Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mahatama Gokhale

Sharma,pt.nand Kumar · 2011/01

PDF Proofread

Front matter

महात्मा
वले
hlres Vilth it 10

॥ श्रो३म् ॥ आंकार आदर्श चरित माला की तृतीय पुस्तक । महात्मा गोखले (राजनैतिक सन्यासी और निष्काम कर्मयोगी) "नरपति हिनकर्ता द्वेप्यतां याति लोके। जनपद हितकर्ता त्यज्यते पार्थिवेन ॥ इति महति विरोधे विद्यमाने समाने । नृपति जनपदाना दुर्लभ कार्यकर्ता लेखक पण्डित नन्दकुमार देव शर्मा (भूतपूर सम्पादक-"विहारयन्धु' 'शार्यमित्र" सयुक्त सम्पादक- सक्षमप्रचारक प्रादि) सम्पादक तथा प्रकाशक पण्डित ओढारनाथ वाजपेयी पडित श्रोदारनाथ यानपेयी के प्रयन्ध से ओंकार प्रस, प्रयाग में छपा। श्राश्विन सपत् १६७४ तृतीय सस्करण] [मूल्य

-
***
-

. হ্মিা समार के महापुरुषो के जीवनचरिता को देखकर शथना पढकर यह पता लगता है निजिवने महापुरुप समार में हुये हे उन्होंने या तो किसी महापुरार के जीरन पो स्मय देसकर उसका अनुकरण किया है अथवा उन्होंने अपने पूर्वजों की जीयन कथाओं को सुना है जिनतो मुनसर उन्हें अपने जीवन का आदर्श धनाया है। प्रमाण के लिये महावीर नेपोलियन को ले लीजिये । बचपन घी से उसे वीर योधाओं के जीवन चरित पढगे में रधि होगई थी । यूनान के योगा जगविजयी सिकदर तथा रोम गुध दुशल लीजर के जीवनचरितों में उसकी विशेष अत्ति थी। वर्तमान सॅटो के जीवनचरित से पता लगता है शिहोरेशस प्रालि यूनान के चोरों की पापारा मूर्तिया को देखकर उसमें उन वीरों के जीवनचरित पढने की इच्छा हुई और उन्हें पढकर उसे अपने को महावली बनाने का उत्साह हुआ । इमलिये छोटे चालक या पालिकामों में अथवा नरयुवा तथा नवयुवतिया में महात्माओंजीवन- चरित पड़न की रुचि उत्पन्न करना चाहिये। इसी उद्देश्य को सामने रखकर यह जाननचरित माला निकालना प्रारम्भ पिया है। इस में कोई सन्देह नही सर्वसाधारण ने इन पुस्तक का अन्या आदर किया है जिसका प्रमाण यह है कि थोड़े ही दिनों ।

में महात्मा गोगले का जीवनचरित तीन बार छप चुका।
सर्व साधारण की रात्रि से उत्तेजित होकर हमने भी प्रत्येक
मास में २ जीवनचरित प्रकाशित करने प्रारम्भ कर दिये
है। इस प्रकार ४०० जीवनचरित निकालने का प्रबन्ध किया
गया है पाया है हिन्दी प्रेमी सजन इस माला के स्थायी प्राहक
चनकर अपनी गुण ग्राहकता का परिचय देंगे।
निवेदक
सोहार नाय वाजपेयी

।
--
महात्मा गोखले
राजनैतिक संन्यासी और निष्काम कर्मयोगी
प्रस्तावना
"मरना भला है उसका जो अपने लिये जिये ।
जीता है वह जो भर चुका स्वदेश के लिये ॥"
इस ससार में मरना जीना सबको हे, कोई अमर होकर
नही पाया है। पर वे पुरुप धन्य ह जो अपनी जननी
श्योर जन्मभूमि की सेवा करते हुये सद्गति को प्राप्त होते
है । इस ससार में नगणित नगरी नित्यप्रति जन्म
लेते हे शोर मरते हैं, पर उनका मरना, जीना घराबर है।
किन्तु जिन्होंने अपने देश की सेवा की है, जिन्होंने अपना
दुख सुग देश के दुस मुख में समझा है, जो देश की
परिस्थिति के सामने अपना सुन उस कुछ नहीं समझते, वे
ही पुरुप धन्य है। नव ही नो करि कहता है कि उनका मरना
भला हे जो अपने स्माई के अतिरिक्त और कुछ चिन्ता नहीं
रसते, जीन ये भी मर के समान है। उनका जीना मरना
दी पया है परन्तु जो इस सलार में भाफर अपना कर्तव्य

६
'महात्मा गोखले
पूरा कर गये हैं जिन्होंने अपने कर्तव्य पालन करने में कितनी
विघ्न बाधा की परवाह नहीं की जिनके जीवन का मूल
मन्म "जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' रहा है।
जिनकी दीन दुखियों की मलाई में, देश की सेवा में ही जीनन
व्यतीत करते हुए मृत्यु हुई हे वे मरे भी जीते हैं। उनके रप
देश उनके कार्य और सब से बढकर उनका श्रादर्श जीवन
उन्हें अमर बनाये रखता है। "अमरफल" "अमृतफल"
श्रादि को बहुतसी कथाए सुनने में आती है, पर सच पूछिये
तो यह "अमरतत्व" देश सेवा में ही है। देश सेवा करनेवालों
को ही अमरत्व प्राप्त होता है । भारतमाता के ऐसे ही सपूतों
में से महात्मा गोयले ये जिन्होंने "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गा
दपि गरीयसी" का जाप करते हुए श्रमरफरा प्राप्त किया है।
इस शतान्दी मे जिन महापुरुषों ने भारतीय राष्ट्र निर्माण और
नध्य भारत के चरितगठन करने का प्रयल प्रयत्न किया है
उनमें महात्मा गोयले का भी बहुत ऊ चा स्थान है। उन
के जीवन का व्रत केवल देश सेवा के अतिरिक्त और कुछ
नहीं रहा था । लगातार तीस वर्ष तक उन्होंने देश सेवा की
थी। तीस वर्ष तक उन्हें दिन और रात देश की चिन्ता रहती
थी। सरकार और सर्वसाधारण दोनों के वे विश्वास भाजा
रहे थे, राजा और प्रजा दोनो के वे अादरणीय मित्र थे ।
श्राशा है उनके श्रादर्श चरित्र से पाठक अनेक शिक्षा ग्रहण
करेंगे।
जन्मभूमि और वंशपरिचय
जननी और जन्मभूमि का मनुष्य के जीवन से घनिष्ट सम्ब.

जन्मभूमि भोर वंश परिचय न्ध होता है इसमें तनिक भी सन्देह फरनेका स्थान नहीं हे कि जिस प्रकार गर्भवती माता के गुण कर्म भोर स्वभाव का गर्भ में स्थित सन्तान पर प्रभाव पड़ता है वैसेही जन्म- भूमिकी परिस्थिति बालक पर कुछ न कुछ अपना रह जमाये बिना नहीं रहतो होगोयले के जन्म का सोभाग्य उसामहाराष्ट्र प्रदेश को प्राप्त हुश्रा हे जो मुसलमानों के समय में रणच- ण्डिका का प्रधान स्थल बना था। महाराष्ट्र भूमि सदैवसे वीरों श्रोर राजनीतिज्ञों की खान बनी रही है शिवाजी जैसे महावीर को उत्पन्न करने का गोरव महाराष्ट्र प्रदेश को ही प्राप्त हे। शिवाजी के गुरुसमर्थ स्वामी रामदास, तुकाराम, एकनाथ, श्रीनींन्द्र श्रादि साधु मन्त्रों को जन्मभूमि और क्रीडास्थल होने का गौरव महाराष्ट्र प्रदेश कोही है | नानाफडननीस जेसे राजनिश इमी महाराष्ट्र भूमि में पले थे। कहने का साराण यह कि विद्या, बुद्धि और बल का सदैव से महाराष्ट्र प्रान्त घर रहा है। आज भी एक बङ्गाल को छोडकर भारतवर्ष का पेसा काई प्रान्त नहीं है जो महाराष्ट्र प्रान्त को समता कर सके । रानाडे, चिपलूणाकर, तैलङ्ग, तिलक, मान्डलिक, श्रापटे, भण्डारकर, गोसले, पराजपे श्रादि गर रत्नो के जोड का एक बहाल को छोड़कर दूसरे प्रान्त में कोई दिखाई नहीं पड़ता है । भारत में विशेषतया महाराष्ट्र प्रान्त में राष्टीय योर मामाजिक विषयों में केवल नामण ही गुश्रा होते आये है और इस समय भी हैं, उनमें भी कोणस्थ और चितपावन ब्राह्मण, विशेषत कालावा मोर. रत्नगिरि जिले के बडे बडे नामा होते आये है । जिम कोकणस्थ जाति में उत्पन्न होने का सोभाग्य रानाडे, तिलक, गानाफडनवीस - -

महात्मा गोगले
श्रादि को प्राप्त है उसी कोकणस्थ ब्रामण जाति के एक नियन
जारमरण रहे यहा पोल्हापुर जिले के कगारा गांव में मन् १८६६
में एक बालक का जन्म हुपा। उस समय किसी को क्या
चयर यी कि एक दिन या गालस भारतवर्ष का एक रत्न
होक- 'महात्मा गोयले के नाम से विख्यात होगा । एक
दिग इस यालक को लोग अपना सिरताज सममंगे, जो ठीन
दुपियों का, वृक्षा भारतमाता का दु य दूर करने का योडा
उठावेगा । जो मार देश को ही अपना फुटुम्ब समझगा।
वाल्यकानं और शिक्षा
बन की अपेक्षा चन्तिा विशेष महत्व है । मनुष्य का
भूषण भीरा ही है, जिसका चरित उत्तम है, उसके धागे धन,.
दौरान लव तुच्छ है। ये लोग जो सोने चादी की जगमगाहट
में अपने पापों को छिपाये कहते हे कदापि उन लोगों को ममता
नही कर सकते है जो अपने शील, स्वभाव और श्राचरण
को निगटने नहीं देते हैं। यदि गोखले के माता पिता दरिद्र
थे, उनके पास धन नहीं था तथापि वे उच्च चरित के और
अन्दे कुल के थे । उनके चरित के महत्व का केवल इसी से
परिचय मिलता है कि उन्होंने निधन होने पर भी मिस्टर
गोखले की शिक्षा में किमी प्रकार की मी नहीं की थी।
गोखले की धारयावस्था की बहुतसी विचित्र चाते है,
जिनको यहा लिखने का स्थान नहीं है । परन्तु इसमें सदेह
नही "होनहार रियान के होत चीश्ने पातश इस लोकोक्ति
फे अनुसार सब को बालक गोपालराव होनहार प्रतीत
* दक्षिण मात में यह चालाई, कि अपने नाम के साथ पिता का.
1
-

वाल्यकाल और शिक्षा & . . . होते थे चालक गोपालराव सुशील होने के साथ ही माथ लज्जाशील भोर सचित स्वभार के भी थे । अपने अध्या- पकों को किसी विषय में धोखा देना अथवा मिथ्या योलना उन्हें कभी पसन्द नही था कहते हैं जिन दिनों मिस्टर गोखले स्कूल में पढते थे, उस समय एफ या एक अध्यापक ने अपने समस्त विद्यार्थियों को घर पर गणित या एक प्रश्न हलकरने को दिया। गोखले ने घर पर किसी दूसरे व्यक्ति की सहायता से गणित का प्रश्न हल कर लिया, और जब दूसरे दिन अध्यापक ने दरजे में देगा कि सिवाय गोराले के कोई विद्यार्थी उस प्रश्न को करके नहीं लाया है, तब उसने गोखले से दरजे में प्रथम स्थान पर बैठने को कहा । अपने अध्यापक की यह प्राशा सुनकर यालक गोपले फूट फूट कर रोने लगे, उनको रोते देखकर अध्यापक तथा सव विद्यार्थियों को प्रच रज हुधा । अध्यापक ने बडे प्रेम से उनको शान्त करके रोने का कारण पूछा,तर उन्होंने सच्चा हाल कह दिया कि प्रश्न मैंने दूसरे धी महायता से किया है, स्सयनहीं किया है। प्रथम स्थान पर बैठने का मुझे कोई अधिकार नही है" इतना कह फर मिस्टर गोयले चुप ही नहीं रहे किन्तु उन्होंने दूसरे से पूछकर प्रश्न हल करने के लिये अपने को यह दण्ड मी दिया कि सप्ताह के याकी दिनों में वे क्लास में सब से अन्तिम स्थान पर ही बैठे। क्या विद्यार्थी गोपालराव के चरित की यह घटना, हमारे यहा के अाजकल के छात्रों को अनुसरणीय भी नाम लिखा करते हैं मिस्टर गोराले के जन्म का नाम गोपालराव था। पड़े होने पर याया उनका नाम गोपाल और श्राधा पिता का नाम कृष्ण मिलकर, गोपालकृष्ण हुआ। " .

महात्मा गोखले - नहीं है ? वर्तमान समय में परिश्रम से जी चुरानेवाले केवल विद्यार्थी ही नहीं, किन्तु वे लेखक, ग्रन्थ कार पोर पत्र सम्पा दक भी अपनी बुद्धि को कष्ट न देकर, जो इधर उधर चुरा चुरा कर दूसरे के सिर पर त्यौहार मनाया करते हैं, इस से बहुत कुछ शिक्षा ग्रहण कर सकते है। छात्रावस्था में ही गोखल अपनी वोत्र स्मरणशक्ति, अपूर्व परिश्रम और सारवानी के लिये विरवात होगये थे । उस समय ही लोगो को विश्वास होगया था कि जिस किसी काय का यह बीड़ा उठावेंगे उसको सीमा तक पहुचाये विना नहीं रहेंगे जेमे ये छात्रावस्था में कुशाग्र बुद्धि थे, वेसे ही इनकी शिक्षा में कमी नदी हुई । सुनते है, जव' गोखले बहुत छोटे थे तर ही उन्हें अपने पितृ वियोग का टु स सहन करना पडा था । किसी ने नच कहा है कि जो माता पिता अपने पुत्रको शिक्षा नहीं देते हैं, वे उसके शत्रु है । गोखले के माता पिता ने निर्धन होने पर भी गोसले को शिक्षा सेवाचित रखकर शत्रुता नहीं की। उन्होंने इस सम्बन्ध में अपना यथेष्ठ कर्तव्य पालन किया । गोखले के पिता की मृत्यु हो जाने पर उनकी शिक्षा में कोई बाधा उपस्थित नहीं हुई। पिता की मृत्यु होजाने पर सारे परिवार का भार उनके बडे भ्राता पर प्रा गया था परन्तु इससे उनकी शिक्षा में रुकावट नहीं हुई। बडे भ्राता ने भी अपने कनिष्ठ सहादर की शिक्षा में यथा- शक्ति कसर नहीं रक्खी । हत भाग्य भारतवर्ष में बहुत से होनहार विद्यार्थियों को शिक्षा में कमी दरिद्रता के कारण हो जाती है, पर भारत माता के सोभाग्य से गोराले के नसीय में यह वात नहीं हुई । उन्होंने कोल्हापुर के राजाराम कालेज स्वभाव में परिवर्तन . ने इन्टरमीलिपट अर्थात् एफ०५० की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। इस परीक्षा में उत्तीर्ण होजाने पर पेयम्बई के पल- फिस्टिन कालेज में और कुछ दिनों नक पूना के "डक्शन कालेज में पी० ए० को परीक्षा के निमित्त पढते रहे । २८ प की अवस्था में, यम्बई की यूनिवर्सिटी से यी०प० की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए । उन ममय अाजकल की भाति सोलह वर्ष से कम की यूनिवर्मिटी में मेदिक (पन्द्रन्स) परीक्षा की पख न थी, यदि यह पप होती तो गोखल महोदय कदापि अठारह वर्ष की अवस्था में पी० ए० पास न होने wi। आजकल एन्ट्रन्स की परीक्षा में सोलह वर्ष की सीमा होजाने से न मालूम गोखले महोदय के समान और प्रतिभा शाली कितने ही छात्रों को निराश होकर अपना समय नष्ट करना पड़ता है। 1 स्वभाव मे परिवर्तन कालेज में पढते समय गोपले महोदय ने केवल विद्या सम्बन्धी ही उन्नति नहीं को विन्तु उनके जीन ओर स्वभाव में वहत कुल परिवर्तन हुश्रा । गोयले के माता पिता पुगने दा के कहर ब्राह्मण थे। वे भोजन के खून छात आदि के माननघाले थे। कालन में पहुचने से पहले गोखले महोदय भी भोजन सम्बन्धी छुन छात श्रादि के विचारों में पते थे। पहले ही दिन जावे कालेज के बोर्डिहहाउस (छात्राश्रम) में पहुचे तब उन्हें अपने माधियों का पीताम्बरादि कोई रेशमी पन्न भोजन के समय पहनते हुए न देखकर और मामूली महात्मा गोखले कपडे कमीज धोती वगैर पहनकर भोजन करते हुए घडा आश्चर्य हुना।वे सही साथियों से अलग चौका में पीताम्बर अथवा रेशमी धोती पहन कर भोजन करने लगे परन्तु उनका यह नियम चल नही सका हमारे पाठकों में से जो स्य विद्यार्थी अवस्था में रहे हो अथ्वा जिन्हें स्कूल के विशेषत कालेज के छात्राश्रमों के विद्यार्थियों की रहन सहन टेपन का मौभाग्य प्राप्त हुना हो उन्हें इसका अच्छी तरह से अनुमान होगया होगा कि मिस्टर गोखले अपने भोजन सम्बन्धी पुराने नियम को पालन करने में क्यों नहीं समर्थ हो सके । प्राय विद्यार्थियों का एक दूपरे को छेड छाड करने का चचल स्वभाव हुश्रा करता है । गोखले महोदय चत्रल स्वभाव के नहीं किन्तु शान्ति त्रिय थे, परन्तु उनके साथी जर कभी ये भोजन करने वेठते थे तब उनमे छेड छाड किये बिना नहीं रहते थे । गोचले के साथी मिर्फ मह मेही गोयले से छेड छाड की बातें करके चुप नहीं होजाते थे किन्तु उनका चौका न्यू लेने ये भोजन करते समय न छू लेते थे। गोसले महोदय के साथी जान बूझकर उनको विडाने के लिये उन्हें स्य छू लेते थे। पहले ही पहल हमारे चरितनायक अपने सगी सायिर्या के इस व्यवहार से दुषित हुए और कुछ क्रोधित भी हुए। किन्तु क्रोधित होने पर भी उन्होंने अपने साथियों के प्रति शान्ति और उदारता का परिचय दिया। वे अपने साथियों के इस व्यवहार से चुपचाप शान्ति पूर्वक बेठ गये। उन्होंने अपने साथियों के व्यरहार की छात्राश्रम के व्यवन्यापक (सुपरिन्टेन्डेन्ट ) प्रभृति से कुछ शिकायत नहीं की। और धीरे धीरे उन्होंने अपने साथियों के समान - है पेला का अनुराग ही भोजन करना आरम्म कर दिया, यदि चे पुराने ओर फट्टर विचारों में ही पडे रहते ता भविप म उन्हें बडी बडी कठिना- इयों का सामना करना पड़ता। ये मिलायत धामियो को इस देश की दुर्दशा मुनाने के लिये न जाने पाते । करते ह इन दिनों जर कभी सामाजिक सुधार आदि की चर्चा चला करती नय गोखले महादय काहा करते थमे अपने कालेज के मित्रों का विशेष कृतज्ञ भार अनुमान ह जिन्होंने मुझसे यह कट्टर- पन छुडाया था।" " खेलों का अनुराग प्राय यह यात देखने में प्राती है कि जो मनुष्य कियाशील होते हैं उनकी क्रियाशीलता पेलकूद में भी अपना विचित्र रूप धारण कर रोती है। चाहे जिस महापुरुप के चरित्र की पालोचना कीजिये तो पचपन में रोलकूद म उसकी क्रियाशी- लता का अनूठा ही पता लगेगा। महावीर नेपोलियन की बाल्यावस्था की खेल कूद को बहुत सी अद्भुत कथाए ह । और कितने ही महापुरुषा के जीवनचरिता में वालपन की विचित्र कथाये सुनने में आती है । मिस्टर गोयले के सवध में भी "न्यू इण्डियन "नामक समाचार पत्र में लिखा है कि छात्रावस्था में मिस्टर गोमते को सेल कूद में बडा अनुराग था । जय कभी चे ताश खेलते थे उस समय उनका साधी खिलाडी ठीक तौर से न खेलता ता वे नाराज होजाते थे। जर कोई उनका मित्र उनके समान ताश सलता तब उनकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहता था उस समय व प्रसन्नचित्त महात्मा गोखले । प्रतीत होते थे और कहने लग जाते थे कि 'ये लोग मुझे जान बूझकर छेडते हे पयोंकि ये जानते है कि में इनकी ऊटपटाग बातों ले चिड जाता हू । वस्तुत इम मरल स्वभाव क कारण ही मिस्र गोपले पर अगणित व्यक्तियों की भक्ति और श्रद्धा हुई है। इस सरल स्वभाव प्रार निष्कपद व्यवहार के कारण ही हजारों श्रादमी उनके अनुयारी हुए है । इस प्रकार की मिस्टर गोयल के चरित्र की बहुत सी घटनाये है जिनके यहा लिसने का स्थान नहीं है । किन्तु उनके जीवन की घट नामो से प्रतीत होता है कि वे प्रारम्भ से ही सीधे सच्चे स्वभाव के ये उन्हें दिसावट और सजावट बिलकुल पसद नही थी। अध्यापन-कार्य जिस समय मिस्टर गोसले बम्बइ यूनीवर्सिटी मे ग्रेज्यु- एट प्रर्थात् वी० ए० पास हो चुके थे उससे पहले ही स महा- राष्ट्र प्रान्त में नवीन उत्साह, नवीन ज्योति स्फुरित होरही थी । महामति रानाडे और चिपलूणकर जैसे देश भक्त और उद्भट विद्वानों के प्रबल प्रयत्न से महाराष्ट्र प्रान्त में नवीन युग उपस्थित होगया था। जिस स्वदशी आन्दोलन का जनार भाटा यहविच्छेद के कारण सन् १६०५ में समस्त भारतवर्ष में उठा था। उसी स्वशी आदोलन की धूमधाम महाराष्ट्र मान्त में पहले ही से होरही थी, इस आन्दोलन के कारण ही सन् १८७० में महाराष्ट्रप्रान्त की पेशगयों को राजधानी पूना में वर्गीय प० गणेश वासुदेव जोशी की अमान्त चेष्टा से सार्वजनिक सभा की नीव पड़ चुकी थी। चिपलूणकर, नाम जोशी, आपटे, आगारकर और तिलक महोदय,फे उद्योग से अध्यापन कार्य पुना में न्यू इङ्गलिश स्कूल की स्थापना हो चुकी थी जो पीछे फरग्यूसन कालेज में परिणित होगया। इस देशभक्ति के भाव ने मिस्टर गोमले पर भी अपना राजमाया। गौसले के बड़े भाई को यह माना थी कि वे (गोसल ) पढकर बहुत सा धन कमावगे, जिससे दरिद्रता दूर होगी । परन्तु उनकी श्राशा निराशामें परिणित दुई। गोखले महोदय ने अपने परि- चार की दरिद्रता दूर न फरके अपनी भारत माता की दरि द्वता के दूर करने की ठानी। कहते हैं गोयले पहल सीनियरिङ्ग पढना चाहते थे। किन्तु परमात्मा जो कुछ करता हे, अच्छाही करता है भग धान की कृपा से गोखले एज्जानियरिङ्ग पढ़ नहीं सके हमारे देश में एजीनियर, चकाल डार आदि की कमी नहीं है। परमात्मा को यह स्वीकार न था कि गोखले महोदय भी एक बडे एजीनियर होकर ही रह जायं। उसको तो उनके हाथ से बडे बडे काम कराने थे। सुनते हे जहा गोसले के बड़े भाई उनके देश सेवा के व्रत को देखकर निराश हुए थे यहा उनकी माता ने प्रसन्नता पूर्वक भारतमाता की सेवा के लिये श्राशा देदी थी। ची० ए० पास होने के थोडे दिन पीछेही मिस्टर गोखले न्यू इङ्गलिश स्कूल में केवल ४०) चालीस रुपये मासिक पर अध्यापक का कार्य करने लगा वे अहरेजी साहित्य के अध्या. पक हुए । उनसे छान मण्डली सदेव प्रसन्न रहती थी। उन दिनों मिस्टर गोपले फो थरेजी साहित्य से विशेष अनुराग था। यह पहले कहा जा चुका है कि मिस्टर गोखले की स्म- रण शक्ति बडी तीन थी। वे जिस किसी विषय को दो बार

महात्मा गोसले
.
पढ लेते थे, उनको कभी भूलते नहीं थे, उनकी स्मरणशक्ति
मे उनको अगरेजी की योग्यता बढाने में और भी सहायता
दी। उन्हें--"टाइम्स श्राफ इण्डिया "जैन्ने पत्रों के कठिन लेख
पढत ही कण्ठ हो जाते थे । वेकन, मिल्टन, शेक्सपियर,
आदि अगरेजी की कविताएँ तथा अन्य गद्य लेखकों के लेख
उन्हें दो एकवार ध्यान पूर्वक पढने से ही कराड होजाते थे।
रात दिन अगरेजी साहित्य के अच्छे अच्छे ग्रन्ध अध्ययन
करते थे, जिससे थोडे दिनों में ही उनका अगरेजी भाषा
पर अधिकार पूरा होगया था और अपने छात्रों को भी बडे प्रेम
से पढाते थे। इस भांति मिस्टर गोखले अध्यापक का कार्य
करते हुए भी स्वग्र अध्ययन करते थे।
फरग्यूसन
कालेज से सम्बन्ध
जिल युवावस्था में मनुष्य के दृदय में अनेक प्रकार की
इच्छाओं और लालसाओं की तरहूँ उठा करती हैं, वहां महा
त्मा गोग्गले की महत्वाकाक्षाएँ देश सेवामें परिणत होगई ।
जहा हतभाग्य इस देश के नवयुवको को युवावस्था में केवल
भोग विलास के अतिरिक्ष और कुछ सूझना ही नहीं है पहा
महात्मा गोपले ने ससार के सब सुगों पर लात मारकर
अपनी समस्त उच्चाकाक्षाओं को भारतमाता के चरणों में सादर
समर्पित कर दिया। उन्होंने सच्चे मन से अनुभव किया कि
देश के नवयुवकों के हृदय में पवित्र विचारों का सञ्चार किये
बिना देश की स्थिति सुधर नहीं सकती है। और यह कार्ट
अच्छे अध्यापकों द्वारा ही होसकता है । नवयुवफा के प्राचार

फरग्युसन कालेज से सम्बन्ध - विचार ढालने और समाव परिवर्तन करने में एक सुयोग्य अध्यापक विशेष कार्य कर सकता है। बस इस विचारवण उन्होंने "न्यू इङ्गलिश स्कज़ाक फरंग्यूसन कालेज में परिणत हा जाने से उक्त फालेज की अध्यापकी स्वीकार करती। भोर वे पीछे “डेक्कन पेज्यूकेशन सासाईटी" दक्पन शिक्षा समिति Lifo membe! (जोरन भर के लिये सभासद) होगये उन दिनों फरग्युसन कालेज में प्रदरंजी के एक अच्छे प्रोफे- सर की आवश्यकता थी । मिस्टर गोसलेने इस कार्य का भार अपने ऊपर लिया । सुना जाता है, जब व अपने विद्यार्थियों को अगरेजी साहित्य सम्बन्धी टिप्पणिया ( नोट्स ) लियात थे, तय घेवढी जल्दी जल्दी गम्भीर विषयों पर नोट्स योलते जाते थे। विद्यार्थियों को नोट्स लिपने में बहुत शीत्रता फरनी पड़ता थो । उनको अग्रजो में शन्द लातित्य और वाक्य विन्यास मुन्दर होता था। अगरेजी के नित्य, नये मुहावरे *दक्सिन शिक्षा समिति के सभासदों को पूना फे फरग्युसन कारोग घोर समिति पे मतगत स्कूला म ७५) परत्तर रूपये मासिक पर पीस वर्ष ता शिक्षक का कार्य करना पड़ता है उस समय सोसाइटी उनका जीवन थोमा ( भाईइस्योर स ) तीन हमार का फरा देती है । सोसाइटी उनने जीवन की गोमा पराई मासिक नर्च भी देती है । यीस वप' पीछ उनको तीस रुपया मासिक पेन्शन मिलती है। सोसाइटी के श्रदाते प्रोफेसर अपोसा के लिये मकान बना सकते हैं । सोमाइटी की इमारत लगभग चार तास रुपये की बनी हुई है। कालेज को सरकार से पचास हजार रुपये की विशेष सहायता के अतिरिक्त दस हजार रुपया वार्षिक सहायता मा मितता वम्बई मात, विशेषत दक्षिण प्रात के लोग भी इसकी सहायता करते है। बुक दिन हुये म्वर्गीय राव साइव वी० एन०माएडलिक ने लगमग पचास, साठ हगार रुपये की पुस्तके इस कालेज को दान दी थी। - ।

महात्मा गोखले । प उनके मुख से निकलते थे। वे केवल अग्रेजी ही नहीं अर्थशास्त्र, इतिहासादि सभी विषय पढाते थे। मिस्टर गोखले ने जिस भाति अंगरेजी में योग्यता वढायी थी, उसी भॉति उन्होंने अर्थशास्त्र, इतिहासादि विषयों में भी अपनी योग्यता का विस्तार किया। केवल सस्कृत को छोडकर चे कालेज में अर्थशास्त्र, इतिहासादि सभी विषयों पर व्या- ख्यान दिया करते थे । परन्तु उनका सबसे अधिक प्रिय विपय "गणित" था, इगलिश स्कूल के अध्यापक रहते समय ही उन्होंने गणित में अच्छी योग्यता प्राप्त करली थी । उन दिनों उन्होंने एक "अङ्कगणित, लिसी थी जो एक अगरेजी पुस्तक विक्रेता ने प्रकाशित की थी। जिससे मिस्टर गोखले को अच्छी आमदनी हुई और शायद जिससे अब भी कुछ श्रामदनी होती है। यम्बई प्रान्त में मिस्टर गोसले की अङ्कगणित का चटा प्रचार हुश्रा । कहने कातात्पर्य यह है कि मिटर गोखले केवल अरेजी साहित्य के ही ज्ञाता नहीं थे, किन्तु और और विपयों के भी अच्छे मर्मज्ञ थे। इतिहास में वे ऐसे प्रवीण येकि एम० ए. न होने परभी एम० ए० के इतिहास की परीक्षा परीक्षक, नये थे। ऊपर लिसा जा चुका है, मिस्टर गोसले फरग्युसन कालेज मे एक लस्कृत को छोडकर अहरेजी, गणित, इतिहास अर्थशास्त्र प्रादि सभी विषय पढाया करते थे परन्तु योडे ही दिन पीछे वे अर्थशास्त्र और इतिहास के प्रोफेसर होगये। इन विपयों को व कालेज के छोडने के समय तक घरावर पढाते रहे । उनकी इतिहास की योग्यता के सम्बन्ध में ऊपर लिखा जा चुका हे पर अर्धशास्त्र का भी उन्होंने इतना मनन किया था कि इस - विद्यार्थियों के प्रति व्यवहार विषय के वे अथारिटी ( प्रमाण ) समझे जाते थे। अर्थशास्त्र फे ये केले विरामण विद्वान् थे, उसका पता उनकी उन पत्र ताओं से लगता है, जो उन्होंने समय समय पर बढ़े लाट साहय की कोसिल में बजट के सम्बन्ध में दी थी। मिस्टर गोसले के अर्थशास्त्र सम्बन्धी व्यारयान विद्यार्थियों को इतने अच्छे प्रतीत होते थे कि जब वे कालेज से विदा हुये तव सय लोग यही कहते थे कि उनकी विदाई से कालेज की यहुत भारी क्षति हुई है। विद्यार्थियों के प्रति व्यवहार अध्यापक रहते समय मिस्टर गोसले का अपने छात्रों के प्रति बड़ा अच्छा व्यवहार था । सुना जाता है जब चे "न्यू इङ्ग लिश स्कूल" में पढ़ाते थे तर प्रत्येक विद्यार्थी को यहा इच्छा होती थी कि यह मिसर गोपले की ही कक्षा में पढ़न जाव । फरग्युसन फालेज में जिन दिनों चे अध्यापक ये, उन दिनों भी प्रत्येक विद्यार्थी उन से कुछ पढ़ना अपने लिये बडा गौरव समझता था। मिस्टर गोखले का विद्यार्थियों को पढ़ाने और जटिल विषयों को समझाने का ढा पडा सुन्दर था । पर जब कभी किसी विद्यार्थी के कुछ वातसमझ मेंन मातोऔर कालेज में समय नरहने पर पूछता तो ये कह देते थे कि वारपारयत लाने समझाने का समय नहीं है, परन्तु जय कभी कोई विद्यार्थी उनके घर पर पहुचता तो वे उसको पडे प्यार से जो कुछ वह पूछता था, बतलाते थे। अच्छी तरह से उसरोसमझा दते थे। इतने पर भी वे विद्यार्थियों से मिलते जुलते समय अपने मान

.
महात्मा गोखले
मर्यादा का पूरा ध्यान रखते थे। ऐसी कोई यात नहीं होने देते
थे, जिसले कोई विद्यार्थी धृष्टता कर सके। विद्यार्थियों की उन
पर विशेष भक्ति और श्रद्धा थी, प्राय सभी विद्यार्थी उनका
मान करते थे।
विद्यार्थियों के पढाने समय मिस्टर गोपले इस बात का
'घडा ध्यान रखते थे कि उनके मुह से कोई अयोग्य अनुचित
याय न निकल जाय । कहते हे जर कभी अगरेजी साहित्य
पढ़ाते समय किसी कान्य में गाररस की यात्रा जाती थी
तब वे अपने पाकेट में से माल निकाल कर अपने मुह में
लगा लेते ये उनका चेहरा सुर्रा होजाता था। विशेषत लड
कियों को हाररस की कविता पढ़ाते समय उनको अत्यन्त
लजा पाती थी। जिस समय वेगाररसकी कविता पढ़ात
थे, उस समय उनके विधार्थी उनके चेहरे की ओर देखने लग
'जाते थे और वे इसलिये नहीं कि मिस्टर गोखले उन्हें कविता
का क्या भाव समझा रहे हवल्कि इसलिये कि कविता के सम.
झाते समय उनकी क्या दशा है ?
कालेज की सेवा
यद्यपि मिस्टर गोयले उक्त कालेज के सस्थापक नहीं थे,
तथापि इस समय कालेज की जेसी अच्छी आर्थिक स्थति है
उसके लिये उन्होंने बहुत परिश्रम किया था। व. उस कालज
का कार्य केवल प्रोफेसर होने के विचार से नहीं करते थे,
किन्तु-उन्हें उस सस्था से इतना प्यारथा कि वे छुट्टियों में भी
उसके लिये'चन्दा जमा करने जाते थे । घडा परिश्रम करते थे

रानाडे का सत्संग २१ चन्दा उगारने के लिये यात्रा करते थे। भारतवर्ष में जो लोग सार्वजनिक कार्यो के लिये चन्दा करते हैं ये ही जानत है कि ऐसे कार्यों के लिये चन्दा करते समय कितनी विकृतें उठानी पड़ती है। पर मिस्टर गोखले इसकी कभी चिन्ता नहीं करते थे। उन्होंने अपना कर्तव्य पालनही धर्म समझा था। फर्तव्य पालन फरने में उन्हें जो यन्त्रणाए होती थीं उन्हों को सुपौर यानन्द समझते थे। कालेज के मान अपमान का कुछ विचार नहीं करते थे। इस भॉतिसे उन्होंने कालेज के लिये लगभग दो लाम्न स्पये एकत्रित कर लिये थे। उन्होंने कालेज की सेवा लगातार अठारह गीस वपतक प्रत्यन्त परिश्रमसे की थी। यद्यपि कालेज के प्रिन्सपल न थे तथापि कालेज के लिये लगातार परिश्रम और उत्साह पूर्वक कार्य करने के कारण कालेज के कार्य सञ्चालन में वे प्रधान थे। वे फालेज के आधारस्तम्भ थे। कालेज उनको प्राणों से अधिक प्यार था। कालेज की निस्वार्थभार से सेवा करते थे । पूना में इस समय फरग्युसन कालेज का जो विशाल भवन बना दुथा है कहने है वह मिस्टर गोयले के प्रयत्न का ही फल हे। + रानाडे का सत्सङ्ग ससार में जितने पदार्य दुर्लभ है उनमें किसी सजन फा सत्सग होना अत्यन्त दुर्लभ है। चाहे गोखले महोदय का पूर्व सञ्चित कर्म कहिये, चाहे भारतवर्ष का सौभाग्य कहिये कि जिस समय मिस्टर गोखले फरग्युसन कालेज का कार्य करते थे, उस समय उनका न्याय मूर्ति, महात्मा

२२
महात्मा गोखले
महादेव गोविन्द रानाडे से परिचय हुआ। जिस भॉति
स्वामी विरजानन्द को आर्य समाज के सस्थापक स्वामी दया
नन्द सरस्वती को देखकर अपने विचारों के प्रचार की
आशा पध गई थी। जिस भांति रामकृष्ण परमहस को स्वामी
विवेकानन्दसे वेदान्त के प्रचार की बलवती भाशा हुई थी, उसी
भाति न्यायमूर्ति रानाडे महोदय को हमारे चरितनायक
गोखलेके देखते ही हृदय में बहुत सी आशाए उत्पन्न होने लगी।
उन दिनों रानाडे महोदय पूना के नवयुवकों के परम प्रिय और
आदर्श थे। यद्यपि वे सरकारी नौकरी में होने के कारण प्रत्यक्ष
रूप से राजनीति में भाग नहीं लेते थे तथापि चे देश सेवा के
लिये नवयुवकोंको तैयार करने में नहीं चूकते थे। वे नवयुवकों
को राजनीति की भी शिक्षा दिया करते थे। रानाडे भारतमाता
के उन सपूतों में से थे, जो चौबीसों घरटे देश की भलाई ही
की सोचा करने.हे । श्रतएव ऐसे महापुरप की सङ्गति में
रहकर यह कब सम्भव था कि महात्मा गोसले देश सेवा
के व्रत से टलते। अनेक व्यक्तियों का ऐसा विचार हे
कि जिस भाति जान (प्रय लार्ड) मोरले ने स्वर्गीय
मिस्टर ग्लैडस्टन की पूर्व सहुति से लाभ उठाया था,
उसी भॉति मिस्टर गोसले के जीवन में महामति रानाडे
महोदय के सत्सद्ग से बहुत कुछ परिवर्तन हुश्रा । न्यायमूर्ति
।
r
। वर्गीय रानाडे-यम्बई हाईकोर्ट के जज धे उनका जम १८ वी जन
वरी सन् १८४२ को हुआ और मृत्यु १६ वी जमघरी सन् १६०१ को दुई
थी। महाराष्ट्र प्रान्त में जो कुछ जागृति इम समय होरही है, उसम का वरत
पुछ यश रानाडे महोदय को ही प्राप्तहै। सरकारी संचारी होते हुये भी राज
नीतिमें भाग लेते थे। काग्रेस के सापति यपं जो इण्डियन सोशल काहस
-

रानाडे, का सत्संग रानाडे और महात्मा गोपवे दोनों ने देश सम्बन्धी अनेक विषयों पर पारस्परिक मनन किया । रानाडे को जेसा योग्य शिष्य मिला वैसे ही गोसले महोदय को सद्गुरु मिले। गुर और शिप्य दोनों का समय देश की परिस्थिति के देखने भातने थोर विचारने में व्यतीत होने लगा । रानाडे महोदयके साथ साथ मिस्टर गोखले ने चौदह वर्ष तक अर्थशास्त्र का अव्ययन किया था। इस रात को गोखले महोदय स्वयं स्वीकार किया करते थे। वे निजू वातचीत तथा सर्व साधा. रण में रानाडे महोदय का नाम यडे श्रादर से लिया करते थे और उनको अपना गुरू कहा करते थे गोपले महोदय को न्यायमूर्ति रानाडे में बडी श्रद्धा और भक्ति थी जिसके विषय मे हम आगे लिखेंगे । परन्तु यहा पर गोखले महोदय के बे शब्द लिम्बे बिना नहीं रहा जाता है जो उन्होंने अंपने गुरु के सम्बन्ध में कहे थे-'मेरे गुर की मृत्यु के पश्चात् मुझे दुनिया कुछ दूसरी ही दिखलाई पड़ती है। कारण यह हे कि जिस देवता ने एक बार दर्शन दिया था सदैव मन में उसके दर्शन की लालसा रही आती है। रानाडे महोदय के होती है वह रानाहे के उद्योग फा ही फल है। रानाडे इनिहास, अर्थशासादि रिपयों के पडे भारी विद्वान थे । सन् १८०६ मंचम्बई प्रात मे पूना के वासुदेव तत नामक डकैत ने उत्पात मचाया था तय सररिचह टेम्पल की सरकार को राना की अोर से सन्देह था कि उन का भी वासुदेव बलव त से पुष सम्बध हे या नहीं और उनकी पूना से धूलिया को बदली करदी । रानाडे को पना शोधू छोड़ने की आशा चम्बई सरकार का यह काम चम्बा हाईकोर्ट तक को पटका और उसने उसका प्रतिवाद दिया परन्तु पीछे यम्बई सरकार को अपनी भून ज्ञात हुई और रानाडे महोदय मिथ्या फज से मुक्त हुये।

२६
महात्मा गोसले
t
दनता प्राप्त कर रहये तब वे बाईस वर्ष की अवस्था में
बम्बई की प्रान्तिक कान्फरस में सम्मिलित हुए । इस का फरस
में उनकी पहली पहिल जो वकृता हुई थी उसी से लोगों को
विश्वास होगया था कि एक दिन परमात्मा इनके हाथ से
बडे बडे काम करानगा" । बम्बई की प्रान्तिक फान्फरेंस की
वक्तृता सुनकर ही गोखले महोदय के प्रिय मित्र मिस्टर
मधोलकर ने यह भविष्यवाणी की थी कि "एक दिन ये
इण्डियन नेश्नल काग्रेस के प्रेसीडेण्ट होंगे"जो पीछे यह
वात सत्य निकली। इसके पश्चात २५ वर्ष की अवस्था में ये
वम्बई को प्रान्तिक कान्फरस के मन्त्री होगये थे।
लगातार तोसवर्प से काग्रेस की कार्य प्रणाली को देखते
हुए श्राज बहुत से लोगों की विरक्ति होगई है । परन्तु प्राज
से बीस वर्ष पहले काग्रेस की प्रारम्भिक अवस्था में काग्रेस
की
धूम
मची हुई थी । सर्वसाधारण काग्रेस में अत्यन्त उत्साह
पूर्वक सम्मिलित होते ये । सन् १८८५ से सन् १८४४ तक
काग्रेस के अनेक स्थानों में अधिवेशन होते हुए, सन् १८४५ में
फॉग्रेस की बारी पूना में आई । सन् १८६५ की काग्रेस इस
विशेष कारण से भी विख्यात हे कि उस वर्ष महात्मा तिलक
के प्रपल निरोध करने पर काग्रेस के पिण्डाल म सोशल
कान्फरेंस का अधिवेशन नहीं होने पाया था। उस वप कॉग्रेस
का जो अधिवेशन पूना में हुआ था उसके सेक्रेटरी मिस्टर
गोखले मुए। उस समय गोग्गले महोदय केवल २६ वर्ष के
थे । परन्तु उस समय उन्होंने इतने परिश्रम से कार्य किया
कि कांग्रेस के पुगने पुराने कार्यकर्ता भी उन की कार्य
प्रणाली की मुककाठसे प्रशसा करते थे।

घेलवी कमीशन में साक्षी
२७
बेलवी कमीशन में साक्षी
सन् १८६७ में भारतवर्ष के वृद्ध और पूज्य श्रीयुत दादा
भाई नौरीजी के प्रयत्न से विलायत में घेलवी कमीशन वेठा।
इस कमीशन का उद्देश्य भारत सरकार के खर्च की जाच धोर
उस में उचित फेर फार करना या । इस कमीशन के प्रमुख
लार्ड बेलवी थे। इसी से इस कमीशन का नाम बेलवी कमी.
शन पडा । इसी कमीशन में भारतवर्ष के मुख्य मुख्य
व्यक्तियों को साक्षी देने के लिये निमन्त्रण पाया था । वम्बई
प्रान्त से स्वर्गीय जस्टिस रानाडे महोदय इस कमीशन में
साक्षी देने के लिये जानेवाले थे। पर इस देशका यह
दुर्भाग्य है कि यहाँ सरकारी कर्मचारी किसी विषय में सरकार
के विरुद्ध अपना मत खुल्लमखुल्ला प्रकट नहीं कर सकते है ।
उस समय लाई एलगिन भारतवर्ष के बडे लाट ये उनकी
गवर्नमेन्ट ने यह उचित नहीं समझा कि रानाडे सरकार के
कर्मचारी होते हुए भारत शासन की थालोचना करें। इस
लिये उन्होंने अपने स्थान में मिस्टर गोसले को भेजा। कमीशन
में साक्षी देने लिये गोखले महोदय ने लगातार छ महीने
अर्थशास्त्र का अध्ययन किया और मिस्टर रानाडे ने उनको
माक्षी देने के लिये तेयार किया। मिस्टर गोमले के अतिरिक
मिस्टर वाचा भी अम्बई से इस कमीशन में साक्षी देने गये थे।
मिस्टर वाचाभी अर्थशास्त्र के अच्छे परिडत थे और वे मिस्टर
गोखले से वीम, चाइस वर्ष अवस्था में पडे थे। उस समय
मिस्टर गोसले ३१ वर्ष के थे, परन्तु उन्होंने इस छोटी सी
उन्न मैही वहा पर जैसी साक्षी- दी थी, उस से उनकी

महात्मा गोखले
है। इसके धागे मिस्टर गोसले ने मिन भिन्न देशो में जे
सैनिक व्यय है, उनका लेखा दिसलायाथा, उन्होंने इस साद
में सेनिक व्यय के घटाने पर विशेष बल दिया था साथ या
भी परामर्श दिया था कि यदि गोरी सेना की अपेक्षा दर्श
सेना रक्पा जाय तो फम सर्चा पडेगा।
इस भाति मिस्टर गोसले ने वेलनी कमीशन में न केवल
सैनिक व्यय के सम्बन्ध में ही अपने विचार प्रकट किये ये
परन्तु अन्यान्य विषय होमचार्ज (भारत से इगलेण्ड के
जो रकम जाती हे )।मादि पर भी अति उपयोगी ओर गम्भीर
विचार प्रकट किये थे। सच पूछिये तो मिस्टर गोसले के
साक्षी मार्क की हे इतने दिन बीत जाने पर भी इस साक्षी
यहुत सी जानने, विचारने और समझने योग्य बातें है
ऐसे हिन्दी लेखक जो उपन्यासों के लिखते समय यहा तक
अश्लीलता की भरमार कर देते है कि बहिन भाई का पार
स्परिक प्रेम अश्लील शब्दों में पति पत्ना का सा दर्शाते हैं,
यदि वे अपनी तथा अपने पाठकोंकी रुचि अग्लील उपन्यासों
की ओर से हटाकर ऐसे विषयों का अनुवाद करें तो देश का
यहुत कुछ कल्याण हो, पर अभी हिन्दी का ऐसा भाग्य कहां
जो इस तरह की पुस्तकें हिन्दी पाठकों के हाथ में पहुचे ,
गोखले महोदय ने वेलवी कमीशन में जो साक्षी दी थी, उस
का तथा पडे लाट की कोसिल में उन्होंने समय समय पर जो
वक्तृताए दी थी उनके हिन्दी अनुवाद की घडी श्रावश्यकता
है, क्या कोई हिन्दी प्रेमी इस ओर ध्यान देने की कृपा करेंगे?
.
--

पूना में प्लेग और गोसले
३१
पूना में प्लेग और गोखले
सन् १८६७ का वर्ष जहा वेलवी कमीशन में साक्षी देने
के कारण मिस्टर गोखले के जीवन में स्मरणीय है, वहां पूना
में प्लेग होने के कारण भी उक्त वर्ष भारतवर्ष के इतिहास
तथा उनके जीवन में सदैव स्मरणीय रहेगा । उस वर्ष बम्बई
प्रान्त में प्लग का विशेष प्रकोपथा, पूना में भी प्लेगने भयङ्कर
रूप धारण किया था सरकार ने पूना में प्लेग के दमन करने
के लिये व्यवस्था की थी। इधर १७,१८ वर्ष से प्लेग का कष्ट
सहन करते करते सर्वसाधारण का उतना भय नहीं रहा है
जितना प्लेग का प्रारम्भ हुआ था तय था । उस समय प्लेग
के कारण सर्वसाधारण में हाहाकार मच रहा था । प्लेग के
सम्बन्ध में अनेक प्रकार की जनश्रुतिया सर्वसाधारण में
प्रचलित होरही थी। सरकार ने प्लेग दमन के लिये कुछ
ऐसे नियम बनाये थे, जो सर्वसाधारण को कठोर प्रतीत
होन लगे, योग के अवसर पर पूना में गोरे सिपाहियों का
पहा कुर असहनीय हुश्रा । इसका परिणाम यह हुआ कि
कि उन दिनों पूना में जो सरकारी अफसर डिप्टी कमिश्नर
मि० रैण्ड योर दूसरे प्लेग आफिसर लेफ्टिनेण्ट पायरेस्ट
का खून होगया । सरकार ने नाटूभाई को १८१८ के तीसर रेग्यू
लेशन के अनुसार देश निकाला कर दिया। लोरमान्य तिलक
तथा अन्य कुछ महाराष्ट पत्रों के सम्पादकों पर प्रजा श्रोर
सरकार के बीच अशान्ति फैलाने का अभियोग चला था।
मिस्टर गोसले को भी विलायत में पूना में प्लेग ड्यूटी पर जो
गारे सिपाही ये उनके मनमाने कार्यों का समाचार मिला।

महात्मा गोखले 1 - गोयले महोदय विलायत में केवल "वेलवी कमीशन" साक्षी देकर ही चुप नहीं रहे थे वहाँ वे सभाओं में, असयारो म तथा पालीमेंट आदि के मेस्वरों में सी भारतवर्म के सम्ब न्ध में चर्चा किया करते थे, अतएव उन्होंने पूना के प्लेग सम्बन्धी समाचारों की चिलायत में विशेष रूप से.चर्चा की श्रार इस विषय पर अधिक आन्दोलन किया । बम्बई गवर्न मेंट ने गोखल के इस आन्दोलन से अपना अपमान समझा और जब वे विलायत से भारतवर्ष को लौटे, तब ,बम्बई सरकार ने उनको विलायत में कही हुई वानों को साबित करने क लिये चिनोती दी और उनपर गवर्नमेंट मुकदमा चलाने को तैयार होगई। उस समय महाराष्ट्र प्रान्त की भयङ्कर परिस्थिति थी, एक ओर तो राजद्रोही मुकदमों की भरमार होरही थी दूसरी ओर प्लेग के कारण अनेक घरों में-हाहाकार मच रहा था । जिन मित्रों के पत्र पाकर, मिस्टर गोखल ने निलायत में प्लेग सम्वन्धी सरकारी व्यवस्था के विरुद्ध आन्दोलन किया था उन मिनी में से गोखले सहायता के लिये कोई आगे नहीं बढ़ा। इस भाति जय उन्होंने किसी को अपने पक्ष में साक्षीदने के लिये नहीं दग्या तर उन्होंने खुल्लम खुल्ला सरकार से क्षमा मांगली । कहते हे रानाडे ने भी गोखलं को गवर्नमेंट से क्षमा प्रार्थना के लिये सलाह दी थी इस अवसर पर क्षमा मागने के कारण, समय समय पर गोसले के प्रतिद्वन्दीगण उन पर भांति भाति के श्राक्षेप किया करते थे परन्तु उनको इससे कुछ दुख नहीं हुआ और न उन्हें इसके लिये कभी पश्चाताप ही हुश्रा। । mo-

सागत और पुनी वी देशमधिः
स्वागत और पुत्री को देशभक्ति
पाया जाता हे मदन मिध कैंप में ताला मानीन्याय
की पर्चा पियापरते थे मालूम नहीं उपर्युक क्या यह नय
सच है परन्तु जिम समय मिस्टर गापा लए स पाई
आये थे । उस समय एक ऐसी महागई जिससे जात
दोता कि उन्हाने अपन समान विचार अपने परिवारका
यशा तय कर रपये थे। जिस समय
यस यम्
साये उस समय उनका यम्बई में पड़ी धूमधाम से म्यागत
दुया। मोद इतनी धनी थी कि मिस्टर गासल को राना
जो गाडी पाद धो यह मोड स बहुत दूर यही हुइ थो। मि.
गोयले का लडकी मी थाई थी जा यहुत मार दान ५ कारण
अपन पिता से मिल नहीं सकी । वहुत दूर से चुपचाप अपन
पिता का स्वागत दप रही थी मिस्टर गांग्रत उमस सरस
पीचे मिले थे एक प्रादमी न उस लडकी से यदा "तुम्हारे
पिता पर हमारे है अय तुम्हारे नहीं ह अय हमार पिता
होगये हैं।" लडकी ने तुरन्त यह जगार दिया मुझे इसमें कुछ
भो दु प नहीं एक पिता के यदले में में इतने भाइयों को
पाऊगी लडकी से यह उत्तर सुनपर उपस्थित जनमती ने
यह जोरसे करतल ध्वनिमी।
प्लेग मे सेवा
राजर्षि भर्तृहरि ने बहुत ठीक कहा है कि सब घों से
यढार सेवाधर्म कठिन है। दीन दुपियों, पीडितो और
अनायों की सेवा पार सहायता करना जितना कठिन है उतना

महात्मा गोखले
ओर कठिन कार्य नहीं है दुर्भाग्यवश हमारे देश में यह बहुत
घुरो चाल चल निकली है कि हम लोग अपने व्यक्तिगत
सुस दुखों का ही अनुभव करते हैं । दूसरे के सुख दुख
की चिन्ता नहीं होती है। हम यह नहीं समभने कि आज
जो विपत्ति हमारे पडोसी पर है कल हमको भी उसका
सामना करना पड़ेगा। सच पूछिये तो हिन्दुओं के अध
पतन के अनेक कारणों में से एक उनमें व्यक्तिगत स्वार्थ की
"जरूरत से अधिक मात्रा बढना और पारस्परिक संघशक्ति
का प्रभाय भी है । गोखले महोदय ने पूना में पहुचकर प्लेग के
अवसर पर सर्वसाधारण और सरकार की बहुत अच्छी सेवा
की । बम्बई के तत्कालीन लाट लार्ड सेण्डहर्स्ट तक ने गोसले
महोदय की सेवा सुश्रूषा की मुत्त कण्ठ से प्रशसा की थी।
प्लेग के दिनों में जहा वाप बेटा तक एक दूसरे को बीमारी की
दशा में छोड जाते है वहा गोसले महोदय ने अपने विकट
साहस का परिचय दिया था। छोटे २ मकानों में घुसकर सेग
पीडितों के पास पहुंचकर उनकी सेवा सुश्रूपा आदि की
व्यवस्था की । प्लेग में गोसले की सेगा देखकर उनके कट्टर
.से कट्टर विरोधी भी शान्त होगये थे और उनकी प्रशसा
करने लगे थे।
प्रान्तिक कौन्सिल मे प्रवेश
किसी ने सच कहा है -कवि बनाये से नहीं बनते हैं।
चे से होते हैं। सच पूछा जाय तो यह लोकोक्ति केवल
कवियों ही के सम्बन्ध में नहीं घटती है प्रत्युत नेता वक्ता
जन्म

भान्तिक फांसिल में प्रवेश लेखक सम्पादकादि के विषय में भी फयती है। शिस भांति कधि के लिये प्रतिभा की आवश्यकता है। उसी माति चिना प्रतिभा घुद्धि ओर विद्या के कोई कभी नेता नहीं हो सकता है। जिस भाति सहृदय कविको ही कविता का प्रभाव होता है उसी भोति विना सहृदयता के कोई नेता नहीं हो सकता है । एक देश के मुखिया के लिये सहदय होना आवश्यक है। जिसके हृदय में दोनों के प्रति दया और दुखियों के प्रति सहा नुभूति नहीं है यह प्रारत नेता नहीं है। यदि गोखले महोदय के जीवन पर दृष्टि की जाय उन्होंने इस देश के लिये जो कुछ कार्य किया है यदि टसपर विचार कियाजाय तो प्रतीत होगा कि वे भारत नता थे वे परमेश्वर के भेजे हुये मुसिया थे। उनके सहृदय और प्रतिभाशाली होने मे किञ्चित्मान भी सन्देह नहीं है। उन्होंने ३१ वर्ष की अवस्था में विलायत पहुंचकर येलनीकमीशन में जो साक्षी दी थी कमीशन की जिरह में जिस भाति उन्होंन निर्भीक ओर शान्त चित्त से अपन जो विचार प्रकट किये थे। वह विषय पोछे लिया जा चुका है । उसके पीछे वे ३४ ३५ वर्ष की अवस्था में चम्बई की प्रातिक कोसिख में समासद निर्वाचित हुये । वम्बई की प्रान्तिक कोसिल में सभालट रहते समय उन्होंने बडे सारगर्भित विचार प्रकट किये थे। जिनका पता उनकी उस समय की वक्तृतानों से लगता है। उन्होंन केरल सरकारी कागजा के भरोसे हीन रहकर प्रजा से सम्बन्ध रखनेवाले विपयों का स्वय मनन किया था। अनेक प्रकार से उनके सम्बध में जानकारी प्राप्त की थी। बम्बई को प्रान्तिक कोसिल में वे सदेव प्रजा का पक्ष प्रहण करते रहे थे। सबसे बढकर मिस्टर गोसले की पम्बई ।

महात्मा गोखले
विशेष रूप से देश सेवा करने के लिये विदा होरहे थे, तथापि
चे हृदय में कालेज से अलग होने में दुख का अनुभव कर
रहे थे। उन्होंने उस समय कालेज से विदा होते समय जो
शब्द कहे थे, उसमें उनका कालेज के प्रति हार्दिक प्रेम टप
कता है। उन्होंने अपने विदाई के भाषण में एक स्थान पर
कहा था-"बहुत दिन हुए, मैंने एक कहानी पढ़ी थी कि
एक श्रादमी समुद्र के किनारे रहता था, उसका बहुत अच्छा
भर था, उसके बहुत सी उपजाऊ जमीन थी, उसके परिवार
के लोग उससे बहुत प्रेम करते थे। परन्तु उसके सामने जो
समुद्र था, उसका उसे विचिन दृश्य दिखलाई पडता था।
अव समुद्र की उत्ताल तर शान्त होती थी तब उसे एक
बच्चे के समान अपील करती हुई प्रतीत होती थी। जब
समुद्र गरजता था, उसमें ज्वार भाटा उठता था, जव उसकी
लहरें घेग से बढती थी, ता उस समय मनुष्य को समुद्र
कोधित पोर गरजते हुए सिह के ममान अपील करता हुश्रा
प्रतीत होता था । अन्त में वह अपनी सब चीजों को एक
छोटी सी नाव में रसकर, समुद्र के यीच में नोका को रोने
लगा। दो बार लहरों ने उनको पीछे हटा दिया, एकतरह
से
उसे चेतावनी दी परन्तु उसने उसकी कुछ भी परवाह नहीं
की तीसरी यार उसने फिर चेष्टा की ओर निष्ठुर समुद्र ने
उसको हडप लिया। आजभी मेरी कुछ ऐसीही स्थिति होरही
है । यद्यपि में इस समय कालेज में मेरे साथी, जिनके सह
मुझे कार्य करने में गौरव और प्रसन्नता है, वे इतने उदार है
कि मेरे दोपों को भी कुछ नहीं समझते है, मेरी थोडी सेवाको
भी बहुत मानते हैं, तथापि में सार्वजनिक जीवन के तूफानी
।

फरग्युसन कालेज से पिदाई
।
.
और अनिश्चित समुद्र पर जाने की ठान रहा ह मुझे अपने
हृदय से इस पथ के अनुसरण करने की प्रेरणा हो रही है
केवल कर्तव्यवश अपने देश की सेवा के लिये ही इस मार्ग
का अवलम्बन कर रहा है। इस देश में सार्वजनिक जीवन में
यहुत कम पुरस्कार है, किन्तु अनेक निराशाए और कठिना
इया है। । वास्तव में देखा जाय तो मिस्टर गोमले का कथन
सत्य ही है कि इस देश में सार्वजनिक कार्य करनेवालों
को बडी बडी कठिनाइयां से सामना करना पडता हे, पगपग
पर निराशाए उपस्थित होती है बहुत सम्भव हे कि महा
स्मागोखले को भी अन्य देशसेवको के समान देश के अनेक
कार्यों में निराश होना पहा हो, परन्तु निराशाओं और कठि
नाइयों का सामना करने पर भी वे अन्त समय तक देश सेवा
में ही जुटे रहे । उनका सार्वजनिक जीवनके अनिश्चित समुद्र
में उतरना अच्छा ही हुश्रा ।
इस व्याख्यान के अन्त में मिस्टर गोपले ने फरग्युसन
फालेज के विद्यार्थियों को उक्त सस्था का महत्य पतलाने हुए
यह परामर्श दिया था कि यदि जय कभी उनको इस सम्था के
कुछ दोष भी प्रतीत हो तो ये उन दोपों के सम्बन्ध में उसी
से कुछ कह, जैसे हम अपने माता पिता के सम्बन्ध में
पहते हैं । परा मिस्टर गोसले के इन शन्दों से उनकी कालेज
के प्रति ज्वलन्त भक्ति का दृष्टान्त नहीं मिलता है । इस भक्ति
के कारण ही महात्मा गोखले ने फरग्युमन कालेज की अभूत
पूर्व सेवा की थी। फरग्युमन कालेज को मिस्टर गोसले ने
जो सेवा की थी, उसका उत्लेम्प पीछे किया जा चुका है, यदि
इस सम्बन्ध में उनको EducationalMISSIonaly अर्थात्

महात्मा गोखले
२
शिक्षा का प्रचारक कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति नहीं होगी।
यदि महात्मा गोखले ने और कुछ सेवा न की होती तो भी जर
तक फरग्युसन कालेज है तब तक भारतवर्ष में कम से कम
महाराष्ट्र प्रान्त में उनकी पवित्र स्मृति सदैव रहती । इस
समय भारतवर्ष में जितने कालेज है, उनमें फरग्युसन कालेज
लाहौर का दयानन्द एङ्गलो वैदिक कालेज और काशी का
सेन्टल हिन्दू कालेज अपने ढह के निराले दं, इन फालिजों के
फार्य सञ्चालकों ने शिक्षा प्रचार के निमित्त अपने सब स्वार्थ
और महत्वाकाक्षानों पर लात माग्दी है । महात्मा गोसले,
महात्मा एसराज और प्रिन्सपल पराजपे का नाम अब तक
भारतवर्ष में शिक्षा का महत्व समझनेवाला एक बच्चा भी
जीवित रहेगा। तब तक वडी भक्ति और श्रद्धा से उच्चारण
करता रहेगा। नमो हमारे देश में शिक्षा की बहुत कमी है।
इस समय शिक्षा के प्रचार के लिये अनेक गोसले, बहुत
से
हसराज और कितने ही पराञ्जपे की जरूरत है। क्या हमारे
देश के नवयुवक धकालत प्रादि के फेर में न पडकर महात्मा
गोसले के जीवन से इतनी शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते हैं कि
अपनी जाति में शिक्षा प्रचार के निमित्त, अपने देश भाइयों में
ब्रान की ज्योति का प्रचार करने के लिये अपने समस्त स्वार्थो
पर लात मार । जिस दिन हमारे हृदय में यह पवित्र भाव
होगा, उस दिन ही भारतमाता के कष्ट दूर होंगे।
कौन्सिल मे गोखले
लाई पर्सन को इस देश से विदा हुए लगभग दश वर्ष
होगये है, परन्तु अभी तक भारतवासी उनके शासन को भूले

कौसिल में गोखले - - नहीं है । सन् १६०२ में जव लार्ड कर्जन का सितारा बुलन्दी पर था तव बडीराज्य व्यवस्थापक सभा (इम्पीरियल कोसिल से सर फीरोजशाह मेहता के अलग होने पर माननीय मिस्टर गोपाल कृष्ण गोसले यडी व्यवस्थापक सभा के सभासद हुए। सच पूछिये तो सर फीरोजशाह मेहता के अलग होने से इस देश के निवासी जिस हानि की श्राशका कर रहे थे जिस हानि की सम्भावना समझे हुए थे, कौसिल में मिस्टर गोखले के पहुचने से वह आशङ्का वह सम्भावना केवत दूरही नहीं हुई प्रत्युत गोसले की कार्य पद्धति से गैर सरकारी मेम्बरों में नवीन भावों (New spirit) का सञ्चार हुआ उन्होंने कौन्सिल के गैर सरकारी मेम्बरां को नवीन मार्ग प्रद- र्शित किया यद्यपि गोसले महोदय से चम्बई निवासी भली- | भाति परिचित थे, यम्यई प्रान्तिक कोसिल में उनके कार्य i का परिचय पा चुके थे, पूना के म्युनिस्पिल बोर्ड के चेयरमैन रहते समय उन्होंने कितने ही ऐसे महत्वपूर्ण कार्य किये थे जिसने यम्बई निवासियों को उनकी योग्यता में किसी प्रकार } का सन्देह नहीं होने दिया। तथापि विशाल भारतवर्ष में । इस छोर से दूसरे छोर तक देशवाशियों ने मिस्टर गोखले का महत्व उनके कौसिल में पहुंचने पर ही समझा। उन्होंने सन् १६०२ में कौसिल में पहुच कर पहले ही पहल, यजट वहस पर जो वक्तृता दी थी यह बडी विवेचना पूर्ण थी उस वक्तृता की भारतवामियों न ही नहीं प्रोक उदार हृदय एडलो इण्डियनों ने भी प्रशसा की थी *मिस्टर गोसले की यनवाली इस वक्तृताने भारतवासियों के हृदय में नवीन पाशा का सवार कर दिया था। वय मिटर रमेशचन्ददत्त ने -- . - ४२ महात्मा गोयले इस बजटवाली यकृता में मिस्टर गोखले ने कई बाते घडे मार्के की कहीीं अर्थ सचिव बजट की जोपचत दिसलायी, उसको मिस्टर गोखले ने मिथ्या प्रमाणित कर दिखलाया था। जो पार० सी० दत्त के नाम से विख्यात हैं, वनारस की काग्रेस में मिस्टर मोखले को सभापति करने के प्रस्ताव का अनुमोदन करते समय कहा था - "थोडे दिन हुये उन्हीं ( मिस्टर गोखले) ने वडे लाट की फासिल में चजट विचार पर चिरस्मरणीय वक्तृता दी थी उसी से उनका नाम राजनी तिमों में हो गया है। सजनों । मुझे मालूम नहीं कि आपलोगोंने इस वक्तृत के सम्बन्ध में क्या विचार किया होगा । किन्तु मैं उस वक्तृता को पढ़तेही सोचने लगा कि ये भारतवर्ष के लिये Coming man है । कोसिन वानी सुन्दर वक्त ता में मिस्टर गोखले का विचार प्रकट करो का ढा तर्क करने की शक्ति तथा प्रकृति प्रमाणों की विशेषता से यही प्रतीत होता है कि आखिर कौंसिल में हमारा भी एक ऐसा शूरवीर है जो अपने देश तथा देशवासियों के प्रति न्याय का अवलम्बन करेगा । लगातार वर्षों से हम ने बड़े स्वाद की फौसिल की जो कार्रवाई देखी है यदि उससे मैं यह शब्द कहू तो मैं समझता हूँ कि में श्राप सब लोगों को जो यहा मौजूद हैं सम्मति प्रकट कर रहा हूँ मिस्टर गोखरो से बढकर कोई भी योग्य और न्याय परा यण व्यक्ति दमारे पक्ष का समर्थन करने वाला नहीं है बनारस की काग्रेस में ही मिस्टर गोखलेको सभापति के लिये धन्यवाद देते हुए कौसिल की वक्तृता के सम्बन्ध में माननीय प० मदनमोहन मालवीय जी ने कहा -'लाई फर्शन छोटी उमर में भारत के पड़े लाट होकर आये थे। मौभाग्यवश भारतवर्ष के छोटी अवस्था के राजनीतितों में बम्बई से बड़े लाट की कोमिल में एक प्रतिनिधि निर्वाचित हुआ। गाईपन सर्क करने की बड़ी शक्ति रयते थे रहोंने देखा कि बम्बई से जो सभामद वाया? वह उनकी टक्कर का है लैग ने अपना एक चमत्कारिक बडा लाट भेना, हिन्दुस्तान ने फौसिल में अपने युपक राजनीतितों में से एक को भेजा दुभाग्यश लेएड पा निर्वाचन प्रसफल हुपा और हिन्दुस्तान का नियाचन सफल हुया । ।

कौंसिल में गोखले ४३ यहाँ पर न तो उनकी समस्त बजट सम्बन्धी वक्तृताओं के अनुवाद करने का स्थान है न प्रत्येक वर्ष की बजटवाली वकृता का साराश ही दिया जा सकता है परन्तु इतना अश्य पाठकों की सेवा में निवेदन करना चाहते है कि मिस्टर गोखले की चाहे जिस वर्ष की बजटवाली वक्तता को उठाली- जियेगा, उससे पता लगेगा कि ये प्रतिवर्ष बडे लाट की कौंसिल में अपने देश की उन्नति के लिये गरीय प्रजा पर टैक्स (कर) बहुत न लगाने के लिये बडे निर्भीक होकर अपने विचार प्रकट किया करते थे। उनकी चाहे जिस वर्ष की वाकृता को उठाकर पढ लीजियेगा तो उससे यही शात होगा कि भारत सरकार को उन्होंने प्रतिवर्ष इस देश के धन का सदुपयोग करने के लिये बडे बडे अमूल्य परामर्श दिये थे। सरकार सेना का जो व्यय बढ़ा रही थी उसको घटाने के लिये और शिक्षा प्रचार तथा अन्य कार्यों में खर्च करने के लिये उन्होंने प्रतिवर्ष सम्मति दी थी। कहते हैं कि मिस्टर गोसले की सैनिक व्यय के घटाने की प्रबल युक्तिया देखकर भारतवर्ष के भूतपूर्व जगी लाट लाई किचिनर को तो यहां तक भय होगया था कि किसी दिन घे सरकार को अपने पक्ष में न करले। मिस्टर गोखले की बजटवाली याकृताओं में गम्भीर विचार तो होते ही थे पर भाषा भी' यडी प्रोजस्विनी होती थी। वक्त तानों के अन्त में घे जिस वर्ष देश की जैसी परि. स्थिति होती थी उस परिस्थिति को लेकर गवर्नमेण्ट को चेनावनी दिया करते थे । सन् १९०५ से देश में जो नई लहर यहनी आरम्म हुई तब से मिस्टर गोखले प्राय गवर्नमेण्ट को - ॥

४४
महात्मा गोपले
भारत के शिक्षित समुदाय के विचारों के अनुसार चलने की
सलाह दिया करते थे। उन्होंगे कितनी ही बार सरकार की
दमननीति का विरोध किया था । सन् १६० में उन्होंने अपनी
पजटयाली घात ता के अन्त में कहा था-"If Lord, the
government will no doubt put dowo, indeed 16
must put down all disorder with a 'firm
land. But toliat the situation really requires
18 not the polico man's baton or the soldier's
bayonot but thic stateman's insight visdom
and courage, इसका अर्थ यह है -"माई लार्ड ! इसमें
सन्देह नहीं गवर्नमेण्ट समस्त अशान्ति को बल ले दमन
कर देगी । परतु वास्तव में परिस्थिति को दमन करने
के लिये पुलिसमैन का डडा अथवा सिपाही की सगीन
दरकार नहीं है लेकिन परिस्थिति को दमन करने के लिये
दरकार है तो केवल 'किसी गजनीतिज्ञ की दूरदर्शिता बुद्धि
और हिम्मत" इस भाति मिस्टर गोयले ने बजटवाली याकृताओं
में एक स्थान पर नहीं अनेक स्थानों पर सरकार को समय
समय पर देश की स्थिति सुधारने की मम्मति दी थी। और
जिसका कभी कभी प्रभाव भी पड़ता था। सन् १९०४ में
मिस्टर प्राडरिफ ने जो उस समय भारत सचिव (स्टेट को-
टरी) थे बडे लाट को गोसले महोदय के कथनानुसार बजट
(अाय व्यय का अनुमानपत्र ) बनाने का परामर्श दिया था।
सन् १९०६ में गोसले की वक्तृता ऐसी मा की हुई थी कि
लोर्डमिन्टों तक को पहना पडा था कि पालीमेन्ट में भी
ऐसी
बहुत कम वक्तृताए होती है । सन् १६०२ में जो अर्थ

कोसिल में दूसरे कार्य
४५
सचिव सर पडवर्ड घेकर थे, उन्होंने कहा था-"मुभो इससे
बढकर और कोई इच्छा नहीं है कि मिस्टर गोखले मेरे याद
अर्थ सचिव हो। सर फ्लीवुड विलसन ने कहा था कि
बजट पर विचार यिना गोखले के ऐसा है जैसे शेक्सपीयर
का नाटक हेमलेट उसके नायक देनमार्क के राजकुमार
के बिना किया जाय। सयुक्तमान्त के छाटे लाट सरजेम्स
मेस्टन ने जिन दिनों वे अर्थ सचिव धे मिस्टर गोखले की
तुलना इगलैण्ड के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ स्वर्गीय मिस्टर ग्लेड
स्टन से की थी । कहने का साराश यह है कि मिस्टर गोपले
की वजट सम्बन्धी वक्तृताए ऐसे उच्चभावों से परिपूर्ण
होती थीं कि उनसे मतभेद् रम्बनेवाले व्यक्तियों तक को
उनकी मुक्तकट से प्रशसा करनी पडती थी। यह भारत
माता का दुर्भाग्य है कि उसकी योग्य सन्तानों का उचित
श्रादर सत्कार यही होता है, यदि मिस्टर गोराले का जन्म
भारतवर्ष में न होकर किसी दूसरे देश में हुआ होता तो वे
किसी बहुत ऊ चे पट पर पहुचते । यदि उनका इगलेंड में ही
जन्म हुया होता तो बहुत सम्भव है कि ये पहा ग्लेडस्टन के
समान प्रधान मन्त्री होते पर भारतवर्ष का ऐसा भाग्य कहा?
कौसिल मे दूसरे कार्य
इसमें सन्देह नहीं कि कासिल में पहुच कर मिस्टर
गोखले ने सदेव प्रजामत का पक्ष लिया था। लार्ड कर्जन
बिना किसी दूरदर्शिता का विचार करके बहुत सी ऐसी
बात कर गये थे जिससे देश की काया ही पलट गई। उन्होंने

महात्मा गोखले जिस समय सन् १९०३ में आफिशियल सीक्रेट एक बनाया था उस समय मिस्टर गोपले ने अनेक प्रवल युक्तियों द्वारा इस पिलका घोर प्रतिवाद किया था । लार्ड कर्जन ने इस बिल को इसलिये धनाया था कि सरकारकी गोपनीय वातै प्रकट न होने पावें । इस विलके केवल हिन्दुस्तानी अखबार ही नहीं, वल्कि एगलोइण्डियन अखवार तक विरोधी थे। प्रजामत का सदैव ले निरादर करनेवाले "इगलिशमेन" तक ने श्राफिश यल मोक्रेट एकृ का प्रतिवाद किया था। पर लार्ड कर्जन ने किसी की नहीं सुनी। मिस्टर गोखले न कोसिल में इस एक के प्रतिवाद में बडी जबरदस्त वक्तृता दी थी। इस एक के बन जाने के पश्चात् मिस्टर गोपलेका भारत सरकार ने सी० श्राई० ई० की उपाधि प्रधान की थी। कहते हे लार्ड कर्जन ने स्वय मिस्टर गायले को सी० आई० की उपाधि देते समय बधाई की चिट्ठी लिखी थी। इस देश में अनेक व्यक्ति उपा धियों के लिये उत्सुक रहते हैं जैसे चातक स्वाति की बूद के लिये तडपा करता है, वैसे हा चेली० आई० ई० और राय वहादुरी श्रादि के लिये भटकते रहते हैं। हमारे देश के अनेक व्यक्ति इन उपाधियों की प्राप्ति के लिये उचित अनुचित सभी उपायों का अवलम्ग्न करते है। परन्तु तब भी उन विचारों के नसीय में उपाधिया नहीं होती हैं। एक मिस्टर गोम्पले चे, जिनको विना किसी प्रयास के उपाधि मिली थी। "आफि शियल सीक्रेट पक्ट" के विपक्ष में सम्मति देने के बाद मिस्टर गासले को जय यह उपाधि मिली तो साधारण मनुष्य यही समझने लगे कि "याफिशियल सीक्रेट एक्ट की प्रति वादयाली वक्तृता की योग्यता को देखकर ही सरकार ने उन्हें सी० आई० ई. की उपाधि प्रदान की है। + कोसिल में दूसरे कार्य श्राफिशियल सीक्रेट एक के अलावे उन्होंने समय समय पर भारतीय प्रजा का अच्छा पक्ष लिया था जर लार्ड कर्जन "इण्डियन यूनिवर्सिटीज एकृ" बनाकर इस देश की उच्च शिक्षा फो मटियामेट करने को उतारू हुये थे तब मिस्टर गोपले ने इस बिल का प्रवल प्रतिवाद किया था । इस भाति उन्होंने समय समय पर भारतवासियों का पक्ष लेकर स्वर्गीय मिस्टर भार०सी० दत्त के इन शब्दों को चरितार्थ कर दिया था- "आखिरकार हमारा भी एक शूरवीर पडी व्यवस्थापक सभा में है, जो अपने देशवासियों और देश के प्रति न्याय को रहण फरेगा"। जव सन् १९०७ में लार्ड मिन्टों ने शिमला पेल पर सभाओं के दमन करने का जो कानून पास किया था इसका उन्होंने बडे जोरदार शन्दा में खण्डन किया था उन्होंने अपनी उस वक्तृता के प्रारम्भ में बतलाया था कि इस प्रकार के कानुनों पर यही व्यवस्थापक सभा का जो अधिरे. शन कलकत्ता में हो उस में विचार करना चाहिये । शिमला में इस ढह के कानून नहीं पास करने चाहिये । चाहे गोखले महोदय की कोसिल की वत्त ताएँ पढ लीजिये चाहे समाधारण में समय समय पर उनी जो वाकृता हुई है उन्हें पढ़ लीजिये, उनसे यही पता लगता है कि गोखले अपनी वत्कृताओं में सयम रूपसे भाषा का व्यवहार करते थे। यह तो उनका सास नौर से नियम था कि वक्तृताओं में अना वश्यक शर्दा को नहीं श्राने देते थे। पर साथ ही उनकी मापा भी ऐसी होती थी जिम में किसी के प्रति कटु शन्द न हो, चाहे भाषा बहुत जोशीली न हो पर प्रभावशालिनी अवश्य हो मिस्टर गोखले की वक्ताओं से यही ज्ञात होता है कि वे मनु के

१८
महात्मा गोपले
1
इस सिद्धान्तको माननेवाले ये किसत्य होपर कटुन हो । अप्रिय
शन्दों से किसीका जो न दु साया जाय परसायही वे किसीसे
सच्ची बात कहने से रुकते भी नहीं थे। वे निडर होकर बिना
किसी सद्दोच के सत्य वात प्रकट करते थे। उन्होंने सभाना
की रूकावटवाले कानून के प्रतिवाद में अपने विचार निर्भीक
होकर प्रकट किये थे। उनकी युक्तियां बडी प्रवल होती थीं।
सरकारी मेम्बर वानरेवुल सर हवे एडमसन ने सभाओं को
रोकनेवाले विलको उपस्थित फरते समय कहा था
"माडरेट ( नरमदल ) एक्सट्रोमिष्ट (गरमदल ) के सिद्धा-
न्टों से समस्त भेद रखने पर भी उनको रोकने की चेष्टा नहीं
करतो । इसका मुह तोड उत्तर मिस्टर गोखले ने वहीं पर
यह दिया--"एगलो इण्डियन अपवार सदेव शिक्षित हिन्दु
स्तानियों के प्रति चुरे भाव प्रकट किया करन हे पूर्ण विश्वास
है कि भानरेवुल मेम्वर तथा अन्य सरकारो मेम्बर पडलो
इण्डियन असवारों के कथन से सहमत नहीं हैं तथापि उनकी
निन्दा नहीं करते है। एक स्थल पर उन्होंने अपनी वक्त ता
में कहा था-"यह सच है कि देश में अशान्ति फैल रही है,
परन्तु क्या सरकार समझती है कि ऐसे कठोर उपायों से श्र
शान्ति दब जायगी नहीं वह कभी नहीं दब सकती ऐसे
कठोर उपायों से उसको ओर भी उत्तेजना मिलेगी। गवर्न
मेंटसे वैरभाव कहीं भी नही है जहा कहीं असनोप है,
कारण प्रत्यक्ष हे ।यदि गवर्नमेंट चाहे तो उसको सहज में ही
मिटा सकती है। हिन्दुस्तान के लोग दृदय से राजभक्त हैं।
यह बात लार्ड कर्जन ने भाज से पाच वर्ष पहिले दिल्ली दर
बार में स्पष्ट कही थी।
उसका
1

महात्मा गोपले
४६
मिस्टर गोपले ने कोमिल में पहुच कर हिन्दुस्तानी प्रजा
की मलाई को जो चेष्टार फा था, उन मयका वर्णन इस
घाटी पुस्तिका में हो नहीं सय ता है। उनका लदय यही
रहा कि गरीर भारत की प्रज्ञा पर अन्याय न होने पाच । किन्तु
मनुष्य की गुद्धि भ्रमात्मक हाती है ससार में ऐसा कोई
मनुष्य नहीं है जिसस भूम न होती हो, सर १६५० म जय
नगगन प्रेस एक्ट घना तय मिस्टर गोपल से भी भूल होगई
उन्होंने उम एक्ट का अनुमोदन किया। कारण उसका यह
था फि मराठी भाषा के पुच अथवारीने 'मिटर गोयले पर
व्यक्तिगत इतने भह और कड़े श्राप दिये थे कि व उम नम
* में पड़ गये और उन्होंने उस एक्ट का अनुमोदन करही दिया
पर इस एक्ट के अनुमोदन करने से भी उन के चरित
का यह महत्व प्रकट होता है कि भूल हो जाने पर ये
स्तन हठी नहीं ये कि अपनी भूल स्वीकार नहीं करते। वे
इतने सरल हृदय थे कि जब उनको यह पता लगा कि प्रेस
एद से प्रजा के दु यों के धुर करने में किस तरह की रुकावटें
भारही , तब उन्होंने उस एक्ट को रद्द कराने में भरसक
यन किया पर वे सफल मनोरथ न हुए । इसम सन्देह नहीं
जर कभी यह नवीन प्रेस एक रद्द होगा तय मिस्टर गोखल
पी धान्मा को स्वर्ग में शान्ति मिलेगी।
मिस्टर गोपले का हृदय दीन दु सियों के प्रति कठोर
उत्तान को देखकर पिघल जाता था। जब उनी देमा कि
भारतवर्ष के मजदूरों को विदेशों में किस भाति कष्ट मिलता
* नवीन न स एक्ट के प्रतिवाद में माननीय श्रीयुत १० मदनमो न मा
चाय नोको घडी श्रोधिनी वक्तृता हुई थी।

महात्मा गोखले है तब उन्होंने बडे लाट की कोसिल में यह प्रस्ताव उपस्थित किया कि विदेशों में यहा से मजदूर न भेजे जायें। दक्षिण अफरीका में भारतवासियों को जो काले रग के कारण पुरे भाव से देखा जाता था, उसको दूर करने के लिये मिस्टर गोखले ने बडा भारी प्रयत किया था, जिसके विषय में हम आगे लिखेंगे पर उन्होंने कौंसिल में उसकी चर्चा छेड कर बड़े लाट लार्ड हार्डिज तक को अपने पक्ष में चार लिया था यदि वे कुछ दिन और जीवित रहते तो दक्षिण अफ्रीका के प्रवासी भारतवासियों के दुस को सदैच के लिये मिटा जाते ।। मिस्टर गोखले की प्रबल इच्छा थी कि भारतवर्ष का बच्चा बच्चा शिक्षा प्राप्त करे । यह हम पहले कह पाए है कि बडे लाट की कोसिल में बजट सम्बन्धी उनकी जो वक ताए होती थी उनमें सेनादि के अनावश्यक व्ययों को घटा कर शिक्षादि प्रजा के उपयोगी कामों में खर्च करने की सलाह दिया करते थे। पर वे इससे ही संतुष्ट नहीं हुए, उन्होंने सन् १९११ में बडे लाट की कोसिल में मुक्त और अनिवार्य शिक्षा के लिये बिल उपस्थित किया था । जिसमें उन्होंने अकाट्य युक्तियों से यह सिद्ध कर दिखाया था कि भारत, वर्ष में प्राथमिक शिक्षा का मुक्त अनिवार्य होना अत्यन्त श्राव श्यक है। शोक है मिस्टर गोसले का यह बिल पास नहीं हो; सका यदि उनका यह बिल पास हो जाता तो देश के बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने में कोई अडचन प्रतीत न होती। हमारे देश में अज्ञानता का प्रचण्ड राज्य है, ऐसे मनुध्या की कमी नहीं है जो अपने बालको को शिक्षा देना अपना कर्तव्य नहीं समझते हैं। साथ ही इस देश में इतन ।

उनका जीवनचरित और व्याख्यान छापे । घही की अनेक
मदरास में भ्रमण
दरिद्रता भी पढ़ी हुई है फि अनेक व्यक्ति धनाभाव के कारण
अपन बच्चों को शिक्षा नहीं दे सकते हैं। यदि मिस्टर गोखले
का शिक्षा बिल पास हो जाता तो इस देश की एक बड़ी आप
श्यकता की पूर्ति होती। पर इस देश का ऐसा भाग्य फहा
जिससे मिस्टर गोखते के प्रारम्भिक शिक्षा सम्बन्धी विचार
व्यवहार में परिणित होते । मिस्टर गोसले के सामने इस बात
की आशा अवश्य थी कि ये एक न एक दिन कोसिल में इस
विशा को पास पाराके छोड़ेंगे पर गोखले महोदय के विलीन
होजाने से यह आशा भी निराशा में परिणित होगई देखना
पाहिये किस दिन यह बिल पास होता है।
मदरास में भ्रमण
विद्यार्थियो को सन्देश
यह पहले कह चुके है कि मिस्टर गासले कांग्रेस में बहुत
दिनों से शामिल होगये थे। जब पूना में कांग्रेस हुई थी तर
व म्यागतकारिणी सभा के मन्त्री भी हुये थे सन् १६०३ में
वे माल इण्डिया काग्रेस समस्त-भारतषपीय महासभा के
संयुक्त मन्त्री हुये । सन् १९०४ में उन्हें काग्रेस के संयुक्त मन्त्री
होन को हैसियत से मदरास में कितने ही स्थानों में जाना
पडा । मदरासियों ने मिस्टर गोखले का घडे ठाट चाट से
स्वागत किया। अनेक स्थानों में विद्यार्थियों ने उन्हें अमिन.
समर्पण किये । मदगस के समाचार पत्रों ने
जिनमें बहुत से एलोरिया समाचार पत भी थे
दिन पत्र

પ૨ महात्मा गोखले सार्वजनिक सस्थाओं में उनके व्याख्यान हुये । सन् १६०४ की २८ वी जुलाई को मदरास के पचप्यपा कालेज के विद्यार्थियों ने उनको एक अभिनन्दनपत्र समर्पित किया था जिसके उत्तर में मिस्टर गोखले ने वहां के विद्यार्थियों को कई उपयो मी कार्य करने की सलाह दी थी। पहली बात उन्होंने विद्या र्थियों से यह कही थी कि विद्यार्थी को स्मरण रखना चाहिये कि कालेज के छोड़ने के बाद ही उनकी शिक्षा समाप्त न हो जाय पर उन्हें सदैव कालेज छोड़ने के पीछे भी ज्ञान प्राप्ति के लिये अध्ययन करते रहना चाहिये। इसके आगे उन्होंने विद्यार्थियों को सर्व साधारण masses की स्थिति सुधारने के लिये परामर्श दिया था। फिर उन्होंने विद्यार्थियों को इस देश की स्त्रियों के दुख दूर करने की सलाह देते हुये कहा कि समस्त स्त्री जाति एक मनुष्य के लिय जो शान रूप जीवन की आवश्यकता है, उस से वञ्चित रक्खी गई है, या फिसी देश के लिये अच्छा नहीं है। धर्म सम्बन्धी बहुत सं पुरानी सस्थाए भी केवल आकार में ही दिसलाई पड़ती ह पर उनके विचार काफूर होगये हैं तुम को जान लेन चाहिये कि तुम्हारे करने के लिये इस ओर भी बहुत फार्य है इसके अतिरिक्त समस्त देश राजनैतिक परिस्थिा के विचार से भी अच्छी दशा में नहीं है । इसव तात्पर्य यह है कि जो लोग राजनैतिक समस्या में कुछ अनुरा रखते है, उन्हे बड़ा काम करना है देश की प्रौद्योगि उन्नति की ओर भी व्यान देना चाहिये मिस्टर गोपले ने मर रास के विद्यार्थियों को जो सन्देश दिया था, वह भारतवर्ष प्रत्येक विद्यार्थी के लिये है। क्या हमारे विद्यार्थी महा। 4.

विलायत में श्रान्दोलन પૂરે गोखले के इस सन्देश के अनुसार कार्य करने की चेष्टा करेंगे। “गत वर्ष ही मिस्टर गोपले ने २४ वी जुलाई को मलया पुर के साऊथ इण्डियन एसोसियेशन में अपने गुरु स्वर्गीय महादेव गाविन्द रानाडे के स्मारक में रानाडे पुस्तकालय खोला था। विलायत मे आन्दोलन सन् १६०४ में धमई में इण्डियन नेश्नल कांग्रेस का बड़ा शानदार अधिवेशन हुअाथा । प्रसिद्ध भारतहितेपी सर हैनरी काटन समापति थे। काग्रेस के उम अधिवेशन में निश्चय हुआ कि भारतवासियों का एक डेपूटेशन इगलैंड जाकर यहावालों को यहा की स्थिति समझावे । यस इस निश्चय के अनुसार श्रीयुत गोपले और ताला लाजपतराय सन् १६०५. में रंगलड गये थे। उन दिनों इगलैंड में भी पालीमेन्ट के एलेक्शन (निर्वाचन ) की धूम मची हुई थी । मिस्टर गोसले को राजनेतिक आन्दोलन के लिये विशेष परिश्रम करना पडता था। उन्होंने पचास दिन के भीतर पैंतालीस व्यारयान दियेथे इसके अतिरिक्त थखवारों में लेख लिसने श्रसगारों के सवाद दाताओं के मिलन पर उनके प्रश्नों के उत्तर देने तथा पार्ती मेन्ट के मेम्बरों से मिलकर भारत के दुस की कथा कहने आदि के बहुत से कार्य दिये थे । इन सर कार्यों में लगातार परिश्रम करने से उनका स्ास्थ्य गिड गया था। उनके गले मैं बीमारी होगई थी और वह बीमारी यहा तक पढगई थी कि भारतवर्ष को लोटते समय जहाज पर ही गले में प्रस्त्र मयोग (प्रोपरेशन ) कराना पड़ा था। उसी वर्ष लाई फर्जन

महात्मा गोखले
की अदूरदर्शिता के कारण यहुविच्छेद होने से बाल में
नई लहर उठने लगी थी। मिस्टर गोयले ने पिलायतयालो
का बनविच्छेद के कुफल की ओर ध्यान आकर्षण किया था
उन्होंने मेनचेस्टर में घी अक्टूबर सन् १६०५ को भारतवर्ष
में असन्तोप नामक एक धक ता दी थी। जिसमें उन्होंने यिन्ना
यतवालों को समझाया था कि जैसा आप अपने यहांकी पार्ली-
मेन्ट के मेम्बरों का चुनाव करेंगे वेसा ही भारतवर्ष के शासन
पर प्रभाव पडेगा। उस समय उनके प्रबल युशियों के देने पर
भी सरकार का ध्यान "भारतवर्ष के असन्तोष" की शोर नहीं
हुना किन्तु यहाँ की जनता में इसकी विशेष चर्चा होने लगी।
और इसमें मिस्टर गोसले को किञ्चित् सफलता भी मात
हुई थी।
भारतवर्ष को लौटना
सात समुद्र और तेरह नदी पार इङ्गलेण्डमें अपनी भारत
माता के फ्लेशों की चर्चा घरके मिस्टर गोसले भारतवर्ष
को लौटे। यम्बई और पूना में उनका बडी धूम धाम से स्वागत
हुआ। उनको बधाई देने के लिये कितने ही स्थानों में सभाप
हुई । लोकमान्य तिलक महोदय भी इन सभा में सम्मिलित
हुए थे और उन्होंने भी विलायत में इस ढग के आन्दोलन को
उपयुक्त समझा था। इसी वर्ष मिस्टर गोसले "इण्डियन
नेप्नल कांग्रेस के सभापति निर्वाचित हुए । सभापति
निर्वाचित होने के कारण, अपनी घरता में साल की वास्त
चिफ और यथार्थ परिस्थिति प्रदर्शित करने के लिये, उनकी
दो एक रोज के लिये, कलकत्ता भी जाना पड़ा था। यदि और
.
-

काँग्रस के सभापति कोई सभापति होना तो सम्भव हे कि सगाल की परिस्थिति विना देखे भाले ही, अपयागें के आधार पर अपनी वक्तृता चर्चा कर देता । परन्तु नहीं मिस्टर गोखले ने स्यय बहाल को परिस्थिति देगाना उचित समझा। । कांग्रेस के मभापति सन् १९०५ में इण्डियन नेश्नल काग्रेस का अधिवेशन हिन्दुओं के परम पवित्र तीर्थ विश्वनाथ पुरी (काशी जी ) में हुना या। उसके सभापति मिस्टर गोखले हुए। सच पूछिये तो काग्रेपचालो ने मिस्टर गोसले को सभापति करके उनके गौरव की विशेष वृद्धि नहीं की किन्तु कांग्रेस को सम्मानित किया। बेचारे भारतवासियों के हाथ में अपने देश के गोखले जैसे महानुभावों को सभापति करने के अतिरिक्तसम्मा- नित करन का और कोई उपाय नहीं था। सन् १६०५ में जर इस देश को भयङ्कर परिस्थिति थी लार्ड कर्जनकी अदग्दशिता के कारण समस्त देश में असन्तोष फैला हुआ था। बहुत से गिक्षित भारतवामियों के हृदय में नवीन विचार और नवीन श्राफाताए स्फुरित हो रही थीं। तब गोसले जेसे प्राकृत- नेना की ही आवश्यकता थी, जोदमन नीति श्रादिवायु प्रपल माकोरे भोर असन्तोप रूपी समुद्र की उत्ताल तरहों से राष्ट्रीय नोका की रक्षा करने में समर्थ हुए थे। उन्होंने सभापति से हैसियत से जो व्यायान दिया था वह बडा सारगर्भित और योजिस्वनी भाषा में या व्याख्यान के बारम्भमैयुवराज ओर युनराशी (वर्तमान मम्राट और सम्राझी) के स्वागत में छु निवेदन करके और तत्कालीन बडे लाट और लाटिनी , महात्मा गोखले 1 T मिन्टों को बधाई देते हुए लार्ड कर्जन की औरङ्गजेबासे तुलना की थी। उन्होंने अपनी वक्तृता में कहा था.-"सज्जनों ! यह' मच हे कि सभी यातोका अन्त होता है। लाडकर्जनकी लाट- गिरी का भी श्रन्त श्राया। गत सात वर्षसे हम उस विलक्षण मूर्ति को देस देखकर चकित होते थे। कभी व्याकुल होते थे, कभी क्रोध के मारे जल उठते थे। कभी दुख से तडफडाने लगते थे। यहा तक अब अनुमान करना भी कठिन होगया है कि वास्तव में हम उक्त मूर्ति से पार पांगये हे या नहीं इसके श्रागे लार्ड कर्जन ने भारतवर्ष से चलते समय बम्बई की चाय कुला क्लरमें जा वक्तता दी थी उसकी पालोचना करते हुए उन्होने कहा.-"उन्होंने (लाटकर्जन) ने वायकुला काय वाली अपनी वत्ता में कहा है कि भारतवर्ष में प्रति सैकडा अस्सी मनुष्य अशिक्षित हैं तथा उन्ही के लिये अगरेजो को भारतवर्ष में परिश्रम करने की आवश्यकता है। व लार्ड कर्जन) नाफ़ी मनुष्यो के अर्थात् शिक्षित मनुष्यों के मत कुछ समझते हो नहीं । मि० ग्लेडस्टन कहा करते थे कि स्वा. धीनता मनुष्य को उन्नति की चोटी पर पहुचा देती है । किन्तु लार्ड कर्जन इस बात को नहीं मानते थे । सर्वसाधारण की महत्वाकाक्षा से उनकी सहानुभूति नहीं थी। पराधीन जानि में महत्वाकाक्षा के चिन्ह दबकर चे तरह बिगडते थे और उसे दमन करना चाहते थे। शायद इसी कारण उन्होंने वायकुला क्लब में कहा या -"भारतवर्ष की भलाई के लिये ही मंने भारतवासिया को किसी प्रकार का राजनैतिक अधिकार नहीं दिया था। वायकुला क्लब वाली वक्तता में लाई कर्जन ने शिक्षित तथा अशिक्षित मनुष्यों के स्वार्थ । ।

कांग्रेस के समापति सुदे जुदे घतलाये है। जो व्यकि प्रजा के स्वायों की प्राशा को जड मूल से सोदना चाहते है उनके लिये इस प्रकार के दो सम्मटायों के स्वार्थी को अलग करना ठीक है। जर लार्ड की ने देखा कि भारतवर्ष के शिक्षित मनुष्य उन पर बिगड़े ह तब उन्होंने अशिक्षिता का आश्रय प्रहण किया। लाई कर्जन कह गये है कि अशिक्षितों के हित के लिये ही मैंने लगान घटाया है और प्राथमिक शिक्षा तथा नहर खुद- पाने के लिये सरकारी पाजाने में रुपया देना स्वीकार किया है। उनकी ऐसी बाता से यह प्रनीत हाता है कि शिक्षित गनुप इस कार्य करने में गवर्नमेंट को रोकते थे, अथवा परवाह नहीं करते थे। किन्तु सभी को मालूम है कि इन्डियन नेशनल कांग्रेस इन विषयों में बहुत दिनों से उन्नति के लिये प्राथना कर रही है। चार वर्ष पहले जर सरकारी खजाने में ७ अरोड रुपया बचा था, उस समय मने व्यवस्थापक सभा में लगान पटाने की प्रार्थना की थी। परन्तु उस समय लार्ड का ने कहा था कि दरिद प्रजा को बहुत माल गुजारी देनी नदी पउती, पर उहीलाई कर्जन ने निदा होने के समय यह डॉग मार्ग है कि मैंने दरिदी के उपचार के लिये नमक का रागार घटा दिया है। इस भाति मिस्टर गोसले ने अनेक विषयों की आलोचना की थी। वविच्छेदका भी प्रयलविरोध उस समय जो स्वदेशी श्वान्दोलन होरहा था उस का समधी किया। प्रागे उन्होंने कोसिला का सुधार, स्टेट मोटेरी की वासिल are-दुस्तानी सभासदों का होना हिन्दुस्तान के समस्त जिलों में उचाइजरी बोर्डों का पिन फरता जिनका उद्देश्य यह हो कि जिलों के प्रधान सर्वसाधा- किया था, ।

म
महात्मा गोखले
रण से सम्बन्ध रणनेवाले कार्यो के करने के पूर्व सर्वसाधा
रण से सलाह ले लिया करे । विचार और शामन विभाग
का अलग करना सेना का व्यय घटाना, प्रारम्भिक शिक्षा का
विस्तार करना, शिल्प तथा औद्यौगिक शिक्षा को उत्तेजना
देना आदि श्रावश्यक विषयों की ओर गवर्नमेंट तथा सर्व
साधारण का ध्यान आकर्षण किया था। सर्वसाधारण ने
मिस्टर गोखले की इस वक्तृता को बहुत पसन्द किया था।
भारत सेवक समिति
इरिडयन नेशनल कांग्रेस के सभापति होने से पूर्व इसी
वर्ष सन् १९०५ में १२ जून को मिस्टर गोखलेने भारत सेवक
fafa (The servants of India Societr) Farfa
की थी। हमारे देश में सस्थानों की कमी नहीं हैं, बहुत सी
सम्थाए है पर यह सस्था अनूठी है। प्रतीत होता है कि
मिस्र गोयले का 'भारत सेवक समिति" की स्थापना से
लद्देश्य यह था कि इस मृतप्राय देश के निवासियों के हृदय
में देश सेवा का भाव वैसा ही प्रवल होजाय जैसे एक ईसाई
पादरी को अफरीका के जगलों में अपन धर्मप्रचार का भून
सवार होजाता है। भारत सेवक समिति इसी उद्देश्य से
स्थापित हुई है कि वह कुछ ऐसे व्यक्तियों को तय्यार करे जो
धार्मिकभाव से प्रेरित होकर, भारतमाता की सेवा के लिये,
अपना जीवन अर्पण करें और नियमबद्ध उपायों का श्रव.
लम्बन करके भारतवासियों की राष्ट्रीयता की जागृति में
सहायता पहुचाये । और इसमें मिस्टर गोसले को अच्छी
सफलता भी प्राप्त हुई थी, भारतवर्ष के भिन्न भिन्न प्रान्तों से

भारत सेवक समिति ५४ - अगरेजी की उच्च शिक्षा प्राप्त अनेक सजनों ने अपने स्वार्थ को लात मारकर इसमें योग दिया है। इस समिति के सदस्यों को मुख्यत पांच वातों की चेष्टा करनी होती है- (१) अपने बचन और व्यावहारिक दृष्टान्त द्वारा सर्व साधारण में मातृभूमि के प्रति प्रेम उत्पन्न करना और उसकी प्रति, त्याग और सेवा से करना। (२) राजनेतिक शिक्षा भोर आन्दोलन के कार्यों का सगठन करना और देश के लोक्मत को प्रयल यनाना । } (३) भिन्न भिष जानियो में प्रेम और सहयोग यढाना । (४) शिक्षा कार्यों को विशेषत स्त्रियों की शिक्षा पिछ- डी हुई मातियों की शिक्षा वेत्रानिक ओर नौद्योगिक शिक्षा के आन्दोलनों को सहायता करना । (५) अन्दूत जातियों को उठाना । समिति में प्रवेश होते समय प्रत्येक सभासद को नीचे लिखी हुई सात प्रतिज्ञाए शपथ पूर्वक करनी पडती है (१) उसके हृदय में प्रथम स्थान देश का होगा । और अपना सर्वस्व त्याग कर उसकी सेवा करेगा। (२)देश सेवा करने में वह अपने व्यक्ति लाभ की चेप्टा नहीं करेगा। (३) बिना किसी जानि अथवा धर्म के यह समस्त भार- नवासियों को अपना भाई समभेगा और सब की भलाई के लिये काम करेगा। (४) समिति उसो तथा उसके परिवार के निर्वाह योग्य जो पुति दे सफेगी, वह उसी से सन्तुष्ट रहेगा यह

६०
महात्मा गोखले
अपनी शक्ति का कुछ भी भाग धनोपार्जन करने में व्यतीत
नहीं करेगा।
(५) वह अपना पवित्र जीवन व्यतीत करेगा।
(६) वह किसी से व्यक्तिगत झगड़ा नहीं करेगा।
(७) वह समिति के उद्देश्यों पर सदा दृष्टिरक्खेगा और
यथाशक्ति उसके कार्य की वृद्धि करेगा। समिति के उद्देश्यों
के विरुद्ध यह कभी कोई कार्य नहीं करेगा।
।
दो प्रकार के सभासद
इस ममिति के दो प्रकार के सभासद होते है । (१)
साधारण सदस्य और (0) शिक्षार्थी सभासद (Members
under tirining) समितिके प्रधान स्वय मिस्टर गोखले थे
वे "प्रथमसदस्य" कहलाते थे, प्रधान को अन्य सभासदों से
कुछ विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं। प्रत्येक सदस्य को प्रवेश
के समय से ५ वर्ष पर्यन्त ममिति में रहकर विशेष शिक्षा
प्राप्त करनी होती है। अर्थात् ५ वर्ष तक वे ऐसे विपयों को
श्रध्ययन और मनन करते ह कि जिमले उन्हें अपनी दश दशा
तथा देशवासियों की स्थिति का पूरा ज्ञान होजाय । इस नियम
से एक वडा भारी लाभ यह है कि भारत सेवक समिति के
सदस्यों को अपने देश की दशा से पूरी जानकारी होजाती है।
शिक्षार्थी सभासद को अपनी शिक्षा के समय में प्रथम
सभासद की रेस देग और अभिभावकता में रहना पडता हे
उसको प्रथम सभासद के निर्दिष्ट ( बनलाये हुये ) विषयों
का मनन नथा कार्यों को करना पड़ता है ।कार्य और अध्य
यन की इस ढह से व्यवस्था की जाती है कि पाच वर्ष में

दो प्रकार के सभासद
।
शिक्षार्थी मभासद को भारत के भिन्न भिमभागों के निरी.
जरा करने में व्यतीत करन पडते है और शेप तीन वर्ष यह
समिति के प्राश्रम में शिक्षा ग्रहण करता है।
साधारण सभामद को भी जिमने पाच वर्षका अपना
अध्ययन समाप्त कर लिया है, प्रथम मभासद के बतलाये
समिति के विशेष कार्य के लिये भारतवर्ष के किसी स्थान में
जाना पड़ता है। प्रथम सभासद और कानिमल जो कुछ आशा ।
और प्रादेश उसे कर देते ६. उसको उन्ही के अनुसार चलना
पड़ता है । तात्पर्य यह है कि इस संस्था के सभासदों को
नियमों का पाला फरना सून मिनाया जाता है वे स्वेच्छाचारी
नहीं होते है। भारतवर्ष की अनक सार्वजनिक संस्थाओं के
मटियामेट होजाने का कारण यह भी है कि उनमें नियमों को
पैर तले गेंदार लोग अपनी बान्धरली मचाया करते ह परन्तु
भारत सेनफ, समिति में सभामदों के नियमों की रक्षा करना
पाम तौर पर सिगलाया जाता है।
समिति के सनासदों को स्वार्थत्याग पूरा करना पड़ता
है ममिति में जो सभासद शिक्षा पाते हैं, उनक परिवार की
सहायता के लिये केवल तीस रुपये मासिक और साधारण
सदस्यों को ५० रुपये मासिक वृत्ति मिलती है । इसके अति
रिक्त समिति में कुछ "स्थायी सहकारी" भी होते हैं, जो
समिति को योग्यता पूर्वक सहायता देश के लिये वतन पर
रख लिये जाते है। ये सहकारी तीन वर्ष तक काम करने के
बाद विशेष योग्य समझे जाने पर समिति के सदस्य भी हो
सकते है।
.
.
समिति का प्रधान कार्यालय पूना में हे वहा पर इसका

महात्मा गोसले
विशाल भवन बना हुआ है, २३ एकड़ भूमि उसके आधीन है
लगभग एक लास की उसकी सम्पत्ति है। "शान प्रकाश
नामक मराठी देनिक पत्र, प्रेस और 'वम्बई प्रेस, भी समिति
की सम्पत्ति है । पूना के अतिरिक्त सयुक्त प्रान्त मदरास, म
मातादि में भी इसकी कई शाखाए हैं सब से अधिक सदर
धम्बई की शाखा सभा में हैं और सब से कम मध्यप्रदेश के
शास्त्रा के हे । मध्यप्रदेश की शाखा सभा से "हितवाद" नामक
अहरजी का साप्ताहिक पत्र निकलता है। संयुक्त प्रान्त के
शासा सभा ने पाल को बाढ तथा गतवर्ष में हरद्वार के
कुम्भ के मेले पर यहुन अच्छा कार्य किया है। लपनऊ का
प्रसिद्ध उर्दू पत्न-"हिन्दुस्तानी" जिसके स्वामी स्वर्गीय बाबू
गहा प्रसाद वर्मा थे संयुक प्रान्त की शाखा सभा क ाधीन
यम्बई की शाना सभा गुजरात अहमदनगर और संयुक्त
प्रान्त के प्रकालो क समय लोकोपयोगी कार्य कर चुकी है।
धम्बई की शाखा ने कई सहयोग समितियॉ, मेहतरों के ऋण
निवारणार्थ, कुलियों को सहायक समिति आदि खोली है ।
"सोशल सर्विस लीग" भी बम्बई की शाखा सभा के श्राधीन
है-'सोशल सर्विस लीग' ने राधि पाठशाला, गश्ती पुस्तः
कालय, होलिका सम्मेलन श्रादि अनेक लोकोपयागी कार्य
किये है लीग में दो सौ स्वय सेवक है ।
मदरास की शाखा सभा के प्रधान माननीय मि० श्री
निवास शास्त्री हे जो वहा की प्रान्तिक कौंसिल के सभासद हैं
और उक्त शास्त्री महोदय ही मिस्टर गोसले के उत्तराधिकारी
हुये है।
मिस्टर गोखले भान नहीं है पर उनकी भारत सेवक
.

पुन चिलायतगममन
मिति से इस देश की भलाई की बात कुछ प्राशा है । यहाँ
र यह कह देना भी अमासगिक न होगा कि सदेव हिन्दु
जान की अच्छी बातों से चिडयाले सर चालेन्टाइन शिरोल
क ने गोखले की भारत सेवक समिति की अपनी पुस्तक
इण्डियन अनरेन्ट में मुक्तकठ से प्रशसा की है । कर्मवीर
न्धी भी इस समिति के सदस्य होना चाहते थे और चे
हामा गोपले को अपना गुरू समझते हैं परन्तु कई विषयों
मतभेद होने से यह उचित समभा गया कि पहले वे भारत
वर्ष में भ्रमण करके यहा के देशको परिस्थिति समझ लें तव
समिति के सदस्यहाँ । परमात्मा वह दिन दिखलायें कि कर्मवोर
गधी भी इस समिति में सम्मिलित होकर अपनी कर्मवीरता
का भारतवासियों में विशेषरूप से परिचय दें। इस समय जय
सारा देश मिस्टर गोखले के शोकसे विह्वल होरहा है तर फ्या
दशवासियों का यह कर्तव्य नहीं है कि वे भारत सेवकसमिति
की विशेष रूपले धनकी सहायता करें जिससे मिस्टर गोखले
यी हार्दिक इच्छा इस देशमें राष्ट्रीय प्रचार का National
MIssionaries के उत्पन्न करने की पूर्ण हो ।
पुनः विलायत गमन
और
स्वराज्य पर निबन्ध
समाचार पत्रों के पाठकों से अविदित नहीं है कि मन् १९०६
मैं भारतवर्ष की कैसी भयङ्कर परिस्थिति थी। उन दिनों
पताल में पड़ी हलचल, मची हुई थी। एक और तो बङ्गा
-
1

महात्मा गोपले
,
विच्छेद के कारण बहाली लोग अपने धावेश को गेफन में
समर्थ नहीं हुये थे, दूसरी ओर गवर्नमेंट न भी दमननीति का
अनलम्वन करलिया था। इसपरस्परकीसंचातानीका परिणाम
बहाल के लिये बहुत बुराहुना किसी किसी अदूरदर्शी बहाल
के होफिम को स्वदेशी तक राजद्रोह दीखने लगा सार्वजनिक
समायों में भी उन्हें गजद्रोह की बू थाने लगी उन्हें वहाल में
बहुत से भले आदमियों को स्पेशल कान्सटेविल बनाना पड़ा
था। मिस्टर गोखले का ध्यान भी देश की, विशेषत बगाल
की इस परिस्थिति की ओर आकर्षित हुआ और उन्होंने उस
वर्ष बजट पर वक्तृता दत हुये गवर्नमेंट को सावधान किया
था। जिसका उस समय के बडे लाट लार्डमिन्टोजैसे सजनके
हृदय पर कुछ भी प्रभाव नहीं हुआ। बजट की वक्तृता देने
के
पश्चात् मिस्टर गाबले बनारस काग्रेस के निश्चय के
अनुसार फिर विलायतवालों को इस देश की परिस्थिति की
ओर ध्यान नार्पण करने और राजनैतिक आन्दोलन करने
के लिये पहुचे । जब मिस्टर गोसल विलायत को जा रह थे,
तव सारे देश की निगाह बारिसाल की भोर लगी हुई थी
कि देखें, वारिसाल में चङ्गाल की प्रान्तिक कान्फरेन्स निविघ्न
होने पाती है या नहीं । यह प्राशङ्का निम्न नहीं हुई । वहा
की लोकल पुलिस ने राह चलते हुये प्रतिनिधियों पर लाठी
फटकारी, बाबू सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को गिरफ्तार किया और
उनपर पाच सो रुपये जुर्माना हुआ जो हाईकोर्ट से सारिज
होगया । इलेण्ड में पहुच कर अनेक सभाओं में व्याख्यान
देकर मिस्टर गोसले न बहायालों का ध्यान इन घटनाओं
फी और श्राकार्षित किया था। उन्होंने लार्ड (तव मिस्टर)
--

पुन' मियत गमन
मौत से यार मटकी भी उमममय भारतमनिन (
टरी मारु स्टेट नेपाल में दमननोति देता
अमुविधायें या उनादुर कर दिया था निम विषय में
घदुत से लोगों का विश्वास है कि मिस्टर गौम ने पार
भारतसचिर से जो मुलाकात की थी उसी का मन.
नीति को पछ कढ़ाई कम होगी भी।
इसलैंड में मिस्टर गोखले नाही गुप नही र
उन्होंन वहाला को भारत्तयामिदों परिवार
महात्वाकालाओं का विशप में परिचय दिया। दोन
रमीयर्थ मन्टन रेस्ट हडिया एमाभियगान नाम ममा में
घराध (Self garerament) नामक निन्दा
धा, जिममें उन्होंने पार्तीयामेंट में मर 18 के भारदर
एक और सन् १८१८ में महागनी विरिया ने जो धारणा
भारत के सम्मान में की थी उनकी बात मार बान
उन्होंने गवर्नमेंट के विचारने याही . नाग
यह समझते हैं कि शिलिन माग्न वादियों का प्रभार पाहून
कम है, और उनकी जातियों और धर्म व अग्रे के कारण
शिक्षित लोगों की बात मर्यमाचार नहीं मानते सरा
मिस्टर गोखले ने गाइन करते हुये कहा था-पहिरने
तो यह (गिक्षित ) लोग अपने समाज में मम्मिाया पाम
देते है, अर्थात् ये केरल अपने हो लिये नहा अपन अपद
जाति भाइयों के लिये भी सोचते हैं इस
के हाथ में, भारत में प्रगामी र
इस यत का अनुवाद में पुरागिन'
प्रकाशित नाट मेमmarat
14
का
v

महात्मा गोराले
विच्छेद के कारण बहाली लोग अपने प्रावेश को रोकने में
समर्थ नहीं हुये थे, दूसरी ओर गवर्नमेंट ने भी दमननीति का
अबलम्बन फरलिया था। इस परस्परकी संचातानीका परिणाम
बहाल के लिये बहुत गहुबा किसी किसी अदुरदर्शीवङ्गाल
के हाकिम को स्वदेशी तक राजद्रोह दीसने लगा सार्वजनिक
समायों में भी उन्हें गजद्रोह की बू भाने लगी उन्हे वङ्गाल में
बहुत से भले आदमियों को स्पेशल कान्सटेविल बनाना पडा
था। मिस्टर गोखले का ध्यान भी देश की, विशेषतः बगाल
की इस परिस्थिति की ओर आकर्षित
हुआ
और उन्होंने उस
वर्ष बजट पर वक्तृना दत हुये गवर्नमेंट को सावधान किया
था। जिसका उस समय के बडे लाट लार्डमिन्टोजैसे सजनके
हृदय पर कुछ भी प्रभाव नहीं हुआ । बजट की वक्तृता देने
के पश्चात् मिस्टर गोपले बनारस काग्रेस के निश्चय के
अनुसार फिर विलायतवालो को इस देश की परिस्थिति की
ओर ध्यान श्राकर्पण करने और राजनैतिक श्रान्दोलन करने
के लिये पहुचे । जव मिस्टर गोसल विलायत को जा रह थे,
तव सारे देशकी निगाह वारिसाल की ओर लगी हुई थी
कि देखें, वारिसाल में बहाल की प्रान्तिक कान्फरेन्स निर्विन
होने पाती है या नहीं। यह आशङ्का निमून नहीं हुई । वहा
की लोकल पुलिस ने राह चलते हुये प्रतिनिधियों पर लाठी
फटकारी, बाबू सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को गिरफ्तार किया और
उनपर पाच सो रुपये जुर्माना हुआ जो हाईकोर्ट से सारिज
होगया । इनालेण्ड में पहुच कर अनेक सभाश्री में व्याख्यान
देकर मिस्टर गोग्यते न वहावालों का ध्यान इन घटनाओं
की ओर आकार्पित किया था। उन्होंने लार्ड (तब मिस्टर)

No text on this page.

महात्मा गोखले समाचार पत्र हैं देशी समाचार पत्र केवल उन्हीं डेढ करोड "देशी भाषा पढे लोगों के विचार नहीं गढ़ते हैं, जो वाला याला उनके अधिकार में है, किन्तु वे और भी कई करोड लोगों के विचार पर अपना असर डालते ह, जिनके पास वे किसी दूसरी रीति से पहुंचते है उस देश अर्थात् हिन्दुस्तान में जा कुछ साधारण सम्पति है, वह सब पढे लिखे लोगों की ही है। इस बात को रद्द करने के लिये अर्थात् शिक्षित लागों के प्रभाव का नाश करने के लिये अफसर लोग बहुवा उन प्राचीन ऐतिहासिक घरानों के लोगों की ओर भाशा पूर्ण दृष्टि से देखते हैं, जो राष्ट्र विप्लव के समय अगुवा बने थे, पर साधारण लोगों के मन में उनका श्रव कुछ भी प्रभाव नहीं है क्यों कि आजकल के शान्तिमय और उन्नति के समय में टूटी फूटी ओर जा खाई तलवारें अपनी शक्ति और प्रभुता स्थापित करने के लिये, शिक्षित लोगों के विचारों का सामना नहीं कर सकती । इस तरह पढे लिखे हिन्दुस्तानियों का प्रभाव अपने देशयालों पर बहुत है शोर वह दिन दिन' चढता ही जानेवाला है। रही जाति और धर्म के विभागों की वात, सो ये भी अब उतने तेज नहीं है, जितन वे कभी पहिले थे । पचास वर्ष की शिक्षा और सौ वर्ष के समान कानून एक समान राज्य शासन, एक गमान दुस और एक समान दुरलता का स्वाभाविक फल भारतवर्ष में भी दिवाई दे रहा है। अलीगढ़ के मुनतमानों से राजननिक हलचल की नानश्यकता समझानतमान समय का सार्थक चिन्द है। ऐमा सम्भव नहीं है कि यदि अलीगढ़ की कार्य- सूचगे भकाशित की जाय तो वह काग्रेस की कार्यसूची से किसी - सराट पुलद अर्थ किये थे। मिस्टर गोखले ने इस निवन्ध में लाडकर्जन के किये हुने घोषणापत्र के घों का तर्क और कामी सरडन किया था। एक स्थान पर उन्होने कहा है इस समय केवल कानून का गंदान उस में मी थोडा ही माग पुन विलायत गमन प्रकार जुदी होगी यद्यपि यह नई सस्था कुछ समयतक अपना काम-काज अलग ही चलावे, तो भी यह एक न एक दिन काग्रेस की यही सस्था में मिल जानेवाली है।" जिस दिन मिस्टर गोखले ने मुसलमानों के सम्बन्ध में उपर्युक्त विचार प्रकट किये थे उस दिन किस को सबर थी कि शीन ही उनकी भविष्यत्वाणी सफल होगी। आज हम देखते हैं कि हमारे मुसलमान भाई मिस्टर गोयले के उपर्युक्त विचारा के अनुमार ही राजनैतिक क्षेत्र में अपनी कार्यसूची काग्रेस के समान ही प्रगट कर रहे है । यहा तक कि मुस- लिम लीग ने भी अपनी कार्य सूची पलट दी है। मिस्टर गोखले ने अपने इस निबन्ध में एक स्थान पर कहा हे -"यह सत्य है और हम भी स्वीकार करते हैं कि पूर्वी देशों को पश्चिमी पद्धति पर ही पहुन सावधानी के साथ नार परीक्षा के तोर पर,अपनी उमति के मार्ग में चलना होगा, पर चालीस वर्ष में जापान में जापान ने जो कुछ 'वह भारत सो वर्ष में अवश्य कर लेता । इन दोनों मामला में दो सरकारों (अर्थात् जापानी और अगरेजी सर- कारों ) को प्रति ही भेटका मुख्य कारण है ! सार्ड की ने स्वर्गीया महारानी निकोरिया के घोपणापत्र के पडे ही किया है युक्ति पूरा गडकिया था। स निबन्ध में मिटर गोखले ने भारतवासियों को जो नही नौकरियों का द्वार पन्द हे उस महात्मा गोखले " । हम लोगो के लिये खुला है और उसमें हिन्दुस्तानी मान वृक्षी चोटी तक चढते दिखाई देते है और यदि हमारे देश वाली प्रधान न्यायाधीश ( चीफ नस्टिस ) और एडवोकेट जनरल के पदों के योग्य पाये जाते हैं, तो उन्हें श्रावकारी, अफीम, नमक, चुगी,डाक, तार, पेमाइश,सेना और दूसरे मह- कमों की नौकरी न देना अन्याय है । वर्तमान प्रबन्ध में, भारत का गुरुत्व केन्द्र लन्दन में है। हम इस अस्वाभाधिक प्रवध के विरोधी है और बडे जोर से यह कहते है कि हिन्दुस्तान में नौकरी करनेवालों को जो परीक्षा देनी होती है, वह केवल लन्दन में न हो, किन्तु वह एक ही समय भारत और इनलिस्तान में होवे । अब हम कलकत्ते के बडे लाट ओर बम्बई और मदारस के छोटे लाटों की प्रबन्ध कारिणी सभाओं ( executive council) में और स्टेट सेक्रेटरी की कोसिल में भी भरती होने का दावा करते है। यागे इस निबन्ध में मिस्टर गोखले ने और भी कई विचारणीय बाते कही थी, उन्होंने एक बडे मार्क की यह बात कही थी कि जिले का प्रवन्ध जो भारतीय-शासन का मूल हे केन्द्र शासन से हटा लिये जावे अर्थात् जिले का प्रबन्ध स्थानीय लोगों की सहायता से चलाया जावे । पहिले तो उसे केन्द्र सरकार के दफ्तरों और कई स्वास मुहकमों के अधिकार से धीरे धीरे युक्त करना चाहिये, और दूसरे जिले के लोगों को उसकी चाल पर अधिक अधिक अधिकार मिलने का मोका देना चाहिये, यहा तक अन्त में कर्मचारी लोग सचमुच (से कि वे श्रमी फेवल यातों में समझे जाते हैं) लोगों ही फे नौकर ( public serrants ) बन जाये। - - ।

उत्तर भारत में दोराचौर लाला जी का देश निकाला
काम की पहिली सीढी यह होगी कि, जिले के अधिकारियों
के साथ शासन के काम में लोगों चुन हुए अगुश्रा सोगों
की कमेटी का मेल पहिले पहिल केवल सलाह के लिये और
पीछे क्षमता के अधिक अधिकार देकर कराया जाये। इसके
प्रागे मिस्टर गोपले ने अपने इस नियन्ध्र में स्थानीय बरा
ज्य (Local Self government) के विषय में कहा था-
"अभी वह देश भर में उसी स्थान पर मौजूद है -५
धर्ष पहले लार्ड रिपन ने उसे रपया था और कही २ तो यह
पीछे हट गया है। श्रय अधिक शिक्षित में स्थानीय कमेटियां
पूरी प्रतिनिधि यनाई जा और यद्यपि धन पर मरफारी
अधिकार कम न होने पाये तो भी वे अफसरों की छोटी
छोटी और सतानेवाली बाधाओं से मुक्त करदी जाये इसको
भागे मिस्टर गोखले न कोसिल के विस्तार आदि के विषयों
पर विशेष पाल दिया है मिस्टर गोसले की अनेक यत्ततामों
में इस ढह के भाव भरे हुये है पर वेट है कि स्थान की कमी
से हम उनको यहा उद्धृन करा में असमर्थ है।
उत्तर भारत मे दौरा और लालाजी का
देश निकाला
समाचारपनों के पाठकों से यह अविदिन नही है कि
सन् १९०६ और ७ में इस के निवामियों में गाजनेतिक विषयो
को लेकर दो दल होगये थे। जो अभी तय मिटे नही।
उस समय इस देश के निवासियों की प्रवृत्ति ही दूसरी बार
थी। राजनैतिक कार्यकर्ता गरम दल में घिसना
।

महात्मा गोखले
हम लोगो के लिये तुला हे और उसमें हिन्दुस्तानी मान
वृक्षकी चोटी तक चढ़ते दिखाई देते है और यदि हमारे देश
वासी प्रधान न्यायाधीश ( चीफ नम्टिम ) और एडवोकेट
जनरल के पदो के योग्य पाये जाते है, तो उन्हें श्रापकारी,
अफीम, नमक, चुगी, डाक, तार, पेमाइश,सेना और दूसरे मह
कमों की नोकरी न देना अन्याय है । वर्तमान प्रवन्ध में,
भारत का गुरुत्व केन्द्र लन्दन में है। हम इस अस्वाभाविक
प्रवध के विरोधी है और बडे जोर से यह कहते है कि
हिन्दुस्तान में नौकरी करनेवालों को जो परीक्षा देनी होती
है, वह केवल लन्दन में न हो, किन्तु वह एक ही समय
भारत और इसलिस्तान में होवे । अब हम कलकत्ते के
बडे लाट ओर बम्बई और मदारस के छोटे लाटों की प्रबन्ध
कारिणी सभात्रों ( executive aoungil) में और स्टेट
सेक्रेटरी की फोसिल में भी भरती होने का दावा करते
है। आगे इस निबन्ध में मिस्टर गोखले मे और भी कई
विचारणीय बातें कही थी, उन्होंने एक बडे मार्क की यह
बात कही थी कि जिले का प्रवन्ध जो भारतीय-शासन का
मूल हे केन्द्र शासन से एटा लिये जाने अर्थात् जिले का प्रबन्ध
स्थानीय लोगों की सहायता से चलाया जाये । पहिले तो
उसे केन्द्र लरकार के दफ्तरों और कई खास मुहकर्मा के
अधिकार से धीरे धीरे युक्त करना चाहिये, और दूसरे जिले
के लोगों को उसी चाल पर अधिक अधिक अधिकार मिलने
फा मौका देना चाहिये, यहां तक अन्त में कर्मचारी लोग
सचमुच (जैसे कि वे अभी केवल यातों में समझे जाते हैं)
योगों ही के नौकर ( public servants ) बन जाचं । इस

उत्तर भारत में दोरा और लाला जी का देश निकाला ६६
काम की पहिली सीढी यह होगी कि, जिले के अधिकारियों
के साथ शामन क काम में लोगों चुन हुए श्रगुश्रा लोगों
घी कमेटी का मेल पहिले पहिल केवल सलाह के लिये और
पीछे क्षमता के अधिक अधिकार देकर कराया जावे। इसके
आगे मिस्टर गोयले ने अपने इस निवन्ध में स्थानीय स्वरा
न्य (Looal Self government) के विषय में कहा था --
"श्रमी वह देश भर में उसी स्थान पर मोजूद है जा २५
घर्ष पहले लार्ड रिपन ने उसे रक्सा या और कहीं २ तो वह
पीछे हट गया है। श्रर अधिक शिक्षित में स्थानीय कमेटियां
पूरी प्रतिनिधि यनाई जायें और यद्यपि उन पर सरकारी
अधिकार कम न होने पावे तो भी वे अफसरों की छोटी
छोटी और सतानेवाली बाधाओं से मुक्त करदी जावे इसके
आगे मिस्टर गोखले ने कोसिल के विस्तार आदि के विपयों
पर विशेष यल दिया हे मिस्टर गोपले की अनेक वक्तृताओं
में इस ढक के भाव भरे हुये है पर खेद है कि स्थान की कमी
से
हम उनको यहा उद्धृत करन में असमर्थ हैं ।
उत्तर भारत मे दौरा और लालाजी का
देश निकाला
समाचारपत्रों के पाठकों से यह अविदित नहीं है कि
सन् १६०६ ओर ७ में इस के निवासियों में राजनैतिक विषयों
को लेकर दो दल होगये थे। जो अभी तक मिटे नहीं हैं।
उस समय इस देश के निवासियों की प्रवृत्ति ही दूसरी ओर
थी। राजनैतिक कार्यकर्ता गरम और नरम दल में विभक
-

महात्मा गोखले
होगये थे । सन् १६०६ में कलकत्ते में जब कांग्रेस हुई थी तय
इस देश के नेताओं की परस्पर संचातानी से भय था कि
कहीं कामेरा भान होजाये परन्तु कलकत्ते में कांग्रेस का
अधिवेशन भारत के वृद्ध ओर पूज्य नेता दादाभाई नौगेजी
की अध्यक्षता में निर्विन समाप्त हुश्रा । उस काग्रेस में मिस्टर
नौरोजी ने इस बात की आवश्यकता प्रकट की थी कि देश के
मुख्य मुरय भागों में कुछ लोग भ्रमण करके सर्वसाधारण
में राजनैनिक जागृति उत्पन्न करे । कलकत्ता काग्रेस के
समाप्त होते ही मिस्टर गोखले ने इस कार्य का वीडा उठाया
और उन्दोर उत्तर भारत में भ्रमण किया। इस भ्रमण में मि०
गोसले ने प्रयाग, आगरा, लाहौर,
अमृतसर, जालन्धर, आदि
स्थानों में अनेक व्याख्यान दिये थे। जिनमें से मुरयत चार ।
विषय थे। राजनैतिक परिस्थिति-"स्वदेशी"-"हिन्द मुसल
मान" और 'विद्यार्थियों के कर्तव्य" । इस भ्रमण में जहाँ कही
मिस्टर गोसले गये थे । वहा उनका स्वागत बडी धूम धाम
से हुआ था । उन्होंने स्थान स्थान पर हिन्दू मुसलमानों के
पारस्परिक मेल से रहने की सलाह दी थी और कहा था
कि देश की भलाई वुराई में हिन्दू मुसलमान दोनों का समान
स्वार्थ है।
सन् १६०७ में पजाव ची वडी भयङ्कर परिस्थिति थी।
जमीन पर कर बढाने से यहां की साट जाति में वडी सलवली
मचरही थी। पगडी सम्हालो श्री जट्टा" श्रादि जोशीले गीत
यहा घर घर में गाये जा रहे थे। इसका परिणाम यह हुमा
कि रावलपिडी के कुछ नेताओं पर राजद्रोह का मुकदमा
चला। लाला लाजपतराय और सरदार अजीतसिह देश
.

फोसिल में सुधार
७१
निर्वासित किये गये । इस पर मिस्टर गोखले ने यमई के
पालो इण्डिपन श्रसयार "टाइम्स आफ इंडिया में एक लेख
सिया था जिसमें लाला लाजपतराय को बिना किसी अभि
योग फे देश निकाला करने के लिये सरकार के कार्य की कड़ी
श्रालोचना की थी। जितने दिन सरकार ने लाला लाजपत
राय को माण्डले में रस्सा था उतने चीन में कोसिल के जो
अधिवेशन हुए थे उन्ही में लाला लाजपतराय के सम्बन्ध में
प्रश्न किये थे। पजारियों का गोसले नेकौंसिल में अच्छा पक्षा
लिया था। इसी साल पम्मई की म्युनिस्पलटी की अध्यक्षत
से एछ एङ्गलो इडियनों ने सर फिरोजशाह मेहता को हटाने
की चेष्टा की थी उसके प्रतिवाद में रम्बई के माधोगग में
७ वी एप्रिल सन् १९०७ को एक सभा हुई थी उसके सभापनि
मिस्टर गोखले थे। मिस्टर गोपले को बडी प्रभावशालिनी
यक्तना हुई थी। बम्बई के एडलो इण्डियन अपयार "टाइम्स"
के जिस श्रम में सरफिरोजशाह मेहता के ऊपर आक्षेप किये
गये थे उस अफ को लोगों ने सभास्थल में फाड़ कर फेंक
का
दिया था।
कौंसिल में सुधार
मन् १६०८ में गोयले पुन विलायत गये, यदि हा जाय
कि सन् १९१० से कोमिल का जो नवी सगठन हुथा है, वह
मिस्टर गोयले के प्रपात का फल है तो अत्युक्ति न होगी।
जय सन् 180 में गोणले महोदय गये थे, तब उन्होंने कोसि
सों के सुधार के सम्पन्धं में लाई मोलें से कईयार भंट को

७२
महात्मा गोखले
थी। और यहा तक सुना जाता है कि लार्ड मोल ने उनको
रिफार्म स्कीम का ड्राफ्ट ( मसविदा ) तक दिखला दिया
था । उन्होंने इस स्कीम के सम्बन्ध में लाई मोले को उचित
सम्मति दी थी। उनकी मृत्यु के पश्चात् "इङ्गलिशमैन" जैसे
कट्टर एगलो इन्डियन शखयार तक को मुक्तकंठ से यह कहना
पडा है कि कौंसिल के सुधारों पर गोखले के मत की छाप है"
सन् १६०८ की मदरास कॉग्रेस में मिस्टर गोखले ने इस स्कीम
के सम्बन्ध में एक प्रमावशाली पकता दी थी।
।
।
-
दक्षिण अफ्रीका की यात्रा
दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारत सन्तानों को कैसी कैसी
यन्त्रणायें मिल रही है। यहा येचारे हिन्दुस्तानियों को मनुष्यो-
चित्र अधिकार की प्राप्त नहीं है। मिस्टर गोखले का ध्यान,
दक्षिण अफ्रीका में भारतवासियों पर जो अत्याचार हो रहा
धा, उस ओर गया था। उन्होंने ४ मार्च सन् १९१२ को बडे
लाट की कोसिल में एक प्रस्ताव उपस्थित किया था कि
शर्तबधे हुये मजदूर यहा पर न भेजे जाय । पर कुछ परिणाम
नहीं हुआ । अन्त में वहा की परिस्थिति से परिचित होने के
लिये मिस्टर गोसले ने दक्षिण अफ्रीका की यात्रा को। पहले
जव वे इङ्गलेण्ड से चलने लगे तो दक्षिण अफ्रीका को जाने.
वाले जहाज ने पहले दर्जे का टिकट देना स्वीकार नहीं किया
परन्तु वहा पहुचते ही यूनीयन सरकार ने बडा भारी श्रादर
किया था। चहा वे दक्षिण अफ्रीका की सरकार के मेहमान
रहे थे। यहा की सरकार ने उनका बडे ठाठ घाट से स्वागत
किया था। और प्रवासी भारत सन्तान भी अपने नेता के

दक्षिण अफ्रीका की यात्रा दर्शनों से प्रफुल्लित हुए । उन्होंने मिस्टर गोखले को कितनेही अभिनन्दनपत्र समर्पित किये थे परन्तु वहां के गोरे अफसरों ओर सरकार से मिलकर ये भी इस झगडे को शान्त नहीं कर सके। मिस्टर गोसले के अान्तरिक अभिप्राय को विना समझे हुए ही अनेक भारतवासियों ने उन पर आक्षेप करने श्रारम्म पर दिये थे। यहा तक सरफिरोजशाह मेहताऔर बाबू सुरेन्द्र नाथ बनर्जी का "पगाला अखवार भी उन से प्रसन्न नहीं हुए । यहां से लौट कर मिस्टर गोखले ने १४ दिसम्बर सन् १९१२ को नम्बई के टाउन हाल में और फिर यांकीपुर की काग्रेस में अपने व्याख्यानों में लोगों का भ्रम दूर किया। इसके कुछ दिन पीछे दक्षिण अफ्रीका में यहाँ की सर- कार और निवासियों के घृणित भावों से उकताकर भारत यासियों ने निष्क्रिय प्रतिरोध ( Passive Resistance ) अर्थात् यूनियन सरकार ने प्रवासी भारतवासियों को रोकने के लिये जो अनुचित कानून, नियमादि बनाये थे, उसका कि- यात्मक रूप से प्रतिवाद करना प्रारम्भ किया था जिस के कारण कर्मवार महात्मा गाँधा तथा उनके साथियों को अनेक कष्ट भोगने पड़े थे। इस आन्दोलन में प्रवासी भारतसन्तानों को धन की विशेष आवश्यकता भान पडी। उनके बाल यच्चे तक भूगों मरने लगे। मिस्टर गोखले ने वहा के निवासियों की सहायतार्थ लाखों रुपये चन्दा किया। मिस्टर गोपले अपने कर्तव्य को कितना पहचानते थे कि दिल्ली के सेन्ट स्टीफिन्स. *पायोपुर में-मि० गोखले की वक्त ताफे पश्चात माननीय पं० मदनमोहन मालवीय जी को हिन्दी भापा में "दक्षिण अफ्रिका मे प्रवासी भारतवासियों की परिस्थिति" पर बड़ी श्रॉजस्विनी वक्तता हुइ थी।

७४
महात्मा गोखले
+
कालेज के विद्यार्थियों ने प्रवासी भारतसन्तानों की सहाय,
तार्थ कुछ चन्दा इकट्ठा किया था और मिस्टर गोसल को
अपने यहां निमन्त्रित किया था उस समय वे स्वर से पीडित
थे, पर इसकी कुछ चिन्ता न करके थोड़ी देर के लिये कालेज
में पहुच ही गये । उस पीडितावस्था में ही मिस्टर गोसते ने
और भी कई स्थानों में पहावालों की सहायतार्थ भ्रमण
किया था। उनका यह परिश्रम सफल भी हुप्रा । जहां उनके
देशवासियों ने अनुरोध पर अपने भाइयों की सहायतार्थ
अपनी थैलियों का मुंह खोल दिया था, वहां हमारे प्रजा
प्रिय लार्ड हार्डिअ को कृपा से दक्षिण अफ्रीका प्रवासी भारत
सन्तानों के कुछ कष्ट दूर होगये हैं ।
पबलिक सरबिस-कमीशन
भारतवर्ष का शिक्षित सम्प्रदाय बहुत दिनों से यह श्रा
दोलन कर रहा है कि भारतवासियों को सरकार के यहा
बडी बडी नोकरिया बहुत कम मिलती हैं सिविल सरविस
श्रादि की परीक्षाए विलायत में होने के कारण भारतवासियो
को सुविधा नहीं हे इसकी जाच के लिये सन् १९१२ में पलिक
सरविस कमीशन बैठा । उसके एक सदस्य मिस्टर गोखले
भी हुये । सदस्य होने पर गोगले चाहने तो १५०००) पत्रह
हजार रुपया वार्षिक इम कमीशन से ले सकते थे, पर ऐसा
करने से उन्हें कोसित की मेरी छोडनी पड़ती। इसने
कौमिरा में भारत के प्रजामन को बडो हानि होती,
उन्होंने इस विचार से यह बडी श्राय स्वीकार नही, की
अस्वस्थ रहने पर भी वे कमीशन की बैठकों में सम्मिलित
1
श्रातपय

। पथलिक सरपिस कमीशन ७५ हुना करते थे मोर अत्यात परिश्रम पूर्वक उसका कार्य किया फरते थे। डाकृरों ने कई बार उनसे फमीशन में सम्मिलित न होने के लिये कहा था। पर देश की चिन्ता घे सामन उन्हें अपने स्वास्थ्य तक की परवाह नहीं रही थी। बीच बीच में दो एक यार के लिये डाकृरों के अनुरोध से उन्होंने कमीशन का काम छोड भी दिया था। परन्तु स्वास्थ्य के तनिक अच्छे हो जाने पर ही ये उसमें सम्मिलित हो जाते थे। इस कमीशन के सम्बन्ध में उन्हें दो बार विलायत जाना परता था इस एप्रिल मास में भी घे विलायत जाते परन्तु कराल काल ने उनको पहिले ही घेर लिया। जिससे इस कमीशन के सम्बन्ध में उनके एदय की लालसाएँ, उनके हृदय में ही समा गई । श्रय इस कमीशन में प्रजामत का पक्ष लेने वाला, मिस्टर गोसले के सिवाय दुसरा कोई नहीं है। कमीशा के कार्यों में गोसले महोदय को कठिन परिथम करना पड़ता था इस विषय में उन्होंने " अमृत बाजार- सम्पादक से स्वय कहा था - "मुझे बडी कठिन खडाई लडनी पडती है वे कई है मैं अकेला ह विशेष परिथम करने के कारण मेरा स्वास्थ्य यराव हो गया है और में अपने को मृत्यु का शिकार बना रहा है। परन्तु तिसपर भी मुझे अपनी चिन्ता नहीं दश की चिन्ता हे"। इसमें सन्देह नहीं कि यदि गोखले पचलिक सरनिस कमीशन की रिपोर्ट के प्रकाशित होते ममय जीवित रहते तो देशवासियों को बहुत नई बातों का पता लगता। मालूम नहीं, वे अपनी रिपोर्ट भी पत्रिका के छोड गये हैं या नहीं।

महात्मा गोखले
-
शिक्षा सम्बन्धी उदयोग
अब तक पाठको ने हमारे चरित नायक को राजनैतिक
ससार में देखा है अब हम उनके कुछ शिक्षा और सामाजिक
सुधार सम्बन्धी विचारों का भी परिचय देना चाहते है ।
मिस्टर गोसले ऋपि कल्प रानाडे के शिष्य थे, नानाडे महो
दय का विचार था कि देश की उन्नति केवल एक विषय पर
ही निर्भर नहीं रहती है। समस्त विपयों को सुधारने और
उनत करने की आवश्यकता हुश्रा करती है। गोसले महोदय
के भी ऐसे ही विचार थे, परन्तु उन्हें राजनैतिक कार्यों में
विशेष योग देना पडता था पर साथ यह वात नही थी कि वे
देश सम्बन्धी अन्य विपरों के विरोधी हो। शिक्षा का कार्य
तो बहुत अधिक किया था। पूना के फरग्यूसन कालेज के
प्रोफेसर होने और शिक्षा का एक श्रादर्श उपस्थित करने के
अतिरिक्त उन्होंने समय समय पर शिक्षा सम्बन्धी अपने घडे
गहन और गम्भीर विचार प्रकट किये थे। बम्बईके ग्रेज्यूएट्स
पसोसियेशन के वार्षिक अधिवेशन में उन्होंने ११ वीं एप्रिल
सन् १८६६ को एक व्यारयान दिया था जिसमें उन्होंने वर्तमान
शिक्षापद्धति के अनेक दोषों को दूर करने के लिये बल दिया
था। इस व्यारयान में उन्होंने वर्तमान शिक्षा प्रणाली के दोपा
को निर्भय होकर प्रकट किया था। जिस तरह से आज कल
विद्यार्थी गण रट रट
कर परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते हैं,
इसपर उन्होंने अत्यन्त खेद प्रकट किया था। इसके अति
रिक उन्होंन लण्डन के ईस्टइण्डियन एसोसियेशन में जो
"स्वराज्य पर निवन्ध पढा था उसमें शिक्षा के सम्बन्ध में
उन्होंने अपने यह विचार प्रकट किये थे-"सर्वसाधारण
।

शिक्षा सम्बन्धी उद्योग
फी शिता भी रतनी तेजी के साथ दी जाना चाहिये कि प्राज
को तारीय से बोस घर के भीतर अगर जल्दी न हो सके तो
लहकों और लड़कियों को मुफ्त और जयरदस्ती शिक्षा देने
का प्रयन्ध हो जावे।
समय समय पर मिस्टर गोपले सर्य साधारण में शिक्षा
सम्र भी अपने विचार प्रकट करके ही चुप नही हुये थे ।
उन्होंने बडे लाद की फोसिल में प्राथमिक शिक्षा का जो
पिल उपस्थित किया था उसकी यात हम पहिले रह चुके
हैं। उस प्रस्तान के समर्थन में भारतवर्ष के बहुत से स्थानों
में सभाए हुई थी । स्वय मिस्टर गोपले ने अनेक स्थानों
में अपने प्रस्ताव के सम्बन्ध में वाकुना दी थी सारा देश
मिस्टर गोयले के इस विल के पक्ष में था। जर दूसरे घर्ष
उन्होंने यिन्त उपस्थित किया पोर जर कुछ सरकारी और
दूर चटुमारिता प्रिय मैचरों ने इसका विरोध किया था तय
मिस्टर गोयले ने कोसिल में वही युक्ति युक्त पूर्ण और ओज
चालता दी थी। उन्होंने अपनी वक्तता में विल के उन
विरोधिया को जिनका कथन यह था कि जबरदस्ती शिक्षा देने
से अगान्ति फैलेगी पर स्थल पर पहा
इस अरस्था में हम लोगों का कर्तव्य क्या होनाचाहिये
पस्तुत, समस्त सभ्य जगत ने इस जटिल प्रश्न की मीमांसा
जबरदस्ती शिक्षा देकर ही की हे ओर करने या प्रयत्न किया
है। क्या हम लोग ही ऐसे मार्ग पर डटे रहेंगे जिससे मूर्खता
बराबर बनी रहेगी । उदाहरण के लिये फिलिपाइन्स टापू
सोलोल और बडौदा राज्य काफी हे केवल यह कह दने से
काम नहीं चलेगा कि इनकी अवस्था निटिश भारत से भिन्न
सिनो

महात्मा गोसले . प्रकार की है। सच बात तो यह है कि दो उदाहरण एक दम एक सरीखे ही नहीं दे सकते । सोलोन के अधिवासी और दक्षिण भारत के अधिवासी तथा बडौदा राज्य के अधिवासी' और वृटिश गुजरात के अधिवासी में भेद हो क्या है इसके आगे मिस्टर गोपले ने अपनी वक्त ना में बम्बई प्रान्त के अन्तर्गत सांगली देशीय राज्य का उदाहरण दिया था जहां प्राथमिक शिक्षा जबरदस्ती से दी जाती है एक स्थान पर उन्होंने अपनी इस वक्तृता में कहा था कि जो लोग सार्य- जनिक शिक्षा से ब्रटिश शासन के नाश को शङ्का करते हैं, उनका भय निष्कारण हे राज्य को भय मूर्ख लोगों से ही है नकि जानकारों से जो लोग यह कहते है कि भारत में अाज ऐमा कानून नहीं बनाया जा सकता है वे भूलते हैं। मीलोन, पौदा और सागली के उदाहरणों से सिद्ध होगया है कि लोगों का यह कथन निस्सार है, जो लोग यह कहते है कि जस्तक पढने योग्य उम् के अधिकांश साटके पढने न लग जॉय तब तक जवरदस्ती की जाय वे अन्य देशका उदाहरण नहीं देखते। जिन समय जपर- दस्ती शिक्षा श्रारम्भशीगयी उस समय इङ्गलेण्डमें सैकडो पीछे ४३ ओर जापानमें सैण्डा पीछे २८ लडकेही पंढते थे। जो लोग शिक्षा की दुहाई देकर कहते है कि जबरदस्ती से शिक्षा थोडी काम की दी जायगी इसलिये वह आवश्यक है। यहां इस समय उक्त शिक्षा से सुयोग शिक्षकों ओर मुनिर्वाचित पाठ्य पुस्तकों की ही धावश्यकता है, उनसे मैं कहूगा कि असल उद्देश्य सम्पूर्ण अज्ञान का नाश करना है। इसके लिये नान रुपये वेतन के शिक्षक और भाडे के अथवा लोगों के प्रदच ।

समाज सुधार सम्बन्धी विचार
७४
प्राज
घर भी ययेय है। ये विपत्तियां इङ्गरोड और रशिया में भी
प्रारम्भ में थी और आज भी है । जबरदस्ती होजाने के पीछे
ये सुधार अवश्य होते रहेंगे, पर इन सुधारों के होजानतक
जबरदस्ती करना-धुद्धिमत्ता नहीं है।
फल प्रत्येक पालक को प्राथमिक शिक्षा के लिये प्रतिवर्ष की
पालक चार रुपये लगते हैं सरकार जो उन्नति करना चाहती
है, उसके हो जाने पर भी डाइरेक्टर जनरल मि० श्रारेज के
हिमाय से ही प्रत्येक यालक पर प्रति वर्ष पाच रुपये लगेंगे
आज दिन्दुस्तान में ६ से १० वर्ष तक की उम्र के सवा करोड
लाके में छामें ४० लाय प्राज शिक्षा पा रहे है । अपनी इस
चताना में मिस्टर गोपले ने उन देशी मेम्परों को जिन्होंने इस
ग्लिके विपक्ष में सम्मति दी थी, उनको सूप फटकार वत
लायी थी।
समाज सुधार सम्बन्धी विचार
बहुत से लोगों का विचार है कि मिस्टर गोसले समाज
सुधारक नहीं ये अथवा समाज सुधार सम्बन्धी बातों से
दूर रहते ये हमागे समझ में ऐसा कहने वाले भूलते है। इस
म सन्द नहीं कि मिस्टर गोखले समाज सुधार सम्वन्धी
कामों में बहुत कम योग देते थे परन्तु इसका कारण यह था
कि देश राजनीतिक कायां में इतने व्यस्त रहते थे कि
उनको दूसरे कारा में योग देने का बहुत कम समय मिलता
था, परन्तु यह नहीं है कि वे समाज सुधारक न होकर कार्य
करनेवाले थे। अपनी लडकियों का बडी अवस्था नक विवाह
।

to महात्मा गोखले न करना और उनको शिक्षा देना, उनके समाज सुधारक हाने का पका सबूत है । इसके अतिरिक्त उन्होंने सन् १८६७ में एक सभा में 'भारतवर्ष में स्त्री शिक्षा" शीर्षक एक निवन्ध पढ़ा था उसमें उन्होंने भारतवर्ष में स्त्री-शिक्षा के प्रचार न होने और लड़कियों का छोटी उम्र में विवाह करदेने पर सेद प्रकट किया है। उनकी ओर भी कई वकृतानोंसे पता लगता है कि वे भारतवर्ष की स्त्रियों को तथा उन वेचारों को जिनको हम अछूत जातिया कहकर घृणा करते हैं विद्यादान देने के बडे पक्षपाती थे । सन् १९२३ की २७ वी अप्रेल को उन्होंने पम्बई की प्रान्तिक समाज सुधारिणी सभाका जो अधिवेशन धूलिया में हुआ था उसमें अछूत जातियों के उठाने के सम्बन्ध में वक्तृता दी थी उसमें उन्होंने अछून जातियों की वर्तमान दशा पर अत्यन्त दुख प्रकट किया था। इस वक्तृताको पढते ही ज्ञात होजाता है कि मिस्टर गोखले के हृदय में अन्त्यज जातियों के प्रति कितनो सहानुभूति थी । उन्होंने अपनी धक्तता में कहा था -"हम कुत्ते विल्ली आदि चाहे जिस जान घर को छू सकते हैं इसमें कुछ पाप नहीं है पर अछुत जातियों से छूजाना पाप है" गोयले महोदय न अपनी इस घक्तृता में यही दर्शाया कि अछूत जातियों को उठाये विना कभी राष्ट्र निर्माण नहीं हो सकता है। १

रोग धार मृयु
रोग और मृत्यु
"दु.स से भासे है भरी माती
फहले लाती हे फाटी जाती" ॥
पया पहें कुछ कहने की हिम्मत न होने पर भी कहे पिना
नहीरदा जाता है। यह हम पहिले ही कह चुके है कि पब्लिक
सरपिस यामीन में कार्य करत समय ही मिटर गोपले
धीमार होगये थे। उस यीमारी यी अवस्था में भी ये अपना
फर्तव्य पालन परते रहें ये यह हमारे देशा दुर्भाग्य हे
कि यहां काम करनवाले जी ही मृत्यु के ग्राम हो जाते हैं
इसका कारण भी यह है कि यक्षा देशमयकाको प्रायश्यकतामे
अधिक कार्य करनापडता है ! पयोकि इस देश में काम करन
पालों का हाथ पटानेयाले पहुत कम हैं पर काम में याया
डालनपाले बहुत ।। मिस्टर गोपले की भी यही दशा हुई
निरन्तर परिश्रम करने और तनिक भी विश्राम न करने से
उन काम्वास्थ्य गिर गया। उन्ह देश सेवा सेहता अवकाश
न मिला कि ये अपना स्वास्थ्य सुधार लेते । यस अन्त श्राहो
पहुचा, जिन घात की शाशका न थी. यही यात दई । यपि
ये मधुमेह रोग मे १५ वर्ष में बीमार ये परन्तु दो वर्ष की
लगातार धीमारी से उनके जीवन प्रदीप कातल शनै शने कम
हो रहा था, वे बीमारी के कारण ही इस वर्ष इण्डियन नेश्नल
कांग्रेस में नहीं गये थे। मृत्युफे पाच दिन पहिले उन्हश्याम की
योमारी होगयी थी। गत ३ वी फरवरी १९१५ को महात्मा
गान्धी पूना गये थे। गोगले ने उनके स्वागत के लिये उद्यान
नौज दिया था। परन्तु उसी दिन गोसळ महोदय की ववि-

महात्मा गोखले
यत सराव होगयी थी सो शीघ्र चले पाये। इसके बाद उनकी
तवियत कुछ अच्छी भी होगई थी २१ फरवरी को बडे लाट
की कौंसिल में वे दिल्ली जानेवाले थे। परन्तु फिर रोग बढ़
गया और इसके कारण वे नहीं जा सके। १८ वी तारीख को
अर्थात् मृत्यु के एक दिन पहिले उनकी दशा भयङ्कर होगई थी
शुक्रवार १६ वी फरवरी को डाकृरों को मृत्यु के लक्षण प्रत्यक्ष
प्रतीत होने लगे, मिस्टर गोखले ने अपनी मृत्यु का अन्तिम
समय निकट जान कर अपने परिवार के सय लागोंको बुलाया
और कुछ परामर्श दिया । भारत सेवक समिति के सदस्यों से
उन्होंने उस काम को चलाने के लिये अनुरोध किया और
कहा -"मेरी कोई जीवनी न छापी जाय" । मृत्यु का समय
निकट जानकर वे तनिक भी विचलित नहीं हुए और कहने लगे
कि अब दूसरी दुनियाँ को भी देखना चाहिये । अन्तिम समय
गोखले को केवल पालिक सरविस कमीशन के काम को पूरा
न करने का दुरस रहा । भारतसेवक समिति का उन्होंने अपनी
श्रोरसे कोई सभापति नहीं चुना और उसका निर्वाचन सेवक
समिति के सदस्यों पर ही छोडा।
१४ची फरवरी को रात्रि के दम बज के पञ्चीस मिनट
पर उन का जीवन प्रदीप बुझ गया शोक है भारत गगन
मण्डली से राजनैतिक सूर्य अस्त हो गया, समस्त भारत
वर्ष में कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक और पेशावर
से कल रत्ते तक सारा देश शोक से छागया । गृद्धा भारत
माना अपने लाल के लिये गेती, तडफती, विलखती रह
गई, दुष्टा मृत्यु ने उस पर तनिक' मी दया नहीं की। निर्दय
पाल ने उप रोने विलसने पर कुछ ध्यान नहीं दिया

तिलक की वक्तृता
३
भारत की नेता, नव्यं भारत का शिक्षक, प्रना और राजा का
शुभ चिन्तक उठ गया। सारे देश में एक छोर से दूसरे छोर
तक शोक ओर दुसपी कालिमा छागई पूना का तो कहना
ही क्या था, इस शोक समाचार को सुनते ही अगणित नर
नारी भारत सेवक समिति के सामने अपने नेता के अन्तिम
दर्शन करन के लिय एकत्रित होगये । लगभग बीस हजार
श्रादमियों की भीड तुड गई । गोखले से राजनैतिक विषयों
में सदे से महात्मा तिलक का मत भेद रहा था । परन्तु
इस अवसर पर वे अपने समस्त मतभेद को भूराकर सिंह
गर से मोटर में थाये, हिजहाईनेस आगा या ने गोखल की
रथी पर फल चढाने के लिये भेजे।
प्रात काल दस बजे पर गोसले के शन का श्मशान भूमि
को लेजाने का विचार था पर भीड इतनी हुई फि डेढ बज
गया । श्मशान भूमि तक पहुंचने में दो घण्टे लगे। मि० क्षेत्र
धर र डाक्टर भण्डारकर मे उपस्थित जग मडली में
गोपले की दश सघा के सम्बन्ध में कुछ कहा, तत्पश्चात् उप
स्थित जन मण्डली के अनुरोध से लोकमान्य तिलक भी
इस शाकार प्रसङ्ग पर कुछ कहने को सडे मुए तालियों की
गड गडाहट ने उनका स्वागत किया गया इस पर मराठी
भाषा में महात्मातिलक ने वकृता की थी। जोमागे प्रकाशित ह -
तिलक की वक्तना
तालियों के पजाने पर महात्मा तिलक ने शोक प्रकट
करत हुए कहा-यह समय तालिया पीटने का नहीं, रोने का
६। गोखले की मृत्यु से वृद्धा भारत माता की जो अकथनीय
F

महात्मा गोखले , हानि हुई है, उस पर यह रोने का अवसर है क्या तुम देखते महीं हो, भारत के हीरा, महाराष्ट्र के रत, प्रमुख कार्य कर्ता वीर गोसले श्राज इस मृत्यु शय्या पर घोर विश्राम कर रहे है । श्रारों खोलकर उनकी ओर देसो और उनसे कर्तव्य करना सीखो । गोखले अपना कर्तव्य उत्तम रीति से करके यहा स चले गये। क्या उनके स्थान पर तुम में से कोई भावे गा? विजयी वीर की माति गोपले अपने नाम को चिरस्थाई करके जा रहे हैं । योग्य रीति से अपनी जन्मभूमि के प्रति कर्तव्य पालन करने का जेसा उत्तर ये परलोक में दंगे, पैसा उत्तर तुम लोग तो क्या भारतमाता का कोई भी पुत्र न देल. केगा। प्रमाणिक रीति से अपना सच्चा कर्तव्य पालन करने का उत्तर ऐसा उत्तमता से ईश्वर को देने का सौभाग्य अर तक बहुत ही थोडे पुरुषों को प्राप्त हुआ है । गोखले को में विलकुल वचपन से जानना हू । वे साधारण नादमी थे । ये न कोई मालगुजार थे, न रियासतदार ओर न मालदार ही थे यरिक हमारे तुम्हारे जेसे ही थे। वे अपनी बुद्धि, यल और कर्तव्य के सामर्थ्य से ही इस पद पर पहुचे ये । यद्यपि आज गोपाल राव चले गये, हमसे बिछड गये। पर ये पीछे ऐसी कितनी ही बातें छोड गये है जिनमे तुम शिक्षा ग्रहण कर सकोगे। इन बातों पर ध्यान देकर तुम में से प्रत्येक को प्रयत्न करते रहना चाहिये जिससे गोखले की कमी पूरी हो और इस प्रकार तुम्हारे प्रयत्न करते रहने से ही स्वर्ग में गोखले को श्रानन्द होगा । कर्त्तव्य वश महात्मा गोखले श्नौर महात्मा तिलक में प्रतिद्वन्दता रही हो यह बात जुदी है परन्तु गुणी लोग सदेव गुणी का श्रादर करते रहते हैं। विबुटन समय

साम्राज्य में शोक
पहा प्रभावोत्पादक होता है उस समय सारा मत भेद सारे
सिद्धान्तों का झगडा सारी प्रतिवन्दता मिट जाती है। यह
यात सदर से चली आ रही है चोर चुडामणि कर्ण मदेव
महात्मा भीष्म पितामह का विरोध करते रहे परन्तु महाभारत
के युद्ध में भीष्मपितामह के पनन होते ही कर्ण अपने समान
विरोध भाव को भूल गये । भीमपितामह कार की ओर से
युद्ध कर रहे थे पर पाण्डय उनकी मृत्यु पर सून रोये थे।
"भतएर जिन लोगों का गोसले से मतभेद था चेभी प्राज अपने
समस्त मतभेद को भूलकर गोगले की मृत्यु पर रो रहे है
मृत्यु पर शोक प्रकट करते हुए उनका गुण गानकर रहे
मतभेद होनेपर किसी के गुणा का भुला दना ठीक नहीं है ।
गोपले की मृत्यु पर इसी उच्च और उदार उदाहरण का
परिचय लोकमान्य तिलक जी ने दिया है। पया हमार जा
साधारण लोकमान्य तिलक महोदय के इस उदाहरण के अनु-
करण करने की चेष्टा करेंगे।
साम्राज्य मे शोक
हम पहले कह पाये है कि महात्मा गोखले की अकाल
मृत्यु से इस समय समस्त देश शोक प्रस्त हो रहा है। भारत
चर्प में ही नहीं समस्त ब्रिटिश साम्राज्य में जहा कभी सूर्य
अस्त नहीं होता है, शोक फेल रहा है। कितने ही स्थानों म
गोयले की मृत्यु के कारण स्कूल, कालेज य द हुप ! अबालते
यन्द हुई । मृत्यु समाचार पाते ही हाईकोर्ट की छुट्टी पर दी
गई । लाई हार्डिअमहादय ने बडी व्यवम्यापकसमा (लेजि

महात्मा गोसले . । . गोखले की मृत्यु से अत्यन्त शोक हुना था, उन्होंने गोखले की मृत्यु पर यह सन्देश अपने देश वासियों के प्रति प्रकट किया या-"मुझे अपने एक मित्र से यह सुनकर अत्यन्त दुख हुमा कि गोखले की मृत्यु होगई। हाय भारतवर्ष पर कैसी विपत्ति थाई ! देश की बड़ी हानि हुई है। इससे अधिक में और कुछ नहीं कह सकता। मेगी सर आशाओं पर गोखले की मृत्यु के साथ ही पानी फिर गया। पर मुझे कुछ गोडा सा सन्तोष यह है कि गोगले की वियोग वेदना को सारा देश अनु भव कर रहा है। समस्त -श गोसले जो कुछ कार्य करना चाहते थे, उमको जानता है और उसकी प्रशसा कर रहा है। दूसरे देशभक्त नवयुयक गोखत के उदाहरणका अनु करण करेंगे और जो कुछ गोसले करना चाहते थे, उसकी पूर्ति करेंगे । तिस पर भी में यह शोक प्रकट किये विना नहीं रह सकता कि यदि गोयले की मामूली उम्र सत्तर वर्ष की भी होती नो वह जो कुछ कार्य करना चाहता था, पूरा कर जाना " क्या बूढे दादाभाई नोगेजी की आशा को इस देश के नवयुवक पूर्ण नहीं कर मकन है? वस्तुत गोमले की मृत्यु से जेला शोक इस देश में हुश्रा है चेना पहले कभी देखन में नहीं पाया । बम्बई में जो शोक सभा हुई थी उसमें इतनी भीड थी कि एक दुसरी सभा उसो ममय रती पडी पी। सभी जानते हैं कि सर फीरोजशाह मेहता बडे अच्छे वक्ता थे, परन्तु गोसले की मृत्यु घे इतन दुखित हुये कि शोक सभा में बहुत दर तक नहीं बोल सके, दादाभाई नोगेजी के सामा यह निगशा अपनो धक्तता में प्रकट की कि "इस वर्ष मैने देश के लिये जो कुछ के कारण 4

सच्चा स्मारक और शिक्षा
म
कार्य सोचे थे, न मालूम गोसले की सहायता विना कैसे
पूर्ण होंगे प्रयाग में २८ वी फरवरी को जय गोखले की
अस्थिया गङ्गा में विसर्जन की गई थी तब पन्द्रह बीस हजार,
आदमी को भीड थी, और भी शोक से व्याकुल हो रहे थे,
लोग राते थे लातो पीटते थे। भारतवर्ष में ही नहीं, गोखले
मृत्यु
के कारण दनिण अफरीका, इङ्गलैण्ड वगैरह में भी
अनेक शोक सभाए हुई । दक्षिण अफरीका में जनरल स्मट्स
ने भी शोक प्रकट किया, इङ्गलेण्ड में पालीमेंट के कितने ही
मेम्परों ने शोर बडे बडे प्रतिष्ठित शहरेजों न शोक प्रकट
किया। चय सम्राट जार्ज और साम्राशी मेरी ने बडे लाट
की मार्फत गोसले के परिवार को पेद सूचक जनक और
सहानुभूति का तार भेजा था।
सच्चा स्मारक और शिक्षा
गोसले को मृत्यु पर शोक प्रकाश करने के लिये स्थान
स्थान पर शोक सभाए हुई थी और सभी सभाओं में अनेक
प्रकार से उनके म्मारक म्यापित करने की चर्चा हुई थी।
सच पूछिये तो ऐसे महापुरुष के जिनने स्मारक स्थापित किये
जाय, जिस दर पनाये जाय समी थोडे है । परन्तु देपना
चाहिये कि सन्या स्मारक महात्मा गोसले का क्या हो
सकता है ? यदि मुझ से कोई पूछे तो में कहगा कि गोसलेका
सबसे पहले और सच्चा स्मारक, उनकी स्थापित की हुई
'भारत मेवक-समिति" है। महात्मा गोपले ने भी मृत्यु
शय्या पर पड़े हुए यही इच्छा प्रकट की थी कि मेर कोई ।

ર
महात्मा गोखले
-
.
हिन्दुस्तानी समझे । वास्तव में हम लोग गोसले का सच्चा
स्मारक बनाना चाहते हैं, तो हिन्दू, मुसलमान का भाव
त्याग करके, आपस के व्यर्थ लड़ाई, मगहों को लात मार
कर देश सेवा का वीडा उठावें । भारतमाता की सेवा का व्रत
ग्रहण करे । धर्म सम्बन्धी मत भेदों पर न लड कर भारत
माता की पूजा ओर अाराधना हो अपना कर्त्तव्य समझे ।
महान्मागोखले का जीवन अपने देश की सेवा करने को बड़ी
भारी शिक्षा देता है।
यों तो गोखले की मृत्यु, पर सभी एडलो इण्डियन और
देशी अवधारों ने शोक प्रकट किया है पर पूना
के "केसरी
असवार ( लाकमान्य तिलक का पत्र है ) अपना विचार पूर्ण
सम्मति प्रकट की है, उसने गोखले के अनेक गुणों का उल्लेख
करते हुए लिखा है -"कोई इनकी बुद्धिमानी की प्रशसा
करते है, तो कोई इनके उद्योग को सराहते है कोई ' इनको
सरलता की पूर्ति मानते हैं, तो कोई इनके निरभिमानी होने
के गात गाते है । परन्तु हमारे मन में सर ऊपरी गुण है।
और इस सम्बन्ध की कुछ बातों में क्मिी किमी का मान्यवर
गोखले महोदय से मत भेद हो सकता है। ये सारे गुण और
पत्र्तृत्व शक्ति जिस एक अान्तरिक सद्गुण से उत्पन्न होते हैं,
बस गुण के सम्बन्ध में मतभेद होना बिलकुल सम्भव नहीं।
और वहागुण "निस्वार्थ अन्त करण से अपने प्राप
को, देश सेवा मे अर्पित करदेना है।"याय काल
* मराठी-"कैमरो" रोप का यह अंग कानपुर "प्रताप से
सात किया गया है।
-

सच्चा स्मारक और शिक्षा ६३ में अभ्यास और युवाकाल में संसार सुख समाप्त करके अपनी शारीरिक श्रोर मानसिक शक्तियों के कर्तव्य शन्य होने पर लोक कल्याण के मार्ग में प्रानेवाले पुरुष मिले भी तो वे कुछ विशप प्रादर के पात्र नहीं है परन्तु जब इन्द्रिया बल से भर रहा है, शरीर में सामर्थ्य लहरे मार रहा है, वृद्धाप स्था करपना में भी नहीं दीखती है। सामर्थ्य ससार के सुप सम्पत्ति को घसीट लाने में एक भारी से भारी उद्योगी से कम नहीं है, ससार के आनन्द का रूप मनाहर रत्न सा दीखता हुना चित्त की वृत्तियों का सहज ही में खींच सकता है- पेसी अवस्था में और विशेष कर ऐसे ससार के सुख साधनों के मागों में से सुख भोर सम्पत्ति मिलने का दृढतर विश्वास हात हुये भी इन मा मनोहर दृश्यों पर से दृष्टिको बलपूर्वक पीछे हटा लेना और अपनी शक्ति से देश सेवा में लग जाना ओर उसमं आई हुई आपत्तियों के सहने में आनन्द मानना और इस भगीरथ प्रयत्न क लिये एकनिष्ठा से सतत परिश्रम करने को तैयार रहना, इन सर तपस्यायों के लिये मनो. निग्रह की पारश्यकता हुश्रा करती है। और इस प्रकार का मनोनिग्रह जिस पुरुप ने सतार में दिखाया वह धन्य है।" वास्तव में हम भी "केमरी के शब्दों में यही कहेंगे कि मि० गोपले में यही गुण था। वे निस्वार्थ भाव से देश सेवा में जुटे हुये थे। जो लोग यह समझत है कि युवावस्था में हम नौकरी चाकरी करले वृद्ध होने पर पेन्शन लकर देश की सेग करे गे ये भूलते हे भला कहीं तय देश सेवा हो सकती है बर सारे अंग शिथित पटगये है विवेक श्रोर विचार शक्ति का हास होगया है मस्तिष्क की सब शचियाँ निकम्मी पड़ કરે महात्मा गोखले . हिन्दुस्तानी समझ । वास्तव में हम लोग गोखले का सच्चा स्मारक बनाना चाहते हैं, तो हिन्दू, मुसलमान का भाव त्याग करके, आपस के व्यर्थ लडाई, भागों को लात मार कर देश सेवा का बीड़ा उठावें । भारतमाता की सेवा का व्रत ग्रहण करें। धर्म सम्बन्धी मत भेदों पर न लड कर भारत माता की पूजा और স্মাগনা हो अपना कर्तव्य समझे। महान्मागोखले का जीवन अपने देश की सेवा करने को बड़ी भारी शिक्षा देता है। यो तो गोसले की मृत्यु पर सभी एदलो इण्डियन और देशी अखबारों ने शोक प्रकट किया है पर पूना के "केसरी" असनार (लाकमान्य तिलक का पत्र है ) अपना विचार पूर्ण सम्मति प्रकट की है, उसने गोखले के अनेक गुणों का उल्लेख करते हुए लिखा है -"कोई इनकी बुद्धिमानी की प्रशसा करते हैं, तो कोई इनके उद्योग को मराहते है . कोई इनको सरलता की पूर्ति मानते हैं, तो कोई इनके निरभिमानी होने के गात गाते है । परन्तु हमारे मन में सव ऊपरी गुण है। ओर इस सम्बन्ध की कुछ बातों में किसी किसी का मान्यवर गोसले महोदय से मत भेद हो सकता है। ये सारे गुण और कर्तृत्व शक्ति जिस पक श्रान्तरिक सद्गुण से उत्पन्न होते है, उस गुण के सम्बन्ध में मतभेद होना बिलकुल सम्भव नहीं। और यहागुण "निस्वार्थ अन्त करण से अपने साप को, देश सेवा मे अर्पित करदेना है।"यात्य काल * मगठी-"सरी" लेस का यर श्रेश कानपुर फे घृत किया गया है। . प्रताप

सच्चा स्मारस और शिक्षा
में अभ्याम और युघाकाल में ससार सुप समात करके
अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों के पतन्य शन्य होने
पर लोक कल्याण के माग में श्रानेगाल पुरुष मिल भी तो
ये युद विशव आदर के पात्र नहीं है परन्तु जब इन्द्रिया चल
म भर रहा है, शरीर में सामर्थ्य नहर मार रहा है, वृद्धाय
स्था करपन्ग में भी नहीं दीमती है। सामर्थ्य ससार के सुख
सम्पत्ति को घसीट लाने में ए भारी स भारी उद्योगी से कम
नहीं है, ससार के अानन्द का समाहर रत्न सा दीखता
दुश्रा चित्त की वृत्तियों का सहज ही में खीच सकता हे-
ऐमी अास्था में और विशप कर ऐसे ससार के सुख साधनों
के मार्गों में स सुम्पोर सम्पत्ति मिलने का दृढतर विश्वास
हाते हुयं भी इन सर मनोहर दृश्यों पर से दृष्टिको बलपूर्वक
पीछे घटा लेना और अपनी शक्ति स देश सेवा में लग जाना
और उसमें भाई हुई धापत्तिया के महने में आनन्द मानना
और इस भगीरथ प्रयत्न कलिये एकनिष्ठा से सतत परिश्रम
करने को तैयार रहना, इन सब तपस्यायों के लिये मनो-
निग्रह की श्रावश्यकता हुआ करती है। और इस प्रकार का
मनोनिग्रह जिस पुम्प न सतार में दिखाया यह धन्य है।"
वास्तव में हम भी "केसरी" के शन्दों में यही कहेंगे कि मि०
गोसले म यही गुण था। निस्वार्थ भाव से देश सेवा में
सुटे हुये थे। जो लोग यह समझत है कि युवावस्था में हम
नोकर चाकरी करलें वृद्ध होन पर पेन्शन लकर देश की
सेवा करे ग चे भूलत ह भला कही तब दश सेवा हो सकती
हे जर सारे प्रगशिथिल पड़गये है विवेक और विचार शक्ति
का हाम होगया है मस्तिष्क की सव शक्तियाँ निकम्मी पड़
।

महात्मा गोखले
गई हे। युगवस्था में जो स्वाभाविक उत्साह होता है ,
क्षीण होगया है। ऐसे लोग जो देश सेवा करना चाहते हे
भूलते हे । हमने ऐसे कितने ही व्यक्तियों को देखा है कि
चे गुलामी की वेडी काट कर किसी देशा संस्था में घुसते
जब उस सस्था के पवित्र उद्देश्य में सस्था के सुयोग कर्मच
रियों के कतव्य पथ में कुछ ऐसी अडचनें उपस्थित कर द
है जिससे उस सस्था को लाभ हान के बदल उलटी हा।
होती है। यदि गाखल महोदय यह सोचते कि युवावस्था
धन उपार्जन करल वृद्धावस्था में दश का कुछ कार्य कर
तो कदापि उनको इतनी सफलता प्राप्त नहीं होती। मनु
का हृदय और मस्तिक सदन उसको परिस्थिति के अनुसा
होता हे एक क्लर्क को चाहे जितना अधिक वेतन पयों
मिलता हो पर उसका हृदय उच्च नहीं हाता वह सदेव यह
सोचा करता है कि हमारा स्वामी मुझसे नाराज न हाजा
मुझे कहीं स रिश्नत मिले मेरा इतना वेतन हाजाय यही बुनि
उस सवार रहती है । पर एक पत्र सम्पादक का हृदय HिE
ही हाता है वह सोचता है कि दश को परिस्थति क सुधार
के लिये किन २ प्रयत्नों की आवश्यकता है अमुक स्थान
अत्याचार हुआ है उसका कंस प्रतीकार किया जाय ?
जिस हृदय में ऐस पविन भान हो वही स्व देश सेना क
चत प्रहण कर सकता है पिडाल वृत्ति करनेवालों का न ता
हरय ख दशी हा सकता है न दश सेवकों का महत्व समभ
सकते है। गासले.महोदय के जावन से हमको यह शिक्षा
प्राप्त होती है कि दश सपा के लिये पवित्र विचारआप पवित्र
हृदय की श्रावश्यकता है। जिनके जीवन का यह मत है कि

सच्चा स्मारक और शिक्षा
पू
साधो, पिप्रो और चेन उडामोघे कदापि देशसेवा के पवित्र
भाव का अवलम्बन नहीं कर सकते हे । राजा मानमिह
ओर महाराणा प्रतापसिह दानो ही राजपूत ये दोनों ही वीर
थे दोनों ही के जीवन का अधिकाश भाग पडे बडे भयङ्कर
युद्धो में बीता था। पर इतिहास के पाठकों से यह अधिदित
नही है कि दोनों के हृदय में कितना अन्तर था जय महाराणा
प्रतापसिह न अपनी जन्मभूमि के उद्धार के लिये अनक कष्टों
का फूलों के समान धारण किया था तब राजा मानसिह ने
मुगल सम्राट अकवर की शक्ति का निस्तार करना हो अपना
कत्तव्य समझा था यह अन्तर परिस्थिति के अनुसार अपने
हृदय और मस्तिष्क बनान का था। हमार कहने का तात्पर्य
यह है कि सस्थाशो में जिस हृदय के मनुष्य पहुचते है, उस
हदय क अनुसार ही अच्छी से अच्छी संस्थाश्रा की दशा हा
जाती है । यारजीवन " जी पुजूर " कहनेवाले सस्थानी में
पहुच कर उनके प्रतिष्ठित कमचारियों से, ऐसे कर्मचारियों
स जिन्होंने अपनी समस्त हानि लाभ का परित्याग करक
अपने से सम्बन्ध रखनेवाली संस्थानों की सेवा का उच्च
श्रादर्श अपने सामन रखा ह उनसे विडालवृत्तिवाले जेसा
पहल 'जीहुजूर" कहते रहे है कहलाना चाहते हे ।यहो कारण
है कि भारतवप की बहुतसी सस्थानों के कार्यकर्ताओं में
मतभद हो जाता है, क्या मि० गोपल के जीवन से "जीहुजूर"
फाहलानघाले कुछ वोध प्राप्त नही कर सकते है।
मिस्टर गोखले सच्चे साधु और सन्यासी थे अवश्य ही
श्राजफल
के साधु ओर सन्यासिया फी भाति भगरे वस्त्र
नहीं पहनते थे। हाथ में कमडल नहीं रसते थे तुम्या नहीं
.

महात्मा गोखले
बाधते थे, पर सन्यासका जो लक्षण त्याग है वह उन्होंने सहर्ष
देश सेवा क लिये अवलम्बन किया था और यावजीवन अपने
श्रादर्श से टल नहीं । सुगत है, एकवार पकवुढिया ने उनसे
पूछा था-श्राप इतने बडे आदमी होकर ७०) ७५) रुपया
मासिक से अपना कैस खर्च चलाते है इसपर मिस्टर गोसले
न बुढ़िया से कहा -"मुझ श्राश्चर्य,ह', कि श्राप ऐसा प्रश्न
करता है । दश में ऐस कितने ही पुरुप हे, जिनको दिन में दो
बार पूरा भोजन भी नहीं मिलता हे में तो समझता है कि मेरा
यह बहुत ज्यादा खर्च है । बुढिया यह सुनकर लजित
और चुप होगइ। क्या यह सच्चे साधु और सन्यासियों के
लक्षण नहीं ह?
महात्मा गासले के समस्त परिवार के ऐसे ही विचार ,
है । कलकत्ते के प्रसिद्ध अखबार " अमृत बजार-पनिका" ने
गोसले की मृत्यु के पश्चात् यह चाप दिया था कि व अपन
परिवार को अच्छी प्राथिक स्थिति में नही छोड़ गये है, उनके
परिवार की अधिक स्थिति अच्छी नहीं है । इस पर चारों
ओर से लोग उनकी लडकियों का धन से महायता करने को
तैयार हुए । परन्तु लडकियों ने किसी से आर्थिक सहायता
लना स्वीकार न किया और कहा -"हमारे पिता, हमको
ऐसी स्थिति में नही छोड गये है, जो हम किसी से सहायता
* भारते दु बापू हरिश्चन्दने ऐसा ही प्रश्न, पडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
की माता से किया थामिमाजी विद्यासागर की माता के हाथ चिना गहने
के कुछ गोभा नहीं देते इस पर विद्यासागर की माता ने कहा -' बेटा।
विद्यासागर की माके हाथ गहने से शोमा नहीं पाते, परन्तु भूखों को दान
देने से इन शापों को शोभा है।
प

मन्या म्माम श्रोर शिक्षा 1 प्रहण करें। उन्हॉन जो अङ्कगणित की पुस्तक लिखी है उससे हमका १२० । पक मां पीस रुपये मासिक श्रामदनी है, जो हमारे स्त्रर्च के लिये यथेष्ट है।" क्या गोग्यले महोदय की पुत्रियों का यह इप्टान्त नहीं बतलाता है कि उन्होंन अपने समस्त परि बार कात्याग की शिक्षा दीथी ।यदि उनकी पुत्रिया चाहती तो य इस मयय कमसे कम पलासरुपया एकत्रित कर मफती था, परन्तु नहा उन्हाने एमा नहीं किया। उन्होंन अपने व्यक्ति गतम्वार्थ के लिये अपनी जाति का कटनीदना चाहा है । देश क काय्या के माने पब्लिक से चन्दा उठा करके चन उडान गाल क्या गावल को पुनिया से शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकत है ? मन एक सम्धा के कार्य सञ्चालकों को रखा है जो अपने काय के लिये तो थट या इन्टर क्लास में यात्रा किया करत ह पर जय उन्ह पबलिक श्रर्थात् ममाधारण क कार्य के लिय जाना होता है ता य समेण्ड काम मै यात्रा करते है कभी कमा वे लोग अपने शिष्या स गुप चुप अपना म्बर्च चलान + लिय भेंट ले लिया ग्ते ह और कहते है कि हमारे पहले समय का कर्जा चला आता या वह भाया है। हमारे पेमे 'नेताओं या कार्यकर्ताओं को गोगले महोदय की निस्सहाय पुत्रियों का उदाहरण इस विषय में अनुकरण करना चाहिये । चाम्तन में गोखले महादय न देश सेवा के लिये जैसे धन पर लात मार दी थी धमे ही उन्होंन मान प्रतिष्ठा की भी पर बाह नहीं की था। पिछले दिना में समाचार पत्रों में छपा था कि लाई धार्टि ने गोखलको मा० आई० ई० को उपाधि प्रदान करने के लिये सम्राट को लिया था, सम्राट न गोम्पत ।

E- महात्मा गोयल महोदय को उस उपाधि देना स्वीकार भी कर लिया था, वाकी पुरस प्रजाशित होनेवाले एक दैनिकपत्र ने इस पर लिखमारा कि यह गप्प परन्तु या गप्प नहीहै पीछे ज्ञात दृश्रा कि यह पान मच थी । परन्तु मि० गोखले न उसको स्वीकार नहीं किया क्योकि बडे लाट लार्ड हार्डिअन उनकी मृत्यु पर शाक प्रकट करत हुए इसका अपनी वक्तृता म जिक्र किया है। मी कितनी हा वाते हैं कहा नक कहे ? गोग्गल इम ससारमें नहीं है पर व अपनी एसी कितनी ही बातें शट गय है जिनसे हम पग पग पर शिक्षा ग्रहण कर सकत है । कहा तक गिनावें। इस लिये हम उन माता का छोडकर अन्त में हम श्रीमती मरोजिनी नायडू के एक लस म म कुछ अश उद्भुत करते ह जिम्मसे पाठकों का मिस्टर गावल की मह. दयता का कुछ पता लगगा । श्रीमती मगेजिनी जी का उक्त लेन-अम्बर के "कानीकल" अस्वधार म छपा है । इम लेग्य के प्रारम्भ में सरोजिनी देनी गोखले महादय के पत्र से यह वाक्यउद्धृत करती है -मैं चाहता है कि मे आपके पास इतना होता कि स्त्रय भाकर आप से मिलना मुझे विश्वास है कि आप का शाक गीतों द्वारा प्रकट होगा और ये गीत न रहेंगे।" सग जिनी जी कहती है कि मिन्टर गोखले यह सुन्दर शब्द ११ फरवरी को लिये गये थे । उपर्युक्त शब्दों से प्रत्यक्ष में कोई ऐसी बात प्रतीत नहीं हाती कि उनकी मृत्यु इतनी नि फार है। यह पन मुझको अपने बाप के श्राद्ध के दिन मिला या" कहिये, पाठक। आपने नहुत म योगियों की कथाए पढी श्रमुष ने अपनी मृत्यु का समय इतन दिन पहल यतला नामक -

मच्चा म्माग्म श्रोर शिक्षा
h
दिया था स्या मिस्टर गाग्वल के दम पन में यह पनि नहा
निकलता है कि उनको प्रपन अन्तिम समय का पृछ प्रामास
मा होगया था । यदि इन्हें अपन अन्तिम समय का कुल
श्रतुमान न हातानो पम शब्द या लियत ?
श्रीमती नगजिना नायडून इम लप म ए स्थान पर
लिग्वा हे -"मिक गागत स मेग व्यक्तिगत सम्बन्ध पम पर
द्वारा इश्रा पार उसकी समाप्त भी पत्र द्वारा ही दुई । मन
7807 मारने की ममम्न भारतीय सामाजिक कान्फ
रनम म ग्गी शिक्षा मन्धी प्रस्तान मुभाको मापा गया था,
मन इग्न प्रम्बार को उपस्थित करते समय कुछ पने वाफय
यह य जिनक मिस्टर गाग्वाले पर अच्छा प्रभाव टुथा उन्हान
शीघ्रता में मुझ रड प्रेम पूर्ण वाक्य लिगे । यद्यपि में श्रपन को
पैमी प्रथमा अर्थात गाठले न जो कुछ लिया था अयोग्य
मममनी । तथापि मलिये उद्धृत करती हैं कि इसन
हमारे भविष्य सम्बन्ध का सूम्रपान हना था
उन्होंन लिम्बा
था-क्या मान्न मम्मान प्रारमन्चं दृदय म श्रापका
यधाइ मयता है। आपकी पत्त ना म अत्यन्त ऊची श्रेणी
बुद्धिमत्ता पूर्ण विचार की अपना अधिक विशपता था
शरण मात्र को हम सरन यही समझा था कि हम सब
नगला में महामा,गोग्वल इन श दो मशान होता
है कि कार्य करनेवाल को दिम भाति उन्माहित किया
करते थ । उनके न सब गुणों न लिये श्राग माग दश रो
आश्रा । पाठ ॥श्राश्रा । हम महात्मा गोम्बल के
जीवन म मर शिनाप ग्रहण के-अपना श्रादर्श जीवन
चना - महात्मा उद्देश्यों का प्रचार करके उनकी प्रामा

महात्मा गोयले
को शान्ति प्रदान करें । यस अन्त में यही प्रार्थना हशि गोयल
महोदय जेमं क्रियाशील महात्मा का इस देश में पुनः जन्म
हो, उनकी मृत्यु से इस देश में क्रियाशील पुरुष का और मई
नता का, जो श्रामन पाली हुश्रा है, वह पूर्ण हो गोम्बले के
कमी किमी तरह से दृर हा । यही हमारी हार्दिक इच्छा है ॥
1
॥ति ॥
.
AUGARCHARD BHAIRCDAN SETHIA.
JALV LIBRARY,:
BIKANE .
सगरचंद भैसेंशा सेठिया
ओम प्रशालय
तीमा (merry
-
-

1 सोङ्कार बुकडिपो (पुस्तक भंडार) प्रयाग। मय मजनों की मैचा में निप्रदन है कि आकार चुकडिगो नमक पक वृहत पुस्तकालय प्रयाग में बोला गया है। जिम हिन्दी साहित्य को मा प्रकार की पुस्न निक्रयार्थ रयी तान्यायो नया स्त्रियों के लिय नो जा मग्रह इस नकालय में किया गया है चेमा शायद मार भारतवर्ष 7 मैं न होगा । चालक नोर पालिकाको इनाम देनेरे लिये प्रकार की उत्तम और शिक्षाप्रद पुस्तके यहा मिलती ह न्य कक्षा के हिन्दी माहित्य प्रेमियों के लिये तो यह पुस्तया य भण्डार हो है। यही नहीं इस पुस्तालय का अपना न मा हागरजी हिन्दी और प्रकार का टाइप जूद है। इसमें हिन्दी भाषा की उनमात्तम पुस्तके छापी जा डी ह । हिन्दी भाषा के लेखक जा उत्तम पुस्तक म्वतत्र लिग अनुवाद करें गोर प्रकाशन का मार ओंकार बुकडिपो को ना चाहे वे कृपा करक मेनेजर से पत्र व्यवहार करें। कमीशन जंट जो हमारी पुस्तक बेचना चाहते है वे भी पत्र व्यवहार रें उनको उचित कमीशन दिया जायगा । मेनेजर-मोकार बुकडिपो, 'प्रयाग कन्या-मनोरजन एक अनोखा सचिनः मासिक पत्र कन्याश्री तथा नरधुओं के लिय कन्या मनोरजन एकही. द्वितीय सचित्र मासिक पत्र है। यदि श्राप को अपनी त्रिया पहिनों नया नमधुओं को विद्यावनी, गुणपनी मधुर- রাবিয়া श्रार मदाचारिणी बनाना है नो श्राप कन्यामनोरजा मनश्य मगाइये । मुल्य भी ऐसे उत्तम मामिक पत्र का केवल ॥) स्पोरल है हाक महसूल सहित माढे ६ पसे मासिक पडते है। मेनेजर-कन्या-मनोरञ्जन प्रयाग । १ ।

- H ओकार मादश-चरितमाला, सजनों को विदित हो कि कार प्रेस प्रयाग ने ससार भादर्श पुरुषों के जीवन चरित निकालने भारम्भ कर दिय है। प्रत्य जीवन चरित का मूल्य केवल आना है। प्रत्येक जीवनचरिन में, लेफर लंगमग १५४ पृष्ठ तक होते हैं और चरितनायक का पक सुन्दर चित्र भी दिया जाता है। प्रत्येक माम में लगभग दो जीवनचरिन निकाले जाता है डिर प्रकार ४०० जीवनचरित निकाले जायगे। यदिीप अपनी तथा अपने बालक तथा बालिकाओं की उन्नति चाहते हैं तो आप पढिये, और अपने बच्चों को पढाइये । जा लोग - भाना भेजय प्राकार प्रादर्श-चरितमाला के ग्राहकों में नाम लि लेगे । उनका i) कीमत की जीवनी क्येल) ही आने मिलेंगी। प्रत्येक मास में दो जीवनचेरिन में मय धी पी और हाफ महमूले के घर चॅट पढुंचग 1 ग्राहका को इसमें, प्रकार का सुभीता है एक नो पुस्तके डाक से मारी ग जावेगी। सरे समय पर लपने ही तरन्त मिल जाया करंगी" छपे हुंथे जीवन चरित म्वामी विवेकानन्द -)- महात्मा गान्धी वामी दयानन्द-15-मिग्लंडस्टन : ३-मामागोम्बले)-१३-पृश्वीराज चौहान, Hry-समर्थ गुरु रामदास ४-महात्मा टालटाय स्वामी रामनीर्थ, '' -- श्रीमती एनी येमेन्ट महाराणा प्रतापसिह ।। दादाभाई नौगजों -श्रारमवीर मुकरान गुळे गोविन्द्रसिह, सागर -नेपोलियन बोनापार्टी धर्मशार पलेवरमा मेनेजर प्रकार, प्रेम, प्रयाग " - HAR 19. ईश्वरचन्द्र

Mahatama Gokhale

Author
Sharma,pt.nand Kumar
Title
Mahatama Gokhale
File name
Mahatama Gokhale
Text
OCR done
Citation
1904
Published
2011/01
Publisher
Onkar Press Prayag
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546609
Barcode
4990010025067.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
7TlV5SrCvH9
Download PDF

Mahatama Gokhale