Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Prabhav Sali Jivan
Front matter
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हिन्दी-अन्य रत्लाफरका ७६ या ग्रन्य व्यक्तित्व अर्थात् प्रभावशाली जीवन और उसकी प्राप्तिका मार्ग श्रीमती लिली एल० एलनके — Personality Its Culti Vation and Power and How to Attain " नामक ग्रन्थका अनुवाद। अनुवादक - वायू माईदयाल जैन, बी० ए० ( आनर्स ) प्रकाशक- हिन्दी-ग्रन्य-रत्नाकर कार्यालय, वम्बई आश्विन, १९८८ वि० अक्टूबर, सन् १९३१ ई. हिली चार [ मूल्य बारह आने
प्रकाराक,
नाथूराम प्रेमी,
हिन्दी-अन्य-रलाकर कार्यालय,
हीराबाग, गिरगाव-चम्बई
-
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रघुनाथ दिपाजी देसा
न्यू भारत प्रिंटिंग प्रेस,
कांदेवाडी, मम्माईन ४
अनुवादकका वक्तव्य हिन्दी-ससार सुप्रसिद्ध लेखक महात्मा जेम्स एलनके नामसे स्व परिचित है। क्यों कि उनकी बहुतसी पुस्तकोंका हिन्दी अनुवाद हो चुका है । उनकी पुस्तकाम कुछ ऐसा जादू है कि उनके पाठसे मृतप्राय आत्मामामें भी जीवन मा जाता है और हतोत्साह आदमी भी उत्साही वीर बनकर कायक्षेनमें उतर जाता है । यही कारण है कि उनका ससारका समस्त उन्नत भाषाओंमें अनुवाद हो चुका है और युवक-ससारम बडा सम्मान है । प्रस्तुत पुस्तक उन्हीं महात्माकी विदुषी धर्मपत्नी श्रीमती लिली एल० एलनकी प्रसिद्ध रचना ' Personality Its Cultivation and Power and How to Attain ' अनुवाद है । इसे पढकर पाठक आश्चर्यके साथ देखगे कि श्रीमतीजीकी विद्वसा, विचारशीलता और लेखनपद्धति ( Style) बिल्कुल अपने पतिके टक्षरकी है। पाश्चात्य देशोंम गुण कम स्वभावके अनुसार पति-पत्नीके चुनावकी जो पद्धति प्रच- लित है, उसका यह एक उज्ज्वल पहलू है । जिस दिन भारतवर्षके लेखकों, कविया, नेताओं तथा वैज्ञानिकाकी धर्मपत्नियां भी उन्हींके अनुरूप होंगी, वह दिन भारतके लिए धन्य होगा। खैर, यह तो विषयान्तरकी बात हुई। प्रस्तुत पुस्तकका विषय क्तिना उपयोगी और महत्वपूर्ण है, इसको मूल लेखिकाके ये वाक्य अच्छी तरह प्रकट करते हैं-" व्यकित्व ही समस्त सफलता. आका आधार है बल्कि हम कहना चाहिए कि समस्त सफलताओंका मूल ही यह है। हम प्रत्येक स्थानपर देखते हैं कि व्यक्तित्वयुक्त स्त्री पुरुष ही धन, उपाधियाँ, कुलीनता और यश प्राप्त करते है । शक्ति और प्रभावको सूचित करनेवाली प्रत्येक वस्तु व्यक्तित्वके सामने झुक जाती है । व्यक्तित्व दिनका अभी सुप्रभात ही है। उन स्त्री पुरुषोंको अवश्य ही व्यक्तित्व प्राप्त करना होगा, या यों कहो कि अपने जीवनको प्रभावशाली बनाना होगा, जो कि भविष्यमें अपने साथियांके यास्ते लाभदायक होना चाहेंगे और जो शक्तिसूचक, प्रभावशाली और महान् पदों प्रहण करेंगे।
- - प्रकृतिका यह भटल नियम है कि जैसी जिसकी भाषा होती है, वह वैसा ही धन जाता है। ऐसा क्या होता है, इसका विस्तृत विवरण इस पुस्तकम मिलेगा। इसके पाठसे विदेशाके लासा नवयुवक अपनी मनोकामनाआको पूरा करनम समय हुए है। हमारे देशफे नवयुवक भी अपनी सर्वांग उन्नति कर सक और अपने जीयनसे प्रभावशाली बना सकें, इसी उच्च भावनासे यह अनुवाद किया गया है । पुस्तकके दो राण्ड है । प्रथम सण्डमें व्यक्तित्वरी ब्यास्या, उसका महत्व, प्रभाव, तथा उसके आवश्यक पहलू यताये गये हैं और दूसरे खण्डम व्यक्किन्व. प्राप्तिका या प्रभावशाली जीवन मनानेका माग प्रदर्शित किया गया है अनुवाद यद्यपि स्वतमताके साथ किया गया है, परन्तु पडी सावधानीस । मूर के भायोगी रक्षाका पूरा ध्यान रखा गया है । इसमें मुझे यहाँ तक सफलता हुई है, इसे तो वही विद्वान् घता सकेगे, जा इससे मूल पुस्तके साथ पटग । इस पुस्तके अनुवाद पण्डित गयरामजी प्रेमीरी सम्मतियासे मुझ अत्यत अधिक सहायता मिली है । भापारा सशोधन भी उन्होने दिया है, जिसके लिए मैं उनका यहुत भाभारी है। इस पुस्तकको पाठकाके सामने लानेका श्रेय प्रेमीजी अतिरिक्त यदि किसी दूसरे व्यक्तिको दिया जा सकता है, तो वह भाई अजितप्रसादजी जैन घी० ए० को, क्या कि उनकी ही प्रेरणाका यह फल है। यदि पाठक पाठिकानि इस पुस्तक्मे लाभ उठाया, तो मे अपने परिश्रमको सफल समझेगा । क्याडी बाजार अम्बाला छावनी -माईदयाल जेन १७ अक्टूबर, १९३१ विषय-सूची प्रथम खण्ड पृष्ठसख्या २१ २७ ३२ કર ४७ १ व्यकित्व २ सम्यविश्वास ३ आत्म-ज्ञान ४ श्रुति-ज्ञान ५निश्चय और तत्परता ६ मात्म विश्वास ७ परिगामिता ८ सद्व्यवहार ९शारीरिक सस्कार १० मानसिक सस्कार २१ नैतिक सस्कार १२ आध्यात्मिक सस्कार द्वितीय खण्ड १ आत्मानुवीक्षण २ मुक्ति ३ आत्म विकास ४मात्म-सयम और मानसिक समता ५स्वतन्त्रता ६ परिवर्तन ७ समतोलता ८मनन और ध्यान ६२ ६७ १०७ ११२
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हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर
इस सुप्रसिद्ध प्रन्थमालामें अब तक ७७ प्रन्य
प्रकाशित हो घुक हैं, जिनकी विद्वानाने भूरी भूरी
प्रशसा की है। प्रत्येक लायब्रेरीम इसका एक सेट
अवश्य होना चाहिए । एक कार्ड लिखकर सूचीपत्र
मॅगाइए।
खचालक - हिन्दी-अन्य रत्नाफर-कार्यालय,
हीरावाग, गिरगाँव, था।
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समर्पण
स्वर्गीय लाला रतनलालजी जैन, सोनीपत,
परम मित्र,
आपका प्रकट तथा अप्रकट रूपसे जो प्रभाव
मुझपर पड़ा है, उसे लिखना अत्यन्त कठिन है।
मुझे यह स्वीकार करनेमें जरा भी सकोच नहीं
है कि आपकी दस बारह वर्षकी सगतिसे मैंने
बहुत कुछ प्राप्त किया है । इस पुस्तकके अनुवाद
करनेमें भी आप एक बड़े कारण थे, परन्तु
शोक
है कि आप इसको साहित्य-ससारमें नहीं देख
सके, इसके प्रकाशित होनेसे पहले ही हमसे जुदा
हो गये। अत आपके प्रभावशाली जीवन' की
पवित्र स्मृतिमें यह साधारण सी भेंट बड़ी श्रद्धाके
साथ समर्पित है।
आपका-
माईदयाल
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प्रारभिक कथन पहुत समय तक हम द्वार द्वारके भिसारी रह चुके है और असत्यका ही प्रमसे सत्य समपर उसपर विश्राम करत रहे है । हम तो राजाआरे भी अधिराज परमात्मा सन्तान राजकुमार और राजकुमारियों-है। अब हम दर दरकी मिक्षा न मागगे। न झुकझुक्कर दास भावसे प्रणाम करगे और न रिसीस प्राथना वरगे । अब हम अपन उन परमात्मीय गुणाम प्रवेश करग, जा कि हमारी पैतृक सम्पत्ति है । आओ, हमारे सामने साका दरवाजा खुला हुआ है । फिर हम दरवाजेपर हा क्या सडे रह ! जय स्वय परमात्मा हम निमत्रण देता है तर हम याहर क्या पड़े रह हम जीवनर वास्त हा नहीं, परन् अत्यत जधिक विशाल जीवनके वास्ते पुकारा जाता है । मरा या धार्मिक भावना है कि यह पुस्तक महान् पयक भटक्त हुए पथिकाया उनकी समस्त वास्तविक सत्ता आका पूर्ण अनुभव परानम तथा उन्ह यह याध करानेम कि ससारम वे क्या बन सकत हे एक पथप्रदशक प्रशाशका काम दे। 2 -लिली एल० एल्न
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प्रभावशाली जीवन प्रथम खण्ड “ १-व्यक्तित्व त्रुटिपूर्ण व्यक्किल हरएर स्थानपर हानिकारक हाता है । --निदा । 'जाय, थोडा है । यह सारी सफलताऑफा आधार और जारी सफलताओंकी जड ह । स्त्रियों ओर पुरपाको आप ससारके फेमी भी क्षेत्रमें देखिए, व्यक्तिन्यके विना ये प्रत्येक स्थानपर असफल होते है। उनकी मनोकामनाएं पूरी नहीं होती। फिर यह कितने आधर्यकी बात है कि हम अपन व्यक्तित्वको समझने की परवाही नहीं करते, इस ओर ध्यान ही नहीं देते । माता- पता अपने बच्चोंकी शिक्षापर सूब धन लुटाते हैं, किन्तु क्या उन्होंने कभी इस घातको सोचनेकी चिन्ता भी की है कि जिस चे गेग शिक्षा समझते है, यह वास्तवमें क्या वस्तु है ? यदि जरा नी गहरी दृष्टिसे देखा जाय और कुछ विचार किया जाय, तो मालूम हागा कि वों और नवयुवकोंको ऐसी ऐसी बाते रटा इना ही आजकलकी शिक्षा है, जिनका आदमीके अमली जीवनसे ना तो बिल्कुल ही सम्बन्ध नहीं होता अथवा यहुत ही कम होता है। कभी कभी तो यह भी देखा गया है कि इस शिक्षाके देते १ प्रमावशाली जीवन- - समय पचोंके व्यक्तित्व चिह्नाको ही दवा दिया जाता है और उन्हें कृत्रिम सहायताओं, परावलम्पनों और निर्वल सहारोंके भरोसे पीछे फेक दिया जाता है। बच्चाको आरम्भसे ही इस प्रकार जकड दिया जाता है और इस प्रकारके शब्द हर समय उनसे कहे जाते है, जिससे उनकी शक्तियोंका पूर्ण रूपसे विकाश ही नहीं हान पाता है । इस प्रकारका व्यवहार पच्चोंफी आत्मामोंके उस भागको नष्ट कर देता है, जिसे व्यक्तित्व कहा जा सकता है । जिस प्रकार एक मूर्ख माली किसी पौधेको हर समय काट-काटकर उसे बदन नहीं देता है, उसी प्रकार यदि दुसरे यादमियोद्वारा बच्चोंका हर समय विरोध हो और उन्हें अपनी आन्तरिक न्याय-बुद्धिको व्यवहारमें लाने तथा विकसित करनेका अवसर न दिया जाय, तो उनके लिए दुर्यल तथा पराव लम्पीके सिवाय और कुछ बनना असम्भव है। इस दंगसे बच्चों के आरभिक अधिकारोंका गला घोंट दिया जाता है, फलियोंको गिलनेसे पहले ही तोट-मरोडकर मिट्टीम मिला दिया जाता है और यच्चोंका व्यक्तित्व ध्रुटिपूर्ण और दुर्बल बना दिया जाता है। जिन बच्चोंको 'डौवा'भूत प्रेत' और 'पायाजी' का डर हर घडी दिखाया जाता है और जिनके मिरपर धमकी और मारका भूत हर समय सवार रहता है, वे क्या शूरचीर बनेंग? नये नये कामामें हाथ डारनेका व क्या साहम करेंगे' यद्यपि इस महान् पापके लिए यच्चोंक माता-पिता सदा उत्तरदायी नहीं होते, फिर भी छोटे छोटे यच्चाको प्रभावशाली तथा शक्ति मम्पन्न न यनाकर यारम्भमें ही उनको जीवनीशक्तिसे यश्चित करना, उनकी सर्या उन्नत्ति न होन देना और उन्हें दुर्वल तथा शक्तिहील चनाना पाप तो है ही। चालकोंपी आन्तरिक न्याय-युद्धिका किस प्रकार नाश हो जाता है और फिर यह फिम प्रकार पुनरजीयित हो सफती है, इस यातको निससिमित घटनाद्वारा स्पष्ट रूपसे समझा जा माता है।एफ यच्चा था । उसके माता पिता इस यातरो जानते थे कि .
ध्यातिन्य यच्चेके दयमिसालोंको समझनेशी शक्ति पूर्णतया विद्यमान होती। और यदि रच्चेफो अपनी न्याय-बुद्धिको व्यवहारम लाने का अवसर दिया जाय, तो वह न्यभावसे अपन दिन भहितकी यात अच्छी तरह मोच मक्ता है। इसलिए ये दानों याल्याव स्थाने ही अपने बच्चये आन्तरिय गुणा भार शक्तियाको प्रोत्साहित करने, उत्तजना दते, और यदानेना प्रयल फरत थ । मे प्रयत्नमा जा फल होना चाहिए था, यही हुआ। सात वर्षकी छोटीसी ही आयुमें उस बच्चे का व्यक्तित्व दृढ हो गया। वह बिना किसी झिझक, आनाकासी आर दलील पढ निश्चयपूर्वक 'थोर 'हाँ' फहता था। उसके माता पिता उसके पेसले, निश्चय, का सदा आदर करते थे और उसकी स्वीकार करते थे। इसके बाद यह स्कृल्म भरती किया गया, परन्तु वहा जाते अभी योड़ ही दिन हुए थे कि उमस उसकी विना जिझक निश्चय करनेकी यह अपूर्व शक्ति विदा होने लगी। उसकी सुन्दर और स्पट विचार-शक्ति मन्द पड़ गई, मानो उसपर चादर छा गय । महज सहज उसके मुपसे चे निश्चित 'न' और 'हा' निफरने बन्द हो गये, जिनकी सर यादमी प्रशसा किया करते थे।वात यही समास नहीं मुई। उसकी आत्मा गिरने रगी, निश्चय स्थिर फरत समय उसके मनमें झिझक प्रकट हाने लगी और स्पय उसे अपने निश्चयोंकी सत्यताफ विपयम सन्देह होन लगा। मचमुच यह एक यडा भारी दुर्भाग्य था ओर उसके माता पिता भी इसे दुर्भाग्य ही समझते थे। जिस समय यह बच्चा घरपर होता था, उस समय ये उसको अपने निश्चयपर दृढ रहने ओर हर बातम स्वय सोचनेके वास्ते प्रोत्साहित करके उसके इस भयकर पतनको रोकनेका प्रयत्न करते थे। ये केवल पर भी यही सकते थे। मोभाग्यसे पचपनके सस्कारोंने उसके मनपर इतनी गहरी छाप लगा दी थी कि स्कूल छोडनेके बाद शीघ्र ही उसके मनपग्में परावलम्बा, आत्म-मन्देह ओर अपने निश्चयामें अविश्वासके भाव मिटने लगे। उसने अपना व्यक्तिच फिरसे प्राप्त कर लिया। ३ प्रभावशाली जीवन- उसके माता पिता उसके उन दृढ निश्चयोको सुनकर प्रसन्न होत थे, जिनसे आत्माका प्रभुत्व स्पष्ट प्रकट होता है। यह पात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि व्यक्तित्व क्या है। इसके विषयमें हमारे मनमें कोई सन्दह न रहना चाहिए । अभिमान, दुराग्रह, ओर घमण्डस चिल्लाना व्यक्तिन नहीं है। मूर्तताले मनको वाम रसना, दिना निचारे चाहे जो कह देना, अस्पटना और उच्वरताका नाम भी व्यक्तित्व नहीं है। अति- साहसी तथा अतिआत्मविश्वासी वालक अथवा युवक या युक्ती सचे व्यक्तित्वके सिवाय किसी दूसरी ही वस्तु के द्योतक है । ये तो हरएक कामम टाग अजानेवालोंके अज्ञान ओर उनके निकृष्ट सरकारों घोतक होते है। सम्भवतया यदि यच्चोंको उनकी अपनी ही समझपर छोड दिया जाय, तो उनमे ये चाते अपेक्षा कृत कम ही होगी, कारण कि अल्पकारिक अतिसाहसी, आक्र मणकारी, तथा वातनी चञ्चोप न तो कोई प्रेम ही करता है और न कोई जादमी उनकी प्रशसा ही करता है । विकाशमान व्यक्ति त्वको प्रकट करनेवाले कुछ गुण होते हैं, और उनका अभाव व्यक्तित्वकी कमीका सच्चा द्योता है । व्यक्तित्वके अभावको प्रकट फरनेवाले प्रधान जवगुण हठ, वडोंका अनादर, माता पिताकी उचित तथा हार्दिक इच्छाओका उल्धन और अहम्मन्यता आत्म- विश्वासके सर्वथा विरद्ध है । व्यक्तित्व-युक्त आदमीके लिए अपने व्यक्तित्वको दूसरोंको दिसानेको आवश्यकता नहीं है । व्यक्तित्व जहाँकही होता है, वहां यह स्वयमेन ही प्रकट हो जाता है, भार इसके अप्रकट प्रभावको सब ही अनुभव कर लेते है तथा स्वीकार कर लेते है । उसको अधिक बोल्न, अथरा दूसरॉपर सपना प्रभाव जमाने तथा अपने महत्त्वको अकित करनेका प्रयत्न करनेकी भी कोई आवश्यकता नहीं है। कारण कि वह अपने प्रभावशाली मोनके द्वारा ही चे सब गते कह देता है जो कि समस्त अवस्थाओं तथा समस्त परिस्थितियोम अपने आपको सतुष्ट और ठीक प्रमाणित करनेके वाम्ने उसके लिए आवश्यक ४ व्यक्तित्व -- है। वह अपने कार्यमा तथा इन्छाको चिन्ता ही नहीं करता, क्या कि यह स्वय अपनी इच्छाका स्वामी और अपने मार्गका निर्माता है । अपने सुख, आगम और सम्भोगको पूर्णतया भूल कर वह अपने स्वभाव तथा प्रकृतिले उन आदमियोको सुख आर' विश्वास, तथा शक्ति और वैभव प्रदान करता है, जो कि उसके सम्पर्कमे आते है । यह अपने पड़ोका कितना आदर करता हे ओर कितने प्रेम तथा पूर्णताके माथ वह अपने माता पिता, मित्रो तथा साथियोके सुस और आनन्दके वास्त अपने आपको न्यौछा वर करना है और सब ही आदमी समस्त विभागोमे उसकी इन महती शक्तिको कितना शीघ्रताके साथ स्वीकार कर लेते है! एक बार दो कुशल वयोने किसी प्रसिद्ध गान-मण्डलीम किसी पदके वास्ते प्रार्थनापत्र भेजे । उनमेसे एक दुर्वल शकल सूरतवाला तथा हाव भावसे जनाना ओर प्रभावहीन था । वह व्यक्तित्वहीन था। जर वह गान मञ्च या स्टेजपर आया, तव मालूम हुजा कि उसकी आनाज तो अच्छी है, किन्तु उसमें कोई मोहिनी शक्ति और प्रभाव नहीं है। दूसरे आदमीकी आवाज और स्वर हलके ये तथा उनमें उतना रस भी न था, किन्तु वह अच्छा व्यक्तित्व रसता था । यद्यपि उसके शरीरकी रचना अच्छी न थी, तथापि उसके प्रत्यक कदम और चाल्में गम्भीरता, वजन और आत्माधिकार था। उसकी दृष्टि पड़ते ही दर्शकगण उसके प्रभा- वमें आ गये ओर उनको उसके आम विश्वासका बोध हो गया। यह व्यक्तित्वयुक्त आदमी था। उसने वह पद शीघ्र ही प्राप्त कर लिया, परन्तु सुरीली आवाजवाले किन्तु व्यक्तित्व-हीन पहले आदमीफो यहाँसे निराश लौटना पड़ा । अतएव यह ठीक है कि “श्रुटिपूर्ण व्यक्तित्व हरएक स्थानपर हानिकारक होता है। हम अपने जीवनमें प्रतिदिन ही देखते है कि सभा-सुसाइटियोंके शेटफार्मोंपर एक दुवला पतला और मन्द आवाजवाला व्याख्यान- दाता सब श्रोताओंको अपने वशमें कर लेता है, ओर खूब जोर जोरसे व्याख्यान देनेवालोंको इसमें कोई सफलता प्राप्त नहीं प्रभावशाली जीवन- 1 . - होती। बहुतसे वकीलॉकी शकल देखते ही हाकिम उनके प्रभावमे आ जाते हैं और वकीलो पक्षमे फेसला दे देते है, परन्तु दूसरे वकील कानूनी पोयियोंके हवाले देते देत तथा चिल्लाते चिल्लाते यफ जाते है, किन्तु हाफिमपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता और ये विरुद्ध फैसला देते है। प्रत्येक स्थानपर प्रभावशाली तथा व्यक्तित्व-युक्त पुरुषों आर स्त्रियोंको ही सफलता मिलती है, दूसरोंफो नहीं। बहुतसे बड़े ओर प्रतिष्ठित स्त्री पुरपोंके सामने जाते ही आदमी घचड़ा जाता है। परसे जो कुछ सोचकर जाता है, उसका आवा भी ठीक रूपसे उनके सामने नहीं कह सकता । कारण यही है कि ये स्त्री पुरप प्रभावशाली होते है ओर आगन्तुक लोग उनके प्रभावले दर जाते है। कई बार हम सुनते भी है कि अमुक पुरुष रोपवाला तथा प्रभावशाली है । धन, उपाधि, उच्चजम, प्रसिद्धि आर दुसरी ऐसी वस्तुएँ व्यक्तित्वके सामने नहीं ठहर सकती, जिनको शक्तिसम्पन्न तथा प्रभावशाली बनानेवाला समझा जाता है। व्यक्तित्व इन सरस पड़ा है। मध्यकालमे धनी आदमी शक्ति सम्पन्न समझे जाते होंगे । वास्तवमें अपसे कुछ ही पहले धन- घलको सभी मानते थे, परन्तु एक समय आया जर कि लोगोने धनको विशेष सम्मान तथा महत्त्वकी वस्तु नहीं समझा । उसे साधारण तथा तुच्छ वस्तु समझकर ठुकरा दिया। फिर विद्वत्ता- का युग आया, और विद्वत्ताकी पूजा होने लगी । जो आदमी दूसरे आदमियों और दुसरी वस्तुओंके विषयम अधिक चात जानता था, यह धनिक आदमीसे भी जियादा लगान समझा जाने लगा। लोग मानको ही शक्ति कहने लगे। (Knowledge 19 Power ) अर कुछ समयसे शान-चलके स्थानपर वास्तविक शिक्षाफी मानता होने लगी है। निस्सन्देह जिस आदर्माके पास चहुतसी डिगरियाँ है और जो आदमी कालेजोंके चिहरूप चन पहने हुए है, यह सम्मानके योग्य है । किन्तु बहुतसी उपा. धियों-डिगरियोके होनेपर भी यह सम्भव है कि वह आदमी -- - प्यातत्य शिकेपास्तयिफ मयों में शिक्षित न हो। कारण पि विद्वत्ता- माप्ति और यदुतसी परीक्षाफिी पास कर लेनका अर्थ सदा सत्- शिक्षा और सुसंस्कार नहीं होता। किन्तु अर तो मान-यल मी प्यत्तित्वके पलके यारले स्थान छोरता जा रहा है। पर तो व्यति त्ययुक्त पुगप और निया ही ममारम महान् शक्तिशाली है। यद इसका आरम्म मात्र है, इसका यह प्रभातीजीसी- पुगर अपने साथियोंक पास्ते उपयोगी हा चाहते हैं, जा भाषिप्यमें महान, प्रभावशाली और प्रतिष्ठित पदोपर पहुँचना चाहने है, उन्हें निश्चयमे अपने व्यक्तित्वका रद करना होगा, व्यत्तित्ययो यनाना होगा। इस अद्भुत शक्तिका सभी आदमी समान रूपस प्राप्त कर सपन है। यह किसीक देनसे प्रात नही हाती । इसे प्रदाा भी फोन कर सकता है ? यह याजारसे गरीदी भी नही जा सकती। व्यक्तित्व कुछ बड़े यद आदमियोंही अधियार नहीं है, उनकी पैतृक सम्पचि या मोरूमी जायदाद नहीं है । फिसीफे नाम इसका पहा भी नहीं लिया हुआ है । यदि आज कुछ आदमी दूसरे माद- मियोंसे अपेक्षारत अधिक व्यक्तित्व युक्त है, तो इसका यही अर्थ कि उन्होंने पूर्व जन्मम इसकी प्राप्तिके धाम्ने अधिक प्रयत्न किया है। जो आदमी इसको प्राप्त करते हैं, उन सवफा इसपर समान अधिकार है । जिस यचके माता पिता व्यक्तित्वक महत्त्व तथा मूल्यको समझते हैं और अपने यथेके व्यक्तित्व विकाशकी और उसरी याल्यावस्थसे ही समुचित ध्यान देते है, सचमुच उस पञ्चेका जन्म धन्य है। जिन आदमियोंको याल्यालमें व्यक्तित्वमाप्ति तथा उसको विकशित करनेके सुभीते प्राप्त न थे, अर यदि उनकी युवावस्था भी ढल चुकी हो, तो भी उन्हें यह समझने की आवश्यकता नहीं है कि अब उनके लिए व्यक्तित्व प्राप्त करनेम देर हो गई है, उसका समय निकल गया है। व्यक्तित्वफी महती शक्तिके बिना ' अपने जीवनमें यहुत आदमी पीछे रह गये हैं आर यहुतसे ससारकी। - प्रभावशाली जीवन- रंगभूमिमें विफल मनोरथ हो गये हैं। क्या आप भी उनमेसे एक हैं? नहीं, आपको ऐसा न रहना चाहिए। यदि आप व्यक्तित्व प्राप्तिकी तीव्र इच्छा करें, तो आप भी इस शक्तिको पा सकते है। अब भी आपके जीवनका अन्तिम भाग दृढ और सुन्दर बन सकता है। यदि भूतकालमें आप इस महती शक्तिके अभावसे असफल होते रहे है, यदि आपको अपने त्रुटिपूर्ण व्यक्तित्वके कारण हानियों उठानी पड़ी है, तो भी आपके लिए अब यही , उचित तथा उपयोगी है कि आप प्रयत्न करके उस वस्तुको प्राप्त कर लें, जिसका आपके जीवन में अभाव या, जिसके बिना जीवन पथमें दूसरे आदमियोंको अपनेसे आगे निकलता देखते हुए भी आप सबसे पीछे रह गये, जिसके अभावसे आप अपनी मनोवा छित वस्तुओंको प्राप्त नहीं कर सके, जर कि दूसरे आदमी आपके सामने ही उनको प्राप्त कर गये। जब हम यह बात याद करते हैं कि मानव-जीवन कुछ साउ सत्तर वर्षों में ही परिमित नहीं है, यह जीवन बहुतसे जीवनासे एक है और नवीन जीरन सदा यहाँसे आरम्भ होता है, जहाँ प्राचीन जीवन समाप्त होता है, तब हम यह जानते हैं कि यदि हम अपने जीवन पथके अन्तिम भागपर भी पहुँच गये है, बिलकुल वृद्ध हो गये है, तब भी यही अच्छा है कि हम व्यक्तित्व प्राप्तिका प्रयत्न करें। कारण कि इससे हम अपने नवीन जीवनमें यहुतसे सुभीतोंके साथ प्रवेश करेंगे, जिनके लिए इस जीवनमें हमारे हदय लालायित रहे थे फिन्तु जिन्हें हम न पा सके थे। - " " २-सम्यग्विश्वास "मे समस्त भूमण्डल, सप्त नक्षता सोर यष, सातर (रामके यली राजा)के पाहु- बल, स्टार मस्तिष्प, महात्मा इसार हृदय और शेक्सपायर कनित्वका स्वामा " -इमसन । मे आत्मारी सिद्रिक मागपर जा रहा हु। मे अपने उस मागका जिसपर काइ पद चिह्न नहीं है पक्षीर ममान दमता हु । म वहा अवश्य पहुचूंगा। --ब्राऊनिंग। ह यात यहाँ फिर दोहरा देनी अवश्यक मालूम होती हे कि व्यक्तित्वको कोई दूसग आदमी नही देता ओर न यह कुछ बड़े बड़े आदमियोकी मोरूस हे । जो आदमी इसकी प्राप्तिका प्रयत्न करते है, इसपर उन सभीका समान अधिकार है। इसको मभी आदमी प्राप्त कर सकते हैं। किसी पुरुष या स्त्रीका, चाहे क्सिी उच्च कुलमे जन्म हुआ हो, चाहे नीच कुल्में, चाहे उसके माता पिता अमीर हो या गरीव, समुन्नत्त हों या पतित, उसके लिए व्यक्तिन्य मार्गमें ये गातें कुछ विशेष अर्थ नही रखतीं । हरएक आदमी अपने ही परोंपर सडा है। उसका अपना जीवन हे, जिसे वह म्चय ही बनाता है और स्वय ही व्यतीत करता है । उसका 'जीवन स्वय उसके ही हाथोंमें है और उसका विधाता भी वह स्वय ही है । इस महान् मूर्सतापूर्ण अध विभ्यासको मनुप्य समाज न जाने कर छोड़ेगा कि अपराधियोंके स्थानपर निदाप आदमी 'दुख पाते है। लोग इस गिरानेवाले विचारसे न जाने क्व अपना पीछा छुड़ायेंगे कि आदमी वश, गह्य परिस्थितियों और इसी प्रकारकी दूसरी अवस्थाओंके अधीन होता है, उनका दास होता है। वास्तवमें अब तो वह समय आ गया है कि जय सभी विचार शील और बुद्धिमान आदमियोंको ऊपराऊपरी विचार छोड़कर गम्भीरताके माथ गहरा सोचना चाहिए और जीवन तथा न्याय प्रभावशाली जीवन- " की तह तक पहुंचना चाहिए । इसी सत्यको एक कविन निम्न- लिखित सुन्दर शब्दोंमें प्रकट किया है आप पिछली बातोंके उपासक है। आपने जातियोंके पूर्वजीवनकी बाब स्थितिको देसा है तथा आदमीको राज नीति, जनता, अधिकारियों ओर वाचायोंका अनुगामी समया है, उनकी रचना समझा है। किन्तु मैने उसे उसकी वान्तविक अवस्थामें अपने अधिकारोंपर चलते देखा है। मैं तो आत्म गौरवको अनुभव करता हुआ व्यक्तित्वका राग अलापता हूँ ओर अपनी भावी स्कीमोंको सोचता हुआ आगामी इतिहासकी रचना करता हूँ।* क्या आपको इस पातपर विश्वास है कि मनुप्य अपने भाग्य का स्वामी और अपने जीवनका राजा है? यदि आप ऐसा विश्वास नहीं करते, यदि आप यह विश्वास रखते है कि आप ससारके एक क्षुद्र जीव अथवा अभागे पापी है, यदि आप अप नेको परिस्थितियों, वश, बाह्य अरस्थाओ, अस्वास्थ्य तथा सहस्रों अन्य हार्दिक दुष्कल्पनाओंका दास समझते है, तो यह पुस्तक आपके लिए अधिक उपयोगी न होगी। क्योंकि प्रत्येक आदमी वैसा ही होता है, जैसे कि उसके विचार होते हैं। व्यक्तित्व प्राप्तिका प्रश्न हरएक आदमीके वास्ते व्यक्तिगत सवाल है । इसका किसी दूसरे आदमीसे सम्बन्ध नहीं है ! दूसरा कोई भी आदमी आपके मन तथा व्यक्तित्वको चलवान और दृढ नहीं बना सकता । कोई आदमी आपको दुलसे शक्तिसम्पन्न, असफलसे सफल और कुछ नहीं' से 'सर कुछ नहीं बना सकता ! आप स्वय ही सर कुछ बन सकते है, और आपमें सर कुछ करनेकी शक्ति मौजूद है। आप इस यातकी जरा भी चिन्ता न करें कि आप अब क्या हैं। यदि आप केवल अपने आपमें विश्वास रक्खें और इस पुस्तफर्म बताई हुई यातोपर चलें, तो आपका भविष्य आपकी इच्छानुकूल बन सकता है। * वाल्ट व्हिटमैनकी “ Leaves of Grass" सम्पग्मिभ्यास - इस यान्तं सभ्यर विश्वास या सन्या विश्वास व्यक्तिन प्रासिक यान्ते सबसे पहला सिद्धान्त हुआ। आपका अपनर्म विभ्यास करना चाहिए । विभ्यास रफ्यो कि आपके वास्ते सब कुछ सम्भय हे, असम्भन युछ भी नहीं है। पफ पापिन कहा है। "तुम भी पही भी ऐसी वस्तु न देखोग, जिमको तुम प्राप्त न कर सको। आनेवाला कोई भी समय, चाहे यह फितनी ही दृर क्यो न हो, ऐसा नहीं है कि जो तुम्हारे पास न आयगा । इतना लम्या कोई भी मार्ग नहीं है, जिसे तुम नय न कर सकागे। कोई भी ऐसा आदमी नहीं है, जो उम न्यानपर पहुँचा हो, जहाँ तुम न पहुँच मफो। कोई भी अधिकार ऐसा नहीं, जिस तुम प्राप्त न कर सको। तुम अपने सह- चाममें आनेवाल आदमियॉर्क मन्तिप्काका शान और उनके पद योफा प्रेम मञ्चय फरो। अपने प्रेमियाका भी उन्नतिके मार्गपर ले चलो। समम्त विश्वकोही सब आत्माओंने चरनेका एक पथ या अनेक पथ समझो। किसी मरे विद्वानका कथन है कि विश्वास रखनेवाले आद मीफे वाले सर कुछ सम्भर है, युछ भी असम्भव नहीं है। क्या यह यात जानकर भी आपरे समस्त शरीरमें हर्षसे सन सनी पेदा नही होती कि उपर्युक्त यात सत्य है? आप इसपर विश्वास करो और इसको अभी अपने लिए स्वीकार करो । इस- पर हृदयकी समस्त शकिसे विश्वास करो। तुम्हें पचल विश्वास- पर हीन ठहरनेका भी दृढ निश्चय कर लेना चाहिए, परन् शीघ्र ही अपने विश्वासको दृढ निश्चयका रूप देकर उसे अमलीरूप देनेफा भी प्रयत्ल करना चाहिए। इमसनफा कथन है कि अच्छे दृढ निश्चयवाला आदमी ही अच्छा है। मस्कृतिका उद्देश्य कदापि इस अच्छाईको नष्ट करना नही है, परन् समस्त विन-याधाओंको दूर करके विशुद्ध शक्तिका सचय करना है। इस तरह दूसरी आवश्यक वस्तु है-दृढ निश्चय या पका इरादा।
प्रभावशाली जीवन- डावाडोल हृदयवाले और अस्थिर चित्त आदमी सदा अस फल होते है । जो आदमी सफलताके पहाड़ी चोटीपर पहुचना चाहता है उसे पिछले विषय-भोगांकी घाटियोंफी ओर नहीं देखना चाहिए, वरन् दृढ निश्चय, स्थिर दृढय, और पूर्ण उत्साह के साथ कटिबद्ध होकर सफलताकी चोटीकी तरफ अपना कदम पदाना चाहिए । रास्तेमें आनेवाली विघ्नबाधाओंकी उसे परवा न करनी चाहिए । चाहे कभी उसका सॉस फल जाय और पैर लड़सड़ा जाये, तो भी उसे सड़े टीलों ओर ऊँचे पहाड़ोंको पार कर जाना चाहिए । चाहे उसे पीछेसे कोई पुकारे, तो भी उसे न ठहरना चाहिए। उसे तो समस्त काठिनाइयोंक होते हुए भी ऊपर हो वदना चाहिए, सामने मृत्यु होते हुए भी ऊपर ही चदना चाहिए । जो आदमी जीवनमे सफलता प्राप्त करना चाहता है, उसका हदय इतना दृढ होना चाहिए कि वह सासारिक मोद, सामाजिक धन ओर दूसरे आदमियोंकी यातोंकी तरफ ध्यान न देकर सकटों और आपत्तियोंके होते हुए भी अपने निर्दिष्ट मार्गसे विचलित न हो । जिस समय स्त्री और पुरुष व्यक्तित्यफे महान महलकी बुनियादमें ये दृढ, सच्ची और अजेय माधारशिलाएँ ग्यखेंगे, उस समय उनकी सारी मनोकामनाए पूरी होंगी, कारण कि प्रत्येक कामका अच्छा आरम्भ ही उस कामकी सफ लताका घोतक है। यह पुस्तक उन युवा स्त्रियों तथा पुरपो ओर अपनो युवाय- स्थाके अन्तिम भागपर पहुँचे हुए उन आदमियोंके वास्ते लिखी जा रही है, जो यह अनुभव करते हैं कि उनके पास व्यक्तित्वकी यह अपूर्व शक्ति नहीं है, जो कि वास्तवमें उनकी ही है। सम्यग्विश्वास ओर उद्देश प्राप्तिके दृढ सकल्पको भले प्रकार समझनेके पश्चात् हमें आत्म परीक्षाका कार्य करना चाहिए । इस यातमें किमीको भी सन्देह न होना चाहिए कि व्यक्तित्वके अभाव की जडे कमजोरी, आत्मापमान, आत्म-लोलुपता, आलस्य और 'मानसिक तथा शारीरिक श्रुटियोंमें ही है। ये निकमी आदतें १२ सम्यग्विश्वास आत्माको गिरा देती है। कोई भी आदमी तय तक व्यक्तित्व प्राप्त करनेके योग्य न हो सकेगा, जब तक कि वह अपने हृदयातरमें मन, वचन, तन और आत्माकी शुद्धि तथा पविनताके महत्त्वको अच्छी तरहस न समझेगा । अपवित्र विचार आदमीको वरवाद कर देते है । जिस आदमीका मन अपने इन शनुओ-गन्दे विचाराको आने देता है, उसे आगे पढनेकी आशा कदापि न करनी चाहिए। कविवर टेनीसनका कथन है कि मेरी सुन्दर तलवार लोहेके टोपोंको काट सकती है, क्योंकि यह अचूक है ओर मेरी शक्ति दस आदमियोंफी शक्तिके परार है, क्योंकि मेरा हृदय पवित्र है। पवित्रता ही बल और शक्ति है। जिस आदमीने काम पविन है, जिसके माथेपर वदनामीका कलक नहीं लगा हे ओर जिस आदमीकी ऑसे घुगे काम न करनेके कारण कभी नीची नहीं होती है, वही आदमी सच्चा वीर है । ऐसा आदमी ही विजयके राजमार्गका पथिक है । सम्मान ऐसे आदमीकी हर समय राह देखता हे और वैभव उसके मुखके पास चमकता है। पविनताके विना व्यक्तित्व प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए व्यक्तिवप्राप्तिके इच्छुकॉको यह यात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि यदि कभी वे झुकते है अथवा किमी चुरे कामकी इच्छा करते है, तो उन्हें इसका भयकर मूल्य देना पडेगा। झिझकनेवाले आदमियोको अपनी झिझक छोड देनी चाहिए और अपने आपको ससार- युद्धफे वास्ते तय्यार कर लेना चाहिए । जो शक्तिहीन आदमी अपनी शक्तियोंको अपर्याप्त समझते है, उन्हें धैर्य तथा साहस धारण कराा चाहिए । क्योंकि जब उनकी मनोवृत्ति पवित्रताकी ओर हे, तव उनके हृदय आवश्यकता पडनेपर अवश्यमेर दृढता ओर यल प्राप्त करेगे । जिन आदमियोंरे आचार विचार पवित्र है, उनके हृदय प्रसन्नता ओर आनन्दले ल्यालय भरे रहने चाहिए और उनके मुखपर कृतज्ञताके चिह्न होने चाहिए। क्योंकि वे ।
प्रभावशाली जीवन- जनसमूहमे राजाके समान शक्तिसम्पन्न, भद्र और वीर होकर रहे हैं। पेसा पवित्राचार्ग आदमा ही अपने शुद्ध, दृद्ध, यल्यान बार दैवी हाथाको दुर्यला, पतिता, पतनोन्मुगों, दु पितों, निस्सहायों और गिग्ने हुए आदमियाको रक्षाफे लिए उठा सकता है। उसके स्पर्श मात्रमें ही दूसरे आदमियोका जीवन होगा। पवित्र आदमीकी शक्ति अपार है। उसे कोन माप सस्ता है? यह अनन्त है। वह ईश्वरीय यल है। वही व्यक्तिल प्राप्तिफा गजमार्ग है। इन पक्तियों को अपने हदय पटपर गहरा अकित कर लो, तथा इनपर सूच विचार करो। अपनी शक्तिके अनुसार इनपर अमल करनेका प्रयत्न भी करते रहो। १४ " ३-आत्म-ज्ञान "मात्म-शान, आत्म सम्मान और आत्म सयम ही माष्यका महती शक्तिया और ले जात है। -टेनीसन । मनुष्यमा अपा महत्त्व समझा रने दा, फिर वह सम वस्तुओंका अपने पैरा फनीचे पर रेगा, अपने वशम वर लगा। -इमसन । म-सम्मान दिना सद्या व्यकित्य प्राप्त नहीं हो सकता। इस लिए प्रत्येक आदमीका मन, वचन और तनसे ऐसा व्यवहार करना चाहिए जिसको वह अपने जीवन में पुरान समझेतथा जिससे उसे लजितन होना पडे।जब कोई आदमी अपने सम्मानकी स्वय ही परवाह नहीं करता, तब वह अपने साथियोंसे अपने सम्मानकी कैमे आशा कर सकता हे ? इस लिए यह बहुत ही आवश्यक है कि वह अपने आपको जाने और अपना शान प्राप्त फरे । आत्म शान केवल अपने अभ्यन्तरको देसने तथा आत्मानु वीक्षणसे प्राप्त होता है । दृढ व्यक्तित्व प्राप्तिके इच्छुकको अपने आन्तरिक जीवन, अपने हृदय, उद्देश्यो ओर इच्छाओंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ताकि उसे अपनी वास्तविक स्थिति मालूम हो जाय । उसे यह मालूम होना चाहिए कि वह कहाँ सड़ा है। उसे अपनी उन त्रुटियों (यदि कोई हॉ) को भी जानना चाहिए जिनका सुधार करना है । उसे अपनी उन दुर्वलताओंका भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए जिनको दूर करना जरूरी है। उसे अपनी उन कमजोरियोंका भी बोध होना चाहिए, जिनके फारण भूतकालमें उसे हानि पहुच चुकी हो अथवा हानि पहुँचनेकी सम्भावना हुई हो और जिाको दूर करनेकी तरफ अर पूरा ध्यान देना चाहिए ताकि भविष्यमें उसके दृढ विचार और सुनिश्चित ध्यानसे उसकी प्रगतिका मार्ग उसके पदार्पण करनेसे पहले ही दृढ हो जाय, उसमें कोई रुकावट न रहे। वास्तव में यह जानना पडा ही उत्साहवर्धक है कि प्रत्येक दुर्वल स्थानको मुद्ध प्रभावशाली जीवन- दुर्ग या किला बनाया जा सकता है और प्रत्यक ऐसे चव भावको जो भूतकालमें हमारे पतन ओर नाशका कारण हो चुर हो, उमग ओर दृढ़ सकल्पडाग इतना दृढ बनाया जा सकता है जिसपर मानसिक प्रवृत्तियोका जरासा भी प्रभाव न पडे । अत्यन्त ही दुर्वल आदमियोंके वास्ते यह कितना पडा शुभ सन्देश हे भीर नया दुर्बल हृदय आदमियोके वास्ते यह कितने आनन्द वात है 'जिस शक्ति, धैर्य, साहस और निर्भीकताको तुमने दम आदमियोंके अधिकारमें अनुभव किया है, वे तुम्हारे लिए भी यदि तुम जाग्रत होकर उनपर अपना अधिकार प्रकट करो परन्तु इनके वास्ते मूल्य देना पड़ता है। प्रत्येक स्त्री तथा पुर जानता है कि उसका मूल्य क्या है और उसे क्या देना होगा वह मूल्य रुपये-पसे नही, किन्तु आत्म निग्रह, त्याग, जात्म निरीक्षण और अथक भक्ति है। हम सब इस महान् मूल्यक अच्छी तरह जानते है, परन्तु इसको दिये बिना ही हम स. समस्त जीवनमे दुल बने रहते है। इस लिए हमे आत्म-परीक्षार्क उस पगडडीको कभी न रोकना चाहिए जो कि आत्म-ज्ञान राजमार्ग तक पहुचती है। यहाँ यह प्रश हो सकता है कि मान लो कोई आदमी अपने हृदयमे किसी निकृष्ट यातको देखता है, या यों कहो कि वह आत्म परीक्षासे जानता है कि उसके हृदयमें पतित भाव मोजूद है, अथवा उसे मालूम होता है कि कभी उसने धुरे काम किये है, तो इससे क्या लाभ ? इसका उत्तर केवल यही है कि क्या फिसी आदमीके वास्ते अपनी निकृष्ट यातीको जानना इससे अच्छा नही है कि वह उस पाप अन्धकारपूर्ण गमें पड़ा रहे जो कि उसके जीवन-स्रोताको वियैला कर रहा है और जो उसके समस्त जीवनकी उत्तम तथा अत्यत पली वानीका नाश कर रहा है ? यहाँ उन स्त्री-पुरचोके वास्ते लिया जा रहा है जो दोग तथा मानाचारकी इच्छा न करके वास्तविक्ताको चाहते है, जो दिखा- घटी जीवनके स्थानपर वास्तवमें सरे तथा विशुद्ध जीवनके १६ आत्मज्ञान Aus . इच्छुक है ओर जो मतमतान्तरों, मान्यताओं तथा दूसगेये सिमा न्तॉपर ठहरनेके स्थानपर अपने आपफो दृढ नींवपर सड़ा फरना चाहते है । एक आदमी अपन सम्बन्धमें जो कुछ भी मालूम कर सकता है, यह उसे अवश्य मालम करना चाहिए, क्योंकि आत्म ज्ञान हीतो यह स्वय है। यदि किसी आदमीफा अपने पड़ोसियों और अपन सम्पर्कम आनाले आद मियोपे साथ ईमानदारीका व्यवहार नहीं है, ता उसया देवालय, मन्दिर और मसजिट आदिम जाना किस कामका ? यदि उसका जीवन पविन नही है और उसके वचन सो नहीं है, तो उसकी लम्बी लम्बी प्रार्थनाओं और स्तुति पाठोका क्या मूल्य है ? यह यंडे हर्पकी यात हे कि अय धर्म-सम्बन्धी भ्रम मूगर अन्ध विश्वास दूर होता जा रहा है और अब ये दिन चले गये जर कि आदमी सारहीन धर्मको सहन करेंगे। अब तो यह दिन आ रहा है, जर फि आदमियों के लिए धर्म और जीवनका एक ही अर्थ समझा जायगा। ऐसे शुभ दिनका अभी प्रभात मात्र है। अब आदमि- योका धर्म किसी धर्मस्थानपर एकनित होने, तीर्थयात्रा करने, किसी मत विशेपका अनुयायी मात्र होनेसे न जोचा जायगा, किन्तु अर वह आदमी धर्मात्मा समझा जायगा, जो कि यास्तवमें पवित्र ओर भद्र होगा, जो अपने वचन और फर्मसे सया होगा और जिसकी दिनचर्या मम्माननीय, दयापूर्ण, शिष्ट ओर निदोष होगी । अब बहुतसे धमाफी मानता न होगी, यन् एक धर्मका सम्मान होगा, और वह है वास्तविक, प्राकृतिक और आत्मस्वभावरूप धर्म । और तब 'परमात्मा' 'परमात्मा' चिल्लाने- वाले आदमी धर्मात्मा न समझे जायेंगे, वरन् परमात्माके आदेशॉ- को अपने अमली जीवनमें परिणत कर दिखानेवाले आदमी ही धर्मात्मा माने जायेंगे। मानव हृदयका यह धर्म कितना प्रारतिक और अकृत्रिम है, जो कि सादगी, सत्य, प्रेम, विश्वास, दया, भद्रता, वास्तविक पुरुषत्व और सच्चे, मधुर तथा हद स्त्रीत्व आदि महान् २ प्रभावशाली जीवन- गुणोंसे बना हुआ है । हमें अपने धर्मसम्बन्धी आदर्शको और ऊंचा करना चाहिर ओर उसकी नीव अपने हृदयोंमें गहरी रखनी चाहिए, क्यों कि जो यात वास्तविक नहीं है, वह न तो धर्म ही हो सकती है और न आत्माका सार ही हो सकती है। इस लिए ऐसे वनावटी धर्मसे पीछा छुड़ाना होगा और उसके दम घोंट देनेवाले प्रभावसे अपने आपको मुक्त करना होगा । अत एव आत्म-ज्ञानके नामसे डरो मत। आत्म-शानके इसी द्वारसे आत्मा स्वतनता ओर विजयको प्राप्त करता है। आत्म-ज्ञानका अमार पुरुषों तथा स्त्रियोको उस दुर्बल तथा नाशकारक मान सिक स्थितिमें डाल देता है, जिसे हम स्वात्माके सम्बन्ध तुच्छ विचार रखना कहते है । तात्पर्य यही है कि आत्म-शानके अमावस आदमी अपने आपको तुच्छ तथा नीच समझने लगता है, जब कि आत्म-शान उसको चीर, अमर और आत्माभिमानी बना देता है। इस लिए व्यक्तित्वके परमावश्यक आधार आत्माभिमान और आत्म विश्वास है। किसी भी ऐसे पुस्प या स्त्रीने कभी व्यक्तित्व प्राप्त नहीं किया, जिसको आत्म विश्वासपर काफी अधिकार प्राप्त न था। महात्मा जेम्स एलनने अपनी एक पुस्तकम लिसा है- " अपने आपको तुच्छ समझना ही आत्म पतन है। वास्तवम यह आत्म हत्याका ही एक भेद है। जिस आदमीका इस प्रकारका विश्वास है कि उसके शुद्धाचारका महत्त्व गन्दे वस्त्रों जितना है, अर्थात् कुछ भी नहीं है, उसमें कुछ भी अच्छी बात नहीं है और वह कमी अपने प्रयत्नोंसे उन्नति नहीं कर सकता है। ऐसा आदमी अपनी इस मनोवृत्तिसे अपने आपको नपुसक यना रहा है, अपने आत्माका गला घोंट रहा है और अपने चरित्रकी सर्वोच्च तथा परमोत्कृष्ट वस्तुकी जड़को काट रहा है और उसे तितर बितर कर रहा है। 1 * शाईनिंग गेट-ये ( Shining Gateway ) १८ आत्म-शान " - आत्म तिरस्कारसम्बन्धी प्रत्येक विचार व्यक्तित्वकी शक्ति और मूलका नाशक लुटेग तथा रोग है।" अपने आपको तुच्छ और नीच समझना बहुत हानिकारक है। इस प्रकारके निचार मानव-समाजको उसकी शक्ति और पास्त विक बलसे वञ्चित कर रहे है। 'ससार झगडोका स्थान है अथवा 'यह दु खोंका घर हे'-इन विचारोके प्रभावसे मानर हृद योकी ससारके सौन्दर्यको देखनेकी शक्ति नष्ट हो गई है। वास्तवमै आदमी क्षुद्र जीन नहीं है । यदि वह परमात्म पदका पानेका सकल्प करे, तो परमात्मा बन सकता है। वह अपने मन आर शरीरका राजा हे । वह अपने प्रत्येक वचन और प्रत्यस कामका नेता तथा पथ प्रदर्शक हे । जब कोई आदमी उपर्युक्त अवस्थाको प्राप्त कर लेता है, तब समझना चाहिए कि उस आदमीने अपने सच्चे आदर्शकी ओर बढ़ना आरम्भ कर दिया है। वह अपने ध्येय की ओर चल पडा आओ, अब हम फिर एक यार उन सब बातोंको दोहरा दे, जो कि अब तक कही गई हैं। व प्रमसे (१) सम्यग्निश्वास, (२) दृढ सकल्प, (३) आत्म-परीक्षा अथवा आत्मानुवीक्षण, (४) आत्मज्ञान, (.) आत्म विश्वास, (६) आत्म-सम्मान ओर (७) आत्म-सयम है। जिस मार्गको बताने का प्रयल यहाँ किया जा रहा है, वह इतना सरल नहीं है कि उसे एक आलसी तथा पेपरवा आदमी प्राप्त कर ले । थोथे विश्वास, जत्र मत्र ओर जादू-टोनेका भी यह मार्ग नहीं है । ओर जादू आदिपर आज विभ्यास भी किसका है ? व्यक्तित्व प्राप्तिका मार्ग कठोर आत्म-साधना ओर तीव्र मानसिक प्रयत्नका मार्ग है। जेम्स एलनने एक ओर स्थानपर कहा है कि "फिसी घुरी आदतके सामने झुकनेसे आदमी अपने ऊपर राज्य करने के अधिकारको खो देता हे।" "जो आदमी आत्म-साधनासे । बचना चाहता हे ओर विचार-शक्तिकी प्राप्तिके वास्ते किसी जादू प्रभावशाली जीवन- + आदिको इसलिए तलाश करता फिरता है कि वह बिना हाथ- पैर हिलाये ही इस महती शक्तिको प्राप्त कर ले, तो वह आदमी अपने आपको धोखा द रहा है और अपनी माजूदा विचारशक्ति को भी दुर्वल बना रहा है। बुरी आदतोंपर विजय पानेमें सफल होनसे जो विचारशक्ति उत्पन्न होती है, वह मनुष्यको नवीन अच्छी आदतें डालनेमे समर्थ पनाती है। क्यों कि एक बुरी आदतसे छुटकारा पानेके वास्ते दृढ उद्देश्यकी आवश्यकता ह ओर एफ नई आदत बनानेके वास्त अपने उद्देश्यक बुद्धिपूर्ण उपयोगकी जरूरत है । ऐसा करनेके वास्ते एक आदमी मनसे चुस्त तथा शक्तिशाली होना चाहिए और उसे अपने ऊपर निर- तर देख-भाल रखनी चाहिए। विचार विकाशके मार्गमे पारगामिता एक अनुल्लघनीय तथा अनिवार्य स्थान है । हरएक कार्यको ठीक पूरे रूपसे करना अन्यत आवश्यक है । फूहडपनका कार्य दुर्वलताका चिह्न है। - १० व्या ४-श्रुति-ज्ञान 'मे अपना जावन कही भी क्या न व्यतीत करू, परतु सदा आत्मसतुष्ट रहगा और सारी आकस्मिक घटनाआम सामना करनके वास्ते तयार रहूंगा।" -वाल्ट विटमैन । तुम एसी किसी भी वस्तुका नहा यता सस्त, जा मर झानसे परे हो । तुन कभा यह मत साचा कि काइ भा काम तुम्हारा शक्तिसे याहर है । तीव्र इच्छावाल आदमार वास्ते कुछ भी असम्भव नहीं है । क्या इस करना चाहिए' हो, मैं इस जरूर करूँगा । यस, यहा एक नियम है, जिसस सफलता मिलता है।" --कस्यचित् । दक्तित्वहीन आदमी सदा दूसरे आदमियोंके आदर्शों और 'निश्चयोंके भरोसेपर रहता है और उसके द्वारा ही अपने जीवनको व्यवस्थित करना है, किन्तु व्यक्तित्वयुक्त आदमी अपने जीवनको म्चय ही व्यवस्थित करता है। वह दूसरे आदमियोकी सम्मतियाको यथेष्ट आदरके साथ सुनता है, किन्तु उसके ऐसा करनेका अभिप्राय यह नहीं होता कि वह उन सम्मतियोके ढंगपर अपने जीवनको पनाता है । उसका मशा केवल उन सम्मतियोमेंसे अच्छी तथा उत्साहवर्धक यात ग्रहण करना ही होता है। दूसरॉकी सम्मतिया समुचित आदरके साथ मुननेमें सुननेवाले आदमीफी शिष्टता और नम्रता भी एक कारण है, तथा इससे यह भी प्रकट होता है कि हमें दूसरे आदमकि रिवारोंका सहनशीलतापूर्वक आदर करना चाहिए । किन्तु हमें यह कभी न भूलना चाहिए कि एक व्यक्तित्वयुक्त आदमी सदा अपने ही निश्चयोंपर चलता है और उनके ही द्वारा अपने जीवन तथा चरित्रको व्यवस्थित तथा मयत करता है। व्यक्तित्व अपने उद्देश्यकी स्वय घोषणा करता है, और यह सब प्रकारसे पूर्ण होता है । व्यक्तिन्ययुक्त पुरुष तथा स्त्रियाँ इस यातको समझ चुकी है कि फिसीकी नकल करना आत्महत्या है।
प्रभावशाली जीवन- यदि कोई आदमी किसी दूसरे बडे आदमीकी इस लिए नकल फरता है कि यह दूसरा आदमी पहले आदमीके वास्ते सम्मानपात्र है, तो यह कहना चाहिए कि नकल करनेवाला आदमी दूसरे आदमीकी चल्ती फिरती छाया मात्र हे। नकल करनेवाले आदमी अपना असली रूप नहीं होते, वे ढोंगी, झूठे और मुलम्मे के समान होते है । यदि हम किसी कामको केवल इसी लिए करते है कि कोई वडा आदमी हमें ऐसा करनेको कहता है, न कि इस लिए कि हमारा उदय उस कामको करनेफी प्रेरणा करता है, तो कहना होगा कि हम यहरूपिए और निर्जीव शरीर मात्र हे, सच्चे पुरप या स्त्री नहीं है। जब जब हम किसी दूसर आदमीकी नकल करते हैं, या किसी ऐसे कामको करते है, जिसे करनेको न तो हमारा अन्त करण ही फहता है और न जिसकी सच्चाईमें हमें विश्वास ही होता है, तव तर हम अपनी शक्तियोको नष्ट करते है। किसी कामको प्रचलित अथवा रूढि समझकर करना अपने अन्त करणकी शक्तियों तथा अपनी विवेकबुद्धिको दुर्बल करना है। ऐसा करनेसे तो हम अपने आपको ठीक सम्मति स्थिर करनेमें अयोग्य बना लेते हैं। जिन आदमियोंकी आन्तरिक विवेकशक्ति नष्ट अथवा सुपुप्त न हो गई हो, निस्सन्देह उनके वास्ते हर समय दूसरे आदमियोंके निश्चयों तथा आदशोंके सामने झुकना बड़ी कठिनतासे सम्भव होता है। ऐसे झुक जानेवाले) आदमियोंकी आन्तरिक विवेकशक्ति सहजहीमें सर्वथा नष्ट हो जाती है और यदि फिर कभी वह जाग्रत भी होती है, तो उस समय जब कि उसके जीवनका श्रेष्ठ तत्त्व उनके हृदयोंकी कमजोरी और इस झुकनेवाली प्रवृत्तिकी भेंट चढ़ जाता है। अपने हृदय में सहसा उठनेवाले विचारों, भावों ओर तरगोंकी देख-भाल रक्पो । उन्हें उठते ही ग्रहण कर लो और उन्हें यों ही विलुप्त मत हो जाने दो। यह सोचते हुए कि यह बड़ा आदमी अथया कोई दूसरा बड़ा आदमी तुम्हारेसे बड़े विचार सोचेगा, उस भाव पेश करेगा और तुम्हारे वास्ते उच्च आदर्श ग्यखेगा, कभी दूसरे आदमियोंके विचारोंकी याट मत देखो, उन्हें तलाश २२ शुति-शान करते इधर उधर मत फिरो। तुम ऐसा क्यों करते हो दूसरा आदमी ही उच्चतर भाव क्या सोच सफता है ? क्या इसकी तहमें यही भाव काम करता है कि उसके पास सोचने विचारनेफी कोई यही शक्ति है ? क्या यह यात अच्छा सोच सकता है। ऐसा ख्याल करना पड़ी भारी भूल है । सोचन विचारनेफी शक्तिहर- एफ आदमीके पास है आर अभ्याससे सर आदमी उसे पदा सकते हैं। जो आदमी अपने विन्यासोको सन्दहकी नजरसे देखता है अपने विचारोंकी अवहेलना करता है, अपनी योग्यताको अवि भ्वासफी दृष्टिसे देखता है और दूमर आदमियोगी सम्मतियों, योग्यताओं और विचागेको, पुरान होते हुए भी, महत्त्वपूर्ण सम झता है, वह कभी व्यक्तिन्य प्राप्त नहीं कर मरता। यह प्रभाव शाली ओर प्रतिभाशाली नहीं बन सकता । ऐसा कहनेका अभि- प्राय यठे घटे विचारकोंकी अवहेलना कराना या उनके प्रति अथद्धा पैदा कराना नहीं हे ओर न इसका मशा यह है कि आदमी दूस रोके विचारोंसे लाभ ही न उठाए, परन् इसका तात्पर्य यह है कि आदमी स्वय अपने अन्दर सोचने विचारनेकी शक्ति पैदा करे, दूसरोंके विचारोंको विना सोचे समझे स्वीकार न कर ले और किसी पेटेण्ट वाईफे समान आँख मीचक्र गलेके नीचे न उतार जाय। इस लिए तुम सदा अपने ही विचारानुसार काम करो। यह विचार तुम्हारा है, उसमे विश्वास रस्सो आर उसे स्वीकार करो। मान लो कि अपने विचारानुसार काम करते हुए तुम्हें यह मालूम हो कि तुम गलती कर रहे हो, ठीक मार्गपर नहीं जा- रहे हो, तो भी वह भूल देखने मात्रकी अथवा बहुत कम हानि- कारक होती है। इसका परिणाम अच्छा ही होगा। क्योंकि एक दो यार भूल करनेपर फिर तुम वैसा नहीं करोगे । उन भूलोंसे उठाई हुई हानि तुम्हारे लिए भविष्य में कई प्रकारसे लाभ देनेवाला व्यय होगा। क्या किसान घोडेपर एक दो यार गिरे विना सवारी करना सीखा है? क्या अपने जीवनको सतरेमें डाले विना फिसीने सैरना सीखा है? फिर भला मनके घोडेपर, विचारशकिसी तीन २३ प्रभावशाली जीवन- गामी सनारीपर क्या कोई आसानीसे निा ठोकर सायही कावू पासकता है ? विचारशक्तिके अथाह समुद्र में जीवनको सफ्ट में डाले बिना ही क्या कोई उसे पार करना सीस सकता है? भूल करके काम सीखना और विफल होकर सफल होना एक घडा लाभदायक व्यापार है। आदमीफी अपनी आन्तरिक प्रेरणाओंके नियमके आतिरिक्त पुछ भी वास्तविक नहीं है। इमर्सनका कथन है, "जो वास्तवमै मनुप्य है, यह हरएक । धानको योही मान लेनेका हमेशा विरोधी होगा।जो आदमी अमर विजयाको प्राप्त करता है, यह अच्छाईके नामसे कभी नहीं रफता, यह तो उसे भी पार करता है। मनुष्य के हृदयकी पवित्रतासे यह कर कोई भी दूसरी वस्तु पवित्र नहीं है। अपने आपको पापोसे यरी और दोपोसे मुक्त कर लो, फिर समस्त ससार तुम्हारे साथ होगा। मुझे एक उत्तर याद हे । जय मैं नवयुवफ था, तब मैंने यह उत्तर दूसरे आदमियोकी प्रेरणापर एक ऐसे आदमीको दिया था, जो मुझे ईसाईधर्मफी प्राचीन मान्यताओंको स्वीकार करनेपर याध्य कर रहा था। मैंने कहा कि जय मेरा जीवन सर्वथा मेरी आन्तरिक भावनाओंफे अनुकूल है, तब मुझे प्रथाओकी पवित्रतासे क्या काम' इसपर मेरे मित्रने कहा कि सम्भव हो सकता हे फि वे भावनाएँ उच्च श्रेणीफी न हों, युरी हो । इसपर मैने उत्तर दिया कि मुझे तो वे भावनाएँ पुरी मालूम नहीं होती, किन्तु यदि वे भावनाएं बुरीभी हों, तो मै भी युरा रहूँगा । अपनी प्रकृति तथा स्वमायके नियमके अतिरिक्त दूसरा कोई भी नियम मेरे लिए पवित्र नहीं है। जो कुछ फि मुझे करना चाहिए, उस सबका सम्बन्ध मुझसे ही है। मेरा कर्तव्य यह नहीं है जो कि दूसरे आदमी सोचते हैं। अपनी निजकी शक्तिको अपने व्यवहारोंसे प्रकट करो। ऐसा जीवन कदापि व्यतीत मत करो जो कि दूसरोके जीवनको प्रष्ट करता है। तात्पर्य यही है कि मनुष्यको अपना जीवन अपने ही विचारानुसार ढालना चाहिए, दूसरोंके विचारानुकूल नहीं। । - २४ शुतियान बिना किसी याहा गायके अपने स्वभावके अनुसार काम करनेको शक्तिके फोपको हमने सो दिया है आर उसे तलाश कर- नेको, उस गोई हुई शक्तिको दुवारा प्राप्त करनेफी बडी भारी आवश्यकता है। दुर्भाग्यसे हमने आधुनिक शिक्षाको इस यातकी आज्ञा दे दी है कि वह स्वयमेव प्राप्त होनवाले शानका गला घोंट दे, उसे प्राप्त न होने दे। जो पात शिक्षकों और पुस्तकाद्वारा हमारे गलेसे नीचे उतार दी जाती है, अपनी आत्मिक शक्तिद्वारा उमसे अधिक जाननेको हम चेष्टा ही नहीं करते । वास्तव में बहुत फरके यह गलत किनारेपर ही काम करना होता है । इस तरह आदमी सत्य ओर ज्ञानको अपने हृदयमें तलाश करनेके स्थानपर उनके लिए बाहर मारा मारा फिरता हे । आदमी इनके वास्ते अपने उस आन्तरिक प्रकाशको छोडकर, जो कि उसके शरीरका आख नाक कान आदिके ही समान एक अग हे, याहरके महारापर निर्भर होता है । यह यह ही खेदको यात हे फि मानव-- हृदयका यह अप्रस्ट देवी प्रकाशपूर्ण नियम आज मत-मतान्तरी, सिद्धान्तो, रोतियो ओर रूढ़ियोंद्वारा इस पुरी तरहसे कुचल दिया गया है कि मनुष्य जाति आज नाटक पात्र, और नक्काल मात्र रह गई है। हममेसे बहुतसे आदमियाकी आध्यात्मिक तथा नेतिक अवस्था आज विकृत हो रही हे ओर बहुत ही कम आदमी दृष्ट, पुष्ट, दृढ ओर पल्यान हैं । हम देखते है कि यहुत ही फम आदमी सधेि तनकर तथा लचीले कदमले चलते हैं । थोडे ही आदमी शान्त दृष्टिसे अथवा तजोमय आपसे देखते है। कुछ ही आदमियों- की धनि उनके वक्ष स्थलसे जोरके साथ निकलती है। ये शेरके समान नहीं विधाडते, वरन् नाकस गुनगुनाते हैं। ओर इने गिने आदमी ही अपने सुदृढ व्यक्तित्वके यलपर ससारके दूसरे व्यक्ति- याले टकर लेते दिखाई देते हैं। ऊपर उन आदमियॉका चित्र गीचा गया है जो कि अपने आपको आत्म-सयत, आत्म-सम्पन्न स्वतत्र, उत्साही, विशाल. हृदय, महान् और शक्ति-सम्पन्न यनानेका साहस करते है। २७ प्रभावशाली जीवन- ऐसे ही स्त्री-पुरुष अपन स्वतत्र मनुष्यत्व और व्यक्तित्वके घडे महलमें रहनेकी हिम्मत करते है और फिर वे हमपर अपने स्वा- तम्यक सौन्दर्य ओर अपने स्वावलम्बनपूर्ण कायोंको प्रकट फरते हैं। हमें श्रुतिझानकी इस महती शक्तिका पुनरद्धार करना चाहिए और वस्तु-स्वभावके रहस्योंमें प्रवेश करना चाहिए और उनहीके अनुकूल अपना जीवन बनाना चाहिए । वस्तु-स्वभावका यह सञ्चा शान मानव हृदयकी मौलिक सादगी ही है और यही वस्तु-स्वभाव सर्वकालमान्य धर्म है। श्रुतिशानके पवित्र सरोवरको फिरसे ढूँढना ही पूर्ण सत्य, आन्त रिक प्रेरणा और उस प्रत्यक्ष ज्ञानको तलाश करना है जो कि हमें निस्सन्देह सी तथा पुरप बना देगा। श्रुतिशान, विना याह्य दनावके स्वेच्छापूर्वक काम करना, स्वत- प्रता और आत्म-सम्मान ही कुछ ऐसी सीढियाँ हैं, जिनपर चढ़ कर हम व्यक्तित्वको प्राप्त करते हैं। स्त्री-पुरुपोंको अपने दृढ, ऊँचे और श्रुतिज्ञान तथा आत्म-सम्मान द्वारा सदा व्यक्तित्व प्राप्तिका प्रयत्न करना चाहिए । . २६ " ५-निश्चय और तत्परता " सत्यपर डट रहा न्याय युक्त कामरा करत हुए क्भा लजित मत हाआ। जिस यात तुम न्याययुक्त समयत हा, उसीमा निधय करो और फिर उसपर जम जाओ। -जाज इलियट । " स्मिी भाकामा आधा धोधा करनसे मे घृणा करता हूँ। यदि वह काम न्याययुक्त है, तो उसे वारतापूवर करो और यदि ठीर नहीं है तो मत करो। --गिलपिन । व्यक्तिन्य प्राप्तिके मार्गी बड़ी यडी रुकावटोमेंसे एक रकावट झिझक या डॉगडोल्पन है । व्यक्तित्वयुक्त आदमी अपने मनको दृढ कर लेता है और अपने सर कामाको अच्छी तरह मोच लेता है । वह सब बातोंको विवेककी तराजूपर तोलता है और एकाग्र तथा लगातार विचारद्वारा ठीक निष्कों, नतीजोपर पहुंचता हे । जो यात उसके वास्ते ठीक है, उसे यह जानता है और उसे ही स्वीकार करता है । विपरीत इसके, एक व्यक्तित्वहीन आदमी अपने लिए दूसरे आदमियोंको सोचनेकी आशा देता है, उन्हीके निश्चयोंको मानता हे और स्वय अपना कोई निश्चय नही रसता । इसी लिए वह सदा दूसरे आद- मियोंके निश्चयों, मतों और विचारोंके साथ चलता है। इसका फल यह होता है कि वह झिझकीला और अनिश्चित हृदय हो जाता है और लगातार इस विचारसे उस विचारपर मारा मारा फिरता है।यह कभी एक विचारको स्वीकार करता है, फिर शीघ्र ही उसे छोडकर किसी दूसरे विचारको ग्रहण कर देता है। ऐसा आदमी समुद्र में यहनेवाले तिनकेके समान है। जिस प्रकार उस तिनकेकी गति निश्चित नहीं होती, उसी प्रकार उस आदमौके विचारकी गति भी निश्चित नहीं होती। जिस प्रकार तिनका स्यय नहीं चलता, वरन् समुद्रके यहावके साथ वहता है, ठीक उसी प्रकार यह आदमी भी जमानेकी रौके साथ यहता रहता है। । । भ प्रभावशाली जीवन- , से आदमीफे पास कुछ देर बैठनेसे ही उसके मनकी अस्थिरता और उसकी नावकी कमजोरी मालूम हो जाती है। यह आदी नदीके किनारेके वृक्षक समान अरक्षित होता है। ऐसी अवस्था- में व्यक्तित्व कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योकि प्रथम तो उसफा अपना मत या निश्चय ही नहीं होता, यह दूसरे आदमियोंके मताका समूह होता है। दूसरे, जो यात वह कहता है, यह दृढ़ विचारपूर्वक ठीक निश्चित की हुई नहीं होती, अपने हृदयके पूर्ण विश्वासके साथ नहीं कही जाती, बल्कि सदा ऐसी दुर्घल, अधि श्वसनीय और प्रभावहीन प्रवृत्तिपर अवलम्बित होती है, जैसे कि 'अमुक आदमी ऐसा कहता है', 'धर्मशास्त्रोंमें यह लिखा है' ओर यहॉफी परम्परा यह है'। किन्तु एक व्यक्तित्वयुक्त आदमीको इस यातकी परवा नहीं होती कि कोई आदमी क्या कहता है । फिर चाहे कहनेवाला आदमी कोई धर्माचार्य हो या गृहस्थ । उसे इस यातकी भी चिन्ता नहीं होती कि धर्मशास्त्रोंम उस यातके सम्बन्धमें क्या व्यवस्था मिलती है और डॉफी क्या परम्परा है। उसके लिए तो यात सत्य होनी चाहिए, अन्यथा उसका उससे क्या सम्बन्ध समस्त धर्मा चायों, शिक्षकों, सम्प्रदायाँ और यडे आदमियोकी उपेक्षा करता हुआ पक व्यक्तित्वयुक्त आदमी अपने आत्माफे पूर्ण बल्से कहना है कि ' मेरे लिए यहां न्याययुक्त है। चाहे ऐस आदमीफे निधया और हमारे निश्चयोंमें कितना ही अन्तर क्यों न हो, कितना ही मत-भेद क्यों न हो, फिर भी हम ऐसे शक्तिशाली तथा स्वतत्र विचारक आदमीके प्रभाव और पलको अनुभव किये विना नहीं रह सकते । उसे अवश्य अनुभव करते हैं। उसके प्रत्येक विचार, शब्द ओर कामसे ऐसी शक्ति, विश्वास और प्रभाव निकलता है कि उसमेंसे हमारी तरफको पुण्यस्रोत यहता है। हम यह भी अनुभव करते है कि ऐसे आदमीफी थोडीसी सगतिसे हमें यह शक्ति प्राप्त होती है, जो हमें भद्र स्त्री-पुरुष बना देती है। व्यक्ति त्वमें यही महत्त्व है कि जिसके पास यह होता है, उसे उपदेश २८ निश्चय और तत्परता देन और प्रचार करनेके वास्ते याहर फिरने की आवश्यकता नहीं पस्ती । उसका तो जीवन ही उपदेशमय तथा आशीर्वादपूर्ण होता है। अत्यन्त महती शक्तिका सदा अनुभव किया जाता है, यह सुनी नहीं जाती। हदय ही इसको समझता तग अनुभव करता ह, ऑम्याफे सामने इसका काई प्रदर्शन (Demonstration ) नहीं फिया जा सकता, इसकी कोई नुमाइश भी नहीं होती। इस पुस्तकंफ आरम्भम कहा गया था कि हम व्यक्तित्वक दिनकी और जा रहे है। उस मुदिनका उदय हो चुका है। समा- चारपोक पढनेसे हमें यह निवास होता है कि ससारने व्यक्तित्व- की शक्ति और उसके अधिकागको समझ लिया है । नाम, धन, उपाधियाँ और बढी घडी स्थितियां आज ऐसी है जेसी कि हवाके सामने खाक । योग्यता, साहस, गुण, पवित्रता, मानसिक यल और चरित्र ही आज यही वस्तुएँ हैं । व्यक्तित्व सुदिनका यह तो प्रभात मात्र है, उसका पूर्ण विकाश हमें क्या न देगा ससारफे इतिहासमें सदा पान और अधिकारीको ही सम्मान नहीं दिया गया है और न मच्चे महापुरुपॉने भूतकालमे वे मम्मान ही प्रास किये है, जो कि उन्ह अपने व्यक्तिगत वल ओर साइससे प्राप्त होने चाहिए ये। उनके स्थानमें कितनी ही यार दूसरे आदमियोंका उनकी स्थिति-पोजीशन-आर नामके कारण सम्मान किया गया है। कितनी ही यार उच्च स्थितिके आदमियोंफो उनकी बड़ाईके कारण सम्मान प्राप्त हुआ है, उसके साहम और धीरन्यके कारण नहीं। किन्तु इस प्रकारफी यातें आज यदुत अशॉर्म यिदा हो चुकी है। आज हमारे साय व्यक्तित्वका पल है । मनुप्य आज सर कुछ है और व्यक्तित्व ही आज वास्त- विक महत्त्वका माना हुआ चिह्न है। अब हम मन ओर चरित्रको दृढ़ करनेमें सहायता देनेवाली धानोंका विचार करते हैं। सबसे पहली यात यह है कि अभिय कामों ओर कर्तव्योंको कभी टालना न चाहिए-मुलतयी न करना २९ प्रभावशाली जीवन- चाहिए । मनचाहते, प्रिय कामोंको पहले करनेके वास्ते छौंटना आपके लिए एक बहुत ही साधारण यातहोसकती है, किन्तु अनुभव और निरीक्षणसे यह मालूम होता है कि प्रिय कामोंको पहले करना अपने चरित्रको दुर्बल तथा पतित बनाना है। व्यक्तित्व प्राप्तिके रास्तेमें यह आदत एक बडी रुकावट है। आपके सामने एक कठिन काम है और आप उमे टालकर अपनी दिनचर्याको आरम्भ करते है । आप उस कामको छोडकर उन कामोंफो करते हैं, जो आपको अच्छे तथा प्रिय लगते हैं और जिनके फरने में आपको आनन्द आता है। क्या इस ढील्से टाला हुआ कोई काम कम अप्रिय और कम कठिन बन जायगा ? नहीं, यह नहीं होता। बल्कि उसे छोड देनेसे आप ही उस कामको करनेके लिए कम योग्य हो जाते हैं । इस प्रकार धीरे धीरे आप कम योग्य और अधिक दुर्बल धनते जाते है। ऐसा करनेसे प्राय जितना आप समझते हैं, उससे अत्यधिक सो देते हैं। पुस्तककी मूल लेखिका एक ऐसे नवयुवकको जानती हैं, जिसे एक पड़े कामपर लगाया गया था। उस कामके वास्ते अधिक आत्म-त्याग, सलग्नता, पवित्रता और कठिन श्रम करनेकी आवश्य- कता थी। वह नवयुवक उस कामके वास्ते सब तरहसे योग्य था। बहुत ही कम आदमी इतने स्पष्ट और उच्च विचारोंवाले होंगे। किन्तु एक दिन उसने लिखा, मैं यह जानता है कि जर आप यह पढेंगी, तब आपको बहुत दुख होगा, किन्तु मैं आपसे कहना चाहता कि अपनी इच्छासे ही मैंने कम कष्टोका काम पसन्द किया है और अपने सभी आदशोंको और जो कुछ मैं यनना चाहता था उसको आज मैं छोड़ रहा है। उस नवयुवकके इस कामका जो फल हुआ, उसपर मूल लेखिकाने दु खपूर्वक पर्दा डाल दिया है, उसे प्रकट नहीं किया है। ओरिजन स्वंटमार्डनका कथन है कि कम कठिनाईके मार्गको पसन्द करनेकी आदत इतनी बुरी है, जितनी कि अफीमसाने ओर मदिरापानको आदतें घुरी होती हैं। साधारण तौरसे सोचनेसे ही मालूम हो जायगा कि ऐसा
निश्चय ओर तत्परता
क्यों हे । फम कठिनाईके काम पसन्द करनेकी आदतसे ओर
अप्रिय कामोंको टालनेकी आदतसे अनिश्चितता, निमक, आत्म
अविश्वास और समयकी पावन्दी न करनेकी बुरी आदतें पेदा हो
जाती हैं और उन्हें दृढता मिलती है । इसलिए जो स्त्री-पुरुप सदा
कठिन ओर अप्रिय कर्तव्योंको हमेशा टालते रहते हैं, वे न कभी
साधारण जनतामे ऊँचे उठ सकते है ओर न बडे आदमी ही वन
सकते हैं।
अब जरा इससे विपरीत यातपर भी विचार करो। उस महती
शक्तिका विचार करो जो कि आदमीको कठिन और अप्रिय कामों
को पहले करनेसे प्राप्त होती है। इससे हमें निश्चय, तत्परता,
शक्ति, उत्साह, विश्वास, आत्म निजय और कठिनाइयोंका सामना
करनेकी शक्ति प्रान होती है।
व्यक्तित्वयुक्त आदमी सदा अपने मनपर काबू रखते है ओर
अपने आपको अपनी मानसिक अवस्थाओंके वशवी नहीं होने
देते।
३१
। ६.-आत्म-विश्वास "आत्म-विश्वास रक्सो, ययाकि इसी लोहेक तारस प्रत्यक हृदय स्पन्दित हाता है। -इमसन। मनुष्य ही स्वय अपना पथ प्रदशक है । जा आ मा मनुष्यको इमानदार और पूर्ण बना सकता है, वही समस्त प्रकाश, पूर्ण प्रभाव और सारे माग्यपर राज्य करता है। उसके लिए वाइ यात समयसे पहले या पाछ नहीं पाती। व्योमाट एण्ड फरार । यर बड़े आश्चर्यकी यात हे कि आज कल मनुष्योंके हृदयोमें . दोपको उसके असली रूपमै नही देरया जाता। यदि बहुधा दुर्व- रताको शक्तिका नाम दिया जाता है, तो पुण्यको ही पाप या पापको ही पुण्य कहा जाता है। कम योलनेवालेको मूर्स आर. अधिक बोलनेवालेको यातूनी या झम्की कहनेवाले आदमियों की भी यहाँ कमी नहीं है। अन्ध विश्वासको धर्म, कर्मको ढोंग और शक्तिको, कायरता कहनेवाले भी बहुत हैं। देशभक्तिको गद्दारी और धोसेवाजीको नीति कहा जाता है। विचारहीन आदमी यदि आत्म विश्वासको अहम्मन्यता कहते है, तो दासोंके समान दूसरे आदमियोंफी नकल करनेको और अपने हृदय के प्रारम्भिक भानोंको ग्रहण न करनेके कायरतापूर्ण भयको विनय कहा जाता है। जो आदमी अपने लिए स्वय सोचता है, और अपने स्वयभूत सलाहकारोफी वातोंपर ध्यान न देकर अपने हृदयपर अकित नियमोंफो समझता है तथा उन्हें व्यवहारमें परिणत करता है, उस आदमीको प्राय जिद्दी, दुराग्रही, और घमण्डी आदि नामोसे पुकारा जाता है । जो आदमी दूसरोंको सलाह देना अपना मुख्य कर्तन्य समझते हैं, ये यह भविष्यवाणी किया करते है कि यह आत्म-विभ्यास m - आदमी अपनी इसे दुरा उठायगा। साथ ही ये लोग उस मधि- प्पफा भी यहा सुन्दर चित्र याचते है, जो कि उनकी सम्मातेक अनुसार काम करनेसे उसे प्राप्त होता। थोटेसे ही निरीक्षणसे हमें यह विश्वास हो जायगा कि जो आदमी इधर उधर सम्मति माँगता फिरता है, यह प्राय पीछ बैठनेवाले आदमियोंमसे होता है, आगे बैठनेवालोमस नहीं होता। इस यातसे इन्कार नहीं किया जा सकता कि कुछ अवसर ऐसे भी आते है जय किरद व्यक्तित्ववारे स्त्री पुरुष भी अपने सच्चे और विश्वस्त मित्रोंसे कुछ याताके बारेमें सलाह किया करते हैं। एक आदमी वास्तविक सहायिका अपनी प्रिया धर्मपत्नीसे सलाह फरेगा और एक स्त्री अपने दृदयानुफल पतिसे भी सम्मति लेगी; किन्तु ये दूसरी याते है और इनका प्रस्तुत विषयसे कोई सम्बन्ध नही है। ये ऐसा किसी दुलनाफे कारण अथवा दूसरेके निश्चयपर विश्वास ही फर लेनेके भावसे नहीं करते, घरन् सहानुभूति, आत्मीयता ओर यो विश्वासके भावसे करते है। निस्सन्देह यह एक बड़े सम्मान और हर्पकी यात है कि दृढ व्यक्तित्वयुक्त स्त्री पुरुष आपसमें किसी विषयपर बातचीत करते है और एक दूसरेके विचारोंको समुन्नत करके जीवन निर्वाहफे अधिक योग्य बनते हैं। युवा आदमियोंको प्रत्येक अवसर और हर अवस्थामें सम्मति देना यही भारी भूल है। 'तुम यह फ्रो', 'मेरी सम्मति मानो ओर उसपर चलो', 'घहाँ मत जाओ', और 'तुम्हें यहाँ अवश्य आना चाहिए' आदि सम्मतियाँ प्रत्येक स्त्री पुरपके वास्ते विनाश- कारक है। यह कितने दुसकी बात है कि यहुतसे माता पिता तथा सरक्षक ऐमा सोचते दिखाई देते है कि युचकाको सोचने- विचारनेफी अपनी कोई शक्ति ही न रखनी चाहिए और उन्हें सदा ही बडे नथा बुद्धिमान् आदमियोंकी मम्मतिसे काम करना चाहिए, उनक इशागेंपर चलना चाहिए । सबसे अच्छी सम्मति जो किसी भी नरयुवक्फो दी जा सकती है, वह यही है कि "मेरे प्यारे लड़के, अपने मुआमलेपर तुम स्वय विचार करो ओर अपने । ३ -- प्रसावशाली जीवन- निश्चयके अनुसार काम करो" फिर यदि आरम्भमें वह भी करे, तो भी उसे उस भूलसे अधिक लाभ होगा और दूसर सम्मतियोपर ऑल मीचकर चलनेकी अपेक्षा वह मूल उर अधिक उत्तम आदमी बना देगी । हमे मनुप्योकी आवश्यकत न कि लाठीसे होके जानेवाले पशुओं ओर इशारेपर नाचनेव कठ पुताल्योकी । हमें दृढ़ और शक्तिशाली आदमियोंकी भाव कना है। हमे ऐसे आदमी चाहिए जिनकी बुद्धि तीक्ष्ण हो जिन्हें अपने आपपर भरोसा हो । हमें ऐसे दृढ सीपुर जरूरत है, जो रीति रिवाजों, परम्पराओं और समाजकी का नथा निरर्थक रूढियोंको ठुकरा सके तथा उन्हें अंगूठा दि सकें, अपने मात्माके विश्वासोंपर दृढ तथा सच्चे रह सके । उलटे समझे जानेसे-गरत-फहमीस-न दरें, अर्थात् यदि जन उनके कामों तथा वातीका उल्टा अर्थ भी लगावे, तब भी पर न करे । एक महात्माका कथन हे कि, "विचारों तथा कामं मूर्खतापूर्ण समानता अनुदार हृदय आदमियोंका भूत है, जिस साधारण राजनीतिज्ञ, तत्त्ववेत्ता ओर वर्मके ठेकेदार किया करते हैं। एक महान् आत्माको समानता तथा परम्पर कुछ मतलब नहीं होता है। आदमीका समानतासे उतना सम्बन्ध है जितना कि उसका दीवारपर पडी हुई अपनी छाया तुम्हारे जो विचार आज है, उन्हें आज नडे जोरके साथ प्रर करो और तुम्हारे जो विचार अगले दिन हो, उन्हें फिर उ उत्साहके साथ जाहिर करो, चाहे ये चिनार तुम्हारे पहले विचागेका खण्डन चरते हों । शायद तुम्हें सयाल हो कि इस आदमी तुम्हारे विपयमें अवश्य उलटी धारणा कर लेंगे, कि गलतफहमीमें पड़ जायेंगे। तो क्या उलटा समझा जाना वा बुरा है 'ससारमें घडेसे बडे आदमियोको लोगोंने उलटा ही समा है, ठीक नहीं समझा । पीथागोरस, सुक्रात, ईसा मसीह, ट्र और न्यूटन आदि तथा दूसरे पवित्र और बुद्धिमान महान् माद सब उल्टे ही समझ गये थे। महान् होना ही उलटा सम जाना है।"
आत्मविश्वास लोग तुम्हें उल्टा समझते है, तो क्या तुम उनकी धारणाको पल्ट सकते हो? यह काम तुम्हारा नहीं है, समयफा है। कुछ समय पीछे, अधिकसे अधिक तुम्हारी मृत्युके याद, सय लोग तुम्हें ठीक कहगे और तुम्हारा मजाक करनेवालाको भृले हुए यताक्र तुम्हारा सम्मान करेंगे। अच्छा, तुम ही बताओ कि आज उन महात्माओंको फोन उल्टा कहता है, जिनके नाम ऊपर लिये गये हैं। इसलिए जनताको व्याख्याओं तथा स्पष्टीकरणों ( clearing position ) से सतुष्ट करना व्यर्थ हे । जो आदमी अपने प्रत्येक कामकी व्याख्या करते है ओर अपने प्रत्येक मोलिक अथवा रूढिसे विरुद्ध कामके पास्त क्षमा माते हैं, ये दुर्वल है। व्याख्या करना अपने कार्यके आधारके विषयमें स्वय सन्देह स्वीकार करना है। जोर जो सन्देह करता है, उसस बुरा होता है। आदमीको ठीक समये जानेकी प्रतीक्षा करनेको तय्यार रहना चाहिए। लगातार क्षमा मांगना या क्षमा मांगने जेसी सूरत बनाये रसना रूढियों ओर प्रयाओंके प्रभुत्व तथा शक्तिको स्वीकार करना है। इससे यह भी प्रस्ट होता है कि क्षमाप्रार्थी आदमी भी समा जका गुलाम ओर रूढियोका दास है। 'जो कुछ मुझे करना चाहिए उसका सम्बन्ध मुझसे हे न फि जनताके विचारोंसे'- यही व्यक्तित्वयुक्त स्त्री पुरुषोंका व्यवहार होता हे । जीवनका यही पक नियम पतित तथा सुद्र आदमियोंको महात्माआसे, कायराको धीरोसे जोर असफल आदमियाको सफल आदमियोंसे जुदा करता है। ससारमें ऐसे आदमी सदा रहेंगे जो कि यह सयाल करेंगे कि ये तुमसे अधिक उत्तम जानते हैं, किन्तु यदि तुम उनसे वाद विवाद फरनेके वास्ते सकते हो, ठहरते हो, तो तुम चुरा करने हो, अपने पर आपत्ति लाते हो, कारण कि उसी समय तुम अपनी शक्ति योको खराव करना, तितर बितर करना आरम्भ कर देते हो। उनसे ऐसे विपयोपर विवादमें लगाया हुआ समय नष्ट ही होता है, प्रभावशाली जीवन- . जिनका फैसला स्वय तुम्हें करना चाहिए । स्वतत्रताका सौन्दर्य कार्य भेद और आत्म विश्वासके आधारपर किये हुए काम उपर्युक्त ध्यवहारसे अलग रहते हैं। एक प्राचीन भारतीय ऋपिका कथन है, कि, " किसी दूसरे आरमीपर भरोसा मत रक्खो । अपने ऊपर विश्वास रक्खो और अपने ही कार्मोका भरोसा करो । दूसरे आदमीकी इच्छाके अधीन होना दुस देता है और आत्म-विश्वासमें सच्चा सुख है।" गोसाई तुलसीदासजीने भी कहा है 'पराधीन सपने सुख नाहीं।' संस्कृत भापाके एक प्राचीन कविने तो यहाँ तक कह दिया है कि जीवनात्त परीधीनाजीवाना मरणम् वरम् ' अर्थात् पराधीन जीवनसे तो मर जाना ही अच्छा है। अपने ऊपर भरोसा करने में युवा पुरुपोंकी सहायता करना उनके लिए धन छोडनेकी अपेक्षा अधिक अच्छा है। क्योंकि यदि वे स्वावलम्बनका पाठ पढ़ चुके है, तो ससारमें अपना मार्ग आप निश्चित कर लेंगे तथा ससारकी वडीसे बडी विभूतिको प्राप्त करनेमें समर्थ होंगे, किन्तु यदि उनमें उपर्युक्त गुण नहीं है, तो आपकी छोडी हुई सम्पत्तिको ये दो दिन में उडा देंगे। किसी पिता अथवा सरक्षकके जीवन में यह समय गर्व करनेका है जर कि उसका बेटा कायरतापूर्वक सम्मति न माँगफर किसी कामको स्वय करनेकी और किसी नवीन मार्गपरचलनेकी घोषणा करता है। इससे यह प्रकट होता है कि वह अपने मुआमलेपर स्वय विचार कर रहा है और बुद्धि तथा निश्चयको काममें लाना सीस रहा है। जो स्त्री-पुरुष अपने आपको दूसरे सम्मति देनेके योग्य समझते हैं, वे स्वय सदा शक्ति लेखिका एक ऐसे शक्तिसम्पन्न तथा प्रमा है जिसने वृद्ध या दी, फिसीको आई चिना O नही किया और भात्म-विश्वास माँगा । न तो उसी कमी पिसीकी आशा सहन ही की और न कभी पिसीको आशा दी। यह आदमी अपने लिए नियम था।इस पातमें कुछ ईश्वरीयता है और कुछ ही भादमी इसे प्राप्त करते हैं। इमे प्राप्त करने वाले मदान हृदय, उद्यादर्श,स्पष्ट निरीक्षण और घट इरादकी आवश्यकता है। इसी प्राप्तिका अर्थ ही सयभयॉफी अपने हदयसे निकाल देना है। घ्यक्तित्वयुक्त आदमीको जीवन या मृत्युका भय नहीं होता। यह जानता है कि ये दोनों ही अपने अपने समयपर अच्छ हैं और इसलिए यह जीवन और मृन्युफा स्वामी होता है । उमे समा जका भी भय नहीं होता। क्योंकि यह अपने साथियॉफी प्रशमा या निन्दाकी परवाह नहीं करता, इनफा उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसके लिए ये दोनों ही समान है और यह उनमेसे किसीकी भी परवाह नहीं करता । यह सत्यसे भी नहीं सरता। कारण कि यह स्वय सत्य है। जैमा एफ आदमी अपने हृदयमें मोचता है, यह पैसा ही होता है । वह भाग्यसे भी डर नहीं मानता । क्यों कि यह स्यय ही अपने भाग्यका मालिक है यह भायीसे भी दूर नही भागता, क्यों कि यह जानता है फि चरित्र दी भाग्य है, चरित्र ही भाग्य घनता है। यह यह जानता हे फि मुझे अपने सिवाय और काई दूसरा आदमी सफलता नहीं दे सकता। यह समझता है कि कोई भी वस्तु मेरे भाग्यफो नहीं रोक सकती। अपने पवित्र और सिद्धान्तानुफूल मार्गपर चलने में असमर्थता या असफलनाके सिवाय कोई भी दूसरी चीज मुझे अपने आदर्शकी प्रालिसे नहीं रोक सकती। उसके मार्गपर यही प्रकाश पथ प्रदर्शकके रूपसे पह सकताहे जो कि उसके अभ्यन्तरसे प्रकट होता है, दूसरा नहीं । ३७ " जो पारगामिता ( पूरी योग्यतासे काम करी) " जो कुछ तुम्ह करना है, उस अपनी पूरी तातिसे करो" -~-याईनल। "धीर पुरुष वही है जा कि अटल रूपस डटा रहता है। आदमियाम जा बड़ा अन्तर है, वह यह है कि एक आदमी अपने ऐसे सिद्वान्ता तथा कर्तव्यासे बंधा हुआ है जिनपर तुम विश्वास कर सकते हा, मरासा कर सकते हो, जब कि दूसरा आदमा इम प्रारक रिसी भी सिद्धान्तस बैंधा हुआ नहीं होता। और चूँकि उस आदमीम पाइ नैतिकता नहीं है, वह किसी सिद्धान्तपर चलनेवाला आदमी नहीं है, इमलिए उस काई भी वस्तु ही वाघ सकती। -इमसन । काम करनेके योग्य है, वह सदा ठीक रूपसे ही किये 'जानेके योग्य है-यही सदा दृढ आदमियोंका पथ प्रद शंक नीति-चाय ( Motto) है। व्यक्तित्वयुक्त आदमी अपनी प्रतिक्षाको अपनी सारी ताकतसे और अपने प्रत्येक कर्तव्यको पूरी ईमानदारीसे पूरा करता है। अपने कामके छोटे छोटे अशको भी पूरी तरहसे करना ही उसका उद्देश होता है। एक दुर्बल व्यक्ति सडियल, फूहडाना और साधारण कार्यसे ही सन्तुए हो जाता है । उसके लिए यह यात काफ़ी है कि उसका काम चलता रहे। बस, इसीपर वह सतोप कर लेता हे । ऐसे स्वभाववाले आदमी उससे अधिक काम कभी नहीं करते है जित-' नेके वास्ते वे अपने आपको पुरस्कृत समझते हैं, जितनेके यास्ते उनके विचारमें उन्हें मेहनताना मिला है। 'जो कुछ मेहनत-मजदूरी या परिश्रमिक मुझे मिलता है, उसके बदलेम मेरा काम काफी है ऐसा कथन सदा अयोग्य, सुस्त" और अच्छा काम न करनेवाले आदमियोंका ही हुआ करता है। फहना व्यर्थ है कि ऐस आदमी कभी किसी महत्त्वपूर्ण पदको प्राप्त नहीं करते। ऐसे आदमी अपने मालिकोंके-उनसे काम करानेवाले भादमियाँके-हदयों में अपने लिए कोई विश्वास पैदा नहीं करते । - पारगामिता - पा सदा अपने मेहनताने, मजदुरी, के आसार काम करता है, इस लिए उससे फाम फगनेयाले मदा उसको उसके कामके अनुसार मजदूरी देते हैं। इतना ही नहीं, दुनिया में पफ और यहा नियम काम करता है, जिसे फाम पग्नेवाले और काम करानेवाले मादमी भी नहीं जानते। यह नियम यह है कि जो आदमी योग्यता रमता है, उन्नीको पुरस्कार मिलना चादिप । उपाशीपाला एक दृढ आदमी हमेशा एफरारे आदमीफे समान काम करता है, एफ फिगयपर रस्ते हुए आदमीफे ममान नहीं । बाद यह दिमागी, मस्तिष्फया, काम करे या हाथफा काम करे, उसफा काम उसके जीयनका अश होता है। यह अपनी कलाकी अच्छाईको मजदूरीके पैसों या रुपयोंस मापफर गय न करेगा। मुझ इतने पैसे मिलते है, माही अच्छा मुझे काम करना चाहिए, इम विचारसे प्रेरित होकर यह कभी अपनी कारीगरीमें पट्टान लगायेगा। एक दिनफा काम उसक लिप पहुत ही आवश्यक और मूल्यवान वस्तु है और इसे यह, इस सयाल से फि फ्यों कुछ पेसॉके वास्ते अपने पुरुषत्वयी महती शक्ति खगय की जाय, थेष्टसे कम दरजेफा न करेगा । उस अपनी उन्नतिके लिए न तो पिसी स्कीमको तय्यार करने की आवश्यकता है और न अपने घेतनको पत्यानेके लिए क्सिीस कुछ पहनेकी । यहाँ भी फिर वही नियम काम करता है कि जा आदमी योग्यता रयता इं, उसे पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिए। पूरे ओर परे काम सामने सयको झुकना पडता है। जो छोटेसे छोटा काम निकम्मा, रही अथवा अधूरा किया जा सफता है, यही परमात्माफी सेवा या अपना कर्तव्य समझफर सारे चातुर्य तथा फलासे अच्छी तरह भी किया जा सफता है। किसी भी स्त्री या पुरपके पाम्ते इससे अधिक लज्जा और गिरावटकी यात क्या होगी कि उसे एक कामको दुवारा करनेके वास्त इस लिए कहा जाय कि उसने अपना काम ठीक तोरसे नहीं किया है, अधूरा किया है।
प्रभावशाली विन- जिस ढंगसे कोई काम किया जाता है यह ढग ही काम करने वाले आदमीके चरित्रको प्रकट करता है, फिर चाहे यह काम कुछ भी क्यों न हो। जो आदमी व्यक्तित्व प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, उसे कभी किसी कामको अधूरा और रद्दी न करना चाहिए । उसका लक्ष्य अपने कामके हरएक भागको पूर्ण रूपसे करना ही होना चाहिए। यह आदमी चाहे किसी भी परिस्थितिमें काम क्यों न कर रहा हो, उसका पथ प्रदर्शक नीतिचाफ्य यही होना चाहिए कि 'खरा और पूरा काम करो। जो आदमी अपने मालिककी उपस्थितिमें, उसकी हाजिरीमें तो कामको लगनके साथ करता है, किन्तु मालिफके पीठ फेरते ही सुस्तीसे कामको भद्दा या मामूली करना आरम्भ कर देता है, वह न किसी शक्तिको प्राप्त करता है और न प्रभुत्वको पाता है। ऐसा आदमी इस प्रकारके व्यवहारसे अपने लिए एक पेसी अवस्था पैदा कर लेता है, जो उसे अपने भविप्यपर जरासा भी विचार करने पर भयभीत कर देगी। वर्तमानमें हम सब अपने पूर्व कोका फल भोग रहे हैं। यदि हम अपनी वर्तमान अवस्थासे सन्तुष्ट नहीं हे, यदि हमारी घर्त मान स्थिति हमारी रुचिके अनुसार नहीं है, तो, इसका दोष हमपर ही है। स्वय हमने पिछले कमोसे अपनी वर्तमान अवस्था को पैदा किया है। हम तो अब केवल पहले योये हुएको काट रहे हैं। यहुतसे आदमी इस घातको स्वीकार न करेंगे, क्योंकि ये इसे एक कठोर लोकोक्ति कहते है, किन्तु उनके विश्वास करने या न करनेसे कुछ घनता विगढ़ता नहीं। प्राकृतिक नियम अटल रूपले अपना काम करते हैं। जिस प्रकार एक किसान गेंहू योफर गेंह ही काटता है, जो थोकर जो ही फाटता हे और यवूल पोकर खुल ही काटता है, ठीक इसी प्रकार हम भी अपने जीवनमें पूर्वकालमें बोये हुए अपने विचारों नथा कमोके पीजों के अनुसार ही फल पाते हैं। जैसा पोते हैं, वैसा ही काटते हैं। जैसा करते हैं, वैसा ही मरते है। ४० पारगामिता - "" " इसी यातको अप्रेज़ीफे एक कयिो यही अच्छे दैगसे कहा है, जिसका आशय यह है "जो कुछ हम योते है, यही हम फाटते हैं। जग पासफे खतो. को देखो। यहाँ मम्मोंसे सरसा पैदा हुई है और अप्लस अप पेदा हुआ है। जिस देगसे यह यात हुई है, उसे कोई नहीं जानता, यद प्रतिफा रहस्य है। इसी प्रकार आदमीका भाग्य यनता है।" "फिमान अपने खेतमें याय हुए यीजोंको काटने आता है और अन्नके साथ साथ व्यर्थफी ऐमी घास-फुस तथा विपली येलें भी पाता है जिनस उमे दुप होता है और जिनसे भूमिको भी फष्ट होता है। "यदि फिसान उचित रूपसे परिश्रम करे और अपने खेतम महानिकारक यास-फसफो निकालकर उसके स्थानपर उपयोगी नया फरदायफ पाधं योता रहे, ता पेत फलदायक, सुन्दर और माफ हो जाय और होनेवाली फसल फोमती यन जाय। क्या हम अपने लिए अच्छी अवस्थाओफी इच्छा करते हैं? क्या हम अपने आसपासफी परिस्थितियांफो पहलेसे अधिक रोचक तथा मुन्दर देखना चाहते हैं ? क्या हम किसी ऐसे उच्च पदको प्रास करनेकी इच्छा करते हैं, जिससे कि हमारा जीवन उच्च तथा विशाल बन जाय ? यदि हम ये याते चाहते हैं, तो हमें अभीसे उनके लिए काम करना चाहिए और अपने आपको उस हालतके योग्य बनाना आरम्भ कर देना चाहिए । हम अपने जीवनको इतना पास्तविक, इतना पूर्ण, इतना परिश्रमी और इतना ईमानदार बना देना चाहिए कि जिससे हमारा भविष्य, जो कि वर्तमान में ही बन रहा है, कार्य और कारणफे सम्बन्ध सूचफ नियमके अनुसार हमारे लिए ये सय वस्तुएँ लाये, जिनकी हम इन्छा करते है। खरा और पूरा फाम करना योग्यताको छाप है, वित है। योग्यता व्यक्किन्यकी छाप है। .
" ८-सव्यवहार "सयवहारकी प्राय उपक्षा की जाती है। यह पुरुषार वास्ते अत्यत अधिक आर. श्यक है और स्त्रियांके लिए भी किसी तरह कम आवश्यक नहीं है । xxx सघवहार सद्गुणाका छाया है । ये उन अन्छाइयागी अल्पकालिक प्रदशिनी है, जिन्ह हमार साथी प्रम करत हे तथा जिनका वे आदर करत हैं। यदि हम वैसा ही मननरा प्रयत्ल कर जैसा कि हम याहर प्रस्ट हानेरा प्रयत्न करते हैं, ता सध्यव- हार हमार कतव्याकै पालना लिए उपयोगा पथ-प्रदशामा काम दे सकते है। -सिडनी स्मिय। 'मुन्दर आकृति सुन्दर मुराकी अपेक्षा उत्तम है, किन्तु सध्यवहार सुन्दर आकृतिस भी अच्छा है । वह मूर्तिया और चित्राम भी अधिक आनन्द देता है। यह सारी ललित क्लाआम सर्वश्रेष्ठ क्या है। -~-इमर्सन “मने एक व्यक्तिरो देसा है। उस सयवहार यद्यपि सभ्य समाजक नियमांक सक्था अनुकूल ये किन्तु उनको उसने उस समाजम न सीरा था। म मौलिक तथा प्रभावशाली य और उसको उनसे समृद्धि तथा रक्षा प्राप्त होती थी। उसे भी न्यायालय सहायतामी आवश्यस्ता न पडी।xx x वह प्रसन्नचित्त सुस्वभावी और स्वतन था 1 x ९ उसम राजाआके समान वैभव था। वह अल्प- भाषी तथा गम्भीर था और लासा आदमियाद्वारा देश जाने याग्य था। -इमर्सन । अब तक रीति-रवाजो और रढियोंकी दासतासे स्वतश्रता पाने और स्वाधीनताके सम्बन्धमें जो कुछ लिसा गया है, उससे यह न समझा जाना चाहिए कि सदावहारकी किसी प्रकारसे बुराई की गई है। यदि कोई पाठक ऐसा विचार करता हो, तो उससे प्रार्थना है कि वह यही ठहर जाय । क्योंकि यहापर सद्यवहारके सम्बन्धमें ठीक बातें पताई जायँगी। यदि व्यक्तित्व.. ४२ " सध्यवहार " प्राप्तिके इच्छुक स्त्री पुरष किसी यस्तुफी उपेक्षा नहीं कर सकते, तो यह सम्यवहार है। यह भी स्पष्ट रूपमे समझ लना चाहिए कि सद्यवहारमे फैशन, या दिसावटी शिप्रता अथवा इनके यहमका मनल्य नहीं है। हमारा मतलय नामधारी चतुर आदमियोंकी पातों और उनके मूर्यतापूर्ण कामासे भी नहीं है । और न हमारा आभिप्राय दिसायटी पहप्पन और ऐसी शिष्टतास हे जो कि झोल या मुलम्मेफे समाज फिसी गास समयपर धारण किया जाय और जिसे काम निकलते ही या यह मोका टल्त ही किमी दूसरे मौके पास्ने उटापर सँभालकर रग दिया जाय । किसीने कहा-"सद्यपदारसे ही पुरप वास्तविक पुरुष बनता है। इसपर यह और यढ़ाना उपयुक्त ही हागा कि स्त्रियाँ भी सद्यय हारसे ही वास्तविक स्त्रियाँ यनती है। जिन स्त्री-पुग्पोंके साथ हम अपने जीवनम प्रतिदिन मिलते. जुलते हैं, उनक प्रत्येक कामपर व्यवहारका रंग चढ़ा होता है। चाहे हम अपने आपका रोकनेका कितना ही प्रयत्न क्यों न करें, हम उन, अपनेमे मिलने जुलनयाले आदमियोंको पेसा ही समझते है अथवा उनके सम्बन्धमे उफि वैसी ही राय फायम करते है, जैसे कि ये अपने यातचीतके व्यवहारद्वारा हमें ऊँचते है, हमारे हमारे सामने आते हैं, कारण कि एक आदमीकी बातचीत और आवाज ही उसके हृदयको निश्चित रूपसे यताती है और उससे हमें यह भी मालूम हो जाता है कि बोलनेवाला आदमी सभ्य, शिष्ट ओर आनन्ददायक हे या इसके विपरीत है। हम अपनेसे मिलने जुलनेवालों के सम्बन्धमें वैसी ही मम्मति स्थिर करते है जैसे कि हमें ये अपने बालचाल-ढाल प्रभावशाली जीवन- , . । असस्कृत और अभद्र व्यक्तिके । ऐसा करते हुए, आदमि योंके यारेमें उनकी यात-चीत, चाल-ढाल और कामोंफे आधार- पर राय कायम करते हुए हम एफ यड़े नियमके अनुकूल काम करते हैं, यो ही किसी बहम या व्यक्तिगत दुर्यलताके वशीभूत होकर नही। ये यातें जानना साधारण मालूम हो सकती है कि आदमीको, भोजनके स्थानपर फिस तरह बैठना चाहिए, चम्मच आदिको किस प्रकार वर्तना चाहिए, साना पीना किस प्रकार चाहिए, खाना खाते -समय किस तरह अपने आपको आरामसे रक्पा जा सकता और अपने सहभोजियोंको किस प्रकारसे पूर्ण सुश रक्खा जा सकता है। किन्तु क्या ये बातें सचमुच साधारण हैं ? कदापि नहीं। ये वही आवश्यक यातें है और कई बार तो सद्यवहारोंके अमायने बहुतसे ऐसे आदमियोंके सुअवसरोंफो सरार फर दिया है, जो सब तरहसे अत्यत उत्कृष्ट चरित्रवाले आदमी थे। वह दिन बहुत दूर नहीं हे जय कि एफ पसेको शिष्टता और सद्यवहारकी शिक्षा देना, उसकी शिक्षाका एक आवश्यक अग समझा जायगा । अत्यत अधिक सम्माननीय तथा आदरयोग्य जो -पद हैं, उनमें प्राथमिक पाठशाला-प्राइमरी स्कूल के अध्यापकका ‘पद एक होना चाहिए । निस्सन्देह वह आदमी पूर्ण रूपसे भद्र “तथा योग्य होना चाहिए, जिसके जिम्मे छोटे बच्चोंको पढ़ाने तथा दीक्षित करनेफा काम है। ओर इसी प्रकार यह स्त्री भी सुशीला और भद्रा होनी चाहिए जिसके हाथोंमें भावी स्त्रियोंके कोमल और छाप लग सकनेके योग्य हृदयोंको ढालना है। किन्तु न तो इस पदको-प्राथमिक पाठशालाके अध्यापक अथया अध्यापिकाके “पदको काफी महत्त्व दिया जाता है और न सस्कृति तथा शिक्षा-दीक्षाके क्षेत्रमें अध्यापकोंफो उनका समुचित स्थान दिया ‘जाता है। परन्तु यह परिच्छेद अपने सार्वजनिक स्कूलोंके अध्या- पकोंकी हालतको अच्छा बनानेके उद्देश्य से नहीं लिखा जा रहा है, सबवहार इसका मतलब तोउन आदमियोंके हृदयापर सध्यवहारके महत्त्वको अकित करना है, जो व्यक्तित्वमाप्तिके इच्छुक है, उसे प्राप्त करनेकी तीन आकाक्षा रसते हैं। जब हम फिसी आदमीको पहली बार बोलते सुनते है, तब क्या कभी कभी हम कुछ धकासा अनुभव नहीं करते? हम उससे कमसे कम एफ शिष्ट और अच्छी बात सुननेकी आशा होती थी, किन्तु उसके स्थानमें सुनते हैं सर्वथा ही गँवारू, कठोर, तीन, शिष्टता हीन और प्रतिभारहित यात । शीघ्र ही अपनी इच्छासे भी प्रल एक महान् नियमके अनुसार हम उसस्त्री या पुरपको उसके उचित स्थानपर स्थापित कर लेते हैं, उसके बारेमें राय कायम कर लेते है। हम प्रति दिन स्त्री पुरषोंमे गलियों, घरों आदि स्थानोंपर मिलते हैं। उनके चरित्रको ठीक रूपले समझनेके वास्ते तथा यह जाननेके वास्ते कि ये स्त्री पुरष मेल मिलाप करनेके योग्य है या नहीं, हमें उनके व्यवहारकी ही जरूरत है। उनके व्यवहारको देख- कर ही उपर्युक्त दोनों बातोंका फैसला किया जा सकता है। चाहे हमारी तुलनात्मक स्थितियाँ फैसी ही हो हम अपने प्रति- दिनके सम्पर्कसे, मेल-जोलसे अपन व्यवहारोंद्वारा सदा यह यात प्रकट करते रहते है कि हम केसे आदमी हैं । सयवहारको शिष्टतासे तथा दूसरोंकी मेवा करनेके अवसरोंको तलाश करनेसे प्रफट किया जा सकता है। निस्सन्देह दूसरोंके वास्ते कृपा और उनका ख्याल रखना सयवहारके रहे यडे चिह्नोंमसे है। वास्त- विक भद्र स्त्री-पुरुप जानते है कि मेवा फिसीको पतित नही करती है, परन् सेवा करनेवालेको समुन्नत करती है। जिन स्त्री-पुरषोंका आदर और विनय करना हमारा कर्तव्य है, उनका आदर और विनय करनेसे आदमी इतने ऊँचे उठ जाते है जितने ऊँचे कि ये आदमी है जिनकी सेवा करते हैं । वास्तविक सस्कृतिके आदमी आक्रमण- कारी, शेषी मारनेवाले और शोर करनेवाले नहीं होते, ये तो हर- एक स्थिति सुखी और प्रत्येक सगतिमें परिचितसे होते हैं। ये ॥
प्रभावशाली जीवन- सदा स्थिर चित्त ओर आत्म-सतुष्ट होते हैं । इममनने कहा है कि एफ भद्र आदमी कभी शोर नहीं करता और एक मह महिला मटा स्थिर चित्त रहती है। इसलिए व्यनिन्यप्रामिफे इच्छुफाको अपने व्यवहारोंकी देय माल रखनी चाहिए। उन्हें अपना व्यवहार टीक बनाना चाहिए । जो आदमी शिष्टता और थेप्टताके मार्ग जानते हैं, उनसे उसे गुशीमें ये बातें सीसनेको तय्यार रहना चाहिए । उसे अपने वचन, चलन, आदत और हाय-भावका प्रत्येक भ्यान तथा प्रत्येक परिस्थितिमें ध्यान रखना चाहिए। उसे यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि शिष्टता, सद्यपहार और श्रेष्ट वर्ताव पेसी वस्तुएँ है, जिन्हें यक्तित्वमाप्तिके काममें छोड़ा नहीं जा सकता।
" " ९-शारीरिक संस्कार "पारीर-गठन शक्ति आदमार अपने ही भातर है।xxx उस आदमीको देशा और उसरी सफरताका कारण तुम समझ जाआग। "जर हम एक से आरमारा दाते ह निसर समस्त काम शाही, प्रातभापूर्ण और गुलाबी फूलार समान आनन्ददायर है, तब हम परमात्मारा धन्यवाद यरना चाहिए कि एसी यात हा सकती है और वतमानम है।" इमसन । “ अपने शरीर मान्दराम परमात्मारा आधेिशित परा । --सेण्ट पाल । जच पक आदमी यह यात स्वीकार करना हे फि सुन्दर 'आमावाले आदमीनी आरति ओर शरीर सुन्दर होते हैं, तब हम यह यात भी माननी चाहिए कि शारीरिक सम्फार नामकी भी कोई वस्तु हे। शारीरिक सस्कारका मतलव शरीरको शानपूर्वक सुन्दर बनाना तथा सधाना है। ऐसा करनेमें केवल शरीरको यधिक योग्य, पूर्ण और अपने कर्त्तयोंको पालन करने तथा श्रेष्ठ काम करनेका साधन बनाना ही हमारा उद्देश्य नहीं है, वरन् उसे देखने में अधिक आनन्ददायक बनाना और शारीरिक प्रतिभा तथा सोन्दर्यसे अपने शरीर मन्दिरमें परमात्माको आधि प्ठित फरना ओर अपने भावोंमें परमात्मीयता लाना भी है। व्यक्तित्वयुक्त सी-पुरुष एक स्वस्थ शरीरकी इच्छा करेंगे। यद्यपि ससारम ऐसे आदमी हुए है ओर वर्तमान समयमें भी मोजूद हैं जो कि किसी न किसी रोगमें सदा ग्रसित रहे है और फिर भी वे महान व्यक्तित्वके धारी हुए है। परन्तु वे निस्सन्देह महान् आत्मा है और अपने पूर्व कमाको ज्ञात रूपसे किसी उद्देश्यके साथ काममें ला रहे है । इतिहास हमें पदसूरत सुकरात, अधे मिल्टन, बहरे वीथोवन ओर दृष्टिहीन होमरका हाल यत लाता है। हमारे देश भारतवर्ष भी कवि सूरदास दृष्टिहीन ही हुए हैं। वर्तमान युगके अगद्विरयात् महापुरुष महात्मा मोहनदास कर्मचन्द गाँधी कितने दुवले पतले और कमजोर आदमी है !
प्रभावशाली जीवन- किन्तु उनकी शक्ति ? ओह वह अपार है। क्या हम अपने जीवनमें और बहुतसे ऐसे आदमियोंको नहीं जानते कि जो भयकर शारी- रिक दुखोंमें फंसे होते हुए भी व्यक्तित्वकी अपरिमित शक्तिके धारक हुए हैं और जिन्होंने बहुतसे ऐसे काम किये हैं जिनका प्रभाव सदा स्थायी रहेगा? उनमें ऐसे उदाहरण भी है कि किस प्रकार मानवी मन शारीरिक अवस्थाओंको जीत सकता है तथा घशमें कर सकता है और उन्हें शक्ति तथा चलकी प्रचण्ड धारामों- में पलट सकता है । किन्तु इतनेसे ही, इसी घातके आधारपर ही हमें दुख तथा शारीरिक दुर्बलताको कोई विशेष महत्त्व प्रदान नहीं करना चाहिए और न महान् पुरुपोंकी शारीरिक अटियोंको कभी अपने स्वास्थ्यके सम्बन्धमें परवाई करनेका या अपने शरीरकी किसी प्रकार उपेक्षा करनेका बहाना बनाना चाहिए। किसी बडे अँगरेज कविके सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि वह व्यक्तिगत रूपसे वडा गन्दा रहता था और अपने वाद्य रंग-ढगके विषयमें बडा चेपरवा था। इस यातका सच या झठ होना दोनों सम्भव है। किन्तु यदि यह यात सच भी हो, तो भी यह इस यातकी क्या दलील है कि हमें भी वैसा ही होना चाहिए, हमें भी गन्दा तथा बेपरवा रहना चाहिए ? हमें न तो आदमियोंकी घुरा इयों तथा असफलताओंकी नकल करनी चाहिए, न उनकी टि- योकी बराबरी करने या उनसे पढनेका प्रयत्न करना चाहिए और न उनकी बुरी आदतोंकी नकल करनी चाहिए। यह आदमी उच्च कोटिकी कविताएँ लिखा करता था, परन्तु उनका कोई प्रभाव न होता था, कारण किवह जाहिरा तौरसे भद्दा रहता था। वह इस यातको बड़े शौकसे कहा करता था कि वह व्यक्तिगत नुमाइशकी परवा नहीं करता । इसको तो कुछ और ही नाम देना ठीक होगा। आजकल शारीरिक सस्कारके विद्यालयोंके बहुत विज्ञापन निकलते हैं। बहुतसे नीम हकीम आजकल समस्त रोगोंको दमके ४८ शाररिक सस्कार दममे अच्छा फर देनेके रिमापन यहाघट कल्पा रहे है। ऐसे घिमापन-याज़ॉफ भाजहर म्यानपर दलके दल है । परन्तु जो स्त्री- पुरपइनके पीछे पीछ फिरते है, ये शायद ही कभी स्वस्थ ओर सुद्ध होते है। यल्कि यहुतमे आदमी विशेषरर नवयुवर दवाइयोंके नामपर न मालूम पया फ्या निपली ओपाधियाँ पाकर अपने स्थास्थ्यसे हाय धी यउने है। पर हम किसी प्रकार बुद्धिमान् यन रहे हैं यार यह यात समझने लगे हैं कि परमात्माका यह इच्छा नहीं है कि हम बीमार हो ओर दुप पाएं ओर न दुर्बल तथा रुग्ण होना देवी रूपाका कोई विह। हम यह यात जानते है कि यीमारी तथा दुसरा अर्थ यही है कि हमने किसी न किसी समयपर किसी तरह से प्रतिके स्वास्थ्यसम्बन्धी नियमोका ताहा हे और उसरा हमें दण्ड भुगतना हे। पूर्ण शारीरिक स्वास्थ्य तथा योग्यता मनुप्यकी प्राकृतिक अय स्थाएँ है और पूर्ण स्वास्थ्यका सुख भोगना प्रत्येक आदमीका अधिकार है। इन दो याताको अनुभव करनेके बाद यह कहा जा सफ्ता हे कि आदमियोंके स्वास्थ्य आर शारीरिक योग्यताको समुप्मत करनेवाली सारी शक्तियोंमें मरसे महान् मनफी मातरिक शक्ति है । परमामाने मनुप्यको अपने नमूनेका ओर अपनी रचिके अनुमार बनाया है । रोग अमित, यीमार ओर अस्वस्थ रहना काई देवी मारूम नहीं है। आनेवाली हरएक नस्ल इस सचाईको खूर समझेगी ओर इसलिए शरीरको अधिक स्वस्थ तथा अधिक योग्य बनाएगी कारण कि उनके विचार उनके शरीरोंको अपने अनुकूल निर्माण करेंगे। सद्विचार ओर सजीवनसे हमें केवल स्वस्थ शरीर यनानेकी ही फोशिश न करनी चाहिए, परन् हमें इनसे अपने शरीर भी मुन्दर तथा प्रतिभा-पूर्ण यनानकी इच्छा करनी चाहिए जो व्यक्ति, चाहे यह स्त्री हो या पुरुप, प्रतिदिन स्नान करनेकी परवा नहीं करता, जिसके नासून कटे हुए नहीं है, यढे हुए हैं, जिसके हाथ कभी साफ नहीं रहते, जो अपने दाँतों ओर वालोंकी उपेक्षा करता --- प्रभावशाली जीवन- है, जो सीधा तथा अभिमानके साथ चलनेके स्थानपर येढगे तौरसे मुरदोंके समान चलता है, जिसकी छाती चपटी तथा थोथी है और जिसके कन्धे गोल तथा भद्दे है, वह आदमी न किसी प्रभुत्व ओर शक्तिको प्राप्त कर सकता है और न व्यक्तित्वपर ही अधि कार जमा सकता है। पाठक यह भली प्रकार समझ गये होंगे कि ऊपरकी बातोसे हमारा अभिप्राय उन लोगोंसे नहीं है, जो कि अपाहिज है, या किसी घटना विशेपके कारण दुस पा रहे हैं, वरन् उनसे है जिनके वक्ष स्थल या सीने, कम साँस लेने ओर चलते समय अपने शरीरको सीधा रखनेवाली शक्तिके अभावसे आगे झुकने देनेकी भद्दी आदतके कारण, चपटे ओर योथे हैं और जो इस तरहसे अपनी छातीको सुकही हुई तथा फेंफड़ोंको कमजोर ओर प्राय' रुग्ण बना देते है। और जर ऐसे आदमियों के सम्बन्ध फुछ कहा जाता है, जिनके कन्धे गोल और भद्दे होते हैं, हमारा मन्शा अपाहिजोंसे कभी नहीं होता, वरन् उन ही आदमियोंसे होता, है जिनके कन्धे भद्दी तरहसे उभरे हुए होते हैं। कन्धोंका ऐसा होना एक ऐसे सुस्त तथा आराम तल्न मनका चिह्न है जिसमें कि शरीरको सीधी तथा स्वाभाविक स्थितिमें चलनेवाली शक्ति तथा साधनाका अभाव होता है। वैठने, सदा होने और चरनेके ठीक तरीकेको ही अपनाना चाहिए । आत्म-सस्कारके उत्साही विद्यार्थी यह बात समझ गये होंगे कि इन सबका इलाज मान- सिक ही है। हम इस बातकी घोषणा करते है, इसे ललकार कर कहते है कि हरएक आदमीको मुडोल बननेका और हरएक स्त्रीको सुन्दर यन- नेफा हक है। यह बात कभी न स्वीकार की जानी चाहिए कि एक आदमी ज्यों ज्यों घड़ी अवस्थाको प्राप्त हो, त्यो त्यों उसे अब श्य ही कम सुन्दर होना चाहिए । यह एक झठा विश्वास है। इसी प्रकार एक साफो अपने यौवन दिन ढलने के साथ अपने सौन्द यंको भी न खोना चाहिए। उसे तो दिन प्रतिदिन अधिक सुन्दर - ५० शारारिक सवार बनना चाहिए । गनुभयमे उमफे मुग तथा शरीरको शक्ति और मौन्दर्य प्रास होना चाहिए । आदमीफी अधेद अवस्था तथा वृद्धावस्था उसपी युवायस्थाफी अपेक्षा उती दी सुन्दर होती चाहिए जितनी फिइपते हुए सूवी छटा उसपे दोपहरफे प्रका शमा तेजफे समान सुन्दर होती है। पूर्ण रूपस घिरा हुआ फूल एक कलीस अधिक मुन्दर होता है। पया हुआ फल और भी अधिक सुन्दर होता है और पताके दिनोंमें मुरझात हुए पत्ते कभी कभी यमन्त ऋतुपे हो रे तथा चमकदार पत्तोंस भी अधिक उत्तर सौन्दर्य रयते है । जय ये यात टीम, तय प्रति देवीपी उथ औरष्ठ रचनाएँ-स्त्री पुरुष-अपनी प्रतिभा,सौन्दर्य ओर प्रमके उच्च आदर्शने क्या पम रह जायेंगे? यदि ये प्रतिफे माथ सहयोग करें और अपने पतंन्याशा पालन फरें, तो ऐमा कदापि नहीं हो सकता । ये कभी प्रारतिफ सौन्दर्यके मापसे, आद र्शसे, नीचे ही गिर सफ्त । शोफपी पात तो यह है कि यहुतसे आदमी उसादु गको एक अत्यन्त कठोर यस्तु में पल्ट लेते हैं जो कि आदमीको पवित्र यना सस्ता है। इसी प्रकार जीवनके अनुभनसे आदीके चरित्रमं दृढता तथा यडप्पन आना चाहिए और व्यक्ति चमें एक विशेष जादूमा आना चाहिए । परन्तु उसी अनुभवसे आदमी अपने मुगाको फटोरसा बना लेते है, उनपर झुर्रियों ओर त्योरियाँ पट जाती है और वे समयसे पहले वृद्ध यनने लगत है। कहनेका मतलर यह है कि जीवनफ अनुभवसे आदमीको शान्ति प्राप्त होनी चाहिए और उसके व्यक्तियमें आय पण पदा होना चाहिए । परन्तु होता क्या है ? ज्या ज्या आदमी अनुभवी होता है, त्यो त्यो यह बहुत गम्भीर पनने लगता है। प्रत्येक आदमीके सामने शारीरिक उमतिया कोई न कोई आदर्श जरूर होना चाहिए । परन्तु हममें कितने आदमी पेमे है, जिनके सामने शारीरिफ उन्नतिका कोई आदर्श है ? यदि अपतक हमारे सामने शारीरिक उन्नतिका कोई आदर्श नहीं है, तो शीघ्र हम अपने सामने कोई आदर्श रक्खें, उतना ही अन्छा से प्रभावशाली जीवन-- J -- है, जो सीधा तथा अभिमानके साथ चलनेके स्थानपर वेढगे तौरस मुरदोंके समान चलता है, जिसकी छाती चपटी तथा थोथी है ओर जिसके कन्धे गोल तथा भद्दे है, वह आदमी न किसी प्रभुत्व और शक्तिको प्राप्त कर सकता है और न व्यक्तित्वपर ही अघि कार जमा सकता है। पाठक यह भली प्रकार समझ गये होंगे कि ऊपरकी बातोसे हमारा अभिप्राय उन लोगोंसे नहीं है, जो कि अपाहिज है, या फिसी घटना विशेपके कारण दुस पारहे है, वरन् उनसे है जिनके वक्ष स्थल या सीने, कम साँस लेने और चलते समय अपने शरीरको सीधा रखनेवाली शक्तिके अभावसे आगे झुकने देनेकी भद्दी आदतके कारण, चपटे और योथे हैं और जो इस तरहसे अपनी छातीको सुकड़ी हुई तथा फेंफडोंको कमजोर और प्राय रुग्ण बना देते है। और जर ऐसे आदमियों के सम्बन्ध कुछ कहा जाता है, जिनके कन्धे गोल और भद्दे होते हैं, हमारा मन्शा अपाहिजोसे कभी नहीं होता, वरन् उन ही आदमियोंसे होता है जिनके कन्धे भद्दी तरहसे उभरे हुए होते हैं। कन्धोंका ऐमा होना एक ऐसे सुम्त तथा आराम तलन मनका चिह्न है जिसमें कि शरीरको सीधी तथा स्वाभाविक स्थितिमें चलनेवाली शक्ति तथा साधनाका अभाव होता है। वैठने, सड़ा होने ओर चलनेके - ठीक तरीकेको ही अपनाना चाहिए । आत्म-सस्कारके उत्साही विद्यार्थी यह बात समझ गये होंगे कि इन सवफा इलाज मान सिक ही है। हम इस चातकी घोषणा करते है, इसे ललकार कर कहते है कि हरएक आदमीको सुडोल बननेका और हरएक स्त्रीको सुन्दर धन- नेका हक है। यह बात कभी न स्वीकार की जानी चाहिए कि एक आदमी ज्या ज्या घडी अवस्थाको प्राप्त हो, त्या त्या उसे अप- श्य ही कम सुन्दर होना चाहिए । यह एक झूठा विश्वास है। इसी प्रकार एक स्त्राको अपने योवनफे दिन ढलनेके साथ अपने सौन्द यको भी न खोना चाहिए । उसे तो दिन प्रतिदिन अधिक सुन्दर शारीरिक सस्कार बनना चाहिए । अनुभवसे उसके मुस तथा शरीरको शक्ति और सौन्दर्य प्राप्त होना चाहिए। आदमीकी अधेड अवस्था तथा वृद्धावस्था उसकी युवावस्थाफी अपेक्षा उतनी ही सुन्दर होनी चाहिए जितनी कि डूबते हुए सूर्य्यकी छटा उसके दोपहरफे प्रका शमान तेजके समान सुन्दर होती है। पूर्ण रूपसे खिला हुआ फल एक कलीसे अधिक सुन्दर होता है। पका हुआ फल ओर भी अधिक सुन्दर होता हे ओर पतझड़के दिनोंमें मुरझाते हुए पत्ते कभी कभी वसन्त ऋतुके हरे हरे तथा चमकदार पत्तोंसे भी अधिक उत्कृष्ट सौन्दर्य रसते है । जब ये बातें ठीक है, तर प्रकृति देवीकी उच्च और श्रेष्ठ रचनाएँ-स्त्री पुरप-अपनी प्रतिभा, सौन्दर्य ओर प्रेमके उच्च आदर्शसे क्या कम रह जायेंगे? यदि वे प्रकृतिके साथ सहयोग करें और अपने कर्तव्योंका पालन करें, तो ऐसा कदापि नहीं हो सकता। वे कभीप्राकृतिक सौन्दर्यके मापसे, आद र्शसे, नीचे नही गिर सकते । शोककी बात तो यह है कि यहुतसे आदमी उस दुखको एक अत्यन्त कठोर वस्तुमं पलट लेते हैं जो कि आदमीको पविन बना सकता है । इसी प्रकार जीवनके अनुभरसे आदमीके चरित्रमें दृढता तथा वडप्पन आना चाहिए ओर व्यक्तित्वमें एक विशेष जादूसा आना चाहिए । परन्तु उसी अनुभसे आदमी अपने मुखौंको कठोरसा बना लेते है, उनपर झुर्रियाँ ओर त्योरियां पड़ जाती है ओर वे समयसे पहले वृद्ध बनने लगते है। कहनेका मतलर यह है कि जीवनके अनुभवसे आदमीको शक्ति प्राप्त होनी चाहिए और उसके व्यक्तित्वमें आक पण पेदा होना चाहिए । परन्तु होता क्या हे ? ज्या ज्यों आदमी अनुभवी होता है, त्यो त्यों वह बहुत गम्भीर बनने लगता है। प्रत्येक आदमीके सामने शारीरिक उन्नतिका कोई न कोई आदर्श जरूर होना चाहिए । परन्तु हममें कितने आदमी ऐसे है, जिनके सामने शारीरिक उन्नतिका कोई आदर्श है ? यदि अबतक हमारे सामने शारीरिक उन्नतिका कोई आदर्श नहीं है, तो जितना शीघ्र हम अपने सामने कोई आदर्श रस्, उतना ही अच्छा है। १ प्रभावशाली जीवन- हमें इस यातका दृढ सकल्प कर लेना चाहिए कि हम पर मान्म-मन्दिरको, शरीरफो, हर तरहसे इतना सुन्दर तथा मतिः शाली बनायेंगे जितना कि सम्भव है। हमें इस चातका विश्वा एसना चाहिए कि शरीरसम्बन्धी पूर्ण स्वास्थ्य, योग्यता में सौन्दर्य आदि हमारे है । दमे हरपक उपायसे अपने शरीरको पेर पवित्र तथा सुन्दर बनाना चाहिए जैसा कि आत्मा जैसी पवि घस्तुके वास्ते होना आवश्यक है, जिससे आत्मा सुखी तथा दुर रॉके लिए सुखदायक हो सके। जो स्त्री-पुरुष अपनी शारीरिक सस्कारकी उपेक्षा करते शारीरिक उन्नतिकी तरफसे बेपरवाह रहते है, ये कभी व्यत्ति त्वको प्राप्त नहीं कर सकते। दृढ विचारशक्ति तथा उच्चादर्शसे हम अपनी शारीरिक अव स्थाको इतना अच्छा बना सकते हैं, जिसके बारे में बहुतसे आदम विश्वास भी नहीं करते। यदि राममूर्तिके कर्तव लोग अपनी आर्य न देवते, तो यहुतसे आदमी उसके ग्लको यातोंको गप्प ही कहते उसपर विश्वास न करते। दुर्वलसे दुर्वल आदमी भी अपनी विचारशक्ति तथा दृढ सकल्पसे अपने आपको कितना बलपान बना सकता है, इस बातको पाटक इस घटनासे समझ जायंगे। एक लडकी थी। वह बडी ही नाजुक थी। जिस मकानमें यह रहती थी, उसमें स्वच्छ वायुकी पहले ही कमी रहती थी, इसपर वह लडकी सोते समय तमाम दरवाजों तथा विड़कियोंको खूब बन्द कर लेती थी। इससे स्वच्छ हवाकी कमी हो जाती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि वह पीली पड़ गई और कमजोर हो गई। तपेदिकके कुछ कुछ चिह्न दिखाई देने लगे। जब यह बहुत अधिक बीमार हो गई, तब डाक्टरोंने भी जवाब दे दिया। फहीसे लडकीके कानमें भी अपने जीवनके सकरमें होनेफी खपर पहुंच गई। सौभाग्यसे तभी लडकीके अन्तस्तलमें शागरिक मस्कार डाफ्टरॉफी यातसे एक हलफोसी मुसफ्यान आगई । उसने उमी ममय अपने एदयमें यह दृढ विश्वास पर लिया कि अय यह अधिर दिन यीमार न रहेगी, शीघ्र ही स्वस्थ हो जायगी। इस विचार परिवर्तनका फर यह हुआ कि यह यहुत ही शीघ्र अपने आदर्श अनुसार स्वस्थ हो गई, यह अपने आदर्शकी जीती जागती मूर्ति या गई और सुगी जीयन विताने लगी। अपने आदर्शपर डटे रहने, उसपर मय अवस्थाओमें विश्यास करने और उसे फभी न छोडनेका ही यह सर फल है। जोयात एफ आद- मोफे लिए सम्भव है, यह सरके वास्ते सम्भय हे। आदमीफे अस्तित्वका आधार उसपे विचार ही है और यह सब वस्तुओंफो इसी लिए प्राप्त करता हे कि यह है । इस लिए सर वस्तुओकी प्राप्तिका आधार आठमीफे विचार ही हैं। ५३ १०-मानसिक संस्कार . "मनको दृढ बनानेकी उतनी ही आवश्यकता है जितनी कि शरीरका पुत्रिके घाले भाजन करनेसी जन्नत है।" ---सिसरो। " अधिपतया पुस्तामलोना द्वारा ही हम उत्कृष्ट हृदयावाले आदमियाक सरसगरा आनन्द उठाते हैं और सत्सगके ये अनमाल साधन सब आदमियाकी पहुंचम हैं । उत्तम उत्तम पुस्तासे हम यड बडे महात्माआके उपदंश विना विमी राक-टोक्क मिलते है और इनके विचार यडी अच्छी तरह मालूम हाते है। इन पुस्तफाक द्वारा हमम नये जीवनमा सचार हो जाता है । पुस्तकांक अस्तित्वके वास्ते परमामासा धन्यवाद करना चाहिए । वास्तवम पुस्तक तो प्राचीन कालके स्वर्गीय महात्माभावी आवाज है और इनके द्वारा हम प्राचीन कालके आध्यात्मिक जीवनके मालिक यन जाते हैं । जो आदमी उन्ह श्रद्धाके साथ इस्तेमाल करते है, उन सबका मानव जातिके उत्कृष्ट तथा श्रेष्ठ महात्माफ आध्यात्मिक सत्सगकी प्राप्ति हा जाती " वैनिल। शारीरि सस्कार चाहे कितना भी जरूरी क्यों न हो, यह बात हमें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि यह मानसिक सस्कारका स्थान कभी ग्रहण नहीं कर सकता। एक सुगठित शरीर एक सस्कृत मनके विना निस्सन्देह एक खोखला पिलर ही है। चाहे यह शरीर पहली बार देखनेपर कितना ही अच्छा क्यों न लगे, परन्तु उसका प्रभाव टिकाऊ नहीं होता, अल्पकालिक ही होता है। उसकी शक्ति यहुत कम समय ठहर सकती है । चाहे कोई आदमी कितने ही सुन्दर शरीरवाला हो, उमफे वास्ते दृढ व्यक्तित्वको प्राप्त करना तातक सम्भव नहीं है, जय तक कि उसके पास एक सस्कृत तथा सुन्दर मन नहीं है। एक सस्कृत मनसे हमारा अभिप्राय केरल एक विद्वान् आद- मीफे मनसे नहीं है। विद्वत्ता और सस्कृति ( Culture ) में बहुत घडा अन्तर है, आकाश पातालका भेद है। क्या हम सब ऐसे मानसिक सस्कार पहुतसे आदमियोंफो नही जानते जिन्होंने स्कुलों तथा कालेजॉफी पहुतसी परीक्षाएँ पास की होती है, पर जिन्हें हम सस्कृत नहीं कह सकते १ उन्हें तो कोई भी आदमी 'वास्तवमें शिक्षित'न कहेगा । यहुतसे ऐसे स्त्री पुरुप देखे गये हैं जो कि अपने नामोंके पोछे बड़ी बडी डिगरियोंके पुछल्ले लगाये फिरते हैं, परन्तु जिन्हें कोई भी आदमी सस्कृत नहीं कह सकता । विपरीत इसके ऐसे भी आदमी देखे गये हैं जिन्होंने स्कूलोंमें बहुत ही कम शिक्षा पाई है, परन्तु जो वास्तवमें सस्कृत थे। उनके मन पवित्र, तथा सयत थे। उनके हृदयों में महात्माओंके शानका प्रकाश और कवियोंका दिव्य सदेश लबालब भरा होता था। उनकी जिह्वापर माधुर्य तथा सरस्वतीका निवास था। फई यार यात्रा तथा सम्मेलन आदिमें हमे जिन आदमियोंकी यातोंसे बहुत यडे ज्ञान तथा उत्साहप्राप्तिको आशा होती है, उनसे बडी ही निराशा होती है । उन्हें अपने देशके विद्वानों आदि के सम्बन्ध में कुछ भी शान नहीं होता। किसीका नाम उनके लिए अपरिचित होता है, कुछके बारेमें उन्होंने केवल कुछ सुना होता है, किसीकी पुस्तकोंको उन्होंने साधारण तोरसे देसा होता है। एक एम० ए०, पल पल० बी० का विद्यार्थी भारत-मत्रीका नाम न जानता था ओर एक ग्रेज्युएट यह नहीं जानता था कि रेमजे मेकडानल फोन है। ऐसे आदमियोंके साथ पल्ला पहनेपर उनसे साधारण राजी खुशीकी बाते करके ही समय बिताना होता है और अपनी महतो निराशाको छुपाना पड़ता है। विद्वत्ता एक अच्छी चीज हे और हरएक आदमोके हृदयम उसको प्राप्त करनेकी तीय आकाक्षा होनी चाहिए, किन्तु पढ ध्यक्तित्व प्राप्तिके वास्ते यह अफेरी काफी नहीं होती, इसके साथ साथ सस्कार ( Culture ) भी होना चाहिए। विद्वत्ता ओर सस्कारमे भेद हे । विद्वत्ताका सम्बन्ध मस्तिष्क, दिमाग, से है। यह ठीक याताका ज्ञान हे ओर आज कलकी प्रचलित व्याख्याफे अनुसार कितावी यातोंको घोक लेना है, रट लेना है।
प्रभावशाली जचिन- । - यह मतलब होना जरूरी नहीं है कि ऐसा विद्वान् सभ्य और संयत भी बन गया हो । सरकारका सम्बन्ध जात्मासे होता है। यह सत्यको पकनित करना है और अन्तरग झानका भाण्टार भरना है। यह अपने सामयिक विचारोंका गहरा तथा हार्दिक परिचय होता है और प्राचीन तथा नवीन कालके महान विचारकों तथा लेखकों, कविया तथा फिलास्फग, ओर आत्मशानियों तथा ऋपियोंका सत्सग होता है। शिष्टाचार, कृपा, सहानुभूति, सभ्यता, सद्यपहार, प्रतिभा और आत्म-सयम सदा सस्कारके साथ रहते है । जहाँ सस्कार होता है, वहाँ उपर्युक्त सद्गुण भी अवश्य होते है। पति-पत्नीके मानसिक सस्कार न मिल्नेका जो नतीजा होता है, उसको नीचकी रोचक किन्तु सहानुभूतिपूर्ण घटनाद्वारा अच्छी तरह समझा जा सकता है। एक विद्वान् नवयुवकने एक आदर्श स्वास्थ्यवाली लड़. कीसे विवाह कर लिया । उसने सोचा कि उसे अपने हृद यके भावोंके अनुकूल एक सहचरी मिल गई और अब उसकी समस्त आशाएँ पूर्ण हो जायेंगी । इत्तेफाकसे उन्ही दिनों कवि-सनाद टैनीसनका देहान्त हुआ था । उस नव युवकने अपनी धर्म-पलीसे बातचीत आरम्भ करनेकी मन्शासे कहा कि क्या तुम्हें मालूम है कि आज कवि-सम्राट् ( Poet Laureate) का देहान्त हो गया है? उस लडकीने उत्तर दिया कि कवि-सम्रा क्या होता है । यह किस चिडियाका नाम है ? जब उसे टेनीसनका नाम बताया गया, तर भी उसने बड़े ही आश्चर्यके साथ पूछा कि टेनीसन या कौन ? लटफेके हृदयको बड़ा धका लगा, यह चुप हो गया और आगे कुछ न योला । एक बार जब यह नवयुवक अपने फिसी मित्रसे अपनी धर्म पत्नीका जिकर कर रहा था, तब उसने कहा कि मुझे तो एक सच्चे साथी की आवश्यकता थी, केवल अपने घरका प्रबन्ध करनेवाली और अपने यधोका पालन पोषण करनेवाली स्त्रीकी जरूरत न थी।
मानसिक संस्कार मंचमुच जीवनके लिए एक सुयोग्य साथीका मिलना यही ही कठिन यात है, और जहा ऐमा नही होता, यहाँ उस नवयुयफके समान सवको निराश ही होना पड़ता है। विद्वत्ता और सम्कारमे दूसरा भद यह है कि विद्वत्ता विद्या- लयोंमें पुस्तके रटन, फितारी शब्दासे अपने दिमागोंको भरने ओर अध्यापकोफ कठोर शासनम कुछ वस्तुशान प्राप्त कर लेोका फल हे । परन्तु सम्कार स्वेच्छासे सर वस्तुआके भावकी तहमें पहुचने और उन रहस्यकी गहराई तक जानेका नाम है। वस्तुओंका रहस्य भिन्न भिन प्रकारस समझा जा सकता है। यह अपने आसपासको भिन्न भिन्न प्राकृतिक वस्तुओंसे समझा जा सस्ता हे, या काव्य, न्याय, धर्मशास्त्र, विज्ञान और आचार- शास्त्रका अध्ययन करनेसे प्राप्त किया जा सकता है। परन्तु यह शिक्षणसे प्राप्त नहीं होता, यह तो अपने भीतरस ही, श्रुतिशान- मे या अपने भीतरी प्रकाशसे ही प्राप्त होता हे। भीतरी प्रकाश आदमीको अपन प्रयल और भक्तिसे, सत्य प्रेम और उसकी तीय अभिलापासे, रटन्त विद्याकी नहीं किन्तु वास्तविक ज्ञानकी पूजा ओर उसकी इच्छासे, और उस परमात्माफी महती पूजासे प्राप्त होता हे जो कि श्रेष्ठ, सया तथा सुन्दर हे । हम एक महान् युगमे रहते हैं । प्राचीन काल चाहे कितना ही अच्छा हो, परन्तु हमारे पूर्व पुरप ऐसी बहुतसी बातोसे वञ्चित थे, जिन्हें हम भोग रहे है। उनके अधिकार यहुत परिमित थे। उदाहरणके लिए सस्ते साहित्यको ही ले लीजिए । आज कल जय कि पुस्तकें बहुत सस्ती तथा सुलभ हैं ओर बडे बडे विचारकॉ. की पुस्तकोंके सस्ते सस्करणसरीदे जा सकते हैं, तब हमारे मनोंके सस्कारहीन रहनेका कोई कारण नहीं हो सकता, कोई बहाना नहीं हो सकता। यह पात बड़ी ही सची है कि सस्कार प्राप्तिके माधनोंमें पुस्तफाँका यहुत यडा स्थान होना चाहिए, क्यों कि उनमें मनुष्यकी बुद्धिमत्तापूर्ण याताका यडा ही अच्छा सग्रहरहता है।
प्रभावशाली जीवन- आज दिन इतना दरिद्री कोई भी आदमी नहीं है जो कि एक अच्छे पुस्तकालयका स्वामी न बन सके । सव ही आदमीप्राचीन फालके घड़े यड़े विचारकोंके विचारोंसे लाभ उठा सकते है। जो आदमी सस्कार तथा प्रकाश प्राप्तिके इच्छुक हैं, उन्हें अब अज्ञान तथा अघकारमें न रहना चाहिए । परन्तु यह यात घहे ही शोकके साथ कहनी पड़ती है कि आज दिन सुस और भोगकी पूजा अधिक होती है। हमारा बहुतमा धन उन वस्तुओंके गरीदनेमें खर्च होता है, जो न हमारे हृदयोको समुन्नत करती हैं और न हमें सतोप देती हैं। यहुतसे नवयुवक तथा आदमी कह दिया करते है कि हम पुस्तके मरीदने में असमर्थ हैं। किन्तु यदि उन्ही आदमि योंके एक सालके पान, तम्बाकू और अन्य व्यर्थ यातोंके सर्चको देखा जाय, तो मालूम हो सकता है कि वे इतने असमर्थ नहीं हैं जितने कि अपने आपको प्रकट करते ह या जितने गरीच चे अपने आपको समझते हैं। उन्हें यह यात स्वीकार करनी होगी कि उस पर्चसे बचे हुए पैसोंसे वे यहुत जियादा पुस्तकें सरीद सकते थे और उनके पास पुस्तकोंका एक अच्छा सग्रह हो सकता था। प्रिय पाठको, यदि आप पान, तम्याकृ पाने-पीने और तमाशे देस नेको सस्कार-प्राप्तिसे अच्छा समझते हैं, तो आपको अपनी इच्छा- पूर्ति और अपनी मनचाही वस्तुको सरीदनेका पूरा अधिकार है। परन्तु फिर आप उस समय दुयी मत होना जर कि दूसरे आदमी ससारकी दौडम तुमसे आगे बढ़ जायें और पुरस्कार- प्राप्त करनेको हाथ बढायें। किन्तु यदि आप इस दुससे बचना चाहते हैं, और अपने आपको ससारमें सबसे आगे देखना चाहते है, तो प्रतिदिन अपने सर्वमसे कुछ पैसे बचामो ओर उनसे उप युरुप अमेरिका आदिके सम्य धर्म चाहे यह बात ठीक हो कि वहा काई भी भादमी इतना गरीब नहीं है, जो एक अच्छे पुस्तकालयका स्वामा न बन सके, परन्तु हमारे देशम तो कइ करोड आदमियाका भर पट भोजन भी नहीं मिलता, फिर पटना तया पुस्तके सरीदना तो बहुत बडी बान है । -अनुवादक।
मानसिक सस्कार योगी तथा अच्छी पुस्तकें सरीद फर पढ़ो, उनपर अमल करो और अपने जीवनको समुन्नत यनाओ। जो आदमी लगातार उपन्यास पढते रहते है, और जिनकी उप- न्यास पढनेकी आदत बहुत पुरानी हो गई है, वे प्राय सस्कृत ( Cultured ) नहीं होते। अच्छे उपन्यास लिखना वास्तव में एक महान् कला हे ओर इस फलामें बहुत ही कम आदमी सिद्धहस्त होते है। यही कारण है कि आजकल प्रका- शित होनेवाले बहुतसे उपन्यास, कुछको छोडकर, साधारण, अश्लील ओर जनाने होते है । जो आदमी आजकल दो तीन उप-- न्यास एक सप्ताहम पढ डालते हैं, वे प्राय कम गहराई तक विचार करनेवाले, साधारण तौरसे सोचनेवाले, कम गम्भौर ओर महत्त्व- हीन होते है । अथवा ऐसे आदमी अदूरदर्शी, शीघ्र भडक उठनेवाले ओर वास्तविक जीवनसे बहुत दूर रहनेवाले होते हैं। इस प्रकारके पठनको सस्कृति समझना भयकर भूल है। विशेषकर ऐसे उप न्यासोंफे पठनको सस्कृति समझना तो और भी बडी भूल है, जिनमें चरित्रों (Charncters) को उच्च स्थितिमें स्वीकार किया जाता है और जिनका प्लाट उच्च जीवनमें रक्पा जाता है। अधिकतया ऐसे उपन्यास अप्राकृतिक, हानिकारक, जोशको भटकानेवाले और पतित भावों तथा नीच विषयचासनाओंको प्रिय होते है। पराव उपन्यासोंके पढ़नेसे आदमीकी विषय-वासना जाग्रत हो जाती है। इनसे भी खराव ये उपन्यास होते है, जिन्हें प्राय धामिक कहा जाता है। यूरुप आदि देशोंके बारेमें बहुतसे आदमियोफा यह विश्वास है कि यहाँ स्त्रियों में उपन्यास पढनेका पन्त पुरुषों शराब पीनेके बन्तसे भी पुरा है । और इसका फल यहुतसे कुटुम्बाका सर्वनाश और गार्हस्थ्य सुसफा लोप हुआ है । यहाँ ऐसी बहुतसी स्त्रिया होती हैं, जो घण्टों उपन्यास पढती रहती हैं ओर घरफे आवश्यक कामाको उपन्यास पढ्नेकी तरगमें सर्वथा भुला देती है । इस देशमें भी ऐसे यहुतसे उपन्यास-पाठक देये गये हैं, जो कहानीके रसके लिए ओर 'आगे क्या होता है' यह जानने के लिए "प्रभावशाली जीवन- उपन्यास लेकर घर-पार और अपने काम-काज सरको भूल जाते है। उन्हें उपन्यास पढनेको पेसी बुरी आदत हो जाती है किचलते चलते भी वे पढते ही रहते हैं। ऐसे कई आदमियोंको दूसरे आद मियॉसे भिडते और ठोकर साकर गिरते देखा गया है। इस प्रकारके अध्ययनको क्या सस्कार प्राप्ति या व्यक्तित्व प्राप्तिका साधन कहा जा सकता है। इस वातको फिर दुगारा कहा जाता है कि मानसिक संस्कार हरएक आदमीकी पहुच में है। किन्तु इसकी प्राप्तिका प्रश्न व्यक्ति- गत है। इसका प्रश्न हल करनेके लिए प्रत्येक अवसरको ग्रह्ण करने तथा उसका उत्तम प्रयोगकरनेका हद सकल्प होना चाहिए। किसी आदमीका मन सस्कृत है या नहीं, इस चातको जाननेके लिए यह यात मालूम कर लेना पर्याप्त है कि यह आदमी अपना वाली समय किस प्रकार व्यतीत करता है। हमें यह बात कभी न भूलनी चाहिए कि ससारके बहुतसे बड़े बडे विचारक और लेसक जिन्होंने समारपर बड़े भारी प्रभाव डाले हैं और जिन्होंने इतिहासमें अपने नाम अमर कर दिये है, पडे विद्वान् नहीं थे। उन- मेंसे कईको वारहसे चोढह घण्टे प्रतिदिन कठोर परिश्रम करना पड़ता था। और फिर भी उन्होंने अपने अवकाशके समयको ठीक नौरसे काममें लाकर अपने आपको सञ्चे रूपसे शिक्षित और •सस्कृत बनानेफा अवसर पैदा कर लिया। यदि आप ६ढ व्यक्तित्त्व पानेकी इच्छा रखते है, यदि आप अपने जीवनको प्रभावशाली बनाना चाहते हैं, यदि आप ससारमें अधिक समुन्नत होनेकी शुभेच्छा रसते है और यदि आप अपने साथि- -योंकी सच्ची सहायता तथा देश, समाज, विश्व और सच्चे धर्मकी कुछ सेवा करना चाहते हैं, तो अपने मनको सच्चे रूपसे सस्कृत तथा शिक्षित बनायो ओर उत्कृष्ट तथा उन्नति करनेवाला साहित्य पढो। यदि आपने अभी तक यह काम आरम्भ नहीं किया है, तो शीघ्र कर दो । फिर यदि पुस्तक खरीदनेके लिए “आपको एक समय निराहार भी रहना पड़े, तो भी आप घाटेमें
मानसिक सस्कार
न रहेंगे । आपका मन आपके शरीरको यहुत ही सात्विक ओर
पुष्ट भोजन देगा। कभी कभी भोजनका त्याग आत्मा और शरीरके
पास्ते उपयोगी भी होता हे।
साहित्यिक ससार आपके वास्ते अच्छी, पढने योग्य और उत्कृष्ट
पुस्तके लिये तय्यार है । आप उन्हें थोडेसे मूल्यपर प्राप्त करो आर
अपने आदर्शकी ओर पहुँचनक वास्ते कदम बढाओ।
यह बात कभी मत भूलो कि जस्तक आप विचार नहीं करते.
तक्तक केवल पढना ही अधिक लाभदायक नहीं है। पढ़ने के साथ
स्वय सोचना, मनन करना ओर उसे पचाना भी जरूरी है। फिर
जो कुछ आप प्राप्त करो, उसे अपने जीवनमा एक भाग बनाओ
और उसको अमली जामा पहनाओ । उसे अपने हृदय पटपर
थकित कर लो । भावी इस्तेमाल के वास्ते इसे निधि समझकर
सचित करो और इस प्रकार महान् हृदयाके विचारों, अनुभगों
और भावोंको अपना लो। किन्तु यह काम एक तोतेके समान रट
पर किसी दूसरेके मनको रिझा देनके लिए अथवा किसी दूसरे
अवसरपर फर फर सुना देने वास्ते नहीं होना चाहिए । इस
पठनका यह मतलर भी न होना चाहिए कि आप यह अभिमान
करने लगे कि हमने बहुत पढ लिया हे । परन्तु आपको इस समस्त
झानसे अपने जीवन और जीवनके व्यवहारका बनाना चाहिए।
प्राचीन अद्भुत महात्माओं ओर प्रभावशाली व्यक्तियों के अनुभवों
को अपने जीवनमें व्यवहार रूपसे परिणत करके अपने गाम्भीर्य,
शक्ति और व्यक्तित्वको बढानका प्रयत्न करना चाहिए।
११-नैतिक सस्कार “स्सिी आदमीके चरित्र बलको उसके उन प्रयास नहीं मापना चाहिए जा -कि यह दबाव पडनेपर परता है, वरन् उसके साधारण व्यवहारसे ही उसके चरित्र- थलका जाँचना चाहिए। -पैसला " दूसरे आदमियांसे अपने प्रति जिस व्यवहारकी तुम आशा करते हो, वैसा ही व्यवहार तुम उनसे करो। यही महान् नियम है और यही महात्माआका उपदेश है।" -ईसा मसीह सी 'सस्कार नैतिक सस्कारका स्थान ले सकता है। यह कहा जा सकता है कि सस्कृत मनवाला एक आदमी अवश्य नीतियुक्त होता है । और यह बात ठीक भी है, क्योंकि जो मान सिक सस्कार आदमीके जीवन और व्यवहारमें प्रवेश नहीं करता, उसको सस्कारका नाम कठिनतासे दिया जा सकता है। जब तक सस्कार किसी मनुप्यके प्रत्येक कामको चरित्रके उच्चादोंके अनु. सार नहीं बनाता तबतक वह मुलम्मेफे समान ऊपर ही रहता हे, तहतक नहीं पहुंचता । ऐसा सस्कार झोलकी तरह ऊपर ही रहता है और जीवनका अश नहीं बनता । इमर्सनका कथन है कि केवल वही आदमी ठीक है, जिसका इरादा अच्छा है। सस्कार- का उद्देश्य इसको नष्ट करना नहीं है, वरन् इसकी सब त्रुटियाँको दूर करके फेवल शुद्ध शक्तिको रहने देना है। हमारे सभी सस्कार प्रकट होने चाहिए, ये गुप्त अथवा अप्रकट न रहने चाहिए । एक सुन्दर, सुगठित और स्वस्थ शरीरद्वारा शारीरिक सस्कार प्रकट होना चाहिए । मानसिक सस्कार आदमी- के मनसे प्रकट होता है और उसके मनकी छाप उसके प्रत्येक काम, वात और लेखपर लगी रहती है । सस्कारयुक आदमी अपने आपको छुपा नहीं सकता। यदि यह ऐसा करना भी चाहे, तो भी अपने मनकी श्रेष्ठता ओर सस्कारको नहीं छुपा सकता।
नेतिक सस्कार सस्रत हे। क्योंकि दूसरे सभी सस्त मनासे अध्ययन तथा सत्संगद्वारा उसफा मेल हे। वह अवश्य ही प्रकट हो जाता है। ज्यों ही हम ऐसे आदमीक सामने आते हैं, त्या ही हमारे हृदयोंमें कुछ ऐसा प्रकाश पेदा होता है, जो हमें उन समस्त श्रेष्ठ यातों की याद दिला देता है जो कि हमने पुस्तकोंमें पढी हैं। उनके सम्पर्फसे हमें अपने जीवनकी समस्त महती आफाक्षाओं और आत्माके महान् सगीतका फिरसे अनुभव होते लगता है और हुन सय पातोसे हम अपने हृदयोंमें यह यात अनुभव करने लगते हैं कि जिस आदमीफे पास इस समय हम यैठे हैं, यह वास्तवमें नेतिफ सस्कार आदर्माके व्यवहार ओर यडेसे लेकर छोटे काम । तकमें प्रकट होता है। आदमीफी दृष्टियॉसे, उसके सहसा तथा अनजानमें किये हुए कामों तथा व्यवहारोंसे, उसके चेहरेकी प्रत्येक आकृतिसे, उसकी आवाजके उतार-चढायसे और उसकी प्रत्येक चाल-ढालसे उसका नेतिक सस्कार जाहिर हो जाता है। इन यातामे बुद्धिमान् आदमी किसी आदमीके नैतिक सस्कार- को मालूम कर लेते हैं । परन्तु जिस गलती न करनेवाले अगसे अथवा इन्द्रियसे हम इन सब यातामरो अनुभव करते हैं और जिनके द्वारा हम किसी आदमीकी नेतिकताका पता लगाते हैं, वह हम सपके पास है। इसको ठीक तौर से वर्णन नही किया जा सकता। इमर्सनने क्या ही ठीक बात कही है कि “प्रकृति प्रत्येक रहस्यको एक यार प्रकट करती है। परन्तु आदमीके रह स्यकोवह हर समय उसकी चाल-ढाल, व्यवहार, मुख तथा मुसके प्रत्येक अगकी आराति और समस्त शररिके हाव भाव तथा कामोंसे प्रकट करती रहती है।" यह आदमी नीतियुक्त है ?-यह पूछनेकी आवश्यकता नहीं है । ज्यों ही हम उसके सम्पर्क में आते हैं, क्यों ही जान जाते हैं कि वह आदमी केसा है। यदि शारीरिक सस्कारके चिह्नोंसे ठीक पता लग जाता है, कोई भूल नहीं होती है और यदि मानसिक संस्कारको छुपाया नहीं जा सकता है, तो नैतिक सस्कार क्यों अधिक अनुभव नहीं किया जा ।
प्रभावशाली जीवन- और उस प्रेमके निर्मल भावोंको निरतर जाग्रत करती रहती है, याद दिलाती रहती है जिसमें किसीके भी अहितका भाव नही है। इमर्सनका कथन है कि"ऐसे आदमी समाजके अन्त करण है।" ये उसे उचित तथा अनुचित और नीतिपूर्ण तथा अनीतिपूर्ण यातोंका बोध कराते रहते हैं। वे बताते रहते है कि समाज तथा राष्ट्रके लिए ठीक मार्ग कौनसा है। जिस प्रकार आदमीका अन्त फरण उसे बुरे काम करनेसे रोकता है ओर अच्छे काम करनेकी प्रेरणा करता रहता है, ठीक उसी प्रकार नीतिवान् पुरप समाजको चेतावनी देते रहते है । इमर्सन आगे कहता है-"ऐसा आदमी चाहे सोया हुआ भी हो, वह वायुमण्डलको पवित्र करता दिखाई देता है। वह देशके नियमोंको शक्ति प्रदान करता मालूम होता है और उसका घर पृथिवीकी शोभा बढाता हुआ दिखाई देता है।" अच्छी और सस्कृत स्त्रियोंके बारेमें भी इमर्सन आगे कहता है कि "स्या ऐसी स्त्रियाँ नहीं है कि जिनकी पविनता तथा प्रेमके उच्च भावोंसे हमाग घर लवालय भरा रहता है जो हमें शिष्टाचारके भावास प्रोत्साहित करती है ओर जो हमें बोलना तथा देखना सिसाती है? ऐसी भद्रा तथा सुसस्कृत माताओंके जीवनका ही अच्छा प्रभार सन्तानको दुनियॉमें यशस्वी और प्रतापी बनाता है। इतिहासमें इस यातको सिद्ध करनेवाले बहुतसे उदाहरण मिलते हैं।" किसी आदमीके निपयमं यह जानना ही कि वह आदमी ससा- रके वास्ते आवश्यक तथा उपयागी हे, उस आदमीका बहा भारी सम्मान है। उसकी पातोंका सत्य माना जाना और उसके कामों. का ठीक होना भी उसका पडा भारी आदर है। नैतिक सस्कार ही पेसी अपूर्व शक्तिमा मूल है । इस पुस्तकके आरम्भसे जो कुछ अबतक कहा गया है, वह समन्त सद्गुणों के सारके अतिरिक्त ओर क्या है ? इन तमाम सद्गुणोंहीसे स्त्री ओर पुरप नैतिक सस्कारयुक्त यनते हैं। दूसरे शब्दोंमें इनहीसे आदमी व्यक्तित्व युक अथवा प्रभावशाली पनते है।
" किमी आदमीपा १२-आध्यात्मिक संस्कार जा आदमी अपन मन परमामापर निगर र दता है, उस आदमी मनका सम्बध उमर समस्त कार्याने हा जाता है और यह अपश्य ही कभी न की विशेष ज्ञा तया शत्ति राजमागपर पहुंच जाता है।" -कस्यचित् । जिन आदमियार हदय पवित्र ह धन्य है, क्या रि य अवश्य परमात्मा दशन फ्रेंग। -वस्यचित् । नैतिक चरित्र उमक कामा,समम्त व्यव हारों, यातों और चालचलनस प्रकट होता है । फिन्तु आदमीका आध्यात्मिक जीरन दूसर नादमियोद्वारा अनुभव किया जा सकता है, देया नहीं जाता । माध्यामिष जीवनमें पर- मात्मीयता आ जाती है और यह उमपी आध्यात्मिक्ता फर- म्वरूप प्राप्त होती है । यह मगुप्यकी अवर्णनीय शान्ति होती और इसको ये ही आदमी ताड सपते है, जो कि स्वय इस अव. जनीय शक्तियो रगत है। हम उस आदमीको आध्यात्मिक भादमी स्वीकार नही कर सक्ते जो कि धर्म जार धामिर सिमान्ताके बारेमें यूर यट-चढ- कर पाते करता है। लोगाका धर्म सिद्धातॉपर आधिर बातें करना भी हमें पसन्द नहीं है। क्या कि हम यह जानते है कि जय यह माध्यात्मिक विषयापर अधिक बातें करता है, तो हमें इस पातमें सन्देह होने लगता है कि जो यातें उसफी जपानपर है, उन पर उसका अधिकार भी है या नहीं। हम इस विचारको रोकने में असमर्थ हैं, फिन्तु फिर भी इसका अर्थ यह नही हे कि हम धर्म चर्चाका विरोध करते है। हम उसकी व्यवहाररहित निरी थोथी चर्चाको उपयोगी नहीं समझते। सच बात तो यह है कि आदमी सत्यको समझ लेता है, यह इसके बारेमे याद करता, क्यों कि यह जान दलीलों प्रभावशाली जीवन- विवादमें नहीं है। वह प्रेमके सम्बन्ध भी बात नहीं करता, कारण कि उसका जीवन ही सत्यपूर्ण और प्रेममय होता है। आदमीके उस अशका नाम आध्यात्मिकता है, जो कि उसकी ध्रुव-स्थायी-शक्ति है । यह आदमीके जीवनका वह गुप्त झरना है जिसका निकास स्थान तो गुप्त है परन्तु जिस प्रकार एक झरना छिपाया नहीं जा सकता, ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक शक्तिके झरनेमेंसे निकलनेवाली धाराये उन आदमियोंकी दृष्टिसे नही यच सकती, जो कि आत्मासे बिना किसीयाणी, शास्त्र ओर घण्टेफे प्रवा- हित होती रहती है।महात्मा जेम्स एलनने कहा है कि जिस प्रकार पानीका झरना एक गुप्त स्थानसे निकलता है, ठीक उसी प्रकार आदमीका जीवन भी उसके हृदयके गुप्त भागोंसे निकलता रहता है। जेम्स पलनने अपनी कई पुस्तकोंमें उन मागोफा उल्लेख किया है, जिनसे आदमियोंकी ये गुप्त शक्तियाँ प्रवाहित होती रहती है और हमपर उन आदमियोंकी आध्यात्मिकता प्रकट करती हैं। एक स्थानपर उन्होंने भद्रताको आध्यात्मिक जीवनका सबसे अच्छा लक्षण माना है । एक दूसरे स्थानपर उन्होंने गम्भीरता तथा विनयको पवित्रता तथा बुद्धिमत्ताके निशान बताये हैं। उनके इन शब्दोंका उल्लेख कर देना भी अच्छा होगा,-"सदा सबके प्रति प्रेमसे रहना ही सच्चा जीवन व्यतीत करना है।" आध्यात्मिक सस्कार पहले तीनों सस्कारोंसे-शारीरिक सस्कार, मानसिक सस्कार और नैतिक सस्कारसे—इस वातमें भिन्न है कि यह एक ऐसी शक्ति, यल अथरा अनुभव है जो कि आदमीकी आत्मामें गुप्त रहता है और केवल भद्रता, प्रेम, नम्रता और परोपकार आदिके रूपमें प्रकट होता है । इन सब गुणोंका निकास-स्थान आध्यात्मिकता ही हो सकता है। इसे नैतिक संस्कारसे जुदा नही किया जा सकता है। धर्माचार्योकी यही भारी भूल रही है कि उन्होंने ना उपदेश दिया |मानों नैतिक आदमी उन्होंने आध्यात्मिकता माध्यात्मिक संस्कार प्रकारके उपदेशस ममारमें विकृत और नोतियिहीन आध्यात्मि पताका प्रचार हो गया है । इसका फल यह हुआ है फि यास्तविक सीवनफे स्थानपर विश्वास और चरित्र स्थानपर मादियों पाफी रह गई हैं। प्रत्यक्ष आध्यात्मिकताफे यिना पुछ मशाम चरित्र पाया जा मक्तात, परन्तु यिना चरित्र आध्यात्मिकता न फ्भीर है और न कभी होगा । केवल यर"यर 'रटनेयाले धर्मात्मा नहीं होते, परन् ये ही आदमी धर्मात्मा हाते है जो कि परमा- स्माफे आदेशॉपर अथवा उमक यताये हुए मार्गपर चलते हैं। धन्य है ये आदमी, जो परमात्माफा उपदेश मुनते और उसके अनुसार आचरण करत हैं। पास्तवमं आध्यात्मिक संस्कारको ध्यारण्या करना एफ ऐसे विपयको वर्णन करना प्रयत्न करना जो शदाद्वारा नहीं यताया जा सकता, अफयनीय है। यह आदमीफ हृदयमें नियास परावाली यह यस्तु है, जो आदमीको विश्वव्यापी मत्पदार्थको जानेके लिए तीय रूपसे प्रेरित करती है। यह पौनालक तथा सासारिक पदायास मी परे देगनेकी नैसर्गिक इच्छा है । आत्मा द्वारा अदृश्य परन्तु सत्, अमर और अनादि पस्तुओंफा जानना ही आध्यात्मिकता है और ये पस्तुएँ मसारफो उन पौद्गलिफ यस्तुओंसे मर्वथा भिन्न है जो फि दियाई तो देती है परन्तु अल्प- कालिक और क्षणभगुर हैं। यह मनको यह माधना है, जिससे यह परमात्मीय प्रभावको प्रहण करनेमें समर्थ यन जाता है। यह आत्माफो उसके मूल निकास स्थानसे जोड़ देना है, मात्मायो परमात्मामें लीन कर देना है। किसी धर्म-स्थानपर जाना मात्र ही आध्यात्मिक सस्कार नहीं है, यह तो उसको प्राप्तिफेयदुतसे साध नोंमेंसे एक साधारण माधन है । पिसी सम्प्रदाय विशेषसे सम्य. न्ध करना भी इसका होना सिद्ध नहीं करता, ये तो इसफीप्राप्तिके छोटे या यह, सीधे या चकरदार, मार्ग है। आध्यात्मिकताफा अर्थ कुछ स्वास दिनोंमें धर्म कर लेना, ग्रत रसना, ईश्वरको भोग लगाना, भजन गाना और प्रार्थनाएँ करना भी नहीं है; ये तो प्रभावशाली जीवन- । आत्मशुद्धिके कुछ साधन है। एक आदमी पूर्ण जोश और. अपनी सारी शक्तिके साथ इन्हें करनेपर भी आध्यात्मिक- तासे कोसों दूर रह सकता है, उस अपनी समस्त आयुमें आध्यात्मिकताका सहस्राश भी प्राप्त नहीं हो सकता । इस चातको यतानेके लिए किसी वडी भारी दलील या युक्तिकी आव- श्यकता नहीं हैं। क्योंकि यह हमारे प्रति दिनके अनुभवकी साधा- रण यात है । इतना होते हुए भी उपर्युक्त सव वात-क्रियाकाण्ड आदि-व्यर्थ नहीं है। बात यह है कि ये सर आध्यात्मिकता- प्राप्तिके साधन मात्र है। परन्तु इनहीको साध्य अथवा लक्ष्य समझ लेना ठीक नहीं है। ये तो अपने ध्येयको प्राप्त करनेकी सीढियों मान है। जो आदमी सीढियापर बैठकर ही यह समझ लेता है कि घह अपने ध्येयपर पहुंच गया है, वह भारी भूलमें पड़ा हुआ है। आजकल प्राय सभी धमोंके माननेवाले अपने क्रिया-काण्डोंको ही जीवनका लक्ष्य समझते है और इससे ये अपने वास्तविक ध्येयसे फोसों दूर रह जाते है । क्या इस पातकी आवश्यकता नहीं है कि उन्हें इस भूलसे निकालकर उनके वास्तविक ध्येयकी तरफ चलाया जाय? आध्यात्मिकता कर्मसे बहुत दूर है और बडी ही निष्कर्म है, किन्तु समस्त कामोंका स्रोत इमीमें है, यही सबका निकास-स्थान है। यह परम मौन, स्थायी आतरिक प्रकाशक ज्ञान और मनु' प्यके अभ्यन्तरमें निवास करनेवाली शक्ति है। यह प्रत्येक आत्मा भीतर समान रूपसे विद्यमान है। जिस प्रकार यह एक महात्माके हृदयान्तरमें मोजूद है, वैसे ही एक पतितसे पतित वेश्या, शरावी और नास्तिक हृदयान्तरमें भी विद्यमान है। जिस खाते पीते और काम करते आदमीको देखकर हम उसे मनुष्य कहते हैं, यह उसका असली रूप नहीं है, यह तो विकृत रूप है। यह तो हाहमासका पिंजर है, आत्मा नहीं है। जब कभी हम उसका आदर करते है, तब वह आदर उसके शरीरका नहीं होना, परन् उस आत्माका होता है जिसके काम करनेका यह . ७० आध्यात्मिक सस्कार शरीर एक साधन मात्र होता है । काश वह आदमी अपने सत्- कोद्वारा अपनी आत्माको-अपने आध्यात्मिक रूपको-प्रकट करे और हमें अपने चरणोंमें बैठने दे। हम जानते है कि एक आदमीमें उसके कामोंसे भी अधिक महान् एक वस्तु है, उसके शब्दोंसे भी कोमल उसमें कोई दूसरी वस्तु है और उसमें एक ऐसी सुन्दर वस्तु है, जिसका स्वय उसको भी शान नहीं है। परन्तु जिस समय आदमी उस महान्, कोमल तथा सुन्दर वस्तुले परिचित हो जाता है, तब आध्यात्मिक सस्का- रकी प्राप्तिके वास्ते उसके प्रथम प्रयत्न आरम्भ होते है। जर मनुप्यके आत्मज्ञान हो जाता है, जब वह अपनी वास्त- विफता, असलीयत, को समझ लेता है। उस समय वह आदमी समझने लगता है कि परमात्मा और उसके वीचमें कोई रुकावट नहीं है। यह बोध होते ही उसकी समस्त शक्तियाँ आध्यात्मिक उन्नतिके लिए चेतन हो जाती है। इस आध्यात्मिक शक्तिके बिना आजतक वह एक प्रकारसे अकेला ही था। किन्तु अय? अय वह अपने आपको परमात्माकी सुसकारी तथा आनन्द- मय गोदमें पाता है और अपने आपको अकेला नहीं, वरन् अनन्त रूपमें देखता है। आध्यात्मिक महान् मोनके अन्तस्तलमेंसे नवजीवनका सञ्चार होता है और फिर उस आदमीके हृदयमें प्रेम, ईमानदारी, सत्यता, कोमलता, सलग्नता, श्रद्धा, भकि, उमग तथा आशा पालनके भाव उत्पन्न होते हैं। ये सब आत्माके स्वभाविक गुण है। ये मनुप्यकी स्थायी शक्तियाँ हैं और उसे इनको प्राप्त करनेका उस समय तक प्रयत्न करते रहना चाहिए जब तक कि उसका समस्त जीवन इनसे न रँग जाय, अर्थात् आदुमीके जीवनमें ये सब गुण न आजायें, और उसके विचारों, शब्दों ओर कामोंपर इन सर गुणॉकी छाप न लग जाय । इसी यातको हम यों भी कह सकते है कि जर तक आदमीके मन, वचन और कर्ममें उपर्युक्त गुण पूर्ण प्रकट हो और उसके व्यक्तित्वपर परमात्मीय शक्तिकी प्रभावशाली जीवन- लग जाय, तय तक उसे इन गुणोंको माप्त करनेफा भरसक प्रयल' करना चाहिए । जिस आदमीमें ये सब गुण मौजूद है, वास्तवमें वही आध्यात्मिक आदमी है । इसी वास्तविक जीवनमें वह अपने जन्मसिद्ध अधिकारको प्राप्त करना है और परमात्माके साथ उसके इसी मिलनमें उसकी आध्यात्मिकता है, न कि मतमतान्त रोंसे चिमटते और पूज्य स्थानोंमें पड़े रहनेसे । वास्तविक थाध्या त्मिक प्रवृत्तिके उन कुछ आदमियोंके वास्ते ये मत मतान्तर और पूजा-पाठ आदि सच्चे सहायक और प्रेरक हैं जो कि यह जानकर ओर समझकर इनका उपयोग करते है कि ये किसी गुप्त रहस्य अथवा सचाईके सूचक सकेत या चिह्न मात्र हैं। सचमुच यह यड़े ही खेदकी बात है कि जनता इन चिह्नोंकी पूजाको अत्यत आवश्यक समझ लेती है और जिन भावों तथा सञ्चाईयोंके थे। चिह्न द्योतक है, उनको नहीं समझती। आज कल प्राय हरएक धर्मके अनुयायियोंमें यही यात देखी जाती है। लोगोंको अब अपनी भूल समझनी चाहिए । एक यात और भी है । इन चिह्नॉफी पूजा आदि और इन साधनोंका उपयोग तभी तक करना चाहिए, जब तक कि इनकी आवश्यकता है । जब आदमी उस अवस्थाको प्राप्त कर ले, जन कि आध्यात्मिक चिन्तनके लिए उसे किसी सहारेकी आवश्यकता नहीं है, तय यह इन चिह्नोंका उपयोग छोड़ सकता है। परन्तु यह खयाल रहे कि यह यात केवल यडे घड़े महात्माओं और योगियोंके वास्ते ही हे, जन-साधारणके वास्ते नहीं। प्रश्न हो सकता है कि जो आदमी इन चिह्नों और पूजा पाठ आदिकी तहमें काम करनेवाले भावों अथवा उनके गुप्त रहस्योंको नहीं समझा है, क्या उसे भी इनका उपयोग करना चाहिए ? यह एक विवादग्रस्त विषय है और इसकी यहसमें पड़ना यहाँ ठीक नहीं है। किन्तु यह कहा जा सकता है कि ठीक यही है कि आदमी उस समय तक इन चिह्नोंका उपयोग करता रहे, जब तक यह ७२ आध्यात्मिक संस्कार इतना सम्मुमन न हो जाय कि उन चिह्नोंके भायों और रहस्यों- को समझ सके । इमर्सनने आदमियोंको तीन भागोंमें यौटा है। पहले ये आदमी है जो कि केवल इन चिहोंफो देखते हैं और इनकी पूजा करते हैं, जिसके भावको नहीं समझते । दूसरे घे आदमी है, जो कि चिनीको साधारण अयया जड़ घस्तु किन्तु पिसी सिद्धान्त अथया भावफे द्योतक समझकर उनकी पूजा करते हैं। और तीसरे ये आदमी है, जो सत्यको प्राप्त करके अपने लिए इन चिह्नांफी भविष्यकै चास्ते कोई आवश्यकता नहीं समझते, इन्हें छोट देते है। ईयर प्राप्तिका मार्ग न किसी धर्म विशेष परिमित हे और न वह किसी प्रियाकाण्डमें मिलता है। यह तो मानयी आत्माफी उन गहराइयों में विद्यमान है जो कि सय धर्मों, पुरोहितों और क्रिया पाण्डासे मुक्त हे। जय आमा परमात्म-सयोगको अनुभव करता है, तब वह अपनी आन्तरिक शक्तियों और अपने वास्तविक स्वभावसे परिचित हो जाता है । भले ही यह योध आरम्भमें धुंधला अथवा साधारण हो । सहज सहज यह प्रकाश उसफी आन्तरदृष्टिको यष्टुत साफ रूपसे दिग्गाई देने लगता है । फिर यह आदमी अपनी आत्मो. प्रति तथा स्यहितके वास्ते अधिक श्रद्धाफे साथ प्रयत्न करता है ओर परमात्म-सयोगके रहस्योंको जाननेकी इच्छा करता है। सहज सहज, अथवा कदम कदम चलकर वह आत्माके दूरवर्ती आदर्शफी स्वर्गीय चट्टानपर पहुँच जाता है । वह प्रत्येक कदम पर महान् दृश्योको देखता है और अपने आगे पढ़ते हुए पदोंके सामन उसे महान् तथा वैभवशाली उच्चताके दर्शन होते हैं। जो प्रकाश कभी समुद्र अथवा भूमिपर नही पहा, यह उसफे मार्गको दैदीप्यमान करने लगता है। और ज्यों ज्यों यह आगे तथा यदता है, उसे यह यात मालूम होने लगती है कि प्रकाश उसके मार्गसे कभी लुप्त होगा और न . ७३ प्रभावशाली जीवन- फताके समयमें उसका साथ छोडेगा । उसको इस यातका ज्ञान हो आता है कि दुनियामें कोई महती शक्ति है और यह सदा रहेगी। यह समझने लगता है कि अनन्त उन्नतिका मार्ग उसके सामने खुला पड़ा है। जो आत्मा अनन्त सुन्दर जीवनमें पदार्पण कर चुका है और आध्यात्मिक सस्कारके मार्गपर चलने लगा है, उसके लिए जो देवीप्यमान यातें सम्भव है उनका कोई अन्त नहीं हैं। उसके सामने आन्तरशानका दरवाजा खुला हुआ है। शुद्ध हृदयवाले आदमी धन्य है, क्योंकि वे ही परमात्माके दर्शन करेंगे। उसी दरवाजेसे गुजर कर, जिसे कोई भी आदमी बन्द नहीं कर सकता, यह परमात्माके दर्शन करता है । इस दर्शनमे जो आनन्द है, उसे कोन वर्णन कर सकता है ? कोन कह सकता है कि मैंने वहाँ यह देखा और मुझे यह आनन्द प्राप्त हुआ। यह तो एक- अवर्णनीय सुरा है, जिसे शब्दोंद्वारा प्रकट नहीं किया जा सफता । यह तो एक रहस्य मात्र रहता है । यहाँपर तो गिरा अनयन, नयन यिनु वानी' वाली कहावत लागू होती है। एक यार महात्मा ईसा मसीहसे एक बडे आदमीने पूछा कि सत् क्या है ? किन्तु मसीह चुप रहे, उन्होंने उस महान् रहस्यको प्रकट किया। इस रहस्यको तो प्रश्नकर्ताकी आत्मा स्वय अपने प्रय स्लले जान सकती है। दूसरे आदमी उस आनन्दको न तो यता सकते हैं और न दिखा ही सकते है । उसको देखनेका तो मनु- प्यको स्वय प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि परमात्मा भी आत्माको कभी शब्दोंद्वारा उस रहस्यको नहीं बताता, वरन् उस कृपाके द्वारा प्रकट करता है जिसको प्राप्त करने का वह आत्मा प्रयल कर रहा है। हमारे जिस भाईको परमात्म दर्शन हो यह भी हमारी प्रशांत भावनाको अज्ञा' शब्दोंसे नहीं, वरन् अपनी । म पर चमकती है और हमें दूसरे त्मिक आध्यात्मिक सस्कार जिनसे कि यह महात्मा भी स्वय अपरिचित है। उस महात्माको इस यातका ज्ञान हो सकता है, (सम्भव है, न भी हो) कि उसका प्रभाव अपना काम कर गया है। ऐसे महात्माके लिए चिह्न, नाम, सम्प्रदाय, दर्शन, प्रशसा और निन्दा आदि कुछ अर्थ नहीं रखते। यह इन सरके झगडोंसे ऊपर है। अपने भीतर निवास करनेवाले महान् तत्त्वफे सम्मिलनसे उसने अपने आपको पहिचान लिया है। अब उसका जीवन कोई भिन्न यस्तु नही है, वह अकेला नहीं है। वह सब आदमियोंसे प्रेम करता है, समस्त विश्वके जीवनमें अपने आपको लय हुआ समझता है । फिर वह कह सकता है कि परमात्मा और वह एक हो गये हैं और इस प्रकार वह अपने बके भारी नीव रखता है। ७५
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द्वितीय खण्ड विषय-प्रवेश आगक पाठ उन आदमियागरी सहायताके लिए लिखे गय हे, जा इस पुस्तकक प्रथम खण्डको पटकर मुसस्कृत और शक्तिशाली जीव- नशे प्राप्त करनेका निधय पर चुक है। यदि इनको सावधानताम पटा जाय तथा दैनिक जीवनम विश्वासपूर्वक व्यवहारम लाया जाय, ता निवित फ्लाको प्राप्त करनेम असफलता नहीं हो सकती । लेखि काने यह माग स्वानुभवसे प्राप्त किया है और अब इस इच्छासे कि दूसरे आदामियाका सहायता मिल जाय, उनका भी जीवन धन्य हा जाय, और वे भी इसको प्राप्त कर ल, इस अनुभवको उनके सामने रस्सा जा रहा है । यथासम्भव इन पाटाको अत्यत सरल भावम लिखा है ताकि आन्म सस्कृतिके विद्यालयका छोटेसे छोटा विद्यार्थी भी इनरे अथको समय जाय और इस मार्गपर चलनेम कोई कठिनता अनुभव न करे । एक बात जिसकी पाठकको आवश्यकता है, वह है अपने उद्देश्यम अटल विश्वास और उसम सफलता प्राप्त करनेमा दृढ सकल्प । कभी कभा क्यिा जानेवाला प्रयत्न लाभदायक तो होगा, किन्तु उससे साधारण लाभ प्राप्त होगा। इसम तो लगातार और अन- थक भक्ति, महान् जोश और प्रति दिन अपने आदशकी और वढनेकी आवश्यक्ता है। प्रिय पाठको, विश्वास करो कि तुम उसके योग्य हो । यही जीवन है, और जीवन भी वह है जो कि अधिक महान् है। --लिली एल. एरन । - - व्यक्तित्व-प्राप्तिका मार्ग १-आत्मानुवीक्षण आध्यामिक शक्तिको प्रामके मार्गमें पहला स्थान आत्म परीक्षाका है। यदि हम व्यक्तित्व प्राप्तिके इच्छुक हैं, यदि हम अपने व्यक्तित्वको बनाना चाहते हैं, तो पहले हमें अपने आपको जानना चाहिए। किन्तु इस कामको हमें ऊपराऊपरी अथवा ढोंगपूर्वक या बनावटीरूपसे नहीं, वरन् सच्चे हृदयसे करना चाहिए । हमें अपने विचार और कार्यकी भूलोंकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, उन्हें नजर अन्दाज न करना चाहिए। हमें अपनी विशेप त्रुटियांको भी 'साधारण कमजोरी', 'अनियमि- तता' अथवा 'विशेष स्वभाव' का नाम न देना चाहिए। हमें या तो आत्म परीक्षाके कामको सच्चाईके साथ वेधडक होकर करना चाहिए, या इस कार्यको निरर्थक समझकर छोड़ देना चाहिए, कारण कि ऐसा करनेसे आत्म परीक्षाका उद्देश सिद्ध नहीं होता और इससे कोई वास्तविक तथा स्थायी लाभ नहीं होता। क्या हम एक वस्तुको उसके असली नामसे पुकारनेको तय्यार हैं? क्या हम अपनी त्रुटियाँको त्रुटियाँ माननेके लिए तय्यार हैं? क्या हम इस यातको स्वीकार करते है कि जर हमने दूसरे आदमियोंने सुपका ध्यान न रसकर लाभका सुयाल सामने रक्या है, तब हमने स्वार्थसे काम लिया है? क्या हम अपनी त्रुटियायो, चाहे वे किसी भी प्रकारकी क्यों न हों, उनके असली नामसे पुकारनेके लिए तय्यार है? और क्या हम ७८ , मात्मानुपीक्षण उाफो अभिमानसे अयया अपनी मानपूर्तिये लिए कोई दूसरा लुमावा मोर चमफदार नाम तो नहीं देते हैं। निस्सन्देह जो काम हमें सर्व प्रथम करना है यह है अपने मन की उन सय याताको मालम करना जो सत्यके विरुद्ध है। मनको सबसे पहले इसी कारण लिया गया है कि हमारे समस्त जीयन और मय व्यवहारॉया निफास मनसे ही होता है। आदमी विचारता, इसी लिए उसफा थस्तित्य हे। जिस प्रकार नाडियोंपर अक्षऔर तथा यवूलोपर आम नहीं लग सरते, ठीक उसी प्रकार दुर्वल मनसे दृढ चरिष पैदा नहीं हो सकता । डायोडोल मनका फल सच्चरित्र नही हो सकता ओर अपवित्र, द्वेषपूर्ण तथा अनिश्चित विचार धारासे सुन्दर तथा प्रभावशाली चरित्र उत्पर नहीं हो सकता । दृढ, सुन्दर भोर प्रभावशाली मरित्रकी उत्पत्तिफे वास्ते पवित्र मनका होना अत्यत यावश्यक है, अनिवार्य है। पुछ समयके लिए यह सम्भव हो सकता है कि हम उन भाद- मियोंकी ऑगोंम धूल दाल मफें, उन्हें धोफा दे सकें, जो हमें सजन ओर योग्य समझते हैं, किन्तु इस प्रकारकी विजय अल्प कालिक ही होती है। हम दुनियाको अधिक समय धोखा देनेमें सफल नहीं हो सकते, हमारी चास्तविकता सयपर शीघ्र ही प्रकट हो जायगी, कारण कि सचाई छुप नहीं सकती । और तो क्या, यदि कोई गात सात कोठोक भीतर छुपकर सहजसे भी कानमें कही जाय, समारक नियम उसको भी डकेकी चोट प्रकट कर देते हैं। याद रफ्पो, ऐसी कोई भी छुपी यात नहीं है जो प्रकटन होगी। झूठा आदमी अन्तमें सिवाय अपने और किसीको धोसा नहीं देता। इसलिए हमें अपने म्याभाविक विचारोंकी ही पडतालसे काम आरम्म करना चाहिए । हमें केवल अपने यहे घडे विचारोंकी ही ।
व्यक्तित्व प्राप्तिका मार्ग- जाँच न करनी चाहिए, छोटे छोटे उठते हुए विचारोंका भी पूरा ध्यान रखना चाहिए, क्यों कि ये भी हमारी जडोंको काट सकते है, हमें हानि पहुँचा सकते है। तुच्छ विचार जीवनको पतित कर देते हैं। मूर्यतापूर्ण व्यवहारकी जड़ें सदा मूर्खतापूर्ण विचारमें होती है । किसी आदमीके विचार जाननेके वास्ते उसको कुछ पैसे देनेकी जरूरत नहीं है। यदि हम किसी विचारशील आदमीके मुख तथा उसके व्यवहारको किसी भी परिस्थितिमें कुछ समय देखें, तो हम उस आदमीके विचार मालूम कर सकते हैं ओर अपने पैसोंको यचा सकते हैं। जर महात्मा ईसाने नामन नामके किसी कोढीसे उसको आराम करनेके वास्ते जोर्डन नामक तालारमें सात चार स्नान करनेको कहा, तय नामनने क्रोधसे मुरा फेर लिया। परन्तु उसके दासोंने आफर कहा, "नाथ, यदि प्रभु ईसामसीह किसी बड़े कामको करनेके लिए कहते, तो क्या आप न करते ? फिर क्यों नहीं आप स्नान करते और अच्छे हो जाते ?" आज ससारमें बहुतसे आदमी नामनके समान है। ये भी नामनकी तरह बडे बड़े काम, बड़े बड़े दान और व्रत आदि फरनेके लिए तो सदा तय्यार है, किन्तु साधारण काम इनसे नहीं हो सकता। वे बड़े काम तो कर सकते है, परन्तु अपने मनोंको शुद्ध करनेका साधारण काम नहीं कर सकते। हमें यह बात खूब अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि आदमी- के विचारोंको कोई भी बाह्य साधन पवित्र नहीं बना सकता अथवा असद्विचारोंसे सद्विचारोंके फल उत्पन्न नहीं कर सकता। यदि किसी सरोवरके स्रोत ही विपैले हों, तो उनसे प्रवाहित होनेवाला जल विषेला ही होगा, मीठा नहीं हो सकता । यदि हम सरोवरके जलको मीठा बनाना चाहते हैं, तो हमें सरोवरको साफ करके उसके स्रोतोंको उचित रूपसे पलटना होगा। ठीक इसी प्रकार जिन आदमियोंके जीवन-स्रोत, विचारोंसे भरे हुए हैं, उनके हो सकते। । प्रक आत्मानुवीक्षण अपने कामाको अच्छा यनानेके वास्ते हमें अपने हदयोंको शुद्ध करना होगा और उनमें उठनेवाले विचारॉको ग्राह्य और सत्य बनाना होगा, ताकि हमारे काम भी सुन्दर और अच्छे हों। सच- मुच जीवन-सुधारका यही एक मार्ग हे, दूसरा नहीं । निस्सन्देह आदमीफा अस्तित्व, उसके कामोंसे अथवा उसकी सफलताएँ उसके विचारोंसे जुदा नहीं हैं। ये सर उसके विचारों- के अनुकूल ही हैं। आत्म-शानके विना आदमी वृद्धि अथवा प्रगति नहीं कर सकता। । आत्म परीक्षा अथवा अपनी आन्तरिक जॉच पड़तालसे ही आत्म ज्ञान प्राप्त होता है। इसके साथ आदमी यह दृढ सकल्प भी कर ले कि आत्मानुवीक्षण करते समय वह पूरी ईमानदारीसे काम लेगा तथा आत्मालोचन ओर आत्म पृथक्करणमें अथक रूपसे फाम करेगा। इस लिए अपने आपको समझो तथा अपना ज्ञान प्राप्त करो। आत्मानुवीक्षणसे ही आत्म ज्ञान प्राप्त होता है। इस लिए अपने हदयोंकी पूर्ण तथा कडी परीक्षासे ही हमें अपने कामको आरम्भ करना चाहिए और जहाँ कही भी हम अपने हृदयाम कोई बुरा विचार अथवा मिथ्या विचार पाएँ, उसकी पूर्ण रूपसे निर्दयता- पूनम निन्दा करें और उसे अपने हृदयमें स्थान न दें, बाहर निकाल फै। प्रश्न हो सकता है कि यह केसे मालूम पिया जाय कि अमुक विचार मिथ्या है, ठीक नहीं है। यद्यपि इस प्रकारकी नियत कसौटी आपको कोई नही बताई जासक्ती, जिसर आप सहसा यह मालूम कर लें कि अमुक विचार ठीक है या नहीं। फिर भी यह कहा जा सकता है कि धुर विचारको मनुप्यका अन्त करण उसी समय बता देता है। क्या आपने कभी यह अनुभव नहीं किया कि जब कभी आपके मनमें कोई बुरा विचार उठता है अथवा आप फिसी बुरे कामको करनेको तत्पर होते ह, उस समय आपके मनमें कुछ घमासा लगता है, भीतरसे कुछ चेतावनीसी प्यतित्व प्राप्तिका मार्ग- . है कि यह विचार अपने हृदयमै मत लायो, यह ठीक नहीं है. ३ इस फामको मत करो? जो आदमी अपने अन्त करणके सकेत काम लेते रहते हैं, उनकी विवेक-शक्ति अथरा मले युरेको पा चाननेकी शक्ति चढती रहती है। विपरीत इसके, जो आदमी अ अन्त करणकी चेतावनियोंपर ध्यान नहीं देते, उनकी उपेक्षा क है, उनकी यह विवेक शक्ति दिन प्रति दिन कम होने लगती ओर अन्तमे उनके अन्त करण मृतवत् हो जाते है । फिर ये आद किसी भी बुरेसे बुरे कामको करते समय न फेंगे । वडे यढे पा महानसे महान अत्याचार करते हुए भी नहीं फापते, इसका कार यही है कि उनके अन्त करण मर जाते है । अत यदि आप चा हैं कि आपको अच्छे बुरे विचारोंको पहिचानना आ जाय, आपको अपने अन्त करणको विवेक-शक्तिको दिन प्रतिदिन विर सित करना चाहिए। उपर्युक नियमको यता देने के पश्चात् उदाहरणके तौरमे फ असद्विचारोंको बता देना भी आवश्यक मालूम होता है, ता उनके समान दूसरे पुरे विचारोको भी आसानीसे पहिचाना सके। यह तो एक अत्यत ही सक्षिप्त सूची है। यहाँ विस्तृत सू= देना कठिन है, उसे तो विचारशील पाठक स्वय ही तय्यार करें दूसरे आदमियोंके सम्बन्धमें सोचे हुए अहितकर विचा सब चुरे होते है, अपवित्र विचार तो बुरे हैं ही।झूठ, चोरी, हिंस ओर कुशीलसे सम्पन्य रसनेनाले विचार अत्यत बुरे हैं । हर प्रता, देशद्रोह, विश्वासघात आदिके विचार भी निन्दनीय हैं। स्वार्य पूर्ण विचार पतित होते है। इस प्रकारके विचारोंकी जाँच करने अधिक सावधानतासे काम लेना चाहिए, क्योंकि इनकी पडताल बहुधाधोया हो जाता है। हम एक असद्विचार तथा अपवित्र विवा रको समझने में कम गलती करते हैं, क्यों कि ये दूरसे ही बुरे मालू होते हैं, परन्तु एक म्यार्थपूर्ण विचार वडा ही धोखा देनेवाला लुभावना और चमकदार होता है और अच्छे अच्छे आदमिया आने उससे चौधया जाती है और वे ढोंगी बन जाते है। दूसरे १२ . मात्मानुयाक्षण आदमियोंके प्रति सफीर्णतापूर्ण विचारीको भी समझना पुछ फठिन होता है, क्योंकि यहुधा आदमी ऐसे विचागेको 'सरी यात', सी समालोचना' और रोकहितके नामसे युछ मुद्दा यने तथा मोहफ या देते है। एक आदमीफे यास्ते, अपने किसी स्वार्थसाधन लिप कठिनसे पटिन धार्मिक तप करना और फिर दिलम यह सोचना कि यह परमात्मा और माय-ममाजी सेवा कर रहा है, सम्भव है। धामिक स्वार्थले प्ररित होफर किये हुए कामाके उदाहरण देना कठिन नही है। परमतावलम्बियापर पर लगाना, उनका पथ फरना, उनके नेताऑको मारना, उनर कामोंमें रुकाट डालना अथया धोसे या चाल्से परमतावलम्बियोको स्यमतकी दीक्षा देना-ये सब ऐसे काम हे जिन्हें फट्टर धर्माध जनता धर्म तथा पर मात्माफ नामपर करते हुए विझकती ही नहीं, पर इनके परनेफे पश्चात् अपने आपको धर्मकी सेवक, धर्मपर मर मिटनेवाली, परमात्माकी सभी भक्त, शहीद तथा स्वर्गका हकदार समझती है। याद रपयो, ये सर काम धार्मिक स्वार्थसे अन्धे होकर ही किये जाते है और इस लिए पुरे हैं । परन्तु फितने आदमी ऐसे है जो इनको युरा समझते हे ? कतिपय धर्माध आदमी तो ऐसे काम करनेवालोंकी पूजातफ करते है निस्सन्देह ऐसे कामा की जितनी निन्दा की जाय, पम है । यह कहा जा सकता है कि धामिर म्यार्थ सर पापासे तीक्ष्ण हे और उनको पहिचानना अन्यत कठिन है। हमें अपने प्रत्येक उद्देश्यकी सूव छान चीन करनी चाहिए और इस फाममें हम तब तक लगे रहना चाहिए जब तक कि हम अपने उद्देश्यक बारेमें यह विश्वास न हो जाय कि इसका भाव ठीक है। जिन विचारोफा फोई उद्देश्य ही नहीं है, उन सरको भी त्याग देना चाहिए। वह गृहस्थ कितना मूर्स है, अन्नको हवामे उडा .
व्यक्तित्व प्राप्तिका मार्ग- और अपने कोठेको भूसेसे भर लेता है ! क्या कभी कमी आदमी बादामको फोडफर उसकी गिरीको फैक नहीं देते तथा छिलकेको हाथमें नहीं रख लेते ? इसी प्रकारकी मूर्खताएँ और भूलें आदमी प्रति दिन हृदयके सम्बन्धमें भी करता रहता है। जिस हृदयको हमें सद्विचाररूपी जवाहरातसे भरना चाहिए, जिससे हमें अकथनीय मानसिक, आध्यात्मिक, शारीरिक तथा ससारिक उन्नति प्राप्त हो, क्या हम उसी हृदयको मूर्यतापूर्ण, लक्ष्यहीन, साली ओर ध्यर्थके विचारोंसे नही भरते? तुम्हारे जीवनके जो क्षण व्यतीत हो रहे है, उनको साद और मीठे, पवित्र और सुन्दर, श्रेष्ठ और आशापूर्ण, उच्च और एढ, उत्तेजक और महत्त्वाकाक्षापूर्ण तथा नम्र और प्रेममय विचा- रोसे भरो। फिर वे विचार तुम्हारे जीवनमें स्वानुरूप ही फल पैदा फरेंगे और अन्तमें तुम्हारा देनिक जीवन तुम्हारे आन्तरिक शुभ विचारोंका जीता-जागता स्वरूप यन जायगा। महात्मा जेम्स एलनने कहा है, "विचारोंले ही हम उठते है और विचारोंसे ही गिरते हैं। उनसे ही हम सडे होते है और उनसे ही चलते हैं। उनकी जवरदस्त शक्तिसे सनका भाग्य बनता है। जो आदमी अपने विचारका स्वामी बनकर रहता है, जो आदमी अपनी इच्छाओंको अपने वशमें रखता है और जो आदमी प्रेमपूर्ण तथा शक्तिदायक विचारोंकी आकाक्षा करता तथा उन्हें मिलाये रसता है, वह आदमी अपने महान् आदर्शको सत्यके तीक्ष्ण तथा अचूक प्रकाशमें निर्माण करता है।"
२-मुक्ति
एक आदमीका जीवन पूर्ण रूपस उसके मनसे हा पैदा हाता है ।
।
-जेम्स एलन
यदि हम उपर्युक्त अवतरणकी सचाईको एक बार भी
'स्वीकार कर लें, तो हम यह बात भलीप्रकार समझ जायेंगे
कि यह क्यों आवश्यक है कि हमारा अपनी विचारशकिपर
पूरा अधिकार हो और क्यों हम पूर्ण रूपसे अपने मन, उसकी
दुर्यलताओं तथा उसकी शक्तिसे पारीचित हो ।
तुम्हारे जीवनकी हरएक यातका, निकास-स्थान तुम्हाग मन
ही है, चाहे वह सफलता हो या असफलता, आनन्द हो
या केश, सुख हो या दुस। विचारमें उत्पादक अथवा रचना-
न्मक शक्ति होती है। चाहे कोई विचार किसी भी प्रकारका क्यों
न हो, उसमें एक शक्ति होती है, जो कि विचारकफी तरफ उसके
विचारके अनुरूप ही जीवनके अनुभव सोचती है। भाव यह है
कि आदमीके विचार उसकी तरफ कुछ ऐसे परमाणुओंको सोचते
हैं जो कि आदमीको वैसी ही बातें अनुभव करा देते है जैसे कि
उसके विचार होते है। इसलिए आदमीका मन उसके भाग्यफा
यहा शक्तिशाली विधाता है और वह उसके जीवनरूपी महलमें
हर समय इस प्रकारका मसाला लगाता रहता है जिससे आदमी
अपने विचारोंके अनुकूल यातें अनुभव करता है।
एक यार एक बूढे आदमीने कहा कि जिस यातका मुझे भय था,
यही हो गई। उसके इस पाक्यमें यही यात छुपी हुई है, जिसको
स्पष्ट करनेका प्रयत्न हम कर रहे है कि मनुष्य अपने विचारोंके
अनुरूप घटनाएं रचता रहता हे । भय एक भयकर वस्तु है ओर
'उसमें एक विचित्र कर्तव्यशक्ति है । जिस यातसे हमभय खाते हैं,
प्राय शीघ्र या देरमें वही यात हमारे सामने जरूर आ जाती है।
किसी भी अवस्था
भय मनमें अधिक देर
.
व्यक्तित्व प्राप्तिका मार्ग- फरते रहनेसे अन्तमें वही परिस्थिति अथवा घटना हमारे सामने पैदा हो जाती है, जिसके होनेसे हम डरते थे। विचारक केन्द्रीय शक्ति है । यह पक ऐसी आकर्षक-शक्तिको पैदा करता है, जो कि उसी बातको हमारी तरफ खीचता है, जिसका हम विचार करते हैं। एक सीकी माँ एक रोग विशेषमे मर गई थी । उस खीको सदा अपनी माँचाली वीमारीका भय रहा करता था। उसको यह बात समझानेका प्रयत्न किया गया कि उसके लिए उस वीमारीसे भय सानेका कोई कारण नहीं है। उसे यह भी बताया गया कि जिन कारणोसे वह चीमारी उसकी माँको हो गई थी, घे कारण उसमें मौजूद नहीं है। उसे आदमियोंके उस अधि. फारका भी ज्ञान कराया गया जिससे आदमियोंको अपने पूर्वजाके गेगासे रहित शरीर मिलता है, किन्तु यह सर व्यर्थ हुआ। इन पातोंका उस लीपर कोई प्रभाव न हुआ।उस बीमारीके स्यालका भूत उस स्त्रीके सरपर हर समय सवार रहने लगा । यह हर समय भयभीत रहती थी और अपने चचावका निरतर प्रयत्न फरती रहती थी। अन्तमें उस स्त्रीको वही रोग हो गया, जिससे यह इतना डरती थी। क्या यह आवश्यक था कि उस स्त्रीको वह रोग होना ही चाहिए, क्योंकि उसकी माँ उस रोगसे मरी थी? नहीं, यह रोग उसने अपने विचारोंसे ही पैदा कर लिया था। *. यदुतसे पाठकोंने एक अध्यापक और उसके विद्यार्थियोंकी वह कथा सुनी होगी, जिसमें कि एक क्रूर अध्य कसे बचनेके वास्त लष्टकोन उसके विचारोंपर प्रभाव डालकर उसको नीमार कर देनेका पइयत्र रचा था। यह कहानी सक्षेपमें इस प्रकार कही जाती है- एक अध्यापक था । वह अपने विद्यार्थियोंको कुछ अधिक पीटा फरता था।विद्यार्थी उससे तग यो एक दिन उन्होंने उससे छुटकारा * 'अभिजनन-शास्त्र' (Eugenies) के विद्वानाका मत है कि कुछ रोग ऐसभा हैं, जो पीढी दर पीढी वशम चलत रहते है। ---अनुवादक पानेकी तरकीब सोची।सपने आपसमें सलाह की कि अबकी बार जय वह अध्यापक कक्षामें आए, तब उसे कहा जाय कि गुरुजी, आपके चहरेसे तो ऐसा मालूम होता है कि आपको कोई यहीं यीमारी हो गई है। अगले दिन अध्यापक महोदयके कमरेमें प्रवेश करते ही कुछ लडकॉने इसी घातको कहा और कुछने अनुमोदन किया। अध्यापकने कहा कि मुझे कोई रोग नहीं है। परन्तु रडकोंने फिर एक स्वरसे पहली यातको दुहराया। अध्या- पकको लड़कोंकी यातका कुछ स्याल हो गया और घर जाकर उसने शीशेमें मुस देखा । कोई सास यात मालूम नहीं हुई। अगले दिन फिर लडकोने वैसे ही कहा और शीघ्र ही कुछ इलाज करानेपर जोर दिया। अब तो अध्यापक महोदयको लडकॉकी वातपर विश्वास हो गया ओर दिलमें विचार करने लगा कि अवश्य में किसी गुप्त रोगसे ग्रसित है। यों सहज ही ये बीमार होगये । जर ये अधिक बीमार हो गये, तव लडकोंने उनसे विद्यार्थियोको कम पीटनेकी प्रतिज्ञा कराकर सारा भेद सोल दिया। समस्त घटनासे परिचत होते ही, अध्यापक महाशयको आराम हो गया। यह कथा सच हो या कल्पित हो, परन्तु विचार-शकिके प्रमावको अच्छी तरह प्रकट करती है। ऊपरकी इन दोनों घटनाओंसे, तथा ऐसी अन्य घटनाओंसे, यह यात भली प्रकार प्रकट होती है कि यदि किसी यातसे तुम काफी समयतक ओर खूब भय साते रहो, तो वह भय वास्तविक रूप धारण करके तुम्हारे सामने आ जायगा, यह भय चाहे किसी रोग- फा हो या घटनाफा, परिस्थितिका हो या किसी हालत चिशेप. का । यही यात सब प्रकारके विचारोंकी है। प्रत्येक विचार अपने अनुरूप ही परमाणु आदमीकी तरफ खीचता हे । अच्छे विचारोंसे भच्छे परमाणु तुम्हारी तरफ आयेंगे और वे वैसी ही अच्छी यात तुम्हारे लिए पैदा कर देंगे । अय आप समझ सकते हैं फि आत्म- ज्ञान प्राप्त करना क्तिना आवश्यक है। यस, यहींसे मुक्तिका कार्य है।आपको व्यक्तित्व-प्राप्तिका मार्ग- कम होने लगे गलत-विचारोंके अत्याचारसे अपने आपको मुक्त करना चाहिए उनसे स्वतत्रता प्राप्त करनी चाहिए। यदि आप चाहते है, तो उनका अलग अलग विभाजन करो। उन सबकी एक सूर्वी यनालो और उनको अलग अलग स्तम्भों (कालमों-खानों); रक्सो। यथा-भयजनक विचारोंको एक स्तम्भमें, आलस्यपूर्ण विचारोंकोदूसरे स्तम्भमें, मूर्सतापूर्ण विचारोंको तीसरे स्तम्भमें और स्वार्थपूर्ण विचारोंको चौथे स्तम्भमें रखो। इसी प्रकार सद्धि चारोंको भी अलग छाँटकर स्तम्भवार लिखा जा सकता है। यथा- उत्साहवर्धक विचार, शक्तिदायक विचार, यापूर्ण विचार देश भक्तिके विचार, विश्वप्रेम तथा विश्वसेवाके विचार आदि यहाँ कुछ हीप्रकारके विचार वताय गये हैं, पाठक अन्य विचारॉकी भी सूची यना सकते है। इतना करनेके पश्चात् आपको जो काम करना है, यह यह है कि अपनी विचारधाराको इस प्रकार प्रवाहित करो कि बुरे विचारोंकी सरया ओर उनका स्थान सद्विचार लेने लगें। निरन्तर प्रयत्न करते रहने से तुम देखोगे कि एक दिन तुम्हारी दुर्विचारवाली सूचीपर एक भी पुरा विचार न रहेगा ओर सद्विचारवाली सूची थर्ड चन जायगी। जब आपको कोई मकान यनवाना होता है, तो अपने भाई मकानका नकशा (Plan ) तय्यार करके मकान बनानेवाले राज या इजीनियरको देते हैं । वे उस नकशेको अपने सामने रख कर काम शुरू करते हैं और काम करते रहते हैं। प्रतिदिन आ अपने मकानको अपने नकशेके अनुसार बनता हुमा देखते और कुछ दिन या महीनोंमे मकान आपके नकशेके अनुसार तथ आपकी इच्छाके अनुसार बन जाता है। ठीक यही हाल आदर्भ और उसके मनका है । आदमीफा मन भी एक बड़ा चतुर निर्मात है। जैसा तुम बनना चाहते हो, वैसा नकशा अपने मनको दे दे या वैसे आदर्शकी उपासना फरी और यही मुस्तेदीसे उसके अनुसार सोचते रहो, तो फिर कोई भी वस्तु आपके जीवन ८८८ मुक्ति आपकी स्कीमके अनुसार यननसे न रोक सकेगी, आपका जीवन आपकी इच्छानुसार ढल जायगा । इस लिए आपको शीघ्र ही उन विचारोंसे अपने आपको मुक्त करना चाहिए, जिन्होंने भूत- कालमें तुम्हारी प्रगतिका रोक रक्खा है, जिन्होंने तुम्हारे रास्ते में मकावट डाली है और तुम्हें निर्यल यना दिया है। शीघ्र ही। सदाके लिए अपने मनसे भय, सन्देह, निराशा, असतोप, और अपने महान् हितमें अविश्वासफे विचारोंको निकाल दो। इस फामको करते समय तुम्हारा हृदय सफलताके उच्च भावोंसे भरा होना चाहिए । फिर तुम अपने आपको प्रतिदिन उस मार्गपर आगे पढ़ता हुआ देखोगे, जिसपर चलनेके लिए तुम्हारा हृदय फरक रहा है, लालायित है । अपने आदर्शरूपी महलको सत्- प्रयत्न और प्रसन्नतापूर्ण आशामय विश्वासफी ठोस तथा हद नीवपर सडा फरो। फिर तुम्हें कोई भी वस्तु नहीं रोक सकवी और न कोई वस्तु तुम्हारे जीवनको उस आनन्द ओर सुरासे यश्चित कर सकती है जिसकी तुम अभिलापा करते हो। अत अपने आपको दुविचारोंसे मुक्त करो। -
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"
जिस
“३-आत्म-विकाश
"ऐ मेरे आत्मा, ज्या ज्यो शीघ्रतासे व्यतीत होनेवाली ऋतुएँ गुजरती है,
स्या स्या तू अपने लिए दृढ भवन निर्माण कर । तु अपने पहले सकुचित निवास ।
स्थानको त्याग दे और अपने लिए पहलसे अच्छा नवीन मन्दिर बना । उस मन्दिर
स्म त उस समय तक निवास पर जब तक कि तू अन्तम पूर्ण स्वतन न हो
जाय, मुक न हो जाय ।
-औलियर उल्ल्यू होम्स।
प्रकार आत्म शान हमारे अपने विचारोंकी सच्ची
परीक्षाफा फल है और जिस तरह आत्म मुक्ति भीतरसे
होती है, उसी प्रकार वास्तविक तथा सच्चा आत्म विकाश भी
आदमीके भीतरते ही आरम्भ होना चाहिए और फिर यह आत्म
विकाश दैनिक जीवन तथा चरित्रमें बाहर प्रकट होना चाहिए।
आदमीका जैसा मन होता है, पेसा ही उसका वाह्य रूप होता
है। वास्तवमें मन ही आदमीको बनाता है।
यदि आपने द्वितीय खण्डके पहले दोनों परिच्छेदॉको पूर्ण
रूपसे समझ लिया है तथा उनपर अमल कर लिया है, तो यह
कहना चाहिए कि आपका विकाश होना आरम्भ हो गया है
और जिस हद तक आपने विश्वास तथा सलग्नताके साथ पहले
दोनों पाठोंमें यताये हुए दंगोंको अमली रूपमें परिणत किया है,
उसी सीमा तक आप मानसिक, आध्यात्मिक तथा शारीरिक
रूपसे विकसित हुए है।
जप जब हम एक सद्विचारका मनन करते है, तब तब हम
घास्तविक हितकी रचना करते हैं और हरएफ वास्तविक हित
जब हमारे जीवनमें प्रवेश करता है, तय निश्चित रूपसे हमारा
उतना ही विकाश होता है।
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आत्म विकाश । ऐसा मालूम होता है कि जनताकी अधिक संख्या अपने जीवन नके बहु भागको आजीविका प्राप्तिमें लगा देती है। आजीविका साधनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, किन्तु उसके पीछे लोग जय समस्त दूसरे कामाको भूल जाते हे अथवा उसे मुख्य स्थान देकर दूसरे अति आवश्यक कामोंको गोण स्थान देते है, तय यही कहना पड़ता है कि उन्होंने अपने इस ढंगसे पहले कामोंको पीछे डाल दिया है और पिछले कामोंको आगे कर लिया है, अथवा यों कहो कि उन्होंने अति आवश्यक कामोंको आवश्यक और आर. श्यक कामोंको अति आवश्यक बना दिया है। यदि वे अपने विचारों, समय और अपनी मानसिक शक्तियोंको अधिकतया अपना जीचन बनाने में लगाते, तो उनको आजीविका प्राप्तिके साथ साथ सुन्दर तथा समृद्धिशाली जीवन भी प्राप्त हो जाता। मानसिक तथा आध्यात्मिक रूपसे विकसित होनेसे आदमी यह यस्तु प्राप्त कर लेता है, जिसमें समस्त छोटी छोटी वस्तुएँ भी सम्मलित हैं। एक स्थानपर कहा गया है कि "ऐ आदमी, तू सर्व प्रथम राम-राज्य परमात्मीय सत्यको तलाश कर, फिर दूसरीवस्तु तुझे स्वयमेव प्राप्त हो जायँगी।" यही एक परमात्मीय नियम है और सदा स्थिर रहनेवाला कार्य है । परन्तु लोग इसपर विश्वास नहीं करते। वे कहते हैं कि आदमीके जीवनका आधार तो केवल रोटियाँ ही हैं, न कि परमात्माका दिया हुआ उपदेश। इसीलिए आदमी अपनी समस्त शक्ति और सारा ध्यान सासारिक, नाशमान और वाह्य वस्तुओंकी प्राप्तिमें लगा देता है । ये वस्तुएँ. शीघ्र ही नष्ट हो जाती है और वे आदमी ससारमें साली हाथ रह जाते है। इन नाशमान वस्तुओंको प्राप्त करते समय आदमी उन आन्तरिक तथा अमर वस्तुओंको सर्वथाभूल जाते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होती। एक भी दिन अपनी ज्ञानराशिमें कुछ न कुछ वृद्धि क्येि, विना और यह अनुभव किये विना मत व्यतीत होने दो कि तुमने अपनी मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों में कुछ उन्नति की है।
व्यक्तित्व प्राप्तिका मार्ग- किसी भी दिनको इन दोनों वस्तुओंको किसी भी अशमें प्राप्त किये विना व्यतीत कर देना अपने जीवनके एक बहुमूल्य दिनको व्यर्थ खो देना है, अपने आपको टोटेमें रखना है। किन्तु यदि आप प्रत्येक दिन कुछ न कुछ ज्ञान जरूर प्राप्त करते हैं और अपने आपको मानसिक तथा आध्यात्मिक रूपसे किसी हद तक सम्म मत करते हैं, तो कहना चाहिए कि आपने अपने उस दिनका 'सदुपयोग किया है और अपनी उन्नतिके मार्गमें आगे कदम घढ़ाया है। तुम्हें यह बात कभी न भूलनी चाहिए कि मन ही आदमी है ओर तुम अपने मनको इस लॅगसे पुष्ट तथा सयत कर सकते हो और उपयोगमें ला सकते हो कि अपने आन्तरिक धनकेभाण्डारसे विचा- रोफे सजाने, मान-राशि और प्रकाशको प्रति दिन बाहर लाओ। इन तीनों वातॉसे तुम अपनी बुद्धि और शक्तिमें इतनी उन्नति तथा विकाश प्राप्त कर लोगे कि तुम स्वय एक महती शक्तिका रूप धारण कर लोगे। इस शक्तिसे तुम अपने जीवन और परिस्थितियोको अपने उस आदर्शके अनुकूल बना सकोगे, जिसकी तुम आकाक्षा करते हो। बहुत आदमी जो गलती, या भूल करते हैं, वह यह है कि वे इस घातपर विश्वास नहीं करते कि उनके भीतर यह वस्तु मौजूद है जो कि उनके आदशोंको प्राप्त करनेके लिए आवश्यक है। ये इस यातपर भी विश्वास नहीं करते कि आदमीका मन एक विशाल कोप है। जबतक वे इस मिथ्या विश्वासपर डटे रहेंगे, तयतक वह शक्ति-कोप उनके लिए यन्द ही रहेगा। ऐसी हालतमें उनको यही अनुभव होगा जैसे कि उनके पास यह ही नहीं । यह महान् कोप फैसे खोला जाय? हमी साधन विचार ही है। यदि इसमें आपको अभी परीक्षा आरम्म कर अपने लि विचार-पाठ (Thonght एक विचार-पाठ सारे दिन ।।
आत्म विकाश - यह समझते हो कि एक पाठपर यार यार विचार करनेसे तुम थक जाओगे या तुम्हें उचाट पैदा हो जायगी, तो तुम प्रात काल, मध्यान और सायकालके लिए अलग अलग विचार पाट नियत कर सकते हो । बहुतसे धर्मोमें भिन्न भिन्न समयोके वास्ते भिन्न भिन्न पाठ नियत होनेका यही कारण प्रतीत होता है। प्रात कालका समय पुण्य, सौन्दर्य अथवा सिद्धान्तसम्बन्धी विचारोंके मननमें लगाया जा सकता है । यह समय हृदय शुद्ध होनेसे सद्भावना- पाठ तथा सिद्धान्त चिन्तनमें व्यतीत किया जासकता है।। दोपहरका समय अपनी मानसिक और शारीरिक उन्नतिसम्बन्धी किसी विचारके मननमें लगाना चाहिए । सायकाल अपने इए भविष्यकी कल्पनाओंके विचारोंमें मस्त रहकर व्यतीत करना चाहिए । उस समय अपने आपको उसी हालतमें सयाल करो कि जिसकी तुम्हाग दृदय उत्कट इच्छा करता है। उस समय, अपनी याह्यावस्था तथा परिस्थितिको अपनी उच्च कल्पनाओं सुन्दर रंग, रंग डालो । उस चक्क अपनी कल्पनामें ही यह समझो कि तुम उस स्थितिमें पहुँच गये हो, जिससे तुम्हे अपने लिए अनन्त सुख प्राप्तिकी सम्भावना हे, जा तुम्हारी शक्तियोको प्रकट होनेके वास्ते विशाल क्षेत्र देगी ओर जा तुम्हें जनताके वास्ते अत्यत उपयोगी पना देगी। शायद आप कहें कि इस प्रकार हवाई किले वनाने अथवा मन मोदक मानेसे क्या लाभ हो सकता है, तो इसका उत्तर यही है कि आदमी जो कुछ यनना चाहता है, उसे उसके अनुरूप पहले अपने मनमें अवश्य लोचना पडता हे और आदमी वही रन जाता है जो कुछ कि वह बनना चाहता है। उपर्युक्त कार्य करनेके वास्ते, विचाराभ्याम करनेके वास्ते, अपने काम-काजको छोड़कर एक तरफ बैठने अथवा घर-चारका त्याग करके याहर जगलमें जाने की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए अपने वर्तमान कामों तथा कर्तन्याको छाडनेकी जरूरत नहीं है, परन् यह काम आप अपने दूसरे काम करते समय भी कर ९३ व्यक्तित्व-प्राप्तिका मार्ग- सकते है। आदमी प्रतिदिन अपने उस अमूल्य समयको गप्पों, लक्ष्यहीन विचारी तथा परनिन्दाम व्यय कर देते हैं, जिसे यदि हमारे लिखे अनुसार व्यय किया जाता, तो उन सहनों आद. मियोंके जीवनों ओर हालतॉमें बहा भारी परिवर्तन हो जाता, जो कि आजकल असतुष्ट, निराश और थके हुए अर्थात् हिम्मत हारे हुए हैं। थोडी देरके वास्त उसी समयका विचार करो, जिसको आदमी अपने कामपर जाते तथा यहाँसे लौटते समय गलियों, मडकों ओर मोटर आदिमें व्यतीत करते हैं । यदि उस ही समय- को आदमी इस पाटमें बताई हुई बातोके अनुसार समुचित रूपसे चिन्तनम सर्च करते, तो एक महीनेमें ही जो फल होता, वह अत्यत अविश्वासी आदमीको भी चकित कर देता तथा उसको भी विचार-शक्तिपर विश्वास करनेवाला बना देता। आदमीका मन एक बडे जलस्थान या सरोवरके समान है। यदि उम सरोवरकी मोरियोंमें गंदी कीचड़ और मिट्टी आदि जम जाय, तो क्या फल हो? इधर सरोवरका पानी सप्ठ उठेगा, उधर खेती वाग आदि जल न मिलनेके कारण अथवा कम जल मिलनेके कारण सूप जायेंगे। यह भी हो सकता है कि गन्दा जल पोधोंको खराब कर दे । किन्तु यदि उसी जलस्थानकी मोरियोंको साफ कर दिया जाय, तो जहाँ उस सरोवरका जल शुद्ध हो जायगा, वहाँ आसपासके जगलम माल हो सकता है, उजड़े हुए चमन द्वारा हरे हो सकते हैं ओर फलियाँ खिलफर पुष्प यन सकती है । यो सरोवरकी मोरियोंको साफ करनेसे कितना बड़ा परिवर्तन हो सकता है। ठीक यही हालत आदमीके मनकी है। यह बडे ही दुखकी बात है कि आदमियाने अपने मन-स्रोतोंको मूर्ख तापूर्ण विचारों, निकम्मी तथा हानिकारक गल्पोंके पाठ तथा विपेली और अनुचित यातचीत और गप्पबाजीकी फीचड़से रोक रक्खा है । इससे एक तरफ आदमीकी ज्ञान तथा बुद्धिसम्बन्धी शक्तियाँ निकम्मी हो जाती है और दूसरी ओर उन ही शकियोंके अभावके कारण उस आदमीका समस्त जीवनरूपी उद्यान उजड़ ९४ आत्म विकाश जाता है। किन्तु यदि आदमी अपने परिश्रमसे अपने मनस्रोतोंको इस फूडेसे साफ कर दे और उसमें गन्दे विचार एकर न होने दे, तो उसके मनमे गुप्त ईश्वरीय युद्धिमत्ता तथा जानका जल प्रवाहित होकर उसके जीवनको अफथनीय रूपसे सुखी तथा सुन्दर बना देगा और उसको यह सफलता तथा आनन्द प्राप्त होगा, जिसकी यह इस समय इच्छा करता हे। इसपर विश्वास करो। इस चमकते हुए मत्यपर भरोसा करो कि ज्या ज्यों यादमी सुन्दर, रचनात्मफ, विधायक ओर आशापूर्ण विचारोंफो सोचनेकी आदत डालेगा, त्यों त्यो उसका चरित्र उसके अनुसार यनेगा। उसफा जीवन उसके चरित्रके अनुसार दल जायगा और फिर शीघ्र ही उसकी परिस्थितियों तथा बाह्य अव- स्थाएँ पल्टनी आरम्भ हो जायेगी। कारण कि चरित्र ही आद मीका भाग्य हे। इस प्रकार आत्म विकाशका अर्थ उन्नति, सफलता ओर सिद्धि हुआ। इसका यही अर्थ है कि सर्वाङ्गसुन्दर तथा पूर्ण जीवन तुम्हारी तरफ आ रहा हे ओर काई भी शक्ति अर उसे तुम्हारे पास आनेसे नहीं रोक सकती। "प्रति दिन पविन विचागेका मनन करनेसे ध्यानी आदमी पविन तथा उज्ज्वल विचारोंको सोचनेकी आदत डालता है। यह आदत उसको सदा पविन, उज्ज्वल तथा समुचित रूपसे किये हुए कामौकी ओर ले जाती है। 'वह दिन धन्य तथा याद रखनेके योग्य है, जिस दिन एक आदमी यह अनुभव करता है कि वह स्वयं ही अपना रक्षक ओर भक्षक है, स्वय उसमें ही उसके समस्त दु खाँ तथा ज्ञानाभा वके कारण मोजूद है ओर स्थय उसके अपने ही भीतर समस्त शाति तथा प्रकाशक स्रोत विद्यमान है। इस लिए सफलता, सुख, आनन्द तथा सिद्धिके जीवनका मार्ग फेयर आत्मराज्य, आत्म प्रकाश, आत्म मुक्ति और आत्म- विकाशमे है। " ४-आत्म-संयम और मानसिक समता दुसको जीतो और शातिको प्राप्त करो। युद्धिमत्ता मनकी शांतिके साथ रहती है। आत्म सयमी आदमी ही अनन्त सुसको जानते हैं। इसलिए तुम सावधान, निमय, विश्वासी, सतोपी और पवित्र बना । सच्चे ध्यानद्वारा जीवनरूपी समुद्रकी गहराई और प्रेम तथा बुद्धिमत्ताकी बडी ऊचाइयोको मापा ।" -जम्स एला जो आदमी अपने जीवनको अपने मनके साथ मिलान करके देखनेका कुछ भी कष्ट उठायगा, वह यह बात भली प्रकार समझ जायगा कि मनुप्यका जीवन उसके अपने विचारोंकी ही नकल है, ठीक प्रतिमूर्ति है। यदि कोई आदमी अपने व्यवहारको किसी भी हालत अथवा परिस्थितिमें देखें, तो उसे यह मालूम हो जायगा कि वह सहसा स्वेच्छासे काम करता है और उसके काम उसके स्वाभाविक और निश्चित विचारोंके अनुसार ही होते है । उदाहरणके लिए आगे लिसी हुई घटना काफी होगी। किसी दिन हम प्रात काल किसी समाचारपत्रमें पढते ह कि किसी थियेटर अथवा सभामण्डपमें तमाशे या सभाके समय आग लग गई । साथ ही हम यह भी पढते हैं कि बहुतसे उप-- स्थित आदमियोंके होश उड गये, वे भयभीत हो गये और वास्त- विक आगकी अपेक्षा कही अधिक मिच जाने, दम घुट जाने और कुचल जानेसे ही मर गये । अब आप ही बताइए कि यहाँ लोगोंके होश क्यों उड़ गये तथा वे क्यों महम गये? क्या यह उनके मनॉकी स्वाभाविक दशा न थी जो कि एक अरक्षित दशा तथा अचानक थानेवाली विपत्तिके समय प्रकट हो रही थी? फिसी बड़े उपदेशका कथन हे कि मनकी निश्चित प्रवृत्तियों ही आदमीके व्यवहारमार्गको नियत करती है । अकस्मात् जरूरत पटनेपर अथवा अचानक आई हुई मुसीवतके समय, जय फि सोचने और दलील करनका समय ही नहीं होता, आत्म-सयम ओर मानसिक समता भादमी अपने मनकी पहलेसे बनी हुई आदतक अनुसार काम करता है। उसके घ्यवहार उसके मनके पूर्वनिमित स्वमायके मनुरुप ही होते हैं। कुछ आदमी अकस्मात् आनेवाली भयकर आपत्तिके समय मनकी जिस महान् स्थिरताका परिचय देते है, यह यों ही सयोग- पश अथरा क्सिीफी रुपा विशेषसे नहीं मिलती।और न विपत्ति, भय और हौल दूसरे आदमियोंपर सयोगसे आते हैं । मनकी स्थिरता एक सयत तथा सधे हुए मनका फल है । यह यात याद रखनी चाहिए कि मनका यह सयम और साधना हमारे साधारण दैनिक जीवनमें उस समय यनती रहती हे जग कि हमारे समस्त काम शातिके साथ निविघ्न रूपसे व्यतीत होते रहते हैं। विप- रीत इसके जो आदमी सफ्टके समय योपला उठता है तथा विपत्तिसाल्में जिसके हाथ पांव फूल जाते हैं, उसके मनकी यह अस्थिरता उसफे असयत, विना सधे हुए ओर अशिक्षित मनका ही फल हे। ऐसे आदमीगमन परिस्थितिक साधारणसे वहायके साथ यह जाता है, यह गुप्त भयोंसे भरा हुआ होता है, यह भूत- प्रेतोकी शक्ति विश्वास करता है और साधारण से यहमका शिकार बन जाता है। प्रतिदिनफी घटनाऑमसे एक दो उदाहरण दे देनेसे ऊपरकी यात स्पष्ट हो जायगी। एक आदमी मोतके नामसे काप उठता है, किन्तु दूसरा आदमी हसता हुआ मृत्युकी गादमें जा बैठता है और उसके साथ एक पिलाडीफे समान पेलता है अथवा एक प्रेमिकाफे समान उसका आलिंगन करता है। स्वदेशभक्तिके उच्च भावोंसे भरे हुए यहुतसे नवयुवक फाँसीकी डोरीको फूलॉकी माला समान अपने गलेमें डाल देते है, सुशी खुशी जेलखानोंमें यले जाते हैं और हर प्रकारसे अपने आपको देशपर बलिदान कर देते है। परन्तु दूसरे आदमी जिनके हृदयों में देशके लिए कोई स्थान नहीं है अथवा जिनकी देशभक्तिकी भावना तीब नहीं है, ये फाँसी, अलसानों और बलिदानके नामसे डर जाते हैं। यूरुपमें जिस व्याकत्व-प्राप्तिका माग- समय मार्टिन ल्यूथरफ अनुयायियोंको पोपके भक्त मार रहे थे, तव एक चीर प्रोटस्टेण्ट, मार्टिनका अनुयायी, सुशी खुशी मरनेके लिए आगे बढता था। भारतवर्षकी घोर राजपूतानियाँ सकटके समय जौहरकी रस्म पूरी करनेके लिए गाना गाती हुई प्रसन्नचित्त से आगमें प्रवेश करती थीं, जर फि दूसरी स्त्रियों-जिनके यहाँ जोहरकी रस्म नहीं होती थी-जोहरके दृश्यको देस भी नहीं सकती थीं। आदमी आदमीमें यह भेद क्यों? एक ही स्थि तिमें दो आदमियोंके दो व्यवहार क्यों ? इसका उत्तर केवल यही है कि पहले आदमी अपने आपको इस प्रकार सधा लेते हैं कि महानसे महान् सकटपूर्ण स्थितियों में भी उनके हृदयोंमें घबराहट पैदा नहीं होती, चित्त स्थिर रहते हैं, जब कि दूसरे आदमियोंने इन सकटपूर्ण हालतोंके लिए अपने आपको तय्यार नही किया, अपने मनको इस योग्य नहीं बनाया कि वे आपत्तियों खुशीसे झेल सके। भारतवर्पके बहुत कम आदमियोंने अंगरजॉकी हालत किसी जहाजके डूबते समय देसी है। उस समयका दृश्य जितना करुणा जनक होता है, कही उससे अधिक विस्मित करनेवाला तथा शिक्षाप्रद भी होता है । उस समय अँगरेज जिस साहस तथा मनकी स्थिरताका परिचय देते हैं, वह देवी तथा सराहनीय होता है। मौतके मुखमें होते हुए भी ये लोग नहीं घबराते और न किसी प्रकारको बेजोसानी दिखाते है ।जहाजके कप्तानकी आशाक 'मनुसार ही सव काम होता है और सब आदमी ठीक वैसा ही हैं जैसा कि उनसे कहा जाता है । जहाजके नियमके अनु पहले यच्चों, स्त्रियों तथा निर्वलॉको बचाते हैं। फिर उन चचानेका यत्न किया जाता है, जिनका बचना उनके यशके नामको बचानेके वास्ते आवश्यक होता है । फिर कहीं पुरुषों तथा अधिकारी लोगोंफा नम्बर आता है । जहाँ तक हो सकता है, सबके बचानेका प्रयत्न किया जाता है, किन्तु समयकी कमी अथया स्थितिके भयकर होनेसे जिनकी नहीं आत्म-सयम ओर मानसिक समता बचाया जा सषता, उन्हें जीवन-रक्षक पेटियाँ (life belts ) दे दी जाती है तथा उन्हें अपनी घुद्धिके अनुसार स्वय बचनेको फह दिया जाता हे।न यचाये जा सकनेवाले आदमी अपने जातीय । साहस तथा धर्यका नाम इतिहासमें अपने सूनसे लिसकर समु द्रके अन्तस्तरम सदाके लिए उतर जाते है । ये लोग अपने यचायके वास्ते कभी जहाजके नियमोंका भग अथवा जल्दबाजी नहीं करते और अपने तथा दूसरोक जीवनको सकटम नही डालते। क्या आप समझते हैं कि जिन अँगरेज धीराने टाइटेनिक तथा ल्यूमीटेनिया नामके डूयते हुए जहाजोपर इसलिए रहना पसन्द किया कि दूसरे आदमियोंको बचानेका अवसर मिल जाय ओर स्यय यही शॉति तथा धेयके साथ मृत्युकी प्रतीक्षा की, उन्होंने यह अद्भुत शक्ति, वह महान हिम्मत, किसी विचिन ढगसे, या देवी माध्यमसे उसी समय प्राप्त की थी ? यदि ऐसा ही हुआ होता, तो मर ही आदमियोंको यह शक्ति तथा साहस समान स्प- से मिला होता। नहीं, उस समय प्रकट होनेवाला उनका साहस तथा मनकी स्थिरता कोई अकस्मात् प्राप्त होनेवाली वस्तु न थी। यह तो उन आदमियोंके मनके उस स्थिर व्यवहारका फल थी, जिसने उनके व्यवहारको निश्चित किया था। टाइटेनिक तथा ल्यूसीटेनियाके वीरोंके वास्ते दूसरे आदमियोंकी रक्षाके लिए अपने जीवनको बलि दे देना तथा मोतके मुखमें देवताओके समान शान्त खडे रहना उतना ही स्वाभाविक या जितना कि ऐसी हालतमें दूसरे आदमियोंके वास्त कायरतापूर्ण भय ओर होलसे जीवन रक्षक पेटियों तथा किश्तियोंके लिए चिल्लाना तथा झग हना स्वाभाविक होता। प्रश्न हो सकता है, कि ऐसा क्यों होता! इसी लिए कि प्रत्येक आदमी अपने ही विचारासे घिरा हुआ है। मूर्वता और घुद्धिमत्ता, शक्ति ओर दुर्वलता आदमीके भीतर हैं, किसी बाह्य वस्तुमें नहीं ।
व्यक्तित्व-प्राप्तिका मार्ग- - 1 । इस लिए आदमीका समस्त व्यवहार, चाहे यह किसी भी हालतम क्यों न हो, सदा उसके स्वाभाविक विचारॉकी प्रकृतिको प्रमाणित करता है। एक भद्र महिला थी। उसने अपने जीवनके पूरे पाँच वर्षों तक प्रत्येक दिनका कुछ भाग अपने मनको सस्कृत बनाने तथा महा- स्माओंके विचारोंके अध्ययन करनेमे ध्यतीत किया था। यद्यपि यह . पूर्ण युवती थी, तथापि आत्म-सयम तथा मानसिक साध- नाके अभ्यासको छोडनेके स्थानपर कभी कभी वह अपने सुखका त्याग कर देती थी। उसकी बातोंको बहुत कम आदमी समझते थे और उससे सहानुभूति रखनेवाले यादमी तो बहुत ही कम थे प्राय उसके अविचारशील मित्र तथा मिलने जुलनेवाले उसका उपहास-ठट्ठा-करते तथा उसे साधी, यावली और धांध पगली कहते थे । किन्तु उमने उनकी बातोंकी कुछ भी परवाह न की और वह अपने मार्गपर खुशी, विचारशीलता तथा आत्म-सतोपके साथ चलती रही। एक दिन जर कि वह घरमें अकेली काम कर रही थी, खौलते हुए पानीका एक वरतन उसके पास ही फट गया और जलता हुआ पानी उसके मुप और गरदनपर गिर गया। कुछ ही समय पीछे उसकी माँने उसे एक शीशेके सामने सड़ी होकर अपने जले हुए शरीरपर रहमे तेल लगात देसा । उस नवयुवतीने पूर्ण धैर्य के साथ कहा कि मैंने इस तेल लगानेके कामको शीघ्र करना इस लिए आवश्यक समझा कि मुझे विश्वास था कि मैं शीघ्र ही अन्धी हो जाऊंगी। डाक्टरोंने बड़े आश्चर्यके साथ कहा कि उन्होंने ऐसे भयकर दु समें मनकी इतनी स्थिरता, ऐसी शाति और इतना धेर्य कभी नहीं देखा । उन्होंने यह भी कहा कि यदि घर युवती ऐसा न करती अथवा इससे उलटा व्यव- हार परती, तो उसका मुरा इतना सुन्दर तथा विना दागवालान होता जैसा कि वह पहले था और उसकी दृधि इतने वर्षोंके आत्म-सयम तथा मानसिक उलटा ही व्यवहार करती तथा उसके पार . 24 आत्म-सयम ओर मानसिक समता प्रिय पाठको, आप ऐसी कठोर परीक्षाके दिनके लिए शक्ति प्राप्त करन ओर अकस्मात् आनेवाली आपत्तियोंका साहस- पूर्वक मुकाबला करने के लिए क्या कर रहे हैं? ऐसे कष्ट तथा सकट झेलनेके लिए आप किस प्रकार तय्यार है ? यदि आप किसी भी प्रकार अपने मनको विचार करने के लिए नही सधा रहे हैं, यदि आप भिन्न भिन्न मुआमलोंपर विवाद करना तथा उन्हें जाँचना नहीं सीखरह है, यदि आप प्रतिदिन आत्म-सयमका अभ्यास नहीं करते और यदि आप परिश्रम तथा लगनसे अपनी मानसिक साधना तथा शक्तिको पुष्ट नहीं करते, तो आप निस्सन्देह ससारके उन आदमियोमसे एक है, जो आपत्तिके समय अपश्य औसान खो वेजेंगे, जो सक्टको ओर भी बढा देंगे, जो शायद आत्म-सयमके अमावसे आत्मरक्षाके प्रत्येक अवसरको सो देंगे और जो अपने स्वाभाविक विचारोंका शिकार बन जायेंगे। अपने आपसे पूछो कि तुम ऐसी अवस्थामें क्या करोगे ? कडी जाँचके प्रकाशको अपने मनमें ले जाकर देखो। अपनी समस्त दुर्बलताओं तथा अपनी असफलताओंके वास्ते अपने आपको दोषी ठहराओ। यदि ऐसा हो, तो इस यातको स्वीकार करो कि इस मुआमलेमें तुमने सच्चाईसे काम नहीं लिया है, कारण फि। अपनी भूलको स्वीकार करना बुद्धिमत्ताकी ओर एक पहला' कदम है, और अपने आपको जानना शक्ति प्राप्तिका निश्चित प्रारम्भ है।
५-स्वतंत्रता
दिव्य स्वतनता ईश्वरका श्रेष्ट वस्तु है ।
" यदि तुम परिवतनके चक्स बँध हा और उस पाशसे मुक्त होनेगा काई
उपाय नहीं है, ता कहना पडगा नि निरन्य आत्माका हदय उसक लिए अभिशाप
है और सब वस्तुआका रहस्य एक निदय यत्रणा है।"
तुम बद्ध नहा हो । पदार्थोका रहस्य मधुर है । आत्माका हदय स्वगीय विधाति
है। सतापकी अपेक्षा इच्छाशक्ति अधिक यल्यान् है । शुभ शुभतरसे गुजरकर
श्रेष्ठको प्राप्त होता है।
-सर एडविन अर्नाल्ड
म तक कोई आदमी अपने यन्धनमें है, तब तक यह न
तो स्वतनताके आनन्दको समझ सकता है और न वह
उसे अनुभव कर सकता है। आदमी अपने वन्धनमें उस समय
होता है जब कि वह अपने भावोद्रेकोंके वशमें होता है और
उसके कार्योंपर युक्तिका अधिकार तथा यश न होकर तात्कालिक
मानसिक उत्तेजनाओंका वश होता है, जो कि इत्तिफाकसे उस
समय पैदा होती है।
आदमी कई बार यह कहते सुने जाते है कि इस समय घे
कार्य करना नहीं चाहते अथवा अर वहाँ जानेको उनका जी नहीं
चाहता । इस प्रकारकी बातें दास कहा करते हैं, स्वतत्र पुरप
या स्त्री नहीं । दास अपने मनोद्रेकॉके फैदखानेमें ही यद
के होते हैं।
एक ओर प्रकारकी दासता भी होती है, जो निस्सन्देह लोहेकी
फड़ियोके समान कठोर होती हे और स्त्री-पुरुपोंको बन्धनमें रखती
है । यह दासता स्वतत्रताके समान दिखाई पड़ती हे इसे
रुचि और अरचि कहते हैं।
-
A
स्वतंत्रता जय तक आवमी रुचियों ओर अरचियोंको अवसर देता है, डोकतब तक उसका आत्मा स्वतत्रतासे अपरिचित ही रहता है। पक्षपात और तरफदारी, स्वार्थलोलुपता ओर सुखेच्छा, धयरा- हट और दुखी होना, फुटना और रज मानना, ईर्ष्या करना और असतुष्ट रहना, तथा पश्चात्ताप करना ये सर यन्धन ही हैं। जब तक इनमेंसे किसी पकको भी अवसर दिया जायगा, तब तक स्थातव्य अशात ही रहेगा। क्या आप स्वतत्रताकी इच्छा करते है १ क्या आप इस कयनका अर्थ समझना चाहते है कि स्वतत्रता परमात्माकी सन्तानकी महनीय यन्तु है ? तय आपका उन वस्तुओंपर विजय माप्त करनी चाहिए, जिन्होंने भूतकालमें आपपर विजय प्राप्त कर रस्पी थी। आपको अपने स्वयसृष्ट पन्दीगृहके दरवाजे खोल देने चाहिए तथा आगेके लिए दास आर वन्दी न रहना चाहिए । अपनी मानसिक अवस्थाओंको वशमें करो। उत्तेजनाका शासन अस्वीकार कर दो। अपने सब कामाका आधार स्थिर तथा सावधान युक्तिको यनाओ । अर्थात् हरएक कामको स्थिर चित्तसे युक्तिपूर्वक सोच- फर करो। अपने आपसे कहो कि यह मामला उचित और अनुचितका है, ओर मेरे भावोस इसका कोई सम्बन्ध नहीं है । इसमें प्रश्न 'मुझे क्या पसद 'नहीं होना चाहिए, वरन् 'मुझे क्या करना आवश्यक है'यह होगा चाहिए। बच्चे भले ही कह कि मुझे यह यात अथया यह बात पसन्द नहीं, परन्तु स्त्रियों तथा पुरपाके मुरासे ऐसे शब्द निकलते शाभा नहीं देते । यदि तुम्हाग जीवन तथा व्यवहार तुम्हारी रुचियों तथा अरचियोंके अधीन है, तो तुम एक दुर्बल गुलाम हो। पक्षपात और तरफदारी आदमीफी ऑयोंको वास्तविकताकी मोरसे अन्धा कर देती है। जो आदमी पक्षपात तथा तरफदारी करनेवाले होते हैं, ये किसी चीजको उसके वास्तविक रूपमें नहीं देख सकते। और जो कोई मी इनमेंसे फिसी व्यक्तित्य-प्राप्तिका मार्ग- - अधीन होता है, किसी एफसे भी अभिभूत होता है, वह ठीक रूपसे निश्चय करनेके अयोग्य होता है। यह उस भादमीके समान है, जिसकी ऑखोंपर रंगीन चरमा लगा हुआ है । जो कुछ भी वस्तु यह उस चन्मेमेसे देखता है, वहीं चदमका रग धारण कर लेती है। पक्षपात और तरफदारी तो गुलामोंके चलनेकी पगडण्डियाँ हैं। बुद्धिमान आदमी सदा सिद्धान्तपर चलते है, तथा ईमानदारीसे न्याय करते है। विपयोका दास सदा इच्छा करता रहता है। परन्तु वह किसी भी वस्तुको प्राप्त नहीं करता। विषय-वासना अपने उपासकको बडी लम्बी चौडी शायें घंधाती है, किन्तु जिस प्रकार एक आदमी पर्वतकी चीजोको देखकर उन्हें प्राप्त करनेके ख्यालसे आशा बाँधे और हाथ फैलाये सड़ा रहता है, उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता, उसी प्रकार विपय. पासना भी अपने उपासकको धोखा दे देती है, उसको इष्ट सुख कमी प्राप्त नहीं होते। यह भी उनके वास्ते सदा तड़पता ही रहता है। यदि उनकी एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी सामने आ खड़ी होती है। उसकी इच्छाएँ सदा बढ़ती रहती हैं। वह सदा 'एक और' 'एक और' फहता है । जिस तरह नट लोग तमाशा करते समय कहा करते हैं 'फसर रह गई', 'कसर रह गई', उसी तरह विपय-लोलुपी आदमीको इच्छाओंके पूरा होनेमें भी सदा कसर रह जाती है। शायद ऐसे ही आदमियोंके लिए संस्कृतका निम्न श्लोक कहा गया हे न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति, इचिपा कृष्णवमेव भूय एवाभिवर्धते । इसका भावार्थ यही है कि जिस तरह अग्नि हवन सामग्रीके पड़नेसे कभी शात नहीं होती, यढती ही रहती है, घेसे ही आदमीकी इच्छायें भी पूरी करनेसे पूरी नहीं होती, बढ़तीही जाती हैं। इस लिप जो आदमी स्वतंत्रताको समझना चाहता है, उसे विषय-वासनाओं तथा इच्छायोंका त्याग कर देना चाहिए । १०४
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ध्यक्तित्व-प्राप्तिका मार्ग- 1 लगा देता है। वह प्रसन्नता तथा विश्वासके साथ उसकी प्राप्तिक लिए काम करता है और अपनी सारी शक्ति तथा इच्छाकी । सहायतासे उसकी आशा करता है । प्रतिदिन वह प्रसन्नताके साथ देयता है कि सहज सहज वह वस्तु उसे प्राप्त हो रही है। फिन्तु ईर्ष्यालु और असतोपी आदमीकी हालत ओर ही होती है। इष्ट वस्तुओंको प्राप्त करना तो उनके लिए बड़ी बात है, वे कुंद-कुढकर तथा हृदयमें घुल-घुलकर ससारमें अपने आपको पहलेसे भी अधिक अयोग्य बना लेते है। और जिस समय उनके साहसी पड़ोसी अपने बहुत वलसे प्राप्त की हुई वस्तुओका आन- न्दके साथ भोग करते है, तव वे उनकी तरफ सुले हुए. मुंहसे तथा ऑयें फाड़-फाडकर आश्चर्यके साथ देखा करते है। उत्तेजनाओं तथा विपय-वासनाओंकादास सदा पाप और पश्चा. 'ताप करता रहता है। आज एक काम करता है और अगले दिन । उसपर पश्चात्ताप करता है। जो आदमी पाप करके पछताता रहता है और जो पाप करके शोक प्रकट करता रहता है, वह न तो धुद्धिमान ही है और न स्वतत्र, वह तोदासतामें बँधा है।बुद्धिमान तथा स्वतत्र आदमी युक्ति, विचार और न्यायवुद्धिसे काम करते हुए पश्चात्ताप नहीं करते। यह जानते हुए कि उनके काम उच्चतम न्यायबुद्धि और पवित्रतम विश्वासके अनुकूल ये, उन्हें पश्चात्ताप करने की जरूरत ही नहीं है। शोक प्रकट करनेको घे समय तथा शक्तिका अपव्यय समझते हैं, कारण कि शोक करनेसे व्यतीतका अश नहीं पलट सकता ओर किया हुआ काम अनकिया ..!'अब पछताए होत क्या जर चिडियाँ चुग गई + ही है । इस लिए स्वतंत्र आदमी शक्ति । तथा न्यायवान् होता है, सय यातों और सब विवेकके प्रकाशमें काम करता है। यह प्रकाश उसके सिंहासनपर उस प्रेमके साथ निवास करता है, जिसकी वचनमें, तथा कर्ममें पाप नहीं है। इस प्रकार आत्मा स्वतत्रताके विशाल मन्दिरमें १०६ --
६-परिवर्तन
" प्रत्येक आदमी अपने विचाराके तग अथवा विशाल चक्रम घूमता है। ++ +
आदमीकी आन्तरिय अवस्था उसकी यायावस्थागरी नीव है । + + + पोलिक
शरीर मनकी साक्षात् मूर्ति है। घटनाएँ विचारोरे स्रोत हैं । परिस्थितियाँ विचारकि
समूह है। +++ यस्तु विचाराशी अनुगामिनी हे++++ अपने विचारामा यदल
दो, पस्तुआम नपीन व्यवस्था स्वयमेव आजायगी।+ + + + श्रेष्ट आदमी यही है,
जिसको अच्छ विचार साचने और अन्य काम करनेकी आदत है । + ++ +
मनकी बदली हुई प्रवृत्ति आदमारे चरित्र, आदता और जीवनो पल्ट देती है।
---जेम्ग एरा
अपनी भूल और दुर्वलताके शानके साथ ही साथ हमारे
'हृदयों में प्राकृतिक रूपसे अपनी भूलको दूर करने तथा
अपनी दुर्बलताको शक्तिमें पल्ट देनेकी इच्छा पैदा होगी। यथा,
यदि आप यह अनुभव करते है कि आपके पास यह मानसिक
शक्ति नहीं है जा कि आपको अचानक आनेवाली आपत्तिय
समय शान्त तथा स्थिरचित्त रक्लेगी, तो आपका अपनी साधा-
रण स्थिति तथा आदतोंकी ओर ध्यान देना अच्छा होगा,
कारण कि एक जऔर उतनी ही मजबूत होती है जितनी मजयून
कि उसकी कमजोरसे कमजोर फही होती है। इसी प्रकार फिनी
भी प्रकारकी कमजोरी अथवा किसी भी प्रकारफी फी भावमीवी
सामूहिक अयोग्यतामें अपना भाग रपती हे। क्या आप आलम्य.
के शिकार है ? क्या आपकी गति मन्द और आपके पाय
योझल है ? क्या आप आपने कामम विशेष रूपस ढील
यदि ऐसा है, तो आपको अपने चरित्रकी उसी दुर्घलतायो तर
करनेसे काम आरम्भ करना चाहिए और इस पातका पद
कर सेना चाहिए कि आप अपनी उस १५
देंगे । अपनी गतिको तेज करो। जब कभी
हुमा अनुमय करो और अपने कामको
१०७
व्यक्तित्व प्राप्तिका मार्ग- तभी अपने काममें सलग्नता तथा सम्चे दिलसे लग जाओ। एक गहरी सास डायफ्राम छाती और पेटके यके भाग के नीचेसे आरम्भ करके लो। सासमे अपने इष्ट उद्देश्यको भी रक्खो, अर्थात् उस समय अपने मनमें अपने आदर्शका स्मरण फरो। फिर इस साँससे अपने ममस्त शरीरको फुला लो । तत्पश्चात् उसे सहज सहज समान रूपसे धैर्यपूर्वक नाकद्वारा बाहर निकाल दो। साँसको निकालते समय अपने मनमें सकल्प करो कि तुम चुस्त शनिसम्पन्न, और विश्वस्त बनोगे । जन कभी तुम अपने आपको अपनी पुरानी आदतफे अधीन पाओ, तभी ऐसा करो। इससे तुम अपनेमें निस्सन्देह एक निश्चित परिवर्तन होता हुआ पाओगे। याद रक्खो, किसी भागकी दुर्बलताको दूर करना अथवा उसका सुधार करना समस्तको उन्नत बनाना है, और एक भी श्रुटिपर विजय प्राप्त करना चरित्रके प्रत्येक अशमें दृढता पैदा करना है। यहॉपर यह यात समझा देनी बहुत जरूरी मालूम होती है कि कोई भी काम एक दो दिनमें नहीं होता। कोई घाटे एक दो दिनमें दूर नहीं होती और किसी प्रकारकी शारीरिक, मानसिक अथवा आध्यात्मिक उन्नति एक दो दिन या दस पाँच दिनके अभ्याससे नहीं होती। इन कामोंके होनेमें काफी समय लगता है और इस ममयमें लगातार नियत रूपसे दृढतापूर्वक अभ्यास करनेकी आवश्यकता है।प्राय देखा गया है कि नवयुवक किसी अभ्यासको दो सप्ताह करनेके पश्चात् ही कोई बड़ा भारी परिवर्तन । कुछ उन्नति प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते हैं और जब उनको वह परिवर्तन या उन्नति, वास्तवमें होते हुए भी, प्रत्यक्ष रूपसे नजर नही आती, तब वे हनोत्साह तथा निराशसे होकर उल अभ्यास या साधनकी उपयोगितामें अविश्वास करने लगते हैं और उसे छोड़ देते हैं। लोगोंको इस घातका विश्वास दिलाना आसान काम नहीं है कि इस पफ दो सप्ताह के अभ्याससे उन्होंने इष्ट दशामें कुछ उन्नति की है, कारण कि इसको हम वि. झानशालामें होते किसी पर 2 परिवर्तन दिखा सकते । इसको तो हम फेवल युद्धि या दलीलसे ही समझा सकते है। इस पुस्तकको जिन्होंने अपतक समझकर पढा है, ये जानते है कि हमारा हरएक विचार अपने अनुरूप परमाणुओंको हमारी तरफ खीचता है और जब उन परमाणुयोंकी अधिकता हो जाती हे, तय हम अपने शरीरम एक विशेष परिवर्तन पाते हैं! यह भी ये जानते हैं कि लगातार अभ्याससे आदमी फुछसे कुछ यन सकते है। अब जरा सोचो कि यह परिवर्तन एक दिनमें नहीं हुआ, परन् लगातार कोशिशोका फल है। हमें यह यात माननी पड़ेगी कि जो शक्ति या परिवर्तन आज हम अपनेमें विशाल रूपमे अनुभव करते है, वह हमारे अभ्यासके आरम्भक दिनसे शुरू होकर सहज महज वढा है। इतनेपर इस यातके मान- नसे इन्कार नहीं हो सकता कि जिस दिन आपने अभ्यास शुरू फिया था, उसी दिन उस शक्तिया परिवर्तनका आरम्भ हो गया था, उसके बीज बोये गयेयाजोर जिस शक्ति या परिवर्तनका आरम्भ हा गया है, वह तो तुम्हारे अभ्याससे दिन प्रतिदिन कुछ न कुछ पुष्ट हो रहा हे, चढ़ रहा है। फिर आप फैसे कह सकते है कि आपने एक दो सप्ताहके अभ्यासस कुछ प्राप्त नहीं किया ? शायद यहाँपर यह यात तुम्हें फिर याद दिलानी युछ उपयोगी हो कि हमारे समस्त स्वभाव, हमारी तमाम दुर्वलताएँ, हमारी मय र्टियॉ ओर प्रत्येक क्षेत्रमें हमारी समस्त परिमितताएँ फेवल हमारे विचारोंकी आदत ही हैं। किसी विचारका मनमें पार-चार मनन करनेसे, उसे बार-चार दुहरानेसे, अन्तमें वहीं विचार एक आदत बन जाता है । कुछ समयके पश्चात् मस्तिफ अपने आप ही काम करता हे ओर जिस विचारका बहुत समय तक मनन किया जाता है, यह एक दृढ स्वभाव बन जाता है। जिस लपमें हम मनुप्यको पहिचानते हैं, वह सर उसकी विचार धाराका फल है। हम अपने विचारोकी पुनरावृत्ति मात्र है। इसलिए अपने मानसिक झुकारको पल्टनेफे लिए तुम्हें आ रिचारोंको पलटना चाहिए । मे इस वानकी परवाह कि तुम किन पिन पापोंमें लिप्त हो, तुममें कौन 18 .
"व्यक्तित्व प्राप्तिका मार्ग- ताएं है और तुम्हें भूतकालमें क्या क्या असफलता हुई है, किन्तु मैं इस यातकी घोषणा करता हूँ कि तुम अपने विचारोंको पलटनेसे उनको पूर्णतया पलट सकते हो। समस्त जीवन, समस्त काम, समस्त व्यवहार और समस्त चरित्रके आधार विचार ही है। क्या तुम सुस्त, क्रोधी और आलसी हो ? यदि ऐसा ही है, तो तुम्हारे पूर्व विचार ही तुम्हारे वर्तमान कामोंके जन्मदाता हैं। अपने विचारॉको पलट दो । प्रत्येक प्रात कालके दस पाँच मिनिट शक्ति, तेज़ी और चुस्तीफे विचारोंको सोचनेमें खर्च फरो। अपने आपको अपने विचारोंसे मिलाकर चलाओ। अपने विचारॉपर दृढ रहो और दिनमें वीसियों यार अपने मनको इन विचारोंपर लगाओ। फिर शीघ्र ही तुम्हारा मस्तिष्फ अपने लिए काम करना आरम्भ कर देगा और तुम्हारे सब कामों में अन्तर हो जायगा। विचार करना ही वैसा वन जाना है। पापु या बुरी आदत विचारकी आदतके सिवाय और क्या वस्तु है? पविनता या मद्गुण भी विचारकी एक आदतके सिवाय ओर क्या है ? एक पापी आदमी इसी लिए पापपूर्ण काम करता है, क्योंकि उसके विचार पापमय हैं। एक पवित्र आदमी इसी लिए पवित्र है, क्योंकि उसका मन पवित्रतासे विचार करता । अब हम समझ सकते है कि क्यों यह उपदेश दिया गया है कि अपने मनको वैसा ही बनाओ जैसा फि प्रभु मसीहका था । अब यात भी स्पष्ट है कि उन्होंने क्यों यह आदेश दिया कि पातें सत्य, न्याययुक्त, प्रेमपूर्ण और प्रशसायोग्य है, यदि उनमें कुछ भी भलाई या प्रशसा है, तो उनका विचार करो। जिस महात्माने ऊपरका उपदेश दिया है, वह जानता था कि सत्यका विचार करनेसे आदमी सत्यरूप बन जाता है। ईमानदारी ओर पवित्रताका मनन करनेसे आदमीका जीवन अनिवार्य रूपसे ईमा- नदार और पवित्र हो जाता है। प्रेमका विचार करनेसे आदमी हृदयमें समस्त सुन्दर तथा अच्छी चीजोंके लिए प्रेम उत्पन्न हो जाता है । जय मन सोन्दर्य तथा प्रेमका विचार करता है, तब ओं .
परिवर्तन कुछ भी मदा भययासराय फररोपाला होता, पद सय मच्छाईमें बदल जाता है। कारण कि म्याभाविक रूपसे प्रेमका विचार करनेवाला अम्बच्छता पसन्द नहीं करता । जिसका मन अच्छी याताका मनन फरना रहता है, भला पह पिस तरह अपने होठापर उन शदीपो गयगा, जो कि यदनामी, दोग और दूसरोंफी धुराई प्रषट करने हैं। जो आदमी लगातार पुण्यका विचार करना है, उमक लिप पापमें गिरना फितना अस- म्भव है इस प्रकार हम देखते है कि एक आदमीफे विचार दी। उसके जीवन, चरिय तथा भाग्यको निश्चित करते है। इसी तरह इस युक्तिफा तुम अपने समस्त जीवनमें लागू कर सकते हो। जो पुछ तुम यनना चाहते हो ओर यदि वैसे तुम नहीं हो, तो इसका इलाज तुम्हार पास ही है। जैसा तुम बनना चाहते हो, उस आदर्शका विचार करों ओर तुम येसे ही बन जाओगे। अपने विचारोम परिवती फिये यिना तुम कुछ समयके लिए जबरदस्ती याहरसे लीपापोती कर सकते हो, तुम धर्मको मान- नेकी भी घोषणा कर सकते हो, धार्मिक क्रियाकाण्डके फट्टर पालनेवाले भी यन सफ्ते हो ओर इससे अपने शरीरका याद्य भाग स्वच्छ हुआ समझ सकते हो, किन्तु जब तक तुम विचारों में परिवर्तन करके अपने हदयको न परटोगे, उस समय तक समस्त गगा परिवर्तन अल्पकालिक ही रहेगा और तुम्हारा पतन एक निश्चित यात होगी। जो कुछ भी तुम अपने अन्तरात्मामे-मनमें सोचते हो, यही तुम्हारे जीवन में बाहर प्रफट हो जायगा ओर जब तक तुम्हारी विचारधाराम परिवर्तन न होगा, तय तक तुम्हारा बाह्य आचार और नियमपालन साथ न देगा। इस लिए यदि तुम अपने जीवन में वास्तविक परिवर्तन चाहते हो और चाहते हो कि यम आदिका पालन तुम्हारा सथा उपकार करे, तो पहले विचारों में परिवर्तन करो।
" " जानी है। ७-समतोलता ( Balance ) " अत जा कुछ हमे सीसना है, यह है पारस्परिक तुलनात्मक सभ्यध अर्थात् परमात्मा राज्यम प्रत्येक वस्तुका औचित्य और सापक्ष स्थान मालम करना । तुम्हारे जीवनके प्राकृतिक पहलू और आध्यात्मिक पहलूम एक्ल्यता या समन्वय हाना चाहिए और कोई भी पहल, अविकसित अथवा अधूरा न रहना चाहिए । ++ + + अपने जीवनक ठीक केन्द्रपर लक्ष्य करा । जीवनके ऐक्यको मुख्य रूपसे और उसके प्रमाण ( Proportion) को गौण रूपस ध्यानमें रस्सा। --विशप वैव जा एक उद्देश्यका अपने सामने रसता है, उसे सर वस्तुएँ प्राप्त हो -याउनि उस ऊँचे तुले चरित्रसे सुन्दर औरयाउनीय कोई भी वस्तु नहीं है और न उससे अच्छी किसी दूसरी वस्तुफी आदमी इच्छा कर सकता है, जिस चरित्रमें अनुपातका सौन्दर्य प्रकट है, जो कि सवाग रूपसे पुष्ट किया हुआ है । कभी कभी हमें ऐसे चरित्रॉपर भी विचार करना पड़ता है जिनमें कि स्त्री या पुरुष अपने चरित्र के एक पहलूको विकसित कर लेते हैं और दूसरे समान रूपसे आवश्यक पहलूकी उपेक्षा कर देते है। हमारी प्रकृति निगु. णात्मक है-(१) शारीरिक, (२) मानसिक और (३) आध्या- स्मिक । तुम्हें याद होगा कि इस पुस्तकके पूर्वार्ध तीन सस्कार घताये थे और वहाँ इन सस्कारोके अतिरिक्त चरित्रसम्बन्धी संस्कार भी बताया था। हमारे मौजूदा मतलपके लिए उपयुक्त तीन भेद काफी है। वास्तवमें पूर्ण पुरप या पूर्ण स्त्री यही है। जिसने प्रतिके सभी अगोंको समान रूपसे विकसित किया है और इस तरहसे अपनी समस्त शक्तियोको ठीक रूपसे एक- त्रित करके अपने चरित्रको सर्वागपूर्ण बनाया है, अपने आपको आदर्श पुरुष या आदर्श स्त्री बनाया है। . 1 AN समतोलता बोद्धिक तथा आध्यात्मिक अशफी उपेक्षा करके, प्रकृति थिवा मानव-शरीरके पाशविक अशको पुष्ट करना एक यकर यात है । इस एकतरफा पुष्टिके कटु फलोंको खनेके लिए हमें अपने आसपास ही देयनेकी जरूरत है, दूर नेकी आवश्यकता नही । जो आदमी केवल इन्द्रिय-सुखों और शारीरिक वासनाओंको तृप्तिके वास्ते जीवित है ओर जिसके विनका उद्देश्य 'खाओ, पीओ, मोज उड़ाओ' है, निस्सन्देह हमआदमी परमात्माफी इस सुन्दर पृथिवीपर एक फलक है, र है। क्यों कि उसमें सभी परमात्मीय गुण होते हुए भी यह पशुके समान नीच घृत्तियों में फंसा हुआ है। खेदकी यात है के देवता बननेवाला आदमी गक्षस बन जाय ! जिस आदम वरीय अश विद्यमान है, यही मनुष्य अपने मुयसे हमें (पने पतित जीवनकी दुसभरी गाथा सुनाता है । जिस आदमी- शरीर सूजा हुआ, भद्दा, लजाकर, दुखी ओर रुग्ण है, यह इस त्यिकी घोषणा करता है कि जो आदमी विषयवासना. की वृमिमें अन्धाधुध, चिना आगा पीछा देने, लगा रहता है, ही शारीरिक अपवित्रताओं, यातनाओंको सहता है। आदमी क शारीरिक, मानसिक और माध्यात्मिक जीव है। निस्सन्देह, कमादमीको शारीरिक रूपसे भी आदर्श होना चाहिए । परन्तु सका मतलब यह नहीं है कि यह शरीरवाला एक पतित शिव अथवा विषयी पथ हो । वास्तवमें आदर्श स्त्री या पुरुष यही । जो समस्त पाशविक वृत्तियों तथा विषय चासनामाफो रसता आ भी उनके ऊपर अपने सुसयत तथा सुशासक मनसे रता है, जो अपने शरीरका स्वामी है, जो अपनी समस्त विषय सनाओंकी लगामको अपने घर तथा धैर्ययुक्त हाथोंमें मपनी प्रत्येक इन्द्रियसे कहता है कि तुम्हें मेरी सेवा करनी के मालिकी तुम्हारा सदुपयोग करूँगा, दुरुपयोग नहीं। प्रीया पुरुष अपनी समस्त कियोको पूर्ण स्त्रीत्वमें या परिणत कर व्याक्तत्व प्राप्तिका माग- . विलास मृत्यु है ओर सयम जीवन है। निवृत्ति भाव-त्या भाव, ही मनुष्यत्व है। सञ्चारसायनशास्त्री वही है, जो विषयवासनाओंके लोहेको आध्यात्मिक तथा मस्तिष्कीय शक्तियोंके स्वर्णमें पलट लेता है, विषय-वासनाओंसे भी शक्ति प्राप्त करता है। कुछ आदमी विषय वासनाओंको मार देनेका, उन्हें दयानेका उपदेश देते हैं, परन्तु हम तो यह अधिक अच्छा समझते है कि उन विपयचासनाओंको उनकी समस्त शक्तियोसहित उन सुन्दर गुणोंमें पलट दो, जिनसे एक मनुष्य भी देवता यन जाता है। वे गुण क्या है ? प्रेम, नम्रता दया, शक्ति, उत्साह, सकल्पकी दृढता तथा आकाक्षा और घेसव गुण जो कि आदमीके जीवनको वैभवशाली तथा विजयी बनाते । इसके साथ हमें शरीरका प्रतिदिन पूरा ध्यान रखना चाहिए तथा इसे सुन्दर बनानेका प्रयत्न करना चाहिए । शरीर तो अमर आत्माका वेश ओर उसका पवित्र मन्दिर है । इस शरीरको इस आत्माके अनुरूप ही अच्छा बनाना चाहिए । शरीरको शुद्ध, सात्विक और शक्तिदायक भोजन देना चाहिए । इसका पोपण ठीक रूपसे होना चाहिए और इसको स्वच्छ (बहुमूल्य नही) वर पहनाने चाहिए, जिससे कि यह शरीर परमात्माकी सुन्दर मूर्ति दूसरी तरफ आत्मा और शरीरकी उन्नतिका ध्यान न रसकर, केवल मनको ही पुष्ट करते रहनेमे भी हानिकी सम्भावना है। नतो आदमीका मन ही सब कुछ है और न उसका शरीर ही सब कुछ ओर इनमेंस एफकी उन्नतिकी तरफ झुक जाना उतना ही है जितना कि दूसरेकी उन्नति तरफ झुक जाना ! इस लिए ही है कि सब ओर समान रूपसे उन्नति की जाय । हमारे - विज्ञानवेत्ता, महान् बुद्धिमान आदमी, बड़े बड़े अन्चे- विद्वान थे ही पुरुष हुए हैं, जिन्होंने अपने । उच्चतम सीमा तक विकाश करनेके साथ पहलूकी उपेक्षा नहीं की है, वरन् अपने हृदय फरने योग्य, नम्र, सहानुभूतिपूर्ण, चन जाय। ।
समतोलता यहाँ हम पेमी विद्वत्ताने सावधान रहा चाहिए, जो एकातया । सिनी, रूखी और शफी होती है। इस यातके यतानेफी कोई पास आवश्यफता नहीं है कि प्राय (कभी कभी कल्पित) आध्यात्मिकताफा विकाश बुद्धिकी पूर्ण उपेक्षाके साथ किया गया है । यहुत समय व्यतीत नहीं हुआ, जर कि 'फट्टर धर्मात्मा'लोग विद्या और शानको धोया ओर जाल कहफर उनका तिरस्कार करना एफ यही धामिक तथा ईश्वरीय यात समझते थे। पेसे आदमियोंके हृदयामें सबसे महत्वपूर्ण जो यात थी ओर जिसको चे अपनेसे मिलनेवाले हरएक आदर्माके हृदयपर अकित फर देना चाहते थे, यह मुक्ति प्रात करना था। पुरुष तथा रिनयाँ भायौ तथा जोशसे अभिभूत होकर यह गाया करते थे कि ससारमें कोई भी वस्तु विचारफे योग्य नहीं है सिवाय इसके कि मैं उस मृत्युसे कैसे बच सकता है, जो कभी मरती ही नहीं। यह अच्छी यात है कि इस प्रकारकी शिक्षाफा शीघ्रताके साथ लोप होता जा रहा है। अच्छा होता कि यह शिक्षा और भी तेजी के साथ लुप्त हो जाती । कारण फि ऊपरकी यात चाहे जितने भी साधारण टैंगसे क्यों न कही गई हा, यह उतनी ही धनानटी तथा लजित करनेवाली है जितनी कि यह योग्य गवेयाद्वारा बहुत ही अच्छे स्वरसे मन्दिरोंमें गाये जानेपर होती। इससे किसीके हृदयमें ये शब्द याद आ सकते हैं कि क्या स्वार्थ, जो कि समयपर पाप है, और जो सदा ही त्याज्य यताया गया है, स्वर्गीय घुद्धिमानी है? फुछ आदमियोंने ऐसे स्त्री पुरुषोंको कभी न कभी अवश्य देखा होगा जो कि शारीरिफ पुष्टिको पलिदान करके आध्यात्मिक सस्कारफो विकसित करते हैं। सब विषय-वासनाओं तथा भायोको पाप समझफर दमन करते हैं और इस तरइसे अपने आपफो पवित्र, सयत और परिवर्तित करनेके स्थानपर मारते हैं, अपनी कायाको क्लेश अपने आपको नष्ट है यत्तित्व प्राप्तिका मार्ग- डालते हैं। यदि शरीर इन्द्रियोंके होते हुए भी एकापापमय वस्तु यन गई है, तो निसन्देह स्वय हमने ही उसे ऐसा यनाया है। आध्यात्मिक जीवनकी प्राप्तिफे यास्ते पहुतसे स्त्री-पुरुप जन- समूहको छोडकर जगलमें रहते हैं, अपनी प्रेम प्रकृतिको याते है, मित्रता तथा सहानुभूतिसे अपने आपको वञ्चित रखते हैं और आदमियोंके रहनेक स्थानोंसे दूर भागते है। निश्चयसे यह एक तरफा और असमान व्यवहार है। अति कही भी अच्छी नहीं होती। एफ अतिवादीमें सदा निस्यतकी कमी होती है, वह सदा एक तरफको झुका हुआ होता है और तुला हुआ नहीं होता। वास्तविक आध्यात्मिकतामें शरीर तथा बुद्धिका भी समावेश है- और वह आदमी इनको पवित्र, उय, श्रेष्ठ और उन्नत बनाता हुआ परमात्मीय पद तक पहुंच जाता है। इस लिए प्रिय पाठको, सर्वोग उन्नति करने और सभी भाक- तिक शक्तियोंको पुष्ट करनेका प्रयत्न करो। किसी भी दशा अति न करते हुए, यथाशक्ति समस्त उपायोंको काममें लाते हुए एक सुन्दर दृढ़, ओर पूर्ण पुरुपत्य या स्त्रीत्व प्राप्त करनेका प्रति दिन प्रयत्न करो। यह एक भली प्रकार 'ऊँचा तुला और सुन्दर चरित्र ही है। शारीरिक, मस्तिप्फीय, तथा आध्यात्मिक दशा- ऑमें सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वोच्च स्थान प्राप्त करना तुम्हारा उद्देश्य होना चाहिए। व्यक्तित्व प्राप्तिका यही राजमार्ग है।
- " ८-मनन और ध्यान । युद्धिमान् भादमी विचारला विचारसे और कामको कामसे मुरीति मिराकर अपने परित्रका निमाण करता है । याग थाहा परके वह अपने उपयोको प्राप्त कर लता है। ऐसा आदमी पूर्ण शांतिक साथ अच्छी तरहसे काम करता है।' " सधै मननसे जीवनरूपी समुद्रकी गहराईको और प्रेम तथा शानकी ऊँची चोटियोंको मापो । जिस आदमीको मननके मार्गका पता नहीं है, यह मुक्ति और प्रकाशको प्राप्त नहीं कर सकता। परन्तु तुम विचारका पवित्र माग प्राप्त पर लागे।" -जम्स एलन किसी वस्तुका मनन करना उस वस्तुके समान ही यन जाना 1 है। आदमीके लिए मननसे सय पुछ प्राप्त करना सम्भव है। इस पुस्तकके पाठकोंने अब तक विचारकी महत्ताको समझ लिया होगा और समझ लिया होगा कि विचारसे ही आदमी उन्नत अथवा पतित होता है। किसी गुणका यार यार विचार करनेसे एक दिन वह गुण प्राप्त हो ही जाता है और किसी पापका विचार करनेसे एक न एक दिन आदमी उस पापमें फँस ही जाता है। इस लिए यह बात आसानीसे समझ ली जायगी कि हम मननको, प्रस्तुत विषयपर नियमित ओर लगातार मननको, नहीं छोड़ सकते । पुछ पाठक प्रति दिनके कुछ भागको मननके लिए नियत करनेकी आवश्यकता अनुभव करेंगे। यह एक यहुत अच्छी तज- यीज है और नियत समयपर मनन करनेमें कोई भी विध-याघान आनी देनी चाहिए। दूसरे आदमी उश तया श्रेष्ठ विषयोंका विन्तन करनेके लिए अपने हृदयोंको इतना उत्सुफ पायेंगे कि उनके लिए दिनके किसी भायको मनन करनेके लिए नियत करना कठिनतासे आवश्यक होगा, कारण कि उनके मन उन विषर्योपर विन्तवन करनेके प्रत्येक अवसरको काममें लायेंगे। मनको पद्म इच्छानुसार मनन करतेने लिग सधाना इससे व्यक्तित्य प्राप्तिफा मार्ग- डालते हैं। यदि शरीर इन्द्रियोंके होते हुए भी एकापापमय बस्नु बन गई है, तो निसन्देह स्वय हमने ही उसे ऐसा बनाया है।। आध्यात्मिक जीवनकी प्राप्तिके वास्ते बहुतसे स्त्री-पुरुष जन समूहको छोडकर जगलमें रहते हैं, अपनी प्रेम प्रकृतिको दयाते है। मित्रता तथा सहानुभूतिसे अपने आपको घञ्चित रखते हैं ओर आदमियोंके रहनेके स्थानोंसे दूर भागते है । निश्चयसे यह पका तरफा और असमान व्यवहार है। अति कहीं भी अच्छी नहीं होती । एक अतिवादीमें मदा निस्यतफी कमी होती है, वह सदा एक तरफको झुका हुआ होता है और तुला हुआ नहीं होता। वास्तविक आध्यात्मिकतामें शरीर तथा बुद्धिका भी समावेश है ओर वह आदमी इनको पवित्र, उच्च, श्रेष्ठ और उन्नत बनाता हुआ परमात्मीय पद तक पहुँच जाता है। इस लिए प्रिय पाठको, सर्वांग उन्नति करने और सभी प्राक तिक शक्तियोंको पुष्ट करनेका प्रयत्न करो। किसी भी दशामें अति न करते हुए, यथाशक्ति समस्त उपायोंको काममें लाते हुए एक सुन्दर दृढ, और पूर्ण पुरुषत्व या स्त्रीत्व प्राप्त करनेका प्रति दिन प्रयत्न करो। यह एक भली प्रकार अँचा तुला और सुन्दर चरिन ही है । शारीरिक, मस्तिप्फीय, तथा आध्यात्मिक दशा- ऑमें सर्वश्रेष्ठ तथा सवोच्च स्थान प्राप्त करना तुम्हारा उद्देश्य होना चाहिए। व्यक्तित्व प्राप्तिका यही राजमार्ग है।
"
८-मनन और ध्यान।
बुद्धिमान् भादमी विचारका विचारसे और कामको कामसे सुरीति से मिलाकर
अपने चरित्रका निमाण करता है । याग थोडा फरक वह अपने उद्देश्योंका
प्राप्त कर लेता है। ऐसा आदमी पूर्ण शांतिक साथ अच्छी तरहसे काम करता है।"
"सचे मननसे जीवनस्पी समुद्री गहराईको और प्रेम तया ज्ञानयी ऊंची
चोटियाँको मापो । जिस आदमीको मननरे मागा पता नहीं है, यह मुक्ति और
प्रधशको प्राप्त नहीं कर सकता।
परन्तु नम विचारका पवित्र मार्ग प्राप्त कर लाग ।
-जेम्स एलन
किसी पस्तुका मनन करना उस वस्तुके समान ही यन जाना
हे । आदमीफे लिए मननसे सर फुछ प्राप्त करना सम्भव है। इस
पुस्तकके पाटकोंने अब तक विचारकी महत्ताको समझ लिया
होगा और समझ लिया होगा कि विचारसे ही आदमी उजत
अथवा पतित होता है। किसी गुणका चार यार विचार करनेसे
एक दिन यह गुण प्राप्त हो ही जाता है और किसी पापका विचार
करनेसे एक न एक दिन आदमी उस पापमें फैंस ही जाता है।
इस लिए यह यात आमानीसे समझ ली जायगी कि हम मननको,
प्रस्तुत विषयपर नियमित और लगातार मननको, नही छोड
सकते। कुछ पाठक प्रति दिनके कुछ भागको मननके लिए नियत
करनेकी आवश्यकता अनुभव करेंगे। यह एक यहुत अच्छी तज
वीज है और नियत समयपर मनन करने में कोई भी विनयाधान
आनी देनी चाहिए। दूसरे आदमी उच्च तथा श्रेष्ठ विषयोंका
चिन्तन करनेके लिए अपने हृदयोंको इतना उत्सुफ पायेंगे कि
उनके लिए दिनके किसी भागको मनन करनेके लिए नियत करना
कठिनतासे आवश्यक होगा, कारण कि उनके मन उन विषयोपर
चिन्तयन करनेके प्रत्येक अवसरको काममें लायेंगे | निस्सन्देह
मनको एकदम इच्छानुसार मनन करनेके लिए पाना इससे कहीं
व्यक्तित्व प्राप्तिका मार्ग- । अधिक अच्छा है कि मनको नियत समयपर मनन करनेके लिए विवश किया जाय बहुतसे आदमियोंने प्रात कालको मनन करनेके लिए सुन्दर समय समझा है, परन्तु क्या यह समय दिन या रातके किसी दूसरे समयसे अधिक सुन्दर है ? जव मन उन वस्तुओंका मनन करनेकी अच्छाई और पवित्रताको समझ लेता है, जिन्हें हम जीवन तथा शाति, और सफलता तथा प्राप्ति कहते हैं, तब उसे मनन करनेके लिए विवश करनेकी ज़रूरत ही न रहेगी । वह स्वय इस काममें लग जायगा। मनन वह चावी है, जिससे हम स्वर्गके दरवाजे खोलते हैं। मननमें सदा एकाग्रता अथवा ध्यान जमानेपर लक्ष्य रक्यो । अपने विचारको सञ्चा, दृढ, अटल, स्थिर तथा गम्भीर बनाओ। तुम्हारे विचार जितने ही एकाग्र होंगे, उतनी ही अधिक शीघ्रतासे तुम्हें अपने काममें सफलता प्राप्त होगी। इस घातको याद रक्खो कि आत्माद्धारा कभी ऐसे उद्देश्यकी कल्पना नहीं होती, जिसे वह प्राप्त न कर सके। आनन्दकी कोई ऐसी अवस्था नहीं, जिसे हृदय अनुभव न कर सके । जीवनकी जिस किसी शक्तिका विचार किया जा सकता है, वह अप्राप्य नहीं है। यही राजमार्ग है। आओ प्रिय पाठको, इसपर चलें और अपने जीवन के उद्देश्यको-एक दृढ और प्रभावशाली व्यक्ति त्वको प्राप्त करें। -- समाप्त
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