Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Patanjal Darshan Prakash
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से लेकर नायक सत्र' या वाकई होम् नमोऽस्तामिणे। पातञ्जलदर्शनप्रकाश की विषयसूचनिगा पृष्ठा पक्तयक १ १ . का ? ७ ३ . २३ प्रथम पाद। विपयनिर्देश सूत्राक योगारम्भ प्रतिज्ञा तदुपयुक्त विचार योग का लक्षण, चित्त औ वृत्तियों का स्वरूप तथा योग के स्वरूप का विचार आशङ्कापूर्वक समाधिकाल में पुरुप का स्वरूपा कथन तथा तदुपयोगी शंका समाधान व्युत्थानकाल में पुरुष के स्वरूप का मनिपा-) दन तथा पुरुष को अपरिणामित्व कथन सप्रकार पांच प्रकार की कृतियों का निरूपण ५६ प्रत्यक्ष अनुमान आगम नामक तीन प्रमाणों का सविस्तर निरूपण विपर्यय ज्ञान का लक्षण तथा बासठ प्रकार का अवान्ता भेद विकल्प का लक्षण निद्रावृत्ति का लक्षण तथा विज्ञानभिक्षु के १० प्रमाद का निरूपण स्मृतित्ति का लक्षण वृत्तिनिरोध के उपाय निरूपणपूर्वक अभ्यास वैराग्य की भिन्न २ सफलता अभ्यास का लक्षणा तथा अभ्यास की हद अवस्या विशेप का निरूपण वशीकारसमकवैराग्य के लक्षण कथन पूर्वक वैराग्यों के भेदों का निरूपण परवैराग्य का स्वरूप वितर्कादिभेद विशिष्ट संप्रज्ञात का निरूपण } ८ ४१ २. ११२ है १३-१४ } ४८ ११ ३ ३ ' [२] सूत्राइ पृष्ठाड पंक्तवा २८ ५४ } ५६' ३ ५ विपपनिर्देश असंमज्ञात का लक्षण विदेरमकृतिलयों की अवस्था का निरूपण तथा विज्ञानभिक्षु के मत का उपमर्द असंमज्ञात के श्रद्धादि उपायों का निरूपण अभ्यासवैराग्य के मृट मध्य नीम होने से योगियों के नव प्रकार के भेद ঘামাঘল ৰূৗ যাধি তাম ন , उपाय निरूपण पूर्वक ईश्वर के स्वरूप का लक्षण पूर्वक अपूर्व विचार २० ६० २१.२२ } २३.२४ २२ . युक्ति ये ईश्वरसिद्धि कथनहारा ईश्वर को) २५-२६ ७० ७५ २९ ७८ ८ १३ } परम गुरु निरूपण ईश्वरमणिधान का निरूपण २७२८ ईश्वरप्रणिधान का स्वरूप साक्षात्कार फल तथा विघ्नों का अभाव रूए अवान्तर फल कथन नवप्रकार के योग विनों के निरूपणपूर्वको पंच प्रकार के विक्षेपानुयायी विघ्नों का निरूपण श्वरमणिपान के उपसंहार पूर्वक चौद्धमत का सविस्तर खण्डन चित्तशुद्ध के उपायभूत मैत्री आदिक भावना १३३ का अपूर्व निरूपण चितम्थिरता के अनेक उपायों का । ३४-३५.३६ ७३८-३९ वशीकार नामक योगी के चित्त की दशा का निरूपण ४० ग्राह्यतमापत्ति आदि के भेद से तीन प्रकार के संप्रज्ञात योग का निरूपण सवितर्क संप्रज्ञात का निरूपण निर्वितर्क संमज्ञात के निरूपण पूर्वर अवयवी के स्थान द्वारा चौद्धसंमत परमाणुपंज का ८ निरूपण १ } २२ २० MAIN विषयनिर्देश सूत्राप्रपा पंक्त सविचार निर्विचार संप्रज्ञात का निरूपण ४४ सूक्ष्मविपयों का निरूपण सचीज समाधियों का उपसंहार २२ निर्विचारजन्य अध्यात्मप्रसाद का निरूपण ४७ ऋतम्भराप्रज्ञा के निरूपणपूर्वक ऋतम्भरा- प्रज्ञा के अलौकिक सामर्थ्य विशेप का कथन ऋतम्भरामज्ञा के संस्कारों से अन्य संस्कारों का अभाव कथन निजि समाधि के कथन पूर्वक प्रथमपाद } ५१ २२ का अवसान } ४८-४९ . संस्कारों द्वितीय पाद । } , १२२ १ १२१ १२६ ३ १ १२८ १ ५ द्वितीयपाद के आरम्भ की आवश्यकता कथन पूर्वक क्रियायोग का निरूपण क्रियायोग का फल कथन २ पांचलंशों की संज्ञा का निर्देश रागादिप्लेशों को अविद्यामूलकत्व निरूपण पूर्वक प्रसप्त आदि भेदों से लशों का विशेष निरूपण चार प्रकार की अविद्या का सविस्तर निरूपण अस्मिता, राग, द्वेप, नाम सेशों का निरूपण ६-६-८ अभिनिवेश क्लेश के निकषण पूर्वक पूर्वजन्म? सद्भाव का मतिपादन क्लेशों के नाश का उपाय कयन धर्माऽपर्यों को क्लेशमूलकत्व कथन पूर्वक } रागादिपूलक धर्माऽयमों क फल निरुपण पूर्वक समावस्राद का सविस्तर विचार तथा विज्ञानमिन की कल्पना रा निराम ८ 2 . २१६ १४८ १८१ । [2] पृष्ठाक पंक्तया २० ५ १७५ १७९ ૨૮૨ रूप की १७ १८९ १९० १ विपयनिर्देश सूत्राह कमों के विपाकों से सुख औदाख प्रतिपादन विवेकी की दृष्टि में परिणाम दुःखतादि मिश्रित होने से विषयसुखको दुःखरूपता निरूपण, १५ चार न्यूहों का कथन तथा बौद्धसंमत मुक्ति का निराकरण हेय तथा हेय के हेतु का निरूपण १६ १७ दृश्य का सविस्तर निरूपण १८. गुणों के पर्यों का निरूपण ओपाधिक झावृत्त के निरूपण पूर्वक पुरुप की। चिन्मात्ररूपता का प्रतिपादन पुरुष के अर्थ निखिल दृश्य के स्वरूप का निरूपण२१ विवेकी के प्रति कृतार्थ हुये प्रधान का भी २२ अन्य पुरुषों के प्रति अकृतार्थता का निरूपण • पुरुप के भोगापवर्ग के संपादक संयोग का निरूपण तथा अविद्या के स्वरूप का सवि- स्तर विचार भोगापवर्गसंपादक संपोग के कारणीभूत २४ विपर्ययज्ञानवासनाओं का कथन कैवल्य का लक्षण हाननामक कैवल्य के कारणीभूत विवेक- शन का कथन विवेकख्यातिषाले योगी को सातमकारकी २७ प्रज्ञा के लाभ का कथन विवेकख्याति के लाभ का उपाय कथन तथा नवप्रकार के कारणों का निरूपण योग के अष्टअङ्गों का नाम कथन, पंच प्रकार के यमों का नाम औ लक्षण तथा महाव्रत का निरूपण पांच प्रकार के नियमों का नाम तथा लक्षण यपादि के विरोधी हिंसादिकों के उपस्थित) होने पर हिंसादि के अभावार्थ प्रतिपक्ष ३३-३४ भावना के स्वरूप का निरूपण . १९८ } ४ २००. २ २०६ ४ २१२ ११ ४ सूत्रांड्व पृष्ठाई पक्तयङ्क विपयनिर्देश अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रह्मचर्य, अपरि. ग्रह, शौच, सन्तोप, तप, स्वाध्याय, ईश्वर- ३८३९१० मणिधान, इन यम नियमों की सिद्धि के ४१४२-४३ सूचक योगीनिष्ठ सामर्थ्य विशेष कथनद्वारा यम नियमों के फल का प्रतिपादन १४-१५ आमन का लक्षण, आसनों के भेद, आसन के साधनों का कथन तथा १६१७१८ आसनसिद्धि का फल माणायाम का लक्षण तथा चारप्रकार के माणायामों का सविस्तर निरूपण क} १९.५०-५१ २२२ ४ २२४ माणायाम का फल A २२८ २२९ ११ प्रत्याहार का लक्षण प्रत्याहार के मयोजन कथन पूर्वक द्वितीयपाद। का उपसंहार यिपाद? २३० १४ १ तृतीय पाद । तृतीयपाद के आरम्भ की आवश्यकता के निरूपणपूर्वक धाराणा,ध्यान, समाधि, इन तीनों का लक्षण सयम के लक्षण कथन पूर्वक संयमजय का फल, सयम के विनियोग का निरूपण १.५६-७ २३७ तथा संयमको अन्य साधनोंसे अन्तरङ्गकथन) नि जसपाधि की सिद्धि में संयम को भी २४१ बहिरङ्गा कथन निरोधपरिणाम का लक्षण तथा फल का निरूपण ९-१० २४२ समाधिपरिणाम तथा एकाग्रतापरिणाम का। ११-१२ २१५ निरूपण पदार्थमान में धर्म, लक्षण, अवस्था रूप तीन २१८ परिणामों का शंका समाधानक सवि- भी ८ ५ wa स्तर निम्यण सूत्राक पंक्तया विपयनिर्देश धर्मी के लक्षण कथन पूर्वक अपूर्व विचार एक धर्म के अनेक परिणाम होने में कारण पृष्ठाक २५७ २६१ ર २६६ २६७ ७ २७१ २७२ २७५ १३ १९ परिणामत्रयसंयम से अतीतानागतवान के लाभ का कथन संमया का निरूपण पूर्व जन्म के ज्ञानार्थ संयम का निरूपण तथा आवस्य जगीपन्य योगिराजोंका अपूर्व संवाद पराये चित्त के ज्ञानार्य संयप का निरूपण १९.२० अन्तर्धान के सीधनभूत संयम का निरूपण २१ मरणशान के साधनीभूत संयम का निरूपण २२ मैत्री आदि बल तथा हस्ती आदि बल के १२३-२४ साधनभूत संयम का निरूपण परमाण प्रकृति आदि सूक्ष्म पदार्थों के ज्ञान, न? २५ का उपायभूत संयम भुवनज्ञान के साधनीभूत संयम का निरून) पण तथा निखिल भुवनों का विस्तारपूर्वक अपूर्व निरूपण ताराओं के निवासस्थान का ज्ञान, ताराओं की गति का ज्ञान, काय २७-२८-२९. व्यूह का ज्ञान, क्षुत्पिपासाकी निवृत्ति, चित्तस्थिरता तया सिद्ध दर्शन आदि के साधनभूत संयमों का निरूपण सर्वज्ञता के कारणभूत प्रतिभज्ञान का कथन तथा चित्तज्ञान का साधनभूत संयम का कथन पुरुपज्ञान के अर्थ स्वार्थ संयम का निरूपण स्वार्थ संयमजन्य अलौकिक पद सिदियों का निरूपण तथा उन को विनरूपता का ३६-३७ निरुपण २७७ २८५ २८८ . .
[ ७ ] सूबाई पंचक्त -- २९३ विषयनिर्देश अन्य के शरीर में प्रवेश के उपायभूत संयम का निरूपण जलादि के ऊपर स्वच्छन्दगमन, अग्नि की तरह तेजस्वी, दिव्य श्रीत्र का लाभ, आकाशगमन, आदि सिद्धियों के उपाय- भूत संयमों का निरूपण । पर के शरीर में प्रवेश के कारणीभूत माविदेहा १ नामक धारणा का निरूपण भूतजय के साधनभूत संयम का निरूपण ४४ अणिमादिक सिद्धियों का निरूपण १५४६ ३०५ इन्द्रियनय के साधनभूत संयम का तथा इन्द्रि-१४७ यजय के फल का निरूपण 180 विवेकख्याति के सर्वशतादिकफल का निरूपण ४९ परवैराग्य की उत्पत्ति द्वारा विवेक ख्याति के १५० मुख्य फल कैवल्य का निरूपण योगबल से उपस्थित हुये देवतादिकों की सकारपूर्वक प्रार्थना के होने पर संगदोष ५१ की भावना का उपदेश विवेकज्ञान का साधनभूत संयम विवेकजज्ञान के अवान्तरफल का निरूपण पिकनशान के लक्षण कथनपूर्वक मुख्यफल का निरूपण सिद्धियों की अपेक्षा से रहित केवल विवेक) ख्याति को कैवल्य के उपायकपनपूर्वक पाद की समाप्ति चतुर्थ पाद। पांच प्रकार की सिद्धियों का निरूपण योगियों के शरीर के त्यागपूर्वक भूतन शरीर के निर्माण विषयक प्रकृत्यादि १२.३.१५ ३३३ करन पूर्वक अनेरु रमणीय विचार १८ २ १ 2 [ ८ ] मूलाइ पंक्ताचा पृष्ठा ३४० १ ७ - ६ १० ३४२ विषयनिर्देश मुक्ति की योग्यता पाले चित्र का निरूपण शुरुकृष्णादि के भेद से चार प्रकार के कमा के को का निरूपण योगी से अतिरिक्त जनों के चित्तों को पास- नाओं का आश्रय कथन आगामी जन्म के अनुकूल ही वासनाओं के उदय होने का विचार संसार के अनादित्व कथनपूर्वक वासनाओं के अनादित्व का निरूपण, पूर्वजन्म सद्भाव तथा मन के परिमाणविषयक अपूर्व विचार वासनाओं की वृत्ति का उपाय अतीताऽनागतपदार्थ की स्वरूप से सचा निरू- पण पूर्वक सत्कार्यवाद का विचार निखिलमपंच को गुणस्वरूपता का निरूपण ३४३ } ३४६. ८ १५ निरू १२ १३ .१ अनेकों के एक रूप परिणाम होने में युक्ति } का निरूपण विज्ञानवाद, दृष्टि सृष्टिवाद के निराकरण पूर्वक बौद्धों के मत के समूल उन्मूलन विषयक रमणीय सरल विचार तथा चित्त ११५.१६ से अतिरिक्त वाध विषय के स्थापन का मकार ३७० 'सिद्धान्तमत में वस्तु को ज्ञात अज्ञात निरू- पण पूर्वक चित्त को परिणामी कथन १७ पुरुप के अपरिणामित्व का प्रतिपादन विज्ञाननामक चित्त की स्वप्रकाशता के खण्डनपूर्वक बौद्धों के सिद्धान्त का १९-२०-२१ निराकरण सिद्धान्त में पुरुष को औपाधिक ज्ञानुत्व ? के कथनपूर्वक साक्षित्व का निरूपण ३७९ ७ [ ९ ] पंक्तयत ६ ११ विषयनिर्देश सूत्राङ्क पृष्ठा चित्त को सर्वार्थ तथा चित्त से अतिरिक्त । २३ २८१ आत्मा के प्रतिपादन द्वारा चौद्धों के प्रतिशिक्षा) चित्त के परार्थत्व का निरूपण २४ ३८१ विवेकी की आत्मभावभावना की निवृत्ति २५ ३८६ कथन द्वारा योग के अधिकारी का निरूपण विवेकी के चित्त के सरूप का प्रदर्शन २६ ३८८ विवेकी के चित्त में बीच २ में होने वाले व्युत्थान संस्कारों का निरूपण तथा उन १२७२८ के नाश का उपाय धर्ममेघसमाधि का लक्षण तथा फल का २९.३० भतिपादन धर्ममेघसमाधिनिष्ठ योगी के चित्त की दशा का) निरूपण गुणों के परिणाम क्रम की समाप्ति का कथन, परिणाम क्रम को लक्षण तथा अनक ३२३३ ३९६ प्रकार का पूजित विचार दो प्रकार के कैवल्य के निरूपणपूर्वक पाद ३४ समाति १० ६ मनगोड तय गणे। योगदर्शनस्य एष्टाङ्कसम्बलितस्सूत्रपाठः । an- सूत्राणि सपाधिपादः प्रथमः । १ अथ योगाऽनुशासनम् । २ योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। ३ तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् । १५ ४ वृत्तिसारूप्यमितपत्र । ५ वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाऽकिष्टाः। २० ६ प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः । २२ ७ प्रत्यक्षाऽनुमानाऽऽगमाः प्रमाणानि । २३ विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्पप्रतिष्ठम् । २४ ६ शब्दज्ञानाऽनुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः । ૩૨ १० अभावप्रत्ययाऽऽलम्बनावृत्तिनिद्रा। ३५ ११ अनुभूतविषयाऽसम्प्रमोपः स्मृतिः। १२ अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः। ४५ १३ तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः । १४ स तु दीर्घकाल-नैरन्तर्य-सत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः४७ १५ दृष्टाऽऽनुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसञ्जा वैराग्यम् । १६ तत् परं पुरुषख्यातेर्गुणवेतृष्ण्यम् ।
सूत्राणि १७ वितर्कविचाराऽऽनन्दाऽस्मितास्वरूपाऽनुगमात् सम्प्रज्ञातः। ५२, १८ विरामप्रत्ययाऽभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः । १६ भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् । २० श्रद्धा-वीर्य-स्मृति-समाधि प्रज्ञापूर्वक इतरेपास्। ६० २१ तीवसंवेगानामासन्नः। ६२ २२ मृदुमध्याऽधिमानत्वात् ततोऽपि विशेषः । २३ ईश्वरप्रणिधानाद् वा। २४ क्लेशकर्मविपाकाऽऽशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष इश्वरः। ६३ २५ तत्र निरतिशयं सर्वज्ञवीजम् । ७१ २६ (स एपः) पूर्वेषामपि गुरुः कालेनाऽनवच्छेदात् । ७४ २७ तस्य वाचकः प्रणवः। २८ तज्जपस्तदर्थभावनम् । २६ ततः प्रत्यक्चेतनाऽधिगमोऽप्यन्तरायाऽभावश्च ३० व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादाऽऽलस्याऽविरतिभ्रान्ति दर्शनाऽलब्धभूमिकत्वाऽनवस्थितत्वानि चित्त- विक्षेपास्तेऽन्तरायाः। ३१ दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसह- ७५ ७७ भुवः। ८२ ३२ तत्प्रतिषेधार्थमकतत्त्वाऽभ्यासः। ३३ मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःस्वपुण्याऽपुण्यविप याणां भावनातः चित्तप्रमादनम् । ३४ प्रदर्दनविधारणाभ्यां या प्राणस्य । ६१ [ ३ ] सूनाइ ३५ विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिवन्धनी ३६ विशोका वा ज्योतिष्मती । ३७ वीतरागविपयं वा चित्तम् । ३८ स्वप्ननिद्राज्ञानाऽऽलम्बनं वा । 88 ३६ यथाऽभिमतध्यानाद् वा । १०० ४० परमाणुपरममहत्त्वाऽन्तोऽस्य वशीकारः। १०१ ४१ क्षीणवृत्तेरगिजातस्येव मणेहीतृग्रहणग्राह्येषु त- स्थतदलनता समापत्तिः। ४२ सत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः सङ्कीर्णा सवितर्का समापत्तिः। १०३ ४३ स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवाऽर्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का। १०५ ४४ एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता। १०६ ४५ सूक्ष्मविषयत्वं चाऽऽलिङ्गपर्यवसानम् । ४६ ता एव सवीजः समाधिः। १७ निर्विचारवैशारयेऽध्यात्मप्रसादः । ११३ ४८ भातम्भरा तन्त्र प्रज्ञा । ११४ ४६ श्रुताऽनुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषयाविशेषार्थत्वात् । ११४ ५० तजः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिवन्धी। ११६ ५१ तस्याऽपि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्वीजः समाधिः । ११८ इति समाधिपाद प्रथम ।
[१] १२५० सूत्राणि पृष्ठाकर साधनपाद: द्वितीयः। १ तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः। २ समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च । ३ अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्चक्लेशाः । १२६ . ४ अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुखतनुविच्छिन्नोदाराणाम् १२८ ५ अनित्याऽशुचिदुःखाऽनात्मसु नित्यशुचिसुखाऽऽ- स्मख्यातिरविद्या। १३४ ६ दृगूदर्शनशक्तयोरेकात्मतेपाऽस्मिता। १३६ ७ सुखाऽनुशयी रागः। .१११ ८ दुःखाऽनुशयी द्वेषः । १४२ • स्वरसवाही विदुषोऽपि तयाऽऽरुढोऽभिनिवेशः । १४३ १० ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः । १४६ ११ ध्यानहेयास्तवृत्तयः। १४७ १२ क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टाऽदृष्टजन्मवेदनीयः। १४८ १३ सति मूले तद्विपाको जात्यायु गाः । १४ ते लादपरितापफलाः पुण्याऽपुण्यहेतुत्वाद् । १६५ १५ परिणामतापसंस्कारदुःखैगुणवृत्तिविरोधाञ्च दुःखमेव सर्व विवेकिनः। १६ हेयं दुःखमनागतम् । १७५ १७ अष्टदृश्योः संयोगो हेयहेतुः । १७६ १८ प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगा- ऽपवर्थ दृश्यम् । १७६ १९ विशेषाऽविशेषलिङ्गमानालिङ्गानि गुणपर्वाणि । १८२ - २०२ सूत्राणि २० द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययाऽनुपश्यः । २१ तदर्थ एव दृश्यस्याऽऽत्मा । २२ कृतार्थ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वा । १६० २३ स्वस्वामिशक्तयोः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः । १६१ २४ तस्य हेतुरविद्या। १४६ २५. तदभावात् संयोगाऽभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम् १६८ २६ विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः । १६६ २७ तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा । २८ योगाऽङ्गानुष्ठानाद शुद्धिक्षये ज्ञानदीतिराविवेक- ख्यातेः । २६ यमनियमाऽऽसनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान- समाधयोऽष्टावङ्गानि । २०६ ३० अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्याऽपरिग्रहा यमाः । २०६ ३१ जातिदेशकालसमयाऽनवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् । ३२ शौचसन्तोपतप:स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः २१२ ३३ वितर्कवाधने प्रतिपक्षभावनम् । २१४ ३४ वितर्का हिंसादयः कृतकारिताऽनुमोदिता लोभ क्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याऽधिमात्रा दुखाऽज्ञाना- ऽनन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् । २१५ ३५ अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधो वैरत्यागः । ३६ सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफनाऽऽश्रयत्वम् । ३७ अस्तेयप्रतिष्टायां सर्वरत्नोपस्थानम् । २१८ - २१० २१७ २१७ [६] सूत्राणि ८ ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायांवीर्यलाभः । २१८ ३६ अपरिग्रहस्थैय्ये जन्मकथन्तासंबोधः । २१८ '४० शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः । २१६ ४१ सत्त्वशुद्धिंसौमनस्यैकाग्रथेन्द्रियजयाऽऽत्मदर्शन- योग्यत्वानि च । २२० ४२ सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभ: । २२० ४३ कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात् तपसः । २२१ ४४ स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः । २२१ १५ समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानाद् । २२१ ४६ स्थिरसुखमासनम् । २२२ ४७ प्रयत्नशैथिल्याऽनन्तसमापत्तिभ्याम् । २२३ ४८ ततो द्वन्द्वाऽनभिघातः । २२४ ४६ तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः २२४ प्राणायामः । ५० वाह्याऽऽभ्यंतरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः । परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः । ५१ वाद्याऽऽभ्यन्तरविषयाऽऽक्षेपी चतुर्थः । ५२ तंतः क्षीयते प्रकाशाऽऽवरणम् । २२० ५३ धोरणासु च योग्यता मनसः । ५४ स्वविपयाऽसम्प्रयोगे चितस्य स्वरूपाऽनुकार इन्द्रियाणां प्रत्याहार । ५५ ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् । २२५ २२७ २२० २३० इति साथमपादः द्वितीयः।
[ ७ ] । २३४ २३७ सूत्राणि विभूतिपादस्तृतीयः। १ 'देशवन्धश्चित्तस्य धारणा । २ 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् । २३५ ३ तदेवाऽर्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः २३६ ४ त्रयमेकत्र संयमः। ५ तज्जयात्प्रज्ञाऽऽलोकः । २३८ ६ तस्य भूमिषु विनियोगः । २३८ ७ त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः । २४१ ८ तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य । २४२ ६ व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावो निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः । २४२ १० तस्य प्रशान्तवाहिता संस्काराद् । २४५. ११ सर्वार्थतेकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समा- धिपरिणामः। २४५ १२ ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययो चित्तस्यै- कापतापरिणामः। २४६ १३ एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः। २१८ १४ शान्तोदिताऽव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी । २५७ ३५. क्रमाऽन्यत्वं परिणामाऽन्यत्वे हेतु । २६१ १६ परिणामत्रयसंयमादतीताऽनागतज्ञानम् । २६५ १७ शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्सङ्करस्तत्प्रविभाग- संयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम्।
[ ८ ] सूत्राणि पृष्ठाङ्क: १८ संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् । २६७ १६ प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् । २७१ २० नचतत्सालम्वनं तस्याऽविषयीभूतत्वाद् । २७१ २१ कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुः प्रका- शाऽसम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् । २७२ २२ सोपक्रम निरुपक्रमं च कर्म तंत्सयमादपरान्त ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा। ર૭રૂ २३ मैत्यादिषु बलानि । २७५ '२४ वलेषु हस्तिवलादीनि । २७६ २५ प्रवृत्याऽऽलोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकष्ट- २७६ ज्ञानम् । २७७ २६ भुवनज्ञानं सूर्ये संयमाद् । २७ चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् । २८५ २८ ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् । २६ नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् । २८६ २८६ ३० कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः । ३१ कूर्मनाड्यां स्थैर्य्यम् । २८५ २८७ २८८ २८८ ३२ मूर्द्धज्योतिपि सिद्धदर्शनम् । ३३ प्रातिभा वा सर्वम् । ३४ हृदये चित्तसंविद । ३५ सत्वपुरुपयोरत्यन्ताऽसङ्कीर्णयोः प्रत्ययाऽविशेपो भोगः परार्थत्वात् स्वार्थसंयमात् पुरुपज्ञानम् २८ २६८ सूत्राणि ३६ ततः प्रातिभश्रावणवेदनाऽऽदर्शास्वादवार्ता जायन्ते । २६१ ३७ ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः । ३८ वन्धकारणशैथिल्यात् प्रचारसंवेदनाच चित्तस्य परशरीरावेशः। २६३ ३६ उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च २६६ ४. “समानजयाज्ज्वलनम् । २६८ ४१ श्रोत्राऽऽकाशयोः संबन्धसंयमाद् दिव्य श्रोत्रम्। ४२ कायाऽऽकाशयोः संबंधसंयमात् लघुतूलसमाप- तेश्चाऽऽकाशगमनम् । २६४ ४३ वहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ।३०० ४४ स्थूल-स्वरूप-सूक्ष्माऽन्यया-ऽर्थवत्वसंयमाद्भूतजयः । ३०१ ४५ ततोऽणिमादिप्रादुर्भावःकायसंपत् तद्धर्माऽनभिघातश्च ३०५ ४६ रूप-लावण्य-वज-वजूसंहननत्वानि कायसम्पत् । ३०६ ४७ ग्रहणस्वरूपाऽस्मिताऽन्वयाऽर्थवत्वसंयमादिन्द्रियजयः ३०६ ४८ ततो मनोजविवं विकरणभाव: प्रधानजयश्च । ३११ ४६ सत्वपुरुपान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठा- तृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च। ३१२ ५० तवेराग्यादपि दोपवीजक्षये केवल्यम् । ३१३ ५१ स्थान्युपनिमन्त्रणेसङ्गास्मयाऽकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गाद् ३१५ ५२ क्षणतत्कमयोः संयमाद विवेकजं ज्ञानम् । ३१६ ५३जातिलक्षणदेशेरन्यताऽनवच्छेदात् तुल्ययोस्ततःप्रतिपत्तिः३२२ ५४ तार सर्वविपयं सर्वथा विषयमक्रमं चेतिविवेकजंज्ञानम्३२६ ५.५. सत्त्व पुरुपयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति । ३२७ दोन मिनिपारस्तृनी ।
[१] सूत्राणि पृष्ठाका कैवल्यपादस्तीयः। जन्मौषधिमन्त्रतप:समाधिजा:सिद्धयः । ३३२ जात्यन्तरपरिणाम: प्रकृत्यापूराद् । निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवद् । ३३५ ४ निर्माणचित्तान्यस्मितामात्राद् । ५ प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेपाम् । ३३६ ६ तन्त्र ध्यानजमनाशयम् । ३४० ७ कर्मा शुक्लाऽकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् । ३४१ ८ ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् । ३४२ ६ जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानतर्य स्मृतिसं- स्कारयोरेकरूपत्वाद् । ३४४ १० तासामनादित्वं चाऽऽशिपो नित्यत्वाद् । ३४६ ११ हेतुफलाश्रयालम्बनै: संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः। ३५.३ १२ अतीताऽनागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदान,धर्माणाम् ३५५ १३ ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः । ३५६ १४ परिणामेकत्वात् वस्तुतत्त्वम् । १५ वस्तुसाम्ये चित्तभेदात् तयोर्विभक्तः पन्थाः । ३६५ १६ नचैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्याद् ३६७ १७ तदुपरागापेक्षिरसाचित्तस्य वस्तु ज्ञाताऽज्ञातम् । ३७० १८ सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुपस्याऽपरिणा- मिवाद । ३७१ ३७२ ३७४ [१] सूत्राणि १६ न तत् स्वाभासं दृश्यत्वाद् । २० एकसमये चोभयानवधारणम् । २१ चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्ग स्मृति सङ्करश्च ३७६ २२ चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ३७६ २३ द्रष्टुदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थस् । २४ तदसंख्यथेयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संह- त्यकारित्वाद् । ३८४ २५ विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः । ३८६ २६ तदा विवेकनिम्न कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् । ३८८ २७ तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः । ३८६ २८ हानमेषां क्लेशवदुक्तम् । ३६० २६ प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथी विवेकख्याते- धर्ममेघ: समाधिः। ३० ततः क्लेशकर्मनिवृतिः। ३६२ ३१ तदा सर्वावरणमलाऽपेतस्य ज्ञानस्याऽऽनन्त्याज् ज्ञेयमल्पम् । ३६३ ३२ तत कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् । ३६६ ३३ क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्माह्य कम। ३१७ ३४ पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति । ४०३ इति कैयल्यपादस्तुरीग । समाप्तमिदम् पातञ्जलयोगसूत्रम् । ओम् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
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उदासीनश्रीधानन्द सम्प..
श्रीयुक्तविपभिग्रेसर आत्मदा
काशी (रामनगर) निवासी बलदेव कषि कृत कविता । वासी कासीपुरी जाको आश्रम उदासी दिव्य सुंदर सुधा से बैन सील के प्रतच्छ घर । पंडित प्रतापी प्रेमी परम प्रमोदित हैं देखे नहि ऐले जग जाहिर सुनामी नर ॥ कहै बलदेव दूजो देव के समान स्वच्छ कच्छ के प्रतच्छ साँचे राँचे रामनाम पर । जोग जप पूजा पाठ निसिदिन आठोजाम ऐसे सुखधाम साँचे बालराम स्वामी वर ॥ १ ॥ देह धरे राजत है कैयौं यह वेदवर कैधौं ए अठारहो पुरान अभिराम हैं । कैधों यह छवो सास्त्र सोभित प्रकास- वान केधों यह रिखिराज धैठे त्यागि काम हैं। कहै बलदेव कंधों धर्म को पताका लसै कैचों विश्वनाथ कैधों गनपति नाम हैं। भ्रम में न भूलो कोऊ श्रम के विचार करो मंगल सरूप स्वच्छ स्वासी वालराम हैं ॥२॥ आनन अनूप कचकारे श्रुति धर वेस नैन नासा दाडिम दसन है मुदामी के । ग्रीवा संख सोहत है सुंदर वृपभकंध परम विसाल वाहु कर अहिवामी के ॥ कहै वलदेव उर सोहत कपाट ऐसे नाभी सर बूड़े ते विलात काम कामी के । घुघुची कहाँ तो वाके कालिख लग्यो है मुख इंगुर के रंग पाँव वालराम स्वामी के ॥ ३ ॥ क्रोध नहिं आवै पास लोभ को न लेस कहूँ मोह को मरन होत आवै नहिं नेरे डर । चले अभिमानी धन विद्या अभिमान करि आवत समीप टीन भाखें पांय परिका [२] कहै वलदेव दिनदिन दया दीनन पै हँसि कै दयालुता सों बोलें जैसे निज घर । सूरत प्रतच्छ देखे दुरित दुराय जात वालराम स्वामी ऐसे वालराम स्वामी बर ॥ ४ ॥ मजन। अब कव नाथ दरस देखाय । ललित कोमल चरन अंबुज मंजु मूरति आय ॥ यह कुटिल पामर पतित को कव लेहुगे अपनाय । बालराम हि स्वामि को भजि नबहि संसय जाय ॥ सोरठा-जो नर बारहि चार, वालराम स्वामी कहै। अर्थादिक फल चार, सो ध्रुव आनंद सो लहै ॥१॥ पाय पत्तनलाल (सुसील कवि) कृत । कवित्त । सकल हिरानो गुन आज को जमानो जहां नाम ही वखानो जात पुराचीन नामी को । ताहू पै सुनात पै सुनात कोउ काहु में प्रवीन कोऊ काहु में प्रवीन विषै एक अनुगामी को॥ ऐसे समै मांझ जो सुसील व्यक्ति एक माहिं देखें गुन सवै धन्य हरि घट जामी को। चहो जो प्रतच्छ आप आंखन निहारन तो लीजिये निहार भले वालराम स्वामी को ॥१॥ जैसे व्याकरण ज्ञाता तैसे रखें न्यायनाता त्योही सांख्य योग मांहि विमल विवेक है। ताही भांति वेशेपिक अपर वेदांत वेद जाने भली भांति वेद अंग प्रति एक है। अति मरमज्ञ अहे सकल धरमशास्त्र औरहु मिमांसा ओ पुरान जे अनेक है । कहां लों वखानों गन सत्य के सुसील जानो सब में प्रवीन स्वामी वालराम एक हैं ॥ २ ॥ खडगविलास प्रेस वांकीपुर माहि जोन, रामदीन सिंह [३] जू को जाहिर जहान हैं। तहां ते पयान कीन्हो स्वामी बालराम आप आत्मस्वरूप संग शास्त्री जू सुजान हैं। जात वैद्यनाथ जगदीश के दरस हेतु मल्लेपुर देखि दुर्ति अति हरपान हैं। हतेिं आदर समेत गिद्धार नरेस आन्यो पूजि पदकंज कीन्हों अति सनमान हैं ॥३॥ उदासीन वैदिक ये धरम सनातन के रक्षन अरथ देस देस रहे घूम हैं । साठ द्विज शिष्य साथ लीने विजे केतु हाथ तीरथन माहि रहे करि धर्म धूम हैं ॥ ऐसे गुन मान उपदेसक सहायक सों सकल सुसील हिन्दू गन रहे झूम हैं। जहां जहां इन के परेहै पद कंज जाय तहां तहां जानें निज भाग धन्य भूम हैं ॥४॥ जगन्नाथ वैद्यनाथ अरु कलकत्ता त्योंही मुरसिद अवाद माहिं बहु नाम पाये हैं । परयाग दिल्ली कुरुक्षेत्र औ फरीद- कोट खूब सास्तरारथ के नीर बरसाये हैं ॥ अम्मरसहर पिंडी रावल कटाछराज डेराइसमेल गाजिखांडं जाय धाये हैं। फेरि मुलतान नरसिंह जू को दर्स करि आनंद की सरिता वहाये हैं ॥ ५॥ सूजावाद माहिं हे सुयोग्य विद्यावान बड़े पंडित ब्रह्मर्षि हेमराज नाम जाके हैं । जगत प्रसिद्ध भयो तिन को समा गम है देस देस माहि जासु फहरे पताके हैं ॥ सक्खर में नदी मांझ गिरिसाधुवेलाउपे जोगिराज वाचावनखंहि थान वांके हैं। तहां एक मास लों विताये अति आदर से पातु वरसा के मोद भली भांति झांके हैं ॥ ६ ॥ सकर शिकारपुर नगर किराची द्वारा-वती गोपीमा भगवान
जूनागढ़ गिरिनार
[४]
संखुधारहुं पधारे हैं। मांडवी सुमंडितकै जाय पोरबन्दर में
करि उपदेस कीने गुनिन सुखारे हैं ।
माहिहुं सुसील जाय, छेत्रपरभास सोमनाथजू निहारे हैं।
देवी सरस्वती जहां पच्छिम दिसा को बहैं, लखे माधोराय
जे प्रवाह के मझारे हैं ॥ ७ ॥
सिरी द्वारिका में करि
पूजन
विधान साथ बहु भांति
विप्रन को भोजन कराये हैं। देखि कै सुसील सील प्रतिभा
प्रताप गुन नगरनिवासी गुनी अति हरखाये हैं ॥ नाटक
की मंडली के मकन जी अधिष्ठाता आगम पानंद खेल
प्रीति सो दिखाये हैं। देखि देखि निधन धनीहू उर मोद
लहे सवै स्वामि बालराम गुन गन गाये हैं ॥ ८ ॥
कीन्हों है गमन झूनागढ राजधानी त्यागि लागत व-
सन्त रितु कानन सोहायो है । काठियावार देस जैतपुर ग्राम
तहां छात्रन समेत स्वामीबालराम आयो है ॥ सुनि पायो
देवली लखन दरवार जी ने सबिनै पखारि पद निजधाम
ल्यायो है । आदर समेत अभिवादन करि वार वार शास्त्र
के विनोद में विशेष सुख पायो है ॥ ६ ॥
जहँ जहँ गये आप मान सतकार लहे शास्त्र चरचा को
सुनि सवे मोद पाये हैं । जूनागढ़ राज के दिवान दास वेचर
जू खुद अगवानी करि टीसन तें लाये हैं ॥ संग में अमर
जी औ राव पुरसोत्तम जी तथा मनसुखराव आदि आदि
धाये हैं। महामहोपाध्या गंटूलाल महाराज जी ने गुन के
प्रशंसापत्र दीन हरखाये हैं ॥१०॥
[५] स्वामी घालराम जब भाऊ नम राज माहि देत रहे सभा मांझ धर्म उपदेस हैं। वहां के दिवान वोले भरी वा सभा के बीच बूढ़े हम भये मेरे पक चले केस हैं ॥ किन्तु ऐसे पूर्णज्ञाता सब ही विषे के माहिं देखे नाहिं सुने आये पंडित् हमेस हैं । धन्य ये अहैं जे अल्प वैसमांहि ऐसे अहै वय जासु चालिस ते नाहिन बिसेस हैं ॥ ११ ॥ माँझ मुल्तान रायहरिचंद यहादुर औ स्वामी ब्रह्मनंद आदि अति गुनखान हैं । त्योही वर पंडित श्री ठाकुर सु- दास जू हे मिलि सब कीने इन अति सनमान हैं ॥ पादर के साथ लाय टीसन तें भौन निज राखै द्वैमास सुने शास्त्र चरचान हैं । ऐसे वालराम स्वामी पंडित महा सुसील कीने आज काल वाद अमदा टिकान हैं ॥ १२ ॥ छद। श्री वाबू भूदेव मुकुरजी जाहिर सकल जहाना । वंग विहार उड़ीसा अजहूं करत जासु गुनगाना ॥ जिन इसकूल इनिसपेक्टर औ डैरेक्टर हू होई। सुस्त अयोग्य भारतिन नामहि काम प्रगटिं निज धोई ॥ हिन्दी संसकिरत की उन्नति बहु प्रकार जिन कीनी । डेढ़ लाख मुद्रा इहि कारन खास कोप तें दीनी ॥ जे "शिक्षा विधिपरस्ताव" अरु “इतिहासिक उपन्यासा"। सारपुरात ” “ ग्रीस, रोम, त्यों इंगलैंड, इतिहासा"। "पुस्पांजुलि” “ विज्ञानप्राकृतिक, विविध प्रबंध " सहाये " परिवारिक, सामाजिक, प्रो आचार, प्रबंध " वनाये ॥ मोरहु " स्वप्न अब्ध भारत को इतिहासादि" घनेरे! "
[६]
पुस्तक विरचि कीन भारत में भले काज बहुतेरे ॥
सोउ श्री स्वामी वालराम सों शिक्षा बहु बिधि लीनी ।
वेद तथा वेदांत आदि ग्रंथान अध्यैन कीनी ॥
तथा डाक्टर रामदास जू
सेन
मुरशिदावादी।
" बुद्धचरित " "भारत, इतिहासिक, रत्न, रहस” इत्यादी ॥
रचे ग्रंथ बहु विधि सुंदर हैं सोउ बहु दिन चितलाई।
स्वामी वालराम सों शिक्षा बहुत भांति की पाई ॥
पुनि' , उत्तरपाड़ा के वासी रासबिहारि मुकुरजी ।
उत्तरमीमांसादि निपुन भे वालराम की मरजी ॥
दीनू बाबू सरकारी प्लीडर हु मुर्शिदावादी।
सात कौड़ि मुकुरजी मनेजर और और इत्यादी ॥
वालराम स्वामी सो पढ़ि पढ़ि चित संदेह मिटाये।
कहाँ कहांलगि श्रीस्वामी के जात न गुनगन गाये ॥
रासविहारी उत्तरपाड़ा वासी
अति गुनखानी।
बालराम स्वामी की सेवा द्रव्य करन चित आनी ॥
पै स्वामी जी त्यागी अति हैं याते उन चित राखन ।
पातंजलदरसन उलथा जो देववानि में भाखन ॥
तीन सहस मुद्रित कराय किय पंडित जन में बितरन ।
सब हरखाय कहे इक सुर सों स्वामी धन धन धन धन ।।
सोइ पातंजल दरसन हिन्दी रसिकन मुद हित लागी ।
श्री महाराज कुमार रामदेनी सिंह ज ने मांगी ॥
स्वामी जी हरखाय तासु हिन्दीअनुवाद बनाये ।
दिये कुमारहि जो अपने प्रेस खड़गविलास छपाये ।।
इहि लखि हिन्दी संस्कृत ज्ञाता लेहु लुटि सुखरासी ।
[७]
स्वामी बालराम है कैसे कहहु उदार उदासी ।।
इन के शिष्य अनेकन तिन में आत्मस्वरूप उदासी।
तैसेहिं हैं जानहु रघुपति के जिमि हनुमान उपासी ॥
इन हू के गुनगन की गाथा जात कछुक नहिं गाई।
सुनत कथा उपदेस ज्ञान की उठत अंग पुलकाई ॥
बालरामस्वामी को अतिही सुघर स्वरूप' लिखावै ।
जो लिखिके न बने समुझावत देखत ही बनिनावे ।।
दिव्य कांति अति पुष्ट वपुख सब मुखप्रसन्न ससि ‘भांती ।
हाथ हथेली तरुमा पग रंग अरुन रंगी दरसाती ॥
डाढ़ी मूछ सीस के कच हैं लघुकाले चमकीले ।
देखि करन
अँगुरीन मुटाई पहलवान हैं ढीले॥
मानहु
जितने विधि प्रपंच निज कने।
सव को सार निचोर गारि के पास मांहि रखि लीने ॥
तासो रचि रचि महा परिश्रम इक नर सुघर बनाये ।
ताको स्वामी वालराम दै नाम जगत प्रगटाये ॥
धन विधिना यह कठिन काल कलि भारत पर करि दाया।
स्वामी बालराम सों गुननिधि शिक्षक सुघर पठाया ॥
हे भगवान दयानिधि रघुबर घट घट अंतरजामी ।
भारत तम नित नसें सूर लौं चढ़ि छिन छिन यह स्वामी ।
भारतवासी परे अविद्या सो दुख सकल विहाई।
-इन के द्वारा सीख सीखि तुव भक्ति लहें सुखदाई ॥
आत्मस्वरूप स्वामि इन सेवक संगति अति सुखदाई।
जिन की कृपा स्वामि की हों गुनगाथ कळू सुनि पाई ॥
विद्यावल गुन
[८]
दरस लालसा जिय में भारी सुनिय कृपाल मुरारी।
सो अभिलाख सुसील कृपा करि पुरवहु बेगि हमारी ।।
कवित्त ।
दृग कर पाद जैसे मन महराज दास दृग के पलक जैसे
कर करतल हैं। पाँयतल पायन के चायन करतकाज टालत
न आयसु सुसील एक पल हैं ॥ परमकृपाल जगपाल रघु-
नाथ जू के जैसे हनुमान दास भक्त निरछल हैं। तैसे विद्ववर
यह स्वामी वालराम जू के आतम स्वरूप सत्य सेवक सरल हैं।
दोहा ।
श्रावण नवमी शुक्ल पख, शनीवार शुभ पेख ।
संवत उनइस चवन को, है सुसील यह लेख ॥
अखतियारपुर जि० आरा निवासी शिवनंदन सहाय टेंसलेटर जनी बांकीपुर छत
रोकाछंद।
श्री गिरजा वर नगर निवासी जगत उजागर ।
सुंदर रूप ललाम धाम गुन 'बालराम' वर ॥
स्वामी पद संयुक्त, सकल सास्त्रन पारांगति ।
धर्मधुजा कोदंड खंड कर त्यों पखंड मति ।।
भारत भू चहुं खंड जासु जस कीरति राजत ।
कली विधर्मी जाहि लखत निज भोनहिं भाजत ॥
सबै स्मृति पोरान जाहि जिह्वागर जानो।
देवगुरू को अंश वेद की मूरति मानो ॥
चित्त प्रसन्न निष्काम काम वस एक राम सन ।
काम कोध मोहादि नहीं व्यापत्तजिहि कोज छन ।
. [९] जिहि दर्शन ते गरम निविड तम तुरत विनासै। जिहि संतसंगति होत बुद्धि की जोति प्रकासै ॥ सुनतं जासु उपदेश विमल मति ईशहि लागे।. कर्म ज्ञान को भाव जान मन · ब्रह्महिं पागै ॥ धर्म सनातन नित दिदाय के वेद प्रचारत। भारत संतति भटक रहे तिहिं नित्त सुधारत ।। धर्म हिं रक्षा हेत. देत लेक्चर बहुः देसन । धर्महिं रक्षा हेत रचे सुठि ग्रंथ अनेकन धर्म.हिं रक्षा हेत. योग पातञ्जल प्यारे । भाषा तिलक बनाय दिये यह हस्त तुम्हारे ॥ करो परिश्रम सफल पाठ कर इहि गरंथ को । हिन्दू सकल समाज सुधारहु धर्म, पंथ को ।। "शिवनंदन" कर जोर कहै श्री वालराम सों। दीजै आसिख हो निकाम मन रचे स्याम सों। :: जिन अवतार लीने धर्मही के हेत जंग धर्म वृद्धि छाडि जाहि और नहिं काम है। पापिन पखंडिन को खंड खंड शास्त्र शस्त्र जत्र तत्र खिन्न भिन्न करें आठो जाम हैं। जासु सदाचार व्यवहार को उचार "सिव"होत चहुं पार ग्राम ग्राम धाम धाम हैं। सदा निःकाम वस राम ही सो काम जाहि ललित ललाम सोई स्वामी वालराम हे ॥ १ ॥ सांचो हैं उदासी ये उदासी पंथ भापे कोऊ, शास्त्रन समूह कोऊ पासंगति जानिये। खंड खंड करत पखंड रीत देख कोज कलि दुरजन के कुठार ही वसानिये ॥ ज्ञान को कोऊ [...] निधान. कोऊ विद्या ही को खान कहै जुगुति अनुमान कहै एक आनिये । “सिक" के विचार वीच. आवै वार २ यही, धर्म को अधार अवतार, वेद मानिये ॥२॥ जल लछुमन: अंजनी सुवन, सेवक राम अनूप । घालराम महराज , -कै, तैसे, आत्मसरूप ॥ नवटोल (मनीगाछी, दरभंगा.) निवासी.पं० जीवछमिश्र कृत । कैसे भाव भक्ति अहैं नेक समुझाय कहु जैसे भृगु माहिं भाव बलि के अनूप हैं । कैसे भृगु माहि. भाव जैसे हैं विदुर पाहि कैसे हैं विदुर पै प्रभाव अनुरूप हैं । जैसे हैं युधिष्ठिर भक्त जैसे हनुमान अहें जैसे अष्टबक्र कहं महिमा अनूप हैं । जान्यो जात नाहिं परतच्छ दिखराय, देहु जैसे वालराम कह आतमस्वरूप हैं ॥१॥ · जासु उपदेश देश देश माहिं छाय रह्यो धर्मपरभाव वाढ़े जग में अनूप हैं । बंग औ विहार सिंध अवध ओड़ीसा माहिं धर्म परचार हेत विद्यमान रूप हैं ॥ नाम वालराम औ अराम धर्मकाजन के जाके नाम जपत अनेक जग भूप हैं। जाके उपदेश तै मुनीश बने केते जन देखो ये नमूने मेरे आतमस्वरूप हैं ॥ २ ॥ मर्म न धर्म को जानें कलू उपदेश करै जस धर्म के भूप हैं। नाम सुने नहिं दर्शन के अरु भापत ईश्वर के कत रूप हैं ॥ ना गुरु ते पढ़े अक्षर एकहूं बेठे रहे जस मेढ़क कूप हैं । भेद कहा जनिहें अस मूरख शक्ति के पुंज ये आत्मस्वरूप हैं ॥३॥. जस रघुनाथ के हैं भक्त हनुमान अरु जसे कृष्णचन्द्र
[१३]
जूके पांडुपूत भूप हैं । वीरभद्र अहें जैसे भूतनाथ शंकर के
जैसे द्वारिकेश कहं विदुर अनूप हैं ॥ जैसे मुचकुन्द हैं मुकु-
न्द के पिआरे पाकसासन के जैसे मेघराज अनुरूप हैं। सौ
गुनो हजार गुनो लाख गुनो बर्द्धमान तैसे बालराम कह
तमस्वरूप हैं ॥ ४ ॥
वान् शिवनंदनसहायात्मज घायू ब्रजनन्दनसहाय अखतियारपुर आरा कृत ।
छप्पयं-सुभ गुण खान ललाम जैति भारत हितकारक ।
जयर स्वामी वालराम अघ कोटि संहारका विविध ग्रंथ की
किरिन पंसार भरम तम नासै । थारो सुजत प्रताप रवी
"ब्रज” चहुं दिस भासे ॥ प्रभु नेम प्रेम मों अटल अति,
सील दयासागर रुचिर । नित करत फिरत उपदेस जग,
जन मन होवत सुनत थिर ॥ १ ॥
सत्य सनातन धर्म जगत परचार करन हित । नव २
युक्ति विचार करत स्वामी सुवाल नित ॥ गो ब्राह्मण की
विपद लखै जा कर हिय पीडित । वेद शास्त्र की सुनतहि
निन्दा विकल जातु चित ॥ अवतार आदि को सिध कियो
दै प्रमाण सब वेद को । यह युक्ति अनुपम टलत ना, पावे
नास्तिक खेद को ॥१॥
राउरि सुविद्या मारतंड को उदोत लखि सतधर्म निंदक
उलूक
से लकाने है । सत्य धर्म ग्रंथन को कंज सो विकास
भयो, जाहि पे मलिन्द सम संतन लुभाने हैं। परम पखंड
भरे 'वज' नवपंथ सब अतिहि मलीन उड़गन से बिलाने
हैं । सुन्दर चिरैयन से रावरी बड़ाई स्वामी, कवि हरपाय
सुनि गाये मनमाने हें ॥२॥
। [१२] स्वामी वालराम कासीपुरी के निवासी 'ब्रज' सुभ गुण रासी भवजाल तें उदासी हैं । कोविद महान बुद्धिमान सीलखान सुठि चतुर सुजान सत्य धर्म के प्रकासी हैं। वृकता प्रसिद्ध तिमि लेखक निपुन अति, नित नव ग्रंथ रच भ्रम के विनासी हैं । योग सुपतंजल. पै तिलक लगाय स्वामी भाषा-दह वीच कंज:पुंज के विकासी हैं॥ ४॥ संत-समाज के ताज अहें जिह नाम लिये अघदूरही. भाजें । भारतभूमि उजागर कारक धर्मधुजा सुठि कीरति राजै ॥ वेद पुरानन; के परचार किये बहु भांतिः सुपंथः को सा । देखत ही जिह के ब्रिज ग्रंथ को निन्दकधर्म-ही को सत लाजै ॥ ५ ॥ आठो जाम जोरे कर ठाढ़े रहें सेवा हित, जैसे दास दीनता से आगे निज़ भूप.हैं । जबै: कछु होत; हैं : सुश्रज्ञा गुरुवर्य-जू की करें न विचार व्रज' पानी और धूप है। जैसे रघुराज महाराज रामचन्द्र जू के, अञ्जनीकुमार वरसे- वक अनूप हैं । तैसे स्वामी बालरामः परम प्रवीन जा के अतिही सुसील दास आतमस्वरूप हैं ॥ ६ ॥ ब्रजनन्दन जुग जोर कर, विनवे सीस नवाय । स्वामी सिख देहु अव, भ्रमतम जाल नसाय ॥ शीतलपुर-सारन निवासी दापोदरसहाय कृत । सोरठा । (वा) नी जासु. अधीन , गनपति हरिहर ध्याइ हिय । (ल) हि उत्साह नवीन , हरिजन गुन कीरति कथन ॥ (रा) खि सुचित चित चार, सरस समस्या संकलन । , [१३ ] (म) ति मलीन अनुसार, ज्यों त्यो कछु पूरन करौं ॥२॥ (स्वा) रथ रहित सुभाव , परहित हित जीवन जनम । (मी) ते कहां कोउ पाव , बालराम स्वामी सरिस ॥३॥ सया ( अ-तरकापिका) देवगिरा में विदेसवसे को कहा कहते इक शब्द निकारों त्योंहि दमोदर जू कुच की उपमा केहि देत सुकंचन वारो। को विलगाई सरे जल छीर गनी औ गरीब को हेर्ने विचारो। आखर आदि अखीर तजो तेहि को सतयार प्रनाम हमारोen जानत ना नाहिं देख्यों सुन्यो इक बार उमंग हिलोरें लगी । दास दमोदर जूं सुकुमार ७ पै कीरति रासि सहोरे- लगी ॥ गौरव की उनके कविता मतिमोहि करे को निहोरे' लगी । कान में स्वामी जू की वतियां दिन द्वैते पियूप नि- चोरै लगी॥ ५॥ श्रीवलदेव सुसील दमोदर त्यों सिव श्री ब्रज के कलमा से । जाहिर जैसे कछु यह स्वामी जू पूरन प्रेम प्रमोद छमा से॥रे मन गाइ कळू इनकी करतूत करै किन पुन्य जमा से। वावरे जाने नहीं जगके 'दिनचार में है हैं तमाम तमासे ॥६॥ सज्जन साधु सुजान जवान सुमान वचे निरधारि लैरी। भेद नहीं हरि औ हरिदास में अपने चित्त मांहि विचारिलेरी॥ सांची तरीफ़ दमोदर जु अपनी मति को भम टारि लरी। गुन गाइके स्वामीजू केरसने 'बहती नदी पाय परसारि लेरी (१) प्राचा (२) RTI (१)दम - मराट रा। (१) धन = परमो - वम | r/ । , (-) महाराजकुमार याद रामदीन सिंह।
M [१४] सवैया । (सिंहावलोकन ) नाइय सीस सही सरधा सह साधु सनातन में सुख पाइय । पाइय-जीवन को फल मीत अनीत के गैल कबौं नहिं आइय ॥ आइय आपस में जुरि आज सबै मिलि स्वामी जु के गुन गाइय । गाइय नाम दमोदर जू अरु 'ग्रीषमे प्यारे हिमन्त वनाइय' ॥८॥ स्वामी जू रावरी नामवरी कहि पार न पाइसके तो कहा कहे। नौ कहिवे ही ते होत कहा है जथारथ जैसे हो तैसे जसो लहे ॥ दीन दमोदर की विनती यह दास तुम्हारो तुम्हारी दया चहे । हा ! पद कंजहू देखिवे को -दिल में अभिलाख भरे के भरे रहे ॥ ॥ . सोरठा । सेवक आत्मस्वरूप, वालराम स्वामी सुघर । जुगल सरूपं अनूप, हरि हरिदास खगेस इव ॥ १०॥ कवित्त । परम विरागी अनुरागी हरि रंगही में प्रगट प्रभाव प्रेम पूरन अनूप हैं। दामोदर दिव्य देह दरसि नसात पाप वानी सुनि बहुत विवेकी भये चूप हैं ॥ करि उपदेस भक्ति ज्ञान औ चिराग हूं के डूबत अनेकन निकारे भवकृप हैं । अधिक कहों का थोरही में बुधजन जानें आतमस्वरूप ऐसे मातमस्वरूप है ॥ ११ ॥ ये। आसिन मास तीज तिथि पारख सुस्याम । मंगल सुग्वद सुहावन दिन अभिराम ॥ १२ ॥ विक्रम संवत उन्निस चार पचास।
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।
[१५]
दामोदर यह कविता करी प्रकास ॥ १३ ॥
सीतलपुर के वासी सारन माहि।
विद्वच्चरन सुसेवन उद्यम, जाहिः॥ १४॥
छमव सुजन जे , भूलन दूयन भोर ।
कार सुदया दृग , कोरन मेरी ओर ॥ १५ ॥
चासदेव पाठक विदरसराय जिला गया।
दुष्ट दल दारुण विदारिये में वामदेव-मोहन में जानों
त्यो लजाय दुति काम के ! भक्त में प्रतक्ष पृथ्य सनक सना-
तन है मंगलिक विदित गनेस पर नाम के -बासुदेव मन्दा-
किनि पाप पुंज्ज नासिवे में रन के उदासिवे में पैज गह्यो
राम के । कोस अलकेस सो जो गाइवे जानिए जू त्याग ब-
लिराज़ सो हे स्वामि वालराम के ॥ १ ॥
सिघडामर जिला जौनपुर निवासी बलभद्र कवि कृत।
सतगुन प्रकासी सदा मोह तम पुंज नासी बेद मत
भाशी ज्ञान सुषमाभिराम के । अष्टसिद्धि दासी जाकी
सेवा में रहति खडी वैन में बसत बानी देखो सुखधाम के ॥
स्वामी:बालराम जी की महिमा बखाने कौन परम उदासी
हैं देवैया सब काम के। तीरथगमन दिगविजै करिवे के
हेत भ्रमत भुवन में भरोसे हरिनाम के ॥ १ ॥
श्री मणिमहान हैं सुजान स्वामी बालराम दयावान
पंडित प्रचीन प्रभाधर हैं। निश्यही विसय बिमुख मेधा
आठो जाम ब्रह्म को विचार जाके हृदि कंज घर हैं ।
भा वलभद्र कवि चारो घेद अष्टादश उद्धरत छवो शान्न
आछे जिहागर हैं ॥ अधम उधारिये को प्रगटे जगत वीच
विजेपन लहिवे को अवतार हर हैं ॥ २ ॥
[१६] या। mire अंश तपश्या को जागि उठ्यो तेहि ते लह्यो सेस से वुद्धि खरादी । ज्ञानविराग लस्यो उर अन्तर सिद्धता फैली दराज अवादी॥ त्यों बलभद्र विहार करें जग विद्या में पाए हैं व्यास की गादी। श्री वालराम चरित्र उदार हैं ध्वंसत मान फिरें जे प्रमादी ॥३॥ किंकर साथ सदा जिन के रहैं ब्राह्मण साठि हैं विद्या- मिलापी । ताहि पढावत आप प्रमोद सों देत वताय सुकर्म की सापी ॥ त्यों बलभद्र प्रताप वली लखि दुष्ट भए संव दूध की मापी । जैसी महत्व सुनी हम कानन तैसी वनाय कवित्त मै भाषी ॥४॥ सेवाकारी सर्बदा सुआज्ञा में निरत रहैं गुरू भक्ति धारी भारी ज्ञान गुनरासी हैं। परम तपस्वी बालराम के सुअन्ते वासि सजन सनेही धर्मपथ के प्रकासी हैं ॥ सौम्य वृत्ति माधुरी प्रकृति चारु शुचि रुचि सर्व शास्त्रवेत्ता आछे वचन विलासी हैं। अष्ट जोग साधै निराकार अवराधे ब्रह्म इन्द्रीजित आतमस्वरूप जी उदासी हैं ॥१॥ महामोह तमहारी काम कोह भ्रम टारी गुरुपद उरधारी ज्ञान दिव्य पायो है। माया छलकारी जाहि आवत न नेरे नेकु विमल विचार त्यों अचार सब ठायो है ॥ उत्तम अनु- पमेय हृदय उदार वर सार वस्तु जाननीय दया दरसायो है। विचरत मही में श्री स्वामी वालराम जी के दास खास आतमस्वरूप कहवायो है ॥२॥ .
उोम् ३
नमोऽन्तर्यामिणे ।
योगतत्वसमीक्षा।
उपक्रम।
“
निखिलशास्त्रनिष्णात, वेदवेदाङ्गपारगं, सुधीरं बालरामाख्यं ।
नत्त्वाविद्याप्रदं गुरुं,सुखबोधाय शान्तानां योगतत्वं समीक्ष्यते।।
उत्तिष्ठत जाग्रता प्राप्य वरान्निबोधत,
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो
वदन्ति (*)
कृ० यज० कट० अ०१ वल्ली में।
परमहंस जन सर्वधन, योगी-मानस-हंस ।
हरि-हर अधर मैं करूं, योगभूमिका हंस (1) ॥
मुमुक्षुजन :
जिस प्रकार तत्त्वज्ञान तथा निर्वाण के अर्थ योगानु-
प्टोन अवश्य संपादनीय है वह प्रकार तो श्रुति-स्मृति द्वारा
श्री १०८ स्वामीजी ने अग्रिम उपोद्घात में प्रतिपादन
जो
पुरुप
शरीरपोपणार्थी सन् य आत्मानं दिदृनति,
(*) (उत्तिष्टन) उठो (जाप्रत) नागो, अर्थात्-अज्ञानका निद्रा में रट यर
भागज्ञान के अभिमन्द होपो (वरान मार) गेष्ठ पुरषों को प्राप्त हो कर (नियोधत )
अपने रूप को जानो, कुछ सगग भाग कर ज्ञागमार्ग की उपेक्षा गत करो क्योंकि
ताण तथा दुर्गम जो छो की धारा है तिमन ताप यह शान गार्ग टुगंग। यह
कविमा मुनियों का अनुभव का कथन है, यह अति का 17 है।
(क) "हमा य?ण्ध शिखाय यमागत मरण 31.
शागोपनियन की िमे हम नाम राहत ३१ दाम गाई
किया ही है परन्तु
"
उपनम।
ग्राहं दारुधिया धृत्वा नदी तर्तुं स इच्छति " (१)
इत्यादि वचनों को पृष्ट (पीठ) दे कर "सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति
संप्राप्ते तु कलो युगे, नानुनिष्ठन्ति मेत्रेय शिश्नोदरपरायणाः(२)
इत्यादि वचनों को सार्थक करते हुये विषयभोगपरायण हो
ज्ञान का आपण (0) उद्घाटन कर अभ्यास-वैराग्य कर
साध्य चित्तसंयम रूप योग की अपेक्षा से विना ही केवल
तालस्वरसंचारविधुर श्रवणमात्र से ही कृतकृत्यताकथन रूप
गीत गाते हैं उन को स्वर ताल (+) वतला कर सुधारने
के लिये यह संक्षिप्त उपक्रम हे ।
तत्त्वजिज्ञासुजन !
यह तो निर्विवाद ही है कि-निष्प्रपश्चात्मतत्त्व का
साक्षात्कार ही अज्ञाननिवृत्युपलक्षितात्मस्वरूपाभिव्यक्ति
रूप मुक्ति का अभिव्यञ्जक है परन्तु वह साक्षात्कार कुछ
अकस्मात् ही केवल श्रवणमात्र से हो जायगा यह कदापि
नहीं माना जायगा क्योंकि ऐसे मानने से प्रथम उपदिष्ट
तत्वमसि' इस वाक्य से ही साक्षात्कार का लाभ होने
से श्वेतकेतु के प्रति नव वार उपदेश प्रदान असमीचीन
हो (३) जायगा किन्तु जैसे रत्न के संग सन्निकर्ष होने पर
(१) शरार वे पापण की इच्छापाला हुआ जा पुरप आमा
परता है वह पुरुष काष्ट बुद्धि से ग्राह को पकड कर नदा तरन यी इच्छानाले सदृश
भविकी है, यह विश्व चूडामणि रे वाक्य का भार
(२) हे मैत्रेप। कलियुगके आन पर लोग सब ब्रह्महा ब्रह्म पुकारेंगे पर तु शिनोदर
परायण (थुन ग्वान पानपरायण) हुपे साधनों का अनुष्ठान नहीं करेंगे, यह भाव है।
(*) (आपण) दुकान । (उद्घाटन) खोलना ।
(1) भ्यास ताल है ओ पैराग्य स्वर है।
(३)पहार जो ओर अनेक सुद्र शवापङ्क उनका मार्जन इस प्रयके परिशिष्टमें देग्यो।
जानन बी इच्छा
उपक्रम । भी केवल नेत्रमात्र रत्न के तत्त्व को नहीं जान सकता है किन्तु रत्नतत्त्वपरीक्षाशास्त्र के अभ्यास जन्य संस्कारों के सहित हुआ ही वह रत्न के तत्त्व को जानता है तेसे शब्द- मात्र आत्मज्ञान का जनक नहीं है किन्तु अभ्यासवैराग्य द्वारा चित्त की स्थिरतारूप सहकारी कारण के सहित हुआ ही वह जनक (१) है यह माना जायगा, ऐसे मानने से ही नव वार उपदेश तथा “शृण्वन्तोपि वहवो यं नविद्युः" " श्रुत्वाप्येनं वेद नचैव कश्चित् (२) " यह श्रुतिस्मृति संगत हो सकती है अन्यथा नहीं। अतएव ज्ञान के साधनों में शम-ौ समाधान का उपादान किया है। अतएव अपरब्रह्मनिष्ट सुकेशा आदिक ६ ऋषियों के प्रति " तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ" इस वाक्य से मन की एकाग्रता रूप तप तथा ब्रह्मचर्य का उपदेश कर फिर चित्त की स्थिरता होने पर पिप्पलाद मुनि ने उन को उपदेश दिया है (३)। इसी से ही सत्त्वगुणप्रधान देवराज इन्द्र के प्रति भी (१) चित्त ही ब्रह्म के साक्षात्कार में करण है भी शब्द सहमारी है। (२) अषण करते हुये भो बहुत जन जिम परमात्मा यो नहीं मान सकते हैं यह पाठच ते का अर्थ है, ओ सुन कर भी इस परमात्मा को पोई नहीं न नना है, यह मग. पद्याप का अर्थ है। (३) अविदीय प्रश्नोपनिषद् के आरम्भ में यह स्पष्ट है।
४ उपक्रम। १०१ वर्ष ब्रह्मचर्य कराकर ही प्रजापति ने उपदेश (१) दिया था कुछ आज कल की तरह प्रातःकाल आया औ सायंकाल तक निष्क्रियब्रह्मस्वरूप बना कर कर्तव्यता के अभाव बोधन द्वारा यथेष्टाचरणशील नहीं बना दिया था, इसी से ही वरुण जीने अपने पुत्र भृगु के प्रति "तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व (२)" इस वाक्य से चित्तस्थिरता रूप तप को ब्रह्मज्ञान का साधन कहा है। एवं च चित्त संयम के लिये वैराग्य अभ्यास द्वारा योग अवश्य ही संपादनीय है यह निर्विवाद है। किंच विचारदृष्टि से आलोचना कियी जाय तो यही प्रतीत होता है कि वैराग्याभ्यासरूपप्रसंख्यानाऽऽख्याऽवस्थाविशेष विशिष्ट मन ही आत्मसाक्षात्कार का करण है कुछ शब्द नहीं। अर्थात्-ब्रह्मात्मा के साक्षात्कार का करण तो शब्द है औ स्थिर मन उस का सहकारी है इस मत से ऋत- म्भरा (३) प्रज्ञारूप से परिणत चित्त आत्मा के साक्षा- कार का करण है ओ शब्द उस का सहकारी है यह मत समीचीन है। अतएव यमराज ने नचकेता के प्रति " शृण्वन्तोऽपि वहवो यं न विद्युः" इत्यादि वाक्य से शब्द को अप्रतिवद्ध अपरोक्षज्ञान के करणस्वाभाव के कथन पूर्वक " अध्यात्म- (१) "एकाशतं ह वे वर्षाणि गघवान प्रजापती ब्रह्मचर्य्यमुवाम" इत्यन्त छान्दोग्य के अष्टम प्रपाठक के ११ खंड में यह स्पष्ट है। (२) तेत्तिरीयोपनिषद्-भृगुवल्लो द्वितीय अनुवाक । (३) ११४ पृष्ठ में ऋतगाराप्रज्ञा का निरूपण है।
" योगाधिगमेन देवं मत्वा धीरोहर्षशोको जहाति (१)" इस वाक्य से योगसहकृत मनकरणक ब्रह्मसाक्षात्कार का उप- क्रम कर फिर "सर्वे वेदा (२) यत्पदमामनन्ति" इस से लेकर एतदानम्वनंश्रेष्ठम् " यहां पर्यन्त ईश्वरप्रणिधान रूप धारणा का उपन्यास कर पुनः “न बहुना श्रुतेन यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः (३)" इत्यादि वाक्य से एकतानसंचिन्तन रूप ध्यान की परिपाकदशा कथन कर फिर "नाऽशान्तो नाऽसमा- हितः (४)" इस वाक्य से व्यतिरकमुख से ध्यान के उत्तर काल में होनेवाली समाधि का उपदेश कर फिर "आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेवतु (५)" इस से आदि लेकर “सोध्वनः पारमाप्नोति तद विष्णोः परमं पदम् " यहां पर्यन्त अर्थ वादप्रणाली से फल सहित समाधि की अवश्य कर्तव्यता (१) प्रत्याहार द्वारा विषयों से निवृत कर जो चित्त का गा विषयक योग कर देना वा अध्यात्मयोग इस अध्यागयोग में प्रकाशस्य आप को नान कर धौर नर हर्ष शोक को त्याग देता है। (२) निग्विल वेद जिम १६ का वारंवार निरूपण करते हैं उप प्रणा का आर. म्यन श्रेष्ठ है क्योंकि यह केरल्य को देने वाला है, यह मात्र (३) बहुत सुनने से आत्मलाभ नहीं होता है किन्तु जो उस परमात्मा को संमृणुते-पम्यक् भनेता है भर्धात्---एक्तान से चिन्तन करता है उस को परमार Bा होता है। (४) जो शम की समाधि द्वारा शान्त औ समाहित नहीं है पह परगारमा यो नहीं जान सकता। (6) मामा रथो है ओ शरीर रशमो बुद्धि मयि है गो गन प्रमा (गाम है भी इन्द्रिप अव है, तहाँ सिप रथी यार बुद्धिरून मारथी इन्द्रियों को दगन कर मन को अपने समान कर लेना। यह सीमा म होता है अपना यह इम का भार है।
६ पक्रम । का उपपादन कर फिर " दृश्यते त्वग्रया चुन्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः (७)” इस वाक्य से तम्भरा प्रज्ञा की सूक्ष्म अर्थ के ग्रहण में सामर्थ्य का उपवर्णन कर फिर “यच्छेद्- वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद् यच्छेज् ज्ञान आत्मनि ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत् तद् यच्छेच्छान्त आत्मनि (१)" इस वाक्य से समाधि के अनुष्ठान का प्रकार कथन कर फिर “आवृतच- क्षुरमृतत्त्वमिछन्" इत्यादि से अभ्यास कर "यदा पश्चापति- ष्टन्ते ज्ञानानि मनसा सह बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः पर- मांगतिम् (1)" इत्यादि से योग का स्वरूप कथन कर “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिता अथ मोऽमृतो (२) भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते" इत्यादि से ब्रह्मसाक्षात्कारफलक योग का उपसंहार किया है। गीता भाष्य में भी "शास्राचार्योपदेशशमादिसंस्कृतं मन आत्मज्ञाने करणम् " इस वाक्य से योगसहकृत मन को ही आत्म ज्ञान का करण माना है कुछ शब्द को नहीं। (*) अषण मनन द्वारा सूक्ष्गोष्टवाले पुरुषों कर निदिध्यासनद्वारा सूक्ष्म जी एका प्रबुद्धि से आत्मा दृश्य होता है । (१) बाणा के व्यापार को मन के अधीन करे औ मन को अहकारोपाधिक ज्ञानामा के अधीन करे ओ ज्ञानात्मा को बुद्ध्यवाधिक महान आत्मा के अधीन करे भो ज्ञानात्मा को शुद्धशान्ताला में मग्न करे यह तत्त्व है। (1) जिस दशा में मन के सहित ही पच ज्ञानइन्द्रिय संयम द्वारा स्थिर हो जाते है जो बुद्धि भी निवष्ट हो जाती है उस दशा का नाम योग है भी यही परमगति का उपाय होने से परमगति है। (२) - जमय में । 'अमान निविल काग इम के निवृत्त हो जाते देह रहे गी ब्रा को प्राप हो जाता है। . उस सम मृत ७ उपक्रम। एवं भामतीपति वाचस्पतिमिश्र ने भी " न ब्रह्मज्ञान- मात्रं सांसारिकधर्मनिवृत्तिकारणमपितु साक्षात्कारपर्यन्तं, ब्रह्मसाक्षात्कारश्चान्तःकरणवृत्तिभेदः श्रवणमननादिजनित- संस्कारसचिवमनोजन्मा पड्जादिभेदसाक्षात्कार इव गान्धर्व- शास्त्रश्रवणाभ्याससंस्कृतमनोयोनिः (१) इस वाक्य से ब्रह्मसाक्षात्कार को अन्तःकरणवृत्तिविशेष कहा है । जो कि यह मत है कि (दशम तूं है इत्यादि स्थल में प्रसिद्ध होने से शब्द को ही ज्ञान करणत्व मानना उचित है मन को नहीं क्योंकि मन को ज्ञान की करणता कहीं प्रसिद्ध नहीं हैं (२)) सो मत असंगत जानना क्योंकि "अह- मेवेदं सर्व सास्मीति मन्यते” इस श्रुति कथित स्वाप्न साक्षात्कार में औ गर्भस्थित वामदेव के साक्षात्कार में मन को करणता की प्रसिद्धि होने से अप्रसिद्ध कथन अनवधान प्रयुक्त है, किंच दशमपुरुष के साक्षात्कार में भी इन्द्रिय ही करण है शब्द केवल सहकारी मात्र है जो कि तत्त्वप्रदी- पिका तथा अद्वैतसिद्धि के तृतीय परिच्छेद में (गाढ़ अन्ध- कार में लोचन विहीन जन को केवल वाक्य से ही दशम का ज्ञान होने से शब्द ही करण है इन्द्रिय नहीं) यह कहा . (१) कु. शब्दज य ज्ञानमा ही ममार को निमृत्ति का कारण नहीं है मोपतु- तरसमाक्षाार, जो कि अन्त.करण पो वृत्तिविशेष है, अर्थात्-~-जैसे पहम आदि सरों का साक्षात्कार गान्धर्वशास्त्राम्पामजनित मस्कार महित मन में यह मे मामाक्षात्कार भी प्राणादिजन्य सारसहित गग से ही जन्य कुछ शब्द से नहीं। (२) सु वादकों को साक्षिभास्य माने में सम्मादि के मामा कार में भी गन पारण नहीं , यह उनका गाशप है।
द उपक्रम। है सो भी केवल साहसमात्र है क्योंकि ऐसे स्थल में भ्रम का होना असंभव है (१)। जो कि किसी का यह कथन है कि (इन्द्रियजन्य ज्ञान को प्रत्यक्ष होने से औ मन को इन्द्रियत्व के अभाव से मनोजन्य ज्ञान प्रत्यक्ष रूप कैसे) सो भी केवल यथाश्रुत- ग्राही छात्र संमोहनमात्र है क्योंकि "एकादशेन्द्रियाण्याहुः" "मनो नेत्रादि धीन्द्रियम्" इत्यादिस्मृतियों में तथा "त इन्द्रि- याणि तद्व्यपदेशादन्यत्रश्रेष्ठाद्” (२) इस व्यास सूत्र से मन को इन्द्रियत्व सप्रमाणक होने से इन्द्रियत्वाभाव कथन अप्रामाणिक है अतएव इस मन का नाम अंतःकरण है क्योंकि अन्तरिन्द्रिय औ अन्तःकरण यह दोनों शब्द एकार्थक हैं। तथाच योगाभ्यासजन्य ऋतम्भराप्रज्ञारूप से परिणत मन को ब्रह्मसाक्षात्कार का करण होने से ऋतम्भराप्रज्ञा के लिये योग अवश्य अपचित है यह सिद्ध हुआ। (३) (१) अनिर्वचनीय वचन के अभिमान से यदि वहा भी भ्रम का वह संभव मानेंगे तो गणना द्वारा सार्शनप्रत्यक्ष ही भ्रम का निवर्तक यहा जायगा कुछ शब्द नहीं, सो जहां बधिरपुरुष को दशमविषय भ्रात होगी वहा गणना से विना और क्या उपाय मानेंग। (२) श्रेष्ठ जो मुख्य प्राण है उस को परित्याग कर शेष एक दश इद्रिय मानने, क्योंकि भ्रात में ऐसा व्यपदेश है, यह अ. २पा.४० १७ इस सत्र का अर्थ है। भाष्यकारों ने भी इस मूत्र के व्याख्यान में मन को इन्द्रिय माना है, जो कहीं २ इन्द्रियों से भिन्न मन का व्यपदेश है वह गोपळीपर्दयाय से जानना, अथवा अन्य इन्द्रियों को वर्तमान गान विषयक होने से भी मन को त्रैकाल्य पदार्थ विषयक होने से भेदव्यपदेश जानना भागतीकार ने भी इस सूत्र के भाष्य की व्यारया में " मनसस्त्विन्द्रियत्व स्मृतेरयगत काचिभेदेनोपादान गौनकीवर्दन्यायेन " इस प्रकार भेर कथन का समाधान किया है । (३) अन्य दर्शनीय नप के ग त में परिशिष्ट में दखो-~-
उपक्रम ।
विस्तर स्वामीजी निर्मित योगतत्त्वसमीक्षा में देखो,
किं बहुना-
तावद्
"प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन
भागवत ।
“ नमोक्षो नभसः पृष्टे न पाताले न भूतले ,
मोक्षो हि चेतो विमलं सम्यग्ज्ञानविवोधितम् ' (वशिष्ठ)
" मनसो
निग्रहायत्तमभयं सर्वयोगिनां , .
दुःखक्षयः प्रबोथश्चाप्यक्षया शान्तिरेव च,"
7 अवश्य आलोचतीय ।
पातञ्जलर्दशन के चतुर्थ पाट के ३१ सूत्र के भाष्य में
व्यासदेवजी ने “ अन्धो मणिमविध्यत, तमनगुलिरावयत्,
अग्रीवस्तं प्रत्यमुञ्चत् तमजिह्वोऽभ्यपूजय " यह एक पद्य लिखा
है ( १) इस पद्य को वाचस्पतिमिश्र जी ने तो लौकिक
आभाणक कहा है ओ योगवार्तिककार विज्ञानभिक्षु ने
योगियों के प्रति चौद्धों का उपहास रूप यह वाक्य है यह
कहा है, औ माधवाचार्य ने इस को वेदवाक्य कहा है, परन्तु
इन तीनों कथनों में से कौन समीचीन है इस आकाक्षा
के उदय होने पर माधवाचार्य का ही कथन समीचीन जानना
क्योंकि यजु-तैत्तिरीयारण्यक के प्रथम प्रपाठक के ११ अनु-
वाक में यह प्रथम ऋग्मन्त्र है, परन्तु 'अविध्यत' इस के
स्थान में 'अविन्दत' औ 'अभ्यपूजयत् ' इस के स्थान में
'असश्चत' इस प्रकार श्रुतिपाठ में विशेष है (२)।
(१) इम पच । अथ इम प्रकाश ये ९९५ पृष्ठ पर सट है।
(२)तीपाद त' यह पद भी प्रति में नहीं है।
i
उपक्रमा तहां अविन्दत् । इस पद का अर्थ प्राप्ति करना है, श्री 'असश्चत्' इस पद का अर्थ प्रशंसा करनी है, निखिल इन्द्रियों से रहित हुआ ही चिप आत्मा यावद् व्यवहार करता है यह इस का भाव (१) है, यद्वा चक्षुत्रादि इन्द्रियों का निरोध कर वाह्य विषयों में अन्ध हुआ ही योगी ऋत- म्भराप्रज्ञा से मणिवत्प्रकाश स्वरूप आत्मा को देखता है श्री उसी प्रज्ञा से स्वस्वरूपनिश्चय रूप उस मणि का स्वीकार करता है, औ स्वस्वरूप में स्थिरतारूप मणि का धारण करता है औ कृतकृत्यता का लाभ रूप प्रशंसा करता है, यह इस का भाव है (२)। उपक्रमकर्ता- तत्रभवदन्तेवासी स्वाम्यात्मस्वरूपशास्त्री (५') तहाँ इतना विशेष है कि जीवात्मा यद्यपि सर्व इंद्रियों से रहित है तथापि देहादि के संग तादात्म्याध्यास से आरोपित निखिल क्रिया बाण है औ परमात्मा अधिस शक्ति युक्त होने से निखिल व्यापार बाळा है। (१) इम भान से ही योगभाष्य में इस का उपन्यास है।
पातञ्जलदर्शनप्रकाश डोम् नमोऽन्तर्यामिणे । स्थितिप्रख्याशोकैर्गुणमयविकारैः परिस्खलत् । सदाऽऽयम्य .. प्राणानपगततमश्चित्तमचलन् । दृढं कृत्वा प्रत्याहृतकरणमातेर्मुनियरैर । उदासीनैज्ञेयः परमगुरुरीशो वि जयताम् ॥ १॥.. दोहा-जिह जाने विन होत जन, जनम-गरन-आराम। , " . हान होत भव जान जिह, सो मैं आतम-राम ॥१॥ कविव-योगीगन बन्दनीय जासु चरणारविन्द बन्दन, करत भवफन्द मिट जात है। जासु सुत सिरीचन्द वेदिवंशसिन्धुचन्द उदासीन-सेवसीय सूति सब गात है... जासु मत चित्त देत ब्रह्मरूप भात होत मिट जातं ममता विकार हट जात है। अमितचरित जगविदितं प्रभाव जासु , तासु गुरु नानक को सदा प्रनि-पात है. ॥ २॥ कर वन्दन हरि हर गुरु, जिन में रञ्च ने भेद करू विशद गुरुवर कृति, लव गुरुमुख से भेद - ॥१॥ माणायाम द्वारा त्रिगुणात्मक स्थिति मल्या-शोकसंज्ञक विकारों से इतस्ततः निरन्तर भ्रमणशील चित्त को तमरहित भी अचलं कर, मत्साहारद्वारा नियमितकरणप्तगृह मुनिवर उदासीनों कर ज्ञेय जो परमगुरु ईश पर सर्व से न आराम-विश्राम, भाराम के स्थान में (विसंराम) यह पाठ भी समी चीन ही है, यहां पर मपम श्लोक रो मानयोगशात का विषय कयन पुरागर " " . 7 उत्कृष्ट रूप से वर्तमान होय ।
- पातञ्जलदर्शनकाशे- कायिक वाचिक चित्त मल, हरण-शील जिहि वानि । मुनि पतंजलि मल हरें, कर रज-तम की हानि ॥३॥ भारत-भारत : हत कियो, भारत ललित वनाय । भाष्यकार श्रीव्यास पद, बन्दों हित चितलाय ॥४॥ राजकुमार उदार वर, धीर" वीर गुनखानि । रामदीन-हरि दीन-हित, कथिन वचनशुभ मानि ॥५॥ दर्शन भाषा-बद्ध कर, हरो । मोह-संचार । तिह ते भापा मैं करूं, हिय जिय-हित निरधार ॥६॥ योग समान न आन बल, भापत वेद आन कान मन न जिन, पातञ्जल पहिचान ॥७॥ वस्तुनिर्देश द्वारा सत्कार व्यापार बोधन किया है, औ इस दोहा से निज- वास्तवरूप का निरूपण किया है, औ अग्रिम कविच मे आधिकारिकबहकारी- पाधिक स्वरूप के परिचय पूर्वक इष्टदेव को वन्दन किया है, यह गुरूचरणों पुरान । , का हृदय है। *जिस पतञ्जलि मुनि की वैद्यक-व्याकरण योग अनुशासन रूप पाणी यथा- क्रम कायिक याचिक-चित्त मल के हरण में समर्थ है सो पतञ्जलिमुनि रज तम की हानि कर मेरे चित्त की पल हरण करें, इस कथन से यह बोधन किया कि जो पताल महाभाष्यकार औ चरक के प्रणेता है वहीं योगसूत्रकार हैं कुछ तीनों भिम नहीं, यह सब सम्यक्पकार से योगतत्त्वसमीक्षा के परिशिष्ट में स्पष्ट है। पा सूत्रकार को चन्दन कर इदानीं योगभाष्यकार वेदव्यास मुनि जी की चन्दना करते हैं (भारतआरत) इति, भारत नाम प्रपञ्च का औं आरत नाम दुःख का है, भारतललित=यह भारतपद महाभारतइतिहास का वाचक है, इस कथन से भी यह बोधन किया कि जो अष्टादशपुराण तथा महाभारत के कर्वा व्यासमुनि हैं वही व्यासमुनि योगभाष्यकार हैं अन्य नहीं, यह भी स्वामी जी कृत योगतत्त्वसमीक्षा के परिशिष्ट के भाषा अनुवाद में मैंने स्पष्ट किया है। 5 इदानी जिन महाराजकुमार के उत्साह औ साहाय्य से इस अमूल्यरन का जिज्ञासुयों को लाभ हुआ है उन के नाम कथनपूर्वक भाषा करने में हेतु प्रदर्शन करते हैं, (राजकुमार) इत्यादि ।
उपोद्घातः। अथ उपोद्घातः। इस निरगल मायिक सर्ग में क्या लौकिक (१) क्या परीक्षक निखिल प्राणिमात्र ही दुःख-जिहासा तथा सुखेप्सा के अर्थ निरन्तर वद्धपारेकर हुये दृष्टिगोचर हो रहे हैं क्योंकि जव नोत्रोन्मीलन कर कहीं दृष्टिपात किया जाता है तो एतादृश पुरुष कोई भी दृष्टिगोचर नहीं होता जो कि दुःख की निवृत्ति औ सुख की प्राप्ति के लिये यत्नशील न होय, परन्तु इतना विशेष है कि जो लौकिक लोक हैं वह अन्धगोलाङ्गुलन्याय (२) से.वास्वछन्द (अपने मनमाने) उपायोद्वारा ही दुःख-सुख की निवृत्ति तथा प्राप्ति को चाहते हैं औ जोपरीक्षकहें वहशास्त्रोक्त उपाय द्वारा दुःख सुख की निवृत्ति प्राप्ति के अर्थी होते हैं सर्वथा ही दुःख-सुख की निवृत्ति-प्राप्ति सर्वाभीष्ट है यह निर्विवाद है। इतना विशेष अन्य भी है कि प्राकृतजन सामान्यरूप से दुःख की निवृत्ति ओ वैषयिकसुख की अभ्यर्थनाशील होते (१) नैसर्गिक तथा शास्त्रजन्य बुद्धिप्रकर्प से रहित लौकिक कहे जाते हैं औ जो नैसर्गिक तथा शास्त्रजन्य बुदिप्रकर्षशील है वह परीक्षक है, साधारण- बुदिवाले लौकिक औ विद्वान् परीक्षक कहे जाते हैं यह स्थल अर्थ है । (२) अन्य नाम नेवहित का है औ गोलाहाल नाम वृपभ (बैल) की पुच्छ का है । अर्थात् जैसे कोई जंगल में भूल कर अपने ग्राम का मार्ग सोजता हुआ पुरुप (तुप इस मैल की पुच्छ पढ़ लो यह तमें ग्राम में पहुंचा देगा) इस पञ्चक के वाक्य को श्रवण कर गो-पुच्छ को रस्त में पकद अपने ग्राम को जाना चाहता है तैमे जो पुरुप विचारम्प नेत्र से रहित हुआ मोक्ष- 'मार्ग का अन्वेपी (तुम नप पढायो या मर्षि की पूजा मन करो, वा दन्तधावन मत करो) इस प्रकार के यन्यकों के वचन सुन कर किसी उपाय में मप दो भाते हैं यह अन्धगोलादालन्याय से मरत हुपे,कदे माने हैं।
पातञ्जलदर्शनकाशे- हैं औ विवेकी गर्न आन्यन्तिकदुःखनिवृत्ति औ दुःखाऽस- भिन्नसुख की प्राति के अर्थी होते हैं क्योंकि विवेकी जन ता- कालिकदुःखनिवृत्ति तथा परिणामदुःखमिश्रित (१)विषयसुख कीमाति को परमपुरुधार्य नहीं मानते हैं,एवञ्चप्रात्यन्तिकदुःख- निवृत्ति औ दुःखामिश्रितनिरतिशयसुख की प्राति ही परम- पुरुपार्थ होने से अभ्यर्थनीय है अन्य नहीं, क्योंकि ऐसा मानने से ही (हमें दुःख कदापि मत हो किन्तु निरन्तर हम सुखी ही रहें) यह अनुभव उपपन्न हो सकता है अन्यथा नहीं। यद्यपि कोइ दुःखाभाव को सुखार्थ मान कर सुख की प्राति को पुरुषार्थ ो कोई सुख को दुःखाभावार्थ मान कर दुःख की निवृत्ति को पुरुषार्थ, औ कोई विनिगमकाभाव से उभय को पुरुषार्थ मानते हैं इस से यह स्थल विवादग्रस्त है (२) तथापि "तदत्यन्तबिनोक्षोऽपवर्गः" (३) "विविधदुःखा- ऽत्यन्तनिवृत्तिः परमपुरुषार्थः" (8) इत्यादि महर्षिगोतम तथा कपिलमुनि के सूत्रों से दुःखनिवृत्ति को ही परमपुरुषार्थजानना। चदुःतनिवृत्ति ही पुरुषाऽभीष्ट होने से साधनीय है यह निष्पन्न हुआ। (१) जैसे कि विषय भोग में परिणामदुःख मिश्रित है वह वितीयपदि के १५ सूत्र में स्पष्ट है। (२) यह सब विषय स्वामीजी कृत कैवल्यकल्पलतिका के भापानुवाद में मने स्पष्ट किये हैं, अतः वहा ही देखलेना। (३) यह न्यायदर्शन के मधमाभ्याय के प्रथम आन्हिक का २२ सवा सूत्र है, 'तद्' शब्द से पूर्वसत्रोक्त "याधनालक्षण दुःख" इस दुःख पद का परापर्य करना, तथा च यह अर्थ हुआ कि तिन टुःखों से जो अत्यन्त विमोक्ष (रहित ) हो जाना यदी अपवर्ग (मुक्ति ) है। (१) माध्यात्मिवादि भेद से तीन प्रकार के दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति ही परमपुरुषार्थ है, यह सामयदर्शन के प्रथमाध्यायस्थ प्रथम सूत्र का अर्थ है।
पोद्घात। यद्यपि भूतकाल में विद्यमान दुःख तो भोगद्वारा ही निवृत्त हो चुका है औ वर्तमानकाल में भोगाऽऽरूद दुख भी द्वितीय क्षण में नष्ट होने से निवृत्तमाय ही है अतः इन दोनों की निवृत्ति साधनीय नहीं हो सकती तथापि भाविदुःख की निवृत्ति ही साधनीय जाननी, अतएव भगवानपतजलि ने "हेयं दुःखमनागतम्" इस सूत्र से भाविदुःख को ही हेय कहा है। सो यह भाबिदुःख की अत्यन्तनिवृत्ति आगामि-जन्म की निवृत्ति के अधीन है क्योंकि आगामि-देहसंबन्धप्रयुक्त दुःख को ही भाबिदुःख कहा जाता है, (१) नौ आगामिजन्म की निवृत्ति धर्माऽधर्म की निवृत्ति के अधीन है क्योंकि धी- धर्म के अनुष्ठान से ही आगामि शुभाऽशुभजन्म का लाभे होता है, औ धर्माऽधर्म की निवृत्ति रागद्वेष की निवृत्ति के अधीन है क्योंकि अनुकूल में राग औ प्रतिकूल में द्वेप से ही पर अनुग्रह निग्रह द्वारा वा शुभाऽशुभ कर्नाऽनुष्ठान द्वारा ही धर्माऽधर्म की उत्पत्ति होती है कुछ स्वाभाविक नहीं, शो रागद्वेष की निन्ति अविद्या-आत्माऽज्ञानादि पदवाच्य मिथ्या- ज्ञान की निवृत्ति के अधीन है क्योंकि मियाजान ही राग- द्वेप का मूल कारण है। अतएव "अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नादारा- णाम्” (२) इस सूत्र से भगवान् पतजलि ने अविद्या को रागद्वेष का मूल कारण कहा है। एवं च निखिलअनर्थमूलभूत अविद्यासंज्ञक मिथ्याज्ञान * यह द्वितीय पाद का १६ सन है। (1) न्यायदर्शनप्रकाश के २ सत्र में यह विचार विस्तर है। (२) यह द्वितीय पाद का रतीय मूत्र.है, अर्थ यहां ही देखो। .
पातञ्जलदर्शनप्रकाश- की निवृत्ति ही सर्वतः प्रथम प्रयोजनीय होने से करणीय यह फलित हुआ। अत एव महर्षि गौतम जी ने “दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्य ज्ञानानामुरारोत्तराऽपाये तदनन्तरापायादपवर्गः (१)इस सूत्र मिथ्याशाननितिपूर्वक ही उत्तरोत्तररागादिनिवृत्ति द्वारा अं त्यन्तिक दुःखनिवृत्ति रूप अपंवर्ग की प्राप्ति कथन किया है यद्यपि अनित्य में नित्यत्वज्ञान, अशुचि में शुचित्वज्ञान, दुःख में सुखत्वज्ञान, अनात्म. में आत्मत्वज्ञानभेद से यह मिथ्याज्ञान अनेक प्रकार का है तथापि आत्मा को यथावत् न जान कर जो अनात्मचित्त प्रभृति में आत्मत्वंज्ञान वही मिथ्थाज्ञान प्रथम निवर्तनीय है क्योंकि इस मिथ्याज्ञान के होने से ही निखिल मिथ्याज्ञान उपस्थित होते हैं श्री. इस मिथ्याज्ञान के नाश से ही सव नष्ट हो जाते हैं अत एव बृहदारण्यक उपनिषद् में "श्रात्मानं चेद् विजानीयादयम- (१) यह न्यायदर्शन के प्रथमाध्याय का द्वितीय सूत्र है। (दुःख) २१ सूत्र उक्त वाधना-पीड़ा तापसज्ञक सांसारिक सुख दुःख, (जन्म) .१.९ गन उक्त पुनरुत्पत्ति-नामक शरीर-इ' ग्यादि का परिग्रहण, (प्रवृत्ति) १७ सूत्र उक्त वाचिक-कायिक मानस सत्य-मिथ्या-रक्षा-हिंसा-दया-परद्रोह रूप शुभअशुभ प्रवृत्ति से जन्य धर्माऽधर्म, (दोप) १८ सत्र उक्त धर्माऽधर्म कारण मत्ति के जनक रागपादि दोप, (मिथ्याज्ञान) अनित्य-अमुचि दुःख अनात्म पदार्थविपया नित्य शुचि-मुख-आत्म ज्ञान-रूप विपर्यय ज्ञान, इन पांचों में से (उत्तरोत्तरापाये) उत्तर उत्तर कारण के अपांय-निवृत्त होने से (तदनन्तरा- ऽपापाद् ) पूर्व पूर्व कार्य के अपाय होने से जो निखिलदुःखमोक्ष वह अपवर्ग कहा जाता है, अर्थात् तत्त्वज्ञान से मिथ्यानान का नाम, मिथ्याजान के नाश में रागद्वेग का नाग, रागद्वेष के नाम से शुभाऽशुभकर्म का नाश, शुभाऽशुभ कम के नाश से जन्म का नाश, जन्म के नाम से हास का नाश, इस प्रकार जो कारण के नाश से कार्यों का नाश हो जाना यही मुक्ति है, विस्तर न्याय- दर्शनमकाश में देखो। है उपोद्घातः। मीति, पूरुषः किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनु संज्वरेद्"(१) इस श्रुति में व्यतिरेक द्वारा आत्मज्ञान को ही निखिल अनर्थ-का कारण कहा है। .. इस आत्माऽज्ञानरूप मिथ्याज्ञान का आत्मज्ञानरूप तत्वज्ञान ही एक मुख्य उच्छेदक है, क्योंकि तत्त्वज्ञान ही मि- प्याज्ञान का विरोधी है, यह आत्मज्ञान-नामक तत्वज्ञान ही प्रतम्भराप्रज्ञा पद का वाच्य है, अतः आत्मज्ञान ही पुरुष को प्रथम सम्पादनीय हुआ। यह भामशान जिन साधनों से प्रात होता है वह सा. चन यद्यपि भिन्न २ स्थानों में भिन २ प्रतिपादन किये हैं तथापि अवरण-मनन-निदिध्यासन ही मुख्य साधन मानने उचित हैं क्योंकि यही वेदसंमत हैं। अतएव “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (२) इसश्रुति में इन तीनों को ही आत्म- ज्ञान का साधन कहा है अन्य को नहीं। . ' तहां वेदवाक्यों का अद्वितीय-ब्रह्मविषयक-समन्वय के भय जो उपनिपदों के तात्पर्यविपयक-अज्ञानसंशयादिप्रति- (१) यदि यह पुरुष (आत्मा) अपने आप को जान जाय कि मैं एतादृश निखिलदुःखाऽनुपङ्गरहित नित्यमुक्त आनन्दस्वरुप हूं तो फिर यह किस की इच्छावाला दुआ ऑकिस प्रयोजन के लिये शरीर में मिथ्याऽध्यासकर अनेक प्रकार के विषयभोग के लिये दु:ख.भोग सकता है यह शुति का मर्य है। एवं च यह फलित हुआ कि आत्मा के अमान से ही निखिल इच्छा वा दुःख मोगादि उपस्थित होते हैं, अन पा कहते हैं, "यतिकदारा" इति । (२) याज्ञवलग अपनी मिया मैत्रेयी मे कहने हैं कि-अरे मैत्रीय निम को यमतत्वसंक्षक कैवल्य की कामना हाय तिस को आत्मा ही मातव्यमार्ग योग्य है, अत: आत्मज्ञान के लिये भयम वेदान्त का श्रवण पुत: मनन फिर निदिध्यासन का सम्पादन करे, यह अति का अर्थ है। .
-- पातञ्जलदानप्रकाशे- बन्धक का निवर्तक वेदान्तवाक्यों का उपक्रमादिषड्लिङ्ग द्वारा निर्णयजनक विचार इस का नाम श्रवण है। अन्य मतों के संग विरोधप्रयुक्त प्रमेय की असम्भावना रूप प्रतिवन्धक के निराकरणार्थ जो श्रुतिस्मृतिसहकृत तर्क का अनुसरण कर निरन्तर वेदवास्यों के अर्थ का चिन्तन वह मनन है। मनन द्वारा निश्चित किये हुये पदार्थ-विषयक जो विप- रीतभावना की निवृत्ति के अर्थ चित्त को एकतान कर देना इस का नाम निदिध्यासन है। इन तीनों में से आत्मज्ञानरूप तत्वज्ञान का निदिध्या- सन अन्तरगसाधन है औं अन्य वहिरड्ग हैं, अतएव "त- तरतु तं पश्यति निष्कलं ध्यायमानः"इस श्रुति में ध्यानशील को ही आत्मज्ञान की योग्यता वाला कहा है। " निदिध्यसन ओ ध्यान यह दोनों शब्द एकार्थक हैं, (१) अत एव शङ्कराचार्य जी ने (निदिध्यासितव्यः) इस श्रौत- पद का (निश्चयेन ध्यातव्यः) निश्चय कर ध्यान कर्तव्य है, यह अर्थ किया है। यह ध्यान ही कालक्रस से परिपाकदशा को प्राप्त हुआ समाधि कहा जाता है, अतएव स्कन्दाचार्य ने ध्यानद्वाद- शकेनैव समाधिरभि धीयते" इस वाक्य से ध्यान के परिपाक को समाधि कहा है। बहुत क्या कहें यह निदिध्यासन ही वृद्धि को प्राप्त हुआ परप्रलयान, सम्प्रज्ञात, धर्ममेघ, ऋतम्भरा-प्रज्ञा,भुवास्मृति, (१) पति में ध्यानभील को आत्मज्ञान की योग्यतावाला कहा है कुछ निदिध्यासनाल को, नी, हरा आशङ्का का पारण करते हैं-'निदिध्यासन औ ध्यान यह दोनों शब्द एकार्थक है' इति ।
. उपोद्घातः। गुणवैतृष्ण्य, परवैराग्य, ज्ञानप्रसाद, प्रसङ्ख्यानपरमकाष्ठा, असस्त्रज्ञात, निर्विकल्पसमाधि (१) शादि नामों से व्यवहृत हो जाता है। यद्यपि विषयभोगवासना तो श्रवण के अंगभूत यमनियमादि से ही निवृत्त हो जाती है औ प्रमाणगत तथा प्रमेय गत असंभा- वना (२) श्रवण-मनन से निवृत्त हो जाती है अतः इन तीनों प्रतिबन्धकों के अभाव के लिये कुछ निदिध्यासन की अपेक्षा नहीं है तथापि विपरीतभावना (३) की निवृत्ति के अर्थ निदिध्यासन अवश्य ही शरणी करणीय है क्योंकि बिना विपरीतभावना की निवृत्ति के अप्रतिबद्ध साक्षात्कार का होना असम्भव है। अतएव "अथ तदर्शनाऽभ्युपायो योगः" "श्रद्धाभक्ति- ध्यानयोगादवहि” • “अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोको जहाति" : "ततस्तुतं पश्यति निष्कलं ध्यायमानः" "कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षताऽऽवृतचक्षुरमृतवमिच्छन्" (१) इस निर्विकल्पसमाघि पर्यन्त ही ध्यानद्धि की सीमा है, इन में से आदि के पञ्च भेद सम्मनातयोग के अन्तर्गत है औ अन्त के पदभेद असम्म- सात के अन्तर्गत हैं, यह भी जानो। (२) वेद का तात्पर्य द्रुत विषयक है वा अद्वैतविषयक है इस का नाम प्रमाणगत असंभावना है, औ चितिशक्ति प्रकृति से भिन्न है या नही, भिन्न होने पर भी यह कर्ता है वा अकर्ता, अकर्ता होने पर भी वह कान धर्मवाली है पा ज्ञानस्वरूप, इत्यादि संशय का नाम प्रमेयगत असंभावना है। (३) यद्यपि वेदों का तात्पर्य अद्वैत में होने से अद्वैत किसी मान से वाषित नहीं तथापि मैं उस परमात्मा को साक्षात्कार नहीं कर सकता किन्तु सास्त्रद्वारा परोक्ष ही जानता हूं इत्यादि भ्रान्तिसंस्कार परम्परा का नाम विपरीतभावना है। * तिस परमात्मा के ज्ञान का उपाय योग है। न श्रद्धा-भक्ति ध्यानयोग द्वारा आत्मा को जानो, करस्य उपनिषद् । * अध्यात्मपयोग के लाभ से देव परमात्मा को जान कर न हप- उपोद्घातः। (१) इत्यादि श्रुतियों में निदिध्यासनसंज्ञक योग को आत्म- साक्षात्कार का कारण कहा है। मनु भगवान ने भी "सूक्ष्मतां चान्ववेक्षेत योगेन पर- मात्मनः" इस वचन से योग कोही परमात्मनिष्ठसूक्ष्मता के साक्षात्कार का कारण कहा है। एवं योगी याज्ञवलक्य ने भी "इज्याऽऽचारदमाऽहिंसा- दानस्वाध्यायकर्मणाम् अयन्तु परमो धर्मों यद् योगेनाऽऽत्म दर्शनम्” (२) इस वचन से योगद्वारा आत्मसाक्षात्कार को 'परम धर्म कहा है। एवं ब्रह्मसूत्रकार वेदव्यास मुनि ने भी "अपि संराधने प्रत्यक्षाऽनुमानाभ्याम्” (३) इस सूत्र से योग को ही आत्म- साक्षात्कारकारक प्रतिपादन किया है। न्यायदर्शनकार महर्षि गोतम जी ने भी "समाधिवि- शेषाभ्यासाद्” (४) इस सूत्र से योगाऽभ्यास कोही तत्त्वज्ञान का उपाय कथन किया है। शोक से रहित हो जाता है, यह कठश्रुति का अर्थ है। (१) कोईक धीर पुरुप अमृतत्व की इच्छा वाला हुमा इन्द्रियत्ति को निरुद्ध कर प्रत्यग्आत्मा का साक्षात्कार करता है। (२) यज्ञ-भाचार-दम-अहिसा-दान स्वाध्यकों के मध्य में से यही परम थर्म है जो कि योग से आत्मा का ज्ञान हो जाना। (३) संराधन नाम ध्यान का औ प्रत्यक्ष नाम श्रुति का औं अनुमान नाम स्मृति का है अर्थात् ध्यानकाल में योगीलोक निरस्तसमस्तप्रपज्य परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं क्योंकि श्रुतिस्मृतियों में ऐसेही प्रतिपादित है, तहां श्रुतियां मूल में स्पष्ट ही हैं, औ “योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्" इत्यादि स्मृतियां भी जान लेनी, योगी लोक सनातन परमात्मा का साक्षा- कार करते हैं, यह स्मृति का अर्थ है। (2) समापिविशेष के अभ्यास से तत्वज्ञान उत्पन्न होता है, यह न्यायदर्शन के ४ अ. २ आन्हिक गत ३८ सब का अर्थ है।
उपोद्घातः। एवं वरुण मुनि ने भी स्वपुत्र भृगु के प्रति “तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व” इस श्रुति से सनइन्द्रिय की एकाग्रतारूप (१) तप-वाच्य योग को ही ब्रह्मज्ञान का कारण कहा है। बृहदारण्यकोपनिषद् के चतुर्थाऽध्यायगत मैत्रेयी ब्राह्मण के व्याख्यान में भाष्यकार शङ्कराचार्य ने भी “यदैकत्वमे- तान्युपगतानि तदा सम्यग्दर्शनं ब्रह्मैकत्वविषयं प्रसीदति नान्यथा श्रवणमात्रेण" इस वाक्य से केवल श्रवण को ब्रह्म- साक्षात्कार के अभाव कथन पूर्वक निदिध्यासनसहित ही श्रवण को ब्रह्म के साक्षात्कार का जनक कहा है। एवं पुराणों में भी “योगात् सं जायते ज्ञानं योगो (२) मय्येकचित्तता” “आत्मज्ञानेन मुक्तिः स्यात् तच्च योगाद् ऋते नहि" (३) योगाग्निर्दहति क्षिप्रमशेष पापपञ्जरं, प्रसन्नं जायते ज्ञानं ज्ञानान्निर्वाणमृच्छति” (४) "स्वसंवेद्यं हि तद् ब्रह्म कुमारी स्त्रीसुखं यथा, अयोगी नैव जानाति जात्यन्धो हि यथा घटम्" (५) “दुःसहा राम संसारविपवेगविपूचिका, (1) "मनसथैन्द्रियाणां चौकानयं परमं तपः" इस स्मृति से भाप्यकारों ने यहां पर मन औ इन्द्रियों की एकाग्रता का ही नाम तप कहा है। (२) योग से ज्ञान उत्पन्न होता है औ योग नाम मेरे विषयक चित्त की एकाग्रता का है, यह आदित्यपुराण के वचन का अर्थ है । (३) आया के ज्ञान से मुक्ति होती है औ सो ज्ञान योग से विना दुर्लभ है, यह स्कन्दपुराण के वाक्य का अर्थ है (१) योगम्प अग्नि शीघ्र ही निखिल पापपञ्जरपुञ्ज को दग्ध कर देता है, तिस पाप के दग्ध होने से प्रतिवन्धरहित ज्ञान प्राप्त होता है, औ शान से निर्वाण संज्ञक मोक्ष प्राप्त होता है, यह कूर्मपुगणस्य गिय चारप का अर्थ है। (५) यथा कुमारी पतिसगमजन्य स्वीसस को नहीं जान सकती औज. न्मान्ध पुरुप घट को नहीं जान सकता तया योगाभ्यास से रहित पाप आत्मा को भी नही जान सकता, यह दक्ष मुनि के पचन या अर्थ है। ६ " उपोद्घातः। योगगारुडमन्त्रेण पावनेनोपशाम्यति” (१) इत्यादि वचनों से योग को ही आत्मज्ञान का जनक कहा है। एवं च श्रवणमात्र को आत्मसाक्षात्कार का जनक न मान कर श्रवणमननोत्तरभाविनिदिध्यासन पद याच्य योग- युक्त चित्त को ही आत्मसाक्षात्कार का करण मानना उचित है, अतएव "दृश्यते त्वग्रया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः इत्यादि श्रुतियों में एकाग्र चित्त को आत्मसाक्षात्कार का करण कहा है। एवं गीताभाष्य में पूज्यपाद शङ्कराचार्य जी ने भी “शास्त्राचाव्योपदेशशमादिसंस्कृतं मन आत्मज्ञाने करणम्" इस वाक्य से योगसहकृत मन को ही आत्मज्ञान का करण कहा है। एवं वृहदारण्यक में भी “समाहितो भूवाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्येत्” (२) इस श्रुति से समाहितचित्त योगी को ही आत्म- ज्ञान का अधिकारी कहा है। एवं छान्दोग्योपनिषद् में भी सनत्कुमार ने नारद के प्रति “सत्वशुद्धो ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः"(३) (१) हे राम ! जन्ममरणार संसार संज्ञक जो विपवंग के तुल्य दिपूचिका रोग है वह रिना योगरूप गारुदमन्त्र से शमन (निवृत्त) होनी असम्भव है, 'यह वशिष्ठ वाक्य का अर्थ है । * श्रवण मनन से सूक्ष्म दृष्टिवाले पुरुपा कर निदिध्यासन द्वारा सक्ष्म औ एकाग्र गुद्धि से आत्मा दृश्य होता है यह कटश्रुति का अर्थ है। (२) (समाहित) समाधिनिष्ट हो कर अन्तःकरण में स्थित हुये आत्मा को देखे, यह उस का अर्थ है। (३) हितमितमध्यभोजन कप योग के अङ्ग से अन्तःकरण की शन्दि होने पर धस्मृति का लाभ होता है भी उस के लाभ से विवेक आदि सर ग्रन्धियें नियुक्त हो जाती है।
उपोद्घातः। इत्यादि से समाधिजन्य ऋतम्भराप्रज्ञासंज्ञक ध्रुवास्मृति को ही मोक्ष का कारण कहा है। यद्यपि जिन को विपरीतभावना उदय नहीं होती है उन को श्रवण-मनन से ही अप्रतिवद्ध ज्ञान का लाभ होने से कुछ नियम से योग आत्मज्ञान का कारण नहीं है, अतएव. "दो क्रमो चित्तनाशस्य योगो ज्ञानं च राघव, योगो वृत्तिनि- रोधी हि ज्ञानं सम्यगवेक्षणम्” (१) इस वाक्य से वशिष्ठमुनि ने विकल्प कहा है, औ ध्यानदीप में “बहुव्याकुलचित्तानां विचारात् तत्त्वधीनहि, योगो मुख्यस्ततस्तेषां धीदर्पस्तेन • शाम्यति' (२) इत्यादि वाक्यों से विद्यारण्य ने भी विक्षिप्त चित्तों के प्रति ही योगाऽनुष्ठान कहा है कुछ निखिल जिज्ञा- सुयों के प्रति नहीं, तथापि जिन पुरुषों को पूर्वजन्माऽभ्यस्त योग से इस जन्म में पूर्वाऽभ्यस्त योगवल का लाभ हुआ है उन योगभ्रष्टों विषयक इन वचनों का तात्पर्य होने से दोपा- ऽभाव जान लेना, नहीं तो शङ्कराचार्य्यादि के मत सेन्यास को ज्ञानसाधनता का लाभ नहीं होगा क्योंकि जनकादि को विना संन्यास के ही ज्ञानलाभ होने से तहां संन्यास.का व्यभिचार दृष्ट है। अतएव सर्वज्ञमुनि ने इस व्यभिचार के प्राप्त होने पर "जन्मान्तरेषु यदि साधनजातमासीत्संन्यासपूर्वकमिदं श्रवणा- दिकं च विधामवाप्स्यति जनः सकलोऽपियन तत्राश्रमे वसन्न (१) चित्तनाश सप मोक्ष के दो उपाय है एक योग औ द्वितीय पान, यह इस का भाव है। (२) विक्षिप्त चित्तों को केवल विचार से आत्मशान न होने से योग ही स्न के लिये मुख्य है क्योंकि योगद्वारा चित्त विक्षेप से रहित हो जाता है।
- -- . २४ उपोद्घावः। निवारयामः" : इस वाक्य से पूर्वजन्मअनुष्ठित संन्यास सद्- भाव को मानकर व्यभिचार का परिहार किया है, एवं च जैसे कहीं विना संन्यास से भी ज्ञान का लाभ होने पर पूर्व- जन्मकृत संन्याल को मान कर संन्याल को ज्ञान का अङ्गः स्वीकृत है तेरो यहां भी जहां विना योगाभ्यास से ज्ञान प्राप्त हो जाय तहां पूर्व जन्माऽनुष्ठित योग का सद्भाव मान कर योग को आत्मज्ञान का कारण जानना । । अतएव भगवान ने "तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्व देहिक, यतते च ततः भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन” (१) इस वाक्य से पूर्वजन्मअनुष्टित साधन सम्पति से उत्तर जन्म में फल का लाभ कहा है। ।" इसी अभिप्राय से ही पुराणों में "जैगीव्यो यथा विप्रो यथा चैवाऽसितादयः, क्षत्रिया जनकाधास्तु 'तुलाऽऽधाराव्यो 'विशः, सम्प्राप्ताः परमां सिद्धिं पूर्वाऽभ्यस्तस्वयोगतः” (२) इत्याटि वाक्यों से जनकादि को पूर्वाऽभ्यस्तयोग से ज्ञान का लाभ कहा है। किञ्च जिन पुरुषों को पूर्वजन्माऽभ्यस्त साधनों से कथ- ञ्चित् तत्त्वज्ञान उदय हो जाता है उन को भी प्रारब्धकर्म- प्रयुक्त दृष्ट दुःख की निवृत्ति के अर्थ योग अवश्य ही आश्रय- (1) यदि पूर्वजन्म में ही संन्यासपूर्वक श्रवणादि का अनुष्ठान किया होय तो उत्तर जन्मे में जिस किमी आश्रम में रह कर भी पुरुप विना संन्यास से विद्या का लाभ कर लेता है, इस के निवारण में किसी का सामर्थ्य नहीं है। । (२) तिस उत्तरजन्म में पूर्व देह में होनेवाली बुद्धि के संग वह योगभ्रष्ट संयोग का लाभ करता है, औ उसी से ही वह शीघ्र २ मोक्ष के लिये यन्न में तत्पर होता है। (२) जनकाटिक पूर्वजन्माऽभ्यस्त योग से मोक्ष को प्राप्त हुये है। -- ।
5ष्ट, योग उपोद्घातः। णीय है क्योंकि आत्मज्ञान आगामी तथा सश्चित कमाँ के ही नाश करण में समर्थ है कुछ प्रारब्ध कर्म की निवृत्ति में नहीं। अतएव ब्रह्मसूत्रकार बेदव्यास जी ने “तदधिगम उत्तर पूर्वा- ऽघयोरसंश्लेपविनाशौ तव्यपदेशाद्" । इस सूत्र से प्रारब्ध कर्मों से भिन्न ही कर्मों की आत्मज्ञान से निवृत्ति कही है। एवं च प्रारब्धप्रयुक्त दृष्ट दुख की निवृत्ति के अर्थ तथा मनोनाशवासनाक्षय द्वारा जीवन्मुक्ति के संपादनार्थ सों- मुमुक्षु को उपादेय है यह सिद्ध हुआ। यदि कोई यह कहै कि आत्मज्ञान द्वारा विदेहमुक्ति के लाभ से ही कृतकृत्य होने से जीवन्मुक्ति की कुछ आवश्य- कता नहीं कि जिस के लिये योगाभ्यास द्वारा मनोनाश वा वासनाक्षय किया जाय, तो उस से हम यही कहेंगे कि आप देवलोक के भोग से ही अपने को कृतकृत्य मानकर विदेह मुक्ति के लिये महा वाक्य का श्रवण भी मत कीजिये। यदि यह कहो कि क्षय अतिशय आदि दोष विशिष्ट होने से स्वर्ग हेय है तो निखिल दोपों में अग्रगण्य मनोराज्य तथा वासना को स्वयंदोषरूपहोने से यह दोनों भी योग द्वारा हेय 'क्यों नहीं हो सकते, यदि यह कहो कि मनोराज्य से क्या अनिष्ट होता है कि जिस की नित्ति के लिये योगाभ्यास अपेक्षित है तो और अनिष्ट तो अपने अन्तर्यामी से पूछिये पर जो अनिष्ट कृष्णमहाराज जी ने श्रीमुख से कथन किया है वह हम सेश्रवण कीजिये-चथा "ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्ग- स्तेपूपजायते"-इत्यादि • तिस परमात्मा के साक्षात्कार होने से आगामी नया सञ्चित पुण्य पाप ना संसर्गामाय गा विनाश हो जाता है क्योंकि वेद में पेमे ही लिखा है, यह इस का संक्षिप्त अर्थ है । न. १ पाद ' मल १३ | * पिपयों का ध्यान करते हुये पाप का तिन विषयों में (पह विषय मेरे उपोद्घात । एवं च निखिलाऽनर्थ भाजन प्रारब्ध कर्म का निवर्तक तथा मनोनाशवासना क्षय द्वारा जीवन्मुक्ति का संपादक जो योगाभ्यास वह अवश्यही मुमुक्षु को उपादेय है, सो यह योगयद्यपि श्वेताऽश्वतर, कट,मैत्रायणी आदि उपनिषदों में प्रतिपादित है तथापि वह एकत्र साङ्गोपाङ्ग निवद्ध नहीं हैं, अतः परमकृपालु पतञ्जलिमुनि ने मुमुक्षुयों के उद्धारार्थ वह योग सूत्र द्वारा साङ्गोपाङ्ग चार पादों में विभक्त किया है, इसी का नाम योगचतुष्पादी वा योगशास्त्र औं पातज्जलदर्शन है, इन योगसूत्रों को अतिसंक्षिप्त औ गूढार्थ होने से अनति- प्रौढ ज्ञानशालीजनों का इन से उपकार न देखकर भगवान वेदव्यास जीने भाष्यद्वारा भूपित औ परिवर्तित कर विशद किया है, औ इस भाष्य को भी क्षणिक-परमाणु पुत्लादिनि- रासप्रभृति अतिगहन विपयों से संवलित जान कर निखि- लतन्त्रस्वतन्त्र वाचस्पतिमिश्र ने तत्ववैशारदी नामक व्याख्या से अलंकृत किया है, यद्याप अनेक स्थलों में कठिन होने से भाष्य ो व्याख्या को अल्पविवरण द्वारा परिभूषित कर मैंने पहिलेभी निखिलदेशीय विद्वजनों के यह दृष्टिगोचर किया है,तथापि हिन्दीभापावेत्ताओं के उपकारार्थइदानी हिन्दीभाषा में इस का अनुवाद कर यह प्रकाशित किया जाता है- सुप के जनक हैं। इस प्रकार सग हो जाता है इस सङ्ग से (यह विपय मुझे मिलें) इस प्रकार काम होता है और काम से . उस काम के हनन करने वाले विपयक कोध उत्पन्न होता है औ क्रोध से संमोह-कर्तव्याऽकर्तव्य विवेक का अभाव होता है, भी संमोह से गाखाचार्योपदिष्ट अर्थ विषयक स्मृति का नाश होता है औ स्मृति के नाश से आत्माऽऽकार बुद्धि का नाश होता है, औ बुदि के नाश से पुरुप नाश को प्राप्त हो जाता है. अर्थात रुपार्य से भ्रष्ट हुआ मृतमाप हो जाना है।
पातञ्जलदशेनप्रकाशे समाधिपादः । १ नमोऽन्तर्यामिणे। भगवान पतञ्जलि बुद्धिमान योगजिज्ञासजनों की प्रकृत शास्त्र में महति के अर्थ (लिये) वात्पर्यद्वारा (6) अनुबन्ध चतुष्टय का प्रतिपादन करतेहुये मखतः (२) चिकीर्पित शाख के आरम्भ की भतिज्ञा करते हैं- । , टिप्पण-अप स्यामी आत्मस्वरुप उदासीन कृत विषमस्थल विवरणम् । नमः श्री शरणापन्नपरित्राणपरायणनारायणाय गुरवे । (१) जिन्हों के जाने बिना ग्रन्थ के अध्ययन में प्रवीण पुरुषों की प्रवृत्ति नहीं हो सकती है एवंभूत नो ग्रन्थ में प्रवृत्ति के प्रयोजाभूत विषय प्रयोजन संबन्ध अधिकारी, वह अनुबन्ध कहे जाते हैं, अर्थात यावत्काल (जब तक ) पुरुष को यह ज्ञात नहीं होगा कि इस प्रन्थ में कौन २ विषय हैं, भी इस मन्थ का प्रयोजन क्या है, ओ प्रयोजन के साथ ग्रन्थ का सबन्ध क्या है, जो कोन पुरुष इस का अधिकारी है, तायकाल (तन तक ) बुद्धिमान पुरुप की किसी ग्रन्थ में प्रवृत्ति नहीं होती है, इसी से ही शिष्टों ने विषय आदि चारों का नाम अनुबन्ध रखा है, क्योंकि यह चारोही अनु नाम अपने ज्ञान से अनन्तर ज्ञाता पुरुषों को शास्त्र में बद्ध कर देते हैं, एवंच प्रकृत योगशास्त्र मे भी पुरुषों को प्रवृत्ति के अर्थ यह अनुबन्ध प्रति पादन करने उचित हैं, नहीं तो प्रकृत शास्त्र में जिज्ञासुजनों को प्रवृत्ति नहीं होगी, सो यहां पर 'योगानुशासन ' इस शब्द से पक्षण, भेद, साधन, फा, सहित योग का निरूपण इम शास्त्र का विषय कथन किया है, ओ निखिल अनर्थ प्राण पूर्वक चितिक्ति पुरुप की स्वरूपायस्थिति रूप दोयल्प इस शास्त्र का मुख्य प्रयोजन है, सो अन्तिम सूत्र से सूत्रकार ने कहा है, एवं अवान्तर प्रयोजन अणिमादि ऐश्वर्य का लाभ भी जान लेना, औ जो पुरष इन्ह दोनों पक्षों की सिr (लाभ की पहा) पाला है वही इस का अधिकारी है, एवं योग को केवत्य या साम्यसाधन मार, तथा शाख मी योग का प्रतिपायप्रतिपादका भाव संयन्ध भी नाग ऐना, पाप सूत्रकार ने इस प्रकार स्पररूप से श्री मुग से स्पपं यह नहीं कहा है तथापि सूनबार या मह अभिप्राय है, इसी से ही 'तापर्य द्वारा ' यह गुरचरणों ने रिखा है। (२) मुरतमाक्षान् शन्दोधारण द्वारा, ! परने की इन्छा या विषय भूत विवातिहा जाता है। .
२ पातञ्जलदर्शनमकायो। १ सू० अथ योगाऽनुशासनम् ॥ १॥ भाषा-अथ शब्द यहां पर न अधिकार (आरम्भ ) रूप अर्थ का वाचक वा द्योतक है, (१) औ योग नाम अग्रिम सूपासे रत्ति निरोधका वाचक है। एवंभूत योग का लक्षण, भेद, साधन, फल, निझपन पूर्वक अनुशासन-प्रति- पादन करनेवाला जो शास्त्र यह योगाऽनुशासन कहा जाता है.! , तथा च यह अर्थ हुआ कि योग एवं योगोपयोगी अभ्यास वर्गग्य यम नियमादि पदार्थों का लक्षण (२) भेद साधन फल'वर्णनघाले 'योगशास्त्र का मै आरम्भ करता हूं, (३) यद्यपि सूत्रकार ने योग का ही आरम्भ कहाँ है तथापि यथा लोक में राजा गमन करता है इस कथन से सेना आदि,परिवार सहित ही राजा का बोध होता है तथा यहां भी-प्रधान भूत योग का आरम्भ कहने से तत्साधन अभ्यासादि रूप परिवार का भी आरम्भ जान लेना । येधपि ( मङ्गलाऽनन्तरारम्भप्रश्नकास्यप्वयो अथ ) (४), इस कोप 7 (1) कुछ यह गत जानना कि सर्वत्र हो अथ शब्द का अर्थ- आरम्भ हो क्योंकि ( अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ) इत्यादि मीमासा सूत्रों में अन तर अर्थ भी इस का शिष्टों ने माना है, इसी के बोधनार्थ कहा है ' यहा पर,' इति अधिकार, प्रस्ताव ओरम्भ, यह तीनों शब्द एकार्थक हैं। + ( १) किसी का यह मत है कि उथ शब्द का तो आरम्भ नहीं है किन्तु जहा पर मय शब्द । वा उमारण होय यहा मानना का रिखनेवाले का तात्पर्य ( आरम्भ करता हु ) इस शब्द के अध्याहार में है, इसी का नाम द्योतक है। of (२) योग का लक्षण २ सूत्र, ओ भेद १७११८ 1 सुन से, ओ साधन १२ सूत्र से, फल अन्तिम सूत्र से, औ शबान्तर फल तृतीय पाद से जान लेना, एव अभ्यास या क्षण भेद १३ । १४ । सूत्र से, औ वैराग्य का १५ । १६ । सूत्र से जान लेना। एव अन्य भी स्थाने स्थान समझ लेना। (। (३) यद्यपि ( हिरण्यगर्भो मोगस्य वक्ता नान्य पुगतन ) इस योगी यापुर क्य के पविय से प्राचीनाचार्य हिरण्यगर्भ ही योगशास्त्र का वक्ता प्रतीत होते हैं, तथापि उसी हिरण्यगर्भ उपदिष्ट योग का पतञ्जाले मुनि सागोपाङ्ग विस्तरपूर्वक निरर्पण वारते हैं यह नानलेना, इसी से है। योग शासनम्' ऐसे न कहकर मुनि ने योगानुशासनम्' यह कहा है, क्योंकि मनु नाग पश्चात् का है, तथा च हिरण्यगर्भ उपदिष्ट योग का ही में पुन विस्तर पूर्वक प्रतिपादन करता हू यह इस या आशय है । (१) मङ्गल, अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न, मपूर्ण इह पाचो गर्थों में गथ अयो शन्द्र । पौ शक्ति है। A . .
१ an गणाधिपादः। ३ से अप शब्द के अनेक अर्थ प्रतीत होते है तथापि (अप इत्ययमधिकारार्थः, इ स. भकृतसूत्रस्थभाष्य से यहां आरम्भार्थक ही जानना 1 यद्यपि शिष्टों के आचरण से ( १ ) वा ( ओद्वाराऽथकारौ) इत्यादि सूत्र मभृति ममाणा से; ग्रन्धारम्भ में अवश्य कर्तव्य मङ्गलाचरण के वोधनार्थ भी अथ शब्द का प्रयोग करना आवश्यक है। तथापि यथा लोक में भोजन आदि अन्य प्रयाजन के लिये नीयमान दधि आदि -मङ्गल्य , पदार्थ भी स्थानान्तर गमन वा पुरुप को मयाण समय दृष्टि गोचर हुये शुभ सूचक होते हैं क्या आरम्भ भादि अन्य अर्थ वोधन करने के लिये उच्चारण किया हुआ अथ शब्द भी मृदङ्गादि वनिवत् श्रवण मात्र से ही मद्गल घोधन करता है (२) कुछ अर्थ इस का महल नहीं है यह जानना, यही सर्व आचार्यों का मत है, किंच भारम्भर्थिक न मानने से मकृत शास्त्र के भारम्भ की प्रतिज्ञा का लाभ भी नहीं होगा, इस से शास्त्रारम्भ की प्रतिज्ञा के लाभार्थ यहां पर अथ शब्द 'को भारम्भ अर्थ ही करना उचित है, अन्य अर्थ की तो योग्यता ही नहीं है, "यद्यपि शिप्य के मन से अनन्तर योग शारन का आरम्भ करते हैं इस मकार THE TATTr यह अथ शब्द आरम्भ अर्थ का वाचक है, यह भाष्य का अर्थ है । (1) जिस कार्य का कोई श्रुति वा स्मृति साक्षात विधान न करती होय कि तु शिष्ट जन अनुष्ठान करते हाय पह कार्य भी सदाचार रूप प्रमाण से करना उचित माना जाता है, जैसा कि होलिका दहन बस तोसन प्रभृति तत्तद्देशीय बायो का करना, यह पूर्व मीमासा में निर्णीत है, एय च मङ्गलाचरण पूर्वक प्रथारम्भकरन रूप शिष्टाचार प्रमाण से प्रथ के आरम्भ में मङ्गलाचरश अभक्ष्य कार्तव्य है यह इस का भाव है, इस प्रकार अन्य प्रथकारों के मत से मङ्गलाचरण की पर्तव्यता प्रतिपादन कर इदानी श्री स्वामी जी अपने गत से मङ्गलाचरण करन में प्रमाण उप यास करते हैं (ओंकार) इत्यादि, यह सूत्र पात्यायनमुनि प्रणीत शुक्लयजुर्वेदप्रातिशाख्य मा १७वा है, आरम्भ में मानार्थ ओंकार वा अथ शन्द का उच्चारण करना उचित है, यह भाष्ययार उबट्टाचार्य ने इस का अर्थ किया है, एक सादग्य दर्शन के पञ्चमाध्याय के ( मङ्गला- चरण, शिष्टाचाराफलदर्शनात् अतितश्च ) इस प्रथम सून से कपिलमुनि ने भी मङ्गला- चरण अवश्य वर्तव्यता योधन गियी है, इसी किये ' इत्यादि सून' यह आदि पद दिया है, सूत्र प्रभृति पद से 5 मद्गलादीनि ' इत्यादि महाभाष्पकार के वाक्य पासाद ना। (२) जैसा कि मृदङ्ग दर्शन मङ्गल मा बोधका नहीं है कि तु मृदङ्ग पनि शवण, तैमे अय शब्द का अर्थ गाल नहीं है कि तु भाणही गगल्य है। ..1 .) यह अथ. F पातजलदर्शनकाशे। - अनन्तर रूप अर्थ का भी यहां संभव हो सकता है तथापि ऐसी उस की आवश्य- कता नहीं है जैसी कि आरम्भ की प्रतिज्ञा की आवश्यकता है, किंच यदि अब शब्द का अर्थ आनन्तर्य माना जायगा तो 'आरभ्यते' इस पद का अध्याहार कर (मैं आरम्भ करता हूं) यह अर्थ करने में गौरव भी होगा, इस से अथ शब्द का यहां आरम्भ ही अर्थ जानना, यहां पर विचारान्तर भाषावेत्ताओं को अनुपयोगी जान कर नहीं लिखा गया है ॥ १ ॥ इस प्रकार योगशास्त्र के भारम्भ की प्रतिज्ञा कर इदानी द्वितीय सूत्र से योग का लक्षण कहते है- सू० योगश्चित्तत्तिनिरोधः॥२॥ भापा-चित्तरत्तियों के निरोध (रोकने) का नाम योग है, गणनयस्वरूप प्रकृति के सत्व रज तम इन्ट तीनों गुणों में से जो लायव औ प्रकाश स्वभाव वाले स्वच्छ सत्व गुण का परिणाम * (कार्य) विशेग वह चित्र (१) कहा जाता है, इसी चित्त के ही परिणामों की वृत्ति संज्ञा है । अर्थात् (-यथा अगापजल परिपूर्ण नदी में घायु प्रयुक्त चाश्चल्य से जल ही तरङ्ग भाव से परिणत हुआ गमन आगमन शील हो कभी तीर को त्याग घहिर्मुख होय इतस्तत: ( इधर उधर ) बहता हुआ प्रवाह से न मिलकर वीर सन्निहित गर्ने वा खाड़ी प्रभृति से संबद्ध होकर तदाकार परिणाम को प्राप्त होता है, औ कभी वही जल अपनी पहिर्मुखता का त्याग कर प्रति लोम ( उलटे) अंग को धारन कर स्वअङ्गी भूत प्रवाह के सन्निहित ही तरङ्गाकार से परिणत होता है, औ कभी बात प्रयुक्त चंचलता के अभाव से अपने स्वरूपभृत प्रवाह में ही अन्तर्भूत हो जाता है, तथा चित्त रूप नदी में भी विषयज्ञान जनित संस्कार रूप वायु-से अनेक ( * ) पूर्व धर्म के परित्याग पूर्वक धर्मान्तर के ग्रहण करने को परिणाम कहते हैं, जैसा कि दुग्ध स्वनिष्ठ विवक्षण माधुर्य तथा अतिद्रवीभूतता औ रेचकता रूपधर्म को त्याग कर काठिन्यादि रूप धर्मान्तर के ग्रहण करने से दधि कहा जाता है, इसी से ही दधि को दुग्ध या परिणाम कहते हैं, सांख्य योग मत में कार्य की परिणाम सज्ञा है । (१) यद्यपि साख्य चा योग दर्शन में तत्वों की उत्पत्ति औ गणना प्रकरण में चित्त तत्व का कहीं नाम नहीं आता है तथापि इह दोनों दर्शनों में बुद्धि के स्थान में चित्त का ओ चित्त के स्थान में बुद्धि का परस्पर व्यवहार देखने से बुद्धिसज्ञम महत्तत्व ही वा भेद चित्त तस्य नानना चाहिये, इसी आशय से ही चित्त मो प्रकृति का साविक परिणाम काहा है । साख्यप्रवचनभाष्यकार विज्ञानभिक्षु ने भी प्रथमाध्याय को ६४ सूत्र में चित्त का चुद्धि में ही अन्तर्भाव काहा है।
-समाधिपादः। ५ प्रकार की तरहे उत्तम होकर कमी नेत्रादि इन्द्रियों द्वारा बाह्य विविध घटादि पदार्थों से संबद्ध हो उन्द विपयों के समान आकार को धाग्न करती हैं, भी कभी बहिर्मुख परिणाम को त्याग कर अपने कारणभूत चित्त के सन्नि- हित ही काम, क्रोध, राग, लोभ, मोहादि रूप से स्थित होती हैं, इन्हीं परि- णाम विशेषों का नाम ति है। सो यह चित्तवृतिये निरन्तर ही बाह्यघटादि आकार से औ आन्तर कामादि आकार से उत्पन्न होती रहती हैं, सो यहां इन्ह दृतियों के स्वभाव सिद्ध भवाह का अपने कारण भूत चित में लवलीन होकर रुक जानाही चित्तति- निरोध कहा जाता है, (१) अर्थात्-जब पूर्व पुण्य के परिपाक से दीर्य काल आदरपूर्वक सत्कारसेवित दृढ अभ्यास औ वैराग्य द्वारा चित्त की वहिर्मुख मवाहशीलता औ आन्तर कामाकागादिरूप प्रवाह शीलता निवृत हो जाती है औ केवल चतुर्भुजादि ध्येयाकार सात्विक तरङ्ग सेही चित परिणत हो जाता है तर वही चित एकाय परिणाम वाला कहा जाता है, औ इसी चित की अवस्था को ही संप्रज्ञावयोग वा संमज्ञातसमाधि भी कहते हैं। औ फिर जब परवैराग्य के सेवन से वही चित आन्तर ध्येयाकारता से भी । निवृत होकर निष्पन्द निस्तरङ्ग निर्वातदेशस्थ जलवत् अचल हो जाता है तब वह चित्र निरुद्ध कहा जाता है, इसी अवस्था काही असंमज्ञातयोगवा असं- मज्ञातसमाधि भी कहते हैं। भाव यह है कि-क्षिप्त, मूह, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध भेद से चित्त पंच मकार का है, तहां जो चित्त रजोगुण की बहुलता से अत्यन्त चञ्चलशील होकर ऐहिक मिथ्या विषयसुखादि में सत्यत्व बद्धि से तत्पर होकर जलौका (जॉक) के तुल्य एक विषय को त्यागकर अन्य विषयों का ग्रहण करताहुआ कदापि स्थिरता को प्राप्त नहीं होता है वह चित्त क्षिप्त कहा जाता है, यह चित्त बहुलता से दैत्य वा दानवों का होता है, (२) औ जो चित्त तमोगुण के आधिक्य से कर्तव्याऽशर्तव्य विवेक से शून्य होकर निरन्तर निद्रा तन्द्रा आलस्य प्रभृति में ही मन रहता है औ कदाचित् आलस्य को त्याग किसी कर्म में प्रवृत होने पर भी क्रोधान्ध होकर अकारण किसी m (१) असे जल तरङ्गाकार परिणाम को त्याग कर अपने सरूप में अवस्थित हो जाता हे तेसे विविधविपयाकार परिणाम त्याग कर चित्त का स्वरूपावस्थित हो जाना ही चितवृत्तिनिरोध कहा नाता है, यह तय है। (२) इन्हों के समानप्रकृतिक धनमद मत्त पुरुषों का चित भी क्षित ही नागना उचित है।
७ ." -- । समाधिपादः। जाता है, एतादृश चित्त ,परवैराग्य * शीलों का होता है। इसी निरुद्ध चिंता वाले कोही प्रेक्षीणक्लेश, कृत्यकृत्यं औ जीवन्मुक्त कहा जाता है ।। II, इस प्रकार यह एकही चित्त क्षिप्तादि भूमिका (अवस्था) के भेद से पंच प्रकार को कहा जाता है। इन्हें पाचों अवस्थाओं में से अन्त की दो अवस्था ही पोग शब्द वाच्य हैं मयिन्य नही, कारण यह कि क्षिप्त मूढ अवस्था तो रंजतम की अधिकता से योग की विरोधिनी ही है, केवल विक्षिप्तावस्था कुछ कुछ योग के अनकल हो सकती है परन्तु उस में भी रजोगण का संपर्क रहने से यह भी हेय कोटि में ही है।(१)इसी से ही भाष्यकारों ने (विक्षिप्त चित्त(२)में होने वाली निरोध संज्ञक स्थिरताको बहुल विक्षेप संरलित होने से योग शब्द वाच्यता का अभाव कह कर)(जो एकाग्र चित (३)में होने वाला राजसतामस वृति का निरोध परमार्थ भूत ध्येय वस्तु कान्साक्षात्कार कराता हैं, औ क्लेशों का समूल उच्छेद करता है, औ बन्धन के कारण कर्मजन्य-अदृष्टों को भूज,कर आगामि जन्मादि उत्पा, दन में असमर्थ कर देता है, औ असम्प्रज्ञातसमाधि के लाभ की योग्यता का संपादन कर देता है वह निरोध संमज्ञातयोग * कहा जाता है, सो यह संघ, ज्ञातावितर्कानगत विचारानुगत, आनन्दानगत, अस्मित्तानुगत, भेद से चार प्रकार की है, यह आगे कहो जायगा, औ जिस निरोध में ध्येयाकार उत्ति भी नहीं रहती है वह अंसम्प्रज्ञातयोग कहा जाता है ) इस प्रकार एकान औं निरुद्ध आस्था को ही योग पद वाच्य कहा है अन्यों को नहीं, बस यही दो प्रकार को योग सूत्रकार ने चिततिनिरोध पद से लक्षित किया है। आशङ्का-इस पूर्व कथन से यह निश्चित हुआ कि एकाग्रावस्था में विद्यमान(होने- ." -- . I (*) पर देराग्य का लक्षण १६ वे सूत्र में देग्यो । (१) यद्यपि विक्षिप्तावस्था में स्थिरता के सद्भाव से कुछ २ योग के सचार होने की सौवना हो मकती है तथापि उस स्थिरता को चित्त पर अत्यन्त ही सूक्ष्म काल रहने से वह स्थिरता योग की उपयोगिनी नहीं है, यह इस वा भाव है। (1) 'मिक्षिप्त चेतसि विक्षेपापमर्जनाभूत समाधिन योगपक्षे वर्तते' इम भाष्य का अनुवाद करते हैं, 'विक्षिप्त इत्यादि से। ( ३ ) ' जो एषामः' यहा से लेकर वह असप्रज्ञात योग कहा जाता यहा पर्यन्त 'यरत्येकानेचेतसि ' इत्यादि भाष्य वा अनुयाद है, भाष्य वाट लिखने को कुछ आवश्यकता नहीं है, इम से नहीं लिखा। (*) सम्यक प्रकार से ध्येय वस्तु या प्रज्ञान-साक्षारकार होता है जिस निरोध में वह संग्रज्ञात कहानाता है। () इस पाद के १७ ये मून के व्यारयान में यह स्पष्ट होगा। । - ८ पातजलदर्शनकाशे। वाली) ध्येयाकार सात्विकी चित्तवृत्ति औ निरुद्धावस्था में विद्यमान निखिल वृत्तियों का निरोध यह दोनों ही योग शब्द के वाच्य है, औ यही भाष्यकारों ने माना है, परन्तु ऐसा मानने से जो चित्तवृत्तिनिरोध रूप योग का लक्षण मूत्र कारों ने कहा है सो लक्षण अव्याप्तिदोप ग्रस्त (१) होने से दुष्ट होगा, क्योंकि संभज्ञात योग में ध्येयाकार वृत्तिके सद्भाव से वृत्तियों का निरोध न होने से वृत्ति निरोध रूप लक्षण वहां पर वर्तमान नहीं है, यदि यह कहा जाय कि ( सूत्र में (२) सर्व शब्द का ग्रहण तो सूत्रकार ने किया ही नहीं जिससे निखिल वृत्तिनिरोध को ही योग माना जाय किन्तु वृत्ति निरोधमात्र कहा है, एवं'च किसी एक वृत्ति का निरोध चाहिये, सो राजसतामस वृत्तियों का निरोध एकाग्रावस्था में होनेवाले संमज्ञातयोग में भी विद्यमान है, इस से यह लक्षण अव्याप्ति दोप ग्रस्त नहीं है,) सोभी समीचीन नहीं है, कारण यह कि-ऐसे मानने से अव्याप्ति दोप का यद्यपि वारण हो सकता है परन्तु अतिच्यासिरूप दोप (३) एक अन्य गलेपतित हो जाता है, क्योंकि सर्व पदके न ग्रहन करने से आप ने यही अर्थ माना है कि किसी न किसी वृत्ति के निरोध का ही नाम योग है, एवंच जैसे राजसतामस वृत्ति का निरोध... संमज्ञात में है ऐसे सात्विक वृत्ति के निराध को क्षिप्त अवस्था में, औ राजस वृत्ति के निरोध को मूढादि अवस्था में विद्यमान होने से उन्हों को भी योग मानना पड़ेगा, परन्तु सो किसी को संमत नहीं, तथा च किसी न किसी दृत्ति निरोघरूप योग लक्षण को अलक्ष्य क्षिप्तादि अवस्थाओं में वर्तने से यह लक्षण भी दुष्ट ही है। (१) जो लक्षण निखिल क्ष्य में न रहकर किसी एक पक्ष्य में करते वह पक्षण अव्याप्तिदोष मस्त कहा जाता है, अतएव (वापिल्वर्णवाली गईया याही जाता है, यह गो का वक्षण दुष्ट माना जाता है क्योंकि यह कक्षण रक्तवर्णवासी गईया में वर्तमान नहीं हैं, एव च चित्तवृत्तिनिरोध रूप योग पक्षण भी सप्रज्ञातयोग रूप लक्ष्य में न रहकर योवल असप्रज्ञातयोग में यर्तने से यात्सिदोष मस्त होगा, यह इस बा भाव है। (२) जिस उपाय को आश्यण वर भाष्यकारो में अध्याति का परिहार किया है उसी उपाय का प्रदर्शन यार दोप निरास करते हैं ( सूत्र में ) इत्यादि ग्रन्थ से । (३) जो पक्षण कक्ष्य में रह कर अनक्ष्य में भी चर्ते वह पक्षण अतिन्याप्ति रूप दोप युक्त कहा जाता है, जैसा कि गईमा का लक्षण शृङ्गयाली, क्योंकि यह रक्षण गो रूप क्ष्य में रहकर अक्ष्य महिप प्रभृति में भी वर्तमान है, तैसे यहाँ पर किसी एया वृत्ति को निरोध को योग पक्षण कहने से अक्ष्य क्षिप्ताद अवस्था में भी इस पक्षण को विद्यमानता से यह वक्षण भी गति च्याप्ति रूप दोष युक्त यहा जायगा । यह इस का भाव है। .
समाधिपादः। समाधान-योगजिज्ञासुजन ! योगतत्ववेत्ता विचक्षणजन इस आशङ्का का वारण इस प्रकार करते हैं कि न तो हम अव्याशि के भय से निखिलच निरोध को योग कहते हैं, औन अतिव्याप्ति के भय से किसी एक दृत्ति के निरोध को दी योग कर सकते हैं किन्तु क्लेश कर्म वासना का समूल नाशक जो वृत्तिनिरोध वही योग पद का वाच्य मानते हैं (१), एवंच एकाग्रावस्था में विद्यमान ( होनेवाले ) संमज्ञातपद वाच्य राजसतामसत्ति के निरोध को औ निरुद्धावस्ग में विद्यमान असंप्रज्ञातपद वाच्य निखिलवृत्तिनिरोध को शा का नाशक होने से यह दोनों ही अवस्था योगपदवाच्य हुयी, औ विक्षिप्त भूमिका में विद्यमान धाकार सात्विकटारी के निरोध को औ क्षिप्त भूमिका में विद्यमान सात्विकतामसति के निरोध को औ मूढावस्था में विद्य- मान सात्विक राजस वृत्ति के निरोध को क्लेशादि का नाशक न होने से यह तीनों अवस्थ्या योगपद वाच्य नहीं है, इस प्रकार अव्याप्ति अतिव्याप्ति रूप दोपविनि- मुक्त होने से यह लक्षण ही सर्वथा आश्रणीय है, औ यही भाप्यकारों का आशय है, अतएव प्रथमसूत्र के व्याख्यान में वेदव्यासजी ने (जो (२) एकाग्रचित्त में विद्यमान क्लेश कर्मवासना का समूल नाशक निरोध वह संमज्ञात योग कहा नाता है ) इस प्रकार संप्रज्ञातयोग को क्लेशादि का नाशक कहा है, जब कि प्रज्ञातयोग भी क्लेशादि का नाशक है तो अपम्मज्ञातयोग सुतरां ही क्लेशादि- नाशक हुआ, तथा च क्लेशादिनाशकत्व का धर्म को एकाग्र निरुद्धभूमिका में विद्यमान होने से यही लक्षण समीचीन है, इसी लक्षण को आश्रयण कर ही टीकाकार वाचस्पति मिश्र ने अव्याप्त्यादि दोप का उद्धार किया है। जो कि योगवार्तिककार विज्ञानभिक्ष ने (किसी एक वृत्ति के निरोध को योग कहने से क्षिप्तादे भूमिकाओं को भी योगपद वाच्यत्व हो जावैगा) इस प्रकार अतिव्याप्तिरूप दोप का आपादन कर ( द्रष्टा पुरुप की अपने शुद्ध रूप में अवस्थिति का हेतु जो निरोध सो योग पद अभिधेय है ) इस प्रकार (१) अविद्यादि केश, पुण्य पाप रूप कर्म, तथा शुभाशुभ वासनाही पुरुषों को बन्धकारक हैं अतः इन्हों का नाश हो पुरुषों को मुख्यतया अभीष्ट है, औ इन्हों के नाशार्थ ही पुरुष योग में प्रवृत्त होते हैं, सा इन्ह सब का नाश सप्रज्ञात औ अमप्रज्ञात योग से हो होता है अन्य से नहीं इम से यह दोनों ही आस्थ्या योगपद वाच्य है अन्य नहीं, इमी को ही लक्षणममन्वय द्वारा स्पष्ट करते हैं, 'एच' इत्यादि ग्रन्थ से, 'क्लेशादि का लक्षण, भेर द्वितीय पाद में स्पष्ट रीति से कहा जायगा। (२) सम्प्रज्ञात योग भी लगों का नाशक है इम में प्रमाण के लिये 'क्षिणीत घलेशान् । इत्यादि भाष्य का अनुवाद करते हैं जो ' इत्यादि से। - , - १० पातज्जलदर्शनकाशे- उत्तर सूत्र ( १ ) के संग इस सून की एकवाक्यता संपादन द्वारा समाधाना- न्तर का आश्रयण कर पूर्वोक्त दोप का निराकरण ( वारण) किया है, सो भाप्यविरुद्ध (२) होने से हेय जानना, किच परस्पर अन्वय की योग्यता के अभावसे एकवाक्यता का संभव भी नही हो सकता है, किच सम्प्रज्ञात योग में ध्येयाकारवृत्ति के सद्भाव से द्रष्टापुरुप की स्वरूपावस्थिति का अभाव होने से यह लक्षण अव्याप्तिदोप से भी ग्रस्त है, यदि यह कहो कि असम्पज्ञात द्वारा सम्प्रज्ञातयोग भी स्वरूपापस्थिति का हेतु हो सकता है, तो फिर भाष्य कारानुसारी वाचस्पति मिश्र उक्त सरलमार्ग को त्याग कर परम्परा का आश्र यण करना 'पिण्डमुत्सृज्य करं लेडि, (३) इस न्याय के तुल्य उपहासजनक ही कहा जायगा, अलम् । यहां पर एक आशङ्का यह भी उत्थित्त होती है कि एकही चित्त का परस्पर विलक्षण क्षिप्तादिभूमिकाओं से संवन्ध किम निमित्त से होता है ? औ असम्मज्ञातसमाधि द्वारा ध्येयाकार साविकी सृत्ति का भी निरोध करने में क्या कारण है ? इस आशङ्का का वारण भाष्यकारों ने इस प्रकार किया है कि चित्त त्रिगुण । है, औ गुणों का स्वभाव चंचल है, इस से गुणों के न्यूनाधिकभाव से ही,चित्त अनेक भूमिकाओं से संबद्ध हो जाता है कुछ स्वभाव से नहीं, अर्थात्-रज्जुवन् सवादि गुणत्रय निर्मित होने से चित्त त्रिगुम है, अतएव जर वह प्रख्या-साद- मीति-बाधवादि (१) धर्मशील होता है ता वह चित्त सात्विक कहा जाता है, ५ H - सूत्र प्रवृते) (१) (तदा द्रष्ट स्वरूपेऽवस्थानम् ) यह उत्तर सूत्र है , (२) भाष्यकारों ने इस सूत्र के अवतरण में (तत्य रक्षणाभिधिःसयेद इस वाक्य से (तिम योग के रक्षण कथन वी इच्छा से यह उत्तर सूत्र प्रवृत्त होता है) इस प्रकार इस एक ही सूत्र को योगलक्षणपरत्व कथन किया है, यदि दानों हा सूप मिककार योगलक्षण परत्न होते तो ( इदसून ) यह एकवचन असगत होगा, क्योंथि आप के मत में द्विवचन ही कहना उचित था, इस प्रकार भाष्पविरोध मानलेना । (३) एक मनुष्य कुक्कुर को ग्रास ( कोर ) देने लगा तो वह कुकुर पाम त्याग कर उस के हाथ को चाटनेरगा, यह न्याय का अर्ध है अर्थात् वाचस्पति मिश्र उक्त कक्षण को त्यागकर अपने मन से दुष्टलक्षण रचना आप की निष्कर है। (१)(प्रख्या) तारतान, ( प्रमाद ) प्रमाता, (प्रीति ) अभिरुचि, उत्साह, (काघर ) हल्यापन, आदि शब्द से प्रकाश, दया, क्षमा, धैर्य, कार्तव्याऽशरीय नियबादि सावमा धम्मों का प्रण जानलेना । - . समाधिपादः। यो जप प्रवृत्ति-परिताप-शोकादि (१) धर्मों को धारण करती है तब राजस कहा जाता है, औजय स्थिति-आवरण-दन्य-गौरव-गालस्यादि (२) धर्म- विशिष्ट होता है तब तामस कहा जाता है। भाव यह है कि यद्यपि प्रकृति का साविक परिणाम होने से चित्ततत्व स्वभावतः ज्ञानशील ही है तथापि त्रिगुणात्मक होने से जिस काल में सत्वगुण से न्यून औ परस्सर दोनों तुल्य रजवम गुणों से संबद्ध हो जाता है तब यह शब्दादि विषयों को औषणिमादि ऐश्वर्य को ही मिय जानकर उन्हों में ही आसक्त होकर विदल हो जाता है, अतएव एतादृश चित क्षिप्त कहा जाता है। यी जिस समय में सत्त्व औ रजोगुण को परास्त कर केवल तमोगुण ही पसर कर चित्त को आवरण कर लेता है तब वह चित्त अधर्म , अशान, अपैराग्य, अनैश्वर्य (३) निद्रादि में मग्न होने से पढ़ कहाजाता है। औ जिस समय में आवरणस्वभाव तमोगुण की मक्षीणता से चित्त में सत्त्वगुण का विकाश होता है तब वह प्रकृति आदि सूक्ष्म तत्त्व की विवेचना में नैपुण्यशाली, औ रजोगुण की लेशमात्र से संमिलित होने से धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यादि विषयों में उन्मुख (प्रवृत्निशील) हो जाता है, एतादृश चित्त ही क्षिस से विशिष्ट होने से विक्षिप्त कहा जाता है। औ जिस काल में अभ्यास वैराग्य द्वारा एकबार रज औ तमोगुण के अपास्त (निटत्त) होने से विशुद्ध सञ्चगुण का प्राधान्य हो जाता है तब वह चित्त स्वाभाविक ज्ञानस्वरूप निज रूप में अवस्थित हुआ प्रकृति पुरुप के विवेक में मम हो धर्मगंध समाधि ( ४ ) में उन्मुख हो जाता है, इस धर्ममेघसमाधि- निष्ठ चित्त को ही योगीजन परप्रसङ्ख्यान (५) कहते हैं। (१) (प्रवृत्ति) कों के आरम्भ करने में उद्योगशीलता, (परिताप) अभिलपित यार्य की पूर्णता न होने से चिन्ताविशेप, (शोक ) पुत्र कलत्रादि के पियोगप्रयुक्त खेद, आदि शन्द से लोग, इर्ष्यादि अन्य राजसूधर्मों का भी ग्रहण जानलेना । (२) (स्थिति ) प्रवृत्ति का विरोधी स्तम्धीभाय, वा विदरता, (आवरण) तत्त्वज्ञान का प्रतिबन्धक अनाग का शक्तिविशेष, (गौरव ) भारापन, (देन्य) धीरता का अभाव, थाकस्यादि इस आदि पद से भयआदि अन्य भी तामस धम्मों का महण जानकेना। (३)( अनैश्वर्य) इच्छा का प्रतिघात अर्थात् मनोरथ को पूर्णता का अभाव । (४) धर्ममेघ समाधि चतुर्थपाद के २९ सूत्र में वर्णन किया नायगा । (५) विवेकपूर्वक ध्येयतत्त्व के साक्षात्कार का नाम परप्रसंख्यान है, यद्यपि यह प्रसंख्यान एकाग्रचित्त का धर्म ही है कुछ चित्तस्वरूप नहीं, तथापि धर्मी के अभेद को आश्नपण कर चित को ही परप्रसंख्यान कहा गया है, यह मानना ।
पातञ्जलदर्शनप्रकाशे - औ जय (१) फिर विवेकख्याति के उदय होने से ऋतम्भरामज्ञा दाग योगी का चित्त (चितिशक्तिरूप पुरुष तो परिणामत्रय रहित, (२.) गुणत्रया- तीत, निर्लेप (३) दर्शितविपय, शुद्ध, अनन्त है, औ विवेकरस्यातिसज्ञक ध्येयाकारसात्विकयुदित्तिरूप जो मसंख्यान वह परिणामशील, सत्वगुणात्मक, ध्येयलित, जन्य, मलिन, सान्त होने से पुरुप से विपरीत हैं, अतः यह मसख्यान भी हेयकोदि में ही है ) इस भावना (विचार) से विवक ख्याति में भी राग- रहित होकर पुरुष का निजरूप में अवस्थान के अर्थ ज्ञानप्रसादसज्ञक पर- पैराग्य द्वारा विवेकख्याति को भी निरुद्ध कार अवस्थित हो जाता है, तब वह निरुद्धावस्थ चिच संस्कारशेप कहा जाता है, यह संस्कारशप चित्त ही नि:- जसमाधि (४) नाम से व्यवहृत होता है, इसी निरद्धावस्था को ही योग- वववशता असम्पज्ञातसमाधि कहते हैं, क्योंकि इस दशा ( अवस्था) में ध्येयाकार वृत्ति का भी अभाव होने से किसी वस्तु का सम्यक् प्रकार से ज्ञान नहीं होता है। इस मकार गुणों के न्यूनाधिकभाव से एक ही चिंत्त का अनेक भूमिकाओं से संपन्ध औ पुरुप की स्वरूपास्थिति के अर्थ ध्येयाकार वृत्ति के निरोध का आवश्यकत्व जान लेना (५)। (१) इस प्रकार एकचित्त का अनेक भूमिकाओं से संबन्ध होने में गुणों के न्यूनाधिक भाव को निमित्त कह कर इदानी विवेक ख्याति के निरोध में कारण प्रदर्शन पूर्वक निरोवभुमिका का सरूप निरूपण करते हैं ( औ जय ) इत्यादि ग्रन्थ से । (२) धर्म, लक्षण, अवस्था, रूप मेद से तीन प्रकार के परिणामों का निरूपण तृतीयपाद के १३ वे सूत्र के व्याख्यान में देखना । (३) निलेप जैसे नेत्रादिइन्द्रियों द्वारा विषयों से बांद्व सबद्ध होती है तैमे पुरष किसी से संबद्ध नहीं है, क्योंकि यह अमन है, इमा से निप कहा जाता है । यदि पुरुप निर्लेप ही है तो फिर विषयों का प्रकाश केसे करता है ? इस का उत्तर कहते हैं, (दर्शितविषय ) इति, बुद्धि दिखलाती है विषय जिम का यह दर्शितविषय कहा जाता है, अर्थात् वद्धिवृत्ति रूप उपाधि से है। विषयों का प्रकाश पुरुष करता है कुछ स्वभाव से नहीं, अतएव सुग्वदुबमोह रूप बुद्धिनिष्ठ धर्मों से असंबद्ध होने से समा- चतः पुरुप शुद्ध है, यह सम तृतीय चतुर्थ सून के व्याख्यान में स्पष्ट होगा। (४) अविद्यादि क्लेशों से अनुविद्धही जन्म ओ भोग के देने वाले जो धर्माऽर्धा रूप बीज सो सब इस समाधि को प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं, इम से इम अवस्था का नाम निज काहा जाता है। (५) भाव यह है बि-जब तका ध्येयाकारवृत्ति विद्यमान रहेगी तब तक पुरप पातञ्जलदर्शनकाशे। इसी मकार जो गीता में भगवान ने 'तं विद्या दःखसंयोगवियोग योगसजितम् (१) इस वाक्य से निखिल दुःख संयोग के वियोग को योग कहाँ है सो भी साधन फल को एक मान कर कहा है, क्योंकि योग के लाभ से निखिल दुःखों का अभाव होने से यह भी योग का फल ही है। इसी प्रकार जो लिङ्गपुराण में 'सर्वार्थविषयमाप्तिरात्मनो योग उच्यते' इस वाक्य से निखिल पदार्थों की माप्तिरूप योग का लक्षण किया है सो भीसाधन फल को एक मान कर जानलेना, क्योंकि योग लाभ से अनन्तर पुरुष को आप्तकाम हो जाने से यह भी योगका फल ही है, इसी प्रकार अन्यत्र भी जानलेना (२)। यहाँ प्रसङ्ग से यह भी जानलेना उचित है कि-योगशब्द यहां पर (युज समाधौ ) इस धातु से निष्पन्न हुआ है कुछ (युजिर्योगे ) इस धातु से नहीं अतएव भाप्यकारों ने प्रथम सूत्र के व्याख्यान में योग शब्द का अर्थ समाधि किया है (३)। यद्यपि द्वितीयपाद के २९ सूत्र में समाधि को योग का अङ्ग कहने से योग औ समाधि यह दोनों भिन्न ही पदार्थ प्रतीत होते हैं क्योंकि अड़ा औं अड़ी को एक कथन युक्तिविरुद्ध है, तथापि अड़ औ अड़ी रूप से समाधि को दो प्रकार का मानने से यह युक्तिविरुद्ध नहीं है, अर्थात-समाधि शब्द दो प्रकार का है एक तो 'समाधान (१) समाधिः' भावसाधन, जिस का अर्थ चित्त की वृत्तियों का रुक जाना है, औ एक 'समाधीयते चित्तमनेनीत समाधिःकरणसाधन जिस का अर्थ वृत्तियों के निरोष का करण उपाय' है, तहां पर जो भाव- साधन समाधि शब्द है वह अङ्गी का पाचक है औ जो करणसाधन है वह अगवाचक है, एवं च भावसाधन समाधि शब्द के अभिमाय से भाप्यकारों ने योग शब्द का अर्थ समाधि किया है औ करणसाधन समाधि शब्द के अभिप्राय से सूत्रकार ने समाधि को योग का अद्भ कहा है यह व्यवस्था जान कर विरोध का परिहार कर लेना । भाषसाधन अङ्गिराचक समाधि शब्द को औ योग शब्द को एकार्य होने से ही स्कन्दपुराण में ( यत्समत्यं योरत्र जीवात्मपरमात्मनोः स नएसर्व- (१) जैसे राक्षसों का पापजन होने पर भी विरुद्ध लक्षणा से पुण्यगर याहा जाता है तेसे दुःखसयोग वियोग यो मी विरद्ध रक्षणा से योग कहते है यह भी मानो । (3 ) भाय यह है पि-इन्ह सम यायों में योग को फळ का कथन किया है कुछ योग का एक्षण नहीं कहा है, पक्षण तो योग का चित्तवृत्तिनिरोध ही है । (३) एवं च समाधि भी योग यह दोनों शन्द एकार्थक है यह सिद्ध हुमा । (५) समाधान, निरोध, चित्त की वृत्तियों का रकनाना, यह तीनों एकार्थक है + A .
. समाधिपादः। सङ्कल्पः समाविरभिधीयते ) (१), ( परमात्मात्मनोर्योयमाविभागः परन्तप, स एव तु परो योगः समासाकथितस्तव ) (२), इत्यादि वाक्यों में समाधि औ योग का समान लक्षण कथन सङ्गत होता है, नहीं तो अङ्ग अङ्गी का समान लक्षण प्रतिपादन असङ्गत हो जायगा, सूत्रकारों ने भी इसी अभिप्राय से सम्मज्ञातयोग को सीज समाधि (३) औ असम्मजातयोग को निजि समाधि शब्द (७) से निर्देश किया है । तथा च सूत्र-माप्य-पुराणादिवचनों की एक- वाक्यता से यह सिद्ध हुआ कि समाधि औ योग यह दोनों शब्द एकार्थक हैं, अलम् ॥ २ ॥ आशङ्का-आप के कथन से यह ज्ञात हुआ कि योग औ समाधि यह दोनों शब्द एकार्थक हैं औ निरुद्धावस्था में ध्येयाकारत्ति का भी निरोध होने से चित्त संस्कारशेपपात्र हुआ स्वकारण प्रकृति में लीन हो जाता है, एवंच जिस समय में निरुद्ध हुआ चिच असम्पज्ञातावस्थाविशिष्ट होजाता है उस काल में एक खभाव क्या होता है अर्थात् किस स्त्ररूप से पुरुप अवस्थित होता है क्योंकि जिस २ आकार को चित्त धारण करता है वही आकार शीलता पुरुपका स्वभाव है औ निरुद्धावस्था में चित्त को निराकार होने से निस्वभाव पुरुष का रहना असंभव है ? (५)। इस आशङ्का का वारण करते हुये सूत्रकार योग का फल कथन करते हैं- सूत्र० तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥३॥ (१) जिस दशा में सर्व सङ्कल्पादि चित्तविकार के नाश होने से नीघात्मा परमात्मा के समान हो जाता है अर्थात् पुरुष अपने शुद्धस्वरूप में अबस्थत हो जाता है, उसी का नाम समाधि कहा जाता है यह इस का भावार्थ है। (२) परमारमा औं आत्मा का जो आवभाग=एकरूपता यही परयोग है, सो मैं सक्षेप से आप के प्रति कह चुका हू अर्थात् जिस के लाभ से जोवात्मा परमात्मा के समान शुद्र रूप से अस्थित हो जाता है वहीं योगपद का वाच्य है । इन दोनों वचनों में भी फल कथनपूर्वक ही योग औ ममाधि का लक्षण कथन किया है कुछ स्वरूप से नहीं, यह जानना। (३) इस पाद के ४६ सूत्र में देदो, । (४) इस पाद के ५१ सूत्र में देखो। (५) भाशङ्का करनेवाले वा तात्पर्य यह है कि क्या नेयायिक की तरह आत्मा को वस्तुगत्या जड मानकर व्युत्थानकाल में बुद्धिवृत्ति की सन्निधि से पुरुष पेतन प्रतीत होता है औ निरद्धावस्था में बुद्धिवृत्ति के अभाव से काष्टात् अप्रकाशरूप. होकर स्थित हो जाता है यह मानते हो या इस अवस्था में गरणावस्था के तुल्य ६ - पातजलदर्शनमकाशे- भापा~-(तदा) तिस निखिलवृत्तिनिरोध रूप असम्प्रज्ञातावस्था में (द्रष्टुः ) दृकशक्तिरूप चेतन पुरुष की, ( स्वरूपे ) अकल्पित असङ्ग निर्विकार स्वरूप निजरूप में ( अवस्थानम् ) अवस्थिति होती है । अर्थात्-यथा कैवल्यावस्था में औपाधिक शान्त घोर पढादि रूप ( १) त्याग कर चितिशक्ति पुरुष अपने स्वाभाविक असङ्ग चेतन रूप में स्थित हाय है तैपे असम्पज्ञातावस्था में भी पुरुष स्वरूपप्रतिष्ठित हो जाता है, कुछ चित्र औ आत्मा एक पदार्थ नहीं है जिस से चित्त के लय होने से आत्मा का भी अभाव माना जाय (२)। भाय यह है ( ३ ) कि मुछ शान्तादि रूप पुरुष का स्वभाव नहीं है, मिस से निरोगवस्था में शान्तादि रूप के अभाव से पुरुप का अभाव माना जाय क्योंकि वह सब शान्तादि रूप औपाधिक हैं, एवं च बुद्धिरूप उपाधि के अभाव से औपाधिक शान्तादिरूप का ही अभाव हो सकता है कुछ पुरुष का अभाव नही पुरुप तो अपने अनौपाधिक रूप में स्थित ही रहता है। आशङ्का-यदि निरोधावस्था में चितिशक्ति (१) स्वरूपपीतष्ठित होती है तब व्युत्थानकाल में वह स्वरूप में अवस्थित नही थी यह अवश्य ही सिद्ध) हुआ, एवं च चितिशक्ति भी परिणामशीला हुयी क्योंकि जो सदा एकरस न पुरुष का अभार मानते हो ? अथवा आत्मा है तो असङ्ग प्रशाशस्यरूप परन्तु व्युत्थान काल में बुद्धिरूप उपाधि से ज्ञातृत्वादि मिथ्याधर्मविशिष्ट वह प्रतीत होता है ओ निरः द्धावस्था में उपाधि के अभाव से करिततरूप को सागकर शान्त आनन्दादि निमग में अवस्थित हो जाता है यह मानते हो । । इन एब में से अ त का पक्ष सिद्धान्नभूत है सोई इस मा पत्र से कहा जायगा. यह भी जानो । ( १ ) मासिक रानम, तामग चित्त का यधा क्रम शात, घोर, मूढ, यह नामान्तर है। (२) मे जपाकुमुग रूप उपाधेि के अगाय से स्फटिकमाण अपने सरप में अस्थित “ जाता है तेसे बुद्धिवृत्ति रूप उपाधि के अभाव स पुरप भी अपने साछ नियमान रूप में अपस्थित हो जाता है कुछ पुरा का अभाव नहीं होता है, यह इम का भाव है। (१) जा पूर्व यह शाशना किसी भी कि शान्तादि आकारायशिप्रचित्त के साकारों को एक करना हो पुरष वा समार हे भो निरोधमान में चित के तादश आकारों या ना होने से पुरष निस्वभाव कोमे रह सका है, इस का अशर देने के रिपे कहते हैं (भार यह है) इति । (१) नियम--टफशास-पुरप-आरमा, यह शन्द एकार्थक हैं।
पातजलदर्शनप्रकाशे- भाषा--( तदा) तिस निसिलचिनिरोष रूप असम्प्रज्ञातावस्था में (द्रष्टुः) दृकशक्तिरूप चेतन पुरुप की, ( स्वरूपे ) अकल्पित असङ्ग निर्विकार स्वरूप निजरूप में ( अवस्थानम् ) अवस्थिति होती है। अर्थात्-~-यथा कैवल्यावस्था में औपाधिक शान्त थोर महादि रूप (1) त्याग कर चितिशक्ति पुरुष अपने स्वाभाविक असा चेतन रूप में स्थित होता है तैसे असम्पज्ञातावस्था में भी पुरुप सम्पप्रतिष्ठित हो जाता है, कुछ चित्त मी आत्मा एक पदार्थ नहीं है जिस से चित्त के लय होने से आत्मा का में अभाव माना जाय (२)। भाव यह है ( ३ ) कि कुछ शान्तादि रूप पुरुप का स्वभाव नहीं। मिस से निरोधावस्था में शान्तादि रूप के अभाव से पुरुष का अभाव मान जाय क्योंकि वह सब शान्तादि रूप औपाधिक है, एवं च बुद्धिरूप उपाधि अभाव से औपाधिक शान्तादिरूप का ही अभाव हो सकता है कुछ पुरुष के अभाव नहीं पुरुप तो अपने अनौपाधिक रूप में स्थित ही रहता है। आशङ्का-~-यदि निरोधावस्था में चिनिशक्ति (४) स्वरूपपीतष्ठित होत है तब व्युत्थानकाल में वह स्वरूप में अवस्थित नहीं थी यह अवश्य ही सिख तुभा, एवं च चितिशक्ति भी परिणामशीला हुयीं क्योंकि जो सदा एकरस न पुरुष का आभार मानते हो ? अथरा आत्मा है ता असङ्ग प्रसाशस्वरूप परन्तु व्युत्भाग. फाल में निर उपाधि से ज्ञातृत्वादि गिथ्याधीवशिष्ट वह प्रतीत होता है जो निर- पारस्था उपाधि को अभाव से कलित रूप को त्यागकर शाना आनन्दादि निजम्मा में अस्मिा हो जाता है यह गानते हो । इन सब में से अन्त का पक्ष सिद्धान्त भूत है सोई इस अपग मन से कहा जायगा, यह भी जानो । (1) माथि राजम, तामा चित्त का यथा का शात, घोर, मामातर। (२) मे जपाकुसुम रूप उपाधेि के अभाव से स्फोटकोण अपने सपा में स्थित ।। जाता है तेसे युधिगृत्ति रूप उपाधि के अभाव से पुरण भी अपने राम में स्थित हो जाता है कुछ पुरर का प्रभाव नहीं होता है, यह इस माहै। (१) जापू यह भाराशा बिगो भी कि सातादि भारी चित्त । मतारों को परम पारना हो पुरुष का समाय हे गो चित्त के ताया HINI OT STT होने से पुल निभाष फेम र सा है, इस या उत्तर देने के लवे कहते हैं ( भाय यह है ) इति । (४) तितला-पुरम-गामा, पहराद एकापा है।
पातञ्जलदर्शनकाशे- वृत्तियों के समानरूपत्व द्रष्टा का होता है अर्थात्-व्युत्थानकाल में यादृश चित्त की वृत्तिये उत्पन्न होती हैं शान्त वा घोर वा मूढ़ तादृश रूप (आंकार) से ही पुरुष का भान होता है । यहां पर वृत्तिसारूप्य होने में हेतुप्रदर्शन के अर्थ भाष्यकारों ने इसस के आदि में (दर्शितविषयत्वाद्)इस पद का अध्याहार किया है, बद्धिकर दधि (निवेदित) (१) विषय होने से ही पुरुप बुद्धिवृत्ति के समानरूपवाला हार है कुछ स्वाभाविक नहीं यह इस का अर्थ है, एव च वृत्तिसारूप्य ऑपाणि है यह सिद्ध हुआ अर्थात्-विपय और इन्द्रियों के सयोग से जो अनेक प्रक की वृत्तिये उत्पन्न होती हैं वह सब बद्धि का ही धर्म है कुछ पुरुप का नई पुरुप तो जान स्वरूप ही है, परन्तु चित्त औ पुरष के अविवेक से पुरुष धर्म प्रतीत होता है (२)। पञ्चशिखाचार्य ने भी ( एकमेव दर्शनम् ) इस सूत्र से जान को एक कर पुनः (ख्यातिरेव दर्शनम्) इस सूत्र से (शब्दादि विषयक ज्ञान वा प्रक पुरुप विपयक विवेकज्ञान यह सब बुद्धि की ही ख्याति चरिद है, कुछ नहीं है कि बुद्धि को पृथक् ज्ञान औ पुरुप को पृषर ज्ञान होता है। इस प्रक ज्ञान को एक कथन द्वारा बुद्धि दृत्ति को ही उत्पत्तिविनाशधर्मशील ज्ञान आधार कहकर पुरुष को ज्ञानस्वरूप ही माना है कुछ मान का आधार नहीं अर्थात्-यद्यपि परमार्थतः पुरुप असङ्गही है तथापि अपम्कान्तमाण के। (१) बुद्धि का यह स्वभान है कि-इद्रियों द्वारा विपयों का ग्रहण कर उन्ह विषयों का प्रतिविम्ब रप चेतन में समर्पण कर देता है, इमी का नाम निदि विषय है, ऐसेही विष्णुपुराण में कहा है-"गृहीतानिद्रियरानालगन य प्रयच्छति, भात भारणापाय तस्मै विश्वात्मनेना" इदियों स विषयों का प्रहण कर जो आत्मा के प्रति सार्पण करता है तिस अतकरण के प्रति नमस्कार होय, यह इस का अर्थ है। (२) यह सब द्वितीय पाद के २० मत गौ तृतीयपाद के ३९ सूत्र भी चतु पाद के २२ सूत्र के व्याख्यान में स्पष्ट राति से पाहा नायगा। (३) इस कहने से यह योधा पिया वि-कुछ हम है। पुरष यो ज्ञानरमा मानते हैं यह नहीं माना तु साड्याचार्य पञ्चाशग्य जी भासेही मानते है .इम अश में साढ्य, योग, येदात यह तीनों एक गत है, यह भी जाना । (४) अपस्या तगणि माग गुम्यक या हे, गीत औमे चुम्बकमर्माण साम्नधिमान से है सत्यनिष्पासन म्ग उपचार यस्ता दुमा भोगसाधन हो मे पुग्ण या पहा गास १ से गिरा भी मानधमान में गिरगायेदन १ उपमार पस्तामा पुर मारप में .
समाधियादः। २१ चत्तस्य ) इस वाक्य का अध्याहार किया है, तथाच मिलकर यह अर्थ हुआ के-पद्यपि चित्त की त्तिये बहुत होने से असङ्ख्यात हैं तथापि जो निरोद्धन्य अर्थात् जिन्हों का निरोध अपेक्षित है वह वक्ष्यमाण प्रमाण आदि भेद से पञ्च ही हैं। : भाव यह है कि-यद्यपि लज्जा तृष्णादि भेद से वृत्तियां असङ्ख्यात हैं तथापि प्रमाणादि पञ्च वृत्तियों में ही सप का अन्तर्भाव जानलेना, एवंच इन पंचो के निरोध से ही यावत् वृत्तियों का निरोध हो जाने से अन्य वृत्तियों के निरोधार्थ प्रयत्नान्तर की अपेक्षा न होने से वृत्तिनिरोध साध्य है यह सिद्ध हुआ (१)। सो यह प्रमाणादि पञ्च वृत्तियें प्रत्येक २ दो प्रकार की हैं, एक क्लिष्ट अर्थात् राजस तामस प्रवृत्ति-परिताप-क्रोध लोभादिक औ. एक अनिष्ट अर्थात्-सात्त्विक मख्या-प्रसाद प्रभृति, तात्पर्य यह है कि जो (२) वृत्तियें धर्म अधर्म वासना समूह का उत्पादक है वह अविद्यादि क्लेश मूलक होने से क्लिष्टं एक पद को रूद के एक पद कारविमीयते येन तत्पमाणम्) इसक प्यु करती है औ करण रूप अर्थ में व्युत्पन्न मानकर प्रमा का जो करण-साधन वह प्रमाण कहा जाता है (३) इस प्रकार पहिले सामान्य लक्षण का आश्रेषि कर फिर यह प्रमाण प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम भेद से तीन प्रकार का है ऐसे विभाग करलेना। वहाँ (४) अनधिगत अवाचित पदार्थ विषयक जो पौरुपेयवोध (पुरुपनिष्ठ (१) एका शब्द को दो बार उन्चारण "ना ही आवृत्ति पद का अर्थ है। (२) जैसे विपर्यय विकल्प आदि वृत्तियों का सूत्रकार ने मिन्न २ क्षण किया है तैसे प्रमाण वृत्ति का लक्षण न कहने से भी न्यूनतापत्ति दोप जानलेना । (३) यहां इतना विशेष यह भी जान लेना कि अव्युत्पन्न प्रमाण पद लक्ष्यार है औ व्युत्पन्न प्रमाणपद लक्षणपर है । ( ४ ) गिस प्रमा का जनक होने से चित्तमृत्ति को प्रमाण कहा जाता है उस प्रमा का लक्षण कथन करते हैं- (अनधिगत) इत्यादि से, नो बस्तु प्रथम किसी ज्ञान का विषय नही हुआ है वह अनाधिगत कहा जाता है नौ निम बस्तु विषयक ज्ञान का साय ज्ञान बाधक न होय वह अबाधित कहा जाता है एवंभूत वस्तु विषयका जो पुरुष- मिष्ठ ज्ञान यह प्रना कहा जाता है। अनाधिगत कहने से स्मृतिज्ञान को प्रमाल का पारण हुआ क्योंकि स्मृति को प्रथम अ य ज्ञान के विपीभूत वस्तु विषयक होने से या अनधिगतयिषयक नहीं है, अयोधित वहने से जो शाक्त में भ्रान्ति से स्वतज्ञान है ।" । 4 पातञ्जलदर्शनमकाशे- शान) यह ममा कहा जाता है, इसी को ही यथार्थ अनुभव वा सत्यज्ञान कहते हैं सो यह यथार्थाऽनुभवसंजक प्रमा चक्षु आदि इन्द्रियों द्वारा वा लिङ्गशान द्वारा वा आमवाक्यश्रवण द्वारा चित्तवृत्ति से जन्य होती है इस से । को प्रमा का करण होने से प्रमाण कहा जाता है... तहां इतना विशेष है जो चक्षुआदि इन्द्रियों द्वारा विमयाकार चित्त की वृत्ति उदय होती है वह प्रत्यक्षप्रमाण नाम से व्यवहृत होती है औ जोवृत्तिलिङ्ग शान द्वारा उत्पन्न होती है वह अनुमानप्रमाण नाम से व्यवृहत होती है औ जो आप्त वचनश्रवण से चित्तवृत्ति उत्पन्न होती है वह शब्द ममाणचा आगम पद का वाच्य होती है, इन्ह तीनों प्रमाणों द्वारा जो पुरुष को ज्ञान होता है वह फलप्रमा कही जाती है, सो यह प्रमा.भी चित्तवृत्ति रूप प्रमाणों को तीन प्रकार होने से प्रत्यक्षममा, अनुमितिममा, शाब्दीममा भेद से तीन प्रकार की है। भाव यह है कि (१)-चक्षुआदि इन्द्रिय द्वारा (२) घट आदि वाह्य पदार्थों से चित्त का. उपराग (त्चिद्वारा संबन्ध ) होने से जो घटादि पदार्थाऽऽकार से जातिविशिष्टव्यक्ति विषयक ( यह .घट है) इस आकार विशिष्ट चित्त की वृत्ति वह प्रत्यक्षप्रमाण नाम से व्यवहत होती है औ तदनन्तर अहं घटं जानामि । इस आकारवाला जो विपयसहित चित्तवृत्ति विषयक पुरुपुनिष्ठ ज्ञान सो फलप्रमा कहा जाता है, यहां इसना विशेष यह भी जानलेना कि-सांख्ययोग मत में प्रकृत में प्रमाण, प्रमा-प्रमाण, प्रमा प्रमाता, साक्षी भेद से पंच पदार्थ माने जाते हैं। तहां जैसे तालाब का जल कुल्या द्वारा क्षेत्र में प्रविष्ट हो क्षेत्राकार हो जाता है तैसे नेत्रादि इन्द्रिय द्वारा वाझविपयों से संबद्ध होकर तिस तिस आकाररूप परिणाम को प्राप्त हुये चित्र की जो यह घट है इत्याऽऽकार चित्तयत्ति (३) वह चौद्धममा कही जाती है, उस को प्रमात्य का यारण किया क्योंकि यह ज्ञान उत्तरकाल में होने वाले (यह रजत नहीं है ) इस ज्ञान से बाधित है, अतः इस का विषय याधित है, फलितार्थ यह है कि स्मृति औ भ्रम से भिन्न गो ज्ञान वह प्रमा कहा जाता है । (१) इस प्रकार सामान्य से प्रमा ओ प्रमाण का लक्षण कथन कर इदा विशेष रूप से प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के लक्षणनिरूपण के लिये कहते हैं (भाव यह है) इत्यादि। (२) जैसे तालाय से क्षेत्र में जल ले जाने के लिये कुल्या द्वार है तैसे चित्तवृत्ति का पाय पदार्थों में आने का चक्षु आदि द्वार + मैं घट विषयक ज्ञानवाला हूं यह इस का अर्थ है। (३) यहां पर चित्त ओ बुद्धि दोनों एक है यह मत विस्मरण करना । ।
. समाधिपादः। २५ मा का विपयसवन्ध द्वारा नैत्रादि इन्द्रिय ननका है, अनः यह प्रमाण पत्र हैं, औ जो पूर्वोक्त चित्तत्ति है वह इन्द्रियों का फल औ पुरुषनिष्ठ- रूप फलममा का करण होने से, प्रमा प्रमाण इन दोनों नामों से व्यव- होती है (२), औ जो पुरुपनिष्ट बोध है सो केवल प्रमा ही कहा जाता है कि वह फल होने से किसी का करण नहीं है। औ जो बुद्धिमतिविम्बित न इस ममा का आश्रय है वह प्रमाना कहा जाता है । औ जो बुद्धित्ति इत शुद्ध चेतन है वह साक्षी जानना । जो कि विज्ञानभिक्ष ने “प्रमाता चननं शुद्धः" इस वाक्पं से शुद्ध चेतन प्रमाता कहा है सो "असगो ह्ययं पुरुमा(२) इत्यादि श्रुति विरुद्ध होने से हेय नना, किञ्च शुद्ध को प्रमाता कहना युक्ति से भी विरुद्ध है क्योंकि ऋद्ध जाम खिलधर्मरहित का है औ प्रमाता नाम . प्रमारूपधर्मविशिष्ट का है, तयाच मरहित धर्मविशिष्ट है यह कथन अवश्य ही युक्तिविरुद्ध हुआ। एवं च चित्त में प्रतिविम्बित चेतन ही प्रमा का आधार होने से प्रमाता कुछ शुद्धचेतन नहीं यही समजस जानना । तात्पर्यय यह है किं-ममा रूप जो बोध है वह पुरुप का मुख्य धर्म नहीं है क्योंकि मुख्यधर्म मानने से "साक्षी चेता केवलो निर्गुणच (३)". इत्यादि दवचन असंगत हो जायगे, किन्तु चित्त में प्रतिबिंबित चेतन को चित्त से आविविक्त होने से पंरुप में यह उपचरित है (४)। अत एव "शानं नैवात्मनो धर्मो न गुणो वा कथञ्चन, जानस्वरुप एवाऽऽत्मा नित्यः सर्वगतः शिवः" इत्यादि वाक्यों में (ज्ञान आत्मा का धर्म या गुण नहीं है किन्तु ज्ञानस्वरूप ही आत्मा है) इसप्रकार शुद्ध पुरुष को साक्षी कहा है, बी विज्ञानभिक्षु ने भी द्वितीयपाद २० सूत्र के व्याख्यान में आरोप से प्रमा का । अधार क६ कर परमार्थतः बुद्धि का साक्षी ही पुरुप को माना है (५), । (१) एवं च इन्द्रियों की अपेक्षा से बुद्धिवृत्ति को प्रमाओ फलप्रमाप पुरुपनिष्ट घोष की अपेक्षा से प्रमाण होने से बौद्धप्रमा के प्रमा--प्रमाण यह दो नाम है यह , सिया (२)यह जो सब का आरमभूत परुप है वह अमन है अर्थात् क्रिमीधर्मों से मंद न होने से निर्मक है। (३) चेतन पुरुष निर्गुण होने से केवळ माक्षी ही है यह इम का भाव है। (१) ( उपचरित ) उपचार (गोणता वा अविवेक ) से प्रतीत होता है। (९) करिषतं दर्शनकर्तृत्वं बस्नुतस्तु बुद्धेः साक्ष्येयं पुरुषः ' यह वहां का विज्ञान भिक्षु का लेख है, पुरुष में प्रमातृत्व कमियत है ओ मादिस्य वास्ता है यह माय है । .
२६ अतः पूर्वोक्त % पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- एवं सांख्यमवचनभाष्य में भी (परुपस्तु प्रमासाक्ष्येव न प्रमाता*) इस वाक्य से पुरुष को प्रमा,का साक्षी कह कर प्रमा के आश्रयत्व का निषेध किया है, त्याच श्रुति-स्मृति-युक्ति-स्वोक्ति के सङ्ग विरोध होने से पुरप को यहां प्रमाता कहना विज्ञानभिक्षु का प्रमाद ही है यह सिद्ध हुया । जो कि फिर विज्ञानभिक्षु ने यह कहा है कि-(यदि बुद्धि को ही प्रमाता माना जायगा तो पुरुप ही नही सिद्ध होगा) सो भी समीचीन नहीं क्योंकि जैसे चेतन से बिना व्यवहार सिद्ध न होने से चेतनभत प्रमाता मान कर पुरुप की सिद्धि की जाती है तैसे साक्षीभूत चेतन से बिना भी व्यवहार सिद्धि के अभाव से साक्षीरूपसे भी.पुरुप सिद्ध होसकता है (१), व्यवस्था ही समीचीन जाननी । यहां पर इतना विशेप और भी जान लेना कि कपिल मुनि ने " योरे कतरस्य वाऽप्यसनिकृष्टाऽर्थपरिच्छितिः प्रमा" (२) इसे सूत्र से वद्धि औ पुरुष इन दोनों को ही प्रमा का आधार कहा है, इसी से ही हम ने पूर्व पौरुषेयप्रमा की अपेक्षा से चित्त वृत्ति को प्रमाण औ बौद्धप्रमा की अपेक्षा से चक्षु आदि को प्रमाण कहा है। बस्तुतः तो दो प्रमा मानने की कुछ आवश्यकता नहीं, अत एव इस सूत्र के व्याख्यान में वेदव्यास जी ने चिस्मृत्ति को प्रमाण में पौरुपैयबोध को प्रमा कहा है कुछ चिजत्ति को प्रमा नहीं कहा है, इसी से ही पूर्वोक्त साजयसूत्र में ( एकतरस्य का ) इस प्रकार अनियमबोधक वा शब्द का प्रयोग किया है, औ वाचस्पतिमिथ को भी यही अभिमत है, चक्षु आदि को तो परंपरा से (३) ही प्रमाकरण होने से प्रमाण व्यवहार होता है कुछ साक्षात् नहीं, साक्षात् प्रमाण तो चित्त की वृत्ति ही है यह तत्व है। * साङ्ख्य के ८७ मत्र के व्याख्यान में देखो। (१) यदि हम वेवळ बुद्धि को प्रगाता गानते तो यह कथन सभव हो सकता कि बुद्धि को प्रमाता मानने से पुरप सिद्ध नहीं होगा सोतो हम मानते ही नहीं कि तु बुद्धि प्रतिबिम्बित चेतन को प्रमाता मानते हैं, तर पुरुष का अभाव केसे सिद्ध हो सकता है यह भी जानो। (२) अज्ञात अर्थ का जो ज्ञान यह प्रमा है, सो यह प्रमा बुद्धि औ पुरुष इन दोनों का धर्म है, या एक बुद्धि का ही धर्म मानना ग्रह सून का अर्थ है, यह सूत्र प्रथ- माध्याय का ८७ है। (३) परम्परा=चित्तमृति पी विषयाकारता करने में कारण होने से घारादि प्रमाण है, अर्थात् प्रमाण का उपयोगी होने से इन्द्रिय प्रमाण है, यह इस या भाय है।
२७ समाधिपादः। । इस (१) पूर्वविचार से यह सिद्ध हुआ कि-इन्द्रियद्वारा घटापाकार जो चित्तवृत्ति वह प्रत्यक्ष प्रमाण औ तज्जन्य जो पुरुषनिष्ठ ज्ञान वह प्रत्यक्ष-. धमाका वाच्य है। एवं जो चित्तत्ति सपक्षों में विद्यमान औविपक्षों से व्याहत्त लिङ्ग के ज्ञान द्वारा जन्य होती है वह अनुमानममाण पद का वाच्य होती है, अर्थात्-जो वस्तुविशेष अज्ञात हुआ किसी हेतद्वारा सामान्यरूप से सिद्ध किया जाता है वह साध्य कहा जाता है, औ वह साध्य जिस स्थान में नियम से वर्तता है वह सपक्ष औ जिस स्थान में कदापि साध्य की सत्ता का संभव न हो सके वह विपक्ष कहा जाता हैं, औ जिस में साध्य की सिदी कियी नाती है वह पक्ष पद का वाच्य है, जिस द्वारा पक्ष में साध्य की विद्यमानता प्रतीत होती है वह लिङ्ग या हेतु कहा जाता है, जिस दृष्टान्त से पक्ष में साध्य सत्ता का निश्चय होता है वह उदाहरण कहा जाता है (२) यहां पर प्रयोगरचना यह है कि-चन्द्रसूर्यतारा प्रभृति (३) गयनशील है क्योंकि जिस देश में पूर्व स्थित थे उस देश से भिन्न देश में प्रतीत होने से, जो अन्यत्र स्थित हुआ अन्यत्र प्रतीत होता है वह अवश्य गमनशील है, जैसा कि पुरुष, जो गमन नहीं करता है वह अन्यत्र स्थित हुया अन्यत्र प्राप्त भी ही होता है जैसा कि पिन्थ्य आदि पति, यहाँ पर देशान्तरमाप्तिरूप लिङ्ग सपक्षभूत पुरुषों में विद्यमान है औ विपक्ष पर्वतादिकों से व्यावृत्त है, एवं च देशान्तरमाप्ति रूप लिन के ज्ञान से जन्य जों पक्षस्वरूप सूर्यादि में गमनरूपसाध्यमानाकार चित्तरत्ति वह अनुमान प्रमाण हुयी औ तजन्य जो (सुर्यादि गमनशील हैं । इस मकार पुरुपनिष्ठ शान यह अनुमिति प्रमा (१) सहप्राप्त विचार को समाप्त कर इदार्टी निगलिनार्थ कथन पूर्वका अनुमानादि भगांणों के रक्षण कथन का प्रारम्भ करते हैं । इस पूर्व ) इत्यादि से । (२) पर्वत पन्हिवाला है धमसबद्ध होने से पाया , इस स्थल में पर्वत पक्ष हे क्योंकि इस में अज्ञात हुये मन्दि की सिद्धि करनी है, एय वन्हि साम्प गौ धूम हेतु है, ओ पारगृह यह दृष्टान्त है, प्रात में पायगृह सपक्ष है क्योंकि इस में साध्य भूव यन्दि का रहना निश्चित है गै जलाशय(तारा) विपक्ष है क्योंकि इस में वाह फे रहने का समय नहीं है, एव च सपक्ष में विद्यमान ओ विपक्ष में विद्यमान नो धूमप लिग तिसके ज्ञान से (नहा धम तहां यदि स्यश्य होती है) इस प्रकार नियामरण प्रयुक्त जो पर्वत में यनिहविषयक वितति यह अनुमानप्रमाण हुया । (३)गाध्यकारी अनान प्रयोग प्रदर्शन गरते हैं-(पदमर्य) सादिसे।
२८ . पातञ्जलदर्शनकाशे- हुई ( १ ) एवं जो चित्तवृत्ति आतउच्चरित वाक्य से उदय होती है सो . आगमप्रमाण पद पांच्य होती है, अर्थात्-जिस शब्द से आप्तजन अपने दृष्ट वा श्रुत वा अनुमित पदार्थों का अपर जनों के चित्त में स्वसमान जान जनन के लिये उपदेश करते हैं तिस शब्द से जो श्रोता की तजन्य तदर्थविषयक चित्तवृत्ति वह आगमप्रमाण वा शब्दप्रमाण से व्यवहृत होती है, औ तजन्य जो पुरुपनिष्ठ जान है वह शाब्दीप्रमा कहा जाती है। तत्त्वज्ञान तथा. कारुण्य युक्त जो यथादृष्टपथाश्रुतपदार्थवादी पुरुप वह आप्त कहा जाता है । आप्त कहने से जो भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा करणापा वादि (२) पुरुपदोप युक्त अनाप्त है उन के उपदेश प्रमाणजनक नहीं है यह फलित हुआ। भाव यह है कि वेदविरुशवादी अनाप्तचा कादि उच्चरित शब्दों से जो अर्थबोध होता है वह केवल वोधमात्र ही है कुछ प्रमाण नहीं जानना, औ जो मनुआदि महपियों के वचनों से बोध होता है वह प्रमाण जानना क्योंकि वह आप्तोक्त औ वेदमूलक है अत एप यः कश्चित्कस्यचिद् धर्मो.मनुना परिकीर्तितः स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हिसः (३), इस श्लोक से भृगु मुनि ने मनुप्रोक्त धर्मों को वेदमूलक कहा है। यद्यपि वेदोक्त अर्थ का प्रतिपादक होने से मनुवचनों को पुनरुक्तदोप अनुवाददोप ग्रस्त होने से प्रमाणता युक्त नहीं हो सकी है क्योंकि अपूर्व अर्थ के प्रतिपादक वाक्य को ही मीमांसकलाफ प्रमाण मानते है अन्य को नही तथापि चेद में किसी शाखा में अष्टका आदि कर्मों की उत्पत्ति, औ किसी ( १ ) इस स्थल में सूर्यादि. पक्ष हैं क्योंकि इन्हों में गगनं सिद्ध करना है, और • गमन साध्य है ओ देशान्तरप्राप्ति लिङ्ग है क्योंकि वह गमनशील समक्ष पुरपों में वर्तमान है गो गमनरहित पर्वतादिक विपक्षों में गवर्तमान है, जैसा कि पुरुष पह अन्वर्य उदाहरण है, विध्यपर्पत यह व्यतिरेवी उदाहरण है। (२) वक्तव्यपदार्थविषयक सन्देह को भ्रग कहते हैं, औ चिंत्त के चाञ्चल्य से पातव्यपदार्थविषयक निश्चयाभार का नाम प्रमाद है, अन्य प्रकार से माने हुये पदा या गयप्रकार से प्रतिपादन कारना विप्रलिप्सा काही जाती है, इसी का नाम प्रता रणा है, अन्य वर्ण के उच्चारण की इच्छा होने पर भी जो इन्द्रियों को दुष्ट होने से वर्णान्तर पा उच्चारण हो जाना यह करणापाटव है। (३) नो कुछ वर्ण या आश्रम का धर्म मनु ने प्रतिपादन किया है यह सर वेद में लिया है, क्योंकि गनुजी निखिल येव के ज्ञाता होने से सर्वज्ञ हैं।
समाधिपादः। शाखा में देवता औ किमी शाखा में मन्त तथा विनियोग लिखा है, जो मनु- भगवान ने उन विप्रकीर्ण धर्मों को लोकोपकारार्थ सुखबोध के लिये एकत्र उपनिबद्ध किया है अतः अपूर्व एकत्रसंग्रह रूप अर्थ का प्रतिपादक होने से औ वेदाविरुद्ध होने से मनुवचन प्रामाणिक ही है अप्रमाण नहीं ( १ )। , 'इन सब विपयों का इस स्थान में विस्तरपूर्वक लिखने का आवश्यक नहीं है क्योंकि यह प्रमेय शास्त्र है अतः इतना ही बहुत है ॥ ७ ॥ इस प्रकार प्रमाणसञक वृत्ति का विभाग मविपादन कर इदानी क्रममाप्त द्वितीय विपर्यायवृत्ति का लक्षण कहते हैं- सू०-विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्पप्रतिष्ठम् ॥८॥ भाषा-(मिथ्याज्ञानम्) रजु में सर्पज्ञान के समान जो बाधित ज्ञान है, वह (विपर्ययः ) विपर्यय ज्ञान है क्योंकि वह ( अतद्पप्रसिष्टम् ) वस्तु के यथार्थ रूप में स्थित नहीं है (२) अर्थात्-जो रज्जु में सर्प वा एकचन्द्र में विचन्द्र रूप मिथ्याज्ञान है वह विपर्याय कहा जाता है क्योंकि वह अपने रूप में स्थित नहीं है, जो वस्तु के यथार्थ रूप से कभी भी न मच्युत होकर वस्तु के यथार्थ रूप को ही भासमान करता है वह तद्पमतिष्ठ होने से सत्यज्ञान है जहां वस्तु तो अन्य है औ चित्तवृत्ति अन्य प्रकार की है वहां चित्त की वृत्ति तिस वस्तु के यथार्थरूप में स्थित नहीं है अत: वह अतदरूपप्रतिष्ठित होने से विपर्ययज्ञान पद का वाच्य होती है। भाव यह है कि-जैसे अग्नि के संयोग से द्रवीभूत (पिघला हुआ) राङ्गा वा चान्दी आदि धातु किसी मूपा (सांचा) में ढाल देने से यादृश मूषा का आकार होता है तादृश आकार को ही धारन कर लेता है तैसे चित्त भी मुपास्थाना- पन्न बाह्यवस्तु से संबद्ध हुआ संयुक्त वस्तु के समानाकार से परिणत हो तदा- कार हो जाता है, यह चित्त का विषयाकार परिणाम ही दृत्ति वा जान तथा . (१) कोई यह भी कहते हैं कि ( बहुत सी.वेद की वह शाखा अच्छिन्न हो गयी है कि-जिन्हों में स्मार्तधर्म का प्रतिपादन किया था, औ मनु भगवान सर्वज्ञ होने से उग को मानते थे अत उन शाखाओं के धर्मों को ही निबद्ध किया है इस से पुनरुक्ति दोष युक्त औं वेदविरद्ध न होने से मनुवचन प्रामाणिक हैं ) परन्तु यह मत मनुभाष्यकार गेधातिथि भट्ट ने स्पयुक्त होने से अप्रामाणिक माना है क्योंकि वेद को शाखायें जितनी वेद में लिाडी है उस से अधिक भी उच्छिन्न मानने में कुछ प्रमाण नहीं है। (२) मिध्याज्ञान-यह लक्षण है, जो विपर्याय - यह सत्य है, ओ म्याज्ञान क्यों है इस में हेतु प्रदर्शन के लिये अतदर पप्रतिष्ठम् यह कहा है।
4 ३. पातखलदर्शनकाशे- प्रमाणपद का वाच्यं होता है । यदि सांचा तो अन्य प्रकार का है परन्तु किसी दोप से ढालेहुये धातुमय वस्तु में कुछ विलक्षणता हो जाय तो वह वस्तु का आकार दोपविशिष्ट होने से स्वरूप में अप्रतिष्ठित हुआ दृष्ट कहा जाता है। ऐसे ही यदि वस्तु का आकार तो कुछ और ही हो औ चित्त की वृत्ति किसी दोप से अन्य प्रकार की हो जाय तो वह चित्त का आकार भी वस्तु के समाना- कार न होने से स्वरूप में अमतिष्ठित हुआ मिथ्या वा दृष्ट वा भान्तिज्ञान कहा जाता है, जैसा कि एकचन्द्र में द्विचन्द्रज्ञान औ रज्जु में सर्पज्ञान, इसी चित्त के वस्तु से विलक्षण आकार को ही विपर्यययनान कहते हैं (१) पदा (२) जो जान निजरूप में प्रतिष्ठित नहीं हैं वह अतद्रूपाप्रतिष्ठं कहा जाता है अर्थात्-चन्द्र में जो एकत्वज्ञान औ सर्प में जो सर्पज्ञान वह निजरूप में प्रतिष्ठित होने से प्रमाणजान है औ जो चन्द्र में द्विचन्द्रज्ञान वा रज्जु में सर्पज्ञान वह उत्तर काल में होने वाले यथार्थ ज्ञान से वाधित होने से निजरूप में अप्रतिष्ठित है क्योंकि उत्तरं कालिक ज्ञान ने स्वरूप से प्रच्युत कर उस की 'प्रतिष्ठा का भङ्ग कर दिया है। एवं च सर्पविषयक सर्पज्ञान किसीवान से बाधित न होने से स्वरूपप्रतिष्ठित हुआ प्रमाण पदकां वाच्य औ रज्जविषयक सर्पज्ञान उत्तरकालिक यथार्थ ज्ञान से गापित होने से स्वरूप में अप्रतिष्ठित हुआ विपर्ययज्ञान पद का वाच्य होता है यह फलित हुया (३)। जिस कारण से यह ज्ञान उत्तरज्ञान से बाधित होजाता है इसी से ही यह ज्ञान प्रमाण नहीं है क्योंकि जो जान यथार्थ वस्तु को विपय कर अबाधित होता है घही प्रमाण कहा जाता है, इसी से ही सत्यपदार्थविषयक एकचन्द्रमान से मिथ्याभूतद्विचन्द्रज्ञान का वाध हो जाता है। (१) विषय के समान आकार से परिणत चितवृत्ति को प्रमाण ओ विषय से विल. क्षण आकार से परिणत चित्तवृति को विपर्यय कहते हैं, यह तत्त्व है। (२) अनपाऽप्रतिष्ठ-इम पद में तद्रूप से वस्तु के रूप यो आश्रयण कर वस्तु के स्वरूप में अस्थित ज्ञान को विपर्यय कहा, इदानों तद्रूपसे ज्ञान का निजरूप.ग्रहण पार अर्थान्तर कहते है -( यदा ) इत्यादि । (१)मे विपप्प्यज्ञान रूपाप्रतिष्टित है तेसे संशय मी उत्तरकारिक ज्ञान बाधित होने से स्पाप्रातिष्टित है, एवंच संशय भी विपर्याय के अन्तर्गत हुया, तथा च तत्प्रयुक्त म्यगता नहीं जाननी । यथा भन्नादोजी शब्द में आदिमनिपेधार्थक अकार का भोजी मा संयन्ध कर याद में मो भोगन नहीं करता है सो वाच्य होता है तथा यहाँ कार का प्रतिष्ठ के साथ अन्यय पार गपने रूप में जो प्रतिष्टित नहीं है नह तपा- प्रतिट मानना, यह भी मानों।
समाधिपादः। जो यह विपर्ययसंजक चित'की दृचि है वही अविद्या कही जाती है। 'सो यह भविद्यासंजक विपर्ययज्ञान अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, आभिनिवेश भेद से पञ्च मकार का है, इन्हीं को ही पञ्चक्लेश कहते है (१)। इन पांचों को ही "तमी मोहो महामो इस्तामिस्रो बन्धसजित, अविधा पञ्चपर्वैपा प्रादुर्भता महात्मनः" इस विष्णुपुराण के वाक्य में तम, मोह, महा- मोह, तामिस्र, अन्धतामिस्र इन पांचो स्वअनुरूप नामों से निर्देश किया है। जो यह पांचोक्लेशों के यथा क्रम तम आदि नामान्तर हैं वह अवान्तर भेद से ६१ बासठ प्रकार के है-जैसा कि साचस्मृति में कहा है । "भेदस्तमसोऽपविधी मोहस्य चं दशविधो महामोहः, तामिस्रोऽष्टादशया तथा भवत्यन्यतामिसः" ॥४८॥ अर्थात् प्रकृति-महत्तत्त्व-अहङ्कार-शब्दादिपश्चनन्मान रूप अष्ट प्रकृति विकृतिरूप अनात्मपदार्थों में जो,आत्मद्धि रूप अजान वह तम कहा जाता है, सो यह अविद्यासंज्ञक तम अविपय विपयक होने से आठ प्रकार का है। एवं गौणफलरूप अणिमादि ऐश्वर्यों में जो परमपुरपार्थ रूप ज्ञान वह अस्मितासंज्ञक मोह कहा जाता है, यह भी अणिमादि (२) को आठ होने से आठ प्रकार का है। एवं अष्टविध ऐश्वर्य को संपादनकर जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध संज्ञक लौकिक औ दिव्य विषयों में अनुराग वह रागसंज्ञक महापोह कहा जाता है, यह भी दशविपय विषयक (३ ) होने से दस प्रकार का है। एवं उन विपयों के भोगार्थ प्रवृत्त होने पर किसी प्रतिबन्धक के बल से जो उन्ह विषयों का भोग लाभ न होने से प्रतिबन्धकविषयक द्वेष वह तामि- सकहा जाता है, यह भी दश विध विषयों की अप्राप्ति प्रयुक्त होने से दश प्रकार का है। एव माट'प्रकार के ऐश्वर्य होने पर औ दशविध विषयों के भी उपस्थित होने पर जो यह चित्त में भय कि (यह सव.कल्प के अन्त में विनए हो जायगे) वह अभिनिवेश अन्धतामिस्र कहा जाता है, यह भी अष्ट ऐश्वर्य औ दशविध विषय प्रयुक्त होने से अष्टादश प्रकार का है। यह सब अज्ञान- *(१) इस कथन से जो यह शङ्का उस्थित होने की स्भावना थी वि-(आवियादि पच क्लेशों को भी चित्तवृत्ति होने से चित्त की वृतिया यच ही हैं यह सूनकारोक्ति न्या. तादोषमस्त होने से भसङ्गत है ) सो भी उग्नि हुयी, क्योंकि यह सब विपत्ति को अन्तर्भूत ही हैं, देशों का रक्षण द्वितीयपाद के तृतीयादे सूत्रों में कहा जायगा । (२) अणिमादि ऐश्वयों का निरुपण तृतीयपाद के ४५ सूत्र में होगा। (२) इस लोक में होनेवाले सौ दिन अर्थात् देवसोर में होनेवाले जो पत्र २ शम्दादि वह दा विषय है। .
३२ पातलदर्शनप्रकाशे- औ दुःखजनक होने से अन्तान, अविद्या, विपर्ययान, भान्तिज्ञान, लेश इत्यादि नामों से शास्त्र में व्यवहृत होते है ॥ ८ ॥ इदानी क्रमप्राप्त तृतीय विकल्पति का लक्षण कथन करते हैं- सू० शब्दज्ञानाऽनुपाती वस्तुशून्यो विकल्प: ॥९॥ भाषा-(वस्तुशून्यः ) जो ज्ञान वस्तु से शून्य है, अर्थात् जिस ज्ञान का विषय अलीक ( मिथ्या ) है किन्तु (शब्दज्ञानाऽनुपाती ) शब्द ज्ञान के प्रभाव से ही अनुपतन अर्थात् उस अलीकपदार्थ के आकार से उत्पन्न हो जाता है वह (विकल्पः ) विकल्प पद का वाच्य होता है- अर्थात् शब्दजन्य ज्ञान से पश्चात् होने वाला जो अलीकपदार्थ विषयक चित्त का तदाकार परिणाम वह विकल्प कहा जाता है। यथा (राहोः शिरः) इस शब्द जन्य ज्ञान से अनन्तर सवपरुप को यह घोध होता है कि राहु का शिर है परंतु जब शास्त्रदृष्टि से यह विचार किया जाता है कि (शिर ही का नाम तो राहु है कुछ जैसे देवदत्त का वस्त्र है इस कथन से वस्त्र भिन्न औ देवदत्त भिन्न प्रतीत होता है तैसे तो यहां नहीं है) तब यह बोध वस्तुशून्य अर्थात् अलीकविषयक होने से विकल्प स्वरूप कहा- जाता है। इसी प्रकार (चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूप) यह जान भी विकल्पात्मक ही है, क्योंकि चैतन्य पुरुप का स्वरूप है यह इस वाक्य का अर्थ है परन्तु जैसे देव- परा से वस्त्र भिन्न है तैसे कुछ पुरुप से भिन्न चैतन्य नहीं है क्योंकि एरुप ही चेतन है इस से यह शान भी वस्तु शून्य होने से विकल्प है, आशङ्का--यदि शब्दज्ञान से अनन्तर ही विकल्पात्मकुटत्ति उदय होती है तो यह शब्द प्रमाण के ही अन्तर्गत हुयी क्योंकि जो शब्दज्ञानाऽनुपाती (१) चित्त की वृत्ति है वहीशब्दप्रमाण का वाच्य है औ यदि वस्तुशून्यचित्तवृत्ति का नाम विकल्प है तो यह विपर्यपय के अन्तर्भूत हुयी क्योंकि जो वस्तुशून्य वृति होती है वह विपर्याय कदी जाती है, एवं च इन दोनों से भिन्न एक नूतन विकल्प वृत्ति मानने का क्या फल है? समाधान--पद्यपि शब्दज्ञान से अनन्तर यह विकल्पत्ति उदय होती है तथापि वह प्रमाण पद चांन्य नहीं हो सकती क्योंकि यदि इस ज्ञान के विषय का बाध न होता तो सुतरां हम इस को शब्दप्रमाण कह सकते परन्तु सो है नहीं क्योंकि विचार करने से. यह पूर्वोक्त ज्ञान मिथ्यावस्तु (१) गनुपाती गन्दज्ञान के अनन्तर उदय होनेवाली। .
. समाधिपादः। विषयक होने से वाधित प्रतीत होता है इस से प्रमाण नहीं हो सकता है, एवं यदि निखिल जनों को बोध न होता कभी उत्तरकालिक ज्ञान से वाघ भी हो जाता तो. इस को विपर्यय ज्ञान कहते परन्तु सो है नहीं क्योंकि जैसा (चैत्रस्य वख) इस शब्द प्रयोग से चैन औ बस का परस्पर भेद होने से विशेष्य- विशेपणभाव प्रतीत होता है तैसे (चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपं) इस वाक्य से भी विशेष्यविशेषणभाव (१) प्रतीत होता है, इस से विपर्यय भी नहीं। : परन्तु जब यह विचार किया जाता है कि चैतन्य औ पुरुप.को एक होने. से विशेष्यविशेषणंभाव असंभव है तब यह ज्ञान. वस्तु शून्य होने से मिथ्या ज्ञान के तुल्य मतीत हो जाता है कुछ वस्तुगत्या मिथ्या नहीं है। अत एव सूत्रकार ने ममाण औ विपर्यय ज्ञान से भिन्न ही विकल्प वृत्ति निर्दिष्ट किया है ।। निखिल जनों को, जिस में वाघ युद्धि उदय होय वह विपर्यय ज्ञान भी अतिनिपुण शास्त्रेनों को विचारद्वारा जिस में वाध ज्ञान होय वह विकल्पमान- कहा जाता है यह तत्व है (२) यह विकल्पत्ति ही कहीं अभिन्न पदार्थों का भेद प्रदर्शन करा देती जैसा कि 'राहों शिरः, औ कहीं भिन्न पदार्थों की अभिन्नता वोधन करा देती है जैसा कि 'अयःपिण्डो दहति (३) इति । इसी प्रकार (प्रतिषिद्धवस्तुधर्मा निष्क्रिया पुरुपः ) यह भी विकल्पवान ही है क्योंकि निखिल पदार्थनिष्ठ धर्मों से रहित. औ क्रिया के अभाववाला रुप है यह इस वाक्य का अर्थ है सो यह साङ्ख्य योग मत से विरुद्ध है क्योंकि जब कि हम एक स्वतन्त्र अभार पदार्थ को स्वीकार करते तो यह कहा जा सकता है कि क्रिया के अभाववाला पुरुप है, परन्तु अभावपदार्य का इस मत में स्वीकार नहीं, क्योंकि जिस आधार में लोक अभाव मानते हैं (१) मेरे चैत्रस्य वस्त्रं यहाँपर.चन विशेपण ओ वन विशष्य है तेसे यहां पर पुरुष विशेषण भौ चैतन्य विशेष्य है। (२) इस आशप से हो पूर्वसूत्र में याचस्पति गिल ने गिध्याज्ञान शब्द से सर्वे- मनानुभव सिद्ध वाध के विषयभूत ज्ञान का ग्रहण किया है, यदि सामान्य से मिथ्याज्ञान का प्रहण होता तो विकलंज्ञान में भी विपर्ययज्ञान के रक्षण की विद्यमानता से विप पक्षण गतिव्याप्तियुक्त हो जाता, यह इस का भाव है। विज्ञानभिक्षु ने तो विपर्याय कक्षण में विकलाभिन इतना गोरं विशेषण देकरं अतिन्याप्ति का पारण किया है, भस्तु । (१) मान्य नाम लोहे के गोले का है, यही पर दाई करना. पयपि पनि का धर्म है तथापि गमेद से कोष होइपिण्ट को दारक कहने हैं। .. " .
. पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- ' उस आधार को ही हम अभावस्वरूप मानते हैं, एवं च अभावरूपपदाथान्तर क.. 'अभाव से विशेष्यविशेपणभाव का यहां असंभव होनेपर भी जो पूर्वोक्त व्यवहार होता है वह विकल्पज्ञानात्मक ही जानना । तात्पर्य यह है कि जैसा कि नैयायिकादि मत में इस भूतल में घट की - अभाव है यहां पर भूतल को आधार औ अभाव को पदार्थान्तर मानकर घटा भावं को आधेय मानते हैं तैसे सामख्ययोगनयाऽनुयायी नहीं मानते हैं किन्तु भूतलं को जो कैवल्पलक्षण (एकलापनरूप) परिणामविशेष सोई घटाभाव है कुछ अधिकरणभूत भूतल से वह भिन्न नहीं है यह मानते हैं। इस (१), वन में आम के वृक्ष हैं यहां पर जैसे बन औ वृक्षों को एक होने पर भी • आधाराधेय भात्र प्रतीत होता है तैसे भूतल औ घटाभाव को एक होनेपर भी भूतल में घटाभाव है इस प्रकार.आधाराधेयभाव जानलेना (२ ). एवं वाणस्थिव था-वाण स्थित है घाण स्थित होगा (.३) इत्यादि.थ्य: वहार भी विकल्पात्मक ही है क्योंकि यहां पर वाण में गतिनिवृत्ति के अनुकूल 'यन का (४) अभाव होने से वाण में कर्तृत्व औं तिसकर्ता में वर्तमानका लादि प्रत्ययत्रय का अर्थ असंभव है, केवल गतिनिवृत्तिमात्र स्था धातु का अर्थ मतीत होता है, अतः यह भी वस्तुशुन्य होने से बिकल्पात्मक ही है। .. एवं ( अनुत्पनिधर्मा पुरुपः ). इस वाक्य से जो (उत्पत्तिरूप धर्म के अभाववाला-पुरुप हैं ). यह बोध होता है सो भी विकल्पात्मक ही है क्योंकि अभावरूप पदार्थान्तर के अनङ्गीकार से पुरुपव्यतिरिक्त क्रिया के अभाव का यहां संभव नहीं है, एवं च वस्तुशून्य होने पर भी जो शब्दज्ञान के प्रभाव से अनुत्पत्तिम्प. धर्मवाला पुरुष है यह बोध है सो भी विकल्पात्मक ही है, एवं. अहं (मैं) हं यह व्यवहार भी विकल्पात्मक ही है क्योंकि यहां पर चेतन औ अहङ्कार को भिन्न भिन्न होने पर भी दोनों का अभेदज्ञान प्रतीत होता. है अतः भिन्नविषयक अभिन्नात्मक होने से यह भी विकल्प ही है,.एवं च जी जो चित्तति वस्तु के स्वरूप की अपेक्षा से विना केवल शब्दज्ञान के प्रभाव से ही (१). यदि भूतक भी घटागाव • दोनों एक ही हैं तो फिर भूतक में घंटाभाव है यह शोभाराधेयभाय को क्योंकि भिन्न ही पदार्थों का शोधासाधेयभाव हो 'सकता है, इस भाराला या पारन करते है। (इस यन ) इंगादि से। (२) यहां पर विचारान्तर कठिन सन. यार साग दिया है, जिसे देखना हो परहार निर्मित योगतत्वसमीक्षाप्रकाश में देख ले | (1) थामा गत वर्तमान भविष्यत्काल के यह उदाहरण है ( १ ) : गगवान का है भो याग गइ है, ३२ में पाणी यज्ञका अभाव है। + समाधिपादः। अलीकपदार्थ विषयक उदय होती है वह सब विकल्पात्मक ही (१) जाननी ॥९॥ अधुना अवसरमाप्त निद्रायत्ति का तिर्वचन (लक्षण) करते हैं- सू० अभावप्रत्ययाऽऽलम्बना वृत्तिनिद्रा ॥१०॥ भापा-निखिल पदार्थों के अभावविषयक जो प्रत्यय (ज्ञान) उस को आलम्बन (आश्रयण) करनेवाली जो चित्तष्टत्ति वह निद्रा पदका बांच्य है। अथवा(२) जाग्रत्स्वमवृत्तियों के अभाव का प्रत्यय (कारण) जो बुद्धिनिष्ट सत्त्वगुण का आछादक तमोगण या अमान.वही है आलम्बन ( विषय ) जिस चित्तष्टोत्त का वह निद्रा कही जाती है, इसी चित्तवृत्ति का ही नामान्तर सुपुसि अवस्था है, इस वृत्ति विशिष्ट पुरुप को ही सपंत औ अन्तःमल कहा जाता है। • भाव यह है कि जिस समय में बुद्धिनिष्ठ सत्र औ रजोगुण को तिरस्कृत कर केवल तमोगुण ही.आविर्भाव होकर निखिल इन्द्रियों का आवरणकर लेता है उस समय में द्वारीभूत इन्द्रियों के अभाव से बुद्धि का विषयाकार परिणाम न होने से जो अज्ञानरूप से परिणत तमोगुण को विपय करनेवाल तमोगुणमधान चित्त की शक्ति वह निद्रा कही जाती है । यह वृत्ति ही सुपप्ति में होनेवाले स्वरूपभूत सेख औ अज्ञान को विषय करती। तहां इतना विशेष है कि योग मत में सुपूप्तिअवस्था को चित्त की वृत्ति मानने से चित्तवृत्ति ही सुपतिकालिक सुख औ अज्ञान को विपय करती है औ वेदान्त मंत में अन्त:करण का अविद्या में लय मानने से सुपुप्ति में चित्त- वृति के प्रभाव से चित्तनिष्टवासनाउपाहतअज्ञानोपाधिक चेतन ही सुपसिकार लिक सुख औ अज्ञान को प्रकाशता है, अतएव सुषुप्तिकालिक सुखादिकों को साक्षिमास्य कहा जाता है। (१) अन्य दर्शत्तकार विकल्पामक वृत्ति नहीं मानते हैं इस से उम के भ्रमो- न्मूलन के लिये अनेक उदाहरण दिवाये गये हैं, यह भी जागो । (4) यद्यापे पूर्व सूत्रों के तुल्य इससूत्र में भी वृत्तिनिरूपणरूपप्रकरण के बल से वृत्तिपद का लाभ हो जाने से वृत्तिपद यहा अनर्थक है तथापि जैसे अन्य नैयायिकादि • निद्रा को वृत्तिरूप न मान कर काल ज्ञानाभाव मानते हैं जैसे हम नहीं मानते हैं किन्नु निद्रा भी एक चित्तका वृत्तिविशेष ही है, इसप्रकार ब्रोधनार्थ ही वृत्तिपद का उपादानकिया है । यह इसी सूत्र में आगे स्पष्ट हे मायगा । (२)प्रत्ययपद को ज्ञानार्थक मान सूत्र का अर्थ निरूपण कर इदानी धाचस्पातीमश्र को मत से प्रत्पपपद का कारणरून अर्थ मान कर व्यारवानान्तर कहते हैं ( अथवा , इत्यादि।
२६ पातञ्जलदर्शनकाशे- जो कि * यहां पर विज्ञानमिषु ने श्रुतियों के तात्पर्य को न जानकर यह कहा है कि (यथा जाग्रत् औ स्वम अवस्था चित्त की वृत्ति है तथा सुषुप्ति भी चिज की ही वृत्ति है कुछ अविद्या की नहीं, एवं सुषुप्तिकालिक भत्रान: तथा मुख सातिभास्य है यह शङ्कराचार्य की उक्ति असङ्गत है क्योंकि साक्षी को अपरिणामी होने से उस में संस्कारों के अभाव से स्मरण का संभव नहीं. हो सकता है (१) ) सो समञ्जस नहीं है क्योंकि यदि सुषुमिकाल में चित्त . की क्रिया विद्यमान रहती तो यह संभव हो सकता कि सुपुमि में चित्त ही अनानादि का मकाश करता है परन्तु सो संभव नहीं क्योंकि सुषुप्तिकाल में चिच का लय होने से वहीं चित्र निष्क्रिय हो जाता है, अतएव "सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोऽभिभूतः सुखरूपमृति(२)" जानानामुपसंहारे. पुढे कारण- तास्थितिः, वटवीजे बंटस्पेव मपप्तिरभिधीयते (३)" इत्यादि श्रुति-स्मृतियों में सुषुप्तिअंवस्था में अन्तस्करण का अव्याकृतविद्यारूप से . अवस्थान प्रति पादन किया है। एवं वृहदारण्यक उपनिषद् के चतुर्थ अध्यायस्थ अजातशत्रुगार्य के संवाद में सुपुतिभवस्थानिरूपणपर प्रकरण में भी ( गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुः गृहीत श्रोत्रं गृहीतं मनः ) इत्यादि श्रुति.से. सुंपुप्तिअवस्था में वाक्-नेत्र-श्रोत्रादि के सहित ही अन्तःकरण का.अज्ञान में लय कहा है। गौडपादाचार्य ने भी "लीयते हि सुपुप्तौ तन्निगृहीतं न लीयते" इत्यादि वचन से चित्त के लय औ निग्रह के भेद से मुपप्ति में समाधि का, भेद निरू- पण किया है। * इदानी स्वामीनी योगयाति को समालोचना प्रसङ्ग से करते हैं-- जो कि" इत्यादि, (१) निद्रा से उचित जम को जो यह स्मरण होता है कि-(मैं सुख से शयन किया ओ कुछ भी नहीं जाना ) सो स्मरण तब हो सकता है जबकि सुषुप्तिकाल में सुखादि का ज्ञान भी तज्जन्यसंस्कार होय, सो साक्षी को परिणामन्य होने से उस में ज्ञान या संस्कार रूप परिणाम का संभव नहीं है, इस से सुखादिका साक्षिमास्य नहीं है. किन्तु चित्तवृत्तिभास्य है, यह विज्ञान भिक्षु का भाव है। (२.) सुपुतिकाल में निखिक बाह्याभ्यन्तर इन्द्रियों का लय होने से फेयक तमोः गुणप्रधान गज्ञानोपहित हुआ पुरुष अपने सुखरूप में स्थित झे जाता , यह योयत्पति का अर्थ है । (३) जेसे घट यो वीजा में भव्यक्तरूप से वट वृक्ष स्थित है तेसे निखिल पाय- द्वानों के अभाव पूर्वक जो बाद मादि को अज्ञान में भव्यक्तरूप से स्थिति हो मानी वही मुगुमिपद का वाच्य है, यह इस का अर्थ है। + .
समाधिपादः। (सुषुप्ति काल में चित्त का स्वकारणभूत अज्ञान में लप होता है औ समाधि में चित्त निगृहीत होता है अर्थात्-सुपुति में तमोगुणप्रधान अविद्या में चिच का लय होता है औ समाधि में अविद्यादि अनर्थ विरहित पुरुष के निजम्प में चिच अवस्थित हो जाता है, यही सुषुप्ति से समाधि का भेद है, यह गौडपा- दीय वाक्य का भावार्थ है)। एवं “सता सोम्य तदा सम्पनो भवति इस छान्दोग्य श्रुति में औ "मानात्मना सपरिष्वक्तो न वाहां किश्चन वेद नान्तरम् " इस हदारण्यक श्रुति में भी चित्तोपाधिकजीव का निजरूप में अवस्यान कथनद्वारा उपाधि- भूत चित्त का लय वोधन किया है। (उद्दालकमुनि अपने पुत्र श्वेतकेतु के प्रति कहते हैं कि हे सोम्य-मियद र्शन पुत्र ! जिस काल में गादनिद्रा होने से पुरुष सुपप्त हो जाता है तिस काल में जीव सद्रूप ब्रह्म से सङ्गत हुया एकी भूत हो जाता है। अर्थात् अन्तःकरण का लय होने से अंत करणसंसर्गमयुक्त जीवभाव को त्याग कर अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाता है, यह छान्दोग्यश्रुति का अर्थ है। कामुकपुरुष मियरमणी से आलिङ्गित हुआ विपय सुख में मम हो बाहर भीतर के विपयों को नही परिज्ञात करता है तैसे सुषप्ति काल में जीव भी अपने भानयनस्वरूप से आलिङ्गित हुआ एकीभूत हो निजस्वरूपभूत आनंद में मग्न हो वाह्य औ• आभ्यंतर के पदार्थों को नहीं जानता है अर्थात् इंद्रियों का लय होने से बाह्य जानपदार्थों का दान औ चित्त का लय होने से स्वामादि पदार्थों का मान नहीं होता है किंतु स्वरूप सुख में ही जीव मम रहता है, यह वृहदारण्यक श्रुति का अर्थ है (१)/- सुपप्ति में विचादि का लय होने से ही पुराणों में इस, को नित्यमलय कहा गया है। विज्ञानभिन ने भी "समाधिसुपप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता" (*) इस साय- सूत्र के व्याख्यान में सुपप्ति में वृद्धि का लय माना है । एवं च श्रुति-स्मृति-स्वोक्ति के संग विरोध होने से यहां पर चित्त के लय का अभाव कहना विज्ञानभिक्षु की अनवधानता ही है। (१) यी इन श्रातयों में शुद्ध बसा हा जान वा स्य निरूपण किया है तथापि अज्ञानोपहित चतन में ही न नना, नहीं ता मक्कि ओ सुपुति का ममान होन से सुपुप्तों के तुल्य मुक्त पुरुषों का पुन म, वा मुक्ति की न्याई सुपुप्ति से पुनरुत्थानाभाव यह दो दोष प्रसक्त होंगे, विस्तर गौडपादीप आगम प्रकरण के भाष्य में देखो। * अभ्याप १ सूत्र ११६ । .
पातञ्जलदर्शनंप्रकाशे- जो कि(१)स्त्रकार ने सुपप्ति को चित का वृत्तिं कहा है उस का तात्पथ्य यह है कि योगमत में सत्कारशाद के अहीकार से सक्ष्मरूप से कारण में स्थित होने का ही नाम लय कहा जाता है; एवंच याप' स्थलचित्त का . सुपुप्ति में अभाव है तथापि कारणभूतअविद्या रूप से यह विद्यमान ही है, वथा च कारणावस्थापन चित्र को पांच हनि से स्त्रकार ने मुंपति को चिच की वृति कदा हे कछ. साक्षान नहीं। यद्वा जैसे निराधसजसम्मजात में चित्त का लय हो जाने पर भी 'निरोध को चित्त का धर्म यहा जाता है तसे सुपर्णत में वित्त का लय होने पर भी मपति को चित्त की वृत्ति:कहा गया है. अर्थात्-चित्त के विकाश होने से पुरुप प्रबुद्ध औचित्त के संकोच हान स पुरुष मत कहा जाता है, अत: चित्त के सद्भाव असद्भाव प्रयुक्त ही जादादि चित्त की अवस्था कही जाती हैं। तथा च चित्त के असद्भविप्रयुक्त होने से निरोधवत् सुपप्तिमी चित्र की वृत्ति जाननी । यहा कारणभूत अविद्या पदवाच्य प्रकृति औ. कार्यभत चित्तं को एकमान कर साप्ति को चित्त की वृत्ति कहा है । कार्यकारण को अभिन्न • मानने सेही किसी स्थल में प्रधानफरुप के अविवेक को भी किसी. स्थल खुद्धिपुरुप के अविवक को. बंध का हेतु :(२) इस' शास्त्र. में निर्दिष्ट किया है। :: विज्ञानभिक्ष ने भी ५८ साथस्त्र के व्याख्यान में स्थल संक्ष्म भेद से वृद्धि को दो प्रकार की मानकर (जहां बुद्धि के अविवेक से वन्ध कहा है वहां मी कारणावस्थापन सूक्ष्पवृद्धि का ग्रहण कर प्रकृति ही ग्रहण करनी) इस मकार कारण कार्य का अभिन्न निर्देश.माना है,(३)। जो कि यह कहा था कि साक्षी को अपरिणामी होने से उस को भासः पत्व कैसे) सो भी शाङ्करमत्त के अज्ञानपूर्वक ही हैं क्योंकि यदि वेदान्ती केवल वन को भासक मानते तो ज्ञानरप क्रिया का आधार होने से चेतन परिः (1) यदि सुपात में चित्त का लप मानते हो तो सूत्रकार ने सुपुति को चित्त की वृत्ति क्यों कहा ? इस आशङ्का के वारणार्थ स्वामी जी सूत्रकार का तात्पर्य निरूपण पामें हैं (जोकि) इत्यादि ग्रन्ग से। (२) द्वितीय गाद के १.५ सूत्र में भाष्यकारों ने प्रधान पुरुष को संयोग को बन्धकार कहा, औ १५ सूत्र में बुद्धि पुरुष को संयोग को गन्ध का हेनु कहा है एवं अन्यत्र भी बहरा स्थान में है। (३) एवेच श्रुतिस्मृतियों के संग आविरोध के लिये यह पूर्वोक्त युक्तिघटित मदुत्त माया ही समीचीन नाननी, यह स्वामी जी का.माय है। में .
. समाधिपाद णामी कहा जाता पर सो वह मानते नहीं क्योंकि अविद्यावृत्ति द्वारा ही चेतन को वह भागक मानते हैं, तथा च साक्षात् क्रिया का माधार न होने से पुरंप अपरिणामी ही है कुछ भासक होने से परिणामी नही हो सकता, (१) यदि यह कहो कि--( अविद्या की वृत्ति को द्वार मानने से साक्षिभास्य. कैसे ?.) तो यह भी. शाबरमत के अज्ञान प्रयुक्त है क्योंकि अविद्याचि से. बिना ही जिसका चेतन प्रकाश करे कुछ उसका नाम साक्षिभास्य नहीं है किन्तु इन्द्रिय अनुमानादि प्रमाण से विना केवल प्रतिमात्र द्वार से ही जिस का भकाश करता है यह साक्षिभास्प कहा जाता है, अत एव साक्षिभास्य स्थल में पीपादाचार्य ने ( अहं अहं ) इत्याकार अन्तःकरण की पत्ति मानी है, एवं -सर्वशमुनि ने भी प्रातिमासिक ( मिथ्यारजनजान) स्थल में रजताकार अविद्या. की.त्ति मानी है। इस प्रसङ्गागत विचार से यह सिद्ध हुआ कि अज्ञान तथा सुख को विषय करनेवाली जो कारणावस्थापन सूक्ष्मचित्त की वृत्ति वह निद्रापद का वाच्य है। आशका-यथा नैयायिकादि सपप्ति अवस्था में निखिल ज्ञान का अभाव मानते हैं तथा आप भी निरोध की न्याई वृत्तियों का अभाव ही सुपप्ति में: क्यों नहीं मानते * समाधान यदि सुपप्ति में निखिल वृत्तियों का अभाव माना जायगा। तो निद्रा से उत्थित प्रबद्ध पुरुष को जो यह स्मरण होता है कि ( सुख से मैंने शयन किया औ कुछ भी मैने वहा नही जाना ) सो अनुपपन्न होगा क्योंकि यह नियम है कि जिसका संस्कार अन्तः करण में स्थित रहता है उसी पदार्थ •का पुरुप को स्मरण होता है अन्य कानही औ संस्कार बिना बान से उत्पन्न नहीं हो सकता, एवं च प्रमुद्धपुरुषनिष्ठ स्मरणजान द्वारा यह अनुमान हुआ कि-सुप्तिकाल में सुख.औ जानाभाय विषयक इस को ज्ञान था, सो जान कार- गावस्थापन, सूक्ष्मचित्त की वृत्ति वा अविद्या की वृत्तिस्वरूप है (२) क्योंकि अन्यज्ञान का वहां संभव नहीं है, तथा च सखाधाकार वृत्ति की विद्यमानता. से यहां वृत्ति का अभाव मानना अयुक्त है,। यहां पर इतना विशेष यह भी जानलेना कि जिस निद्रा में सत्वगुण के लैश सहित तमोगुणं का प्रचार होता है उस निद्रा से उत्थितं पुरुष को ( मध्य से मैंने शयन किया, मन भी मेर (१) सत्र मुखादिशानन्य सरकार को अविद्यानिष्ठ होनेसे पुरुष अपरिणाम है यह सिद्ध हुआ। (२) तहा इतना विशेप है वि-सुपुरी में यह ज्ञान चित्तामनानासित अज्ञान को वृत्ति है जो जागरण में यह चित्तरूप में परिणत अनाम की वृत्ति है .
पातालदर्शनप्रकाशे- प्रसन्न है, औ प्रधा भी स्वच्छ है ) इस प्रकार मान होता है। औ जिस निद्रा में रजोगुण केलेश सहित तमोगुण का संचार होता है तिस निद्रा से प्रबुद्धपुरुप को (दूःखपूर्वक मैं सोया, औ मन भी मेरा अकर्मण्य (टीला) है क्योंकि स्थित न होकर निरन्तर भ्रमण कर रहा है। इस प्रकार मान होता है। यो जिंस निद्रा में केवल तमोगुण का ही पावल्य होता है उस निद्रा से उत्पित पुरुष को ( में खूब गाद निद्रा से मुद होकर सोया, औ शरीर भी मेरा भारी है, औ चित्त भी मेरा यकित पुरुष के तुल्य अलसयुक्त है क्योंकि पद्ध तस्कर के तुल्य स्तब्धीभूत है ) इस प्रकार मान होता है। यदि सुपुप्ति कालिक सुखादि विषयों का अनुभव नहीं माना जायगा तो यह तीन प्रकारका जो प्रबुद्ध पुरुष को स्मरण वह अनुपपन्न होगा। अर्थात् यह तीन प्रकार का जान मत्यक्षात्मक तो है नहीं किन्तु स्मृतिरूप है सो स्मृति अज्ञात विषय की हो नहीं सकती अत; निद्रा को बृत्यभाव न मान, कर पृत्तिविशेष ही मानना उचित है। : इस पूर्व विचार से जो कि नैयायिकों को यह भ्रम था कि-(सुपप्ति में शानसाधन इन्द्रियों के अभाव से औ प्रबोधकाल में स्मरण के न होने से सुपुप्ति में निखिलज्ञानों का अभाव होता है ) सो भी उच्छिन्न हुआ क्योंकि पूर्वोक्त प्रकार से यह दोनों हेतुं असिद्ध (१) हैं। यद्यपि विक्षेपजनक होने से प्रमाणादि वृत्तियां ही योग की विरोधिनी हैं कुछ निद्रावृत्ति नहीं क्योंकि, निद्रा को एक प्रकार की एकाग्रता होने से यह योग का प्रतिपक्षीभूत. नहीं है, तथापि तमोगुणप्रधान से निदो को.भी संबीन : निज समाधि का प्रतिपक्षीभूत होने से इतरवृत्तियों की तरह यह भी निरोधनीय : (निरोध करने योग्य ) ही है, अतएव निरोध करने योग्य दृचियों में सूत्रकार: ने इस.की परिगणना किया है। गौडपादाचार्य ने भी "उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्त कामभोगयोः, सुप्रसन्न लये चैव यथा कामों लयस्तथा" इत्यादि वचनों से निद्रावृत्ति का निग्रह ही योगी के मंति कर्तव्य उपदेश किया है। (विषयभोग में प्रवृत्ति द्वारा विक्षिप्त जो चित्र औ श्रम के अभाव से निद्रामात प्रसन्न जो चित्त इन दोनों का ही अभ्यासादि उपाय से निग्रह : करना उचित हैं क्योंकि यथा विक्षिप्त चित्त अनर्थ का हेतु है तया लयसे प्रसन्नता . (1) सुपुप्ति में अविद्या की या सूक्ष्मचित्त की वृत्ति मानने से ज्ञानसाधन का 'ममाष रूप हेतु असिद्ध है, मरगमद्भाव से स्मा- समाधिपादः । को माप्त भी चिरा अनर्थ जनक है, यह गौडपादीय वाक्य का अर्थ (१) है १०॥ इदानी क्रमप्राप्त स्मृति वृत्ति का लक्षण कहते हैं- सू० अनुभूतविषयाऽसन्प्रमोषः स्मृतिः ॥ ११ ॥ भाषा-( अनुभूतविपय ) प्रथम किसी शान का गोचर हो चुका जो विषय, उस का जो फिर (असम्ममोप ) चित्त में आरोह पूर्वक तन्मातविषयक शान वई स्मृत्ति है। अर्थात्-भवनादिप्रमाण द्वारा अनुभूत (ज्ञातये ) विपय का जो फिर उद्बोधक सन्निपान से संस्कारद्वारा चित्त में स्फुरण, वह चित्त का परिणाम- विशेष स्मृति पद का वाच्य है। तात्पर्य यह है कि जब कोई वस्तु दृष्ट वा श्रुत होता है तन्न अवश्य ही एकप्रकार का चित्त में तदाकार संस्कार अारित हो जाता है फिर जब किसी समय में उद्योधक सामग्री ( २ ) के उपस्थित होने पर यह चित्तवर्ती संस्कार प्रफुल्लित हो जाता है तब वह बात हुये पदार्थ के आकार से चित्त को रञ्जित कर तदाकार ही चित्त का परिणाम कर देता है, यह जो शात पदार्थ- विषयक चित्त का तदाकार परिणाम वहीं स्मृति वा स्मरण पद का वाच्य है । यद्यपि चित्त में अनेक प्रकार के संस्कार विद्यमान रहते है तथापि जिग्ग की उद्योधकसामग्री संबलित होती है वही संस्कार स्मरण को उत्पन्न करता है अन्य नही, सो उद्बोधक सामग्री कही चित्त की एकाग्रता औ कही अभ्यास औ कहीं सहचारज्ञानादि है, (3) औ कही स्नेह ही उदयोधकसामग्री है जैसा कि ( सो मेरी याता) यह स्मरण है। (१) सुपुति में सचीन अज्ञानोपाहत चेतन में चित्त लीन होता है औ समाधि में शुद्ध निज ब्रहारूप से मस्थित होता है, इस से रूप से निवृत्त कर शुद्धनहासरूप में अर स्थिति का संपादन करना ही योगी के किये परम कर्तव्य है, यह इसका भान है ( २ ) माता पिता के स्मरण में गग (प्रीति ) उद्बोधकमागमा है, औ शत्रु- विषयक स्मृति में द्वेष उरोधर सामग्री है, औ पढे हुये वो याई आगे में अभ्यास उद्यो- धक मागनी है, एक अन्य भी उहापोह से जानलेना। (३) से किसी पुरुष ने पूर्ण रथमाहेत सारथि देखा हो औ फिर कही केवल सारा ही दाट गोचर हो जाय तो वह सारांध का ज्ञान हो उदबाया हुआ उस यो रव का देता है, इसी को सहचारज्ञान कहते हैं, उद्बोधक सामग्रियों को सहाया ओ सज्ञा न्यायदर्शन में निर्दिष्ट है, जिसे देखना होय वह स्वामी जी निर्मित न्यायदर्शन- प्रकाश के तृतीयाध्याय द्वितीयाहिता के ४५ सूत्र के विवरण में देखले । ३ स्मरण १२ पातञ्जलदर्शनपकाये- अनुभव से स्मृति में इतना ही भेद है कि अनुभव अज्ञातवस्तुविपयक होता है औ स्मृति ज्ञातयस्तुविषयक होती है क्योंकि स्मृति का यह नियम है कि-जितना विपय अनुभव ने प्रकाशित किया है उस विषय से अधिक विषय का यह मकाश नहीं करती है क्योंकि यदि अधिक विपय का.यह प्रकाश करे- गी तो यह भी अज्ञात विषय का प्रकाश करने से अनुभव ही हो जायगी, इसी के बोधनार्थ ही मृत्रकार ने ( असम्पमोप ) यह पद दिया है । तहां (मुपस्तेये ) इस धातु से निप्पन्न होने से सम्प्रमोपनाम तस्करता (चोरी) का है औ असम्पमोप नाग तस्करता के अभाव का है, जैसे लोक में पुन अपने पिता की वस्तु से भिन्न किसी अन्य की यस्तु ग्रहण करने से ही चौर कदाजाता है कुछ पितृस्वत्वग्रस्त वस्तु के ग्रहण से नहीं, तैसे स्मरणज्ञान भी अपने पिता * अनुभव कर मकाशित से अन्य किसी विषय का प्रकाश कर ने से ही संप्रमोप ( चोरी ) वाला कहा जायगा कुछ अनुभव प्रकाशित विषय का प्रकाश करने से नही, सो स्मरणज्ञान अनुभूत विपय से अधिक विषय का प्रकाश करता नहीं अत: यह भी संममोप से रहित ही है, यह अनुभूत विषय से अधिक विषय का मकादशं न करना ही स्मृति में असम्प्रमोप है। यहां पर इतना विशेष यह भी जान लेना कि-असंप्रमोप पद से अधिक विपय का न ग्रहण करना इसी अर्थ का लाभ होता है कुछ न्यनविपय का 'ग्रहण नहीं करणा इस अर्थ का लाभ नही होता है, एवं च जहां (सो मेरी माता) इस प्रकार स्मरण न हो कार केवल ( हाय मेरी माय ) इस प्रकार प्रमुष्टतत्ताक (१) स्मरण होता है वहां भी लक्षण समन्वय हुआ क्योंकि यहां पर तत्तारूप सो इस अंश का संप्रमोप हाने से यद्यपि अनुभव से यह न्यूनविपयक है तथापि अधिक विषय का ग्रहण न करने से असंप्रमोप यहां पर विद्यमान ही है। एवं च जो विज्ञानभिक्षु ने इस लक्षणसमन्वय को न जानकर प्रमुष्टतत्ता- कस्मरण को अनुभवमाना है वह अदार्शनिकता का चिन्द है क्योंकि कोई भी दार्शनिक ममष्टवत्ताकस्मरण को अनुभव नहीं मानते है । आशङ्का-चित्त जो स्मरण करता है सो प्रत्ययमान (ज्ञानमात्र) का ही (*) स्मरण ज्ञान को भस्कारद्वारा अनुभव जय होने से स्मरणज्ञान भी अनुभव का पुत्र ही है अतएय अनुभव को पिता कहा है,। (१) सो मेरी माता इस स्मरण में जो (स) यह अश है वह ( तत्ता ) इस नाम से व्यहत होता है मो जहा इस तत्ता का प्रमोप (अमाव) होता है यह स्मरण प्रमुष्ट- तत्ताक पद का वाच्य होता है।
समाधिपादः। स्मरण करता है वा ग्राहमात्र (विपयमात) का स्मरण करता है वा ग्राह्य ग्रहण ( विषय औ ज्ञान ) इन दोनों का ही * रमरण करता है ? समाधान-यद्यपि शानविषयक अनुभव के अभाव से विपय का ही स्मरण होना संभव है तथापि पूर्व अनुभव को ग्राह्य ग्रहण उभयाकार विशिष्ट . होने से तज्जन्य संस्कार भी उभयआकार संयुक्त हुआ ग्राह्यग्रहण उभयस्वरूप ही स्मृति को उत्पन्न करता है कुछ एकविषयक नही, अत: ज्ञानसंबद्ध विषय का ही स्मरण होता है न केवल ज्ञान का औ न केवल विषय का । तात्पर्य यह है कि अनुभव-संस्कार-स्मरण यह तीनों समान ही आकार से भान होते हैं विभिन्न आकार से नहीं, औ (मैं घट विपक ज्ञान बाला हूं ) इस अनुभव में घटी घटज्ञान इन्ह दोनों का ही भान होता है तो इस अनुभव जन्य संस्कार भी दोनों विषयक ही मानना पड़ेगा, एवं च इस संस्कार से जन्य स्मृति को भी उभयविषयक होना उचित है एक विपयक नही । तथा च यह फलित हुआ कि-ग्राह्य औ.ग्रहण इन्ह दोनों का ही स्मृति प्रकाश करती है कुछ एक एक का नहीं। सो यह स्मृति दो प्रकार की है एक भावितस्मतव्या अर्थात् मिथ्यापदार्थ- विषयक, जो कि स्वमावस्था में होती है औएकअभावितस्मर्तव्या अर्थात् यथार्थ पदार्थ को विपय करने वाली जो कि जागरण काल में होती है । यद्यपि ( १ ) स्वम मानस विपर्ययज्ञानविशेष ही है कुछ स्मृति नहीं क्योंकि स्मृति मानने से जो यह स्वम में ज्ञान होता है कि ( यह अश्व धावन करता है ) सो अनुपन्न होगा क्योंकि यह शान प्रत्यक्ष स्थल में ही संभव हो सकता है स्मृतिस्थल में नहीं, स्मृतिस्थल में तो (सो अश्व) इस प्रकार ही ज्ञान का होना उचित है क्योंकि यहीं स्मृति का आकार है, एवं स्वम से अनन्तर मबुद्ध पुरुष को जो यह स्मरण होता है कि ( मैने राजा को देखा) सो भी अनुपपन्न होगा क्योंकि स्मृतिवादी के मत में (मैंने अमुकराजा का स्मरण किया) इस प्रकार के ही स्मरण का संभव हो सकता है अन्य प्रकार का नही, एव च स्वप्न को स्मृति न मानकर स्वप्न में नूतन ही मातिभासिक (मिथ्या) (*) यद्यपि माष्यकारों ने (किं प्रत्ययस्य चित स्मराते आहो श्विद विषयस्य ) इस माध्य से दो ही विकल्प किये हैं तथापि उभयग्रहण का सिद्धान्त करने से तीसरा विकल्प भी भाष्यकारों को अभिप्रेत है, इस आशय से तृतीय विकल्प का भी उपन्यास किया गया है, यह जानना । (१) श्रुतिशादियों के संग अविरोध के लिये स्वप्न यो स्मृति प्रतिपादक भाष्य के तात्पर्य निणार्थ विचारान्तर का उत्थापन करते हैं (यद्यपि ) इत्यादि से,।
११ पातञ्जलदर्शनप्रमाणे- पदार्थी की मनोमयी रचना आमिथ्या ही उन का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है यही मानना समीचीन है। • अत एव रहदारण्यश उपनिषद् में (न तत्र स्था न स्थगोगान पन्यानो भवन्त्वय रथान् रथयांगान् पथः सृजते ) ( १ ) इस श्रुति से नूतन ही माति भासिक सृष्टि की उत्पत्ति निग्पण कियी है, तथापि स्मृतिवत् (स्मृति की तरह ) स्वमशान को भी संस्कारजन्य होने से संस्कारजन्यत्य रूप साव्य को आश्रयण कर (२) ही भाष्यकारों ने रखम को स्मृति कहा है कुछ वस्तुगत्या वह स्मृति नहीं है यह जान कर विरा- धका परिहार करलेना । अतएव इसभाप्प को व्याख्यान में वाचस्पति मिश्र ने (यह सम स्मृति नहीं है किन्तु विपर्यय लक्षण युक्त होने से विपर्य ही है स्मृति के तुल्य प्रतीत होने से भाप्यकारों ने स्मृति कहा है कुछ वस्तुगत्या नहीं) (३) इस प्रकार स्वम को विपर्यय भान ही माना है स्मृति नहीं। जो कि शारीरकभाष्य में शराचार्य जी ने (४)सम को स्मृति कहा है सो भी इसी अभिप्राय से ही जान लेना। यह पूर्वोक्त स्मृतिज्ञान प्रमाण विपर्यय विकल्प-निद्रा स्मृति संधक गृतियों.. के अनुभव से ही उत्पन्न होता है स्वतन्त्र नही, अतएव निखिल वृत्तियों के अन्त में इस का निरूपण किया गया है । यह (५) निखिल ही प्रमाणादि वृत्तियां सख दुःख मोह स्वरूप औ सम्वन्दःख मोह क्लेशवरूप है । अतः इन वृशियों का निरोध ही करना उचित है । यद्यपि सरकार ने गग दूप अविद्यादि को ही लेश कहा कुछ (१)तिम सम्नास्था में न रथ ही है ओ न रथयोग ( अश्व ) ही है और रथचलने का मार्ग ही है परन्तु नतन हो रथ-अश्व-मार्ग वा जीव सर्जन कर लेता है पह इस शुति का अर्थ है । (२) असन्निहितविषयक होने से भी सप्न श्री स्मृति दोनों सदा है। (३) ( "नेय स्मृतिरपि तु विपर्यय तलक्षणोपपन्नत्वात् स्मृत्पाभासतया तु स्मृति- रता ) यह वाचस्पति मिश्र का लेख है , (४) द्वितीयाध्याय २ पाद के २९ सूत्र का भाप्य देखो । (*) प्रमङ्गप्रात विचार को समाप्त कर इदानी प्रकृत का अनुमरण करते हैं। (१) मिन देशों से पुरुष दुखित होता है उन्हीं का निरोध करना पुरष को उचित हो सकता है कुछ प्रमाणादि वृत्तियों का नहीं क्योंकि यह सब क्लेशजनका नहीं है इम आशा या वारण करते हैं ( यह ) इत्यादि से (1) सालिका रानस तामस वृत्तियों या यथाक्रम सुखदुः ख गोह यह नामान्तर है। - N है " समाधिपाद। सुख दुःख-मोह को नहीं तथापि सुख दास को रागद्वेष का जनक होने से यह भी क्लेशजनकत्वरूप धर्म से क्लेश ही जानने, अतएच सूत्रकार द्वितीयपाद में ( सुखानशी रागः , दुःखानुशयी द्वेषः ) इन दोनों सूत्रों से सुख दुःख को केशजनक कहेंगे, मोह औं अविद्या को एक होने से मोह भी क्लेश ही है, तथा च होशजनक सुखदुःखमोहस्वरूप होने से यह निखिलवृत्तियां अवश्य ही नि- रोध करने योग्य है यह फलित हुआ। इन पांच प्रकार की वृत्तियों का निरोध होने से ही सम्मजातयोग औ पद्वारा असम्प्रजातंयोग का लाभ होता है ॥ ११ ॥ पूर्व प्रकरण से निरोधनीय वृत्तियों का निरूपण कर इदानीं (इन वृत्तियों के निरोध में कौन उपाय है) इस आशङ्का के शमनार्थ जिन उपायों के सेवन से वृत्तियों का निरोध होता है उन उपार्यों का प्रतिपादक सूत्र उभारण करते हैं- सू० अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥ भाषा-( अभ्यासवैराग्याभ्याम् ) वक्ष्यमाणलक्षण अभ्यास औ वैराग्य से ( तन्निरोधः ) तिन पूर्वोक्त वृत्तियों का निरोध ( रुकावट) होता है। अर्थात्-चित्तवृत्ति निरुद्ध करने के दो उपाय हैं एक अभ्यास गो एक वैराग्य, तहां स्वाभाविक जो चित्त की बाहिमखपवाहनशीलता सो वैराग्य द्वारा निवृत्त होती है औ अभ्यासबल से आत्मोन्मुख जो आन्तरिकप्रवाहशीलता वह स्थिर होजाती है। भाव यह है कि-चित्तनामक (१) नदी के दो प्रवाह हैं एक तो कल्याण- वह औ द्वितीय पापत्रह, तहां जो प्रवाह आत्मानात्मविवेक रूप मार्ग से वहता हुआ कैवल्यपर्यन्त विश्रान्त होता है यह कल्याणवह कहा जाता है औ जो प्रवाह अविवेकरूप मार्ग से बहता हुआ विषयभोगपर्यन्त विधान्तिशील होता है वह पापवह कहा जाता है । इन दोनों में से जो विषयमोगरूप पापवह मवाह वह विपयदापटिरूप वैराग्य से निरुद्ध होता है औ विवेकरूप जो कल्याणवह प्रवाह वह चियेकज्ञाना अभ्यास से उद्घाटित होता है, इस प्रकार अभ्यासवैराग्य यह दोनों मिलकर त्तिनिरोध के उपाय है, अतः इन दोनों के अधीन ही चित्तत्ति का निरोध है। अर्थात् ल्यथा तीव्रवेगवाला नदी का प्रवाह प्रथम सेतुबन्धन द्वारा मन्द- (१) चित्तनदी नागोभयतो पाहिनी ) इत्यादि भाष्य का अनुवाद करते हुये काभ्याम घेराम्य इन दोनों का कर्तव्य भेद से समुघय प्रदर्शन करते हैं (चित्तनामक) इत्यादि से।
. में - च गृह्यते" पातजलदर्शनकाशे- धेग संपादन कर फिर कुल्याद्वारा क्षेत्र के उन्मुख तिर्यक ( तिरछा ) प्रचार वाला संपादन किया जाता है तथा चित्त नदी का विषयमवाहरूप वेग मी प्रथम वैराग्यद्वारा निवारण कर फिर अभ्यासद्वारा विवेकोन्मुख किया जाता है, एवं च समाधि के उत्पादन में अभ्यास वैराग्य इन्ह दोनों का समुच्चय ही जानना कुछ ( अभ्यास से वा वैराग्य से चित्तका निरोध होता है । इस प्रकार विकल्प मत जानना, इसी से ही भगवान् ने "अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण इस वाक्य में समुच्चय वोधक चकार का उपादान किया है। सूत्रकार ने भी ( अभ्यासवैराग्याभ्यां ) प्रकार समासयटित पद के उपादान द्वारा यही वोधन किया है क्योंकि विकल्प अर्थ में एतादृश समास का संभव नही है। यद्यपि केवल वैराग्य से ही बारामगृत्तिनिरोध पूर्वक चित्त की अन्तर्गखता हो सकती है तथापि अन्तर्मुखता की स्थिरता के लिये अभ्यास भी अपेक्षित है क्योंकि विना स्थिरता से चित्त एकात्र नहीं होगा। यद्यपि सूत्रकार ने प्रथम अभ्यास ही का उपादान किया है तथापि यो- ग्यतानुसार कार्यानुरोध से प्रथम वैराग्य ही उपादेय जानना (१) अभ्यास औ वैराग्य की क्षमता (सामर्थ्य) सर्वापेक्षया अधिक औ विल- क्षण है यह अग्रिग दोनों सुनों की व्याख्या में कहा जायगा ।। १२ ॥ इन दोनों उपायों में से प्रथमनिर्दिष्ट अभ्यास का लक्षण कहते है- • तत्र स्थितो यत्नोऽभ्यासः ॥ १३ ॥ भाषा-(तर) तिस पूर्वोक्त निरोध में (स्थिती) चित्त की स्थिरता के निमिन, जो ( यत्न ) मानस उत्साह पूर्वक यमादि अङ्गो का अनुष्ठान वह ( अभ्यासः ) अभ्यास कहा जाता है। अर्थात्-राजसतामसगृत्तिरहित चित्त की जो प्रशान्तवाहिता ( सात्तिक वृतिभवादशीलतारूप विमलतासंज्ञक स्थिति ) तिस स्थिति के संपादनार्थ जो मानमउत्साहपूर्वक दृढ़ होकर यम नियमादि अगों के अनुष्ठान में तत्परतारूप पत्न वन अभ्यास पद का वाच्य है यह अभ्यास ही स्थिरता को संपादन कर चित्त को एकाग्र कर देता है, यह भी एक अदमुतशक्तिविशेप अभ्यास में ही पाया जाता है जो कि असाध्य कार्य (१) भाव यह है कि जब तक वैराग्य से चित को अन्तर्मुखता नहीं होगी तब तक 'अम्पास निर्विषय ही है क्योंकि अन्तर्मुखता की स्थिरता के अर्थ ही अभ्यास अपेक्षित है भो मतमवता वैराग्य से बिना अमाप है , अत.वैरारय ही प्रथम अनुठेय है । . सृ.
समाधिपादः। भी इस के बल से वशीभूत हो जाते हैं देखिये जिस विष * अहिफेन प्रभृति के भक्षण से पुरुष मृत वा मूर्छित हो जाते हैं उन विपादि के सेवनाऽभ्यासी उन को वशीभृतकर लेते है मत्युत विपादि के न सेवन से ही वह मृतमाय हो जाते हैं, इसी प्रकार जव मुमा भी चित्त स्थिरता के अर्थ अभ्यास निष्ठ होगा तो वह स्थिरता भी उस के अवश्य ही वशीभूत हो जायगी, क्योंकि दुःसाध्य को सुसाध्य कर देना कुछ अभ्यास के आगे दप्कर नहीं है ॥ १३ ॥ इदानी जिसमकार यह अभ्यास दृढमूल हुआ अनादिकाल से प्रवृत विप- यवासनाजनित व्युत्थानसंस्कार का वाधक होता है वह प्रकार उपदेश करते हैं- सू० स तु दीर्घकाल-नैरन्तर्य सत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः ॥१४॥ भाषा-(स तु) सो यह पूर्वोक्त अभ्यास ( दीर्घकाल ) वहुतकालपर्य्यन्त (नैरन्तर्य ) व्यवधान रहित सत्कारासेवित ) ब्रह्मचर्य श्रद्धा-भक्तिपूर्वक अनुष्ठित हुआ ( दृढभूमिः ) दृढ अवस्था वाला हो जाता है । अर्थात्-यदि यह अभ्यास तितिक्षा ब्रह्मचर्य-श्रद्धापूर्वक डोहारादि जपरूप विद्या से आहत हुआ निरन्तर अनुष्ठान किया जायगा तो फिर यह अभ्यास दृढावस्थाचाला हुआ कदापि व्यत्थान संस्कारों से वाधित नहीं होगा प्रत्युत उन्हों के ही तिरस्कार करने में यह मत्त हो जायगा। भाव यह है (१) कि-अनादिकाल से हा यह चित्त विपयभोगवा- सनाजन्य व्यत्यान संस्कारों से चञ्चलता का ही अभ्यास करता चला आता से चञ्चलता चित्त को एकस्वभावभूत धर्म ही हो गया है सो यह स्व- भावभूत चञ्चलता आगन्तक अल्पकालसाध्य किसी उपाय से निवृत्त होनी असम्भव है, अतः जिस उपाय से चञ्चलता पराभूत हो जाय औ स्थिरता चित्त का स्वभावभूत धर्म हो जाय यह उपाय ही योगलिप्सु को उपादेय है, औ एतादृशं उपाय अभ्यास की दृढ़ता के सिवाय अन्य कोई देखने में आतr नहीं, अत:यहुकाल पर्यन्त अभ्यास का अनुष्ठान करना ही एक स्थिरता का मुख्य उपाय है, वहुकाल करने पर भी यह नहीं है कि चलो दिन में एक दो (-) (विप). सवाया, (बोईफन ) भाम, अदि शब्द से गाडा प्रहरि पा ग्रहण कर लेना। (१) अनादिकाल से प्रत चञ्चरता के प्रसाद यो आधुनिक मम्माम यो परामर कर सकता है इस आपदा या यारण करते हुये मन-माप्य या तार्पयते हैं (भाष यह है ) इत्यादि।
i. पातसलदर्शनकाशे-- घटिका करने से ही कार्य सिद्ध हो जायगा किन्तु निन्तर व्यवधान रहित ही करे, सो भी अवज्ञापूर्वक नहीं किन्तु अद्यादि पूर्वक होना चाहिये, यस यही यमादि अभ्यास की हदता का उपाय है। कष्टसाध्य जानकर उपराम न हो जाय किन्तु मानस उत्साह से खेदरहित होकर निरन्तर अभ्यास में ही तत्पर होवे, अत एच भगवान ने "स निश्चयेनं. योक्तव्यो योगोऽनिर्विष्णचेतता" इस वाक्य से सैद रहित होकर ही योगानु- द्वान की कर्तव्यता मतिपादन कियी (१) है। गौडपादाचार्य ने भी-"उत्सेक उधैर्यद्वत कुशाग्रेगकविन्दना" मनसो- निग्रहस्तद्वद भवेदपारखेदतः (१) इस वाक्य से रिहिमष्टान्त द्वारा खेदा- भाव पूर्वक ही.मन का निग्रह करना कहा है, यह फलितार्य है ॥ १४ ॥ इदानीं जिस एकाग्रता को दहता के अर्थ अभ्यास की दृढ़ता अपेक्षित है उन एकाग्रता का साधनमत औ एकाग्रताविरोधी चिपयत्ति का प्रतिबन्धक जो अपरवैराग्य उस का लक्षण कहते हैं- सू• दृष्टाऽऽनुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकार- सञ्ज्ञा वैराग्यम् ॥ १५॥ भाषा-(दृष्ट) इस लोक में दृष्टिगोचर ऐहिक भोगोपयोगी माला चन्दन- पनिताविलास-भोजन-पानादि विपय, (आनुश्रषिक ) वेदाद्रि द्वारा श्रुत स्वर्ग (निक्ष हेतु से बहुकाल औ कष्ट साप होने से उपराग होने की संभावना हो सकती है इस हेतु से हैं। भगवान ने खेद रहित कहा है यह तत्व है। (२) जैसे टिभि पक्षी ने कुशसदृश अग्रभाग वाली चौचद्वारा एक एका विन्द से 'समुद्र का रत्येक (बाहरकमेवा ) निश्चय किया था तैमे खेदाभाव पूर्वक निश्चय से ही मन का निग्रह होता हे खेद से नहीं, यह गौडगादीय वाक्य का अर्थ है टिट्टिमा- रयान शङ्करानन्दकृत आरगपुराण में विस्तृत है, . संक्षिप्त उप्त का यह है कि समुद्र की तरहों द्वारा अपने अण्डों का समुद्र में पतन होने पर पक्षी ने यह प्रतिज्ञा किया कि मेरे बच्चों को तो समुद्र लेहो गया है परन्तु मैं गो विना शोषण किये निवृत्त नहीं हूं गा, इस आशय से है। समुद्र को शुष्क करने के लिये चोचद्वारा एका एक बन्द बाहर फैंकने , लगा, ( भरा इस तरह कभी समुद्र शुष्क हो सकता है) इस प्रकार पक्षियों के कहने पर यही कहता था कि क्या कुछ यह नियम है कि आज ही या ३त्सर भर वा इम जग में ही शुष्क करूगा किन्तु ( कोटि जन्मतक रगर हमारी ) यही उत्तर देता था इस साहस को गरुड जी ने उसको अण्डे दिला दिये। इसी तरह (काबहोगा) इस प्रकार की भावना को साग कर निरन्तर अभ्यास में ही योगी तत्पर रहै कुछ बेद गत करे, यह नख है टिगिनाम-टटीरी का है।
४६' -- समाधिपादः में होनेवाले अमृतपान अप्सराभोगादि ऐश्वर्य तथा विदेहभाव औ प्रकृतिलयता का ( १ ) आनन्द, इन निखिल विषयों में (वितृष्णस्य ) तृष्णासे रहित मु- मुक्ष के चित्त में जो उन विषयों में वैरस्यज्ञान वह वशीकारसंज्ञा पद वाच्य अपरबैगग्य कहा (२) जाता है । अर्थात्-गण-दोप के विवेक द्वारा विपयों में दोपदृष्टिवाले चित्त की उप स्थित हुये ऐहिकपारलौकिक विपयों में जो रागद्वेष के अभाव द्वारा हेयोपादे यशन्य स्थिति उसका नाम वशीकार संज्ञा वैराग्य है । यह वैराग्य ही बायविषयप्रति रुद्ध करने का एक मुख्य उपाय है । अभ्यास की तरह इस वैराग्य की भी विलक्षण कार्यकारिता किसी से गुप्त (छिपी ) नहीं है क्योंकि यह लोक में प्रत्यक्ष दृष्ट है कि मनुष्य को जिस वस्तु में (से) उत्कट वैराग्य उत्पन्न होजाता है फिर उस वस्तु के निमित्त कदापि विरक्त पुरुप का चित्त चलायमान नही होता है मत्युत जस के उपस्थित होने पर ग्लानियुक्त ही हो जाता है, इसी प्रकार जब संसार के निखिल विषयों में दोपदृष्टि द्वारा वैराग्य उदय हो जायगा तो फिर उस विरक्त का चित्त भी जयों किसी विषयभोग के लिये चलायमान हो सकता है, विपपभोग निमित्त चित्त'का चांचल्य न होना ही बाह्यमत्ति का रुक जाना है, अतः सतरां वैराग्य द्वारा चिन की बाधावत्ति का रुद्ध होना सम्भावित है कुछ असंभावित नहीं । परन्तु विना दोपचिन्तन से वैराग्य का भी होना असम्भव ही है, अत: प्रथम दोपचिन्तनरूप प्रसंख्यान बल ही (३) ममा के लिये परम संपादनीय है।' तहां विषयों में दोपदृष्टि यह है कि (बिना धनादिसम्पत्तिं के वनितादि का भोगविलास होना असम्भव है औ धन के सम्पादन-रक्षण-व्यय (खर्च) करने में दुःस के सिवाय मग्यलेश नही है ) एवं स्वर्ग में भी अधिक ऐश्वर्य वाले के उत्कर्ष को न सा करना, औ समान ऐश्वर्य वाले के सह स्पो होनी, ओं पुण्यक्षप के अनन्तर उलटे होकर गर्यलोक में पतन हो जाना, इत्यादि दोप चिन्तन जान लेना(४) (१) विदेह औ प्रकृतिलयों का प्रतिपादन इम पाद के १९ गत में होगा । (२) यद्यपि मा में आस्वैराग्य नाम नहीं कहा गया है तथापि अपिण मा पर वैराग्य का लक्षण कपन से यह भएर राम्य ही जानना । (३)विषय भोग को दुःखम्प जान कर वियों में दोपमानना की तर हो जाना हो प्रमरमानयन कहा जाता है, जिस प्रकार विश्यमोग दुरुप २ पाद फे १५ मन में कहा जायगा । (४) जिम ने मम्पर प्रभार दौर हाट यो मागमा यारनी होप यह योगयातित के समप्रहरण या सण सरे ।
५० पातशालदर्शनकारी- यहाँ (१) पर घशीकारसञ्शक वैराग्य के कथन से अन्य पूर्वभावी वैराग्य लय का भी ग्रहण जान लेना साकि उन तीनों के बिना चशीकार वैराग्य का होना असम्भव है। भाव यह है कि-पतमान, व्यतिरक, एकेन्द्रिय, वशीकार भेद से वैराग्य की चार सजा है, तहां (चित्तवर्ती राग द्वेपादि मल ही इन्द्रियों को अपने २ विपयों में प्रदत्त करते है सो यह रागादिमल इन्द्रियों की विपयों में प्रति न करें तो श्रेष्ठ दोय ) इस विचार से जो रागादिमल की नित्ति के लिये मैत्री- आदि (२) भावना का अनुष्ठान करना वह चैराग्य यतमानसंडा (३) नाम से व्यवहृत होता है। औ मैत्रीआदि भावना के सेवन करते २ जो चिकित्सक बत् पक ऑअपक मलों का.व्यतिरेकनिधय ( इतने चित्तमल निवृत्त हो चुके है रो इतने निरत्न होने वाले हैं औ यह निवृत्त हो रहे हैं इस प्रकार निवृत्त भौ विद्यमान चित्त- मलों का जो पृथक २ रूप से ज्ञान ) वह व्यतिरेकंसंजक वैराग्य कहा जाता है (2) औ जप निवृत्त हुये चित्तमल इन्द्रियों की विषयों में प्रवृत्ति करने में असमर्थ होकर केवल चित्तमात्र में ही अवस्थित हुये कुछ २ विपयों में उत्कण्ठित रहने हैं तब वह वैराग्य की तृतीयावस्था एकेन्द्रियसशा पद से पाच्य होती है । जब फिर विवेकाल से निखिल विपयों में उपेक्षा वृद्धि होने से वह उत्कण्ठा भी निवृत हो जाती है तब वह वैराग्य की तुरीयावस्था वशीकारसना पद से व्यवहृत होती है। यह वैराग्य की तुरीयावस्था ही सूत्रकार ने निर्दिष्ट किया है, भी यह अवस्था ही अपर वैराग्य की सीमाहै, औ इसी क्रम से ही इस की उत्पत्ति होती है। एवं च यहा वशीकारसंज्ञक वैराग्य के कथन से पूर्वभावी तीन वैराग्य.. ( १ ) अपरवैराग्य को चारप्रकार का होने से सूत्रकार ने एक ही प्रकार क्यों पहा, इस के समाधानार्थ कहते हैं ( यहा पर ) इत्यादि । (२) मैत्री आदि भावना का निरूपण इस पाद के ३३ सूत्र में होगा, जिसप्रकार मैनी आदि भावना से रागादिमल निवृत्त होते हैं वह प्रकार भी इसी मूत्र के व्याख्यान में प्रदर्शन किया जायगा। (३) गुरुमुव से शास्त्रद्वारा संसार में सार अमार का निश्चय करने के लिये जो सद्योग वह भी यतमाग ही जानना । (१) निवृत्तमलों से विद्यमानमलों यो पृथक् जानकर उ ह की निवृत्ति करना ही व्यतिरेक वैराग्य का फल है। .
। समाधिपादः। भी अर्थ से लब्ध हुये (१) क्योंकि उनतीनों के विना इस की उत्पत्ति का असम्भव है ॥ १५ ॥ इस प्रकार सम्मज्ञातयोग के साधनभूत अपरवैराग्य का लक्षण प्रतिपा- दन कर इदानी सम्प्रजातसमाधि का फलभूत औ असम्भज्ञातसमाधि का का. रण जो परवैराग्य उस का लक्षण कहते हैं- सू० तत् परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥ १६ ॥ भाषा-(पुरुपख्याते: ) विवेकज्ञान के उदयं से, जो (गुणवैतृप्ण्यम् ) गुणकार्य विवेकज्ञान में भी तृष्णा का अभाव (तत्परम् ) वह परवैराग्य कहा जाता है। अर्थात्-ऐहिकपारलौकिक विषयों में दोपष्टि द्वारा विरक्त हुये चित्त में जो गुणस्वरूप प्रकृति से भिन्नरूपता से पुरुप (निजरूप) का साक्षात्कार- रूप.पुरुपख्याति * तिस पुरुपख्याति से जो गुणवैतृप्ण्य (समाधि के फल भूत विवेकख्याति में भी तृप्णा का अभाव ) वह परवैराग्य कहा जाता है। भाव यह है कि--सम्पज्ञातसमाधि में विद्यमान ध्येयाकारत्ति के निरोप ' के लिये जो उस में वैरस्यज्ञान अर्थात् समाधि के फल में भी इच्छा का अभाव पद परवैराग्य (२) है। इस वैराग्य को ही ज्ञानप्रसादमात्र कहते हैं क्योंकि इस में रजतमगुण का गन्धमान भी नहीं रहता है। इस वैराग्य के उदय होने से ही योगी धर्ममेघसमाधिनिष्ठ हुआ अपने मन में यह मानता है कि जो हमें पापणीय था सो प्राप्त हुआ, औ जो क्षय करने योग्य पंचक्लेश थे सो भी मेरे क्षीण (नष्ट ) हुये, औ जिस धर्मअधर्म के समूह से घटीयन्त्रवत् निरन्तर ही जन्मोत्तरमरण औ मरणोत्तरजन्म को पुरुप माप्त होता है सो धर्माऽधर्मसमूह भी मेरा उच्छिन्न हुआ। (१)एवं च वंशीकार को ग्रहण से सब का ग्रहण होने से तस्कथना ऽभाव प्रयुक्त न्यूनता दोप यहां नहीं है, यह तत्व है। (*) पुरुष चेतन, शुद्ध, अनन्त है, ओ प्रकृति पढ, माझेन, सान्त होने से हमसे मिन है इस प्रकार मिनरूपता से जो पुरुष या माक्षात्कार इसी कानाग पुरषख्याति है । (२)गो गो त्रिगुणात्मक युद्धि का कार्य है सो सयो योगी को हेपोटि में है थी, विकल्पाति भी सस्यगुणामक यो बुद्धि का कार्य है इस से या सापही है इस भामेमाप से लो उस में कृष्णा का भभाष मह पर राय है।
पातजलदर्शमप्रकाश- यह वैराग्य ही जान की पराकाष्ठा (अयधि है औ कंवल्य भी इसी वैराग्य का अविनामाथि (१) है १६ ॥ इस प्रकार निराध के उपायभूत अभ्यास-पैराग्य का लक्षण प्रतिपादन कर इदानीं निरुद्धचिरावृत्ति योगी को जो सम्शातसमाधि प्राप्त होता है (?) उस का अवान्तरभेद सहित स्वरूप निदेश करते हैं। सू वितर्कविचाराऽऽनन्दाऽस्मितास्वरूपाऽनुग- मात् सम्प्रज्ञात: ॥ १७॥ भाषा-वितर्क, विचार, आनन्द-भस्मिता नामक रवरूपों के अनुगम. (सबन्ध ) प्रयुक्त जो निरोध वह निरोध सम्प्रज्ञात कहा जाता है । अर्थात्-जिस भावनों में संशयविपर्ययशान के अंभावपूर्वक यथार्थप से ध्येय (२) वस्तु का ज्ञान होता है उस भावनाविशेष का नाम सम्प्रज्ञात है, सो यह सम्मज्ञात ध्येय के भेद से चितकानुगत, विचाराऽनुगंत, आनन्दाऽनु- गत, अस्मिताऽनुगत भेद से चारप्रकार का है, इस भावनाविशेप को ही स. 'विकल्पयोग वा सविकल्प समाधि कहत है। ... भाव यह है कि-विषयान्तर के परिवार पूर्वक किसी ध्येय पदार्थ में वारं वार चित्र के निवेश का नाम भावना है, तिस भावना का विषयभूत जो भाव्य वह ग्राह्य ग्रहण गृहीतृ-भेद से तीन प्रकार का है, इन तीनों में से ग्राह्य भी स्थूल सूक्ष्म भेद से दो प्रकार का है, तहां जैसे धनुर्विद्या में निपुण होनेवाला "पुरुप प्रथम स्थूललक्ष्य को येधन कर फिर सूक्ष्मलक्ष्य के वेधन में तत्पर होता है ऐसे योगेच्छु भी पहिले स्थलध्येय की भावना की दृढ़ता कर फिर सूक्ष्म विपय की भावना में प्रवृत्त होता है कुछ सहसा ही सूक्ष्म में नहीं। एवं च स्थूलपञ्चभूतो विपयक वा पांचभौतिक स्थूल चतुर्भुजादि रूप विपयक जो भावनां, एवं स्थल भूतों के कारण-सूक्ष्मभूत पञ्चतन्मात्रविषयक जो भावना इन दोनों का नाम ग्राह्य भावना है, इसी को ही ग्राहसमापचि वा ग्राहासमाधि भी कहा जाता है। + (१) पर वैराग्य के उदय होने से कैवल्य प्राप्ति मे कुछ मी विलम्ब नहीं होता है इन से कैवल्य वैराग्य का अविनामावि है, जिम की सत्ता से जिस की अवश्यही सचा 'होय वह उसका आश्रनाभावि कहा जाता है। (२) जिस का ध्यान किया जाता है वह धेय या भान्य कहा जाता है । भावना ध्याग, यह दोनों मी. समानार्थक जानने । 14 समाधिपादः। तहां स्थूलविषयक भावना का नाम वितर्कातिगत सम्प्रज्ञात (%) औ सूक्ष्मविषयक भावना का नाम विचाराऽनुगतसम्पज्ञात है। एवं सत्चमधान अहङ्कार के कार्यभूत दश इन्द्रियो विषयक जो भावना उस का नाम ग्रहणसमापति वा ग्रहणसमाधि है, इसी को ही भानन्दा गत- संम्पज्ञात कहते है। एवं इन्द्रियों के कारण अहकार वा गुद्धि वा प्रकृति या परुपविषयक जो भावना उस का नाम ग्रहीतृसमापत्ति का ग्रहीतृसमाधि है, इसी का नाम अस्मिताऽलगत सम्प्रज्ञात है। इनचारी समाथियों में से जो प्रथम वितर्कसमाधि है वह मनुष्याऽनुगत है अर्थात् वितर्क, विचार, आनन्द, अस्मिता इन चारों से ही यक्त है कारण यह कि-घटााटे कार्य में मृत्तिका की तरह निखिलकार्य में कारण अन्गत रहता है, यह शास्त काभनयम है तथाच स्थूल भूतों को पञ्चतन्मानों का कार्य, होने से स्थूलभूतों में सूक्ष्मभूत अनुगत है, एवं पञ्चतन्मात्रों को अहंकार का काय होने से तन्मात्र द्वारा अरद्वार भी अनगत है, एवं अहवार को बद्धि का कार्य होने से अकारादि द्वारा वृद्धि भी स्थलभूतों में अनगत यी, एवंच स्थूलभूतों की भावना करने से फलतः सवी की भावना प्राप्त हुयी, अतः स्थूलभूतविषयक भावना चतुष्टयानगत है यह सिद्ध हुया । एवं सविचारसम्प्रज्ञात भी वितयानगत है क्योंकि इस गायना में रयु- लभूतों का भानन होने से * यह वितर्क से रहित है, एवं सानन्द सम्म ज्ञात द्वयाऽनुगत है क्योंकि इस भावना में स्थूलसक्ष्म भूतों का भान न होने से यह वितर्क ओ विचार से रहित है, एवं अस्मिताऽनुगत (२) सम्प्रज्ञात को एका. (१) यहा इतना विशेष यह भी मान लेना कि-शिम भावना में पञ्चभूतों का (सोनभून प्रथम सत्पन्न हया ओ विस भूत में क्या धर्म है ) इस प्रकार पाडपर अनुसन्धानपूर्वक चित्त की वृत्ति विद्यमान रहती है यह भायना सायतर्फ नाम से याश्य होती है भी जिम में इस अनुम धान को त्याग कर बेवज्ञ वस्तुमासविषया चित्तशि होय यह नियित ममापत्ति कही जाती है परन्तु यहा इन दोनों काही नाम पिता- ऽनुगत मम्माज्ञात जानना । इसी तरह मविचारनिरिचार भी नान लेना, यह सब । १२ । १३ १ ४४ । इन सूनों में स्पष्ट होगा। (*) कार्य में कारण अनुगत रहत' है कुछ यारण में वार्य नहीं इस से त गायों को भावनों में स्थूळ भूनों या भागनहीं होता है। (१) यहा पारंगता से महार ओ प्रति तथा हमारोपाधिक पुरप, हा तांना काही प्राण जानना ।
५४ . पातल्शलदानप्रकाशे- नुगत जानना क्योंकि इस में अस्मितामान को त्यागकर किसी अन्य का भाननहीं होता है। यह सर समाधिय सालम्प औ सीन है क्योंकि इन सब में किसी न, किसी ध्येय का आलम्पन तथा पीनभृत अंशान (१) विधमान ही रहता है। अत एव इन समाधियों का फल मुक्ति से भिन्न ही वायपुराण में कथन किया है यथा " दश मन्वन्तराणीह विन्तीन्द्रियचिन्तका, भौतिकास्तु शतं पूर्ण, सहन स्वाभिमानिका;, बौद्धा दशसहस्राणि तिष्ठन्ति विगतज्वराः, पूर्ण शतसहस्रं तु तिष्ठन्त्यव्यक्तचिन्तकाः, पुरुपं निर्गुणं प्राप्य कालसंख्या न विद्यते" । इति । इन्ह श्लोकों का अर्थ-(पुरुपों के सवत्सर के प्रमाण से बीस हजार अधिक ४३ तितालीसलक्ष चारोंयुगों का प्रमाण है, औ यह चारोंयग जव २५५६५ चार व्यतीत होते हैं तर एक मन्वन्तर होता है। जो पुरण इन्द्रियों का चिंतन करता है वह पुरुष देहपात से अनन्तर दश- मन्वन्तर पर्यन्त इन्द्रियों में लीन रहता है, औ जो पंचभूतों की भावना करता वह शतमन्वन्तर भूतों में लीन रहता है, एवं अहंकार की भावना करने वाले सहस्रमन्वन्तर, औ बद्धि की भावना करने वाले दशसहस मन्वन्तर, औ प्रकृति की उपासना करने वाले शनसहस्र मन्वन्तर अर्थात् रक्ष मन्वन्तर प्रकृति में लीन रहते हैं, यह सनी ही फिर संसार में आते हैं, क्योंकि इन्हों का यही अवधि है, इस से यह सब समाधिये समाधिाभास होने से मुमचयों को हेय हैं, औ जो पुरुप असमज्ञातसमाधि से स्वस्त्ररूपभूत निर्गुण पुरुष को मात होते है उन की कालसंख्या नहीं है, अर्थात् असप्रज्ञातसमाधि वाले भवबंधन से मुक्त होकर फिर संसार में नहीं आते है)। यहां प्रसङ्ग से यह भी जानलेना कि-इस पाद के ४२ सूत्र में जो समा- घि क ग्राध-ग्रहण-ग्रहीतुसमापत्तिरूप तीन भेद कथन किये है उन्ही समा- धियों का ही ग्राह्य नो म्यूल सूक्ष्म भेद से दो प्रकार का मान यहां पर चार भेट निरूपण किये गये हैं कुछ यह मत जानना कि वह तीन अन्य है औ यह चार अन्य हैं, इसी से ही दोनों मिलाकर यहां हम ने निरूपण किया है ॥१७॥ इस प्रकार अपरवैराग्यजन्य सम्प्रज्ञातसमाधि का निरूपण कर इदानीं परवराग्यनन्य असम्पज्ञात समाधि का लक्षण कहत हैं- सू० विरामप्रत्ययाऽ यासपूर्वः संस्कास्शेषोऽन्यः ॥१८॥ (1) आत्मभिन्न स्थळ भूतादि अनात्मा का ध्यानकरन यहां अज्ञान है। है समाधिपादः। 'भाषा-(विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः) पूर्वोक्त न भावना के विराम=अभाव का जो प्रत्यय-कारणभूत परवैराग्य तिम वैराग्य के अभ्यासपूर्वक जो संस्कार शेष-नितिकचित्त का अवस्थानविशेप वह ( भन्या ) सम्प्रज्ञातसमाधि से 'भिन्न असम्मज्ञात है। अर्थात्-जैसे भजित (भूजाहुया ) बीज अंकुरोंत्पादन में असमर्थ हुया केवल स्वरूपमानशेप कहा जाता है तैसे निरुद्ध हुया चित्त भी वृत्तिरूप कार्य करने में असमर्थ हुया संस्कारमालशेप कहा जाता है, सो यह चित्त का संस्का- रमात्रशेषरूप से अयस्थान होना कुछ अनायासलभ्य नहीं है किन्तु परवैराग्य के अभ्यास से ही प्राप्त होता है, एवं च परवैराग्य के अभ्यास से जो संस्का- रशेषरूप निखिलवृत्तियों का निरोध वह संमज्ञात से भिन्न असम्मज्ञातसमाधि जानना यह फलित हुया। भाव यह है कि जैसे सम्पज्ञात में किसी ध्येय का आलम्बन (आश्रयण) रहता है तैसे असम्ममातयोग में आलम्ब नहीं रहता है अतः निर्वस्तुकविराममत्यय- (निरालम्बपरवैराग्य ) ही इस का उपाय हो सकता है कुछ सालम्ब अपर- वैराग्य नही क्योंकि भर्यशून्य (१) होने से परवैराग्य ही असम्प्रजात के सदृश 'है अपरचैराग्य नही। इस परवैराग्य के अभ्यासपूर्वक ही चित्त निरालम्बन हुया अभावमाप्त के तुल्य हो जाता है। इस असम्भज्ञात को ही निर्वीजसमाधि कहते हैं क्योंकि संसारवीजभूत अविद्यादिलेशों का इस दशा में अभाव हो जाता है। इस दशा को माप्त हुये पुरुप ही ब्रह्मविद्वरिष्ठ इस नाम से भूपित होते हैं, औ यही तुर्थगा नाम ज्ञान की सप्तमी भूमिका है, औ यही योग की परम फाटा है। इस अवस्था में योगी का चित्त नित्तिक हो कर केवल ब्रह्मस्वरूप से विराम नाम पूर्वोक्क वितर्कादिभावना के साग का है. जो प्रत्यय नाम कारण का है तथा च राम का कारण भूत जो परवैराग्य निम का अभ्याम है पूर्ण (कारण जिम या 'यह पिराम्प्रत्ययाऽभ्यामपूर्व हुया, इसी आशय से सून या अर्थ 4 ते .. (पूर्वोक्त ) इत्यादि । (१) ( अर्थशून्य') ध्येयरूप आलम्बन रहित, अर्थात् कार्य के समान शाला ही कारण बन सकता है विभिन्नरूपयाला नहीं अत गुणवैतृष्ण्यरूप परपराग्य असम्प्रज्ञात का कारण हो सकता है भार वैराग्य नहीं क्योंकि यह विरूप है।
. " * पातखलदर्शनकाशे- ही (१) अवस्थित होता है कुछ निज चञ्चलरूप से या ध्येयाकार से नहीं, अत एव इस को निरालम्यसमाधि कहते हैं ॥ १८ ॥ सो यह पूर्वोक्त निविलवृत्तियों का निरोध दो प्रकार का है एक उपाय- प्रत्यय अर्थात्- वक्ष्यमाण श्रद्धा आदि उपाय से जन्य, आ एक भयमत्यय अर्थात्- अनात्मभूत पदाथों में आत्मत्ववाद रूप अज्ञानजन्य, इन दोनों में से जो उपायमत्यय निरोध है वह योगियों को होता है औ. यही मुक्ति का उपाय होने से मुमुक्षुयों को उपादेय ( ग्राहा) है, सो यह अग्रिम २० सूत्र से कहा जायगा, इदानीं योगियों को हेय जो भयमत्यय निराध यह फिन पुरंगों को होता है यह निरूपण करते हैं--- सू०-भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥२०॥ भाषा--विदेह-प्रकृतिलयों को जो वृत्तिनिरोध प्राप्त होता है यह भवप्रत्यय अंर्धात् अज्ञानजन्य है। 'भव नाम संसार कां आ संसारकारण अज्ञान का है (२)ी संसार नाम जन्ममरण के प्रवाह का है, तथाच मंत्र (संसार ) का जो प्रत्यय कारण वा भव ( अज्ञान ) ही हैं प्रत्यय ( कारण ) जिस का यह भवप्रत्यय हुया । एवं च विदेह-प्रकृतिलयों को होने वाला जो निरोधं वह 'अज्ञानजन्य तथा जनगगरण का कारण है, अर्थात् मुक्ति उपाय नहीं यह फलित हया । भाव. यह है कि--जो पुरुप भूत औ इन्द्रियों में से किसी एक पदार्थ में आ- स्मत्व भावना कर उन्हीं का समाधि में आलम्बन कर ध्यान करते हैं वह विदेह कहे जाते हैं क्योंकि वह देहपात से अनन्तर भूत वा इन्द्रियों में लीन होने से देहरहित हो जाते हैं । औ जो पुरुष प्रकृति-महत्तय-अहङ्कार-पञ्चतन्मात्रों में से किसी एक पदार्थ में आत्मत्व भावना कर उन्ही का ही समाधि में आल- बन करते हैं वह प्रकृति लय कहे जाते हैं क्योंकि वह देहपात से अनन्तर' प्रकृति में लीन हो जाते हैं। मनमो वृत्तिशून्यस्य ब्रह्म कारतया स्थितिः असम्प्रज्ञातनामऽसौ सामधिर भिवीयते । इत्यादि वचनों से वृत्तिरहित चित्त की ब्रह्मस्वरूप से अप्रस्थिति का नाम भमानज्ञात है, यह भाव है । (२) " भवन्ति= जायन्ते जन्ततोऽस्यामिति गवोऽविद्या " इस वाचस्पतिमिश्र के लेखानुसार भव नाग अज्ञान का भी है इस आशय से कहते हैं ( अज्ञान का) इति, उपन्न होते हैं प्राणा जिस निमित से वास के होने मे यह भब कहा , यह याचस्पति मिश्र के वाक्य का अर्थ है। अविद्या से ही जन्म मरण होने में अघिद्याही' गहा मय पद या याच्य हैं यह तय है। । नाता है, समाधिपादः। -- , यह दोनों ही यावत्काल अपने २ ध्येय में लीन रहते हैं तावत्काल शरीर- इन्द्रिगविगयांयोग के अभाव से इन की चिचरत्तियां निरुद्ध रहती हैं, सो यह जो लयसमय में होने वाला चिचत्तिनिरोध वह भवात्यय है अर्थात् प्रचल्या- दि अनान्मवस्तीवपयक आत्मत्वज्ञानरूप अज्ञान से जन्य है, औ जन्ममरण का कारण है क्योंकि अवधि से अनन्तर फिर भी संसार में इन को अवश्य आना होता है। किस की भावना करने वाला कियकाल के अनन्तर लयावस्था को त्याग कर संसार में आता है यह प ५४ इस पृष्ट में स्पष्ट है । यह (१) पूर्वोक्त विदेहसंज्ञक देव संस्कारमाशप चित्त से लयावस्था में कैवल्य पद के सदृश (२) पद का अनुभव करते हुये फिर अवधि से अनन्तर तथाविध संस्कारविपाक (३) को अतिवाहन (अतिक्रमण) कर लेते हैं अर्याद- फिर संसार में आ जाते है, एवं प्रकृतिलय भी प्रकृति में अधिकारसहित (४) चित्त के लय काल में कैवल्य पद के तुल्य पद को अनुभव करते हैं परंतु यह. कैवल्य तुल्य पद का अनुभव भी तारकाल ही होता है कि यावत्काल चित्त अधि- कार के बल से प्रकृति से विभिन्न होकर संसार में आगमनशील नहीं होती है। यहां इतना विशेप यह भी जान लेना कि-जो विवे ज्ञानयुक्त हुआ चित्त लयमाव को प्राप्त होता है वह निरधिकार होने से संसार से विमुक्त हो जाता है औ जो चित्त विवेकज्ञान से रहित होता है वह चित्त साधिकार होने से संसार में आगमन शील होता है। एवंच इन दोनों को विवेकज्ञानशून्य होने से यह भी साधिकारचित्त वाले है, अतः जैले वर्षाकाल के आने से मण्डकादिकों का देह मृत्तिकाभाव को प्राप्त हया भी फिर वर्षाऋतु आने से मृत्तिका से चियुक्त हो कर मण्दकभाव को माप्त हो (१) इस प्रकार सूत्र का अर्थ निरूपण कर इदानी "तहि ससस्कारमात्रोपयोगेन चित्तेन कोवल्पपदमिवाऽनुभवन्त " इत्यादि भाप्य का अनुवाद करते है (यह) इत्यादि से । (२) यद्यपि अधिकारविशिष्ट चित्त के मद्भव से प्रकृतिलय पद कैवल्य से वि. लक्षण है तथापि वृत्तियों का अमार होने से कैवल्य के समान कहा गया है, इसी से सहश कहा है। (३) विपायां नाग फल का है, अर्थात् निस भावनाज यसस्कार से प्रकृतिल्यता प्राप्त हुई था उस सस्कार के फल को भोग कर फिर ससार में आ जाते हैं। (४) निस चित्त में विधाज्ञान उदय नहीं हुआ यह विन अधिकारसहित कहा जाता है।
पातञ्जलदर्शनकाशे- जाता है तैसे प्रकृति में लयभाव को प्राप्त हुआ भी चित्त अवधि के अनन्तर फिर संसारोन्मुख हो जाता है। तयाच इस प्रकृतिलयरूपनिरोध को जन्म मरण का नाशक न होने से यह ममुच कर हेय ही है यह सन औ भाष्यकार का हृदय है यह तत्त्व (नि- चोड़) हुया। जो कि ( १ ) विज्ञानभिक्षु ने यहां भवशब्द को जन्मार्थक मान कर (विदेहप्रकृतिलयों को साधन के अनुष्ठान से बिना ही केवल जन्ममात्र नि मित्त से ही असम्पशात योग का लाभ हो जाता है, औ अधिकारसमाप्ति के अनन्तर विदेह औ प्रकृतिलय मुक्त हो जाते हैं (२),यह कहा है सो प्रकृत भाप्यार्थ के अजान निवन्धन होने से अपेशल ( अयुक्त) ही जानना । अर्थात्-इस सूत्र के अवतरण में भाष्यकारों ने "उपायमत्ययो योगिनां भवति" इस वाक्य से ( योगियों का निरोध परवैराग्यादिपायजन्य होता है) इस प्रकार विशेष कथन से अन्य जो भवप्रत्यय निगंध है वह योगियों को उपादेय नहीं किन्तु हेय है यह स्पष्ट ही योधन किया है। सो (२) यह उपायप्रत्यय की उपादेयता औ भवप्रत्यय की हेयता कैवल्य- जनकत्व औ कैवल्याऽजनकत्व रूप कारण से ही उपपन्न हो सकती है अन्यथा नहीं क्योंकि यदि दोनों ही निरोध असम्प्रजातपदवाच्य औ कैवल्यजनक होते तो एक को योगियों कर उपादेय औ एक को हेय कथन यह विभाग समीचीन नहीं हो सकता है, सो यह भाप्योक्तविभाग (विदेशाप्रकृतिलया अपि मुच्यन्ते ) इस वाक्य से विदेह भी प्रतिलयों की मुक्ति कयनशील विज्ञानभित के मत से हो नहीं सकता क्योंकि इस मत में दोनों निरोधों को मुक्ति का हेतु होने से एक को हेय औ एक को उपादेय कहना संभव नहीं, औ हमारे मत से तो प्रकृत्यादि अनात्म पदार्थों विषयक आत्म- स्वरूप अज्ञानजन्य जो विदेहप्रकृतिलयों का निरोध सो मुक्ति का हेतु न होने से हेय औ परवैराग्यादि उपाय जन्य जो उपायमत्ययसंजक असम्प्रज्ञात वह मुक्ति का हेतु होने से योगियों कर उपादेय यह भाप्योक्त विभाग सुतरां संभव है। (१) इदानी श्री स्वामी श्री योगवातिक को प्रसग से समालोचना करते हैं (मो कि) इत्यादि से। (२) "महदादिदेवानां साधनानुष्ठान विनयाऽसम्प्रज्ञातयोगो सन्मानमित्तको भवति," "विदेहा प्रकृतिल्या अपि अधिकारसमाप्तो मुच्यन्ते' इस योग वातिक का मह अनुवाद है।
- समाधिपादः। किञ्च-जव कि भाष्यकारों ने (कैवल्यपदमिवानुभवन्ति यावन्न पुनरावर्ततेऽधिका- पशाचित्तम्) इसवाक्य से (जयतक अधिकार के वलसे चित्त की पुनरागृत्ति नहीं होती तबी तक वह कैवल्प पदको अनुभव करते हैं) इस प्रकार स्पष्टही विदेह-प्रकृति लयों की मुक्तिप्रभावकथनपूर्वक पुनराष्ठति निरूपण की है तो फिर प्रकृतिलयों । को मुक्त कथन विज्ञानभिक्षु का प्रमादन ही है तो क्या है। किञ्च-इस पाद के २४ सूत्र में जव स्पष्ट ही भाष्यकारों ने (प्रकृविलीन स्योत्तरा बन्धकोटिः ) इस वाक्य से मनिलयों को फिर संसार में आगम- नप्रयुक्त वन्ध कहा है तो फिर प्रकृतिलयों को यहां पर मुक्त कहना विज्ञान- भिक्ष को अस्थानेव्यामोह ( वेठिकाने भ्रम ) क्यों हुया ।। आश्चर्य तो यह है कि यहां प्रकृतिलयों की मुक्ति मानकर फिर (प्रकृतिलया अपि पुनराविभवन्ति)(१) इस वाक्य से साक्ष्यप्रवचनभाष्य में अपने ही प्रकृति लयों की पुनरावृति कैसे मानी । एवंच भाष्य तथा स्वोक्ति के सङ्ग विरोधहोने से यहां विज्ञानभिक्षु का प्रकृतिलयों को मुक्तकथन असमञ्जस है यह सिद्ध हुया । जो कि (भव नाम अज्ञान का है यह वाचस्पतिमिश्र की उक्ति असद्गत है क्योंकि अज्ञानी को पर वैराग्य होने की संभावना नहीं है) यह कहा है (२) सो भी स्थूलदृष्टि निबन्धन होने से हेय जानना । अर्थात्-कुछ भाप्यकारों ने परवैराग्यादिपायजन्य असम्मज्ञात को दो प्रकार का नही कहा है जिस से भिक्षु का वाचस्पति मिश्र के उपर यह पर्य- नुयोग ( आक्षेप ) होय किन्तु संस्कारमात्रशेप जो निखिलवृत्तिनिरोध उस के दो प्रकार कहे है, तहां विदेहप्रकृत्तिलयों को जो तत्तत्लयप्रयुक्तनिरोध वह अडानपूर्वक होने से भवमत्सम है औ पर वैराग्यादिउपायजन्य जो निरोध वह उपायमत्यय है। तयाच भवप्रत्यय को वैराग्य जन्य न होने से भवशब्द का अज्ञान अर्थ मानने में कोई दोप नही केवल उपमात्र ही है (३)। (१) तृतीय अध्याय के १४ सूत्र का साख्यप्रवचनभाष्य देखो । (B) "भवोऽविद्येतिबाचस्पतिमित्रोक्तमसगत पर वैराग्यस्य बिटुष्यसम्भवात्" यह विज्ञानभिक्षु का लेख है। (३) यदि भवप्रत्यय निरोध को परवराग्यजन्य कहते तो आप यह यह सकते 'थे कि (यदि अज्ञानियों को भवप्रत्यय होता है तो उन में परवेराग्य कैसे ) पर सो यहा है नहीं किन्तु कयाप्रयुक्त को भवप्रत्यय ओ उपायनय को उपापप्रत्यय कहते हैं तथा च कोई दोष नहीं, किश्च यदि भवप्नत्यय में भी पर वैराग्य की अपेक्षा मानों गे तो उपायप्रत्यय से इस में वैक्षग्य क्या क्योंकि दोनों ही पर वैराग्य मन्य हैं, एवं घ भवप्रत्यय में परखैराग्य की अपेक्षा नहीं यह सिद्ध हुआ। यह इस का भाव है।
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पाइला-
यहां पर यह भी जानलेना उचित है कि पूर्वीच्याव-प्रणसमापत्ति वाले
योगियों का नाम विद औ ग्रहीनुसमापनि वाले योगियों का नाम प्रकृतिलप
है. यह दोनों पुनरावृति शील है यह बायाण के वचन से पर्व वाचक
अतः भवभत्ययनिरोध को पुनराइतिकारक होने से देय जानना ॥१९॥
इस प्रकार भवनत्यय का निरूपण कर इदानी योगियों को उपादेय जा
उपायप्रत्ययनिरोध उस का उपादन करते हैं-
मुः सायं ऐनिमलविशाल
इतरेषाम् ॥२०॥
समाधिपादः। शेष निरोध वह योगियों कर उपादेय उपायमत्यय असम्मशात कहा गाता है (१)॥२०॥ 2. सो यह पूर्व उक्त श्रद्धादिउपाय पूर्वजन्म के पुण्यपरिपाक को गंद- यम-तीन होने से किसी पुरुप के मृदु औ किसी के मध्यम औ किसी के लीन होते हैं, इस हेतु से कोई योगी. मृदुउपाय, औ कोई योगी मध्यमउपाय औ कोई योगी अधिमानोपाय वाला होता है, (२) इन्द तीनों योगियों में से मृढउपाय वाले योगी भी तीन प्रकार के हैं, कोई मृनुसंवेग (३) अर्थात् सन्दवैराग्य बाले औं कोई मध्यसंवेग अर्थात् सामान्पवैराग्य चाले, औ कोई अधिमाप्रसंवेग अर्थात् तीववैराग्य वाले, इसी प्रकार वैराग्य के तारतम्य से मव्यउपाय औ अधिमानउपाय वाले योगियों के भी तीनर भेद जान लेने । इस प्रकार सब मिलकर योगियों के नव भेद हुये-(१) यथा-मृदु- उपाय मृदुसंवेग १ मृदुउपाय मध्यसंवेग २ मृदुउपाय तीब्रसंवेग ३ पध्योपाय मृढसंवेग ४ मध्योपाय मध्यसंवेग ५ मध्योपाय तीनसंवेग ६ अधिमानोपाय सुदुःसंवेग ७ अधिमात्रोपाय मध्यसंवेग ८ अधिमात्रोपाय तीव्रसंवेग ९ । इन नवों में से अन्तिम योगियों को सर्चापेक्षया शीघ्र समाधिलाभ होता औ अन्यों को उपायानुसार कुछ २ विलम्ब से होता है। (१) यहा पर १८ सूत्र में जो अमम्प्रज्ञात रूप अर्थ का वाचक 'अन्यः' यह पद है इस पद का १९,२०,२१,२२,२३, सूत्रों में अन्वय मानना, इसी सेंही इन सब स्त्रों में असम्प्रज्ञात पद का लाभ होता है यह जानो । (२) मृदु नाम कोमल वा शिथिळ वा अल्प वा मंद का है, ओ मध्य उस को कहते . हैं कि न तीन ही हो न मन्द ही हो किन्तु सामान्य हो औ अधिमात्र नाम तीव्र का या दृढ़ का है । पूर्व जन्म के संस्कार वश से कोई धीरे धीरे उपायों का अनुष्ठान करता है भी कोई सामान्यभाव से, मी कोई दृढ़ होकर तीव्ररूप से अनुष्ठान करता है, इस से तीन भेद हुये। (३) सवेग नाम वैराग्य का है। जो कि विज्ञानभिक्षुप्रभृति ने उपायाऽनुष्ठान में शीघ्रता का नाम सवेग कहा है सो अधिमात्रोपाय कहने से ही शीघ्रता का लाभ होने से असङ्गत मानना, अतः संवेग नाम वैराग्य का ही जागना । (१) प्रथम श्रद्धा-वीर्य-स्मृति-समाधि रूप उपार्यों को गन्द-मध्यम-तीम होने से ज्योगियों के तीन भेद कथन किये फिर वैराग्य को गन्द गम्यम तीन होने से एक एक के तीन तीन भेद कथन किये, इस प्रकार सब मिल कर ना हुए, सोई कहते हैं। (पपा) इति ।
. इत्यादि पातखलदर्शनप्रकाशे- 1- यही इदानीं सूत्रकार कहते हैं- सू० तीनसंवेगानामासन्नः ॥२१॥ भाषा-इस सूत्र के आदि में भाष्यकारों ने ( अधिमानोपायानाम्। इतना, पाठ और संबद्ध किया है, एवंच यह अर्थ हुआ कि जो अघिमात्रोपा (हद श्रद्धादिउपायवाले) तीनसंवेग (तीववैराग्ययुक्त), हैं। उन्हों को (आसन्नः शीघ्र ही समाधिलाभ तथा समाधि का फल होता है। इन्हों की अपेक्षा से अधिमानोपाय मध्यसंवेगों को कुछ विलंब से होगा, औ इन्हों की अपेक्षा से अधिमात्रोपाय मृदसंवेगों को कुछ विलम्म से होगा, ऊहापोह, से जान लेना ॥२१॥ इदानी तीववैराग्य के भी तीन भेद मान कर विशेपांतर कहते है। सू. मृदुमध्याऽधिमानत्वात् ततोऽपि विशेषः॥२२॥ भाषा -तांबचराग्य को भी ( मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ) मंद-मध्य तीवभेद से तीन प्रकार का होने से (ततोऽपि ) तिस तीव्रत्वादिविशेप प्रयुक्त भी (विशेषः) समाधि के लाभ में विशेप होता है। अर्थात्-मध्यवैराग्यविशिष्ट अधिमानोपाय योगियों की अपेक्षा र मृटु-तीन-वैराग्यविशिष्ट अधिमानोपाय योगियों को शीघ्र समाधिला होता है, भी इन्हों की अपेक्षा से मध्यतीनवेराग्यविशिष्ट अधिमानोपायों को शीघ्रतर ( अतिशीघ्र ) होता है, और इन की अपेक्षा से अधिमानतीन वैगग्यविशिष्ट अधिमानोपायों को शीघ्रतम ( अत्यन्तशीघ्र ) होता है । एवंच योगियों को अधिमान उपाय औं अधिमान तीववैराग्य के लाभ मंधी यनशील होना उचित है कुछ आलस्य मत करें यह फलित हुआ ॥२२॥ इदानी ( क्या इन्दी पूर्वोक उपायों से ही अत्यन्त शीघ्रसमाधि का लाम होता है वा अन्य भी कोई सुकर उपायान्तर इस के लाभ में संभव हो सस्ता है ) इस आकांक्षा के निवारणार्थ सूत्रकार सकर उपायान्तर कहते है- स० ईश्वरप्रणिधानाद् वा ॥ २३ ॥ भापा-(पा) अथवा ( ईश्वरमणिधानाद् ) ईश्वर की उपामना से भी भत्यन्तशीघ्र समाधि का लाभ * होता है। । love (.) यहाँ पर विशेष इस पद या पूर्व मन से अनुतन वार अर्थ पारते है (भर न ही समाधि का शभ होता है) इति ।
- समाधिपादः। अर्थात्-कायिक-वाचिक-मानसिक-सगस्तव्यापारों को ईश्वर के अधीन हानना, औ जो कार्य किया जाय उस के फल तरफ दृष्टि न देकर औ पारीरिक सुख का अनुसन्धान न कर उन सब का के फल का परमेश्वर के ति समर्पण करना, औ उस के ध्यान में ही.मस हो एकतान से परमेश्वर नामों का चिन्तन करना, यह सब ईश्वरमणिधान कहा जाता है औयही भक्ति है। इस भक्तिविशेप से आवजित (मसन्नतापूर्वक अभिमुख हया.) ईश्वर-" भिध्यान ( संकल्प ) मात्र से (१) तिस योगी पर अनुग्रह कर देता है, इंस भाभियानम्प ईश्वरानुग्रह से भी अत्यन्त शीघ्र ही समाधि का लाभ : तथा माधिफल योगी को माप्त होजाता है- भगवद्गीता में भी "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते; तेपां' नेत्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्" इस वाक्य से ईश्वर प्रणिधान को योग हम का (२) निर्वाहक कहा है ॥२३॥ : :. (प्रधान भी पुरुप से भिन्न ईश्वर कौन है कि जिस के प्रणिधान से शीघ्र माधि का लाभ होता है) इस साझयमताऽनुयायी की (३) आशझा के शप- अर्थ सूत्रकार ईश्वर का लक्षण करते हैं। स० क्लेशकर्मविपाकाऽऽशयरपरांमृष्टः पुरुष- विशेष ईश्वरः ॥२४॥ भाषा-(फ्लेश) वक्ष्यमाण अविद्याआदि पञ्च क्लेश (कर्म) रागादि लेशजन्य -- (१) इस मेरे भक्त को शीघ्र ही समाधि याा काम हो नाय इस प्रकार संकल्प का म अभियान है सोई कहते हैं (संकल्पमात्र सै) इति । : (२) अप्राप्तवस्तु की प्राप्ति कर देने का नाम योग है, भी प्राप्त हुये यस्तु का लन कर उस का नाश न होने देना क्षेम है । जो पुरुष अनन्य ( एवातान ) हुये रा ध्यान कर मेरी उपासना करते हैं उन नित्यअभियुक्तध्याननिष्ठों के योग क्षेमको । नियाहता हूं, यह भगवद् वचन का अर्थ है भ. ९ । २२ । (३) माशङ्का करने वाले निरीश्वरवादी सांख्य का यह आशय है कि-चेतन औ बड़ इन दोनों से हो निखिल विश्व व्याप्त है सो यदि ईश्वर वेतन है तो चितिशक्ति यो। असन भी उदासीन होने से भक्तों के उपर अनुग्रह कैसा, औ यदि नट है तो प्रति या प्रकृतिकायों में से ही कोई एक ईश्वर काहा जायगा क्योंकि पदार्थान्तर मानमा अप्रामाणिक है एवं च जड होने से चेतनधर्म अनुग्रह से सबन्ध केसा, अतः प्रकृति-पुरुष मिन्न तृतीय इश्वर गानना पसङ्गत है ।
पातञ्जलदर्शनकाशे- शुमाऽशुभकर्म, (विपाक धर्माधर्मजन्य सुखदुःखरूप फल, (आशय) सुखदख भोग से जन्य विविधवासना, इन चारों पदार्थों से (अपरामृष्टः) असंबद्ध ज. (पुरुषविशेप) अन्य पुरुषों से विशेष (विभिन्न उत्कृष्ट चेतनं वह ईश्वर है। अर्थात्-चित्त के संग एकरूपतापन्न जीव के जो औपाधिक अविद्या आदि धर्म हैं उन धर्मों के संपर्क से विरहित जो विशुद्धसत्त्वगुणप्रधान चित्तो- पाधिक नित्यशानैश्वर्यादिधर्मविशिष्ट सत्यकाम सत्यसंकल्प चेतन वह ईश्वरपद कां वाच्य है औ सब पुरुपों से यह विशेप है। आशङ्का लक्षण वही कहा जाता है कि जो असाधारणधर्म होय औ असाधारणधर्म यह है कि जो लक्ष्य से अन्य में न रहकर केवल लक्ष्यमात्र में ही विद्यमान रहै, एवं च यह लक्षण यदि ईश्वरमात्र में रह कर अन्य किसी में विद्यमान न होगा तवी असापारणधर्म होने से लक्षण कहा जायगा अन्यथा नहीं, औ यहां पर क्लेशादिराहित्यरूप ईश्वरलक्षण को ईश्वर औ पुरुष इन दोनों में वर्तने से असारणधर्मत्व का संभव नही, अतः सतरां यह रक्षण अतिव्याप्तिरूप दोप युक्त होने से दुष्ट हुया, अर्थात्--साय योग मत में केशादि निखिलधों को चित्तनिष्ठ मान कर पुरुप को असंग माना जाता एवं च यथा ईश्वर क्लेशादिनिर्मक्त है तथा पुरुष भी क्लेशादिविमुक्त ही हैं, तथा चक्लेशादिरादित्यरूप धर्म को लक्ष्यईश्वर से अन्य अलक्ष्यपुरुषों में वर्तने से मह लक्षण अतिव्याप्तिदोपग्रस्त होने से असङ्गत है, (१) एवं ईश्वर औ पुरुपों को समान होने से ईश्वर को पुरपों से विशेष कहना भी अयक्त ही है । समाधान--यह सत्य है कि ईश्वर औ पुरुप यह दोनों स्वाभाविक हशा- दि के संपर्क से शून्य है परन्तु इतना विशेप है कि पुरुप अक्वेिक से चित्त को अपने से भिन्न न जान करें उपाधिभूतीचचनिष्ट प्लेशादिकों से संबद्ध हो जाता है जो ईश्वर विवेकद्वारा सदा क्लेशनिर्मक्त ही रहता है एवंच औपाधिक क्लेशों के संपर्क से रहित जो चेतन यह ईश्वर है यह लक्षण निर्दष्ट हुआ क्योंकि पुरुषों में औपाधिक रुंशों का संपर्क होने से यह लक्षण वहां पर पर्वता नहीं। तात्पर्य यह है कि-यथा राजा औ सेना का परस्पर स्वस्वामिभाव- संबन्ध रोने से सेनाकक जय पराजय का स्वामीभूत राजा में व्यवहार होता है क्योंकि वह उस के फल का भोक्ता है तथा चित्त औ पुरुप का भी परस्पर स्वस्वामिभापसंबन्ध होने से चित्त में वर्तमान ही अविद्यादि केशों का पुरुष (१) पुरपविरोध कथन से हो रेशाद रहित कर काम होने से शादि रहित विशेषग भी क्यों यह भी जानो।
, समाधिपादः । । व्यवहार होता है (१) क्योंकि वह इस के फल का भोक्ता है। एवं च पुरुप में जो लेशादि का समन्ध वा सुखादिभांग वह सब चित्त- रूप उपाधिप्रयुक्त होने से औपाधिक ही है स्वाभाविक नहीं, अतएव कठ उप- निषद् में "आत्मेन्द्रियमनीयक्त भावत्याहमनीषिणः" इरा तिद्वारा उपाधि- संयन्नमयुक्त ही पुरुष को भोक्ता कहा, सो यह औपाधिक लेशों का संबंध अविवेक प्रयुक्त होने से विकशाली ईश्वर में सभावित नही, यस यही चौपा- धिक भोग के सम्बन्ध का न होना ही ईश्वर में पुरुषों से विशेषता है। . आशङ्काभ्यादि (२) क्लेशादिसंपर्क से रद्विरा ही ईश्वर कहा जाता है तो मुक्तपुरप वा प्रकृतिलीन पुरुष ही इश्वरपद का वाच्य क्यों नहीं माने जाते क्योंकि वह भी लेशादि संपर्क से रहित ही है अत-एच कपिलमुनि ने ईश्वरप्रतिपादक श्रुतियों को "मुक्तात्मनः प्रशंसा उपासासिद्धस्य या (३) इस सूत्र से मुक्त औ सिद्धपुरुषों के निरूपणपरत्व प्रतिपादन कर फिर तृतीयाध्याय में “स हि सर्व विसर्वस्य कती, "ईदृशेश्वरसिद्धिः सिद्धा" () इन सूत्रों से प्रकृति लीनों को ईश्वर मान कर प्रकृतिपुरुप से व्यतिरिक्त ईश्वर को "अभाव माना है, एवं च (१) यथा युद्धादि द्वारा राजी का उपचार करने से सेना को स्व शौद्रव्यदानादि द्वारा सेना का उपकार करने से राजा को स्वामी वहा जाता है तथा इद्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण कर पुरुष के प्रति निवेदन करने से चित्त को स ओ स्वसन्निधि से अचेतन चित्त को भी चेतन तुल्य करने द्वारा उपकारक होने से चेतन को खामी कहा जाता है, इस प्रकार परस्पर उपकार्यउपकारकभाव, होने से चित्त का भी पुरुष का सममिभावमयध जान लेना , (*) ज्ञानी लोग शरीर-इन्द्रिय मन से युक्त ही आंगा को भोक्ता पाहते हैं शुद्ध को नहीं, यह श्रुति का अर्थ है। (२) (वैल्य प्राप्ता सहि सान्ति च बहव योलिन ) इस भाष्य को अनुसरण कर आशङ्का उत्थापन करते हैं ( यदि ) इत्यादि से। (३) "य सर्वज्ञ सवित्" " सहि सबित् सर्वस्थ वर्ता " इत्यादि श्रुतियों में जो सर्वज्ञ सर्व का वार्ता प्रतिपादन किया है वह मुक्तपुरष की प्रशसा के लिये वा योगा: भ्यासरूपउपासनासिद्ध योगियों की स्तुति के लिये. हे कुछ ईश्वरप्रतिपादक यह 'श्रुतियां . नहीं है यह साक्ष्य के प्रमाध्यायस्थ ९५ सूत्र का अर्थ है । (४) पूर्वोक्ति प्रतिषीन हो प्रबुद्र हुआ पर्वचित् सर्यकर्ता कहा जाता है, ईदृश ईश्वर की सिद्धि ही हमारे गत में सिद्ध है, निम ऐश्वर्यशाली ही विवाद प्रस्त है, यह . ५६.९७ इन दोनों सूत्रों का अर्थ है।
- . समाधिपादः। ६७ यह विना चेतन की प्रेरणा से स्वकार्यजनन में असमर्थ होता है जैसा कि सारथि से विना स्थ, औ पुरप को असंग निष्क्रिय होने से मेरकल का सभव नहीं, अतः विशुद्धसत्त्वोपाधिक नित्यज्ञान क्रियश्चर्यशाली चेतनभूत ईश्वर अवश्य ही माननीय है। अत एव वाचतरउपनिपद में" मायान्तु प्रकृति विद्यान्मापिनन्तु महे- श्वरम्" ११) ग मन्त्र से. ईश्वर को.मायासम्झकमकृति का प्रेरक कहा है। भी गीता में भी "मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् " इस वचन से भगवान ने अपने का माया का अध्यक्ष मान कर ('मेरी ही प्रेरणा से प्रकृति चराऽचरमपञ्च को उत्पन्न करती है)इस प्रकार ईश्वर को माया का प्रेरक कहा है। यद्यपि चेनभूत ईश्वर में ज्ञान वा प्रेरफादि क्रियारूप परिणाम का होना संभव नहीं हो सकता है क्योंकि वह रजतमगुणरहित विशद्ध क्ति का धर्म है औ चित्त के संग नित्यमुक्त ईघर का सस्वामिभावसंबन्ध असम्भव है, तथामि जैसे अन्यपुरुषों का अविद्यागयुक्त चित्त के सग• स्वस्वामिभावसंवन्ध है तैसे ईश्वर के संग अविद्याप्रयुक्त नहीं हैं किन्तु चित्त के स्वभाव को जानता हुया ज्ञान रहेंपदेशद्वारा वाफ्नपीडित जनो के उद्धारार्थ औ प्रकृत्यादि की प्रेरणाद्वारा संसार के रचनार्थ ही वह विशुद्धसत्त्वरूप चित्त को धारन करता कुछ अज्ञानमयक्त नहीं। एवं च अनानपूर्वक ही चित्र के सग को परिणामिता का कारक होने से : ईश्वर में ज्ञानं वा प्रेरणा की असंभपिता नहीं है। अर्थात्--जो अविधा के स्वभाव को 1 जान कर अविद्या को.सेवन करता है वही भ्रान्त कहा जाता है कुछ जान कर सेवन करने वाला नही, तथा च जैसे नट अपने में रामकृष्णादिभाव को आरोप कर अनेक लीला करने से भ्रान्त नही कहा जाता है तेसे ईश्वर भी चित्तद्वारा अनेक लीला करने से भ्रान्त नहीं किन्तु विद्वान् ही है यह परमार्थ है। यद्यपि वर्मझानोपदेश द्वारा पुरुषों के उद्धार करने की इच्छा होने से पामेश्वर मायासज्नक विशुद्धसत्यस्वरूप चित्तरूप उपाधि.को धारण करता है औ उपाधि के ही धारन करने से पूर्वोक्त इच्छा होती है इस मकार अन्यो- न्याश्रययदोष का संभव होता है (२) तथापि वीजाऽङ्गुरवत् ससारे को (१) गत्या प्रपञ्च का उपादानवारण है ओ माया का सागा प्ररा परमेश्वर निमित्त कारण है, यह श्रुति का भाव है। १२) उद्धार को होने से ईश्वर चित्र का प्रहण करता है भी चित्त ग्रहण करने से ही. उद्धार का इ-छा होता है इस प्रकार परस्सर की अपेक्षा होने स भयोऽ गाभयदोप जानना। 0 है विशेष सोई शास्त्र कहा जाता है औ ईश्वर की सर्वोत्कृष्टता किसी को प्रत्यक्ष 'प्रमादादिपुपनिष्टदोप:(१) विरहित सर्वज्ञ ईश्वर का प्रत्याभूत वेद ही ईश्वर नहीं है, अतः शास्त्र भी प्रमाण नहीं हो सकता है, यदि यह.कहो कि भ्रम- की सर्वज्ञता में प्रमाण है तो यह भी अन्योन्याश्रय दोपग्रस्त होने से असमं- पातञ्जलदर्शनप्रकाश अनादि होने से व्यवस्था संभव कर दोपाभाय जान लेना। अर्थात्--जैसे. कोई पुरुप यह प्रणिधान (चिन्तन ) कर शयन कर कि प्रात: काल इस समय में उत्थित, होकर अमुक कार्य को अवश्य करुंगा तो वह उस संस्कार के वश से अवश्य ही उत्थित होकर उस कार्य में प्रकृत हो जाता है तैसे उत्पतिमलयरूप.प्रवाह को भनादि होने से किसी सर्ग के अवधिकाल में जन परमेश्वर को संहार करने की इच्छा होती है तब अपने चित्त में (जवं प्रलयकाल का अवधि होगा. तब फिर में विशुद्धचित्त को ग्रहण कर गा) ऐसा मणिधान कर ही प्रलय में उन्मुख होने से प्रधान में लय हुआ भी चित्त मणिधानसंस्कार के वश से फिर कार्योन्मुख हो जाता है, तथा च ईश्वर के प्रणिधान को औ विशुद्धचित्र के ग्रहण को अनादि होने से अन्यो- न्याश्रयदोप नहीं है। आशङ्का-जो यह पूर्वोक्त ईश्वर में विशुद्धसत्यमय चित्त के ग्रहणद्वारा सर्वोत्कृष्टता निरूपण की है सो यह उत्कृष्टता सनिमित्त = सममाणक (-प्रमाण- सिद्ध ) वा निप्पमाणक है यदि सप्रमाणक है तो वह प्रमाण कॉन है. औ यदि प्रमाणरहित है तो माननीय कैसे, यदि यह कहा जाय कि : श्रुतिस्मृतिरुण आदि शास्त्र ही ईघर की सर्वोत्कृष्टता में प्रमाण है. हर सम्भव नहीं क्यों किर पदार्थ का प्रतिपादक जो वाक्य- इश्वरप्रणीत वेद प्रमाण होय औ वेद में प्रामाण्यज्ञान होय तो तिस प्रमाणद्वारा जस ही है क्योंकि प्रथम वेदरूप प्रमाण से ईश्वर की सर्वज्ञता सिद्ध होय तो श्वर की सर्वज्ञता सिद्ध होय । समाधान-यद्यपि अन्य कोई शास्त्र ईश्वर की सर्वोत्कृष्टता में प्रमाण नहीं "हो सकता तथापि सर्वज्ञ ईश्वर प्रणीत वेद को उस में प्रमाण मानने में कोई बाधक नहीं क्योंकि अन्यप्रमाण द्वारा ईश्वर को निर्धान्त गौ सर्वज्ञ सिद्ध होने से ईश्वरसणीत वेद की ममाणसा स्वतःसिद्ध है। अर्थात् ईश्वरप्रणीत तत्त्कार्यसाधकमन्त्र तथा तत्तद्रोगनिवतक औपंध- प्रतिपादक आयुर्वेद के प्रमाण्य में तो किसी को संदेह ही नहीं क्योंकि उनका (१) नम आदि दोपों का निरूपण पूर्व, इस ७ सत्र में स्पष्ट है। . कि प्रत्यक्ष वा अनुमान समाधिपादः। फल भत्यक्षदृष्ट है(२) केवल अन्यभाग में प्रामाण्य का सन्देह है क्योंकि अन्य- भाग को अलौकिकअर्थ प्रतिपादक होने से प्रत्यक्ष का वहां संभव नहीं, सो यह अन्यभागमें प्रामाण्यका सन्देह भी तावत्कालही है कि यावत्काल इसके बक्ता में सर्वजत्व औ यथार्थवक्तृत्व का निश्चय न होय (२) जब फिर मन्त्रायुर्वेद- भाग के निर्माण से यह निश्चय हुआ कि ईश्वर सर्वज्ञ औ यथार्थ वक्ता है तब यह सन्देह भी सुतरां उछिन्न हुया क्योंकि स्थालीपुलाकन्याय से (३) अन्यभाग.के वक्ता की भी सर्वज्ञता युक्ति सिद्ध है,.एवं च वेदों को प्रमाण होने से वेदमतिपादित ईश्वर की सर्वतता-सत्यकामता-नित्यज्ञानश्वर्यशालि- तारूप उत्कृष्टता सप्रमाणक है यह सिद्ध हुया (१)। सों (५) यह पर्वोक्त सर्वज्ञतादिरूपधर्म तथा वेदरूपशास्त्र यह दोनों ही ईश्वर के विशुद्धसत्त्वगुणमय चित्त में विद्यमान हैं औ अनादि ही इन दोनों (१) अर्थात्-जिम जिस कार्य सिद्धि के अर्थ जो जो.मन्त्र औ निस २ रोग निवृत्ति के लिये बोर औषध प्रतिपादन किये हैं यह अपने ५ फल जनन में समर्थही देखने में आते हैं असमर्थ नहीं, अतः सत्यार्थप्रतिपादक तिस वेदभाग के प्रामाण्य में सदेह का संभव नहीं। (२) शब्दबोधित अर्थ के प्रामार्य में वत्ता को आप्त या सर्वज्ञ जानना ही एका मुख्य कारण है यह शास्त्र का नियम है । (३) स्यालो नाम बटुई का भी पुकाक नाम सिद्धोन्मुखतण्डुल का है जिस को भय भाषा में पुलाच कहते हैं जैसे पाचक स्थानों में से एका तण्डुल. निवास कर यह परीक्षा करता है कि अन्य तण्डुल सिद्ध है या को है तेसे यहां भी मन्त्र आयु र्वेदरूप वेद भाग में प्रत्यक्ष फल दर्शन द्वारा प्रामाण्य निश्चयवत् मन्य तत्समान वेदभाग. में मामाण्यनिधय जान लेना, यह दृष्टान्त का भाव है। (४) प्रत्यक्षफल के दिखलाने से आयुर्वेदके कर्ता को भ्रमरहित सर्वज्ञ मानना औ.सर्वज्ञ ईश्वर निर्मित होने से वेदों को प्रमाण जानना, एवञ्च अन्योन्याश्नय नहीं है, यह इस. वा भाम है । इस कथन से जो यह शहा यी कि (अपने ऐश्वर्य के प्रकाशार्य ईश्वर ने मिथ्या ही अपनी प्रशसा वेद में किडी है, ) सो भी निवृत्त हुयो क्योंकि आयुर्वे- दादि के देखने से यह कदास सम्भव नहीं हो सवाता है कि ईश्वर प्रतारणा को ये मिथ्या उपदेश भी यर सकता है । निमें बिस्तर इस प्रमा को देखता होय वह श्रीस्वामी जोनिगित न्यायदर्शनप्रकाश के द्वितीयाध्याय के प्रश्ण मान्टिक के १७इस मसले केशर ६७ हम सूत्र पर्यन्त यो विवरणपर दृष्टिपात करे । (५) इदानी " एतयो शानोरकर्पयोरीसरससे वर्तमानयोरमादि. सवय." इस भाष्य का अनुवाद करते हैं ( सो पर) इत्यादि में। - . समाधिपादः। निवारणार्थ सूनकार अनुमानरूप प्रमाणान्तर का उपन्यास ( १ ) करते है- सूः तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥ २५ ॥ भापा (तर) तिस पूोक्त ईश्वर में ( सर्वशयीजम् ) सर्वज्ञता का (२) (पीज) कारण मृत जो ज्ञान पंह (निरतिशंयम्) अतिशय से रहित है अर्थात् अन्तिम नति.से विद्यमान रहता है। अर्थात् सपा के न्यूनाधिक होने से कोई पुरुप वर्तमानकालिंक ही पदार्थों को जानता है औ कोई अतील अनागत वर्तमान कालजय के ही पदार्थों विषयक ज्ञानवाला होता है औ कोई स्थूलवस्तुविषयक औ कोई सुक्ष्मवस्तुविषयक 'ज्ञानशील होता है एवं कोई एक वस्तु विपयंक भी कोई अनेक वस्तु विषयक . ज्ञानवाला होता है, इस प्रकार सातिशयता (कमज्यादेपन) धर्म-घाला जो सर्व- ज्ञता का कारणभूत-ज्ञान वह वृद्धि को माप्त हुआ जहां निरतिशयता को प्राप्त होता है वह सर्वज्ञ ईश्वर है। भाव यह है कि जो पदार्थ न्यूनाधिक्यरूप ( कमज्यादे पन ) धर्म विशिष्ट होने से साविशय होता है, वह अवश्य ही कहीं काष्टा को माप्त हुआ निरतिशय हो जाता है (३) जैसा कि अशुपरिमाण परमाण में औ महत्वपरि- माण आकाश में (काष्टा को प्राप्त हुभा निरतिशय हो जाता है) सो यहां भी न्यूनाधिक्यरूप धर्म विशिष्ट होने से ज्ञान की निरतिशयता अवश्य ही होनी- उचित है, तथा च जिसमें जाकर ज्ञानं काप्टा को प्राप्त होकर निरतिशयरूप से विद्यमान रहता है वहीं ईश्वर है। अर-पया शनास-सा-आमक-मिल रहा प्रकृति में (१) अर्थात्-साधनसम्पन्न जिज्ञासु या भक्त या ज्ञानी वा योगियों के चित्त में तो ईश्वर स्वायत. ही प्रकाशमान है अत उन्हें समझाने के लिये तो अनुमानादिरूप प्रमाणान्तर वी अपेक्षा ही नहीं है परन्तु जो लोक शुष्कतर्क द्वारा ईश्वर का निराकरण कारते हैं उनकी शिक्षार्थ प्रमाणान्तर का उपन्यास किया जाता है यह इसका भाव है। १२) सीज--यहा पर सर्वज्ञ पद सर्वज्ञता( सर्वपन ) रूप अर्थ वा वाचक इसा थ शय से याहते हैं ( सर्वज्ञता का ) इति, किसी पुस्तक में ( साक्ष्यबीजम् ) ऐसे भी पाठ देखने में आता है पर तु व्यारयागारों को बह सगत नहीं है, ज्ञा.के होने में ही सर्वज्ञतारूपधर्म का लाग होता है, इम से सर्वज्ञता का कारण हो से ज्ञान ही समाज का यहा अर्थ जानना। (३) जो वस्तु किसी की अपेक्षा ते न्यन वा अधिक होय वह सातिशय परा जाता है जो जो पदार्थ काष्टा • को प्राप्त हुना का विश्रा त हो जाता है यह निराते- शय नाहा जाता है। 4 .
७४ पातञ्जलदर्शनमकाशे- एवंच भूताऽनुग्रह ही पत्ति का कारण है अन्य कोई नहीं यह सिद्ध हुया। अपने प्रयोजन के न होने पर भी कृपा से मत्ति होती है यह निरीश्व- खादी पञ्चशिखाचार्य जी भी मानते हैं क्योंकि उन्हों ने यह कहा है कि (आदिविद्वान् परमर्पि (१) कपिलमुनि भगवान्भ्योगवलनिर्मित चित्त को आय यण कर कृपा से जिज्ञासु आसुरिनामक ब्राह्मण के प्रति पञ्चविंशति तत्त्वों का उपदेश करते भये) ॥ २५॥. इदानी (पूर्वसूत्रोक्त अनुमान द्वारा ब्रह्मादि ही निरतिशयशात्त का आधार क्यों नहीं होते) इस आशङ्का को निवारण करते हुये ब्रह्मादिकों से भी ईश्वर को विशेष कहते हैं- सू० स.एषः पूर्वेषामपि गुरुः कालेनाऽनवच्छेदात्॥२६॥ भाषा-(स एंपः) सो यह परमेश्वर (पूर्वेपाम् ) पूर्व उत्पन्न ब्रह्मा- दिदेवताओं का (अपि ) भी ( गुरु: । उपदेप्टा वा जनक है, क्योंकि (काले- नाऽनवच्छेदात् ) काल कर अवच्छिन्न ( परिमित ) न होने से । अर्थात्-जैसे ब्रह्मादि देवता सृष्टि महाप्रलय में उत्पत्ति विनाशशील होने से कालपरिच्छिन्न हैं (२) तैसे ईश्वर नहीं क्योंकि यह सर्वदा विधमान होने से झालपरिच्छेद से रहित है, अतः ब्रह्मादि देवताओं को उत्पन्न कर उन के ति ज्ञान देने से यह ईश्वर उन सब का गुरु, जनक, औ उपदेष्टा है। एवं च जैसे वर्तमानसँग के आदि में ज्ञानेश्वर्ययुक्त परमेश्वर सिद्ध है तैसे पूर्वसों के आदि में भी एतादृश विद्यमान होने से यह परमेश्वर ही अनादि सर्वत्र निरतिशयज्ञान का आधार है ब्रह्मादिक नहीं यह सिद्ध हुया। ब्रह्मा को उत्पन्न कर उस के प्रति जान उपदेश किया है यह “यो ब्रह्माणं .
सू० । . समाधिपाद:.. विदधाति पूर्व यो वै वेदाच महिणोति तस्मै " (१) इत्यादि वेदवाक्यों में प्रसिद्ध ही है ॥२६॥ इस प्रकार पूर्वपकरण से ईश्वर का निरूपण फर इदानी तिस ईश्वर के मणिधानं कथनार्थ प्रथम ईश्वर का वाचक कहते है- ० तस्य वाचकः प्रणवः ॥ २७॥ भाषा-(तस्य) तिस ईश्वर का ( वाचका) बोधक शब्द ( मणवः) जोंकार है। अर्थात् यथा शृंग पुच्छ-सास्ना * वाले पशुविशेष ( गाय-बैल) का वाचक गो शब्द है तथा सर्वज्ञतादिधर्मशील परमेश्वर को वाचक ओंकार है, भी ईश्वर इस ओंकार का वाच्य है। अत एव योगियाशवल्क्य ने " अष्टचिग्रहो देवो भावगायो मनोमयः, सस्योंकारः स्मृतो नाम तेनाऽऽस्तः प्रसीदति । (२) इस वाक्य से ओंकार को परमेश्वर का नाम कहा औ कोई यह भी कहते हैं कि प्रतिमा में विष्णुद्धि के तुल्य डॉकार में ब्रह्मचुद्धि का उपदेश होने से ओंकार ब्रह्म का मतीक है अत एक “एतदाऽऽल- म्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्" इस मन्त्र-से यम ने नचिकेता के प्रति ओंकार को . श्रेष्ठ आलम्पन कही है। (i) त ह देवमात्मबुद्धिप्रकाश मुमुक्षुर्वे शरणमह प्रपये" यह इस मन्त्र का शेष है, मो परमात्मा साष्टे के आदि में ब्रह्मा जी को उत्पन करता भया, ओ नो परमेश्वर तिस बहार के प्रति बेदी का सम्प्रदान करना भया अर्थान् उपदेशद्वारा ब्रह्मा जी के हृदय में प्रकाश करतां भया तिस आत्मबुद्धिप्रकाशक देवकी शरण को मैं मुमुक्षु प्राप्त होता हु यह पर्जुरेदीय वेताश्वतरोपनिषद् ६ अध्याय के १८ मन्त्र का अर्थ है । इश्वर की शान शक्ति को आश्रयण कर ही नादिया सर्वज्ञ कहे जाते हैं यस्तुत मुल्यं सर्वज्ञ ईश्वर ही है यह तत्व है। जो गाओं के गले में कम्बल सा लटया होता है यह सारा है। : (२) (अष्टविप्रह) इन्द्रियों का भरिपय जो भाषमाहा मनोगम्य देय हे तिस पर भेश्वर का आधार यह नाम है क्योंकि प्रोद्वार स्प नाम से भारत (बुधाया हुया) पह परमेश्वर प्रसन्न हो.माता है या का बर्ष है । जैसे गी पद के उगारण से मन तर हो शृङ्गादिविशिष्टव्यक्तिविशेष चित्त में भात हो पाता हे से गोहार फे उचारण से मन- तर भी सचिदानद परमारमा या पित में मान हो माता साना इन दोनों का पर. स्पर याम्पयाधकमायसर है पह गाय है। पापक, अनिशापया, मा, एकाधिक है, एष याच्य, अभिधेप, सन्दी महमा का पालने । नाग, पर पातलदर्शनप्रकाश- निस अधिष्ठान में ब्रह्मादि से ब्रह्म की उपासना किया जाती है वह प्रतीक औ आलम्बन कहा जाता है जैसा कि शालग्रामादि, अस्तु । आशङ्का--जो (१) यह सूत्रकार ने ईश्वर-प्रणव का वाध्यवाचक भाव समन्य कहा है सो सइतकृत (मझेत जन्य) है वा प्रदीपप्रकाशयत सङ्केत घोत्य है, अर्थात्-इस पद से इस अर्थ का श्रोता को पौध होय इस प्रकार की ईश्वर की इच्ज का नाम सङ्केत है, घट पद से पृथुगन्द्रोदर कम्बग्रीवाले (स्थूलगोल दर औ शववत् गर्दनवाले) पदार्थ का बोध होय यह इच्छा का स्वरूप है, सो क्या यह सङ्केत ही घट पद के स्थलउदरादि रूप अर्थ के संग सबन्ध को उत्पन्न करता है यह मानते हा, वा घट पद-में स्थलोदरादिरूप अर्थ के बोध की पाक्ति तो प्रथम ही थी परन्तु सङ्केत ने उस को ज्ञात करा दिया जैसे विद्यमान रूप को ही दीपप्रकाश ज्ञात करा देता है यह मानते (२) हो ? समाधान-जप्ते (३) मीमासक शब्दअर्थसबध को नित्य मानते हैं तैसे हमारे मत में भी शब्दार्थ फा याच्यवाचकभाव सबन्ध, नित्य ही है, कोवल संकेत मान से उस सम्बन्ध की अभिव्यक्ति हाती है कुछ संकेत से वह सम्बन्ध जन्य नहीं है। अर्थात्-जैसे पिता-पुत्र का परस्पर जन्यजनभावसम्बन्ध विद्यमान . हुआ ही ( यह इस का पिता औ यह इस का पुत्र है ) इस प्रकार सङ्केत से जाश किया जाता है कुछ इस सहेत स ही वह पिता नौ वह पुन नही हुआ तसे ईश्वरकृत सङ्केत भी विद्यमान शब्दार्थसम्पन्ध को प्रकाश करता है कुछ उत्पन नही करता है। इस प्रकार सर्वत्र ही सङ्केत विद्यमान सम्मन्ध का प्रकाशक है कुछ जनक नहीं यह जानना। यह सईस जस इस सर्ग में हैं तेप्से सगीन्तर में भी विद्यमान ही था, अतः पूर्व सम्बन्ध के अनुसार उत्तर २ सर्ग में भगवान सङ्केत करता है कुछ ऐसे ही नहीं। ()" क्रिमस्य सङ्केतकृत वाच्ययाचवम्, अध प्रदापप्रकाशवदयास्तम् इस भा'को अनुमार शहा या त्यापा करते हैं (जो यह ) इत्यादि । .( २ ) दि. सदेत में धान्याचा भाव सबुध की उत्पत्ति माना जाय गीत जय हा से सम ध भनित्य यहा जाय गाओ यदि समेत से बन नहीं होता कि तु पनाया जाता है इम प्रभार सङ्केन को द्योतक मानो गे तो सप ध पित्य कहा जाय- गा, इस दौती में से को। गत ममत है यह प्रष्टा का भाव है। (३) स्थितोऽस्य वा यस्य वाचन सद, सबध " इत्यादि मान्य का अनु- पार रस्ते हो. अतिगत यो समत मानकर सिद्धात कहते हैं (गैमे) इत्यादि से । " . .
- . समाधिपादः। 'इस प्रकार अनादिसिद्ध वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध को सतद्वारा घोत्य मान करही वेदार्थज्ञाता मीमांसक शब्दार्थसम्बन्ध को नित्य (१) मानते हैं ।।२७|| इस प्रकार जिस साधक ने ईश्वर प्रणव का वाच्यवाचकभाव ज्ञात कर लिया है तिस के प्रति कर्तव्यं मणिधान का प्रतिपादन करते है- (विधातवाच्यवाचकत्वस्य योगिनः (*) सू० तजपस्तदर्थभावनम् ॥ २८ ॥ -भाषा-(विशातवाच्यवाँचकत्वस्य योगिनः ) पूर्वोक्तप्रकार से बात हुया है ईश्वर-प्रणव का वाच्यवाचकभाव जिस योगी को, तिस योगी को ( तज्जपः ) तिस प्रणव का जप, भौ ( तदर्थ) तिस प्रणव के अर्थभूत ईश्वर का ( भावनम् ) चिन्तम, कर्तव्य है,। अर्थात्मणवजपपूर्वक ईश्वर का ध्यान करना योगी को उचित है क्योंकि इसी का नाम ईश्वरमणिधान है। इस प्रकार प्रणव को जपते हुये औ प्रणव के अर्थभूत ईश्वर का चिन्तन करते हुये योगी का चित्त एकाग्र हो जाता है औ तदनन्तर निज़रूप का साक्षात्कार भी योगी को हो जाता है। यद्यपि जप औ ईश्वरभावना का एककाल में सम्भव नहीं हो सकता तथापि भावना से पूर्व औ पश्चात् काल में जप करे यह क्रम जानना (२) । अत एव व्यास जी ने " स्वाध्यापाद् योगमासीत योगात् स्वाध्यायमा- मनेत्, स्वाध्याययोगसम्पत्या परमात्मा प्रकाशते" ( ३ ) इस वचन से इसी क्रम का उपद्रेश किया है। (१) यद्यपि प्रलय में अपनी शक्ति के सहित ही शब्द प्रभान में व्य हो पता है तथापि फिर सर्गकाक में शक्तिसहित ही आविर्भाव हो जाता है कुछ पाक्तिरहित नहीं अत पूर्व सबन्ध के अनुसार ही सवेत होता है.कुछ विलक्षण नहीं, गत एव इस व्यव- होरपरम्परा से शब्दाऽर्थसय ध नित्य है, यह तत्त्व है। (*) इतने पाठ या भाष्यकारों ने मन को आदि में बंध्याहार किया है, मत एन इस का उप यास किया है। (२) चित्त को सर्व ओर से निवृत्त कर सेवक ईश्वर में स्थिर कर देने का नाग भावना है, अत एक काल में दोनों सभव नहीं, सामान्य से स्मरण करने में तो एका साथ होने में कोई बाधक नहीं यह जानो। , (३) स्वाध्याय नाम प्रणतना का है, प्रणवनय से अगर योगाभ्यास करे भी योगाभ्यास से गन तर फिर प्रणवनप करे इस प्रकार जपयोग की सपत्ति होने से पर- मामा का साक्षात्कार हो जाता है, यह इस का अर्थ है। - ७८ पातञ्जलदर्शनकाशे- पद्यपि (१) "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन्, यः प्रयांति त्यजन् देह स याति परमो गत्तिम्'(२) इस वाक्य से कृष्ण भगवानने साक्षात् ही ईश्वरमणिधान को मोक्ष का जनक कहा है तथाऽपि "आस्थितो योगः धारणाम्" इस पूर्व वाक्यसे एकवाक्यता कर (ओङ्कारजपपूर्वक ईश्वर ध्यान से योग को प्राप्त हुआ योगी परमगति को प्राप्त होता है) इस प्रकार अर्थ कर' समन्वय कर लेना, नही तो सूत्रकार ने जो ईश्वरमणिधान को समाधिलाभ द्वारा मोक्ष का जनक कहा है सो बाधित हो जायगां ॥ २०॥ (क्या ईश्वर के मणिधान से केवल समाधि का ही लाभ होताई वा अन्य भी कुछ इस का फल है).इस आकांक्षा के निवारणार्य सूत्रकार फलान्तर भी कहते हैं। सूतत:प्रत्यक्चेतनाऽधिगमोऽप्यन्तरायाऽभावंश्च॥२९॥ भाषा-(ततः तिस पूर्व उक्त ईश्वर के प्रणिधान से (प्रत्यरुचेतन) अन्तः करण(१)में स्थित चेतनरूप आत्मा का (अधिगमोऽपि) साक्षात्कार भी होजाता है (च) और (अन्तरायाऽभावा) वक्ष्यमाण अन्तरांय-विनों का अभाव होता है । अर्थात्-जैसे ईश्वरके पणिधान से समाधि लौंभ होता है तैसे अन्तरायों के अभावद्वारा निज शुरूप का भी साक्षात्कार हो जाता है। फु ईश्वरप्रणिधान से शीघ्र समाधि का ही लाभ होता है यह मत जानना किन्तु अन्तरापनिवृत्तिपूर्वक स्वरूप साक्षात्कार भी सङ्ग के सङ्ग ही हो जाता है, इसी के बोधनार्थ सूत्र में (अपि) यह पद दिया है। भाव यह है कि ईश्वरमावनासे (जैसे पुरुपविशेष ईश्वर शुद्ध प्रसन्न केवट (१) सूत्रकार ने पूर्व २३ इस सून से भी द्वितीयपाद में ४१ इस सून से ईश्वर प्रणिधान को समाधिसिद्धि का साधन कहा है ओ भगवान ने मोक्ष का उपाय कही है इस विरोध का परिहार करने के लिये कहते हैं.( यद्यपि ) इत्यादि से 1. अथवा दोन प्रमाणों से ईश्वरप्रणिधान दोनों फलों को देने वाला है, इस प्रकार विरोधाभार मान लेना (१) ब्रह्म के याचका प्रणन का जप भी मेरा स्मरण जो पुरुष करता है वह देह साग से बनन्तर परम गति को प्राप्त होता है यह कृष्ण वाक्य का अर्थ है । अध्याय ८1 श्लोश १३। (१) नडवर्ग प्रकृति मादि से ( प्रतिकूल ) निळक्षण रूप से नो प्रनीत होता है चेतन वह प्रत्यक् चेतन वहा जाता है इसी का नाम जीव है, अधया ( प्रत्य) भात. वरण में होने वाला, बो चेतन वह प्रत्यक्धेतन है, सर्वथा ही प्रत्यक्पेतन नाम जीवा गा का है, यही कहते हैं ( अन्त शरण ) इति ।
समाधिपादः। . अनुपसर्ग (१) है तैसे मैं भी शुद्ध असङ्ग हूं) इस प्रकारका निश्चय पुरुष को होता है, इसी को ही प्रत्यक्चेतनाऽधिगम, औ पुरुपदर्शन औपुरुपसाक्षात्कार कहते हैं। यद्यपि ईश्वर की भावना से ईश्वर का ही साक्षत्कार होना उचित है आत्मा का नहीं क्योंकि यह नियम है कि-जिम की भावना कियी जाती है उसी का ही साक्षात्कार होता है अन्य का नही (२) तथापि ईश्वर औ पुरुष को परस्पर अत्यन्त सदृश होने से पुरुपका भी साक्षात्कार संभव होसकवा है। अर्थात्-विजातीय वस्तु की भावना से विजातीय वस्तु का साक्षात्कार ना यद्यपि असम्भव है तथापि सजातीयभावना से सजातीय का साक्षात्कार होना अनुपपन्न नही क्योंकि एक शास्त्र के अभ्यास से सजातीयशास्त्र का । अनुभव लोक में प्रत्यक्ष ट है। व्यवधान का अभाव होने से ( ३ ) प्रथम ईश्वर का साक्षात् न हो कर अपने रूप काही साक्षात्कार होता है यह सूत्रकार का आशय है ॥९॥ जिन अन्तरायों का ईश्वरमणिधान से अभाव होता है वह कौन हैं, यदि यह कहो कि जो चित्त को विक्षिप्त कर एकाग्रता से प्रच्युत कर देते हैं वही। अन्तराय है, तो इन की इयत्ता कहनी चाहिये कि इतने हैं, इस आकाङ्क्षा के निवारणार्थ सूत्रकार अन्तरायों का स्वरूपनिर्देश करते है- सू० व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादाऽऽलस्याऽविर- तिभ्रान्तिदर्शनाऽलब्धभूमिकत्वाऽनवस्थितत्वानि चि- तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥ ३० ॥ भाषा-व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्ति दर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व, यह नव (चितविक्षेपाः) चित्त के विक्षेपक है अतः (ते) ये ही नव ( अन्तरायाः) योग के विघ्न है। अर्थात्-इन नवों के होने से ही पूर्वोक्त प्रमाणादि वृत्तियां उत्पन्न होकर चित्त को विक्षिप्त कर देती हैं औ इन के अभाव से चित्त स्थिर हो जाता है, (१) (प्रसन्न) लेशरहित, (केनल). धर्माऽधर्मरहित, ( अनुपसर्ग ) जन्म-अवरम भोग ल्य विनों से रहित । (२) कामिनी की भावना करने से यागिनी का ही साक्षात्कार होना है कुछ सनकादिक ऋगियों या नहीं यह भाव है। (३) निस यो मारना किया है उसका साक्षात्कार न होकर आत्मा का ही • साक्षायार क्यों होता है, इसका उच्चर कहते हैं - (व्यवधाना भाव होने से) इति ।
पातालदर्शनमकाशे- इस प्रकार अन्वयव्यतिरेक से (१) यह नव योग के प्रतिपक्षी (विरोधी हैं। व्याधि धातु-रस-करण का अपम्प अर्थात् (२) वातपित्तकफसंज्ञकन 'तीनों धातुओं में से किसी एक धातु का कोप होकर न्यूनाऽधिकं हो. जान धातुचैपम्प औ भुक्त पीत. ( खाये पीये ) अन्नजल का सम्यम्मकार (अर्छ तरह) परिपाक न होना सर्वपम्प, नॅनादि इन्द्रियों की शक्ति का मन्द मध्य हो जाना मारणयपम्य कहा जाता है, इस पातुरसकरणं के पम्यं का ना 'व्याधि है। 'स्त्यांनम्-चित्त की अकर्मण्यता, अर्याव-इच्छा होने पर भी किसी कार्य करने की क्षमता ( सामर्थ्य ). न होने का नाम स्त्यान है। संशय में योग साध सक्गा कि नहीं अथवा यह योगरूप काहय सिर होगा कि नहीं, इस प्रकार दो कोटि को विपय करने वाला जो ज्ञान घुर संशय है। प्रमाद-समाधि के साधनों का अभावन अर्थात् समाधि के साधनों में उत्साहपूर्वक प्रचि का अभाव आलस्यं शरीर औ चिंत के गुरुत्व से प्रवृत्ति का अभाव, गुरुत्वं नाम भारीपन का है. वहां पारीर का भारीपन कफ के प्रकोप से होता है औचित्त की भारीपन, तमोगुण के आधिक्य से होता है। अविरति-निंपन्द्रिय संयोग से चिच की क्पियो में तृष्णा होने से वैराग्य का अभाव। (१) इन नवों के होने से विक्षेप का होना शन्यय है, इन मे अभाय से विक्षेप का अभाव होना व्यतिरेक है। (3) शरीर का धारण (स्थिति) करने से वात-पित्त-कफ इन तीनों का नाम धातु है इनका इयत्ता (अनदान) को त्याग कर न्यूनाधिका होजाना धातुरूपंम्प कहा जाता है इसी को वैद्यक्र में धातु प्रकोप. कहा जाता है। पारपाकशापन्न भुक्तंपीत अनमक के सार का नाम रस है, तिसका क्षेत्रम्य यही है कि साया पीया, नकदी हजम न होना। करंग नाम, नेत्रादिइन्द्रयों का है उन का पम्य यही हैं कि कम देखना या कम सुनना,. इत्यादि जान लेना. यही कहते हैं ( अर्थात् ) इत्याहि मे।
: समाधिपादः.. भ्रान्तिदर्शन-विपर्ययज्ञानं, अर्थात् अन्य वस्तु में अन्यप्रकार का शान() । अलब्धभूमिकत्व-किसी प्रतिबन्धकब्रश से. वक्ष्यमाण मधुपती आदि योग- भूमि का लाभ न होना। अनवस्थितत्व-किसी एक योगभूमि का कथञ्चित् लाभ होने पर भी उस में चित्त की, निरन्तर स्थिति का अभाव, अर्थात् किसी योग की अवस्या का लाभ होने से यदि उस में ही कृतकृत्य मान.ले गा तो समाधि के अलाभ से 'चित्त स्थिर नहीं होगा क्योंकि-समाधि के लाभ से ही चित्त स्थिर होता है ऐसे नहीं, एवं च समाधि के अलाभ से जो चित्त की अस्थिरता वही अन्य-. स्थितत्व पद का वाच्य है. यह फलिते हुआ (२.) यह पूर्वोक्त नव ही चित्तविक्षेप, योगमलं, योगमतिपक्ष, योगान्तराय, इन नामों से व्यवहृत होते हैं ॥३०॥ केवल यह नय ही योग के प्रतिबन्धक हैं यह मत जानना किन्तु इन नवों के होने से अन्य भी प्रतिबन्धक उपस्थित हो जाते हैं, इस आशय से सूत्रकार उन अन्यों का भी स्वरूप निर्देश करते हैं- सू दुःखदौमनस्याऽङ्गमेजयंत्वश्वासप्रश्वासा विक्षे. • पसहभुवः ॥३१॥ दौमनस्य, अङ्गमेज़यत्व, श्वास, प्रश्वास, यह पांचो ही. (.विक्षेपसहभुवः) पूर्वउक्त विक्षोपों के सङ्ग होने वाले हैं। अर्थात्--पूर्वउक्तविक्षपों के होने से यह पांच अन्य भी मतिबन्धक उपस्थित हो जाते हैं। दुःख-जिस के संबन्ध होने से पीडित हुये पुरुप उस की निवृत्ति के लिये यत्र करते हैं वह दुःख कहा जाता है, सो यह दुःख आध्यात्मिक आधिभौतिक आधिदैविक भेद से तीन प्रकार का है। तहां कामक्रोधादिजन्य जो मानसपरिताप औ वातपित्तादिप्रकोपजन्य (1) यहाँ योगपक्ष में विपर्ययज्ञान-यही है कि योग के साधनों को असाधन, जानना मी असाधनों को साधन मानना। भाषा-दुःख, . (२) जिस हेतु से समाधि के काम बिना चित स्थिर नहीं होता है अत: समाधि यो काम में ही पुरुष को अपत करना उचित है यह इस या भाव है।
. पातजलदर्शनकाशे जो शरीर में होनेवाला अरादिरोग, यह सब आध्यातिएकदुःख है (१) एवं सिंहव्याघ्र आदि भूतों से जन्य जो द स बह आधिभौतिक है, .ी वजपात ग्रहपीडा, अतिष्टि-अतिगरमी आदि से जन्य जो नु.ख वह आधिदैविक है । दौर्मनस्यम् अभिलपितपदार्थविषयक इच्छा की पूर्ति न सेने से जो चित्त में क्षोभ यह दौर्मनस्य है। अङ्गमेजयत्व शरीर के. प्रत्येक अङ्गों में कैम्प का होना । (२). श्वास इच्छा से बिना ही चाय वायु का नासिका से अन्तर मवेश छोजाना। प्रश्वास इच्छा से विना ही आन्तर (भीतर की) वायु का बाहर निकस जाना। यह पांचों ही विक्षिप्तचित्त को होने दें औ समाहितचित्त को नहीं होते हैं, अतः यह विशेपसहमुव कहे जाते हैं ॥ ३१॥ यह सब विक्षेप समाधि के विरोधी है अतः पूर्वोक्त अभ्यास वैराग्यद्वारा ही इन का निरोध करना उचित है, (३) सो अभ्यास वैराग्य पूर्व कह चुके हैं, इदानीं इन दोनों में से पूर्वोक्त ईश्वरप्रणिधानरूप अभ्यास के विषय को उप- संहार करते है सू० तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाऽभ्यासः ॥३२॥ भाषा-(तत्प्रतिषेधार्थम् ) तिन पूर्वोक्त विक्षपों के प्रतिपेध (अभाव) के लिये (एकतवाऽभ्यासः) एकतत्व का अभ्यास करे । यहां पर एक शब्द प्रधान अर्थ का पाचक है, एवं च एकतत्त्व का अर्थ प्रधानतत्त्व हुया, सो प्रधानतत्व यहां पर ईश्वर है, उस ईशा आलम्बन में वारंवार चित्र का निवेश करना ही एकतत्व का अभ्यास कहा जाता है औ इसी का नाम ईश्वरमणिधान है, एवं च यह अर्थ हुया कि इन सब विक्षेपों की निवृत्ति के लिये पूर्वोक्त ईश्वरप्रणिधान का योगी अनुष्ठान करे। यद्याप एकतत्व शब्द से किसी एक तत्त्व के ही ग्रहण होने का यहां (१) यद्यपि निखिल दु ख मन मा धर्म होने से मानस ही है तथापि को मन से ही केवळ मन्य होय यह मानस कहा जाता है भी जो अ य किसी द्वारा मन से जन्य होगा यह तिस २ नाम व्यबहत होता है यह भेद है। आत्मा नाम मन का भी शरीर का है इन दोनों को अधिकार (निमित्त) से जो दुख उत्पन्न होता है यह आध्या- मिक कहा जाता है इसी से ही आध्यात्मिक को दो भेद कहे गये हैं यह जानो। (२) तहां शरीर का कांपना समाधि के अङ्गभूत आसने का विरोधी है । एव श्वास, यो रेचक-प्राणायाग का जो प्रश्वास को पूरक प्राणायाम का विरोधी जान देना। (३) ययपि ईश्वरप्रणिधानरूप अभ्यास ही सूत्रकार ने विक्षेपों का निवर्तका पाहा है. तथापिइम भाष्यकार के याश्य से वैराग्य को भी उस का सहकारी जान लेना। . .
समाधिपादन सम्भव हो सकता है कुछ ईश्वररूप विशेषतत्त्व का नहीं सथापि ईश्वरमणि- थान का प्रकरण होने से ईश्वर का ही या ग्रहण करना उचित है क्योंकि शास्त्र का यह निषय है कि-जहां अनेकार्थ होने से शब्द के अर्थ विशेप का निश्चय न होय वहां मकरणरल से ही अर्थ विशेष का ग्रहण होता है (१), किञ्च-" पसंहरनिदं स्त्रमाह" इस वचन से भाष्यकारों ने इससूत्र को उपसंहारपरं ( समाप्तिपर निरूपण किया है औ उपसंहार,उसी का ही होता है जिस का उपक्रम (आरम्भ ) कियाजाय, औ उपक्रम यहाँ पर ईश्वर- प्रणिधान ही है, अत: उसी का उपसंहार होना उचित है अन्य का नहीं, एवं च उपक्रमउपसंहार की एकरूपता के पल से एकतच शब्द को ईश्च- रार्थक मान कर यहां ईश्वरमणिधान का. ही ग्रहण करना योग्य है कुछ किसी -एक तव के अभ्यास का नहीं यह सिद्ध हुआ।. जो कि योगवातिककारविज्ञानभिक्ष तथा भोजवृत्तिकार ने इस उपनामाप संहार की एकरूपता को न जान कर एकतत्व शब्द का अर्थ कोइ एक स्थलतच माना है सो प्रकरणविरुद्ध तयाँ पूर्वोक्त भाष्यकारोक्त. उपसंहार-कथन से विरुद्ध होने से हेय जानना । किञ्च-पूर्व १९ इस सूत्र से ईश्वरप्रणिधान को अन्तरायनित्ति का उपाय कथन कर, वह अन्तराय कौन हैं इस आकाङ्क्षा के उदय होने पर, ३०,. ३१, इन दोनों सूत्रों से अन्तरायों का स्वरूप निर्देश कर फिर इस सूत्र से तिन्हों के अभाव के लिये एकतवाऽभ्यासे कहा गया है, एवं च जिस ईश्वर- 'मणिधान को आरम्भ में विक्षेपनित्ति को उपाय कहा है उसी को यहां पर उपसंहार करना उचित है क्योंकि इसी का नाम उपक्रमोपसंहारैकरूपता है। यदि यह कहो कि-यथा ईश्वरप्रणिधान विक्षेपों की निवृत्ति का उपाय है तथा एकतत्वाभ्यास भी एक स्वतन्तं पृथक् ही उपाय सूत्रकार ने कहा है। तो फिर सूत्रकार ने “ एकतत्त्वाऽभ्यासो वा." इस प्रकार विकल्पबोधक.वा' शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया क्योंकि वा शब्द का प्रयोग करने से ही (अथवा विक्षेपों की निवृत्ति के लिये एकतत्व का ही अभ्यास करे कुछ ईश्वर के मणिधान का नियम नहीं है ),यह अर्थ हो सकता है अन्यथा नही। किञ्च-" यथाभिमतध्यानाद् वा ३९ इस सून से जब आगे किसी (१) से सैन्धव शब्द को लेवन औ अन्य रूप अनेकार्थक होने पर भी भोजनरूप प्रकरण के बैंक से वणरूप अर्थ की निश्चय नौ गमनख्य प्रकरण के बक से अवरुप अर्थ का निश्चय होता है तेसे यहा भी प्रकरण के बल से विशेष अर्थ का निश्चय नान लेना। + " ' .. पातलदर्शनकाशे- एक स्थूलतत्त्व के अभ्यास को कहना ही है तो फिर यही उस के कंधन का अवसर ही क्या, अलंबहुना । यहाँ प्रसङ्ग से यह भी अवश्य सातव्य है कि-जो (१) कि. वैनाशिक * लोक चित्त को क्षणिकत्व प्रयुक्तं मत्यर्थनियत मत्ययमान (२) गानते हैं तिन के मत में सब चित्त को एक एक विषय में ही नियत स्थित होने से अनेकविषय- गमनशीलतारूप विक्षेप के अभाव से एकाग्र विच का सम्भव नहीं हो सकता है, एवं च चॅनाशिकगुरु युद्ध जी ने जो विक्षेपनित्ति के लिये शिष्यों के प्रति- चित्तं की एकाग्रता के अर्थ भावना का उपदेश किया है सो अनर्थक होगा क्योंकि जब निखिलविपयों से निवृत्त कर किसी एक विषय में पिच की निरन्तरस्थिति कियी जाय तय ही चित्त एकाग्र कहा जा सकता है सो यह निरन्तर एक विषय में चित्त की स्थिति बौद सिद्धान्त-से विरुद्ध है क्योंकि : वह चित्र को प्रत्यर्थनियत औ क्षणिक मानते है । अतः बुझंउक्त एकाग्रता के उपदेना से, विरुद्ध होने से चित्त को प्रत्यर्थ- नियत मानना स्वसिद्धान्तविरुद्ध है ( ३ ) एवं च चित्तं प्रत्यर्थनियत नहीं है यह सिद्ध हुआ। यदि बौद्ध यह कह (४) कि-एक विषय के परित्याग पूर्वक अन्यान्य विषयों (२) यहां पर भाष्यकारों ने “ यस्य तु प्रत्यनियत प्रत्ययमाने . क्षणिक च चित तस्य सर्वमेन चित्तमेकाम नास्त्येव विक्षिप्तम् " इत्यादि प्रन्ध से बौद्धाऽभिमतचित्त की क्षणिकता निराकरण किया है, अतः उस भाष्य का अनुपाद करते हुये संक्षेप से. क्षणिकवाद का खण्डन करते हैं (जोकि ) इत्यादि से । * नाशिक नाप बौद्धों का है क्योंकि वह निखिल प्रपञ्च को क्षणिक होने से निनाशशील मानते हैं। (२) द्वितीय क्षण में जो नष्ट होय वह क्षणिका कहा जाता है, क्षणिक होने से ही चित्त प्रत्यर्थनियत है, अर्थात् जिस विषय को चित्त प्रहण करता है उस से अन्य चपय का महण न कर उसी विषय में समाप्त हो जाता है, अतएव प्रत्ययमात्र अर्थात् तिरूप आधेय से रहित हुआ निराधार है। (१) (निखिक ही वस्तुज त क्षणिक गो दु ग्वस्वल्प है इसादि भावना के परि- क से चित्त एकाम होता है ) यह भौद्धों की उक्ति वदतोव्याघातदोप युक्त होने { अप्रामाणिक है, अपने ही माक्य से जहा स्वउक्ति का विरोध होय यह वदतोव्याघात हा जाता है। यह भान है। (४)योगी सदृशमाययप्राणि चैत्तमेको मन्यते " इत्यादि भाष्य का अनुबाद कारते हुये यौनी का अभिप्राय वर्णन करने हैं (पदि यह कई वि) इत्यादि से।
५ . . . . समाधिपादः। में गमनशीलता को विक्षेप औं एक विषय में निरन्तर स्थित रहने को एका- ग्रता नहीं कहते हैं किन्तु नीलपीतादि-अनेक-परस्पर विभिन्नविपयाकार होने से जो क्षण क्षण में चिचनिष्ट विलक्षणाकारधारणशीलता है वह विक्षेप है औ शान- मात्र होकर जो निरन्तर सहशविषयाकार से चित्त का प्रवाह होना वह एका- प्रता है, सो यह एकाग्रता हमारे मत में भी संभव हो सकती है क्योंकि यद्यपि चित्त क्षणिक है तथापि प्रथम क्षण जिस विषय में गैमन कर चित्त समास हुया है फिर द्वितीय क्षण में भी उस के सदृश विषय में ही निरन्तर उत्पन्न औ समाप्त करना ही साध्य है क्योंकि सदृश प्रवाह का धारण करना ही हमारे मत में एकाग्रता है। तव उन से यह पूछते हैं कि जो वह सहमत्ययप्रवाहशीलता रूप एकाग्रता : है वह प्रवाहचित्त का (उत्तरोत्तरधारारूपचित्त के प्रवाह का) धर्म है वा प्रवा- हांश का (प्रत्येकचित्त की व्यक्ति का) धर्म है। यदि चित्त के प्रवाह का धर्म कदो गे तो प्रत्येकव्यक्तियों से भिन्न एक कोई चित्तप्रवाह ही नही है जिसका आप धर्म कहियेगा (१)। किञ्च-स्तुमात्र को ही आप के मत में क्षणिक होने से चित्तमवाह को भी वस्तु होने से क्षणिक ही मानना पड़ेगा, एवं च स्थिर एक आश्रय के अभाव से एकाग्रतारूप धर्म का निरन्तर रहना सुतरा असंभव १२) हुयां । यदि प्रत्येकचित्तव्यक्तियों का धर्म कहोगे तो फिर चाहे विलक्षणमत्यय प्रवाहशाली होय वा सदृशविपयप्रवाहवाला होय सर्वथा मत्यर्थनियत ही कहा जायगा (३) क्योंकि जिस विषय में उत्पन्न हुया उसी विषय में समाप्त होने से अनेक गमनरूप विक्षेप का यहां संभव नहीं, है। एवंच विक्षेपनिवृत्ति के लिये जो एकाग्रता का उपदेश किया है वह फिर भी असगत हुया। अतः स्वभावतः अनेक विषयों में गमनशील, श्री उपाय द्वारा एक विपय में स्थिरतावाला एक स्थिर चित्त अवश्य ही माननीय है। (१) प्रत्येक २ चित्तव्यक्ति ही मिक्ति हुयी चित्तमाह का वाच्य कुछ व्यक्तियों से भिन्न चित्त का प्रवाह नहीं है, क्योंकि प्रवाह वाले से भिन्न प्रवाह कोई वस्तु नहीं है यह भाव है। (२) एकाग्रता भी एक वस्तु ही है, तथा च वस्तु होने से-एकाग्रता भी क्षणिक हो माननी पडेगी, यह भी जानो। (३) सदृशनत्यय प्रवाह भी वस्तु होने से क्षणिक ही है तो फिर निरन्तर एका- प्रता प्राइ का सभर कैसे यह भी शोचो। है ८६. . .. पातंजलदशनप्रकाशे- किञ्च यदि एक चित्त को स्थिर न मान क्षण २ में चित्तं भिन्न भिक्ष माने जायगे तो पूर्व क्षण में अन्य चित्त से ज्ञात हुये पदार्थका अन्य क्षण में द्वितीय पिच से स्मरण कैसे होगा क्योंकि अनुभव-संस्कार-स्मृति का एक ही आश्रय होता है विभिन्न नहीं (१)। एवं अन्य चित्तु के किये हुये कमी का अन्य चित्त फलभोक्ता भी कैसे होगा क्योंकि यह नियम है कि जो कर्म का अनुष्ठान करता है . वही उस के फलका भोक्ता है अन्यथा अझताऽम्यागम कृतविमणाशरूप दो दोप मसक्त हो जायगे (२)। यदि यह कहो कि यथा पुत्रकृत श्राद्ध से पितृगण को औ पितृकृतवैधा- नरइष्टि से (३ ) पुत्र को फल शास्त्र में प्रतिपादन किया है तथा अन्य चित्त-. कृत कर्मों से अन्य चित्त को भी फल का होना संभव है, तो यह भी आप का वक्तव्यं समञ्जस नहीं क्योंकि यदि जैसा पिता-पुत्र का परस्पर जन्यजनक भाव संपन्ध है वैसा पूर्वचिज के सङ्ग उत्तर चित्त का जन्यजनकभाव संपन्ध । होता तो आप यह कह सकते थे कि पूर्वचित्त कृत कर्मों के फल का उत्तर चित्त भोक्ता है पर सो आप के मत.में है नहीं क्योंकि परस्परसंवन्ध से रहित ही नूतन नूतन चिरा क्षणर में उत्पन्न होते हैं यह आप का सिद्धान्त है। किञ्च-जैसे पुत्रं आदि पितामभृति के उद्देश से कर्मों का अनुष्ठान करते है तैसे कुछ पूर्व-चित्त के उद्देश से तो उत्तरचित्त कर्मों का अनुष्ठान करता नहीं जिस से (१) यह कदापि समय नहीं हो सकता है कि देवदत्त ने शास्त्र का अध्ययन प्रया श्री यज्ञदत्त को उस का संस्कार हुआ औ विष्णुदत्तने उर्स का स्मरण किया है, पोंकि जिस को ज्ञान होता है संस्कार-स्मरण भी उसी को ही होता है यह अनुभव • द्धि है, आप्न के गत में एक क्षण से अनन्तर पूर्वचित्त नष्ट हो कर , द्वितीय नूतन ति उत्पन्न होता है, तथा च अनुभव से हुआ अन्य चित्त को जो संस्कार हुआ अन्य त्त औ स्मरण हुथा अन्य चित्त को यह अनुभव से विरुद्ध मानना पड़ेगा, अतः चित्त स्थिर ही माननीय है, यह भाय' है। (९) विना कर्मानुष्टान से फल की उत्पत्ति का नाम अकृताऽभ्यागम भी किये हुये का फल दिये बिना नाश होनाना कृतविप्रणाश कहा जाता है । अन्य चित्त के प हुये कर्भ से यदि अन्य चित्त को फल होगा तो उत्तर चित्त को बिना ही कर्म से फम्माति होने से अकृताभ्यागम दोप, भी पूर्व चित्र को किये हुये का फल न मिलने से कृतविप्रणाश दोष हुया । (२) पुत्र की तेजस्विता वीरतादि के लिये जो पुत्र के जन्मदिन में वैश्वानर देवता के उदेश्य से पिता यज्ञ करता है उस मा नाम वैश्वानरइष्टि है । श्राद्ध तो स्पष्ट ही है। . .
0 उत्तर चित्त को फल होय किन्तु अपने ही निमित्त करता है, तब उत्तरं चित्त को फल का संवन्ध कैसे, बहुत क्या कहें जितनी आप की युक्तियों हैं वह सब गोमयपायसीयन्याय से भी दुष्ट ही हैं। अर्यात-2) (जैसे गोमय (गोबर) भी पायस (राबड़ी) के तुल्य स्वादु औ भक्ष्य है क्योंकि वह भी दुग्ध की तरह गईआ से ही मन्त्र होता है) यह युक्ति. दुष्ट है तैसे आंप की भी सब युक्तियां दुष्ट ही हैं, वस्तुतः इस.ते भी अधिक दृष्ट हैं क्योंकि उस में तो गोमय को मिष्ट कहने में (गयीआ से उत्पन्न होता है) यह हेतु भी दिया है औ आप के मत में तो अन्यचिच के किये हुये कर्मों का अन्य चित्त भोक्ता है. इस में हेतु ही कोई नहीं मिलता,. अतः एक स्थिर चित्त मानना उचित है । . किञ्च (२) यदि प्रतिक्षण में चिंत्त को अन्य से अन्य नूतन ही मानोंगे तो आपको जो यह अपना अनुभव होता है कि (जो मैं देखने वाला हूं सोई । मैं इसको स्पर्श करता हूं) सो अनुपपन्न होगा क्योंकि इस शान में दर्शन औ पनि का एक ही कर्ता-प्रतीत होता है भिन्न भिन्न नहीं। अर्थात्-(३) जो मैं दर्शन करता था वहीं मैं अब स्पर्श करता हुं औ जो मैं स्पर्श करता था सोई मैं अब देखता हूं. इस प्रकार भिन्न २ दर्शन स्पर्शनादि ज्ञानों में अई अहं ( मैं मैं ) इत्याऽऽकार प्रतीयमान जो उन शानों का आश्रय वह एक ही प्रतीत होता विभिन्न नहीं, सो यह भिन्न २ मानों में अनुगस जो अहं अहं इत्याकारक अभिन्न प्रतीति सो यदि अत्यन्तभिन्न क्षणिक चित्त माने जायगे तो अनुपंपन्न हो जाय गी क्योंकि अत्यन्तभिन्न क्षणिक चित्तों में इस एकाऽऽकार प्रतीति होने का संभव नहीं, औ इस प्रत्यभिशाप मत्यक्षानुभव (१) का माहात्म्य किसी.से अपलाप हो नहीं सकता क्योंकि प्रत्यक्षममाण ही सब से चली है औ इस प्रत्यक्ष प्रमाण के पल से ही अन्य . प्रमाण सिद्ध होते हैं। (१) "कञ्चित् समाधीयमानमप्येतद् गोमयपायसीयन्यायमाक्षिपति" इस भाष्य नर्थ को स्पष्ट करते हैं (अर्धात्) इत्यादि से। (२) किञ्च सारमाऽनुभवाऽपन्हवश्चित्तस्याऽन्यत्वेप्रामोति) इस भोप्य का. करते हुये दौपान्तर कहते हैं (निध) इत्यादिना । अनुवाद (३) “यदहमद्राक्षं तत्स्पृशामि" इत्यादि भाष्य के अर्थ - को स्पष्ट करते है (अर्थात् ) इत्यादि से। (४) जो देखनेवाला हूं सोई.सर्श करता है यह प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष का स्वरूप है।' कपिलमुनि ने भी "न प्रत्यभिज्ञावाधात्" अध्याय १ के६५ सूम से इसी प्रशोर क्षणिकप का खण्डन किया है। .
चित्त प्रसन्न पानालदर्शनमागे- एवं च प्रत्यभितामत्यक्ष से क्षणिकर पा पापहोने से स्थिर चिरामानन आवश्यक है। जोकि बौदी ने क्षणिकत्व की सिद्धि के अर्थ (जो वस्तु है नर सणित है, क्योंकि वस्तु होने, रो, जसे कि दीप की निगा) यह युक्ति दी ई सो युत्ति भी दीप की शिखा को अनेकक्षण अवस्थायी दोने से भ्रमालक है। अत एव कपिलमुनि ने “टान्ताऽसिद्धेश" (१) इस सूत्र से दीपशिग्न रूप दृष्टान्त का खण्डन किया है। विस्तर अन्यत्र (२) सद६ ॥३२॥ इस प्रकार ईश्वरमणियानष्ण अभ्यास को एकाग्रता का उपाय निरूप फर इदानीं जिन साधनों के अनुष्ठान से रागपादि-चिलमल निचिपूर्वक स्वच्छ निर्मल) हो कर ईश्वरमणिधान की योग्यता घाला जाता है उन साधनों का प्रतिपादन करते हैं- सू० मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्याऽ- पुण्यविषयाणां भावनातः चित्तप्रसादनम् ॥ ३३ ॥ भाषा-( सुख दुःख पुण्याऽपण्यविषयाणाम् ) मसी, दुःसी, पुण्यात्मा पापात्मा पुरुषों विपयक, यथाक्रम से ( मंत्रीकरुणामुदितांपेक्षाणाम् ) मित्रता, दया, मुदिता-हर्ष, उपेक्षा-उदासीनता, इन घों की (भावनातः) भावना के अनुष्ठान से (चित्तप्रसादनम् ) चित्त की प्रसन्नता होती है, वा चित्त को प्रसन्न निर्मल करें। अर्थात्-जो पुरुप सुखसम्भोगसम्पन्न (मुखी ) है उन में मंत्री भावना (१) नदीप शिखाप दृष्टान्त में क्षणियात्व नहीं है किन्तु सूक्ष्म अनेक क्षणों का भान न होने से मौद्धों को क्षणिकाय का भ्रम हे यह सारय के प्रथमाध्यायस्प ३७ सूत्र का अर्थ है। (२) स्वामीजी निर्मित बौद्धदर्शनसमीक्षा में स्पष्ट है । अर्थात् यदि चित्त क्षणिक होने से आयन्त मिन २ गाना जायगा तो नीलपीतादि विलक्षण ज्ञानप्रवाह याला चित्त बद्ध ओ नीलज्ञानादि रहित विशुद्धज्ञानप्रवाह याला "चित मुक्त होने से मन्धमोक्ष का एक आनय नहीं होगा । एय भावना के अनुष्ठान करनेवाला वित्त अन्य ओ भावनापरिपाकजन्य कैवल्य फल का गोका मयं यह भी युक्ति विरद्ध बौद्धों को मानना पड़ेगा, अतः सर्वथा ही क्षणिकवाद असक्त है । --- समाधिपादः। करे (१) औ जो पुरुष दुःखित हैं उन पर कृपा की भावना करे, औ जो पुण्यशील प्राणी है उन में मुदिता.की भावना करे अर्थात् उन को देख कर आनन्द को प्राप्त होय, औ जो पुरुप पापाचार हैं उन में उपेक्षा नाम उदा- सीनता की भावना करे अर्थात्-उन के सङ्ग उदासीनभाव से वर्ताव करे । इस प्रकार इन चारों भावना के अनुष्ठान से शक्ल धर्म (२) की उत्पत्ति होती है औ तदनन्तर चित्त प्रसन्न हो जाता है, औ फिर प्रसन्न हुआ चित्त एकाग्ररूप स्थितिपद का लाम कर लेता है। भाव यह है कि-राग, द्वेप, ईर्ष्या, परापकारचिकीर्पा, असूया, अमर्प संज्ञक राजसतामसरूप पद धर्म चित्त को विक्षिप्त कर कलप (मलिन ) कर देते हैं, अतः यह पट् चित्तमल कहे जाते हैं, इन पद्मकार के चित्तमलों के होने. से चित्त में पट्मकार का कालुप्य उत्पन्न होता है यथा--रागकालप्य, देपालप्य, ईर्ष्याकालुप्य, परापकारचिकपिाकीलुप्य, असूयाकालप्य, अमर्पकालुप्प । रागकालुष्य-स्नेहपूर्वक अनुभव किये हुये सुख से अनन्तर जो ( यह मुख मुझ को सर्वदा ही माप्त होय ) इत्याकार राजस वृत्तिविशेष वह रागकां- लुष्य है क्योंकि यह राग निखिलसखसाधनविषयों की प्राप्ति के न होने से चित्त को विक्षिप्त कर कलुपित कर देता है। द्वेषकालुष्य-दुःख भोग से अनन्तर दुःख देने वाले विषयक अनिष्ट- चिन्तन पूर्वक जो (यह दुःखपद नष्ट होय औ मुझ को दःख न होय) इत्या कार तामस दृत्तिविशेष वह द्वेपकालप्य कहा जाता है क्योंकि यह ट्रेप दुःख हेतु सिंह व्यानादि के अभाव न होने से सर्वदा चित्त को विक्षिप्त कर कलुपित कर देता है। (१) अर्थात्- सुखीप्राणियों के सम गिनभार से वर्ताव करे, गैनीनाम द्वेपाऽभाव का औ वह वा है। मनुभाष्यकार मेघातिथि मा तो यह कहते हैं कि मैत्री से द्वेषाऽमाव का हौ ग्रहण करना कुछ स्नेह का नहीं क्योंकि म्नेह भी एक तरह का राग होने से बन्धन ही है। एर मुदिता नाम भी शोक की निवृत्ति का है कुछ हर्प का नहीं क्योंकि हर्ष भी एकप्रकार राग का हेतु होने से हेय ही है । (२) यथा वेदाध्ययनादिनित्यकर्म से जन्य जो पापलेश से रहित धर्म वह शुफ कहा जाता है तैसे मैत्री थादि भावना से जन्य नो धर्म वह भी शुरू हो जानना क्यों कि इन दोनों में पाप का देश न होने से यह दोनों शबसालिक हैं, भी जो धर्म यज्ञादि से उत्पन्न होता है वह कृष्ण शुक्ल कहा जाता है क्योंकि उसमें हिंसादिनन्यं पाप का पेश रहने से यह शुद्भुमारित्रक नहीं है, यह भार है ! १२ पातञ्जलदर्शभप्रकाशे- ईर्ष्याकालुष्य-अन्य पुरुष के गुणाधिश्य वा सम्पचिआधिक्य देख कर जो चित्त में क्षोम (एक प्रकार की जलन उत्पन्न हो जानी) वह ईष्याकालुष्य कहा जाता है क्योंकि यह भी चित्त को विक्षिप्त कर कपित कर देती है । परापकारचिकीर्षाकालुण्य अन्य किसी के अपकार (घरायी).करने की इच्छा, यह भी चित्त को बिहले कर कलर्पित कर देती है । असूयाकालुष्य=किसी के श्लाघनीयगुणों में दोप का आरोप करना, जैसे किसी व्रतआचारशील को दम्भी पामण्डी जानना । अमर्यकालुष्य-कुत्सितवचनश्रवणपूर्वक अपने अपमान से अनन्तर •जो उस को न सह्य कर बदला लेने की चेष्टा वह अमर्पकालुप्य कहा जाता है। यह छै प्रकार के कालुप्य ही पुरुषों के चित्त में विद्यमान हुये चित्त को मलिन कर विक्षिप्त कर देते है, अतः सुतरां इन के रहते चित्त प्रसन्न औ एकाग्र होना दुःसाध्य है। मैत्री आदि भावना द्वारा इन चितमलों की निवृत्ति ही.योगेच्छु को प्रथम करणीय है जिस से निर्मल हुआ चित्त एकाग्रता की योग्यतावाला हो. जाय यह सूत्रकार का आशय है । तहां (१) सुखी पुरुषों के सङ्ग मित्रभाव का वर्ताव करने से राग धौ ईया कालुप्य की निवृत्ति करे, अर्थात्-जप किसी को सुखी देखे वव उस के सङ्ग मैत्री कर यही समझे कि यह सब सुख मेरे मित्र को है तो हमें ही हैं, वच जैसे अपने राज्य के न होने पर भी पुत्र के राज्यलाभ को अपना जान उस राज्य में राग नित्त हो जाता है तैसे मित्र के मुख को भी अपना मुख मान कर अवश्य ही उस में राग निवृत्त हो जायगा, एवं जप परकीय सुख को अपना ही समझै गा तो उस के ऐश्वर्य को देख कर ,चित्त में जलन न होने से ईयां भी निहत्त हो जायगी। एवं दुखित पुरुषों पर कृपा करने से द्वेप औ परापकारचिकीर्पारूप कालप्य की निवृत्ति करे, अर्थात्-जब किसी दुःखित पुरुष को देखे तो अपने चित्त में (इस (२) विचारे को बड़ा कष्ट होता होगा क्योंकि जब हमें भी कोई संकद (१) इदानी निस प्रकार इन भावना के अनुष्टान से रागादिकालुष्य की निवृत्ति होती है यह प्रकार उपपादन करते हैं (तहा) इत्यादि से । (२) इदानी "प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा, आत्मौपम्येन सर्वत्र दया कुर्वन्ति माधव" इस युद्ध आवय के अनुसार कृपा का अर्थ करते हैं (इस विचारे) इत्यादि से । मेसे अपने प्राण हमें गरम प्रिय हैं तैसे अन्य प्राणियों को भी यह प्रिय ही हैं, इस विधार से साधुजन अपने प्राणों के तुल्य सब उपर दया करते हैं, यह इम का अर्थ है।
. माता समाधिपादः। बान पड़ता है तो किसना दःख भोगना पड़ता है वह हमी जानते हैं ) यह विचार कर उस के दुःख दूर करने की चेष्टा करे कुछ यह मत समझे कि हमें इस के दुःख वा सुख से क्या प्रयोजन है, जब इस प्रकार करुणामयी भावना चित्त में उत्पन्न हो जाय गी तो अपने तुल्प सब को ही मुख की चाइना से वैरी का अभाव होने से वेप औ पराऽपकारचिकी निवृत्त हो जाय गी। एव जय पुण्यात्मा जनों के देखे तो चित्त में ( अहोभाग्य इस के पिता के किं जिन्हों न एतादृश भाग्यशाली कुलप्रदीप सत्पुरुप की उत्पत्ति हुयी है औ धन्य इस को जा तन-मन धन से यह पुण्यकामों में प्रवृत्त हुआ है ) इस मकार आनन्द को मान होय, जय इस प्रकार मुदिताभावना चित्त में उत्पन होगी तो असूयारूप चित्त की पल भी अवश्य निवृत्त हो जायगी। एवं पापी पुरुषों की देखे तो अपने चित्त में ( यह हम को कुत्सित वचन ही वोलें वा अपमान ही करें हमें इन की कुटिलता से वा इन का बदला- लने का प्रयोजन ही क्या जो चाहे सो करें अपने कर्तव्य का फल यह आप- ही भोगेंगे ) इस प्रकार उन पर उपेक्षा की भावना करे, इस उपेक्षाभावना से अमर्प रूप चित्तमल की निवृत्ति हो जाती है, इस प्रकार जब इन चारों भावना के अनुष्ठान से यह सब कालुप्य निवृत्त हो जाते है तब वर्षाऋतु से अनन्तर जल- यत् चित्त भी अवश्य निर्मल हो जाता है, अतः प्रथम इन चारों भावना के अनुष्ठान से चित्तप्रसादन ( स्वचित्त ) करे यह फलिव हुआ ॥ ३३ ॥ इदानी प्रसन्न हुया चित्त जिन उपायों द्वारा स्थितिकप एकाग्रता का लाभ करता है यह उपाय प्रतिपादन करते है- सू० प्रछर्दनविधारणायां वा प्राणस्य ।। ३४ ॥ भाषा-(वा.) अथवा (प्राणस्य ) कोस्थित माणसज्जक वायु का (प्रर्दनविधारणाभ्याम् ) नासिका द्वारा रेचन-धारण कर, चित्त की स्थि- ति का सम्पादनकरे (१)। अर्थात्-योगशास्त्रोक्त प्रयत्नविशेप से ( २) कोष्ठस्थित (कोग-उदर (१) यहा पर (मनस स्थिति सम्पादयेत्) इस भाष्य अनुसार उत्तर सूत्र में से (मनस ) औ स्थितिनिधिनी' इस पद के एकदेश स्थिति पद का गायर्पण कर (सपादयेत्) इस पद का अस्याहार कर लेना, इसी भाशयसे कहते हैं-(चित्त की स्थिति का सपादन करे) इति। (२) यह सब द्वितीयपाद के ५९, ५०, ५१, इन सूत्रों के व्याख्यान में स्पष्ट . कहा जायगा।
1 . . . पातखलदर्शनप्रकाश- में होने वाले ) वायु पर अपने नासिकापुट द्वारा शेने.२ रेचन ( बाहर निका- सना ) प्रर्दन शब्द का अर्थ है, उस रेचित वायु का (पाहर निकसे हुये वायु का) जो फिर सहसा भीतर प्रवेश न कर बाहर. ही स्थापन करणा वह विधारण कहा जाता है । एवं च मर्छदनपद से रेचक प्राणायाम औ विधारण- पद से कुम्भकमाणायाम का ग्रहण हुया (१)। तथा च यह अर्थ हया कि रेचक कुम्भकमाणायाम द्वारा मन की स्थिति का संपादन करे। यहां पर सूत्र में जो या शब्द है वह यक्ष्यमाण उपायों के सम्म इस प्रा- णायाम रूप उपाय का विकल्पयोधक है, अर्थात् वक्ष्यमाण उपायों से चिच की स्थिति का संपादन करे ना प्राणायाम से करे इस अर्थ का वोधक वा शब्द है कुछ यह मत जानना कि मैत्रीमादिभावना से चिंच असम करे वा माणा- पाम से करे। अत एव भाष्यकारों ने पूर्वसूत्र में ( तत्व चिंचं प्रसीदति) इस भाष्य से मैत्रीमादिगावना का चित्तप्रसन्नता का कारण यो " ताभ्यां या मनसा स्थिति संपादयेत् (२) इस प्रकृतसूतस्थभाप्य से प्राणायाम को स्थिति का साधन कहा है। एवं च प्रथम मैगी आदि भावना के अनुष्ठान से चित्त प्रसन्न करे फिर- मसाप्त हुये चित्त की स्थिति चाहे प्राणायाम से वा अन्य वक्ष्यमाण उपायों से करे, कुछ आग्रह नहीं है कि प्राणयाग से ही स्थिति को यह फलित हुआ। प्रसन्न चित्त हुये विना स्थिति का होगा असम्भव है अतः मैत्री आदि- भावना का अनुष्ठान साधन भी प्राणायामादि वक्ष्यमाण उपाय साध्य , यह सूत्र-भाष्यकार का आशय है। अत एवं भाष्यकारों ने पूर्वसूत्र में "प्रसन्नमेकाग्रे स्थितिपदं लभते" (३) (१) कोई यह कहने हैं कि-घायु के भीतर पूरण किये विना विधारणसंज्ञया युम्भक का होना भतभा है अत. कुम्भकपाधक विधारण पद से पूरा का भी प्रहण पार देना, तथा च रेचक-पूरक-कुम्भका प्राणायाग से चित्त की स्थिति का संपादन करे यह सूत्रार्थ हुया । यस्तुतः तो जैसे भीतर यायु यो पूर कर रोकाना कुम्भक है तेसे याथु को बाहर गियाप्त पार रोकना भी कुम्भका ही है, अतः पूरया के बिना ही कुम्भक होने से पूरक प्राण का कुछ प्रयोजन नहीं, यह सब द्वितीयपाद में ४९ इन्यादि सूत्रोंमें स्पष्ट होगी। (१) ताभ्याग' मउदनविधारणद्वारा मन को स्थिति का सपादन करे। (३) मैत्री आदि मे प्रमान हुया चिन एकाग हो कर स्थितिपद का राम कर देता है।
. . समाधिपादः। इस वाक्य से प्रसन्न हुये चित्त को स्थिति पद के लाभ वाला कहा है भगवान् ने भी अर्जुन के प्रति "प्रसन्नचेतसो शाश बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ".(१) इस वाक्य से प्रसन्न हुये चित्त को स्थिति की योग्यता वाला कहा है। तथा च मैत्री आदि भावना का समञ्चय ( २) भी स्थितिसाधन माणा- याम प्रभृति का विकल्प जानना। एवं च जो विज्ञानभिक्षु ने यह लिखा है कि ( मैत्रीमादि भावना से वा पाणायाम से चित्त को प्रसन्न करे ) या असंगत हुया क्योंकि मैत्री भादि भावना प्रसमता का कारण हैं औ प्राणायाम स्थिति का कारण है इस मकार कार्य भेद होने से विकल्प का यहां संभव नहीं है (३)। यद्यपि प्राणनिरोध से चित्त की स्थिरता का होना असंभव है क्योंकि चित्त औ माण यह दोनों भिन हैं तथापि " ने वीजे चित्तक्षस्य प्राणस्पन्द- नवासने, एकस्मिश्च तयोः क्षीणे क्षिम छे,अपि नश्यतः"(१) इत्यादि वशिष्ठपाक्य से वासनानिवृत्ति द्वारा माणनिरोध को भी चित स्थिति का उपाय जान लेना। भाव यह है कि-यथा (५) घटीयन्त्र में सूक्ष्म सूची की अश्य- मान मूक्ष्मक्रिया अधोवर्तमान निरन्तरभ्रमणशील यन्त्र की स्थूळक्रिया के अधीन है तथा शरीररूप यन्त्र में भी अदृश्यमान सूक्ष्म मानसी क्रिया निरन्तर- भ्रमणशील प्राणवायु की क्रिया के अधीन है, तथा च जैसे अधोवर्तमान यन्म की क्रिया का किसी प्रकार नित्ति करने से सूची की क्रिया निवृत्त हो जाती है तैसे यहां भी माण की क्रिया निवृत्त होने से मन की क्रिया निवृत्त हो जाती है, अतः सुतरां प्राणनिरोध से मन का निरोध हो सकता है ॥ १४ ॥ (१) प्रसन्नचित्तवाके योगी की शीघ्र ही बुद्धि स्थिर हो नाती है यह कृष्णयाक्प का अर्थ है । अ.२ लो..। (२) समुच्चय अर्थात् चित्त प्रसन्नता के अर्थ मन्त्री गादि भायना का तो अवश्य ही मानुष्ठान करे, स्थिति चाहे किसी उपाय से करे । (३) जहाँ पर एक कार्य के दो साधन होते हैं यहाँ पर ही विकल्प माना माता है भन्यत्र नहीं, यह भाव है। (४) चित्तरूप वृक्ष के दो दौम हैं एक प्राणस्पन्द अर्थात् प्राणों की निरन्तर क्रिया भो एक वासना, इन दोनों में से एक के नाश से दूसरे का नाश भी शीघ्र ही होजाता . है यह याशिष्ठवाक्य का अर्थ है। एवं न मानभूत प्राणगति के निरोध से मानना निवृत्तिद्वारा चित्त की स्थिति की हीना कुछ असम्भव नहीं, यह तत्व है। (१) यपि योगविषयक योगी के अनुभव के बिना युक्ति की अपेक्षा नहीं है तयापि दृढ़ता के लिये युक्ति कहते हैं-(पथा) इत्यादि से। . .
पातजलदर्शनमकायो- इदानीं जिन स्थिति के उपायों के संग प्राणायाम का विकल्प बोध किया है उन उपायों का प्रतिपादन करते है- सू० विषयवती वा प्रत्तिरुत्पन्नां मनस: स्थिति- निवन्धनी ॥ ३५॥ भाषा-(वा) अथवा ( विषयवती ) गन्धादि विषयों का साक्षात्कार करने वाली (प्रवृत्ति ) योगी के चित्त की वृत्ति ( उत्पन्ना) उत्पन्न हुयी (मनसः स्थितिनिबन्धनी ) मन की स्थिति का कारण है। अर्थात् गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द संज्ञक पचविपयों के साक्षात्कार करने वाली चित्तवृत्तियां उत्पन्न हुयीं भी चिच को स्थित कर देती है। भाव यह है कि-गन्धादि पर विपय लौकिक दिव्य भेद से दो प्रकार को हैं, तहा पृथिवी, जल, तेन, वाय, आकाश सज्ञक पच स्थूलभूतों में दृश्यमान 'जो गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द है यह पाच लौकिक हैं क्योंकि इन्हों से लोकों को सुख दुःख मोहरूप भोग होता है, पचतन्मारों के कार्य सूक्ष्मभूतों में विद्यमान जो गन्धादि पंच सूक्ष्म विषय है वह दिव्य कहेजाते है क्योंकि वह देवताओं (को). के ही भोगोपयोगी होते है मनुष्यों को नही (१) इन पाचों दिव्पविपयों का जो उपायद्वारा परुप को साक्षात्कार हो जाना वह यहा विषयवतीप्रवृत्ति पद का वाच्य है, सो यह प्रति गन्यादिविपयों के भेद से पचप्रकार की है यथा--गन्धप्रवृत्ति, रसमवृत्ति, रूपप्रवृत्ति, रपर्शप्रवृत्ति, शब्दप्रति। गन्धप्रवृत्ति अपनी (२) नासिका के अग्नभाग में सयम (३) से 'चित्त को एकतान कर धारण (लगाने) से जो दिध्यगन्ध का साक्षात्कार होना वह गन्ध्रप्रवृत्ति है, इसी को दिव्यगन्धसविद् कहते है । रसप्रवृत्ति=जिता के अग्रभाग में संयमद्वारा चित्त को लगाने से जो (1) जैसे लोकिन गधादि में शा तधारमूढनामक तान धर्म हैं तैसे सूक्ष्मग धादि से नहीं है क्योंकि वह मुना मर ही है, अत इन का दिव्य कहा जाता है। गिरें इस विपय को सम्यम् प्रकार भागना होय वह सांख्यदर्शनप्रकाश के प्रथमाध्यायस्थ ६२ सूत्र के विवरण पर दृष्टिपात करें। (९) "नासिबारे धारयतोऽस्यया दिल्या धसाय सा गधप्रवृत्ति" इत्यादि भाष्य या पाद करते हुये प्रवृत्तियों का बनण कहते है (अपनी नासिका) इत्यादि नथ से । (१) एयस्तु विषयमा धारणाप्यागमगाधि करो को सपम कहा जाता है, यह तृतीपराद के ४ मूत्र में वर्णन पिया मायगा । .
समाधिपादः। ९५. . दिव्यरस का साक्षात्कार वह रसप्रवृत्ति कही जाती है, इसी को दिव्यरससं- विद् कहा जाता है। रूपप्रवृत्ति तालस्यान में चित्त का संयम करने से जो दिव्यरूप का साक्षात्कार वह रूपमति पद का वाच्य है, इसी कोही दिव्यरूपसंविद् कहते है। स्पर्शप्रवृत्ति-जिहा के मध्यभाग में चित्र का संयम करने से जो दिव्य स्पर्श का साक्षात्कार वह स्पर्शप्रवृत्ति का वाच्य है, इसी को ही दिव्यस्पर्श संविद् कहते हैं। शब्दप्रवृत्ति-जिहा के मध्य भाग में चित्त का सयम करने से जो शब्द का साक्षात्कार वह शब्दप्रवृत्ति हे, दिव्यशब्दसंविद भी इसी का नामान्तर है, यह पांच प्रकार की प्रवृत्तियां उत्पन्न हुयी चित्त को स्थितिविषयक बद्ध करदेती हैं। अर्थात्-इन प्रवृत्तियों के होने से निजरूप के साक्षात्कार में वा ईशर के साक्षात्कार में भी योगी को चित्त समर्थ होजाता है। एवं पुरुषों को जो यह संशय होता था कि (ईश्वरप्रणिधान से पुरुष का साक्षात्कार कैसे होगा) इस संशय को भी यह प्रवृत्तियां दूर कर देती हैं, अत एव समाधिपज्ञा में यह द्वारीभृत है अर्थात्-इन प्रवृत्तियों के होने से समाधि भी अनायास से सिद्ध हो जाती है । इसी प्रकार चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, मणि, प्रदीप, रत्नप्रभादि में चित्त के संयम से जो इन सब का साक्षात्कार वह भी विपयवती मवृत्तिही जाननी । यद्यपि इन सा प्रवृत्तियों को केवल्य का उपयोगी न होन से इस शास्त्र में इन प्रवृत्तियों का निम्रपण करना अनुपयुक्त है तथापि जैसे अनात्मपदार्थ विपयक धारना करने से अनात्मनस्तु का साक्षात्कार हो जाता है तैसे आत्म- वस्तुविषयक धारणा करने से आत्मा का भी साक्षात्कार होना कुछ असम्भव नहीं है, इस प्रकार विश्वासोत्पादनाऽर्थ यह निरपण कियी गयीं है यह जानना। यद्यपि यक्तिपूर्वक शास्त्र तथा आचार्यों के उपदशे द्वारा प्रतिपादन किया औ जाना हुया पदार्थ यथार्थ ही होता है कुछ मिथ्या नहीं क्योंकि शास्त्रा- दिकों की यथार्थ अर्थ के प्रतिपादन करने में ही सामर्थ्य है कुछ मिथ्या अर्थ के प्रतिपादन में नहीं, अतः शास्रोपदिष्ट अर्थ में संशय का अवकाश न होने से विश्वासोत्पादन की कुछ अपेक्षा नही ह तथापि जब तक जिज्ञासु को शास्त्र- प्रतिपादित अयों में में किसी एक पदार्य का प्रत्यक्ष नहीं होगा तब तक उस को कैवल्यपर्यन्त निविल सूक्ष्मरिषयों में हृदविश्वास नहीं होगा क्योंकि उस को किसी एका अर्थ का प्रत्यक्ष न होने से सर पदार्थ परोक्ष ही प्रतीत हो रहे ६। अतः शाखादि उपदिष्ट.भर्य विषयक हप्ता के अर्थ भी संशयनिवारणार्थ . पातजलदर्शनकाशे- किसी एक देश का प्रत्यक्ष अवश्य कर्तव्य है, जब फिर शास्त्रादि उपदिष्ट अर्थ के एक देश का जिज्ञासु को प्रत्यक्ष हो जाता है तब कैवल्यपर्यन्त जितने सूक्ष्म- विपय हैं उन सब में उस का श्रद्धापूर्वक विश्वास हो जाता है, इसी लिये इन प्रतियों का निरूपण किया गया है (१)। इन पूर्वोक्त प्रतियों में से किसी एक प्रवृत्ति के लाभ से तिसतिस शास्त्रोक्त अर्थ में वशीकारता (स्वाधीनता) के होने से तिसरे शास्त्रोक्तअर्थ के मत्यक्ष करने में पुरुप की सहज ही शक्ति हो जाती है औ शास्त्रोक्त अर्थ में श्रद्धा का आधिक्य होने से श्रद्धा-वीर्य स्मृति समाधियों का लाभ भी योगी को निर्विघ्न हो जाता है। - (१) यहां पर याचस्पतिगिन ने "एत्तचागगा प्रत्येतव्ये न युक्तितः" यह लिखा है, इस या अर्थ यह है कि यह सब उपदेश शास्त्रसेही निश्चय करने योग्य हैं कुछ युक्ति से नहीं । भाष इस का यह है कि यह सर्वाऽनुभवसिद्ध है कि यदि इन्द्रिय के साथ चित्त का संमन्ध न होय तो चाहे इन्द्रिय के साथ विषय का संसर्ग बना भी हो ओ विपय स्थूळ भी हो तथापि विषय का प्रत्यक्ष नहीं होता, गी जिस समय इन्द्रिय के - सङ्ग सम्यक- प्रकार चित्त का संबन्ध होता है तब वहा तक उस इन्द्रिय में साध्य हो जाता है कि सूक्ष्म पदार्थ को भी वह विषय कर लेता है, एव च नासिका के अग्रभाग ( जहा प्रा- णेन्द्रिय का निवास है ) में चित्त को एकतान लगाने से दिव्यगन्ध वा सूक्ष्मगन्ध का साक्षात्कार होना कुछ अनुभव विरद्ध नहीं, एय निद्रा के थामभाग (जहारसनाइन्द्रिय- फा निवास है ) में चित्त को एकातान चगाने से दिव्यरस वा सूक्ष्मरस का भी. साक्षा- रकार होगा कुछ प्रतीतिविरुव नहीं हैं, परन्तु तालु में संयम करने से बो रूप का साक्षा- कार, जो निवामप्प में संयम करने से जो स्पर्श का साक्षात्कार, औ जिद्धा भूक में संया फरने से भो शब्द का साक्षात्कार होता है इसमें कोई युक्ति वा अनुभव काग नहीं देता १, भतः इन स्थानों में पुक्ति का आनय न के कर केवक श्रद्धा के बल से .शास्त्रोक्त राति का ही थापण कर इन में विश्वास करे, मजा यह हम कैसे कह सकते हैं कि ताररमान से उपमाहक नैनेन्द्रिय का, या निहागप्य से स्पर्शप्राहकारयगिन्द्रिय का, निद्वामण से शप्दमाहक प्रोजेन्द्रिय का कुछ बन्ध है या नहीं, न जाने इन का परस्पर ऐसा कुछ संपन्ध है कि जिस से तालुस्थान में सपा से दिव्यरूप का भी निता के माप शो ममभाग में संपग से स्पर्श औ शब्द का साक्षात्यार हो जाता है। एये च शान को यायन पर दी इन विधाम कर उक्त स्थान में चित्त या संयम करो, फिर इन विषयों का साक्षात्कार हो शाय गा तो पाप ही सन्देह सब दूर घा जापगा, यह जानो।
. समाधिपादः। अत: विश्वास के लिये औचित की स्थिति के लिये पहिले इन वृत्तियों का संपादन करे यह भार है ॥३५॥ इदानी अन्य भी स्थिति का उपाय कहते है । सू० विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६॥ भापा-(वा) अथवा (विशोका) शोक-दुःख से शून्य (ज्योतिष्मती) ज्योति- प्पतीनामक प्रवृत्ति उत्पन्न हुयी भी चित्त को स्थिर कर देती है (१)। अर्थात्-यथा पूर्वोक्त विपयवती पत्तियां उत्पन्न हयी चित्त को स्थिर कर देती है तैसे शोकरहित ज्योतिप्मतीसंज्ञक मत्ति भी उत्पन्न हुयी चिच को स्थित कर देती है। हृदयपद्म में चिन का संयम करने से जो चित्त का साक्षात्कार एवं मन के कारणभूत अस्मिता ( अहङ्कार ) में संयम करने से जो अहङ्कार का साक्षात्कार इन दोनों प्रवृत्तियों का नाम विशोका ज्योतिष्मती है। भाव यह है कि नाभि के उपर (२) दश अङ्गुल परिमित देश में अदल रक्त यर्णवाला एक पंचछिद्रयुक्त कमल है, इसी का नाम हृदयपद्म है, यद्यपि जस- कमल का मख नीचे की ओर आ नलिका ऊपर की ओर होने से वह पद्म अधो मुख तथा संकुचित है तथापि प्रथम रेचक प्राणायाम के अभ्यास द्वारा वह उ- ईमुख औ प्रफुल्लित किया जाता है, तिस ऊर्द्धमुख प्रफलित पदम के मध्य में सूर्यमण्डल तथा अकार औजाग्रतस्थान है, तिसके ऊपर चन्द्रमण्डल तथा उकार औ स्वमस्थान है, तिस क उपर पन्हिमण्डल तथा मकार औ स्वम- स्थान है, तिस के उपर आकाशस्वरूप ब्रह्मनाद तथा अर्बमात 'तुरीयस्थान है, उक्त हृदयकमल की जो कणिका ( बीजकोश ) है विस में विद्यमान ऊर्द्ध- मुखी एक ब्रह्मनाडी है, इसी को ही सप्मणानाडी कहते हैं, यह नाटी सूर्य्यादि मण्डल के वीच से होकर एकबार मूर्खपर्यन्त जा पहची है, अत एव यह नाडी चाय के सूर्यआदि मण्डलों से भी ओतप्रोत (निरन्तरसंबद्ध ) है। यह नाडी ही चित्त का निवास स्थान है, जय योगी अपने चित्त को उक्त मुप्पणानायक नाडी में संयम द्वारा एकतान कर देता है तब वह सात्विक- (१) यहापर पूर्वसूत्र से (प्रवृत्तिरुपना गनमः स्थितिनिबन्धनी) इतने वाक्य का सबग्धकर अर्थ करना, इसी आशय से कहते हैं ( प्रवृत्ति उत्पन्न हुया चित्त को स्थिर कर देती है ) इति । (२) "हृदयपुण्डरीके धारयतो या बुद्धिसविद्" इत्यादि भाष्य में अर्थ को स्पष्ट करते हैं । (नाभि के ऊपर" यादि अथ से । - पातञ्जलदर्शनकाशे ज्योतिास स्वरूप आकाशतुल्य भास्वर हुआ चित्त ( १ ) कमी सूर्य कभी चन्द्र कभी नक्षत्र कभी मणिप्रभादिरूप आकार से भान होता है, फिर उसचित्त का साक्षात्कार हो जाता है, सो यह नो ज्योतिस्वरूप चित्त का साक्षात्कार वह ज्योतिष्मती-प्रवृत्निपद का वाच्य दै, इस में पूर्वोक्त सूर्य्यादि अनेक विषय रहते हैं इस से यह भी विपयवती ही है (२) एव अस्मिता में समापन्न (३) हुआ चित्त जयंनिस्तरङ्ग समुद्र के तुल्य शान्त औ अनन्त हो कर सत्त्वप्रधान अहङ्कार का स्वरूप हो जाता है तब उस चित्त की दशा को अस्मितामानज्योतिष्मती कहते हैं। इसी प्रकार ही पंचशिखाचार्य ने अस्मितासमापत्ति का स्वरूप कहा है (४) इन सब में से प्रथमनिरूपित जो चित्तसविद् (चित्तसाक्षात्काररूप प्रवृत्ति) इस का नाम विपयवतीज्योतिप्मतीप्रष्टत्ति है औ द्वितीय नो अस्मितासरूप चित्त की प्रवृत्ति वह अस्मितामात्रज्योतिष्मती कही जाती है, औ विशोका इन दोनों का ही विशेषण है क्योंकि शोक के कारण भूत रजोगुण का इन दोनों में लेश नहीं है। इन दोनों प्रत्तियों के उत्पन्न होने से भी योगी का चित्त ईश्वरविप- यक स्थितिपद की योग्यता वाला हो जाता है ॥ ३६ ॥ उपायान्तर कहते है- सू० वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ ३७॥ भाषा-(वा) अथव (वीतरागविषयं नित्तराग-रागरहित योगि- (१) "बुद्धिसान हि भास्वरमाकाशवल्पम्" इत्यादि भाष्य का यह अनुवाद है । इस भाष्य में जो बुद्धिसज्ञक चित्त को आकाशतुल्य कहा है सो अनेक विषयों में चित्त. गान करता है इस आशय से कहा है कुछ वस्तुगत्या आवाशतुल्य कहने से इस यो व्यापय गत जानना, अतएव कपिल मुनि न "हेतुमदायगव्यापि" इसादि अ० १ स् १२४ से बुद्धि आदि को परिछिन्न यहा है, एवच विज्ञानभिक्षु ने नो चित्त यो व्यापक माना है यह प्रमाद ही है। (२) सत्वगुणप्रपात होने से यह प्रवृत्ति र ऐगुण से रहित है, अत विशोरा भी इसी मा ही नाम है। (३) अस्मिता नाम अहद्वार का ?, धारणापूर्वर स्थिरता का नाम समापन है। (2) "तगणुपातमागानमनुविद्याऽरमारोव तापमानीते" यह पञ्चशिखाचार्य या ममा १, तिम अणुमान (दुरबिंगम) मुहकार वा धारणापूर्वक चितन कर, अप रूप माने, यर इस या अर्थ है।
समाधिरादः। गणों के चित्तविषयक संयम से एकतान लगा हुया (चितम्) चित्त भी स्थिति का लाभ कर लेता है। भाव यह है कि-जिन महात्माओं का चित्त संसार की वासना से रञ्जित नहीं है एवंभूत जो शुरुदेव, कृष्णद्वैपायन, दत्तात्रेय, सनकादिकप्रभृति योगिगण है उन के चित्त को ही आलम्बन कर यदि संयम द्वारा उस चित्त • का एकतान ध्यान करे वो भी चित्त तदाकार हुया स्थिरता को प्राप्त हो (१) जावा है ॥ ३७॥ इसी के सदृश अन्य उपाय कहते हैं- सू० स्वप्ननिद्राज्ञानाऽऽलम्बनं वा ॥३८॥ भाषा-(वा) अथवा (स्वमनिद्राज्ञानाऽऽलम्पनं) स्वम वा निद्रा समय में ज्ञान का विपय जो पदार्थ है उन पदार्थों के आलम्पन वाला भी चित्त स्थिर हो जाता है। लता है, एतथा पूर्वोक्तगोव्यक्ति के देख यहां सम से सात्तूिप परिणामविशेष ( गईया का ज्ञान ) वह भी अर्थान्प्रयुक्त होता है, इन तीनों स्थानों में गो शब्द गो अर्थ गो ज्ञान इन तीनों भिन्न पदार्थों का एकसा ही भान होता है, इसी का नाम शब्दार्थ ज्ञानविकल्प है क्योंकि यह वस्त से शून्य है, को शब्द ज्ञानाऽनुपाती है। भाव यह है कि-यद्यपि (१) गो शब्द कण्ठस्थित तथा उदात्त अनुदात्त मन्द उचनादि धर्मवाला है, औ गो शब्दका अर्थ शृङ्गादिविशिष्टव्यक्ति भूमिस्थित तथा जडत्व मूर्तचादिरूप धर्म वाली है, एवं गो शब्दका ज्ञान चित्त स्थित तथा प्रकाश अमूर्तत्वादि धर्म शील है, अत: इन तीनों का भिन्न ही पन्या है अर्थात् तीनों यह भिन्न भिन्न है (२), तथापि सर्वत्र इन का भान पररपर सकीर्ण रूप से अभिन्न ही प्रतीत होता है, अतः यह विकल्पात्मक है। अर्थात्-(३) यदि कोई किसी से यह कहै कि आप 'यह गौ है। इस का उच्चारण करिये तो वह अवश्य कहै गा कि (यह गौ है). भो फिर यदि गोशाला में स्थित गोशब्द के अर्थभूत व्यक्ति की तरफ अंगलि कर पृछे कि यह क्या है तब भी (यह गौ है) एसे ही वह कहै गा, एवं यदि उस से यह (1) इस ज्ञान वो विकल्पात्मक मिद करने के लिये शब्द-अर्थ ज्ञन या गद यधनपूर्वक अभेद प्रदर्शन करते हैं-(यद्यपि) इत्यादि प्रय से। (२) यद्यपि से के वर यहा तक "निमभ्यगानाचाऽन्ये शब्दधर्मा अ येऽअर्थधर्मा अन्ये विज्ञानधर्मा इत्येतेषा विभक्त पथा" इस भाष्य का अनुवाद है। (३) परस्पर सङ्कीर्णता को साष्ट करते हैं (अर्थात्) इसादि से । .
समा . है, तहां प्रथम दो पत्ति में यथार्थ वस्तु का ही भान होता है अयथार्य ति के हैं, इन अर्थात्- (१) जितने गो-घट-पट आदि शब्द हैं कहने है एक२ पर के सद्ग नियमित संपन्न है इसी का नाम शब्द-संकेत सविरच जिस पुरुष को यह ज्ञात नहीं होता कि 'गाय' पद का किस स, नियतसंबन्ध है औ ' लायो' पद का निर्थ के सङ्ग नियतसंबन्ध है उस पुरुप को ( गाय लायो ) इस शब्द के मण से कुछ भी वोध नही होता है, जो जिस पुरुप को यह ज्ञात है कि गाय शब्द का शृङ्गादिविशिष्ट व्यक्तिविशेष के राग नियतसंबन्ध है औ लायो शब्द का असन्निहित पदार्थ को सन्निहित कर- दने रूप अर्थ के सज नियमितसंवन्ध हे वह पुरुप 'गायलार्यो' इस शब्द के श्रवण से अनन्तर ही गईआ को ले आता है क्योंकि इस को शब्दसदेत का ज्ञान है। एवं च शब्द सङ्केतका स्मरण ही आगम अनुमानादिकज्ञान का कारण है यह निर्विवाद है, सो यह शब्दसंकेत ( यह गौ है ! इत्यादि उपदेग द्वारा ही प्रथम ज्ञान होता है ऐसे नही, और यह गौ है । यह शब्द अंध ज्ञानों का इत. रेतराभास रूप होने से विकल्पात्मक है, तथा च.शब्दस तस्मृति से जो आग माभनुमानादि जान होता है वह सरतिसात्मक ही होता है । वहा सवितर्कसमापत्ति में जो योगी को पदार्थों का भान होता है यह शब्द सङ्केतस्मरणपूर्वक होने से विकल्पात्मक कहा जाता है, औ निवितर्कसमापत्ति में जो योगी को अर्थ का भान होता है वह शब्दसंकेतस्मरण के अभावपूर्वक होने से आगम अनुमानज्ञानविकल्प से शन्य केवल पदार्थमानविषयक होने से निर्विकल्पात्मक कहा जाता है। उस भावना में विपर्ययतान का लेग न होने से यह योगी परमत्या है, यह योगीका पर प्रत्यक्ष ही आगम औ अनुमान पापीग है क्योकि इस के यठ से दी अर्थ का प्रत्यय कर पोगी लोक उपदेश करते है। पद योगी का जो निवितरसमाधिजन्य नान यह अपने कार्यभूत पिकल्पान्मक आगम अनुमान से अनुपक्त ( संबद्ध न होने में प्रमाणान्तर से असही है। एताहा निश्निकसमापनि काइम अगिम सून दाग मनार लक्षण कहते हैं- सू० रमृतिपरिशुद्धो स्वरूपशुन्येवाऽर्थमाननि- र्भासा निर्वितर्का ॥ ४२ ॥ भापा-(स्मृतिपरिशी ) आगम अनुमानःान के बारभन मन्द मग (मय दिना' पद पर PATRI शको रष्ट परी है (दि।
है, तहां प्रथम दो पत्ति में यथार्थ वस्तु का ही भान होता है अयथार्थ ति के हैं, इन अर्थात्-(१) जितने गो-घट-पट आदि शब्द हैं कहढे है-. एक२ अ के सद्ग नियमित संबन्ध है इसी का नाम शब्द-संकेग सविरव जिस पुरुष को यह ज्ञात नहीं होता कि 'गाय' पद का किस ॥ सा नियतसंपन्ध है औ ' लायो ' पद का किस मार्ग के सङ्ग नियनसंपन्थ है उस पुरुप को (गाय लायो ) इस शब्द के मण से कुछ भी बोध नही होता है, जो जिस पुरुष को यह ज्ञात है कि गाय शब्द का शृङ्गादिविशिष्ट व्यक्तिविशेष के सग नियतसंबन्ध है औ लायो शब्द का असन्निहित पदार्थ को सन्निहित कर- दने रूप अर्थ के सजनियमितसंवन्ध हे वह पुरुप 'गायला?' इस शब्द के श्रवण से अनन्तरही गईआ को ले आता है क्योंकि इस को शब्दसईत का ज्ञान है। एवं च शब्दसङ्केतका स्मरण ही आगम अनुमानादिकज्ञान का कारण है यह निर्विवाद है, सो यह शब्दसंकेत ( यह गौ है ) इलादि उपदेश द्वारा ही मथम ज्ञात होता है ऐसे नहीं, और यह गौ है । यह शब्द अंथ ज्ञानों का इत रेतराभास रूप होने से विकल्पात्मक है, तथा च.शब्दसङ्केतस्मृति से जो आग माभनमानादि ज्ञान होता है वह सर पिल्लात्मक ही होता है । तहा सवितर्कसमापत्ति में जो योगी को पदार्थों का भान होता है वह शब्द सङ्केतस्मरणपूर्वक होने से विकल्पात्मक कहा जाता है, औ निवितर्कसमापत्ति ‘में जो योगी को अर्थ का भान होता वह शब्दसंकेतस्मरण के अभानपूर्वक होने से आगम अनुमानज्ञानविकल्प से शून्य केवल पदार्थमानविषयक होने से निर्विकल्पात्मक कहा जाता है। इस भावना में विपर्यायजान का लेश न होने से यह योगी का परप्रत्यक्ष है, यह योगीका पर प्रत्यक्ष ही आगम औ अनुमान का वीज है क्योंकि इसके वल से ही अर्थ का प्रत्यक्ष कर योगी लोक उपदेश करते है। यह योगी का जो निचितर्कसमाधिजन्य ज्ञान यह अपने कार्यभूत विकल्पात्मक आगम अनुमान से अनुपक्त (सबद्ध ) न होने से प्रमाणान्तर से असङ्कीर्ण है। एतादृश निर्वितर्कसमापत्ति का ही इस अग्निम सूत्र द्वारा सूत्रकार लक्षण कहते हैं- सू० स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवाऽर्थमात्रनि- र्भासा निर्वितर्का ॥४३॥ भाषा-(स्मृतिपरिशुद्धौ ) आगम-अनुमानज्ञान के कारणभूत शन्दसङ्केत (१) भाष्यस्थ "शब्दम तस्मृतिपरिशुद्धि" पद का अर्थ शब्दसङ्केतस्मरण का अभाव है, इसी को स्पष्ट करते हैं (अर्थात्) इत्यादि से । १४ प पातञ्जलदर्शनकाशे- रण के अपगम (निहत्त) होने से, जो ( अर्थमात्रनिर्भासा ) केवल ग्राह्यरूप में को ही प्रकाश करने वाली, अतएव (स्वरूपशुन्या) अपने ग्रहणाकार ज्ञा- सत्मक रूप से रहित चित्तचि, वह ( निर्वितर्का) निवितर्कसम्मज्ञात है। अर्थात्-(१)जैसे सवितर्कसम्मज्ञात में ग्राह्यपदार्थ तथा ग्रारापदार्थ का वाचक शब्द तथा ग्राह्यपदार्थ का ज्ञान यह तीन विषय चित्त में वर्तमान रहते हैं तैसे निर्वितर्कसम्मज्ञात में यह तीनों विषय चिद भामही रहते हैं, क्योंकि इस दशा में केवल ग्राह्य (ध्येय) वस्तु विपया ही चित्तस्थिर रहता है कुछ शब्द औ ज्ञान विषयक नही, अत एव इस को अर्थमात्रनिर्भासा कहते हैं क्योंकि इस समापत्ति में शब्द-अर्थ-बान रूपविकल्प का भान न हो कर केवल अर्थाऽऽकार से ही चित्त विद्यमान रहता है। यद्यपि इस अवस्था में अर्थाऽऽकार चिरावृत्ति भी रहती है परन्तु वह अपने रूप से भान नहीं होती है किन्तु ध्येयस्वररूप ही हो जाती है, अत एव (स्व. रूपशून्या इच ) यह ' इव' पद दिया है। शब्द औ ज्ञान का भान न होकर केवल अर्थ का ही भान क्यों होता है इस में हेतु प्रदर्शन के लिये "स्मृतिपरिशुद्धौ यह पद उपात्त किया है, अर्थात्-यदि विकल्पात्मक आगम-अनुगानशान के कारणभूत गन्द सङ्केत को स्मरण इस में रहता तो शब्द औ ज्ञान का भी भान होता परन्तु सो स्मरण इस दशा में रहता नही क्योंकि उस की इस दशा में परिशुद्धि (निवृत्ति) हो गयी है, अतः शब्द औ शान का भान न हो कर केवल स्थूल घटादि पदार्थों के स्वरूप का ही इस में भान होता है अन्य का नीं। यहां प्रसंग से यह भी जान लेना उचित है कि इन निर्वितर्कसमापति का विषयभूत जो स्थूल गोधयदि पदार्थ है वह न तो अणुसमुदाय रूप है औ न शान स्वरूप है औ न अणयों से उत्पन्न भिन्न कार्य स्वरूप हैं किन्तु (२) (१) सचितर्फ सम्प्रशांत से निर्वितर्क सम्प्रज्ञात में भेदबोधक नो (अर्थमात्रनिर्माता) यह पद है उस के अर्थ को सष्ट करने के लिये कहते हैं-"अर्थात्" इत्यादि । (२) जितने स्थूल घट आदि पदार्थ दृष्टिगोचर हो रहे हैं वह अनन्तपरमाणु ही मिले हुये हैं कुछ परमाणुओं का कार्य वा परिणाम घट नहीं है, अतः परमाणुपुञ्ज ही घट है, यह वैभाषिक सोमान्तिक संज्ञक बौद्ध का मत है, इसी को संघातवाद कहते हैं, यह सब घटादि विज्ञानखरूप हैं यह योगाचारसज्ञक विज्ञानवादि बौद्ध का मत है अगुर्षों से द्वयगुका दयगुरु से त्रसरेणु इलादि प्रकार से परमाणु आदि का पट कार्य है, यह नैयापिका मानते हैं इसी का नाम आरम्भवाद है । इन्ह तीनों से भिन्न परिणामबाद सालय योग का मत है, सोई कहते हैं "किन्तु" इत्यादि से।
. समाधिपादन 'यह एक घट है ' इस एकरद्धि को उत्पन्न करने वाले अणुयों काम 'परिणामविशेप है (१) भार यह है कि-पदि (२) अनेक मिलित परमाणुयों को ही घटस्वरूप माना जाय गा.वो ( यह एकघट है ) यह व्यवहार कैसे होगा क्योंकि अनेक परमाणुयों में एक व्यवहार का होना असम्भव है, एवं ( यह महान् स्थूलपट है ) इस ए परमाणुओं में महत्त्व औ स्थूलत्य की प्रतीति भी कैसे होगी क्योंकि परगणयों में महत्त्व तथा स्थलत्व का अभाव है। किञ्च-मुद्गरगहार द्वारा घट के फुट जाने पर जो कपाल तथा शर्करा (कांकड') प्रभृति मनात होते है सो भी चौद्ध मत में न होने चाहिये क्योंकि कुछ कपालादिकों ने तो घट का आरम्भ किया ही नही जिस से कपालादि- दिखायी दें किन्तु मिले हुये परमाण ही घट है तथा च इस मत में घट का फूटना क्या मानों परमाणयों का योग ही हो जाना है, एवं च वियुक्त हुये परमाणुयों को अतीन्द्रिय होने से घट फूटनेसे अनन्तर कुछ भी दिखायी देना न चाहिये औ कपालादि सभी को दिखायी देते हैं । अतः यह संघातवाद मत असगत है। एवं (३) यदि विज्ञानस्वरूप ही घट माना जाय गा तो (यह घट है) इस मकार बाह्य देश में घटादि पदार्थ मतीत न होने चाहिये क्योंकि यदि बुद्धि में घट मानते हों तो 'बुद्धि में घट है' ऐसी प्रतीति होनी उचित है औ यदि बुद्धिस्वरूप घट है तो (में घट हु) इस प्रकार मतीति होनी उचित है, सर्वथा ही भदन्त + मतानुयायी योगाचार का मत असंगत है । एवं (४) यदि धणुकादि क्रम से घटादि की उत्पत्ति मानी जायगी तो (१) "तस्या एकवुद्धथुपक्रमा गर्थात्माऽणुप्रचविशेषात्मा गनादिर्घटादिर्या लोक." इस भाष्य का यह अनुवाद है। (२) पूर्वोक्त भाष्य को अर्थ को स्पष्ट करते हये पहिले सघातवाद का खण्डन करते हैं 'यदि' इत्यादि से। (३) पूर्वोक्त प्रकार से ( एकबुद्धयुपक्रम ) इस भाष्य' के अर्थ कथनपूर्वक सघातपाद का निराकरण कर इदानों (अर्थात्मा) इम भाष्य के अनुसार विज्ञानवादी पर आक्षेप करते हैं (एघ यदि) इत्यादि से। ज्ञानवरूप घट नहीं है किन्तु बाह्यपदार्थ खरूप है यह (अर्थात्मा) इस भाष्य का अर्थ है । (*) भदन्त नाम २७ सत्ताइसदातवाले का है, बद्धदेव के सत्ताइस दात में इस से बुद्ध को भदन्त कहते हैं, विशेष बौद्धदर्शनसमीक्षा में देखो। (४) इदानीं ॥ अणुप्रचविशेषाऽऽत्मा " इस भाष्य के अनुसार नैयायिकमत पर आक्षेप करते हैं "एन यदि" इत्यादि से । अगुपों का स्थूलरूप परिणामघट है, यह इस भाष्य का अर्थ है। अतः पातञ्जलदर्शनकाशे- स्तका से भिन्न अन्य वस्तुओं से भी घट की उत्पत्ति माननी पड़ेगी क्योंकि थम अविद्यमान पदार्थ का ही फिर विद्यमानत्व हो जाना उत्पत्ति पद का अर्थ है, एवं च यथा मृत्पिण्ड में पहिले घट अविद्यमान था तथा बालमति में भी अविद्यमानल.समान है, तया च से मृतिण्ड से घट उत्पन्न होता है तैसे वालमभृति से भी होना चाहिये परन्तु होता नहीं, अतः प्रथम अविद्य- । मान पदार्थ की फिर उत्पचि होती है यह आरम्भनाद भी असङ्गत है (१)। एवं च (२) जसे तिलों में विद्यमान ही तैल की पोइनद्वारा अभिव्यक्ति होती है तैरो मृत्खिण्ड में विद्यमान ही घट की कुलालादि के व्यापार से अभिः । व्यक्ति होती है कुछ यह नहीं कि पहिले नहीं था फिर उत्पन्न हुया है, यही मत समीचीन है। * परन्तु इतना (३) विशेष है कि-फलालादि के व्यापार से पूर्व मृत्तिका में अनागताऽवस्था * रो घट विद्यमान रहता है औ कुलालादि के व्यापार से अन- न्तर वर्तमानावस्था वाला हो जाता है औ दण्डमहार से अनन्तर अतीताऽवस्था- पन्न हो जाता है, सर्वथा ही घट का कुछ अभाव नहीं है, अत: पार्थियभूत- सूक्ष्मों से कथंचिद् भिन्न औ कथंचिद् अभिन्न जो स्थूलपरिणामविशेप सोई घट है यह जानना। यह(४) परिणामविशेप की अवयवी इस नाम से व्यवहृत होता है, औ यही एकमहान् तथा स्पेशवान् औ जलादिधारनरूप क्रियावाला औ अनित्य पहा जाता है, औ इस अपयवीद्वारा ही सव व्यवहार होता है । एव च जिस बौद्ध के मत में यह मचयविशेष ( स्थूल परिणाम ) अव- यवी अवस्तुक (तुच्छ ) है उस के मत में परमाणुओं में पूर्वोक्त स्थूलादि व्यहार का असंभव जानना, क्योंकि परमाण अतीन्द्रिय औ सूक्ष्म है । तथा च शैद्धमत में अवयवी के अभाव से जो यह पूर्वोक्त एक स्थूल- अवययी इत्यादिव्यवहार होता है वह सब अतद्पप्रतिष्ठ होने से मिथ्या ही ज्ञान कहा जायगा क्योंकि जो जो देखने में आता है वह सब अवयवी है औ वह अवयवी मानते नहीं, अतः सम्परज्ञानशील न होने से बोद्धमत दुष्ट है। विस्तर ग्वण्डन सायदर्शनप्रकाश के अ० १ ० ११६ में देवो । (३) स्वसिद्धा त कहते हैं "एसच" इत्यादि से । '(३) यदि सौदाही घट मृत्तिक में विद्यमान है तो दृष्टिगोचर क्यों नहीं होता इस का उत्तर पाहते हैं-(परन्तु इतना) इत्यादि से। * इस अनागता तस्याकोहोमगाऽवस्था औ अनीभव्यतावस्था कहते हैं । (१) 'सएप धोऽयवोत्युन्यते' इत्यादि भाष्य का अनुवाद करते हैं 'यह' इत्यादि से।
१०१ 4. समाधिपादो। तथा च ज्ञान के सत्यत्व के लिये मदान-स्थूल इत्यादि व्यवहारवाला एक अवयवी अवश्य ही मानना चाहिये । यह पूर्वोक्त प्रकार से साधित स्थूलरूप अवयवी ही इम निर्वितर्कसमा- पत्ति का विषय है ॥ १३ ॥ इस प्रकार स्थूलपंचभूत तथा भौतिकपदार्थों विपयक प्राधसमापत्ति के सवितर्क-निर्वितरूप दो भेद निरूपण कर इदानी सूक्ष्मभूत तथा पञ्चतन्मात्रों विषयक ग्राहसमापति के दो भेद निरूपण करते है- सू० एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मवि- षया व्याख्याता ॥४४॥ भाषा-(एनया एच ) इस सवितर्क-निर्वितर्कसमापत्ति के निरूपण से ही (सूक्ष्मविपया) सूक्ष्मभूतों विपयक (सविचारा निर्विचाराच) सविचार-नि- विचारम्प समापत्ति भी (व्याख्याता) व्याख्यान कियी गयी। अर्थात्---जैसे स्थूलपदार्थों में शब्द-अर्थ-ज्ञानविकल्प से सङ्कीर्ण भावना को सवितर्कसमापत्ति औ असंकीर्णभावना को निर्वितर्कसमापत्ति कहा जाता है तैसे अभिव्यक्तधर्म वाले (१) भृतसूक्ष्मों में जो देश-काल-कारणवान (२) पूर्वक भावना प्रयत्न होती है सो सविचारा जाननी, औ देशादि मान के अ. भाव पूर्वक जो केवल सूक्ष्मभूतमात्र वियक भावना मत्त होती है वह नि- 'विचारा जाननी। सवितर्का की तरह इस सविचारा में भी वर्तमानादि धर्मविशिष्ट ही सूक्ष्म- भूत आलम्बन हुये सपाधिमजा में भान होते हैं, अतः कार्यकारणभाव (1) "भूतसूक्ष्मष्यभिव्यक्तधर्मपु” इत्यादि भाष्य का अनुवाद करते हुये सविचार समापत्ति का निरूपण करते है "अभिव्यक्तधर्मवाले" इत्यादि से, अभिव्यक्त प्रत्यक्षदृष्ट घटादिरूप स्थूलपदार्थ हैं (धर्म) परिणाम जिनों का एवंभूत जो सुक्ष्मभूत, यह इस का अर्थ है। (२) देश उप्पर, पार्श्व, गंध । काल=वर्तमानादि, कारणज्ञान पार्थिवपरमाणु (सूक्ष्म- पृथियों) का गन्धतन्मास प्रधान पचतन्मान कारण हैं, गो जलपरमाणु ( सूक्ष्मजल ) का गबतन्मात्र रहित ररात-मानप्रधान चार तनपान कारण हैं, औ गग्निपरमाणु (सू- मअग्नि ) का गन्ध रसतन्मानरहित रूपतन्मात्रप्रधान तीन तन्मात्र कारण हैं एवं वायु परमाणु ( मूक्ष्मवायु) का गन्ध-रस-रूपतन्मान रहित स्पर्शतन्मात्रप्रधान दो वमा कारण है। एवं साकाशपरमाणु (सूक्ष्मआकाश) का केवल शब्दतन्मात ही कारण है । हेयह सविचारा समापत्ति है, यह तत्व है। . इस प्रकार कार्यकारणभाव विचारपूर्वक जिम भावना में सूक्ष्मभूतों का साक्षात्कार होता पातखलदर्शनकाशे- का विचार रहने से यह सविचारा कही जाती है, भी जो भायना सर्वथा देश कालादिज्ञान से रहित केवल सूक्ष्ममतों को विपयकर कार्यकारणभाव के पिचार में महत्त न हो कर केवल अर्थमात्रा होती है वह निर्विचारा कही जाती जाती है। इस निर्विचारसमापत्ति में भी निर्वितर्कसमापत्ति की तरह महासंमक चित्त 'की वृत्ति स्वरूप से शून्य होकर अर्थमात्र ( १ ) हो जाती है । भाव यह है कि विचारसमापत्ति में (सूक्ष्मपृथिवी गन्धतन्मात्रप्रधान- पञ्चतन्मानों से उत्पन्न हुयी है आँगन्ध इस का धर्म है ) इत्यादि प्रकार से कार्यकारणभाव का विचार विद्यमान रहता है औ निर्विचार में केवल सक्ष्म- भूतों का ही.भान होता है कुछ पूर्वोक्त विचार नहीं रहता है, यही दोनों में भेद है। एवं च स्यूलपदार्थविषयक सवितर्क निर्षितर्क औ सूक्ष्मभूतों पिपयक स- विचारनिर्विचार-रूप भेद से यह ग्राह्यसमापत्ति चार प्रकार की हुयी यह नि- पन्न हुआ ॥१४॥ इदानी ( सविचार-निविचारसंनका सक्ष्मग्राह्यसगापत्ति में जिन सूक्षण- विषयों का साक्षात्कार होता है उन सूक्ष्मपदार्थों की विश्रान्ति कहां पर्यन्त है, इस आकांक्षा को निवारण करते हुये सूक्ष्मदिपयत्व की अवधि कहते हैं- सू० सूक्ष्मविषयत्वं चाइलिङ्गपर्यवसानम् ॥४५॥ भाषा-(सूक्ष्मयिपयत्वं च) सूक्ष्मग्रासासमापत्ति के विषयभूत सूक्ष्मवि पयत्व का तो (अलिङ्गपर्यवसानम्) अलिङ्गसंजक प्रकृति ही पर्यवसान अवधि है। अर्थात्-सूक्ष्म-ग्राह्यसमापत्ति की जो सूक्ष्मपदार्थविपयता है सो प्रकृति- पर्यन्त जा कर समाप्ति हो जाती है। भाव यह है कि-पार्थिवपरमाणु (२) तथा इस का कारणभूत गन्धत- (१) अर्थात्-इस भावना में कार्यकारणभाव विचार को त्यागकर चित्त की वृत्ति एतादृश सुक्ष्मभूताकार से परिणत हो जाती है कि मानों अपनावृत्तिभावही एका- बार उसने त्यक्त कर दिया है। (२) पार्थिवपरमाणु नाम पृथिवीसज्ञक सूक्ष्मभूत का है, एवं जलपरमाणु बला- ख्यसूक्ष्मभूत का, अग्निपरमाणु भग्निसज्ञक सूक्ष्मभूत का, वायुपरमाणु वायुसज्ञक सूक्ष्मभूत का, आकाशपरमाणु-आकाश सज्ञक मूक्ष्मभत का नाम जानना । यहां इतना विशेष यह भी जान लेना कि योगभाष्यकार के मत में शन्द-स्पर्श- रूप-रंत-गन्ध इन पच सन्मानों से पहिले आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथिवीरांज्ञक सूक्ष्मभूत उत्पन्न होते हैं, फिर उन सूक्ष्मभूतों से आकाशादि स्थूलभूत उत्पन्न होते हैं कुछ-सांख्य गत की तरह तन्मात्रों से ही स्थूलभूतों की उत्पत्ति नहीं होती,हे । .
- समाधिपाद। न्मांत्र, एवं जलपरमाणु तथा इस का कारणभूत रसतनमात्र, एवं अग्निपरमाणु तथा इस का कारणभूत रूपतन्मान, एवं वायपरमाणु तथा इस का कारणभूत स्पर्शतन्मात्र, एवं आकाशपरमाणु तथा इस का कारणभृत गन्दतन्मात्र, एवं इन पञ्चतन्मात्रों का कारणभूत अहङ्कार आ अहङ्कार का कारणभूत लिङ्ग संबक (१) महत्तत्त्व, औ महत्त्व का कारण अलिङ्गसंजक प्रकृति, यह सब सूक्ष्म विषय कहे जाते है। इन सब में से पूर्व २ कार्य की अपेक्षा से उत्तरोत्तर कारणभूत सूक्ष्म है। प्रकृति से परे फिर अन्य किसी सूक्ष्म पदार्थ को न होने से प्रकृति में ही सूक्ष्मता पी विश्रान्ति है। यद्यपि "अव्यक्तात्पुरुपः परः" इस श्रुति में प्रकृति की अपेक्षा से पुरुप को भी सूक्ष्म कहा है अतः प्रकृति में सक्ष्मता की विश्रान्ति कथन असमञ्जस है तथापि पुरुप को अगाश औ चेतन होने से ग्राह्य जड़पदार्थों की सूक्ष्मता की विश्रान्ति का प्रकृति में ही संभव होने से तहां ही विधाय कथन समजस है (२)। अर्थात्-जैसे पहत्तय की अपेक्षा से प्रकृतिमें सक्ष्मता है ऐसी पुरुप में नही है क्योंकि जैसे महत्तत्व का महति उपादान कारण है तैसे पुरुप उपादान कारण नहीं है अपितु निमित्त कारण है, एवं च यद्यपि वस्तुतः पुरुष भी सूक्ष्म है तथापि जड़ ब्राह्य परिणामि उपादान कारणता सहित सूक्ष्मताकी विश्रान्ति प्रकृति में ही है पुरुष में नही, अतः प्रधान में ही निरतिशय सौक्ष्य कहा गया है। सूक्ष्मभूतों से ले कर प्रकृतिपर्यन्त जितने सक्ष्म पदार्थ है वह सब ही. सीवचार-समापत्ति के विषय है यह तात्पर्य है ॥४८॥ ग्राह्यविषयक इन चारो समापत्तियों का नामाऽन्तर कहते हैं। सू० ता एव सबीजः समाधिः ॥४६॥ भाषा-(ता एव) यह पूर्वोक्तं चारो समापचियां ही (सीजः समाधि:) सबीज समाधि कही जाती है। (1) जो तत्व वारण में लीन हो जाता है वह लिङ्ग कहाजाता है, महत्तत्वा- दि निखिल कार्य अपने २ कारण में लीन होने से लिङ्ग हैं औ प्रयात, किसी में लान न होने से अलिङ्ग है। महत्तत्त्व अपने कारण प्रधान का बोधन करता है इस से भी यह लिङ्ग है । (२) गाव यह है कि सक्ष्मप्राद्यपदार्थ की समाप्ति कहा पर होती है, इस को उत्तर में प्रकृतिपर्दा त समाति कही गयी है, एक च पुरुष भी सूक्ष्म रहो परन्तु जड- पदार्थनिष्ठ सूक्ष्मता को विश्वान्ति तो प्रधान पश्यन्त ही कही जायगी। - .. ११२ पातखलदर्शनकाशे- अर्थात-यह चारोही समापत्तियां सबीनसमापि नाम से पाहत होती हैं क्योंकि यह चारो ही वहिर्यस्तुचीजवाली (१०३, अर्थात् इन चारों समाप- । चियों में स्थल वा सूक्ष्म एक न एक आलम्पन यना ही रहता है अतः यह सालम्बन होने से सवीज है। पाचस्पतिमिश्र तो यह कहते है कि यहां पर "ता एच सवीजः" इस प्रकार पाठ से यह अर्थ मत जानना कि यह चारो ही सपीज है. अन्य नहीं क्योंकि ऐसे मानने से ग्रहण-ग्रहीतुसमापत्ति को सीजस्व का लाभ नहीं होगा किन्तु "ता सवीज एव" इस प्रकार भिन्न क्रम से एव-शब्द का सपीजशब्द के संग अन्वय कर यह अर्थ करना कि यह चारों सवीन ही निर्यान नहीं, एवं च इन चारों को निजत्व का निपेध हुया कुछ ग्रहण-गृहीतममापत्ति को सवीजत्व का निषेध नहीं हुया, अतः इन दोनों में भी सीजत्व की विद्य मानता से ग्रहण गृहीत्समापत्तियों को भी सनीज जानना । एवं जैसे ग्राह्य समापत्ति में विकल्प औ विकल्प के अभाव द्वारा दो भेद निरूपण किय गये है तैसे ग्रहण-ग्रहीतृसमापत्ति भी दो दो भेद जानलेने (२) । तथाच चारप्रकार की ग्राह्यसमापत्ति भी दो मकार की ग्रहणसमापत्ति औ दो प्रकार की ग्रहीतृप्तमापत्ति की सिद्धि होने से सब मिलकर सम्मजातसंजक सबीजसमाधि के आट भेद हुये यह फलित हुया (३)। वस्तुत: तो ग्रहणसंजक इन्द्रिय औ ग्रहीत्संजक अहङ्कार भी सूक्ष्म ग्राह्य के अन्तर्गत ही है अतएव सत्रकार ने प्रकृतिपर्यन्त सूक्ष्मविपय कहा है, यद्यपि भाप्यकारों ने सूक्ष्मपदार्थों में इन्द्रियों की गणना नहीं किया है तथापि तन्मालों से इन्द्रियों का भी ग्रहण जान लेना क्योंकि जैसे पञ्चतन्मान अहवार का कार्य औ सूक्ष्म है तैसे इन्द्रिय भी अहकार का कार्य औ सक्ष्म है, एवं च ग्राह्य समापत्ति में (१) बहिबस्तु नाम प्रकृतिभादि बाह्य अनात्मयस्तु का है औ बीज नाम आक. म्बन का है । अथवा इन सब समाधियों में बीनभूत अज्ञान बना ही रहता है इस से यह सबील हैं। (२) ग्रहण-नाम श्रोत्र आदि इद्रयों का है, शब्द श्रोत का विषय है औ अ- इनार इस का कारण है इस प्रकार विचारपूर्वक भावना करने से सविचारग्रहणसमा- पत्ति, केवल इन्द्रियमान की भावना करने से निर्पिचारग्रहणसमापत्ति, एव महत्तत्र का कार्य अाहार गुणात्मका हे इस प्रहार भावना से सविचारग्रहीतृसमापत्ति, यल महङ्कारमान की भावना करने से निर्बिचारग्रहीतृसमापत्ति जाननी । (३) एव च छै प्रकार का सम्प्रज्ञात योग है, यह विज्ञानीभक्षु का प्रगाद ही - भानना।
समाधिपादः। ग्रहण-ग्रहीद समापत्ति का अन्तर्भाव जान कर ही सूत्रकार ने चार समापत्तियों को सीज कहने से यथाश्रुत पाठ में भी कोई न्यूनता दोष नहीं है यह जानना। जिस सम्प्रज्ञातसमाधि के १७ सूत्र से चार भेद कहे गये हैं उसी केही ११ सूत्र से तीन भेद कहे हैं, औ उसी की फिर चार विभाग में यहां समाप्ति की है, औं अवान्तर भेद से यही आठ प्रकार का है, यह परमार्थ है ॥४६|| इन सवितर्कादि-संप्रज्ञातसमाधियों में से अन्य समाधियों की अपेक्षा से निर्विचार-सम्मज्ञात को फल कथन पूर्वक श्रेष्ठ कहते हैं। सू० निर्विचारवैशारोऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥ भाषा-(निर्विचारवैशारये) निर्विचारसमाधि की विशारदता होने से, योगी को ( अध्यात्मप्रसादः ) एक काल में निरिवलपदार्थविषयक यथार्थज्ञान उदय हो जाता है। रजतम (१) गुण के आधिक्यमयुक्त जो अशुद्धि तथा आवरणरूप मल तिस से अपेत (रहित) हुयी प्रकाशस्वरूप बुद्धि का जो सत्वगण के प्राधान्य से रज तम से अनभिभूत ( अतिरस्कृत ) स्वच्छ स्थिरतारूप एकाग्र प्रवाह, इस का नाम शारय है, जव निर्विचारसमाधि की उक्त विशारदता (प्रवीणता) योगी को लब्य हो जाती है तब योगीको सूक्ष्मभूतों से लेकर प्रकृतिपर्यन्त निखिलपदार्थों का एक ही काल में साक्षात्कार हो जाता है, इस साक्षात्कार • का नाम ही अध्यात्मप्रसाद है। इसी को ही स्फुटमज्ञाऽऽलोक कहते हैं, औ प्रज्ञामसाद भी इसी का ही नामान्तर है, इस मज्ञा-प्रसाद के लाभ होने से योगी अशोच्य ( शोकरहित ) हो जाता है, अत एव भगवान वेदव्यास ने- " प्रज्ञाप्रसादमारुह्याऽशोच्यः शोचतो जनान् , भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति इस वाक्य से प्रज्ञाप्रसाद वाले को अशोच्य कहा जैसे शैलशिखराऽऽरूढ पुरुष भूमिस्थित पुरुषों को अल्प देखता है तैसे यह योगी प्रज्ञाप्रसाद रूप शैल पर आरूढ हुआ ज्ञान के प्रकर्प से अपने को (1) " अशुद्ध्यावरणमझाऽपेतस्य प्रकाशात्मनो बुद्धिमत्त्वस्य रजस्तमोभ्यामन- भिमतः स्वः स्थितिप्रवाहो पेशारद्यम् " इत्यादि भाष्य का अनुवाद वारते हुये निर्वि- चाये शारथ का अर्थ करते हैं " रनतम " इत्यादि से ।
पातपलदर्शनकाशे- सर्वोपरि जानता हुआ अशोच्य (शोक से रहित ) होकर अन्य राय पुरुषों को शोकयुक्त मी अल्प देखता है, यह इस का अर्थ है ॥ १७ ॥ इस अध्यात्मप्रसाद के लाभ होने से जिस प्रज्ञा का योगी को लाभ होता है उस का सार्थक नाम कहते है- सू० ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥ ४८ ॥ भाषा-(तत्र ) तिस अध्यात्मप्रसाद के लाभ होने पर, जो योगी को (प्रज्ञा) बुद्धि लब्य होती है उस का नाम ( नतम्भरा ) है। अर्थात्-निर्विचारसमाधि के वैशारद्य से जन्य अध्यात्मप्रसाद के होने पर जो समाहितचित्त योगी की एक प्रकार चित्त की दृत्ति उत्पन्न होती है उस का नाम स्तम्भरा पड़ा है ( १ ) अर्थात् यह प्रपा सत्य अर्थ को ही धा- रण करती है कुछ मिथ्या अर्थ को नहीं क्योंकि इस में विपर्ययज्ञान का लेश भी नही है। यह जो इस चित्तवृत्ति का नाम ऋतम्भग है सो कह नहीं है किन्तु अर्थ के अनुसार ही है क्योंकि ऋत नाम सत्य का है औ भर नाम धारण करनेवाली वृत्ति का है, एवं च सत्यार्थयारिणी होने से ऋतम्भरा यह नाम सार्थक है। इस प्रज्ञा के होने से ही उत्तमयोग का लाभ होता है, ऐसे ही परमपि ने कहा है। " आगमेनाऽनुमानेन ध्यानाभ्यासरसेन च । विधा प्रकल्पयन् प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम् (२) इति॥४॥ इदानी इस ऋतम्भरा प्रजाजन्य प्रत्यक्षज्ञान को आगम औ अनुमान जन्य ज्ञान से श्रेष्ट कहते है- सू० श्रुताऽनुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषयाविशेषार्थत्वाद् ४९ भाषा-(श्रुताऽनुमानप्रज्ञाभ्याम् ) श्रुत-शास्रजन्य प्रज्ञा औ अनुमानजन्य प्रज्ञा से, यह ऋतम्भरा प्रज्ञा (अन्या) भिन्न है क्योंकि (विशेषार्थत्वाव) यह प्रज्ञा विशेषरूप से अर्थ का साक्षात्कार करने से विशेपार्थविषयक है। (1) इस प्रज्ञा से जो पदार्थों का भान होता है वह सत्य हा सत्य होता है, कुछ मिथ्या नहीं, यह भाव है। (२) आगम नाम श्रपण का, अनुमान नाम मनन का, औध्यानाऽभ्यासरस नाम निदिध्यासन का है, इन तीनों द्वारा प्रज्ञा को प्रकलाना से अर्थात् मार्जनपूर्वक सूक्ष्मता यो सम्पत्ति से योगी उत्तम योग यो प्राप्त हो जाता है, यह इस का अर्थ है । - समाधिपादः। श्रुत नाम आगमज्ञान का है, अर्थात्-आगमजन्य ज्ञान सामान्य को ही विषय करता है विशेप को नहीं क्योंकि विशेषकथन करने का आगम में सामय नहीं हैं कारण यह कि विशेप के सर शब्द का वाच्यवाचकभाव संवन्ध ही नहीं है (2)। अर्थात्-शब्द जो है वह सामान्यरूप से ही लक्षणद्वारा वस्तु का निरूपण कर सकना है जैसा कि इस को स्वर्ग कहते हैं यह आत्मा का लक्षण है यह प्रकृति का लक्षण है, कुछ यह आत्मा है यह प्रकृति है यह सूक्ष्म भूत है इस प्रकार विशेप व्यक्ति का प्रत्यक्ष नहीं करा सकता है। एवं अनुमान भी (जहां धूम है वहां अमि है, जहां प्राप्ति है वहां गति है औ जहां गति का अभाव है वहां प्राप्ति का अभाव है) इस प्रकार सामान्यरूप से ही वस्तु का ज्ञान उत्पन्न कराता है कुछ विशेष प्रत्यक्षरूप से नहीं (२)। अतः आमम औ अनुमान विगेपविपयक नहीं है किन्तु सामान्य-विपयक ही है। औ, ऋतम्भरा-प्रना तो विशेषरूप से प्रकृति आदि अनात्म मूक्ष्मपदार्थों का भी पुरुपगत विशेप का भी मत्यक्षकर लेती है इस से उन दोनों से अन्य- विषयक होने से यह विशेष है । पद्यपि इन्द्रियजन्य प्रत्यक्षज्ञान भी विशेष को विपय कर सकता है तथापि वह सूक्ष्म-व्यवहित दूरवर्ती पदार्थ गत विशेप ग्रहण में असमर्थ होने से पुरुप-प्रकृति आदि गत विशेष का प्रत्यक्ष नहीं कर सकता । औ यह तो कोई कही नहीं सकता कि (लौकिकमत्यक्ष-अनुमान-आगम- प्रमाण का विषय न होने से पुरुपगत विशेप अमामाणिक है) क्योंकि योगी- लोक पुरुपादिगत विशेप को समाधिकाल में प्रत्यक्ष देखते हैं। एवं च समाधि में होने वाली ऋतम्भरा प्रजा से ही पुरुप-प्रकृतिगत विशेष का साक्षात्कार होता है अन्य से नहीं, (३) अतएव यह प्रजा विशेप-विपयक (१) निम यस्तु के साथ शब्द का शास्त्र ने सङ्केत किया है तिम वस्तु को वह शब्द सामान्यरूप से ही बोधन करता है विशेषरूप से नहीं, अत एष गौशब्द के श्रवण से मनुष्य को सामान्य ज्ञान होता है कुछ विशेष व्यक्तिविशेप का नहीं, यह तत्व है। (२) कुछ धूम शान द्वारा वन्हि त्रिकोण वा चतुष्कोण है इस प्रकार विशेष ज्ञान नहीं होता है किन्तु सामान्य रूप से ही वन्हि का ज्ञान होता है। (३) यद्यपि बुद्धितत्त्व सत्वगुण प्रधान होने से सर्व पदार्थों के प्रत्यक्ष करने में स्वभावतः ही समर्थ शील है तथापि तमोगुण कर आवृत होने से निखिलपदार्थों का अहण नहीं कर सकता, फिर जब अभ्यासपैराग्य-जन्य समाधि से रजतमगुणनाशपूर्वक बुद्धि में वैशारय उदय हो जाता है तब ऐसा कोई पदार्थ ही नहीं है कि जिस को यह पातञ्जलदर्शनकाशे- ११६ होने से धुत-अनुमान प्रमा से अन्य औ उत्कृष्ट है यह निप्पन्न हुया ।। ४९ ।। इस समाधि मजा के लाभ से जी योगी के चित्त में इस मजा से जन्य नूतन २ संस्कार उत्पन्न होता है वह अन्य सब विक्षेपसंस्कारों काप्रतिरन्धर होता है । यही सूत्रकार कहते हैं- सू० तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५०॥ भाषा-तज्ज.) तिस ऋतम्भराप्रज्ञा से जन्य, जो (संस्कारः) संस्कार है, वह (अन्यसंस्कारप्रतिबन्धी) अन्य विक्षपजनित संस्कारों का प्रतिबन्धक है। अर्थात्-निर्विचारसमाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा से उत्पन्न जो संस्कार है वह निखिल अन्य व्युत्थान-संस्कारों का बाधक होता है । यद्यपि (१) अनादिकाल से प्रतृत विषयभोगवासनाजनित दृढ संस्कारी को प्रबल होने से इस आधुनिक ऋतम्भराप्रसाजन्य संस्कारों से उन का वाघ होना असंभव है तथाऽपि बुद्धि का तत्त्वविषयक पक्षपात होने से यह आधु- निक संस्कार भी अनादिव्युत्थान का बाधा कर सकते है । अर्थात्-तावत्काल ही यह बुद्धि विक्षिप्त हो कर इतस्ततः भ्रमण कर रही है कि यावत्काल यह तत्त्व का लाभ नही करती आ जय फिर तत्त्व का लाभ हो गया तय आपही अन्य विषयों का त्याग कर उस में स्थिर हो जाती है, औ दिनों दिन स्वसंस्कारद्वारा मिथ्या संस्कारों का अभिभव 'निरादर कर देती है। इस प्रकार व्युत्थानसंस्कारों का अभिभव होने से फिर विक्षेप जन्य प्रमाण- विपर्ययादि वृत्तियां भी उत्पन्न नहीं होती है, औ इन वृत्तियों की उत्पत्ति न होने से वृत्तिनिरोधलाभ द्वारा निर्विचार समाधि भी उपस्थित हो जाता है औ बुद्धितत विषय न कर सके पापन सूक्ष्म, दूरस्थ, व्यपधानमहित, भूत, भविष्यत् निखिलपदार्थो को विषय कर लेता है, इम से प्रकृति तथा पुरषादि गत विशेष के प्रत्यक्ष करने में ऋतम्भरा प्रज्ञा ममर्थ होने से आगम अनुमानादि ज्ञान मे उत्कृष्ट है यह तत्व है।' (१) जैसे उद्दण्ड प्ररहमान बाय के येग में दोष की शिग्वा या स्थिर होना दु माध्य है तेमे प्रचण्ड विषयवासना म यिक्षित हुये चित्त में स्थिरता का संस्कार भी होना असाध्य है, इस लाशका का अनुमोदनपूर्पक उत्तर कहते हैं "यद्याप" इत्यादि से । (२) स्वभावत बुद्धि का पक्षपात सत्यवस्तु की ही तरफ रहता है मिथ्या की और नहीं, एव न यद्यपि मनुष्य के चित्त में अनेक प्रकार के सामारिक विपय विद्यमान हैं तथापि उग को मिथ्या होने से द्धि उम तरफ उन्मुग्व नहीं हाता किन्तु यथार्थ तत्तमाहिणी यो तत्य या पक्षपात बार उनामथ्या संस्कारों का पराभव कर देती है, यह तत्व है।
समाधिपादः। फिर निर्विचारसमाथि से ऋतम्भरा प्रना का लाभ होता है, फिर उस मशा से निरोध संस्कार होता है, औ संस्कार से फिर ऋतंभराप्रज्ञा का प्रकप, उस मना से फिर संस्कार का प्रकप, इस प्रकार दिनों दिन नया नया ही संस्कार उदय होता रहता है आशङ्का-जब कि (१) समाधिमजाजन्य संस्कार विद्यमान ही रहते हैं तो वह संस्कार चित्त को अधिकारविशिष्ट क्यों नहीं करते, क्योंकि जो चित्त- पासनाजनित संस्कारों से युक्त होता है वह चित्त जन्मादिदुखदेनकी योग्यता वाला होने से अधिकाराविशिष्ट कहा जाता है। समाधान-~यद्यपि संस्कार विद्यपान रहते हैं तथापि यह संस्कार संश- क्षय का हेतु होने से चित्त को अधिकारविशिष्ट नहीं कर सकते मत्युत चित्त को अधिकार से रहित करदेते हैं क्योंकि जो संस्कार क्लेशादिवासना से जन्य होते हैं यही संस्कार चित्त को अधिकारविशिष्ट करते हैं कुछ मतम्भराप्रजा- जन्य नहीं। भाव यह है कि-चित्त का दो कार्यों में अधिकार है एक शब्दादि का पुरुषों को भोग देना औ एक विवेकख्याति उत्पन्न करनी, तहां भोग-हेतु क्लेशादिवासनाजनित-संस्कारविशिष्ट चित्त भोगादिअधिकार वाला कहा जाता है औ समाधिजन्य संस्कार से क्लेशसंस्काररहित हुया चित्त विवख्यातिअधिकार वाला कहा जाता है, इन दोनों में से प्रथम ही अधिकार भोग का हेतु होने से दृष्ट है दूसरा नहीं (२)। विवेकख्याति के उदय से भोगाधिकार की समाप्ति हो जाती है क्योंकि विवेकख्याति के उत्पादनपर्यन्त ही चित्त की चेष्टा है फिर आगे नहीं* ॥५०॥ इस प्रकार ऋतम्भरामज्ञारूपफल सहित सम्मज्ञातसमाधि का निरूपण कर इदानी ( इस योगी को प्रजाजन्य संस्कारों के निगेधार्थ अन्य कुछ कर्तव्य अपेक्षित है वा नहीं) इस आशङ्का का निवारण करते हुये जिस असम्मज्ञात- (2) "कथममी मस्कारातिशयश्चित्तं साऽधिकार न करिष्यति" इम शंकापर भाष्य यनुमार माशङ्का का स्थापन करते हैं (जब कि) इत्यादि से। (२) बावत्काल हो चित्त भोग के लिये चेष्टा करता है कि यावत्काल वियेक' ख्याति की उत्पत्ति नहीं करता है औ जब विवेकाख्याति उदय हुयी तब क्लेश निवृत्त होने से अपने ही भोगाधिकार सगाप्त हो जाता है, एवं च भोगाधिकार को शान्ति हो प्रज्ञाकृतमस्कारों का प्रयोजन है यह तत्ल है। (*) "ल्यातिपर्ययसानं हि चित्तचेष्टितम्" इस भाष्य का यह अनुवाद है।
पातसलदर्शनप्रकाशे- समाधि से इन प्रशाकृत संस्कारों के निरोध द्वारा चित्त एकवार निरधिकार हो जाता है उस असम्मशात का.लक्षण कहते हैं- सू० तस्याऽपि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्वाजः समाधिः ५१ भापा-(वस्थाऽपिनिरोध) परवराग्य द्वारा तिसमशाजन्यसंस्कारों का भी निरोध होने पर, (सर्वनिगेघात) निखिल पुरातन नृतन संस्कारों का निरोध होने से (निर्मजः समाधिः ) नि:न-समाधि हो जाता है। अर्थात्-पूर्वोक्तगुणवैतृप्ण रूप परपैराग्य से जन्य जो निखिल वृत्तिप्रवाह औ संस्कार प्रवाह का निरोध वह निवीज समाधि कहा जाता है (१)। इसी को ही निर्विकल्प वा असम्मनात रामाधि कहते हैं। सो यह निरोध केवल समाधिजन्य ऋतम्भराप्रज्ञा का ही विरोधी नहीं है किन्तु प्रजाजन्य संस्कारों का भी यह विरोधी ही है, इसी के वोधनार्थ सन में (तस्यापि) यह 'अपि' पद दिया है। अर्थात्-इस निरोध से जो संस्कार उत्पन्न होता है वह सब संमलात समाधिजन्य संस्कारों को घाध कर ही उदय होता है ऐसे ही नहीं। यद्यपि इस सर्पत्तिनिरोध में तथा परवैराग्यजन्य संस्कारों में प्रत्यक्ष प्रमाण की योग्यता नहीं है क्योंकि सर्ववृत्तिनिरोध का योगी को प्रत्यक्ष होना असम्भव है एवं स्मृतिरूप कार्य से भी निरोधसंस्कार सत्ता अनुमित नहीं हो सकती क्योंकि वृत्तिमात्र का निरोध होने से इन संस्कारों की स्मृतिजनन में शक्ति नही है तथापि चित्त की निरुद्धावस्था का जो महूर्त अर्द्धमहर प्रहर दिन-रात्रि रूपादि कालक्रम तिस से निरोधसंस्कारों का अनुमान जान लेना (२) । अर्थात्-जैसे जैसे परवैराग्य के अभ्यास से व्युत्थान तथा समाधि के मंस्कारों की न्यूनता होती है तैसे तैसे निरोध की संस्कारों की सत्ता का अनु- मान कर लेना, क्योंकि विना निरोध संस्कार की सत्ता से समाधिपक्षाजन्य संस्कारों की न्यूनता होनी असम्भव है। (१) जैसे सप्रज्ञातसमाधि में ध्येयाऽऽकार वृत्ति का विमय भूत प्रकृति आदि आल म्वन रूप बीज विद्यमान रहता है तेसे इस समाधि में ध्येयरूप बाज नहीं रहता है, इस से यह निवज है। (२) पोगी वो बो वृत्तिों का निरोध होगा सो एक काल में तो होगा नहीं दिनु पहिले दो घटी फिर गईप्रहर इत्यादि क्रम से हागा इसी से निरोधवृद्धि का सद्गार जानलेना।
-समाधिपादः।। इस निरोधावस्था में क्लेशजनक व्युत्थानसंस्कार तथा कैवल्योपयोगि संप्रजातसमाधिजन्य संस्कारों के सहित ही चित्त अपनी प्रकृति में प्रविळ्य होकर अवस्थित हो जाता है। यद्यपि निरोधसंस्कारों के सद्भाय से यह चित्त यत्किञ्चिाधिकारवि- शिष्ट ही प्रतीत होता है तथापि यह संस्कार अधिकार के विरोधी ही है कुछ भोग के हेतु नहीं, क्योंकि इस दशा में शब्दाद्युपभोग वा विवेकख्याति यह दोनों ही अधिकार निवृत्त हो जाते हैं। अत एव यह चित्त निरोधावस्था में समाप्तअधिकार वाला होकर संस्कारों के सहित निवृत्त हो जाता है। इस समाप्त-अधिकारवाले चित्त के निवृत्त होने से पुरुप निजशुद्ध रूप में प्रतिष्ठित हया शुद्ध तथा मुक्त कहा जाता है। इस असम्प्रज्ञातयोग के लाभ से ही योगी जीवन्मुक्तिपद में अभिपित्त हो जाता है। .यह असम्प्रज्ञातयोग ही निखिलकर्तव्यों की सीमा है * ॥५१॥ दो० उपक्रम न लच्छन योग पुन, लच्छन वृत्ति वखान । योग उपाय विभेद कथ, कियो पाद अवसान ॥१॥ * यहा पर भाष्पकारों ने " इति पाताले सायप्रवचने योगशास्त्रे समाधिपादः इस वाक्य से इस शान को सांत्यप्राचन कहा है, इस का अर्थ यह है कि- यह योगशास्त्र सांख्य शास्त्र का ही प्रकृष्ट से वचन प्रतिपादन करता है, अर्थात्--इस योगशास्त्र में प्रक्रिया सब सारय की ही है केवळ ईश्वर का स्वीकार भी योग का प्रतिपा- दन इम में प्रष्ट अधिक है, अतएर इस का नाम सेश्वरसाल्य है। • इदानी इत पादोक्त अर्थ को संग्रह कथन पर दोहा का उपन्याप्त पार पादस. माप्ति करते है ( उपक्रम ) इसादि से, उपक्रम नाम आरम्भ का है, तहा–१ सूत्र से योगारमा की प्रतिज्ञा याथन कियी ५ सूत्र से योग का लक्षण कहा, गौ ३, , सूत्रों में योग का ओ व्युत्थान का परस्परमेद निरूपणकार,५ से ११ तक चित्तवृत्तियों पा निरूपण किया, तिर १२ सूत्र से वृत्तिनिरोध का उपाय कहा, पधात अन्याय- नराय के क्षग काथन पूर्वक ४० स्त्र पर्यन्त स्थिति को उपाय फहे, फिर सा- तिपर्यन्त अपान्तरभेद सहित सम्प्रज्ञात गसम्प्रदात समाधि का भेद निरूपण किया । प्रथमः * १२० पातञ्जलदर्शनमकाशे- इति श्रीमद् उदासीनप्रवर-स्वामि-बालराम परमहंस समुद्भासिते पातक्षलदर्शनप्रकाशे समाधिपादः * प्रथमः । * इस पाद में मागोपाग समात्रि का निरूपण प्रधान है अतः इम का नाम समाधिपाद है। इति श्री यतिवरउदासीन आत्मस्वरूप हंस न समुदीपित पातञ्जलदर्शनप्रकाश- टिप्पणम् । हमनाम पेद में शिखाराहत यज्ञोपवीतधारी उदासीन का है। यह भूमिका के प्रथम पृष्ट के टिगण में स्पष्ट है।
साधनपादः। १२१ उम् नमोऽन्तामिणे। पातञ्जलदर्शनकाशे साधनपादः ॥२॥ दो० जिज्ञासु जन तरन हित, साधनपाद अनूप । करत प्रकाश महेश नम, बालराम यतिभूप ॥१॥ पूर्वपाद में (१) समाहितचित्त योगी के प्रति योग उपदिष्ट किया, इदानीं व्युत्थितचित्त पुरुष भी किसी प्रकार समाहित- चित्त हो कर योगयुता हो जाय एतदर्थ द्वितीय साधनपाद का आरम्भ किया जाता है (२) । तहां वक्ष्यमाण यस नियमादि योगसाधनों में से पृथक कर पहिले सुकर अत्यन्तोपकारक क्रियायोग का निरूपण करते हैं- सो०-उदासीन कवि-भूप, शिक्षाविद्यामद गुरु । चन्दत आतमरूप, साधनपाद विवरण हित ॥१॥ (१) ( जब कि अवान्तरभेद सहित सफल योग या निरुपण हो ही चुका तब फिर क्या शेप रहा कि जिस के लिये उत्तर पाद का आरम्भ किया जाता है' इस आशका या वारण करते हुये उत्तरपाद के सग पूर्व पाद की मगनि निरूपणमहित पूर्व वृत्त के अनुवादपूर्वक उत्तरपाद के भारम्भ में हेतु कहते हुये साधनपाद के प्रकाश का आरम्भ फरत है ( पूर्वपाद में) इत्याद मे । ( २ ) भाय यह है यि-पूर्व समाधिपाद में मूढ तथा क्षिप्त चित्तवाले पुरषों के प्रति योगाऽभावक्धन पूर्वक समाहित चित बाल योगाऽस्ट उत्तम अधिकारी के प्रति आभ्याम परगग्यमाप्य अमप्रज्ञातयोग गौ एका प्रचित्तवाले । ध्यावधिकारी के प्रति मम्प्रज्ञातयोग कथन किया, परन्तु विक्षिप्त चित्ताले मन्द अधिकारी के प्रति कोई भी उपाय निरूपण नहीं किया क्योंकि उन के चित्त को मामारिकयामना तथा रागद्वेष से पलाइत होने से उन पुरणों को झाटोत अभ्याम वैग्यादि का होना असम्भव है, इदानी यह विक्षिप्तचित्ताले पुरप भी जिन माधनों के मनुष्टान से शद्धान्तःकरण स-पास घेराग्य की योग्यता सपादन द्वारा एमाग्रचित्त होनीय सन साधनों के प्रति पादनार्थ कृपार आचार्य द्वितीय माधनपाद का मारम्भ करते हैं।
१२२ पातञ्जलदर्शनकाशे- सू० तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ।। भाषा-तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान, यह तीनों (क्रिया- योगः) क्रियायोग हैं। अर्थात्-तप आदि तीनों क्रिया (कर्म), योग का साधन होने से क्रियायोग पद का वाच्य है। बिना तपस्वी से योग सिद्ध हो नहीं सकता अतः प्रथम तप का उपादान (यहण) किया है । भाव यह है कि-अनादि कर्म क्लेश वासना से चित्रित हुया जो विषयों में उौन्मुख्य (प्रवृत्ति) कराने वाला अशुद्धिसञ्जकरजत- मकाप्रचार वह विना तप के अनुष्ठान से सम्भेद (विरलप्रचार वा नाश) को प्राप्त होना असम्भव है अतः सब से पहिले तपरू- पसाधन का उपदेश किया है। तप-हित-मित मध्य भोजनपूर्वक (१) इन्हसडतकशीतउ- ष्णादिसहनशीलतासहित इन्द्रियों का निरोध तपशब्द का अर्थ है। जो (२) तप चित्त की प्रसन्नता का हेतु हो तथा शरीर (१) यहा हितभोजन से योगविरोधी अतिअम्झ, अतिक्यण, अतिउष्ण, अतिरुक्ष, तिक, सर्पप, दधि, माम प्रभृति का त्याग, ओ गेहू, तण्डुल, गोदुग्ध, खण्ड, घृत, मधु मूग प्रभृति का सेवन लेना, ऐसे ही दत्ताऽऽत्रेय जी ने कहा है-"लपण सर्पप चाम्कमुप तीक्ष्ण च रक्षकम्, गतीय भोजन त्याज्यमतिनिद्रातिभापणम्" इति । स्यन्द- पुराण में तो "त्यजेत् कट्टुम्लस्यण क्षौरभोजी सदा भोत " इम वाक्य से काटु आदि को त्यागपूर्वक दुग्धमान ही योगी यो पथ्य कहा है । उदर के दो भाग अन्न से पूर्ण करे औ एक भाग जल से पूरण करे ओ तुरीयभाग वायु के समारार्थ खाकी रक्खे, इम का नाम मितमोजन है, मय, मत्स्य, गाम, रुशुनादि के त्याग पूर्यक परवल, सूरण, वाथ प्रमृति के शाका का सेवन करना मध्यभागन कहा जाता है। (२) "तम चित्तप्रसादनगराधमानमनेनाऽऽव्यमितिम यते" अनाद पारते हो प्रानोगयुक्त ता या रक्षण करते हैं "नों ता" इत्यादि से । इस भाष्य का साधनपादा। इन्द्रियादि का बाधाकारक (पीड़ाकर) न होय वही तप योगारु मक्षु मन्द अधिकारी के प्रति सेवनीय है अन्य नहीं, यही सूत्र- कारादिमहर्षिों की अभिमत है। अर्थात्-यहाँ पर तप शब्द से स्मृतिकारोक्त (१) शरीरयोडा- कर तपों का गहण नहीं करना क्योंकि उपवासादि के अभ्यास से मरणभय यो चान्द्रायणादि के अभ्यास से धातुवैषम्य होने से यह सेव योग के विरोधी हैं किन्तु हित मित-मध्य भोजन द्वारा इन्द्रियों का निरोध करना ही यहां तप-शब्द का अर्थ है। अतएव “तपसाऽनाशकेन" इस श्रुति में (जो शरीर का नाशक नहीं है एवंभूत तप से आत्मज्ञान की योग्यता होती है ) इस प्रकार पीड़ाकर तप का निषेध किया है, अतः युक्त आहार-वि- हार (२) को यहां तप जानना। स्वाध्याय डोकार, रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्ता, मण्डल, ब्राह्मण आदि वैदिकमंत्र, तथा ब्रह्मपार आदि पौराणिक पवित्रमन्त्रों का जप, एवं मोक्षशास्त्र-उपनिषदादि का अध्ययन, इस का नाम स्वाध्याय है। ईश्वरप्रणिधान-निखिल कर्मों का परमगुरु भगवान में घर्पण करना, जैसा कि मुनियों ने कहा है- "कामतोऽकामतो वाऽपि यत्करोमि शुभाऽशुभ, तत्सर्वं त्ववि संन्यस्तं त्वत्प्रयुक्तः करोम्यहम्" अर्थात्-फलेच्छा से वा निष्का- मता से जो मैं शुभाऽशुभकर्म का अनुष्ठान करता हूं सो सब मैं आप ही को समर्पण करता हूं क्योंकि आप हो अन्तर्यामी हो (१)"उपवासपराकादिकच्छचान्द्रायणादिभिः, शरीरशोपण प्राहुस्तपसा तप उत्तगम्" इस स्मृतिउक्त उपनासादि । (१) युक्तभाहार पूर्व कह चुके हैं, भी युक्तपिहार यही है कि रात्रि के प्रथम जो अन्तिम प्रहर में जागरण औ मध्यके दो प्रहर में शयन इत्यादि। - - १२१ प्रतिजलदर्शनप्रकाशे- कर प्रेरणा करते हो तो मैं करता हुं ऐसे नहीं (१) । यद्या फलेच्छापरित्यागपूर्वक कर्मो का अनुष्ठान करना हा यहां ईश्वरप्रणिधान जानना, जैसा कि गीता में कहा है-- "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदा चन, मा कर्मफलहेतु- भर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि" हे अर्जुन ! कर्मों के अनुष्ठान में ही तुमें अधिकार है, श्री को के फल में कदापि अधिकार नहीं, अतः फल के अर्थ कर्म का अनुष्ठान मतकरो, पो (निरर्थक कर्म करने में क्या फल होगा') इस कुतर्क से कर्मों के अनुष्ठान में आमक्ति का प्रभाव भी मत करो किन्तु निरन्तर कर्म करते ही रहो, यह कृष्णवाक्य का अर्थ है। भयांत्-ईश्वर की प्रसन्नता के अर्थ मृत्यवत् निष्कामकर्मानुष्ठान का नाम ईश्वरप्रणिधान है। यह सब क्रिया योग का साधन हैं इसलिये इन को क्रिया- योग कहा जाता है। विष्णुपुराणान्तर्गत खाण्डिक्यकशिध्वजसंबाद में मी पहिले इस क्रियायोग का ही उपदेश किया है। एवं भगवान् ने गीता में भी-“पारुरुक्षोर्मुनेयोगं कर्म कार- गामुच्यते” इस वाक्य से प्रारुनु (२) योगी के प्रति पहिले क्रियायोग ही करना कहा है॥ १॥ इदानी (इस क्रियायोग से क्या फल लब्ध होता है) इस आकांना को निवारणार्थ क्रियायोग का फल कहते है- (१) भगवान् ने भी गीता में “ पत्करोपि यदनासि यजुहोमि ददामि यद्, यन्तपरयासिकोतय तत्कुरवादर्पणम् । इमवाक्य से-( हे कौन्तेय नो पारो या भक्षण कारो या यज्ञ को वा दान करो ह सब मेरेही अपर्ण करो" तुम कार्य प्रबार अणि को ही ईश्वरप्रणिधान कहा है। (२) योगेन्छु का नाम आररक्षु है। इम साधनपादः। . 'स हि क्रियायोगः* सू० समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२॥ भाषा-(स हि क्रियायोगः ) सो यह पूर्व उक्त क्रियायोग, 'समाधिभावनार्यः' समाधि की भावना-सिद्धिरूप प्रयोजनवाला है, (च) और 'क्लेशतनूकरणार्थः, क्लेशों को सूक्ष्म करदेने रुप प्रयोजन वाला है। वहा 'अनुष्ठेयः' इस पद का अध्याहार कर यह अर्थ करना कि- सो यह क्रियायोग समाधि की सिद्धि के अर्थ श्री क्लेशों की सूक्ष्मता के अर्थ अनुष्ठान करना उचित है। अर्धात्-यह क्रियायोग आसेव्यमान (सम्यक्प्रकार सेवनकिया हुया ) समाधि की भावना (उत्पत्ति वा सिद्धि ) करदेता है औ क्लेशों को सूक्ष्म कर देता है। इस ( १ ) ब्रिायायोगद्वारा सूक्ष्म किये हुये क्लेशों को ही फिर योगी प्रसंख्यानरूप अग्नि से दग्धबीजतुल्य संपादन कर अन- सवधर्मी (२) करदेता है। भाव यह है कि यथा अंगारमध्यपतित बीज अंकुरोत्पादन -(*) इतना पाठ भाष्यकारों ने सूत्र के आदि में अध्याहार किया है। (१) यदि निया योग के अनुष्टान से हो क्लेश सुक्ष्म हो सकते हैं तो फिर प्रमख्यानसंज्ञक विवेकख्याति किम किये है, इस आशङ्का का वारन वारते हुये " प्रतन् कृतान् क्लेशान् प्रमख्यानाऽग्निना दग्योजकल्पानप्रसवर्मिणः करिष्यति " इस भाष्य को अनुवाद करते हैं.." इस क्रिया " इत्यादि से । (२) नो अपने फुर उत्पादन में समर्थ न होय वह यन्ध्य यो अप्रसवधर्मी कहे नाते हैं, अर्थात्--कियायोग का क्लेशों को सूक्ष्म कर देना ही कर्तव्य है कुछ क्लेशों को (वय ) दग्य करदेना नहीं, ओ प्रसझ्यान तो बन्ध्य करदेने में भी समर्थ है, परन्तु पिना सूक्ष्म हुये क्लेशों का वध होना असम्भव है अतः क्रियायोग भी प्रमयान दोनों ही उपादेय हैं। .
१२६ पातञ्जलक्ष्शनकाशे- में असमर्थ होता है तैसे वलिष्ट विरोधी क्लेशों से संवलित अन्तः- करण में प्रधान पुरुष का विवेक होना दुर्घट है अतः प्रथम क्रिया हुये योग के अनुष्ठानद्वारा क्लेशों को सूक्ष्म करे फिर सूक्ष्म क्लेशों को प्रसंख्यानअग्नि से दग्धतुल्य करे कि जिस में वह क्लेश अपने संस्काररूप अंकुर को उत्पन्न न कर सकें। क्लेशों के तनूकरण (मूक्ष्मकरण ) से अनन्तर फिर क्लेशों कर अनभिभूता हुया सत्वपुरुषान्यताख्यातिसज्जक विवेक सहज ही उदय हो जाता है, तदनन्तर ऋतम्भराप्रज्ञा भी योगी को अनायास से हीलब्ध हो जाती है। परन्तु यह विवेकख्याति भी तावत्काल ही विद्यमान रहती है कि यावत्काल निरोधसंज्ञक असम्प्रज्ञातसमाधिका लाभ नहीं होता क्योंकि निरोधकाल में यह प्रज्ञा भी समाप्त अधिकार (१)-- होने से प्रतिप्रसव (विलयभाव) के लिये समर्थ हो जाती है, (२) अर्थात्--यह प्रजा भी निरोधकाल में लय हो जाती है ॥ २ ॥ (जिन क्लेशों को क्रियायोग सूक्ष्म करता है वह क्लेश कौन हैं और कितने हैं) इस आशंका के शमनार्थ संख्या सहित क्लेशों का स्वरूप निर्देश करते है। सू० अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाःपञ्च क्लेशा।३। भाषा-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश, यह पांच वनेश हैं। (१) समास-नाश किया है सत्व आदि गुणों का भी श्लेशों का कार्यजनन सागर्य जिस ने यह समाप्तअधिकार याली कहो जाता है । (२) अर्थात्-सत्तपुरपा यताख्याति भी गुणों का वाय होने से हेय हो हे इम रिये विकरयाति की प्राप्तिगात्र से ही अपने को कृतकृय मत समझे चिन्तु निरोधत- गाधिद्वारा इस का भी रप करे, यह सर तृतीय पाद में १८ इस सूत्र के व्याख्यान मेंस होगा- , साधनपादा। १२७ अर्थात्-अविद्या प्रादि पंच, क्लेश का हेतु होने से क्लेश कहे जाते हैं, औ यही पंच विपर्याय भी कहे जाते हैं (१) । यद्यपि मिथ्याज्ञान, विषlवज्ञान, अविद्या, इन तीनों को एकार्थक होने से अविद्यासंतक क्लेश ही विपर्यायस्वरूप है तथापि अस्मिता आदि चारों क्लेशों का भी अविद्या सद्भाव अधीन सद्भाव औ अविद्या समुच्छेद अधीन समुच्छेद होने से वह भी अविद्यामूलक होने से विपर्यय ही हैं। यह (२) क्लेश ही स्यन्दमान (उदारावस्थावाले) हुये सत्त्वाटिगुणों के कार्योत्पादनरूप अधिकार को दृढ़ करते हैं, प्रौ पुनः वह क्लेश ही कार्यकारणप्रवाह को उत्पन्न करते हैं, भी यह क्लेश ही परस्परअनुयह के अधीन होकर (३) कमों के फल को निष्पादन करते हैं ( ४ ) । भाव यह है कि-जिस हेतु से यह क्लेश ही उदारावस्थापन्न होकर सत्त्वादिगुणों को कार्योत्पादन में औन्मुख्यकर गुणवैषम्य- रूप परिणाम द्वारा प्रधानमहत्तत्त्व आदि परम्परा से कार्यकार- णरूप परम्परा को निष्पादन कर कर्मफल जन्म आदि का हेतु होते हैं इस हेतु से अनर्थ परम्परा के हेतुभूत यह क्लेश अवश्य ही डेय है ॥३॥ (१) यहां पर भाष्यकारों ने "मेशा इति पच विपर्यया:" इस भाष्य से इन को विपर्यय कहा है, इस से विपर्यय भी इन का नाम जानना, यह तत्त्व है। (२) ससार का कारण होने से केश हेय हैं इस आशय से " ते स्यन्दमानाः गुणाधिकार द्रढयन्ति " इत्यादि भाष्य का अनुवाद करते हुये श्लेशों को ससार का कारण कहते हैं-" यह " इत्यादि से । (३) अविद्या से राग राग से कर्म कर्म से जन्म जन्म से छेश लेश से फिर को कर्म से फिर जन्म जन्म मे फिर राग इत्यादि प्रकार से परस्पर अनुग्रह अधीन ही क्लेशादि सप्तार के हेतु हैं, यह तत्व है । ( ४ ) प्रथम गुणों का अधिकार फिर गुणवेपम्य फिर सृष्टि, यहि सृष्टि का क्रम है १ पूर्व १२८ पातालदर्शनमकाशे- यविद्यामूलक होने से यह क्लेश अवश्य ही हेय है, इस भाशय से क्लेशों को अविद्यामूलक कहते हैं- सू० अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नो- दाराणाम् ॥४॥ भाषा--(प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ) प्रसुप्त-ननुवि: छिन्न-उदार सज्जक चार भेदों में विभक्ता 'उत्तरेषाम्' सूत्रोक्त अविद्या से परवर्ती अस्मिता आदि चारों क्लेशों की (अविद्या) प्रथम उक्त अविद्या ही-( क्षेत्रम् ) मूल कारण है। अर्थात्-प्रसुप्त आदि भेद से चार प्रकार के जो अस्मिता आदि चार क्लेश हैं उन सब का अविद्या ही मूलकारण है। प्रसुप्त जो राग आदि क्लेश विदेह-प्रकृतिलयों के (१)चित्त में विद्यमान हुये वाद्य प्रकाशमान नहीं होते हैं औ न कुछ अपने कार्य करने में समर्थ होते हैं किन्तु दुग्ध में दधि की तरह वीजभाव से अवस्थित हुये स्वकार्य जनन की शक्तिवाले हैं वह प्रसुप्त कहे जाते हैं। अर्धात्-पूर्वपाद उक्त विदेड तथा प्रकृतिलय जब तक अपने ध्येय तत्त्व में तीन रहते हैं तब तक उन के चित्त में अस्मिता- राग धादि क्लेशों का न तो प्रकाशही होता है औ न वह क्लेश कुछ कार्य ही कर सकते हैं किन्तु सूक्ष्मरूप से शक्तिमान (अना- गतावस्था) से एतादृश विद्यमान रहते हैं कि मानों सोये ही पड़े हैं, अतः यह क्लेश प्रसुप्त कहे जाते हैं परन्तु यह सुप्त भी तवी तक रहते हैं कि यावत्काल इन दोनों की अवधि पूर्ण नहीं होती, श्री जब फिर अवधि के अनन्तर विदेह प्रकृतिलय उत्थित हो जाते हैं तब फिर उन के संमुख उत्तेजक (१) विदेह प्रकृतिलयों का निरूपण पूर्वपाद के १९ सल की व्यारया में देखा।
१२९ साधनपदः २ विषय की उपस्थिति होने से वह क्लेश भी अंकुरित हो कर अपने कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं, अर्थात् जैसे प्रसुप्त पुरुष किसी उत्तेजक में प्रबुद्ध हुये अपने कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं तैमे यह तत्त्वतीनों के क्लेश भी प्रबुद्द हुये अपने कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं। श्री जो पुरुष विवेकल्यातियुक्त हैं उन के क्लेश प्रसंख्यान अग्नि से दग्ध हो जाते हैं अतः वह क्लेश प्रसुप्त नहीं जानने (१)। दग्ध वलशों से प्रसुप्त क्लेशो में यही वैलक्षण्य है कि प्राप्त क्लेशों का विषयसन्निधि से प्रबोव हो जाता है और दग्ध क्लेशों का योगसम्पत्ति बल से विषयमदिनधि होने पर भी प्रवोध नहीं होता है, क्योंकि “ दग्धवीजस्य कुतः प्ररोहः” अर्थात्- दग्धबीज का प्ररोह कैसे हो सकता है। जैसे दग्धवीज अंकुरोत्पादन में असमर्थ हैं तैमे दग्धवलेश भी अपने कार्यकरने में असमर्थ हैं, यह फलित है। विवेकख्याति द्वारा क्लेशों का दाइ होने से ही यह योगी क्षीणक्लेश, तथा कुशल, प्रो चरमदेव ला (२) कहा जाता है। तथाच-यह दग्धबीजभावतंत्रक पंचमी क्लेशअवस्था योगी के ही चित्त में विद्यमान रहती है विटेहादिकों में नहीं यह निध्यन्न हुया । यद्यपि सिद्धान्त में सत्कार्य वाद के अंगीकार से विद्यमात- (१) बिना धिवकल्याति के उदय से लशों का नाश होना असम्भव है, ओ विदेह प्रकृत्तिलयों को विवेकाहाति उदय नहीं हुयी, आत. विदेह औ प्रकृतिलय प्रसप्त क्लेश याले हैं दग्धलेश धाले नहीं यह भी जानो । (२) जिस देश से अनन्तर फिर अन्य देह का योग नहीं होता है यह 'घरगदेह कहा जाता है, योगी को मुक्त होमे से फिर देह का योग होता नहीं इसलिये योगी भगमदेह वाला कहा जाता है, यह भार है।
ब पातजलदर्शनमकाशे- पदार्थ के अत्यन्ताऽभाव का अस्वीकृत होने से क्लेशों की विद्यमा- नता योगी के चित्त में भी अवश्य माननी उचित है एवं च यो- गबल से विषयों की सन्निधि होने से प्रसुप्त क्लेशों की तरह दग्ध क्लेशों का भी प्रवोध होना उचित है तथापि विद्यमानक्लेशों का विवेककाल में बीजरूपसामर्थ्य नष्ट होने से विषय सन्निधि होने पर भी इन का प्रवोध नहीं होता है यह जानना (१)। भाव यह है कि यद्यपि क्लेशों का अत्यन्ताभाव न होने से योगी के चित्त में क्लेश विद्यमान ही है तथापि उन में जो कार्यकरणरूप सामर्थ्य था सो विवेकख्याति से नष्ट हो गया है, अतः वह विषयसन्निधि होने पर भी आविर्भूत नहीं होते है (२)। तनु-जो (३) क्लेश अपने प्रतिपक्षीभूत (विरोधी) तपस्वा ध्याय आदि क्रियायोग के अनुष्ठान से उपहत हुये सूक्ष्म हो. जाते है वह तनु कहे जाते है। यहा अविद्या ऑदि पांचो के यथाक्रम विरोधी भूत सम्यग्- जान, विवेकज्ञान, माध्यस्थ्य, (४) अहंताममतात्याग के होने से जो क्लेश कृशित हो जाते है वह तनु जानने। (1)" सता लेशानां तदा माजसामर्थ्य दग्धमिति विषयस्य समुग्वाभावेऽपि मति न भवस्येपा प्रबोधः" इस भाष्य का यह अनुवाद है। ( २ ) जैसे स्वरूप से विद्यमान मना हुआ घणा सलिलधरणा सयाग के होने पर भी अङ्कुरोत्पादन में असमर्थ है तैमे योगी के चित्त गत्त क्लेश मा दग्ध हुये सवार्य करने में असमर्थ (न पुसक) होने से अविद्यमान तुल्य ही हैं यह तत्व है । (३) इस प्रकार क्लेशों की सुप्त ओ दग्ध अवस्था का प्रतिपादन कर इदानी प्रतिपक्षभावनोपहता क्लेशास्तना उच्यते " इत्यादिभाष्य वा अनुवाद करते हो सनु क्लेशों का लक्षण करते हैं-'नो' इत्यादि से | (४) यह ग्रहण करने योग्य है ओ यह त्याग करने योग्य है इस प्रकार अनु- कल प्रतिक ज्ञान का जो अभार का माध्यस्थ्य है, यह र गद्वेष का प्रतिपक्षी है । .
साधनपाद: २॥ विच्छिन्न = जो क्लेश वीच बीच में विच्छिन्न विच्छिन्न हो (अन्तरा पाकर) फिर तिसी रूप से आविर्भूत हो जाते हैं वह विच्छिन्न कहे जाते हैं। अर्थात्-राग के आविर्भावकाल में क्रोध का आविर्भाव न होने से जो अदृश्यमान क्रोध वह विच्छिन्न कहा जाता है, एवं एकवस्तुविषयक उत्कट राग होने से जो अन्यवस्तुविषयक अनु- त्कट अदृश्यमान राग वह भी विच्छिन्न जानना। भाव यह है कि-किसी वस्तु में पुरुष का राग देखने से अन्य पदार्थ में यह पुरुष विरक्त है ऐसे मत जानना क्योंकि यह कभी भी सम्भव नहीं हो सकता है कि चैत्रनामक पुरुष एक स्त्री विषयक रक्त (प्रीतियुक्त ) है औ अन्य में यह विरक्त है किन्तु एक स्त्री- विषयक उत्कट होने से राग लञ्चवृत्ति अर्थात् उदार है औ अन्य स्त्रियों में राग भविप्ववृत्ति अर्थात् विच्छिन्न है। परन्तु इतना विशेष है कि-गम के आविर्भावकाल में जो अनुरकट क्रोध है वह विजातीय राग की उदारताप्रयुक्त विच्छिन्न है यो एक विषयक राग के आविर्भावकाल में जो अन्यत्र अनुत्कट राग है वह सजा- तीवराग की उदारता प्रयुक्त विच्छिन्न हैं। औ यह भी नियम नहीं है कि जिसकाल में एक क्लेश उदार होता है उस काल में अन्य क्लेश विच्छिन्न ही होते हैं किन्तु कहीं अन्य क्लेश प्रसुप्त हैं औ कहीं तनु हैं औ कहीं विच्छिन्न हैं (१)। (1) साख्ययोगमत में सत्कार्य्यवाद होने से अविद्यमान पदार्थ का प्रादुर्भाव नहीं माना जाता है अत चालकों के चित्त में अविद्या को उदार मान कर राग गादि को प्रसुप्त वा तनु जानना नहीं तो प्रौढ अवस्था में उन का प्रादुर्भाव नहीं होगा, एव तत्वलीन विदेहादि के चित्त में अविद्या को उदार गान कर रागादि केशों को प्रसुप्तनानना नहीं तो अवधि से अन-तर उन का उद्भव नहीं होगा, औ विच्छिन्न का उदाहरण तो मूळ में स्पष्ट ही है, इस प्रकार एक क्लेश की सदाराऽवस्था में गन्य क्लेश कोई प्रसुप्त कोई कहीं तनु कोई कहीं विच्छिन्न जानना ।
ঘননিকায়- उदार = प्रयने विषय में लब्धवृत्ति होने से जो उत्कटरूप से वाह्य प्रकाशमान हुये अपने कार्य में तत्पर है वह क्लेश उदार कहे जाते है। यद्यपि उटाराऽवस्थापन्नाही रागपादि, क्लेश का जनक होने से दक्षिणपदवाच्य प्रौ हेय (त्याज्य) हो सकते हैं अन्य नहीं तथापि प्रसुप्त अादि तीनों भी भविष्याकाल में उदाराऽवध पन्न हुये क्लेश का जनक होने से क्लेश पटवाच्य यो देव जानने। अतएव भाष्यकारों ने "सर्व एवैते क्लेशविषयत्वन्नातिका- मन्ति” (१) इस वाक्यसे चारो अवस्थाचाले रागादि को क्लेश कहा है। यद्यपि (२) क्लेगत्वेन क्लेश एक ही है तथापि तत्तद् उठा- राटिअवस्था विशिष्ट को भिन्न २ मानकरचार प्रकारको जानने । यह चार भेटों में विभक्षा जो दलेश है वह से प्रतिपक्षीत निया योग के अनुष्ठान से सूक्ष्म हो जाते है तैसे विषयासक्ति विषय-चिन्तन प्रभृति उत्तेजक से उदार भी हो जाते हैं, एवं च यथा क्रियायोग क्लेशों की मूक्ष्मता का कारण है तथा विषयग्रासक्ति का प्रभाव भी .वलेशों की तनुता (सूक्ष्मता - कृशता) का हेतु जानना। यह सब पूर्वोक्त क्लेश अविद्या के ही भेद है क्योंकि इन सव में अविद्या ही अनुगत है, अर्थात्-जो वस्तु अविद्या से उपरिधत होता है गगादिकलेश भी उप्ती में लब्धवृत्ति वाले हुये उदार (१) यह सब ही अर्थात् चारो अवस्थानाले ही राग आदि क्ले शपद वाच्यता यो उलघन नहीं कर सकते, अर्थात् सब ही उदार हुये क्लेश जनक हैं यह भाष्यका अर्थ है । (२) यदि सब उदाराऽस्थापन हो सकते हैं तो चारमेद क्यों, इस आशड्डा या वारण करते है ( यद्यपि ) इत्यादि से। , सांधनपादः २। हो जाते हैं, अतः अविद्या के अन्वयव्यतिरेकानुसारी होने से (१) 'यह सब विद्यास्वरूप ही हैं। अविद्यास्वरूप होने से ही यह क्लेश विपर्यय ज्ञानकोल में उपलब्ध होते हैं औ सम्यग्ज्ञान द्वारा विषय॑ज्ञान के नाशकाल में यह नष्ट हो जाते हैं यद्यपि दग्धसतक पंचमी क्लेशावस्था का भी योगिजना- ऽनुभवमिद होने से सूत्रकार को निरूपण करना उचित धा तथापि. दग्धअवस्था को अविद्यामूलकत्व के अभाव से प्रसुप्त आदि चार ही अवस्था का निरूपण किया गया है। भाव यह है कि इस सूत्र में हेय क्लेशों की:ही यवस्था का निरूपण किया है कुछ उपादेय अवस्था का नहीं, अतएव (अविद्याक्षेत्रम्)-इस पद से सब को अविद्यामूलक कहा है, पौ पञ्चमी दग्धश्रवस्या अविद्या का विरोधी होने से उपादेय है, अतः तत्काधनाभाव प्रयुक्त न्यूनत्व दोष नहीं जानना। यद्यपि (१) तनु अवस्था के सम्पादनार्थ क्रियायोग का निरूपण करनेसे तनु अवस्था भी उपादेय ही है कुछ हेय नहीं एवंच तनु अवस्था को अविद्यामूलक कहना उचित नहीं तथापि असम्प्रज्ञांतयोगी के लिये वह भी हेव होने से अविद्यामूलक ही है यह जानना । अर्थात्-क्रियायोगद्वारा क्लेशों की तनुअवस्था सम्पादन (1) अविद्या के होने से क्लेशों का होना शन्वय है यो अविद्या के अमाव से क्लेशों का अभाव हो नाना व्यतिरेक है। इसी को स्पष्ट करते हैं " अविद्यास्वरूप " इत्यादि से। (२) यदि हेय कोशों का ही निरूपण किया है तो तनु अवस्था का निरूपण क्यों किया क्योंकि यह उपादेय है, इस आशङ्का का नियारण करते हैं ( यद्यपि ) इत्यादि से।
१३४ पातञ्जलदर्शनकाशे- करने का यही प्रयोजन है कि वह तनु हुये प्रसध्यान अग्नि सेंदग्धवीज हो जाय कुछ उपादेयता के लिये तनु अवस्था का सम्पादन नहीं है। दो० तत्त्वलीन (6) जन सुप्त-युत, तनु-युत योगी जान । कभी विच्छिन्न उदार पुन, संसारिक जन जान ॥४॥ इन पांचो क्लेशों में से प्रथम अविद्या का स्वरूप कधन करते हैं- सू० अनित्याऽशुचिदुःखाऽनात्मसु नित्यशुचि- सुखाऽऽत्मख्यातिरविद्या ॥५॥ भाषा-(अनित्याऽशुचिदुःखाऽनात्मसु ) अनित्य, पशुचि, दुःख, अनात्म इन चारों में, यथाक्रम जो (नित्यशुचिमुखात्म- ख्याति) नित्य, शुचि, सुख, आत्म ज्ञान, वह (अविद्या) अविद्या- पद का वाच्य है (१)। अर्थात्-स्वर्गादि अनित्य प्रपञ्च में नित्यज्ञान, औ अशुचि शरीरादि में, शुचितान, ओ दुखरूप विषयभोग में सुख नान, प्रनात्मभूत बुद्धि इन्द्रिय शरीरादि में आत्मज्ञान, वह चार प्रकार का विपर्यज्ञान अविद्या पद का वाच्य है। ( * ) इस सुत्रस्थभाष्य-वो व्याख्या की समाप्ति में याचस्पति मिश्र ने "प्रमु- ता-तत्त्वलीनाना तन्वरस्थाश्च योगिना, विछिन्नोदारख्याश्च क्लेशा विषयसङ्गिनाम् " यह शक लिखा है, उसी का दोहा से अनुवाद करते हैं-( तत्वलीन " इत्यादि से- विदेहादितत्वलीनों के क्लेश प्रसुप्त हैं औ योगियों के क्लेश तनु हैं, औ विषयी पुरपों के क्लेश पिच्छिन्न तथा उदार हैं, यह श्लोक औ दोहे का अर्थ है । एव योगारूट तथा ज्ञानियों के क्लेश दम्भ है.यह भी जानलेना- (१) यद्यपि रक्षण का प्रकरण होने से प्रथम लक्षण कथन कर फिर ही अ- विद्या का भेद निरूपन करणा उचित था तथापि प्रथमपादस्थ सप्तममूत्रोक्त रीति से आवद्या पद की यावृत्ति कर ( नविद्या विद्या) अर्थात् विपर्ययज्ञान अविद्या पद का पाच्य है, इस प्रकार दोपाभाव नान लेना ।
साधनपाद:२॥ भाव यह है कि-जन्य (कार्य) होने से अनित्य जो पृथिवी यादि प्रपञ्च इस में (पृथिवी तथा नक्षत्र चन्द्रादि सहित स्वर्ग नित्य है एवं देवता भी अमृत-मरणहित होने से नित्य है,) इस प्रकार जो विपर्ययज्ञान वह अनित्य में नित्यत्तानस्वरूप प्रथम अविद्या है (१)। एवं परमवीभत्स = अत्यन्तविकृत पूयशोणितपूरित अस्थि- चित मांसलिप्त चर्मवेष्टित मबहाराविनिष्क्रान्त स्त्री के अशुचि शरीर में जो (यह कन्या ऐसी कमनीया है कि मानों नूतन एक चन्द्र की रेखा है तथा मधु यौ अमृत के अवयवों से ब्रह्मा ने इस की रचना कियी है, मानों अभी चन्द्रमण्डल को भेदन कर वाह्य निसृत हुयी है, औ नीलकमलदल तुल्य विस्तृत नयनों से युक्त हुयी हावभाव-कटाचादि गर्भित लोचनों से मानों जीवों को यह धैर्य दे रही है कि तुम मृत्यु से मत भीत हो मै तुम्हारी रक्षा करूंगी ) इस प्रकार पवित्रता का वा कमनीयता का ज्ञान वह अशुचि में शुचिज्ञानरूप द्वितीय अविद्या है। यह पूर्वउक्त प्रत्यक्ष सिद्ध शरीर की अपवित्रता ही योग- भाष्यकारों ने “स्थानाद् वीजादुपष्टम्भान्निप्पन्दान्निधनादपि कायमाधेयशोचत्वात्पण्डिता ह्यशुचिं विदुः" । इस श्लोक से युक्तिपूर्वक निरूपण कियी है। (१) एच जो पुरुष पचभूतों को नित्य मानकर वायु वा नल स्वरूप होने के लिये अश्या आकाशाद में क्य होने के लिये पचभूतों का उपासना करते हैं एत्र जो पुरषच दाद वर्गलोक के प्रत्यर्थ धूमादिमार्गहेतु उपामना था अनुष्याा परते हैं एय यो म्प देवताओं को अमर मानकर अपने अगर होने के लिये ( अपामगोमामृतासम्म इत्यादि युतियों के यश होकर यज्ञादिमें सोमाता का पान करते हैं यह सब विपर्यय- ज्ञानी है। हैं, क्योंकि इन सवय अनि य में नित्य सा है यह फरित हुआ।
पातालदर्शनप्रकाश- स्थान नाम स्थिति के आधार का है अर्थात्-मलमूत्रप्रभृति, टुन्धिवस्तु से लिप्त जो अत्यन्त अपवित्र माताका उदर वह तो इस शरीर को उत्पत्ति का स्थान अर्थात् क्षेत्र है, एवं अत्यन मलिन जो माता पिता का रजवीर्य वह इप्त का (बीज) उपादान कारण है,एवं भुक्तपीत अन्नजलादि के परिपाकसे उत्पन्न जो रुधिरादिरूप से परिणत रस वह इस शरीर का उपष्ठम्भ है, अर्थात् घाश्रय है क्योंकि इस रस ने ही शरीर को धारण किया है, एवं मल मूत्र प्रस्वेद प्रभृति अपवित्र पदार्थों का इस शरीर से निप्पन्द (१) होता है, एवं निधन अर्थात् प्रावियोग के अनन्तर यह शरीर अस्पृश्य हो जाता है क्योंकि चाहे वेदपाठी हो वा जानी हो मृतकशरीर उन का भी अपवित्र ही माना जाता है, एवं यह शरीर प्राधेवशौच है अर्थात् जैसे कामिनी स्वतः निर्गन्ध अपने शरीर में श्रडाराग (अवटन) द्वारा गन्य की प्राधेयता कल्पना-भा- बना कर लेती है तैसे जलमृत्तिकादि द्वारा शरीर में शुद्धि का माधान किया जाता है वस्तुतः उस मृत्तिकादि से वह शरीर पवित्र नहीं होता। इस प्रकार स्थान बीज-उपष्ठम्भ निष्यन्द निधन-अधेियशोच तारूप हेतुओं से पण्डितगण इस काय को अशुचि ही मानते हैं, शुचि नहीं, यह इस श्लोक का अर्थ है। इस प्रकार के (२) अशुचि शरीर का भला किस चन्द्ररेखा से क्या सम्बन्ध है अर्थात् दुर्गन्धपूरित शरीर का मधुअमृतादि उपमा के संग संबन्ध ही स्या, परन्तु पूर्वोक्त प्रकार से अशुचि में (१) निस्पन्दनाम प्रस्त्रवण (झरने ) का है। (२)' कस्य केनाऽभिमम्बन्ध । इत्यादि भाष्य का अनुवाद करते हैं । प्रचार के' इत्यादि से। इस - १३७ साधनपादः २। शुचिरूप विपर्याय ज्ञान होता है, अतः यह भी अविद्या ही है। अशुचि में शुचिबुद्धि के प्रदर्शन से अपुण्व हिंसादि में जो मीमांसको को पुण्य ज्ञान, तथा अर्जन पालन प्रभृति दुःख- बाहुल्य से अनर्थजनक धन में जो अर्थ ज्ञान वह भी अविद्या- संतक विपर्यय ही जानना (१) एवं विषयभोगरूप दुःख में जो सुखज्ञान वह भी एक अविद्या ही है, जिस प्रकार विषयसुख दुःखरूप है वह प्रकार सूत्रकार (परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेवसर्वं विवे- किनः, पाद २ सू १५ से) आप ही कथन करेंगे, इस से यहां कहने की कुछ आवश्यकता नहीं। एवं देह के उपकरणभूत अात्मभिन्न पशु भृत्य थादि चेतन पदार्य, तथा शय्या आसन गृह स्थानादि अचेतन पदार्थ, एवं मेगाऽधिष्ठान . शरीर, औ पुरुप का उपकरणभूत मन, इन सव अनात्मपदार्थों में जो आत्मज्ञान वह चतुर्थी अविद्या है। पञ्चशिखाचार्य ने भी " व्यक्तामन्यक्तं वा सत्त्वमात्मत्वेनाs- भिप्रतीत्य तस्य सम्पदमनु नन्दति आत्मसम्पटं मन्वानस्तस्य व्यापदमनु शोचत्वात्मव्यापटं मन्नानः स सर्वोऽप्रतिवुद्धः वाक्य से पूर्वोक्तप्रकार से ही अनात्मविषयक प्रात्मख्याति का इस निरूपण किया है। अर्धात्- -व्यक्त न अन्यक्त जो सत्त्व अर्धात्-पुल, कलत्र, यह, क्षेव प्रभृति चेतन जड पदार्थ, इन सब को अात्मत्वेन अभिप्रतीत (१) मे गशुचि में शुनि बुद्धि भ्रम है तैमे अपुष्य यो अनर्ध में पुण्य गो अर्थ भी श्रम ही है यह तत्वहे। (*) शरीर में स्थित होकर पुरष भोग भोगता है इमरिये शरीर को भागाधे. धान कारा जाता है । एय सुवादिभाग में मन यो माधन होने से म्न उपकरण है। (1) व्यक्त नाम चेतन पुतादि का भी अन्यक्त नाम ना प्रहादि का है।
१३८ पातालदर्शनकाशे- कर अर्थात् आत्मा यो प्रात्मीय जानकर, जो पुरुप इन की सम्पत्ति को अपनी सम्पत्ति मान कर पानन्द को प्राप्त होता है एवं इन की हानि को अपनी हानि मान कर शोक को प्राप्त होता है वह पुरुष अप्रतिबुद्ध (अन्नानी) जानना (१) यह पञ्चशिखा- चार्य जी के वाक्य का अर्थ है। यह (२) चार प्रकार की * अविद्या ही रागद्देषादि क्लेश प्रवाह का तथा रागद्देपजन्य धर्म-अधर्म का एवं धर्माऽधर्मजन्य सुखदुखादि का मूलकारण है। यहां पर अविद्याशब्द में न ज का अर्थ विरुद्ध जानना कुछ प्रभाव नहीं। अर्थात्-(३) जैसे अमित्रशन्द में न ञ् का ( ४ ) अर्थ विरुद्ध होने से मित्रविरुद्ध शत्रु रूप अर्थ प्रतीत होता है श्री अगो- प्यद शब्द से गोखुरविरुद्ध विपुल देश का बोध होता है तैसे अवि- द्याशब्द में भी न ञ् का अर्थ विरुद्ध मानकर विद्याविरुद्ध विपर्यय ज्ञान का ग्रहण करना। . (१) अर्थात्-आमा से भिन्न असत्य-जड रूप अत करण, देह तथा देह के अङ्गभूत पुत्र कलन क्षेत्र प्रभृति अनात्मपदार्थों को आत्मा वा आत्मीय मानकर जो पुरुप इन की वृद्धि या हानि से अपनी वृद्धि वा हानि मानते हैं वह विपर्ययज्ञानवाले हैं। (२)" एपा चतुष्पदा भवत्यविद्या मूलमस्य क्लेशसन्तानस्य कर्माशयस्य च सविपाकस्य " इस भाष्य का अनुवाद करते हैं ( यह ) इत्यादि से । (*) यद्यपि दिग्भ्रम शुक्तिरजतादिभ्रम भेद से अविद्या अनन्त है तथापि कलेशों का मूलभूत यह चार प्रकार की ही है, इसलिये चारविध कही गयी है। (३) "तस्याश्चाऽमित्राऽगोष्पदन्ट् वस्तुसत्तत्व विज्ञेयम् " इस भाष्य के अर्थ वो स्पष्ट करते हैं ( गात् ) इत्यादि से । गोष्पदनाम गाय के खुर का है । (४) अमित्र अगोषद आदि शब्दों में आदि का वर्ण नो (अ) है वह कहा जाता है। ।
साधनपादः २। भाव यह है कि जैसे अमिवंशब्द न तो मित्राऽभाव का वाचक है औ न मिखमात्र का किंतु मिनविरुद्ध शत्रु रूप अर्थ का वाचक है औ अगोष्पदशब्द भी न तो गोखुर के अभाव का बोधक है श्रौ न गोखुरमात्र का बोधक है किन्तु गोखुरविरुद्द विस्तृत देश का वाचक है तैसे यहां पर अविद्याशब्द भी न तो तत्त्वज्ञान का ही वाचक है यो न तत्त्वज्ञान के अभाव का ही वाचक है किन्तु तत्त्वज्ञान से विरुद्ध जो मिथ्याज्ञान उस का वाचक है ॥ ५ इदानीं इस अविद्या का कार्य्यभूत जो बुद्धिपुरुष का अवि- वेकरूप द्वितीय अस्मितासजक क्लेश उस का लक्षण कहते हैं। सू० हग्दर्शनशक्तचोरेकात्मतेवाऽस्मिता ॥ ६ ॥ भाषा-(दृग्दर्शनशक्त्योः ) दक्शक्ति-दर्शनशक्ति मञ्जक पु- रुपचुद्धि की जो (एकात्मता दुब) अभिन्नता सी प्रतीत हो जानी, वह (अस्मिता ) अस्मितासनक क्लेश है। दृकशक्ति * नाम पुरुष का है क्योंकि यह सब का द्रष्टा है औ दर्शनशक्ति नाम बुद्धि का है क्योंकि यही विषयाकार से परिण हुयी दृश्य-विषयरूप को प्राप्त होती है, यह दोनों परस्पर अत्यन्त विभक्त हैं, तथापि पूर्वोक्त अविद्या के बन्न से जो इन दोनों का एकरूपत्व वा तादात्म्यभाव सा प्रतीत हो जाना यही अस्मिता है। इस अस्मिता के होने से ही (अहं अस्मि ) अर्थात् मैं हूं वा मैं सुखी हूं इत्यादि व्यवहार होता है। वस्तुतः बुद्धितत्त्व परिणामी मलिन तथा जड़ है श्री पुरुष कूटस्थ शुद्ध तथा चेतन है इसलिये इन दोनों की एकता होनी असम्भव है परन्तु विवेक के अभाव से एकता सी प्रतीत होती है, इसके वोधनार्थ सूत्रकार ने (एकात्मता दूव) यह 'इव' पद दिया है। " पुरषोडशक्तिद्रिदर्शनशक्तिः" इत्यादिभाष्य का अनुवाद करते है "शक्ति " इत्यादि से।
१४० . पातालदर्शनमकाणे- अत्यन्त (१)असकीर्ण (विलक्षण) शेने मे परस्पर अत्यन्त भिन्न जो भोक्तृशक्ति-भोग्यशक्तिसंतक पुरुप यो बुद्धि, इन दोनों की जो यह अविभागप्राप्तिरूप अस्मिता यही पुरुष को भोग का हेतु है क्योंकि इस अम्मिता के होने से ही पुरुष अपने को कर्ता भोक्ता मानता है। औ जब फिर विवेकख्यातिहारा अस्मिता का नाश होने से पुरुष को अपने रूप का साक्षात्कार हो जाता है तव भोग के प्रभाव होने से केवल हुया कैवल्यसञ्जक मुक्तिपट के लाभ से पुरुष अपने को प्रभोक्ता मानता है। एवं च अन्वयव्यतिरेक से यह अस्मितासन्जक अविवेकही सुख दुःख आदि भोग का हेतु है यह फलित हुया । पञ्चशिखाचार्य ने भी "बुद्धितः परं पुरुपमाकारशीलविद्यादिमि विभक्तमपश्यन् कुर्यात् तत्राश्मबुद्धि मोहेन" इस बावय से इस अविवेकसउत्तक अस्मिताको ही मोहद्वारा भोगका हेत का है। प्राकार शील विद्या (२) प्रभृति विलक्षणधर्मो से पुरुष को बुद्धि से भिन्न होने पर भी अनात्मविषयक आत्मज्ञान रूप मोह से भिन्न न जान कर बुद्धि में यात्मबुद्धि अविवेकी कर लेता है यह पञ्चशिखाचार्य जी के वाक्य का अर्थ है (१) “भोक्तभोग्यशक्तयोरत्यत्तविभक्तयोरत्यन्ताऽमङ्कीर्णयोरविभागप्राप्ताविव मत्या भोग कल्पते" इत्यादि भाष्य वा अनुवाद करते हुये बुद्धि पुरष के अविवेक को भोग का हेतु ओ विवेक को मोक्ष का हेतु कहते हैं- ( अत्यन्त ) इत्यादि से । भोक्तृशक्ति नाम भोक्ता चेतन पुग्प का है औ भाग्यशक्ति नाम जड वुद्धि का है । (२) आमार नाम स्वरूप या औ शील नाग स्वभान वा औ विद्या ना चैतन्य का है, अर्थात् पुरुष का स्वरूप शुद्ध, ओ रवभाव औदासी य है, ओ चेतनता विद्या है, औ बुद्धि या सरूप मकिन, औ स्वभाव परिणामी, औ धर्म जडता है, इस प्रकार यह दोनों आकार शील-विद्या मादि धर्मों से विरक्षण हैं, यह तत्त्व है।
१४१ साधनपाद:२॥ नित्य शुद्ध-बुद्ध-कूटस्थ आत्मा को नौ मलिन जड़ विकारी बुद्धि को मिन्न न जान कर मैं कर्ता भोक्ता हूं इस प्रकार पुरुष अपने को मान लेता है यह भाव है। यह अस्मितासज्जक चित्जडअविवेक ही वेदान्तात में (चित्जडयन्थि ) इप्स नाम से व्यवहृत होता है। इसी चिजडग्रन्थि को ही “ भिद्यते हृदयग्रन्धिशिद्यन्ते सर्वसंशयाः, नीवन्ते चाऽस्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे पराऽवरे" । इस श्रुति में हृदयग्रन्थि कहा है। तिस प्रानन्द अमृत रूप परावर * परमात्मा के साक्षात्कार शेने से हृदयगन्धि का भेदन होजाता है औ जितने इस जिज्ञासु' को अविवेकप्रयुक्त संशय थे सो भी साक्षात्कार से इस के किन्न शे जाते हैं यो देहारम्भक प्रारब्ध कर्म से भिन्न थावत् संचित । यो प्रागामि कर्म थे वह भी सब इस ज्ञानी के क्षय हो जाते है यह श्रुति का अर्थ है। इदानीं क्रमप्राप्त अविवेक के कार्यभूत ( १ ) रागडेप का नक्षण करते हैं- सू० सुखाऽनुशयी रागः ॥७॥ भाष-(मुख-अनु शयी) सुख नाम सुखभोग से धनु नाम अनन्तर शयी नाम अन्तःकरण में रहने वाला जो अभिलापावि- शेष, वह (रागः ) राग कहा जाता है (१) यह मुण्डक उपनिषद् गत द्वितीयमुण्टक के द्विताप एण्ड या ८ गान। (-) (परावर) पारणरूप से सर्व से पर यी कार्यरूप से राया=निष्ट, अर्थात- पारणवायपायदा मपिक्षपा पर हिरण्यगर्म आदि मा परनिष्ट, निसंग सो हो परायर गाग परगारमा का। (1) आयोक मे रागदप के होने में ओ विषेश से रामदेय मा माय होने मे धागणेश ही रामदेव का कारण है, यह तरस है । पहाय परार, १ पातखलदर्शनकाशे- अर्थात्-सुखाऽभिन्ज ( १ ) पुरुप को सुखस्मरणपूर्वक जो तत्सनातीय सुख तथा तत्साधनों में गध * तृप्गा = लोभ चाह वह राग कहा जाता है। सू० दुःखाऽनुशयी द्वेपः ॥८॥ भाषा-दुःख नाम दुःखभोग से अनु नाम अनन्तर शयी नाम चित्त में होने वान्ता जो दुःखविषयक क्रोध वह वेप कहा जाता है। अर्थात्-दुःखाभिज्ञ पुरुष को दुःखभोगस्मरणपूर्वक जो दुःख तथा दुःखसाधनों विषयक मन्यु = जिघांसा ( २ ) क्रोध वह देष कहा जाता है। इन दोनों सूत्रों का भाव यह है कि-जिस काल में पुरुष को. पहिले किसी प्रकार के सुख बा-टुःख का अनुभव हुया था उस काल में उन दोनों ने एक प्रकार का संस्कार भी चित्त में उत्पन्न किया था, उस संस्कारद्वारा ही उस पुरुप को समय समय पर उस मुख वा का स्मरण होता रहता है, फिर उस म्मरण से ही अनुभूतसुखसजातीध सुख विषयक इच्छा औ अनु- भूत दुखसदृश दुःखविषयक वेष होता रहता है। एवं च पुरुष को जो अब सुख वा सुखसाधनसामग्री विषयक राग होगा एवं दुःख त्या.दुःखसाधनसामग्री विषयक देष उत्पन्न होगा वह अवश्य ही सुखानुशयी ( सुखस्मरणपूर्वक ) औ दुखानुशयी (दुःखस्म- रणपूर्वक ) ही होगा यह निष्पन्न हुया । 4 (१) जिस पुरुष ने सुख का अनुभव नहीं किया उस को सुखस्मरण का अभाव होने से 'सुखाऽभिज्ञ ' यह पद दिया है ( * ) गई, तृष्णा, कोभ, इच्छा, यह सब एकार्थ, हैं । (२-) जिघांसा नाम हनन करने की इच्छा का है, मन्यु, जिघांसा, क्रोध द्वेप पर्याय हैं।
साधनपाद: :२॥ तहां इतना विशेष है कि-अनुभव किये हुवे सुखविषयक स्मरणपूर्वक राग है औ वर्तमानकाल में भोगारूट सुखविषयक स्वाभाविक राग है, एवं दुःखविषयक भी जान लेना (१) ॥८॥ इदानी अवसरमाप्त पंचम अभिनिवेश क्लेश का लक्षण कहते हैं। सू० स्वरसवाही विदुषोऽपि तथाऽऽरूढोऽभिनिवेशः।९। भाषा-(स्वरसवाही ) वासना के बल से स्वभावसिद्ध ही, जो (विदुषोऽपि ) विद्वानों के चित्त में भी (तथाऽऽरूढः ) मूखों के तुल्य आरूट (विद्यमान) मरणभय, वह (अभिनिवेशः) अभिनिवेशसंत्रक क्लेश है। अर्थात्-(२) निखिलप्राणिमात्र को यात्मविषयक जो यह निरन्तर प्रार्थना कि (मेरा अभाव कमी मत हो किन्तु सर्वदा ही में विद्यमान रहूं) इस मरणभय का नाम अभिनिवेश है। सो यह मरणभय जिसने पूर्व मरणरूप धर्म का अनुभव नहीं किया है उस को होना असम्भव है, अतः इस मरणभय द्वारा यह प्रतीत हुआ कि पूर्व जन्म में इस ने मरण का अनुभव किया है अतएव यह अभिनिवेश स्वरसबाही अर्धात्-पूर्वमरणानुभव की वासना से वहन शील है। अर्थात्-यह अभिनिवेश निखिल प्राणिमात्रसाधारण तथा स्वभावसिद्ध है क्योंकि जिसने प्रत्यक्ष अनुमान भागमप्रमाण. द्वारा कभी मरणदुख का अनुभव नहीं किया है एवम्भूत तत्काल- उत्पन्न कोट प्रभृति को भी यह मरणवास दृष्ट है। (१) एय सुखपाधन मालाचन्दनादि में दृश्यमान नो प्रीति है वह भी पहिले इन सब को मुग्व हेतुता का अनुभव कर चुका है इसलिये स्मरणपूर्वक ही माननी । (२) " सस्य प्राणिन इपमामाशी या भवति गान भूव भ्यासमिति " इस माथ्य का अनुवाद करते हुये (स्वरमयाही) इस पद के अर्थ को स्पष्ट करते है " अर्थात् " इत्यादि से।
१४४ . पातञ्जलदर्शनकाशे- सो यह तत्कालउत्पन्न कीटादि को दृश्यमान जो उच्छे. दज्ञानस्वरूप मरणवास यही पूर्व जन्म में अनुभूत मरणदुःख का अनुमान कराता है। भाव यह है कि-(१) प्रौढमनुष्यों को तो क्या कहना है उत्पन्नमात्र (तत्काल का जन्मा हुआ ) बालक भी जिस समय मारक किसी भयंकर सिंह सर्पादि को देखता है उस समय वह कांपता हुआ दिखायी देता है, एवं निकृष्टतमचेतन कीट को भी यदि कोई छेडछाड करता है तो वह भी प्राणपरिपालन के- लिये इधर उधर चेष्टा करता हुआ कांपता ही दिखायी देता है, इस बालक शो कीटादि के कंपन से यह जाना गया कि मरण- रूप दुःख को समीप भागत जानकर भययुक्त हुआ वह कॉपरहा है, क्योंकि दुःख वा दुःख कारण बस्तुयों से ही भय दृष्ट है अन्य से नहीं, यौ इस बालक वा कीट को अभी उत्पन्न होने से यह कह नहीं सकते कि शास्त्र से वा अन्यलोकों से श्रुत (सुनाहुआ) ही मरण दुःख बास का हेतु है, औ यह भी संभा- ना नहीं हो सकती कि अनुभव किया ही मरणदुःख स्मृत हुआ इस को वास का हेतु है क्योंकि अभी इस की उत्पत्ति होने से पहिले मरणदुःख के अनुभव का संभव नहीं, अंतः परिशेष से यह सिद्ध हुआ कि पूर्वजन्म में अनुभव किये मरणदुःख को स्मरण कर ही यह बालक वा कीट भव युक्त हुआ कांपता है। एवं च यह सिद्ध हुआ कि यह मरणवात ही पूर्वजन्म में अनुभव किये हुये मरणदुःख का औ पूर्वजन्म के सद्भाव का वोधक है। (१) मव प्रसङ्ग से पूर्व जन्म के अभाव मानने वाले नास्तिक का तिरस्कार पारते हुये पूर्वोक्त अर्थ को स्पष्ट करते हैं ( भाय यह है ) इति ।
साधनपादः २॥ १४५ तथा च पूर्वले जन्मों में अनेकवार अनुभूत हुआ जो मरण- टुःख उस मरणदुःख के अनुभव मि उत्पन्न हुआ जो वासना- समूह वहीं इस मरणत्रास का कारण है यह फलित हुया। अत एव यह मरणवास स्वरसवाही है (१)। सो (२) यह मरणभय रूप अभिनिवेशक्लेश जैसे अत्यन्तमूढ कोटाटिको में देखा जाता है तथा “विदुषोऽपिरूटः” अर्थात्-- विज्ञातपूर्वाऽपरान्त (३) विद्वानों के हृदय में भी वैसेही दृढ आरूठ है क्योंकि पूर्वजन्मानुभूतमरणदुख के अनुभव से (मैं मतमा) यह वासना विद्वान अविद्वान इन दोनों को ही समान है। यहां पर विद्वान शब्द से सम्प्रज्ञात योगी का निवेकी वा जानी का यहण नहीं हैं किन्तु आगमरनुमानद्वारा जो प्रकृतिपुरुष के विवेक को जानने वाला शास्त्रज्ञाता है उसी का ग्रहण है नहीं तो “ विद्वान् न विधेति कदाचन" (४) इस श्रुति कर ज्ञानी को भयाभाव कधन असंगत होगा। अतएव वाचम्पतिसिथ ने न सम्प्रजातवान् विद्वानपितु श्रुताऽनुमानविवेकी” इस वाक्य में शास्त्रज्ञ का ग्रहण किया है ज्ञानी का नहीं। (१) सरस नाम वासना द्वारा वाही नाम प्रवृत्त है, यह इस का हाथ है । ( २ ) इस प्रकार प्रमागन पूर्वमन्गाभाववादी नास्तिकमत निराकरणपूर्वक स्वरसपाही इम पद या व्याख्यान कर इदानी (निदुपोऽपि तथा रूढ.) इम पद का व्याख्यान करते हैं “ सो यह " इत्यादि से । (३) अन्त नाम कोटि वा दशा का है, पिज्ञात नाम शास्त्रद्वारा जान लिया है पूर्वदशा= सम्पर औ उत्तरदशा केल्य जिमने एवम्भुत शास्त्रज्ञ का नाम विज्ञातपूर्वाऽपरान्त है। ( ४ ) ब्रह्मज्ञानी कदापे गय को प्राप्त नहीं होता है यह तैत्तिरीयश्रुति का अर्थ है, ( कुतश्चिन् ) यह भी शाखान्तर का पाठ है, ज्ञानी किसा मे भी भीत नहीं होता है यह इम पाठ का भर्थ है, यदि ज्ञानी को भग माना जायगा तो यह श्रात असङ्गत हो जायगी, यह तत्व है। " पातञ्जलदर्शनकाशे- एवं च जो विज्ञानभिक्षु ने सम्प्रज्ञातयोगी को भी मरणभय कथन किया है सो अज्ञानमूलक ( १ ) ही जानना ॥ ८ ॥ पूर्वप्रकरण से क्लेशों का लक्षण तथा प्रसुप्तधादि अवस्थाच- तुष्टयका निरूपण किया, ओ स्थूल क्लेशों की क्रियायोग से सूक्ष्मता भी कही ; इदानीं क्रियायोग से सूक्ष्म किये हुये क्लेशों की तथा प्रसजल्यान अग्नि से दग्धवीज हुये क्लेशों की निवृत्ति का उपाय दो सूबहारा सूत्रकार निरूपण करते हैं- सू० ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥ १० ॥ भाषा-(ते ) यह पूर्वोक्त पञ्च क्लेग (सूक्ष्माः ) क्रिया- योग से सूक्ष्म औं प्रसंख्यानअग्नि से दग्ध हुये (प्रतिप्रसवहेयाः) असम्प्रज्ञातसमाधिद्वारा * त्यक्त (निवृत्त) करणीय हैं। अर्थात्-क्रियायोग से सूक्ष्म हुये क्लेश जब प्रसख्यान- अग्नि से दग्धबीजतुल्य हो जाते हैं तब समाप्त अधिकार वाले चित्त का अपनी प्रकृति में लीन होने से वह क्लेश भी संग के संग ही अस्तंगत अर्थात् लीन हुये निवृत्त हो जाते हैं। अर्थात्-प्रतिप्रसव से विना उन क्लेशों के निराध के लिये अन्य यत्न की अपेक्षा नहीं है॥ १० ॥ ( १ जो कि { संस्कारों को बली होने से तत्त्वज्ञ को भी अभिनिवेश हो सकता है, यह विज्ञानभिक्षु ने कहा है, सो भी प्रमाद ही है क्योंकि " तजः संस्कारोऽन्य- संस्कारप्रतिबन्धी " इस पूर्वपाद के ५० सूत्र से समाधि मंस्कारों को अन्य संस्कारों का नाशक होने से मध्यामस्कारों का तत्त्वज्ञ के चित्त में सभव नहीं । . यदि ज्ञानी को भी मरणमयरूप अभिनिवेश नाश नहीं हुआ तो ज्ञान का फल हो क्या यह भी जानो। (* ) प्रम नाम उत्पत्ति का है प्रति नाम प्रतिकूल विरोधी का उत्पात के विरोधी प्रलय का नाग प्रतिप्रसव हुआ । परन्तु यहां पर चित्तप्राय रूप असम्न • ज्ञातयोग या ग्रहण करना इस आशय मे कहते हैं-"असम्प्रज्ञातसमाधिद्वारा" इति । तथाच साधनपाद: २। १४७ स्थितानान्तु वीजभायोपगतानां ।। सू० ध्यानहेयास्तवृतयः ॥ ११ ॥ भाषा-(स्थिताना) जो क्लेश चित्त में स्थूल रूप से स्थित हैं अतएव (वीजभावोषगतानां ) बीजभाव से युक्त हैं अर्थात् दग्ध- वीजभाव नहीं है, उन क्लेशों की जो वृत्तियां है (तवृत्तयः) वह वृत्तियां (ध्यानहेयाः ) क्रियायोग से सूक्ष्मकर प्रसङख्यान- सतक ध्यान से हेर अर्थात् दग्धवीजतुल्य करनी उचित हैं। अर्थात्-जो क्लेशवृत्तियां स्थूल अर्थात् उदार हैं वह प्रथम क्रियायोग से सूक्ष्म कर फिर प्रसडल्याननामक ध्यान से दग्ध- वीज तुल्य सम्पादनीय है भाव यह है कि जैसे वस्त्रों का स्थूलमल बिना ही प्रक्षा- लन से विधूनन (फटकारन ) द्वारा निरस्त हो जाता है श्री सूक्ष्म मल प्रक्षालनादियल तथा क्षारसंयोगादि उपाय से निवृत्त होता है तथा क्लेशों की स्थूलवृत्तियां स्वल्पप्रतिपक्षवाली अर्थात् समाधि की अपेक्षा से सुकर यो स्वल्प जो प्रसल्यान तिस से निवृत्त हो जाती हैं औ जो सूक्ष्म क्लेशवृति हैं वह महाप्रति- पक्षवाली अर्थात् सर्वाऽपेक्षया उत्कृष्ट औ दुःसाध्य जो असम्प; ज्ञातसमाधि तिस से निवृत्त होती है (१)। स्थूलक्लेशों को निवायोग से सूक्ष्म करे औ सूक्ष्मों को ध्यान से दग्ध करे औ दग्धहुये क्लेशों का फिर असम्प्रज्ञातयोग से समूल नाश करे यह परमार्थ है ॥ १२ ॥ (1) इतने पाठ का भाष्यकारों ने सूत्र के आदि में अध्याहार किया है। (१) भाय यह है कि-जैसे वस्त्र का स्थूल गल बिधूनन से औ मदम प्रक्षालन निवृत्त होता है तैसे स्थूळ-उदार देश क्रियायोग से रे औ सूक्ष्म श्लेशों को प्रसख्यानआग्ने मे दग्ध करे, औ दग्धतुत्य अतिसूक्ष्म हुये में- प्रज्ञात द्वारा निवृत्त करे। सूक्ष्म औ सूक्ष्मतर क्षारसयोग पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- आशंका-जो पदार्थ जन्मादि दुःखहारा पुरुषों को क्लेशित (दुःखित ) करता है वही क्लेशपद का वाच्च हो सकता है अन्य नहीं सो ऐसा धर्म भी अधर्म है क्योंकि यह दोनों ही के जन्मद्वारा लोकान्लर में गमन बागमन सुख वा दुःख हेतु हैं, एवं च अविद्यारागद्दषादि को क्लेश न कहकर धर्माधर्म को ही क्लेश कथन उचित है ? '' इस आशडका का वारण करते हैं- सू० क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टाऽदृष्टजन्मवेदनीयः॥१२॥ भाषा-(कर्माऽऽशयः ) शुभ अशुभ कर्मों का आशवभूत जो (१) धर्म ओ अधर्म वह (बलेशमूलः ) अविद्यादिक्लेशमूल कही होता है, सो काशव कीदृश है कि ( दृष्टाऽदृष्टजन्मवेद- नीयः) कोई धर्माऽधर्म दृष्टजन्मवेदनीय अर्यात्-इसी जन्म में फल देने वाला है ओ कोई अदृष्टजन्मवेदनीय अर्थात् मरण से अनन्तर पर जन्म में फल देने वाला है। अर्थात्-पुण्य अपुण्य संज्ञक जो कर्माशय है वह काम-लोभ मोह-क्रोध ( २ ) द्वारा जन्य होने से अविद्यादिक्लेश मूलक है, एवं च अविद्याआदिमूलक ही धर्माऽधर्म को जन्मादि का हेतु होने से अविद्या आदि ही क्लेश का हेतु होने से क्लेश हैं कुछ- धर्माऽधर्म नहीं यह फलित हुआ-(३) (१) शुभाऽनुगकों के अनुष्ठान मे नन्य नो चित्त में रहने वाला एक प्रकार या अट वह कईशय यहा जाता है, इसी का नाम धर्माऽधर्म है । इमी आभिप्राय से काहरा है" धर्मअधर्म '' इति । (२) "पामरोभमाह लोधप्रमः पर यागाद मे राग मी झोधपद मे दंप भो लोमा से अभिनिवेश भी मोहपद से आविद्या कानो अस्मिता या ग्रहण कार बना। (३) रागदेषक कर्माऽनुष्ठान मे अन्य धर्माऽधर्म ही जन्मादि का कारण है गगुरु नानपूर्यग निकास पार्मानुष्टान मे पाय नहीं, स च मुग्यतया समार का कारण तो मे गगपादि दो देश में कुछ धर्गाऽधर्म नहीं, यह तत्रा है, यह अप्रिम सत्य में राष्टरोगा। इस भाष्य का यह अनुवाद है, यहा साधनपाद: २॥ १४२ तहां इतना विशेष है कि अविद्या तथा अविवेक रूप दो. क्लेश तो धर्म अधर्म इन दोनों के कारण हैं श्रीराम केवल धर्म का ही कारण है, एवं लोभ परद्रव्यअपहरण द्वारा औ मोह हिं- सादिहारा केवल अधर्म का ही कारण जानना, एवं क्रोध भी ब्रह्म- वधादिद्वारा अधर्म का कारण है, परन्तु कहीं क्रोध धर्म का भी कारण हो जाता है जैसा कि ध्रुवजी का, क्योंकि ध्रुव जी ने विमाता गोस्वतात उत्तानपाद कृत निराटर से उत्पन्नहुये क्रोध से तपअनुष्ठान द्वारा ऐम धर्म का लाभ किया था कि जिस से अद्याऽवधि सर्वोपरि स्थान में वह विराजमान हो रहा है। तहां जो धर्म, अत्युयप्रयत्नपूर्वक अनुष्ठित मन्त्र वा तप वा समाधि अथवा इश्वर-देवता-महर्षि-सहानुभावों के अत्युय बारा धन द्वारा निर्वर्तित =निष्पादित ( उत्पन्न ) हो सद्यः (शीव) ही अपने फल देने में उद्यत हुआ इसी जन्म में फल देता है वह धर्म दृष्टजन्मवेदनीय कहा जाता है, जैसा कि (?) शिलादमुनि का नन्दीनामक कुमार अत्युय महादेव के पूजन से मनुष्य शरीर को त्यागकर उसी जन्म में देवदेह के लाभ से अमर सुमा घा (२) एवं जो अवर्म, भीत व्याधित कृपण जनों के प्रति क्लेश देने मेवा विश्वासप्राप्त (३) पुरुषों को दुःख देने से वा महानुभाव- तपस्वियों का अत्युय अपकार ( पीडा) करने से उत्पन्न हुआ (१) " यथा नन्दीश्वरः कुमारो मनुष्यपरिणाम हित्वा देवस्वेन परिणतः" इस भाष्प का अनुवाद करते हुये दृष्टजन्मोदनीय धर्म का उदाहरण कहते हैं "जैसा- किशिलादमुनि" इत्यादि से। (२) यह कमा शिवपुराणायमन कुमारसंहिता के ४५ इत्यादि अध्याय में प्रसिद्ध है। (३).जिस पुरुन ने यह विश्वास कर लिया है कि इस से हमें कदापि अनिष्ठ नहीं होगा उस विश्वासप्राप्त पुरुष का अनिष्ठ करना भी एक बड़ा पाप है।
- १५० । पातज्जलदर्शनप्रकाशे- शीघ्र ही अपने अनिष्ट फल देने के उन्मुख होता है वह अधर्म भी दृष्टजन्मवेदनीय है। जैसा कि (१) देवेन्द्रभाव को प्राप्त हुया भी नहुष राजा शिविकासंलग्न (पालकी में लगेहुये) महानुभावषियों का पार्ष्णिप्रहाररूप अयकार करने से अगस्त्यमुनि के शापद्वारा शीघ्र ही देवदेह को त्याग कर अजगरसर्पभाव को प्राप्त हुया था ।(२) । अदृष्टजन्मवेदनीय धर्माधर्म तो प्रसिद्ध ही हैं, (३) जो हो निखिल धर्म ओ अधर्म क्लेशमूलक ही है। यहां पर इतना विशेष है कि जो पुरुष (४) नारक अर्थात् रौरवादिनरकप्रापक पाप का अनुष्ठान करते है उन पुरुषों को जो धर्म उत्पन्न होता है वह दृष्टजन्मवेदनीय नही होता है क्योंकि यह कभी भी संभव नहीं हो सकता है कि इसमनुष्य- लोक मेही सहस्र वर्षों कर भोगने योग्य गैरवादिनरक की प्राप्ति हो जाय। एवं जो क्षीणक्लेश योगी वा ज्ञानी है उन का धर्म भी अदृष्ट जन्मवेदनीय नहीं होता है क्योंकि उन के सव धर्माऽधर्म प्रस- डल्यानरूप अग्नि से दग्ध हो गये हैं (१) “तथा नहुपोऽपि देवानामिन्द्र स्वक परिणाम हित्वा तिर्थक्वेन परिणत." इम भाष्य का अनुवाद करते हुये दृष्टजन्मवेदनीय अधर्म का उदाहरण कहते हैं (जैसा देवेद्र ) इति । (२) यह महाभारत के भानुशासनिक १३ पर्व के १०० अध्याय में प्रसिद्ध है। (३) यज्ञदानादिजन्य जो मरण से अनन्तर परलोक में स्वर्गादि फल देनेपाला धर्म, एस ब्राह्मणवध आदि ज य जो मरण से अनतर नरकादि फल देनेगाला अधर्म या दोनों अहमदनीय हैं, यह भार है। नारयाणा नास्ति दृष्टन-मोदनीय कगाशर्य, क्षीणशानामपि नारत सर? प कर्माऽऽशय." इस भाष्य का अनुवाद करते हैं " जो पुरुष नारा" इस दि मे। । १ - ( 1 - साधनपादः २॥ कोई (१) तो यह कहते हैं कि “नारकी पुरुषों को दृष्टजन्मवेद- नीय कर्माशय नहीं" इस भाष्य का यह थर्व है कि (जो पुरुष नरकपतित हैं उन को सामग्री के अभाव से वहां पर धर्माधर्म की उत्पत्ति न होने से दृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय नहीं हो सकता है औ जो स्वर्ग में स्थित है वह तो लीलामानुषविग्रह को धारण कर प्रयागादि तीर्थों में कर्मानुष्ठान द्वारा दृष्टजन्मवेदनीय धर्मशील भी हो सकते हैं इसलिये भाष्यकारों ने नारकी मात्र को निषेध किया है स्वर्गी का नहीं, ॥ १२ ॥ इस प्रकार धर्माधर्म को अविद्यादिक्लेशमूलक प्रतिपादन कर इदानीं ( धर्माधर्म को अविद्यामुलक होने से विद्या उत्पन्न से अविद्यानाश के अनन्तर कारण के अभाव से प्रागामि धर्माऽ. धर्म का संचय पुरुष को मत होय परन्तु पूर्व अनेक जन्मसंचित- धर्माधों को विद्यमान होने से तत्प्रयुक्त आगामी जन्मआदि अनर्थ की निवृत्ति न होने से विद्या होने से भी आगामिजन्म का अभाव कैसे ) इस आशंका के वारणार्थ खयोदश सूत्र का प्रारम्भ करते हैं- सू० सति मूले तद्विपाको जात्यायुभोंगाः ॥१३॥ भाषा-(मूले ) धर्माऽधर्मादि के मूलभूतन्कारण अवि- शादि क्लेशों के (सति ) विद्यमान होने से ही (तविपाकः ) तिन धर्मअधों का फल होता है अन्यथा नहीं, सो यह विपाक अर्थात्-कों का फल तीन प्रकार का है (जात्यायुभोगाः) जाति = जन्म वा देवमनुष्यत्वादि उत्तममध्यमजाति, आयु = जीवनकाल अर्थात् कुछ कालपर्यन्त शरीर के संग प्राणों का (1) वाचस्पतिमिश्र की व्याख्या के अनुसार पूर्वोक्त भाष्य के अर्थ का निरूपण कर इदानीं विज्ञानभिक्षु कृत अर्थ का प्रतिपादन करते हैं " कोइ तो " इत्यादि से।
पातजलदर्शनप्रकाशे- सम्बन्ध, भोग = इन्द्रियादि द्वारा मुखदुखभोगात्मक चित्त वृत्ति । (१) अर्थात्-अविद्याआदि क्लेशों के होने से ही यह માં अपने फल का जनक होता है कुछ उतिन्नवलेशमूल (२) नहीं। : जैसे तुष ( ३ ) रूप सहकारी कारण से संबद्ध औ अटग्धवी- जभाव ( ४ ) हुये ही शालितण्डुल अपने अंकुरोत्पादन में समर्थ होते हैं औ तुषरहित तथा दग्धवीजभाव नहीं तैमे Eि. क्लेशरूप सहकारी कारण से संवह हये ही धर्माधर्म अपने फल देने में समर्थ होते हैं अपनीत क्लेश नवा प्रसंख्यानाग्निद- ग्धवीजभाव नहीं। भाव यह है कि जैसे जल से सेचन किवी हुवी भूमि में ही उप्त (बोये हुये ) वीज उत्पन्न हो कर अपने फल को देते हैं तैसे अविद्यादि क्लेशरूपी सलिल से सेचन कियो हुवी चित्त- भूमि में ही पुण्यपापरूपी बीज उरत हुये अड्कुरित हो अपने सुखदुःखादिफल को देते हैं अन्यया कदापि नहीं। (१) इन तीनों में से मुखादिभोग तो मुख्य पल है ओ जाति तथा गायु यह दोनों इम के लिये होने मे गौणफल हैं क्योंकि भोग यदि उत्तम होना होगा तो देव- त्वादि उत्तानाति नथा अधिक आयु का लाभ अवश्य होगा औ यदि गन्दभोग होना होगा तो होनजाति वा हीन आयु का भी लाभ अवश्य होगा। (२)(उछिन्न ) नष्ट हो गया है ज्ञान से रागादिश्लेशरूप मूलकारण जिम का वह धर्माऽधर्म उन्छिन शमूल हैं । (३) नुप नाम उम का है जो कि चायकों पर भुस्मा होता है। (४) तुप रहने पर भी नहीं दग्ध हुआ प्रस्वेदादि द्वारा योजमाव जिप्त का, यह इस का अर्थ है। (1) योगाभ्याम से अपनीतदूर कर दिया है रागादिलेशरूप सहकारी कारण ति का सो धर्माऽधर्म गपनीर कश कहा जाता है । । .
है साधनपादः । एवं च मे जलसेचनरुप सहकारी कारण के प्रभाव से क्षेत्र- उप्त चीज अपने फल को नहीं देते हैं तैम सहकारीभूत अवि धादि के प्रभाव से अनन्त संचित धमाऽधर्म भी स्वफल नहीं देते हैं, तथा च ज्ञान से संचित धर्माऽधर्म का भी नाश होने से तत्प्रयुक्त गामिजन्मादि का नाश सुतरां संभव हुया । अतएव भगवान् ने "ज्ञानाऽग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तधा" इस वाक्य से प्रसंख्यानअग्नि को वावत् धर्माऽधर्म का दाहक कहा है। अनन्तसञ्चितकमी का क्षणभर में नाश करने से ही "नास्ति योगसमं बलम्" इस वचन से योग को सर्व से बली कहा है (१)।' अव (२) यहां पर प्रसंग से वह विचार किया जाता नि. (क्या एक कर्म एक जन्म का कारण होता है वा एक कर्म अनेकजन्म का कारण होता है, द्वितीय विचार यह है कि (क्वा 'अनेक कर्म अनेकजन्म को निष्पादन करता है वा अनेक कर्म एक जन्म को ही उत्पन्न करता है। यदि एक ही कर्म आगामी एक जन्म का आरम्भ करता है यह प्रथम पक्ष माना जायगा तो अनादिकाल से अनेक जन्मों कर संचित भोगावशिष्ट असंख्येश कर्म औ वर्तमानकाल में अनुष्ठित कर्म के फल का क्रम नियत न होने से लोकों की विश्वासाभाव से कर्म में प्रवृति नही होगी, परन्तु मो प्रवृतिअभाव (१) जब कि प्रारब्धम क भा नाश पारण में याग समर्थ है ता अ य के नाश में तो क्या कहना है, निम प्रकार प्रारब्धका वा नाश योग से होता है वह प्रकार जौर मुक्तिविक में देखना। (२) यहा पर भाष्यकारों ने " तत्रेद विचार्यते यिमेक कस्य जन्मन रेणम् । इत्यादि प्र य मे ।पचारपूर्वक एकभविकवाद का निरूपण किया है, उसी के अनुनाद का आरम्भ करते हैं-( अवयहा ) इत्यादि से । छा- . पातञ्जलदर्शनप्रकाश- किसी को अभिमत नहीं क्योंकि यावज्जीवनपर्यन्त ही शास्त्र शुभ- कर्मानुष्ठान का उपदेश करता है, अर्थात्-कर्म तीन प्रकार का है एक सञ्चित जो कि पूर्वले अनेकजन्मों में निष्पादित किया हुया स्थित है (१) औ द्वितीव प्रारब्धकर्म जो कि उन्हीं सञ्चित कर्मों में से निकासा हुवा वर्तमानशरीर तथा भोगादि का हेतु है (२) औ तृतीय अागामिक़र्म जो कि इस वर्तमानदेवांश आगामि फल के लिये अनुष्ठित किया जाता है, एवं च यदि या ही माना जाय कि एक ही कोई कर्म उत्तरकालिक एक जन्म का आरम्भ करता है तो किसी पुरुष की आगामी पुण्य अनुष्ठान में प्रवृत्ति नहीं होगी क्योंकि यह तो उस को निश्चय है नहीं कि प्रथम अमुक कर्मफल देगा, किन्तु सञ्चित कर्मों में से ही कोई एक उत्तर जन्म देगा यही उम को संभावना है, एवं च यह भी सम्भव हो सकता है कि उसजन्म में कहीं पाप का अनुष्ठान हुया तो वर्तमानकालिक पुण्वानुष्ठान भी नष्ट हो जायगा, तथा च पुण्यानुष्ठान को निष्फल जान कर लोकों की शुभकमों में प्रवृत्ति नहीं होगी (३)। एवं ( एक ही कर्म आगामी अनेक जन्मों का कारण है) यह द्वितीय पक्ष भी समीचीन नहीं क्योंकि अनेक सञ्चित वा भागामिकों में से एक ही किसी कर्म को अनेक जन्म देने से - अवशिष्ट कर्म निष्फल हो जांच में क्योंकि उन कमी को फल (१) अर्थात्-जिन कमों ने अभी फल नहीं दिया गौ अवशिष्ट पड़े हैं वह संचित कहे जाते हैं। (२) गीत-जित ने गपने फल देने का भारम्भ किया है यह प्रारब्ध याहर माता है। (३) वर्तमानकाल में किये हुये पुण्य भागामजन्म का आरम्ग करते हैं या सदियों में से ही कोइएक कर्म आगागी जन्म का आरम्भक होगा, इस संदेह से पुरुप को शुभारम में प्रवृत्ति नहीं होगी यह तय है। .
साधनपाद: २। देने का अवसर नहीं मिलेगा, एवं च विफल जान कर आगामी- कमों में प्रवृत्ति के (१) अभाव से यह पक्ष भी अनिष्ट ही है (श। एवं (अनेककर्म अनेक जन्म का कारण है) यह तृतीयपक्ष भी समज्जस नहीं क्योंकि यह अनेक कर्म एक ही काल में अनेक जन्म देंगे सो तो संभव नहीं किन्तु क्रम क्रम में देंगे एवं च एक कम से एक जन्म हुया यह प्रथम पक्ष ही फलित हुया, तथा च प्रथमपक्ष कथित दोष कर ग्रस्त होने से यह भी सं- गत ही है अतः (३) जन्म से लेकर मरणपर्यन्त जो असंख्यात तथा विचित्र यौ गुणप्रधानभाव से अवस्थित यावत् धर्माधर्मसमूह है वह सब ही मरणकाल में अभिव्यक्ती हो कर एक ही काल में एक साथ मिलकर आगामी एक ही जन्म का प्रारम्भ करता है अनेक का नहीं, यह अन्तिमपक्ष ही समीचीन है। । अर्थात्-मरणकाल से पूर्व बलीभूत प्रारब्ध कर्म रूप प्रतिबन्ध क बल से संचित कर्मो की अपने फल प्रदान के लिये अभिव्यक्ति- उपस्थिति' नहीं होती है औ मरणकाल में प्रतिबन्धक के प्रभाव से जितने संचित कर्म है वह सब ही उपस्थित हो जाते (१) आगामिपापों से सचित पुण्य के नाश होने की संभावना से भी पुण्या- नुष्टान में प्रवृत्ति नहीं होगी यह मी नानो । (२) जब कि प्रथमपक्ष में एक कर्म को एकजन्म का कारण होने से ही पुरुषों को कर्माऽनुष्ठान में विश्वासाऽभाव कहा है तो एक कर्म को भनेकानन्म का कारण मानने में पुरुषों को अविश्वास होगा यह सुतरा सिद्ध है, यह तत्त्व है। (३) (इदानी "तस्मालमप्रायणान्तरकृत." इत्यादिभाष्य का अनुवाद करते हुये भन्तिमपक्ष का सिद्धान्त करते हैं ( अत.) इत्याद से । - ) पातजलदर्शनकाशे- हैं ( १ ) 1-सो यह मरण, विशेषाऽभाव से (२ ) निखिल ही अग्र- दत्तफल * कर्मों का अभिव्यञ्जक होता है कुछ एक दो का नहीं क्योंकि निमित्तकारण के समान होने पर एक की अ- भिव्यक्ति होती औ एक की न होनी यह धन युक्ति मे विरुद्ध है स्या (३ ) यह कभी संभव हो सकता है कि प्रदीप-की-सन्निधि की समानता होने पर घट का प्रकाश होय और पट कान सोय, एवं च मरणकात में प्रतिवन्धक के अभाव से निखिल ही कर्म परस्पर संघटित 'मिलजुल कर' प्रधानगौण भाव (४) को प्राप्त हुये उत्तरकालिक एक ही जन्म का प्रारम्भ करते हैं अनेक का नही यह निष्पन्न हुया । सो यह मिधित हुये अनेक कर्म जैसे आगामी नाम उम्मक पारस्म करते है तैसे उस शरीकी आयु का औ उस आयु होने वाले सुख दुःख भोग का भी यह प्रारम्भक होते हैं। अत एव वह कर्माशय जन्म, आयु, भोग, इन तीनों पल का कार होने से विविपाक कहा जाता है, इस प्रकार मिलकर एकजन्मद ( १ ) एस च मरणसमय ही सचित कर्मों को फलोन्मुग्ध करता है, यह बोध किया, यह जानना। ( २ ) यह वर्ग उपस्थित होय यह न होय इस प्रकार विशेष वारण को अभाव से ()जित कर्गों ने अपना फल अगी तक नहीं दिया वह अप्रदत्तफल प जाते है। (३) मरणकार ही निखिल कर्मों यो उपस्थिति में निमित्तवारण है, फिर इम उपस्थिति होय इस यी न होय यह कहना अमम्मत्र है, सोई दृष्टात से स्पष्ट करते क्पा यह" इत्यादि से। ( ४ ) जो वर्ग अधिक होने मे गडरित हो जाने फल देने में सब उन्मुख ह प्रान है शो को वर्ग कुछ विश्व मे फल देने वाले हैं वह गौण हैं, इन दो में से प्रधान के अनुसार ज म या लाभ होता है, यह तत्व है।
साधनपादः २॥ १५७ से ही यह कर्माशय एकमविक (१) कहा जाता है.। यद्यपि (२) यह एकमविक मत समीचीन नहीं है क्योंकि यह कबी भी संभव नहीं हो सकता है कि स्वर्गसाधन ज्योति- ष्टोमादि शुभ कर्म औ नरकसाधन ब्रह्मवधादि,अशुभकर्म यह दोनों मिलकर एकही उत्तम वा मध्यम जन्म का प्रारम्भ करते हैं क्योंकि विरुद्ध फलहय का एककाल में होना युक्ति से भसंबद्ध है। किंच ऐसे मानने से वेद से भी विरोध होगा.क्योंकि साम- वेदीयछान्दोग्योपनिषद् में यह लिखा है कि जो युरुष , इष्टापूर्त- यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं वह धूमादिमार्गहारा चन्द्र लोक में गमन कर कर्मफलभोग के अनन्तर फिर संचित कर्म से मनु- प्वलोक में आ कर जन्म धारण करते हैं, (३) तहां जिन पुरुषों के संचितपुण्य अवशिष्ट हैं वह रमणीय ब्राह्मणादिजन्म को प्राप्त होते हैं औ जिन के संचितपाय अवशिष्ट हैं वह कुत्सितशूद्रादियोनियों में उत्पन्न होते हैं (४) । एवं च यदि मरणसमय में सब कर्म उपस्थित होकर एक ही जन्म देंगे तब तो चन्द्रलोकभोगोपयोगी जन्म से अनन्तर मनुष्यलोक में फिर जन्म बोधन करनेवाली श्रुति असंगत होगी क्योंकि भापके मत में तो कोई कर्म शेषरहा ही नहीं जिस से. मनुप्य लोक में फिर जन्म होय (५) । । (१) भर नाम जन्म का है, एक ही जन्म होता है जिम कर्माशय से बहक- मशय एकभाविक कहा जाता है । (२) इदानी इम एकभाविकमतपर भाष्य को श्रुतिआदियों के संग विरोध परिहारार्थ श्री स्वामीजी संक्षिप्त समालोचना करते हैं ( यद्यपि ) इत्यादि से | ( ३ ) "यावरसम्पातमुपित्या अयतमेवाधान,पुनर्निर्तन्ते" यह छान्दोग्य श्रुति है। (४) "तद् य इह रमणीयचरणा' इत्यादि श्रुति का यह अनुवाद है। (१) एवं च सब कर्भ मिलकर एकजन्म नहीं देते हैं किन्तु कई एक देते हैं जो कद एक भवशिष्ट रहते है, यहो मानना समीचीन है, नहीं तो फिर आगे जन्म नहीं होगा। 1 -- - १५८ पातञ्जलदर्शनकाशे- औ आपस्तवमुनि ने तो “ वर्णी आश्चमाश्च स्वकर्मनिष्ठा प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलरूपायुः श्रुतवृत्तवित्तसुखमेधता जन्म प्रतिपद्यन्ते” इस वचन से स्पष्ट ही शेषकर्म का सद्भाव कहा है। (स्वकर्मनिष्ठ जो वर्णी वा आश्रमी हैं सो परलोक में अपने कर्मफलों को भोग कर फिर अपशिष्ट संचित कर्म से विशिष्ट देश में उत्तम जाति, कुल, रूप, आयु, अध्ययन, आचार, धन, सुख, बुद्धि वाले हुये जन्मधारन करते हैं ) वह आपस्तंबमुनि के वचन का अर्थ है। .एवं च श्रुतिस्मृति के साथ विरोध होने से यह मत असंगत ही है, तथापि एकभविक वाद को स्वाचिकत्व होने से दोपाभाव जामना। यर्थात्-दृष्टजन्मवेदनीय नियतविपाकस्थल में ही एकभाव कवाद का स्वीकार है सर्वत्र नहीं (१)। जो कि विज्ञानभिक्षु ने “स्वर्ग वा नरक में अन्यधर्माऽधर्म की उत्पति के अभाव में नौ प्राचीन संचितकमे की भोग से समाप्ति होने से स्वर्गी वा नारकी का फिर जन्म न होगा यदि एकमविकवाद माना जायगा" इस प्रकार आशंका कर फ़िर "स्वर्ग देनेशला कर्म स्वर्गभोग से अनन्तर ब्राह्मणादि जन्मदेने में समर्थ है, औ नरक देनेवाला कर्म नरक से अनन्तर स्थावरादि जन्म देने में समर्थ हैं,एवं च उन्हीं का ही ब्राह्मण-स्थावरादियो- निपर्यन्त फल होने से यह टोप नहीं है ) इस प्रकार समाधान किया है सो शारीरक के तृतीयाध्यायस्थ रहतिपादक शांकरभाष्य के अनध्ययनप्रयुक्त है क्योंकि वहां पर “ यदिस्वर्ग के हेत कर्म- शेष से ही ब्राह्मणादिजन्म का लाभ माना जाय गा तो फिर च- न्द्रलोक से प्रत्यागत पुण्याचरण पुम्पों के लिये ब्राह्मणादि जन्म (1) यह सब इमी सूत्र के अग्रिम गाप्य के अनुवाद में स्पष्ट होगा।
साधनपाद: २॥ १५९ ओ पापाचरणयुरुषों के लिये चाण्डालादिजन्म प्रतिपादक वेदवा- वाक्य कदर्थित होजाय गा क्योंकि स्वर्गहेतुपुण्य के शेष से ही यदि फिर मनुष्यलोक में जन्मता है तो स्वर्ग से आगत पुरुषों की ब्राह्मणादि योनि ही होनी चाहिये चण्डालादि नहीं” (१) इस प्रकार से इस समाधान का समूलनाश किया है, तथा च पूर्वोक्त - समाधान ही उत्तम है यह जानना । यहां इतना विशेष यह भी जान लेना.कि जो दृष्टजन्मवेद- नीय धर्माधर्म है सो कहीं भोगमाव का ही जनक होने से एक विपाक 'एकफल देनेवाला' होता है औ कहीं आयु, भोग, रूप दो फल देने से द्विविधाक होता है, तहां नन्दी नामक ब्राह्मण ने जो महादेवजी के आराधन से धर्म सम्पादन किया था वह धर्म घायु तथा दिव्यभोग देने से दिविपाक है (२) श्री नहुष राजा ने जो ऋषियों के अपकार से अधर्म सम्पादन किया था वह सर्वरूप जन्म देने से एक विपाक है (३) एवं च यह सिद्ध हुआ कि अदृष्टजन्मवेदनीय धर्माधर्म त्रि वैपाक (४) है नौ दृष्टजन्मवेदनीय धर्माधर्म कहीं द्विविपाक कहीं एकविपाक है। इतना विशेष यहां पर अन्य भी जान लेना कि मे धर्माऽधर्म को एकमविक कहा है तैसे वासना को एकमक्कि मत जानना क्योंकि यदि वासना को एकभविक माग जायगा (१) वेदा तदर्शन के तृतीय अयाय गत प्रथमपाद के ८ सत्र का भाष्य देखो। (२) नदीनामक ब्राह्मण का आठ वर्ष मात्र हो जीवनकाल लिखा था इस से अमरब के लाभ से आयु का लाभ तथा दिव्यभोग वा लाम होने से यह धर्म दो फल देनेवाला है, यह भान है। (३) नहुप राना का मना तथा आयु तो जिस कर्म द्वारा इन्द्र बना या समी ही दिया था वोवल दु खभोग ही अत्युमपाप से हुआ था इस से यह अधर्म एक फल है, यह तत्व है। (४) जन्म, आयु, भोग इन तीनों फलों के देने वाला। . - पातञ्जलिंदर्शनप्रकाशे- तो जो पुरुषजन्म से अनन्तर पशुजन्म को प्राप्त होगा वह पशु- जाति के भोगों को नहीं भोग सके गा क्योंकि पूर्वले मनुष्यजन्म में पशुंभोग के अनुभव का अभाव होने से उस को पशुभोग की बसिना को प्रभाव हैं मी विना वासना के भोग का होना घस- म्भव है', (१) एवं च पूर्वजन्म में जिस का अनुभव किया है उसी अनुभवजन्य वासना मे ही उत्तर जन्म में भोग होगा यह नियम नहीं किन्तु अनन्त वासना से चित्त को चिवित होने से जैसा"अगि.जन्म होगा तैसी ही पूर्वती किसी जन्म की वासना से उत्तर जन्म में भोग होता हैं यह जानना (२) इसी यभि- प्रायसे ही भाष्यकारोंने- क्लेशकर्मविपाकानुभवनिमित्ताभिस्तु वासनाभिरनादि- कालसंमूर्छितमिदं चित्तं चित्रीकृतमिव सर्वतो मत्स्यजालं ग्रन्थिभिरिवाततमित्येता अनेकभवपूर्विका वासनाः” (३) इस वाक्य से वासनों को अनेकजन्मपूर्वक कहा है। यदि यह कहो कि यदि वासना से ही भोग होता है तो आदि जन्म में किसी वासना के अभाव से भोगन होना चाहिये, सो इस का उत्तर यही कहा जाये गा कि वासना अनादि हैं, भाष्यकारों ने भी इसी आशय से शसना को अनादि कहा है, (१) जामनी नाम सस्कार वा' है, प्रथम अनुभवें फिर सस्कार फिर फिराप्रमृत्ति यह नाम है। (२) अर्थात्-जब पुरुप को पशु जन्म होगा तो पहिले किन सना से ही उस को पश भोग में प्रवृत्ति होगी, एव च अनेक पूर्वजो पशुजन्म को वा वासना ही भोग का हेतु है कुछ थव्यवहित पूर्वजन्म के अनुभवजन्य के अनुभव से नन्य (३ ) हेश, धर्म तथा फल यो अनुभवरूप निमित्त से ही यह सिद्ध हुया। यह चित्त ऐसे समूच्छिन भी प्रयित औ चित्रित है जैसा कि मत्स्थापन हुयी वासनों से तरफ से अनेक प्रन्धियों से प्रथित होता है, अत यह वासना अनेकडनेका जाल चारो स्थित हैं कुछ एकाजन्म की नहीं यह भाष्य का परमार्थ है । न्तरमा एक जन्म की चिंत में साधनपादः २॥ " यथा--"ये संस्काराः स्मृतिहेतवस्ता वासनास्ताश्चानादिका-: लीनाः" (१) । एवं (२) सवी धर्माश्चर्म एकमविक हैं यह भी नहीं है किन्तु जो निवतविपाक धर्माधर्म हैं वही एकमविक हैं। अर्थात्-धर्माऽधर्म दो प्रकार का है एक तो नियतविपाक अर्थात् अवश्य ही फल देनेवाला औ एक अनियतविपाक अर्थात् नियम से फल न देने वाला, तहां जो धर्माऽधर्मनियतविपाक हैं उसी में यह नियम है कि सभी मिल कर उत्तरकालिक एक जन्म देते है कुछ अष्टजन्मवेदनीय अनियतविपाकस्थल में नहीं, क्योंकि जो धर्माऽधर्म अहाटजन्मदेदनीव अनियतविपाक हैं उन की तीन गति है एक तो यह कि “ कृतस्याविपक्वस्व नाशः" अर्थात् कृतकों का विना फल देने से नाश हो जाना, यौ द्वितीय यह कि-(प्रधानकर्मण्याबायगमनम् ) अर्थात् किसी प्रधान कर्म के संग मिल कर री फल देना स्वतन्त्र नहीं, तृतीय यह कि (निवतविपाकप्रधानकर्मणाऽभिसूतस्य चिरमवस्थानम् ) अर्थात् प्रवश्व फल देनेवाले प्रधानकर्म से अभिभूत हो कर चि- रकाल पर्यन्त प्रवस्थान होना। इन तीनों गतियों में से किये हुरो कर्म का विना फल देने से नाश हो जाना यह है कि शुक्लकर्म के (३ ) उदय से विना फल दिये कृप्गाकर्म का नाश हो जाना, अर्थात्-जिस पुरुष (१) मा स्मृति फ हेतु सरकार या वासनापद पाय मी मनादि है पर भाष्य का गध है। (२) मो पाई पहा था कि एभोग्यपाद काधिाया है यह मागे या' सोई यहने का अर प्रासम करत है " इत्यादि। (३) किपापोग से दा मैत्री मादिमापना मापनो धर्म यह है प्रम- यादिसाय नो पाप है यह रण है।
पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- ने तप वेदाध्ययनादि शुदतकर्म का अनुष्ठान किया है उस के पाप का नाश फल दिये बिना ही हो जाता है, एवं च यह पाय - कर्म फलदिये बिना ही नाश होने से अनियतविपाक है। शुक्लकम से कृष्णकर्म का नाश होता है इस पपने कथन की पुष्ठि के पर्व भाष्यकारों ने " द्वे ह वै कर्मणी वेदितव्ये पापकस्यको राशिः पुण्य- कृतोऽपहन्ति तदिच्छस्व कर्माणि सुकृतानि कर्तुमिहेव ते कर्म कवयो वेदयन्ति” यह श्रुति प्रमाण दियी है, इस का अर्थ यह है कि-(पापकस्य ) पापीपुरुप के, (वैदि- तव्ये ) भोगनेयोग्य, जो (हे हे ) दो प्रकार के ( १ ) कर्म, उन दोनों को (पुण्यकृत एकोशि:) तपवेदाध्ययनादिपुण्यकर्म जन्य जो एक शुक्लधर्मसमूह है वह (अपहन्ति) नाश कर देता है, (तत्) । तिन हेतु में “सुकृतानि कर्माणि कर्तुमिच्छन" धर्ममान का जनक जो वेदाध्ययनादिशुक्त कर्म उन के पनुष्ठान की इच्छा कर क्योकि (इहैवतेकर्मकवयो वेदयन्ति) इस मनुष्यलोक में ही तुम कर्माऽनुष्ठान प्रतिपादन किया है अन्य लोक में नहीं, यह विहान् लोग उपदेश करते हैं। इस श्रुति से यह ज्ञात हुया कि शुक्लकर्म के उदय का एतादृश अपूर्वप्रभाव है कि ज्ञो उत्पन्नमात्र ही कृष्ण तथा शुक्ल- कृष्ण का नाश कर देता है। एवं (२) प्रधानकर्म में पावापगमन यह है कि-यजग- तपशुहिंसादि का स्वतन्त्र दुःखरूप फल न होकर यज्ञजन्य स्वर्ग- (१)एफ कृष्ण, दूसरा शुरुष्ण । (२)रितीप गति सष्ट करते हैं ' एव' इत्यादि से।
. - "साधनपादः २१ फल के संग ही फल होना (१)। ज्योतिष्टोमादिकर्म जन्य स्वर्ग में हिंसापाप जन्य दुःख का संसर्ग रहता है, यह भाष्यकारों ने पञ्चशिखाचार्य जी के वचन. से स्पष्ट किया है, यथा- "स्यात् खल्पः संकरः सपरिहारः सप्रत्यवमर्षः कुशलस्य नाऽपकर्षायाऽलं कस्मात ? कुशलं हि मे बहुन्यदस्ति, यत्राऽय- मावापं गतः स्वर्गेऽपि अपकर्षमल्पं करिष्यति” (२) इति । एवं प्रधानकर्म से अभिभूत होकर चिरकालपर्यन्त यवस्थान होना यह है कि वली पुण्य.कर्म का निरन्तर भोग होने से पाप- कर्म का पडा रहना वा बली पापकर्म का निरन्तर भोग होने से पुण्यकर्म का पड़ा रहना। थर्धात्-पूर्व जो मरणकाल को निखिलकों की उपस्थिति का हेतु कहा है सो जो कर्म अवश्य फल देने वाले हैं उन्ही सब (1) भाव यह है कि स्वर्गसाधन ज्योतिष्टोमादि यज्ञ में नो हिंसा कियी माती है वह एक तो यज्ञ का उपकार करती है क्योंकि हिंमा रूप अ के पिना अङ्गीभूत यज्ञ की साङ्गता नहीं होती है, तो दूसरा फल हिंसा का दुःख देना है परन्तु यह सा स्वतन्त्र पापरूप फल नहीं दे सकती किन्तु निम यज्ञ का यह अङ्ग है उस प्रधानरूप यज्ञ के फल समय में ही सग संग दु.ख देता है इसी से ही स्वर्गवासियों को सर्वदा कोई न कोई दुःख होता ही रहता है, इसी का नाम प्रधानकर्म में आवापगमन है। (२) ज्योतिष्टोगादियज्ञ जन्य जो धर्म है वह हिंसाजन्य पाप से मिश्रित होने से स्वल्पमकर है भो यदि कुछ प्रायश्चित किया जाय तो वह सकर (पाप का मेक) निवृत्त भी हो जाता है अतः सपरिहार है, औ यदि प्रमाद से प्रायश्चित न किया माय तो स्वर्ग में उस पाप का दुग्व भी सह्य करना पड़ता है अत: समत्यवमर्प है, यह हिमाजन्य पाप अल्प होने से महानभूत जो यज्ञफल स्वर्ग है उस का प्रक्षय नहीं करसयाता है क्योंकि यज्ञ का फल अधिक है भो हिंसा का फल अस्प है, अतः प्रधानभूत स्वर्ग- भोगरूपफल में यह हिंसामय पाप आवार को प्राप्त हुया स्वर्ग में कुछ २ दुःव देगा अधिक नहीं, यह पञ्चशिखाचार्य जो के वाक्य का भावार्थ है।
. पातलदर्शनकाशे- का ही कहा है कुछ धनियतविपाक वाले का नहीं क्योंकि जो अनियतविपाक वाला होता है वह तो कोई वली कर्म से नष्ट हो जाता है पो लोई. पावाप को प्राप्त होजाता है यो कोई नियं- तफल वाले बली कर्म से दवा हुया चिरकाल तक स्थित रहता है; सो यह कर्म चिरकालपर्यन्त सी तबी तक,स्थित रहेगा कि-वावत् काल विरोधी बली कों का फल न भोगा जायगा वा इस कर्स के समान फल वाला दूसरा कोई वली कर्म इस का सहायक नहीं होगा, परन्तु किस काल में यह कर्म विरोधी के प्रभाव से वा. किसी सहायक से फलोन्मुख होगा यह जानना कठिन है कोन कह सकता है कि इस कर्म का फल इस समय में होगा। इस प्रकार कर्म के फल का निश्चय न होने से ही शास्त्र में कर्मगति को विचित्र औ दुर्विज्ञेय (१).कहा है। परन्तु यह संशय मत करना कि (जब सर्वकर्म मिल कर . एक जन्म नहीं देते हैं तो एकमविक कैसे माना ) क्योंकि यथा- संभव ही एकमविकवाद का स्वीकार है, कुछ सर्वत्र नहीं, अर्थात्- नियतविधाकस्थल में एकमविक का संभव होने से वहां पर एक भषिक माना जाताहै भी अनियतविपाक में संभव न होने से वहां नहीं माना जाता है, तथा च एकभाषिक मत को क्वाचिल्क होने से कोई भी दोष नहीं है (२) यह फलित हुआ ॥ १३ ॥ इस प्रकार कमों को क्लेशमूलक औ विपाकों को कर्ममूलक गहमा कर्मणो गतिः" इत्यादि शास्त्र में । २. (२) एवं च यह सिद्ध हुया कि एकमधिकबाद उत्सर्ग है अर्थात् जहाँ कोई बांधक होय वहां एकभावक्र मत मानना, औ अन्य सर्वत्र मानना परन्तु सर्वथा एक । भावकवाद नहीं है यह मत जानना, इसी आशय से भाष्यकारों ने कहा है। नचौरस- स्याऽपरदानिवृत्तिः) अर्थात्-कहीं अम्भव होने से उत्सर्ग की एकवार निवत्ति की नहीं होती है।
. साधनपाद! कहा, इदानीं (यह विपाक किंस क्लेश का मल हैं) इस पाशं- का का वारण करते हुये विपाकों का फल कहते हैं। सू० ते लादपरितापफलाः पुण्याऽपुण्यहेतुत्वात् ॥१४॥ भाषा-ति) यह पूर्वोक्त जन्म, आयु,भोग नामक तीनों विषाक (पुण्याऽपुण्यहेतुत्वाद् ) पुण्य औ अपुण्यरूप कारणमूलक होने से (इलादपरितायफलाः) बाल्हाद औ परिताप फल वाले हैं। अर्थात्-शुभ कर्म से जो जन्मादि प्राप्त होते हैं वह आनन्द रूप फल के देने वाले है श्री अशुभवार्म से जो जन्मादि प्राप्त होते हैं वह दुःख रूप फल के देनेवाले हैं। यद्यपि पायहेतुक जन्मादि को दुःखफलक होने से पाप- कार्य ही जन्मादि योगी को त्यागने योग्य हैं कुछ पुण्यहेतुक नहीं, तथापि जैसे दुःख प्रतिकूलरूप सर्वानुभव सिद्ध है तैसे योगी को विषयसुख भी प्रतिकूल होने से दुःख है (१) क्योंकि विषय- सुखभोग काल में भी योगी को सूक्ष्म दुःख का अनुसन्धान बना ही रहता है, अतः सुखफलक भी जन्मादि हेय ही हैं यह जानना ॥ १४॥ 'विषयसुखभोगकाल में भी योगीलोक दुःख का अनुसन्धान करते है यह किस युक्ति द्वारा जाना जाय' इस आकांक्षा का शमन करते हुये युक्तिपूर्वक विषयसुख को दुःखरूप कहते है- सू० परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणत्तिविरोधा- च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥१५॥ भाषा-(विवेकिनः) विवेकशील योगी की दृष्टि में सर्व- दुःखमेव' निखिल विषयसुख दुःखरूप ही है क्योकि (परि- *(१) यया चेद दुख प्रतिक्लात्मकमेर विषयसुखकालेऽपि दुखमस्येव प्रति- कात्मक योगेन." इस भाष्प का यह अनुवाद है।
पातञ्जलग्नप्रकाशे- गामतापसंस्कार दुखैः) परिणामदुःख, तापटुःख, संस्कारदुःख इन तीनों दुःखों से विषयसुख को मिश्रित होने से, (च) औ (गुणवृत्तिवि- रोधात् ) गुणनिष्ठ स्वाभाविक चाञ्चल्य से निरन्तर सत्त्वगुण की सुखाकारवृत्ति को अन्य विरोधी वृत्तियों कर संवलित होने से। अर्थात्-परिणामदुःखतादि धर्मों से मिश्रित होने से विवेकी को निखिल ही सुख दुःखरूप भान होता है। परिणामदुःखता-निखिल (१) प्राणियों को जो पुत्र कलत्र मित्र- धन यह क्षेत्र रूप चेतन अचेतन पदार्थों द्वारा विषयसुख का अनुभव' है वह सब रागरूप क्लेश से अनुविद्य (युक्त) ही होता है क्योंकि यह कवी भी संभव नहीं हो सकता है कि यह विषय इस को सुखप्रद तो है परन्तु पुरुप का इस में राग नही है किन्तु यही नियम है कि जहा सुख.वहां राग अवश्य ही होता है, अतः सुखाऽनुभव रागानुबिद्ध है यह सतरां सिद्ध हुआ, श्री वह राग रजोगुण का कार्य होने से सुखसाधन पुण्य अपुण्य में प्रवृत्ति अवश्य ही करारावैगा, एवं च वानुभव समय में जो राग वह प्रवृत्तिहारा पुण्या पुण्य का हेतु हुआ, एवं (२) सुखाऽनुभव समय में दुःख को साधनों मे द्वेष होना भी स्वभावसिद्ध है, एवं च द्वेष भी अनर्थ में प्रवृत्ति द्वारा पाप का जनक हुआ, एवं यदि दुःख साध- नों के परिहार करने में वह पुरुष असमर्थ होगा तो मोह वश से कर्तव्याऽकर्तव्यविवेक को भी वह विस्मृत कर देगा, एवं च मोह भी अनर्यप्रवृत्ति द्वारा पाप का हेतु हुआ, एवं भूतहिंसा मे विना भी, भोग का असम्भव होने से कायिकहिंसा जनित "(१) प्रथम परिणाम दु खताका विवरण करते हैं (निखळ ) इत्यादि से । (२) विषय सुग्व में राग से जन्य धर्माऽधर्म का निरूपण कर उप न य अध. कहते हैं (एव इत्यादि से। t - साधनपादः २॥ व भी एक पाप हुआ (१) यह जो सुखाऽनुभवकाल में राग, द्वेष, मोह, हिंसादि की विद्यमानता से आगामी अवश्यभावी पापजन्य दुःख वही परिणामदुःख है, इस परिणामदुःख का जनक होने से ही विवेकी जन विषयसुख को दुःख जानते हैं, अतएव पूर्व (२) विषय सुख में सुख ज्ञान को अविद्या कहा है। यद्यपि सर्वाऽनुभवसिद्ध विषयसुख का दुःख जान अपलाप करना योगी को उचित नहीं तथापि विवेदी का तात्कालिक घी अविचारितरमणीय विषयसुख में शाटर न होने में वह उस को दुःख ही जानता है, अर्थात् यथा सवु-विष मिसित भोजन में तात्कालिक सुखजनकता को सर्वाऽनुभव सिद्ध होने पर भी विवे की लोक परिणाम मे दुःखप्रद जान कर त्याग करते है तैसे योगी भी विषयसुखभोग को तात्कालिकरमणीय होने पर भी आगामी धर्माधर्मोऽत्यत्तिद्वारा दुःखप्रद होने से हेय समझते हैं। अतएव भगवान् ने-" विषयेन्द्रियसंयोगाट्यत्तदयेऽमृतोप- मम्, परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ” (३) इस वचन से विषयसुख को परिणाम में विषतुल्य कथनहारा हेय कहा है। (१) विषयभोग में हिंसा होने से ही मनुजी ने "एच सूना ग्रहस्थस्य ' इत्यादि वचन से ग्रहस्थ को प्रतिदिन पच हिंसा वाला वाहा है । अर्थात्-चल्ली, पेरणी ( गाता वोचको ) उपस्कर (झाडू) कण्डनी ( उग्वली ) उदकुम्भ (जमघट ) इन पांचों द्वारा गनेक प्राणियों की हिंसा प्रहस्थ क ग्रह में होती है, यह तत्व है। (२) १३४ पृष्ट में देखो। (३) लोक में प्रसिद्ध लगच दनवनितादि विषयों के संग इन्द्रियसयोगद्वारा गाय जो भारम्भ में पुरषों को अमृतके तुल्य ओ परिणाम में विप के तुल्य सुख वह रामट है, यह गीतायाप का अर्थ है, अ० १८ शोक ३८ ।
पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- यदि कोई यह कहै कि (१) इम कुछ विषयभोग को सुख नहीं मानते हैं जिस से पूर्वोक्त टोष होय किन्तु भोगविषयक इ- न्द्रियों की तृप्ति होने से जो भोगतृष्णा की शान्ति वह सुख है भी जो तृप्ति के अभाव मे शान्ति का अभाव वह दुःख है, एवं च भोगविषयक तृष्णा ही महान् दुःख है कुछ विषयभोग नहीं, यो विषयतृष्णा विषयभोग बिना शान्त हो नहीं सकती, अतः तृष्णा की शान्ति करता ही विषयभोग का फल हुआ, औ सो शान्ति यरिणाम में दुःख जनक है नहीं, तथा च विषयभोग में परिणाम दुःख कैसे? तो यह उस का वक्तव्य तव समज्जस हो सकता है जब कि विष- यभोग से तृष्णाशान्ति की संभावना होय परन्तु सो संभावना हो नहीं सकती क्योंकि “भोगाभ्यासमनु विवईन्ते रागाः कौशला- नि चेन्द्रियाणाम्" अर्थात्-भोगों के.अभ्यास से तृष्णा का अभाव तो दूर रहा प्रत्युत भोगाभ्यास से तृष्णा की वृद्धि औ इन्द्रियों की भोग में कुशलता होती है, जातु कामः कामाना- मुपभोगेन- शाम्यति, विधा कृष्णवर्मेव भूय एवाऽभिवईते (२) इस वाक्य से मनु जी ने विषयभोग को तृष्णावृद्धि का हेतु कहा है। इत्थं च भोगाभ्यास सुख का उपाय नहीं यह निष्पन्न हुआ। तथा च जो पुरुष विषयवासना से युक्त हुआ भोगाभ्यास से तृष्णा की निवृत्ति का संपादन चाहता है वह पुरुष वैसे ही दुःख- (१) " या भोगेष्विन्द्रियाणा तृप्तेरपशान्तिस्तत्सुखम्" इस भाष्य का अनुवाद घरते दुपे आशका उत्थापन करते हैं, "यदि वाई" इत्यादि से । (२) ( काम ) विषयभोग की अभिलाषा ( कामानामुपभोगेन) विषयों के भीगने से शान्त नहीं होती है किन्तु जैसे घृतादि डालने से आग्न अधिक समृद्ध होता है ते भोग से अधिक से अधिक बडती हो जाती है, यह मनु ग३।९४ श्लोक का अर्थ है। " थतएव न " साधनपादः । १६.. पंक में निमग्न होगा जैसा कि वृश्चिक से भीत हुश्रा पुरुष सर्प के मुख में पड़ कर दुःख में निमग्न हो जाता यह परिणामदुःखता ही योगी को विषयसुख के अनुसब काल में प्रतिकूल हुची दुःखप्रद होती है क्योंकि भोगकाल में भी योगी मन में यह विचार करता ही रहता है कि इस विषयसुख से धनन्तर दुःख अवश्य ही होगा! तापदुःखता = विषयाऽनुभवकाल (१) में सुखमाधन की पूरणता के अभाव मे चित्त से परिताप होने का नाम तापख- ता है, शर्वात्-सुखाऽनुभवकाल में सुख के विरोधी पदार्यों में शेष होने में जो चित्त में खेदविशेष वह तापदुःख है, एवं देष से यशुभग्रवृत्ति द्वारा धर्म भी अवश्य उदय होगा, एवं सुखसाधनों की प्रार्थना करता हुआ कायिकवाचिकमानसचेष्टा द्वारा किमी श्रो किसी को पीडा भी अवश्य ही करेगा, एवं.च अनुयह निग्रह द्वारा भी धर्माऽधर्म उत्पन्न हुआ, तथा च सुख- भोगकाल में देषजनित जो चित्त में खेद यो देष-मोह-जोभादि (२) जन्य धर्मधर्मधारा जो आगासी दुःख की संभावना वह ताप- दुःखता जाननी (३)। पर अनुग्रह , ARMANARAAMNx (1) परिणामद.ग्यता का निरूपण कर इदानी तापटु पता पाहत हैं "विप. याऽनुभन" इत्यादि से। (२) अनुकूल ननो पर मग्य लोभ से अनुग्रह वरने गे औ विरोधि जनों पर मोह वश में पीडा देने में भी धर्माधर्म अयश्य उत्पन्न होगा, अत द्वेषात् लोभ मोह भी परिणामदु.व का हेतु जानना । (३) परिणामदुःनता से ताप टुलता में यह विशेषता है कि पारणामदु.खता कोयल विवेवी को ही ज्ञात होता है ओ सापटु ग्यता भोगी को भी भोगशल में ज्ञात हो जाती है, तापद्वारा शुभाशुभ कमों में प्रवृत्ति द्वारा आगामी धर्माऽधर्म जन्य सुग्व दुख होने से परिणामदु म्यता भी तापट खता में अनगत जाननी । . + १७० पातञ्जलदर्शनप्रकाश- संस्कारदुःखता सुखाऽनुभव (१) से मुख संस्कार, संस्कार से सुख स्मरण, औ स्मरण से सुख में राग, ओ राग से सुख के लिये कायिकादिचेष्टा द्वारा शुभाऽशुभकमों में प्रवृति, औ प्रवृत्ति से पुण्याऽपुण्य, पुण्याऽयुण्य से फिर जन्म द्वारा सुखादि का अनुभव, श्रो अनुभव से फिर वासना, औ वासना से फिर स्मरण, फिर राग, फिर प्रवृत्ति, इस प्रकार सुखानुभव से जन्य जो संस्कार तथा कर्माशयसमूह वह संस्कारदुःखता है (२)। पूर्वोक्तप्रकार से अनादि प्रसृत (पसरा) हुआ जो यह दुःखप्रवाह वह योगी को ही प्रतिकूलरूप हुया क्लेशप्रद है भोगी को नहीं, क्योंकि "अक्षिपानकल्यो हि विद्वान्” यतः नेत्र के गोलक तुल्य योगी अतिसूक्ष्म है, अर्थात्-जैसे प्रतिस्निग्ध भी पटतन्तु (रेशम की तार) वा उतन्तुं नेत्र में ही पतित हुयी स्पर्श द्वारा दुःखप्रद होती है अन्य अंगों में नहीं तैसे नेत्रगोलकतुल्य सूक्ष्म योगी को ही यह तीन प्रकार के दुःख स्मृत हुये विषयभो- मकाल मे क्लेश देते हैं इतर भोगी को नहीं क्योंकि इतर भोगी पुरुष को तो प्राप्त हुये ही आध्यात्मिकाटि ग्यूल दुःख दुःख प्रतीत होते है कुछ बिषयसुखभोगकाल में विद्यमान सूक्ष्मदुःख नहीं, अर्थात् इतर जो भोगी पुरुष है वह अनादिवासना से विचित्र रूप चित्तवृत्ति (३) अविद्या से अनुविद्य ो अनात्मपदार्थों (1) सस्कारदु रता का निरूपण करत है ( सुग्याऽनुभय) इत्यादि म । ( २ ) सस्मारनय स्मरण द्वारा प्रवृति से धमाऽधर्म ज य आगामी दुख की संभावना होने से मार द्वारा भी विषयसुख दु ग्व है । (३) चित्त में रहनेवाली ओ निदिल का कारण वो अविद्या उस अविद्या से ('समन्तत. ) सव कार्यों में अर्थात् शरीरादि में महनार ( मैं हूँ) औ पुनादि में ममकार अर्थात् यह मेरे हैं इस प्रकार हेय पदार्थों में आत्मबुद्धि वाले पुरष यो त? स्वयार्मोपानित नये से नये आध्यात्मिकाई स्थूल दु ख ही दु ग्व प्रतीत होते हैं कुछ परिणामादिदःख नहीं, यह भाव है।
नही। .. सापनपादा। में अहंकार समकार करता हुआ औ स्वकर्मोपार्जित प्राप्त प्राप्त दुःखं को भोगहारा त्यागता हुआ औ त्यक्त त्यक्त दुख को फिर ग्रहण करता हुआ विषय सुख में, सूक्ष्म दुःख को न जानकर स्थूलदुःख का ही अनुसन्धान करता है कुछ सूक्ष्म दुःाव का इस प्रकार अपने को ओ अन्यों को अनादिदुःखप्रवाह द्वारा इतस्ततः भ्रमणशील जान कर यह योगी सम्यग्ज्ञान से बिना अन्य कोई दुःख की निवृत्ति का उपाय न समझ कर सम्यग्ज्ञान की शरण में ही प्राप्त होता है, कुछ विषयसुख के भोग में वह प्रवृत्त नही होता है। जिस प्रकार (१) परिणामदुःखतादि से मिथित होने से विषय सुख दुःखरूप है तैसे गुणवृत्तियों को परस्पर विरुद्ध होने से भी विषयसुख दुःख ही है, अर्थात्-प्रख्या प्रवृत्ति स्थितिस्वरूप सत्त्व रज तम यह तीनो गुण जिस कार्य का (शान्त वा घोर वा मूढ का) आरम्भ करते है वह कार्य विगुणात्मक ही होता है क्योकि वह तीनों परस्पर अनुगृहीत हुये ही कार्य का प्रारम्भ करते हैं कुछ एकले, ही नही, एवं.च सुखोपभोगरूप शान्त चित्तवृत्ति को मी त्रिगुणात्मक होने से उस वृत्ति में भी दुःख औ विषाद की विद्यमानता अवश्य ही माननी पडेगी, तथा च सत्त्वगुणप्रधान- गुणवव की कार्य्यभूत शान्तस्वरूप सुखवृत्ति को भी राजसटुःख औ तामसविषाद कर अनुविद्ध होने से विषयसुख स्वभाव से ही दुःखरूप है,यह सिद्ध हुया। किंञ्च (२) यह सुखोपभोगरूप शान्तवृत्ति यदि कुछ काल- (१) इदानी " गुणात्तविरोधाच " इस पद का व्याख्यान वरते हुये विषय- मुग्व में स्वाभाविकदुख वा ससर्ग निम्पण परते हैं (जिस प्रकार ) इत्यादि से । (२)" च च गुणवृत्तमिति क्षिप्रपरिणामि चित्तमुक्तम् " इत्यादि भाष्यश अनुवाद करते हुये सुखात्मकवृत्ति को क्षाणक कहते हैं (विञ्च) इत्यादि ।
१७२ पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- पर्यन्त स्थित रहती तो भी कुछ विषयसुख को मुख कहा जाता परन्तु सो है नही क्योंकि गुणों को चञ्चल होने से क्षणार में ही चित्त विलक्षण र परिणामों को धारन करता रहता है, प्रतः क्षणिकमुख होने से भी विषयसुख दुःख ही है। यदि कोई वह शंका करे कि "एक ही चित्त की वृत्ति का एक कान मे परस्परविरुद्ध शान्त घोर मूट रूप धर्मों से संवन्ध कैसे" तो इस का उत्तर भाष्यकारो ने यह दिया है कि- "रुपा- तिशया वृत्त्यतिशयश्च परस्यरण विराध्यन्त सामान्यानि त्वति- शयः सह प्रवर्तन्ते” अर्थात्-धर्माधर्मादिरूप (१) का अतिशय या वृत्तियों का अतिशय परस्पर विरुद्ध है सामान्य तो अतिशय के सग भी रह सकता है। अर्थात् अतिशय श्री सामान्य परस्पर विरुद्ध नही। भाव यह है कि जो उदारावस्थापन्न विशेष धर्म है यह सजातीय उदारावस्थापन्न विशेष के विरोधी होते हैं कुछ सूक्ष्मा- वस्थापन्न सामान्य को नही क्योकि तुल्यवलशीलों काही विरोध होता है अतुल्यबलों का नही, एव च जो धर्म फलोन्मुख होने से अतिशय है वह उसी अधर्म का विरोधी होगा जो कि अपने फल देने को उन्मुख हुया चाहता है औ जो सामान्य रूप से अधर्म विद्यमान है उस का विरोधी नही होगा, एवं सुखो पभोग वाल मे सात्त्विक शान्तवृत्ति भी उदारावस्थापन्न दुःख वृत्ति की विरोधी है कुछ सूक्ष्म वा विच्छिन्नाऽवस्थापन्ने दुःख वृत्ति की नही, तथा च यह सिद्ध हुया कि गौणमुख्य भाव को प्राप्त हुये सत्गटिगुण जिस कार्य का प्रारम्भ करते हैं वह (१) भाष्य ग प नाम बुद्धि व धमो वा है । धर्ग, अधर्म, ज्ञान, अज्ञान, धेराग्य, अप्रैराग्य, एश्वर्य, भनैश्वय्य, यह आर नाद्ध के धर्म हैं, मोई वहत हैं ( धमाS माटे) इति ।
साधनपादः २. सब लिगुणात्मक होने से सुखदुःखमोहस्वरूप अवश्य ही होंगे, । परन्तु इतना विशेष है कि-सुखभोगससव में दुःख औ विषाद गौण हैं।ौ सुख प्रधान है, एवं दुःख के प्राधान्यसमय में मुख विषाद को गौण जानना (१) अतः विवेसी को विष- यसुख भी दुःख है यह सुतरां सिद्ध हुया,तथा च विषयसुख को औपाधिक (२) तथा स्वाभाविक दुःखाऽनुविद्ध होने से विषयसुख का योगी को त्वागही करना उचित है, परंतु इस दुःखपरम्परा- मिथित विषयसुख का त्याग अविद्या की निवृत्ति बिना होना असंभव है क्योंकि अविद्या ही इस महान्दुःख समुदाय का मूल कारण है, जो अविद्या की निवृत्ति विना तत्त्वज्ञान से होनी असं- भव है, क्योंकि तत्वज्ञान ही मिध्याज्ञान के समूलउन्मूलन का हेतु है, यौ तत्त्वज्ञान का होना योग के अंगों के अनुष्ठानाधीन है, औ योगांगों का परिज्ञान विना इस योगशास्त्र के परिशीलन में प्राप्य नहीं, अतश्च कैवल्योपायभूत यह योगशास्त्र परमोपकारी- होने से मुमुक्षु को उपादेय है यह फलित हुया, एतादृश परमो- पकारी होने से ही यह शास्त्र सर्वोपकारक वैद्यकशास्त्र के समान चतुडूंह वाला है। अर्थात् (३) जैसे वैद्यकशास्त्र में रोग, रोग का हेतु, रोग की निवृत्ति, रोगनिवृत्ति का कारण भैषज्य, यह चार व्यूह (१) मुम्वकाल में सत्त्वगुण प्रधान रहता है औ अन्य दानों गुण सामान्यरूप से रहते हैं, इत्यादि विशेप भी जानलेना | (१) यहा इतना विशेष यह भी जान लेना कि परिणाम ताप-सस्कार दृश्यों कर श्रित होने से विषय सुम्व में औपाधिक दुख कहा गो गुणवृत्तिविरोध से खाभाविक ख कहा सोई कहत हैं ( औपाधिक)। (३) यथा चिकित्साशाख चतुर्व्यहम् " इत्यादि भाष्यो अर्थ को सट करते हैं ( अर्थात् ) इत्यादि से। . स । १७४ पातञ्जलदर्शनकाशे- (१) हैं तैसे इस योगशास्त्र में भी संसार, ससारे का कारण, मोक्ष, मोक्ष का कारण, यह चार ब्यूई (२) है, इन चारो में से जो दुःखबहुल संसार है वह हेच है, श्री प्रकृतिपुमय का संयोग इस हेय का कारण है, औं संयोग की अत्यन्त निवृत्ति हान है, ओ सम्बग्टर्शन हान को उपाय है (३)। }. वहाँ पर इतना विशेप यह भी ज्ञातव्य है कि संयोग की आत्यन्तिकनिवृत्तिरूप जो कैवल्यपदवाच्य हान है वह हान करने वाले पुरुप का स्वरूप ही हैं कुछ पुराण मे भिन्न नहीं (-४) अतः वह कैवत्व न उपादेय ही है नौ न हेय ही है क्योंकि जो वस्तु अंपने से भिन्न होता है वही उपादेय वा हेय होता है कुछ निजरूप नहीं। एवं च जो बोद्ध विज्ञान सन्तानरूप आत्मा के अभाव को मोक्ष मानते है उनके मते में आत्मा के शन से उच्छेद, बाद (५) प्रसक्त होने से भी जो विशुइविज्ञानप्रवाह के उदय को मोच मानते हैं उन के मत में नूतन कैवल्य के उदय - (१) व्यूहनाम सक्षिप्त अवयरचना वा विभाग का है। (0) इही का हौ यथाक्रम हेय, हेयहेतु, हाग, हानोपाय, यह नाम है। ( ३ ) यहा रोग के स्थानापन्न हेय सत्तार, औ रोगकारण धातु पम्य के स्थाना पन्न प्रकृतिपुरप वा सयोग, औ आरोग्य फ स्थानापन्न हान पद वाच्य मोक्ष, ओ औषध के स्थानापन्न सम्यग् ज्ञान, जानना । (४) इस मत में अभाव को अधिकरण स्वरूप होने से औपाधिकस्योग जय दु ख वी निवृत्ति पुरुषस्वरूप है यह तत्त है । ( ५ ) योगाचार मतवाले नौलपीतादि रूप से विरक्षण क्षणिक ज्ञानप्रवाह । बध मानते हैं औ दीपोनर्वाण के तुल्य उस प्रवाह के नाश को मोक्षमानते हैं भी क्षणिक विज्ञान ही उन के मत में आत्मा है, एव च आत्मोच्छेद हो उह के मत में गोक्ष होने से यह उच्छेद वाद हुआ ।
साधनपादा '१७५ से हेतुवाद (१) प्रसक्त होने से यह दोनों, अपुरुपाय (27) होने से अग्राह्य है, सो इन दोनों से भिन्न जो आत्मस्वरूपाव स्थान कैवल्य है वह हेयोपादेयशून्य होने से याह्य है, ओ येही शास्वतबाद है, ओ यही सम्बग्दर्शन है । १५... इदानीं जिस प्रकार यह शास्त्र चतुर्दूइ है उसी प्रकार को क्रमपूर्वक प्रतिपादन करते हुये सूत्रकार प्रयस हेय का निरूपण करते हैं- सू० हेयं दुःखमनार्गतम् ॥ १६॥ भाषा-(अनागतम्) आगामी अर्थात् आगे होने वाला जो (दुःखम् ) दुःख ; वह (हेवम् ) डेय बर्यात् त्यागने योग्य है। अर्धात जो टुःख अतीत हो चुका है वह तो भोगधारा ही = नष्ट हो चुका, अतः वह हेयपक्ष में नहीं हो सकता, औ जो दुःखं वर्तमानक्षण में भोगारूट है वह भी द्वितीय क्षण में नष्ट होने से हेयता को प्राप्त नही हो सकता, किन्तु जो भावी दुःख है वही नेत्रगोलकातुल्य योगी को क्लेशित करता है, अतिवाहित . (1) माध्यामा गत वाले नालादि ज्ञान प्रवाह का अभ्याम से निवृत्ति पूर्यक विशुद्ध विज्ञान प्रवाह य उदय का माक्ष मानते हैं, एव च इस के गत में नूतन प्रवाह का उपादान हान स हनुवाद हुआ अर्थात् उत्पन्न होने से मोक्ष अनित्य हुआ। (२) प्रथम पक्ष में आत्मा का रछेद होने मे पुरुषार्थाऽभाव स्पष्ट ही है, ओ द्वितीयपक्ष में कैवल्य को उत्पत्ति घाला होने से कार्य्यत्व प्रयुक्त अनित्यत्न होने से पुरु. पार्थाऽभाव जानना, अतएर यह दोनों अग्राह्य है। यद्यपि त ब्रसेगाका-तों को अपने मान के लिये विपभक्षणादि में प्रवृत्ति होने मे आरमोच्छेद भी पुरुषार्थ हे सकता है तथापि विचारशील पुरुष मात्माच्छेद को पुरुषार्थ नहीं मानते हैं क्योंकि विषादि से आत्मोच्छेद करना साहासिक ओ अविचारशीलों को ही कर्तव्य है कुछ विवकियों का नहीं ।
. १७६ पांतखलदर्शमप्रकाशे- मतः वही हेय हो सकता है (१)। इस प्रकार य का निरूपण कर इदानी इस हेय का कारण निर्दिष्ट करते हैं- सू० द्रष्टदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७॥ भाषा-(द्रष्ट्टदृश्ययोः) द्रष्टा औ दृश्य का जो (संयोगः ) परस्पर भविवेवाकृत संबन्ध, वह (हेयहेतुः) हेयसंज्ञक संसार वा दुख का कारण अर्थात्-प्रधान-पुरुष का जो अनादि अविवेककृत परस्पर संयोग वह संसार का कारण है। द्रष्टा नाम बुद्धिप्रतिसंवेदी (२) पुरुष का है ो दृश्य नाम बुद्धिसत्त्वोपारूठ (३) निखिल धर्मों का है, यह बुहियादि दृश्य ही अयस्कान्तमणि के तुल्य सन्निधि मात्र से हशिरूप स्वामी का उपकार करता हुया दृश्यरूप से स्व हो जाता है, भो यही मोक्ताभूत पुरुष का भोग्य हो जाता है, यद्यपि यह दृश्य (१) यहां पर यह शामत करनी कि ( भावष्यत् दुःख को सत्ता में प्रमाण के अभाव से तिम की नियति पुरुषार्थ कैसे ) क्योंकि तृतीयपाद के १४ मन में नि- खिल ही वस्तु में अनागतावस्थ्या से कार्य रहता है यह अनुमान प्रमाण वक्ष्यमाण है, अर्थात्-यावत्कालपर्यन्त वस्तु की स्थिति रहती है तायमालपर्य्यन्त उस की शक्ति भी अवश्य ही रहती है, औ शक्ति कहिये या कार्य की अनागतायस्था याहिये यह दोनों समान है, एवं च यारत्काल चित्तरूप द्रव्य रहे गा तावत्कालपर्यन्त अनागताऽवस्था से दुःख भी अवश्य उन में रहेगा, यह तत्व है (२) बुद्धि में प्रतिबिवित हो तदाकार के धारन करने से पुरुष को बुदिप्रतिसं- बैदी कहा जाता है, अधवा अपने प्रतिबिम्धद्वारा बुद्धि को चेतन तुल्य करने से बुद्धि- प्रतिसंवेदी जानना। (३ ) इन्द्रियों द्वारा जिनपदार्थों का बुद्धि प्रहण करती है या महङ्कारादि द्वारा जितगे तत्त्व युद्धि से उत्पन्न होते हैं यह मब पदार्थ बुद्धिमत्त्वोपास्ट कहे जाते हैं, एवं च दृश्य पद से निग्विल प्रकृतिकार्य का ग्रहण हुया, क्योंकि एप्ता कोई पदार्थ ही नहीं है। जिम को बुद्धिविषय न करे यो जो बुद्धि का कार्य न होय, अतएव आप्रेमसूत्र में निखिल हो भडवर्ग यो दृश्य वाहा दे। . - साधनपाद: २ अपने जड़रूप से लब्धमत्ता वाला होने से स्वतन्त्र है तथापि पुरुष के अर्थ होने से परतन्त्र ही जानना, एवं च पुरुषार्थप्रयुक्त जो (१) स्वस्वामी भाव वाग्दृश्यभाव वा भोक्तभोग्यभावरूप अनादि । प्रकृतिपुरुष का (२) परस्पर संयोग वह दुःख का कारण है यह निप्पन्न हुया। पञ्चशिवाचार्य ने भी "तत्संयोगविवर्जनात्स्यादयमात्यन्तिको दुःखप्रतीकारः" (३) इस वाक्य में प्रकृति पुरुष के संयोग को दुःखका हेतु कहा है (१) पुरुषार्थप्रयुक्त कहने से पुरुप का भोग अपवर्ग रूप अर्थ हा सयोग का कारण है यह बोधन किया, भागादिरूप पुरुषार्थ प्रकृतिपुर पमयोग का स्थिति कारण है, क्योंकि इसी लिये सयोग स्थित है। औ विषयक नवामना सयोग का उपादान फारण है, यह तत्त (b) अनादि कहने से नो-यद्द शङ्का उदय होती थी कि “जो यह प्रकृति पुरप का सयोग है वह सामायिक है या नैमित्तिक है, यदिस्वामाविक वहो तो प्रकृति पुरुष को निस होने से सब भा नित्यमानना पडगा, प च नित्य मब ध की निवृत्ति के अमान से कल्य केमे, यदि यह कहो कि विपरयज्ञानयामनारूप निमित्त जन्य होने मे नैमित्तिक है तो अ त रणरूप आश्रय के अभार से वासना की स्थिति कैस क्योंकि अन्त करण भी वासनाकार्य्यमयोग जन्य है, एव च विपर्ययज्ञानवासना होय को सयोग द्वार" अ त करण को उत्पात्त होय ओ अ त करण होय तो वासना को आश्रय मिले, इम प्रकार अयो याश्रय दोप भी हुआ " सो शङ्का भी उच्छिन्न हुयी क्योंकि विपर्ययज्ञाननासना का अनादि होने से सयोग भी अनादि हा है, एव विपर्याय ज्ञानवासना या औ प्रकृतिपुरुषसयोग वा निमित्तनैमित्तिकभावमबध भी अनादि जानना, एव च सयोग नैमित्तिक औ अनादि है यह फलित हुआ । (२) यद्यप दृश्य के सङ्ग पुरुप के सयोग को ही मसार का कारण बहा है तथापि कृति द्वारा ही अ य दृश्य का सयोग होने से यहा दृश्याद से मुरयभूत दृश्य प्रकृति हो लेनी, अतएव भाष्यकारों ने (प्रधानपुरषयोः सयोगों हेयहेतु ) इस वाक्य से प्रकृति पुरुष को सयोग को समार का कारण कहा है, यह नानो। (३) दुवकारण वुद्धिसपोग के वर्जन से दु ख का अत्यत प्रतीकार (नाश) होता है यह इस का अर्थ है । ।
१७८ पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- लोक में जैसे परिहार करने योग्य दुःखहेतु पदार्थ का प्रतीकार (निवृत्ति का उपाय ) दृष्ट है तैसे यहां भी दुःखहेतु संयोग का प्रतीकार जान लेना, अर्थात्-लोक में जैसे पाद का तन्त भेद्य है औ कण्टक उस का भेदक है, सो कण्टक पर पाद न रखना वा उ- पानत्वरिधान (जूता पहिन) कर पादविन्यास करना यह इस दुःख का प्रतीकार है तैसे यहां कोमल पादतल के तुल्य मृदुल सत्त्वगुण (१) तप्य है औ रजोगुण उसका तापक है श्री प्रधान पुरुष के संयोग की हानि वा विवेकख्याति उस ताप का प्रतीकार है, एवं च लोक में जैसे भेद्य, भेदक, परिहार, इन तीनों को जानने वाला भेदक कण्टकादि की निवृत्ति के उपाय का अनुष्ठान कर भेदजन्य दुःख को प्राप्त नहीं होता है क्योंकि वह भेद्य, भेदक, परिहार, इन तीनों को जानता है तैसे यहां भी जो तप्य, तापक, परिहार, इन तीनों पदार्थों को जानता है वह भी विवेकख्यातिरूप परिहारका अनुष्ठान कर संयोगजन्य दुःखको प्राप्त नहीं होता है। यद्यपि ताप रूप जो क्रिया है वह कर्मभूत ( २ ) मत्त्व में ही है कुछ पुरुष में नहीं क्योकि पुरुष अपरिगामी तथा निष्क्रिय है तथापि दर्शितविषयत्वरूप (३) उपाधि से वा यविवेक से बुद्धि के तदाऽऽकार होने से पुरुष भी तदाकारधारी अनुताप को प्राप्त हो जाता है, एवं च पुरुष में औपाधिक तापसंयोग है ( ४ ) यह जानना ॥ १७॥ (१) यहा सत्च पद से सत्त्वगुणप्रधान बुद्धि का प्रहण करना । जिस को दुख होय वह तप्य औ बो दुख करें वह तापक है। (२) नो ताप को प्राप्त होता है वह ताप क्रिया वा कर्म है, अर्थात्-बुद्धि ही तप्य है पुरुप तप्य नहीं । ( ३ ) दर्शितविषयत्व का अर्थ १ पाद के चतुर्थ सूत्र के व्याख्यान में देखो । ( ४ ) बुद्धिरूप उपाधि के सबन्ध से पुरप तप्य है, औ प्रकृति पुरष का सयोग तापक है, औ विवेकख्याति इस का परिहार है, यह तत्व है।
साधनपाद:२। १७१ जिस दृश्य के संग संयोग होना ही निखिल दुःखों का कारण कहा है उस दृश्य का स्वरूप कधन करते हैं- सू० प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मक भोगाउंपवर्गार्थ दृश्यम् ॥ १८॥ भाषा-(प्रकाशक्रियास्थितिशीलं) प्रकाशशील, क्रियाशील, स्थितिशील जो बधाक्रम सत्त्व, रज, तम,यह गुणवय, वह (दृश्यम्) दृश्य कहा जाता है, यह गुणत्रय कीदृश है कि (भूतेन्द्रि- यात्मकम्) महत्तत्त्व, अहंकार, तन्मात्र, इन्द्रिय, तथा भूत रूप से परिणत होने मे भूतेन्द्रियस्वरूप है, किस के लिये गुणवय भूतादि रूप से परिणत होते हैं इस का उत्तरं कहते हैं (भोगाऽयवर्गा थम् ) पुरुप के भोग औ अपवर्ग रूप प्रयोजन के अर्थ ( १ )। अर्थात्-पुरुष के भोग अपवर्ग के अर्थ भूतेन्द्रियादिरूप से परिणत जो प्रकाशादि धर्म शील तीनों गुण वह दृश्य हैं। यह प्रकाशादिस्वभाव वाले संयोगविभागधर्मशील * तीनों गुण ही साम्याऽवस्था को प्राप्त हुये प्रधान वा प्रकृति शब्द के वाच्य हो जाते हैं यद्यपि (२) यह तीनों गुण भिन्नर धर्म वाले है तथापि इन का (१) प्रकाशक्रियास्पितिशाल-इम पर से गुणों का स्वरूप वाहा, औ भते- न्द्रियात्मकम्-इम पद से गुणों का कार्य्य कहा, औ भोगाऽपवर्गाऽर्थम्-इस पद से गुणों की प्रवृत्ति का प्रयोजन कहा, यह तत्व है । (4) जिन को विवेकख्याति उदय नहीं हुयी उन के सग गुण सयुक्त रहते हैं भी जिन को विवेकख्याति उत्पन्न हो गयी है उन से गुण विभक्त हो जाते हैं, इस लिये यह सयोगविभागधर्मशील हैं। (२) यहां पर भाष्यकारों ने “ परसरोपक्तप्रविभागा" इत्यादि अन्ध से तीनों गुणों का विशेषणद्वारा स्वभाव वर्णन किया है, सोई कहते हैं ( यद्यपि ) इत्यादि से- १ पातजलदानप्रकाश- भाग ) परम्पर उपरत ही रहता है, अतएव वह तीनों गुण परस्या अंगांगी भाव (२) में मिलकर ही एक कार्य को उत्पन्न करते है कुछ प्रयक्र नहीं, परस्पर ( 3 ) अंगांगिभाव होने पर भी इन गुणों की शक्ति भिन्न भिन्न ही रहती है, अतः निखिलकार्य विलक्षण हैं, मिल कर कार्य करने से ही यह तीनों गुण तुल्यजातीवअतुल्यजातीव ( ४ ) कार्यों के प्रारम्भक होते हैं। परंतु इतना विशेष है कि-स्व स्व प्राधान्यकाल में यह गुगा उद्भ तवृत्तिवाले होते हैं, ओ गौणकाल में सहकारीरूप से प्रधान के अन्तर्गत हुये अनुभूतवृत्ति वाले होने से अनुमित होते है (५) यह तीनों गुण किसी अन्य निमित्त से बिना केवल पुरु- पार्यकर्तव्याताप्रयुक्त समर्थ शील हुये एक प्रधान गुण का अनु- (१) सत्यगुण का प्रकाशरूप जा भाग है यह राजम प्रवृत्ति तथा तागम द ग्व में उपरक्त (युक्त) है, एन रजागुण का जो टुग्वरूप भाग है वह मात्तिक प्रकाश म तथा तासम्म मपादम अनुगत है, एर तामम पिपाद भी इतर भागों कर उपरक्त है । ( २ ) जब प्रकाशप र र्य उत्पन होगा तब सत्त्वगुण अङ्गी कहा जायगा जी इतर गुण अङ्ग कहे जायगे, एर अन्यत्र भी जान लेना । ( ३ ) यदि सब गिलकार हा कार्य का आरम्भ करते हैं तो मय को गुणत्रय का कार्य होने से धैलक्षण्य कैसे, इस वा उत्तर कहते हैं ( परस्पर ) इत्यादि से। ( ४ ) प्रकाशरूपसात्तिक कार्य के भारम्भकाल में सत्वगुण तुल्यजातीय है औ अ य दोनों गुण अतुल्यजातीय हैं, एर सत्त्वगुण की अपेक्षा से प्रकाश तुल्यजातीय है औ अ य गुणों का अपेक्षा से अनुल्यजातीय है, नहा नो तुस्यजातीय है यह उपा- दान कारण है, औ जो अतत्यजातीय है वह सहकारी कारण है। ( ५ ) जब दिव्यशरीर उत्पन्न करना होगा तब सत्वगुण का प्राधान्य रहता है औ रजतगगुण गौण रहते हैं, जो मनुष्य शरीर उत्पन्न करने समय में जगण का प्रा- धान्य औ मत्त्वतम की गौणता, एन तिर्यक् वीटादि शरीर की उत्पत्ति करने में तमो गुण का प्राधान्य औ मत्नरज या अप्रधानता जाननी, जिस का कार्य आरब्ध होता है वह गुण प्रधान हुगा उदार होता है औ जो इतरगुण हैं वह सहकारि कारण होने से अ- नुमित हुये सूक्ष्मरूप से रहते हैं, क्योंकि कार्यमात्र को त्रिगुणात्मक होने से सहकारी कारणों की मत्ता भी माननी रचित है।
साधनपाद: २॥ १८१ सरण कर अयस्कान्तमणि के तुल्य सन्निधिमान में पुरुष के उप- कारी होते हैं, एतादृश धर्म शील गुणों का ही नाम प्रधान है, यो यही दृश्य कहा जाता है। सो यह दृश्य ( १ ) भूतेन्द्रियात्मक है अर्थात्-सूक्ष्म-स्थूल भूतरूप से तथा सूक्ष्म-स्थूल इन्द्रिवरूप से (२) परिणतं होने से भूते- न्द्रियस्वरूप है, सो यह जो भूतादिरूप से प्रकृति का परिणाम है वह निष्प्रयोजन नहीं किन्तु सप्रयोजन है अतएव (भोगाऽपवर्गार्धम्) यह कहा है, अर्थात्-पुरुष के भोगाऽप्रवर्गाऽर्थ ही वह प्रकृति भूतादिरूप से परिणत होती है कुछ निप्प्रयोजन नहीं। तां अविभागापन्न गुणों के (३) इष्टानिप्टस्वरुप का अवधारण करना भोग है, औ गुणों से विभक्त भोक्ता पुरुष के स्वरूप का अव- धारण करना अपवर्ग है, इन टोनों प्रयोजनों से अन्य तीसरा कोई प्रधानप्रवृत्ति का प्रयोजन नहीं है। पञ्चशिवाचार्य ने भी "अयन्तु खलु त्रियु गुणेषु कर्तृपु अकतरि च पुरुपे तुल्याऽतुल्यजातीये (४) चतुर्थे तात्क्रयासा- (१) इम प्रकार गुणों का धर्म कथन कर इदानीं गुणों का कार्य कहते हैं "सो यह" इत्यादि। (२) सक्षमभत से पञ्चतन्मात्र, औ स्थूलभूत से पृथियो आदि पञ्चस्थूलभूत का ग्रहण करना, एव सूक्ष्म इन्द्रिय से महत्तत्त्व, उग्हड्तार, औ स्थूल इन्द्रिय से अन्य एकादश इन्द्रिय का ग्रहन करना। (३) अविभागापन्न, गुणों से अपने को भिन्न न जान कर गुणात्मक बुद्धिनिष्ट सुव दुग्यादि इष्टाऽनिष्ट धर्मों का अपने में अवधारण=निश्चय करने का नाम भांग है। ( ४ ) तुल्याऽतुल्य जातीये जैसे प्रकृति अजन्य है तेमे पुरूप भी अनन्य है, अतः पुरुष प्रकृति के तुल्पनातिनाला कहा जाता है, एरा गुण परिणामी औ पुरुष अ- परिणामी निष्क्रिय है, अतः प्रकृति की अपेक्षा से पुरुप विजातीय है। यह अविवेकी पुरुप त्रिगुणात्मक बुद्धि को कर्ता होने पर भी त्रिगुणातीत तुल्या- sतुल्पजातीय बुद्धिमाक्षी तुरीय अकर्ता पुरुप में बुद्धिनिष्ठ सुखादिधर्मों का आरोप करता हुआ गुणों से भिन्न अन्य शृद्ध चेतन को नहीं जानता है, यह पञ्चाशखा- चार्यमी के वाक्य.का अर्थ है। - पातखलदर्शनप्रकाशे- क्षिण्युपनीयमानान् सर्वभावानुपपन्नाननुपश्यन्नदर्शनमन्यच्छ- ड्कते" इस वाक्य से अविभागापन्नगुणों के स्वरूप निश्चय को ही भोग कहा है। यद्यपि यह भोग अपवर्ग रूप दोनों पुरुपार्थ वुद्धिकृत होने मै यौ बुद्धि में वर्तने से बुद्धि के ही धर्म है तथापि जैसे जयावा पराजय योद्धा में वर्तमान होने पर भी स्वामी भूत राना में व्यवहत होता है क्योंकि वह उस के फल का भोक्ता है, एवंवन्ध वा मोन बुद्धि में वर्तमान हुया ही पुरुष में व्यवहत होता है क्योंकि पुरुष बुद्धि का स्वामी औ उस के फल का भोक्ता है। तहां भोग अपवर्गरूप पुरुषार्थ का समाप्त न होना ही बुद्धिनिष्ठ बन्ध है यौ विवेकख्याति की उत्पत्ति से उस पुरुषार्थ की परिसमाप्ति हो जानी मोक्ष है। जिस प्रकार वन्धमोक्षरूप बुद्धिधर्मों का पुरुष से आरोप किया जाता है, इस प्रकार ग्रहण, धारण, अह, अपोह, तत्त्वज्ञान, अभिनिवेश (१) आदि धर्म भी बुद्धि में वर्तमान हुये पुरुष मे आरोपित किये जाते है, क्योकि यही उन के फल का भोक्ता है ॥१८॥ इदानी पूर्वोक्त दृश्य गुणो के स्वरूप प्रो अवान्तरभेद के निरूपणार्थ उत्तर सूत्र का प्रारम्भ करते है- सू० विशेषाऽविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणप- वाणि ॥१९॥ (१) ( ग्रहण ) स्वरूपमात्र से पदार्थ वा ज्ञान, (धारण) ज्ञात हुये पदार्थ की म्मति, (ऊर) पदार्थगत विशेष माँ का नितई से जानना, (अपोट) युक्ति से आरोपित धर्मो का दूर करना, ( तत्त्वज्ञान ) ऊह अपोह से पदार्थ वा अवधारण, (अभिनिवेश तत्यामधारणपूर्वका ग्रहण साग करना ।
साधनपादः २॥ १८३ , भाषा-विशेष, अविशेष, लिंगमात्र, अलिंग, यह चार तीनों गुणों के पर्व ( १ ) हैं। विशेष अविशेषसंज्ञक शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध, नामकपञ्च- तन्मानों के कार्य जो आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, यह पाञ्च भूत, औ अहंकार के कार्यभूत जो श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, धाण, नामक पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, औ बाक् हस्त, पाद, गुद, उपस्थ, नामक पञ्च कर्म इन्द्रिय, औ एकादश सर्वार्थ (ज्ञानकर्मे- न्द्रियस्वरूप) मन, यह षोडश गुणपरिणाम विशेष कहे जाते हैं क्योंकि यह सब शान्त-धोर-मूट-रूप विशेष धर्मों से युक्त हैं। अविशेष = एकलक्षण शब्दतन्मात्र, द्विलक्षण स्पर्शतन्मान, विलक्षण रूपतन्मात्र, चतुर्लक्षण रसतन्मात्र, पञ्चलक्षण गन्ध- -- (१) बाश के दण्ड में बांच बीच जो प्रन्धि ( गांठ ) होती है वह पर्व कहा नाता है, अर्थात्-इन चारों विभागों में गुण विभक्त हैं, अर्थात्-यह चार गुणों की आस्था है। यहा इतना विशेष यह जानलेना कि-साख्य योग मत में सब तत्त्व चार विभाग में विभक्त हैं, यथा-प्रकृति, प्रकृतिविकृति, विकृति, अप्रकृतिविकृति, प्रकृति नाम तत्स्व के कारण का ओ विकृति नाम कार्य का है, तहा गुणत्रय की साम्याऽपस्थारूप को प्रधान वह प्रकृति है, औं महत् , अहङ्कार, पञ्चतन्मात्र, यह सप्त प्रकृतिविकृति है क्योंकि यह सप्त कार्य कारणस्वरूप हैं, अर्थात् महत्तस प्रकृति का कार्य औ अहवार का कारण है, एव अहङ्कार महत्तत्स का कार्य है ओ पचतन्मात्र का कारण है एव पच तन्मात अहकार का कार्य है औ स्थळभूतों का कारण है, पचभूत एकादश इन्द्रिय यह पोडश पदार्थ विकृति हैं, औ चेतन पुरुष अप्रकृतिविकृति है, तहा जो विकृति- रूप १६ पोडश पदार्थ हैं, उन की विशेष सज्ञा है, औ जो प्रकृतिविकृतिरूप है उन ) को अविशेष सज्ञा है, जो प्रथम विकृति महत्तत्व को लिंगमान सज्ञा है, औ प्रकृति की अकिंगसज्ञा है। (1) इन पचत मात्रों में से पूर्व पूर्व तन्मान उत्तर उत्तर तन्मात्र में अनुगत है अत यथाक्रम एक क्षण द्विपक्षणादि जानना ।
१८१ पातजलदर्शनकाशे- तन्मात्र, यड पाञ्च, यो इन का कारण भूत यहंकार, यह षट् अविशेष हैं (१)। वह अविशेषसंजक पट् सत्तामान महान् आत्मा (महत्तत्व) के परिणाम है, क्योकि इनपट से पर औ इन छवों का कारण भूत जो सत्तामात्र महत्तत्त्व है तिस सत्तामात्र (२) महत्तत्त्व में सूक्ष्मरूप- से स्थित हुये ही वह पट् पञ्चभूतादि कार्योत्पादन द्वारा स्थूल रूप मे वृद्धिकाष्ठा को प्राप्त होते हैं औ फिर लयोन्मुख हुये भी यह षट् तिससत्तामात्र महत्तत्त्व में सूक्ष्मरूप से अवस्थित हुये जो निसत्ताऽसत्त (३) निसदसट निरसट् अव्यक्त गलिंग प्रधान है तिस में लीन हो जाते है, (४) अतः यह पट महतत्त्व के परिणाम हैं (१) इनम्न में शान्त घार मूदरूप विशेषधर्म नहीं रहते हैं अन यह विशेप हैं। (२) पुरप क भागाऽपपर्गरूप अर्थ क्रिया करन का क्षगतापाला होन से मह- तव सत्तामान कहा जाता है। (३)(निसत्ताऽमत्तम् ) पुरुषाथ सपादन का नाग सत्ता है औ तुच्छता का नाम असत्ता है, इन दानों स रहित का नाम निमत्ताऽनत्त है, अर्थात्-गणत्रय की साम्यावस्थारूप जा प्रधान हे यह पुरुप के भागाऽपवर्ग सपादन में असमर्थ है क्योंकि जब सत्वगुणरजगुण व प्राधा य स महत्तत्वादि का उत्पत्ति हाता है तबा महत्त्वादि पुरुषार्थ व सपादय होत हैं, कुछ साम्याऽवस्था नहीं, अत यह प्रधान सत्ता से रहित है, औ शशशृङ्ग के तुल्य एकसार मिथ्या भी नहीं है अत: अमत्ता स राहत है । (निसदसद्) असत् नाम सूक्ष्मवारण का ओ सत्नाम स्थूल कार्य का है, अर्थात् कार्यकारणभाव स राहत, गुणों का वैपम्याऽवस्था यो हा कारण हाने से साम्यावस्था कारण नहीं है, अत यह किसा का कारण नहीं, ओ गुणत्रयस्वरूप हान में किसी या कार्य भी नहीं, (निरसद् ) आकाश पुष्प का तरह तुच्छ न होने से असत् से भिन्न है। स्थूक न होने से यह प्रधान अव्यक्त है। (b) यह सब पट अविशेष महत्तत्त्र मे उत्पन्न होते हैं औ उसी में लीन होते है अत यह छै महत्तत्व का परिणाम हैं प्रथम अपने कारण में लीन होकर फिर धारणसहित प्रकृति में लीन होते हैं, यह क्रम है। .
साधनपादः २।। , . लिङ्गमात्र = इन पट का कारणभूत जो प्रधान का प्रथम परिणाम महत्तत्त्व वह लिंगमात्र है। अलिङ्ग = महत्तत्त्व का कारणभूत जो निमत्ताऽसत्त पदवाच्य गुणों की साम्यावस्था रूप प्रधानाख्य परिणाम वह अलिंग (१) है। इन गुणों की चारो अवस्थाओं में से विशेष, अविशेष,लिंग- मात्र, यह तीनों अवस्था पुरुषार्थकृत होने से अनित्य हैं, श्री अलिंगाऽवस्था नित्य है क्योंकि अलिंगावस्था में पुरुषार्थता रूप कारण के अभाव में वह पुरुषार्धकृत न होने से अजन्य है। अर्थात् जब शब्दादि स्थूल विषय उत्पन्न होंगे तवी पुरुषको भोग हो सकता है ऐसे नहीं थौ स्यूलविषय महत्तत्त्व यादि धारा उत्पन्न होते है, अतः विशेष, अविशेष, लिंगमात्र, यह तीनों गुणपरिणाम पुरुषार्धप्रयुक्त होने से अनित्य हैं, औ भलिंगसंज्ञक धानाऽवस्था किसी पुरुषार्थप्रयुक्त न होने में नित्य है। यहां इतना विशेष यह भी जान लेना कि-दून सव परिणामों अनुगत जो गुणवय हैं वह वस्तुतः न तो उत्पन्न ही होते हैं नो न कही लय ही होते है किन्तु अतीत-अनागत-वर्तमान- उत्पत्ति विनाशधर्मशील महत्तत्त्वादिद्वारा उत्पत्तिविनाशशील प्रतीत होते हैं, जैसे कि लोल में देवदत्त दरिद्र हो गया क्योंकि इस का धन हरण हो गया औ गाय आदि पशु सब मर गये हैं, दरिद्रव्यवहार गावग्रादि के मरने से ही देवदत्त में धारोप किया जाता है तैसे महत्तत्त्वादि की उत्पत्ति नाश से गुणों की उत्पत्ति वा (१) गुणों की साम्याऽवस्था को गुणों से कथ चित्भिन्न होने स प्रधान को गुणों का परिणाम कहा है, कुछ इस को गुणों का कार्य नहीं जानना, भत एव भाष्य 'कारों ने इस अवस्था को निस कहा है, कपिलमुनि ने मा "मूले मूलाभावादमूल मूलम्" १० १ मूत्र १७ से प्रकृति को राजन्य कहा है, निखिल वार्य के मूलभूत प्रधान में अय मूल कारण के अभाव से यह मूल प्रहाते (अमल) अजन्य है यह इस का अर्थ है n पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- नाश व्यवसत होता है कुछ वस्तुगत्या गुणजन्य वा नाशशील नहीं, यहां पर सत्कार्यवाद होने से प्रथमकार्य जो लिंगमात्र मह- त्तत्त्व है वह उत्पत्ति से पूर्व प्रधानमें सूक्ष्मरूपसे स्थित हुया ही फिर सृष्टिकाल में प्रधान से विभक्त हो जाता है, कुछ पहिले असत् नहीं था, यह जानना, एवं पट् जो प्रविशेप हैं वह भी,लिंगमात्र में पहिले सूक्ष्मरूप से स्थित हुये ही फिर अभिव्यक्त होते हैं, एवं विशेष भी अविशेषों में प्रथम स्थित हुये ही फिर विभक्त होते हैं। श्री षोडश विशेषसंतक पदार्थों से धागे कोई तत्त्व है नहीं अंतः विशेषों का कोई अन्य तत्त्व कार्य नहीं हैं अतः उन में न कोई सूक्ष्मरूप से स्थित ही है औ न कोई तत्त्वाऽन्तर उत्पन्न हो विभक्त होता है, अतएव इन सोलह पदार्थों का नाम विकृति कहा जाता है (१)। यद्यपि इन स्थूलपदार्थों का तत्त्वान्तररूप परिणाम नहीं है तथापि धर्म-लक्षण अवस्था संज्ञक तीन परिणाम वाले होने से यह परिणामी जानने, यह तृतीयपाद में स्पष्टरूप से (२) कहा जायगा, यह जानना ॥ १६ ॥ इस प्रकार दृश्य को निरूपण कर इदानीं दृष्टा के स्वरूप निश्चयार्थ यह अग्रिम सूत्र आरब्ध किया जाता है- सू० द्रष्टा दृशिमावः शुद्धोऽपि प्रत्ययाऽनुपश्यः ॥२०॥ भाषा-(शिमावः) निखिलधी से रहित जो चेतनमान ( १ ) यद्याप आकाशादि भा शब्दादि के कारण हे तथापि शब्दादि कुछ तत्त्वा- ऽन्तर नहीं हैं, अत. आकाशाद प्रकृति नहीं हैं, क्योंकि जो पूर्वतत्त्व को अपेक्षा से कुछ विलक्षण अन्य तत्त्व की उत्पत्ति करता है वही प्रकृति कहा जाता है कुछ सामान्य से कारण का नाम प्रहात नहीं है यह भाव है। (२) ३ पाद के १३ सूत्र में देखो।
साधनपादः २॥ १८७ अर्थात्-ज्ञानस्वरूप पुरुष, वह (द्रष्टा ) द्रष्टा कहा जाता है, यदि ज्ञानस्वरूप है तो ज्ञान का आथय कैसे (1) इस का उत्तर कहते हैं "शुद्धोऽपि प्रत्ययाऽनुपश्यः” अर्थात् यद्यपि वह स्वभाव से जान का आधार न होने से शुद्ध ही है तथापि प्रत्ययसंजक बुद्धिधर्म ज्ञान को अनुसरण कर ज्ञान का आधार कहा जाता है। अर्थात् यद्यपि पुरुष ज्ञान स्वरूप ही है तथापि बुद्धि दर्पणा में प्रतिविम्बित हुआ तिस बुद्धि के धर्मभूत ज्ञान का आधार प्रतीत होजाता है, अतएव बुद्धिवृत्ति का अनुकारी होने से (१) यह पुरुष प्रत्ययाऽनुपश्य कहा जाता है। सो (२) यह दृशिमात्र चेतनभूत पुरुष नतो बुद्धि के समान रूपवाला है औ न अत्यन्त विभिन्नरूय वाला है, अर्थात्-यह पुरुष बुद्धि से विलक्षण है क्योंकि . ज्ञातअज्ञातविषय होने से बुद्धि परिणामिनी है, औ सदा ज्ञातविषय होने से पुरुष अपरि- णामी है, अर्थात् बुद्धि का विषयभूत जो गो घट पट आदि पदार्थ हैं वह कभी ज्ञात होते हैं नौ कभी अंज्ञात होते हैं। श्री पुरुष का विषयभूत जो बुद्धि तत्त्व है वह सदा पुरुष को ज्ञात ही रहता है, अतः बुद्धि सदा एकरस न (३) रहने से परिणामिनी है. औ पुरुष (1) ज्ञान के आधार का नाम द्रष्टा है, जिस को लोक में जानने वाला कहते हैं, एव च ज्ञानरूप धर्म का आधार होने से दृशिमात्र कैसे, यह शकक का आशय है । (१) अनुकारी-तदाकारधारी, चैतन्यप्रतिबिम्बप्राहिणी बुद्धि वृत्ति को विपयाकार औ ज्ञानाधार होने से तदविभागापन्न पुरुष भी ज्ञान का आधार प्रतीत हो जाता है कुछ घस्तुगल्या पह पुरुष किपी धर्म का आश्रय नहीं है क्योंकि वह साक्षी रूप है यह तत्व है (२) " स बुद्धर्न सरूपो नात्यन्त विरूप. " इत्यादि भाष्य का अनुवाद करते हैं 'सो यह ' इसादि से । (३) जिस काल में विषय सन्निधि से बुद्धि विषयाकार होती है तिस काल में बुद्धि ज्ञातवियय होती है औ अन्य काल में अज्ञातविषय होती है-अत. कमी विषया- कार ी कभी भविषयायार होने से सदा एकरस नहीं है।
पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- 'सदा एकरस होने से अपरिणामी है क्योंकि पुरुष का विषयभूत बुद्धि तत्त्व सदानात ही रहता है अतः यह दोनों परस्पर विलक्षण है एवं संहत्यकारकत्व (१) होने से बुद्धि परार्थ है भी पुरुष स्वार्थ है,अतोऽपि (इस से भी) दोनों विलक्षण हैं, एवं शान्त घोर मूढाकार में परिणत हुयी बुद्धि शान्त धोरमूढ पदार्थो विषयक मध्यवसाय शीत होने से विगुण तथा अचेतन है यौ पुरुष गुणों का उप- दृष्टा (२) मात्र होने से गुणातीत औ चेतन है अतः वह दोनों विलक्षण होने से असरूप है। एतावता यह दोनों पत्यन्तविरूप है यह भी नहीं जानना क्योंकि यतः वह पुरुप प्रत्यानुपश्य है, अर्धात्-बुद्धिवृत्तिा- पज्ञान को प्रकाशता हुया बुद्धिवृत्ति स्वरूप न होने पर भी बुद्धि- वृत्ति स्वरूप से भान होता है। पञ्चशिखाचार्य ने भी " अपरिणामिनी हि भोत्तृशक्ति- रप्रतिसक्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसक्रान्तेव तवृत्तिम- 'नुपतति तस्याश्च प्राप्तचैतन्योपग्रहरूपाया घुद्धिवृत्तेरनुकारि- मानतया बुद्धिवृत्यविशिष्टा हि ज्ञानवृत्तिरित्याख्यायते" (३) ( १ ) केश, धर्म, मिना तथा विपयन्द्रियादि से सहत=मिलकर पुरप के भोगापवर्गलप अर्थ का सम्पादन करने से बुद्धि सहत्यमारी है, अर्थात् जो अद्ध पदार्थ मिलित होकर किसी एक कार्य को सम्पादन करते हैं वह अ य के लिये होते हैं । जैसा कि शयन आसन ग्रहादि प्रभृति जड पदार्थ मिलित हुये पुरुष के भोग साधन होने से पुरपार्थ कहे जाते हैं तेसे युद्धि भी गिलित हुयो कार्य करने से पगर्ष है, मो पुरष असहत (केयल) होने से किसी अन्य के अर्थ नहीं है अत स्वार्थ है। (२) बुद्धि में प्रतिविम्बित मान हुया ही प्रशाशता है कुछ तदाकार से परिणत नहीं होता है अत उपद्रष्टा है। (२) अपरिणामी जो भोक्तृशक्ति सनक पुरुष है वह यद्यपि अप्रतिसक्रम है अर्थात् किमी विषय से सबद्ध न होने से निलेप हे तथापि परिणागी बुद्धि में प्रतिविम्बित { या तदाकार होने से तिस बुद्धि को वृत्ति का अनुपाती ( अनुसारी ) हो जाता है मोतिस चत-यप्रतिबिम्बमाहिणा मुधिचि के अनुकारमात्र होने से बुद्धिवृत्ति से अभिन्न हुया यह चेतन हो हान वृत्ति कहा जाता है, यह पशिखाचार्य जी के पाक्य या अय है। + साधनपादः २ । इस वाक्य से बुद्धिवृत्ति के अनुकार से पुरुष को ट्रष्टा कहा है॥२०॥ इस प्रकार दृश्य औ द्रष्टा का स्वरूप वर्णन कर इदानीं स्वस्वामीभावरूप संवन्ध का उपयोगी जो दृश्यनिष्ठ पुरुषार्थत्त्व उस का निरूपण करते हैं- सू. तदर्थ एव दृश्यस्याऽऽत्मा ॥ २१ ॥ भाषा-(दृश्यस्य ) पूर्वोक्तदृश्य का, जो ( आत्मा ) स्वरूप है, वह (तदर्थ एव) तिस ट्रष्टाभूत पुरुष के ही अर्थ है। अर्थात्-ज्ञानस्वरूप पुरुष की विषयता को प्राप्त हुया जो 'बुद्धि प्रादि दृश्य है उस का स्वरूप स्वार्थ नहीं हैं किन्तु पुरुष के भोगअपवर्गरूप पुरुषार्थ का संपादक होने से परार्थ है। जिस हेतु से यह दृश्य का जडरूप पुरुष के भोगापवर्गाऽर्थ है इस हेतु से हो पुरुष के भोगापवर्गरूप अर्थ के संपादन से अनन्तर यह दृश्य विवेकी पुरुष के प्रति अदृश्य हो जाता है। भाव यह है कि-सुखाद्यनुभवरूप भोग तथा विवेकख्यातिरूप अपवर्ग ही दृश्य का प्रयोजन है, ओ जब पुरुषको निज रूप का ज्ञान हो जाता है तब प्रयोजन के अभाव से दृश्य का विलय हो जाता है क्योंकि विवेकख्यातिरूप अन्तिमप्रयोजन के सम्पादन से अन- न्तर अन्य प्रयोजन के अभाव से दृश्य की प्रवृत्ति का संभव नहीं है। यहां पर यह शंका मत करनी कि “यदि (१) विवेकख्याति के उदय से दृश्य का स्वरूप हान होने से नाश हो जाता है तो अन्य पुरुषों के भोगाऽपवर्ग का सम्पादन कैसे होगा क्योंकि विवेकी की द्रष्टि से ही दृश्य नष्ट हुया है कुछ मर्च की दृष्टि से नहीं, अतः जिन को विवेकज्ञान नहीं हुया उन की दृष्टि से दृश्य को विद्य- मान होने से अन्यों का भीगापवर्ग होना सम्भव है ॥ २१ ॥ (१) "स्वरूपहानादस्य नाशः प्राप्तः" इम शेकापर भाष्य का अनुपाद करते हैं (यदि ) इत्यादि से।
१ पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- वही सूत्रकार कहते हैं- सू० कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधार- णत्वा ॥२२॥ भाषा- कृतार्य प्रति) विवेकग्न्याति की उत्पत्ति द्वारा संपा- दन कर दिया है अर्थ जिस पुरुष का, उस पुरुष के प्रति (तत्नष्टसपि) यह दृश्य नाश को प्राप्त हुया भी है, तो भी (अनष्टम् ) अन्य अविवेकी की अपेक्षा में अनष्ट अर्थात् विद्यमान ही है,क्योंकि (अन्यसाधारणत्वाट) वह दृश्य अन्य सब पुरुषों का साधारण है। अर्यात्-दृश्य का जो भोगाऽपवर्ग संपादन रूप प्रयोजन है वह कुछ एक पुरुष के लिये नहीं है जिस से एक पुरुष को विवेक उदय होने मे दृश्य के अभाव से अन्य पुरुषों का भोगाऽयवर्ग संपादन न होय, किन्तुं निखिल पुरुषों के अयं दृश्य की प्रवृत्ति है, अत. निखिल पुरुषों के लिये दृश्य की साधारण प्रवृत्ति होने से विवेकी पुरुष की दृष्टि में कृतकार्य दृश्य नष्ट भी है परन्तु अविवेकी को दृष्टि से कृतकार्य न होने से वह अनष्ट (विद्यमान) ही है, ( १ ) अतः तिन पुरुषों को विषयता को प्राप्त हुया यह दृश्य चेतनरूप आत्मा के द्वारा निज रूप से लब्धमत्ता वाला (१) अर्थात्-जैसे अध पुरप को रूपदृश्य नहीं होता है एतावता कुछ रूप का अभाव नहीं माना जाता है क्योंकि नेन वाले जनों की दृष्टि से रूप की उपलब्धि प्रत्यक्ष सिद्ध है, एप विमा को दान से दृश्य की अनुपलब्धि होने पर मा अय की दृष्टि से प्रत्यक्ष सिद्ध होन से दृश्य विद्यमार ही है, इसी प्रकार श्रुति में कहा है ( अनो बेगो जुपमाणोऽनुशेत जहायना मुक्तभोगामजोऽय ) एक नो बद्ध पुरुष है वह जुपमाण अर्थात्-प्रोत या पिणयों का सेवन करता हुआ मैं सुखी वा दुखी हू इस प्रकार अनुताप युक्त होता है औ अ य नो विगी पुरप है वह भुक्तभोग प्रकृति को न्याग देता है यह श्रुति का अर्थ है।
साधनपाद:२॥ . ही होता है कुछ अभावप्राप्त नहीं, अतण्व प्रकृति पुरुप को नित्य विद्यमान होने से इन दोनों के संवोग को अनादि कहा जाता है, ऐसे ही पञ्चशिखाचार्य जी ने कहा है-यथा-"धर्मि- णामनादिसंयोगाद् धर्ममावाणामप्यनादिः संयोगः” (१) इति॥२२ इस प्रकार अनादि स्नस्वामीभाव संवन्ध का निरूपण कर इदानीं तत्प्रयुक्त सयोग के स्वरूप कधनार्थ यह अयिम सूत्र प्रवृत्त होता है-- सू० स्वस्वामिशक्तयोः स्वरूपोपलब्धिहेतुः .. संयोगः ॥ २३ ॥ भाषा-(स्वस्वामिशक्त्योः) स्वशक्ति-स्वामीशक्ति-संज्ञक बुद्धि- पुरुष के ( स्वरूपोपलब्धिहेतुः ) स्वरूप की उपलब्धि का हेतुभूत जो संवन्ध, वह (संयोगः ) संयोग कहा जाता है। अर्थात्--(२) दृश्य को पुरुष के अर्थ होने से वह स्वशक्ति है, श्री दृश्यकृत भोगादिरूप उपकार का भाजन होने से पुरुष स्वामीशक्ति है, इन दोनों के स्वस्वामीभाव प्रयुक्त अनादि संयोग से जो अविवेकद्वारा दृश्य की उपलब्धि अर्थात्-सुखादि विषयों का अनुभव वह भोग है औ विवेकद्वारा जो दृश्य से भिन्न अपने रूप का यथार्थ ज्ञान वह अपवर्ग है, वही स्वरूपोपलब्धि है, तथा च भोगाऽपवर्ग का हेतु जो प्रकृति पुरुष का स्वस्वामीभाव संबन्ध वह संयोग है यह निष्पन्न हुया। (१)(धर्मा ) गुणों का सयोग का अनादि होने से धर्मभुत महत्तत्वादि का योग मा अनादि है, यह पचाशवाचार्य नी के वाक्य का अर्थ है । (२) यहा ( स्वरूपोपरवि) इम पद में स्व शब्द दृश्य ओ द्रष्टा इन दोनों या पाचक है, तपा च दृश्य की स्वरूपोरा से भोग का ग्रहण हुआ औ द्रष्टा की रूपोपलब्धि कहने से अपवर्ग का लाभ हुगा, तथा च भोग रूप पुरुषार्थ का सम्पादक नो प्रकृतिपुरप का स्वस्वामीभाउ सबवे यह सयोग है, यह तर है, सोई स्पष्ट करते हैं ( अर्थात् ) इन्यादि से । , १९२ पातालदर्शनकाशे- सो यह प्रकृतिपुरुप का संयोग जैम अनादि है तैमै अनन्त नही जानना क्योंकि विवेकल्याति पर्यन्त ही संयोग रहता है फिर नही, अतएव दर्शन को वियोग का कारण कहा जाता है, दर्शन प्रदर्शन का प्रतिद्वन्दी (विरोधी) है, अतः जैसे दर्शन वियोग का कारण है तैसे श्रदर्शन संयोग का कारण है यहां पर इतना विशेष यह भी जान लेना कि-ज्ञान (१) को अज्ञान का विरोधी होने से यह जान अत्तान का ही कुछ सुखादिभोग रूप बन्ध का नही, अतः ज्ञान साचात् मोक्ष का कारण नही है किन्तु अज्ञाननिवृत्तिप्रयुक्त बन्धनिवृत्ति द्वारा परम्परा से मोच का कारण है, अर्थात्-अज्ञान के प्रभाव से जो बन्ध का अभाव हो जाना सोई वहां मोच है औ ज्ञान के होने में ही बन्धकारण अज्ञान का अभाव होता है, अतः इस अभिप्राय से ही दर्शन को कैवल्य का कारण कहा जाता है कुछ सानात् कैवल्य ज्ञानजन्य नही है (२)। अव यहां पर प्रसंग से यह विचार किया जाता है कि-जिस अज्ञान का ज्ञान से प्रभाव होता है वह अज्ञान किंस्वरूप है अर्थात् अविद्या किस का नाम है, क्या गुणों के कार्यारम्भणसा- नाशक है , । (1) दर्शन नाम विवख्याति वा ज्ञान का है औ यदर्शन नाम अज्ञान औ अविवेक का है (१)(ज्ञान अपने विराधाभूत अज्ञान का निवृत्ति को परन्तु वध की निवृत्ति फोसे होगी ) इस आशङ्का वा अनुमोदनपूर्वक उत्तर कहते हैं ( ज्ञान ) इत्यादि से । (२) बुाद आदि से भिन अपने शुद्धरूप में अवस्थान का नाम मोक्ष है, इस स्वरूपावस्थानरूप मोक्ष का ज्ञान कुछ कारण नहीं है कि अज्ञानरूप प्रतिब धक पी निवृत्ति ही कारण है, गत अज्ञाननिवृत्तिद्वारा ज्ञान को मोक्ष का कारण कहा जाता है कुछ वस्तुत वह ज्ञान से ज य नहीं है, ब धनिवृत्ति को पुरुपस्वरूप होने से औ पुरुष को नित्य मिदं होने से मोक्ष ज्ञागज य नहीं है कि तु निस है यह तत्व है।
साधनपाद: २।। मर्थ्य का नाम अविद्या है (1.)। वाशिरूपस्वामी के भोगाऽ. पवर्गरूप अर्थ के संपादक चित्त का अनुत्पाद, (१) अर्थात्- पुरुषार्थ को समाप्ति न होने में ज्ञान का प्रभाव अविद्या है। वा गुणों की अर्थवत्ता (२)। अथवा चित्त की उत्पत्ति का वीजभूत ओ प्रलयकाल में चित्त के सहित ही प्रकृति में लीन जो विपर्ययज्ञानवासना वह अविद्या है। अथवा प्रधान संबंधी स्थिति- संस्कार के चय होने पर गतिसंस्कार की अभिव्यक्ति अविद्या है अर्थात् प्रधान में दो प्रकार का संस्कार रहता है एक स्थिति- संस्कार जो कि प्रलयकालीन साम्यावस्था का कारण है, जो एक गतिसंस्कार जो कि महत्तत्त्वादि विकारों का प्रारम्भक है, ऐसे . . : (i) वन्ध का हेतुभूत जो प्रकृति पुरुष का संयोग है उस सयोग का हेतु कौन है, इस का उत्तर आंग्रेमसूत्र मे यह दिया है कि 'आवद्या सयोग का हेतु है, तहाँ अविद्या किम को कहते हैं इम के निर्णयार्थ भाष्यकारों ने "किंचेदमदर्शन नाम" इत्यादि पन्ध मे पट् विकलर किये है, तहाविपर्ययज्ञानवासना का नाम अविद्या है यह सिद्धान्त पक्ष है, जो कि चतुर्थ विकल्प है, वह आग्रेगसूत्र के व्याख्यान में कहा जायगा, इदानी जो लो सृष्टिका कारण होगा सोई सपोग का कारण होगा इस सभावनामान से कहते हैं ( क्या गुणों की) इत्यादि से, गुणों का जब कार्यारम्भ में सामर्थ्य होता है नबी सृष्टि होती है अतः सृष्टिहेतु सयोग का कारण होने से क्या गुणों के अधिकार का ही नाम अविद्या है पह भाव है। (१) तान काळपर्यन्त ही प्रधान वा चित्त चेष्टा करता है कि यावत्काल भोग भी विवेकख्यातिरूप दोनों विषयों को पुरुष के प्रति दशित समर्पण नहीं करता है, औ जब इन दोनों विषयों का निष्पादन कर देता है तब वह चित्त निवृत्ताधिकार हो नाता है, एलभूत समाप्ततव्य चित्त या जो अनुत्पाद उत्पत्ति का अभाव क्या इसी । अविद्या कहते हैं। अर्थात् चित्त के अधिकार की समातिन होना ही विद्या का ल है, अधिकार समाप्त न हुआ तो फलतः एतादृश चित्त का न होना ही अविद्या हुयी यह इस का भार है। (२)चित्त में भोगाऽपगला अर्थ को सक्ष्णाऽवस्था से विद्यमानता रहनी ।
१९४ पातञ्जलदर्शनकाशे- ही पञ्चशिखाचार्य जी ने कहा है-यथा-"प्रधान(१) स्थित्येव वर्तमानं विकाराऽकरणादप्रधानं स्यात् तथा गत्येव वर्तमानं विकारनित्यत्वादप्रधानं स्यात्, उभयथा चाऽस्य प्रवृत्तिः प्रधानव्यवहारं लभते नाऽन्यथा, कारणान्तरेष्वपि कल्पिते- वेप समानश्चर्चः ” एवं च गतिसंस्कार के होने से जो महदादिकार्य का प्रारम्भ क्या इसी का नाम अविद्या है। श्री कोई यह कहते हैं कि-"प्रधानस्यात्म-ख्यापनार्थी प्रवृत्तिः” (२ (१) प्रळयकाल में होने वाली जो कार्यारम्भ से रहित गुणों की साम्यावस्था उ. का नाम स्थिति है, औ सृष्टिकाल में होनेवाली जो गुणों को कार्यारम्भरूपाऽवस्था उ का नाम गनि है, तहा ( यदि प्रकृति स्थितिअवस्था वाली है तो कभा भी उस उत्पत्ति न होनी चाहिये ओ यदि गतिअवस्था वाली है तो सर्वदा ही उ पत्ति हो से प्रलय का अभाव होना चाहिये' इस प्रकार बादी की भाशका के वारणा पंचशिलाचार्यजी ने यह उत्तर दिया है कि "प्रधानम्" इत्यादि, प्रधान स्थितिसे वर्तम माना जायगा तो किसी कार्यके न करनेसे अप्रधान हो जायगा क्योंकि जिसमें सूक्ष रूपं स्थित हुआ फिर उत्पन्न होता है उसका नाम प्रधान है, यो यदि गतिसे वर्तमानहोग 'तो भी विकार को नित्य होने से अप्रधान हो जायगा क्योंकि किसी पदार्थ के कयाध कोही प्रधान कहा जाता है, अत उत्पत्ति काल में गति वाला औ प्रल्यकाल में स्थितिवार मानकर दोनों प्रकार से प्रधान की प्रवृत्ति द्वारा प्रधान व्यवहार मानना चाह्ये क्यो। ऐसा मानने से प्रधानत्व के लाभ से किसी दोष की प्राप्ति नहीं है, कुछ प्रकृति में यह विचार नहीं है किन्तु अयशादियों कर कल्पित नो ब्रह्म परमाणुआदि हैं उन विषय भी यह विचार समान है क्योंकि ब्रह्मादि भी यदि स्थिति शालमाने जायगे तो कि कार्य के न करने से अकारण यो नायगे ओ यदि गतिशील माने जायगे तो कार्य : निस होने से अकारण कहें नायगे, यह पचशिवाचार्य जी के वाक्य का अर्थ है (२) प्रधान की प्रवृत्ति अपने सल्पल्यापन (बोधन) के अर्थ है क्योंकि जब प्रधान की प्रवृत्ति नहीं होगी तर तक प्रधान के स्पस्प का परिचय नहीं होगा, य स्पष्ट करते हैं ( अर्थात् ) इत्यादि से । यहा पर सर्वत्र ही ज्ञान के होने से जिस नाश होता है ओ जो सृष्टि का कारणभूत प्रकृति का अपरथाविशेप है यह दोनों भविद्यापद के याचगमाने गये हैं यह जानना ।
. साधनपादः २॥ . इस श्रुति से दर्शनशक्ति ही अविद्यापद का वाच्य है अर्थात्- यद्यपि निखिलपदार्थ के ज्ञान में पुरुष समर्थ है तथापि प्रधान की प्रवृत्ति से पूर्व पुरुष उस को देख नहीं सकता औ सर्व कार्य करने में समर्थ हश्य भी उसे दिखायी नहीं देता है, अतः प्रधान की प्रवृत्ति से जो पुरुष का दर्शनसामध्य क्या उस का नाम अविद्या है। कोई यह कहते हैं कि-प्रकृति तथा पुरुष इन दोनों में जो परस्पर दर्शनशक्ति वह अविद्या है, यद्यपि दृश्य जड है औ पुरुष असंग निर्मक है अतः दोनों का ही धर्म दर्शन नहीं हो सकता तथापि चेतन के प्रतिविम्व से दृश्य को चेतनतुल्य होने से तिस चेतनछाया की अपेक्षा से दृश्य का धर्म दर्शन औ बुद्धि रूप दृश्य की अपेक्षा से पुरुष का धर्म दर्शन जानना, अर्थात् बुद्धि श्री चेतन का परस्पर अविवेक होने से दोनों का ही दर्शन धर्म है। नौ कोई यह कहते हैं कि-शब्दादिविषयों का नो ज्ञान यही अविद्या है। इस प्रकार अविद्या के स्वरूप निरूपण में अनेक प्रकार के शास्त्र : में विकल्प किये हैं, परन्तु यह सब विकल्प सर्व पुरुषों के संग प्रकृतिसंयोग में कारण होने से साधारण हैं अर्थात् यह सब पूर्वोक्त अविद्या का लक्षण उसी अविद्या में रह सकता है जो कि प्रकृतिपुरुष के संयोग द्वारा निखिल प्रपञ्च का हेतु है, नौ जो अविद्या प्रत्येक पुरुष के संग बुद्धि संयोग द्वारा सुख दुःख भोग के वैचित्र य में हेतु है उस का यह लक्षण नहीं, (१) अतः (१) अर्थात्-संयोग दो प्रकार का है एक निखिल समार का कारण भी एक प्रत्येक ३ पुरुष को मुखदुःड बन्ध मोक्ष का कारण, तहाँ प्रथम संयोग का हेतु जो अविद्या है उसी के यह सब पूर्वोक्त लक्षण हैं कुछ द्वितीय संयोग के हेतुभूत, अविद्या के नहीं।
पातञ्जलदर्शनप्रकाश- यह लक्षण साधारण हैं ॥ २३ ॥ (यदि प्रत्येक पुरुष के संग बुद्धिसंयोग का हेतु यह पूर्वोत्त अविद्या नहीं हो सकती तो फिर सुखदुःखादिभोग के हेतुभूत संयोग का कारण कोन अविद्या है ) इस का उत्तर कहते हैं- '... सू० तस्य हेतुरविद्या ॥ २४॥ भाषा-(तस्य) तिस पूर्वोक्त दुखहेतु प्रकृतिपुरुषसंयोग का, (हेतुः) कारण (अविद्या) विपर्ययज्ञानवासना है। अर्थात्-अनादि ( १ ) जो विपर्ययजानजन्य वासना वही अविद्यापद वा वाच्य है औ यही असाधारण संयोग का हेतु है। भाव यह है कि जिस काल में विपर्ययज्ञानवासना से बुद्धि वामित = ओतप्रोत (संवलित ) होती है तिस काल में विवेक-' ख्यातिरूप अन्तिम कर्तव्य की निष्ठा को न प्राप्त होकर साधिकार होने से प्रकृति में लीन हुयी भी बुद्धि फिर उत्थित हो पुनरावृत्तिशील हो जाती है औ जब विवेक के उदय से विपळव- ज्ञानवासना के अभाव से पुरुपख्यातिपर्यवसान हुयी बुद्धि अपनी अन्तिम कर्तव्यनिष्ठा को प्राप्त होने से समाप्त अधिकार हो जाती है तब अज्ञान से रहित हुयी संसारकारण अज्ञानकेनभाव से पुनरावृत्तिरहित हो जाती है, एवं च अन्ययव्यतिरेक द्वारा विपर्ययज्ञानवासना ही संसारहेतु संयोग का कारण है अन्य नहीं। इस विपर्ययत्तानवासना के निवर्त्तक विवेकज्ञान के उदय के (१) अनादि कहने से (बुद्धि पुरुष का सयोग होय तो विपर्ययज्ञान द्वारा विपर्ययवासना होय औ विपर्ययज्ञानवासना होय सो बुद्धिसंयोग होय) यह परंपराश्रय दोष भी उछिन्न हुया, अर्थात्-पूर्वसर्ग में यद्यपि विपर्ययज्ञानयासना स्वकारण बुद्धि यो सहित ही प्रकृति में कीन हो जाती है तथापि उम की वासना से प्रधान मासित रहता है अतः फिर यह वासना ही पूर्वसदृश बुद्धि के संयोग को उत्पन्न करदेती है, इस प्रकार यह प्रवाह अनादि है । .
पातञ्जलदर्शनकाशे- १९७ अनन्तर जव ज्ञानप्रसादमात्र पर वैराग्य उदय हो जाता है तब विवेकख्याति के निरोध द्वारा चित्तनिवृत्तिरूप मोक्ष भी पुरुष के हस्तगत हो जाता है, अत एव विपर्ययज्ञान नाश के अनन्तर बुद्धि अपुनरावृत्ति शील हो जाती है। यहां पर कोईक नास्तिक षण्डक (१) के उपाख्यान से इस पूर्वोक्त कैवल्य का आक्षेप करता है, अर्थात्-किसी मुग्धा न भार्या ने अपने नपुंसक पति के प्रति यह कहा कि-हे पार्यपुत्र ! जैसे मेरी भगिनी पुत्रवती है तैसे मैं पुत्रवती क्यों नहीं, तब वह नपुंसक बोला कि मर कर मैं भी तेरी संतान को उत्पन्नकर तुझे पुववती कर दूंगा, जैसे वहां पर नपुंसक का वचन असंगत है तैमे याप का मोक्षप्रतिपादन भी असंगत है, अर्थात्-जिस ने जीवते हुये पुत् उत्पन्न नहीं किया वह मरकर पुत्र उत्पन्न करेगा जैसे यह प्रत्याशा असम्भव है तैसे विद्यमान विवेकख्याति ने जव चित निवृत्तिरूप मोक्ष नहीं किया तो परखैराग्य से विनष्ट हुयी विवे- कख्याति मोक्ष उत्पन्न करेगी यह भी असम्भव है ? इस आक्षेप का धारण कोईएक प्राचार्यदेशीय ( २) इस (१) पण्डकनाग नपुसक का है, अर्थात् नपुंसक के दृष्टान्तद्वारा कैवल्य का खण्डन करता है। (1) मुग्ध नाम सूधी साधी भोली भाली स्त्री का है। (२) आचिनोति च शास्त्रार्थमाचार स्थापयत्यपि, स्वयमाचरति यस्मादाचार्य- स्तेन चोच्यते " इस वायु पुराण के वचन से नो पुरुष शास्त्रप्रतिपादित अर्थ का सम्यम्परिशीलन कर आप सदाचार का सेवन करे औ अन्यों को भी सदा चार में दृढ निष्ठा वाला करें वह आचार्य कहा जाता है, इस आचार्य से भो कुछ न्यून- धर्म वाला होय वह आचार्यदेशीय कहा जाता है, अर्थात्-कुछ हम ज्ञान से चित्त की निवृत्तिनहीं मानते हैं किन्तु ज्ञानसे अज्ञाननिवृत्ति द्वारा चित्त अपने ही परिणाम से रहित हो जाता है, यह मानते हैं, तथा च इस मत में कोई भी आक्षेप न होने से व्यर्थ 'शका का उत्तर देना निरर्थक है इस अभिप्राय से उपेक्षा प्रदर्शनार्थ आचार्य्यदेशीय कहा है, अर्थात्-न्यून आचार्य भी इस आशंका का परिहार कर सकते हैं तो इस के उत्तर देने से क्या प्रयोजन है।
साधनपादः २॥ . १९८ प्रकार से करते हैं कि-बुद्धि के भोग विवेकख्याति रूप परिणाम ही की निवृत्ति का नाम मोक्ष है कुछ बुद्धि की निवृत्ति का नहीं, अर्थात् बन्धकारण अज्ञान के प्रभाव से जो बुद्धि के परि- णाम की निवृत्ति उसका नाम मोक्ष है औ बन्धकारण अज्ञान की निवृत्ति ज्ञान से होती है,एवं च ज्ञान कुछ साक्षात् चित्त की निवृत्ति का कारण नहीं है कि जिस से निरुद्ध हुवे ज्ञान को चित्त निवृत्ति का कारण मान कर कोई दोष होय, (१) तथा च व्यर्थ ही नास्तिकों का यह मतिविक्षम है ॥ २४ ॥ चारव्यू हों में से हेय दुःव तथा हेयकारण संयोग का नि- मित्त पूर्वक निरूपण कर इदानी हानसंज्ञक तृतीय व्यूह का निरूपण करते है- सू० तदभावात् संयोगाऽभावो हानं तद् दृशः कैवल्यम् ॥२५॥ भाषा-(तदभावात्) तिस पूर्वोक्त अज्ञान के अभाव में, जो (संयोगाभावः ) बुद्धि पुरुष के संयोग का अभाव, वह (हानम्) हान कहा जाता है, (तद् ) यह हान ही (दृशः ) ज्ञानस्वरूप-' पुरुष का (कैवल्यम् ) कैवलतारूप मोक्ष है। अर्थात्-अज्ञानके अभावद्वारा जो बुद्धि पुरुपसंयोगाभावरूप आत्य- न्तिक वन्धन का(२)यभाव वह हान है,औ यही पुरुष का कैवल्य अर्थात्-अमिथीभाव रूप फिर गुणों से पुरुष का संयोगाभाव है। (१)गोई यह कहते हैं कि सस्पन बुद्धि के विद्यमान होने पर कवल शब्दाद्याकार परिणाम यो निवृत्ति का नाम मोक्ष है यह आचार्यदेशीय का मत है, स्वरूप में हो युद्धि मिलय का नाम मोक्ष है यह आचार्य का मत है। (२) यद्याप महाप्रलय में भी सयोगाभाव होता है परन्तु वह सृष्टि काल में फिर । उन होने से अपुरपार्थ है, इस के बोवगार्थ कहा है ( आत्यन्तिकबन्धाभाव ) इति, निवृत्त होने से मनन्तर कदापि फिर उन्नविन न होने का नाम आयन्तिक है।
साधनपादः । जिस काल में दुःखकारण संयोग की निवृत्ति से दुःख का उपरम (अभाव) हो जाता है उस काल में यह पुरुष केवल हुया स्वरूपप्रतिष्ठितां कहा जाता है ॥ २५ ॥ इदानी (हानकारण अविद्याऽभाव का लाभोपाय कौन है) इस आकांक्षा का वारण करते हुये चतुर्व व्यूह का निरूपण करते हैं- सू० विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥ भाषा--(अविप्लवा ) मिथ्याज्ञानरूप उपद्रव से शून्य, जो (विवेकख्यातिः ) प्रकृति में भिन्नरूपता कर पुरुप का साक्षा- कार, वह (हानोपायः) हानकारण विद्यानिवृत्ति का उपाय है। अर्थात्-जो विवेकख्याति मिष्टयाज्ञान से संवलित होती है वह विप्लव वाली होती है, औ जब मिथ्याज्ञान दग्धवीजभाव हुवा बन्ध्यप्रसव हो जाता है तब रजतम-क्लेश से रहित परवैशारा (१) पूर्वक परवशीकारसंज्ञा में वर्तमान हुये चित्त का विवेकज्ञानप्रवाह अविप्लव निर्मल हो जाता है, यह जो निर्मल विवेकज्ञानप्रवाह रूप अविप्लवा (२) विवेकख्याति वह हान का उपाय है। इस विवेकख्याति से ही मिथ्याज्ञान दग्धवीजभाव हुया अप्रसव हो जाता है, अतः यह विवेकख्याति मोक्षमार्ग हान का (1) नो अपने कार्य को उत्पन्न न करे वह बन्ध्यप्रसर है । (१) वैशारद्य औ परशांकार पूर्व ११३, १०१ इस पृष्ट में देखो। ३) यद्यपि आगम तथा अनुमान से भी विवेकज्ञान उत्पन्न होता है परन्तु वह मिथ्याज्ञान जनित व्युत्थान ओ तामस्कारों का बाधक नहीं होता है क्योंकि आगर्म अनुमानजन्यज्ञानीक के चित्त में भी मिथ्याज्ञानमूलक व्युत्थानजन्य सस्कार विद्यमान ही रहते हैं, अतः वह ज्ञान विस्वसहित है, यो अरगम अनुमानजन्यज्ञान को निरन्तर- दीर्घकाल सरकारपूर्वक भावना से जो प्रकर्षपर्यन्त समाधे में होने वाली साक्षात्कार वती ऋताम्मराजा वह मिथ्याज्ञान शून्य होने में आयाश्या है, यह तत्व है । ५ २०० पातञ्जलदर्शनकाशे- उपाय (१) है यह निष्पन्न हुया ॥ २ ॥ इदानी विवेकख्यातिरूप निष्ठा के स्वरूप निरूपणार्य विवे- कख्यातिनिष्ठ योगी को जिस प्रज्ञा का लाभ होता है उस का कथन करते हैं- सू० तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २७ ॥ भाषा-(तस्य ) उत्पन्नविवेकख्याति योगी को जो (प्रज्ञा) बुद्धि लब्ध होती है वह (सप्तधा ) विषयभेद से सात प्रकार की है, वह प्रज्ञा कीदृश है कि-(प्रान्तभूमिः ) मर्वापेक्षया उत्कृ- ष्टश्रवस्था वालो है। अर्थात्- रजतम के आधिक्यप्रयुक्त जो अशुद्धिसंज्ञक आवर- णरूप मल तिस मल के अपगम (अभाव) से जो राजसतामसप्र- युक्त व्युत्थानप्रत्यय का अभाव तिस से विवेकख्यातिनिष्ठ योगी के चित्त को सप्तप्रकार की प्रज्ञा प्राप्त होती है, यथा- "परिज्ञातं हेयं नाऽस्य पुनः परिज्ञेयमस्ति ” अर्थात् निखिल हेयसंजक संसार परिणामदुःखतादि से अनुबिद्ध है यह मैने सम्यक् प्रकार जान लिया अब फिर अन्य कुछ हेयविषयक ज्ञातव्य नहीं, द्वितीय यह कि-"क्षीणाः हेयहेतवो न पुनरेतेषां क्षेतव्य मस्ति" अर्थात् हेय के कारणभूत अविद्यादि क्लेश सब मेरे क्षीण हो गये हैं अब फिर इन का कुछ क्षयं कर्तव्य नहीं है, तृतीय यह कि- 4साक्षात्कृतोनिरोधसमाधिनाहानम्" अर्धात्-यसम्प्रज्ञात समा- धिद्वारा मैने हानसन्जक कैवल्य भी साक्षात् (प्रत्यक्ष) कर लिया है अब कुछ इस विषयक अन्य निश्चय कर्तव्य नहीं है, चतुर्थ यह कि- "भावितो विवेकल्यातिरूपःहानोपायः" हान का उपायभूत (१) यद्यपि पूर्वसूत्र में विद्या के अभाव से हान या लाभ कथन से भविद्या यो निवृत्ति ही हानलाम या उपाय है तथापि हानहेतुभूत अविद्या की निवृत्ति का उपाय होने से विषारयाति को हार का उपाय यहा गया है, अर्थात् आवद्या नितिद्वारा कर यात हान हा उपाय है कुछ साक्षात् नहीं । , .. . की साधनपादः २ विवेकख्याति भी मैने निष्पादन कर लियी है, अब कुछ अन्य निप्पादन करणीय नहीं है। यह चार प्रकार वाली प्रज्ञा को विमुक्ति का- है, (१) इन चारों प्रज्ञा के लाभ से जो स्वतः ही अन्य तीन प्रज्ञा लब्ध हो जाती हैं वह चित्तविमुक्ति है (२), तहां एक तो-भोगाऽपवर्ग रूप पुरुषार्थ के निष्पादन से मेरी बुद्धि समाप्तअधिकारवाली हो गयी है, प्रो हितीय-जैसे गिरि के शिखर से च्युत = अधः पतित हुये पाषाण विदीर्ण हो जाते हैं तैसे यह तीनों गुण भी चित्तरूप आथय के अभाव से निराधार औ स्वकारण प्रकृति में लयाऽभिमुख हुये चित्त के सहित अस्त हो गये हैं, लयभाव को प्राप्त हुये इन गुणों की फिर प्रयोजन के अभाव से उत्पत्ति नहीं होगी, औ तृतीय-इस अवस्था में गुणसंवन्ध से रहित भी स्वरूपमात्र ज्योतिस्वरूप अमल हुया पुरुष केवल तथा जीवन्मुक्त कहा जाता है। इम सात प्रकार की प्रज्ञा को जानने वाला औ इस का आश्रयभूत जो योगी वह कुशल कहा जाता है, एवं प्रधान में चित्त के लय होने पर भी पुरुष कुशल औ मुक्त कहा जाता है (३) क्योंकि यह दोनों गुणातीत हैं ॥ २७ ॥ सो यह पूर्वोक्त विवेकख्याति प्राप्त हुयी ही हान का उपाय (1) विमुक्त नाम चित्त के अधिकार की समाप्ति का है, अर्थात्-यह चार प्रकार की प्रज्ञासबन्धी निमुक्ति कार्या अर्थात् प्रयतम प्य है । कहीं (कार्यविमुक्ति ) यह पाठ है, प्रज्ञा को निग्विलकार्यों के पार्तव्य से ममाप्ति, यह इस पाठ में अर्थ है। (२) अर्थात्-एक बार ही चित्त के अधिकार की समाप्ति । (३) अर्थात् असे अमम्प्रज्ञातमगाधि द्वाग चित्त को ल्य प्रयुक्त गुणातीत होने मे पुरष मुक्त कहा जाता है तेमे इम प्रज्ञावाला भी मुक्त हो है, परन्तु मित्तलप याला विदेहमा गो इस प्रज्ञावान नान मुह , या विशेष है।
- पातजलदर्शममकाशे- हो सकती है ऐसे ही नहीं, यो विवेकस्याति की प्राप्ति साधनों के अनुष्ठान से बिना होनी अमम्भव है, अतः जिन साधनों के अनुष्ठान से विवेकख्याति सिद्ध हो जाय उन साधनो के प्रति- पादन करने के लिये विवेकख्याति के लाभ का उपाय कहते है- सू० योगाऽङ्गाऽनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा- विवेकच्यातेः ॥ २८॥ भाषा-(योगाऽगाऽनुष्ठानाट् ) वक्ष्यमाण योग के यमादि आठ अंगो के अनुष्ठान से ( अशुद्विनये ) रजतमप्रयुक्त पञ्चप्र- कार विपर्यवज्ञानरूप अशुद्धि के क्षय होने पर (आश्विकख्याते:) विवेकख्याति पय॑न्त (ज्ञानदीप्तिः ) सम्यक् ज्ञान की अभिव्यक्ति होती है। अर्यात्-जैसेर योग के अंगों का पुरुष अनुष्ठान करता है तैमेर अंशुद्धि तनुभाव = क्षय को प्राप्त होती जाती है, औ जैसे जैसे अशुदिक्षीण होती जाती है तैसे २ क्रमअनुरोध से ज्ञान की दोप्ति वृद्धि को प्राप्त होती जाती है, सो वह ज्ञानदीप्ति वृद्धि- प्रकर्पता को अनुभव करती हुयी प्रकृति पुरुष के विवेकज्ञान पर्यन्त उन्नति को प्राप्त हो जाती है। यहां पर जैसे कुठार केद्यकाप्टादि के वियोग का कारण है एवं योगाऽगों का अनुष्ठान अशुद्धि के वियोग का कारण है, यौ जैसे धर्माऽनुष्ठान सुख की प्राप्ति का कारण है तैमे योगांगोंका अनुष्ठान विवेकख्याति का प्राप्ति कारण है, कुछ अन्य प्रकार से कारगा नही वह जानना । भाव यह है कि -कारण नव प्रकार का होता है-(१) (१) यहा पर भाप्ययारों ने " पति चेतानि यारणानि शास्त्रे भपति" वाश्य से शास्त्र में कितने कारण माने हैं यह प्रश्नकर वत्याह' इम बचन से नय ही पारण है श प्रसार मामा य से यह कर गिर " यात स्थिसभिव्यक्तिपिधारमन्य इम साधनपादः२। एक उत्पत्तिकारण, जैसा कि मन विज्ञान का है (१)। यो एक स्थितिकारण, जैसा कि पुरुषार्थता मन की स्थिति का ( २ ) श्री अन्नजल का छाहार शरीर की स्थिति का कारण है। नौ एक प्रसि- व्यक्तिकारण, जैसा कि मालोक (प्रकाश) रूप की अभिव्यक्ति का, यौ बुद्धिवृत्तिरूप रूपत्तान पौरुषेयवोधका कारण (३)है। औ एकवि- कारकारण,जैसा कि स्त्री यादि विषय मनके विकार का(४)ो अग्नि पाक्यतण्डुलादिन का कारण है। थौ एक प्रत्ययकारण । जैसा कि - पाऽऽप्तयः, पियोगाऽन्यत्यवतय. कारण नवचा स्मृतम् " इम कारिका से नमों का परि- गणन कर ( तनोत्पत्तिमारण मनो भाति विज्ञानस्य " इत्यादि भाष्यते इन नत्रों का स्वरूपनिर्देश लिया है, माई करते हैं (एक उत्पत्तिकारण ) इत्यादि से । (१) सत्कार्य्यवाद में वर्तमानाऽास्थपादन करना ही उत्पत्तिशब्द का अर्थ है, यो मन ही ज्ञान की अताताऽवस्था को नाश कर वर्तमानाऽपस्था वाला करता है, अतः मन ज्ञान की उत्पत्ति का कारण है। यहा पर सर्वत्र पष्ठातापुरप जानना । (२) तामाल हा गन स्थित रहता है कि यावर काल भोगाऽपर्गरूप पुरपार्थ सम्पादित नहीं करता औ जब यह पुरुषार्थ समाप्त हुआ तब लय हो जाता है, एव च पुरुषार्थ ताही मन की स्थिति का कारण है । यहा पर मर्वन सष्टाऽर्थ अ वयानुमरण नहीं किया। (३) प्रत्यक्षज्ञान का निमित्तभूत जो विषयनिष्ठ प्राकन्यविशेष वह अभिव्यक्ति है, तहा मर्यादि का प्रकाश बुद्धिवृत्तिरू। रूपज्ञान का भिव्यञ्जक है जो बुद्धि वृत्तिख्य रूपज्ञान पौरुपेयबोध का भिव्यञ्जक है, अत. यह अभिव्यक्ति के कारण हैं, गर्थात्- सूर्यादि के प्रकाश से कुछ घट की उत्पत्ति नहीं होती किन्तु विद्यमान घट की अमिव्याकि हाती है । (४) वेषयान्तर की आमक्ति मन के विकार का कारण है, जैसा कि समाधिनिष्ठ- मृकण्डु मुनि का चित्त उम्को चा नामक अप्परा कर वादित वीणा रो नि स्टत मतस्तराऽन्त- र्गत कोकिलरव तुल्य पचमस्तर श्रमण से अन तर व्यस्थित हो उम स्त्र में आमत हो शिरी हो गया था। .(+) काठन आय वाले तण्डुलादि का शियिनअयस्तत रूप जो विकार तिस का कारण अग्नि है। (+) प्रत्ययकारण - ज्ञान का कारण ।
२०४ पातजलदर्शनकाशे- धूम ज्ञान अग्नि के ज्ञान का। औ एक प्राप्तिकारण जैसा कि योगाऽगोंका अनुष्ठान विवेकग्याति की प्राप्तिको, (१)एक. वियो- गकारण जैसा कि योगांऽगाऽनुष्ठान अशुद्धि का। औ एक अन्य त्वका रण-जैसा कि सुवर्णकार कुण्डलादिनिर्माण द्वारा सुवर्ण (२) के अन्यत्वका कारण है। एवं (३)एक ही स्त्रीज्ञाननिष्ठ मूढत्वरूप अन्यत्व का अविद्या कारण, औ तन्निष्ठ दुःखत्वरूप अन्यत्व का हेष कारण, प्रौ तन्निष्ठ मुखत्वरूप अन्यत्व का राग कारण, औ तन्निष्ठ माध्यस्थरूप अन्यत्वका तत्त्वज्ञान कारण जान लेना। अर्धात्-कामुक पुरुष को जो अन्य अप्राप्य स्त्री विषयक ज्ञान वह कमनीया स्त्री इस प्रकार की पूर्वोक्त अविद्या से मोह (विषाद) से युक्त होता है, ( ४ ) एवंच इस ज्ञाननिष्ठ जो मोहयुक्तत्व वह अविद्याप्रयुक्त होने से अविद्याही इस ज्ञान के मूढ़त्त्वरूप अन्यत्व का कारण है, एवं सपत्नी को जो उस स्त्री में द्वेष वह उस स्त्री . (१) वस्तुनिष्ठ स्वाभाविक सामर्थ्य का नाम प्राप्ति है औ उस स्वाभाविकमामर्थ्य का किसी प्रतिबन्धक यश से अभाव हो जाना अप्राप्ति है, जैसा कि निम्नस्थलबहनशीलता जल का स्वाभाविक सामर्थ्य प्राप्ति औ सेतुद्वारा तिस का निरोध अप्राप्त है, एवं च बुद्धि की स्वाभाविकप्रकाशतारूप जो विवेकख्याति वह प्राप्ति, औ अधर्म यात मागुणरूप प्रतिव- धक से जो उस का अभाव यह अप्राप्ति हुयो, अर्थात् नत्र योगाङ्गानुष्ठान से अधर्म भी तमरूप प्रतिबन्ध का अपगम हो जाता है तब फिर विवेकख्याति आप ही आप प्राप्त हो जाती है, इस प्रकार योगाऽको का अनुष्ठान विवेकख्याति की प्राप्ति का कारण है कुछ उत्पत्ति का नहीं। (२) यद्यपि साकाNयाद में कुण्डल सुवर्ण मे अन्य नहीं तथापि कार्य को भिनाs भिलस्वरूप होने से भेदविवक्षा से कुण्डल को सुवर्ण में अन्य कहा गया है। (३) वाहा अन्यत्वकारण का उदाहरण प्रदर्शन कर आध्यात्मिक अन्यत्वकारण का उदाहरण कहते हैं ( एवं ) इत्यादि से । ( ४ ) पुण्यशील इस पुरुष को ही यह स्त्रीपन लब्धं हुआ, मुझ मन्दभाग्य को नहीं, इस प्रकार विपादयुक्त होजाता है। - साधनपाद: २॥ २०५ ज्ञान के दुःखत्वरूप अन्यत्व में कारण है, उवं उसके पति को जो उस स्ती में राग वह उस स्त्रीज्ञान के सुखत्वरूप अन्यत्व में कारण है, एवं विवेकी पुरुष को जो उस स्त्रीविषयक मलमूत्र पूरितत्त्वरूप तत्त्वज्ञान वह उस स्त्रीज्ञान के हेयत्वरूप अन्यत्व में कारण है (१)। औ एक धृतितारण-जैसा कि इन्द्रिय (२) शरीर के धारण का कारण हैं, जो शरीर इन्द्रियों के धारण का कारण हैं,ौ पंचमहा- भूत शरीर के धारण का कारण हैं, एवं पंचमहाभूतों का भी पर- स्पर विधायंविधारकभाव जान लेना, एवं तिर्यग् तथा मनुष्य श्री देव शरीरों का भी परस्पर विधायंविधारक भाव जान लेना। यह नव प्रकार के कारण हैं, इन नव कारणों में से जहां जिस का संभव होय वहां समन्वय कर अन्यपदार्थों में भी उहाऽयोह द्वारा कारणत्व का निश्चय कर लेना, प्रसंग में योगअड्गों का (१) एक हा त्रास दखकर अज्ञानी पुरुप प्राप्तक अभाव से मोहित हो जाता है, ओ मपना द्वेप से दुखित हो जाती है औ भर्ता राग से सम्वी हो जाता है औ विकी मलमुत्रपूरित जान कर गलानियुक्त हो जाता है, इस प्रकार एक ही स्त्रीविषयक ज्ञान के गढत्लादिरूप' अन्यत्व में अविद्यादि को कारण होने से यह सब अविद्यादि अन्य- त्यकारण हैं यह तत्व है। (२) इद्रिय नाम प्राण का है, प्राणों से बिना शरीर नहीं रहता है औ शरीर से बिना प्राण भी निराधार नहीं रह सकते, अत यह दोनों परस्पर के धारन करने याले हैं, इस प्रकार शरीर के प्रत्येक अड्डों का भो परस्पर विधार्यविधारकभाव जान- लेना, एर पच महाभूतों को शरार का वारण औ आधार होने से पच महाभूत भी शरीर के धृतिकारण हैं,एस आकाशादि भूतो में से पूर्व पूर्व को उत्तर उत्तर में अनुगत होने से पृथिवी में पचभूतोंको, औ जल में चार भूतों को भी अग्नि में तीन भूतों को यो वायु में दो भूतों को अनुगत होने से इन का भी परहा विधार्यविधारक भाव जानलेना, एवं मनुष्य शरीर पशु पक्षि आदि का उपयोगी है औ पशुपक्षिादि मनुष्य शरीर के उपयोगी हैं, औ मनुष्य कर्तृक यज्ञबलिदान देवताओं का उपयोगी है श्री वृष्ट्यादि द्वारा देव शरीर मनुष्यों का उपयोगी है, इस प्रकार यह मन ही परस्पर के भृति कारण हैं यह भाव है।
पावालदर्शनप्रकाश- अनुष्ठान तो दो ही प्रकार से कारण भाव को प्राप्त है, अर्थात्, विवेकख्याति की अपेक्षा से प्राप्तिकारण है, और अशुद्धिकी अपेक्षा से वियोगकारण है ॥ २८॥ इदानीं न्यून अधिक संख्या के वारणार्थ योग के अंगों का अवंधारण करते हैं। सूख्यमनियमाऽऽसनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्या- नसावयोऽष्टावङ्गानि ॥२९॥ भाषा-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, यह (अष्टौ) आठ,(अंगानि) योग के अंग हैं, (१) अर्थात्-विवेकख्याति की इच्छा शला यथाक्रम इन का अन ष्ठान करे॥ २८॥ इदानी यथाक्रम इन के स्वरूप निर्देशार्थ प्रथम यमों क स्वरूप कहते हैं। सूत्र-अहिंता सत्यमस्तेयब्रह्मचर्याऽपरिग्रहा यमाः३. भाषा-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरियह, यह पंच यम हैं। अहिंसा-मन बाणी-काय से अनिष्टचिन्तन परुषभाषण-पीड़ा द्वारा प्राणियों का द्रोहकरणा (सताना) हिंसा है,सर्व प्रकार से (२) सर्व काल में किसी का ट्रोह न करना यहिंसा है। (1) पद्याप पूर्वपादोक्त अभ्यास वैराग्य-श्रद्धा मार्य भी योग के आठ ही हैं यह नियम हाना असम्भव है, तथाऽपि इन आठों में ही सब का अन्तर्भाव । मानकर दोपाभान जानना, तहा अभ्यास का समाधि में, औ वैराग्य का सन्तोष में, भो वीर्य का धारणा में अन्तर्भाव जान लेगा, श्रद्वा से बिना यगादि में प्रवृत्ति होनी असम्भ है अतः श्रद्धा का अर्थतः लाम हुया । (२) सर्व प्रकार कधन से श्रौतपश्वालम्भन (येदिकाहिसा ) या भी परित्याग मानना, शोचादिक्रिया में क्षुद्रजन्तुओं की हिमा को दुनिवार्य होने से तिम हिंसाजनित पाप मी निवृत्ति के लिये अधिक प्राणायाम का अभ्यास करे, यह भी जानो । । अङ्ग ।
साधनपादः २॥ इन सब अंगों में से अहिंसा ही सब का मूल है क्योंकि उत्तर (मागे के) जो यम नियमादि हैं वह सब अहिंसा की ही सिद्धि के लिये प्रतिपादन किये है, अर्थात्-इस अहिंसा के ही निर्मल यो पुष्ट करने के लिये अन्य अंगों का उपादान है (१) । ऐसे ही पञ्चशिखाचार्य जी ने कहा है-यथा-"स खल्वयं ब्राह्मणो यथा यथा व्रतानि वहनि समादित्सते तया तथा प्रमादकृतेभ्यो हिंसानिदानेभ्यो निवर्तमानस्तामेवाऽवदातरू- पामहिंसां करोति" इति । सो यह मोक्षेच्छु ब्राह्मण जैसे जैसे यमनियमादि व्रतों का सम्पादन करता है तैसे तैसे प्रमाद कृत हिंसाकारण मिथ्याभाष- गादि से निवृत्त हुया हिंसा को ही अवदात (निर्मलरूप) करता है, वह इस का संक्षिप्त अर्थ है। सत्यम्-बाणी तथा मन का वधार्थत्व, अर्थात् यथादृष्ट यथा- जुमित यथाछुत तथा ही (२) मानसज्ञान के समान अन्य के पति वाणी द्वारा कथन करना सत्य है। भाव यह है कि अन्य पुरुष के चित्त में स्वचित्तनिष्ठ ज्ञानसदृश ज्ञान के उत्पादनार्थ जोवाणी उच्चरित कियी जाय वह यदि अव- ञ्चिका (वञ्चन शील)(३)न होय नौ निरर्थक न होय तो वर वाणी (१) मिथ्यासभाषण चोगी स्त्रीभोग आदि से भी किसी न किसी का दोह भवभ्य ही होता है, मत इन तीनों पो अभावस्वरूप नो सत्य अस्तेय ग्रह्मचादि यम यह हिंसा के ही नियर्तक हुये, एव च अहिंसा को ही पुष्टि के लिये यमनियमादि का उपादान है यह फालत हुया, एव अन्यत्र भी जान लेना। (२) जेमा इन्द्रियादि से देखा औ जैसा ऊहापोह से जाना ओ जैसा किसी से सुना वैसे कथन का नाम सत्य है। (३) यादृश अपने चित्त में इन्दियादि मन्य ज्ञान है तादृश ज्ञान की ही दूसरे के चित्त में उत्पत्ति करने के लिये मानसज्ञानाऽनुसारी मो वाणी उच्चरित होगी यह अव.
, पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- सत्य जाननी, एतादृश वाणी भी(१) यदि सर्वभूतोपकारार्थ उच्च- रित हुयी किसी भूत का अयक्षार नहीं करेगी तबी सत्य होगी (२) औ यदि वह उच्चरित हुयी वाणी किसी प्राणी का अप- कारक होगी तो असत्य मानी जावगी क्योंकि जिस उच्चरित हुयी वाणी से किसी प्राणी का अनिष्ट होय वह वाणी पापजनक होने से मिथ्या के तुल्य है, अर्थात् जो प्राणियों के अपकार करनेवाली सत्य वाणी है वह पुण्याभास है, अतः तिस पुण्याभास से जैसे अपकृतपुरुष को कष्टप्राप्त होता है तैमे उच्चारण करनेवाला भी अवश्य कष्ट को प्राप्त होगा, अतः विचार कर एतादृश ही सत्य- संभाषण करे कि जो सर्वभूतों को हित होय, अतएव मनुभगवान ने "सत्यं ब्रूयाप्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्” इस वाक्य से अनिष्टकर सत्वसम्भाषण का निषेध किया है इसी अभिप्राय से ही धर्मशास्त्रकारों ने “प्राणनाणेऽनृतं वाच्यमात्मनो वा परस्य च” इत्यादि वचनों से अपने वा अन्य के प्राणरक्षणार्ध मिथ्याभाषण में पापजनकत्त्व का अभाव कहा है। अस्तेय = शास्त्रोतविधि से बिना अन्य से द्रव्य का ग्रहण शिवा होती है, एवच द्रोणाचार्य को प्रति पो युधिष्ठिर ने यह वहा था कि अस्वत्थामा मरगये, वह बागी यश्चित्रा होने में किया जाननी क्योंकि जेमा इन्द्रिय जन्य अश्वत्थामानामक हस्ती हननविषयमबोध युधिष्टिर के चित्त में वर्तमान य तैपा द्रोणाचार्य के चित्त में नहीं रदय हुया पितु अपने पुत्र वध का ही बोध उसे हुया । (१) इदानीं । एषा सर्वभूतोपकार) प्रवृना न भूतोपघाताय ) इत्यादि भाष्य का अनुवाद करते हुये शो मत्य दूमरे का अनिष्ट करता है वह मिथ्या के तुल्य अनिष्टकर होने से हेय नानना यह कहते हैं, - ( एतादृश) इत्यादि मे। (२) जेमे किसी मार्ग में धनिक पुरष चले जाते थे भो तस्कर उन का अन्वेषण कार.थे तब उनों ने किसी ससमता से पूछा कि वह धनिक इस तरफ गये हैं या इम संरफ तप वह अपने को सत्यसभाषणशोळ जानकर बोला कि इस तरफ गये हैं, यह सत्य मभाषण एक का उपकारक गौ अन्य का अपकारक होने से मिथ्या है यह तत्व है । है । .
साधनपाद: २॥ २०९ करना स्तेय है, उस के अभाव का नाम अस्तेय है, अर्थात्- शास्त्र में जने “पादुके चापि गृह्णीयात् कन्थां शीतनिवारिणीम् इत्यादि वाक्यों से पादुका तथा कन्या (गुदडी) कौपीन (१) प्रभृति अत्युपयुक्त पदाधीका भिक्षु को ग्रहण लिखा है उस से विना अन्य पदार्थों के ग्रहण न करने का नाम अस्तेय है, इतना विशेष यहां पर यह भी जान लेना कि ग्रहण का जो प्रतिषेध किया है सो ऐसा नहीं है कि अपने हाथ से द्रव्य का यहण न करना किन्तु चित्त में एक वार स्पृहा का अभाव रहना ही अस्तेय है, अतएव भाष्यकारों ने “अस्पृहारूपमस्तेयम्” इस वाक्य से इच्छा के अभाव को अस्तेय कहा है। ब्रह्मचर्य = अन्य सब इन्द्रियों के निरोधपूर्वक उपस्थइन्द्रिय" के संयम का नाम ब्रह्मचर्य है। अर्थात्-"स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणं, संक- ल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिवृत्तिरेव च, एतन्मैथुनमष्ठाङ्गं प्रव- दन्ति मनीपिणः, विपरीतं ब्रह्मचर्यमेतदेवाष्टलक्षणम्” (२) इस दनमुनि के वचनानुसार आठ प्रकार के मैथुन का त्याग ब्रह्मचर्य है। (१) कूप - १ में पतन के योग्य होने से कोपीन नाम पाप का है, उस पाप का साधन होने में शिश्न इन्द्रिय भी कौपीन कहा नाता है, सो उस इन्द्रिय का आदिक जो लिङ्गोटसज्ञक वस्त्र वह भी उपचार से कौपीन जानना। (२) स्त्रा का स्मरण, कीर्तन, तथा स्त्री से हास्यादि क्रीडा, सवा स्त्री की तरफ दृष्टिपान करना, तथा एकान्त में स्त्री से वार्ता करनी, तपा स्त्रीभोग का सङ्कल्प, तथा स्नाभाग के ल्ये निश्चयपूर्वक एक स्थिर सलाह, तथा क्रियानिवृत्ति अर्थात् अनर्थ मूलका पवर्म नामक परस्पर चर्भमघर्ष, यह साठ प्रकार का मैथुन है, इन से नो इन रा त्याग वह आठ प्रकार का ब्रह्मचर्य है। २७ 1 २१० पातज्जलदर्शनप्रकाशे- अपरिग्रह-विषयभोग में अर्जन, (१) रक्षण, चय,संग, हिंसा.. रूप दोष को जान कर अपने प्रायास प्राप्त विषयों का भी स्वीकार न करना अपरिग्रह है। यद्यपि अस्तयकघन से ही विषयों का अस्वीकार प्राप्त है अतः अपरिग्रह का भिन्न कथन निरर्थक है, तथापि अस्तेय से शास्त्रोक्तं विधि से स्वीकार का दोषाभाव कथन किया है, यो यहाँ पर शास्त्रीयविधि से प्राप्त हुये पदार्थ में भी दोप जान वार त्याग करना उपदेश किया है इतना भेट जान लेना, यहा अस्तेय से चोरी का प्रभाव औ दानन्का यहार करना, यो अपरिग्रहपद से उपयुक्त कोपीनादि प्रभृति अन्वपदार्थों के ग्रहण का भी यथा सम्भव अभाव यहण करणा। यह पांचो ही हिंमा, मिध्या, स्तेय, मैथुन, परियह का अभावरूप होने से यस है क्योंकि यस नाम उरपम (अभाव) का है ॥३०॥ इस प्रकार मामान्य से यमो का निरूपण कर इदानी या दृश यम योगी कर ग्रहण करने योग्य है तादृश यमों का निर्देश करते है- ते तु सू०-जातिदेशकालसमयाऽनवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥ भापा- (ते तु) यह पूर्वोक्त पंच यम (जाति-देश काल-सम- (२) अशी नाम मपाटन का है, पिपयमाग पे सपादनााद में दु ग्य तो स्पष्ट हा है, भी मतदाप यही है कि आमाल से राग यी वृद्धि होता है, जो पिना भताहिमा से भोग भी नहीं होता है यह मिा दोष है, या इस पाट के १५ मन में स्पष्ट है। प्रनिप्रद से भा पुण्य राक्षप होता है शन उस का भी जहा तक हो साग यारे यह तप है।
साधनपाद: २ २११ । याऽनवच्छिन्ना:) जाति-देश-काल-समय रूप अवच्छेद (विभाग) से रहित होने से (सार्वभौमाः) सर्व अवस्था में व्यभिचार से रहित हुये (महाव्रतम् ) महाव्रतनाम से व्यवचन होते हैं। अर्थात्-एक अहिंसा जातिअवच्छिन्न होती है जैसा कि सत्स्य की ही मैं हिंसा करूंगा अन्य को नहीं इस प्रकार मत्स्यबन्धक (१) की मत्स्यविषयक, इस जातियवछिन्न अहिंमा में ही यदि इतता विशेष अन्य संमेलन जियाजाय कि अन्य देश मैं ही हिंसा करूंगा तीर्य में नहीं तब यही देशाऽवविन्न हो जाती है, जो इसी उम यावछिन्नां अहिंसा में वदि इतना विशेष अन्यं मेलन कियाजाय कि चतुर्दशी-संक्रांति प्रभृति पुण्यकांत में मैं हिंसा नहीं करूंगा, तव यही कानाऽवच्छिन्न हो जाती है, * इस जीनप्रकार की हिंसा से रहित पुरुष कर्तृक जो देवता वा ब्राह्मणों के अर्थ ही मैं हिंसा करूंगा ऐसे नहीं इस प्रकार संकेत कृत अहिंसा वह समयाव- चिन्न-है, एवं जत्रिय होने से मैं युद्ध में ही हिंसा वारंगा अन्यत्र नहीं यह भी ममयाऽवच्छिन्न जाननी। इस प्रकार जाति-टेश-काल-समय रूप विसाग को त्याग कर जो सर्वधा हो सर्वजाति-सर्वक्षाल-सर्वदेश सर्वप्रयोजन, रूप विशेष परित्यागपूर्वक अहिंसा का परिपालन वह जातिदेशकालसमयाs वच्छिन अहिंसा है। एवं प्रागा जाण आदि से अन्यन मैं मिष्टया संभाषण नहीं करूंगा इस प्रकार सत्य को समयावच्छिन्न जानना, एवं दुर्मिन से विना चोरी नहीं करूंगा, इस प्रकार अस्तेय को समयावच्छिन्न जानना, एवं केतुकाल से अन्य काल में स्त्रीगमन नहीं करेगा इस प्रकार ब्रह्मचर्य को ममवावछिन्न जानना, पिता की परिपालन के लिये ही मैं प्रतिया ग्रहा करंगा मे (१) माया नाममा पारने वाले या है। .६ प्रकार प्रसेस २ भी मानना। - एवं वृद्धमाता २१२ पातञ्जलर्दशनमकाश- नहीं इस प्रकार अपरियह को समयाऽवच्छिन्न जानना । इस सर्व जाति आदि विभाग को त्यागकर जो सर्वथा ही हिंसा-मिथ्या-चौर्यस्त्रीगमन-प्रतियह का त्याग वह जाति-देश- काल समय से अनवच्छिन्न अहिंसादि हैं। इस प्रकार अनवच्छिन्न होने से जो सार्वभौम अर्थात् सर्व जाति-देश-काल-समय-श्रादि अवस्थ्या से अव्यभिचरित यहिंसादि, तिन के अनुष्ठान का नाम महाव्रत है। एवं च विवेकज्ञान को इच्छा बाला योगी महाव्रतका अनुष्ठान करे कुछ जात्यादिअवच्छिन्न अहिंसादि का नहीं यह फलित हुधा ॥३१॥ इदानों क्रमप्राप्त नियमों का स्वरूप कहते हैं- सू० शोचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥ ३२॥ भाषा-शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान, यह पांच नियम हैं। शौच मृतिका-जल-गोमय आदि से शरीर का प्रक्षालन, औ हित मित-मध्य भोजन से उदर का प्रचालन, • आ मैत्री आदि भावना से चित्तमलों का प्रक्षालन करना शौच है,। सन्तोष = विद्यमान भोगसाधन वस्तुजात से अधिक अन्य अनुपयुक्त वस्तुविषयक इच्छात्मक चित्त की वृत्ति का प्रभाव । तप = इन्डका सहना, अर्थात् क्षुधापिपासा, शीतउष्ण, स्थानभासन * इत्यादि इन्दों को सद्य करना, एवं काष्ट + हितमितमेष्यभोजन का विवरण पूर्व १२२ इस पृष्ट के टिपण में, औ मैत्री यादि मायना का निरूपण ८८ ३म पृष्ठ में देखो। * स्थान खडे ही रहना, यो आसन बेठेही रहना ।
साधनपादः २। मौन, आकारमौन (१), औ यथा योग कृच्छ चान्द्रायण सान्त- पनादि व्रतों का (२) अनुष्ठान करना तप शब्द का अर्थ है स्वाध्याय मोक्षप्रतिपादक अध्यात्मशास्त्र औ वेद का अध्ययन तथा प्रणव का जप करना। ईश्वरप्रणिधान = परमगुरु परमेश्वर में सर्व क्रिया का अर्पण करना, इस प्रणिधान से जो फल प्राप्त होता है वह वेद- व्यास जी ने "शव्याऽऽसनस्योऽय पथि व्रजन् वा स्वस्थः परिक्षो- रणवितर्कजालः, संसारवीजक्षयमीक्षमाणः , स्यान्नित्यमुक्तोऽमृत- भोगभागी" (३ ) इस श्लोक से. कहा है, एवं सूत्रकार ने भी (१) इङ्गित-हस्तादिचेष्टा इसारा द्वारा भी अपने अभिप्राय का प्रकाश न रना काष्ठमौन, केवल वाणा मात्र के निराध का नाम आकारमान है। (२) तीन दिन प्रात काल हा कुम्टअण्ड सदृश पशिति २६ माम, ओ फर तीन दिन मायकाल ही तादृश बत्तीस ३२ प्राम, फिर तीन दिन बिना याचना से गप्त हुये ही तादृश २४ ग्रास का आहार करना, फिर तीन दिन उपनाम करना, इम का नाम कृष्ट्र है । शुक्लपक्ष का प्रतिपद् स ले कर मे २ चद्रमा की कला वृद्धि को प्राप्त ोती जाय तेसे २ मयूरअण्ड परिमित एक एक ग्रास को बढा वर पौर्णमासी तक पन्द्रह प्स को भक्षण कर फिर कृष्ण पक्ष की प्रतिपद को १४ फिर द्वित्ताया को १३ इस प्रकार घटाते घटाते अमावस्या को उपास करे, यह चान्द्रायण है । प्रथम दिन आहा- तर के पारत्यागपूर्वक भाठमाया ताम्रपर्णा गाय का मूत्र औ १६ मापा श्वेतवर्णा राय का गोबर, भो ५२ माषा घोचनयां गाय का दुग्ध, यो दशमापा नील रणां गाय का घृत ओ इस सब से अंद्र परिमाणवाला फुश तया जल मिला कर पान रे भी द्वितीय दिन उपवास कर यह मा पन है, यह सर मनुमहिताके ११ अध्याय में ११२ इत्यादि लोगों में औ याज्ञवल्यस्मृ त के प्रायश्चित्ताअध्याय के ३११ इत्यादि लोगों को मितक्षरा में सष्ट है। (३)जो योगी सध्या तथा गामा पर स्थित हुआ चा मार्ग में चलता हुभा या सात में स्थित हुमा हिमाद वितयों मे रहित हुआ सरप्रणिधान करता है यह दिनों दिन ससारी रागादि ये क्षण या अनुभव करता हुया मायन्मुक्ति के मुस के भोगने मे निसान या भाव है। -- पातखलदर्शनमकाशे- "ततः प्रत्यक्तनाऽधिगमोऽऽप्यन्तरायाऽभावश्च" (१)इस सूत्र से इस प्रणिधान का आत्म साक्षात्काररूप फल कहा है, एवं च ईश्वरप्रणिधान अवश्य करणीय है यह फलित हुग ॥ ३२ ॥ इटानी श्रेष्ठकार्यों में विद्या की संभावना होने से यदि अहिं सादि यम किसी विघ्न से प्रतिरत होने लगें तो प्रतिपक्षभाव नाद्वारा उन की निवृत्ति करे, यह कहते है- एतेषां यमनियमानां- सू० वितर्कवाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३३ ॥ भाषा-(एतेषां यमनियमानाम् ) इन पूर्वोक्त यमनियमों का (वितर्कवाधने) अहिंसादि के विरोधी तर्ककप (२) हिंसा मिथ्या- भावणादि से बाध प्राप्त होने पर (प्रतिपक्षभावनम् ) हिंसादि, में दोषदृष्टिक हिंसादिविरोधी विचार का सेवन करें। • अर्यात्-जब इस ब्रह्मज्ञानेच्छु योगी के चित्त में अहिंसादि' के विरोधीभूत यह व्यवसाय उदय होवै कि-(मे अवश्य ही इप्स वैरी का हनन करूगा, भो इस को दुःखप्रटानार्थ मिथ्या संभाषण भी करूंगा, औ दूस के द्रव्य का अपहरण भी करूंगा, यो इस की स्त्री के सम पशुधर्म भी अवश्य करूंगा, जो इस के धन का स्वामी सी हूगा,) तब इस अतिवृद्ध उन्मार्गप्रवण (३) वितर्कनामक ज्वर से वाध्यमान हुया हिंसादि मे प्रवृत्त न होवै किन्तु (इस घोर संसाररूपगंगार में निरन्तर दह्यमान पच्यमान हुये मैं ने सर्व भूतो के प्रति अभयदान के अर्घ कथंचित् अहिंसादि रूप योगधर्म के शरण का लाभ किया है तो यदि में इस गृहीत अहिंसादि को त्याग कर फिर इन के विरोधीभूत हिंसादिको यह (1)पूर्वपाद ये ७८ पृष्ठ म दया । (२) गामि दिनमी मन को तर्क अर्धा में आवश्य हिमा कस्गा इत्यादि निधप इन या सामयितन। (३) वर्मा की तरफ प्रवाहनाला ।
साधनपाद: २। २१५ 1 करूंगा तो मैं भी कुक्कुर के आचरण के तुल्य आवरण बला हो जाऊंगा क्योंकि बैंसे कुक्कुर वान्तस्वाटी है तैस त्यक्त के ग्रहण करने से मैं भी दान्तभक्षी हूंगा,) इस प्रकार प्रतिपक्ष- भावना करें। इसी प्रकार नियमादि में भी वितों की प्रतिपक्षभावना जान लेनी॥३३॥ इटानी, वितकों के स्वरूप-प्रकार कारण धर्म-फत भेद का निरूपण करते हुये प्रतिपक्षमावना का स्वरूप करते हैं- सू० वितर्का , हिंसादयः कृतकारिताऽनुमोदिता लोभनोधमोहपूर्वका मृदुमध्याऽधिमात्रा दुःखाऽज्ञाना- ऽनन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३४ ॥ भाषा--(हिंसादयः) हिंसा मिथ्याभाषण आदि जो (वितकाः) अहिंसादि के विरोधी हैं, वह (दुःखाऽज्ञानाऽनन्तफलाः) दुःख भी अज्ञान रूप अनन्त फलदोही देनेवाले है कुछ। सुख तथा ज्ञानरूप फलके नहीं, (इति प्रतिपक्षभावनम्) इस विचार का नाम प्रतिपः क्षभावना है, सो यह हिंसादि कियेहुये ही दुःख फल देते हैं सो नहीं किन्तु (कृतकारिताऽनुमोदिताः) कृत = अपने से निष्पादन किये हुये, औ कारित - शाज्ञाहारा अन्य से निष्पादन कराये हुये ओ अनुमोटित-हां साधु साधु इस प्रकार अनुमतिद्वारा अनुमोदन किये हुये भी दुःखफनक हैं, सो यह हिंसादि कहीं मांस चर्मादिकी लोम से जन्य होते हैं औकहीं मेरा इसने अपकार किया है तो मैं भी इस का अवश्य धपकार करूंगा इस प्रकार क्रोध (*) हिंसादयः-इस पद मे वितों का स्वरूप कथन, कृतकारित इत्यादि पद से प्रकार कशन, लोभ इत्यादि से कारणकथन, मुटु इत्यादि से धर्म कथन, दुख-इत्यादि से फल कान मान लेना।
०१६ पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- से उत्पन्न होते हे, ओ कही बलिदान देने से कुछ धर्म होगा इस प्रकार मोह (अविद्या ) से उत्पन्न होते है, सोई कहा है (लोभ मोहक्रोधपूर्वका ) वह लोभादि भी (२.दुमध्याऽधिमात्रा.) मृदु मध्य तीब्र भेदसे तीन प्रकार के है, एवंच मिलकर एकाशीति ८१ प्रकार के (१) जो हिंसादि वह दुःखफलक होने में हेय है इस विचार से हिंसादि से निवृत्त होय यह निष्पन्न हुवा। भाव यह है कि हिंसक पुरुष पहिले वध्य पशु के वीयंका(नाश करता है, औ फिर शस्तादिनिपात द्वारा पशुको दुःखप्रदान करता है औ फिर उसको जीवन से भी विमोचित कर देता है, तहां पशु के वीर्य का नाश करने से हनन करनेवाले प्राणी के पुत्र कलन धनादिक उपकरण क्षीण हो जाते है अर्थात् उसके भोगने योग्य नही रहते है। श्री शस्त्र नियातद्वारा पशुको दुःख देनेसे अपने भी नरक तिर्यक् प्रेताटियोनियो मे दुःख का अनुभव करता है, औ पशु का जीवन मोचन करने से दुःसाध्य रोगकर पीडित होने से प्राणान्त सन्निहित अवस्था को प्राप्त हुया मरण की चाह वाला होने पर भी दुखफल को अवश्य भोगनीय होने से किसी प्रकार मे जईश्वाप्स द्वारा जीवनधारण करता है, यदि अंगीभूत किसी (१) पहिल कृतकारितअनुमादित भद स तीन प्रकार य1, पर काम माह- मोध ज य भेद स एव एव तागर प्रकार का हाने से ना प्रकार या हिंसा हुया, ओ फिर सामादि यो मृद मध्य अधिगात्र भेद से तीन २ प्रकार के होने स सत्ताईस प्रकार हुया, फिर मदु आदि तीनों को भी मृदुमृट, मध्यमृद्, ताबमृदु, इत्यादि भेद से तान२ प्रकार का होने से ८१ प्रभार [ हुया । वस्तुत नो मत्स्य का हिमा करुणा अय की नहीं, इस नियम के भेद से, वा एस दिन में एक ही विमा की हिंसा यरूगा दो की नहीं इस विकल्प के भेद से गा सब यो हिमा परगा इस प्रकार समुच्चय क भेद से यह हिमा अमरयात है, औ प्राणियों को आरत रोने से भी हिंसा अमझ्यात है। () या ( यशस्तम्भ ) धनद्वारा सामर्थ्य का। को हा मैं - साधनपादः २२७ पुण्य के अनुष्ठान से हिंसाजन्य पाप' कुछ निवृत्त हो जायगा तो उस पुण्य के फलभूत स्वर्ग की प्राप्ति होने पर अल्पायु पो दुःखी होंगा, यही हिंसा में दुख फलकत्त्व है। इस प्रकार मिध्या संभाषणादि को भी दुःखफलकत्त्व जान' लेना। हिंसादिक्तिों के इस पूर्वोक्त अनिष्ट फल की भावना करता हुया पुरुष फिर वितर्कों में मन न दे किन्तु प्रतिपक्षमावना से इन का परित्याग ही करे यह परमार्थ है॥ ३४ ॥. इस प्रकार प्रतिपक्षभावना से जब यह . हिंसादि. दग्धवीज- तुल्य हो जाते हैं तब योगी को जो यमादि कृत ऐश्वर्य प्राप्त हुये यमों को सिद्धि के सूचक होते हैं उन का निरूपण करते हैं- सू० अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥३५॥ . भाषा-(अहिंसाप्रतिष्ठायाम् ) अहिंसा विषयक योगी की प्रकृष्ट स्थिति होने से (तत्सन्निधौ वैरत्यागः) तिस योगी के समीप शाने पर विरोधियों का भी परस्पर वैर निवृत्त हो जाता है। अर्थात्-जो योगी जात्यादिअनच्छिन्न अहिंसा में निष्ठा: . वाला होता है उस के समीप स्थित हुये स्वाभाविकविरोधशील अश्व-महिप, पक-माजार, सर्प-नकुल, मी मित्रभाव को प्राप्त हो (१) जाते हैं ॥ ३५ ॥ .:, सू० सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाऽऽश्रयत्वम् ॥३६॥ .: भाषा--सत्यविषयज्ञप्रतिष्ठा होने से क्रियासंजक धर्माधर्म का औ तत्फल स्वर्ग नरकादि का आश्रय पुरुप हो जाता है। (१) एवंच नय स्वसन्निधि को प्राप्त हुये सामाविक विरोधी प्राणो भी परस्सर और का त्याग करें तब योगी यह जाने यि अब मैं गहिसानिष्ट हया इं.इस प्रकार मागे भी मान लेना।
२१८
पातखलदर्शनमका-
अर्थात्-सत्यसंभाषणनिष्ठ पुरुष यदि किसी पापी को कई
कि तुम्हारा पाय नष्ट हुया औ धर्म वृद्ध हुया तो अवश्य ही वह
धार्मिक हो जायगा, एवं (१) तुम्न स्वर्ग को प्राप्त हो जायो गे ऐसे
जिप्स को कहेगा वह स्वर्ग को भी अवश्य ही प्राप्त हो जाय गा,
अर्थात् सत्यनिष्ठ की वाणी अमोवा हो । जाती है ॥ ३६ ॥
": सू० अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥
भाषा-अस्तेयविषयकप्रतिष्ठा होने से सर्व रनों की उप-
स्थिति हो जाती है।
अर्थात-अस्तेयनिष्ठ पुरुष के समीप सर्व दिशा देशान्तर
में होने वाले अमूल्य रत्न हीरक मुलामत आदि उत्तमद्रव्य उप-
-
स्थित हो जाते हैं॥३०॥
साधनपाद:२॥ २१९ कारता का ( संबोध ) ज्ञान होता है, अर्थात्-हम पूर्वजन्म में कौन थे कहां घे किस प्रकारसे स्थित थे, पो वर्तमानकातिकशरीर भूतोंका कार्य है वा भूतों का समूह है वा भूतों से अन्यत् है ओ आगे हम क्या होगें शकौन होंगे वा किस प्रकार होंगे, इस प्रकार भूत-वर्तमान-भाविजन्म विषयक यथार्थ ज्ञान उदय हो जाता है। यह पूर्वोक्त पांचों सिद्धियां पांच प्रकार के यमों विषयक स्थिरता होने से लब्ध होती हैं ।। ३६ ॥ इदानीं नियमविषयक निष्ठाशील को जिन सिद्धियों का लाभ होता है उन का वधाक्रम प्रतिपादन करते हैं- सू० शोचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परेरसंसर्गः ॥४०॥ भाषा-पूर्णतया शौच के अनुष्ठान से (स्वाङ्गजुगुप्सा) अपने. शरीर के अंगों में ग्लानि होती है औ (परैरसंसर्गः) अन्य मलिन वा शुद्ध पुरुषों के संग संसर्ग का अभाव हो जाता है। अर्थात्-जब योगी अपने अंगों में अशुद्धि प्रयुक्त ग्लानि के होने पर शौच का अनुष्ठान करता है तव (स्थानावीजाद) इत्या- दि पूर्वोक्त युक्ति से शौच करने पर भी शरीर को शुद्ध न जानता हुया शरीरविषयक अव्याम से रहित हो जाता है, ओ काय के स्वभाव को जानता हुया अन्य किसी के संग संसर्ग न कर एका न्तसकरी हो जाता है, अर्थात् जो पुरुष मृत्तिका जलादि से प्रक्षा- लन करने पर भी अपने शरीर को शुद्ध न जान कर शरीर के त्याग की इच्छा करता है वह पुरुष मला अन्य मृतकतुल्य मलिन शरीरों से कैसे (१) संसर्ग करेगा। ॥ ४० ॥ (१) एपच शरीरापास की निवृत्ति मी एकान्त मंचन करना हा शौच का फल है, मो इन दोनों के होने से ही योगी शोपनिष्ठ प्रतीत होता है, यह जानना।
२२० ~ पातजलदर्शनप्रकाशे- बाह्य शीच प्रयुक्त सिद्धि का निरूगा कर इदानीं बान्तर शौच की सिद्धि का सूचक फल कहते हैं- सू० सत्त्वशुद्धिसोमनस्यैकाग्रयेन्द्रियजयाऽऽत्मदर्शन- योग्यत्वानि च ॥४१॥ भषाा-मैत्री वादि भावना से रागादि निवृत्ति हारा (सत्त्व- शुद्धि ) चित्त सत्त्व की अमलता धाविर्भूत होती है औ अमलता से (सोमनस्य) स्फटिक के तुल्य स्वच्छता, यो स्वच्छता से एका- यता औ एकाग्रता से तदधीन इन्द्रियो की वश्यता, ओ वश्यता से आत्मसाक्षात्कार की योग्यता लञ्च होती है, यह शौच की स्थिरता का फल है ॥ ४१॥ सू, सन्तोपादनुत्तमः सुखलाभः ॥४२॥ भाषा–सन्तोषविषयक निष्ठा होने से (अनुत्तम )जिस में अन्य कोई उत्तम नही है एतादृश सुख का लाभ होता है। ऐसे ही व्यासदेव जी ने भी कहा है यया-“यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखं, तृष्णाक्षयसुखस्यैते नाऽहंतः पोड- शी कलाम्()" इति, अपने पुत्र पुरु के प्रति यावन यर्षण काल में ययाति राजा ने भी “या दुस्त्यजा दुमतिभियां न जीयंति जीयाते, तां तृप्णां सन्त्यजन् प्राज्ञः सुखेनेवाऽभिपूर्यते" • जो लोक में यामसुम्य अर्थात् पाहेक मान चदन बनतादि मे ज य सुम्य है, ओशो दिव्य स्वर्ग में होने माला अपराभाग अमृतपानादि प्रयुक्त सुग्व है, यह दोनों ही मुष्ट तृष्णाक्षयप्रयुक्तमतोप सुख यी पोडश का व याम्य नहीं अर्शत् स तोप सुख से सोमहवा हिस्सा भी मुग्व इन दोनों में नहीं। दुमीत पुरपों पर जो त्यागनी कठिन हे औ शरीर को जार्ण होने पर भी जो बीर्ण नही हे गर्थात शारीर पर बुढापा आने स मा जिम पर बुढापस नहीं होता है एतादृश, तृष्णा को त्याग करने पोका पुरुष अनुचम सुख से परिपूरित हा जाता है, यह इस का अर्थ है । * २२१ .. . साधनपादः २ इस वाक्य, से तृष्णात्याग रूप सन्तोष को अनुत्तम सुख का जनक कहा है ॥४२॥ सू० कायेन्द्रियसिदिरशुद्धिक्षयात् तपसः ॥४३॥ षाभा-(तपसः ) तप के अनुष्ठान से] (अशुद्धिंचयात् ) रज तम प्रयुक्त अशुद्धि संजक आवरणरूप मल के क्षय होने में (कायेन्द्रियसिहिः) शरीर तथा इन्द्रिय निष्ठ सिद्धि लब्ध हो जाती है, अर्थात्-शरीर संबंधो अणिमादिक मिद्धियां औ इन्द्रिय संवन्धी टूर से श्रवण करना तथा दूर से देखना प्रभृति सिद्धियां योगी को प्राप्त हो जाती है.॥ ४ ॥ सू० स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः ॥ ४४ ॥ , भाषा-(स्वाध्यावात्) स्वाध्यायशील होने से (इष्टदेवता) अभिमत देवताओं को (संप्रयोगः ) साक्षात्कार हो जाता है। अर्घात्-जिन देवताओं को वा ऋषियों को वा मिडों को वह दर्शन के अर्थ चाहेगा वह देवताटि स्वाध्यायशील को दर्शन देंगे यो उस के कहे हुवे कार्य क्षा सम्पादन भी करेंगे ॥४४॥ सू०समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ४५ ॥ भाषा-( ईश्वर प्रणिधानात् ) ईश्वर प्रणिधान से ( समाधि सिहिः) सम्प्रजातसमाधि की सिद्धि होती है। अर्यात्-जिस ने सर्व कर्मों का ईश्वर में अर्पण किया है वह एतादृश समाधिप्रज्ञा का लाभ करता है कि जिस प्रज्ञा द्वारा वह योगी देशान्तर देहान्तर कालान्तर में होने वाले पभिमत पदार्थों को भी यथावत् जान सकता है । यहां यह शड्दा मत करनी कि-" जव कि ईश्वरप्रणि. धान से डी समाधि का नाम हो जाता है तो इतर सात पंगा पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- के अनुष्ठान मे क्या प्रयोजन है" क्योंकि उन सातों के विना ईश्वर प्रणिधान का लाभ न होने से वह सात (१) ईश्वर प्रणिधान के उपयोगी हैं ॥ ४५ ॥ इस प्रकार सिद्धियों के सहित यम नियमों का निरूपण कर दूदानी क्रमप्राप्त आसन का लक्षण कथन करते हैं- सू० स्थिरसुखमासनम् ॥ ४६ ॥ भाषा-(स्थिरसुखम् ) जिस द्वारा निश्चल हुये को सुख जाम होय वह (आसनम् ) प्रासन काहा जाता है। अर्थात् पद्मासनादि बासनों में से जिस श्रासनद्वारा स्थिरता सिद्ध होय उसी आसन का योगी सेवन करे, पद्मासन = वाम (वाई ) (२) उरु के ऊपर दक्षिण चरण को संस्थापन कर, औ वाम चरण को दक्षिण उरु के जपर स्थापन कर, दक्षिण हस्त को पृष्ट की तरफ कर वाम उस पर स्थित दक्षिण चरण के अंगुष्ट का यहण कर, वाम हस्त को पृष्ट की तरफ कर दक्षिण उरु पर स्थित वाम चरण के यंगुष्ठ का यहण कर, फिर उर (छाती) के , चार अंगुल के मध्य में चिबुक (ठोढी) को स्थापन कर औ नासा के अग्रभाग का यालोकन किया जाता है जिस स्थिति में वह पद्मासन है। वीरासन = एक पाद का भूमि में स्थापन करे द्वितीय पाद को नानु भाकुंचित कर उस के ऊपर स्थापन करे, यह वीरासन है। (१) तहा यमादि अशुद्धि के क्षय द्वारा ईश्वरप्रणिधान के उपयोगी हैं ओ मासनादि इटाल ददादि नित्त द्वारा उपयोगी है । (२) यद्यपि सामन अनेया है तथापि जिन आसनों का भाष्यकारों ने परिगत पिया का लक्षण निरूपण करते हैं (पाम) इत्यादि से।
सापपादा। २२३ भद्रासन = दानों पादतलों को अण्डकोष के समीप संपुटित कर तिस के ऊपर में दोनों हाथों को सम्पुटित करना भद्रासन है। स्वस्तिकासन = वाम चरण को पाकुंचन कर दक्षिण नांघ श्री उरु के मध्य में स्थापन कर, दक्षिण चरण को आकुंचित कर वाम जंघा औ उर के मध्य में स्थापन करना स्वस्तिकासन,है। इसी प्रकार दण्डासन (1) सौपाथय, पय्यक, क्रौञ्चनिष- दन, (१) हस्तिनिषदन, उष्ट्रनिषदन, समसंस्थान, (२) स्थि- रसुख, यथासुख, इत्यादि आसन जान लेने। इन सब में से जिस प्रकार से स्थित हुये पुरुष को सख से स्थिरता प्राप्त होय वही स्थिरसुख नामक आसन योगी को उपादेय है यह भगवान् सूत्रकार को सम्मत है ॥ ४६ ॥ शासन का स्वरूप कथन कर दूदानीं श्रासन का साधन कहते हैं-- सू० प्रयत्नशेथिल्याऽनन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥ भाषा-(प्रयत्नशैथिल्य ) स्वाभाविक शरीर की चेष्टा का * दोनों पादों की अङ्गुलियों को ओ गुल्कों को लिष्ट (परस्पर मिरित) कर दो मेघ-उरु-पादों को भूगि से श्लिष्ट कर पसार देने का नाम दण्डामन है । बाहुयों का बाधारविशेष काष्टनिर्मित चौगान सज्ञा से उदासीनों में प्रसिद्ध मो काष्टनिर्मित योग पट्टक उप योगपट्टक द्वारा स्थित होना सोपाश्रय है, जानुभओं के ऊपर चाहु पसार कर शपन करना यर्य है। (१) क्रोअनामक पक्षिविशेष की तरह स्थित होने को क्रोश्यासन कहा जाता है, इसी प्रकार हस्ती सदृश स्थिति का नाम हस्तिनिदिन, औ उष्ट्र सदृश स्थिति का नाम उष्ट्रनिषदन जान लेना। (२) पाणि (ऐडी) औ पाद के अप्रभाग को गाकुंचित कर परस्सर सम्पीडन का नाम समसस्यान है, कोई यह कहते हैं कि दोनों बानुयों के ऊपर हस्त रखकर फाय शिर प्रोवा के सरल भाव से अवस्थापन करने का नाम समसंस्थान है ।
, सू० १२१ पातअलदर्शनकाशे- नाम प्रयत्न है ओ अंगमेजयत्व (शरीर कस्पन) के अमावार्य उस स्वाभाविक चेष्टा को न्यून करना (१) प्रयल की शिथिलता है, इस प्रयत्नशैथिल्य से आसन सिह होता है,वं अनन्तसमात्ति से अर्थात्-फणामण्डलधृतब्रह्माण्ड जो पनाग तिम विषयक- चित को एकतान लगाने से भी आसन सिद्ध हो जाता है ॥४७॥ इदानी आसनसिद्धि सूचक चिन्ह करते हुये 'प्रासन सिद्धि का फल कहते है- • ततो द्वन्द्वाऽनभिघातः॥४९॥ भाषा-(ततः ) तिम आसन के लाभ में (इन्दाऽनभिघातः) शीत उष्ण आदि द्वन्दों कर योगी पीडित नही होता है ॥ ४८ ॥ इदानी क्रमप्राप्त प्राणायाम का सामान्य लक्षण करते हैं- सू० तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४८॥ भाषा-(तस्सिन् सति ) तिस पूर्वोक्त आसन के पूर्णतया लाभ होने पर, जो (श्वासप्रश्वासयोगतिबिच्छेदः ) श्वासप्रश्वास की स्वाभाविकगति का अभाव, वह (प्राणायामः) प्राणायाम है। वाद्यवायु का भीतर प्रवेश करना श्वास है ओ उदरस्थित- वायु का वाहर निःसारण करना प्रश्वास है, इन दोनों के अभा. वका नाम (२) प्राणायाम है ॥ ४६॥ (१) यदि लौकिक विसी व्यापार के अन तर आसन करेगा ता शरीर का थकित होने से अङ्गकम्पन से आमन की स्थिरता नहीं हागा अत् लोकक व्यापार की शिथि- लताही योगा को कर्तव्य है कि जिससे आसनकाल में अङ्ग कम्पन न होप यह भाव है। (२) यद्यपि पूरक प्राणायाम में श्वास फे सद्भाव से भी रेचक प्राणायाम में प्रश्वास के सद्भाव से इन दानों में श्वारा प्रश्वास का अभाव नहीं फितु कभक में हा है तथापि साभाविक नो नोवों को श्वास प्रश्वास अनियत होता रहता है उस का अमात्र इन तानों में ममान ही है, गत यह सामान्य लक्षण है, यह जानना साधनपादः २१ इदानीं प्राणायाम के विशेष तीन लक्षण कहते हैं- स तु- . सू० बाह्याऽऽभ्यंतरस्तम्भत्तिर्देशकालसङ्ख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥ ५० ॥ भाषा-(स तु) सो यह प्राणायाम (बाह्याऽऽभ्यन्तरस्तम्भ- वृतिः ) बाह्यवृत्ति, ग्राभ्यन्तरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति भेट से तीन प्रकार का है। अर्थात् प्रश्वास द्वारा स्वाभाविक प्राण की गति का जो प्रभाव वड़, बाह्यवृत्ति (रचक) है, औ श्वासद्वारा जो स्वाभाविकगति का प्रभाव वह आभ्यान्तरवृत्ति (पूरक) है, औ प्रयत्न मे एक बार ही इन दोनों का अभाव स्तम्भवृत्ति (कुम्भक) है, अर्थात्-जैसे तप्तपाषाण वा तप्तंलोह के ऊपर न्यस्त (फैकाहुया) जल संकोच को प्राप्त हो जाता है तैसे दृढ प्रयल से जो श्वास प्रश्वास का एकवार ही प्रभाव वह कुम्भक प्राणायाम है। सो यह तीन प्रकार वाला प्राणायाम (देश-काल-संख्याभिः परिदृष्टः) आभ्यन्तर बाह्य देश, तथा क्षणों की इयत्तानिश्चयरूप काल, तथा श्वासप्रश्वास की संख्या, इन तीनों द्वारा (परिदृष्ट) अभ्यासद्वारा परीक्षित औ परिवर्द्धित हुया (दीर्घसूक्ष्मः ) दीर्घ तथा सूक्ष्म हो जाता है। अर्थात् जब योगी प्राणायाम करता है तब प्रथम उस की देश द्वारा परीक्षा करता है कि इतना देश इंस का विषय है, (१) (१) अर्थात्-वातरहित देश में नासिका के अमभाग में प्रादशमान परिमाण पर तक(ई) को स्थापन कर याद्यवायु विषयका रेवक प्राणायाम की 'परीक्षा मारे कि इस नक पर्यन्त वायु पहुचता है कि नहीं जब तूल के डोकने से निश्चित हो जाय कि यहा सक बाझवायु का विषय स्थिर हो गया है तब एक बित्ता भर दूर पर तक रख कर परीक्षा करे, इस प्रकार जय द्वादश अहुक पर्यन्त रेचक स्थिर हो जाय तब जाने कि यह दीर्घ सूक्ष्म हुया, एय पिपीलिका सदृश स्पर्श से भान्तर विषयक परेक की परीकी करे, नाभिचक पर्यन्त नाने में यह पूका भी दीर्घ सूक्ष्म कहा जाता है । 7 .
२२६' पातजस्तनप्रकाश- मो फिर काल द्वारा परीक्षा करता है कि इतनी मात्रा (१) पर्यन्त यह स्थिर रहता है, जो फिर संख्या द्वारा उस की परी- ना करता है कि इतने श्वास प्रश्वास से यह प्रथम उद्घात (२) हुया घो इतने श्वास प्रश्वास से यह धितीय उद्घात हुवा पौ इतने श्वास प्रश्वास से यह तृतीय उट्यात हुया, एवं यह मन्द प्राणायाम हे यो या मध्य है यो यह तीद्र है, इस प्रकार देशकाल संख्या * द्वारा परीचित हुवा या अभ्यास द्वारा परिवर्डित हुया जो यह प्राणायाम वह टी सूक्ष्म कहा जाता है (३)। भाव यह है कि जैसे धुना हुवा तृन्तपुज्ज पसर कर दीर्घ यो सूक्ष्म हो जाता है तैसे देश कालादि वृद्धि से परिवर्तित हुवा प्राणायाम भी दीर्घ श्री सूक्ष्म हो जाता है ॥५०॥ (१) हाथ को जान के ऊपर मे चागे ओर फिरा कर एक युटयो बना देने में मितना काल लगता है उस का नाग माता है, तां दिनों दिन वृद्धि यो प्राप्त हुया जब ३६ मात्रापर्यन्त स्थिर हो जाता है तब यह जानना कि यह सूक्ष्म दृया । (२) ऊगमन को करता हुया प्राण जब असाग पाडा ना दया स्थिर हा माता है, यह उद्घात है, तहा द्वादशमात्रापर्य त प्राण का 1₹३९ गहना प्रथम उद्घात है, भो २४ मानापथ्यत स्थिर रहना द्विताय उद्घात है, गौ ३६ गावापर्य्य त स्थिर रहा तृतीय उद्घात है। एवं १२ मात्रा परिमित मृद, औ २४ माथा परिमित गम्य, गौ ३६ मामा परि मित तीन प्राणायाम जानना । (*)गाना के परिमाण से वृद्धि को प्राप्त हुया कालदष्ट है और श्वास प्रश्वास परिमाण वृद्धि को प्राप्त हुया सवपापरिदृष्ट है इतना भेद है। (३) नासिका के अग्र भाग में वाहिर १२ मङ्गुरूपर्य त गमनशील भी आन्तर नामि चबा वा पादतळपर्य्य त गमनशील नो ३६ मात्रापर्यam... यूक्षम है, यह तत्व है। * यह दीर्घ २२७ साधनपाद:२१ '. प्राणायाम के तीनं भेदं कथन कर इटानी चतुर्थ भेद का लक्षण करते हैं- सू"वाह्याऽऽयन्तरविपयाऽक्षपी चतुर्थः ॥५१॥ भाषा-(बाह्यविषय ) रेचक प्राणायाम, (प्राभ्यन्तरविषय) पूरका प्राणायाम, इन दोनों का (प्राक्षेपी ) याक्षप करनेवाला अर्थात्-इन दोनों की अपेक्षा से रहित जो केवल कुम्भक, वह (चतुर्थः) चौथा प्राणायाम है। अर्थात् कुम्भक दो प्रकार का है एक सहित यो एक कैवल, तंही (१) पूरक प्राणायाम से वा रेचक प्राणायाम से अनन्तर जो प्राणनिरोध होता है वह सहितकुम्भक है, औ रेचन पूरण से ' विना प्रथम एकवार ही निरोष करना यह केवलकुम्मक, है (२)। इन दोनों में से प्रथम कुम्भक वाद्याऽऽभ्यन्तरविषय रेचक पूरक की अपेक्षावाला है बो दितीय कुन्सका बाह्यविषय रेचक यो मन्तिरविषय पूरक की अपेक्षा न करने से इन दोनों का याक्षेपी (अनपेक्षी), वही चतुर्य प्राणायाम है। वडा याक्षेपी नाम विचारपूर्वक वर्तनेवाले का है, एवं च पूरक का जो नाप्सा के भयभाग से लेकर द्वादश. अंगुल पन्त वायविषय ओ रेचक का जो नाभिचक पर्यन्त आभ्यन्तरविषय, इन दोनों के विचार पूर्वक जो कुम्भक वह चतुर्ध प्राणायाम है, अर्थात् जो कुम्भक, पूरक रेतक संबंधी देश काल संख्या की परीक्षा नकार एकवार हो धारब्ध किया जाता है वह तृतीय कुम्भक है, . (१) "आरेच्याऽऽपूर्य वा कर्या । मह हितकुम्भवाः" इस स्मृति को अनुमरण कर सहित कुम्भक का लक्षण करते हैं । "तहां", दि से। (२) “श्चक परकं सता सुम्यं यद् वायुधारणं, प्राणायामोऽयमित्युक्तः स हि . केवलकम्भकः" यह बाशष्ट पचन इस में प्रमाण है ।
धादि क्लेश तथा अज्ञानजन्य पाप वह प्रकाशावरण है, ऐसे ही २२८ यह । पातञ्जलदर्शनकाशे- पो जो पूरक रेचक की ,ौ अपनी-भी परीक्षा द्वारा प्रारब्ध किया जाता है वह चतुर्थ कुम्भक है, सो वह कुम्भक होना कुछ सहज नहीं है. किन्तु अभ्यास द्वारा पूर्व पूर्व अवस्था. को संपादन कर क्रम, २ से लब्ध होता है क्योंकि जब तक पूर्व भूमि का विजय नहीं करेगा तब तक उत्तर भूमि की प्राप्ति होनी असम्भव है, अर्थ जानना ॥५१॥- इस प्राणायाम का अवान्तर न प्रयोजन कहते हैं- सू० ततः क्षीयते प्रकाशाऽऽवरणम् ॥५२॥ भाषा-(ततः ) प्राणायाम के अनुष्ठान मे, (प्रकाशाव- का पाकरण करने वाला (पाछा- टक) जो अंज्ञान वह (क्षीयते ) क्ष-को-ना है। बुद्धिनिष्ठ विवेकज्ञानरूप प्रकाश का बाच्छादक जा आवद्या पञ्चशिवाचार्य जी ने कहा है यया-"महामोहमयेनेन्द्रजालेन प्रकाशशीलं सत्त्वमावृत्यं तदेवाऽकार्ये नियुङ्क्ते” (१) इति । यह जो प्रकाशाऽऽवरणरूप संसार का कारणभूत अज्ञानजन्य पापरूप कर्म वह प्राणायाम के अभ्यास से प्रतिक्षण दुर्बल हो नाता है, ऐसे ही आगमज्ञाता पञ्चशिखाचार्य जी ने कहा है- यघा-" तपो न परंप्राणायामात् ततो विशुद्धिर्मलानां दीप्तिश्च रणम् ) प्रकाशस्वरूप विवेकज्ञान. । * प्राणायाम का मुख्य फल तो आप्रमसूत्र से चित्त को स्थिरता है, परन्तु स्थिरता का उपयोगो जो मलानवृत्ति रूप अवान्तर फल सो पारेके वाहते हैं। • (1) इद्रनाल के तुल्य जो महामोह सज्ञक राग तिस द्वारा प्रकाशशोक चित्त सत्त्व । पो आवृत्त(आच्छादित)कर यह अविद्याज प अधर्म ही पुरप को शकार्य हिमादि में प्रवत्त , भाराता है यह इम का अर्थ है।
सापनपादः ॥ ज्ञानस्य” (१), मनुभगवान्ने भी "प्राणायामैदहेदोषान्" (२) इत्यादि से प्राणायाम की प्रशंसा कियी है ॥ ५२ ॥ इदानीं प्राणायाम का मुख्य फल कहते हैं- सू० धारणासु च योग्यता मनसः ॥ ५३ ।। भाषा-प्राणायाम की अभ्यास से (मनसः धारणासु योग्यता) मन की वक्ष्यमाणधारणाविषयक योग्यता हो जाती है। अर्थात्-वह प्राणायाम मन को स्थिर कर धारणाविषयक सामर्थ्य वाला कर देता है। प्राणायाम को मन की स्थिरता का हेतुत्व पूर्व “प्रछर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य" (1) इस सूब में स्पष्ट इदानी क्रमप्राप्त प्रत्याहार का लक्षण कथन करते हैं--- सू. स्वविषयाऽसम्प्रयोगे चितस्य स्वरूपाऽनुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥ ५४॥ भाषा--(इन्द्रियाणां ) इन्द्रियों का (स्त्रविषयाऽसम्प्रयोगे) अपने २ विषयों के संगसन्निकर्ष के अभाव होने से जो (चित्तस्य स्वरूपाऽनुकार इव ) चित्त के रूपसदृश इन्द्रियों को अवस्थिति हो जानी, वह प्रत्याहार है। (१) प्राणायाम से घेष्ट अन्य कोई तप नहीं है क्योंकि इस प्राणायाम से ही रागादि मलों को विशुद्धि (निवत्ति) हो जाता है औ ज्ञान की दीप्ति (अभिव्यक्ति) होती है, यह इस का अर्थ है। (२) "प्राणायामर्द हद् दोषान् धारणाभिश्व किल्विषम्, प्रत्याहारेण ससर्गान ध्याने नानीश्वरान्गुणान्" यह समन मानर वचन है, प्राणायामद्वारा रागादि दोषों का दाह करे औ धारणाद्वारा किलप (पाप) का नाश करे, प्रत्याहारद्वारा इन्द्रियों या विषयों से समर्ग निवृत्त करे औ ध्यानद्वारा काम लोभादे अनीश्वर गुणों का नाश करे, यह इस ६ अन्यायगत ७२ सोका का मर्थ है। +९१ पृ. को देखो।
. पातञ्जलर्दशनकाशे- .', अर्थात्-प्राणायामद्वारा स्थिर हुये चित्त का जो विषयों के संग अमम्प्रयोग (सन्निकर्षाऽभाव) तिस से जो तदधीन इन्द्रियों का भी विषयों के संग संयोगाभाव, वह इन्द्रियों का चित्तस्व- रूपानुकार है,यो यही प्रत्याहार है। --- एवं च चित्तके निरुद्ध झेने से अपने से ही इन्द्रियों को स्थिर होने से कुछ उपायान्तर की इन्द्रियनिरोध के लिये अपेक्षा नहीं है यह बोधन किया। भाव यह है कि जैसे उत्यतनशील (उड़ते हुये) मधुकरराज को देख कर अन्यसव मधुमक्षिका उस के अनुसारी हुयीं उस के पीछे ही उड़ पड़तो हैं ओ मधुकरराज के बैठने पर वह सब बैठ जाती हैं, तैसें इन्द्रियों को भी चित्त के अधीन होने से वह, भी चित्त के विषयोन्मुख होने से विपयामत, औ निरुद्ध होने से निकहो जाते हैं, यह जो चित्त के निरोध से अन्य इन्द्रियों का स्वतः निरोध यही प्रत्याहार है ।। ५५ ॥ इदानी इस प्रत्याहार का फल कहते हैं- सू० ततः परमा वश्यतन्द्रियाणाम् ॥ ५५ ॥ भाषा--( ततः ) तिस प्रत्यार से (इन्द्रियाणाम् ) इन्द्रियों की (परमा) उत्कृष्ट (वश्यता) वशीकारता हो जाती है वश्यता नाम इन्द्रिवजय का है, तहां (१) शब्दादिविषयों विष- यक यासक्ति के अभाव का नाम इन्द्रियजय है,ौ कोई वह कहते है कि शास्त्राऽबिनविषयों का सेवन ओ निपिविषयों का (१) परमायश्यना का निरूपणार्थ पाहेले अन्य टक्त अपयस्यता कहत हैं (तहा) इत्यादि मे। (७) इन्द्रियों का सगार चित्त के मनुपारी होता है कुछ उन का वा नाश नही होता है इस यो बोधनार्य का है (अनुवार इव) हांग ।
राधनपाद:२१ परित्याग ही इन्द्रियजय है ओ कोई यह कहते हैं कि-अपनी इच्छा से (१)ही विषयों के संग इन्द्रियों का सम्प्रयोग होना इन्द्रियजय है। श्रोकोई यह कहते हैं कि रागदेषके प्रभावपूर्वक सुखदुःखशून्य शब्दादि का ज्ञान होना इन्द्रिय आय है। चित्त के एकाय होने से एक बार इन्द्रियों ती शब्दादिः विषयों में प्रवृत्ति का अभाव हो जाना ही इन्द्रियजयरूप वश्यता है वह जैगोपच्य योगी का मत है, प्रो वही सूत्रकारसम्मत पर- मा वश्यता है। एवं च चित्त के निरोध होने से जो इतर इन्द्रियों का प्रय- लान्तर की अपेक्षा से बिना ही निरोध हो जाना यही परमा व- श्यता है, यो यही प्रत्याहार का फल है यह निष्पन्न हुया। भाव यह है कि जैसे यतमान नामक वैराग्य के लाभ होने पर भी अन्यइन्द्रिय जय के लिये एकोन्द्रियसंज्ञक वैराग्य की द्वारा अपेक्षा होती है तैमे प्राणायाम चित्तनिरोध के होने से कुछ बाह्यइन्द्रियोंके निरोध के लिये अन्य यत्न की अपेक्षा नहीं है किन्तु स्वतः ही परमावश्यता हो जाती है ॥ ५५ ॥ दोहा-क्रियायोगपथं क्लेशकथ, कफलादि । वखान । योगअङ्ग वहिरङ्ग कथ, कियो पादअवसान ॥१॥ (१) अर्थात्-~-अपने विषयों के अधीन न होकर विषयों को अपने अधीन रवना। " आदि शब्द से परिणाम टु ग्यतादि ओ व्यूहों का प्रहण करना, तहाँ १ सूत्र से क्रिया योग औ २ सूत्र से क्रियायोग या फल औ ३ पूत्र से ९ सूनपर्यन्त लशों का रियरण कहा फिर दो सूत्र मे क्लेशों की निवृत्ति का उपाय कहा, फिर ३ सूत्र से '२१२ पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- इति श्रीमत्समहसपूज्यपादभीसत्मकाशशिष्य निखिलशास्त्रनिष्णातस्वामि पालराम उदासीनाभासिते पातञ्जलदर्शनप्रकाशे साधनपादो द्वितीयः । धर्गाऽधर्म यो क्लेशमूलक कह कर का का फल कहा, फिर एक सूत्र से विषय भोग को दु ख रूप कहा फिर २७ सूत्रान्त चार व्यूहों का निरूपण कर एक सून स विवेक रूपाति का उपाय कहा, औ फिर पाद समाप्ति पर्यन्त सा पान योग के बहिरङ्ग अङ्गों का निरूपण किया, इस पादमें साधन प्रतिपादन प्रधान है, अत यह साधनपाद है। इति श्रीयतिवर आत्मखरूप उदासीन समुद्दापितं पातञ्जलदर्शनप्रकाश टिप्पणम् ।
" उम् नमोऽन्तयामिणे । पातञ्जलदर्शनकाशे विभूतिपादस्तृतीयः ॥ ३ ॥ दो०-जिज्ञासु विश्वास हित(१), योग विभूती पाद । करत प्रकाश सुयोगिवर, उर धर हरिहर पाद ॥१॥ प्रथम औ द्वितीय पाद से यथाक्रम समाधि औ समाधि के साधनों का निरूपण किया, इदानीं समाधि के साधनों के अनुष्ठान में पुरुषों की विश्वासपूर्वक दृढ प्रवृत्ति के लिये तृतीय विभूतिपाद का आरम्भ किया जाता है तहां वक्ष्यमाण विभूतियों को संयम कर साध्य होने से सो०-उदासीन कविभूप, शिक्षा-विद्या-प्रद गुरू । चन्दत आतमरूप, पाद तृतीय विवर्ण हित ॥१॥ (१) विभूति नाग ऐश्वर्य का है अर्थात् योगयक से नो दूसरे के अभिप्राय को मान केना औ पशु पक्षी आदि निखिक भूतों की वाणी को समझ लेना, गो बैठे २ चन्द्रमा आदि को अगुील से सर्श कर लेना ओ जल की तरह पृथ्वी में गोता मार माना जो पृथ्वी की तरह जक पर चले जाना इत्यादि सामर्थ्य का नाम विभूति है सो इस पाद में इन ऐश्वगों का साधनसहित स्वरूप प्रतिपादन किया है इस से इस का नाम विभूतिपाद है। यद्यपि इस कैवल्यप्रतिपादक श स्त्र में इन विभूतियों के निरूपण का कुछ उपयोग गहीं है तथापि जन जिज्ञासु को यह निश्चय हो जायगा कि (जब स्थूल पार्थ विषयक समाधि करने से सो सो ऐश्वर्य अवश्य प्राप्त हो जाता है तो पुरुष विषयक । समाधि करने से पुरष का साक्षात्कार होना भी कुछ दुर्घट नहीं ) तय दृढविश्नास- - पूर्वक साधनों के अनुष्ठान में जिज्ञासु की अनायास से ही प्रवृत्ति हो जायगी, इस तात्पर्य से ही यह विभूतिपाद गारमा किया है कुछ मुक्ति का सहायक जान कर नहीं, सोई कहते हैं कि (मिज्ञासु विश्वास हित ) इति ।
पातञ्जरदर्शनप्रकाशे- औ संयम को धारणा-ध्यान-समाधि-इन तीनों का समुदाय. रूप होने से प्रथम विभूति के साधन भूत धारणादि त्रय का निरूपण करते हैं। यद्यपि धारणादि त्रय को योग का साधन होने से साध- नपाद में ही इन तीनों का निरूपण करना उचित था तथापि (यम आदि पंच वहिरकर साधनों से धारणादि तीन अंतरङ्ग साधन हैं) इस विशेष के वोधनार्थ साधनपाद में निरूपण न कर भिन्न प्रकरण में निरूपण किया है यह जानना । अतएव भाष्यकारों ने “उक्तानि पंच वहिरङ्गाणि साध- नानि धारणा वक्तव्या" इस वाक्य से यम आदि को वहि- रंग ओ धारणादि को अन्तरङ्ग कहा है । तहां धारणा भादि तीनों में से भी पूर्व २ को उत्तर २ का कारण होने से प्रथम धारणा का लक्षण कहते हैं- सू० देशवन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥ भापा-(चित्तस्य) चित्त का जो (देशवन्धः) किसी देशविशेष के संग संवन्ध, वह (धारणा) धारणानामक योग का अङ्क है। अर्थात्-नाभिचक्र, हृदयकमल, मस्तक में विद्यमान ज्योति, नासिका का अग्रभाग, जिह्वा का अग्र भाग, तालु, इत्यादिक माध्यात्मिक देशरूप विपयों में तथा हिरण्यगर्भ, इन्द्र आदिक वायविपयों में जो चित्त का वृत्तिद्वारा सबन्ध है वह धारणा कही जाती है। (१) - (1) पयपि सून मी माज्य में दयादिदेशों विषयक चित्त की स्थिति को ही धारणापा है तथापि हा देशसभागारों में ब्रह्म यो भावा कर तिस प्रविषयक . विभूतिपादः। भाव यह है कि-स्थूल वा सूक्ष्म वाह्य वा आभ्यन्तर किसी न किसी विषय में चित्त को बांध देना अर्थात् लगाये रहना यह धारणा है। विष्णुपुराण में भी "प्राणायामेन पवनं प्रत्याहारेण चेन्द्रि- यं, वशीकृत्य ततः कुर्य्याचित्तस्थानं शुभाश्रये" इस श्लोक से प्राणायाम औ प्रत्याहार से अनन्तर शुभ आश्रय (१) में चित्त की स्थिति का विधान कर फिर चतुर्भुज आदि विष्णुजी की मूर्तिविषयक चित्त की स्थिति को धारणा कहा है ॥१॥ इस प्रकार धारणा का लक्षण कथन कर अव धारणा कर साध्य ध्यान का लक्षण कहते हैं- सू० तत्र प्रत्ययकतानता ध्यानम् ॥२॥ भाषा-(तत्र) तिस पूर्वउक्त देश (विषय) में, जो (प्रत्य- पेकतानता) ध्येयाकार चित्तवृत्ति की एकाग्रता, वह (ध्यानम्) ध्यान कहा जाता है। अर्थात्-जिस विषय में धारणा से चित्तवृत्ति को लगाया है उसी विषय में जो विजातीयवृत्तिप्रवाह से रहित सजातीयवृत्ति का निरन्तरप्रवाह करदेना(२)वह ध्यान है॥२॥ चित्त की स्थिति पो धारणा जागना, अतएव "प्राणायामादशभिर्यावत्कालः कृतो भवेत, स तावत्कालपर्यन्त मनो ब्रह्मणि धारयेद्" इत्यादिगरुडपुराण को वाक्यों में ब्रह्मविषयक- चित्त की स्थिति को धारणा कहा है, ( बारह १२ प्राणायाग करने में जितना काक लगता है उतने काल पर्यन्त ब्रह्म में चित्त को धारण करे, यह इस का अर्थ है । (१) शुभाश्रय नाम शास्त्रोक्त श्रेष्ठ आश्रय का है अर्थात् जिस देव वा परमात्मा मोल्प में चित्त की अधिक रुचि हो उसी में चित्त को स्थिर करे । (२) मो ध्यान का विषय है अर्थात् जिस का ध्यान किया जाता है उस विषयक ही चित्त की वृत्ति का प्रवाह रहना गयविषयका नहीं यह विजातीय प्रत्यय से रहित रानातीयप्रत्ययप्रवाह है।
- पातञ्जलदर्शनकाशे- इदानी क्रमप्राप्त ध्यान साध्य समाधि का लक्षण कहतेहैं- सू० तदेवाऽर्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः॥३॥ (तद् एव) सो पूर्व उक ध्यान ही (समाधिः) समाधि कहा जाता है। कैसा ध्यान समाधि कहा जाता है, इस पर कहते हैं (अर्थमात्रनिर्भासम्) अर्थ मात्र अर्थात् ध्येयस्वरूप मात्र का ही निर्भासं निरन्तर भान होय जिस में, फिर केसा है कि (स्वरूपशून्यम्) अपने ध्यानाकार रूप सेशून्य= रहित होय। अर्थात्--पूर्वोक्त ध्यान ही जव अभ्यास के बल से अपने ध्यानाकारपन को त्याग कर केवल ध्येयस्वरूपमात्र से अव- स्थित हो प्रकाशित होय तब उसे समाधि जानना (१) । ध्यान औ समाधि में इतना भेद है कि ध्यान में ध्येय औ ध्यान का भेद भान होता है औ समाधि में ध्येय के स्वरूप में अनुगत हुआ ध्यान ध्येय से अभिन्न भान होता है, अर्थात् ध्यान में त्रिपुटी (२) का भान होता है. समाधि में केवल ध्येय का (३) । -- . (१) गर्थात् नेप्से जल में गेरा हुआ लवण मलाकार हो जाता है तो काय ध्येय विषयक ध्यान भी ध्येय सरूप हो जाय तब उसे समाधि जानना । (२) प्यान करनेवाला चित्त, ओ मिस चित्तवृत्ति से ध्येय का भान होता है, मी जो ध्यान का विषय है, यह तीनों ध्यातृ भ्यान ध्येय रूप पुट (आकार) है इन के समाहार-फटे होने का नाम त्रिपुटी है। (३) इतना विशेष यहां पर यह गौ मान लेना कि पांच घी पर्यन्त ध्येय- विषयया चिरा को वृत्ति को जगाये रखने का नाम धारणा है गो १० घडी एका तान से ध्येय का चिन्तन करना पाग पाहा जाता है, जो १३ दिन निरन्तर ध्यान को ध्येयाकार कर देना समाधि है, ऐसे ही स्कंदपुराण में लिखा है यथा-"धारणा पचगानीका पानं स्यात्वपिनाडियां दिनदादशयोनेत समाधिरगिधीयते" इति ।
विभूतिपादः। यद्यपि ध्यान में भी ध्येय का भान होता है तथापि ध्येय मात्र का नहीं इस के वोधन अर्थ सूत्र में (अर्थमात्र निर्भास) यह 'मात्र' पद दिया है, यदि समाधि में ध्यान स्वरूप से रहित ही है तो फिर ध्येय का प्रकाश कैसे होगा क्योंकि ध्यान के अधीन ही ध्येय का भान होता है स्वाभा- विक नहीं इस शंका के निवारण अर्थ (स्वरूप शून्यम् इव) यह इव पद दिया है। अर्थात् सर्वथा ध्यान का अभाव नहीं है किंतु ध्येय से भिन्न रूपता करके न भान होने से स्वरूपशून्य की तरह है न कि स्वरूपशून्य ॥३॥ इदानी लाघव के लिये धारणा ध्यान समाधि इन मीनों की तांत्रिकी (१) परिभाषा कहते हैं। सू० वयमेकर संयमः॥४॥ भाषा-(एकत्र) एक विषयविषयक जो (त्रयम्)धारणा ध्यान समाधि यह तीन, सो (संयमः) संयम कहा जाता है। अर्थात्-धारणा ध्यान समाधि इन तीनों के समुदाय को योगशास्त्र की परिभापा से संयम कहा जाता है, जिस (१) तंत्र नाग योगदान या है उन में होनेवाली का नाम तांत्रिकी है, मक्षेप पार्थ शान पो रिय को शास्त्रका या मत यह परिगापा कही माती है। अर्थात्-इम पाद में आगे यह कथन यारना है कि तीनो परिणामों में धारणा पाग समाधि करने से अतीत अनागत का ज्ञान होता है औ वाद अर्थ ज्ञान विषयका धारणादि से सर्वभूनों को पानी का ज्ञान होता है इत्यादि, मो यदि इन मंत्रों में मात्र ही धारणा पान समाधि यह सिडने तो गारस होना इम मे काया यो पिय इन तीनों में सपा पद पास पर दिया, एवंघ जहाँ ना ग संयम पद आरंगा तहाँ २ इन सोपानो नया।
२३८ । m पातञ्जलदर्शनकाशे- विषय में प्रथम धारणा कियी है उसी विषय में जो फिर ध्यान ओ समाधि होय तव संयम जानना औ जब अन्य विषयक धारणा होय औ अन्यविपयक ध्यान चा समाधि होय उस को संयम नहीं जानना इस के बोधन अर्थ सूत्र- कार ने (एकत्र) यह पद दिया है ॥ ३ ॥ अब इस संयम के अभ्यास का फल कहते हैं। सू० तज्जयात्प्रज्ञाऽऽलोकः ॥५॥ भाषा-(तद्जयात् ) तिस संयम के जय से (प्रज्ञा लोकः ) समाधि प्रज्ञा का आलोक होता है। अभ्यास के बल से संयम का दृढ परिपाक हो जाना संयभजय है, ओ अन्य विजातीय प्रत्ययों के अभाव पूर्व केवल ध्येय विषयक शुद्ध सात्विक प्रवाह रूप से बुद्धि का स्थिर होना प्रज्ञालोक है। अर्थात्-जैसे जैसे अभ्यास से संयम स्थिरपद-दृढ होता जायगा तेसे२ समाधि में होनेवाली बुद्धि भी निर्मल होती जायगी, एवंच समाधिप्रज्ञा के विमल करने के लिये जिज्ञासु संयम का अभ्यास करे यह फलित हुया ॥५॥ इदानी जिस विषय में संयम का विनियोग करने से पूर्वउक्त प्रज्ञालोक फल होता है सो विषय कहते हैं- सू० तस्य भूमिषु विनियोगः॥६॥ भाषा-( तस्य) तिस संयम का (भूमिपु) सवितर्क प्रादि योग की अवस्थानों में विनियोग। (१) करे अर्थात्-प्रथमपाद में उक्त जो स्थलविपयविषयक सवि- (१) विनियोग नाग सबध का है। - विभूतिपादः। २३९ तर्क-निर्वितर्क समापत्ति औं सूक्ष्मविषयविषयक सविचार- निर्विचारसमापत्तिनामक योग की भूमि के हैं उन में संयम करने से प्रज्ञालोक होता है। भाव यह है कि-प्रथम स्थूलभूतों विषयक संयम करे फिर जव स्थूलपदार्थविषयक सवितर्कसमाधि स्थिर हो जाय तव जो नहीं वशीभूत निर्वितर्कसमापत्ति है तिस में संयम करे फिर सविचार औ निर्विचार में, इसप्रकार जिस २ भूमि का जय हुवा है उस से अनन्तर २ भूमि में संयम करे अर्थात् जबतक (अधरभूमि) (१) सवितर्कनामक प्रथम योग की भूमिका संयमद्वारा वशीभूत न होय तब तक उत्तर भमि में संयम करने का उद्योग न करे, क्योंकि यह कभी भी संभव नहीं हो सकता कि प्रथमभूमि को न जय कर मध्य की भूमिका को उल्लंघन कर अन्त की भूमि में संयम का लाभ हो जाय, इस से कम से ही संयम करे, क्रम से न करने से उत्तरभूमि के लाभ के अभाव से प्रज्ञालोक होना दुर्घट है। पुराणों में भी प्रथम शंखचक्र आदि आयुधविशिष्ट पर- मात्मा का ध्यान विधान कर फिर उस की सिद्धि से अन- न्तर चक्रमादिआयुधरहित मूर्ति का ध्यान विधान कर फिर केयूरकिरीटादि के परित्याग द्वारा शरीरमान के ध्यान के विधानपूर्वक उत्तम मुखादि अवयव पर्यन्त उत्तर उचर सूक्ष्म (१) घरभूगि नाम प्रादा सगापत्ति का हे गो मध्यभूमि नाम ग्रहणसमापत्ति पाद यो प्रातभूमि नाम प्रहातममापचि या है, इदी को ही यथाक्रम से प्रथम गप्पम नचम भूमिका करते हैं, इन समापत्तियों का निरपण प्रथा पाद के १०१ पास कर ११२ तक किया गया है।
२१० पातञ्जलदर्शनकाशे- विषय में ध्यान विधान कर फिर सोहं इस भावना का विधान कह कर फिर इस को भी त्याग कर अहं अहं यह । अति सूक्ष्मभावना विधान कियी है (१) अतः क्रम से संयम करे यह निष्पन्न हुवा, परन्तु इतना विशेष यह भी जान लेना कि यदि पुण्यपरिपाक से वा महात्माओं की कृपा से वा भक्ति से संयम विना ही उत्तर भूमिका में चित्त की स्थिति का लाभ हो जाय तो पूर्व (पहिली) भूमिकाओं में संयम करने का कुछ प्रयोजन नहीं है क्योंकि पूर्व भूमि में संयम करने का फल जो उत्तर भूमि का लाभ था सो उस को ईश्वर की कृपा से प्राप्त है। यदि यह कहो कि यह हमें केसे ज्ञात होय कि यहाँ प्रथम भूमि है औ यह द्वितीय औ यह तृतीय है तो इस में योगशास्त्र ही प्रमाण जानना, ऐसे ही योगभाष्यकारों ने कहा है यथा-योगेन योगो ज्ञातव्यः योगो योगालावर्तते, योऽप्रमत्तस्तु योगेन सयोगे रमते चिरम्” इति, अर्थात् योग- वज से आप ही पूर्वी उत्तर भूमि का विवेक हो जाता है।६॥ आशंका-यम आदिक आठ योग के अंगों में से धार- णादि तीन में कौन विशेषता है कि जिस से अन्य पांचों को त्याग कर इन तीनों का ही समाधि में विनियोग कहा है। (१) विष्णुपुराण में प्रथम भूषणविशिष्ट चतुर्भमादि के ध्यान का विधान कर फिर, "ततः शमगदाचप्रमादिरहितं बुधः। चिन्तयेद् भगवद्पं प्रशान्तं साक्षसूत्रकं ॥१॥ पदा च धारणातस्मिन्नवस्थानवती ततः । किरटो यमुप्पणरहितं स्मरेत् ॥३॥ तदेवावयय देय सोहं चति पुनः ! कुर्यान् ततोगमितिप्रणिधानपरो भवेद" ।।३।। इत्यादि सोकों से यह सब निरूपण किया है। - , विभूतिपादः।। समाधान-यम आदिक जो पांच अंग हैं सो धारणा ध्यानद्वारा समाधि के साधन हैं कुछ साक्षात् नहीं, इस से वह बहिरंग हैं औ धारणादि तीनों साक्षात्। समाधि का साधन होने से अन्तरङ्ग हैं, यही सूत्रकार कहते हैं- -सू० त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७॥ भाषा-(पूर्वेभ्यः) धारणादि से पूर्वले जो पांच यम प्रादि अङ्ग हैं उनसे (त्रयम्) यह धारणार्दितीन अन्तरंग हैं। अर्थात्-साधनीय जो संप्रज्ञात समाधि है तिस का जो विषय है सोई धारणादि का विषय है इस से समान- विषय होने से धारणादि तीन सम्प्रज्ञात समाधि के अन्त- रङ्ग साधन हैं (१) औ यम आदिक समानविपय न होने से वहिरङ्ग हैं ॥ ७ ॥ यह जो धारणादि तीनों को अन्तरङ्ग साधनत्व कहा हे सो भी संप्रज्ञात समाधि के, ही सिद्ध करने में जानना (२) (१) यह सब द्वितीय टिप्पण में स्पष्ट है। (२) भाव यह है कि-अन्तरङ्ग दो प्रकार का होता है एक तो जिस साधन से अनन्ता अवश्य ही साध्य को सिद्धि हो जाय वह, भी एक वह कि नो विषय साध्य का होय उसी विषय विषयका होनेवाला, तहां प्रथम सन्तरा तो यहा पर सूत्रकार को शमि- गत नहीं क्योंकि इम ५४ सूत्र से ईसर प्रणिधान यो संप्रज्ञात का साधन पहा है जो माना है उस को पहिरण, क्योंकि धारणादि तीन ही सूत्रकार के गत में अन्तरङ्ग है इस से द्वितीय प्रकार या गन्तरण ही सूत्रकार को समाप्ट है 'यो यहा पर तो न संयम यो सानन्तर ही निर्णान समापि उदय होता है और संयम का विषय हो निन समाधि के विषय के समान है क्योंकि इस अवस्था में त्रिपुटी का अभाव होने से यह एक समाधि है, इसमे दोनों प्रकार की तरङ्गता का अगार होन से निर्धीज गघि का मुषा गत मापन नहीं है किन्तु परराग्य ही इम का मतरङ्ग ॥धन है।
से A पातजलदर्शनकाशे- कुछ निजि असंप्रज्ञात में नहीं क्योंकि वह समाधि इन तीनों के निरुद्ध होने से अनन्तर होती है, इसी आशय निर्वीज समाधि की अपेक्षा से संयम को बहिरंग कहते हैं- सू० तदपि बहिरङ्गं निर्वीजस्य ॥ ८॥ भाषा-(तदपि) सो यह पूर्वउक्त धाराणादि तीन अन्त- रङ्ग भी (निर्वीजस्य) असंप्रज्ञात समाधि के बहिरङ्ग साधन हैं। अर्थात्-परवैराग्यसे जब धारणादि तीनोंका भी निरोध हो जाता है तब असंप्रज्ञात समाधि उदय होता है इस से परवैराग्य ही असम्ञज्ञात का अन्तरङ्ग साधन है धारणा- दिवय नहीं यह फलित हुवा ॥८॥ आशङ्का-गुणों का स्वभाव चंचल है इस से प्रतिक्षण परिणामवाले गुण हैं यह पूर्व प्रतिपादन कर चुके हैं, एवं च निरोधसमाधि काल में जो चित्त है उस का भी प्रतिक्षण परिणाम अवश्य ही होता-होगा, क्योंकि विना परिणाम से 'क्षण भर भी चित्त का स्थिर होना असंभव है तथा च उस काल में कैसा चित्त का परिणाम होता है इस आशंका 0 का समाधान कहते हैं- सू० व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावो निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥ भापा--(व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोः) क्षिप्त-मूढ-विक्षिप्त भूमि नामक जो व्युत्थान श्री ज्ञानप्रसादनामक जो परवैराग्य- * ऐने २ स्थों में मापा जान कर परमवर्ण का नियम नहीं रखा गया हे सार- सादसे गुद्ध विभूतिपादः। रूप निरोध, इन दोनों के जो संस्कार इनों का ( अभिभव प्रादुर्भावी ] तिरो भाव औ आविर्भाव अर्थात् व्युत्थान संस्कारों का तिरस्कार औ निरोध संस्कारों का प्रादुर्भाव, यह जो (निरोधक्षणचित्तान्वयः) निरोधकाल में होने- वाला चित्त का दोनों संस्कारों में अन्वय (१) वह निरोध परिणाम कहा जाता है। अर्थात्-निरोधसमाधिकाल में व्युत्थानजन्य (२) सं- स्कारोंकी अतीतावस्था होती है औ परवैराग्य रूप निरोध के संस्कारों की वर्तमानावस्था होती है औ इन दोनों अवस्था- विशिष्ट संस्कारों का नाशयभूत जो धर्मी रूप चित्त है सो दोनों अवस्थाओं में अनुगत है तथाच प्रतिक्षण जो चित्त का संस्कारान्यथात्व अर्थात् व्युत्थान संस्कारों का हान श्री निरोध संस्कारों का आधान (निवास ) यही निरोधकाल में चित्त का परिणाम है। भाव यह है कि--क्षण २ में जो चित्त से व्युत्थानसंस्कारों का (निर्गम) निकसना औ निरोधसंस्कारों का प्रवेश होना यही असंप्रज्ञातकाल में चित्त का परिणाम है, एवं च व्युत्थान संस्कारों के नाश के अर्थ अभ्यास से निरोधसंस्कारों का" प्रादुर्भाव करे यह निष्पन्न हुआ। आशङ्का-कारण के नाश से कार्य का नाश सर्व संमत है इसी से ही अविद्या रूप कारण के नाश से तिस के कार्य रागादि आप ही निवृत्त हो जाते हैं एवं च जव व्युत्थान वृत्तिका निरोध हो गया तब उस वृत्ति से जन्य संस्कारों का (१) अन्वय नाम मंन्ध का है। (२) मगंप्रज्ञात साधि की अपेक्षा से संप्रइ त को भी यहां पर व्युत्थान जानना।
२४४ पातञ्जलदर्शनकाशे- निरोध भी स्वतः ही हो जायगा फिर व्युत्थान संस्कारों के नाशार्थ निरोधसंस्कारों की क्या आवश्यकता है। समाधान-कुछ यह नियम नहीं है कि कारणमात्र की निवृत्ति से ही कार्य की निवृत्ति हो जाती है किन्तु उपादान- कारण की निवृत्ति से कार्य की निवृत्ति होती है यह नियम है एवंच व्युत्थानसंस्कारों का उपादान कारण, भूत जो चित्त है उसको विद्यमान होने से व्युत्थानसंस्कारों की स्वतः निवृत्ति होनी असंभव है (१), ओ वृत्ति तो संस्कारों का निमित्त कारण है इस से वृत्ति के नाश से संस्कारों का नाश होना असंभव है, (२) औ अविद्या तो रागादि का उपादान कारण है इससे अविद्या के नाश से रागादि का नाश होना समीचीन है, इसी अभिप्राय से भाष्यकारों ने यहां यह कहा है कि (व्युथानसंस्काराश्चित्तधर्मा न ते प्रत्ययात्मका इति प्रत्ययनि- रोधेन निरुद्धाः)(३) इति,तथाच व्युस्थानसंस्कारों के अभावार्थ निरोधसंस्कारों की वृद्धि करे जिस से चित्त संस्कारशेष हो जाय । जिस प्रकार असंप्रज्ञात में चित्त संस्कार शेप मात्र होता है सो प्रकार प्रथम पाद में कह चुके हैं ॥६॥ ( १ ) इसी से ही बहुत काल से वृत्ति के नाश होने पर भी सस्कार द्वारा पदार्थ का स्मरण लोक में दृष्ट है। (२) कोक में भी कुकाल रूप निमित्त पारण के नाश से घट रूप कार्य का नाश नहीं होता है, नितु उपादान रूप कपाल नाश से हो घट नाश दृष्ट है, तैसे महा भी मानना । (३) व्युत्पान संस्कार चित्त या धर्म है अर्थात् चित्त इन का उपादान कारण है कुछ प्रत्ययात्मया नहीं अर्धात् वृत्ति इन का उपादान कारण नहीं इस से वृत्ति निरोध होने पर भी समारों या निरोध नहीं हो सकता क्योंकि उपादान कारण चित्त विद्य- गान है, पह भाष्य का अर्थ है।
२४५ विभूतिपादः। अब इस निरोध संस्कार का फलीभूत परिणाम कहते हैं- सू० तस्य प्रशान्तवाहिता संस्काराद् ॥१०॥ भाषा-(संस्कारात्) निरोधसंस्कार से (तस्य ) तिस चित्त की (प्रशान्तवाहिता) विमल निरोधसंस्कारधारा की परंपरा रूप स्थिति होती है । अर्थात्-निरोध संस्कारों के अभ्यास से चित्त की प्रशान्तवाहिता स्थिति हो जाती है, व्युत्थान (१) संस्कारमंस से रहित जो निरोध संस्कार की उत्तरोत्तर अविछिन्न परंपरा वह प्रशान्तवाहिता है, एवंच प्रशान्तवाहितारूप स्थिति के लिये निरोध संस्कारों का ऐसा अभ्यास करे जिस से निरोध संस्कार में ऐसी निपुणता आ जाय कि वह व्युत्थान सं- स्कारों का तिरस्कार कर दे, नहीं तो निरोध संस्कारों के मन्द होने से व्युत्थान संस्कार ही निरोध संस्कारों का तिर- स्कार कर देंगे ॥१०॥ इस प्रकार असंप्रज्ञातकाल में होने वाले निरोध परि- णाम का स्वरूप औ फल कथनकर इदानीं संप्रज्ञात में होने वाल समाधिपरिणाम को कथन करते हैं- सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधि- - सू० परिणामः ॥ ११॥ भाषा-(चित्तस्य) चित्त की (सर्वार्थता-एकाग्रतयोः) विक्षितता मी एकाग्रता का, जो (क्षय-उदयौ) नाश औ- प्रादुर्भाव होना, यह समाधि परिणाम कहा जाता है (१) प्रशा ताहिता का रक्षण वहते हैं- (युत्थान) इत्यादि से- 7 पातञ्जलपर्शन प्रकाशे- २४६ अर्थात्- क्षण में जो अनेक विषयों में चित्त का गमन वह सर्वार्थता रूप.चित्त धर्महै औ. एक ही किसी पालम्बन में निश्चल वृत्ति प्रवाह से चित्त का स्थिर होजाना एकाग्रता रूप चित्त धर्म है, इन दोनों धर्मों में से जो सर्वार्थता रूप चित्त के धर्म का क्षय (तिरोभाव) हो जाना औ एकाग्रता रूप चित्त के धर्म का उदय (आविर्भाव ) हो जाना यह समाधि परिणाम है, यहां पर भी पूर्ववत् विक्षितता-एकाग्रता रूप धर्मों का आविर्भाव तिरोभावं होता है औ चित्तरूप धर्मी दोनों कालों में,अनुगत रहता है यह जानना । निरोधपरिणाम से समाधि परिणाम में यह विशेष है कि निरोध परिणाम में व्युत्थान संस्कारों का अभिभवः औ निरोध संस्कारों का प्रादुर्भाव होता है औं समाधिपरि- णाम में संस्कार का जनक जो व्युत्थान तिस का क्षय श्री एकाग्रता स्वरूप धर्म का : (१) आविर्भाव होता है ॥ ११ ॥ इदानी इसी संप्रज्ञात की दृढ़ अवस्था कहते हुये एका- प्रतापरिणाम का लक्षण कहते हैं- सू० ततः पुनः शान्तोदितो तुल्यप्रत्ययो चित्त- स्यैकाग्रतापरिणामः ॥ १२॥ (ततः) विक्षिप्तता रूप धर्म के क्षय होने से, जो (शान्त. (१) गार यह है कि पहिले संग्रहात में व्युत्थान का क्षय भी एकाग्रता का उदय - फिया जाता है गो फिर संग्रहातगें निरोध संस्कारों के आवियसे व्युत्पान संस्कारों माना तिरोगाव किपा जाता है। AL विभूतिपादः। उदितौ) अतीत वर्तमान (तुल्यप्रत्ययों) प्रत्यय तुल्य हो जाने यह एकाग्रता परिणाम है (१)। अर्थात्-समाहित चित्त का जो पहिले प्रत्यय उदय हो कर शान्त हुवाथा फिर तिस के तुल्यही उत्तर प्रत्यय उत्पन्न होता है फुछ विलक्षण नहीं, ओ चित्तरूपधर्मी दोनों प्रत्ययों में अनुगत रहता है इस से इस में दोनों प्रत्यय तुल्य हैं। भाव यह है कि-संप्रज्ञात समाधि के प्रथम क्षण में व्युत्थान वृत्ति उत्पन्न हुई२ शान्त होती है ओ द्वितीय क्षण में एकाग्रता रूप वृत्ति उदय होती है इस प्रकार संप्रज्ञात में पूर्व औ उत्तर प्रत्यय विलक्षण है क्योंकि पूर्व प्रत्यय जो शान्त हुवा है सो तो विक्षेप रूप है और उत्तर प्रत्यय जो उदय हुवा है सो निरोधरूप हे यही चित्त का परिणाम पूर्व सूत्र में समाधिपरिणाम नाम से कहा गया है, और जब दृढ़अभ्यास के वल से विक्षेप का अत्यन्ताभाव होने से निरन्तर प्रतिक्षण निरोध रूप ही प्रत्यय उदय होता है तव प्रथम क्षण में उत्पन्न हुवा जो प्रत्यय सो भी निरोध रूप है औ द्वितीय क्षण में शान्त हुवा जो प्रत्यय सो भी निरोध रूप है और फिर तृतीय क्षण में जो उदय हुवासोभी निरोध रूप है इस प्रकार दोनों प्रत्यय तुल्य होते है विलक्षण नहीं, इसी का नाम एकाग्रतापरिणाम है । परन्तु यह एकाग्रता- परिणाम भी तावत्कालही रहता है कि यावत्काल समाधि में योगी स्थित होता है ओ जव समाधि से योगी का उत्थान होता है तब विक्षेप प्रत्यय का भी उदय हो जाता है । (कअर्थात् समाधि पात्र में सर्वदा एकाग्रता का प्रवाह हो जाना ही एकाग्रता परिणाम है।
२१८ - - । -- W पातजलदर्शनप्रकाशे- । एवंच उत्थानकाल के विक्षेपकी निवृत्ति के लिये असं- प्रज्ञात का योगी अनुष्ठान करे कुछ संप्रज्ञात की प्राप्ति से ही । अपने को कृतकृत्य मत माने यह निष्पन्न हुवा ॥ १२ ॥ जिस प्रकार चित्त परिणामी हे इस प्रकार अन्य वस्तु भी परिणामी हैं इस के वोधनार्थ भूतादिकों में भी तीन प्रकार का परिणाम सूचन करते हैं- सू० एतेन भूतेन्द्रियेषुधर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः॥१३॥ भापा-(एतेन) इस पूर्व उक्त चित्त के परिणाम कथन करने से ( भूतेन्द्रियेषु ) भूत औ इन्द्रियों में भी (धर्मल- क्षणाऽवस्थापरिणामा) धर्मपरिणाम लक्षणपरिणाम अवस्था परिणाम ( व्याख्याताः ) व्याख्यान किये गये अर्थात् चित्त के तनि परिणामों के कथन से भूतादिकों के भी तीन परि- णाम अर्थ से कहे गये जान लेने। यद्यपि सूत्रकार ने साक्षात् शब्दउच्चारण द्वारा यह तीन परिणाम निरूपण नहीं किये है तथापि निरोधपरिणाम कथन से यह सूचित किये हैं। (१) तहां धर्मी के विद्यमान होते ही पूर्व धर्म के तिरो- भावपूर्वक जो अन्य धर्म का प्रादुर्भाव वह धर्म परिणाम है, जैसे कि चित्त रूप धर्मी के रहते ही पूर्व व्युत्थानसंस्कार रूप धर्म के तिरोभाव पूर्वक अन्य निरोधसंस्कार रूप धर्म (१) जिस प्रकार से (मुचित) मताये गये हैं सोई प्रभार सष्ट पर के दिखाते । है (तहा) इत्यादि से।
२११ " विभूतिपादः। का प्रादुर्भाव हो जाना रूप निरोध परिणाम है, (१) विद्य- मान धर्मों को अनागतादिकाल के त्यागपूर्वक वर्तमानादि काल का लाभ होना लक्षणा परिणाम है, तहां जो वस्तु नष्ट हो गयी है उस को अतीत लक्षण वाली कहते हैं औ जो वर्तमान है उस को वर्तमान लक्षण वाली कहते हैं, औ जो आगे को होनेवाली है उसको अनागत लक्षणवाली कहते हैं। तथा च-जिस समय पुरुष समाधिस्थ होता है उस काल में व्युत्थान अपने वर्तमान लक्षण को परित्यग कर अतीत लक्षण को प्राप्त होता है औ निरोध अनागत लक्षण को त्याग कर वर्तमान लक्षण को प्राप्त होता है एवं फिर जो व्युत्थान होगा तो वह अनागत लक्षण को त्याग कर वर्तमान लक्षण को प्राप्त होगा, यह जो धर्मों का लक्षण भेद सोई धर्मों में लक्षणपरिणाम है। अर्थात्-व्युत्थान की वर्तमानतादशा में निरोध की जो अनागतता दशा सोई निरोध का सूक्ष्म लक्षणपरिणाम औ व्युत्थान की भतीत दिशा में जो निरोध की वर्तमानतादशा सोई निरोध का वर्तमान लक्षण परिणाम जानना । एवं निरोध की वर्तमानतादशा में जो निरोध संस्कारों की प्रबलता ओ व्युत्थान संस्कारों की दुर्बलता सो अवस्था- पणिाम जानना। तथा च (२) प्रथम जो चित्तरूपधर्मी के रहते व्युत्थान का तिरोभाव भो निरोध का प्राविर्भाव वह धर्मपरिणाम (१) धर्म परिणाम परमार अब एक्षण परिणाम पाहते हैं (विद्यमान) इत्यादि मे। (२) गवतानो परिगागों का एक संकलन कार उपहार करते हैं, 'तपात्र' - . २५० पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- हुवा, औ निरोधरूपधर्म में जो अनागतलक्षण का तिरोभाव औ वर्तमानलक्षण का प्रादुर्भाव यह निरोधरूपंधर्म का लक्षणपरिणाम हुआ, निरोध के वर्तमानलक्षण की जो वल- वत्ता सो लक्षण का अवस्थापरिणाम हुआ, इसप्रकार धर्मी का धर्मपरिणाम धर्मों का लक्षण परिणाम औ लक्षणों का अवस्थापरिणाम जानं लेना। ::: (१) भाव यह है कि जिस हेतु से गुणों का स्वभाव चंचल है इस हेतु से गुणों का प्रचार क्षणभर. भी एकरस नहीं रह सकता इसीसें ही सर्ववस्तु को त्रिगुणात्मक होने से वस्तुमात्र परिणामी हैं क्योंकि इन तीनों परिणामों से शून्य कोई वस्तु भी क्षणमात्र स्थिर नहीं रहसकता, एवं च जैसे चित्त में तीन प्रकार के परिणाम हैं: इसी प्रकार से भूत औ इन्द्रियों में भी धर्मधर्मीभाव से तीनों परिणाम जान लेने .तहां पृथ्वीरूप धर्मी का जो घटरूप विकार वह धर्म परिणाम है क्योंकि पिंडाकार धर्म के तिरोभावपूर्वक कंवुग्रीव- आदिआकार का यहां प्रादुर्भाव है, औ (२). घट का जो अना गंतलक्षण के त्यागपूर्वक वर्तमानलक्षणाला हो जाना वह घटरूपधर्म का लक्षणेपरिणाम है जो वर्तमानलक्षणवाले घट का जो नयापन औ क्षण २ में पुराणापन यह अवस्था परिणाम है। (१) दृष्टान्तरूप नित्त में तीनों परिणामों का कथन यार इदानी, दाटत रूप भूतादियों में तीनों परिगाणों के कथन का आरम्भ करते हैं, (भावयह है) इस्पादि से। (२) धर्मपरिणाम पाहकर धर्म में होगेयाला गो लक्षण परिणाम है सो कहते हैं । (ोपट पा) पादि में : विभूतिपादः। , एवं इन्द्रियों का जो नीलादिविषयों का आलोचन (१) यह इन्द्रियों का धर्मपरिणाम औ नीलादिज्ञान:का,जो वर्त- मान लक्षणवाला होजाना यह लक्षणपरिणाम, औ वर्तमा- नतादशा में जो स्फुटत्व अस्फुटत्व सो अबस्थापरिणाम: जानना, एवं अन्यत्र भी जान लेना-!-- सो यह जो तीनप्रकार के परिणाम कहे हैं सो धर्मी से धर्मादिकों की भेदविवक्षासे कहे हैं परमार्थ से तो(२) केवलध- मपरिणाम ही मुख्य है क्योंकि धर्मको धर्मिस्वरूपमात्र होने से धर्मों का विकार ही धर्म-लक्षण:अवस्था परिणामशब्द से. व्यवहृत होता है कुछ धर्मादि-का-विकार नहीं, एवंच.धर्मा- दिद्वारा यह-सव धर्मी के, विकार का ही प्रपञ्च (विस्तार), जानना तैसे. यहां इतना विशेष यह भी जान लेना कि मृत्तिकारूप धर्मी में अनागतअवस्था से वर्तमान जो घटरूपधर्म है उसी का अंतीत अनागत. वर्तमानकाल में अन्यथात्वं होता है कुछ मृत्तिकारूप धर्मी का नहीं, जैसे सुवर्ण के -भाजन (पात्र) को गलाकर अन्यथा करने से केवल कुंडल कटकादि आकार औ यह कुंडल औ यह कटक है इत्यादि व्यवहार का ही भेद होता है कुछ सुवर्ण असुवर्ण. (३) नहीं होजाता। यहां पर वौद्धजन यह शंका करते हैं कि “ यदि धर्मी (१) भालोचननाम ज्ञान का है। (२) साझुपयोगमत में सत्कार्यबाद सोपरिणामवाद होने से धर्म की गो का पास्तव से भेद नहीं माना जाता है। (३) गमुवर्ण-सुवर्ण मे भिन्न रमत आदि ।
२५२
पातञ्जलदर्शनकाशे-
का सर्वकाल औ सर्वअवस्था में धर्मों में अन्वय है तो
मृत्तिकादि धर्मी को सदा विद्यमान होने से चेतन के तुल्य
कूटस्थनित्यता आ जावैगी सो नित्यता आप को संमत
नहीं है क्योंकि आप के मत में चितिशक्तिरूप पुरुप से
बिना अन्य कोई कूटस्थ नित्य है नहीं" इस का परिहार
भाष्यकारो ने यह किया है कि-हम चेतन की तरह मृत्तिकादि
को.एकान्त नित्य नहीं मानते हैं किन्तु न अत्यन्तनित्य
है.नौ न अत्यन्तअनित्य है अपितु कथंचित् नित्य है औ कथं:
चित् अनित्य है, इसप्रकार मानते हैं।
भाव यह है कि-यावत् कार्यमात्र है सो सव अपनी-
व्यक्ति से अपायको प्राप्त होता है (१) अर्थात् अपनी वर्त:
मानावस्था को त्याग कर अतीतरूपता को प्राप्त होता है
इसी से ही अत्यन्तनित्यता का कार्यमान में अभाव है,औं
यह भी मत जानना कि फूट जाने से अनन्तर घट का
अत्यन्तअभाव हो जाता है किन्तु अतीतावस्थापन्न भी
घट मृत्तिका में विद्यमानही रहता है क्योंकि अत्यन्त अनि
त्यता के अभाव से कार्य का अत्यन्त उच्छेद हमारे मत
में प्रमाणविरुद्ध है, परन्तु इतना विशेष है कि वर्तमानावस्था-
पन्न घट की उपलब्धि (२) होती है भो अतीतावस्थापन्नघट
स्वकारण में लीन होने से सूक्ष्मता को प्राप्त हुआ दर्शन के
अयोग्य हुआ उपलब्ध (३) नहीं होता है।
औ इतना विशेष यह भी जान लेना किं घटरूप जो धर्म
(१) नेते कि उत्पन्न हुये घट का फिर फूट नाना ।
(२) नेवादि यो विषयता रूप नप्ति ।
(३) प्रत्यक्षज्ञान का विषय नहीं होसकता।
विभूतिपादः।।
है सो भूत-भविष्यत-वर्तमान इन तीनों कालों में ही मृत्तिका
रूप धर्मी में विद्यमान रहता है, जिस काल में घट फूटने से
अतीतावस्था को प्राप्त होता है उस समय भी. वह सूक्ष्म
अनागत औ वर्तमान अवस्था से संयुक्त ही है कुछ वियुक्त
नहीं, एवं अनागतावस्था वाला जो घट है सो भी वर्तमान
श्रो अनागत अवस्था से संयुक्त है, एवं वर्तमानावस्थावाला
जो घट है सो भी अतीत औ अनागत लक्षण से संयुक्त है।
अर्थात्-जैसे कोई पुरुष एक स्त्री में रागवाला है इस
से अन्य स्त्रियों में विरक्त है यह नहीं माना जाता है
किन्तु जिस स्त्री में राग है तहां राग वर्तमान अवस्था वाला
है औ अन्य स्त्रियों में राग अतीतावस्था वाला होता
है यह माना जाता है (१) तैसे जिस काल में घट वर्तमाना-
वस्थावाला होता है तिस काल में अन्य अवस्था का अभाव नहीं
जानना किन्तु वह भी सामान्यरूप से उस समय अनुगत हैं।
यहां पर कोई यह दोप देते हैं कि " परस्पर विरुद्ध
तीनों अवस्थाओं का एक काल में एक वस्तु में अनुगत
होना असंभव है औ यदि अनुगत होना माना जाय तो
जिस काल में घटो वर्तमानः (२) यह व्यवहार होता है उस
काल में घटोऽतीत(३) इत्यादि व्यवहार भी होना चाहिये,
इस आशंका का परिहार यह है कि क्रोध से उत्तरकाल में
भी चित्त रागधर्म वाला प्रतीत होता है यदि वर्तमान में
(१) यह सब द्वितीय, पाद के 2 चतुर्म मूत्र के व्याख्यान में स्पष्ट है।
(२) यह घट यर्तगानावस्थानाना है।
(३) घट भतीतावस्थायाला है, भादि पद से घट अनागतावस्थावाला है यह
भी मान लेगा।
.
४
पातञ्जलदर्शनप्रकाशे-
ही जो धर्म उसी को धर्मत्व मानोगे तो उत्तरकाल में चित्त
को रागधर्मवाला न होना चाहिये क्योंकि अविद्यमान वस्तु
की उत्पत्ति नरशृंगवत् असंभव है, (१) इस से क्रोधकाल
में भी राग अनागतावस्था से विद्यमान है, यह अवश्य सिद्ध
हुवा तैसे यहां भी जान लेना (२) ।
अर्थात्-विशेष के संग विशेप का विरोध होता है
सामान्य के संग नहीं यह पीछे कह चुके हैं इस से परस्पर
विरोध से भी तीनों अवस्था का एककाल में असंभव नहीं
होसकता औ. यहा वर्तमान है औ यह अतीत है औ यह
अनागत है यह व्यवहारतो विशेष को लेकर होता है इस से
व्यवहार संकर-भी नहीं होता है (३)।
यह जो पूर्व लक्षणपरिणाम कथन किया है सो घट
आदिरूप धर्म का ही हे कुछ भृत्तिकारूप धर्मी का नहीं
क्योंकि घटरूप धर्म ही तिसर अवस्था को प्राप्त हुए अन्य
अवस्थावाले.से.भिन्नरूपता कर कहे जाते हैं कुछ मृत्तिका-
रूप धर्मी से भिन्नरूपता कर नहीं, क्योंकि मृत्तिका रूपधर्मी-
सर्वअवस्था में अनुगत है।
अर्थात् जैसे एक ही रेखाविशेषतिस तिस स्थान के
भेद से अर्थात् शत के स्थान में शत, दश के स्थान में दश,
ओ
एक के स्थान में एक इत्यादि भेद से भेदवाली हो जाती
है औ वास्तव से एकही है जैसे वा एक ही स्त्री संवन्धियों
(१) इसी से ही इस मत में सकायवाद माना जाता है
(१) यह सब १७२ पृष्ठ पर सट ह, उसी को फिर सष्ट करते हैं (अर्थात्---
इत्यादि से।
(३) अर्थात् एका काम में तीनों व्याहार नहीं हो सकते है।
- विभूतिपादः। के भेट से (१) माता, भगिनी पुत्री इत्यादि भेदवाली हो जाती है तैसे धर्मी एक ही है परन्तु तिस तिस अवस्था के भेद से भिन्नरूपताकर प्रतीत होता है कुछ वास्तव से नहीं। यहां पर कोई यह आक्षेप करते है कि यदि धर्मी सर्वदा विद्यमान रहता है तो वह भी चेतन की तरह कूटस्थनित्य हो जायगा। अर्थात्-आप का यह सिद्धान्त है कि जिस काल में जलाहरणादि (२) कार्य को न करता हुवा घट मृत्पिण्ड में विद्यमान है उस काल में वह घट अनागत कहा जाता है औ जिस काल में जलाहरणादि कार्य को करता हुआ विद्यमान है उस काल में वह घट वर्तमान कहा जाता है औ जिसकाल में जलबाहरण आदि कार्य को संपादन कर उस कार्य से निवृत्त होकर कारण में सूक्ष्मरूप से विद्यमान रहता है उसकाल में वह घट अतीत कहा जाता है, एवं च आपके मत में सर्वदा ही घटरूप धर्म को विद्यमान होने से पुरुप की तरह घटादि भी कूटस्थ नित्य होने चाहिये। इस का परिहार यह है कि सर्वदा विद्यमान होना ही कूटस्थनित्यत्व नहीं किन्तु अपरिणाम हो कर सर्वदा एकरस रहने का नाम कूटस्थ नित्यता है सो यह नित्यता महत्तत्व आदि यावत् कार्य में बाधित है क्योंकि इनको सर्वदा विद्य- मान होने पर भी तिस तिस रूप से आविर्भाव तिरोभाव होने से यह सब परिणामी है अर्थात् गुणी प्रधान यद्यपि (१) या धयों के भेद सेगुन भाता पिता यादि को गेद से । (२)जमना दक्ष में प्रोश पर! F
पातञ्जलदर्शनपकाशे-
नित्य है तथापि गुणों की विमर्द विचित्रता (१)से वह एकरस
नहीं है किन्तु परिणामी है, अतः कूटस्थ नित्य नहीं ।
भाव यह है कि जैसे आविर्भावतिरोभाव वाले पृथ्वी
आदि पंच भूत्तों को शब्द आदि पंचतन्मात्राका कार्य होने से
पृनी आदि की अपेक्षा से शब्दादि को अतिरोभावी (२)
कहा जाता है तैसे आविर्भावतिरोभावशील महत्तत्व को
प्रधान का कार्य होने से महत्तत्व की अपेक्षा से प्रधान को
अतिरोभावी जान लेना, इस प्रकार सर्वत्र ही कार्य की
अपेक्षा से कारण अतिरोभावी ओ सर्वदा विद्यमान कहा
जाता है कुछ कूटस्थनित्यता को ले कर नहीं, जैसे (३) कि
मृत्तिकारूप धर्मी का पहले पिण्डाकार धर्म होता है फिर
घटाकार धर्म होता है परन्तु मृत्तिका सर्वदा अनुगत
रहती है इस से उस को धर्मी कहा जाता है तैसे घट भी
अनागत लक्षण को परित्याग कर वर्तमान लक्षण को प्राप्त
होने से लक्षणपरिणामधर्मवाला होने से धर्मी है इस प्रकार
अपने २ धर्म की अपेक्षा से सवी धर्मी जान लेने ।
यद्यपि सूत्रकार ने तीन परिणाम कहे हैं तथापि यह
सव परिणाम धर्मी के स्वरूप में ही अनुगत है इस से यह
सव धर्म परिणाम ही जानने ।
यद्वा इन सव परिणामों को धर्मी की अवस्था होने से धर्मी
के ही यह अवस्थापरिणाम जानने अर्थात वास्तव से यह
सब धर्मी के ही धर्मपरिणाम वा अवस्थापरिणाम कहे हैं औ
(१) गुणों का यूनाधिक्य ( का जियाद ) हो नाना गिर्द याहा जाता है।
(२) नाश से रहित ।
(३) गर धर्म धाममा गापेक्षिका कहन है ( मेमे ) इत्यादि से ।
- विभूतिपाद: अवान्तरभेद को लेकर : सूत्रकार ने तीन परिमाण कहे हैं, यही भाष्यकारों का सिद्धान्त हैं । परिणाम का लक्षण इस सूत्र के व्याख्यान के प्रारम्भ में कह चुके हैं। इससे फिर कहने की कुछ आवश्यकता नहीं ॥१३॥ इदानीं जिस धर्मी के यह तीन प्रकार के परिणाम कहे है उस धर्मी का लक्षणः कथन करते हैं: तत्र-(१) सूशान्तोदिताऽव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥१४॥ भोपा-(शान्त) अतीत, (उदित) वर्तमान, (अव्यपदेश्य) भविष्यत् जो धर्म, इन में जो (अनुपाती ) अनुगत होने वाला होवे वह धर्मी कहा जाता है। अर्थात्-भूतवर्तमानभविष्यत् जो घटादि धर्म है तिन में जो सर्वदा अनुगत मृत्तिकारूप कारण वह धर्मी है । मृत्तिकादि (२) द्रव्य में रहनेवाली जो पिंड घट आदि की उत्पत्ति की योग्यतारूप शक्ति वह धर्म है. श्री मृत्तिका यद्यपि घटोत्पत्ति की योन्यतारूप शक्ति का मृत्तिका में प्रत्यक्ष से अनुभव नहीं होता है तथापि कार्य की उत्पत्ति में जो यह नियम देखने में आता है कि मृत्तिका से ही घट का होना औ बालू से न होना एवं तंतु से ही पट का होना (1) तल' इस पद का गाध्यकारों ने अध्याहार किया है, यो योई इस पद को सूत्र यो गन्तर्गत मानते हैं, तिन धर्म मोमियों के गप्प में, अथवा परिणाम भी परिणामियों के बीच में से यह इस पद का अर्थ है। (२) पिना धर्म के ज्ञान से घमाँ का ज्ञान होना असंभव है इस से पहिले ध. का स्वरूप पाहते हैं ( मृत्तिकादि) इत्यादि मे- . .
२५८ पातखलदर्शनकाशे- औ मृत्तिका से न होना यह नियम ही अनुमान द्वारा यह बोधन कराता है कि मृत्तिका में घट की उत्पत्ति की योग्यता- रूप शक्ति है वालू में नहीं, एवं च घट का होना ही मृत्तिका में घट की उत्पत्ति करने की योग्यतारूप शक्ति में प्रमाण जानना,सो यह जो योग्यतारूप धर्म है वह अनेक प्रकार का है कुछ एक नहीं, इसी से ही एक मृत्तिका के-चूर्ण-पिंड-घट- रूप अनेक परिणाम देखने में आते हैं। तहां (१) मृत्तिकारूप धर्मी से पहिले चूर्णरूप विकार होता है फिर पिण्डरूप औ फिर.घटरूप होता है तहां जिस काल में चूर्ण से पिंड बनाया जाता हे तिस काल में वर्त- मानदशा को प्राप्त हुआ वह पिंड अतीतावस्थावाले चूर्ण से औ अनागतावस्थावाले घट से भिन्न कहा जाता है कुछ मृत्तिका से भिन्न नहीं क्योंकि मृत्तिका सर्व में अनुगत है औ जव वह पिंड भी अव्यक्तरूप से मृत्तिकारुप था तब उस का किसी से भेद नहीं होता है क्योंकि मृत्तिकारूप धर्मी सर्व में अनुगत है, तथाच-चूर्ण-पिंड-घटरूप धाँ के भिन्न होने पर भी जो सर्व में अभिन्नरूप से अनुगत मृत्तिका वह धर्मी हुई। तिस इस मृत्तिकारूप धर्मी के शान्त, उदित, अव्यपदेश्य, यह तीन प्रकार के धर्म हैं, तहां जो अपना कार्य कर के उप- राम हो गये हैं सो शान्त (२) कहे जाते हैं, जो जोधर्म अपना कार्य कर रहे हैं सो वर्तमान कहे जाते हैं, इतना विशेष यहां पर यह भी है कि अनागत से अनन्तर वर्तमान होता (1) इनवाने या प्रकार के परिणामों यो स्पष्ट करते हैं " तहाँ " इत्यादि से । (२) l-अपने कारण में लीन हुये । .
Pho . -- विभूतिपादः। है औ वर्तमान से अनन्तर अतीत होता है नौ अतीत से अनन्तर फिर वर्तमान नहीं होता है क्योंकि अनागत भी वर्तमान काही पूर्व पश्चात् होना देखने में आता है अतीत मो वर्तमान का नहीं, एवं जो कारण में सूक्ष्मरूप से अवस्थित वह अव्यपदेश्य हैं, इन्ही को अनागत कहते हैं। अर्थात्-सर्ववस्तुओं में जो सर्वविकारजनन की योग्य- तारूप शक्तियां सोई सूक्ष्मरूप से वस्तु में विद्यमानहूई अव्य- पदेश्य पद कर के वाच्य हैं। ऐसे ही पूर्वले प्राचार्यों ने कहा है "जलभूम्योः पारि- णामिक रसादिवेश्वरूप्यं स्थावरेषु दृष्टं, तथा स्थावराणां जं. गमेपु जङ्गमानां स्थावरे" इति (१)। अर्थात्-बनस्पति लता गुल्मादिकों के फल फूल मूल पल्लव में जो रस गन्धादि का वैचित्रय देखने में आता है सो जल औ भूमिका ही परिणाम है नहीं तो फलादिकों में विलक्षण रस आदि का होना वांधित हो जायगा क्योंकि असत् का शाविर्भाव होना प्रमाण से विरुद्ध है, एवं च जल और भूमि में सूक्ष्मरूप से विद्यमान जो फलादिकों में रस आदिविकारजननशक्तिरूपयोग्यता सोई अव्यपदेश्यपद का वाच्य हे यह सिद्ध हुवा, इसी प्रकार स्थावरों का परिणाम जगमों में श्री जगमों का परिणाम स्थावरों में देखने में याता है, तहां सेव, अंगूर, नारंगी आदि के भक्षण से पुरुषों में विलक्षणरूपादि संपत्ति का हो जाना जगमों में स्थावरों (1) स्थानर शादियों में जलभूमि के परिणाम गिमित्तक हो रसादिकों की विधिता र है, इसी प्रकार स्थायरों को नष्प्लमों में भी जगमों को स्थावरों में विचित्रता घर है, यह शारार्प है, इस को स्पष्ट करते हैं, (नर्धात्) इत्यादि में- - पातजलदर्शनकाशे- का परिणाम है, औ पुरुष के रुधिर सेचन से दाडिम फल, (अनार) का तालफल सदृश हो जाना स्थावरों में जगमों का परिणाम है, इस प्रकार सर्व वस्तुओं में सर्वविकार जनन की शक्तिरूप योग्यता जान लेनी, यद्यपि सर्व को सर्वशक्ति- वाला होने से सर्व वस्तुओं से सर्वदा ही सर्वदेश में सर्व की, उत्पत्ति होनी चाहिये तथापि देश, काल, आकार, निमित्त, आदि सहकारी कारणों के अभाव से सर्वत्र सर्व से सर्व का संभव नहीं हो सकता। भावार्थ-यद्यपि पृथ्विी में केशर जनन की शक्ति है तथापि कश्मीरादिदेश उस का सहकारी है इस से अन्य देश में केशर की अभिव्यक्ति नहीं होती। एवं आम्रवृक्ष में (१) जो फलजनन की शक्ति है उस का काल सहकारी है इस से हेमन्तकाल में पाम्रों की अभिव्य क्ति नहीं होती, इसी प्रकार भृगी में सनुप्यरूप आकार का आविर्भाव न होने से मृगी मनुष्य को नहीं उत्पन्न करती औ पुण्यरूपनिमित्त के आविर्भाव न होने से पानी सुख- नहीं भोग सकता। एवं च सर्ववस्तुओं में सूक्ष्मरूप से स्थित जो वस्तु वह अव्यपदेश्यपद का वाच्य है यह सिद्ध हुआ। इन शान्त, उदित, अव्यपदेश्य रूप धर्मों में जो अनुगत मृत्तिकादि सो धर्मी कहा जाता है, जो वोद्ध लोक धर्मधर्मभाव को न मान कर केवल क्षणिकविज्ञान मात्र को ही पटार्थ मानते है उन का (1) मप्रकार दश यो सहमारी कह कर अब या दो सहसा दिग्वाते हैं, ( एप अग) इसादि, इमाप्रशार आगे के दो उदाहरणों में यथाक्रम आकार भी निमित गा माना।
विभूतिपादः। मत पूर्व (+) निराकरण कर चुके हैं इस से फिर यहां कहने की आवश्यकता नहीं है ॥ १४ ॥ इस प्रकार धर्मी का प्रतिपादन कर इदानीं एक धर्मी के अनेकपरिणाम होने में कारण कहते हैं- सू० क्रमाऽन्यत्वं परिणामाऽन्यत्वे हेतुः ॥१५॥ भाषा-(परिणामाऽन्यत्वे) परिणामों के भेद में (कमा- ऽन्यत्वं) क्रमों का भेद (हेतुः) कारण है, अर्थात्-पहिले मृत्तिका का चूर्णरूप से परिणाम होता हे फिर पिंडरूप से औ फिर घटरूप से औ फिर फूटने के अनन्तर कपालरूप से फिर कमालिकारूप से ओ फिर कण- रूप से होता है यह जो एक मृत्तिकारूप धर्मी का परिणा- मान्यत्व अर्थात् अनेक भिन्न भिन्न परिणामों का होना इस में क्रमान्यत्व अर्थात्-चूर्ण पिंड घट का जो पूर्वापरीभूतरूप (१) क्रमभेद सोई कारण है । भाव यह है कि-एक ही मृत्तिका की जो चूर्ण-पिण्ड घट-कपाल-का-आदि आकार से परिणाम परंपरा सो सर्व को प्रत्यक्ष ही क्रमवाली देखने में आती है, क्योंकि चूर्ण यो पिंड का जो प्रानन्तर्यरूप क्रम है वह अन्य हे शो पिण्ड तथा घट का जोआनन्तर्य वह अन्य है, एवं घट औ कपाल का जो आनन्तर्य-वह अन्यहे एवं कपाल ओ कण का भी यानन्तर्य अन्य हे यह जो आनन्तर्यरुपक्रम का अनेक प्रकार का भेद है लोई परिणामभेद का संपादक है, नर्यात् यह क्रमभेद ही परिणामभेद का कारण है। (1) मगराद को ३२ म.- (1) आगे पो होना ।
.
२६२
पातखलदर्शनकाशे-
तहां जिस धर्म के अनन्तर जो धर्म होता है सो धर्म
तिस का क्रम कहा जाता है, जैसे पिण्डरूप धर्म से अनन्तर
घटरूप धर्म,को होने से घट पिण्ड का क्रम है, इसी प्रकार
सर्वत्र जान लेना।
यह जो चूर्ण-पिण्ड--घटादिरूप क्रम प्रदर्शन किया है
इस को धर्मपरिणामक्रम कहते हैं ।
औ घट का अनागतभाव से वर्तमान भाव हो जाना
औ पिण्ड का वर्तमानभाव से अतीतभाव हो जाना यह
लक्षणपरिणामक्रम है, अतीतभाव से अनन्तर अन्यपरिणाम
का असंभव होने से अतीत के क्रम का अभाव जानना
क्योंकि दो धर्मों के पूर्वपरभाव होने से ही क्रम होता है
ऐसे ही नहीं, सो अतीत को किसी से पूर्वभाव न होने से
अतीत के क्रम का अभाव है अतः अनागत श्री वर्तमान
इन दोनों लक्षणों का क्रम जानना।
ऐसे ही नूतन घट में जो क्षणपरंपरा के अनुसारी पु-
राणता देखने में आती है सो घट का अवस्थापरिणामक्रम
जान लेना, यद्यपि धर्मपरिणामक्रम की तरह अवस्थापरिणा-
मक्रम प्रत्यक्ष देखने में नहीं आता है तथापि अतिपुराणता
को देख कर अनुमान से उस का ज्ञान जान लेना
यत् (१) यलेंस कोठे में रक्खे हुये ब्रीहि आदि अन्न
अनेक वर्ष से अनन्तर निकासने से प्रशिथिल अवयव हुये
हस्त के स्पर्शमात्र से ऐसे धूर सरीखे हो जाते हैं कि मानो
फिर परमाणुभाव
को वह प्राप्त हो गये हैं यह जो इन का
से परमाणु भाव का हो जाना है सों
... करते हैं--(अर्थात ) इसादि से।
1
विभूतिपादः। एकबारगी होना तो असंभव है किन्तु क्षणपरंपरा से सूक्ष्मतम, सूक्ष्मतर, सूक्ष्म, स्थूल, स्थूलतर, स्थूलतम रूप क्रम से होता है यही माना जायगा, इस प्रकार जो क्षणपरं- पराक्रम से प्रतिक्षण वस्तु में पुराणेपन का होना यह अवस्था परिणाम है। तहां इतना विशेष है कि धर्म श्री लक्षण परिणामतो कादाचित्क.१) होता है औ यह अवस्थापरिणाम प्रतिक्षण में होताही रहता है औ स्थूलभाव को प्राप्त हुआ प्रकट होता है। यह जो तीनप्रकार के क्रमों का भेद कहा है सो धर्म- धर्मी के भेद की अपेक्षा को ले कर कहा गया है। अर्थात्-यह सब धर्मधर्मीभाव आपेक्षिक है कुछ वास्तव से यह नियम नहीं है कि यह धर्म है औ यह धर्मी है क्योंकि जिस मृत्तिकारूपधर्मी के तीनपरिणाम कहे गयेहें वह मृत्तिका भी गन्धतन्मात्र का धर्मही है, एवं यह गन्धतन्मात्र जो मृत्तिकाकी अपेक्षा से धर्मी है सो भी अहवार का धर्म है (२)। एवं च प्रधानही मुख्य धर्मी है औ उस धर्मी के ही यह सब परिणाम हैं, श्री यत्किंचित् भेद को लेकर तीन प्रकार के कहेगये हैं औ वास्तव से यह एक धर्मी के ही धर्मपरिणाम का विस्तारजानना यह सिद्ध हुआ। जैसे यह वाह्य पदार्थों में अनेक धर्मपरिणाम हैं ऐसे चित्त में भी अनेक प्रकार के धर्मपरिणाम विद्यमान हैं, तहाँ (३) चित्त के धर्म दोप्रकार के हैं एक तो परिदृष्ट अर्थात (१) पादाचित्य-कभी २ हानाका, अर्थात् प्रतिक्षण में न होनेवाला है। (२) एव अहयार राधी भी महत्तत्त वा धर्म है, जो गदत्तत्व भी प्रधान फा पर है, इस प्रकार से मापेक्षिक धर्मधर्मी गाय है कुछ नियत नहीं है। (३) "वित्तस्स पे धर्मा" इत्यादि भाष्य का अनुवाद करते हैं 'तहा' इत्यादि से। - पातञ्जलदर्शनकाशे- प्रत्यक्षरूप ओ एक अपरिदृष्ट अर्थात्-परोक्षरूपह, तहां जो प्रमाण (१) आदि चित्त की वृत्तियां हैं वह प्रत्यक्षरूप हैं औ । निरोधनादि जो चित्त के धर्म हैं वह परोक्षरूप हैं क्योंकि निरोध आदिक शास्त्र वा अनुमानद्वारा ही परिज्ञातहोते हैं कुछ प्रत्यक्ष से नहीं, सो निरोधादि धर्म सातहैं, निरोध १ धर्म र संस्कार ३ परिणाम ४ जीवन ५ चेष्टा ६ शक्ति ७। ऐसेही व्यासदेव जी ने कहा है यथा-"निरोधधर्मसंस्काराः परिणा- सोऽथ जीवनं, चेष्टा शक्तिश्च चित्तस्य धर्मा दर्शनवर्जिताः" इति। तहां चित्तवृत्तियों का निरोधरूप जो असंप्रज्ञात अवस्था है सो केवल योगशास्त्र से प्रतीतहोने से आगमगम्य है (२) अतः निरोधरूप चित्तधर्म परोक्ष है, एवं पुण्यपापरूप जो चित्त के धर्म हैं वह भी आगमगम्य होने से वा सुखदुख के भोगदर्शन से अनुमेय (३) होने से परोक्षरूप ही हैं, एवं स्मृतिद्वारा संस्कारों का अनुमान होने से संस्कार (2) भी अप्रत्यक्षरूप हैं। एवं जीवनरूप जो चित्त का धर्म है सो भी श्वासप्रश्वास द्वारा अनुमय होने से अप्रत्यक्षरूप है। एवं प्रतिक्षण जो चित्त के अनेकप्रकारके परिणाम है सो भी अप्रत्यक्ष हैं क्योंकि चित्त को निगुणात्मक होने से ओ गुणों के स्वभाव को अतिचंचल होने से चित्त का परि- (१) आदि शन्द से विपर्यय-विकल्प निद्रा स्मृति राग द्वेषादि वृत्तियों का पण मारलेना। (२) गो केयक शास्त्र द्वारा पदार्थ परिज्ञात होय यह आगमगम्य कहा जाता है। (३) सुखदर्शन से पुण्य का भी दुखदर्शन से पाप का अनुमान होता है। (४) इसी प्रकार जो चित्त को सस्कारशेषायस्था है सो भी अनुमैप होने से मानपक्ष हो है यह प्रथमपाद यो ५१ सत्र में देवो ।
विभूतिपादः। रणाम अनुमेय है, एवं चित्त की जो चेष्टा (क्रिया) है सो भी अप्रत्यक्ष है क्योंकि वह भी तिस तिस इन्द्रिय के साथ ज्ञान का हेतु.जो संयोग है उस से अनुमेय ही है। एवं चित्त में जो कार्यों की सूक्ष्मावस्थारूप शक्ति है सो भी परोक्ष है क्योंकि वह भी स्थूलकार्य के ज्ञान से अनुमेय (१) है ॥ १५ ॥ इदानी इस पाद की समाप्ति पर्यन्त धारणादि में निष्ठावाले संयमी योगी को जिज्ञासित पदार्थ के साक्षात्का- रार्थ संयम का विषय भी संयमसिद्धि की (+) ज्ञापक विभूतियां विवेकपूर्वक प्रदर्शन कियी जावेंगी, तहां प्रथम पूर्वउक्त परिणामत्रयविषयक संयम करने से जो सिद्धि प्राप्त होती है सो निरूपण करते हैं- सू० परिणामत्रयसंयमादतीताऽनागतज्ञानम् ॥१६॥ भाषा-(परिणामत्रयसंयमाद् ) धर्म-लक्षण-अवस्था- संज्ञक तीनों परिणामों में धारणा--ध्यान-समाधि करने से (मतीताऽनागतज्ञानम्) मतीत श्री भनागत पदार्थों का योगी को साक्षात्कार हो जाता है । अर्थात् (२) तीनों परिणामों के विषयक संयम करने से उन परिणामों का पहिले साक्षात्कार होता है फिर उन प- रिणामों में भनुगत जो अतीत अनागत धर्म उन का ज्ञान (१) अर्थात सरकार याद सिद्धान्त होने से स्थक रागादिकों को देख पार सूक्ष्म गादि का अनुमान किया जाता है। (1) मतमानेपाको। (१) निस विषपया संयम किया गया है उमी का साक्षाकार होगा सचित है गाय कामही, एवं परिणामों के विषय संपम करने से भतीतादि का साकार पोमे, इस भाग को पान करते हुये भाष या माया पाइने --"" दि- 4 पातजलदर्शनकाशे- होता है, इस प्रकार परंपरा से परिणामत्रयसंयम को अती- तानागतसाक्षात्कार का हेतु जानना ॥ १६ ॥ सू० शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्सङ्करस्तत्प्र- विभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ १७ ॥ भाषा-(शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्) शब्द-अर्थ- ज्ञान इन तीनों का परस्पर अध्यास होने से (संकरः) पर- स्पर मेल प्रतीत होता है, परन्तु जो पुरुष सूक्ष्मदृष्टि से इन तीनों के विभाग को जानकर उस विषयक संयम करता है उस पुरुष को (तत्प्रविभागसंयमात् । तिस विभागविषयक संयम करने से ( सर्वभूतरुतज्ञानम् ) संपूर्ण जो पशु पक्षिी आदि भूत हैं उन सब की वाणी का परिज्ञान हो जाता है। जिस प्रकार शब्द, अर्थ, ज्ञान इन तीनों का परस्प- राध्यास होने से सङ्कर है वह प्रकार प्रथमपाद में स्पष्ट है, ओ जिस प्रकार यह तीनों विभिन्न हैं वह भी वहां पर स्पष्ट तहां जो योगी विवेक से इन तीनों के संकर को विकल्परूप होने से मिथ्या जान कर इन तीनों के विभाग में संयम कर ( गो शब्द कण्ठ में विद्यमान, औ उदात्त, अनुदात्त, मन्द, उच्चतादि धर्मवाला है ओ गो शब्द का अर्ध भूमि में स्थित शृङ्गादिविशिष्ट व्यक्ति हे ओ गो शब्द का ज्ञान चित्त में स्थित ओ प्रकाश रूप है, ) इस प्रकार दृढ़ संयम जन्य यथार्थ ज्ञानवाला होता है वह निखिल प्राणियों की वाणी के अर्थ का परिज्ञाता हो जाता है। (1) माद के १.३ पृष्ठ पर १२ मन के व्यापान में पइ सब स्पष्ट है २६७ विभूतिपादः। अर्थात्-सजातीय तो क्या विजातीय पशु पक्षी आदिकों की भी वाणी का अर्थज्ञान उस को हो जाता है। यहां पर भाष्यकारों ने प्रसङ्ग से कुछ स्फोटवाद का विचार किया है परन्तु योगजिज्ञासुओं को अनुपयुक्त जान कर उसे छोड़ दिया है ॥ १७ ॥ सू० संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥१८॥ भाषा-(संस्कारसाक्षात्करणात् ) संस्कारविषयक संयम द्वारा संस्कारों का साक्षात्कार होने से (पूर्वजातिज्ञानं ) पूर्व जाति का परिज्ञान होता है। अर्थात्-जितने जन्म पूर्व व्यतीत हो चुके हैं उन सब का यथार्थ ज्ञान हो जाता है। भाव यह है कि-सस्कार दो प्रकार के होते हैं एक तो वासनारूप जो कि स्मृति औ क्लेशों के हेतु है (१) औ एक धर्माऽधर्मरूप जो कि जाति-आयु-भोग-के हेतु हैं, यह सर्व संस्कार पूर्वले जन्मों में अपने कारणों से निष्पन्न हुये चित्त में रहते है, जो परिणाम चेष्टादि की तरह अप्रत्यक्षरूप हैं, (२) इन संस्कारों के विषयक सयम करने से संस्कारों का साक्षा- स्कार होता है। यद्यपि संस्कारों के विषयक संयम करने से संस्कारों का ही साक्षात्कार होना उचित है पूर्व जन्म का नहीं क्योंकि अन्यविषयक संयन से अन्य का साक्षात्कार होना (.)ता प्रत्यक्षादिप्रमाणाय ससार स्मृते क हेतु है, ओ अविद्या भादि सत्कार अवेद्या आदि देशों के हेतु है। (२) परिणामचेष्टादि अप्रत्यक्ष धर्मो वानिरूपण १९ सत्र की व्यारया ोयत में सट है।
२६८ पातशरदर्शनप्रकाशे- अनुभव से विरुद्ध है तथापि देश (१) काल निमित्त के ज्ञान से विना संस्कारों के साक्षात्कार का असंभव होने से संस्कारों के साक्षात्कार का होना ही पूर्वजन्म के ज्ञान का पाक्षेपक जानना। अर्थात्- (२) यथा दिवाभोजी (३) को रात्रि भोजन से विना पीनता (७) की अनुपपत्ति होने से पीनता रात्रि भोजन का आक्षेपक है तथा पूर्व जन्मादिकों के ज्ञान से विना संस्कारों का साक्षात्कार अनुपपन्न होने से संस्कार का साक्षात्कार ही पूर्व जन्म के ज्ञान का आक्षेपक है। यहां पर भाष्यकारों ने “ परत्राऽप्येवमेव संस्कार साक्षात्करणात् परजाति संवेदनम् " यह कहा है। स्वसंस्कारों में संयम द्वारा अन्य पुरुपों के संस्कारों का साक्षात्कार होने से अन्यपुरुषों के भी पूर्वजन्म का ज्ञान योगी को हो सकता है, यह इस का अर्थ वाचस्पति मिश्र ने किया है, ओ अनागत अवस्था से विद्यमान आगामिजन्मों के संस्कारों के साक्षात्कार से आगामिजन्म का ज्ञान होता है यह इस का अर्थ विज्ञानभिक्षु ने किया है, इन दोनों (१) देश-गिस स्पान में शग हुआ है, कार=जिम काल में पदार्थों का अनु- भय का है, निमित्त जिस शरीर इन्द्रियादि के सबन्ध से ज्ञान हुआ है, इन सब का हाम न होने से पक्ष संस्कारों को ज्ञान का होना असमय है। (२) मा मिस प्रकार संस्कारों का साक्षाकार पूर्वमन्म के ज्ञान का भाक्षेपक मान -साधक है सो प्रकार निरूपण करते हैं ( अर्थात् ) इत्यादि से- (३) दिगमें न मोजन करनेवाले यो। (७) पोगता-स्थरता, मुटाई)
विभूतिपादः।
भर्थों के युक्ताऽयुक्त में केवल योगी का ही अनुभव शरण है
इस से विशेष विचार की यहां पर भावश्यकता नहीं है।
सब जो भाष्यकारों ने यहां पर इस पूर्वोक्त अर्थ में
विश्वास के लिये भावव्य नामक योगीश्वर का योगिराज
जैगीपश्य के संगसंवाद उपन्यास किया है उस का निरूपण
करते हैं ( एक भगवान् जेगीपव्य नामक योगेश्वर थे जो
कि संस्कारों के साक्षात्कार से दशमहाकल्पों में व्यतीत
हुये अपने जन्म परिणाम परंपरा का अनुभव करते हुये
विवेकज ज्ञान संपन्न थे, औ एक भगवान् भावव्य नामक
योगिराज थे जो कि योगवल से स्वेच्छामय दिव्यविग्रह को
धारण कर विचरते थे।
किसी समय में इन दोनों महानुभावों का संगम हो गया
तव आवट्य जी ने जैगीपव्य से यह पूछा कि
दश महाक.
पों में देवमनुष्यादि योनियों में उत्पन्न हुये आपने जो अनेक
प्रकार के नरक तिर्यग् योनियों में औ गर्भ में दुखों का अनु-
भव किया है सो सव आप को परिज्ञात हे क्योंकि आप को
भव्य (१) ओ धनभिभूत बुद्धिसत्त्व होने से निखिल पूर्वजन्मों
का परिज्ञान है, सो चाप यह कथन करो कि दशमहाकल्पों
में जो आप ने अनेक प्रकार के जन्म धारे हे इन जन्मों में
भाप ने औ
दुःख
में से अधिक किस को जाना अर्थात्
संसार सुखबहुल है वा दुःखबहुल, तब भावव्यभगवान् के
(1) गप न शोमग का है अर्थात् रजतपस्या से राहत हो, इसी से ही
भाष के युधिनिष्ट सत्व को रजतग ने तिरछन नहीं किया है अर्थात् दबाया
सुख
महा।
२७० पातजलदर्शनकाशे- प्रति जैगीषव्यजी ने यह कहा कि इन दशमहाकल्पों में अनेक प्रकार के नरक तिर्यग् योनियों में दुखों को अनुभव करते हुये वारंवार देव औ मनुष्यादि योनियों में उत्पन्न हुये मैंने जो अनुभव किया है उन सब को दुःखरूप ही जानता हूं, अर्थात्--विषयसुख को दुःखरूप होने से संसार दुःख वहुल ही है सुखबहुल नहीं, तव फिर भगवान् आवदय जी ने यह कहा कि हे जैगपिव्यमुने ! दीर्घ आयुवाले आप को जो यह योगबल से प्रधानवशित्व (१) औ अनुत्तम संतोपसुख का लाभ हुआ है क्या यह भी दुःखपक्ष में निक्षिप्त है, तव भगवान् जैगीपव्य बोले कि हे आवव्यमुने ! विषय- सुख की अपेक्षा से ही यह संतोपसुख अनुत्तम कहा जात है औ कैवल्य की अपेक्षा से तो यह भी दुःखरूप ही है क्योंकि यह जो सन्तोप है सो चुद्धिसत्त्व का धर्म है औ जो: बुद्धि का धर्म हे तो सब त्रिगुणात्मकप्रत्यय होने से हेयपक्ष में पतित है। अर्थात्-बुद्धि का धर्म होने से सन्तोप भी मुख्य सुखरूप नहीं हे, (२) जो कि सूत्रकार ने “सन्तोपादनुत्तमःसुखलाभ' इस सूत्र से सन्तोष को अनुत्तमसुख का हेतु कहा है उस का तात्पर्य यह है कि-रज्जु की तरह पुरुषों को बांधने (१) प्रशनशिप्रति को अपने अधीन करलेना, इस सामर्थ्य के होने से ६ योगा ईश्वर यहा नाता है क्योंकि प्रधान वशित्व होने से जो चाहे सा योगीकर सकता हैं (२) मिस त प in मुरगसुम्बस्वयप नहीं है तो सूत्रकार ने उम को वर्ग: गत क्यों पहा, इसका समाध 7 मरते है ( जोक्ति) इत्यादि से- २७१ १ विभूतिपादः। वाली जो दुःखस्वरूप तृष्णारूप तन्तु है तिसं तृष्णारूप दुःख का सन्तोष से नाश होता है जो फिर तृष्णा के प्रभाव से चित्त पीड़ा से रहित हुआ प्रसन्न हो जाता है, इस प्रकार तृष्णा की निवृत्तिद्वारा सर्वानुकूल सन्तोपसुख को उत्तम कहा है कुछ वास्तव से नहीं क्योंकि कैवल्य की अपेक्षा से यह सब दुःखरूप ही है) ॥१८॥ सू०प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥ १९॥ 'भाषा-(प्रत्ययस्य ) पर चित्त विषयक संयम करने से (परचिर्त्तज्ञानस् ) दूसरे के चित्त का साक्षात्कार होता है । यद्यपि प्रत्यय नाम केवल चित्त का है कुछ परचित्त का नहीं तथापि पराये चित्त का साक्षात्कार रूप फल कथन से यहां पर प्रत्ययपद का अर्थ परचित्त जानना क्योंकि जिस विषयक संयम कियाजाता है उसी का ही साक्षात्कार होना युक्त होता है अन्य का नहीं ॥ १६ ॥ जैसे संस्कारों के साक्षात्कार से पूर्वजन्म का साक्षात्कार कहा है तैसे परचित्त के साक्षात्कार से विषय सहित चित्त का साक्षात्कार होता है वा केवल चित्त का, इस पर कहते हैं- सू० नच तत्सालम्बनं (*)तस्याऽविषयीभूतत्वाद्॥२०॥ भाषा-(तत्) सो जो परचित्त ज्ञान हे वह (सालम्बनं नच) विषय सहित (२) चित्त का नहीं है क्योंकि (तस्याऽ विपयीभूतत्वाद् ) तिस परचित्त के विषय को संयम का (6) यह सूत्र नहीं किन्तु गाप्य है, यह योगपातिककार का भ्रम मानना क्योंकि भोग पति कार भो याचस्पति मिश्र ने इम को मुत्रमाना है। (1) मन नाग रागादि विषयों या है।
पातालदर्शनकाशे- अविषयीभूत होने से, अर्थात-इस पुरुष का चित्त रागयुक्त हे वा द्वेषयुक्त है एतावन्मात्र योगी को ज्ञान होता है औ इस विषय में राग वा द्वेषवाला है यह विशेष ज्ञान योगी को नहीं होता है। भाव यह है कि-पराये चित्त का जो ( आलम्बन ) विषय है अर्थात् जिस विषय विषयक परचित्त रागयुक्त है सो विषय योगी के चित्त ने विषय नहीं किया है किन्तु पर- चित्त ही योगी के चित्त का विषय है इस से पराये चित्त का ही योगी को ज्ञान होता है पर चित्त के विषय का महीं, औ यदि विषयविशिष्ट में संयम कियाजाय तो विषय विषय ज्ञान होना भी दुर्घट नहीं जानना ॥ २० ॥ सू० कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुः प्रकाशाऽसम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥ २१ ॥ भाषा-(कायरूपसंयमात्) अपने शरीर के रूपविष- यक संयम करने से (तग्राह्यशक्तिस्तम्भे) तिसरूप की ग्राह्यशक्ति के रुक जाने से (चक्षुःप्रकाशाऽसम्प्रयोगे ) दूसरे के नेत्रजन्य प्रकाश से योगी के शरीर का संनिकर्ष न होने से (अन्तर्धनम् योगी के शरीर का अन्तर्धान हो जाता है। भर्थात्-यह जो पाञ्च (१) भौतिक शरीर है सो रूपवाला होने से नेत्रजन्य ज्ञान का विषय होता है अर्थात रूपद्वारा ही यह शरीर चक्षु कर के ग्राह्य होता है, जब योगी इस शरीर के रूप विषयक संयम करता है तव जो रूप में प्राय शक्ति है सो प्रतिबद्ध हो जाती है, अर्थात-चक्षु का विषय (1) भो का परिणाम विशेष ।
विभूतिपादः। २७३ हो जाना जो रूप में सामर्थ्य है सो रुक जाती है, तिस के रुकने से फिर परकीयचक्षुजन्य ज्ञान से योगी के शरीर का असंप्रयोग हो जाता है, अर्थात्-सन्मुख विद्यमान भी योगी का शरीर किसी के नेत्र का विषय नहीं होता है, इसी का नाम अन्तर्धान (१) सामर्थ्य हे। जैसे रूपविपयक संयम करने से योगी के शरीर के रूप को कोई नहीं देख सकता है तैसे शब्दविषयक संयम करने से शब्द की श्रोत्रग्राह्य शक्ति के रुकजाने से श्रोत्र का शब्द के संग असन्निकर्ष होने से शब्द का अन्तर्धान जान लेना, अर्थात्-जैसे योगी का रूप किसी को प्रत्यक्ष नहीं होता तैसे योगी का शब्द भी किसी को सुनाई नहीं देता है. इसी प्रकार स्पर्श रस गन्ध का (२) भी अन्तर्धान जानलेना ॥ २१ ॥ सू० सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्त ज्ञानमरिटेस्यो वा ॥ २२ ॥ भाषा-सोपक्रम औ निरुपक्रम रूप जो दो प्रकार के कर्म हैं तिन विषयक संयम करने से ( अपरान्तज्ञानम् ) मरण का ज्ञान होता है (वा) अथवा तीनप्रकार के अरिष्टों के ज्ञान से मरणज्ञान होता है । (१) अ तार नाम गुप्त अर्थात छिपजाने का है । (२) अर्थात--जैसे योगी गपनी काया के रूप ओ शब्द विषयक सयम गारने से हा बी शब्द को न ह्यशक्ति यो प्रतिबद्ध कर देता है तसे स्पर्श-रस-गध पियक सयम करने से तिन को भी ग्राह्यशक्ति पो प्रतिबद्ध कर देता है, अर्थात समादि पाया विषयक संयग करने से योगी के शरीर म शम्द पर्श प रम गन्ध को मीस्थित पुरम भी विपण नहीं कर सकता है ।
२७४
पातञ्जकदर्शनकाशे-
अर्थात्-कर्म दो प्रकार के होते हैं एक तो सोपक्रम श्री
एक निरुपक्रम, तहां जो कर्म अपने फल देने में प्रवृत्त हुवा 4
वहुत फल दे चुका है औ अल्प फल देना जिस का शेष है
वह सोपक्रम कर्म कहा जाता है क्योंकि ( उपक्रम)
फलदान रूप व्यापार से वह युक्त है औ जो कर्म वर्तमान
काल में फलदान रूप व्यापार से रहित हुवा कालान्तर में
फल देनेवाला है वह निरुपक्रम कर्म कहा जाता है (१) ।
भाव यह है कि--यथा आई ( गीला ) वस्त्र विस्तार
पूर्वक पसारा हुवा शीघू (शुष्क ) सूख जाता है तथा
सोपक्रम कर्म है, औ जैसे वही वस्त्र इकट्ठा कर के रक्खा
हुवा देर में सूखता है तैसे निरुपक्रम कर्म जानना, अथवा
जैसे शुष्क तृणों के ऊपर फेंका हुवा अग्नि चारो ओर से
वायु कर युक्त हुवा शीघ्र ही तृणों का दाह कर देता है
तैसे सोपक्रम कर्म जानना औ जैसे हरिततृणों पर फेंका
हुवा अग्नि देर से तृणों का दाह करता है तैसे देर से फल
देनेवाला निरुपक्रम कर्म जानना, इन दोनों प्रकार के
कमों के विषयक संयम करने से योगी को मरणज्ञान होता
हे अर्थात्-इस देश में इस काल में मेरे शरीर का पात होगा
यह योगी को दृढ़ ज्ञान हो जाता है, (अरिष्टेभ्योवा) अथवा
अरिष्टों के ज्ञान से भी मरणज्ञान हो सकता है, अरिष्ट
नाम सन्निहित मरण सूचक चिन्हों का है, सो अरिष्ट तीन
प्रकार के हैं, आध्यात्मिक प्राधिभौतिक आधिदैविक, तहां
कानों को अंगुलि वा हस्त से बन्द करने से भीतर की
(1) अर्थात-सा फार देशाला वर्म सोनाम है जो देर म फल देनेगाला
एम मिPITITI
विभतिपादः। २७५ ध्वनि का न सुनना औ नेत्रों के निमीलन होने पर भीतर अग्नि के कण तुल्य ज्योति का न प्रतीत होना आध्यात्मिक अरिष्ट हैं, औ अकस्मात् ही यमदूतों को भी अपने मृत मातापिता आदि को देखना आधिभौतिक अरिष्ट हैं, श्री अकस्मात् ही स्वर्ग वा सिद्ध आदि को देखना आधिदैविक अरिष्ट हैं, इन तीनों प्रकार के अरिष्टों के होने से भी समीप मरण का ज्ञान हो जाता है। इसी (१) प्रकार विपरीत ज्ञान हो जाना भी एक अरिष्ट जानना अर्थात्-मनुष्य लोक ही को स्वर्ग जानना औ अधर्म को धर्म तथा धर्म को अधर्म जानना यह भी सन्निहितमरण के चिन्ह हैं, एवं (२.) प्रकृतिविपर्याय भी मरण का चिन्ह जान लेना ॥ २२॥. सु० मैत्रयादिषु वलानि ॥ २३ ॥ भाषा-(मैच्यादिषु) मैत्री-करुणा-मुदिता इन तीनों भावना विपयक संयम करने से (वलानि) मैयादिवल प्राप्त होते हैं। अर्थात्-सुखी प्राणियों के विषयक जो मैत्रीभावना पूर्व विधान किवी है उस भावना का निरंतर प्रवाहरूप संयम नामक दृढ़ अभ्यास करने से पुरुप को मैत्रीवल प्राप्त होता है अर्थात्-सर्व ही जन इस के मित्र बन जाते हैं औ सर्व को वह सुखकारी हो जाता है, इसी प्रकार दुखी प्राणियों (१) (विपरीतं वा सम् ) इम भाष्य का अनुराद करते हैं . 'इभी प्रकार इन्यादि से। (२) कृपणापि यदान्य स्याटबदा-य कृपणो यदि प्रकृतपितिश्चेत् स्यात्तदा पक्ष. वमृति, इत्यादि स्कंदपुराण के वचनों में जो कृपण का उदार होना भी उदार का कृष्ण होना चादि सभाव का बदए ना गरण चि ह कहा है सो कहते है (एक) इत्यादि से।
" पातञ्जलदर्शनप्रकाश- में करुणाभावना का संयम करने से करुणाबल प्राप्त हो जाता है, अर्थात्--दुखितजनों के दुःख की निवृत्ति करने की सामर्थ्यवाला हो जाता है, एवं पुण्यशीलों में मुदिता भावना विषयक संयम करने से मुदितावल प्राप्त होता है, अर्थात्-चिन्तायुक्त खिन्न पुरुष को आनन्दयुक्त कर देता है । औ (१) जो पापीजनों में उपेक्षारूप चित्त की वृत्ति है वह तो त्यागस्वरूप है कुछ भावनारूप नहीं इस से उपेक्षाविष- यक भावना के अभाव से संयम का अभाव होने से उपे- क्षावल की प्राप्ति का यहां पर अभाव जानना ॥२३॥ सू० बलेषु हस्तिबलादीनि ॥ २४ ॥ भापा-हस्ती आदि के चलचिपयक संयम करने से हस्ती आदि के बल प्राप्त होते हैं। अर्थात्-हस्ति के बलविषयक संयम करने से हस्ति के तुल्य बलवाला हो जाता है ओ गरुड़ के बलविषयक संयम करने से गरुड़तुल्य बलवाला हो जाता है, वायु के वलविपयक संयम करने से वायुसदृश बलवाला हो जाता है, जिस के वल में संयम करेगा तिस के बल को प्राप्त हो जाता है ग्रह तत्व है ॥२४॥ सू० प्रवृत्याऽऽलोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहित- विप्रकृष्टज्ञानम् ॥ २५॥ भापा-प्रथमपाद में जो ज्योतिप्मतीनामक मन की (0 पूर्वपाद में मैनी पर मर्दिता उपेक्षा, यह चार वा का निरूपण होने में यह भी चरों का फन याहा चाहिंग, फिर तीन का यों कहा दो गोको) गति। . . इम या उत्तर विभूतिपादः। २७७ प्रवृत्ति निरूपण किया है । तिस का जो पालोक (१) है उस को जिस पदार्थ में सूक्ष्म (२) वा व्यवहित वा विप्रकृष्ट में योगी संयम द्वारा न्यास करेगा तिस न्यास से सूक्ष्म आदि निखिल पदार्थों का ज्ञान योगी को हो जाता है ॥२५॥ सू० भुवनहानं सूर्ये संयमाद् ॥ २६ ॥ भाषा-सुर्यविषयकसंयम करने से भुवन का ज्ञान होता है, अर्व यहां पर जिस प्रकार भाष्यकारों ने भुवन का विन्यास (३) कथन किया है सो प्रकार प्रदर्शन करते हैं। तहां भूमि भादि सप्त लोक तथा अवीचि आदि ७ महा- नरक तथा महातल आदि सप्त पाताल यह भुवन पद का अर्थ है, औ ‘इन का विन्यास यह है कि-अवीचि से लेकर मेरु की पृष्ट पर्यन्त जो लोक है वह भूलोक है, औ मेरुपृष्ट से ध्रुवनामक तारे पर्यन्त जो ग्रह नक्षत्र तारा करके चिनित लोक है वह अन्तरिक्ष लोक है, ओ इस से परे पंच प्रकार का स्वर्गलोक है, तहां भूलोक औ अन्तरिक्ष लोक से परे जो तीसरा स्वर्गलोक है वह माहेन्द्रलोक कहा जाता है, ओ चतुर्थ जो महःनामक लोक है वह प्राजापत्यस्वर्ग कहा जाता है, इस से. आगे जो जनलोक तपलोक सत्यलोक नामक तीन स्वर्ग हैं वह तीनों लोक ब्रह्मलोक कहे जाते हैं, - ७ (1)८८ पृष्ट को देखें। (१) आलोया नाम सालिम प्रकाश का है। (२) सूक्ष्म परमाणु प्रति आदि, व्याहित परधान वाला पदार्थ अर्थात् पृथ्वी के भीतर में दया हुवा निधि गादि, विप्रष्ट दूर स्थित सुगेर मादि गिरि में होने पालेभापथि गादि। (३) ग्ई धोरा से स्थित ।
" २.८ पातजलदर्शनकाशे- ब्राह्मरित्रभूमिको लोकः प्राजापत्यस्ततो महान् , माहेन्द्रश्च स्वरित्युक्तो दिवि तारा भुवि प्रजाः ॥ यह इन लोकों का संग्रह श्लोक है। जिस प्रकार पृथ्वी के उपरिभाग में६ लोक अन्य है इस प्रकार पृथ्वी के अधो (नीचे) भाग में १४ चतुर्दशलोक अन्य हैं, तहां सब से नीचे अवीचि नामक नरक है, उस के ऊपर महाकाल नामक नरक है जो कि मही कंकड़ पापाण कर के युक्त है, औ इस के ऊपर अम्वरीप नामक नरक है जो कि जलकर पूरित है इस के ऊपर रोरव नरक है जो कि अग्नि कर भरा हुवा है इस के ऊपर में महा- रौरव नरक है जो कि वायु से भरा हुवा है इस के ऊपर काल सूत्र नामक नरक है जो कि भीतर से खाली है इस के ऊपर अन्धतामित्र नरक है जो कि अन्धकार से व्याप्त' है, इन सब नरकों में वही पुरुष दुःख देने वाली दीर्घ आयु को ग्रहण कर उत्पन्न होते हैं जो कि अपने किये हुये पाप- कमों से दुःख भोगनेवाले होते हैं, इन नरकों से ऊपर महातल-रसातल-अतल सुतल-वितल तलाऽतल-पाताल यह सप्त पाताल हैं, औ आठवीं यह भूमि है जिस को वसुमती कहते हैं यो जो सातद्वीपों कर संयुक्त है यो जिस के मध्य भाग में सुवर्णमय पर्वतराज मुमेरु विराजमान है । उस सुमेरु () भन-नए-मरा नाग तीन भागता वाला प्रमकोका ? आतिस को त मह- नागका प्रमापति शेष है यो ति नारे सानामा गाहे कोका है जो इस ॥ अपोभाग में म तरिक्षरे क है कि में ताप आदि विद्यमान है भी इस से नाचे पृथ्वी रोका है जिस में अनेक प्रकार को माया प्रमा विद्यगान है, यह इस श्लोक का गई।
२७९ विभूतिपादः। पर्वतराज के चारोदिशा में चार शृङ्ग हैं तहां जो पूर्वदिशा में शृङ्ग है सो रजतमय है औ जो दक्षिणदिशा में शृंग है सो वैदूर्यमणिमय है औ जो पश्चिमदिशा में शृंग है सो स्फटिकमणिमय है, औ जो उत्तरदिशा में शृंग है सो सुव- णमय है। तहां वैदूर्य्यनामक (1) मणि की प्रभा के संबंधसे सुमेरु के दक्षिण भागस्थित आकाश का वर्ण नीलकमल के पत्र की तरह श्याम है, औ पूर्वभाग में स्थित आकाश श्वेत वर्ण है, औ पश्चिम भाग में स्थित आकाश स्वच्छवर्ण है औ उत्तर भागस्थित आकाश पीतवर्ण वाला है, अर्थात्-जैसे २वर्णवाला जिस २ दिशा का शृंग है तैसे २ वर्णवाला तिस २ दिशा- स्थत आकाश का भाग है, इस सुमेरु पर्वत के ऊपर इक्षिण भाग में एक जंचू नामक वृक्ष है जिस के नाम से इस द्वीप का नाम जंबूद्वीप है। तिस सुमेरु के चारो तरफ सूर्य भ्रमण करता है इसी से ही जिस सुमेरु के भाग को सूर्य त्याग देता है वहां रात्रि हो जाती है जो जिस भाग को सूर्य भूपित करता हे वहां दिन हो जाता है, इस प्रकार सर्वदा ही सुमेरु दिन ओ रात्रि से संयुक्त रहता है, तिस सुमेरु की उत्तर दिशा में नील-श्वेत-शृंगवान् नामक तीन पर्वत विद्यमान हैं, यह तीनों पर्वत दो २ हजार योजन विस्तार वाले हैं, औ इन पर्वतों के बीच में जो अवकाश हैं उन में रमणक-हिरण्मय- • उत्तरकुन नामक तीन बर्ष है ( 1 ) यह सब नों २ हजार योजन विस्तार वाले हैं, इसी प्रकार दक्षिणभाग में दो २ ल) यह गण नीलो होता है। . () नाम गड का है।
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२८०
पातजलदर्शन प्रकाशे-
हजार योजन विस्तारवाले निपध-हेमकूट-हिमशैल नामक
तीन पर्वत हैं, औ इन के बीच के अवकाशों में नौ २ हजार ।
योजन विस्तार वाले हरिवर्ष-किंपुरुप-भारत नामक तीन वर्ष
विद्यमान हैं, एवं सुमेरु की पूर्वदिशा से संयुक्त माल्यवान्
नामक पर्वत है, औ उस पर्वत से समुद्र पर्य्यन्तभद्राश्वनामक
देश है एवं सुमेरु की पश्चिम दिशा से संयुक्त गन्धमादन
नामक पर्वत है औ उस पर्वत से समुद्र पर्यन्त केतुमाल
नामक देश हे, औ बीच के वर्ष का नाम इलावृत है इस
(१) प्रकार यह संपूर्ण जंबूद्वीप सौ हजार योजन विस्तार
वाला है।
तहां इतना विशेष है कि पंचाश हजार योजन विस्तार
वाले देश में तो सुमेरु विराजमान है औ पंचाश हजार
योजन विस्तारवाला देश सुमेरु के चारो ओर में है (२)
यह सब मिल कर लक्षयोजन परिमाणवाला जंबूद्वीप कहा
जाता है, यह जो सो हजार योजन विस्तारवाला जवूद्वीप
है सो अपने से द्विगुण परिमाण वाले वलयाकार (३) क्षार
समुद्र करके वेष्टित है ,
इस जंबुद्वीप से आगे द्विगुण परिमाणवाला शाकद्वीप
है यह भी अपने से द्विगुण परिमाणवाले वलयाकार इक्षुरस
के समुद्र करके वेष्टित है, इस से आगे द्विगुण परिमाण
(1) "सम्वत्वय शेतमहस्रायामो नम्दाप . इम भ प का अनुवाद करतेहुये
संपूर्ण गम्बट्टीप का विस्तार प्रमाण निरूपण यारते हैं-"म प्रकार" इत्यादि से-
(२) अर्थान--सुमेर के चारोदिदाओं में जो अरकाश यो देश है सो पंचाश
हमारगोन सिम्तापाला है।
(३) यायनाग नाण का है-अर्थात्-ककण को तरह गोल शाकारणाले -
विभूतिपादः।
२८१
वाला कुशद्वीप है, यह भी अपने से द्विगुण परिमाण वाले (१)
वलयाकार मदिश के समुद्र करके वेष्टित है, इस ले आगे
द्विगुण विस्तारवाला क्रौंचद्वीप है यह भी अपने से द्विगुण परि-
माण वाले वलयाकार घृत के समुद्र कर के वेष्टित है, इस से
आगे द्विगुण विस्तार वाला शाल्मलद्वीप है यह भी अपने से
द्विगुण परिमाणवाले वलयाकार दधि के समुद्र करके वेष्टित
है इस से आगे द्विगुणपरिमाणवाला मगधद्वीप है यह भी
अपने से द्विगुणपरिमाणवाले वलयाकार क्षीर के समुद्र कर
के वेष्टित है इस से आगे द्विगुणपरिमाण वाला पुष्करद्वीप है
यह भी अपने से द्विगुणविस्तारवाले वलयाकार मिष्टजल के
'समुद्र करके वेष्टित है, तहां सातो समुद्र सर्पपराशिकल्प(२)
हैं औ द्वीप विचित्र पर्वतरूप अवतंसों (+) कर के संयुक्त
हैं,
इन सातों द्वीपों से आगे लोकाऽलोक पर्वत है।
इस लोकाऽलोकपर्वत से परिवृत जो सप्तसमुद्र सहित
सप्तद्वीप हैं सो सब मिलकर पंचाशकोटियोजनविस्तारवाले
जानने क्योंकि ऋपियों ने इतना ही इन का परिसंस्थान
किया है न्यून वा अधिक नहीं।
जो यह शोभन संनिवेश वाला लोकाऽलोकपर्वत कर
परिवृत विश्वंभरा (३) मंडल हे सो सब ब्रह्मांड के अंतर्गत
संक्षिप्तरूप से वर्तमान है, औ वह ब्रह्मांड प्रधान का एक
(१) कुशद्वीप से द्विगुण विस्तारवाले, इस सरद सर्वत्र ही पूर्व द्वीप से
उत्तर उचर द्वीप को द्विगुणविस्तारयाला जानलेना ।
(२) मे सरसों का देर न तो उथ होता है जो न भूमि के समान होता है मे
दो समुद्र है।
(1) मानस नग सान के भरण वा है।
(२) विश्वमा नाग की गई।
२८२ पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- सूक्ष्म अवयव है क्योंकि जैसे आकाश के एक अतिअल्प देश में खद्योत विराजमान होता है तैसे प्रधान के एक अतिअल्पदेश में यह ब्रह्मांड विराजमान है। (१) तहां इन सब पाताल-समुद्र-पर्वतों में असुर-गंधर्व- किन्नर (७) किंपुरुष-यक्ष-राक्षस-भूत-प्रेत-पिशाच-अपस्मारक- अप्सराएं-ब्रह्मराक्षस:कूष्मांड-विनायक नामक देवयोनिविशेष निवास करते हैं, औ सब द्वीपों में पुण्यात्मा देवमनुष्य निवास करते हैं, औ सुमेरुपर्वत देवताओं की उद्यानभूमि है, क्योंकि वहां पर मिश्रवन-नन्दनवन-चैत्ररथवन-सुमानसवन यह चार वन हैं, औ तिस सुमेरु के ऊपर सुधर्मा नामक, देवसभा है, ओ सुदर्शननामक पुर है औ वैजयंतनामक प्रासाद है,. यह सव पूर्वोक्त भूलोक कहा जाता है। इसके ऊपर अंतरिक्षलोक है जिस में ग्रह, नक्षत्र, तारका(२) भ्रमण करते हैं, यह सब ग्रहनक्षत्रादि ध्रुवनामक ज्योति के संग वायुरूप रज्जु कर बांध हुये वायु के प्रतिनियत संचार से लब्धसंचारवाले हुये२ ध्रुव के चारो ओर भ्रमण करते हैं, औ ध्रुवसंज्ञक ज्योति मेढि- काट की (३) सरह निश्चल है, इस के ऊपर स्वर्गलोक है. जिस को. माहेन्द्रलोक कहते हैं, इस माहेन्द्रलोक में-त्रिदश- अग्निप्वात-याम्य-तुपित-अपरिनिर्मितवशवर्ती, परिनिर्मितव- शवर्ती, यह पट् ६ देवयोनिविशेष निवास करते हैं, यह संब (१) अब नो सिम स्थान में निवाम कारते हैं उनका निरूपण करते हैं। "तहा" इत्यादि से। (4) इन दोनों में से एक ही केम्वनीय है। (२) (प्रह) सम्पादि, (नक्षन) अश्विनीमाटि, तारकाना अ य क्षुद्र ज्यातियोंका है। (३) गढिमाष्ट उ९ का नाम है जो कि वर-खरदानग्यारहान के ग-य में एक पाट का नाम बदा होता है जिम धारो और बल घमने रहते हैं। ।
, विभूतिपादः। २८३ देवता संकल्पसिद्ध औ अणिमादि ऐश्वर्यसंपन्न औ कल्पा- युपवाले (१) तथा वृंदारक ओ कामभोगी भी औपपादिक- देहवाले हैं औ उत्तम अनुकूल अप्सराओं कर यह, परिवृत हैं अर्थात् 'अप्सराएं ही इन की स्त्रियां हैं। इस स्वर्गलोक से आगे महान् नामक स्वर्ग विशेष है इसी को ही महलोंक तथा प्राजापत्यलोक कहते हैं, इस महर्लोक में कुमुद, भु, प्रतर्दन, अञ्जनाभ, प्रचिताभ, यह पांच प्रकार के देवयोनि विशेष निवास करते हैं, यह सब देवविशेष महाभूतवशी, (२) औ ध्यानाहार तथा कल्प- सहस्रायुवाले हैं। इस महर्लोक से आगे जनलोक हे, इसी को प्रथम ब्रह्मलोक कहते हैं, इस जनलोक में ब्रह्मपुरोहित, ब्रह्मकायिक, ब्रह्ममहाकायिक, अमर, यह चार प्रकार के देवयोनिविशेष निवास करते हैं, यह देवताविशेष भूत तथा इंद्रियों को स्वाधीनकरण शाल हैं, इस जनलोक से आगे तप लोक है, इसी को ही द्वितीय ब्रह्मलोक कहते हैं, इस तपोलोक में अभास्वर, महाभास्वर, सत्यमहाभास्वर यह तीनप्रकार के देवयोनिविशेष निवास करते हैं, यह देवताविशेष भूत-इंद्रिय प्रकृति इन तीनों को स्वाधीन करण शील हैं औ पूर्व २ से (१) पत्रापर्य तगामुमाले, वृदारया-पूजा करने योग्य, (कामभोगी) पशुधर्मनागका मेधुन में अंग करनेवाले, (गोपादेकादेह ) मातापिता से बिना दियशरीरयाले । (१) नो नो इन को रचि होती है सोई सोई गहाभून सगादन कर देते हैं, अर्थात्---दन की इस से महाभूत तिम २ वार्य से परिणाग को प्राप्त होनाते हैं, (पानाहार ) दिनाही गन्नादि के सेवन से पानगान मे तृप्त भी पुष्ट है।
२८४ . पासञ्जरदर्शनकाशे- उत्तर २ द्विगुण २ आयु (१) वाले हैं, औ सभी ध्यानाहार । तथा ऊद्धरेतस हैं () एवं ऊर्द्ध सत्यादिलोक में अप्रतिहतज्ञान वाले औ अधर अवीचित्रादि लोक में अनावृतज्ञानवाले हैं (२) इस तपोलोक से आगे सत्यलोक है इसी को ही तृतीय ब्रह्मलोक कहते हैं, इस मुख्य ब्रह्मलोक में अच्युत, शुद्धनि- वास, सत्याभ, संज्ञासंज्ञी यह चार प्रकार के देवताविशेष निवास करते हैं, यह देवता विशेष अकृतभवनन्यास होने से (३) स्वप्रतिष्ठ हैं, औ यथाक्रम से उपरि उपरि स्थित हैं। औ सभी प्रधान को स्वाधीनकरणशील औ यावत् सर्ग आयुवाले हैं, तहां इतना विशेष है कि जो अच्युतनामक देव विशेष हैं वह सवितर्कध्यानजन्य सुख भोगनेवाले हैं औ जो. शुद्धनिवास हैं वह सविचारध्यान से तृप्त हैं औ जो सत्याभ हैं वह पानंदमात्रके ध्यानसे सुखी हैं, औ जो संज्ञासंज्ञी है वह अस्मितामात्र के ध्यान से तृप्त हैं इस प्रकार यह सभी संप्रज्ञात (४) निष्ठ हैं, इसी से ही यह मुक्त नहीं हैं किन्तु त्रिलोकी के मध्य में ही प्रतिष्ठित हैं। यह पूर्वोक्त सातो लोक ही परमार्थ से ब्रह्मलोक जानने क्योंकि हिरण्यगर्भ के लिङ्गदेह कर यह सब लोक व्याप्त हैं, (१) आगास्वरों से द्विगुणभायुवाले महामास्वर, औ इन से द्विगुणयुवाले सत्य. गहामास्तर है। (ल) मिन का वीर्यपात कमी नही होता यह ऊदरेता याहेनाते हैं। (२) अर्थात्-निखिलकों वो यधार्थस्य से जानते हैं। (३) अर्थात्-किमी एक नियत गृह के मभान होने से आने शरीररूप गृह हो धित है। (१) सब सप्रज्ञात के मेद १२ पृष्ट में १७ सूत्र के व्याख्यान में स्पष्ट हैं। ५ , विभूतिपादः। २८५ (१) विदेह-प्रकृतिलय नामक योगी तो मोक्षपद के तुल्य भव- प्रत्यय , नाम असंप्रज्ञातसमाधि में स्थित हैं इस से वह किसी लोक में निवासकरने वालों के बीच में नहीं उपन्यास किये गये हैं। यह पूर्वोक्त प्रकार से वर्णित जो भुवनविन्यास है इस का योगी को करामलकतुल्य साक्षात्कार होता है इस से सूर्य्यद्वार (२) में संयम कर योगी इस भुवनविन्यास के ज्ञान को संपादन करे। कुछ यह नियम नहीं है कि सूर्यद्वार में संयम करने से ही भुवनज्ञान होता है किन्तु योगोपाध्याय (३) कर उपदिष्ट अन्य स्थान में संयम करने से भी यह भुवन- ज्ञान हो जाता है, परन्तु जब तक भुवन को साक्षात्कार न होय तव तक दृढ़ चित्त से संयम का अभ्यास करे कुछ वीच में उद्वेग से उपराम मत हो जाय ॥ २६ ॥ सू० चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥ २७ ॥ भाषा-चन्द्र में संयम करने से ताराव्यूह का ज्ञान होता है अर्थात् अमुक तारा अमुक स्थान में निवास करता है यह विशेष ज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ २७ ॥ सू० ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥ २८॥ भाषा-ध्रुवसंज्ञक निश्चल ज्योति में संयम करने से (तद्गति ) तिन ताराओं की गति का ज्ञान होता है, (१) विदेह भी प्रतिष्यों को गणना किसी झोकनियासियों में क्यों नहीं किया, इस का समाधान करते हैं " विदेह " इत्यादि से, इन योगियों का निरपण ५६ व २० सूत्र में स्पष्ट है। (२) सूर्यकार नाम सुपूला गाडी का है। (१) योगोपाध्याय ना योगशाम्रो जाना भी योगाभ्यासी भाषाप्यों का।
२८६ থানঞ্জয়ানমায়- . अर्थात् यह तारा इतने काल में इस राशि में गमन करता । है इस प्रकार तारा नक्षत्रादिकों की गति का ज्ञान होता है इसी प्रकार ऊर्द्धविमान अर्थात् सूर्यादि के रथों में संयम करने से सूर्यादि के रथों का परिज्ञान[१] हो जाता है ।२८॥ सूनाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥ २९॥ भाषा- नाभिचक्र में संयम करने से कायव्यूह का ज्ञान होता है, '.. अर्थात् (२.) वात पित्त कफ ये तीन दोप, हैं त्वक रक्त, मांस, स्नायु,अस्थि, मजा, शुक्र यह सात धातु हैं, इन में से शुक्र सर्वे से आभ्यन्तर है जो उस से बाह्य मज्जा है औ मजा से वाहर अस्थि (हड्डी), अस्थि से बाहर लायु, स्नायु स्ते वाहर मांस, मांस से बाहर रक्त, रक्त से बाहर- त्वक् है, इस प्रकार शरीर में विद्यमान जो पदार्थों का विन्यासविशेष वह योगी को साक्षातूप से भात होता है ॥ २६ ॥... सू० कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥३०॥.... भाषा-कंठकूप में संयम करने से क्षुधा तथा पिपासा की निवृत्ति होती है, . अर्थात्-जिह्वा के अधोभाग में विद्यमान जो जिह्वा- मूल है उस को तंतु कहते हैं, इस तंतु से आगे अधोभाग में कंठनामक देश है तिस कंठ के समीपं अंधोभाग में. विद्यमान जो गर्ताकार प्रदेश हे वह कंटकूप कहा जाता है, (१) इसी प्रकार सूर्य्यादि के रथों के गमन का ज्ञान भी जान लेना। (२) कायव्यूह पद का अर्थ करते हुपे शरीर में स्थित पदाथों का पिन्यास.. विशेष वायन करते हैं अर्थात् ' इत्यादि से । . । .
२८७ 7 - . - विभूतिपादः। इसी स्थान में प्राणादिकों का स्पर्श होने से पुरुष को क्षुधा पिपासा बाधा करती है, तिस कंटकूप में संयम करने से प्राणादि के स्पर्श की निवृत्तिं द्वारा योगी को क्षुधा पिपासा बाधा नहीं करती है ॥३०॥ सू० कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥ ३१ ॥ भाषा-(कूर्मनाड्यां, कूर्मनामक नाड़ी में संयम करने से (स्थैर्य्यम्' स्थिरता की प्राप्ति होती है , अर्थात्-कंठकूप के अधोभाग में उर में विद्यमान एक कूर्माकार नाड़ी है जो कि कुण्डलित सर्प की तरह स्थित है। तिस नाड़ी में संयम करने से योगी का चित्त स्थिरपद का लाभ कर लेता है। भाव यह है कि-गोधा (१) की तरह योगी का चित्त एक विषय में दृढ़ स्थिर हो जाता है ॥ ३१ ॥ सू० मूर्द्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ।। ३२ ।। भाषा-(मूर्द्धज्योतिषि) मूर्द्ध में होनेवाली ज्योति में संयम करने से (सिद्धदर्शनम्) अदृश्य (२) सिद्ध पुरुषों का दर्शन हो जाता है अर्थात्-शिर के कपाल के मध्य में जो ब्रह्मरन्ध्रनामक एकछिद्र है उस छिद्र के मध्य में जो प्रभास्वर [३] एक ज्योति हे उस ज्योति में संयम करने से आकाश ओ पृथिवी के मध्यवर्ती दिव्यपुरुषों [४] का दर्शन हो जाता है ॥ ३२ ॥ (१) गाधा नाम गोह का है। (२) मानो किसी पो दिपायोग। (२) प्रभासर नाम प्रकायाले का है। (५) साक्षि में मिले माझे मिद पर मोदिल पर गहरे है। .
-- पातञ्जलदर्शनकाशे- अव सर्वज्ञता का उपाय कथन करते हैं- सू० प्रातिभाद् वा (१) सर्वम् ॥ ३३ ॥ भाषा--(प्रातिभा वा) प्रातिभ नामक ज्ञान से भी योगी (सर्वम्) सर्व पदार्थों को जान लेता है अर्थात्-सर्वज्ञ हो जाता है। भाव यह है कि-विवेकज्ञान के कारणीभूत संयम के दृढ़ अभ्यास से जो मन में अतीत अनागत सूक्ष्म व्यवहित' पदार्थों के ज्ञान का सामर्थ्य विशेष है वह प्रातिभ कहा जाता है क्योंकि वह अपनी प्रतिभा से उत्पन्न अनौपदेशिक ज्ञान है यह प्रातिभज्ञान ही प्रसंख्यान की समीपता संपादन द्वारा संसार से पुरुषों का उद्धार कर देता है, इस से इस कार तारकज्ञान भी कहते हैं, औ यही विवेकजन्यज्ञान का पूर्व- रूप है क्योंकि इस के होने से विवेकज्ञान अवश्य ही उत्पन्न होता है, अर्थात्-जैसे सूर्य के उदय होने का प्रथम ज्ञापक चिन्ह प्रभा है तैसे प्रसंख्यान के उदय होने का प्रथम लिङ्ग प्रातिभज्ञान है, इस प्रातिभज्ञान के उत्पन्न होने से योगी को निखिलपदार्थों का परिज्ञान हो जाता है फिर अन्य संयम की अपेक्षा नहीं रहती है ॥ ३३ ॥ सू० हृदये चित्तसंविद् ॥ ३४ ॥ भाषा-हृदये) हृदय में संयम करने से चित्त का (संविट् ) ज्ञान हो जाता है। (1) पूर्ण कहे हुये सयों में से प्रत्येक २ सयम करने से गो गो फल होते है यह सभी पर प्रातिपान में ही प्राश हो जाते हैं, इसके गोपनार्थ गत में (पा) गद दिया है ।
विभूतिपादः। अर्थात् जो इस ब्रह्मपुरनामक हृदयदेश में अधोमुख स्वल्प पुण्डरीक है वह चित्त के निवास का स्थान है उस में संयम करने से वृत्तिविशिष्ट चित्त का साक्षात्कार हो जाता है ॥ ३४॥ सू० सत्वपुरुपयोरत्यन्ताऽसङ्कीर्णयोः प्रत्ययाऽविशेषो भोगः परार्थत्वात् स्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम् ॥३५॥ भापा-( अत्यन्ताऽसङ्कीर्णयोः ) अतिशय कर भिन्न २ धर्मवाले होने से अत्यन्तविभिन्न (सत्वपुरुपयोः) बुद्धि औपुरुप का जो (प्रत्ययाऽविशेषः) अभेदरूपता कर भान, वह (भोगः) भोग कहा जाना है, सो यह भोगरूप प्रत्यय यद्यपि बुद्धि का धर्म है तथापि वुद्धि को ( परार्थत्वात् ) पुरुप के अर्थ होने से यह भोगरूप बुद्धि का धर्म भी पुरुप के अर्थ जानना, इसी से (१) यह भोगरूप प्रत्यय दृश्य (२) कहा जाता है, ओ जो भोगरूपप्रत्यय से भिन्न चेतनमात्र को आलंवन करनेवाला पोरुपेयप्रत्यय रूपबुद्धि का धर्म है वह स्वार्थप्रत्यय कहा जाता है, इस ( स्वार्थसंयमात् ) स्वार्थप्रत्यय में संयम करने से (पुरुप ज्ञानम् ) चेतनमात्ररूप पुरुप का साक्षात्कार हो जाता है। भाव यह है कि-रज वा तमोगुण कीप्रधानतावाला जो बुद्धिसत्त्व (३) हे वह तो अत्यन्त विधर्म होने से पुरुप से अत्यन्त विभिन्न है ही परन्तु जो घुद्धिसत्व समानसत्त्वापनि- वन्धन () रजतम को अभिभूत कर सत्वगुण के प्राधान्य (1) मी मे बुद्धि पा धर्म होो से। (२) (ER) भांप को मना है। (१) युसे परिणामो सगुग पुरा यहा जसा । (१) (मामोमिद ) मराण में मग म सपा ।
- पातजरदर्शनकाशे- से प्रख्याशील हुआ विवेकख्यातिरूप से परिणत है वह भी बुद्धिसत्व चिन्मात्ररूप पुरुप से विधर्म होने से (१) अत्यन्त विभिन्न है क्योंकि बुद्धिसत्त्व परिणामी होने से मलिन है पुरुष कूटस्थ होने से शुद्ध है। इस प्रकार अत्यन्त असंकीर्ण ( विभिन्न ) बुद्धि पुरुप का जो प्रत्ययाऽविशेष अर्थात् शान्त-घोर-मूढ रूप बुद्धि के धर्मों का बुद्धिप्रतिविवित चेतन में अध्यारोप वह पुरुषनिष्ठ भोग है। अर्थात्-बुद्धिकर दर्शित विषय होने से बुद्धि का धर्म रूप भोग पुरुषनिष्ट कहा जाता है इसी से ही वह बुद्धि का धर्म भोग रूप प्रत्यय (+) परार्थ होने से दृश्य कहा जाता ओ जो इस भोग से विलक्षण चितिमात्र को आलंबन करणे वाला पीरुपेयप्रत्यय है वह स्वार्थप्रत्यय कहा जाता है, इस । स्वार्थप्रत्यय में संयम करने से पुरुष को विश्य करनेवाली प्रज्ञा उत्पन्न होती है, परन्तु यह मत जानना कि-बुद्धि के धर्मभूत पुरुषप्रत्यय कर के पुरुष जाना जाता है किंतु, पुरुष ही बुद्धि में प्रतिविवित हुआ स्वात्मावलंबन (२) रूप प्रत्यय को देखता है, ऐसे ही वेद में कहा है " विज्ञातारमरे केन विजानीयात् " अरे (३) मैत्रेयि सर्व के जाननेवाले विज्ञाता परमात्मा को पुरुष किस साधन से जान सकता है अर्थात् (१) पिसक्षण गिन २ धर्मपाले होने से, जिस प्रकार ये दोनों विधर्म हैं सो १२ पृष्ट में सराट । (1) यहा सर्वत्र प्रसप नाग वृत्ति का है। (२) (स्थामाव1) अपने स्वर को प्रकाश करनेवाला । (१) यह पाप या गोपि प्राप्त समाधन है।
विभूतिपादः। नहीं जान सकता है (१) यह श्रुति का अर्थ है ॥३५॥ इदानीं यह स्वार्थसंयम जव तक अपने मुख्यफल पुरु- पज्ञान को उत्पन्न नहीं करता है तिस से पूर्व जो इस के गौण फल है सो निरूपण करते हैं- सू० ततः प्रातिभश्रावणवेदनाऽऽदर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥ ३६॥ भाषा-(ततः) तिस स्वार्थसंयम से, प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद, वार्ता नामक पट् ऐश्वर्य (जायन्ते) उत्पन्न होते हैं, अर्थात्-(२) मन का जो अतीत अनागत विप्रकृष्ट सूक्ष्म व्यवहित पदार्थो के जानने में सामर्थ्य वह प्रातिभ है, औ श्रोत्र का जो सूक्ष्म दिव्य (३) शब्द के ग्रहण करने का सामर्थ्य है वह श्रावण जानना औ त्वक् का जो सूक्ष्म दिव्य स्पर्श के ग्रहण का सामर्थ्य है वह वेदन कहा जाता है, इसी प्रकार चक्षु, जिह्वा, घाण, इन तीनों इन्द्रियों का जो यथा- क्रम दिव्य रूप-रस-गंध के ग्रहण करने का सामर्थ्य वह यथा- क्रम आदर्श, प्रास्वाद, वार्ता इन तीनों नामों से व्यवहृत होता है, अथवा ( ४ ) सूक्ष्मव्यवहितादि पदार्थों के जानने (१) अर्थात् चेतनही जड को प्रकाश कर सकता है कुछ नह यदि चेतन को नहीं इस से पुरुष स्वय प्रकाश है, इमी विवेक में दृद्ध अभ्याम करने से पुम्प के पया स्वरूप का परिज्ञान होता है। (२) गय सूत्र में कथित नो प्रातिग आदि य पदार्ग उन या गोगश र के मवेत से अर्थ निरूपण परते है.--" अशा " गादि मे। (३) देवताओं के भोगने योग्य जो समापद गादि है यह दिव्य योगाते हैं। (१) इस TIT इद्रिगों हो पनि भोक मणिरेषा HIN ঘনব্রতানমন্ধায়-- की शक्तिवाला जो सन सो प्रातिभ पद का वाच्य जानना औ दिव्य शब्द के ग्रहण करने वाला श्रोत्र श्रावण पद का वाच्य जानना, इसी प्रकार दिव्य स्पर्श-रूप-रस-गंधों के ग्रहण करने की शक्तिवाले जो त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घाण, यह चार इन्द्रिय हैं वह यथाक्रम वेदन, आदर्श, आस्वाद, वार्ता इन चारों पदों के वाच्य जान लेने, यह सव योगशास्त्र कृत संकेत से गम्य हैं। तहां प्रातिभ के होने से सूक्ष्मादिपदार्थों का ज्ञान श्री श्रावण से दिव्यशब्द का श्रवण औ वेदन से दिव्यस्पर्श क ज्ञान औआदर्शसे दिव्य रूप का ज्ञान, आस्वाद से दिव्यरस क ज्ञान, वार्ता से दिव्यगंध का ज्ञान योगी को उत्पन्न होता है यह सव स्वार्थसंयम का आनुपंगिक फल जानना ॥३६॥ कदाचित् ऐसा मत हो जाय कि स्वार्य संयम में प्रवृर हुआ योगी इस संयम के प्रभाव से इन पूर्वोक्त सिद्धियों को प्राप्त हो कर अपने आप को कृतार्थ जान इस संयम से उपरामता को प्राप्त हो जाय किन्तु इन सब सिद्धियों को विघ्नरूप जानकर पुरुपसाक्षात्कार पर्यन्त अवश्य ही संयम का अभ्यास करे क्योंकि इस संयम का आत्मसाक्षात्कार ही मुख्य फल है कुछ सिद्धियां नहीं, इस अभिप्राय से सूत्र- कार कहते है- सू० ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः॥३७॥ शादिमण र दानी अ यगत से गोविनमानी शिप विशिष्ट होगा में। पहरा है इनसादि मे।
विभूतिपाद।। भाषा-(ते) यह जो पूर्वोक्त (७) ऐश्वर्य हैं वह सब (समाधो) आत्मसाक्षात्कारजनक समाधि में (उपसर्गाः) विप्न जानने, औ ( व्युत्थाने ) व्युत्थानकाल में तो यह सब ऐश्वर्य (सिद्धयः) सिद्धिपद के वाच्य होते हैं। अर्थात्-समाधि से उत्थानकाल में जिन पूर्वोक्त ऐश्वर्यो का योगी को लाभ होता है वह सव समाधि की दृढ़ता के विरोधी होने से समाधि में विघ्न जानने, भाव यह है कि जैसे जन्म से ही दरिद्र पुरुष अल्प धन के लाभ को अधिक फल मान कर अपने को कृतार्थ समझता है तैसे विक्षिप्त चित्त को ही यह पूर्वोक्त ऐश्वर्य उत्पन्न हुई सिद्धियां प्रतीत होतीहैं कुछ समाहितचित्त को नहीं क्योंकि वह इन सब को विघ्नरूप जानता है क्योंकि ( १) योगी को पुरुष के साक्षात्कार में यह प्रतिबंधक है, अर्थात्-इन ऐश्वर्यो के होने से ही अपने को कृतार्थ मानने से संयम के अभाव से फिर पुरुष का साक्षात्कार योगी को नहीं होगा, इस से इन प्राप्त ऐश्वर्यों से दोष- दृष्टि द्वारा उपराम हो कर पुरुपसाक्षात्कार के लिये स्वार्थ संयम का अभ्यास करे यह फलित हुवा ॥ ३७॥ इस प्रकार पुरुपदर्शन पर्यन्त दिव्यज्ञानरूप संयम- फल (२) निरूपण कर इदानीं क्रियारूप ऐश्वर्या कहते हैं- - () प्रतिम आदि पट् प्रसार के माम विशेष जो पात्र में रहे हैं। (२) इन को विस्त होने में (तदर्शनप्रयनीय बाइ) पद भाकारोक्त हेतु का है "क्योंकि" इत्यादि से । (२) यो जिन सपनों से अनेक प्रकार के दिग्गजामा ऐश्वर्ण प्राम गहरदिय भगिन संगो गाय के शरीर में प्राण पातलदर्शनप्रकाशे- सू० बन्धकारणशैथिल्यात् प्रचारसंवेदनाच चित्तस्य परशरीरावेशः ॥ ३८॥ भाषा-(वन्धकारणशैथिल्यात् ) चित्त को बन्धन कर- नेवाले धर्माऽधर्म का संयम द्वारा शैथिल्य होने से (च) और (प्रचारसंवेदनात् चित्त के प्रचार के ज्ञान से (चित्तस्य) चित्त का (परशरीराऽऽवेशः) अन्य के शरीर में प्रवेश हो जाता है, अर्थात्--(१) चंचल स्वभाव होने से एक स्थान में न स्थिर होनेवाले मन का जो धर्माऽधर्म के वल से एक शरीर में स्थिर निवास हो जाना वह वन्ध कहा जाता है, तिस बन्ध के करनेवाले धर्माऽधर्म का नाम बन्धकारण है, तिस बन्धको रण कर्म की जो अदृष्ट (२) संयम से शिथिलता हो जाने इस को वन्धकारणशैथिल्य कहते हैं, औ चित्त के गमन आगमन का मार्गरूप जो नाडियां हैं वह प्रचार कहा जाता हे औ तिस प्रचार में संयम करने से जो चित्त के प्रचार का ज्ञान वह प्रचारसंवेदन कहा जाता है। इन बन्धकारणशैथिल्य औ प्रचारसंवेदन रूप दोनों कारणों से योगी अपने चित्त को स्वशरीर से निकास कर अन्य के शरीर में प्रविष्ट कर सकता है, औ जिस काल में चिच प्रविष्ट होता है उस काल में चित्त के अनुसारी होने से इंद्रिय भी उस शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं। आदि ऐश्वर्य का काम होता है उन के निरण का आरम्म करते हैं । (२) इदानी ययाक्रम से सूत्र में विद्यमान-च ध, नौ व वकारण, तथा चन्धवारण शोपित्य, एर प्रचार, तथा प्रचारसंवेदन, इन पदों का अर्ध कहते हुये सूत्र का रोगा नपण मरते हैं पात् " इत्यादि । (२) दृष्ट नाग धर्म गौ का है।
विभूतिपादः। अर्थात्-जैसे (१) पुष्पों पर से उड़ते हुये मधुकरराज के पश्चात् ही सव मधुमक्खियां उड़ जाती हैं औ अन्य पुष्पों पर निवास करते हुये के पश्चात् ही पुष्पों पर निवास करती हैं तैसे इन्द्रिय भी चित्त के निर्गमन के पश्चात् ही पूर्वशरीर से निकस कर फिर चित्त के परशरीर में प्रवेश होने के पश्चात् ही उस शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं । भाव यह है कि-चंचल होने से चित्त एकस्थान में स्थिरता से नहीं रह सकता है औ आत्मा भी व्यापक होने से सर्वत्र विद्यमान है अतः इन दोनों का एक शरीर में निरन्तर स्थिर होना यद्यपि असंभव है तथापि इन दोनों का जो भोक्तृभोग्यभाव (स) संबंध से एक शरीर में स्थिर होना है वह धर्माऽधर्म प्रयुक्त है इसी से ही धर्माऽधर्म को बन्ध- कारण कहा जाता है, जवफिर संगम द्वारा योगी धर्माऽधर्म को शिथिल कर देता है अर्थात् धर्माऽधर्म के बन्धन करने की सामर्थ्य को निवृत्त कर देता है तब एक शरीर में चित्त की प्रतिष्ठा करने वाले प्रतिबंधक के अभाव से स्वतंत्र- प्रचारवाला हुआ चित्त सर्वशरीर में गमन आगमन की योग्यतावाला हो जाता है एवं आत्मा भी बंधकरनेवाले अदृष्ट के अभाव से सर्वशरीरों में स्वतंत्र प्रचारवाला हो जाता है, परन्तु (२)जबतक योगी को यह परिज्ञात न होगा (१) "पथा मधुकरराजानं गक्षिका उत्पतन्तगनपान्त" इम भाष्य का अनुवाद रते हये इन्द्रियों के परशरीर में प्रवेश होने में दृष्टान्त कहते हैं "से" इत्यादि से हा जो स्थूलआकारमाका भ्रगर है यह मधुकरराज पानना मो मो क्षुद्र गधुमकिवा है में गधुगक्षी जानना। (1) मारमा भाता भोचिच भोग्य है। । योगी को अन्य शरीर में प्रवेश करने में कुछ अहट संया हो कारण नहीं है केन्त नाडीसंपम भी संगअपेक्षित है इस आशय से सत्रकार ने समुपयोधक (ब) (६ पद दिया है, इगो को सर करते है " परन्तु " इत्यादि से। .
पातञ्जलदशनकाशे- कि यह नाड़ी चित्तवहा है अर्थात् इस नाड़ी द्वारा चित्त वाहर निकस सकता है तब तक भी चित्त का परशरीर में प्रवेश होना असंभव है इस से नाडीसंयम द्वारा चित्त के प्रचारवाली नाड़ियों के भी ज्ञान की योगी को आवश्यकता जाननी। एवंच योगी को अन्य के शरीर में प्रवेश करने में अदृष्टसंयम तथा नाड़ीप्तंयम इन दोनों साधनों का 'समु- चय जानना- (१) कुछ विकल्प नहीं जानना ॥ ३८ ॥ सू० उदानजयाजलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ॥ ३९ ॥ भाषा-(उदानजयाद्) उदान नामक प्राण के जर करनेसे (जलपङ्ककण्टकादिपु) जल-कर्दम-कंटक आदि युक्त स्थानों में (असंङ्गः) संबन्ध का अभाव होता है, अर्थात्- जल आदिक योगी की गति का प्रतिघात नहीं कर सकते हैं किंतु रमणीय भूमि की तरह उन पर भी स्वछंद गमन कर सकता है, (च) और उदान के जय का फल यह है कि (उत्क्रान्तिः) अर्थात्-प्रयाणकाल में उत्तरायण मार्ग द्वारा ऊर्चगमन करने का लाभ होता है। भाव यह हैकि-तुप(२ ज्वाला वा कपोतपंजरचालन(३) (१) तहां इतना विशेष है कि अदृष्टसंयम से धर्माऽधर्ग की शिथिलता होती है। ओ नाड़ोसंयम से प्रतिमन्ध से रहित चित्त बाहर निकस कार अन्यशरीर में प्रविष्ट हो जाता है। (२) तुपनाम उस का है जो कि धान्यों के ऊपर भूसा होता है, जैसे उस तुप में, साग्नि लगाने से एकादम अग्नि प्रमलित हो जाता है तैसे एककाल में उत्पन्न जो इन्द्रियों को वृत्तिय वही प्राणपद याध्य हैं कुछ इन से भिन्न वायु का विकार प्राण नहीं है, यह सांल्य भी योग का सिद्धान्त है। (१) मे एक कपोत शो को नहीं चला सकता है आ गिले हुये अनेक कापोत
२९७
विभूतिपादः।
की तरह जो एक काल में उत्पन्न होनेवाली निखिल
इन्द्रियों की साधारण वृत्ति वह जीवन-शब्द कर वाच्य
होती है, इसी जीवनवृत्ति का ही क्रिया भेद से प्राण अपान
आदि नाम से व्यवहार होता है, तहां मुख नौ नासिका
द्वारा गमन करनेवाला औ नासिका के अग्रभाग से ले
कर हृदयपर्यन्त वर्तनेवाला जो जीवनवृत्तिविशेष है वह
प्राण कहा जाता है, औ अशित पीत (खाये पीये ) अन्न
जल के परिणामरूप रस को अपने अपने स्थानों में समान
रूपसे पहुंचानेवाला औ हृदय से लेकर नाभिपर्यंत स्थिति
वाला जो जीवन है वह समानपद का वाच्य है,
औमूत्र-पुरीप-गर्भादि को बाहर निकासने की सामर्थ्यवाला
औ नागि से लेकर पाद के तले पर्यंत वर्तनेवाला जो जीवन
है वह अपान कहा जाता है, औ रस आदिकों को कंठ से
ऊपर पहुंचानेवाला तथा नासिका के अग्रभाग से लेकर
शिरपर्यंत स्थितिबालाजो जीवन हे वह उदान पद का वाच्य
है, औ जो सर्वशरीर में व्याप्त हो कर वर्तमान हो रहा है
वह व्यान कहा जाता है, इन सव में से प्राण प्रधान है
एक दग व्यापार से उम पंगरे को चला सकते हैं तैसे गिल हुये इन्द्रियों का को
शरीरधारण सा व्यापार यह प्राण मानना, यहां पर इतना विशेष यह भी जान लेना
कि मिले हुये मो तीन मन्त धरण है उ-ही को या साधारण वृत्ति प्राण कुछ
यात इन्द्रियों को नहीं क्योंकि सुपृप्ति में चक्षु गादि के लय होने पर भी प्राणों का
व्यापार देखने में आता है, इसी से हो "प्रयाणां सालक्षण्यम्" २ १.३० से
बुद्धि-भकार गन इन तीनों का लक्षण कथन पर फिर " सामान्यकरणत. प्राणाया
पार. १६" ३१ इम सत्र से कपिल मुनि जी ने बात करणय की ही साधारण
कृत्ति को प्राण कहा है, की मो निम्दि इन्द्रियों पर शत गार के पूर्ण प्रय
लो मह पिशक्षि ने कहा है यो गारद मानगा।
है
२९८ पातखलदर्शनकाशे- क्योंकि प्राण के निकसने के पश्चात् ही और सब निकस जाते हैं, तहां उदान में संयम करने से उदान के जय द्वारा जलादिकों कर योगी का प्रतिघात नहीं होता है श्री भीष्म- पितामह की तरह उत्क्रान्ति को अपने अधीन कर लेता है अर्थात् स्वच्छंदमृत्युवाला हो जाता है ॥ ३६ ॥ सू० समानजयाज्ज्वलनम् ॥ ४० ॥ (समानजयात् ) संयमद्वारा समान-नामकप्राण के जय करने से, योगी के शरीर में ( ज्वलनम् ) अग्नि की तरह दीप्ति हो जाती है, अर्थात्-समान नामक जो प्राण है वह जाठराग्नि को चारो ओर से वेष्टन कर स्थित है अतः तिस कर छन्न (1) होने से वह जाठराग्नि मंद तेज वाला हुआ शरीर के बाहर दीप्ति वाला नहीं हो सकता औ जब फिर योगी संयम द्वारा स- मान-नामकप्राण को स्वाधीन कर अग्नि को निरावरण (७) करदेता है तब वह अग्नि उत्तेजित हो जाता है अतः उस तेज से योगी तेजस्वी प्रतीत होता है अर्थात् अग्नि की तरह उस का शरीर दीप्ति युक्त हो जाता है।॥ ४०॥ सू० श्रोत्राऽऽकाशयोः संबन्धसंयमाद् दिव्यं श्रोत्रम् ॥ ४॥ भाषा-श्रोन इन्द्रिय ओ आकाश के संवन्ध विषयक संयम करने से दिव्य श्रोत्र हो जाता है, अर्थात्-अहंकार का कार्य जो शब्दग्रहण करने । वाला इन्द्रिय है वह श्रोत्र है ो शव्दतन्मात्र का कार्य (1) (गन) - आदित उस हुआ । (.) साादन रहित । - विभूतिपादः। जो सर्व शब्दों की प्रतिष्ठा (नाधार ) है वह आकाश है, (१) इन दोनों का जो आधाराधेय भाव संबंध है तिस में संयम करने वाले योगी का श्रोत्र दिव्य हो जाता है, अर्थात्-तन्मात्र रूप सूक्ष्म शब्द के ग्रहण करने की साम- य॑वाला हो जाता है ॥४१॥ सू० कायाऽऽकाशयोः संबन्धसंयमात् लघुतूल- समापत्तेश्चाऽऽकाशगमनम् ॥ ४२॥ भाषा-शरीर औ आकाश के संवन्ध विषयक संयम करने से (च) अथवा (लघुतलसमापत्तेः) सूक्ष्मपदार्थ (तूल) रूई भादिक में संयम द्वारा चित्त की समापत्ति होने से आकाश में गमन रूप फल होता है, अर्थात्-जिस २ स्थान में शरीर की स्थिति होती है वहां सर्वत्र ही आकाश विद्यमान होता है क्योंकि अवकाश केविना शरीर की स्थिति का होना असंभव है औ अवकाश देना आकाश का धर्म है, इस प्रकार तिस आकाश के साथ जो शरीर का व्याप्यव्यापकभाव (२) संवन्ध है तिस में संयम करने वाला जो योगी है यह तिस संबंध को स्वेच्छा- धीन कर लघु रूप वाला हो जाता है अथवा परमाणुपर्यन्त सूक्ष्म पदार्थ तूल आदिकों में चित्त की समापत्ति को प्राप्त कर योगी जितसंबंध (३) हुआ लघुरूपवाला हो जाता है, (१) यहां पर भाष्यकारों ने भाकाम आ गौन की मिदि में परिचिन् यिभार किपा है सो मुमुक्ष मों को अनुपयोगी जाग कर नयाग दिया है। (२) तर व्याप्य है भो आकाश व्यापक है। (२) सपा के दल से ने अधीन रहे वाय भी भाग 4 लिने यह गितमंधवा पातञ्जलदर्शनकाशे- इस प्रकार (१) लघु होने से अनन्तर वह जल के ऊपर चरणों से भी गमन कर सकता है औ फिर उdनाभितंतु (२) में भी स्वच्छंद विहार कर सूर्य की किरणों में सूक्ष्मरूप से प्रविष्ट होकर किरणों में विहार करता है, औ फिर इस योगी को यथेष्ट आकाशगमन का लाभ होता है, अर्थात्-इन दोनों संयमों के अनुष्ठान से योगी अपने को ऐसा सूक्ष्म औ हलका कर लेता है कि सूर्य की किरणों में संचारवाला होकर आकाश में स्वच्छंद प्रचार वाला हो जाता है ॥ ४२ ॥ अब पर के शरीर में प्रवेश करने का कारण तथा क्लेशादि के क्षय करने का कारण अन्य संयम कहते हैं- सू० बहिरकल्पिता उत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः॥४३ ॥ भाषा-(वहिः शरीर से बाहर जो (अकल्पिता) शरीर की अपेक्षारूप कल्पना से रहित (वृत्तिः) चित्त की वृत्ति है, वह महाविदेहा नामक धाराणा है, (ततः) तिस महाविदेहा- नामक धारणा से (प्रकाशाऽऽवरणक्षयः) प्रकाशरूप बुद्धि को । आवरण करनेवाले क्लेश आदिकों का क्षय हो जाता है, अर्थात्-शरीर से बाहर जो किसी विषय में मन की वृत्ति का प्रचार होना वह विदेहानामक धारणा है, सो यह धारणा कल्पिता औ अकल्पितारूप भेद से दो प्रकार की है। (१) सय मिस माग से योगी यो मायाश गमन का काम होता है यह क्रम दिखाते हैं "इस प्रकार" इत्यादि से भर्धात्-इन दोनों संपो द्वारा ग्घु होने से । (१) जो (कोट) पौड़ा गान गातर से सूक्ष्म सूत निक्तासता है यह उdनामि है, सूत । गाग सातु है।
विभूतिवाद।। तहां शरीर में स्थित हुये मन का जो वाह्यदेश में वृत्ति द्वारा प्रचार होना वह कल्पितानामक धारणा है औ शरीर की अपेक्षा से बिना ही जो स्वतन्त्र चित्त का बाहर प्रचार हो जाना वह अकल्पितानामक धारणा है (१)। इन दोनों में से जो कल्पिता विदेहा धारणा है वह साधन है औ अकल्पिता महाविदेहा धारणा साध्य है क्योंकि कल्पिता के अभ्यास से ही अकल्पिताधारणा सिद्ध होती है ऐसे ही नहीं। (२) इस अकल्पितानामक धारणा के होने से ही योगी जन चित्त के प्रचार द्वारा अन्य शरीर में प्रवेश कर यथेष्ट व्यवहार करते हैं, औ प्रकाशरूप बुद्धि के आच्छादन करने वाले जो रजतममूलक क्लेश-कर्म-विपाक-हें वे तीनों भी इस धारणा से क्षय हो जाते हैं ॥ ४३ ॥ इदानी अणिमादि सिन्द्रियों का हेतुभूत जो भूतजय है तिस का साधन कहते हैं- सू० स्थूल-स्वरूप-सूक्ष्मा-ऽन्वया-ऽर्थवत्वसंयमाद् भूतजयः ॥४४॥ भापा-आकाशादि पञ्च भूतों के जो स्थूल-स्वरूप-सूक्ष्म अन्वय-अर्थवत्त्व-यह पञ्च अवस्थाविशेष हैं तिन में संयम करने से भूतजय नामक ऐश्वर्य प्राप्त होता है, (१) यद्यपि प्राकृत पुरषों का भी चित्त शरीर में रिक्त हा ही बारदेश में युधि शाम करता है तथापि इन्द्रियानकर्ष द्वारा ही टन का चित्त बाराविषयों में गमन करता हे सतन्त्र नहीं ओ योगी का चित्त तो इन्द्रिपसन्निकर से रिगा भी चिद्वारा माहादेश में विषयलाभ का यह विशप है। (२) गर इस धारणा का फक पहते है, "इस " इत्यादि में ।
पातञ्जउदर्शनकाशे- (१) तहां पृथ्वी आदि में होने वाले जो शब्द-स्पर्श- रूप-रस-गन्ध-नामवाले विशेष औ आकार आदि धर्म (२) वह भूतों का स्थूलरूप है, औ पञ्चभूतों का जो स्वस्वसा- मान्यधर्म है वह भूतों का द्वितीय रूप जानना। अर्थात्-कठिनता धर्म पृथिवी का स्वरूप है औ स्नेह धर्म जल का स्वरूप है एवं उष्णताधर्म अग्नि का, औ बहुन- शीलता रूप धर्म वायु का, औ सर्वत्र विद्यमानता रूप धर्म आकाश का स्वरूप जानना। यह कठिनतादि धर्म ही स्वस्वसामान्य पद के वाच्य हैं, इस कठिनतादि सामान्य धर्म वाले पृथिवी आदिकों के परस्पर भेद करने वाले शब्दादिक हैं इस से शब्दादि को विशेष कहा जाता है। ऐसे ही पश्चशिखाचार्य जी ने कहा है “एकजा समन्वितानामेपां धर्ममात्रव्यावृत्तिः” (३) इति- (१) यथाकम से स्थूल आदि पदों का अर्थ कहत हैं। तहा ) इत्यादि से । (२) गाकार गरयों का सन्निविशेष, गौरस भारीपन, रोक्ष्य-रुखाई, आच्छा. दनापना, स्थैर्य, सर्वभूताधारता, भेद-विदारग, सहनशीलता, कृशता, कठिनता सर्पभोग्यता, यह ११ एकादश धर्म पृथ्वी के हैं-स्नेह, सूक्ष्मता, प्रभा, शलता, मृदता गौरय, शीतस्पर्श, रक्षा, पवित्रता, संगठन, यह दा धर्म जल के हैं, ऊर्द्धगगनशीलता पवित्रता, दाहशालता, पाचवता,लघुता, मास्त्ररता, प्रधान ओमक शीरता, यह मठधा अग योतिय्यंगगमन, पार्थिनता, आक्षेप-गिरादेना, कम्पन ,शल, शरता, भजा यताका छादन का अभाय, रोक्ष्य, यह भाठ धर्ग वायु के हैं-व्यापकता, विभाग फारना, अवकासप्रदान, यह तीन धर्म भामाश के है। इन राम धगों के सहित पृथ्वी आदि में होनेयाले गो शब्दादिक है यह भूतों व - , स्थकराई। (३) जातियाले पृथी गादियों का गम्क गधुरादि धर्मगान से व्यावृत्ति होर विभूतिपाद।। इन दोनों सामान्य विशेषों का जो समुदाय है सोई योगमत में द्रव्य (१) कहा जाता है, परन्तु वह समुदाय दो प्रकार का है एक तो (प्रत्यस्तमितभेदावयवानुगत ) अर्थात् अवान्तरविभाग के घोधक शब्द कर जिन अवयवों का अवान्तरविभाग नहीं वोधन किया है उन अवयवों में अनुगत जो द्रव्य है वह (प्रत्यस्तमितभेदावयवानुगत) कहा जाता है जैसा कि शरीर, वृक्ष, यूथ, वन, (२) यह समुदाय है, क्योंकि यहां पर अवान्तरविभाग के वोधक शब्द का उच्चारण नहीं किया गया है, औ जहां पर अवान्तरविभाग के वोधक शब्द का उच्चारण किया जाता है वह (शब्दो- पात्तभेदावयवानुगत) समुदाय कहा जाता है जैसा कि उभये देवमनुयाः' यह समुदाय है, यहां पर दो अवयव होवें जिस के यह उभय शब्द का अर्थ है नहां वह दो अवयव है, यद्यपि कठिनतादि धर्म भी पृथ्वा यादिकों के परस्पर भेदक हैं तथापि नौवू- रूप ी से नो अगर रूप पृथ्वी का भेद है उस फ करनेवाला येवल खट्टा मीठा रस ही कहा जायगा इस से रस आदि को विशेष जानना--अर्थात् पृथ्वी का मकादिकों से जो भेद है वह तो फठिनतादिरूप गपाधारण धर्मों से परिज्ञात हो सकता है परनु पृथ्वी से अ य पृथ्वी का भेदक रमादि ही हैं, इस अभिप्राय से ही ( एवजाति समीयतानां ) यह कहा है। (१) अर्धात्-जैसे ताकि लोक सागा विशेष के आश्रय यो द्रव्य मानते है तेने योगी लोक नहीं मानते पितु सागा यविशेष के समुदाय को ही द्रव्य गानते है क्योंषि साह्ययोगगत में समुदाय गो समुदायी धर्म गौ धौ भभिन्न माने नात । (१) हस्तादि अपयों का समुदाय शरीर पद पा पाप्य है, औ शासादि अयपों का समुदाय वृक्ष पद वा याच्य है, गाय पल आदि का समुदाय यूथ पद या पाप है, भी शादि पा समुदाय पन पद का याच्य है, इस सप समुदायों में भयान्तरविभाग या वधासद कोई नहीं उगारण किया गया है केयश समुदायमान उपारण निपा गया है इससे यह ( प्रगनगिन) मादा रहा है। .
- पातजलदर्शनप्रकाश- कौन हैं इस आकांक्षा पर कहा कि देव औ मनुष्य, यहाँ पर इस समूह का एक भाग देव हैं श्री द्वितीय अवयव मनुष्य हैं सो दोनों देवमनुष्याः' इस शब्द कर के उच्चारण किये गये हैं, इस से यह समुदाय (शब्देनोपात्तभेदावयवानु- गत) कहा जाता है, फिर भी यह समुदाय भेद औ अभेद की विवक्षा से दो प्रकार का है, तहां भेद विवक्षा से (आम्राणां वन) अाम्रों का बन है (ब्राह्मणाना संघः) ब्राह्मणों का (संघ) समूह है, यह दो प्रकार का समूह जानना, औ अभेद विवक्षा से आम्रवन, ब्राह्मणसंघ (१) यह दो समूह जानने, फिर भी यह समुदाय दो प्रकार का है, एक युतसिद्ध अर्थात्-जुदे जुदे विरले अवयवों वाला जैसा कि वन औ संघ रूप समुदाय है क्योंकि यहां पर वन के अवयव वृक्ष जुदे जुदे औ विरल प्रतीत होते हैं औ यूथ के अवयव गइया बैल आदि भी पृथक् २ प्रतीत होते हैं, औ एक अयुतसिद्धावयव समूह है अर्थात् पृथक् प्रतीति से रहित मिले हुये अवयवों वाला, जैसा कि शरीर, वृक्ष, पर- भाणु रूप समुदाय है क्योंकि इन के अवयब मिले हुए हैं, इन दोनों प्रकार के समूहों में से जो अयुतसिद्धावयव समूह हे वह पतंजलि मुनि के मत में द्रव्य कहा जाता है, वहीं भूतों का द्वितीय रूप है औ यही स्वरूप पद का अर्थ है, ओ भूतों का कारण जो पंच तन्मात्र है वह सूक्ष्म नामक भूतों का तृतीय रूप जानना, यह जो तन्मात्र हैं सो भी परमाणुओं का अयुतसिद्ध अवयवानुगत समुदाय है। भो ग्राह्मण ही संघ इस प्रकार समूह समुद्री मी बदरिक्षा समानाधिकरण जानना । (१) शाम हो वम, . विभूतिपादः औसर्वकार्यों में अनुगत जो प्रकाश-प्रवृत्ति-स्थितिशील तीनों गुण वह अन्वयनामक चतुर्थ रूप है,ौ पुरुषों के भोग औ अपवर्ग के संपादन करने का जो गुणों में सामर्थ्यविशेष है वह अर्थवत्ता नामक पंचम रूप है, तहां इतना विशेष है कि गुणों में तो भोगापवर्ग संपादन की सामर्थ्य साक्षात् अनुगत है औ तन्मात्र-भूत भौति कों में परंपरा से ( गुणों द्वारा ) अनुगत है एवंच साक्षात् औ परंपरा से सर्वही पदार्थ अर्थवत्ता वाले जानने । (१) इन पंच रूपवाले पंच स्थूल भूतों में संयम करने से भूतों के निखिल स्वरूपों का सम्यग्ज्ञान औ भूतों का जय योगी को प्राप्त होता है अर्थात्-भूतों के पञ्चरूपों को स्वाधीन कर भूतजयी हो जाता है। इस प्रकार भूतों को स्वाधीन होने से फिर जैसे गइयें वत्सों के अनुसारी होती हैं तैसे निखिल ही भूतों की प्रकृतियां योगी के संकल्पानुसार हो जाती हैं, अर्थात् भूतों का स्वभाव योगी के संकल्पानुसार हो जाता है ॥ १४ ॥ अव योगी के संकल्पानुसार भूतों का स्वभाव होने से जो योगी को फल होता है सो निरूपण करते हैं- सू० ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत् तद्- धर्माऽनभिघातश्च ॥४५॥ भाषा-(ततः) तिस भूतजय के होने से (अणिमादि प्रादुर्भावः) अणिमा आदिक आठ सिद्धियों का योगी को (१) इस प्रकार मोक्त पवरूपों वा व्यायान पर गन्न के गर्ग फरान पूर्वक संग ! फर पहले , ' उन' इ गादि में ।
,
.
.
पातजलदर्शनकाशे-
प्रादुर्भाव होता है, औ ( कायसंपत् ) शरीर भी दर्शनीय औ
वलवाला हो जाता है, ( च ) और (तद्धर्मानभिघातः )
भूतों के धर्मों कर योगी को अभिघात नहीं होता है,
अर्थात्-अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य,
वशित्व, ईशितृत्व, यत्रकामावसायित्व, यह आठ सिद्धियां
योगी को प्राप्त होती हैं,
(® ) तहां अणिमा नामक सिद्धि के होने से महान्
परिमाण वाला भी योगी अणुपरिमाण वाला हो जाता
है (१)।यो लघिमा नामक सिद्धि से योगी का शरीर ऐसा लघु
हो जाता है कि तृण की तरह वह आकाश में भ्रमण कर
सकता है, औं महिमा नामक सिद्धि से अल्प परिमाण वाली
भी योगी नाग-नग-नगर परिमाण (२) वाला हो जाता है, ओ
प्राप्ति नामक सिद्धि के होने से योगी पृथ्वी पर स्थित
ही अंगुलि के अग्र भाग से चंद्रमा को स्पर्श कर लेता है,
ओ प्राकाम्य नाम इच्छा के अनभिघात का है, अर्थात्
प्राकाम्यनामक सिद्धि के होने से योगी की इच्छा का
प्रतिघात नहीं होता है किन्तु जो चाहता है सो अवश्य ही ।
हो जाता है इसी से ही वह जल की तरह भूमि में उन्मजन
ओ (३) निमज्जन करने की शक्तिवाला हो जाता है।
(४) अप यथाक्रम से सिद्धियों का उदाहरण द्वारा विवरण करते हैं (तहाँ)
इत्यादि में।
(1) इम ठाणिमा नामक सिद्धि के बस से ही योगा नो देवता, गध-पितृ धादिक
महानुमाय मम हो पर मर्वत्र विचरते हुने किसी के दृष्टिगोचर नहीं होते हैं।
(0) नाग-हरनी, नगर, नगर-माम !
(१) नये गा को उदोदन पर गा में मार हो जाता है तेमे प्रगती
॥
विभूतिपादः। औ भौतिकों को अपने अधीन कर लेना औ आप उन के अधीन न होना. यह वशित्वनामक सिद्धिं है, इस वशिवनामक सिद्धि के होने से योगी के अनुसारी हुये भूत अपने धर्म को भी त्याग देते हैं। भूत औ भौतिकों के उत्पत्ति स्थिति नाश करने में जो सामर्थ्य विशेष वह ईशितृत्वना- मक सिद्धि है। औ यत्रकामावसायिता नाम सत्त्यसंकल्पता का है, इस यत्रकामावसायितानामक सिद्धि के होने से जैसे योगी का संकल्प होता है तेसेही भूतों के स्वभाव का अव- स्थान हो जाता है, इसी से ही वह योगी चाहे तो अमृत की जगह विषभोजन करा कर भी पुरुष को जीवित कर सकता है । यहां पर इतना विशेप यह भी जान लेना कि यद्यपि वह योगी सर्व सामर्थ्य वाला है तथापि पदार्थों की शक्तियों का ही वह विपर्यास कर सकता है कुछ पदार्थों का नहीं, अर्थात्-चन्द्रमा को सूर्य औ सूर्य को चन्द्रमा कर देना औ विप को अमृत कर देना इस प्रकार पदार्थों का विपर्यय योगी नहीं कर सकता है, किन्तु विप में जो प्राण- वियोग करने की शक्ति है उस को निवृत्त कर उस में जीवन शक्ति का संपादन कर देता है अर्थात्-पदार्थों (१) का विपर्यय होना नित्य सिद्ध ईश्वर के संकल्प से विरुद्ध है इस से वह नहीं होता है औशक्तियां तो पदार्थों की अनियत है इस से उन के विपर्यय करने में कोई दोप नहीं है। को उदभेदन पर भी उद खड़ा होता है, इस का नाम उन्मजन है, से जल में गोता मारते हैं इस प्रकार पृथिवी ने भी प्रवेश कर जाना इस का नाम निमजा है। (१)-अर्मात-नियसिद्ध योगिराज ईश्वर के संकलमानुसार ही योगियों का संकल्प होता है से ही नहीं इस से पदार्थों वा विपर्याय बद नहीं कर सकते हैं।
- अग्रिम सूत्र पानञ्जलदर्शनकाशे- भाव यह है कि-योग से बिना जो नित्यसिद्ध सत्य- संकल्प ईश्वर है तिस का यह संकल्प है कि सूर्य सूर्य ही रहे नौ चन्द्रमा चन्द्रमा ही रहे तो फिर इस के विरुद्ध योगी का संकल्प कैसे होसकता है । यह जो आठ प्रकार का ऐश्वर्य है सो भूतजय का फल है (१), इसी प्रकार कायसंपत् भी भूतजय का फल जानलेना । कायसंपत् का अर्थ सूत्रकार आप ही श्रीमुख से से कहेंगे इस से यहां पर उस के विवरण की आवश्यकता नहीं है, इसी प्रकार तद्धर्मानभिघात भी भूत- जय का फल जान लेना, अर्थात्-पृथिवी अपने कठिनतारूप धर्मद्वारा योगी के शरीर की क्रिया कारुकावट नहीं कर सकती इसी से ही योगी शिलर' आदिकों के भीतर भी प्रवेश कर सकता है, औ स्नेह वाले जल भी योगी के शरीर को आई (गीला) नहीं कर सकते, नो उपणस्पर्श वाला अग्नि भी योगी के शरीर का दाह नहीं कर सकता है जो नित्य वहनशील वायु भी योगी के शरीर को कंपायमान नहीं कर सकता है औ अनावरण रूप आकाश में भी आवृतकाय हुआ योगी सिद्धों कर के अदृश्य हो जाता है, अर्थात्-आकाश में स्थित योगी को कोई भी नहीं देख सकता है, इसी का नाम तद्धर्मानभि- घात है ॥ ४५ ॥ (१) यहां पर इतना यह विशेष है कि भूतों के स्थक रूप में सयम करने से आदि को चार सिद्धिया होती है, जो द्वितीय सरप में सयम करने से इच्छानभिधात होता है जो तृतीय सूक्ष्मरूप में सयम करने से पशिव सिद्धि होती है औ धनुर्थ अन्ययरूप में सपा से ईशिताप, गौ पचा मयतारप में सपा करनेसे सत्यसकरपता सिद्धि होती है।
विभूतिपादः। ha इदानीं कायसंपत् का अर्थ कहते हैं- स०रूप-लावण्य-बल-वजूसंहननत्वानि कायसम्पत्॥४६॥ भाषा-दर्शनीयरूप तथा (लावण्य) कान्ति, औ वल, तथा ( वजसंहननत्व) वजसदृश दृढ अवयवयुक्तत्व, यह कायसंपत् कही जाती है, अर्थात्-योगी का शरीरकमनीय औ अतिमनोहर तथा दर्शनीयरूपवाला एवं कान्ति वाला तथा अतिवलशील औ वज्र के तुल्य दृढ़ हो जाता है ॥ ४६ ॥ इस प्रकार फल के सहित भूतजय का उपाय कथन कर इदानी इन्द्रियजय का उपाय कथन करते हैं- सू० ग्रहणस्वरूपाऽस्मिताऽन्वयाऽर्थवत्त्वसंयमा- दिन्द्रियजगः ॥४७॥ भाषा-ग्रहण, स्वरुप, अस्मिता, अन्वय, अर्थवत्त्व, इन पांच रूपों में संयम करने से योगी को इन्द्रियजय प्राप्त होता है। अर्थात्-इन्द्रियों के इन पांच रूपों में संयम करने से निखिल इन्द्रिय योगी के वशीभूत हो जाते हैं। तहां सामान्यविशेषरूप जो शब्दादि(७) ग्राह्य विषय औ विषयाकार इन्द्रियों की परिणामरूप वृत्ति यह ग्रहण , (0) यात में महां पर घटादि विषय लिखने की मी हे तहाँ माग्य-योग गत शम्दादियिषप यह पद सिता जाता है।
पातखलदर्शनकाशे- पद का अर्थ है सो(१) यह इन्द्रियोंकी वृत्ति केवल सामान्य मात्र विषयक नहीं होती है किन्तु सामान्य-विशेष उभय विषयक ही है क्योंकि यदि विशेष विषयक इन्द्रियों की वृत्ति न मानी जाय तो इन्द्रियों कर अग्रहीत वह विशेष मन कर के कैसे निश्चित होगा क्योंकि बाह्य इन्द्रियों के अधीन हुआ ही मन बाह्य विषयों में अनुव्यवसाय वाला होता है, स्वतन्त्र नहीं इससे सामान्यविशेषरूप विषयाकारही इंद्रियों की वृत्ति जाननी,यहमहणनामक इन्द्रियों काप्रथमरूप है, औ प्रकाश रूप महत्तत्व का परिणाम जो अयुतसिद्धा वयवरूप साकि अहंकार है तिस में कार्यरूप से अनुगत जो सामान्यविशेषसमूहरूप द्रव्य वह इन्द्रियोंका स्वरूप ' अर्थात्-सात्विक अहंकार का कार्य जो प्रकाशस्वरु द्रव्य वह इन्द्रिय है, यह इन्द्रियों का स्वरूप नाम दुसरा रूप है, और इन्द्रियों का कारण जो अहंकार वह इन्द्रियों का अस्मितानामक तृतीय रूप है, औ व्य साय रूप महत्तत्व के आकार से परिणाम को प्राप्त प्रकाश-क्रिया-स्थितिशील गुण वह अन्वय नामक इन्द्रियों का चतुर्थ रूप है अर्थात्-अहंकार के सहित इन्द्रियों को मह- तत्व का परिणाम होने से ओ महत्तत्त्व को गुणों का परि- णाम होने से तीनों गुण इन्द्रियों में अनुगत है इस से गुणों को अन्वयरूप कहा जाता है, ओ गुणों में अनुगत (१) पामा य नाम गनुगत धर्म का है जिस यो ताफिक माति कहते हैं तो विशेष नाम धर्गी का है, तहा बौद्ध लोग यह गानते है कि सामान्य तो इंद्रिया है गो विशेष गन कर को प्राध है, इस रत के दृष्टता के अर्थ रहते है (मो यही इत्यादि-- 1 , विभूतिपादः। जो पुरुप के भोगापवर्गसंपादन की सामर्थ्य वह अर्थवत्त नामक इन्द्रियों का पंचमरूप है, इन पांचों इद्रियों के रूप में योगी को यथाक्रम संयम करना चाहिये, फिर संयम से तिस तिस रूप के जय द्वारा पंच रूपों का जय होनेसे योगी को इन्द्रियजय प्राप्त होता है अर्थात्-इन्द्रियगण योगी के अधीन हो जाता है ॥४७॥ इन पंचरूप विशिष्ट इन्द्रियों का जय होने से जो फल होता है सो निरूपण करते हैं- सू० ततो मनोजवित्वं विकरणभावःप्रधानजयश्च॥४८॥ भापा-(ततः) तिस इन्द्रियजय होने से मनोजविस्व, औ विकरणभाव, तथा प्रधानजय, यह तीन फल होते हैं, तहां देह को अनुत्तम गति के लाभ का होना मनोजवित्व कहा जाता है अर्थात् मन की तरह शीघ्र ही अनेक योजन व्यवहित देश में गमन करने की शरीर में सामर्थ्य होना मनोजवित्व कहा जाता है। ओ विदेह इन्द्रियों का जो अभिलपित देश कालादिकों में वृत्ति का लाभ होना वह विकरणभाव कहा जाता है, अर्थात्-जिस देश (१) वा काल वा विपयों में योगी की अभिलाषा होती है उन देशादिकों में शरीर की अपेक्षा से विनाही इंन्द्रियों की वृत्ति हो जाती है, अर्थात् हरिद्वार में स्थित हुआ ही प्रयागराज में स्थित पुरुपों को नेत्रों से देस सकता है, इसी का नाम विकरणभाव है, यो निखिल (१) देश-बागीद, माल मनोन गादि, मिग हा आदि।
पातञ्जरदर्शनप्रकाशे- कारण तथा कार्य को वश कर लेना यह प्रधानजय है (१), यह तीनों सिद्धियां योगमत में मधुप्रतीका नाम से कही जाती हैं, औ इन्द्रियों के पंचरूपों के जय से यह प्राप्त होती हैं ॥४८॥ इदानीं जिस विवेकख्याति के लिये यह सब संयम निरुपण किये गये हैं (२) उस विवेकख्याति का अवान्तर- फल कहते है- सू० सत्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठा- तृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥४९॥ भाषा-( सत्त्वपुरुषाऽन्यताख्यातिमानस्य ) प्रकृति औ पुरुष के विवेकनिष्ठ चित्त वाले योगी को ( सर्वभावा ऽधिष्ठातृत्वम् ) निखिल पदार्थों के अधिष्ठातृ (स्वामी) पने का लाभ होता है (च) और ( सर्वज्ञातृत्वम् ) निखिल- पदार्थों के यथार्थ ज्ञान का लाभ होता है। अर्थात्-जिस समय चित्त रजतमरूप मल से युक्त था उस समय वह चित्त वशीभूतनहीं था जव फिर मैत्री आदि भावना के अभ्यास से वह चित्त परवेशारद्य (३) में वर्तमान (१) यद्यपि इद्रियो विषयका सर्यम से इन्द्रियगय द्वारा इन्द्रिप ही योगी के यश होने चाहिये प्रमान शादिष नहीं तथापि पवरूपविशिष्ट इद्रियों के मय होने से प्रधानमय भी पल जान 511 (२) मुम्पत ता सपना था गिरपण विषयायाति के हो अर्थ है परतु उस में प्राये प ग प सपनों का गिर पण हे इस लिये सर्व ही सयम वियवाल्याति के पि मानने। (१) ससस सभा पिकापता के प्रशाद का - RA - विभूतिपादः। होता है तब वह चित्त योगी के वशीभूत हो जाता है, तिस चित्त के वशीभूत होने से विवेकख्याति में प्रतिष्ठित हुये योगी को सर्वपदार्थों के स्वामित्व का लाभ होता है, अर्थात्-जड़ औ प्रकाश रूप जितने गुणमय पदार्थ हे वह सव क्षेत्रज्ञरूप स्वामी के भोग्य औ दृश्य हो कर उपस्थित हो जाते हैं, इसी से ही वह योगी निखिल प्रपंच का स्वामी कहा जाता है, औ सेवक की तरह निखिल ही भूत भौतिक उस के संकल्प के अनुसार चेष्टा वाले हो जाते हैं, इसी प्रकार अतीत-अनागत-वर्तमान वस्तुरूप से परिणाम को प्राप्त जो गुण त्रय हैं उन का भी (अनमोपारूढ ) युगपदुत्पन्न विवेक जन्य ज्ञान होता है, अर्थात् एक काल में ही निखिल पदार्थों का यथार्थ साक्षात्कार हो जाता है, इसी से ही वह योगी सर्वज्ञ कहा जाता है। यह जो सर्वभावाधिष्ठातृत्व ओ सर्वज्ञातृत्व है इसी का नाम योगशास्त्र में विशोका सिद्धि है क्योंकि इन दोनों धर्मों के होने से योगी शोक रहित हो जाता है, तथा सर्वज्ञ औ क्षीणक्शबंधन(१) औ वशी होकर सर्वत्र विहार करता है॥६॥ अन्य सब संयमों को पुरुषार्थाभासरूप फल वाले होने से विवेकख्याति संयम ही मुख्य पुरुषार्थ रूप फल वाला है, इस वार्ता को दिखाने के लिये पर वैराग्य की उत्पत्तिद्वारा विवेक ख्याति का मुख्य फल कहते हैं- सू० तद्वेराग्यादपि दोषवीजक्षये कैवल्यम् ॥५०॥ (१) निवृत्त हो गये हैं भनिनादिशा पधन निम ये यशो' मुगा सकी।
) A ३११ पातजलदर्शनकाशे- भाषा-(तद्वैराग्याद्) तिस विवेकख्याति विपयक वैराग्य होने से ( दोपवीजक्षये ) रागादि दोषों का वीजभूत जो अविद्या तिस के क्षय होने पर (कैवल्यम्) आत्यन्तिकदुःख निवृत्तिपूर्वक स्वरूपप्रतिष्ठा रूप कैवल्य फल होता है, (अपि) (१) और पूर्वोक्त फल भी होता है। अर्थात्-क्लेश कर्म के क्षय होने से जव योगी को यह जो विवेकप्रत्ययरूप धर्म है वह बुद्धिरूप सत्व का धर्म है औ बुद्धि जो है वह अनात्म होने से हेयपक्ष के अन्तर्भूत है औ पुरुप जो है सो बुद्धि से भिन्न औ अपरिणामी है) इस प्रकार के विवेक से विवेकख्याति में वैराग्य उदय होजाता है तब उस पर वैराग्य वाले पुरुप के चित्त में विद्यमान जी लेशवीज हैं वह दग्धशालिवीज की तरह अपने अंकुरोत्पा दन में असमर्थ हुये मन के सहित ही नष्ट होजाते हैं, औ तिन केशादिकों के प्रलीन होने से फिर यह पुरुप आधा त्मिकादि तीनों तापों को नहीं भोगता है, श्री कर्म क्लेश वि. पाक रूप से चित्त में विद्यमानगुणों का प्रतिप्रसव अर्थात् चरितार्थ हुये गुणों का मन के सहित ही स्वकारण में लय हो जाता है, यही पुरुप का आत्यन्तिक गुणवियोग है औ इसी को कैवल्य कहते हैं, औ इसी दशा में चितिशक्ति। रूप पुरुप स्वरूपप्रतिष्ठित कहा जाता है, औ यही योग की परम सीमा है ॥ ५० ॥ (१) सूत्र में अपि शब्द भिन्न क्रम है-अर्थात् जिम के समाग पढा है उम के मह सरय न कर "वैवल्यम् " इस पद के साथ अन्यय करना, तथा च, यह अर्थ हुआ किवोल कि पाति या सर्वक्षतादि ही फल है यह नहीं मानना कि तु पर येराग्य पारा अमाप्रज्ञात समाधि के सम होने पर वैल्य भी इमो का फल है। .
विभूतिगादः। इदानीं मुक्ति के साधनों में प्रवृत्त हुये योगिजनों को जो विघ्न उपस्थित होते हैं उन के निवारण का कारण निरूपण करते है- सू० स्थान्युपनिमन्त्रणेसङ्गस्मयाऽकरणं पुनरनिष्ट- प्रसङ्गाद् ॥ ५१ ॥ भाषा-(स्थान्युपनिमन्त्रणे + ) देवताओं की सत्कार- पूर्वक प्रार्थना होने पर, उन के कथन में (सशस्मयाऽकरणम्) सङ्ग भी विस्मय न करे, क्योंकि (पुनरनिष्टप्रसङ्गाद् ) फिर अनिष्ट की प्राप्ति होने से, 2 अर्थात्-जव देव गण अप्सराओं के सहित प्रान कर ब्रार्थना करें कि चलो स्वर्ग में भोग भोगने के लिये तव इन के कहे को न मानें औ न कुछ गर्व करे क्योंकि ऐसे करणे से फिर भी जन्ममरणरूप दुःख वना ही रहता है- भाव यह है कि (१) चार प्रकार के योगी होते हैं एक तो प्रथम कल्पिक औ द्वितीय मधुभूमिक ओ तृतीय प्रज्ञा- ज्योति औ चतुर्थ अतिक्रान्तभावनीय, तहां जो अभ्यासी प्रवृत्तमात्रज्योति है अर्थात् संयम में तत्पर होने से पर- चितज्ञान आदि सिद्धियों के उन्मुख हे वह प्रथम कल्पिक योगी है, औजो समाधि द्वारा तम्भा प्रज्ञा वाला है (1) स्थानी नाम इद्रादि देवताओं का है गो उपनियत्रण नाम सगीप जाकर पार पूर्वक प्रार्थना का है। (1) गर जिन योगियों यो नि उपस्थित होने की समायना है उनके निसय रिय योगियों के भेद कहते है-" माय यह है कि " इत्यादि में।
पातञ्जलदर्शनकाशे- भापा (तद्वैराग्याद्) तिस विवेकख्याति विषयक वैराग्य - होने से । दोपवीजक्षये ) रागादि दोपों का बीजभूत जो अविद्या तिस के क्षय होने पर (कैवल्यम्) आत्यन्तिकदुःख निवृत्तिपूर्वक स्वरूपप्रतिष्ठा रूप कैवल्य फल होता है, (अपि) (१) ओर पूर्वोक्त फल भी होता है । अर्थात्-क्लेश कर्म के क्षय होने से जव योगी को (यह जो विवेकप्रत्ययरूप धर्म है वह बुद्धिरूप सत्त्व का धर्म है औ वुद्धि जो है वह अनात्म होने से हेयपक्ष के अन्तर्भूत है औ पुरुष जो है सो धुद्धि से भिन्न औ अपरिणामी है) इस प्रकार के विवेक से विवेकख्याति में वैराग्य उदय होजाता है तब उस पर वैराग्य वाले पुरुष के चित्त में विद्यमान जो क्लेशवीज हैं वह दग्धशालिबीज की तरह अपने अंकुरोत्पा दन में असमर्थ हुये मन के सहित ही नष्ट होजाते हैं, औ तिन क्लेशादिकों के प्रलीन होने से फिर यह पुरुप आधा त्मिकादि तीनों तापों को नहीं भोगता है, औ कर्म क्लेश वि. पाक रूप से चित्त में विद्यमानगुणों का प्रतिप्रसव अर्थात् चरितार्थ हुये गुणों का मन के सहित ही स्वकारण में लय हो जाता है, यही पुरुप का प्रात्यन्तिक गुणवियोग है औ इसी को कैवल्य कहते हैं, श्री इसी दशा में चितिशक्ति । रूप पुरुष स्वरूपप्रतिष्ठित कहा जाता है, औ यही योग की परम सीमा है ॥ ५.०॥ (१) सूत्र में अपि शब्द भिन्न कम है-अर्थात् जिम के समीप पहा है उस के सङ्गमय न बार "काल्यम्" इस पद के साथ अन्यय पारना, तथा घ, यह अर्थ हुआ निपल विक पाति या सर्वज्ञतादि ही फल है पर नहीं मानना किन्तु पर वैराग्य नारा अमाप्रज्ञात ममाधि के लाभ होने पर पेशव्य भी इसी का फल है।
विभूतिपादः। इदानीं मुक्ति के साधनों में प्रवृत्त हुये योगिजनों को जो विघ्न उपस्थित होते हैं उन के निवारण का कारण निरूपण करते हैं- सू० स्थान्युपनिमन्त्रणेसङ्गमयाऽकरणं पुनरनिष्ट- प्रसङ्गाद् ॥५१॥ भाषा-( स्थान्युपनिमन्त्रणे + ) देवताओं की सत्कार- पूर्वक प्रार्थना होने पर, उन के कथन में (सङ्गन्मयाऽकरणम्) सङ्ग भी विस्मय न करे, क्योंकि (पुनरनिष्टप्रसङ्गाद् ) फिर अनिष्ट की प्राप्ति होने से, अर्थात्-जब देव गण अप्सराओं के सहित आन कर गर्थना करें कि चलो स्वर्ग में भोग भोगने के लिये तब इन के कहे को न माने औं न कुछ गर्व करे क्योंकि ऐसे करणे से फिर भी जन्ममरणरूप दुःख वना ही रहता है- भाव यह है कि (१) चार प्रकार के योगी होते हैं एक तो प्रथम कल्पिक औ द्वितीय मधुभूमिक औ तृतीय प्रज्ञा- ज्योति औ चतुर्थ अतिकान्तभावनीय, तहां जो अभ्यासी प्रवृत्तमात्रज्योति है अर्थात् संयम में तत्पर होने से पर- चितज्ञान आदि सिद्धियों के उन्मुख है वह प्रथम कल्पिक योगी है, औजो समाधि द्वारा ऋतम्भा प्रज्ञा वाला है (1) स्थानी नाग इन्द्रादि देवताओं का हे ओ उपनिमन्त्रण नाम सगीर जाकर कार पूर्वक प्रार्थना का है। (1) अब निन योगियों को चिन्न उपस्थित होने की संभावना है उन के निश्चय के लिये योगियों के भेद कहते हैं-" भाव यह है कि " इत्यादि से। .
-
पातमकदर्शनकाशे-
औ
भूत.तथा इन्द्रियों के जीतने की इच्छा वाला है वह
मधुभूमिक योगी है, औ जिस ने पूर्वोक्त संयम से भूत
औ इन्द्रियों को अपने अधीन कर लिया है ओ परचित्त
ज्ञानादि में कृतरक्षावन्ध (१) है औ विशोकादि सिद्धियों
के लिये यतशील है वह तृतीय प्रज्ञाज्योति है, औ जिस
योगी को असंप्रज्ञातसमाधिद्वारा केवल चित्त का विलय.
रूप कर्तव्य ही अवशिष्ट है अन्यत् किञ्चित् भी कर्तव्य
नहीं है औ.इसी से ही सप्तविध प्रांन्तभूमि प्रज्ञा (२) के
लाभ वाला है वह अतिक्रान्तभावनीय चतुर्थ योगी है।
तहां इन योगियों में से जो प्रथमकल्पिक योगी है
तिस को तो महेन्द्रादिकृत प्रार्थना की प्राप्ति ही नहीं है,
क्योंकि वह अभी योग में प्रवृत्तमात्र है, औ जो तृतीय
भूतेन्द्रियजयी योगी है उस को स्वतः ही अणिमादि ऐश्वर्य
शाली होने से देवगण प्रलोभन नहीं कर सकते हैं, औं जो
अतिकान्तभावनीय चतुर्थ योगी है वह परवैराग्यशील होने
से किसी की परवाह ही नहीं रखता, इस प्रकार परिशेप से
ऋतम्भराप्रज्ञावाला द्वितीय योगी ही देवता कृत उपनिमंत्रण
की योग्यता वाला जानना क्योंकि इस को ऐश्वर्य की प्राप्ति
सिद्ध नहीं है ओ न परवेराग्य ही है, तहां इस मधुमतीभूमि
के साक्षात्कार करनेवाले द्वितीय योगी की बुद्धि की शुद्धि को
देखते हुए इन्द्रादि देव उस योगी के समीप आनकर स्वर्गीय(३)
(१) अर्थात् परचित्त ज्ञानादि सिद्धियों के लाभ याला है।
(२) यह द्वितीय पाद के २७ सूत्र के व्याख्यान में २०० पृष्ट पर स्पष्ट है।
(३) स्वर्ग में होने वाले।
विभूतिपादः। विमान अप्सराप्रभृति को दिखला कर उस के प्रलोभन के लिये इस प्रकार सत्कारपूर्वक प्रार्थना करते हैं कि "भोरिहा- ऽऽस्यताम्, इह रम्यतां, कमनीयोऽयं भोगः, कमनीयेयं कन्या, रसायनमिदं जरामृत्युं वाधते, वे हायसमिदं यानम् अमी कल्पद्रुमाः, पुण्या मन्दाकिनी, सिद्धा महर्पयः उत्तमा अनु- कूला अप्सरसः दिव्ये श्रोतचक्षुषी, वजोपमः कायः, स्वगुणैः सर्वमिदमुपार्जितमायुष्मता; प्रतिपद्यतामिदमक्षयमजरमम- रस्थान देवानां प्रियम्” इति, ( हे योगिन् -- आप यहां स्थित होइये, औ यहां ही रमण करो, देखिये यह क्या कमनीय भोग है औ यह कैसी कमनीय कन्या है, औ यह कैसा सुंदर रसायन(१)है जो कि जरा औ मृत्यु को दूर करता है, औ यह आकाश में चलने वाला विमान है, औ यह श्राप के भोग के लिये कल्पद्रुम उपस्थित हैं औ यह पवित्र मंदाकिनी गंगा आप के स्नान के लिये उपस्थित है औ यह सिद्ध औ महर्षि आप के सत्कार के लिये उपस्थित हैं, भी यह उत्तम औ अनुकूल रमणीय अप्सरायें आप की सेवा में उप- स्थित हैं, औ जिस प्रकार योगवल से आप के कर्ण औ नेत्र दिव्य हैं औ शरीर व सदृश दृढ़ है इसी प्रकार योगवल से आप ने यह पूर्वोक्त भोग उपार्जन किया है इस लिये देवताओं को प्रिय जो अक्षय तथा अजर अमर स्थान है उस को आप प्राप्त हो कर आनंद भोगो)। (1) इन अमरगों के ललित वचनों का भाषानुवाद करते हैं "हे जोगिम्" , इत्यादि से। (१) रमागन नाम अलौकिक ऑपधाधिशेष या है।
पातञ्जलदर्शनकाश- इस प्रकार उन देवताओं के कथन से लोभयुक्त हुवा योगी उन की बातों में विश्वास करके संग न करे किंतु संग- दोप की भावना करे, (१)अर्थात्-अपने मन में यह विचार करे कि (इस घोर संसार रूप अंगारों में पच्यमान ओवारंवार जन्म मरण रूप अन्धकार में भ्रमण करते हुये मैं ने किसी प्रकार से इस योगरूप दीपक का लाभ किया है जोकि क्लेशरूप अन्धकार के नाश करने वाला है तिस इस योगरूपी दीपक के यह विपय रूप वायु विरोधी हैं (२) क्योंकि यह विषय रूप वायु वासना से उत्पन्न हुये अनेक प्रकार के विषय भोग ओतृष्णा को उत्पन्न करते हैं, सो मैं अव योगज्ञान रूप प्रकाश को, प्राप्त हो कर फिर किस तरह विषय रूप मृगतृष्णा से वञ्चित हुवा इस संसार रूप अग्नि का अपने को इन्धन करूं, अर्थात् जान बूझ कर मैं क्यों संसार रूप अग्नि में अपने को लकड़ी की तरह जलाऊं, इस से हे देवगण आप को तथा तुच्छ जनों कर के प्रार्थना करने योग्य इन स्वप्नोपम अप्सरादि विषयों को मैं नमस्कार ही करता हूं, आप की स्वस्ति कल्याण हो आप मेरे पर कृपा करें) इस प्रकार निश्चितमति हो कर फिर समाधि के अनुष्ठान में तत्पर होवै, इस प्रकार विषयों के बीच में दोषदृष्टि द्वारा उन में थासक्ति का अभाव कर फिर स्मय भी न करे, (१) अब जिस प्रकार से सनदोष की भावना करनी चाहिय वह प्रकार दिखाते " अर्थात् " इत्यादि से। (२) नेमे बाह्य वायु दीप का विरोधी है तैसे विषयरूप वायु योग दीपक का विरोधी हैं। २.
विभूतिपादः। ३१९ अर्थात्-मैं इतने प्रभाव वाला योगी हूं कि देवता भी मेरी प्रार्थना करते हैं इस प्रकार गर्व वा अहंकार न करे क्योंकि ऐसे अभिमान करने से वह योगी अपने आप को सुस्थित अर्थात् कृतकृत्य मान कर मृत्यु करके पकड़ा हुआ अपने को न जान कर समाधि से उपराम हो जायगा, तब फिर निरन्तर योगी के छिद्रों को देखने वाला यो महान् यत्न से निवृत्त होने योग्य जो प्रमाद है वह समाधि से उपरामतारूप छिद्र को प्राप्त हो कर फिर क्लेशों को प्रवल कर देगा, उस से फिर योगी को अनिष्ट की प्राप्ति हो जायगी अर्थात् योग से भ्रष्ट हो कर अनेक संकटों में पड़ जायगा, औ जव पूर्वोक्त प्रकार से संग श्री गर्व नहीं करेगा तो भावित अर्थ(१) दृढ़ हो जायगाओ भावनीय अर्थ उस के अभिमुख हो जायगा, इस से संग ओ गर्व का त्याग कर निरन्तर योग के अनुटान में ही तत्पर रहे जिस से परंवैराग्य द्वारा असंप्रज्ञात समाधि का लाभ कर विशोक हो कर जीवन्मुक्तता को प्राप्त हो जाय क्योंकि यही योग की परम सीमा है ॥ ५१ ॥ अव निःशेषरूप से सर्वज्ञता का कारणभृत जो विवेक जन्य ज्ञान है तिस का साधनभूत संयम कहते हैं- सू० क्षणतत्कमयोः संयमाद् विवेकजं ज्ञानम् ॥५२॥ (1) मया द्वारा संपादन कर दिया बो पर चित्त बान आदि का भाषित अर्थ भी निक गाति के अभ्याम से विशेषा में लेकर परपेशाय पर्यत पोमपादन करने योग्य है वह मारनीय यं काहा माना है।
पातसर दर्शनप्रकाश- भांपा-क्षण औक्षण के क्रम विषयक संयम करने से योगी को विवेकज ज्ञान प्राप्त होता है। (१) तहां जैसे लोष्ट () आदि का विभाग करने पर जिस अवयव का विभाग न हो सके ऐसा जो अति सूक्ष्म अप- कर्षपर्यन्त द्रव्य वह परमाणु कहा जाता है तैसे परमापकर्ष पर्य्यन्त जो अति सूक्ष्म निर्विभाग काल है वह क्षण पद का वाच्य है। अथवा जितने समय में परमाणु चल कर पूर्व देश का परित्याग कर उत्तरदेश को प्राप्त होता है (+) उतने काल का नाम क्षण है। इन क्षणों का जो प्रवाहाविच्छेद (२) वह क्रम पद का अर्थ है सो यह क्रम वास्तव नहीं है किन्तु काल्पिनिक क्योंकि एक काल में एकत्रित न होनेवाले क्षणों के समा. हार का असम्भव होने से क्षणसमाहाररूप क्रम का संभव होना विचार से विरुद्ध है, जिस तरह से क्षण समाहाररूप क्रम अवास्तव है इसी प्रकार क्षणों का समाहाररूप जो घटिका-मुहूर्त-प्रहर-दिन-रात्रिरूप काल है यह भी अवास्तव जानना, अर्थात्-क्षण ही अविवेकी जनों को विकल्पवृत्ति(३) से (१) क्षण औ क्रम का लक्षण कथन करत हुये सूत्र के अर्थ को स्पष्ट करते हैं "तहाँ' इत्यादि से। (*) बोष्टनाम माटी के ढेले का है। (+) परमाणुमान देश को उल्लघन करता है। (१) क्षणों का जो उत्तरोत्तर भाव रूप से ययस्पान होना यह प्रयाह शब्द का अर्थ है उस प्रवाह का नो अविच्छेद अविरल बनेर तर्य यह क्रमपद का अर्थ है । (७) शन्दगान से प्रतात होने वाला नो अर्थशू य अर्थ वह विकलावृत्ति का विपय है, यह प्रथा पाद में राष्ट है। .
विभूतिपादः।
घटिका आदि पद कर के व्यवहार विषय होता है परमार्थ
से तो क्षण से अतिरिक्त घटिकादि काल का सम्भव ही नहीं
है, इसी से ही काल के वास्तवरूप को जानने वाले योगी
जन क्षण को ही मुख्य काल मानते हैं अन्य को नहीं,
भाव यह है कि क्षणों का नैरन्तर्य रूप जो क्रम है तिस
को आश्रयण करने वाला जोक्षण सो वास्तव है औ तिन क्षणों
का जो क्रम है सो अवास्तव है क्योंकि पूर्वले क्षण से जो उत्तरले
क्षण का अविरलल रूप प्रानन्तर्य यह क्रम कहा जाता
है औ सो क्रम दोक्षणों का एक काल में अवस्थानरूप जो
समाहार तिस के अधीन है औ दो क्षणों का समाहार होना
असम्भव है, इस से एक वर्तमान क्षण ही वास्तव जानना
पूर्वोत्तर क्षण औ तिन का समाहार नहीं।
जिस तरह समाहार के असम्भव से क्रम कल्पित है
इसी प्रकार समाहार के अभाव से घटिका आदि भी कल्पित
हैं यह योगशास्त्र का सिद्धान्त है।
एवं च योगमत में एक वर्तमान क्षण को ही अर्थक्रिया
में समर्थ होने से वही सब व्यवहार का आश्रय है औ तिस
क्षण कर ही सव लोक परिणाम (१) को अनुभव करते हैं
यो पूर्वोत्तर जो क्षण हैं वह सब सामान्य से उस में समनुगत
हैं यह निष्पन्न हुआ।
(२) तहां पूर्वोक्त क्षण औ कम विषयक संयम करने से
योगी को क्षण औ क्रम का साक्षात्कार होता है प्रो लिस
(१) डोटा पडा, नया पुरातन यह वार कृत परिणाम जानना ।
(२) ३५ प्रकार क्षण भी कम मा सम्पहार मन का ी in "तहा"इयादि मे ।
पालजलदर्शनकाशे- से फिर .विवेकज ज्ञान का आविर्भाव होता है ॥ ५२ ॥ अब इस विवेकज ज्ञान का उदाहरण दिखाते हुये विवेकज ज्ञान का अवान्तर फल (6) कहते हैं सू० जातिलक्षणदेशैरन्यताऽनवच्छेदात् तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥ ५३॥ भाषा-जाति, लक्षण औ देश करके ( अन्यताऽ नवच्छेदाद् ) भेद का निश्चय न होने से, जो (तुल्ययोः ) समान पदार्थों का (प्रतिपत्तिः ) भेद का ज्ञान, वह (ततः) तिस विवेकज ज्ञान से होता है, . अर्थात्-जहां पर जाति आदिकों से दो पदार्थों के परस्पर भेद का निश्चय नहीं हो सकता है तहाँ केवल विवेकज ज्ञान से ही भेद का निश्चय होता है, भाव यह है कि लोक में जो दो पदार्थों के परस्पर भेद का ज्ञान है वह तीन कारणों से होता है कहीं जातिभेद से औ कही लक्षणभेद से भी कहीं देशभेद से(१),तहां समान देश में स्थित ओ समान वर्णवाली (२) जो गाय ओ वडवा (1) है इन दोनों के भेद की प्रतीति का हेतु गोत्वादि जाति का भेद है, यो जहां पर गोत्र रूप जाति भी समान है श्री पूर्वत्व रूप देश भी समान है तहां पर जो कालाक्षी औ (*) अर्थात् --मुए पफक इस का पोल्य है, इसी से इस ज्ञान का नाम अग्रिम ५४ सूत्र में तारक कहा है। (५) गर्नेक व्यक्तियों में अनुगत जो सामान्य धर्म यह आति है, औ अमाधारण धर्म का नाग पक्षण है जो देश नाम पूर्णव तथा परस्य का है। (२) रागान पूर्ण पालो कहने मे दोनों का एक पक्षण बोधन किया (ल.) बड़या जोड समान
विभूतिपादः।
स्वस्तिमती (१) गाय का परस्पर भेद है तिस का हेतु काला-
क्षित्व औ स्वस्तिमत्व रूप लक्षण का भेद है, श्री जहां पर
जाति भी आमलकत्व रूप तुल्य है औ वर्तुलन (गोलाकार)
रूप लक्षण भी दोनों का तुल्य है तहां पर जो दोनों
आमलकों का परस्पर भेद है तिस का हेतु पूर्वत्व आदि
देश भेद है, इस प्रकार लोक में जाति भेद औ लक्षणभेद
ओ देश भेद यह तीन पदार्थो के भेद के हेतु हैं, परन्तु जहां
पर यह तीनों ही भेद के हेतु नहीं हैं तहां पर जो भेद
ज्ञान होना वह विवेकज ज्ञान का फल है,
अर्थात्-जहां पर पहिले तुल्य जाति श्री लक्षण वाला एक
आमलक योगी के पूर्वदेश में स्थित हो ओ एक उत्तर देश में
स्थित हो ओ फिर योगी के अन्यव्यग्र (२) होने पर योगीके
ज्ञान की परीक्षा के अर्थ किसी पुरुष ने उत्तर देश में स्थित
आमलक को वहां से उठा कर उस देश में पूर्व देशस्थ
आमलक को स्थापन कर दिया हो तहां पर उस आमलक
का जो उठाये हुये आमलक से भेद ज्ञान है वह लौकिक
प्राज्ञ (३) को होना असंभव है क्योंकि वहां पर भेद के
कारण जाति-लक्षण-देशों का भेद नहीं है परन्तु योगी
(१) काले नेपाली गायको कालाक्षी कहते हैं, औ मस्तक पर उर्द्धचन्द्रादिक
चिह वाली गाय को स्वस्तिमती कहते हैं ।
(२) मामलका की ओर दृष्टि गो धान के आभार पूर्वक जो अप किसी पदार्म
में दृष्टि भी धान का हो जाना वह अन्यन्यनता है।
(३) योगदक से बिना नो मय प्रमाणों से व्यवहार करने वाला है वह लौकिक
प्राज्ञ पहा जाता है।
३२४
पातञ्जलदर्शनकाशे-
असंदिग्ध ज्ञान वाला होने से वहां भी भेद जान सकता है,
एवंच ऐसे२ स्थलों में जो भेद ज्ञान होना वह विवेकज ज्ञान
का फल जानना।
परन्तु यह ज्ञान योगी को किस प्रकार होता है इस
पर भाष्यकारों ने यह कहा है कि-पूर्व आमलक के संग
समान ( एक ) क्षण वाला जो देश है वह उत्तर आमलक
सहक्षण वाले देश से भिन्न है श्री तिन दोनों आमलकों
के स्वदेश सहित क्षण के ज्ञान से वह दोनों आमलक भी
भिन्न हैं, तहां पर योगवल द्वारा जो उस आमलक के अन्य
देश सहि तक्षण का यथार्थ ज्ञान है यह दोनों पामलकों के
भेद ज्ञान का कारण है (१)। जिस प्रकार आमलकों का
योगी को भेदज्ञान होता है इसी प्रकार परमाणुओं का भी,
परस्पर भेदज्ञान जान लेना,
अर्थात्-समान जाति-लक्षण-देश वाले जो परम सूक्ष्म
परमाणु हे उन का भेदज्ञान भी क्षण के साक्षात्कार से
जान लेना,
जो कि वैशेषिक लोक यह मानते है कि ( नित्यद्रव्य
में वर्तने वाला जो विशेष पदार्थ है वही परमाणु आदि
निरवयव द्रव्यों (२) का भेदक है) सो यह उन का मानना
अयुक्त है क्योंकि वेशेपिक मत में भी जाति-लक्षण-देश
(१) यह सब योगाभ्यास से बिता वृद्धि में आना पठिन है।
(२) यद्यपि सायपर द्रव्यों का अश्या भेद से ही भेदज्ञान हो सकता है तथा
निरसय द्रव्यों के मेरा विशेष पदार्थ माना है, इस विशेष पदार्थ यो गानने से ही
पणादातानुपायी पेशेषिक यहे नाते हैं।
विभूति रादः। ३२५ मूर्ति (१) व्यवधान आदि से भेदज्ञान का संभव होने से निरर्थक एक विशेष पदार्थ मानना गौरव ग्रस्त है। यहां पर इतना विशेष है कि-जाति आदि के भेद से पदार्थों का भेदज्ञान होना तो साधारण है औ क्षण भेद से भेद ज्ञान होना यह केवल योगी के ज्ञान कर के गम्य है। औ जहां पर इन भेदों के कारण जाति आदिकों का अभाव होता है वहां पर लोकों को भेद ज्ञान नहीं होता है, इसी से ही वार्षगण्याचार्य ने यह कहा है कि "मूर्ति-व्यवधि जाति- भेदाभावान्नास्ति मूलपृथक्त्वम् ” इति । अर्थात्-जगत् के मूलभूत प्रधान का(पृथक्त्व)भेद नहीं जाना जाता है क्योंकि मूर्ति व्यवधान जाति आदि जो भेद के कारण हैं उन का प्रधान में अभाव होने से, अर्थात्-पूर्व जो द्वितीय पाद में (9) यह कहा है कि विवेकी की दृष्टि में यद्यपिपूधान नष्ट है तथापि अन्य जनों की दृष्टि में वह अनष्ट ही है तहां जो नष्ट औ अनष्ट पूधान का परस्पर (२) मर्तिनाम-अवयव सन्निवेशविशेष का है, अर्थात्-विशुद्ध या न्यून या वक अवयव वाले पदार्थ का जो मलिन औ अधिक तथा सरळ अवयव वाले पदार्थ से भेद ज्ञान है उस का हेतु अवयवसन्निवेशविशेष है, एव कुश द्वोष का औ पुष्कर द्वीप का जो परस्पर भेद है उस का हेतु व्यवधान जान लेना, माति आदि का उदाहरण पूर्व कह चुके हैं, एवंच नाति, लक्षण, देश, मूर्ति, व्यवधान यह पांचभेद के कारण है यह निष्पन्न हुमा, तहां यह विशेष है कि मूर्ति तो केवल साययवपदार्थो का भेदक है ओ माति आदि साययव निरवयव साधारण के भेदक है । तथाच नलीय औ पार्थिव परमाणु का परस्पर भेदक जाति तथा लक्षण है को पार्थिव परमाणुओं का परस्पर भेद करने वाला देश भंद है इस से निरर्थक विशेष पदार्थ मानना अयुक्त है। (*) १९० पृष्ठ पर देग्यो ।
३२६ पातञ्जलदर्शनकाशे- भेद है वह जाति आदि से नहीं जाना जाता किन्तु शास्त्रीय, विवेक से ही जाना जाता है, . भाव यह है कि ऐसे २ विषयों में लोकिक हेतुओं से भेद ज्ञान नहीं होता किन्तु विवेक वा योगवल से होता है ॥५३॥ इस प्रकार विवेकजज्ञान का अवान्तर फल कथन कर इदानी लक्षण कथन द्वारा मुख्य फल दिखाते हैं- सू. तारकं सर्वविषयं सर्वथा विषयमक्रमं चेति विवेकज ज्ञानम् (*) ॥५४॥. भाषा-(तारक) संसार सागर से तारने वाला ( विषयम् ) पदार्थ मात्र को विपय करने वाला (१) (सर्वर विपयं) सर्व प्रकार से सर्व को विषय करने वाला अर्थात्- अवान्तर विशेष धर्मों के सहित भूत-वर्तमान-अनागत काल में होने वाले पदार्थों को जानने वाला (अक्रम) विना क्रम से एक काल में होने वाला (इति) ऐसा जो ज्ञान है वह विवेकज ज्ञान कहा जाता है। अर्थात्-कैवल्य का हेतु तथा स्वप्रतिभोत्पन्न (२) अनोपदेशिक, औ अतीत-अनागत-वर्तमान-सूक्ष्म-व्यवहित विप्रकृष्ट पदार्थांविषयक जो विलंब से विना ज्ञान वह विवेकज ज्ञान जानना, इस विवेकज ज्ञान का ही नाम परिपूर्ण ज्ञान है, औ सम्प्रज्ञात योग भी इसी ज्ञान का ही एक अंश सर्व (७) वियोग ज्ञान-यह वक्ष्य है, ओ शेप पद सब लक्षण हैं । (१) अर्थात् ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो इस ज्ञान का विषय न हो । (२) विना उपदेश से अपने अनुभव से उत्पन्न ।
विभूतिपादः। है, औ यह ज्ञान ही योग मत में तारक कहा जाता है औ ऋतम्भरा प्रज्ञा से इस ज्ञान का प्रारम्भ होता है औ सप्त प्रकार की प्रज्ञा (१) के हो जाने से यह समाप्त होता है । ऐसे ज्ञान के होने से ही योगी कर्तव्य से रहित हुआ ब्रह्मविद्वरिष्ट औ जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ ५४ ॥ इस प्रकार परंपरा से कैवल्य के हेतु भूत संयमों का निरूपण कर संयम के प्रकरण को समाप्त कर अब कैवल्य का साक्षात् साधन कहते हैं- सू० सत्व (4) पुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ॥ ५५॥ भाषा-(सत्त्वपुरुपयोः ) बुद्धि औ पुरुष की (शुद्धि- साम्ये ) शुद्धि के तुल्य हो जाने से (२) (कैवल्यम् ) मोक्ष होता है, इति-शब्द पाद की समाप्ति का बोधक है। अर्थात्-विवेकख्याति के हो जाने से ही पुरुष कैवल्य को प्राप्त हो जाता है पूर्वोक्त विवेकज ज्ञान हो चाहे न हो, अर्थात्-जिस समय(३) बुद्धिसत्व रज-तम रूप मल से रहित हो कर केवल विवेकख्यातिमात्र में तत्पर हुअ दग्ध क्लेश वीज वाला हो जाता है तिस समय वह शुद्ध कहा जाता है, यही पुरुष की शुद्धि के समान बुद्धि की शुद्धि कही (१) साप्त प्रकार की प्रज्ञा का निरूपण द्विताय पाद के २७ सूत्र स्पष्ट है। () सत्य नाम बुद्धि का है, इसी को ही बुद्धिसत्व वहते हैं । (२) बुद्धि औ पुरुष की तुल्य शुद्धि हो जाने को ही विवेक ख्याति कहते हैं। (३) शुद्धिसाम्ये इम पद वा सष्ट गर्थ करने के लिये पहिले युद्धि पी शुद्धि का सरा निरूपण करते हैं "जिस सग" इसादि से ।
1
पातञ्जलदर्शनकाशे-
जाती है , औ अविवेकदशा में उपचार रूप से पुरुष
में
प्रतीयमान जो धुद्धि का धर्म भूत भोग उस का एक वार ही
अभाव हो जाना यह पुरुष की शुद्धि है, यह जो बुद्धि औ
पुरुप का एक सरीखा शुद्ध हो जाना इसी का नाम शुद्धि-
साम्य है इस अवस्था के होने से ही योगी कैवल्य को
प्राप्त हो जाता है चाहै वह योगी ईश्वर होचाहै अनीश्वर हो।
अर्थात्-पूर्वोक्त संयमों के बल से ऐश्वर्य वाला जो
योगी है अथवा संयमों के अभाव से ऐश्वर्या से रहित जो
योगी है इन दोनों को कैवल्य का हेतु केवल विवेकख्याति ही
है कुछ संयम जन्य सिद्धि रूप ऐश्वर्य नहीं क्योंकि विवेक
ज्ञान रूप अग्नि से अविद्यादि क्लेश वीजों के दग्ध होने पर
फिर अन्य सिन्द्रि आदिकों की मुक्ति के लिये विवेकी
कुछ अपेक्षा नहीं है, औ(१) यह जो इस विभूतिपादमें अनेक
प्रकार के ऐश्वर्य रूप तथा अलौकिक ज्ञान रूप सिद्धियों का
निरूपण किया है सो तो केवल परंपरा से अन्तःकरणशुद्धि
द्वारा चा विश्वास द्वारा ही कैवल्य का उपयोगी जानना कुछ
वास्तव से वह ऐश्वर्य कैवल्य के हेतु नहीं है क्योंकि
यह योगशास्त्र का सिद्धान्त है कि-ज्ञान के होने से अज्ञान
की निवृत्ति होती है औ अज्ञान के निवृत्त होने पर रागादि
क्लेशों का अभाव होता है औ क्लेशों के अभाव से कर्म औ
विपाक का अभाव हो जाता है फिर इस अवस्था में समा-
(4) उपचार नाम गोपाधिश का है यह सब प्रथादके चतुर्थ सूत्र में स्पष्ट है।
(१) यदि पूर्वोक्त विभूतियों की योनल्य में ओक्षा नहीं है तो इम पाद में इन
पानि क्यों किया इन आराधा का मगाभान माग्ने है,
"यह जी" इन्गादि में।
५ , विभूतिपादः ३२९ साधिकार हुए २ गुण पुरुष के सन्मुख दृश्यत्व रूप वा भोग्य रूप से परिणाम को प्राप्त हो कर उपस्थित नहीं होते हैं क्योंकि विवेक ख्याति के होने से गुणों का अधिकार समाप्त हो जाता है, बस यह जो ज्ञान के होने से अविद्या के नाश पूर्वक गुणों के अधिकार की समाप्ति हो जानी इसी का नाम पुरुष का कैवल्य है (१) अर्थात्-इस अवस्था के होने से ही पुरुष प्रकाशस्वरूप मात्र श्री अमल हुआ केवली हो जाता है, एवंच विवेक ख्याति ही केवल कैवल्य का कारण है अन्य सिद्धि आदिक नहीं यह फलित हुआ ॥ ५५ ॥ दोहा-(२) अन्तरङ्ग योगाङ्ग पुन, परिणामन को ख्यान । संयम भूति ज्ञान भन, कियो पाद अवसान ॥ इति श्रीमनिखिल शास्त्र निष्णात योगिराज स्वामिवालरामोदासीन परमहंसोभासिते पातञ्जलदर्शनकाशे विभूति पादस्तृतीयः । (१) कैवल्य, अगवर्ग, निर्वाण, मुक्ति-गोक्ष-गुणाधिकारसमाप्ति, सरूपायस्थिति, वास्तवात्मस्वरूगाभिव्यक्ति, परमधाम- परमपद यह सब शब्द एकार्थक हैं । (२) इस पाद में उक्त अर्थ का संग्राहक दोहा कहते हैं ( अन्तरंग ) इत्यादि, अर्थात् इम पाद में योग के अन्तरङ्ग माग औ तीन प्रकार के परिणाम भो संयम विभूति-विवेकमज्ञानादि का निरूपण किया है। इति श्रीमदासीनात्मस्वरूप शास्त्रिममुद्दीपिते प्रकाशटिप्पणे तृतीयः पादः । -- डोम् नमोऽन्तामिणे । पातजलदर्शनप्रकाशे कैवल्यपादस्तुरीयः । दो वास्तव फैल कैवल्य हित, पादि तुरीय अनूप । करत प्रकाश महेश नम, पालराम यति-भूप ॥१॥ इस प्रकार प्रथम-द्वितीय-तृतीय पादों से समाधि-तत्सा धन-विभूतियों का प्राधान्य से निरूपण किया औ प्रासङ्गिक(१) तथा औपोद्घातिक अन्य भी कुछ व्युत्पादन किया अब केवल समाधिजन्य कैवल्य का निरूपण करना अव: शिष्ट है परन्तु जब तक कैवल्य की योग्यता वाला चित्त तथा परलोक में गमनशील औ क्षणिक विज्ञान से अतिरिक्त स्थायी आत्मा, तथा प्रसंख्यान की परम काष्टा आदि विषयों का व्युत्पादन न किया जायगा(२) तब तक कैवल्य के स्वरूप का यथार्थ व्युत्पादन नहीं होगा इस लिये उन सब के निरू- पणार्थ यह चतुर्थ कैवल्य पाद आरम्भ किया जाता है । तहां पहिले पञ्च प्रकार के सिद्ध चित्तों में से कैवल्य की योग्यता वाला चित्त कौन है इस अर्थ के निर्णयार्थ पञ्च प्रकार की सिद्धियों का निरूपण करते हैं- उदासीन कवि-भूप, शिक्षा-विद्या-प्रद गुरु । आतमरूप, पाद तुरीय विवर्ण-हित ॥१॥ (१) प्रासङ्गिक प्रसग से प्राप्त नो क्षणिक याद तथा परमाणुपुञ्ज आदि का खण्डन । औपोद्घातिक प्रकृतशास्त्रप्रतिपाद्य जो योग तिस के उपयोगी विचार का नाग उपोद्घाते हैं तिस से प्राप्त जो वृत्तिभेदादि का निरूपण यह औपोद्घातिक है । (२) यहाँ पर भी इन विषयों का निरूपण प्राधान्य से है गो प्रसंग से पूर्वजगी सदभाव, चित्तपरीक्षा प्रकृत्यापूगदि का निरूपण मानना । .
पातालदर्शनमकाश- सू० जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाःसिक्ष्यः ।।१॥ भाषा-जन्म, औषधि, मंत्र, तप, समाधि, इन पांचों से जन्य पांच प्रकार की सिद्धियां हैं। तहां जैसे पक्षियों को जन्म से ही आकाशगमनादि सामर्थ्यविशेष होता है तैसे स्वर्गीय (१) कमों के अनुष्ठान से जो मनुष्य देह से अजन्तर देवयोनिरूप देहान्तर की प्राप्तिमात्र से आकाशगमनादि सामर्थ्यविशेप हो जाना वह जन्मजन्य सिद्धि कही जाती है, औ लोहगुग्गुलु (२) आदि रसायन के सेवन से जो देवसदृश सामर्थ्य के लाभ द्वारा जरा ओ व्याधि से रहित हो जाना वह औपधजन्य सिद्धि जाननी, ओ मंत्रों के अनुष्ठान से जो आकाशगमन वा अणिमादि का लाभ हो जाना वह मंत्रजन्य सिद्धि जाननी, भो तप के चल से संकल्पसिद्धि होने से जो काम- रूपीओ कामग हो जाना वह तपोजन्य सिन्द्रि जाननी, - , (१) स्वर्ग के साधनभूत धर्म को स्वर्गीय वर्ग कहते हैं । (२) यह सम -"अय पुल गुग्गुलुरात्र योज्य पलत्रय व्योप गलानि पन, पलानि भष्टो त्रिफलारजश्च व लिहन यात्यमरवाव" इत्यादि ग्रन्थ से भावप्रकाश में स्पष्ट है, एक पक लोहचूर्ण, नोन पक गुग्गुलु गौ पंच पल व्योप-अर्थात् शुण्ठी मरीच पिप्पली औ आठ पल त्रिफला, इन को मिला कर एक वर्ष सेवन करने से देवभाव को प्राप्त होता है यह इस का अर्थ है, तहा शास्त्रीय प्रमाण से चार कर्ष का एक पक औ १६ पेडश मामे या एक कर्प औ पञ्च गुजा का एक माता जानना। (३) जिस रूप की कामना करे या जिस अणिमादि की कामना करे तिस की प्राप्ति जिम को हो जाय वह कामरूपी कहा जाता है, जहा चाहे तदा गान करनेवाले का नाम कामग है। .
कंवल्यपादः। श्री पूर्वपाद में निरूपिन जो सिद्धियां हैं वह सब समाधि जन्य सिद्धियां जाननी, इस प्रकार सिद्धियों के पांच भेद से सिद्धों के भी पंच भेद जान लेने ॥१॥ इन पूर्वोक्त सिद्धों को जो पूर्वजातीय शरीर इन्द्रियों के वदल जाने से अन्यजातीय नूतन अलौकिक शरीर इन्द्रियों का लाभ होता है वह किस से होता है ? इस आशंका के निवारण अर्थ जात्यन्तरपरिणाम का हेतु निरूपण करते हैं-- तत्र कायेन्द्रियाणामन्यजातीयपरिणतानाम् (8)- सू० जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूराद् ॥ २॥ भाषा-(तत्र अन्यजातीयपरिणतानां कायेन्द्रियाणाम्) नहां मनुष्यादि जाति रूप से परिणाम को प्राप्त शरीर-इन्द्रियों काजो (जात्यन्तर परिणामः) नूतन देवजाति आदि रूप से परिणाम हो जाना वह ( प्रकृत्यापूराट् ) प्रकृतियों के आपूर से होता है। अर्थात्-औषधादि साधनों के अनुष्ठान से पूर्व जो मनुष्यादि जाति रूप से परिणाम को प्रात शरीर औ इंद्रिय हे उन का जो सिद्धि के वल से पूर्वले परिणाम के त्यागपूर्वक नूतन देवतादि जाति रूप परिणाम से हो जाना है वह प्रकृत्यापूर (१) से जानना, अर्थात्-शरीर के कारणभूत जो पञ्चभूत तथा (*) इतने पाठ का भाष्यकारों ने इम सूत्र के आदि में अव्याहार किया है। (१) प्रकृन्यापूर-प्रक्षति नाग उपादान कारग का है, जो आपूर नाम अपने काय? में गायों के प्रदेश का है, इसी को स्पष्ट करते हैं "र्थात्" इत्यादि से ।
पातजलदर्शन मकाशे । इन्द्रियों का कारणभूत जो अहंकार यह सब अपने २ विकारों पर नूतन स्वच्छ अपने अवयवों के प्रवेश द्वारा अनु. ग्रह करते हैं, यह जो अनुग्रह करना है इसी का नाम प्रकृत्यापूर है। परन्तु (१) यह अनुग्रह पूर्वोक्त मंत्रादिसाधन से जन्य धर्मादि निमित्त की अपेक्षा वाला है कुछ निरपेक्ष नहीं इस से सब को इस का लाभ नहीं होता है। यहां पर इतना विशेष यह भी जान लेना कि--जहां पर महिमादि सिद्धि रूप परिणाम होता है तहां प्रकृति के नूतन अवयवों का प्रवेश जानना औ जहां पर अणिमादि- रूप परिणाम होता है तहां प्रकृति के अवयवों का अपगम (निकस जाना) जानना (२) । इसी प्रकार से जो वामन अवतार के शरीर का क्षण भर में त्रिभुवनव्यापित्वरूप परिणाम है, औ श्रीकृष्ण जी के शरीर का जो विश्वरूपत्वादि परिणाम है औ एक ही बालक के शरीर का जो कौमार यौवनादि रूप से परि- णाम है ओ एक ही वटवीज का जो वृक्षादि रूप से परि- णाम है वह सब प्रकृत्यापूर से जान लेना ॥२॥ यह जो आपूर है सो क्या प्रकृतियों का स्वाभाविक धर्म हे अथवा धर्मादि निमित्त की अपेक्षा वाला होने से (१) पदि प्रत्यापूर मे ही नतन देहादि का लाभ हो जाता है तो सब को क्यों नहीं होता, इस माशका का वारण करते हैं "परन्तु" इत्यादि से । (२) एष अगस्न्यादि मुनियों का जो मुद्रामादि करना लिखा है यह भी प्रा. सरगमेगान लेगा।
कैवल्यपादः। नैमित्तिक है, इस सन्देह के होने पर यदि कोई यह कहै कि-सव को न होने से धर्मादिजन्य ही है स्वाभाविक नहीं (१) इस आक्षेप का वारण करते हैं- सू० निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवद् ॥ ३॥ भाषा-(निमित्तम्) धादिक जो निमित्त है, वह (प्रकृ- तीनाम्) प्रकृतियों का (अप्रयोजकम्) प्रयोजक नहीं है (तु) किन्तु (ततः) तिस धर्मादिक से ( वरणभेदः ) प्रतिबंधक की निवृत्ति होती है, (क्षेत्रिकवद्) खेत जोतने वाले किसान की तरह (२)। अर्थात्-जैसे कृषीवल(३) जल से भरे हुए एक केदार (४) से अन्य केदार में जल लेजाने की इच्छावाला हुआ २ कुछ अपने हाथ से जल को खींच कर उस केदार में नहीं ले जाता है किन्तु जल के गमन का प्रतिबन्धक जो आलवाल (५) है उस को वह भेदन कर देता है फिर उस आलवाल के (१) यदि स्वाभाविक हो तो प्राणिमात्र को प्रकृत्यापूर का लाभ होना चाहिये यह इन का आशय है । (*) वरण नाम आवरण का है इसी को हो प्रतिवन्धक कहते हैं। (२) धर्मादिक प्रतिबन्धक के निवर्तक हैं कुछ स्वतन्त्र कारण नहीं इस अंश में यह दृष्टान्त जानना, इसी को स्पष्ट करते हैं " अर्थात् " इत्यादि से ! (३) क्षेनिक औ कृपीवल किसान नाम हैं। (४) केदार नाम खेत के बीच में होने वाले छेटे २ विभागों (हिस्मों ) का है निध को पनाव में कियारा कहते हैं। कोप में तो केदार क्षेत्र यह दोनों एकापक हैं। (५) भारवाल नाम उस का है जो कि केदारों के चारों ओर मट्टी कसा सेतु होता है इसी को रुशायट से केदार का जम बाहर नहीं नासकता है।
पातञ्जलदशनकाशे- भेदन होने से जल आप ही अन्य केदार में प्रवेश जा करता है तैसे धर्म भी प्रकृतियों के आपूर का प्रयोजक (१) नहीं है किन्तु आपूर के प्रतिबंधक (न होने देने वाले ) अधर्म का भेदक (निवर्तक) है, फिर प्रतिबंधक के निवृत्त होने पर प्रकृतियां आप ही अपने २ कायों के ऊपर अब- यवों के अनुप्रवेश द्वारा अनुग्रह करती हैं कुछ धर्म उस का प्रयोजक नहीं है। भाव यह है कि-धादिक केवल प्रकृत्यापूर के निमित्त मात्र हैं कुछ प्रयोजक नहीं क्योंकि कारण ही कार्य का प्रयोजक होता है कुछ कार्य कारण का नहीं (२) ओ धर्मा- दिक तो प्रकृति के कार्य हैं इस से वह प्रकृति के प्रयोजक नहीं हो सकते। एवंच आपूर प्रकृतियों का स्वाभाविक धर्म हे औ (३ धर्मादिक प्रतिबंधक की निवृत्तिद्वारा उस में निमित्त हैं यह सिद्ध हुआ। यद्वा (क्षेत्रिकवद्) इस का यह अर्थ जानना कि-(जैसे खेत में वोये हुए धान्यादिकों के मूलों (जड़ों) में जल के प्रवेश करने में कृपीवल स्वतंत्र कारण नहीं होता है किन्तु मूल में जल जाने के प्रतिबंधक जो उपमूल (2) में उत्पन्न (१) प्रयोजन नाम स्वतन्त्र पारण का है, इसी को हेतु कहते हैं। (२) जो जिम से उत्पन्न होने वाला है यह उम वा कदापि हेतु नहीं हो साता है क्योंकि यह परतत्र हे भो स्वतन वारण का नाम हेतु है। (३) यदि स्वाभाविक है तो योगादिन य धर्म का क्या नाम है, इस शमा के गियारणार्थ कहते हैं " औ" इत्यादि से। (४) उपक नाग धाय रे गुल के माप का है।
- कैवल्यपादः। गयेधुक श्यामाक (१) आदि तृण हैं उन को वहां से उत्पा- टन कर अलग कर देता है फिर उन के उपाड़ देने से जल आप ही धान्यों के मूलों में प्रवेश कर जाता है कुंछ कृषी- वल उस का हेतु नहीं है तैसे धर्म भी प्रकृति की प्रवृत्ति के प्रतिबंधक अधर्म के निवृत्तिमात्र में कारण है कुछ प्रकृति की प्रवृत्ति में नहीं। अर्थात्-शुद्धि औ अशुद्धि का परस्पर विरोध होने से धर्म अपने विरोधी अधर्म को निवृत्त कर देता है फिर प्रति- बन्धक के निवृत्त होने पर प्रकृति आपही अपने अवयवों पर अनुग्रह करती है कुछ धर्म उस का हेतु नहीं है। जिस प्रकार से धर्म प्रकृत्यापूर में निमित्त है इस तरह अधर्म को भी प्रकृत्यापूर में निमित्त जानना, तहां (२) इतना विशेष है कि जहां निकृष्ट योनि से उत्तम योनि रूप शुद्ध परिणाम की प्रांति होती है वहां पर धर्मको अधर्म की निवृत्ति द्वारा निमित्त जानना औ जहां उत्तम योनि से अनन्तर निकृष्ट योनि रूप अशुद्ध परिणाम की प्राप्ति होती है तहां पर अधर्म को धर्म की निवृत्ति द्वारा निमित्त जानना (७) । (१) बिना जोतने भी बोने से जल के सब-1 मत्र से उसन्न होनेवा के क्षुद्र तृण विशयों क यह नाम हैं। . - (२) कौन स्थान में धर्म प्रकृन्यापूर में निमित्त है, औ किस स्थान में अपर्म इन मेत्त है इस मामाझा के होने पर कहते हैं ' तहा ' इत्यादि से । (6) अर्थात्-मत्त्वगुणवहुल शरीर-इन्द्रियों के परिणाम में धर्म निमित्त है जो तमोगुणक शरीर इन्द्रियों के परिणम में अधर्म निमित्त मानना ।
पातञ्जलदर्शनप्रकाश- तहां धर्म का उदाहरण नंदीश्वर (१) जानना औ अ- धर्म का उदाहरण नहुप-अजगर (२) जानना ॥३॥ अव जिस समय योगी अनेक शरीरों द्वारा किसी व्यवहार करने की इच्छा वाला हुआ स्वशरीर के तुल्य अनेक शरीरों को रचता हे तिस समय वह सब निर्मित शरीर एक मन वाले होते हैं (8) वा अनेक मन वाले? इस विकल्प के होने पर अन्तिमकल्प (+) को सिद्धान्त कहते हैं- सू० निर्माणचित्तान्यस्मितामात्राद् ॥ ४ ॥ भाषा-(अस्मितामात्राद् अहंकाररूप उपादान कारण मात्र को ग्रहण कर (निमाणचित्तानि) निर्माण चित्तों (३) को योगी रचता है। अर्थात्-जितने शरीरों को योगी धारण करता है उतने ही चित्तों का योगी निर्माण करता है, इससे निखिल ही (१) न दी नामक मनुष्य शिवपूजन ध्यानादि से ज य धर्म से ईश्वर भी अमर हुआ है, यह द्वितीय पाद के १२ मूत्र के व्यारयान में १ष्ट है । (२) इ द्रभार को प्राप्त हुआ नह पनामा गमा अगत्यादि मुनियों के अपमान से न य गर्म से भाजगर सर्ग हुशा यह भी द्वितीय पाद के १२ सुन्न में राष्ट है। (*) अर्थात्-अनंगा शरीरों को निर्माण करने वाला जो योगी है उस के शरीर में वर्तने या चित मे ही अ य मद शरीरों में समयादि व्यवहार होता है या सम शरीर भिन्न २ वित्त वाले हात है। (1) अर्थात- -सब शरीरों में गिन्न २ चित्त होता है यह अत का पक्ष यंग शभिदात है। (३) माहार हो या 7 हॉग में महामात्र में ही जो चित्त नये रचे जात है पर निगणिचित हे जाते हैं।
चत्यपाद। योगी के शरीर भिन्न भिन्न(१) चित्त वाले होते हैं ॥४॥ यदि अनेक चित्त माने जायंगे तो प्रत्येक २ चित्तों के अभिप्रायों को भिन्न २ होने से एक अभिप्राय के अनुसार व्यवहार नहीं होगा (२) इस से विलक्षण एक ही चित्त अनेकशरीरवर्ती मानना चाहिये ? इस भाक्षेप का वारण करते हैं- सू० प्रत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥५॥ भाषा-( अनेकेषाम् ) अनेक चित्तों की ( प्रवृत्तिभेदे) प्रवृत्तिविशेष में ( एक चित्तम् ) एक चित्त (प्रयोजकम् प्रेरक जानना। अर्थात्-अनेक चित्तो की भिन्न २ प्रवृत्ति न होय किन्तु एक किसी चित्त के अभिप्रायानुसार ही हो, इस वार्ता को विचार कर पह योगी एक चित्त को सब का नायक, (३) बना देता है, अर्थात्-पूर्व सिद्ध (४) जो योगी का चित्त है उसी को सब का नियामक कर देता है, तब फिर उसी नायक चित्त के अभिप्रायानुसार ही सब की प्रवृत्ति होती है कुछ स्वतन्त्र नहीं, इस से अनेक चित्त मानने में कोई दोप नहीं यह फलित हुआ ॥ ५ ॥ (१) यद्यपि सूत्रवार ने कण्ठ से अमेक चित्त नहीं कह हैं तथापि निर्माण- चित्तानि ) इस बह वचन से अनेक चित्तों का लाभ जानना । (२) भिन्न २ चित्तों के भिन्न २ सत्य होने से योगी को यथेष्ट व्यवहार का लाभ नहीं होगा। (३) प्रयानक, नायक, नियामक, सामा, यह सब सार्थक हैं। (२) यागी के शरार में जो प्रथम वर्तमान चित्त है वह पूर्वसिद्ध मानना ।
पातजलदर्शनप्रकाश- इस प्रकार प्रांसङ्गिक विचार को समाप्त कर अव पूर्वोक्त पञ्च प्रकार के सिद्ध(१) चित्तों में से जो कैवल्य की योग्यता वाला सिद्ध चित्त है उस का निश्चय करते हैं सू० तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥६॥ भाषा-(तन)तिन पांच प्रकार के सिद्ध चित्तों के मध्य में से, जो ध्यानज़म) ध्यानजन्य सिद्ध चित्त है, वह (अनाशयम् ), आशय-(२) वासना से रहित है। अर्थात् प्रथम सूत्र में कथित पांच प्रकार की सिद्धियों के भेद से जो पञ्च प्रकार के सिद्ध चित्त हैं उन में से समाधिजन्य सिद्धि वाले योगी का जो चित्त है वही कैवल्य की. योग्यतावाला हैं अन्य सिद्धचित्त नहीं क्योंकि अन्य जो सिद्धचित्त हैं वह रागादि का हेतुभूत वासना कर वासित होने से पुण्य पाप के संबंधी हैं औ योगी का जो -चिंच है वह क्षीण क्लेश होने से वासना से विमुक्त हैं, इसी से ही वह पुण्यपाप के संबंध वाला नहीं (0) हैं ॥ ६ ॥ योगी को पुण्य-पाप का संवन्ध नहीं है ओ इतरों को है, इस में हेतु कहते हैं- " (1) पच प्रकार की सिद्धियों के भेद से पन प्रकार के सिद्ध मानने यो पञ्च प्रकार के सिदो के भेद से पच प्रकार के सिद्ध चित्त नानने । (२) आशय नाम- -कर्ग गोशों की वासना का है। (4) यद्यपि योगी भी यान साधि आदि कर्मों का अनुष्ठान , करता है तथापि पद कर्म पुष्पजनक नहीं है क्योंकि रागादि पूर्वक ही कर्मानुष्टान पुण्य का पाए का मनका पोता काछ सेवन कर्गानष्टान नहीं, यह सब द्वितीय पाद में २३ मूत्र में स्पष्ट है ।
कैवल्यपादः। सू० कर्माऽशुक्लाऽकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥७॥ भाषा-( योगिनः ) योगी का, जो ( कर्म ) यमनिय- मादिक कर्म है, वह ( अशुक्लाऽकृष्णम् । अशुक्ल औ अकृष्ण है, ( इतरेपाम् । योगी से इतर जनों के जो कर्म हैं वह (त्रिविधम्) शुक्ल, कृष्ण, शुक्लकृष्ण, भेद से तीन प्रकार के हैं। अर्थात्-कृष्ण, शुक्लकृष्ण, शुक्ल, अशुक्लाऽकृष्ण, इन भेदों से चार प्रकार के कर्म हैं, तहां तमामूलक तथा दुःखरूप फल देने वाले जो ब्रह्महत्यादि रूप दुरात्माओं के कर्म हैं वह कृष्ण कहे जाते हैं, औं रजोमलक तथा दुःखमिश्रितसुख रूप फल देने वाले जो वाह्यसाधन (9) साध्य यज्ञादि कर्म है वह शुक्लकृष्ण कहे जाते हैं क्योंकि यज्ञादिक परपीडा (१) औ परानुग्रह द्वारा पुण्यो पाप के जनक हैं, औ सत्त्वमूलक ' तथा सुखमात्रफल देने वाले जो मनोमानसाध्य तप, ( २ ) स्वाध्याय, ध्यान आदि कर्म हैं वह शुक्ल कहे जाते है क्योंकि परपीडाकर न होने से स्वाध्यायादि केवल पुण्यमात्र का जनक हैं औं गुणामूलक तथा सुखदुःख रूप फल से शून्य जो सम्प्रज्ञातसमाधि' आदि कर्म हैं वह अशुक्लाऽकृष्ण कहे जाते हैं, अर्थात्-क्षीणक्लेश चरमदेह(३) वाले जो संन्यासी योगी हैं उन के कर्म अशुक्ल औ अकृष्ण हैं। (*) बोर्डि, यव, घृत, पशु, स्त्री आदि जायज्ञ क माधन है यह बाबमाधन है जाते हैं। M (१) पशुवधादि परपीडा द्वारा पाप के जनक हैं भी ब्राह्मणों के प्रति दक्षिणा दानादि रूप परानुमइ द्वारा पुण्य के जनक है । (२) तपद्रियों का निमा, स्वाध्याय वेदादि या गप्ययन । (२) मिज देह से आ तर म य देह की प्राप्ति न होय यह चरम देह है।
" पानबालदर्शनकाश- भाव यह है कि यद्यपि योगी लोक भी यमनियमादि शुभ कर्मों का अनुष्ठान करते हैं तथापि फलकामना के प्रभाव से वह कर्म शुक्ल नहीं हैं, श्री निपिद्धकों से भिन्न होने से वह कृष्ण भी नहीं है, किन्तु अशुक्लाऽकृष्ण हैं, तथा च पुण्य-पाप के संवन्ध वाला न होने से योगी का ही चित्त कैवल्य की योग्यता वाला हे इतरजनों का चित्त नहीं क्योंकि इतर जनों का जो चित्त है वह यथायोग से पाप, पुण्य, पुण्य-पाप, इन तीनों के संवन्ध वाला है यह सिद्ध हुआ ॥७॥ इस प्रकार योगी के चित्त को वासना शून्य निरूपण कर अव इतरों के चिनों को वासना का आश्रय कहते हैं- सू० ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्ति । र्वासनानाम् ॥८॥ भाषा-(ततः) तिस पूर्वोक्त तीन प्रकार के कर्मों से (तद्विपाका(७) ऽनुगुणानामेव वासनानाम्) तिन कर्मों के फल के अनुसारी ही वासनाओं का ( अभिव्यक्तिः ) प्रादुर्भाव होता है, अर्थात्-जिस पुण्य वा पाप रूप कर्म का जो दिव्या? वा नारक जन्मादि रूप फल होना होता है तिसफल के अनुकूल ही उस कर्म से वासना प्रकट होती है पूतिकूल (.) पिाक नाम फल का है, सो फल जाते-आयु-भोग-रूपोद से तीन प्रक का है यह २५ पाद के १३ मंत्र में स्पष्ट है । (१) दिव्य स्वर्ग में होने वाला । नारस-नरक में होने वाला । -- । कैवल्यपादः। नहीं, क्योंकि यह कभी भी संभव नहीं हो सकता है कि देव (१) कर्म फलोन्मुख हुआ नरक-तिर्यक्-मनुष्यभोग की वासना का निमित्त है किन्तु देव (२) भोग के अनुकूल (उपयोगी) जो वासना है उन का ही वह व्यजक कहा जायगा, ऐसा न माना जायगा तो जिस को मनुष्य जन्म से अनन्तर उष्ट्रजन्म का लाभ हुआ है उस की कण्टक भक्षण में प्रवृत्ति न होगी, इस से यह अवश्य मानना चाहिये किं उष्ट्रयोनि का पापक जो फलोन्मुख कर्म है वह उष्ट्रयोनि के भोग के उपयोगी वासना का निमित्त (३) है, इसी प्रकार नारकादि (४) कर्मों में भी जान लेना। एवंच जिस जीव को जिस विपच्यमान (७) कर्म से मनुष्ययोनि से अनन्तर मार्जार वा उष्ट्र योनि की प्राप्ति होनी होगी तिस जीव के चित्त में तिस कर्म से मार्जार उष्ट्रयोनि के भोग के उपयोगी ही वासना प्रकट होंगी (५) अन्य योनि की वासना नहीं यह सिद्ध हुआ ॥ ८ ॥ यहां पर यदि कोई यह आक्षेप करे कि (बहुत व्यवहित), योनि पूर्व हो चुकी है तिसी की (१) देवतायोनि की प्राप्ति कराने वाला कर्म । (२) देवयोनि में होने वाला भोग। (३) अर्थात्---कर्मों के दो फल हैं एक तो देवादियोनि की प्राप्ति करा देनी भी एक उस जाति के भागों के अनुकूल यासना उत्पन्न कर देनी । (४) नारक नरक के देने वाला कर्म, अर्थात्- नरक का मापक नो कर्म है यह , नारकीय भोगानुकुल वासना का निमित्त है । (६) इसी मे उष्ट्रयोनि में उत्पत्तिमात्र से ही तिम जाति में उचित भोगों में वह प्रवृत्त हो जाता है। (1) व्यरहित व्यवधानवाला । जो मार्जार औ उष्ट्र (.) फलोन्मुग्व ।
पासवदर्शनकाश- वासना अभिव्यक्त होगी ओ अव्यवहित जो मनुष्य जन्म है उस की वासना प्रकट नहीं होगी यह कथन समीचीन नहीं किन्तु अव्यवहित जो मनुष्य जन्म है तिसी की वासना का प्रकट मानना समीचीन है क्योंकि यह कभी भी संभव नहीं हो सकता कि अव्यवहित दिन में अनुभूत पदार्थ का स्मरण नहीं होता है औ व्यवहित दिनों के अनूभूत का स्मरण होता (१) है इस आक्षेप का वारण करते हैं- सू० जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वाद् ॥ ९ ॥ भाप-(जातिदेशकालव्यवहितानामपि) जाति-देश-काल- कृत व्यवधान वाली बासनाओं का भी (आनन्तर्यम्) अव्य जधान ही जानना, क्योंकि ( स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् स्मृति औ संस्कारों को समानरूप होने से, अर्थात्-मार्जार वा उष्ट्र योनि का प्रापक जो कर्म है वह जब अपने फल देने के उन्मुख होगा तव पूर्वले उष्ट्र औमार्जार योनि के संस्कारों (२) को ले कर ही उन्मुख होगा ऐसे नहीं, इस से वह(७) चाहे शत जन्म के व्यवधान वाला वा दूर देश के व्यवधान वाला वा शतकल्प के व्यवधानवाला (१) अर्थात्-मनुष्य न म को ही अव्ययाहत होने से मनुष्य जन्म की ही वासना होनी चाहिये उष्ट्र जन्म की नहीं, क्योंकि उष्ट्र जन्म को व्याहित होने से उस की यासना का आनन्तर्य्य ( अव्यवधान ) नहीं है। (२) अनुभव से ,जन्य स्मृति के हेतु जो सरकार हैं वह वासना पद के वाच्य हैं इसी से ही यहा पर सामना के स्थान में संस्कार पद रिखा है । (+) (१६) कर्माशय । .
कैवल्यपादः। भी होय तो भी पूर्वानुभृत जो व्यवहित मार्जार वा उष्ट्रयोनि है उस के संस्कारों को ले कर ही उदय होगा अन्य अव्यवहित संस्कारों को नहीं, क्योंकि उष्ट्रादियोनि का प्रापक जो कर्म है वह उन संस्कारों का निमित्त है, इस से यद्यपि वह वासना व्यवहित हैं तथापि समान-कर्म जन्य होने से फल दृष्टि से उन का आनन्तर्य (अव्यवधान) ही जानना। व्यवहित संस्कारों का भी फलवल से आनन्तर्य (अव्यवधान) होता है इस में हेतु कहते हैं ( स्मृतिसंस्कार योरेकरूपत्वाद् ) अर्थात्-जैसा अनुभव होता है तैसा ही उस से संस्कार होता है औं तादृश ही उस संस्कार से स्मरण होता है इस प्रकार स्मृति औ संस्कारों को एक रूप ( समानविपयविषयक ) होने से जात्यादि व्यवहित उन पूर्वले संस्कारों का ही प्रादुर्भाव होता है अन्य अव्य- वहितों का नहीं, यदि मनुष्य जन्म की वासना का ही प्रादुर्भाव माना जायगा तो उष्ट्रजाति के भोग का स्मरण नहीं होगा (१) क्योंकि इन दोनों का भिन्न रूप है, एवं च पूर्वोक्त ही समीचीन जानना। भाव यह है कि-(२) यद्यपि मनुष्य वासना अव्यवहित हैं (१) अर्थात्-उष्ट्र की नो खजाति उचित कण्टकमक्षणाई में प्रवृत्ति है तो है सो उतनाति के भागो के स्मरण में होती है मो यदि उष्ट्रजाति के भोग का स्मरण नहीं होगा तो उष्ट्र की स्वजातीय भागों में प्रवृत्ति न होगी श्री प्रवृत्ति होती है, इससे उष्ट्र- सरकारों का ही प्रादुर्भाव होना युक्त अन्य का नहीं। (२) अन्ययहित मनुष्यवासना का प्रादुर्भाव क्यों नहीं होता र इम का ममाधान वाहते हैं " यद्यपि " इत्यादि मे।
से व्यजक सद्भाव पातालदर्शनप्रकाश- तथापि उन के व्याक कर्म का अभाव होने से वह प्रकट नहीं हो सकती ओ उष्ट्रादि वासना का तो उष्ट्र योनि प्रापक जो कर्म है सोई व्यजक है, इस के से उष्ट्रादि वासना की ही अभिव्यक्ति होती हे अव्यवहित मनुष्य वासनाकी नहीं, एवंच व्यवहित वासनाओं का भी निमित्त नैमित्तिक(१) भाव होने से थानन्तर्य है यह सिद्ध हुआ ॥ ६॥ यहां पर यदि कोई यह आशङ्का करे कि "जिसजीवको प्रथम कभी उष्ट्रयोनि की प्राप्ति हो चुकी है मो फिर बहुत योनियों से अनन्तर उष्ट्रयोनिकी प्राप्ति हुयी है वहां पर तो यह कह सकते हैं कि पूर्व उष्ट्रयोनि के संस्कारों का प्रादु- र्भाव होता है ओ प्रथम ही जो उष्ट्रयोनि की प्राप्ति हुयी थी। वहां किस प्रकार संस्कारों का प्रादुर्भाव माना जायगा क्योंकि उस से पूर्व उष्ट्र जन्म के सद्भाव में प्रमाण का अभाव है" इस आशड्डा के वारणार्थ संसार को अनादि कहते हुए वासना को अनादि कहते हैं- सू० तासामनादित्वं चाऽऽशिषो नित्यत्वाद्॥१०॥ भाषा-( तासाम् ) तिन वासनाओं को (अनादि- खम् ) अनादिल है, क्योंकि ( आशियो नित्यत्वाद् ) आशी- दि (२) को नित्यत्व होने से, (१) उष्ट्रयोनि का प्रापक जो कर्म है वह निमित्त है जो बासना नैमित्तिक है। (२) इष्ट पदार्थ की प्रार्थना का नाम आशीर्वाद है, इमी को राष्ट करते हैं 'अर्थात् इत्यादि से।
कैवल्यवाद।
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अर्थात्-निखिल प्राणिमात्र की जो आत्म-विषयक
यह निरन्तर प्रार्थना है कि." मेरा अभाव कभी मत हो
किन्तु सर्वदा ही में विद्यमान रहूं" इस प्रार्थना को सर्वदा
होने से वासना को अनादि जानना।
भाव यह है कि-यदि पूर्व पूर्व जन्म के मरणदुःख की
वासना न मानी जायगी तो जातमात्र जन्तु को जो यह
मरणत्रास (१) होता हे सो न होना चाहिये ओ होता
है इस से वासना को अनादि तथा पूर्व पूर्व जन्म का
होना यह अवश्य मानना चाहिये, यह सव पूर्व निरूपण
कर चुके हैं (8) इस से यहां पर फिर विस्तार की कुछ
अपेक्षा नहीं।
जो कि पूर्वजन्माभाववादी नास्तिक लोक यह कहते
हैं कि (जातमात्र जन्तु को जो यह मरणत्रास है वह (२)
स्वाभाविक है नैमित्तिक (३) नहीं) तो उन से यह पूछना
चाहिये कि याद स्वाभाविक है तो सर्वदा क्यों नहीं होता
क्योंकि जो स्वाभाविक होता है वह किसी निमित्त की
अपेक्षा नहीं करता (१) है।
अर्थात्-यदि स्वाभाविक है तो इष्टवस्तु तथा
(१) गेरा भार कमी मत होय इस प्रकार गरण का भय, पा गयर पदार्थ
देखने से नासपूर्वक काम।
(*) द्वितीय पाद के ९ सूत्र या व्याख्यान देग्यो ।
(1) मे कमल का सोच औ यिकाश साभाविक है तसे जातपाल अन्तु यो जो
• इष्ट यस्तु के दर्शन से इपं ओ भयर वस्तु के दर्शन से शोक का हाना है यह भी स्वाभाविक
यह चार्गकों का आशय है।
(३) वासनारूप निमिर से अन्य नहीं ।
(2) खगक का विकाश औ सकोच भी दिनकर (सूर्य) की किरणों के सर्व
ओ अमपर्क का निमिच से न य है इस से वह भी स्वाभाविक नहीं. या
है
पातञ्जलदर्शनप्रकाश- भयङ्करवस्तु के दर्शन से बिना भी हर्ष औ शोक होना चाहिये औ होता नहीं इस सेवाप्सनाजन्य होने से नैमित्तक ही मरणत्रास है स्वाभाविक नहीं, तथाच वासना अनादि है यह सिद्ध हुआ, यहां पर इतना विशेष यह भी जान लेना कि-यद्यपि अनादि अनेक जन्मों की विलक्षण वासना से जीव का चित्त अनुविद्ध (१) है तथापि सब वासना अभिव्यक्त नहीं होती हैं किन्तु जो कर्म फल देन को उन्मुख हुआ है वही कर्म जिस का व्यञ्जक होता है वही वासना उदय हो कर पुरुष के भोग में निमित्त होती हैं अन्य सब वासना नहीं । (२) अव यहां पर एक यह संदेह उपस्थित हो सकती है कि इन वासनाओं का आश्रय जो चित्त है सो मीमां- सक संमत महत्परिमाण वाला होने से विभु है, वा नैयायिक संमत अणुपरिमाणवाला होने से अणु है वासांख्यादि-संमत मध्यमपरिमाणवाला होने से अणु औ विभु से विलक्षण है) इस संदेह के उपस्थित होने पर भाष्यकारों ने प्रथम तो सांख्यमत को ले कर यह कहा है कि “घटप्रासादप्रदीप- कल्प सङ्कोचविकाशि चित्तं शरीरपरिमाणाकारमात्रमित्यपरे प्रतिपन्नाः, तथाचाऽन्तराभावः संसारश्च युक्त (३) इति"फिर मीमांसकमत को ले कर यह कहा है कि " वृत्तिरेवास्य . . (१) अनुविद-युक्त । (२) अब प्रसार से चित्त के परिमाण के निर्धारणार्थ विचार का प्रारम्भ करते ₹"अ" इसादि से। (२) से घट भी प्रासाद (राजमन्दिर) रूप अल्प यो महान् आश्चय के भेद से कैवल्यपादः। विभुनः संकोचविकासिनीत्याचार्यः (१)” परन्तु इन दोनों पक्षों में से कौन पक्ष सिद्धान्त है यह निर्णय करना केवन व्याख्याकारों का कृत्य है। तहां वाचस्पति मिश्र आदि व्याख्याकारों ने यह निर्णय किया है कि प्रथम पक्ष तो एकदेशी है,औ द्वितीय पक्ष सिद्धान्त है, अर्थात्-चित्त विभु है यह सिद्धान्तपक्ष है (२) परन्तु (३) विचारदृष्टि से समालोचना कियी जाय तो प्रथमपक्ष ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है द्वितीय नहीं क्योंकि प्रकृति से अतिरिक्त यावत् कार्य्यजात को साङ्ख्यमत में परिच्छिन्न होने से मन को विभु मानना अयुक्त है अत एव “हेतुमदनित्यमव्यापिसक्रियमनेकमाश्रित लिङ्गम् "(४) प्रदीप का प्रकाश सङ्कोच औ विस्तारवाला होता है तैसे पिपीलिका औ गनरूप अलग औ महान् आश्रय के भेद से चित्त भी स्वला औ. मह परिमाणवाला होता है, इमी से ही तिम २ शरीर को परिमाण के तुल्य परिमाणमाका चित्त है, यह अपर साट्य लोक गानते हैं, (तथाच) शरीर परिमाण गानने से ही परलोकगमनरूप जो अन्तराभाव ओ फिर यहा से आगमनस्य जो समार, यह दोनों युक्त होता है, अर्थात्-यदि चित्त विभु माना जायगा तो यह निष्क्रिय होने से परलोक में गगन भी वहां से फिर यहाँ शागमनल्प क्रिया वाला नहीं होगा इस से मध्यगपरिमाण मानना ही युक्त है, यह इस भाष्य का अर्थ है। (१) इम विभु चित्त को यत्ति ही सकोच विकाश याली है बुर चित्त सकोच विकाश वाश नहीं है क्योंकि चित्त निभ है, यह इस का भावार्थ है । (२) प्रथा पक्ष में ( अरे प्रतिवन्ना ) यह ' भरे ' पद दिया है इस से पह एकादेशी है भो द्वितीय पक्ष में ( आचार्य ) यह पद दिया है इम से द्वितीय पक्ष सिद्धान्त है, यह गिन जी का आशय है । (३) यह जो चित्त को विभुत्र प्रतिपादन किया है यह पे.यश आचार्यगत के अनुमोदना प्रोटि याद ही जानना पुछ यास्त से चित्र विभु नहीं है, इस भाराप से सामी भी शामिद्वान्त करते है " पातु " इत्यादि से । (४) (नुमन्) कारणा, धर्मात्-कार्य ( भनिय ) सदा न होने पाश, पातबरदर्शनकाशे- इस सूत्र से कपिलमहर्षि जी ने महत्तत्त्वादि निखिल कार्य को अव्यापक कहा है, जो कि प्रभाकर ने (मन-विभु है, नि त्येन्द्रिय होने से, श्रोत्र की तरह ) यह अनुमान प्रदर्शन किया है सो भी अमान जानना क्योंकि “एतस्मात्प्रजायन्ते मनः सर्वेन्द्रियाणि च" (१) इस श्रुति से मन औ श्रोत्र इन दोनों को जन्य मानने से हेतु (२) ओ दृष्टान्त असङ्गत है । अतएव कपिलमुनिजी ने " न व्यापकत्वं मनसः करण- स्वादिन्द्रियत्वाद्वा" (३) "सक्रियत्वाद् गतिश्रुतेः" इन दोनों सूत्रों से मन के विभुत्व का निराकरण कर " न निर्भागत्वं तद्योगाद् घटवद् (छ) इस सूत्र से अणुपरिमाण का खण्डन कर परिशेप से मध्यमपरिमाण वाला ही मन माना है। एवं च समानतन्त्र( ४ ) सिद्धान्त ही के स्वीकार को (आध्यापि ) सर्व मगह में न हान याला, ( सक्रिय ) क्रिया-वाला ( अनेक ) प्रति शरीरों में भिन्न २ होनेयाला, (आश्रित) अपने अपयनों में निवास करनेवाला (लिङ्ग) प्रकृति के मनाने घाला, अर्थात्-प्रकृति से भिन्न- जो कार्य जात है वह इतने धर्म याला है, सासयदर्शन प्रथमाध्याय का यह १२४ सूत्र है । (१) इस परग लगा से ही गन ौ निखिका द्रय उत्पन्न होते हैं, यह मुण्डका ति का अर्थ है। (२) हेतु नियन्द्रिय वरूप, गौ दृष्टान्त श्रोत्र की तरह, यह मानना । (३) मन यो व्यापकता नहीं, परण होने से, इद्रिय होने से, क्रियावाला होने से, परलोक में गमनयाका होने से, यह साड्यदर्शन के पश्चग गध्याय के ६९७० इन दोनों बों या अर्थ है। (4) चित्त यो ( निर्माग ) निरवययता नहीं है क्योंकि ( तद्योगाद् ) एक पार में अनेक इंद्रियों के सग सयोग हाने से, किन्तु (घटवत् ) घट की तरह सापयर है, यह ०५ स७१ या अर्थ है। (2) समान त 7=Vव शारा, अर्थात् यह भी साद्य है और यह भी साट्सय है इस से मान शास्त्र या होमिद्धा त गानना उचित है, .
कैवल्यपादः। , उचित होने से यहां पर जो विभुत्व का प्रतिपादन है सो प्रौढिवाद से ( १ ) जानना। तथाच संकोच विकाश वाला होने से चित्त मध्यम परि- माण वाला है यह निष्पन्न हुआ , (२) परन्तु वह चित्त अपने संकोच औ विकाश में तथा शुभाऽशुभवासना के प्रकट करने में स्वतन्त्र नहीं है किन्तु धर्मादि निमित्त की अपेक्षा वाला है इस से संकोचादि कादाचित्क (३) है। वह जो धर्मादि ( ४ ) निमित्त है सो भी दो प्रकार का है एक तो वाह्य भी एक आध्यात्मिक , तहां शरीर-इन्द्रिय धन आदि कर के साध्य जो नमस्कार-स्तुति-दानादि (५) वह वाह्य धर्मादिनिमित्त हैं औ केवल चित्तमात्र कर के साध्य जो श्रद्धा-मैत्री आदि (३) वह आध्यात्मिक धर्मादिनिमित्त ७)हें-मैत्रीआदिक (8) आध्यात्मिक धर्म हैं यह पञ्चशिखा: चार्य को भी संमत है, इसी से ही “ येचैते मैत्र्यादयो ध्यायिनां विहारास्ते वाह्यसाधननिरनुग्रहात्मानः प्रकृष्टं धर्म- (१) यहां पर प्रोढियाद का अर्थ प्रगल्भता अर्थात्-जबरदस्ती नानना । (२) यदि संयोचादि स्वभाव वाला चित्त है तो सर्वदा ही क्यों नहीं संकोच- विकाश वाम होता है, इस का समाधान कहते हैं " परस्तु" इत्यादि से | (३) कदाचित होने वाला है। (१) भादि पद से अधर्म का महण करना, एवं अन्यत्र भी जान लेना । (1) आदि शब्द से निष्ठुरभाषण हिंसादि या प्रहण जानना, (६) आदि शब्द से रागद्वेषादि का प्रण करना, (७) याप पह सब नगरकारादि धर्म नहीं है किन्तु धर्म के साधन हैं तथापि साधन-माप का अभेद मान कर नमस्कारादि को भी धर्म मानना, इसी से ही यज्ञादि हाता है, (*) यहां पर भादे पद से केरक वारणा-मुदिता-श्रद्धादि लेगे ।
पातञ्जलदर्शनमकान- मभिनिर्वर्तयन्ति (१)"इस वाक्य से पञ्चशिखाचार्य ने मेनयादि को प्रकृष्ट धर्म का साधन कहा है। तहां इन दो प्रकार के धर्मों में से बाह्यधर्म की अपेक्षा से मानस धर्म अति वली है क्योंकि ज्ञान वैराग्यादि रूप जो मानसधर्म हैं उन से अधिक प्रवल कोई वाह्यधर्म दृष्ट नहीं है, अर्थात्-बाह्यधर्म के वल से मानसधर्म का बल प्रवल है, अतएव जो असाध्य कार्य है वह मानस धर्म के वल से साध्य हो जाता है जैसा कि रामचन्द्र जी का दण्डकारण्य का निर्जन करदेना औ अगस्त्य मुनिजी का समुद्रपान करना। अर्थात्-मानसवल से विना शारीरिक बल कर दण्ड- कारण्य शून्य करने की किस की उत्साह शक्ति है ओ अ- गस्त्य की तरह समुद्र कौन पान कर सकता है, इस मानसधर्म वल ही सब से प्रवल जानना ॥ १० ॥ इस प्रकार से वासना को अनादि कथन किया औ प्रसङ्ग से अन्य विचार का भी उपन्यास किया, पर यह शङ्का उत्थित होती है कि [ यदि वासना अनादि हैं तो इन का उच्छेद ( नाश ) न होना चाहिये क्योंकि जो अनादि होता है वह नाशरूप धर्म से रहित होता है जैसा कि पुरुष () ] इस शङ्का के निवारणार्थ कहते हैं- (१) (ध्यायिना ) योगियों के मो यह मैत्री अदि विहार अयनसाध्य व्यापार है यह बाह्य साधन की अपेक्षा से रहित हुये २ प्रकृष्ट धर्म अर्थात्-शुक्ल धर्म को ( गभिनिवर्तयन्ति ) उत्पन्न करते हैं, यह का अर्थ है। (4) यदि अनादि का भी नाश गाना जायगा तो पुरष का भी नाश होना: चाहिये, यह शङ्कक का आशय है । अब यहां कैवल्यपादः। सू० हेतुफलाश्रयालम्बनेः संग्रहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥११॥ ( हेतु-फला-ऽऽश्रया-ऽऽलम्बनैः) हेतु (१) फल, आश्रय आलम्बन, इन चारों कर के ( संगृहीतत्वाद् ) वासनाओं को संगृहीत होने से ( एपाम् ) इन चारों के (अभावे) नाश होने पर (तदभावः ) तिन वासनाओं का अभाव हो जाता अर्थात्-वासनाओं के अभिव्यजक जो अविद्यादि हैं उन का विवेकख्याति से नाश होने से वासना आप ही निवृत्त हो जाती हैं (२)। तहां अविद्यारूपदण्ड कर के भ्रामित जो पडर(३)संसार चक्र है, वह वासना का हेतु जानना । (४)अर्थात्-प्रथम जीव को धर्म से सुख ओ अधर्म से दुःख होता है औ फिर सुख से सुख ओ सुख के साधनों (1) ( हेतु ) धादिया, (फळ) सुन्दादिका, ( आश्रय ) मन, (आशयन ) शब्दादि विषय। (२) कुछ गनादि होना ही नाश के अभाव का निमित नहीं है किग्नु विनाम के कारण का सभाय होना, तहा पुरप के नाश कारण का अभाव है इस में पुरुष का गाश न होता है जो वासना के नाश का कारण तो अविद्यादि का नाम विद्यमान है, इस मे यासना नष्ट हो जाती है, यह विशेष है। (३) आर नाम उस का है तो कि रप के चक्र के बीच में नियर वक्र काष्ट होत है, (पट् ) होधैं भर जिम में यह पहर कहा जाता है, अथवा मुलाक के घम की कामों का नाम अरगानगा । (१) पट यार को सष्ट करते हुये हेतु गद के पर्थ का निण करने , गर्मान् ॥ यादि में।
फिर सुख दुःख . पातञ्जलदर्शनकाशे- में राग, औ दुःख से दुःख औ दुःख के साधनों में द्वेप, फिर राग द्वेप से प्रयत्न अर्थात्-मन-वाणी-शरीर की चेष्टाद्वारा । परानुग्रह औ परपीडा, फिर अनुग्रह औ पीडा से धर्म ओ अधर्म फिर इन दोनों से सुख औ दुःख से राग-द्वेष, इस प्रकार अनादि काल से प्रवृत्त जो धर्म, अधर्म, लख, दुःख, राग, द्वेष, रूप पट् अर वाला संसार चक्र हे वह वासना का हेतु जानना। यह जो प्रतिक्षण आवर्तमान संसार चक्र है सो भी स्वतंत्र नहीं है किंतु सव क्लेशों का मूल जो अविद्या है वह इस संसार चक्र का प्रेरक है, (१) तथा च संसारचक्रद्वारा अविद्या ही वासना का हेतु है यह सिद्ध हुआ औ (+) जिस पुरुषार्थ (भोगमोक्ष के उद्देश से धर्मादि का अनुष्ठान किया जाता है अर्थात्-जिस फलकी इच्छासे धर्मादिक वर्तमानावस्था (२) वाले होते हैं वह वासना का फल जानना, औ मन इन वासनाओं का आश्रय है, परन्तु साधिकार मन ही वासना का आश्रय है कुछ (३) समाप्ताधिकार नहीं क्योंकि समा- साधिकार मनमें वासनाओं की स्थिति का होना असंभव है। (१) एत्र च वासना का हेतु ससारचक्र औ ससारचक्र का हेतु अविद्या, यह सिद्ध हुआ, तहा इतना विशेष है कि मन रथचक्र की शलाका का नाग अर है तब अविद्यारूप सारथी कर भ्रामित ससारचक्र वासना का हेतु नागना ओ जब कुलाल चक्रको शलामाका नाम अर है तब अविद्या रूप दण्ड भ्रामित ससारचक को वासना का हेतु जानना।[] वासना का हेतु कह कर अब बासना का फल कहते हैं "जिस" इत्यादि से । (२) अर्थात् --धर्मादिक अनुष्ठान से उत्पन्न नहीं होते हैं किन्तु वर्तमानावस्थावाले होते हैं क्योंकि सावार्य वाद में अपूर्व 'असत्' की उत्पत्ति निषेध है । (३) विवरयाति के अभार वाला म्न साधिकार कहा जाता है औ विवेकख्याति वाला जो मन है वह समाप्ताधिकार काहा जाना है।
कवन्यपादः। (१) ओ जो वस्तु सन्मुख उपस्थित हुई जिस वासना का अभिव्यलक होती है वह उस वासना का बाल- म्वन (२) है। इस प्रकार हेतु-फल-आश्रय-मालवन इन चारों करके वासना सङ्ग्रहीत हे अर्थात्-इन चारों के अधीन वासना हैं, जब फिर विवेक ख्याति के उदय से इन चारों का अभाव हो जाता है तब फिर आप ही वासनाओं का अभाव हो जाता हे ॥ ११॥ असत् की उत्पत्ति नहीं होती श्री सत का विनाश नहीं होता यह योग का सिद्धान्त है तो फिर सत् रूप से करते हैं- विद्यमान वासनाओंकी निवृत्ति कसे ? इस सन्दह का बारगा सू० अतीताऽनागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्यभेदान धर्माणाम् ॥ १२ ॥ भापा-(अतीतानागतम् ) मृन-भविन्यत्- वस्तु भी ( स्वरूपतः ) अपने रूप से (अस्ति । विद्यमान ही है, एक धर्मी में एक काल में विन्ड) धर्मों की सत्ता कसे ? इस पर कहते हैं [ धर्माणाम् अध्व (+) भेदाद ] धर्मों के काल (१) वामनायों का आप्रय पद का अवना यातयन बार श्री' इन्यादि से। (१) अर्थात्-कामिनामपर्क अदि यापनात्रों का आगमन है। (1) अतीत, नागत, वर्गमानतालि Afrदमी या कार में , भमुम्भव है (T नाम वार का । , ।
- । पातञ्जलदनिकाशे- का भेद होने से विरोध का अभाव (१) जानना, अर्थात्-यदि अतीत अनागत वर्तमानता रूप तीनों धर्मों की एक काल में समान सत्ता मानी जाय तब विरोध हो सकता है परन्तु सो हम मानते नहीं किन्तु जिस काल में घट विद्यमान हुआ वर्तमानतारूप धर्म वाला होता है उस काल में वर्त- मानता रूप धर्म तो वर्तमान काल वाला है औ अतीतता रूप धर्म अनागत काल वाला है (२) ओ अनागतता रूप धर्म अतीत काल वाला है यह मानते हैं, तथाच तीनों धर्मों को भिन्न २ काल वाले होने से एक काल में तीनों धर्मों का वर्तना विरुद्ध नहीं है यह सिद्ध हुया । भाव यह है कि जिस वस्तु की अभिव्यक्ति आगे होने वाली है वह अनागत है औ जिस की अभिव्यक्ति पीछे हो चुकी है वह प्रतीत हे औ जो वस्तु अपने व्यापार में उपारूढ़ हुआ अभिव्यक्त हो रहा है वह वर्तमान है (३) यह तीनों प्रकार की ही वस्तु छ) योगी के प्रत्यक्षज्ञान का विषय है यह योग का सिद्धान्त है, तथाच यदि स्वरूप से अतीत औ अनागत वस्तु न मानी जायगी तो योगी को (1) "विरेघ का अभाव है" इतने पाठ का भध्याहार जानना । (२) अतीतताधर्म आगे होने वाला है, औ अनागतताधर्म पाछे हो चुका है, इस से अतीतता का अनागतकाल जानना जो अनागतता का भूतकाल जानना, इसी प्रकार गायत्र भी जान लेना, यह सब तृतीय पाद के १३७ सूत्र के व्याख्यान में स्पष्ट है । (३) इ ही तीनों को ही अध्यादेश्य, शान्त, उदित कहते हैं, यह सब तृतीय पाद के १४ये सूत्र (*)यपि यस्तु शब्द नपुसक है तगापि लोकव्यवहार से वहीं स्त्रीलिङ्ग जमे गहन हो जाता है। में स्पष्ट कैवल्यपादः। त्रैकालिक (१) पदार्थ विषयक योगज प्रत्यक्षज्ञान न होगा क्योंकि बिना विषय की सत्ता से प्रत्यक्ष ज्ञान का होना असंभव है, इस से अतीत अनागत वस्तु भी स्वरूप से विद्यमान है यह अवश्य मानना उचित है। किश्च यदि अनागत पदार्थ न माना जायगा तो स्वर्ग- मौ अपवर्ग के लिये जो परीक्षकों की साधनों के अनुष्ठान में प्रवृत्ति है वह भी अयुक्त हो जायगी (२) क्योंकि असत् की उत्पत्ति का योग मत में अभाव है। अर्थात् -(३)दंडादिक जो कारण हैं वह कुछ अपूर्व असत् घट का उत्पादन नहीं करते हैं किंतु अव्यक्त (सूक्ष्म) अवस्था से कारण में विद्यमान जो घटादि कार्य हैं उन को वर्तमान अवस्था वाला कर देते हैं परन्तु इतना विशेष है कि वर्तमान अवस्थावाला जो कारण है वही कार्य की व्यक्त (स्थूल) अवस्था के संपादन में समर्थ होता है अतीतादि अवस्था वाला नहीं, इसी से ही अतीतावस्थावाले कारण से किसी कार्य का आविर्भाव नहीं होता है (e)। (१) तीनो कालों में होने वाले । (२) यदि मागे होने वाले वर्गादि फल साधनानुष्टान काल में अत्यन्त असत् गाने जायंगे तो नर शृङ्ग की भांति उन की उत्पत्ति का अभाव होने से तिम के उद्देश से निपुग पुरुषों को साधनों में प्रवृत्ति न होनी चाहिये गौ प्रवृत्ति होती है इस से भनागत वस्तु का मानना भातश्यक है, यह तत्व है । (३) यदि तत्पत्ति से पू भी कार्य विद्यमान ही है अमत् गहीं यह मानते हो नो दद्ध चकादि या क्श फाम है । इम पर करते है "अर्यान्" इसादि से (2) जमे वर्तगानागस्या वाझे मृपिण्ड से घट या गायिभीत होता है सेमे घट के ३१ देने में भी तावाताना नो गृतिपट हे उम मे भी फिर घट की पत्ति क्यों पातअलदर्शनप्रकाशे। इतना विशेष यहां पर यह भी जान लेना कि जैसे वर्तमान वस्तु अभिव्यक्ति को प्राप्त हुई दिखाई देती है तैसे अतीत औ अनागत नहीं किन्तु भविष्यद् व्यक्ति(७) रूपसे अनागत वस्तु है, औ अनुभूत व्यक्ति रूप(1) से अतीत वस्तु है, इस से वर्तमानकाल में ही वस्तु के स्वरूप की स्पष्ट प्रतीति होती है अतीत औ अनागत काल में नहीं, परन्तु इतना तो अवश्य माना जायगा कि एक अध्व के वर्तमान समय में अन्य दोनों अध्व भी धर्मी में समनुगतही हे कुछ अत्यन्त प्रभाव वाले नहीं क्योंकि पूर्व न हो कर फिर होना यह सिद्धान्त से विरुद्ध है, अर्थात्-जिस समय घट रूप धर्मी में वर्त- मानतारूप धर्म प्रकट होता है उस समय अतीत अनागतता रूप दोनों धर्मों का भी घट में अनभिव्यक्त (सूक्ष्म रूप से समन्वय जानना, इसी प्रकार अन्यत्र भी ( १) जान लेना । इस प्रकार (२) कालभेद से धमों की व्यवस्था होने से अतीत औ अनागत वस्तु भी स्वरूप से विद्यमान ही है कुछ अत्यन्त असत् नहीं यह सिद्ध हुआ। एवंच पूर्व सूत्र में जो वासना का उच्छेद कहा था सो नहीं होता क्योंकि आप क मत में घट के वर्तमानकाल में भी अतीतावस्था वाला मृपिण्ड विद्यमान है ? इम आशङ्का के वारणार्थ यह प्रथ है। (*) आगे होने वाली स्पष्ट रूपता से । (1) पूर्व होने वाले स्पष्ट रूप स । (१) जिम सगय अनागतता रूप धर्म प्रकट होता है उस समय अन्य दोनों धर्गों का सूक्ष्म रूप से सम वष नानना, एर अतीतावस्थावाले धर्मों में अन्य दोनों धर्मों का सम वथ मानना। (२) सब सुन के गर्ग का उपसहार करते हैं "इम प्रभार" इत्यादि से । .
विभूतिपादः। वासना का अत्यन्ताभाव नहीं जानना किन्तु वासनाओं की अतीतावस्था निष्पन्न होती है यह जानना यह फलित हुआ ॥ १२ ॥ अव एक रूप वाले प्रधान से अनेक विचित्र रूप वाला प्रपञ्च कैसे आविर्भाव होता है ? इस शङ्का के वारणार्थ सू० ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥ १३ ॥ भाषा-(व्यक्त(१) सूक्ष्माः) अनागत वर्तमान अतीत रूप जो अनेक प्रकार के धर्म हैं (ते) वह सब (गुणात्मानः) तीनों गुणों का ही स्वरूप हैं। अर्थात्-पृथिवी आदि जो पञ्चभूत हैं वह पञ्चतन्मात्र- स्वरूप हे, औ पञ्चतन्मान तथा एकादश इन्द्रिय अहङ्कार- स्वरूप हैं औ अहङ्कार महत्तत्त्वस्वरूप है औ महत्तत्व प्रधानस्वरूप है ओ प्रधान गुणत्रयस्वरूप है, इस प्रकार साक्षात् वा परंपरा से निखिल प्रपञ्च ही गुण स्वरूप जानना, ऐसे ही वार्षगण्याचार्य ने (२) कहा है- "गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति, यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायेव सुतुच्छकम्” । इति । अर्थात्-गुणों का जो परम वास्तव रूप प्रधान हे सो अतीन्द्रिय होने से दृष्टिगोचरता को प्राप्त नहीं होता है प्रो जो यह अनेक प्रकार का प्रपञ्च दिखाई दे रहा है वह सब (१) व्यक्तपद का अर्थ यर्तमान है, भी सूक्ष्मपद का अर्थ गतीत मी अनागत है। ( १४६० पदार्थ प्रतिपादक साग्व्यशास्त्र के प्रणेता का नाम यार्पगन्याचार्य है। .
पातञ्जलदर्शनप्रकाश- इंद्रजाल की तरह तुच्छ है, यह इस का अर्थ है, अर्थात्-- परमार्थ से यह सब गुणत्रयात्मक रूप प्रधान स्वरूप(१) ही है कुछ प्रधानसे पृथक् नहीं। एवंच अनादि विचित्र वासना समन्वित विचित्र तीनों गुणों का स्वरूप होने से प्रपञ्च भी विचित्र रूप है यह फलित हुआ ॥१३॥ यदि सर्व को गुणों का परिणाम होने से परमार्थ से सव गुण स्वरूप ही हैं तो परस्पर विरुद्ध इन तीनों गुणों का पृथिवी जल आदिक एक रूप परिणाम कैसे २) औ इन्हीं तीनों गुणों का जो एक श्रोत्र आदि इंद्रिय रूप से औ एक शब्द आदि विषय रूप से विलक्षण परिणाम का (३) हो जाना सो भी कैसे? इस आशङ्का के उपस्थित' होने पर कहते हैं- सू० परिणामैकत्वाद् वस्तुतत्त्वम् ॥ १४ ॥ भाषा-( परिणामेकत्त्वाद् ) अनेकों के परिणाम व भी एक रूप होने से (वस्तुतत्त्वम्) तन्मात्र भूत भौति आदि वस्तुओं का भी (तत्य) एकत्त्व जानना । अर्थात्-रुमा (४) निक्षिप्त परस्पर विजातीय अश्व- (१) अर्थात्-~कारण यी ही अवस्था विशेष कार्य है कुछ नैयायिककी तरह मित हम नहीं मानते है। (२) अर्थात्-विजातीय तीनों गुणों का एकमातीय पृथियो वा नळ भादि र परिणाम होगा अयुक्त है। (२) एक ही गुमाए । कार से पर१र विजातीय प्रकाश तथा जड़ खरूप इन्द्रिय मो पिपा का मादाय योमे यह इस का आशय है। (1) रमा नाम पण ही जान का हे निम में निक कैवल्यपादः। महिष-उष्ट्र-गज-आदिकों का जैसे एकजातीय लक्णरूप परिणाम एक हो जाता है औ परस्पर विरुद्ध तैल-वर्ति- वन्हि का जैसे एक प्रदीप रूप परिणाम होजाता है तैसे विजातीय तीनों गुणों का भी एक जातीय सन्मात्र-पञ्चभूत आदि परिणाम हो सकता है। (१) एवं सत्त्वप्रधान रूपता से गुणों का प्रकाश स्वरूप इन्द्रिय परिणाम हैं औ तमःप्रधान रूपता से शब्द आदि विषय परिणाम हैं, इसी तरह कठिनता धर्म प्रधान औ स्थूल रूप पृथिवी परिणाम है औ स्नेहधर्मप्रधान चारो (8) तन्मात्रों का सूक्ष्म औ स्थूल जल परिणाम है, औ उष्णता-धर्म-प्रधान तीन (1) तन्मात्रों का सूक्ष्म औ स्थूल रूप अग्नि परिणाम है औ वहनरूपधर्मप्रधान दो तन्मात्रों का सूक्ष्म औ वायु परिणाम है औ अवकाशदान रूप धर्म वाले शब्द स्थूल आकाश परिणाम है, यह सब प्रथम पाद में स्पष्ट है (२) इस से विशेष लिखने की आव- श्यकता नहीं ॥ १४ ॥ पञ्चतन्मात्रों का सूक्ष्म स्थूल रूप तन्मात्र का सूक्ष्म (१) इस प्रकार अनेकों के एकजातीय परिणाग की समीचीन कथन कर इदानों (एक से विजातीय इन्द्रिय ओ विषयों का प्रादुर्भाव कोसे) इम या समाधान देते "एवं" इत्यादि से। गंध को साग फार अन्य चारों तगात्रों का । (1) गंध औ रस को साग यार इतर तीनों का, एवं भागे भी जानना । (२) १०९.११० पृष्ठक २-३ क का टिपण देखो।
पातञ्जलदर्शनकाशे- जो कि (१) योगाचार मत वाले वैज्ञानिक वैनाशिक लोक यह मानते हैं (कि विज्ञान के अभाव काल में पदार्थों की प्रतीति के अभाव से (२) औ पदार्थों के अभाव काल में भी स्वप्न आदि में विज्ञान की विद्यमानता से विज्ञान- मात्र ही एक तत्व है अन्य कुछ नहीं क्योंकि अन्य जो सव वाह्य पदार्थ प्रतीत हो रहे हैं वह सब स्वप्नादि विषयों के समान अलीक हैं ) सो यह उन का मानना असमीचीन है क्योंकि इदन्तारूप से प्रतीयमान वाह्य पदार्थों का एक दम अपलाप करना प्रमाणों से विरुद्ध होने से अयुक्त है। अर्थात्-यदि विज्ञानमात्र ही तत्त्व है तो "अयं घटः" यह घट है इस प्रकार इदन्ता रूप से जो बाह्य प्रतीति (१) अप्रिम मूत्रों में बौद्धमत के निराकरण का प्रकार होने से यहां पर भाष्य कारों ने प्रसग से कुछ विज्ञान वादी के मत पर आक्षेप किया है सो प्रदर्शन करते है "जो कि" इत्यादि से, इस ग्रंथ का अग्रिम सूत्र से सबंध है इस लिये यह आमिम सूत्र की भूमिका जाननी । . (२) अर्थात् बाह्य जो जडपदार्थ हैं वह स्वप्रकाशता के अभाव से अपने प्रकार के लिये विज्ञान की अपेक्षा वाले हैं इस से विज्ञान काक में ही पदार्थों की प्रतीति होती है विज्ञान के गगाव काल में नहीं, एवष नेसे मृत्तिका के सत्त्व काल में घट का सत्व होने से ओ गृत्तिका के अमत्व काल में घट का असत्व होने से मृत्तिका अतिरिक्त घट कुछ तत्व नहीं माना जाता है तैसे विज्ञान के सस्त असत्य के अधीन ही बाह्य पदार्थो की सत्ता असत्ता होने से विज्ञान से अतिरिक्त कुछ बाह्य तत्व नई है यह द्धि हुआ। किच से सात में बाह्य पदार्थों के अभाव होने पर भी विज्ञान ही अनेक पदा वार रूप से भान याका गाना जाता है तैसे जान काल में भी विज्ञान ही अनेकाका प्रतीत होता है कुछ बाह्य विषय नहीं यह मानना उचित है, इसी अभिप्राय से है पहते है " पदायाँ यो सभापकाल में" इत्यादि।
कैवल्पपादः। होती है सो उन के मत में न होनी चाहिये क्योंकि विज्ञान को आन्तर (भीतर )होने से (अहंघटः ) मैं घट हूं इस प्रकार आन्तर प्रतीति होनी ही उन के मत में उचित है, जो कि उन्हों ने यह कहा है कि-(“यदन्तर्जेयतत्वं तद् वहि- वैदवभासते" अर्थात्-जो अंतर में वास्तवरूप से ज्ञेय है। सोई वाह्यपदार्थ की तरह प्रतीत हो रहा है) सो भी उन का कथन तभी समंजस हो सकता है कि जय कोई वाह्यपदार्थ माना जाय नहीं तो वाह्य की तरह यह उपमा (१) कथन ही असङ्गत होगा क्योंकि यह कभी भी संभव नहीं हो सकता है कि बन्ध्यापुत्र की तरह यह राजकुमारं सुन्दर है, एवंच उन के कथन से ही बाह्य पदार्थ की सत्ता के सिद्ध होने से वाह्यपदार्थ का अपलाप करना केवल उन का प्रलाप (२) मात्र जानना। जो कि उन्हों ने,( सहोपलम्भनियमादभेदो नीलत- द्धियोः" इस वाक्य से 'नीलविषय औ नील ज्ञान का सहो- पलम्भ नियम होने से (३) ज्ञान का विषय से अभेद कहा है । सो यह उन का कथन भी तभी सङ्गत हो सकता है कि यदि अभेद स्थल में ही सहोपलम्भ के सद्भाव का नियम (1) अर्धात्-विद्यमान पदार्थ की ही उपमा दी जाती है कुछ अविद्यमान को नहीं । (२) उन्मत्त उक्त मानक पाक्य का नाग प्रमाप है। (३) एक किसी पदार्थ के सङ्ग ही एक काल में किसी पदार्थ का इकडे ही भान होना महोपमानियम कहा जाता है, अर्थात्-जैसे द्वितीय चन्द्र के ज्ञान को वास्ता एक चन्द्र के ज्ञान याल में ही होने से द्वितीय चन्द्र को भिन नहीं गाना जाता है शान काल में ही निलय का भान होने से विषय भी ज्ञान मे भिन्न नहीं है।
पातालदर्शनकाशे-
होता औ अन्यत्र न होता परन्तु सो है नहीं क्योंकि
स्थल में भी सहोपलम्भ नियम का सद्भाव दृष्ट है।
अर्थात्-जैसे चाक्षुपरूप (१) प्रभा कर अनुविद्ध होने पर
भी प्रभा से भिन्न माना जाता है तैसे ज्ञान काल में विषय
का भान होने पर भी विषय को ज्ञान से भिन्न ही मानना
उचित है अभिन्न नहीं।
भाव यह है कि जैसे प्रभाऔ रूप के उपाय उपेय (२)
भाव रूप निमित्त को ले कर ही दोनों का सहोपलम्भ
होता है कुछ दोनों के अभेद को ले कर नहीं तैसे ज्ञान
ओ विषय का भी उपायोपेयभाव हेतुक ही सहोपलम्भ
होता है कुछ अभेद हेतुक नहीं।
एवं स्वप्नकालिक ज्ञान के समान जाग्रत्काल के ज्ञामें
को निरालम्बन (७) मानना भी असमीचीन जान लेना,
क्योंकि स्वाप्नज्ञान का विषय बाधित होता है औ जाग्रत्ज्ञान
का विषय अवाधित है, विस्तर अन्यत्र देखो (३) ।
पूर्वोक्त युक्तियों से सौगत मत को अयुक्त होने पर भी
(१) चाक्षुष-नेत्रों का विषय घटादिगत रूप, प्रभा नाम आलोक (प्रकाश)
का है, तिस कर के ' अनुविद्ध ' संगत अर्थात-प्रभा काक में ही निमम फार के भान
होने पर भी वह रूप प्रभा से भिन्न है ।
(२) उपापनाग सहकारी कारण या साधन का है गौ उपेयनाम उपाय कर के
साधनीय पदार्थ का है, तहां जैसे प्रभा उपाय है गौ रूप ज्ञान उपेय है मे प्रकृत में
विषय उपेय है ओ ज्ञान उपाय है, इसी से ही दोनों पा सहोपलम्भ है।
(*) निराकम्बन निर्विषयक ।
(३) "वैधर्माच न स्वादिषद् " अ०२ पा०२ सू ० २९ इत्यादि ब्रह्मसूत्र
फे प्रकाश में यह सब सष्ट है।
कैवल्यपादः। इदानी अन्य युक्तियों से स्वयं सूत्रकार भी इस मत को अयुक्त प्रदर्शन करते हैं- सू० वस्तुसाम्ये चित्तभेदात् तयोविभक्तः पन्थाः १५॥ भाषा-( वस्तुसाम्ये ) वस्तु के एक होने पर भी (चित्तभेदात् ) ज्ञानों को अनेक होने से ( तयोः ) ज्ञान औ वस्तु का (विभक्तः) भिन्न ( पन्थाः ) मार्ग है (१) । अर्थात्-जहां पर अनेक चित्तों का विषयी भूत एक वस्तु स्थित है तहां वह वस्तु न तो किसी एक चित्त कर कल्पित है औ न अनेक चित्तों कर कल्पित है किन्तु स्वरूप प्रतिष्ठ ही वह मानी जायगी क्योंकि यदि चित्त कर कल्पित मानी जायगी तो चित्तों को अनेक होने से वस्तु भी अनेक रूप वाली होनी चाहिये परन्तु होती नहीं, एवं च वस्तु के एक होने पर भी चित्तों को अनेक होने से वस्तु औ चित्त भिन्न है यह निष्पन्न हुआ। भाव यह है कि-रक्त, (२) द्विष्ट, विमूढ़, मध्यस्थ इन चारों नरों को जो एक ही स्त्री के विषयक धर्म,अधर्म,अज्ञान, तत्त्वज्ञान रूप निमित्तों की अपेक्षा से यथाक्रम (३) सुख, (१) गात-ज्ञान भी झेप भिन्न है । ज्ञान-विज्ञान-चित्त-दि-इन सब का इस प्रक- रण में एका अर्थ जानना । (२) (रक्त ) अपनी स्त्री विषयक राग याला पाते, (विष्ट) स्त्री से द्वेष करने पाटी सपसी, (पिगढ़) खो के लाभ के समाय से मोह युक्त गन्य कागी पुरुष, (मपर) रागादि से शून्य उदासीन वन । (३) धर्मशप निमित्त पी अपेक्षा से रक्त कान्त को अपनी स्त्री विषयका सुम्व- मान, भी साधरण निगिस से दिष्ट सपनो को टस विषयका दुःखुज्ञान, ओ अज्ञान
থানহীনমায়-
दुःख,मोह, माध्यस्थ्य ज्ञान होता है तथा इस ज्ञान से अनन्तर
जो (जो स्त्री आप के दृष्टिगोचर है सोई मैं देखता हूं) इस
प्रकार का अनुसंधान होता है वह किस के चित्त कर परि-
कल्पित माना जायगा अर्थात् किसी के भी चित्त कर वह
कल्पित नहीं हो सकता है क्योंकि यदि कल्पित माना जायगा
तो जिस चित्त कर कल्पित होगा उसी को वह विषय प्रतीत
होगा अन्य को नहीं क्योंकि अन्य के स्वाप्न ज्ञान के विषय
भूत पदार्थ का अन्य पुरुष के ज्ञान का विषय होना अदृष्ट
और असंभव है, श्री ( १ ) सिद्धान्त में तो वस्तु मात्र को
निगुणात्मक और चल होने से तिस २ निमित्त के अनुसार
एक वस्तु में भी अनेक प्रकार के प्रत्यय का संभव जान
लेना।
अर्थात्-रजोगुणसहित जो सत्त्वगुण है वह धर्मसा-
पेक्ष हुआ पति को सुखज्ञान का जनक है औ रजोगुण
सहित जो तमोगुण है वह अधर्मसापेक्ष हुआ सपत्नी के
दुखज्ञान का जनक है औ केवल जो तमोगुण है वह
अज्ञान सापेक्ष हुआ कामी के मोहज्ञान का जनक है औ
जो विशुद्ध सत्त्व गुण है वह तत्त्व ज्ञान सापेक्ष हुआ उदा-
सीन के सामान्य ज्ञान का जनक है, इस प्रकार एक ही
रूप निमित्त से विमूढ कामी को उस विषयक मोह ज्ञान, ग तत्त्वज्ञानरूप निमित्त से
उदासीन को सामान्य से वस्तुमान का ज्ञान, यह यथाक्रम जानना ।
(१) साहय येग गत में भी एक वस्तु अनेका ज्ञान का मन पीसे होती है ?
इम भाक्षेप का वारण करते हैं ।" सिद्धात में इत्यादि से।
कैवल्यपादः। वस्तु धर्मादिनिमित्त के अनुसार सत्त्वादिगुणों के आविर्भाव द्वारा अनेक प्रत्ययों का जनक है (6) ॥ १५ ॥ अब कोई एक जो विज्ञानवादी के एक देशी (पूर्वोक्त युक्तियों से यद्यपि पदार्थ ज्ञान से भिन्न हैं तथापि ज्ञान के समान काल में ही भान होने से सुखादि की तरह (१) ज्ञानकाल में ही उन की. सत्ता माननी उचित है अन्यकाल में नहीं (यह मान कर पुरुषान्तर साधारण()विषय के वाध द्वारा ज्ञान से पूर्व श्री उत्तर क्षणों में वाह्य पदार्थों का अप- लाप करते हैं उन के मत को असङ्गात कहते हैं- सू० नचैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदनमाणकं तदा किं स्याद् ॥ १६ ॥ भाषा-(वस्तु ) बाह्य जो पदार्थ है, वह ( एकचित्त तन्त्रं न च ) एक किसी चित्त के अधीन सत्तावाला नहीं है, क्योंकि यदि ज्ञान काल में ही विषय की सत्ता मानी जायगी तो जिस समय में कोई वस्तु (तदप्रमाणकम्) तिस अनु- (*) तहां इतना विशेष है कि-जेसा २ धर्मादि निगित होता है उसी के सार ही सत्त्वादि गुणों के आविर्भाव द्वारा यस्तु सुहादि ज्ञान का जनक होती है ऐमें ही नहीं इस से सर्वदा सर्व को सर्व ज्ञान नहीं होता है। (१) सुखादि या ज्ञानकाल में ही भान होने से येदान्ती इन सी अज्ञात सत्ता नहीं मानते हैं। (क) जिस को ज्ञान हुभा है उसी को दृष्टि में विषय है अन्य की दृष्टि में नहीं इस प्रकार अन्य पुरुषों को अपेक्षा से विषय के अभाव द्वारा, इसी का नाम राष्टि- राष्टिसाद है।
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पातजलदर्शनकाशे-
ज्ञान रूप प्रमाण का विषय नहीं होगा (तदा) तिस समय
में, वह वस्तु (किं स्याद्) क्या होगा।
अर्थात्-यदि ज्ञानमात्र के अधीन ही वस्तु की सत्ता
मानी जायगी औ पूर्व उत्तर क्षणमें उस वस्तुका अभाव माना
जायगा तो जिस समय घट को विपय करनेवाला चित्त (१)
घट से निवृत्त हो कर अन्य किसी पदार्थ में व्यग्र (२)
हो जायगा वा निरुद्ध हो जायगा तिस समय उस वस्तु
के स्वरूप को चित्त की विषयता का अभाव होने से वह
घटरूप वस्तु क्या होगा अर्थात् उन के मत में वह नष्ट
ही हो जायगा क्योंकि व्यग्र औ निरुद्ध चित्त का तो उस
के संग संबन्ध ही नहीं श्री अन्य किसी चित्त का वह
विषय ही नहीं हुआ इस से अगृहीत(३) स्वभाव होने से वह
उन के मत में अप्रमाणक है, एवं च कुछ काल के अनन्तर .
जब फिर वह घट किसी अन्य चित्तके संग संवन्धवाला होगा
तो वह नष्ट हुआ घट किस से उत्पन्न होगा क्योंकि विना
कारण से कार्य की उत्पत्ति माननी अयुक्त है। (0)
(१) इस प्रकरण में सर्वन ही ज्ञानरूप वृत्ति का नाम चित्त मानना ।
(.) (पन) भासत ।
(२) नहीं किमी ने ग्रहण किया है वरप भिम का यह प्रहातस्वभाव कहा
हाता है।
(.) यदि यह यह कहें कि ज्ञान ही उस घट का कारण है तो उन को आशा-
गोदय, मी पण्यमोदकों को भी समान या वीर्य का जनक भी पुष्टिकारका मानना
गोगा। सहा जन से जो पलना किये गये हैं छड्डू यह आशागोदक हैं औ मामार
भो दुकानों पर पिकय होते र मह पापमोदक है।
(इभी से ही पहिरव्यापक के भाय से धुम शव्याप्य का धमाष
माना जाता।
कैवल्यपादः।
तथाच ज्ञानके अभावकाल में विषय का नाश औ फिर
ज्ञान काल में बिना कारण से विषय की उत्पत्ति इन दोनों
मन्तव्यों को सर्वानुभव विरुद्ध होने से यह मत भी उन्मत्त
प्रलपित के तुल्य असङ्गत जानना।
किंच यदि ज्ञानाधीन ही वस्तु का सद्भाव माना
जायगा तो घट का जो अर्वाग् भाग (१) है वहीं इन्द्रिय
सन्निकर्ष द्वारा चित्त का विषय होने से ज्ञात होगाऔ अन्य
जो मध्य तथा पृष्ट भाग है वह नहीं तथाच अज्ञात जो घट
का मध्य औ पृष्ट भाग है तिस का उन के मत में अभाव
होने से (२) तव्याप्त जो अर्वाग्भाग है उस का भी उन
को प्रभाव मानना लगेगा क्योंकि व्यापक के अभाव से
व्याप्य का (6) अभाव सर्व संमत है।
एवं च उन्हों के मत में घटरूप अर्थ के ही अभाव
की आपत्ति होने से ज्ञानाधीन विषय सद्भाव वादी वैनाशिक
सिद्धान्त असङ्गात जानना किन्तु (सर्व पुरुप साधारण (३)
स्वतंत्र ही बाह्य पदार्य है कुछ ज्ञान परतंत्र नहीं, औ प्रत्येक
पुरुषों के चित्त का स्वतंत्र ही उन विषयों से संबंध होता है,
श्रो विषय तथा चित्त के संबंध से जो उपलब्धि (४) वह
(१) को नेत्र के सन्मुख देश है यह घट का सर्वाग् माग मानना ।
(१) महा २ पर्याग भाग है यहा २ मप्प यो पृष्ट भाग अवश्य होता है इस
मकार मध्य भो पृष्ट भाग व्यापक हे मी भाग माग तिप्त कर के व्याप्त है।
(१) भर्षात--जिम यो घट ज्ञान हुया है टमी को दृष्टिं में घट है यह नहीं है
किन्तु सर्व पुरुष साधारण यह पट है। (४) (उपन्ध) सम्दादिविषयों का दान।
* म -- पातज्जलदर्शनकाशे- पुरुष का भोग है) यह सांख्ययोग सिद्धान्त ही संगत जानना यह निष्पन्न हुआ ॥ १६ ॥ यदि वाद्य पदार्थ स्वतन्त्र हैं तो वह जड़स्वभाव होने से कभी भी ज्ञात न होने चाहिये औ यदि उन को प्रकाश स्वभाव मानोगे तो सर्वदा ही ज्ञात होने चाहियें ? इस आक्षेप का वारण करते है- सू० तदुपरागापेक्षित्वाञ्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताऽज्ञातम् १७॥ भाषा-(वस्तु) बाह्य जो पदार्थ है, वह (ज्ञाताऽज्ञातम्) चित्त कर के कभी ज्ञात होता है औ कभी अज्ञात होता है क्योंकि ( चित्तस्य ) चित्त को ( तदुपरागापेक्षित्वात् ) तिस विषय के उपराग (१) की अपेक्षा वाला होने से । अर्थात्-जिस समय विषय का चित्त के सङ्ग इन्द्रिया द्वारा संवन्ध होता है तब वह ज्ञात होता है औ अन्य समय में अज्ञात होता है। भाव यह है कि-अयस्कान्तमणि के तुल्य जो विषय हैं वह इन्द्रियसन्निकर्प द्वारा लोहतुल्य चित्त को अपने संग योग कर तिप्त चित्त को स्वतमान आकार कर चित्रित कर देते है, एवं च जिस विषय कर चित्त उपरक्त (२) होता है वह विषय ज्ञात होता हे पो अन्य अज्ञात होता है। - (1) इद्रिय सनिवर्प द्वारा मो विषय का चित्त में प्रतिविम्य पड़ गाना यह अपराग वहा जाता है। (१) गर्धात्-जिम विपण या चिच में प्रतिछि परता है।
कैवल्यपाद। ३७१ इस प्रकार ज्ञाताऽज्ञातविषय होने से ही चित्त को परिणामी (१) माना जाता है ॥१७॥ इस प्रकार चित्त से अतिरिक्त विषय को स्थापन कर चित्त को परिणामी कथन किया, इदानीं अपरिणामित्वरूप हेतु से आत्मा को चित्त से अतिरिक्त प्रदर्शन के लिये उत्तर प्रकरण का आरम्भ करते हैं: -:: ......... यस्य तु तदेव चित्तं विषयस्तस्य (3) सू० सदा ज्ञाताश्चित्तटत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्याऽपरिणा- मित्वाद् ॥ १८॥ ‘भाषा-( यस्य-तु.) जिस चेतन आत्मा का तो (तदेव चित्तम् ) वह विषयाकार चित्त ही ( विषयः ) विपय होता है ( तस्य तत्प्रभोः तित चित्त के स्वामी पुरुप को (सदा) सव काल में ही ( चित्तवृत्तयः) चित्त की वृत्तियां ( ज्ञाताः ) ज्ञात रहती हैं, क्योंकि ( पुरुपस्य अपरिणामित्वाद्) पुरुष को अपरिणामी होने से-... : अर्थात् यदि चित्त का स्वामी तथा साक्षी भूत पुरुप भी चित्त की तरह एकरस न रह कर परिणाम को प्राप्त होगा तो पुरुप (की) के विषयीभूत जो चित्तवृत्तियां हैं वह भी चित्त के विपय घटादिकं की तरह ज्ञात ओ अज्ञात हो जायंगी परन्तु सो है नहीं क्योंकि पुरुष को सदा वृत्तियां ज्ञात ही -- (१) अर्थात्-कभी विषयाकार भी में संविषयायार होने से कम नही है, यह सब द्वितीय पाद २० मा के न्यादयान में १८७ पृट पाट । (4) इनने नाम का नाकारों ने माने गादि में अप्पाहार किया है।
पातञ्जलदर्शनकाशे- रहती हैं अज्ञात नहीं (१), इसी सेही पुरुष अपरिणामी है (२)। तथा च परिणामी चित्त. से अतिरिक्त अपरिणामी पुरुष है यह फलित हुआ ॥ १८ ॥ अब यहां पर जो वैनाशिक लोक यह शङ्का करते हैं कि "चिच ही अग्नि की तरह स्वाभास (३) ओ विषयाभास हो सकता है अतिरिक्त आत्मा मानना अयुक्त है ?". इस आशङ्का का उन्मूलन करते हैं- सू० न तत् स्वाभासं दृश्यत्वाद् ॥ १९॥ भाषा-(तत्) वह चित्त (स्वाभास न । अपने को आप ही प्रकाश करने वाला नहीं है, क्योंकि ...(दृश्यत्वाद्)- घटादि की तरह चित्त को भी दृश्य होने से, अर्थात्-जैसे अन्य इन्द्रिय औ विषय दृश्य होने से स्वप्रकाश नहीं हैं तैसे चित्त भी दृश्य होने से स्वप्रकाश नहीं है किन्तु साक्षिभास्थ है। जो कि विज्ञान की स्वप्रकाशता में अग्नि का दृष्टान्त दिया है सो भी अग्नि को स्वप्रकाश न होने से असंगत जानना । (१) यदि चित्तवृत्ति भी कदाचित् पुरुष को ज्ञात नहीं होगी तो मैं सुखी हूं यह निश्चय नहीं होगा किन्तु मैं सुखी हूं वा नहीं इस प्रकार संशय हो जायगा इस से पुरुष सदा ज्ञाता है। (२) पुरुष परिणामी है, सदा ज्ञातविषय होने से, जो परिणामी होता है यह सदा ज्ञातविषय नहीं होता यथा चक्ष आदि, यह अनुमान इस में प्रमाण जानना । (३) विपर्य को भी प्रकाशता है भो अपने को भी प्रकाशता है अर्थात् जैसे गरि अन्य को भी प्रकाशता ई भी माने को भी प्रयासमा ई इस से स्वप्रकाश है. गेमिणगी मप्रकाश - कैवल्यपादः। अर्थात् यद्यपि अन्य किसी अग्नि कर अग्नि प्रकाशित नहीं होता (७) है तथापि विज्ञान कर प्रकाशित होने से वह भी. पर प्रकाश्य ही है कुछ स्वप्रकाश, नहीं। किंच जैसे लोक में गन्तव्य औ गन्ता इन दोनों भिन्न २ वस्तुओं के सन्निधान में गमन रूप क्रिया दृष्ट है तैसे प्रकाश रूप क्रिया भी प्रकाश्य औ प्रकाशक इन दोनों भिन्न २ वस्तुओं के सन्निधान में ही देखने में आती है कुछ प्रकाश्य प्रकाशक के अभेद स्थल (१) में नहीं, एवं च प्रकाश्य औ प्रकाशक को अभिन्न मान कर जो वस्तु को प्रकाश मानना है सो एक पदार्थ में कर्मत्व औ कर्तृत्व रूप विरुद्ध धर्मों के समावेश का असंभव होने से अपेशल (२) जानना। किंच जैसे (स्वात्मप्रतिष्ठमाकाशम् ) इस शब्द का (*) कोप के अनुमार अग्निशब्द पुल्लिङ्ग है। (१) अर्थात्-देवदत्त ग्राम को गमन करता है यहाँ पर जैसे गगन क्रिया फा कर्मभूत जो गन्तब्य प्राम है यह भिन्न है ओ गमन क्रिया का कर्ता जो गन्ता देवदत्त है वह भिन्न है तैसे निग्विक जगत् को मूर्य प्रकाशता है यहां पर भी प्रकाश क्रिया या फर्मभूत जो प्रकाश्य जगत् है वह भिन्न है औ प्रकाश क्रिया का कर्ता जो प्रकाशक सूर्य है वह भिन्न है, एवं च एक ही वस्तु को प्रकाश्य ओ प्रकाशक गान कर यस्तु को सप्रकाश मानना अमंगत है। (२) (अपेशल) अचारु, अरमणीय, अर्थात्-अममीचीन, जैसे आपने सिर पर सपार हो कर सैर करना असभव है तेसे अपने को आप प्रकाशना भी असंभा है यह तस है। यद्यपि घेदान्ती भी विज्ञानसा परमात्मा को सप्रकाश मानते हैं तथापि यह (अपने को आप हो प्राण करना) इस प्रकार से नहीं मानते हैं किन्तु किसी ज्ञान यो विषगता को न प्रात हो कर भरोक्षरूप मे भान होना रूप खप्रकाशस्य मानते हैं, इनना पिशप है। w पातञ्जलदर्शनकाशे- अर्थ यह माना जाता है कि आकाश किसी अन्य के आश्रित नहीं है तैसे (स्वाभासं चित्तम्) इस का अर्थ भी यही माना जायगा कि चित्त किसी अन्य कर के ग्राह्य (७) नहीं है, एवं च प्राणियों की जो अनेक प्रकार की प्रवृत्ति होती है सो उन के मत में असंगत होगी क्योंकि अपने चित्त के प्रचार (1) को जान कर ही पुरुष प्रवृत्त होते हैं न जान' कर नहीं। :- अर्थात्-यदि चित्त को अग्राह्य माना जायगा तो (इस समय मैं क्रोधयुक्त हूं, वा भय युक्त हूं औ इस विषय में मेरा चित्त (१) रक्त है औ इस विषय में मेरा चित्त द्वेष वाला है) इत्यादिक जो चित्त के ग्रहणपूर्वक व्यवहार हैं सो न होने चाहिये भी होते हैं, इस से (.वृत्तिविशिष्ट जो चित्त है वह चेतन पुरुप कर के ग्राह्य है) यह सांख्य-योग- वेदान्तमत ही संगत है सौगत (1) मत नहीं ॥ १६ ॥ अव चित्त को विषयाभास औ स्वाभास (२) मानना स्वमत (३) से भी विरुद्ध है, यह कहते हैं सू० एकसमये चोभयानवधारणम् ॥ २० ॥ भाषा-(एकसमये) एक काल में (उभयाऽनवधारणम्) विपय औ अपने को ग्रहण करना असंभव है। (७) (ग्राह्य) विषय । (क) प्रचार नाम चित्त के व्यापार या वृत्तिया का है । (१) (क) रागवाला1 (1) मोगत,वैनाशिक,वैज्ञानिक, यह सम बौद्ध के नाग हैं । (२) अर्थात्--विपर को भी प्रकाशता है ओ माने को भी प्रकाशता है। (३) बौद्धगन से, गर्शत्-नई जो दोष दिये हैं यह सर्व गत के अनुसार से है सो भत्र गोल माद्धगत मो अनुमार मे दोष देन है।
कैवल्यपादः। अर्थात् बौद्धमत में चित्त को क्षणिक होने से एक क्षण में ही विषय में अपने को ,ग्रहण करना अयुक्त है क्योंकि क्षणिक वादी के मत में जो वस्तु की उत्पत्ति है वहीं क्रिया वा कारक है कुछ उत्पत्ति से अतिरिक्त क्रिया वा कारक नहीं है। भाव यह है कि जैसे अन्य मतों में यह नियम है कि "प्रथम क्षण में पदार्थ की उत्पत्ति होती है औ द्वितीय क्षण में पदार्थ क्रिया वाला होता है औ तृतीय क्षण में किसी कार्य के करने से कर्तारूप कारक होता है" तैसे वौद्ध मत में नहीं है किन्तु जो वस्तु की उत्पत्ति है सोई इन के मत में क्रिया है औ सोई कारक है क्योंकि द्वितीय क्षण में वस्तु का नाश होने से भिन्न २ क्षण में इन तीनों का होना इन के मत से विरुद्ध है, तथा च एक क्षण में विपय प्रो अपने स्वरूप के ग्रहण का असंभव होनेसे चित्त को स्वाभास ओ विषयाभास कहना प्रलपन (१) जानना ॥ २०॥ यदि किसी वैनाशिक का यह आशय हो कि “ यद्यपि द्वितीय क्षण में विनाशशील होने से चित्त अपने को आप ग्रहण नहीं कर सकता है तथापि समनन्तर (२) अन्य द्वितीय (१) प्रपन नाग टम्मत्त के वचन का है गति-जिस व्यापार में चित्त घट को मिषय योरेगा उमी म्यापार से ही गाने स्वरूप को विपय करेगा यह तो हाही नहीं सकता क्योंकि एक रूप म्यापार से भिन्नरूप कार्य का होना असभा है इस मे शय एक व्यापार उन को मानना होगा पा सो उन के मत में हो नहीं सकता क्योंकि त्ति से सातिरिक्त अन्य व्यापार का होना उन के मत से विरुद्ध है एच एक क्षण दोनों का प्राण गमभन बनना । (२)' मगनता . नट चित से अपमान उत्तर क्षण में ननन सन, पातञ्जलदर्शनकाशे- चित्त कर के वह ग्राह्य माना जायगा इस से चित्त अग्राह्य नहीं किन्तु ग्राह्य ही है" इस आशय को दुष्ट प्रदर्शन करते हैं- सू० चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धरतिप्रसङ्गः स्मृति सङ्करश्च ॥ २१ ॥ भाषा, चित्तान्तरदृश्ये ) अन्य चित्त कर के यदि चित्त को ग्राह्य मानेंगे, तो ( बुद्धि (७) वुद्धेः ) तिस चित्त का अन्य चित्त कर के ग्रहण होने से ( अतिप्रसङ्गः ) अन. वस्था रूपदोष होगा, (च) और दोप यह है कि (स्मृतिसङ्करः) स्मृतियों का परस्पर संकर हो जायगा । अर्थात् -यदि घट को विषय करने वाला चित्त किसी अन्य चित्त कर के ग्राह्य माना जायगा तो वह अन्य चित्त । किस कर के ग्राह्य मानेंगे (१) क्योंकि यदि स्वग्राह्य मानेंगे) तो पूर्वोक्त दोष (२) तदवस्थ होगा सौ यदि किसी अन्य चित्त करके ग्राह्य मानेंगे तो वह चित्त अन्य कर के ो वह अन्य अन्य कर के इस प्रकार से अनवस्था दोप होगा, एवं च चित्त से अतिरिक्त एक चित्त का ज्ञाता आत्माही मानना उन को उचित है (३) किंच ऐसे मानने से विषय के अनुभव काल में (*) 'बुद्धि, पित्त, विज्ञान यह एवार्थ हैं। (१) अर्धान्-किसी करके ग्राह्य नहीं होगा, सोई स्पष्ट करते हैं क्योंकि इसादि से। (२) (पूर्वोक्तदोप) एक में वर्तृत्व काय रूप पिरद धर्म का असंभव रूप दोष (तदषस्य) तितो मयस्था याला, अर्थात् जैसे का तेसा ! (१) स्मृतिसंयर का दोष को स्पष्ट करते हैं-"किंच" इत्यादि से । - कैवल्यपादः।। उन को ज्ञानों का धाराप्रवाह ( १ ) मानना लगेगा, तथा च विषय की स्मृति काल में भी तिन अनन्त ज्ञानों की. एक काल में स्मृति मानने ही लगेंगी क्योंकि जैसा अनुभव होता है वैसी ही स्मृति का होना सर्व मत संमत है, एवं च (घट मैं ने जाना ) इस प्रकार जो एक मात्र आकार वाली स्मृति होनी उचित थी वह न होगी किन्तु (घट में ने जाना- घटज्ञान मैं ने जाना, घंटज्ञानज्ञान मैंने जाना, फिर तिस का ज्ञान) इस प्रकार से अनन्त आकार वाला स्मृति संकर हो जायगा पर सो सव के अनुभव से विरुद्ध है। तथा च सर्वानुभवविरुद्धवादी (0) तथा चित्त से अतिरिक्त सर्वानुभवसिद्ध वुद्धि के साक्षी भूत पुरुष का अपलाप करने वाले जो वैनाशिक हैं वह व्याकुल (२) जानने, इसी से ही जो जो इन का सिद्धान्त है वह २ सव आकुल ही है निराकुल ( ३) नहीं। किञ्च जिस जिस वैनाशिक ने जो जो आत्मा का स्वरूप अपनी ऊहा से कल्पना कियी है वह भी सभी न्याय विरुद्ध है अर्थात्-जो विज्ञानवादी क्षणिक विज्ञान रूप चित्तमात्र को आत्मतत्त्व मान कर फिर ( जो सांसारिक मलिनं पञ्च- (१) प्रथम घटशाग-पुन घटज्ञानज्ञान-फिर घटझाग-ज्ञान-ज्ञान. इन्यादिक -गात ज्ञान की धारा होजायगी। * यह नाशिक बोहों का विशेषण है। (२) (व्याकुम) भात । (१) भात कोई मामिमान पर नहीं है।
पातञ्जलदर्शनकाशे- स्कन्धों (१) को त्याग कर मुक्त हुआ शुद्ध पञ्चस्कन्धों का अनुभव करता है वह तत्त्वविशेष आत्मा है) इस प्रकार मानता है वह भी स्वस्वीकृत क्षणिकवाद से भीत (२) होने से न्याय विरुद्ध है क्योंकि किसी स्थायी पदार्थ से बिना मलिन पंचस्कन्धों का त्याग तथा शुद्ध पंचस्कन्धों का उपा- दान होना असंभव है, एवं बंध मोक्ष का वैय्यधिकरण्य(३) भी इन के मत में दुर्वार जानना । इसी प्रकार जो शून्यवादी शून्य को ही परम तत्व मान कर फिर ( स्कन्धों विषयक महावैराग्य के लिये औ पुनर्जन्माभाव रूप प्रशांतिके लिये जीवन्मुक्त गुरु के.समीप जा कर ब्रह्मचर्य के अभ्यासद्वारा तत्त्व का साक्षात्कार करना चाहिये ) इस प्रकार मानता है वह भी न्यायविरुद्ध (१) गह-अह इसाकारक नो आकय विज्ञान का प्रवाह है यह विज्ञान स्कन्ध है औ सुग्य आदि का मो अनुभव है यह वेदनास्कन्ध है, ओ मैं गौर हु ब्राह्मगहू इत्या- कारका जो सर्विकल्प ज्ञान हे वह सज्ञा स्कन्ध जानना, एव विषयों के सहित जो इन्द्रिय है वह रूप-स्कन्ध के वाच्य जानने, तथा राग, द्वेष, मोह, धर्म, अधर्म यह सस्कार- स्कन्ध है, यह सोगों का सङ्केत है, तहा नील पीत आदि अनेक प्रकार के गलिम स्कन्धों का त्याग कर विशुद्ध विज्ञानाकार प्रवाह हो जाना यह उन के गत में मुक्ति है। (२) पहिले मामा को क्षणिक माना फिर उम को मुक्ति काल में विशुद्ध प्रवाह वाला स्थिर माना यह उन के मत में भय जानना- यदि मुक्ति काल में भी क्षणिक मानेंगे तो उत्पति भो नाश वाला होने से आरमा अनित्य हो जायगा । (३) क्षणिक यादी के गत में नौलपीतादि मगि विज्ञानप्रवाह वामा चित्त है गो उस के सनातर अन्य क्षण में नूतन उत्पन्न विशुद्ध प्रवाह याका चित्त मुक्त है, सच बन्ध मोक्ष का एक आश्रय न होने से पेयधिकरण्य मानना, यह सब प्रथम ३३ मत्र के व्याख्यान में स्पष्ट है। ५६ के कैवल्यपादः। जानना क्योंकि जव उन के मत में कुछ है ही नहीं तो भोक्ता तथा मोक्ष एवं ब्रह्मचर्य आदि साधनों की सत्ता का स्वीकार करना अयुक्त है। तथा च चित्त का स्वामी औं द्रष्टा तथा भोक्ता रूप स्थिर पुरुष को मानने वाले जो सांख्य योगी आदि हैं वही न्याययुक्त जानने वैनाशिक प्रतारक नहीं यह सिद्ध हुआ॥२१॥ यदि चित्त स्वाभास भी नहीं औ न किसी अन्यचित्त कर के ग्राह्य होता है किंतु आत्मा कर के ही ग्राह्य है यह मानते हो तो फिर असङ्ग ( १ ) तथा निर्विकार आत्मा भी चित्त का द्रष्टा औ भोक्ता कैसे ? इस आक्षेप का वारण करते हैं- सू० चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्ववु- द्विसंवेदनम् ॥ २२॥ भाषा-(अप्रतिसंक्रमायाः) एवं सर्वत्र इन्द्रियों की तरह विपर्यों में प्रचार से रहित, (चितेः) चेतन पुरुप को (तदा- कारापत्तौ) स्वप्रतिविम्वित चित्त के आकार की तरह श्राकार की प्राप्ति होने पर (२) (स्वबुद्धिसंवेदनम्) अपने विषयभूत बुद्धि का ज्ञान होता है। (1) जेमे विषय के सग सबन्ध को प्राप्त होकर वित्त विषय को प्रकाशता है सेसे आरमा भी चित्त के सग सबन्ध को प्राप्त हो कर ही चिरायो प्रकाशेगा एवं घ असंग मात्मा का संबन्ध कसे, तथा निर्विकार आत्मा में प्रकाश रूप क्रिया या संगन से, यह पूर्व पक्षी का आशय है। (२) एक प गारमा में दर्शनकर्तृति भोगाधिक है सामायिक नहीं यह बोधन किया।
३८० पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- अर्थात्-अपरिणामी जो भोक्तृशक्तिः संज्ञक पुरुष है वह-यद्यपि अप्रतिसंक्रम अर्थात्.-किसी विषय से संबद्ध न होने से निलेप है तथापि विषयाकार परिणामी बुद्धि में प्रतिविम्बित हुआ , तदाकार होने से वह तिस बुद्धि की वृत्ति का. अनुपाती (अनुसारी) हो जाता है, एवंच चैतन्य प्रतिविम्वग्राहिणी बुद्धिवृत्ति के अनुकारमात्र होने से ही बुद्धिवृत्ति से अभिन्न हुआ वह चेतन ज्ञानवृत्ति कहा जाता है कुछ परमार्थ से वह चेतन ज्ञाता नहीं है। यद्वा चेतन के प्रतिविम्ब का आधार होने से जो चित्त का चेतनाकार हो जाता हे वह तदाकारापत्ति है इस तदाकारापत्ति के होने से जो चित्त में दर्शन कर्तृत्व है तिस को ले कर ही चेतन को द्रष्टा कहा जाता है कुछ वास्तक में नहीं (१) । भाव यह है कि-जैसे अमल जलमें पतित हुआ चंद्र प्रतिविम्ब अपनी क्रिया से विना ही केवल प्रतिविम्वाधार जल के चल होने से चञ्चल प्रतीत होता है तैसे चित्त तंति- विम्वित जो चेतन है वह भी अपने व्यापार से बिना ही केवल प्रतिविम्वाधार चित्त के विषयाकार होने से तदाकार प्रतीत हो जाता है कुछ स्वाभाविक नहीं। एवं च चेतन प्रतिविम्बित चित्त ही चिदाकार हुआ अपने को दृश्य ओ चेतन को द्रष्टा कर देता है कुछ वास्तव से पुरुप द्रष्टा नहीं है यह निष्पन्न हुआ। (१) अर्थात्--औपापिया भेद को ले कर विषयाकार चिच दृश्य है भी चेतन प्रतिविम्म चित्त द्रष्टा है, यह गपिम सा स्पष्ट है ।
कैवल्यपादः। चित्त औ चेतन को अभिन्न रूप से भान होने से ही "न पातालं नच विवरं गिरीण नैवान्धकारं कुक्षयो नोद- धीनां, गुहा यस्यां निहितं ब्रह्म शाश्वतं बुद्धिवृत्तिमविशिष्टां कवयो वेदयन्ते " इस वाक्य (१) से ,आगम में चेतन को बुद्धिवृत्त्यविशिष्ट कहा है ॥ २२ ॥ ('चित्त ही चेतन से अभिन्न सा हुआ विषय औ विपयी का उपस्थापक है यह अवश्य ही मानना उचित है क्योंकि लोक में ऐसा अनुभव सर्वानुभवसिद्ध है ) इस आशय से चित्त को सर्वार्थ कहते हैं- सू० द्रष्ट्टदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥ २३ ॥ भाषा-जिस हेतु से ( चित्तम् ) चित्त, ( द्रष्टुंदृश्यो- परक्तम् ) दृश्य (विषय ) तथा द्रष्टा (पुरुप) इन दोनों से (उपरक्त संवद्ध है, इसी हेतु से वह चित्त ( सर्वार्थम् ) सर्वार्थ (२) कहा जाता है। अर्थात्-चित्त जो है वह केवल दृश्य अर्थ से ही ( उपरक्त ) संवद्ध है यह नहीं जानना किन्तु अपनी वृत्ति- दारा(३) विपयी पुरुप भी उस के संग संवन्धवाला है, इसी . (1) " गुहाहितं गहरेष्ठ पुराणम् " इत्यादि श्रुतियों में जिम गुहा ( गुफा ) में शाश्वत (निस ) मा निहित (स्थित) कहा है वह गुहा कुछ पाताल, या गिरिकता मुहर, या गन्धकार, वा समुद्र का उदर नहीं है किन्तु प्रतिविम्बित चेतनसे शाभिन्न सी. पो दिवृत्ति है यही गुहा माननी क्योंकि कवि ( सर्वज्ञमाने ) मन उस को ही मा गुहा मानते हैं, यह भागग पाक्य का अर्थ है । (२) प्रष्टा भी दृश्य इन दोनों के सग संबन्ध पास होने से अनेक ।। (१) वृत्ति नाम पद पर चिचर्ग चेतन की छाया के परगने का है गीत- पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- केवल दृश्य अर्थ का से ही लोक में 'घटमहं जानामि' (घटविषयक ज्ञानवाला हूं) यह जो प्रत्यक्षरूप ज्ञान है वह विषय औ विषयी इन दोनों का ही उपस्थापक होता है कुछ ही उपस्थापक नहीं। एवं च अचेतन विषयरूप भी चित्त चेतन औ विषयी के सदृश होने से चेतनाऽचेतनस्वरूप तथा विषयविपयिनि- र्भास ( १ ) हुआ स्फटिकमणि के तुल्य अनेक रूप वाला है यह निष्पन्न हुआ। भाव यह है कि-(२) जैसे एक ही स्वच्छ स्फटिक मणि अपने दोनों भागों में स्थित रक्त पुष्प औ नील पुष्प के प्रतिविम्ब से औ अपने निज रूप से तीन रूप वाल प्रतीत होता है तैसे एक ही चित्त विपय मौ आत्मा के प्रतिविम्ब से औ अपने रूप से गृहीता-ग्रहण-ग्राह्य स्वरूप हुआ तीन रूप वाला हो जाता है, (३) इसी से ही चिर सर्वार्थ है। यहां पर प्रसंग से यह भी जान लेना उचित है कि- यह जो सर्वार्थ होने से चित्त औ चेतन का सारूप्य है इर विषय चित्त में प्रतिबिम्बित है तैमे चेतन भी चित्त में प्रतिविम्बित है इम से विस दोनों से उपरक्त है। (१) (विपय) दृश्य, (विण्या) द्रष्टा, अर्थात्-द्रष्टा औ दृश्य रूपसे भासता हुमा (२) स्फटिक मणि के तुल्य-इम दृष्टान्त को स्पष्ट करत है "से" इत्यादि से । (३) तहां अपने आप से चित्त महणावार है गौ विषय के प्रतिबिम्ब से माद्याकार है भी आत्मा के प्रतिविम्य से प्राहलाकार है इस प्रकार अनेकाकार होने से पित पषि है।
कैवल्यपादा
चित्तसारूप्य से ही भ्रान्त हुए वैनाशिक लोकों ने चित्त को
आत्मा माना है कुछ ऐसे ही नहीं, (१) एवं योगाचार ने जो
चित्त से अतिरिक्त वाह्यप्रपञ्च का अभाव कहाहै सो भी इस
अविवेक
मूलक भ्रम से जानना, एवं च उन वैनाशिकों की
आस्तिकों ने उपेक्षा नहीं करना चाहिये किन्तु उन पर अनु-
कंपाकर चित्त से भिन्न आत्मा का स्वरूप उन को वोधन
करना चाहिये क्योंकि यदि वह ऐसे ही चित्त को आत्मा
मान लेते तब तो उन की उपेक्षा करनी उचित थी परन्तु
ऐसे उन्हों ने माना नहीं किन्तु चित्त को जो पूर्वोक्त प्रकार
से
द्रष्टा
औ
दृश्य
के आकार से भान कहा है सो भान ही
उन को चित्त के आत्मा मानने में भ्रांतिकारण है, एवं च
प्रांति के कारण का सद्भाव होने से चिस'को चेतन मानना
अविवेक से उन का संभव है, इससे उनको' कृपा कर
वोधन करनाही उचित है कुछ उन की उपेक्षा करनी नहीं।
अर्थात्-२) पूर्वोक्त युक्तियों से चित्त से अंतिरिक्त
आत्मा का उन को उपदेश कर फिर आत्मा के साक्षात्कार
के लिये अष्टाङ्ग योग द्वारा समाधि में उन की विश्वासपूर्वक
प्रवृत्ति करा कर यह उन को वोधन करना उचित है कि-
(समाधिकाल में जो सविकल्प प्रज्ञा(३) होती हे उस प्रज्ञा
"
(१) ऐसही-भ्रान्तियारण से पिना ही।
(२) जिस प्रकार से बौद्धों पर कृपा करनी चाहिपे सो प्रकार प्रदर्शन करते है
मर्यात् " इत्यादि से ।
(१) पह मप समाधि प्रा प्रशम पाद के ४२ इन्पादिमत्रों में स्पष्ट है।
पातखलदर्शनकाशे- में प्रतिविम्वित अर्थ भिन्न है ओ जिस में विषय का प्रति- विम्ब पड़ता है वह प्रज्ञा भिन्न है तथा प्रतिविम्बितपदार्थ युक्त प्रज्ञा को अवधारण करने वाला जो पुरुष है वह भिन्न है कुछ चित्तमात्र ही सव नहीं है क्योंकि यदि चित्तमात्र ही बाह्य अर्थ को माना जायगा तो चित्त अपने को आप ही ग्रहण करता है यह मानना पड़ेगा पर सो यह मानना असमीचीन है क्योंकि गृहीता-ग्रहण-ग्राह्य यह तीनों भिन्न २ ही माने जाते हैं कुछ अभिन्न नहीं (१) )। तथा च जिन सांख्य योगी वेदान्तियों ने विवेकद्वारा गृहीता तथा ग्रहण एवं ग्राह्य इन तीनों को परस्पर विजा- तीय रूप से पृथक् २ माना है वही सम्यग्दर्शी हैं ओ उन्हों ने ही पुरुष के स्वरूप को जाना है औ अन्य जो अविवेकी हैं वह सब भ्रान्त हैं यह निष्पन्न हुआ ॥ २३ ॥ किस हेतु से चित्तसे अतिरिक्त आत्मा मानना उचित है? इस आकांक्षा के होने पर सूत्रकार हेत्वंतर (२) कहते हैं- सू० तदसयेयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं सं- हत्यकारित्वाद् ॥ २४ ॥ भापा--(तद् ) सो चित्त (असंख्येयवासनाभिः) असंख्यात वासनाओं कर (चित्रमपि यद्यपि चित्रित है, तो भी (परार्थम्) (१) अर्थान-इम प्रकार उन को योधा का चित्त गौ चेतन यावियेक प्रदर्शन पुछ उनकी उपेक्षा न करे, इतने पर भी न गाने तो विवि भाति गाणे जान कर उन्मा हा यानी या है। (क) हेनु भोंमे नानिकि हेम् । बरे . कैवल्यपादः। अपने से भिन्न जो पुरुष है तिस के ही अर्थ है क्योंकि (संहत्यकारित्वाद् ) संहत(१) हो कर कार्य करने से, अर्थात्-यद्यपि अनंतवासनाओं कर चित्रित होने से चित्त ही को भोक्ता मानना उचित है क्योंकि जो वासना का आश्रय होता है वही भोग का आश्रय होने से भोक्ता बन सकता है अन्य नहीं, तथापि वह चित्त स्वार्थ नहीं जानना किन्तु पुरुष के भोगापयगार्थ ही जानना क्योंकि जोर जड़पदार्थ मिलित होकर किसी एक कार्य को संपादन करते हैं वह लोक में परार्थ ही माने जाते हैं स्वार्थ नहीं। • भाव यह है कि (२) जैसे शयन आसन गृह प्रभृति जड़ पदार्थ मिलित हुए पुरुष के भोगसाधन होने से पुरुषार्थ कहे जाते हैं तैसे चित्त भी क्लेश-कर्म-वासना तथा विषय-इंद्रियादि से मिल कर पुरुष का अर्थ संपादन करने से पुरुषार्थ ही है अर्थात्-सुखाकार जो चित्त है वह चित्त के भोगार्थ नहीं (३) हे औ तत्त्वज्ञानाकार जो चित्त है वह चित्त के अप- वर्गार्थ नहीं है किन्तु यह दोनों प्रकार का चित्त परार्थ ही हे, एवं च जो इस भोग औ अपवर्गरूप अर्थ से अर्थ वाला हे सोई असंहत केवल पुरुष है यह जानो। यहां पर इतना विशेप यह भी जान लेना कि (जोर (१) विषय तथा इन्द्रियादि से मिळवार । (२) सहकारिताद-- इस पद के गर्ष को स्पष्ट करते हैं "" इत्यादि से । (३) गान्---गुप हो सुगा बर के अनुकमनीय नहीं जो III ही शान कार गोपनीय नहीं किन्तु इन से मिन ही पुरा भारतीय तथा गोपनीय मागा। स्वार्थ नहीं। .
३८६ पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- संहत्यकारी होता है सोर पर के अर्थ होता है । इस युक्तिसे कोई सामान्य पदार्थमात्र ही पर नहीं मानना.क्योंकि यदि सामान्य से किसी पदार्थ को पर माना जायगा तो वह भी संहत्यकारी होने से परार्थ ही कहा जायगा किन्तु जो असंहत्यकारी पुरुप विशेष है सोई पर मानना चाहिये (१) औ उसी के अर्थ चित्त मानना चाहिये ॥ २४ ॥ इस प्रकार युक्तियों से चित्त से अतिरिक्त आत्मा के स्वरूप का प्रतिपादन कर इदानी इस आत्मा के उपदेश द्वारा साक्षात्कार करने की योग्यता वाला जो अधिकारी है तिस का अन्य अनधिकारी पुरुषों से विशेष कहते हैं- सू० विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥२५॥ भाषा-(विशेपदर्शिनः) चित्त से अतिरिक्त आत्मा को जानने वाले पुरुप की (आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः) आत्म- भावभावना निवृत्त हो जाती है। (२)अर्थात्-(पूर्वजन्म में हम कौन थे, कहां थे, किस प्रकार से स्थित थे, औ मेरा वास्तव रूप क्या है, औ यह शरीर भूतों का कार्य हे वा भूतों का समूह वा भूतों से भिन्न है आगे हम क्या होगे' औ कौन होंगे औ किस प्रकार होंगे ) इस प्रकार जो आत्मविषयक विचार है वह आत्मभावभावना जाननी । (१) यदि बाई अ य भी सहत माना जायगा तो वह भी सहत होने से अ यार्थ यो म य भा सहत होने से अग्यार्थ इम प्रसार मानवस्था हामा, इस से असंहत हो पर मानना चाहिये। (२) (II TRITIATI) इस पद का अर्थ यहते हैं अर्थात्" इगादि से ।
कैवल्यपादः। परन्तु यह आत्मभावभावना तावत्कालपर्यन्त ही विद्यमान रहती है कि यावत्कालपर्यन्त विवेकज ज्ञान का उदय नहीं होता हे औ जव फिर उपदेश द्वारा समाधि के अनुष्ठान से इस अधिकारी को (यह सव जो अनेक प्रकार की भावना है वह सब चित्त का ही विचित्र परिणाम है श्री में तो अविद्या के संपर्क से रहित तथा चित्त के धर्मों से अपरामृष्ट ( ७ ) होने से शुद्ध औ निर्विकार हूं) यह विवेक ज्ञान उदय होता है तब उस योगी की वह आत्मभावभा- वना निवृत्त हो जाती है। (१) एवंच जिस पुरुष के चित्त में यह भावना होती है वही आत्मज्ञान के उपदेश का अधिकारी है भी वही योगाभ्यास द्वारा विवेकज्ञान का संपादक है औ उसी की ही विवेक- ज्ञान से यह आत्मभावभावना निवृत्त होती है औ जिन्ह नरों को यह आत्मभावभावना ही नहीं उन को न तो आत्मोपदेश का अधिकार है औ न विवेकज्ञान ही होता है औ न आत्मभाषभावना की निवृत्ति है, यह सिद्ध हुआ। (२) तहां इस के चित्त में भावना का उदय है औ इस के चित्त में नहीं, यह अनुमान से जान लेना । (x) अपरामृष्ट-वियुक्त । (१) यहां पर सूनकार ने जो विशेषदर्शी (विक ज्ञानी) यी आग यभावना को निवृत्ति कही है इस से अर्थात् यह बोधन किया कि उस के चित्त में पहिले आगभान- भावना का उदय था क्योंकि बिना उदय से अमत् की निवृत्ति का होना अमगर है, तथाच आत्मभावभावनायालाही विशेष ज्ञान का अधिकारी हे अय नही यह फरिताआ। (१) पूर्वोत प्रकार से यह निक्षप हुमा तिमिन के वित्त में इस भाषना या . ३८८ पातजलदर्शनकाशे- (१) अथात्-जैसे वऋितु में तृणों के अंकुरों का प्रादुर्भाव देख कर उन तृणों के बीजों की सत्ता का अनु- मान किया जाता है तैसे जिस पुरुप को मोक्षमार्ग श्रवण से (8) रोमांच ओ हर्ष पुरस्सर अनुपात होय तिस पुरुष ने विवेक ज्ञान का बीजभूत तथा अपवर्ग का साधन जो यमनियमादिक कर्म हैं वह पूर्वजन्म में अनुष्ठित हैं ओ इस के चित्त में आत्मभावभावना का उदय भी है यह अनुमान से जान लेना। एवं जिन पुरुषों की पूर्वजन्म में शुभकर्मों के अनुष्ठान के अभाव से केवल (२) पूर्वपक्ष में ही रुचि हो औ सिद्धान्त में अरुचि होय तिन पुरुषों के चित्त में अनुमान से आत्मभाव- भावना का अनुदय जान लेना ॥ २५ ॥ अब विवेकी के चित्त का स्वरूप प्रदर्शन करते हैं- सू० तदा विवेकनिम्न कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥२६॥ भाषा-(तदा) विवेक ज्ञानके उदय कालमें (चित्तम् ) उदय है उन्हीं के प्रति गहात्माओं को आत्मोपदेश करना चाहिये अन्य शुष्क तार्किको यो नहीं परन्तु यह उपदेशक को कोसे ज्ञात होय कि इम के चित्त में माना का उदय है जो इम के चित्त में नहीं, इन आकाक्षा के शान के लिये कहते हैं, "तहो" इत्यादि । (१) सोई अनुगान प्रकार दिखाते हैं "अर्थात्" इत्यादि में । (*) पेराग्य बोधवा पचनों कार युक्त जो साइप योग वेदान्तशास्त्र है उसे गोक्षमार्ग जानना। (१) अर्थात्-रलोक हे या नहीं, निराकार का पान कैसे, ईश्वर दिखाई क्यों नहीं देता, इसादि तमों में गिन की रनिहो वह उपदेश के अधिकारी नागने । - कैवल्यपादः। ३८९ विवेकी का जो चित्त है वह (विवेकनिम्नम् ) विवेकमार्ग संचारी, तथा ( केवल्यप्राग्भारम् ) कैवल्य के अभिमुख हो जाता है (१) अर्थात्-विवेकज्ञान से पूर्व जो चित्त का प्रवाह अवि- वेकरूप मार्ग से वहता हुआ विषयभोग पर्यन्त विश्रान्ति वाला था वह चित्त विवेकज्ञान के उदय होने से आत्मा- नात्म विवेक रूप मार्ग की ओर निम्न हुआ कैवल्यपर्यन्त विश्रान्ति वाला हो जाता है, विस्तर (७) अन्यत्र देखो ॥२६॥ याद योगी का चित्त सदा विवेकनिष्ठ है तो वह चित्त कभी भी व्युत्थित १.२ ) नहीं होता है ऐसा मानना पड़ेगा एवं च विवेकी का जो भिक्षाटन स्नान शौच आदि व्यवहार देखने में आता है वह कैसे उपपन्न होगा क्योंकि विना व्युत्थान से भिक्षाटनादि व्यवहार का होना असंभव है ? इस आक्षेप का वारण करते हैं- सू० तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः॥२७॥ भाषा-(संस्कारेभ्यः ) पूर्वले व्युत्थान के संस्कारों से (तच्छिद्रेषु ) तिस विवेकनिष्ठ चित्त के अन्तरालों में (३) (प्रत्ययन्तिराणि ) अन्य प्रत्यय भी उत्पन्न होते रहते हैं। (१) नल के प्रवाह के सचार योग्य जो नीच प्रदेश है यह निम्न यहा माता है, गो पर जाकर नल का प्राह र क जाता है ऐसा जो उन प्रदेश है वह प्राग्- भार जागना, इमी को स्पष्ट करते हैं " अर्थात् " इत्यादि से। (*) प्रथम पाद के १२ सूत्र के पार पान में ! (१)(स्थित ) व्युत्थान याला अर्थान् स्थिरता के अभाव में विक्ष मार । (३)विद्कानी २ बीच २ में होने वाला जो पिकामात 7 TI यह दिमागमा इमी को अ तराफ यो समर पहते हैं।
पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- अर्थात्-यद्यपि विवेकी का चित्त विवेकख्यातिमात्र प्रवाह शील होने से विवेक निम्न ही है तथापि क्षीयमाण वीजरूप (१) पूर्व संस्कारों से कभीर मध्य में विवेकज्ञान के शिथिल होने पर (यह मै हूं, यह मेरा है, यह मैं जानता हूं, यह में नहीं जानता हूं,) इस प्रकार के अनेक प्रत्यय चित्त उदय होते रहते हैं क्योंकि अनादि काल से प्रवृत्त व्युत्था- नसंस्कार प्रवल हैं औ विवेक अभी दुर्वल है ॥ २७ ॥ यदि विवेकज्ञान के होने पर भी व्युत्थानसंस्कार वीचर में अन्य प्रत्ययों को उत्पन्न करते रहते है तो ऐसा इन के नाश का उपाय कोन है कि जिस से नष्ट हुये यह फिर अन्य प्रत्ययोंको उत्पन्न न करें? इस आकाक्षाको शान्त करते हैं- सू० हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥ २८ ॥ भाषा--(एषाम् ) इन व्युत्थान संस्कारों का (हानम्) नाश होना (क्केशवद् ) क्लेशों के नाश की तरह जानना क्योंकि ( उक्तम् ) ऐसे ही पूर्वाचार्यों ने कहा है (२) अर्थात्-जैसे प्रसंख्यानरूप अग्नि से दग्धवीजभाव हुये क्लेश अपने अंकुरोत्पादन में असमर्थ हो जाते हैं तैसे विवेकाभ्यासरूप प्रसंख्यान अग्नि से दग्धवीजभाव हुये पूर्वले संस्कार भी अन्यप्रत्ययों को उत्पन्न नहीं करते हैं। (१) क्षय हो रही है भोजन शक्ति जिन संस्कारों की यह सस्कार क्षीयमाण- योग रूप कहे जाते हैं, अर्थात--विधवा यासरप अग्नि से नहीं दग्धहुगे सरकारों से। (३) या मे द्वितीयपाद में १०-११-इन दोनों सूत्रों में देशों का नाश पहा तमे सकारों पा गाश गी गान सेना।
कैवल्यपादः। नहीं यह सिद्ध हुआ एवं च अपरिपक्क विवेकज्ञान निष्ट चित्त में ही व्युत्थान संस्कारों का प्रादुर्भाव होता है, परिपक्वज्ञान निष्ठ चित्त में -- भाव यह है कि प्रथम विवेकज्ञान के अभ्यास से विवेकज्ञान के संस्कारों का संपादन कर व्युत्थानसंस्कारों का निरोध करे फिर निरोधसंस्कारों से विवेकसंस्कारों का क्षय करे फिर निरोधसंस्कारों का असंप्रज्ञातसमाधि से लय करे कुछ विवेकज्ञानपर ही आसन लगा कर अपने को कृत- कृत्य न माने ॥२८॥ इस प्रकार व्युत्थान के निरोध का उपाय (विवेकाभ्यास रूप प्रसंख्यान) कयन कर अव प्रसंख्यान के निरोध का उपाय कहते.हुये जीवन्मुक्ति की परमकाष्ठा रूप धर्ममेघ समाधि को स्वरूप कहते हैं- सू० प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्या- तेधर्ममेघः समाधिः॥२९॥ भाषा-(प्रसङ्ख्यानेऽपि ) विवेकज्ञान में भी (अकुसी दस्य) फल की इच्छा के अभाववाले योगी को (सर्वथा ) निरन्तर (विवेकख्यातेः) विवेकज्ञान के होने से (धर्ममेघः समाधिः) धर्ममेघ नामक समाधि प्राप्त होता है। अर्थात्-जिस समय ब्रह्मनिष्ट योगी प्रसंस्थान में भी अकुसीद (१) हो जाता है अर्थात्-पर घेराग्यद्वारा प्रसंन्यान (१) निसी को मग देकर उस मे जो गाम २ युर दि लेगी उग का नाम धमाद, इम्रो को ही शो में यही सद सो गाही भाग है, पदि यह योगी - .. पातञ्जलदर्शनकाशे के फल (१) में भी विरक्त हो जाता है तिस काल में इस पर वैराग्यशील योगी को निरन्तर विवेकख्याति का लाभ होता है क्योंकि संस्कारों के क्षय होने से अन्य प्रत्ययों की उत्पत्ति का उस काल में प्रभाव है। यह जो दृढ़ अभ्यास तथा पर वैराग्य द्वारा व्युत्थान संस्कारों के क्षयपूर्वक निरन्तर (२) विवेकख्यातिमात्र रूप से चित्त का अवस्थान इसी का नाम धर्ममेघ समाधि है (३) । ओ यही संप्रज्ञात योग की परमकाष्टा है, ॥ २६ ॥ अब इस समाधि के होने से जो फल होता है वह कहते हैं- , सू० ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥ ३० ॥ भाषा-(ततः ) तिस'.धर्ममेघ समाधि के लाभ से (क्लेशकर्मनिवृत्तिः) क्लेश तथा कर्मों की निवृत्ति हो जाती है। अर्थात्-इस समाधिके लाभसे अविद्यादि क्लेश समूल नष्ट हो जाते हैं तथा क्लेशमूलक शुभाशुभ कर्म भी भौ क्विक ख्यातिके फल की हिप्सा याला होता तब वह भी कमीद वाला कहा जाता परन्तु वह चाहता नहीं इस से वह अकुमीद है, इसी को स्पष्ट करते हैं " अर्थात् " इत्यादि से। (१) विवेक ख्याति का फल सर्पइ-वादि का लाभ है, यह सब ३१२ पृष्ठ पर ४९ सूत्र के गाल्पान में स्पष्ट है। (२) व्युत्पान संस्कारों द्वारा नो बीच २ में अन्य प्रन्ययों का उदय होता था उस का एकबार अभार हो जाना ही निरता पद का अर्थ है । (३) "मयंतु परमो धर्मो पद योगेनात्मदर्शनम्" इम योगी याज्ञाक्य के वाक्य से साक्षाकार का नाग धर्म जानना, इस धर्म को जो वृष्टि कारने वाला होप उस का माग धमघ समाधि है । , - कैवल्यपादः। समूल हत ( नष्ट') हो जाते हैं, फिर क्लेश कर्म के क्षय होने से विद्वान् जीवन्मुक्त हो जाता है। "अर्थात् जन्म-मरण का 'निदान जो विपर्यय ज्ञान है उस के क्षय होने से वह जन्ममरण के अभाव द्वारा निखिल वन्धनों से मुक्त हो जाता है क्योंकि क्षीणविपर्यय कोई पुरुष भी किसी ने कहीं पर उत्पन्न हुआ नहीं देखा है । गौतममुनि जी ने भी “ वीतरागजन्मादर्शना (७) इस सूत्र से.वीतराग का जन्माभाव कहा है ॥ ३०॥' अब धर्ममेघसमाधिनिष्ठ जीवन्मुक्त के चित्त को अन्य चित्तों से विलक्षण कहते हैं- सू० तदा सर्वावरणमलाऽपेतस्य ज्ञानस्याऽऽन- न्त्याज् ज्ञेयमल्पम् ॥ ३१ ॥ भाषा, (तदा..) तिस काल में (१) ( सर्वावरणमला ऽपेतस्य ) निखिल आवरणमल (1) से वियुक्त हुये (ज्ञानस्य) चित्त को (२) (आनन्त्यात् ) अपरिमेय होने से ( ज्ञेयम् ) वाह्य विषय (अल्पम् ) परिच्छिन्न हो जाता है। अर्थात्-चित्त को आच्छादन करने वाले जो क्लेश कर्म - -- (.) भ०५ मा० १ सू० २५ (१) गर्थात्---धर्मगंध समाधि के अनुशन द्वारा लेशादि फे क्षय होने पर जीयन- गुक्ति के नाम पास में। (1) पित्तनिष्ट सरसगुण को माछादन यरो याने नो केशबर्गरण गम है यह बापरणमल भागने (२) ज्ञान, वित्तमस, दाप, गर मय मा शाह का अर्थ यहाँ रचित विकार।
पातजलदर्शनप्रकाशे- रूप मल हैं उन के क्षय होने से चित्त अपरिच्छिन्न होजाता है औ बाह्य ज्ञेय पदार्थ परिच्छिन्न हो जाते हैं। भाव यह है कि यद्यपि चित्तसत्त्व सत्वगुणप्रधान होने से स्वभावतःही सर्व पदार्थों के ग्रहण करने में सामर्थ्य- शील है तथापि तमोगुण कर आवृत्त होने से मुग्ध हुआ वह निखिल पदार्थों को ग्रहण नहीं कर सकता है किन्तु क्रिया- शील रजोगुण कर प्रवर्तित हुआ किसी २ विषय को ग्रहण करता है ( १ ) इस से समाधि से पूर्व चित्त का प्रचार तो अल्प होता है औ ज्ञेय पदार्थ अनन्त भान होते हैं ओ जब फिर धर्ममेघसमाधि के अनुष्टान से वह चित्त रजत-ममूलक क्लेश कर्म रूप आवरण से विमुक्त हो जाता है तव फिर कोई ऐसा पदार्थ ही नहीं है जिस को चित्त विपय न करे - इस से उस काल में चित्त अनन्त अपरिमित-अपरिच्छिन्न : हो जाता है ओ ज्ञेय पदार्थ आकाश में खद्योत की तरह परिमित परिच्छिन्न हो जाता है। अर्थात्-गदि पंचविंशति २५ तत्व से अतिरिक्त अन्य भी कोई तत्त्व होता तो उस को भी योगी का चित्त विषय करता परंतु अन्य कोई तत्त्व है ही नहीं इस से ज्ञेय ही अल्प है कुछ योगी का ज्ञान अल्प नहीं ( २ )। (१) धर्मात् - यद्यपि सत्वगुण प्रकाराशाल है तथापि अक्रिय तथा तमोगुण कर अभिभूत होने से यह कुछ कर नहीं माता पर तु मद रजोगुण शापित होकर उस को उत्तजिन यार तमोगुण यो यत्किचित् तिरस्टत मार देता है तब फिर किसी २ विषय यो वा सण यस्ता देयो जर फिर रागागण उद्भुत होता है तो फिर यह निविन विषयों को प्राण में समर्थ नहीं। (२) गाग-1 हो भनगान है पर योगी के ज्ञान या नहीं । रोशाता है इग बह कैवल्यपादः। एतादृश जो धर्ममेघसमाधिनिष्ठ योगी का चित्त है यही निर्वासन तथा विगत मल होने से कैवल्य चित्त कहा जाता है औ इस चित्त के प्रभाव से ही धर्ममेघ समाधि वाले का फिर जन्म नहीं होता है। यदि कोई यहां पर यह आशंका करे कि (इस समाधि से क्लेशादि का क्षय होने पर भी फिर योगी का जन्म क्यों नहीं होता ?) तो इस आशंका के वारणार्थ भाप्यकारों ने यहां पर- " अन्धो मणिमविध्यत् तमनगुलिरावयत्, अग्रीवस्तं प्रत्यमुञ्चत् तमजिह्वोऽभ्यपूजयद् यह एक लौकिक आभाणक(१) कहा है, इसका अर्थ यह है कि-अन्ध पुरुष वजद्वारा मणि को छिद्रवाला करता है औ (अनलिः) अङ्गुलियों से रहित पुरुष (तम्) तिस मणि को (आवयत्) सूत्र से ग्रथन करता है औ 'अग्रीवः' ग्रीवा से रहित पुरुप तिस को (प्रत्यमुञ्चत् गले में धारण करता है औ (अजितः) जिह्वा से रहित पुरुष तिस को (अभ्यपूजयत्) स्तवन करता है। अर्थात्-जैसे यह सब असंभव है तैसे क्लेशादि के क्षय होने पर फिर जन्म का होना भी असंभव है (२)। (१) (आमाणक=) अमभव अर्थ के प्रतिपादन करने वाला लोगों का याक्य, औसद मंद में सो गावाचार्य की हम वाक्य को द के नाम मे कहा है। (२) विज्ञानमिन जो तो यह कहते है शि-(धर्ममेगांधीनष्ट योगी के चित्त को जो यह दशा वही है सो दशा होनी अप है म आश मेरा लोगों ने पर सपहाम किया है -िशेगांणाविष" गादि, भन्मेि मोय में अन्धामिनाद गाश्चर्य है तेमे पर योगी को मनाना भी वर्ष है- हास्यजनक प्रारत - -- 4 पातञ्जलदर्शनप्रकाशे- भाव यह है कि यदि कारण के उच्छेद होने पर भी कार्य का अभाव न माना जायगा तो असंभव अर्थ का प्रतिपादक जो यह आभाणक है वह भी आप को युक्त मानना लगेगा पर इस को कोई युक्त मानता नहीं इस से जन्म- कारण क्लेशादि के नाश होने पर फिर जन्म का अभाव होता है यही मानना समीचीन है ॥ ३१ ॥ पूर्वोक्तप्रकार से धर्ममेघ समाधि के लाभ से क्लेशादिकों के क्षय होने पर भी गुणों को विद्यमान होने से वह फिर योगी के शरीर का आरम्भ क्यों नहीं कर सकते ? इस का समाधान कहते हैं- सू० ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ॥३२॥ भाषा-(ततः) तिस धर्ममेघसमाधि के उदय होने से ( कृर्तार्थानां गुणानाम् ) कृतप्रयोजन हुये गुणों के (परिणाम क्रमसमाप्तिः) कार्योत्पादनरूप परिणाम के क्रम की समाप्ति हो जाती है। अर्थात्-तावत्कालपर्यन्त ही तीनों गुण परिणामक्रम वाले होते हैं कि यावत्कालपर्य्यन्त भोग तथा अपवर्ग रूप दोनों कार्यों का पुरुष के प्रति संपादन न कर अकृतार्थ तथा असमाप्ताधिकार होते हैं औ जब इन दोनों कार्यों को संपादन कर कृतार्थ तथा समाप्ताधिकार हो जाते हैं तव । पाप कलियुगी पंजाबी गन्धे भी गणि में उिद्र कर गकते है तथाणि अल्पदे- नाय सत्ययुगी अन्धों की गपेक्षा से यह अमभव जानना ।
३९७ कैवल्यपादः। फिर यह गुण परिणामक्रम ( १ ) से रहित हो जाते हैं, मर्थात्-कार्यनिष्पादन के अनन्तर क्षण भर भी वह परिणाम के लिये अवस्थित नहीं होसकते हैं, एवं च विवेकः ख्याति की पराकाष्ठारूप धर्ममेघसमाधि के उदय होने से समाप्तकर्तव्य हुये तीनों गुण योगी के शरीर का प्रारम्भक नहीं होते हैं यह सिद्ध हुआ । परन्तु इतना विशेष है कि-जिस पुरुष के प्रति यह कृतकार्य हैं उसी के प्रति यह परिणामकम से रहित होते हैं अन्यपुरुषों के प्रति नहीं, इसी से ही पूर्व यह कहा है कि "कृतार्थ (२) प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वाद्" इति ॥ ३२॥ अव परिणामक्रम के ज्ञान का उपाय कहते हुये परि- णामक्रम का लक्षण कहते हैं- सू० क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्माह्यः क्रमः॥३३॥ भापा-क्षणप्रतियोगी, क्षणों का संबन्धी, तथा ( परिणामापरान्तनिर्णायः ) परिणाम के अवसान कर ज्ञाय- मान, जो गुणों की अवस्थाविशेष वह (क्रमः ) क्रम कहा जाता है। अर्थात-क्षणों की अव्यवहित धारा को आश्रय करने वाली जो परिणामधारा है वह परिणाम कम जानना (३) । (१) प्रथम तो गुणों का कार्योत्पादन में आभिमुग्व्य, भौ फिर गुणमेषम्य औ फिर महत्तत्वादिरूप से अनेक प्रकार के परिणामों का होना, यह परिणाग कम है। (२) द्वितीय पाद का २२ सवा सून, १९० पृष्ठ में देखो। (३) पिना कग वाले से कग का निरूपण पारगा मशक्य है ओ एक क्षण का पातअलदर्शनकाशे- सो यह क्रम कैसे परिज्ञात होता है, इस आकाङ्क्षा के होने पर कहा है कि " परिणामापरान्तनिर्माह्यः” अर्थात्- परिणाम के अवसान कर के यह क्रम ज्ञात होता है । (१) अर्थात् प्रयत्नपूर्वक संरक्षित नूतनवस्त्र में जो अनेक वर्षों के अनन्तर 'पुराणता=जीर्णता ( पुराणापन ) देखने में आता है वह परिणाम का अपरान्त (अवसान) (0) कहा जाता है ओ इस परिणाम के अपरान्त से वह क्रम ज्ञात होता है। भाव यह है कि यह जो वस्त्र में प्रशिथिलावयंव रूप जीर्णता है यह एकवार एक दिनमें हुयी हे यह तो मानना असंभव है किन्तु प्रथम सूक्ष्मतम पुराणता फिर सूक्ष्म- तर फिर सूक्ष्म फिर स्थूल, स्थूलतर, स्थूलतम इस प्रकार क्रम से हुयीहै यही मानना लगेगा, एवं च यह जो पुराणता रूप परिणाम का अपरान्त है यही परिणामक्रम में प्रमाण हे यह सिद्ध हुआ। परन्तु (२) यह परिणामक्रम केवल अनित्य पदार्थों M निर्गाह्य" क्रम हो नहीं सकता इस से अनेक क्षणों को आश्रयण करने वाला जो क्षणों क पोगर्य्यरूप परिणाम प्रयाह यह परिणाग का मानना । (१) तहा (क्षणप्रतियोगी ) यह तो क्रम का लक्षण है औ । परिणागापरान्त यह क्रम में प्रमाण प्रदर्शन पर है, इमी के अर्थ को सट करते है गर्थात् " इत्यादि से। (*) अपरान्त, अवसान-पर्यवमान, अन्त; यह सब एकार्थक है। (२) इस प्रकार सूत्र का अर्थ कथन कर " नित्येषु च क्रमो दृष्टः" इत्यादि भार का अनुवाद करते हैं परन्तु" इत्यादि से।
कैवल्यपादः। में ही होता है यह नियम नहीं है किन्तु नित्य पदार्थों में भी यह दृष्ट है (१)। भाव यह है कि-नित्यता दो प्रकार की होती है एक तो कूटस्थनित्यता ओ एक परिणामिनित्यता, तहां पुरुष में तो कूटस्थनित्यता है श्री गुणों में परिणामिनित्यता है । यद्यपि स्वस्वरूप से अप्रच्युत होने से कूटस्थ रूप पुरुष ही नित्य हो सकता है गुण नहीं क्योंकि वह स्वरूप से प्रच्युत (२) होने से परिणामी हैं तथापि " यस्मिन् परि- णम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम्" इस लक्षण का दोनों में (७) समन्वय होने से गुणों को भी नित्य जानना । (३) अर्थात्-जिस के परिणम्यमान होने (1) पर भी स्वरूप का विधात न होय वह नित्य कहा जाता है सो ऐसीनित्यता गुण तथा पुरुष इन दोनों में विद्यमान है क्योंकि दोनों के स्वरूप के विधात का अभाव हैं,(४)। (१) तह इतना विशेष दि-अनिस पदार्थों में स्थत हो या परास्त होने से काग है जो नित्य गुणों में विषारों ये अपरान्त द्वारा क्रम मान लेना, अर्थात्---गुणोंका वार्यपात्र में अ यय होने से यार्य के अपरा त द्वारा गुणों में भी क्रम का अनुगान पर लेना। (२) पूर्व रूप के त्याग पूर्वक अय रूप की प्राप्ति का नाम प्रभ्युति है । (*) दोनों में गुण औ पुरुष (३) पूर्वोक्त भाध्यकारीय लक्षण का अर्थ काहते हैं " अर्थात् " इत्यादि से । (1) (परिणम्यमान ) परिणाम को प्राप्त हाने पर । (१) अर्थात-अतीतावस्था से शू य होना मात्र ही नित्य का सामा य रक्षण कुछ परिणामी परिणामी का याच में निवेश नहीं है सो अतीतावस्था शू य गुण यो पुरुष दोनों ही हैं क्योंकि धर्म लक्षण अवस्था ही उदय नाश याले होते हैं कुछ धर्माभूत गुण नहीं।
A पातालदर्शनकाश- यद्यपि गुण परिणामी हैं श्री पुरुष अपरिणामी है तथापि प्रतीतावस्था की प्राप्तिरूप जो स्वस्वरूपप्रच्युति है इस का अभाव होना दोनों में ससान है इस से दोनों ही नित्य जानने ।....., तथाच अनित्य बुद्धि आंदि तथा परिणामिनित्य गुण स्वरूप प्रधान एवं क्रूटस्थानित्य पुरुप इन तीनों में ही पूर्वोत्त क्रम का संवन्ध जानना, तहां इतना विशेप है कि-बुद्धि आदिव जो गुणों के अनित्य धर्मः हैं तिन में तो परिणामापरान्तमाए क्रम लब्ध पर्यवसान है ओ धर्मी रूप जो नित्य गुण । तिनों में यह क्रम अलब्धंपर्यवसान है, (१) यो कूटस्थ रूप जो नित्य पुरुष.हे तिस में भी यह क्रम अलब्धपर्यवसान है (२). यद्यपि वास्तव-क्रम का होना पुरुप में असंभव है तथापि अस्ति क्रिया को ले कर अर्थात्-पूर्व काल में भी पुरुष थ औ वर्तमान काल में भी पुरुष है श्री. भविष्यत्काल में भी यह पुरुष होगा इस प्रकार जो सर्वकालसंबन्धरूप नित्यता है इस अस्ति क्रिया को लेकर अवास्तव क्रम का पुरुष में.भी संबन्ध जान लेना (३) । (१) लब्ध प्राप्त हुआ है पर्यवमान अतीतायस्था रूप धर्म जिस को यह लब्ध पर्यवसान जानना, अति-बुद्धि भादिक धर्म विनाशशीक है इस से उन के परिणाम क्रम का पर्यवसान होता है गो गुण स्वरूप प्रधान को नित्य होने से उन का परिणाम नग अलब्धपर्ययसान है। (२) वृद्धि गादियः धर्मरूप से परिणाम को प्राप्त होने से प्रधान का परिणाम- माम यद्यपि सम्भय हो सकता है तथापि अपरिणामी पुरुष का परिणाग अग से, इस माशंका के होने पर कहते हैं " यद्याद" इत्यादि से । (३) अर्थात् यद्ध पुरुषों को चित्त से अविवेक होने से चित्त के परिणाम क्रम का अभ्यास मानना भी मुक्तपुरुपोंको अस्ति कियाको लेकर कल्पित कूगका संबन्ध जानना। " कैवल्यपादः। अर्थात्-पुरुष में क्रम विकल्पमात्र है वास्तव नहीं, प्रब यहां पर एक यह आशङ्का उत्थित होती है कि यह नो सृष्टिप्रलयप्रवाहरूप से गुणों में वर्तमान संसारक्रम है इस कम की समाप्ति होती है वा नहीं यदि होती है तो फेर अलब्धपर्यवसान कैसे कहां औ यदि नहीं होती है तो पूर्वसूत्र में गुणों की परिणामकूमसमाप्ति कैसे कही ) इस आशङ्का के वारणार्थ भाष्यकारों ने यह कहा है कि "अवचनीयमेतत्, कथम्? अस्ति प्रश्न एकान्तवचनीयः-सवों जातो मरिष्यति, डोस् भो इति, अथ सर्वो मृत्वा जनिष्यत इति ? विभज्य वचनीयमेतत्-प्रत्युदितख्यातिः क्षीणतृष्णः कुशलो न जनिष्यत इतरस्तु जनिष्यंत इति, तथा मनुष्य जातिः श्रेयसी नवा श्रेयसीत्येवं परिपृष्टे विभज्य वचनीयःप्रश्नः पशूनुद्दिश्य श्रेयसी, देवान् ऋषीश्चाधिकृत्य नेति, अयन्व- वचनीयः प्रश्नः संसारोयमन्तवानथाऽनन्त इति, कुशलस्या- स्ति संसारक्रमसमातिनेतरस्येति, अन्यतरावधारणे दोषः तस्माद् व्याकरणीय एवायं प्रश्न" इति । (B) अर्थात् यह जो आप की आशङ्का है वह अव- चनीय है अर्थात् एक बार ही हां वा नहीं कह देना इस प्रकार : उत्तर देने योग्य नहीं है किन्तु विभागपूर्वक उत्तर देने योग्य है। भाव यह है कि प्रश्न दो प्रकार का होता है एक तो एकान्तवचनीय अर्थात्-नियम से एक ही समाधान (*) पूर्वोक्त भाष्य के गर्य को स्पष्ट करते हैं। अर्थात्" इत्यादि से।
य पातखलदर्शनकाशे- द्वारा उत्तर देने योग्य, श्री एक विभज्यवचनीय अर्थात्-- विभाग पूर्वक उत्तर देने योग्य, तहां 'जो उत्पन्न हुआ है क्या वह सब मरेगा' यह जो प्रश्न है वह एकान्तवचनीय है अर्थात्-अवश्य मरेगा इस प्रकार एक ही उत्तर देने की योग्यता वाला है, औ 'जो मरेगा सो क्या फिर जन्मेगा' यह जो प्रश्न है वह विभज्यवचनीय है अर्थात्-प्रत्युदित- ख्याति (0) क्षीणतृष्ण कुशल पुरुष नहीं जन्मेगा, औ इतर अविवेकी जन्मेगा इस प्रकार विभाग पूर्वक उत्तर देने योग्य है, एवं 'मनुष्यजाति श्रेष्ठ है वा अश्रेष्ठ' यह जो प्रश्न है वह भी विभज्यवचनीय जानना अर्थात्-पशु शादिकों की अपेक्षा.से श्रेष्ठ है श्री देव तथा ऋषियों की अपेक्षा से अश्रेष्ठ है। तथा च यह जो प्रश्न है कि 'संसार अन्तवाला है वा अनन्त' यह भी नियम कर अवचनीय होने से विभज्य- वचनीय ही जानना अर्थात्-यदि संसारक्रम 'सृष्टि प्रवाह' का उच्छेद माना जाय तो संसारको अनादि अनंत वोधन करनेवाला शास्त्र (१) वाधित हो जायगा औ. यदि इस का उच्छेद न माना जाय तो किसी की भी मुक्ति न होने से मोक्ष प्रतिपादक योग- शास्त्र व्यर्थ हो जायगा, इस से नियम कर के संसार का उच्छेद वा अनुच्छेद निश्चय करना दोषयुक्त होनसे अशक्य (*) प्रत्युदितख्याति आर्तमान विकख्याति वाला 1. (1) " रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो नचादिर्नच सप्रतिष्ठा" इत्यादि शास्त्र ससार को प्रमाहरूप से अनादि औ अनन्त मोधन करते हैं। man 7 an ।
कैवल्यपादः। किन्तु कुशल (१) पुरुप में संसार.क्रम की समाप्ति हैं नौ अकुशल में नहीं इस प्रकार विभागपूर्वक ही इस का प्रवधारण करना युक्त है, तथा च पूर्वोक्त जो प्रश्न है (७) हि एकान्त वचनीय नहीं है किन्तु विभज्यवचनीय है (२) यह निष्पन्न हुआ ॥ ३३ ॥ गुणों के अधिकार की समाप्ति द्वारा जो परिणाम की समाप्ति होने पर कैवल्य कहा है अब उस कैवल्यके स्वरूप का अवधारण (क) करते हैं। सू० पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ॥३४॥ भाषा-(पुरुषार्थशून्यानां गुणानाम् ) कृतार्थ होने से । (१) धर्ममेघसमाधिनिष्ठ योगी का नाम कुशल है औ अविवेकी प्राकृत पुरुष का नाम अकुशल है। (4) संसार अन्तवान् है वा अनन्त इत्याकारक प्रश्न । (२) यहां पर जो एक यह क्षुद्र संदेह उपस्थित होता है कि (पदि मुक्त पुरुषों के लिये प्रधान के परिणाम क्रम की समाप्ति होती है तो गशः प्रत्येक जीयों को मुक्त होते २ एकवार ही प्रधान के क्रम की समाप्ति हो नायगी तथा च संसार का उच्छेद भी प्रधान को अनित्यता हो नायगी) इस संदेह का वारण वाचस्पतिमिश्र ने इस प्रकार से किया है कि जीव असङ्ख्यात है इस से संसार का उच्छेद नहीं है, किंच पशु पक्षी-ऋमि-कीट-गशक-यका-लिक्षा-सर्प-वृश्चिक-कालास-कता-गुल्म-बनस्पति-औपधि- वृक्षादि स्प प्रभेद से अनन्त चराचर को विवेकख्याति के काम के अभाव से सर्व प्राणी का मुक्त होना भी असंभव है, किंच अनेक जन्माभ्यासपरंपरसाध्य तत्व ज्ञान का पुरुषमान को न लाभ होने से सब पुरुषों की भी मुक्ति होनी असंभव है, विस्तर खामी नी निर्मित (कैवल्य कल्पलतिका) में देखो। (1.) (अवधारण)-लक्षणद्वारा निश्चय ।
४०१ पातजलदर्शनकाशे-- पुरुषार्थ से रहित बुद्धि आदि रूप से परिणत गुणों का जो (प्रतिप्रसव) अपने २ कारण में लय द्वारा प्रधान में लय, वह (कैवल्यम्) पुरुप का कैवल्य जानना (वा) अथवा (स्वरूप प्रतिष्ठा) अपने शुद्धरूप में प्रतिष्ठा रूप (चितिशक्तिः चेतन शक्ति रूप पुरुष का हो जाना कैवल्य है, इति शब्द शाख की परिसमाप्ति का बोधक है। अर्थात्-पुरुष के भोग तथा अपवर्गरूप पुरुषार्थ संपादन से कृतार्थ हुये पुरुषार्थशून्य कार्यकारणस्वरूप गुणों का जो प्रतिप्रसवअर्थात्-व्युत्थान-समाधि-निरोध इन तीनों के संस्कारों का मन में लय औ मन का अहंकार में लय औ अहंकार का लिङ्गरूप बुद्धि में लय औ बुद्धि का गुण स्वरूप प्रधान में लय हो जाना यह-एम्प का कैवल्य जानना अथवा बुद्धिसत्त्व के संग फिर कभी भी संवन्ध न होने से जो पुरुष का निरन्तर केवल चितिशक्तिरूपमात्र से अवस्थान रूप स्वरूपप्रतिष्ठा वास्तवरूप से अवस्थान वह कैवल्य जानना। जैसे वेदान्त मत में अज्ञान की निवृत्ति औं परमान- न्दस्वरूप ब्रह्म प्राति को समकाल होने पर भी कहीं अज्ञान की निवृत्ति(१) को औ कहीं ब्रह्म की प्राप्ति को मुक्ति कहा है तैसे यहां पर भी गुणों का प्रतिप्रसव औ स्वरूपप्रतिष्ठा (१) " भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः" इत्यादि श्रुतियों में अज्ञान की निवृत्ति वो मुक्ति कहा है औ " स यो ह वै तत्परम ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म की प्राप्ति को मुक्ति कहा है ।
कैवल्पपादः। इन दोनों को समकाल होने पर भी तात्पर्य की एकतासे कैवल्य के दो लक्षण कहे हैं कुछ लक्षणभेद से कैवल्य का भेद नहीं जानना ॥ ३४॥ उोम्-तत्-सत् । शान्तिः शान्तिः शान्तिः। दोहा-मुक्तचित्त(७) परलोक पुनि, विषयी विषय वखान । धर्ममेघ कैवल्य भान, कियो पाद अवसान॥१॥ वेद वाण निधि सूर मित, संवत् विक्रम भोग ()। रक्षावन्धन दिवस में, कियो समापत योग ॥२॥ इति श्रीमत्परमहंस योगिराज निखिळशास्त्रनिष्णान-स्वामि पालरामो- दासीनोद भासिते पातञ्जलदर्शनप्रकाशे कैवल्यपादश्चतुर्यः । हरिः-उोम्-तत्-सद्-ब्रह्मार्पणम् । (*) अब इस पाद में कथित अर्थ का संग्रह प्रतिपादक दोहा कहते हैं-"मुक्त चित्त" इत्यादि से, तहाँ मुक्ति की योग्यतावाला चित्त षष्ठ सूत्र से कहा, औ परलोक- सिद्धि दशम सूत्र से कही फिर बाह्यविषय की सिद्धि ११ इत्यादि सूत्रों में कथन की तथा चित्त से अतिरिक्त विपी पुरुष की सिद्धि १९ इत्यादि सूत्रों में कथन की, यो धर्मगेघसमाधि का प्रतिपादन २८ वें सूत्र से किया, फिर ३० वें सूत्र से बीवन्मुक्ति सो ३४ वे सूत्र से विदेहमुक्ति का निरूपण किया, औ प्रसङ्ग से प्रकृत्यापूर तथा वासना को अनादि, इत्यादिक पदार्थों का निरूपण किया, यह इस का अर्थ है। (क) (वेद) चार, (बाण) पांच, (निधि) नव, (सर) एक, अर्थात्-विक्रम जी के १९५४ संवत् के भोगकाल में श्रावणपूर्णिमा के दिन यह प्रकाश समाप्त हुआ। नास्ति योगसमं वलम् इति श्रील हंसोदासीनात्मस्वरूपशाखिसमुद्दीपिते प्रकाशटिप्पणे तुरीयः कैवल्यपादः ॥ १॥ " " तस्माद योगी भवार्जुन
पातञ्जलदर्शनकाशे-
कुलं पवित्रं जननी कृतार्थी वसुन्धरा पुण्यवती च तेन ।
अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिन् लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः ॥
योग बिना जो ज्ञान वतावै, विना ताल से गावै ।
कहै घाघ यह तीनों भकुत्रा, काम किये पछितावै ॥
" जोनमोऽस्तामिणे । योगतत्वसमीक्षापरिशिष्ट । उपसंहार। " प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते, अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत् (७) मुण्डक। " समाधिनि—तमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं भवेत् , न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते (+)" मैत्रायणी शुश्रूपुजन ! यदि किसी योगभ्रष्ट को पूर्वजन्मानुष्ठित साधनों से स जन्म में तत्त्व ज्ञान के उदय होने पर “यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थि विकिरतीह सोम्य" (१) " ब्रह्म वेद रह्मैव भवति (२)" "भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः शीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे (३)" । (4) ठोकार धनुप है जो आत्मा वाण है श्री ब्रह्म उस का लक्ष्य है, प्रमाद से हित हो कर लक्ष्य को यंधन करे, जैसे माण लक्ष्य के संग एकत्चामया होता है मे मात्मा को ब्रह्मरूप रक्षा के सग एकरवामक करे, या मुडब ध्रुति का भार है। (1) समाधिद्वारा रजतममक से रहित आत्मनिष्ट चित्त यो नो मानद प्राप्त होता है यह योगी के चित्त यार दो सद्य होने से पाणी यर भाजपनीय है, यह फरितार्थ है। (१) जो पुरप बुदिरूप गुहा में साक्षारूप से स्थित आत्मा को माना है यह भषिद्यापन्थि (अविद्यापासना) को नाश कर देता है, यह मुख्यधु ते या भाग है । (२) नो ब्रह्म से जानता है वह ब्रह्म हो जाता है, मण्ड। (१) तिम परामर (कार्यकारण या सर्वोत्तम ) पामारमा पे जाना में अधि ( अथियथा ) निवृत्त हो जाता है गौ अनेक प्रार पे जो प्राण प्रगत माग हैं यह भी निवृत्त हो जाते हैं जो प्रागे राशि Tel मारो काम है। 1 सुखाविर्भावरूप पचलानरक्षा, तप, विसंवादाभाव, दुःखनाश, भूत मनोनाश वासनाक्षयोजन.जननी.जीवन्मुक्ति के साधन- पुरष हदयाकाश में विद्यमान बुद्धिरूप गुहा में स्थित सत्य ज्ञान अनत सरगना को जानता है वह सज्ञ ब्रह्म में अभिन्न हुआ सर्वकाम को प्राप्त हाता" आमादी है यह स पद को प्राप्त होता है जहां से फिर आगमन नहीं होता है। कार। उपसंहार। नाभ्यास (२) तिस परमात्मा यो जान कर मत्यु को तर जाता है, वेना । पुरष बुद्धि रूप सारथी वाला हुशा मन को अधीन कर सदा शधि भी "सत्त्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्, सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता” (१) तमेव विदित्वातिमृत्युमेति (२)” “यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः सतु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते (३)".“य एवं वेदाऽहं ब्रह्मास्मीति सइदं सर्वं भवति" (४) इत्यादि श्रुतियों से यथाक्रम अविद्याग्रंथि, अब्रह्मत्व, हृदय : ग्रंथि, सर्वसंशय, प्रारब्धेतरकर्म, असर्वकामत्व, मृत्यु-पुनर्जन्म, असर्वज्ञत्त्व, इन बंधनों की निवृत्ति होने से ज्ञानोत्पत्तिसम- काल (५) ही आगामिदेहाभाव रूप विदेह मुक्ति का लाभ हो भी जाय तथापि जो तत्तिरीय। (७) जो पुरष मैं मम ई इस प्रकार ज्ञान वाना है यह सर्व रूप हो जाता है । दारण्यया । (4) जय देह पद मे निविल देहों का ग्रहण पर यायद देहों के अभाव का मा विदेह गाना जाता है तब तो ज्ञान मम पाल में इस वर्तमान देह के सद्गाय से १५ दे६ यो वियोग मे धनतर ही विरह मुक्ति मानी जायगी, ओ भर आगामी देह के MAITE यानक दिह पर गाना नागगा तर भागा दह के अभार को ज्ञान ममा नमे गति या नाम जानना।
उपसंहार।
अपेक्षित है, १) तहां ज्ञान के उदय होने पर भी चित्त की
विश्रान्ति के अभाव से जो विपरीतभावनात्मक कल्पना से
ज्ञान की अदृढता है तिस का अभाव होजाना ज्ञानरक्षा है।
अतएव विश्वामित्र जी ने-
"न राघव तवास्त्यन्यज् ज्ञेयं ज्ञानवतां वर,
स्वयैव सूक्ष्मया बुद्ध्या सर्व विज्ञातवानसि,
भगवद्व्यासपुत्रस्येव शुकस्येव मतिस्तव,
विश्रान्तिमात्रमेवात्र ज्ञातशेयेप्यपेक्षते' (२) ।
इत्यादि वाक्यों से श्रीरामचंद्र जी के प्रति ज्ञान के
उदय से अनंतर चित्त विश्रांति की अपेक्षा का शुकदेव जी
के
दृष्टान्त से उपदेश किया है।
अर्थात्-यद्यपि शुकदेव जी को पूर्वले संस्कारों के
वल से स्वतःही तत्त्वज्ञान प्राप्त था तथापि उस तत्त्वज्ञान को
संशय विपर्यशून्य न होने से जव शुकदेव जी ने अपने पिता
तत्त्वजिज्ञासार्थ प्रश्न किया तब व्यास जी ने भी जिस
प्रकार शुकजी ने तत्त्व जाना था उसी परिपाटी से समाधान
किया फिर भी ज्ञान की दृढ़ता न होने से जब वह जनक जी
के समीप गये तव जनक जी ने भी व्यास जी की परिपाटी
(१) ज्ञानरक्षा-पद वागर्थ करते है, तहा इत्यादि से ।
(०) हे ज्ञानियों में से श्रेष्ठ गमचंद्र गौ ! भाप ने सतीय सूक्ष्मयुद्धि से हो पर्य
यो तत्व शे भान लिया है इस से अन्य कोई ज्ञप शेष नहीं है पल व्यास नो के
पुन शुरुदेव मी के तुल्य आप को बुद्धि विश्रा ितमान की भोशा वाश है, क्योंकि
ज्ञातय होने पर भी वित्त विवाति की पेक्षा अश्प रहना है, यह याशिष्ठ
यों का भाव है।
- -
४
उपसंहार।
के अनुसार ही अनुशासन किया तव फिर शुकदेव जी ने
तत्त्वजिज्ञासा के प्रश्न का परित्याग कर जनक जी से यह
प्रश्न किया कि ( १ ) जिस प्रकार मैंने स्वतः तत्त्व को
जाना था उसी प्रकार से ही मेरे पिता ने उपदेश किया
औ उसी प्रकार से ही आप ने किया औ शास्त्र का भी
यही सिद्धान्त देखने में आता है परंतु इस की दृढ़ता
नहीं होती है. अतः जिस उपाय से संकल्प विकल्प के क्षय
द्वारा एकवार ही संसार निःसार रूप हो जाय सो उपाय आप
कथन करो तव जनक जी ने कहा "स्वसंकल्पवशाद बद्धो
निःसंकल्पस्तु मुच्यते" तब शुकजी ने इस उपदेशको शिरोधा-
रणं कर मेरु के शिखर पर गमन कर दशसहस्रवर्षपर्यन्त
समाधिके अभ्याससे चित्त की विश्रान्तिका संपादन किया।
एवंच हे रामचंद्र ! जैसे शुकदेवजी ज्ञातज्ञेय भी थे परंतु
चित्त की विश्रान्ति मात्र उन को अपेक्षित थी.तैसे आप
भी चित्तकी विश्रान्ति मात्र अपेक्षित है अन्य कुछ नहीं।
(१) "स्वयमेय गयापूर्वमेतज् ज्ञातं विवेकतः,
एतदेव च पृष्टेन पिना गे समुदाहृतं,
गयताप्येप एवार्थः याधितो बाविदों यर
एस एव च वाक्यार्थः शास्त्रेषु परि दृश्यते,
स्थाऽयं विकल्पोत्यः स्वयिकलापरिक्षयात्
क्षीयते दग्धसंसाो निःसार इति निश्चयः ।
तरिकगितामहावाहो सत्यं हि मगाच,
त्वत्तो विभागमामोति चेतमा भ्रागित नगद
गद पदेयी के मन को वाक्य है, इन्हीं का हो भावार्थ काहते है (मिस प्रकार)
इत्यादि से।
उपसंहार। तथा च यथा ज्ञातज्ञेय शुकदेव औ राघव जी को ज्ञान रक्षा के अर्थ चित्त की विश्रान्तिके लिये समाधिजन्य ऋत- म्भरा प्रज्ञा अपेक्षित थी तैसे अन्य ज्ञानियों को भी ज्ञान रक्षा के अर्थ समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा अवश्य संपाद- नीय है (१)। (२) एवं अनुग्रह निग्रहरूप सामर्थ्य विशेष का हेतुभूत जो मन सहित इन्द्रियों की एकाग्रतारूप तप यह भी जीव- न्मुक्ति का प्रयोजन है। यद्यपि तप का कुछ विशेष मुक्ति में उपयोग नहीं है तथापि शिष्य-भक्त-तटस्थ इन तीनों जनों पर उपकार करना तप का फल जानना। अर्थात् जब योगाभ्यास से गुरु की अन्तर्मुखवृत्ति होगी औ कथन से बिना ही अन्तर्यामिरूपता से शिष्य के मनोगत संशय को गुरु जान जायगा तो शिष्य की गुरु में प्रामाणिकत्वभावना से विश्वासपूर्वक गुरुपदिष्ट तत्त्व में विश्रान्ति हो जायगी, इसी का नाम शिष्यसंग्रह है। एवं अन्नप्रदान-निवासस्थान रचनाआदि से योगी की सेवा करने वाला जो भक्त है उस को भी योगी के तप के (१) अर्थात्-जमे प्रदीप्त हुमागी अग्नि गणि-गतादि से प्रतिया हुआ दग्ध नहीं कार मकता है सेमे उत्पन हुआ ज्ञान भी गितचारल्याप प्रतिबन्ध से प्रतिबद्ध हुमा सकार्यजनन में अमगई है, एव च चित्तचायन्यापप्रति धन के अमापार्थ पित्त- स्थिरता योग अवश्य भोक्षित है यह मि हुआ। (१) ज्ञानरक्षा रूप प्रयोगन पायन कर इदानी माय मुक्ति पा द्विताप तर प्रपोमन कहते हैं-"ए" इत्यादि।
६
उपसंहा।
फल का भागी होने से (१) ओ समय समय आनेवाली-
विपत्तियों का भी योगी के आशीर्वाद से अभाव होने से उस
की सेवा सफल होगी ओ आगे को अन्यमहात्माओं की
सेवा करने में रुचि होगी, इस का नाम भक्तसंग्रह है।
एवं तटस्थ जो आस्तिक पुरुप हे वह योगी के सन्मा-
गर्गाचरण को देख कर स्वयं भी सन्मार्गाचरण में प्रवर्तमान
हो जायगा।
एवं नास्तिक पुरुप भी योगी के दर्शन से पापक्षयपू-
क आस्तिक हो जायगा (२), इस का नाम तटस्थसंग्रह है।
एवं शिष्य-भक्त-आस्तिक-नास्तिक जनों पर उपकार के
लिये तप भी आवश्यक है।
(३) एवं किसी अन्य मतवाले के संग विवाद वा
किसी मत की निन्दारूप जो विसंवाद है उस का अभाव
हो जाना भी जीवन्मुक्ति का फल जानना (७)।
एवं प्रारब्धप्रयुक्त दृष्टदुःख की निवृत्ति तथा सर्वसा-
क्षित्व,सर्वत्राकामहतत्त्व, सर्वभोक्तृत्व कृतकृत्यत्व प्राप्तप्रापणी-
यत्व रूप सुख का आविर्भाव भी जीवन्मुक्ति का फल
(१) “ सुहृदः साधुत्याम् " इस श्रुति के प्रमाण से भक्त को योगी के तर
का फलभागी जानना।
(२) " यस्याऽनुभापर्यन्ता तत्से बुद्धिः पवर्तत, तदृष्टिगोचराः सर्वे मुच्यन्ते
सगाती
इम प्रमाण में योगी के दर्शन से पापक्षय जानना ।
जिस को योगाम्याम से अनुभवपर्यन्त तत्व विषयक दृदज्ञान उदय हुआ है
निम की दृष्टिगोचर को २ प्राणी होते हैं पद सब पातका से मुक्त हो जाते है।
(३) विसवादामाय रूप तृतीयायोजन निरूपण करत है- 'ए' इत्यादि से।
() निस्तर शान्तचित्त शाल योगी को किसी से विवाद या अयगर ही कहा,
उपसंहार। " जानना, (१) तथा च इन अनन्यलभ्य पंच प्रयोजन के जनन करने वाली चित्तस्थिरता के लिये यह पातञ्जलदर्शन अवश्य ही मुमुक्षुओं को आदरणीय है यह फलित हुआ। “अन्तःशीतलतायां तु लब्धायां शीतलं जगत् " " तापस, पण्डित, यज्ञकृत, राजा, औ बलवान, ज्ञानी, इन पट नरन में शान्त अधिक मन मान" शेषा वणिग्वृत्तयः भगवान् पतञ्जलि। यहां पर प्रसङ्ग से यह भी अवश्य ज्ञातव्य है कि जो वेद्यकशास्त्र तथा व्याकरणमहाभाष्य के रचयिता श्री पतस- लि मुनि हैं वही योगसूत्र के निर्माता हैं, औ इन्हीं योगि- राज का द्वितीय नाम गोनीय है (२) इसी से ही जहां २ भाग्यकारों ने अपना हार्द निरूपण किया है तहां २ " गो- नर्दीयस्त्वाह " ऐसे अपना परिचय दिया है, ओ जो कोई लोक यह कहते हैं कि महाभाष्य में (वात्तिकं पेत्तिकं श्ले- प्मिकम्-५ अ० १ पा० १ ० दधिनपुसं प्रत्यक्षो ज्वरः, नबलोदकं पापरोगः" ६ अ० २ पा० २ आ०, एसे २ लेख (१) विशेषदर्शनीय (यल्यकातिका ) में देखे। (१) गोनर्ददेश में होनेराले का नाम गोनीय है, गोगर्ददेश में सम्योपामा गम्य में किमी सोप को गति से सहम हो यार तिन हुये घे इस से इन्हों का गाग पाशाल है, यह ऐतित है यह सन्देन्दु शेगर को टीपा में संघयेन्द्रागाणं या र है, अयोध्या प्रदेश (गोण्डा ) नागक को नगर है यही पूर्व गोनपद या भाभिषेय या यह आधुनिक ऐतिहागिनो या निर्णय है, राम गोTIMIRRET TIL.देगा। " - Et. lion Intrjuri ८ उपसंहार। लिखने से महाभाष्यकार औ वैद्यकशास्त्रकार पतञ्जलि मुनि तो एक हैं औ योगसूत्रकार भिन्न हैं क्योंकि योगशास्त्र का परिचय कहीं महाभाष्य में मिलता नहीं ( १) ) सो यह उन का अनुमान अकिश्चित्कर है क्योंकि विना प्रसङ्ग से योग का परिचय देना अकाण्डताण्डव है (२)। किंच यदि यही आग्रह है तो जैसे महाभाष्य में वैद्यक का परिचय देने से महाभाष्यकारों से वैद्यकप्रणेता अभिन्न हैं तैसे योगशास्त्र में चतुर्थ पाद के प्रथमसूत्र में औषधजन्य सिद्धि के निरूपण से योगप्रणेता जी को भी उन से अभिन्न मान लो, ऐसे मानने से ही "योगेन चित्तस्य पदेन वाचा मलं शरीरस्य च वैद्यकेन, योऽपाकरोत्तंप्रवरं मुनीनां पतज्ज- लिंप्राञ्जलिरानतोस्मि” (0) यह अभियुक्तोक्ति सार्थक होती है अन्यथा नहीं। जो कि यह कथन है कि "व्याकरण औ वैद्यकशास्त्र में पतञ्जलि मुनि ने भाष्य ही निर्मित किया है इस से वह योगसूत्र के भाष्यकार ही होने उचित है न कि सूत्रकार" सो भी भयुक्ति सह है क्योंकि योगभाप्यकार व्यास जी को ही वेदान्तसूत्रकार होने से पूर्वोक्त नियम व्यभिचारी है, यदि यह कहो कि “एतेन योगः प्रत्युक्तः" अ० २ सू० ३ (१) महादेशीयासियएटिकममा प्रकाशित निरुक्त की भूमिका में (ची ) इम चियुक्त पत्र में पं० सत्यवतमामश्रमी का यह केख है। (२)पिना समय का नृत्य । (*) योग द्वारा चित्त को भी पद द्वारा याणी योगी येद्यक द्वारा देह यो पारने याले मो पतशाल मनि र तिन मुनिप्रपरों वों में अनि मा घ का गरको दूर नगरकार करत - फल कैवल्य आदि विषयों के प्रतिपादन पर है क्योंकि च योगशास्त्र में जो प्रधान का निरूपण है वह सिद्धियों के उपयोगी जो प्रकृत्यापूर आदिक हैं उन में उपयोगी जान कर किया है कुछ वास्तव से प्रधान प्रतिपादन योगशास्त्र का उद्देश नहीं है, तथाच प्रमाणीभूत योगशास्त्रसे भी प्रधान का सद्भाव नहीं हे यह सूत्र का तात्पर्य है, इसी से ही (1 तारिमपि, येदव्यामेन भापित संक्षिप्तसटरी ममता " पद ये गायकी व्याएका गरम्भ गवाजमनिमिन का हितक। परते कहा है। सरकार समाचार्य जी ने भी पराशरस्मत आदि के सामानों में इस मामतीकार ने "नानेन योगशास्त्रस्य हैरण्यगर्भपातजलादेः उपसंहार। इस सूत्र से व्यास जी ने योग का निराकरण करने से व्यास जी योगभाष्यकार नहीं हैं, तो सो भी वाचस्पतिमिश्रं आदि की उक्ति से (१) विरुद्ध होने से असमीचीन है। ' - 'किंच इस सूत्र की योग के प्रत्याख्यान में तात्पर्य का अभाव होने से भी यह कथन अविचारितरमणीय है। अर्थात्श्रुति के संग विरोध होने से कापिल मत से स्वतन्त्र प्रधान की सिद्धि मत होय तथापि योगशास्त्र से प्रधान का सद्भाव आप को भी मानना चाहिये क्योंकि वेद संमत होने से योगशास्त्र आप के मत में प्रामाणिक है, इस शंका के होने पर कहा कि (एतेन योगः प्रत्युक्तः), अर्थात्- कुछ प्रधानादि की सत्ता प्रतिपादन पर योगशास्त्र नहीं है किन्तु योगस्वरूप तत्साधन तदवान्तरफलविभूति तत्परम- यत्परः शब्दः स शब्दार्थः" यह न्याय सर्व संमत है, एवं उपसंहार । सर्वथा प्रामाण्यं निराक्रियते” इस वाक्य से इस सूत्र का योग के प्रत्याख्यान में तात्पर्य का अभाव कहा है, औ नारायण तीर्थ ने भी “ स्वातन्त्रयसत्त्वत्वमुखं प्रधाने सत्यं च चिभेदगतं च वाक्यैः व्यासो निराचष्ट न भावनाख्यं योगं स्वयं निर्मितब्रह्मसूत्रैः, अपिचात्मप्रदं योग व्याकरोन्म- तिमान् स्वयं, (१) भाष्यादिषु ततस्तत्राचार्य्यप्रमुखैर्मतः” इस वाक्य से वेदव्यासजी को योगभाष्यकार कहा है। योगभाष्य के व्याख्याकार वाचस्पतिमिश्र के विषयक जो भामती की भूमिका में काशीनिवासी पं वालशास्त्रीजी ने तथा साड्ख्यतत्त्वकौमुदी की भूमिका में पं० तारानाथ तर्कवाचस्पति जी ने तथा सायतरगिणी की भूमिका में साहित्याचार्य पं० अम्बिकादत्त व्यासजी ने अनवधानता- पूर्वक लेख लिखे हैं उन की समालोचना मन्निर्मित साङ्ख्यतत्त्वकोमुदी की टीका की भूमिका में देखनी । " यथा सुनिपुणः सम्यक् परदोपेक्षणे रतः (4)। तथा चेन्निपुणः स्वेषु को न मुच्येत बन्धनाद् ” । “य विनिद्रा जितश्वासाः सन्तुष्टाः संयतेन्द्रियाः । ज्योतिः पश्यन्ति युखानास्तस्मै योगात्मने नमः" उपसंहर्ता-स्वामी आत्मस्वरूप, (१) प्रधान में स्वत सता तथा सत्यता तथा चेतन का भेद ही व्यास देव जी ने वेदात सूत्रों में खण्डन किया है कुछ भावना रूप योग नहीं, इसी से हो मतमान व्यास जी ने योगसूत्रों पर भाष्य विया है जो प्राचीन आचार्यों ने उस भाष्य को माना है, यह इस का भाव है । () नेसे अयपुरुषों के दोष देखने में नर निपुण है तैसे यदि अपने दोषों की गेर पान वरे तो योन नहीं मुक होय ।
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