

अर्थ d ++पञ्चदश पभरणा मूत्र पतर्थ उपाह 4282 पण्णचा ' से केणटेण भते ! एव वुच्चइ ? गोयमा ! जहण्णठिईए असरिखज पएसिएखधे जहणठिईअस्स असंखब पएसियस्सखधस्स दवट्ठयाए तुल्ले परसट्ठयाए चउट्ठाणवडिए, ओगाहणट्टयाए चउढाण वहिए, ठिईए तुम्ने, अण्णइहिं उघरिल चउफासेहिय छट्पण वडिए, एष उक्कोसाठईवि, अजहण्णमणुक्कोसाठईएवि एव घेव णवर ठिईए चउट्ठाण पडिए ॥ ३२ ॥ जहण्णाठिईयाण अणत पदेसियाण पुच्छा ? पिक है पमे ही सस्कृष्ट स्पिसिकामी कदमा और अजघन्योत्कृष्ट स्थितिका भी ऐसा ही कहना, जिस में सना विशेष स्थिति माश्रिय चतुस्न हीनाधिक कहना अहो भगवन्! जघन्य स्थितिवाले अनंत प्रदेशिक घक विक्षने पर्याय? हो गौतम ! भनत पर्याय कहे हैं! किस कारन से भरो मगमन् ! भनव पर्याय को महो गौतम! मघन्य स्थिति के भनस प्रदेशिक स्कंप भन्य जघन्य स्थिति के अनत प्रदक्षिक स्कंप की अपेक्षा म द्रव्यार्यपन तुल्य है, प्रदेशार्थपने पदस्थान हीनाधिक है, अवगाहना की अपेक्षा चतुस्थान नापिक स्थिति की अपेक्षा सुल्प, वर्ण, गव, रम पाठ स्पर्श की अपेक्षा पद् स्थान हानाधिकई एम ही स्तृष्ट स्थिति का मी काना, और अजघन्पोत्कृष्ट स्पिति का भी ऐमा ही कहना निम में इतना विशप स्थिति की अपेक्षा चतुस्यान हीनाधिक है ॥ ३२ ॥ जपन्य गुण काले वर्ण क परमाणु पुहल की पृच्छा ? अहो गौतम ! अन्च पर्याय कहे हैं अहो भगवन् । किम कारन ऐसा : पंचम पर्याय पद १ मते ' एव वुचइ ? गोयमा ! जहण्गठिइए सखिज पएसिए खधे जहण्णठिईयस्त सखिम पएसियरस वधस्स दवट्ठयाए तुझे, पएसट्टयाए मुलाण घटिए, ओगाह- गट्टयाए दुष्वाण वहिए, ठिईए तुल्ले, वण्णइहि उवरिल्ले चउफासेहिय छट्ठाण याठिए, एव उद्योसठिईएवि, अजहण्णमणुक्कोसठिईएवि एवचेव, णवर ठिईए चउट्ठाण वहिए, जहष्णाठिईयाण भते ! असखिज्ज पएसियाण पुच्छा ? गोयमा ! अणता पजया भनुरा-बाल्यममारी मुनि श्री ममोनक फापनी+ ससयार मटेशिक स्कन्ध अन्प जघन्य मदेशिक संख्या मदनिक स्कन्ध की अपेक्षा दृष्या पने तुल्य पदार्थ पने द्विस्थान हीनापिक है, अवगाहना की अपेक्षा द्वीस्थान होनाधिक है, स्थिति की अपेक्षा नुरूप हैं, रण, गर रस और उपर के चार स्पर्श की अपक्षा पट् स्पान हीनाधिका ऐमे ही उत्कृष्ट स्पिति वाले का भी काना भौर अमपन्योस्कष्ट स्थिति वाल का मी ऐमाही कहना जिसमें इसना विशेष स्थिीन की अपेक्षा पतुस्थान हीनाषिक कहना जघन्य स्थितिवाचे असल्यास प्राधिक स्कंध की पृच्छा १ भो गौतम ! मन पर्याप को किम कारन अहो मगवन् ! अनत पर्याय करे? अहो गौतम एक मपन्य स्थितिमा भसंख्याम मदेशिक कप भन्य अपन्य स्पितिवाले अतरुपात प्रदेशिक स्कंध की अपेक्षा, इम्पार्थपने मुल्य है, प्रदशार्यपने चतुस्थान हीनाधिक में, मयगाना की अपेक्षा चतुस्वान हीना- धिक है, स्थिति की अपेक्षा सुल्प है, पर्ण, गप, रस और ऊपर के चार स्पर्श की अपेक्षा पदस्थान दीना- - प्रकाशक-राजामहादुर ताला मुसदेवसहायमी मालाममादमी , ट्ठयाए तुझे, ठिईए चउट्ठाण बडिए, कालवण्ण पज्जवेहिय तल्ल, अवससा वण्णागरिथ गध रस दुफास पनवेहिं छट्ठाण वहिए, एव उक्कोसगुणकालरवि, अजहण्णमणुक्कोस गुणकाल एवि एवचेव,णवर सटाण छट्ठाणवडिए जद्दण्णगुण कालयाण भत! दुपरसियाण पुच्छा? गोयमा अणता पजवा पण्णचा,से केण?ण भते!एव वुच्चइ 'गोयमा !जहण्ण गुणकालए दुपपासए जहण्णगुण कालगस्स दुपरसियरत दन्वट्ठयाए तुल्ले, पएसट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्टयाए सियहाणे सिय तुल्ले, सिय अभहिर, जइ हीण अर्थ 4. पञ्चदश-पभरणा मप्र चतुर्थ उपा र मो गौसम । अनत पर्याय को ? किम कारन स हो भगवन् ' भनत पर्याय फो?? भो गौतम । एक जघन्य गुण काला दिमदेशिक स्कम मन्य नपन्य गुण कासा ट्रिमदेशिक रूप की अपेक्षा पार्यपने तुल्य ई, मदेशार्थपने तुल्य है, अवगाहना की भपक्षा स्यात् हीन है, स्यात तुल्य है, स्याद मपिक है यदि हीन तो एक प्रदेश टान, भपिक में तो एक प्रदेश अधिक है स्थिति की अपेक्षा चतुस्थान हीनापिकी, काल पर्ण की अपेक्षा तुल्य है पर शेप ४ वर्ण २ गप ५ रस कपरके चार सर्श की अपेक्षा छस्थान हानाधिक है। एससी उत्कृष्ट गुनकालकामी फहना, भमन्योत्कृष्ट गुणकाले काभी ऐसे ही कहना, जिम म इतना विशेष स्सस्यान पदस्थान रानाधिक है, ॥ ऐसे ही यारत् दश प्रदेशी पर्यन्त काना, निममें इतना विशेष भरगारवा एफेक प्रदेश की वृद्धि करना यावत् दश प्रदेशिक में 481748 पचप पर्याय पद 82481+ . व अनारदकनारनवारा मुनि श्री भोसक पिमी के गोयमा । अणता, से कणट्रेण? गोयमा! जहण्णाठिईए अणत पदसिए जहण्णठिई यस्त अणत पएसियस्स दवट्टयाए तुल्ले,पएसष्टुयाए छटाणवहिए,ओगाहणट्टयाए चउट्ठाणवहिए ठिईर तुल्ल, वणादि अट्टफासेहिं छट्ठाणवडिए एव उक्कोसठिईएवि ॥अजहण्ण मणुको- सठितीएवि एचव णवर ठिईए उढाणवडिए | जहण्णगुण कालयाण परमाणु पोग्गलाण पुन्छ।' गोयमा! अणता से केणट्टेण गोयमा!जहण्णगुण कालप परमाणु पोग्गले जहण्णगुण कालगस्त परमाणु पोग्गलस्म इन्वयाए तुम्ने, परसट्टयाए तुल्ले, उगाहण- ओ गौषम । एक जघन्य गुण काला परमाणु पुरल अन्य मघन्य गुण फाले परमाणु की मता से द्रम्पार्थपने तुल्य है, प्रदेशार्थपने तुल्य है, अभगाना की अपेक्षा तुल्य है, स्थिति की अपेक्षा चतुस्पान रानाधिकारी, काल पर्ण क पर्यत्र की अपक्षा तुल्प है, ऊपर श्रेप चार वर्ण नीं करना क्योकि या फक्त काल वर्ण का ही पर्णन है, गघ, रस और ऊपर के चार स्पर्श की भसा पदस्यान नापिक है ऐसे ही उत्कृष्ट गुण काल पर्ण के परमाणु का और मजघन्योत्कृष्ट गुण काला पर्णवाले परमाणु का भी एमा काना, जिम में इवना सास वण की पर्याय आश्रिय पदस्थान होनाधिकई जघय गुण झाले टिमदशिक स्कंध की पृच्छा मायक-राजाबहादुर लाला मुम्बटेरमहायजी मारापमादमी का मी पाना विशेष स्वस्थान पञ्चदश-पभवणा सूप-चतुर्य उपाय - तुल्ले, पपसट्टयाए वाण घडिए ओगाहणट्टयाए दुट्ठाण घटिए ठितीए चउमाण पडिए कालषण्ण पनवेहिं तुल्ले,अबसेसे वण्णाइहिं उवरिल्ल चउफासहिय छट्ठाणघटिए ॥ एवं उकोसगुण कालपवि,अजहण्णमणुक्कोस गुणकालएवि,एवंधव, नवर सटाणेछटाण वहिए। अहण्णगुण कालगाण असखिज्ज परप्तियाण पुच्छा?गोयम/अणंता पण्णतासिकेणट्रेण? गोयमा! जहण्णगुणकालए असखिज पएसिए जहण्णगुणकालगस्स असखिजपपसियस्स - दवट्ठयार तुल्ले, परसट्टयाए पउढाणवहिए, भोगाहणट्टाए चउष्ट्राणवदिए, ठिईए घउट्ठाणवढिए, कालवण्ण पज्जवेहिं तुल्ले, अवसेसेहिं घण्णादि उवरिल्ले घउफासेहिय मगरन् ' किस कारन ममरुपात पर्याप कीअहो गौतम! एक मधन्य गुन काला मसंण्यात प्रदेशिक स्कपमन्य जघन्य गुन कामा भसंरूपास प्रदेशिक स्कर की मापेक्षा दन्या पने तुल्य है, प्रदेशार्थ पने चतुस्थान हानापिक है, अरगाहना की अपेक्षा भी चतुस्थान 'हीनापिकी, स्पिति की मपेक्षा भी पतुस्थान हीना शिक, कासे वर्ण के पर्याय की अपेक्षा तुल्य है, अपर शेष ४ पर्ण २ गप ५ रस व कपर के ४ स्पर्क की मपेक्षा पद स्पान होनापिक है पेमे ही उत्कृष्ट गुत काले फा मी काना मगधन्पगुन काला अनंत पदेशिक की पूछा ! अहो गौतम' मनव पर्याय को किस कारन अहो मगमन् ! ऐसा कहा !,अहो गौतम ! एक मपन्य गुन काला अनव प्रदेशिक संघ भन्य जघन्य गुन काला अनन प्रदेषिक स्कंध की अपेक्षा गार्धपने अर्थ 40 पम पांय पद 47 4 मनुबादह-मायामारी मुनि श्री पोसक प्रपिनी में परसहीणे अभिहिर, परम ममहिए ठिईए घउट्ठाण वहिए कालवण्ण पबवेहि तुझे, अवसेसेहिं वण्णाइहिं उबरिले चउफासेहिय छयाण वडि र एव उक्कोनगुग कालरात्रि, अजहण्गमणुकासगुणकालरवि, एवचेव नवर छाणे माण वडिप, एत्र जाव दसपएसिए,णवर उगाहणाए परसपरियुट्ठीकायन्याओगाहणा तहवाजहण्णगुण कालगाण भते!सखिज्ज पासियाण पुच्छा' गोयमा अणता पजवा पण्णत्तासे केणगुण गोयमा जहण्ण गुफा कारए सखिज पएसिए जहणागुण कालुगस्त, सखि पएसियस्त दमट्टयाए ना मदेश की मृदि करना पो भगवन् ! मघन्य नुनकाले संख्यास मदेशी स्कन्ध की पृण ? भा गौतम? भनतपर्याय में महा मगवन् किम कारन भनसपर्याय प्रो गौतम' एक जघन्य गुनगाले संख्यात मदेशिक सात मन मपाप गुफाले सस्यात दक्षिक सत्र से दृष्यायपन सुरुप है, प्रदेशपने विस्वान होनाधिक है, भगमाइनाही अपेक्षा मी द्विस्थान हीनापिक है, स्थिति की अपेक्षा चतुस्थान होनाधिको कासेवर्ण क पाप की अपेक्षा मी तुरुप है, पपूर शेष र वर्ण मन रम कार के चार मर्य की अपेक्षा पद स्थान गविकी रेसेपी उत्कृष्ट गुन का कामी करना और अजपन्योस्कष्ट [मध्यम ] गुन कापा का भी इस प्रकार काना जिम में इतना विशेष स्थान काले पर्ण की पर्याप पटू स्यान हीनाकि पाना प्रम र गुन कासे मनपाद प्रशिक की पृष्ण : भो गौतम ! भना' पर्याय बरे महा * प्रकापक-रामाषगदर लाला सुखदेव सहायनी वाला सादनी .

7 अधा 418 पञ्चटमा पुनरणा सूत्र चतुर्थ उपा 4.1 - अविल महररसपनवेहिय एव चेव भाणियन्या, वर परमाणुपोग्गलरस सुम्भिगवरस दुभिगधा नमण्णइ, दुन्भिगधस्स सुम्मिगधोनवणइ, तितस अवससा नभण्णति,एक कडयादी णिधिसेस सचव ॥३३॥-जहण्णगुण कावडाण अणूतपएसियाण पुच्छ।' गोयमा ! अण्णता पज्जवा पण्णता, से केणवेण भते । एव बुझ्चइ ? गोयमा ! जहण्ण- गुणकम्वड अणतपएसिए जहण्णगुणकक्खडस्त प्रणतपएसियरत दन्वयाए तुल्ल, 'पएसट्टपाए छटाणवहिए ओगाहणट्टयाए चउष्टाणवहिए, ठिईए चउढाणवार्डए, समानु पुदलको मुर्मिगध के स्थान दुभिगध नहीं कहनाध्मौर भिगच्ची के अभिगधी नहीं कहना तैसे तिक्त रस प्रयान का अन्य चारों समय नही कहना क्यों किया सब प्रतिपक्षी हैं, ऐसे ही कटुकादि पांचों रसों का जानना और सप खेप्ता ही कहना ॥ ३॥ ॥ अब स्पर्श का प्रश्न करते हैं, इस में कश मृदु गुरु और यह चारों स्पर्श असरूपात मदेशिक म्कन्ध सक नहीं पाते हैं, फक्त अनंत प्रदेशिक स्कन्ध में समन्ध के कितने पर्याय ? ? भो गौतम ! अनेत पर्याय हैं मो"मगन ! जघन्य गुन कर्कश स्पर्श के भनत पर्याय -क्रिस कारन कहे है ? अहो गौतम ! एक जघन्य गुन कक्ष अनंत प्रशिक सन्य अन्य अयन्य गन कर्कश मना प्रदेशिक समन्य की अपेक्षा व्याय-'तुरपी मदेशार्य पर स्थान 'हीनाधिक 44मयम पर्याप पट 43 पाते हैं इसलिये इन का प्रश्न यहां पूछते हैं मो भगवन् जघन्यगुन कर्कश स्पर्श के मनृत पदचि * अनुगदा मियाममारोमुनि श्री भमानक अपिभी + छट्ठीणवाडए पत्र उकामगुणकालाव, अजहष्ण मणुमात गुण नवर सटाणे छठ्ठाणवडिए ॥ जहण्णगुणकालगाणं भते ! अणतपएसियाण , पुच्छा ? गोयमा ! अणसा पबवा पण्णचा,से केण?ण भते । एष चुपागोयमा शहष्ण- गुणकालर अणतपरसिए जहणगुणकालगस्स अणतपरसियस्स दयटुयाए तुल्ले, पएसट्टयाए छट्ठाणवहिए, ओगाहपट्टयाए चउढाणवहिए ठिईए घउढाणवहिर, काल- क्ष्ण पनवेहि तुल्ले, अबसेसेहिं वण्णाईहिं अफासफ्जवहिय - छढाणयडिए । एव -उपासगुणकालरवि, अजहण्यामणुक्कोस गुणकालपवि एव-चेक, णवर सदाणे छट्ठाण धरिए, एवं नील लोहिय हालिद सुकिल्ल, सुभिगध दुमिगध तित्त कॉय कसाय तुप, मदेवार्थपने षट् स्थान रीनाधिक है, अपमाहना की अपेक्षा-चतुम्यान हीनारिक है, स्थिति की भपेक्षा चतुस्थान हीनाधिक है, काले वर्ष की अपेक्षा परस्पर सुल्प । अपर प ४ वर्ण-२. गप ५ रस ८ सर्व की अपेक्षा पट् स्वान हीनापिक है, ऐसी उलट गुन काले का मी काना ममपन्योत्कृष्ट (मध्यम) गन कालेका भी पसेही कहना निसमें इतना विशेष स्थान आश्रिय पटल्यान.रीनाधिकौनसे माले रण के पुरकों का फयन कहा, एसे, ही रे लाल पीले लड़े, इन चारों पुढे मा, ममिंगर दुर्पिगध दोनों गधों का, तिक्त गर्दक पाय अम्बाट प. मधुर ने पांचे रस का भी ना जिम में इतना विशेष प्रकाशक-रानापाादुर माता मुखदेवसहायत्री मालामसादजी - - भर्य 48 पथदश पभरणा मूत्र-चतुर्य उपा ओगाहणट्ठयाए तुरुले, ठिईए चउढाणवहिए, पण्ण-गध रसेहि-छट्टाणवडिए, सीयफास पजहिं तुल्ले ॥ उसिणफासाणभण्णइ, मिड लुक्सफाम पनवेहि छटाणवडिए, एवं उक्कासगुणसीएवि, अजहण्णमणुकोसगुणमीएवि एव चेव णवर सहाण छदाण- पहिए जहण्णगुणसीयाण दुपएसियाण पुष्छा ? गोयमा | अणता पजवा पण्णचा से केणट्रेण भत ! एव वुझ्चइ ?गायमा! जहण्यागुणसए दुपएसिए जहण्णगुणसीयस्स दुपएसियस्स दयट्टयाए तुल्ले पएसट्टयाए तुल्ल, आगाहणट्ठयाए सियहीणे सियतुल्ले, गााना की भापेक्षा भी सुस्प है, स्थिति की अपेक्षा चतुस्थान होनाधिक है वर्ण गप रस की अपेक्षा ७ स्थान नापिक है, भीम स्पर्श की अपेक्षा तुल्य है, मष्ण स्पर्श नहीं काना क्यों कि यह प्रतिपक्षी है, लिग्न मास की अपेक्षा पट स्थान हीनाधिक है ऐसे ही उत्कृष्ट शीर स्पर्श का भी कहना और भजघन्यात्कृष्ठ (मध्यम) धीत स्पर्श का भी ऐसा ही काना जिसमें इतना अधिक कि स्वस्थान पटस्थान माश्रिय हीनापिक कहना जघन्य गुण शीस दिनदेशिक की पृच्छा ! महो गौतम मनतपर्याय को अहो भगवन् ! किमकारन से अनत पर्याय को हैं। अहो गौतम! एक भयन्यगुण शीत दिमदशिक अन्य जघन्यगुण शीत द्विपदशिक से द्रव्यार्य तुल्य है, प्रदेशार्य तुल्य है अगाहना की अपेक्षा स्यात हीन है, स्पातू तुस्प है, स्यात् मषिक है, यदि हीन है वो एक प्रदेश हीन है, अपिको एक ++ पचम पर्याय पद , wnwrKA ममुपादक-पाल्ममवारी मुनि श्री प्रमोसम यीनी यपण-गध रम-पचयहि छदाणयलिए, कक्खडफास पजवेहिं तुल्ले भवसेसहिं सरफास पनवेहिं छट्ठाण वहिए, एक उकोसगुण कक्खडेवि ॥ अजहष्णमणुकोस गुणकवलहफासेवि एंव चेच, णपर सठाणे छट्ठाणवडिए ॥ एवं मउय गुष्य लहुएवि - भाणियन्वा ॥ ३४ ॥ जहष्णगुणसीयाण मंते ! परमाणु पोग्गलाण पुष्छा? गोयमा! भणता पजवा पण्णत्ता से केणदृर्ण मते ! एवं वुषा ? गोयमा ! जहष्णगुणसीए परमाणुपोग्गले जहण्णगुणसीयस्स परमाणुपोग्गलस्स दयट्टयाए सुरुले पएसट्टयाएतुरुले, भगाना की अपेक्षा चतुस्थान होनापिक में स्थिति की अपेक्षा चतुस्थान हीनापिकी, ५ वर्ण २ गब १५ रन अपेक्षा पदस्पान हीनापिक है, कर्कश स्पर्ष की तुल्य अपेक्षा भवर शेष साव स्पर्श की अपेक्षा पदस्थान हीनापिक है ऐसे ही नत्कृष्ट गुण कप स्पर्श गर्न प्रदेशिक स्कंध का काना मोर भमप पोखरा मध्यम ) गुण कई स्पर्ष का भी एसी काना, मिस में इवना विशेष स्वस्थान कईश सापर्णप से पदस्थान माविकाना ऐसे ही कोमा, मारी, भोर छमु का भी काना पाचारों साकारा ॥ १४ ॥ भो मगान् ! अपन्न नुन पीत सर्व प्रमाणु पुनस में कितने पार पाये। मा मौसम ! अनत पर्याय पाव किस कारन मन पर्याय पावे !मो मौतम! एक मपम्प नुन पानु पुनम अन्य नपन्य मुन ममानु की अपेक्षा द्रम्पाई पने दूसरे प्रदेवार्थ भी दुख है - पकाशक-रामाहादुर शाखा मुतदेवमामी भासायसादगी म पञ्चम-पणावणा मृम पतुर्य उपार *2 सीयरस सखिज पएसिएयस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसट्टयाए दुट्ठाण वडिए, ओगाह- गट्टयाए दृट्ठाण वहिए ठिइए चउट्ठाण वाहिए वण्णादीहिं छठाण वडिए सीयफास पज्जवेहिं तुल्ल, उसिणणिड लुक्खेहि छट्ठाण वडिए, ॥ ए३ उक्कासगुणसीएवि अजहणमणकोसगुण सीएवि एव चेव णवर सटाण माणलिए ॥ जहण्णगुण सीयाण असखिब परसियाण पुम्छा ? गोयमा अणता पचवा पण्णत्ता? से क्णटेण भते! एर वुच्चइ? गोयमा! जहण्णगुण जहण्णगुण सीत असखिजपपसिए, जहष्णगुण सीतस्स असखेज्न पएसियस्स इन्वट्ठयाएतुल्ले, पएसट्टयाए चउट्टाणवहिए,ओगाहणट्ठयार चउट्ठाण बडिए ठिइए चउट्ठाण वहिए, वण्णाइपजयहिं छट्ठाण वडिए, सीय फास +4+ पचम पर्याय पद 48 मर्थ भहो गौतम ! एक जघय गुण शीत सख्य त मदेशिक अन्य जघन्य गुण भीन सख्यास मदेशिक पार्थ मुल्य ही प्रदेशार्य द्विस्पान रोनाषिक, अवगाहना की अपक्षा भी द्रिस्थान हीनाधिक है, स्थिति के अपेक्षा चतुस्यान रीनाधिक है, वर्ण, गा रस की अपेक्षा छ स्थान हीनाधिक है, शीत स्पर्श की अपेक्षा सुल्प , उष्ण स्निग्ध इस स्पर्श की अपक्षा पट्स्थान हीनाधिक है, एसे ही उत्कृष्ट गुण शीरा का मा मानना एमे ही अजघन्योत्कृष्ट शीत का भी मानना विशप स्यान श्रीस स्पर्श की पर्याय पट स्थान विनाधिक जपय गुन शीत असख्यात मदेशिक की पुच्छा मनस पर्याय है, भो भगमन किस कारन अनत पर्याय है? अहो गौतम एक जघन्य गुन शीत् असरन्यात प्रदेशिक अन्य मघन्य मा गौतम . ? * मनुराहक-मालब्रह्मपारीमुनि भी ममोलक प्रषिनी से सिय अम्महिण, जइ होणे पएसहीण, अह अमहिए पएसमन्भहिए, ठिईए चउट्ठाण वहिए, वण्ण गध रस पनवेहि छट्ठाण बडिप, सीयफास पजयेहि तुम्ले, ॥ उसिण गिर लुक्खफास पनवेहि छट्ठाण पहिए, एव उकासगुगसीएवि, अजहण्णमणुकोस. गुणसीएवि एवमत्र णवर सटाणे छट्ठाणघडिए, एव जाय इसपएसिए, णवर मोगा- हणट्ठयाए, पएपसरिवुड्डी कायव्या,जावदस पएसियरस नवपएसियसा पएसावुट्टीयति ॥ जहण्णगुणसीयाण सखज पएसियाण पुग्छा गायमा । अणता पज्जा पण्णता ॥ स केणटेण भते ! एवं वुच्चइ ? गोयमा ! जहष्णगुणसीए सखिज्जपएसिए जद्दण्णगुण प्रदेश मपिक है, स्थिति की अपेक्षा चतुम्यान हीनापिक है, पर्ण, गध, रस के पर्यव की अपेक्षा पटस्थान नापिकी, शीस स्पर्श की अपेक्षा दुस्प है, उष्ण सिम्प पक्ष स्पर्श की अपेक्षा पटस्थान हीनाधिक है एमे ही उत्कृष्ट गुण शीव का भी करना, और अजघन्योत्कृष्ट शीत का भी ऐसे ही काना, जिसमें इना विशेष सस्पान शीत स्पश की पर्याय की अपेक्षा पटस्यान हीनापिक है जैसा या दिनदेशिका का एमे ही वीन, चार, पांच यावत् दश मदक्षिक का काना जिस में इतना विशप अवगाहना की मपला एक मदेव की मृध्दि करना यापत् दन प्रदेश पर्यंत नब मदन अधिक काना जघन्य गुण भीम सरूपाव मदशिक की छा! मा गौतम । अनस पर्याय का? किस कारन भनत पर्याय का है। भकाधक राजावादर लाला सुखदेवसहायजी बालापमादमी. - - 48 पचान-पणारणा मूत्र मतुर्थ उपाङ्ग +8 सायरस सखिज पएसिएयरस दवट्टयाए तुल्ले, पए सट्टयाए दुट्ठाण रहिए, ओगाह- णट्टयाए दृट्ठाण वडिए ठिइए चउट्ठाण वहिए वण्णादीहिं छठाणबडिए सीयफास पनवेहिं तुल्ल, उसिणणिद्ध लुक्खेहि छट्ठाण वडिए, ॥ ए। उक्कासगुणसीएवि मजहणमणकोसगुण सीएवि एव चेव णवर सट्टाण मट्टाणपडिए ॥ जहण्णगुण सीयाण असखिज पसियाण पुच्छा ? गोयमा अणता पज्जवा पण्णत्ता ? से कणटेण भते! एव बुच्चइ' गोयमा! जहण्णगुण जहण्णगुण सीत असखिज्जपरासिप जहण्णगुण सीतरस असखेज पएसियस्स इन्वट्ठयाए तल्ले, परसट्टयाए चउट्टाणवडिए,ओगाहणट्ठयार चउट्ठाण वहिए ठिइए चउट्ठाण घडिए, वण्णाइपजयहिं छट्ठाण वड़िए, सीय फास अर्थ भो गैतम ! एक जघन्य गुण शीत सम्व्य त प्रदेशिक अन्य जघन्य गुण शीन सख्यास प्रदेशिक हठयार्थ मुल्य र प्रदेशार्य विस्पान हीनाषिक, अवगाहना की अपेक्षा भी द्विस्थान हीनाधिक है, स्थिति क अपक्षा चतुस्थान हीनाधिक है, वर्ण, गप रम की अपेक्षा छ स्यान रीनाधिक है, शीत स्पर्श की अपेक्षा तुल्प है, ऊष्ण निग्य मस पर्श की बपक्षा पट्स्यान हीनाधिक है, एमे ही उत्कृष्ट गुण शीय का मा मानना पमे ही अजघन्योत्कृष्ट शीत का भी नानना विशप सस्यान शीत स्पर्भकी पर्याय पट स्यान नाधिक ? जपन्य गुन श्रीस असख्यात मदेशिक की पुच्छा बनत पर्याय है, अहो भगन् किस कारन अनत पर्याय है? महो गौतम एक जघन्य गुन ग्रीत असख्यात मदेशिक अन्य जघन्य + पचम पर्याय पद 488 . 7 महा गौतम 4 जनुदानावरमपारी मुनि श्री अमोलक मिमी । पजाहिं तुरले उमिणणिड लुक्ख फास पजवेहिं छट्ठाण वडिए ॥ उकासगुण सीएवि, अजहण्णमणुक्कोस गुणसीएवि एव चेव, णवर सटाणे छाण वहिए जहण्णगुणसीयाण अणत पएसियाण पुष्छा ? गोयमा । अणता स कणट्रेण ? गायमा । जहण्णगुणसीए अणत परसिए जहफ्णगुण सीतस्स अणत पदोसियस्म इन्वट्टयाए तुल्ल पएमट्टयाए छट्ठाणलिए, ओगाहणटुयाए चउट्ठाणवाहिए दिइए चउठाणवहिए, वण्णाईहिं छवाणवाहिए, सीयफास पनवेहिं तुल्ले, अवसेसहि गुन चीन अमरयात मदेशिक मे द्रव्यार्य तुस्प है, प्रदेशार्थ धतुस्यान हीनापिक है, अवगाहना की अपेक्षा चम्मान शिनापिकी स्थिति की अपेक्षा चतुम्धान रीनाधिको पर्ण गघ रस के पर्याय की अपेक्षा पद स्थान दिनापिक है, शीत स्पर्श की भपेक्षा तुरय है, उष्णलिम्प रुक्ष स्पर्श के पर्यर की भपेक्षा पद स्पन रानापिक है एमेडी उत्कृष्ट गुन शीन का मानना मध्यमगुन शीत का भी से ही माना पातु स्वस्थान माश्रिय पदस्यान सनाधिक जघन्पगण शीत मनत प्रदशिक की पुग्ण हो मौतम ! अनल मा भगवन् ! किम कारन से अनंत कह ? भा गौतम! जघन्य गुन चीत मन्प मपन्य गुण शीत की साथ द्रव्य स तस्य, पोश स पट्वान रानापिक भयगाइना से चार स्थान, स्थिति से चार स्थान नापिक वर्णाद पर्यत परस्पान, चीत की साय तुस्य अपर क्षेप मान स्पर्श की मोसा पट् स्थान नापिकीनी उत्कट गुन शीका मी काना, भजघन्पालष्ट गुन श्रीवका मो ऐसाही काना पिस में इतना मषिक स्वस्थान शीत के पर्याय कर पद स्थान होनाषिकर मैसे चीत स्पर्म का वर्णन कहा, -काशक-रामानहरादुर मासा सदसहापभी बालामसादनी घ्र सत्तफास पञ्चदेहिं छटाणवहिए, एत्र उक्कोसगुणसीएविएमजहण्णमणुकोस गुणसीएवि एवचेव, नवर सटाणे छट्ठाण वहिए एव उसिणेणिडे लुक्खे जहासीए, परमाणु पोग्गलास्स तहेव पडिपक्खो, सबसि नभण्णात्रीि भाणियन्य ॥३५॥ जइण्णपएसि- याण भते । खधाण पुन्छा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णता ॥ से केपट्टेण भते ! एव वुच्चइ? गोयमा! जहण्णपएसिए खधे जहण्णपएसियस्स खधस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएमट्टयाए तुल्ले, ओगाहणट्टयाए सियहीणे सियतुल्ले सिय अम्भाहिए, जइहीणे पएसहीणे, अह अमहिए पएसमग्भाहए, ठिईए चउदाण पहिए वण्णाइहिं उवरिल्ल घउफासेहिय छट्ठाण वहिए ॥ उक्कासपएसियाण स्वधाण पुष्छा ? गोयमा ! एमा ही उष्ण मित्र अल स्पर्श झा काना, सर्ष स्थान प्रतिपक्ष पर्श को छोटकर करना, श्री का उष्ण मसिपक्षी सेम उष्ण का शीत मतिपक्षी, मिग्य का रुक्ष प्रतिपक्षी सेमा सक्ष का सिग्प प्रविपक्षी यों जिस प्रकार भोन ममामु बादि की व्याख्या की वैस मब की करना ॥ ३५ ॥ अहो भगवन् ! नपन्य (दिम-शिक ) सन्ध फ किसने पर्याय है ? महो गौसम ! भनत पर्याय में किस कारन भरा भगवन । मपन्य प्रदशिक स्कन्ध के भनत पर्याय है ? यो गौतम ! जपन्य प्रशिक सन्ध अन्य जघन्य प्रदक्षिक स्कन्ध की अपेक्षा स द्रव्यार्थ तुल्य मदशार्य मी तुल्य है, भगाना की अपेक्षा स्यात् हीन है स्यास् तुल्य है, स्यात् अधिक है यदि हान को एक प्रदेश हीन है, अधिक है तो एक प्रदेश अधिक है, स्थिति की अपेक्षा चतस्यान हीनाभिक 48+ पञ्चदस-पभत्रणा म्मन्यतय उपाय अर्थ als पचम पर्याय पद 48414 मनुवार मायामपारी मुनि श्री भयोलक अपिनी + अपत पनवा पण्णता ? से केणणेढ भते ! एव तुच्छइ गोयमा! उक्कोस पएसिएखधे उक्कामपएसियरस खधस्म दबट्टयाएतुल्ले,पएसट्टयाए तुल्ले ओगाहणट्टयाए चउढाणवडिए ठिईए चउवाण बडिए, वण्णाईहिं अट्टफाप्त पञ्चवहिं छट्ठाण वडिए ॥ अजहण्णमणु फास परासयाण खधाण पुष्छा ?गोयमा अणता पज्जवा पण्णत्ता से कणटुण भते ? गोपमाअजहण्णमणुकोस परसिएग्वधे अजहण्णमणुक्कास परासियरस खधस्सं दन्वट्टयाए तुल्ल परसट्टयाए छाण वहिए, ओगाहणट्टयाए चउट्ठाण वहिए, ठिईए चठट्ठाण पर्ण गप रस भार ऊपर के चार स्पर्श की अपक्षा पद् स्थान सेनाधिक है | उत्कृष्ट ( अनंस प्रदेशिक ) स्कन्ध की बा गौतम ! अनत पर्याय ॥ किस कारन अहो मगरन् ! उत्कृष्ट सन्त्र के अनत पर्याय ? भाा गौतम ! एक वत्कृष्ट प्रशिक समन्य अन्य उत्कृष्ट प्रदेशिक स्कन्ध की अपेक्षा न्याय तुल्य है, प्रदशार्थ मी तुल्य , अवगाहना की अपसा चतुस्थान हीनाभिक है, स्थिति की अपेक्षा मी चतुस्थान नापिक है, ५ वर्ण • मप ४ रस ८ स्पश की अपेक्षा पद स्यान गनाधिक है ॥ अजपन्या तष्ट प्रदेशिक सन्ध की पृच्छा ? अहो गौतम' मनव पर्याय ॥ किस कारन मो भगवन् ! भजघ- पासष्ट प्रदेशिक स्तन्त्र के अनंत पर्याय ? महो गौतम । एक अमघन्य अनुन्छष्ट प्रदेशिक स्कन्ध अन्य भनय प भनुउत्तर स्कन्च की अपेक्षा व्यार्थ तुल्य है, प्रदेार्य पट् स्थान शिनाधिक रे, अवगाहना की भकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसायमी बालाप्रसादमी प्रच्छा १ .

4. पंचदश-पमरणासूम चतुउपाय - वहिए, वण्णाइहिं अट्ठफासे पञ्जवेहि छट्ठाण वडिए, जहण्णागाहणगाण पोग्गलाण पुच्छा ? गोयमा ! अणता पववा पण्णता, स केणटुण गोयमा ! जहण्णो- गाहणए पोग्गले जहण्णागाहणगस्त पोग्गलस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसटुयाए छट्ठाण वाहिए, ओगाहणट्टयाए तुल्ल, ठितीए चउट्ठाण वडिए, वणाईहिं उपरिक्षे चउफा. सेहिय छटाणवडिए,उकोसोगाहणएवि एवचव नवर ठिईए तुले, अजहण्णमणुकासगा हणगाण पोग्गलाण पुच्छा' गोयमा ! अणता पनवा पण्णत्ता ॥ से केणटेण ' गोयमा! अपेक्षा चतुस्थान हानाधिक है, स्थिति की अपेक्षा चतुस्थान होनाधिक है, ५ वर्ण २ गंध ५ रस ८ स्पर्क की अपेक्षा पट् स्थान नाषिक मघय एक मदशावगाही अषगाना वास्ले पुद्गल की पृष्ठा । परो गौसम अनत पर्याय हे भो भावन् । जघ प अागाहना वाले पुद्गल की भनक पर्याय किम कारन है ? अहो गौतम ! एक जघन्य अवगाहना पाला पुरल थन्ग जघन्य अवगाहना पाले पुद्गल की अपक्षा दन्यार्थ सुल्प है, प्रदेशार्य षट् स्यान हीनाधिक है, भवगाहना की अपेक्षा तुल्य है, स्थिति की अपक्षा चतुम्यान हीनापिक है, अपर के चार प्रदेश की अपक्षा पद स्थान हीनाधिक है एसे दो उत्कृष्ट भषगाइना का मी काना, जिस में इतना विसप स्थिति की अपेक्षा तुल्य है, क्यों कि उत्कृष्ट भनगाहनामत वा सर्व लोक पापक अचिच महा स्कन्ध और केसरी समुदास के समय कर्म स्कन्ध यह 4848 पचम पर्याय पद 442 .

. 4 मनुवादक पलमारी मुनि श्री भमोलक पनी * अजहण्णमणुकासौगाहणए पोग्गले अजहण्णमणुकोसोगाहणगस्स पोग्गलरस, दब-' ट्ठयाए तुले, पएसटुयाए उट्ठाणलिए आगाहणट्टयाए चउट्ठाण वहिए, ठिईए घट्ठाण पहिए, वणाईहिं अट्ठफास पजवेहि छटाणवडिए || जहण्णठिईयाण भते । पोग्गालाण पुष्छा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णता ? से केणटुण भते ! एव बुच्चइ ? गोयमा ! जहण्गठिईए पागले जहणठिईयस्स पोग्गलस्स दवट्टयाए तुल्ले, पएसट्टयाए छट्ठाण वहिए, ओगाहणट्टयाए घउठाण वहिए, ठिईए तुल्ल, वणाईहिं दोनों होते हैं, इन दोनों की स्थिविदा कपाट मयन लोक पूर्ण करे ठप चार समय की होती है, इसलिये सुस्प का। अमपन्योत्कृष्ट (मध्यम ) पुल स्कन्ध की पृच्छा ? अहो गौतय ! बनत पर्याय को भो मगरन् ' भमपन्पोत्कृष्ट पुरस स्कन्य की अनंत पर्याय किस कारन कही है १ भहो गौतम ! एक भमपन्यात्कष्ट अपगाइना का स्कन्ध अन्य मनपन्यास्कृष्ट भवगाला की अपेक्षा दम्पा पने तुल्प है, प्रदेशार्यपने पद स्थान दिनापिक होता , अवगाहना की अपेक्षा पतुस्यान हीनापिक है, स्थिति को भपक्षा भी पतुस्थान होनापिक है, ५९ गए ५ रस ८ स्पर्म की अपेक्षा पट् स्थान होनाषिक मपन्य स्थिति पारे पुद्र की पृया | भो गौतम ! अनंत पर्याय का : महो मगवन् ! जिस कारन अपय स्थिति पाप बन पर्याप की मो गौतम ! प्रकाशक-रामायापुरसाम मुसदेसहायमी नामसारनी.

सून भर्ष dat पञ्चदश-पणना मा-पवर्ष उपार +8+ भटफास पजहिय छटाण घडिए, एवं उकोसठिईएवि अजहण्यमणुकोसाठईएवि एषचव, णपर ठिईए चट्ठाण वहिए, जहण्णगुण कालगाण भते ! पोग्गलाणं केव- इया पनवा पण्णचा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णता ॥ से केणटेण भते ! एष पुच्चही गायमा! जहण्णगुण कालए पोमगले जहण्णगुणकालगस्स पोग्गलस्स दवट्ठयाए तुझे, परमट्टयाए छट्ठाण घहिए, ओगाहणट्टयाए चउट्ठाणवहिए ठिईए पट्टाणवाटिए कालवण्ण पजवेहिं तुल्ले, अवसेसेहिय षष्ण मध रस पजवेहिं छटाण षडिए, से लेण?ण स्पिसिराला पुद्गल मन्य अघन्य स्थितिरासे पुरस की अपेक्षा म्यार्य सुस्प प्रदेषार्य पद स्थान बीनाधिक है, भगाता की अपक्षा चतुस्यान हीनापिक है, स्थिति की भपक्षा तुस्प, ५ वर्ण २ गप ५ रस ८ स्पर्श की मपला पट् स्थान रीनापिक है ऐसे ही पतष्ट स्थिति पाले का मी काना और भमघन्कए स्पिति वाले का भी ऐसा ही कहना, मिस में इतना विशेष स्थिति की अपेक्षा पतुस्थान हीनापिक में भो भगवन् ! मघन्य गुन का वर्ण के पुद्रसक कितने पर्याय ! भो गौवम! अपम्प गुन काल पर्ण क पुद्गस के अनंत पर्याय है? किम कारन महो मगरन् । भनत- पर्याप हैं? भो गौसम ! एक भएल्पगुण काल पर्णवाला पुल भन्य मपन्य काले गुनबासे पुगसकी अपेक्षा द्रपार्ष तुल्य है, प्रदेशार्थ षट्स्पान होनाफिक है, भवगाहना की मपेक्षा चतुस्थान दानाधिक है, स्थिति की अपेक्षा पंचम पर्याय पद PM - 44 मनुरादा-बालबमारी मुनि श्री अमोल पमी + अजहण्णमणुकोसीगाहणए पोग्गले अजहण्णमणुकोग्नोगाहणगस्स पोग्गलरस, दय- ट्ठयाए तुले, पएसट्टयाए छट्ठाणवहिए, आगाहणट्टयाए घउट्ठाण वहिए, ठिईए घट्ठाण पहिए, वरुणाईहिं अटुफास पवेहि छटाणवडिए || जहण्णाठिईयाण मते । पोग्गालाण पुच्छा ? गोयमा ! अणता पज्जया पण्णचा ? से देण?ण भते । एष घुचइ ' गोयमा ! जहण्णठिईए पागले जहण्णठिईयस्स पोग्गलस्स दवट्ठयाए तुले, पएसट्टयाए छट्ठाण वहिए, ओगाहणट्टयाए उट्टाण पडए, ठिईए तुल्, वण्णाईहिं दोनों होते हैं, इन दोनों की स्थिति दर कपाट मयन लोक पूर्ण करे तव चार समय की होती है, इसलिप तुल्य का मापन्योत्कृष्ट (मध्यम ) पदस स्कन्म की पृष्ठा ? अहो गौसम ! अनत पर्यायको मो भगवन् ' अनपन्पोकल पुलस स्कन्ध की अनंत पर्याय किस कारन कही है ? महो गौतम ! अमपन्यावर भरगाइना का स्कन्ध अन्य भमपन्यास्कृष्ट अवगाहा की औक्षा दार्थ पने तुस्प है, मदशार्यपने पट् स्थान दीनापिक होता है, अवगाहना की अपेक्षा चतुस्थान हीनापिक है, स्थिति को अपक्षा भी चतुस्थान दीनापिक है, ५ प ५ मा ५ रस ८ स्पर्श की अपेक्षा षट् स्थान हीनापिक में मपन्न स्पिति वा पुद्गल की पृया भारो गौतम ! मनस पर्याय फा बिस, कारन मपन्य स्थिति ना बना पर्याय को १ भो गौतम 1 एक अपम्प प्रगणकाचापपुरमण मुसदेवसहामी बासमतादमी. - 1 . भो भगवन् । - सत्र ५ datt पञ्चदप-पम्पमा मा-पर्प उपाय 31+ मटफाम पजवेहिय छट्टाण वहिए, एव उकोसठिईएवि अजहण्यमणुकोसठिईएवि एवचव, णर ठिईए चउट्ठाण घडिए, जहण्णगुण कालगाण भते । पोग्गलाण केव. इया पबवा पण्णचा ? गोयमा ! अपता पजवा पण्णता ॥ से केणटेण भंते ! एवं घुच्चइ? गायमा! जहण्णगुण कालए पोमगले जहण्णगुणकालगस्त पोग्गलस्स दबट्टयाए तुझे, पएमट्टयाए छट्ठाण घटिर, ओगाहणटयाए चउट्ठाणवहिए ठिईए आउट्ठाणयाटिए कालवण्ण पबवेहिं तुल्ले, अवसेसेहिय वण्ण मध रस पवेहिं छट्ठाण वढिए, से लेणखूण स्थिविरासा पुद्गल भन्य नघन्य स्थितिषाले पुगस की अपेक्षा द्रव्यार्य सुस्य प्रदेधार्य पद स्थान हीनापिक है, मवगाहना की मपला पतुस्थान नापित है, स्थिति की भपक्षा तुस्प, ५ वर्ण २ प ५ रस ८ स्पर्श की अपक्षा पट् स्थान हीनाभिक ऐसे ही उतष्ट स्थिति पाले का भी काना और भमन्ये कर स्थिति वाले का भी ऐसा ही काना, मिस में इतना विशेष स्विति की अपेक्षा पतुस्थान शिनापिक हैं भो भगवन् ! मघन्य गुन कामे वर्ण के पुल कितने पर्याय! भो गौतम मपन्य गुन काम वर्ण पुद्गल के अनंन पर्याय ? किम कारन भो भगरन् । भनव पर्याय है? भो गौसम ! एक अल्पगुण फाम पर्णवाला पुरस अन्य जघन्य काले गुनपाले पुनसकी अपेक्षा ट्रम्पार्य हुल्य है, प्रदेशार्थ पदस्थान होनाफिक है, अवगाना की मपेक्षा चतुस्थान हीनापिक है, स्थिति की अपेक्षा पंचप पर्याप पद NIM 44 मनुवादक पालमपारी मुनि श्री भोलापनी एक अजहण्णमणुकोसीगाहणए पोगले अजहण्णमणुकोमोगाहणगरस पोग्गलरस, दन्य- ट्ठयाए तुझे, पएसट्टयाए छट्ठाणघटिए आगाइगट्टयाए चउट्ठाण वहिए, लिईए चट्ठाण घडिए, वण्णाईहिं अटफास पज्जवेहि छट्ठाणवहिए ॥ जहण्णठिईयाण भते । पोग्गालाण पुष्छा ? गोयमा | अणसा पचवा पण्णता ? से केणटुण मते ! एष बुबह ? गोयमा ! जहण्णठिईए पागले जहण्णठिईयस्स पोग्गलस्स दबट्टयाए तुल्ले, पएसनुयाए छट्ठाण घडिए, ओगाहणट्टयाए चउट्ठाण बहिए, ठिईए तुल्ल, वण्णाईहिं दोनों होते हैं, इन दोनों की स्थिति दर कपार मथन सोक पूर्ण फरे उपचार समय की होती है, इसलिये तुस्प कहाँ अमपन्योत्कृष्ट (मध्यम) पहल स्कन्ध की पृष्ठा ! अहो गौतम ! अनव पर्याय को मो भगवन् ' ममपन्पोत्कृष्ट पुहरू स्कन्ध की अनंस पर्याय फिस कारन की है ? अहो गौतम ! एक भयपन्यासष्ट भगाइना का सन्ध मन्य ममपन्योत्कृष्ट भषगाहा की मोक्षा इाध पने तुल्य है, मदधार्थपने पद स्थान हीनापिक होता है, अरगाहना की अपेक्षा चतुस्थान हीनापिक है, स्विति को भपक्षा मी पतुस्थान दीनापिक है, ५ वर्ण २ गप ५ रस ८ स्पर्ष की अपेक्षा षट् स्थान होनापिक में अपना स्थिति या पुद्रस की पृया। भो गौतम ! मनंत पर्याय फा लिस कारन अफस स्थिति पार बनत पर्याय को भो गौतम ! मसाधक-रामायापुरमाग मुसदेसहाबमीनासमतारमी . अहो मगबन् सूत्र भर्ष at पम्पदप-पाणवना मूमन्चवर्प उपा भट्टफाम पजवेहिय छटाण वडिए, एवं उकोसठिईएवि अजहण्यमणुकोसठिईएवि एयचव, णपर ठिईए चट्ठाण घहिए, जहण्णगुण कालगाण भते ! पोग्गलाण केव. इया पञ्जवा पण्णचा ? गोयमा ! अफता पजवा पण्णता से केणट्रेण भंते ! एत्र बुधइ? गायमा! जहण्णगुण कालए पोम्गले जइण्णगुणकालगस्स पोग्गलस्स दबट्टयाए तुले, पएमट्टयाए छट्ठाण वाडर, ओगाहणट्टयाए चउट्ठाणवहिए ठिईए पट्टाणयाटिए कालवण्ण पनवेहिं तुल्ले, अवसेसेहिय षण्ण गध रस पनवेहिं छहाण पढिए, से लेणदेण स्पितिवासा पुद्गल मन्य नघन्य स्पिसियाले पुगस की अपेक्षा द्रष्यार्य तुस्य प्रदेषार्थ पट् स्थान हीनापिक १, भरगारला की भपक्षा चतुस्थान रीनापिक है, स्थिति की भपसा तुस्प, ५ वर्ण २ गप ५ रस ८ स्पर्श की अपक्षा पद स्थान हीनापिको ऐसे ही पलट स्थिति पासे का भी काना और भमपन्यत्कृष्ट स्पिति पासे का भी ऐसा ही काना, मिस में इतना विशेष स्थिति की अपेक्षा पतुस्थान हिनाषिक हैं भहो ममवन् ! भघन्य गुन कामे पूर्ण के पुल कितने पर्याय ? भो गौतम ! मपन्य गुन काम वर्ण क पुद्गल के अनत पर्याय! किम कारन मो भगवन् । भना- पर्याय है? महो गौसम ! एक जघल्पगुण फाल वर्णवाला पुद्रग्स अन्य जघन्य काले गुनवाले पुनसकी अपेक्षा द्रव्या तुल्य है, प्रदेशार्थ पट्स्थान रानाधिक है, भवग्याना की अपेक्षा चतुस्थान होनाधिक है, स्थिति की अपेक्षा Pal पंचम पर्याय पद 4RPRt .

44 मनुवादक-मालामारी मुनि श्री भीमसारमी + अजहण्णमणुकोसीगाहणए पोग्गले अजहण्णमणुकोग्गेगाहणगस्स पोग्गलरस, दव्य- ट्ठयाए तुझे, पएसट्टयाए उढाणवहिए अगाहणट्रयाए घउट्टण बहिए, लिईए घट्ठाण पहिए, घण्णाई हिं अट्ठफास पवेहि छट्ठाणवडिए ॥ अहण्णठिईयाण मते ! पोग्गालाण पुण्छा ? गोयमा ! अणता पजवा पण्णता ? से केण?ण भते । एवं वुधइ ? गोयमा ! जहणठिईए पागले जहण्णठिईयस्स पोग्गलस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसट्टयाए छट्ठाण वहिए, ओगाहणट्टयाए घउमाण पाहिए, ठिईए तुल्ल, वण्णाई हिं दोनों होते हैं, इन दोनों की स्थिति दर कपाट पथने सोक पूर्ण करे तप चार समय की होती है, इसलिये तुल का अभपन्योत्कष्ट (मध्यम ) पदर स्कन्ध की पृष्ठा ! हो गौसम ! अनव पर्याय को भो भगवन् ' अनपन्पोक्त पुरस स्कन्ध की अनंत पर्याय किस कारन कही है ? अहो गौतम । एक बमपन्पाला भपगाइना का समन्ध अन्य अमपन्योत्कृष्ट अगाहा की अपेक्षा दम्पा पने तुल्य है, प्रदेशार्यपने पद स्थान होनापिक होता है, अवगाहना की भपेक्षा चतुस्यान हीनापिक है, स्थिति को अपना भी चतुस्यान होनाधिक है, ५ वर्ष २ गर ५ रस ८ स्पर्श की अपेक्षा पद स्थान होनाषिको जपन्य स्थिति या पुद्र की पृया! ओ गौतम ! मनत पर्याय फा है : महो मगवन् ! रिस कारन मपन्य स्थिति पाप बनंद पर्याय फो? मो गौतम ! एक मपम्म • मशव-रामायापुरमाग ससदेक्सहातमी बासमतादमी.

* पष्ठम विरह पदम् * चारस, चउवीसाइ, सतरय, एगसमय, कत्तोय, उवण, परभवियाउयच, अष्ट्रेव चआगरिसा ॥ १ ॥ निरयगईण भते ! केवइय काल विरहिया उक्वाएण पण्णता गोयमा ! जहण्णण एक समय उकासेण बारस मुहुचा ॥ तिरियगईण भते! केवइय काल विरहिया उवधएण पण्णचा गोयमा।जहण्णेण एक समय,उकोसेण चारसमहुचा मणुयगईण भते ! केवइय काल विरहिया उपधारण पण्णता ? गोयमा ! जहणेण एसमय उकोसेण पारस मुहत्तदेवगईण भते केवइय काल विरहिया उववाएण पपणता मा छठ पद में जीव का उपपामादि सम्पधी विरा ( अतर) कहते हैं इस के आठ द्वार है जिप्त के नाम । सामान्य से बारे मुहूर्त का उपपात उन का घिरह द्वार २ चौवीस मुहूर्नादि विशेष उपपात उद्वर्तन द्वार, ३ उपपात दर्शन का अतर, । एक समय में उपास उतन, ५ कहां से आकर कर उत्पमोच यह आगतद्वारमरकर कहां जाव सो गदर,परभाका आयुकितने प्रकारसे बच, भौर८शाठवा आगरिसा द्वार प्रथम विरह द्वार सामान्य से कास, अहो भगवान् । नरक में कितन काल का विरह हासा है ? [ एकादि जीव नरक में उत्पन्न हुवे बाद फिर मिवने काल बाद दूसग जीव भाकर उत्तम होये उसे विरह कहते हैं ] अहो गौवम ! नघन्य से एक समय उत्कृष्ट पारा मुहूर्त [प्रश्न प्रथमादि मातो नरक म से किमी भी नरक में चोवीस मुहून रो कम विरह नहीं कहा सो यहाँ ।२ मुहूर्त का विरह 48+ पञ्चदश पमरणा सूत्र चतुर्थ उपास 18 भर्थ 488 पटर विरह पद 4232 गीयमा ! एवं वुच जहण्णगुण कालपाण पोग्गलाण अणता यजवा पण्णचा, एवं उकोसगण कालएवि अजहष्णमणुकोस गुणकालएवि, एव चेव ।। णवरं सहाणे छदाण वहिए, एव जहा कालवण्ण पञ्चवाण अत्तव्यया भणिया तहा सेसाणवि षण्ण गध रस फासाण पत्तम्बयामाणियव्या जाव अजहण्ण मणुकासगुण लुक्ख सष्ठाण छट्ठाण वतिए, सेच रूवि अजीव पजवा ॥ सेच अजीव पज्जा ॥ सेत पजवा ॥ इति पण्णवणा भगवईए विससपय पंचम सम्मत्त ॥ ५ ॥ n का अनुसारक-पासमारी मुनि श्री ममोएक प्रपिमी + . मी चस्पान नापिक है काल पर्ण के पर्यय की अपेक्षा तुल्य है, ऊपर शेप पर्ग गप - रस स्पर्श अपेक्षा पद स्पान शिनापिकी इस कारन महो गौतम ! ऐमा कहा जघन्य काले गुन के युगल मानव पर्याय पती वस्कट मासे गुन के मी असंख्या पर्याय माना और "अमघन्य उत्कृष्ट काले गुन-कामी पमा काना विशेष-स्वस्थान में पद स्थान दिनाधिक काना यों मिस मकारसे कासे पर्व पुल की व्यक्तन्पवा कही तैसे ही वेष पर्ष गप रस सर्श की व्यक्तव्यमा काना मापद अमघन्मोत्कृष्ट गुन रुक्ष पुल स्वस्थान पट् स्थान होनापिकी या रूपी भगीर के पर्पर का भषिकार हुमा हामनी के पर्यर का अधिकार ना मोर या सर्व प्रकार के पर्पर का अधिकार समात सा इस भगनती पमाना का पर्पप विरुप नामक पचिपा पद समाप्तम् ॥ ५ ॥ + प्रकाशक रामावहादुर लाला मुसदेव सायणी मालाममादी- ? 88 पञ्चदश पनरणा सूत्र चतुर्थ उपाङ्ग 48 मर्थ * षष्ठम विरह पदम् * चारस, चउवीसाइ, सतरय, एगसमय, कत्तोय, उवट्टण, परभावियाउयच, अटेव चआगरिसा ॥ १ ॥ निरयमईण भते ! केवइय काल विरहिया उववाएण पण्णचा गोयमा ! जहण्णण एक समय उकासेण बारस मुहत्ता ॥ तिरियगईण मते! केवइय काल विरहिया उववाएण पण्णचा गोयमा!जहण्णेण एक समय,उकोसेण वारसमहुत्ता मणुयगईण भते ! केवइय काल विरहिया उवधाएण पण्णता ? गोयमा । जहणण एसमय उधोसेण पारस मुहचा।देवगईण मते!कवइय काल विरहिया उपवारण पण्णत्ता मा छठ पद में जीव का उपपानादि सम्बधी विरह ( बसर) कहते हैं इस के आठ द्वार है जिप्त के नाम : सामान्य से पारे मुहूर्त का उपपात दर्तन का विरह द्वार २ चौवीस मुर्नादि विशेष उपपात बर्तन द्वार, ३ उपपान उन का अतर, । एक समय में उपपान उतन, ५ कहां से भाकर कर उत्पमरोष पर आगतदारमरकर कहां नाव सो गसद र,परभवका आयुक्तिने प्रकारसे बंध, भौर८ भाठवा आगरिसा द्वार प्रथम विरह द्वार सामान्य से करस हैं अहां भगवान् नरक में कित्तने काल का विरह हासा है ? [एकादि नीव नरक में उत्पन्न हुवे पाद फिर जिवने काल बाद दूसरा जीव भाकर उत्पन्न होवे उसे विरह कहते हैं ] आओ गौतम ! जघन्य स एक समय उत्कृष्ट पारा मुहूर्त [प्रश्न प्रथमादि मातो नरक में से किमी भी नरक में चोवीस मुहू से कम विरह नहीं कहा वो यहां १२ मुहर्न का हि 428 पष्ठम विरह पद भर * मनुवादकामयापारीमुनि श्री भमोलक ऋपिनी गायमा ! जहणेण एक गमय उच्चासेण बारस मुहत्ता ॥ सिद्धिगईण भते । कपड्य काल चिरहिया सिझणयाए पण्णता ? गोयमा ! जहण्णेण एक समय उधोसण छम्मासा ॥ १ ॥ निरयगईण भत ! केवइय काल विरहिया उबट्टणाए पण्याचा ? गोयमा ! जहणेण एग समय उक्कोसेण बारस मुहुचा ॥ तिरियाईण भते! केवइय किस मकार का ? उत्तर-समुचय सातो नरक में कोई भी भीव उत्पन्न नहीं होव इम भाश्रिय पारद मुन का विरह कहा है भो भगवन् । सिर्ययगति का विरह कितने काल का कहा है ! बहो गौतम ! नपप एक समय का उस्कृष्ट बारह मुहूर्त का (या विर्यप गति का पिरह अन्य गति मे आकर उसमरे उस अपेक्षा से कारा, क्योंकि पांच स्थापर में हो येही मरफर समय २ असख्यात, सया बनस्पति में अनंत उत्पम दाते ) अहो मगवन् ! मनुष्य गसिका कितना विरह का ? भो गौतम ! मपन्य एक समय उत्कृष्ट वारा मुहूर्त मो मगमन् ! देवगति का विरह फिपने काल का कहा है ? मो गौतम ! जपन्य एक समय का उस्कृष्ट बाग मुहूर्त का हो भगवन ! सिद्ध गति का विरा सिवने काम का कहा है ! मो गौवम ! अघन्य एक समय उत्कृष्ट छ महीने का ॥ ॥ अर निरसने आश्रिय विरह मते में भो भगवन् ! नरक में निकलने आश्रिय कितने कास का विका? [एक मीप नरक का मरे पाद दूमरा जीव मरे उस का जितना अंतर पडे ] अहो गौतम ! मप य एक समय उत्कृष्ट पारह मुहूर्न भो मगन् ! तिर्यम गति में निकलने का कितने प्रकाशक-राजारादुर लाला मुखदेवसायजी बालाप्रसादजी.

? tra8- पञ्चदश-पनवणा सूप-चतुर्य उपाय - काल विराहया उवणाए पण्णता ? गोयमा । जहण्णेण एक समय उक्कोसेण वारस मुहुना ॥ मणुयगईण मते ! केवइय कालं निहिया उबट्टणाए पण्णचा गोयमा ! जहाणेण एगसमय उक्कोसेण बारस मुहुत्ता एव देवगइएवि ॥ १ ॥ २ ॥ रयणप्पमापुढवि नेरइयाण भते ! केवइय काल विरहिया उववाएण पण्णता? गोयमा। जहण्गेण एगसमय उक्कोसेण चउवास मुहुत्ता ॥ सक्करप्पभा पुढवि नेरइयाण भते! कवइय काल विरहिया उववाएण पण्णता? गायमा ! जहण्णण एग समय उक्नोसेण सञ्चराइदियाइ ॥ बालुयप्पभा पुढवि नेरइयाण भत ! केइस काल विरहिया उववाएण पण्णता ? गोयमा ! जहन्नेण एग समय उकासेण अद्वमास॥ पकप्पमा काल का विरा कहा है ! अहो गौतम ! जघन्य एक समय उत्कृष्ट पारह मुहूर्म का अरो भगवन् मनुप्य गति का किसने काल का विरह कहा है ? अहो गोतम ! जघन्य एक समय का उत्कृष्ट पारह मुडून का अहो भगवन् ! दवता का निकलने आश्रिय कितने काल का विरह कहा मो गौतम ! मधन्य एक समय का उत्कृष्ट पारह मुहूर्त का और सिद्ध तो सादि अपर्यत्रसित (सादि अनस) है चय नहीं है इसलिये उन का चयन आश्रिय विरह न होता है यह प्रथम द्वार ॥ २॥ अब चौपीमही दहक का अलग २ कह में महा भगवन् । रत्नप्रभा नरक का उत्पान आश्रिय कितने काल क अर्थ 87 पटम विरह पद पर OS मनुरादर-नामप्रामधारी मुनि श्री अमोलक पिमी र पुढवि नेरइयाण मत ! केवइय काल विरहिया उववाएण पाणचा ? गोयमा ! जहण्णण एग समय, उक्कोसेण मास ॥ धूमापमापुढवि नेरइयाण भते ! केवइय फाल विरहिया उववाएण पण्णता ? गोयमा । जहण्णेण एग समय उधोसेण पोमासा || तमप्पमा पुढवि नेरइयाण भत ! कवइय काल विरहिया उपवारण पण्णता ? गोयमा ! जहण्णेण एग समय, उक्कोसेण चत्तारिमासा ॥ अहे सत्तमा पुढवि नरइयाण भते! केवइय काल विरहिया उवधाएण पण्णता? गोयमा! जहण्णण एग समय, उकासेणं छम्मासा ॥ ३ ॥ असुरकुमाराण भते ! केवइय काल विरहिया उवधाएण पण्णता ? गोयमा । जहणेण एग समय, उक्कोसेण घउधीस विरह कहा है ! ओ गौतम ' मपन्य एक समय का उत्कृष्ट घोपीस मुहूर्स का [ पेमे आगे भी प्रश्नो- पर मानना ] शर्कर प्रमा नरक में मघन्य एक समय उत्कृष्ट साच अहो रात्रि का, पालु प्रमा नरक में नपन्य एक समय उस्कृष्ट पन्दरा दिन, पाममा पृथ्वी में जघन्य एक समय उत्कृष्ट एक मीनाका, पुम्रममा नरक में मघय एक समय उत्कृष्ट दो महीने का, तमप्रभा में मपन्य एक समय का उत्कृष्ट चार महिने का और सातवी तमतमा नरक में मपन्य एक समय का उत्कृष्ट छ महीने का ॥ ३ ॥ अमुरकुमार देवता का मपन्य एक समय उत्कृष्ट पीपीस मुहूर्त का, जैसा भमा भकाशक-राजावादुर लाला मुखदेवसायमी वाला प्रमादनी पन 48 पञ्चश पमवणा मत्र चतुय उपा १ महत्ता॥णागकुमाराण भते'केवइय काल विरहिया उववाएण पण्णचा? गोयमा!जहण्णेण एक्समय उक्कोसेण चउबीस मुहत्ता एव सुवण्णकुमाराण विजुकुमाराण अग्गिकुमाराण, दीवकुमाराण, दिसा कुमाराण, उदहि कुमाराण, वाउकुमाराण, थाणयकुमाराणय पत्तय २ जहण्णण एगसमय उक्कोसेण चउवीस महत्ता ॥ ४ ॥ पुढविकाइयाण भते ! कवइय काल विरहिया उववाएण पण्णता ? गोयमा ! अणुसमयमविरहिय उपवारण पण्णत्ता एवं आउकाइयाण वि, तेउकाइयाणवि, २ उकाइयाणपि वणरस- इकाइयाणवि,अणुसमयम विरहिय उववाएण प०॥५॥बेइदियाण मते केवइय काल विर- हियाउववाएण पत्तागोयमा! जहण्णेण एगसमय उकासेण अतोमहत्तएव तेइदियाय बुपार का कहा ऐगा ही नाग कुमार, सुवर्ण कुमार, विद्युत्कुमार, अग्निकुमार, दीपकुमार, दिशाकुपार, उरिकुमार वायुकुमार, भौर स्तनित कुमार इन दशोही भवनपति दवों को अलग • जघन्य एक समय उत्कृष्ट चौकीम मुहुर्न का विरह मानना ॥ ४ ॥ पृथ्वीकायिकादि चारो स्थावर म समय • असख्यान उत्पन्न न हैं और वनस्पति में माधारन आप्रिय समय २ अनत जीवों उत्पन्न होते है इसलिये भविगति जानना ॥ ५ ॥ इन्द्रिय तइद्रिय प चौरिन्द्रिय का जघन्य एक ममय का उत्कृष्ट अतर्मुहूर्तका सम्म तिर्यंच पचेन्द्रियका मी जघन्य एक समयका उत्कृष्ट अतर्मुहूर्नका, गर्भज तिर्यंच पचेन्द्रियका जघन्य 448 पम विरा पद 44 अर्थ ५ 49 अनुपादक पाएमापारी मुनि श्री भमालक ऋपिनी + चउरिदियाय सम्मुच्छिम पचिंदिय तिरिक्ख जोणियाण भते ! वेश्य काल विरहिया उवधाएण पण्णत्ता' गोयमा ! जहण्गेण एग समय उक्कोसेण अतोमहत्त ।। गम्भवक्कतिय पचिंदिय तिरिक्खजोणियाण भते! केवइय काल विरहिया उववाएण पण्णत्ता ? गोयमा ! जहणेण एग समय उक्कोसेण बारस मुहत्ता ॥ मम्मुच्छिम मणुस्साण मते ! केवइय काल विरहिया उववाएण पण्णता? गोयमा! जहण्णेण ९ग समय उक्कोसेण चउवीस महत्ता । गम्भवक्कतिय मणुस्साण भते ! पुच्छा? गोयमा! जहण्णेण एगसमय उक्कोसेण वारस मुहत्।।।६॥ याणमतराण पुच्छा ? गोयमा ! जहण्णेण एग समय उक्कोसेण चठन्नीस महुचा ॥ जोइसियाण पुच्छा ? गोयमा ! जहण्णेण एग समय उक्कोसेण चठबीस मुहुचा, सोहम्मे कप्पे देवाण भते ? केवइय काल विरहिया उपवाएण एक समय का उत्कृष्ट सरप मुहूर्त का, समृश्चिम मनुष्य का जघन्य एक समय का उत्कृष्ट घोषीप मुहूर्न मा ( यद्यपि समझिम मनुष्य का आयुष्य अतर्मुहूर्त का ? तपपि फिसी पक्क में ऐसा की नोग बनता है कि काई भी समझिम २४ मुकून तक उत्पन्न नहीं हाता है) गर्मज मनुष्य का जघन्य एक समय उत्कृष्ट पारद मुहूर्त ॥ ६॥ पाणव्पन्नर देव का नघन्य एक समय उत्कृष्ट चौवीस मुहूर्व, ज्योतिषी देर का मधन्य एक समय उत्कृष्ट चौवीस मुहूर्म, सौधर्म ईशान दवलोक का जघन्य एक समय उत्कृष्ट चौवीस मुहूर्त, सनत्कुमार देवलोक का जघन्य एक समय उत्कृष्ट ना दिन घीस मुहुर्त पा, माहेन्द्र देवलोक का * प्रकाशक राजाबगदुर लाला सुखदेवसहायजी घालामसादजी.

A ? Hg पञ्चदश पनवणा सूत्र-चतुर्य उपान का पण्णता ? गोयमा । जहण्णेण एग समय उक्कोमेण चउव्वीस महत्ता ॥ ईसाणे कप्पे देवाण पुच्छा' गोयमा ! जहण्णेण एग समय उक्कोसेण चउब्बीस मुहत्वासण कुमार देवाण पुच्छा ? गोयमा ! जहण्णेण एग समय उक्कोसेण गवगइदियाइ वीस मुहुचाइ ॥ माहिंद देवाण पुच्छा ? गोयमा ! जहण्णेण एग समय उक्कोसेण बारसराइदियाइ दस मुहुचाइ ॥ बमलोए देवाण पुच्छा ? गोयमा ! जहण्णेण एग समय उक्कोसेण अडतेवीसराइदियाइ ॥ लतग देवाण पुच्छा ? गोयमा ! जहणेण एग समय उक्कोसेण पणयालीस राइदियाइ ॥ महासुक्कदवाण पुच्छा ? गोयमा ! जहणेण एग समय उक्कोसण असीतिराइदियाइ ॥सहस्सार देवाण पुच्छा ? गोयमा। जहण्णेण एग समय उक्कोसेण राइदियसत, आणय देवाण पुच्छा ? गोयमा ! जय य एक समय उत्कृष्ट बारह दिन दश मुहू,ब्रह्मदेवलोक में जघन्य एक समय उत्कृष्ट माडे यावीम अहोरात्रि तक देवलोक में जघय एक सपय उत्कृष्ट पंतालीस अहोरात्रि, महाशुम देवलोक में जघन्य एक समय उत्कृष्ट अस्सी अहोराषि, सहस्रार दरलोक मे जघन्य एक समय उत्कृष्ट एर सो (१००) अहो रात्रि, मानसदरलोक में और माणत दवलोक में जघन्य एक समय उत्कृष्ट सख्यात मीने आरण और 10 भच्युन देवलोक में जघ प एक समय उत्कृष्ट सख्यात वर्ष, ग्रीवेक की नीचे की पिक में सस्पात सो वर्ष 44 पष्ठम विरत पद 822 अर्थ । 4 अनुवादक-पारमामचारी मुनि श्री अमोएक अपिभी + जहणण एग समय उक्कासण सखिजमामा, पाणय देवाण पुग्छ। जहणण एग समय उकासेण सस्विज्जमासा ॥ आरण देवाण पुच्छा ? गोयमा । जहण्णेण एग सयय उक्कोसेण सखेजवासा ॥ अच्युय देवाण पुच्छा ? गोयमा ! जहण्णेण एग समय उक्कोसण मखिज्जवासा ॥ हेछिमगेविजदेवाण पुष्छा ? गोयमा ! जहण्णेण एग ममय उकासेण सखिजाइ वास सयाइ, ॥ मझिम गेविज्जग देवाण पुग्छ। ? गोयमा ! जहण्णेण एग समय उक्कोसेण सखिज्जाइ वाससहस्साइ उवरिम गविजग देवाण पुच्छा' गोयम!जहण्णण एग रामय उकासेण सखेजाइ वाससयसहस्साइ ॥ विजय वेजयत जगत अपराजिय देवाण पुच्छा ? गोयमा ! जहण्णेण एग समय उक्कोसेण वर्ष, मध्यम वयफ में जघन्य एक समय उत्कृष्ट मख्यात हजार पर्प, ऊपर की वेक में जघन्प एक ममय उत्कृष्ट भसख्यात लाख वर्प, विजय येजयत जयत और अपराजित विमान में जघन्य एक समय उत्कृष्ठातख्यात पाल और सर्वार्थ सिद विमान का नघाय एक समय उत्कृष्ट पर पोपम का सख्याता माग का मो भगवन सिद्ध भगवत मिदपने उत्पन्न क्षेत्र नो कितने काल का विरह होवे ? महो गौतम !जयन्य एक समय का उत्कृष्ट छ माम का (यहा सरुपात महीने आये वहां, पूरा नहीं सख्यात सो पर्प आये वहां पोरमार वप नहीं जा सयात इनार वर्ष माये वहां परेलाम्ब नहीं और जहां सरयाव लाख ? मकाधक-राजापहाटर लाला मुखदव सहायजी ज्वालाप्रमादजो -

असखेज कालावटसिद्ध देवाण पुच्छा ?गोयमा ! जहण्णेण एग समय उक्कोसण
पलिओवमस्त सखजहभाग ॥ सिहाण भत ! केवइय काल विरहिया उववाएण
पण्णचा? गोयमा! जहण्णेण एग समय उक्कोसेण छम्मासा ॥ ७ ॥ रयणप्पमा पढपि
नेरइयाण भते ! केवइय काल विरहिया उबटणाए पण्णता ? गोयमा !
जहण्णेण एगसमय उक्कोसेण च उन्नीस महुचाएवमिहि वजाउन्बट्टणाएविभाणियन्वाजाव
अणुत्तरोवाइयत्ति, नवर जोइसिय वेमाणिएसु चयति अहिलावो कायन्व॥२॥ ८ ॥
48 पचदश पनवणा मूत्र सुर्य उपाय 48
++2 पष्ठम विरह पद ?*
अर्थ
वर्प को वहां पूरा कोर पर्प नी ९९९१ ९२९ वर्प म्यरा महीने २१ दिन जानना कुछ भी कम सर्व
म्यान समझना) ॥ ७ ॥ अप निकलन ( मरने ) आश्रिप विरह का है भो भगवन् ? रत्नप्रभा पृथ्वी
में निकलने का चिरा पडे तो कितना काल का पदे ? श्रओ गौतम ! जयन्प एक समय का उत्कृष्ट चौबीस
मुहूर्न का अर्थात् चौत्रीप्स मुहूर्न के बाद कोई मी पहिली नरक का नेरीया जरूर ही मरे यों पावत्
जमे उत्पम राने का सिर कहा सैसही पर चरने का विरह काना यावत् सर्वार्थ मिद पयत परनु चाने में
मिद नहीं करना क्योंकि सिद्ध सादि अपर्यवसित है, कभी चवसे न और ज्य तिपी विमानिक के
स्थान उर्वन नहीं कहना किन्तु चवन कहना क्योंकि-य मस्कर नीच उत्पन्न होत हैं ।इति हुनरादार ॥८॥

42 अनुापदरबासमभचारा मुनि श्री अमोलफ प्रपिमी * नेरइयाण भते । किं सतर उपवज्जति निरतर उबरजति ? गोयमा ! सतरपि उववज्जति, निरतरपि उवयजति ।। तिरिक्व जोणियाण भत ! किं सतर उववजति, निरतर उचजति ? गायमा । सतरपि उश्वज्जति निरतरपि उबरजति ॥ मणसाग भते | कि सतर उववजति निरतर उवरजति? गोयमा सतरपि उववज्जति निरतरपि उववजति ॥ देवाण मते ! कि सतर उववज्जति निरतर उववज्जति ? गोयमा ! सतरपि उपयनति निरतरपि उवववति॥देवाण भते किं सतर उपवजातनिरतर उपवजति ? गोयमा सतरपि उबवजति निरतरपि उववज्जति॥रयणप्पमा पुढवि नेरइयाण भते किं सतर मा तीसरा मनर द्वार कहते हैं महो भगवन् ! नेरीये अतर सहित उत्तम होते हैं कि निरतर उत्पन्न गते । भो गौतम! अंतर सहिन भी उत्पन्नात तब ही विक पदसा है और अंतर रहित निरतर भी उत्पन्न रोते मो भगान् ! वियच यानिक क्या असर महित उत्पन्न होते हैं कि अतर ररिस उत्तम दावे ? प्रदो गीतम! अंतर सहित भी उत्पन्न होते हैं [या प्रम तिपंच आश्रिय ], निरतर मी उत्तम रेति । आओ भगवन् ! मनुष्य अतर सहित उत्पन्न होत कि अतर रहित उत्तम सोते है' भरो गौतम ! मसर सहित मी और अंसर रित भी उत्पनाते है यो भगवन् ! देवता मसर सहिन उत्तम हवे हफि भवर रहित उत्तम होता हैं? अहो गौवम । तर महित मी उत्तम प्रकाशक-रामावहादुर लाला मुस्वदेवसहायनी मागप्रमानो .

उववजति निरतर उववजति गोयमा सतरपि उक्वजति निरतरपि उववजति ॥ एव जाव महे सत्तमाए सतरपि उववजति निरतरपि उवधज्वति। असुरकुमाराण मते! देवा किं सतर उववजति निरतर उवयजति ? गायमा ! सतरपि उववज्जति निरतर उपवजति ॥ एर जाव थणियकुमारा सतरपि उवववति निरतरपि उववजति पुढपि काइयाण भते! किं सतर उवधज्जति निरतर उववज्जति गोयमानो सतर उववति निरतर उववज्जति ॥ एव जाव वणस्मइकाइया नो सतर उघवजति निरतर उववज्जति ॥ बेइदियाण भते । किं सतर उववज्जति निरतर उववज्जति ? गोयमा ! सतरपि उवव- 488 पञ्चदश-पभरणा मूत्र चतुर्य उपाङ्ग 48811 अर्थ होते हैं और असर रहित भी उत्पन्न होते हैं अब चौबीस दबक माश्रिय करते हैं अहो भगवन् । रत्नममा नरक के जीव अतर सहित उत्पन्न होते हैं कि असर रहित उत्पन्न होते हैं? अहो गौतम । अतर सहित भी उत्पन्न होते हैं और अंसर रहिस मी उत्पन्न होते है जैसा रस्नममा नरक का कहा सैसी सातोंदी नरक का जानना महो भगान् ! असुरकुमार देवता असर सहित उत्पन्न होते हैं कि भतर रहित उत्पन्न होते हैं ' अहो गौतम! असर सहिस भी उत्पन्न होते हैं और अतर रहित भी उत्पन्न होते हैं ऐसे ही स्थनित कुमार पर्यंत कहना अदो भगवन् ! पृथ्वी काया के जीव अतर सहित उत्पन्न रोते हैं कि मनर रहित उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! पृथ्वी काया अनर सहित उत्पन्न नहीं होवे 49 पष्ठम विरह पद 982- 4 मापदरासपालचारा मुनि श्री भमोलफ अपिमी + नेरइयाण भते । किं सतर उपवजति निरतर उपयजति ? गोयमा ! सतरपि उवववति, निरतरपि उवववति ।। तिरिक्व जोणियाण भत ! किं सतर उववजति, निरतर उपयजति ? गायमा । सतरपि उववज्वति निरंतरपि उवववति ॥ मणसाग भते ! किं सतर उपवनति निरतर उपवनति गोयमा। सतरपि उबवज्जति निरतरपि उपपजति ॥ देवाण मते ! किं सतर उपवनति निरतर उववज्जति ? गोयमा ! सतरपि उक्वजति निरतरपि उवववतियाण मते!किं सतर उपवनतिनिस्तर उववज्जति ? गोयमा सतरपि उववजति निरतरपि उववजातिारयणप्पभा पुढवि नेरइयाण भते किं सतर मा वीमरा भवर द्वार कहते हैं महो मगवन् ! नेरीये असर सरिन उत्तम होते हैं कि निरवर उतान गते भो गौतम ! अतर महिन भी उत्पम इसे [तम हो विर परता है ] और तर रहित निरतर भी उत्पम रोने: पो भगवन ! तिर्यंच यानिक पा असर महित उत्पन्न होते हैं कि अतर सनि उत्सम हाले ? प्रमो गौतम ! अंतर सरिस भी उत्पन्न होने [या प्रम तिर्यंच आश्रिय ] निरवर मी उत्सन्न होते हैं महो मगवन् ! पनुष्य भतर सहित उत्पन्न होत हैं कि मंतर रहित उत्पम होत अहो गांवम ! अतर सहित मो और अतर ती मी उत्पम हाते हैं यहो भगवन् । देवता अवर सहित उत्तम होते हैं कि प्रवर रहिन उत्सम शेष है ? भो गौतम ' अंतर महित भी उत्तम •प्रकाशक रामावहादुर लाला मुखदेवसहायनो ज्वाराप्रमानो पञ्चदश-पभरणा सूत्र-चतुर्य उपास 428 यजा भाणियव्या आव वेमाणिया, गवरं जोतिसिय येमाणिएस चयण अमिलाको कायन्बो ॥ ३ ॥ १० ॥ नरइयाण भते । एगसमएण केवइया उववजति गोयमा! जहण्णेण एगोवा दावा तिणिवा, उक्कोसेण सखेजावा असखजावा उववजति ॥ एवं जाब महे सचमाए ॥ असुरकुमाराण भते ! एग समएण केवइया उवयजति ? गोयमा ! जहष्णेण एगोवा दोवा तिण्णिवा, उझोसण सखिज्जाधा असखेजावा ॥ एष णागकुमारा जाव थणियकुमारावि भाणियन्वा ॥ पढधिकाइयाण भते ! एग 42titi पष्ठम विरह पद 44 अर्थ परतु सिद्ध भगवंत का उदर्नन नहीं माना और ज्योसिपी तया वैमानिक का चरन कहना ॥ इति तीसरा द्वार॥ १० ॥ चौथा एकममय में उत्पन्न होने वाश्रिय कहते हैं अहो भगवन ! मेरीये एक समय में कितने उत्पन्न होते हैं " ओ गौतम ! जघन्य एक दो तीन उत्कृष्ट सख्यात असख्यात नेमा यह समुचय नरक का कहा वैसे ही र प्रभा यादि सातों नरक का कहना अहा भगवन् ! असुर कुमार देवया एक समय में कितने उत्पन्न हाते ! हा गौतम ! जघन्य एक, दो, तीन उत्कृष्ट सरुपात अंसख्यात ऐसे ही नाग कुमार परित् स्थनिव कुमार पर्यंत काना' अहो मगषन् । पृथ्वीकाया एक समय में कितने उत्पन्न होते ? अब गौतम ! समय २ में रिस रहिव असंख्यात सत्पन्न हो। ऐसे ही यापत् पायु काया 40 मनुवादक-पासप्रमचारी मुनि श्री ममेक ऋपिणी " जति, निरतरपि उवववति ।। एवं आर पचिदिय तिरिक्ख जोणिया सतरवि उवव- जति निरतरपि उवववति ॥ मणसाण भते! किं सप्तर उववजाति निरतरं उववजाति? गोयमा सतरपि उववज्जति निरंतरपि उववज्जति ॥ एव वाणमतर जोइसिया सोहम्म जाव सन्बट्रसिद्ध देवाय सतगपि उवयजति निरंतरपि उववज्जति ॥ सिद्धाण भते । कि मतर सिझति निरतर सिझति ? गोषमा | सतरपि सिझति निरतरपि सिज्झति ॥ १ ॥ नेरइयाण मते । किं सतर उपहति निरतर उन्नति ? गोयमा ! सतरपि उवहति निरतर उहति ॥ एव जाव जहा उववाओ भणिओ तहा उवणावि सिद्धि. . प्रकाशक-राजापहादुर लाला मुखदेवमायनी ज्वालामसादी * परतु निरन्तर उत्पम दोस में एमेही वनस्पति काया तक काना-'अहो भगवन् ! पहन्द्रिय भसर सहित उत्पन्न होत किं निरंतर उत्पन्न " भो गौतम ! अन्तर सरिस मी उत्तम होते हैं और निरक्षर मी उत्पन्न होते हैं, एसे ही तिर्यप पचेन्द्रिय, मनुष्य, पाणव्यान्तर ज्योतिषी भौर वैमानिक पारह साप सिद्ध विमान पर्यंत काना सब चिरतर दोनों प्रकार उत्पन्न होस है ॥ अहो. भगवन् ! सिद्ध भगरत अंतर सहित सिद होने हैं कि निरवर सिद्ध होसे ओ गौतम! दोनों हा प्रकार सिद्ध होते ॥ ॥ मम निकलने भात्रिय कहते हैं आओ भगवन ! मरेक के जीवों अंतर सरित निकलते हैं कि निरतर निकलते हैं? महो गौतम जैसा रतम होने का कहा वैसा है ईतन-निकलने का भी कहना - 48 पथदश पभरणा सूत्र-चतुर्य उपास 48+ जोणिया, गम्भवक्कतिय पचिंदिय तिरिक्ख जोणिया ॥ समुच्छिममणुस्सा, वाणमतरा जोइसिया सोहम्मीसाण सणकुमार माहिद बभलाय लतक महा सुक्क सहसतार क्रेदेवा एते जहा नेरइया॥ गमवक्कतिय मणुस्साणयपाणय आरण अच्चय गेविजगअणुत्तरो- ववाइयाय एते नहष्णेण एक्कोवा दोवा तिणिवा उक्कोसेण सखेज्जावा उबरजति सिद्धाण भते ! एग समएण केवइया सिझति ? गोयमा ! जहण्णण एक्कोवा दोवा तिण्णिवा उकोसेण अट्ठसय॥१॥नेरयाण मते! एग समएण केवझ्या उवदति गोयमा! जहण्णेण एकोवा दोवा तिणिवा उक्कोसेण सखिज्जावा असखिज्जावा उवदृति, एव जहा नपन्य एक, दो, सीन उत्कृष्ट सख्यात ममख्यात उत्पन होते हैं और गर्मम मनुष्य आणन माणत धारण अच्युस यह पार देवलोक में नप प्रेवेयक में पांच अनुचर विपान में जघन्य एक, दो, तीन उत्कृष्ट सल्या की उत्पन्न होत हैं क्यों कि गर्मम मनुष्य तो संख्यावती और नवये देवलाक से यायत सर्वार्थ सिद तक मनुष्य ही मरकर नाते हैं, इसलिये एक समय में सख्यात ही उत्पन्न होते हैं यहो भगवन् ! सिद्ध एक समय में कितने सिदावे हैं ? अहो गौतम ! जघन्य एक, दो, तीन उत्कृष्ट एक सो आठ सिद्ध होते हैं ॥ ११॥ अप उदर्तन फाते हैं मो भगवन् ! नरफमें से पक समय में सिने जीवों का वर्सन होता है अर्थात एक समप में कितने जीवों निकलत है? महो गौतम । जघन्य +8+ पष्ठम विरह पद 488-9: मर्थ मनुवादक-पालनमवारी मुनि श्री नमोहक फपिनी + समएण कवइया उपयज्जति ? गोयमा । अणुसमय अविरहिय असखजा उवयवति।। एव जाव वाउकाइयाण ॥ वणस्सइकाइयाण भते ! एग समएण केवइया उववज्जति? गोयमा! सट्टाणुववाय पहुच्च अणुसमय अविरहिय अणता उवववति ॥ परट्ठाणुवधाय पडुच्च अणुसमय अविरहिय असतेजा उवववति ॥ बेइदियाण मते ! केवइया एगसमएण उववज्जति ? गोयमा ! जहण्णेण एगोवा दोवा तिण्णिवा उक्कोसण सखेबावा असखेबावा ॥ एष तेइदिय परिदिय सम्मुच्छिमपचिदियतिरिक्त पर्यंत काना अहो ममवन् ! पनस्पतिकाया एक समय में कितने उत्पन्न होते हैं। हो गौतम ! सस्थान मानिय भर्यात् पनस्पति से मरकर पुन पनस्पति में उत्पम होना उस अपेक्षा समय २ में पिरह ररिस मनन उत्सम हासे हैं और परस्पान आप्रिय असल्याव उत्पन्न होते हैं क्योंकि पनस्पति छोड अन्य स्थान में मसरूयात ही जीवों में महो भगवन् ! इन्द्रिय एक समय में कितने उत्पम, होते हैं। मा गोदम' नप प एक, दो, तीन पत्कृष्ट सख्यात असंख्यास उत्पन्न वे ऐसेरी इन्द्रिय चौरिन्द्रिय, समूचिम तिर्यंच पचेन्द्रिय, गर्म तिर्यंच पचेन्द्रिय समूर्तिम मनुष्प, पाणम्पन्तर, ज्योविषी, मोर प्रथम सौधर्म देवलोक से यापत् पाठवे सहसार देवसोक तक नरक से ही एक समय में प्रकायक-राजारपदर लाग मुसदेव सहायजी मालाप्रसादमी - 486 पञ्चदश-पग्णरणा समन्मवर्य उपा4881 तिरिक्खजोणिएहितो उपवध्वति, णो बेइदिय तिरिक्खजोणिएहितो, णोतेइदिय तिरि- खजोणिएहितो, जो चउरिदिय तिरिक्खजोणिएहितो उपवनति,पचिंदिय तिरिक्खजो- णिएहितो उववज्जति ॥ जइ पचिदिय तिरिक्स्व जोणिएहितो उपवनति, किं जलयर पचिदिय तिरिक्खजोणिएहितो उववज्जति, थलयर पचिदिय तिरिक्खजोणिएहितो उपयजति, स्वइयर पचिंदिय तिरिक्खजाणिए तो उववज्जति ? गोयमा! जलयर पचिदिय तिरिक्वजाणिएहितो उववञ्चति, थलयर पचिंदिय तिरिक्खजोणिएहितो उयचति, स्वहयर पचिदिय तिरिक्खजाणिएहितो उवधज्जति ॥ जदि जलयर पचिंदिय तिरिक्खजोणिएहितो उववजति किं सम्मुग्छिम जलयर पचिंदिय तिरिक्खजोणिरहितो उववपति, गम्भवतिय जलयर पचिंदिय तिरिक्खजोणिय तिरिक्खजोणिएहितो उव- भो गौतम ! एकेन्द्रिय, बेइन्द्रिय, नान्दिप और चउरिन्द्रिय से तो नेरीये उत्पन्न नहीं होते हैं परतु तिर्यच पचेन्द्रिय स नरीय उत्पमा हाते में वो मारन् । यदि तिर्यंच पचन्द्रिय से नेरीय उत्पन्न होते हैं तो क्या जलचर सिर्यय पचन्द्रिय से हाते कि स्थलचर विर्यच पवेन्द्रिय से होते हैं कि स्वेचर विर्यच पचेन्द्रिय से स? अहो गीप जलचर स्यसचर चर वीनों से ही होते है यदि अहो भगवन ! जलघर तिर्थव 438 पष्ठम घिरा पद 48ind मर्थ --- HHHHHHHHH में विपुल गिरि पर सथारा ले वे मी मुक्ति में गये । भागे छटे अध्याय में उमी कारन्दी के निवामी, धृति घर नामक गाथापति के सम्बन्ध में मी ठीक ऐमा ही कहा गया है । तव सातवें भार थाटवे यध्यापों में यह उनस पाया जासाइकि-साकेत नगर-निवासी कैलाश भौर हरिचन्दन नामक गाधापठियों ने समय पर भगवान् महा- वार का उपदेश सुन दीपा को अङ्गीकार किया । पारह वर्षों तक चरित्र का पालन कर, अपने अन्तिम समय में उसी विपुलगिरि पर सन्यारा ले मोक्ष-धाम को सिधार गये । भागे ना मध्यार में भी राजगृह के निरासी वारसक नामक गापापति के सम्बन्ध में ठीक इसी प्रकार का वर्णन पाया जाता है । उसके दीवित सने, चारित्र- पालन करन तथा सन्यारा ले मोघ में जाने, मादि का वर्णन ठीक पाठवें अध्याप ही के समान है। इसी प्रकार दशवें पौर ग्यारहवें अध्यायों में उन्नख है, फि दुखिपलास उद्यान से सुशोभित वाणियों गांव के निवामी मुदर्शन मैर पूर्णभद्र गापापतियों ने भी दीचा ले पाँच वर्ष का चालि पालन किया । क्या अपने भन्तिम समय में उठी विपुल गिरि पर सन्थारा ले ये भी मोघ धाम को गये । भागे बारहवें राधा तेरहवें भध्यायों में वर्णन शिया गया है, कि श्रावस्ति नगरी के निवासी क्रमश सुमन-भद्र मौर सुप्रतिष्ट नामक गाधापतियों ने दीपाचारण की। मुमन- मद्र मुनि ने भनेक वर्षों तक चारित्र पाला । और सुप्रतिष्ट मुनि ने सचाईम वर्प वर चारित्र पाला । भार, वर ये दोनों भी अपने भाने मन्तिम समय में, विपुलगिरि पर सन्यारा ले, मति में गये । मागे फे चौदहवें अध्याय में राजगृह के निवासी मेप.नामक गाथापति का उनस है । उन्होंने मी समय पाकर, दीपा धारण की । भनेकों वर्षों छठा . मृल.-उक्खेनो पन्नरमस्स यज्झयणस्त एव वयासी एव खलु जब तेण काण तण समएण पोलासपुरे नयरे, सिरीवणे उज्जाणे तत्थण पोलासपुरेनयरे विजये नाम राया होत्या । तस्सण विजयस्स रन्नो सिरीनाम देवी होत्था, वरणश्रो । तस्सण विजयस्स रन्नो पुत्त मिरीए देवीए अत्तए श्रइमुत्ते नाम कुमारे होत्था, सुकुमाले । तेण कालेण तेण समएएणं गमणे भगव महावीरे जाव सिरीवणे विहरइ । तेण कालेण तेण समएण समणस्स भगव श्री महारीररस जेहे अतेवासी इदभूई जहा परणत्तीए जाव पोलासपुरे नयरे उच्च जाव अडइ। भाई जम्पूस्वामी न सुधर्मस्वामी से कहा- भगवन् ! छठे वर्ग के चौदह अध्यायों में, जो वर्णन किया गया द, उमा श्रवण तथा मनन भने किया । भव शगले अध्याय में, जो भी कुछ भगवान् ने श्रीमुख से वर्णन किया ६, उग रन न की कपा करें । हे जम्बू ! सुन । उसी काल में एक पोलासपुर नामक नगर था । जो श्रीवन नामक एक परम मनाहर उधान मे सुशामित था । उन दिनों यहाँ विजय नामक राजा राजासीन थे। उसकी रानी का KHAN नाम श्री देवी था । उन विजय राजा के पुत्र और श्री देवी का अगज अइमुच एवन्ता-नामक कुमार था । जो बहरा ही मुकुमार तथा सुशील था । एक दिन भगवान् महावीर भव्य प्राणियों को धर्म का बाघ परते-कराते हुए उसी पोलासपुर नगर के बाहर ' श्रीवन ' नामक वाग में पधार गए । भगवान् पी भर रोग-नाशिनी माता को प्राप्त कर उनके सबसे बड़े शिष्य, द्रभूति जिस प्रकार भगवतीजी मूत्र में वर्णन है, येसे ही यहाँ पोलासपुर में, पनी तथा निर्धनी सभी घरों में भेदा भेद के मावों का जरा भी विचार अपन हृदय में न रखते हुए भिषा के लिये जाते। मूल.-इम चण भइमुत्ते कुमारे दहाए जाव विभूसिए वहहिं दारए य दारियाहि य डिभए हि य डिभिया हि य कुमारए हि य कुमारिया हि य सदि सपरिबुडे स या गिहायो पडिनिक्समइ २ ता जेणेव इदट्टाणे तेणेव उवागए, तेहि वहहिं दारएहि य दारियाहि य डिभएहि य डिभियाहि य कुमारएहि य कुमारियाहि य सद्धिं सपरिचुडे अभिरममाणे २ विहरइ । तए णं भगव गोयमे पोलासपुरे नगरे उच्चनीय जाव घडमाणे इदट्टाएस्स दूर सामते ण वीईवयइ । तए ण से अइमुत्ते कुमारे भगव गोयम दूर मामतेण वीई वयमाण पासह २ ता जेणेव भगव गोयमे तेणेव उवागए उवागइ त्ता भगव गोयम एव वयासी के प भताम्मे "पा मग.

AME पर मदन्र- श मधम्। ण भते ! तुम्भे ? कि वा अडह । भावार्थ एक दिन उसी समय अचानक भइमुत्त कुमार भी स्नान कर बत्रालङ्कारों से सुसजित बन, भनेफ सरक दारिका, डिम्भक डिम्मिका और कुमार एव कुमारिकामों के साथ, घर से निकल कर जहाँ इन्द्रस्थान अर्थात् खलन या क्रीड़ा करने की जगह थी, उधर भा निकले । और उन सभी के साथ वे भी वहाँ खेलने लगे । भग- वान क सब से पड़े शिष्य श्री इन्द्रभूति (गौतम स्वामी ) जो पोलासपुर नगर में सभी धनी निर्घनियों के घर में भिचार्य भाये हुए थे, उस दिन उस क्रीड़ा भूमि के निकट हो कर प्रस्थान कर रहे थे । उन दिव्य तपोधारी एप तेजस्वी गौतम सामी को भइमुच कुमार ने अपने क्रीडा स्थल के विल कुल समीप ही से निकलते हुए देखा। खन को परे रख, वह उनके पास थाया और उनसे उनका परिचय पूछने लगा । एव उनके, यों इधर-उघर घर घर रिन का कारण जानना चाहा। मृल'-तए ण भगव गोयमे अहमुत्त कुमार एव वयासी अम्हेण देवाणुप्पिया समणा णिग्गथा ईरिया समिया जाव वभयारी उच्चनीय जाव अडामो । तएण अतिमुत्ते कुमारे भगव गोयमे एव वयासी ए हण भते ' तुम्भे जा ण अह तुभ भिक्ख दवावमीति का भगव गोयम अगुलीए गेण्हइ २ ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागये। तए ण सा सिरी देवी भगव गोयम एज्जमाण पासइ २ त्ता हट्ट तुट्ट प्रासणागो अन्भुट्टेड २ ता जेणेव भगव गोयमे तेणेव उवागया,भगव गोयम तिक्खुत्तोग्रायाहिण पयाहिण करेइ २त्ता वड नमसह वदिचा नममित्ता विउलेण असणपाण सादिम सादिमेण पडिलाभेड जाव पडिविसबेइ । मावार्थ -इस पर गौतमस्वामी ने अमुच कुमार को उपर में इस प्रकार पहा-हम पांच महायत, पाँच ममिति मदि भार नौ नियम पूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले, श्रमण-निर्ग्रन्थ है । भितार्थ इधर उधर परों में हम जा रहे हैं। स्वामीजी की इन बातों को अपण कर अइमुचकुमार पोला भगरन् । भाप भिवा के लिए फिर रहे। म एव चलिये भाप को मैं मिचा दिलाता है। ऐसा कह कर बुमार ने स्वामीजी की प्रालिये पार ली । र, उ हें अपने घर लाया । कुमार की माता श्रीदेवी ने श्रीगावम स्वामी को भरने पर भनिधि के रूप में पाये हुए दस का, बड़ी प्रसन्नता प्रकट की सथा विधि-पृषक पन्दना पर उच्च भावों के साथ, अति ही निर्मल शन्त करण से, भाउन, पान, खाद्य और स्वाद यह चारों ही प्रकार का माहार उन्हें पहराया।

ra- दशाह सूचम्। ११ मूल -तए ण से अइमुत्ते कुमारे भगव गोयम एव वयासी कहिण भते ! तुम्भे परिव सह तए ण भगव गोयमे अहमुत्व कुमार एव वयासी-एव खलु देवाएप्पिया ! मम धम्मा- यरीए धम्मोवएसए भगव महावीरे थाइगरे जाव सपाउकामे इहेव पोलासपुरस्स नयररस पहिया सिरिवणे उज्जाणे अहा पडिग्गह उग्गह उग्गिरिहत्ता सजमेण जाव अप्पाण भावे माणे विहरइ, तत्थण अम्हे परिवसामो । तए ण से अइमुत्ते कुमारे भगव गोयम एव- वयासी-गच्छामि ण भते! अह तुम्भेहिं सद्धिं समण भगव म गवार पायवदए । अदासुह देवाणुप्पिया ।। भाव र्थ तत्पश्चात्, उन भइमन्त कुमार ने गौतम स्वामी को यूँ निवेदन किया कि भगवन् ! भाप कहा निवास परते ६ १ उत्तर में गौतम समी ने कुमार से कहा-हे देवानुप्रिय ! धर्म का फिर से उत्थान करने वाले और मोचाभिलापी, मेरे धर्माचार्य एव धर्मापदेशक भगवान् महावीर इसी पोलासपुर नगर के बाहर स्थित ' श्रीवन' नामक उगान में, सयम और तपस्या से भाराधना करते हुए भाजकल विराजत हैं। वहाँ, मै भी, उनकी सेवामें रह कर फाल-पापन कर रहा हूँ। यह सुन कर कुमार चोला भगवन् ! मैं भी भापके साथ, उन परम प्रभु के . દર, दशनाथ मऊ, ता क्या हानि है ? स्वामीनी न फमाया-वाइ हानि नहा । विम प्रकार तुम्हें मुग हो, निर. माव म तुम सा ही कर सकते हो । मूल -तए ण से अइमुत्ते कुमारे भगव गोयमेण सर्दि जपर समणे भगर महावीर तेणेव उवागच्छइ २ चा समण भगव महावीर तिक्खुत्तो थायाहिण पयाहिण करई २ त्ता वदह जाव पज्जुवासइ । तए ण भगव गोयमे जेणेव समणे भगर महावीर तव उवागए जाव पडिदसेइ २ ता सजमेण तपसा अप्पाण भावेमाणे विहरइ । तएण ममणे भगव महा वीर अइमुत्तस्स कुमारस्स तीसेय धम्मकहा। तए ण मे अइमुत्ते कुमारे ममणस्म भगायो महावीरस्स प्रतिए धम्म सोचा सिसम्म हट्टतुट्ट ज णवर देवाणप्पिया अम्मापियगे यापु. च्छामि तए ण अह देवाणप्यियाण प्रतिए जाव पव्वयामि । ग्रहासुद्द देवाणुपिया ' मा पडिबध करेह । भावार्थ तय इन अमृत कुमारने, गौतम स्वामी के साथ, भगयान् महावीर पे पास, प्रारर उ विधि विधान के साथ वन्दना की। इतना ही फर फे फुमार चुप न रहा। यह उनकी मेया में भी virth -- ܐ नान्न-2 TIR मुश्मा M गांसम स्वामी न भी भगवान् के पास मा उन्हें माहार दिखाया । फिर भोजन ग्रहण पर लेने पर, सयम पौर तपस्या में, अपनी मात्मा को सलग्न किया । उधर भगवान महावीर प्राइमत कुमार को धर्मापदेश देने लगे। धमाप-श श्रवण पर मार का हृदय याँसा उछल पड़ा । उस हदयङ्गम पर यह भगवान् से यूँ मोला-भगवन में माता पिता में पछ र भाऊँगा धार मापसे दीक्षा ग्राण करूँगा । भगवान् ने फमाया-हे देवानुप्रिय ! जिस प्रकार तुम्हें सुख प्राप्त हो, उस प्रकार करो ! परन्तु किमी भी शुम काम में, किसी भी प्रकार का विलम्प करना टीना। मूल -तए ण से अइमुत्ते कुमारे जेणेव अम्मापियरो तेणेव उवागए जाव पव्यत्तित्तए प्रदमुत्त कुमार अम्मापियरो एव वयासी चाले सि ताव तुम पुत्ता असबुद्धे सि तुम पुत्ता किं न तुम जाणासिं धम्म ' तए ण से अइमुत्ते कुमारे अम्मापियरो एव वयासी-एव खलु ग्रह अम्मायायो ज चेव जाणामि त चेव न याणामि ज चेव न याणामि त चेव जाणा- मि । तए ण त अइमुत्त कुमार अम्मापियरो एव वयासी-कह न तुम पुत्ता । ज चेव जाणासि जाव त चेव जाणासि ।

. 12 होंगे। मैंने इसी लिए कहा था कि-जो में जानता हूँ, उसको में नहीं जानता भार जिम में नहीं जानता है, उसे जानता हूँ। पूजनीय ! अव तो बहुत हो गई। पापी माझा प्राप्त होने पर मेरी ती भर दीवा प्राग माने दाम प्राल इच्छा है । इस पर फिर भी उस के माता पिताने उसे अनेकों प्रकार से मनाल नपा प्रतिज्ञ पपनों म समझाने की मरपूर चेष्टा की । परतु भगवान् के घणमर पे सत्सङ्ग मात्र से, मार पशुम फमा या उप पात्र हो भाया था। भत वह तो टस से मस मी न था । भर उस पा निथप भटल था । मब तो उपर मातासिता ने उस से, भन्त में, ३ कहा-पुत्र ! कम से कम यह गाव तो मानतो, रि. पर दिन का राव करते हुए हम तु, अपनी भाखों देख लें । कुमार ने अपनी मान के द्वारा थाने माता पिता के प्रस्तार रा मामादन पर मम र्थन क्यिा । भरने कुमार के इन भावों को देख, उनका फएठ गद्गद् से गपा | मार शरि रोमाधित हो ने कुमार का विधान के साथ राज्याभिषेक किया । कुमार ने गम्प पी पागोर फो सपने दाय में से फर, मां प्रथम भपने दीपोत्सव ही की भाना दी । तर महाल की मांति एमार ने भी दीक्षा पारण या, सामादिर से ने कर ग्यारह भङ्गों का सम्पूर्ण मधन फर डाला । उन्हों ने गुण रत सरत्सर, मादि नास्पाएँ भी सूर ही की। भनेको वर्षों तफ चारित्र-पालन किया । अन्तिम समय में, पिपुलगिरि पर स चारा ले, मोच धाम में ये जारिप । मूल.-उक्खेवयो सोलमस्स शझयणम्म | ma Hain धर्ग मा यम्। . ण वाणारसीए एयरीए काम महावणे चेइए, तत्थण वाणारसीइ अलक्खे णाम राया होत्था। गदम्त- तेण कालेण तेण समए ण समणे भगव महावीरे जाव विहरइ परिसा निग्गया तए ण थल क्खे राया इमीसे कहाए लट्टे समाणे हट्ट तुटू जहा कूणिए जाव पज्जुवासइ, धम्मकहा। तए ण से अलक्खे राया समयस्स भगवयो महावीरस्स थतिए जहा उदायणेतहाणिक्ख- ते, णवर जेट्ट पुत्त रज्जे पहिसिंचइ, एकारस अगा, बहृवासा परियायो जाव विपुले सिद्धे एव जवू ! समणेण जाव छट्टमस्स वग्गस्स श्रयमट्टे पण्णत्ते । मायार्थ श्री जम्मू स्वामी ने श्री सुधर्म स्वामी से कहा भगवन् ! छटे वर्ग के पन्द्रहवें अध्याय में, जो वर्णन था, पा मापने कपा फर के मुझे कह सुनाया । उसका ध्यान, घारमा मौर निधि प्यासन-पूर्वक मने मनन भी किया। प्रागे इसी वर्ग क सोलहवें अध्याय में वर्सन है, उसे जानने की मेरी उदय इच्छा है । अस्तुः । उसी को फर्माने की अनुक पा माप भर मुझ पर दिखाइए । जम्प् ! सुनो ? भगवान महावीर के समय में काम महावन नामक बाग से सुशोभित एक पायारसी नगरी थी । उस समय वहाँ 'श्रलच ' नामक एक राजा अपने राज का सञ्चालन करता था। उसी प्रयधि में भगवान् महावीर छोटे-पड़े सभी गार्यों में धर्मोपदेश देते हुए वहाँ पधारे । भगवान् की पधरा १२७ MAH वनी उसी वान में हुई। सारे नगर में, विजली की भाँति थापके शुभागमन का मुसबाद पहुँच गया । भवतो भाप के दर्शन करने तथा व्याख्यान श्रवण करने के लिए बनता नगरी की दशों दिशामों से सिमिट मिमिट कर माने लगी। प्रभु के पदार्पण का यह शुम सन्देश राजा अलघ को मी एफ दिन मिला । सन्देश के श्रवण करते ही, राजा बड़ा ही प्रसन्म हुभा । और कौणिक की तरह बड़े ठाट-पाट-से, एक दिन प्रभु की सेवा में मा उपस्थित हुमा । भगवान् ने उसे भी धर्मोपदेश सुनाया । उपदेश श्रवण कर राजा भलत ने भगरान् महावीर पे पाम उदाई राजा-की-तरह दीधा धारण करली । भन्तर कवल यही है, कि इन्हों ने भरने पड़े पुत्र के सिर कन्धों राज का सारा मार-रक्खा । भलच मुनि ने ग्यारह मा तक का ज्ञानाम्यास किया तदन वर, अनेकों यो तक चारित्र-पालन कर भन्तिम समय में विपुलगिरि पर सन्थारा ले, मुनि घाम को वे सिधारे । जम्यू ! अन्तगह के छटे वर्ग में इस प्रकार मगवान् महावीर ने वर्णन किया है ॐ इति पप्टमो धर्ग SATH सप्तमो-वर्गः टूटा वर्ग सात । मूल -जइण भते सत्तमस्स वग्गस्स उक्लेव श्री जान तेरस अज्झयणा परणत्ता। तजहा-नदा तह नदवई नदोत्तर नदसेणिया चेव । मरुया सुमरुया महमरुया मरुद्देवा य अट्टमा ॥ १ ॥ भदाय सुभद्दा सुजाया सुमणातिया । भूयदिन्नाय बोद्धव्वा सेणिय भजाण नामाइ । जइण भते ! तेरस अज्मयणा पन्नता पढमस्त ण भते ! अज्मयणस्स समणेण जाव सपत्तेण के पट्टे पगणते ' एव खलु जबू । तेण कालेण तेण समएण रायगिहे पयरे गुण सिलए चेइए सेणिए राया,वरणयो। तस्सण सेणियस्स रगणो नदा नाम देवी होत्या वएणयो । सामी समोमढे परिसा निग्गया । तए ण सा नदा देवी इमीसे कहाए लट्ठा समाणा जाव हट्ट तुट्टा कोडविय पुरिसे सद्दावइ २ चा जाण जहा पउमावइ जाव एकाररस अगाइ अहिजित्ता वीस वासाइ परियाग्रो जाव सिद्धा । एव तेरस वि देवीयो णदागमेण १२६ -- 3 णेयवाथो णिक्खयो। भावार्थ,-श्री जम्बू स्वामी ने श्री सुधर्म स्वामी से कहा भगवन् ! छठे वर्ग में, जो वर्णन था, वह मैने सुना। मागे सातवें वर्ग में, जो वर्णन है, अब उसी को कृपा कर के फावें । जम्बू । सुनों । सातवें वर्ग में कुल तेरह अध्याय हैं। उनके नाम इस प्रकार (1) नन्दा, (२) नन्दमति, (३) नन्दोपरा, (४) नन्द सेना, (५) महया, (६) सुमरुधा, (७) महा मरुता (E) मरुदेवी, (६) भद्र, १०) सुमद्रा, (११) सुजाता, (१२) सुमति, थार (१३) भूत दिमा! यह रह ही, राजा माफ की रानियों । इन तेरह रानियों में से एक एक रानी का एक-एक, अध्याय में, घर्गन । यों उनके नाम से ये वेरह अध्याय है। भगवन् ! सातवें वर्ग के, इन तेरह अध्यायों में से, प्रथम क अध्याय में किस विषय का वर्मान है ? जम्मू ! सुनो ! भगवान् महावीर की मौजूदगी के समय में, राजगृह नामक एक नगरी गुसशील नामक एक पारा से सुशोभित थी। उस समय यहा राजा श्रेणिक का शासन था । उस भेमिक राजा के नया नाम की एक महारानी ची। उसी भी में, भगवान् महावीर धर्मोपदेश करते- करवे एक बार वहाँ पधारे । जनता भगवान् के पदार्पण की सूचना पाते ही दर्शनार्थ दौड़ पड़ी। राजा अधिक की महारानी नदा को जब यह सूचना मिली, तो वह भी मति ही प्रसन्न हुई। उसने अपने किसी एक कौदाम्बिक पुष्प को घुला कर रथ तैयार करवा मंगाया । तब रथ पर सवार हो वह मी भगवान् के दर्शनार्थ गई । भगवान् का सदुपदेश श्रवण र उसे ससार के प्रति घृमा उत्पम हो गई। और पैराग्य उसके हृदय में जोर पकड़ गया। १ पा, फिर क्या था । उसने राजा अंखिक की भाना प्राप्त कर, पशावती रानी के समान दीक्षा धारण करली । ग्पाद अहो वक उसने शास्त्रों का अध्ययन किया । और, वीस वर्ष चारित्र-पालन । अन्तिम समय में सन्थारा ले, वे मुक्ति में गई । इमी प्रकार, अवशेष रानियों का वर्णन भी समझना चाहिए । समी रानियाँ समय-समय पर दीक्षा घरण कर, अन्व में मोच में पहुँची । एक-एक रानी का एक-एक अध्याय, यों पूरे तेरह अध्यायों का घर्शन पाठर पृन्द सममें। Aur पर सात ॐ इसि-सप्तको वर्ग () r +Hit+++HI+NE १६ अष्टमो-वर्ग ? मूल -जइण भते समणेण जाव सपत्तेण अट्टमस्स अगस्स ग्रतगड़ दसाण सत्तमस्स वग्गस्स अयमद्वे परणत्ते । अट्ठमस्स ण भते ! वग्गस्स अतगड़दसाण समणेण जाव सप. तेण के पट्टे पण्णत्ते ? एव खलु जवू ! समणेण जाव सपत्तेण घट्टमस्स अगस्स अतगड दसाप अट्ठमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा परणता, त जहा-काली सुकाली महाकाली करहा सुकण्हा महाकयहा वीरकण्हा य बोद्धव्वा रामकण्हा तहेव य॥१॥ पिउसेणकण्हा नवमी दसमी महासेण कराहाय । जइण भते ! अट्ठमस्स वग्गस्स दस अज्झयमा परणत्ता, पढमस्स ण भते । अज्झयणस्स समणेण जाव सपत्तेण के अहे पपणते ? भावार्य श्री जम्बूस्वामी ने सुधर्मस्वामी से कहा भगवन् ! श्रमय भगवन्त महावीर स्वामी, जो मुक्ति में पधार गये, उन पुरुषों ने पाठवें भङ्ग श्री अन्तगढ सूत्र के सातवें वर्ग में जो वर्णन फर्माया, वह भाप से मैंने सुना । परन्तु ! - मदन्त- घशाम सुनम्। भगवन् ! भन्तगढ के भाठवें वर्ग में भगवान् ने क्या फाया है, कृपा कर उसे फर्मावें । जम्यू ! सुनो। भाठवें अङ्ग श्री भन्तगठ-सूत्र के भाठवें वर्ग में कुल दस अध्याय हैं। वे इस प्रकार है-(१) काली, (२) सुफाली, (३) महा काली, (४) कृष्णा, (५) सुक्रप्णा, (६) महाकप्या, (७) परिकृष्णा, (८) राम कृष्णा, (६) पितृसेन कृष्या और (१०) महासेन कृष्णा । यो दसों ही रानियों के नाम मे दम भध्याय है। भगवन् ! इन दस भध्यायों में से प्रथम अध्याय में क्या वर्णन है? मूल.-एव खलु जवू । तेण काले ण तेण समएणं चपा णाम नयरी होत्था,पुण्णभद्दे चेइए, तत्थण चपाए नयरीए कोणिए राया, वरणश्रो । तत्थण चपाए एयरीए सेणियस्स रएणो मज्जा, कोणियस्स रगणो चुल्लमाउया काली नाम देवी होत्था, वएणयो । जहा नदा जाव सामइयमाइयाइ एकारस्स अगाइ अहिज्जइ, बहूहिं चउत्थ छट्टमेहिं जाव अप्पाण भावमाणे विहरइ । भावार्थ -हे जम्बू ! सुनो । सरावान् महावीर के विधमान् समय में, पूर्ण मद्र नामक, मनोहर उद्यान से सुशो- मित, 'चम्पा' नामक एक परम सुन्दर नगरी थी । वहाँ उस समय कौषिक राजा-राज कर रहा था । उसी के राज घराने में बाजा श्रेणिफ की तो पत्नी, और राजा कौशिक की छोटी माता 'काली' नामक एक रानी थी। - अष्टमो-वर्ग HHHHH मूल -जइण भते ! समणेण जाव सपत्तेण अट्ठमस्स अगस्स अतगड दसाण सत्तमस्स वग्गस्स अयम? परणत्ते । अट्ठमस्स ण भते वग्गस्स अतगडदसाण समणेण जाव सप- चेण के अटे पण्पत्त ? एव खलु जबू ! समणेण जाव सपत्चेण अट्ठमस्स अगस्स अतगढ दसाण अट्टमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, त जहा-काली सुकाली महाकाली कयहा सुकण्हा महाकण्हा वीरकरहा य वोद्धव्वा रामकण्हा तहेव य॥१॥ पिउसेणकण्हा नवमी दसमी महासेण करहाय । जहण भते ! अट्ठमस्स वग्गस्स दस अज्मयणा पगपत्ता, पढ़मस्स ण भते ! अज्झयणस्स समणेण जाव सपत्तेण के पट्टे पण्णते ? भावार्थ भी जम्पस्वामी ने सुधर्मस्वामी से कहा भगवन् ! श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी, जो मुक्ति में पधार गये, उन पुरुषों ने पाठवें भङ्ग श्री अन्तगढ सूत्र के सातवें वर्ग में जो पणन फर्माया, वह भाप से मैंने सुना । परन्तु

साधी उमी रत्नावलि नामक तपस्या को करने में सलम हो गई। वह 'रत्नावलि-तप ' इस प्रकार है -
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रजापलि-सप
मम्।
।२।२।२।
।२१२१२
।२।२।२।
२२॥
Mar
0 mA
मूलः-चउत्य करेइ २ ता सम्बकाम गुणिय पारेह २ त्ता छट्ट करेइ २ ता सव्वकाम
गुणिय पारेइ २ ता अट्टम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा अट्ट छट्ठाइ करेइ २
ता सबकामगुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ ता सव्वकाम गुणिय पारेइ २ ता छटुं
करेइ २ चा सन्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता अट्ठम करेइ २ ता सबकामगुणिय पारेइ २ त्ता
दसम करेइ २ ता सब्वकाम गुणिय पारेइ २ ता दुवालसम करेइरत्ता सबकाम गुणियं
१६

उन्हीं दिनों भगवान महावीर विचरते-विचरते एक बार वहाँ पधारे । काली रानी ने भगवान का उपदेश भरण पर नन्दा रानी की माँति दीक्षा ग्रहण की । सामाइक से लेकर ग्यारह भङ्ग पर्यन्त का झानाम्यास उन्होंने रिया । तपस्रा करने में मी कुछ कमी उ होन न रखी। कमी वे उपवास करती थीं तो कभी येला और पमी वेला । यो, नाना भाँति की तपस्या से अपनी भात्मा को भाराधित करने में तत्पर हो कर, वे इधर-उधर विचरने लगीं। मृल. तए ण सा काली अजा अण्ण्या क्याइ जेणेव प्रज्ज चदणा अजा तेणेव उवागया उवागच्छित्ता एव वयासी इच्छामि । अज्जायो तुम्भेहिं भणुण्णायासमाणी रयणावलि तव उवसपज्जेत्ताण विहरेत्तए । श्रहासुह देवाणुप्पिया' मा पढिवध करेह । तए ण सा काली अब्बा प्रज्जवदणाए श्रमणुण्णाया समापी रयणालिं तवोकम्म उवमपजित्ता ण विदरह, तजद्दा- भाषा--एक दिन, वे झाली.' नामक साधी, श्रीमती सतीजी श्री चन्दनवाला आर्याजी के पात्र भर पोशी-हे महामागा ! मेरी ऐसी इच्छा है, कि भापकी आशा प्राप्त होने पर, मैं-रत्नावलि नामक तपस्या की धारा धना करू । श्रीमती चन्दनबालाजी ने कहा-हे देवानुप्रिये ! जिस प्रकार तुम्हें, सुख प्राप्त हो, यैसा ही तुम करो। तपस्या करने में तनिक मी विलम्ब न करो। इस प्रकार अपनी गुराणीजी की मात्रा प्राप्त कर, ये 'काली' नामक मदन्त- पर्ग पाठन दशान (पम्। करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता अट्ठारस्सम करेइ २ ता सबकामगुणिय पारे। २ चा मोलसम करेइ २ ता सव्वकाम गुणिय पारेइ २ त्ता चोहस्सम करेह २ त्ता सव्व कामगुणिय पारेइ २ ता वारसम करेइ २चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता दसम करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता अट्ठम करेइ २ ता सव्वकाम गुणिय पारइ २ ता छ? करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता पट्ट छट्ठाइ करेइ २ ता सव्वकाम गुणिय पारेइ २ ता अट्ठम करइ २ ता सव्व काम गुणिय पारेइ २ ता छट्ट करेह २ त्ता सव्वकामगाणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ त्ता सव्वकाम गणिय पारेइ । एव खलु एसा रयणावलीए तवो कम्मस्स पढमा परिवाडी एगेण सवच्छरेण तिहिं मासेहिं वावीसाए य अहोरत्तेहिं अहासुत्ता जाव बाराहिया भवइ । भावार्थ - उन काली नामफ भार्याजी ने,रत्नावलि तपस्या करने के लिए उपवास किया । पारणा करके घेला किया । पारणा करके तेला किया। पारणा करके भाठ वेले किये । पारणा फरके उपवास किया । पारणा करके वेला किया । पारणा करके वेला किया । यो अन्तर रहित चोला किया। पाँच किये। छ. किये । सात,आठ,नौ,दस,ग्यारह, १३ पारेइ २ वा चोदसम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २शा सोलसम करेइ २ चा सबकाम गुणिय पारेइ २ चा अट्ठारस्सम रेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २त्ता वीसइम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २चा बावीसइभ कोइरत्ता सव्वकामगुणिय पारेह२ चा चउवीसग करेइ२ चा सब्बकामगुणिय पारेइ रचा छव्वीसइम करेइ २ चा सबकामगुणिय पारेइ २त्ता अद्यावीसहम करेह २ त्ता सब्वकामगुणिय पारेइ २ ता तीसइम करेइ २ ता सबकामगुणिय पारेइरत्ता बत्तीसइम करेइ२त्ता सव्वकामगुणिय पारेहरत्ता चोचीसहम करेइरत्ता सव्वकामगु णिय पारेइ २ चा चोत्तीस छट्ठाइ करेइ २ ता सव्वकाममुणिय पारेइ २त्ता चोत्तीसइम करेहर चा सब्वकामणिय पारेइ २ चा बत्तीसइम करेइ २ ता सबकामगुणिय पारेइ २ ता तीम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ२ चा अट्ठावीसइम करेइ २ चा सब्बकामगुणिय पारेइ २ चा छव्वीसइम करेइ २ ता सव्वकाममुणिय पारेइ २ चा चउवीसइम करेइ२ त्ता सव्व कामगाणिय पारेइ २ ताबावीसइम करेइ करेह चा सव्वकामगुणिय पारेइ २त्ता वीसइम र्ग भार मदन्तन (धम्। करेइ २ ता सबकामगुणिय पारेइ २ ता अट्ठारस्सम करेइ २ त्ता सबकामगाणय पारइ २ ता मोलसम करेइ २ त्ता सव्वकाम गुणिय पारेइ २ त्ता चोदस्सम करेइ २ ता सब्ब कामगुणिय पारेइ २ चा वारसम करेइ २त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता अट्ठम करेइ २ त्ता सव्वकाम गुणिय पारेइ २ ता छ? करेड २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता चउत्थ करइ २ चा सब्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता अट्ट छट्ठाइ करेइ २ चा सव्वकाम गुणिय पारेइ २ ता अट्ठम करेइ २ ता सव्व काम गुणिय पारेइ २ चा घट्ट करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ ता सव्वकाम गणिय पारेइ । एव खलु एसा रयणावलीए तवो कम्मस्स पढमा परिवाडीएगेण सवच्छरेण तिहिं गासेहिं वावीसाए य अहोरत्तेहिं अहासुत्ता जाव धाराहिया भवइ । भावार्थ - उन काली नामफ मार्याजी ने,रत्नावलि तपस्या करने के लिए उपवास किया । पारणा करके घेला किया । पारणा करके वेला किया। पारण्या करके आठ वेले किये । पारणा करके उपवास किया । पारणा करके वेला फिया । पारणा फरके तेला किया ! यों अन्तर रहित चोला किया। पाँच किये। छ। किये । सात,भाठ,नौदस,ग्यारह, #Atta घरह,तेरह,चौदह पन्द्रह भर सोलह किये। फिर चौंतीस-घेले किये। पारणा करके सोलह दिन की तपथा को। पारणा करके पन्द्रह दिन की तपस्या की । यों चौदद, सेरह, पारह, ग्यारह, दस,नौ, माठ, सात, छ , पाँच, चार, तीन, दो और उपपास किया। पारणा कर के भाठ ले किये। पारसा फरके वेला किया। पारणा करके पेला किया। परणा करके उपवास किया । फिर पारणा किया। इस प्रकार, उन्होंने ' रत्नावलि तप' की एक परिपाटी (लदी) को । ऐसी तपस्या की एक बार लड़ी करने में पूरा-पूरा एक वर्प, तीन महीने शोर चाचीस दिन लगते है। जिप्स प्रकार सत्र में विधि बताई है, उसी तरह इन भार्याजी ने इस की भाराधना की । ऐमी एक परिपाटी करने में 'न सौ चौरासी दिन उपवास के भौर भासी दिन पारणे के, यो सब चार सौ पहचर दिन होते हैं। मूल.-तयाणतर चण दोच्चाए परिवाडीए चउत्थ करेइ २ चा विगइवज पारेइ २त्ता ? केरइ २ चा विगइवज्ज पारेइ २ चा एव जहा पढमाए वि, पवर सव्य पारणए विगइ- ज्ज पारेइ जाव पाराहिया भवइ । तयाणतर चण तच्चाए परिवाडीए चउत्थ करेइ २ चा लेवाड पारेइ सेस तहेव । एव चउत्था परिवाडी नवर सव्व पारणए भायबिल पारेर, सेस तचेव । पदमामि सब्बकाम, पारणय विइयए विगहवज्ज । ततिय मि मलेवार भापविल re - .. CHHALLAHHI -- वर्ग माटर इम्त- शाह रम्। . यो चउत्थ मि ॥ तएण सा काली अजा रयणावली तवो कम्म पचहिं सवच्छरोहिं दोहि य मासेहिं अट्ठावीसाए य दिवसे हिं अहासुत्त जाव बाराहेत्ता जेणेव अज्ज चदणायजा तेणेव उवागया उवागच्छित्ता थज्ज चदण वदइ एमसइ वदित्ता एमसित्ता बद्दहिं चउत्थ जाव अप्पाण भावेमाणी विहरह। भावार्थ -तत्पश्चात् उन 'काली' नामक साध्वीजी ने इस 'रत्नावलि तपस्या' की एफ परिपाटी-शृङला कर ली। भार उसके साथ ही, वे दूसरी परिपाटी- याला करने को उधत हुई । प्रथम, उपवास किया । उपवास के पारणे में विगाय, दूध, दही, मिष्टाम, तेल, घी, भादि का खाना एक-दम बन्द कर दिया । इस प्रकार उपवास फा पारणा कर उन ने वेला किया । पारण में वही विगय बन्द रक्खी । इसी तरह, वेला किया । पारणा करके भाठ येले किये । पारणा करके उपनाम किया । घेला किया। तेला किया। यू सोलह तक किया। फिर चौतीस पेले किये । पारणा करके सोलह किये । फिर पन्द्रह, चौदह तेरह, पारद, ग्यारह, दम, नौ, पाठ, सात, छ पाँच, चार तीन, दो,मौर उपवास किया। पारमा करके पाठ येले किये। पारणा करके तेला किया। वेला किया भौर उपवास किया। समी पारणों में विगय यन्द रक्खी । जिस प्रकार प्रथम परिपाटी की, उसी तरह दूसरी मी की । इन में विगय तो खाई ही नहीं गई । साथ ही में, रत्नावलि की तीसरी.. लड़ी.मी इसी तरह की । यहाँ तक, कि विगय चन्द रखने - १३० 4344-4A के साथ ही साथ, घी से चुपड़ी हुई रोटी तक न खाई । भर्धाद लेपवाली वस्तुभों का खाना रिलाल ही छोड़ दिया। तीसरी परिपाटी के पूर्ण होते ही चौथी परिपाटी मी इसी तरह की । पर इसके पारणे के दिन तो, फिर भी मायम्पिल-सूखी रोटी और यह मी धावन या ठरले किये हुए गर्म जल में मिगो कर खा लेती थी। इस प्रकार ये 'काली' नामक साधी जी 'रत्नावलि तपस्या करते हुए पूरे-पूरे पाँच वर्प, दो महीने मार भट्टाइस दिनों में जैसे सूत्र में विधि पतलाई गई है, उसी प्रकार इस तपस्या की भाराधना कर, अपनी गुराणी श्री चन्दनवाला भार्याजी के पास वे भाइ । भौर, उन्हें विधि-पूर्वक वन्दना कर फिर भी फुटकर उपवास, वेले, तेले, की तपस्या करती हुई, अपनी मात्मा को पवित्र ये फरसी रहीं। मूल. तएण सा काली अज्जा तेण योरालेण जाव धमणिसतया जायायावि होत्या, से जहा इगाल सगडी वा जाव सुहुय हुयासणे इव भासरासिपलिच्छण्णा तवेण तरण तव- तेय सिरीए अईव उवसोभे माणी चिट्ठइ । मावार्थ -तदनन्तर, उन 'काली' नामक भार्याजी का शरीर इस प्रकार की प्रधान तपस्या करने से, प्राय मास भौर खून से रहित हो गया । केवल मस्सि-पम्जर का रॉचा मात्र चे रह गई। उठते-बैठते, उनकी हड़ियाँ का कर शम्द करने लगी। भौर उनके शरीर में चाँ भोर नसों का जाल-सा दिखाई देने लगा।वे अपने प्रयप्प.

से J मिदम्त- घग माट धम्। १४॥ जनजीवन ही से जीवित थी । और चलती फिरती थीं। वे इतनी कृश हो गई थी, कि योलना तो दूर रहा पर, चलने के विचार-मात्र से ही उड़े फार प्राप्त होता था। जिस प्रकार सूखे फाए, सूखे पत्ते या कोयले की मरी हुई गादी पलते समय भान.ज करती है, उसी तरह उनकी हडिया भी उठते-पैठते, चलते-फिरते भावाज करने लगी थीं । नो मी उन साध्वी के शरीर का माँस एप रुधिर प्राय सूख गया था, तब मी तप और तेज रूपी लक्ष्मी से ये दिन दूनी और रात-चौगुनी सम्पन्न हो कर शोमा को प्राप्त होती जा रही थीं। मूल -तएण तीसे कालीए अज्जाए अण्णया कयाह पुब्वरत्वावरत्त काले अय यज्झथिए जहा खदयस्स चिंत्ता जहा जाव अत्थि उठाणे कम्मे बले वीरिए पुरिसफार पर- फमे सद्धाधिई सवेगे ताव ताव मे सेय कल्ल जाव जलते अज्ज चदण अज्ज आपुच्छित्ता अज्ज चदणाए अज्जाए श्रमणुनायाए समाणीए सलेहणा भूसपा राहणा भत्तपाण पडियाइक्खे काल अणवकखमाणे विहरेत्तए चि का एव सपेद्देइ २ त्ता कल्ल जेणेव श्रज्ज चदणा अजा तेणेव उवागच्छइ २ ता अजचदण अज वदह णमसइ, वदित्ता णमसित्ता एव वयासी-इच्छामिण अजो! तुम्भेहिं अभणुराणाया समाणी सलहेणा जाव विहरेत्तए अहा- Hal . के साथ ही साथ, घी से चुपड़ी हुई रोटी तक न खाई । अर्याद लेपवाली वस्तुओं का खाना बिलाल ही छोड़ दिया। तीसरी परिपाटी के पूर्ण होते ही चौथी परिपाटी मी इसी तरह की । पर इसके पारणे के दिन तो, फिर मी प्रायम्बिल लुखी रोटी भौर वह भी धावन या-उपदे किये हुए गर्म जल में भिगो कर खा लेती थी। इस प्रकार वे 'फाली' नामक साध्वी जी 'रमावलि तपस्या करते हुए पूरे-पूरे पाँच वर्प, दो महीने भार अट्ठाइस दिनों में जैसे सूत्र में विधि पतलाई गई है, उसी प्रकार इस तपस्या की भाराधना कर, अपनी गुराणी थी चन्दनवाला भार्याजी के पास वे भाइ | भौर, उन्हें विधि-पूर्वक वन्दना कर फिर भी फुटकर उपवास, वेले, तेने, पी तपस्या फरसी हुई, भपनी भात्मा को पवित्र वे करती रहीं। मूल -तएण सा काली अज्जा तेण पोरालण जाव धमणिसतया जायायावि होत्या, से जहा इगाल सगडी वा जाव सुहृय हुयासणे इव भासरासिपलिच्छपणा तबेण तरण तव- तेय सिरीए अईव उवसोभे माणी चिट्ठइ । भावार्य -सदनन्तर, उन 'काली' नामक भार्याजी का शरीर इस प्रकार की प्रधान तपस्या करने से,प्राप मस और खून से रहित हो गया । फेवल-अखि-पचर-का दाँचा मात्र वे रह गई। उठते-पेठसे, उनकी हड़ियाँ का-फर शम्द करने लगी। और उनके शरीर में पहुँ भोर नसों का जाल-सा दिखाई देने लगा। अपने अयप्प:

HNAME घ मदन्त- शाम सूयम्। २४३ ने माया-हे देपानुप्रिये ! जो तुम्हें सुखकर हो वैसा ही करो । इसमें विलम्ब मत करो । यस, इस प्रकार थाना हो जाने पर, उहोंने स थारा कर लिया । इन साध्वीजी ने अपनी गुराणी श्रीमती चन्दनपालाजी के समीप सामा- इक में लेकर ग्यारह मङ्गों तक का सम्पूर्ण झानाम्यास किया । पूरे-पूरे आठ वर्ष तक चारित्र पाला । और, एक महीन र सन्थार में सम्पूर्ण घनघाती कर्मों का एकान्त निकाश्चन कर, मन्तिम चासोश्वास के पश्चात् वे सिद्धगति मोक्ष में पहुंची। मूल.-उक्खेवयो विय अज्झयणस्स । एव खलु जबू! तेण कालेण तेण समए ण चपा पाम एयरी, पुरणभद्दे चेइए, कोणिए राया, तत्थण सेणियस्स रगणो भज्जा कोणि- यस्त रगणो चुल्लमाउया सुमाली नाम देवी होत्था । जहा काली तहा सुकाली वि णिक्खता जाव वहहिं चउत्य अप्पाण भावे माणे विहरइ । तए ण सा सुकाली अज्जा अएणया कयाइ जेणेव श्रज्जचदणा अजा जाव इच्छामि ण अज्जो । तुब्भेहिं अब्भणुएणाया समाणी कणगावली तवोकम्म उवसपज्जित्ताण विहरेत ए। एव जहा रयणावली तहा कण गारली वि एवर तिसु ठाणेसु अट्ठमाइ करेइ जहा रयणावलीए छट्ठाइ एक्काए परिवाडिए RELATEHNE १६ सुह देवाएप्पिया ! मा पडिवध करेह । तयो काली अजा यज्ज चदणाए अभणुराणाया समाणी सलेहणा असिया जाच विहरइ । सा काली प्रजा यज्ज चदणाए अतिए सामाइय माझ्याइ एकारस्स गाइ पहिबित्ता बहुपडिपुन्नाइ घट्ट सवच्छाराइ सामएपपरियाग पाउ- णिवा मासियाए सलेहणाए अप्पाण भूसेचा सढि भत्ताइ असणाए छेदत्ता जस्सट्टा कीरइ जाव चरिमुस्सासनीसासेहिं सिद्धा। भावार्थ तत्पश्चात् , उन 'काली' मार्याजी को, एफ रोज, पिछली रात्रि के समय सन्दक की भाँति ऐसे विच र उत्पन्न हुए, कि मेरा शरीर तपस्या से इस प्रकार कृश हो गया,तब भी मुझ में उत्थान, यल, वीर्य, पुरुषार्थ, पराक्रम, श्रद्धा, ति सवेग मौर शक्ति मादि भमी तक विद्यमान हैं। अतएच क्ल सूर्योदय होते ही मुझे गुराणी भीमगी पदनमालाजी से पूछ कर, माहार-पानी का जीवनमर के लिए परित्याग कर लेना चाहिए । तथा सन्धारा करक, जीवन एव मृत्यु की भाशा-रहित होकर, विचरण करना चाहिए। ऐसा विचार कर, सूर्योदय होते ही होते, वे 'काली' नामक भार्याजी, श्रीमती चन्दनपालाजी के पास आई । और उन्हें वन्दना कर के बोली- महाभागा! मेरी इच्छा है, कि भाप की मात्रा प्राप्त होने पर, मैं सुन्धारा कर के रहूँ। उत्तर में श्रीमती चन्दनवाला भाजी - . .

THEHRA म नीमचन्त- दशाम सुषम्। २४३ ने फमाया-हे देयानुप्रिये ! जो तुम्हें सुखकर हो वैसा ही करो । इसमें विलम्प मत करो । बस, इस प्रकार भाषा हो जाने पर, उहोंने स थारा कर लिया । इन साध्वीजी ने अपनी गुराखी थीमती चन्दनवालाजी के समीप सामा- इक मे लकर ग्यारह मङ्गों तक का सम्पूर्ण ज्ञानाभ्यास किया । पूरे-पूरे आठ वर्ष तक चारित्र पाला । और, एक महीन व सन्धार में सम्पूर्ण घनघाती कमों का एकान्त निकाश्चन कर, अन्तिम श्वासोचास के पश्चात् वे सिद्धगति मोक्ष में पहुंची। मूलः-उक्खेवयो विय अज्मयणस्स । एव खलु जबू । तेण कालेण तेण समए ण चपा पाम एयरी, पुण्णभद्दे चेहए, कोणिए राया, तत्थण सेणियस्स रगणो भज्जा कोणि- यस रगणो चुल्लमाउया सुकाली नाम देवी होत्था । जहा काली तहा सुकाली विणिक्खता जार वहहिं चउत्थ अप्पाण भावे माणे विहरइ । तए ण सा सुकाली अज्जा अण्णया कयाइ जेणेव अज्जचदणा अजा जाव इच्छामि ण अज्जो | तुम्भेहिं अभणुएलाया समाणी कणगावली तवोकम्म उवसपज्जित्ताण विहरेत्त ए। एव जहा रयणावली तहा कण गावली वि णवर तिसु ठाणेसु थट्ठमाइ करेइ जहा रयणावलीए छट्ठाइ एकाए परिवाडिए HAR १ सुह देवाणप्पिया ! मा पडिबध करेह । तो काली अजा श्रज्ज चदणाए अभणुगणाया समाणी सलेहणा मुसिया जाव विहरइ । सा काली अब्बा अज्ज चदणाए अतिए सामाइय माइयाइ एकारस्स अगाइ अहिजिचा बहुपडिपुन्नाइ अट्ठ सवच्छाराइ सामएपपरियाग पाउ- णित्ता मासियाए सलेहणाए अप्पाण भूसेत्ता सट्ठि भत्ताइ अणसणाए छेदत्ता जस्सट्ठा कीरइ जाव चरिमुस्सासनीसासेहिं सिद्धा। भावार्य तत्पश्चात् , उन 'काली' भार्याजी को, एक रोज, पिछली रात्रि के समय सन्दक की भाँति ऐसे विच र उत्पन्न हुए, कि मेरा शरीर तपस्या से इस प्रकार कश हो गया,तब भी मुझ में उत्थान, पल, वीर्य, पुरुषार्थ, पराक्रम, श्रद्धा, धृति सवेग भौर शृक्ति भादि भमी तक विधमान् है । अतएव फल सूर्योदय होते ही मुझे गुराणी श्रीमती पदनपालाजी से पूछ कर, भाहार-पानी का जीवनमर के लिए परित्याग कर लेना चाहिए । तथा सन्यारा करक, जीवन एव मृत्यु की भाशा-रहित होकर, विचरण करना चाहिए । ऐसा विचार कर, सूर्योदय होते ही होते, घे 'काली' नामक भार्याजी, श्रीमती चन्दनपालाजी के पास माई । और उन्हें वन्दना कर के गोलीं-महामागा! मेरी इच्छा है, कि भाप की माला प्राप्त होने पर, मैं सन्धारा कर के रहूँ। उचर में श्रीमती चन्दनपाला मार्याजी .

生中中中中中 मियन्त- दशाम धम्। २४३ ने फमाय-हे देवानुप्रिये ! जो तुम्हें सुखकर हो वैसा ही करो । इसमें विलम्ब मत करो । बस, इस प्रकार थाना हो जाने पर, उन्होंने सन्थारा कर लिया । इन साध्वीजी ने अपनी गुराणी श्रीमती चन्दनवालाजी के समीप सामा- इक मे लफर ग्यारह मङ्गों तक का सम्पूर्ण ज्ञानाम्यास किया । पुरे-पूरे आठ वर्ष तफ चारित्र पाला । और, एक महीन र मन्धार में सम्पूर्ण घनघावी कर्मों का एकान्त निकाश्चन कर, अन्तिम श्वासोधास के पश्चात् , सिद्धगति- मोच में पहुंची। मूल.-उक्खेवयो विय अभयणस्स । एव खलु जयू ! तेण कालेण तेण समए प चपा णाम एयरी, पुण्णभद्दे चेइए, कोणिए राया, तत्थण सेणियस्स रगणो भज्जा कोणि- यस्त रगणो चुल्लमाउया सुकाली नाम देवी होत्था । जहा काली तहा सुकाली विणिक्खता जाव वहहिं चउत्य अप्पाण भावे माणे विहरइ । तए ण सा सुकाली अज्जा अण्णया कयाइ जेणेव अज्जचदणा अजा जाव इच्छामि ण अज्जो ! तुम्भेहिं अभणुण्णाया समाणी कणगावली तवोकम्म उवसपज्जित्ताण विहरेत्तए। एव जहा रयणावली तहा कण गावली विणवर तिसु ठाणेसु थट्टमाइ करेइ जहा रयणावलीए छट्ठाइ एकाए परिवाडिए १६ れなかキは मक सुइ देवाणप्पिया' मा पडिवध करेह । तो काली अजा अज्ज चदणाए अभणुरपाया समाणी सलेहणा मुसिया जाव विहरइ । सा काली अजा अज्ज चदणाए अतिए सामाइय माझ्याइ एकारस्स गाइ अहिबित्ता वहुपडिपुन्नाइ घट्ट सवच्छाराइ सामएपपरियाग पाउ- णित्ता मासियाए सलेहणाए अप्पाण झूसेत्ता सट्ठि भत्ताइ यणसणाए छेदत्ता जस्सट्टा कीरइ जाव चरिमुस्सासनीसासेहिं सिद्धा। भावार्थ तत्पश्चात् , उन 'काली' मार्याजी को, एक रोज, पिछली रात्रि के समय सन्दक की भाँति ऐसे विच र उत्पम हुए, कि मेरा शरीर तपस्या से इस प्रकार कश हो गया,तब भी मुझ में उत्धान, पल, पीर्य, पुस्पार्थ, पराक्रम, श्रद्धा, धृति संवेग और शक्ति मादि ममी सक विद्यमान हैं। श्रतएव फल सूर्योदय होते ही मुझे गुराणी श्रीमती चन्दनवालाजी से पूछ कर, भाहार- पानी का जीवनमर के लिए परित्याग कर लेना चाहिए । तथा सन्धारा फरक, जीवन एव मृत्यु की भाशा-रहित होकर, विचरस्थ करना चाहिए। ऐसा विचार कर, सूर्योदय होते ही होवे, घे 'काली' नामक मार्याजी, श्रीमती चन्दनवालाजी के पास आई। और उन वन्दना फर के पोलीं-महामागा! मेरी इच्छा है, कि माप की मात्रा प्राप्त होने पर, मैं सन्यारा फर के रहूँ। उचर में श्रीमती चन्दनपाला भार्याजी THE more 0 घर्ग । पाट ന് ന് ന मिदम्स- इशाम सम् । फमकाचजि-तप ।।३।। 1111३।३। 16initil 111111 11३।३।। |praNP arop Irror इस तपस्या के समाप्त होने पर, फिर भी कई तपस्याएं उन्होंने । जिससे उन का शरीर सुम्ब कर काँटा पन गया । अन्तिम दिनों में सन्यारा कर नौ वर्ष का चारित्र पाल कर य भी मोक्ष में पहुंची। मूलः-एव महाकाली वि पवर खडाग सीह निकीलिय तवो कम्म उवसपज्जित्ताण विहरइ, त जहा-चउत्य करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता छ? करेइ २ त्ता सव्व- कामगुणिय पारेइ २ त्ता चउत्थ करेइ २ ता सबकामगुणिय पारेह २ त्ता अट्टम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता छट्ट करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दसम १४.

" सवच्छरो पच मासा अट्ठारस दिवसा, मेस तहेव । नव वासा परियायो जाव सिद्धा। भावार्थ -जम्पू स्वामी ने सुधर्म स्वामी से कहा-भगवन् ! मने भापके श्री मुख से प्रथम अध्याय अयण कर लिग । भागे दूसरे अध्याय में जो वर्णन है, कृपा कर के भव उसे फरमायें । जम्बू ! सुनो । उस काल में, वही चम्पा' नाम की एफ नगरी थी । वहां फौणिक राजा राज करता था । श्रेणिक राना की पत्नी भौर कौणिक राजा की लघु-माता, सुफाली नाम की एक रानी थी। उन दिनों, यहां एक यार भगवान् महावीर स्वामी पधारे । जिस प्रकार, पाल फाली रानी ने दीपा धारण की, उसी प्रकार इन सुकाली महारानी ने भी दीक्षा ग्रहण की। एक दिन यही सुकाली नामक साधी, श्रीमती चदनवाला भार्याजी के पास याफर, यों चोली-हे महामागा भार्याजी ! भापकी भाशा होने के पश्चाद, मेरी इच्छा है, कि 'मनकापति ' नामक तपस्या की भाराधना में करूँ। उवर में उनोंने कहा-जो तुमें मुखकर प्रतीत हो, पैसा तुम करो । तदनन्तर, उन मुकाली भार्याजी ने, जिस प्रकार काली भार्याजी ने 'रत्नावलि ' तपस्या की थी, उसी प्रकार इन्होंने मी 'फनकायलि' नामक तपस्या की। पान्तु जहाँ रत्नावलि में तीन जगह पेले किये । यहाँ उम जगह तेले किये । इस ' कनकावाल की एक परिपाटी भृाला करने में पूरा पूरा एक वर्प, पाँच महीने और पारह दिन लगते हैं-1-बस में प्रयासी दिन पारसे के मार एक वर्ष दो महीने एवं चौदह दिन तपस्या के होते हैं। यो. चारों ही परिपाटी करने में पुरे-पूरे पाँच अर्प, जी महीने भर भट्ठारह दिन लग जाते हैं। वह 'फनफावलि' सपस्या इस प्रकार है। - .

घ शान उपम्। करइ २ चा सकाम गुणिय पारेइ २ ता दसम करेइ २ चा सव्वकाम गुणिय पारेइ २ त्ता वारसम करेइ त्ता सयकामगुणिय पारेइ २ ता अट्टम करेइ २ ता सब्बकामगुणिय पारेइ २ त्ता दसम करेइ २ चा सबकामगुणिय पारेइ २ ता छट्ट करेइ २त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता अट्टम करेइ २ ता सव्वकाम गुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता घट्ट करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता चउत्थ करेइ २ ता सबकामगु- पिय पारेइ २ त्ता तहेव चत्तारि परिवाडीयो, एक्काए परिवाडीए छम्मासा सत्चय दिवसा, चउराह दो वरिसा अट्टावीसा य दिवसा जाव सिद्धा । एव कण्हा चि एवर महालय सहि पिपीलिय तवो कम्म जहेव खुट्टाग, णवर चोत्तीस इम जावे एयब्व तहेव ऊसारेयब्व, एक्काए वरिस छम्मासा अट्ठारस य दिवसा, चउरह छ बरिसा दो मासा वारसय ग्रहो रत्ता, सेस जहा कालीए जाव सिद्धा ।। (७) भावार्थ -६ जम्मू ! इस वर्ग के तीसरे अध्याय में वर्णन है, कि चम्पा नगरी के श्रेणिक राजा की पत्नी #TREATRAINER १३ A करेइ २ चा सबकामगुणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेह २ चा दुवालसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा दसम करेइ २ चा सव्वकाम- गुणिय पारेइ २ चा चोइसम्म करेइ २ ता सव्वकामगणिय पारेह २ चा वारसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा सोलसम करेइ २ चा सव्वकाम गुणिय पारेइ २ त्ता चोदसम करेइ २ ता सब्वकाम गुणिय पारेई २ चा अट्ठारसम करेइ २ ता सबकाम- गुणिय पारेइ२ चा सोलसम करेइरत्ता सबकाम गुणिय पारेह पारेह ता वीसइम रेइ २ चा सब्बकाम गुणिय पारेइरत्ता प्रहारसम करेइ २चा सव्वकाम गुणिय पारेइर त्ता बीस इम करेइ २ चा सव्वकाम गणिय पारेइ २ चा सोलसम करेइरत्ता सब्बकामगुणिय पारेइ२ चा अट्ठारस्सम करेइ करेइ त्वा सव्वकाम गुणिय पारेइ २त्ता चोदसम करेइ २ ता सम्बकाम गुणिय पारेइ २ ता सोलमम करेइ २ ला सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा बारसम करेइ २ चा सब्वकामगणिय पारेइ २ ता भट्टम करेह २ ता सव्वकाममुणिय पोरइ २ चा चोइसम मिरम्त- पम्। २४७ करइ २ ता सव्वकाम गुणिय पारेइ २ ता दसम करेइ २त्ता सब्बकाम गुणिय पारेइ २ त्ता वारसम करेइ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ २ ता समकामगुणिय पारेइ २ चा दसम करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता छट्ट करेइ २त्ता सव्वकामगुणिय पारेह २ त्ता अट्टम करेइ २ ता सव्वकाम गुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता छट्ट करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ ता सब्बकामगु- णिय पारेइ २ चा तहेव चत्तारि परिवाडीयो, एक्काए परिवाडीए छम्मासा सचय दिवसा, चउराह दो वरिसा अट्ठावीसा य दिवसा जाव सिद्धा । एव कण्हा वि णवर महालय सहि पिपीलिय तवो कम्म जहेव खुड्डाग, एवर चोत्तीस इम जावे गयब तहेव ऊसारेयव्य, एक्काए वरिस छम्मासा अट्ठारस य दिवसा, चउराह छ वरिसा दो मासा वारसय ग्रहो रत्ता, सेस जहा कालीए जाव सिद्धा ।। (७) भावार्थ -हे जम्बू ! इस वर्ग के तीसरे अध्याय में वर्णन है, कि चम्पा नगरी के श्रेणिक राजा की पत्नी 14-12-24 . . १९ M**** करेइ २ ता सव्वकामणिय पारेह २त्ता अट्टम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारे। २ चा दुवालसम करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा दसम करेइ २ ता सव्वकाम- गुणिय पारेइ २ ता चोइसम्म करेइ २ ता सव्वकामगणिय पारेइ २ चा वारसम करेइ चा सव्वकामगुणिय पारेह २ चा सोलसम करेइ २ चा सव्वकाम गुणिय पारेइ २ ता चोद्दसम रे २" "म गुणिय पारेई २ वा श्रद्वारसम करेइ २ चा सव्वकाम- सबकाम गुणिय पारेइ पारेइ त्ता वीसइम करेइ २ जा सव्वकाम गुणिय पारेइ२ चा वीस नेहरचा सव्वकामगुणिय पारेइ२ बोद्दसम करेह २ त्ता सव्वकाम इ२ चा वारसम करेइ २ चा गय पारइ २ ता चोडसम + -- मदम्त- रदशाह घषम्। १४७ करेइ २ चा सव्वकाम गुणिय पारेइ २ चा दसम करेइ २ चा सव्वकाम गुणिय पारेइ २ त्ता वारसम करेइ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता दसम करेइ २ चा सव्वकामगणिय पारेइ २ चा छट्ठ करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ २ त्ता सव्वकाम गुणिय पारेइ २ त्ता चउत्थ करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा छट्ठ क्रेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेह २ चा चउत्थ करेइ २ चा सव्वकामगु- णिय पारेइ २ ता तहेव चत्तारि परिवाडीओ, एक्काए परिवाडीए छम्मासा सत्चय दिवसा, चउण्ह दो वरिसा अट्ठावीसा य दिवसा जाव सिद्धा । एव कण्हा वि एवर महालय सहि णिकीलिय तवो कम्म जहेव खुडाग, णवर चोत्तीस इम जावे णयब्व तहेव ऊसारेयव्य, एक्काए वरिस छम्मासा अट्ठारस य दिवसा, चउण्ह छ परिसा दो मासा वारसय ग्रहो रत्ता, सेस जहा कालीए जाव सिद्धा।। (७ भावार्थ -हे जम्बू ! इस वर्ग के तीसरे अध्याय में वर्णन है, कि चम्पा नगरी के श्रेणिक राजा की पत्नी Ht************* . !

करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा दुवालसम करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेह २ चा दसम करेइ २ ता सव्वकाम- गुणिय पारेइ २ ता चोदसम्म करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा वारसम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा सोलसम करेइ २ ता सव्वकाम गुणिय पारेइ २ ता चोदसम करेइ २ चा सव्वकाम गुणिय पारेई २ चा अट्ठारसम करेइ २ चा सव्वकाम- गुणिय पारेहर चा सोलसम करेहरचा सम्बकाम गुणिय पारेइ पारेइ त्ता वीसहम करेह २ चा सव्वकाम गुणिय पारेइरत्ता प्रहारसम करेइ २त्ता सव्वकाम गुणिय पारेइ२ चा वीस. इम करेह २ ता सव्वकाम गुणिय पारेह २ ता सोलसम करेइरत्ता सव्वकामगुणिय पारेइ२ त्ता भट्ठारस्सम करेह करेइ त्ता सव्वकाम गणिय पारेइ २ चा चोहसम करेइ २ त्ता सम्बकाम गुणिय पारेइ २ चा सोलमम करेइ २ ला सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा बारसम करेइ २ त्ता सब्वकामगाणिय पारेइ २ ता भट्टम करेह २ ता सव्वकाममुणिय पारेइ २ चा चोदसम व " पीमन्त- परशा मम्। आराधना की । तत्पथात्, फिर भी उन भार्याजी ने फुटकर कइ तपस्याएँ की । अन्तिम समय में सन्थारा कर के फर्मों का सम्पूर्ण नाश हो जाने पर,मोक्ष मे वे पहुंची। इसी तरह राजा श्रेणिक की पत्नी और कौणिक की छोटी माता, रुप्णा नामक रानी ने, भगवान् का उपदेश अवश कर श्री चन्दनवाला भार्याजी के पास दीपा धारण की । और, जिस प्रकार महाकाली पार्याजीने 'लघुसिंह निष्फोदित' नामक तप में, नौ तक की तपस्या की थी ठीक उसी प्रकार इस तप की प्रथम परिपाटी-याला इस प्रकार की -सर्व प्रथम-उपवास किया । पारणा कर के वेला किया । पारणा फर के उपवास किया। यो वेला किया। पेला, चौला, तेला, पंचौला, चौला, छ , पाँच, सात, छ , भाठ, सात, नौ, माठ, दस, नौ. ग्यारह, दस, बारह, ग्यारह, तेरह, बारह, चौदह, तेरह, पन्द्रह, चौदह, सोलह, पन्द्रह सोलह चौदह, पन्द्रह, तेरह, चौदह, पारह, तेरह, ग्यारह, घारह दस, ग्यारह, नौ, दस, भाठ, नौ, सात, माठ छ , सात, पाँच, छ, चौला, पंचोला, तेला, चौला, वेला, तेला, उपवास, पेला, भौर फिर पारणा फर के उपवास किया। यों, एक परिपाटी की । जिसमें, इकसठ दिन उन सतीजी ने पारमा-मोजन किया और पूरे-पूरे एक पर्प, चार महीने तथा सत्रह दिन, अर्थात् चार सौ सचान दिन तपस्या की । ऐसी एक परिपाटी कर के, साथ ही साथ, दूसरी, तीसरी पार चौधी परिपाटी भी की। जिसमें पुरे-परे छ' वर्प, दो महीने भौर बारह दिन लगे। इस ' महानिफ्रीदित- तप' की एक परिपाटी इस प्रकार है:- - मार फॉपिक की छार्टी माता महाकाला रानी न मी सुकाली रानी की तरह दक्षिा धारण की । इन महा काली नामक साध्वीजी न ' लघुसिंह निर्णारित' नामक तप किया । वह इस प्रकार है - सर्वप्रथम उपवास किया। पारणा करके पेला किया । पारणा कर के उपपास किया । पारणा कर के तेला किया । यो बेला चौला, वेला, पंचोला, नौला छ पाँच सात, छ , माठ सात, नो पाठ, नौ सात, पाठ सात, पाँच, छ चौला, पंचौला, तेला, चोला चेला, तेला, उपवास घेला, और उपवास किया । इस प्रकार ‘लघुसिंह निष्क्रीडित' नामक तप की एक परिपाटी की । जिसमें तैतीस दिन.तो पारस्था.किये और पूरे पांच महीने एव चार दिन की तपस्या हुई । यों चार परिपाटी इन ने की । जिसमें दो वर्ष और अट्ठाइस दिन लगे। इस तपस्या के हार का चित्र निग्न लिखित । m X P 9 रूपुदिहनिफीमित नप O इस प्रकार के 'लघुसिंह निष्क्रीडित' तप की उन महाफाली भार्याजी ने सूत्रों में बताई हुई विधि के अनुमार घ श्रीमदम्त- सूत्रम्। माराधना की । तत्पश्चात्, फिर भी उन भार्याजी ने फुटकर कर तपस्याएं कीं । अन्तिम समय में सन्यारा कर के कमी का सम्पूर्ण नाश हो जाने पर,मोघ मे वे पहुँचीं। इसी तरह राजा थेणिक की पत्नी भौर कौशिक की छोटी माता, कृप्या नामफ रानी ने, भगवान् का उपदेश भवण कर श्री चन्दनवाला भार्याजी के पास दीपा धारण की । और, जिस प्रकार महाकाली भार्याजीने 'लघुसिंह निष्क्रीदित' नामक तप में, नौ तक की तपस्या की थी ठीक उसी प्रकार इस तप की प्रथम परिपाटी-गृहाला इस प्रकार की -सर्व प्रथम-उपवास किया । पारणा कर के बेला क्यिा । पारणा कर के उपवास किया । यो वेला किया। पेला, चौला, तेला, पँचौला, चौला, छ , पाँच, सात, छ भाठ, सात, नौ, माठ, दस, नौ, ग्यारह, दस, पारह, ग्यारह, तेरह, चारह, चौदह, तेरह, पन्द्रह, चौदह, सोलह, पन्द्रह, सोलह चौदह, पन्द्रह, तेरह, चौदह, गारह, तेरह, म्यारह, पारह दस, ग्यारह, नौ, दस, पाठ, नौ, सात, पाठ छ , सात, पाँच, छ', चौला, पंचोला, तेला, चौला, घेला, तेला, उपवास, बेला, भौर फिर पारणा कर के उपवास किया। यों, एक परिपाटी की । बिस में, इफसठ दिन उन सतीजी ने पारबा-मोजन किया और पूरे-पूरे एक वर्ष, चार महीने तथा सत्रह दिन, अर्थात् चार सौ सचानवें दिन तपस्या की । ऐसी एक परिपाटी फर के, साथ ही साथ, दूसरी, वीसरी और चौथी परिपाटी भी की। जिसमें पूरे पूरे छ वर्प, दो महीने और बारह दिन लगे । इस ' महानिष्फोदित- की एक परिपाटी इस प्रकार है - तप www amaMMAMAT महासिंह निफीडित तप . -- इस प्रकार, कृप्या भार्याजी ने महानिष्क्रीदित तपस्या विधि-पूर्वफ कर के, फिर भी कई फुटकर तपस्याएँ की। मन्तिम समय में, सन्यारा कर के, काली भार्याजी के समान ये भी मोघ में पहुंची। मूल -एव सुकमहावि, पवर सत्चसत्तामिय भिक्युपडिम उवसपज्जित्ताण विहरइ पढमे सत्तए एकेक भोयणस्स दचिं पडिगाहेइ एक्केक्क पाणयस्त दोच्चे सचए दो दो भोयणस्स दोदो पाणयस्स पडिगाहेह, तच्चे सत्तए तिगिण भोयणस्स तिगिण पाणयस्त, चउत्थे चउ, पचमे पच, छटे छ, सत्तमे सत्तए सत्त दत्तीयो भोयणस्स पडिग्गाहेइ सत्त पाणयस्स, एवं खलु सत्त सत्तामय भिक्खुपडिम एगृणपणणाए राइदिए हिं एगेणय छन्नउएण भिक्खासपण , ***** मिदन्त- शाह मम्। महासुत्ता जाव पाराहेत्ता जेणेव मज्जचदणा अजा तेणेव उवागया अजचदण अज वदह णमसइ वदित्ता णमसित्ता एव वयासी-इच्छामिण अज्जायो ! तुम्भेहिं अभणुगणाया समाणी अहमिय भिक्खुपडिम उवसपज्जित्ताण विहरेत्तए । श्रहासुह देवाणुप्पिए मा पडिवध करे। भावार्थ -इसी तरह, राजा ग्रेणिक की पत्नी और फौणिक की छोटी माता , सुकपणा नाम की रानी ने भी भगवान् महावीर का उपदेश श्रवण कर, श्रीचन्दनवाला भार्याजी क पाम दीघा धारण की । तत्पश्चाद, सुकृप्या भार्याजी ने 'सप्त-सप्तमिका' नामक मिचु-पटिमा-प्रकार की वह इस प्रकार है -सात दिन तक नित्यम्प्रति एक बार गृहस्थों के द्वारा दिये हुए माजन और पानी पर निर्वाह करना । अर्थात् एक वक में रोटी का पाव हिस्सा और एक दार की घरा में, जितना पानी दिया, तो उतना ही उस रोज खासे पी किन्तु दुपारा माँग कर फिर नहीं लाते हैं । यही क्रम सात दिन तक रक्खा जाय । इमी को ' सप्त सप्तमिका-भिक्षु पडिमा' कहते हैं । इसी प्रकार, दूसरे सप्ताह में, दो घार का दिया हुमा मोजन और पानी ग्राम्य किया । और फिर इसी प्रकार क्रमश तीसरे सप्ताह में तीन बार, चौथे सप्ताह में चार पार, पाँचवें में पाँच वार, छठ में छ वार और सातवें सप्ताह में सात वार गृहस्थों द्वारा दिये गये भोजन और पानी को ग्रहण कर, उसी पर भरने प्राणों की - प्रति-पालना की । यों, उनपचास दिन-तफ-इस-प्रकार-की-सप्त- मिच परिमा,-सूत्र में जिस विधि से पाली नाती सप्त-सप्तमिका पष्ट अष्टमिका १ १ १ ܀ १ २ २ २ २ २ १ २ २ २ २ ૨ २ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ B. ३ ३ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ५ ५ ५ k ५ x ५ ५ ६ ६ ६ ६ ६ ६ ६ E ६ ६ ६ ६ द ७ ७ ७ ७ . ७ ७ - । ८ , * पर्ग - पाठप है, उसी प्रकार 'मुहम्णा' नामक भार्याजी ने इस तपस्या को समाप्त कर, व श्रीमती चन्दनवालाजी भायांजी क पाम भमौर उहें वन्दना कर के बोली-हे देवानुप्रिये ! मेरी इ छा है, कि भपकी भाना हाने के पश्चात, नदात- भष्ट-भष्टमिका भिन्नु पदिमा' को भगीकार कर के मही में विचरण में कहें उत्तर में श्री चन्दनवालाजी ने शाद फर्माया, जिस प्रकार भी तुम्हें मुख हो, वैसा ही करो । उममें विलम्प को रत्ती भर भी रथन न दो । पम्। मूल -तए ण सा सुक्ण्हा अजा अज्जचदणाए अभणुणायासमाणी अट्टअट्टामिय भिक्ख पडिम उवसपाज्जिताण विहरइ, पढमे अट्ठए एक्केफ भोयणस्सदत्तिं डिगाहेइ एकेक पाणगस्स दतिं जाव अट्टमे अट्ठए घट्टभोयणस्स दतिं पडिगाहेइ घट्टपाणगस्स । एव खलु एय प्रद्यमिय भिक्खुपडिम चउसट्टीए राइदिएहिं दोहिय अट्टासीएहिं भिक्खासएहिं यहासुत्त जाव धाराहित्ता नवनवमिय भिक्खुपडिम उवमपज्जित्ताण विहरइ । पढमे नवए एक्केक्क भोयणस्स दत्तिं पडिगाहेइय एक्कक्क पाणयस्स जाव नवमे नवए नव दत्रि भोय-: एस्स पडिग्गाहेइय नवनव पाणयस्स । एव खलु नवनवामिय भिक्खुपडिम एका सीई राई- दिएहिं चउहि पचोत्तरेहिं भिक्खासएहिं श्रहासुत्ता जाव श्राराहित्ता दस दसमि FERHI प्रति-पालना की । यो, उनपचास दिन-तक-इम-प्रकार-की- सप्त- भिसु-परिमा, सूत्र में जिस विधि से पाली जाती सप्त-सप्तमिका प्रष्ट अष्टमिफा १ - १ १ १ २ १ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ४ ४ ४ ४ 3 ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ५ ४ ५ k ५ ke ५ य ५ ५ ५ ६ ६ ६ ६ ६ ६६ भAXCपक ६ द ६ ६ ६ ७ ७ ७ PARAN ८ ७ ७ ७ ८ ८ ६ समदम्त- सत्रम्। - नित्यम्मति, एक एक दान पानी की मार एक-एक दात भोजन की उन्होंने ली । ऐसे ही मरी, तीसरी, चौथी, पौवीं, छठी, सातवीं भारवीं और नौवीं नवमिका में, नित्यम्प्रति क्रमश दो, तीन, चार पाँच छ , सात, माठ और नौ पार गृहस्थियों द्वारा बहगये गये भाहार और पानी को अहस कर उसी से अपना निर्वाह किया । इस नव-नवमिका-मिनु पडिमा 'मैं पूरे पूरे एक्यासी दिन-लगे। और चार सौ पाँच पार का दिया हुमा माहार-पानी ग्रहण किया गया । इम नव नवमिफा मिचुपदिमा को समाप्त कर लेने के पश्चात् उन्होंने ' दस-दशमिका मिनु पडिमा' भङ्गीकार की। प्रथम र शमिका, अर्थात् प्रथम के दश दिनों में, नित्यम्प्रति एक बार का दिया हुमा मोजन और पानी ग्रहण किया । यो दूसरी, तीसरी चौथी पाँची, छठी, सातवीं, भाठवीं नौवीं भौर दयीं दशमिका में नित्यम्प्रति, क्रमश' एक मे लगाकर दश पार गृहस्थियों द्वारा दिये गये भाहार और पानी को प्राण फर, उपसर अपना जीवन निर्वाह किया। इस तपस्या को पूरी करने में कुल सौ दिन लगे । जिममें भोजन भार पानी की साढे पाँच सौ दाछ हुई। इस तपस्या को पूर्ण कर लेने के पश्चात्, उपवास, चेले, तेले, मासक्षमण, मई माम-चमण की मी उपवर्या इन्होंने की। जिस से श्री सुकम्पा भार्याजी का शरीर बड़ा ही कश हो गया । किन्तु फिर मी, मतिम समय में, सन्यारा कर के, सम्पूर्ण फर्मों का नाश करती हुई, ये मोघ-धाम में पहुँचीं। उपरोक नव-नवमिका' और 'दश-दशामिका' मिझुपडिमा तप के यन्त्र निम्न प्रकार है - * य भिक्खुपाहिम उवसपज्जिताण विहरह । पढमे दसए एफेफ भोयणस्स दतिं पडिगाइय एकेक पाणयस्स जाव दसमे दसए दस दस भोयणस्स दत्तिं पढिग्गाहेइ दसदस पाणयस्स एव खलुएय दस दसमिय भिक्खुपडिम एकेण राइदियसएण श्रद्ध छट्टेहिं भिक्खासएर्षि महासुत्त जाव याराहेइ २ ता बद्दहिं चउत्थ जाव मासद्धमास विविहतवो कम्मेहिं अप्पाण भावमाणी विहरइ । तए ण सा सुकण्हा अजा तेण भोरालेण जाव सिद्धा । मावार्य -सप्त-सप्तीमका मिनुपडिमा कर लेने के बाद उन 'सुकृप्या'नामक भार्याजी ने श्रीमती चन्दन- पालाची से, भष्टम-अष्टमिका मिनुरिमा करने की भाशा प्राप्त की भौर तदनुसार तपस्या करना शुरू किया। प्रथन क अटवाद (भाठ दिनों) में, नित्यम्प्रति एक दात पानी की भौर एक दात भोजन की अर्थात् गृहस्थियों द्वारा दिय हुए एक पार के श्राहार और पानी को ग्रहय कर, उसी पर निर्वाह किया । इसी प्रकार दूसरे, सीसरे, चौथ पांचवें, छठे, सातवें और भाठवें भठवाडे में नित्यम्प्रति क्रमश: दो, तीन, चार पाँन, छ , सात, भार भाउ पार गृहस्थियों द्वारा दिये गये माहार और पानी को ग्रहण कर उसी पर अपना जीवन धारण ये करती रहीं। यो सम्पूर्ण परिमा में फुल चौंसठ दिन लगे । मार दो सौ मासी दात हुई । अर्थात् दो सौ अठासी मार माहार पानी लिया गया। इसी प्रकार नव-नवमिका मिडरिमा की । प्रथम नामिका मर्यात प्रत्येक नानी दिनों में पर नामदम्त- शा सुषम्। मूलः-एव महाकण्हावि णवर खुट्टाग सव्वयोभद्द पडिम उवसपजिवाण विहरई त जहा-वउत्य करेइ २ तासब्वकामगुणिय पारेइ २त्ता छट्ट करेइ२ ता सब्वकामगुणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा दशम करेइ २ तासव्वकामगुणिय पारेह २ ता दुवालसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता अट्ठम करेइ २त्ता सव्व- कामगुणिय पारेइ २ चा दसम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा दुवालसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा चउत्थ करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा छ? करेह २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दुवालसम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा चउत्थ करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता छट्ट करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा अट्ठम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेह २ चा दसम करेइ २ ता सब्वकामगणिय पारेइ २ चा छट्ठ करेइ२ ता सव्वकामगुणिय पारेइरत्ता अट्टम करेइत्ता सव्वकामगणिय पारेइ २ चा दसम करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २त्ता दुवालसम करेइ २ ता सब्वकाम- RE मपम-नामका - - १ १ १ - १ १ N २ २ AN २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ ३ । ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ २ ४ ४ ४ ४ ४ ४ d ४ ४. ४ ४ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ ५ . ६ ६ ६ ६ ६ ६ ६ द ७ ७ ७ ८ ८ ८ 11 ८ ८ ८ 1 MALE ३ E M है है ६ है ६ ६ ६ - है है ६ है ६ 10 १० १० १० दस वरामिका - घर नामदम्त- सुषम्। मूलः-एव महाकण्हावि पवर खुडाग सवयोभद्द पडिम उवसपजिवाण विहरइ त जहा-वउत्थ करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २त्ता छ? करेइ२ चा सव्वकामगुणिय पारेह २ चा अट्ठम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा दशम करेड् २ चा सव्वकामगुणिय पारेद २ चा दुवालसम करेह २ चा सव्वकामगणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ २त्ता सब- कामगुणिय पारेइ २ चा दसम करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दुवालसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता चउत्थ करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता छट्ठ करेइ २ ता सम्बकामगुणियं पारेइ २ चा दुवालसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा चउत्थ करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता छट्ट करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दसम करेइ २ त्ता सम्वकामगणिय पारे। २ चा छट्ठ करेइ२ त्वा सव्वकामगुणिय पारेइरचा अट्टम करेइत्ता सव्वकामगणिय पारेइ २ चा दसम करेइ २ ता सव्वकामगुणियं पारेइ २त्ता दुवालसम करेइ २ ता सबकाम HERE+ गुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ ता सब्वकामगुणिय पारेइ २ ता दसम करेइ २ चा सव्वफामगुणिय पारेइ २ चा दुवालसम करेह २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा चउत्य करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा छट्ट करेहरत्ता सव्वकामगाणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइरचा । एव खलु एव स्खुट्टागसव्वनो भदस्स तवो कम्मस्स पढ़म परिवाडिं तिहिं मासेहिं दसहिं दिवसेहिं अहासुत्त जाव पाराहेचा दोच्चाए परिवाडीए चउत्य करेइ २ चा विगहवज पारेह विगइवज पारेत्ता जहा रयणावली ए तहा एत्थ वि चत्तारि परिवाडीयो पारणा तहेव । चउरह कालो सवच्छरो मासो दस य दिवसा, सेस तहेब जाव सिद्धा। गायार्थ -इसी तरह, राजा थेशिक की पत्नी भौर फौधिक की छोटी माता महाकृष्णा रानी ने, भगवान् महा वीर का उपदेश श्रवणकर श्रीमती चन्नमाला भार्याजी के पास दीपा धारण की। तत्पथात्, श्रीष दनमाताजी का भामा प्राप्त कर, मधुसर्वतोभद्र' नामक तपस्या की माराधना इन ने की। वह इस प्रकार सर्व प्रथम, उपवाम किया । पारणा कर के मेला किया। पारस्पा कर के देखा किया। यों, भोला, पैचोला, तेला, पौसा, चोता, . . - उपयास येला . पंचोला, उपयास, बेला, तेला चोला, घेला, तेला, पोला. पंचोला, उपवास, चोला, पैथोला, उपवास, पेला और तेला किया | इस प्रकार लघु सर्वतोभद्र ' नामक तप की एक परिपाटी-जड़ी-उन श्री महा सर्वतोभद्र तप व धीमपम्ठ- 202ttITTE सुषम्। ४ । २ ४ १ ८ २ ४ । २ ३ ४ ५ . HIRA SHA TV ५ १ . कृष्णा भार्याजी ने पूरी की। जिसके करने में कुल पचहचर दिन की तपस्या और पच्चीस दिन पारणे के होते हैं। इस परिपाटी को समाप्त कर, साथ ही साथ, दूसरी परिपाटी भी इसी प्रकार की । फिन्तु पारयो में दूध, दही, घी, तेल, 44 ENCE मिष्टाम, खाना बिलाल पन्द कर दिया । तीसरी परिपाटी में, पारने के दिन, लूकी रोटी खाना प्रारम्भ किया। अर्थात्, घी, तेल के लेप-मात्र पाली सम्पूर्स वस्तुओं का खाना ही निकल पन्द कर दिया । और चौथी परिपाटी में पारणे के दिन भायम्पिल किये । जिस प्रकार ' रत्नावति' तपस्या की चार परिपाटी ला होती है, उसी प्रकार इस तपस्या की चारों परिपाटियों की स्वानुमार भाराधना की । जिसमें पूरे तीन सौ दिन तपश्चर्या के और सौ दिन पारणे क होते है। महाराणा मार्याजी ने इस लघुसर्वतोभद्र तपस्या करने के पचास्, फिर भी अनेकों छोटी-बड़ी फुटकर तपस्याएँ । अन्तिम समय में सन्याग ल अपने सर्व कर्मों को नए करते हुए, उन्होंने सदा के लिए जन्म-मरण से टफाग पाया। मूल -एव वीर कण्हा वि, पवर महालय सब्वतोभद्द तवोकम्म उवसपजित्ताण विह रह, त जहा चउत्थ करेइ २ चा सब्वकामगुणिय पारेइ २ चा बट्ट करेइ २ चा सव्वकाम गुणिय पारेइ २ चा अट्ठम रेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा दसम करेह २ त्ता सब्बकामगुणिय पारेइ २ चा दुवालसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेर २ चा चउदस करेइ २ त्ता मञ्चकामगुणिय गरेइ २ ता सोलस करेइ २ ता सबकामगणिय पारेड २ वा धम पढमालया दसम करेइ २त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २त्ता दुवालसम करेइ २ ता सव्वकाम भीमदम्त-गुणिय पारेइ २ ता चउदस करेइ २ त्ता सव्वकामगणिय पारेइ २ चा सोलसम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता चउत्थ करेइ २ चा सव्वकामगणिय पारेइ २ ता छट्ठः करेइ २ ता सबकामगुणिय पारेइ २ त्ता अट्टम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेह २ त्ता वितियालया सोलस करेइ २ त्ता सबकामगुणिय पारेइ २ चा चउत्थ करेइ २ त्ता सव्वकाम- गुणिय पारेइ २ ता छकरेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ २ ता सव्य कामगुणिय पारेइ २त्ता दसम करेह२ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दुवालसम करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा चउदस करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा तितिया लया । थट्टम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता दसम करेह २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दुवालसम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता चोद्दसम करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता सोलसम करेइ २ ता मन्वकामगुणिय पारेइ २त्ता चउत्थ करेइ मिष्टाम, स्वाना विशाल पन्द कर दिया । तीसरी परिपाटी में, पारखे के दिन, सूफी रोटी खाना प्रारम्भ किया। अर्थात्, घी, तेल के लेप-मात्र वाली गम्पूर्ण वस्तुओं का खाना ही पिजकल पन्द कर दिया । और चौथी परिपाटी में पारणे के दिन भापम्पिल किये । जिस प्रकार 'रत्नावलि' सपस्या की चार परिपाटी भूला होती है, उसी प्रकार इस समस्या की चारों परिपाटियों की स्वानुमार भाराधना की । जिसमें पूरे सीन सौ दिन तपषर्या के और सौ दिन पारसे क होते है। महाकप्या भार्याजी ने इस लघुसर्वतोभद्र तपस्या करने के पथात्, फिर भी अनेकों छोटी-बड़ी फुटकर तपस्याएँ की । मन्तिम समय में सन्धारा ल अपने सर्व कर्मों को नष्ट करते हुए, उन्होंने सदा के लिए जन्म-मरण से हुटकाग पाया। मूल -एव वीर क्ण्हा वि, णवर महालय सव्वतोभद्द तवोकम्म उवसपजित्ताण विह रइ, त जहा वउत्थ करेइ २ त्ता सब्दकामगुणिय पारेइ २ ता छट्ठ करेइ २ चा सम्बकाम गुणिय पारेइ २ ता भट्ठम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दसम करेइ २ त्ता सब्बकामगुणिय पारेइ २ चा दुवालसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेह २ ता चउदस करेइ २ चा मव्वकामगुणिय गरेइ २ ता सोलस करेह २ त्ता सव्वकामगणिय पारेड २ ता रदया सुभम्। ૨૬૩ चा सव्वकामगुणियं पारेइ २ चा छट्ठ वरेइ २ चा सबकामगुणिय पारेइ २ ता अहम करेइ२ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता दसम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता सतमी लया। एकेकलयाए अट्ठ मासा पच य दिवसा चउयह दो वासा अट्टमासा वीस दिवसा । सेस तहेव जाव सिद्धा। भावार्थ -जम्यू ! अन्तगढ-सूत्र के सातवें अध्याय में, वीरकप्या, जो कि श्रेशिक राजा की पत्नी और फाणिक या छोटी माता कही गई हैं उन्होंने भगवान् का उपदेश पाकर, श्रीमती चन्दनमाला भार्याजी के पास दावा धारण की । जिनका वर्णन है, कि उन वीरवृष्णा भार्याजी ने दीपा लेने के भनन्तर अपनी जननी ममान भीमती गुरामीजी की मात्रा लेकर । महासर्वतोभद्र ' नामक तपस्या करना प्रारम्भ की। सबसे पहले उपवास किया । पारणा करके घेला किया । पारणा करके वेला किया । यों चौला, पचौला छ , सात, चौला, पंचोला, छ , साव, उपपास भेला, तेला, सात, उपवास, घेला, वेला, चौला, पैंचोला, छ', तेला, चोला, पंचोला, छ , सात, उपवास, पेला, छ सात, उपवास, येला, वेला चौला, पंचोला पेला, तेला, चौला, पैंचोला, छ , सात, उपवाम, पैचोला, छ , सात, उपवास, बेला तेला, और, चौला, किया । इस प्रकार इस तप को यह एक परिपाटी हुई। इसे कर फे, साथ ही साथ, दूसरी परिपाटी शुरू की । पर तु इस बार पारणे में, दूध, दही, घी, भादि विगय - - - . - .

ENTER8255 २ चा सव्वकागुणिय पारेइ २ ता छट्ट करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइरत्ता चउत्थीलया। चोहसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा सोलसम करेह २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा चउत्त्य करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा छट्ठ करेइ २ चा सव्वकामगु- णिय पारेइ २ त्ता अट्ठम करेइ २ चा सव्वकामगाणिय पारेइ २ चा दसम करेइ २ चा सव्व- कामगुणिय पारेइ २ चा दुवालसम करेइ २ चा सबकामगुणिय पारेइ २ चा पचमीलया। छट्ट करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता भट्ठम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेह २ चा दसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता दुवालसम करेइ २ ता सव्वकामगु- णिय पारेइ २ चा चोदसम करेइ २ चा सव्वकामनुणिय पारेइ २ चा सोलसर्म करेह २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेर २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा बठी- लया। दुवालसम करेइ २चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा चोहसम करेइ २ चा सव्वका- मगणिय पारेड २ चा सोलसम करेइ २ चा सव्वकामगाणेयं पारेइ २ ता पउत्यं करेह २ .

मिर मा सुभम्। चा सव्वकामगुणियं पारेइ २ चा लट्ठ करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा अट्टम करेइ२ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दसम करेह २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा सतमी लया। एकेकलयाए घट्ट मासा पच य दिवसा चउण्ह दो वासा अट्ट मासा वीस दिवसा । सेस तहेव जाव सिद्धा। भावार्थ -जम्प ! अन्तगढ-सूत्र के सातवें अध्याय में, वीरकृष्णा, जो कि भेखिक राजा की पत्नी और काणिक का छोटी माता कही गई है, उन्होंने भगवान् का उपदेश पाकर, श्रीमती चन्दनपाला भार्याजी के पास दीक्षा धारण की । जिनका पठन है, कि उन वीर.प्णा भार्याजी ने दीक्षा लेने के अनन्तर अपनी जननी ममान श्रीमती गुराणीजी की माझा लेकर · महासर्वतोभद्र ' नामक तपस्या करना प्रारम्भ की। सममे पहले उपत्राम किया । पारणा करके पेला किया । पारणा करके तेला किया । यों चौला, पचौला छ , सात, चौला, पंचोला, छ, सात, उपवास, पेला, तेला, सात, उपवास, बेला, तेला, चौला, पैंचोला, छ', तेला, चोला, पॅचोला, छ , सात, उपवास, पेला, छ सात, उपवास, घेला, तेला चौला, पंचोला बेला, तेला, चौला, पैचोला, छ , सात, उपवाम, पंचोला, छ , सात, उपयास, बेला तेला, भौर, चौला, किया। इस प्रकार स तप को यह एक परिपाटी हुई। इसे कर के, माथ ही साथ दूसरी परिपाटी शुरू की । पर इस पार पारमो में, दुध, दही, घी, भादि विगय . - - 4 + (स्निग्ध पदार्थ) खाना बन्द कर दिया । इसी तरह तीसरी परिपाटी मी की । किन्तु इस तपस्या के पारणे के दिन घी मिष्टाम, मादि विगों से लेपित मात्र वस्तुमों तक का परित्याग कर दिया । फेवल लूका भोजन किया । ३ ५ ६ ७ ६ ७ १ २ ३ १ Fमदासर्वतोभद्र तप B CL ५ ७ २ A ६ P २ B ७ ३ FREE चौथी परिपाटी की तपस्या के पारश्चे क दिन तो लूके मोजन को भी पानी में भिगो कर सा लेने का नियम लिया। इम तुप फी एक परिपाटी करने में तपस्या के दिन एक सौ छम जगते हैं और पारखे के उनपचास दिन होते हैं।

HEE भीमन्स- सूमम्। - यो पल दो सौ पंतालीस दिन इसमें एक पार लगते है । चारों ही परिपाटियों के करने में कुल दो वर्ष, आठ मास भार बीस दिन पूरे-पूरे लगते ।। उन वीर कृष्णा भार्याजी ने इस 'महामर्वतामद्र' नामक तपस्या को करने के पश्चात् फिर भी छुटकर तपस्या पहुत की । अन्तिम समय में सन्थारा कर के भक्ति में पहुंची हैं। मूल.-एव राम कण्हावि, पवर भदोत्तर पाडिम उवसपज्जि ताण विहरइ त जहा- दुवालसम करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता चोदसम करेइ २ ता सव्वकाम- गुणिय पारेइ २ ता सोलसम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता अट्ठारसम करेइ २ चा सव्वकामगाणिय पारेइ २ ता बीसइय करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता सोलसम करेइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता अट्ठारसम करेइ २ त्ता मव्वकामगु- णिय पारेइ २ ता वीसइम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ२ ता दुवालसम करइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता चोदसम करेइ २ ता सव्व कामगुणिय पारेइ २ त्ता वीस इम करेइ २ ता सव्वकामगाणय पारेह २ ता दुवालसम करेह २ ता सव्वकामगाणय म127 पारह २ चा चोद्दसम करेइ २ ता सम्बकामगुणिय पारेह २ ता सोलसम करेड़ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा श्रद्वारसम करेइ २ ता सव्वकामगणिय पारेइ २ ता चोद्द- सम करेइ २ ला सबकामगुणिय पारेइ २ ता सोलसम करेइ २ ता सबकामगुणिय पारे। २ चा अट्ठारसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा वीसइम करेइ २ च सम्बकाम- गुणिय पारेइ २ ता दुवालसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेह २ चा अट्ठारसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता वीसइम करइ २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दुवालसम करेइ २ चा सव्वकामगाणिय पारेइ २ त्ता चोद्दसम करेह २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा सोलसम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा । एकाए कालो छम्मासा वीस य दिवसा,चउण्ह कालो दो वरिसा दो मासा वीस य दिवसा,सेस तहेव जहा काली जाव सिद्धा। भावार्थ इसी प्रकार, राजा भेणिक की रानी और कोनिक की छोटी माता रामकृप्यादेवी भी भगवान महा- * - वीर का उपदेश प्राणकर, श्री चन्दनबालाजी क द्वारा दीक्षित हुई। इन नव दीधित श्री रामकृष्णा आर्याजी ने मानी पूज्या गुराखीजी की भाझा प्राप्त कर, ' मद्रोचर ' नामक तपस्या को नीचे लिखेऽनुमार करना प्रारम्भ रिया-सम मे प्रथम पैचोला किया । पारणा कर के छ किया । पारमा कर के सात किया । यो माट, नौ, सात, धामदन्त- एदशाह सूत्रम्। ६ ७ ६ ५ भद्रोत्तर तप ८ है ६ ५ ७ माठ, ना पाँच छ , नी पाँच, छ सात, भाट छ , सात, माठ, नो, पाँच, माठ, नो, पाँच छ , भौर सात, श्यि । इस प्रकार एक परिपाटी पूरी हुई । यो चार पूरी पूरी परिपाटियाँ उन्होंने की। दूसरी परिपाटी के पारणे के दिनों में, समस्त विगय वस्तुमों का सेवन बिलकुल ही छोड़ दिया । नीसरी परिपाटी में, विगय की लेपित मात्र वस्तुमो का त्याग किया। मार चौथी परिपाटी के पारणों में भायम्बिल किये । एक पार की परिपाटी-शृशला में H tatt-20 N पुल पर सीपिचहत्तर दिन तपस्या और केवल पञ्चास दिन पारणे फहराते हैं। याँ, चारों ही में कुल दो वप, टो माम मार योस दिन हात है। रामकृष्णा मायाजी के द्वारा, इस ' भद्रोचर' नामक तप को करन के पश्चात्, छुटकर और भी काफी मात्रा में यह तपश्चर्याएँ की गई । मतिम दिनों में सन्यारा कर के सति में वे पहुंची। मूल -एव पिउसेणकरहा वि, णवर मुक्तावली तवोकम्म उव सपजित्ताण विहरह,तजहा- चउत्थ करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेह २ ता। छट्ट करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा चउत्थ करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ त्ता अट्ठम करेइ २ चा सव्वकामगुराणिय पारेइ २ चा चउत्थ करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा दसम करेइ २ त्ता सव्वकाम- गुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता दुवालसम करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा चउत्थ करेइ २ चा सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा चोइसम करेइ २ चा सब्वकामगुणिय पारेइ २ चा चउत्य करह २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ चा सोलसम करेह २ चा सव्वकामगुणिय पारेर २ ता चउत्थ करेइ २ ता सव्वकामगुणिय **** या मा दशा सूत्रम्। पारेइ २ ता अट्टारसम करेइ २ चा सब्बकामगुणिय पारेइ २त्ता चउत्थ करेइ २ ता सब्व- आमदम्त- कामगुणिय पारेइ २ ता वीसइम करेइ २ चा सव्वकामगणिय पारेइ २ त्ता चउत्थ करह २त्ता सव्वकामगणिय पारेइ २ ता बावीसइम करेइ २ त्ता सव्वकामगणिय पारेइ २ त्ता चउत्थ करेह २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता चउवीसइम करेइ २ ता सकामगणिय पारेइ २ ता चउत्य करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेता २ ता छब्बीसइभ करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेह २ त्ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता अट्टावीस करेइ २ त्ता सबकामगुणिय पारेइ २त्ता चउत्थ करेइ २ ता सबकामणिय पारेइ २ त्ता तीसइम करेई २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ ता सव्वकागगुणिय पारेइ २ ता बत्तीसइम करेइ २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ रत्ता चउत्थ करेइ २ त्ता सव- कामगुणिय पारेइ २ ता चोत्तीसहम करेह २ ता सव्वकामगुणिय पारेइ २ ता चउत्थ करेइ २ ता मन्यकामगुणिय पारेइ २ ता वतीसहम करेइ २ ता । एवतहेर श्रोसारेइ जाव चउत्थ २६ 441 Hill: - करेइ चउत्थ करेइत्ता सब्बकामगुणिय पारेइ । एकाए कालो एकारस्समासापनरस य दि- वसा चउरह तिरिद्द वरीसा दस य मासा । सेस तहेव जाव सिद्धा। भावार्थ -नसी प्रकार राजा श्रेणिक की राना भौर कोणिक की छोटी माता, पितु सेन कृष्णा देवी न भगवान् का उपदेश श्रवण फर श्रीमती चन्दनवालाजी भार्याजी के शरण में जाकर दीचा धारण की । न पितुमेन कृष्णा भार्याजी ने भपनी गुराणाजी की प्राज्ञा प्राप्त कर 'सकालि' नामक तपस्या नीचे के अनुमार की सर्व प्रथम उपवास किया । पारणा कर के पला किया । पारसा फर के उपवास किया । पारणा कर के तेला किया। यों, एफ-एक उपयाम यीच वाच में करता हुई, इनकी सख्या को सोलह तक इन्होंने पहुँचाया । फिर इसी प्रकार पीच-पीच में उपवास करती हुई जिस प्रकार चड़ी था, उसी प्रकार एक उपवाम तक वे उतरी । इस प्रकार एक परिपाटी हुई । काली रानी की तरह, चारों ही-परिपारियाँ-साड़ियाँ उन्होंने सम्पूर्ण की । इसकी एक परिपाटी में पूरे पूरे उनसाठ दिन पारणा के मोर भवशेष तपस्या के दिन यू कुल मिला कर ग्यारह महीन और पद्रह दिन होत है। चारों की परिपार्टियों के करने में घुल तीन वर्ष भोर दस महाने होते हैं। समक्तावलि तपस्या का यन्त्र इस प्रकार है। #FFII Ve ~llo M ~ पग पदन्त- शाश TAITRA मुक्लावासि स्थापना माठा प्रम् । . - M मूलः-एव महासेण कण्हा पि, णवर प्रायविलवड्ढमाण तवोकम्म उवसपजित्ताण विहरइ, तजहा-यायविल करेइ २ ता चउत्थ करेइ २ चा वे प्रायविलाइ करेइ २ त्ता चउत्थ करेइ २ ता तिगिण श्रायविलाइ करेइ २ ता चउत्थ रेड् २ ता चत्तारि श्राय- पिलाइ करेड २ चा चउत्य करेइ २ त्ता पच प्रायविलाइ करेइ २ त्ता चउत्थ करेइ २ ता छ प्रायविलाइ करेइ २ ता चउत्थ करेड २ ता एकोत्तरियाए बडढीए प्रायविलाइ वड्ढति चउत्थतरियाद जाव प्रायविलसय करेइ २ ता चउत्थ करेइ । भावार्थ -मी नरद्द राजा श्रेणिक की रानी और मोणिस की छटी माता, महामन कप्णा' नामक दवी ने 21-14tta2 १७१ * भी यथा समय, श्री भगवान् महावीर का धर्मोपदेश सुनकर, श्रीमती चन्दनवाला भार्याजी के पास दीक्षा अङ्गीकार की उन्हों ने अपनी पूजनीया गुराखीजी की भाशा लेकर, 'भायमित-वईमान ' नामक तपस्या की ! उसमें सर्व प्रथम, एफ मायम्बित किया । दूसरे दिन उपवास लिया । फिर दो प्रायम्बित किये । उपवास किया । चीन भापम्पिल किये । उपवास किया । चार मायनिम्न किये। उपवास किया । पांच भायम्पिन किये । उपवास किया । छः मायम्बिल किये । उपपास किया । यो, बीच-बीच में उपवास करते हुए, पूरे-पूरे. एक-सौ भायम्पिल किये । भार, उपवास किया । इस-तपस्या का यन्त्र इस प्रकार है १।।२।।३।।५।रास।७।।२।१०शराराशशरारा रिशर रारारा|११०।१।२१।१।२।१।२३।रासारा२५।।२।१।२७।१॥२८॥२॥११३०११ रार ३२।१।।४ाराशरादार1३७।३८४ाराराराशरा४३।४४।१।४।१ एवारासाराबाराहामारामारा५४॥५५॥१॥५६।।७।।५८१९३५६।१।६०११ सारारारारारारा६।६७।१।६।९।१७७१।७२।७३।९।७४।१।७५।१ UARIUIIEInारामारारारारारारारादाराजारापासा१1०। पराशरा४ाराशरारा ७११८RILAR००110101010101010101010 मूलः-तएण सा महासेन कण्हा अन्जा भायबिलवड्ढमाण तवो कम्म चोदसहिं वासेहिं तिहि य मासहिं वीसहिय अहोरत्तेहिं अहासुत्त जाव सम्म कारणं फासेह, जाव THAT मिन्स मम् । याराहेत्ता जेणेव अजचदणा यज्जा तेणेव उवागच्छइ २ ता अज्जचदण अज्ज वदह णमसइ वदित्ता नमसित्ता वहहिं चउत्थे हिं जाव भावेमाणी विहरइ । तएणं सा महासेन कण्हा यज्जा तेण पोरालेण जाव उवसोभेमाणी चिठह । भावार्थ -उन महान कृष्णा भार्याजी ने 'मायम्पिल बर्द्धमान ' तपस्या करने में परे-पूरे मोहह वर्ष, तीन माम अर बीम दिन लगाये । जिस प्रसार सूत्रों में विधि-विधान इस तपस्या के लिए पतलाया गया है, उसी प्रकार इन मार्याजी न मम्मम् प्रकार मे इसका भाराधन करके श्री चन्दनवालाजी के पास वे भाई । और उन्हें वन्दना करके फिर भी छुटयर तपस्या में जुट पड़ी । ऐसी तपस्या करने से इन महासेन कृष्णा भार्याजी का शरीर, रुधिर पर माम से प्राय रदिन, अर्थात् दुर्वल हा गया । पर तपस्या के प्रभाव से शरीर इनका तेजोमय और अनुपम यान्तिशाली मना रहा । मूल -तएण तीसे महासेणकण्हाए अज्जाए अण्णया कयाइ पुज्वरत्ता वरत्तकाले चिंता जहा सदयस्स जाव अज्ज चदण अज श्रापुच्छई जाव सलेहणा, काल प्रणव कम्पमाणी विहरइ । तएण सा महासेण कण्हा अजा, अज्जचदणाए अज्जाए अतिए सा- A +11-12 माइयाइ एकारस्म अगाइ पाहिजित्ता बहू पडि पुन्नाइ सत्तरस वासाइ परियाय पालइत्ता मासियाए सलेहणाए अप्पाण झूसेचा सहि भचाइ अणसणाए छेदेचा जस्सट्टाए कीरह जाव तमट्टयाराहेइ चरिम उस्सासणीसासेहिं सिद्धा बुद्धा । अह य वासा श्रादी एकोचरीयाए जाव सत्तरस । एसो खलु परितामो सोणिय भज्जाण पायव्यो । भार ---उत्पभाव, उन महासेन कपमा भार्याजा को एक दिन पिछली रात्रि में, सन्दक की तरह विचार उत्पन्न हुमा, कि जो मी मेरा शरीर इस तपस्या से ऐसा कुश हो गया है । तथापि कुछ और शक्ति मुझ में है। भत फल सूर्यादय होते ही, श्रीमती च दनबालाजी से पूछ कर मुझे सन्यारा कर लेना चाहिए । तदनुसार प्रात' काल होत ही उन्होंन अपनी धर्म-जननी गुराणीजी की मात्रा प्राप्त कर सन्थारा ले लिया । अर्थात् ' यश के लिए भ अधिक के' या 'दुख के फारम में शीघ्र ही मरूं' इन सम्पूर्ण प्रकार के सन्प-विकल्पों से रहित होकर, समाधिमार्ग में प्रमम चिच से.पे.रहने जगी। इन महासेन कृप्या भार्याजी ने भी चन्दनपालाजी से, सामायिक से लगा कर ग्यारह भड़ों तक का सर्वाङ्ग मानाध्ययन कर लिया । लगातार के सतरह वर्षों तक चारित्र का पालन किया । मन्तिम समय में, पूरे एक माम का सन्धारा कर, भन्तिम श्रासोमास में अपने सम्पूर्य धनषादी कर्मों को नए कर, मुह में वे पाँची । कास्नी आर्याजी ने भाठ वर्ष पारित्र पासा । दूसरी मुफ्ती ने नौ वर्ष । यो क्रमशः मिपात मरम्। पर पपई महामन कम्णा ने रे-पूरे सवरह या तक चारित्र का पालन किया। ये दसों ही राजा श्रेणिक पो गनिया था। अंर, फाणिक की छोटी माताएं। पृल -एव खलु जवु | समणे ण भगवया महावीरेण श्राइगरेण जाव सपत्तेण अट्ट- मस्म घगस्स अतगडदमाण अयमढे पएणचे तिमि । अतगडदसाण अगस्स एगो सुय- खयो अवग्गा भट्ट मु चेव दिवसेसु उद्दिसिज्जति,तत्थ पढ़म वितिय वग्गो दस दस उद्दे- सगा, तइयवग्ग तेरस उद्देसगा, चउत्थ पचमवग्गो दस दस उद्देसया छट्ठवग्गे सोलस उद्दे- सगा, मत्तग्नागे तेरस उद्देसगा, अट्ठमवग्गे दस उद्देसगा । सेस जहा नाया धम्म कहाण ।) भायाध हे जम्प ! धर्म के प्रकट करने वाले , श्रमण भगवान महावीर जो मोच में पधार गये , उन्होंने भाट भग भन्नगः सव' का यह भाव फर्माया है । उसे मैने ज्यों का त्यों तुम्हारे सामने वर्णन कर दिया । इस मन्नगढ़ में एक तस्य ध यार माठ वर्ग है । भार, जिन्हें केवल माठ ही दिनों में भगवान् ने फर्माया है। इस व प्रथम र दुमरे यगों में क्रमश दस-दस शध्याय है। तीसरे वर्ग में तेरह , और चौथे तथा पाँचवें वर्गों में पिर दमदम अध्याय । घट यर्ग में सोलह भध्याय । सातवें वर्ग में तेरह मौर भाठवें वर्ग में दस अध्याय है। माशप मानाधर्मधार सूत्र के अनुसार जानना चाहिए।

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श्री मदन्तकृशामसूत्र समारम्
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Shri Antkritdashang Sutram

Author
Maharaj, Pandit Muni Pyarechandji
Title
Shri Antkritdashang Sutram
File name
Shri Antkritdashang Sutram
Text
OCR done
Citation
1936
Published
2011/07
Publisher
Agra, Lohamandi, Seth Bhikamal Chotemal Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
925
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314002
Barcode
99999990312159.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
79FZUWH5uI2
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