Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Arbo Ke Dhesh Me
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अरवों के देश में . मूस्म ४.. लेखक की अन्य रचनाएं कुछ सब कुछ मूठ' (सबिन, पुरसत) पुस्तक में कितना सब है पौर नितना मठ महतो पाकरही पानामा सकता है किम इसने स्प-साहित्य मे एप मा सैनी को परम दिया है। सभी मस्मरण पत्यन्त रोचक पौरमय विनोब से परिपूर्ण ह पिसाव कार्टूनिस्ट धिमार्गी पम्प पियों से पुस्तक में चार चार मग गए है। मैंने कहा '(सचित्र, पुरस्कृत) पिट सामाजिक चुमते हुए साहित्यिक पौर राजनैतिक पप्प-विभोर में परिपूर्ण मानिक निकामगा। इन नियोका अनुसार का प्राधिक मापापों मै मो हुपा । गिन्मात् कामकार या पामर के मुन्दर पिपिनियों के समान हास्य की पपि करते है। दूसरा संसरप। बमे पा रहे है (सचिन पुरसस) इसमें प्यास भी की 'मामा' 'सनमार' ण का प्रारिधी मीनतम लोकप्रिय फरिवार सेपहावयाकभिता के साप प्रापाठ पम्प-चित्रकार रवीगरेपनमोन कार्टूम भी दिए गए हैं। "मी सुनो (सचित्र) हिन्दी करिया में पिए हास्य की परम्परा के पम्मगवा पास पी ही है। ममी मुनो उनको प्रसिबास्म करिवारों का संहहै। य रचनाएँ करापी में कलकत्ते पार पामीर से कन्याकुमारी तक बनता के दिनों में पर किए हुए है। बीवा करमा हमारे राप्रपिता यो भाषी पी पर पनेर पुरतः तिसी गई लेकिन उनके जीवन और रन को एक ही पासप में पार्षक बिन्नानी से म्पय करनेवामी या प्रथम प्रामानिक पुस्तक है। प्राचार्य मिनोगामार ने इसकी भूमिका और रेशम पी में इसके दो पद मिये है। काम-गरम बहाए जा इसमें प्रोगपूर्व भाषा में सतम्मता-मंबामा परापमपूर्ण ऐतिहाधिन प्रस्तुत किया गया है। हिन्दी में यह वीर रसपूर्व गगनाम्म मपनी पपरा में एकरम मौमिक पौर राष्ट्रीय मावनामों में पोत प्रोत है। मुम्ब... मूस ९. आत्माराम एपड संस, दिल्ली-६
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अरबों
के
देश
गोपालप्रसाद व्यास
में
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आत्माराम राण्ड संस
काश्मीरी गेट दिल्ली
ARBON KE DESH YEN
by
Gopal Prud Vyus
Rs 3.50
प्रकामा
राममास पुरी सघामक
प्रारमाराम एण संस
कादमीरी मेट विस्मीद
सा टीम
प्रयम मंस्करण
हिन्दी प्रिंटिंग प्रस रिम्पी
और क्या लिखू? यह पुस्तक यामा-विवरण नहीं है। इसमें भरण पेसों की प्रगति के सरकारी पोपर या विज्ञप्तियां भी पामित नहीं है। यह फिसौके कहने से या किसी प्रचार के लिए भी नहीं लिखी गई । इस पुस्तक की रपना तो पड़ी फुर्सत पार मायके साप हुई है। इसे तिसार मे फिर से पड़ा।बड़ा मार पाया। मुझे मया कि पर गों की बातों पाप-साथ इसमें मप व्यक्तित भी नम उमरा है। इस पुस्तक में मै स्पर्म मी प्रपने बान-मभान पोर सूनी-पराधियों के साप चोर पोर के साप हागिरह महर तक या बैक भी है। पर कवक मिपम के पाप पपने को मिना नहीं देता तबतक बात बाद ही पती पाहिल्य नहीं बनती। मैंने इस पुस्तक को भूगोल इतिहास या राजनीति की दृष्टि से नहीं साहित्य की ही दृष्टि से निबाद। निसते समय मैने एक बात का पौर मान कि मेरी पुस्तक मेरे पामे बावकर हिला के पाठक पागे । मुझेसमा मिा नाय हिन्दी के पाठकों में ममी पंमार पुस्त पाना पुकमही किया है। कम-से-कम मुम से वो गन्हें किसी पनीरतिको माया कदापि मही है । मैंने भी अपने पाठकों की इस मामा को तोड़ा नहीं है। पूरेभाप्ठीय पृष्टिकोन के साथ हंसतीसेनती यह कति अपने पाठकों को सौंप रहा है। पामर पहें पसन भी पाए । मार्च १९५८ में में दो सप्ताह के लिए प्रख मनराम्पो निमंत्रण पर विरेप गया था। अपने सौमित शानको मेरो सप्ताह का समय होता मी क्या है? पिर परों की निया दो गरी है। मैंने दो केबत मिम सीरियापारगुएन पीहीच मतक रेडी बी। इसलिए प्याप निशासा रखने वालों क लिए यह पुस्तक गत पपूरी सिटहोगी। मेटिन यो विहे सारणाही है बिपी के एक पापम को तय इवे परबर तत्व तक पांच पाएंगे ऐमी में पाया इसमे पपिए और क्या निम्। निस्तान मारमा २० मार्च १९५. गोपालप्रसाद पास
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६
११
क्रम
१ वह तो भगवान् ने बर की
२ वहाँ की भूमि सोना नमसती है
३ भारतीय रुपया सरा मौर करारा
४ मेटम सस्कार
५ गाधी टोपी शिवागार !
६ मिस्र का मुर्गा मी करता क्रांति है
७ मीम नहीं तो मिस्र नहीं
८ ससार का सावा पाश्चर्य पिरामिर
मिस की गगा स्पेन
१० येनीस माम्याएं
११ क्या देला ?
१२ भरवी साहित्य
१३ वृक्ष एक साता दो
१४ नेहरू पोर नासिर
१५ परदों की समस्पाए
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वह तो भगवान ने खैर की मी हाँ वासा ने सैर ही की नहीं तो जान के जाने में पौर कितने मिमट गाको यचे थे! घर से हजारों मोम पूर न भरती न पाकाच बीच में हो ऐसे मरे होते कि वहाँ अपना रोने वामा एक न होता ! मृत्यु से साक्षात् वर्शन का प्रभोग अनुभव पा} कान पकड़कर जैसे बकरों को बमि के स्थान पर ले जाया गाता है और वे अवश्य मिमियाते हुए सिंघे परे माते हैं ऐसे ही हम सोग बरबस मौत के मुंह में विषेपले जा रहे थे, और बमि के यारों की तरह कभी-भी कुछ मिमिया उठते थे। फांसी के तस्ते पर गाने से पूर्व से पुषमरी समा हत हो जाते हैं उसी प्रकार हममें से कुछ मौत से पहले मर भी गए थे, पानी अचेत हो गए थे। करेगा हो महको नही पा रहा पा उसके साय-साप पेट में गोमुधपा वह बाहर निकल पाने को उताबमा हो उठा पा। मगवा पा कि प्राणों से भी पहले हदय पिर मुंह की राह बाहर मा परेगा। हमारा हमाई महारस्प की तरह यहाा रहा था। कानों ने छेद रुई से अच्छी तरह बाद हिय हए थे, फिर भी उनके परवे फटे या रहे पे। बाहर-मोवर सभी मगह माय-साय मम रही पी। परकर-पौर पकार ! चयर पर पाकर ! मगता पा बाहर भीतर सब-मुष गोल है, पौर घूम रहा है। बात यह पी फिहम रेगिस्तान के चकाकार तूफान में फंस गए ये पौर पराबी से दोपहर को पातकर व हमारा हवाई यहार मूरब छिपे युएस पहुंचा, तो सूफान इतना भयंकर पा पि हाई बहार को उतरने के लिए स्पान ही दिखाई नहीं दे रहा २ मरणोप में पा । रेगिस्तान का तूफान पंषा और प्रलयंकारी पा। पीये हे तो प्रयाह समुद्र पार भाग ब तो भपार रेगिस्तानाह-बरें भी सोये? किसके पूवे'बहार में पैट्रोत भी सो सिर्फ कुएव तक कर ही पा । फिर लिम्बगी और मौत के इन भूलों में भपति नीचे उतरने फिर ऊपर पामे, पकर काटने और फिर हवाई पट्टीखोजने के प्रयासों में उसकी माक्षिरी भी पस-पमकर समाप्त होती जा रही थी। वायुयान संचालन में से निकप्तकर एक सरजन इम मोगों के पास पाये, समझाने मगे कि ऊपर यह सतरे की पोशाक रसोई है। हमाई भारो-जिसे कहते है वह यह है पोर यो मुमती है। उन्होंने बताया कि यह मापकामीन मिहकी है। संकट काल में इसे सोम देते है पोर एक-एक परके पादमिमों को मीचे दुवा देते है। लेकिन पबराइए महो । पमी ऐसी कोई बात नहीं। बारा होगा दो पहरे उसे हम पोदमे । प्रन्या 'प्रो के ! तभी तो सामिपहठो भगवान् मे और की, मही वो मेरा भी यही हास होता नो एक दिन दिम्मी के लोकप्रिय नेता मामा देश वम्मु गुप्त का हुपा था। और पाप इस पल को पढ़ने के बाप मार तीम प्रखबारों में बसा ही कुछ समाचार देसठे जैसा पापने पिछले दिनों बाडुग सम्मेलन के समय पीनी शिष्टमासक सगम में पड़ा था। यह दुर्घटमा टस मायगी ऐसौ उस क्षण किसी को मापा न भी। माराएत नगर सड़ा होकर हमारे हवाई हार को अवश्य फर फरते देख रहा पा, प्रिय मिरा पद गिरा। सबके दिस भय पोर सुभकार्मों से भरे हुए पे किम जाने यत्र-पंछी कहाँ अपने पर फैसा दे ! मचान इसका कौन-सा कोना मिस इमारत से कहाँ टकरा नाम और इस सम्बरठे हुए ही नहीं, इसके साए में पाने वाले भी मुले-प्रदम को रवाना हो जायें। भारतीय पत्रकारों के शिष्टमास साप पद में दिल्ली से परख गमपम्प पी यात्रा पर मामा हुमापा, तप सपने में भी यह मही मोषा पाशिमौत कोलनी निष्ट से देगने का पबमर पापगा प्रापवस ५ यह पो भयवान् नरकी पारह पटेरेमन्दर ही यह हमारे स्वागत को यो मा पहुंपेगी। पामम हवाई पर मैं दूल्हे की तरह हार-संगार से मदा-बदा विमान-पालकी पर बरे चौक में सवार हुमा पा । मेरो पत्नी ने पायही तो मुझे पर माला पहनाई पो। क्योंकि शादी के समय परमासा पहनाने की रस्म पा तो हम सोगों में होती नहीं या होती होगी तो वह उस ममय इतनी प्रयोष पी गिजीवन के सबसे पवित्र मोर उल्लासपूर्ण पर्व पर मैंने उन्हें विवाह सेदो पर अपनी बगस में सुबकते हुए ही सुना था। सी परमासा? कोई उन्हें गोदो में उठाकर विवाह-मम्प में माया पा पौर वही सात फेरे फिराकर वापस मी से गया था। पाम फिर उनमें मन्तर में सुवकियां उमर रही थी। मैंने देखा कि उनकी नयन-सीपियों में मुमता-कण भूम पाए हैं। मैने परिहास में अपने साथियों की मोर गिव करते हुए उनसे महा 'मैं प्रकमा हो तो जा रहा हूँ। ये सब लोग तो यहीं रहेंगे। सेमिन व हवाई जहाज पर-नीचे हिमोसे खा रहा था, दा बाएं चार काट रहा पा और उसकी सूझ्या क्षण प्रति-क्षण मोरे ऊपर माग-दौड़ रही पी तर सहसा मेरे मन में यह प्रश्न उगा कि क्या सपमुम ही अब मैं मुंह से पुप चुप दिस से प्यार करने वासी अपनी प्राणापिका पत्नी के पास नहीं पहुंच पाऊँगा? मुझे स्मरण पाया जिप मेरे मम्ने मेरी पिदेश-यात्रा पर मरे बुरा पौर गौरवान्वित थे, और अपने मित्रों और परोसियों में मेरे प्रबास को बधाई पाटते फिरते थे, तव मेरी पत्नी मेरी विदेश-यात्रा को रेकर कुछ भलीम तरह से खिन्न और गमोर हो गई थी। यह एक- दम गुम हो गई मों, जैसे उन्होंने मौन-प्रत साप सिया हो। सोग मिमने पौर विदा देने पाते पम्प हसते-करते, सामान की सूची बनतो, मारो होती, मेकिम वह इन सबसे पलम-पमग, उपास पोर मोईई-सी पी। जैसे मो दुध हो रहा पा यह उन्हें सूहा नहीं रहा था। उस क्षण मुत्यु के मुंह में गावे-बाते मुझे यह सब स्मरण हो पापा । मैंमे सोचा क्या उन्हें इस मागी दुर्घटना का कृष पूर्वामास हो गया था ? एक ४ पवास में पोट-सी मगी कि घोटे-मोटे प्रबोप बच्चे कोई किसी मायक नहीं पर में पैसा नहीं बैंक में पूंमो नहीं। जीवन का सतरे का कहीं कोई बीमा महीं । बलते समय कुस १५५ रुपया उनके हाप पर रस पाया है। हे मगवान | *से क्या होगा भव सा विम मजबूत पा वह भी कमजोर होने मगा। मेरी देनी पड़ गई। मेरी मांत्रों के सामने मॅपरा पा गया। सफिन तभी मेरे मानस पटम पर एक पवित्र मूर्ति मंकित हुई। पंचकक्ष की पोठी उपर रेपाम का उपरना गमे में तुससी की माला पेपर हाप का कता हरदो से रैमा पमित्र मझोपगोत ममाट पर देवीप्यमान तिम: मुख पराप्माश्रम स्तोत्र । यह मेरे पिताजी थे। ऐसे पिताजी गो नल का पानी मही पीठे। किसी क हाप का भोजन नहीं करते। घर-गृहस्पी से कोई सरोकार नहीं रखते। कोई मरे तो ग्रम नहीं पैदा हो तो मुसी नहीं।बह ममे और उनकी ठाकुर-सेवा भली। महनिष्य उनका गायत्री गीता भगवद्-भवन मौर कीर्तन में ही म्यतीत होता है। एक-एक करके समके कई वाम भाई मरे, वेटे-बेटियाँ पोते-पोतियों मास के पराम गाम में फंसते पसे गए परिवार पर पोर-से-मोर दुम पौर मौर शोक के बावस पिरे और बरस लेकिन वह प्रपमी गोंपर मन यूट यने रहे। कोई भी वरी-से-बड़ो प्रांषी उन्हें न उसा, सकी । शायद बह अपने इस इफमौते पुत्र की मौत को भी निविकार होकर सह गाते पीर उनके कार्यक्रम में कोई बापा न परती। मैं मन-ही-मन उनकी स्पित प्रमता का रहस्प सोष ही रहा था कि मुझे मगा कि पिताजी अपने वानपूरे पर प्रपमा प्रिय भजन गा रह है परी गोपास को सब हो। जो रचि गपी नव-जन्म मै- मेटि सकेमा फोड पौर मेरी प्रमित मति स्पिर हो गई। मोपा यावले विस चार में पड़ा है? जो तेरे मप में नहीं है उस पर साथ मरने से क्या माम? भगवान् मर भसी ही करेंगे !
महतो समवान् मेरी प्रप्ततोगत्वा भगवान् मे मस्ती ही की। हवाई महास के फ्रोनी कप्तान ने साहस करफे 'रिस्क' ले ही मी। से भीम अपने लक्ष्य पर टूटकर गिरती है वैसे ही म्पाटे के साथ हमारा पायुयान भूमि पर माया-- मक! धरती का स्पर्ध पाते हो हम सबको पेतना मौर माई। ममा हुमा जून फिर से नसों में दौड़ने लगा। हमने एक दूसरे की भोर कुछ नए हर्प पौर नए विश्वास के साप देखा। सबके मन में एक ही भाव पा 'बष गए भाई ! बहुत बचे ।। पर यह खबर कुएस के शेस मुबारिक शाह को मिली तो उन्होंने अपनी गालियां हमाईमाको पौड़ा दीं। प्रादेपा दिया कि हिन्दी दोस्तों को पहरे सीधे उमके महम में माया जाय । लेकिन हमारे सा शम उतरने की सुयो हवाई भोके पधिकारियों और उसके पास पास काम करने वाले भनेक हिन्दुस्तानियों को मी शेख साहब से गम म पी। सम ऐसे गले मिस रहे 4 पोर यों भानंद-विभोर थे कि कुछ मिनटों में हम भूल गए कि हम लोग किसी बिरामे मुल्क में या गैर विरादरी ने बीच में हैं। येस साहब के प्रतिषि-गृह में बैठते वक्त तक तो हम उस पिछले दुस्वप्न को याद तक भूल पुक पे। वह याद तो हमें वेव साहयन अपने स्वागत-मापण में हमारे बनने पर खुदामा क्रिया भदाबाने हो दिमाई। हम तो वहाँ मे शाही सवार ठाट-बाट, वहाँ जब मौकरों प्रौर परवी रीति-रिवाजमीचमाघि मैं खुदाको भूम ही पुके थे। खतरा टम माने के माद खुदा को याद करता भी कौन है? एएत में हमें पामवार भोर दिया गया। मारनों की दिगिमवा के साथ-साप प्रने प्रकार की मदिगएँ भी पी पौर मदिर-मयनाएँ भी। भूसे तो लोग पे ही पिस परे। हमारे पाही भोग्न के लिए बोसियों तरह के मोस देयार किये गए थे। पद मेरे सापो हिन्दू मित्र या पाकर उन पर हाप साफ कर रहे थे तब मैं एक कोने में पापों पर पोड़ा पही गलकर सोच रहा पा पानी में मीन पियामी। मोहि मुनि-मुनि पाप होमी ।। .
जहाँ की भूमि सोना उगलती है मारत से तीन हपार तीन सौ किसोमीटर दूर पश्चिम में एक ऐसा नगर है वहाँ एक एप में शेव' बनती है चार पाने में पान मिमता है दो भाने में पांच गैलन पानी प्राप्त होता है पीर सौ रुपये महीने मम पिसी भी कमर का किराया नहीं होता। सेपिन यह पाकर ममान से उत्पन्न महगाई के सूचक महीं। यह तो वहाँ की उम्प भाषिक म्मिति कहो बोसर है। यह मगर क्या एप घोटी-सी रियासत ही है। घोटी सिर्फ से क्षेत्रफल की दृष्टि से ही कहा जा सकता है, पनसम्या की दृष्टि से भी कह मीनिए, नहीं सो पौमे दो मास की पानादी के इस राग्य का गापिकमनट मम्मरोग रुपये के समभग है। यहाँ के शासकों का कहना है कि पगर राग्य मी पाय में समस्त स्रोत एपाएक बन्द भी हो मा वो भी ये दस वर्ष तर मगातार इमी स्तर पर राम्प-व्यवस्मा पमा सकते हैं। इस म्यवस्था को बसाना कोई मासान बात नहीं। रमपम में मपन्न पैदा होता है और म पानी। प्रन्न विदों से प्रातार मौर पानी साफ परके समुद्र से। म कपड़े बनते हैं न पीपर। पौरतो पौर पाय के लिए दूप भी पैदा नहीं होता । यह पदिपमीदों से पातार के रूप में मैंगवाया जाता है। गाय ता यहाँ सिर्फ पामक के प्रांगन में होपी है । न यहाँ पर होत है न पशु-सपी । मवसर यह पि जीवम पीहर पापश्पक बीर सुई से पर मिमाई की मगीन तक पुरी में मेकर बर्तन काकरी सक, पोतने-बिछाने । पपों से रेकर सार यहाँ की भूमि सोना उगमती है श्रृंगार के सामान ता, यानी सव-छ, नाहर से मंगामा पाता है। यही क्यों जीवन स्तर के कुछ पौर मार भी कम चौकाने वाले महीं है। मोटर-कावर महाँ पांच सौ रुपमे महीने से कम पर नहीं मिलता। वह सामी सपों से ही सशुष्ट नहीं होता, मोटर मालिक कोनसे रोटी कपड़ा और मकान भी देना पाता है। मोटर बाइपर की बात तो कुछ पीई, लेकिन साधारण योमा उठाने वामा कुमी मी वहाँ दस रूपये रोग से कम पर मही मिल सकता । गरीम या फकीर यहाँ से कहा है जा सिर्फ दो सौ रुपमा मासिक ही कमा पाठा है। यह देश प्रमरीका नही । यद्यपि मोटरो की विसास सस्या को देखते हुए, इसके अमरीका होने का भ्रम पर हो सकता है । पाप पामते है यहाँ कितनी मोटर गाड़ियां है? बीस हजार गारियां भी कैसी ? जिसमें पस-पसभापमी एक साथ बैठ सकें। नये-से-मये मॉग्स मई-से-नई और प्रधिकाध में रेडियो फिट । यह इमर या फोम के किसो मा मा रास की भी बागीर नहीं है। यद्यपि यहाँ प्रोगी भोर फच दोनों ही समझी-बूझी पाती। पौर कुछ घरों में तो जीवन के रहन-सहन का स्तर उस ऊँची मूरोपीय पति से चलता है, कि इसे कहने वाले यूरोपीय उपनिवेश भी कह सकते है। यहाँ के वागारों में पहले से हिन्दी समझी मौर बोसी जाती है। भारस के रुपये रेजगारी से ही यहाँ का सेन-देन पमता है। हवाई महे पर भारतीय बहार पाट पर भारतीय ग्राइवर भारतीय टेली फान महकमों में भारतीय दुकानदार भारतीय, नौकर भारतीय पौर यहाँ के रहने नामों की प्राम शक्ल भी भारतीय सेरिम फिर भी यह मारतीय प्रदेस महीं है। हामारि यहाँ की दुकानों पर मुरादाबाद के बम मागग मानपुर के बूते, बरेमी का फर्नीचर, मैसूर कश्मीर और परापार की भारीगरी के नमूने तथा भारतीम कपट से पटी हुई दुकानों को देखकर कोई भी भगनयी इसे भारत का हो एक समृद्धि पासी नगर मानने की भूल कर सकता है। यहाँ में सब पोवी भार २ जहाँ की भूमि सोना उगलती है भारत से तीन हजार तीम मौ विमोमीटर दूर पश्चिम में एक ऐसा मगर है यहाँ एक रुपये में शेव' बनती है भार पाने में पान मिमता है वो माने में पाप गैसन पानी प्राप्त होता है पोर सौ रुपये महीने से कम किसी भी कमरे का किराया नहीं होता। सेमिन यह पाको प्रभाव से उत्पन्न महगाई क सपक नहीं। यह तो वहाँ को उपमापिक स्पिप्ति के हो पोतम है। यह नगर क्या एम घोटी-सी रियासत ही है। मोटी सिर्फ इसे क्षेत्रफम मी दृष्टि से ही कहा जा सकता है जनसंख्या की रष्टि से मो कह मीगिए, नहीं तो पौने दो मास की प्रामापी के इस राम्पमा पार्पिक बरट मम्मे फरोड़ रुपये पगमम है। यहाँ शासकों का कहना है कि अगर राम्य की प्राय ने समस्त स्रोत एकाएक रम्द भी हो जाये तो भी ये दस वर्ष तक मगातार इसी स्तर पर राम्म-म्पपस्मा पला सकते हैं। इस व्यवस्था पो बसाना पोई मासान बात नहीं। इस देश में मपन्न पैदा होता है प्रौर म पानी। भन्न विदेों से पाता है और पानी साफ करके समुद्र से । न पपा बनते हैं न फर्नीचर । पौर-तो पौर नाय के लिए दूय मो पैदा नहीं होता। यह पश्चिमी देशों से पाउार कप में मंगवाया जाता है। गाय तो यहाँ सिर्फ पासक के प्रांगन में हो रेपी हैं। म यहाँ पर होते है म पशु-पंछी । मसलब यह कि जीवम पीहर मारयर पीर मुई से मगर मिसाई की ममीन ता मृगे से मेकर वर्तन कापरी तप, भोरम-विधाने रे पपमे मगर माग - बह की भूमि सोना उममठी है भंगार के सामान पर मानी सबकुछ, वाइर से भगाना पड़ता है। यही क्यों बीवन-स्वर क कुख और प्राको भी कम नौकाने यास नहीं है। मोटर-नावर महापांच सौ रुपये महीने से कम पर नहीं मिलता। मह खाती रुपयों से ही सन्तुष्ट महीं होता मोटर-मामिक को उसे रोटी कपा और मकान भी देना पड़ता है। मोटर वाहवर की बात तो कुछ बड़ी हुई, लेकिन साभारण वोमा उठाने वाला कुमी भी वहाँ इस रुपये रोष से कम पर नहीं मिल सकता । गरीव या फकीर यहाँ उसे कहत है जो सिर्फ दो सौ रुपमा मासिक ही कमा पाता है। यह देश अमरीका नहीं। यद्यपि मोटरों की विशाल सस्पा को देखते हुए, इसके भमरीका होने का प्रम पर हो सकता है। माप पानव है यहाँ किसनी मोटर गारिया है ? बोस हसार । गारियां भी कैसी ? जिसमें दस-रक्ष भादमी एक साथ बैठ सकें। नये-से-नये मौग्स, मई-से-नाई, मौर भिकाश में रेग्यिा फिट । यह सैर या फ्रांस के किसी सा या रस को मी जागीर महीं है। यपि यहाँ प्रोगी भोर मच दोनों ही समझी-पूझी गाती हैं और कुछ परों में तो गोगन के रहन-सहन का स्तर वस ऊँची मूरोपीय पति के चमता है कि इसे कहने वाले यूरोपीय उपनिवेध भी कह सकते है। यहाँ के बागारों में पास्से से हिदी समझी और बोली जाती है। भारत के रुपमे रेवगारी से ही यहाँ का सेम-देन बसता है। बाई मा पर भारतीय नहार पाट पर भारतीय डायर भारतीय, टेली फाम महकमों में भारतीय दूकानदार भारतीय, नौकर मारतीय पौर यहाँ में रहने नामों को प्राम धक्ल भी भारतीय मेकिन फिर भी यह भारतीय प्रवेश नहीं है। हालांकि यहाँ की दुकानों पर मुरादाबाद के पन, पागरा कानपुर रेपूरे दरेमी या पर्नीचर, मैर-कानौर और हैदराबाद की कारीगरी के नमूने तया भारतीय कपड़े से पटी हुई दूकार्मो मो विपकर कोई भी प्रसनवी से भारत मा हो एक समृद्धि- धामी नगर मानने को भूम पर सरता है। यहाँ के सब पोरो भार A घरों में इसमें वीय है। यहां के सब सिनमामों में भारतीय चित्र सूव षसते हैं। भार तोय भामाश वाणी के कार्यक्रम यहाँ सूग सुने जाते हैं। लेकिन म यह अमरीका है, पौरन यूरोप । भारत भी नहीं है। यह सो हंसती-सेसतो मन भौर जन से भरपूर उन्नति के मिसर पी मोर अबाध गति से बढ़ती हुई परयों को एक छोटी-सी दुनिया है। माम है इसका कुएत । एशिया के माथे में सऊदी अरब के पूर्वी किनारे पर यह एक शेख-शासित रियासत है। यहाँ की भूमि भसे हो मम्म-उस न उपनाती हो लेपिन वह सोना उगमती है। सोना यानी ससार की सबसे उपयोगी दुर्षम प्रौर कीमती वस्तु पैट्रोस । प्रति वर्ष प्ररयों रुपये इसकी रायल्टी के स्म में राज्य को प्राप्त होते हैं। यह पन राशि पैट्रोस की तरह ही उफनकर पुएत में चमत्कार पैदा कर रही है। इसके पोर से यहाँ ऊंची-ऊंची इमारतें पड़ी हो रही हैं। जगह जगह पौराहे पार्क पोर उचान मगाए जा रहे है और सर निकम रही है। परब भूमि के रेगिस्तान के ऊपर परीट सीमेंट पौर मोहे को मजबूत पर्ते पा रही है। दुनिया की हसबम में मया कुएत प्रपनी महत्वपूर्ण जगह बना रहा है। ममी तो कुएत में म रेम है न ट्राम । न नहर है न तामाष । न कुएँ है न बगीचे । सेकिन मय पर-घर विजसी और टेसोफोन पहुँच रहे हैं। समुद्री पाट और हवाई परेमा विस्तार किया पा रहा है पौर उम गहन मा प्रदेश में पार की बज्ञानिक सुविधामों से जो भी माम उठाया जा सकता है, उठाने की पूरी-पूरी कोभिशमी जा रही है। परयों को अपनी कुछ पुरामो विशेषताएं भी हैं। जैसे समापा स्ववेश मौर सपर्म में गहरी प्रास्पा। यहाँ के सब मोग(पो अंग्रेजी पठे-मिमे भी) गर्व से भरपी वोमत है सबको प्रपमे कुएती होने पर पमिमान है पौर मव-के-मब रोगा-नमाप में पौफस है। दोने इम्लाम दुलियों की परवरिश करने को यतीमोमो सहायता पहनाने को महत्व देता है।पुण्त को शासन-म्यवस्था में भी यही बात है। अगर पुएन का कोई गरीब म्यक्ति नहीं कोई मोपड़ी गसना पाहे तो उसे राग्य से ।
१ यहाँ की भूमि सोना उगमती। मुपत्र में जमीन मिल जाती है। मगर कुएतो यहाँ के पास से यह कहे किबह बेरोजगार है तो उसे तत्कास रोजगार मौर म्यापार करना चाहे वो उसके सिए यमासमय रुपये को व्यवस्था पर पोजाती है। प्रारम्भिक और माध्यमिक स्तर तक महाँ भिमा मुफ्त दो आती । वमों के रहने-सहने पहनने-मोदने खाने-पीने मौर किताबो की म्यवस्था भी मुफ्त होती है। माध्यमिक स्तर पासपरके यदि काई विदेश में पाकर मागे पडला पाहे तो उसे स्कॉलरशिप भी मिस माती है। स्मों के भवन ऐसे हैं जैसे महल । यहाँ के प्रध्यापकों का वेतन इतना है निधना भारत के माई० सी० एस० का । सात सौ रुपये से लेर दो हजार रुपये मासिक तक वहाँ अध्यापको का वेतम दिया जाता है। दुए को दर-म्पक्स्पा कठोर है। चोरों का महा बगे सस्त समादी पाती है। अगर कोई पिक्षी चोरी करता हुमा पकड़ा गाय तो उसे तत्कास एव से बाहर निकाल दिया जाता है। बेईमानी यहाँ बर्दाश्त नहीं की जाती। यही कारण है कि लोग नोटों के नाम-वास साइकिसकरिपर पौधे बांधकर बका में ले जाते हैं। कों में भी उन्हें सेमालने-सहेजने को कोई खास महत्त्व नहीं दिया जाता । यूं ही बेदर्दी मे माप चन्ह फेर दिया जाता है। वहाँ शासर का रहन सहन प्रादर्श है। मह एक घोटे-से मान में रहते हैं। वह एक- परलोवती हैं। उनके पास कपम एक ही मोटर है। कुएत में मच-पाम बन्द है। सिफ पिदपी लोगों को सराव पोने को इमारत है। पौरत परदे में रहती है । सह-शिक्षा नहीं है। यहाँ मार्गो का रहन-सहन हो महीं, परिण भी ऊँचा है। भारत पोर कुएत के सम्बन्ध बरे सौहादपूम है। भारतीयों को यहाँ शिरामा नहीं समम्ध गावा। भारतीय रुपये की यहाँ बड़ी साख है। जैसा हमने उपर बताया कि यहाँ पी फरसो ही एक प्रकार से मारसीम एपमा है। यहाँ केवागारों में भारतीय रुपया ही मही नये पैस भी पसने सगे है। मगमगलीस हार मारतीय युएत में रहने बताए १ प्रबों रेस में जाते हैं। ये सब बड़े सुसी नजर पाते हैं। मेक्नि इनके जीवन में स्पायित्व मगर महीं पाता। पारण पच्चों की पढ़ाई का कोई ममग प्रयम्प यहाँ नहीं है। इन्हें प्ररची भाषा के साप साप यहाँ की पार्मिक शिक्षा मी ग्रहण करनी पड़ती है। यह ममीन सेकर वहाँ अपना मकान भी नहीं बना सकते। कुएत का पपिकांधम्यापार पपि भार तीय ही चमाते हैं लेकिन ये सीमा म्यापार नहीं कर सकते। किसी कुएती को उन्हें साप मगामा पड़ता है। परन्तु हर देश के पपने कानूम कायदे होते हैं। भारतीय सनरा मावर करना मानते हैं। यही कारण है कि ये शासन में प्रिय है, यही कारण है कि वे सुनी है और पार पैसे मी कमाते हैं। दुध तो सिर्फ यह है कि उनमें से अधिकांस के बीवी वो भारत में है। कुएत के मोग भपमे शेख के प्रप्ताबा ससार में दो ही महापुरुपों को सम्माम की दृष्टि से देखते हैं। उनमें पहसे है नासिर मौर दूसरे है नेहरू । परों पौर वागारों में जगह-जगह नासिर मौर नेहरू के चित्र मगे हुए मैंने देने और यह अनुभव किया है कि भले ही कुएत में ब्रिटिश रेजीडेट रहता है लेकिन उसकी पात्मा में स्वतत्रता का पैसा ही बोस समाया हुपा है जैसा मिल पौर भारत में।
भारतीय रुपया खरा और करारा सीसप पूर्व पर मैं रोगी की तमाप में घर से पहले-पहस निमा तो चार दिन बाद मुझे माठ रुपये महीने की मौकरी मिली जो सिर्फ पन्द्रह दिन ही पन सकी यानी मुझे सिर्फ बार हो रुपये प्राप्त हुए। इसके दस वर्ष बाद यानी पार से पीस साम पहसे मेरा वेतन पासीस रुपये मासिकया। इसके बीस सासवाद पानी इस सेस को मिलते समय मेरा सन भार सौ रुपमै मासिक है प्रात् में प्रप पहले से सौ गुना अधिक कमा रहा है लेकिन चार रुपमा कमाते समय जो निश्चिन्तता और बेफिकी भी यह पाय मगर महीं मापी। तव रुपये के सोमह मेर गेहूँ निकले थे सबा सेर का भी पा ५ पैसे सेर दूध पाठा पा एक पैसे का नमक, एक पैसे को मिष एक पैसे को खटाई, धेले की हम्दो पौर भेले पा धमियां हम दोनों स्त्री-पुरुषों के लिए एक सप्ताह के लिए काफी होता था। मारहास मह है कि भर के सब मोर्गों का भगर एक ही दिन पूर्व पहलने पर वार्यता प्रापी सनलाह स्वाहाहो है। यह हाम मुफ पार सौपाने वाले कामहीं, चारहतार पानवामी का भी है। यह सब अम्न को महंगाई पर पागर माट सम्मा कारण है। रोमो प्रशास्त्रियों का भी यही कहना है zिा- फीति और भारी मात्रा में विदेश से मन्न पायाउनमें प्रर्प-परस्पा को पसमित परके,गमताको महेपाई मार रहा है। विरोपी दत्तो नेता भामा नाट छानेही परबास में जाते हैं। ये सब बरे सुसी नगर पाते हैं। मेक्नि इनके पीरन में स्मायिस्व नजर नहीं पाता। कारण बच्चों की पढ़ाई का मोई भाग प्रपम यहाँ मही है। इन्हें परमी भापा के साप-सामबहाँ की पार्मिक शिक्षा भी ग्रहण करनी परती है। यह जमीन सेकर यहां अपना मकान मी नही बना सकते। कुएत का अधिकांस म्यापार यपि भार सीय ही पसाते हैं लेक्नि वे सोपा व्यापार महीं कर सकते। किसी कुएती को उन्हें साप लगाना पड़ता है। परन्तु हर देश के अपमे कानून कायदे होते हैं। भारतीय जनता पादर करना जामते हैं । यही कारण है कि वे सासन के प्रिय हैं, यही कारण है कि मे सुखी है पौर चार पैसे भी कमाते हैं। इस तो सिर्फ़ यह है कि उनमें से भपिकाम के बीवी बने भारत में है। कुएस के मोग अपने प्रेस के प्रमावा ससार में वो ही महापुरुषों को सम्मान को दृष्टि से देखते हैं। उनमें पहमे है नासिर मौर दूसरे है मेहरू। परों और वागारों में जगह-वगह मासिर मौर मेहरू के पिण ममे हुए मैंने देने पौर यह पनुमव किया है कि ममे ही कुएव में ब्रिटिश रेजीरष्ट रहता है, सेकिन उसकी प्रारमा में स्वतन्त्रता का पैसा हो बोस समाया हुमा है जैसा मिन और भारत में।
भारतीय रुपया खरा और करारा तीस वर्ष पूर्व पद मैं रोगी की तलाश में पर से पहले पहत निमसा, तो चार दिन बाद मुझे भाठ रुपये महीने पी नौकरी मिमी, वो सिर्फ़ पन्द्रह दिन ही चम सकी, यानी मुझे सिर्फ़ पार ही रुपये प्राप्त हुए। इसके दस वर्ष बाद पानी पान से बीस साल पहले, मेरा वेतन पाप्तीस रुपये मासिमपा। इसके बीस पास बाद, यानी इस लेख को मिसन समय, मेग वेतन पार सौ रुपये मासिक है, अर्मात् मैं पर पहले से सौ गुना अधिक कमा रहा हूं, लेकिन पार रुपया कमाते समप को निमितता भौर पेफिकी पी, बह प्रान नबर महीं पाती। वा रपये के सोमह सेर मेहूँ विकोप, सबा सेर का धी पाच पैसे सेर दूम पातामा एक पैसे का नमक, एक पैसे की मिर्ष एक पैस की पटाई, पेसे की हल्दी पौर पेरे का पनिया हम दोनों बोस +मिए एक सप्ताह के लिए काफी होता था। माहास बही पर के सब लोर्यो को प्रगर एक होरिम जूते पहनने पा जागा तनदाह स्वाहाहो से। यह हास मुझ पार सौ पाने वाले कानहीं, पारमा गरी का भी है । यह सब मम्न की महमाई मोर नाराहर भारण है ! र दामियों समीपहार- स्फीति भोर भारो मात्रा में विशेष से पन्ना मर्य-म्यवस्थाको प्रसंतुसित करू तारमेंस रहा है। पिरोपी दो नेता भाजे पखारेगमें यह हुए मावों को पा रसने के कारप, सरकार को रास रोग कोसते रहते है। जम मेरा बेवम भी पहम् सप्ताह में ही पाता है तो मैं भी और कुछ न पाकर अपनी सरकार को कोसने बालों में पामिम हो माया हूँ। दरपसम्म प्रारकम की मारी महंगाई मे भारतीय जनता के प्राणों को दबोच रहा है। हिन्दुस्तान में बैठे हुए लोग यहो समझते हैं कि सारी दुनिया के लोग सुन पन में हैं, सिर्फ हमारी सरकार हमारे लिए कुछ महीपरती मेफिम भरवों रे देश में भागर मेरा यह प्रम टूट गया । मुझे यहाँ गाकर यह महसूम हुमा कि महमाई का अभिमाप कोपस हिम्दुस्ताम को ही नहीं मगा हुपा है दुनिया के दूसरे रेग मी उसकी मरमपुरी तरह फंसे हुए हैं। मोट सिर्फ हिन्दुस्तान में ही मही पर दूसरे देशों में भी यह सस्रतों को पूरा करने के लिए छापे जा रहे हैं । हिन्दुस्तान की मर्म म्पदम्पा पौर उमरपये की कीमत हमें अपने घर में या देश में पैठ कर, टीक-ठोर मासूम नही हो पाती। भारतीय रुपया फितना खरा पीर करारा है भारत की पर्ष-म्यवस्था की बाहर कितनी मात है यह तो समुद्र पार पर ही ठीक से गामा पा सकता है। कुछ उदाहरण मीजिए हमने पासम पर पाय पो। चाप मायामा तीन पाने में मिमा। करापी में पापपीतो एक प्यासा पाप के पाठ प्राने पम्म किये गए। दमिय में वही चाय का प्यामा कोई एक रुपये से ऊपर पहरा मौर काहिरा में भी इससे सस्ता महीं मिला। विस्मो में मात्र से एक वर्ष पूर्व गवनाने के दो पाने मराठे थे। करागीरे हमाई म पर पाठ पाने दमिश्क में एक सपा मोर काहिरा में भी इससे गुप मला नही पा । दिस्मी में एपसमीर भी घुमाई दा मामे दमिश्क में एक रुपमा पौर काहिग में दो मशरपये के माम-पास । हामी पालिका पनुपात मो इमी प्रकार मममना पाहिए।
भारतीय सपा सरापारारारा शराब मैंने पी नहीं, मेकिन अपने एक साथी का शराब का बिस मगत्य देखा पाएर सप्ताह में कोई टीम सौ रुपये की शराद वह पी गए थे। मेरे सागी भारी पियक्कों में से नहीं थे। इसलिए मैंने यही पनुमान मगाया कि पाराम यहाँ बात हो महेगी विकती है। पमते समय मैंने और मेरे मित्रों ने बाम-यमों के सिए कोई छोटी-मोटी खरीरवारा की। तब हमें दाल-पाटे का भाव मालूम हमा। मा दिल्ली या भौर ममकप्ता के मुकाबमे मीरिया और मित्र के बाजारों में पीयें दुगुनी से अधिक महंगी थी। पर घरेमू उद्योग की पी भयप सस्वी पी। लेकिन कुटीर उद्योम की चीजें तो हमारे देश में और भी सस्ती मिमती है। मे सिगरेट पीने वाले सापी भी प्रस्सर झींकते रहते थे। पाठ- दस रुपये रोगना उनके सिमरेट-माधिस पर सर्प हो जाते थे। मैं पापको मिस्र के पार की कीमत माहाम बताता हूँ। बप हम भाग पामम से रवाना हुए तो मालूम हुा कि मिनी पौर का भाग सासह रुपया है। कुएव पहुंचने पर उसका भाव तेरह मौर पौवह रुपये मालूम हुमा। दमिक में बारह मोर तेरह का भाव पा। सेक्नि काहिरा में सुद मैने नौ रुपये का एक पौगसरीदा पा। इस यात्रा में मुझे महसूस हुमा कि यदि किसी मारतवामी के पास परब देशों की मुद्रापी भवस्था नहीं है तो काईहर्ष की बात नहीं है। भारतीय सिक्के से उसका काम हा जपह बखूबी पत सकता है। समस्त परय देणों में केवम यार मैक, होटम या मुद्रा परिवर्तन मेम ही भारतीय सिक्का स्वीकार नहीं करते बहारे नाई, देसी, पौगो बगार, वामसामे मौर मै भी भारतीय रुपया पार तुम होत है। शायद एक्सपेंग में उससे उन्हें कुछ मधिक प्राप्त हो पाता होगा। यहाँ कहीं भी हमको होटस के गें, मोटर के पोफर या दाही निवास-स्थामा रे मरटेकरों को यदीप देनी पड़ी वहां उन्होंने हमसे पारपरक मारतीय रुपये की मांग की। पुएत में तो और रागीय मुद्दा ही भारतीय सिमा है मेपिन रमिक और काहिरा मैं भरबास में एसक्योडिया पोर पोर्ट सईद में, मस्त्रियों के पास मोर पिरामिरों में निकट नहीं भी पाप भारतीय रुपया मेब में गसकर मिल माइए, दुकामदार प्रापका दिम से स्वागत करेंगे। मौर तब मुझे मासूम हपा कि 'घर का योगो जोगना भान गांव मा सिर' इस प्रकार होता है कि हम अपनी सरकार को कोस मले ही में लेकिन बाहर मो नसने सास यमाई है उसे हम अपने ही घर में अपनी ही दुनिया में कूप-मयूक हार ही ठीक नहीं प्रोक सकते । म हा हो हिन्दुस्तान प्रब सागे की चिरिमा लेकिम मात्र मी उसमें कागम के पक्ष विदेशियों के लिए कम मूस्पबाम नहीं।
४ अंडम संस्कार पुराने नमाने में प्रमर मैने ऐसी समती की होती तो मेरे बिरा- परी बासों ने भवस्य ही मेरे पास मुंग्या दिये होते । मुझे निश्मम ही पंचयम्य पिमा दिया होता, पौर मुझे सिर्फ़ मंगा-स्नान का ही नहीं पपितु परित पीर पुरोहितों को मिठाई मिलाने का भी पुष्य-फम प्राप्त हो गया होता। मैंने कोई साधारण अपराम महीं किया था। मैंने मनु महाराणहारा मार्गजनों के निवास के लिए निदिपट सरस्वती पदवी नरियों की सीमा का ही सरलपन महीं किया था परन् ‘स्वर्गादपि गरी यसो' भारत-भूमि को त्यागकर, में परब सागर की सीमा को पार कर गया था। और पापा कहाँ ? मिसको हमारे पूर्वर यवम पोर मेन्य भादि पदविरों से विभूपित किया करते थे। मुझे मार है कि बचपन में जब हमारे ममुराफे मन्दिर में मुसस- मान नरकारची मौवन बचाने के मिए ऊपर बंगले में गाया करते थे, तो हमारे पितागी उनकी छाया से भी अपने के लिए दरवाजे के पिवार बंद करवा सिमा करने मे। समय का फेर देखिये कि उन्हीं का पुत्र सासिम मुसलमानों के वेश में, यहाँ माई-पोबी मी-बावर्षी पर ही मुसप्तमान ये अपने पिता से बिना पूछ सैर करने के लिए चुप पाप उड़ गया पा! मार मुझे यह दिन मी यार है, जब पर से और बीस वर्ष पूर्व मेरे पिताजी ने मुझे मापी से गाकर यहां के मोपास मन्दिर में मुझे बह्म सम्बन्ध दिमवापा पा। मेरे ब्रह्म संबंप से पूर्व मेरे दीक्षा-मुरु ने मुझसे एप मनचाही प्रतिज्ञा मो को कहा था। मेरे पितामीनी पड़ी या पी दिइस प्रतिमा में भरणेदेष में मैं नस का पानी पीना घोर , लेकिन मैंने वैसा नहीं किया। मैंने सिर्फ यही प्रतिमा मी कि इस बीवन में जो कुछ मोग करूंगा वह भगवान् के प्रर्पण करके कस गा। ऐसे परम वैभव पिता का ऐसा 'वह' संबपी पुष जब परवों के देश में पहुँमा तो उसकी मासे मुल गई। वास रोटी प्री, खीर, रायता-पटमी पौर अपार-पापा मी तो कौन कहे सारे भरव देश में मुझे पूरी-कमोरी लम्सू-अमेवी, गर्यो भोर कमाकन्द की एक मी दूकान नहीं मिमी। पौर-तो-पौर, नहीं फॉकने के भिए भुने हुए पने भी दिखाई नहीं दिये। यह नहीं कि इस देशों में हिन्दू म रहत हों ! क्या कुएव श्या सोरिया क्या मिस इन सीनों देगों में भारतीय व्यापारी फैले हुए हैं लेफ्नि म यहाँ भार तीय साप-पदार्पो की कहीं दुकानें हैं और न कही निरामिप मोमना लय। सुनते है कि सोनियत स्स मूरोप मौर अमरीका में निरामिप भोगियों के लिए कोईवास कठिनाई उपस्थित नहीं होती लेपिन परव देशों में तो निरामिप मोजी सिए पग-पग पर मठिनाइयाँ ही-ठिमाइया है। मगर परवों को दही साने का सौक न होता और यहाँ बड़े-बर होटमों में वैराइटी नाम पर पापम प्राप्त म हो पाते तो मेरी क्या हासत हुई होती इसे धौरिया नपवास करने वाल पन्धी तरह जान सकते हैं। माप मेरी हामत का सही-सही प्रयास नहीं भगा समन्व। पर मेरे दस के दूसरे पत्रकार सामी बोबरे होटों के कम-अपि अधिकारियों या गबनरों को दारों में मदिरा प्याले धासकार, विभिन्न प्रकार से पमपर पसबर पोरमभमरों के भूमे पाए और जमाए इएमासों को वाह-वाह करके प्लेट-पर-प्सेट माफ करते थमते थे तब मैं उन्हीं पी बगम में बैठा हुमा मन मारे पापस में दही मिसाकर पोरे-धीरे पोट पर अपनी पम्मप सटपाता रहता था। मोग मरा परिहास करते थे कि पणिवी माप मांस भसे हो म माएँ, मदिरा मन हीन पीएँ सेपिम पम तो प्रापबपा महीं। पता है पापको नि पारस परवान नहीं है यह मन्त्री ग्मोई है। पापके अपामसार पितागो तो किसी के हाथ को पाकी रसोई भी नहीं बीमते पौर तुम मियाँ, मुसममानों के हाप के पावन बारहे हो।कमी-अभी तो पौर भोगधर्म-संकट उपस्थित होता कि यम किसी का भधिकारी की पाईपमुषसंपाम परली मेरी वमान में बैठी होती और मुझे मूठे हाथों से कोई फम या घूस या मस्सन को प्लेट या टोस्ट के टुमहे या पौर शिष्टाचारवश मेंट करती तो हृदय के किसी कोने में मोये हुए सस्कारों परसराम तर बाती। एक चिमगारी-सी चमक कर मेरे अन्तर मन से कहने मगती है पालमपुत्र मौर मपुरावासी वैष्णव । यह क्या कर रहा है? और तब माद माता बचपन में पिताजी का बधापा हमा यह नीति वाक्य 'पाचार प्रपमो धर्म प्रर्शद भाचार हो पहला धर्म है। गांधीजी की शिक्षामों परिणाम स्वरप पितामी पापारनी बात मेरे युग-पर्म प्रवाह में अपने पैर नहीं टिका सकती थी। में अपने मम से मुपातमो हिन्दू-मुस्सिम के मेदभाव को भूल चुकाया फिर होटलों में लार प्रमतिमीस सोगों के साम रहकर पत्रकारिता का पशा भपना कर भी मांस-मदिरा पौर नपान से एपदम प्रसूता हो या गया । यपपि मेरे मित्रों ने मना मनसरों पर प्रमाण सहित मुझे समझाने की चेष्टा को कि प्रा और मममी सामिप भागन नहीं है। पाय और काफ़ी की तरह बीयर भी निर्दोष पेय है उसे मदिरा नहीं रह सकते। ऐकिन उनको यह बात मेरे गले में सिर्फ इतनी ही उतरी थी कि मैं मांस सानेवाले सोर्गों को योमठार विमा गसानि के प्रपमा मिरामिप माहार ले समतामा और लोगों को मिसकी बीयर पीवे देखकर मी मुझे न तरंग उम्ती पो भौर ने उबकाई पाती पी। अपनी इमी सहिप्नुता के रम पर ही मैने भरा देशों की यात्रा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। लेकिन यहाँ पहुँकर मेरी सहि प्युदा के पैर महसमा गये। वहाँ पग-पप पर मांस-मदिरा मौर पृन पान का दौरदारा पा पार पहाइम सबभीनों से बनाएर प्रभार सम्पवा भौर सिप्टाचार के विमाफ-सा था लेकिन परयो की दुनिया १८ प्रपोंरेप में में भूत-प्यास को शांत करने की भी तो एक समस्या मुंह बाए सड़ी ही पी। मेरा हाम तो यह पा कि जब मेरे सामी किसी को बाटी भवासे याबी पिचोड़ते तो मुझे उस निरपराप प्राभी का नीमन पसर अपनी कल्पना में फाफड़ाता हुमा दिखाई देता। कहते हैं मांस पाने वार्मों के लिए मध्य एशिया (सोवियत स्स का भी हिस्सा) स्वर्ग है। मांस की गितनी पधिन किस्में भरब देशों में बनती है उतनी कही नहीं। मेरे सापी लोग इन सम ही रिस्मों का पूरा-पूरा स्वाद सेने में कोई कसर महीं सो रहे पे पौर में भी अपने मन को ग्सानि को दबाने में अपनी तरफ से कोई कसर महीं उठा रहा था। मेरी दोहरी परोमा हो रही थी। एक तो वही पावल उसी हुई वरकारिया मक्सन मौसमी का रस मोर पसिया के प्रमाया मुझे कहीं कुछ मिस नहीं पासा पा । पेट भरता पा लेकिन मन नहीं भरता पा। दूसरी पोर मेरे सापी मुझे दिसा-दिसाकर, चिड़ा पिकर पौर कमी उक्सा-उपसापर तीनों टाइम सेटों-पर-पोट साफपरते थे। पौर ये हर बारपा-पीकर ऐसो मारते थे कि जिसमा मर्म मह होता पा कि पगित जी पोगे इम कोसनों को पार्टी में शामिम हो जामो पौर सापो-पिमो मौन करो !कोई-कोई तो यह भी कह देता पा कि अपर यही सब करना पाहोपर्नमिग्म में क्यों पाए ? तो दफ्तर में बैठे-बैठे रेसम करते रहते ! विदेशों की ताक्यों धामी ? पौर पर विदेश में पा ही मरे तो हम कौन तुम्हारे पर जाकर कह देगे? जो यहाँ की विशेषता है उसे बिना बवे, बिना भोगे युद्ध की तरह वापस लौट पाने में क्या मना है? एक बार तोमभारी धर्म-सकट भी उपस्पित हो गया। पटना फुएत की है। रमगान के दिन थे। हम माग पहाँ के खरे यहाँ भोजन पर पामषित थे। कोई सौ मादमियों मा भोजन एप ही समी भर पर परोसा हुमा पा। सब सोग साप बैठकर खामे बास थे। रमजान के दिनों में एक ही बार पाम को खाना मिसना है। इमलिा भव माम संसार मी बड़ी कराकर मयो हुई पी। हम लोग साम के कमरे में पहभ। राग्य के सभी मभिमारी परिप्ट सैनिक और सम्मानित प्रसिपि इस भोज में पामंषित थे। क्षाने की मेष छोटी-मोटी कौकियों को जोमर मगाईमईपी। सब उसके पासपास मास्ती-मानी मारकर बम गए । सैकड़ों प्रकार के भोज्य पदार्प पोष्य भौर मेध यहाँ परोसे हुए थे। जैसे हमारे यहाँ प्रसयूट या सप्पन भोग होता है उसी प्रकार का यहाँ दृश्य उपस्पित हो रहा था। लेकिन रर्म की गति देसिए कि यहाँ मुझे बैठने को गगह मिमी पी वहाँ एक परात जैसी प्लेट में मूमा हमा सामुख दुम्बा पाहमा पा। इसके मदर भौति-भांति मेये मसालों से मुक्त पावन मरे हुए थे। मै तो पहले दस-पाहमिनट सिर्फ देमताही रहा कि कोई उस दुम्मे की टोग तबाह कर ले गया कोई उसरे कसले को से उड़ा किसी ने उसके पेट में हम हाम कर मेवे-मसासे को मिकास लिया । मर साली भी भाग मन-हा-मन को पुन पे । सोच रहे थे कि पपित मार पसा? दरमसन में फंस तो गया ही पा। मेरे साने योग्य पोरें यहाँ बहुत-सी पी-पापमये, सिकन पी पूछ जलेबीनमा पदार्प भी पे कुछ पुए जैसी पीनें भी थी लेकिन वहाँ का हाल प्रय या। सिकरम का प्यासा एक नठाता पीसा और रम देता विसरा उसे फौरन उठा सेवा । मौर पर तक यह उसे छोड़ भी न पावा fr तीसरा उसकी इतजार में पता । मोस बरसे हाप से पावस और पावस वासे हाप से मछसी, पौर मममी बासे हाप से दुम्बा, और दुम्ने बारे हाथ से मिठाइयों पर साग ऐसे टूट कर पा रहे थे जैसे पकासरे भूम हो। मुझे वहाँ अपने योग्य सिर्फ एक ही मीन दिलाई वी, यह पे मम्मे-सम्बेहोदाम के पक केसे । मैंने परफर सत्यनारापम की पा फा प्यान केमो की तरफ हाप बढ़ाया । शायद केल भी मेरे पर सर्थ से इसार्प हुए हो क्योरि भोजन की दम मारी भीर में उनकी करमेयासा सिर्फ एक में ही था। मिस प्रकार का में सीता मे रावासों के बीच पपने सतीत्वपी पसा की पी वैसे ही मैं यात्रा पर अपने मोबन धर्म को निवाइया परदेस में रहा । जैसे बैदेहीमो नब गवण से बात करनी परी तो उसने तिमके की प्रोट पारण कर ली थी जैसे ही में भी यही-बावल की मोट में अपनी गारी पोसीप हो के गया। फिम दमिश के हवाई पो पर मेरे माथियों का कहना है कि मेरा धर्म प्रप्ट हो गया । उस दिन दमिक की पहाड़ियों पर वर्क पर रहो पी। हवा ऐसी जोर की पी शिरीर के परे उड़े जा रहे थे। हम मोग दिम भर के पके-मादे भूपे-प्पासे हवाई मा पर उतरे तो सबक पेट में पूहे विमविला रहे थे। हवाई पाके बाहर एक छोटा सा रेस्टोरों का। कुछ शीत से पचने के लिए हम सब नाग उसमें जा पुसे। पार दिए गए । पिसी में कुछ मंगाया और किसी मे कुछ मपिन मेरे मैगाने योग्य यहाँ एक भी वस्तु नही पी। सीरिया और मिम में माफी के प्यास भी फम्बस्स पूंट-घूट भर के होव है। चाय में दूध गमने ना रिवार भी शायद वहां नहीं है। चाय मी ऐसी होती है कि उसमें पोर माफ़ी में कोई खास फई मामूम नहीं रता । पुष्ठी पर मयस्य मे पर उस ठरक में उन पीत पेयों को सीमा मुझ स गुराम प्रिय म्यक्ति के लिए बीमारी को मिमत्रग देना पा। में पगोपेश में ही पा दिया कर यमा म कर कि मेरे पास एर सापी पत्रकार पाए और कहने लगे पगितली माप फित्र पीगिए मैं पापका ममी प्रगम्य करता हूँ। देशविदेश घूमने का उनका मनुमन बहुत है। मध्य-एपिपा भी वह कई बार ना एके है। उन्होंने मुझे बताया कि यहां एक मरीडिश बमती है जो वेगि रियम' होती है। इसे पह मेरे लिए मंगवा मे। उस वा भूप एमी सगी पीमि वनरामहना ही मेर यिा पर्याप्त संतोपमापारण मदिन फिर भी मैंने उनसे स्वभाववश पूछ ही लिया पिवह रिम रोडपी यमसी है। नन्होंने बताया रिस प्रपने यही गाभी की गिरी पनती है म बस ठीक वैसे ही समझ, मो। में पीग्नही पवी हो गया। पोड़ी देर पाप मेरे साममे यह हिमपा गई। मूग तो रिपार भी गापः सगते हैं। इस पर पह तो माजी बनी मर्म प्रपम मेम्बार पीज पी। रही सोंधी सपट उसमें से प्रा रही यो। मैने भगवान का ध्यान पर जोपहमा कौर गमे के नीषे उतारा तो ऐमा स्वाद माया कि पता ही नहीं पमा कि प्सेट व खत्म हो गई। फेट समाप्त करके मैंने माफ़ी पी पोर अपने साथियों को भार वैसे ही वृप्ति से देखा पैसा मरे मवृप्त रहने पर प्राय मुझे देखा करते थे। मेरे इस मूर का मेरा सामियों मे वारा स्वागत किया। उनमें से एक बोसा लो पति, प्रार एम सिगरेट भी पीनो। मेरे क्षमा मांगने पर दूसरा बोमा-'ममी नहीं पशितगी भोरे वीरे सब बातें सीगे। पाम दो मापने सिर्फ पा साया है। कल इनमो एक पैग पिमाएंगे मौर परसों सिगरेट । तीसरा बोमा "लेकिन माई पणित के साप तुम लोगों ने किया बुरा । बेपारे को भर माकर गया स्नान करना रहेगा।" हमारे दल में एक दक्षिण भारतीय भी थे। वह हमकर कहने समे कोई बात नहीं मिस्टर प्यास ' भार मापका पंटम सस्कार हो गया है। इस सूची में प्रव हम सरा विस प्रापरी ही पुराना चाहिए। मैन कुपित नेत्रा से मुझ पर दया करमे बामे सापीको पोर देना। मह बरे गमीर भाव से बोसे महीं पणितमा ! इसमें कोई भगा वणा नहीं पा । यह सर मोग भापको बना रहे हैं।" किम उनकी इस बात को मेरे सब ही सापियो मे पर रोरदार कहाहा में उड़ा दिया। मेरे मुंह से तृप्ति का भाव गायब हो गया। एग मित्रमन मी मुंह में उग्ने सगी। ऐसा मगा कि बसे में रो पगा। वातावरण भरघ गमीर हा गया पा। मेरे मापी पुन उठार मेरे पाम पाए पौर मरा या पपपपाते हुए बोले "व्यामगी। मैं पापके साथ रमा नहीं कर सकता। कहिए तारे को मार पुपरा "इस परीफर अन्य समोसायी मुम्परा उठेरियर तो पूफ्ते मोर पुएबाने से क्या होता है । अगा तो पेट में गया। यह बाहर नहीं पा. साप्ता।
२२ मरवों में तब ही मेरे मन में यह विचार नठा कि घोसे से तो प्रगस्त ऋपि को भी चकरा सिमा दिया गया था। उससे अगस्त के शान मा पित्य में कोई कमी नहीं पाई भौर न उनका पर्म हो मष्ट हमा। फिर यहाँ वो इस बात का भी प्रमाण नहीं कि ममा है भी या नहीं। फिर मै मे तो सिचरी हो या प्रणा भगवान को समर्पित कर उसे पाया है वह सो महाप्रसाद या। फिर में सानि क्यों कर !पौर में अपने सापियों से कहा 'ममा यारो । मण्णा पा तो होने दो। ममा मी मपुरा के पणा के पेट में जाकर रसगुल्ले का सा हो पाम करेगा।' कहने को तो मैंने उनसे यह कह दिया गेकिन मैं सब से पप तक कई पार यह सोच चुका हूँ कि क्या सपमुष उस विन दमिश्क में मेरा मरम-संसार हो गया था ?
५ गांधी टोपी जिन्दावाद! अपने जीवन में गांधी टोपी के मैने कई चमत्कार देसे है। एक माना पा रग लाग गांधी टोपी मगावे परते थे। एक यह भी समय पा सब इस टोपी की भान पोर वाम रमन के सिए मोग अपनी पान तक कर्माम कर देते थे। उसके बाद वह वक्त भी पाया जब गोपी टोपी राजमुकुट बन गई। देखते-देखते वह दिन भी माने सगा है, पब नयह-जगह यह नमामी बामे लगी है भोर मोग इसे पाह- मने में पुन हिपकने मगे है। जहाँ तक मेरा सर्वप है टोपी के मामले में में बंगाप्ती वर्गका पादमी हूँ।मादतन सादी पहनसे तो कोई पम्पीस वर्ष वीव गए परन्तु गांधी टोपी में प्राय नहीं हो मगाता । मेकिन जब में विदेशबाने ममा तो मुझे मित्रों ने समाह दी कि यहाँ मैं गांधी टोपी भवस्य लगाता । मेरो एक महिला मित्र ने बताया कि मेहरूणो के कारम विदेशों में गांधी टोपो वही ही लोकप्रिय हो गई है। उन्होंने यह भी कहा कि सचमुच मेरे सम्वे पेहरे पर गांपो टोपो मूग हो निमेगी। इसलिए पहनी गातो कारण तो पराम मगर दूसरों को निगाह में प्रच्छा दिखने के मिहार से मैं अपने सापमुषप्रन्छौ कसफदार गांपो टापियाँ ले गया। पालम पर हवाई महार में मवार होते ही मैने गापी टोपी पड़ा मो। पहनते ही मम में पनव तरह की फुरफुरी-मी उठी। ठोक वैसी हो जैसी दिनया गहमा पहमने पर किसी मब-यौवना के मन में उम्मी होमी रि कोई उसे देये कोई पुष्पहे। वायुयान में अपने सापी पत्र- २४ परोप में । कारों के बीच में राजमुकुट को पहनने मात्र से प्रतिष्ठित मान मिया पाउँगा ऐसो पाशा रखना तो मेरी मर्मता पी लकिन हाँ उस समय मुझे अपमी उन महिमा मित्र का सयात प्रवश्य प्राया और महसूस हुमा किइस यात्रा में बस यही कमी रह गई है कि इस समय कोई यह बताने पामा महीं कि टोपी मुझे कैसी फर रही है ? खैर इस कमी को ममे मुद ही दर्पण देखकर पूरा कर लिया। मेरा तन हो नहीं मन भी इस समय हमा के घोड़े पर सवार पा । नादी की पैट बोषपुरी मोट पौर नुकीसी गांधी टोपो सब मिसागर सच बताऊँ मैं ऐसा मग रहा या किसे किसी पिछे हुए प्रवेश का नया भरतो किया कोई मानसी मत्री ही हो। मेकिन लयालों में मत्री बने ए मुझ भाबुक म्पक्ति का मूग सापियों मे कुछ ही मिनटों में इस तए सराव कर दिया मि मापसे क्या कहूँ ? टोपी को मेकर दुरिगीबियों में यहाँ बहस पिगई। मेरा महना पा कि अपने घर में नहीं तो कम-से-कम पाहर हमें अवश्य हो प्रपनी राष्ट्रीम पोशाक में रहना चाहिये। इस पर पमट कर मुझे वो ट्रक पाय दिया गया “यह तुमसे किसने कह दिया कि गांधी टोपी राष्ट्रीय पोशाम है ? यह मान के पासों की पोशार हो सकती है राष्ट्रीय हर्गिज नहीं। मैपोर-चोर से वादी को राष्ट्रीय पोशाक सिटकर कि एक साहब बीच में ही योम उठे रहने भी दो पयों हम मोपों पी रही-मही प्रासादो को तुम काप्रसी कठमुस्से मस्म करने पर तुसे हो। ससार में यही तो एक ऐसा देश है यहाँ बाने को, पीने की पहमने को मौर गोप्सने की पूरी प्रासादी है। अगर हमने भी अपनी प्रमेकता में एकता पासी विशेपता सो दी तो हममें और दूसरे मुस्कों में फर्क ही या रह जायेगा? भनेकता में एकता के सिद्धान्त पर बहस मे मया मोर लिया ही पारि एक नौरमान ने पपन की भागदी का प्रत्यक्ष प्रमाण उप स्पित कर दिया। उसने गांपो टोपी को ऐसो कुत्सित उपमा दीपि गांधी टोपी पिताबार! युति के इस वमन पर मेरा भी मिचलाने लगा। मैंने अपने प्रापको इस बहस से निकास सिमा। वायुयान को मिड़की से मोषे झांकने मगा। सेकिन नोचे भी मन को प्रसन्न करने पासा दृश्य नहीं था। हमारे देश के भनेकसावादियों ने बुद्धिमोजियों मे एक ही मां से दो टुको कर डाले थे। एमही परती पर दो देश बना गमे मे। पर अपने देश में ही हम विदेशो में । कराची पाने गामा था। लेकिन यह पर्षातो मैने यों ही कर दी। हम हिन्दुस्तानी अपनी मपनों की, अपनी बीनों को सुधार करते ही कहाँ है ? गाभी को ही जब हम मोर्गों ने महीं बीने दिया तो उसके नाम पी टोपी की क्या कीमत ? परन्तु बाहर ऐसा नहीं है । माथी हिन्दुस्तान से मर कर वाहर पन्म से रहा है। उनकी टोपी भी महाँ से उस पर बाहर जम रही है। कम-से-कम मेरे साप तो यही हुमा । मैं परब देशों में गया मेकिम परवी मुझे महीं पाती थी। पग्रेजी मी ऐसी महीं कि अपने मावों को सहन उग से व्यक्त कर सकूँ। मेकिन वहाँ बड़े-बडे मोगों से मिसना पड़ा को-बड़े होटलों में ठहरना पग। मुझे न विदेशी शिष्टा पार माता पा पीर न सही तरीके से पुरो पौर कोटा पकरने की ही वमीप पी। कुछतो अपवासी पोर कुछ कविता का पौत्र स्वभाव में सापरवाही भी गम न पी। पत्रकारों का मौर कोई गुण चाहे म सीखा हो लेकिन उनका महापम तो मुझमें सोमहीं माने पा ही। कोई एक दाप हो तो गिनाऊँ ? म में शराब पीता पा पौर म मांस ही सातापा। विदेश माने बामे के मिए ये अवगुण अक्षम्य है । मेरे साथी भी मेरे इन प्रवद्रों से कम परेशान म पे। ये मुझे पग-पग पर समरते-मुनते रहते लेकिन अब वेपी तोता रामनाम रट कर महीं देता तो झीरते भी कम नथे। पन्त में हारकर उन्होंने मुझे अपने हाम पर घोर दिया। मारिनरये मेरे लिए अपने पापको प्रमम्म से कहता समसे थे? पर में प्रापसे सप पहूँ कि केवल इस गांधी टोपी पी बदोलन में महीं भी पिसी तरह से पाट में नहीं रहा । न मुझे कहीं कि सीत परदोश में मसुविधा हुई, कही कोई प्रभाव पसा । मेरे साबो मुझे पाहे जो सममता रहे हों मेग्नि गांधी टोपी के बल पर लाने की मेज से लेकर प्रेसिट मासिर तक की मुलाकात में मोग मुझे पम मा मेवा समझते रहे और हाप मिसाने से मेकर फोटो सिषाने तक के कामों में मुझे सर्दय परिष्ठता प्राप्त होती रही। वागार हाट में गमी पूों में नये-पुराने शहरों में मेरे सापी पीर गाइर मेरी काफ़ी सोग सबर रखकर पता करते थे। मेकिन मेरी सदैव यह इम्छा रहा करती थी कि कहीं सो गाऊँ, नहीं रास्ता भूम मापौर फिर रिसी युवक या सुम्दर-सी दिखाई देने वाली युवती से पूछ "वतामो मैं कहाँ हूँ मेरा ठिकाना कहाँ है? मेकिन मेरे सिर गांधी टोपी लगी होने के कारण न तो मेरे मित्रों को मेरे लिए पुलिस स्टेशन पर फोन करमा परा पार न मुझे ही किसी से नमी प्रपनी तरफ से बामने की कोशिश परनी पड़ी। रास्ता मटकते ही लोग प्रश्न करने मगते पे हिन्दी ?" मानी क्या तुम हिन्दुस्तान के रहने मासे हो? मेरे स्पीति सूबा सिर के हिमते ही उनकी पक्षिों में नमक प्रा पाती पोर वे बडे उल्लास से हाव उपर उठाकर कहते 'नेहरू । इसका मतलब यह होता पा कि तुम्हारा मेता मेहरू बहुत बड़ा प्रावमी है । उसको हम इसमस करते हैं उसे हम प्यार करते हैं। पौर इससे पहले कि मैं भी नेहरू जी की प्रघसा में अपने कुछ शम्प गोई में 'रस' कहार सपकतेथे गहककर मिसते पे प्रक में भर कर प्रपर पास में कहीं रेस्टोरों होता तो काफी या पोका-कोमा भी पिमा देत मे भौर प्राय खुद साप मारर होटस तक छोर पाया करते। दमरिक एप माई मे तो मेरी मुफ्त में हमामत भी बना दी। यह देर तर नेहरू जी के बारे में मातमरता रहा। उसे मेनन पी स्पीप भी कईश याद थे। उसको एक ही तमन्ना पी निकोई ऐसा मौषा मिमे रि यह मेहम्जी बाम मारने का मौका पागाए। यह गांधी टोपीमाहीपुम्य था कि मैं विदेशो में गई पापों से बन गया। काहिरा के माट पसर" यो नामी है। जब में हिन्दुस्तान से बांधी टोपी शिम्बाबार! २७ बसने मगा, तो मेरे एक कवि मित्र ने एक विदाई समारोह में मुझे मक्ष्य करके एक कविता पड़ी थी। पिता का प्रानय यह पा 'तुम परय मा तो रहे हो लेकिन मेरे दोस्त यहाँ की हरों से बना । ऐ भौरे का सा स्वभाव रसने वाले मेरे कवि यहाँ की कमियां रात में महकती है उन रजनी गरपाों के फेर में परफर तुम हमारी भाभी भी को कही भूल न जाना?' मेरे कुछ सापी अक्सर इन रात्रि क्मों का रस प्सिया करते थे। लेपिन रोग सुबह मौटपर इस बात पर खेद प्रकट परते थे कि भाज इसमे पार से कट गए कम इतने पौर सर्प हो गए। कुछ शराव इतनी पी जाते पे कि सुबह मेरे पास पूरम मांगमे पाते या अमृत पारा प्रपना एस्प्रो की तमाम करसे। उनमें से एक प्रक्सर मुमसे कहा करते थे "मार, श्यों बेकार विदेश में भी प्रापर भास मार रहे हो ? पार पमो म हमारे साप? मैं उत्तर देता 'मैंने कब इनकार किया? मैं तो तैयार हूँ। मगर सुम साथ ही कहाँ से गाते हो ? इस पर वह महते 'साप कसे से बाएँ हर वक्त तो तुम यह गांधी टोपी पड़ाए रहते हो ? इसे उत्तार कर किसी दिन पमो हमारे ? साप?' मकिन म मैं कभी टोपी उतारता पौर म कमी का मुझे अपने साप मे गाता। अगर मेरे सिर पर गांधी टोपी का साया म होता तो पता नहीं क्या होता ? पादमी के मन को प्रौर पौरत येरको फिसलने में क्या नहीं कुछ देर मगती है ? मेरिन बह छो गांधी टोपी ही मी मिनिसने मुझे नमार लिया। गांभी टोपी का सबसे बड़ा चमत्कार वा मैने २० मार्च मोगागि में देमा। मिस मोर सीरिया का मिसन सप्ताह मनाया जा रहा पा। सीरिया के मिसन के बाद प्रेसिट नासिर पहलीमार मावगनिम सभा में मापण करने वाले थे। हमारा मोग देहातों से चमकर इस सरे के मिए पाहिरा पाए पे। सभा में पड़ी भारी भीड़ पी। प्रम मोर २८ परोस में भी उस बस में ग्रामत्रित थे। सभा की कार्रवाई सुरू होने से कोई पाप पटे पहले हमें यहाँ ले जाया गया। पास मचानष भरा हुमा था। जैसे ही हम लोगों ने प्रबंश किया सभा मंडप तालियों से गूग उठा। मोग उठनठकर देसमे मगे। कुछ नारे भी भरनी भाषा में हिन्दुस्तान का माम लेकर सगाए जा रहे थे । वम के सोगों में में सबसे मागे पा। मेरे पीछे क्या लगभग साप-ही-साप एक मारतीम महिमा अपनी सुहावनी वसती सारी में चल रही थीं। हम दोनों में परस्पर इस बात पर मधुर बहस घिर गई कि ये तासिया सिके लिए पग रही है? मेरा कहना था कि यह गोपी टोपी का चमत्कार है मेकिन उनका मत पा कि यह भारतीय साड़ी की हो महान महिमा है। लेकिन पर परगी लोगों ने मुझे वहाँ पेर मिया पीर बन-बदार हाप मिमामे मगे हस्ताक्षर कराने लगे तो शायद उनका प्रम दूर हो गया कि यह सव गोषी टोपीमा ही प्रभाव पा हिन्दुस्तान की ही महानता पी नेहरमी का हो वोमबामा पा। हमारे दस में ही एक-से-एक पढ़-सिने अनुभवी पौर दुनिया से भादमी पे। वह तो वाने का ही प्रसाप पा सि जिसे धारण परके बम भी साधु के रूप में पूजित होते है। उसके बार तो गांधी टोपीका पदमा मेरे सापियों में भी घा गया । जिस दिन हम मोग प्रसिट मासिर से मिलने जा रहे थे मुझमे कई मित्रों में गोपी टोपी को मांग की। लेकिन तब तक मेरी सभी टोपिमा मैमी हो चुकी थी। उस दिन मेरे पास एक ही प्रमम-बमस गोपी टोपी पी पी गिसे में किसी भी कीमत पर किसी को देने को सैयारमपा।
मिस्र का मुर्गा भी करता क्रान्ति है मासूम हुपा कि उसका नाम हाशा है। पूछने पर किंचित मगाते हुए उसने बताया कि हीफा पदमा परयो मर्म पतली मिरपाली होवा है । नाम उसका पा भी सार्थक । सम्मी-घरहरी वह मौरागी नीम सूपरी, मिल भूमि-सुपार विभाग की कोई अफसर भी। में मिम के पुरुष प्रफसरों की मालोचना नही करता उससे मुझे पपा सेना? मैं तोइस मेस में सिर्फ़ उस समझदार मुवती की सराहना करना चाहता हूँ। अपने विषय पर प्रधिकार रक्षमा दो कुर्सी सबको सिता देती है सेकिन वास्तव में अपने काम मी सही जानकारी पौर उसमें पसगापित निपुमता म मोर्गों को ही प्राप्त होती है। हीमा ने जिस तरह से मिमके भूमि सुधार मौर रुपि चपसम्धि विषय को हमारे सामने रमा उससे उसरी बुद्धि विमक्षणवा महर में हो प्रकट होती भी । मवि उसने अपना भाषण रटा नहीं पा, तो सपमुष कमास की तैयारी पी उसकी। उसमे मित्र की पुरानी भूमि म्यवस्मा से कर क्रान्ति के बाद तक के परिवर्तनों पर विस्तार से प्रकाश गसा। बधामा मि राजपच से किस प्रकार विना मुमागरे भूमि घीम सी गई है, पौर दूसरे पर जमीदारों को भूमि का भुपावरा मिस अनुपात में दिया गा रहा है। मालूम हुमा कि यहाँ का किसान अपने पास काफी एमा मूमि रस मरता है मौरबहाँ पप में हमारो तरह दो महीं तीन फसमें पैदा होती है। किसामों को किस प्रकार उसम वीम दिया जाता है ये उनकी फुसस विस्तो है, उसकी सोसाइटियों का संचामम रिस प्रार होता परोसमें है ? यह सब होफा मे गरे सुमोप रंग से बड़ी मच्छो भोगी में हमें समझाया। उसे अपने देश के भूमि सुधार मी बावत ही नहीं दूसरे देशों की भूमि समस्या के सम्बन्ध में भी पर्याप्त मानकारी पी। उसे विनोगावी के मूदान-प्राम्दोसन के सम्बन्ध में भी कुछ बातें मासूम पी। बड़े उत्साह भरे सदों में उसने कहा था कि यह एक बार भारत इसलिए पाना पाहती है कि इस ऐतिहासिक सन्त के दम पर सरे। उसकी वार्ता में हमें प्रतियोक्ति पा पुट नपर नहीं पाया। उसने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया पा कि मित्रवासी भूमि-सुपार से मामले में तो विधेप प्रगति नहीं कर पाए, सेकिन प्राप्त जमीन से प्रपिमाषिप्रापि उपसम्मि करने में उन्होंने बहुत कुछ किया है। माप कहीं न तो महीं मए रिए महीं में मापको मिखमी भूमि-म्पमस्पा या कपि उपसम्पि के मामलों के गाम में फंसाने नहीं जा रहा । न मैं पापको यह वसाने जा रहा है कि यहां की सौकी गज-पन मर की तोरी फूट-फुट मर की कपाड़ियाँ गाह-वाह मम्मी पौर मासटे तीम-सीम पाव के होते हैं। न मैं मापसे यह कहना चाहता हूँ कि यहाँ की गाएँ मैसों सो गदहे पोहों जैसे पौर भेसे ऐसी होती है कि उनकी पीठ पर पापार्य रुपमामी से कदम्पक्ति पाराम से सूटी सान कर सो सकते है । मैं तो पापको सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि हीका नामकी यह पाना उस दिन हमें सूबते हुए मूर्य की मेसा में माहर से बाहर से गई पी। यह हमें एक मुर्गीपासा दिसाना पाहती भो। मुझे मुर्गीपासा देखने में कोई विसपस्पी म पी। लेकिन मैं हीफ़ा के अनुरोम को टाल म सका। कारण कि यहाँ उस यह मासूम हो गया मा कि मैं कविता की कुछ पंक्तियां गा मेता हूँ वहाँ मुझे भी मह पता मग ममा पा कि हीफ़ा भी समी-कमी मन की कल्पनामों को दामों में पिगे मिया परती है। पर मुर्गामाता पाहर से दूर एक खुसी जगह में काफी दूर तक फैसोहा पो। उमरेका विमाम पे । मिलमी मरकार मे यह स्पबम्पा मिम का मुर्गा मौकरता मम्ति है को है कि कोई भी किसान यहाँ से मुफ्त में एक बहुस पन्छी किस्म को मुर्गी ले जा सकता है। उसके बदले में उसे सिर्फ चार परे देने परते हैं। ये पो उस मुर्गीपाला में वैमानिर ढंग से सेए गाते हैं और एक मुर्गी की पार मुर्गियां बना मी जाती हैं । वा भगीन-सा दृश्य था। यह देसिए दो दिन के परे और यह लोगिए भार दिन का अंग! इमर निगाह गलिए परे तैयार हो गए हैं। भासा के कर्मचारी ने मैगुमी की एक इसकी-सी बोट मरे के सिरे पर की कि पी वीरता हुभा मुका एक यथा उसमें से निरस पडा। मागे बड़े दो दिन के वसे चार दिन के अम्बे दस दिन के बम्मे। फिर देखा मुगिमा प्रमग मुर्ग प्रसग । मुगियों के पर हम गए तो ये इतने सारे मावमिमों को एप साप माया देनार सदर-पवर भागों सिर पर पैर रखकर और मुस भली अपने-अपने दरों में। मुगों के यहां पहुंचे, तो वे गोसे हूँ माप पाए हैं। ये तत्काम अलग प्रसग अपने गोल बमा कर मोचों पर बम गए । पोंचे उठी कमगियो हिमी । मुर्य नेता ने वांग दी-'सबरवार ! दसों के नायक पौरजमताने फौरन नारे को दोहराया-हम सावधान है। मन में तरह-तरह के भाव उठे सेपिन इन सवम विहारी का यह दोहा कपर र माया नितप्रति पूनों हो रहत पानन प्रोप उगास। पिसी पन्द्रमुनी को दस कर कषि को सूमा पा जिस पर में वो हमेशा पूर्णमासी ही रहती होगी। मैंने हीफ़ा से पूछा "इस जगह तो रात होने का कोई सवाप्त हो नहीं उठता उसकी बहोरी मा विस्मय से भर पाई। पूछा पर्यो ?' मपरे, यही नि मुर्घ पोसते रहते होगे, पौर राम भापती रही होगी।
प्रयोदेसमें
मैंने पहा
मैंने महा
यह सुनकर उसके नयों से हप के फूस कर उठे।
गजब है हीफा तुम्हारे मिस्र में। हिन्दुस्तान क्या
चीन को भी मात कर दिया। सत्तर हजार पर प्रौर उनसे निरसने बासे
प्रतिदिन हनारों मुर्गी के मम्मे ! बाप-रे-बाप | ठिकाना ह कोई इस
जनसख्याका।
हीफ़ा मे मेरे इस पपन पर कोई टिप्पणी नहीं की। बुध पजर
सो निगाहों से मुझे देखा पौर फिर पोरी देर बाद पेहरे पर काम
पानी मुस्कराहट साकर मुर्गीप्तासा का सम्मति रजिस्टर मेरे सामने
पर दिया । बोमी 'पुष लिस दोजिए इस पर ।
साइए, दस्तसत लिए देता हूँ कि सनद रहे और पका
पर काम पाए।
तो बोसी 'उहूँ। इस पर सिसिए कुछ पह भी गय में नहीं
पप में।
मैं परेशानी में पड़ गया। मुसियों पर कविता ।
सेकिन मेरे सापियों मे मुझे उत्साहित किया सिसो म यार ।
दो मारने फट से पमा गमो गब मेंस भीर गवों पर मिनी है तो एक
फनिताच मुर्गी पर भी सही।
मैंने टासा 'मेरी हिन्दी कविता को यहाँ समझे पोर पड़ेगा
कौन?
तो भग्रेगो पत्र के एक विशिष्ट मतिनिपि ने प्रावासन दिया
'उसपी चिन्ता न करो। भमुवाद मैं कर दूंगा।
और मैने मिस्र पी भूमि पर पहमी चार मपिता भी दो पंक्तियाँ
उस रजिस्टर पर लिमी
सत्य कहता नहीं यह प्रान्ति है।
मिसपा मुर्गा भी करता क्रान्ति है।
नील नहीं तो मिस नहीं नीम नदी का रंग यपि हमारी पुप्पतोया यमुना की भांति विनम्र भाकाध जैसा है पर मिन में नीस का महत्व वैसा ही है जैसे हमारे यहाँ गगा का। सचिन पिए, माप कहीं गसत म समझ जाएं। समूचे मिल में नवो नीम नदी किनारे ती या देवालय है न पी और पुजारी जो यात्रियों को महाने से पूर्व प्रपना भार्मिक कर वसूस करते हैं न नील माता की वहां पारती हावी है न उसके जम को सोग पीधियों से लेकर पीों तक भर फर से गाते हैं और म उस पर पुष्प बहसे हैं म दूध को धारा पौर रात को दीपर। फिर भी नीस पवित्र है। केबस पवित्र हो नहीं परम पवित्र है। पह मिन के निवासियों को मर कर महीं जीते गोम्पर्ग प्रदान करती है। मिस ये मेरो मौस फैसे उस मरु प्रदेश में यदि नीस महोती तो मनुष्य का नाम म होता । नीस उन्हें असही महीं प्रम भी देती है मुल भी देती है सम्तोप भी प्रदान करती है। नीम से बादाता मिम सेमिए और कौन है ' महाँ-वहाँ मील है यहाँ यहाँ बीमन है, वहाँ- वहाँ योपन है। यहाँ मोस नहीं है वहाँ सूखा है वासू है वायु के पगार है । जब में मिझ में पा तो नोस की महिमा मैम प्रपनी पानी से देखी भोर सोचा कि इस महानती की महिमा को पपर पर। मि हे अनन्त जलसंचारिणी हे पपल वारि तरंगे हे नीलाम्बर धारिणी, में तरेप और यौवन पर गुण मौर पौर वैभव पर मुग्म हूँ। मुझे इसस क्या मेमा मि तू किस पोसा पिरास मी तनया है । मुझे सस भी मोई सरोकार नही किसूक्ति परपोप में - पीर-गांभीर महासागर से वर को लोग में पर से निकम परी है। पिस जाति की है तेरा खुद का इतिहास पया है ? में इस पार में भी महीं पएंगा। तू मस्वापिन की तपन को गमन करती है, तेरे स्नेह सीकरों से मनु के बेटों पी तन-मनपी प्यास तृप्त होती है सू नेत्रों की धीतसता है हदय की संगीवनी है कर्म को प्रेरक है । तूने बार-बार मेरे नयनों को अपनी पोर तोंचा है। दू मेरे मन में माली होकर सदा सदा के लिए पस गई है। हे परदेसिन ! में तुम पर रीम मया हूँ से ही जैसे वेरे तट पर रहने वाली स्पा पर हमार मिश्र कमी वापर में रोझ गए थे। मुझे शाप्त नहीं कि मिस्र के कपि अपनी मोल की प्रशंसा पिन शम्दों में करते हैं । सेफिन मिस्र के ग्राम सोग पपनो महानदीको जिस तरह करते हैं गह में पाखों देख पाया हूँ। पहसे पापको में यह बता कि इस महत्व को रखने के लिए क्या-गया नहीं परते। मित्र ने मोग भने हो नोसमी भारती न उतारें, मेकिन वे हगिक नीस के क्मिारों को हमारे मोगों की तरह मसमूत्र से गदा महींकरते। मेमे कोई गवा नासा भी मीस में मिसते हुए नहीं देता। रात के समय अपने पर काराकरकट भी उठाकर मोग नीम में नहीं फैकमासे।नोस परफूस नहीं पाए पाते तो क्या मरे हुए गानवर या मुर्दे मी तोउसमें नहीं फेरे जाते । यह टीप है कि नील के मुरम्प तट पर हमारे देश की तरह मात्मक पाट, सभ्यता और ससतिरे परिचायक गयमनुम्बी भवन पौर सरय सनातम-धर्म को महान् महिमा का गुणगाम करने वाले मम्प मन्दिर मिल में नहीं है ममीस के किमारों पो सभ्याकामीन मिस्त ग्मता पौर उदामी यो तोरने के मिए यहाँ मन्दिरों से पंटा-प्पनिही पाती है पीर म प्रात कालोन मूर्य का प्रमाप नदी के स्वर्गशियरों पर पाकर बस में स्वर्ण महगें की मृष्टिही मरता है। सेपिन नीस के किनारे बहुत कुछ ऐसा है जो हमारे यहां नहीं है पिस्तु होना चाहिए। उदाहरण के लिए, माहिरा में मीलों तर दोनों पोर मीम यो मौत महाँ दो मिन मही झील की नए पक्के तटपयों में कांपा गया है। मही करिनारे किनारे मीनों तक सुरम्प वाटिकाएं और मजे कटे पहों की कमर पंक्तिमा है। बम्बई के पौपाटी की तरह मीमों सक रहमने के लिए मदी के किनारे-किनारे सटफार्म है रहसने के लिए पार्क महाने के सिए फूम है और विहार करने के लिए नौकाएँ हैं। हमारे प्रमोम्या मपुरा माया, कामी, काची प्रबन्तिका किसी भी नही पुर में ऐसा महीं है। अपने देश में किसी भी नदी का स्या समुद्र का मी नट इतनी दूर तम श्वनीम्पवस्पा के साप इतने नपमाभिराम स्प में सहेजन्मेवार कर नही रखा गया। हम मोग प्राचीन पर गई तो बहुत करते हैं सेक्नि पर्तमान का महीं देखते भविष्य को मही बनाये। मिन-वासियों मे अपनी प्राचीन गरिमा को, यो नामक रूप में भवन्त रुप से भान भी प्रवाहमान है पान के अनुरूप बनाकर अपने ममिम को उसयन किया है। इसीलिए वे सम्भों में मीसपुत्र पहनाने के अधिकारी हैं। उसके किमारे मोग मानकर सुलफे का एम सपाकर ममा-मैया मही पिल्लाते। ये बिना पिस्माए नील का मावा से भी मधिर पादर मिस इतिहास में एप समय ऐसा पायापही को सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी को मिल की दुलहिन पोपित किया जाता पा और एक दिन परर मोग उसरी होती धूमपाम से उठाव हुए उसे मीसरे वट पर से गाते थे। प्रवियप मिस की एक सर्वश्रेष्ठ सम्बरी देखते-देखते मील की वसि दे दी जाती थी।नोस की महरों में मतो उतरावी पौर पम पर मौत के मुंह में गाती उस सुन्दरी का काण पन्त देखने के लिए मासों मोम एकत्र होते थे. भौर विधाता की सृष्टि के सर्वोत्तम सुमम को गोषित सप्त-समापि देकर यह विम्वास सफर पर मोटो पनि मीस देवता पर प्रसभ रहेगा और हम पर कोप नहीं करेगा। मेकिन मवये रिम हवाहुए । मान नौस कोपरा नहीं क्या का देवता हो गया है। उसे देगने को दो गेर जन-समा उमम्वा रहता परयों में है पर पह कमी नहीं उमरता । पार नोप्स का वरिया प्रपनी पुषियों की बसि महीं सेवा, उन्हें अपने अंक में हिसरावा-दुमराता है उसकी पठसियों में मोग देता है, उन्हें प्रसन्न होते देखकर पुसकता है। पान मिस की सुन्दरियों नीम के नाम से परराती नहीं उसको पर्चा मान से खिस उठती है। नील उनके मरण मानहीं मवयीवम का संदेश है। मीम मेवम सुन्दरियों के लिए ही नहीं, समूभे राष्ट्र में मिए मब जीवम का सन्देश । चना मिए यह महामत है 'यदि मील महीं तो मित नहीं। मदि स्वेज मियपी पारमा है मान है, तो मीस उसका शरीर। मिस्र के मोग अपने इस शरीर की रक्षा परने के लिए, इस पुष्ट वमाने के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार है। पिछले शासन में नीस का पूरा पूरा लाभ नहीं उठाया गया । भारत की तरह म नीस से माफी महरे निकसी है न बाप बने हैं और न उसके बम से प्रमी पर्याप्त विवनी उपतम्प की गाती है। सेमिम पब नये मिस्र, सोग मासमान गौम वापार इस एमी पो पूरा करना चाहते हैं। मीस नदी का यह गोप माग मिस्त्रियों की समस्या है। सपिन स्पेन समस्याको पपने पदम्प साहस से सुसमा सेने बाम हमारे मित्र नीस-समस्या को भी पासानी स शान्ति के साप सुममा संगे, ऐसा हमारा विश्वास है । पौर उस दिम की इन्तजार करनी पाहिए, जग नीस एप महीं अनेक पारामों में नहरों रजवाहों पौर शुमावों रेप में बहार मिस को परतीकोकण-कण सिकताको प्रपनी जीवमपारामों से परिप्सारित पोर मीस से निस्सृत विप्ताक्ति मिस रे मांग-गौरमो पामोषित कर देगी। उससे पस पोरकारपाने चल परमे पौर मील पो फिर से अपना पुराना सोहित माम प्राप्त हो जायेगा। ।
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स्फिक्स-माहिरा के निकट नसिह की एक रिणाम प्रतिमा
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F
समारहाइ पाापर्य-पिरामिा
८ संसार का सातवा आश्चर्य · पिरामिड मन की ममी किसकी पूरी हुई है मरी इच्छाएं मो पब तक मपूर्ण है। उनमें से बहुतों का मसास मुझे नहीं है। परन्तु एक रहा ऐसो अवश्य है कि निसक पूरी म होने की कामुक मुझे उम्र भर मानती गो। ऐसाकों में पहले कि मी साडी है, मौर ऐसी इच्छाएँ है भी यही छोटी-सी, मेकिन उन्हें पूरा करने में मो मम्माम और साहस की पारस्यकता है। गांव में पेश होकर मेरी इा गहर में पाने की पी। गहर में पाकर मेरा पमो कमिदमरी में मंपा तसा करने की पी। कमिश्नरी में बमकर मेरा विचार राजपानी पापने का हमारामपानी में पहुंचकर मैंने पाहा हि में पत्रकारबममा। पत्रकार बननपरमरी ठमन्ना हुई कि मुझे मौ विमा प्रमण करसे पाबसर मिझे। विम मात्रा की मुषिमा हाने पर मैंने चाहा कि मैं पहले मिस पहूँ। मिम पहुंचने पर मेरो पहली स्वाहिम पी कि मैं पिरामिा दे। पिरामिा देखने पर मुझे जो हम्मा हुबह वही है जो पूरी नहीं हो सकी। पाप सोचते होंगे कि क्या हजारों वर्ष से भविषम सरेहए सैकर्ग फूट उप महाकाय पिगमिा को देखकर मेरे मन में भी वृक्षसी हो इम्या हो गई, सो किताबमहम को देखकर एक परीक्न रमपी की हो पापी। मैंने हरपिन भी उस अमरीकन रमभीको तर यह एक क्षण के मिए नहीं सोचा कि मगर मेरी पादपार में भी कोई ऐसा महान् स्यारह बना रे तो मैं अभी मपनी जान देने को संमार हैं। म मेरी 10 प्रयास में । तमन्ना यह पी कि मैं किराये मी परगी पोशार पहन पर ऊँट पर पड़ कर दोस्तों को दिखाने के लिए पिरामिर नीचे एक पडिमा सो फोटो सिंपवा लूंसा कि यहां पहुंच कर प्राम तौर से लोग किया करते हैं। मेरो इच्छा तो सिर्फ यह पी कि बस मेरी माखों के सामने मिस्र के नौनिहाम पिरामिरों में पत्परों को पका-पका कर बंदरों की तरह घाम मगावे सैकड़ों फूट ठीदवाय परते चमे पा रहे हैं उनमें मैं मी अपने पापको शामिस कर मूं। मैंने अपनी यह इच्छा उस मिनी अधिकारी से प्रकट भी कर दी पो हमारी सुविधा के लिए वहाँ की सरकार की भोर से हमारे दम साप पा। लेकिन उसने अत्यन्त गिन प्रतापूर्वक मरी यह प्रार्थना प्रस्वीकार कर दी। क्योंकि हम सोम प्रतिपि थे पोर हमारे जीवन की सुरक्षा का दायित्व वहां की सरकार के पर या। माना कि उस भयंकर मरु प्रदेश में सैकड़ों मीम दूर से इम पत्परों को तो-काटकर माना पड़ा कठिन पार्य पा। मामा कि उससे मी मठिन कार्म इन पत्थरों को बिना मगीनों की सहायता के काट-सराशकर सैकड़ों फुट ऊभे स्तूपों में पुनना था। सेपिन इम पहार से पिरामि: पर बिना किसी सहारे पौर रास्ते के छमाग मारते हुए मगे पैर, बिमा किसी सहारे के सीमे बढ़ गामा वास्तव में सबसे पधिक कठिन पाय पा। इन पुरकों को , पिरामिों पर पाते देख कर मुझे उस समय ऐसा पमुभव हमा किठिनाईयो खड़ा करमे वासे हो माटिनाईको पार कर सकते हैं। प्रपर मिमियों के पूर्वगों मे यह पहाट मे पिरामिा खड़े कर दिपाये पे तो प्राजक माने में उनसे बम्चे उन पर हंसते इससे घसांग मार कर पर भी सकते है। मेरो गोषन में दिमपस्पी है मौत में नहीं। मेरी शिव में भक्ति है आप में नहीं । मेकिन मिल भी यह पो पिरामिर ससति है उसमें मे मे शव की महत्ता क प्रपम बार दर्थन रिये । अपने देश के पुराणों में मैने मोमों के सदेह स्वग माने की कथाएं पड़ी है। बुध मागों के सदेह संसारकासावा प्रारषय पिरामिड अमर होने की बात भी हिन्दूशास्त्रों में कही गई है। लेकिन मरने के पार न पाने कव प्रास्मा उसी मरीर में फिर पापम मा जाप, यह बात पाहमी बार मिल में ही सुमी । मिस्र के मासक फराउनका यह विश्वास पा कि मरफर मेस्मी भी अपनी मृत देह में वापस पा सकते हैं। इस लिए उनके धव को कड़ी हिफायरे साप पहारों पे पिरामिर्गे के मीवर ही सुरक्षा के साप रखा जाता था। म जाने बह कय जीवित हो न मौर उन्हें कर किस चीज की भावग्यकता हो पाए, इसलिए उनके सत्र के साथ ही साने-पीने की वो निक पपहार में पाने वाले पदार्थ, माराम मौर चौक के समस्त साधम ही मही, उनके गुलाम भौर पालतू जानवर भी मारकर दफना दिये जाये पे। पिरामिर बाहर से देखने पर गो कठोर, मनगद मौर मगभग पसुपर रिसाई पाते हैं। उन्हें बाहर से देखने पर माश्चर्य में हमको ममता को गाती है क्योंकि म इनमें सारमहम जैसी नकामी है पौर म कुतुब मीनार जैसी बुमदी है, मोर न ममता मौर भलोरा मी तरह पारमा का सौन्दर्म इन्हें देख कर भोसों के सामने मात्र उठता है। लेकिन पिरामिों के प्रपर से मानव-मम्पना मोर इतिहास के धर्म भौर विश्वास के कमा पौर विमास के पो ममूने प्राप्त हुए है संसार के इतिहास में वे बोर है। मैं पापको यह बताने का कष्ट नहीं रहेगा कि प्रधाकुस कितने पिरामिडों का पता मगाया जा चुका है । मैं पापका समय यह मतापर भी मप्ट नहीं करमा पाहता कि पौन पिरामिा किराना पाहै? पिखना बोगहै? उसके मम्दर कित्तमे कमरे है । वह गिवने सास पुराना है ? उसका पत्थर कहाँ से पार किस रास्ते से माया पा? उसमें पिसमा सब सोमा हुमा है ? मैं मापसे यह भी नहीं मतामा पाहता कि जिस पत्थर के ताबूत में फरानों का प्रब रखा जाता पा गह परपर एक ही पट्टानमा पर कितना हमका होता पा! और यह भी कि पत्थर र ताबूत के नीचे सममरमर का उसके बाद पीठसा मौर उसके बाद, मन्त में, सोने का वायूस हपापरतापा। पीर यह भी Y. प्रयास में । कि उस सोने के ताबूत में फराऊनों का सव किस मसामे से मपेट कर किस विधि से पिस यत्न से ऐ सहेज कर रखा गाता पा कि हजारों वर्ष बाद पार भी उनकी चमड़ी में सिकन नहीं पड़ी है। मैं तो पापको सिर्फ यह बतामा चाहता हूँ कि एक मुग पा, पर मारत की तरह ही मिल के सोग भी सूर्य की उपासमा किया करते थे। यह भी बताना चाहता हूँ कि फराम्म शासक मूर्यवधी थे। इसीलिए प्रमर पे पौर इसीलिए उनके सव को इतनी मुरक्षा से रखा जाता पा। पिरामिडों के अन्दर सूर्य देव की प्रतिमामा पाया जामा इस कपन की पुष्टि करता है। हिन्दुपों के लिए एकरात पौर भी बताना चाहता है कि ताबूत में फराऊनों के सिर की तरफ सोने के पत्र पर एक गाय का पिम प्रकित होता पा । यह गाय विवेशी तरह की नहीं शुर भारतीय मस्त सी होती पी। इसके लम्बेवान पोर लम्पो-सम्वी पूष मौर मदी में से इसका पुवरना ऐमा मामूम पड़ता पा से मैतरणी पार कर रही हो। गो-मगित इस ताबूत को मैमे काहिरा के प्रमायबर में अपनी भासों से देसा है और देखा है गनेरा में पिरामिडों के पास प्रयुमहोम की विशालकाय मरसिंह मूर्ति को । इस मूर्ति का पा सिंह का है और बेहरा मनुष्य का। मुझे इस वेसकर मारतीय पुराणा मॅगणित मरसिंह अबतार की याद मा गई जिसमें चेहरा सिंह का मौर ष, मनुप्प का भारण करके भगवान मे एक राक्षस का संहार किया था। क्या अबुल- होस पौर नरसिंह पवतार में कोई साम्य है-यह मैं सोच ही रहा था कि मुझे पतहोम को विशामकाय मूर्ति में तस्बों ने दधन हुए ।ममे देखा कि उसके घर में सिंह मंसी पक्ति है उसके मुग पर गमगीर्षसी मुस्काम है, पर उसरे विधाम मस्तिष्क में उसके यमाने पामे सुपर कलाकार मे भानगरिमा फूट-फूट कर भर दी है। अब यह जानकर कि उसकी पूंछ फितन गर मम्बी है और उसकी माफ किसने पटरी है, मौर इस माम पोकर मेपोमिपम ने क्यों तोर दिया पा पौर मिम्म के कारीगर उसे अब तक क्यों नहीं बना पा रहे है -पाप बया तंगे। माप सिर्फ यह पानिये कि जीवन के लिए परीर में बना मुए - संसारका सातवा पाच पिरामिर पर मुस्कान और मस्तिष्क में सतुसन को प्रावश्यकता ह । प्रबुसहोल की प्रतिमा हमको यही सदेश देती है। में पय नर्गमह पीर सिंह नर के बार में सोम ही रहा पा तब मरे गारों ने मुझे एक पोर मनूठी पीक दिखाई। यह एक हमार वर्ष पुरामा मदिर पा। इस मदिर में सापकों की सामना क लिये प्रसग-प्रमग स्थान बने हुए पे पौर ऐसी जगह भी भी महाँ कभी कोई मूर्ति रही होगी। उस मदिर का गर्भ गृह उसके सम्मे उसकी छा उसक द्वार मुझे मारतीय परम्परा के निकट प्रतीत हुए। मैं सोचने ममा कि यह पिरामिरों में सोए सूर्य वची राणा, यह मरसिंह को महाकाम मूर्ति मोर उसके पास हीबमाइमा यह देव मंदिर प्रवश्य ही कोई ऐसी कहानी बह रहा है बिसे माम बमाना भून पुका है और विसके विषय में इतिहास भी अभी तक मौन है। मेपिन चमामा मसे ही भूसे एक भारतीय को यहाँ पाकर बहुवमी वासे याद मा जाती है । इतिहास ममे ही मौन रहे सेपिम समय और पास की सीमा से परे देखने पासा मिकमी मौन महीं रह सकता । यह पुकार कर कह रहा ह कि मिस मोर भारत कमी एक पे एक है और एक हो होकर सहर रहेंगे।
६ मिस की गंगा स्वेन्न दुनिया के लोगों के लिए स्पेज का महत्व चाहे जो हो, मिस्रवासियों के लिए तो वह प्रागों से भी बा कर है।यह स्वेर के लिए अपने प्राणों की ही नहीं यदि उससे भी बड़कर उनके पास कोई भी हो तो उसकी भी बारी लगाने को तैयार हो सकते हैं, क्योंकि स्पेर उनके लिए म कवस मनीत के गौरव की स्मृति है म केवम पर्वमान भी सुन समृद्धि को स्रोत है बस्कि यह उनके भविष्य की मी मपुरतम एवं मनोरम पाया है। जैसे सुयोग्य पुत्र को देसकर माता-पिता की छाती पर्व से फूस उठती है, या सुम्बर प्रौर समर्थ पति को प्राप्त पर पत्नी पारम विभोर हो जाती है मा कोई पनिक जैसे प्रपनी सचित सम्पपा को निरलकर निहास होता रहता है वही बचा मिस के मोर्गों की स्वेर को देखकर पा उसकी बातें करते हुए होती है। एक मियी अभिकारी के साप जब मैं स्वेर के किनारे-फिमारे उस दिम सफर कर रहा पासो उसने हाप उठाएर बरे गर्व से इपित करते हुए मुझसे कहा था "देसने है पाप उस पार मोहगारोंमोग एकर वह पर रहे हैं? ये नम्ही महान् परब पूर्वजों की सम्तान है जिन्होंने हजारों वर्ष पूर घरती मी छाती पर पिगमिा सारके सुसारको मादपर्यवरित कर दिया था भाज उन्हीं के बंधन एक मार फिर दूसरा पुरपार्य करने को तत्पर है। मैंने पूछा बह क्या तो उस अधिकारी ने मुझे याही राष्ट्रीय गई से संजीदा तन में वसाया पिये मोम स्पेशको पौर प्रभिः पौड़ा करने में सर है। २ मिसकीयमा स्पेन हम सोग पाहप हे स्पेश ठनी बोडीहो पाए कि इसमें एक साय कम से कम दोपहार प्रपन्य मा एमके पौर चन्हें मरे को रास्ता ने के लिए बीच-नोष में मगर मरासने पर। स्वको देखने पर यह नहीं ममता कि यह काई महर है। वह खासी नदी दिखाई देती है। उमका पाट ४१० फुट चौडाई पौर उसकी मम्बाई मी मोई कम मही, १०३ मोस है । सेकिन नदी मी उसे कसे कहा जाए । मदी बहती है । पहार से निस्तार झोल या समुद्र में गिरती है। मेकिन स्वेज रहती महों समुद्र की तरह म्पिर ह । बह सागर मे निकल कर सागर में मिमती है। वह मानव पुरपार्य कोमो ही मिसाल है बसी रामायण काल में हमारे भारत में पटिव हुई पो। राजा राम के साम भारतीयों ने मिनहर कभी समुद्र पाटा पा। उसी प्रकार मिम्नियों ने प्राय से तीन हजार गप पूब समुद्र से सम्म को मिमामे वाले इस महान कार्य की प्राचारपिसा रती पो। स्वेज के निर्माण पर अपना दावा करने वाले और उस पर ममि मान तामे मासे मान कई पूरोपियन राष्ट्र बा-बार गाने को है। इंसिरमी तिचोरियों से यह गर्व है कि स्वर के निर्माण का श्रेय उनको है। फास का कहना है कि स्वैर उसके यसमास्त्रिया को करामात का नमूमा है । इटमी पौर पुर्तगाम मो इसी प्रकार के दावेदार है। लेकिन मिल के युग-युग प्रापीन इतिहाम में भाग से केवस पौन सदा पूर्ण स्मेक कम्पनी का निर्माण कस को-मो पटना मातम पाती है। सपाई यह है शिरोम सामर पोर साम मामर मोजम-माग से मिमाने का विचार सबसे पहले मिमियों में कम्पनामीम में ही उत्पन्न हपापा पोर इसका प्रयम स्वप्न देखने गाल पे फराऊन गम मैम । उसके बाद एक बार वपतक मियबहादुर सागम महान् पम्पना मदन मापन नाम के लिए कोरपोल पर विकार-विमरते रहे। पासिर एक दिन वह माया कि राम नहर को मार पूम पाम मे रप दी गई मौर मिन के मजदूत मोगाने १८ मोम कीम मानदार नहर निर्मापसरगना।समारराम में यह एक है मिस की गंगा स्वेन दुनिया क मोर्गो कमिए स्वेबसा महत्व पाहे पो हो मिसपामियों के सिए तो बह प्राों से भी बड़ कर है।यह स्पेन के लिए प्रपने प्राणों को ही नहीं यदि उसमे भीड़ उमरे पास कोई और होता उसी मी बारी मपाने कोठयार हा सकते हैं क्योंकि मेर उतरे मिा म केवन प्रतीत गौरव सम्मृति है म केबम बतमाम की मुम ममृमि को सात है बल्कि यह उनके मरिष्य मी मी मपुरतम एवं मनोरम पाया है। उसे मुयोग्य पुत्र को देखकर माता-पिता को घातो गप से फूम उनी है या मुन्दर पौर मर्प पति का प्राप्त पर पन्मी प्राम विमोर हा जाता है या कोई पमिक से अपनी सचित सम्पदा को निरसार निहास होता रहता है वही दगा मिस क लोगों को स्वा का देसकर या उमरी बातें करते हुए होती है। एक मिनी प्रमिपारी + सायबर में पाक किनारे-किनारे उम दिम सफर कर रहा याता उसन हाप उठाकर गरे गर्व से इगित करत हुए मुनन कहा पा “वेनते है पाप उस पार मोहमारीसाग एकत्र है वह क्या कर रहह' य टन्हीं महान् परब पूर्वजोंगी मन्तान हैं जिन्होंने हमागें वप पूत्र घरती रोपाती पर पिगमिा योमरके ममारको प्रापपक्ति पर दिया था भार उन्हीं के मगर एकबार फिर मग पुरपाप करने का सत्पर हैं।" मैंने पूछा "यह क्या तो उम पपिकारी ने मुझे पो ही राष्ट्रीय गई से समीदा कम में बनाया कि सोप स्पो प्रौर पपिक गौरा करने में तत्पर है।
मिलकीमा स्पेस - हम सोग पाहवे हे स्त्र इवनी पौती हो जाए कि इसमें एक साप कम से-कम दो बहार एवमय मागास पोर उन्हें दूसरे को राम्ता ने के लिए बीच-बीच में मगर म समने पर। र को देखने पर यह नहीं लगता कि यह कोई महर है। वह सासी नदी दिखाई देती है। समका पाट ४५० फुट भौगह मौर उसकी मम्बाई भी कोई गम नहीं, १०३ मोम है। लेकिन नदी भो उसे कसे कहा जाए । मदी महतो है । पहार से निगम कर मास या समुद्र में गिरती है। सेकिन स्रेर महती महीं समुद्र की तरह स्पिर है । बह सागर से निकल कर सागर में मिलती है। यह मानव पुरुषार्य की सी ही मिसाल है मेसी रामायण काम में हमारे भारत में घटित हुई पी। राजा राम के साथ भारतीयों मे मिमकर कमी समुद्र पाटा मा । उसी प्रकार मिसियों ने पान से सीन हजार वर्ष पूर्व समुद्र से समुद्र को मिमाने वारे इस महान कार्य मी माघारशिला रही थी। स्पन के निर्माण पर अपना दावा करने वाले और उस पर ममि मान मवाने वाले मान कई मूरोपियन राष्ट्र बाबाकर मात करते हैं। ग्र की तिजोरियों को वह य है पिस्वस के निर्माण का श्रेय उनको है। फीस का कहना है कि स्वेर उसमे यत्रास्त्रियों को करामात का ममूमा है । इटमी पौर पुर्तगाम मी इसी प्रकार के दावेदार है। सेपिन मिम के युग-युम प्राचीन इतिहास में भाव से केवल पौन मदी पूर्व मेज कम्पनी का निर्माण कम की-मी पटना मामूम पाती है। सपाई मह है कि रोम सागर मोर सास सागर को जल-माग से मिसामे का रिचार सबसे पहले मिमियों के कपमाणीम में ही उत्पन्न हुमा या पर इसका प्रथम सप्न देखने वामे थे फराम राम सैम । उसके बाद एप हमारवर्ष तक मिस्र बहादुर सोम इस महान् कल्पना का महा सम्भव बनान के लिए बाममोन और विपार-विमर्श करते रहे। प्रातिर एक दिन वह माया कि जब हम नहर ही नौब धूम पाम से रपरी गई मौर मित्र के मरबूत सार्गो मे ५८ मीस पीएम मानदार नहर पर निर्माण सरसमासमार के तत्र फौगल में पह एप परदेश में प्रभूतपूर्व पटना पो । लोगों ने देखा परती के ऊपर पिरामिा यनाकर वेगाने वाले मोग परती के मी नहर सोद पर काफी गहरे भीगा सकते हैं। सदियों की गर्द पौर काम के झभागात मा प्रभाव इस नहर पर भी पड़ा । फराऊनों के पतन के माप-साप यह नहर भो गर्द गुवार से मट पट गई। इसके पिमारे टूट-फूट गए। ऐसा मममे सगा कि मामो परती पर से सपा नामोनिशान हो मिट जाएगा। सेक्नि मिय में इस्माम के नागरग के साप-साप इस महर के इतिहास मे मो फिर भगगईसी। परव गवर्नर प्रमर इग्न-प्रम प्राम ने फिर इसके स्प को मिलारापोर पयस्विनी फिर से मिस्र मेदिमी का मनोरंजन करने मगी। पूरोपीय मोर्गों में सबसे पहले इसका पाम मेपोलियन को पाया। उसका पिपार पा हिमाल सागर और रोम सागर को पस भाग से मिमा दिया गाए ताकि उसपी गुप्रदर्शी सेमाएं पूर्व के देशों को भी सहर ही पदाशत कर सम् । मेकिन यह प्रासाम नहीं था। मिन की भूमि में किसी विदेशीने द्वारा ऐसा प्रयत्न तो और भी मसमग पा। पुरानी महर पर सदियों को पत इस तरह जम गई थी कि उसका जीवन पण कग करके सोम लिया गया था। अब महर माको नहीं बची पो यहाँ वहाँ उसके मिशही रह गए थे । नेपोसियन मनमी मन में रह गई। नेपोमियन का मप्न बाद में उसी के एम देशबासी मापे में पूरा किया। उसने मिस्र के सदीन इस्माइस से स्पेरमाक्षेत्र मिन्यानो वर्ष के पट्टे पर लिया स्पेग कम्पनी बनी यूरोप के विभिन्न पेषों की पूंजी इसमें मगी। पौर पौन सदी पूर्व वर्तमान महर इस स्म में पाई। इस नहर के निर्माण में पूरे ग्याइ पर्प मग गए। तनिक तम महाम् परियम की कल्पना कीजिए-उसमें म जामे कितने सास हाम मगे होंगे क्योंकि सरकारी प्रांको बताते है कि इसके निर्माण में बत्तीस हजार मिस्त्रियों को तो अपने जीवन ही की गति देमी पर मिकी मेवा मंत्र गई मो। यह महर मूमम्पसामर से सामसागर को मिलाती है। इसके बन आने से एशिया से यूरोप की यात्रा परने गामों का दोहजार मौसका पाकर पप गाता है और सोन सप्ताह का समय कम मगसा है। इससे प्रति दिन सत्तर साण रुपये की मामदनी होती है। मस्साह से लेकर स्वेज गवर्नर बहारों लोगों को रोगी इससे पसतो है। म्बेर का संसार के लिए प्राषिक हो मही रामनैतिक महत्व मी है। इसके एक किनारे पर एशिया दूसरे पर मफीका तीसरे पर यूरोप पौर पापे पर मारत भाने माने का मुमम माग । सोसिए केवल मन की वासिर ही नहीं राजनैतिक कारमा से भी फीस और ब्रिटेन इस पर कपा बनाए रखमा पाइवे पे । मेकिन स्वेज महाँ परयों के लिए श्री-समृद्धि का सन्देश मेकर पाई पी रहाँ उमने परत मानि को राष्ट्रीयता का भी मन प्रदान किया। सर किनारे पर पहुए पोर्ट सईद पोर इस्माइमिया परव गष्ट्रीयता के ऐसे जागरण केन्द्र बन गए निमिनके वार-बार के विशाह ने प्रातिर विदेशियों के पर सवार ही दिए । पारदी पीदो पास मोर मर मिस पर पर्वर हमसे सकभी नहीं भूल सकती । भयभर बमबारी ने पोर्ट सईद एकदम मप्ट प्रप्ट कर सा पा सेकिन मैंने अपनी प्रांतों से पोर्ट सईद को देखा तो मुझे एक मग दो मी यह नहीं सगा रि यहाँ कमी किसी रिवेगी बमवाय का हममा भो हपापा। पिनाथ की जगह सर निर्माण मये अंकुर महरा रहे थे। राष्ट्रपति नासिर मे मनस मेज से घिदेषिों को ही पदेश दिया कि वह नो परवानी मिलेर गा पे रसे पम्द ही दिनों में गौगुना भावाद करके दिवा लिया। लोगों का यह पयाम पाकिपिदेमियों के पसे पाने से स्पा फिर पट-पट मागी मिन रसोग उसे बहारगनो के मोग्य न म सगे उमपी प्यास्था विगा जागी पौर परबों को अपने लिए पर पद ताना पड़ेगा। सेरिम दुनिया ने देखादिमा कुछ मही हपा । मोगों में देसा कि स्पेशवामू है । उमरे प्रबन्ध में पहले से प्रपिप पवम्पा है।
परगोश में उसमें गुजरने वाों को पहसे से अधिक सुविधा है और स्वेव मपमे देशवासियों को पहले से कहीं मषिक दौमत भी देने मगी है। सन्प्या का समय हो सुहागना-सा मौसम हो पापके साप पन्छो मित्र-मम्मी हो पिपमिरपा पासम हो तो स्वेग के विनारे सैर मरने मा सोहोर निहारने का प्रानन्द सेमे हो माया होता है । स्वेर में से भीमे-भीमे गुजरते हुए महार ऐसे मगते हैं स कोई नयभू दोगासी के दिन पास में प्रसस्य दीपरबास पर पिसी मिसन महो सबको पम पड़ी हो।
ये नील कन्याप अब में हिन्दुस्तान से काहिरा को रवाना हुमा सो भनेक मित्र गोष्ठियों में मुझे कई प्रकार की ससाह दी गई। कहा गया तुम ठहरे कवि, रस के माभी सौम्पर्म के उपासक गुण पर रीझने वाले। देखना परब देशों को ना तो ऐ हो लेकिन यहाँ को हरों से परमा गिलमों से सावधान रहना परियों में अपने परम फैसाना । यह मराक मुझसे पुरुषों ने ही नहीं, कुष मेरी पिक्षित समियों मे भी किये। मुझे बताया गया कि काहिग में रामियमयों में गरी रौनक रहती है। दमिम में प्रौरतों के बरेच पाले हैं। पोर्ट सदि में पापाचार की पराकाष्ठा है, बहुत से गाल ई, तरहराए के फरेव है, मानि माति के लोग है । सयापार ! पॉप संभास के पसना । कुम पौर भनुभवी विस्म के लोगों ने कहा पाविदिस्मो से पश्चिम तुर्माता वैसे-वैसे पड़ते गाइये नारी-सौम्पर्य दुगुना पौगुना मिलता पसेगा। किताबों में पापा और मनुगों से सुना था कि मरण सोग यो रहापुर किन्तु साप ही बड़े मोगी किस्म जीव होते हैं। इन सरदातों मे दिमाग पर परख नाणे के समय में दुध ममा फिम्म की तस्वीर परित कर दी पी। इन बातों की यात्रा प्रपम दौर में पूष पुष्टि भी मिमी । मैंन देवा किएत के एक भोन में मौरतें मदिरापान में पुष्पों से पोछेन पी। उनके कहकहे पौर मबार भी पुषकमोर नहीं थे। माहिग के एक होटल मदिरा-मास में मैने मारियों से परपुष्यों पौर परपों को परनारियों के माप सन्मत्त होकर पाते-पोते पोर नाचे ।
४८ परवोदेश में देसा पा । काहिरा पोर पोर्ट सईद में वेश्यामों प्रौर मावारा पौरतों के तन का सौदा करने वाले मोग और दसाप्त मुझे वहाँ तहाँ पूछताछ करते दिसायी पिये। मैमे देखा कि रूप में गंगार सग्या में सौर तरीके में मार पान पान में पर नारी किसी भी प्रसार पेरिस सन्वन यावाशिगटनी नारी से उम्मीस नहीं है। उसमे पश्चिमी सिबास हो नही पहना उसपी पारमा में भी स पश्चिम की मारी उतर भाई हो । लेकिन अगर कोई मेरे इस विबरण से और इस पिचमी काम मोमुप प्रति पारम से या मोमों की सुनी सुमाई वात के माषार पर होटनवासी दुनिया के एकागी भीवन से परब मारी की तस्वीर नींबना पाहे तो बह एकदम गलत और पूरी तरह उसटी होगी। नई दिस्सी से मेकर मन्दन तर दुनिया के किस सभ्य वेश पर मगर में ऐसे दृश्य नहीं मिमते? यदि तम्हीरे पापार पर हम किसी देश की मारी के बारे में अपनी पारमा बना लें तो यह वैसी ही गमत होगी जैसी भारत के बारे में मिस मेयोपी पो। परव नारी मार संसार के किसी भी सम्म देश की मारी से पीछे नहीं । दफ्तरों में टाइप टेसोफोन पूपताछ मौर स्वागत-सत्कार का काम करने वामी महिमाएँ तो यहाँ है ही लेकिन महत्वपूर्ण सरकारी महकों की अफसर, सकीस प्रोफेसर पत्रकार और विदेश विभाग में भी यहाँ महिमामों की सस्या माफी मात्रा में पाई जाती है। हमारे महाँ कारखानों मिमों और फैक्टरियों में हिन्दुस्तानी नारी का प्रदेस मगप्प-सा ही है। प्ररव देशों में खासतौर से मिल में, ऐसी बात नहीं। यहाँ काफी संम्पा में महिलाएं कलकारमानों में पुस्पों का हाप बटाती मराकस्पना कीपिए, पाय से १४०० वर्ष पूर्व उस परव मारी की जब वह मी मूट के सामान की तरह एक मवव मर पी। उसमा काम पमुभों की तरह मनुष्य के संकेतों पर पाना मोर उसको इन्चा पति का सामन बनना पा। यह बागारों में पेची बानी पी रेप को नीम कम्पाऐ तरह पिता उसे अपने साप सवेर से बाते पे। एक एक पादमी के हरम में मनगिनत प्रौरते कबूतरियों को ठहदयों में भरी रहती पी। म उसे किसी प्रकार के सामामिम अधिकार प्राप्तये न कोई शिक्षा संस्कार हीपे। किम भार देखिए किकोई उसकी एम्दा के विपरीत उसे म्याद नहीं सकता, उसे तसा का अधिकार प्राप्त है वह मनुष्य की सम्पत्ति महीं उसकी सम्पत्ति की प्रषिकारिणी है। फैक्टरियों में काम करने के लिए भनेक सुविधाएँ प्राप्त है और उसकी राय न केवल पर गृहस्पी के मामों में परिम समाग पौर गगनीति के मामलों में मी भारी महत्त्व रखती है। मैंने मिस्र की नारी भिक्षा के प्रांको मालूम क्मेि तो पता चला कि वहाँ प्रारमिक शिक्षा तो सबके लिए अनिवार्य है ही, मेकिन चिन्हें पूरी तरह सिमित कहा ना सकता है ऐसी मारियों की मल्या मिस्र में इस साल है। दो परोकी जनसंस्पा वाले किसी एशियाई देश में दस लाख मारियों का शिक्षित होना कोई गम बात परब देशों में मारी-सागरण में एप पटना का बड़ा सकितिक हाथ है। बात सन् १९३० की है। भीमती शरापी माम की एक महिमा एक काम्फस में भाग लेने रोम गईपी। यहां उन्होंने संसार की मारियों को देसा, उनके विचार सुने । विश्व के नारी-जागरण मी एक झलक उन्हें उस कान्फ्रेंस में मिली। पीमती परागी एक निश्पय के साप स्वदेश मोटीं। नव वह स्वदेश के बन्दरगाह पर पहुंचीं तो बहुत से स्त्री-पुरुप उनके स्वागत को उपस्पितपे। यहार की सीढ़ियों से रत रसे-उतरसे उन्होंने एक ऐतिहासिक कार्य किया। वह यह कि अपना गुरमा उतार पर सपने देखते-देखते समुद्र में फेंक दिया। उस दिन से मा मिस से पुरका गया यह मान तक नहीं मोटा । मब भी दूर देहानों में पौर धहरों में कुछ पुरामी उम्र की महिनाऐं पुरके से सिपटी नहीं तहाँ मिल जाती है मेकिम मिन को हर साकी और समस्त नगपुर तियो इस रेशमी परदे से गहरमा गईमग्यास बाहरी मापरण के उतरने से उनके पीलमा हास हो पया हो, ऐसा में नहीं मानता।
में कई महस्म महिमानों से मिमा। एकदो शिक्षित युवतियों के सम्पर्क में भी माया । मैंने देला नि भारत ही की तरह उममें भी पीत सकोप पौर भांदा भार विद्यमान हैं। मिस्र के मुकाविसे सीरिया पौरपूसरे देशों की मारियों में पुरका मोर पुरासन पावाओं के विह ममी ज्यादा पाये जाते हैं। दमिरक को एक पटमा माद माती है। हम सोम बहाँ बार में कुछ सामान मरीद रहे थे। हमारे साप एक भारतीय महिमा मी थी। बब हम मोग वागार से गुजर रहे थे वो हमारे साथ की भारतीय महिला को पीछे से माती एव पुरके वासी महिमा ने बड़े गोरा मुक्का मारा। मुक्का मारफर यह ठहरी नहीं सीधी पसी गई। हम मोग हैरान यह क्या बात है। बाद में मामूम पर कि सिर सोसे हुए इस पार तीय मारी को यह पुराने सयालों की भरम नारो सहन सकी पोर अपने कोष का प्रदर्शन उसने मुगक रूप में कर ही तो दिया। कुएत मादि दूसरे खेत मा शाह शासित प्रदेशों में मार्मिक सत्यन कुछ ग्यादा की है। इसलिए युगका भी यहाँ ग्यारा मायूती के साप पहना जाता है और मारी-बागरण भी उस मात्रा में कम पिसाई परवा है । मेकिन मिम में यह बात नहीं मिस की नारियों को देखकर तो यह मयता ही नहीं कि हम किसी पविकसित पा भविकसित एशियाई देश में है। परबमारी को यदि प्रबसर मिने वो यह समाज के हर क्षेत्र में पुरुषों के ममान ही नहीं, उनसे भामे माफर भी अपनी योग्मता सिद्ध कर सकती है। उसमें साहस है, क्षमता वृद्धि विक है। किसी पोटी परव वामिका को देखिये वो पहचाक्षात देवकन्या दिखाई देगी। किसी सरुणी को नीष मसरो से वाकिये तो पापका दिल ऐका हो गापेगा। रिसो गृहस्प महिसा के यहाँ भोग्न कीनिमे तो बह पापको साक्षाय मनपूर्मा दिखाई देगी । पौर यदि किसी पचास वर्ष से अमर की मरव माता परमों में बैठने का सौभाग्य प्रापको प्राप्त हो जाय तो पापमो भगेगा कि ऐसी ही महिमाएँ पीर प्रसपिनी कहमाने की पषि -
मे मीनकम्माएं
।
कारिणी है।
इतिहास के पन्नों में प्ररयों पीवीरता के प्रमेक उम्पम पास्याम
मंकित है। नये युग मे उसमें एक मौर पन्मा जोग है। उस पर रिसी
भरव पुष्प की नहीं, पर महिला को पहामी साक्षरों में सिसी मई
है। यह कहानी है जमीमा दुइरोदा पी। यह महिमा पस्नीरिया के
स्वतन्त्रता संग्राम में सहाई के मोरवे पर काम करती हुई पकड़ी गई
पी। फांसीसी इसे पका कर अपने फोगी शिविर में से गये। उस पर
वरह-वहरे मत्याचार क्मेि गमे, भौति-भांति के प्रसोभन रिये गमे
और कहा गया कि वह अपने साषियों का भेद फोसीसी सरसार
बतमा दे । मेकिन मोम प्राप पार्क की तरह उसने प्राण देना तो में,
किया पर दुश्मन को अपना भेद बवामा स्वीकार नहीं किया। परिसी
पामस्वरूप उसे फांसी की समादी मई। सारे भरब राष्ट्रों में इस मा में
की पोपमा से रोप था गया । ससार को मारियों में इस वीर वार,
प्रप्ति पसा उमर पड़ी। विश्व के भनेक देशो ने, जिनमें भारतयों को
फांसीसी सरकार पर यह दवार रामा विबह इस महानमारी यमौन
फासो के पस्ते परम पड़ाये । विश्व जनमत के पागे फार
सीको पोस
पापौर मीमा फासी के तटे से उतार दी गई।
पागोस में
इस तरह पर से मेकर रणसंप तर मारही पररन
महीं पा।
मौहर दिखा रही है। जिस देश की नारिया जाग उठती है
नारों में
को फिर कभी कोई नहीं सुना सस्ता। पर मारी गा,
महाम परग वाति के पुनर्जागरण की कल्पना सहा में हो ।
सकता है।
परोप में
प्रसाद कह कर पुकारा। देसिए, में मापसे कृष्ध छिपाता नहीं। मुझे
कुरता पहमे देख कर किसी भी सम्दरी मे कहीं भी हाप मिमाने से
इन्कार नहीं किया।
पाप कहेंगे, यह तो भापक मिए मम्धी ही बात रही। इस पर
मापको मुख ही होमा पाहिए ।
जी हाँ मैं मुध तो पा, लेकिन मेरी मुधी एक पास से परा कुछ
कम हो गई।
मयी वहां के किसी एक नासमझ पारमी मे हमारे एक सापी
को, यह मानते हुए भी विवह एक वर्ग के मुसममान हैं, फरटिकी
मरवी गोमते हैं समझिए मरे वागार में बेव पाट सी।
राम राम | मह तो बहुत पुरा हुमा
मनी भभी क्या हमा, सुनिए म हमारे एक सापी एकम से
किसी कवर पाकिस्तानी मगते थे। माफ कीभिए, मैंमे परा मसत कहा
सम्म सो हम हिन्दुस्तानी पाकिस्तानी समी की एक सी ही होती है,
उनका लिबास परा षोमेवान पा। उनके साथ एक रिम और मो दुरी
बीती।
हाँ-हाँ बताइए,
पी महीं, पापको परमिन्या सुनने का पस्का मगा मासूम पड़ता
है। माप यकीन करें या न करें, मैमे तो मिस्र से मौटने के बार मुव
अपनी तारीफ और दूसरों की निम्बा करना एकरम घोर ही दिया है।
।
क्या हमा
?
अरवी साहित्य समझ में नहीं पाता कि मैं अपनी नारासो किसपर म्यात कई ? स्वयं अपने पर या मुझे अरब देश की यात्रा पर से पाने वामों पर । परब देशों की यात्रा पर मामे से पहले ही मैंने संमुक्त परब गण राग्य के विल्मी दूतावास बालों से साफ-साफ कह दिया था कि यह तो एक संयोग बात है कि मैं प्रसवार में नौकरी करता हूँ और इस माते मापने मुझे इस यात्रा के लिए पुना है मेक्मि दरमसम में हिन्दी का एक प्रदना साहित्य-सेवी हूँ। यूं तो पाप पो विसाएंगे यह सब देनूंगा ही, पर मेरो दिलपस्पी इसमें है कि मैं मापके साहित्यकारों से मि मापक कसाकारों के दर्षन कई लोकगीतों का प्रामन्द उठाऊँ और वेतूं कि भाप मोकनृत्य कैसे होते हैं। मैंने उनसे अनुरोध किया कि परमी साहित्य के संगठनों से परिचित कराया जाए। वहाँ की किसो साहित्य गोष्ठी में यदि सम्मिलित होने का सौभाग्य मुझे मिल सके तो बड़ी सपा हो। मैंने एक नाम भी उन्हें बवामा। महा यदि प्राप मुझे अपने यहाँ के महान साहित्यकार थी ताहा हुसेन से मिला देंगे तो मेरी यह सहस्रों मीस मम्मी यात्रा सचमुष सफम हो जाएगी। मेकिन सेव है कि मेरी एक भी मनोकामना पूरी नहीं हो पाई। पत्रकारों के पिष्ट मास में मैं पसबारनवीस हो रह गया पौर काहिरा इम्मान मिया पार्ट सईद दमिश्क और एएत में वापर वही देख पाया गो रिमी. मी देश की. महार, दिली. पत्रकारों को दिलाया करती है। मुझे एग्रीनस्पर के फाम दिमाए गए, करपर के कद्र नहीं । मुझे कम पारपानों में से पाया गया, कमानेन्द्रों में नहीं। मैंने पमु-पक्षियों के भरोध में पड़े-बड़े केन्द्रों को पूम तो फांकी, मेकिन साहित्य प्रौर ससति के उन महान सापकों को परणपूमि अपने सर पर न मे सका जिन्होंने पाय मरनों की प्रारमा की मायापमट पर गमी है। फिर भी पम पमवे, उपते-उड़से महां-सहा पूछकर, इधर-उधर देनकर, कृष पढ़कर कुछ सुनकर परयो साहित्य के सम्बम्प में गो प्रया मैने सचित को है उसे यहाँ पापको मर्पित कर रहा हूँ। परबी साहित्य पार का नहीं भारतीय साहित्य की तरह पग पुराना है। उसकी गौ भतीत में बहुत गहरी गई हुई है। भानकम के इतिहासमार परबों का प्रम्पदप इस्लाम के पागमन से मामठे हैं। स्माम यहाँ १३७६६० में माया पा। मेफिन परबी साहित्य उससे भी पुराना है। उसके प्रमाण भाग भी सुरक्षित है। परनों का यह प्राचीन साहित्य भारतीयों की तरह ही पद्यमय है पौर परिकशि वीर पूगात्मक है। जैसे मुसलमानों के प्रागमन से पूर्व हमारे देश में हर रामा या शासक के साप उसका एक राजकमि रहा करता पा उसी प्रकार इस्माम के मागमन से पूर्व परयों के हर कबीले पोर मानवान के साथ एक-एक घायर हमारतामा जो भारतीय पारगों मा भाटों की तरह अपने कुल मा कबीले के शौर्य एव समृद्धि का वड़ा-बड़ाकर बशाम पिया करता था। इस्माम के पूर्व परयों में मूर्ति-पूना की मारी प्रथा थी। उस समय का परवी साहित्य भी उसी प्रकार की भया भावना से प्रोत प्रोत है। जिस प्रकार भारतवर्ष के प्राचीन साहित्य में मैसर्मिक तत्वों की घटा विसरी पड़ी है वैसे ही मरगी का प्राचीन साहित्य भी पूर्ण तया मीन मवी की महिमा से प्साविस पौर बाद मौर सितारों से पमतत है। उसमें रेगिस्तान पोर उसके प्रनम्य सापी में भी विराद मर्गन पाए जाते हैं। प्राचीन परगी साहित्य में यहाँ मोरे को मेकर प्रमेव पर लिखे गए हैं यहाँ मरभूमि को पारी बना देने वाले मोहक भाकाश का भी बड़ा मनोरम वर्णन पाया जाता है। इस्लाम के प्रागमन के बाद प्ररयो साहित्य में मया मोर भाया ।
परवी साहित्य मूर्ति-पूगा समाप्त हुई। उसके स्थान पर सर्वश्वर पौर निराकार पौर सर्वव्यापी ईश्वर को मान्यता मिसी। एक नये समपर्म का उदय हुमा।हमरस मोहम्मद साहिब भौर उनके अनुयायियों ने न केवल मूवि पूगामा विरोध किया परन् उन्होंने साहित्य में बसे पा रहे पतिश योक्तिवाद और निराधार कल्पनावाद को भी निम्दा की। परवी साहित्य में एक नये तस्व का उदय हुमा । कुरान धरीफ परवी में मिसी गई। यहाँ क साहित्य पर माध्यारिमाताकी साप पसमे मगी। इस्लाम में प्रचार का दायित्व पर परयों पर पाया और वे दूसरे बेगों के सम्पर्क में पाए तो यहाँ के साहित्य का भी प्रभाव मिश्चय रूप से परी साहित्य पर पा । मम्पकातीम परवी साहित्य में रािन मादि की छाप बहुत सप्ट रिखाई देती है । इस युग में परवी साहित्य में भी एक सूरदास हुए हैं। उनका गुम माम पा पदुम भाला मापरी । इनकी रपनामों में देदाम्त दर्षन को स्पष्ट प्रमिष्यक्ति है। एक बार इनको किसी मे एक भुना हुमा तीतर भेग दिया पा। उसे पाकर कवि के गो उद्गार प्रकट किए नमकी मार्मिकता देसिए । यह कहते है ऐ तीतर । तुझे यह सगरा इस बात की मिली है रितू तीतर बना चील नहीं बना। संसार में कमजोरों की सदा मौत के सिवा और दुष नहीं है। परवी साहित्य नवोन्मेप प्रमी सौ नप पूर्व की घटना है। यह नगोम्मेप मरवादी पारमा में स्वतन्त्रता की भकुसाहट से प्रारम्भ हुमा पा। परव क साहित्यकारों ने अनुभव किया कि यदि मरयों को सान, मजदूत मौर एक बनाना है तो पाद सितारों की दुनिया का घौहार उनको धरती पर पाना पड़ेगा। मब मानव जाति के कष्ट पप्यारम वर्षा से दूर नहीं हो सकते । नई पोड़ी मो नमै सघपमिए तैयार करने के लिए उन्हें माननीय मुन्न दुसरे गीत गाने पड़ेंगे। परब के साहित्यकारों मे समय की मांग को पूरापरने के लिए पारादी, काम्ति पौर प्रगति के गीत भीमे-धीमे माने पुनरिए। भारत चाहे तो इस पर पर्व कर साता है कि नये परवी साहित्य १८ परोप में की नाति मा मत भारत क हपरावाद में रहे श्री सैयद मसानु होन अफगामी । वह हैदराबाद से पाकर मिस्र में बस गये पे। यहाँ साहित्य को उन्होंने मवयुग का पाठ पढ़ापा । हपरावाद जिसने भारतकोकिता श्रीमती सगेरमीनायडू को पपकापा पाहदरावाद जिसने हरेमनाप घट्टोपाध्याय को प्रमोकिक प्रतिमासे मंरित किया। इसी हैदरावाद ने सैयद पफगानी को अपने यहां पाश्रय देकर ऐसी साहित्य महिमा से मंरित किया जो मरव साहिय में एक युग प्रवर्तक पटना रेस में उदित हुए। धीमफगानी ने परमी साहित्य में निम्र नये युग का प्रारम्भ किया था उसको परम्परा को उनके चिप्प प्रशियों ने दूर तक पौर देर तक पहीनी से मिनाहा । इममें से यो के माम परवी साहित्य में प्रमुख रूप से मादर के साप मिए नावे हैं। ये हैं सर्दयो धोद रिवार भोर समसूम। इन साहिरियकों में परवी मापा की अनेक स्पों से सेवा की। देश में ही नहीं विदेशों में भी परवी भाषा और साहित्य का प्रचार किया। पेरिस और म्यूपाई में परगी साहित्य के पम्पयन अध्यापन केन्द्र स्पापित कराए। इन्हीं दिनों में मिस्र में दैनिक पत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ हमा। भार के दो प्रमुख परवी वैनिक मम हिमाम धौर 'मम महराम' उसो युग की रेम है। इन पत्रों की मोकप्रियता का पमुमाम इसीसे लगाया जा सकता है कि मारन दैनिकों की पापनाम से भी ऊपर प्रतियो प्रति शिन प्रकाशित होती है। यूँ तो मिस मोर भारत में ममेक समानताएँ । मेकिन उनमें से एफ का बर्मम यहाँ प्रसंगमात अमुचित नहीं होगा। से भारत की राष्ट्रमापा हिन्दी के लिए ईसाई मिशनरियों मे भारम्म में वा महत्व पूर्ण कार्य किया है वैसे ही पानी भाषा को प्रसारित करने और उसे समट करने में भी ईसाणे महान मा महत्वपूर्भ हा है। भारम्म में हिन्दी को भागे गाने पर उसमें साहित्य रचना कराने में थे भारत स्मित फोर्ट दिमियम कायेन श्रीमान मिळपिस्ट का माम हिन्दी साहित्य में मादर के साप मिपा बावा है उसी प्रकार परको प्ररपी साहित्य साहित्य को समृद्ध बनाने में श्री जुगी पेदाम का नाम बहुत ही महत्व पूर्ण है। इन्होंने 'हामम हिसास प्रकाशन गृह की स्थापना करके किमी ही उनोपयोगी पुस्तकों पत्रिकामों मोर ग्रन्थों का परवी भाषा में प्रकाराम किया। इनके प्रतिरिक्त दान मे 'इस्लामी सभ्यताका इतिहास पाप लों में प्रकाशित करके तपाइने हो मामों में परवी साहित्य का इतिहास पवाकर महत हो उपयोगी पाय किया । इस समय परवी साहित्य को गममा ससार क समय साहित्मों में की जा सकती है । उसको समृद्धि का पम्दार हम इस बात से सहन हो पा सकते हैं कि काहिरा का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय प्रमहबर' ससार के प्राचीनतम विषविपासयों में से है पोर इसमें सब ही विपयों को शिक्षा परवी माध्यम के द्वारा दी जाती है। भरबी भाषा में ससार को अप्ठतम साहित्य कृतियों के अनुवाद उपसरम है। भारत के प्राचीन साहिस्पिक मन्य महाभारत रामायण, गीता प्रादि हो नहीं प्रापूनिक युग के महान विपारकों क पन्प भी प्रकाशित हा पुके हैं। पान महारमा गांभी, नेहरू मी तथा गुरुदेव टैगोर की पुस्तके मी परबी भाषा में सहर प्राप्त है। भारम्स भरपी साहित्य को जोसोग समृद्ध कर रहे हैं उनमें इन महानुभावों के माम विधेपरूप से उस्लेसमीय है ग० ताहा हजैन,मन्दुन कादिर रागिनी गाटर हवस अहमद पमीनपा प्रमास प्रक्रबाद। इममें से गटर ताहा हुसैन मूभन्म माने जाते हैं। उन्होंने नौ सौ से ऊपर प्रयों की रपना की है। वह उसी प्रकार के मौमिक रिपारक है से अपने यहाँ भाचार्य विनोबा । मह वैसे हो पाणोनिधारद है बसे हमारे पही स्वर्गीय मदनमोहन मामनीय पे। समता और सरसार में तम्हें बैंसे हो निर्विवाद प्रादर प्राप्त है से हमारे यहाँ राष्टपषि मैपिमीमरण गुप्त को। यह थी चिन्तामणि देशमुख की तरह साहित्य कार पडित पौर सरकार क मत्री भी रह एक है। उनकी पायों को ज्योति मा पुगो है। लेकिन यह प्रमापसुगर दोसने सपा है तो परपोरेप बुनियादी से मो मुखियादी प्रोता इनके पारिप से मोहित हुए बिना महीं रहता। मान का प्रसरकोप और वाणी का विमल परदाम इस महापुरुष को प्रगल स्प से प्राप्त है । जो साहित्य ताहा हुसैन को पैदा कर सकता है मह मिसन्देह कभी नहीं मर सकता।
वृक्ष एक शाखा दो क्षमा कीजिए भार से में परों को पासकर मिस्त्रियों को पिया तीय मानने से इन्कार कर रहा हूँ। माप पाहे बुरा मार्ने मुझे दकिया नूस करें पुराणपंपी पणित कहकर गामियों में मेकिम में भरी भीड़ में किसी स्थान पर बहार बोरसोर से पूरी ताकत के साप यह कहना चाहता हूँ कि भारत मौर मिन एक ही मुलगी दो शाखाएं है। एक ही रफ्त हम दोनों को धमनियों में पूरी उप्मता के साप प्रवाहित हो रहा है। हम दोनों के पुरसे कभी एक पे। हम दोनों के प्राचार- विचार कमी एक ये पौर संस्कृति भी कमी एक पी मर्म भी एकही रहा होगा । यह मेरा पसा विश्वास है । मास का कितमा हो गहरा पर्दा इन सम्बम्पों पर माकर क्यों न पर गया हो, सून के रिश्ते कमी गुदा महीं हो सकते। हजारों वर्ष के बमे कोहरे के बाद मान भी ऐसे अनेक प्रमाण हैं जो मेरो इस मास्था को सत्य सिर कर रहे हैं। इतिहास के विद्वान, भाषा साहित्य भार पुरातत्व के पन्नेपर्को से मेरी अस्पन्त विनम्र प्रार्थना है कि ये इस तप्प की पोर गम्भीरता से प्यान दें कि प्राय से पाप-कहबार मप पूर्व या उससे भी कमी मागे ऐसा समय क्र माया मा बब मारत में मोम समुद्र में मार्ग से सोमाप्ती में उतरे और यहाँ से मिस्र में उत्तरको पोर फैसते पए? भारतीय पुराणों के विरोपों से मेरा मह मनुरोप है कि वे इस मात का पता मगाए कि पुराणों की रचना हमारे ऋषियों ने भारत में को या मिस्र में प्राचीन मिस्र के वासी गझकार्यन पपने मोमानते परयोंस में 1 पे पोरगा प्रपने देवता विष्णु परामनन्म भक्त मौर सहर है । वहाँ केरामा प्रपने को सूर्यवंशी कहते रहे है। प्राचीन मिस्र के सांस्कृतिक इतिहास में यह प्रास्पान माता है कि प्राइसिख गो सूर्य मी माता तपा प्रसिरिस की साप्पी पत्नी भी उसने सव नामक पक्षस द्वारा अपने पति की हत्या को गाने पर, उसके वन गाईस टुकड़ों को एएप्रितमरके दफन किया जो सस ने मिस में घर-उमर फेंक दिए थे। मिस्त्रियों का विश्वास है कि प्रसिरिस पीसी समापिस्तदेह से नाव की वालिया फूटी हैं। हमारे पुराणों में विति-परिति कट और वनिता, सुर पौर मसुरों की उत्पति के कई माम्यान ऐसे है यो मिस्र के तपास्पानों से एकदम मिलते हैं। उत्तर मिस्र के रहने पासे दक्षिण मिस्र को यम का देश मानते थे। उन्होंने किसी ऐसो जाति पर विजय की पी निमके दम मगार उनका चित्रगमरते। यहाँ त मेरा विश्वास है पौर गो मैमे मिस्र की प्रापोन एकति पौर सम्पता सम्बन्ध में पड़ा है देना है और सुना है उसके अनु सार मैं तो इसी नतीजे पर पहचाई कि मिल में इस्माम के प्रागमन से पूर्व तक माचार-विचार धर्म पौर संसति की नहीं पापन ज्योति जनती पी गो भारत में युग-युग से प्रकाशमान घमी पाई थी। मैने काहिरा के पुरातत्व संग्रहालय में पमुपपारी मीरों की ये प्रागैतिहासिक मूर्तियां देखी चिन्हें देखकर सूर्यवंशी राम का सहप ही प्रम हो सकता पा। मैंने मिस्र के गापशाहों के खातों में सूर्य पीर गाय पिप देले वैतरणी नदी बहती हुईदेसी मक्य को सापनावस्था मै सापकों की मग्न प्रतिमाएं देखी । प्रापीन मन्दिरों के बाहर से मार देता कि मात्र मी पखों के मन में जो भारतीयों के प्रति सहल बन्पुत्व है वह फेवन रामनितिक महीं, उसके पीछे मुष प्रसक्म रिस्ते गुरे हुए हैं। मिस्र की प्रापीम संसति का अध्ययन करते समय हमें यह पता पमता है कि मान से चार पाच हजार वर्षे पूर्व मिस में प्रिमूति की पारापना होतीं पी। मिसरासी भी भारतीयों की तरह त्रिगुणोपासक पे। मोककी अपेक्षा परमोफ को प्रपिक महत्व देते पे। सब योनिर्मों इम एक साहारो में मानव योनिको सर्वश्रेष्ठ समझते थे मौर मारमाको ममर मानते ये। कर्म के अनुसार उनका समान मी ब्राह्मण क्षत्री और वैश्य प्रादि दिनों की तरह पुरोहित, सैनिए सपा कृपों में विभक्त पा। सूमर पासने वाले यस्तो से पलग रहत । मिमी समाज में उनका स्पान बही पा जो हमारे यहाँ पदों का गिना जाता था। समान में पुरोहितों वास्मान समेष्ठ था। वे पंपस मुरवाते लना ही नहीं वे उपवास रखते पे और दिन में कई बार स्नाम किया करते थे। चर्म प्रयोग इनलिए परिव पाये नियमिप भाजन परते थे। किन्तु कुछ विशेप स्पौहारों पर ये मोग पाकाटकर देवताओं को भोग सगाया करते थे पर ऐसी अवस्पा में मास प्रसाद मी साया करते थे। जो पुरोहित पछु-बप्ति करते थे ये सन महसाते थे। हमारे वेदों में इन्हें धर्मा कहा गया है। संसद में धातु काटने के पर्थ में प्रयुक्त होती है । मिम्ममा न पोर मारतीय धर्मा सम्म भी म्युत्पत्ति एक ही पातु से हुई दिसाई देती है। इतनी पपिक समानता है दोनों देशों के प्राचीन पुरोहितों में। वरगी की तरहमाचीन मिस्रो पावास-मीसदीपस्सना में विश्वास करते थे। पूर्णमासी ननके यहाँ प्रमुख पार्मिक तत्सम था । दीपावली के समान उनके यहाँ भी एर स्यौहार मनाया जाता था और नगर ग्राम दीपमामिका से बगमगा उसमे।मिलीजन मारतीों के सत्यनारायम पतमी तरह अपने यहां सस्प कास्यौहार भी मनाया करते थे। भारत के समान पि प्रधान देश होमे रे कारण प्राचीन मिस्र के सेविहर मी फसलों कीपटाई पर उस्सरममावे येयम और मसि पिया करते थे। तुमा पोर मकर सति भी मिमियों के प्रमुख स्पाहार थे, इसके मना प्रमाग प्राचीन मिसी ग्रंो से मिरे है। व्रत और अनुष्ठाम में पति पत्नी की उपस्थिति अनिवार्य पी। विगंप अवसरों पर मूर्तियों के उसूस निपात मावे पे इनके प्रागे मंगम कसम होवे । धर्म में सपीना प्रमुख स्थान पा। मारलवामिरों पौर मिम्मियोंगी समनापम पम ठकही frfire परयों में हो, ऐसी मात नहीं, दोनों निकलीन रहन-सहन और मामोद प्रमोद में भी अनेक समानताएं पी। नपाएरम के लिए मिसपासी भी गाय को परिम एवं पूजनीय मानते थे। पतिपियों का स्वागत पुष्प मानाएँ पहनाकर किया जाता था तपा रसोई में हाप मुंह को गते उतारकर बैठने का प्रपसन पा। मिस्री भी भारतीयों के समान मर्मकार प्रेमी पे। सौदर्य प्रसापनों में पारस पौर सुरमे प्रमराग पौर प्रयोग में माप नाते थे। मेंहदी भी रचाई पाती थी। केस में पुण लगाने का मो रिपार या पौर कमम यहाँ के लोगों का प्रिय पुष्प पा। मिनी मारतवासियों के समान दाहिने हाप से भोजन करते थे। पूरोपवासियों के समान उनके यहाँ पुरी काटोमा भनम नहीं था। मागन पूर्व मंत्रोच्चारण की भी प्रपा पी। प्राचीन भिति-मित्रों के देखने परमात होता है कि मिस्र में रस का पतन पा। मौकाएं भी यातायात के काम में माईगाती । जिन पप्पुभों के चित्र मिले हैं ये भारत में प्रयोग में माए जाने वाले पप्पुमों ही के समान है। पोनों देशों की भाषामों का मूम स्रोत एक ही रहा है यह तो इतिहासकार स्वीकार ही करते है। किन्तु प्राचीन मिमी भरपा मार संस्कृत में भी रुध-म-कुध संबप रहा है, घाम-बीम करने पर यह भी प्रमामित किया जा सकता है। नामों में समानता, उम्पारण में समता पौर प्रमों की एकता कितने ही सर्यो में देखने योग्य है। उदाहरण के लिए नाम के लिए संस्कृत में लेन पद है, मिसी इसे झेन कहो पे। इसी प्रकार सापु को 'साई' तथा वह को कहा जाता पाप्रा लिए मिली पर घम्द इस्तेमाल करते थे।मी को सरकहा करते थे। मिसी भाषा में हृदय को 'इ'तमा सुता (टी) को 'मित कहते थे। इतना ही नहीं मिल के साप हमारेषापी-विवाह के संबंध मी पापीकमगाती पनिस्म का मिसाइ मिस देवकी कन्या ऊपा से हमा पा । मिस की सस विजय पपन परम-सर्प पर भी वर यूरोप अन्य वृत एकावा देव भमान की महरी नीद में सोये हुए थे। मिस्र मे ही मनान को पहले पहल सम्म बमापा ! मह पूनान ही मामे पमकर यूरोपीय बागृति का कारण बमा । प्रश्न होता है कि मम्म एशिया में अतुर्दिक बार मोर्मों से घिरा हुमा यह प्रदेस यकायक स्तमा सभ्य विना सुससत इतना मौतिक पौर माम्यारिमा दृष्टि से उन्नत देश कसे बन गया। इसका उत्तर एकही है, यह यह है कि कई पी पी जो भारत और मिस को एकता के सूत्र में गोरेहए पो । मह केवल म्यापार महीं हो समता वह दोनों देशों के परस्पर के राजनीतिक समय भी मही हो सकते । इतिहास के गहरे गर्भ में दवा हुमा कोई ऐसा ही पुरपार्य है पैसा रि मनोकरे समय में मारतवासियों ने प्रदधित किमा पा। ऐसा समता है कि दूर प्रायेतिहासिक काम में किसी महान योपज को कोई चासा मिस्र कोई होगी। इतिहासकार बरे स्वरों में ऐसीबात स्वीकार भी परते हैं। यह तो प्रसिस ही है कि गमिठ पोतिप पंचक संगीत चित्र सा मौकानयन सवी, वस्त्र सम्मा मीर रप-युर ससार को भारत की हा देनहे। विहासकारों का यह भी कहना है कि भारतीय मार्यो कीबो यासाएं कभी हाल का दीप सेपर पश्चिम की पोर हो पाँ, जिसमें से एक मित्र में पहुंची और दूसरी मिन भादि प्रदेशों में। पार के बिमाम को, पार की विद्वत्ता को, इन टूटी हुई कड़ियों का फिर से गोहना है। हम विक्षरे हुए सूपों को फिर से सम्हासना है। यह दोरम केवल भारत पौर मिस के सिए, बस्कि संसार की मामय समति के इतिहास में सिए मो मूस्पवान सिर हो सके।
भरवोस में । हो, ऐसी बात नहीं दोनों के दैनिक जीवन रहन-सहन और मामोद प्रमोद में भी अनेक समानताएं कीं। उदाहरण के लिए मिस्रवासी भी गाय को पवित्र एवं पूजनीय मानते थे। पतिथियों का स्वागत पुष्प माताएं पहनाकर किया जाता या तया रसोई में हाप मुंह षो मते उतारकर बैठने का प्रपसन मा। मिसी भी भारतीयों के समान प्रसंगार प्रेमी थे। सौदर्य प्रसाधनों में कामम पौर सुरमे अमराग पोर इन प्रयोग में माए मावे थे। मेंहदी भी रपाई माती पी। केश में पुष्प मगाने मा भी रिवार था। मौर मम वहाँ के मोर्गों का प्रिय पुष्प पा। मिस्रो भारतवासियों के समान वाहिने हाप से भोजन करने थे। मूरोपवासियों के समाम ठमके यहाँ पुरी कांटों मा पमन नहीं था। भोजन के पूर्व मंत्रोम्पारण की भी प्रपा थी। प्रापीम भित्ति चित्रों के देखने पर ज्ञात होता है कि मिस्र में रप का चमन या। नौकाएं भी यातायात के काम में नाई माती पी। मिन चप्पुमों के पिन मिले है ये भारत में प्रयोग में लाए गाने पाले पप्पुमों ही के समान है। पोनों देशों की भापानों का मूल स्रोत एक ही रहा है, यह तो इतिहासकार स्वीकार ही करते हैं । किम्सु प्राचीम मिषी भापा पोर मसात में भी कुछ-न-कुष संवम रहा है चानबीन करने पर यह भी प्रमाणित किया जा सकता है। नामों में समानता उम्पारण में समता पौर प्रमों की एकता कितने ही शम्दों में देखने योग्य है। उदाहरण के लिए गाय के लिए संसत में खेम सम्द है, मिस्री इसे खेन कहते थे। इसी प्रकार साधु को 'सार' मा देह को 'द' कहा जाता पा। प्रजा के लिए मिस्री परमम्द इस्तेमास करते थे।पोको'सर'कहा करते थे। मिमी माषा में हवय को 'हव' तपासुता (बेटी) को 'सित' कहते थे चिना हो महीं मिस्र के साथ हमारे सादी-विवाह के संबंध भी पे। श्रीकृष्ण के नाती अनिस्ट का विवाह मित्र देश की कन्या व्या से हुमा मा। मिस्र की संस्कृति परमपने परम-उत्कर्ष पर पी सव यूरोप के अन्य पृण एक सापा देव मशान की गहरी नींद में सोये हुए थे। मिम मे ही यूनान को पहले पहस सम्म बनाया । यह यूनाम ही पाये पसकर मूगेपोम नागृति का कारण बमा । प्रश्न होता है कि मध्य एशिमा में चतुर्दिक मर्डर मोर्मों से पिराहमा यह प्रदेश यकायकाबना सम्म इतना सुससात वना भौतिम मौर माध्यारिमक दृष्टि से उम्नत देश से बन गया। इसका उत्तर एक ही है वह यह है कि कोई भीम पीसो भारत और मिस को एकता के सूत्र में पोरे हुए थी। वह केवल म्यापार मही हो सकता यह दोनों देों के परस्पर के राजनीतिक सबंध भी नहीं हो सकते। विहास के गहरे पर्व में दबा हा कोई ऐसा ही पुरुपाये है जैसा कि प्रशोको समम में भारतवासियों में प्रदर्शित किया था। ऐसा ममता है कि दूर प्रागैतिहासिक नाम में किसी महान घोषवृक्ष पोकोई शाखा मिमको गई होगी। इतिहासकार दवे स्वरों में ऐसीबात स्वीकार भी करते हैं। महतो प्रसिव ही है कि गणित म्योतिष वैवर समोत चित्र कसानौकानयम खती बस्त्र सम्मापौर रप-युट संसार को भारत की हो देन है। इतिहासकारों का यह भी कहना है कि भारतीय मायौ की रोपासाएं कभी मान का दीप लेकर पश्चिम की पार नही को विसमें से एक मिस में पहुंची और दूसरी ईरान पावि प्रदेशों में। मार के विमान को, मान की विद्वत्ता को, हम टूटी हुई करियों को फिर से मोरना है। इन विखरे हुए सूत्रों को फिर से सम्हासना है ।मह सोरम पम भारत पौर मिस क लिए, बलि सम्रार की मामय समति के इतिहास रे मिए भी मुस्यबाम सिम हो सके।
नेहरू और नासिर मेहरू भौर नासिर दोनों ही नाम मकार से प्रारम्भ होते है। ससार के ये दो बरे मेता पमी-अपनो रुपियों में किसी कदर नफा सत पसन्द है मौर दोनों को ही शासन मौर समाज में पले भाने वासे पुराने तौर-सरीकों से गहरी नफरत है। दोनों ही अपने-अपने वेधों में विदेशी हस्तक्षेप को नापसन्द करते हैं । यद्यपि नेहरू को अपने जीवन में फौजी द्रनिंग प्राप्त नहीं हुई, लेपिन फिर भी व मनुशासन पौर पुस्ती के नमूने हैं और इसी तरह यी नासिर को यपि सागनिक जीवन बिताने का कमीकोई मौक महीं मिला फिर भी ये प्रपनी मरष जाति में सार्वजनिक मार्यकर्तामों से मी मधिर मोकप्रिय है। इसका कारण यह है कि इन दोनों को ही कुदरत मे वह मगात बस्सी है पो एक मन्मगात नेता में होती है। दोनों ही मपमे-अपने देश की जनता के मायने हैं। दोर्मों के माम में और पक्तित्व में पुष मजय पादू है कि मोग पर-वार काम-कार घोरकर हजारों-मानों की ताराप में दोनों को देखने पौर मुनने के मिये समर परसे हैं। मोगों के दिमों पर कैसे पापू किया जाता है और कैसे उन्हें किसी काम के लिये दोबाना बनाया जा सकता है इसका गुर पोनों पम्छी तरह जानते है । मरवाती लोगों के दिलों मा सोपण करना कोई हमसे सोसे। मैंने अपने देश में सोगों को मेहरू के माम के पीधेप्ट सहकर मी पावसे होते देखा है और मासिर के नाम पौर काम के पीछे न केवम मिस पार सीरिया बस्कि मिन-जिन शों में भी परष लोग वससे है उनमें एक मजन दीवानापन पिपमानहै ।
भारतमोषधिय प्रधानमंत्री भी गवाहरलाल
महरू गो रापपविभासिर के अभिग्न मित्र है।
मगर पामेंट पिपा मा राष्ट्रपति
मासिर स्वार-युक्त पिण
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मेषक परवी प्रमुह निक पर प्रम-पदबारे पोम संचामा-मपार साप
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परवा देश में ६८ । देश है उसने अपनी मावादी भी पान्तिमय तरीकों से हासिल की है मागादी वाद भी वह अपनी समस्यामों को शान्तिपूर्ण उपायों से हम कर रहा है। उसका मेता नेहरू भी भाग संसार में शाम्तिमा हनुमा समझा जाता है लेकिन प्ररव मोग स्वभाव के हो भावुक और एक खास किस्म के कोशीसे व्यक्ति होते हैं। मिस्र मे अपनी प्रागावी हपि यारों के बस पर प्राप्त की है और उस मानादीकी रक्षा के लिये भी उसको संगीन हरदम तनी रहती है। उसका नेता नासिर मी गोत्र परोश मोर क्रान्ति का संदेशवाहक है। भारतीय क्षितिज पर नेहमपा उदय सर्वधर्म-समन्वय सर्वोदय पौर सद्भाव एक महिंसा के वातावरण में हुमा है।बहबीसवीं पाताम्मी के महान् सन्त महात्मा गांधी की देन है। चपन में दबंग पिता मौर विद्यार्थी जीवन में विमायती हवा से उन्होंने प्रवश्य कुछ मफ़रत के पाठ पढ़े थे लेकिन सेवाग्राम की कुटिया में साबरमती के भाषम में राम नीति के सविनय अवज्ञा मान्दोमन में उन्होंने तीस वर्ष तक मगातार पहिंसा का चमत्कार देता है। यह उनके मन प्राण में ऐसा ममा गया है कि नफरत को दूर शासन प्रौर राजनीति में भी बहमान की दुनिया को कूटनीति को रिपाकर नही बरत सकते । एक पन्धी सासी सेना के स्मामी होते हुए भी ये सैन्य वम को तुन्ध समझते हैं। विश्व-शस्त्रयम पो मीतने के लिये उनमें पास दो हो हपियार है-एक सहयोग पौर दूसरा सद्भाव। इसके विपरीत नासिर मे अपने देश की कायापमट हपियारों के बस से की है। उसने नई क्रान्ति के विरोधियों के साप भी कोई खास दयाकाबर्तावमही किया। जिस तरह उसने फारसको शाही तस्व से उतार फेंका पा उसी प्रकार उसने फारसके समर्थकों और कान्ति के रोगों को भी अपने रास्त से उसार फेंका। यह स्पेन सबासको मेकर प्रग्रेजों और फांसीसियों से मिल गया। मौर यह मानते हए मीकि राइस की पीठ परपरेनों का हाप है वह उसके सामने भी सीनाताने सहाहमा है। एक भेद पौर भी, कि नेहरू पायोमते है तो दूसरों की निन्दा प्राय नहीं करते पौर परते भी है तो किन्तु-परन्तु ।
मेहरू और मासिर के साय । सेफिम नव नासिर वोमने सर होते हैं तो उनका सीन-पापाई भापण विरोपियों पर पाक-माम बरसाते हो बीतता है। उनको मारी बाद में भी फूटनीति से कम सामा उनमे हपियारों का नहीं होता। नेहरू से मोग मोहमत करते हैं इसका रहस्य दुध रसका मोहक पपिवस्व ग्यादा उसको रयाग-तपस्या, कुपभपनी उममी प्रपने देश के प्रति मगन और उससे भी ज्यादा उसी मममनसाहत पोर ईमान दारी है। यह अपनी देश की जनतामासिसौमा है। मोग उसकी गस से प्यारमरते हैं मोग उसके महने और कपड़ों को नास करत है, माग उसकी प्रदामो पर मिसार होते हैं और उसकी सोन पर गैझते हैं। उसका जादू उसके समर्परों पर हो महीं उसके विरोभियों पर भी पलता है। माग उसरे समर्पक उसके प्रेमी यही सोचव मार पाये है किनेहरू के बाद क्या होगा? और उसके विरोषी रात-दिन यही सोचते हैं कि मेहरू के रहते कुछ नहीं हो सकता है। इसी तरह प्ररण सोग मासिर से भी बेहर मुहम्मत करते हैं। मोह गत फेबम बातूनी नहीं, यह भार उसके सिये मान भी देने को तैयार है। मैं अपने दौरे में जहां-वहाँ जिस-जिस उमह गया पासर मोगों में [--पाप नासिरसमिसे ? सा है वह ? मुदा नसमा मसा करे। पब सोई हुई पप गाति गापेगी। पव परयों की किस्मत पा मिसारा सन्द हो गया। ऐकिम साप ही माप मैंने यह बात भी महमूम की दिनासिर र प्रति मोगों के प्रममा रहम्य है कि यह ऐमा पास है जिसे कठोर पहा गामाताहै बो दुश्मन मोमसकार सपना है बिरोभो मिससे भय खाते हैं। यानी मासिर मा प्रम केवल उसमें विपास म्पतिस्प से हो मगर महीं यह मामलार मौर भय म भी मुमसे पूछा-- साग उमसी सलवार प्राप्ति मजग रहें और उमस भय मात रहें एमके प्रति मासिर सावधान भी कम नहीं है। पर बिम सागनिर ममा का मेन पिक लिया है। उममें पूरा फोगी प्रगममा।बा मारी मुफिया एतराम पा। पौर नासिर उसमें पाये भी पूरे अंगो वीर . प्रादेस में तरी मे। सुरक्षा पुलिस का प्रमग्य मेहरूजी के लिये भी कम नहीं होता किन नेहरू मोवह सब पसन्द महीं। यह मौका मिसते ही सारे सुरमा प्रवष को छिन्न भिन्न कर देते हैं । मेहरू पनता के मनवम्त्र के भादमी है और ये उसी के होकर भी रहना चाहते हैं। सेफिन मासिर फौजरेपौर फोजी शासन क भावमी है और अपनी इस विशेषताको स्रोमा भी मही चाहते । मेरिन उसका मर्म यह नहीं है कि नासिर रिस्टेटर होने का स्वप्न देख रहे हों। मा नमता या बनाव से उन्हें कोई दिली मगाव महीं है। सपाई तो यह है कि वे मी मेहरू के समान जमकस्पाम के पक्षपाती है। अपने यहाँ जनतान्त्रिक व्यवस्था भी चालू करने में लगे हुए हैं लेकिन वे ऐसे बनतन्त्र के विरोपी है कि जिसमें हर पादमी को मनमानी करने का मौर गासी देने का हम हासिम हो पाता है। एक निजी मुलाकात में हम लोगों के प्रश्न करने पर उन्होंने बताया मा कि हमारी समस्याएँ एकदम मारत जैसी नहीं हैं। हमारे यहाँ शिक्षा और राजनीतिक चेतना भी अभी पूरी तरह गागृत नहीं हुई है। हमारे यहाँ नवमागृत राष्ट्रीयता को प्रमी देशी-विदेशी पल्यग्नों का भी सतरा लगा रहता है। हम पारों मोर पुश्मनों से घिरे हुए हैं ऐसे समय हम अपनी मुट्ठी मी नही पर सक्ते । हम परों को जनतन्त्री अधिकार दंगे प्रवश्य देंगे लेकिम पीरे-धीरे कदम फूल-फूंकार । मेहरू के परित्र की एक विशेषता है कि यह गलती करते हैं गल ठियों पर प्ररते है लेकिन महसूस होते ही रीमे पर गाते हैं और उन पर पछताते भी हैं। नेहर को अपने देश की बड़ी पिम्ता है। मेक्नि वे अपने देश की समस्याओं को एकांगो दृष्टिकोम से नहीं देखते। उसे संसार की समस्यामों के साथ तोसते हैं। पौर देश के साथ विदेशों की समस्या को भी कमी-कभी ऐसा चमत्कारिक स्पर्ध देशाते है कि ससार के राजनीतिक वग रह जाते हैं। प्रागादी के संपर्य के दिनों में नेहरणी मे ससार के देशों की सहानुभूति मपमे देश की मोर सींचने में कम कोशिश नहीं पी पी। मान भी पे भारत की तम्नति करने में विदेशों मेहसमारनाधिर की पूरी पूरी सहायता प्राप्त कर रहे हैं। दुनिया में स्स मोर प्रमरोगा मसे ही परस्पर एक-दूसरे के पिरोषी हों लेकिन मारत की सेवा सहायता के मामले में दोनों दतचित्त है। नासिर साप यह बात नहीं है। उनका ध्यान इस समय सारे ससार पर नहीं, सिर्फ भरयों की दुनिया परपेन्द्रित है। भरयों मावोस्त उनका दोस्त है परयों का दुश्मन वनका पुश्मन है। दोस्त के साप में गर्वन कटा सकते हैं और दुश्मन की पाती पर पढ़कर चून मी पी सकते हैं। ससार पी उमट-पमट को बह सिर्फ परयो के साप सामजस्म मिमा कर रेखते हैं। इसके लिये सोग पाहे उन्हें समीर्मतावादी या रिक्टेटर मले हो कह में मेकिन वह अपने पापको विश्व का बहुत बड़ा नेता या पसमीतिम ममवाना महीं चाहते। यदि उनके लिए समस्त पर राष्ट्र एम हो गए तो यही उना लिए सबसे बरा काम होगा। स नेहरू भारत की एकता के लिए नमकी सुख-समृद्धि के सिप अपना जीवन समर्पित किये हुए है वैसे ही मासिर भी परयों को एकतारे मिए, उनकी सुख-समृद्धि के लिए पपनो मी-बान की वासी नगा पुरे है। दोनो ही एशियाई देशों के पुनस्पान मा सपना अपनी पसकों में संगोये हुए है पौर दोनों के विर्मों में दवाये हुए प्रफीकी लोगों के प्रति गहरी टोस है । बोग-सम्मेसन मे वोमों को प्रत्यन्त निकट मा दिया है । मौर मैंने देखा कि नासिर के अपने कमरे में उसनेमासन में सामने मेहरू को मन्छी उसपोर कपी हुई है। मैंने मह भी देखा कि मेहरू का देश इस समय परयों में पुनरुत्थान के सिमे प्रागे बापर हाम रटाने में ममग्न है और यह देवा दिनासिर का देश फिरमा पादी मुस्सिम धमातों पौर देशों मिप्या प्रचार को निम्सार समय- पर नेहरू देशमी टिम समस्यामों के साप प्रपमा मन्या मिड़ाने को सदर उपत है। रिवर संसार रगमष पर नेहरू और मासिर की गोड़ी अमर रहे पौर अपने-अपने इरादों में वे सफल हो । इनकी सफमता में मी मुझे सन्दह नहीं है। सिफ इतना हो निवरन परना पाहता हूँ रि मेहरू यपि बहुगुणसम्पन्न हे मेपिन नामिर की सा परशदेश में उनके लिए अपनाने की वस्तु है और प्रेसीडेन्ट नासिरको जो पत्यधिक पुरपाी, योग्य पोर ईमानदार हे उन्हें भी महत के स्वभाव के मनीसा पनमो भगीकार करना चाहिए। यदि यह समन्वय हो गया तो वह दिन दूर नहीं जब विश्व के रामनोविक रंगमंच पर पेय मौर मार मनहावर पीवरह मासिरमौर मेहरू के नारे भी गोर-शोर से बुल होने लगेंगे।
। अरवों की समस्याए संयुक्त परय गणराज्य के छोटे से दौरे में मैंने बहुत कुछ नहीं देखा। यूं गिनाने को मैंने कुएत सीरिया मौर मिस्र यह तीन देश देश लिए । प्रेसीट नासिर भूतपूर्व प्रेसीट कुम्पतमली पोर कुएत के शेष से मिस सिया। दमिश्क, काहिरा सिकन्दरिया इस्माइमिया पौर पोर्टसईद जैसे महत्वपूर्ण मगरों को भी झांकी पर पाया। मेकिन सचाई यह है कि ऐसा बहुव कुछ रह गया जो मैंने नहीं देखा, पौर जो मुझे अवश्य ही देखना चाहिए पा । फिर भी इस मागदौड़ में मितना देस मिया वह कम ससस्सी वस्त नहीं है । पहमी वात,यो में देखने गया था वह यह कि परयों में साप हमारी मित्रता क्या केबत राजनीतिक है या उस मित्रता पीछे कोई सन्नी हार्दिकता भी है। मापसे में छिपाउँगा नहीं- पामे से पूर्व मेरा मन प्रविश्वासी पा। मध्य एशिया से पाने वासी पातियों ने पिस प्रकार धर्म के नाम पर हमारीकला ससति सम्यता मौर पुरातत्व निपि को मस्ति प्रौर मूठित किया है उसक पाव प्रासामी से नहीं भर सकते। मेरे मन में भी इन सब बीमों की पोट पम महरी नहीं है। विमापन से पूर्व भारतीय मुसलमानों की पार्मिक प्रसहिष्णुता ने भी मुझे मम स्पषित नहीं पिया था। मैं समझता पा कि मुसलमान-मुसममान सब एक है पौर पार किन्हीं कारणों से भने ही पमग-प्रसग दिखाई देते हो मेपिन समय माने पर यह सब फिर एप हो पाएंगे और यदि किसी षामिम नेता मे फूल भर दी तो यह भी प्रसभव नहीं कि यह सव भारत पर पा दो। सपिन अपने पोरे में मैंने यह अनुमर किया कि ऐसा सोपना मेरी भूस पी। यहाँ तक -यात्रा पर ७४ परबों रेस में । । भरब गणराग्य मा सबब है हमारी राजनीति को इस प्रकार कोई भय नहीं। यह ठीक है कि परप इस्माम के घर पर पनुयायी है, लेकिन जहाँ तक मैंने देखा उममें धर्मान्धता नहीं है। मानवता क नबोन्मेप ने पौर समय के तमाने मे प्रग्बों पोमान के नए प्रकाश में साकर सग पर दिया। यह ठीक है कि प्रग्व पपके राष्टवादी हैं लेकिन उनमें नेता विश्व की समस्यामों पर मजहवी दृष्टि स कसई विपार नहीं करते। कस क्या होगा? इसको पार कौन कह सकता है। लेकिन मान की स्पिति यह है कि परवों के प्रत्यस मारप्रिय और परम शनिवशासी नेता प्रेसोट नासिर भी धर्माम्भ-माम्प्रदायिक मोगों को सी होनफरत से देखते हैं जैसे कि हमारे नेहरू भी। परव मोग भारत को अपमा जिगरी दोस्त मानते हैं। नेहम बी से उन्हें वैसी ही मुहम्मत है बसी भारतीमों से । ये हमारी सरह ही पाक्स्तिान के रवैये को नापसंद करते है। हमारी तरह ही वे परिपम के मामाम्यवावी हपको से सतर्क हैं, पौर स्स या अमरीका की सहायता प्रॉस मूव कर स्वोमारमही परते। दूसरी वात भो मैंने अपनी यात्रा में देवी यह यह–सार प्ररय पशों में इस समय परस्पर निष्ट माने की एक होने की मिमकर घमने की पासाहट बढ़ रही है। मैं चन देशों के माम मही गिनाऊँगा जो इस समय संयुक्त परम गणराज्य स बाहर हैं, या पूसरोकासारों परलेल रहे हैं। मैं तो सिर्फ यही बताऊगा कि इस समय ससारमेहर मरव पेश की जनता यह पाहती है कि उसके प्रलग-प्रसग शासन मौर सीमाों ने बधन टूट जाएं और वे अपने दूर-दर फैल भरव माइयों में दौडार गमे मिल समें। सबकी निगाह इस कार्य के लिए इस समय प्रेसीट नासिर की मोर है उनका विश्वास है कि यही एक पक्ति ऐसा है जो सपूर्ण भग्य जाति को एक झडे में नीचे सा कर सकता है। मिस्र को बतत्र करने और सीरिया को सयुक्त कर के वार प्रसी उट नासिरमा भी यही प्यारा स्वप्न है । इस मार्ग में रुकावटें भी कम नहीं है। बहुत से रामाराने है जो परय बनता की छाती पर सापको तरह मैठे हुए है मौर गोवहाँ से रिसी भी प्रकार हटने को तैयार नहीं। ।
परषों की समस्याएं फुध निधी पाया भी मार्ग में राजे मटा रहे हैं। कुछ निहित स्वार्य वासे लोगों का सबका भी इस तरह की बापट है, फिन भेग विश्वास है विजनता प्रयुद्ध हो जाती है तव कोई भी कामट उसे अपने मार्ग से विनित नहीं कर सकती। भार नहीं तो कम गप भरव दया मी पपनी गरदन पर से सामाग्यवादी नुमा उनार फैकगे। सीमरी बात जो मैंने इस दौर में लक्ष्य पीबह यह कि अरब देशों कपासन में से पाहे वो भी भिन्नता हा---पर जहां ना जगाम का सर्वष है उसके पिपट वे सब दरला से मर्गात मौर महें। उन्हें रूम और पमरीका से निरमौर पास मातना खतरा नहीं है जितना गइल से। सपूर्ण परपजाति इजराइल को म्मिति को गप्टीय प्रपमान के रूप में अनुभव करती है पोर कक्षगामी यह विगाम करमे को तयार नहीं है, किराहम अपनी हद तक मीमित रहेगा। पोपी समस्या परनों के मामने मुझे गा दिखाई दी वह यह कि एक मोर तो उसे पर के दुश्मनों से लोहा सना परता है पौर दूसरी पोर उसे रिटेन-पास के साम्राज्यवादी हपकारों से मारपानी बरतनी पाती है तीसरे उमगार पर हम मोर पमराका दाना बरे-वरदा एक हाय में पेसी और दूसरे में हथियार लिए हुए महायमा में सिर मरे हुए हैं इनमें से वह किम का बीयर करे और किम का प्रस्वीकार? पहने का तात्पर्य यह रिस भारत इम ममय पर कभदियों मीमा फसवरी राष्टोंगी गुटबदियों माप-माय पपने नवनिमाण गमिए प्याकुम है वही हाम इस ममय प्रग्बो मामार मग गप- गग्य का है। पनिाश्या बहस हे उमझने मी कम नही मदिपा को गुमामी का मिमसिसा भी माप है, भौतिक उन्नति काम युग में मापन भी न के बराबर है, "फिन दोनों में विम्यामी मगनपा परिश्रम की मेतृत्व को, सूझ की कमी नहीं है। इसम माता बनी यह मवश्य हो अपने कार्य में मफल होंगे। अपने सपने पूरे का मामे । भगवान करे ऐसा ही हो।
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