Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Chandar Mahi Pati Kamla

Gadgila,vishnu · 2011/08

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

घामदाचार्ययोनिशमशास्त्रविनावान्तविरचिन.
चन्द्रमहीपतिः
पार्वतीविवृतिमहिनः
कमला
दिको am AENTERN.
प्रायनलेखक -
श्रीनरहरि विष्णु गाडगील
समालीचको
क० थीहनुमत्प्रसादशास्त्री (संस्कृतभाषायाम्)
म. धीशतकोटिमुखर्जी (प्राडालभापायाम्)
8136
याणी ममंव मुरमा यदि रजयित्री न प्रार्यये रसविदामवधानदानम् ।
सायन्तनीषु मकरन्दवतीपु मङ्गाः किं मल्लिकासु परभन्त्रणभारमन्ते ।।
दानायिनो मधुकरा यदि कर्णलालदूरीहताः करिवरेण मदान्धबुद्धया।
तस्यैव गण्डयुगमण्डनहानिरेषा भङ्गाः पुनर्विकचपनवने वसन्ति ।।
निर्माणकाल: १६६१ वैक्रमः
प्रथममुद्रणकालः २०१६ वक्रमः

No text on this page.

Karh वैयाकरणकेशरिणां पूज्यजनक- श्रीनवरङ्गरायशास्त्रियां करारविन्दयोः समर्पणम् पाराध्यदेव! श्रीचरणसान्निध्ये समधिगतं शास्त्रप्रकाशमर्थ- जगतो विभीपिकान्धतमस विलुम्पति । तस्य क्षीयमाणज्ञानप्रकाशस्य कतिपयानवशिष्ट- शब्दाशूनवचित्य न्यास एष सम्भालयितुम- शक्यः सम्भाव्यमानः श्रीमद्भ्य एव सादरं सश्रद्धं सलज्जञ्च प्रत्यावर्तयता समय॑ते- -श्रीनिवासेन श्रावणी पूर्णिमा १६६१ वैक्रमः भारद्वाजभवनम्, राजगढ़, बीकानेर (राजस्थान) Rai द्वार निकाला जायमानो ये ब्राह्मणस्थिमिणणवाजायते। ऋणं देवस्य यागंन ऋषीणां पाठपर्मणा। सन्तत्या पितृलोकानां शोधयित्वा परिवजेत् ॥ इति हि धर्मशास्त्रकाराः समामनन्ति । तत्र पोगो पाटामणेतिवचनस्य तात्पर्पमिदमेव पपिभिः प्रज्ञानेश्रेण यिलोश्य यद् प्रन्यपूपनिवदं तत्सा- भिनिवेदामनुशीलनीयं तदनुरूपा नव्याश्चापि ग्रन्या निरचनीया इति । एवमेवर्षिप्रतिपादितं रिस्थं परिरक्षितं परिवद्धितश्च स्यात्, ऋषि ऋणञ्च निर्यातितं स्यात् । प्रयन्यतया पुनरस्माकमयत्वं खलु निरस्पतमा एवं ऋषिऋणविनयाय प्रयासमातिष्ठन्ति, सुविरलतमाच तत्र साफल्यमधि- पन्यन्ति। एवेव घ सुविरलतमेध्वन्यतमः धोधोषीनिवासशस्त्र- महाभागः। साहित्यप्याकरणादिविविधशास्त्रेषु कृतयमेण दिपश्चिदप- श्चिमेन शास्त्रिमहाभागेन रसभरनिर्भरेण गन चन्द्रभूपतिकथा समुपनिबद्धा। "मोजः समासभूपस्त्वमेतद् गयस्प जीवितम्" इत्युपदेशमनुपाल- यतापि शास्त्रिमहोदयेन लेगतोऽपि प्रसादो न परियपतो न वा माधुर्य- मुत्सारितमित्यहो सुवर्णेऽपि परमामोदः। प्रमादा प्रत्र वर्तन्ते वेचन, परं धारतरतरुण्याः कपोलकाजलवन प्रभवन्ति ते कथागतमुस्कर्षमप- हातुर। अवश्यमेव समास्वादनीयः कयाया प्रस्या रसः सहृदयः । प्रतिविद्यालयं प्रतिमहाविद्यालयं प्रतिपुस्तकशालञ्च रक्षणीयमिदम् । पुस्तकस्यास्य कृते शास्त्रिमहोदयो राष्ट्रकर्णधारः पारितोषिकेण संवर्धनीय इति नः प्रतिभाति । अत्र पद्यान्यपि भूयांसि विलसन्ति। तेषु च कानिचन अन्यकृत एक, अपराणि च तेषां तेषां कवीनाम्। सर्वाण्येव सरसानि मनोहराणि च । इतरकविषु च प्रतिवादिदिरदपञ्चानने पण्डितराजजगन्नार्य शास्त्रि. महोदयस्य महमानो दृश्यते। सास्त्रिमहाभागस्प गये पये च सममेव पुण्यं परिलक्ष्यते। चिरजीवतु मारित्रमहोदयश्चिरञ्च सम्लङ्करोतु सुरसरस्वती- मोदृशोभिः मुमनोमालाभिरिति शिवम् । ८, भूपेन्द्र बोस एवेन्यू थीक्षितीशचन्द्र चट्टोपाय कलकत्ता २१४५६ मम्पासम्पादकः -

No text on this page.

No text on this page.

राजभवन चण्डोगड पञ्चावराज्यपाल महामहिम श्रीनरहरि विष्णु गाडगील महोदय का प्राक्कथन। मनुष्य प्रातःकाल उठ कर अपने शरीर के कार्य करता है, फिर अपने वान्धी के, फिर मित्रों के, फिर दूसरों के। यह सर पहलुओं में लागू होता है। कुछ स्वयं मन कर राष्ट्र को बनाने का उद्देश्य उत्तमपुरुषों का सभी राष्ट्रों में रहा है। उन्हीं सत्र कार्यकलारों के एक प्रणालीबद्ध निरूपण को उस पुरुषोत्तम के द्वारा या बाद में एक वाद का खरूर मिलता है। इसी उद्देश्य से विश्व में विश्वहित के लिये विभिन्न पद देखे जाते हैं। बाद के प्रणेता एवं उसके अनुगामी उस अपने वाद को ही सर्वाधिक विश्वहिताय मानते हैं। परन्तु इन सब वादों से ऊपर उठ कर इनको वास्तविकता देसने से सभी कर्ण से दिखाई पड़ते हैं। यही कारण है कि अनेकों बाद विश्वमंच पर भाये और विलीन हो गये। परन्तु सौदय एक ऐसा समन्वयात्मक याद है जिसमें स्थायित्व की क्षमता है। ठेस ने सभ्युदर का प्रयोग विशेष उद्देश्य से किया है, और व्याख्या की है...स' ' मनुष्यों द्वारा' सिस्मिन् 'पुरल और रिपतियों में 'सरमें सब के रिश 'स्मात् ष उपयों हैं स्य' प्राणिमात्र का' अभि-'समन्तात उदयः सर्वाभ्युत्थः ।

दग्रसे उगमता में भौर परमवलेमुरमा और में गांतोमान। याद में नहीं मान समार है *- १६ममा मानस में समरिमेहै। रा भानु गुरािनः स सनु निरामयाः । ग माणि पश्यन्तु मा चित् दुशभाग मवेत् ।। महा राम के लिये पाप और मुगरी कामना है, बहुजनों के लिये नहीं - यह पुरातन पिका संग्रपर भाशीर्वाद है, संस है। यह कोई हाई हिला नही मषित विधरोगों को स्परहरणीय भवपर्य महौषर है। इसकी आधारशिला है आध्यात्मिक अवैत । समन्वय, सामजस्य, सामरस्य इसकी प्रणालो है। यह वस्तृतः जीवनमात्र के लिये जीवनामृत है। यह मानवनिर्मित वैषम्य को दूर करता है और प्राकृति वैषम्य को पटाता है। यहाँ प्राणिमात्र के लिये समार प्राप्त है। इसमें खामी और नौकर का, मिलमालिक और मजदूर का अन्तर नाममात्र का रहता है। यदि घर में कोई नौहर कार्य करता है तो वह कृपा करता है कि आना कार्य छोड कर हमारा कार्य करता है। अतः उसके लिये हमें हेय भाव नहीं रखना चाहिये, अपितु समादरभाव रखना चाहिये। “भोजन जीवनस्तरमाधिपतिराम: स्यात् ।" इसी प्रकार व्यापारिक प्रतिष्ठानों में काम करने बलों का अधिपति के समान खल होना सर्वाभ्युदय का उमेश्य है। दस बीस भादमी मिल कर काम करें तो यह साझेदारी का काम है मगर उसमें कोई अधिक हड़पना चाहे तो वह बेहयापन है तथा चोरी है। सर्वाभ्युदय का उद्देश्य है दूसरों के लिये जोवो, ऐसा समाज निर्माण जिसने व्यकि को सर्वविध विकास का अवसर प्राप्त हो। इसमें न अमीर न गरीब, फिर भिक्षुक का तो प्रश्न ही नहीं। आज प्रमी को श्रम का मूल्य नहीं मिलता। किन्तु ययाकरित् जोवनधारण के लिये कुछ मिलता है। शेष वह साझेदार हप जाता है जिसे भाग ३ पूंजीवादी भाषा में स्वामी" कहा, जाता है। इस हराम की कमाई के निराकरण सर्वाभ्युदय के लिये परमावश्यक है। यन्त्रों का उपयोग मानवविकार के लिये हो, धनसंचय के लिये नहीं। आज मानवता संकट में है और उससे प्राण पाने का एक मात्र रास्ता है "सर्वाभ्युदय"। हमारा इन शताब्दियों का इतिहास पूंजीवाद से प्रभावित होकर स्वार्थ- नौति से नितान्त दूषित रहा है। हममें से हो कुछ ने विदेशोंसे आततायियों को भारतविदलन के लिये बुलाया। हमारे भीतर विद्यमान खार्थों के बल पर ही उनका शासन चला। मनमाने अत्याचार हुये और अन्त में भारतमाता के संड हुये। आज भी यत्र तत्र, सर्वत्र राजनीति, व्यापार और सम्प्रदाय में यह स्वार्थ ही सर्वोपरि है। सरकारी नौकरियों व व्यापारिक प्रतिष्टानों में ऊंचे पदों में स्वार्य व पक्षपात हो दृष्टिगोचा होता है। तिकड़मी स्वार्थी समानशील अधिकारियों से सांठगांठ कर भ्रटाचार फैलाते हैं। ऐसे अक्षम मनुष्यों से न तो समाज की रक्षा होती है न उत्थान । धनार्जनके अतिरिक इनका कोई उद्देश्य नहीं होता। इस प्रकार की धनलोलपता से पतन अवश्यंभावी है। इन तथा समाज में व्यास अन्य समस्त दोषों के लिये सभ्युदयबाद अमोष भौषध है। आइये, हम पार्थपूर्ण इतिहास को उज्ज्वल बनाने के लिये कटिबद्ध हो। हिमालय के समान उपलधरल, अाकाशके समान विशाल, वायु के समान व्यापक एवं सूर्य के पमान सप्रभ संस्कृत वाङ्मय में गयपन्यों की अल्पताका कारण उस समय के रसिकों की रुचि का अभाव ही प्रतीत होता है। उस समय छन्दोबद्ध विषयों का ही जनता रसास्वादन करती थी। और विशेषतः पद्यात्मक रचना ही कविता मानी जाती थी। यही कारण रहा होगा कि इस वामय मैं गयमन्य भंगुलीगणनीय ही रहे। अब इस और विद्वानों का प्यान जायेगा तो अवश्य हो उसकी पूर्ति हो जायेगी। आधुनिक काल में साहित्य की धीद्धि में अधिक हाय गयधों का ही इता है। अन्य भाषाओं का साहित्य गश्यों के ही आधार पर समन हुआ है। शान्ति लाने में सबसे प्रपन काम साहित्य का है। उस मनुष्यों के मस्तिष्क पर प्रभाव हारने वाला साहित्य ही भविष्य में भान्ति लनेही क्षमता रखता है। आज भी हन रावण न पुरला चलाते हैं और राम को पड़ते हैं सथा कृष्ण को माम हरहे है और सो गाली देते हैं, विनित तीर्थस्थानों को यात्रा करते हैं। यह सब साहित्य के कारण हुआ और हो रहा है । अतः उत्तम साहित्य ही राष्ट्रके स्थायी स्तंभ है। कवि समय का प्रतिनिधि होता है, उसको स्वना यद्यपि इतिहास नहीं होती पर उस समय का ज्ञान अवश्य कराती है। यह बात प्रस्तुत लेखक की कृति के अन्दर सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। लेखक ने जिस विषय को धुन कर जो सर्वथा मौलिक अभिनवकृति साहित्य को दी है वह सामयिक तो है ही पर भाषासौष्ठव से अभिराम व मोहक भी है। सम्भवतः संस्कृतसाहित्य में यह सर्वप्रथम पुस्तक है जिसमें लेखक ने सर्वाभ्युदय की स्थापना को है। पुखक का बघ कडेवर भाषा है। सर्वप्रथम उसो को ओर पाठक का ध्यान जाता है और वह आकर्षित होता है। भाव या उद्देश्य तक तो धीर गम्भीर युद्धि वाले ही जा पाते हैं। प्रस्तुत पुस्तक की भाषा को छटा बहुत आकर्षक है जो लेखक को प्रावीन कवियों की श्रेणी में उपस्थित करती है। वर्णन में छोटे छोटे पदों के कारण मुगमना होते हुए भी कहीं कहीं वाण और दण्डी के जैसे दण्डक भी हैं। यदर्थ लेया ने अन्तमें लिखा है हि-न्यासि कचन कचन प्रीत्यै विदुषां मया नु काठिन्यम् । नीरजमृदुला तन्वी कुचयोः कठिनैव सम्भाति । प्रकृतिवर्णन लेखक प्रकृतिवर्णन में अद्भुत योग्यता रखता है। पाठकों को इन मनोम दक शों का मानन्द अवश्य लेना चाहिये। टेता इमो सहभाधुनिक शैली के प्रयोगर्ने भी मफल है। उद्देश्यनिरूपण पी पुस्तक के अन्त में देखने प्रतिकार सानु का सनिय किया है। पुम्दा के प्रसार में ही उसमठा प्रतीत होती है। सूर्यत्रमा के माप भरप, मत्रता संग्राम मे वन, मिस बार और पटना पास दिर में गश्य अनुतदिखाया गया है।

समस्त पुस्तक में लेखक के विविध विषयों के ज्ञान की सट छाप स्थल स्थल पर दिखाई देती है, जिसके कुछ उदाहरण मौदे दिये जा रहे हैं। जीवन में प्रतिदिन व्यवहरणीय भोजनों तथा यन्त्रशस्त्रों व वैज्ञानिकतयों का समन्वय साहित्यमयी भाषा में करके पाठकों के लिये एक अद्भुत उपयोगी कोष दिया है। यथा- "प्रोडमनोरमेव कुवाईनेन सचेत शरीराभाद् यामिनी, विश्व शब्दरत्तभैरवीत्वं जा विभावयाः" । पति सूबमा जालार्थगुप्तः", "व्याप्ति लक्षणमिष प्रभूलनिवेशभा- समानः, खाइनखाख दमिरखण्डनाने कशासनः शन्देन्दुशेखाइन सिद्धान्तब्याख्याता"। 'सुध्युगम्यो मभरिरिव धात्रंशोऽलाकृतिः।' रसगुगलिचारितसरदसेवन झीणायः साक्षाचन्द्र इवालक्षि। 'खदिगिरिगुहाया- माम सकीय रसायनमाखोर', 'प्रदरं नाशयतु पुण्यानुगामा सेवमानायामनुपेयाभिग्य- धाराभिरिव सिपमानापां चमुक्सा", "विवियका सविमाना मासका समस्मचूर्णा चरकसंहितेत सभी होलिका । सुभता कामटेन केनाप्यनुत्तरेण नावतस्थे । “अस्या वाणी भगाद्भकिाका परितर सरसा गाहप्रवाहवत् खच्छा, शिशुहासरत् साला, पसलि- भणितिरिव भावपूर्ण सुरोधा व विद्यते।" "चन्द्रस्तु न नाऽऽउमौके सरकारमतरीयूपानमोनमधुपुश्क", "आयुर्वेद शास्त्रमा लक्ष्मीविल समागी", "प्रिपालमनोरमावर्ग इह, कामेधामोदामुदिता, 'रम्पाणि चित्रापि पुण्यश्लोकानां दोनोधनामानि चकितानि सन्ति', 'रचितान्या पररूविः, वारपरित्यारिः योशो दियो होतकार' भूत इव मुरारमशायमानमखित या' "सोऽयं वारणायांनामीप्सितः कालो वती, यत् कुकुमेनाच हितोऽदितोऽण्ठिनावाने पम्मितो गुणरलैः, अनुस्वारस्य मयि पाहा:" इस सोदाहरणो राजा राज। कुछ ऐसे वाक्य हैं को जीवन को उपदेश देते हैं, चमत्कृत करते है। यथा- "मर । स्मर्तयोगी पुभिाग्य हावि जगति"। हऽपि विसं माई सौन्दर्यशी गरलम्" "अघटनोयघटनास्टोपस पटसं वाटपाटय को पानीते","अगुरपनि कान्तारमन्तयति', देवदतन दर शनिउरेऽपिशिवमानेऽपि सुखो न विडि", "पा रत्नं स्पन एव राम", "पुनान्सुले सर्व विरमाति", "महारो लमोरिरम्, "मास पसलो भगवान सा सपठि", "लेशाविरमलिना सम्ध्या धमो मेवे".

( १०) "भोजनप्रिये विप्र मनखितेवनेश्यते स्माहाद', "मुभिक्षेवणिगिव दुई श्यदशमासीबगरम् याकरणकाव्ये रसानुभूतिखि कवन वचन प्रेक्ष्यते स्म जनावस्थितिः", "परतन्त्रताय घृतादनात् स्वतन्त्रतायां घासादनं गरीयः","मरमणिःप्रतापो घासमेव जघास", "खामि देश्या वा स्युविदेश्या वा स्वाय लुण्ठतां रक्त शोषयता पनिनां वा नान्तरम्', "कुशाग्रबुद्धि- योगशीलः सद्यः साफल्यमरनवे", "मृत्युमुखं विशता कोऽवसर उत्सवस्य , "समुद्रा शुष्कोऽपि मानसं परस्तिरस्कर्तु प्रभवत्येव", "दृढप्रतिसं साहसिन नरं प्राकृतिश्यो बाधा निश्चितपयान निवारयितुं शका", "साधनाविरहितः कथं प्राप्नुयान्मानवोऽभीप्सितम् । "मम प्रासादः साधनास्थल नभोगभूमि","दोषा देवामावनाश्रयाः","मात्सर्य भोगभूमावेव भवति न साधनास्थडे", "आप्रियमेलनं प्रेयसीना दुःखम्", "प्रज्ञावा प्रज्ञायास्तदेव मुकर्म येनानादम्बरमप्रदर्शन जगतो विराजी भगवतोपलाभिलापमर्चनं भवेदिति", "अहिंसा प्रेम च मानवखभावः", "विक्तच्छायायां नरो विवेकविच्युतो भवति।" भन्तमें सर्वाभ्युदयस्थापना में महावियों के पद्यरत्नोंके गुम्फन ने इस स्वर्णपुरक को हीरकमण्डित सा कर दिया है। मैं चाहता हूँ कि इस प्रकार के संदों का समाज में अधिकाधिक भादर हो। और सद्यपवार की दृष्टि से इसका परीक्षाओं में सर्वत्र सन्निवेश हो, ताकि संस्कृतसाहित्य की श्रीरदि को प्रोत्साहन मिले। अन्तमें बाधुनिक भाषा की इस उत्कृष्टतम कृति के विद्वान् लेखक कविशाल श्रीनिवास शादी को भूरि भूरि धन्यवाद के साथ माशीर्वाद देता हुआ पामर्श देता है कि संस्कृतसाहित्य के विशाल भवन में इसी प्रकार के अन्य प्रन्य भी। अत्यन्त मानन्दरस्नेह के साथ रही निष्णु, गाऽ अभ्यस्तानेकदेशभापोऽनल्पलिपिज्ञः कलिकावाविश्वविद्यालयस्य तुलनात्मक भाषाशास्त्र सम्मानिताध्यापको भारतशासनसष्पटितसंस्कृतायोगस्य भूतपूर्वाध्यक्षः पा- Tilaa 4:37.A. (CALCUTTA), D.LIT. (LONDON) भजन বিধান-পরিষদ পশ্চিমবঙ্গ কলিকাতা। Chairman Legislative Council West Bengal, Calcutta December 2, 1958. सभापति विधान परिषद पश्चिमबा BETT 11 I have gone through the Sanskrit work in both proda and verbe "CHANDRA MAHIPATI" whioh has been composed by Kaviraj Shri Saridiwa Shastri of the Shri Visuddhazana Saraswati Marwari Hospital in Calcatta. This is a work of a Den type in which he has sought to give in simple anuskrit prose, with veras stanzas in different metres occasionally interperged, an exposition of the Sarvodaya Ideal, in the form of a story. The Author bas & vary remarkable facility in the UBO of Sanskrit and he is a trne poet to whom Sanskrit Versifiostios in different styles comos most easily. I am sure, & book tite this will be very much appreciated by those who cso read Ssoskrit, and it should be useful for stodonta of Siakrit who want some good reading matter outside of the classical texts which they have to stady. I wiska wide publicity for this Boot and I TRUST ON ITS OWN MERITS it will be accepted by our ganskrit Scholars sll over the country. Suniti Kuman Anglegi #1 -

GOVERNMENT SANSKRIT COLLEGE
Calcutta, the 14th January. 1939.
No. 2339/A1
I have gone throagh the book entitled "CHIANDRU
MAEIPATI" by Pt. Shrinimas Shastri, It has given me
very great pleasure to notice that oven in present timo s
Scholar can writo sanskrit Prose with mucb ease and Besibility
ol style. I would only wish the book : wide publicity.
Dr. GAURINATI SHASTRI,
Principal
Sanskrit College, Calcutta.
Judge Eigh Court
36. Ballygunga Park,
Calcutta-19.
Calcutta
I have read with great pleasure and interest CHANDRA
MADIPATI & sanskrit work of Kaviraj Shriniw._Shastri
of 8.V.8 M. Hospital, 118, Amborst St, Calcutta-9. The book
is well written. The Story rings true to the universal
ideals of the Hindu Sepatan Dharms. The author has done .
distinct service. First, to the ideala of spoh Daarms and Secondly,
to the cause of Sanskrit. It is a Commendable cadearoor:
Dated Monday the 9th day of Februáry, 1959
(8) P.B, MUKHARJI
(Honourable Justice High Court Calcutta)
President. Bapgiya Sanskrit Shiksba Parishad.

MINISTER Law Deptt. and Local Sell.Goverpment and Panchayats Department Government of West Bengal, मैने पं० श्रीनिवासजी शास्त्री का "चन्दमहीपति" नाम का उपन्यास संस्थत भाषा में पदर। शास्त्री जी ने इस उपन्यास को अत्यन्त सुन्दर रूप से लिखा है। इसके भाव और भाषा दोनों ही सराहनीय है। यह पुस्तक संस्कृतज्ञों के लिए पनीय है। इस सम्लता के लिए में पंडितजी का अभिनन्दन करता हूँ। ईश्वरदास जालान विश्वविख्यातधीसरआशुतोषमुखीमहोदयज्येष्टपुत्रस्य, लोकनायकस्य मुक्तारमनो- उमरकीस प्रीश्यामाप्रसादमुखजीमहाशयस्यामजस्य न्यायसिन्धुरमाप्रसादमुख्योपाध्यायस्य- Phone ४८-१८९१ ७७, आशुतोष मुखर्जी रोट, कलकत्ता-२५ कविराजश्रीनिवासशास्त्रिविरचित कथाकाव्यमालोक्य पर प्रीतिमाप्तवानस्मि । प्रशंसनीया पदविन्यासपरिपाटी, आधुनिकविभिन्नविषयाणामनुशीलनशैली, भारतीय- संस्कृतावनुश्मानुरक्तिशास्त्र काव्येऽस्मिन् मया समवलोकिता। स्याकरणसाहित्या- युर्वेदादिषु वैदुष्यमुपेयुषः शात्रिणः काव्यकलानैपुण्यं मनीषिमनःप्रोणनहेतुतामहति । पामेशप्रसादात् श्रीनिवासस्य कवेः कास्यमिदं यशसेऽयकृते शिवतरक्षतये वास्तु इति मे शुभाशंसा। श्रीरमाप्रसाद मुख्योपाध्याय न्यायसिन्धुः फविचक्रचस्वतिनश्चक्रवत्तिनो महामहोपाध्यायस्य श्रीकालोपद- वाचार्यस्य कविकाव्यप्रशस्तिः श्रीश्रीनिवासशातिथितं नानागुणैः समादिलम्। चन्दमहीपतियव्यं गनिबद्ध मया टम् ॥१॥ गद्यं सहृदयहां कविगुणनिकष चिरं वदन्त्याः । याणमुबन्धुप्रमुखाः कवयो यत्र श्रिताः कीत्तिम् ।।२।। -- संस्कृतकाव्यविभूतिः क्रमशः क्षीणा वसुन्धरापृष्ठे। दृप्त जनयति तापं सुचिरात्तत्रानुरकानाम् ॥३॥ पर्व कथमपि हृद्यं बहवः कवयः सदा निवघ्नन्तः । सम्प्रत्यपि सन्तोपं विदधति यत्नैरनायासैः॥४॥ किन्तु न गयनिवन्धे भाति यहना विपधितो यमः। अथवा सत्यपि तस्मिन् खपजनानामिहोत्कर्षः ॥५॥ श्रीधीनिवासशास्त्री व्यरचयदेतद्यदुत्तमं काव्यम् । मुपटितगद्यमयं तत् मुसयति चित्तं सचित्तानाम् ॥६॥ वृत्तं यदुरसवित्तं नितचित स्वया धियोपासम् । कवितोवर्षात् सत्यं प्राकृतमत्राकृत भाति ॥७॥ न कल्पनरम कविना यन्नाद् वृतं पर चित्रम् । बागप्रमृतिस्वीना इमरणं येन प्रमिधानाम् ॥८॥ शक्तिः कापि समृदा स्वभावविक्षा मतिनयाविज्ञा। मुत्ररत्र समिक्षालतिशास्त्रे तथा श्रदा ॥९॥ ललिताल तिरम्यध्वनिपामुमगा कृतियथा योगा। विलपमुरसविशेषा रसात घेतो रमज्ञानाम् ॥१०॥ समायोनिधिपार न मियमः कवरोबाटम् । येन शिवशिवभावा विस्ताः यो रुटाकारम् ॥1॥ हामि मुरम्य गीतकार मुरचं प्रमरतो नरम् । सामनुगतिमेरे पति मिनिटे वेश्यम् ॥१२॥ प्रोष्ट्रमाता रिति गमापा निराया। प्रमादिलितोपरसातयत् मुम्वरिती माया ॥१३॥ एपहियनिकन्धः मुमपावत्यः प्रम धितानन्दः । मुखदेव सिर मित्रता पम्मन् ॥ril सनुदेशनीमंदिरिद नरम् । मारिया बालम मामानम् ॥१५॥ It (१५) श्रीधीनिवासशास्त्री सुकविपशोभिः मुशोभयनाश रसिकविशेषानेवं ग्मयतु नियतं सरखत्या ॥१६॥ भामयविरहितमायुश्विरमयमीयाहयावादानुः। एवं ललितनिवन्धेरान्ध्य जगतस्त्या ठिन्यात् ॥१७॥ इंशकाव्यविचाराद् विवुधा मुग्धा दृढ वित्रुप्यन्ताम् । संस्कृतभापामसमा राष्ट्रियभाषापदे योग्याम् ॥१८॥ जयति कविलयीधीनिवासी नवीन: सुमधुरमुरवाणीगद्यविद्याप्रवीणः। जयति विबुधवाणी तेन हप्ताभिमाना जयति भरतभूमिस्तद्गुणैरेधमाना । १२६५ वताब्दीय सोरमार्गशीष, महामहोपाध्यायश्रीकालीपदतर्काचार्यस्य। म० म० डा. श्रीयोगेन्द्रनाथतसाह्यवेदान्ततीर्थानामाशीर्वादः- कविराजश्रीनिवासशास्त्रिप्रणीतश्चन्द्रमहीपतिनामकः सन्दी मया साद्यन्त मवालोकि । सन्दर्भाध्यमधुनातनी समस्या रशन्, इदानीन्दनी प्रणाली व्यवहरन, प्राचीनकवीना मनोज्ञमधुरा रीतिमप्यतिशयानो बाणस्य प्रबन्धसौन्दर्य्यम्: कालिदासस्य खाभाविकताम्, दण्दिनः पदलालित्यम्, भारवेरर्थगौरवम्, माघस्य पाण्डित्यम्। हर्षस्य वर्णननैपुण्यम्, त्रिविक्रमभट्टस्य श्लेषम्, शहरस्यादै तसिद्धातच पुनः पुनः स्मारयति । मन्ये संस्कृतसाहित्येऽयमपूर्वी विषयो लेखकेन साधिकारं निबद्धः । श्रमेणात्य प्रसौदनई सस्नेहमाशिषा संयोजयामि । म० म० डा. योगेन्द्रनाथतर्कसाइयवेदान्ततीर्थः डि० लिट्, दिनाङ्क: २७-३.५९ ( १६ ) सत्यं परं धीमहि महामहोपाध्यायमहाकविमारताचार्यश्रीहरिदाससिद्धान्तदागीशमहोदयानामा बज्ञाक्षरं देवनागरीलिप्याम्- श्रीश्रीनिवासशानिप्रगोतं चन्दमहीपतिकाश्यमवडोक्य नितरामानन्दितोऽस्मि । हि पदे पदे अनुप्रासालङ्कारमकारेण काव्यमिदं स्मृतिपयमानयति महाविधीहर्ष महाकाव्यं नैपधीयचरितम्। स्थाने स्थाने भावगाम्भीर्य माधुर्य्यमातनोति- प्रायेम नानाविधा अर्याल रा नितरा प्रोग्यन्ति हस्यम् । तन्मन्ये काव्यनि काव्यरसरसिकेषु पण्डितमण्डलेयु सर्वथा समादर लप्यते इति । श्रीहरिदाससिद्धान्तवागीशशम तारिस २२-७-१३६५ महनीयमहिम्नोः श्रीजीवन्यायतीर्थश्रीनारायणचन्द्रस्मृतितीर्थयोः- गद्यपद्यरचनानिपुणधीश्रीनिवासातकाव्यविशेषम् । चन्द्रभूपतिविचित्रचरित्रं शोलयन्नतुलमोदमुपैमि ॥ शक्तिप्रकाशकुतुकी विरेष नध्यं काय परैरपरिशीलितमार्गगामी। निर्माय निर्मलमतिः सुमनोमनस्सु सामन्दसान्दरससौरममातनोति ॥ भट्टपल्लीवास्तव्यश्रीधोजीरन्यायतीर्थशर्मणः अत्र ममापि सम्मतिरस्ति प्रीतिमाशीर्वचोऽपि वितरतो भट्टपल्लीवास्तथ्य- श्रीनारायणचन्द्रस्मृतितीर्थशर्मणः। कलिकाताविश्वविद्यालयाध्यापकशास्त्ररनाफरविद्यासागरमीमांसा• न्यायसाहित्याचार्यश्रीपी०एन पट्टाभिरामशारित्रणाम्- पण्डितवरः श्रीश्रीनिवासशानिभिविरचितं 'चन्दमहीपति नामकं मधुरं गद्यकाम- महमालोक्यम्। संस्कृतवाड्मये गद्याव्याना सत्यपि वैशिष्टये तद्विरक्ने लोकाना प्रातिल प्रायैव । तत्रापि सरसानां सरलानाच गद्यानां चरस्यमेवेति कथन मासस्वमिव । तदिन रयं श्रीशात्रिणोऽसहमानास प्रन्यमिमं रघयाम्दभ्युरिति वे नितरामभिनन्दनीया एव । अस्मिन् काव्ये न केवल कथावस्तु सहृदयाना मनासि रायति वर्णनाचार्तु यम्, सालानामेव पदानां गुम्फनम्, प्रायो दीर्घसमासाहित्यम्, शत्या मधुरिमा भामूलरलं प्रयागुणपाहवे ति नून हृदयान्यावर्जयन्ति। स्वतन्प्रेऽस्मिन् भारते शिक्षाधिकारिण इस अन्य शिक्षाको संयोज्य साकं निलिम्पकायाः प्रचारेण श्रीशास्त्रिणः पुरस्युरिति विश्वसिमि। पट्टाभिरामशास्त्री अधिगतमस्माभिरान्तमधीतच जयपुराभिजनेन श्रीमता श्रीनिवासशास्त्रिणा विरचित चन्द्रमहीपतिरित्याख्यमुपन्यासनम् । एतादृशे मनोऽभिरामे पस्तुनि रममिति नैकान्तत उच्चैर्वादः। पठितु प्रत्तस्यासमाप्य त्यक्त खिद्यते पुरोवतित- विज्ञानोत्सुक वेतो जनस्य । सलीलापि सरलापि ललितबन्धशालिनी भाषेति यत् सत्य मुवणे गन्धसम्बन्धोऽयम् । कमोतर्षमारोहन्ती विचित्रा घटनापरम्परा उत्कण्ठा- कष्टकितानि करोति पठता घेतांसि। एतस्य परिच्छेदाः प्रत्येकमेनिधार समाप्यतया निधाराशामलभन्त । तत्र तत्र वणिता चनशैलकालादिरूपा प्रकृतिरपि वृत्तावत- पतितस्य संस्थापनामिव विदधाति मानसस्य । में केवलं गद्यनिषद्यायां पद्यपदव्यामपि दृश्यतेऽस्य कवेर्महाई पण्यजातम् । एतानि च पद्यानि न केवल सहजकवित्वसर- सान्यपिलाहार्य कविप्रतिभाभामुरैः इलेषयमकरित्रादिभिभूपितानि चिन्ताशक्युन्मेपेऽपि किमपि साहायकं विदधति पाठकानाम् । खलता खल्बधिगुणेष्वल्पभापणम्पोति विदन्नपि प्रसहादिपालोचनयाद विस्मन् ननस्यास्य कविप्रकाण्डस्योत्तरोत्तरोन्नति- मीशप्तकाशे मुदृढमाशासे इति शुभम्। सारख्यतीर्थस्य श्री उपेन्द्रमोहनदेवशमणः । १८८. शकीयसौरमाथस्य पञ्चमदिवसीयम् । मुनीन्द्रविद्यायतनम् ४, आनन्द लेन, कलकत्ता। सम्मतिरत्र श्रीनगेन्द्रनाथशास्त्रिणः, ईश्वरचन्द्रशास्त्रिणश्च ।

श्रोशलाजीमन्दिरचान्दोदयडोदास्थश्रीधर्मचन्द्रोदयपीठाधीश्वर- वंदान्तशिरोमणिश्रीमदनिन्दाचार्यवेङ्कटाचार्याणाम् -- सरलया सरसया संस्कृतभाषया मुन्दरतम सरसमेकमुपन्यासं चन्द्रमहीपतिनाम श्रीनिमशास्त्रियो निबन्धुः। यस्मिन् वर्तमानकालिको जनसमुदाचार समुपन्यस्तर करगि: पारमिहाशेममलोरन्नित्याग्रहयामः। स्वतन्त्रया शेल्या परि- माभिप्रायानाविरोति। अधिकरोति चौपनिवदा त। अन्यस्य का वेदोचा आमिष भासामाना ययं मन्यस्य प्रथनभिलयामः, इति शम्। बलाना-दिना२८-१-५९ अनिरुद्धाचार्यवेदाचार्यः सा. २५.२६.२७ दिगम्बर १९.. में प्रथम योकानेरराज्यमादित्य- मम्मेलन, हा धोदशरथ शमा एम०ए० के सभापतित्वमें हुआ था। उगने चन्द्रमोटिनगी का प्रमाणपत्र विद्या ने दिया था. एव नोये सिली मम्मति दी। এলো নম্বী বাপ্পীরাবন ধৰমণৰ হরি হয় कामना मनुषहै। टेसम्महोदय ने कवि व संतान रही धन्धा पीया। भात विहार वाला भनेर बम मल रम्न है। भाग भागोत्र हंगने पुच मीन टायगर भी रा गमगधर्मपर हो मा दान करेगा मे बरनाक बादादात्र मीमी रही। हमा {मसल दिन निरागारमा रमहारत समान:। (0) शायरामा इंगर कालेज, बीकानेर के हिन्दीविभागाध्यक्ष ख्यातनामा श्रीस्वामी नरोत्तम दासजी- श्रीमान् पंडित श्रीनिवासजी शास्त्री की अभिनव अनुपम कृति चन्दमहोपति के कई अंश मैन देखे और मुने। यह अन्य एडितोकी काव्यशक्ति का मुन्दर परिचायक है। वनों की निराली छटा के साथ साथ अलंकारादि का तथा व्याकरणविषयक विविध बातों का मनोहारी सौन्दर्थ मन्य में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। पंडितजी की सद रमना सर्वप्रकारेण अभिनन्दनीय है। आशा है जिस प्रकार की अनेकानेक सुन्दर- रखना से पंडितजी अमरवाणी के भंडार को भरते रहेंगे। पोपदि १४सं० १९९५ नरोत्तमदास स्वामी एम०ए० सप्रमोदमिदमावेद्यते यदाजस्थानीयविद्वन्मणिमालायामभिनवमणीयमानस्य श्रीमतः योनिवासरित्रण आयुर्वेदाचार्यस्याभिनवा कृतिः "चन्द्रमहीपति"-नामकः संस्कृतोपन्यासमन्धोऽशतः समालोकि। इतः प्रागपि किया थदंशोऽस्य सो- गौरतामनायि। महानयं दविधरो यदधुनापि संस्कृतविदुपामुर्वराशक्तिसम्पन्न मस्तिकमोदशि सर्वविरगुणसम्पमानि काव्यानि निर्मातु प्रभवति। काव्यस्यास्य माषा, भारः रीतिः, गुणालङ्कारादियोजन चेति सर्वमेव मनोहारि। . प्रन्धरामिद मासाथ सूक्तिनुर्भगवती भारती प्रवीदतामिति निर्मायेन मनसाऽऽशासे- हनुमत्प्रसादशर्मा ( साहित्याचार्यः) विद्यावारिधिः प्रधानाध्यापका सरदारदाहर विद्याधरशास्त्रो एम० ए० एन.आर. संस्कृत कालेज संस्कृतविभागाध्यक्ष:- रामगढ (सीकर) इंगर कालेज, बीकानेर राजस्थान शब्दरमभाण्डागार व ललितहाएपचिसमन्वितः संस्कृतभाषाविद्यासहेतुलाध्येतस्य सामयिकवाय श्रीनिवासशास्त्रियश्चन्द्रमहीपतिः कमलानामको प्रन्यः । द्धिकामरित्रमालदी तीर्थराजमिश्नज्योतिषी।

(२०) श्रीनिवासवानी का चन्द्रमहीपति देखने का सौमाम्य प्राप्त हुआ। पनरौली, प्रवाह विशेषरूप से उल्टेसनीय है। मानसिक मावों का संघर्ष टपन्यास के दत्तं प्रधान गुण माना जाता है जिसे मुन्दर रूपसे सन्निविष्ट किया है। रामकृष्ण मारती, शास्त्री, पी० ए० साहित्य सरदारशहर २६११२१४० सरस्वती कालेज, लाहौर Sri Bhandarakere Mutt. Udipi, (South Kinara) Dated 2-2-1959 Camp कलकता। स्वस्तिश्रीमतरमहंधपरिमाजकत्वायनेकविरुपाक्नादिकद्वतमतप्रतिधापरवगद्गुरु मन्मवाधार्यगुभसम्प्रदायप्रवर्तकधीमदुइपिभण्डारकेरिमठाधिपतिश्रीविद्यामान्यतीर्यः स्वामिपादाचन्द्रमहीपतिनामस्मन्यर्तृभ्यः श्रीनिवासशास्त्रिभ्यो नारायणस्मरण पूर्वकं निवेदयन्ति-युष्मकं चन्द्रमहीपतिनामको अन्यः सर्वाभ्युदयस्यात्युरयुए प्रतिभासते, मनोहरकथाप्रसन जनानां चिताकर्षक इति मन्यामहे । अस्मिन् या सर्व जना आदरं करिष्यन्तीति वयमाशास्महे, इत्यनेनारायणस्मरणानि । [वेदविद्याप्रयत्तमानमानसः "Naurang" कलिकातास्थो व्याहतवैरिटरः 6. South End Park P.O. Rash Behari Aveave श्रीकालीप्रसादखेतानः] Calcutta-29, 22nd March, 1959. The publication of CHANDRA MAHIPATI by Kavita Shriniwas Shastri is a very interesting event in the field om modern Indian literature. It is a novel written in modern Sanskrit. The style ia Composite, partly of the old and partly of the new. Ingealous forms of grammar and of description of patere alternate with coined scientific expressions &od modoro political and social topics. I must state frankly sbat all the translatioos of the scientife worde are not likely to by accepted by the pablic. Bat that does not affect the morit of the book. It is a bold attempt to employ Sanskrit once agafo as a medium for popular literature. What is more, is that the book is bound to prove to be a source of inspiration to writers in Sanskrit even iroleding himsell .......... (5d.) Kali Prasad Khaitan .

No text on this page.

No text on this page.

लेखकस्य द्विनाः शब्दाः युगद्रये व्यतीले पविशति सम्प्रामो युवेर चन्द्रमहीपतिमन्मञ्जूषातो निमृत्य मृत्पूर• निरुद्धो धोखाडा इव श्रीमतो समझं समायात एव । सर्वत्र राष्ट्र खातन्यपूरे प्रहति, प्रत्येकस्य मानसे मुखेन समृद्धया च युक्त राष्ट्रद्रष्टु व्याकुले, विदुपा संसार विभिन्नभाषासु सत्स्वप्यनेकेषु प्रत्यरत्नेषु "सर्वोऽप्यों बुधैः स्पृष्टी पपीह तथापि मे। सत्सन्द शक्तिता ममता केन वार्यते"। इति युवदिशा दुम्बाहतेन मयेष निखर पर संस्कृतलेखकानामाथिको स्थितिमीपणा, प्रकाशनमतिदुष्करम् । भधुनतत्प्रकारयतेही विचार्यवाहं प्रसीदामितमाम् । विशे वयसि यौवनोचितया निरनुभाया स्वेच्छाचारितया, अबहुशतया, अबहुदशितया च सह लेखनाचनाभ्यासः शैशवसुलभा पण्डितम्मन्यता चासीत्। अतः सन्दर्भऽस्मिन् तमुलभमौसम कचन कचन विद्यते । परिमइफल्गुत्वमपि शिशोः प्रमोदास्पदम् । तद्विरक्षप्य तथाविधमेव मुदापयितु निरदिशम्, यतो बालम्वेनिसस्य परिचयः पाठकपालभ्येत । प्रौदकीना मकरन्दश्यन्दिन्यः पीयूरमादच्योतयरियो हादकमप्यो रचना भाद्विरनेश आखादिताः, सम्प्रतीमा बालकाम्लोमप्यालयन्त्विति । पदार्थस्याभिव्यन्य अधिनियमे कचन कवन शैथिल्यमवलम्बितम् । तदर्थ पूज्यान घटता क्षमापये। उपमानोपमेये पभानलिवचनताया शास्त्रीया परिपाटो विद्यते, परम्, "नोपमा एगाया यत्रोदेगोन धीमताम्" इति दण्डिनः काम्यादस्याश्रयेण वा विद्वत्सब परिवर्तितवानरिमा महनीयमहिममण्डिताः फुन्दकुमुदविलसत्सकोतयलपोमूर्तयो मान्याः! पुरा भारते भारवहा अपि संपदा वा भाषन्ते रम। परमय तु कतिपय एवं सत्र शहार । मसंवमेवाभविष्यता संस्कृतप्रन्याः पुरातत्तविमानसंगतगारस्य सम्भारा एमाभविष्यन् । समस्तमसम्मम्युरिटा बामदादिभिजीदिरपि पुष्पेशिता जननी सोचनीया दरनीया हि महर दुखावहम् । हिमवय एतदेव रोचते ? सरयायचाम्, समय हिन्दो एक्ते? नवोदिदेश एवं राजमायासिंहासन- মঘাই? এসেছি। বহু মেমী, বন্ধুবানব- मानामपि रमा रा! रिडोर मदीया मिरचदाः परशमु स्मन ( २२ ) प्रापिताः। एकैकश भासनविशानि संस्करणानि तेषां भूतानि । खल्पज्ञाना । देशकाः कण्ठमधुरिम्णा मधमापूरयन्तस्तुकान्तपदैर्यशो धनयापुः। फलतो नतीन भवि अपनोकबाहुल्येन लोकप्रियतामुपेताया हिन्द्या राष्ट्रमापावं भूतमेर । परं संस्कृतम् ! प्रथमतो लेखका एवानुलिगण्याः, तेऽपि दीना जीवनात व्यापता वीतरचनाने पुम्या विरयव्यापि प्रकाशयितुमपाः प्रकाशितेऽपि च तुन लभन्ते। संताजीविनोऽपि संस्कृतप्रन्यान् झोला न पठन्ति। संस्कृती सबाल Er, शिवविद्यालयेषु पाव्यनिधारयित्रीसमितः संस्कृतसदस्याच नवीना एक परीक्षामु न सभिवेचयितुं गृहोत शपया इन प्रेक्ष्यन्ते। केवल प्राचीनानि पृटपिट पुस्खाल निवेश्यन्ते । अस्या थिती कर्ष सम्भाव्येत संतोमतिः पाम्, सम्पति विपनटेवस्माभिः प्रतिशतव्यम् , समन्तभाषाजनम्या भाव माया उपल्यै चेरितध्यय। नगीनलेखकानां संवद्धन, स्वप्रमावेग नगीनावान परीशमु पनिवेशने लेखनप्रकाशनविकरणे च परमादेररमामिवितम्यम्। अन्य पितुन गमा नयोनाः कुतो करें शिक्षामितव्यम, येन ताः मायास्ति युः। विद्यालये पन्यत्र वा एताः कृतीसाहात प्रेषितम्यय । भकरवाना विद्याधनाना संत प्रागानां रितु समाधवनोद दुस्टेऽस्मिन् पथि छानन्दं प्रया पाय॑ने । রাগ শনীয় নিঃস্বরণ বীনি বিষয়- सामानो रिमनि। भया मामीनः श्रमान श्रीमता करविन्दयोराधानानन्टर. मुसरनति, सम्प्र प्रमानय्ये श्रीमन्तः प्रमाणम् । पवायरमरमिजकुश्मलस्य मृत्यं मित्याऽम्म. सरसि विनिमो यहियन् । आमोदी विकमनमिन्दिरानियाम. नाम दिनारकृत्यमामनगि। Seीमत एमत, पाय जमि! प्रथमत:म मदरतामा Mareena (समालोपनाNirst श्री: "चन्द्रश्चन्द्र इवातन्द्रः 8636 लेखक :-कविराजः श्रीहनुमत्प्रसाद त्रिों, साहित्याचार्यः...आयु र्वेदाचार्यः, विद्याभूपगः, विद्यावागीश, संस्कृतार्णयः, जामनगरस्य आयुर्वेदीयस्नातकोत्तरशिक्षणकेन्द्र मौलिकसिद्धान्तविभागस्याध्यक्षः। धाजन्मवैफल्यमसह्यशल्यं गुणाद्भुते वस्तुनि मोनिता वेत् ।' वादिगन्ते बहुभापिणं तु दुर्गे पथि प्रक्रमण मदोयम् ।। অনুমশিনীতি এtqর্ণ:, তকতাবি নিত্যু:, লিঙ্গান্তীত্ব मन्दानन्दप्रकाशः, कपाकाव्यवन्धं वधुरयन, कपन्यासाकाश भासयन, रतिकजनमनांसि यस्यश्चन्दमहीपतिः। इतो विंशतेभ्यः भागयं काश्चित्कला एवादीहशत, अधुना जिलाभिस्वाभिर्मध्येगगर्न मोदमानो नभी द्विचन्द चरीमति । यद्यपि भाषान्तराणां वाङ्मयानि गोरेव तुन्दिलयन्ति वघि, सल्पान्येव तेषु पयानि प्रचकासति। पान्तु संस्कृतवामयस्य कथैवान्यया। इह तु वेदाः पद्यमयाः, पुराणानि पद्यात्मकानि, स्मृतयः श्यगतयः, आयुर्वेदोऽपि यः सुवेदः, आस्तामन्यत्, कोपोऽपि न पयेषु विजोपः। छन्दशेऽनुरोधादखच्छन्दा अपि तस्मिन्नेव पथि स्वैरं प्रासरन काय इति तु मन्ये देशस्यास्य थानन्दैकतानताया गानकाभिव्यग्यता पश्यतः संस्कृतेरे माहात्म्यम् । यद्यपि न मोजः प्रवादी वा रसभावविदः कवे." इशित् 'नेक पर्यन गर्थ वा रसभावविक्षः कवेः" इत्यपि वक्तुं शक्यम्, अवसरय तमेतमाभाणकं बाणजिमुन्धुमशा महामवयो निबन्धुश्च ते निरयागौरपि धान्याणि काव्यानि, तथापि वे सन्त्यगुलिगणनीयाः। সমুন্নবিৰিীয়া হারামণি সিগনীষীণন, কানাঘাবা- निबन्धबन्धनकविधिः, गोयमानावधानविधानावदानः, घटिकमातकोषाधिः, धीमान- चिकादाराव्यासो थाम महाकविः, यदीयं शिवराबविजय' नाम गद्यकाव्यं सौटवेन, सारल्येन, भाषन्युसत्या, विषयनिहाणपरिपाट्या चातीव प्रशस्यते मनीषिभिः । पुनरयमातरति रागभूमौ राजस्थानीय एवं महाविः श्रीनिवासो नाम वस्तुतः - ( ४ ) सरखतीनिवासो विद्वन्धन्य चन्द्रमहीपति प्रकाशयन्नदितीयनपि सद्वितीयान् विषय। यद्यरीदं युगमस्ति तुलनात्मम्ममालोचनायाः, तयारी कस्यविलपनेन करक महनेन बुद्धिभेदापादन पूर्वेषां कृतिशीतिविलोपन्य न रचिरं मन्यन्ते नीरागर मनीषिणः। नैव नासंस्खाशा भपि चाटुकाराः केवलकवयः करयो ये दिनकर प्ताहारलाभरितुष्टाः पंचषप्रामाधोशमपि 'लमर्कसवं सोमः' इति तुजन्तो व- विग्लापयामासुः, परन्तु म सर्वेऽपि तादृशाः, न वा सर्वे कुचयनयनवदने निन्त यहिं राष्ट्रम्, समाजम्, धर्म, संस्कृतिय समुजीवयितु कृतो वाचो देव्या वरदान श्लाघ्यः सदुपयोगः, वस्तुतस्ते विकालवन्दनीयाः सर्वस्य बगतः। इलाध्यताया भने परीक्षानिकयो यजनसेवा सर्वाभ्युदयकामना । प्रस्तुतमभिनवं चन्द्रमहीपतिनामधेयं काव्यं परीक्षमाणाः सर्वथा निर्दोषमैदर- कलयामः । इह कांचिद् दृष्टिकोणान् पुरस्कृत्यैव समालोचनं विदामः, वे बेमे क्रमशः- (१) लक्षणानुसरणेन यद्यपि कथाकाव्यमिदं व्यपदेष्टुं शक्यम्, कादम्पयामि वासवरतादिवच, कल्पितनायकादिमत्त्वात्। तथैवारम्भे बहुभिः श्लोकमलादिमाव- रणाच, तयापि तत्रैवात्र कथासम्बद्धानां नायनायिकादीनां देशनगरादिपरिक्सा पूर्वमेव न दीयते, अपि तु घटनाक्रमेणौत्सुक्यमुत्पाद्य तदनु तदुपशान्तिरुपजन्यते । संस्कृतवाए मये सर्वथैवाभिनवोऽयं पन्या भाग्ल्यादिषु नवलकथावत् हिन्धादिषुपन्यासपश्च कारिदपूर्वा छटा विच्छुरयतीति टपन्यासकाव्यमिदमिति कथनमधिकमुचितं भाति। कमितत्वेऽपीतियत तथा सुदिलष्ट' सुसातं च यथा तस्य ऋमिके हृदयापार हे न मनागपि श्रमानुभवः स्यात् । पाठकः सत्पुस्तकं हरवे कृत्या लालसमानसोऽप्रेम मृत्तरसमासादयसपरिचयाय स्वरमाणश्च समाप्तिं यावत्त जिहासति । (२) युवकाना युक्तीनां चापि भगाराभिव्यञ्जनावसरेऽपि न विदुसष्ठा ममता पावलम्बिता, प्रत्युत "अनौचित्याहवे नान्यसहस्य कारणम्" इति नियमा नुरोधेनौचित्यरक्षणाद् रसनीयता सर्वत्रकाम्याहता लन्यु' शक्या। ततश कुमरामा यूना सानाय सर्वेपा हस्ते निदिविक्सि निविराम दातुमईनिदम् । ३) झाश्यप्रणयिनी रसिका यथेह समुचितेन, अलकतन, सगुणेन, कलित-

सना मा मरन्या
पनि होseakiri नितमनुभो .
मोरमोदrte गुप्तkulaim: UT
सारः गुराणो, मेरदेवारिसमा, सभERIE
मारपीटभोतमनगर वसः [.बामा.
नाNिer: #र ामाजिकता
सामप्रीमिद अप मा। -
पित्तो पार सम्पनुमा पोपमो.
गंमी दनदना हानी माट।
भानुग्र्यानिरीविना गाओ feी मी
राष्ट्रागारविदा को समति: NEt writ
सोम्स मारिमा पुगो हामी पति नलिोसपमा
पेयम, श्री मित्र पुमो धमेश निजामति स एवम
सरनुपाटू पीतयोग्यतासम्ररः स्यात्, गोविनगामान्यायापियार
समगम्।
(४) सीnj finalप्रततका मागमाना था फेचन या
केवल तशेन करिता प्रयुनासो गुणायेव समयान, प्रत्युत विती मयना
পিণ্য বিস্তার ঘখিনামি হয়নি। তার বিনি
प्यारेभिनयादरवना गोवणवाणीमुशने प्रेशन्ते पति भारत राय
হবিগ্রমশালসি খুব, সয়ায় সবি হবার ।
(५) रविना दयानि पयन्यपि तत्र तत्रयरच्यन्त प्रायुज्यन्त य, "गप
कोनोमिa" इति परीशनिवदीयानि निरवानि शान्येव सबंध
मिमलामी रेशाभिः रामवियुपन्ति कानन मरकृति चेताए। परिमा
लिये कविय सवा साक्यमवनिति निर्माय निगयो। शिशुशल

सदामाद है गुणेकपक्षपातिनो निर्मत्सरा मामिकाः। (६) इह हि नानाशास्त्रागा मनोरमसमन्वयवत्, नवप्रभाभाखराणा श्री पयोगिनां समस्तानां यानादिसाधनानाम्, शस्त्रास्त्राणाम्, यन्त्राणाम्, पादानाम् । हाराणापि तथा नाम तोहारो संनिवेशोऽक्रियत, यथा नाम कवेरस्य सर्वत्र बहुदर्शिता च प्रस्फुटं प्रतिभासते। रिला एवैतादृशाः कवयो व्युत्पता विद्वांसथ। (७) इह सूर्याचन्द्रमसोरुदयागयाः, नन्दिनस्यावरयापर्यायाः, शरद्वधन हेमन्तादीनामृतूना प्रातयः, वनोपजनरम्यहम्यंनदनदोसरित्समुदपर्वतदरदादिसंनिवेश वर्णनानि च तश्चलयन्ति तथा मोवानि सन्ति, यथा द्रष्टः पुरस्तायिनिक यन्ति। सद्रिस्मस्यात्मानं मुग्यो विदग्धो जनोऽलौकिक करिमंधनानन्दार पाराबारे विर निममत्येव, याददुन्मवति तावत् परः कश्चनानन्दोपः पुरः प्रसन्नात्म विलीनयति सदसम् । नेमानि चिदपि हीयन्ते कादम्यादीनां वर्णनेभ्य है मुताई व शक्यते। (८) प्राकृतिक वर्णनमिव समस्टपामा परिचित्रण गुद्धचरं सभा रिचमानुत्तमं थ। “काय यशमेऽर्थते व्यवहाविद सिदेतरक्षतये, तथा कान्दा संम्मिदरसोदेशयुने" सोशिशपायाप्यपैश्यते, तदेतत्प्रयोजन साधु नियूंटे कावे- मानेन। परमभिनन्दनीय मनितासाधरणेन गुणोत्वग। परि मुख्यनायरान বেয়াবিয়াহ বন্যায়বিয়নীঃ হয়, অথবীবাহাই- पर्टय्यटदिदी र म चरित्रमपक प्रगति । पदे पर चन्द पनि परमोद प पतुपन्दन्दिर कति। त्या प्रमिक परियो नाही या पूर्वरागो पया मामते, न दया पवाय । दरनिरप टप पत्रमदितमामुम्बई (पृड्गीय दोहारिया ) पायरीयारकादायीन तदेतदत्र पर्याप्त नियूंढे रस्यवे रसिकः सुसूदमाध्ययनेनामन्दानन्दसन्दोहपरम्पराः परिप्राप्य। (१०) सर्वतोऽप्यधिकं यदेतत्काव्यसम्बन्धे वक्तव्यं तदिदम् -भारतीयस्यादर्श भूतस्य समाजस्य स्वरूप तथान विशदम्, सजीवम्, मूर्तम्, उज्ज्वलय निबद्धमस्ति यदितोऽन्यस्मिन् साहित्ये प्रायौ दुर्लभमेव। प्राचीनावाचीनादर्शयोरय समन्वयप्रकारोs- भूतपूर्वः सातिशयमुदारव। श्रीश्रीनिवासव्यतिरिकोऽन्यः कश्चिद् विद्वानिदं कर्तुमध्यान्न वेति सन्देदंतु भविष्यन्नेर कालो निराकरिष्यति। कृतिरिय कविना श्रीशास्त्रिणा तरुणे पयस्येशकारि, येयमिदानी हयोगावरतां प्राप्य सुरसरखतीसेवैकरसिकानां सहरयाना मनांसि सदैव मोदयिष्यति । कवित्वशक्तिस्मिञ्जन्मजातेति सुच्यते । तापति ताहण्ये मन्ये खसा एव सुदिलसुसम्वद्धकाव्यनिर्माणे विशिष्टप्रतिभानवन्तः स्युरिति । यस्य समाजवादस्यादर्शरूप वित्रित कविना, सोऽयं रामलीनेन महात्मना गान्धिना 'सौदय'-नाम्ना व्यपविश्यते स्म । अस्मिन् काय्ये तु तस्य नाम 'सर्वाभ्युदयः' इति निदिश्यते कविना । सर्वाभ्युदयशम्दतु "ar- समाजस्थमनु येण, परिमन काले, सर्वस्मै-मानवाय, पर्वमादुपायात, सर्वस्य प्राणिजातस्य अभि-समन्तादयः सभ्युदयः" इति ध्युत्पति पुरस्कृत्य कविना कृत इति संस्कृतभापया व्युत्पत्तिनिवनादि- विधयाऽर्थप्रतिराइनेऽद्भुता कामदुपा दशक्ति सूचयति। कवेथापि तत्र मर्मशतामा- विष्कोति। सभ्युत्पादस्यास्यातीव सजीवं दार्शनिक पाण्डित्यपूर्णव विवेचनमिह लप्स्यन्वे भातुका अनुमविष्यन्ति च दार्शनिकीमनुभूति स्वरम् । (9) प्राचीनानां सरश होनतानुभावके, तत एव च विषमविषमयमाला- दलीबिलीःखोपनियतदुःसहे निर्मदे रिमझनेहमि कान्दिशीकानामितस्तता विश्वता जागतिकागो जोवानो भारतीया संस्कृतिरेख समुदारापाले भविष्णुः । तस्याः संरकृतेः प्रारच केरल संस्कृतदिनुपानेव कृटिसाध्यः। परन्तु- पोदारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मरदूषिताः। भरोधोरहताधान्ये पोयम मुभाषितम् ।। इति सिइयापूर्वमुदीरितेन महरिपसा, न जाने, कति कति वसुन्धरात्तमतास्ता- रशसि सुका रचना दारितासारामनासा साप्त पार्दन्ति, न केवल ( २८ ) ता एप, अपितु सरचनास्तारोऽपि सारे जीर्ण श्रदरभार्यन्ति । परन्तु यदी सद् पैदेशिकपरतन्त्रताशपारवस्य दुरितोद युंगम्। सम्प्रत्यम्युदितो युगान्तरकारी स्वातन्मयाः। केन्द्रीयशासने प्रान्तीयेतु शासनेषु चाने के महामहिमशालिनो मन्त्रिको राज्यपालाश, राष्ट्रसर्वस्वं राष्ट्रपतिश्च निखिलभुक्नैकयात्री तामेताममरमारती हृदयेना- भ्युदितो कामयन्ते। सा चेदियमात्मगौरवोभिते सिंहासने भूयोऽपि प्रतिष्टाप्येत, तहि न दवीयस्तद् दिन यत्र शान्तिमुधाधाराः सर्वाभ्युदयाय सर्वन निःष्यन्देरन् । मातृभूमिगौरव. संरक्षण जागरूको समाजनेतृभिपियेऽस्मिनोदासीन्यं विहाय जागरितम्पम् । पुररकरणीया राष्ट्राभ्युदयायैव न, अपितु, विश्वाभ्युदयाय पामतः संस्कृतविद्वांसः, विशालेन सध्घटनेन प्रकारानीयाः प्राचीनाः सारभूता अन्याः। सर्वासी वैज्ञानिकीनों प्रवृत्तीना चिरजीवनाया- भिनवा विरचनीयाः शानसन्दर्भा। भूयोऽप्यत्र चिरविला' सारस्वतं सोतः प्रतिदि प्रवहन पावयेन्निखिला बन्धुरा वसुन्धराम् । अभ्युदेतु च सर्वोऽपि लोकः। ये सन्त्यधुनापि कतिपये प्राचीना विद्वांसस्तत्साहाय्यमवश्यामिहोपयोज्यम् । कविरपि चायं द्वित्रैः शब्दैवांच्यो यद् युगेनानेन परिवतितान् प्राचीनाशान प्रतिष्ठा- पयितु खनिर्माणकौशलेनान्यानपि समुत्साहये, परस्परसहयोगेन च न केवल भारते व एव, अपितु विश्वस्मिन् भुवने भारतीयसंस्कृतेरादान प्रचारयितु नेतृत्वमालम्वतामिति । सर्वः समाजोऽप्यत्र सर्वात्मना सहयोग विध्यादिति च। काव्यमिद हृदयेन प्रशस्य भूयोऽपीदमाशंसे- 'गद्यं कवीनां निकपं वदन्ति रेखोज्ज्वला तरच याऽभुताऽभूत् । सा श्रीनिवासस्य कवेः सदा स्यात् सर्वच सर्वाभ्युदयधात्री ॥ इति ।

1 5 A Review By Dr. Satkari Mookerjee, Director, Naya Nalanda Mahavibara Nalanda (Patna). Chandra Mahipati -a modera povel in Sanskrit by Eevirij ri Sloivia Santri, price Bs. 6)- only, Nobody could imagine that in modern times a scholar ndowed with an extra-ordinary poetio skill and a wonderful mastery of the Sanskrit idiom could write a povel in faultleas sangkrit in the manner of the Classics written by the povelists » Larope and India. It proves that Sanskrit is still a living anguage and cap evolvo tawonted modes of expression embody. ing the charming features of Bānabhatta's Kaiambar together with the modern realistic approach. It is a tour-de force of talent and scholarship. A Sapokrit scholar will be really surprised by the novel stances of expression which wbile reriniscent of Classical beauty of the romances composed by Bubandbo. Blagbhatts and Dandia are examples of modern Tealistic pictures of the current state of things. Apart from tho plot, the sothor's melodious lavguage is sure to grip the attention of the lovers of poetry. The author bee coined new espressions wbich faithfully and effectively represent modern ideas. Those who are steeped in the terms of the old Bapakrit Classics, whose namber, bowever, is extremely fewer than the modern outpat, will be thrilled with plasagnt surprise to fod that the work sader review estes bappy departure from the Ancient styis and mader without forleiting the attracti. Yenegg of Clagsi03. Though on several occasions, the digiealties caused by unfamiliar expressions, may be felt by modern studests aceastomed to easier expressions, be will be amply Tecompensed by the labour undergone to mastering > rich tocabulary. In the general course of this stors, the style of the author is simple direct espressive and effective and reader will not feel the jerks and jolts which are frequent the celebrated classics. The work is the remarkable for oom sination of the old and the new styles. As is the case with modern novels, it contains dialogu and conversations in a style which will not allow the intere of the reader to flag or flop. Of course it is pro-supposed b the roader is possessed of a morlicum of koowledgo of Biostr in order to be able to appreciate the beauty of this achievemen I am optimistic enough to believe that in India and antall where Sanskrit ig coltivated, the present adrentars will be fail to win the approbation of a large number of connoisseurs This is in briel my eyalation of the author's language 1 styis which ought to be regarded as sexting up & nos feard. Tho antbor hails from Rajasthan which is noted for! multitadlagus episodes of chivalry sod romsaco. The loro and admiration of the chivalry of the mediaeval kelgbterrants has been imbibed by him from the milieu and the tradition of tho Brahmanical farpily devoted to the cultivation of the poetry and scientific discipline of ths old in which bo has been partured. In the present day, when accostothed to the desb commonplaces of stroglo for esto stance, the story of love adventure, thrills and narrow escopet may striks i mojera reuder u unrealistic and romantic. Ech with a little imagiostion and sympathy, the reader will alw the este o tas boelia iatores: anloljed la 14. It must be sekoorlet301 tbs tba ssthoe believes with Bornstu Shaor lo roseattlezet od Jasoula Bbsga ol ths Itib Contery. ** the pet hus & mission sal philosophy of life, whleb de tracta lor the editoetisa al bla readers. Ils le bol porpanely destis sed but stilfolly abudoes the boring effects bless #!13:134 profects oa bis 12.Jllors. The actbor lo es men Am * slavishly chained to the fleag of the old order of biose and knights and bas (sith is the inherent rights of the syerage rad of men and women to the good thiogg add opportovities of the world. The story he has span, underlines the transition from aristocracy and piatocracy to real democracy. The commodistic philosophy is now extending its sway over the rodeveloped countries of the world. This philosophy is based on the hatred of classes and seeks to root out the inequalities in the distribution of wealth by violence. It ends in Dictatorship which ironically sough thrives on tbe enslavement of the mass. It seeks to conciliate the mob by providing food and drink and ebelter is exchange of bard labour in factories. The author is keeply alive to the misery and degradation of poverty. He pleade for the liquidation of ibis dabasing state of tbings in which a few taea and women fatton on the dradgery of the mase. But his method is entirely different. In this sorel, the author demoretrates the Fay in which i bis position of affairs can be radically relormoj by & philosophy of love. He believes that, if persons who bold position and power are trained in the philosophy of lova to develop a cultured and sensitive wentality, they will vogrudgingly share their wealth with their fellow beings. He calls it "Sarvabbyadasa' which he prelers to 'Sarvodaya" This philosophy of life has been preached by Nabatma Gandhi and is going to receive a concrets shape ander tbp lendership of Binoba Bhave with his able lieutenante as Sri Jayprakash Narsysa aod the like. The author bas made bis bero Chandrs Mabipati, a king wbo gives op all his wealth to bis subjects. Tho kieg feels Bupress joy and satisfaction in dosading bimself of bis superfidity of the material possessions. This was the ideal of Rimsohandra and also of Mahatma Gandhi who cared for the establishment of 'Rama Rajss' in Iodis alter the departar of the British rulers, Oar present aathor shows that this is DC en unattainable atopia. He develops his plot with consumoale skill and makes the traosition from monarchy and arist cracz to democracy & natural process and eventuality, Note the monarchial state of things has come to an er in India, India has adopted the parliamentary system cl of Goveriment which is in vogge in Great Britain and America But the high oficials, from Governors and Ministers down to the humble oficers of the state, are tbreatering to form A? order of aristocracy which tends to widen the cleavage between the rolers and the roled. This condition can be remedied sod reformed if the love of superflaous wealth is sbown to ecd is self-stultification. The horrors of poverty accertoated by foreiga rnle of nearly one thousand years have produced 15 unhealthy reaction. Our people are becoming egocentric and individoaliatic. It is necessary that they should learn the lesson of History tbat the poverty of the majority and the wealth of the minority can not go uncombatted. A DEW philosophy of life is to be evolved in which nobody should exploit the poverty and freed of the people. If abundance cannot be secured, we must all elect of onr own free accord to share the privations with our fellos men and women. trast, that the work of Srinigàs Sastri will prepare the grouod for this consommation. The present povel proves the truth of Bhimsha, the ancient autbor of Sanskrit poetics. tbat these io no ert or science which does not contribute to the making of a poet'e work. Oar author is a versatile scholar. showed kis capacity to utilize bis knowledge of Papiol, classics od syatems of Indian philosophy in the constitution of a work fart. With gaitablo Instractions, even a beginner will b tbe marine of Ho bas ! ble to appreciato the propriety and beauty of these gems postitating a mossia of apcommon ercellence. It is encouraging to find that the persons who are placed 1 high positions are now realizing the cecessity of preserving od toatering the cultivation of the Banskrit language and the sola treagures of wisdom and science for the emergence of 8 Ited Indian nation. Banskrit wäe the cultural language eptiro India. Centaries of foreign rule have not sacceeded potting Banskrit out of yogue, Sanskrit can till claim to the wpiversal Isogause of India. It is not more difficult an Cogliab. With wise modifcation in pedagogy and carri- Jam, it can be made the olicial and cultural language of dis as beloro. It is almost impossible to bope that a provintangongo will become the all India language. Sanskrit a bo ma to easy. It is only imperfection of kpopledge which is ponsible for imperfection of sympathy. We have bad enough kirbomage rendered to Sanskrit. It is bow time to get down branu tacks. The Sanskrit Commission has recommended universal culture of Sanskrit to our schools and colleges. author has showed that Sapskrit possettes an aplimited eer lor erolring neer words and exprensione lor representing modern concepts of sclance. Politica and lary etc. No er language in India can approximate to this perfection of atrit. Only if the modero universities cao take courago touko Sanskrit the univerzal language of aultare in India fire right!al encouragement and refrossgo to modern ors like the author of Ibo book onder zetlow, the aspiraticu attaio Iraillod and fulbloedt. --- 9 Satkeri Moskerjee lostitate of Asian African Relations 103 Raja Basanta Roy Road, Calcutta-29 Director: Dr. KALIDAS NAG, W.A. (Cal.), D. Litt. (Paris) Visiting Professor of Asian Civiltaation, Hill lound St. Paul, Vignesota, U.S.A, President : Tudo-Aliddle East Association, Calcalts Chairman : Tagore Cortinary Committee, Calcutta Member : Isdisa Cuancil for Cultural Relations, Miaka Edgoition, New Delhi. Phone 46-431 Datou 25 January, Kaviraj Suriaiwan Saatet is not caly a Vaidya lor buman body but aspires to caro tbo mortal disrasos ol Bals Politie si deptoted by our master Dharmasban lito Manu aad Yajnatalksa. With full faith in the effica Hilaju Juriatia ido4. Kaviraj havi Shriolwasji has comp 40 erigiosl un1994: la Santbrit whoro be shows mattery forcefal Prose and cbarmiar Poetry. The plot is worked as in our age of brezsition from individual monarcbial. to coolstintie we!!are stato "Barrodaya . outlined by Mabu Cuads, the latber of Indica freddopr. I elus ezy doeg sppreciation to the lwerneut autbor for literary ora! Llost wblon told 1.apire mon and wor el tret Inis. S; I #7:00 th, ooolloot took " CANDI UIPAT!" to the sholt esd Collages where alm Funkt la:23:41 4 tk, spirta 1435R18 U Istatak #zlog tuais uzi calitated. I wish the water orory DY Kalidas Mag Espartaalb, L'. Foster Viar orati.

सुप्रसिद्धमेव सुरभारत्याः कल्पान्तरस्थायि नवयौवनवैशिष्टयम् । वासटर्जगत्यां कियलो भाषा समुत्पना काटेनाकाले कालिताश्च। प्रातमागधीवाली साहित्यावलोकनानिवप्रवं तासां साम्राज्यमनुमातु शक्यते परम्, "सर्व यस्य वशादगात् स्मृतिपथं कालाय तस्मै नमः" इति स्मृत्वैव दो निश्वसन्ति तदताः। परमिमां चतुर्दशविद्यानां चतुःषधिकलानाथ प्रसवित्री प्रतिनिमेय' नवनवायमानामविस्ताविकलागीमनुक्षणे लोकोपकारि साहित्य सृजन्तीमार्या देवभाषामालोक्य कमपि नवं मोदमुद्बहामः। सर्वदैवानया यथाशक्यं जगत्सेवाव्रतं निरलसया निरुटम् । आस्तिम्नास्तिकसिद्धान्ता दर्शनानि, विविधा वादाश्चास्यों सम्यनिबद्धा इति को नाम विपयिन्लाङ्गीकुर्यात् । नात्र तनीयान् संशयलेशोऽपि यदधुना सातिशयं लोकप्रियतामुपेते सर्वोदये साम्यवादे च भवीनेन कविना भिववर्यण श्रीनिवासशास्त्रिणा प्रासलसंस्कृतेनोपनिवद्धोऽतीवमनोहरश्चन्द्रमहोपतिरुपन्यासः कादम्बरी- दशकुमारचरितौलीमनुर्वन्चतिशय प्रमोदोत्सवमावति । कविरत्र विषयवस्तुप्रतिपादने- ऽतीव सफलः। आधुनिक प्रचारितः साम्यवादो निरीश्वरः केवल भौतिकोऽतो न भा'तीय- विदुर्गा प्रमोदावहः। परं फविनामुना सेवरो वैदिको भारतीयो मनुव्यासादिसम्मतः साम्यवाद प्रतिष्ठापितः । ( यावद् ध्रियेत जटरं तावत् स्वायं हि देहिनाम् । अधिक योऽभि- मन्येत स स्तेनो दण्डमहति ॥ योऽसद्भ्यो धनमादाय सधुभ्यः सम्प्रयच्छति । स पत्वा प्लवमात्मानं तारयेत्तावुभावति) हिमस्मादयधिकमुकामकं वचो विद्यते माणसंवादेऽपि ? भारतीयः साम्यवाद ईश्वरं धर्म परलोच्च सम्म मन्दानः साम्यमभिलपति प्राणिनाम् । तचन्द्रमहीपतेमाषणे नवमनिम्यासे सम्यगालोचयन्तु विचक्षणः। भारतीय विद्यालये- ध्वस्याध्यापनं छात्राणां संस्कृतिवमुख्य निरन्धत् वैदेशिकसाम्यवादादुत्तम साम्यवाद शियिष्यतीति मे मतिः। भाशा कवेः कृतिरसमं सम्मानमाप्स्यतीति-- काश्यसाद ख्यस्मृतितीर्थः कविराजरिवक्षजोशी प्रकाशक का नम्र निवेदन पर के हाथों में देख कर प्रसता है। कलात में मुदण-व्यय सभा है रेकार मोजिटरों करोड़ों की भल्पता अय च संयुक्ताक्षरों को न्यूनता भी। मुपएम प्रयास था भौर प्रफ शोधन एक कला है, जिसने जानकारी THE या-तत्र बहुत अशुसियां रह गई, युछ अंश छूट गये तथा EHATEEN गये, ये सब भव द्वितीय मुद्रण में ठोक होंगे। फिर भी गिर समयनियों ने अपने प्यापृत जीवन के अमूयणक्षण देकर इस कार्य को बहुत साया उनके नाम हम बड़ी श्रद्धा के साथ स्मरण करते है- एकमेवर भौषधालय, मोहा ( राजस्थान ) के प्रधानविविता- मोसत्यनारायण शास्त्री साहित्याचार्य, आयुर्वेदाचार्य । (१) प्रोणाचार्यजो मिश्र, व्याकरणाचाय, साहित्याचार्य । (३) श्रीतिलकधारीजो पाण्डेय, साहित्याचार्य, एम०५०। हलके अतिरिक मोहनुमत्प्रसादजो शास्रो साहित्यायुर्वेदाचार्य, tria तरत के प्राण, संस्थत मागिक पत्रिका "मपा" के मराती पगार भीक्षितीराचन्द्र पट्टोपाध्याय ने इसमें सर्वतोमुरा सहयोग दिया: गुरमेय गुम परमाRE भोसमोरकुमार पगु एवं वहां के विभागीय कर्मचारियों ने भोजीपीarte साप कार्य सम्मान धिमा। पर महामान्य राज्यपाल महोदय ने माने म्यनजीवन में समानित rakr. हाधीशनकोटि मुखी, जयरेषा, मन मायाम पिप, बलनर ने भने ही समाटोमा तया पोस्ट ग्रेवाटर मेन्टाइन पारेर रेगर, सहायता क. भोहनुमत्लगायती शाय ल में सलमान पनी महानुभावो माने Mer माला कप पनधि, पन्या प्रशंब से इन सेनामातही। प्रहमी मी

श्रीमदाचार्यश्रीनिवासशात्रिकविताकान्तविरचितः
चन्द्रमहीपतिः
स्वोपज्ञपार्वतोसमाख्यया विवृत्या विवृतः
कमला
प्रथमो नि:श्वास:
समरमुदितदैत्याऽऽदित्यहर्षप्रकर्षा
ललितवदनमालाद्विस्रवत्स्वेदयन्दा ।
विगलदमृतबिन्दोबिभ्रतो कान्तिमिन्दो-
जयति विहतविना कापि सा भक्तिनिता ।।१।।
महाईरत्नाचितरक्तशाटीसुवीतमध्यागुतकत्रकान्तेः।
जयन्ति फुल्लन्नलिनायितानि प्रशान्तनेत्रान्तनिरीक्षितानि ||२||
कावराभाखरवस्त्रभासो बुधेन्द्रसम्मानपरम्परस्य ।
श्रियो निवासस्य विदो वरस्य प्रियप्रियायाः कमलालयायाः ॥३॥
प्रत्यूहपूराइतिदिकरेणवः शिवे ! शिवास्त्वत्पदपद्मरेणवः ।
जयन्ति साष्टागपतत्पुरन्दराः किरीटभाभानुजुषो विकस्वराः ||
वनानि यद्भिरभिज्ञसिःप्रासोददल विलार्चनेन ।
दिश्याद्विपङ्गमनङ्गभङ्गी भगों विनामनुकूलभूतः ॥२॥

२
चन्द्रमहोपतो
शिव शिया पश्चयितुं प्रवृत्ते विधाय नारोमयमात्मरूपम् ।
यस्त्रान्तनिर्यराटिनीप्रनष्टेऽमोष्टहासाः प्रजयन्ति मासा ॥६॥
त एय सद्योऽद्य विनाशयन्तु विस्फजितं यद् हृदये तमोज्यम् ।
य हिमानोधवलं पुरारेर्वपुः सुधारनातमिवायमाति III
श्रीकालिदासामरयाणहान् जगदरं यागविलसद्विभूतिम् ।
प्रणम्य विक्लेशमगम्यमार्गे विशाम्यशकं मुमनःप्रपूर्णे ||८||
येषां निवासाय विदामधीवरी वागीश्वरी स्वान्तनिशान्तमीप्सति ।
शास्त्रामृताऽऽपूर्णपयोधिमन्दरा वन्द्याः कथं नाम न ते कवीश्वरा: ICE
क साध्यमेतत् पृथुशेमुपीजुपा क चास्म्यहं स्वल्पमतिश्चलेन्द्रियः।
तथापि मूनां विदुपां सती शिवां वहन्ननुशामलमातनोम्यदः ॥१८॥
रम्यं सुधास्पधि कविप्रियं न चेन्न चैव सम्पन्नधियां मनोरमम् ।
तथापि रस्यं रसयन्ति कोविदा विपन्नपं लोकहितात्मकं वचः ॥१६॥
त्रुट्यो यदि स्युः कचनाप्यमुप्मिल्लेखात् प्रमादान्मतिविभ्रमाद्वा ।
शोध्यास्तदा सद्भिरमर्पमोपं जोपं कदा मुह्यति लेखको न ॥१२॥
ईष्यांहितान्तःकरणा द्विजिह्वा यागाशिपा शेपजनान् दशन्ति ।
वृत्त्यानयाऽऽनन्दितचेतसोऽमी दुःखात्परं दुःखमलं भजन्ति ।।१३।।
ततोऽपि कष्ट प्रचुरं विषह्य मनो न तस्या विनिवर्तयन्ति ।
सत्यं न शिष्टः कथितं किमेतद्दग्यापि रज्जुर्वलना न मुञ्चत् ॥१४॥
नाम्ना भरद्वाज उदयप्रविष्ठो जगद्ध्यान्तभगो महिष्ठः।
अचाक्षुपज्ञाननिधिरिष्ठोऽभवन्मुनियोगविदां वरिष्ठः ॥१५॥
जातो धनुर्धतिपराहतशत्रुसङ्घः शास्ता समस्तकुरुपाण्डवबालकानाम्।
तस्मादमेयगुणगौरवपूर्णकोणो द्रोणो विशस्तरिपुरक्तकृतान्यशोमः॥१६॥

प्रथमो निश्वासः ३ तदन्वये धन्वनि धान्यधन्ये सखेतडौरक्षितलाम्बिपल्ल्याम् । निश्शेषवेदान्तविशुद्धयोधो हनूतरामो प्रतिनां विरामः ११७॥ भूपालमौलिमणिशाणितपादपद्मः सत्पात्रदत्तधनराशिविधूतपापः। तापप्रतप्तजगतो नवनोरदाभो लेभे प्रभा विपुलबुद्धिवरो वरेण्याम् ॥१८॥ वाग्देवता मण्डलमण्डनन्य प्रकाण्डवागधिवगाहिनोऽस्य । स्वयं भवन्ती समुपस्थितारं मातेव कार्य सकलञ्चकार' |१६|| विवेकविद्याजलपूरपूर्णाः सत्तन्त्रमीनाञ्चितचेतसोऽमो। सत्पुरुषाम्भोदचयनिपीता जयन्ति सज्ञानपयोनिधानाः ॥२०॥ इन्द्रो यथा कश्यपतेजसोऽजनि स नारदोऽध्यात्मभुवो यथाऽजनि । तथाऽजनि श्रीमदमन्दमोदकः श्रीभानुरामो महसां निधिस्ततः ।।२।। १ जयपुरराज्याधीनखेतडोराज्यान्तर्गतलाम्बीवासिनो हनूतरामस्य शिष्यो निकटस्थ- प्रामाधिपः क्षत्रियो नरहत्यापराधे आजन्मकारावासं प्राप। तद्वन्धुभिरानभ्य इन- से निवेदितः । एतरुक्क मोक्ष्यते भगवतीप्रसादात् । ततस्तवण्यास पाठ आरब्धः । साहं नोत्तस्युन अनुर्न चोचुः, किम्बहुना आसनपरिवर्तनमपि न धः। यस्मिजीर्ण- टजे देवीमसौतदकस्माद्धारित्यं भेजे। तदेव पचेरीतो रथ आगल उपराजमातृ बिनाय। तत्र फिलकारसिंहमुखाजज्ञातं यदहं केनापि महसा जयपुरकारातो वार्य खग्रामसीम्नि निगडमोवं पातितः, इति। ताभिरवनतामिक याच्यता एम्। परन्तै याचि, केरल परीवासिविप्राणों विवाहकरमोचनाय न्यवेदि। भव प्रतिज्ञातम् । धूयते तदुऽन्तःपुरे वृद्धभावात निष्ठ्यू तचिह भित्तिलम्न वान्तःपुरस्था आइनन् । सुधालितेऽपि सौध तत्स्थानमलिझमेवात । अष्टादशशताच्या तितमे वर्ष वृत्तमः। एवंविधा: शतशश्चमस्तयस्तेषां गीयन्ते। पचोत्तरकोन. प्रतिशततमेऽन्दे वे देहं तत्यजुः।

४ चन्द्रमहीपतो पार्श्वस्थपोस्रजपूजितो यो रेजे दघञ्चन्दनपुप्पमालाः । माहेश्वरध्यानपरायणस्य यस्यास्त हस्तामलकं त्रिलोकी ॥२२॥ भवन्ति सत्यामृतवर्पिणो भवे रहोजुपस्तथ्यपुषो विपश्चितः । क तादृशाः संसरणस्वभावके भवन्ति चेत्ते विरला वनौकसः ।।२३॥ ततोऽभवत् पण्डितमण्डनामयः कुशाग्रबुद्धिः श्रुतपारदृश्या । सन्तुष्टिदारः श्रितशास्त्रसारो विद्याधनो नान्यकरामसज्ञः ॥२४॥ धैर्य धरा तेजसि चित्रभानुक्रोधे यमं वाचि गुरु सुराणाम् । जित्याऽमृताप्तिप्रतिभाप्रसन्नश्छन्नऽर्चयामास सुरान् सुसं यः ।।२।। तस्मात् सुपुत्रौ निपुणायमूर्ता मन्दारकल्पाववनी द्विजानाम् । ज्येष्ठो युधेन्द्रो नयरगरायः पत्यन्तरोऽन्यो गणरायनामा ॥२६॥ ज्येष्ठो वरिष्टेरय जुष्टनिष्ठः पद्शास्त्रया'रयगाइवित्तः। संसेव्यमानः कृतिमिः समास्तेऽमो पण्डितेन्द्रो नवरगरायः ॥२५॥ यत्पाठिताश्यानमपत्रिका अलं प्रकाण्टसत्त्वाः प्रथिता मनोपिषु । अधीतविद्याः प्रतिवादिमीपणाश्चरन्ति पर्याचफितीताचलाः ॥२८॥ नपामुपुष्पा मुचिर्कात्तियल्लरी पद्शास्त्रमौगन्ध्ययनी क्षमाफला। आसामु येषां विततानिशोभना छानालिसङ्गीतगुणा भदसा ॥२॥ अयानयामागमदोषकान्तः शान्सात्मनम्तोपपनस्य यस्य । कात्यायनीकान्तकृपाकटा हेमद्य से पथ मुताः स्तुनाः स्मः ॥३०॥ ज्येष्टश्च धादीन्द्रविवोर्गमुद्रात् शम्तशास्त्रौषममुद्रान् । धमूह युवः फेशरनामिकायां विनियः फरणारिमकायाम् ॥३१॥ पाटोपदी अविमुदेन्यः शब्दागमे प्राप्य मनाक प्रराम् । बहानदैन्द्रियपापोऽयं सानियामा बिदुपा विधेयः ॥३|| प्रथमो निःश्वासः येनायमद्धा सुकुमारसंविदा सचिनानन्दमभीप्सता भुवि । अनष्टमोहाविलया विमुग्धया धिया विनोदाय बुधां निवध्यते ॥३३॥ कथारम्भः आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसो जायतामा राष्ट्र राजन्यः शूर इषव्योs तिव्याधी महारथो जायतां दोग्नी धेनुर्वोढानड्वानाशुः समिः पुरन्धि योपा जिष्णू रथेष्ठाः। सभेयो युवास्य यजमानस्य वोरो ज्ञायत निकामेनिकामे नः पर्जन्यो चर्पतु फलपत्यो न ओपधयः पच्यन्त योगक्षेमो नः कल्पताम् ।। शु.य... २२।२२ । अयमायो राष्ट्रियः सर्वाभ्युदयभावः। हे ब्रह्मन् । राष्ट्रे ब्राह्मणः-विप्रः { बढ्य अधीते वेदमा) बमवर्चसी - ज्ञानप्रकाधित आजायताम् - सम्यक् प्रकारेण मात । राजन्य:-क्षत्रियः, शरः-पाराक्रमी, शय्यः-इधुपयोगबुशलः, अतिव्याधी-अविकान्तं धर्मशनून पा विध्यति सः, महारयः- योदा, भाजायताम् । ब्राह्मणो ज्ञानप्रधानः क्षत्रिय कर्मप्रधानः । तयोः सम्यम्योगादेव राष्ट्रस्योन्नति परिवारस्य दम्पत्योरिव । वैश्यस्योः सेवायोः पूर्वदयस्तित्वेन ने पृथनिर्देशः। धेनुशेश्रो, अनः-शकर बदति सोनवान् बौदा बदनक्षमः, राप्तिः- मयः, भाशुः शीघ्रगामी हायता. मिति उत्रादयः। सर्वे पशवोऽपि वलि नैपुण्यभाजः स्युः। सांभ्युसः। योषा-लो, पुरन्धिः-परिवारपालनकुशला स्यात् । अस्य यजमानस्य- देवाना गुदोनों सरकत अधिपमिपोदानशीलस्य च युवा बीरी विष्णु-विजयो, स्पेटार-योसा, भेष-सघटनशीलो जायताम् । न:-अस्माकं राष्ट्रे पर्जन्या- मेषः, निकामे निकामे-या परितधातु। ओपथमा-धोपध्यः पलपान्त:, अनेन स पामशानामपि प्रहपम्। फलवत्याभ्यासपरयुग (प्राशरत्ये मनुस् पप्यन्ताम् पाः स्यु, देहे क्षेत्रे । न-अस्माकं योगः-अलपलामो योगः, लब्याक्षणं भल एवं - क्षेमध, पताम्।

चन्द्रमहीपती विकलयति कलाकुशलं हसति शुचि पण्डितं विडम्ययति । अधरयति धीरपुरुवं क्षणेन मकरध्वजो देवः।। त्रिविक्रमभट्टः। स्वस्वव्यापृतिमनमानसतया मत्तो निवृत्तेजने चन्चकोटिविपाटिताररपुटो यास्याम्यहं पञ्चरात् । एवं कोरवरे मनोरथमयं पीयूपमास्वोदय- त्यन्तः सम्प्रविवेश वारणकराकारः फणिमामणीः ॥ पण्डितराजजगवाया। "प्रर्पणधौता इव साभाः ककुभो व्यपगतरजसः कलानुपः प्रासादाः प्रसादपत्रप्रभार पादपाः कृष्णोज्ज्वला वल्मीकं प्रविविक्षवः सर्माज्ञ सरला विदूरगामिनो लोकाया यावश्यं मनःप्रसादयन्ति देव।। प्रियदिक्षाहर्षविधुतविवेकाबहोः कालादियुक्तेर सान्तुमुत्वरा नकगत्या मार्गलाघवं रवयन्ती, अष्टलिं कुर्वती सायन्तन्या सौरीप्रमया रक्ताम्बरातेव बक्यौवनोल्लसिता वप्रमिव विधित्सन्ती तुझोमिभिः, स्वयमुल्लासवाद्य वादयन्ती सुधा मधुरैः कलकलैरानन्दमेघयमाना, उच्छलतरवगुण्ठनमपनीय प्रियप्राप्तिमिव प्रेक्षमापो. इतनीवा मदिरेक्षणा परिणतयौवना नदी मानिनीव रूपगविंदा रेऽक्षिपथाल्लुमाऽन्तहिता । त्र जनसानिध्ये तस्या महदधैर्य वीक्ष्येव मूढा उन्मत्ता इवासाता द्वित्रा दूरंदेश्यन्ते दपा घ्यानमग्नेव शान्ता धरिग्री च। चलत्तरमायाः पीतभाया इन पूर्णमानाया वास्तटे उत्फुल्लकमलामोऽमलवारिणि हारिणि कृत्रिमेऽवकोहिले सरसि मृदुमृणालिनी- उलशय्याशायिभिःप्रजोपवननिकुञ्जशोभिनो मचा मुक्ताः इदानी य्यच्चाः शनैशनैः पूर्ण्यन्ते। , महाहवाससामापिका विकसितस्मिता आकृतयः कमलासनस्य कौशलं प्रकाशयन्ति । बन पातामना भाप्रेमाप उदयः परस्पराबद्धकैकबाहूनि यौवनमधुमधुराणि सेयं यीस्य लानि विशता विलोक्यन्ते, परे चामिनवप्रेयसीप्रेमपतिता अवधप्रणा प्रथम य. बाबासनावातोडू तयुद्धयो बधिराधा महामोहान्याः। केचन पलाशपत्रपुटो म्लवेशवारोपस्कृतान् वटकान् पीतशाकररसान् रसगुस्मांच प्रसादविकसिते प्रेयसीमुखे मक्षयन्ति, परे च पुटपातं प्रतीक्षमाणा मनोर्माणकाः पतनसमकालमेव तल्लिन्ति।

प्रथमो निःश्वास श्चि नरा अप्यश्वायिता वहन्ति नारीनरीश्च स्वसमान् । कीदृशो व्यामोहः। कोहग्वै- न्यम् । यद् दृष्टा मनः खिद्यते । केचन विद्यालयमसमये विमुच्य काव्यरसमनास्लाय वारुणीभक्का दोलालोलां लक्ष्मी बन्द्ध तथ्यासका अन्वयागतरामरापाटनपठो रूपयौवनसमृद्धा अविवेकाश्चलचित्र- निनिरता वित्तभूचितभूमता मोशेन्मादिनो जपन्तो ममनटोनाममालां पुष्पमाला वक्षस यन्त आनासिकं पापप निमबन्तः प्रेशन्ते पितृपितामहाजितधना निकुञ्जवासवित्तर तसाधुताः साधितसाधिता जीवनचिन्तामणि काचमूल्येन विक्रीणाना निद्राणास्तथ्यपथ्य- याद्विद् ता वासनायासिनो वितृष्णा युवानः, इतकान्तप्रियाः प्रियविद्या भविष्यजीवन- नवान्दविविध्वंधिया नवनीलनीरदाचिरेऽछ कुरित दृशन्छये शास्त्राण्यभ्यस्त्रमानाश्च । तश्च कच्नुकोशाकलनपटवः पक्ष कोटयपतधनास्ताकरशिशको गुरवेऽर्पयन्ति यामाजितं शामित्र चिन्वच्चोरविकोषितव्यानि शिदयमाणाश्च । इतश्च पश्चिमाशाभरणशं तीक्षमाणाः प्रत्ययो वदनवलीका अपि ममगारतसितावपूर्णनेन तिरोहितवलोकाश्चन्दन- ििन्दतदनधिया यमर्जरेन्दु जिगीषव इस पलितकस्तिकेयोऽपि कृष्णाप (खिजाब ) कृष्णकेश्यश्च्युतदन्योऽपि कलितदन्त्यो व्यपेतविनया लोलाक्ष्यः कान्ताकारकेशकीर्ण- हन्दकुसुमा बलयितन्याले धम्मिल्ले फुलसितसुमस्रजः परिमलगन्धवहान्धीकृतकामुका मेधूतशोणिम्नोरथरयोः कायाभयोः कपोल्यो रागम्, चारचकोरचञ्चलवरयोः प्रजागर- मुन्दिलशोषयोरुमरणोः कजलस्य सूक्ष्मा रेखावायोज्याधःकृतनवयुवतयः सर्वदोत्फुल्ला लता इव प्रसमप्रभा यौवनजलविरहिता नीरसा अपि हमररससरसिम्मन्याः 'कमलमुकुल- जूलकोमलौ कुची लोकयूनां परिरिप्सयेव समुत्थाप्य मनोभवभूपतेः पटक्थ्य कञ्चुकिकया इलिशको प्रत्याययन्योऽविस्लिामतदिन्दनित वर्षन्त्यः प्रियेप. नारीलोकम्य वातन्त्र्य चन्द्रमहोपतो प्रियप्रेमो करसलिललितलीलाविलसितमदमरशिथिलन्यस्तैरसर्वविचारपतविर म प्रार्य स्खलन्त्यश्वलन्यो विषयामवमिदाई सामाना स्वानुश्या अध्यनूनवेगं प्रान्त कामिन्या, चपदचितवासोभिरानराशिसं रमजटितरलवालस्कृतालयमा द्योतमाना विद्यत इन सझणझगंवर्यमरुत्तरादवतीर्यानधिगतचातुर्यास्तुर्या मित्रावस्यां मनमान धनानन्देन साशमितस्ततो वीक्ष्य एकं घन द्वितीयं नातो तोव निश्चित्य दधिष्टान् कटर- कीत्वा युगपदेव निजिगलिपया व्यात्तमुस्यो निःसरत्सवने वा एकिन्यो पनिन्ययम वीक्ष्य गनस्वस्यति । इतश्च श्याम कुचमादिनः शिशवः, यान् वीक्ष्य मानसं हति इतचोद्यानकोणे प्रारब्धं राजनीतिविफलानां दरकार्यविघटनपटूना कटुना गजितबचिरितमा परोनतिकथामात्रेण शिरलिनामभ्यस्वाक्षाद्वयानामप्यल्पज्ञानोद तप्रतिभाभिमान्दा परदोषदिव्यदशिनां पूर्वप्रासिद्धानां लोकप्रियन वाणानां वाचालानां वाग्जालम्, वृत्तवताना वृत्तपत्रप्रतिनिधीनां गुप्तचराणां सतलेसनञ्च। अपरस्मिंश्च भवभयविधाताव हि शप्तां सुप्ता लता लुष्ठितां मानवां पुनः प्रविचारयिपूणां विगतायासक्लेशानां शास्त्रामसे गमितवयसां लोककल्याणैकमनसां पापापनोदनफ्टीयसां तमश्छन्न जीवनपयं प्रकाशयता दुष्कृतबहिष्कृताना गुणागाराणां काव्योमेरुणां पुराणप्रवीणानां नन्दनीयवन्दनीयकर्मी प्रसादमधुराणां वीतसारमपि संसार ससारं सम्पादयतामिद्धबोधानां सतां विदुषां प्रवचनम् । यत्र द्वित्रा एजङ्ग्रीवा विलोक्यन्ते वाचंयमाः। सगलप्रहणमवकरगत्तें निक्षिप्ता अपि समाजस्य भूत्यै विशिथिलं परिकर बन्द मुसुभाना प्रतोयन्त एव विक्षिप्तचेतसो मुग्धाः। यान् वीक्ष्य चक्षुः क्लिद्यते । इतथाल्पवयसोऽनकुरितर्चका उत्फुल्लामलकोमलोत्पलमुखा मुग्धस्मिताः शिमच उपानपरिष्करणे दाक्ष्यम्, केचन मुद्गफलीनाम कुरिताना मुद्गमष्टानां प्रशंसा समुदः घोपयन्तो लवणाम्ललिताना मृष्टखिन्नघणकानां बल्यतामुग्णताचोपदिशन्तः शाजम्मी- चूपिका विक्रीणाना उदरमत्सिता विद्योद्योगं बीवनस्य श्रेष्ठामिष्टामिष्टि मिष्टि विहातु बाधिता भ्रमन्ति, यान् वीक्ष्य मनःलाम्यति । इतश्च विधम्भरस्य विश्वभरणप्रतिज्ञामिबाहयमानाबुभुक्षाभक्षिता बलिना कलिना कवलित धर्मणः पुण्यभूमेरितस्यासाधारणमहिमानस्वपोधामानो मुनय इव शुद्धाः प्रगृह्मादवदविकारा नीरसोऽपि रथ्यारनोयूसरिता प्रवृतिप्रत्ययोपेता अप्यपदाः पुमासः, अनन्यपुष्पधीका एते भ्रान्ताः समाजेन सावम जन्म प्रथमो निःश्वासः ह अपि क्षीणधोकाः पतिपरायण पाषाणाकान्ता दूर्वा इव पीता महिला उभ्यत्क्षोणीधयिणः छहामाः दावा इद शिसवय, आयामशतोत्पादितविपुलओनसम्पदः समस्तमस्तकमयु- चिता अपि शताब्दीभ्यः समाधानुमतिप्राप्त थोरैरसप्रणतरगैररुणाः परपरितापन- अनुनिमित्कटकालयूटाटिलराजीवनाभ्यस्तापपटलप्रतिष्ठितः शोमतीमाभदभाव सर्वदविलोभलुम्टितमतिभिः परिपूर्णभोगाभोगगरिमभिभाँगिभिः सर्वप्राधिभिवधु पिक- निथयौजन उष्टितर्वस्त्राः कृपाकणिकाशून्येन मौनमग्नेन समाजेनानिराकृततापविपक्षा जिजीविषया, उप्रष्ट्रान्मृत्योर्मुसामियियातया पर्वतापशमनकभेषजं प्रान्नभयभजन मृत्युषयमिव नगरं मत्वाऽऽपिता लोकपथपानाकुल्यन्तो घर्षयन्तश्च प्रयत्नसहोणापि मृतिमनाप्नुवन्तः स्वेदस्यन्दिनः सिन्नास्तुन्ना दीनानाः प्रतिनिमे विसर्समानदुःखा जाज्वलनग्बालोत्तमाः प्रसारितकम्पितहस्ता एकतानकातररया धीक्षमाणाः सकरणामभि- व्यपिम्, अरादायां विदुलता निष्कपर्दा भनिध प्रत्याधाना अनभ्यस्त्याचनश्वनैः सदैव निःसरत्प्राणा अल्पमाणा: प्रेक्ष्यन्ते प्रामीणा, यान वीदय मनोभ्राम्यति । इतवार्थपणया दारगवं विहाय राजधानीमुपैता वैफल्यविकलाः परिभ्रमणधान्ताः कमलान्ताः कर्तव्ये प्रान्ता मलिला मावशून्याः धमनमापनोदनाय सरितः इलदणशीत- शिनासूपविशन्तो युवानः, यान् दोश्य मानस खिद्यति । देव । हरछोको लोकः।" “नियविः केन नियन्तुं शक्यते देवि! कर्मणां विधिविपाको हीददाः । बलवान् -विधिरयं स्वेच्छयाऽऽनलमूलधीकास्तुच्छयन् भनसर्परान् प्रपूरयन्, विदुषो विडम्बयन, समुदान विरिधन, उन्नयन, पातयन् भाकुलयन् सुखयन् क्रीडति, भान कश्चन परिवर्तने प्रमुः। भावनेन घेताग्योदयस्पावावा वा सर्वाधिकमुदियात्। परं किं कियच्याचक्ष्महे साम्प्रतिकजोवजगतः। नेतादृशेषु विषयेषु तवोचितो विचारः। अस्तु, भपि स्वास्थ्य- मनुभवति भवती व्यपगता चोदर वेदना?" *आम्, आर्यपुत्र । सम्यक् सारथ्यमनुभवामि ।" "कस्ते विचारो नदेन्दुना सम्बन्धाय ?" "मन्ये धास्ये शयनासनाहारविहारान् क्रीडाकौतुर्क बन्धुत्वय्यवस्थया भाविविधानध भवान् व्यधित, तदा कल्पनेव नासीद् यत् सोऽल्प्यमहत्वं राज्य समधिगमिष्यति । किन्तु सम्प्रति समधिगतमातुलराज्यस्य तस्य यौवनोगमलसदभिनवप्रभं न पया, प्रचुरजलेन चन्द्रमहीपतो यशसा सहवासादिता न्यकृतामरीः श्रीः, जनसष्कुलं कुलम्, अवापरपदकमो विकर, अपुग्यजनदुर्लभा लन्धख्याते राज्ञः पुत्रो पन्नो, प्रचुरवसुर्वसुन्धरा, लोकोत्तरचमत्कृतिर्मत, जितपुण्डरीकासवंगर्व जगद्वितानीभादव्यं यशः-इति महामहिमा महारमा नवेन्दामा समावपरवशो वृत्तमिदमुपहासारपदं विमृशेच्चेत् !" "अये! बालविहसितवत् सरलः, मुत्रविमणितवत् सरसः कान्ताकटाक्ष इव मनोहरो हास्याभिमुसो गर्ववर्वरेणादूषितः शैशवत एवाभिनाविलासोक्तिचमत्कृतः श्रीमतः स्वभावः।" "धीमवे यथा रोचते सविधेयम् । धात्रीनिविशेषाणा गृहविहारिणीना मघोना- मत्र का परामर्शः। सन्ततिसंस्काराणा प्रायशः पितैव प्रभुः।" "अस्तु. प्रमानन्तरं वयमुजयिनी यास्यामः। यत्र भगवस्सा हरमिया सर्वना भविष्यति जातस्य चीलसंस्कारय।" "देव । केयमुमयिनी! अपि देवो गता खत्र!" "उमिनी मालादेवस्य राजधानी । रम्योऽसौ प्रदेशः सरप्या भाती ता प्रचुरं मनोविनोद मुटवर स्वास्थ्यमधिगमिष्यतीति मामहीनो विद्यासः। मामबपरित चिरन्ति हमारएशो जगदलयमाजिदोषाभंगातो महाकालम्याधिताममिम, संमत- समारम्यारा मगरल्या हरसिमपा बिहारवाटिकाम् धारापरेशपामप्रेमजितपास भनिन मार्गकमिटमारस्य विधिपतवेष्यस्य विनाकालिदायाराथाना पनि स्पटीम, विविशुविशावमा पन्यनामयागुमयिनीम्। के पार पटा दियाय दनदुःशदनायोः संवत्मप्रवयितु विमस्य प्राशययन सम्म। प्रातदिन प्रातः मान्तो धन्यानामिनः। मिना ही गत Hrगमदिनुग्धानां शिशा को सयमै रामपुर पान परशुभ निम, गटातार्य यनं ममम मयाय धमनीने मागणी रा लि माविकरम चिर देते रम। समय प्रनामा यावामन्। मानिmatीमा प्रभु मा समाया गिर गायतम मत । । -- प्रथमो निःश्वास: मष्टिमात्रमकुष्ठाय क्षुद्व्याकुलेन कुलीनेन श्रात्रा निरस्तनिश्शेषदोपा तरुणी भगिनी व्यभि- चारिण न विक्रोयते स्म । बुभुक्षया दता शिशूनां करुणकन्दनेन मातृणां वक्षः शिशुभिः सभमेव न विदीर्यवे स्म। योजनदीपेंषु राजमार्गेषु क्षुधाशोधितानां शवानां गगनचुम्बिनः कालकूटा नेश्यन्ते रम! अधिधारगविताना यानानि सुत्पीडितांचित्कुर्वतो वक्त गन्तुञ्चासमर्थान् मुखेषु तृणमाधाय सछ केतैरेव प्राणभिक्षां भिक्षमाणान् नियमाणान् सम्मयं तेषामस्थिकङ्काले सञ्चूये शिष्टान् द्विवान शोणितपतोच पथि प्रसार्य शुस्कान्नाणि 'बन्यो विकीर्य पवित्र भारतानानिच्छन्तीमपि भगवती मेदिनी मेदखिनी विधाय च न भ्रमन्ति स्म । देशभकानां गलपाशप्रोषितपतयो युवतयो निरवलम्या नासन् । येन च विश्वजिता राजभेन सनाथासीत् सरस्वती मही भारतं वर्षच ......." "भार्यपुत्र । विरम्यताम्, नाहमधिकं श्रोतुं समर्या । वैदेशिकशासने परतन्त्राः पक्षिणोऽपि दुखिताः, का कथा ज्ञानविज्ञानसम्पहानां मानवानाम् ।" "अहमप्येकदा परममित्रेण नवेन्दुना साई तत्र समप्रामैतिहासिकसामग्री माक्षम् । सोऽयभव नवेन्दुर्यस्य धर्मपत्री ऐपमो भारे शुलदशम्या पुत्र TAT १२ चन्द्रमहीपतो विमलपुरयटिपरमेष्टो रामाल: पूर्गालादेशामृगमरपरिमल मागालोरल दलान् तयश्च प्रासादमय मुगन्धाटले राणा गर्ममरक्यामग्नपते बतानन्देन । पीयो मासः। तारमधुरं शब्दपमने शेत्यतिारामणामदयविश: पोऽनशुल टिकिन तृतीया। सर्वतः गोतस्य साम्राग्यम् । प्रागिनो खडेन जलेन सार्क पायाभोन्द्र । शोतभयाद्विमावमुरपि सहोवितमालमाल अरमोयाशानीवाशारागि भस्मवयीमार सद्य एवाच्छादयति । पवमानोऽपि सत्वरसत्वरं प्रश्न विधगिरिगुहामु बिरिस्त "माऽस्मान् सततप्रणयिनो विहाय प्रवामीः" इति सकोलाहल म्याजिद्दीषु राहुनित भर्त्सयन्निव निवारयन्निव लोलतानाति। शीतभयभीता विदवा दिशोऽपि दूरीमः। आकाशमपि शीतशितशरीरमित शून्यता विमति। किमपि कर्म कर्तुं नोत्सहते मानन्। ईपदपि प्रावरणपृथग्भूतमा विनश्यदिव प्रतिभाति । भय लोकपटीप्रतिनिधौ चलचयी चपलचूड़े ताम्रपड़े सरोजिनीशरीरसंहरणस्फुटागसि हेमन्ते वजहस्तजितकोप इव प्रतीयमाने पावरे साधनासमये हेमन्तेन भक्षितपत्रपुष्पफलेविर काण्डशेषेषु पयपृष्पकमनप्रेरितेषु पर शाखासघर्षणेन खटखटशब्दैन्तानिव घट्टयत्नु वृशेषुपविष्टास्तपश्चान्तो यौगिन ईर साक्षात्कारमिव दिनेश्वरसाक्षात्कारं प्रतीक्षन्ते पक्षिणः। गोजाविकं म्लानम्, चुद्रीगुहाभस्मक्यमुप्तः वा ताडितोऽपि नौमति। वराक: स्वाहानि खस्मिन्निहोतुमिच्छन्तः कच्छपवत् सङ्कुचन्ति। अय कमलकोडकार न्मुक्तः सुमनःसौरमभ्रान्तीयमानगुणो मृणालिनीविलासोल्लासवाही विरहविधा कोवधूवन्धुरवन्धुदिमण्डलीमणिमुकुटमण्डनहीर उत्फुपमिनीप्रतिविम्बेनेव लोहि हितः शोताना निघूमो मारवशमीकाटालार इवामितप्ताभिरायसीभिः कशामिरिता रुणाभिः सत्वामित्वरीमिमरीचिभिर्विदीर्णदिग्धान्तीयः, उदयपराधरमूर्धमपिान- नन्दनाकामः फलानपेक्षा सेवाव्रती सोतले शितों भोतथिरं सुप्त इतीमायामिन शोतात विपन्नपतिका पतित्रता मुन्बमुन्जायमानामभिरिव तुहिनवणैः कि भ्रतृजायामित्र हैमनी यामिनों नियम्य विश्व प्रेरयितुं प्राविशत्सेवाशनम्। सूर्यस्य र किरणावली प्रस्ता, सुखावहेन सौरातपेन स्नाता स्यामा सर्वसहाऽऽाशिता .

प्रथमो निःश्वासः १३ . शीतस्य खकीयेऽस्मिन् समये गगनारखीपञ्चाननेन न किमपि कत्तु शेके । दिनमशेष शीतेन परिकृत्यमानशीरं सत्वरमेवान्तमाप । सलजो दिनपतिरप्यस्तगिरिगृहां विविक्षुरम्ब- रतलादवालम्वता विमलपुरराजभवनेऽद्यानन्दलहरी प्रसूता । व्यग्रा पुरन्ध्रीवर्गः सत्वरसत्वरं व्रजन् कार्यस्य महत्त्वं ज्ञापयति । राजचिकित्सालयस्य विदुषो वैद्या परिचारिका बोधयति । विमल- स्तूलराशिरस्त्रशस्त्रयन्त्राणि च पूयन्ते। उष्णायतेऽन्तहसन्तीभिर्भवनम्। गीत गायन्तीभिर्गायिकाभिदवादिभिविषेय भूपतिभवनं भूप्यते। राजा रामपाल उत्क उपविशन् प्रतिक्षणं भित्तिघटी मणिबन्धपटीच पश्यस्तयोः समयसाम्यं वीक्ष्यापि मन्दगतित्वं मुहुर्मुहुराशते । अन्तःपुरादागच्छन्त्या दास्या मुखात् किमपि सुषुः समुत्तियति । "देव । देवस्य गृहं भगवती स्वयं सनाथयानकार" आगत्य प्रणम्य कञ्चुकिनीचे। सन्मत एव सरला मुग्धा कमला कैरपि रुदती न दृष्टा। कदापि विषादलेखया नात्या मुखकमले स्थानमा बालसुलभमनिमिपदर्शन खच्छन्दो हारा: स्वाभाविकी प्रतिभा उत्सालामृतमधुरा सुखावहा मालकाकली च सर्वेषां मनात्याकर्षति स्म । सर्व एव तां खात्यामचोकमन्त। सत्यपि धात्रीसहस महिषी तो स्वयं लालयति स्म । नरपतिस्ता- मुत्यौ कृत्वा नितरी प्रासीदत् । विहायनो कमला भित्तिदर्भणेषु प्रकान्तमूत्तिरपर- बालालापेच्छया मुश रमयमाना वर्जनीसाहाय्येन तां विहायापि च शद्वितन्यस्खपादं प्रवलन्तीतस्ततः प्रेक्षणेन सममेव पतिता सत्वरमेवोदतिरत् । - "देव! एए दिनेषु बहवोऽनुरका भक्ता हरसिद्धिप्रसादायोजयिनी समायाताः। श्रीमती मित्र राजनगरबमाण्डप्रमापि।" "अपि सत्यम्, मम मित्र नवेन्दु, मामकीनं सन्देशमादाय सपदि गच्छ।' "ययाशाप्यते देवे" "एसोहि अनुकम्पय भूतोरम भूतानां मानभाजनम्, यस्यावार्स मवादशावरण- रेभिः पापयन्ति, हरिचन् पूजिता देवी!" विखर्बनी रहीला शनैशनचलन्ती सुवर्णदा बालिका प्रेम्पोत्सद नयता नवेन्दुनोचे। . w १४ चन्द्रमहीपती "सर्व कुशलम् । कयं न स्यात् कुशलं यस्य मवादशाः पवित्रकीतयो रबर नाम्नवामझलना मङ्गलं कामयन्ते। प्रातरेव पूजिता प्रसादमुमुखी परमेश्वरी कार देवदेवो महाकालवा वा प्रातरेव गन्तव्यमिति देवदर्शनसुखमनुभवितु प्रेरितोऽस्ति । श्रीमन्तं यतो ज्ञातवानस्मि, तत एवं विलम्बमसहमानोऽधीरतामनुभवामि।" “प्रत्यावर्तितत्तं मनः शैशवचरितं पुरोभवदिवानुभावयति रामपाल ! नोसहते र श्रोतुं प्रयाणवार्तामपि। किन्तु चित्रपटचञ्चला राज्यश्रियः कामिन्य इव मावि कालक्षेपं सोनु समाः। भगवान्छिच ईदृक् सुदिनमन्यदाऽप्युपहरवाद् यत्रपर- मलनं सम्मवेत् ।" "अहनिशं प्रेक्षणीयं राग्यम् । स्वभावदुर्जनो घनपदादुर्दमनीयदानवनिर । लुम्टानिकरः, आपद्गता विविधकरः पीडिताः प्रमाः, सर्वेषामेव समये सम्भालनम् । "देव, सजमुष्णपेयम्" प्रणम्य न्यवेदिसेवकेन । "एहि मित्र, तत्रैव वार्तामुसमनुमविप्यावः।" भय सूर्यास्तेन विचलित लोके तमोमग्ने च गगने दिगडनावदनवन्दनविन्दुरिखमयूराने सोयोतितरमारेसः स्मरप्रदीपाकुरः कुमुदालालविकासी यामिनीसीमापमिनर तमः कवलयन, दुग्यतयाधौतविधः शनारदमुन्माचर्यचर्यचन्दालोकः। प्रियकरहन्मुस तमकन्चुरी पलीलमपहाय प्रतिरोमनिदानन्दाहामा विरहियरीव निशा प्रियेशमा- वों तहाममिषेण मादखिलं हंगाशतिमितीकरिष्यन्ती नयनमानसामन्दानन्दादिन' विमलगाटवन्यजनिकामणिश्रेणियाधिनी दन्तप्रमामिर ज्योत्स्ना सर्वतो दिया प्रासयत्। कपाललिपतिधीत विषहाम। मेन्दचिन्तामणिरिव सभी विमासी चन्दौदयेन। पी.यूखास्य चन्द्रलोक प्रमाबन्दरपालो। प्रदत्राणीव बभौ विश्वं ममन्या। स्मिन् गर्नु रटोत्तरेस्टपोटे रेशमृगमदन्धियुगे पनि गिना योग घेछ रहस्यमबदाम, इतय कीरतो कारवयोगन्द्रकमायोपसमाजमर्च- देदी! शैक्त एप प्रगानको समानसमापनवयुगौ व दुग्म्। मर शनिम्न वर सायं वा मन्तव्योरप्यतः नारया पुस 'पुस्मन। एस्विरश्च पदमाटोसम्मे।"

प्रभमो निःश्वासः १५ - . मवेन्दुः के भाशयः श्रीमतः मतिर:- कीरनिरती बाली निर्दिशन ) देवौ, युगलमेतदाजीवनविच्युत- भवेत्। नवेन्दुः-यापि ममः भिराम्यामेवार्य परमे वर्ष पान्चकार। परन्तु म मि सम्बनिरन विधाय प्रशासमितमाम्। गधव, भानयारिमन्नपत्रं हविसरे भौसा उपवेश्य पयः पाययामि। गमनस्थिरः कालः। संसारस नवधिनाटयापरप्रचत्वरे प्रगतः। प्राकृतिक सं परिवत्तितम्। नारीतयस्तारिताः। इतो रामारनेत्रशीतपिराभिलषितः पुजा गया। पुनरेग्दोरहारलहरी प्रमैघिट । पुनः शवन्यासानलयानामुराधाशम् । नमामिन्यो पुरारयामागुलयनपुरमा वृतैः रामाजिरम्। नपरकल्पना पुनरमर परमपोता पुनयिनिविद्यमधिग्दत् । पुनमौर मिप्यमोश्यन् । परन्तु दन्त । रातः मुर्ग समिक्षितम्। प्रायः प्रशातिर प्रलयं प्रत। MORE रोऽप्यनन्तरम्यापा शेते। रथल कालोनी मयते। भूविभागको मालयप्यारमेषि, पीपूरिनरप कोच्यते। सराप्येतदेवभूत् । प्रसीलीदिता पारसीलिय भवन हसायुयानमनिमपनयना आप हम्पगु विन्तिी मरम्. सर्प मात Fri परन्ती परमाया गूर्व सन्दिपत्री ममरनासीर KAR मालोज्याला ममता mrati विनोदसाटिन भन्दा बौ। PAPriहे। रन्तर पोलिबिलापापाः। सप्तम्भय सः - । - भूत मारामासापोरा गुमनरावर हरदा Faबदन नि। म सपनारम्ब तिम्रो रियो । दो सदाभा भंगपुर बतायः पन्ना रखना infi . -- दरारोहाया नितान्त नवीनं बयः, विघनेन्दुधमति मुखें यौवनामा, मुरमाशये चन्द्रमहीपती शव सानुयोरामणीयमहोदयरारामस्य हरितः कयास प्रारन्दे । सन्द्रा नायर पुपाः प्रतानिन्यः प्रचन्दशोस्ता प्रायः प्रसारण पन्ति। चनामा कोयाः केदारं कुर्वन्ति चन व केन्नि उरमोत्सतरेका केशम्। कचन गुमान कचन कोलियाम्तो, कवन सारसगितम्, कचन हनविरिदम् , अचन दार काणामेकाना वगितम्, कवन पुणवत्तीधमान्छनादानिये पारामदयाल म गुजन्मधुन्धमुदितमधुकानिकामधार, कचन सेलघटकचुः। सन्दिकाचयेने पूर्व जल जातजलजनमा विमलतला नत्यगाधजला मुदीप दीपिका पवनस्थित्यः पाच पादपपूरं हरितयन्त्यापयति मनासि। निशामु तारागप्रतिक्रया पनिटरनम भ्रान्ति यस्या नोरं कामिनीशिरःपरिमलपरिमलितं सौरमसौन्दर्यसरवार शतपय इव रजतदर इस प्रतीयते। नागवलीदलधनुर काामु वेदिकामु पुष्पपनैदादिक काव्यभुवीव शोममानापानुपदनभुवि क्रमानुशारिपविटपन्यासविलसति कीटापुबला, पादकन्दुकाणिकन्दुककीडनाय रम्यदूर्वः प्रदेशश्च । फलावादलोलुस विदेशीया अपि कलविहारिणः पक्षपुटपूतपादपप्रान्ताः पक्षिपोन प्रचुर प्रेश्यन्ते, हारिणो हरिणाः, विविधदेशासादिता पिलशयाः, कौशलेन समाविति चित्राणि च। मध्ये च नवनीतममुगधवलशिलं गवाक्षागति समयभित्र नं माणं राजोचितसम्भारसम्भृत विशाल बहुशलं हर्म्यम् , यत्र धवलोक्षउपाषाणस्तम्भेषकधी बलय्यः शिपिनो निष्णात निश्चययन्ति। कौशेयनीलास्तरणास्तृतमिव यन्त्र समानदूर्व सखीजनैःप्रणयप्रक्षिप्तशुभ्रामुमं तारम्तिं विदिव क्षेत्रम् । समस्तराम्रालाकुशलया गानविद्यावित्तया साहित्यार्थशास्तनिष्पातया माध्याक्किा शिक्ष्यमाणा धनुपा मुशुण्डिकया लक्ष्यवेधने, करवालफलममर्यादामु, चलतरपगनायो धावने मरुत्तरवायुयानादिपरिचालने कुशला कमलाध्यैव निवसति । सिसौदामिनीर कस्तूरिकाकुल कुमाधितरमोदाखाललाटा कदावन कनवालकीमादाय धरापुरम कृतौष्ठवसतिमियोपसमधरोप्न प्रत्याययन्ती सुधोमिनिर्यासमधुरमुत्तासौधोत्सव सात प्रासारयदानन्दजलदा भाच्छादयन्ति स्म सुधासमीरणस्तृतास्वखोऽपि व्यटभन् । कपोलोऽममिव प्रश्टयति लोचनलोमनीयां ण्टाम् विरहतविसितोत्पलदिलाने मि.

प्रथमो निश्वासः माने चक्षुषी अवाक्षुपं हृदयवेद्यमानन्दं प्रति सस्पृहे, कुचावपि कस्यापि सुकृतिन : समालिलिजिषयेव प्रत्यहमेधमानमहोत्साही, बलोभासि मध्यं कस्यापि सुभगस्य सोपान बुभूषदिन, काव्यकलाकलापालापज्ञातरतिसर्वस्व, निरन्तरगाननिरतं मनोऽपि कस्यापि मनस आधारोवुभूपदिन भुजलते कस्यापि गलपादपस्याश्लेषामे इन चाले, तथापि नाधुनामारप्रवृत्तिरजातप्रणयतत्वाया एतस्याः । सात्विकीमेवावस्थां भजते यतः सा । * र प्रौढमनोरमेव कुवाईनेन संकुचितशरीराऽभवद् यामिनी। यामिनी। विप्राश्च शमात्नभैरवीत्वं जद विभावर्याः। भ्रमणवीक्षिताश्चर्यचमित्र कलावं कुर्वति पक्षि- समूहे दिनेशागमनता प्रागेक, अन्धकारसकरमानिहोर्पति शोणितकिरणेऽरुणे, उत्थानवेशमिव विज्ञपयति धाराप्रवाहमासाद्या शोतशीने प्रावरणर रिपूत इव विमल. त्रिमले, कुसुमामोदमादायेव धीरे सरति समोरे, उन्मुखमुमिनीचूडामणिप्रभ परि- भूतपिवलीयमानेषु नक्षत्रेषु, नास्मानन्धकारेण सहैव संहरेत्सूर्य इति भयेनेव कम कोतिमुखरमुखेषु भ्रमरेषत्थितोऽभिषकोत्सवसूचकस्तुमुलस्तूयतोभनादः । নিৰিহঘৈনা, परिमलपाय-परिषिक' सुरभिसुगृहीतमानसरनलसे अंडरति संभ्रमरे कुतुधमग संवरण स्थिायति पश्यताधेतः। सुवासारसंलितभित्तीनि पताकापवनपूयमानप्रान्तानि प्राजन्ते निशान्तानि । राजनगरमयवस्तुतो राजनगरम् । कुमारश्चन्द्रोऽय युवराजरदेऽभिषेक्ष्यते । यसमा दालगुणगणान् लोप्रियताच गायन्यो महतं कामयन्ठे कामिन्यः, परपीर्य- कार्याणि विवर्णयन्तो परान् वन्ति विप्रवरेण्याः । राजभवनञ्चाय महेन्दभवनमपि परिभावयति । सम्मुखे चास्य द्वात्रिंशस्तम्भेषु विविधरागपटशकलाचित वितानच मुहुर्म हत्कयतिनेत्रम्। अभिवितानं दोदुल्यमाना मालाः सुषमावती प्रतानिनी च सौरं तापं तर्जयन्तीवास्ते। परितोराजभवनच शस्त्रपञ्चकाश्चितशरीरा बलिनः समादस्थिताः। वितानस्यमध्यचत्वरे रनजटितवर्णस्तम्भवतुथ्यविभासि, स्वर्णसूत्रस्यूतशिस्नैिपुण्ये बिताने, महादेवरिष्कृतरक्तछौशेयतूलियतुल, गजदन्तसुधरणं हरणमापदा, पई राज्यलक्ष्म्या, राजवे राजसिंहासनम् । - . २ उप प्राद, मन्दिन अगहनन्दनः पादमा १८ चन्द्रमहीपती सिंहासनस्यैकतः चित्रितशकुनिकुलेषु णेष्वास्सरणेषु, परिमलटेलानुसार कर चचिताना, मौलिमुकुटैश्चक्षुपि चरिठयता गुणगमाधिगतगौरवाणां राजकुमारागस पणीपालट्रकृतशिरसां शोभन्ते सितवाससा देशरत्नानामासन्धः। अयकुमारचन्द्रो युवराजपदेऽभिषेश्यते, चिरंजीवतात् प्रजाप्रणयी युवराज इत्येव श्रूयते सर्वतचर्चा। द्वारमुमयतो मध्यमुत्त मार्ग सशस्त्रसैनिकपंनिविदूर- समयाद स्थितास्ते। भाखता राजतेनानाइतेन मरत्तरेण प्रणतप्रणामाशालीन् प्रतिगान मन्दिर चन्द्रेण च युषः सभाभवनं प्रविश्य गृहीतसैनिकप्रणामोऽस्वकार सिहासनं नवेन्दुपालना। खच विष्वक्सेनयन-पाणि विहितसत्याग्रहो माधवंजगद्धवो विहसन, शारा विभूतिय्याशवपुः, वामन व कृतरलिप्रदणः, हिरण्याक्ष इस तवमुन्धरी, मोरयादी सूक्षमित्र पाता गुप्तः, य्याशिलदाणमिव प्रभूतनिवेशभासमानः, सण्डनसाना सरिताने शासनः, शम्देन्दुशेसर इव सिद्धान्तय्याख्याता, रामकुटालंकृतः, अश्लामा स्वेदमुफेन, हाटवतन्तुस्यूतस्ट बकेन कौशेयाप्रपदीनेनारामतन, गजान्तमुधिया हेमोशेन कौशेयोग विलसितमप्यो गम्भोगकृतिः वी राज रामनगरभूमि- मामिनोमाभागी नवेन्दुपालः। वामतः प्रभवः प्रगुणाना पराभवभवनं पागना, अपस्पृश्ये दुष्टः, सन्तुष्ट वि. खस्ता पूर्वजन्, अधिविधाम्म धेः, निरमारको मोक्दुराचाराणा, निरवपिन विशे, उगाते जावेशमिना, दुपगमगाम्भीयो, विमीयमान इस सोसाय, म परासय, निकायो निनयस्य, श्रधा आपलताना, परिधान यावालाना मुरमशः स्टावा, मुस्लमास्य, उत्थान मनस्सिना, अभिमाको पात प्रतिश, परिभूत र हामियः प्रिया जना, मुद युगको मी धारावानि पहल पम्मी माइटरनिगमाम, गुन्दामपुर कुन्दलेगोर मागमा मिसिनविरूप पुस मानिसमा मिष्यं सर्वयोगडिव मननशान, इमलनः म मि प्रथमो निश्वासः जिलमश्रीः, होरकसचिवेन स्वर्णत्सरुणा हेमकोशेन चन्द्रहासेन पूज्यमानवामपाइवः, जातरूपतन्तुरचितमहाईमहोष्णीषः, पटवासवासितवासोबद्धविग्रहो, हिमशुनधीतवसनः रेमतेपन्निासूतदशन, आरक्तदशनवसनः, करवालकेलिचकितीकृतवीरवरो राजकुमारः स्वर्णासन्या समलभत स्थान धन्यजननीकचन्दः । यथ रसगुणवलिजारितपारदसैवनक्षीणक्षयः साक्षाचन्द्र हवालक्षि । किमितीऽप्यधिक रम्य मारवपुरस्मेवस्मर इतिविचार्य कृष्णीकृन्तमिवकचकलापं भ्रमरः, सुगन्धितमिववपुर्वसन्तेन मुखमारीकृतमिव भुमनोमिः प्रकटितमित्रत्वधर्म मिलितमिव मारमिः। दक्षिणतय काशनीकाशकेशाक्षिपश्मा, अन्वीक्षित आन्वीक्षिक्यो, अद्वितीयस्त्रय्या, शीण्डोदण्डनीती, वित्तोवासु, विपमिताभपदिमः, विहसभिव एकाक्षं कमनीयाक्षः, रेजे रजतमा शुभासा मन्त्रिपरोऽशेषविद्याधरो विद्याधरः । भय समायो रामण्यार्या समेतेषु माननीयेषु नागरिका, लोकप्रियेषु लोकहित- प्रतिष, पारपान रिपते घ, प्रयनसिपपपितापात्रा संघभूमौ सकलं माण्डलिक- मण्डलमभ्युत्थाय यशो दौवारिकदत्तपरिचयः प्रणाम । भय एमयमानोनरपतिः पोयूएपीतयेव मधुरया, भगाधहरयान्तवसत्येव गीग्या वाचा वकुमारभत। प्रयामहर्पर, प्रियाः प्रजाथ, महामहिम्नो विशासितुः परमानुसम्पया राज्यस्तो मे चत्वारिमाद् वाणि पवीतानि । यत्प्रमुबई प्राप्तयौवनोऽस्मि प्रजानां सर्वविधानि स्थान्यपनेनु' उत्पोरम: दुष्कारमहामार्यादिसाइटविनाश दनुभहक परमेशन प्रति सर्वदेवानोरम प्रसई प्रार्थयमानौ भवता योगमाय। माय राज्ये पा प्रगाढा भरियेद्यत्यागो सानुले प्रेम भवटी परित तेन समेषों रो दि अतुलो हर सम्भवति। पप बहोर क्लान् राम- प्रयोः प्रचलित धामीत् पिपत्रसम्बया, पौगशिरा मामला बळ शनि यसोऽशायरीमानससरोजे राजते समनं मुगल सम्बन्धः। मा मुसे इरा व सुव सभासम् । स यसमावदामा जिघृक्षति। तस्य हदि खयमुपाजितवस्तुन एव उपभोगेच्छावतते। न राष्ट्रपट न दाराजना, न मद्यालयो, न ड्तालयः, नधूतों, नवञ्चको, नाननुशासनोन निधन, चन्द्रमहीपनो ममनन्दसरारा प्राप्ता दुतावसराय यत्र जगतः स्वाभारियन साई मात्र मे साहाय्य तमास्ते। भगवतेऽनन्तकोटिममाण्डसामिने प्रगामोपायनमुपदरामि येन पयनिरीक्षण सदसद्विवेधनाचेतना धराधरगनई बारापूर्वकार्यचिठीप्रवण उत्साहो अगर लोकयितुं सत् सारप्यश्च मे प्रदत्तम् । सकलस्य राज्यस्य सेवाये राबविधनवीनमानसम्ममा जलस्थलवायुभेना नुः शातनेऽसाम्यमासादयति। थई सर्वदेव प्रजाधिशरमरक्षायै तासामावश्यतापूत्यैवीयुमानोऽस्मि । रमन विधिसभासदस्या जनतया निर्वाचिता राज्यसलनोषितं राष्ट्रोमविकरच विविध विश्वानुकरणीयाँ व्यवस्था व्यवस्थापयन्ति। प्रतिप्रभ प्रामीनप्रथिता प्रामन्च पारस्परिक विवादाभियोग शमयन्तो वैषम्या भस्मयन्तो प्रमोन्नति कुर्वन्ति । लघुष्वपि प्रामेष्वेका खपीयसी रम्या पाठशाला, आरोग्यशाला, बरू प्रौढशिक्षणशाला, पत्रालयो, वाचनालयः, स्वयंसेवककोडास्थल, पार्टिका, खर्व प्रान चातुर्येण रचिता राजमार्गाः, फुल्या, प्रभूतधान्यानि क्षेत्राणि, च वीक्ष्य कस्य व मन परमानन्दस्यावधि समेति । भाभ्यन्तरव्यवस्थाये न राज्ये रक्षकसेवकानानावश्यकता चौरजारानौचित्याचारचर्चेद न धूयते, न कधनागृह्यमाणोऽपि धराफ न कुचेलः। नास्त्यत्र सन्देहलवोऽपि यद्रायमिदं यौष्माकैरास्माकैश्च पूर्वजमहता अनेक पर कोटिं नीतम्। अनया पैतृसम्पत्त्याऽस्माकं सत्यो गर्वः। परन्दिक न विस्मरणीयं यदेषा स्थितिरस्माभिर्महता प्रमेणानीता। भत्रैव प्रविशतनार शिक्षितो नहि साक्षर आसीत् । अत्रैव शिशूनां मृत्युः प्रतिशतमशीतिरसद दुराचारय्यभिचारव्याधिना नरा भासन् । क्षयः सामान्यप्रतिश्याय सर्वत्र प्रमृत आसीत्। दुभिक्षण प्रजा प्रतिवर्षमेकस्थानादपरस्थानं ६ आसन् । सर्वदेव चौरपाराणां भयं सर्वान् बाधते स्म। परन्त्वधुना सर्व । मस्ता प्रथमो निवासः २१ ध्यावशेषाः संवृत्ता। सर्वमेतद् राज्यस्य भवताश्च धमस्य प्रमस्य प्रत्यक्षंफरम् । भवन्तो राज्या धन्यवादास्पदम। परन्तधुनारमा केवलमिदमेव मास्ति यदिदं वर्तमानमेवरूपं विमृयात, किन्तु लोकोत्तरसमुलतः शिखरमारा निरात सानन्दं निवसन्त्यः प्रजा वास्तविरुमानन्दमुरभुऔरनिति । सोऽहमधुनावृद्धोभूतः। वाक्यभावान्नवनवेषु कार्येषु नोत्सहते चतः। प्रविष्वपि वपुरवश्यकर्तव्येषु शयिष्ये भजते । न मतिर्मननीयमपि मनुते मतम्। करणजाते कार्यकरणश्रान्टमिव मन्ये। कुमारचन्द्रः मुशिक्षितः सुविनी- तोयुवा क्षमोभुना धुरमिमा योदुमतो योज्योऽयमस्मिन् धर्मणि-इति विश्वपयितुमेव भवन्तः सादरमामन्त्रिताः। पदप्रदानात् पूर्व कुमारायापि विशाप्यमस्ति-यन्या नाम राज्यश्रीमदमत्तः प्रजाया योगक्षेमं विश्मापी। महाप्रभावो लक्ष्मीमदो मधुमयनमपिमोहयति । लसन्मणि- होरकं गुट कटकाको पानीहिः कौशेयतूलिक स्वर्णसिंहासनं शिला- एवं सशरीर वितानमिवापदा विधि। चामरयुम्म शोधक समावानामा मुख्यसनाना मन्यस्त । नदि विलासाला राजानी राज्यस्य प्रायमुरहारं कर्तुं क्षमाः। प्रशाना सातन्न्यीवन स्थिरयितु सदैव सरप्पो भवः । दामने सतत भरवालम्रो भूयाः। विद्या सत्कृतावण्यप्यालय मा गाः। प्रिया:प्रताः। पया खामिमत्याभवद्भिधारित पूर्वषो राशी शासन, विनिनि साऽस्माई नवीन- महाराजे प्रति अधिकाधिक समेधिप्यते। द्विरक स्यमिव राज्यमा समुन्नतेरत्युग शिसरमधिोइलित्यस्तु मे शुभाशीर्वाद। षष महागासने पम्पन्ने युवराजसंस्मरे, महाराजेन सहस्तेन ते परमारे, प्रत काशेयो, प्रमोसमानश्न भासपा चामासमतोल बीने राशि पदमायाना राबधिषि, विषया पदसायो, दिश्यता भारतीया संस्कृति विजस्ता रामनगर, वियता पन्दो युवराति बारसोयालित सोम. रावधानः परिते, हरित, बदमदनारमनीतीशे यस्तोहारपारपराग परम्नामनियाभोरलारभुडोर भागना समपनक, नर चन्द्रमहीपतो युगराजविगापिमुखचन्द्रो अनरागरस्य प्रामानेन सह समुत्थाय स्निदेन है यन्नन्तःगभममारत:- पूग्यासमाः महर्पयो, मान्या रामायः सहयोगिनः सभ्याचा योऽयं कार्य मारः धीमदिरामात्म्यारोपितः श्रीनां सहयोगासन समयों भविष्यामोत्याशारो। अयतर्न रामाद न विलायमूबा, अपितु प्रधानसेन प्रधानप्रदरित्वमेव पोपपति। उपहारमानादिना यं सम्मान धीमन्तो मयि प्रविन्द स ममम, अपितु राष्ट्ररोजमस्य-राष्ट्रस्य घागरूकप्रदरिणः सम्मानः। नाइमेक्स सलो योग्य उपभोका। भत एता सामग्री बालविकामपरिषद उपहरामि, बला के भाविनो भारवाहा राष्ट्रस्य । मान्या, बहुविद्यतेऽस्माकंकरणीयम्। अद्ययन्त्रयुगे वयमधुनापर्यन्तमत्यन्तावश्यकपदार्थोत्पादनाय संलमा भारम, परमय तेन भयेन धये मुकाः रमः। परन्तु कदापि परेयां दरापात्राणि यथा न भवेमतथाऽस्माभिर्ववितव्य मस्ति। अद्यसायंकालिकसभायामस्मिन् विषये विचारयिष्यामः । विज्ञानस्य मइत्यावश्वस्तपते। * *2 "देव व्यत्येति भोजनवेला। आगन्तुका मान्या अतिथयोऽपि धीरणी प्रतीक्षन्ते । भाखेटार्य गतो युवराजश्चिरयति"-मन्त्रिणोपेलादोचि । "न जाने कथं विक्लवता भजते चेतः। किमप्यज्ञातभयमिव भावयति भावना । आखेटार्य गतश्चन्द्रो नाधुनापि प्रतिनिवर्तते। अद्यतनोत्सवं राजभोड्ध विदशापिध कथं चिरयतीति महदुत्कष्ठित चेतः। अभितोऽशुभच्छायामिवपश्यामि, कन्दनभित्र चिकीर्षति मामकीनं मनः। न जाने किं भावि ।" "देव ! सर्व शःश विधास्यति, देवस्य वात्सल्यमेव एवं चिन्तयति। (मुर पश्यन् ) 'कयय देवव्रत कथं विस्यति युवराजः।' देववतः-(प्रणम्य उच्छृसन् ) देव, कुमारमित्रेण विश्वशेखरेणाय धीमत एको विलक्षणप्रेक्षणीयोऽध उपहृत आसीत् । कौतुकळीतमिव भवति युक्झदयम्, परिणाममपरिचिन्वती च मतिः, विगतसाध्वसव साहसम् । अपेतसारत्यञ्च तारज्यम् ।

प्रथमो निश्वासः
२३
হলথাৎস্যমিঃ হায়ণগঞ্জংইংসাৰ দিহাঙ্গুলিঃ -
नदंष्ट्र पचानने वीक्ष्य हन्तुमनाखदनु प्रस्थितः, अस्माभिरम्यश्वपृष्ठलानेनुगतः
जननशान्धकारे पयविच्युतैखीक्षितचापोरगोवर एव संशतः।
विद्वद्वरेण्यनवरतनूजनुर्यः
सालोचनं विपुललालितकाव्यमालः ।
सभीनिवास ठररीकृतनभ्यरोतिः
शं न्यश्चमद्वरसुधोवरणीयमाद्यम |
धीमवासरायशानितनुजनुरा यौनिकासशास्त्रिषाकृते
चन्द्रमहीपती
प्रपभो निधासा
-

द्वितीयो निश्वासः भिन्ना महागिरिशिला: करजाप्रज्ञान- दुद्दामशौर्यनिकरः करटिभ्रमेण । देचे पराचि करिणामरिणा तथापि कुत्रापि नापि सलु हा! पिशितस्य लेशः । -पण्डितराज जगनायव उत्कूजन्तु पटे पटे यत यकाः काकाः पराका अपि काङ्कुर्वन्तु सदा निनादपटवस्ते पिप्पले पिप्पले सोऽन्यः कोऽपि रसालपल्लवलवनासोल्लसत्पाटव- क्रीडत्कोकिलकण्ठकूजनकलालीलाविलासक्रमः । मुभाषितरत्नभाण्डागारम् अथ जातोदये पीयूषमरीचिमालिनि सकलशस्यपितृके जैवतृके, स्वर्णादिगुहाखा 'मलकीयं रसायन्माखादेव सत्वरसत्वरमम्बरमवतरति रतिविदारके तारकेश्वरे ज्योत्स्नया हिलायामिलाया प्रकाशमाने वस्तुविसरे, राजतपत्राच्छादिते कर्पूरपराग- मिव वर्षति नमसि, प्रदरं । नायितु पुष्यानुगमिवसेवमानाया', मनुपेयाभिर्दुग्धधाराभि- खि ज्योतनाभिः सिच्यमानायां वसुमत्या, अपुष्टकरवेषु, सरस्सु, सत्रपकमलिनी दीपिकासु, रमरमानादनासु च कुमुदिनीपु समाधिमिवादिलण्य निद्रादेवीमाराधयत्सु धनेषु द्विनाः पुरुषाः पर्वतान्तः प्रदेशे स्थिताः सन्ति । महानयं प्रदेशः। अभितो लघुलघवः पर्वताः पादपप्राचुर्यवन्तो ये समागन्तुनेत्र निपातासान् पश्यन्ति। 'प्रदरोरोगः पुष्यानुग 'चन शाग्यते। पसे प्रकृटो दरोभयः, पुष्यइति नक्षत्रो पलक्षणं तान्यनुगानि यरयतेन पन्द्रेण नाश्यते । नक्षत्रोदये भयं नश्यतीतिभावः। इति भाषा।

No text on this page.

The publication of CHANDRA NAHIPATI by Eating modern Indian literature. It is a nuvel written in many Shritiwae Shastri is very interesting event in the Bold of the new. Ingenious forms of grammar and of descriptio Sanskrit. The style is Composite, partly of the old 19 p modern political and social topics. I must state frully of nature alternate with coined scientific expresion # all the translations of the scientife words are not likely to accepted by the public. But that does not affect the per २०) श्रीनिवासशास्त्री का चन्द्रमहीपति देसने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वर्गका प्रवाह विशेषरूप से उल्टेसनीय है। मानसिक भावों का संघर्ष उपन्यास के - प्रधान गुण माना जाता है मिसे मुन्दर रूपसे सन्निविष्ट किया है। रामकृष्ण भारती, शास्त्री, वी० ए० साहित्य सरदारशहर, २६.१२४. सरस्वती कालेज, लाहौर Sri Bhandarakere Mutt. Udipi, ( South Kinara) Dated 2-2-1959 Camp कलकत्ता। खस्तिश्रीमतरमहंसपरिमाज म्त्वायनेकविश्वालिदिदैवमत्प्रतिष्ठापडगा- मन्मध्वाचार्यशुभसम्प्रदायप्रवर्तकधीमदुइपिभण्डारकरिमठाधिपतिश्रीविद्यामान्यठी स्वामिपादाश्चन्द्रमहीपतिनामप्रन्याभ्यः श्रीनिवासशास्त्रिभ्यो नाममा पूर्वकं निवेदयन्ति-युष्मकं चन्दमहीपतिनामको प्रन्यः सर्वाभ्युदयापासुन प्रतिभासते, मनोहरक्याप्रमान बनाना विताकर्षक इति मन्यामहे । अमित कर सर्वे जना आदरं करिष्यन्तीति वयमाशास्महे, इत्यनेकनारायणस्मरणानि । [ वेदविद्याप्रयतमानमानसः "Neurang" कलिकातास्मो व्यामृतवैरिष्टरः श्रीकालीप्रसादखेतानः] the book. It is a bold attempt to employ Bagsbrid dalt R8 & medium for populer literatare. book is bound to prove to be a in Sanskrit even including 6.South Ead Park P.O. Rash Bebari Areen Calcatta-99, 22nd Mareb, 1923 प्रथमो निश्वासः 'झुरी अचाक्षुष हृदयवेद्यमानन्दं प्रति सस्टहे, कुचावपि कस्यापि सुकृतिन : हिपयेव प्रत्यहमेधमानमहोत्साही, वलीभासि मयं कस्यापि सुभगस्य सोपान काव्यकलाकलापालापज्ञातरतिसर्वस्व, निरन्तरगाननिरतं मनोऽपि कस्यापि धारोबुभूषदिव भुजलते कस्यापि गलपादपस्यालेषकामे इव चपले, तथापि (प्रवृत्तिरजातप्रणप्रतत्त्वाया एतस्याः। सालिकीभेवावस्था भजते यतः सा। प्रौढमनोरमेव कुवमर्दनेन संकुचितशरीराऽभवद् यामिनी। विप्राय वोत्व बह विभावयः। प्रमणवीक्षिताश्चर्यचमिव कलावं कुर्वति पक्षि- देनेशागमनतः प्रागेर, अन्धकारसङ्कामाजिहीर्ष ति शोणितकिरणेऽरुणे, मेव विशपयति धाराप्रवाहमासाद्यर शोतशोने प्रावरणर रिपूत इव विमल- मामोदमादायेव धीरे साति समोरे, उन्मुखपुकामिनीचूडामणिप्रभ परि- 'मानेषु नक्षत्रेषु, नारमानन्धकारेण सहैव संहरेत्सूर्य इति भयेनेव (खामुखेषु भ्रमरेषधितोऽभिषेकोल्स वसूवस्तुमुलस्तू येतोमनादः । किरविंशोधनपरिपूत, परिमलपायपरिपिक सुरभिग्रहीतमानसग्नलसे 'मरैः कृतश्रमण संसरणं स्थिायति पश्यतायेतः। सुधासारसंलिप्तभित्तीनि पमानप्रान्तानि धाजन्ते निशान्तानि । मद्यवस्तो राजनगरम् । कुमारश्चन्द्रोऽय युवराजयदेऽभिषेश्यते । यस्या- न लोकप्रियताञ्च गायत्यो मजलं कामयन्ते कामिन्यः, बलीर्य- यन्तो वरान् वदन्ति विप्रवरेण्यः । चाय महेन्द्रभवनमपि परिभावयति । सम्मुले चास्य द्वात्रिंशस्तम्भेषु किलरचित वितानञ्च मुहुर्भहुरुत्कयतिनेत्रम्। अभिवितानं दोदुश्यमाना तो प्रत्यानिनी च सौर तापं तर्जयन्तीवास्ते। परितोराजभवनश्च चतशरीरा बलिनः समयादस्थिताः। ध्ययवरे राजटितवर्णस्तम्भवनुष्यविभासि. वर्गश्त्रस्यूतशिल्पिनैपुण्यं छरिष्कृतरक्तकौशेयतूलिकातुले, गजदन्तवतुश्रण हरणमापदा, पदं जते राजसिंहासनम् ।

कामदो, विहसचिव गिरीशं सर्वशोऽनुकुचिव चतुराननश्चतुरानन, कमलासनः कमलासन, प्रजापतिः प्रजापति, समाक्षिपत्रिव देवकीनन्दनं बगदानन्दनः, पादसंवाहनलान धर्म १८ चन्द्रमहीपनी सिधागनतः चियितानिाले भोणकरणे, परिमल्टलानुसार वर्ग, चर्चिताना, मौलिमाटेगानिमस्तियां गुपगमाधिगत गौरवागा राहामारणामतः णीपटगृतशिरा शोमन्ते शिवनारामा देशरत्नातामासन्यः। अमरधन्दो युवराजपदे मिश्यते, चिरंजीवता प्रायसी युवराजमान इत्येव धूयते पर्वतपर्चा। दागुमयतो मध्यमुच मार्गा सशनिकर्षनिविदा समयाद स्थितास्ते। मासता राषनानारतेन मरतरेप प्रणतप्रणामामालीन् प्रविमान मन्त्रित चन्द्रेण च युकः समाभवनं प्रविश्य गृहीतसैनिकप्रणामोऽधकार सिंहासनं नवेन्दुपालनमा - सच विष्वक्सेनश्चमपाणि विहितसत्याग्रहो माधजगतो विहसन, शारा विभूतिव्याप्तवपुः, वामन व कृतालप्रहणः, हिरण्याक्ष झ धृतवमुन्धरो, गेरभावित सूत्रमिव जातागुभिः, व्याप्तिलक्षणमित्र प्रभूतनिवेशभासमानः, सम्डनखण्डवामित्र खण्डितानेकशासनः, शब्देन्दुशेसर इव सिद्धान्तय्याख्याता, रनमकुटालंकृतः, अवलम्बित वेतमुफेन, हाटपतन्तुस्यूतस्तवकेन कौशेयाप्रपदीनेनाच्छन्नतन, मजदन्तमुस्लिा हेमकोशेन कौक्षेयकेण विलसितमध्यो गम्भीराकृतिः कृती रराज राजनगरमून भामिनीभ्रूभन्नभागी नवेन्दुपालः । वामतच प्रभवः प्रवृष्टगुणाना परामवभवनं पापाना, अपस्पृष्टो दुष्टः, सञ्जुष्टः शिष्ट स्नुकर्ता पूर्वजान्, अवधिविद्याम्भोधेः, निरसारको लोकदुराचाराणा, निरवधिनिष्णो निस्त्रिंशे, दुःसह्यते जास्तेजखिना, दुधिगमगाम्मीयों, विलीयमान इद लोकहृदये, आधारो वीररसस्य, निकायो निश्शेषनयस्य, अधिप भापद्ताना, अपिधानं वाचालानो, मटि मुक्तकोशः कलावता, सुहत्प्राणिमात्रस्य, उत्यानं मनसिना, अभिभावको अन्तर प्रतिष्ठितप्रज्ञः, परिभूतभूविरी, हासप्रियः प्रियः प्रजाना, मुद्ध युपास्यो मारिन धात्रंशोऽलाकृतिः, षडानन इव वाम्मी मूकीकृतवचखिसमाज, सुन्दरमधुरः स्निग्ध कुन्तलोगौरः, कपदिन संसारसर्वस्वः, पिनाकिन सर्वाननिषुषः, विरूपाक्षं पुण्डरीकाक्षः, काम १ ममशः सर्व उपसर्गाः।

-- प्रथमो निश्वासः १६ सर्वाङ्गलमश्री:, होरकसवितेन वत्सरुणा हेमकोशेन चन्द्रहासेन पूग्यमानकामपालः, जातरूपतन्तुरचितमहाहमहोशीया, पटवासवासितवासोबद्धविग्रहो, हिमशुधौतवसनः स्मितेपनि मृतदशन, भारतदशनवसनः, करवालकेलिचकितीकृतवीरवरो राजकुमारः वर्णासन्या समलभत स्थान धन्यजननीकश्चन्द्रः। यथ रसगुणबलि जारितपारदसेवनक्षीणक्षयः साक्षाचन्द्र इवालक्षि । किमितीऽप्यधिक रम्य मारवपुरयमेवश्मर इतिक्विार्य कृष्णीकृतमिवकचकलाप भ्रमरैः, सुगन्धितमिववपुर्वसन्तेन सुकुमारीकृवमिव सुमनीभिः प्रकटितमित्रत्वधमै मिलितमिव मारमित्रः। दक्षिणतश्च काशनीकाशकेशाक्षिपक्षमा. अन्वीक्षित आन्वीक्षियां, अद्वितीवस्त्रय्यो, शौण्डोदण्डनीती. वित्तीवार्तासु, विपश्चितामपश्चिमः, विहसचिव एकाक्षं कमनीयाक्षः, रेजे रजतमम्यां शुभासन्या मन्दिवरोऽशेषविद्याधरो विद्याधरः । अथ सजायो समज्यायां समेवेषु माननीयेषु नागरिकेपु, लोकप्रियेषु लोकहित- प्रतिए, यथास्थानं मिथतेषु च, प्रयदरसिद्धधूपधूपितायाध संसद्भूमौ सकलं माण्डलिक- मण्डलमभ्युत्थाय कमशो दौवारिकदत्तपरिचयः प्रणाम। अथ स्मयमानोनरपतिः पीयूपपरीतयेव मधुरया, भगाधहृदयान्तर्वसत्येव गभीरया वाचा वकुमारभत। श्रद्धया महर्षयः प्रयाः प्रजाक्ष, महामहिम्नो विश्वासितुः परमानुकम्पया राज्यकुतो मे चत्वारिंशद् वर्षाणि व्यतीतानि । यत्प्रमृत्यह प्राप्तयौवनोऽस्मि प्रजानां सर्वविधानि कष्टान्यपनेतु तत्परोऽस्मि । दुष्कालमहामार्यादिसटकटविनाशकं पादनुप्राहक परमेशा प्रति सदैवानतोऽस्मि प्रसई प्रार्थयमानो भवतां योगक्षेमाय । मयि राज्ये च या प्रगाढा भकिर्यश्चत्यागो यच्चातुले प्रेम भवद्भिः प्रदर्शित तेन समेषां राजा हदि अतुलो हपवर्षः सम्भवति । यश्च बहो: कालातू राज- प्रजयोर प्रचलित भासीत् पितृपुत्रवत्सम्बन्धः, गोमतशिरा अहमद्यापि वर्षे पाकोमि यत्सोऽयाप्यायो मानसरोजे राउवे समान सुदृढमूलः सम्बन्धः 1 ama भवता सुखे दुस व सदैव सहचरीभवनासम् ।

चन्द्रमहीपतो
ममानन्दावसराः प्राप्ता दुःखावसराच यश्च जगतः खाभाविकोधर्म खहि भाद्र
मे साहाय्यं कृतमारते।
भगवतेऽनन्तकोटिब्रह्माण्डस्वामिने प्रणामोपायनमुपहरामि गेन राज्यनिरीक्षणाना
सदसद्धिवेश्यनाचेतना घराधुराधरणसह वपुरपूर्वापूर्वकार्यविकीपप्रवण उत्साही जगा
लोकयितु सत् स्वास्थ्यञ्च मे प्रदत्तम् ।
सालस्य राज्यस्य सेवाय सर्वविधनवीनसाधनसम्पमा जलस्थलवायुसेना शुभ
शातनेऽसाम्यमासादयति ।
भई सर्वदेव प्रमाधिकार सुरक्षायै तासामावश्यकताप्रत्येचोयुजानोऽस्मि । रासस
विधिसभासदस्या जनतया निर्वाचिता राज्यसयलनोचित राष्ट्रोमतिकरय विधि
विधानुकरणीया प्यवरा घ्यवस्थापयन्ति। प्रतिमाम प्रामीगेनथिता प्रामण्य एस
पररिक विवादाभियोग शमयन्तो पम्या भस्मयन्तो प्रामोन्नति पुर्यन्ति ।
लयुवपि प्रामेष्वेवा सखीयसी रम्या पाठशाला, भारोग्यशाला, परमान
प्रोटशिक्षणशाला, पत्रालयो, वाचनालयः, मयंसेवकोटाथल, पाटिका, स्वर में
धातुपैग विता राजमार्गाः, कुल्याः, प्रभूतधान्यानि दोत्राणि, चवीस करमर
परमानन्दस्यावधि समेति। भास्यन्तरम्यवस्थायम राज्ये शकमेकानामात्यार
मौरभारानौचित्याचारपद म धूयते, न धनारामाणोsi :
faysति। तम्य हमियमुशामितवादन एव उपभोगेरछावर्तन। न राष्ट्रगान
र पर, न मलयो, न टूतालयः, मधूतो, नवरको, नाननुशागतो. या निईन.
मकुवेटः।
नत्र भन्देइलो। ययामि योमारामा निर्माता श्रीत्र
पारी 2 तम्। अनया पैशायाधम मन्यो । पति
नियादी बरंच यदिारमामिमंहना भवनीता। अनि
शिक्षित कर सपा अपन। भर लिए गणः प्रतिशतमाम
दुरपामा गरा भमन। यः समपटल
सरप्राम
या iPATWARI 44
भन्छन् । सो बात म f ri | माना
R

- प्रथमो निश्वासः २१ फयावशेषाः संवृत्ताः। सर्वमेतद् राज्यस्य भवताव श्रमस्य प्रत्यक्षफलम् । भवन्तो राज्यश्च धन्यवादास्पदम। परन्त्वनास्माकं केवलमिदमेव कृत्य मास्ति यदिदं वर्तमानमेवरूपं विमृयात, किन्तु लोकोत्तरसमुनतेः शिखरमास्य निरात मानन्दं निवसन्त्यःप्रजा वास्तविकमानन्दमुसभुशीरनिति । धोऽहमधुनावृद्धोभूतः। पार्टषयभावान्नवनवेषु कार्येषु मोत्सइते चेतः। प्रभविष्यपि वपुरवसकर्तव्येषु शैथित्यं भजते । न मतिर्मननीयमपि मनुते मतम् । करणजात कार्यकरणधान्दमिव मन्ये। कुमारश्चन्द्रः सुशिक्षितः सुविनी- तोयुषा क्षमोऽधुना धुरमिमा बोदमतो योग्योऽयमस्मिन् कर्मणि--इति विज्ञापयितुमेर भवन्तः सदरमामन्त्रिताः। पदप्रदानात् पूर्व मारायापि विज्ञाप्यमस्तियन्मा नाम राज्यधीमदमत्तः पजाया मोगक्षेम विस्मात महाप्रभावो लक्ष्मीमदो मधुमपरमपिमोहयति। सरन्मणि- होरकं मुाट पटकाको बानीहि। कोदोयतूलिक स्वर्णसिंहासन शिला-- ए सारीर बितानमिवापदा विद्धि। चामरयुग्म शोध सद्भावानामा बुध्यसनाना मन्यव । नहि विलासालमा राजानो राज्यस्य प्राग्यमुरकार कतुं क्षमाः। प्रजानां सातन्थ्यजीवनं रियायितु सदैव सक्षणी भवेः। दस्यहमने सतत करवालको भूयाः। विदुषां सत्स्तावपयालय मा थाः । प्रियाप्रडा पग सामिमत्यादिधारित या राशपासने, विश्वसिमि सारमा नदीन- महाराचे प्रति अधिकाधिक समेधिप्यते। द्विधर स्थमिव राज्यमदः समुन्नतेरत्युथ शिसरमधिरोहलित्पातु मे शुभाशीर्वाद।

चन्द्रमहीपतो युवराजविभाभूषितमुसश्चन्द्रो जनसमूहस्य करतलवादनेन सह समुत्थाय स्मिदेन स्ति- यन्नन्तासभमभाषत:- पूज्यपादपमाः महर्षयो, मान्या राजपया सहयोगिनः सभ्याश्च । योऽयं कार्यभारः श्रीमद्भिरस्मस्कन्धआरोपितः श्रीमर्ता सहयोगादशमोऽकई समर्थो भविष्यामीत्याशासे । अद्यतन राजपई न विलासपूवर्क, अपितु प्रधानसेवकत सूचक प्रधानप्रहरित्वमेव घोपयति । उपहारप्रदानादिना यं सम्मान श्रीमन्तो मयि प्रदशिववन्द्र स नमम, थपितु राष्ट्रसेवकस्य-राष्ट्रस्य जागरूक्परिणः सम्मानः। नाहीतस्य सत्यो योग्य उपभोक्ता। अत एता सामग्री बालविकासपरिषद उपहामि, बाला हिं भाचिनो भारवाहा राष्ट्रस्य । मान्याः, बहुविद्यतेऽस्माकरणीयम् । अद्ययन्त्रयुगे विज्ञानस्य महत्यावश्यकतावतते । वयमधुनापर्यन्तमत्यन्तावश्यकपदार्थोत्पादनाय संलमा आरम, परमद्य तेन भयेन बरे मुकाः स्मः। परन्तु कदापि परेषां दयापात्राणि यथा न भवेमतथाऽस्माभियंतितव्य. मस्ति । अद्ययायंकालिकसभायामस्मिन् विषये विचारयिष्यामः। "देव व्यत्येति भोजनवेला। आगन्तुका मान्या अतिषयोऽपि श्रीचरणी प्रतीक्षन्ते । भाखेटार्य गतो युवराजश्विरयति"-मन्त्रिणोपेल्यावोचि । “न जाने कथं विश्लवां भजते चेतः। छिमप्यज्ञातभयमिव भावति भावना । आखेटाय गतश्चन्द्रो नाघुनापि प्रतिनिवर्तते। अद्यतनोत्सवं राजभोजय विदापिस कथं चिरयतीति महदुत्कष्ठित चेतः। अमितोऽशुभच्छायामिवपश्यामि, मन्दनभित्र विहीति मामकीन मनः। न जाने किं भावि ।" "देव! सर्व शर्वःश विधारयति, देवस्य वात्सत्यमेव एवं चिन्तयति । पश्यन् ) 'कथय देवव्रत क्यं विरयवि युवरामः। देवतः-(प्रणम्य उच्छ सन् ) देव, कुमारमित्रेण विश्लशेखरेणाद धीमत एको विलक्षण शशीयोऽध उपद्धत आयीत्। कौतुरमीतमिव भवति युवम्हादयम् । परिणाममपरिचिन्वती व मतिः, विगतसाषाश्च साहसम् । . अपेतयारया तारख्यम् । ( सम्मुख

प्रथमो निश्वासः
राजश्चन्द्रसमास्यास्मामिः शनैश्शनैरनुगतोऽकस्मादेकरमाद् विटरव्यूहान्निासान्त .
रदंष्ट्र पञ्चाननं वीक्ष्य हन्नुमनावदनु प्रस्थितः, अस्माभिरम्यश्वपृष्ठलग्नेनुगतः
नननशान्धकारे पथविध्युतैरवीक्षितश्योरगोचर एव संवृत्तः ।
विद्वद्वरेण्यनवरङ्गतनूजनुर्यः
सालोचनं विपुललालितकाव्यमालः ।
सश्रीनिवास उररीकृतनव्यरोतिः
शं न्यश्चमद्वरसुधीवरणीयमाद्यम् ॥
श्रीमनवरणरायशानितनुजनुपा श्रीनिवासशास्त्रिणाकृते
चन्द्रमहीपतो
प्रथमो निश्वा सः

द्वितीयो निश्वास: भिन्ना महागिरिशिलाः करजाग्रजान- दुद्दामशौर्यनिकरः करटिभ्रमेण । देवे पराचि करिणामरिणा तथापि कुत्रापि नापि खलु हा! पिशितस्य लेशः। -पण्डितराज जगन्नाथरस उत्कूजन्तु क्टे वटे वत वकाः काकाः वराका अपि क्राङ्कुर्वन्तु सदा निनादपटवस्ते पिप्पले पिप्पले सोऽन्यः कोऽपि रसालपल्लवलवग्रासोल्लसत्पाटय- क्रीडत्कोकिलकण्ठकूजनकलालीलाविलासक्रमः । सुभाषितरत्नभाण्डागारम् अप जातोदये पीयूषमरीचिमालिनि सकलशस्यपितृके जैवातृके, खनिग्रहास्या 'मलकीयं रसायनमाखादेव सत्वरसत्वरमग्बरमदतरति रतिवितारके तारकारे ज्योत्स्नया हिलायामिलाया प्रकाशमाने वस्तुविसरे, राजतपत्राच्छादिते करपटण- मिव वर्षति नमशि, प्रदरं । नायितु पुष्यानुगमिवसेवमानाया', मनुपेयाभिर्दुग्धधाराभि- खि ज्योत्सनाभिः सिच्यमानायां वसुमत्या, प्रपुष्टकरवेषु, सरमु, सअपकदिनी दीपिकासु, रमरमानानमासु च घुमुदिनीषु समाधिमिवादिलप्य निद्रादेवीमाराधयत्सु जनेषु द्विनाः पुरुषाः पर्वतान्तःप्रदेशे स्थिताः सन्ति । महानय प्रदेशः। अमितो लघुलधकः पर्वताः पादपप्राचुर्दवन्तो ये समागन्तुनेत्र निपातासान् वधयन्ति" 'प्ररोरोगः पुष्यानुग न शाम्यते। पक्षे प्रो दरोमयः, पुष्यति मात्रा पलक्षणं तान्यनुगानि यस्यतेन चन्द्रेण नाश्यते। नक्षत्रोदये भयं नस्यतीतिभावः । स्त मापा।

द्वितीयो निश्वासः २५ मध्ये विविधधासविभासी, हरिणरोममृदुलोरम्यस्तापहारी, शीतला प्रदेशः । गण्डशलान् परयन्ती खल्पजला सरिदेका वहत्येकतः । या पावतमध्यमासाबादश्या भवति । पूर्वतः पुरुषैरमुक्तकपुरगम्या दुर्गमा दरत् । मध्ये नितरां सान्दा पादपावली ! यत्र तत्र पुटनिटे' शोटे मधुमक्षिकाः भनभनायन्ते। इतस्ततोभ्रमन्तो दुष्टात्मानोऽत्रैवात्मानं सुसिन मन्यते। पुत्रदुष्ट स्थानमेतं लुप्टाकानां लीलानिलयं, चौराणामाचारचत्वरं, पिशाचाना पसनं, रक्षसामारानं, यक्षाणां भक्षणभवनं, उत्पातानामुत्पत्ति, वराकाधिकानां सिलीनप्रष्टपनगमाचक्षते। विस्मृतसरणिरकिश्चन सजन इतो नाटीकते। अद्यापि प्रयः पुरुषा अनावलोक्यन्ते । निधप्रचन्ते दुशात्मान-इतितु स्थानमेवाख्याति, परन्तु उदालापशुश्रूषा चेत् "पाठकाः पाठिका" निमृतमागच्छन्तु मा नाम नारशिक्षित तान् सुचेतयेत्-मः किं सैविचार्यते। यनितेषु शिलापोटमधितिष्ठन् नायक इव प्रतीयते वयसा पविशतिवर्षों विपुलांसः प्रोसमात व सभ्यवेशो नातिमुन्दो बलवान् पटखण्डेन सेदबिन्दून प्रोच्छनास्ते। अन्यौ द्वौच मुघटितदारीरी सैनिकदरानौ बदटितटी. स्कन्धावलम्बमानकन्धौ, कृष्णाहि- कोशको क्षेयककरी भिन्दिरालपूजितपायों युवानी सम्मुखीनशिलातले समुपविटी स्तः । अधुनको निकटनिझान्निधकाम दिनालीमुभगकटितटोऽसितम्टो पीरमटः । "एदिरे प्रचल। चिरात्प्रतीक्ष्यसे"--"देव, समय एव समागवोऽरम्याशाप्यताम्। "प्रियाः । पूर्व सदैव मलार्यसाधनाय सक्षणाः स्प। प्राणान् संशयशिखरमारोप्य मत्वार्यसाधने तस्पराणा मानुष्पमासादयितुमलमस्मि । प्रबलेन यथोपतोऽस्मि, मन्ये सितायेम पालयेत्, माताप्य नमानयेत, माताप्येवं नविधियात् । प्रवाल-देव! भवत्पादयोः सम्यगपचितिः कदापि न भूता। मुधैव देवो राशि पतिपति। त्तिभुजो पर्य यदि देवमारापयामोऽपि सनिःसार्थम्। वेतनं भलमा बपि दे दिन सेवमहे, वदतु पात्रेसमताना न पाने करिमन्निपातः निरये। यता प्रति महागामो बन्दनपुरेपरो पालोकगनायितवास्तत एवं प्रतिमा शोषम्यनुतिन, प्रवामि ए परमेश र प्रभो सामेजमा मोचनामा मन्मत्रिकुमार सान्तसिहान् मन्दरपुररामसिंदायनेमाटो पनि। दत्सेना भरपेट नही पटरने।

चन्द्रमहीपती
कान्ति-प्रबल। विरमात्मा वाध्मपात् । नाहं राज्य कामये। अभई
साम्राज्यम्। नास्माकं प्रयोजन राज्यवार्तयापि। यास योगक्षेमं रक्षन्नहं या
भासं, ताः प्रजा एवास्माकं विरोधिवचो ब्रू युवदास्माकमेव देन किम् ! रामो
किमम कश्चन नैजः स्वार्थ आसीत् !
प्रबल.-सर्व जाने देव। परन्त्वन्येन कणे फूक्तो बनः स्वार्थ मी नाराय।
भरत, शादिश्यतां कचनादेशः। निर्मगान्तु दिनान्येव नातियन्ति ।
कान्ति-मल्या सह परिणयप्रति कृतवानरिम-इति तु भवता विसर।
मम प्रतिक्षाया, तर प्रारत्ये, वीरवरस्यचातुर्य, सूर्यसिंहस्य साहसे य द्वयोर योगाभवाने
विशयः। भरि सत्यं रोचते वीरवर !
पोर.-अदिवा एकवार्य सम्मल भवन्तमप्र शैलशिलादले समुरिएका
कान्तिा-पानु मायो विशतमेवारते यत् प्रविणमन्ता न मिल पाते।
सर्वप्रधानन्यावसना विशेषतय विश पुन राजकुमार्थासह । बीमामा
रगुन्यूनतोन्यून पदलममुद्रामामावस्यता! भी। कोर! धनताकी
पिक सपः।
11.-! [चित्रमा मिनीति रामनगरनाम्नि नगरे मन
मानुयो प्रा लिनुपनाको मान्यताएरममापराधा विशेयरी नाम ॥
पाम मातुलान्याः रामउमेर मा दुचाकणमर्मपरिष्यत् । वन
THदेश नेम्। प्रच.पीमा म m fr
मराय froभ्ये।
•-वरिष्टयम् !
4.! मान हानीको धीमानate
र पुत्र बतायाः बिस
- पानुहारम् ।
to-महस) मात्र! What artant
एलान । नाम pril

द्वितीयो निश्वासः २७ तत्र किसतालमानन्दसन्दोह सन्दीप्यावसर प्राप्यकार्यमपि सायायामः। नीत्यापिनीय किरपानएवकार्य येनकारि शानिरपि न सम्भाध्येत । सूर्यप्रकलाभ्यो सद्भवन कोशरद अभ्यन्तरालया भित्तिमितिगर्व प्रागेव दर्शयिष्यामि । किन्तु देव । चौर्यकाले एतयोः पाहाय्य प्रत्यमाचरिष्यामि । "या" हाननोपटेऽन्यत्रया यत्रोपयुक्ता भविष्यति-- एदी मिलियामि। मौनीभूतः दिमित्र विचारयति सूर्यविद । पूर्व-किमिव विधारयामि. को देवदतकनुकोटितात् । भतुला मन्यिपुत्रपदवी परिलम्प भाविनी मन्दनपुरनरेशता विनाश्यधुना वीरवरेण्या अपि चौर्यमणिरता, Fram पोरतापा--न्यतोऽधिक लिमिव शोचनीयनवल! सदुष्पमसम्म दिटेन दुक- दुरामदेण भगवान् भारवानपि दीनदीमय शिरलेशनजिहीर, समुद्रोऽप्युग मुरगुरुगुन्गुनये. .मानोऽपदन्य प्रादयेत् । प्रपल.-र्य, तिभोग्यरि पाना पुन्येनात्मनः समितमिर पिसारयति । मनुरा: पर पो शिशितोऽपि पर जाने समविदेशमदमहेण एदीतः । पुनराकरणिध्ममनोहर मिप्यरातमसंस्तुतमेर रक्षा प्रभारिवारिया ने निपुरणामाचाधि যে-ণেশ। v বয়ােখায় অ ধীরে বিলা पर्यास्त। पामग्था सम्पादित पर समगुरमुख पुम्यो की ये twari पुग--ौशाय पति, सारपसन् शिर मा (समा विपति, पर सबnet शत-परामरवदोरमुन्दि । सायम्। - बाल शिम निरमायामि वासिमरीमाईम्। ut माभरणम्। एR.-भार gf चित मार पुन) । मा org मा । - - -- - - चन्द्रमहापता प्रबल - (मध्ये एव) देव । वालोऽयमबहुदशि चास्य हृदयम् । विचारधार मिरर धीरितधैर्य सथएवोत्पथायते। कालेन श्रीमद्भिः शिक्षितो भविष्यति । क्षम्योऽधुना। सूर्यः-शनैशनैः) कोमर्पयिष्यतीतितु समयेन ज्ञास्यते। * * "उत्तिष्ठ ज्ञानमाधेहि। अचेतनावस्थां गतस्य तब दिनत्रयमत्रम्यतीतम्। भर तवाङ्गानि सचेतनान्युष्णानि च प्रतीयन्ते। भगवाञ्छियो मदीयां सेदो सफल पर मिच्छति । निद्रा पहि हि, पश्य सूर्योदयो जातः। पक्षिणस्तवेहशी दशा विलोम सशोकाइव दृश्यन्ते। तएव मम परिजनास्तव पुशलमित्र पुरयन्त भानुरसिटन्छ । सर सात शेन मुखयन् मातेव मातरिश्वा म्यमो मूकः परिभ्रमन् न स्यं लभते । दत्तिय ममाप्येपावनवेला। गौरपि पसंधायितुं हुति। सापि दिनप्रयात्तवेदन स्थिति विलोक्य सपतृणावर्तत, अद्य शप्पोन्मुसा प्रतीयते। गुममि लक्षणम् । मन्ये तर चेतना शीघ्र प्रत्येप्यति। विपाद बाहहि । सर्वान्येतानि तव माल सूचन उहि जादि । करल ? कदात्वं मोचयिष्यसि मातरं पवित्रा भारती भुतम् । मारमान सा दु:सिवन, कलाः। मा मातरं शासनावमानिता विधाः, मा सातव्या ममापने प्रदत्ततिपुत्रम्हपनाहुतीविधता अधिक खेदी। मारामनारहतसर्वम्वान यून - मन्ये एकोऽपि योजनाहरनं केनामी दुन्तिरायकेन नद्या विमइमा दशामा"- "शाइमाग्न मानिने, साम, देवत, कोऽयं बटिल प्रतीहार, निरमा विपरितनगनुनो। "चान्ति भने सर्व एकविलम्ब समामिान्त, इष्यम, स्थानमा বিষয়। নামাখিৰী নন: মসলে সব ময়া এই कौरवोपराधिमा हिय कुटीर समनीतः। दिनत्र तौलमय श्रीमान पेटना मो-दत्यानादितं मम मनः। सुन पयोहाण, रियर मनट"अप्रलंवर पयोमुने दाता महामने थे। दुराम मुन ददय स्यैः पयोमर, महामना पनेर रम्य मोर मा सम्भो। मारमना माह द्वितीयो निश्वासः २६ स्शनमयितुमारेभे। यूनः शून्यापु चेतना प्रासार्षीत् । मनोरमोऽयं प्रदेशः । सर्वतोऽनन्तराल स्थितानो निम्बानो मित्तिरिख भाति। मध्ये च चतुरस्रो पासविभासी प्रदेशः। एकत एका खच्छा रम्या कुटी। धवलपाषाणखण्डबद्धश्च कुट्टिमम् । सम्मुरो च मुटीद्वयम्। एकस्य हिमधवला मांसला वात्सल्यपूर्णाधेनुः सम्मुखमीक्ष माणा स्पितास्ति। पार्श एव पयः पानं कामे पाणी, भाम्रपलाञ्च दक्षिणे दपत् उपपष्टिवयाः विमलधौ यदीप्तप्रभा कौपीनवासाः स्थितोऽस्ति । युवचेतसि शनैः शनै शेतना प्रसूता-स्मृतिरागन्तुमारेभे, ते स पुनरुध्यो पयः पायित्वा शाययित्ताच कालानः "अधुनाई खस्योऽस्मि, कर्य कैदशन्दराभार प्रदर्शयामि-नजाने। युभुक्षा पाधते. शौचामित्य युभुक्षामि"। "नागरिकजनवदाभारप्रदर्शनं नावश्यर, पार्खएव शौचाग्निमृत्य कवोष्णजलेन नास्वाऽगच्छ, सिद्ध पायसं तवोल्लापायालम् । "सत्सु समेषु लेनवोप्यपेयादिषु महापात्रा नेहगानन्दोऽधिगतो योऽय कदलीदले प्राप्तोऽविरतस्य पायसस्य भौजने" -क्षीरं प्रसत्या लिहता यूनोचे । "एकान्ते भगवन्तं भजता मयाप्येष भानन्दोऽचैव मनसि मूनीकृतः अस्तु, अधुना व स्वस्थोऽसि, जिज्ञासा च मामाभीण्येनमुखरयति, कस्त्वम् ! कथमित भागमन कशी दशा तष। "देव! मार पन्म प्रदानुर्भवतः सम्मुख नाई मिय्या पदिश्यामि यतासी जिज्ञासा बर्तते थे च्यू पवाम्- "अद रामनगरपतेः श्रीनवेन्दुवर्मणः पुत्रधन्दोऽस्मि यदि धीमतः कदापि कर्ण- मरशम्। मम युवराजमहोत्सददिने मम मित्र मधमेकमत प्रादात् । समधमारया- रोटा मित्रैः साद गतरानासम् । सौभाम्येनानायासमेव सिंद एकोऽभ्युपेतः भय एभरातमिदं युवराजमहोत्सव-इति विचार्य उमन्वभावम् । परन्तु स बन्यपणुः समता रानि यापयित्वा वा िमलीनः । समखरात्रिश्चादनेनयोग्य नितरी धान्द्रोऽभूवम् । षश्रय स्वेशात दपुः प्रकम्प मा मामीन सक्थि- दुगधारभेदभावं भजदिन प्रवीस्ते स्म। परन्नु माधमप्यचादवतीर्य- - -- चन्दनाय निब- माना तुम्बी ॥ केवलं जलसिकमङ्गणं, शरादे धूपमन, दीपालर चन्द्रमहापती मानः दानः पदातिथलनमभ्यस्य मिति स्थान प्राप्तुमच्छम्। पार्व एवं शिडका मपश्यम् । शिवालयो शहे निलीन मासीत् । प्रवर्षगेन तस्यरानः पन्न भासीत् । शिसालानोऽमनो लोहदण्डो यस्मिन् कदापि घनः समुच्छितो भने च्छून्यता विभत्तिस्म। कवाटमेग्मेवासीत्तदपि मन्नं दधम्। अन्दा म पत्पीछे शिवमूतिरासीत् । शिवमूतिदिव्या धोविमवविभाव्या भया। केनापि शिवभक्तेन महात्मनान रहसि बिल्वव्यूहेनिकरे निम्बकदम्वे धनुरपूरेऽभामा गरे शस्य शस्यप्रशस्ये स्थले स्थापना कृता भवेत् , परन्तय मन्दिर म स्याभावभावयति स्म। मलिनं तूल भग्नो दीपः, अक्षताः दूर्वापुष्पाणि च कमपि पूजर्क सूचन्तिन। कोऽपि इतः कुतोऽप्यागत्य कदाप्यचति-इति प्रतीयते स्म । काष्टखण्डमेकरयां भग्नकुण्डिकायां पतितमासीत् पूजनाय अमार्जनात्सर्वमवकरकूटं शैत्यान्महती दुर्गन्धिर्ता प्रसारयति स्म। भित्ति पर पिसुदृढासु पल्ल्योनिश्शवमयन्त्य आसन् । मन्दिरस्य पाछेराप्येका विद्वांसोदर परन्तु कुट्टिमहीना पान्यानां चुलीधूमेन कृष्णीकृता दीनावस्था वन्यपशुभूत्रिका नितरां नाऽऽसीत् । नितरां भ्रान्तो विश्रममनिच्छन्नति वन्यपशुभयरे वने गमनाशशरीर कयङ्कथमपि स्थानं विय सुप्तवान् । परन्तु निद्रा द्वताऽऽसीत्, चिरान्वेषणेनापि सा नापि हिन्वन्ततोशादि शैथिल्यमभजन् । शरीरध निद्रा सर्वख समर्प्य सुष्वाप । प्रवल्या हेपया मम निद्रा भना। सहसरदिमः प्रकाशते स्म। मया ( यदेक पञ्चाननो ममावस्य पृष्ठ विदारयति। यावदहं सद्यएव कृपाणं निष्को विरार समोऽभवं स वृशान्तनिलिये। पोरं वनं, शिथिल शरीर, चेतनाहीनानीयजानि अवश्च मृतः किमधुना करणीयमिति विचारयति मयि पुनः स दृष्टिपथमागतः । भहमधुना रक्षणार्थ मार्गमन्वेष्टुकामः शनैशने निष्कोपकृपाणकरोऽवलम्। अहं होरेप पाच एव रावेगं प्रवहन्त्या नद्यास्तीर भागतः। पूर्णपोयूपसानीयां नदी, परितो हरिद्वार पादपाः मुरभिर्धनिकोपवनपदनः सेवमान इतस्ततः सचार। अहय कणेहत्य पीत्वा भस्मादेवायल १ द्वितीयो निश्वासः ३१ समधुरमधरीकृतमाक्षिके शुशीर नो प्रस्प्रचुर पादपतले शीतलमुरभिसमीरणेन समपनेनुं समुपविः इभालातमिच्छवि शकुनिकुले, स्वेदविषो वियति मातरीव मातरिधान, सीगण इव पादयोः पतति दूर्वा विसरे, प्रतृवित सगलयन्य मिलत्यु दमशायाम तरीव छाय कृत्वा यासाः शिरः स्पृशतिपादप, प्रियायामिव परिजनरायोचाद- मलत्यो सरजमस्थायोत्याय लीयमानायमित्र नयाँ मया यत् स एवं पैदः प्रलम्बया जिह्वया कराले ट्राप गर्जनेन व भीषयमाणो ममाभिमुख सत्वर त्वरमागति। तस्य मुखमुद्रया स दृढनिश्यः प्रतीयते स्म। परिस्थितिजैटिला ऽसीत् सहसान्तर एव सिह भासीत् । अहं निमिषेणैव पद्धपरिको युयुत्सुः सञ्जातः । सहः सत्वरमागत्य मुखव्यादाय अप्रपादाभ्यामाहन्तुमना यमा प्रचलति, तथाह युद्विमः कीटनेअहो निष्कोश करवाल तन्मुसे प्रावेशयम् । आहतोऽपि स यत्र तत्र साधावेन रसमाप्तावयत् । परन्लन्ततः अषदको निपपात अहध शोणित पुपरः प्रशारनाय नदीतीर गत्वा यावजलमाहामि सावदेवावयो युनजर्जरीभूतं अन्तई तमदं नदीतीर मयासहेव नद्यापपात । महध नितरोधान्त आसम् । परन्तु मृत्युमीत्या नियमाणेष्वप्पो चेतना व्यास, सम्मुखेस काटपालामेकं जयोलमान- देतनारयायामधिगतवान् । पश्चात् कि जातमित्यई न जाने। अधुना देवः स्पष्टयनु, यत्कोऽय प्रदेशः । कियडू थे तो राजनगरम् ।। "पुत्र चन्द्र बहूनि पानि विषय जीवितेशस्य द्वारमिवाप्य प्रतिनित्तोऽसि । दन्द्वयं नदीप्रवाहे काटपट्टे व्यतीत्य अद्यत्वां बीवन्तं दृष्ट्वा परमानन्दमनुभवामि । पार्व एव विमलपुर विद्यते यत्र भूमहेन्द्री जगत्पालो रामपालो निवसति। एतान्युपदस्त दर्शनीया युपवनान्यपि राजकीयान्येव । स्वस्थतामापद्य प्रान्तमिमं निरीक्ष्य शीघ्र प्रतिनिवर्तन। त्वदीयौ पितरोन जाने की दशामनुभवतः।" "विमलपुरं रामपालमहाराजस्म विमलपुरमिति सावर्य सांगुलीन्यास सोकण्ठं मणति चन्द्र "" "t" इति मदन संन्यासी खकार्ये लमः। * *देवि ! कात्वं सौन्दर्यसागवयवा यवाइनासा, नववपशोभिता तन्नी नवमालिकेष "श्रीमन् , ३२ चन्द्रमदीपनो सजीवा, सविधममिततः पश्यन्ती परिमिा कुर्वन्ती अभिरामताविपशुओं द्वारदेधिन कस्य चेमुवानम्। मित्र स्थान प्राणु शस्यते " मनोहामुननिद जितारेवारेश्वरमान्तिकीत रसो नाम प्रियपुयाः कमलायाः। पत्र प्रान्ते भ्रमन्तः पुंसशिमोऽयुग्रुप्यन्त, तत्र माई दृशा विक्षिप्तकामिन्यः सारीरा व कमा वामाभिरामाः कर्ष समेतः। यदि कर युप्मादृक्षाणां प्रमगं धूपेतोपोद्यानं तदा निता पतिः कारायान् । अतोऽस्नारगड ज्झटिति तथा यातव्यं यथा कोऽपि दृटिमति न क्षिपेत्, मानित। क्षन्तव्या चेयमनपराधिनी परवती कोतदासो.......... "देवि, खदीयो भाषणभट्टीमाकर्ण्य पुनःपुनर्भवति चेतस्त्वयः श्रवणाधीरम् । परत नवयं कस्यापि निर्दूषणस्यापकाराय।" "देव, क्षम्यतामपराधः, देव थाक्त्योचकुलो देवदुर्विराकेन दुखत्यः आशाप्यतां का चन सेवा।" "अहमत्र नवीनोऽस्मि न कमपि जाने। कचिन कालमत्र स्वत्यापयितुनिन्छ त्वं यदि मस्कृते स्थानमेकं व्यवस्थापयेः, आजीवनं स्मरिष्यामि।" "भगवन् , निकट एवैकस्य घनिनः प्रोच गगनचुम्नि रम्यं भवनं विदई । कमलोपवनसान्निध्यादधुनैतन्नव्यवहत्तुं शक्यते। केचनैतद्भूतावासमपि मन्ववे। पर भवनं सुभगभोग्य योग्यमस्ति । अभितो रम्या वाटिका। दक्षिणत भावनिर्मज वापी पीयूषपूर्णा । वामतच निपुणनिमितो लीलाशैलः। मध्येच रजपपारिता राजोचितः प्रासादः। श्रीमद्भयो यदि रोचते विधम्यतामत्र कश्चित्वालम्।" शब्दशास्त्रान्धिमनानां जलाविष्टुतचेतसाम् । कृते द्वितोयो निश्वासः सोऽयं चन्द्रमहीपतेः।। श्रीनिवासशाखणा कृते चन्द्रमहोफ्तौ द्वितीयो निधासः ।

--- -------- L तृतीयो निःश्वासः एताः स्खलद्वलयसंहतिमेसलोत्य- मवारनूपुरपराजितराजहंस्यः । पुर्वन्ति कस्य न मनो विवशं तरुण्यो विनम्तमुग्धहरिणीसदशः कटाक्षः ।। भर्तृहरिः मध्ये त्रिवलीविपधे, पीचरकुचचत्वरे च घपलदशाम् । छलयति मदनपिशाचः पुरुष हि मनागपि स्खलितम् ।। त्रिविक्रम भट्ट उद्वेगमहावर्ते, पातयति पयोधरोत्रमनकाले । सरिदिय तटमनुवर्ष विवद्धं माना सुता पितरम् ।। पाणः अपहस्तितान्तरायानर्थानुररीकृतान् प्रसाधयतः । विधिरपि बिभेति तस्मानिरतिशयं साहसं यस्य ।। त्रिविक्रम भट्टः मत्तेमकुम्भविदलनकृतश्रमं सुनमन्तकप्रतिमम् । यमलोकदर्शनेच्छुः सिंह बोधयति को नाम ।। "मया श्रुतं यद् राजनगरं प्रति मुद्रा प्रेषिता, अपि सत्यं, मनोरमे।" मनौर-ललिते ! श्रुतं तु मयापि चन्द्रकला खात् । चन्द्रकला -मामपि तिलोत्तमाह। ललिता-का तिलोत्तमा ? चन्द्रकला-सैव मन्त्रिणः प्रमुखा दासी। "किमाह !" ललितया सोरकण्ठं पृष्टम् । LATE- --- - २४ चन्द्रमहीपतो चन्द्रकला-एवमाह यद् राजनगराधीशपुत्रेण सह प्रतिक्षातचरः समाविकार विवाहयोग्याच मां वीक्ष्य कमलापाणिपालवं योजयितु तिलका प्रेषितः । ललिता-ध्यते यत् सौन्दय स साक्षालामः। केचन नाशिताशेषोपवं प्रभा मप्तक व्यसनेषु विक्रमिणं तावतारमर्जुनं मन्यन्ते। परे च मुसमुद्रया बगदानन्दपन्न भगवन्तं चन्द्रमसमाचक्षते। इतरे चाप्रतिहतशक्तिया जगदमलविनाशनिरतं मर व्यायक्षते। यस्य पिता प्रबलप्रभापरिभूतभूतगणः कथं न स्यात् तस्य पुत्रोऽपि प्रताप परिष्वरिपुपूरः, रस्य पिता द्विधारधारासमाष्टशसीमन्तिनीसौभाग्यः कर्य म सार तस्य पुरोऽपि विजयवाम दक्षिणभुअलताभूषितकन्धरः । मनोरमा-तरमा कमला कि रवेन्यूना ! अलब्धामरशरीर मार मत्येवेभिः गटा, वासन्तपुष्पविकासनीशशहासा, श्रिय, माधुर्य, वात्सल्य प्रेम ययोविभ्रममुद्रमन्री, 'प्रसिदा सगत्या, पगगभूता प्रमदाना, अपचितिश्वतोमवस्य, संसरण हावाना क्षेत्र मोहिन्याः, अवतसमता सौन्दर्यसरर्सनम्, निश्शेषत्रलालमा, निरतिशयमोऽमापा, शश दुरट, दुम्मोत्याहा, विखितहमितविधिया, आपूर्णा प्रेममकरन्दैन, निकि मन्मपमहेन्द्रश्य, अधीश्वरी मुरभिनिधनाना विलासरादनाय च, अधिन रायभावान् मनिशान्तशिरीपामुमामार्दवे, गुवर्णवर्णा, उरग्यला मलनिकया, अभिरूण गुगमा प्रातस्या, परियेकानन्दाम्भोधः, अनुगाधिगुन्दरी कमला कमिव प्रेक्ष्यते । पर बहसकणगरफचरणपा. समावरवालभारमितीयतयाय, अपित पितरटीशरमानुरष्टवरणा सतारोधी दुर्गव, जनप्रिया रामभिरमा बनेक, য়তিবন্তিয়মান, সহবীথিনী প্রয়শা হলুণা rিg रुमामा मुख जगदमिरामा, प्रमापितशिरोमहा मिमिवरमरम्प Hre न्दुिभूमिया, मिरीनयना, पENTar. खनिम्म्मरचरघुनीदर, नमुनुवामिद शारदारवा. HTTTTTTET felmar. प्रेम

तृतीयो निःश्वासः
एनामुत्पाद्य सजातो विधातुः सौन्दर्यरवनासम्भारनिधेः कलाकलापस्य च क्षयः।
किश्यामे!
श्यामा-रते कि साम्यं कमलया। साउनास्य वनिता कोकिलाली मनौमन्दिरा ।
एषा व विश्वविदितवीश्वरस्य वरा अनिता मनोरमाससी
कदामी मुमगः समयः समेप्यति, चैत भानन्दस्य चामग्रीमानमापस्थति, यालयामस्ती
रत्तकारणनिबदमणिबन्धालतवालंबतइस्तवला परिमिताभरणा सविमं भ्रमन्ती ।
कमला-तिरत ने युप्माभिः सहाक्रीडमेप्यामि। प्रगमभाषिग्यो विरता
भद। यात..
मनोरमा-चन्दकले । यतः प्रभृति सं युवानमेषाऽपश्यद् विमनस्कान वापि ।
लभते। विलक्षणशासीदीधरप्रेरितः स युवा। मामकीन मनोऽपि तस्मै हर
स्या रहस्या सोऽस्माकं धनिरामबालमेव समागल करालदंष्ट्र गनरूपवन माय
पधानने पसलमगमयत्, साधारणशशिशुमिव समकोडयद् वस्तुतः प्रशंसनीयो विव
चन्द्राला-युवा तु सस्पीयर्माऽसीत् । सरलया निर्भयया गया सिरप
रिदाय "अनुमामी"सुरवारिसो एयरत प्रतिनियर यदि स र
पातु मलास्टहा मानुपयुकार शश्यते. इतर मुजैनुस योग्यतमः प्रतीयते ।
मनोरमा-परन्तु ममाया पादान यशर एए सातम्, भार्यकन्या थ
प्रदीयन्ते।
अपामसभात्यानयनातिनि, अपपुरस्सरे समाजिनिति भगवति गमस्लिम
। उपेता गमकोला गन्तव्यमुहारीददलनायेति दिराव विपिस्चयचुए पर
मसफदिप मुसमन्तापा, प्रहरिपमयेन प्रा. संध्या रिप
पधिमा पिसाराति मन्दतिविपनास, सरोजराविषसोपानोपान
। पदान्दिन,
पूतिमरिमुषपुष्पसामन्तरामु तमन्टे, प्रामा
युनोलशाले योऽरणधिनादीभिमाईदा गाद भर
. हरविसरमा
समास कोविनिमयभूमिपम्। सरदर महाराहाय
देरे पास प्रमभ्रमर पलनम्। बरेच सारास

4E
r
चन्द्रमहीपतो
मुकलिताः। श्यामले दुर्वास्थले प्रमुतास्लुहिनमणी चतुमिव बालभास्करस्वामिनका
किरणावली स्वर्णरेसेव विशदनीलाम्बरतो हसन्ती विकसन्ती नीवरक्तरति स्म ।
निकुञ्जपु वनेषु वसतां पक्षिणा दिनेशागमनजयशब्देनेव विरावण मुखति
वभी विधम् । चेलुश्च ते प्रणमन्त इव विहायसम् । विकासमाज उपयमसुमनसे
विटपाश्चानन्तानन्दसुधापानाय प्रतीक्षमाणा इवासन् । विविधकुसुमानां मादकेनामदेव
कोणं कोणं मुदितम् ।
मनोरमा कदम्बकुसुमस्वबकं ललितायाः सीमन्ते न्यस्यन्ती तस्याः कर्णे पूझार।
सा च तां पुष्पसजा तताड। श्यामा च न्यायाधीशतां सम्पद्य पक्षविपक्ष शुधव
चन्द्रकला च प्राड़िवाकोभ्य वचो विचित्रयुक्तिभिरयुक्तमपि युक्तयितुमचेष्टत। द्विीप
कुसुमकरा कमला मल्लिकावल्लरीवितानेवलिकेलिलीलां पश्यन्ती, मञ्जुमरीमन्डि
महीरहमण्डपेषु पुस्कोकिलान् प्रेक्षमाणा करकनिष्ठिकानिष्टयोमिकया दीप्तां कुसुममा
तर्जन्या लोलयन्त्यकारिनी भ्रमतिस्म । शीतलसुरभिसमीरविलुलिता तस्याः समयमा
कुरितकुचिता महणमसणा स्नेहवद्धितालकावली सपिणीव नितम्वेऽवरोहन्त्यापार
प्रसताऽऽसीत्। सुवर्णप्रसूनाऽलक्ष्यतन्तुसंयोगा नवनीतनिर्मितेव मृदुला तयार
वायुलोला काठिन्येन संवियते स्म । क्षणमव्यक्त कण्टेन कूजन्ती सा स्फुटं जगौः-
कुड्मला दधति च्छविं मातरिक्षविचालिताः। (स्थायी)
SU
मा
ध्वनिनामुना सर्वाः सख्यः सखीभूताः क्रमशो जगु:-
मनोरमा०। योगिहृदयं कामिनीना लिम्पते योगावरम् ।
पुष्परते योगतो मस्तो हि भूता गन्धिताः।
चन्द्रकला..
चम्पको यकुलो सालो मालतीगणिकागणः
चन्दनोवरनीरतृप्तचेतसा हारीमतः।
वायुलीना पुपातिभिन्नवर्णमनोहरा
पत्रमध्ये राजते कान्तेय कान्तविमदिता।

तृतीयो निःश्वासः
३७
श्यामा।
पूर्वसंयोगे यथा ललनामुलं परिवर्तिते
मधुकरेषुपतत्यु सदद् विचलिता उपवनलताः।
भईफुल्ले पन्दे नीरज शतपत्रकृत्
श्रीनिवासोदेवरन्दे शोभते दापीस्थितः।
*
एसनी, धनीकिनीय कामय मला, एकस्या निम्बाम्रोदुम्बरकदम्बजम्बू-
जम्योरपोभितार्या, बलदलबलकुदलायो, फर्कन्धूयन्धूम्वन्धुरामा लोललवाललितायो,
माणवेतशिलायां कमलकमले मानन्दमुपविटा कमलेश राजते ।
मकामादेको मधुरोऽयधावनध्वनिः कमलाकर्ण ने बदलीचधार। सा
क्षणेने विरोभूप ध्वनिः परयाः दिशः सभेतीति निधिलापश्यद् यदेका रवेशा
पदपूजा ऽधमारूटा गुरिणमवे भावयति ।
कमलाऽऽद्धनिपुणाऽऽसन्। सा तस्मिन् सान्ध्ये मुभगसमये मनोविनोदाय
प्रोमा बखेटदेशमायोज्य स्खीयममारा सामन्द प्ररियता।
पन परिणममुगन्य पूर्वमेव हन्तुमना इतगत्माऽयचालयामस। मनोरमापि
तामेकाकिनी गन्ती रारामारदानुगसार। कमलैच्छत् यत् परपपेन पूर्व
गत्वा हरिण निदत्यना समिष्यामि, परन्तु मार्गान्तरणनेन समयोप्यतीतः।
हरिण प्राप्प पश्यद् यत् स जीन्ने शरयते। बमला पर शरउन्न
भोप साशि सतीत्व विसर। परन्तु सय पल्मपत् ।
हरियापदात समात्य पतित । कमसर ये साबिसमन्यव स पुरषोऽस्ति
परिउन्नरोगनेनारद मला एच सवा प्रतिशोधमनिस्टर टप
भिम नमसरवरे ला पणे प्रक्षित् । अरसामुनाऽऽपातेन
तोता मला भूमिगरियामा पर
घर सचर कमला
मुगारमन् शिउपरो विमानोर विरति दाव परतन

सच हरिणशिशुना सहैवावमारह्योत्तरमप्रतीक्षमाणो यथा प्रचलितस्तथैव मो. चन्द्रमहीपतो ":! त्वमसि वीर! अरमार्क सिंहात्ताताऽनादांसितपुरस्कारः....... अन्माद वयितु नोवेशमिवापायाऽत्र नमसि" "नाप्रवचना, भाज्ञापय तव कामर्चनाश्चरामः। पिशासिताचेबलमानयामा मुट चेत् फलान्याहरामः। क्लेशिता चेत् क्लेशमपनयामः। मन्ये कापि देवी व ही भ्रमणायावती।" "कस्त्वं पौन:पुन्यनेषु दिनेष्वितोऽवलोक्यसे?" “देवि! नाहमस्म्यैतद्देशीयः। द्विवैः सप्ताहैः धुमाक्षरन्यायनेठः समागतोऽलय निवसामि च पावें श्रीसिद्धेश्वरदेवस्याश्रमे। मनोविनोदाय कदाचन विमलपुरं कवि । वात्सल्यपूर्णेन देवेन सहयोगी हरिणशिशुरय मा प्रदत्तः। मार्ग एव श्रीमत्या माने विद्यतेऽतः श्रीमत्या दर्शनं द्विनिर्जातम् । यदि कापि त्रुटिश्चेत् क्षन्तः नवीनः। अधुना देवस्य सन्ध्यावेला विद्यते, चपलोऽयं हरिणशिशुरितस्तो प्रति अतएनमप्यच उपवेश्य शोघ्र यास्यामीतिबुद्धपाऽहमेनं ग्रहीतुकाम आस पर श्रीमत्या बाणेन व्याघातः कृतः। अधुनाहं श्रीमती प्रसाद्यानुचितावरपाय यामि" रमोपेता। कमला चान्वश्वारं पश्यन्ती स्वन्धेव तस्थौ । "कमले, स्पष्टं कथय युवयोर्व्यवहारेण किमपि ज्ञातुमनुमातुच शक्यते" मनोरम चे। कोयं मनुष्यमात्रनिषिद्धमानोपवनप्रान्त निशमध्यास्त। विचित्रोऽसि, अशी लक्षण्यमापादयसि, लं यदि देही स्यास्त्वत्कर्म कोऽनुमा शक्नुयात् । प्रातविवाहवार्तयैवार्ता सखोः समवारुषत् सेव कमला धैर्यधस्मरेण स्मरेम लक्ष्यीकृता ! स्मर! स्मर्तव्यः कृतोऽपि पुरभिदाशेषे जागपि जगति । हर्षेऽपि विष भवति सौन्दयेऽपि गरलम्। तव दर्शनसमकालमेव यूनोऽस्य प्रवक्ता चातुरी भग्ना, कठोर मनः सुन्दरीदर्शनेन द्वतम् । तोमतोमसहमपि वपुर्वपते स्म करिकरकठोरोऽपि करोऽकपत कदलीदलमिव । य उलूईमान केशरिकिशोरमा भूमिशायिनं य्यधित स खां प्रेक्ष्य सिलदारः सञ्चातः । येन कदापि गजेन्द्राम विदारिणो हरेः पृष्टमप्रणाय न मुकं स एवार स्वेदनातस्तवापराधमान त्वामेव क्षमाममिझता . तृतीयो निःश्वास: - जाने विलक्षणोऽयं स्मरखस्य लीला। अस्येव कृपया मोहिता दत्याः सुधां विहाय मर्थ पपुः, भगवान् विष्णुरपि तुलसीप्रेमपिपामुछ रचयामास, कृष्णोऽपि राधा- पादाराधनाविरं विदधे, मोहिनीमत्तदिशवोऽपि विष्णुधिरविखेद, परन्त्वज्ञातकुलखभावे नवीनेऽस्मिन् यूनि तदीयो भावोऽनुविताचारता प्रष्टयति । कमले । लीना सि!" सा चानुत्तानपश्वमारोह। * . . "अमात्य कमलाऽनानन्दितचित्ता, शुन्यमानसेव सालसामना, शक्तिहृदये। प्रक्षिप्तनेत्रा, कोणे पश्यन्तीवालन्धनिद्रे धान्यमनस्कैव वर्तते। केयं दशा पुत्र्याः। परिणयस्यावस्योपस्थिता। यश्चैतस्यै स्थिरीकृतो वरः सोऽपि न लग्धः। मत्समीप । नाधिक तिष्ठति, प्रातःकालिकं वन्दनं विधाय भीतेवापसपेति । ह्यस्तु कमलाऽऽयातैव । नहि, श्रुतं तस्याः शिरोसिविद्यते। किं करणीयम् । खिन्नोऽस्मि" उच्छसता राज्ञोचे । अमात्य --"नहि देव, शान्तं पापम्। जाने विनयशालिनी तपखिनी मुग्धां । कमलाम् । पयःखभावोऽयम् । यदि कश्चन व्याधिः, सम्बन्धेऽस्मिन् सर्व विमृश्य । सूचयिष्यामि। -- * । अयं विमलपुरसंसरणं पुनः पताकाभिरवीज्यत । पुनः सैनिकावलिर्जनश्चिकितयामास । पुनर्नारीनेत्राणि वातायनेभ्यो बहिनिपेतुः । पुनरुत्सवकोलाहलो दिगन्तान्मुखरयामास । पुनर्वकुलगन्धो प्रमरानभ्रामयत् । पुनर्वाद्यानां तडतडता जगतो नीरवता बभन्न । अपराहकालः। राज्ञोरामपालस्य सभाद्य जनसमुदयेन व्याप्ता वर्तते। राजकुमारेण द्वन्द्वयुद्धे सिंहो हतः, रालोत्साहवर्द्धन रत्सवः। अस्मिन्नेवोत्सवे धानुष्काणा परीक्षायै निवत्तिक एकोदोपः प्रज्वलयिष्यते। यः कोऽपि पानुष्को मध्यमा वत्तिकामपहरिष्यति, अनिर्वापयन्नुभेस सविशेष पुरस्करिष्यते । अथोच्च स्वर्णसिंहासनासीने राशि, दक्षिणतश पीस्थिते राजकुमारे, राजकुमार्या कमलाया, परित्तश्च यथा स्थानं स्थितेषु मान्येषु समुपस्थितेषु च बहुषु धानुष्केषु, द्वास्थः प्रविश्य विजयं व्याइत्य "कश्चित्स्वस्य धानुष्कता ख्याश्यर द्वारदेशे तिष्ठति, अग्रे देवः प्रमाण" मित्याह ।

Iोही शेयी नागरी
चन्द्रमहीपतो
"प्रवेशय"-दत्ताशे महीपतौ प्राविशदेको युवा।
युवासौ महाजनीतिपुलोद्भ ताखिला ज्ञवेजखी, मुरभिबिष्ण कुशल
लौलविलम्मिभिः कनिचितशिरस्कः कटिलम्यमानद्विधारः सिंह व निक
रमणीयोऽस्ति । यस्य प्रलम्पसर्गपट्टामीचन्द्रशकलानुकारी, ललाटपटः परता
मेपरसभामुदबान्धवयन्धुरं मुरा, ईष्टुभिषच्छमधुरुतरोधः, विस्तृते गणे, मसिह,
न्नता प्रीया नासाय, विमार कोऽयरी मांसलोधी, परिणाह पीनमुरः, सरपुर
करिकरापातसह सविथयुगल महत्ता सूचयन्ति। सभासनिमारवीरनिनिर्भिताया
व सप्रेम प्रैक्षिा राजेऽपि परमरम्येऽस्मिन् यनि स्पृहस्पती निपपात टि। -
सपोरालय:-
महाराज:-पोरवर। पुतः समागमनम्।
दुरा-देव, मुरमरमन्नगरं राजपुरम्। पुपारन्यायेनेतः यमागतोऽसि ।
भर पान परीक्षायोजनस्य प्रत्यक्षानन्दानुभूत्यै रामागतोऽस्मि ।
महा.-न्ति मान!
युग-देश पर
महा-मामारित पर्व करिमन्नति कायें।
दुरा-मा मगर
महा।
-अपमा
मानयते मग
•
-गति वियोम।
महा-(धमन) दाप।
भन्दो मा पा ML RATEEAt Taimer
द, मो. प्रशान्य भागन् । प्रदर
कर दोन त समेत काल

तृतीयो निःश्वासः महाराज इंङ्गिटन शशधरमसूचयत् । धानुकै सेयं सात बौक्षित एषलधीयसा हस्तेन शासनमाकृष्य शरं व्यसृजनिखापयच मध्यमा पत्तिाम् । महा.-धन्यो धन्यः । नितरां प्रसीदामि । युवासौ विलक्षणो विचक्षणः । शशधर। नियुचरत्वमय मृत्यः। सभाभवने तवोपस्थितिः प्रतिदिनमवश्यम्भवेत् । कोशाध्यक्ष प्रतिदिनमस्मै शतं मुद्राः प्रदेया, भय पुरस्कारभूताः स्वर्णस्य सहसमुद्राश्च । "देवस्याऽध्याऽहमपि किंचिद् विवक्षामि तुष्यतु देवः"-उत्थाय राजकुमायौंचे। महाराज:-आम् आम्। कमला--श्रीमते पूर्वमेव निवेदितवत्यस्मि यदहमेकदा प्रातरेवोपवन गता पञ्चानन- प्रैक्षिता प्राणाय साहाय्यमयाचिषि, तदाऽयमेव युवा कुतोऽप्यागल मामरक्षपत्, अदत्त- परिचयः पुरस्कारानभिलाषः साधुवादमप्यगृहीत्वाऽपसृतः। स एवायमद्य धानुष्का- परीक्षायां प्रथममायातः सविशेषमस्मामिमन्तव्यः। श्रीमतामाज्ञयाऽहमस्मै प्राम- पवई पुरस्करोमि, प्रार्थये च यदयमेव पीरो मद्भवनस्य प्रधानव्यवस्थापको भवेत् । महा-अह मनुमोदयामि। भवनस्य द्वारशाला शशधरस्यावासःस्यात् । "कमले, केये दशा, क्वापि शान्ति न लभसे। सर्व दिनं सर्वा विभावरीध विचार एक व्यतियापयसि । सावधानं न रणोपि, उत्कण्ठितेव दरीश्यो। भाकारः कम- प्यालरसि हससि, उपालभसइद । प्रातः ससोभिः कथं कयमप्युत्साहिता ताभ्यः संवृत- गुसेर "कोलाहल श्रोतु मोत्सदेते थोत्रे एकाकिन्येद यास्यामगुएनमिति" ध्याउनेको पानमुपैशि। प्रतिक्षणं विचारपयोनिधौ निमम्मेव प्रेयसे। कौशिकीव सूर्यातपाद् निभेषि थन्दिकाचयात्। मुसमये मशं दयसे । पानुनयं निषिद्धापि दिवा स्वपिपि, सने इससि. अपराभर मिपि पक्षि भित्तिचित्र रिमप्यालपसि। रात्रौ भ्रमन्त्री तारागणयन्तो किमपि प्रलपसि । सलग्जेर श्यते कपोलपाली, शुको बिबाघरो मदरनालसेर दनुलतादु गौरवम् । स निरुपय केय रिपतिः कमला नदि नदि। भ्रमाभिम्तालि मनोरमे, तुपरिवर्तवत्रन्देयमरूस्थता, रान्याको विशेषः। .मनो-आने, महे श्रीमत्याः सहस्मि। शिवत एव भवत्सः मनोदर्शा - ४२ चन्द्रमहीपती मनोव्ययाच सम्यग् बुध्ये। नेशनुपखितनं कदाप्यनुभूतम्, विश्रब्धं स्वय क्यासक यतिष्ये । अहमप्पभिन्नप्राणा एव । सूचय किमस्मिन् यूनि तव विशिष्टा स्टहा! कम-जाने नहि का स्पृहा नाम ! किन्त्वेशा मधुराऽनभिव्यका श्रद्धेष तस्मिन मम वर्तते। गर्दिनेऽहमुपवनं गता दीपिकायास्तटे शिलातलमुपविध किपि विक- रयन्त्यासम् । पाल एव मदीयः प्रियः सहचरो हरिणशिशुरप्यासीत् । अहं शिका मनो विनोदयन्ती जगनालेन विश्व्यं मानसं सान्वयन्ती कदाचन तं हरदेन पर- मृशन्ती, रोमराजि निपुणमीक्षमाणा, दाडिमीबीजाभां तस्य दन्तक्ति गणयन्त्याउन् । मन्दं मन्दं मारतोध्यतेस्म। सान्ध्यगगनस्य लोहित्यं दीधिकाशं सिन्दूर द्रवस्य भ्रममुत्पादयति स्म, पवनप्रेरितेषु दररेषु शिशोः प्रतिमूतिरनुमेयो कान्ति प्रकटयतिस्म। नितरां चञ्चल आसीरिणशिशुः विचित्रा च ममावश्या। अहं दीपिकालेन प्रतिमापूर्य हरिणशिशवे हरिणशिशवे पाययितु प्रत्ता। अकरमादेर मम दृटिः सम्मुखीनसान्ध्यशकुनिकलरवं प्रति विदूरीभूता। शिशुश्चायं केवल प्रतिदृष्टियांदने प्रासरत, तावदेव स्वलितपरयो गृहीतोदीधिकया। शियोस्सरणशक्तिदुर्बलाऽऽसीद वापभिसिव पहिरयने बापि, सक्षणेन सिन्नोऽभवत् । अहं नियमाणं तं नावलोकयितुमशम् । शिक्षाधिगतमाहमा, प्राणिप्राणनेच्छया पाप्या निपल्स शिक्षासम्पादिवगवा कि प्रमरैसमकायाक्षि। एयुदिनेषु मम सारथ्यमुत्सादी मनःस्थितिय न शोमा परमाणि च विशलान्यासन्। र तपापहं शिशुमप्रदीपं किन्तु यमलोमीट सन्नतः स सायर ममइस्तानिगृतः। एतेषु दिरसेपई जळे विदरची नारम्। सस्पेनैव समयेन प्रान्ता। आशष्टी मा पाशवदभारसीत् । एकागारा कयमाया मुदोपया दीपिका पारमापयामीति विचार्य मम मनो धैर्यमवहन् । मन जीवनाशा महता बन "मात, प्रतनिममामि, निममामि" इन्यवोयन् । अस्पनीयष्टनास्टीययः पटवं सटाटस्यको नानीवे। पिरो मनरी टाय गण यि पते तस्य नाति र मनिलेशोऽपि वयमेदुरा प्रात्ता, एच्चारमात् प्रतिर बलतरण- से अदन्दनमा पश्चिमान् पनि सटो गरदादेवी यासः ।

तृतीयो निःश्वासः भगवत्प्रेरित इव मटित्यागल मा हरिणय कुलमानीय, तापार्णस्याग्नः प्रबन्धं विधाय मामुद्बोधितवान्। राजास्तृते इव मृदुले दूर्वातले मूलच्छिन्ना कदलीवाह प्रस्ताऽऽसम् । मृगशिशुरपि सन्धबोधोऽन्तेवासोच पार्श्व आसीत् । महिना भनेन द्विजकलरवैयोन्मीलितनयनाद. अमरवेदविन्दुमातविषण्णमुख, मलकालपूर्धानं प्रैश्याम सुवानमुत्थानुमनाः "भगवति, अखस्थानि तेऽज्ञानि कियकालमाचारपोत्यात्यसि" इत्युका यित्काल विधम्यावास प्रतिनियुत्ता। सोऽय खसि, महानुभावी मधरमपुरमालान्, श्यनशतैः समये दयमान भाभारिणी कृतवानस्ति । भारतीया संरकृतिसवनदाने बीवनदानेनाप्यादृष्यमासादयितु मां औरयति । भई वा नियोजयामि यदस्य पूर्ण परिचयः प्राप्तभ्यः । "तपसिनी तरणी कामकेलिवलब्धवेदाभ्या मुग्धा, मृणाल विशदनमा यजीवेव मणि पुत्रिका भभूषितरनुलता, पामकरतरविन्यस्तकमोसपाली धनधिपतनियावन्दा रहस्तम- माधिय किमत विचारयन्ती मध्ये मध्ये उत्थाय गवाक्षतो दारती नमस्ता कमपि गणपती पते कमला। महद रेयं सा राजकुमार्याः-उद्यानपालिकया "म्ब, बहमेवरया दया रणे मुस्यारम। समलायर विगीती रवनीयता- मामाहमे प्रधान दशनमरिम। ती मृतास्मिा पारपिटारर भिष्टमक्सानम् ।" "तप पश्यामि धारस्य दशम सच सर्वपदानि यामिनीष नेत्रयो- ध्यान पतिपयति । तस्य परवि रेतः of स्थापि नास्ति। सर्व दिनमभ्रमे पार निरास भामिपिन, बनार विचारः अपरेसनी. मनायाभवानि दारावरतानमायेजम्यारस्पपिदिनपधिप बालिका गरंगोऽयम्। एन एकदा अंधापरतः हमे मारगाम । क्षया भगतमिर विपुः परमाद: पणन्दाः। नि: एणे साप्ने विधि Forjमर | Pricो मनायो बियप्रारिषर में नाममा। सिमाससमधल। मापश्यनिमारकोप, । ४४ चन्द्रमहीपती भ्रमभ्रमरगुञ्जनमपि विभाव्य विक्षिप्तनयना वृत्तिमुजः प्रहरिणोऽपि तन्दाभिन्तकार मध्येमन्दनिद दिलष्टभित्तयः पतन्तो जागरणं लभन्ते। परितो रम्यपुष्पवाटिकं विशालमदो भवनम् । द्विपदशननिमितविचित्रचित्रपटनि शोभन्त भावासमवनानि । अभिभित्ति वर्णपरिवरणानि, भित्तिप्रतिष्टितद्धिपदनाठि प्रतिष्टितानिः महान्त उत्तेजसो भूयांसो मुकुराः, उपर्यस्तिस्यतशोगिलहरितावि काचभाण्डानि वल्लयों विटपाः शोर्मा संवर्द्धयन्तोऽवलम्वन्ते। येवगुरुमनसारात्यो दोपाः सौरभेन सह प्रकाशन्ते। अभितो भवनं देयाना, अनुकरणीयपरिवाना प्रतापप्रभृतीना राा सजीवानीव चेतोहराणि चित्राणि। मणिमयमुष्टिकावलकार विस्मृताच्छादनानि सुगन्धिद्रव्याणि प्राणतयन्ति। नागदन्तेषु शुपिफसारसना सौपर्णानि गृहाणि निस्तत्सुधामयूरामयूखै राजतानीय प्रेक्ष्यन्ते । अय पवनपयार्वप्रमुना, उन्मुसमयूसजितचन्द्रेणेव द्विरददशनेन निमितनुपादे गगनारगापयाफेनपटलायितप्रशस्वतूले, चित्रितकोशेयोत्तरच्छदे पोपबह, पामिर पुण्डरी. पटले, घरटामिव सपक्षती पयहारे पायानां ददर्श कमलाम् । वमुनमुपमा निपीय गत्यन्तो चन्दिाऽपूर्वा छवि चित्रयते स्म। मुबारेषु रमलाप्रतिकृति प्रकृति विपरत म। रका कौशेयी दाटी तस्या सामादिलप्य गुप्ताऽऽमीत्। सस्पेश पादचनिनोनिद्विता न्या.तामर कामिनी कमलोरपाय राण-सणायमानभूपर्ण स्पृष्ट्रा बरेय प्रियगगी प्रियोदन्तप्राप्तिबहादसण्या वतुमसमां मुघ विनिन्दकेन स्मितेन प्रपन्ती, मृगालोमलाभ्यांराम्यामाप्याऽऽमन्दी तोपवेशयन्नी भितिमानुषतः सोपी देटिनेसनिसायं तत्र ताना पूगाना टलया गयानि विधान एगुणात्रा" रायरेशरमगरवाहित विश्वय्य मागाप्दल बोटिक सहरतेन रती Mom मनोरने। मन्त" घोरता विशावावाच । मापा गांगनवामि"- इस हमारा दायरेश्मामा तम्य कामायन वागमगरम्। मा करयन गिराधने पाव भूनावार माना M. नाममा निम्न प्रसमस।। Seria artist भाई सेव दंगभून मला त्योमम्। लमिट कमलामुवचन . हवीयो निवासः ४५ लोहमा दिप पुस्तानि नन्दिनी, समाचारपत्र मार्ग प्रानो पी. स्मिन् छोगे च पपनस्य म्यवरपा। मई सह सौ पक्ष नन्दिनीमा। सैश दैनन्दिनी मासचटयेनारमा सीत्। प्रतीवरम स्लेपन मन वृत्तमेशस्मिन् दिनएव सितम्। इतरमागरम्य व प्रतिदिन दिनमा मासीत्तस्य सारोऽशि पदपा राजनगरस्य रजोनवेदो पुत्रपन्नोऽस्ति, रोग पौवराज्याभिषेकदिन भाटा सिहानुपामिनः महापालाप मदा फोगा। दिनत्रयानन्तरं चाय नपोद्धमानः मिधरण निष्काशित उपस्तिप। अनगिन सवितादिनी पदासदेवरे प्रीता। उल्लापेन मिरेशका समापनेमामुना सिंहातक रक्षा हता। अत्र लेकिन लयि पदमीटर पम्। पालकाशा समुत्तीर्णतानन्तरं प्रतिदिनमनेन निन्दिनी लिरिवति "म" "अ" प्रदीयते । एक प्रतिज्ञापत्रमाप महाराबहसाक्षरत तमेवगीर परिमचन्दप एद य विवाहस्य पण बासीत्। एष पोप लेराउन सस्या विरतविध पी पिण- मटेखि येन मम लोवनयोपंत राविरभूत् । अनासपाहि दव रस्य दिचापे मम मन मानन्देन पूर्णम्। टत्वष्टारथाने धर्यण धृतम्। भारया वर्गमुगान्यनुभूतानि कम्पता करेण मया तव पुस्तक न्यायि। योध्य, यस्य लं दर्शनात् प्रागेव भूरिभूर प्रामाणितपती, यस्य च वीरता लाघवय बहुशः प्रैक्षितवती, देवेन वर पाणियस्य कामलकमनीये करिकरकोरे करे दानु स्थितोऽस्ति, यस्य च परणयोराराणीवन- सर्वस्व निधाय तम्सेदरवेदविन्द्वान्दविदलनस्पृहा वरणरेजिपृश पत्वा चपलयति स्म, यमुद्दिश्यामप्रवेशोऽयं स्मरोऽसूर्यम्पश्या खां विकरोति, र शुद्धमानसपरिचित भावी मा चन्द्र एवं शशधरोति" इति । प्रेमाभूणि सावयन्ती बाप्पावरुद्धकण्ठा कमला घता सप्रेम भालिलि। -- * । ऋतुरये वसन्तः होलिकोत्सवय। खच्नीलमम्बरम्। नातिशीतोष्णो वासन मुखयति । यो महता प्रयासेन धगत्तमोऽपहन्तुं प्रयतन्ते। राजेवाक्तचान विशाय सैनिकान् घृतकादमौरवर्णवेशोशेषन्तमोभहन्तुमुपस्थितयन्दः । राजगिरिव किरहेंलया नाशितन्तमः । विवकास तेन मनोमोदयता विजयैन धन्यवादमिर वितरसदिक्ष 20 ६ चन्द्रमहीपतो सर्वअगत् । विजयपटहध्यानमिव चक्र नवोढा वलयनपुरमणिमञीरशिञ्जिटम्। निशान्देश प्रसुप्तकान्तावसनधनच्छलेन भुवने विस्तारयामालेव विजयं पायुः। अद्यतनेषु दिनेषु सर्वत्र भङ्गाभवान्या सप्रेम पूजनम् । साहि पहपकवेलजवावाद द्राक्षाखाससवीजपचकबकुलदलमिश्रा मियदुग्धसिताजसजिनी, अमिनो साझमानोद- विनोदं नोदयति। सम्प्रत्यहिफेन आदियते भासत्र आसूयते, निकुन्जेय गाया अनिमुर्त सेवा । गुलालस्य कथैरका, याया वोथिरवलोक्यते गुलालरचितेवाभाति। पारकवासख्या नोनिविशेषं पुरुषा विदूरतो वीक्ष्यन्ते। बहुविधरागपूर्ण निमर' र्जना जगदेव रवयन्ति । वराकानां गदर्भानामयत्वे गरीयसो दुःखस्य समय उपस्थितः। एते यत्र झ्यापि अ कूपनिपाने निपतितगृहकोगे, श्मशानगृहे वाऽऽत्मानं तिरोभावयन्ति तत्रैवैते नागरिक दुर्बाला एतेषां वराकाणां पृष्ठन शून्यं कुर्वते। ताज्यमाना घाव्यमाना रेवारशब्देनान्यान सहयोगिनः सूचयन्त इव व्या प्रकटयन्त झाभितः प्रेक्ष्यन्ते। अश्लीलशब्दैन्मुख मानन्दसाम्राज्यमनुभूयते। एकतो मनुष्या महता चर्मनद्धन ढक्केन सहोहोकारं कायन्ति, इतरतश्च कामिन्यः सवलयसणकार तारं गायन्ति । एक्तो युवानो मध्यधृतमुरजा वत्त लन्यासेन स्थिता दण्डसण्डेन दण्डखण्डं वादयन्तो गां दादडायन्ते। अन्यतश्च वधूट्यो यौवनच्छटा वचसा वाससा, निरीक्षण, भूषणश्चलनेन, गमनेन, हावै, हसिनोदमन्त्यः सेलायन्ति । कवन काश्मोरागुरुपूर्णा मुष्टिरामृश्यते वचन भस्मगोमयगोमूत्राणि निषिच्यन्ते । प्रतीयते संवत्सरसधितां पाशवप्रवृत्ति पुमानशेषेण प्रमाटु सजते । विविधकल्या सविमाना सासवा सभस्मचूणां चरकसंहितेव बभौ होलिका। मुद्धा वाग्भटेन केनाप्यनुत्तरेण नावतस्थे । नन्दनविनन्दकेन, पादपातितचैत्ररथपरिमलेन समलसंसारमुगन्धसारस्तेनेव कान्य कुमोद्भवेन जितेन्द्रियाणामपि प्राणमाम्यता, मुरमिलोलुपमिलिन्ददृन्दविहितपिधानेव निहारिया द्रवेण पूरिता होलिकोत्सवाय परिकमलाभवनं स्थापिताः शुभ्रमणिसविता नील- स्वनिर्मिता तारकिशमिवनभोऽनुम्वत्या स्नानजलकुण्डिका विशेषतो भवन भासयन्ति । समयेऽस्मिन्नविगणय्य कमलिनीसोचो रोलम्बदम्बेनारमा मतिरनुमुगन्धि- 1 पिपधारा। -- tware J सृतीयो निश्वासः १७ म् । भामोदिनातन दिशः प्रडेदुः इन्मभूषि सौरमस्य प्रमामिव पग्रिन्याः कमला- भवनमा आय शितमोरवाया सलादतायां रदितहसताया कमशः शान्तायां सर्वदिन- भयपृशम्यागत मुनिसिलेका नीरवता परितः प्रासापौत् । मनोरमा हम्मेप होणं होणं साई पश्यन्ती गतोपरमलम् । सा च सत्वर- गुपार कुरमरमन्पराऽऽहम्ममाणेच विपुलेन अपनस्थलेन मन्दोदरी पस्पर्श पाणि सस्मित मारणेन कराण। যুগে সিদিশা কাৰায়ী সদয় ভাঙৰ। পৰীনেহা উলালুৰি । মোহি। মধ্য প্রায় নি। যার প্রয়োৰ অৱ सोनियल मिन महोत्सवे शतगुणितोत्साहन संयुकाः। दिर केलि बभूव । तेनामुना सारिमालयन जादा परियलिव प्रतीयो एम II मामलाभवनती विस्मृतात्मक विचारममोडधोनेरः धत्वरं पर Tone | प्रासादस्य मापटपुट्टिमस्य मयप्पता गुणयन् मुगन्धिनले श्यामासोर पग्मिन् सलन होगस्थिति निदारितदान , छिन्तु सखीनामहासेन सरिसरणि िए सो पयामाह-लीलयैव सिंहहन्तारोग्य भादेव mad सान्दि भरा "पूरस्थो रायोऽवसमा होलोत्सव पमि उम्मनायो मालगवार अभिोग्योश्य मितिश्पयन्ती जलनिर्गमे मरिचत् । REMI NEPमरियम्। शव क्लेदो रियथितः। इववियमभट्ट Marias for पायी। धर्म सम्म मटिति निसा रामः समदातर मलि। परयाप सरन्तर महावि विदा मासमाना मुगन्धन INirती व पतुस्थिता। " keyरसन्टपेर विटमः।* starमारतीयतामावलम्बोमाता और पसार रायको मानवता , मा - मकरे।

१ जलजातजलजनजा विमलतला नत्यगाधजला सुदीर्घा दीपिका पवनशिप पार्थ पादपपूर हरितयन्त्याकर्पयति मनांसि। निशामु तारागणप्रतिमू जनितरा- इव रजतदः स प्रतीयते। नागवल्लोदलधनुराकाससु वेदिकामु पुष्पधनेश्वर काव्यभुवीव शोभमानायामुपवनभुवि क्रमानुसारिक्षपविटपन्यास विलसति झाडापुपको फलास्वादलोलुपा विदेशीया अपि कलविहारिणः पक्षपुटपूतपादपप्रान्ताः पक्षियो प्रचुरं प्रेक्ष्यन्ते, हारिणो हरिणः, विविघदेशासादिता पिलेशयाः, कौशलेन सम्मानि चित्राणि च। मध्ये च नवनीतममृणधवलशिलं गवाक्षागति खसमास्वमिव समर माणं राजोचितसम्भारसम्मृतं विशाल बहुशालं हय॑म् , यत्र धवलोभतपाषाणस्तम्भेकर वल्लार्यः शिल्पिती निष्णातता निवाययन्ति। कौशेयनीलास्तरणास्तृतमिव मन्त्रक शिक्ष्यमाणा धनुषा भुशुण्डिच्या लक्ष्यवेधने, करवालफ्लकमर्यादाम, बलवरपगाको समस्तरानालाकुशलया गानविद्यावित्तया साहित्यार्थशास्त्रनिष्णातया वापत्रिम धावने मरुत्तरवायुयानादिपरिचालने कुशला कमलाऽनव निवसति। सिौरस कस्तूरिकाकुश कुमाधितरन्नोद्भाखरललाटा कदाचन कनखल्लकीमादाय धामाकन aanोवनशोभनीया छटाम, विरक्तविकसितोपडविरो। चन्द्रमहीपती शाखाकृतयो रामणीयकमहोदधेयरामस्य हरिताः कम्वद इव भ्राजन्ते । सन्द्रा बार पुष्पाः प्रतानिन्यः प्रचाशोस्तापं प्रायः प्रतापच धर्षयन्ति । वचनाकन्द = क्रौञ्चाः के वारं कुर्वन्ति, क्वचन च केकिन उत्सनोत्सातरेको केकाम् । वचन कुरान कचन कोकिलकाकली, वचन सारसरसितम्, वचन हसविहरितम् , वचन दस काणामेणकानां वल्गितम्, वचन पुष्पवल्लोसमाच्छनपादपनिलयेषु पारावनगुहार गुजन्मधुलुब्धमुदितमधुकरनिकाझङ्कारः, क्ववन खेलघटकचुहारः। चन्द्रिकावनेना भ्रान्ति यस्या नोरं कामिनीशिरपरिमलपरिमलितं सौरभम्रौन्दर्यसर-सार इन पता पादकन्दुकपाणिकन्दुकक्रीडनाय रम्यदूर्वः प्रदेशच । समानदूर्व सखोजनः प्रणयप्रक्षिप्तशुभ्रकुसुमं तारकित वियदिव क्षेत्रम् । आच्छादयन्ति रम सुघासमीरणरतृप्तारतरवोऽपि व्यभन् । वरारोहाया नितान्त नवीन वयः, विपनेन्दुसमाति मुखे यौवनामा एक .

प्रथमो निश्वासः माने चचुरी अवाक्षुप हृदयवेशमानन्दं प्रति सस्पृहे, कुवावपि कस्यापि सुकृतिन : समालिलिलिपपत्र प्रत्यहमेधमानमहोत्साही, क्लौमासि मयं कस्यापि सुभगस्य सोपान खुभूदिर, काव्यकलाकलापालापशावरतिसर्वस्व, निरन्तरगाननिरतं मनोऽपि कस्यापि मरस आधारोबुभूपदिव भुजलते कस्यापि गलादपस्याश्लेषकामे इस साले, तथापि माधुनामारप्रतिरक्षातप्रणयतत्त्वाया एतस्याः। साविकीभवावस्था भजते यतः सा। -- * * -- म. प्रौढमनोरमेव फुधमनेन संकुचितशरीराऽभवद् यामिनी। विप्राथ शहालभैरवीत्व जद विभागाः । भ्रमणवीक्षिताश्चर्यचर्चामिद कालखं कुर्वति पक्षि- सद दिनेशागमनतः प्रागेर, भन्धकारसकरमाजिहीर्ष ति शोणितकिरणेऽरुणे, । उत्थानव जामि विज्ञपति धाराप्रदमासायेर थोतसोते प्रावरण रिपूत इस विमल- विमले, मुमामोदमादायक धोरे पति मोरे, उन्मुखामिनी यूगमणिप्रभ परि- भूदेशितलीयमानेषु नक्षत्रेषु, मारमानन्धमारेप सदैव संहरेस्र्य इति भयेनेव কীfমদিঘীবিকটৰম্ভবনা । महानिकारविशोधनपरिपूत, परिमलपायापरिषिक्त सुरभिसुगृहीतमनसैरललस समाः कृउबा संसरणे स्थित्यति पश्यताछतः। सुपासारसंलिशभित्तीनि শঙ্কাণবনাশাপানি মা নিয়াকানি। राजनगरमासुतो राशनगरम् । कुमारश्चन्द्रोऽय युवराजाऽभिषेश्यो। यस्या- पवाभगवान लोकप्रियताच गायत्यो माल कामयन्वे कामिन्यः, वरवीर्य- कार्याणि विदर्गयन्तो दरान मुन्ति विप्रवरेण्या । राजभवन चाय महेन्दभानमपि परिभाषयति । सम्मुखे वारस्य दानिशम्भेषु मिलरचित वितानभ्व मुर्महुरकयातनेत्रम्। अभिवितान दोदुस्पमाना मला पुनासो प्रनिनी र छोरा वसन्तीपास्त। परितोराजभानन्च सावितरिना समय निरमपरखरे हरणमापदा, पद ४४ चन्द्रमहीपतो भ्रमद्भमरगुञ्जनमपि विभाव्य विक्षिप्तनयना वृत्तिमुजः प्रहरिगोऽपि तन्द्राभिमूतदया मध्येमन्दनिद्र' दिलभित्तयः पतन्तो जागरणं लभन्ते । परितो रम्यपुष्पवाटिकं विशालमो भवनम् । द्विपदशननिमितविचित्रचित्रवाटान शोभन्त आवासभवनानि । अमिभित्ति वर्णपरिवरणानि, भित्तिप्रतिष्टितद्विपदन्तरेउ- प्रतिष्टितानिः महान्त उत्तेजसो भूयांसो मुकुराः, उपर्यसितश्येतयोगिटहरितावि काचभाण्डानि वल्लयों विटपाः शोमा संवर्द्धयन्तोजलम्बन्ते। येवगुरुपनसातत्यो दीपा: सौरभेन सह प्रकाशन्ते। अभितो भवनं देवानां, अनुकरणीयचरिताना प्रतापप्रमृतीनां राज्ञां सजीवानीव चेतोहाणि चित्राणि । मणिमयमुष्टिकावलमारी विस्मृताच्छादनानि सुगन्धिद्रव्याणि घ्राणंतर्पयन्ति। मागदन्तेषु शुकषिरसारमान सौवर्णानि गृहाणि निपतत्सुधामयूखमयूखै राजतानीव प्रेश्यन्ते । अथ पवनपथपाप्रसुप्ता, उन्मुखमयूखचितचन्द्रेणेव द्विरददशनेन निमितचतुष्पादे गगनापगापय फेनपटलायितप्रशस्तठूले, चित्रितकोशेयोत्तरच्छदे सौपक्हें, पद्मानिव पुण्डरीक- पटले, वरटामिव इंसपक्षतौ पल्या दायानां ददर्श कमलाम् । कमलामुखबर तन्मुखमुपमा निपीय नृत्यन्ती चन्द्रिकाऽपूर्वा छबि चित्रयते स्म। मुकुरेषु कमलाप्रतिकृति प्रकृति विकरते स्म। रका कौशेयी शाटी तस्या अङ्गमादिलप्य मुप्ताऽऽसीत् । सूक्ष्मण पादध्वनिनोनिद्रिता न्यक्तामरकामिनी कमलोत्याय सण-सणायमान वर्ण स्पृष्टा हरेक प्रियसली प्रियोदन्तप्राप्तिप्रहपद्धका वकुमसमा मुघविनिन्दकेन स्मितेन पूजयन्ती, मृणालकोमलाभ्यांकराम्यामाकृष्याऽऽसन्दी तप्रोपवेशयन्ती भित्तिममपातः धौनी पेटिकामे निमार्य तत्र ताना गाना शंकुल्या शक्लानि विधाय एलागुरुपत्रजपुषः तपुष केशरमगमदसहितं विरचय नागवलीदलं बोटिक सहस्तेन दरती भय मनोरमे। कटदन्तः" धोरतां विहायावीचन् । "धैर्यमाघम्स राई सूक्यामि"- इतः समायाने शायरमेन्दा तस्य वागण्यानं भूनाकाममगच्छम् । ममा विनि- निीतं पश्ययनरः कक्षावन मिश्राश्रमे बहुच भूतावासे सरित। पर नित्व रमणीय परं पामामावाद विरुपता प्रतमासीत् । परिवाघुयात् पनि लोपटेश्म । अहं सोरलेन द्वितीयभूमी गत्वा एकमावासकोमध्यद्राक्षम्। शमिन - हवीयो निःश्वासः ४५ नोहमध द्विप्राणि पुस्तकानि दैनन्दिनी, समाचारपत्रं मसीपा रानी चासीक- रमन् कोणे च शयनस्य व्यवस्था। अई क्षणेनैव सर्व वीक्ष्य दैनन्दिनीमादल्यापटम् । नपा दैनन्दिनी मासचतुष्टयनारम्भाऽऽसीत् । स्पष्ट प्रतीयतेश्म यस्लेसकेन भासदयस्य- वृत्तमेकस्मिन् दिनएव लिखितम् । इतरमाशद्वयस्य च युक्त प्रतिदिनं विस्ताशालिशित- मापीत्तस्य पारोऽस्ति पदसौ राजनगरप्त्य गझोनवेन्दो पुत्रश्चन्द्रोऽस्ति, रोऽसिस पौवराज्याभिषेकदिन आसेटाय सिंहपृयामुगामिनः सदायास्यास्य नद्या पातोत्रातः । दिनप्रयानन्तरं घाये नदोहामानः सिद्धेश्वरेण निष्कासित पचरितध। अत्र ऐसकेर सतिशायिनी श्रद्धा सिदेवरे प्रकटिता। उल्लाधैन विमलपुरेक्षणाय समागतेनामुन सिंहात्तव रक्षा कूता। अत्र लेखकेन त्वयि शन्दसौटवे प्रयुत्तम्। धानुष्कारीक्षाय समुत्तीर्णतानन्तरं प्रतिदिनमनेन दैनन्दिनी लिसितेति "अद्य" "अध" शब्दः प्रदीयते एक प्रतिज्ञापत्रमपि महाराणहस्ताक्षरहितं तत्रैवासीद् यस्मिंश्चन्द्रण सह त विवाहस्य पण मासीत् । एषु पत्रेषु टेखकेन स्वस्या विपसेविशद सजीवं विवरण मलेखि येन मम लोचनयोर्वेपत्तराविरभूत् । अनुकूलप्राहि तव हृदयं विचार्य मम मन आनन्देन पूर्णम्। उत्कण्ठात्मानं धैर्यण धृतम् । आशया स्वर्गसुखान्यनुभूतानि कम्पता करेण मया तव पुस्तकं न्यधायि । सोऽयं, यस्य त्वं दर्शनात् मागेव भरिभरि प्रशसामाकर्षितवती, यस्य च वीरता लाघवच बहुशः प्रेक्षितवती, देवेन तव पाणिर्यस्य कमलकमनीये करिकरकठोरे करे. दातुं स्थिरीकृतोऽस्ति, यस्य च चरपयोराराज्जीवन- सर्वख निधाय तत्सैदावेदविन्दुन्दविदलनस्पृहा तचरणरेजिपृक्षा च त्वा चपलयति रम, यमुद्दिश्याशातप्रवेशोध्य स्मरोऽसूर्यम्पश्यो खो विकरोति, स शुद्धमानसपरिचितस्ते भाको भत्ती चन्द्र एव शशधरोस्ति" इति। प्रेमाश्रूणि सावयन्ती वाष्पावरुदकण्ठा कमला च ता सप्रेम भालिलिङ्ग । * * ऋतुरयं वसन्तः होलिकोत्सवश्व। खच्छनीलमम्बरम्। मातिशीतोष्णो वातस्सनु सुखयति । उइवो महता प्रयासेन जगत्तमोऽपदन्तु प्रयतन्ते। राजेचाहतकार्यात् विज्ञाय सैनिकान् घृतकाश्मोरवर्णवेशोऽशेषन्तमोऽपहन्तुमुपस्थितश्चन्द्रः । राजगिरिव किरणलया नाशितन्तमः। विवकास तेन मनोमोदयता विजयेन धन्यवादमिव वितरसदिव ४८ चन्द्रमहीपती "देवस्य यया देव्या अप्ययं मानकृत् । देवेनोक्तं यदहं कमला सूचयिष्यानि, भासते कार्य विलम्ब मा कृयाः।" "हुँ, अहमपि शुश्रूपे इदमावश्यकं कार्यम्, नो चैद्धानिः।" "किन्तु'-इतस्ततो वीक्ष्य चन्द्रणोचे। कमला-(परितक्ष्य) एकान्तम् । शयधरः-( सर्वासु गतासु ) अद्य चरेण समदेशि यद् गजेन्द्रपालो दिनलपुर मेकं महत् पड्यन्नं महती सेनाध सजयति। प्रबलः पराक्रमशालिसेनश्चार्यसका। स यद्यास्यति, निश्चितं सुन्दरतमस्य कलालयस्य विमलपुरस्य विनाशः, सम्मको पराजयश्च। तत्र देवस्येच्या वर्तते यत्कोऽपि वीरवरतत्र गत्वा रहस्यमुझेय उमेर कार्य विपटयेत्। सम्भाव्येत चेत्तत्रैव युबैत च। कार्यायामुष्मै अौका सभाऽभूत्। प्रस्ताव प्रस्तुते न कोऽप्यप्रेसरो बभूव । महाराजो मयि चक्षुः प्राक्षिपत् । अहं समापन समादियमाणः सर्वान् प्रतिज्ञातवान् यत् श्रीमतामाशिषा कार्य साधयित्वा प्रतिनिवस्या कमला-(साधनयनेव ) नहि नहि, राजेन्दो मायावी दुष्टश्च । मामकीनं मनो विक्लवता भजते तत्र गन्तु नाहमनुमोदयिष्यामि। इतः समापन पितरौ सर्वथा विस्मृती, अधुनाऽवश्यन्ती लिस्यन्तौ स्तः। मुधैव समय यतियापर्यन । यदि हदये सलीयस्यपि पितृभक्तिरवस्य पूर्वमिदमेव कर्तव्यम् । शराघर:-दुष्कृत्यनाशकृतसङ्कल्पः सत्रियः वापि कातरता न भजते । कमला-किं कययामि, मनवमातेन विमूढास्मि, चेतः शिष्टाचारपषि कर यिनुभिव यतते। दारापर: कयमय पैलाये वाचि। कमला-श्रीमन् । अहं सातवत्यस्मि यत् श्रीमान् राजनगरस्य युवरात्रः। महाराजोऽपि रहस्यमेतत्ति! शाधर:-श्यं भवतीति ।..... मला-धीमा दनन्दिन्या..... राघर:-भा: करम् । नहि नास्ति साधुनाध्नस्यता । कमातिदिक्माना कार्यम् तर गमन .

४६ -वर्षण, मासेन, पक्षण, सप्ताहेन, युगेनापीति तु को जानीदे। आगमने त्वरानुष्ठे या नो भेन्माधवीलदेव तिग्ममइसा, वियोगेन दग्धा कर्मवल्लरी कथावशेषा यतिष्ये। -नाधीरता मां मुमति। जगदीश्वर एव रक्षकोऽधुना। देवो देवाय * स एव सुवासितानि पुरुषवस्त्राणि समादाय राजकीयरजकः सरवरसत्तर ३, पुरोदेवः प्रमाणम्" प्रणिपत्य चरेण खाध्यक्षः समदेशि । त्वा तं कथय यदव सर्व रजका राजभोजनमापयन्ति त्वमस्माकं , सत्कर्नु राजप्रासाद निमन्त्रितः। समये द्वितीयकक्षायां समागच्छ” -शि। - समये परिमलसमाकृश्लोकः प्रकल्पितमुभगनेपच्यः करकपटेन पटुता रयन् रथ्या भितीच सुगन्धयन् राजभवनयहिरजिरं प्राप्तो द्वितीय- । “एहि एहि चिराद् दृष्टोसि, मागच्छ उपविश" इति वदति विभागाध्यक्षे बंशत् । पन्धिद्वयं कुतः समानीतवानसि, युतमानि मद्दाहीणि वासास" समपरछत् । रजकस्य स्वकीयानि वासांसि नासन, स पृरछामाङ्गव विटो म्लानाः रांपत्तः। साहसिकाना भीणि चेतांसि । अयन्तु पटायसिन्नः खिन्नो मुगप्य इन्द्र इव वियोगितिसरे सूर्य इव तमस्तोमे सिंह इद गजनजे, विस्फूर्जपुरिख- कर इवावीरवारे भावर्तइवाम्भोधी, ज्वर व प्राणिना काल इस देहिनां रमेश्यति निसामरिभ्यन् माययन् विशेषां मनासि । परमय सापको- रिति चिन्तयताऽप्यशेणोचम् :- पप शिपिलायसे। न्, नाई देषि यदेतानि भीमा मासिप्रातरेर कमलोपवनदायी चन्द्रमहीपतो मामाहूयाइ “यानि मासास्यमुना प्रशान्य देयानि।" रामवने न सर्वदा भुज्यते -- सौभाग्यनैतत् सदन समिति विचार्य अत्तममेतद्वायो विदित्वा रहकसमावः परिवर- गतोऽस्मि। सोऽहं देव! बहनेभरावा सान् क्षम्यः । पय विकम्पमानो बनायुताय "नहि नहि मा भैषी' रियुट वसन्त्रदुषले सश्त्य भोजयितुं नीतः। "पभो, न माने...कोऽपि विदस्थामुग्धातिरदत्तपरिनयो मा स्थानीः स्त्रीजनोचित धानस्य समीप” मिति बहुशो कार्यमाणो विभी मा भाययन् भूतावासं प्रतिवति। स कुन मजति शेतेऽत्ति, भ्रमतीति किमप्यहं न जाने। अज्ञातजनपदस्य साहले मानवधर्म इति कृत्वा तस्य वप्रक्षालने साहाय्यं कृतवत्यस्मि । क्षन्तव्या नायकारको भवचरणसेविनी" इति। अथ लोलरकनीनिकामुद्यानमालिनी कोट्टपालहस्ते समय॑ सशस्वसैनिकानाशासन सुप्त भ्रमन्तं भक्षयन्तं वा तमानेतुमिति । "देव, आज्ञप्ता वयं भूतावासं गत्वा गिरिगृहासुप्त केरिकिशोरमिव सान्दन्ि नरव्याघ्र प्रेक्ष्य तत्प्रभावपरिभूता मूहा एवाकृतपादध्वनयः प्रत्यापत्तिताः। देव, सोऽ राजेन्दपाल विजये कृतप्रतिज्ञः शशधर एवासीत् । देव, कोनाम यमेन रमेत. भुवनमपार कालाहिं करेण कलयेत् , कोमूद सल्लोलसहन' हिंससाघुलं पारावार प्रविशेष) मत्तगजेनाजि रचयत् बुभुक्षितं सुप्त पञ्चाननमुनिद्रयेत्, मतोऽविदिवसभावना स्मो विगतनि कत्तुं "मिति, सैनिकन्यवेदि। "आः गेहेरा भीरव औदरिका अपसरत जात्माः" इति सो गुप्तचरविमाणा- ध्यक्षोऽमिकोट्टपाल चारक्षिपत् । सच मनोभावं ज्ञात्वा, गत्वा च तत्र विधाम्न सूर्यातपतप्तमपि सुरभिपुष्पपवनवीजितमासाय भूतावासं शून्यं पर्य' पत्रेषु लिमिता गीति, दैनन्दिनी दैनन्दिनी चपेटिकाशात् । सर्वा सामनोमादायाध्याय ग्यवेदयत् । अध्यक्षध सः सामग्रीः सूक्ष्मशिय्या प्रेस संक्षिप्तविवरणेन सह मयिक समीप प्रेषयत् । मन्त्री पापरेयुः महाराबनुगम्यानव- इतीयो निश्वासः "क्षमस्व देव, नरेण पादोऽपि विचार्य रमणोषः। विचारो संस्कृतगरद- भक्षणम्, अनमिपातं दहनम्। भलक्ष्म्याश्च निधान । विचारो हि भूमियशसः श्रिया जीवनस्य मर्यादायाचः। युधिष्टियभूतयः प्रमतयः पुरा शिल विचारेणैवाध्यासया- मासूराज्यम्, अविमृश्यकारिणी कृते सतोष जो विश्मः । महाराज, यस्य पराक्रमोपक्रम, सौन्दर्यसम्पत्ति बुद्धिवैभवच श्रावं श्रावं ष्यन्नास, येन सह स्थिरीकृतः कमलाविवाहा यामै तिलकोऽपि प्रेषितः, यस्मै महीमहेन्द्रेण न्यत्कृतपस्यारिवर्गण, प्रगे स्मरणीयनाम्ना, हिरुहनाचारेण तप्यते दिवानिशं महाराजनवेन्दुना, धूयते सोकोकमावदन्ती यस्प जननी नितरां क्षीणा, सोऽगुलिनोमिकेच न लक्षितो न- विदितः, पादाप्रज्वलन इव न कार्य कृतः । स एव वीरवारवर्णनीयवीर्यस्य राक्षो नवेन्दुवर्मणः पुगे विकाशिशारदशर्वरीश्वरमुखश्चन्दः शशधरवेन राजपुरवासित्वेन प्रकाशितमप्यर्थ वचनरचनया तिरोदयद् राज्यकार्य प्रसाधयितु राजेन्द्रपालपुरं गतः। पश्यत्विदं श्रीमल्लिखित प्रतिज्ञापत्रं गीतिश्च शशधरनिबद्धा। . . हरसिद्धियात्रा उज्जयिनी निवेशः - :- जगद्वित्ततयशोराशेर्नवेन्दुपालस्य महनीयमहिम्नो रामपालस्य वाद्यतनः प्रस्तावः परमप्रमोदास्पदं सम्पद्यते। श्रीमतोः सन्तत्योश्चन्द्रकमलयोश्चन्द्रसूयौं यावत् परां प्रीति प्रकाश्यतु गुणोत्कर्षः। समये विवाहसूत्रसूत्रितं युगलमेतत् स्वर्गेऽपि न वियुज्यताम् ; युज्यत्पश्चायुषा विद्यया, कलया, प्रिया, सम्पदा यशसा । पूरयतुचे मा प्रतिज्ञा परमपावनः परमेशानः। -- विषयममुंप्रमाणीकरोति-! रामला। विमलपुरम् नियमन खीकुरुते नवेन्दुपालः राजनगाम् रघुनन्दनः- कुलपुरोहितः अक्षयतृतीया ११८. ---------- सम्भावितमप्येतदेवासोद् यदवश्यमर्य करयापि राशः पुत्रा परन्तु पनामा चन्द्रमहोपतो फुल्लाप्यमन्दमधुरं मकरन्दमूरु निष्कासयद्भिरभितो विरुचैः पयोः । पद्माकरेश, नलिनी चलमोपणाभ्यां भोग्या न मानिभिरियं भ्रमरलेभ्यः॥ सम्मान्य मान्यमहिमाग्विलधारिणोऽस्मान् दद्याच शिष्टिमुपभोक्तु मनातकामान् । गुअन्त ईश गुणिपु प्रगुणान् महात्मन् गायन्त आजिपु भटानिय गाश्चरामः ।। बरः( शशधा) विमलपुरम् राजनगरम् "अये, किं शशधर एव चन्द्रः" सोलागं राशोघे "हन्त हो हो हो।" अपवास: एवं नाधिगतः। किनु अमात्य, कष्टसाध्यमिद कार्य, परमो मायावी बार सुसमारो नवीनचार्य पुमारःन्नुि करणीयम् । मन्यो.. मात्र विचारणा सर्व गमिद्ध वीरगणाम्। आरपति कान्तरमन्दन । सहाय्यायान्ये प्रेपियन्त। आनन्दस्वीर लगा Berjः । निमिपमानवानमा पनि मत पायरतामस्तु । गापि कमलाप्रियमयी मनग्मामा मध्यापन अन्तरे | 'मगुरनारमनी भाषा नियर, परदा इयत्री बन्नो सन्तान या राहण्याम पान म, धुलिागतमामयन। frrrr ' या वणव मोrotiigirl काना) ferti- - - तृतीयो निःश्वासः तत्य॑माणमिवास्ति यद् यात यात्रिकाः? दूरत एवं यात, एतस्माद्भवर्द्धनेन पृथिवीसमात्करकूपादन्यथाऽन्धकारान्धीकृतान् वोऽयं कृपणदशोऽस्यति । पाएका पादपो विपद्ग्रस्तेन कूपेन कूपेन सहानुभूति प्रकटयन्निव स्थाणुभूतः स्वशरीरमपि चिन्तावितम्या विचाय । तस्य महता प्रकाण्डेन सूय्यते यदर्य छरिमन्नपि काले शालशाखाभिविशालो भवेत् । तस्यैका शिफा कूपकुच्छ विदाये निर्मता तेनात्यन्तिकं प्रेम प्रस्टयति । कृषो मूलादत्तेन जलेनेनं, पादपः स्वतच्छायया एवमेतौक दापि परस्परं सुदृढसम्बन्धावास्ता परन्तु सम्प्रति योरेव दशाऽतिसारकिणः क्षयिण इच चिन्त्या। अन्त' चर्मचटकाश्चरचरायन्तेश्म। 'वरटानां तत्र बहु बलमासीत् । अन्तभित्तिषु तेषां छत्राणि महत्या संख्ययाऽऽख्यायन्तेस्म। ते दंशेन कालपाशेन यमदूता इव विश्वविश्रुता आसन् । केऽपि तेषां निर्गमनसमये तस्य पार्वतो न टीकन्तेस्म । एवेषां सातत्यवासात् पथिवैश्यं प्रदेश एवापहूत भासीत् । एतद्धिका पराक्योऽपि तेषां मध्ये दत्सु जिल्हे व यथाकचिन्निवहन्ति स्म । आँ पारावतपुङ्गवा नितगे प्रसमा भासन्न् । कूपकुब्यक्तकुलायाना तेकामनवरतगुकारः सर्वा काननस्थली मादयति स्म । विश्यालानि शिलाशालानि सम्प्रत्यपि पान्यविश्रमाय विस्तृतान्यासन् । एकः पथिकः शक्तिचित्त इस कमपि कोणेऽन्वेषयनिवेतस्ततो वीक्ष्य वरत्र- फटकारेण शिलामेका विशोध्य कूपवेदिकायामुपविष्टः । मुखात्मतता स्वेदवजेन प्रवेग प्रचलता धान चायं निता श्रान्तः प्रतीयते स्म। समुपविश्य स्कन्धावलम्पिनी कन्यामेकतः संस्थाप्य पुनरितस्ततः प्रेक्ष्य शनैश्शनरस्फुट नदितुमारेभे- बहुभिर्वरेतस्य कान्तिसिइहतकस्य साहाय्यमायरामि, परमय दुष्टः केवलं प्रबलमेव मानयति, तस्यैव गायां गायति । तस्मा एवं गूढरहस्यमाख्याति । तेनैव मन्नयति। अहह, दुष्टेनामुना कमलया विवाह प्रतिज्ञातः । अहो? कथमिवैनं दुष्टं १ कुलीनाकुलीनं राजकुमारी यंसक वृणीतम् । हन्त ! येनानेन निर्दयं खपितावि परलोकपर्य प्रापितो विषेण। खसामिपुत्री सरोजिनी भगिनी निविशेषाऽपि दुर्ने क्षिता। समस्मिन् राज्ये चापूर्व यशः प्रसारितम् । १ चमड़। टटिया (पीतप्रमरः) ३तितली। ४(बड़ बहाने लगा- ५ मा पूर्व यस्य तत्-भयश इतिभावः ।

प्यति। किं कान्तिसिंह एवं सौन्दर्यसम्पत्तिलमिलयन। चन्द्रमहीपती प्रभापि निष्करणं लुण्ठिता बहुशः। सतीनां सतीत्वेऽप्यसदाचरितम् । सोऽयं हन क्षत्रियदतकः कस्य कस्य सुखे मा विधास्यति । आनन्दोत्सामुष्ठान कारकानुद्धितियः । भाशाभव्यभवनेयुपविधान कास्तांदवर्णयिष्यति। प्रेमायोधौ सन्तरतः कांस्कादिम परन्त्वहमप्येतस्य कान्तिसिंहहतकस्य पितृयोऽस्मि ! समुख दमन र निद्रयिष्यामि। तस्य शया, यां पुष्पमुकुमारा मनुते, कटकारीया विश्वस्त तस्य मनोरथं व्यर्थयिष्यामि। अधुनाऽहमपि प्रदिवाने। कमला कान्हा न भविष्यति न भविष्यति वयमपि वान्छामः, नहि वयमेव वान्छामः। अथैवासादमाखादयतु दुष्टः कान्ति एतस्य लालसावमस्य । प्राणानविगणय्य, अपयशः प्रसार्य, कुलरीतिममिसावर, मद सम्मर्य व्यसकतां व्यसनीकृत्य यस्य कार्य साधयामः, स केवलं खमुख एवं सोऽमा पश्यति, तदास्माकमपि कर्त्तव्यं यद्वयमप्युनितं विधारमामः ( सम्मुसमवलोक्य ) अपर अधुना वीरवरप्रवली समागच्छतः साहित्यं तिष्टामिः ( तयोरभिमुख) मया व विचारित बहुसमयो भूतः, अद्य नागमनं सम्भाव्यते। कोर ---साधु ! किमस्माकमपि कार्यक्रमः परिवर्तते। अपि सूर्यसिंह! दे समायातः! सूर्य-नहि । अधुनायावत्तु तेषां सूचनैव न समागता। प्रबल. तेऽपि समायाता एव। उपविशन्तु क्षणं श्रममपनुदामः। एते यथा कन्यामुतार्योपविशन्ति तथा कान्तिसिंदोऽपि समायातः। इतथ कपटपटना पाटवं प्रेशिनुकाम बावन्दचन्द्रोऽप्याकाशं निभासयामास । प्रालपरिशोधिते कूपशिलातले स्थितिमता कान्तिसिंहेन तेषां बघुरातापा- प्रल-तहिने तु देव। अस्माकं कार्यमल्सैनवायासेन इदम् । बीसरथ दुरः। सम्भगवसरस्त्वे लन्धो यत्तत्रयो गमकुमारोऽसूयित्वैव कापीत भासीत् । प्रहरिमचेतसतो थ्यप्राः समासन् । प्रधुरो प्रातः । कान्ति-परतच यशवं हत्ववान म किम् । प्रात:- देव! कानिविद् भूगमानि नु वरखास्य मातुलेयधनुरानैदान १ भाहित्या-आकारगीपनम्। २ प्रेग्राम। ३ - तृतीयो निःश्वासः एव । अपराणि च पत्रभूषणानि पजानि। देव। मानन्दस्य भवद्विवाहदर्शने पद्दतीच्छाऽऽसीत् । परन्तु स बराको विश्वशेखरप्रहारमवश्वयन मृत एव । कान्ति -( उन्मना इव) ओं नवीन एवासीत्सः। आपातच तस्य मार्मिक भासीत् । पान्त्वस्माक सझे तन्मृत्युना काचन हानि भून् । पोर? त्वमपि कृत्य हतवानसि। पीर-समये ऽई गतः परन्तु यस्मै कार्याय प्रेरितखतथा न कृतवानस्मि । दिवासमयः, सतर्ग, सारत्रशस्त्रोभयतः सदा गरीयसी सेना। यद्यल्पीयस्यपि सरदिहा दृष्टिनिपततेत्तदवश्य प्राणानामेव संशयः, अतः फेवल मदर्सव सूर्य देव ! कमलाया शैशय एवं स्थिरीभूतो विवादयन्द्रेगेति तु विज्ञातमेव । ता। किमयं कस्यापि मुस भग्यते। मुधैव परलोकमनालोकायते। एतश्लोर्क कलायते, पशता योरितः सौन्दर्यदयो भवञ्चरणरेणुं जिशन्ति ; व्यर्थमेव कमलाकालीमावर्णपिनुमाफुलीभूता स्थ । कान्ति -सूर्य बहु विभशामि। सर्वतः प्रथमं मनोरमया यह महतरादा मृगया पूर्वठी कमला मया । कीदक कौशल कोदशी शिप्रकारिताऽऽसीत् । तस्माधिक कपोलपाली, कोमलोमलाभ्या राभ्यां मुशुण्डियाकलनमचापि ममाणोः पुरतः रफरतोय । सत एवं विमुग्धम्मलादर्शनेन सुधामवधीरयता मुखेनाहमन्य एक रत्तोऽस्मि । विरात्राय व मृगयावर पितवानस्मि, परन्तु इन्त, पुनर शिपमेव भोपेता। अहे पचाय यन्मम शा पदवशी न भविष्यति, समयेन समासातिप्रसादो भविष्यामि, परमाग्येनाग्निबालेव एधते। विचारयामि धन्वेण सह तया विवाहा थियीभूतो, योग्योज्य राजकुमारो वीरथ । मारम कस्यापि मुरास्यान्तरायो भूरिति मानसं मा मुदमन्त्रपति। परं किं कुर्या तस्याः प्रतिमूतिः प्रशिक्षणविलशया सनेऽपि साम्मुरूप न मुवि ........ प्राल. मपए) म मोरयति ! प्रतिशत रामपरित्यजन्ति । भविभागानयन्ति। -देोऽपरणमेपासोन्पमालय। मया तुरषीय सम्म वितरितम् । पति--तिमिर........

चन्द्रमहीपती वीर.-मयाद्य श्रुतं यच्चतुभ्यां रामपालस्य जन्मदिनम्। अस्मिन्नवसरेच निकि भोज्यं मद्यपानादिकच कान्ति-सत्य, ( हण-प्रोच्छलच्छरीरः ) अस्माकं प्रयोजन मुसिद्धम् । क्षत्रिय एताहगासरे सर्व एव मदमत्ता भवन्ति विशेषतो दासीदासम् । वीर०-श्रा, तदपि सर्व विचारितम् । हर्म्यस्योत्तरहरिति विविक कमलाबाद- स्वत्रपक्षद्वारलोहदण्डे' गोधापाशमायोज्य सुखमुपरि शय गन्नुमिति न कश्चन दई दासयोयोटेकः। केवलश्चन्दचन्द्रिका मां शिथिलयति...... कान्ति -किं भयम् । अनुनिशीथं गन्तव्यम् । एषोऽवसरः पुन ने लपते। सूर्य । तथापि कथनं करमा अप्यवसरायोचित नाम, परन्तरे । यस्या यौवनमममो हृष्यन्नासं, घटितानेकमनोरयो विस्मृतमानसस्त्यकापरकार्यः केदलं तत्प्रदक्षिणायमैदपर्म सब कमला दुग्धमक्षिकामिव मां दूरं प्रक्षिप्य चन्द्रेण रस्तुमनाः सुखमनुभूति । किं तत्सुखमहं सोढुमर्हामि, महि नहि सूर्य-तारित विधास्यामः। पापाणेनैव पापाणप्रतिशोधं विस्थामः। यथाज्ञाप्यते तथैवाचरिष्यामः। वीर। कः कार्यक्रमस्त्वया निरपारि । वीर:-सप्रबलोऽहं तत्र गमिष्यामि। सूर्यच मामाद् बहिः समरुत्तरो मिलनु सूर्य। वायुप्लवोऽप्यानेयः। विमलताडाशीकरशीद प्रातः पौराः पवमानसेवनाय पुराद् यहिः प्रयान्ति। नगरसीम्नि विशदमधुरानो विकासिरुमुदिनीवियोभी हृदो हादयति बनानां मनः । समीरणः, मधुरमधुरं स्वन्तः पक्षिणः, चललाः इमाच निरोजासपि विनोदामोदरस भावमापादयन्ति। अद्य राज्ञो रामपालस्य जन्मदिनम्। वधिमीया इतरे च राक्षः प्रासादे भ'श्यन्ते, न करयापि रद्देऽमिप्रज्वाला। राजभोग्यसाय स समन्ते। केवन मा पिता १ चौग लुप्टाकाय भवनारोहणाय गोयायु र मुक्षिप्य तस्यां मिलिदिलाया ताबद्धररखामबनेपामेहन्ति । २ वायुर्णी बढ़े प्लवनतरणमापनः "वाइयोट" श्याख्यः।

सृतीयो निश्वासः इवरे व मासाना लम मलं शरीरतोअनयन्ति, अन्येच स्वेदमलिनानि कुवासासि गुणासयन्ति। मध्याहात् पूर्वमेव कशामु जात्यनुमारं सर्व एवं समायातुमारब्धाः, खासनेषु समुशिता । घेदविदो विप्राः, अधिचरिणः क्षत्रियाः, मुवेशाः विशः शूदाश्च सलामु यथारीति यययति यथामाद स्वागतमत्काराय राज्ञा नियोजिताः। रोल्युबाया एदिस्वागताया महरटाया देदिपात्रायाः रियाया भय प्रावल्यम् । का परदन्याभूति प्रितेव प्रदीयते । .वन 'प्रस्फोटन परिपूत, 'कण्डोलनिश्च तमण्डं राजाईमोदनमघते। अन्यत्र जन पाय परिषेप्यते । वचन मत्स्यण्डी मिधा कुचिकाऽऽखाद्यते । इतरत्र क्षीर- सामापूर्णागिमित्रमभिवष्यते । कपन सुपन्धिद्रव्य विता मनोमोदका पपशमा उदार पूर्वन्ते । पात्र शतपुष्पामरिचाश्चोतदता 'तापूपा जयसार बिन्ते । अगालिया व जलावलिः-मकरन्दविन्दव इव बिन्दवः . मानदापि "पापिता, भावी मुद्र"माप" मार मिश्रा स्वपत्र पनि यस्तायाम्पसीव साप्पाली दालीम परिवेष्यते । मिद्विजिलं. टेम"पिरही" अस निशान मास्वादयति, करन कृष्णिका"हणा. पिरणान्या धन्य" राग्य गरनलिया गिल्यते। कच "एक" कि पुदीनाध्यहिकपरिहाले। करन अम्बोरतीनिमितो पेशावरे पाणुलिदहमावायते । ऋचन सारना"सदविका अधिकाम canा पम्बन्। र मेशिकामदित रसालललित सापटेहन ११ पलामको निहारनेवलासका स्टिाए। सामसाण्ड (a). पर। ५ मा राना। (मर अदने। । १।१. इंदिया (क)। "पूदिया। १९ बरहर, p, १४ र १५ मे १६ एरोनी, १७ असारन, टोपदी हुई, १.मला, एफ(C) २२ होग, २५राई, २४ पीएस, ५.मरा, २८ प धारण, ३१ बस १४, १५सपी पी 14 चन्द्रमहीपतो मन्तधीयते। वचन पुरोगेन पौरोगवेन। जनगीयमानं यशो भोजनप्रशंसा श्रूयते । पटोलशाक, कूष्माण्डशार्क', वास्तुकशाकं', कटीशाक, मूलकशाकं' भेण्डाशा, घृन्तार्क, गोजिह्वाशाक, महाकोशातकीशा'", कालिशा, कारवेलशाक, आलकशाक", त्रपुषशाकं दीयां देहि, आनय, अलं, गृहाणेत्येव श्रूयते सर्वतो पनिः। घृतपक्का गवानफलिनी", करीरफलं, पटकश्च० परिवेषितः-भोजनयज्ञस्य पूर्णाहुतिर्जाता । पचतमृजताखादतपिबता, माहरभुक्ष्वा, हसतमोदता क्रमश उपरता । लन्धावसरा क्षणदा दिनपतिमस्त विज्ञाय स्वाधिपत्यं तेने। निशानाथोऽप्येकाफिनी प्रयतमानां प्रिया प्रेक्ष्य सद्य एवोदयगिरिमारोह । सच्छासकप्रसन्ने जगतीव कलानाथ- विभासिनि नभसि दैनिककर्मधान्ताः मृत्याश्चन्द्रिकयाऽऽल्हायमानाः, सद्यो निद्रा भेजुः । - * प्रहरी हम्य॑मभितः शिथिलमर्यादः सालसं गतागतं कुर्व चन्द्रप्रकाशे दरत एवायान्ती दी नरौ दृष्ट्वाऽऽह-"को स्थः दूर एव तिष्टतम् किं न बानीय इदं महाराजशयनगृहम्।" "प्रहरिन् । विदुरप्रचलनेन नितरां प्रान्तौ स्वः। किमिदं महाराजशयनगृहम् । सत्यं न जानीवः।" "कुत्रत्यौ युवाम् , वेशभूयादिभिरप्रत्याविव प्रतीयेथे।" "प्रहरिन् । अस्यैव देशस्य प्रियौ पुत्रावास्ख परन्तु हन्त ! दारिपदुर्गतौ परदेश व पद्धितौ शिक्षिती च। भ्रातः प्रहरिन् । पहुशलेनापीत वसते तमालं सम्प्रति नंतर श्रान्तौ स्वः; काप्यमिर्लन्धु शश्यते ! मुखः प्रहरी अनभिज्ञश्च चतुरसंसारस्यैतयोवत्तिया सकरुणो जातः । एकेन धूमाये" माल न्यधायि ; प्रहरी च इसन्त्या" वद्धिमानीतवान् । पूर्व धूमपा प्रहरिण रहतम् । स विग्निस्तद् घलेनाकृष्य मूच्छितः। एकेन विहस्योक्त, "प्रवल । मः १ महानयाध्यक्षः, २ परवल, ३ कोइला, ४ बथुवा, ५ ककड़ी, मूली, ७ भिण्डी, बैंगन, ९ गोभी, १० घीया, ११ मतीरा ( तरबूज, १२ करेला, १३ भानु खीरा, १५गुवारपली, १६ करिया (टीट१५ पापसात मयरक- ..

तृतीयो निःश्वासः कथं शिवामवरायरधुना वेतस्य पुत्रोऽपि मोत्यास्यति । निहितसर्वजन दृश्यते भवन, स्थरस्त । अहमर at प्रतिशलयामि । समुपरिंगच्छ-इति । सदसहगगर्व सम्पतोऽवतः कौतुकाद्वामाणिना, इविकाखणकारेण बल्गामाकृष्या- वतीर्य, पत्तोले शिविशिष्टरधिष्ठित कौशेषवितानं, अगुवन्द्रवत्तिकागुरभित न्यणतामर- रामकुर, प्रदिप राजाल, साभ्युत्पनं साजलि सामोनिशं सतत उपराज सासन- मलराधार चला। 'मान्या, जनस्योत्गुस्तामालीच्याभ्यधितो महाराजकुमारचन्द्रोऽय स्वयानातान्त' मरमान भावयिष्यति । भान्तरलेन लाभान्विता भविष्यन्तीत्यहमाशासे। कुमारी पूरी विशदयतु-"उत्थाय मन्त्रिपोलम् । रिमजितम्योत्स्नधन्दः परितः रेश्य प्रामारभतः- का सायः समीपमासीत् । गोपगुमा गलो नान्तराद् रोमन्यायमाना: फनायमाना में प्रत्यावर्तन्ते स्म। कायन स्यन्त्य उपुरण्यन्ते रम, आयनोदन्यतयः परगौरवण गुम्योऽपि मन्दा गति विहाय पाय धयन्टरमा इतरा क्षीरसता शिशूना प्रबलप्रेम्णा रस या विसदारम्भ रेमन्त स्म। तसा गरोस्ता धरिनाकाशे श्यामपटेक प्रतीयते मा क्षेत्रसन्नि स्थिताः पयः हानेवाः परन्तिाय । गोपा भारतासो दिपारने या क्षन्त रम। दवा खपी ययाऽप्पापनेन नांदायर गोरे सदर सीमान्त रम। गोएका पथात् बलिना सानिका तिरपुर्वन् निशितपुर में मुररान् गोरखकायसनेनाधार मानन शिविरमारेशव नण प्रलय- पुष्पगुणवतको बना विपरित तामित बन सारसं मर मन्दं पलन माहितीसमगेरिमा शरिन । रममा महिला पाय HIRENT सन्दीपसन्तो गोरा मामपुरमा पनि मन्दिरमा को इलाव: a एपी गरम परिमा शप मतिना रेस रिसरासर सर एस प्रम।

. ६० चन्द्रमहीपतो चतुष्पये स्थिता ज्यायांस आयतीगई प्रतीक्षन्ते स्म । क्षणेनैव ग्रामटिका व्याप्ता धेनुकेन। गर्वा पृष्टपरामशिणा हस्तेन ध्वनिमत्यभूत् पाटी। आसीच तिष्टद्गु, सुतने होपस्नुताः पयखिन्यो धारासारेण संसारं सन्तर्पयामासुः । अहमपि तेनैव सार्थन तच्चरणरेणुरूपितपवित्रगात्रो वाजिनमारूतस्तस्यामेव प्रामीण- प्रामण्यो गृहं गतो भुक्त्वा सर्वा विभावरों यापयित्वा, निकट एव तपस्यतः कस्यापि महाप्रभावस्य साधोत्तं ग्रामीणेम्यो विदित्वा तद्दर्शनोत्सुकोऽवं ग्रामण्यो गृहे न्यस्य पदातिरेव गहनं काननं प्राविशम्। खासदायो विच्युतपयो निविडतरे हिंसकविहााभूमौ वनेऽस्मिन् सर्व दिनमतिबाह्य निद्रप्सुर्महान्तं पादपमेकमारा विभावरीमत्यवाहयम्। प्रातरानन्देनेव तिग्ममह- साऽऽच्छादितामु दिक्षु उत्तशिखरमारुह्य दूरवीक्षणेन गव्यूतिपञ्चके उपगण्डौल तपन्तं कश्चन साधु दृष्ट्वा देवान्मनस्येव नमस्यन् , कण्टकाकीर्णसर्वाडो विशिथिलसन्धिः सायकालतो गेव तत्रागमम्। महात्मानं परितोऽन्तेवासिन इस व्याघ्रसिद्दशार्दूला मृगवच्छादलमध्यास्य स्थिता मां वीक्ष्य सकृदुत्थापितकर्णाः पुनरवनतशिरसो मा प्रणमन्त इवासन् । अहं तेषां मण्डलमतिक्रम्य मध्ये परिस्कृतभूम'वुपाविशम्। रम्यं स्थानम् । शान्तं वातावरणम् । सम्मुखमेवैका स्वल्पीयसी कुटी गण्डशैलं कर्तयित्ला कृता गुहा, खच्छो निरः सम्मुखध मुनेः स्थितिभूः। पशव आदेशं शुश्रूषव इव मौना अभिमुनि स्थिता असन् । महाल्मनः शरीरमस्थिमात्रमपि तेजोषितानमिवासीत् । लम्यमाने हिमधले मणी प्रांशु शरीरं प्राचीनकालस्य स्मृतियशुश्चत्वरे चित्रयते स्म । काल, उदो पोर्णा प्रलम्बो कृणां शशिश्वेता . जटा साभं मुसमण्डल पर्य न जातिदेशाशलनामानन्तरं कार्यार्थ पृष्टः सर्व सत्यं सत्यं न्यवेदयम् । महारमा-वत्स, दुःसाध्यमिदं कार्यम् । सञ्चातिमुकुमारः। -सत्यं देव, तदपि रष्ट्रस्य रक्षा स्वस्य जीवनदानेनाप्यापर्य करणीयद । बिरयेऽस्मिन्नाहं विशिष्य वैधि। ध्रुयते राज्ञी राजेन्द्रप्रसस्य परमा गुन्दरी II विशाल

मगराहिः प्रयः सकते मुप्ता प्रातरूपाय
(রি বিল অব বৰ বিয়াৰ যিমৰ
पुतिया पतिविविधस्सा भूल ग पारपस्व
भुरो भत्तः सभागिरे रामाधीनः सेनापतयो मन्त्रिणप, मध्ये
दिने मयम एपीस इभ्यं प्रति मध्यरावर
देशान्ता प्रमानिया के प्रतापरन्दी एम्मुरमुरयमीहवामा कर,
प्रेक्षमा पुरAt mesनाइयोपेश्मा मनानिमिता न.
गुन्दरीराममहम्
पुनःपरिकलिन ने महिलापरणो माता मापसी
दिशोऽमर पाउनुः प्रभातम् । लाप, हिन्द समदनमधिोऽ.
सोममपि भीतरबारमी।
भरपालापेन मारापम् ।
-

K चन्द्रमहीपती प्रथमा वार-पश्य केयं दशा पुरस्यामुष्य। परिवर्तनशीलं जगद् विनश्स उछायाः। द्वितीया वारु.-नगरस्य समृद्धि विद्यावैभवं यदा स्मरामि, विकम्पते चैतः राज्ञोऽस्य न्यायप्रियता, प्रियता प्रयतार प्रजार्या, मायावीश्वरते, परिभावकस्य, कस्यापि विबुधवयंता नियामयतो, मयतोऽधिविदो वास्तौ, प्रज्ञापालन व्यवहारो लोकोत्तर एवासीत । परन्तु हन्त, सा सिद्धिः व्ययापि नावशिष्टा। प्रिय किं विस्मयते राज्ञ उपवनम् । प्र. वाक्-तदपि किं विस्म शक्यते, स्वयं फलपूर, पूरकं पत्तिमटरपिठाणां विविधा लताच परिमलेन मलिनानपि मोहयन्स भासन् परं वर्तमानेन राज्ञा सर्व चरित्र- मात्रीकृतम्। सोऽयं प्रतिक्षणं युद्धवार्ताप्रियः खकीयं पुरमपरस्मिन् मागे नियि पुरं जगतो भ्रमाय पापाणेन प्रकल्प्य सततं युद्धाभ्यासनिरतो जगत ईश्वरतामभीप्सति । भ्रूयते एतस्य कन्यैनमस्मिन् कर्मणि नियोजयति शाखि च। यदि कश्चन वनुरता राजकुमारी सत्पमे समानीय युद्धमार्गात् प्रतिनिवर्त्य लोककल्याणे योजयेत्तदोन्नतिः हस्तामलकवत् सुलभा। राज्यायतः प्रतिशत नवतिमुदा सैन्यप्रसाधने ध्येति । यदि स धनराशि जगतः सेवायै शिक्षायें समुन्नत्य वीयाच्चेद् वर्षपचकेनैव स्याद् गरीयसी सव्यवस्था-इति रुद्धोऽयं वाचा प्रसारः। अहं मासद्वयेन मगरस्य, राज्ञो राजकुमार्याः प्रदेशस्य च रहस्य विज्ञायैकदा मुनि- पचनानुसारं पावनं प्रविश्य सूक्ष्मेक्षिकया तब पचाननस्थिति निधित्यकरिमन प्रोजे तरी सबशस्त्रास्त्र उपविष्टः। अपराहवेलायामाखेटवेशा कृष्णाया वचतुष्पयुताप्येकाफिनो अनिन्द्यसौन्दर्या सुन्दरी वनं प्रविवेश। धानः संरतैराखेटं समीपमेव पोपयामामुः । सा सन्नद्धाऽसिं करे कलयन्ती सतऽभवत् । अहमपि शासेने शरमायोज्य प्रतीक्षायामासम्। अकरमादनल्पकोधो निशिताष्टः सिहो निस्वैरियाः पाय धृवसाय इन गईन सत्तामेकस्माद् गुमानिसृतः। सरिकणी लिइन्ती सस्य जिह्वा सत्वरमेव मानुपरफासादलोल्पाऽवतंत । सोऽमिसुन्दर प्रस्थितः । सिंहदर्शनसमकालमेव १प्रयता पवित्रा, २ सायाया अडीपता, पुत्रीत्वेन रतियन स वस्प, ३ कस्यापित - मममः।

६ ३ बकाम। तृतीयो निःश्वासः खिका सुन्दरी सस्या अवश्थाप्रपादावुत्याय एलायितुमना इवोद्विमः संवृत्तः । सिंहोऽभ्यधमा- अवश्य वेगेनारोहिणीक्षिप्यैक्तः प्रययौ। आखेटवित्ता सुन्दरी ३ भूमौ. प्रसूता। सिंहवाप्रपादावुत्थाप्य सुन्दर्याऽऽतनेत्रः सकरणं वीक्षितो यावदने प्रावसत्ताव- देव मबाणविद्धः करणे मन्दन घरामधासीत् । एतत्सर्वमेकरिमन्नेव क्षणे जातम् । देवि, कात्वमस्मिन्, वीरभयङ्करे वने एकाकिनी मृदुलहजुलताऽऽत्मानं सन्देशसिन्धौ निपात्य भ्रमसि, नैतत्तवानुरूपम् । निवेदय वा त्यो प्रेपयामि, क्वच तव पितरों कों पथो मासि" -पृक्षादवतीय तस्याः संशयमपहरता विनीतेन मया न्यवेदि। "महमा पार्श्ववत्तिनो राज्ञो राजेन्द्रपालस्य पुत्र्यस्मि, युद्धाभिरुचिाहं सर्वदेवाखेटार्थ- मागरलामि। बहनः सिहा हेलयैद मया निपातिताः, परन्तु हन्त, अयाोन नवीनाधेन मुषितारिम। समये यदि भवान्नागमिष्यदहमवश्यममरिष्यम् । अधुना वीवनदातृत्वेना- इत्तमोदेव भाख्यात्नभिज्ञानम्" --वनखण्डेन स्वेदं धूलियापनयन्त्या सुन्दयोंचे। "आ एवम्, त्वं वात्सल्यभावपूणे महिलासमाजे वन्म लब्धाप्यदः किरातकोलभिल्ल- पित गहितं कर्माजीकृतवत्यसि तत्र किमु पकव्यम् । नाहं शामिसुधाला मैं वार्च भाला पदालापेनीतंजयिष्यामि, क्षम्यो याम्यहमथुना, श्रीमती चेत् साभिलाषा गन्तु शिरीभूतोऽयमध पारधागच्छतु", भवाभिमुखं प्रचलता मयोचे। साथ नितरां विनीताऽऽभारं हृदयेन प्रदर्शयन्ती परिचयाय मुहुर्मुहुराजप्राह । अहवादीचम् । देवि, समयातिपातिनी ते प्रवृत्तिः। पश्य स्वयि युद्धकर्मणि प्रात्तायां का दया तव देशस्य । सर्व एल विभागाः नाममात्रमासते। एकदाहं धृत्तजिज्ञासया तव नगरपर्यवेक्षणाय प्रातः। नगरपालिकाया भायमार्गः सम्पन्नोऽसि. स्तूिदकोवाखादाः कर्मकरा चतुर्षभागमेव संगृहन्ति। नगरस्य रप्या राजमार्गाः भमान कोऽपि पर्यवेक्षते । फेवल प्रासादमार्ग एव सुभगः सरलः खच्छाचासि। रथ्यासु गान्यासन् यन्त्र पार्व- रहाणा मलमूसलमागल्स रप्यानिवासिनो स्वास्थ्य दूषयत् दुर्गन्धिता प्रसारयति । रध्या नितर विमा: नवगृहाणि प्राचीनगृहतो हव हसाईम निस्तानि सन्ति । मन्ये पौरप्रतिष्टानाधिकारिष उत्कोचं गृहीला एहपतेरिच्छानुसारमनुशनन्ति । येन रप्पाला सौन्दर्य सुगमता च प्रणश्यति। रात्री ने प्राशस्य प्रवन्धः। केवलं पौर. प्रतिशनसदस्यानामधिकारिणाय गृहाणि पौरपतिटनेन प्रशासन्। इतरे विवन्ति -

चन्द्रमहीपतो
यदयमेवेषामेवाधिकारः। प्रधानमार्गष्ववकरस्य यूटाः प्रेक्ष्यन्ते। न कोऽपि
प्राणायामाभ्यासं विना तेषु मागेषु गन्तु शमोति। वराकासन्मार्गस्यायिनो
रोगपीडिताः गतवोऽदनिश कण्डूयनपरा मशकमभिकानिवारणमारणपरा
दीर्भाग्यं दुर्मठास स्वीकुर्वन्ति । नगरे वराकालाना पोषणाय गोशालेका पोट
स्याति । गवा दिसती तत्र दुनते परन्तु सदस्याना शिशवः नियो मला
कर्मकराध पयः पीत्वा शेषश्य पयसो दधि विधाय नवनीतय प्रधानसदस्य रहेर प्रेम
मुचित परचितशिशुभ्यः प्रदीयते पेषा मातरः सदस्यगृहेषु निःशुल्क फर्म
विशेरशासमन्ते। एवं तेरा नाम विलिसगिटारहीत्वा तर श्वेत पर दय
तेभ्यः प्रदीयते। नगरसारख्याध्यक्षः प्रधानो नगरवैयः प्रतिदिन प्रपत्र
दसरा पायरस पोप्रतिष्ठानानुमा सारप्यविवरण दहाति।
पर मतकालिक पयः प्रवाहित करोति, अतः शिशुभ्य उपसियम् ।
पान्तस स्सा सस्यानाय हित सन्निविटमसि। दयनीयेय दशा
पटालानां नैव साधी प्यास्था। अध्यापक भरामये रामायान्ति। म
संचन विधान्ति, थारे वासयि प्रशालयन्ति, केचन पत्र लिन्ति परे
महानतं मोग्य भुजते, इतरे मित्रः सद्दालान्ति ।
केचन कमि
हान् प्रान्ति, मन्ये गृहकार्यसम्पादनाय, मध्ये मध्ये को
freeलहाल कुल सत्रेभ्यो दगारपटादक दवा पुनः
विरारची शिक्षा को पश्यते। योम्याः शिरासन मध -
बदर मत्महत्येयम् । सोसय माविन्य माया एवं दुष्यंत दयन्ते। थाने र
य, न मरता धोना पत्र लाना सिप,
मत वर्मत। ममः पट्टिा, रातार मागि
पुल सहमपासना मशिन प्रान्ति। श्रन, राज्यार ।
दियः व मधि। कार हम दिन मागतो.
हमने पुरमा सरायणाय नोदन। दमा मुल
डी मेरो मानेर गरेका
मौरी पाल बिता बाल

सृतीयो निःश्वासः सरकारा मारा स्थान सममान पाठशाला सन्ति। भयोम्या अग्रक्षामु नियोजिता पायममननुगान्तः विशाल शिक्षाप्रहेण यापयन्वोऽप्यपोम्परः निगरन्ति। सिर न ारीरिक न पा पदिक सौष्टयम्। न वाकाटना न १ व्यायामनेष्यम् । एका मुरबोवन यापयन्ति । छिमेतद् भवत्या युद्धाभिर्न . परमिग विनितरा होश। तरपाध्यक्ष प्रतिमा नरी मसार कोणाति। प्रतिमा परातो मुबाग) लापरि एसपुरे प्रमुरामुरोगान्त पर रासो मरनेस्यानमार्ग एभरें। सनिर्मापयन्त्र छोय पलपति जिगाति । एक प्रशोप्य स्थलीभूला । मध्यापमवितना परिवरखता गुरमति काता नामी दुबया मेति वं बेसि, युरोपनेत्रा मान्यदायो। मनापोलिसवर्णनाय रितिरिपरि तप परोक्षम्यो मरप ml on शनिमयर पपलमष न नियन्त्रितमन्न माता, तर बाराभितगूनापामाहे तस्मादेव प्यारिणः शाम एकोमा योपभोग विवि सपना মানুষ মিথ্যা। विमि प्रधानाधिरि पर र समस्त दरायोतमानि भैमी वेग एवं मन रामसान्तडात एवं सानिया मारा परमो बाया माये। परमपः महर- माग बणे हि तोमर पुरलार्मा ग 4 दिनाय एका पनि - पर समेव सरासरसोय स्वदपि। मा म CTC री। Freी पास को । .

६ त चन्द्रमहीपतो परिभ्रमन्तः प्रहरिणश्चौराणां मुयोगाय सूचनायै च चन्ति। कस्यापि विपनि मनस्य विपद्विवरणमपि नोटिख्यते विनोत्कोचम्। सतीनां सतीत्वं, धार्मिक धर्मः, धनिना धर्न, सुजनानां सौजन्यं मयाभिभूतम्। किं भावीति विचारे सर्वेऽस्थित बुद्धयो नोन्नति कर्त समर्याः। किमेतस्योत्तरदायित्वं त्वयि नास्ति । केवलं युद्धकर्मण्यतिप्रवृत्ता समृद्धं सम्पन्न देशं व्यकापी। यदि कथन निर न्यायालयो भवेत्त्वा देशद्रोहापराधे आजन्म कारावासं प्रापयेत् । परन्तु मा नाम भूदा तव कारावासः, भगवान् जगदीश्वरोऽणुकपसमिविश्स्वामवश्यं ददयिष्यति श्ण नाधुना जगति कोऽपि युद्धमभिलपति। सर्व शान्ति मुधा पिपासकः शान्ति वात्तमिव गुश्रूपन्ते। निरवधिनिरवच्छिन्नशान्तिप्रिये पवित्र भारते पुनारकरणात प्रसारयितुमीहसे! नाघुनाश्शुक्मानामावश्यकता। जीव, लोकजीवने च सहाय- भवेत्येव प्राणिवर्गस्यामिला। परन्समधुना लोकसंहारक्तसहस्पेव शन्नामाणि निर्मापयसि। कस्य कृते। साम्यवादस्य प्रबलधारया समाप्यतेऽस्मिन् जगति तव साम्राज्यवादरयाहतुक आश्चर्यकरः कदमिलापः हास्यास्पदम्। जर्जरीभूत साम्राज्यवादः सहैव स्रनुयायिभिरर्थवादादिभिर्लघीयांसमायातमेव प्राप्य विनाशाय सब इस स्थितः। किं भवती कस्यापि विवेभ्यतो हदये साम्राज्यवादमामन्त- वादावादान् प्रति श्रद्धा प्रेक्षते । "परन्तु देव, एा प्रवाहपतिता नौरियाधुना महता वेगेन प्रपति विचारधारा किन्नु हुदोऽस्य कार्यकाल । ए धारा न विर स्थातुं समर्था । बीतत्वममिनाऽअश्य दूर क्रियते सकृत्, किन्तु स्थायिनी स्वामाविकी शीतमा न सर्वयाऽपहत्तुं शक्यते। एवमेव निधननिनोः सरोगनीरोगयोः दुर्बलमुक्तमोर विववाविवेकातोः साम्यं न की स्थिरयितुं शक्यते। एकदैव भोः परतापत सन्त्रय प्रामश्विना प्रत्यावति। तस पुनरेष मक्ता साम्यवादः पुरवलयाना अन्पसंख्या वरिष्यति। “अनुमोदयाम्पदमपि टासी विद्यारम्। मा नम अलीत् सम्पवर म. एल मवावे समुन्मुखय बस्ता सामाविको धर्मः बिदेश समस्मिन् विमर प्रबलियत, जापौरमानव विवानियतीति एक्सत्यम् । एतरी या यच दर ant मम पित हतोयो निःश्वासः बाणानो विपाकगोलकाना वमानाद्यावश्यकता। जगच्छान्तिमभिलपति। जगतो जीवनेच्छा प्रकला, एतादृशे जगति न भवाश्या आवश्यकता"। "क्षण विधम्याराधिन्या अपराध मर्पलार्यः । सापराधोऽपि परितप्यमानः आधुभिरवश्य मर्पयोय एव।" "क्षणिके परितापे को विद्वान् विश्वसिति) भय मृत्यु सम्भुखमुपलभ्य श्मशान- पेराग्यमित्र परितप्य पुनविस्मृस्य स एव पन्यास्तदेव परम्।" "देव, सत्यमच पर्यन्तमह युदाभिचिरासम् , कन्याप्य पितुः पुत्रस्थानीया विध विजिगीषुरारा, किन्वय भवद्विचारमावर्ण्य युद्धं त्यक्तुं फ़्तसन्यास्मि । राज्ञो गजेन्द्रपालराहमेय युवपरामर्शदात्री, अहमेव बहून राहो विजित्याधुनः रामालेन योमुयुक्तवती । परमय विचारः परिवत्तितः।" "तिग्ममइसा वीरवरेण रामपालेन सह भवत्या युद्ध सर्वथाऽसमीचीनमासीत् । एतत्वं न वेसि। भई युदभयारं रामपाल शस्त्रास्त्रविचक्षणों तस्य चमूम सम्यग् पनि। तेन युद्धे निश्चित भवत्याः पराभयो हस्तामलकात् प्रत्यक्षम्। अहमैहिकी सर्या कि विशतवानरिम यत् कीदर्श सारं श्रीमती रहति ।" "शान्त पापम्, भई भगवन्त सूर्यम् , परितः स्थितान् पादपान् बनदेवतां जीवनदातारे भवन्तय साक्षितवे न्यस्य क्षत्रियराख' धनुष स्पृष्ट्वा प्रतिवाने पद दिसनात्मक कार्य' विहाय राष्ट्रोन्नत्यै सर्वात्मना समिष्यामि । तुष्यत्वधुना देव "निता प्रसीदामि । अस्तु, पदमेश्वरम महते कार्याय इतमामोऽविलम्ब यामि, देखो तु ताबको पलम्।" भरतोतरोई धीमदिशि प्रावलमिति । बनानन्दिने चन्द्राय सधुवाद वितरत्यु परिजनेषु चिरशीव, तावक पुरिले विगार नितरी प्रगीदामि हर्षाणि मुघता राम प्ररूपादि। "पान्तु पुत्र, तोऽप्यधिकं गरीयः सायं सनापदितं येनाहं शिीदन पुरः स्थानुष म पक्रोमि। मैतस्मिन् पाय त्वत्तोऽधिक कमपि परमो रात्री मनोरमका सह सदाहे मुभा मा प्रानुन स प्रेशे। ..."

AM
८
पन्द्रमहीपतो
येपो द्वारमुरन्या अहमहमिकया तालयन्ते नियुक्ता
वैदयांद्याध येगा पदतलदलनप्रामसौभाग्यदृष्टाः।
लेपः रिलटोऽगमर्द रसिकजनमुदे शाक्षिणा श्रीनिवासा-
नामैत् काव्ये तृतीयः परिमलललितः कान्तनिःश्वास एपः
इतिश्री-
मान्यनुर्धन्य-विद्वत्सारायणिक धीमावरायात्मजेन
काव्यालकारेण श्रीनिवासमानिणा रचित
काव्यकोविदकुमुदकुमुदिनीनायके चन्दमदीपली
तृतीयो निश्वासः

- -- चतुर्थो निःश्वासः सायं शशाङ्ककिरणाहतचन्द्रकान्त- निःष्यन्दनीरनिकरेण कृताभिपेकाः । अर्कोपलोडसितपद्विभिरहि तमा- स्ती महामतमियान परन्ति चप्राः ।। मुभाषित रनभाण्डागार जीवनरो भद्रशतानि पश्येन फचिद् भूमौ शय्या फचिदपि च पर्यशयनः कचिच्छाकाहारी फचिदपि च शाल्योदनरचिः। पचित्कन्याधारो फचिदपि च दिव्याम्बरधरो मनस्वी कार्याधी गणयति न दुःग्यं न च सुगम ।। भर्तृहरिः धैर्य धामवतो धनम् त्रिविक्रम भट्टः सतत अन्तमरमन्मनः सत्रात्यविश्यादपादनेन । अधुना वयं चिरविरहिता राशो नरेन्दुपालाय परिषद मामः । यसा रियुतानामरमा दिवाना तु या पतीतनि। पतपन्द्रो रगत त एक नारमभिरसक्दन सभाम्। भानावपतिरपिता मालस्दस्य परामम्। माना विवर। रिमित नेत्रसदस्य हत्यम् । हिरहा ऐसहाना रेरानीगन्दमयन् । भरभर किया नपुरशिक्षितम् । अनं पार गरि पदमीन।

चन्द्रमहीपतो स्थति चन्द्रः ६ गतभन्दा कमपि पृष्टा गतभन्दा? कदापि केनापि वर्ष गमनाय तमन्द्रासादितिप्रानपारम्पर्य विचारचातुर्यमातुर्यच सभाभवने। भविष्यद्विदा ज्योतिविदा पहितानन्य प्रासाद सम्मेलो दरीदश्यते। अदर- सम्भारेण ते पूज्यन्ते सत्कियन्ने कौशेयोत्तरच्छदामु सौवींचासन्दीपु सान्युत्यानं समुपदेश्यन्ते। केचन महोप्पणीयास्तिलकाद्वितमस्तका आप्रपदीनं दधतो राजती पाटं कलयन्त- समश्र शालिनः प्रगल्भभाषणे महीपति मोहयन्तो धनलप्सयाडम्यरताण्डवं रिचयन्त । अपरे च बटिला आत्मानं देवो भगवतीभक्त' विख्यापयन्त भारतकोशेषवधना भाषणभूपणा भूपति तोपयन्ति । इतरे च दुग्धवतिनोऽखिलां सिद्धि कर एव कलयन्तः शोषितकाया भवनं प्रभासयन्ति । परं कोऽपि सत्यं “वः परचो मासतो वर्पतो नवाऽऽयास्यति चन्द्र' इति कथयति । पुत्रप्रणयिनी जननी उपजासं वयः समाध्रिता हा चन्द्र ! मन्मनःरिवविकासक ! चन्द ! क गतोसि अप्रसूच्य प्रियां मातरम्"-इति विलपन्ती सस्य शयनागारं, प्रसाधनसामग्री वाजिनय प्रतिक्षणं प्रेक्षमाणा, स्मारं मारमहनिशमनपूर्णलोचनसरोरहा स्वारप्यमेव गमयायकार। महाराजो रुग्णः प्रजागरकृशो निमीलने त्रयुगलो गतसत्व इवोपबहमश्रयन् स्थितः। विदूरे चैको मृत्यः प्रलम्बदाम्दा म्यजनमाकर्षति । न कोऽपि शतो मौनप्रभोः प्रभुत्वमपहन्तुम्। "विद्याधर ? हरि सुभदौ महत्या प्रतिज्ञया गती, अपि प्रतिनिवृत्ती. तन्द्रा साम्राज्य मर्दयन्महाराज आह । मन्त्री-आम् देव ! परिभ्रमण कृशकृष्णविनही म्लानमुखौ प्रातरेव प्रतिनिवृत्तौ । परन्तु...... महा.-(मध्य एव )भतकायौं। किमेतदेव । मन्त्री-आम् देव ? महा०-एतदेव सम्भावितमासीत् । शतवमिव वर्षचतुष्टयं वीतम् , नास्ति को समाचारो जीवति नवैति, प्रतिदिन पटका प्रतिदिशं प्रेय॑न्ते, पर वेतनभुजः पटया प्रेक्ष्य चतुर्थो निःश्वासः चतुरशिरोमणीनां समवायः समीक्ष्यते, पर सस्यापि मुसमण्डलं कृतवृत्यत्वेन साभ नावलोक्यते। प्रतिदिनमेतदेव भूयते, मद्भाग्यत एवभिनाक्षरावलिरेव रसा। (विधिनिन्वय ) मन्छिन् । उद्विग्नोऽस्मि, अरमाद् दुःखोदधै निःसत मत कामोऽस्मि । बहु सोढम्, इतोऽधिकं सो, नालमस्मि । मन्त्री तच्छोभते धैर्यधारिधुरन्धरे मवति भगवन् ! पुरा दिल नलरामयुधि- छिरादयो विपत्तिमनारतेन वक्षसा सहन्तः कालेनातुला सम्पदं प्राप्य प्रचुर यशस्तेनुः । पाकिधरोप्यात्मनाऽस्मिकाय लग्नोऽस्ति....। महा-(मध्य एक )-अपि अप्यासादितः कथन समाचारमशक्तिपरस्य ! मन्त्री-दो, भोर तेनागमन सूचितम् । मन्ये कृतवार्यः स निवस्य॑ति । सोऽपि समरामुखः। महा--विमनायमान इच) भाम् लपते । अधुनैव वेदस्तो दौवारिका प्रविश्य विजय ध्याहत्य "देव! श्रीमन्मन्निकुमारोऽपरेण केनचिदशतनामधेयदेशवातिना साई श्रीमचरणी प्रपिनसति, श्रीचरणी प्रमाणमित्यूने। महा.-[ उत्पास्तिनयनो हौदारिक निपुणे निरीक्ष्य माम् प्रेषय। दौवारिक, कावश्यकता को व्यवहारस्यामुप्य, प, घोघ्र प्रेपप । प्रणम्य प्रयाते प्रहरिणि समायावः सपहचरः शकिया। महापजे मन्त्रिणव प्रणम्य, राक्षा-पुत्र! पाकिधर चिरञ्जीव नत्युच्यमानवनिर्दिष्टकाटीटिकाया- मुविधा पार सहचरः। दाधिपरोसी वर्णन शोषितप्रभ भाला सुधमाघरो मन्जुलो पयसा परदिशतिपर- देशीयो, बनाएगीयमानमेष'-बी-विरार-एह' शेमुरी मुगुणा, कोमलपटेवर उत्पाहारा प्रमाविषमसभोति। पहचस्मारय शिव प्रासमय रिको वितमतनुपधिमनीवरः प्रावेदविन्दपूर्ण- कपलायला पोतदशनोऽसितवासा परिसप्रीयते। भय मारामो मेराशेठेन मुबपन्नवाब- अपि पुराल पुर! स्वमरि नियोभूतक को समानीदरवया। पत्रिम्। निम्। सरितादम्। - सिमा ५ः चन्द्रमहीपतो शक्ति-धीचरणकृपया कुशलम् । महाराज | कि विस्मयतेऽसौ चदमित्रं विध शेखरः। यो हि युवराजमहोत्सवे तस्मा उच्चालप्रसूतमधमदात् । महा.-(विस्मृतं पूर्वोदन्त स्मास्ति इव, पूर्वानुभूता युवराजसमयउटामनुभावित इस विस्फारितनयनः) आः (क्षणं निवस्य) यधारा चन्द्रोऽस्मान् दुसितधिकार शक्ति-कथयतो महाराजस्य मध्य एब ) देव । प्राप्तिसाधनमप्येष एय। पोयूमरिप्लामिव मधु श्रोत्र स्रोतसा मानसमानन्दयन्ती वाचमिमामाकर्य श्रोतुम. धीरो महाराज ऊचे, अप्पासादितः कश्चन समाचारः स्वमित्रस्यापि पुन ! कमिय शापि गमनपदवी लम्पा? अपि कुशली हारते चन्द्रः-विशवलाय कथ्यता सकीय यात्रा-वृतान्तः। चक्ति-देव, अरमान्नगन्निर्गतोऽहं विचित्रविचित्राणि, सोमनशोभनानि पनानि स्थानानि मगराणि कन्दराचापश्यम् । परतव नर्मदाकूलशैलशिलागुहागु जातशश्चिरं तत्र वासमकमयम्। नर्मदायाः मुरम्योऽयं प्रदेशः। उभयतम्तट हरिणमुस-यन्त्रकारिता वर्मा कूलान्ति कुर्वत्यासीत् । विरं यावन्नितरामदुटिला नर्मदा श्वेतपमित्र प्रत्येत । कुले लागाः मानशिला भनीतकाले पुष्पमताम सूचयन। एक्तः फूले पितर नितिन वनमामोद, द्वितीयतच विरलपादाः समः प्रदेशः। एकतः साईल-हरि-बराव मस्र सगिनां ग्राम्य गम्य, द्वितीयतय मृग-धमर-धार-गवय प्रमूर्त नाम् । एम्तो निशितना- विदारितारणा रीगा वेदा', परतवाकन्तदम्बानो दिन के एक समूलाग्मूलन दिन', परतय फायदहार स्तम्। परश्याविरोधि प्रदेश विभन्नी नमरवान्यान्।ि आई नर्मदा मिलागु शिजापविष्टोऽनन्तानन्दमुथा दिन कायनान- भारका सामावि वरना, सावन वन्यशाकाना रोप्रदेदो मिनी बरवरेनदाईमा “लायटन, सायन पारसे कपिल समन *भूरिमारसमुत्यमाया पावस बगरमागरे मु-भर युनिया र मम is wr -मिरः। २५-गलम् । लियो मार्गमा .

निर्गला आसन् । चतुर्थो निःश्वासः वरक्तन तपस्विना स स्थापिठो भवेत् । शतशस्तापसकुमारास्तस्मिन्यवसन्, हविर्गन्धि. विभावसुधूमः पाश्र्वप्रान्तमपुनात, परमद्य 'वंसावशेषमात्रमासीत् । बिल्वरक्षाणों सान्द्ररछायासु निर्मिताः परिधयोऽद्यापि यज्ञवेदी आम्रस्थाणुशिषकेषु' धेनुदामनीघर्षण- धि सौरभेयीणां प्रचुरी सम्पदमसूचयन् । उद्यानं यस्मिन् तापमाः सविभ्रम भ्यहाः काननीभूतमासीत्, केवलं वचन वचन स्थिता बन्यदाडिमा बीजपूराश्च तस्य प्राचीनपरिचयमस्चयन् । कोणेप्वद्यापि देवमन्दिराण्यासन्, भग्नानि नितरी जीर्णानि । तेषां भित्तीविदार्य बहवः क्षुपा अप्रिमवेदिकाना-यासु वेदयतिनो वेदमध्यापयामासुः-लोशनि प्रकीर्णान्यासन् । तत्र 'वामटरपूराणां पिपीलिकापूर्णानां प्राचुर्यम्। एक विशाल भग्नावशेष विनाऽत्र किमपि नासीत्। परमद्यापि-सम्प्राप्तदशमीक:' सोऽतिथिसेवा न व्यस्मरत् । विदृश्यात्रिणोऽद्यापि तस्य छायासु विधाम्यन्तो प्रीमभीष्मस्य प्रचण्डवण्डकरकिरणवाणानपानेषुः । विस्मृतमार्ग अवनीना अद्यापि प्रारपेण्यान् झावातानसहन्त । लघुलघुभिरपि खल्पस्वल्पैरपि फल बठरदेवमतोषयन् । यूथमुक्कान् मृगानद्यापि स स्ववेदीनामन्तः शं शाययित्वा निर्विघ्न रात्रि व्यतियापयितु सहायिष्ट। अर्जुनशाखासु निषण्णाः पक्षिण आश्रम- स्यातीतगाथामद्याप्यागन्तुकानभावयन्। नगराणी मदमत्तमानवेषु प्रासादेषु, विलास- शालिपूरवनेष्वानन्दस्य शाततमोऽप्यसो मासि यस्तत्राश्रमस्य भग्नावशेषेष्वासीत् । तस्य मूकवरेण करुणरागे, अकृत्रिमौदासीन्ये भूतगाथापाच का विलक्षणा मादकताऽऽसीत् । माधुर्यपूर्ण प्रकृतेश्यमासीत् । सोऽयमाधम एव ममाना वास आसीत् । महमितस्ततः सन्देदृश्यानेषु परिभ्रम्य सत्रैवातिटम् । तस्य भवनानि सम्प्रति वासयोग्यानि नासन् । भाधमस्य मध्य एका पिपलस्तपस्वीच स्थित आसीत्, को जानीले कतिभिवर्षस्तपस्यन, जीवने कीरशैः पाचवातेदवानलै धार्य व्यमितो भवेत् , परन्त्यासीद्विस्तृतो निश्चलो निष्कपश्च। अधुना सत्य स्वचा वाक्यं प्यायीत् । पासासु बालवं युक्त्वञ्च बीतमासीत् । तस्य शाखासु १ सदहर-इतिभाषा। २ सुंटा। ३ चोटियों का स्थान । ४ दशमी - अन्ति- मावस्या' ५ध्वनीन:-पधिक।

मे चन्द्रमहीपतो सहस्रशः पक्षिणा फुलक्रमेण न्यबसन् । शेष इव सोऽपि तान् स्वशिरसाऽधापी ते तत्रैव न्यष्टोवनम्वयनहदन्ननृत्यन्स्कूदन्तास्वंय, परन्तु स सर्व सह शासीत् । मश तेशं समीपे पिप्पलस्यैकतमे उज्वैः प्राण्डे काण्डे एको म व्यरचि। महता श्रमेण दालकाण्डे शवण्डरेकाकी तमामेव । सुन्दमुन्द कोमलकोमल: पुष्पात्रराच्छादिता सा कौशेयावरणमप्यत्यशेत। वंशानामेका छिदमः भित्तिापि मया परितो निरमायि। भई विदूरारकार्य कृत्वा समायन् सस्नेहं सग ता मनोरमा युटों पश्यन्नासम्। मने तस्या वियोगं न सहमाने भारताम् । सापि म मैरिव सहस्रशरिछानिमिपनयना पिबन्तीवासीत्। अहे तस्या कोणे महुविधा पनि रक्षन्नासम् । तान्येव भम जीवनात्य साधनान्यवर्तन्त । कदाचन तृप्ति रात्रौ हिसभयङ्करं नधास्तटमगच्छन् कन्यदाडिमीफलानो रसमेगापिरम् । एकदाई सर्व' दिन काय मुश्यन भासम् । कः पर्यमासीद् यत् कति गव्यूतरों मयावावजाहिरे, परन्तु मम शरीर नितरामशफमभूत् । थान्तस्य सोऽपूर्वी दिखस भासीन्, मच्छरीरं स्वेदस्पेण बहिनिरत् । अई नर्मदाशिवरोधमि शिलाफलकमेकमधिशयानः कदायित्मान, कदावन भयहरं कानन, कमान स्वम्यायनशितामरतात्यताच काचन बन्याशन कदाचन चन्द, कदाचन भवन्त. चिनुशन्धममपनुरक्षासम् । दिनपतिः पतमासीत् । दिनमपि तच्छोके मुमेक इव म्लानमभूत्। भरमार मीषणभीपyलिमिश्रितायुर्वतः पर्यपूर्यत पधिमाशा। पूसाही निररिवाराशेये प्यार पानप्रेरित निधराधरैः। मदीया मृतप्रायधिर शिपिलवभिनयं भयं सरितम्। जीवनपणस्य मम रिटार्ग साइरामहरी, धान्नेषां मीना पाति: पति सनगर। थई सत्सरमधरं मिताभिमुगोऽयम्। मन्दरपोरेगचारणैः एवं प्रौद या विणको भगाता हमारी पतसम्म शनि प्रस्तम्। महम्मान पीता रच्दा समरियत । पान गुम न थिटा, होन्द पनि पाकिम। हम्नः हलो नसामा प्रनारायटयां बम बिमी तु मलया। F- गुदामेनानीमचालित चतुर्थो निःश्वास शक्तिभिः प्रकाशदीपैरपि तिमिरदुर्ग नाशितुमशक्यमासीत् । महेश्वरीया मायेव भुवनं व्यामोहयत् । पान्वहं मत्उया प्रविष्ट आसम् । मया दुर्ग प्राप्त मितीवाई व्यवसम् । काननं वन्यपशुपक्षिणा वन्यपशुपक्षिणा रोमायकारिणा कोलाहलेनोदिनमासीत्। सवें खायप्रवणा आसन् । सौभाग्येन मुहूर्तात्परतश्शनैशनेवियद्विशददशामापत् । निश्चला उडवो विपद्ग्रस्ताकाशेन सहानुभूतिमिव प्रकटयन्त्य आप्राकाशन्त । यथाक्थचिन्नीरवता विस्तृता। वनभूमिः खपुत्रान् लालयन्तीव गाढनिहिताश्चकार । अहम फलानि प्राश्य सुप्तः परन्तु सशङ्कः सचेष्टश्च। शिरोवेटनं शिरस्येवासीत, कृपाणः कटितटे ला आसीदेव, वस्त्राणि सर्वाणि परिहितान्येवासन् । केवल मुपानयुगलमुन्मोच्यैकस्मिन्कोणे निहितम् । कुटीरस्यै एकहस्ततोऽपि न्यूने द्वार एवाई शयानासम्। अकस्मान्मम निद्रा भग्ना। मम धैर्यधारि हृदयमधीरतामभृत। तस्य गतिः- शततोऽप्यधिचाऽऽसीत् । आकस्मिकेन भयेनोद्विग्नः सहसा पावनिकुशाद् गर्जनमश्रीषम्। उपविश्वशुषी विस्फार्यादाक्षे यदधो निकुञ्ज जिया सकिणी लिहन सिंहो भ्रमति। तस्यामारप्रतिमे अक्षिणी नैशिकमन्धकारं कर्तयन्ती चोतेते। पुच्छमुत्थाप्य स गमीरगभीरं सत्वरसत्वरं बुभुक्षित इव पादाम्न्यस्यन्नितस्ततोऽभ्रमत् । सत्य भयङ्करा दंडाः धन्तमसेऽपि प्रत्पक्षमैश्यन्त। तस्योत्पाटितं मुखं सुपटो- राखेटिनः पाटवोत्पाटने पट्रासीत् । तस्यैका लघीयसी दृष्टिर्मत्कुटीरे न्यपतत्, एकेनैवोकूर्दनेन स मत्कुटीरोपासीत् । हृदयभावश्वषोरप्रतः समायातः। स निदश गर्जन् कुटीररहने श्रमक्षा- सीत् । तस्य मुखादाममांसगन्धो मन्मानसमुदविजीत्। मर्मरशब्दः कुटी स्वस्साः शोचनीयाँ शौचनीयाँ दशा मय सत्रण न्यवेदयत। सम्प्रति जीवनसंशीतौ चिन्तावकमसमीक्ष्य इस्तधृतनिस्त्रिशोऽभीरिवाभवम् । परं मम कुटी सन्त्रस्तैवासीत्। तस्य निशिता नखा वंशप्राचीरस्य पार्वतोऽन्तः प्रविधा आसन् । सिंहवलिंगतेन पर्णकुटी साङ्ग रकम्पत। पिप्पलशासा मर्मरायन्त्योs. ट्यन् । मुटीप्रवेशाय केवलमेकमेवासीद् द्वारम्। यस्मिन्नहं स्थित एवासम् । मयाऽतुलसाहसेनाक्षिणी उपरि कते स मृशं गर्जितः। द्वावारी मम नितरां समीपे समैन्। पतितः। या कह चन्द्रमहापता ज्वलन्तावाताम् । तस्य ममोधः यासः युटीमण्यत् । सिंहो भीपर्ण साज़ उच्छत्य द्वारस्य एम्मम्मीनको मयारी सङ्गोऽक्षित्री निमीय परन्तु सिंहः प्रहारं श्ययन्नुच्छत्य पुनमंहता वेगेन बुटीरे अधुना फटी विभहला बाता। वस्या मानि शिथिलमन्यमवन् । शन्देन शरीर सिंहनसामावहौषीत् । अनेनाकस्मिकेन भ्यतिकरेण सन्मस्वः सिंहोऽपि सायं एकतः संपूर्व युजलीनोऽभूत् । मया च तरमै नमोऽकारि। कुटीदशा विचित्राऽऽसीत्, भूकम्पोत्तर नगरस्य संग्राम- सम्भनगानस्य वीरस्येव । प्राची प्राकाशत। सूर्यदीपमादाय भुवननीराजनामिवाचरन्ती सा नितरामराजन् । अहं प्रातराशं विधाय गन्तुं व्यचारयम् । तस्मात्स्थानान्मम मनस्तृतमासीत् । क्षणं भमगानो कुटी, क्षणमाश्रमं क्षणं पिप्पल, क्षणं मत्प्रतिवेशिनः पक्षिणः पस्नेह वीक्ष्य पादपर्वतकन्दराभिमुखमगच्छम् । उपवनमेवासीत् पर्वतः। वनपर्वतयोमध्ये एक विस्तृत मुरम्यं चक्षुःसवस क्षेत्रं पर्वतनिर्मराणां विमलजलेन सितमुपवनता दधदासीत् । एकतः शिल्पिनिमितेव सरला चा वंशभित्तिरभ्राजत। अन्यतच शिखरैराकाशं स्पृशन् विविधमलतागुल्मगहनः लोऽवनितलमाक्रम्य वियत्सुधामापिद्भिः करीरपनसतिनिशपारिभद्रार्जुनादिभि मिणामनवरतराणत्कारेण च व्याप्त मासीत् । अहमेकस्य सच्छायमदीदत्य शीतले तल उपविष्टः पार्वतीः घनयना यशावली: उमाण आसम्। अस्मान्मया दृष्टं यत् सान्दवमनिलये भालान्तौ द्वी पौ पर्वतपाषाणविकतननिमितायां गुहायो प्रविशतः । गोत , कियता भ्रमेण कतिभिश्च वर्षः सा सम्पादिता भवेत्, परमद्यापि गुहाभवनान्निगतो "हे प्रभो? हे नारायण ! हे दीनबन्धो ? मा जीवये"ति विरलविरलोऽरफुटाक्षरो ध्वनिर्मकी सतविकरोत् । अस्खनपदन्यासोऽहमपश्यं यल्लोहदण्डद्वारायां कारायां विवशेखरः प्रादमधुः कृशः कस्वस्या निर्माणकाल पडोसी-इतिभाशा . चतुर्थो निःश्वासः कृष्णो दोनो म्लानोऽपरिचीयमानोऽस्ति । तन्मुखादेव तानि पदानि नि.सरन्ति । ताहगवस्यं दृष्ट्वा हृदयमसाधारणया करणया पूर्णम् । लधुरेव "विष्कम्भक भासीत्तदने, पापाणपातेन्धत सद्योऽभिदम् । ततन यथाऽऽनीतवानस्मि, तथा श्रीमतामने स्थित एव। अनेन कथित चन्द्रगमनकृतमिति । ततय सभासदां साधुवादन रहैच विरते श्रीमति शकिधरे प्रार्द्धमानायाश्च महाराज- स्याधीरतायो मौसय भजत्सु च संसद्येषु शक्तिधरानन्धरातः सजिज्ञपत् । देव! केवलं हमावभिन्ने परमसुदि श्रीमति चन्द्रकुमारे गते द्वित्रेषु दिने व्यतीतेप्वई मम निवेतनस्य क्षोमे' सुप्त बासम् । ममाकरमागिता भाना। निशीथः। सर्वतः प्रसूता च भोषणा निस्तब्धता । मूरतामन्तर्धत्तं तमसिनी ॥ नितर तिमिरिणी। मिशीकरणमटकारमन्तरा कोऽसि शब्दः श्रुतिपर्ध नावावात्। समस्त बगदापादमसके भयम मवासीत्। क्षिप्रधाविणा झवणे- भानुभूतो भवनस्याधौभागे ध्यानपूर्वाधानः। उद्विग्नो भीतवाहमसामयिकेन ध्वानेन, भित्तिमजपातः पयगुटिक भिन्दिालमेक निःसार्य कुक्षि 'गुटिकायर्या संस्थाप्य, नागदन्तेषु सम्पमानानां पन्द्रहासानामेस्तम लघीयांसं हसे कृत्वाऽमादितचरणः सोपानरवतीर्या- दी मन्मम दासा उसचेतना एकस्मिनिद्वारे सज्ञानं शेरते। सान् विहाय- वाने विचिकित्सता मया कवाटसूक्ष्मच्छिदनिर्गमनलघु दृष्ट' ज्योतिः । कपाटे पादापातेन निरवैषं यत्नपाटयुगलमन्तरतो 'मुद्रितमस्ति । अनुभूतिः प्रत्यस्ता मत। कतिवन पुरसः शनरालपततिभाया मम कोरात सत्वरसत्वरं बहिनिरशिपन्। विनर्माप्रकाशिधाप्रकाशथासिल "विमाप्रकाशिधापकाशासिल बखजात प्राकायत । द्वारमन्मुद्रयिष्यन्तीति पर्यासोच्य बहिरागस स्वान् यत् यः पुष्पा मम- कोपागतं प्रमोप्य पोलिशासायथ्य जिवायोग्य गन्तुं सवाः। प्रयः पुरषः शरीरेण, साइसेन, पुस्पा, स्या, शोभ, हलेन, कोन २ गरिया:- एकथमित विचार्मारि नामामह शाकमोर्यमार्ण रामात - ५ वाला-इतिभाषा । २ परकमप्रितमें। परिसीलारपेट पर दी। दति भया। टॉईट। मुंप - चन्द्रमहीपतो "तिस्त रे। चौर्यकलङ्कपडिलाः। दुष्टभ्रष्टाः इति सगर्जनमाभाष्य सदश्चमेक मारूढो निष्कोशकृपाकृपणकृपाणपाणिरहमन्वधावम् । किश्चिद्दरं गतो व्यवारयम्- यदेते निर्दयाः साहसिका-एकाकिनं मा हन्युस्तदा दुःखदमिमं संवादं का धावयिष्यति खजनसम्बन्धिनः। सर्वे मित्रवान्धवैरविशात एव मरिष्यामि। मम हृदयगतिः पदे पर प्याकुलता चावद्धत। उद्गताः वीरभावा एकपद एव विलीना। मुखमण्डल सिन्नम्। करोऽकम्पत। शरीरं शिथिलतामभापीत् । भरमादधः-हिं हि शब्देन स्तब्धतामभनन् । तद्वाचि उत्साह भासत, खामिभक्तिरात्मविश्वासथ । अकरमात्स्पिरमभूद् हृदयम्। भीतियीता। अहमस- दायोरमीति भावना नष्टा । पशुरयमस्माकं किमुपकरिष्यतीति विन्नपि तस्य हेप- नवीनेनोत्साहनाई प्रतियोधितोऽद्भुतधैर्येण पूर्णः । सम्प्रति मदीयो पाहो वातेन समलपत् । तेषां वाजिनोऽनि बेगेन मार्गमतियन्त आसन्। परन्तु ममाप्यवस्वेभ्यो विदरो मासीत्। को जानीते कति कोश- मध्वानमहं प्यत्साय, परन्तु नक्षप्रेक्षणेन रायिः खलखवावशिष्टा प्रत्येत् । तेऽकरमा दश्वेभ्योऽवती। भदमप्यवतीय वगां करीर शासावायोग्य मांदया स्थितो भिन्दिपाल निमार्य प्रारम् । चतुर्दशी चन्द दैत। ध्यप्रस्य ममापिणी सम्मथ माग्यवाम् । तथापि दो पुसावाहतो, तथापि दौ पुरावाहतो, एक्य परेतरामस्यायनीन मरवन्। पना शालिः। पन्दप्रकाशानाय तमः। जनसम्पर्करहितचार्य प्रदेशः। माई ममी धनराशि पिचरप्रादे प्राचत, तदैव “वीर पर पश्यसि । पति- इति समययत कपकुहरविकोटन पालो पोर अपद प्रत्या तरतुयालले कुति-रमने तिरपनाती पोरमदादये कममानमरवले भीग निक मिन्दिालचिनुरोमनिरम्वे हम्मीरे मयि निम्टामा चिमारलतर, कालाय मापूरीतर महिमा नितिनेर, मखिलाजासानिम्बारमितक, मानव ser- कुनय, प्रादहत्या मवादमायवेद, हयाान्न सामग -- चतुर्था निःश्वासः ७६ कृष्णपटेन समावृतशरीरो भीलवस्त्रावगुण्ठिताननो भयङ्कराकारः साकार इव कालो दृढदारीरो मल्ल इस हस्तघृतमलः कश्चन ना। साक्षान्मृत्युमिव पुर स्थितं ते वीक्ष्य शोधनमात्मानं धिकृतमकार्षम् । नवरवृत्ते वित्तस्य गरीया लोभन प्राणानपि स्वहस्तेन संशीतिमारोपपत्ता मया स्वस्याविश्यकारिवं व्यक्तम् । तमसला चचला जीवनपारावारे समभ्येति नश्यति च बहुशः, परन्तु तनुरनमिदं न पीनःपुन्येनाप्यते, हन्त ! कथं निःसर्तव्यमस्मान्मृत्युमुखात्। कथमस्य विपत्- पारावारय परं पारमाथयेयमिति चिन्ताकुली मरणमवश्यं सम्भाव्यमानः सत्वरमेव- सिना प्रारम्। परन्तु मलिटन प्रकोष्ठे गृहीतीमुना कालेन केवल स्पा निश्वसन अन्तःस्थितं क्रोध- मक्षिभ्यां वमन्नासम् । तावदेव वायुवनिना' संकेतितः कश्चिदागत्य शिरसि विषमय- प्रचुरपरिमलमूदायकोषधपरीतं वस्त्र प्राक्षिपद्येन घ्राणाप्रत्तिनवाई मसंज्ञः संवृत्तः। मष्टमूर्छश्वात्मानं लोहदण्डनिमितद्वारे कारागारे प्रापम् । यस्मिंश्व कम्बलयं प्रावरणविस्ता], पयःपूर्ण घटं भग्नतुम्बीपात्रं विना नान्यत् किमप्यासीत् । कश्चिन्मूको दासो द्विवेहोमिर्मह्यमन प्रमच्छनासीत् । नैवाहमियन्ते काल दुःखमा- कलण्यापि जीवामि। अन्यदा प्रमाते समन्वभवं यचन्द्रः घरेणुकामारुढो मइति धमारोहे धमाद्रिय- माणोऽचरे नगरे राज्ञो हाभिमुखं प्रयाति तमन्वहमपि वाजिनमारूदी यामि। विलक्षणो वाद्यध्वनि हाद मुखरयति । अकस्मादेको महाँस्खोमचलितः। तेन- महाशरदेव व्योऽई निद्रामजहाम्। क्षणं स्वप्न क्षणं स्वकीयां वर्तमान दशा विमृशन्नई निशा व्यगमयम् । बभूव मुप्रभातम् । अथ दिन मम जीवनस्य विशिष्टं दिनमाधीत् । स्वर्णसूर्य उगात्। किरणावली प्रमोद प्रावत। पक्षिणो रुवेन भाविसन्देशमिवासूचयन् । गुहावासिनो मृगा अपि सहानुभूति प्रकटयन्त इव मदीयद्वारग्डे कण्डमपानवान् । विचारव्यग्रे माय भविदित इव मभ्यामतीत्यापराहोऽभूत्। पादयनिरिवाश्रादि । मयानु- मित मूरदासो भोजनमानयति। अहं जीवने निराशस्त्वासमेव । सद्यो जीवनक्षपणाम १हिसिल सीटी। तोभा-तोप इतिभापा।

चन्द्रमहीपतो परमेशं प्रार्ययमानेन कारावास?ईलाभ्यां नेत्राभ्यां प्रेश यच्छ्रोमान्मन्निकुमार= परमशक्तिधरमशक्तिघरो द्वारस्य पुरो वेदिकामच्याते। क्षणं मया चन्दम्वप्न इवैषो स्खा एव मतः। परन्तु क्षणेनैव भाहितमान्ये मनसि विवेकरेसा समचरन् । भन्ने तालके सर्वाङ्गघलेनाहमुदतिष्टम् । सस्नेहं, सरगं, सतरं मनोरनारगयोश्चरम- सरोरुहयोः पतितोऽध्रुषोतसा वनभ्रमणधूलिमक्षालयम् । भाभारी ऋणी कृतज्ञश्वामि यदय अपेक्षितर्यभ्रा सम्राजां नितरामसम्भावित दर्शनसुखमनुभवामीति कथयित्वा विश्रिंसतीव तटरि, "चन्द्रः कच्चित्ता-नित साधीरं भाषमाणे व राज्ञि पुनः प्रारभत वक्तुं सौढप्रचुरकटस्तथा। देव, चन्दः किमर्थवा गतः-इत्यहमेव जानन्न सम्। यतः स मया सदैवामन्य- गतः। शक्तिधरस्तु नासीत् । महा.-आम्, भस्माभिरप्येतदेवान्वमायि यद् विश्वशेखरोऽपि तमनुगतः । विश्व०-एतदेव विचारितमासीत्, परं मध्य एव यस्मिन् विश्पयोधौ न्यमबती- मतां पुरी निवेदितमेव । महा.-( किश्चिदधैर्यण ) भाम्, आम् ततः। विश्व-देव, किं न स्मर्यते भगवद्धरसिद्धियाना, विमलपुरेश्वरपुन्या च चन्दार परिणयप्रतिज्ञा। महा.-(सोत्कण्ठेन मनसा स्मृतपूर्वोदन्त इव ) आम् कथन, चन्द्र गते सप्तहे ध्यतीते ततस्तिलकः समायातः। विस-एकदा सान्धिवेल' विधि समाप्य प्रादोपमशनमुग्भग्य भवनमुखोपपने पबनानन्दमनुभवति मयि द्वारपश्चन्द्रागमनं न्यवेदयत् । स्मितेन रात्रिमुख राजयति मौनमुपविष्ट तस्मिन्नहमवोच:- वातलेऽपि स्विन्ना कपोलपाली गरीयांसमाधि प्रस्टयति, म्लानं मुसं कामिा व्यनक्ति, स्फुरदधरो धैर्यमिवावधीरयति, स्सलन्तौ चरणी महती मुत्मुस्ता सूचाता किमिदं श्विास्य कारणम् ।। चन्द्रः-सत्यमुपलशित मित्र ! परसुतो नितर सिन्नाऽस्मि । अहं-युमार, कोऽयमभिनवः खेदावसरः।

चतुर्थों निःश्वासः चन्दा आम अभिनवः, यदर्यमामन्त्रणायागतोऽस्मि । भाई-भयमहं धीमा जन्मनोऽवगिव दासः । पन्दः-ससे, ससेदोऽस्मि । पश्यरिनुराधानाद्वाससो वनाध्यक्षेण लन्धमिदं पत्रम् । विश्व-देव, तदेवेदं पत्रमासीद, यदुनायिन्या विमलपुरेश्वरेण लिखितम् । तदिदं पठित्वा स मशमुदताप्सीत् । न्यजितक्रोधोऽयोचथ। "अगर नगुप्सितमनायंचरणीयमयशस्यमाचरितमिदं पत्रंदिस्मरता ताठेन, महसवाग्दाना चेत् परिचीता, यतो न पूर्ण रूपः प्राप्य विटनपविवाहिताः चुलीनाः न्यास्तदा मइद- न्याव्यम्।" "कुमार, शान्तं पापम् । अमरपदिनी वे सम्पत्तिः, नेत्रशतविलोपया काममोहिनी ते भूतिः भूपाल वककीसितकोत्त। धोलश्रीमहाराजनवेन्दुपालस्यैकाकी प्रियः पुत्रः, अमालसा बलं, पूणे वर्तमानोप्ये उत्सम्बन्धजिटिषयाऽदतवादानस्तन्मन्ये सापि भारचरणसरोरुहदास्यमपेशत एव । विलक्षणोऽय भगवान् विधिः"। "सम्माय्यवे, परं खोभाविराजतिलकरयन्तमान स्थित्वा परत एतदर्य मास्यामि।" इति। तर, पन्द्रो विमलपुर गवः सई क्षेममेव विधात्यति देवः प्रमथनाथः। जुत्यमेव अपने देवेन पन्द्रस्य। अहमेतत्सर्व विदसपि धीमते निवेदनायालन्धावसर भासम्। "पर दिलम्बेकोऽवलम्या -दत्युस्वामूधितो महाराजः। प्रातकालः, समलमनोहाटमपुरस्सरं विकास मुफ्भावम् । कार्यकरयरमामिा कार- बन्दी भास्कररिरणाली जगताको प्रस्ता। विपरी निगमिः प्रणिन्सया उचामानान्यनुशीलसन्त सपिजामुगागमत् । सय हास्पेनाभिनन्दस्तमा:- "पूर्व महानिम्बलरसापित पकायायित परिधाममुरां कर्म कुर्वन् नरो दीयो सानोति भो रामारान्वरमा मताद एसपेयमाश्यमेव म्पबदतव्यम् । "मनोभानो मनस्येव धेलान् । परिवरवता तिमानुपानव विदम्पम् । मिपिरदेसपायर यासंघारमोठिमागम विशातार रविचारेभ्यः म बिरादरहर सिन्ततिहाय रिपन दो मके या न स पुनस्त्यदेव ।

चन्द्रमहीपतो . मा वद। सर्वेषां विचारं श्रुत्वापि निर्णये स्वतन्त्रः स्याः । निधि निरीसम्म पन्नाभूषणे सभ्यता मर्यादोकृत्य प्रजेः। धने नादाता नव दाता भूयाः। सत्यमात्मे भव्यभावनः सर्वदेव सक्षणो मवेः। प्रतिज्ञातपरो भूया इति ।" उपसमुद्र स्थलम्, स्वर्णकणा इव मुद्सन्निभा धुलिकणाचण्डकिरणसम्पर्श भ्राउ कस्मिति दिमागे शकुनिकुलाकुलिता नेक्ष्यन्ते सान्द्रपादपाः। पाचन कान गर्ज राणा नारिकेलानाय विरलविलाऽवलिः । शकिधरो यानस्य प्रतीक्षाभवने क्षण विश्रम्य राज्ञ पिनेच सन्दिय सहयोगिनोऽभि नन्दानुशाणितरणि प्राविशत् । सरणिधे यमेकाऽन्पीयसी नगयवासीत् । पृथक श्रेणिविभागः वाचनालयः, भोजनालयः भ्रमणा कीडार्थच वेदिका निवासायापासाः तेयुप शयन-विश्रम-शौक्स्नानादिकर्मणां कृते नितरा सौकर्यम्। शातिधरीकी प्राग म्यवाय पिनमावा प्रविश्य कार्यक्रम निरमासीत् । भय नौ र्षायुध्वनिना बनान् प्रसूच्य घर-रए शब्देन परधरायितथरा बैगेन विभाग कर्तयन्तीय पयोषि प्राचलत् । धान्तोमगान् गमस्तिदसोऽस्तामलयन्द्रग्रहमजमहत् । गृत्योरशरीर पूमि मान- मभिनय प्रगतम् । शिसप्तौ प्रोपित शोकविद्यौः पतिमता योगिक्षिणम्बना मौनमय स्थिता। प्यान्नविष्वसधैर्य दियश्वास गरिता मामिन गितमा सिती तमाम मीनम्। प्रशान्तनमननेनारी मपाः पाम्बाधर पुष्कर दयावा पुरणो मवमपिरन् । धास्माविष्ट पायो । य ग सभा रम्भापालेन बदमनवरदनसम्नीलविदः, निकाय प्रेय ए, रमाक्षेतमा पात्रा प्रसारितः बटरिख, तमसोमा विराट चलमिदुमनः सुग्गाशमृन्वरित धराधरणधान्त यसमीरोदनाय म विडेव वियः कृत्य परमपणे घायाम्। ai मन्टेसर महाविहन विभव बन जात्र, ster बसपी भिवानी प्रोडमा गोरखपत्रायलीमा विमानमारोरपन्दी मा बामत् ।

चतुर्थों निःश्वासः ८३ समुद्रोऽध उच्छृङ्खलमनुष्यरनवरत विधीयभाना घर्षणामितोऽधिक सोढुं न शक्ष्यतीव सत्यत । स्वभावगम्भीर तस्य हृदयं मानवाना स्वायपरताया विरोधीव रणागणे गर्जतो इत्यादपि प्रचण्ड, प्रलयकारि चासीत्। सलो स्ताडिततरेः, मुसलधारं पतता धारासारेण हतोत्साहस्य प्रधानकैवर्तकस्य मनो विहलता प्रापदि पदे पदे। निमोलितकनयनः स कदाचन दूरवीक्षणेन परी नावं, कदाचन जलप्रावल्यं, कदावन मझावातस्य गति, तस्याप्रशमनकालय परामृशत्। जनमानसानि भगवशामजपे सामान्यास । किन्तु शतिधरशक्तिघर एव । तस्य सुपटितं शरीर निभीको यौवनमुलभ आत्मविश्वासस्तेन सार्द्धमासीत् । भयकरेऽपि समये सरिता पत्युस्ताण्डवं पदयन, गायन्नास्त । भकरमात् कलोलसंहत्या भृशमाहता वरिस्तिर्यम्भूता, जनतायाः सारुणः कोलाहल- स्तमस्तोमे लीनः। दिशि दिशि ततरन्याते विद्वद्वरानवरगतो विततमहसः शान्दे शाखेऽवतीर्णबृहस्पतेः व्यथित कृतधीः फे० के० शास्त्री मनोज्ञकविप्रियं- बहुलमधु तुर्यो निःश्वासः स चन्द्रमहीपतेः । इति धीटीकमानीवेदवेदावविद्यालयमुख्याध्यापकाना पपिडताबरामितरायपूजितपादारविन्दाना धौलश्रीनवाणरापनात्रि तनयेन काम्पालबारेण भोनिवासशामिणा रविते चन्द्रमहीपती चनुयों निश्वासः। -

पञ्चमो निःश्वासः
अपि दलन्मुकुले बकुले यया
पदमघायि कदापि न हेलया।
अहह ! सा सहसा विघुरे वियों
मधुकरी बदरीमनुसेवते ॥
मुभाषितम्
अद्गनवेदी यसुधा, कुल्या जलधिः, स्थली च पातालम् ।
वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य वीरस्य ।।
बाणा
इतो विद्य द्वल्लीविलसितमितः केतकरजः
स्फुरद्न्यं प्रोद्यजलदनिनदस्फूर्जितमदः ।
इत: केकिक्रीडाकलकलभरः पक्ष्मलदशा
कथं यास्यन्त्येते विरहदिवसाः सम्भ्रमरसाः॥
मुभाषितम्
देव
प्रत्यूषा प्राकाशत। मुकरोउम्मलाः मुक्तावतला उर्जिक्षन्निय पियक्षेत्रे
धावन् विक्षमाण इव वा सांसारिकमाश्चर्य भगवान् भाखानारोहोदयगिरिम् । भातपोषणा
जगत उद्धमविधमया च मम निद्रा ममा। मम प्रिपरीक्षिणा घ्राणेनानुभूतो गपने
विलक्षणो गन्धः । नितां शिथिलानि गतस्फूर्तीनि ममासान्यपि गूरामिवासूययन् । मम
व्यायामि पक्ष परित्यागेऽनीहम् । पावें कमलाप निष्कमलं प्रेस मन
साशामभूत् । मटित्युत्यायेतस्ततो वीश्य यहिरेत्य सहचरीरयष्ठम् । ताः प्रत्यू:

पञ्चमो निःश्वासः 'मनोरमे, कि भणसि बहिस्तु न समेता खामिनी जागरणसमयमपेक्षमागा चिरं प्रतीक्षमाणा भवती मुन्निद्रयितुकामा इत आयत्या स्मः'। 'किन्तु भवने नास्ति राजकुमारी' साशवाहं प्रावोचम् । एक प्रवाहः प्रसूतः, क्षणेन भवनस्य कोण कोणमवगाढम्। महाराजो निवेदितः। सकोट्टपाला नगरनियामका मन्त्रिणा सहैवागत्य व्यवस्थिरे, परं कमला नाधिपाता। देव, श्रीमति याते प्रत्यहं गुप्यन्ती नेममापातं सोढुं शश्यति देवस्वरस्य" "राज्ञ भारक्षानियुक्त रन्ततः किं विनिर्णीतम्"। "देव, अन्ततो मन्त्रिणा नैशः प्रासादरक्षको देवल: समाहूतः, वयधुमने भो रज्जुबद्धः शिथिलाको निष्प्रभमुसो घर्षरवता खरेण सब नैशोदन्तं प्रायोधयत् । अग्रे च रात्रौ प्रेषितानां चराणां मुखा देवः भणोतु:- "देव, परहारे रात्री पञ्चाया जना मरुत्तरारूदायरैः सायं दीक्षिताः, किन्तु देवस्पोत्सवे समागमाशाया न विशेषत भाशङ्किता। एको मकतरो रामावुहियं वीक्षितः, स एव च रात्रौ नदीमार्गमारूढोऽवलोकितः। नद्यास्वटे नाविकनायकेन सूचित घारराने कविचन पाटबराःशवेन साई जीवनीकास्त्रारदा वनं विविशुः" इति । चन्दश्वराणां योग्यतामफलां विभाव्य तान् किमपि निर्दिश्य खयमेवाप्रेसरोऽभून् । "पिपासा बाधते शुद्ध जलं लन्धुं शक्यते ।" नवागन्तुकेन वृद्धा प्रावोचि । "अवश्यम्, उपनदि बाहुल्ममस्य, क्षणं विधाम्य, धूलिधसरणमनवरतभ्रमणं, दीर्थों- निश्वासस्टयन्ती वाक् च तो श्रान्त घोषयति । वादृशानां कोमलकलेवराणामेवं निश्यसहाय भ्रमणं मनो भ्रमयति । अहमद्य भवन्तं दुर्घटनाग्रस्तमिवानुभवामि।" --गोविन्द, सद्यो जलमानय"-मुसं व्यावृत्य कैवर्तक आह । "माविक, त्वमा कार्य कुर्वन्नेव वृद्धोभूना, मन्ये बढ्यो घटनास्त्वया दृष्टाः" "महाशय, नदीतटें दुर्घटनानां स्थानम् । यदा पन महामहावेगेन प्रवर्षणेन च प्राचद्धत नदी, गृहाणि गृहिण्यः पुत्राइच विलक्षाः, भ्रमणव्यसनिनश्च पाहा कपलोभूताः।" "दस्यवोऽपि नद्या लाभान्विता भवन्ति"!

चन्द्रमहीपती
"अथ किम्।
"एषु दिनेषु त्वया किमप्यस्थाने हम्"
"परयो निशोथात्परतो निरागमनलघुतरमरुत्तरारुढारत्रयः पुरुषाः
समेत
पाच एव तमालनीला सान्द्रामा स्थत्यस्ति, निशीधे तत आगमनमाथर्यकरमास
अहं जागरित एकासं युद्धभावान्निद्रा राम्य नैति, यतश्च कनीयान गृतोऽस्ति सा नम
छावदीलीना, सर्वा........."
"स्थाने," ततस्तः, श्रीमुक्याचस्तति प्रोटयतोक्कम् ।
"ते मा मुदायकमातरं दित्सवोऽतिवेलमाग्रहीषुः, किन्तु कवभिप्रायर्यास्ताननुम
पादाय नप" तमालधुममाप्य पुनः प्रोवाय माविकानदतः पारमस्मिन् ।
विचित्रमयनानि नरान् पयन्ति, जगत्ल्याताना लण्टाकानामेवाय निलयः। पे गत
मप्रतिनियत
"भाम, तेक ता"
". गताः" इति तु सानुमराश्यम् । से मतदेह शवमिय, वायुरणों म
स्तरणगाधना जीवननावधोत्तार्य नद्या निपत्याभिवन यान्तोरगोचरे संग।
महत्तरच गती यवागतम्।”
यो नापीभरस्य ar"
"बनान्तरित भाच्छियः (किदिवाय) शिक्षितमिर अपने हम
श्रोत"
"लमा पारं प्रातयिष्यसि।"
" दायान यात्रा मनात कृते पानि ।
"तुरंत मनान पनि, दि में गमनमा वागाय।"
"र दनांगरम प!ि firम मतः ।"
मन्ये
दागरोटरी इष्पक्ष, मिन भागमा
गुणकापर्णः

पञ्चमो निःश्वासः कलयाप्यस्पृश्यतले, विशालशाखशासिसहस्रसङ्घल, कुलभवनं कोलेयकानां गृहं गण्डकाना निलयं लुलायाना, सम सिंहानां वेश्म व्याघ्राणां निकेतन करटिनां कान्तारम् । अतिशयशीतलायर्या बनावनावभिनवानि पदचिहानि पश्यश्चकितः शुष्यन्ती गलनलिकामोरयोः प्रसूता पर्पटी प्रस्सन्दमान चेतश्च नारकरसेनाश्चास्य भुतवानदो वचः। "आः दुः, सर्व जीवनं दुष्कर्मसु भादयो विगमय्य इत्यमुपहतोऽस्मि । मया दातशो निरपराधा निर्दयं हन्त हता, श्राः बलम् हन्त गलोऽवरुध्यते। सत्यः पातिताः.. महात्मानोऽवमानिता, तत्फलं मया सम्यम् । किं अवै ..( परवता स्वरेण ) हन्त, वराकी कमला मन्तिमशब्दयवणेनैव स व ध्यस्माीत् । वाचा प्रचारमन्वेष्टुकामो यथा प्रावतत्तथैवादाशीन्नियमान निःसरद्वायुपन्दमाना- वयवमुष्णशोणितशोणितीयतझोणिमश्वसद्धोर्ण पादोरक्षेपमृदुलितवरं नरम् । तस्य वापर टितो शिलान्तर्गता उत्तारके दृशौ शिथिलं शरीरमासीत् । स मुख म्यादायानन्त- निदायामशेत। यावन्दो व्यचिकित्सदोषीत् पिकान् सयोग्यत् रम्भारम्भं दम्भयत्, मेनका मौनयत, उर्वशी बशयत् , तुम्युरु स्तम्भयत् कदलीमृदुलता दलमत्, सुधामवधोरयत्, विसहादि, जितमनसामरि विकार, पशुपक्षिमामपि मनोहारि विमानिताप्सगेगान गानम् । निर्जने पने मनुष्यमृत्युः-प्रहारेण न वन्यहिंग पुनश्वेताश्चेतोहारि गानम् । विगे। भयङ्कररमणीययोविचित्रो मेलः। भार्यम् । पानोत्तर रावस्य समालोचनो विधत्सुर्यथा ४ प्रतिस्त दस्य विमचि हस्य मानुमन्यत । प्रतिनिवर्त्य हट शो नागोत् । निकुमाः निष्टक्टाबादलोहिताः पोषित प्रयतमासीत पाय उत्थाप्य पुचरितः। उसकाननमे प्रारतिर विस्तृत क्षेत्रम् । दुर्वा नास्ति, न कुगुमलता न च पुष पास किन्नु परिक्षाचन समूदिता विशाल शातिनः ससायो स्थिताः । क्षेत्रावरा गगन एशन्स पर्वतमाला श्यन्ते । माया रान्दाहिया खिदेहरिमन से समस्योरमेन शान्तरं गन्नु कति।

चन्द्रमहीपतो
तकस्मिन् पादपे कौशेयदामनिवायां दोलायां समानवयौवर्णवामोमूनानि
मुन्दर्यः रसापाहतपीयूष सररासररां मधुरमधुरं सारतारं गायन्तिः-
हम् मम् म् मम् सलिलदायमा स्थायी।
श्रावणमासो हासो भूमेः सान्द्रो वातो जगदभिरामम्
मारामृतमिव वर्षसि । (१)
विदियं वरिणवर्णा विस्कृजितबधिरीकृतका
थाहत्याध्युशमशयति (२)
अभितटमा नीरदमला कालिम्ना कलपीकृतशाला:
मम मानसमसितयति। (३)
विमलेय शाटी मम तन्वाऽऽश्लिष्टाऽऽदांतादात्म्यमुपेता
अभितो मा ससि इसति । (४)
पिकवाणी प्रवणान्तविश विमथितमानसवस्तिका
शं द्रष्टुमिवेच्छति । (५)
मजुळवजुलसान्द्रनिकुओं केकाविस्तं सारसरसितं
मन्मथमदिरा वर्षति । (६)
गानेनामुना विस्मृतान्यव्यापार उन्मुखो मृगगणो मन्त्रमुग्ध इव पीतमद व
वशीकृत इन रज्ज्वाऽऽबध्याकृष्यमाण इव विवशस्त्र प्यष्टोभिष्ट। साश्चर्यः सावधान
श्चन्द्रस्ता वीक्ष्य यावदने प्रचलितस्तावत्ताः दोलादाम्नैव सान्द्रपादपेष्वारूढाः सत्मना
चन्द्रो व्यचारयत् :- मानुषीषु कदापीहक् रूपं प्रैक्षि । अद्य कल्पना रूपसरसा-
मप्सरसा साक्षाकृत्या प्रत्यक्षीकृता। स्मिाभिरपहृता भवेत्कमला! किन्तास रफ्मीर
नाख्याति । किं पुशेशयकिसलयं करपत्रायते । प्रकृतिस्थं पानीयमपि प्रज्वलयति ।
सुपमा...पाठ्माधुर्यम्...विचित्रम्। अवश्यमेता एतत्प्रदेशत्याभिशयः । एतासा
साहाय्येन कमलावश्यं सन्धु शक्यते।"-विचारचयभन्न शिस्तिमाकण्यानुशिक्षित
लब्धाशोऽन्वसरत् ।.
वाटचरावटवीप्वनुमितमागों विभीमन् शारदमेपनिवइमिव सितं भालमिव

पश्चमो निःश्वासः भुवनस्य सान्द्रगुपानिपुंश्वेतमयणमिति, यूमिव प्राचीनयशोधनाना स्तूपमित्र धर्मस्य वीर प्रसाद सासामापर मन्यमानः प्रविविशुः प्रदक्षिणं कृत्वाध्यैष्ट यपिता पर्नुलमदो भवन यत्र भासिदारस्य पशद्वारस्य वा हिमपि। हरयाहितकमल रिमिक सौ परिकमतचन्द्रश्याशासन्तानं तमस्तोमे दिलाय विधारतिरदश्यतामयात् । बभवतस्मखिन्या वनभूमौ सूर्यस्यासमयनेन विश्वव्याप्त समः। मानुक्तिमपोडी प्रारय धरलमवनधावत्यमप्यासीदकिश्चित्करम् । शव पदपे मुमोऽहम्पनिदानन्दः प्रत्यूप एवोत्पाय भवनभावनायो लमः । भाम' पोध मेघमासाधनामुलभ्य सौपीनं या शिरोवण ध.तबम्बमायोग्य गोपाप संयोज्योझिपर। असालियभित्ती तयायमोऽप्यनायासायेनोपाजपामा किन्नु दैवे प्रतिकूले सर्व प्रति कूलम, पतो बहुभारायासिता बालगोधा प्राणानुवराट । শৰ গিৰি খনি চিন্তা ছিলাম বন বিম- येने मोविशाल उपरितनी भाषः। एवो भित्तो गुड लोहनिमित द्वारम् । निपुण- निज निरवारि परमेोऽय रे भगो दिमतो नौलागेण रको दुर्लक्ष्य योगो मोहफल के प्रति मासीत् । क्षण विससिपिलानि वारागि एम्यगास्य पालतलनो निरीक्षप्रमगेन परिक्षामनुप्रयन् । मोरार सोपनियन्ते मा निशा सारा पोपरा- ASSEYमति से पादरी मुस्टनदेशदार पनि भएन शिमाया - भन्ने मान्मः। भभितो समरिहतशिभARAT कातिल डन्ति। म Tree, सिमर दोश्रमरपरा arsी परभन्दाय ने सन् मुगरा राकको MERIT समय राये परमपरं कर ६० चन्द्रमहीपती लिन्ने पूतिगधी पथि पतितः सं म्रियमाणमिवामन्यत । दुरत्ययो दुदैवदुविधा। कामाग्निहवनकुण्डे सर्वखजुहुति युवानः । निर्वपतो जीवनदीपस्य सल्पीयसी प्रभा तदक्ष्णोरमतोऽनत्तीत् । जीवनमरणसन्धौ स सकृत् खकीय सुससमुदयमस्मरत् । "पाटचराणां विनाशाय कृतया प्रतिज्ञया सहैव कमलापि नष्टा, कोदशोऽहं दुरदरः । हन्त, पालयित्री ही सर्वापदां मान्या जननी, वात्सल्यविगलदभुस्नपितश्मः पूज्यः स्निा क च शक्तिधरः। यानसूचयित्वा समायातोऽस्मि कृतनः। क्वागत्य मृतोऽस्मि । मत्प्रतिज्ञायामाहितविश्वासो रामपालो व्यर्थः, व्यर्थमेव च प्रियग्रजानामपेक्षणम् । व्यर्थान्येवाशाभवनानि विरचय्य प्रलोभितवानस्मि । हन्त मिये मन्दभाग्यः।" प्रजा * * उद्यानविश्राम वेदिका प्रातःकालः। समुदीयमानश्रीभगवान् विभाकरः। पर्वतशिखरे लालित्य वर्तते । पर्वतावृतः प्राकृतिकोऽयं प्रदेश उपवनानि परिभावयति। तरुवारपूर्ण परमरम्येऽस्मिन्प्रदेशे फलपादपाः फलभरेण मनुजन्मनामनागमन सूचयन्ति, यान् परिपिश्चन्त्येका तन्वी सरित प्रवहति । अभितोऽनारोह्या पार्वती भित्तिः, ततः सेहुण्डस्य धना भित्तिः । प्रदेशमध्यं कृत्रिममिवास्ते, परमधुनाऽपरिष्कृतम् । पथिषु कुण्डिकासु पन्यविटपा उहता, स्थले स्थले पतितपर्णानां कूटं, वेदिकामु पोजानि पक्षिपुरीपसरवावलोक्यते । जलं प्रणाल्यो धूलिपूर्णा अविदिता इवासन् । मसूणपाषाणा यसम्पूर्णाङ्गाः काठीय भजन्ते । कृत्रिमनिर्मरकुण्डिकामु मरकतपुत्रिका भन्नता पार भ्रटतायोपगताः। उद्यानस्यैकत एक पुराणभवन युट्या दावेन वन्यैः पशुभिः पक्षिभिविकृतं शिवरा- मासीत् । कचिद् भमत्रं क्वचिद्दग्धे कवाटे, खण्डिता भमा भित्तिश्चिकसर्पपूर्णा । चन्द्र प्रकृतिदेव्याः पुष्पाभरणः पक्षिसजीतः कीचकवनवंशीभिनिर्मराणामधान्तनादेन सरससमीर- समीरणेन कविकल्पनाऽकल्पनीयमानन्द विभावयन् हरितहरितेषु सान्द्रसान्द्रेण पादपदे प्राप्तारमानन्दानां मधुरमधुरं कूमतां तर्जयतामिव प्रतिपक्षिणां पक्षिणां विगर्व वन 4. शून्यहृदयः शल्यनिकुञयु विविक्तकोणेयु कमपि गवेषयन् नयास्तटेऽनो ।

एपमा नि:पाय:
Halfariwar aurmyte
मतदाता परिवार
Marमायः मग गाव माममार.
Ram RNATAstreifarie: न पन कदम
सपना सामान पर
दिया मदीपदममा:-
"
मामा मामी राममनिन्दन किमी
राय। नमादिमिरपार
मिया एमपिपी मानि।"
मनमरिरमान पति रिस मास माग
। सारमा मारिनी की परिन।
ना"-
"धापाये।"
बन्दोम्पोमाता समझाम्पन, बार भारताम्। घाटायरामनामा।
लोग्ने प्रापरणविवायरताम् । एकोपमदिरी मिपीय दिपिकमो
গলঃ কবে পাশ্যাদয় দোল খায়-
वाणी समेत भनिदिलान्यमानालिसाटमारय पपमपानेन म पतितोलीनधान्तः ।
वरालोऽयं । कय दर्शया प्रापरवन माविमोय.
TAsविय भूषिगात सविसमा भारतीमौलिश्रीगणिकाय सादयः
वमन्तः पुषविटा महान्ती माराय राजन्ते। प्रिया प्रणपरिसपानी
गे संशोग्य विविध्य विपश्य मया दमया मागतीकिरमाण सटमा
मीक्षमाणो विदरे वक्षमा कोर्ण भवनमे प्राप्य मम्पद्वारे सिलसिला.
sः, न प्रदेशम्यमन्तदतिहिरिरातमेशिए। पहुए द्वारेणु भगनरपारपा-
देवमेव दार बहियालया बदमागीत् ।
न्द्राण हेलमध्यायन्, तदन्तः प्रविश्य दारा:सर्वाणि द्वाराणि मीसाशेय

प्रजाः प्रातररमानन्दानां मधुरमधुरं फूजा वर्षयतामिव प्रतिपक्षिा पक्षिण विगर्व वन् ६० पन्द्रमहीपतो लिने प्रतिगधी परि पतितः स प्रियमाण मवामन्यद। दुरत्ययो दुदैवदुविधा कामानिहवनकुण्डे सर्व इति युवानः। निपतो जीवनदीपस्य सल्पीयसी प्रमा तदारमतोऽनतीत् । बोवनमरणसन्धौ । सकृत् स्वकीय मुसममुदयमस्मरत् । "पाटघराणा विनाशाय कृतया प्रतिज्ञया सहैव कमलापि नष्टा, कोदशोऽहं दुरछ । हन्त, पालयित्री ही सर्वापदा मान्या जननी, वात्सल्यविगलदश्रुस्नक्तिरमशः पूज्यः पिता क च शकिधरः। यानसूचयित्वा समायातोऽस्मि कृतः । क्वागत्य मृतोऽस्ति । मत्प्रतिज्ञायामाहितविश्वासो समालो व्यर्थः, ध्यर्थमेव च प्रियप्रजानामपेक्षणम् । व्यर्थान्येवाशाभवनानि विरचय प्रलोभितवानस्मि। हन्त मिश्र मन्दभाग्यः।" प्रातःकालः। समुदीयमानश्रीभगवान् विभाकर। पर्वतशिखरे लालित्यं वर्तते । पर्वतावृतः प्राकृतिकोऽयं प्रदेश उपवनानि परिभावयति। तस्वारपूणे परमरम्येऽस्मिन्प्रदेशे फलपादपाः फलभरेण मनुजन्मनामनागमनं सूचयन्ति, यान् परिषियन्त्येका उन्दी सरित् प्रवहति । अमितोऽनारोह्या पार्वती भित्तिः, ततः सेहुण्डस्य घना भितिः। प्रदेशमध्ये कृत्रिममिवास्ते, परमधुनाऽपरिष्कृतम्। पथिषु कुण्डिकासु वन्यविटमा उत्ता, स्थले स्थले पतितपर्णानां कूट, वेदिकासु घोजानि पक्षिपुरीषसङ्करथावलोक्यते। पर प्रणाल्यो धूलिपूर्णा अविदिता शासन् । असम्पूर्णाजाः काठोय भजन्ते। कृत्रिमनिमरकुण्डिकामु मरक्तपुत्रिका माता पात भ्रष्टताधोपगताः। उद्यानस्यैकत एक पुराणभवनं पृष्टया दावेन वन्यैः पशुभिः पक्षिभिविकृतं शिवदश मासीत् । धाविद् भन्म छत्रं क्वचिद्दाधे कवाटे, सण्डिता भमा भित्ति विकसपूर्णा । चन्दः प्रकृतिदेव्याः पुष्पाभरणः पक्षिसङ्गीतः कीवकवनशीभिनिर्मराणामधान्तनादेन सरसममीर- समीरणेन कविकल्पनाऽकल्पनीयमानन्दं विभावयन् हरितहरिनेषु सान्द्रशान्द्रय पादपकुम्जेष मसूणपाषाणा उद्यान विधामवेदिम गि विहितकोशेष हरि गोगma टेनो- -- पञ्चमो निश्वासः छायायो शिलायो विधम्य यास्पिवतार्य प्रक्षाल्य शाखिशाखामु शोपणार्थ मायोज्य कौपीनो नद्या चिरं माला धौत वासः परिधाय टायाधीतले शिलापट्टे कृतराय उपरथाय पाधिवशिवार्चनस्ताजिदयो नदीतधान्प्रेशमाणः मधुगणि सत्सानि मृशमास्वाय- अनि मनोहायो सब्यसारथ्यः पक्षिणा प्रियाभिः एम पञ्चपोट फण्डमक्ष सर्व पश्यमवर्तत। रम्यस्थाननिरीक्षणेन तस्य रमिकचर चेतः पाठप्रत्यावर्तनेनेव- ते शान्तिधापन परमज्ञातमागेषा पाणी तस्य शान्तिमभनक:- "मया बहुशः प्रेम्णा साम्नाऽऽग्रहीता परं साऽस्मन्निन्दनाइन्यन्न किमषि 1, च। कथयति दुष्टस्पृष्टं न भक्षयिष्यामि अपि मरिष्यामि।" प्रियता क्षुदभाषिणी सा का हानिः।" मैतद् अहि, महत् का विश्वात्मानं सन्देहसिन्धौ निपात्म यामानीतस्तिस्यै नैतागू- । तथाऽऽचर यथा सारमासु प्रसीदेत् । हटिनी किं करिष्यति गलभूषणातिरितम्। निप्रैपय।"- "अस्तु तथा करिष्ये।" चन्द्रो व्यग्रोऽभून, दन्ता भघरमकाम्यन्, पाहू अस्फुरताम्। भ्रटिरशरासनायत । 1 लोचने प्रावृषेण्यजलदाविदाचरताम् । स क्रोधमदिरा निपीय विवेकविकलो- । णितहृदयः दोरग इव श्वसन्नुत्यायानुमाय यत्पार्वतभित्त रधस्तादनुनदी- वाणी समैति; भविदितान्यमागों लिमाटमावथ्य सधमध्वानेन नद्या पतितोलीनथान्तः । वेशालोऽयं प्रदेशः। ॐा दूर्वाया प्राण्यत्वेन मीलकण्ठकण्ठसन्निभकौशेय- (रिछादिवेव भूविभाति । चित्ववचित्प्ररूढा मालतीमौलिश्रीगणिकावकुलादयः बर्द्ध यन्तः पुष्पविठपाः महान्ती महोरुहाश्च राजन्ते। प्रिया प्रणयपरिप्तचन्द्रो संशोप्य विकीषितव्यं विमृश्य सूक्ष्मया क्षमया खायतोकिश्माण इव दृष्टया क्षमाणो विदूरे वेतमष्टकोणं भवनमेकं प्राय मध्यद्वारे सितशिलाशकलेs. रैः, "न प्रवेशव्यमन्तः" इतिलिखितमैक्षिष्ट । बहुपु द्वारेषु भवनस्यास्या- वेकमेव दारं बहिःहुलया बदमासीत् । न्द्रस्तु लेखमध्यायन्, तरन्तः प्रविश्य दर्श:-सर्वाणि द्वाराणि नीलकौशेय

६०
।
चन्द्रमहीपतो
क्लिन्ने पूतिगन्धौ पथि पतितः वं नियमाणमिवामन्यत । दुरत्ययो दुई दुर्वक
कामाग्निहवनकुण्डे सर्वस्व जुहति युवानः ।
निर्वपतो जीवनदीपस्य स्खल्पीयसी प्रभा तदस्योरमतोऽनीत् । जीवनमरणासन्न
सकृत् स्वकीयं सुखसमुदयमस्मरत् ।
"पाटचराणां विनाशाय कृतया प्रतिज्ञया सहैव कमलापि नशा, कोदोऽद पुरा
हन्त, पालयिनी हनी सर्वापदा मान्या जननी, वात्सल्यविगलश्रुस्नपितरमशः पूज्य ।
क च शक्तिधरः। यानसूवयित्वा समायातोऽस्मि कृतमः। कागल मृतक
मत्पतिशायामाहितविश्वामो रामरालो व्यर्थः, व्यर्थमेव च प्रियप्रजजामपेशन
ध्यान्येवाशाभवनानि विरचय
प्रलोभितनिरिम। हन्त र
मन्दभाग्यः।"
प्रजाः
उथानीयम
प्रातःकालः। समुदीयमानश्रीभगवान् विभाः। पर्वतशिसरे मालित्य की
पर्वतान्तः प्राकृतिकोऽयं प्रदेश उपदनानि परिभावयति । सवारपूर्ण परमरम्येऽस्मिन्य
फलपाराः फलमरेण मनुजन्मनामनागमन सूचयन्ति, यन् परिविचन्त्वेका तन्त्र
सरिन् प्रवदति। अमितोऽनारोमा पार्वती भितिः, ततः सेण्डस्य पनाम:
प्रदेशमध्ये कृत्रिममिकारते, परमधुनाभरिकृतम्। पथित पुण्डिकागु भयपटमा मग
यो रथले पतिताना कुटं, वेदिकाय बोजानि पक्षिपुरीगररथावलोम्यते।
प्रमन्यो लिग आदिता समन् । मणावधा
अपम्पूर्ण पाटो भान्। त्रिमनिमाविकामु मरमाविका प्रभा
नाताबोला।
न एवं पुरधान पान पन्यः पमः मित
मामा मन पत्र दिसाय वाटे, मन्दिता भगा famitram We
बिर: मायमगणाम mate
समग्र liters मप्र विरmami
सारदा मात्रा हो

एथमो नि.भास: अनिवारम free futur भप्राय - भारतमा पपिया धीम पुग uteringa: AM .. Rethictura in Fermen were"प्रपा eye- IrrigMIRI cler newstra Ane rukupreme or farmer ATTARATrant kresmrrar ke Sirriters PRE RATE" mat. Prime rem.५ It ramant. Maratrnmore Nareena treekre fraternmen tainmendutoria ka Mat भाषयन्ते नरकशालाः। दृष्टः। ६४ चन्द्रमहीपती एकस्यां शिलादिकार्या लोकीलकपरिश्तायामेकः सद्यो मृतः पयजनः प्रतीयते, सूक्ष्मया दृष्टया निरणायि यसोऽयं शवो यः पार्श्वकनने वचन लोणे मर्मरास्यि कहालस्य प्राचीनत्यं प्रथयति । बचनाधोनिन, क्वचिद् भान कपालास्थि दण्डापावेन मृत्यु सूचयति। चिद्वर्तभिन्न शहास्थि भिन्दिपालगुलिकया मृत्यु प्रमापयति । क्वचन विगृहलकशेरुकः कालः पाशमृत्युता विख्यापयति। इतरे यक्षोऽस्टिन प्रविश्च्छुरिका दादयांदनपगतरिकाः सयौ भारिता इवावगम्यन्ते। आयुर्वेदीयशवच्छेदविभाग इवास्मिनाश्चर्यचकितः शोकाशकी भयविस्फारिताक्षः कमपि गवेषयन्नयमधुना मधुनाऽप्यहार्य दुर्गन्धनिघानेऽनाचार प्रधाने, सद्वित्तिरोधाने प्रकाण्डहत्याकाण्डमाण्डे प्रचण्डे भवनखण्डे विभीघ्रमन पार्श्व भित्तिवातायनादाकणितवान् "हा? प्रिया? म्रिये, "हा त्वं न वेसि फयमहमस्मि" इति। करुणाकुपारपूरपरिप्लुतेऽस्मिन् वसि काप्यद्धतेव शातिरासी द्यातश्चन्द्रस्त्यकान्यविषयो द्वारानभिज्ञ उपकुञ्य पापाणानायोज्योत्यापितपाणिः प्रैक्षिष्ट यत्-कूपनिम्ने कारागारे एकस्मिन् कृष्णकम्बले, रसालकपोलशालिनी कमला मलाचितवसना, शुष्कगण्डमण्डला, म्लानमुखचन्द्रा, मृतकल्पेन शिथिला, हतप्रभेव- दीपदीप्तिः, शुष्यजलेव महानदी, नवमेव वाटिका, मृतनुपेव पुरी भयरा, शिखेर कृपीटयोने—माचिता, आज्ञेव सम्राजो धूर्तरवमानिता, वीतसुषमाऽसमा वामाना, मानाम्भोधेला लोहद्वारे कारागारे भित्तिमाश्रित्योपविष्टास्ति। अधुनापि तस्या मुखं निष्प्रभमपि सुन्दरमासीत्, सत्यं रत्नं पके न लप्यते"। ठस्या सम्मुखे चैकः प्रचण्डचण्डः पिचिण्डिलो गृहीतासिधेनुका स्थितोऽस्ति । क्रोधान्या सरोपं वफ़ मारभत-- "आः पाप! किं पौनःपुन्येन छुरिका दर्शयसि। अरे न वेत्सि, यस्य भारतस्य परमपूतनामधेयाः सीतादमयन्तीद्रौपद्यः पुश्य आसन, तस्य भारतस्य-- यस्मिन्नाना जीवन्त्य एव खामिनाश्चितासु भस्मीभूता भगवतो भूतभावनस्यारागतो सम्पयन्ते, तस्याहमप्येका पुष्यस्मि। तासां चरित्रं, साहस, कर्म, तदेव भारतीय रुधिरं मदीयशिराजालेषु प्रसदमास्ते। अमुल्यपातिप्रत्यधर्म धर्म मादृशीना प्राणार्पणम् । मद, मुधैव मुहुर्मुहुरसिं दोपयसि, धारा निशातयसि, यदि युवाशि, धीरोऽसि - - पञ्चमो निःश्वासः ई सपयेव प्राणानपहर। परं दुष्ट ॥ निकृष्ट ! त्वत्सम्मुखे प्राणास्त्यत्त ज्जा। मां देहि इमां छुरिका, यया स्वामीष्ट साधयामि। आ: विव हेतु · नहि तु वा किं कारयामीति विचारः परम्"- इति कथयन्ती किचिच्छिथिला जाता, परन्तु पुनःप्रोवाच- कामोन्मत। पापान्ध] पश्य । अक्षिणी उन्मुद्रय, विचारय। क्षणिक लगातृप्त्यै कीदृशं महान्तमपराध शिरसा वोटु मिच्छसि । कुलाशार ? न वेसि भारदरमणीनाक्षेतः खगेसुन्दरं, सज्जनवच इव मृदुलं हालयश इवोज्ज्वलं, तपोधनविचारवत् पवित्रं शिशुखभाववत् सरल, कति सोऽपि प्रबलं भवति। यत्र लोभलोलायाः, भयभावनायाः, विलासवासनाया छायाया अणुरपि नास्ति। नरपिशाच! मानसमुक्काभक्षणस्पृहा इसी किमवकर किरति । चकं विलोकयति, मेघमत्तम नृत्यन्ती मयूरी कि गईणीयं श्मशानरानं सऽपि गर्धते । मूर्ख ? मुधैव कुबेरायो पतिता विध्रुडेव चातकतृप्त्यै अल, सा महान्त रझाकरमपि कुटिलेन काणेनादणा इतोऽधिकं चन्द्रः श्रोतु नायकत् । धर्यशिला, विपत्तेगाधै पयोनिधी भन्ना। प्रलयकरिणा झंझावातेन धैमो ध्यनाशि। स क्टक्टायितदशनः मरोषः"प्रिये, मा भैषीः, आः कुमुमकोमले। साम्प्रतं स्याण्डलमधिशेते ? असम क हे स्थान मदसिलश्यवृत्त। प्रिये! आगतस्ते प्रिय प्याहत्य भितः पातो भविष्यति द्वारमित्यालोच्योदकूर्दत । कमला वाचमिर्मा भुत्वोत्कर्णाऽभूत् परं निष्पासम्, यतो मित्यारोहणसमकालमेव- प्रभूतलोहदण्डाघातामूस्तियन्दः। भाशायाः तरमिशेरशिलाता चूर्णितामा तलें परमर्श तिछ रे दुष्! विशालोऽयं प्रसादः। स्थानम्। •हरितयत चन्द्रमहीपतो परिमलेन प्रान्तं प्रीणत्, फुल्ल द्विविधमुमं, लग्नविपुलफलमवकोरिलं, यापी विमुदान पीवरपवनपरिलसितमुपवन राजते। या मधुरमधुमय्या मालतीलतम्या मल्क मत्ता मधुपा माद्यन्ति। यनोपवनचतुष्पयेषु स्फटिक्कुण्डिकामु मारकत-पालिका लघुलधून विन्दून निपतयन् नितरामामाति कृत्रिमनिमः। यथोचितमिराकामिविरविधा सरणिर्मालाकारस्य कृतित्व, स्वामिनो विलासित्यं ख्यापयति । प्रासादो हि रकपारण विहितः मुबहूरिछूतो रमणोपचारते। मणश्वेतशिलाभीरचितानि, भासविंशनि सोपानानि, करटिरदनशकलमापलिता द्वारशासा, दृढ राजतपत्र वाटगुगल, स्त्र पअचिन्ता बस्यो विटपाथ शिल्पिनः शिल्पकर्मणि नैपुण्ये योतयन्ति । समामवने यात श्रूयते। श्रूयते। पचगु पदगु द्वारेषु केवलं मध्यद्वारमेवानतिम् । भित्तिमपाः, 'काचवालयों भाण्डनि पपई एनिमेषयन्ते भवनस्यामुग्य। भवने मिस्तितः खियः थासन्नविंशतिययसा, गौरव परसाप मालपन्ति। तारा या महामुन्दरी, या महामुन्दरी, मुश्मामनिर्गनिः पन्दस्य, नायियागाति, या वयं नामज्ञानं यावत् 'गुन्दरी' पदेन बोधयिष्यामः, म समुपदिर स्ति। दिमिर निरूपयामोऽस्याः सौन्दर्यम् । अभिनवलावपति, सीमयाँ नन्दनगर, सचदेव मुरमा, प्रफुटसलनेय मलिता, विमलयरतरलमलोदा, मुमटा, मनुभाषिनी कामकान्ता, प्योभूनेव ज्योत्स्ना, प्रेमातिमा, गौरशिला, पटकटनी मप्रमा, माया मानगमात्रमागीययो: मदन पारिजटायुपतयोरियोनदयोः रदनयो: ममममा, देवता कामयी शाटी, सपा अमाया श्री चहक रचर्यात गोवण मजनमाने में दीनदया- “बरे! देव ममय मेना गोम्पयामरयत्। -मम्। मन्दिरका भारत का भनमा पद थापा र नयन मिनिमामिल arelu लिया।

पञ्चमो निःश्वासः
६७
माहय सामाप्यौपानस्य भष्यमाने पर्यो शायला मलाट्टिकामायोज्य
समानत परिवोय सान्ददममासाय तवंश परश्यम् ।
गुन्दरी-भौतक्सने शनिहितम् !
पला--तस्मिन् वा प्रविट एक शिलादेदिकायामहा घाटी च
ते। तानिमितनेत्र भावप समनः सन्ध्या विपाति। मन्मुख किमीशने !
यो परिवेश्य । तदागमनापूर्वमेवाम प्रमेतद् भवने स्थापयिनुमिष्यामि। भामररी
परिवरम संपाश परिवेय। भई हर्गभाजनामानयानि (मनीय) एए
पापपराकानि परे ।
मुन्दरी-परिवामि.मि ।
परम-गुगरे। मनुसः शिशिरपिमझतवत्यसि ।
गुन्दरी-समुष शरियाणामे समस्यामा पसि, परमय न रामसहसा
रामन्यात भर प्रियावामुरा बिहार सरन्ते । स्वंम्पर्षमेशरम्ये रोदिषि,
भर यमरपाईनने संवानन्तरम नीधाम मनसः ।
पल-मममिति (सपार)देखि पत्र दामि।
पन्नासएप निर्माजमा होता।
पत-जामानिमि! (भियनपी।
पर-१३। रिस परव! !ि मनीभूता!ि
मुनी- हमाम् ।
मो
kare
अम्बा-(एक रियविर, सिमर tra,
TRI
परी-
मार, र सद
देnिtwise मायमरी पन्दा मला
गुस्से परपरको रसमापी । पर

.....
६८
चन्द्रमहीपती
पार्यकानने दोलारूडामपि त्वामवशयत् । चन्द्रनयनचन्द्रिका व प्रसन्नद्वारस्य माया-
भवनस्य द्वादशसंख्याकारायां निगडिता...
सरो०-(साश्चर्य सहर्पम् ) कदा! क्व वा कुमुदिनि !
कुमुदिनी-अनीतायास्तु पक्षो व्यतीतो भवेत् (किञ्चित्स्यित्वा ) सरोजिनि ! त्वं
कमलां कारातो निसार्य सत्कृत्य तस्याः पुर प्रेम्णा वसंवदायामर प्रस्तूपान
मन्ये कारामोचनप्रसन्ना, ऋशमपदिनीषन्ती स्वपतिना विवाहमनुमोदयेत्, परन्तु मा
नाम कान्तिसिहो वृत्तमदो विजानीयादन्यथा सोऽस्मास्वपि प्रकृष्ट निकृष्टो घेरायिष्यते।
सरोजि-कुमुद ! प्रिये । कयं ज्ञातवत्यसि ? सत्वं कथय !
कुमुदिनी-(विहस्य ) योगिन्यरिम, योगप्रभावाज्ञातवती।
चपला-नैवं कथयसि यद्वियोगिन्यरिम प्रबलस्य। ( उभे हसतः)
*
भगिनि! कमले। स्तोकं दाहिमीरसं पिब, पक्षो व्यतीतः, नधुना
बापु
दायम् । पीता कपोलपाली गर्तगते गलज्जले निष्प्रभ नेत्रे मम सेवा कदयन्ति ।
कथय कापि त्रुटिरवहेला यद्यस्ति सपदपनयामि कमपि सुचिकित्सकमायामि । त्वमेवैतस्प
गृहस्य स्वामिनी, क्यमाज्ञावाहिन्या भाज्ञापय ।
कमला-सरोजिनि, किं वक्षि। अहं स्वस्था सन्तुष्टा चास्मि । त्वतः कदापि न
भविष्याम्यनृणा।
कुमु -शनैः) भविष्यसि ।
कमला-मगिनि ! नहि नहि मातः। देवि! ( सरोजिनी हस्ताभ्यो बमलाया
मुखमाच्छादयति)
सरोजिनी-प्रिये । करले। त्वयाई भगिनी निविशेष दासीनिविशेष सम्बोध्या,
नीच्या या
कमला-यभवत्यै रोचते, परमृणभारमसमास्मि बोदुम् ।
चपला-यदि कोऽपि भवतीमा का पारयेत्तरमै मिपि देय नाम ।
कमळा-देयम् ! शिरोपरामुत्तार्य पादयोः पातयिष्यामि, जीवनवनमेर हल्ले
मुद्रा सनोमि।

पञ्चमो निःश्वासः १६ चपला-अपि सत्यम्। कमला-रात्यम् कि पात्रियकुलप्रसूताया रसना द्विर्भापत्रे। सत्यम् नितरी सत्यम् । चपला-परमप्रियवस्तु वितरणे पदान्योऽपि पहोवमधति, मतः सम्यक् पृच्थ्यमे । कमला-तहि विस्पटवबोभिवंदय कथमानण्यमासादयितुं शक्नोमि। चपला-सरोजिनि, लमधुना विश्राम्य, अहं श्रीमत्या मनो विनोदयामि। (दमे- मारणतः) ध्यताम:- मत्स्यत्र सन्देहलवोऽपि यन्नन्दनपुरेधरो नन्दनसिंहः प्रतिभावान् सहसयो मगराणामधिपतिरासीत्। राजसभानं अनसमुदयेन प्रपूरित प्रैश्यवे श्म। शवो गायकाः, कलाकाराः, चित्रकारा भवनमधामयन्त। परकान् साचन पटभन्। तरा साधर्यभवनान्यद्यापि तस्य प्रतिभा परिचाययन्तो राजन्टे, येशु निलीनः पुमान् प्राणानेव करन जहाति। येवसंख्यात धनं निहितमारते। यद्यपि सः कला अपवे कालालितास्यापित्तनशिश एष विस्मयाधालम् । वयं व्यतीत स पुद्धिमस्त्रियेण बिडीमसाजता सर्ग पनाथयामास। सत्पल्योऽपि भारोरुपेण सेवितु समनुसग्नः । नन्दनसिहो निपुत्र एकासीत् । केवलमेर एमाशी सरोजिनी एकाकिन्देव सस्य पुत्रयस्ति । क्षरया यौनुस्मा भवनेषु मुगुतर्भात। भाचर्यभवनएर, तन्मणी निधः, सरोजिन्येव पूर्णाभिमा। एसे मन्न्यपि एकः प्रजाभको यो राजकुठे कुलीन भाचर्यभवन- विशेषा भासीत् । महाराज सम्मरेते स एवेनो राग्यस पलदमासीद पान्नु प्रियपुत्रंग कान्ति संहेन मन्त्रिपरमात्य दतविक सामित्रमनुराधार। अधुना घरोजिनपिशष्या कामेश्वरसिहो राम्यं समीक्षते। कान्तिसिंहय यातिरिति राम्यान्निसारितो नराहामा तिरिरानो विदरे गम्यूतियान्तरालयले भाषभानसले निति। तो समय बक्तते। तु सरोत्रिन्देव Resoससम्पति विपरभावनाधिते। सिरोपिन्या प्रेमा। भरोह, हरिहरने, सरलरने, सामने, परवप्ने, ससाधादिष्मपि सनिवरो रिपुमा एदस्याः प्रत्येकाप मुन्दरवाया घा। समरसौन्दर शादा मामला मुग्धोभूदेवरित प्रारते। माग पनि विपरीर प्रभावमा

चन्द्रमहीपती
भस्या वापी भगवद्भक्तिरका कवितेव सरसा, गाजवहया खच्छा, शिवहारासत
पतञ्जलिमणितिरिव भावपूर्णा सुभोपा च विद्यते।
एलरमा पनिवाक्लीः सौन्दर्यवितानस्य सान्दतिलछापायो विदा
वीरा मानम सोपयितुमन्छन्। रोपावनाकोपबालिका नाति, भरयाः समीर
कायकानने वमन्तेन वायो विहितः, सौन्दर्यराधनि प्रेमाकुरो विगः ।
हदपमोरे मरयरो विकसितम्। प्रततप्रतिभे पितार परेवे या सर्व
समिनी। समावस्यलगेत एकदा यसोनिजितपन्द्र यन्द्र थक्षणेन म्यामचम्।
तरयाबुल्यतया निम्ननीतं मीरमित न प्रत्यावयितुं शक्यते।
न भोतमाभियोगे पसनम् । भवत्येव योषिता सदोयुक्त मनो , पुनवस
परे मरे, मानगमुन्मपति मन्मय विलासिनिकेवल रामसहाय गोनिंदा
प्रधुरबानुग्छीपूताना व मनोविचारे व्यं स्यादपणे प्रानपैर। भान
भगमरण विभा घे। पदमप्यभिलामि या अभयुक्यो
पथरि मालिट।
कमला-जातनिराशावरम धन्याम्मि, या मन्दमाया साम्मुत्य त्राम
मामिली मिनीवशा, देवामदगमादारा,
दरला ना गुणामालानामिसन मागुपश्यामि । पाताल
पिया मया मार्गका भात इन, हलामि।
पन्त रममा मनिया। पहला रोजिनी कपास aparta
नेन, म्यानपवयम्यानार।
সব
were: मग मामाया मा मरम्मत
ब, मधुनम पायाrt kriRaftar
का नाम : सरप) RTS
मार दे।
पार TER नाम शाद। बा Imat.
'भारतर सन्मान

रमोनिभाग
Tarere.firm भरमा: errt.
ganttirert:
Anirmalkartment
NE MARRIAN Mrhter.cm.
Arther. rana, RJITTErtist
र पेपरriRI
रा, IT arrent इस arterierTARAT
dr.m.mg-at-RIFrun
KIRATRang meterate TRAV
riwari-Traram wrn गुमा
rect Re Treasar: भर
TOTATE trutiful
ghtी गमे भर bur auraneral
मिरममा पसार, REER. धार निमाREN R.
RTE मा Arthatain coliin
पातमा भामम्। परम्पERATrarte.com पर
सपा me, anा। शिकाय
भीपापी भने।
गादिस्यगारण्यापारीतुरी.
प्रायशिरोमणः कपः।
प्रायामिणाय ती मदीपनी
नमो गर्दा गर्षयती गुपथमः ।।
पायलामपिताना श्रीनिवागशानिगाही
परमहीपती पथमो प्रियागः ।
-

षष्ठो निःश्वासः यो दिव्याम्बुजलोलमत्तमधुपप्रोद्गीतरम्यं सर- स्त्यक्त्वा मानसमल्पवारिणि रतिं वध्नाति फैदारिके। तस्यालीकसुखाशया परिभवक्रोडीकृतस्याधुना हंसस्योपरि टिट्टिभो यदि पदं धत्तेऽत्र को विस्मयः ।। सुभाषितरक्षम् हृदयणकुटीरे दीप्यमाने स्मराग्ना- वुचितमनुचितं वा वेत्ति कः पण्डितोऽपि ॥ त्रिविक्रम भट्ट गरलसहोदरजाता (लक्ष्मीः) यन्न मारयति तदपि वरम।। यकुलगुलशय्याशायिना गणिक यामिन्याः प्रथमो यामः। वायुर्न वाति । गणदारहारिवक्षसा सुगन्धशीतय्यजनेन वीग्यमानानामपि निलंग्य बनिता माम मुदत्युषणता। उगता उष्णता, ताडशोपतालुशोषः, हिम हिम, बामपट्टिम पकुलपहिकाकलेपः कपरटेपश्चन्दनं चन्दन, जल जलम् अहो खेद का ' मराकाः मराकाः, वायु युरित्येव श्रूयते सर्वतः श्रुतौ। कचन प्रलम्यगुणाप्यमा म्यानम्वनः, कचन दतनिद्रगुन्दरीनपुरमवारः, क्वचित् करतय्यमनिकाभिनभि- विधीयमानः वंदभालप्रशमनः शिशुना रोदनप्रशमनः लापः । प्रतिगवाई समीरमिव गृगयमाणानां गृगीशा वेवेशि पलपशिपिम् । पासवेटिवेश्की पटेषु प्रवपमेव पानीयम्। उशीरनीरसिम्यमना ...रामेव पुग्णाति।

पठो निःश्वासः १ हार एवं भारोऽजदमेवाङ्गदम्। ललन्तिवान्तिका, रशनैवाशना, वस्त्रमेवार तूलिकव शलिका, उपधानमेवापत् । किंबहुना वायुरपि वायु वाञ्छति, सरसामपि सलिलहा, पिसाक्षाम नयोऽप्या सद्यः समुदमनुधावन्ति । मोनोऽपि दोनः। तुहिनमपि हीनम् । का मपि समलम् । प्रतिप्रतोलि "हे भगवन् ! हे नारायण! दोनबन्धो। कथं बग जीवयिष्यसि" इति ध्यते प्राद्धः प्रादघोषः। सोमलोकलोकं लोक लोकं वियामध्यमव्यास्ते चन्द्रः। सुशीतलजलशीतलतले शयनागारल्याप्रकुट्टिी मन्चे उपधानमाश्रयन् महारा रामपालो विनोतविशदवे त्यैर्महा तालान्ताभ्यां पीग्यमानो मन्त्रिणाऽऽलपा समीपे च न नितरा राजते राज दोपाधानेभ्यरतिकृतो दीपः। अद्य रामपालमन्दिरै मालिन्यसमाजः शासन समबोक्यते । धावल्य विदूर- प्रसूतेषु यशस, चापल्य लतालोनेपलिए, 'भगा गीत प्रस्ताः संसारे, चालन ध्यजनाना, फुल्लता पुष्पाणा, विकाची भूम्भिताये, पम्मेलोऽनु । धिर धिक. कुर्वती पटी लोल लोलकेनाधैर्य ध्यनक्ति । "मन्त्रिन ! शेष बहु प्यतीता रानि"। मन्त्री -आम् देव । शयिष्ये। भूपेन्द्र प्रतीक्षे, दत ए३...... महा.-( मध्ये एव ) किं सम्भावयसि मन्त्रिन् । यत् कमला पुनर्दक्ष्यामि !... हन्त ! महात्मनो नवेन्दुवर्मयोऽस्म्यहमेक, दुःसारणम्। बोवले मृतोऽस्मि । मन्त्री--बहि, देव ! नैव वारयम्। महाराजाना चरणी शरे, यतो भूपेन्द्रो. गतोऽस्ति पराकेण अपागाढम् । नासी सलो यत्कार्यम, प्रमादेन अधातू । तत्पत्रमपि समायातम् ( कक्षिगुटिकाया निःसार्य)। महा.-किलिसति स:- मनो--(दौमतिका निविदुष) देव! समा सम्पौष लिखति- कति योजनानि प्रत्यहमहो। मान्छे। बपदकालो काले सोऽपि -- नास्त्रि गौ यासो वा भगा-ग-रहित-ईसय पर्यः । २ लोलाण्डसम ।

थापालको- १०४ चन्द्रमहीपतो दान्ति न लभे। विविधरूपपरिवर्तनेन प्रतिक्षणमात्मानं सन्देहसिन्धौ निमबननापि साशः। श्मश्चेद् गुरौ भवता मिलिनुमिच्छामि, मयनात्सप्रणाम सान्त्वनीयो महाराजः। जीवनेन कार्य विषारये। शेष पुशलम् । टिपातर } भूपेन्द्रः महा०-अध. मन्त्री-आम् देव ! अव गुरुदिनम्। मन्येऽधुना स आगत्यास्मान हर्षयिष्यति । महा.-रश्यताम्, किं भावि, मन्विन् । विरक्तोऽस्मि । मन्त्री०-देव! आपदः प्राणि वेद पद दधति। पुरापि पृथुप्रतिष्ठाः पार्थिवा आपत्तीराप्यापि धैर्य न वत्यजुः। धैर्यधारिघुरन्धरा भवादक्षा अपि धैर्य हास्यन्ति, चेत् तदा इन्त ? के नामायिष्यत्यनाथ्रया धीरता। गगनमेव गति शक्नोति सूर्यमण्डलस्य । द्वाःस्थो भूपेन्द्रागमनमसूचयत् । भागतश्वका सभ्यवेशः प्रभावितमुखोऽस्माकृतिः उपत्रिंशवयाः, दीर्घाकारो व्यायामिविग्रहोऽदृष्टजव्रजः पुरुषः । मन्त्री०-भूपेन्द्र, अपि कुशलम् ! कचिलम्धो वृत्तान्तः? भूप, तवैव चर्चा सवति यामेष्वष्टम् । भूपेन्द्र-किमिव कथयामि देव, अनवरत रतो भवत्सपर्यायां पर्यायण प्रचुरनगराध्य- गाहमानः खारथ्यं गमयित्वापि पूर्णोदन्तं न ज्ञातवानरिम। श्रीमश्चिन्द्रो मरुत्तरारुढो नवान् , तदा चालकेन किमपि प्रत्यायत्य न निवेदितम् ! मन्त्री-विपत्ती विपद एव पदं कुर्वते। को जानी ततः कि सूचितमायेंगा, न्तु स वराकः समायन् पथ्येद केनापि हतः। मरुत्तरध नीतः। सोऽयं एवं नपाय आनीतोऽन्वेपकैः। तत्पदपतिश्च मटा महत्या मुसलधारया पृष्टया। भूपेन्द्रः-( निवस्य ) तहि देव! केवल सूचयितुमेवागतोऽस्मि। कदाचित्पत्रं नुवानि, सत्कार्य श्रीमद्भिः सत्वरमेव विधेलिमम् । . * "चपले १ भकारणयान्धवे, बहुभिदिवसैररमान् सेवयसि । खकीयममूर्य समय 'व्यर्थयसि। कुरामयागमनेनरमानं संशये भारोपयसि। याहि, सवाभिलषितं पठो निःश्वासः ते खामिन्या अभिलषितं पूरयिष्यति परमेश्वरः। परन्तु चपले। सरोजिनी होत्सवे वयं न विस्मर्तव्याः।" ३, अपरं शृणु, कोऽपि पीः प्रबलसिंहस्त्वत्स्वामिनीप्रेयांस चन्द दुह्यति, नासि तम्! . - देव! तपसाधिगतसिर्भवतः कि तिरोदधामि । स एवं मम कुमुदिन्याः प्रणयपात्र वर्तते तस्याः सूचनादेव कमला मोचिता। सर्व तम् । परन्तु सोऽस्मत्कृत्यमण्यपि न जानाति । न च कुमुदिनी तस्मै सूचयति । ई तदर्थ किमपि करणीये किम् ! मा-नहि, किं करणीयम् न करणीयम् । कुमुदिन्यपि म सूचनीया । सत्यवीरः प्रचलः कान्तिसिंहदुष्टाय सूचयिष्यति। कीदृशो वीरो दुष्टस्य पतितः। देव! एते सवें राज्ञो नन्दनसिंहस्य मृतिभुज भासन, परन्तु देवावे- ते दुधस्येतस्य हरते पतिताः। परन्तु प्रबलः सम्प्रत्यपि सरोजिनी मा-अस्तु, त्वमधुना गच्छ। । महात्मा कस्मारकालात्तपस्यति-इति सर्व एव इतस्ततरत्या जानन्ति । विर- एतत्यान्तीयाः सर्व एव परिचिताः विशेषतौरधूर्ताः। कार्यसिदय त एनं शादियन्ते। एपा चपलाप्येकदा महात्मकीतिमुखरितया सरोजिन्या काय- प्रेषिता। महात्मना-"देवि। महात्मना सेवैवामन्त्रतन्त्र वशीकरणम्, लगता सिद्धिः। ते मान्यत्तिमपीच्छन्ति"-इत्युक्ता प्रतिदिनं सेवितुं । प्रत्यति। महात्माप्युत्कण्ठया सरोजिनीरियमाणं पपलया विनियमाणं न भणोति। महात्मन्ययं विशिष्ट गुणो यद् येन सदालपति तमा- प्रयति । युक्तयुधिभिमादयति। सः सह मृदु भाषते विद्दस्य वक्ति, चन यदा कदा घ्यति, तदपि करणे। भत एख एनं सर्व भाट्रियन्ते। योऽप्येतस्प नितरां परिचिताः पर्वन्ति चिकीर्षन्ति च महात्मने

१०६
चन्द्रमहीपती
सोऽयं महात्मा एतत्प्रदेशजानां कर्मणामभिज्ञाता, परं स्यान्नाम किमनेन महात्मा
स तु एकेन कर्णेन वन्नपि अपरेण निष्कासयन्, स्वयभनयाजन एव रत भारते।
कृष्णः पक्षः। निशीयः समयः। अधुलिवायुः सम्पाः पादपाः। निरिको
जनं जगत।
निशयाऽष्टमीन्दु विजिस खसाम्राज्य विस्तारितम् । तस्याः पैशाविकी कम
घरायरे प्रभावमाच्छादयत् । सदयतयधन्दरमय इव न्यलीयन्त। पन्याहयान्ता
खातय इन विधमुमाना वराकमन्तूनां विधियांसयाऽभ्रमन् ।
खच्छसलिल सरः। सरस्वटे अतिथिविश्रमायावासभवनानि। भालयले कि
निम्य-न्यमोया यथास्थानमराजन्त। भूपेन्द्रः शिशयिषुः, पहचरैः सम्मन्यकस्मिन् मात्र
प्यरमन् । भान्त भासीदेव पतन्नेर गाउमाकान्तो निदया।
"सहयोगिनः। अधुनवाई सनमन्वभवम्"-भूपेन्द्रणोत्यायोकम् ।
पदई अन्यनगराद् बहिरवास्टो यामि। भास्मादयो गहन वन प्रति पाडो
वृकम्यानयामाः शन्दायन्ते। मम हरते घेई वेश्मास्ते। पर यथा-
न्मनी दयन् वनाशितः। भने एशा नदी प्रहति। तस्यां जानुमित जला।
सरपामधारत एकाई पारं प्रानुमिरर्यामि। असामानदीमलम प्रार।
जमा हो वो गारी को विनीतः। जले प्रोरया पलाना प्रभार
समायोत्याक्तिलिदैवान्तो गो निमनन् केनल सामान
मितिः पार गतः पातितः। भरण्माने दाम्य प्रवाही ग!ि
म भनो स्या पराये, या विदिम बाले पतितो यथा न भयेन गरे
प्पासोसियाममा मना"ति।
सपना रागनयममा सम्मन्य परमा ।
बन ए दर मस्यौहल्यायनन्। वदास भूमामः। OER :
बर। अनुप विनम्। प्रागन बम मान
wrn मामले। अनतिर
एमात्र TM, MATATE.
पानाम्दुतvidNIMAL HATANTRA.
महिनामा

पठो निःश्वासः १०७ देत: प्राणिमात्रस्येव सत्यः, अहेतुकधातुकप्रष्यनिष्ठुरदुष्टसन्त्रासरस्वयाऽलब्ध- मारण्यया दरया पूरिता इव पीवरः वासरशकलवेष्टित-कटिभागो, नाग व निभीको नेजितप्राणः, सारअन्तरसः, करुणाप्रवाहप्रवर्तकः, अपरतफ-पारावारपारीणधुरीणः, भसितसितकेशपश्मश्मश्रु व्यायतललाठो महात्मा कुशासने स्थितः। समीपे का तुम्बी नारिकेलस्य सर्परपानं चिम्मटं दण्डः इति । भयासी प्रचुर विधार्य महात्मनोऽनतिदूर उपविष्टः समाधिभगमपेक्षमाणस्तन्मुख- कृतेक्षण आस्त। पटिछात्रयेण महात्मा सागमई सजम्भमुत्थायाऽमि प्रदक्षिणी- अत्याचम्य हस्तयुगलमायोज्य श्लोकमिममपटत- भपार-संसार-समुद्र-तारिन् । खमफ-भूतासिल-दुःख हारिन् । निशावर-खोम-विनाश-कारिन् । प्रायख मामुसलमालभारिन् । "धीमा परणसरोरुहयोः प्रगमामि" महात्मना सावधानं वीक्षितः प्राव त भूपेन्दः । महात्मा--भूष्णीभूत किमपि विचारयति ) भूपेन्द्रः-भगवन, देदीप्यमानप्रवलसाम्राज्यस्य कलेः फेलिकाले, पारः प्रमथ्यमान- सोधनगोधननिरम्बे महात्मनां तपोऽभिदिवसमानन्दावहा। संसारे भगवद्भजन- मेर धेयः। सरन्तरा पुसः पररिमलोके का कादिष्यपि प्रादुर्भवति । विषयसुख 'माहेय 'माहेयमिव हेयम्। देर । भरदशा एव घगदर्णवत्र धाराः, सन्ति । भादशाना योगबलेनैव स्थितारते । भगवन । पुस्परिन, पराकोऽसि मयता लपोयसापि हस्तेन भासावसंपतिवानी स्वरिष्यति । मदात्मन् । दयनीयोमम्। भवन्ति ति मा साधूनामनुधम्याः। महात्मा बबरमशोनाकर्म खुद इस सिन्दूररिस्ताभ्यामिर, पुरः चिटयोनिप्रतिविमिताat रोहितोरागाझा विशालाम्पा क्षेत्रमा परमिक, उमरक्षित शिक्षक, पेतन विरामस्तकामनरा, गम्भीरया प्रतिपनि गया रवानाकी समस भर्सयन माह ) नाम पिरन्तःसा- मा भर्व महेपम्। सही मामाहे-दिन।

१०८
चन्द्रमहीपतो
कूपारगर्भप्रतिज्ञानाम् , ज्ञानाम्भोधिपानागस्त्यानाम् ।
सततसन्ततितिकर्यविन्टर
तारगतचेतसाम्, अयश्वीनमरणाय अकार्यकरणापेयपानासायखादनापामगाउन इस
दर्शनकलुपितन-पूरितनिन्दानिधिमेघानाम् , असदभिनिवेशप्रदुष्टस्वान्तानम्। कुरुत्व
सम्पादितयशसां, 'अनभ्यासमित्यानां पशुवृत्तिपराणां नराणां वाया भावसकता!
पूर्व भगवद्भजनमाहात्म्यं कथयित्वा सम्प्रति नावमावर्त पतिता मोति। मम
कौपीनप्रन्यौ निवद्धास्ते नौः, उन्मोचय मम का विलीनास्ते निकासय। धूर्त !
मा नाम गार्हस्थ्यवार्त या दृषितं विधेहि मनः। अपेहीतः। नाहं तव ने
पतिष्यामि धुर्त । कुलाहार !
कपटप्रिय। पथिस्वधक। हह (हसत)
विचित्रमदो हास्यमासीत्।
भूपेन्द्रो गतप्राण इव सम्भूतः तस्य घेत
सशक्षिका विचाराचेरः स शोचन्नासीद् यदय कीरशेनाज्ञातसमावेनावसर
समातितः। ईश्वर एल क्षेममाचरिष्यति। परन्नु हासेन जातं चिदाराबयन
प्राणेषु । क्षणं पक्षद्वयत एव नीरवताऽऽरछन्ना। पुनः प्रशान्तया पाण्या मधुररारत
महात्मा-
पान्य किमिच्छसि। कयं तव मौरावत पतिता। वर्ष सापको गवरः।
न कम प्रेक्षामहै। असिलं विनः। प्रेमपात्रस्याप्रे कथयामोडी। यय चिन्ते
प्रयोजनम्।
भूपेन्दामहाराज! बिभैमि । यभयं मवेता किमपि निवेदयेयम् ।
महात्मा.-अभयन्तेऽस्तु, कथय ।
भूपेन्द•-महारा। जो रामाराय पुत्री कमला रात्री मुप्ता प्रति एमा
दरहामा गो भावी माता नाम्ना चदाशनगररामरोशी मत
पदि धीमा मनिमा शान्तरमना महात्मना दया मच तयोः चिन सूब
मरहमसम्धमोपहारत श्रीयम शरदः शतम्।
महामा.-चन्द्रमसिपहार सयसे,हिमनेरमा।
भूपेन्द-मक्ष देव! यत्रमुगः भविष्यति मातः। सपा
माहिमाम्।

पठो निःश्वासः १०६ महात्मा०-भवत एताः कः शिक्षयति, हुम्, अस्तु तहि सत्यं व्ययामि किम् । भूपेन्द्र०-ओ महाराज महात्मा -चन्दोऽधुना नन्दन पुरे" भारते। तत्रैव च त्वत्स्वामिसुता कमला। परमशतस्त्वं तौ लन्धुं यतः कस्याश्चन प्रेमिण वासः। भूपेन्द्र - नैव प्रवक्तव्यम् । अहं पातालादवि शक्तोऽस्मि निस्सारितुम्, का कथा नन्दनपुरमामटिकायाः। महात्मा०-आ, एवम्। ब्रज साधय, कुरु कार्यम् । सायं दिय दृष्टिः करपा) भविभाउनासो नैशिकोऽयकारः प्रादुभूतः। अमुदिनी नरवेशमायोज्य पुरं प्रेक्षमाणा मौनमवलम्ब्यागतप्रत्यागd विधाति । गोपुरे कमपि भवनवीनमपश्यत् प्रादुरासघालोला भालापा । मुदिनी-पान्य । कयासि । भूपेन्द्र -किन्ते प्रयोजनम्। वापि यामः । धुमुदिनी- अरे। मई कोटुपतोऽस्मि पुरः। मानासि न वा। भूपेन्द - अवर समायाता (अप्रे प्रति कुमुदिनी रणजि) कुमुदिनी - याति पूस! पूर्वन्तु अपित पदवायातः-अधुना पा प्रजसि, बलिरा! भूपेन्द्र परीक्ष्य प्रवकम्यम् । नार्य प्रमटिको बट्टः, किन्तु चतुरधिरोमणि भूपेन्द्र इति रुपयन् उद्धान्त इवाभूत। परमरमा कोहपाला विशिरपतुर भासीत्, यतो मर्यादया एकतो भूत्वा पुटिका- मेरो भूमौ समस्तपत्। मुस्लिवधूमेन २ मूभितः सुसहचरी भूपेन्दः। तथ युमानेनाकरितः सहचरैः पोलिशासादाय सभक्ने प्रेषयत् । भनुम दे इन पर समान प्रतिनियर भूभवननिरई न भुवि विछन्द सहचरं बोश्य भूपेन्द्र दस्प- कन्यागुतादिमन्वेसन्ती पाणि सम्धा तस्य दैनन्दिनीय प्राय सौदामिनीव सरला- भजनको।

१२० चन्द्रमहीपतो कारा, कारायन्धन सत्य पोचन्ती, सदुयोग सालय धनव शतक्ती। चिरं चिन्तयमस हन्त। महानयमनयाँ जातः। भानु यमान तबादम् । * * पायोनिकेतने खत्यन्यकृततूल फूलमासाय पर परमश्रमालतलेोहितलनमा लगाम्भक सरोधिनीव मभी गरोजिनी। सा चोत्पन्नमहाउपहायोदस्वन्ति वधि मरणमञ्जूपया शुष्मवत्राणि पृत्वा भीरुभामिनीभूपगं दूपणं साहसिकानामाहत्य शोकलोकं याहीभूमावागत्याभिनयां रपलेसामविदूर एवापश्यत् । आरित- मना एकस्मिन् प्रोच्च गण्डलमारयाऽभितः पश्यन्ती गव्यूत्यन्तराल उद्धानिन्दा भुवि शनैशनैर्यन्तं रथमेकमैक्षिष्ट। त्यसम्मुखपादपेभ्योऽकस्मान्निस्तया टया सारधेरेवमभूवन्नालापाः। सरोजिनी-क यासि रे। पाटचर तिष्ठ, पक्ष्यामि। रथे विमति । सारथिः-मन्ये धृतस्त्रीवेशः कोऽपि धूर्तोऽसि, परं नाहं वेशेन दयिष्ये। दिद्धा चर्परयिष्यसि चेलमचपेटो घरी धास्यसि । प्रज, अपेहि न तेऽवस्या (कशयायी ताडयति)। परोजि०-मूढ ! मदाज्ञामवज्ञाय च, पलायितुमिच्छसि, पश्य सजो भव । सरोजिनी एकतो भूत्वा रथ्यस्य शिरोध कृपाणमोषकेन सद्य एव हारयाश्चकार । गतप्रीवे चार्वति, अतिरीषकपाये च सारधेस्तुण्डे क्रोपोद्यमतरलनेत्रायां सरोजिन्या समजनि जन्यम्। पादाहतः कृष्णोरग इव प्रादुर्भूतमदः करीव भीकरकायः रोषोरछलगातः स सरोजिन्या पराक्या उपरि कटकटायितदशनः कृपाणपाणिः पतितः। परन्तु सरोजिनी सौन्दर्य एव केवलं नाप्रगण्या, किन्तु कलाकलापालापिनामपि, स्व स्तत्प्रहारं व्यर्थीकृत्य लघीयसा हरतेन तच्छिरः फलमिव पबिल्वस्य निपातया धकार । मृते सारथौ रध्ये पररथ्ये च गन्तुमसमर्थेऽय सफला सा सद्य एवं रयान्मूञ्छितं पनवेष्टितं पुरुषमेरमुत्तापिश्यत् फेनमृतमुसचन्द्र स्वमनःकुमुदचन्दा रिपुपूरतमश्चन्द्रश्चन्द्रम् । तमेवं चिन्त्यां दशामनुभवन्त वीदय मालभन्ताधूणि स्थानमन्तः। सानि सत्वरमन्तर्गतदुःसताडितानि धावमानानि नेत्रद्वाराभ्यां यद्विरागत्य तारादुखिता पप्ठो निःश्रासः भुवमपि सिपिचुः। "कयमेकाकिनी शसख्कुले सोपवे विजने बने विलपामि । कोऽत्र त्या विपत्ती साहाय्यमाचरिष्यतीति तसा सतानियमाणा निपुणे नाडी परामृश्य मूरा विज्ञाय तदपनयनौषधीं तस्मा आघ्राप्य, कादिचद्विन्दूनपि उन्मुखे नेत्रयोक्ष निपात्य प्रतीक्षमाणातिष्ठत् । घटिकाषष्टांशेन स नेत्रे उन्मील्येतस्ततो ध्यक्षत, तावदेव प्रबलमवमत् । मुख प्रोग्य यावदुत्तिष्ठासति प्रमदामेको चन्द्रहासतारण्येन चक्षुधक्तियन्दी वीक्ष्य "महि शस्त्रात्यन्ताभावशालिनि पुसि अयान शस्त्रपात" इत्याह । सरोजिनी रोकतः पतितं सारयः खड्ग लक्ष्यीकृत्य "गृहाणामुपगममपि कीर कर्म दिदः" इत्युत्तीर्य योद्धमसजत । घटिका यावदभूद् बहुलविधान जन्यम् । "कस्त्वम्, अपहरन युध्यसे।" "महाराज ! एते दुष्टाः श्रीमन्तमाबध्यानैपुरितिवृतमहं ज्ञात्वा मनाक सेवितवती । मूर्छनशिथिलाइस्य भवतो मनोविनोदाय भालस्यापनयनाय य क्रीडिता, म रुषा, सैर्य धूटता साधुशीलः भ्या। सम्प्रति अनुक्कामीन, मानमिव पीने रथावशिश्मश्चमारा यथाभिलषितं प्रदेशं प्रयातु देवा, अहमपि यामि। "किनाम देवस्य ।" "चन्द्र!" "कुत्र भवती निवसति । किञ्च नाम भवत्याः।" "पाई एव नन्दनपुर तत्रैव मम दप्ततिः आख्या च सरोजिनी स्मर्तपेयं कार्ये” इति कथयित्वा सीयं गुरफलम्बि, अगरक्षकं सकृदपहाय फटकारेण धूलिकणानरसार्य पुनरायोज्योत्तरमनपेक्षमाणा, प्रस्थिता । चन्द्रश्च व्यतिकरणामुना किंकर्तव्ये व्यमुहृत् । अब विरोचनो रोचीपि समकोवत् । विदूरप्रसूतहिमततिताइनसंकुचिताविर काटासु प्रावस्य बभूव तमसः। सर्वत्राकाशे तमःखोमो ध्यापले। हुदिनानीव दीनान् तमांसि भुवंध्याकलयामामुः। देवदतकेन : शहिलयेऽपि शिवभक्नेऽपि सुखी न निष्ठति । तस्यामृतमपि विषायते, मुखसाधनं दुःखायते, प्रसूनान्यपि प्रहारायन्ते, मातृमन्दिरमपि यममन्दिरायचे। अहेतुका आपदा (फारीभवन्ति। १ अनुकमोनो-यपेटगन्ता। -- --

११२
चन्द्रमहीपतो
यतश्चन्द्रः सरोजिनीमनुचलितो गहने गहने मदमत्त इवेयाय ।
चन्द्रः प्रथमन्तु ज्वलितं जातवेदसं महात्मानच वीक्ष्य वाऽऽयातोऽस्मीति मत
महात्मनः समीपमयासीदेव । स च चरणध्वनिना सतर्क भागन्तामा
इतचन्द्रोऽपि साध्वीक्षणसमकालमेवाश्चादवतीर्य धल्गामावर्षयन् साधारभ्य मुपेतः ।
चन्दा-(प्रगामं कतमीहमान इव ) भगवन् !
महात्मा-नाहं प्रणम्यस्त्वया अधिकवराकान्मुधैव हिसन् भ्रमसि ।
चन्द्रः-(महात्मस्वनुचितं को प्रशमय्य) महात्मन् । भवता कर्य तो
यदहं वधिमः।
महात्मा--हयोऽपि कृत्रिमको प्रदर्शयन् ) भाम्, महात्मन्! हमा
जगरक्षक! त्वं नासि वधिकः। वयं रमो यधिकाः। योगिराज खगत वेस।
चन्दा-निरीही वास्तविकः स्तवनीयकोतिर्महात्माय प्रतीयते ) महात्मन।।
सगधारिण एव रधिका भवन्ति, किं मालाविकतारो भगवद्भका गाम्नामिक
रामपि सर्गसौभाग्यभागिनः।
महात्मा• नाहं भवत अमान शिक्षयामि। कस्याधन नायिकाया रामोपा
चन्द्रः-पोसिलकावापा, विरदास, पत्यः प्रेयसा स्याग्या सर्वनाम।
भवतादिपिकादन राम्पोष्ये।
महरमा साम्दो भूत्वा ) अत उपविधराने । के भयो।
स्टोरेश वतंते, अवाय देदि। यो गन्ता ।
पन्दः-दमा भरियति छोमनाम् ।
या प्रलम्बया वागया नियम्य धारय महामादल तक
मुग्मुर पदोषी महामनः एमीर समयले पाएम्बई: पनमा
पन। सो रित प्रवचरा पूर्ण क्षेत्र महोती प्रणम्। दो।
नो मात्र पार्टनगं पर भर्ष in मुखी
परनु तिरं शतम्। अन्तः समावद महमद
माय! बिम! Rrat

पप्ठो निःश्वासः चन्द:-मालोका'चन्द्र' इति सम्बोधयन्ति। जात्या क्षत्रियोऽस्मि। महात्मन् ! किं नाम भवतः? महात्मा०--(स्मयमानमुखः) अस्य शरीरस्य 'शफिनाथ-इति संज्ञा। अस्तु, चन्द। सत्यं कथयिष्यसि, यदहं प्रक्ष्यामि । चन्द-श्राम देव । कर्थ स्थातिरोधानं करामलजगतां भवतां पुरः । शति-नानि श्रमक्षमाणि, न च प्रतीयते भाहितश्रम वपुः। न च विदित- पनरत्तान्त मनः, न प तापत्तिः प्रकृतिः। पुनः किमयं 'च्यौनीभूयाटवीतोऽटवौं, पुलिन्दाभिन्दा मू भावं पापं पुरः पुर नपादगं भ्रमति। 'पुटवासिनो भवादशा मार कर रोदितशिवारचन्दनसिंहश्वेडाव्याघ्रविजृम्भणब्यालकरालकैलिलालिते- शार्दूलदोलनशक भावनाविधुतधैर्य, धमट अन्यान्यवन्यशीव विसरसते, "मृत्वनसित दिपव्याप्ते ऽवने यनेऽनवना भ्रमन्ति इति मरेत् कापि क्षतितदि सशिष्य कथनीयस्तावकोऽयं प्रत्तान्तः। चन्द्र-मिरिदित भगवत्पादानाम् । सब विदपि बालबदाचरसि । धन्या भवन्तः, यैरसरदारयामाव्यवहुताशेन भरिमतममित पुलस्याप्येनः। पावरपूतं यनमिवार- वशेष पूतं प्रतिभाति येषां वपुः। धन्यौ भवता बनित्वी यावीद पुररलं प्रदाम् । भगवन् ! अलमेडादशमलिनवृत्तं श्रुत्वा। भगवन् ! मृदुलो- रिम, दुरावल्मायुशामसतमुखसूर्योदयाना भवासा भविमोचा एव भवन्ति शुभाधयाति पोष्ण निरस्य चन्दःखकीयमुरन्त विपन्यवेदयत्। परिपौवना जमिनीव पामिनी विल्यमभचत । चन्द्रो निशा सुनः। दाकिनाथस्तु निमुनमुल्याय, गठी यपेच्यम् । बराबत प्रारीममिन्याः सौभग्यायपासिन्दूरबिन्दुविद्यालभाले। बभर याप्रेसर उजवा परमेश पेक्षा प्रहरमाव बभूव मध्यमः। पर युवराजयन्दः सुप एर। तरपानलपोपा घोणा निभरं याशोत् । पर कोमल- दूपुरमक्षण- १बोलो-गमनशील २दुपिन्दा दामा। कुटर बनादम्। ४ भारत पः। ५मंगभेरा ली। इधा मगर पोवारगर। पता-प्रमा। ..अपने-मिले। "पक्षपः। +

.
पत्रकाचना
११४
चन्द्रमहोपतो
गतमो हपंतपः शरीरं धुन्वन् बाजी एनमुदनिदयत् । अय
भौतयोत्थाय रगतो मुनिरिति सकून् राम्भ्रान्तः, अयाऽऽयास्यति मिलना
निश्चिन्तः, स्नात्वा प्रचण्ड मुहाशामवदनो मुनेरामा विनापि कुटीकोणध्वनि फ
समुरमुग्य वाहमारणाभिमुख दण्डमायमाश्रित्यायासीत् ।
नन्दनपुर प्रवेश एवासीचटुल्कशाला। अध्यक्षेण चन्द्रस्याभूदालापः ।
"भोजनालयोऽप्यन्तः"
"आम्, भोजनालयः, शैत्याधर्ताहमालयो बलालयः ।
भोजनसमये च नृत्यस्य प्रबन्धः, रात्रौ च मनोरजानाय गानवाद्यमिति सर्वा सुखपध
भवता पुरो नृत्यति"।
"कस्यां भूमौ स्थानं दास्यते"।
"तृतीयायाम् , यतस्तत्रैव राहदास्तरणास्तृताः मुसज्जाः पर्यशाः। महर्हा असन्ट
विचित्राणि चित्राणि । सर्वा राजोचिता व्यवस्था।"
"घोटकस्य..."
"आम् , घोटको मन्दुरायां स्थास्यति। अस्मै घासादिकमप्यस्माभिदस्यिते।"
"भोजनशालायाः प्रबन्धः कीटक
"देव! सामिपं निरामिषञ्च भोजनं पृथक् पृथक् स्थानेषु निर्माप्यते । भुपाचक
वैद्यैः परीक्षितं विशुद्ध भोजनं दीयते ।
"तहिं निर्दिश पन्यानम्।"
"कियच्छुल्कमेतस्य"-
"प्रतिदिनं दशमुद्रा" इत्युत्तीर्य तालिका समर्थ "कस्यापि वस्तुन आवश्यकताया
सूचनीयः-इति वदन गतः।
भवने शौचस्नानवेशागार आसीत् । स च नावोपस्थाय पावकानीतं मधुरमा
खाद भोजन प्राय भवनाप्रभूमादेव शतपदी विरचय मृत्यानीतं ताम्बलदलमे सर
निराकमायिट।
-
एकस्मिन् भवने सपीयसि दीपधाने स्थितः प्रदीपो मन्द मन्दं प्रकाशते

पठो निःश्वास ११५ प्रकरशेनामुना न शक्यते शमयितुममन्दं कोर्ट तमः। एकस्मिन् भमकाष्ठपी स्थिती धौ पुरुपौ शनैशनैरालपतः। "न जाने कोऽस्य क साहाय्यमाचरति वीर "कापि विशेषा शक्तिरेनं रक्षति प्रबल ! परमधुनाऽस्माकं काले तथा पतितोऽस्ति यथाऽख्यावशेष एव संवस्यति । कान्तिसिहाय पूर्वमेव बहुशोऽस्य बघायावो पर न जाने स किमिव विचारयति, यतः ‘गुप्तगुहायामेव प्रेपयितुमच्छन् परमय सारधिमधा निहत्य इहायातः।" प्रबल-वायचषक निपीय) अस्तु, गतः सोऽवसर, अधुना करणीय विचारणीयम । पोर-विचारितमेव विद्यते। आवो तारस्वरेण चौरपोर-इति कथयिष्यावः। रवेण स मनिद्रा भविष्यन्ति, न चन्द्रः। यतस्तस्य भोजने पाचकेन प्रचुर भगा दत्ता। मादिनीमतः स म शेडे तद् समेव । तत भावा तद्भवनस्याने ती अस्मिन् भवने प्रविधीरः" इतिकर्याययावः । एष उपायः कार्यसाधकः । शुल्कशालाध्यक्ष मुदाशत दावा सानुकूमत एव । क्षणे "चौरयार इयुत्थितः प्रचण्डो पनिः। जननिद्रितः। चन्द्रस्तु मुप एवाधीत् । शुकशालाकोटपालोपि कोलाहलममुमाकर्ण्य पहचरः समेतः । से सर्व एवं सेवा कारटपटना कथनानुसारं स एव चन्द्रभवनं प्रातः | परा वाटयुगलमाजगुः-प्रबलमजुहबुध पर स नोत्थितः। अन्ततः कर्णविस्फोटकेन वा निनादेन पक्तिं स उत्थितः। भियुभ्यमन एवासीत् । रत्यापि धायड' धान कुर्वतस्वान् नेव विस्य सामर्षः पर्वत करणं पाणी कृत्वा सादापार मुझटप प्युन्मुः संगतः। को नाम गले से क्षात्मानं प्रपातये, सर्व एव दशः पान्दिय सलन्ती नियन्तो पुः। देरलं सपायरः पहाल वीरवरी चEET रेट पालस्प मनायो तस्मिन् रावमाप चौरविधसः। प्रधोरोऽये यान- महत्या गुपन्मुक्ति पति पतमा निधिल सपहरः रेहमालो दोसरः प्रलय दुगदेर रागरता परन्दान पदहापरलनन्दरामी पतस्टेमिप्यायो परवाशरी भूमिसत्त्वा पदर प्रनिहोति तर पुरतः प्रबन उमाबद्ध सोऽप्ये शत्र ११६ चन्द्रमहीपतो हसगुगलोऽवर्तत । ते च सामा मुष्टिचपेटापादापामशं यदन्तः कटुवभिन्म- स्पृशन्तो युवराज प्राध्वंत्य' भीरमाकारायां कारायां निपातयामामुः। पाति। प्रातः समयः। व्युवायुर्नवीनं लीवनं सधारयन् रयेन मन्दोऽमन्दमानन्दं तन्व उदीयमानः सूर्यः पूर्वत एवारुणदूत प्रेष्य सागमनं सूचयति। अमरेशक राजभवनमिव बीक्षितमुचःशिराः, पर्वतोचनाकारोरसभित्तिः कपनिम्नया कटरिदुमा नितान्तदुर्गमया महत्या परिसया परीतो विचित्रको विहितरको रक्षोर्सत्र आदर्श दुर्गा राजते। महाराजः श्रीमान् कामेश्वरसिंहो वाजिनमास्टः, एकाको प्रमातिकपवनयला वनाय जगतः प्राकृति सौन्दर्य समयस्य रामणीयश्च विलोकयन् मनस्यैव मत्र इतस्ततश्चक्षुरविक्षिपन् यनासीत् । सघनवटवृक्षस्यैकस्य तले आलवालकृतासनो मालां विभ्रामयने काक्येकासीत् प्रा शक्तिशक्तिनाथः। कामेश्वरसिंहोऽप्येतस्य नितरां भक्त एतस्य रम्यन्यारूपाने सर्वोदयप्रवचने बहुश उपस्थाय खमतुलात्मनो महात्मनधरणयोरार्पयत्। बहुश एने नन्दनपुरागमनायाग्रहीच। तमधात्रोपविष्ट वीक्ष्योपगम्य अधादवतीर्य देई नमन "साधो। प्रणमामि"-इत्याह । शक्ति०-( शनैः) चिरं जीव । कामेश्वर -(शक्तिनाथेन निर्दिशिलातल उपविशन् ) भगवन् ! अनीहया औदास्येन कथम् । केनाप्याराद्धः किम् । कयं दुःसित इव प्रतीयते भवान् । शक्ति-राजन् ! अपराधस्तु साधुसद्धर्मरक्षितरि भवति भर्तरि न सम्भापयितुं शक्यते। परन्तु यस्य योगक्षेमनाशिताशेषभीतयः साचाराः प्रजाः सुख शेरते, येन विश्वविध्रुतयशमा शशाइनिर्मला ख्यातिवर्द्धमानमहाप्रचारेण धर्मेण सहेव दिगन्तं नीता, यत्य प्रभावेण त्यक्तवैरा विरोधिनः पशवोऽपि परस्सरमडादा मोडन्ति स्म। येन चुरापत हिरण्यं समुत्पादितभयं मृशं दण्डितं मुण्टाकलं यस्यारातिदयदाइकेन प्रतापवधिना १बन्धनेनानुल्य विधाय "प्रावंबन्धने।"

पष्ठो निःश्वासः विद्रुतभीतयो भामिन्यो गृहाणां द्वारमेव नाव : यं पितरमिव पालक मातरमिव मानदात्वं प्रातरमिव क्रीडाकरं गुरु'मव शिक्षक, कुबेरमित्र धननिवयमृतकोशं प्रजा मेनिरे प्रजापतिम् तस्यैव वर्णाश्रमव्यवस्थापकस्य सनातनधर्मसमाश्रयस्य श्रीमती नन्दनपुरनरेशस्य दास्य- समूद्धमृद्ध योग्यजनसम्पदा पद राज्यं नक्ष्यतीति विचार्य दुःखितं मे चेतः । किमिति कमिति कुत इति" सामर्ष सगर्व सविस्मयं समयं सनयनोस्फार सासूर्य कथितवति धीमति नन्दनपुरबमाण्डब्रह्मणि ध पुनः प्रावोचत् । घोरवर । वयमशेषां शेषाधारां विचरामः। समेषां मुगुप्तान्यपि मानसमहोदधि- लीनानि वृत्तरत्नानि परेशदयया विमः। कामे-याम्, निश्चितमेव। पाक्ति-भावी विमलेश्वरजामाता, माता वीरधैर्याणा राजनगरराजकुमारो भवत्पुरे समायातो राजकीयशुल्कशालायामावासं परिकल्पितवान्। स थाधुना वृत्तचौरीकृतो व्ययितच कारायां रायर्या निधिनिगडित आस्ते। तमुन्मोच्य तत्प्रादाय सपुत्री सरोजिनीध समसगुणात्याय तस्मै प्रदाय सुखीभवितुमिच्छसि चेद्भव। मा नाम अतुल शस्य विपुल कौशलकुसूले देशं रक्तरजितभुवं भुवं पौराणा, रोरुद्यमान चेखिद्यमान- क्लिक्ष्यमान-नारीवातवाल-समुश्यं का। महतो हेतिसम्ममा सेनास्य । राजनगराधिपतेरस्य पिनुरपि प्राप्तप्रशस्तिका थमूर। तत्समय एक हदयसाकुरु मंदावयम्। कामेश्वरसिहस्तु भुवैतच्छिथिलाको गूढ सम्मम प्रजदिना जवनेन शुन्कशाला सद्य एवं प्रापत् । शौकशालिकायाचितमहाराजागमनसम्भ्रान्ता भीता हरायुगलान्यायोज्य प्रणमन्तः क्षमा याचमाना जयान् भाषमाणा एम्तः सन्तस्थिरे। "कास्ते कोट्पाल". इत्युकऽ साचन् विदूरत एष प्रणनन् महतः पृच्छादृत्तधैर्य धाययौ पः। महाराजा-कति सेक्काः सन्ति सम्प्रति कोडर-देव! धोमतः प्रलपवापतपनेन नाशितं भीषणवृत्तसन्तमसम् । तदहं द्वौ सेवकावेव पर्याप्ती विज्ञाय नियुक्तवानस्मि । अप्रे धीचाणाभिधानम् । महा-अपि नामत्कापि घटनागवेऽदि ! कोट्टा-जगत्पते! रात्रौ क्यनपटुना चौरेणैकेनारइतः प्रचरो ।

मन्दमदीना ant, PART मा निम्न *मा. wit-- Hema गोर रोग भREA teacो गुमनामसदिनन् ! giform परम्। मासकी। मा-rtal: सम्पायभार सनभानुदास मोर सता ई-सारिक मम महा.-आम.सीमास। থী গীকি রামা ফিন্য দলগন বিধিবগে খায় = पापना रेष शान्तिामयी। तानि य सन्मोचित बसार सब [स्ताय पन्नाय रागोदारेण प्रेम सागमन संसूचय आगाम भातिर कामेशहित चन-उत्थाय भलिबदा ) श्रीमपरपसरोरुहयोः प्रणमत्ययम् । महा.-निरजीव! मानतो प्रमतोऽनुचित मृन्यत्य मर्षणीय कुमारेण । चन्द-कथमसपो भारो निपात्यते। महा-नदि नहि। युवराज सतोऽसि मच्छीमानैव प्रभापतिः, धीमानेव विमलपुरनराधिपकन्यारत्नसौभाग्यभागी। द्वाश्यमपि भवतः केनापि सम्बन्धेन पवित्र भविता। अतो मर्पणीया इमे भवत- भूत्या. चन्द्र.- एषा दोषः, क्षम्या एते। दैवं हि जगत मानापमाने, सुखदुःखे, लाभालाभे च हेतुः। महा.-कुमार। उत्कण्ठामावहन्ति दर्शका, तत्सपोव सुनाथय । अथ चन्द्रो घोटकारूढोऽसयजनानुगतो राश खयं निर्दिश्यमानविशिरवनो ध्याम्यत् । मच्छीमानेव राजनगत मन्ये एक- राजधानी न पप्ठो निःश्वासः ११६ शफिनाथस्थान्वनु पुरोहितमामन्त्र्य विवाहतिथि निश्चिन्वति नि चन्द्रेण न्यवेदि यत् पूर्व कमलपा सइ विवाहो भविष्यति तदनु चान्यो विचारः, इति । मिलपुरे व्यमामाकलव्य श्रीकामेवरसिंहेनामन्त्र्य कुमुदिन्या मुक्त भूपेन्द विमलपुर प्रेषयलिसच्च। देव, सादामभिरादनम्। धोरणानुसारया कुशल्पई परेशानुकम्पया प्रामध्ये प्राप्तवानस्मि ; रावं धृतं भूपेन्द्रो निवेदयिष्यति । श्रीमन्नन्दिनी नादावधि स्वस्था, स्वास्थ्यप्रस मुरभरारमुखदसामग्रोको रम्यचार्य प्रदेशा-दति तिचिदिनान्यध्युष्या- ऽऽयापयामि, न कापि ध्यप्रका कार्या। शेष कुशलम् । धीमताम् ललितानम्। । बीताप्य द्वियामस्तममिनीदियः। ज्योतनाजयिनी महाईमण्डनमद्विताना इम्याण प्रभा भास मा तन्त्रोपर दंशोशिमलविरादेग कोकिलकारस्या शिलासिनीविभावेश दिलपति म ललितानम्। बारमान्मधेमदुर दुरवर जाते जगत् । निशालालम्पावकारी निशोषसहायनाधिवप्रसर तमाशासन बाइसेन तितम्। मत्र तत्र निपुण मोहिम प शामवलिनु मतिता, दिनुस प्रालरोनयानयारम्पराग्यो राजेश तास्तिरमदाने गवेषयति । भरिमन्नेगनेहसि इसिला रन्मिोग, साइममिव वासिमपो परिपत समारमा घाटावाने युरिटाया। देर युगमोनिशान्त रान कलवार-विम्ल- बभूव निम्। पन्यासे मत्य RAE' पर पारा सासरथा, राधियता दिए. सम्मोरिस, रिलायधी, पुरनगर लाश सतबिन्दुपातमोर- पाए। तर पनि संघान् अनिमन्तरितरिमोन्दपुर- रिरी- देव! समिडिया सामरगा सोमलोएसिदान- TE तित. मरम्नेहा देशातभिरेष समारोपी सोन्याय Fertia शिपमत सी देश प्ररण" मिदनमत् । “सूबर १२० चन्द्रमहीपतो चहिरेवायामि”–इत्युत्तीर्य वस्त्राण्यायोज्य, बहिरेत्य, इतस्ततः पर्यव्य, बहुरा भएन किमभूदिति चिन्ताचक्रवरितचित्तचन्दः परन्शन सद्य एव प्रतिनिवृत्तः। कमपि पुमांसं नापश्यत् । * * "प्राभातिको मातरिश्वा ललिता लोलत्कुसुमाः मुगन्धविसरमुद्रमन्त्यो वासन्त्यो स्वाय सुखयन्ति त्वाम् ? त्वन्मेलनहर्षवर्षविधुतस्मृतिरह वृत्तमेव नापृच्छम् । तत्रयम य्यवहृतं तः। अहं स्थानस्यामुष्य परिचितोऽस्मि त्वमपि किमन कदापि समायादा! कमला०-शशधर, यस्मिन्समये मयूराणां नादेन मन मूछा मष्टा, सन्मुसे मुखायोजितरत्रानयो भयङ्कराकाराः कारुण्य वनदहना असभ्यतानिधय माकलितचर विहान महा इवौत्पातिकाः पुरुषा स्पा न्यकृतमृत्यवः स्थिता आसन् । ते मामाहुः- "कमले। केनाप्यविज्ञातोऽयं प्रदेशः, चतुरैरप्यज्ञेयोऽस्य पन्या भरमापतिरिक गमने च प्रवं मरणम्। अस्माकं देवः कान्तिसिंह कार्यवशाद बाहीकप्रदेशान् पनि गतस्तदाशयद वयं तदनुपरास्त्वामानीतवन्तः। सोऽपि समये भवती तायकोनोऽयं प्रदेश इति विशाय स्वस्थान इवान व्यवहरतु भवती इत्यामाप्य पर रगोयरे संवृत्ताः। महाध सत्यपि क्षुत्पिपासाशामके माणचित्ता सर्व वासरमत्यवाहयम्। तस्मिंश्चिन्तापारावारे मदीयचातुरोतरणिनिमा साई 'एप्रवेशान, शन्नपयोगान, शन्नपयोगान, विविधसादसिकार्याणि वेधि-ति राम' सरभर्म चूणितम् । दुःखित स्वान्त निजजनान्सरमार-भदह ! धननी हा! हन्त ! 'सानु दुभंगाया मम शैशन एव खर्गता। परि धानीव पानी अपि इन्त कौहम्दशा भदो साम्प्रतमेव भानदापारिपती गमुदाउमीन् । विचारितमासी परधुनाउमिनमुध मुस यिर सस्पते । हन्त ! तारिम, बीदी मन्दमागमा 'या' वैतिर प्रगतिकोfirf विमोइन । प्राडा रामः। एवम विचारमन्ती विरायामामेव म्यम्मरम्। सम्धीधा स एव त्रयः उन्मुसे नियतव्ययत "देखि प्राममामी देक कानिदो तिगुनाः। शोब बनाम दाबी नाशिः दया , महा भूगोमन यानी सनी मरिमाप फलबहुले चिन्तापरल्मीकि पप्ठो निःश्वासः १२१ बलवान् ओजखी यशस्खो घाम्मी चातुरोतुरीतन्तुवायोऽप्येक एवास्ति। अतो मवती रतिरमणीयां वयं सादरं प्रार्थयामो यदा भवती नः स्वामिनी भूत्वा निलयस्यात्या यौवनस्य च आनन्दसन्दोहमनुभवन्ती चिरं रमताम् । मा नाम प्रचण्डचण्डहेती विन्ताशशुक्षणी कमलकोमलमृणालपलवपेशलमिदं शरीरं पातयतु । चन्द्रसदृशा बहवो राजानस्तच्चरणाम्बुजरेणुपरागानुरागिणः सन्ति, मन्यस्वेदं सद्वच" इति । निशीथ एकदा शोचन्ती वृक्षमाश्रित्यानिद्रा एवा सं तावदेको मनुष्यो मदभिमुखमा- गच्छन्नासीत् । अद्दश्च "शया भी पादपतमसि निलीना समभवम् । स मामन्विप्याह। "कमले। वदनुचरोऽहं भवती स्थानादस्माद्वहिनिनीषामि। परमात्मा एते मां सलमनोरथं द्रष्टुं हन्ते । अधुनावसरोऽस्ति सपागच्छ मा भैपीः । अनुत्तरन्त्यामपि स मां सकरबन्धं नेतु प्रस्थितः। तावदेव चचलाचश्चरछटै कृपाराकान्तः। भीताहचन्द्रहासचापल्येन मूच्छिताऽभवम् । तस्य का दवा सम्पन्नेति न जाने। ततः प्रभूति कारायां वासः । दुःखविचारैराभाषः। तैरेव प्रेमा। शोकायुना ध्ययनम् । प्रजागरागरेण दंशनम्। सन्तापसिहेन भक्षणम् । तमोमिला। सन्तुदाभिरातिभिः खेला। चन्द्र--(निवस्य) ततः कथं मोचिता? कमला०--तदिन मम कारागृहजीवने पीयूषपरिप्लुत मासीद यस्मिन् मम जीवनवलरी क्षणं व्यसत्, परमुत्थापितकर्णा प्यतीतेषु द्विषहासु देवी सरोजिनी, कलितकृष्णवेशा कारायां समापाता। मया व्यचारि यी निर्दयं माशीनां देहधारिणोना प्राणान् गृहन् नूनं चचरीकश्यामलझमरीको मृत्युप्रेमति। मन्येऽय ममावसर इति मां नेतु' समेतः-इति । कृष्णाष्टकटिततः इतिचनायव्युन्मुश्य ममाह हसितगहितसरोजा सरोजिनी। सुधाक्षि कमले। अहं त्वां पाने यत्वं महा- प्रभावस्य राज्ञो भवेन्दुपालस तुषा, प्रभुवरस्य रामपालस्य प्रेयसी पुत्री, थतुलगुणनिधेरकर्मणवन्दस्य प्रियाऽसि । त्वामई बहिष्यामि। तिट, त्या लानिम्। ददितश्तेश्य भाग्यभावान् । अधुनानुभव पत्या सह दिष्कष्ट गल्यसुखम्।" इति भवता वाचमशृष्यम्। निराशा समभवम् ।

चन्द्रमहीपतो भहनु तारानीवनामरणं यो मन्वाना यचनचानुयाचितं विनोइयन्ताः किन्धमालम्य भवनमगाम् । तस्या निर्मायारिचर्यया सपरेव दिनरधिग- सारख्याऽभवम् । एकदा सरोजिन्याः पिया सखी चाला सरोजिया हदयमा न्यवेदयत् । अहमपि तामाग्नमा प्रतिज्ञातवतो। सेयं देव, मम भातच जीवनरावी रमणीया रमणी सत्कुलीना मम भगिनी निविशेषाऽवस्यनद्वाहा। "कयमेतत् सम्भविष्यति, सरोजिनीसदृश्यो नरायमाणा रमण्योऽप पुरुष मपेक्षन्ते।" "श्री धनम् , धनस्याधिपतिना रक्षकेण भवितव्यमेव ।" "अद्य स्त्रियः पुष्पमनुजीवन्ति, नैतच्छोभाईम्। आद्याशतिप्रतीका स्त्री राय पुरुषमपेक्षते। जगतः प्रसूः पालिका स्वपुत्रैरवमता स्वपुत्रानेवारयति । यो पितृलोऽधिकं वन्द्या विद्मः, आती यामेव भगवत्रस्थाने स्मरामः सा पुत्र पति प्रतरं वाऽवयेद् रक्षितुम् । अशोमनम् । स्मर्यताम् , अपरेण रक्षितः कदापि सुरक्षितो न भवति, यः खरक्षितः स एव सुरक्षितः। यथा नरः स्त्रीनिरपेक्षं जीवन यापति शकस्तथैव स्त्रियोऽसि पुरुपनिरपेक्षं जोक्नं व्यतियापयितु शाः स्युस्तदेव ताः खरक्षिता सुरक्षिताश्च भविष्यन्ति ।" "सत्यम्, परं स्त्रीषु मातृत्वभावनाऽन्तनिहिता। मातृपदमनधिष्ठाय न खो खां कृतकृत्यों मनुते। अतः स्त्रियाऽवयं पतिमत्या भवितव्यम् । भावनामेना स्त्री केवल ज्ञातुं समर्था न पुमान् । मातृत्व लिना स्त्रीत्वं ने सार्थकम् । तच विवाह । च पुमांसमपेक्षते। पुमांच सुशीलः सुन्दरी विद्वान् कुलीनो पनी समवयस्को वर- स्वदा वरणीय एव। एकदा यदि घृतस्तदा वृत एव सर्वदा। नरकासुरवधोत्तरं मनसा कृष्ण पतित्वेन वुणा भाव खीचकार एव। परिस्थितिः प्रबला। मारतोयसर्वस्वं ववस्तु रक्ष्यमेव ।" पादपनि विभाव्योत्कणेन चन्द्रण प्रयो बना अपलोकिताः। भीता कमला वान् परिचीय सन्धय आदिशत् । चन्द्ररतु ता मध्यस्यकाष्टपीठस्याधःखात् कृत्वा “पस एतेऽपिपलमनुभवन्तु-" इति कथयन् सतोऽवातिष्ठत । रे, अप्रवेश्ये भवने प्राविश: दाखादयाशासनपादपदम्, पातय च भगवान् कृष्योऽपि पष्ठो नि.श्वासः १२३ कान्तिसिंहसगधाराप्रवाहे सम् , नैशी योजना विफलीभूता तामधुना साधयिष्यामः" इति सङ्गार्य युगपत् खड्गधारया अभ्यषिचन् । परन्तु चन्द्रस्तु न "EISSTRलो" विकासहकारमजीपीयूषपानपीनमधुपपुङ्गवः, न च 'यधिकरणधर्मावच्छिन्नसामान्य - लक्षण'मण्डनपण्डितः, नवादतवादिवादीन्द्रवेदान्तिकातपाटवः, किन्तु करवालकेलिको. विदः, यत अपततस्तान् मर्यादयापहृत्यैवेनैव लघीयसा इस्तेन कान्तिसिहशिरः समपातयत् । तस्य कराधे च पतिते प्रकर्षामों 'चन्द्र ! इयमागता तेऽस्तमन- वैला, वीरवरदुःखमपि महतामीलेन यथाकथञ्चित् सोढम् । पर वोढुमेनं कथमपि म शश्यावहे, अधुना तु ते शोणिताजलिभिरेवैन तर्पयिष्यावः । स्मर स्वेटदेवम् , भव सज्जः इति साक्षिविक्षेपं व्याहृत्य गृध्राविव जिघत्सू सड़गाभ्यां युगपदाकाम्यताम् । परध चन्द्रोपलहासः स चन्द्रहास एव तौ समरुपत् । प्रशस्तरकालपतनसमकालमेव तयोः खडूगौ भनौ। चन्द्रस्तु विज्ञायैतद् मृत्यशिरोऽनुटत् । ततो गतासिः प्रबल:-"चन्द्र ! किं निश्शस्त्ररशत्रुर्हन्तव्यः । धर्म एष आर्यवीराणाम् ? अस्तु जातन्तभातम् । सम्प्रति सम्प्रतिष्ठ! इन्द्रयुद्ध समाचर मया सह । चन्द्रस्तु रिमाप- विवारपि वाग्वेगमवरुध्य योद्धमेव सद्यः पजो बभूव । निबद्धकौपीनेन बभूव सावकाशदर्शनं सपा परिवर्सनं मुहूत यावजन्यम् । परन्त्वन्ततः प्रचण्डदोर्दीडविक्रमी युवराजस्तं कटितटे समुत्पाप्य भूमौ प्राक्षिपत्। सय विहसन् तत्क्षणादेव चन्दचरणयो- निपत्याकोच,-"देव | ममेषा प्राणसमा उपांशु प्रतिज्ञाऽऽसीद् यद् यदि कदापि- कोऽपि मा द्वन्दयुद्ध लिपातयिष्यति तस्याहं दासः संवत्स्यामि" इति । तदेव! मा प्रभृति प्रभूणो चरणशरणः संवत्तोऽस्मि इति । वस्तुदो रन स्थान एवं राजते। ईदृशपुरुषरमस्य, सत्यवीरस्म, अतुलसाहसस्य उपचन्द्रमेवावश्यकताऽऽसीत् । विविधधातुकृत्तकसमस्तवकेषु परकेशधवटेषु राउतपत्रारदादितेषु स्टम्भेषु लमान कथुरवनकर्तितवारीनरीहत्यमानाभिमदरोण बादशमलस्यूतादिलकमलविदित- सेवकजनचातुर्याणा, रकवासोवितानानामध आयुर्वेदशास्त्रवि लक्ष्मीविलासभागि सन्मदिर राजकुल राजते। सवय, २८ पुष वयसा, पन्द्रमहीपती पसगामी बिमोहिन्या, कामनायो यहिणीशिस्तजितसमतशतलस्वजना:- पारि कटितटे सटे कामलासपाः, माचिदु संसचेतोहरे, इदचन शिरत शिशिरोरत्ने, कदाक्षिरते इतं न्यस्यन्त्यः, मोहिन्य इन तामृतानवाः टोल- स्टप्रान्तप्रेक्ष्यमाणावतोदरा हरिमायो वारवपः परममधुरं, प्रद्रय, पदना गानेन सवर्णयद्धमाकर्षन्यो गायन्ति । यविशाः पितरा स्वरान्मेच माडक सह सहस्त्रकार तारं रणरणायन्ते। कुंसा 5 विक्षेपबनितविशेषा बनान् समूह पन्ति । सर्वप्राभिनवो हर्षः पताका अपि भलिइन्त्य फरष्यमाणाः दुःखोदन्तावर्णन दुःखितमाकाशमय वीजयन्तीद। प्रबलनेजस्ता निष्कासिततमसस्तडिनदी महो? निसामपि दिनयन्ति । सर्वत्र सौगन्ध्यम् । समरिमन् मनप्रसादः । सर्वत्र हारपलास्ये। स्थैर्यमजीवेषु धूयमाणगानगमने चालस्यमासीत् । सोऽयं महोत्सवो विविघाख्याननिपुर्ण विद्याविलासालिभिः कविकोदिदैः केदलं शान्तस्वान्तवेद्यः सम्मलस्य चन्द्रस्येयत् महत् कष्टं विषय सकुशलनिवृत्ती लागत सम्पादनाय विहित आसीत् । रात्रिमुख एव एव दीपाः प्रज्वलिताः विमलपुरबहिभूमौ चन्द्रप्रसादपाय खागतसामग्रीव्यग्रो जन ईश्यते। मितानस्यायिनां सर्वेषां भूमि सम्मुदीनम में लग्नानि सन्ति । अस्मादेव संसरणाचन्द्रागमनं सूचितम् । हम्य व सजिताराति सरोजिनी नितरामुका। प्रतिक्षणमित स्वतः सखीष्टु दीपप्रकाशः सर्वदनसमूह मुखायामास । पश्यत एव द्वे मरुत्तरे प्रमाययतुः। सन्दर पुरीयं सजवनिकं मरुत्तरं प्रासादमाससाद, परवितानभूमिम् । अथ सम्रलोकजयशब्देन सह समवतीर्य महनीयरामपालचरणसरोज नयन- नीराभिषेक प्रगम्य, सगद्गदमाशिर्ष प्रतिमा सभासदैर्यथायोग्यं सत्कृतो रामपालनिर्दिष- मासनमलष्कृत्य, वृत्तजिज्ञासातिशय विज्ञाय भूपेन्दणितमपि सोपेण निय राशाऽऽमन्त्र्य विश्रमाशी जप्राह । अथ महाराजो राजसदने दिनादौ दोषज्ञो, परिवसिता सिताम्वरो वरी वीरेषु प्रताप निजितमहेन्द्रो भूमहेन्द्रो रामपालः, नन्दनपुरेश्वरः कामेवासिहश्च मुल्यैः सामन्तरशेष विद्यानिधिना निधिना जराया राया होसवेरेण मतिमा वरेण मन्त्रिणा मतितरेष, प्रेरयति। मरुत्तर .

पप्ठो निःश्वासः १२५ आयुर्वेदमहोदधिमथनमहनीयमहिम्ना हेम्नो दाम्मा विभासितगलेन धाम्नां धाम्ना नाम्ना चन्द्रशेखरेण शेखरेण ज्योतिविदा कनकदण्डोपनेत्रेण क्षेत्रेण सकलकलानो ताक्षिपदमणा कुलगुरुणा च परामृशति । मध्ये हस्तलिपिता भूर्जपत्रमयी जीर्णाssी स्वर्णाक्षरः वस्वासोवेटितापि न मनोमोहिनी विराजते राजते पत्रे पुस्तिका। यस्याः पराशि इतस्ततः प्रचाल्य किमपि हस्तरवसु गणयन्ति गणकवरेण्याः। विशेन देवशेन निस्थायि चैत्री पूर्णिमा विवाहे वरणीयतमा वेला च त्रियामायाकृतीयो यामः । "सौजन्यजमिनो नवेन्दुवर्मणः समागमन लघीयसि समये न सुपर पुण्यश्व पूर्णवयसौ बेलाविलम्बायोग्याः" इति मन्त्रिणामन्थ्य कमलाविवाहसमारोई समारभते रामपाल "महात्मन्, महाराजः काभेश्वरसिंहो रामपालश पत्रमिदं प्रष्य जिज्ञासन्वे यद् पानादिक कदा किंवा प्रेप्यम्”---अश्वानुत्तीर्णः सादी प्राह । महारमा च जत्वपहाय पत्रं पपठ- भानीया, एकोऽहे महु रयमिति समायममणः प्रथमपन्दनेन पक' चराचरम- মুম্পা দ্বষ মাখি। যুণী যবসিয়া বেগহিয়া জানান प्रवाह पुराणपुरुषस्याभिलपः। विवाहस्तस्याभिव्यक्तिः सामाजिकी। सोऽयम- मिला रामपालाप पुत्राः कमाया, मदनसिहस्यात्मनायाः सरोजिन्याय महा महिम्नी रझो गोन्दुमालय पुग श्रीनन्दरामारेण या पूर्णिमाको दि रूपेण सम्पायते। धीमन्त उत्सरसम्पत्य उपस्यानुप्रान्ते । कामेपरसिह विमरम् तिमासीत् :- रापितोऽभिलारोमदामा सम्बते। अनाममने पूर्णदेव प्रसन। सतया महात्मनः योगिता -उरोशिनी १२६ १ २ ६ चन्द्रमहीपतौ महात्मा-सूचय समये समेष्यामि। न यानत्यावश्यकता। * उपगवाक्षमागमा अद्य चैत्री पूर्णिमा या बहोः कालाल्लोकश्रवणयो रणरणायमानाऽऽसीत् । अद्य तुच्छनुच्छस्यामि मनुजन्मनो मनोमवमवनमनोरमे रमेशकृपाकटामिन क्षितेः पत्युभवने नास्ति वासावकाशलेशोऽपि। यत्र तत्र पन्यानः परिजियन्ते, शाराणि द्वाराणि रच्यन्ते, आसन्य आसाद्यन्ते, जवनिका विस्तार्यन्ते, सर सादिनः शिक्ष्यन्ते, द्विपा भूप्यन्ते, शिक्षिकाः साध्यन्ते, मृत्या भार्यन्वे वाधि मुवाश्यन्ते। अय भूते दिनस्य साये विमाया पुत्रा व विभावर्या निःशारित प्राय उद्धगणेऽनी. तपनतापामु धूप पितागु दिशु, तोभषानेन बधिरीमियमाणेच दिगन्तराले, मन्टना- नाशपबलादिवियुदुष्मुकैदिवास्तायां यामिन्या, नपुरशिषितजितजितेन्द्रिये समये, राभुशुण्डिकोत्तानं समान सतर्क कषु पदा भयतः स्थितेषु कटियन्तायलम्बमानकरवालेषु अवालेषु राजपुरुषेषु, गुगन्धन र रेतुहिने सिम्यमाने संगरणे, सम्बभवनेषु वनेषु सौन्दर्यशामिना ललित गावन्दी मलनामु, रापुष्पातोल्क्षेपमाशिष पदरमु दमु समाहितताम्यूलीटे rat सनि विचलयन् विन, कायन् सहाना मेदवित्री प्रारम्भः प्रम मार मदंसहो महामहः। अपनः प्रतावावविहारो TER, तोविदिताभितयः प्रमतयो मौe वः मापा मुगाइगुलियावादाना पश्च्या, तो विवरण बारगमनमनमा मुशमलाएननाविपरमागम भनी बाममीना निपटपात्रो गया, तशयमहोमपमापी আগবন্ধনয়ন: শিলান্ত পরিশ্ন ए गन्नुमदार, भूमाता भगान, मंजन वा पिवई असई भा re माप विशोभिकर सम्ममा शरारा पा संय, गव Partorrent षष्ठो निःश्वासः १२७ कृष्णवर्णानाम्, महाहरनखचित-वर्णपीठस्थित समधिकसमरजथिसामन्बुमाराणाम्, महा- मात्रप्रयत्नरुद्धशीघ्रगतीनां करिणा গ্রাফিলিখিত্তবানবীপি- श्रमझमर श्रेणयः श्रेषयः, ततो मुशुण्डिकापलम चवनि शितसितासिधेनुकाशोभित- सन्धदेशानां परेषा करकलितनिष्कोशकरवालानां तीक्ष्णफालशोभिकुन्तधारिणी, राजपुरपत्वख्यापकवतलपित्तलपट्टिकालंकृतवक्षस्थलानां, स्थलानां वीरतायाः स्ताना- राजनि, जनिमा सत्कु पु, कुलेषुधिधनुर्धारिणां वोखराणां वारः, ततो मुक्तानिमित- राजहंसमिथुनेन, मध्यमुक्काकलापेन, नीलमणिना रचितमयूरयुगलेन भास्थलर कनक- दण्डेन रककौशेयसम्पादितेन, पृटस्थसत्सामन्तगृहीतेन, विशदेन आतपत्रेण प्रकटित- सुषमः उभयतो हस्तिवरारूढाभ्यां सामन्तराजभ्यां प्रचारयमानचामरयुगलः, महार्हरननिवितकिरीटविभासिभालो लोलालकः, शमीपत्र सुमकोरककुम्बुमकाश्मीर- चचितमुखमण्डलः, दशननिजितकलानिधिः, कलानिधिः, स्वर्णसूत्रस्यूतपुष्पलतारतबक- भाजा, एककौशेयेनाप्रपदीनेन वस्त्रसम्राजा समेधित्तश्री:, धियो यशस उदारतापा वीरतायाः सौजन्यस्य व भाजन सश्रीफलेन दुकूलेनानद्धकटितट, प्राजातर स्थूलवतलमुस्काहारण चन्द्रहारेण वक्षसानुक्ततारापतिः, पतिः राजनगरवसुमत्याः, मत्या विहसितकाव्यः, काव्य- रचनाचतुर, तुझविद्याप्रवीणः, वीणाकणनमुग्धीकृतप्रमदः, मदोत्कटकारकटपाटन पाटवप्रथितः, कविशोभिमणिबन्धेन हीरसचितस्वसनीलकौशेरकोशकरबाल- धारिणा रन जटितोमिकाहारिमा करेण दौतितचापल्योऽपल्यः, प्रधौतधौतवसनः, सुभर- पादत्राणः, महाईपरिस्तरणायां रशी रामपालस्य परमप्रेमभुवि भुवि सम्पदा प्रतिष्ठानान; करेगुका कायाक्तिचित्रायां कृतवर्णासनस्थितिः, स्मितेन दशनवसनयोसलितललामा प्रसारयन् रसिया, विकासयन् कामिनोनेत्रकुमुदानि, उद्दोपयन्मनोभवप्रभावशन् सत्काव्यमिर पदे पदे हर्षयन् सर्वचेतांसि आसीत् कामिनीयामिनीमनी- वियचन्द्रधन्दा पृष्टतच महान्तमनलहरणमपि अलङ्करणमवानामचौरसमारूद आसीन्महामात्यो मतिवरोऽनुपतः सशनधारोहिभिवावरः। कामिनीपातितः कुसुसमालाभिः स्तव मृदुला ताकिटकाभूहसुन्धरा । १पलं मांसाहतीति पायान स. सोऽपल्यो-न मांसभोय।

चन्द्रमहीपतो चारुहासिनीहास्यः कथमपि हातः, विलासिनीनयन्वागुरया कपडयमप मुच नपुर- शिशितैर्यथास्यचिदनाकृष्टः, वामभ्र दर्शनमाराकान्त इव शनैशनेबलन समारोह महामहिम्नो रामपालस्य दुर्गान्तहेर्यमाड्डौके। अद्य हि भगवतोऽवतो दमुषां सुधास्मितस्य रामरालय भवनं वनं दिल जिताय. विभाति महेन्द्रस्येव। हाटकघटिवेन द्योक्तिशिपिनपुग्धेन पत्रेण बटिद, चरिती- कृतावलोचकलोचननिचयं मुखद्वारम् । थभितो लमाथ पुष्पस्तबकलतायुधाः जवनिकाः । सम्मुखे तस्य रक्तकौशेयनिर्मित विलसदालतकुनम नृत्यत्नान्तप्रतानिनी'- वीडितसकलजनं द्वात्रिंशरस्तम्भैविहितायाम महावितानं दिततम् । यत्र मुसचिव सिंहासनानि सहप्तशः स्वर्णासन्यो राजतासन्यो त्रासन्यो राजन्ते। यमभिटो निष्कोशकृपाणपाणयः पटवो भटाः समर्यादमासते। मुग्धा नूपुरशिजितद्विगुपितरावहिणीखनाचिरप्टयः, मोहितसमाजेन वि. नन्दकेन कोकिलानुकारिणा करिणामपि मनो हारिणा खरेण मधुरमधुरं टरतरं गायन्ति। इतराण्यपि वाद्यानि यद्यपि सखविजयाय मनुजमानसान्यपहर्तु प्रयतन्ते, परन मुग्धवधूगानमिदं सर्वातिशायि विजयमध्यगात् । अय वादकेष्वेकतो भूत्वा वादयत्न यलु मुक्तमागे च सैनिसमुदये हम्- सम्मुखकुटिममायाता करेणुका आयतललाटपराजितचन्द्रस्य चन्द्रस्य । निःश्रेणियोजनेन जनेन दताशिपि समवतीणे वरे हस्तिपनान्यतः नीडा करेणुकायां करघृतैः सौवर्णः कृत्रिमनिझरैः मुगन्धविसर पनि मुभिटे मनसमुदये, सदासं समन समुन्सासं प्रवत्सु पलस्सु च यजनेयु विहिततोरम पद भाहतोऽपि परमसुन्दरीषा दरीणां मनोभवस्य भवस्य सारैः कटः, भतीत्य हम्यप्रथमद्वारमासमाद वधूविधूयमावमानसराजहंसपतिसितम्यजनं विर्णितनयनं, नयननोरजैनीरजादायिताजिरं, नकदण्डवमरप्राहिम भित्तामूल वाहिनीमिः, पतद्माधारिणीभिभूपमभूषितामिसीमियांचालित, मलगानस्यस्ति द्वितीय द्वारम् । प्रतानिनी मालरोईत भाषा।

प्रणय पष्टो निःश्वासः १२६ तत्र चाहनाभिः कृतेऽचने कमलयापि पापितःसदयामिन्या सरोजिन्या सहर सविमं ललनान्तरितधारीरलउया पुष्पस्टवफेनाहते चन्द्र इतस्ततः सविलासं प्रयातासु विलासिनीषु गौडविडोजसा परिवत्सितसम्भारा परितकदलौदण्डा चारा वेदिका सस्त्रीक कामेश्वरसिहो रामपालच कन्यादानाय परिकल्पितमहाई- सम्भारावविशताम् । समये जगदानन्दी चन्दोऽपि मण्डपे वर्णपीठे पदशकार। यथाविधि कमलासरोजिन्योश्चन्द्रेण सनो विवाहसंस्कारः। शामीलं भरस बधवायोरङ्गान्ययामास । राजा रामपालः स्खचातृभावनोपेतः कामेवर दासदाधीहत्यवस्थामालङ्कारयुक्त यौतुकं कौतुककरमदात् । चनुश्च विवाहख्यापकास्तोभाः। सम्पन्ने विवाहे चन्द्र आचार्य राजामं रामपाल कामेवरच शक्तिमायस्य पादयोः परमप्रेणाऽवनिनसुः "केवलेन नमस्कारेण किम्, कामपि भूयसी दक्षिणां देहि यो यावजीवं स्मरामः।" इत्युक्तः स्वकीर्य महाहमगुलोयकं ददी । अथ सम्पने उपयमनेऽवलाभिर्बलादाहूतः पुरुहूतोपमः शिक्षानवलयया कमलया सजोपरजन्या सरोजिन्या चानुगतो गतवानुपदेवं देवश्चन्दः। तत्र च कृतकुलाचारी- महिलाभिराग्रहीतो नेत्रसम्पातेन परितः प्रेक्ष्य मदनसदनखामिनीभिः प्रमदप्तमदाभि- गोत्कण्ठमवलोक्यमानोऽचिरं विचार्य पद्यमदः पपाठ कल्याणानां निधानं कलिमलमधनं पावनं पावनानां पाथेयं यन्मुमुक्षोः सपदि परपदप्राप्तये प्रस्थितस्य । विश्रामस्थानमेकं कवियरवचसा जीवन सजनाना धीजं प्रेमद्रुमस्य प्रभवतु जगतां भूतये चुकामम् ।। लेभे के महाईमाशुलीयकम् । तत्र च धाररसस्रोतसि प्रबहमाने प्रकृत्यैव हासप्रिया प्रिया सखी कमलाया गनोरमा, रमाविनिन्दवरूपाऽधारं तर्जयन्ती गुणरत्न, रत्नमण्डिततनुयष्टिः, यष्टिर स्मरस्खलितस्य, किवित्परिवर्तितपई हनुमन्नाटकीय पद्यमदः भुवा स्मयमान- मुखी उवाच- ३० चन्द्रमहीपतो देव । यदिन कालेक्षेपो यदि व प्रसादसम्मुखो देवोऽस्मासु, सहि मायन शुभूपामहे परामदः। अयोधविश्लवस्य ललनाजनस्यानुपेक्षणोमोऽयमनुरोधः । "कलितवैदग्प्यस्य दग्यस्यापि हमरस्य प्रधानजीवनसभनी विमुग्धस्यापि मुग्धमन्य स्याजनाजनस्य कृतानुभवः सध्केतोऽप्यत्र गरीयान् । कठिनार्यविशइनमात्रफनिया हि विदग्धातिः।" विकसितसिताम्भोजभष्यमुखचन्द्रोऽवदत् । "तयाय कलिरन प्रणयकलहः स एव मल, तनयानय मपनम् । मुमुक्षेत्र मितिशेषः। पर पदाभ्या.. सत्यापये प्रस्थितस्य, इत्येव भापमाणे पपासुका हस्तेन निषेपयन्ती, अलमलमितिम्याहारयाला पटफितहमला रागुणस्यो मनोरमा विमोचितचन्दौत्तरीया प्रमदायनश । मागन्तनशीपयौवनमचैतने धगत्यति सजीवसौन्दर्य पूरयति म। विशदनौलाको बरे नीरमनीरमा उरोगगन शामेन गुवं भाययते स्म । दिगाना मात्र मादाय जगमनाईनाया दिशति म। शुभग्योत्स्ना अगतीतले पारित प्रमा कीरन्यासीत् । हवन इदन नारीनपुग निशीधिनीनीरसता मन्ति दीपरश्याम पिपरपुमादारावलीमारिन रानगामारीन परिपलो रजत एव । परिचय परिपूर्णपुषणिोपरा प्राय गरमि लामा गुणगामी गला मन्द मन्द बदतिमा faখাখালি খাব না মান। মনুসং- पन्ना पूनम शोमा सत्यमानी। गर्मनाभी मुगुममाया पोरस करती पर ramटोरिणी मारा। बामपनि समयः समेतः। 7 ममने arm मदनराकानमोल हो। पद हार AsstatwwATTISiriyar बनेपामा रादा मुक्त श्री र पष्टो निःश्वासः রিনি, লাম্বালিয়াঘ ধন্যয়ামীবিরবানির नयनयोनिद्रा। धीताध्यद्रियामा त्रियामा । पन्दसरलतररमणीये शयनीये गवाक्षागतमुरभिनमखद्गाद- निदोऽस्वात् । प्रियतमा च तस्य भतर विहाय उपर्य पर्यदिशामेकामध्यास्त । इतनिद्रा, साथ निर्भरं चन्द्रप्रकाशे रन्दाननामृत निपीय विलक्षण तृप्तिमध्यगात् । महोवा हा चन्द्रस्योरखि पोलयोः शिरसि पाणिपाल भ्रमयन्ती तमपि गततन्द चकार। "पस देव, कौसी मनोरमा यामिनी, दियव मुपादिग्रुप इव वर्षति ।" पक-निस्सन्देदम् । परमेशस्याः शोभा पत्या चन्द्र जैव। भस्तु खपिहि, मधुरा निद्रामनुपामि । चिर रात्री झोडतोः ऐयित्यमापन्नयोनिद्रव सारथ्यप्रदा । सदि जगति परिस्थित्यनुमारं मनोरमममनोरम या भवति, शेष। " मध्य एय तामिभूत्वा ) प्रिय ! भगिनी सरोजिनी योग्यभक्तपरिणया अलगविता। सम्प्रति मानचित् प्रवीत्येव नह-" पर-अयन प्रिवीषि मुग्थे । "भई सचामन णिशामि। बतायः देलिकाले आकाश ममति ।" चन्द्रबिन्तहि चाद। *भाम, थम् आर्यपुत्र, स एव सत्य कृते महान् ः शिरस्यायः सरोजिन्य बसा दिलक्षापा मारिनी सरकार" पन्द्र-रे! एतरिम सर्वर विद्या पदसम्म लपसि "प, रिमद सश्विी माननि भाइसित्तपति बारमाहो रिम प्रमति" पर-सोरेग्मोमोसंसमि! हिन्त बाम!. " (स) भागिरपए मना त स बार मिनि। महर! Sः परि तिमान्ति पर। सम्मान्दो मन्ननति रिसामर! सण, सम्मायलेकामोन्मदिन।"

प्रियाप्रेमपरायणो 'युवराजा कुमम त्वारि ३ सरोजिनी। हसन्या सरोजिन्या धोतवदना चन्द्रण साश्चर्य वीक्षिता चतरामपुर चन्द्रमहीपतो चन्द्र-स्मृतिभ्रंशः? आः पापिनि ! वाचतोऽस्मि, एलम् (प्रकाश प्रमत्य पलात्तन्मुख वीक्ष्य) भाः कुटिले! किं कृतवत्यसि । नाइमरिन तब पतिः । "स्वप्ने! स्त जापति?" चन्द्रः-जाग्रद्दायां प्रकृती स्थितोऽहं वच्मि यत्-यत्वं स्वपति मन्यसे सऽ। पुरस्ते चन्द्रः। ( सनयनोत्स्फार मुसं दृष्ट्वा ) नहि नहि भवन्तो धौर्य विरचयन्ति। मुकुरे मुत पश्यन्तु भवन्तः।" (मुकुरमानयति स स्वमुखं वीक्ष्य विस्मितो भवति) चन्द्र-भवश्यं मह्यं केनापि परिवत्तितम् ( जलेन क्षालयति रागः पतति ) पदय में रूप केनापि परिवत्तितं वचकेन । "अरे! ( अभ मुखी ) भवतां किमनेन नष्टम् , अहं नटातिवत्या मास्मि । राजकुमार ? नेदं भवदनुरूपम्। स्वयं रूपं परिवर्त्य स्त्रीणामुज्ज्वलपतिव्रतविनशन कि भवद्विधानो कर्म ? अहह ! भवादशा एवं धर्मस्यैतस्य पालकचरा नाशाय भविष्यन्ति वेत्तदा हन्त। वत॥ कं नामाश्रयिष्यत्येपः। अन्याय्यम् ?" चन्द्र-कथं मां दृषयसि ? सर्वयाऽदूषणोऽस्मि। मां निरयपातिनं विधात सर्व सतीत्वस्य ढक्का निनादयसि । "तहिं के दूषयामि ? (सविलक्षविस्मयं ) अहो। भगिन्याः सरोजिन्या : एव दशा भूता भविष्यति। सा मम पत्युसरारं गता भविष्यति। बहुत विस्मृत्या, हिया, सक्कोचेन, मूढदासीकथनेन द्वयोरेव च्युतो धर्मः, हा " चन्द्र-कि कि मदीया प्रिया परस्या। (खड्ग निकोशकुर्वन् ) कोऽखि । "युवराज! किम्भवन्त एवं क्षत्रियाः। श्रीमन्त मत्पति स्ति क्षत्रियः। तस्य तनावपि प्रोष्णं राजन्यरक राजते। सर वरणीयवीर्यः स को जानते रिमाचरिष्यति । अत्रमण्यम् ! यस्य प्रिया भवन्तो रहसि छलेन निति......” इत्यनर्गल प्रबदन्त्यामेव तस्या समाजगाम विकसितवरनसोर एवं शूरवारवरा-18 एवं कमला समवर्तत। महरभूदास्यं प्लास्यम् ।

पष्ठो निवासः १३३ युवमानिधन्दधन्वनया कमला सततविकसितनयनसरोजया सरोजिन्मा च रममाणः पामुस्टशेखरायमाणप्रत्रलप्रवरसिंहविधीयमानरी विश्वस्त रक्षित प्रासादोऽविषादः सानन्दं राज्यमीक्षमाणः नीतिनाशितभीतिः रीतिरशिलानीति प्राः प्रजेशपरमप्रणये बदन, मानयन्नधिकारिण भाचर्यभवनानीतविपुलधनराशि- देवान् नद्धान् विमानयन् प्रसन्नाशो विमलपुर एव स्थितिमालरत् । पुमान् मुरो सर्व विश्मरति। प्रवरं कष्ट विषय वकीर्य जीवन सन्देहसिन्धी निपाल जनयित्री प्रिया मातर, कृच्छ्तामनुभूय धनादिकमर्जयित्वात्मजमेव सर्वस्वं मत्वा पालयन्त पितरं शैशवराहचणि मित्राणि, कलमपुप्रभातुनपि विरमरति । हन्त ! महामदो लक्ष्मीविषम् । प्राणान्नु कथैव का या प्राप्य शेशवे हेयकीननु, सशेषदेवदानवरक्षामनुप्यसिद्धसाप्यविरमुनिमुमुनुवाषिराजषिदेव शिरसंदिग्दर शा- वादिपि क्षीरनिधी निद्रामेव जपतेऽनारतम् । भइह । सत्यं । “हालाहलो मग दिल विर्ष रमा। पारिमालया सततसे परमात्मानमपि विस्मरन्ति स्मरणीय चरिता शिक्षितः। का का संधारणमान्दियावर्ग पुरधानाम् । यद्यपि पाध्येयं सर्वश्य भागो जनस्य, पास्तु यां प्राप्यापि न मुसेन पुअन्ति, क्षपित महता राजेन। निया, सया, मोधेन, स्त्रिया शिपसमा पुगपा, अनन्त परामरूपमसी समते। योऽसौ नेवनिरीक्षितप्रकृतिको सम्मापांटिका- थाप्यारामतहागपसरिता श्यस्य मर्मप्रदः । सेने सेन पयोनन फाविना धोशास्त्रिगा द्विस्त्रिमा सस्मिभन्द्रमहीपतो मुमतयः ! पप्टो परिष्टो गवः ।। पिट धोडिटेन्सदधीमीनरागरसारित्रस्नपेन रमहरेष नियमचरित्रया खेपदमरतोरि

सप्तमो निःश्वासः
अघटितघटित घटयति घटितं घटितं च दुर्घटीकुरुते ।
विधिरेय तानि घटयति यानि पुमान्य चिन्तयति ।।
पुरुषु यः कमलिनीकमलोदरेषु
चूतेषु यो विलसितः कलिकान्तरस्थः ।
पश्याद्य तस्य मधुपस्य शरद्व्यपाये
कृच्छूण येणुवियरे दिवसाः प्रयान्ति ॥
भासारावलिस इव चवञ्चन्दिके वियति यतिमानसविमले परिमलीहारिधि प्रह
श्रीवामौदसामोदे दीपिका-रणे, दिमशीते चलतिशेलितलते, भगुदपनार
पन्दनघूमधूमे रसिहप्राणरन्य सन्तयति नैशिके मातरिश्वनि, मयेने निमिते वैमरा
शेयारणास्तृत महति म उपवईमानिसोपवि चन्द्र परितः धमार्सना गरे
प्रमशेन दिनमााणार्या विमाषयां' गान सापयरगु गायकेषु राममति
निरहे ग्रहस्तः प्रहरी प्रविश्य "अयतु जयतु देव"-ति त्रियाहरय 'यन गरि
परीटतनुः तनुमानियोगहोऽविषादी सादी भागभामध्यमय सीमित है।'
प्रमभन्न निवेच, 'अम् प्रवेशप' इति श्रवा गतः।
चन्द्रश परत एव प्रहरिनिदित्यमानमार्ग परतो वोशमा व्यन्तमा
परिचिदमिर गति गिरनुभूतामिति बारामतोरिन पान सर गारमन
पसर समीरमायादव परिचय भामाथि मेरोमटियुषय 'श्राः मान
पिरति पयन मनौतमधिगम्य साटमा समाय पाया
पवमुतांश पत्र।
"बन्योमनरौलवरी मन्त्रिमार fer?'
(स) विपर्दा श्रीमत्र माना

सप्तमो निश्वासः १३५ "विहर्षः। अय कुमारस्य पुत्ररत्नजन्मनः पठे दिनम् । परममित्रं कुमारस्य श्रीशक्तिघरच समेतः, अद्य निरवविहः । देवं प्रार्थये जातस्य शिशोहर्षवर्द्धन इति नामकरणाय" सर्व सभ्या एकवरेपा:- “अथ किम्" चन्द:-अपि कुशलम् ? कुशलिनस्तातरादा! मद्वियोगदुःखिता अम्बा वासराणि सानन्दं व्यतियापयति कचित् ? पितुः परमश्रद्धास्पदं मन्त्री कुशली ? भवतो कुशलवृत्तं वेदितव्यमोऽस्मि । शक्तिः-पृशं दुःखितोऽस्मि, किमिव कपयामि। चन्द्रा- सभ्यान् प्रति ) अद्यतनो महोत्सवो द्विगुणतरोत्साहेनानुष्टातव्य आयः। अहमपि समये अमेष्यामि। प्रेममन्दिरे 'प्रबल1 शोघ्र प्रबन्धमायोजय'- - - चन्द्रा-शक, मम दुःखानि परैग्नुमातुमशक्यानि । शकि:-अये, तब राष्ट्रोपकृत्यै, तपसे, सिद्धये, विद्या धनाय वा, किन्तु प्रियायै । (हस्तं हस्तेनायोग्य हसति, चन्द्रः खनामाङ्कमगुलीयकं वीक्ष्य वेतमुखो भवति । मौनम् , अस्या एव कृते पनादनं भ्रान्तोऽसि, कारासेवीकृतोऽसि ताडितोऽसि बद्धोसि, शातम् एवं लभ्यन्ते मन-प्रियाः प्रियाः। चन्द्रः-मृश मा खेत्सोः खितचरम् । शक्ति-खेर अटवीतोष्टवी भवनाद्भवनमटतो महान्तं कालं यापयतः, भीरु- भामिनी भिरभिकोडा मोल कुर्वतः भयानलान वान शयानका, अपत्सलामनीक्षित- "भरन्यू, परीक पार्शरीकान्य जन्युसमन्युगर्जना वनावनिमवना अचूर्यमाणस्य रहा “साधन्तभाषणं विदधतो न ते खेदलयोऽपि, सम्प्रति स वार्ताभिरेव ! न जिहें पि? चन्द्रा-मर्षय मित्र मर्षय । शतिः-स कि क्षम्यो भवति यः पातार पितरमामनस्यपहा मातर, विवषयोजनारद पायुः २ अजगर ३मार्गा ४ सूर्य: ५कुटेलः ६हिसः निजला ९ साधुः।

१३६ चन्द्रमहीपतो चित्ताः प्रजाः सहयोगिनो मित्राणि चासूचयित्वा दोनो हीन इस आसां बीवनर नष्ट- यामिनीना कामिनीनां पृष्ठलमोऽशेषवान्धवाज्ञातश्चरणरेणु चुम्बन् त्यचाभिमानः कारी- भवति लक्ष्यीभवति च किनरमुष्टितलानाम् । हन्त हता मनखिता। चन्द्रः-अस्त्यागः तथापि क्षम्योऽहम्। प्रथममेलने किमेवं मण्ड्ये। शक्तिः-अहन्तु सखे, मिलितवान् परं वं न। प्रियापरमप्रेमपानीयागावपायोधी शिखामामन आसी। चन्द्रः-मा स्म पापारावरे पातय शक्ति-त्रपा पराकी स्मृतिपयमायाताा, भाग्यम् । सा तु त्या स्मृत्वा पते । चन्द्रः-अलं, विरमास्माद् शतिः-तहि पश्यैनम्। (अजलीयकं दर्शयति । ) चन्द्रः-पूर्वमेव प्रैक्षि। इदं शक्तिनाथाय विवाहायतौ दत्तवानस्मि । शक्तिः स शचिनाय एव शक्तिधर। चन्दः -आ एवं किल तत् ! विचित्रं रूपं परिवत्तितवानसि, मायाविन् । शकि:-मायान का, एपातु कला। ... "चपले, इय दिनपर्यन्तं क स्थिता? केवल दिनद्वयार्थ गता सप्ताहमेवागमयः।" "महारानी कमला देवी सरोजिनी च विजयताम्। महं देव्याशया पितृसद " मातरय सम्भाव्य यन्ती पित्रानुशासिता यद्विमलपुरमरमाकं प्राचीना । मपिता- महोन कदाचन प्रधानामात्य आसीत्, परं पिशुनेन भ्रमितमतिदेवस्व निवासपन । तत्समृति नन्दनपुरेश्वरस्य छत्रच्छायायामावासः। तव व्यतिरेऽस्माकं सवा सम्पन् रनाऽऽत्मसात्कृता केवलं नगरान्ते एका पाटिकापशिष्टा यस्यां मम मातामहरंशी ग्यवसत् । अयापि तत्र मम वृद्धा मातामही नियसति । रिमामात्रा चरित टा इष्टुकामाऽगमम् । वाटिकैयौं विशाला स्तुि भवन दुर्गतम् । वाटिकाभिनिर्भमा पतिता च गृहमपि ताहगवम्यम् । परितोषकरवट, पशिविष्टा । भह अभेग पर जलानपनाममप ममारुप कू गया जलमारण्य शिरस्यायोग्य प्रत्या सावदेवगत एको मामारिचित योझिमो मस्मिातमतिः प्रयुयानको सप्तमो निःश्वासः १३७ गोवत्सः। अहं नामवं प्रत्यध्यम्' इति वदन्ती सधपादा मृत्यु प्रतीक्षमाणाऽऽसं परमेको युवा देवप्रेरितोऽवाद् व्रजन्नात वचः श्रुत्वा "मा भैषीः, भयमहमागत एवं" इतिकथयन अवादुत्तीर्य वायुगत्या प्रजन् मोधोद्वेगवमद्वायुपूर्णपोणं वत्समनुधावन्नुपेत्य मम वत्सस्य च मध्यमुपतस्थौ। मुद्धो गर्वितच वत्सस्तं वीक्ष्याहन्तुमनाः प्रचलितः। युवकन्तस्य कावादाय पचाश्चकार। पुनः स पशुरुत्याय यूनः शिरसि तथाउज- घान यथा रक्तधारा प्रादुर्भूता। परं युवक उत्थाय एकेन हस्तेन तस्य नासा परेण च जिलामाचा। एतावता च ममानन्दनं श्रुत्वा पुरुषाः समेत्य वत्सं रज्जुभिवबन्धुः। युवा च मूच्छितो भु पस्पर्श। तममुं चतुर्दिनं यावत् संसेव्य प्रसादसमुख ज्ञात्वाऽऽमन्न्य श्रीमती सूरयितु मागतास्मि यदाण्यमासादयितुं मह्यमपि अवसरो देयः।" "यूनोऽयः किंवर्ण आसीत्। मेवा, बराको मूमः पशुः खामिनमोहगवस्थ प्रेक्ष्य प्रकटितानल्पदुःखो वेगेन पावित्त 'को वासः कथ समय भासीत् सी प्रातः सप्तवादनसमयः' निश्चित कथा शतिधरमेवानुसरति । स एव प्रातभ्रमणाय गती न निरत्त स्तस्यैव मेचकोऽवो मन्दुरायामादनसमये रिहपृष्टो निवृत्त 'कोऽय शक्तिधाः 'देवस्य परममि मन्त्रिमारोऽस्माकं विपरिचितः कुमारान्वेषणाय सुचविरक- देशाशचिनाथ 'भाः क्तिनाथ एव शक्किएर हे ईश्वर, सत्यं सत्यस्वरूपस्त्वम् 'देवो नितरामधान्तस्त्वरया सूचय वृत्तम् 'आम् यामि “देवस्य परममित्र शकिपरी मां रक्षन् गोवरसेनाहतो महमध्यास्ते निश्चिन्तो भक्तु, देवः चपलयोतम् --

*
*
*
'योम्यः प्रशस्वस्तेऽभिलापः, नितरां प्रसीदन् युगलय सौक्यांय अमराई
१३८
चन्द्रमहीपतो
'शक्ति स्त्वद्ग्रहमास्ते ? त्वरितमेव प्रधानराजकीयचिकित्सकेन सह गत्वाऽऽनय
"कथय कीदृशी स्थितिः, अकस्मात्तव लोपोऽवस्य प्रत्यावर्तनधारमानखेदस्व ।
दचिणो देवोऽद्य यत्वा कुशलिनं पश्यामि ।
मन्ये शीघ्रमेव खस्यो भविष्यसित
सेवायै कृताभिलाषा चाला चात्रैव स्थास्यति, अहच खो समये द्रश्यामि ।" चन्द्रोऽजोर
'शके। कीदृशी स्थितिः'
'स्वस्थोऽस्मि अद्यैव स्नात्वा शिवं पूजितवानस्मि'
'कथयाम्मै कार्याय को विशेषतः पुरस्कार्य
"एपाऽनिन्द्यसुन्दरी दिव्यदेहा चपला। एषा नकन्दिनं त्यक्ताहारविहार निवाऽनका
मामेवापश्यत् । मूच्छिते मयि भिषग्वरमपृच्छत् ‘भिषग्वर, अयं बोवन पारपित
किम् ? जीवने कृतैः पुण्यकर्मभिर्भगवन्तमेतस्य जोवनाय प्रार्थये'। अहमेनां बहोर
कालाजाने, किन्त्वस्मिन्नासरे एतस्या विलक्षणरमणीय मनोवलोम्तिमानस्मि"
'कथय चपले, किं देयमस्मै उपकाराय'
'देवो मनोऽभिलषितं दास्यति !
"कयमत्र सन्देहा"
"विश्वखोऽप्यात्मा केवलं वाचा सन्देग्धि'
निश्चितं वान्छित ते दास्यामि'
"यथाज्ञापयति देवः" इति कथयन्ती शतिधरायोतरीयप्रान्तं गृहीत्वा शिता
लबावनतमुसी अतिष्टत् ।
'देव, भरोऽप्येक उपहारो देयो नाम, देवःप्रसीदतु
'कृपय कोऽसौ
'देव, सोऽपि परिजनः कुशल कलपति, केवळ कुमुदिनी प्रासप्रेमा देर
प्रतीक्षमामा वर्तत-देवोऽनुमोदयतुं

सप्तमो निःश्वास १३६ 'कथमद्य तव जिह्वा समुदिता 'देवस्य लेहो मा मुखरयति' 'अस्तु' * कथं रे हर्ष कथं रोदिषि, आश्चर्यम् ? 'कुमारपाल कर्थ कुमारस्यैतादृशी अवस्था । 'अपराध मर्पतु देवी, भय सायवाले कुमारः सवयोभिः खमातामहामात्य- कुलालरुचकुलप्रभः स्वसमानविक्रमः कुमारः पूर्वपवनप्रेरिते सुदूर्वकोमले उपवने कीडन कमपि अधिवयस वैश्यशिशुभनाज्ञाकारिणं स्वा चपेटाभिरताडत्। चपेटायात- संकुचितान वैश्यबालेनाभाणि-मधैव दपितोऽसि, दुःशील, नेकटिक इव मातामहगेहे कौलेयकवदन्नमरिस, न ज्ञायते कस्य कुलस्य देशस्य प्रामस्याधीशो दासो वा पिता, कच पत्रो पैतामहिकी सपत्, न था। अत्र दयालुना राज्ञाऽस्मत्सम्पत्या परिपोष्यते परिहारः पिता सधुना मातामहमहिम्नोऽनुभव सुभौगम्, ताडयानपराधिनः शिशून दुचरितश्विर पर। इतो निर्वासितैज्ञास्यते किं कुमारैः कार्यम्, को पानीते काटवीष्पाद्दिण्डमानो युभुक्षितो मर्ता।" इत्युपमित्रं युभुक्षितो मर्ता।" इत्युपमित्रं वज्रकल्यैः ममच्छेदनैः কীদাসিনত: বয়লিলিহিরবিশঙ্কাবিখালেসিঃ ভিৰি ৰা- बचोभिस्तितक्रियमाणोरका सम्पोऽनलोपमो रुवानप्लुताक्षो निशब्दं सदन सुन्धसुवामितो मया विर सान्त्व्यमानोऽप्यशान्तः श्रीमतोमपेतः"- लालगन्या कयायमपि सान्त्वनवनोभिः शोक हापयितुं कथयन्त्यां तन्मातरि सपनर रमाकं देशः, किं कुलं पितुः, पत्र वयं कर्ष नियामः, यदि कपयितु शक्रोसि विशदय नो चेत् पितरमाच्छे।' "मर विलक्षणोपरम तव वचः श्रुत्वा प्रसीदामितमाम, भा, भस्मा राजधानी प्रतिभारत भारते रूपातनामधैर्य, ध्येय सद्गुपपीयूसिभिः राजनगरं नाम शत्रवेना- निगलनामगरमिर नगरम् । तव पिता विश्वस्यन्ते राक्षो भवेन्दुपालाय प्रिया पुरः। एकदा घुणाक्षान्यायेनेतः समायातेन संकारवशान्मम बादो विशाहः । सानन्दमत्र निवसामः। खप्ना अपि नोदेखिनः, पामय तब रोदनमारय ममापि क्षत्रियोचिता विचर: प्रसरन्तिा - . .

१४० चन्द्रमहीपतो "मातरी नाहमत्र तिष्टासामि सामि क्षणम्। लग्नास्पदमेतत् क्षत्रस्य कृते । * * प्रारब्धा। प्रयाणसज्जा शक्तिपरप्रवलसिंहयोः शासत्वे कमलासपेदियो चालाकुमुदिन्योहपस्य च दासीदासगणेन कोशेन च समं सेनामुरक्षितना मम सुनिश्चितमासीत् । जलविहारप्रेमिणश्चन्द्रस्य च बलमागण। किन्तु कमलाहविधि जलविहरणोत्सुकौ वीक्ष्य सह गमनमनुमोदितवान् । "पुत्रि, त्रिनयनाम्बारागविमर्दिभिः धिवकृतैरावतबलैः खरूपसन्त्रास्तिदिग्ग गजैः परिवेष्टिता फेनसितखल्लीनः निभृतोर्ध्वर्णविपुलवणेस्तुरगैः परिवृता ताका म्वरभाखरवसनवर्णाभिदासीभिः सेवितां पटुपटहपहननविगतविषादा यन्ती भवन्दी प्रेक्षमाणो भृशं सुखमनुभवामि"-साश्रुनेत्रेण गद्गदवाचा रामपालेनोस एरमेशस्यो सदैवेदशसौभाग्यशालिनी रक्षेत्। परं मोहमदिरामोहितो वियोग दीक्ष्य भृशनुद्धिमोऽस्मि । दुहितः। हिताधायको वृद्धः पिता न कदापि विस्मर्तव्यः। पारगृहे सदैव गुरुजन कारिणी पितृकुलमुन्नतमापादयः । भनाशासम्पादिन्यो हि दुहितरः स्निादान मयन्ति, चिरायुपं हर्ष प्रेम्णा परिपालये?" जलाविललोचना कमलापि "पितः। सत्वरमेवायास्यामि मवत्पादरक्षणाय - इलामन्त्र्य प्रणनाम सरोजिनी तत्सख्यो हर्षश्च । मतीतजीवनस्मृती भविष्यजीवनयापने च कल्पितानसत्यनचन्द्रो जलपरात भितमालनीलमुल्लोलं ब्रह्मपुत्रम विशत्। सपा विहरणतरणिनिना गमन सूकान शब्दायमाना स्सलन्तीवाचलत् । अन्तली फमला इयन्तं महान्तमनालीकाम जलातिरिक्तवस्तु' वीरभीपकं प्रेश्य दृश्यमुद्विग्नचेता भज्यमानेन भजमानेन सरे अलविलोचनाऽनोयन् :- आर्यपुत्र, आम्यः प्रादुर्भवन्ति, शिपिला मुक्षिः पशूल जपनं समन्तात्कार पोडा मलमूत्रत्यागेच्या म असा प्रपत्र सूचयन्ति, प्राणनाय प्राणा निमियम दुखम्। थाः यम्। अवाप्यता मानम् । नमुय्यते, कयं मयारे सरित्पती यानमारो रायते, क्षार्ग पर्यमापन मुदर निस्तापि,ससेदेव समदेनार्य पार प्रापयामः, भगवान् शिवशिवधि सप्तमो निःश्वासः "भा प्रिय,"--इत्युत्तमा मुभूई कमला। "आर्यपुत्र, वयं कुत्रमा"। "प्रिये, भावत्सलो भगवान् स्वत एव सर्व साधति । एषः प्रासादः केनापि रसिकनात्र प्रदालतायोपरि निर्मापितः सुरादामप्रीपूणों भागते स्वर्गरस समिव । वेवर टिनिमित विशाल भवनं सरप्रायवे । वर्णा मुकुरा समिधुनारदलभासि उम्पल कुहिम निमरपुत्रिका भासन्यः कलाविक कलावता यान्ति" "प्रबल शूलमनुभवामि, इन्त, दे कि विधित्यति"-इति कथयन्ती मुमूर्ट कमला। पदो यथा पलमन्वेष्टु शवलत्तस्य शिः शिलालेखेऽगच्छर, विनाय पलयनिणे सुख प्रदालु सदा नवीनेन नप्रियेण राशा राजदेवेन भानन्दमानमिदं श्रमेण शिरपा प निर्मापित, पाय ममपुमा सिमितः मानागारे अलमपि निर्मलम् इस्पेर पहिला पार्समानागार: खयालमापूर्य प्रस्तमनेन समणि जातशिसोदनम् । सम्भान्तनागत्य दर पर-वियोतिद्वान्तर्मवन धवलवाटी शानापनयनःसोमवशिर रोदिति । कमला प प्रसवरीम्रता, हय मुखे दागुल थितोऽति। रिपुरगुटबन्दोऽरि चिर चिन्तयामम- विलक्षणे पटन विपा। जितारावेनवेन्दः पात्ररकम् । बर इतः अपने मयम्। इन परिचय बचान्द पायो यथ। इन्त, शिलामो विवरण भाई भगवान विपति। स्पान पतरीय छोरलेन मादरला पापी जामिदिरास लोयनादिम्मार मगरेमनाने पर पारवा हम वि. बायः समारमा पनि प्रस्तान मेम्पन् । मसर्मरे भोला। बरगदररहनुभएमावन- भरत बोभा मारणामहनार पाम, भरपत्र परमरपन्। पुरवत्र पसार र दे १४२ चन्द्रमहोपतो आशितकवीनमरण्यमतः सायाहात् पूर्वमेव प्रत्यावर्तनं निश्चितम् । शीघ्रतायै चर माविकान् सहैव नेष्यामि। वराकी कमला किं ब्रवीत, अगाधे पयोराशौ प्रियेष सह वियोगः बालवयमहर भोज्याभावः-सर्व 'युगपद् विचार्य गन्तुमनुमेने। हर्पस्योत्कण्ठिते नेत्रे सवदथ कमलामुख सप्रेम प्रेक्षमाणः "नवशिशुः पर्यवेक्षणीय इति कमला प्रेटर्य यानमारोढुकामः प्रचलन् नाविकानवोचत्-- "यथाशीघ्रचलता" 'देव, विहरणतरणिरवतरणसमये दुरवस्थाऽभूत् व्यपरस्माभिस्तदा नाघ्याय। भगुना सूक्ष्मेक्षिकयाऽवेक्षणेन तस्य स्थितिर्न शोभना प्रतीयते।" नाविकाः प्रत्यवोचन् । 'भगवान् शं विघास्यति सम्भववेगेन चलितव्यम्' छपछपाशब्देन नौचलया। यन्त्रस्यास्वाभाविकः शब्दः, मध्ये मध्येऽवरोधश्च सर्वेषां मनस्सु भयमुदपादयत्। पता- काराः कल्लोला अभित उत्थाय नावमुपायन्, परं नाविकाश्चातुर्येण पन्थानं निमांच सत्वरसत्वरं निर्गन्तुमचेष्टन्त। किन्तु विधरिच्छा विचित्राऽऽसीत् । जीवर्णिपन्या कल्लोलाघातविहता विहरणतरणिः सामुद्रपर्वतेनाहत्य शतघा भिन्ना। दुर्गम्यकाव्यविज्ञानदुःखितानां कृते कृते । यातः सप्तमनिःश्वासः श्रीनिवासस्य शास्त्रिणः॥ इतिश्रीभूदेवमौलिमणिशाणायमानचरणस्य विपत्तिलजस्य श्रीनवरशरायशानिणस्तनूजेन धीनिवासास्त्रिणा कृते रसिकमनः कैखबन्ने चन्द्रमहीपतौ सप्तमो निःश्वासः।

अष्टमो निःश्वास:
धारामाधिपतिविवेकविकलो नूनं रसा नीरसा
घात्याभिः परुपीकता दश दिशश्चण्डातपो दुस्सहः ।
एवं धन्यनि यापकस्य सकले संहारहेतावपि
त्वं सिवामृतेन तोयद ! कुतोऽध्यापिनो पेसा ।।
খিরাঙ্গা
पाटीर ! तय पटीयान् कः परिपाटीमिमामुरीकर्तुम ।
पपिपतामपि नृणां पिष्टोऽपि तनोपि परिमलः पुष्टिम् ।।
पडितराज
रोलम्यैर्न यिलग्यितं विघटितं धूमाकुलाचुले-
मायूगलितं पुरेप रभसात्कारपोरगतम् ।।
एरेनापि गुपहरेन तम्मा दायानलोपप्टयः
सोदः को न विपरमु मुश्चति जनो भूभ्नापि यो लालितः ।।
गुभाषितम्
मनसि पयसि काये पुण्यपीयूपपूर्णा-
खिनुपनमुपकारगिभिः प्रीणयन्तः ।
परगुपरमानून पर्वतीत्य नित्यं
निजनिविसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः॥
मालि
मुन्दरमुनीन्द्रवसति पनुिपाति रो विमुर।
व पधिरेनापि मया मुरवोल्यठे स्मुः।

१४४
चन्द्रमहीपतो
जहोहि गुरु गर्जितं विजाहि गुण्ड्या शीत्कृतं
परिभ्रम शनैर्वनं किमु गजेन्द्र ! गर्यायसे।
तथा न किल केशरी गिरिदरीपु निद्रां त्यजन्
विमूर्छयति जम्भया सुभग ! तावकीनं मनः ।।
सुभाषितम्
शीतम्।
। এর। সিম্বলীদাস্তাগণ ধনিযুকী, নগেনা
कोशोदारमाण्डागारिक, रामुमदरानचनिन्दनन्दनीयः परमात्मा
भाषशाय मार्गशीर्षः। भवः प्रथमो सामः। नरिमननेशि नमन हर।
दुशयन् प्रचुरोगांकावनियातनामपि तनुमा सन, बाबा
प्रवानिपुगैः ममदेवाति रिपुस्तितो विदातरस, तरनतारा :-
भुमार सायन, हाहासास्तिजा , पातिता, शितप्रभावो मन्तिको मार
वाला Rajा लय नविता, मीशीश OE
Inानया, भगधरणा, एयीभूय पीता fal
भासदारया:, नितिनियम, मेघरमोपविता sirit
निमम' अतिमागमः, यन्त्रणमा परि न
traumaarimantritrafine
he

अष्टमो निश्वासः १४५ भगुम विलक्षणाय नमो भगवते कालाय । भायालाया सह रजनी देता। परमाणिः परणो मूहीवनमहारो বলবো ম বরণ যাত্যহিৰাগ্যমণ্ডিত। সে कोमलकोमलः परमयालो पालालोकः पुरेपु नवदमदाटे पतीपसद्धिमाप- मारेए कोउन्मेपासक भारण्भया वितरितकबाट जिन्दारित रामपायाः, मनवातमुण्डा नायनाः साम्पते। पस्य संत- VERSभागः, एशिविरपापितोमवार परागमगिटतामणि- पटना पत्ते। महामहिम भाशालारनाथ चित्रपुराधीशरयाभिनवरतिनिमित मध्य भय भान भाग। पसी भानाप निसिल सामग्री हिमपिता पर नवी सनातविधिमंजा धमेष दिसापिस्तववभाति। मुख्य भुमार art: face परमेश्यामि परसतर। सोनभूभागे राय म nि मधीपत्रमास पना। दो निम्ना नमसा दुगरपीस 'ग्पोमा परिरहनिमुमय wrthaTO मोदी एस्मन् ।रे सपा Ram Tोयमय हत। पुरेसको पिक- KARो मारमा परतावनाAIR. Eyeet at wसमान TET पाएमा RE (T SARTH, हल्दी: RRER.. Free सापmit R : . . : . Prera Teejष समान arreariorit- Terle-RATHI । विदुरो दूषयति, नीवानच्या करोति। अहह। पुरा ये विप्रा विद्यदानलोमेन निष्टीवनमपि न च त एक्य रूप भवति धवलधरले वतुलवतले मिचित्रचित्रे विलक्षणाक्षरे मारवति मानने खातु, रुप्यकोष्मणोष्णीकृतो गौपुरिक प्रासादोन्मुखो भूत्वा एमहिनामा चन्द्रमहीपती पुनण्यातप्यम्। देवदाना सध्याचीया दियोममाहोखिन् कृपयाना बाळ राध्यभागतरपा पारपुनिमिताना खायाना दर्शनस्य ! गच्छ गच्छ, इति । पर सरिताशो दि इशिगुटिकातो हप्पकमेकं नि.सार्य तस्य हस्ते दर - प्रार्थयत् । रुप्यके महती शनिवियते, एतत् कुटिलमपि सरलयति दुर्घन राग्जनयति। अहह ! विलक्षणमिदं स्प्यम्, बगदपत्रेऽव्यर्थलक्ष्यः प्रहारः। यस्य हात लोहमपामेतदलङ्करोति वशंवदस्तस्य संसारः। एतत् पतिव्रताः पातपति, पूजार जारीकरोति, मकान् विषयासजान् विदधाति, हा! हन्त !! पलरूप्यक त्यागः, उपकारः, ब्रह्मचर्यम्, सत्यम्, सर्वाण्येव कयामानावशिष्टानि धगति त्वय्येव लीनानि। पत। विप्राणां विश्वविएक स्त्यागो हन्त दुर्वर्ण! त्वयि त्वया दा को जानते व विलीनः । पस्य शात चर्चाप्यधुना साश्चर्यमीक्ष्यते। काकिण्याः भग्नकपर्दस्य लाभलोभेन निष्ठीवनमपि परिशोधयेयुः। हा! कारण लक्षण्य फलेः। या नार्यः पूर्व जगतो मूल्येनापि सातस्य खधिक मूल्य स्ता एवाद्य हन्त ! परगृहमटन्त्य एतस्य बिन्दुवर्तलस्य लोभेन किमिव न कुर्वन्त ति... यश्चित्पुरुष सम्बोध्य "अयं महाराजान् दिदाते' इत्यत । स च ', लित पृष्ट्वाऽऽयामि" इत्युक्त्वाऽन्तर्गतः क्षग्न प्रतिनिकृत्य "आम्, एहि" इत्याह । ततः समीक्षितावयवो' बहुमूत्यरमादिकं विनाऽप्राप्तान्यसम्भारः शायो 'मल्लादल्यवारणावार्यनिशितसितमल्लशतविपटिवेन, स्थूलतरण्यसपत्रपुष्टेन, लोहर सललमपित्तलवतु लोन्नतपत्रिकाप्रथितदाव्यसौन्दग, घनाघोषवधिरितजनया महर उलयालकृतेन फवाटयुग्मेन समुद्भासित द्वार प्रविश्य राजविभूती पश्चगाम । १ तलाशी लिया हुआ। २ मलदलिनुमशक्यम् ।

१४७ अष्टमो निःश्वासः द्वारमिदं मारकतहपन्निवद्धकुट्टिमं बहुभिर्भवनैविभासमान विकासते। भजिरे च रमणीया पुष्पवाटिका, तदुत्तरतोऽवलोक्यते राजभवनम् । पुष्पवाटिका न विशाला, पर तिर्दगिष्टकारचितवीथिभिः, पक्षिमिथुनाङ्कितमारकतालवाल लगविटपपरिमः, विचित्र- ईमः, द्विकद्विरैफमयूरसन्नादितश्व माघवनी वनावनोमत्यशेत । पुष्पादिकाया उत्तरतो द्वितीयं द्वारं विपुललोहं विशाल शालोन्नतश्च । अन कचन हैषाध्वनिमहितजना वादिनः, बचन निमीलिवेक्षणा मत्ता भ्रमन्मधुलिहः करिणः, चन चकोर की गिरा विधर्णितेक्षणा हरिणाः शोभन्ते । तृतीयद्वारकपाटयुगल वर्णपणे मणिगणेन रचितलतापुरुषस्तवः लावण्यपयनैपुण्यमा- दधत् शिल्पिना प्रमाणपत्रमिवावभासते । उभयतः सुविटपानी परिमलभाजा- पुष्पाणा परिमलमतिनिहारिक प्राणतर्पणं धमेभ्यो विभजन् भगवान्पत्रमानो विदलितोद्यानविटपः प्रखरयोऽपि कदलीपर्णपुष्करकर्णखण्डितवेगरच्युतलक्ष्यो थोद्धव मन्दं याति। क्षय वेश्या कौशेयजनित्य हम्यस्यान्तः प्रविश्यापश्यद् यत् , मुकुरीदलायो पलक्षणभित्ती रम्याणि चित्राणि पुण्यश्लोकानां सर्वादीनि सर्वनामानि चाहिवानि धन्ति । मध्ये च परितो जाम्बूनदासन्दीद्विगुणितसुषमाया, सदुपलसम्पादितायामुन्यासित- तूलिकामहोपबई परिस्कृतायामेस्तो पोशातकुम्मानिमितेऽक्षिलमोदधिसारखंड्ये, मारक्त- ब, मोलकौशेयाला कुत्तपृष्ठे, जातरूपातपत्रे मयूरासने समुपविशे गुह इव, उपहार- दानतराजन्यमारोपगूढः, गूढपत्रुरशः, अनारतधराधरपतिपुत्रीसेवितः शिव इव, प्रो धादिलसरस्वतीक, राम इव दुःखितदुखहारी, अर्जुन इव भारतप्रसिद्धा, राधेय इव दानादीनः, भीम स ममचारी धनुविद्या वित्तः, रचितन्न्यासो वरदविः, बारपरिः, दत्यारिः धीयो विष्णूदयो होतकार, सुग्रीवा, साहदो हनुमान, सहमविरलकचौऽपि परिमलयपरपदबहुलितकेशः समुज्वलायतमस्तको दीर्पसुन्दाघ्रः गोपुरकबाटोर:- स्पलो राजा राजते। कथनोपवीणयति धनोपरलोभ्यति धन दूरस्थायी सामन्तः साचलगन्ध प्रसमक्षपराधभिक्षा भिक्षते, स्थन दुःखहालज्वलितचेताः क निवेदयते । श्रम --

वपुःपरिमलमोहिवमुनिजना सुरभिनिधासा नियमानीतवानस्मि। सकलदेशतिर
ज्योतिःशास्त्रानुसार परीक्षितुमनुशिष्या परीक्षिता। महता भ्रमेण अनुनयविनयेन
स्वहस्तमदर्शयन्न मुसम्। सा सत्य त्रिभुवनपट्टमहिपीत्वानुरूपा कमिमा दया मागे
१४८
चन्द्रमहीपतो
रामायतमो रिरचोदीमराया बाशुसान्दमा नरेन रित्रिदुइत्यन्त
भूमिशि, महाराय मलवेटामाकलव्य महलक्षदेनैव निरिन्दा
महाराज्यायोरेग्मभूदालापः।
राजा मानन्दितोऽसि धेष्टिन् ।
पैश्यः । (सजातिप्रमावेश विभ्यत् ) भाम् जगाक। को नाम करू
भवति भवदाज्ये च कोऽयुत्पातः।
गता दूरधीराः। महद्भनं यस्मदर
पलायितम्। चिरजोवतु श्रीमान् चिरमानु।
राजा । कोऽपि हेतुरस्ति रिमागमने ।
वैश्यः । देव! देवादानां दर्शनाते को नाम मुख्यो हेतुः सन्मद
वन्यपाद! वयं वणिशो देशाद्देशमटन्तः सुन्दरमुन्दापि विचित्राणि वस्तून्यक्लोपन
देवपादानों दयया लभामहेऽपि ।
गतयात्रायामहं काश्मीरदेवामयासिपम्, हर
माना साऽशेषभुवनभालायमानो भवानतोऽहं समवेतसौन्दर्या दामीत्वेनोपनिहायने
सका कामाम
राजा। वहयोऽत्र दास्यः, नास्ति प्रयोजनम् ।
वैश्यः । परं देव, महता कष्टे नानीता तो श्रीमचरणसरोजाजः सैदिनी ।
नितान्तमुत्मुकोऽहम् ।
राजा। अस्तु, प्रेष्या।
"देव, देवीमह तो वक्ष्ये, सा श्योपड़ता 'काश्मीरीये ति कृतनाममा दसी र
इत्येव विचारः। एका सत्योयसी रेसा तस्याः साम्राज्य विदूरपति, मन्ये द्विश्रेरणा इना
दशामनुभवति । एषावश्य भगवतीखरूपा न कदाप्यवमान्या मान्या च पट्टमहिषीत ।
"किं कथयसि ज्योतिविद्
"सत्य देव"!
*

अष्टमो निःश्वासः १४६ "सता किं भवति" "देव, विलक्षणोऽयं विधिः, प्रातघ्रमता मयाय द्वौ गोपघालावपि तेजोमय मुखी श्रीक्ष्य सयोई सो विलोकिती। उमावेव राज्याविास्ताम् । निर्वाधराजसदानी तयो रेसा। अहं तयोः स्थितिज्ञानायाहोरानं तवपश्यम्। दुविनीतो विचिनोऽयं काला, विचित्रशास्य महिमा। यस्य आत्मनः प्रतिमूर्तय इव मन्त्रिसामन्त- मान्यधनिबंधावतंसा समलकुल दलनिलयनिर्गता मणय शाणोदीदाः स्वर्णस्यूतवाससः सुगन्धिगौरशरीस शोभालाः कृष्णवाला बालाः सदाया पुचिता- स्तस्यैव शिहाणपूर्णपोणाः स्वपल्लाला पिकादपितवीक्षणाः प्रकामं पुद्धिकिरन्तः सविप्रहा एक काला नमा बालाः सहवरा आसन् । यस्यालकेषु प्रयनसिद्ध परिमलातुले ব, সুখস্মাই বাবশিলমালম্বীৰিৰ বৰ্মৰ প্ৰলিবিমুল- प्रमस्य पेरोरिव एडकामूमिश्रिता धूलिर्धारणाय। प्रतिदिनधावननिघुष्टोतरच्छदे प्रतिदिन सौलितन्यमानतूले मृदुलमृगरोमास्तरमे दीतलविद्युदपजनवी जिते सौवणे कौशेयतन्ती परिमुगन्धी मशयनोचितो हलफालविषमेषु प्रचण्डारतप्तेषु स्थलेशुमान माहूतोऽपि न जागति स्म। यस्य मुमधुरं सामोद शरदाय भोग्यमुचितं दस यवागू पयरामायमानम्, तदपि कदाचिदपा पदाविश्यम् । कादमीरनारामतपलदादिमीका- शिवायनीफलौषितस्य करवाने दुधापम् । मापदन सोपपनै प्रमगोरितोऽजागोष्ट- निपुटसेवी। पात्रीभिर्मातापितृभ्याध सप्रेमाभ्यनोचितो भोजनाय रोदिति हम, दिलपति स्म। कुलगणिकाचाम्पेयनागकेशरवनुलमध्नुलजलेन नानोचितोऽय देबिन्दुषित- तमुहासे । रमा परिणता यूवालयः फेशा सनीशता समपन्ति । फर्णयोः पोपमा भरणा पिका, हारोचिंद गले मलरेसा, तनौ दोर्गन्ध्यम्, करयोरपाटनम् कमलकोमलयोः पाइयो विवादिका, परीरे कम्, मत्यो मान्यम्, प्रतिभायपत्रमालमन्दरह- मन्यतमम् । दुर्गा देव. दिवाननि मनपराजिनि शिशी, विलक्षणोऽतिर अघटन- पटापटनपटोय! छोममा देव, मयारोऽवरी से यदेशीरसीमेवाररेखा परसामि। मम मदिवा प्रदायात्राणि विपरीतानि नापिनोनि।' - - -- धनतिमिरं मातु पिपिप्पा मारवो क्षत्रियसेनेव प्रादी सदापन्

"देव।
दिया तर
गतमासे मृतो गावो महिष्यश्च महामार्या मृतास्तदा वराहाणामाम
"देव शनारमभ्य कार्य सत्येव नहि। भावा म्यभन चालयितु,
साक्नुः परं नास्माइशेतु कधन दयते, दरिद्राण दर्शनमेव परिहातिर
अधुनतयोः मुदिनानि धमितानि। पावन सदा येतयोः प्रेम भूल्य।
दवसायो दयते। सरप्याशियम्भोगले तान्या प्रयराना हो
खभावो मुधिविधता परततातो बामणा विनयेन मशवान mer
बरमौ नियम महायागारेश्वरमा बाद मया
चन्द्रमहीपतो
विक्षिपन्ती धनधान्तमध्वंसयत् । पराजिता रात्रिर्मुसमन्तधौ। प्रातर
पुरयोषितां मन्द्रगम्भीरो दृषवनिर्मादकता प्रसारयामास। प्रकृतिनवरेम
पुनर्जहास। पकुलवनस्य मुकुलानि विचम्सुः ।
प्रगेतनं पवमनं सेवितु सदधमारूढो याति चित्रपुरेश्वरः। मागें कावपि मुग्धौ ।
पापाटवौ कोमलकमनीयतनू मलिन नुसौ शीर्ण-वनी बालौ दृष्ट्वा स ज्योतिर्षि
स्मृत्वा सस्पृहः सप्रेमावोचत् "बालौ। कस्य तनयौ स्था"!
कृष्णगोपमुतौ खः।" प्राम्यशिशुमुलभया
ज्येष्ठोऽभूत।
"अपिशिक्षितौ किश्चित् ।
"नहि दैव! अध्यापको रुप्यकं याचते, अस्माकगुदरदयेव न पूर्वते, पण
पटनप्रबन्धः "आवामभत्या गावारयावा"।
"अपि कार्य कर्त' शक्नुया?"
यदि दया भदेसरामामरि दुःखोदन्वतः पार मभेवहि ।
राजा नु विदस्य दुर्गे व्यसनचालन कार्याय आदिस्य नाम ।
मत्या व मान रशंदयामामुः। मावानerent
समये समाप्मनादन
भ, संय, रवा, नम, बाबर की।
पुग:
स्माई बाप्पा मार
Frautari with

अष्टमो निश्वासः १५१ मध्ये मध्ये राज्ञी मुर्ख निपुर्ण निरीक्ष्य किमवि विचारयन्ती पुनः ख कर्म सावधानमा चरन्ति। बहिस्थिती चालौ च राजमयेन शिशुस्वभावारनैः शनैरालमन्तौ मुहता सत्रणान्तर्यजनं चालयन्ती स्थिती स्तः। यद्यपि शिरोगृह परितोद्वार तदपि कन्या अपि दिशोऽध भगवान् समीरों ने सरति। दूरस्थयोर्वालयोरप्याला काश्मीरीया ध्यानेन भणोति। कनिष्ठः-प्रातः कामपि गीतिमालप रे। ज्येष्ठ नाहं जनामि। कनिष्टः-केशवस्तु बहु जानाति । ज्ये:-तेन किमस्माकम् । आवान्तु न जानीवहे । कनिष्ठः-तहि किश्चिदन्यदालप। अन्यथा तन्दा शिथिलयति, उमा ग्लपयति । ज्येष्ठः-यदि आग्रहस्तहि भणु- अय मया एक पधे रचितं. गुरवे श्रावयिष्यामि त्वमेव पूर्वणु- क राजास्ते पन्द्रोऽस्तमिवरिपुन्दो नरपरः कहो बालोऽस्ति कनु जलधिजातो नवशिशुः । व माता मान्या नावहह ! कमला धर्मविमला करालोऽकाले हा! किमिव विदधे कालवधिकः ।। बालस्तु धवणमानप्रसन्नो ननमोलः शुचिर्वभूव । परन्तु सामोरीया बीजयन्ती मधुरमधुर स्फुटाक्षर सुगम्याथै लोकमिम भूचा किमपि स्मारितेव निशितरिकया हदि विदारितेव सन्तापतान्यगि मुमोच । तानि च तस्या विवादमादेन नरेन्द्र- मसके निपेतुः। अयोगोलस्तापाता वि मृशोर मिननि गोत्थितेन राशा पृथ्म- "कभं रोदिषि! काश्मीरीये, विशदय, अई ते दु:सारणमचिरं जिज्ञासे"। का-देव! भवति शास्तरि कोत्र दुःखलमोऽपि। कि तमस्खोमहन्तरि भगवति सवितरि समुदिते सम्भाव्यते तमोलेशोऽपि । रा-सत्य कथय क्यं रोदिय! अभय वेदशामि।

समुद्र स्थिता वीर्णाऽसीत्, अवतरणसमय एव विदुमपर्वताहता दुसरा नमन किचिद्दरं गता समुपदेन पट्टिता, मत्पतिय पर्वतोचतों विलीनः। अमर शिरस्फोरः सान्त्वयन्ती "नानि शहनीय"मिति मनस्व दीयमस्वर ११२ चन्द्रमहीपतो का.-महाराज! रिमाम्हेप, किन्नु ययामि, नितरां दुनिन्दस्मि । रातिभिर्दुःसवातभिः उदय माद दर्य विशेदमि। न चर्चि' शान्त र दुःसत्यमारोपस्नुि मुत्सहे, अलमधुना फटुरन्तं श्रुत्ता। मा नान प्रडीश्नल के क्षयन्नास्वपन्नु। उदितविज्ञसस्टेनोत्तरेप बहुशः काश्मीरोयावृत्तम कृतमुकलाश्च सय पर्यट्य पानीयं निपीय बहिश्यत्वरे असन्दीमावृत्योपविटो इत्तं श्रेतुं सजोऽम- सा च कथमप्पवरदवाष्पा पृचिया समुपविश्स प्रवक्तुं प्रारभत- वनपाल ! ययत्यन्तं कुतूहलं यदि च मन्दभाग्यापा दुई दुःखई जून में तदा मृणोतु- वर्तते प्रततप्रतापारीक सादितशमुशहरीका,' इनपुटयोधममरीक सिट पुरेश्वरो रामपालो नाम, दिलक्षणस्याटेर्यस्याहं मन्दभागा तनया... राजा--( साश्चर्यम् ) तत्र भवतो विमलपुरेशस्य पुत्री.. ! कादमो । आम् देव। राजा-आम्, ततः त्वरख। फा--ततो देव, श्रीमनरेन्दत्रातमालायमानस्य नवेन्दुपालस्य पुत्रो विश्वयन परिणीय प्रसूतपुत्रा धरल्यमानयत् । दलमार्गे ममाभूदेकोऽपरः पुत्रः। सहर्ग नासीत् । जीवनायावश्यक वस्तुजातमानेतु मत्पतिनावमारोह। तरः कर पश्वारेज दिलोकयन्ती भारहितानिष्टा न्यपतं सर्वसहायमसहाया। रुदतो हर्षस्य पारिजस्य चाकोशेन कपडयमी नमूच्छां हर्ष बभि की - पोराछौ भोजनमानेतु गतं पति प्रतीक्षमाणा सर्व दिन व्यत्ययाश्यम् । पारेपदिननिरन्तरयात्रापरिधान्ते रसमिते बिसिसौ पशिशिमलति मगर १ अर्वाच-अशोके । १ सूर्यः। ३RY Y शरीरम् (भोपादि

.ग.पा.
एका बलमलिया
पहपदीपिती रत्वरित शान्तयन्ती सयमपि भुक्षिता तृषिता जलमन्वेषयन्ती
टेसनमा पलागारं प्राप्य पानीयं रिपीयोगवारिजादाशम् ।
चन्द्रित विरसिताऽऽसीत् । पदाने प्रौधा भित्तिः।
पादपतपणाय मिरवस्तातामायति। पक्षाः फलाः सपुष्पाश्चान्। बुभुक्षितो
शर्मनीमावर्षयन् मामदुरायन्। बालविलापमाफय सानैया परोधानप्रवेश
शरितानि किमरियम्। पत्रपुषफलानामविशौयनेन मत र परिहरन्ती फटिनि
पला रसालानि मायाणि दाहिमानि च पित्वा धौलपत्रपुरे संस्थाप्य रामय
মীমালং প্রমু। হয় ব্যাধি ক্যান ইনামুল হাব।
मदीय दशा विटाणाऽऽसीन् । भारगमन प्रवीशमाणा, नौकाविघटनेनानिष्ट
मारामाला प्रसव वेदनाभिभूतानुकाले सिमालमे।
शाम्तो नि:पसमयः, रातः धान् द्राविधान्दिा मा प्रा। प्रतक
पतनिरिमरिष्माईनाले।
बुगुरप्येका प्रपा शिामी दुखेऽपि सिन लाकरोति ।
SPA प्रतिदिनभ्यसा पलापहरणमुखमने। शो माम तुरयन स्पतीत्याय।
परमामा मान्ती पसायदन्ती मवन प समय सामन्ती भवति।
र हरिन्दे शाल गोयरतो हारगुल्मका बासीन्दयन्ती पर.
पूEिTE समनुमाम्। मामगो निकेतनस्य पाएर
पता भासन। मरद हो सलतू ज दी। बहरा
पन्ती मोका पालामयम् . भादग्दो फिरी.Cred!
RETRA, मग मरम्"।
मानुष मारेषमान्तादियां
एमा Fri भारत भूमपमम् औषरभारी
परम्”-दिनसम्!
Arrशमाने।
Ras RTI RE Fe: पर।

१५४
चन्द्रमहोपतो
विवरमिव जिगमिथुरकूपारतलं दिनुचलाभवन्नौः।
লাৰ সঘন=
पापपुअश्व। उभयतः कल्लोलापातथासदेव मुहरसमः। वायुना म्लपित
शुभाशया सद्देव भग्ना नौः। एकस्मिन् शकले हर्षवारिजौ पस्मिन् कुमार
भय। शेषं मृत्यभाण्डादिक यादसा पत्या साईकृत्वा साधिवेभ्यो गोम् ।
मजता जनानां भीषगं चीत्कारमार्य बलधिहास। पलतानविरमा
मानौ विहलो शरिजौ विलोक्य द्विहस्तमितालसहायाह घिरसला गर्व
मालिङ्गितवती । अर्यस्यास्य विशिप भगोऽभन्मे मूरविंशः। एष मा नगदी
टिकायामरक्षत् । उत्तमा प्रसाधनसामयी, अनुराः प्रति मा माय
संसा दिवसकः सप्रयत्ना दास्यो ममाने प्रस्तुता भायन, भत्तम भोग्यय ।
उदा राम्रो पक्षचन्द्र चाचशे प्रसाधितवेशः परिमलालकः सार: पाrte
पितर विद भगिनी मत्या नीतायां मयि पतिप्रतायां पाजललानागुनमा त
प्रोनमैरछन् । पर मया, "नीच ! कदर्य । वितयातिशा नाई गमिथा,
कुलीना क्षत्रियारिम, तमा, यदि मामन ययशि येमियता ते मदिरा
न्युक्तः परमभीरुभुशितायाः सिमा र नोभाया मम चोमिता मा
पिन, सभावयतुर, प्रटेनापि कार्यण मतो धनमान
भराम देवयत् ।
मिन् दिने भयमनचालयोनायोरात काश्मिता
মtr Fলখালী মৰ আঁৰ হৰিৰ গৰু ধাৰণয়ণ ম
मबिमित विर्य मानी, पामगुना पाया arger
पैरवी मानव सप्र में सात गोमा सरोद मह TRENA
मान दिया अनपया दुभगाया में पुषमम
मी मम्। रन्, itter : PEOPLE
पटगः बदर द Tajarrian
at किसान, इस
Mer मा artiy
पना rent Remixsi
Fur, THERE ARE Eartaram

अष्टमो निःश्वास थो राशमशाद भ्रमन्नावकाशमलभत यह भाविनश्चक्रवत्तिन विदुरणीयवाणयो बचतवनयादीपा दशा ? विचिकित्सते शास्त्रषु मामक मनः। हन्त ! किमिदम् ? राजा हन्त किन्नाम भ व त्याः काश्मीरोया. देव। कमला। राजा तु सत्वरमुत्थाय विगलदः सर्वदाऽवगुण्ठननिलीनं धरादशि तस्या मुख मटित्युपाट्य निपुर्ण निरीक्ष्य कराभ्यां दृढ बदवा मृशमरोदीत्। कमला तु महाराजस्यापूलिङ्गनधुरता विलोक्य निविण्णा विविक्षुरपि वकुमसमर्था सम्भ्रान्ता विस्फारिताभ्यो नेत्राभ्यां कमपि प्रचुरं दृष्टचरमिव पश्यन्ती कथमपि विपुलेन बलेन पराभ्यां मुका विवेकविकला एकतः स्थिता । राधा तु बिलः पादयोरानतः "प्रिये ! यं त्वं न मन्यसे, यश्च वमनार्थी पारो राशावजहात्, यस्य कृते त्वं पराकीव सेवितमतिका भ्रमसि, यश्च श्रीलधीनवेन्दु नयनानन्दनोऽभ्यनानन्दनः सोऽसावभाग्यो भाग्यशाली घ भर्ता तव चन्द्रः।" कमला उ पुननिपुर्ण निरीक्ष्य मुखचन्द चन्द्ररय हा! प्राणे" इति कथन- साई करमलमुपगता पतिता च मालती लव चन्द्रा। विलक्षणो मनोहारी परममधुरः सहृदयहृदयसवेद्यामदानन्दायैष समागमः। नाटकीयथलनी पदनिकापातो जातः। क्षक महदन्तरं जातम्, शतशो दास्यो विविधोपचारमछमनिन्युः। धनीकृताकाशशोभासोमा' कमलासग्मानाय विश्णुपद विदलयामामुः। 'न्यून, ऊन, एहि एहि। रात्रौ लपवे धावितं पर पुनः श्रावय, परममधुरमासीत् ।' न्यूनः-ययाशापयति देवः। (भावयति ) राश-यात्मजी युवम्। न्यूनः-(प्रिम्य ) गत्पालाप छत्रछाया श्रीमत्तेजप्रभावशताःसो गोधनओवी कृष्णनामा गोपाल असोत् । पुरा सीमसामन्त वीरचक्रधर" स्मनगरे पसनासीत पर दुपालनहानामिविपुलेन राइकरेप च मृशं पौडितो देवराम १ महिसासम्) १५६ चन्द्रमहीपती विविधमाल विज्ञाय मन मातामहसदनमायातो देवश्यया सम्यकृताजीवनः मुख न्यान्न् । स ऐपमः श्वसनकपीड़ितो देहं जही, तस्यैवावा तनयौ रवः। "हर्प, किन्तं कृष्णस्य पुत्रोऽसि, अपि स्मरसि परिचिनोपि माम् ! किं बलनिवेतन विस्मृतवानसि ?'-दर्पस्नेहदुःसविगलदास्नाताननया कमलयोचे । न्यूनः-- खन्ध इव आश्चर्यचकित इव कमलामुखं निनिमेषनयनो विलोक्य तद्वचनरीतिश्च परिचीय ) "आः मात?" इत्युक्त्वा साध र्गलमालिलिङ्ग । उत्तापतातमरौ पीयूष्वपिणः प्रावृषेण्या वारिदा वमुर्धा स्वर्गयाम मुः, ऊपर आरामटी भेजे। स्थली रसिकानां मनोमुदे क्रीडास्थली जाता। कृष्णगोपालस्य पत्नी ससम्मानमाहूता पृथा चाब्रवीत्- "एकदा मध्याहे वृद्धो मामुपेत्याह । 'प्रिये नावयोः सन्ततिः, वृद्धोऽहं तमपि च, वार्द्धके आवयोः सेवाये परमकारणिकेन भगवता प्रेषिताविमौ विधिविषाकदारुणवेदसा विपन्नौ रोदनवन्धकण्ठौ जलसम्पर्कवणी प्रवाहोहमानदारशकलसहायौ यथापना सुकोमले तटे समानीतौ कम्बलान्तकृत्वा घृतं विलिप्य त्वदन्तिकमानीती पलय देवदत्तौ" इति। खभाववशाहमवोचम् “समाप्तसप्तमीक, युद्धिस्ते भ्रथा, प्रतिदिन कमपि समानपटि, अद्य मृताम्बो वत्सः, अद्य वाऽय गर्दमः, मन्ये खमेव धात्रा निराश्रितानामेम्मात्रमाय स्टः। *ण, एकदाई युवतिरासं, त्वदानापालने दृष्टानुभवो नासीत परमधुनाई दमा खस्यैव जीवनाय आवश्यकत्येऽपि सालस्य वपुरेतेषां निराश्रिताना सेवाय नालम् । क्षमस अचाहं तवान्तिमामाज्ञा पालयिष्यामि परं नान्यदाहमाज्ञाप्या"-इति । ">rगु, वृद्ध। एतौ मानवजातीयौ देवदत्तो वालको, एतादृशाक्यवानीतवानमि इमीग्रेम्गा परिपालय।" गृहे देव, गर्वा महिपीगाध समूह भागीत्। थप्पाटकं घृतं प्रतिदिन भवति स्म । दुग्धाय दम्नश्च घटाः पूर्वन्ते रम। धानोऽपि पयम्नृप्ता बासन् । गृहे फेवलमाया दम्पती आस । भइमेतावेकरयों कोमलायर्या शय्यायां शाययित्वा नवनीतं विलय पर्यचाम् । अगसमयन म्यपगतवेदनौ rat रानी। यूर नशेति। प्रारोवायपाननी, मानीवाशारागानदेही मुबायरी भकामेठयोनीमाया अष्टमो निःश्वासः दौ सवेणीको अभूतामेती। वृद्धतयोविवाहादि इतु पयो विकेतु पालनधारब्धम्। किन्तु देव, पद्धोऽवृताभिलाष एवं मृतः। सनकेन स प्रामे कश्चन वैद्यो नासीत् । परग्रामत एको दाकरः पञ्चाशन्मुद्रा गतः परं सोऽल्पजस्तस्य जीवन रक्षितु न शशाक। तस्थान्तिमेच्छा एतयो शासीत् । ना देव, एती मम जीवनस्य स्तम्भौ भक्ता दयया मृत्यौ नियोजिती। कृते कन्ये मयावलोकिते, मुद्राक्ष सुमिता शीतकाले एतयोविवाहं विधाय पादयिष्यामि देवस्य कृपया। यद्यपि नैती विवाहयोग्यौ, पामहं वृद्धा न जाने रदेह त्यजेयम्, अतो विवाहे विधाय निचिन्ता बुभूमि ।" :नितरी प्रसीदामि"-दखाभ्यामुत्थाप्य सिंहासनमारोहयता राज्ञोचे "समय- जीवन हर्य एव स्थास्यसि राजमातेव सम्मानवती, एतौ च तव पुत्रौ सस्य जानी" इति। रमाउग्नयनयोग्यावास्ताम् । एडसे सम्परः संस्कारः। भविष्यद्भाषी पि प्रमशत प्रापत् । प्रत्यमसाममा स्नपिती भासदाससौ स्वर्णकौशासि- जन्मध्यौ मुरभिशरोसे विविधशिक्षक शिक्ष्यमाणो मनोयोगेनाध्येतु प्रवृत्तौ तौ । মােঃ । নিয়নুষ্ঠানিমালবন সংরীলাঃ ঘরাম- ব্র মাহিৰাৰ যি সকশনালগবিহাছিবা ইলমুন্সী वहारा भालस्यमभ्यस्यन्ति। पथिका न तथा पधि पाथेय पाथः पथ्ये ।। मासेमन्दास्ति पायपूरपस्तिसम्बरपरच्याश्यामलं विपन्, न च निरिभावको बालभौविस्तारको विश्पू, न च स्वचाडचश्यवमतिदयेन अमरकरियो पीताम्बरस्य भगवतो नीलपुरोऽनुनी, महान्धकारेऽपि प्रपर प्रविधी, जलपराजमहिनी अमटा टा। कविकामिनीव सा ना दोना विभवभाइहे अगते स्वमुखं सुखं दायितुन नोटीव । परदर्शनोन्मतमनसा मेघनादागुलामिना भारदस्टललामलगललिप्रतिमून तितमेव । प्रकुलरसालमगहीदमानमा स्कोलिना परमगं

१५८
चन्द्रमहोपतो
स्तमपि पितम्। टिजलभरिष्यमाणालबालानां पासना शासिता मनोहारको भूगर
उदनविकाशोऽपि निराशः।
सितिले, विलोपममुरो से प्रशयमानरजसि प्रदेशेऽन्ताऽप मुहान विपन
पचलन् किमु हानपि विशोप्योसाटयन, शातिशासा मारायन्, समानी बी.
धूच्यापारेग पोतन अभिभानीयाभ:स्तिमालालानिधि, सहन नमा
मलमिर गिरीराश्य, हास्यमित प्रकृतेः, यश इस सीना, प्रभवस्थानमा मुना
गुभासिनमा भानमपि मलिनपन् प्रयत्युत्पताः। मनुतन् माना गरेर
नव प्रमया विविधिमालपरेपरेषु रागः। तेयद्याघ्रता पाटो प्रया।
परमन्द चित्रपुराधीशः पुमानीसमेत नित मुगी मचे बयानोऽनि।
fromयोऽयं मगवान् बालः। एतस्मिन् काल
एन ।
एक: समय , चन्द्रस्य कमला हप कारमय य पादशागत,
मातरमीनारमा तन्नेशने म। जगत् मुझे प्यागनमा, पe.
योनि वरिपतनुपातला प्रमानु, सिमितरेण प्रयोजनम्। पामर
म मदिरामाधारमः सला।
महामप्यते। एसपने धतगी पश्यः स
दिने। नती मागम हो ममन्तपुर पामेजने । हेनुरी
सिनेविन्यनेयमत
भATratलकर शिः प्रामन गुणगुमना करने
मम मम शामीकामनाया। या
part Trtneral
करने, दाश मान मरियम मन, मा
Karawint fen therefrirat
सरनं करा,
rear,
Foए मान सनr, irret REN
दरहेका Krtaent FREE
साय पतिसमेंट

अष्टमो निःश्वासः १५६ घटिता सप्तकी, नखेषु मुखरमास खर्णकिहिणीशताल शुल्फालहरणम् ; शाय- पचालिटजधनदण्ड चण्डातक' करे पासित्तपटइतेऽधिको विमेधयन्तेऽस्था। परमप्रेमपारा, सतीशलारभूता कमला वीजयति। प्रचुरानुकम्पाचपाच पादौ संवादयति । एकरयो शुभासन्धामुपविष्टया व्यजने व्याप्रियमाणया कमलया भवत्लालापश्चन्द्राय च। कमला-देव, तदपि कथनीयम्। चन्द्र:-अये, किमिव कथयामि, महानसौवृत्तान्तः, शोकाकरच । कमला -भाइवेब जिज्ञासे श्रीमन् , यावन श्रोष्यामि तारान्ति च्यामि । चम्पापि शमुवा- चन्द-यूयता यदि पुतूहलम् , प्रवालपर्वतइदि भक्त्या पियुनोऽहं... कमला- मध्य एव )नाथ को नामायं प्रवालपर्वतः। चन्द्र-मुग्धे। जलजन्तवः प्रवालकोटाः खावासाय जालमयं गई विरश्यन्ति, तदेव वर्द्धमानं कालान्तरेण पर्वतरूपतामुपैति, तत्रैव हयं निर्मितमासीत्। प्रवाल- पर्वतान्त पातित्वेनैव तत्रत्यं जलं मधुरं निर्मल उत्सानिध्यादेव ताण समित्यशासीत् , परन्तु प्रसकेन प्रभावो दौतित शासीत् । सस्तु, भवत्या साहसी निकटवर्तिनी नगरादशमूलीयौषधीः बलातैले गम्यमाज्यं यवानीमोदकान् पूगपाकव्यानेतुकामः प्राचलम् , परन्तु मम नौर्भग्ना। विभिन्नफलकेपु जीवनरक्षाव्यापूतानां तत्प्रयोजको हेतुश्च विधिरेवासीत् । पयोधिषय शेत्यशीतले कमलामलकमाचितनमखस्क्रियमाणध्यजने कोमलसीमृदुले सिकतिले व्यपगतमुच्छोऽपि नितान्त शिथिलः शीतवातवी जितस्तन्द्रा- विका निशमलभे। परं तवोपालम्भप्रचुरःखप्रपेनिस्त्वा हाधिकृत्य दलरम् । हन्त, प्रचण्डचण्डबरकरनिकरमरी मालती पादमार मारयिष्यते। हो, एतदेव विघटयितु सयैतदावरितम् ! विदूरवासिन्यामज्ञातायां प्रेम .. मृत्युमुतेवात्मानं निपात्य यामानीतवान् हन्त, सैव वामामचत्रिका असहाया विपत्स्यते । ममपेक्षमाणा ताईन्या हर्ष वहन्ती उत्सोन च बारिज बहिर्गतागत पूर्वती मामनागरहन्तं वीक्ष्य वियोगविधुरा गर्न बाधों पतिता कश्यापि तिमः कवलीभता। झझावात 1 प्रपातय! समुन्धो! आत्मसाकुरु मकरा कराभ्यां गृहीत , "ईगा मापायाम्। वेष:1 पन्द्रमहोपतो स्तमपि विरतम्। यूटिजलभरिष्यमाणालबालानां पालना शाखिना मनोहारको नूतन- उदनविकाशोऽपि निराशः। मितिले, तिलोपममुखे से प्रोगोयमानरजसि प्रदेशेऽन्तराः सुस्पान् विरुपपन, पचलन् किमु सनपि विशोप्योत्पाटयन्, शासिशासा नाशमन्, सभावनीले नभी धूयामारेण पोतयन्, अनभिमानीयाभाभिभूतमालकलानिधि, सत्येन निजिहिमालय- मलमिव गिरीशस्य, हास्यमित्र प्रकृतः, यश इस वीना, प्रभवस्थानमिव मुजना, गुवालिमसज भवनमपि मलिनयन् प्रवस्त्युपातवातः। मनुतनूमाना नस्येषु हास्य, नव प्रभया विजितविम्बरल बरेवधरेषु रागः। तेष्वद्याप्रमश्वेता पर्पटी प्रमता। परयन्दतु चित्रपुराधीशः पुत्रग्नीसमेतो नितरा सुखी म शयानोऽस्ति। विलक्षण योज्य भगवान् हालः । एकस्मिन् काल एव विधभावना विगावति । एक समय भारत, चन्दस्य कमल याः वर्षस्य वारिजस्य चका दाऽसीतापपरामर्थ जगत् कानागाऽपि तान्नेशने एम। जगत् पमुले व्यासकमानीन्, कस्यापेक्षा का करिशोधनिबत निस्तनु पातलं वा प्रयान, हिमितरेण प्रयोजनम् । परमय । कमलाया न गतदिवसगाधारणः कालः। पाय पतिपुत्रसमैदा होता. मरती देवी पट्टराशीतप्यते । एकाउने शतशो पापः राफर पुरा सम- पतिटन्ते । विलासैनाम ध्र कुटिविलासमोचे सर्वमन्तपुर पामेश। भहेत.

अष्टमो निःश्वासः १५६ परिता सप्तको, नखेषु मुखरमभोरम, वर्णविहिणीशतालकृतं गुल्फालहरणम् ; शाय. पशादिलराजपनदण्द भण्डात' करे वामितरटरवतेऽधि छविमेधयन्तेऽस्याः। परमप्रेमरा, सतीसारभूता मला वीजयति । प्रचुरानुकम्पा चम्पा च पादौ संवाहयति । एकरया शुभासन्यमुरविण्या य्यजने प्याप्रियमाणया कमलया भवत्यालापचन्द्रस्य च । हमला-देव, तदपि स्थनीयम् । बदा-ये, किमिव कथयामि, महानसौरत्तान्तः, शोरया कमला•-सावेव शिसे धीमन् , यादन्न भोप्यामि तवधान्ति प्यामि । पापि मशमुवा- भन्न-धूयतां यदि पहलम्, प्रवालपर्दतहम्याद् भवत्या दियुफोऽद... कमला--(मध्य एवं नाय को नामार्य प्रवालपर्वतः। चन्द्र-मुग्धे । बलजन्तवः प्रवालकीटा: सावासाय चालमय पद रिचयन्ति, तदेव समान कालान्तरेण तरूपतामुपैति. तत्रैव हर्मेनिमितमासीत्। प्रवाल- तान्तःपतित्वेनैव बल्ल बल मधुर निर्मल मताधिपादेव वहाणा स्टैमित्यासीत् । परन्तु प्रायन प्रभाको चोतित भासीत् । अतु, भवरया दत्ता धीमनिस्टपतिनी भगतरामूलीयोपभोः बलातल गम्यमाश्य वानीमोदकान् पायाने मा भारतम्, परन्तु मम नौममा। विभिन्नफलकेषु बोवनरक्षापताना सरोजको हेनुय रिधिरेवासीत् । पयोधियोत्स्सीतले धमलमलकापाचिनमसरकरमपमरने कोमल्स गह मितिले प्परगतम नितान्त शिपिल चोदातीरिवलमा Fist मिली। परं तारतम्भरधुरैशापेतरियाता पंचविल्य पलाम् । (त, प्रारदारहरनिरैमरी मादी समारं मारयः। 6. एर नियरि सतादम्। दिएरसिमझादायी प्रेम एजमशेषमन निपम पमनीटर दन्त र सामरिंध मसदामा रियो। ममपेमामा तयार पान्द्री सतरनारदात दी मामबाररान्तसिगरा नोटा सरदा। भन्मरण! 1 पदबन्यो ! कमाउर करा।

मित्रा १६० चन्द्रमहीपतो प्रवात ! श्रूयते वं प्रामानपि प्रचलन् सुसंवदति, वनान्यपि समूलान नयसि । तदा 'प्रवात ? अहमेव बहुभारः-( हसिला) पश्यत कोदशी निष्ठ अस्याः करुणापि नोदेति .. कमला-आम् आम् करुणाकूमार ! भवतामिव करुगा जनेषु कस्यानि मा नाम भूत धन्याः स्त्रियमपि न सस्मः। हन्त! कारुण्यम् । चन्द्र०-अस्तु पुनरहमेवं प्यलापियम् । सुखिनोर्वत ! केलिकामयोः परतन्योरपि साम्यमीयुपोः । हरता महमावयोर्विघे ! निहताः हन्त ! वयं नु दुःखिनः ॥शा हे विधे! केलिकामयोः क्रीडाभिलाषयोरत एष सुसिनोः तन्वो देऽपि अभिच जीवयोरावयोमहम् - उत्सवं हरता नाशयता दुःसिनो वयं निहताः ॥१॥ रतिहास्यपदानि चिन्तयन् गमने विभ्रमचेष्टितानि च। विजितेन्दुमुखे कथं प्रिये ? कमले ! कश्चन हा ! जिजीविपेन् ।।२।। विजित इन्दु येन तादृशे मुखौं यस्याः सा तत्सम्बुद्धौ प्रिये कमले रती ते हास्य- पदानि, गमने विभ्रमेण रितानि च चिन्तयन् कश्चन् कयं जिजीविषेत् ॥२॥ जघनेऽयि! निधाय मच्छिरो रचयन्त्या रचना कचे फचित् मुग्ववासन एति शत्रतां कुसुमेपोरधुना स्म किं! प्रिये ॥३॥ स्थयि प्रिये। मच्छिरः स्वजपने निधाय क्वचित स्थाने समये बने उपरने या काय रचना स्चयन्त्या भवत्या मुखवासनः कुमुमेपोः शनतामेति रम। अधुना किम् त्वाय मृतार्या वार्ता एवावशिष्या इति भावः॥३॥ तपनीयललाटपट्टके ललितं वर्तुलविन्दु ते ससि ! स्मरतोऽपि फुजीयन प्रिये ! प्रजति स्मृत्यवशेषता नहि || प्रिये! तेन्तप तपनीयं-स्वर्ण तद्वद्भारपरे सलाटपट्टके ललितं धतुलविन्दु हिगुलस्य योगेन रचितं व सबिन्दु त्रियो दति। तस्मातोऽपि ममैतत्व बीवन प्रत्यवशेषता-मृति न प्रजाति ॥४॥ १ प्रवात-सामुद्रिक बंदर (साईटोन) अष्टमा निःश्वासः प्रथिताभकपोलतहमात् ललितान् पकरसालवद् वरात् । व्यथते हृदयं ममाधुना हसितात् कन्दुकवत्समुज्ज्वलात् ।।५।। प्रथिता - जगत्प्रसिद्धा भाभा यस्य तस्मात् कपोलतल्लजातू-श्रेष्ठाद् गण्डयुगलात् , परसालेन - रसालफलेन तुल्यात् वरात, इसिते-हासावसरे कन्दुकवत् समुज्ज्वलाता समुन्नतात् कन्दुकवद्भासमानात् कपोलादधुना मम हृदयं व्यथते ॥५॥ कुसुमाचितहेमपट्टिकाललितास्तन्वि! विचुम्व्य तेइलकान् । स्वदवाप्तसुगन्धसक्रियः सदयं शाययतीव मारुतः॥६॥ कुमुमैः पुष्पत्वेन न्यस्तः, हीरकशकलैः आचिता - सचिता हेमपट्टिका-शिरो- भूषणभेदः, तेन ललितानलकान् विचुम्व्य, त्वत्तोऽवाप्ता सुगन्धसरिकया येन त्वत्केश. परिमलप्राप्या प्रसन्न इति भावः । मारुतः-वायुः, सम्प्रति मां-सत्कारकारिष्मा- खव पति सदय तब ऋणित्वेन शाययतीव ॥६॥ विकचानन आकुलाङ्गनो रजनीनाथ उद्देष्यति प्रिये ! हततुल्यगुणो महात्मनां सुखदो हन्द ! हता महात्मता । प्रिय! भय रजनीनाथश्चन्दः, विकचं प्रफुल्लमाननं यस्य त एवं आयुला अगना येन कामोद्दीपकत्वात् तयाभूत उद्देष्यति। यतो हतस्तुल्यगुणः समानगुणी मंत्रम्भूतः। महात्मनां महाशयानां सुखदा-हर्षप्रदः अद्यतना महाशयाः सममाने को प्रसीदन्तिः हन्त । खेदे, महात्मता पुरातनी महात्मपद्धविहता नष्टा। "सत्र भदाणि पश्यन्तु इति तेषां विचारोऽपि विदलितः। तव लोचनमित्रमम्बुजं समदुःस्सममदं विकल्पये। घ तिमन्तमुद्रीक्ष्य यद् विधु समकोचीन तय मृत्युशङ्कया । अहं अम्बुजं, तव लोचतमि अतएव न दुःखेन प्रमदेन च समो-तुल्यौ दुःखें प्रमदो-हर्षश्च यस्य वयाभूत विकल्पये - विचारयामि। यत्रमल विधु युतिमन्त वीक्ष्य मृत्युमनुमाय, कमलायां सत्यान्तु कदाप्येवं प्रफलानो नोदगाव, मदयोदेति तन्मन्ये मृता कमलेति विचार्य, समकोची-समुचितकाल 160 . १६२ चन्द्रमहीपतो अधरे मधुरानने ! प्रिये सुरतामोदनयेऽधुना स्मृतम् ! न्यसनं तय कोमलाङ्गुलेविरतं मां विद्धाति जीवनात् ।।६।। अयि मधुरानने! मुरतस्य य भामोदः मनोहारी परिमलस्ठेन नवे ! मुरतोत्सवेषु अधरे कोमलाइगुलेसन स्थापनं मां जीवनाद्विरतं विदधाति ॥९॥ समितो नदि विस्मृतेः सूति सुभगो बित्यसमो कुचौ तब ! अयि मञ्जुलदेहवल्लरीसुपमान्यस्कृतकामकामिनि ! ॥१०॥ पाय! मन्जुलदेहवलाः सुषमया परमया शोभया न्यक्ता दूरीस्ता कामकामिनी - रतिर्यया सा तयाभूठे। ते सुमगौ विवसमी, कठिनी बर्तुलरवेन शालिनी च कुचौ विस्मृतेः सति-विस्मृतिमार्ग र समित नं गच्छतः। कमला-(मन्दं इसन्ती, अपाङ्गन चन्द' पश्यन्ती निन्धसिति।) चन्द्र--(हसन् किमर्थ मुधैव कृत्रिमनिवासविधौ व्याप्रियसे। कमला-नहि देव) अहं भवतो जीवन एवं नौकाघटनात् शहिताऽऽसम् । परन्तु भवन्तो वृत्तावादमनारायन्तोऽविच्छेदेन प्रकृतमनुसरन्तु। औ ततः? चन्द्र-ततोऽहं पुनरपि "देव! किमनायं कृतवानसि, असिताक्ष। विपन्ना मातरं दृष्ट्रापेतहपो होऽपि नूनं कथावशेषता यारयति । हा। नवजात शिश विदलिते लवेद पृथिवीतले प्रसारिप्यति। मामदृष्ट्रा मदन्तं वाले हर्प कमला सान्त- विष्यति "पुत्र। हर्ष! नवीननदीनानि वाससि, वर्णसूत्रस्यूत छत्रम् , मुकामुणीपिका, पटकारान, फुस्लमी: ज्योतिरशलाका भानेष्यति मा दिल रे हर्ष। मा दिहि" परन्तु हन्त। वियत्काल सान्त्वयिष्यति, अन्ततः...| r! हन्त ! घियै। ममारवं मनोरया!" इति विपुल विलय चेतनामजहाम्। वा प्रास्टादिलरमूलय एष ध्यत्याध्ययम् । प्रातः प्रयुद्धो विलपन जीवन , गत्वाऽरमान अलमारकर्तुं सम भासम्, पन्न मध्यमशनी भगवान् यदिराति सदेव भवति, यतस्तरिमन्नेव रामये एयप fruीपर्णामि: व्यतिभिरिक वितताभिर्मण्डलाकाराचनाभिटामिर्भा अष्टमो निश्वासः १६३ द्भासितमुखमण्डलः प्रोन्नतायतललाटो भाखरोन्नतधोणो भस्मत्रिपुण्द्रातिपरिणाहिललाट- मांसलवक्षःस्थलः, सध्येन दण्डभिवरेण कमण्डलु करेण कलयन, लबभानरद्राक्षमाला, कदलीदलकोपीनः, पीनश्वरगम्भीराकृतिः कृती, तेजसा शान्तेन पापपुआनधि रक्षयन् रुपाकुरिवाधर्मस्य दलनः, प्रभवो धर्मस्य, विहतपापपुञोऽतमाः, शमदमनिमलमनाः, अस्पृहयालयालमुनिः। स च गभीरया वाचा शब्दयन् शब्दगुणमुवाच- पुष्कराक्ष 1 नास्ति पापमात्महननतुल्यम्, यस्मै दुःखाय म्रियते तत्तेऽचिरादेव सम्पत्स्यते सुखम् । मा स्म पातक कैषीः। आयाहि तपोवनं प्रविशावोऽतिवर्ततेऽर्थनवेला, इति । वनभूमि विपूय ऋषिशिशुश्रमेण निर्मित आथमो लधीयानेवासीत्, परं घण्टाघोषेण पुष्पपरिमलेन धूपगन्धेन व मुखरित आसीत् । वचन निदशहा हरिणा रोमर्थ वर्तयन्ति मा वचन धेनवो नवौपस्येन स्नपित्तधराः स्तनन्धयान स्तन्वं पाययन्ति रम। वचन पनपात्राछानाः पुष्पाण्यवचिन्वन्ति स्म। असर्वभक्षिणोऽप्यक्षीणाः पक्षिणोऽभ्यास- प्राचुर्याच्यास्त्राण्यभ्यस्यन्ति स्म। कृतरक्षा वृक्षाच विपुलफलपरितोपितमुनयो नयोपपादिताः प्रजाहब फलं ददति स्म । पापिनामपि मनषि तपमा जनयन्ती बनावनीयं विलक्षणा भव्यरमणीयाणीयसाप्येनसा रहिता हितासीत् । तत्राई कचित्कालमध्युष्याभ्रमं सभ्रमोऽरण्या- नोष्वसंसक्तचेताः परिपात्यमानवरवारणकुम्मोत्पाटननिःमृतमुक्ताभाखरनरामयूखाः देवशा इव ज्योतिषा भावन्तः, सम्प्रधानप्रहकात्यायनीप्रदत्तधन्यवादहस्ता इस हर्ष. पण हरिणप्राणान् हान्तो वारणमारणोपारुहरा अमितपिशितादनमदभरमन्परा:, म्भणदरीसमानशोणितशोणरदनसदना, बालभास्करवणेन, मृगराजवख्यापक- वजेनेर, मृदुललोमनिषितामपुच्छपदेशेन शोभितपप्रदेवाः पनवसतया, केशरियो रजायन्ते स्मा कचन शाकिशोरका मीरुभयहरं कैशोरचौर्य चयन्ति म। वचन परिणीकलमभूषितासितपाल, घलवरबगदाशयत् , सायमा स्नानु सरी गरछव, शुण्डकुण्डेषु नौरमापूर्य पूरितालबार, मग्यमानशबजे, सन्मदं चलभरीके जलपर्वतमिवाचनान्युक्षित, बुभुक्षित, प्रखरमरट करटिकुले कुल्या अकुलपति स्म । विहित हितरादिपपत्ताय दरारहित हिंसन्ति स्म। कचन' मस्कमल्टक बदकाक्रान्त निशन्तायो निष्ठुरशूराजगरपूरपरितायों काननभुति, मुवि विपदा भालजलसितपातयः, मृग। २ पक्षी।

बाचन प्रकाय. १६४ पन्द्रमहीपतो दापोलीटोप्रविणा घोरशोपयोगा, योणिनो दमान् पर्पयन्ति स्म । म्यापमुजयर-कोलेयच्यासत्रातः, त्यक्षाचवितरोमन्यः, फेनिललपनैः, जमाभिः, जीरने हतारितरस्मिनुषि मेलिष्याम इत्यादिलटमगीतः, मृगीभिः सोम कण्यमानः, गुर्गविस्फार्यमाणनेनाः सातनेत्रा इव, नरीनृत्यमानमयूराः कचन भगालीलीलारिता, वचन विशालविकासलाहिताः बचन बन्यरायभीम एभरपनीरमा, सततभक्तमंशतिपयला:, शुकपिनियमाण- जयपोपा, सग्लभागीयमानगुणरभिनयात पुस्तिपत्रपूरपूरितदुर्घटवः শরিয়ামতাকাযবিধিবিধানা, ২যাগদান विशिदनल दागिन्दालादिमानाः, भयारदर्शनाः, अग्युन भाग अविरतनराः, वनभूमीमर, प्रयन पन, कचन वृक्षमादन , सिद्धगजन्यमापन, मदन इस बिलान, तन्नतिन् पीपान्दमनेरमन्यपदा वतमान रातमीशमी पा, मोटापोटगुमारितापपातर पशो दुसितो. दादा जीवनम मगो बनाय पचामयि। रेलमारनेर चामलिना सन्ध्या या मंजे। शासमोरमाना पतिः। प्राधा च कालाम्मरमारिणी मे भिवरी। मेरा या सम्माभिमाणममायासमान बने । त्यान। भरधिन यत् पत्रामसमुदस्वादयोजितम् । घाम लवनि गुणः। नदी त्यामागस विधित बिमानमा to छोटीमोम पुः प्रामातिको राग इस प्रदान की गमना सारः। दावा मिनाविणापमाना। we समयमा प्रत Ef प्रस, नायर "बदमयमा मनमादी या first नाम र परिचयपुश्राम प्रतिमा मन - AnPam #a', मम्मान +:-ममरे।

अष्टमो निःश्वास. १६५ नागरिका बालाः खभावपला दुष्पकृत्तयश्च मो मूह मवानाः कोलाहलेन बधिरयन्ती दृषद्भिः कण्टकमयाभिटिकाभिश्च नितरां दुःखयामामुः। परमहं दुर्दैवदुर्वीक्षणवीशितः सर्व सहमानः किमपि नावोचम् । दयाशीलानां कतीनाचिन्नृणां भर्सनया बालेषु यातेपु तदनु प्रचलन्ने भवनमयासिपम् । भवनस्य प्रधानद्वारे बालमित्रायित- क्षरछोणितायितलोहितमलयजायितवसने भगवदम्बरायितवर्षाचश्चलायितकादमीर- नोरायितकृत्तकादाक्षरैः परमशोभनं-"टीकमानीवेदवेदाङ्गविद्यालय"-इत्यादित- मासीमाम। अज्ञाषिपं यते पारायणिका आसन् शेषामसी निलयः। विशालमदो भवनम्। सम्मुखे विडोजसो दिशि पथद्वारं सभाभवनम् । द्वी त्रिद्वारी तदभितः, उत्तरस्यो दक्षिणस्याच द्वौ द्वौ त्रिद्वारी, वरुणदर्शित द्वार, प्रपा, पथिकावासादयथासन् । मध्ये विद्यालय को हस्तिपत्रनिचयनिचितो निम्नः समुल्लासति स्म। अहह ! कोलमनोरम भासीद् वृक्षराइसौ पिचुमन्दः। यो हि तस्मिन्नती प्रकटितनवच्छदनविकासहासदृश्यमानपत्रगर्भमुखरक्तिमा, सर्वामयेकजायुः सधनधनद्धायः कपतिजगीयमानानवाहदागुणनि कुरम्बो व्यलसत्तमाम् । यस्य कुटिलकाण्डेच चपुटाप्रेण पक्षति कण्ट्रयमानो नितरामाभाति स्म केकारवचेतनीकृतरछात्रन्दः केकी । यस्यायवारयन्नमदन्तः पारस्परिकरपद्धया उपयुपरि पतन्तो विलक्षणामानन्दमादकता प्रसारयन्ति स्म कपोतपुजवाः। येषु च निषतन्तोवराकाः काका भस्मनिपतित- स्पेशालयस्य साम्यं दधति स्म। येषां निशितवन्यविक्षता क्षितिज णिनीवाभाति म। आमोदमुदितमनोनासिका, परिमलप्रलीनसमामयः, विलक्षणोऽमन्दो गन्धः प्रसर्पति स्म विचमन्दात् । सर्वरजा निदर्तने, विभिटमुदा प्रवर्तने चायमेव हेतुः । अत एव परिपुटवपुपोऽविज्ञातरोगाच मुखं शेरते रम छात्रा यत्रत्याः। मस्य मूलती मध्यदेशं यावसाधिता. नितान्तमृदुला, सपुष्पार्कबल्ली, लावण्यवती प्रिया वर्धारित प्रत्यक्षमाश्लियभूयो भुपमामाहादश्च जनयति स्म दर्शकस्य । या चार वल: पुष्पः, हरितदेलेच, हरितकौशेयातशरीरा हीरक्सदमण्डिता रमपीवाभाति स्म सक्लरी। यया प्रेयस्या रिसमकरः प्रदत्तपन्यवरत प्रफुद्रति एम नितरम् । १औषधम् । २विलापती आफकी बेल।

६ १६६ चन्द्रमहोपतो ईशानकोणस्थानद्वारे आलपा महर्षियलम्यानां चन्दनभाग्मालाना छात्र परमात्मस्तवान् शुभूपुस्लमागमम् । शिपि च छाना मगान्तमुपदलोकया केचनोपलचयरचितकुण्डिकाप्रतिष्थापितस्य महामहिम्नः शिवस्य समही विश्वति । - ऋद्धिमिद्धियुतस्य भगवतः करियोनरपान्तरायनाशकाः सवा पट्यन्ते। इतरत्र कार विराजितपित्तलाभासनस्य श्रीलदनस्य पादोदकं जरीमधदे। अन्यत्र पार्श्व वुख्खा प्रविश्य सिन्दूराहितविरविमासिवर्गमालायाः, केशरिगो लावश्यधराया कन्धर विराजमानाया:, त्रिशूलरूपाया भगवत्या जगदम्बिकायाः पादयोनिपत्यते । सम्म चास्य भवनस्य काटपीठप्रतिटितपुराणः, मश्रुनिचितमुसः प्रौढ जसराम इत्याख्य इ भगवरचाराचार्यकृतां गीति गायन्नासीत्- जय नारायण ! जय पुरुषोत्तम ! जय वामन ! कसारे! उद्धर माममुरेशविनाशिन् ! पतितोऽहं संसारे ॥१॥ दीनोद्धरण ! नरकरिपो ! नर ! केशव ! कल्मपहारिन् ! मामनुकम्पय दोनमनाथं कुरु भवसागरपारम् ॥शा जय मुकुन्द ! राधायर ! सुन्दर! जय शिशुपालविनाशिन् ! जय करुणामय ! जय गजरक्षक ! जय वैकुण्ठनिवासिन् ॥३॥ त्वं जननी जनकः प्रभुरच्युत । त्वञ्च सुहृत् कुलमित्रम् । त्वं शरणं शरणागतवत्सल ! त्वं भवजलधियहित्रम् || जय जय देच ! गयासुरसूदन ! जय मुरमधुहन् विष्णो ! जय लक्ष्मीमुखकमलमधुनत ! जय दशकन्धरजिष्णो !॥२ पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि गर्भनियासम् । सोढुं नालं पुनरपि माधव! उद्धर मां निजदासम् ।।६।। यद्यप्यहं सकलं कलयामि किमपि हरे न हि तत्त्वम् । तदपि न मुञ्चति मामिह माधय ! पुत्रकलत्रममत्यम् !

१६७ १ ६ अष्टमो निश्वासः अपराध में मुरहर! परिहर कुर्व परणश्रयणम् । संसारार्णवतरणे फरणावरुणालय ! भव शरणम् ॥८॥ जनकमुतापनिचरणपरायणशङ्करपरिगीतम् । तारय नाथ ! परं पुरुषोत्तम ! मां भवजलधिनिपीतम् ।। तपस्यारामा यदा राम्रो पक्षन्ति रम, सूर्य उदेति स्म । तेषां शास्त्राभ्यास शुद्धः गुः गुमति स्थिरा पूर्णा, निवान घाल विनीतम्, दचनावली मधुरा मोडस्विनी, साथ पानय देयं साधारणशासीत्। ईश्वरभक्तिरतेपामोहयो यो पटेः शिव नापयन्ति रम, विविधनियमतानि, पालयन्तिस्म । तेस सद्व्यवहारोऽविनीतासमयतिरम, तेवगतो रविरोधेन शस्यमासोत् । ते परस्पर मात्सर्य न कुर्वन्ति स्म। सहपाठिभिः पाठचर्या परिन, प्रोषान् दिनोभावेन सात, ते शिशिवरदार्थमादानुव ते प्रवीणा आसन् । पारमिते जीवनकालय विधिर धानन्द भासीत् । मध्यादरामये सदिराः सक्रियमाणोऽमुक्षिा पाशाला सत्सीयसी धूमपूर्ण हान्न् ि। उसोपना रास एएम रिदिता भन्। भोजनमाधने एक दी दो पारी, सूम, रापमोदनर परिवेषितमासीत्। मामय भोजनभाग्नं दतम् । गत्व पथिमा पपा साहुत्यं सस्मिन् भोज्य भरीतथा नादाधि नपासादितम् । ती भो भोज भोप पुनधि, पाय पथ परली नायम्। पोजनसम्पदि हास भोगनरचनातामुन्ति । नभूत्। महाकाय दश धापनभने सूलिकादियान, मदोपहर fमुरारनुसान्, पनिर, परिहामापान, असमान, महामनोन मकवकिप्रसम्ममसरसा, विमलामनगिभूपदा पुरः प्यार की प्रसारित परमार, पन्दन्न, दान्तान पारसदारreatiमदिन ঘর্নোগ্রাম, मन पररररोवार, सरला रातिकाजलद- मारिया शारारिमापूर, सन्यरन ,सासा पुरानडेगोमनासपनावि दुसरममान, परमेनि १६८ चन्द्रमहोपतो इस हन्मध्यसावित्रीकान् , विष्णूनिव द्विजेन्दाश्रयान, शिवानिव लप्तविभूतीन, भवभूती कालिदासान, त्रिविक्रमान, रामानिव शास्त्रार्यमवनिमुपागतान्, कृष्णानिवार्जुनसम्पृक्तान नारदान्, श्रीमन्नृपतिमुकुटायितवीरबलविपुलोरस्कांसलवतश्लोकधीशामिहशासित योकाने सराग्यान्तर्गतम्राकारवेतिमाखदाजदुर्गराजदुर्गस्य, शिवाधिष्टिवेशनकोपविराम मानच्छायापरितान्तरणसद्धर्मनिपानधरणध्वस्यमानधर्मशरणप्रतिटिवचरणावासिमपण. शारामच्छामवारणसनिलयटीच्मानीवेदवेशाविद्यालयप्रधानाध्यापकानपरसम्। प्रया पारायणिकाः पुस्तिका उद्धाट्य स्थिता आसन् । मा तथा स्थित वीदय सेर- भेतममाहाचार्य:-"ननु रामचन्द्र! पृष्ठ, कोऽयम् , कुतः समायातः, विभिपति। आइत्योपजातिरिव प्रतीयते"। हढोरवशाः, प्रमाविललाटचन्दनो, स्यायततनुः श्वेतवासाः, निःसरहमध, सात, धारमाध्ययनाविलया वाण्या सप्रश्रयमाह स:-"पाग्य'! कुतः समागमन, काप पाति:" अहब"विदूरादागमन क्षत्रियोऽरिम" इन्युदतरम् । स र देर बास्यं विधितामाश्चिमानां पुरः प्रापयत्। अहम विगृह वन- সুরঃ খ ফান বনবিন্যায্য মৃগীৰিয়ালৰ, মৰা মন্দ हरयान्तसिनी यात विक्रीयामि, यदि... अप ते मानवानन्तोऽी सीजन्य प्रकटयन्त आवश्यक कार्य पाप अपारिश्रमप्रान्तमपि पर गौर राजपामामुः- "मोहलास! प्रान यूपं श्वः प्रातरेवागन्नारप" पर उम्मनाके तम्मिन् गमचन्द्रम, धारेग चाशतामिम्येन पटना पर मानमिस्टे पिया याना पीमित परत यन्ती मा दयाहा बथनमा प्रदन्नो मां भगः प्रमाना "मगवन् ! दुमय पामिनुभवामि । "एवम् , हम भई चाटोमाटोई योजना त्रिोता दर्मा यमनमाया PATRA m ६ अनमो निःश्रासः १६ पण्डिताः-भस्सरसामु त्रिलोकीराग्यमुसं पश्यामः । पश्यामः। (क्षणं विरम्य) परमल्पीयमी पापा, अदस्य सतां नुन निवारयति कोऽपि। सथ्य वाच्यं पा व्यबदतिः। अहम् --उदरपूस्य अलग्धालानां नः ३ धरणीरमणीध्र माभूषि शरीरम् ! पण्डिता:-किमिव पयामा) अहम.-देव! सहमणि थरमाद दिनार्णवाहि-सरिप्यामि, ममाप्युझारो भविष्यति पण्डिताः-उदार:घटीयन्त्र पुस्तकमावलोक्य गणयित्या) भामुतिस्तु भगवती. प्रमाक्षात् शीघ्रमेव, पामेवेव दिनेषु दुममपि लप्स्यते । ६.-1 देवेन दीयमान सर सदिये। सार्य सम ए साया प्रचुरप्रभपयेध्ययनाः श्रममपनेतु, शौचं निवतीयतुश्च Taम। अहमपि पण्डितवरान् शिरसा सादर प्रणम्य उतीयः सदागमम् । छाए दुषित एष मुगया भासन, ये पण्डितानामन्ति के था। एते मुधामन- धीरयन्का पन्दारकगिरा बनमपि मगरयन्तः, हास्येन, लीडया दिनश्रममन्नयन्तो विचः। म्पवर विलक्षणभुस्यो रिकारिता शोर नियंत्ये परास्तेऽदमपि। विद्यालये उतरता, उति सरला प्याशी। अगतमधुररसय पपक्षम्-उडम्। उ पुषविटा: मुगन्ध विकिान्ति स्म। सन्ध्ये विधी मता बन्दवासिना। विद्यालयपूदिशि मलय भासोर वानरे पनि पाप्रापि सन्तानिया गन्दै मा किया NEERI प्यायामो जीपन प्रतिमारति व्यायान्तम। रतः। प्रथमटाणु अमावसानि पिटय मेपाना महासम्मेलनम्। मर। Rark मे भूटान्दै । भई माटोभाराने' प्रमहरूम्। स्थन मदो विरानमेवामीत् । हार अगाईत R सम्मेषु RET R दमा काम AIR ER पर्व परामदा को 1 ret १ मुसरिन।

चन्द्रमहीपता उदमविधमा प्रासरत् । क्षणेन धक-धकायितधरणी, पथिस्शोकहरणी, दिवरिण- अभीष्टदेशप्रायणती शकटो समेता। अहं प्रथमग्या आवासेऽविशम् । शतश उपनेप्रधारिथ्यो रमण्यो वातायनेभ्यः प्रेशन्ते स्म । देवाद्विद्यालये मर यत्राणि प्रक्षालितान्यासन् यतः कोऽपि पृच्छको मां चिटिकायै नाखेदयत् । मुन्दर विशालमजिरम्, कान्तारम् । बहुशोऽवलोकिता सान्दा दुमावली । दूरत एव दुमदलमध्यतो दृश्यमानं रक्तध्वज लक्ष्य कृत्वाहमवरम् । गम्यून्यन्तरे परमरमणीय मन्दिरं प्रोचभूमी शिलाशकलानि सौन्दर्येण न्यस्य विरचितमासीत्। अग्रे व प्रस्तरमयं कुट्टिमं यत्र सहस्रशो मनुष्याः स्थातुं शक्नुवन्ति, नदीनमिव प्रतीयते स्म। वेतममृणपापाणसम्पादिता द्वारशास्त्रा, शिल्पिसम्पादितं कपाटयुगल. मासीत्। मन्दिरमनारतमेवासीत्, अहमन्तरविशम्। भव्यानि भवनानि, चेतीविकपि च सभाभवनमासीत् । मन्दिर भगवत्याः शाकम्भया शासीत् । पवित्रमूक्तिः पूजमश्च स्वकीयमनुष्ठेयं निर्वोपविष्ट मासीत् । परमातिथैयः स मदीयं बनोचितं सत्कारं विधाय मवृत्तमपृच्छत् । अहमपि सर्व विशुद्धभावेन न्यवेदयम्। जगदम्बिकाचरणशरणो मदुःसहरणे सकरुणः स मह्य मन्त्रमेकमुपादिशत् । सप्ताहं यावत्पूजकाज्ञया कृतार्चनजपध्यानोऽस्वार्थवन्धु पूजकं प्रणम्य, लब्धाशी मात्माल्यविभूषितकण्ठः प्रसन्नमनाः प्रातरबैंक पन्यानमाश्रितोऽचव्यम् । सायकालः, प्रभाविभासी भास्करो विरहिता पधिमाशामालिापारुणिम्नाऽऽचकने। विदूरतः संसरणसम्मुखमेव करिकुम्भाघातसहाभ्यां घटिततीक्षणायसर्लाभ्यामाय. सान्यामारताभ्यां कपाटाभ्यामुत्पाटितरिपुसाहस, हसन्तमिव वीरगणं वीर्यग, प्राणापहारक, नोलशिलं तोपकोपसद्वोचकं गोपुरमपश्यम् । पहिविस्तृवे चतुष्कोणे क्षेत्रे नग्ननिनिशानां रक्षकानां चन्द्रहासचमत्कार- रायसान्यप्यरराणि राजतानीव राजन्ते स्म । पन्धानमशितः शीतलच्छाया सान्दा दमणिः। प्रतिदम मारकतप्रभया दुर्वया लालितानीव ललितालवालानि व्यद्योतिश्त । "रक्षा" मया पृ 'कयाऽऽस्सयालक क्रियतेऽदो नगरम्। कस्य च शश्या- वनंसो भूरा कानि चाक्षराणि यमाप्य धन्यानि भवन्ति ।

अष्टमो नि:श्वासः
१७१
ने मामममिया प्यार :--"पान्य ! चित्रपुरनाम्नोऽमुर मगरस्माधिपतिः
पनि धीमान् शिव प्रसार-ठि
मम्मादाय पियाने वेगेन पावन्ती समाप्तन। अहे मगरा पहः किन्तु
द्वारकरिमन्नमायने शरायपम् ।
भामाशामा महालिलारा गौतममधापम् । विपिन दिनुसार
तम
प्रिययर। पात प्रयोः
मम पोलिटयघसे (स्थायी)
সব ধৰি । প্রায় নিথ' এম হুয়াকিং
मपि पटनोहरन प्रगतोऽगिरे पौर । (१)
मोहकमन्वयीता प्रिय' भवतः
विषमगतर्गनना पटाम्पिपयित्र (6)
मिमानुरा न पियमेटनमाम
पिrefargra निधनं पामि पिभाम । (३)
Mmstar TEA रा.
metrinary मास, तुरटर! देर
Meet Pres itun l
rrentRITAMARHTTA
ARTriramga.
Fire Energree'।
FreePTETTrrent
Ram: FATHEarrhytretc.

१७२ चन्द्रमहीपत्ती प्रमोदिनः प्रतियुवकं योद्ध युध्यमानाथ द्रष्टुं समरयन्ति स्म नामपट्टिकया स्म। गोपालिकानां प्रसन्नदृश्योद्गाररूपा गीतयो वीता आसन् । पूर्वरात्रमतिवाय मध्यम आयन्नासीत् । तीक्ष्णरयो वायुरसरायत । था शाराः स मुस सुन्तः। पथिकानां किमु प्रदरिणामपि यातायातोऽसद = ममरणदोषाः मूकमुनय इव दण्डिता नरा इव च निश्चला आसन। एका सन मुग्धा विधवा विदुरे व्यलपत, परन्तु शान्तनिशायां निकमय प्रतीयते स्म । निशे ! हे आलि ! नाथः फास्ते में ' मुत्रासं मुखनिद्रया, निद्रां स्वा! जहर्थ (स्थायी) रे! स्वप्नाधम ! ययक ! प्राणान्ते पियुनश्मि । समारे! दुष्टासत्यं फयं यः ॥११॥ मन्दस्मितमुधया हरन, गत्मासादसुधाम् । * बिहुतयर ! ना यातोऽसि ॥२॥ मर्शना विपुल यन् , यप्रयधीरितईम ! हताशा मुनया यानोऽमि || मुकुरे पोल्य मुमं मयाभूपि शरीरं हन्स ! यद जननीरज ! याती:गि at भृरादुःबाई पन्द्रिय ! मपि दुःखं गादि हिनायासनीय भगिनिया नामि नमिमा यामिनि ! मचिरावा न भूतामि। पवितवरमपि ! दयित देदि । at garl RiR " अष्टमी निःयासः जलमप्रा अभयम्मम आशा मापस्फीव मृत्यो! चरणी ते शरणम् ॥५॥ एलामा पकीय रामपी सासचिनी पादप पाता इन्ते हम, सिन्धयः Tigeraturममा समाय विरजस्य हदयस्तरे दुसरय स पर। पर नया पिता भू मांद परमय राम मन्दिराधि MIRMIRI प्रसंगला, निभानानि । रसिपमापरयाशिम समापन म। सिामना मनुमा मुमम्मले शोमालिनः ला लि कानमा NAREAMPITIगिरनाम सामनगवा, भनकारणाः, पारा, m t मरमति दीपयन kिपवितोगारोन अगस्त मतसर सर साततिः गरम हो पाय। भाrushextreanerg मा भूमिगारनियमलामन्ने म ATRI ON OR Aafree infrjar म। पारम. दान देष पुरीशिम भन्न Prem Rs maसायोग म्प3 २ पुEas for R५ पन प्रापर Airtan Trianferent shat ta hartere'मा भन्नु पERIES mपशोभितः (मादी) नाम भन्नासू दुनिता। पासमार freeमोनाति relerstaT१९१९-दुस्तदर चन्द्रमासिललाटपट्टः, शुभ्रवारिजलोचनः । रम्यतेलसुगन्धिमूर्धा हन्त ! दव ! समापितः ।।२।। मच्छिरः स्वाङ्के निधाय लालयन्तं सत्पतिम् । हा! लभे काहं हताशा हन्त ! क्त ! हा! हा! हृतः।३॥ श्वेतपक्ष्मशिरोरुहा श्वश्रूर्मदीया त्वगतिम् । याता भवन्तं द्रष्टुकामा नाथ ! नाथय वागितः ॥४॥ तानि पूर्वदिनानि चित्ते, हा। विचार्य करोमि किम् । श्रीनिवाससुशान्तरूपं, संनमामीशं सतः ॥५|| करुणया कण्टक्तिचेता अभ्याकन्दं गच्छन्ने कं भव्यभावनं सज्जनमन इव विशाल वरच गृहमपश्यम्। नूतना रसालपर्णखजोऽशुकानि सिन्दरकुछ कुमस्तिक- चहानि अर्द्धमुच्छिताः कदलीस्तम्भाः पूर्णा जलकुम्भास्तस्याभिनवां वास्तुप्रतिष्टामसूचयन् । Eातशः क्लिनचक्षुषो धैर्यधरा नरा विनता वनिताश्च गतागतेन देहलीमधर्षयन् । अस्मिन्नेव प्रावदाई जनाः कन्दन्ति स्म । अथाहं विपुलविचारो विप्रासादाभिर्यतः करमाचिन्नुरशासिषं यदिदं जनपशुरो- दविदुषः कर्मशौण्डस्य विप्रस्य भवनम् । अस्य चैक एव पुत्रो युा। एष एकदा नोकमचे सर्वहितैपिसभायां स्वातन्त्र्यमुपदिदेश। अतोऽयं शडितमनसा जनपदायक्षेप नेगडितुमाशप्तोऽवश्यं मृत्युदण्डाय कल्पयिष्यते। निदोषोऽयम्। मवीन हय॑मनेन नरमायि। वृद्धो पलीपलितो धवलमूर्धा सालपीवोऽरदनवदनो यटिधताशयटिभंग- सहायोऽस्य पिता। अपनेता विलमश्रवणशक्तिर्जरती जननी। विनवनविकासा हन्त । हताशा नवोदा कुलीना सुन्दरी चायाप्रजा धर्मपत्री, सर्वेषा- पामाश्रय एष वेदविद्याविचक्षणोऽय विपत्स्यते विप्रयुवक इति दुखिवाना कर प्रेष सहानुभूति प्रष्टपति नागरिको बनः। किन पश्यति । एताः सदा विपुल्वमका हालिका मलिनाम्बराभिविधवाभिरेवाप्यास्यन्ते। सहस्रशो युदानः सतन्त्रता संग्रामे महनेत्रोशिताः पाशेन यमावासं प्रेषिता इति । रामपय एवं विश्वासादा पाव चासीत् सर्वहितपिसमाकार्यालयः। अहं तत्र सम्यगजात अष्टमो निश्वासः प्रविश्य जवनिकारद्वारस्य गृहस्याम कृष्णकाएर 'प्रधानमन्त्री इति परित्वा “अन्त- रागन्तुं शक्नोमि महाशय" इति पृष्ट्वा तेन 'आम् स्वैरम्' इति प्रत्युत्तरितः प्रविश्यादा न्यदेको श्रद्धा समाप्तसप्तमोक एकस्मिन् भममलिने पीठे उपविष्टोऽस्ति। मित्तौ च लोक- नेनणा टितभुमानि चित्राणि। भहम प्रणम्य भूतले उपविष्टः "भगवन्, कर्थ केयं दशा नगरस्यास्य"-"अप्यस्ति कश्चन सापकोयनगरस्य इवाम् । "अस्य नगरस्य शासको घुमणिश्या फल्याणसिंहो नाम प्रान्यातपोपो वीरेषु, शासनव्यवस्था चायतनेषु दिनेषु नगरस्य प्रशोणा-मन्दं स रइतरत् । "यो नाम्नेव केवलं कल्याणसिंहः पालकम्मन्यः सूर्यवश्यः सन्नपि दुरवस्थस्य राज्यस्य रक्षायै भटमी मुधैव क्षत्रिय उद्यते। तस्मिन् जीवति जामति बैदेशिको राष्ट्र विपदयति, तस्य कौत्ति कलायति, क्षत्रियत्वं व्यपाकरोति, धिग् जीवनम् ! धिक् वास्य "प्रजादितवतिनो दयम्" इत्युपोषः। यया हरिणमाणहारी हरिमंगेन्द्रस्थायमपि सीमा कल्याणसिह"। प्रधानमन्त्री नैतत् सत्यम् । शासकरत्वयं बलवान् पृतपत एवासीत् । परमधुना सा केन्द्रय गौरामाधीनम् । किमयं कर्त सपनुयादाः। शासन तस्य न परम्पराप्राप्त किन्तु बलाधिगतम् । तदाहं शिशुरेवासम् , मम पिता कथयति स्म यदस्य नगरस्य जनसंख्या लक्षत्रयमितासीत् । एको राक्षसीरिममारे समायशासीत् । यावन्तो नराहतस्प सम्मुख समागमन् सर्वानमयदमारयश्च । अत्रत्ये नागरिके पलाय्य भगरान्तर गतेऽपि राक्षसोऽत्याचरत्, भदोऽत्रत्याः कपि स्थान न समन्ते स्म। एदा एतरप्रदेशाधिपेन राय "मदेवं ते कतिपयैरेव दिवस ग्यप्रभा एयराज्यो भविष्यामि" इति विस प्रावन्धि पद, प्रत्येक रही प्रलवसर राजाशानुसार निशीये स्थानशितायामक व मापन महिद सपदमपमितं मिटराइक नवीनपातु' युवाने (नहुलिय)प्रपा इति। राजा प्रतिदिन सोममायारा प्रार्थयत प"मा दाम राष्ट्र मारप" इति । राक्षसोऽपि वप्रति पयाससमश्नन् प्रसीदत् । एस्दा दुर्भाग्यपाहि मात्रय प्रशाररूवसर मासीत् । पकवासीत् वित्रगृहे। पुत्रो माया मातुएंबया प्रियकमा गमाश्रयः । प्रिययमत्र गमाश्रयः। भामरनाम्मन्टनो र तदा कस्यामपि सेनाया निकोभिकारिमोऽसूविधाऽऽगतो विप्रान्तमा भयच युवा प्रभावोसनः गरोदनं ध्रुवोनिम टत्यायन्य यदेतोऽध ग्रोतः सारयन्, भिती रोदय निरगद्गदकको बळ माऽपि “हा! पुथ, तपाई यास्यामि रक्षेमुशानी न होप्यामि त्वं मा गा" इति मिल पुर। अरगतलोचना मुलोचन! को नेप्यति नयज्ञ! सम्भापियति मापद मुरां प्रश्यति पटो! हा! हतास्मि बटो। अमुग्ने दिनार पालितो दुप्पटतसेचने हा ! सूनो। इति समतताइन रदती तन्माताऽनुरामि । भन्यतः पि! प्रपंधर। मन्नयनबन्द? अविदितजगदानन्दारिम! हा! हन्त !! हिन्वियामि, अन्वेष्यामि सामिन् ! भवन्तः स्वामिनोऽनुशा पालयन्तः सानन्दं गन्छन्तु, हा! प्रिय। इति प्रचुरं चीतल ससय्युर शिरस्ताउन रोख्यमाना युवकाका जानि भुवि लोठयति । एकतश्च मुमूर्पवे विप्रवालकाय राक्षसतृप्त्यै चोटसलास्फोटितम्य तितविशोधितस्यानस्य रसवत्या बलरन्तिकायां मधुरं शादाज्यं भक्ष्यं निमयते । कतोऽलिअरेषु', पिठरेषु च 'जीपपत्र घृतात सोपस्करं सचुकवे लजाबाजीक नवभेषजजलामि बाहीकगन्धि सनिशाह' साक्षी राक्षससम्बन्धि मिष्टान्न निष्टनम भवन्तमन्दरा र रेवेष्यते। विदलितभीरुधैर्य दुःसिनां दृश्यमदो वीक्ष्य समुपज्ञातदयो गृहाजिरे निश छन्, यश दृष्टो गम्भोखाचा तान् सम्मुखयन् प्रावीचन्-"मा शोकं कार्य, मृतसकलमुटुम्बोऽहं संसारे निवृत्तजीवितेच्छो मरणमेव श्रेयो मन्ये । अमुना नधर- रेण . ईदक्षः सदवसरः कदापि न लश्यते; अतोऽहमेवाद्य तस्य रक्षोराजस्य भूयोप्यामि। वृद्धौ। मा शोचनम्। भवदाशालताश्रयः पादपा मुदृढमूला स्वरं विलसतु । नवोढे। मा स्म तनु शोकाग्निसाकार्षीः, न वियोश्यसे। पत्यु- रस विधेहि इति। द्ध करत्वं देव! एभिः सुधामधुरः शब्दः सिञ्चन्नागतोऽसि खर्गतः। परन्तु चालनी। २ सूपकारः। ३ चुलिः। ४ महाकुम्भः। ५ तापवाइन "ता" वणम् । .७ तेमनम्। -PM १७७ अप्टमो निःश्वासः भई भारतीयः सस्य मुखस्य कृते न कमपि दुःखयिष्यामि। भवानपि सरया अपि भभूपगं सौभायसिन्दूरं नयनोत्सवच । श्रहं सने शोपयित्वा बदयिष्यामि।" याणो नाम क्षत्रियकुमारी खगति न कमप्यात्मीयं पश्यामि। मां - नकवन नेप्रेधार्दयिष्यति । भारतीयशचियस्य कर्तव्यं मा विवशयति तो जीवति विप्रकुमार इन्तु नकचन समर्थः। अहमप्यायर्यो भारतीयां लयिष्यामि।" Tal पाय ) हो। धन्योऽसौ ग्ल्याणः। यस्य नामसापीर्तनेन म, अतिसारथाप्रतिषिो भवति स्म बृहद्गशाधरेपापि, मीता भामिन्यो स्म गर्भानपि, राज्ञः सन्देशहरमेव दृष्ट दिगमित्र इवासनसवस्तस्यैव स्य सोगजस्य पुरः स्वेच्या प्रयियासति, धन्योऽयं धन्यौ चास्य शं गुणादस पुत्र अनितवन्ती यः परय प्रेम्णा देई दादपि निरहदवारः धोपटीया पुरामधुरी परतत पेपोयमाना, व्यापमपि बातनिषयाः अभिरे। । जिनमभूत् भय परिपुरे मासले महिथे। इतस्ततो मित्राणि अन्तिम । एम्पुरको मनो मूरपटा. प्रशान् हरता व परमा राजशामुन मन्दाविपरपुत्र प्रादसाय! प्रस्तानेहा ! मनपान इति । सान्तपिपा शिलमांदर विविधिक विषय समादय महिप- प्रस्मोनितोनिय गरिसचिोरमारागद, शिरीडा- ari भू विनुदान सहनापसी, छोपितला, - मेरा पति मांगता मिना यादमा एस्तो पायो सामना मुटनदुप्पानी कमांतर rface, rन नब निरयन मीरलाय- RE, लाम्, मुसटशात पांग, चन्द्रमहोपतो अवक्षण ऊरः, प्राणिप्रापहारिणी भयङ्करा मनम्खिमानोहोपनी भीषणा सामग्री। स्या- णश्च विरग्य विप्रात्मजं वासरं धानयन, कासारं गता पयः पीत्वाऽधिगत शान्तिः पार करमैचन वराकाय हालिकाय सैरिभ दत्त्वा, शिलामेत्य अपूपादीनुपबहीकृत्याविष्ट । रूप मौनमारलयति पतत्रिपुरे, अन्धकारेणान्धीकृतास्वाशामु, विचित्प्रकाशमाने अजनमिव वर्षति वियति, मृत इवेश्यमाणे समस्मिक्षति, निशीयदीपेषिव विद्योतनाने सद्योतेय, निशीयप्रायायां निशीथिन्यां सहाहाकारं रदत्सु गोमायुष, छानलपाले क्रोशन्ती शिवामु, राक्षसागमनमपेशमाणे, विचारोमिसङ्कले च कल्याणे प्रावलदुपातपातः । मन्दस्या समीरः क्षणेन सूक्ष्मपरसण्डवता दधत् प्राबल्यं भेजे। प्रकम्पनम्मिता पार राहतोशेयमानः पशिभिः सूचयामा राक्षसागमनम् । पयोशितः स दरत एवापश्यत्-अशुभदर्शनं निफेशेन भूत्वान्टिना विस्फोटकरणाहितेन रमकस्य वस्त्रप्रज्ञानोपलेनेवाशिशेन शिरसा, निम्नमध्येन कति उच्चन धूम्ररोमराजिविभासिना मारेन, ग्रीमती यूलान्ता कालिन्दीमित मिले भस्मपतिमिव च दयानम्, विरलयाला धूसरिता प्रफुटीम, शुष्पाभुम्नानणा श्रवणी, करे गर्तगते पदरबोजोपमिते शिकतावर्णपश्मणी वीक्षणे चोन्मीलयन्त भार पूतिगन्धिशिवाणमृतया दौरावेऽयपतनयमवया शासामूगर्भक्षित मसूरियाविणया बभूव इव सुस्पटमसायमानमस्तितया विपुलवालया नासिमोलविता निशिताः शीघ्नं मांसमिश्या वित्तिया वा बहिनिगरालोहितसितांगना पतविक रहनः प्रपूर्णवदनं विस्तृतपुटोमयाधर प्रलम्पमाजि होनहन सरवण मिनीरादुकुरी गडी धन पुयपिणा पापयुभेनेव भालोहितेन बदायों विलेन मश्रुवाछेन स्यामरम्, स्यशमौश्यमाणमय्यूहया मागदनमारल्या श्रीप: विदितमंदन पानेन सदिमेव मस्तिाननेहमयअनेन रशिनि असर परिमसतिन्धना पटनायकन मदरासावितोसोने प्रपठेन नामिनि परमादिविकेशापुटीमोर मनुस्मक मानाविधानमर प्रामनदादाटम्, धमतमागमनिटेन अनिण मारामारनुप्रिमो ने देशव प्रदर्थ भीषयमा विराम इलग सोडा मारिपारपसार गम Tam समुरार अष्टमो निश्वासः १७६ युद्धप्रवेशलिलोभपजानुलया समन्ताद् अमन्मक्षिकं गुष्कायतपाद श्वेतनसमपि स्कनखं भक्षितभुवनमप्यनाप्तभुवनं सततं भुअन्तमप्यलब्धार्न प्रस्फुटविपादिर्क समलकटेवर भक्षितमानवं दानवम्। यमभितः धान इव व्याधम्, कुमन्त्रिण इन कुन्पतिम्, असत्यतीहारा इवोत्कोचिनो न्यायाधीशान, मुनिमा इन पनि मद्दचराः केचिदेककर्णाः केचिद्भग्ननासिकाः कृत्तौछार एम्बोदरा अनेत्राः काणाः केकरा: युशयः शुष्कोदरातनुतनवोऽतनुतनवचोर्ध्वकेशजीत- शूला इश्यन्त। परिपदिय सजनजलपानागस्त्यभूता, नियमयममेघोच्छेदमरुटूपा, वेदेन्य- नासिमा, योगिजनसमुथूटनवाल्या देवानप्रचारनौवरणालयावात्मिका कारण्यप्रासाद- भूकम्पानुरुपा दयाउदावामिसमा, विद्याथिकुलतान्तरूपा, विपुलमुरा अपि सनातनधों- धारकमारकपुरस्सरा आसीत् । भने च कालायसव्युत्पन' भादनावरणेनेव चर्मणा संतशरीरः, परिपुटमासलग्रीवः, रम्याभुप्रविषाणमण्डलो, ललिततिलकायमानमितरोमाज- परिणताऽऽयसपहायितललाट, प्रलम्बपुच्छदण्टेन अमता दूरयन् विश्वसद्भावान, टपरि- विन्यरवेन तैलपूर्णचतुर्वत्तिना खदीपेन प्रकाशितशरीरः अभीकृवेमा सैरिमः सलील सानन्द जम्म साराय विरकारितने सजिवाधामण पश्यनागच्छन् । येषमाइतिरेव सगदरन्तुदा कयं न स्यात्तेषां मांसादत्वं प्रतिसिद्धम् । मतस्ते- पामागमनेन मुसा विस्तयोऽपि निद बहुः। सहसा दीपो निर्वाणवां गतः। प्रगाढे समसि रा सहवरा इन्द्रियागोचरता अम्मुः। सत्प्रवेशदुपांकृतिरजनाकृती राक्षसच शिलासमीपमेत्य सोवन्तं तं महिषानुवरभक्ष्यस्य सिमान्तस्य न्यूनता महिपामावर विमाय नगरदादिमा मोधामिना भीषयमाणः "कस्त रे इत्युच्चैरवीत् । मौनमवलनामाने पतस्मिन् पुरः स साभिमानमाइ-"भुणे : मन्दमाग्यो यो भूपो दोरदिप मा विरगृतमान !ि सन वैत्ति यत्तस्य नगरं मम प्रातराशादायकल्पम् । सत्यं स विशवीरान, मयारि तन्नगरे एषु दिवसेषु नामि । अस्तु, वामधुना १ मुनीम, मुनीर मिन-रिमान्ति प्रदायन्वे-मसंगन्ति धामा मने शळे "पोस्। ३ दिएमा मुरा अभिवायुमा खरो पलामे भार। -बिगुला मुरा-मदिराला साट।

१८० चन्द्रमहीपती दंष्ट्राभूपर्ण विधाय नगरं प्रवेश्यामि, उत्तिर, स्मरामीटं यावदई कुलिंदशक गन्या कराभ्यां त्वा नामशामि।" विपुलोत्साहः स्मित्वा क्रोधोत्समवेपथुस्त्याय सम्मर्स्यन् सोऽनूत-कोऽपि रे! सत्त्वाधम ! किमर्थमुपशिलमागत्य निद्रां हास्यसि ? सपिमि, सपद्यपसर इतः, सिंहस्य मुखनिदाभजको मृगो मा भव! याहि याहि दर्शय पृष्टम्, इति । राक्षसे लश्रुतपूर्वः परसवचोभिद्दीपितमन्यौ कल्याणः प्रबलपराक्रमया दोभगोलक- भयङ्करया दृढया सा गुडाल्गुलिवद्धया सिद्धया मुष्टिकयोर थाहल सम्रौढि अवदन "राक्षसाधम ! समेतस्ते मृत्युः। कदर्य! नाधुना ते विमुक्तिः। तावद्गार्ज चोच भ्रम उच्छल यावन्मम मुष्टिष्टिविनष्टतनुयष्टिमंतिमवाप्यापेतसमीरो विमुक्तमाऽन्यस्मि- अनुपि कस्यचिदरसोऽजिरं न पश्यसि । विपुलाम ! यहवस्त्वया धर्माश्रया देशमकाः मानिनो विपश्चितो नीच! मक्षिताः। विधवानेत्रनिष्यन्देन महीयसी सरसी लया सम्पूरिता अधुना त्वधन्य! प्राप्तस्त्व प्राणहर्ता कर्ता चित्रपुरवासिनागरिकनिकरस्य सुखम् । चिन्त्यान्त ! चिन्तयान्तिमचिन्तनीयम् ।" इति अथ श्वेडानुकारि घनघनाघनष्वानानुसारि दमितजनारि वच आभाष्य उस्लत्याय- समिव तच्छियो दृढेन करालकरतलेनामृदुलयत् । पुरुरोपयोः सत्वरपदन्यासमूदुलितधरपो- मुष्टिकापतनसकुचितावयवयोः सिन्नखिन्नगात्रयोस्तयोः सध्वाने सकरतलपात बभूव तुमुल जन्यम्। ततः स शुण्डिशुण्डामिव प्रचण्ड शिलामिर नीला घालणामस्य माहिषीमिव आयसीमिव तद्ग्रीवा दोर्दण्डेन मृशमाहत्योत्याय गजमिव त बलद्धस्तं श्रोण्यो तलेऽपातयत्। तेन च दिगन्तव्यापिना कणकुहरभेदकेन प्वानेन भीतः पक्षिपूर आख्यातुमिव वियविहारिणं विनतानन्दनं शब्दितसकलपदेशो दिशाखगमद् ऋते केकाभीपित्तजन केकिनम् । अयासी प्रसृतस्य तस्योरसि समुपविष्टस्तुदन् वचनसूचीभिः प्रारब्धमुष्टियष्टिरमवीद। "रक्षोऽपसद! गतीविषाद । निषाद ! क्षणस्थायिनरते प्राणा, स्मराभोम्" इति । परं परमगर्दः स क्रोधाश्रुपूर्णवीक्षणः पद्यां दस्या नखाभ्यां तुइन, नासिच्या प्रबल समुच्छसन, मुख्याऽऽहतो मुनि, फेनमुद्रमन् नसा धिरक्ष, मुर्ख च्यादाय शत्रुतो मान- मनमनुभ्यानन्तविश्राममन्वभवत्। तस्य प्राणमरत् नागरिकमित्रतेव सय एवं अष्टमो निःश्वासः १८२ लम्वेव वीतः। तस्य पाटितमपि मुखं भीधैर्य पर्येक्षत। शून्यः स प्रदेशः प्रहार- कोलाहलेन गुजितः। तस्य लोहचपेटा अमोघाः प्रहाराः सोधे ज्वलती चक्षुषी निशिता दन्ताः स्फरन्तायौधौ निश्वसन्तो नासिका तस्य धीरत्वपरीक्षायै अलमासन् । परं स उत्तीर्णः। तस्य च कर्णनासानिर्गतेन मेदखिना नोलगाढेन पिच्छिलेन प्रालिप्यत दसुधा क्षत्तजेन, दधती अन्वर्थाख्यां मुमुद इव मैदखिनी। भधासौ जन्यजन्यभ्रमप्रान्तो विस्तृत माहिषं चर्मास्त्रीय रक्षौवक्षचोपधानी- कृत्य गाढमशयिष्ट। शशादनवायसारातिव्याघ्राटकर्करेटुककरसकृत्प्राजकाकोलातायि- दाक्षाय्यक्रौञ्चकुरराणां रावण साई वाद्यध्वानेन सविस्मयमुत्थितोऽपश्यत् स यत् तार- गम्भीरं मुरजमृदातालपरिवादिनीवादिनो पश्चिकाच पराजमा समायान्ति । स्वर्ण- सूत्रितकुथस्थमणिटितकार्तखरकल्पनायां' मदोन्मत्तसलीलगमनायां दन्तावलवनितायां वित्रपुरपतिः मन्त्रिप्रमृतयोऽसंख्याताः सुवासःसज्जितवाजिनः सादिनचायन्ति म। कल्याणस्तु सैनिक भासीद् व्यवहारानभिज्ञः, युयुत्वयाऽऽगच्छतस्वान् विशकमानी विकोशासिालीढमर्यादयोदतिष्ठत । "देव ! स्वागतं विनीतभावेन विधेयम् , पुनरयमस्मरत्राता सविशेष सत्कार्यः, अतः पभ्यामेव चलनीयम्, अन्यथा को जानीते किमाचरेदेष युवा" इति मन्भिणा प्रतिबोधितो इस्तिनोऽयतीर्य करकलितपूजापात्रो मन्त्री राजा च तमभ्ययाभास समारोहण पुरमानयच । "वीरवर ! देशस्य दुखमपनयन सपरिवार राजानमेव न हि सकल देशमेव यशी- कृतदानसि । अस्मद श्रं विवश वकीतिलता देशक्षेनेक्षयां कृतकाधि" कल्याणः-आर्य। बहुकृतकार्यमात्मानं भवत्प्रशंसितं श्रुत्वा जिहे मि। क्षत्रिय- धर्म एषः। का नवीनता। मन्त्री०- महा महत्त्वमेतद्य दैववर्य कर्म कृत्वापि न प्रमाद्यन्ति । कल्याण:-केन सूचकेन राज एतत्कष्ट दत्तम् । मन्त्री-विपचितामपश्चिम। जगति जना बनानदितान् वीक्ष्य प्रहृष्यन्ति । ते चावसरापरदिने तत्र “वर्थ स ह्यो हतः"-इति दिदृश्या यान्ति । तैश्च भीरभिरद महता प्रयासेन राक्षसो मृतो मतः। ततश्योपहार लिप्सवः क्षतजेन लिसदण्डामा १ कटेहा - लो।

चन्द्रमहीपतो
राक्ष राक्षसमारणं सूचयाश्च। केचन दलमायोज्य वासासि लिप्ता "अरमाभिः
स देव ! प्रसह्य हतः" इत्यपि प्रोचुः परस्परं प्यवादिषुः। महाराजमुखगगने नवीन
ज्योतिरुदगात् । मानससमुद्रश्योपहारतरशाः कराभ्यां निर्जग्मुः। प्रामाणामधिकारसत्रय
लिरितानि । सर्वेषां मुष्टयो भारताः ।
अहं विचाऱ्यांवोचं "देव ! किमयं निर्धनीमियते कोशः। अत्रत्या एवंने न
कदापि व्यापादि राक्षसोऽप्रस्थैरेव । अद्य किमेषु देवं बलमुपेतम् । देव । यदि
राक्षसो मृतस्तहि अनन्यसाधारणो हन्ता तत्पृच्छतु कस्यावसरः कोऽगमत्" इति ।
तत्र थ व्यतिकरे भवदमनं भवच्छयनय विदितम् । अतः परं यजात तशाप्त
एवं श्रीमद्भिः।
कल्याण-आम्।
मन्त्री--कस्य वंशस्य विभूपर्ण देवः ।
कल्याण-राधन्यकुलप्रभवोऽहम् ।
संसरगे यदामोभूगरनारीभिः कामयाम्भिर्मधुरादावाग्मियाद्रियमाणः हत्या
सज्ञा रामभवनमानीतः।
यसमेतनगरनिवासिन एवं नहि प्रान्तीया भरि यमूदिताः। मानवमी परेर
सासरक्षिा धागन् । सौ जनः प्रान्तप्राणदातुर्दर्शनाय भापुरल भासीत्। एप
महराजेन सह राजमवनम्य गाजे स्थिनो जनसमूह नन्दपामास । विनर
विदीया छोकचभूपि चमार्दन् । महारामचलोसम्योप्या वनविगारा
महारयेव प्रावोवत्-
घः प्रतः! अपतन दिनमामजीवनस्य प्रदीतम दिन वो नहाने
कमाया के गाय महाप्रभारय यून भामा प्रदर्शनमो मनो मनोन
अम्माधिमा यत् प्रत्यय यमायममगादपमः।
राधा न पटीति गर-स्दै। Ar
पर ममयः मानव लाश जमिदतः। तर पुरयमम
पनि । मोजा मंदिनुमति। मगना मदत
,
मात्रकार बनत
MP
m

अष्टमो निःश्वास -चितम्। अस्माभिसरात्म्येन तत्तुलपरम्परया सोक्तम् । अन युवानं वीक्ष्य अनुतनो लज्जितवारिम, अतु इतः प्रगति भयमेव प्रशाना शासकः। लोकस्य न्यावं योग्येऽधिकारिणि समर्प माररहितोऽहं नितरी प्रधीशमि। भवीननरपालस्यासने - विधमानन्दमनुभवन्तो भवन्तः प्रेयः यथाप्नुवन्तु इत्यस्तु मे शुभाशीर्वादः इति । महाराजः स्वयं स्खमुस्टं तस्य शिरसि पर्यधापयत् करवालं करयोरादायार्पयत् , चामायालय सर्वतः प्रधर्म ध्याइयत् । महाशय, अधुनायं नितरां वृद्धा केवत नाममात्रेण राजा। केन्द्रादेशानुसारिकार्य- निर्वहणे विवशः किं करोतु पराकः इति । अथाह प्रधानमन्विणं सम्माय्य वामगबटुनाऽऽलपितुकामस्तस्यावासं गत्वा यमदूतो- पमैश्चतुभी राजपुरुषैः कृतेक्षणं सलावदपदं सहयोगिभिभविष्यकाममायालपन्त- मनितरसाधारणवैदुष्यमनालस्यं कर्म कत्तमा डयन्तं विप्रयुवान पीय तद्वावमुग्धस्तस्योदेश्य विभाव्य तस्य जीवनं परमावश्यक मन्वान उदघोषयम् :- "मान्याः, शासनस्यान्याय्य पर काटा स्पृशति । परोऽपराध्यति दण्ज्यते चार अस्मदीया एव प्रान्त्याऽस्मान् हन्तुमसराः। कर एव गलमपजिहीच्चेत्कथं जीवनम् । अस्माकं भ्रातर एवास्मान हन्युस्तदा कथं जोविष्यामः । भरमाभिः प्रतिज्ञातव्य वर्य संघटिताः शासनमनुकूलयिष्यामः । एतदर्थमेका रिचारपरिषत् स्वतन्त्रोपवने परेधवि पचनदनसमये भविष्यति सः सभेतव्यम् । एतदाद्यानय सर्वेभ्यः भावयितव्यं येन्गधिका जनाः समागच्छेयुरिति ।" पृद्धायुपगम्यावोच “शोकं त्यजतम्, अहं भवत्पुत्रमन्यांश्च कारावासित उन्मोचयिष्यामि नो चैत्खीकृतापरायो भवत्पुत्रस्थाने शूलमारोक्ष्यामि । अहं कथयिष्यामि यन्मम प्रवन्धो मदाज्ञया मयि रोगप्रस्तेऽनेन पठितः। पाठको निर्दोष मक्त्पुत्रस्य रक्षर्ण देशस्य कृते परमावश्यकम् । धन्यौ भवन्ती यो स्वार्थ परित्यज्य देशस्म निर्माणाय स्वातन्त्र्याय च प्राणापकं सुतं प्रासुवाताम्। भवादृशामाश्रयेणैव स्थिता भूः" । प्रयोदशपलन्यूने पचनदनसमये स्वतन्त्रोपवने मनुष्याः स्त्रियथासम्मुः। धरिणी मानवान प्रसवमानेच प्रतीयते स्म । पचनदनघण्टापोषण सममहमुत्याय सभापतिपदाय जनपदगुरु प्रस्तूय पार्शमचे स्थापिताया भारतमातुः प्रतिमाया गले पुष्पहार समविचम् ।

चन्द्रमहोपतो समवेतसहयोगिनः! मुहर सर्वतः प्रथमं सं सर्वया निरीश्यामाभिः प्रतिशतव्यम्, याई खेन्छय भारताय तस्य से वायै सतायताये टनले च समर्पये। एतय कशापतो दृश्चिकः तोदा कारावासो मशकानं परिजनैवियोगःशया द्रव्यदग्दो मृत्युव मन्निये प्रतीक्षित मशकाः। सायं परित्यज्य देशहिताय वर्णवर्गधर्मनिरपेक्षः कार्य करिष्यामीति। यूर्य सर्वे भारतम्याधिस्तयः, सतवेभारते सर्वस्य समानमुत्तरदायित्वम् , इदमनु भविष्यति मदहमाशापयामि, परमहं भवद्विनियोजितोऽनुशिष्ट सहयोगीव निवेदयामि । अस्माभियंयाशक्ति संघटा देशस्योत्याने यतिव्यम् । वृदन्तद् विचारतीचे यह साधीनं भारतं द्रष्टु का स्थास्पति-एप विचारः कर्मणि शैषियमांदसीन्यापादयति । सर्वेपामस्माकं कर्तव्यं यद् ययमरमजीवनसर्वस्वं सतन्त्रमारतस्याधारशिलाया अस्तव स्थापयिष्यामो यत्र कोऽपि नेक्षेत। अद्यतना भोगा भस्मद्वान्धवरजसिता हाव्या अवधार्यताम् , परतन्त्रतायां धृतादनात् स्वतन्त्रतायां घसादनं गरीयः। मरुमनि प्रता घासमेव जघास। विश्वसन्तु, एष दासो विषये पराजये तेजसि तमसि सुखे दुःखे सहैव भविष्यति। अहं किं दातुं शक्नोमि, ऋते सुर्धा तृपां धर्म खेदं क्लेशं मृत्यु या। एतबीवन भारतमातुश्चरणयोर्पये। मुहदो मातरो भगिन्यच संघर्ष चालयितुं धनस्यावश्यकता वर्तते । निर्धनो समर्थः यातुमघटने समये । एतदर्भयुगम्। अर्थस्याय महती प्रतिष्ठा। धनत्य प्रतिष्टोन्मूलनमस्माकं म्यम् । पर नाय तस्य समयः। अतः कष्टकेन कष्टकमिवानेन परतन्त्रतोन्मुलनीया। अस्माई कार्य न परलम्। साँ दीर्घकाला कठोरथ सम्भाव्यते। नवनीताभं न भवति अपि तु यामम् । यत्र स्त्रीणां चौकाराः शिशूनामातनादार वृद्धानां तकेयाः अत्र द्गमं कर्तुं न शक्ताः। अतः सर्वसाधनानां ग्रहोप्रमाभिः कार्यः। अरमाकं भ्रातरी भगिन्यश्च करकरवाला भुशुण्डिकामादाय सर्वविधाः परिस्थितीः विरोद्ध समर्या भवेयुः, यद्यपि नारमा यस्प्रेषु विधासः। परं क्षमाऽपि शकी त्यामेव वरीयसी। भारतस्य परिश्रमरियाभिः प्रजामिनदमाश सितम्यं यत् परेषा शासकस्य हद १८५ अष्टमो निःश्वासः छलेत भ्यसनेन सुण्ठन्तो धनिनः, साम्राज्यवादिनः शासनस्य लुण्ठने साहाय्यमा- तोऽस्मत्साहाय्य करिष्यन्ति। निमिः स्वार्थ साधयितुं सलक्ष्यैः साम्राज्यलोलुपः सम्मिल्य विवस्यामदाता कृषकोऽमाय परमुखापेक्षी, विश्वव्यापाराय तन्तून् वयन् वायश्च तरण्याः पुश्याः लजाय वासांसि याचमानो विहितः। कारमयविश्वकर्मानुरूपं दं निर्मायापि शकरवासं बसन् मत बाधितः, ८ एवं समाजस्य कलङ्कः खार्थी का इस शासनस्य घटक स्वस्य साधारणमनोरञ्जनाय लक्षशो रूप्यकाणि प्रवाइयति। न्यायो बदिने यावन् न स्थास्यति । आधुनिको धनी ज्वालामुख्या क्रीडति की घोऽभवहितो निश्चित पतिप्पति। किं सम्भाव्यते सोऽस्माभिः सहायिष्यते ? माकं वे हसिष्यति, साधीनसंग्रामापी दत्तपत्याहुतीरवहेलयिष्यति, लीयोऽपि स्यरत प्रेमा अंशयितुमेषिष्यति । साथिनो देश्या वा स्युविदेश्या वा स्वाय रकं पोषयतां धनिनीया मान्तरम् । गृहीतधनस्य कणाः स्वतन्त्रतामन्दिरस्य पथि विवरिष्यन्ते, भारतमानुचरणयो- न्तेि इति। मास्थले विशेषतो विषयाः खिय भासन्निरलङ्करणा नराम, तथाप्या- * পুষ্টিমাপুৰু লৰ ফাংলা: লােভাতামাশীষ । परमनेन स्त्रीणां तृप्तिन खाता, साभिन ज्ञातमासीद् यदा धनसंप्रहो भविष्यति, (रदिने सभाय भाजगृहुः । तासामाग्रहेण द्वितीयस्मिन् दिने तस्मिन्नेव समये सभाऽभूता। रस्य सवात्रियोऽय भालता इस शेयखण्डेषु चहत्तमात्याभूरणान्यावथ्य सम• बोपेताः। तासा मुसुष्वदेवा विलक्षणा देजोमपी छाया ध्यात् । आभूपवाना भूयाना राजधानां सौवर्णानां भाइनानास कूट भारतमातु परणयोजतम् । उपवास बसन्तान प्रशितवत्यो बालिकाः पुलविताः प्रपरबारक मुल्यो मसः साई बासमदानमा सन्धमारतवैदिधायो जीवनसहित यः। निदरा रुस्ती युपति समरम्म मुजमुबारिता अशानियः सनास पदिसल्या गोत्र रसा मयता खरेच प्राबोधयन् सदस्याः सरल १८६ चन्द्रमहीपती मुशीलो युवा भर्ती राजद्रोहापराये पद्धोऽद्य शूलमधिरोपित इति। "हन्त, हन्त," इत कोलाहलः सर्वतो गगनं व्यनाश्यत् । अपूर्णारतलोचना रमणी र ससौमायसिन्दूरेष सह रत्नखचितं चचत् शिरोरन्नमजली कृता भारतमातुश्चरणयोगप्पंयत् । सत्यम्, ईदृशदेव्याश्चरणरेणु होतु देवास्तपोरता मुनयश्च लालायिताः। एका पृदा स्खलन्ती एकेन हस्तेन वक्षसारिल2' चित्र परेण च दई दधती समेना। दिमस्त्रेता सारुदत्यवोचत् "एतन्ममैकमात्रस्य पुत्रस्य चित्रमस्ति । अस्य रिता महर पण्डितो विद्याव्यसनो मनखी निर्धनी युवावस्थायामेव देहमजहात्। तस्यन्ति मेरठाऽऽसीद् यसरय पुत्रो महान विद्वान् भवेत् । निशा पत्या निषिद्धाऽऽौत तवन्या पुत्रमानसे निम्ना दयनीया भावना न भवेयतोऽहं यनात् शुक समानीय विक्रीणन्ती सुतं पाठ्यन्ती जीवन्त्यासम् । एकदा मम पथदशा निर्भर भाषमाणो माणवकः शायनेनावः। एको गौर आयुषः सह दशभिरन्यै रामपुरी शिएमाझ्यावदत्-“वन्दे मातरम्" म वफव्यम्। परं विष्टरादयोऽदम्योरा तस्याने एक तरम्परेण "वन्दे मातरम्" इत्यवदन् । पासिरधिसरी कसयाऽऽहन्तुमादिदेश । विद्यालयस्य प्रापण एका प्रति गदायमानाः कशास्तस्य हमलकोमले हलेपरे निपेतुः। एतान्तरं माय वाला भोजनमादायादमप्युपेता। स बन्दे मातरमिति ध्ययन भूमी पटिरः। देन का साइन ननुभूतमासीत्। तस्य लयो निर्माण र पारे । शनानः वन्दे मातरम्" बदनु स बीवनजल भारतमानुवरणयोगायन। पर सिंददितः पिशोर सौरतलहन मामिनःप्रियता भार भने । जानना पदयन्ती सोमनविदा स्वगा उन्मसेव विहारिनेत्रा शिकोतरे जय मला । दिनयतन ममेटने मर गूगा भा। गरी सोना पतमामपुरमदमनन्ती अमी। राम र साग बन म्याग , मनियाई पुनर्गना। दम्य वि मुर्ग मर Rm Firf मनोमा: TERE, reader मन मा इमारी से एमो निःश्वासः सन् । शाकिरोन सो जनः पुष्ट रोदिनुमारेभे। भतीतः नेत्रद्वारेऽमान् नामासिवाड, ईरय मापस मानः काबो मतः। चित्रान् मनस्थिता जमा भुपनि सत्ययोः गोले च प्रगतमासीत् । पदया चित्रं सौवर्णी शाखा মহাস থি। मामुपयायोचम्, ययमवार्य सफला भवियानो माश्यः शरणागतोनातरित्राण- पमा दम्मा निवान्ति, तर भारत कर विपदेन ! पाभिः पतयः पुत्र भ्रता स्तिरः मनाथ शासनकादिवासामारोपिता भाहतार, arl भारत कथमनसादेन ! पते पापन्नेको युगो म परमदात्। अहोरपाटय जननामधापम् मयूराम प्रथमे रिपोरमेऽरमाई भारियो मरिष्यति । अस्मदवसानमनु रासमोसमीस्तरमेति। भरमाई जीवनप्रदीरः प्रतमणी विग्यते, धमारे पटवायो माया परमानीया विचाग विमिन् विपारेगाव- सानो र सन्ति । भरसक मुश्मिर माम परि निस्ता नम्। सनवालारान् परमासाय थापिनुमभियोगोडसे योग्यः। सेन को साथमा र सनुरोध निवेदपि यो परस्टान- Mehan मुसाnिfeatu भालोमा सार्प Pearcreatori मानगो न भवियत । मनुम्म सागर निभायमरपति। को सो भूकममममम समपरमि- दाम्। me rurarith ' सम्मान men we तो मानो Teritman rerature मार एF न परामर free are मनटेरनारस। हारिरदेश * * भ्रमयन्ती विरक्तिपदन्यास! हन्वधः शिरसि मध्ये च हस्तं न्यस्यन्ती अगुवजन्यौ प्राणयन्ती कदाचन मुश्या हस्तौ संयोज्य विभजन्ती उत्तरीयं हस्तयोरदाय वातगेन १८८ चन्द्रमहीपती समागमो यद्यपि सिदान्तविरुद्ध मासीत्, परमश्चनजनारिहानाय, राय कारवारे प्रियमाणेन्यो लोकभावनामधिकारिभावनःश समागमनपरिहल्यं मत्व विहितममयास्तस्यावास गताः। ग्रामसीम्नि कस्यापि समानशीलस्य पनिनो विद्यालं भवन देन वायत्तीकटमर्मत् । तस्य विशाले सभास्थले कुमुमाइमलायरेणु पुण्डरीकसिनेषु सहस्न्यः काचना उत्पभाः प्रदीपाः प्रयोतन्ते स्म। अभित उपविटाभिदायस्यामाभिरप्सरोभिरविष्टः मिन्दपुरीमनुकुर्वति सभास्थले नगरस्यानजितपना घनिनः कृषकोपावितपय समन्टा उत्तोचिनो राज्याधिकारिणय कौशेयासनेषु वृहदुबईपृष्टाः म स्विन्तस्ताम्बूलं वपन्द्रः पतद्महे निष्टीवन्तो धूममाकर्षन्त पारन् । मध्ये च विलासलीनः सलीमः। गृहोतमु द्वारपालेन बहिरेवासूचि यदुपरयाता महोदयो गानसमातिसमकाम- मेवान्तःपुरं प्रवेश्यति, आलापेच्छा चेत् प्रतीक्षितव्यमेव । प्राप्तस्थाना हृदये शोकशल्येन विद्यामपि गानमये उपविष्टाः। अर्थकाऽऽनसशिखान्त रनसविता नर्तकी निःसरदनन्तचन्द्रा पौर्णमासी विशेष मसरा अनन्तश्चत्तारासमायुक्त पारवताम्बरं शिरसा पहन्ती स्यूतरननवनीतकोशेषरडतका विद्युल्लेखेत मञ्चमुपेता। सा जानुभ्यामनि गत्वा वृहत् कमलकुड्मल हनुम्पर्शन विकाश्य अअलावादाय स्मितेन सिवयन्ती सभास्थलं जनसाधुवादेन साईमुषस्थानु- थरणयोरार्पयत्। पार्थपतितो ज्ञातं यदुपस्थाता महान् कलाकारोऽस्या गुइथे। गुरुवन्दना। सा प्रतिस्पद्धिभिरनेकर्वणविकार्दशिकैरनुखरं प्रकणभिरनुगता ह. परस्परं योजयन्ती मण्डलिवचधचण्डातका भलसकचित्रितहरूतला विद्युदिन घर यावत्या झन् तनपुरा कदाचन चूर्णकुन्तलान् स्पृशन्ती कदाचन झणझणायमाना रसना रतिवजमिव प्रसारयन्ती पाइतलेनापि सार्क रवयन्तो चक्षुद्रया विश्व विमोयन्ती पदमविलासविमासिसौन्दया मुद्राभिरेव गानस्यार्थमुबोधयन्ती सप्रभमुखी ओठमुद्रा वयं कोगे क्यानी अय अष्टमो निःश्वासः भाव मानवमानसे उनियन्ती प्रोता मध्यच वलयन्ती कमलकुड मलायितावुरोजी ती कजलाक्षी प्रलम्बकृष्णकुन्तला दीपशिखातिलका साझवि मूत्यन्ती राम मनो व्याकुलम् रात्रिन्दिवमलि! मिलनं चिन्तन्। (स्थायी) शीतः सान्द्रो वायुति विद्युत् पत्या सह चाभाति मोपितपतिका मुग्धा तरुणी घनघोरपदा पश्यन्ती भृशमेतद् ! उद्विजते । मम मनो व्याकुलम् (१) प्याराादीपं हटा अङ्गनमध्यमदो उपविष्टा सना भूपावेषाधरलि! द्रष्टुं श्याममुषं भृशमुत्का सुविलम्यो मां तुइते । मम मनो व्याकुलम् (२) गयाक्षणमधुरालापन- इतस्पर्श: प्रेमोत्पाद्य पलं निद्रा हत्या घरायन तारा: गणितुम् प्रियतम! स्वरमेहि। मम मनो व्याकुटम (३) २६० पन्द्रमहीपती उभयतो स्वाभ्यां मवनीतवरहातमुत्याय ननननन्न पुग अदुटियोदय कामकोटिं परायन्ती विद्युल्लेशेव दागस्थिरा आपततो भ्रमरछन् कोमल्यतम्बाभिरतपुर लिभिर्मध्ये मध्येऽपसारयन्ती धर गुन्यच पुष्टसाहल्यैन शिरसि मटमुद्रा रान्त धपा कार्यमूले नेप्रपोच हात विन्यस्य विविधमा प्रहारायन्ती मामे मध्ये काम युसमयन्ती मोहिनीव साज । मध्ये भावोदोघनाय शतविलम्यितां गतिमाश्रित्य आरातिकमुद्रा का प्रकल्प त्तदा भित्तिरिष्टकाचारि धन्यवादान् व्यतरन् । मदोन्मत्त उपरपाता सर्वेषा समक्षमेव प्रदशितानुरागस्तस्याः कम्बुकमनीय उचतवन्धुरे कन्धरे सप्ताबलिहारं सहस्रनामध्य इस्तमायोज्यान्तःपुराभिमुख गन्नुमना अभाव । एतत्राख्केतेन सर्व एवोत्याय अपसन्न । अहध कथमपि जनव्यूह प्रतीर्य तमुपेत्ल अनभ्यस्तदन्योऽपि तं प्रसादयन्नवोचम् "स्वामिना समयो दतः" इति। पर मैरेयमतः कक्षीकृतकामिनीसमुपारुडगर्यो विगलितदन्तस्थ्यवदोष्टोऽस्फुटवार भर्सायन्नाह-"अपेहि नायमनेहा"। अयाहं पहिरुपेत्य सहयोगिनः सूचयित्वाऽचलम्, द्वास्थः पुनरुपहाराय हस्तं प्रासारयत "एतादृशस्य घनिनो द्वास्थस्त्वं किमु भस्मान् खेदयसि ? समुद्र के बिन्द स्थानम्" ! अहमवोयम्। "क्वात्र धनम्। स्वामी प्रतिमासं पविशतिमुद्राः प्रामोति शाधनवः, व्ययन प्रतिदिन पधशतम् । वर्षयं व्यवीतम् , मासिकं मुद्रात्रयमेव न लभ्यते। शिरवा पालनं भवाशानां दययैव सम्पाद्यते" स उदतस्त् । * वयं समयात् पूर्वमेव न्यायालयमुपेताः। वाकोलस्यान्वेषणमारब्धम् । तत्र अन- समुद्देऽज्वेषणमेव दुष्परं नवीनेन। परं तस्य लेखक उपलब्धः। सोवत यदय गानवाद्यरसिको वाकोल उपवनभोजने करया अपि गायिकायाः सम्मानमोजने सम्मिलित इति। पचपदसमुद्राः गृहीत्वापि देशसेवकाना प्राणः कोही विचार्य मनो धृणया पूर्णम् । न्यायालयो सनसमुदयेन परिपूर्णः । अप्रामस्थाना बहिरजिरे पक्षाणामालवाले अरमा नि:श्वासः १६१ 'গত অধি। এমই স্বাগৰি মধুৰ বিচন্তা নিৰি4 । राक्ष श्यामानमवार I भिक नामवरिशवाय तेषां भापनिया MI बसे रामा भAT कि परामश्या ! पररप्ये मितिभियोग- पर रोषनागीन् । सानियोजितो पला अर्थ पाराधिना मनभियोगबाबहन भोदिन। विभिन्नारा प्रस्त बार जनोतर नये प्रतिशत पानामदीया- भिलिभिरन्तरः सीपुरा प्रधानन्याधीनी रायता- याप्प परदिनाय धरण पदकम् । नमा हामोदर, भyा प्रायः प्रात: प्रतिदिनमा सो विषयमा पनि सामा। म मानिधन। SARITE रतिवमुना n Men माम् । र कारपुराणिक समय सम्म लामा Em भाषाम• सपने मरता मरममा Receive पोरRTRY मसभा hrestment kaar | भरतपुर म HTriaRekki Trrrry riyra rm - Liter rt art trent wrent rt Treer Ras | १६२ चन्द्रमहीपतो अद्य समस्मिन् नगरे सर्वेषु कर्मसु हरिताल' प्रस्तम् । नगरस्योबुद्धयो न्यायम मुपेताः। कारावासिनः सैनिकसुरक्षिताः समये समागताः। कारावासिनो सहरूमा अधिकाऽसीदतो दर्शवागन्तुमाज्ञप्ताः। आगतमात्रा एव ते "वन्दे मातरम् "जया खतन्त्रं भारतम्" "उत्क्रान्तिजीवतात्" इत्युद्घोपैविष्णुपदमेव व्याफुलयामामः। असा त्येयजनगलनादिना यानेन न्यायसमिरासनमेव दोलायितमभूत् । कारावासिनः पुष्पमालाभिराच्छन्ना आयस गृहमानीताः। मृतभुशुण्डीकार्य सैनिकानां पक्तिरभितः सनाऽऽसीदेव । शासकीयप्राविवाकोऽभियुकानामपराधं पुनः श्रावयामास । (१) अभियुक्तर्म ग्धा जनता महाप्रताप राजानं दान्ती कारिता । राममोहः । (२) सभायर्या बहवो यथा जाताः। नरहत्या। (३) दुर्बलमनयां मनस्मु दुर्भावना सध्पर्षमायनायोत्पाद्य वेषां दुर्गतिरपेय प्रजाना दौरथ्यम्। आदिरादिः । प्रतिदिनं होराटकमेतकार्य प्रचलदासीत् । शतशः साक्षिणो भारतीया श्री स्वतन्त्रतासहरिणां विरुद्ध मुद्दालोमेनागत वा सजाः स्थिरीता असन् । र योगोऽयमादशभ्यो वर्षेभ्यश्वलन्नासीत् । अपराधियु बहवो राजपुरः पर्ष हानि दहमलान्, फेवन नणाशिनिसालयेषु न्यारान् । शासनस्य विशप्लक्षामुद्रा भीमर ययिता भारान् । पर कार्य निर्णयाभिमुर्रा नासीत् । अतः शाराने का विशेषा परि परिता सीता अतः स बल पर्यः समयोऽस्मिन् कार्य लाभासीत् । पणिपुर प्राप्यभिपोगे बीवन समेतम्। अन्ततोऽन्तिम प्रतिपरीशदिनमभ्युपेतम् । न्याय गाना मण्डल परायिनामिक्षानभिर्मगृशमारियनः प्रलम्वन प्रासमान प्रीवामन्यनेर पदेनोसनेप्रेण मगिवन्धष्टी पश्यन् सम्मानिने उस्मये को पासमा पापम् । सम्मुन एक पारिवानामासन्यः स भन्। पुस्तोमु उदरणगौविचार दमासमा मह मिसनप्राशसोदाः पररासाय , मंग्यूट योगद हरित समायोय सूचन्ति स्म “हामप्यारमा सो मवर। नाई वायरसः। तसम्मान समयमभा। ३ ।

अष्टमो नि:श्वासः १६३ युपेताः। भरमामातासहस्रमुमोऽी कथमपि लब्धावकाश! स्खलदुपनेप्रः स्वेदनातः पुस्तकीकृतचतुरागतः। होरावध्यं यावदन्तिम प्रतिपरीक्षणं जातम् । शनिर्मोकमोचिनतर्म न्यायालयाजिरं मोहयामामुः। शेषेऽस्माकं त्रिविक्रमरण्डित सीत् । जनकरतलनिना वद्धिदवाणीप्रवाहः प्रचुरोत्साहः कृतसंनाहः स न्यायाधीश- लाभिभुषोभूत्वावरत् । सर्वे धोतारचित्रलिसिता इकाभवर। यश कदा जनकरतल- निस्तानबाधापयात् । वस भाषणस्य सारमिदमस्ति । यदि कथन स्वधातर शिक्षयितुमुझेतु स्वावलम्बनाय स्खोमत्यै वा प्रयतते सकिं अपराधा ? देश स्वतन्त्रयितु सेवकसंघटने तेषो कर्मक्षमतोसादनश्च वो नैतिकमुत्थान । राजयोः। शासनस्य प्रणाली समालोचपन् खस्थताः किं द्रोग्धा ? उत्कोचिना नार्थसाधनाय परान् पीडयमानानामधिकारिणां समालोचने कि राजद्रोहः ! संख्याता नरा नार्यध्द कारासु निगडिताः, बहवो वसन्ता बीतास्तेऽश्न ताभियोगा एव रामु खोदन्ति, राष्ट्र देशामायत्यै चिन्तितम् । भारत स्वतन्त्रयितुं कर सहमानेभ्यो यदि दण्ड स्यवे, यार तेऽधुना दण्डमेव मुन्ति बहुभिः कारासु कष्ट सहन्ते, तेनात्यधिका वरोधिनी भावना भारतीये जागरिप्पति, येन शासनस्य महती हानिः सम्भाव्यते । सोन्नतिः सात सर्वतः प्रथमो धर्मः। देशभको देशेवरतार्थ यदि मनति तसमकोऽप्यपराधः। भय नागरिकाचारोऽवः सदाचारोगण्यते। अत एते निदोपाः। भारतमोजारावालमाश्रित्य नि.सतोजी शिवरामो राजनीतो न कापि सापराधो गमिडः। सोनपैकवाचन सधर्मसिद्धान्तप्रतिकूलमपि हमाप्रपन्न हेपो गम्यते। स्थानुनय सरो चन्मसिद्ध ईसरदतोऽपिचर। सनरहल्यापराधी या घरच्या परान् मीत्य मारपेय प्रहान् सफलो भात। थार्यम्। शासनविहिता सामोशिशरेषाप्यते । स हि शासनीयराजपुरुषः कृतः। अतो भारत्ये- मनोरन िदोषः। मास्क मर्यापयामेने सर्वथा न्यायस्प परिपाटमा पालनबालम अपने माता सापोशाना ते समुस्दिमासीत् । परीक्षपतिरोन भयोगत धापन। हेन नामाभिटोमाभूत् । पर व्यापार ते एरे। दादी निराधोदपोष विठी सकारा- १० १६४ चन्द्रमहीपतो वासेन पाती परवर्षकारावासेन दष्टिता। करनु निवसतां दन्डः समास भासीत, अतः सर्वे तत्क्षणमेव मोचिताः पौरप्रतिटनस्य विशलं भवनमुपेताः अनन्हे- सोल्लासं सत्कृता रामायेव चित्रपुरमायाताः। कात्तिकृष्णपक्षः। दीपावलीमहोत्सवो बहुभिर्द व आसीत् । मृत्युनुवं दिशा कोऽवसर उत्सवस्य ? सर्वे दोनवदना अल्पिताशा हतोत्साहा हीनहासा दृश्यन्ते स्म, देव महोत्सववात्तवात्तिकरी। सर्वेषु कारावासिधु मुक्तेषु राजाजयोत्सवयो। मुबा- कारिणां कारुणा महर्षता सम्मन्ना। रहोरात्रं गृहाणि धवलयद्भिर्भोजनवेलैव न लया। इतः पटरागिणां काष्ठरागिणामप्यमानः। सर्वेषां मुखे मनसि चनन्दः। सदर्श करौ पादौ च परिमार्जने लगी। गृहा अवकरनिकरव्याप्ता विपणयबाय सारकूट- मुदगिरन् । पौरप्रतिष्ठानस्य मृलाः सरणिसङ्करपरिमार्जनायां प्राचुर्येण व्यमा अनवरतं महिपैगर्दभैर्वहन्तो व्याकुला आसन्। नगरे नवीनं जीवनं समेतम् । मुघलय है। रागरक्तं चिपचित्रितस्तैलस्निग्धैः कवाटय नगरं विचकास । मलिनं मालिन्च ईया गर्तगतमभून् । संसरणानि जननिरीक्ष्यतां भेजुः । महालक्ष्मीरानी प्रदोष एव गृहेषु विचकसुदीपावल्यः । विविध यस्ता पडतयो संसरणं दीपयामासुः। विलक्षणरागः प्रकाशः प्रकाशते स्म। कान्दविवाद प्रसादयद्भिालामाशोतयद्भिः वर्णरचतपत्रलिप्तैः सवैचित्र्यं न्यस्तैः काममभूषा : मामिष्टान्ने विमणि पूर्णयामामुः सौन्दयंग। इतः फलवितारोऽपि दाडियसन्नीरता स्वरजितपिठरा पुरपानार्पयामामुः। वस्त्रापणिकानां विषणयोध्य प्रोज्ज्वलाभासबसे दीप्यन्ते स्म, येषु पटपमा द्विगुणयन्तः प्रशाशा अवलम्बन्ते स्म । मनोहरमजूपसु कि स्वर्गरमतभूमणा भाविकतारश्च पशुशियन्ति स्म । ताम्यूलिकानां विपणिध्वर मेला इस लक्ष्यते स्म । तेषां पातवियश एव दुईमः । परिणाम परिदेविनो आतदेविनय राभाशयाऽदीव्यन् । युगपदचनौद्भास्तेया कोलाहल आसारामपि प्याकुलयति देषु केचनाहसन् , परे उदासत । अभितो वेष्वनयः धूयन्ते स्म। विमदिना भान गाका गन्ति स्म रमणीभूषणशिजितानि विजयन्ते स्म । पटवासबासितदसनाः पारालापाटिलोमा पुश्यन्ते स्म । यधारति सम्मन्नोम्भूदत्तकः ।

अष्टमो निश्वासः १६५ अपरदिने सभाभवने समासीनेष्वखिलेषु सामन्तेषु, प्रतिष्टितेषु नागरिकप च, वाग्वि- तारकयन्त्रेषु व लग्नेषु एकस्मिन् वर्णासने स्थिते मयि सबायर्या च समज्यायां राजा माजसिहाधनादुत्थाय सभ्यान सम्बोध्यावत:- प्रियाः! सभ्यः । विदितमेवैतद् यनगरजनमनःसरसिजविकासकरय वीरवरबिरी- चनस्य श्रीचन्द्रकुमारस्य स्वागतचिकीर्षया भामारप्रदर्शनमिषेणैतस्य महत उपकारस्य कृते किमपि देयमसमीक्षमाणाः केवलान् साधुवादान् दित्सामहे, इत्येव महोत्सवस्य विषयः। महत आनन्दस्यावसरो यत् धीचन्द्रकुमारो वीर्यविजितेन्द्रस्य श्रीनवेन्दुपालस्य पुत्रो विमलपुरनन्दननरेशयोश्च जामाता विद्यते । प्राणप्रदाने प्राणदानमपि स्वल्पदानम् , परन्तु 'अदानान्मन्ददानं श्रेय, इति इत्वा कामपि तुच्या सकृति इमारवरणरेणोरारावाधारये। श्रीमन्तो जानन्ति यदस्माकं पूर्वी महाराजो मावेजोऽतिशायित्वेन पालकत्वाच राज्यं दत्तवान, ते गुणा अद्य मयि होनाः, उपनयतिवया अहं प्रजाः पालयितु सर्वथाऽसमर्थः । अतोऽह राज्य लोकस्य न्यास योग्ये सर्वधुरीणे समर्पयन्ममैकमात्रसन्तत्या राजकुमार्याचम्पायाः पाणिपल्लवमप्युपहरामि । अनेन कर्मणारमा पूर्वस्य राज्ञः प्रणाली पालिता भवति या नितरामुपयुक्ता इति । प्रशंसता जनानां साधुपादेन सदेव मटिरसि छत्रं चामरयुगले च संलमे। ततः सल्लने ध्यूढा ये चन्द्रिकाचयाचितेव, नवनीतनिमितेव, मृणालमृदुला, सघनवटच्छायेव नवविशालयकलितदमावलीय शीतला, मन्दमुन्यस्मिता, शस्यश्यामला वसुधैव सजीवनो, लवण्यलीलाविस्तारिणी, वीणावाधावीमा, मुकुरविमलकपोला, दिमशुक्रवदना, रुक्मिणी, सत्यभामाऽसुराधा त्वमिवापरा पम्पा। ततश्चैतदुर्ग प्राचीनं, जीणोद्धारेण नवनिर्माणे- नाभिनवर्ता नीतम्। देवात्वमपि लन्धचराप्यद्य लब्धा, पुत्रावपि । सम्प्रति सुखी समृपा यशसा राज्येन स्त्रीपुत्राभ्याश्यत्येव ममोदन्तः । श्रीविटुचिरं मितान्तमधुरं वागौशवन्य लम- शास्त्रं तन्त्रकृतषि विद्रसिकपाणावाहितोऽगाद्रुवि । रम्य मानिमनशू चिरं रमयतां तस्याष्टमोऽयं वचन् द्रौतस्य भवेन मयूखमहितोऽहीनो गुणैः सत्कृपः ।।१।।

१६५
Pexiपाय पुराणमारनाम
मामय राजापुर
favrमलना
हरपानुमान मता
श्रीनाम:
परमागगरपाम
मतमाता प्रिया युन्ड: ये सिसोयर, मपरमजन यानि निट
मान, सगाथम्, मार सोन्दर बन्- किनार
माहिराधन्दमदी दिनारको मन्मः भुष शानिमनः यि रमपनाम् ।
सजा पर पोऽध्यापनशीतः, मयूरोवि विपिः मदितः यु
भाष गुगैः अहोनः पूरैः साधा यस्मिन एवंभूतो भवेत्। तस्यायममोनित
गा। पदेऽस्मिन् धौनिवामशषिमा विरचिताबन्दमरताय निमानि !

नवमो नि:श्वास: विद्वज्जनसम्पर्को नष्टेष्टज्ञातिदर्शनाभ्युदयः । कस्य न सुखाय भवने भवति महारत्नलाभश्च ॥ मीनयती नयनाभ्यां चरणाभ्यामपि प्रफुल्लकमलवती । शैवालिनी च केशः सुरसेयं सुन्दरो सरसी । अद्यापि तां कनकचम्पकदामगौरी पुल्लारविन्दनयनां तनुरोमराजिम् । सुनोत्थिता मदनविह्वलसालसाड़ी विद्या प्रमादगलितामिव चिन्तयामि ।। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग भवेत् ।। रचना विरच्यमानाऽनुपदं क्लेशयति नव्यदामेव । कालेन परिचिता सा सुकरा गलभूपणीकृतम्। अत टपसंहराम्येनाम् । মপিরী মনীষীতিশ কুমুদিনা সৰিবণশুয়া অমাঃ মাহৰলুবলি 'सरोजिन्या च सहितः समायातो राजनगरम् , खकीयं चन्दस्य व वृत्तं राज्ञः पुरो न्यवेदयत् । सरोजिनी बालारणं विना प्रभातमिव मन्दमलयसमीरं विना कुसुमितवसन्त इस प्रयास दिना नाधिकमराजत, किन्तु विष्कुर्यादन्तत एकाकिन्येव पास स्पृष्ठा प्रासाद प्रविधा। चदविलम्बे शाकिरस्य सरोधिन्याच विशेषतः शतितमभूच्चतः परं परमविनो- दिनोऽश्य सम्भाव्यते विनोदविलम्ब इति विदाय विविधैर्य बभूव मनः मास ऋनुरपनम्, ऊनवरों वर्ष, प्रतीक्षायामेव व्यतीयुः। शतशः सूर्या उदिता निममा, सुदीर्घाणि महान्याययुः सामानि बभूवुथा विशाला निशा राज्य टेनु शुश्च, विसा विश्चमः काण्डमात्रयावत- स्थिरे च। परं चन्द्रो न समायातः महाराजो विचितशक्तिपर प्रतिदिन खेदसति ।

- १६८ चन्द्रमहोपतो पुनः पटवः प्रेरिताः, पुनरियोगवारा निधेः शोकसागरस्य च प्रवाहोद्गाराः प्राबल्यं प्रापुः । मालिन्यं पुनर्मनुजमुखमण्डलान्यभजत। महाराजे मन्त्रिणा मन्त्रयति द्वास्यो गुम- विभागाध्यक्षागमनमसूचयत् । इशिताशातः स तं !षयत् । स च निःप्रणम्यासूचयन् - "देव, महत्या सेनया राजनगरमधिगन्तुकामश्चित्रपुरेशः समेति। शतं शिबिग्रनाम, प्रतिशिविकं निकोपनिस्त्रिशाना यलवपुषा पदातीनां शतम्, भौशुण्डिकानां सादिनाच त्रिशती, मदमत्तमातस्थायिनां द्विशतो, भालकराणा नराणां चतुःशती। विज्ञान असंख्यातयन्त्रा परा सेना, तस्या रक्षायै चाश्वारोहिया पदातीनाश दशसाहाये। पाच मरुत्तरारूटा वातुजातरक्षायै पञ्चसाहस्री। सहस्रशश्च फर्मकराः सेक्काः पापा निवेशकाः। प्रतिदिनं गव्यूतिपयकं प्रचलन बनादन कृतनिवेशः समायाति ।' राजा-दुवेऽविचारितागमना विपरः स्फीता भवन्ति। मन्निन् , को विचरः। मन्त्री-युवराजे गते सर्वत्र शिथिलता वियते विभागेप, भरया स्थिती सन्धिरेष गरीयान् । राजा नहि नहि, एतन्न भवितु शोति। महाराजो नवेन्दुवार आसीत्। शक्तिधरप्रश्लावपि गणनीयगुणापराम। एते साहसगिरा निर्जीवाना मानमेऽपि साहसविरमाया रामचारि। रामनगरमा जगदितपौरपसीत् , चन्द्र गते शिथिलता तामन गुहत् । तथापि समुद्रा मानमं गरसिरस्कर्त प्रभार येव । विभागरलायन्नेर, विद्यतत्पशेनेत्र तंबंध नवीना पतिः समाजगाम ! सेना मले विपदाहिनी च वियति. महत्तरयमच स्यले सविता। 'सिरि सन्याम वयममुः। नगरमन्यतममेन' परिचितं चारितम्। समुदं प्रार" सम्मान प्राधा नियुः। जलनिर्माजन्यो' विवरणोता. गुजा सई प्रमारिटाः। परं पसरा पाये रताः। भटानाम चरला दुर्गा मंगवायाम मुः। सहान्यो समानामा र २ अ (Diact ort) (LIEnt-bran vart - सा) ४ (Tak)।

सैलानिग्धा बभूवुः। नवमो निःश्वासः १६६ जगती सम्देहसिन्धी जुक्षिनु विपोद्वामा वमाः विस्फोटकवमा नगरभरममाणोऽग्निवमा' शीघ्रविरफुटनशीला, समयापेक्षिण' वमाः प्रयामात्रया निमिताः। गोलिकोदमिनीनांकित परीक्षिता। नरसंहाणा विधाय भसारिणः' क्षाविणः सोदोत्पादिनी विसर्पसम्पादिनच गेषाः" प्रभाव- प्रचारेणेव भुवं भीषयावकिरे। परप्रयुकान् गेपान् स्यर्थयितु दुरवातीपरोधिका". सड प्रहः समारब्धः। परममुन्दयो गानवायप्रणयलीलाप्रवीमा वीणाध्यक्षतामार। "वग्मोयन्त्राणि सैनिकवास दे नियन्त्रितानि। साविभागे, दुरालापयन्यविभाग," "भतारतोसोपविभागे च राजनियन्मणानि स्थानधनुः । राजभवनानो निभवना- नामुपरि पार्वतश्च सिकतासंग्रहः समनि । चिकित्सालयेषु विशेषविहान्यरितानि । शिशूना स्त्रीणाव कृते पृथगम्यवस्था प्रारभ्यत । भरक्षागृहाणि" प्रचुरमाया सत्वरसत्वर मिमितानि। वायुपानविध्वधकतोपाः' भविष्य देशकयन्त्रेण तदतानिर्देशकयन्नेगा। २ संयुका माधर्यकर र चमुः। वायुयानदर्शनाय प्रशतीनि प्रकाश्यप्राणि भाविकृतानि । समरिमन् राजनगरे यानान्तनशाला" प्रसारिताः। गुप्तभाषप्रयोगा: . पमतोदि यमः "ट्वम् उरणे" "परायच। दिसोटयतीति विरफोटकस्तस्य पाय बना इत्यर्थः(nirbeptorire bruba) २४ाकरम (lacandiary homtu.) पृषीपर गिरते ही पटनेवाले Immediate tomba, ४ टाइम पर पटनगोवन (Delayed Action Bombs)। ५मराभगन Machinesaas, fte A (Poisonoce cases) उरलाने पटी गैस Tear sms किने वाली गैस Xere irritant gul ९ गुनगुनाइटपैदारने वाली गैस Lang trritans .फफोले उसन्न घनेवाली गैस Bister rest भत्र सत्र मेष अनियमित्यरमात् पपि 'गे, पदः। बन्दिशा-पग- मारिणनितिक गैस के अधर को न होने देने वाली टोपी Gvoukri १२ काटनमिसाएर १४ टेलीफोन। १५ रेडियो। १६पादोडरमा मासेरनेशटो Atl airerat Gen. शिससे यह मदन ताकिरोल्पाहा पहुंगा, बद: बार मी यार ९बहारी लाप मोल, पोटमाटम एने पन्च। २. भपक कटी हट। २.दन रे Bulon Ranare) एकदाह Ex गुले रगड़ने साय सय मष्टो है।

चन्द्रमहीपती सतलिपपश्चार्यप्रापणे नवा रीतिमनुसघः। पक्षिणोऽपि धनो शिशाम दुः एहमयुद्धय इन्द्रियमाननिपुणा विविधमायावीणाः, लिपिजानलयुपा तत्वयक्मिा' नियुक्ताः। लपदो युद्धपोताः सपोता:' सहायकपोता औपचारिकपोतच विविध- सम्भारैः सम्मृताः। अद्य राजनगास्य चत्वरान् चतुपयसमुद्रानमितोऽभिनव अबकोलाहलस्तरमायते । सोऽयं वारणार्थानामोप्सितः कालो वर्तते। अलर्माणेषु नवयुवकेषु रिमु प्रोटेपि नवीन उत्साहो मुसरीभवति। सर्वेषां को दमभुसाधने लगौ वधनुषोश्चापमा प्रेक्ष्यते । परितो वीरतावरवयांमुच्यन्ते ध्यन्ते च। भटाना वीरमावो भेरीमारेष टुदुर्भ- ध्दानेन चतुर्गुणितो भवति । युद्धवाद्येन योद्धणां पादाः खपमप्रतश्चलन्ति । पूर्णीजसोऽत्यन्तीना अश्वा अपि रणकण्डूमपनेतु सर्वप्रथमं जिगमिषया कृच्छेण साद भिर्वार्यन्ते। मदमत्ताः करटिनो घप्टापोपैविश्व वाचलयन्तः प्रावृषेण्याः सविद्युतो बारिश इव अभितो भ्रमन्ति। सझाना खणत्कारेण कुन्तानां प्रभया भुशुण्डिकानां तोनानी तुमुलेन शब्देन शङ्खाना ध्वनिना सर्वा दिशोऽद्य परस्परमालपन्य अप्रतिभान्त । सर्वोच्चदुर्गशिखरेऽभिमानलालिता जगन्मानिता कीतिलतेव विजयपताका फपर पते । मुकुरमनोहरे, निर्मलनिर्मले, प्रोच्चमोच्च आकाशे हाणां कनककलशाः, विरोचकिरण- कुलेन धौता इव विविइसन्ति। तत्र तत्र वातायनेषु स्थिताः सौभाग्यमुन्दर्य कमनीयाः कन्याश्च पुष्पाणि पुपमालाश्च विकिरन्ति। यत्र तत्र यन्दिान्देन कोरवरणा वर्णना वर्ण्यन्ते। भगिनीभितभाला भूष्यन्ते। कश्चन संवर्मयति, इतरोऽनुलोमयति परोऽभिणयति। मन्त्रणामन्दिरे मन्त्रिणो मन्त्रस्यापदक्षीणतामक्षीणयितु सप्रयन्नाः प्रतोयन्ते । अभितः सताः पृतदिनलिकाः सैनिकपहरिणः स भ्रमन्ति। एको दूतचित्रपुरनामा इितपदकप्रतिष्ठ भागत्य प्रहरिणमसूवयद् यत् "स चित्रपुरेशस्य पत्रवाहकोऽस्ति १ सैन्यर। २ छोटा बंगी बहाल Sloop | T Escort ship. Y Anxilary Vessela. ५ Hospital Bhip.

नयमा नि:श्वासः r मा दिने" नि सी परिसरामध्ये पाय, सदानं समाब' रामानमएपयत्। स च तस्यागमन इवागमनविधिनानुमुमुद। पहर परित असभ्यायो परिपरि समगत्य महाराज दारा रामनार asirsafe पर तो गुणरत्नः, अनुमाराय रवि पासव सौरपरयो सराहते। तर चिः प्ररम्य जननेनैवविधमावभरपा माण पत्र प्रदान । महाराजः पचं पृथ्नोऽपले पय मन्त्रिणं पटनायादि। समस्यौपाय राशनमप्यधावत् । धोमान्ससान्तसामन्तदेवीपमान मिताभरायलन- हादमिति निविताशेदमयतमामु, भरान्तरारमुगाहरगाशर गुराग दौराविषिरपेष भरमारयमाणे. पिरणेसाने मायनपुरागर भाना नाम: त्रियुग्म बन्दस्य परमी देवर भरपy सम्ममम पराजधानमनपराभूता- "पोमा" . म Sears Indreating ranfurtriRER 4 । emaratRA

चन्द्रमहीपतो
"तदा मिस्मत्सरिकयामपेक्षते सः?"
"आं देव!"
"तहि सूचय वयमायास्यामः।"
"आं देव "
"f चन्दण'आं दे'-इत्येव कथयिनु नियुक्तः।"
"आं देव"
घाव परिवत्तिता। इश्चिन्द्रायणयोरामनिम्बयोः, दीनारकपर्दयोः, सुभिक्षभिरको
युद्धसन्प्योरिय भेदो बभू। रामोरभिमुसं प्रपात्री महती सेना चबागा-
चिकोया प्रोम्बलमानसा यभूव । कर्णाकणिकया क्षणेनैवेष समाचारः सर्वत्र प्रगतः।
मलिनमुखे नगानरे विलक्षणा दीतिरागता। पवे सम्मिल्य पताकाभिः समरमसेवनैः
परिमपिटपन्यानमालामालाभिरिरवनैध पुरं पुरन्दापुरयामामुः ।
*
हीरकपतरस्यकोरगिरा विधूणिते प्रासाद रम्यारान्यामासोना राजमाता। मित
भजमानानां भ्राममानानां विटानां पुष्पलताना सौन्दय्यं भवनमौरभचाराय पोरवीर
समीरी विस्मिन् वितरितुमिव वाति । सरोजिनी प रायपि सतीशने दीवाये
परमोमाया मयमेव लघुना प्यमनेन प्यजति । किरकलितको मुवी
चशिपिनो नैपुषीक्षणे निमपिता अधमादुरिष्टा पार्थ तय हयस्य रचना सन्दर्भ
दोग्य द्वार कााधानते। सैव हमेशाय अधिरता। शो Car
मनपा परिदो मन्तिा एका दगी तस्याः कान्टिक सरकार। सर
सरोजिनीम्।
सोजिनी-त्य क्यासिवादमोह
उनी यमर महरासमुयाच थान् ।
सोगिनी-धा
उदयपुरेसवर सा समय नन्दू समर।
मो.न
गरि ) अाया महा।

नयमो निःश्वास २०३ सरोजिनी --ज्ञायता राजसभासंवादः। * योजनदीः समारोहोऽयं नगरसंसरणानि व्यापत् । हर्षवर्षप्रपना भूमिहरीय काशमपि विदितत्तं चकार। तोपानां निनदेन दिशोऽपि विज्ञपिता। समये राजभवनं प्रविश्य अत्रपितपितृपादः पितरं मोहमुग्धमुखी मातरध नाम चन्दः। प्रणेमतुश्च हर्षभुवनेशौ । अय सरोजिनी कविकामिनीव कृशा प्रोचविचारा कमला प्रणम्य प्रश्नशतेन सलमपृच्छत् । कमला व कमनीया गुल्या चम्पा निर्दिशन्ती सर्वमसूचयत् । एणमानसा सरोजिनी व प्रागनियाणाभितां विपति संध्रुव नाशकयो वाष्पाणि । "देव, महतो दुःसत्य विषयः, महामात्यो विद्याधरः संन्यासाक्रान्तोऽकामाबगनदी" कृष्णवस्त्रेण मृत्येन महाराभो नवेन्दुय॑वेदि। "था विद्याधरो दिवं गतः, अधुनेव मया सइ बहुशो राष्ट्रिययोजनासालप्य गती तथ हन्त ! कोर क्षणभद्गुरमिदं शरीरम्, कोदृशो व्यामोहा, अशीतिसमकीन पयः, पसः पामसुन्दयोऽप्सरस स तु पोदा शाकलहाः मृदुलस्वभावाच, प्रियतिता गिद्धमणविपुलपतिभचन्दः सुभगो पौनी, सुव्यवस्थप्रजम राज्यम्, तथापि नाहं पकुमराहे, अनन्तेयं मोहनिया हन्त ! "भूल। यानमायोजय शोन मां गुरुसमीपं प्रापय-'नवेन्दुना प्रोतम् । "गुरो। बोरगये संसारः कथमरमायावत्ता बहिर्गन्तुं शक्यते"? राजन, अशानमेव बन्धनम् । अवानन् यथा पुमान् मदनगरे श्रममनुभवति उस्तु दुराम तथा न सानन्। झनमेव मोक्षः अज्ञानमेव बन्धनम्। सुरिय पायामि। मात्र सुखम्। पुमानलोकमुखशया भ्रम्पन् पुरानेदाप्नोति । सुसं तुरेवल भगवतत्वानुसन्धानम् । सवैकान्ते निश्छन् माधिना माथि पागोन चिरेण प्रामध्यमधिगमिष्यसीति में विस: "बन्धपतिनाम म:!

कमलाकान्त इति स्वरूप २८४ चन्द्रमहीपती "महाशय ! मां जनाः के, के, शास्त्रीति मापन्ते"। "के. के. शास्त्रीत्यस्य कोऽयः"? के. के..-अर्थन्तु भाषा एव जानन्ति, परं लोके भाष्यते मनामैतत् सैनिक ! सैनिक:०-(सहासम् ) एतदेव पृच्छयतेऽनर्थक सार्थकं तत् ! के. के..-को जानीते। सैनिक:-का-ब्रह्म व जानाति ? के. के..-(अनपेश इव ) सम्भाव्यते । सैनिक:-(सादरम् ) मर्पत्वार्यः। उत्कण्ठाकलित चेतसा पृष्टम् । के.के..-केचन कविताकामिनीकान्तः, परे च प्रकाशयन्ति । सैनिक -आ एवम् । आधग्ललिप्यनुरूपम् (शिचिदिरम्य) किं लियतेत्र महानुभावेन ! के. के..-किं क्रियते, अस्मिन् काले किमपि कत्तं शक्यते ! कः पृच्छति पण्डिता- मद्य, कोऽय पिपठिपति संस्कृतां वाचम् । दोहासवैयारवयितृणामल्पज्ञाना केवल कण्ठमधुरिम्णा मोहयितणां तथाकथितानां नवीनानां करिम्मन्यानामय सम्मानः । साध जगदापाजनन्यपि विनोच्यमानापि विभिन्नरूपेण, मृतभापति शब्यते म्लेर3- भाषाविगिनवीनः। संस्कृतशाना सुदुस्तरतरा दारिद्रयापगा प्रतिदिनमेधते । यया प्रपोय- मानमहोदधिचराश्चकातिभिरपि प्रत्यहमच॑मानचरणयुगलचराः अविगणय्य अम्बामण्यगणितगमस्तीन खेदनाताः प्रतोलोतः प्रतोली पर्यटन्ति बचावः । येऽशलिजलमानतुटास्तपोधना राज्ञोऽपि वाहीकृत्य पेल, सक्रोधेषु येषु लोकपालानामपि त्यकाधैर्यधैर्य मनः, त एते प्रक्षीणतपोवैभवा भशतजातीनां धनिनां गृहेष्वनाहता मान्तो विना प्रणाममाशिष बदन्त उद्गारे जृम्भणे व 'चिरोव' इत्यादि म पन्तो मिथ्याचरा प्वाक्षायन्ते। भतरयोकोचताधिगतचनाचरित्राचारविरहिता घनिनध कारण्डकाण्डपटलायितसितहितशीतवसनविभूपिताः इन्तलतलपरिमलेन भवनमामी- पक्षद्वारलमोशीयः शीतटापनियन्केण सेय्यमाना रामतपादपेषु मात्र रिश्ता सम्प्रति माना समुफेनमुधामर

मयमो निःश्वासः
वैधमिव तमन्तःपायोसादका काम प्रभयान भसन्ति । धर्मरक्षकाः प्राधान्ये.
बाउन् क्षत्रिपाः परभुना मा मरेष शौर्य चिन्तयन्तो निराशा पटामला निर्वापय
परन् मन्तोऽनुनीता पालाः कन्याहननाशिनः परस्परविरोधविनाशिनपरा दिशा
सालटिना कुर्वन्तरी पुत्रोत्सव सम्मान समन्त।
रासायनिसारेगामाराव न समस्ते दुराचरा साभार ।
रोनित, विविधरित्रोमेकायद्योगनारणाधून रासो भिgrat.
धर्मगीन हरिभन्नादन् सोनवनः मशान से दिको hearय मुलतमुग्नत
सीधभौजियारपति।
तारमन्लेग नगरेडरमा गुगारपन्दो नियत पर्या-
असमरमा टिसाप समयमादायति । Eart योग्यतारमामीटर
बरः प्रतिक्षा भनेन पूरा: पाठयपदाया पासनमानेन प्रहार
परममा मधुना : मरे पनपुरमाटी ?
- लंदर बातम्। पर पदोन रख,
सरसिर मेदभूतमा at RETREE BHदवार
सिना पनि पत्तावोशन मदीनन रनिगा
मान सामान पारमारिन होत.
मम दिलायमहिलर festra बाट पर
मोमासर सदमपुरी। समोसमनः ।
हय HिOTRA a free
व हिनावारीका Er habshser:
RATrera me yeate.
in पर रिसर
दल र प्रसो का मctar ses
एम.rfraternita
wwो। परmritterper

चन्द्रमहीपतो पूर्व पुरुषाणामाशया स्त्रियोऽधुना च ता एव वमं दक्षिणयन्ति। प्राचीनानां वान यथा तथैवाधुनिकानां धूर्तता। नवीनाः सम्प्रदायाः प्रतिदिन प्रेक्ष्यन्ते। जगति जागरूकदम्भारम्भा जना जठररी पूरणाय अविवेकिजनवञ्चनाय मुतरां स्वपरिवारपूत्य मिश्यायप्रचाराय च नः सम्प्रदायं प्रचारयन्ति। नवीनत्वा प्रचलितविपरीतत्वम् । अगत्प्रचलितस्य सम्प्रदाय व्यवस्थापका बाटला मुण्टिनो वा, अतो नवीनः केशा जुन्यन्ते, प्राचीनाः सान्ति बन परोपकाराय प्रेरयन्ति च, नवीनाश्चानान्तो मातापित्रोरपि सेवा कदयन्ति। चन्दनुरू कमलिनीकमनीयतनुलताः कदलीकोमला बालिकाः परलोकतारिण्यादिपदैश्चाशतैः प्रय क्योभिः प्रलोभ्य यौदने पदमर्पयन्त्यः प्राधिता भनेकवरः प्रथिताः पृथुगुणः केश विलुच्य यास पट्टिका मुसे थावभ्य मानज्ञानाचारसंस्कारान् सर्वथा परित्यज्य केव विषयनिरतः ( केवलिभिः) उपधर्मगत्तषु पात्यन्ते । के-के-अक्षरमा सत्यं कथयसि । सैनिक:-मगवन, जगतः स्वाभाविक एष धर्मः । स्यापयितुं शक्यते, किं पुननिवाना चपला प्रवृत्तिः। विचाराः प्रतिक्षणं परिवर्तन्ते । अस्तु, अहे देवस्य परिचय थोतुकामः। के. के.-खल्पीयान् कविरहमस्मि, सोऽहमधुनाऽखाय इते गृहीतायकाशी रहे निवसामि। सैनिकः-तहिं श्रीमन्तः कवितामपि तन्दन्ति । के. के.--आम्, कदाचित्कुतूहलपरवशः। सैनिक:-किंविषयिणी देव। के. के-को विषयः, यस्यावसरः समापतेत् , स एव विषयः । सैनिक:-गुरो। जगमालोदिन घेतः साहित्यवसिरितुधेटते । यदि नासि भक्ती वेलाविलम्बः, यदि चेम साहित्यमुपयाऽनुजपूक्षन्ति, तहि पूरयन्तु ममाभिलाम् । के.के. भात्रिय ! कः संसारविहारी एतरमाजगमालादुन्मुफोऽसि । महशी भयस्मिन्याशे गुमर्श पदाः, पर साहित्यचर्या चरितृमोहास्ति चेद् मूहिक विषयमधिस खो प्रसादयामः। लमरमारमशामिनः साहित्यातिथिः। नद्याः प्रवाहोऽपि नत्र -

नयमो निःश्वासः
२०७
सैनिका-मुरी। सार्य समयमेवाधिश्रय कापि सरसा मनोमोहिनी शान्त:-
प्रसादनी रचना भवेत् ।
के. के-यतिष्ये। गयं रोचते उत पद्यम् ।
सैनिका-भगवन् 1 पद्यम् ।
के. के.-धोतव्यं तत् । अक्ष्मस्य समयस्य शब्दचित्रं भरतः पुर एवावतारमामि-
मुखदशारदमौर्णिमचन्द्रमामुविशदप्रभभावरविप्रहाम् ।
अवहुदश्यतुरक्तकृतीनों विपुलपिनमचिन्त्यगुणां नुमः (१) ।
मुसं ददातीति सुखदी यः शरदि भवः शारदः "ऋत्व" शारदा पौणिमचन्द्रस्तवत्सु-
विशदप्रभा-उज्ज्वलकान्तिः, भाखरश्च विप्रहो यस्याः सा ताम् अवहुदशि भत्तस्य कृतो.
रचनायां विधनसमूहम् असारयन्ती अनिर्वाच्यगुणा कामपि नुमः।
जिगमिपुदिशि पाशभृतः पपीरपहरन् कमलनियमोक्षितः
परिचितैरिव लजितमानसः समभवत् परिरक्तसिताकृतिः (२) ।
पाशमृतः-वरुणस्य, दिशि - पश्चिमायां, जिगमियुः - गन्तुमिच्छुः पपीः सूर्यः, परितो
रता चासी, सिता आकृतिर्यस्य स समभवत् । कमलाना थिय-शोभा अपहरन् ,
परिचितैः-लोक-लोकः इक्षितादृष्टः, अतएव लजितमानस इव। अपहरणसमये
2. सर्वोऽपि लगते। अयच सहस्ररश्मिरमुष्मिन् क्षुदगी कर्मणि प्रत्त इति
महलजारपदम्। लाजतस्य मुखं रक्त वितं च भवतीत्यनुभूतम् ।
सकलवासरतिग्महगातपयथितकाय इयोग्यरितोऽग्मिना ।
जलनिधाविव मक्त मभीहते कमलजातविशोकिविमाकरः (३) ।
कमलजातविशोकी चासो
एष सूर्यः। एमिना
उज्ज्वलित छ पक्षिदायः प्रान्तो नर इव ।
तिम्मरुवा भावपेन
व्यथित कायः-दुःखितशरी
ति वा (१)

२८८ चन्द्रमहीपती इनः सूर्यः । श्रमगे वोशितं-', फापकदादकम् - अनाचारधनूई, गमपि बान्दि मुनिता - मुनिमात्र, मयिनु - प्रातु, गिरिगुहाम् -अस्ताचलदरीम्, उपविश्य अमुन्वेन परिकल्प्य तितप्सति तप्तुमिच्छति । खस्मान् (जात) कुलं-स्खलं-सूर्यवंशस्तेन वस्तिो यो वार्षिक समुह ( पत्रिसहस्सगरमुतासं मृगयमाणैरेप सनितः-इति पौराणिकाः तं वा टपैति। उपतटोढ़तपादपमन्जुले किसलयारणिते नववझुले विशदवारिणि बाधितटे शुचावयि ! विधित्सति सान्थ्यविधि रविः (१) रविः, तटस्य समोरं उद्गतः = उत्पन्न : पादपैः मञ्जुले-मुन्दरे। बिजलद- नवपत्रैरहणिते, न्या:- नूतनाः बञ्जुलाः- वेतसा यंत्र, शुचौ -विशुद्ध इन्दुम- स्वादितिभावः। विशदं वारि यत्र तथाभूते बाधितटे-समद्रकुले, साध्यविधि विधा- कर्तमित इव। क्षितितले कमला भवतां प्रिया युवकराजकवाञ्छितमुस्मिता। इति निवेदयितु जलशायिने त्वरितमस्तमगादिव भास्करः (३). क्षितीति-"युर्वव युवकः, राज्ञा समूहो राजक गोमोक्षे ति बुम" तेन वार्ड अभिलषितं मुस्मित यस्याः सा भवतां प्रिया भवतां प्रियेव सुन्दरी कमला, शिदिने मर्त्यलोकेऽस्ति-दति बलशायिने भगवते विष्णवे निवेदस्ति इव भास्कर पूर्ण, त्वरितं यथा स्यात्तथा यस्तमगात् । सैनिक । शास्त्रिन्! के कमला। के के । कवयो हि नाम केवलकीर्तनपरा वस्तुनः सौन्दर्य मुनिरन्तो निषण्या में दोषमाधोमवन्ति, सम्मोजानिरिकाम्भसः। कापि भवेत् कमला। सैनि। दैव निस्तारः। अतु, प्रकृतमनुसरन्तु। उपगतेऽप्रगति जगदक्षणि विपुलगर्वसदर्ववियूननान् गगनमंसरणात्परिमार्जितं निपतितं पततीन्दुसम रजः (७) नवमो निश्वासः २०६ जगतोऽक्षणि चराचरस्य नेत्रे भगवति सूर्य, अपगति अस्तं प्राप्ते, विपुलगर्व- सौ सदर्वा =Jष्ठाश्वस्तस्य विधुननाम्पनात् निपतितम् । इन्दुसमकरितुल्यं -:, गगनमेव संसरण -राजपथस्तस्मात् परिमार्जितं सत् पतति। श्रान्तोऽध- Eर विधनपति। . उदरदपविनाशकृतश्रमाः शुककपोतमयूरपिकादयः । कथयितुं दिनदृष्टमिवाद्भुतं विविशुरेत्य कुलायचर्यास्तरून् l उदरस्य "नाई फेनापि पूरणीय भवामि" इति पो महान् दर्पत्तस्य विनाशे- माशे कृतः श्रमो यैस्ते शुझादयः पक्षिणः, तरून् -खायान् वृक्षान् एत्य नटमद्धतम् - आश्चर्य परस्परं वालेभ्यो वा कथयितुमिव कुलायचयान विविशुः । अगरवः शिशवोऽशनयान्विताः सकणचन्चुपुटानथ वीक्ष्य तान् । विदधते विरुवम् , नवपत्रिताः शकुनिमिविटपाः सुपमामिव ॥६॥ न महत् येषां देऽगाता अपक्षा, अतएड शिशः - बालाः पक्षिशावकाः । शनया - भुक्षया, अन्विता:-युफाः, सण-अन्नकणसहित चञ्चुपुटे येषो वे, तान् पक्षिणः, शिक्ष्य हष्ट्रा, वित-कलावं विदधते -कुर्वन्ति । अथ विटपाः शकुनिभिः-पक्षिभिः कादिभिः, नवपत्रिता:- सातनवपत्रा व सुषमा-परमां शोभा धारयन्ति । सैनिक:- साधु 1 पण्डित । साधु । वस्तुतः कविताकामिनीकान्तोऽप्यसि । कवीन्द्र । नुभूतोऽस्येकस्मिन् दिपये, पुनरिमा पूरयित्वा अनुगृहाण विलक्षणार्या समस्या "दिनकरे अनीकरतां गते।" के.-क्षण नभो विलोक्य )- प्रचलितेऽति, समोलिहि भास्करे कमलिनोवटनादिव संस्थिते । मुखरितं विहितं विभिरावन दिनकरे रजनीकरतां गते ॥१॥ अहि-दिने प्रचलिते, तमोलिहि-तमोहन्तरि भारको-सूर्य च, कमलिनीदलनान्- पिनोपयोगात् 'बल' संवरणे स्युद् संस्थिते व-मृते व सध्यमाणे, भतरल दिनकरे ये, पनीर गते प्रास, विभिः-पक्षिभिः आ-समन्तादनमायनं मुखारते. -

२१०
चन्द्रमहीपतो
याचालितम्। निशाकरणे सूर्यस्यापि अस्तमयनेन साहाय्यम् , sal दिनचरस्था
रजनीकरत्वं युक्तम्।
लघुष पुष्यरथेषु कृवस्थिति भ्रमति वृन्दमिदं रमणीजुपाम् ।
विमटमाल्ययुजां सुहृदामितो दिनकरे रजनीकरतां गते ।।११।।
दिनकरे रजनीकरतां गते लघुयु - खल्पेषु, पुष्यरथेषु-मुखम्रमपायु स्येषु “टांग
“वग्यो” इत्याख्यातेषु "असौ पुष्यस्यचक्रयानं न समाय तत्" इत्यमरः । कृता स्थिति
तत्, रमणोजुषा -सोपरिप्रशालिनां वृन्दं समूहो प्रमति। इतश्च विमलमाल्ययुजी-
निर्मलखां सुहृदां - मित्राणां वृन्दं प्रमति ।
अरुणिते सुरवर्मनि तारकाः बृहतिकाङ्कितशुभ्रकुशेशयाः ।
वमुरिवातनुभास इनद्विपो दिनकरे रजनोकरतां गते ॥१२॥
दिनकरे - सूर्य, रजनीकरतां अस्खतामिति यावत्, गते प्राप्त, इनद्वषः सूर-
विरोधिन्यस्तारकाः, सूर्य उदिते एता निष्प्रभा भवन्ति मत एताः सूर्य द्विषन्तीतिमाकः।
अत एवातनुभासः-प्रोजलाः। महषिते-लोहिते, सुरवमनि-वियति वृहतिमायाँ-
उपर्याच्छादनवस्त्रे, भविताः रजतस्वर्णसूत्रचिईता, शुभ्राशयाः-सितम्मलानीव अभुः ।
वियति मौक्तिकवृन्दमिवात रवितुरङ्गमकण्ठतलाच्च्युतम् ।
विपुलभ भमलं प्रतिभात्यदो दिनकरे रजनीकरतां गते ॥१३॥
सूर्येऽस्ते विशिष्टप्रभ नक्षत्रन्दं वितुजमाणां - सूर्याधाना कण्ठतलारच्युतं विति-
आकाशे, भातत-विस्तृतं मुकाबन्दमिव अलं प्रतिभाति ।
कमलिनी मलिनो समभूदरं कुमुदिनी मुदिनो भ्रमरैः समम् ।
सरसिका रसिकाचितभूमयो दिनकर रजनोकरतां गते ॥१४॥
दिनकरेऽस्ते कमलिनी-नलिनी, भरम् - शीघ्र मलिनो समभूत् । सरसिमा सरकार
रमिकः-भावकः, भाविता-व्याप्ता भूमयो यासा ता अभूदन् ।
अहनि कार्यकदम्बमृशाकुलं जनकुलं शयनीयगृहं गतम् ।
नमस आविरभूत्सुमहत्तमो दिनकरे रजनीकरतां गते ॥१२॥

नवमो निःश्वासः २११ सूर्यऽस्ते, महनि = दिने, कार्यकदम्बेन-कर्मसमूहेन, भशमाकुलम्, नरकुलम् मायनीय- यहम् -खावासं गतः। नभसः सकाशात् सुमहत्तमश्चाविरभूत् । क्षणदया विततं स्वशिरोंऽशुकं रजतपुष्पयुतं कृमिकोशजम् । गगनमृक्षगणेन विभात्यदो दिनकरे रजनीकरतां गते ॥१६॥ सूर्येऽस्ते, अदो गगनम् -आकाशम्, ऋक्षगणेन तारकासमूहेन क्षणदया राज्या, रजतपुष्पयुतं कृमिकोशज- कौशेयं स्वशिरोऽशुकम् - उपरिवस्त्र विततमितीव विभाति । धन्वदेशे स्त्रियः कौशेयं रजतपुष्पावित "ओढना" पदवाच्यं उपरिवासो दधति इति । कनकदामहिमांशुसुचन्दनैर्विहितकल्पन एप महेश्वरम् । अभयदं भजते क्षितिनिर्जरो दिनकरे रजनीकरतां गते ।।१५।। दिनकरे रजनीकरतां गते-प्रदोषे, एषः क्षितिनिर्जर:- भूदेवः, कनकदाम: पत्तरसक हिमांशुः - कर्पूरः सुचन्दनः काश्मीरागुख्युक्तस्तैः विहिता- कृता कल्पना पूजनसामग्री येन सः, अभयद महेश्वरम् शिवं भजते । यमदमविमलं गतवासन नियतशान्तिजुपो विदुपो मनः । झटिति संश्रयते विभुमव्ययं दिनकरे रजनीकरतां गते ।।१८।। नियतशान्तिजुषः - निर्वार्धा शान्ति दधानस्य विदुषः ज्ञानविज्ञानसम्पनस्य यमदमै- विमलम् , यमदमाभ्यां मनसो विमलकराणि सर्वाणि साधनान्युपलक्ष्यन्ते । वासनारहितं मनः प्रदोषे मटिति अध्ययं विभु श्रयते। अपत्ति मन्त्रपवित्रकुशासने बटुजने हरिणाजिनधारिणि । समुद्गात् कुमतेरपि सन्मनिर्दिनकरे रजनोकरतां गते ।।१६।। सूर्यास्तसमये मन्त्रैः पवित्रे कुशासने हरिणानामजिनं-चमे धारयति तच्छीले मुटुजने - ब्रह्मचारिंजने जपति सति- जपं कुर्वति सति, कुमतेरपि-नास्तिकस्यापि शोभना बुद्धिः समुदगात् । स्मरति योगिजने विधुशेखरं मटिनकर्मजुपामपि मानसम् । द्रुतमहो! परमात्मनि सङ्गतं दिनकरे रजनीकरतां गते ।२।।

२१२ पन्द्रमहीपती सूर्येऽस्ते योगिनने विधुशेखरम् = शिवं स्मरति सति, मलिनमंजु - निन्दिदकर सेविना मानसमपि अहो। आश्चर्यम् , द्रुतम् - शीघ्र परमात्मनि सजदम् । नदति वाद्यवरं सुरमन्दिरे कनककुम्भविभूपितसानुनि । प्रविद्धत् किल दुष्टजनन्यथां दिनकरे रजनीकरतां गते ॥२१॥ कनकस्य - सुवर्णस्य, कुम्भ:-कलशैभूपितं सानु यस्य तस्मिन् मुरमन्दिरे, दुष्टजनना व्यथा प्रविधत् - प्रकुवंत, वाद्यवर नदति । पिपठिपुनिजपाठ्यसुपुस्तिका न्यलयितुंकिल दीपमयोमयम् । विशति सत्यरममिगृह बटुर्दिनकरे रजनीकरतां गते ।।२।। सूर्यऽस्ते निजपाध्यमुपुस्तिका:- पठनीयपुस्तकानि पिपटिषुः, अयोमय दीपं वर्तम बटुः-ब्रह्मचारी सत्वरममिगृह विशति । किरणकर्मकरैः परिशोधिते क्षणदया वितते तिमिरे घने । विपुलमं प्रतिभाति वियद्वपुर्दिनकरे रजनीकरतां गते ॥२३॥ दिनकरे -सूर्य रजनीकरता = चन्दता प्राप्त सति, प्रकाशनत्वेन चन्द्राय तेज दानाच। क्षणदया - रात्र्या वितते-विस्तारिते, घनतिमिरे किरणर्मकरः किरपर्म- चारिभिः शोधिते वियतः-आकाशस्य वपुः विपुला भा यस्य तथाभूतं प्रतिमाति। विरहिणी प्रचुरार्तिकरः शरः विहितसालसचौरजनाकरः । वितनुतेऽतनुतेजसि सत्वरं दिनकरे रजनीकरतां गते ॥२४॥ अतनुदेजसि = विपुलवेजसि दिनकरे गते सति, विरहिणां-धीवियुक्ताना प्रगति कर:-विपुलव्ययापरशर इद। विहितः-कृतः सालसः चौरजनाको न, चौराश्वन्दिकायों सालसा भवन्ति, तयाभूत एष चन्द्रो रजनीकरता सत्वरं यथा स्यातका वितनुते विस्वरयति। दिनकरमयादिति भावः। मदनमोदकरो वनितावतां घयलरश्मिभिरन्धमधो नयन् । द्रढयतेजुलकान्तिविधुनिता दिनकरे रजनीकरतां गते रक्षा दिनकरे गते - सूर्यऽस्ते. अनुलाकान्तिर्यस्य तादयो विधुर, वनितावता - श्रीमतो,

नवमो निःश्वासः
२१३
मदनमोदकर:-स्मरकरः, हर्षकरश्च, धवलरश्मिभिः- शुभ्रकिरणः, अन्धं तमः, अधो
नयन् निर्जा रजनीकरता -निशापतिता ढयते।
अलकमन्जुनिकुञ्जतिरोहितद्विजपतिः प्रथिताभसुविग्रहा।
झटिति सजति विश्वजिगीपया दिनकरे रजनोकरतां गते ॥२६॥
दिनकरे रजनीकरतां गते -सूऽस्ते मलकाना मन्जुनिकुञ्ज तिरोहितो द्विजपतिर्यया
सा, प्रपिता आभास्त एव सुशोभनो विग्रहो यस्याः सा कापि झटिति-क्षणमपि
नातिवाह्य विश्वं जेतुमिव सज्वति ।
सैनिक:- अल्पितधिषणधिषण | गुरुवर । साधु,
भवति यच्छविमत्कमलाकरे नयति यत्कमलापतिरचने ।
प्रहपतेपिरहे मलिनं हि तत् कमलज कमलं कमलाकरे ॥२७॥
कमू-जलम् भलयति-भूषयति तत् कमलम्, कमलज - पयोज, कमलाकरे स्पमी-
इस्ते, छविमद् भवति । यत्कमलं कमलापतिरर्वने-पूजने नयति तदेव कमलं प्रहपतेः-
सूर्यस्य विरहे मलिनं कमलाकरे हदे वर्तते । नारं स्थान विधित्सति ।
अथ वियोगजनिर्वच ! कोकयोः प्रियवियोगमहोत्कटशोकयोः ।
असुखमेति सुखात्परतः सदा नियतिसिद्धमिदं जगति ध्र वम् ॥२८॥
प्रियवियोगेन महोत्कटशोकयोः कोश्यो:- चकाच्यो, वियोगनिः- वियोगोऽ-
भूत् । सुखात्परं सदा दुसमुपेतीति नियतिनियमः ।
गणिकया गणिका सुपमान्विता गृहगवाक्षनिधापितकूपरा।
पथिचरानयनेन विकुर्वती धवलिते वियुधायन इन्दुना ॥२६५
विबुधायने-आकाशे, इन्दुना धवलिते-प्रशिद, गृहगवाक्षे निघापितः कूरो
यया सा, गणिग्या-"जूहो"पदवाच्यपुष्पेण सुषमा-परमाशोभा तयान्विता गणिका,
पपिरान् पथिनन्, नयनेन विकुर्वती-विकृति नयन्ती विद्यते ।
सुललनामणिनूपुरशिखितं वलयमकृतयोऽमुसोगताः ।
कुमुदवान्धवशोभिददिग्नजे न पुरुषस्य हि कस्य हरन्ति हत् ॥३०॥

चन्द्रमहोपतो कुमुदवान्धवेन = चन्द्रेण शोभितयासी दिगमजस्तरिमन, सुललना। मणिसचिटन पुराणां शिमितम् , भट्टानां - शिरोगहाणां, मुखेन-द्वारेण, उद्गवाः निमुनाः, बलय म तयश्च कस्य पुरुषस्य हृद्-मानसं न हरन्ति । अवश्यमेव हरन्तीतिमतः। सैनिक:-साहित्यामलसरोराजराजहंस ! कवीन्द। धन्या भवन्तो य एवमहरिस मकरन्दमोहिभिः पीयूपमयैः काव्यालापविनोदयन्ति मनः। नानावास भवादृशां साहित्या- बताराणां समागमाः सागमानो सम्पद्यन्ते। के० के० सेनापते। बहवो जर्गत काव्यकलाकलापकलापिन: रिलयेषां काव्य- मूर्तीनां मादृशास्तु छात्रत्वेऽपि न मताः। परन्तु सरणिरियं प्रत्यहं प्रक्षीयमाणा। सैनिक:-गुरो। वित्रालद्वारपूर्णा कवितामपि तन्वन्ति भवन्तः । केके.-तस्याः काव्ये गडुभूतत्वं मतमाचार्यः। सैनिक-भगवन् , तेषां रकने दैदुष्यं तु परीक्ष्यते एव भवेन्नान गभूतत्वम् । सोऽपि रस आस्वायः। के. के.-आकर्णय- सैनिक:-आमवहितोऽस्मि । देव ! सान्ध्यविम्युचितोऽयं कालः। तथा यतनीय यथा देवानां स्तुतिरपि सहैव भवेत् । के०के-अस्तु, एवमेव मतिष्ये। अयं सर्वतोभदः शिवस्तवः-- देवं कुश श वन्दे रहतां ककता हरम् । कुनाम्बरं रम्बनाङ्कुशं सरं व्यव्यरं सशम् ॥३१॥ कुत्सितान् दुष्टान्, श्यति-तनूकरोति यस्सा देवं भगवन्तममापति, शा। दण्डबद् बन्दे। किम्भूतं-रहता - वेगवताम् , अविचार्य कुर्वतामितियावद् काटा ग' कुर्वतां का लोध्ये" लौल्य गर्वश्चापत्यय । अनुदात्तेललापमात्मनेपदमनित्य पक्षियो लिस्मरणात् । हरम-नाशनम् । पशम् -कल्याणसहितम् । पुरसित न भन्बर यस्य सम्, रमन्ते-कीडन्ति ते रमः-विलासिनः मते विच" तेषां बनस्य अनुशमिम। परम्संहार प्रति, परम् - शीघ्र भकस्य विपसमकालमेव व्यको - विधियोऽदी, सका - समूहम नयमो निःश्रासः अम्या नुमो भासमाना पान्ययादशुमादिमा । नुवाममा नाल्पमासमोदमानाननाऽशुभा ॥३॥ रसासाररसामन्दकासारी समसामनाम् । तो मसाममुसाहित्या शंमरिरसाहिनाम् ।।३।। युग्मप्म्। पूर्वमदंभ्रमकम् हितोयो मुरथया । हा मासमना-मा जलन्तीम् अम्बा-देवी नुमः । बभो बन्धन हरसमयी बापः स एषहरया- धमपो बाद में शुभा-श, मादिमा । दुर्ग-प्रणमता मना- सरातिनी, मालभास-विपुलोजर मोदमान शान पराः सा मामा भाउ- सय:- प्रसरणशीलामा यस्याः सा । रसाना-पारादीन यासार-शसम्पदः स एव सो जलम् , तर भमन्द- -माजलासरस्पाम्, तमसा-नेन, अतुम्-मला। मामी रस्पास्तीति मम्-भागम्यम् " पद पाभूत पत्रगान गु-सोमन. खादित्य पवाःसात-मुस मिले पनि सम्परा:-रा, सर पारामतीत भयरोग, जिम्मरान् -frg.nन्ति-भारतविमरो:- सभी रसेव-नेमाटि-मम् । मारतो विपमा पाररुपामाइतमादिमा। मारिका देव्युमा गेया पागेमागतो रमा १३४॥ महापामनयना नमामो अगदम्बिकाम् । महावापनपना समाप्या जगाभिकान al एमम्। च सय रनर नरामयः । गुन्रोले - बबासः। बदर -प्रामा 21- 2 करणे मा. सभKN-PR NE NE-मान-पान्। पाप-दागरोता:-:- store.ITANो- चन्द्रमहोपतो इति मेदिनीकोशः। मालिका-जगद्वारिणी "मलधारणे" देवी-देवनशोला पातः संपारस्य, अमा- सहबत्तिनी शक्तिरूपेण, यागे-पूजायां गेया-सवास्ये साधारण प्रथम गणनीया, रमा-उत्कृष्टरूपा एवं भूता या उमा सा नमामः । पालिका जीववृन्दस्य लये महति कालिका । फापि माता सतां मान्या मवे जयति विश्वपा ॥३६॥ पाकशासनसम्मान्याऽनन्तदेयमहाधिपा। पाशायद्धपापिपूरा पायोजाइम्मुिपादुका ॥३७॥ साबन्धः। जीवादस्स-प्राणिमात्रस्य पामिका-रसिका। महति ध्ये-मा- प्रलये कालिघ-क्षयची पाकशासनस्य -इन्दम्य सम्मान्या, अनन्तदेवाना-मस्या- सानो गुराणां महाधिया-अधीश्वरी, पाशेन भावना पापिना पू:-छगहो गया था। पाचोकमत सदर योः मु-दोमने पादुके यरयाः सा, विश्व पति रमति सा. मान्या-पुण्या-दिलाना माता भदे क्यति-शोवरण पाते। श्रीयां नित्यं बुधवासं भेजे चन्द्रसमानना । मनोरमकलापारा तो नुमो यीतसं वितः ॥३८॥ सतनधान्तकमलो हम्तः शान्त्य भयेद् ध्र पम् । देस्यन्दशिरोही योवरा नो दिरोदिसम ॥३॥ पर्वतबन्धः। सुम्मम्म्। या चन्दसममाननं यायाः मा श्री:- गभारणी it बामो सयम भत्र-मिरवे। ता मनोरमान-शान भनुपानमा मामा तमवितों व नुमः। एतं प्रान्त कमाई येन तयाभूतो त शन्ध मरम्। महसम्मान मात्रा। श्री रा-टायान fort मारासम्म दिन पियत्। रमा या मादमायामा सना शामा दमागिता। मा माममा यामाहे माल ! मानमाचर mall सिन्। बट! का त -RR, Raker नवमो निःश्वासः २१७ मायायाय क्षमा-सहवत्तिनी । “अस सह समीपे । रमा लक्ष्मीरूपा । धमा- सद्पा, श्यामा सदैव युवतिः। दमान्विता, प्रेम्णि - प्रेमविषये असमा वामा, नास्ति समस्तुल्यो यस्याः सा वामा उमा-पार्वतीरूपिणी त्वं मानमाचर -विधेहि । मुक्तिवर्ये! मुरारिस्त्रि.! मुक्तोपेतमुखाम्बुजे ! यामावर्येऽव कृष्णास्त्रिप्रिये ! पूतपदाम्बुजे ॥४|| चळबन्धः। हे मुक्तिवये । मुकिदाने श्रेष्ठे। मुरारेः खि! मुफ रुपेतं मुखाम्बुजं मस्यः सा तथाभूते। वामासु वये। कृष्णश्चासौ अस्त्री - अत्रकुशलस्तस्य प्रिये । तं पवित्र पदाम्बुजं यस्यास्याभूते । मां-तव शरणागतं अव-रक्ष । सततं नम्यते या श्रीरस्तु सा नितर' पवा । चारेण योगिनीनां सहिता मा नितराममा ॥४२॥ धनुर्वन्धोऽयम् । या श्रीः सततं नम्यते, सा योगिनीनो बारेण - समूहेन सहिता, मा-माता, नितरी पका-अत्यन्तं पावनी, नितराममा च-अत्यन्तं समीपवत्तिनी चारतु। सैनिकः - एकदा देव। देशभ्रमणोत्कोऽई विद्वन्मतल्लिकाकान्तका भगवतस्तारक- तायिनुनिःखार्थमुक्तिपदस्य विश्वनाथस्य पुरी गतः पूर्णपुरीमन्नपूर्णा शिरसाभि- नन्ध, अगदपापनाशनसल्पायर्या त्रिभुवनवन्द्यायां महेशोतमाङ्गसझायां गाया- मखिलं मलं विशोध्य, भैरवदण्ड कालभैरवधानम्य, भवं विघ्याय, वृन्दारवाणी- मुधासतृष्णः कवितीकः कस्यापि कवीन्द्रस्य भवनमगमम्। श्चि पद्यमय दमकार पदभित्तोऽदलापुकमावि न्यस्तमासीत् । के. के.-आम्, पाम् भवन्ति तादृशा अपि बन्धाः। तानपि भणु- श्रीर्यस्य पश्चन्मुखचन्द्रदन्यशा नितान्तरम्या मुदभाजिनी स्त्री। वामेतर: स्यान्मुरदैत्यमातुकः स श्रीपतिमें मुदमायहच्छविः ॥४३॥ पच कमलबन्धाः। यस्य विष्णोः पधन् - विलसन् मुखचन्दस्तेन दैन्यम् - शोर सन्ते तनकरोति सा, भत एव नितान्तरम्या, मुदभाटिनी-दृषिमा रम्याति मदिर बाघस तदा तया चिम्! थी:-रखनी, स्त्री-पनी। स मुदभावहन्दी छविस्व स 'मुरहन्ता, एतेन घोरत गम्यते। २१८ चन्द्रमहीपतो तथाभूतः, एतेन सौन्दर्य प्यज्यते, मुरदैत्यमातुक- स श्रीपतिः-विष्णुम-मम वामेत:- दक्षिणः- अनुकूल स्यात् - भूयात् । श्रीशङ्करः कामरिपुः शुभस्पृशा नितान्तमव्यान्मखनाशकोऽस्रो। वामेतरः स्यान्मददो कदम्बकसमृद्ध ईझ्यो मदमत्तशीविः ॥४४॥ कामरिपुः श्रीशङ्कर, मसनाशकः दक्षयज्ञविसका, अली अनवनुरः, शुभास नेत्रेण मां नितान्तमव्यात्। मई- हर्ष ददतां कदम्बके-समूहे समृद्धः, मदेन मत्तानां - दृप्ताना शोषित-हिंसक ईड्यश्व अस्मा वामेतर-दक्षिणः स्याच । श्रीद्रोहिणामाशु विनाशकर्कशा निश्शेपदेशेऽशुभनाशिनी स्त्री। वामाभिरामाऽऽशु निहन्ति दैत्यकसङ्घ नुमस्तांशुचिना हतो रविः ॥४॥ या घामासु-स्त्रीष, अभिरामा सुन्दरी, धोद्रोहिणा-समृद्धि पिणा अय विनाशे कर्कशा, या च निशेपदेशे - सर्वत्र, माशु-शीघ्रमुपद्रवसमकालमेवं अशुभ नाशिनी भकल्याणही, अथ च दैत्यसठ घं निहन्ति । यया च शुचिना-शारण ">Zार शुचिरूग्सलः" रविः सूर्योऽपि हृतः = अपतेजाः कृतः। ता नुनः । श्रीभास्करो दीप्ततनुः समस्पृशा निश्शकमव्यात्ततकान्तिरत्री। वारेण एमेस्तमसा व्यपोइकः समः समेषां तरुणारुणो रविः॥४६॥ श्रीतुल्यां भासं करोति अतएव दीप्ततनुः तता-विस्तृता कान्तिर्यस्य या अस्त्री, रमे:- किरणस्य, वारेण -समूहेन, तमा व्यपोहका माशकः तरुणाण- समेष - सर्वेषां समः-तुल्यः रविर्मा निश्शम् - असंशयम, भव्यात्-रस्यात् । श्रीर्यस्य हस्तीशमुखस्य दुःखशा नित्यं गतास्ते शरणं शुमा स्त्री। वामः सलाना शरणं नु मेचकसगों नुतोज्याशययिनजागृविः ।।४।। यस्य हस्तीशमुखस्य - गजाननस्य, दुःख श्यति. तादृशी जगद्गुरसहन्त्री, उभी- पतित्रता स्रो, श्रीः-ऋद्धिसिसिपिणी, नित्यम् - सततं शरणं - सेविकात्वं गता का आपने। प सलाना - दुराना यामः, मेचम्सर्गः-चित्रविचित्रावयवः अवस्वान्नरवर गमत्वात् । अत्याचया: ये विमला जाराविः-बागाः। मेधारणमस।

नवमो निःश्वासः २१६ सनिक:- आश्चर्यम् । शानिन्। मपछि तत्य चित्रमेव पुरा स्थायसि । विलक्षणो भरतोऽभ्यासः। स हिमाख्य वृतमिदम् । के. के.-इयमुमतिः। यद्यपीन्दामोपेन्द्रवजाप्रमृत्योः समानारयोरशतिः प्रयुक्त प्रसिद्धा च, परं समलयेनेनोधार्यमाणानां दारयादीनानिय मदीनोपजाति। "एवं पिलान्यासपिमिश्रितामुदत्यादिना तस्या विधानान् । सनिक-भा एवम् । गुरो। हम नाम समागोमामा का गुमने स्थान, पया हस्याधन नायिकाया गलेऽस्तिमिव । परि सम्भाव्यता मय गीतएषायाः मुन्दयां कमलाया एव गलेऽप्यताम् । के.के.--उक्त हाररये तु माम न उमेष्यति, पर परस्मिन् परशुराधे समेति । गज, साधयामस्थावत्-- मिध्यारम्येऽतिकान्तिप्रतिमसमसमष्टी मुगे मुद्रमुदा, रेदायिदायहर! तहदयदरे! दरमु कच्चां कली कः । मन्येऽमन्दं मनं विनरानाविन्य प्रवेशं प्रशन्धा। सम्भावे ! भारमासे ! मणिमयमपुरे ! पुर्यपुर्य ! रवीमि १४८ मला निररत्व परिश साम! मरमदिरा भानन्दादिमा मले। मिप्र रम्परामारामारियन तान्या- रिपुलप्रभर, प्रतिमा-स. समा-1, सहिए हर मद मुझे। एक: चन्द सर वग, स्तन्मुराणम्, उमर कस भारः। हम-गरी ती मुश मालमुक- सभा। सपा निर्व-पति करे स-मेर मnिdra-सितांना गती सदा-मा। हमा हि मनोरने। लो-: साररोग साडे! त्यु दिने होमसम्म मार लामालगुन्दर RTI ML मारेए बने। उसमो! Raje ki me! रार मापनहेगनार.

२२० चन्द्रमहीपतो निर्माणादिति भावः। तथा मणिमयैः- मणिसचितैराभूषणैर्मधुरे। ते मुस ममन्द-विपुलं मलेनं - तमोरा प्रति, विनशनकृतिः-विनाशनम्, तत्र कृत्ये ण कृवेशम्-विहितेश मन्ये - माने। चन्द्रानास तमोऽपि वन्मुख नाशयति । वं प्रष्ट -कल्याणं दधाति वादशी। अपि ! धुयाणा-सौन्दये अप्रगप्पाना । प्रथमगणनीये। मई त्वामेव खीमि। सैनिक:-अहह ! पण्डितपार्वभौम। कवियम्यत्तिन् । (सकीया मुकामला शास्त्रिगो गले पातयन्) धन्योऽसि । शोभन विरचितमनसि नाम सरित सद्गुगानपि वर्गयन् वैचित्र्यमाचर्यय पृतवानसि। (परितो थीय) भनुमीयतेऽमी यार सगतो यामिन्याः। के..। भाम् , इपानेव प्रतीयते। चदन्दिश्या पुनर्दिवाभूता रानिः । नि:-श्राम्। भन्यरिश्मपि धयिष्यते । के..-sure for ) भये । इयं पुतो प्रथिटासयन्दा देदीप्यमानमल वर्नाल्या मदहा माला। सनिक गदिमनीदमानोडी) गुरुतर एरा तुरोपतिः भोकरवाना মারলে খমশৰোনীয় হইল, সিমা पनदियोक्तान *.2.-, या पदन्यावयामः । समामाध्मय पोऽभनी । मनस-या दनावर नोमि देव! महतारमा । नुमः प्रदात्री गुगभूगना मा नुमः प्रदानी गुगनूगा मान । नुनः प्रदायी गुगभूगना मा नुमः प्रदात्री गुणभूपणा माम् ४ माईदम रम् । प्रात्री- दामी, गुगा माया साडा अमरकर कम मन-fy ext- पिए। -प्राली-ग्राम fat merry कम - भूमानितम मास htr" नमक माना जा नयमो निःश्वासः २२१ मसामिणाना, वेभ्यः सन्वन्ति-शन पति से गुणभूमो विद्वमिः "समोतविष" टेगा गुणभूषण-विदुपा व प्रात्री मा-मातरं नमः । गुमभुवन्ति । गुषभूमपः 'उप रायाम्' निन् वेषां गुणाणा -गुणस्थानन राधा प्राची -- प्रतक्शनशीला मादेवी नुमः। चिन्तामणिमातचितप्रसादसमुन्यलाद्गो स्तुम ईशयामाम् । चिन्तामणियातचितप्रसादसमुभवटाहास्नुम शयामाम ॥३॥ समुदायमम्। चिन्तामणिः-भभितरितवदनम्। तस्य प्राटेन - समूटेन रिय-निमितो मः प्रसार-प्रसहता तेन रामुरवलान्दानि यस्याः सा तम्, शाम-शिवधिमः। अभ्यते-हत्यमः शन्दा बहुलापयापन, पपेरमा पिन:-शान्दिन, म प्रतिज्ञा-धाप्यमनपा देश मात न शिक:- उसको प्रभादो मेमय हैन समग्माला, चिन्ता-विकामा-भीम ई-समी सन्ति के प्रपनवारपास्तवामा-प्रतिडाम एमः। सासिः सिसा सासिसासा सामुमः सेः ससासमोः। सासासी सामुसा साझम ससे सासिः ससाससा ॥१॥ (कुटरम्) INDI पन्ति-शिEि सन्ति माना परिनन् र सन-पुर दरमन्अमिका सहपतले समाति-RRET ---पना सR- पहिय पूर्वको दिदिय"SIRTre- पति-बारात सामिया कोन सावित पाएर कानात सामन्त गुमाने पर AT निमा गुर-पिपरा "यू और हर act-KHESTER से मार- -: बाटोग्नु न ! pot नि:- मारनपुरेस Knाद। हम-सन - । - Ey tetra मटर - २२२ चन्द्रमहोपतो सामुसा-असुभिः सह वर्तन्ते ते सासदा- विपुलौजसो दैत्याः, दान स्यति सा। अले. स्कन्धे असिर्यस्याः सा! ससाससा-समानान्स्यन्ति ते ससः-दैत्याः, एकफ्तृितदेवाना दैत्याः समानाः । “समानस्यैति"सभावः। तान् अस्यति स्यति व सा, पवायच-उत्तरत्र कान्ताट्टाम्। सागौरी "सा च लक्ष्मीः बुधैः प्रोका गौरी सा सच ईश्वरः - इत्येकाक्षरकोशः। आस = अमुविक्षेप। तामुमां नमाम इति परेणान्वयः । कुलकम् । रजोजर्जजजज्जूराऽजो जजज्म रेजाऽजरा। रराजोजोऽजिरे राजे राजे रुजोरुजा ॥५२।। द्वपक्षरः। रजसाम्रजोगुणेन, जर्जन्ति-भयिन्ति "जर्ज मर्त्सनादौ, तुदादिः । तयाभूता ये जजन्तो दैत्ययोद्धारः "जज हिंसादौ" भ्वादिः। तान् जूर्यति सा 'भूरी हिंसायाम्' अजन्ताट्टाप् । अजी, अजस्य - अजन्मनो भगवतः स्त्री। जब- जजतो-युध्यमानान् “जज युद्धे" जिगाति - वयो हापयति सा "जि पयोहानी दिन् । उरुजा, उस्तो-महत्तो जातापि अजा। अजरा-नियतावस्था। राजे-समूहस्य दैत्यानामितिभावः जर्जरत्य-क्षीणतां औजोऽजिरे-ओजखिनि रणाने राज-शुशुभे। योयायियाययीयायाऽरीरं रो रेररेररम् । ददादा दादुलालेला लोललीलला ॥३॥ एकाक्षरपादः। यौति-मिथ्रयति सजीवनेऽधर्म सयोः-नीचातो राक्षसादिः । "यु मिश्रणादो, वित यातीत यायी - ताग्विषो रक्षासमूहः याणिनिः, युक्च,तपात एवम्भूतो यो ययी:- मार्गतस्मिन् यानं यस्याः सा, तेयो विन्पशायतिमायः। या मा पम् । शरीरं रोः। भरि - मोरित्या इति अरोरम् , रक्षेपे। राष्ट्र प्रशष्यत्यफ। रोः- सदायमाना! भट्टहासादिनतिमाः। परेः-शनोः समीपे भरं-गोत्र - गननशीला । "रि गती" विन्। दादा-ददते इति स तमाददवे सा सारा दादा दात्री। सादा-दान - दातन् पादुनौति इति दसानु त राति - सापति सा रहा। इलाया-पृथियाः, टेला-दीप्तिः। लोला लीला की-आने गादपाभूना। दजा-पीडा गतस्य, साजेयुदस्य। - नवमो निःश्वासः २२३ लातातललला तालोनतां नीतोन्नति नुताम् । हो! हंसासिसंहासां नमामो मामुमाममा ॥५॥ दूधक्षरपादः । लात-आदत्तो गृहीतो यः अस्य - विष्णोः तलः पादतलमिति भावः । तस्मिन् लला-ईसा यस्याः सा ताम्। तालबदुनताम्। भूताम् = नमस्कारिणा, नीता स्वतिर्यमा सा ताम्। हंसः असिश्च ताभ्यां समः संहायो यस्याः सा ताम् । अमा- निकटं वर्तमानाम् , उमा मां भगवती नमामः । नमामहे हेममानभासितां जजतां सिमा । शिवावाररवावाशि राजिताजिर्जिताजिरा ॥५॥ प्रतिलोमानुलोमपादः। हेम्ना सुवर्णन यो मानः-चित्तसमुन्नतिः, मत्समो नास्तीति मिचारस तेन भासिताम् - उज्ज्वलां नमामहे । किम्भूता सा--शिवानाम गालीनां कारस्य खेण वाशते तस्मिन्-युद्ध, जनताम् -युध्यमानानां सिभा-मारयित्री। पिभु हिंसाः, पचाचि टाप। जितमजिर रणक्षेत्रं यया सा। राजिता शाजिया सा। याचते मनसा वाण्या भक्तायादभ्रदापिनी। नीपिदाऽदयाऽऽक्ताभण्यावासा नमतेऽचया ॥५६॥ गतप्रत्यागतम्। मनसा वाण्या वा याचते भकाय, अदन-प्रचुरं दापयति म्च्छोला। भोषम् - कदम्यं तदस्यास्तीति नीपी-कदम्बप्रेमी भगवान कृष्णः, ते ददाति अनदयाका - धान्मेषवश्ययाका-आद्रा कोमटमानसा। भणिनो-विद्वांसस्तेषु आवासो यस्याः सा। भचया-माखि चयः वृद्धियस्याः सा । विविकारमावस्यौपलक्षणम्। तामसौ नमते । जलजात्तलसद्भस्तहृद्यायाः शरणं गतः। साशङ्काना शरण्यायास्तस्यावरणनीरजे ॥५७५ निरोष्टपः। जलजावेन -कमलेन लसन् शोभमानो हो यस्याः सा हा च वस्थाः। सवानां शरयायाः चरणनीरजे-पाइपने धरणं गतोऽस्ति। ततचा विवाति श्री के. के. शारिणि अप्रावि शानिन्। शानिन् । रहि-इति चनिः। सेव्यत्वेन सा।

पन्द्रमहोपता के. के.-आयामि मगरन। (सेनिशामिमुनम् ) आय- नुमो मा सद्बुधान् रष्ट्रा मूहमानससूपलान् । दद्यागनुकम्पाती मोदमाना त्वरं मुतान् ।।८।। पतालप्यः। स धान्-श्रेष्ठकवीन् । मुहम्-विवारशून्य मानसन्मलं येोटर पयाभूतान् मुतान् -पुप्रनिविशेषन् योन्। दृदा सदागनुमानः-दीचमार- विवेकपूर्णवापीरूपया दयया, तरम् - शो मोदमानम् - हृष्यन्दी मा नुमः । पुनरभावि, “शारिनन् शास्त्रिन्" इति धनिः। के. के.-एमि प्रियकर समीवन्द्र। एमोत्युत्तोर्य यावद् विवर्ष तावदेव प्रत्युत्पनमहोत्कण्ठोऽपृच्छद् विवारचतुरः सैनिक-देव ! कियदरसा मौन महिता देवेन। के० के०-चौता शरदा विंशठिरागत ! मोदेन वयसि सातोपम् । अधुना घारासाारैरविमलकेशां भजामो माम् ॥१६॥ संयोगः। हे भागत! वयसि-अवस्थायां, सातो-सानन्दं, शरदा सिदि वीता-गता। अधुना मोदेन - परमप्रेम्णा धारासारः, विमला-कृष्णका मां- भगवती भजामः। पुनः श्रुतः "थास्त्रिन् एहि सत्वरम् , व्यत्येति भोजनबेला, शीघ्रताय प्रेरयन्ति विपश्चितः" इति धनिः। के. के.-महोदय, अनुलहनीया गुरुजनाज्ञा, भवाशां समागमोऽप्यानन्दः । परं समाहाननिबन्धो मां विवशयति । समयो सभ्यत चे पुनरपि साक्षात्कारेण सम्भाध्याः । मन्ये भवभिवेशेऽप्यकारणविलम्बेन सोत्कण्ठा भविष्यन्ति भवनुचराः। आम्, भवत्र कि नाम? सैनिकः-(प्रणमन् ) देव, चन्द्र इति । के. के-कुशलम्, अलु यामः प्रयाते कबो तरयागविधुर प्रदेश मूर्ना सम्भाव्य चन्द्रोऽपि निजमर्वन्तमायरोह ।

--- नवमो निःश्वासः भागाई निरन्तरं पारायम्पातः। गहने दम हो सूर्णचन्द्रमणी शरमेय परमाम्। पर, अन्यतममम्, दन्तापट्टन शीलम, दोपणरयोगयु, महेश नाम प्रगत सम्भार बम दोपराला शीतला, पथरीमुर- मारम. रहाण सिननियुष्टः एकामिश्रितो गगनापोलः । कार: SATH मारपण शोधने 'बललाम इम्तं प्रतिदिन प्रपशपामागुः। बन्यो मगरेभ्यो नगारनिरिमा प्रशनेस सारखतन्युम्लभानि। गिलात सर्व: Natre ल गगन पर्वदन्दोमो बभूव । सपन्या भावनत्य र सरोजिनी दुभवीडित ने प्रेपन्न NARE रासत परिशव पनीयामिनि पापाय Re's पायो मा परे। सदिय "Brपके पामगानो र सरमित क्षेत्र मीना, पपनसरि मापनेव का भोर मन संपरेप्रेषयाम, रोहतर परिसर मरमर पर मनमो गुमममम्। Ek बरजरोबानियाला मार रातो दु: प्रसारमा न पर पर ATARIET SARYTry ममता वारपार or what meri wwwindiye मात्र मेरमा fredirecters. पर retire . एपले MOREntry fatherr कारभार १८२rs (Uritai). माग 1Cपुरतामेरा २२६ चन्द्रमहोपतो सर्वत्र पृथ्वी जलाप्लताऽऽसीत् । उन्नतभूभागेष्वभितीजला: पल्यो प्रामाः प्रेश स्म, येषामुटजेषु कूजतां मानवानामातनाः सहृदयानां हृदयं व्यययति । न नार्यः शिशवः जलजीर्णशरीरा नग्ना घुभुक्षिता अमृता मूताश्च यूक्षेप्शरूढाः सन्दि जलप्लावे महता वैगेन शुष्कतृणीषा सटा गावो महिष्योऽवा रष्ट्रामोद्यमाना अनुप्तचेतन करुणवरेण रक्षितुमाह्वयन्तः पतयः त्रियः, स्त्रियः पतीन, मातरः शिशून् परित्यय काठे पुपविष्टाः सहैव हिंस्रः सादिभिधोपेता भगृह्यमाणाः परिस्थित्या मित्रतामापन कन्दन्तः प्रवहन्ति । उत्लोलाः पार्यभूमि भजन्तो वृक्षांधात्मसाकुर्वन्तः शब्दायमन बधिरयन्तो भीषयमाणाः प्रजन्ति। पुलनेषु प्रजा एकत्रीभूयापि जलाताहर साधनहीना दीना मृत्युमेवापेक्षन्ते। काचन पभिषु मुख ध्यादाय अक्षिणी विस्फार्य । विस्मृत्य च शून्यदृष्टयोऽविधान्तमावेनानुद्देश्य प्रजन्योऽवलोक्यन्ते। चन्द्रस्य मानसमदो विलोक्य नितरां दुःखितम्। स शीघ्र प्रत्यावर्य वायुयः सिदं भोजनं वासांसि काठ' दीपशलाकाः शुष्कमन्न पात्राणि नियत प्रायनात्। पले सहस्रशो नाव उड्डाच मुताः। 'अस्वस्थपरिवदनानां सर्वत्र प्रबन्धी विहितः। सर्वतो 'भारवामिस्त्तर पिशष्टीभिर्वायुयान यात समाप्त प्रारब्धाः। आरोग्यशालायाः कृतयोम्याश्चिकित्सा मनोयोगेन की सेवायै ना। आरोग्यालायां केवलं शय्यासदयमासीत् । सगाना सख्या चासयेया। पत्रेष अन्तःपुरं रोगिणीनां कृते दत्तम् । कमला व रोगिमायायै नियोजिताऽसीदा। आरोग्यशालाया भन्त पुरस्य च कोण कोण रणप्तिम्। 'बिरामदेय् दाप्यानियोतिः। कमला बामपनमारोग्यशालायाम्, भारात माराय महिलाम्पसमा व्यतिवाय एम। निशीये म तिमांचकाशिकामादाय पूर्णामारोग्यशाली पसन्दो भारत। विसच धान्यः परिचारका एव म मायन प्रतिदिन सा अणिवा प्रबन्धन मर्य विमनोमुरष मणे परिधोपविय ari avrमोजमाप मामा व पुरती पैनिगन्ती मार अबुन्द्रनम, २६, रेकगी, ४ या यामाग, ५रमा- विमो विमानपत्र । पहिलो निर्मम भापर्न वा ५ ॥

-- नवमो निश्वासः २२७ मृतलप्तवान्धवान् नष्टधनान् गतगृहान सान्त्वयन्ती मुग्धस्मितेन स्मयं सञ्चारयन्ती रोरिण आहादयत्। स्त्रीविभागे काहण्यपूर्ण दृश्यमासीत्। मृतमातृकाणां शिशूनामपरिसख्येयाः शय्या आसन् । प्रत्येकस्य कृते एका धानी क्रीडासाधनानि चासन् । अन्तःपुरस्म भर्वा दास्यः शिशुशेकायां गृहीताः। कमला व माहृदयेन तान् लालपति मा यदा सा विमागे प्रविशन्यासीत्, सर्वे शिशवः "अम्ना आगता" इत्युच्चैत्रं धन्तस्ता पर्यावृष्यन्ति स्म । छत्तमातापितृपतिपुत्राः स्त्रियोऽभारतमार्त रुदत्यो जीवनं हातु कृतसङ्कल्पा औषधं पथ्यं भोजनमनश्नत्य उच्छूननयना कमला व्यथयन्स्य आसन् । सा तासा परिचय- मधिगत्य जनसेवाविभागतः प्रतिक्षणं दूरालापतो लससम्बन्धिनां कृते जिज्ञासमाना घान्त्वयन्ती स्वहस्तेनौषधं पध्य भोजनं ददती धैर्यमुपदिशन्ती भवर्तत। खल्यै- रदोभिता तां देवील्याहुः। परं कमलया भगिनी निविशेष प्रेक्षणाय प्रेरिताः सौहार्दैन भगिनीशब्देनोल्लासयामासुः । सर्व एव रोगिणो व्यथासमये ता समीपमेव पशुः । उल्लापानी पुरुषार्णा महिलानां च कृते विविधाः कुटीरोद्योगाः स्थापिताः। शिक्षायै रुचिमन्योक्ष्य शिक्षा नियुक्ताः। शिशवः शिशुशालार्या प्रेषिताः। सर्वेषां नामानि वित्राणि परिचयेन सह वृत्तपत्रेषु प्रकाशितानि । चन्द्रः प्रतिदिन जलाप्लुत क्षेश 'फविमानेन खयमपश्यत् । एकदा स जलप्रते प्रदेशमवेक्ष्य प्रत्यावर्तमान एकस्मिन् पुलिने शिविरसनिवेशमपश्यत् । स्थानमिद राजनगरतो नातिविदूरमासीत् । सुनिवेशय सुभगः मुदः सैनिकः कृतरक्षो व्यवस्थितो जलप्लावेनाप्रभावितः शान्तबासीत् । एका हीरकमाले भावरा सणेरामा रमणी नद्यास्वटे साध्यविषये अभिसूर्यमुर- विद्याऽऽसीत् । शोणितशोणिती तरया करौ बदाली भास्ताम् । साधिदेलोणिमा बामा बलोचतपोलयोनिपल्य तो सेवति तस्यादविं द्विगुणयति । मुग्धा यश कदमा पोलयोरपततः केशान् मृदुलदुलामिस्तनुतनुभिः करा लीभिरपसारयति, वं मुख चन्दमिद विशदयति। पत्रेयं विनीता वनिता स्थिताऽसीत्तस्मादनतिरे एवापरं पुलिनमशोभत । . पुलिय। २ ग्लाइडर-चुपचाप चलनेवादम हवाई बदान। .

२२८ चन्द्रमहीपती पुलिन बलशालनप्रामपुष्पैः दुः पूर्णमासीत्। ठलासः, शान्तिः, सौन्दर्यम्, प्रकृत सुन्दरतम रूपं तपसीत् । जगतचिन्ता, तृणा, मात्सर्यमभिशापः, आक्रोशः अनरवस्त्र सर्वथा नासीत्। विविधरागाः पतक्षिका अलिप्तपरनाम घोम्यन्त्यः क्रीडन्त आसन् । अभितः एमा नयो मध्यकता मुग्धा इस अवहन्त्य थासन् । प्रचन्डधारासम्पाती- द्विरता प्रकृतिः सम्प्रति शान्ता भवन्ती नीरवतां शनैशनः प्रसारयन्ती मलयानिलेन निर्जनशान्ति लालयन्त्यासीत्। सतो जलपालनविगतमला नयनहारिणी विपिन विभूतिमानसं हरति स्म । सन्ध्यासमय भासीत् । प्रदेशशान्तता विचार्य तत्रैव सन्ध्योपासना विधिसुचन्द्रः सनिवेशपुलिने स्थानाल्पवया अवतरणासौकर्येण पार्थ पुलिने पकविमानमवतरणायादिशव नदीशिलातले उपविश्य मुखं प्रक्षाल्याचम्य प्राप्पानायम्य सान्ध्यविधिप्रवणोऽभूच । आकाशविम्ब स्वच्छनदीजले दृश्यते स्म। चन्दो विचारयामास, महद्विशाल वर्तते एतदाकाशम्। अहह ! हिमगिरिसदृशा दशामनवधयोऽयुतशो पारिधराः सूर्यसहसा प्रहाचारिमन सावकाशं चकासति । विज्ञायते सूर्यः 'सपादनवकोटिकोशमितं दूरमस्ति । भस्माकं पादाम ल्यां कण्टकेन विद्वायां यावता शैयण मस्तिष्के शानं भवति ; तौर कल्प्यतां यद्यस्माकमङ्गुली सूर्यसामीप्यमेत्य ततापाइहेत, तदा तदहन पचदशवर- स्माभिज्ञातं भवेत् , इयान् सूर्योऽस्मत्तो विदूरोऽस्ति । अहह ! अहह! एतादृशा अनन्त- संख्याः प्रहा आकाशाजिरे चरन्ति, ये विदूरत्वादस्माभिलघुलपा प्रतीयन्ते । धकरप्यमानकल्पना नीहारिकाश्चास्मिनन्तप्रमाण्डेऽनन्ता असछ स्येयाच सन्ति, विदूगधेयत्यो यत्-यः प्रकाशः प्रतिक्षण षडशीतिसहस्राधिकैवलक्षकोशमितमध्वानमति- कामति स प्रकाशस्वत्र त्रिंशल्लक्षवजेत् । विज्ञायते एषा भूमिरपि यस्या सवरावर जगदिदं वसति कदापि सूर्यस्य भागो ज्वलदारप्रतिम मासीत् । परं प्रकृत्या बहिः शीतलीभूय वचन काले सूर्यगोलकान्निःसूता, अद्यापि तमभितो प्रमति । चन्द्रोऽपि 'एकाग्जवर्पपूर्व पृथिव्याः सूच्याकृतिांग आसीत् । सोऽयमेकदा पृथ्वी- तो भिन्नः। तेन भुमी *सप्तविंशतिकोशनिम्नः सातः समजनि । स एव समुद्र उच्यते । १वा नो करोड़ मील। २ प्रकाश का वेग १ मिनट में १८६... मौल है। क्षण-मिनट । ३ एक भरव, २७ मील गहरा । सभी जगह मोशसे मीलही माना है।

नयमो निःश्वासः
૨૨૯
एणभूमिः-असहय कोशमिता महतो स्थलो-आकाशे प्रगत्या पवमान्ती
पत। पूर्व यश चन्द्रो वृथिव्या सहवासीदतस्या गतिशीगामीर, दामोरा
को भारासत, पालु मनाया गतिभन्दा पाता, प्रतिहार देवल पावोm.
पहिसकोरामात्रम् । बदादामिना पृषी महती सल्यामः, सपा मसीतारामु
पात् प्रतीसरे। पोशा नाम नशत्रमहो। इसरिसाल संदे, पतरिमन पर
"मित्राः पृथ्यो मा परान्ति । हन्त । तविषयावन्ति मगन्तनिक्षत्रपि
माकाग्रे भ्राजन्ते।
भाजन्ते। भूवनसत्रमामतः पान्महापासिकोमत'
रिसरमसि। हन्त! कौरतो विलक्षणाऽनन्तता महाकाय !
पन्ना भवन्तीति वा परिचायत, परन्तु विझयो टेमी नयी भूपराध
सन्त-दही को विजानाति, परनु हन्त। पूजा-अनिवनीमापे मगर
मसत्त पन्तो महान्तोऽपर, कल मन्ति, यूपी मा
प। र यो वराला पूर्ण सरसेनाका एक निरपेशी,
नियर एस भो मौदिशा परिने सम्भाम्पवा दिनदेन .
हा हिमीभूर मरकारमात्म मार दी।
रधिमास समार। समान्तरेण पो धमासमरा
MENUAR. पर सर riotsमम् । पE REA
RATE, Trधार मोरना नाin समर rmire
-
प्रशासन कोय मी तरsarah
भारदसभिल र स्वरि तिबरेजका पद
KR नामहभिक पाये।
मन्तर समेटरपियो रवी utsekre.
पुरसम्पदामाद का irat
पर..................... Tut
areshth TREE..................
Boric trrner. ।

चन्द्रमहीपती मासीत्। नीरसं गई वायुमण्डल कन्तिनोन्मादकन पोरमेगा परिमलेन प्राम्पितम्। मालमोहूतिर तमोऽहन्दूनाथमा विमेव सा शनदधनः पुलिन- मारोहत्। तस्याः मुमं पौणिमचन्दादाडाद सामयासीत्। ये प्रकिना सपिणीव वेणी-यस्यां कुन्दमुमन धन्द रशिनु बेगीसपिणीमाक्रमणेरच्याऽऽलियतारा इश्यन्त-आपाणि लम्यमानासोत् । साक्षरमोरिव भासमाना पा छन्मुखमय चन्द्र' प्राणमत्। चन्द्र गताशी साधनसम्पमा सम्पनसौन्दया रमणो अद्यावधि नैक्षितासीत्। तस्याः मुसमण्डलेन सा परिचितेव कदाचिद् दृष्टवाय प्रतीयते स्म । विस्मितः स स्मितावलोकनेन तामुदतरत्। मय सा देव । प्रमदाजनस्य पाष्टर्यमशम्यम्, पर विपुलं लिप्टस्य धाप्यं क्षम्यं भवति गुणज्ञानाम् । अतोऽहं काप्यपरिचिता काश्विपृष्टपूर्वान प्रश्नान् पिच्चिपामि, दयनीयाहं दीनवत्सलैदीना" इति सप्रश्रममवादीत् । तस्याः खरे सहीतवत् सुकोमलता माधुर्य्यद्यासीत् सौन्दयं च कवित्वम्। उत्तेजना घशात्तस्या नेवाभ्यां विचित्र ज्योतियाँतमानम्, मोष्ठौ स्फुरन्तौ शरीरच रोमान्चितमासीत् । तस्याः स्फुटं विकसितयोश्चक्षुषोर्मादकता, अरुणकपोलपोषोल्लास आसीत्। सौन्दर्य तस्याः शरीरसौधेट्टहासं फुर्वदासोत्। साधनायास्तेजोमय्याऽभया सा तपखिनीय प्रतीयते स्म। अथ चन्द्रस्तस्याः निःसीम साइसम्, उत्कृष्ट बीरता साधनाध, अनितरसाधारणी प्रतिभाम, अलौकिक सौन्दर्यम्, पाणिस्पशिनः सुचिकणान् कलावलयितान् कृष्णोज्ज्वलान केशान, सुभगान्यज्ञानि विलोकयंश्चक्तिस्तकतर्वाकुलो नेयं लबावनता भयविहला सुर- सुन्दरीव भव्यदर्शना दुश्चरित्रा भवितुं शक्नोतीति विचारयन्नवत्- चन्द्रः-आम, स्वैरं स्वरमभिधीयताम् । अभिधास्ये अभिधेयम् । रमणी-कदापि देवः खपवित्रपादविक्षेपणेन किमपि पाषाणीभूतं पुरमलधकार ? चन्द्रः-आम्, एकदा. रमणी-पतीनां वर्षा वात्ता चन्द्र-युगादधिकम्मवेत् .

भवमो निःश्वासः
२३१
रमणी-सत्यम्, सत्र मान कति दिनान्यासीत!
मासस्यम्भवेत्।"
"सन्तपुरमप्यवालोकि
"मा पाषाणपुरस्य पापागोमूतमन्तपुरमवालोकि।"
कि किमालोकितना"
विपुलमवालोति, मात्यप्यरतोकि।
"अगापि निमगिर"-दश रमणी प्रह।"
"सिंहालेटपातया भवन्या साहाय्यमकारि ।"
"नातः परं तपशि देवपालनपन्नीरवनौरेण पापना एरपन्ती
खामाद मन्तामहितहपभरभाराक्रमकासमुसो रमगो “देव, साई मन्दमा राज
इममि या परातिहारिया दरिया परिणाम देवेन पारपुरे प्रेरिता रशिया
। दुरिसपतु:सिमित विभिटोन पर प्रभुदम् । सविपतिमा
प्रतिसाद पाई गुगाभिन मास रिपे भाव सदी रहा।
मिमीपत्। भायेरमो देवस्व लिपतिमा भया बाया
परंभशीपसौभामा बस्तिमति देव दारि सम प्रामसमपर पन्न
सरगन् । तर प्रतुरपोमेररि मनोर: । र,
सपा मविपाशा विषयात भावोजना विका
पनि पदाया। माल मगोताय तो मर । पर
सोमालिन्, मलनिरा पर cिtion
पर। रोपवारियरमा.मानपिनर
हाम्। Rat मारमेर औराम !
मामा मसन । तरकन् ।
यो वियर पर मेरी ाि सारन्ट मान्टरपन
पिनमा परे
RET मा TREENA

२३२ चन्द्रमहीपती किमपि कष्टं नाभूत् । अव भगवानयममृतमरीचि चीननेऽपि मुधावियुको न्यसेच यदहं पवित्रचरित्रेण मनसा प्रेमाणाऽऽराध्यदेवमध्यगमम्। भवत्यधिगते मम । चिन्ता व्यपगताः। यात्रायामसल्येयैः कष्टैराशवामिव व्याकुलमानसा परमधुना भाशा, चिन्ता, व्याकुलता च युगपदेव व्यपगता। भथुनावित कुटिलकाल लिस्यमानाय दास्य कश्चनादेशः, क्षम्यताय प्रष्ट छटाय प्रनाम प्राशोगकरी प्रयमा पटता" इति । सर्वतः प्रसरति प्रापेण्ये सौरभे, ईपत्कम्पने मलयविरम्पने, उज्वलायर्या चन्द्रिकार स्मयमानायां ताराकयाम्, विधने प्रदेशे, नदया स्तब्धतायाम , निर्मायगिरा विवसनाव प्रकृति प्रसादयता प्रसन्न मुलेन, मनः प्रसादयन्त्यामनुपमेयमुन्दर्या सोपक्रम : विजयाजित इव स्सलन् जान्नैयायिक इव समदमवादी- विकसितयौवनारामे। रामे! मवादशीमिर्द शोत्पादितमानसोन्मायिमन्मया रप्रियामिः प्रतिशतानि वैपायमाप्नुवन्ति कार्याणि नाम ! परमई वि परिस्थितिवशान्मम तिसः त्रियः। अहं राष्ट्र बपनीकत्वं व्यपातु सब्बः, कसमेतरा स्वयमेव क कोमि। पातश्च मम दियो लोककल्याणे । सांसारिकभोग विष्य मराशा कर्माणि पुनीनां तासां कामिनीमुलमा भोगार सर्पयामागताः। म प्रसाद सापनास्थलम्, न मोगभूमिः । त्वच प्रैलोक्यमुन्दरीज्यमपि मात्र मोति रितान् भोग्नदास्यसत्व विरामोशियः, मह निवार्य कवयियामि। सत्यम्, विचार्य चल पाययितुमलस्य दानेमाने वा मान्तरण पर सिमासस्य जीवनमरथयो प्रश्नः। अय पदोपा दे। मगर रहरीवं दपोश्री सद्मनासाद् गुमः। सायनामले परशिया: गमा मुग युगदेव पावर्त या माग्दै भोगभूमा माति, सपनाको पद- अनुगामिनाविमो दिएन सहाय नमुगाना। मिशिदोनियो भेरिन एवं दुः। ग्मती। मैन् श्रियो दिपायमः, नुमा यि কেন মন ৰী মনশেফিল, জী খামায় নি यम,दा भालदी। मनी-1

नयमो निःश्वासः
पदसरया रणनैपुण्य साहो सौन्दर्य सरिमन भावमार्यवारीसंदतिय विकासे
तयारीतदेव यानचालकोऽसूभयन् दानगरस्य समापे सेनुभप्रात् वापराष्टी
दरारनि विवरातोरोपेपासूरि-दति ।
"इन्त दौर्माग्यं रहस्य, मातु, पान समय । (अभिरर्माण ) भाग बात तसतम्।
बालन प्रेयसीना दुःसम्। पुलिन म मुगापहम् । भाती प्रसाद विधामा
धानुपरान् दुर्गमागन्तुम् । भारोपानम्, पत्येति बेलामा
“एमा नाम सूर्यप्रगा।
पन्द्रो शिरतोदोपरेण सेनिहालोरर रिस्पर' पटनारपल गनुमारिस समय
साम्मा बाम: सेनुर्नवीन मासीद, मन हत्येप तस्य विए भार।
या प्रतिहार राशिकोगेन पावन सेटोमी भर
II पाक्षिक मिः पराशनगर। अपामा मायः
bear विपुटेन धनेन मा निमाविमलोमतेम। सारखा
सामन्योऽन्द दिशा मनहर चिमई महानाय :
NRषमा मनमानावे पण मनाना
गुर पता भगाताने Two ki
स्वर पिटा पर मेरी
दान दिलोरदारसन।
परिमारत पहारेप पन्दोमा।
करे MAN Or माम•kti
km.Reररे विमान
--
Freeneryपरमात मा २..
INदिस्सर १cersnear
पोhitsure र • Isranties
POries

२३४ चन्द्रमहीपतो विकर्षिणी नीरवता प्रस्ताऽऽसीत्, यत्यां तन्त्रीरभरणका उल्लास स्फूत्तिं चेदना जनयन्- आसन् । कवन वचन ब्राझे मुहूत विदुषां विरला वाचो भगवद्भडनं सारत्वेन वर्गवर- धूयन्ते स्म । अकरमाद् वितारहत्तमयोपयद् यद् राजनगरस्य पश्चिमोत्तरस्यां दिकि गव्यूतिदशकान्तराले वातहंसः क्षतिग्रस्तः। चन्द्र त्यितमात्र एवैतच्छ तवान् पवलोऽमुना वायुयानेन जलाप्लुत क्षेत्रं प्रेक्षितु प्रेषित मासीत् । चश्चिन्तयामार कथमहं कुमुदिन्या अप्रे स्थास्यामि। हन्त। हता कुमुदिनी! दुर्भिक्षमस्ते प्रदेश सोत्साहं जनान् सेवमाना सा यदेदं श्रोष्यति हन्त! घातः। किं विकसि प्रबल ! सत्यं सफलं ते जीवनम् । घटनास्थल प्रेक्षितुशामो मरुत्तरेण सत्वरं गतवान् सः। औपचारिका आसञ्चेव । योजनविशाले क्षेत्रे वायुयानस्य तस्मिन् स्थितानाच अवयवा अपरिचीयमानाः प्रक्षिता आसन् । एकतश्च रिण्डितं ज्वालाभजितं वायुयानम् । अग्रिमभागो वायुयाने नासीत् । अप्राप्तसन्तोपो वायुयानावतरणभूमि' गतोऽजिज्ञासत उत्तरितच “वातईसे चालक- द्वयम्, द्वौ च सैनिकावास्वाम्, प्रबलो व्यवस्थायै तत्र स्थितः"। सन्तोषस्य निग्धासो निरगात्। मनुभ्यः प्रकृति जेतु कृतप्रयत्नः । नभसि निर्वाधगमनः स कृतकृत्यमारमानं मनुते। परं प्रकृतिस्तस्याल्पज्ञवां विचिन्त्यष्ट- हासं कुरुते। किमेष एवं प्रकृतिजयः? मानवः व्यं भ्रान्तः! अल्पेऽी ने कीरशी तस्य मान्धता? इति स विवारयामास । पले स्पले माननीया महाराज्ञो सरोजिनी पत्रं लिखिनुमादिशति मुदिनी 1 विजयतां भारतीया संस्कृतिः। अहं बविना' वीपेन व्यवस्था सम्पादयन्तो प्रान्तममुं पर्यटामि। प्रान्ते प्रतिशत नवनवतिमाः। सर्वत्र दुर्भिक्षम्। प्रामेषु बहको मृताः, केचन शमीपत्राणि शमोतार पापा जीवन यापन्ति। अमरहिता अपि नान्न याचित पारयन्ति मनसिनो प्रय पायुयान का नाम । २ एरोड्रम। ३ बीवयति-युदानिशीघ्र मुरं प्रारमेन . यस बीपः "पृषोदरादित्वात्साधुः (जीप गादी)।

नवमो निःश्वासः २३५ हदीसौतोविरहितेऽस्मिन् प्रदेशे को इलमेव नास्ति। द्विअयोडनतो जस्मानीय विन्दुमात्रया पीयते। मामान्तेषु पशूनां कटालाः प्रसूताः। सर्वतः सिम्तापर्वतेषु हरितपत्रस्य दर्शनभेव नास्ति। कहालकलेवरा, स्यामाः, नमाः, नराः, परेता इस परितः प्रेश्यन्ते। सर्वत्र दीर्घाकारा साकारेव दीनता दरिद्रता युभुशा रिधोदरा दन्तान्निष्काश्य निखरतनेशराभ्यामभूणि सारयन्ती मानवोचित सम्मान सम्मार्य हस्तं प्रसारयन्ती हर्ट हट्टमट्ट महम नगरं नगरम्, प्रामं मामम्, गृहं गृहम्, कुटी कुटी भ्रमन्ती अतृप्तोदरा मानवमासा- मोदममा नव मृत्युक्ती सतोपं जोपं ताले रचयन्तीवासंख्येयानवतारान् एहीत्वे भ्रमति । असहाया निरुपाया वः साशं सतोष सश्रमं पोषिताः कमलकोमलाः मृत्योर्नुले माधोभूता दंष्ट्रापातमिवान्तिम क्षणं प्रतीक्षमाणाः शुधया शुष्यमाणा माणवका दुख सोमपारयन्तः कृष्णोभूय पीतीभ्य पादपात पाणीव निपतन्ति गतजीवनाः । विश्वस्याति- मेदिनी अद्य सुसूतानां विपद्मस्तानामस्वसत्त्वाना कहालेः पूर्णा । दुर्भिक्षशताना धुभुक्षिताना मानवानां समूहो भाजनानि वासांसि आभूषणानि भूमि बालान् युवतीच विकीय पैतामह गृह परित्लग्य, प्रवर्षमाशा हमालयन्दायाँ पार्यायत्ता मुभिाविधालय महासागरस्यागाधे तले निमग्न्य वृषभेय वस्तुहातमायोग्य प्रति । सपनपनपटायासु चकासता विधूयमानाना क्षेत्राा नयनमनप्रसादनी विभूतिरय एता उपत्यकामु धनेषु प्रान्तरेषु विविधदमः सबिता पुथफटख्यानेस्वरुवरः समृदाः सरत योतमो निमरस्य च पावें नितरामुरा सुहासिनी लगन्धवैभवा! विरभरणो परणी म्यन्त ! सेयम्, काण्डदग्गुमा शस्यहीना दीना मलिना शीया अनन्त जगररूपमित्र स्वा जगद् असिनु सजा। प्रता भगिनीम्, माता सनन्पयन , से दुकान पानव सभ्यः। पर पनो योवन सौन्दय विलसं हावान् भावान् प्रेम प विस्मृत्य प्युनिष स्लपितान् शुषस वितरमावशेषन का स्तनान् शिम असुपाशान, गोवि- प्रदान विपीय मानुः हिमोगा हालटेवराः मन्त्राव पगन्तो या पुरेमोन्न- सन् स्नेहं तमभिटान्ति, व सत्य सम्पदामलेभेन देशल माय विमाचरन्तो विदेशेषु विरोधिषु अन्न पन्तोधिन्नामलोभेन निधन्दो का मारियो सिम समावन् मिपमापान रहार दमदावान्दो रामा सस्य मनसो .

२३६ पन्द्रमहीपती राजनाय हारपनिर, गुरासायंकालेगीगरमा पुरशिजतैः सइ पति- प्रताना पाशन गमागमा कोमार व निज निलंग राजदतामाभिः साहन लम्यन्तो विन्ति। लिनिगु मोगा दिलामः राह रमजविसर्वचपर्क- मुरा निगोप गन्ति। यत्र तानाना पतन पोरस गर्विटमुख्यतिरिकवणेन विमोहितगपनाः गुलोचना मन्दसौ दसायः स्मपमाना मोदमा नना इवान्वयनि- धिरारम्वरभूषिताः पाक्षिका मनो रमपन्ति। पत्र मृत्याः धानबाप्पीला यम्यतिमारान् भजन्तधिम्सिालयेप प्रसन्ना पति 'विरवन्ति । प्रजाः स्वमान्य विनंत्यः साधिकार सभागं साबित इश्य पररूपमुख्यमन विनाइय- मानस वीक्ष्यापिन झिमनि कुर्वरयो वायोऽप्याः कायरा'कानि कोष सइन्ते। धनिनो मृत्यानुपदिशान्ति-मगवता पत्रमावतारेण कृष्णेनोदपोषि 'कृत कर्मण्येवाधिकारो न फले' अतोऽहनिशं भ्राम्यद्भिः फलमतस्य वेटनस्याकापाव महत् पातम्म्। अरमामिरास्ति'नवविधं किमरि कर्तव्यं येन भगवद्वाक्य विरोधः समापतेद् इति। हन्त ! कीदृशः सार्थान्या संसारः! शासनेन 'भाशनस्य प्रबन्धो विहितः। अन्नरोता सापराघो घोषितः। कोऽपि पक्षव्यवहादिमिन रहे विपणी वा रशितु नाधितः । जनपिगो व्यापारियोऽपार- मा निरन्धानाः सन्ति व्यसनोपजीविनः व्याशः। ते परिवारसदसः सर्वेषां सदस्यानो नाम्ना पार्यक्येन परिवारान् प्रकल्प्यान न्यरुपन् कूटनिपुणाः । "पृष्टविपणिः सर्वविधान्नेन परिपूर्णाऽस्ति, समविपणौ चोद्त्तवलासनः मशिका मारपन्नेकलः पणो। माइकान् स कथयति, "भवतां दुख पश्यन्नहं नितरां दुःखो, परं विवशोऽस्मि, विकेतु मम प्रमोपे किमपि नास्ति, शिशुभ्यो दिमणमितमन्नं मुद्राशतेनानीतवानस्मि तर्द्धमगृहीतलाभो दातुं शकनोमि।" आचारे व्यवहारे च सर्वत्र विशेषतो नगरेषु छलं दोषः समीक्ष्यते । पीडितमानवाना कृते पौरः समितयो योजिताः। शवशो युवान आतंत्राणाय सजा अभवन् । ते रथ्य दुर्भिक्षपीडितानां सेवाय रक्षायै भन्न यासांसि धनचायाचन् । जनता मुक्तहस्तेन दी। १ क्यू। २ काये रमन्ते ते, औणादिको हः। ३-ईषद् अशनम् - आशनम् । सल्यं परिमितचाशनम् - राशन । ४ चौरपाजार । ५ गद्दी उलटाकर।

सेवायै नियुक्तः । नघमो निःश्वासः घरवाहिभिर्मरुत्तरः संग्रहः कार्यालये प्रेपयितुमारब्धः। गरीयांसं राशिमेरितं दृष्ट्रा पाना बिहा च्योतिनुमारया। तैः सर्व धनमाजिहीर्षभिविपुलं धनं दानपत्रे लिखित्वा धमृतिक चतुरं भागिनेयमामै कार्याय योग्यतम विवर्य परामृष्ट यदस्माकं विश्वस्तो का कार्यमा प्रेशिष्यते। कण्डाकुलितो विचचिकाविक्षनो दददरिदितो मरिकारिणी हणमदितो मशकाशितो विषमकालजरपोडितः कृष्णकलेवरोऽपरोऽलन्धमृतिम तिमिव समाणोऽमाणः काणो विश्वस्तो मानवो मुद्राणां पञ्चशती मासिक वेतनं यातायातम्यर्य निष्यवस्थाच प्रकल्प्य पीडितमानवानां विश्वसमानवाच्या नान्युत्तमानि वासांसि पुरातनेभ्यो वीणेभ्यः पृथाकृत्य क उपयोग एवेषां घराघु कृत्वा विक्रीतानि, वेषां वितरणय प्रामनामान्युल्लिख्य प्रशितम् । वास्तविक- सर्गुणो व्ययः पुस्तकेपङ्कितः। एवं संगृहीतधनासाशं परिचितमृत्यदान्धव- भ्यो वितीय तेभ्यो गृहाणि स्वयं यशो धनय निर्माय निर्मायो विश्वस्तो मानवः । त्राणापरिपदो विवरण प्रकाश्य अभिनन्दनपत्राणां प्रार्पणमनुभवति । अधुना स नगगद् 'पास्टे सामन्तोपवने मोत्या दुभिक्षपीडिताना साहाय्याय ! विशाल भवन कारयति । को पानी किमर्थमेषां पापात्मना मष्टिभूतानुमोदिता या समाजेन । पर माधुपा- पता प्रेश। यो नीति प्रणाली पाऽऽधित्वैप शिरोऽतिमुपश्यति स त्वानेय एप पिमता पुरुषव्याघ्र ! भास्यमेवापनेया। एष कलहो भारतस्य प्रारतो- लाटापहव्य एव। प्रजाया भादोऽविभीपियर्या तिरोहितः। भदोथि- सत्यमेवोच्यते। रूप्य गुन्य व्यक्त्तिा चतुराणा विकोणत्यापिका सरला यिन्ते। सदाचारी रसातल मोपगदः प्रतीयते। अध्ययनराशाया और रा। संन्यासिनोमी संप्रदिपः। अर्थ सतिशादी। लोको विविषयाजेन संपूरहोठमुकः । न्यायो मुदाभिर्विकीयते । रतोचोप्राचारो सेग्रवारदा एट. " देवमन्दिाणि लोहिताय निर्मित राय वसा मारभूमपथ । rr परकोटेवहीडा कौय पोस्य पवनय कला। -सम्मिी। मुगन्धवनन्त विशेष सन्नदं सम्बन्धिदस्यानेषु गत्ता को र। नौर। सात।

२३८ चन्द्रमहीपतो व्यवारीत राज्यस्य दशकोटिमुदाणा वर्षचतुष्टयस्य च व्ययेन निर्मित 'आनन्दर भमः । तद्वन्धविधातेनैव सों जनपदो जलप्लावे निमनः। बन्धनिर्माण निगु "मृत्स्नास्थाने सिकतामुपयोज्य मृत्स्नाच विक्रीय पुप्राय 'पत्रनिर्माणशाला स्या *वननिर्माणशालायाकारयत्। स एव जनपदस्य योगक्षेमाय रचित भानन्दर- जलयलेन भनो जनपदं जलेनाप्लापयत्। वाप्पशकट्याः सेती च राज्यतो दत्त लोहवलभीनां स्याने जीर्णा लोहवलभ्यो रागेण रकाः प्रयुक्ताः नवीनाश्चान्या विक्रीता जीर्णाश्व निरन्तरप्रपणेन: काटयुमो भग्नाः, इति । "आश्चर्यम् ॥" चन्द्रश्चिन्तयामास “जनः स्वस्य लाभलोभेन विद्य विहन्गमयुगम लोदवलभीविक्रयेण सहस्र द्विसहस तस्य लामो भूतो भवेत्, विनाशय कोटिमुझ= सहसाणां मानवानाम् । अयमर्यविकारः, संग्रहविकारः, स्वार्थविकारो जीर्णा खोलभी मुपयुनकि गरनास्थाने विकताय । हन्त ॥ विलक्षणोऽयं विकारः। विलक्षणयैव पार चिकित्सया भवितव्यम्।" चन्द्रो ऽधिकोपमाशापयामास यदमूषा धनमगुसन्धातव्यम् अनुसन्धान यावत् पन्धसेतुनियुकाः रासम्बन्धिनो ग्याभिरक्षायां गृहीताः युति । भाग्नेयरिरणहरू तापितनिरपराधरांसारं परितापापेनेव पायोधौ पतितं दिनमा वीश्य शो दमणिः समस्तदिनाकुल्याणिनः सान्त्वयन्निय, नक्षप्रमुकानां विवादविमर विशालमुम्बलं हार परिधाय कुमुदव्याजेन विदछन् चर्षितताम्यष्टमिवातार गनेर रश्मिशालेन विशेष्य मुख प्रकटितोगग्वलदन्तपपिगंगनाने साइनो धावति । उन्मुख्याना निरशना तगोधवला मुबला तपस्विनीवोरे करपया लक्ष्यसेवा निन्दनीरवता प्रगादी शान्ति दधाना प्रवहणस्य प्रशान्तमादकलारेन बसन्ति । मनुमत्तमोदिमाकरेणेव मन्द निवारिता नदी मन्द मन्द प्रवदति। अशान्तानपि प्रमन शमयत् शान्त वातावरणम्, गुमगरितः सौरमपम, दो पालना मदलगमनमा गौरमम्, मपुरमीयमात्रिश्चन्द्रमगो माग परिवारका सदसनत्यम्, प्रति दयानन्दसायी निमा रापना भन्। न्य D1 १ मेन्ट पामिया मिला । : संपादोरी Castody By Government. .

नयमो निःश्वास २६६ प्रसवणपूर्णायामुपत्यकायां विजनमनोरमे सरित्तटे विविषवल्लीवलयित कोरकमुकुल नते चलदल दधिफल मन्दारकोविदारो दुम्बरनिम्बजम्बोरपरिहते माधवीमल्लिकाशेफा- माथ्यकरवीरकरीचाम्पेयचम्पयन्धककनकरुचकुरवकमलवालकलाकुले निया रम्। तमेव लक्षीकृत्य शनैशनैः सरितः प्रशान्त स्थल विभाजयन्ती भिप्रेरिता दरिः युटोरान्तिकमुपेमाय । तरि शकुनाऽऽवध्य भूमिमवलोणी युवा कुटि मजन् अखपद्धशान्तिस्वरूपनिमममध्यात्मचिन्तननिरत विरतवासनमात्माल्पनालीन कल्पनातीत कैलाशविलासकेशे तेजखिने मनोज्ञहास्य निरालस्यमुपास्य निरतमान- সৌক্ষন ঠাৰিব। ভালবাগুরাবলী দ্বীপ -- अपरिमेयानि पापानि मम विश्वसर्वस। अन्तविरदिता दोपाः। संसारे भ्रमवी मरने पर्यटतो जगवालजलधी प्रवहत उन्मत्तीभ्य कर्तव्य विभूल जातो मृगतृष्णा- पवमानस्य स्वेन व निश्तो मे आयुर्व्यतीवम् । अद्यावधि विकारपोषणतिरिक पत्कृतवानस्मि। अभ्यस्तविषयाखादो गुरुवरप्रेरितोऽपि विजने विश्नी बसन्नपि आमदमघुनाऽस्मानं विचारयितु पारयामि । "अप्यधिपानात्महतः मुमेरून्मूलनादपि । अपि पहन्यशनाद् राम ! विषमश्चित्तनिमः।।" पति पसिटकमुष्ट। क्षणभ गुर बिनशनशील जीवन वितानि मास्मिन जन्मान पायमिन् मया विचारायाभ्यस्तम् । तथापि नाई निराश हत्येत । मासुधरिष्यसि भात्मसात् करिष्यसीति में सुहगे विधायः। ममापान मनम्तन पर सायनन्ता। सा मा दानवोदत पर। सब पास्वरमौ स्माविस सोम मातो कहाल्दिनमतिदूरं भवेन्, पर वर्सत प्रई ससम् । मिथिई समस्या का पाविशिष्षसि । अधीरता प्रतीक्षास्मिन्नानन्द च्यपन्नेवाहे परमो बरसा हनुमत थामि या त सौ मिनुभविवमिति सनिर्वचनीने पर समोरमलोपामुमकिसलयकोमल्य परशतारिमरदा भवधिययालय एमासभाको दवनन्दमनुभदिया। ख। २सा सवार ।

चन्द्रमदोपतो दीपाण्यधान्यपिगुचीय भवन्त्यहानि हानियलस्य शरदीय नदीजलस्य । दुःखान्यसपरिमया इस दुःसहानि हा! निःसहोऽस्मि कुरु निस्सरणेऽनुकम्पाम् ।। (बगदरमहत्त तरितवाच शनैरूपमृत्यानम्य दुवोचे- अर्थवादस्य दुर्दम्यपिशाचेन कारावार वक्षितु बाधितां दुराचारकर्मशलौह इटा- निवां भारतीयो भुवे प्रबन्ध प्राचीनार्यभारतीयसंस्कृत्या भूषयितुमुन्मुक्तवातावरणे नियन्ति नरेन्द्रमण्डल समावयति युवराजश्चन्द्रः। तस्मिन्नरसरे तातस्य वाग्भागोरया सानु सर्वः परमोत्मुकः। इति। "श ! चिरायुपश्चन्द्रस्य साधनायो व्यवस्थायां मम महान् विश्वासः । मूसाशास्त्वं राममनुलक्ष्मण झाशेपं निर्वहसि । मया यह उत्सवा दृष्या उपदिष्टाः कृताः सघालिवाया। अधुनाहमुपरतः कालात्ययितो न क्वापि जिगमिषामि गुरुणामाः। चन्द्रः प्रजाति सयुयुशुभिरन्यै राजमिस्त्वया च परामृश्य यचिकीर्षति, तदेव परम्। "गुणानोडल विरुदबुद्धयः प्रकृत्यमित्राणि सतामसाधवः" अतः सर्वैः परामर्शो वरीयान् , देवो दिशतु युप्मभ्यं साफल्यम् । अथ च किमुत्सवैः? अलं प्रजाधनदुरुपयोगेन । विश्वसाम्राज्यनि- प्सवः सहस्रशः सुन्दरीण प्रियतमाः, लक्षशः कलावतां कोटिशः कर्मकराणामाया भगवदगुजम्मान इव मनुजन्मानो दुर्गान् प्रासादानारामान निर्माप्य संसारसाधवारम्भे- ऽदम्रारम्मा रमणीयतमानुत्सवानकाएः, परं क्वाद्य ते ? एते भग्नावशेषा मूकमाकन्दयन्दो जगन्मानमहिभिवोरैरप्सरःस्पदिसौन्दर्याभिः सुन्दरीभिरघ्युपितयरा अपि निर्भर- मुद्घोषयन्ति यद् वयमदयमदिता मर्दिता निष्ठुरनियत्याः क्रूरकरः। विस्मित स्वविचारान् वरुचि प्रसारयितुं सयमा हन्त ! भयक! तेषां नामकालानुसन्धाशमी पुरातत्त्वविभागस्थानां शिरोऽत्तिकरम् । एष वायुः, एषा भूमिः, एतदाकाशम्, एतानि वनानि तान् सदजिगमिषूच निःशब्दं विहसन्तीव। वनवृशेषु निपतति सान्ध्यपूर्या- लोके क्षर्ण विविधरागाणां प्रतीतिरिवास्मिन् संसारे सुखाना प्रतीतिः। प्रज्ञावतां प्रया खदेव सुकर्म येनानाडम्बरमप्रदर्शनं जगतो विरामो भगवतोऽफलाभिलापमर्चनं भवेदिति।

" . नवमो निःश्वासः २४१ "तदेव देव। वयं कर्तुं कृतमध्कल्पाः।" पौलोमोपतिपत्तनोपवनपरिमलेनेव परिपूर्णस्य प्रासादस्य विबुधावलिवलयिवे सारस्वत- स्रोतोपरैः सुधीवरदेशरत्नराकुले रमाकर इव प्रेक्ष्यमाणे दिशाले हाले' सुखमासीनानां "समयकोमावश्यतामनुभूय विचाराय समवेताना विभिषमण्डलनरपालानामेच विचार অবলু মাখ। দু ঘা বিরল ঘৰৰ নিখিনিখিকাঃ যথিবং मलयार। सस्तिवाचनानन्तरं समुत्सुकेषु तूष्णीम्भूय प्रतीक्षमाणेषु सर्वेषु पन्द आमन्त्रणस्य प्रयोजन विशरमन्नुवतियत्। चन्दस्य विशालं शालोपतं सुघटित विम परिणतमायेयजलधरयामानः स्निग्धोग्ज्वला भाकृति रम्या काम्मा सामा हन्तः सन्धविमणिः प्रलम्बिनः कृष्णाः केशाः, मानस्य मदेिष तपस्विनः साधनेव मांसलोन्नता प्रलम्ग प्रीवा, निपनीलाम्बरे सहसोदितस्य सूर्यस्य महलमिव तेजति मोहकमाकर्पमिन्दिावन्दित मुखमण्डलं सर्वेषु सम्भ्रम पधारयामास । स्मयमानः स प्रावोचत- शितम्योत्स्नमृणाल कमनीयकीर्तयो दुदिभाष्यभवा भदभूतयो विवामिमगुगण- अमिता भूमण्डलमण्डनकतिलका मान्याः! भय धमेतिहासिकेऽधिवेशने धने नामणे परिच्छया समवेताम इति महत मानन्दस्य विषयः । दियितामाबिमा भवन्तो शान्ति मोरारम्भकाले नात्मा एकपरमत, अतः रिरसया बहुरूपी पचायत। एतर भापतीकम् । पर्यस्याभेदमावोष्तत्वम्, परश्य पालिकामा मानवर भयो मन आदिकालास्यावधि बदसरूपेग विस्ते, वदावादेव मानो सामागिता। का एक महर्षयो जोत्नमिदं "शारास्यम्" ईयरमा तनहु। म एष धोने पारन्दमावस्य सिता एमेव भावाना वस्ने सर्वपते । सेहम्, 'राम लामिहावा बोभेदभावोतभावोदयः। परमधुना अन्ता विल भदोरमभिःप्रवावस्थामा पाटेवेह महदा मोगो म पार परेका भूमिरासीत्, न वेदर धनेन नकाबार। पत्यार पर पते-शिलिस्यवे-मियवे जवसमुश्पेन सुगर RTE-विलं पारत- सद विलसने । २ सनसम्म मन् ।

.
-
बाद मतदाई क्ष शियमशrate
२४२
चन्द्रमहीपती
आर्यता व्याहिरासीत् । अस्माकं बचताम्रपत्रलेखायते स्म, पगश्च सूर्यास्वप्रति
आसीत् । राष्ट्रान्तराणि यदा तमसाहतान्यनारवानि विटेप शयानानि चासन् , भान
राष्ट्र जगद्गुनवलम्लाविवेकविज्ञानेषपाखतुलमासीत् । अत्रैव विश्वस्य प्राचीनन
अन्य ऋग्वेदअस्मादेव विधस्मिन् शान्तिलताप्रसारक दर्शनात्मकं सानभ्योतिददगान
भरमादेव आग्नेयपाशुपतवारुणवायव्यत्रमात्रामृतोना विधमयराणामनापाना
प्रशमथ। सानज्योतिरीप्पया लोकान्तरीया भवानिगमिपन्ति स्म। अत्रेय हो
कल्याणकमनसो मनखिनस्तासिनो विविधा होतिनीतीः प्रसारयामामुः। सांत्र -
वात्सल्यम्, खौहार्दम्, सहयोगिता, अभेदभावः, सहभावः, सद्मावश्चायोत् । परमय
भूमिः सूर्यचन्द्रो वायुराग्रश तु त एव सन्ति पर मानवमावनाः परिवर्तिताः। मा एवं-
परिमो ध्वस्तव सस्यते । हा! विलक्षणो देवदुविकः । केन भावनारमा पुगपकन
वयप केन निवसामः।
पुरा सरसि मानसे विफचसारसालिस्सलन्
परागसुरमीयते पयसि यस्य यातं ययः ।
स पल्यटजलेऽधुना मिलदनेकौंकाकुले
मरालकुटनायकः कथय रे ! कयं पर्नताम् ॥ परित
प्रतिवेशिनि धुमुशिल दीने रुग्णे प भोग्नं गहितमागोत् । हरिमंशिरीने माना
सवं ग्रामीणासम्मै साहाय्य प्रदाय सत्यमकुर्वन् । तस्मिन् दुईसयभन्ने मोरे
प्रमोगानामवरत्वं प्रतिरतमभीत। साभाय संप्रदो हेय अषीत् ।
योपामिनो पितं निपखान मिसम्पचः।
सदयो नियं गर्नु धन पन्थानमनः।।
ফল বিকিছু হয় সময় নি। তার
मिनो अम्वास प्यारिणः तम्यम् , तशसभी गम म । म
बायोमर्मत। म जना पर पवित्र गान rairir
रम्यकथा विपटिमा मारमा नाममा सो

नवमो निःश्वासः २४३ कावासानाचा परमा सा व्यवस्था खगुणवैगुण्येन हीनतां गतेवाभाति । टतमोऽपि स भावोऽस्माभिरभावतां नीतः। सत्यम्: प्रथलतमसामेवंशया: शुभेष हि वृत्तयः स्रजमपि शिरस्यन्धः क्षिप्त धुनोत्यहिशङ्कया। कालिदासः । परमवाप्यशिक्षिदेभ्यः शिक्षालया, अन्धरधिरेभ्यः स्त्रीभ्यश्च पृथक् शिक्षाप्रबन्धः, (गिभ्यः पशुभ्य उन्मत्तेभ्यचिकित्सालयाश्च-खल्पसङ्ख्यायामेव स्युः--क्रियन्ते। विनव रणं दुःखमपनेतुम, रोदनकारणं ज्ञातु नरः सज्जते. वक्तव्यमनुभवन्तं धानम्, अतिभार• दिनं खामिना ताध्यमाने बलीवई महियं वा वीक्ष्याशूद्गमः । गोवा च स्वामिन- कम्यमाणं दृष्ट्रा सब्धय सजते दुःखायते च। एषा अभेदस्य -- अद्वैतस्याद्या पिना, सन्निहितस्य दुःसानवलोकनेच्या च। सर्वः सर्व शिक्षितु स्वस्थमदुःखमसमर्थ मयितुवाभिलपति यद्यक्षीणमानवस्वभावः। एष परस्परोदयस्य पर्यायतः सर्वाभ्युदयस्य रोहित आयो हादों भावः स एवास्माभिः प्रकाश्यो. मलापनयनादादर्श इव । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाफ्यथ' । वस्तुतोऽहिंसा प्रेम च मानवस्वभावः । हिंसा-स्वेतरस्य दुःखापादनं द्रोदश्च ते मवति, यत्राभेदोऽद्वैतभावस्ता न तराभावात् । दन्तैजिह्वायामुपहतायां न कश्चन कुप्यति कपोलमाहते या। अभेदस्या- म्भोऽअभाव भवति पर्यवसानच तादात्म्ये। पावायामपगवायो समाव उपतिष्ठते, उष्णजलस्याग्नेरवतार इव । वैरूप्यापादने नमित्तस्यावश्यकता न खपापाइने। स्वस्थस्य रोगोत्पादने निमित्तं भवेन्न तु स्वस्थस्य सारथ्ये। सा बाधवास्माभिनिरास्या, तस्यामपगतायामेव प्राकृतावस्था। सर्वः प्रैम्भ्यानन्दमनुभवति न दे, संवादे सुखमनुभवति २ विवाद, मतैक्ये मनुभवति न धैमत्यै। जोवने जनः परैः सह योक्तुमभिलपति। सानन्दे परिचिनैः अम्मित्य खानन्दमेधयति, दुःखध हसयति। युद्धम्, विवादः, सङ्घर्षः, वैमनस्य च न मानवखभावः, अपि तु मानवविकारः। एतेष मितिहासो मानवप्रतिकूलाना विनाशकानां इभावानां प्रदर्शनं लोकोद्धोधनाय। मानव ईश्वरस्य प्रतिकृतिः प्रतिनिधिय जोदजगति, मतः स्वभावतः सत्प्रात्तः। दुष्प्रवृत्तिविकारः पुजवादादिकृतः।

२४४ चन्द्रमहोपती अगुणको गुणराशियमिह देवात् खलानने पतितम् । प्रसरति तैलमिवैकः सलिले घृतमिव जडत्यमेत्यन्यः।। अवधार्यताम्, अस्माकं विशाले वाड्मये कपाटावरोधिका केवलं सलवार तालकम् । तालकमविधासभोत्यौः पुजवापुत्रयोरपत्यम् । सकलसौख्यसाधनस्या भावस्यायल्यता भूता, तस्य खसिंहासने प्रतिष्ठापनमस्माकमुद्देश्यम् । समाजे सर्वे समाना आसनर्यदृष्ट्या, परं केवन धूर्ताः खरक्षपौषमाय खार्थसंरक्ष शासकैरुत्साहिता माध्यहरणभावमाश्रित्य प्रतियोगिताव्याघ्री निर्माय सस्थिति दडयित्वा- गरटन्तोऽनुगामिन आइन्तुमारेभिरे कृतमाः । अज्ञातदेशकालाश्वपलमुखाः पङ्गयोऽपि सप्लुतयः । नवविहगा इव मुग्धा भक्ष्यन्ते धूर्त्तमातारैः।। क्षेमेन्द्रः । अनुगामिनश्च सदाहताः पतिताः परिस्थितिपोडिता जानन्तोऽपि तेषां दावीभूत धौर्त्य धाय च नोत्थातुमवशाःप्राभवन् । उपेक्षते यः सलमाक्षिपन्तं साधुर्मनोऽबुध्यत कारणं तत् । द्विजिहमेनं स यदेकजिहः प्रयुक्तिभिर्न क्रमते नियन्तुम् ।। सोमेश्वर- अपि तु परिस्थितिपतितास्तानेवाप्रगामिनो धूतान् पोषयामासुः । एते मत्कुषा मश यूका इव मानवरफमाचूपयन्तः परजीविनी मानवशरीर दुःसयन्तोऽपि मानवशरीरे स्थिता एते हि कालपुरुषाः पृथुदण्डनिपातहतलोकाः। गणनागणनपिशाचाधरन्ति भूर्जध्वजा लोके ॥ करतेपा विश्वासं यममहिपविपाणकोटिकुटिलानाम् । नजति. न यस्य विपत: कण्ठे पाशः कृतान्तस्य ॥ क्षेमेन्दः । एतेषां शीर्षपातिना प्रसत्यापसारण जीवनाय किंन परमावश्यकम् ! सहयोगी नियमन समावस्य जीवनभूती, तापय इन्त। गृती। वस्तुतो एन लोकस्य भावः । परम्परया पररिपत्या वा प्राप्त धन लोकस्य न्यायः। यथासम्म शोन पपारीति दल प्रत्यावर्तनं प्रतिदान न्यासपरस्य योग्यतायाः सूवरम् । मनोर या समति M नवमो निःश्वासः स्यावरबमात्मिकाऽऽनुवंशिककमेणाधिकारणार्जनेन वाधिगता, भाषामामुद्रमनाधो- पमनेन वोपेवासा समाजस्य, न्यासघरेण शीघ्र प्रत्यर्पणीया। तां प्रत्यय स शान्तिमनुभवेत् न्यामधरो न्यासं प्रत्यर्प्य यथा, न परितापम्। अन्यथा स्तेन एव सः । मानवः किमर्थं सगृहाति ? किं शतशाटीको युगपच्छाटीनां शतं परिवत्ते? शताधर शतमरुत्तरो वा किं युगपत् सर्वधारोहति ? व्यञ्जनाना भोज्यानाच शते किस शतगुप्पमत्स्यति ? भवनानां सहस्रऽपि स एकस्मिन्नेव सप्पयति । परमयं प्रान्तो प्राता दयापानम्। स्वर्गापवर्गयोद्वार प्राप्य लोकमिमं पुमान् । द्रविणे कोऽनुपज्जेत मोऽनर्थस्य धामनि ॥ भागवतम् १२।२३।२३ पुजवादः सर्वेषु भयमविश्वास होत्यादयति, विन्यच्च मानवगुणैश्त्यज्यते, मानवीय- मूल्यानो स्यापनाय भयनिवारणे कारण राज्यम्। सम्पतेविभजनम्, अपरिग्रहस्यास्था परं प्रेम विश्वासमोसादपति, "सकरगुणसीमा वितरणम् ।” अस्माकं व्रतमासीत, शतहस्तसमाहर, सहस्रहस्तसङ्किर। अथर्ववेद ३।२४।५। परं विभजनेऽनीह: परिग्रही सतताशङ्की सर्वामियनानक्षमान् मूर्खान दुर्वलानेव वाञ्छति प्रक्षोणभगवद्रायो मन्दमाग्यत्तस्करश्चन्द्रामावमिव । एतादृशे भावे कथं सम्पन्नता ? वस्तुतो यो मनुष्ये मनुष्यवद् व्ययहरति । एव मनुष्यः । दुरासदानरीनुप्रान् धृतेविश्वासजन्मनः। भोगान् भोगानिबाहेयानध्यात्यापन्न दुर्लभा'। भारविः। केवन कथयन्ति यद् धनिनां धनविभाजने भोगविलासेप्वालमणे च दरिाणां कोऽधिकाः सत्यम् परिमाणां सम्पदाहाणे भनिना कोऽधिकारः! सम्पद एताः कस्य ! इत्येव विचार्यों विषयः । व्यको धनार्जनाभिलाष उन्नतेः स्थायि तत्त्वमस्तीति सत्यम्, परमिदमरि सत्यं यदाधुनिक्यजनेच्छा इतरान्निर्धनयितुमेका योजना विद्यते। भनी यावत्सल्य दरिदान कत्तं समर्थस्तावत्प्रमाणं सफलः। ५ विश्वासजन्मनो धृतेः सन्तोषस्योमानरीन् भोगान् - धनानि, आहेयान् भोगान= फामानोकायास्यापन्न दुर्लभा, अपि तु निवर्ग सुलभा ।

J पोतपाषाणखडतो चन्द्रमहीपतो खलश्च खड्गश्च नहि स्वभावं जहाति कोशार्पणलालितोऽपि । यम्यातिमा मलिनात्मकस्य परं द्विधा कुर्वत एव रागः॥ सोमेश्वर अस्यामक एव सर्वग्राही युभूपत्यतापिरिव, परस्परं धनमजिहीपति च । अस्याम वस्थायानाशकापूर्ण वातावरणे क्व. आनन्दः? व मुखम् ? मन्यतां भवान् मृत्यमभिलपति, तस्मै किमपि भोजनवस्यादि प्रशव तस्य श्रमेण स्वकार्य विकीपति, तदाऽवश्यनेत्र भवत्प्रतिवशिना निर्धनेन भवितव्यम् । भवदैवयं भवतः प्रतिवेशिनो दादिपेनलम्वितम् । परम्, राष्ट्र कश्चन भोजनवम्रादेरिच्छको न भवेत्, सर्वेषां जीवनव्यारः स्न चलेत्तदा मृत्यप्राप्तिरशश्या। वपनम्, पशुचारणम्, भोजनम्, जलानयनम्, लेखन- व्यवहारादिकं तेनैव कार्यम् । राष्ट्र तद यदि सम्पन्नं भवेत्, सर्वेऽयावका अनभिलाषुकाव स्युस्तदा वर्णपतेः वर्णस्योपयोगिता नाधिका। तेन सचितमन्नवनादि घुणादिजर्जरितमेव भविष्यति, यतो न कश्चना- कापक्षकः। स स्वयच नान्नम्, न वासांसि, न गृहाणि वा शतसहस्रगुणमुपयोच मुपभोक्तु वा समर्थः। अतस्तत् सर्व विनश्यति। युध्यता सस्य स ग्रहस्य कोऽर्थः। खल्पा यानन्दायापि तेन श्रमिवत् कठिनं श्रमितव्यमेव । विशाल क्षेत्र खयमेकाकी न वर्नु न लवितुम्, न चोपयोङ समर्थः, न च विशालस्य हर्यस्य जोपौधारे टपलेसे किमु वासेऽपि समर्थः। स जीर्णशीणानि गृहाणि स्वकीयानि कथयन्नेव यति । भविष्यति चान्यगृहनिमणेऽनुत्सुकः। अतः स लघीयसि गृहे उद्याने वा वसन् खदत कृतसर्वकार्य एवातिसन्तुष्टो भविष्यति। धनार्जने चतुरो धनमर्जयेत्, परं तस्योपयोगः सार्वदेशिको भवेत् स्या वायुराकाशं जल विधजनीयानीवाप्रदत्तानि च तथैव धनम्। धनं सोकस्य न्यासः। विचार्यताम्, यदि माता शक्तिशालिनी चतुरा च, तदा किं सा दुबैटस शिशोभोज्य सादेत् । यदि सादेत्तदा करता मातरं कथयिनुमीहेत। सर्वे का हाकिया वदिष्यन्ति। परमत्र विज्ञः सर्वसाधनसम्पन्नः पितृस्थानीयो धनी रहम् मातारितो, दारापत्यश विहायागताना पुत्रायमाणानां भृत्यानां भृत्योपाजितराम्पत्तो निदय सर्वस्वं हत सभणः।

नवमो निःश्वासः सोपजे सहायकवा अमृतं किरति हिमांशुः विषमेव फणी समुरिति । गुणमेव वक्ति साधुदोषमसाधुः प्रकाशयति ।। विचार्यता श्रीमता सम्मतीस कर्थ सम्बोध्यः? आधुनिक ज्ञान विज्ञानं केवलं परिप्रहिणां धनार्जनस्य साधनमात्रम्, परेषमाकर्षणे अद्य विज्ञानाविष्कृतानि यन्त्राणि मानवमूल्यहराणि । प्रतीयते पुसवादोऽय मन्त्रारूढो मानवजयी । मन्त्रं समाजेशानां शफिर्धनाय परिश्रमपरिहाराय জীয়ান বাদলকুশালায় প্রায়হগশ ৰ মৰিছিল। নীঃ গবিনামী- पनेत्रं दूरवीक्षण सूक्ष्मेशणा, वाचः शक्तपै ध्वनिविस्तारकम् , पादयोः शालिवद्धनाय विचक्रिका मरुत्तरम्, बापयानम् , वायुयान । इस्तयोः शक्किार्द्धनायासपण्येयान्दि यन्याणि, लिपिश्नमपरिहाराय मुदणालया। सोऽये मानवविकासाय मानवसानों यस्युरूपाय गुणोदयाय चोपयोगः सम्मतः। परं योऽवकाशः सर्वविधतीनामुदयाय यन्त्रेण दत्तस्तस्मिन्नेकाधिकारः पुषवादेन कृतः प्रतिद्वन्दितामुत्पाद । एवमल्या अाभौजिनोऽनल्पाधानवकाशयोजिनःसंता:। सन्तापमोहकम्पान सम्पादयितुं निहन्तुमपि जन्तून् । सखि ! दुर्जनस्य हि मतिः प्रसरति दूरं ज्यरस्येव ।। गोवर्दनाचार्यः । भयतनं यन्यत्रैपुल्यं मानवीयकलाना समाप्तिम्, अनुरमेका मुलमं सौम्येण चौपाय दने केन्द्रित करोति, कटाभिहिं पाते, उत्पादने मानवस्पर्स स्पति । मनुष्यस्य विकासरत्तनेन पुजवादप्रेरितेन पाहत एव सम्प्रति तद् विकासापार मनुष्यमेव रिपति । शिपत्सा निराहल तस्योपयोगिता केवलमरमा भिवस्थाया। न परं फलति हि किश्चिन् सल एवानर्यमावइति यावत् । मारयति सपदि विपतहराध्यमाणं ममापनुदे ।। स्योदयात् पूर्वमामाभिदा पशः समाये हलिवाटपयोगिता नीताथ, पमना लिनु गरायमपि इति । अनुमुग्यमानस रशम्भवामदेव। पान्युपे मुसा, पदमप्युरोऽभिप्रेत, किन्तु दिमागे। पर सभ्युरपीस- विरमाई सिरिचिताना नाना पाला मोशरिरामवरम् ।

२४८ चन्द्रमहीपती स्मर्यताम्. राष्ट्र सर्व समानाः शरीरेशानीव। समये उप्ता पर्यवेक्षमामो लविता कृषकः, सन्धियोगनिपुणो नौनिर्माता, लोहकारः कुम्मधारयमंघरो व्यवस्थापक- चिकित्सकोऽध्यापकः, गृहकार, गृहकार्यदक्षा गृहिणी, स्वगन् संयोज्य गायन्ती गायिका सैनिकः, शोधको देशस्य सम्पादका महलकरिश्च । मैते करमाच्चिदर प्रजाव्यवस्थापकाद् राशा, सदसद्विवेचयतो न्यायाधीशाद्वा न्यूनाः। मम सम्मती राज्ञा पनिनाचाय विकासक्रमः। पुरा प्राम्या प्राम्य पलवन्तमूचुः-"वयं तब बीविका साधयिष्यामस्त्वं ग्रामं रक्ष। स स्वीकृत्य दण्डधरो नैपुण्येन प्रामं रक्ष। तस्य कार्यप्रणालीप्रसन्नाः पार्श्ववत्तिनोऽपि तं प्रामाणां रक्षार्थमनोदयन् । स स्वीकृत्य खानपुरुषान्नियोज्य रक्षितुमारेभे । एवं शनैश्शनैः स बहूना नगराणा रक्षको बभूव । "प्रजाहितप्रतिनो वयम्" इत्येव तस्यादर्श मासीत् । प्रामरक्षकाणामावासाय परेषा प्रहाररोधाय प्रजानां सुरक्षाये वेनधुना विशालं दुर्गः निरमायि । व्यापातकानां कृते तेनायुधनिर्मितिरारब्धा । राणा शिक्षणाय वपुत्राणामध्यापनाय व वनादाहूय विद्वांसो नियोजिताः। अध्यापयन्ति शास्त्राणि तृणीकुर्वन्ति पण्डितान् । विस्मारयन्ति जाति स्वां वराटाः पञ्चपाः करे।। यातायातसुखाय प्रामान्तरेषु लोकपया निमिताः । वाहनानि सहगृहीतानि, अजितश्नेन सेनाच सगृहीता। अधुना सोऽधिगतवलः पटुर्जनताया दौर्बल्यमनुभवन् काश्चित् सपने कृत्वा स्वैरं कर ग्रहीतुमारभवान् । रक्षकोऽपि सोऽधुना मशको भवितुमारेभे । लोसार इतररक्षकाणां रक्षाव्यवस्था विभल्सलामकल्पाचौद्घोष्य इतरप्रदेशान् स्वायतीतुर्वन् प्रभाहितबतिता मासारयत् । स एव लगुडघरो रामपदेन स्वीकृतः, पपु विशेषतो राजनात् । सम्माव्यते स एवाधुनिहलगुडिना पूर्वजः। लोकेन च मौख्यात् सा सत्ता प्रामालायिताय राज्ञपिता। त्वममा कल्याण- माचर, यदि वयं मेरठामतहि दडमरमा कल्याएमावद, एमाऽनियन्त्रिता पत्ता भोपाधिधारिणे प्रामालाप प्रता। राजा सर्व साधारणो मानः, न तस्मिन् कापि वैशिष्टा सत्ता प्रक्रिय, या सता शक्तियां सामानामेव एवं स लोकस्य सत्ता कारया नवमो निःश्वासः २४६ व स्वार्थसंरक्षणाय लोकान् यथेच्छ दण्डयितुमारमत। प्रथमतो राजा निर्वाच्य आसीत् , यतो हि रक्षकस्य निर्वचनं रक्षणयोग्यतानुसारि। परं शनैशनैः सम्प्राप्तसाधनोऽनुरक- विविजनः सोऽरमापूर्वजो राज्यं कुलझमागवयकार। वस्तुतोऽस्य स्थितिार- पालतो नाधिका। ब्राह्मणैः क्षत्रबन्धुर्हि द्वारपालो निरूपितः। भागवते । पया वादिराजा पृथुः- अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः । रक्षिता वृत्तिदः स्वैषु सेतुपु स्थापिता पृथक् ।। भागवते ४।११।२२ राज्ञां सुरिविपत्परिहाराय जाता। रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ मनुः ३६ प्रभवतीति प्रभुः-प्रकृसत्ता (सार्वभौमसत्ता) सम्पन्नाः प्रजाः। विप्रसम्भ्यो इ. संज्ञायाम् ३२॥१८० नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुपः। मनुः ७४१०२ दण्डो दमनादित्याहुस्तेनादान्तान् दमयेत् । गौतमस्मृतिः १११ सर्वत्र शासनान्यायव्यवस्थायाः पार्थक्येऽप्येतदेव कारणम्, यच्चासन द्वारपालायिता- धीनम्, न्यायध विद्वदधीनः । त्यकास्वादा धने वसन्तो विषयषिणी विद्यासोऽप्यधुनाS:- हारमा फूती गगनशिसौधे व मोहिता दुःखाकरं वनवाप्यमुत्सृज्य, अमात्यपुरोहितादि- पदलोलुपास्तस्याभिषेकनाष्टकं चकिर अनुमुमुदिरे व कुलझमागतर्मणि दाक्ष्यम् , उचुश्च "अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः' इति । सत्यम्। अपथै पदमर्पयन्ति हि थुतवन्तोऽपि रजोनिमीलिताः । याज्ञवल्क्यस्मृतौ (भ. १३.९.१.) राज्ञा लक्षणं प्रत्यपादि-- महोत्साहः स्थूललक्ष्यः कृतज्ञो युद्धसेवकः । विनीतः सत्त्वसम्पन्नः कुलीनः सत्यवाफ शुचिः।। १ भई पृथुः प्रजानां वृत्ति-वृत्ति ददाति राष्ट्रव्यवस्थापनेन सः, तयाभूते राष्ट्र बातो भवितुं शक्नुवन्ति । स्वेष सेतुपु-मर्यादामु स्थापयिता दण्डयरो रश्विाच प्रवाभियोजितः। -- .

२५० चन्द्रमहोपतो अदीर्घसूत्रः स्मृतिमानक्षुद्रोऽपरुपस्तथा । तस्य कर्मच- स्वराष्ट्रन्यायवृत्तः स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु । मुहत्वजिह्यः स्निग्धेपु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः॥ मनु ११ एवं वृत्तस्य नृपतेः शिलोच्छनापि जीयतः । विम्तीर्यते यशो लोके सैलबिन्दुरियाम्भसि ।। मनुः ॥३॥ परमवारमामु मति तयाभूताः मन्तीत्यात्मा निरीक्ष्यः । कुलानि जातीः श्रेणीध गणाझानपदात्तथा । स्वधमंचलितान् राजा यिनीय स्थापयेत् पथि ।। म सयमा १३ शनैशनैर्दु गोलपारायन्नम्नामु प्रजामु ज्ञानप्रगाराभावादात व भुरासयामामुः- मयों दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ॥ मनुः ॥२२ दण्डः शान्ति प्रजाः सर्वाः दण्ट एयामिरक्षनि। गर्भाश्य म धृतः मश्यक गयां रथयते प्रजाः । अममोदय प्रणीतस्तु विनाशयति मशः॥ मनुः ॥१८-१६ दरम्यः पत्तिय ग मेरो माया प्रीय, मेयमनुमति। मन ध्यानानि राया परिहायस्यगन- दरा कामममुग्यानि तयादी मोधनानि च । यमनानि दुरन्नानि प्रयत्नेन यियमयेत् ।। मनुः ०४५ मृगयानी दिवास्वनः परियादः खियो मदः । म:यदि पाटा पकामनाको ग १५ पान्य माहगंद्रोदयांगूयार्थदूषणम् । बम धपायं यत्रापि गोमाः||" नयमो निःश्वासः परमय त्वेष्वेव देपेषु सर्व आरष्ठं मग्नः। भनु, कुलक्रमागत सार्यरहित पुधनादाप्रभाविते कर्मण्यनुमवस्तु गरीमान्, पर पुजवादप्रभाविते तु दौगुंण्यमेव । अतः शासकेनाजस्र परिवर्तनवता भवितम्यनेव। अन्यथाऽऽधुनिको राजेवाधिगत- दशश्वास्त्रः पगृहीतसेनो बाहनवलः मृतदुर्ग भातलिजगत् सेवकोऽपि 8 सेभ्यो भविष्यति, नरपालथापि नरपतिः। परिस्थितियोपितः साधारणोऽप्यसाधारणः। परि- पर्सने दुर्बलमना उपभुक्तभोगः परिवर्तनेऽनीहः शासनादलय एव भविष्यति । भोगैश्वर्यप्रसताना तयापहनचेतसाम । व्ययसायात्मिका बुद्धिः समाधौ'न विधीयते ।। गोदा। एवमेवोयोगविरपि परिस्थितियोपितः। स्था -अमुरुमामादन्नमाहर यय तुभ्यं भोजनं दास्यामः, इति प्रामीपरितः पटुसेवकः सार्थवाहः स बहुनामशाहरणेन बहुभोग्यमार। उपयोगावशिष्ट तदेव विकीपानो विनिमयमानः शनंजतिसष्प्रहो वैवधिकचरी यानं स्थानब निर्माण धनरयावश्यकतानुसारि वस्तुमात पार्श्वपत्तिभ्य एव मोत्या यथेरडमूल्येन पातम्य र विक्रीतवान् यधेरथमूल्येन । सह यसतामप्यसतो जलरहालयद् भयत्यसंस्लेपः । दूरेऽपि सा घसता प्रोतिः कुमुदेन्दुपद् भवति ।। शनैः सहोवयनो बलोदई मुशळपयोग्य मान्दरेजी दामिरमाको मूलधन भवत्। "लाभाल्लोभः प्रवर्द्धते"। व निमारः स पनित्वमध्यगमत् । दोऽगप्पयन पिलभभावना तस्योटाना। सीमावरे बोरपिता पर उन्मय. নিলীম ময়দা জৱািৰিহাননে সম্ভাষণবিন্যাস মুল बहरय माध्यमियोवनधारणयोग्य कम भोम्य प्रापसारद। सलन् । टम्योदयोऽपि हि सलः प्रयम स्वजनं नु नपनि परितापम् । उच्छन् वदनी जन्मभुवं दार निहनि । माधिः-अन्तरम्। २ पारित-पाय 1 परिवारो।" तिन।

२५२ चन्द्रमहीपतो एया पुक्षवादस्याचा भावना। मथुना सोऽनायासैनासम्बयन च नित्यमुपाय- मानानां वस्तूनां निमाणेच्छयावश्यताप्रसान्नियनास्दन्तुवायांस्दशहाँलोहकरन् कुशलान् कारयामन्दोदयां दया वन्निव नियोग्य दस्तूनि निर्माप्य जीवनधारगयोन्य प्रयच्छन् प्रचुर धनमैपयत । वराकास्ते च परिसिविपीडिताः किं कुर्यु, तो हि "सारम्मास्तण्डुलप्रस्थमूलाः।" सत्यमेव केनापि कविनोधम् । इयमुदरदरी दुरन्तपूरा यदि न भवेदभिमानभङ्गभूमिः ! कथमपि न सहे भयाशानां कुटिल कटाक्षनिरीक्षणं जनानाम् ।। कपति वपति लुनौते दोव्यनि सोव्यति पुनाति वयते च । विदधाति किं न कृत्यं जठरानलशान्वये तनुमान् ।। अथ च गोः स्खनन्धयो यत्सः प्रतिदिनमेकप्ररथमितं पयः पिवन् प्रतिप्रश्पनागर- मूयेन संवत्सरे पचचत्वारिंशन्मुवर्णा केवलं पयः पास्यति, राष्पादिकं पृथक् सेवस्थानादि- व्ययश्च पृथक् । एकहायनस्य वत्सस्य मूल्यच मुद्रापदम्। चत्वारिंशन्मुशां हानिरवि विचायं गौर्वत्सं विना कथं दुग्धं दयादित्युपायमन्विष्य पातमात्रमेव वत्समेश्या मुद्या गोपातिभ्यो विनिमय केवल स्वार्थपण्डितः। अतिमलिने कर्तव्ये भवति खलानामतीव निपुणा धीः । तिमिरे हि कोशिकानां रूपं प्रतिपद्यते दृष्टिः॥ सुबन्धुः। पुलवादे एतादृश्यः कल्पनाः कला मण्यते विज्ञानं दा। विकारिणो।" समातुर्दुग्धपाने वत्सस्यैवैधिकारो रक्षिणस्तु पोतरोपे नवं तस्य विचारः। भगवतो वसुओं पच, वत्सस्य पित्रा यलोवईन पृष्ट्वाधिगतमन्नम्, पटया नातं शपं मनसा खायत्तीकृत्य यथेच्छाचरपाय सतन्त्र ईवामुपेश्य, राष्ट्रहितम् भवति. कता परिस्थित्या मूशानां च हितमपश्यन् पराजितस्याहरणाय सायंरोषणाय ते परिपड़ी। एवं परिस्पित्यजितयनःस भौतिकीमुन्नतिमकरोत् । परिस्थितिरेवाय ऊषय नयने परना विध। यथा च श्वन विप्रः शिष्यहं गतः शिष्येण प्रक: "मान्नस्मनात चारमदानीतं पयः विति, धतो भवानेव पचतुचलमाइलुम" इति खस्ने तात् । -दावन शिश्यस्य नियां समाया रजसलायां वा भूतायामितरजातिः शियोमर हन्त ! "भृद्धिचित्त- नवमो निःश्वास २५३ “गुरो। भवान् पश्यत्येव, भावाभ्यामपि पक्तुं प्यताम्, उदयं मुदामेको दास्यामि, यतो न विना मूल्यमावा गुरुपाचित खादिष्याः" इति शनैशनैश्चलित एर व्यवहारोऽय हन्त ! प्राणान् पावकान् प्रास्थायिनः चारा हन्तपारशा परिस्थितिः । परिस्थित्या चान्त्यशाशनैशनैः कृतवाणिज्यादा उच्च पामुपेताः। अध भवायुयोगपतिरनवरतमधिकाधिक धाम्यते परिस्थित्या प्रतिभिरामर्धाप अमिणे प्याशिजीवनं धधु किचित् प्रशिप्य, कायितामु वुटीपु पदपयाम दाऽऽपरप स्वस्त- महारत्यक्षातभावेन। एवम्छोपर्ण प्रकटितभवबाघस्याऽऽनन्दोपवनदायाने कपरमरय पुजवादस्य ज्येष्ठः पुत्रः। एतेका लst सहसाणा दान्यतमः कवन दान कश्चन यशोयी साधी किमपि ददाति चेतदान नीको प्रमोष्य इमुदायि तम्यूलबीटिकाप्रत्यर्पणवत्, 'धनं प्रचोर्य सूचिकारानपदा विचित्रम् । भय राजानः समन्ता भूमिदारा धनिन उद्योगपतयो म्यापारिण इतरे व पके जीवन्ति । सोऽयं सोपजीव्य ईशरस्य लघुभ्रातेव लोकभोदनाय सर्वया मरणोऽपि निर्धन एस्ति। तस्य पशुरालवालपरिषद्विभरणाः शिखिशिखराववतसाः गलमुरन्दसमार शिशः साधनविहीनाः खासभषपदादिविला उपासन्तो मृत्युमुख विशन्दि, विवेकनेकविरहिता अशिक्षिता दा जोवन यापयन्ति पराप इस ते पसः प्रधानत- यो पयः पातुन शक्नुवन्ति, नदनोतस्म निमांद्वारोऽपि तन्नादन्ति, सस्य पादारी मना, पन्नस्यैकमा बालारोऽपि निरन्नाः। अन्य एव पन हटादेशमशानदरिदाता मुग्नना हलत्यसमादाय तरभु जाहन्वसमानामरमाई कर नितिर्भविपनि। "कृतघ्ने नान्ति निष्पतिः।" तैरत्या परिस्थिती ज्ञानविज्ञानयोररयोग पभगो विधारपठे इति व मशयम् । बाबासालीबलविदाना टीयो दि पोरन पन्य केलं जनानां प्रबलन पादपातान् समितीनो एबिटम, रेप स्वय रिकाराय च लम्हन्त ! "दारिद्रपदोपो गुजराशिनाशी'। फुलं शोथ सत्सव प्रज्ञा तेजो कृतिपयम । गौरवं स्यः स्नेहो दारिद्रय विनश्यति ॥ ! *दो-भी। २पन-रहकूटने

चन्द्रमहोपतो
मानो या दो वा विज्ञानं विभ्रमः सुबुद्रिा ।
सर्वप्रणश्यति समं वित्तहीनो यदा पुरुषः॥ पनन्नम् ।
परं ते तु धन्या एव येषां मृतानो लोकोपकारभावीतप्रोताम्यस्थीन्यपि गुना
मुस्यन्ति।
पाटोर ! तय पटोयान् कः परिपाटीमिमामुरीकर्तुम ।
यत् पिपतामपि नृणां तनोपि परिमलः पुष्टिम् ॥ (पण्डितराजगन्नाथः)
प्रामोसत्यै सरों व्याय, परमुमतिनगराणां भवति, वराका वनश्यन्ते ।
आजीविकासाधनान्यपि नगरेवेत सन्ति। सार्थः, पक्षपोषणम, सेमवम्, बरतम्
परिहिणा नागरिकाणां प्रधान धर्मः। पराका प्राम्या दुभिविशिताः गढपना बनाः
मुवर्णमुभर्ग मजुलमुमयरममुगन्धगभवशासितामयपुल मुरविटरिबाटीपारिताम्।
पुरसुरजनपरिष्ट' सरग्म्योरमाशुद्ध सौभाग्यभीवनजनन सारयहित मोस
बीवर दोवनमिव प्राममुगभ्य मगांवरकमिव मशकमत्कुणमशिकार
दुर्गन्धनिपानामु रव्या निवासाय बाध्यन्ते परकमाइपमाना यामशिता और
परमप्रमेय समन्वन्तसनीयाम पाशुमी र सनियन्ति, न च पश्येतु पाता
राम्यवारिमोडी नित्यनव प्रया: मायावतमः साया: अमे
मान्ति । यदो दिन तत्र विविषयोग्य दिनानि विवादित
गुन्दावन हरपतीतानि वाततिापमान वाटताविमोयनमगगन
मितने समयान्युन्वितयविमूतानि सपनोपनीताम मोर
र में बर्मराज मानेपानन्याइनानाभन्दापनि, प्रल
पुमालानपिटर लिन मुबमिनमुमन कामिनमोmakram
धर्मगुजर भाभ, म प्रनरय र पार्वती RAPE
मामो मदवा ARE Uा को नम लFिrepress
मवानामखिल मानमा प्रदेश)
सुभाई महरा पग महायपरकंत्र tatrents
पर नहा। पत्र मद्यपदन् । '
भय! Ri art

नवमो निःश्वासः कापणत्य शिल्लभ्यन्ते। एतद्धनं मदीयं तदपि ममैव स्यादित्येवनारतं तस्य विचारः। भाकल्यं जिजीविपुरिव स द्वीपसम्पदपहरणे नमः। तस्य रटी घनस्य, केवलं धनस्य मूल्यम्। धनार्जनाय स स्त्रियम्, पुत्रोम्, प्रतिष्टाम्, पुण्यम्, सिद्धान्तम्, धर्मम्, न्याम वाणिज्यारे' विकनुमाकुलः । “मा गृपः कश्यखिदनम्" इति सिद्धान्तस्तेन साईचन्द्र नितम्बे पादं प्रहत्य निष्कासित उत्तभुवं सेवते। आश्चर्यम् । कयन निरन्नोऽन्न- पाय अयरधन्न तस्य दोपः, जीवनसंरक्षणं तस्यायो भावः। परमन्नपूर्णसमुद्रा अमितवा न्यायमन्याय पुण्य पापमविचार्य यदि तस्मै सयमादा किम वकव्यम् । इदानीन्तना समयो विकृतो भयानकश्च । एव भारतस्याशयिताः मविष्यन्तः कृष्पराम- गुदा मन्दमुग्धस्मितरनषितमुखारविन्दा बालाघापपानके परिवेशित्वम्, एम्पायु कद- प्रमेहाल कान् प्रचेतुम् समूहे नीवीमाहर्तुम्, माकुरितयौवनाः परिणतशादरापाना रदनजितमीकिकतना निसर्गक्षीणोदयः मुन्दर्यः कालिदासस्य कला समसिमन्यः सत्यः कमलकोमलकामनाः कन्याथ विमलकठिननिचलयतारचलिताः नमनागारेषु वेश्यालयेप्यनुचिता भृति का का पाप्यन्ते । हन्त । धनेन कीरशी स्थितिः परिवतिता। सर्वे स्थान केवलमनन गतिम् । न লাথি ছামি বিধিমা য ব বিলিনবভাষন মালবন বেগে तरा भविष्यति। विधरिमन्नास्ति कोऽप्यनयों यो घनेन न साधय शक्येत । अन्यायस्य, शोपणस्य, व्यभिचारस्य, प्राचारस्य, चौस्य, प्रसारणस्य हराया- भापारशिला घनमेर केवलम् । सत्यम्, वित्तचापाको नरो विवेकविन्दुतो भवति । सपनो मोतियनस्यात, खाः सातिशयो तर यदि त्यागत्यस्ता माम् ! "नोरनीचरतिनीधनोचः सईदपायनमेव साभ्यम्"। • धर्न परमेरका परषिक: परमेश्वरलकोपानभाहताक्षदायिरिसरममा हत्या, मा राभ्यधारभूत् पुंसः भेयस्कामस्य मानः । स्वजनानुन पन्थून या न पश्यति ययान्धरम् ॥ मग rite वा दुरपयोऽवभिनिदेशः । त्रिभुवनराम्पत्यमरममममा. रस्मरमानसिमिसेवाधाम्।

सहनशो मनुष्याणां चिसाहादक करतलवनिः । को माम एवं विधमाकर्षणमुत्दम पुजवादे मनुष्यो धनसमहस्य यन्त्रम्। केन व्यापारेण कया प्रणाल्याशिवाय 'धनं मे प्रभवदित्येव तस्योद्देश्यम् । नाम मनुष्यश्य मूल्यम्। प्रतिदिन यन्त्रेषु जीवनर पन्द्रमहोपतों मानो वा दो या विज्ञान विभ्रमः सुबुद्धियां । सर्वप्रणश्यति समं वित्तहीनो यदा पुरुषः॥ पचनन्यम् । परं ते तु धन्या एव येषां मृताना लोकोपकारभावौतमोतान्यस्थीन्यपि गुवामुक- मुवस्यन्ति । पाटोर ! तव पटोयान् कः परिपाटीमिमामुरीकर्तुम् । यन् पिपतामपिनृणां तनोपि परिमलैः पुष्टिम् ।। (पण्डितराजवगाय) प्रामोन्नत्यै सौं व्याचट, परमुनतिर्नगराणां भवति, वराका पचनैन्यन्ते। आजीविकासाधनान्यपि नगरेम्वेव सन्ति । सार्यः, पक्षपोषणम्, लोलपत्वम् करत्वम्। परिप्रहिणां नागरिकाणां प्रधानं धर्मः। घराका माम्या दुभिशविक्षिप्ताः गतवना बना सुवर्णसुभगं मञ्जुलकुसुमसरससुगन्धगन्धवहोद्वासितामयकुलं सुरक्टिपिवाटीपरिचरन्। पुजवादपुरञ्जनपरिप्लष्ट शरज्ज्योत्स्नाशुद्धं सौभाग्यजीवनजननं वारयहित महित वीतरागं तपोवनमिव प्राममुत्सृज्य स्वर्गाभरकमिव मशकमत्कुणमक्षिकासंरक्षिता दुर्गन्धनिधानासु रथ्यासु निवासाय बाध्यन्ते चरकमायमाना यमभक्षिता श्रीवन्तः परमधमेपा सचिन्वन्तस्तनीयांस पाशुमपि न सचिन्वन्ति, न च सञ्चेतु शक्नुवन्ति । राज्याधिकारिणोऽपि नित्यनवप्रियाः चाकवायकरावणचेतसः सासूयाः प्रामेषु म यान्ति। यतो हि न तत्र विविधव्यानोपहितानि द्विजटत्रिजटस्फुरदिन्दोवरनिन्दि- सुन्दरबदनामृतहास्यगीतोपेतानि राङ्कितलजितरसभरचञ्चलतापविमोचनमधुरदृगन्तशो- 'भितानि उदप्रसूध्यप्रकञ्चुकाचितवशोविभूषितानि सधनोपनीतानि गोष्ठीभोव्यानि, न सौवर्णराजतभाजनेषूपहृतान्याइताक्षण्यभिनन्दनपत्राणि, न प्रत्छन्नच्छलकपट्टतानि पुष्पफलावादितानि दीनारपिटराणि,न सुवासितसुमनसा वासितवाससो हाराः, न । स्वर्गसुखदा आवासाः, न भ्रमणाम चक्षुपि चमत्कुर्वन्तो महत्तराः, न च सभोपेतना रूक्षशुष्केष्वसभ्याज्ञानदारिद्रयपूर्णेच साधनाधमेषु प्रामेषु गन्तुमुत्सहेत ! जनानां कापि मूर्य निरीक्षितम् ! सौचिकः सूख्यो भतायां शोचति दिनु ! निवासाय नयमो निःश्वासः कप.पणस्य विशालभ्यन्ते । एतन महीये तदपि ममेव स्यादिरयेपनारतं तस्य रिचर भाकर बिजीविपुरिव व दीपसम्पदाहरणे । तस्य री धनाय, केवल धनस्य मूल्यम्। धनार्जनाय स्त्रियम्, पुत्रोम्, प्रविटाम्, पुस्यम, सिदान्तम पम्, न्याय वाणिग्यारे विस्वमालः । “मा गृपः कस्यखिदनम्" इति सिमान्तरलेन साइंन्द्र बिम्रे पदं प्रदल निशासित उत्तमुव सेवते। भाम् । इन निरन्नोऽन्न- स्पाय सपनधन य दोषः, जोवनसंरक्षणे तापायो भावः। परमन्नपूर्णसमुदा अमिता न्यायमन्याय पुण्य पापमविचार्य यदि तस्मै समसका रिकाम्यम् ! मनोन्तना समयो विस्तो भयाना। एवं भपतरवाशायिताः मरिष्यन्तः परम- इस मन्ममुग्धस्मितानविनुसारविन्दा बालयायतनहेषु परिवशित्यम्, रामु बर्गर पापेनाल कान् प्रचे नम्, समूहे मोदीमरहम, आरितयौवनाः परिपतवारदामवदना रजिमोतिसदना निसर्गशीणोदर्यः मुन्दः कालिदासस्य कला मूतिमाया या मलकोमलकामनाः सन्याय विमलाठिनिधनवारला निमनगरे पेसालयेपनुचिता भूविदा का पाप्यन्ते । त! भनेन कोरसी मिति परिवतिहास हमनेनन् । দৈখি কৰি ৰিমার এ ঘর বিনিমখন মলষনই দে। Ke भविषता विस्मिन्नास वोपनको यो भनेन व सक्त। मार, पोपमाय, मभिवाराय, प्रकार, स. सहारणाप, Mer- पारशिला परमेर रेवलम् । सरूम, तिया मरो पिरो भाति । पभोशियम सादे समस्या fr! “नीपरनोपरतिगोपनीयः सरूपानमेव मान्यम्"। परः। IYAमिली. मा राज्यपारभूत् पुंगा पसामस्य मानद । रवनानुन मन्सून या न पश्यति स्पान्यो तपुरमा मारमा जशश। reams ---

।
२५६
चन्द्रमहोपतो
येनामन्दमरन्दे दलदरविन्दे दिनान्यनायिषत ।
फुटजे खलु तेने हा ! सेनेहा मधुकरेण कथम् ।। गन्नाथः ।
अद्य प्रविशतमेश्यानजितसम्पत्तावधिकार व्यापारिपरिपहिणी सगुगी सधमा परहार
पोषकी । एका मुष्टिमेयमानवाना रक्षाय व्यवस्थाये ये खापत्तीदपरसम्पदो समभिलपन
सर्व मिश्यते । एताशे वातावरणे कार्यमवन् धनार्जडचौरायितः प्रसयाहरको ग्याको
चतुरो गम्मते, हन्त ! दृश्यता पुजवादे मापदण्डयातुर्यस्य ! इसव रात्रिन्दि भान
'कत्त" इत्युग्यमानोऽपि न फलभः । अत्र प्रतिशत नवनवतेचा जितसम्मता.
वेर नाधिकार, कवनाशातहत एव तामपहरति । पास्य चानजितसम्पत्ती परमाधि-
गतसमती पूर्वाधिकारः।
एकतः समाजेऽपरिभाम्यतामिन्द्रियाणि व्यर्थतामुपयन्त्यनुपयुज्यमानानि, इतर.
रेषामन्युयोगेन। एतादृशे समाने प्रतिशतं नवनवतिर्मनुष्याणां छोरश्रमाय बापते,
एस्थानुगादकोऽयम्यन्ननारत विश्रमाय विषयोपमोगाय रिश्यते। योनीरिती
मोदधमा गत भ्रममश्रम युद्धिमता युक्षि झोला परैधितो' धनेनारमान पतिवाद
पर सवारदरिती स्थिति: प्रेग्यतोऽधिका मासीत् । परमय र परास्सन्दी'।
विषयरतोऽन्यतिविपमः खल इति न मृपा यदन्ति विद्वांसः ।
यदयं नालद्धपी सकुटद्व पी सदा कृपणः ।।
चामिनोवादमावर हतंय चोर्यम्। यया पोम प्रमेण लग
प्रतिमा पर कितन्। मिमितानि द्वादर पौतमाम न पानिगम
अंदन। रिमाइलोनाका मुलाय, का बहाणाम, प नायक
प्रबम्भाय च र चिनिनु एकदशेनयन मनोज येन बत्रमा मन
प्रमोन्टना, गारेगन मा पाम्। हि
दममटर, धमाग्नु नि ! आपणमामा भया !
रमाबीपादो
* Tit v*tez. GayParatte 1 an Bester. I
- MEER
मुबाया।

नवमो निःश्वासः येपो प्राणिवधः क्रीडा नर्म मर्मच्छिदो गिरः। कार्य परोपतापिरवं ते मृत्योरपि मृत्यवः ।। परमवधार्यताम्, नैतत् प्रबुद्ध भारते चलिष्यति। वयमेतदन्याय्यमपहत समवेताः। न्यापि दुरवस्थया कोऽपि लाभान्वितो न भवेत् । व्यतिक्रमविनाशोऽस्माकमुद्देश्यम् । परितो भोगाव्या सौवर्णी ला यत्र तत्र मुनीना कालकूट रामेण प्रेक्षितम् । तोषधनाः न्तारमानः पठनराठने यजनयाजने ज्ञानविज्ञानाविष्करणे प्रयतमाना लोकोन्नत्यै रस्य भूत्यै भ्राम्यन्तः प्रतीकारापरायणा मुनयो राक्षसैर्जग्याः, जनस्यानमपि तदरण्यता , मुनिभूमिरपि सा मृत्युशिलेवाभूदिति वाल्मीकि ते। परम्, कि सम्भाव्यते तदनं दन्तैर्दष्ट्राभिर्वाभूत् ? नहि नहि, अपि तु तेषां नैशाचर्या नीत्या। धनेश्वरस्य यात्रा धनीवुभूषणा रावणेन शोषिताः शान्ताः शान्तिप्रियाः सविनया मुनयः सम्पोडिताः इयो मृता, शिष्टावोद्विग्ना भवसन्ना दीना मृतेभ्यः काष्ठमनि पिण्डमपि दातुन नन् । नैते साधनसम्पन्ना दिव्यसिद्धय ऋषयस्तेषां परशापसामर्थ्याधृष्यत्वात्। अपि स्तसमस्तदोषाः प्रजा एष मुनित्वेन वणिताः सुशीलवात् साधुत्तत्वात्। रक्षोराजो दामीको द्विदशकरच वणितः। परं किं सम्भाव्यते यत् कश्चन द्विपाद् दशग्रीवो करच भवितुं शक्नोति ? वस्तुतस्तस्य कर्मणः प्रतीको पादौ दावेवास्ताम्, रमादातुं शासकस्य दुर्मदत्तगुणैरुपेतः स विंशतिकरः, दशेन्द्रियविषयानुपभोध न वासीत्। अनया साइणनीत्या शोपणप्रणाल्या दुःखयन, मानवान् पीड्यन्, राहरन् त्रैलोक्य रावयामास, भतो रावणवाम्ना प्रसिद्धः। तस्य भ्राता मयासम. नघुनन्यासको लोकव्यवहारविरको न कस्मादपि किमपि शुश्रूधुर्महानिदः कुम्भकर्ण र रथ लोकभीषणो विभीषण इति विभ्रतः। जनस्थाने चास्य दुत्तो मुख्यौ शासका. सरोदूषणच, इमौ गुणावपि सविप्रहाचित्र पुरुषवद् वणिती प्राचुर्यात् प्रावल्पाच्च । : खरः शासनकाठोर्यम्, दूषणच सकलदोषसमवाया, जनस्याने एतयोरेष साम्राग्य- तएव जनस्थानमरण्यता बमार। बमुदिमडने राष्ट्र दशरयाद्-दोन्द्रियाणि रथाइब(नियतानि वशीवानि येव) तस्मात् विशायाम् -अन्धकारे अज्ञानान्धकारे च परन्ति-मसयन्ति ते निशाचराः टिष्टाः ।। २. सम्भे कथनाश रिमपि फळ सन्धुपवयम् , सर दर।

। चन्द्रमहोपतो कौशल्यायाम् कुशलकोपेताया रामः प्रसूतः खर्मशमसन्द्रिय एव युध्दम पुमांसमु. त्पादयितुं प्रभुः । तेन सर्वलोकहितैपिशालोपयरमणाद् राम इत्युपाधि दयता सर्वा मर्यादा प्रतिष्ठापिताः । रमपति विश्वंस रामः तस्यत्री सीता कृषिप्रतीकाराष्ट्रस्याजीविका धनकस्य- उत्पादकस्य पुत्री। एवं समेलोक्यरमणः छीतो परिणीय सरलक्षणं लक्ष्मणम्, विधमरगम विषयानासक्त विरक्त ज्येष्टानुशासनेऽनुरक भरतम्, मर्यादाशगां हनने शननस्य प्रातृत्वे प्रकल्प्य "साधुतपखिकण्टक विरावणं रावणमुनीरूपम्" निहल सर्वत्रानन्द प्रसारयामास । अत एव तस्य पुरी भयोध्या-न केनापि योद्धु योम्या शक्या वाऽऽसीत् । तस्य राज्य मधुनापि स्मयते । यत्र प्रहृष्टमुदितो लोको हः पुत्रः सुधार्मिकः । निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जितः॥ विविधरूपेण माबुकात गायन्त्युपश्लोकयन्ति च। यतस्वस्य जीवनं न स्वस्मै, अपि तु लोकरञ्जनाय। एव स्थिति हिरण्यकशिपोः। हिरण्यस्य कशिपुः- पर्यको यस्य, यत्र बना वलाय प्रस्खास्तत्र स पर्यहमपि हिरण्मय- मकारयत्, एतादृशो दुत्तो भोगामिलापी च, यः स्वपुत्रायितान् प्रहादमानाम् जनान् निष्पोज्य स्वैर विचारोपेक्षितेवरान्तर ईश्वरमानी निरकुशः प्रचुर श्वर्यः । तदा कश्चन नरसिंह एवाज्ञातागमनखं पयामास । प्रहाद इत्यव्यसन्दायमानस्य दुखितसमाजत्योपलक्षणम्। एत एव राक्षसाः पुरा रक्षका भासन् , आसीच ता सम्मानरोधिका राक्षसपदवी, र तेषां नशंसव्यवहारेण नैशाचर्या नोत्या व साप्ययोगतिं गता महत्तरहरिजनशम्दात् । एवे निशाचराः सामान्यसाधुजनानां शोपणादेव ला सौवर्गी कशिपूध हिरण्मयान, तुं प्रामवन् । भरमा सद्भावनारते विरतविद्धचे संस्कृतिसम्मन्ने शान्तसन्तुएजने अष्ट्रेऽमितो दिशं दृश्यमानान् प्रासादान् परितः कालकूट ततोऽप्यधिकमैक्षिप्त घटनामन्यत्रोपयोगो नाभविष्यत् । एकस्यां सौवा माया शोषक भोगाभिलापिर्ण पास समुच्छत मर्यादा प्रतितिष्टापयिषु रामोऽवातरकपरमधुना परितः प्रेक्ष्यमाणामु वर्णीषु लहापितामु सर्वतः सरता सणायमानाना हिरण्यकशिप्यमानाना बानाय कृते या प्रतितिष्ठापरिनिर्भवहिरेव रामरूपेण नाविहरूपेण च भवितव्यम् । यतो हि सतीदि रास, रक्ष पालने अमुचन्ताबाप। अधुना तु शत्यस्मात् । २ सम्यक सम्झायमानान् । दमय शम्दे। गुरवि हुए।

नवमो निःश्वासः यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः। मायाचारो मायया यारणीयः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः।। नूनं नानामदोनद्धाः शान्ति नेच्छन्त्यसाधवः । तेषां हि प्रशमो दण्डः पशूनां लगुडो यथा ।। भागवते १०.६८।३१ नंतत् सम्भाव्यते यदेते बोधनेन सत्पथे समागमिष्यन्ति। भूयोऽपि सिकः पयसा धृतेन न निम्यक्षो मधुरत्वमेति । परमेवे भ्रान्ताः समाबेनोच्यमानाः धम्भ्रान्ताः। भ्रान्तानामप्युट्यो दयापात्रा प्रत्युपैरेटन्य एव। यतः- रुद्रोऽदि जलधि हरिदिविषदो दूरे विहायःश्रिताः भोगोन्द्राः प्रक्ला अपि प्रथमतः पातालमूले स्थिताः । लीना पद्मावने सरोजनिलया मन्येऽथिसार्थादिया, दोनोद्धारपरायणा: कलियुगे ससूरुपाः केवलम् ।। जिह्वायां दन्तैर्दयायां न कोपि कुप्यत्यभेदात् । एतेभइतसुवर्णमहाविद्याः । एष मद एषाभपनेयो येनाप्राकृतिकीमवस्था विहाय प्राकृतिकी दर्ता भजेयुः। “असतः श्रीमदान्धस्य दारिदय परमासनम्"। भागदते १-११०११३ । एप बरकोनारः। समुदाद्य देवेष गतायां श्रिया या स्थितित्यानाभासोत सेवाद्या- रमाक पनिना। "अन्तरापाति हि श्रेयः कार्यसम्पत्तिसूचकम् ।" भेदभावनाया परकीयभावनाया दीवायां विपक्षता. तत्यामसायामल्पतराया- ममशः सम्पक्षता। सर्वेभ्यः समाना प्रातिरभेदमासस्य सति- मावस्यतिमावस्याभिलाक्षेत्र भवति स एवारमाकं साप्या, निरोपरिहार सर्वत्र समत्वापादनम्, कर्तध्ययुद्धया प्रदर्शनरहित सहभं स्नं च। शिशु सेवमाना माता किं वृत्तपत्र विवरण प्रकाशयति ! माता सेवाया आदर्श नमोमूरा पूरा समुदीयमानः किमुखोपयते । यदई तमोऽपहनिष्पामि, पशिषः प्रेपियामि, मोशन पि योजयिष्यामि परमेतसाय सत्या खतो भवत्येव । परिमल प्रभारमन् विधरामे मल्लतमायाच २६० चन्द्रमहीपतो सुरूपतामुल्लासच विश्वासयन् धार्या फलानि च ददत्तप्तौद्घोषयते, न जानाति न च गर्वमनुमवति। यतो हि स तेषां सजभाः। वयं सर्व पोदाम, उपलब्धसर्वसाधनान्यु- पयुधानाः सुसिनः प्रतिक्षणं समवेत्योदीयमाना बोवान। यतः- पुंसत्रिवों विहितः मुहृदो हनुमावितः । न तेषु हिश्यमानेषु त्रिवर्गोऽर्याय कल्पते ॥ भागवते १०।५।२८। राष्ट्रस्याथिकी स्थितिमुन्नेनु यतमानानां मानव विहिता विषमतामपकरियां प्राकृतिकोध न्यूनयिष्यवामस्माकं पणोऽस्तु यजलस्यैको विन्दुरमस्यैकः कणः समयस्यैकर क्षणः श्रमस्य खल्पतमोऽशश्च न व्यर्थमुपेयात् । सर्वे च मुखिनः प्रियदर्शिनश्च भवन्तु, न कश्चिद् दुःखभाग भवेदिति। एवं कृते दुःखम्, दारिद्रयम्, शोकः, भयम्, असानच कथावशेषतां ध्यपेयायादवश्यम् । “एकचित्ते द्वयोरेव किमसाध्वं मवेदिति" वयं तुबहवः। सुमन्त्रिते सुविक्रान्ते सुकृतो सुविचारिते। प्रारम्भे कृतबुद्धीनां सिद्धिरव्यभिचारिणो ।। असिद्धार्या निवर्तन्ते न हि धीराः कृतोद्यमाः। श्चिद् प्रते, असम्भवः सर्वाभ्युदयः। महर्ता लघुष जीवनं प्रकृतिसिद्धम्, “जीवो जीवस्य जीवनम् । सर्वन ज्येष्ठः कनिष्टम्, सवलोऽवलम्, पण्डितो मूर्खम्, घनी निर्धनम्, भूमिपाल कृषकम, विश्रमजीवी श्रमजीविनं जिघरसति। मत्स्यन्यायः प्रकृतिसिला। "वरिष्टो मत्स्यो मनत्ति' इति न कथमपि प्रकृतिविरुद्ध कत्तुं शक्यम् । नादतने न पान नयतने जगति दुर्यलानां स्थितिः। अतः कल्पनामधुरोऽयं सर्वाभ्युदयो न प्यावहारिका कपल प्रशावादो विचारका वाचा ध्यायामति । पर प्रान्तमा धारणा। सर्वाविवादिबलशाल्येव जीपने साधिकारसदा पुरुष एक उभ्योऽक्षमा क्षमावारी नैसगिकसाधनविहीनः प्राणी। यतस्तस्य न टोणानि नसानि, म भोमा दंष्ट्रा, नोयनाय पक्षी, न Pा, न विविध मावनकि नोस्वाम्यासमषले नरपले न याचशे सस्याबाया गतिः। परम केल सजीपति अपि सर्वान् बलिनी पायति । हस्तिनमुष्ट्रमवचारोहति, सिंह एक पमित्ता .

-
नवमो निःश्वासः
यथेच्छ नर्तयति, ङ्गिणो नियोजयति, गा महिषी दौग्धि व्यवहरति च। अतोऽव्य-
बहार्योऽयं मत्स्यन्यायो बुद्धिमत्सु मानवेषु । 'बुद्धिर्यस्य बल तस्य । सा घेयं शरीरबल
तो भिनाऽनवधिका शक्तिदिनाम। या शरीरेण न क्षिपोति, अपि तु प्रखरा प्रखर-
तरा वर्द्धते। अत एव मानवसमाजे शरीरशस्याऽशक्तोऽपि वृद्धो नेता भवति, भवितु
शक्नोति च । नैव पशुसमजे। अतः समाजे बुद्धिमतामेव वरीयस्त्वम् । बक्षकवत्तिनी
विजयिनो मृताः। न कश्चन तेषां नामापि वेत्ति, परं पुद्धिमन्तः प्रातः एमर्यन्ते ।
अत एव देवराजो मृहस्पतिम्, पपर्वा शुक्र प्रसादयामास । केचिद् वदन्टि भ्रान्ताः
पुण्योपार्जितसम्पदोऽपदानि विपदा घनिनः कथं पुण्येऽक्षीणे एव निर्धनाः गर्नु
क्यन्ते । एते हि परमधामिकाः। लोकस्य भूत्यै विद्यालयान, पुस्तकालयान, भौषधा-
ध्यान, आरामान, धर्मशालाः, गोशाला:, गोचरभूमीः, कुरान, देवमन्दिरापि निर्माय
पदस्थापयन्ते । एते विवस्य स्खम्भाः, मर्यादासेतवो मधुरफलानो विनता पक्षाय ।
एवेषामभावे विश्वस्य व्यवस्थवासम्भवा लोकश्च विश्नतां प्रवेत्। इतथा.
पुण्या क्षीणा दरिदाः कथं सपनाः कर्तुं शक्यन्ते ! हति शास्त्रेप प्रत्यपादि।
सत्यम्, एते धमें व्ययन्तो धामिकत्र वाः प्रायशः केतृणां विक्रेटपाच पकाशात् प्रतिमु
कापिगमेकमादाय प्रतिवर्ष सहस्रशो लाश उत्साय शाशं यशोथिनो धर्म धन्यवादाय
ध्ययन्ति । विचार्यताम्, किमो धर्मः परोपकारो धा! छिमेतस्य फलं धनिना साधिकार
भी शक्यते । तस्य फलेन च स धनवान् भवितुं शक्नोति ! यया पर्य राजानः
प्रजापनेन सर्व निर्मापयामो भुन महे च तथैवे। वस्तुतः पुण्यं स्वमनन्धरीजित-
समापनेन।। भय व शास्त्रे गेल्यपि प्रत्यपादि यत् पुण्येन मनः शुद्धपति, उपसा
सरगुद्धिमाचख्युर्महस्यः । शुद्धमनायौदा सायाः, शमायाः, दयायाः, सन्तोषस्य, चरित्रस्य
अभिधानम् । परमय विदुपे पदाय भूदेवाय पुण्यप्रर्वतय लोकोदरपतिनेश्वनिमय
विधिवशान्माचीरमाकाक्षते ब्राह्मणाय लक्ष्मीलदोल्लसदमन्दमावपूषितरपरन्द्रामारो
-दारसया प्रदीयते येन स स्वंतत्रद ब्रह्मात् कन्या किमप्युपलभ्येत चा सत्यम् ।
विद्यातपोवित्तवपुर्वयःफुलैः सा गुणः पहिरसत्तमेतरः ।
स्मृतौ हतायां भृतमानदुशः स्तव्या न पश्यन्ति हि घाम भूयसाम् ।।
श्रीभापते ॥३१॥

२६२ । चन्द्रमहोपतो किमेतदेव पुण्यम्! एष एवं धर्मः! पुथानुष्यायिनामेतदेव दम! अजित तपद्यामधिगततपःफलानां तापसानामेप एव भावः ! मुज्यन्ते स्वगृहस्थितैरिव सुखं यस्यार्थिभिः सम्पदः पटी यस्य मतिः तमःमहतये द्वावेव तो प्राणितः । यस्त्वात्मम्भरिरुनतेऽपि विमवे हीनश्च विद्वच्या तस्यालेख्यमणेरियाकृतिघृतः सत्ताप्यसत्ता ननु ॥ स्वामिने सम्पत्कूटं चिन्वतामनाराधिनां मृत्यानामपि धनजिक्षयाऽपराधमुद्घोष धनमादाय भविष्यद्वापानिरोधाय तान् कारायां निरोधयत्सु काय दया, कक्षमा क धर्मः, वौदार्यम्, व दाक्षिण्यम्, कच लजा! परवादे दशवदनः पररन्ध्रनिरोक्षणे सहस्राक्षः। सद्वृत्तवृत्तिहरणे पाहुसहस्रार्जुनो नीचः।। धार्मिकम्मन्याना प्रन्येषु, यस्तेि पामारमतान् कथयन्ति, द्रव्यं सर्वासना पदम्, अपदं पुण्यस्य, निषिद्धमप्राह्यमुतम्। द्रव्यवतामहमप्राप्य इति भगवानाह । "यस्याहमनुहामि हरिप्ये तदनं शनैः”। साह ईश्वरोपासनायाः सर्वमा प्रतिकूलः । ऐश्वर्य विपदा बीजं प्रच्छन्नं ज्ञानवारणम् । मुक्तिमार्गार्गलं दाय हरिभक्तिव्यपायकम् ।। ब्रह्मवैवर्तपुराण प्र. स. ३६४८ परं तदपि धार्मिस्य वा समाजेनोच्यमाना ईश्वरप्रियाः देवाना प्रियाः परोन्नतिशूलेन शल्याकुला अन्यायेन धनमर्जयन्ति। विशाला दुर्गापिताः प्रासादा, अपिलशनरोधीनि च यन्त्राणि सन्तोषस्य चमिवानवरतं विदधति सर्वतः सोद्घोषमवलोक्यन्ते, पत्रामिषसाय भाषा कुराणामिद सपर्षस्वामसडाय प्रवर्णरफोट प्रयते । पारस्परिकथ्यवहारे खल्पमात्रयापि यदि स्नेहसहानुभूत्यो ध्यवाहरिष्येताम्, तश निति ताभ्यन्तरवरिनऐक्षित साहस कार्यक्षमताय प्रदर्शयितु श्रमिकोऽपश्यत् , पण पवार नामविष्यत् , परम्, प्रबलया भौगलिप्सया कठोरात्याचारपानुक्रनाभिश्च सरईट- पना सपनोपतो यह वितरिता निभाना सादिवरा- .

. नयमो निःश्वासः साधा स्वामिनो दारुणाभाषणा भीषणाः कृतान्तस्य दूता इव प्रतनुवभवोद्भवदम्पर्वगा बरा विनाशोन्मुखाः श्रमिक सहामोद दुर्व्यवहरन्ति । परक्षतक्षोदविनोदलीलाः खलाश्च काकाच यदृच्छयैव । पात्रेऽप्यपात्रेऽपि विगर्हणीयां वाचं च विष्ठाञ्च समुत्सृजन्ति ।। आ-1 कथम् । दुधे।। सोमेश्वरदेवः। एकः स एव जोवति हृदयविदोनोऽपि सहृदयो यो निखिललघिमकारणमुदरं न बिभर्ति दुष्पूरम् ।। पादाहतं रजोऽपि मूर्धानमधिरोहति, तदा कथं न स्याचेतने दुनिवारव्यथे समुत्पीडिते मानवे सर्पः । अस्तु, चरित्र तेषां सायमभिरामवित्राणां पोट्टल्या सह समवेताना घट- काना वर्णनेनानुमातुं शक्यते, यत्रार्यता यतित्वमुररीकृत्य धनम्, वर्णाश्रमाचारोऽनाचरित- भिक्षः क्षारधिम् , भारतीयता यतवाक् सत्येन सह रसातलं प्रविविक्षति । प्रपा प्रपते, स्या दूपते, मानो म्रियते, मौनं चीकुरुते, थार्जव भर्जते, ब्रह्मचर्य जिति, प्रावा रोदिति, द्यौः प्रपित्सति, पृथ्वी प्रेजति, पापं प्राच्छेति, पातित्यमुपेधते, सूर्य उपोषति, कट कटायते, मनीषा शेते, यशः ख जुपाति। सत्लाय यायते म्रियमाणाय दा मुष्टिमात्र दिसन, संस्कृतिप्रचाराय ज्ञानविज्ञानधौनत्यै च प्राधितः सर्वदा सम्प्राप्ताहानिः, पर वर्णकोलाय सर्वम् त्यक्षु सर्वदा सज्जः। प्रारभवरामजित- तपसो यस्य विविधं यावागुरायां मुग्धवधूरावघ्नन्तश्चराः प्राचुर्येण चरन्ति । यत्र तत्र वैज्ञानिध्मनस्नानागारस्य कलानिकेतनात्य संस्कृतिपरिषदो मनोरखनशाल'या नेश- भोजनशालायाच मिषेणाभिनवप्रकाराणि व्यभिचारमहाणि समेधन्ते, यत्र स्मेरचाह- बदनविदलिदेन्दीवरमदाः मृडावलिस्निग्धोम्ज्वलाचारनिकुरम्या मृदुलमनोरमप्रलम्बाडुलीकास्तमीरमणमुख्यो नसोद्योतविसिटरकोपलाः स्मिता- यमदभ्योत्स्ना गतावहतहंसाः कलाकुटिलकेशोत्लरफुरन्मणिद्विगुणितामाः . सुनरीट- नयनाः सालश्वेतोपतपीदा- मल्लिकामपालमृदयो विद्यदल्लीकन्दलीमसराः कलधौत- कलेवरा अधौन्मिषितयौवना भुवनामाः पादप्रभापरिभूदला क्षामोदर्यः मुगुमायः - कृष्णपक्षमलाइयो दलाला • चन्द्रमहीपदोः कुमार्यों जोषमयुस विस्लपितकोलवक्षसो जीवनं कदयन्ति । मत्र काशी केशाः कपूरस्फटिकेन्दुसुन्दावदात का प्रवचनना धनोदामघामानोऽहानमोगा मंदीर भोगास्तचेतसो वपीयो धनिनो मकरन्दस्यन्दिनी मधुरखरलहरीमाणवितुकामा मारीकीतिकौमुदीकलहुनकमयकलपितकावराः काककामुशाः प्रामं प्रेश्यन्ते । अवधार्यताम्, एतदपश्रयमेकदा राष्ट्रस्य विनाशाय समर्थम् । प्रातः समधिगतधनः सायं निर्धनः खपिति मन्दभाग्यः। स किं प्रातः पुष्पकमा यच प्रनष्टपुण्यः ? पुनरपरसप्ताहे चाधिगत्पुण्यफलः । वस्तुतो यावन्ति छलानि वित्यो मुद्राः। शतच्छलश्शतपतिः, सहस्रच्छलः सहसपतिः, सक्षरछलो रक्षपति, टिच्छलः कोटिपतिः, तदूतु दलात्मकः । पतित्वं हि साधीनवस्तुन एव सम्भवति. लं हि साथीनं न द्रव्यम्, तस्य गमनशीलत्वात् । अतः कोटगविशब्देन रिच्छलपतिबौद्धब्धः। माकपार्थिवादित्वात्समासः। फूटकलाशतशिविरर्जनधनवियरः क्षयक्षपातिमिः। दिविरैरेव समस्ता प्रत्ता जनवा न कालेन ।। नायेा सम्मानवावकलं राक्षसशब्दवत्। राक्षसा एव स्तुतिप्रिया' । यन्नोपकारक यन्न भूपणं यत् प्रकोपमातनुते । गुरुगापि तेन कार्य पदेन किश्लीपदेनेव ॥ गोवर्धनाचार्यः। यस्तत एतान् संस्कृतिविनाशकाना साधुसदारापरिस्थितिपीडितमुनिजनायिताना सत्व না রাখনিখানা বৈসিভিখাৰিঘৰষ্কালী ঘষায়ানু ভদ্র , स्थितिमीडिता नापि या शानुयुः। परिस्थितिमीडिदेन केनापि सत्यमेवोपम्- १दोतिर्दशार्थः, दशैव चामरे देवभेदः। समशचाोपलन्धिः। देव:- । विद्याधर-विमिगीगावाप!! मारा व्यवहारवित। पहा-पति श-रतिषियम् । गन्धर्वः-मोदी। किधरमदासतः। पिशाधः- मिलापी, सव इत्यज्ञानोपलक्षणम् । मुखक-कामी सिद्धा-भव्याहतगतिः । वैकलिला प्रायः सर्वगुणोपेतः । .

नवमो निःश्वासः २ ६ ? मानः कस्य न वल्लभः परमुखप्रेक्षित्वदुःस्था स्थितिः कस्य प्रोतिकरी ? पाभरनतं कस्मै शिरो रोचते किन्तु स्वामिनि सावलेपहृदये दासीकृताः शत्रुभिः क्षुद्रानद्यतनेश्वरान् धनमदक्षोवान् निपेवामहे ।। रस्तुतो ये सु-सुखं गन्ति-ददति ते सुरास्तद्भिन्ना असुराः । अद्यतन धन संयोगात् केवलम्, काकतालवत्, पणाक्षरवच्च । मैतत्पुण्यस्य फलम् । भरच पुग्नैतदेव लभ्यते, कृच्छू तपसश्च तदेव फलधे त्, नियमयमदमादिभिरेतदेव प्राप्यते चे दावग्नी दहत्वेतत्तपः पुण्यच, भरम चास्य रसातले तया निखातं भवेद् यथा प्रलयान्तेऽपि दोपर्युपेयात् । विद्याधनम्, पशुधनम्, कृषिधनम्, कलाधनं पुरा धनपदवाच्यमासीत्, पामहो । भय विनिमयसाधनानि मुदितानि कर्गदखण्डानि धनपदय्यवहार्याणि ? आश्चर्यम् । अद्य निर्माय गुणप्रणयिनः पादपांसुपरिमर्शपावितपतितपत्तनपरमपीवरपापिनः सार- जालपादपैकफला मुनीयमाना विद्वांसो धनमृद्वेत्रिदाहुद्वारकातरधियो रौरवायितेषु पन्नेषु निवसन्ति पा वृत्तिमाश्रिता दरिद्राः। एता राष्ट्रस्य विभूतयो पार्द्ध के विविध- पातिकलैष्मिकण्याधिविपन्ना औषधोपयोगायाप्यपारयन्तः श्लेष्मसिध्याणपूणितमस्तिष्का रक्षपयन्ति, परं न कहन याचन्ते- विषमङ्गता अपि बुधाः परिभवमिश्रां श्रियं न घाब्दन्ति । न पिवन्ति भौममम्भः सरजस्कं चातका हते ।। व तपखिनो विद्वांस एवं सीदन्ति, तद् राष्ट्रमन्नेष्यतीत्याशैव खपुष्पायिता प्रश- पिता सैकततैलायिता च । इतश्च चलचित्रनट्योऽप्रकाशितागमना भवि भा- देतागमा यथा सक्रियन्ते यजनसेवाविभागः प्रबन्धव्यासकोऽशको भवति । याचारविहीने कश्चन धामिकोऽस्थास्यत्तदा दिमतादृशी स्थिविरभविष्यत् ! धिगदेपा -विद्यां : धिगपि कवितां धिक् सुजना वयो रूपं घिग् धिग धिगपि च पुलं दुर्गतिमताम् । सकलगुणहीनोऽपि धनवान् पहिर्यस्य द्वारि तृणलवसमाः सन्ति गुगिनः ।। - असौ जीयादेकः .

६ । . २६६ चन्द्रमहोपतो निद्राति स्नाति मुङ्क्त भ्रमति कचभरं शोषयत्यन्तरास्ते दीव्यत्यझन चायं गदितुमवसरो भूय आयाहि याहि । इत्युदण्डः प्रभूणामसकृदधिगतान् वारितान् द्वारि पाल: पश्याम्मानन्धिकन्ये ! सरसिरुहरुचामन्तरङ्गरपाङ्गः।।. परमय धूर्ता धर्मस्य डा केवलं नादयन्ति यकभनाः न च धर्म चान्ति। सनडे समत्वाय गुणर्मविभागशश्चातुर्वण्र्य चतुरेण सृष्टम् । परम्. शिरो बीफलायने- भुजाविषीकायेते, पादो शलाकायेते, केवळमुदरं दाव प्रापणकर्म रिकताधर्म सुरसाशरोरनिव भूगोलाईभागमिव वैधते विवेकहीनाः समभावोत्पादकं सर्वाभ्युदयमहितकरं मन्यन्ते। नैतत्साम्यम्, यस परिमार्जनं गृहनिर्माणं वा कुर्युः प्रत्यं वा भक्षयेयुरिति। किन्तु सर्वे खखयोग्यतानुसार कर्म कुर्वाणा राष्ट्रतो जोवनोपयोगि योग्यतावद्धकच साधनं समान लभेग्न् । घनवलेन स्थापिता घताऽभूर्णा सन्दिग्धा च, पारस्परिकनिष्ठया समस्ये पारिताच स्थायिनो प्रभावोत्पादिका च । सा यदि प्रतितिष्ठतदा प्रतिदिनं प्रेश्यमापो भोर पारस्परिक सध्पों विनश्येत् । अद्यायमर्थविकारः शारोरिको रफविकार इस छमस्त राष्ट्र देहमिय दूषयति । अनेनार्यविकारेण प्रबद्धन रक्तस्य चापेनेव समाजस्य पक्षाघातः समबन, हसितेन च रकासता। एप समये समये श्रमिकान् प्रलोभ्य वययति, कत्ताशयानानि प्रदर्य तान् विनाशयति, वंशी नादयित्वा कस्तूरीमृगमित्र मोहयित्वा हन्ति । परमिदं ध्येय यद् यो दरिद्वान् दुर्गमयति तस्य दुर्गतिर्मया । विश्वास्य मधुरवचनैः साधून ये वञ्चयन्ति नम्रतमाः । वानपि दधासिमातः काश्यपि! यातस्तथापि हि विवेकः।। जगन्नाथः । खकार्य सिपाघरिपुः पुजवादी नम्रः, सिदौ च राक्षसः भोऽभिमाश्य पुत्रवादखभावः मत्स्यस्येवरप्सु सदा दम्मस्य ज्ञायते गति: फेन।' नास्य करोन पपादोन शिरोदय एयासोमेन्दः! 4 नवमो निःश्वासः एकस्मिन् भवगहने तृणपतपयलयजालसंघनः । फूपः पतन्ति यस्मिन मुग्यकुरङ्गा निरालम्ये ॥ क्षेमेन्दः । एव दीनप्रमियोवस्था विज्ञाय सपेन गूयाभेन गोवा वेभ्य एव मार्य विकीपीते। ल ल मृत्स्नात्याने सिता नबालभीयाने धोणी हामी मायुग्य, धोवनरक्षकेप्वीप यश्किचित् मिय, शशा विचलित कान, गोषम- पण विन्तिकपीजचूर्णम् , पयसि पानीसमाधि पून्तिग्य, मरिचेपियकारण दियाँ पोतो मृदम्, पृते वसा वैलान्तराणि च सन्निध्य गष्ट्रय जनन् कोरियो पनप दिनाथपिनु शापवुदि। एक्ममन्द निम्यः यिकर तरमच मोगेम स्ट रिजहाति। सत्यम्, तस्करस्य फुतो धर्मः मातरं पितरं पुत्रं धातरं वा मुदत्तमम् । लोमाविष्टो नरो इन्ति स्यामिनश्च सहोदरम् ।। पाम्, रिमनेन राधमुन्नेनुशवपने गई या सालाना गुदा पालो किम्! परिवार परिसमाप्यान्न मुभ विभायो रिम्। माम. मेरेर मुत्पतिर्मवति । एमः परमोमोमो ससम्मान करना मारा सहचेता चिरन्थिावरायुत रिदुर्ग का भी। पर- सनं निःश्वसिति शिवि चिलिम्पनि प्रस्तीति न प्रेयसः मोति सनि भिरीशितः करनले पत्ते फोरम्पतीम् । पादेयो दयायरेन गुरुमात्रान्ता हतारोथा नीताविपतकोपनियापनरन्नोप्रमापाताम् ।। धामो पूर्व पश्चिमी ले सन् . कर हरिम् । इमानत पर भी गा। परमय व अनुना सादर कन्या रमुपपरीमो माnen मckvare

सत्य
२६८
चन्द्रमहोपतो,
शरणे समुजङ्गमें स्वपन् प्रतिबुदन परेण योषितः ।...
तरुणः खलु जातविभ्रमः स्वयमुपं मुनगं जिघृक्षति ।। अधयोपः।
विसालयाकाशस्याघो द्योतमानानां चन्दतारका प्रकाशम, चौत मन्द प्राइतो
वायोः शान्तसुटेथानन्दं पिमुच्य के कारायिडे गृहोणे विद्यजनवावे
वासोरमाभिरती कृतः
हन्त।
भानन्द एवाद्य पुजवादपूरे प्रौटा।
मनटीषु वेश्यासु वानरभल्लूपार्शनेषु निपतन्ति मानवा भानन्द लिप्सको दुष्काले
धुमुक्षिता अनधित। अहो! आनन्दामासे प्रतिरठायायामेवानन्दननुभूति
मुग्धः। अस्माकं जीतने धारोत्साहः! वयं वसिमो यतो हि प्राणा न निर्यान्ति ।
परं जोवने जोवनं नास्ति, उत्साहस्य मानसशक्तं थाभावः। कलाहीनं नवीनताविहीन
भावनारहितं रोस्यमानं जीवनम् । किमेतदपि जीवनम् !
वयमाः। भार्यसंस्कृतेः प्रसाराय वयमेवाधिकृताः। अस्माभिर्बहनो भोगा मुकार
पर तृणाधुनापि युवतिरेव।
या दुस्यजा दुर्मतिभिजीयतो या न जोर्यति ।
तो तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ।। भागवते ९।१९१६
आधार्यताम्, भस्माकं माहात्म्यं त्यागेनैव नतु भोगेन । जठर को न बिमति केवलम् ।
भोगविण्याः न शमिनु पार्य्यन्ते। अथ च यदि वयं भोगाम लयामस्वदा
भोगा भरमान् विहाय प्रजिष्यन्ति। यदि वयं प्रमाना क्षेमं न साधयिष्यामतदा
प्रशाः खतस्तत् साधयिष्यन्ति । ता कास्माकं वैशिष्टयम्, क च सम्मानः, zि
गरोयसोऽध्ययनस्य फलम् ।
याते मय्यचिरान्निदायमिहिरम्बालाशतेः शुष्कर्ता
गन्ता के प्रति पान्यसन्ततिरियं सन्तापमालाकुला।
एवं यस्य निरन्तराधिपटलेनित्यं घपुः क्षीयते ।
धन्यं जीयनमस्य मार्गसरसो धिग् पारिधीनां अनुः।।
एका समयस्यावश्यम्ता ! भूमण्डले यहूनि राष्ट्राणि धागरितानि । दरीवयों पायो

नवमो निःश्वासः २६६ प्युटताना जाता। अस्माभिरपि जागरितव्यम्, योकव्यय विश्वस्य भूत्यै। सवतो. पधारनिरतमनसो मवादशा एवादो महत् कर्म कक्षमाः। उद्धृतो भवति कस्य वा मुवः श्रीवराहमपहाय योग्यता। मापः। एषा च सत्संस्कारस्य दिव्यधारा समस्तजीवने सतत प्रबहेत् । प्रवहणज्रयां दिशि। पर्वते पतितं पानीयं शतमार्गेभ्यः प्रबन्न सरित निर्मातु प्रभवेत्। देव रस्या दिशि प्रबहत् घोतो भूत्वा धारारूपेश नदीरूपेण परिणम्य समुदमित्र खोदेश्य प्राप्त उमर्यम्। एवं स्थितिः संस्काराणाम् । जल हि निम्ने सर्वतः पुत्ला दिशयति । प्रथमतो भूमेः पोषणं निहन्धदुर्वराशक्ति हासयति, द्वितीयतश्चैकयीभूत विषाकवायु प्रशारयन मराकान् प्रकाममुपाय विषमज्वरमापादयति। अतो लोकहितार अलविताय पतस्य सर्वस्मिन् भूभागे विभाजनमेव वरम् । एवमेव व्यस्य। द्रव्ये हि गी' भातोड्युसनम्, गतिशीलता सत्य प्रधान धमेः। निरोधे व्यापत् । विविधव्याधतलोकपनोऽनुसादकः सतो हियमनुभूय, चोरयमाणः परयो हासमिषेण दियं दोपं परिहान्निव स्वामित निराकुर्वन, स्वत्वं त्यजेत् । सप्तोऽ- परिधाम्यत उपभोगेऽधिकार एव कथम् । पुभुक्षिताः पक्षिणः सयमाहाराय यवन्ते। पार्सस्य पुरद्धान्तिः स्वयं भोजनेनैव । इत्तव सर्वत्र फलभा । समाजो दि सहयोगिनां सहमिणो पारस्परिकभावपूर्णः सामनाये सामरस्ये प নাগিব মুফ। এসব অছিম মালীবাশ্বাবি ৪াবি না- भूता व्यपेतलमाः। एतानन्तरेण न सापि समाजे सतिः। पथाव- (१) ब्याजोपजीवी-स्यापि हातमु भूषा क्षेत्रं रई पदिा न्यस्य अवस्यकतापडिताय पचासन्मुद्रा ददाति न्यासवरः। एतस्य दुसी दस गुरुन प्रतिमासम्। न्यासावर्तनादधिमसित्रयम्। परिस्थितिपीडितो मसरोऽधिमध्ये अपनापन्यास प्रत्यावर्तयितुन समर्थः । न्यासपरस्य कुठीदरकारमा पा प्रतिशरमेने, स्वरस्य व एसः। अव एव स महाशनः। दनो सननोऽपवन-दर- मनोचितगुगरहित, सोऽपि न सामान्योऽपि तु महान् । अपना 'अब गदिशेरपोर- भर पसेन सह यासवरस्याप्यात्मसाभरने पर सफर, सोऽपि महर। বিন । १ पर्युदासोन।

चन्द्रमहोपतो, दरयुगाबद्ध सम्म भ्योऽसहरति, पामयं तु वराकानम्धिनान अमरमागान, मनन विषमान, विधान् यन्नानदयाश्यति । अत एव प्रायः स 'बा', 'माला' मामि सम्बोध्यते। (२) यवनोपनोपी-परेषा व्यसनेनटेन दिसत्या यो लामान्वितो भवति यथा पाकीलो वैद्यय। शानं हि परंप शर्म। यो मनं विक्रोमानो लोकस्य विष लाभान्वितो युभूपति स किं ज्ञानोपासक! ते हित्वा काइन राशि पांभुराशिनुपासते सतु प्यापारी भगवत भाशिर माशासानो मक इव "नस भक्तः स वै वणिक्या- मारोप्यमापात् परसहन मुमूच राहं निभृक्षति विचार्यां स कोशः! यो म कामादपि हत कामः'। नार्थाय नापि कामार्यमय भूतदयां प्रति । वत्तते यश्चिकित्सायां स सर्वमतिवर्तते ॥ चरकः । : एतादृशास्तु राष्ट्रस्य गौरवम्। परमय कियन्तस्वादृशाः । अद्यत्वे चिकित्सका प्रथम रुग्णन हि, तस्य धन दिक्षन्ते, स बीवतु म्रियता वा। (३) शुल्कोपजोवो-गृहशुल्केन शम्शुल्केन जनवाहनशुल्केन जीवति. शतं सहन्न वा मानवानां नियतवेतनेन नियोग्य यन्त्रादीनां परिचालनेन वार्यमुपायति । (४) पटका केवल वातावित उभयोपभोका उभयार्थहरय। (५) समानशीलस्य धनिनः पोध्यपुत्रोऽपहवाहिरण्यस्य परिरक्षको लगुडी च । मद्य वयं सर्वाभ्युदयाय कृतसपाः समवेताः। सर्वेण सर्वस्मै सर्वस्मात् सर्वर सर्वस्म मि उदयः-सर्वाभ्युदयः। सर्वेषामेकाहिन्युदये न सन्तुलन सम्भाव्यते । समन्तादृश्योऽस्माकमभीरः। स चाधिदैविकोनामाधिभौतिकीनामाध्यात्मिकीनाव शकी ममितो रशमुस्कर्षः खमावाधिसया बाधाया अपनयनच। सोऽयं पनि भनिदोषाः 2 उर्दूका उपर्ग। यया या कायदा या इवत। पन्न या। दुर्गन्धाय सभ्यय्यवहारमें केवल कहनेकी प्रपाली है रकरणम् सर्वदा 'काला' इति रोति सः। का आदाने। मगर मुखाल्लालाइयोतन्ति । धनेन । प्रापिने।५ गया। ले परिस्थाने च।

- नवमो निःश्वासः बहिपुञ्जनादोत्तभुजाभतो, अभिमानभीष्मोघमप्रीष्मसान्तामृतस्यन्दो जगचिवदोद- डेदो पाभूतभूतवर्गानुकम्पो पुत्रवादहुङ्कारकातरातुरहर्षवर्षी भवभयाग्निविविग्नामृतवी बमहर्पज्वरको आन्तरगुहागहनगेहगृहितच्चान्तविध्वंसी कलासकासाहरो मायामत्त जगदगदार शस्यमहमा प्रियोऽभयड्रो मन्दीकृतभीतिभूद्विपद चमच्छर्मकर्मा जानन्दधामा दिग्देशकाललननिरपेक्षःक्षपितात उढहेमरुचाम्, सफलकर्मफलोपलम्भः बावनोपातम् दोनजिनिविलसितोष्णशमनशीतसुभगमुरभिसमीरा पुअ- दलाटोयुपसारशिशिरो सिन्धुलहरीनिर्मलः कोलितभाग्योत्कीलकः विपनवन्धुः नखतापोपेतापन्नपालनप्रथितप्रवीणः प्रायशो विवजनवाङ्मनसाऽनुमोदितो महीमहितो निश्शेषरूमशमशमोऽशेषजनचिन्तामणिनिःसामान्यो पदान्यमान्यो पाद. न्योऽस्माकं प्राकन आदशः पारस्परं फलानपेक्षः स्वभावः। सर्वोत्र सर्वस्मै पाय न सम्प्रदायाय अपि तु लोकाय। 'वसुधैव कुटुम्बकम्', 'यो वै भूमा स्तम् । स चायं परस्तरमभेदभावेदते सहयोगे च प्रतिष्ठितः। सम्पत्तरप्ययमेवार्थः यह पदनम् -प्राप्तिः (पद गती, या प्राप्तिः समेभ्यः सम्यग् रूपेण जायते सैव) तिः, या च विशिष्टरूपेण ( केवलं विशिष्टेभ्यः प्राप्तिः) सा विपत्तिः। यत्रैको दति नवनवतिश्च नराणां शते विपीदति सा विपत्तिः पुजवादस्य फलम् । यस्यानुष्ठानच शदेन युकेन मनसा कार्यम्। अद्याभिलाषः शान्तः परं संयोजन समस्य, भूमिका धर्मस्य वर्णनं व्यभिचारस्य दृश्यते, एवं कृते न सफलता। सद्भावेन माने सफलता खयमुपतिष्ठते पक्ष्मणी इवाक्षणि। अनुष्ठानच समन्दयेन । समन्वयो अभावो न सङ्घर्षः। इखाना दीर्घता दोघांणाच हसता समन्वयकरी, बमीकः त्तिश्च । एष नासाभ्यो न चानायासेन साध्यः, परं प्रयनसाध्योऽस्माभिरनुष्य समस्मिन् राष्ट्र भूमण्डले जीवनस्तरे च समता अनुशासनेन सह व्यदतिष्ठेत । नादस्य भावना, आवश्यकतानुसार वितरपधारमामुद्देश्यम् । उत्पादनस्य फलमावस्यकतापत्तिः। द्वितीयञ्च वासनातृप्तिरार्धन्छ। सानी बहूनि यस्तूनि बासनातृप्त्यै घनाजनाय न निमौयन्ते यत्र राष्ट्रस्य भ्रमो प्यर्थः । सुतो विनिमयलभ्यं धनं परत्याशाने दौर्बल्ये च प्रतिष्टितम् । दुईनाः समाषस्य सारल्यै बाडोपारिकलामलोमे नानावश्यध्वस्तूनि निर्माय समावस्य सचिमपव्ययन्ति ।

चन्द्रमझोपतो; दयुगरस्तु सम्पाभ्योऽपहरति, पामयं तु वराकानश्चिनान अभद्रभागान, मन्नई विषग्यान, सिमान् सन्नानक्सादयति । अत एव प्रास्दैः स 'बा', 'माला' आदिक सम्बोध्यते। (२) व्यसनोपजीवी-परशा व्यसनेन कोन रित्या यो लामान्वितो भवति - यथा वाकोलो वैद्यश्च । शानं हि परेशां शर्मणे। यो सानं वित्रीमानो लोकस्य दिर लाभान्वितो धुभूपति सकिं ज्ञानोपासक ! " हित्वा कारनं राशि पांगुराशिनास सतु व्यापारी भगवत भाशिष शासानो भवन "नस मकः सबै वणि या शूल मारोप्यमाणात् परमहर मुमूर्षीय शत निक्षति विचार्यां स कोशः यो मत- कामादपि हत्त कामः'। नार्थाय नापि कामार्थमथ भूतदयां प्रति । वत्तते यश्चिकित्सायां स सर्वमतिवर्त्तते ॥ चरकः । एतादशास्तु राष्ट्रस्य गौरवम् । परमद्य कियन्तस्वादृशाः । अयस्खे चिकित्सा प्रथनं रुग्णन हि, तस्य धन दिक्षन्ते, सजीवतु प्रियता वा। (३) शुल्कोपजीवी-गृहशुल्केन शक्टशुल्केन जवाहनशुल्केन जीवति, शर्त सहन्न' या मानवाना नियतवेतनेन नियोग्य यन्त्रादीना परिचालनेन मार्थमुपातिकः । (४) पटका केवल वार्तावित उभयोपमोळा उभयार्थहरथ । (५) समानशीलस्य धनिनः पोध्यपुत्रोऽपद्दतहिरण्यस्य परिरक्षको लगुडी च । भय वये सर्वाभ्युदयाय कृतसकल्पाः समवेताः। सर्वेष सर्वस्मै सर्वस्मात् सर सर्वस्मनभि उदयः - सर्वाभ्युदयः। सर्वेषामेकालिन्युये न सन्तुलन सम्भाव्य समन्तादयोऽमाठमभीरः। स चाधिदैविकोनामाधिभौतिकीनामाध्यात्मिकोबार ।

नवमो निःश्वासः पुजवादस्य नवीना रचनास्तत्स्थाने समागता शुल्कशाला, सजश्यामा भक्ष्यशाला, पशु- पालनम्। महाविद्यालयात्राबासश्च केवलं धनेन विनिमेयानि जातानि, सदाऽतिधीनो सेवा, समाजस्य व्यवस्था, गवां संरक्षणम्, लोकहितसाधकानां साधूनां सपर्या च विलुप्ता सदा वत्पूत्यै भानमा पत्राणि गोशालाश्च स्थापितानि । परं तान्यपि उण्टितुकामः परिग्रही विचितुच्छ दानु प्रतिज्ञाय प्रविश्य भ्रंशयति। दुष्टदाम्भिकः शिष्टवेशमायोध्येव दृष्टता कत" शकः। अनायास जिहोगा चन्दनविन्दुमालामासिना नित्यं गदगा- लायिना प्रदर्शनवता च भवितव्यमेव । आमध्याह्ननदोवासः समाजे देवतार्चनम् । सदतं शुचिवेशश्चेत्येतद्दम्भस्य जीवितम् ।। नीलकण्ठः । अप च प्राप्ताधिकारी हि सार्थपरो झानविज्ञानयोधर्मस्य संस्कृतेधोपयोग खस्य, देवलं सस्य लाभाय करोति । पापो हि स्पर्शनापि पातयति। पुअवादस्यातिराय- भोपारमाखागताना दोषाणां फलमस्माभिभुज्यते, पूर्वजन्मनः कर्मणां फलमिव, मोश्यते रनिवृत्तः, पर भविष्यचीवनाथावधानताऽऽधेया, यतस्तस्य सम्पापिन तित। झं मधुमुखं विपं हरति जीवितं तत्क्षणाद् अपस्यमिदमाशितं व्यथयते विपाके यपुः । इदं घणगणावृतं विलमयो विधत्ते क्षणाद् यदत्र मलिनोल्वणे विणमर्जितं कर्मभिः॥ अगदरः। अधुना वयं सर्वस्य न केवल बहुमनस्यार्थसिद्धयेऽस्माम्माशी पद्धति प्रतिस्पर्नुि নম্বরঃ। এর বংগান, অবিন্দ ববলিগেন্ধমালি । पदन्युत्गदयित क्षेत्रे वप्तुः स्वामिता, तदनन्तरं समावस्य। पुरुस्वादस्य प्रिया पुत्री विन्दिता, प्रतिस्पर्धा प्रतियोगिता कापि न भवेत् पर परिपथों मवेत् । येन मानवाय ri तिकवलय समेधेत तदेवोपयोगि मन्येत । मानवमूल्य सामामि स्यात् । पश्य विनिमयस्य सामान्य साधनम् । पादनाम मुलभदा। सर्वत्र जीवनोपोनिसटूर्ना यो नि बतूनाश निषेधः स्वत्। मानवाप दाराची नमो गश्नम् तस्य च विसापा। नो नो नोयोन शेतकोन चन्द्रमहापतो सिद्धान्ततः सर्वाभ्युदयस्यान्तिमा स्थितिः शासनामोशः। नेयमराजस्वागन्य विभखलता, अपि तु सर्वेच्छया पानुसन्धान परसरोदये समाश्रिता व्यवस्थापना सारप्यापादनं चिकित्साविषयः, एवमनुशासनम्यवस्थापन शासनस्य विक्सः। तस्म व्यवस्थिते न मासनस्यावश्यकता सस्थाय चिकित्सकस्येव। बसन्ते पुराणपत्राव शानं खयमपेयात्। चिकित्सउच्च स एवाभिमतो वरीयान् यस्मारिदिने पुना रोगाविर्भाव एव न स्यात् । 'प्रयोगः शमयेद् व्याधिम्', 'शमये यो न कारयेत् । एवमेव शाधनमपि तदेव वरं यदनन्तरं शासनपद्धतेरावश्यस्तैव न स्यात्। नागरिक जीवने स विशेषः समागच्छेद् यदन्तरेण शासनं शासनानुसारि कार्य प्रवलेत् । पुचवादनाने- नावहिती लोक परपरस्माद् विमेति न च परस्परस्मिन् विश्वसिति, तदा मयापनोदनाम शासनस्यावश्यकता, तद्भये पेन्मानवमानसेभ्यः पलायेत, परस्परं विश्वासच जायेत तर घासनस्य कावश्यकता? सहयोगिनः ! दण्डहोनशासनस्य खच्छ व्यवस्थापनस्य प्राथमिकी प्रयोगशाला- ऽऽस्रोद् गृहस्यानमः। व्यक्त सुखसोकर्यादीनामुत्सर्गः समूहजीवनस्वाभ्यासो ग्रहस्या- श्रमस्य विशेषः। अयं व्यतः सार्याहुतये यज्ञशाला समतोत्पत्त्यै चारमः । मस्मि व यथाशक्ति थमो ययाव्ययमादानधासोत्। कचन कवनाधुनापि विलोक्यते- ऽस्य ध्वंसावशेषः। परं वयमधुना राष्ट्रमेव कुटुम्ब निर्माय गृहस्थस्य गृह विश्वस्यातिविशाला कर्तुं व्यवसिताः। इतिहासावलोध्नेन जानीमो यदियमतिथिशाला पामरमणत्या- ऽऽसीत्। सो गृहस्थो भोधनात्पूर्वमतिथि प्रत्यक्षत। "भुञ्जते ते त्वधं पापा ये पचन्त्यात्मकरणात्"। तस्य भोजन परस्मै, जोवनं च परस्मै अभूत् । “शश्व. परार्थसहः परार्थकान्तसम्भवः । भागवते ११।१८। परमधुनैपातिविशाला पुञ्जवाददावानलेन दाधा, यत्र तत्र तस्या भरमाणवोऽयना सुभेक्षणेनेक्ष्यन्ते । . गृहस्थाश्रमे कश्चन पुजवादप्रभावितो घूतः प्रतिद्वन्द्रिताया समधनोऽत्पनी खकीयाँ नियमेर प्रमाण्ड मन्यमानखस्य पालनायाधिकृतो विष्णुमानी समायर विर्य समाजव्यूहाधिमृत्य एकाकी विषयस्तो अठरांमत्रोऽपि विश्वामा स विश्वनि समानशीली धनिरामानावनुर्वनन्यानप्येवं कमलमत्। एवं कुटुम्बस्य कहना अतिपिशाला गोशाला पाठशाला गुस्फुलं यदा पुधवारप्रभावेण मम्नम् अय - नवमी निःश्वासः स्य नदीना रचनास्तस्थाने समागता शुल्कशाला, घनश्यामा भक्ष्यशाला, प. . महाविद्यालयस्यात्रावासश्च केवलं धनेन विनिमेयानि जातानि, यदाऽतिथीनां माजस्य व्यवस्था, गर्दा संरक्षणम्, लोकहितसाधकानां साधूनां पायर्या च विळता पूत्य साया सत्राणि गोशाला स्थापितानि । पर वन्यपि सुटिनुकामः विशित्तुच्छं दातु प्रतिज्ञाय प्रविश्य भ्रंशयति । दुष्टदाम्भिक शिश्वेदामायोग्यव त" शकः। अनायास जिहोणा चन्दनदिन्दुमालामासिना नित्य गदगा- प्रदर्शनवता व भवितव्यमेव । आमध्याह्नदोवासः समाजे देवतार्चनम् । सवतं शुचिवेशश्चेत्येतदम्भस्य जीवितम् ॥ नीलकण्ठः । प्रासाधिकारी हिसारो ज्ञानविज्ञानयोधर्मस्य संस्कृतेशोपयोग स्वाय, स्य लाभाय करोति। पापो हि सर्शनापि पातयति। पुजवादयातिशय- मासागताना दोषणा फलमामाभिर्भुज्यते, पूर्वजन्मनः कर्ममा फलामिक, भोयते परं भविष्यजीवनायावधानवाऽऽधेया, यतस्तस्य सम्पबापि न दिर्गत। इदं मधुमुसं विपं हरति जीवितं वत्क्षणाद् अपय्यमिदमाशितं व्यथयते विपाके यपुः । इदं रणगणार विलमयो विधत्ते क्षणाद् यदव मलिनोल्वर्ग विणमर्जितं कर्मभिः॥ गदरः। बिय सर्वस्य न केवल बहुइनस्वार्थसिदयेऽनाम्मा पति प्रदान उत्सादिकरण सत्वरधारनम्, भारिश्राम्यतः सवनिराकरणपारमानन्। समिक्षेत्रे वनुः स्वामिता, तदनन्दरं समारस्य। पुजवादस्य प्रिया पुरो प्रतिपर्धा, प्रतियोगिता कापिर मरे, परं परिभा भवेत् । न मनाय देशालय समेत तदेवोपगि मन्येता मावानूनं विवि रसात् । माप सामन्य साधनम् । पस्तूना मुलभता। सर्वत्र कौनोरोभिवान रविष्य बरवनाथ निषेधः सन्। मानवार धारा विनम् तस्य पनि धनी नमोनोप्पोन पोर । चन्द्रमहोपतो स्वैरीनच वैरिणी। अत्र यथाशक्ति श्रमो यथाव्ययमादान न्यायोपेतय वितरण पुषवादेन शके दुरुपयोगो लगुडना भयं भ्रशचार इति, सध्दो मिक्षा चौर्यमति प्रदोषाः समाजशरीरे ध्यामाः, एतत्सशिपातहरणाय सर्वाभ्युदयश्चन्द्रोदयः । सर्वभूतहिते रताः सांभ्युदयिनशानुतिसक्ताः कर्म कुर्वीरन् । अनुत्सेकः स विक्रमालङ्कारः। अद्वष्टा सर्वभूतानों मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी । श्रीमद्भगोताया कर्तृगां मनःसरस्सु काप्यराद्विचारसर' न तिठेत्, यद् बाह्यमानास्पदयात्। व परपरं साहाय्यमाचरिष्यामः, पर न कमप्यायिष्यामः। प्रतिदिन मैत्रीरया विश्वमेव मिनं करिष्यामः। निष्कामे गुस्तमे कर्मणि कतः केवल कर्म, फालमा पत्याश्चिद् व्यपि तु व्यापकस्याय्यकमगवतः । "पणा फलहेतवः।" अत एक जनताजनार्दनाय स्वेच्या कर्मफलपंगमरमा गाभ्युदयार्यनीतेः प्रमुराः सिमान्तः । पर पुदिना दोष उशादियालामं विना न कोडी कर्मणि प्रवर्तते साया সীকি ন স”। যা আগামী মানা কথা, ঈগল कारियो भावना व समागता पर साभावः पशना भावोन पुद्धिजीविना मानवारम् । भरमा जितान्तः पाभोवनाय जोवनम्, परान् भोजयितु भीमनम्, 'याशिनः सन्नी मुम्पन्न परिव' याय 'या देवासतिरगदानेषु। केवलायो भवति देती। केवटेन धर्मग बुदायमरणारगुकः । यानि जीयोन्यतामियं परमं सममः पदम ।। भागते । न सम्मान पान पायोनि दन् निशान इशित भाषम्। सोधिनी সম্মাননা হজযালিফেটৰ প্ৰকলমাখা গrd म् । “पर्नु मन प्यवस्पति व गुमाया"। संपा। मगमरमानुमरीमागमनिकाः । वात्मनः पुत्रान पायनरमाना किया। मा मध्ययनमा दुरवस्तम्, irrti मारमा परture नयमो निःश्वासः २७५ निरभिलापोऽपि। धावा वृक्षकोटरे जीवनं यायित्वापि लोकाय रत्नानि ददुः। विश्वविध्रुतो माकरणो महामुनिः पाणिनिः, काकामिनीकर्णभूषणायमानहीत्तिविश्वस्यैकमानं दार्शनिको प्यासः, अस्तिजगन्मृदितमलमायोऽतविचारः शङ्करच कमर्थ साधयिनु पर्यधाम्यन् ! राणा प्रतापः कामै सुखाय पासमघसन् ! महामनाः कस्मै लाभाय विश्वविद्यालय निर्माति १ महात्मा कास्य प्रान्तस्य राजा भविनु दण्डाघातान् सहते है कि मोहन भोग भोक्नु पवादारं कुरुते यवाहरः सहस्रशो घलिधीश हुतात्मानः कस्मै लाभाय इसन्तः शूलमारोहन्ति । एतत् भोग्नतमानवस्य पुरषोत्तमस्य वैशिष्ट्यम् । मम्वा,' परित्यग्य प्यापकायांय मतते, अनुक्त एवासिलं लोरमानन्दयति य । किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः कुमुद्रावबोधनम् । स्वभाव एवोत्तमचेतसा सतां परोपकारव्यसनं हि जीवितम् ।। एपाऽस्माकं परम्परा । खेलायामानन्दमनुभवन् बाली व्यायामगुणयुज्यत एव परमय स खभावो मानवेभ्योऽपगतः। अत एवैग्वधमताऽविय । पन मदोराहपत्तिष्ठत् । नदो प्रतिक्षणं निम्नाभिमुरा एवं परमी निम्नानामव. सस्तामनुभवतामभिमुखं भवेत् । “दरिन् भर कौन्तेय ! का प्रयच्छेवरे धनम्।" परमधुना मनुष्यस्वभावे विकृतिरापादिता पुभवादेन । मानवनिगुगः। (१)विवेकी, (२) भापावान ( ३ ) करवाया फोन्यता प्रमाणः सयौ मान्यस्मिन्नुत्पादनेऽस्ति । विवेकेन स सदावरच विचरपति, मनवे- रान् वायति हसति रोदिति। भाषासाभिप्राय इनान् धारपिया खननं प्रसग्दनि, माया रिपिताश वा स्वविचारं विश्वस्मिन् कलाये च प्रचारपति। भरणय याय लाना प्रत्यायः । मानवागुठः सवा अगुलीः राति। न स विहान र समर्थः। शरीरे हो जो ज्योतिशिलामा प्रतिनिधिः। दिशार मदने या प्रतिनिधमानवस्यैव सामन् । पारनलोविस्मिन्दोरदार एम अलगद प्रमुः परम मानवः पुमादेन प्रशासनमामिटार पुगे त्यात् परिस्थितिप्रतिरोऽभूत् । परमेश वितररन, भारत न्यु नपत्र । स्या रशन चौर प्रतिदिन प्रतिवेशिनो मान्न सहर नामा र प्रकिश्या दार दतं पदकापति सन्द दसम्माय पदका ર चन्द्रमहोपतो प्रचलति च । एकदा प्रबुद्धेन प्रतिवेशिना ज्ञातम् , हन्त । अयमस्माकं श्रमाजितां सम्पर चौरयन् स्वयमकृतश्रमोऽपि सानन्द सामन्तजीवनं यापयति । वयचानेन दण्डित नरकजीवनं जीवितुम्। अनेन लाशो मुदा अस्माकमपहृताः शतशो जनाथ विना मूल्य मृत्यतामुग्नीताः। दुष्टोऽयं कथमपि हृतं धनं प्रत्यावर्तयितुमसतो हन्तव्य एव । एष- आततायो। आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयनिति मनुः । एतदेव रकान्तमूलम् अतः समशीलानां धनिनामस्माकञ्च परिणाम एकदाऽवश्यम्भावी। अतो जोवनं सुरक्षितु- मिच्छद्भिः समयात्पूर्वमेव जागरितव्यं परेयां जीवनाय यतितव्यच । यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम् । अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥ भागरते ।।१४।८ । वस्तुतः परस्परविरोधस्य हेतुरेवायम् । यत्केवन भौतिकीमुक्षति खमुखमाधिको मत्वा प्रतिवेशिनो हिताहितमविचारयन्तः सङ्घर्षे आक्रोशे सन्नद्धाः सम्पत्सष्प्रहे मग्नाः । वस्तुतो य ईश्वरो विश्वमिदं निर्मायैनदविशत् स समग्रसम्पदा सहैव। अतः सा सम्पदी- वरस्यैव । यथा वायोः सूर्यस्याकाशस्य जलस्य भूमेथोपयोगोपभोगे वयं साधिकारा- स्तथैव तजानामन्यासामपि सम्पदा समुपयोगे क्यं सर्वे समानत्वेनाधिकृताः। परं पुजवादे. नैतद्वैषम्यमुदपादि। तनिराकरणमस्माकमुद्देश्यम् । नात्र कश्चन परोपजीवी स्यादपि तु परस्परोपजीवी । सर्वोऽत्र परस्य सौकर्याय प्रथमं चेष्टत जीवेच्च । परिश्रमो यत्र प्रतं भवेत् । सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेप योऽस्त्विष्टकामधुक्॥ 'सत् स्वास्थ्यम् आवश्यकं धनम्, ऐकमत्यंभ्रातृा, खच्छं सुपयः सम्पनं मधुपुरं महश, मुशीलः शिशुः, नोरोगिता, शीलरूपसम्पन्ना रमणी, अनपमान जीवनम्, सद्विचार तदनुसारिकर्मप्रभावश्च क्षेत्रे सदादाजीविका च मुकर्मणि ध्ययः इत्येव केवलं न सां- भौतिकी समुमतिः। अस्माकं सर्वाभ्युदयरय नेतादृशी दाऽऽधारशिला । : । विविधवाधा अङ्गीकृत्यापि मानवः शाधतमुखाभिला! पा। १ भावः मरास्वनुयनादयः।

नवमो निःश्वासः नियतं कुर स्तस्तदात्मसम्वन्धि सुखम् । नार्थ सम्बन्धि । हन्त । वयमय केवलं परिवराय भाग- नोपणे एव कृतकृत्यं मन्यामहे । योगस्थः कुरु कर्माणि सगं त्यत्वा धनञ्जय ! सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ योगः कर्मसु कौशलम्। बोक्ने सिद्धान्तानामनुष्टानं कला सैव योगा। धोना बकोयतेऽतो प्रतिष्टितः। अर्म च प्रतिटतम्। मन एव श्रमजीवी सन् जीवनी हितो विधमजीवी च गहत जोवन्नपि सततः। एता पुणादाय परम्परा । रमस्माभिःधमा प्रतिष्टाप्यः। कर्येव विमेऽधितो भवेन्नाहौ। धमम्प रियो मा विनश्यति तसाधनो धमनिष्टो भविष्यति। स्वेच्या धाम्पतो मनोविनोदः । पराम प्रहेण परचापेन व थाम्यतोऽजाता दण्ड । धनी पूर्वरिमन्नान पर बाटोमनुभवति । यय वाधामो यच्छमः पम्पतिर्भवेत् । सवें पता भिलार: । कुर फर्म त्वं कर्म ज्यायो घमणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्दकर्मगः।। गीता सर्वाभ्युश्यसमाजय सप्रेमत्येन पवादित। बामदार पासने रिलाय- सर रयायित्वसम्पादने पो म सोराया सापयितुं सपा मार या विरोधाविसमसमयो सोसेसामनारा परी उगने प्रति पापोनडामा साधनको प्रसभविष गरननपरेम। रिम समाने दाता न च भिवः। स सर्वनामराव सप र NEERI पोहानिरपेक्ष सsa रिमिला निरनिको मुरेमा । फर्म पुटियुक्ता हितं यया मनोनिः । जन्मसन्धयिनिर्मुकः परं गचन्दनामयम् । IT मायेन किमारो । दिने परिसर माग दमन गईमा किन उ संगरदारा सिर घय समय समय २७८ चन्दमहीपतो अतोऽस्माभिनिष्कमभावनास्मिन् योकम्यम् । एवं कुलता विश्वमरमा सहयोग "खयमेव हि बातोऽग्नेःसारस्य प्रतिपद्यते"। मम मानसे भावनास्ति यत् प्रत्येको प्रामो नागरिककृत्रिमताविरहित एककुटुम्- वद् व्यवस्थितः सरस्वती विहारभूमिनिर्मलेन ज्ञानालोकेन साभाविकेन सौन्दर्येण विकसि पुष्पोपवनसमृद्धो धान्यपूर्गकुसूलो गोदुग्धधाराभिरभिषिको नवनौतनवीनाभन विद्युत्प्रभविद्वद्वालः स्वर्गतुल्यो दीप्येत। मुखसलिला नद्यः सर्वतः प्रसूता रा पयाच देशं पोषयेयुः। उदासि सरांसि हंसकलरवैमनो मोदयेयुः। प्रत्येकं गृह मुल्लासेन वीणाविरावेण वालाना काकल्या च मुखरितं भवेत्। नाकालमृत्युः स्वाद पितर स्थिते नात्म जनिधनं न च विधवावक्लव्यं वापि भवेत् । सर्वः स्वस्वधर्मे कर्मणि च स्थितः परस्परेण सह युञ्जोत । वस्तुतो यतोऽभ्युदयो निःश्रेयससिद्धिश्च स धर्म दुर्भिक्षस्य कयैव न श्रूयेत। न विग्रहो न चौर्य न व्यभिचारो न च लोकव्यवस्था पकाना सैनिकानामावश्यकता भवेत्। जनानां सुपुष्टं मस्तिष्क नदावि काराय सज्ज तिठेत्। समाजस्य सेवा, धारणा, वृद्धिः, समृद्धिः सर्वाभ्युदये व्यवस्थिता स्यात् । बुद्धिवलाः शरीरबलाश्चात्र समानाः, सर्वत्रोद्योगशीलताया वृद्धिः, समृद्धता च देशे न तु व्यकी। सामाजिकविषमताना शोषणस्य च विनाशः। उत्पादनधोपयोगाय। प्रामाणामवस्यानं पञ्चसहस्रजनसङ्ख्यातो नाधिकं भवेत्, यत्र सर्वे परस्परं खानीयुः । प्रामीणाः सावश्यकतानुसारि सबै खयमुत्पादयेयुः। क्रयस्यावश्यकतव न भवेत् एषु ग्रामेषु एकाऽन्नविपपिरेका वासोविपणिरेका चोपयुज्यमानवस्तु. विणिः, बालानां प्रौढानां महिलानाथ कृवे निःशुल्का नवीनसाधनसम्पमा पाठशाला पारोम्यशाला, उपयोगिपुस्तकान्वित आकाशवाणियुक्तो वाचनालयः, विविधविश्य- प्रदर्शकपट्ट मनोरञ्जनव्यायामादिव्यवस्थं वनोद्यानच सर्वाभ्युदयेन सन्चालित तिष्ठेत् । न कश्चनानधरस्तिष्ठेत्। रुग्ण आरोग्यशालायामेव चिकित्सितो भवेत्। भारोम्याध्यक्षः हस्मिंश्चिन्मृतेऽनाप्तदश्चमीके तस्य विवरणाय प्रव्योक्षमोत्तरो दण्डभाक, चौय चारक्षक पर पतनविरसेप्यसारेपु श्रीविकारेप्वयुद्धेषु सर्वाभ्युदये च व्यवस्थिते न चौर्य सम्भाव्यते। व्यवस्थायै न परेषामावश्यकता, प्राम्याः स्वयं व्यवस्थापयेरन् । प्रामाद् पहिर्यन्धाणाम वस्थितिभवेत्। यत्राहोरात्रस्य तृतीयांशे कार्य भवेदशवर्षाणि यावत्, ततचतुर्था । खया वा।

नवमा निःश्वासः २७६ शिक्षालयेष्वध्यापन सायं प्रातद्विर्भवेच्छिल्पशिक्षणध । अध्ययनायाध्यापनाय शिल्प- शिक्षणाय मनोरञ्जनशारीरक्रियायै चाहोरात्रपञ्चमांशः। शयनकालवाहोरात्रस्य तृतीयांश भाद्यायां शेषासु च चतुर्थाशः। प्रवेशसमये मूलप्रवृत्तिविभागे मासं छात्र आवास्यः । उनुमोदनानुसारं विभागे प्रवेशो भवेत् । कक्षास्तिस्रः । आदायाँ वर्षषट्कम् । मध्यमायाच वर्षत्रयम्। उत्तमायो वर्षद्वयम् । विभागीयाचार्यपरीक्षा प्रविविशुवर्षभेकमधीत्य योग्यता- परीक्षा प्रविष्टः प्रतिशत प्रापयधिकाङ्कः प्रवेष्टुमधिकृतः। तस्यां वर्षच नृष्टयम् । प्रति- प्राममायकक्षायाः पाठ्याला जनरदे च मध्यमाया जनपदच्छात्रावासश्च । भयादों व्ययो जनपदधाभ्युदयसमाजेन देयोऽर्द्धवाभिभावकेन । भागीयनगरेपूसमावष्यध्यापन मवेत्। छात्रावासच पूर्ववत् । एतेऽधीयानाः शासनां कुर्युः। केन्द्रनगरे व विभागीयाचार्यपरीक्षायै महाविद्यालयछात्रावासथ। छात्रावासव्ययश्व केन्द्रण सोढव्यः । अध्यापकेभ्यः सपरिचर आवासः सर्वायुदयसमाजेन देयो वेतनश्च । भारतस्य चत्वारो भागाः स्युः। पूर्वनगरम्, दक्षिणनगरम्, पश्चिमनगरम, उत्तर- नगरमितिभागीयनगाणि । केन्दध केवल शासनपरः प्रदेशरहितस्तिष्ठेत् । केन्दनगरे प्रजाया वसतिन स्यात् । अधिकारिणां गृहाणि, पोचविद्यालयः, साथ- चिकित्सालयः, विभागानां कार्यालयाः, पुरातत्त्वविभागोऽनुसन्धान विभागः, राजदूतावासाः, सेनासनिवेशः, अतिधिनिवासः समाजेन व्यवस्थापिता विश्णयो भोजनालयय स्युः। पर- विशतिवपाः पुमान स्त्री च मन्तव्यं प्रकाशयितु निर्वाच्यता प्राप्तु चशानुयात् । समरिमन राधे एका लिपिः संस्कृता व भाषा स्यात् । एषु भागेष्वेग्लनिर्वाचनः प्रदेशो जनपदशब्देन योद्धव्यः। प्रतिजनपदं सर्वाभ्युस्यसमात्रस्य सम्प्रपनं प्रामसर्वाभ्युदय- समयसापेक्षं भवेत् । उपसहनिर्वाचका प्रामगणे नियुः। स च खक्षेने पथगणान् स्वेच्च्या निव यात्। गणेशशतभासमानं प्राप्य वन्मयत एवं धनपदग्गेश मन्त्रिण निकर कार्य प्रचात्यैत । सर्वत्र तृतीयभागस्य निर्वचनं वापिस भवेत्। अधिकारिणाय योपटासापेक्षम् । गणेशे या योग्यता द्यावकारः प्रतिरादित साविशेषयोपेत ए प्रशाभिनिर्वाच्यः। मुमुसः-सर्वदा प्रसनमुः। एकदन्त:-स्मिते निस्तकान्तो मन्दस्मितः। केनाधिपतेन विरमदो गम्भीरः।

। २८० चन्द्रमहीपतो कपिल:- कपीनपि लाति-आदत्ते - गृहाति-कार्येषु योजयति सः = अयोग्यपुरष- नपि कार्यप्रवर्तनार्हान् कर्तु निपुणः इति मावः। अथवा साठ स्याचार्यः कपिल इवाना- सक्तः, कर्म कुर्वाणोऽपि निलिप्तः । गजकर्णः - सूक्ष्मतमधावी। तेन प्रदेशभवर्मणां सौदम्येण श्रोता। लम्बोदरः अत्रोदरशब्दो न पाकस्थल्यानवोदरगुहाया वाचकः अपि तु मध्यमानस्या प्रदेशवृत्तं श्रुत्वाप्यधुन्धः। अविकारिवृत्तं केनाप्यविज्ञातं तिष्टे देवसरोपयोगाय । विकट:- कर्तव्ये निष्पक्षो दृटवती। न यत्र प्रेम्णो वरस्य वा प्रभावस्तिठेत् । विघ्ननाशः-प्रान्तहितव्याघातकानां तत्त्वानां नाशकः । विनायकः = सर्वाभ्युदये न कोऽपि नायकः सर्वेषां समानाधिकारत्वात् , व्यवहार- प्रचलनाय नियमनाय च तस्यावश्यकतास्त्येव । अतोन नायको नचानायक, अपि तु विलक्षणो नायकः। अहम्भावे विगतनायकत्वाभिमानः कार्य च विशिष्टः इति वा । धूमकेतुः-आकाशे उत्पातविशेषद्योतक नक्षत्रम्। तन्न कस्यापि दुःखदत प तस्य दर्शनाजना विभ्यति, भवन्ति चातहिताः। तद्वदेने सर्व पा भवेयुर्यद्यप्यसौ न कस्यापि दुःखदः । गणाध्यक्ष:- खगणानां कर्मणामधीक्षकः । येन कर्मकरेषु शैथिल्यमुत्कोच पक्षपातो वा नोपेयात्। भालचन्द्रः-भालश्चन्द्र इव (आहादकः ) यस्य सः तेजस्विशान्तमुखमण्डलः । गजाननः- गम्भीरमुखमुदः। वस्तुलात निवेद्य न कोऽपि निवेदको निवेदनस्य भावं ज्ञातु प्रभवेत्। अस्माकं राने सर्वत्रेतादृशा गणेशा भासन् । कार्यारम्भे निविन परिसमापनायै सत्तार एवेपामावश्यक मासीत् । अत एदेष शिवस्य-कल्याणस्य पुत्रः-पलम् । परमधुना साम्राज्यवादपुजवादमधुना बीतविवेके जगति तादृशपुस्यरत्नानामुत्पतिरेव विमा। पर गतानुगतिका मुग्धा गणेश नाम्नैव पूजयन्ति ससस्ते तस्य रेसामिव । नियने प्रचारिण आजीवनं निर्वचने निर्वाचने व नाधिकृताः स्युः। प्रशाः काना स्वेच्छया सानुरोध नित्र युरयमस्माकं प्रतिनिधिः। तेषां बहुत्वे सादाचितले साशवाः सम्प्रान्ता 4.

२८१ हाचिरके पत्रगणना भवेन्नान्यथा। एवं परस्परं परिचिन्वन्तोऽभयं दास्यन्ति मतम्, रे मत केतु शश्यम्, न च लगुडिनां भयादश्रेष्ठोऽयोग्यो निर्वत शक्यते । जनपदसर्वाभ्युदयसमाजस्यैकवर्षानुभवः षष्टांशस्तेनैव निरुतो भागीयसर्वाभ्युदय- स्मा प्रतिनिधित्वेन गच्छेत् । तन्मध्यतो भागपालस्य मन्त्रिणव निर्वचनं भवेत्। मन्त्री च भागपालेनामन्य राष्ट्रियवरिष्ठसमाजेन च विमृश्य विभिन्नपदेषु मन्त्रिणो नियुधीत । भागस्यैकसूत्रतापादनाय सर्वोचसर्वाभ्युदयसमाजकार्य साहाय्याय च यतेत । छलावमेचनादिव्यवस्था सुगमा साधारणव्ययाच दुर्वीत । भागीयसांभ्युदयसमाजस्य द्विवर्षानुभवो दशमोऽशः सर्वोच्चसर्वाभ्युदयसमाज पाल्प्य तन्मध्यतो वरिष्टसमाजमेकत्रिंशज्जनाना प्रकल्पयेत्। तन्मध्यत एव भागीय- समाजसदस्यानां सर्वथा बहुमतेन वरिष्ठसमाजस्यैकमत्येन च राशो मन्त्रिणश्च निर्वचनं मके। मन्त्री च राज्ञाऽऽमन्व्य विभागीयमन्त्रिणो नियुञ्जीत। सर्वोचपाभ्युदय- समाजो वरिष्टनमाजेन राष्ट्रस्य सर्वकार्यसम्पादने साधिकारस्तिठेत् । निम्नतमकर्मचारिणो वेतनात्साई चेतनं गणेशस्य, तस्मात्साई जनपदमन्त्रिणः, तस्मात्साई' जनपदगणेशस्य, तस्मात् साई भागीयमन्त्रिणः, तस्मात्सार्द्ध भागपालस्य खोचमाभ्युदयसमाजमन्त्रिणाच, तस्मात्साई प्रधानमन्त्रिणः, तस्मात्साई च राज्ञः । एभ्यः सपरिच्छद भावासो राष्ट्रण देयो यानछ। कर्मकरा आपटेर्वयसः समाजसेवा कुर्वन्तोऽवकाशकाले यावर्प तावन्मासं वेतनं लभेरन् । निरन्तरं पञ्चवर्ष कृषका क्षेत्रस्य, नियतं शरदो दशकं शुल्केन गृहावासिनो गृहस्य च स्वतः खामिनः स्युः, एककालं दशवर्षाणां शुल्कदातारश्चापि। यन्नेषु विपणिषु निरन्तरं दशवर्षाणि कर्म कुर्वाणाः खतो मागमाजः स्युः। सर्वत्र कर्मकराणां भोजनाच्छादनं जीवनस्तरश्चाधिपतिसमः स्यात् । सर्वोचसर्वाभ्युदयधमाजानुसारिप्रणाल्या आचरन् भागीयसर्वाभ्युदयसमाजो मुद्राम् । शिक्षाम् , सामरिकीम् , शासनव्यवस्थाम् , यातायातव्यवस्थामन्याच सर्वभागसम्बन्धिनी व्यवस्था विहाय सर्वकार्ये स्वतन्त्रः। ध एवं सक्षेत्रे योग्यान् कर्मकराशियुद्धीत सवादीत। करस्य पटांशध राष्ट्रियसमाजाय दद्यात्। जगदवतां भवतां सहयो- गेन दशभिरतल्लन्धुं शक्यते । क दुरादनं तेषो पुंसामुदाम पेतसाम् ।" भागवते । व कृतेऽस्माकं राष्ट्रमधुनापि सर्वस्यानुकरणीयमेव ।

२८२
चन्द्रमहीपतो
नात्युमशिसरो मेरुनातिनीचं रसातलम् ।
व्यवसायद्वितीयानां नाप्यपारो महोदधिः॥
स चायमायो विचारः। स्था श्रीमद्भागरते नुणो विशलक्षणति ।
भगवान् प्यास:-
अन्नाधादेः संविभागो भूतेभ्यध यथाईतः ।
तेध्यात्मदेवतायुद्धिः मुतरां पु पाण्डय ! ॥७॥११३१०
माय नमः सम्प्रशयो वादोवा किन्वरमा पूर्वजाना प्रणाली, मानरमायः सह
सभावः। सभ्युदयिना विचारेऽप्यनाग्रहबदा भवितव्यम् । रामहो नि
पादरुस्तमगाहते। यो हिंसाप्रधानत्वाइधर्मः। विचारमापौरोयो पुलंदापम्
विवारप शानस्य न कश्चन निर्माता, केवलमभिम्याक एव । अत एर शानमाराम
पौरोयत्वम् । कपरपरया भूयमागताय तो श्रुतिः ।
अस्मिन् कायें समानां प्रारम्मिः सहयोग भाधारशिलेव मरियति। भाधारशित
र कोई पति, परमति केवलं गगनपिन सौधम् । परल्यापारी बनानीको
दिगिम्यो मारिः। अनागतात्या धर्म वक्त श्रेष्टा बुद्धितिधारयते। मता
शरीर पहेंगा मिमगाहमाना मालाः थमेग सह बीजमपि विनासन्ति । -
थामा धनम् इव परम्। सोनाममलोयनग मामा मोतिः।
अम्मान कलमानलमाइताना ये प्रगाउमुसलेपदानय ।
ग्नेदं विमुच्य महमासळतां प्रयालि ये वापीडनयशान वयं तिलाने।
तो व सरनिया बुरा अंग १ युक्ता प्रतिमा गाय मारयो ।
मादेश्यने हि योदयं नामानि मदोलाम। पिaser
ध्या तातरम्। यया यदा ति भवन
এ প্রসগাে প্রশে গে fষয় নয়াগামগঞ্জ
नो नाम प्रार्ष प्रभामा
Exci मायामय मान प्रमाण
दिम बान। मामामा artaran

नवमो निःश्वास इतिहासो विशदोज्ज्वल उत्साहवर्द्धकः । कर्तव्यारूढा भनेके मानवा अविचलिता मृत्यु सहर्षमालिङ्गय विधुशेखरस्याङ्गरागतामुपगताः। सर्वा भूमिदतोऽप्यविचलिताः । सत्यम्:-- कियती पञ्चसहस्री कियती लक्षाएि कोटिरपि कियती । औदार्योन्नतमनसा रत्नवती वसुमती कियतो ।। येषां नाम स्मरन्तो वयं धन्याः। येषां कीर्तिगीति गायन्तश्चारणा राष्ट्र राष्ट्रम्, नगर नगरम् प्रामं प्रामम्, वनं धनं मुखरयन्तः शाब्दिक कीत्तिस्तम्भमुच्छायमन्ति । येका महिम्ना वयं मूर्धानं साभिमानमुच्चैः कर्तुं शताः । “अपि स्वदेहाकिमुतेन्द्रियादि यशोधनाना हि यशो गरीयः" । अस्माकमयं प्राचीनो निधिर्महाः पवित्रथ। दिदमतोतं गौरवं पश्यभिस्तस्याशुष्णमर्यादाय यतितव्यम् । व्यसायात्मिका युद्धिरेकेह कुरुनन्दन ! बहुशाखा हनन्ताश्च युद्धयोऽव्ययसायिनाम् ।। पुद्धियुक्तो जहातीह उभे मुकृतदुष्कृते । तस्माद् योगाय युझ्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।। नास्ति वुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः मुखम् ।। एतत्वामान्य रेखाचित्रं मम शस्यमाशस्य धीमता समशमशास्थापि, परतय समये समाधाः राम्मित्य वैशासनाधिकाधिकमुपयोगिनो नियमान् विधान्ति। भरमार्दः जवादमपाल्या विधमुख विचारित मवेद, परमनमा दुःसम् , दारिम, कलदः, भय अधिक भागच्छन्तु वयं प्रगतिविरोधिनामानन्दशत्रूणा यह विकृष्य विच प्रकारयामः। उमामहीनःप्रस्ताव परवध भौचरणाप्रमाणम् । उचिउत जाप्रत प्राप्प दरान् निबोधत । पुनश्य, अरमा राज्यमयान्तं पुलझमागठमासीद, विरदेव रिहनि प्रोग्य मोस्य न्यासं लोकाय प्रत्यय प्रसोदामिदमाम्। सम्मास्ते देवर मां भ्रान्त मन्दरन. परम भ्रमः सत्यस्य राशिरानन्दस्य सिंधिया २८४ चन्द्रमहीपतो एतस्मिन् प्राचीनाचितेऽपि नवीनवद् मासमाने भुवनमान्ये पथि विचरता कदा स्खलनमपिचेद् विश्वसिमि यभगवानस्मान् सयंरक्षिष्यति। चलनमारममाणःशिशुमंत्र पेशितोऽप्यन्वीक्षित एव सा सदा त पतनाद्वायत्येव। बाप्रशायां रक्षायै सावधान- यद्यप्यक्रिश्चित्करं तन्, परं खने यस्य शकौ विधमन्तो बीवानः सोऽस्मान् रक्षिष्यति । विश्वस्य यः स्थितिलयोद्भवहेतुराद्यो योगेश्वरैरपि दुरत्यययोगमायः। क्षेमं विधास्यति स नो भगस्त्रियघोशत्तत्रास्मदीयविमृशेन कियानिहार्थ जीर्णा तरिः सरिदियं च गभीरनीरा नकाकुला वहति वायुरविप्रचण्डः । तार्याः स्त्रियश्च शिशवश्च तथैव वृद्धास्तत्कर्णधारभुजयोलमाश्रयामः ।। "सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु, सह वोर्य करवायहै, तेजस्वि नावधीतमस्तु, मा विद्विषावहै ।" 'सङ्गच्छध्वम, संवदध्यम, सं वो मनांसि जानताम् ।' 'मा मा प्रापत् प्रतीचिका' सुपारथिरवानिव यन्मनुष्याने नीयतेऽभोमिवाजिन इव । हत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्टं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।।१।। ये ते पन्थाः सवितः पूर्व्यासोऽरेणयः सुकृता अन्तरीक्षे। तेभिर्नो अद्य पथिभिः सुगेभी रक्षा च नो अधि च हि देव ॥२॥ यत् -मनो मनुष्याने नीयते - अत्यर्थमितस्ततो नयति। मनप्रेरिता एवं प्राणिनः प्रवर्तन्ते । मनुष्यशदा प्राणिमात्रोपलक्षः। सुमारथिः योभनो यन्ता यथा अमोशुभिः प्रप्रदेरवान्नेनीयते, रश्मिभिनयति नियच्छति । एवं मनोऽपि मानवान् प्रार्तयति नियच्छति च। यच्च मनः हृत्प्रतिष्टम् - हृदि प्रतिष्ठा यस्य सन्। यच्च मनः, अभिगम् - जरारहितम्, मालवस्थविरेप मनसः समानावस्थता। यच्च चविष्टम् - अतिवयवद्वेगान, तन्मे मनः शिवसहल्यम् , शिवः-कल्याणपूर्णः सङ्कल्सो यस्य तारामतु ॥१॥ हे सवितः 1 देव ! जगतःप्रवाधिष्टातः तेजोऽपिटातश्च । ये ते पन्या पन्यानो-- माग अन्तरिक्षे मुस्ताः साधुरताः वर्तन्ते। कोदशारदे ? यांसः-पूर्व कालेषु भवः याः। अरेणवः नास्ति रेणुपत्र - अमुलाः, तेभिः-तैः पथिभिः-मागैरस्मान्नय। -

नामो निभासः
२८५
भग एष भगवा आत देयाम्तेन पयं भगपन्तः म्याम ।
मरवा मग मनोयोनि म नो मग पुर पता भवेद ॥३॥
प्रमगरको स्वमाय गन्ना सूपाय योधि मन प जिन्य ।
विदुमयपनि देपा वृक्षादेग पिश्य मुयोर: ||
बायतु विभप र प्रमोदता यायन्तु भूनानि शिर्ष मियो धिया।
मना भदं भजनालो आश्यमा नो मतिरप्यांतुकी।
হিমা নাস; ঘামেনিনো মল মুনা:
रोगप्रयान्नु शान्ति मयंत्र गुग्गी भवन लीकः ।।
परम शरदः शनमा जीवेग शरदः शतम ।
नन्दाम शरदः शतम, गोदाम शरदः शतम् ।
-
पुरमान पलप पिपि भभि भागीय माहिएते मदीया इति ।
Rat-पदिय पदरमा हित पध्यम तत् । किम्भूतः पथभिः । मुगेभिः
मुगः। युमेन गया येत ते से प्रभूनामाः। व्याधिविरहितः ॥२॥
-साना मग एक भगवानानु। भगः- ऐश्वर्यम्। "मधीकाम-
मादाम्पीयन" र "वर्यस्य पमतस्य धर्मस्य यशरः श्रियः ।
नाराययोरपन्या मातोरणा " सेन भगेन श्यं भगवन्तः - समस्तैश्वर्यसम्पहाः
स्वाम। हे भग! १- एक जना, प्रमिका-या जोहवीति पुनः
पुरतिशत भादयति रिदये। हे भग 1 विवादितवीर्य समिदना-अरमा
पिपुर एता-भप्रयापी गर। अपेपरो भूदा सर्वकार्याणि साधय ॥३॥
देवनगरले समय जातो यन्ता-नियन्ता । एजाय -आमदुलपय साधु-
वनस्य (मणि पटी) सूक्तं बोषि-युध्यत । भस्मयुफा सुतिरता शायतामिति
भाषः। तनयम प्रिन-भरमसत्यानि प्रोणीहि, त्वत्प्रसादादेवा पद्दम् -कल्याण.
मन्ति - पालयन्ति तर विधम्याम् भद्रमामाकमस्तु । किय गुतीय कल्यापपुत्राः
धन्वो वयं विदधे-
यमातिम्, वदेम-दीयतां मुग्यतामित्याद्यचारयेम ॥४॥

२८६ चन्द्रमहोपतो भवाम शरदः शतम, शृणवाम शरदः शतम् । प्रनयाम शरदः शतम् अजिताः स्याम शरदः शतम् ॥ तत्तिरीयारण तस्य मुखहिमवतो निर्गच्छन्ती हितमितं च्योतन्ती मन्दमरो शब्दनि घटोसप्तकमविरलभावेन श्रावकान् वचनामृतेनाप्लान्य व्यरमत्। रूपी गुर्वर्धगम्य स्थिरतडिल्लेखाभाखरां सरसा सुवर्णा लोदयश्रेयस्करीमार्यहृद्यां नानापुराणनिगमा सम्मतो क्वचिदन्यतश्चाप्युपलब्धां विधूतान्तवान्तां वाचमाकर्ण्य साधुवादस्य गगनव्या हर्पघोपेण सह प्रस्तावानुमोदनपुरस्सरं खखराज्यमहमहमिळया सर्वाभ्युदयाय स्वीच बचश्चमत्कारप्रभाषितं प्रसन्नमानसं नरेन्द्रमण्डलम् । * प्रा उद्योपितो निर्वचनसमयः सम्प्राप्तः। गृहेषु सबुद्धयः सङ्घीभूय शान्तये शासनसामर्थ्य समाजप्रचालनयोग्यताच विचार्य खप्रतिनिधीन् निश्चिच्युः । गणेशानां निर्वचनं समस्ते भारते शान्त्या प्रेरणा सौहार्दन जातम् । निरुत श्वापरदिने दर्भपाणयः प्राधमुखाः प्रातर्देशम्य भूत्यै प्रतिजगिरे। तस्माजनपदसमः गत्वा समाज व्यवस्थापयामासुः, तस्माच गता भागीयसमाज ततश्च राष्ट्रियसमाज एवं विना व्यर्ष सर्वत्र निर्वचनमभूत् । राष्ट्रियसमाजश्च देशस्य सवा व्यवस्था सम्पादयित खमध्यत एकत्रिंशन्मानवानां वरिष्टसभा निरुवाच । सबहुमानं सर्वैरागृहीतो गुणगा यान्नियोजितश्शक्तिधरो मन्त्रिस्वे, जातश्चायं चन्द्रो महीपतिः पट्टरशी कमला व यहिका गजला गीतिन्दवाद्येन सहायत- अम्बिका भवतु प्रसन्ना राशि चन्द्र भूपती (स्थायी) मारमिय यं योक्ष्य वध्यो जालमार्गकृतेक्षणाः विस्मृतालङ्कारवस्त्रा मूञ्छिताः पतिताः क्षिती ॥१॥ यस्य यलबका ममत्रोटिनो भृशदुःसहम् । धृत्वा मृतं विज्ञाय दग्धाः शनुकामिन्यश्चिती ॥२॥ यम्य धिषणा नीतिनिपुणां वीक्ष्य नोविविचक्षणः। तत्यजे गर्यो मनीषिभिरादितः स्वस्या मती ||३|| - नवमो निःश्वासः २८७ रामवद्राज्य प्रशासद् द्वीपणान् दमयन् दृढम् । श्रीनिवासं शं नमन् सम्पुष्पितं भवतान् क्षितौ ॥४॥ निश्वास एप नवमो गतश्चन्द्रमहीपतो। तौहिने नलिनोपत्रे जगत्पत्रे विलासिनि ॥१॥ निरर्थकपदान्यासे मञ्चलङ्कारशोभिनि । निधिते श्रीनिवासेन पण्डितेन्द्राञ्जनिम्जुपा १२॥ सगन्धः । कमला तरुणबुधानां कान्त्या हरतां कदापि नो चेतः । किन्तु समाहितशास्त्रं मानसमधिवसतु हंसीय ॥३॥ न्यासि कचन कवन प्रोत्य विदुषां मया नु काठिन्यम् । नीरजमृदुला तन्वी, कुचयोः कठिनैव सम्भाति ॥ किमिह कृतं प्रत्यय सकटाक्षं भापिणो बुधा बहवः । किन्तु समाजे विदुषां विरलाः प्रतिभान्ति करिः ।।५।। म्वकाङ्कन्दुः (१९६१) मितेऽन्दे ज्येष्ठ शुक्ले रवी दिवसे । एकादश्यामेप प्रारम्भि श्रीनिवासेन ॥६॥ ताताइविपद्मयुगले सम्पोताशेपशास्त्रमकरन्दः । परमश्छानविनोदी प्रत्यवसितगुरुकुलफ्लेशः ॥७॥ विद्वन्मण्डलकोर्तितकोतिः प्रेम्णा मुदे कवीशानाम् । धावणकृष्णतृतीयारविदिवसे ऽपूरयत्स इमम् (८t रविदिनविहितारम्भो, रविदिनपूर्णो मनोहरन्यासः सुखये कवी विरायासी चन्द्रः पञ्चसप्ताहः ।।

२८८ चन्द्रमहीपतो यस्यामिजनो लाम्बी ह्यधिवसता राजदुर्गमक्लेशम् । चक्रे विशे वयसि लिये भूत्यै च कीत्य वा ॥१०॥ विद्वद्वीक्ष्य उपास्य आस्यरचने रस्यः प्रशस्यः समः सल्लोकव्यवहारशास्त्रविधिभिः सम्पूरिताभ्यन्तरः। रम्यश्चन्द्रमहीपतिः सुकृतिभिः सेव्यः सुखाकादिभि- विन्यस्तः कमलानिवासकविना हृद्योऽनवद्यश्चिरम् ॥११॥ वित्तो व्याकरणेषु काव्यनिपुणः पौराणिकप्वग्रणी- गण्यो दर्शनवेदिनां व्यवहृतो सम्प्राप्तसम्पाटवः । आयुज्योतिरधीतिनां सुकुशलो विज्ञानविज्ञो प्रती राष्ट्राचारविदां वरो वरमतिः स्पृश्यादिदं पुस्तकम् ।।१२।। वेदेन्द्वध्रविलोचनेड (२०१४) नुसमयं संस्कृत्य पौषेऽल्पशः काझ्यश्चन्द्रमहीपतिर्मतिमतां मोदाय मुद्रापितः । यस्या निर्भरसेवया बहुविधे व्यस्तेन कार्यक्रमे स्तोम्यम्यां व पतञ्जलेस्तनुमती सेवा क्षमा पार्वतीम् ।।१३।। पशुरिश नमान - पार्वतीविवृतावुद्ध तेतराणामप्रसिद्धानां शब्दानां कोषः पर कूड़ा पेया अनुपानम् क पुष्पाङ्किताः शन्दा नवनिर्मिताः उपबई - मसंड धिमा पूर्व उदन्यन् = पिपासुः उत्कोच-रिश्वत गुण्ठन-घट उष्णोषिका-टोपी, पगड़ी एकेलि-अठखेली एषमः- इस वर्ष ( ऐसकै) चूणन पाउडर और्ण- ऊनी हंसन्ती-दिवाल की सिगढ़ी रस्तारकिहिणी-मालरी की घण्टी कणहत्य-आतृप्ति मजपा-तिजोरी *कञ्चुकोश-जेबका धन ढक-सेर से अधिक *करकर्पट रुमाल बहार भोजन *करवासः भियोगः-मुकद्दमे की सुनवाई के विना कविका-घोड़ेके मुंह का कड़ा न परिणाम करटो -गजः का बनके छाणे कशेरुका-पृष्टास्थि त्य -प्रसवकष्ट करोटि:-शिरोस्थि स-कम्पार्टमेन्ट कारण्डवः-पक्षिभेद क्षणितरणिः-अगनवोट कान्दविका-कन्दोई, मिठाईवाले -बाग -महिषः --भइसे एक दिन में जाने योग्य मार्ग कासार:- नि-अचकन कीकसम् -अस्थि प्रसवव्यथा कुणिन्दा वन्यजातिः यो *कुचमादी-कुचाना स्तन्यं पीत्वा माधति साफा स:-बाला। -उतावली -वळकर कासरः- वृणिः न (२६० ) कृष्णाप-सिजाब फेर:-विकृतनेत्रः (ऍचा) निशान्तम्-गृहम् *केशनिर्मीकमोचो-यालकी साल सोचने निवेशक:- तम्बू गाने वाले याला निथ्यः-याण्डाल कोरेयाः-या निन्धः-आग्रह क्षीरस्यन् - दूध पीने की इच्छा से नीविः-अपी नीशार - रमाई-सोर गुफालारगम्-पाजेव नेमाकान्त-आधे दयाये हुए गोफणा-गोरिया नैकटिका-भ: गंगाधरररा:-धतिमाररोयकोपया प घ परारि-गतवर्ष “पवित्र-सिनेमा पो-टिरामली, छोटा गारदाणी। *पक्षोटा-पोकेट परिवरण-भीमटा, प्रम परिरक-पालिग *अमेरपिया हेमनयम जीव वनौषधम्। पनराश्या-बलाटाभरण-मांगी। वानरः-चन्दः ज्योतिलाध-रंगशष्टाई पत्ररथ-पशी विधाम-पेमेaafst म दाटमर-बिगारमय परमोती- 1 दम पर बनेको - ( २६१ ) प्रवात-बवंडर (साईकोन) सत्यती-गर्भाधानार्थ पच्छ गो। प्रावरण-बोदनेका बस्न वश्नु-वाम्मी प्राभातिक:-परभाती रग वटक-बड़े व्ययाः बेगे पाथः-जालम् वितान-तम्ब, अपमाना पायसमिता:-भोजनकाले एव साताः वायुपनि-हीसल पारितय्या-सोमन्तव्यस्वर्णपट्टिका(सांचा) पारिहार्यः-(धान) वाशित-पक्षित पिचित-रिचगये विरपूर्जपुः-वनियोगः रिनुमन्द-निम्ब दिनदिवरण-परी देना प्रोन्न-पोछता हुआ बोभम् - विमलम् पौरप्रतिष्टान-सिटीकापोरेशन सन्ति-हार -फारमरी-पूलझड़ी •दिसम्टा-मोट (लिमटताति) उलायः-मदिरा बालमित्रा-उदयन् सूर्यः लोया-राजमार्गः पेठ-सूर्यः फ भूमर-फमोन्दार म मात्तर-मेटर मनटो-स्टेज एपस समाप-छोटेष्ट पिनी-दी 41-5(पान) र साथ-सास शायोपवीवी-महार पामेलम्-दामीपमान सिक-शिरोभूगर बोर गुन्प्युः-(..) •8-26 स्मानी-मन्त्र से समापन - मन्द-शुपाय द चौर-तरमा) एंडार-मार्य 6-मोहोर शुद्धिपत्रम् उपर नीचे को मात्रायें, रेफ टूट गये, भ म, व व, मनुखार म्, आश्चर्यवोधक, सम्बोधन, प्रश्नबोधक, चिड़ों का विपर्यय, भो, ई को मात्रायें ठीक न लगी, ये अशुद्धियाँ पाठक खयं शुद्ध करें। विशेष अशुद्धियों की शुद्धि दी जाती है। प्रकाशकः पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध पृष्ठ पंकि अशुद्ध १७ ४ आधारो आधारी ७२ १३ प्रत्येत प्रत्ययत १८ २१ हासप्रियः उपहासप्रियः ७३ २४ वाक्यं वाई २१ ५ वार्धक्यभावा वार्द्धका ७४ २३ प्रत्यैद् प्रत्ययत २३ २ तदनु तमनु २५ २४ प्रार्थयामि प्रार्थये ७५ २० मुदविजीत् मुवेजयत् २९११त्त्व स्नात्वा ७५ २६ नाक्षिणी नाक्षणि ३१ १५ धमान बमानम ७५ १४ लिद्दन लिहानः ३२ १३ व्यत्या व्यतिया ७९ २३ मपानवान् मपानेयुः ३४ ५ चक्षते चक्षन्ते प्रत्ययत ९६ २२ गृहीदवी गृहीतवीं ३७ १४ खीय स्वकीय ११२ २२ द्वावेव च महोत्की-महोत्के ४२ २२ भावनात प्रायध्वम् সবার मायध्वम् १०७ २१ वरिष्यतिस्दा शस्यने ५. ६ माने जाने १२४ १७ सरोजिनी नितरा मनोरमा ५. ६दस्था: मुग्ध विदग्धमुग्ध नितरा ५२ २. दूरयन्तों देवयन्तो १२६१९ समाकामिना समार- ५४११ विधारमामः विधास्यामः कामिनीत ६३ १ एलायितु पलायितु १२८१हात ६५१२ घेत. वेत्तु १३ १७ प्रतिको परयो ११९९मपेतः मुपेतः .राहमाना १४.१९वतामोग रिमन सय १४. १८ इयन्त महान्टम इसन्मार ८३ २ प्रत्यंत " " प्रकृतिः सामोरम ( २६३ ) पृष्ठ पंकि अशुद्ध १६१ २ इसितात् १६४२ मुक्तशर १९५१५चनमदन्तः १६६ प्रौढ १७२४ शारास १७२ १९ हितायास १७८ ९ सहतोद्वीय रसोय जगतोऽक्षणि शुद्ध हसिते मुक्तशरशवितैः चान्नमदन्तः प्रौढो शारा:सर्व हितायायस सइसोहीय पृष्ट पंक्ति अशुद्ध २०३ २ सोय २०८ २२ जगदक्षणि २२४ १९ निबन्धो २२६ ९विस्फार्य २१ कौशल्येन २२८ ३ अलिप्तापक्ष निर्बन्धी। विस्फार्य स्वं " कौशलेन अलिशाप गीतिपरिचयः २८६ १७३ कुडमला दधतिच्छविं मातरिधविचालिताः। अम्बिका भवतु प्रसन्ना राशि चन्द्र भूपतौ। हा। गतः क्कासी प्रियो मे कृष्णवेशः शोभितः एतास्तिस्रो गजलपदवाच्याः। निशे हे आलि नाथः वास्ते मे (स्थायी) शुद्ध थाट, ताल कहरवा । ध स स रे गग०० गमम• गग रेगस. १७२ सुप्तासम्-अन्तरा) घसस घससा सरि सरि ग. सरिग गमम ग. रे ग स. प्रियवर। पातं नेत्रयो। राजस्थानी माड़ शीघ्रमेव प्रकाश्यते चन्द्रमहीपतेरुत्तरखण्डरूपोऽपि स्वतन्त्रः, सूर्यप्रभायात्रावृत्तान्तात्मक द्वितीयो भागः। यस्मिन् भारतस्य विशिष्टनगराणामाधुनिकः समुदा- चारो जीवितभापया पठिप्यते । विषयोऽयं संस्कृतज्ञानां कृते सर्वथा नवीनः परमं व्यवहारवर्द्धकः सातिशयमानन्ददश्च । अभिलापुकाः अमिमधनं विनैव केवलं नयकापणपञ्चकस्य (५N. P.) पत्रमेकं लिखित्वा नामाङ्कनं कारयेयुः। मुद्रिते च तस्मिन् श्रीमन्तः सत्वरं सूचयिष्यन्ते यथाभिलपितं कर्तुम् । स्वरचित तारसप्तक मन्द्रसप्तक कोमलसप्तक चाल- मन मोरा यावत। तीन ताल। स्वरलिपिः भातखण्डेपद्धतिः । १८९ पृष्टस्थगोतिस्वरलिपिः पाठकसौपाय। स्थायी + ३ सा सा रंसा घ गरे मग रे . म म म-नो व्या ... रे सा प प ध नि ध म ग - लम्ऽs 515 5 5 रा त्रि दि य म लि - म ग सानिध प मिल नम् - चि -- ). अन्तरा सा निसारे ग ग 5 शो तः सा - न्द्रो- . ग s| नि नि निपनि सानिध . - या-यु- - ति वि - ताप - त्या-- मन गम पर प प गंसार सा - - पह चा - - भा ति प्रो पित पनि का स। रानि च ध घ नि - ग्था -- प न पो-र पटा - पध मा निघः । sat निष प पन - . सो द 3 रेग पर मगरम परे सनिधन

No text on this page.

No text on this page.

श्रीमतां कर्त्तव्यम्-
।
(१) संस्कृते नवीनाः सरला रचना विधेयाः ।
(२) तासां विक्रयणे प्रचारे चेष्टितव्यञ्च ।
(३) पुस्तकस्यास्य सर्वत्र प्रचारः कार्यः, येन संस्कृतप्रच
सह विपयस्यापि प्रचारो भवेत् ।
(४) नवीनपुस्तकानां परीक्षासु निवेशनेन संस्कृतभाष
वास्तविक उद्धारो भवितुं शक्नोति, तदर्थमधिका
चेष्टितव्यम् ।
(५) सर्वविधः परामर्शः पत्रव्यवहारश्चाधो लिखितेन सड़के
करणीयः। संस्कृतज्ञानां विश्वस्मिन् प्रसूतानां विद्
मध्य परमाकुलोऽहम् ।
श्रीनिवासशास्त्री
११८, अमहट स्ट्रोट,

No text on this page.

श्रीमतां कर्त्तव्यम्-
(१) संस्कृते नवीनाः सरला रचना विधेयाः।
(२) तासां विक्रयणे प्रचार चेशिवव्यञ्च ।
(३) पुस्तकस्यास्य सर्वत्र प्रचारः कार्यः, येन संस्कृत
सह विषयस्यापि प्रचारो भवेत् ।
(४) नवीनपुस्तकानां परीक्षासु निवेशनेन संस्कृत
वास्तविक उद्धारो भवितुं शक्नोति, तदर्थमा
चेष्टितव्यम् ।
(१) सर्वविधः परामर्शः पत्रव्यवहारश्चाधो लिखितेन र
करणीयः। संस्कृतज्ञानां विश्वस्मिन् प्रसूतानां
मैत्र्य परमाकुलोऽहम् ।
श्रीनिवासशास्त्री
११८, अमहट प्रोट,

No text on this page.

Chandar Mahi Pati Kamla

Author
Gadgila,vishnu
Title
Chandar Mahi Pati Kamla
File name
Chandar Mahi Pati Kamla
Text
OCR done
Citation
1918
Published
2011/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
364
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310981
Barcode
99999990314416.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
7JDLEIBq0VU
Download PDF

Chandar Mahi Pati Kamla