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Ek Zindagi Banjara
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एक ज़िन्दगी बनजारा
शैल रस्तोगी
Thurum
CE
angouch
प्रकाशन
मेरठ
9 डॉ० श्रीमती शैल रस्तोगी १७५, मोरी पाड़ा मेरठ-२५०००२ इन एकांकियों के खेलने के लिए लेखिका की अनुमति आवश्यक । अनुमति के लिए उपर्युक्त पते पर पत्र- व्यवहार किया जा सकता है । मूल्य: १२ रुपये प्रथम संस्करण सितम्बर, १६७४ प्रकाशक: कल्पना प्रकाशन ७, कबाड़ी बाजार, मेरठ कण्ट-२५०००१ प्रावरण-सज्जा: प्रशोर पार्टी ३००/ए, चाणक्यपुरी, मेरठ मुद्रक : उर्वशी प्रेस वंधवाड़ा, मेरठ Ex ZINDAGI BANJARA (EKANKI) BY DR. (1.) SHALL LASTIGI
शशि भाभी के
लिए
नहीं
जो प्रब
क्रम
१
२६
५७
कुछ कहना है, इसीलिए
१. एक जिन्दगी बनजारा
२. पंधेराधेरा.."ौर प्रधेरा
३. एक समुन्दर गहग गा
४. पर्वत में गिरा एक मन
५. तृशान पोर पहनाया
६. गूली पर पा एक पोर मर्माहा
७. पनविदा, मेरे दोग्नों!
पोरे पो गहपात्री।
६.
...और एक नया गूरज
कुछ कहना है, इसलिए रचनाओं का भी अपना-अपना भाग्यमोना है। हर महीं अन्दाज़ मुझे “एक जिन्दगी बनजारा' के प्रकाशन से हो रहा है। न जाने कितने वर्षों की साध थी कि मेरा कोई काव्य-संकलन प्रकाशित हो। 'पराग' का प्रकाशन सन् १९४७ ई० में हुआ था। तब से अब तक न जाने कितनी वार नयी काव्य-पुस्तिकाओं के प्रकाशन की बात मेरे सामने आयी और टूट गयी। कोई सिलसिला जमता दिखायी नहीं देता था। अब भी 'पारमिता' (काव्य-संकलन) के प्रकाशन की ही बात थी और प्रकाशित हो गया एकांकी संकलन । है न भाग्य को ही बात ! आज का युग एकांकी का युग है-अनेकांकी का नहीं । बड़े रंगमंचीय नाटकों के प्रस्तुतीकरण की सुविधाएं हमारे छोटे-छोटे विद्यालीय रंगमंच नही दे पाते, फिर समय का अभाव। ऐसी स्थिति में ३०-३५ मिनट में समाप्त होनेवाले एकांकी अनायास ही हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। 'एक जिन्दगी बनजारा' को रचना का कारण भी बहुत कुछ यही रहा है । बहुत दिनों तक कॉलिज को एकांकी नाटक-प्रतियोगिता की संयोजिका के पद पर कार्य करते हुए मुझे बार-बार लगता रहा कि हिन्दी में एकांकियों की कमी है । कुछ अच्छे एकांकी हैं अवश्य, पर उनमें काट-छाँट की बहुत अपेक्षा होती है । 'एक जिन्दगी बनजारा' में मेरे समय-समय पर लिखे गये नौ एकांकी संगृहीत हैं । ये सभी एकांकी मूलतः पारिवारिक हैं। यथास्थान राजनीति, मनोविज्ञान, समाज आदि का संस्पर्श इनमें है, पर इनका मूलाधार परिवार ही है। परिवार के सुख-दुःख, सम्पन्नता-दरिद्रता, भाव-अभाव सभी कुछ इन एकांकियों में समाविष्ट है । आज का युग विषमताओं का युग है। बढ़ती हुई महगाई ने समाज की अर्थ- व्यवस्था को बुरी तरह झकझोर डाला है । असन्तोप से घुटा-घुटा माहौल, संत्रास से सहमा-सहमा परिवेश, लगता है एक गहरा धुंधलका, कभी न छंटने वाला कुहासा जन-जीवन पर छाता चला जा रहा है । कभी आन्दोलन तो कभी विस्फोट, कभी सड़कों पर चप्पलें पिसती बेकार पीढ़ी तो कभी पुरानी पीढ़ी के टूटते तार-तार होते सपने । असलियत तो आज यह है कि यह स्थिति हमारे देश में ही नहीं है, सारा संसार ही दिएस्लाम के नानार पर खड़ा है। आज जो कुछ हो रहा है, उससे कहा- कर जीवन नहीं चल सकता । जीवन की सारी विसंगतियों से आज का साहित्य भरा हुआ है । यह तो होना ही है, क्योंकि साहित्य तो जोवन के साथ-साथ चलता है। ये सभी एकांको रंगमंच पर आसानी से प्रस्तुत किये जा सकते हैं । 'एक जिन्दगी बनजारा', 'पर्वत से गिरा एक मन', 'एक समुन्दर गहरा सा' प्रादि एकांकिमों का मंचन सफलतापूर्वक किया जा चुका है। - ( ज ) मेरे एकांकियों के सभी पात्र व्यक्ति पात्र हैं-जाति पात्र नहीं। 'एक समुन्दर गहरा सा' की रचना पर मेरे कुछ साथी लोगों ने देवता-पात्र होने का दोषा- रोपण किया है, रचना मानव पात्र है--वस्तु-स्थिति को जटिलताओं से पलायन करनेवाला- --एक साधारण पात्र । इन एकांकियों के अधिकांश पात्रों को मैने अपने जीवन में देखा है, अपने जीवन के अनेक क्षणों में जिया है। मैंने उन्हें कही भी काल्पनिक-अवास्तविक आवरणों से ढकने का प्रयास नहीं किया। ये पात्र न तो समझ में न आनेवाले घोर बुद्धिजीवी पात्र हैं, और न हवा के झोंकों से उड़ जानेवाले हल्के-फुलके पात्र । इनका अपना अस्तित्व है-अपना व्यक्तित्व है। कहीं कुछ भी यदि साहित्य के महायज्ञ में एक प्राहुति-मात्र मेरे ये एकांकी बन पाये, तो मुझे प्रसन्नता होगी। १ सितम्बर, १६७४ शैल रस्तोगी
१
एक ज़िन्दगो बनजारा
(युद्ध के बाद बंगला जन-जीवन पर आधारित)
पात्र
मां कविता को साम
कविता यह
कुमार
दो घनिष्ठ मिन
मेयर
गरिमा
(मायु ५ यप)
कविता की बेटिया
नोनिमा
(पायु ३ वर्ष)
ढाका के एक साधारण परिवार का मकान । समय प्रातःकाल ८-६ के लगभग। बंगला देश की आजादी के बाद धीरे-धीरे सभी शरणार्थी अपने- अपने घरों को लौट आये है । जन-जीवन सामान्य हो चला है । एक कमरा है । कमरे के दायी और एक चारपाई बिछी है, जिस पर कुछ कपड़े पड़े हैं । बायी ओर एक ट्रंक ज़मीन पर रखा हुआ है। ट्रंक पर एक पुस्तक है। ट्रंक के पास एक मेज है, उस पर कुछ प्याले-प्लेट रसे हैं । साथ ही एक डलिया में कुछ फूल भी हैं। सामने एक खिड़की है जो बाहर को खुलती है। मेज़ के पीछे दीवार पर एक बड़ा-सा फ़ोटो टैगा हुआ है। कमरे के वायी और अल्मनी पर हैंगर में एक कोट टॅगा है व कुछ साड़ियाँ । कमरे के दोनों ओर दो दरवाजे हैं। दायां घर से बाहर जाने के लिए और वायां घर के अन्दर की ओर ले जाने के लिए है। पात्रों को वेशभूपा बंगालियों जैसी है । पर्दा खुलता है । कमरा खाली है । मां का प्रवेश । वह कमरे में फैले सामान को धीरे-धीरे सहेजती है और फिर खाट पर बैठ जाती है। फिर उठकर ट्रैक पर रखी कोई किताब उठाती है। एक क्षण फोटो की ओर देखती है, फिर लौटकर चारपाई पर बैठ जाती है। . 11 गरिमा और नीलिमा का प्रवेश। दोनों के बस्ते कमर के पीछे लटके हुए हैं। पहले दोनों वच्चियां फ़ोटो के पास खड़ी होती है, शीश झुकाती हैं, फिर मां के पांच छूती हैं 1] एक जिन्दगी बनजारा मा : (दोनों के शो पर हाथ फेरतो है) जा रही हो दोनों स्कूल? दोनों बच्चिा : हाँ, दादी माँ । मां : गरिमा ! नीलू को संभालकर ले जाना। बड़ा ट्रैफिक रहता है रास्ते में। गरिमा : अच्छा, दादी मां। दोनों बच्चों का दाएँ द्वार से प्रस्थान । बाएं हार से सविता का प्रवेश। उसके माथे पर बड़ी-सो यिन्दी है, मांग में सिन्दूर । वह चौड़े किनारे को तांत की साड़ी पहने है । पहले वह डलिया से. फूलों की माला निकालकर फोटो को पहनाती है, प्रणाम करती है, फिर मां के चरण छूती है। मा : जा रही है, बेटी ? कविता : हाँ, मां ! माज में जरा देर से लौटूंगी। मौ : अच्छा, बेटी ! (लम्बी सांस लेती है) कविता का दाएँ द्वार से प्रस्थान । मां कुछ देर चुप बैठी रहती है, फिर धीरे-धीरे लेट जाती है। पृष्ठ- भूमि से एक दर्द-मरा संगीत उमरता है : बनजारा जिन्दगी उजड़ा हुया चमन ये उजड़ा बाराबा कोई भी नहीं है हम पर मेहरवां सोये समी उदास, पोड़ा जगी जगी बनजारा जिन्दगी धोरे-धीरे स्वर क्षीण होता जाता है। मां उठती है, खिड़की से बाहर झांकती है और चुपचाप देखती रहती है उदास-उदास । कुमार का वाएं द्वार से प्रवेश। कुमार : (मां के पास जाकर) क्या देख रही हो मां ? मां : कुछ नहीं, वेटा ! वेचारी अभागी लड़की कितना दर्द-भरा गीत गाती है। कुमार : यह तो जमीला चौधरी है, माँ ! यूनिवर्सिटी में हमारे साथ पढ़ती थी । वैचारी लड़की ! कुंवारी ही गर्भवती, पागल हो गई है । कभी गाती है, कभी हंसती है और कभी रोती है। ४ एक जिन्दगी चनजारा .. : थक जाती है तो "नहीं ! नहीं ! नहीं !" कहकर चिल्ला उठती है। मां : इसके परिवार का कोई भी नहीं बचा वधा, बेटा? कुमार : सब कुछ मिट गया, माँ ! कुछ नहीं बचा। मां : (उदास होकर बिस्तर पर प्राफर बैठ जाती है) वेचारी लड़की......! कुमार : क्या सोच रही हो, मां ? मां : कुछ भी तो नहीं, वेटे ! कुमार : तुम बहकाने की कोशिश मत करो, माँ ! तुम अब भी उदास हो। अतीत अव भी तुम्हारी आँखों के आँसुओं में लहराता रहता है । भूल जाओ, मां ! सब कुछ भूल जानो। माँ : अतीत को भूल जाऊँ ? बहुत चाहती हूँ बेटे ! पर'.... पर इतनी सारी तस्वीरें हैं कि उभरती. ही चली आती है एक के बाद एक मेरी आँखों के सामने । कुमार : पुरानी तस्वीरें मिटा डालो, माँ ! नई तस्वीरें बनायो। तभी तो जी सकोगी, नहीं तो..... नहीं तो। हॉफ जाता है। माँ : ठीक कहते हो, बेटा! कोई भी तो घर ऐसा नहीं बचा जहाँ मनहूसियत का साया न पड़ा हो। पड़ोस के सेठ की लड़की जुलेखा, याद है न तुझे, कल ही तो धान के खेत में उसकी लाश सड़ती हुई मिली। कुमार : सब देख रहा हूँ, मां ! सब सुन रहा हूँ। तानाशाहों ने हमें हर तरह से वरवाद कर डाला। जालिम लुटेरे कहीं के ! अस्मत लूटी, जानें लूटी, दौलत लूटी, कुछ भी तो नहीं छोड़ा ! उफ़ ! ये दर्दनाक कहानियाँ इतिहास के पृष्ठों से कभी नहीं मिटेंगी मां ! (कुछ रुककर) कविता और बच्चे गये मां ! मुझे भी जाना है । माँ : हाँ जामो, बेटा। कुमार : अगर तुम्हारा मन न लगे तो पड़ोस के गांगुली दा के यहाँ हो पाता मां! कुमार का प्रस्थान। माँ : पड़ोस के गांगुली दा के यहाँ हो पाऊँ ! पड़ोस...."जहां खण्डहरों की आत्माओं का चीत्कार ही सुनाई देता है केवल । गांगुली की जवान बहू आज तक लापता है । एक भी तो घर पहले जैसा नहीं रहा। (कुछ रुकती है, बैठ जाती है, फिर एक जिन्दगी बनजारा खड़ी हो जाती है) सामने वाले वे प्रोफेसर भट्टाचार्य, उन्हें भी मार डाला कातिलों ने और उनके वे फूल-से सुकुमार दोनों बच्चे, उफ़ ! अनाथाश्रम में पल रहे हैं। उनकी मां का तब से ही पता नहीं। (हांफ जाती है) और......और... 'सोनार बांगला' दैनिक के सम्पादक गोसाई, उनकी बेटी गिरिवाला ...."सव कहां गये, कहां गये भगवान् ? किसको भूलूं, किसको याद करूं? (रोती है) और अपना दर्द भी सवको देखकर भूली रहती हूँ। क्या करूँ कभी-कभी'' (कलेजे को थामकर बैठ जाती है। तभी बाहर से जमीला चौधरी के हंसने की अावाज उभरती है। मां फिर खिड़की के पास जाती है और कलेजे पर हाथ रखकर फिर बैठ जाती है) हाय वेचारी लड़की ! दर्द भरा गीत धीरे-धीरे उभरकर दूर डूबता चला जाता है। उजड़ा हुमा चमन ये उजड़ा थागबा सोए सभी उदास पीड़ा जगी-जगी... तभी शेखर का प्रवेश शेखर : मां! मां! मा : (एफदम चौककर) कौन ? कौन ? अरे शेखर ! अरे-परे तू लौट आया बेटे ! (दौड़ती है। शेखर को हृदय से लगाती है, हांफती है) तू भा गया वेटे ! (उसे चारों ओर से टटोलती है) हाय मै तो तुझे..... समझती थी। मरें तेरे दुश्मन.....। शेखर : हाँ, माँ ! मै तो मर ही चुका था, पर मुक्तिवाहिनी के सैनिकों ने मुझे बचा लिया। हम लोग तो साथ-साथ ही घर से निकले थे। मां ; हां पाकिस्तानी गुण्डे तुम्हें हम सबके बीच में से खीच ले गये थे। कविता.भी तो तुम्हारे ही कपड़े पहनकर निकली थी । वह कुछ पीछे रह गई तो बच गई धरना....."हां वे गुण्डे देखते-ही-देखते सबके भव तुम पर पिल पड़े ये एक साय । भला हो कुमार का । सबकी मांसों में धूल झोंककर वह हमें बाहर निकाल लाया था। शेयर : कुमार जिन्दा है मो? यही तो मेरा एक दोस्त था। एक दिन्दगी यनजारा माँ : हाँ. कुमार जिन्दा है वेटे! बाद में पीछे आनेवाले शरणा- थियों ने तुम्हारे बारे में यह दुःखद समाचार दिया कि तुम...... शेखर : मर गये..... (हसता है) मौत भी कभी-कभी कितनी करारी हार खाती है माँ ! देखा तुमने मेरे साथ में तो यही हुआ। मार तो डाला ही था कातिलों ने, कसर भी क्या रह गयी थी? क्या सोचने लगीं माँ ? और सब कहाँ हैं ? माँ : कुछ नहीं सोचती बेटे ! तू नहा तो सही। सभी पाते हैं, खबर भेजती हूँ। सब ठीक हैं ! कुछ जलपान तो कर ले । शेखर अन्दर की ओर जाता है। माँ : हाय भगवान् ! अब क्या होगा ? जिस कहानी को खत्म हुना समझ लिया था, वही टूटी कहानी फिर से शुरू हो रही है । . अब क्या करूं भगवान् ? क्या होगा? नहीं नहीं उसका कुछ दोष नहीं । वह तो मना करती थी, पर...... पर..... मेरे सामने कोई और रास्ता भी तो नहीं था। कुमार...."कितना टूटा-टूटा-सा लगता था। मां-बाप, भाई-बहिन सब छिन गये । कोई भी तो उसका नहीं बचा। वेचारा अकेला कुमार.....(हांफती है) मैने ही उसकी दशा पर तरस खाकर'.... फिर हम सब कहां जाते. कहाँ जाते? श्रावाज अन्तर्मन की : तू हत्यारी है । तूने अपने हाथों अपने बेटे को बगिया उजाड़ डाली। मां : नहीं। नहीं ''मेरा कोई कसूर नहीं है, मैं वेकसूर आवाज : वेक़सूर नहीं है तू ! पापिनी है। अपने बेटे की दुश्मन है तू । तू अपने बेटे से प्यार नहीं करती थी। तू मां नहीं है, मां नहीं है। मां : नहीं, नहीं, ऐसा न कहो। मैंने कोई कसूर नहीं किया। में कुछ नहीं जानती......। पायाज': तू कुछ नहीं जानती ? तू सब कुछ जानती है। सब कुछ जानती थी । पापिन हत्यारी कहीं को ! मो : नहीं, नहीं, नहीं (चोखकर बेहोश हो जाती है । कुमार और शेखर दोनों का एक साथ दौड़ते हुए प्रवेशा, पर एक-दूसरे को देखकर चौंक उठते हैं। शेखर : अरे कुमार ! तुम यहाँ हो । मां कह रही थीं कि तुमने मेरे एक जिन्दगी यनजारा - ७ परिवार.....। फुमार : प्ररे शेसर ! तुम मा गये । तुम"तुम" तुम्हें तो (दोनों एक-दूसरे से लिपट जाते हैं)। शेसर : हाँ कुमार ! मां भी यही कहती थी। मुझे पाकिस्तानियों ने मार तो डाला ही था। मारने में कसर भी यया छोड़ी थी। वो तो मुक्तिवाहिनी के सैनिकों का भला हो । गुझे मरा जानकर पाकिस्तानी गुण्ई छोड़ गये थे। मेरे शरीर में कुछ हरकत देखकर मुझे मेरे देश के सिपाही उठा ले गये और तभी से में अस्पताल में था। अभी एक सप्ताह पहले ही तो चलने लायक हुग्रा । असली बात तो यह है --जाको राखे साइयां कुमार : (हकलाते हुए) हो, हो, ठीक कहते हो । अच्छा शेखर, तुम जरा डाक्टर चौधरी से दवा ले पायो मां की। मां का यह दवा का पर्चा है, में मां को संभालता हूँ। पोखर का प्रस्थान । कुमार : (लड़खड़ाता है) हाय, यह क्या हो गया मेरे भगवान् ? मैं कसूरवार नहीं हूँ मेरे दोस्त ! मैने कभी तुम्हारा बुरा नहीं चाहा था। मुझे माफ़ करो। मैने कोई पाप नहीं किया। केवल दुःख-दुःखों को बांट लें. यही सोचकर मै दुःखी हताश हो दुःखों की छाया में पाया था। पर... पर..." सुख कितना छलिया निकला। (तिर पकड़कर बैठ जाता है, फिर उठता है । ट्रंक के पास जाता है, ट्रंक में से एक चित्र निकालता है) यह तस्वीर सच्ची नही है, सच्चो नहीं है । इसके टुकड़े-टुकड़े करके हवा में इसकी चिन्दियां उड़ा देनी चाहिये । (चित्र को ध्यान से देखता है) इस तस्वीर का हर रंग झूठा है-झूठा है। हाय भगवान् कितने नकली रंगों से तुमने मेरी ज़िन्दगी की तस्वीर बनायी थी। सारे रंग फीके ही रहे। तस्वीर को फाड़ने के लिए हाय बढ़ाता है। तमो मो होश में प्रा जाती है, और कुमार से फोटो लेकर खाट पर फेंक देती है। माँ : क्या करता है रे पागल ? क्या तस्वीरें अपने हाथों यों मिटाई जाती है ? (कुमार का हाथ पकड़ती है) चल तो जरा मेरे साथ । वाहर तक जाना है, एक जरूरी काम है। (दोनों का प्रस्थान) एक जिन्दगी वनजारा कुछ देर स्टेज खाली रहता है। एक क्षण के बाद कविता का प्रवेश ।) कविता : (दोनों हाथों से मुंह ढांपकर फूट-फूट कर रोती है) अव क्या होगा प्रभो ! मैं विवश थी (प्रांखें पोंछती है)। अन्दर से प्राती अावाज : ऐसी भी क्या विवशता थी। लाचारी की आड़ लेकर तूने अपनी इच्छाओं की पूर्ति करनी चाही थी। कविता : नहीं, नहीं, ऐसा नहीं था, मैं किसी से प्यार नहीं करती थी । मेरी कोई भी इच्छा बाक़ी नहीं थी। आवाज : तू झूठ बोलती है। एक साल भी तू चुपचाप बैठी नहीं रह सकी । तूने अपने पति की दुनिया में भाग .... | कविता : नहीं, नहीं नहीं... मुझे अपने पति से अत्यधिक प्यार था । मैं उनकी दुनिया में आग लगाना नहीं चाहती थी, पर शरणार्थी कैम्प में फैलती अपयश की वे चिंगारियाँ- आग बरसाती अफवाहे-"कुमार-कविता साथ-साथ रहते है । कुमार कविता के बच्चों को अपने बच्चे समझता है। माँ को अपनी मां और कविता को अपनी... उभरती हुई मिली-जुली हँसी के स्वर । कविता : (चीखकर) नहीं-नहीं, मैं यह सब कुछ नहीं चाहती थी। तब मां का आदेश हम दोनों ने जवर्दस्ती स्वीकार कर ही लिया। अब क्या होगा? वे क्या सोचेगे, दुनिया क्या कहेगी ? मुझे मर जाना ही चाहिये । (चारपाई के पास प्रात्तो है, चारपाई से फोटो उठाकर देखती है, फिर चारपाई पर फेंक देती है) ये तस्वीर, मिटा दे कविता ! (कुछ सोचती है) अब तो हर तस्वीर मिट गई। कोई-सी भी तस्वीर सच्ची नहीं रही। झूठी दुनिया की भूठी तस्वीरें मिटा दो भगवान् ! मिटा दो ! (रोती है और मुंह ढककर अन्दर चली जाती है)। शेखर का प्रवेश। शेखर : जब से घर में पाया हूँ सब सही-सही-से लगते हैं-अातं. कित हैं सब जैसे मेरे पाने से ! (सोचता है। मां को मेरे पाने की इतनी खुशी क्यों नहीं हुई जितनी होनी चाहिये थी ? और कुमार...."कितना उसड़ा-उसड़ा-सा लग रहा था। डॉ. चौधरी के पास गया तो उन्होंने भी कहा--"बड़ा मफसोस है मापने प्राने में देर कर दी, शेखर !" मैने पाने मे देर कर दी? क्या हुअा पर तो अपना ही है, देर से एक जिन्दगी बनजारा पानी गागर । राग में पाटग मांग मिग, गभी उग-उग गं। पारों मोर प्रा सागर देता है। यही पर. यही मेरा मोटो। राय मेरे मोटी पर कविता फूल नहीं पाती भी, पर पूल पाये गये है । नहीं दी है. यही मेर-गिणी और पाग के ये ही पानेागर पुछ यही, मुछ भी तो नहीं पाता । (म के बिस्तर पर जागर) यही मां का कारन । (नटी पर गो गाविता को साहियो देश कर) यही कविता मी गादिया, जो गं गरीनी पी। सब पुछ सो यही है, दिर मा यदमा है ? (पोहा पाकर) पहने हैं पर गोग। मां यन गयो, कविना भी बदम गयी होगी ? गुमार यास गया । (मो को पारपाई के पारा पाता है । पिस्तर पर पी फोटो को उठाकर) रिसर माह का है यह फोटो ? यह..."यह तो शुमार है। याद दोस्त, ग्याह कर लिया और यताया भी नहीं ? दुल्हन तो पड़ी मुन्दर है। परे....."परे बिल्कुस कविता जगी। यविता......शयिता भी व्याह के समय ऐगी ही दीराती थी (हंसता है)। {फिर जोर से घोलता है) मा ! तुम सब कहाँ हो ? इनगे दिन बाद पाने पर मेरा ऐमा स्वागत ? मुझे तुम लोगों से इसकी भाशा नहीं थी। कुमार, कविता, मा सय दौड़कर पाते हैं। दोसर : गुमार! यह क्या है ? ब्याह किया और मुझे निमन्त्रण भी नहीं। कुमार : ब्याह ? सय प्रखिों से मांसू पोंछते हैं । दोखर : यह सब क्या रहस्य-लोला हो रही है माँ ! मेरी समझ में कुछ भी नही पा रहा। मां : सब समझ जायोगे वेटे ! तुमने बड़ी देर कर दी। तुम्हारे पाने की कोई उम्मीद नहीं थी। उधर कुमार बिल्कुल अकेला रह गया था। परिवार की परवरिश की जलती हुई समस्या मेरे सामने थी। शेसर : पहेलियाँ न बुझायो माँ ! साफ़-साफ कहो, मै समझ नहीं पा रहा। माँ : सब समझ जायोगे बेटा ! मुझे कहने दो। मेरी इच्छा को पूरी करने के लिए कुमार ने कविता की मांग में सिंदूर भरा है-ये दोनों निर्दोष है। एक ज़िन्दगी बनजारा शेखर : तो यह बात है । कविता और कुमार दोनों अब पति-पत्नी हैं । समझ गया, सब समझ गया। तभी सब लोग सहमे- सहमे से, उखड़े-उखड़े-से थे। कविता सिसकती है, सिसकती है, कुमार प्रांत पोंछता है। शेखर : तो हम चल दिये दोस्त ! कोई बात नहीं, जैसे आये थे, वैसे ही चल दिये.... ...... | अब हमारी जरूरत भी कहां रह गई? कुमार : नहीं शेखर ! तुम नहीं जानोगे । जिन्दगी के त्रिकोण से किसी एक को हटना है तो मुझे हटना है। तुम क्यों हटोगे ? घर तुम्हारा है, मां तुम्हारी है, बच्चे तुम्हारे हैं और कविता, वह तो तुम्हारी थी ही, और अब भी तुम्हारी ही है । उसका कोई दोष नहीं, उसे माफ़ कर देना शेखर ! शेखर : नहीं कुमार ! तुम नहीं जानोगे, मुझे जाना है । कुमार : नहीं शेखर ! तुम रोकना भी चाहोगे तो जानेवाला नहीं रुक सकेगा । एक उजड़ा हुआ वीरान थी मेरी ज़िन्दगी और मैंने उसे बसाने की भूल कर दी थी। भूल का पता चल चुका है मेरे दोस्त ! अब आगे और भूलों की गुंजाइश नहीं है मेरी जिन्दगी में..... अलविदा । शेखर : नही कुमार ! तुम्हें मैं नहीं जाने दूंगा। कुमार : नहीं दोखर ! बंग माँ की हरी-भरी घरती मुझे अपनी सेवा के लिए पुकार रही है । मुझे अपने देश का सेनानी होकर जाना ही पड़ेगा । मुझे आशा दो माँ ! कविता ! फविता सिसकती है, मां रोती है। तभी दोनों बच्चों का प्रवेश । गरिमा पहले तो मां और दादी को रोती देखकर किंकर्तव्यविमूढ़-सी खड़ी रहती है फिर दौड़ कर शेखर से चिपट जाती है । गरिमा: पापा! शेखर : मेरे बेटे ! एक तू ही तो इस घर में ऐसी निकली, जिसने मुझे पहचान लिया। अन्यथा सब बेगाने-बेगाने, अनजान से। कविता सिसकियां भरती है, नीलिमा दौड़कर कुमार से चिपट जाती है। नीलिमा : पापा! कुमार : (नीलिमा को गोद में उठाकर प्यार करता है) बेटे ! वे रहे तुम्हारे पापा । पर नोलिमा शेखर को पोर नहीं बढ़ती, सहमी हुई एक जिन्दगी बनजारा कुमार से चिपटी रहती है । कुमार प्यार से नीलिमा की पीठ थपथपाता है और फिर गोद से उतार देता है। दीवार पर टॅगे कोट को उतारकर पहनता है, फिर उतारकर रख देता है । कुमार : अच्छा अलविदा मेरे दोस्त ! मैं चाहता तो मर सकता था, पर जिन्दगी में वेमौत मरने में भी कोई मज़ा नही। दर्दो से भरी ज़िन्दगी को जितना जिया जाये उतना ही.. शेखर : कुमार ! नहीं, नही, तुम्हें यहीं रहना है इसी घर में । कुमार : वह अधिकार में खो चुका हूँ शेखर ! माफ करना सब अनजाने में हुआ। बदनसीब लोग दुनिया में आकर सोचते हैं कि अपनी बदनसीबियों को दुनिया के दामन में डालकर हल्के हो जायेंगे, पर दामन उनका अपना ही भारी होता चला जाता है। माफ़ करना मेरे दोस्त ! इतनी बड़ी दुनिया में जीने के बहुत सारे रास्ते हैं। मै मरूंगा नहीं। मैने तुम्हारे साथ कोई छल नहीं किया, मेरा कुछ दोष नहीं । मुझे क्षमा करना माँ, कविता भा.....भी...... आज फिर तुम्हें उसी पुराने सम्बोधन से सम्बोधित कर रहा हूँ। मुझे माफ़ करना। याद कर लेना कभी कोई बनजारा अपने काफ़िले से कटकर घर बसाकर बैठ गया था। बनजारा तो बनजारा ही है, अव उसे जाना ही है। मुझे अब कोई भी नहीं रोक सकता शेखर ! ज़िन्दगी की सारी खुशियों से भगवान् तुम्हारा दामन भर दे। लड़खड़ाता है, खाट पर बैठ जाता है, प्रांखें बन्द कर लेता है। कविता और मां सुबकती हैं। बच्चे रोने लगते हैं । शेखर कुमार के पास बैठकर उसका हाथ अपने हाथ में ले लेता है। कुमार : सारे दरवाजे खोल दो माँ ! घर में गन्दी हवायें भर गयी थी, उन्हें निकल जाने दो। जिन्दगी के आखिरी लमहों में तुम सबके प्यार का सहारा लेकर में जा रहा हूँ। अच्छा, अलविदा! खड़ा होता है, जाने के लिए दायों ओर बढ़ता है, शंखर उसका हाय पकड़ता है, पर वह हाय छुड़ा । लेता है। कुमार : मेरे हाय को मत छुओ शेखर ! मै गुनहगार हूँ, में पापी हूँ. मैने अपने दोस्त की गृहस्थी उजाड़ी है...। मेरी एक जिन्दगी बनगारा
मंजिल मुझे पुकार रही है. मैं जा रहा है।
द्रुत गति से बाहर चला जाता है।
शेखर : रुको कुमार ! मेरी बात तो सुनो...सुनो तो सही ।
बाहर की ओर जाता है। एक क्षण बाद ही लौट
प्राता है।
शेखर : वह बड़ा जिद्दी है शुरू से ही, पर मैं उसे लौटा लाऊँगा। यों
म.....!
मां : रहने दो शेखर ! उसे जाने दो। वह नही पायेगा, अव
कभी....'नहीं आयेगा।
सुबकती है। कविता और बच्चे भी सुबकते हैं।
शोखर मस्तक पर हाथ रखकर चारपाई पर बैठ
जाता है। बाहर से पगली जमोला के गोत की
कड़ियां पुनः सुनायी देती हैं-
हम पोछे रह गये
काफिला
यह तो टूटना था
अाखिरी सिलसिला।
यूं लूटती हैं उम्मीदें सगी-सगी
वनजारा
जिन्दगी ।
गया
एक जिन्दगी बनजारा
१३
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२ अँधेरा"अंधेरा" और अंधेरा
पात्र
मां मनी की मां
मनो एक युवती (प्रायु २१ वर्ष)
श्यामू गाय के ज़मीदार का विकृत-मस्तिष्क बेटा
(ग्रायु ३० वर्ष)
चौथा
चार पुरुप पहला, दूसरा, तीसरा,
स्त्री
पुरुप
[राम गंगा के किनारे बसे किसी बड़े गांव के बाहर छोटी-सी सराय । प्राधी रात का समय । रंगमंच पर कुछ स्पष्ट दिखायी नहीं देता। कुछ धूमिल-धूमिल- सी वस्तुएँ यत्र-तत्र विखरी-बिखरी-सी लगती हैं। सामने शायद कोई चौको बिछी है, जिस पर कोई बैठा है, पूजा करने की प्राकृति में । पता नहीं कौन है ? पास की विछी खाट पर कोई लेटा हुआ है या क्या है दिखायी नहीं देता अँधेरे में। पीछे से केवल कुत्तों के भोंकने की आवाजें उभरती हैं और बीच-बीच में चौकीदार का स्वर' जागते रहो, जागते रहो' 'कभी पास से सुनाई देता है और कभी दूर से । कभी-कभी सन्नाटे को चीरती दूर से आती अस्पष्ट-सी संगीत-लहरी सुनाई दे जाती है। बाहर बारह बार घण्टे सुनाई देते हैं । बारह बजे हैं, अब यह निश्चित है। पूजा करतो प्राकृति धीरे-धीरे उठती है और पासवाली चारपाई की ओर झुकती है, शायद कोई चादर-सी उढ़ाने का उपक्रम कर रही है, तभी एकाएक लेटी हुई प्राकृति उठकर बैठ जाती है । लेटी हुई प्राकृति बैठकर : क्या है म? मां : कुछ नहीं बेटी! मैने सोचा-तुझे उढ़ा दूं। कपड़ा ठीक तरह ढक कर नही सोती। ठण्ड लग जायेगी, तो क्या होगा? पैसा भी चाहिये और प्रादमी भी....... । वेटी : हूँ"तो आज भी तुम्हें नीद नहीं आई, मां ! रात-रात भर जागकर न जाने क्या करती रहती हो ? मो : करने को है ही क्या, बेटी? सोना चाहती हूँ, पर कहाँ सो पाती हूं ? लगता है कोई मेरे सिरहाने खड़ा मुझे गड्ढे में घकेल देना चाहता है। प्राय वन्द करती हूँ, तो एक तूफान. अंधेरा.. मंधेरा...और अंधेरा मा उठता लगने लगा है। क्या करूं बेटी ? समझ मे कुछ भी तो नहीं आता। बेटी उठती है, अंगड़ाई लेती है और तकिये के नीचे रक्खी हुई दियासलाई निकालकर पास स्टूल पर रखो लालटेन जलाती है। हल्की-हल्की रोशनी में रंगमंच पर रखी चीजें उभरने लगती हैं। रंग- मंच के दाहिनी पोर एक चूल्हा रखा है, जिसमें दो- चार लकड़ियां लगी हैं बुझी हुई। चूल्हे पर पतीली रक्खी है। पास-पास पांच-सात वर्तन रक्खे हैं बेतर- तीब । चूल्हे से थोड़ी दूर पर एक लकड़ी की छोटी-सी आलमारी है। चौकी चौड़ाई में बिछी है और चार- पाई लम्बाई में। रंगमंच के धीच में एक खिड़की है जो बाहर को ओर खुलती है। बायीं ओर बाहर जाने का दरवाजा है। दाहिनी मोर का दरवाजा दूसरी कोठरी को ओर खुलता है । लड़को उठकर पालमारी खोलती है, और कुछ निकालती हैं। फिर मां को लाकर देती है।) बेटी : लो माँ ! गोली खा लो । मुंह में डालते ही नींद आ जायेगी। कल ही वैद्य जी ने दी थी। मां : गोली खा-खाकर ज़िन्दगी की न जाने कितनी रातें बीती, बेटी ! अब तो जगने ही दे। देखू कब तक जगती हूँ। थकूगी तो आप ही सो जाऊंगी। तू सो जा, बेटी ! बेटी : अब मुझे भी कहाँ नीद आती है, मां ! एक बार उचट जाये नींद, तो फिर लाख यत्न करने पर भी कहाँ आदमी सो .. माँ : हाँ सो तो है ही । न तुझे सोने देती हूँ और न खुद बेटी : कैसी बातें करती हो माँ ! (कुछ सोचकर) कल रामू काका की आयी चिट्ठी के बारे में क्या सोचा, मां ? यहाँ तो सूने .स्थान पर रहते बड़ा डर लगता है। अब तो गांव ही चलो। रात को कहीं कोई जंगली जानवर.. मां : पादमी ही सबसे बड़ा जानवर हो जाता है, मनी ! और फिर इन जानवरों की दुनिया में रहना है, तो डरना भी क्या? मनी : फिर भी मन तो ऊपता ही है, मौ ! बड़ी याद आती है गमू काका की। कितना प्यार करते हैं ! मम्मो की, विम्मी एक जिन्दगी बनजारा " की । बचपन को वे सहेलियां, माँ! तुम्हें याद है कम्मो कितनी गोरी थी? उसके गोरे-गोरे मुखड़े पर जब मै हाथ फेरकर कहती कि कम्मो, तेरे गाल तो ऐसे हैं जैसे मक्खन के गोले, तो वह मुझे चपत लगाकर कहती थी कि और तेरे ऐसे जैसे (लजा जाती है)। माँ : जैसे गुलाब के फूल । है न ! मेरी लाड़ली वेटी ऐसी ही तो है । (हंसती है) अरे मनी ! वे दिन भी क्या दिन थे ? तू छोटी थी। जब तेरा बापू तुझे अपने कन्धे पर चढ़ाकर घूमने निकलता था, तो कोई भी तुझे लड़की नहीं समझता था। सब कहते थे लड़के को घुमाने जा रहे हो? तो वे कहते-मनी मेरा बेटा ही तो है। सच तुझे वे कितना प्यार करते थे। बायीं ओर के द्वार पर थपथपाहट सुनाई देती है। मनी : कोई यात्री मालूम होता है, मां ! मां.: हाँ और क्या? तू बैठ, मैं जाती हूं। जाती है । बाहर से कुछ प्रावाजें उभरती हैं । स्त्री-स्वर : बड़ा सीरियस केस था। थोड़ी देर बाद पहुंचते तो... पुरुष-स्वर : उसका बचना कठिन था। अब केस कण्ट्रोल में आ गया है। भाम्य से जो इंजेक्शन ज़रूरी थे, मेरे बक्स में निकल आये। स्त्री-स्वर : जिसकी जिन्दगी होती है, उसे कोई नहीं मार सकता... | पुरुप-स्वर : यह तो है ही (थोड़ा रुककर). "जव-जब मैं इस कस्ये में पाता हूँ तो न जाने "ये कस्वा ये नदी.. ये गांव, जाने कसा कसा लगने लगता है। दरवाजा खुलने पर दोनों अन्दर प्रा जाते हैं । पुगप : हमें रात भर के लिए स्थान चाहिये। आपकी सराय के अतिरिक्त यहाँ और कोई स्थान है ही नहीं रुकने को। मां : प्राइये मेरे साथ । (मनी से) मनी "दो नम्बर को कोठरी खाली हो गई है, जरा दिखा दे, बेटी ! (भागन्तुफ पुरुष से)हाँ वावू जी ! २४ घण्टों के १० रुपये होते हैं । साने-पीने का इन्तजाम हमारे यहां नहीं है। केवल चाय चाहेंगे तो मिल : सकेगी। पुरुप : :"नहीं चाय नहीं चाहिये और हमें चौबीस घण्टे कहो रुकना है, दिन निकला और हम गये। स्त्री : यह तो अचानक अंधरी रात पड़ गयो, वरना हम रकते घोड़े पंधेरा.."अंधेरा"और"अंधेरा हो। फिर भी सये तो आपको मिलेंगे ही, पूरे १० रुपये, प्राप चिन्ता न करें। पुरुष : हाँ सो तो है ही । पाप चिन्ता मनो स्त्री-पुरुष के साथ दायीं ओर चली जाती है। मां : उटतो है (इधर-उपर घूमती है-हंसतो है) जिन्दगी भी क्या खूब खेलती है । ब्याह हुमा, शहर की लड़की ब्याह के वाद "रंगीन चूनर पहनकर गांव में ससुराल आ गयी और फिर "फिर जिसने सुहाग चढ़ाया था."उसने ही काली चादर "डाल दी. प्रासें खुली. 'राक्षसों से घिरी, जिन्दगी बोझ लगने लगी.. केवल दो हज़ार''बढ़ते- बढ़ते 'दस हज़ार "हे राम! दरवाजा खुला छोड़ दो. तो चोर''कभी-न-कभी तो घर में घुसेंगे ही मेरे घर में भी चोर घुस आये थे उस दिन-~अंधेरी रात के आलम में। जिन्हें अपना समझती थी, वे तो दुश्मन थे जनम-जनम के (फिर बिस्तर पर बैठ जाती है। तकिये के नीचे से बैग निकालती है-प्रौर कुछ गिनने का प्रयास करती है) "एक"दो तीन चार पाँच "छ:.."अभी तो पूरे चार कम हैं। हे भगवान्, वह जानवर इतनी लम्बी मनी का प्रवेश। मनी : किस जानवर की बात कर रही हो, मा ? मां : जानवर और कोन? जानवर, जानवर है, बेटी ! मनी : और तुम रफ़म के बारे में भी कुछ कह रही थी। कैसी रकम, मौ? मां : भरें ! तू क्या जाने जिन्दगी के झमेलों को, वेटी? तु सो जा'.. अभी तो साढे बारह ही बजे हैं। दिन भर बदन टूटेगा। मनी : नहीं मां ! अव नीद कहाँ आती है। तभी आंधी पाने लगती है~भीषण तुफान लगता है। सांय-सांय की ध्वनि से मनी डर कर मां के पास खिसक प्राती है। मनी : डर लगता है मो! कैसी भयंकर प्राधी है ? चारों मोर सांय-साय करता मंधेरा ही भेघेरा । मां : हाँ बेटी! मा ना तू मेरे पास या जा। यह तूफान मुझे भी बहुत डराता है। ऐसी ही तो एक रात थी, जब मांधी एक जिन्दगी पनजारा में तेरा बापू नाव के साथ बीच में ही फंस गया था । रात भर में इन्तजार करती रही और सवेरा होते ही भांखें फाड़े, नदी के किनारे उनको ढूंढती रही पर वे नहीं लौटे फिर कभी "नदी ने अपनी बाहों में समेट लिया पूरी नाव को तेरे बापू को 'तेरे भय्या को। रह गयी तू और मैं अकेली...1 मनी : अव भय्या कितना बड़ा होता, माँ ? माँ : पच्चीस वरस का होता, बेटी ! पांच बरस का तो था ही, और तू तो तब केवल एक बरस की थी। तू क्या जाने ? मनी : बापू कितने बड़े थे मां ! उस समय ? मां : तीस बरस की जवान उमर में ही तो यह सब हो गया। गांववाले उन्हें देखकर कहते थे कि ऐसा सजीला जवान गांव भर में नहीं है। मनी : सुन्दर तो माँ, रामू काका भी हैं। मां : (उपेक्षा से) हां, पर तेरे बापू की तरह नहीं । धीरे-धीरे तूफ़ान तेजी पकड़ रहा है। मां : मनी बेटे ! सामने की खिड़की बन्द कर दे। मनी : (खिड़की से झांककर) उफ़ मां ! आँधी है कि "अरे माँ ! देखो वह क्या है । हाथ में लालटेन लिये ये कुछ डोलती-सी परछाइयाँ । देखो माँ ! मा : (उठकर खिड़को में से बाहर झांकते हुए) किसी को ढूंढने जा रहे होंगे, बेटी ! कोई अभागा फिर घर नहीं लौटा होगा । तेरा वापू भी तो घर नहीं लौटा था तो गाँववाले उन्हें ढूंढने के लिए लालटेन हाथ में लिये तूफ़ान में ही निकल पड़े थे। मनी : उफ़ माँ ! कितनी अंधियारी रात है ? माँ : हां वेटी ! वह भी अंधियारी रात थी । इसी सराय में तेरा वापू रहता था । तूफान के पहले किसी मुसाफिर की गर्भ- वती स्त्री को शहर छोड़ने गया था नाव से, तो फिर वह लौटा ही नहीं। कहते है लौटते वक्त्त तूफ़ान में नाव फैम • गयी। मनी: तो फिर भय्या कैसे साथ चला गया? मां : वे मंगल को अपने साथ ही रखते थे। कहते थे मर्द की जात को सब काम आने चाहिये। मनी : (डूबते स्वर में) बेचारे बापू ! बेचारा भय्या ! माँ ! हम अँधेरा.. अंधेरा.."और"अंधेरा .. लोग कितने प्रभागे है ? बाहर कुछ कोलाहल-सा होता है । मिली-जुलो कुछ अस्पष्ट ध्वनियां। मनी और मां सतर्क हो जाती हैं और मिली-जुली प्रावाजों को सुनने को चेष्टा करती हैं। पहला स्वर : इधर नहीं, उधर चलो। दूसरा स्वर : श्यामू तो पूरव की ओर गया था। तीसरा स्वर : पूरब की ओर तो तूफ़ान है । अंधेरा है और... चौथा स्वर : अरे भय्या ! अंधेरा तो चारों ओर है और यह तूफ़ान मचाता तूफ़ान भी... दरवाजे पर थपथप । माँ दरवाजा खोलती है। चार पुरुष अन्दर पा जाते हैं। मनी और मां पीछे हटती हैं। पहला : क्या श्यामू यहाँ पाया है ? माँ : कौन श्यामू ? क्या वही 'सेठ जी का पागल बेटा ? दूसरा : हाँ आज शाम से ही घर नहीं लौटा। चौथा : प्राज नदी की ओर गया था शाम को वह। तब से आया ही नहीं । तीसरा : तूफ़ान के बीच में पता नहीं कहाँ फंस गया है ? मनी : आज शाम तो वह नदी किनारे घूम रहा था । पहला : नदी किनारे? चौथा : पर वहाँ तो अब नहीं है। दूसरा : हम ढूंढ-ढूंढ हार गये। तीसरा : चलो भय्या ! एक बार फिर ढूंढ लें । श्यामू यहाँ भी नहीं : मिला। सब वापिस लौटते हैं। बीच-बीच में सांप-सांय करती प्रांधी ध्यान.भंग करती है। माँ : बेचारा श्यामू भी नहीं मिल रहा। तूफ़ान ने कही उसे भी समेट तो नहीं लिया अपनी बाहों में ? मनी : बेचारा जिन्दगी से कितना ऊया हुआ था ! कोई भी तो उसके लिए अपना कहने को इस दुनिया में नहीं है । पत्नी मर गयी, पुत्र गया और फिर सौतेली मां-सौतेले भाई ! चन न लेने देते थे हत्यारे एक पल भी। मो : वारा प्रभागा श्यामू ! द्वार पर पपयपाहट । एक जिन्दगी बनजारा मनो: फिर कोई प्राया दीसता है, माँ ! माँ : तू रक मनी, मैं दरवाजा खोलती हूँ। मां दरवाजा खोलतो है। काला कम्बल लपेटे एफ प्राकृति प्रवेश करती है। माँ : कौन हो तुम ? बोलो, बोलते क्यों नहीं ? माकृति : चुप रहो धीरे-धीरे वोलो (दरवाजे की ओर देखकर) वे मुझे पकड़ लेंगे । में कैदखाने से भाग पाया हूँ.. मनी : कोन कोन 'श्यामू ! श्यामू : मेरा नाम मत लो, सुन लेंगे, मनी ! वे सुन लेंगे। देखो काकी ! कल रात हण्टरों की मार, मेरी कमर लहू-लुहान हो गयी है। कमर दिखाने को बढ़ता है । माँ : रहने दे, श्यामू ! वे हत्यारे राक्षस तो ऐसा करेंगे ही, करते : श्यामू : अब मैं कभी नहीं जाऊँगा, काकी माँ ! मुझे कहीं छिपा लो। मां : कैसे छिपा ले तुझे तेरी काकी माँ, बेटे ! तू तो मुझे अपने मंगल जैसा ही लगता है । पर वे हत्यारे'"वे हत्यारे । मनी : प्राधी सम्पति का हकदार है श्यामू, इसलिए गरीब को जिन्दा नहीं रहने देना चाहते । श्यामू : में नहीं जाऊँगा, काकी माँ ! कहते है मैं पागल हूँ। मुझ पर सड़क के लड़के कंकड़ उछालते हैं। मुझे मारते है। म यहीं रहूँगा, मनी ! काकी माँ ! मैं यही रहूँगा मैं पागल नहीं हूँ.. मैं पागल नहीं हूँ... मां : ले मनी ! में श्यामू को थोड़ा आराम करने के लिए जगह दे दूं। बेचारा थक गया होगा। कब से भटक रहा है जिन्दगी के अँधेरे से उजाले में आने के लिए। बेचारा स्यामू ! मां श्यामू को लेकर जाती है। मनी मां को चार- पाई पर बैठ जाती है। मां का तकिया हटाती है। नोचे से कपड़े का बैग निकल पाता है। रुपयों की कुछ गड्डियां जमीन पर गिर पड़ती हैं। मनी घबरा जाती है... रतने सारे रुपये? फिर किस रकम की बात करती रहती है ? (चंग में से कोई कागज मुड़ा हुमा उसके हाथ में पा जाता है ।) यह कसा कागज़ है ? किसी की पुरानी अँधेरा'अंधेर"और अंधेरा चिट्ठी लगती है । (खोलकर पढ़ने लगती है)... प्रिय मनी की मां ! मै तुझे भाभी नहीं कहूंगा। मैंने तुझे सदा प्रेम की नजरों से देखा है । मैं चाहता हूँ तुझे अपनी पत्नी बनाना । तब तेरा, मेरा और मनी का सवका जीवन सुखमय हो जायगा । रही मेरे दस हजार रुपयों की बात । तुम्हारे मेरे रुपयों में अन्तर ही क्या है ? मैं तुमसे रुपये नही लूंगा। फिर वे तो केवल दो हजार थे । ब्याज से प्राज दस हजार बैठते है । वे रुपये तो मैने भय्या को सराय चलाने के लिए दिये थे, सो समझ लो उसके साथ ही डूब गये। रह गयी मनी की बात । वह सुन्दर है, उसके लिए अच्छे-अच्छे खरीदार पायेंगे, चिन्ता न करना। तुम्हारा ही रामू मनी : (पत्र हाथ से छूट जाता है) रामू काका! तुम्हारा यह वीभत्स रूप? छी: छोः ? मैं अब तक तुम्हें आदर देती आयो । समझ गयो आज सब कुछ। 'मां गाँव चलकर क्यों नही रहना चाहती ? वहाँ तुम तुम जैसे जानवर जो रहते हैं । तुम'मादमी नहीं पिशाच हो.. पिशाच... मां का प्रवेश । मनी के हायों से छूटे हुए पत्र को देखकर, फिर तकिये के पास पड़ें बैग को देखती है, उठाती है। माँ : तूने आखिर पढ़ ही लिया यह खत । जिस राज को मं राज ही रखना चाहती थी, आज तू भी जान गयी सब कुछ। एक दिन तो जानना ही था। मनी : हाँ माँ, तूफान बीत गया है। तू मत डर । तेरी मनी ऐसे- ऐसे दस रामू काकाओं को भुगत सकती है। भेड़िया कही का ! बेटी के लिए खरीदार टटोलता है। माँ : (सिसकती है) मनी : तुझे अक्सर रुपये गिनते देखा है। आज समझी दस हजार रुपयों के भूत ने तुझे क्यों परेशान कर रखा था। हम कर्जदार है रामू काका के "का"का नही नही "काका नही.. पाई-पाई चुकायेंगे हम "उसका पैसा भी हमारे लिए पाप है। (हायों के कंगन और गले को माला उतारकर) ये सब कुछ कल ही बेचकर कर्जा चुकाना है, माँ ! पुरे एक जिन्दगी बनजारा : .. भादमियों का कर्जा अधिक समय तक रखना ठीक नहीं। मी : (सिसकती है) मनी : अकेले ही दुःख का बोझा ढोती रही । तू भी खूब है, माँ ! देख रात योत रही है। तूने मुझे सदा गाँव से दूर रखा--- शहर में पढ़ाया। क्या मेरी सारी शिक्षा यूं ही चली जायगी? मां : वेटी मनी ! मनी : (खिड़की का दरवाजा खोलकर बाहर झांकती है) अब तो आंधी थम गयी मौ ! लो सवेरा होने लगा । काली रात के बाद उजला सवेरा हमारे जीवन में भी आ रहा है, माँ ! दुर्भाग्य के साये अब हमें नहीं घेरे रख सकते-नही धेरै रख सकते.. माँ !.. तभी रात जो स्त्री-पुरुष प्राये थे उनका रंगमंच पर प्रयेश। पुरुष : लो माँ ! अपने दस रुपये । स्त्री : धन्यवाद माँ ! तूफान फंस जाते हम लोग। अच्छा ही हुआ, हम रात वापिस नहीं लौटे। माँ : जीते रहो बेटा ! तुम लोग । दोनों का प्रस्थान। माँ : मनी ? देख ले जरा जाकर । सामान तो हमारा सब सही सलामत है न ? मनी जाती है। मां : कभी-कभी ऐसे लुटेरे आ जाते हैं कि कुछ पूछो मत-एक भलामानरा तो पिछले साल हमारा कोरा कम्बल ही लेके चलता बना था। बड़ा दुरा जमाना पा गया। मनी का प्रवेश। मनी : माँ ! सब कुछ ठीक है। पर देख यह डायरी तो वेचारे की छूट ही गयी और साथ ही यह लॉकेट भी गले का । शायद सोते समय उतार कर रख दिया था। जाते समय भूल गये। अभी तो कुछ ही दूर गये होंगे। माँ : (लॉकेट को देखती है और लॉकेट में से ताबीज निकाल कर गौर से देखती है। भावावेश में) मनो! मनी! यह ताबीज यह ताबीज तो वही है जो तेरे बापू को एक साधु ने दिया था और उन्होंने मंगल के गले में... मनी : (प्राश्चर्य से) भय्या के गले में बापू ने ताबीज़ बांधा था? अँधेरा अंधेरा और अंधेरा (तायोज देखती है। माँ : कहाँ गये ये लोग? ये मेरे मंगल को जानते होंगे, जरूर जानते होंगे। मैं जा रही हूँ। (दौड़तो है)। मनी : (मां को रोककर) जल्दी ठीक नहीं है, माँ ! वे भी तो अपने छूटे सामान को लेने आयेंगे ही। रुको तो सही, यह डायरी भी देख लो। (मनी डायरी खोलती है, फिर पढ़ती है। डा० सुमंगल प्रकाश -चन्दौसी। माँ : सुमगल प्रकाश डाक्टर अपना मंगल...तेरे बापू कहा करते थे मंगल डाक्टर बनेगा बड़ा होकर'' वह डाक्टर बनेगा''ज़रूर डाक्टर बनेगा। (हॉफ जाती है। कुछ रुककर) मंगल डाक्टर बन गया. मंगल डाक्टर बन गया.. मेरा मंगल (चीखती है --विक्षिप्त-सी हो जाती है। कभी बैठती है, कभी धूमने लगती है। बाहर भागती है, मनी दौड़कर पकड़ लेती है।) मनी : (डायरी पढ़ते हुए) कुछ याद नहीं है । धुंधली-धुंधली तस्वीरें हैं. कुछ मिट गयी है। कुछ मिट जायेंगी ? कोई गाँव है। नाव है."तूफ़ान है और "अब तो सब कुछ बदल गया है । कहाँ गये बचपन के साथी. वे लोग जो अपने थे? टूटी-टूटी कड़ियों को जोड़कर जो कुछ सूत्र बनते हैं, वे भी टूट जाते हैं। क्या कहा करते थे बचपन में मुझे मां-बापू सेठ चुन्नीलाल का दत्तक पुत्र हूँ. मैं सुमंगल प्रकाश । डाक्टर कामना मेरी पत्नी है । कभी-कभी सीरियस केस के लिए मुझे किसी गाँव में जाना पड़ता है तो मां की.. बापू की याद आती है। नन्हीं गुड़िया-सी कोई बह्न थी. शायद मेरी.."ौखें ढूंढती हैं पर कहाँ है वे सब लोग कहाँ गया है अतोत...? वर्तमान में उलझकर खो गया है अतीत और सुलझाना चाहता है मन तो, उलझ जाता है और भी। कैसी उलझन है कभी न सुलझने वाली... मां : (नोलकर) मेरा मंगल"मेरा मंगल था "वह डाक्टर बन गमा । ग्रहा, वह टाक्टर हो गया। अजी सुनते हो, तुम्हारा मंगल डाक्टर बन गया मनी : मां ! तूफ़ान के बाद सर्वरा पाया है। इतनी जल्दी न करो। जिन्दगी चलते हुए अपनी राह से भटक गयी थी? अब उसे फिर रास्ता मिल गया है । इन्सानियत के दुश्मन : एक जिन्दगी बनजाग
हैवानो ने हमारा शिकार करना चाहा था, वे भी हार गये
है । अवेरा वदनाम हो गया, उसने गलत जगह आकर बसेरा
से लिया था।
माँ : (विक्षिप्त-सी देखती है) मंगल मंगल.''डाक्टर'..
मनी : दिल छोटा न करो, मां ! तुशियों के लिए बड़ा दामन
चाहिये "बड़ा बहुत बड़ा ।
मां : (विक्षिप्त-सी -हंसती है, अट्टहास करती है।)
मनी : माँ ! माँ ! क्या हुअा तुझे ? माँ ! क्या' "हुमा मां...
(मो को झकझोरती है)
मां : (हंसती है, हंसती है, हंसती चली जाती है, हँसती है,
चीखती है)- मेरा मंगल डाक्टर हो गया."डाक्टर...
डाक्टर' मेरा मगल डाक्टर हो गया। मेरा मंगल
डाक्टर हो गया "अंधेरा'"तूफ़ान "मनी.. मनी...
(हँसती है, हंसे चली जाती है) मेरा मंगल.डाक्टर...
तूफान 'अंधेरा...
मनी : मा, माँ.."यह तुझे क्या हो गया मौ ! यह तुझे क्या हो
गया ? अँधेरे के बाद यह कैसा सबेरा ? नहीं माँ,.."नहीं
माँ "यह नहीं, यह नहीं "(मनो मां से विपट जाती है।
पर्दा गिरता है।
अंधेरा अँधेरा.. और पँधेरा
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ar एक समुन्दर गहरा सा
पात्र
शान्ति मां
प्रनीता पुत्र (शरण) की पत्नी
'चेतन शरण का मित्र
रचना पुत्री
नन्दा रचना को बह्न
मन्थन
रचना का भाई
[एक साधारण कमरा । कमरे में एक ओर खाट पर विस्तर विद्या है जिस पर शान्ति रजाई ओढ़े बैठी है। एक ओर एक साधारण मेज़ है जिस पर मेज़पोश बिछा है और एक फूलदान रखा हुआ है । सामने की ओर दीवार पर एक चित्र टंगा है । कमरे के दोनों मोर दो दरवाजे हैं। एक सड़क को पोर जाता है, दूसरा घर के दूसरे कमरे की ओर खुलता है। खाट के पास एक मशीन रखी है। समय-सायकाल। पर्दा खुलने पर रचना मशीन चलाती दृष्टिगत होती है। पास में कुछ सिले-अघसिले कपड़ों का ढेर है। कुर्सी पर बैठा मन्यन कुछ खाट पर लेटी शान्ति को खांसी उठती है । वह उठकर बैठ जाती है । शान्ति : रचना बेटी ! अव तो दिन छिप रहा है । रचना : हाँ मा ! आज कैसी तबियत है ? शान्ति : मुझे क्या होनेवाला है, बेटी ! (रुककर) अाज भी शरण को कोई चिट्ठी नहीं आई क्या ? ना : नहीं मां ! शान्ति : (मन्यन से) अरे बेटा ! तू ही एक चिट्ठी शरण को लिख दे ना ! हां, यह जरूर लिख दीजो, मां का मुंह देखना चाहो तो आ जाओ। मन्थन : कितने पत्र लिख चुका हूँ, मां ! एक काःभी तो उत्तर नहीं देते भया। पर तुम कहती हो तो जरूर लिखूगा । शान्ति : बड़ा राजा वेटा है मेरा मन्थन ! हाँ री रचना ! देखियो, दोनों वक्त मिल रहे हैं, अब तो सीना बन्द कर दे। तेरी दादी कहा करती थीं कि दोनों वक्त मिले काम करने एक समुन्दर गहरा सा से चिड़िये प्रांतों की रोशनी चुगकर ले जाती है और फिर हाथ भी तो दुखते होंगे मशीन चलाते-चलाते । रचना : नहीं मां ! हाथों को अब कप्ट नहीं होता, कप्ट तो इन्हें तब होता है, जब काम न हो । तुम जानती हो माँ, कल १५ तारीख है। मन्थन और नन्दा की फीस जायेगी। घर में राशन भी समाप्त हो रहा है। शान्ति : जानती हूँ, बेटी ! सब जानती हूँ। अरे मन्थन बेटा ! तू ही अपनी दिदिया का कुछ हाथ बंटा दे । मन्थन : (हसता है) तुम भी माँ ! मज़ाक करती हो, अव में भी बैठकर दीदी के साथ सिलाई करने लगू, तो कल तुम ही मुझे दर्जी कह कर चिढ़ानोगी। (उठता है) लो तुम भी मानोगी कि मन्थन बेटा भी वस मन्यन ही है । (रचना से) बताओ मेरी दजिन दिदिया, क्या करूं ? (रचना के पास बैठकर कपड़ों की उल्टी-सीधी तह करता है।) रचना : हट वावले ! तह भी ठीक नहीं बनानी आती तुझे तो। मन्थन : हाँ दीदी ! (कुछ रुककर) अाज अभी तक भाभी नहीं लौटीं। साँझ हो गयो । रचना : आज स्कूल में कोई उत्सव है, भाभी उसमें व्यस्त हैं, पर अब तो आना ही चाहिये । शान्ति की खांसी उभरती है। वह उठकर घर के अन्दर चली जाती है। दूसरे द्वार से प्रनीता का प्रवेश । मुख पर यका-यका-सा भाव है, शरीर शिथिल है। खाट पर बैठ जाती है। रचना : आज बहुत थक गयीं क्या भाभी? सुबह से ये वक्त हो गया। प्रनीता : हाँ रचना ! थक तो सचमुच गयी । लगता है तुम लोगों ने भी अभी तक चाय नहीं पी । मन्थन भय्या कैसे मुरझाये-से लग रहे हैं ! मैने दस बार तुम लोगों से कह दिया कि मेरा इन्तजार मत किया करो, पर तुम लोग हो कि सुनते ही नहीं। मन्यन : हो भाभी! कुछ कान वहरे हो जाते हैं ऐसी बातों के लिए। बोलो भव सव साथ चाय लेंगे तो आनन्द पायेगा या तुम अकेली रह जाती, हम चाय ले लेते तव आनन्द आता। प्रनीता : बातें खूब बनानी मा गयी हैं, मन्थन भय्या ! अच्छा चलो सब, दो मिनट में चाय बनती है। मां शायद रसोई में . - : एक ज़िन्दगी वनजारा पहुंच गयी हैं। रंचना : तुम लोग चलो, मैं हाथ के काम को समेट कर पाती हूँ। मन्थन और प्रनीता का प्रस्थान रचना : (थको-सो अंगड़ाई लेती है) मन के सूने प्राकाश पर झुकी- "झुकी ये पीड़ा की बदलियां और दर्द के समुन्दर में उठती ये लहरें"। चेतन का प्रवेश। चेतन : लहरों से फैसी शिकायतें हो रही हैं रचना, ! लहरें तो उठती हैं तो गिरेंगी भी। जानती हो एफ लहर ने चाहा उठकर में फछार को छू लूं। भंगड़ाई लो एक फली ने में बहार बन फूलूं। रचना : जब देखो बैतन, तुम्हें कविता ही सूझती रहती है। चेतन : मोर जब मेरे काव्य की प्रेरणा मेरे समक्ष हो तो क्या कहने । क्यों रचना? रचना : हटो चेतन ! तुम्हें सदैव परिहास का काम ही है और में टूटती जाती हूँ इस जर्जर होती गृहस्थी की चिन्ता में। सारा परिवार टूट रहा है, शक्ति विखर रही है। अब तो मकान भी हाथों से निकल गया। दारण भय्या की पढ़ाई के लिए परिवार का एक-एक सदस्य मिट रहा है--मिट चुका है-~मन थक गया है अब तो....... चेतन : तुमने एक कहानी सुनी है रचना ! थपेड़ों से लड़ती एक नाव की... विशाल समुन्दर सी नदी, जिसमें लहरों के भीषण झंझावात और नन्ही-सी नाव "लेकिन अन्त में नाव ने थपेड़ों को परास्त कर दिया। ऊब रही हो जीवन के संघरों से और खोज रही हो कोई विधामदायिनी छाया......"कोई.... रचना : कोई सहारा ''यही न कहना चाहते हो चेतन ! नही ! नहीं ! छाया, स्वप्न, कल्पना, ये सब तो कवियों के लिए हैं, हम सब लोगों के लिए इनकी अपेक्षा नहीं। नन्दा का चाय लेकर प्रवेश। नन्दा दोनों को एक-एक प्याला चाय बनाकर देती है। 'चेतन : (नन्दा से) कहो कैसी पढ़ाई चल रही है, नन्दा ? नन्दा : (लजा कर) ठीक ही है। रचना : पूरे क्लास में टॉप करके भी कैसे मरे-भरे स्वर में बोल रही है, नन्दा! .. और अब तुम . एक समुन्दर गहरा सा नन्दा : हटो भी दीदी, तुम तो तारीफ़ के पुल बांधती रहती हो। नन्दा चली जाती है,, रचना चाय का प्याला एक मोर रख देती है। चेतन से भी प्याला लेकर रखती हैं। रचना : (एकाएक कराहती है) उफ़ यह क्या होने लगता है प्राणों में हलचल सी. "जैसे समुन्दर में ऊँचे-ऊंचे ज्वार उठ रहे हों। चेतन ! यह ददं मेरी जान ले लेगा। (खाट का सहारा ले लेती है) कुछ लाता .. चेतन : फिर दर्द उठा है, रचना ! कितनी बार कहा डाक्टर के यहाँ चलो। जिन्दगी को ग़मगीनियां उजाड़ देंगी, रचना! उजाड़ देंगी। इतना मत झेलो। शान्ति का.हाय में मोटी छलनी लिए हुए प्रवेश । पीछे-पीछे मन्थन एक छोटे कनस्तर है और रचना के पास ही रख देता है । शान्ति बैठ जाती है। शान्ति : क्या फिर से दर्द हो गया ? मानती ही नहीं, सुबह से उठकर जो काम पर बैठी, उठी ही नहीं। लाख कहती हूँ, इतनी मेहनत मत कर, पर कोई माने तब न? बेटा चेतन ! इस जिद्दी लड़की को तू ही समझा, मैं तो हार गयी (रचना के सिर पर हाथ फेरती है)। रचना : मैं ठीक हूँ, माँ ! शान्ति : हाँ ठीक है, देख तो कंसा पीला-फद्दक मुंह पड़ गया है । (चेतन से) तू भी, वेटा चेतन ! अव कई-कई दिन नहीं प्राता । तू तो मेरा शरण ही है। मैंने शरण से तुझे अलग मान कर कभी नहीं देखा। चेतन : जानता हूँ, माँ ! सब जानता हूँ, पर कल पिता जी की एकाएक तबियत खराब हो गयी, इसलिए नहीं आ पाया। यस कल ही तो नहीं पाया। पिता जी को जिस दर्द से कल तिलमिलाते मैंने देखा था, उसी दर्द को मैने रचना के प्राणों में उभरते देखा है । डाक्टर को दिखाना होगा, मां ! पान्ति : डाक्टर महलों के लिए होते हैं, वेटा ! झोंपड़ियों के लिए नहीं। चेतन : झोंपड़ियां.महल "सब जग के छलावे मात्र है, मां ! झोंप- ड़ियों में क्या महलोंवाली चेतना नहीं रहती? दर्द क्या केवल दरिद्रता के भाग्य की ही कहानी मात्र है ? लगता है मान भी घर में चूल्हा नहीं जला है। केवल एक कप एक ज़िन्दगी बनजारा.
, चाय पर जीवन का भार ढोने को आप लोग तत्पर हैं। माँ! यह कैसे सम्भव हो सकता है ? शान्ति : आज तो सोमवार है, बेटा! स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी के आदेशानुसार आज के दिन तो एक समय ही भोजन करना या । वही हम लोगों ने किया। चेतन : या यों कहो कि शाम का इन्तजाम हो नहीं है। (फनस्तर से मक्का जमीन पर लौटते हुए) कल जब यह मक्का पिसेगी, तव भोजन की व्यवस्था होगी। सबके मुखों पर एक फीकी मुस्कान छा जाती है। पृष्ठ-भूमि से एक शोर उमरता है । मिले-जुले स्वरों को अस्पष्ट अावाज तीव्र होती जाती है। चेतन : यह कैसा शोर है ? शान्ति : राशन की दुकान पर प्राटा लेने के लिए लोगों की भीड़ जमा हो गयी है । एजेन्सीवाला कहता है, रात हो गयी कल मिलेगा। लोग कहते हैं आज ही लेंगे। आज नहीं लेंगे तो कल क्या खायेंगे? दो मुट्ठी आटे के लिए लड़ती हुई जिन्दा लाशों का नाच देखना चाहते हो, तो देख पायो, बेटा ! चेतन : जा रहा हूँ माँ ! मुर्दो को अट्टहास करते जरूर देखूगा । ग़मों की छायाएँ वहाँ हँसती हैं, दर्द के समुन्दर वहाँ लहराते हैं । बेचारा इन्सान आज कितनी लाचारियों में बँधा सिस- कता है, पर उसकी आवाजें कैद हैं बन्द दायरों में । चेतन जाता है, प्रतीता का प्रवेश । प्रनीता : चेतन दा पाये थे, मां! अभी क्यों लौट गये? शान्ति : राशन की दुकान पर लड़ते प्रादमियों की, आदमी नहीं कुत्तों की बारात देखने गया है । कैसा भोला है चेतन ? प्रनीता : विचारों की संकुचितता में बंधे रहनेवाले नहीं हैं दा, मां ! वे कवि होते हुए भी यथार्थ की विषमताओं से परिचित हैं। मैं कितनी बार कह चुकी हूँ कि रचना के लिए चेतन से सुन्दर घर नहीं मिल सकता, माँ ! पर तुम मानो तभी न! शान्ति चुप रहती है। रचना : भाभी शान्ति का प्रस्थान। प्रनीता : हाँ रचना ! हर लड़को का ब्याह होता है, हर लड़की अपने भविष्य के सपने संजोती है । मैं जानती हूँ, तुमने भी सपने : । .. एक समुन्दर गहरा सा संजोये है । मैं तुम्हारे उस स्वप्न-देवता को भी जानती हूँ, गिराको मूर्ति तुम्हारे मन में न जाने कब से अंकित है । रचना : सपने तो तुमने भी संजोये ये, भाभी ! मां ने भी संजोये थे पौर तुम्हारे और मां के सपनों का यह देवता'' (दीवार से फोटो उतारकर) कहाँ है तुम्हें मालूम है ? प्रनीता : (थफ कर कुर्सी का सहारा लेती है) इन्सान हार रहा है, रचना! आज की विपम परिस्थितियों से । में भी हार गयी हूँ। मेरे व्याह के लिए सजाये गये वन्दनवारों की कहानी मत दुहरायो, रचना ! मत दुहरायो पृष्ठभूमि में ब्याह के गीतों का स्वर उभरकर तीव्र से तीवतर होता है, तीव्रतम, फिर धीमा होता जाता है। किसी के जोर से अट्टहास करने को हल्की-सी प्रावाज सुनाई देती है। रचना : सुनीता का व्याह है न कल, भाभी ! उसी के गीत गाये जा रहे हैं। मट्टहास की ध्वनि जोर पकड़ती है। प्रनीता : मां को फिर पागलपन का दौरा उठ पाया है, रचना ! में जाती हूँ। (प्रनीता तीव्रता से जाती है) रचना : परिवार का हर आदमी बीमार है । ये उभरते हुए साये... अन्धकार के वीरान में अंगड़ाइयां लेता एक तूफ़ान' मन में भावनाओं के बनते-बिगड़ते ज्वार-भाटे। भाभी कहती हैं रचना अधूरी रह जायेगी चेतन के बिना। जीवन का यह अधूरापन", पर आकाश में घुमड़ते रीते मेघों को पानी कौन देगा, कौन पानी देगा?"(सिसकियां फूटती हैं)। पृष्ठभूमि से प्रनीता की आवाज -"होश में प्रायो मेरी भोली मां, होश में मानो। देखो, हमारे घर में भी सुनीता के व्याह की तरह रचना का व्याह होगा।" शान्ति का पट्टहास गूंजता है सूने वातावरण में। चेतन का प्रवेश । चेतन : क्यों रो रही हो, रचना ? प्रांतों के ये मोती यों ही बिखेरने के लिए क्या प्रांतों में भर दिये जाते है ? मैं तुम्हारे इन मोतियों को बीन लूंगा, रचना ! (प्रांचल फैलाता है)। रचना : (हंसने की चेष्टा करते हुए) माज तुम पर फिर तुम्हारा कवि हावी हो रहा है, चेतन ! कंसी पागलपन की बातें करते हो ! एक जिन्दगी बनजारा . .
पृष्ठभूमि से ढोलक पर सुनीता के व्याह के गीत उभरते हैं। रचना : (कातर-दृष्टि से चेतन की ओर देखती है). ~~माज पड़ोस के सेठ जी की लड़की सुनीता का ब्याह है, चेतन ! उसी के मंगल-गोत कानों में सुनायी पड़ रहे हैं। चेतन : (रचना के पास पड़े हुए मक्का के दानों को उछालते हुए) ये मक्का के दाने..... देश को निरीह जनता के जीवन का सहारा यन गये हैं, रचना ! अरे हाँ, तुम्हें पता है आज सेठ चरनसिंह के यहाँ क्या हुआ ? रचना : (उत्सुकता से) क्या हुमा, चेतन ? चेतन : गेहूँ की खत्तियों पर छापा मार कर गेहूं निकाला गया है । सेठ चरनसिंह जेलखाने की हवा खा रहे हैं । रचना : हाँ चेतन ! पिछले वर्ष ही तो इन सेठ जी के यहाँ मोने के संकड़ों बार पकड़े गये थे। वेतन : हाँ रचना उन्ही सेठ जी के सुपुत्र महोदय तुम्हारी मुनीता देवी के यहाँ व्याहने आ रहे हैं । रचना : (पाश्चर्य से) सच..."सुनीता चोरों के घर जायेगी ? प्रनीता का प्रवेश। चेतन : चोरों की लड़की चोरों के यहां चली जाये तो...... प्रनीता : हर्ज क्या है और एक भोली-भाली कवि-स्वभाव की लड़की को यदि कवि के हाथों में सौंप दिया जाये तो... चेतन और रचना दोनों प्रनीता की ओर देखते हैं। "तो ठीक नहीं रहेगा, भाभी ! (चेतन लड़खड़ाता है। मनीता उसे सहारा देती है और घर के अन्दर ले जाती है।) रचना : लगता है मेरे अन्तर के किसी दुर्वल कक्ष के अजि द्वार खुल गये हैं । उफ़, यह कौन कह रहा है -"चेतन के बिना रचना अधूरी. है."रचना अधूरी है।" (रोती है) चेतन ! तुम कदाचित् सोचते हो, रचना अपराजिता है, पर नहीं, रचना तो वार-चार हारी है, तुमसे बार-बार हारी है। पृष्ठभूमि से उभरती श्रीवा। पहली मावाज : चेतन से ब्याह कर ले रचना ! इमी में तेरी खुशी है --तेरे परिवार की खुशी है-~-चेतन की सुशी है । तू चेतन से प्यार करती है। इस सत्य को मत अउला । दूसरी आवाज : तू ब्याह रचायेगी रचना, वेतन से ? भोली प्रनीता--जिसका पति शरण : इंग्लण्ड गाकर दूसरा ब्याह रचाकर अपने איה ...... रचना : तो. एक समुन्दर गहरा-सा दायित्वों को भूल गया-उसका क्या होगा? परिवार के प्रति क्या प्रनीता का ही कर्तव्य है, तेरा नहीं ? ली आवाज़ : तुझे प्रनीता से क्या मतलव ? 'तू अपने भविष्य की भोर - निहार । तेरा जीवन, तेरे संजोये स्वप्न .“तभी संवर सकते है, जव चेतन से तू व्याह करेगी। प्रादों से मुख मोड़ ले। तरी आवाज : रचना ! यादों की दुनिया में अपनी ज़िन्दगी को गुमराह मत कर। पृष्ठभूमि से मां का उभरता हुआ अट्टहास मन्थन, नन्दा, प्रनीता, चेतन के मिले-जुले स्वर । रचना : ये कैसी आवाजें हैं ? (सिर पकड़ लेतो है) में क्या करू, चेतन ? मुझे राह दिखायो । मेरा मन भावनामों के भवर- जाल में भटक रहा है। मेरी पागल मां, प्रनीता भाभी... मन्थन'''नन्दा...(शरण के चित्र को उतार कर देखती है फिर फेंक देती है)। तुम शरण ! मेरे भाई ! तुम्हारा यह चित्र मन को छलनेवाली प्रवंचना ! एक ढोंग ! प्रनीता का प्रवेश । चित्र के टुकड़ों को बटोरती है। प्रनीता : यह क्या किया, रचना? मेरी प्राकांक्षाओं को इतनी निर्ममता से क्यों नष्ट कर दिया ! मेरे जीवन का यह विध्वंम क्यों किया क्या मेरी इतनी भी प्रसन्नता तुम्हें...... ? रचना : (हतप्रभ-सी) इस चित्र के सहारे ही तुम परिवार के दायित्वों के बन्धन में बंधी थी, भाभी! अगर शरण भय्या दूसरा ब्याह कर सकते हैं, तो तुम दूसरा ब्याह क्यों नहीं कर सकती? तुम माज से मुक्त हो, भाभी ! मुक्त हो। प्रनीता : ये परिवार के दायित्व ही तो मेरे मन का बन्धन बन गये है, रचना ! इन्हें कैसे तोडू? तुम स्त्री होकर भी स्त्री के मन की पीड़ा नहीं समझ पातीं। पीड़ा से तिलमिलाते हुए प्राणों को अगर गान्ति मिल मकती है, तो इन दायित्वों की पूर्ति में हो। तुम इन्हें मेरे लिए भार मत मानो। मा में मुझे उन्ही का रूप दीसता है। तुम, मन्यन, मन्दा मेरे लिए, मेरे लिए क्या हो रचना, बैगे तुम्हें गमनाऊँ ? सपना : (हतप्रभ हो जाती है। मुझे क्षमा करो, भाभी ! में प्रम में थी। फिर पृष्ठभूमि से गान्ति पट्टहास उभरता है। प्रनीता : (हसते एर) दम पर माफी मांगने सौ। र पतो, जोहो पया, हो गाने दो, मो का जीवन बघा मी, रपना ! एर पिदमी बननारा r 11 ? चेतन से ब्याह कर लो। तुम्हारी भाभी के सूने जीवन में भी रंगीन बहार आ जायेंगी। हाँ कर दो, रचना ! मेरे लिएमां के लिए-चेतन के लिए । (रचना के मुख पर कठोर भावाकृतियां उभरती हैं, मिटती हैं ।) चेतन : (प्रवेश करके) पाषाण से तुम कहना चाहती हो कि वह दर्द से पिघल जाय । कठोरता से कहना चाहती हो कि वह द्रवीभूत हो जाय, भाभी ! उल्टी गंगा बहाने का प्रयास मत करो। प्रनीता: पापाणों को पिघलते मैने देखा है, चेतन दा ! कठोरता की आँखों में लहराते करुणा के सागर को भी मैने देखा है, तुम भी देखोगे । प्रायो, चलो मां के पास । चेतन और प्रनीता का प्रस्थान, नन्दा का प्रवेश । नन्दा : ओहो रचना दीदी! "ज तो तुम बड़ी उदास-उदास सी लग रही हो। क्या कोई नयी बात है ? रचना : पुरानी जिन्दगी में नया फ़साना ? पतझर में बहार" ये सब हमारे लिए नहीं हैं, नन्दा ! नन्दा : तुम तो हमेशा दुःख, पीड़ा, दर्द की बात करती हो, दीदी ! मुझे तो हँसना अच्छा लगता है । डालों पर फुदकती चिड़ियों को जव में देखती हूँ, दीदी ! तो सच कहती हूँ, मेरा मन पुलक उठता है । हाँ दीदी ! तुम्हें मालूम है, में इस बार भी "कॉलिज की कई-कई प्रतियोगिताओं में प्रथम प्रायी हूँ...। "रचना : (नन्दा को प्रालिंगन में बांधकर) तू मेरी बड़ी ही प्यारी बह्न है, नन्दा ! मेरा कहना मानेगी ना? नन्दा : तुम्हारा कहना भने कव नहीं माना, दीदी ! तुम्हारा आदेश तो मेरे लिए सदैव माननीय रहा है और रहेगा। रचना : हाँ नन्दा ! ऐसी ही प्राशा मुझे तुझसे है । हाँ, जरा चेतन को भेज दे मेरे पास | भाभी के कमरे में है । लेकिन भाभी को 'मत माने देना, यहीं बातों में लगा लेना। 'नन्दा : समझ गयी, दीदी ! समझ गयो, अव जल्दी ही मेरा मुंह मीठा करामोगी ना! रचना : हट पगली. नन्दा का प्रस्थान। रचना कपड़ों को समेट कर मक्का सात करती है। । चेतन फर कविता की कोई पंक्ति गनगुनाते प्रवेश । चेतन : कहिये रखना जी ! प्राज कैसे मुझ नाचीज़ को आवश्यकता .. . ..... एक समुन्दर गहरा सा चेतन: पड़ गयी? रवना : व्यंग्य मत करो, चेतन ! मेरे मन की गहराइयों में भी कभी तुमने उतरने का प्रयास किया? चेतन : गहराइयों में तो कोई उतरे तव, जब अन्तर के द्वार खुलें.... रचना : नही चेतन ! द्वार तो अपने पाप खुल जाता है और तुम यह भी नहीं जानते...? चेतन : हाँ हाँ कहो, चुप क्यों हो गयी? रचना : विवशतानों ने मुझे जड़ बना दिया है, चेतन ! एक कहना मानोगे? बेवल एक बार। चेतन : तुम कहो रचना, और चेतन न माने ! वचन देता हूँ तुम जो कहोगी, रचना ! में मानूंगा'"मानूंगा'मानूंगा... रचना : (टूटती हुई-सो) तुम्हें नन्दा से व्याह करना है, चेतन ! मेरी छोटी बहन से 1. (चोख , पड़ता है) यह क्या, रचना रचना : हाँ चेतन ! मेरे लिए नन्दा से ब्याह कर लो। परिवार की दूसरी बड़ी होती हुई लड़की, पहली बड़ी लड़की से भी भयंकर समस्या बन जाती है। मेरे लिए, मेरे परिवार को डूबने से बचा लो, चेतन ! हां कह दो मेरे लिए केवल एक बार । (चेतन चुप है)। अन्दर से मन्यन, प्रनीता और नन्दा का प्रवेश। पृष्ठ- भूमि से सुनीता के ब्याह के गीत उभरते हैं। प्रनीता: मैं कह रही थीन, मान जायो। रचना! मान जापा, प्राखिर .मेरी बात मान ही ली तुमने ? रचना : (कांपती-सी) हां मामी! तुमसे बाहर भी कैसे जा सकती है तुम्हारी रचना ! भाभी, रोली तो ले मानो। प्रनीता प्रसन्न माय से रोली लेने जाती है। रचना मागे बदकर चेतन के कांपते हुए हापों में रोली का पात्र पमाती है। चेतन कांपते हाथों से नन्दा की मांग भर देता है । व्याह के गीत पृष्ठ-भूमि से तीन होफर मन्द होते जाते हैं। प्रनीता : (घोस पड़ती है)-रचना !... मन्यन व नन्दा के नेत्रों से प्रांगू मरते है • रचना : ही भाभो ! प्रान हमारे परियार में भी ब्याह का गुन दिन पाया है। कितने तूफानों.को मेने भेला? माज मेग एक जिन्दगी बनमारा
अन्तर कितना शान्त है? कोई हलचल नहीं । चलो मां से
ग्रागीर्वाद लेने चलें।
सब प्रांतों से प्रांसू पोछते हैं।
रचना : अरे, खुशी के अवसर पर यह होने की बात पयों? नहीं...
नहीं...।
चेतन पथराई दृष्टि से रचना को देखता रहता है ।
नन्दा शिरुकती है। पृष्ठभूमि से किसी मिसारी का
दर्द से भीगा स्वर उमरता है।
इस चमन को मत संचारो
गुलजार है
जिन्दगी को हर गली को
मांसुओं से
प्यार है
राम भरा प्राफाश
धरती स्वप्न में डूबी हुई
इस विजन को मत सेवारो
पतझार है।
पदी गिरता है।
एक समुन्दर गहरा सा
४१
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पर्वत से गिरा एक मन
पात्र
गोमती मा
अमित पुत्र
सुनीता बहू
कान्ता वहन
चन्दन अमित का (डॉक्टर) मिन
चन्दू नौकर
डाक्टर सहाय फॅमिली डॉक्टर
[सायंकाल ५ बजे। अमित के घर का एक कमरा । सामने की दीवार में बीच में एक चित्र है । इधर-उधर अन्दर के कमरों में जाने के लिए दो द्वार हैं, जिन पर हरे रंग के पर्दे पड़े हैं। बीच में दायीं ओर एक बंड कवर से ढकी चौकी बिछी है और उसके पास ही एक सोफ़ा । सोफे के आगे बीच में लम्बी मेज है जिस पर एक फूलदान रक्खा हुआ है, जिसमें प्लास्टिक के फूलों का गुच्छा है। पास में ही एक एलवम भी है । सोफे के यायों और रैक में कुछ किताबें लगी हुई हैं। पर्दा खुलता है। कान्ता बच्चे की शर्ट में चौकी पर बैठी वटन टॉक रही है और गोमती के हाथ में चाकू है, उसके पास में सब्जी की टोकरी । वह सोफे के वरावरवाली कुर्सी पर बैठी हुई सब्जी काट कान्ता : आज भी भाभी ने सुबह से झाडू जो उठायी है, रखने का नाम ही नहीं लेती, मा ! चन्दू दो बार सफ़ाई कर चुका है घर की, पर पता नहीं भाभी को क्या सनक सवार हो जाती है कभी-कभी। गोमती : मेरी तो खुद कुछ समझ में नहीं पाता । अक्ल पर पाला पड़ गया है जैसे । उसका बस चले, तो सड़क पर भी झाडू लगा दे । वो तो बंधी हुई है-यहू जो है। कान्ता : तुम्हें याद होगा, मां ! इस बार हम जब मुरादाबाद से मामा जी के यहां से लौट रहे थे; तो बस में चढ़ते ही भाभी ने 'नाक चढ़ायी थी। "हाय कितनी गन्दगी है" भाभी ने कहा 'था। गोमती : (हसकर) और तूने भी तो उसे सूब अच्छा उत्तर दिया था। पर्वत से गिरा एक मन "तुम्हारा यस परे तो, भाभी ! तुम यहाँ भी झाड़ लेकर गमाई करने सगो।" यही कहा था ग? फान्ता : हो मां, पोर गुनी भाभी रूट गयी थी। गोमती : देखती हूँ बेचारे ममित को तो जिन्दगी हो तबाह हो गयी। श्या ऐसा सोचा था कभी? मच्छी सासी लड़की, पढ़ी- लिसी, सुन्दर । किसको पता था, बेटी! यह सुन्दर मूरत माटी की है-केवल माटी को? कान्ता : राय तो भाभी के घरवालों ने सब कुछ छिपा लिया था, जैसे अपने सिर की यला वे दूसरों के सिर मदकर मुक्त हो गये। हिन्दुस्तान के लोगों को यह बहुत गन्दी आदत होती है, मां ! यह तो खुल्लम-खुल्ला घोखा हुमा । गोमती : उनका क्या बिगड़ा !. ": पर हम तो कही के न रहे।... (कुछ सोचकर) जवान लड़की मां-बाप के सिर का बोझ होती है, वेटी ! .."और हर मादमी अपने सिर के इस योझे को उतारकर जल्दी-से-जल्दी फेंक देना चाहता है। कान्ता : (सोचकर) तब तो तुम भी, माँ ! मुझे फेंक देने की बात सोचती होंगी. 'जवान लड़को मां-माप के सिर का बोझ होती है.. आदमी उस बोझ को उठाने में असमर्थ हो जाता है। बेचारा बोझ... बेचारी "लड़की... ! गोमती : पगली कहीं की ! कहाँ-से-कहाँ पहुँच जाती है। सचमुच पढ़नेवाली हर लड़की का दिमाग खराब हो जाता है, मैंने तो देख लिया। तमी पीछे से कुछ शोर उमरता है, किसी बच्चे की जोर से चिल्लाने की आवाज प्राती है, बच्चा सुब- कियां भरता है । चन्दू का प्रवेश । चन्दू : मां जी ! देखिये, बहू जी ने फिर डब्बू को नहला दिया है। सड़क से खेलकर आया था। उसके हाथ-पांव गन्दे थे और बहू जी ने उसे हौज़ में खड़ा कर दिया । वाप रे वाप ! इस सर्दी में छोटा बच्चा रोये नहीं तो क्या करे? गोमती : (खड़े होकर) हाय राम ! यह तो मां नहीं है। पता नहीं कौन कुलच्छनी मेरे घर में आ गयी है। बच्चे को मार ही डालेगी। अमित का प्रवेश । मुख पर परेशानियां झलकती हैं। पेण्ट पर ऊनी फुलालोज का पुलोवर पहने है । ममित : मैने तुमसे पचास बार कहा, अम्मा ! तुम डब्बू को सुनीता एक जिन्दगी बनजारा - :
है के पास मत छोड़ा करी, पर तुम लोगों को यच्चे से कोई प्यार हो तब न । कान्ता का प्रस्थान गोमती : कैसी बातें करता है रे अमित ! मुझे बच्चे से प्यार नहीं ? तू नहीं जानता, येटे ! मून से न्याज प्यारा होता है। तू जानेगा भी कैसे?... अमित : यस मो ! मब मुझसे इस घर में नहीं रहा जाता कितना प्रभागा होता है कोई-कोई इन्सान दुनिया में, मां ! बदनसीषियों के काले सायों से घिरा-घिरा इन्मान"पहले में कल्पना भी नहीं कर सकता था.. पर अब तो स्वम में ही कितना बदनसीब हूँ, मैं...कितना बदनसीब' ! मेरे लिए पर श्मशान. है"याहर के प्रलोभनों में मेरा मन बंध पाता । क्या कर मं? (मापर पकड़कर बंड जाता गोमती : घबरा मत, बेटे ! भगवान् सब भला करेंगे। ममित : भगवान् भगवान् "मुझे भगवान् के मस्तित्व पर भय सन्देह होने लगा है, मां ! इन्सान अपनी जीत-हारों का सेहरा भगवान् के सिर पर रखता रहे पौर भगवान् बहरा वना उन्हें स्वीकार करता रहे। बस यही न? भगवान् कोई नहीं है, कोई नहीं है, मां ! सब मनुष्य के मस्तिष्क को बांझ कल्पनाएँ हैं। तमो धन्दू का प्रवेश चन्दू : चन्दन वाबू पाये हैं, अमित बाबू ! चन्दू का प्रस्थान। चन्दन,का प्रवेश । अमित चन्दन को देखकर उससे लिपट जाता है। चन्दन गोमती के पांव छूता है। गोमती माशीर्वाद देती है। गोमती : कय भाया रे, लखनऊ से ? अबकी बार तो बहुत दिन लगा दिये। चन्दन : हाँ मौ! फाइनल था न ।. बहुत सारे काम पूरे करने होते हैं आखिरी साल में। गोमती : तो मेरा चन्दन वेटा अब डाक्टर हो गया ? चन्दन : तुम्हारी कृपा से सब काम पूरा हो गया, माँ ! गोमती : अच्छा तुम लोग बैठकर बातें करो। में चाय बनाती हूँ -- गोमती का प्रस्थान । पर्वत से गिरा एक मन ४७ चन्दन : (प्रमित से) इतने दिन वाद मिले, और तू मुंह लटकाये बैठा है। क्या बात है रे अमित ? अमित : मैं बहुत परेशान हूँ, चन्दन ! सुनी। चन्दन : क्या हुआ सुनी भाभी को, अमित ! जल्दी बता क्या हुआ । अमित : यही तो पता नहीं चलता । 'छ: महीने बीत गये, मै तो इलाज कराते-कराते थक गया । मुसीयत तो यह है कि उसकी बीमारी के बारे में सारे डाक्टर भी एकमत नहीं हैं। कोई कहता है ऐलोपथिक ट्रीटमेण्ट करो, तो कोई कहता है होम्योपैथिक । मेरी तो बुद्धि भ्रष्ट हो रही है, चन्दन! चन्दन : सुनीता भाभी इतनी वीमार है, और तूने मुझे खवर भी नहीं दी । इतना गैर कब तक समझते रहोगे तुम मुझे, अमित ! तुमसे यह नहीं हो सका कि लखनऊ लेकर चले आते ? वहाँ मेडिकल कालेज के सभी तो अच्छे डाक्टर मेरे परिचित है । पर तुम ठहरे बनिये के वेटे, अमित ! तुम तो एक दिन भी कहीं नहीं खिसक सकते, रोज़गार जो ठप्प हो जायगा तुम्हारा। अमित : ऐसा न कहो, चन्दन, ऐसा न कहो । जब बुरे दिन आते हैं तो मनुष्य की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। कही भी तो कोई आशा की किरण नहीं दिखती. 'सुनी के साथ बिताये घे दिन में भूल नही पाता, चन्दन, भूल नहीं पाता। जिस सुनी के खूबसूरत चेहरे पर गुलाबों की ताज़गी थी, "जिसकी निगाहों की मासूमियत पर सब फ़िदा थे, वह सुनी अब कहाँ है, चन्दन ? मुझे लगता है कि मेरी बगिया को चहकती बुलबुल अब शापभ्रप्टा हो गयी है। चन्दन का • वह पौधा अब नहीं महकता, जिसे मैंने अपने घर की खुशबू मान लिया था। चन्दन : सुनी.भाभी की बीमारी ने तुम्हें शायर बना दिया, मेरे दोस्त ! इतने भावुक मत बनो । सभी बीमारियाँ लाइलाज नहीं हुआ करतीं। सुनी भाभी जल्दी ठीक हो जायेंगी। यह मेरे दिल की आवाज है। चन्दू का प्रवेश । हाथ में चाय को ट्रे है। ट्रे को मेज पर रखकर प्यालों में दाल-ढालकर चन्दन और प्रमित को देता है। इसके बाद विस्कुट को प्लेट एक ज़िन्दगी बनजारा दोनों के प्राण करता है। दोनों एकाएका यिस्कुट उठाकर साने लगते हैं। पन्दू : मां जो ने यहूरानी से कहा कि चन्दन यायू माये हैं, जामो मिल भानो पर यह जी ने सो कान्ता यीबी के कमरे में जाकर दरवाजा हो बन्द कर लिया। तब से वरावर मां जो खुलवा रही है, पर वे हिलती ही नहीं। प्रमित : देखो, चन्दन ! तुम्ही देखो। ये भला नहीं अच्छी हरखते हैं ! कभी-कभी तो सुनी को इन मादतों पर क्रोध पाता है। भला कमरे में गयी थी तो दरवाजा बन्द न करती! चन्दन : प्रच्या चलो, हम चलें वहाँ । चन्दू का प्रस्थान, कान्ता का प्रवेश । कान्ता : (चन्दन से) नमस्ते चन्दन 'भय्या! तुम अच्छे समय पर माये । हम सब तो तुम्हें याद ही कर रहे थे। चन्दन : हलो कान्ता ! कहो कसी हो ? अब तो एम० ए० पूरा हो गया होगा ? महिला कॉलिज में हो न? अमित : इस सीमेस्टर से इसने यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया है । कान्ता : पर प्रव पता चलता है कि अपना कॉलिज कितना प्यारा होता है, भग्या! उसकी चारदीवारियों से भी एक मोह- सा हो जाता है। अमित : अच्छा, तू दीवारों को भी प्यार करती है ?... चन्दन : सचमुच दीवारें ही नहीं इंटें भी प्यारी होती हैं, मिट्टी भी प्यारी होती है -अपने स्कूल को-अपने कॉलिज को अपने । घर की अपनी गलियों की। मेरे एक दोस्त हैं-रतन । मुभ- से दो वर्ष सोनियर थे । अव कनाडा में हैं। वहीं सैटिल हो गये हैं । अबकी बार उन्होंने अपने एक पत्र में मुझे लिखा-- "अपने देश की मुझे बहुत याद आती है, चन्दन ! वह "खुला आकाश, मेरे मोहल्ले की वे गलियां -ये चौराहे-दे घर--सब मुझे भरमाते हैं। हमारी गली के चौराहे का समाचार लिखना, क्या अब भी वही सांझ को रशीद गद्दी की गायें लावारिस-सी जमा हो जाती हैं ?" (हसता है) कान्ता : इन्सान कहीं भी रहे, भय्या! अपनों की याद आती ही है । सच कहूँ, तुम मानो या ना मानो, न जाने कितनी बार ग्रांखें भरी है और ढल गयी है अपने कॉलिज की याद में। फ्रेन्ड्स का वह सरकिल भी तो अब नहीं रहा । लता ने कॉलिज छोड़ दिया तो फिर में लता के विना कैसे पढ़ती वहाँ? पर्वत से गिरा एक मन - चन्दन : लता ने कॉलिज क्यों छोड़ दिया? तुम्हारे ही तो साथ थी। कान्ता : लता की शादी हो गयी, भय्या ! चन्दन : लता की शादी हो गयी ? (सुनकर पाहत-सा हो जाता कान्ता : हाँ भय्या ! उसके पति इरीगेशन में इंजीनियर हैं । अमित : लता की शादी से तुम्हें लगा होगा तुम्हारे सपने आकाश से धरती पर आ गिरे हैं, चन्दन ! यही न? मैं भी सोच रहा था, पर तुम्हें लिखता भी कैसे? एक ये कान्ता है, इसके पेट में कोई बात नही पचती। चन्दन : अच्छा ही किया कान्ता ने तो। क्या सच को बहुत दिनों तक झुठलाया जा सकता है ? एक-न-एक दिन तो पता चलता ही। अमित : वे दिन बालू के घरौदे थे, चन्दन ! ढह गये। नये घरोंदे बनाने ही पड़ते है। कान्ता हतप्रम-सी दोनों की ओर देखती है। कान्ता : मुझे माफ़ करो, चन्दन भय्या? मुझे तुम्हारे इस रहस्य का कुछ पता नहीं था। लता ने कभी संकेत भी नहीं किया था, पर लता मजबूर थी। चन्दन : मजबूरियां इन्सान को बांध ही लेती हैं। अच्छा छोड़ो यह प्रसंग । समझ लो कोई एक क्षण था, वह भी वीत गया कभी न लौट आने के लिए। हो, हां, सुनी भाभी के पास चलना है न, अमित? कान्ता : हाँ, भय्या ! सुनी भाभी तो दरवाजा ही नहीं खोलतीं। मैने कितनी बार द्वार खटखटाया, पर वे तो जमे पापाणी बन गयी हैं । सुनती ही नहीं। गोमती का प्रवेश। गोमती: मैंने भी कई बार कोशिश कर ली, पर वह तो हिरा कर ही नहीं देती। अंधेरा भी हो गया है, अब तो दोनों वक्त मिल गये हैं। प्रमित : (ध्यन होकर) कहीं फुछ अनहोनी न हो जाये। पन्दन : चलो जरा, डाक्टर साहब के पास चलें। सयका प्रस्थान ! पोड़ी देर के लिए रंगमंच साली रहता है। अन्दर से रम्बू के रोने को भावाड पाती है । पर्दे के पीछे से कुछ मिले-जुले स्वर उमरते हैं । गोमती : पान्ता ! प्रो रो कान्ला ! देपियो जरा डम्बू रो रहा है । एक मिन्दगी बननाग मं तेरे पिताजी के लिए दो रोटी तवे पर डाल दूं, तू उसे कहानी सुनाकर सुला दे। इसको नोंद का समय हो गया है, और हाँ, सुलाने से पहले दूध भी ले जा उसका । सोने के बाद दूध नहीं पीकर देता। कान्ता : दूध दे दिया है अम्मा, डब्यू को। कहानी नहीं सुनता। कहता है, मम्मी के पास जाऊँगा। गोमती : मम्मी के पास जाऊँगा, मम्मी के पास जाऊँगा."मां तो पूरी राक्षसी है "मारती है जल्लादों की तरह । दिन देखे न रात देखे ठण्डे पानी में डुबो देती है जाकर । कुछ देर तक शान्ति रहती है रंगमंच पर । अन्धकार और बढ़ने लगता है। सुनी का प्रवेश । यह स्विच मान करती है । कमरे को अस्त-व्यस्त अयस्था को देखती है। चाय के बर्तनों की ओर जाती है। सुनी : उफ़ चाय के ये वर्तन कितनी घिनौनी झिल्ली-सी तर रही है इन प्यालों में ! लगता है जिन्दगी पर भी गन्दगी की ये घिनौनी झिल्लियां जम गयी हैं-जमती जा रही हैं... गन्दगी की झिल्लियों से भरी ये...जिन्दगी...उफ... कितनी तीखी बदबू है ! .."लाख बार कहा चन्दू से कि प्याले घोकर रस दो पर कौन सुनता है ? यहाँ का तो हर प्रादमी बादशाह है। (धाय के प्याले ट्रे में रखती है, उठा- कर अन्दर ले जाती है. फिर एक मिनट बाद प्रवेश... । एक हाथ में भाड़, है दूसरे में झाड़न ।) कितनी धूल है दरवाजों पर ! जैसे वर्षों हो गये झड़े हुए। (झाड़ती है। रैक में रखी हुई किताबों को उठाकर देखती है) यहाँ भी धूल''वहाँ भी धूल-सब जगह धूल- (एक किताब उठाकर पढ़ने लगती है) यह डायरी मेरे छात्र- जीवन की है। कितने मादक क्षण इसमें भरे हुए हैं कितनी सारी कविताएँ हैं ? क्या होगा इनका, क्या होगा? मेरी जिन्दगी के जिन्दे कब्रगाह हैं ये । नहीं"नहीं. इन्हें मिटा दूंगी... (फाड़ती है एक पृष्ठ, पर हाफ जाती है, फिर मेज़पोश उठाकर भाड़ती है, फिर बिछा देती है । पलंग से बंड कवर उठाकर झाड़ती है, फिर बिछा देती है। झाड़ लगाने लगती है।) "लेकिन झाड़, तो रात को नहीं लगती। अरे, अम्माजी न देख लें। (भाड़, को सोफे के नीचे छिपा देती है, फिर सोफ़ पर बैठ जाती है । सिर पकड़ लेतो है।) पर्वत से गिरा एक मन .५१ .... मुझे सब कहते हैं मैं पागल हो गयी हूँ | क्या सचमुच मै पागल हो गयी हूँ?"हमारे घर के पास ही जो रम्मो भाभी रहती थीं, वे थीं पागल तो-रात को सोयें, दिन को चिल्लायें । हँसती ऐसे थी जैसे '(पागल की तरह हंसने का एफ्टिग करती है)। (मेज पर रखे एलबम को उठाकर देखती है) ये मेरी शादी के चित्र हैं । (ध्यानमग्न होकर देखती है-एक-एक फ़ोटो पलटती है ।) ये अमित खड़े है सेहरा बांधे हुए" पर नहीं, नहीं...."अमित नही, अमित नहीं.." हाय ! फिर नाम ले लिया। (दरवाजे की ओर भागती है) अम्माजी ने तो नहीं सुना, अगर सुन लिया तो नहीं... नहीं 'अव अमित नहीं कहूँगी 'अमित'अमित 'नाम नही लूंगी। एक दिन अमित को अमित ही तो कह दिया था.."माँ जी के सामने 'और तव माजी ने कुलच्छनी कहा था "सचमुच भारतीय लड़की पति का नाम नहीं लेती... पर में क्या करूं.. याद ही नहीं रहता? (फिर फ़ोटो देखती है) यह मेरे हाथ में वरमाला है और मेरा यह दुलहन वेष (हँसती है) क्या कार्टून बनाया था मेरा !.."और ये सब मेरी सहेलियों नीता, वीना, कली, अली, मंजरी, गरिमा .."और कुछ तो चेहरे पहचान में ही नही आते ।। धीरे-धीरे एलबम के और भी चित्र पलटती है। ये डब्बू है ! डब्बू मेरा बेटा माँ कहती है, "डब्बू को सुनी के पास न जाने दो.. डब्बू को मार डालेगी।" अमित कहते हैं."नहीं, नहीं, ये कहते हैं--"डब्बू को सुनी के हाथों में मत दो।" और कान्ता से जब मैं डब्बू को मांगती हूँ तो यह जैसे सुनकर भी अनसुनी कर देती है सब मुझे पागल कहते हैं सब घर का नौकर चन्दू भी... (सुबकने लगती है) मुझे माफ़ कर दो, मेरे बेटे ! मैं तुझे मारती हूँ'न ! मै सच तुझे मारना नहीं चाहती" पर क्या करूं...?.."मेरे अन्दर का शैतान इन सबके विरुद्ध बगावत कर देना चाहता है..... ये सब पागल हैं." में इनसे प्रतिशोध लेना चाहती हूँ। इन्होंने मेरे सपने तोड़े हैं..... मेरे व्यक्तित्व को कंद किया है इन दीवारों की मीमा में । मुझे पागल कहते हैं.."पागल कहीं के ! उफ़, मेरे बेटे यार मेरे बीच में कितने ऊंचे व्यवधान खड़े कर दिये एक जिन्दगी बनजारा हैं इन्होंने 'मै राक्षसो हूँ"जल्लाद हूँ.."अपने बेटे के लिए, उफ ! (माया पकड़ लेती है, एलवम यहीं रख देती है ।) रेडियो प्रॉन करती है, गीत उभरता है-- "भो रे, ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में, सागर मिले कौन से जल में, कोई जाने ना, प्रो रे !" रेडियो बन्द कर देती है। गीत की पंक्ति धीरे-धीरे दोहराती है- ..."ताल...मिले. नदी. के...जल... "में, ...नदी.....मिले..."सागर......... "सागर.. मिले.. कौन.."से.. जल.. में कोई..."जाने "ना..." कितना सुन्दर गीत है ! अमित से कई बार कहा कि इस गीत का रिकॉर्ड ला दो ना! पर उन्हें तो जैसे फुरसत ही नही है--(गुनगुनाती है)--अरे हां, यूनिवर्सिटी में जब म्यूजिक कान्फेन्स हुई थी, तब साइट म्युजिक काम्पिटीशन में मुझे ही तो फ़र्स्ट प्राइज मिला था। लेकिन अब तो मेरी वीणा के तार ही टूट गये। मैं मोम की मूरत हूँ; घर में लाकर मजा दी वस.. देखे जागो सब कोई... । जल-जल कर गलती रही गलती रही (हँसतो है)। कितने स्वप्न संजोए थे जीवन में ? सब टूट गये। वे टूटे सपने सुराही के टुकड़ों से मेरे सामने पड़े हैं और में जोड़ना चाहती हूँ।" पगली सुनी ! भला कहीं टूटी सुराही भी जुड़ती है। (लेट जाती है) ये मकड़ी के जालों से भरी कड़ियाँ, एलबम की. ये बोलती गुमसुम तस्वीरें, ये दीवारें, ये फूलदान, ये मेज"ये कुसियाँ, मुझसे कहीं अधिक भाग्यशाली है । अम्मा ने कहा था-(खड़ी हो जाती है) विदा के समय... क्या कहा था "उफ़, कितनी कमजोर याददाश्त हो गयी है मेरी 'अम्मा ने कहा था-उस घर की कुल-लक्ष्मी बनना - बेटी;"कुल-लक्ष्मी और मैं कुल-लक्ष्मी बनने की चाह लिये, आ गई यहाँ सोचा था'छोटा-सा घर होगा। खूब साफ़-सुथरा "चमकता हुआ पर "जिन्दगी यूं ही बीत गई और हम किनारे पर खड़े-खड़े तमाशा ही देखते रह पर्वत गिरा एक मन गये"(दीवार में लगे कुछ चित्र हैं। सुनी उनके पास जाकर उन्हें देखने लगती है)। "यह उजड़ते पतभर की तस्वीर है, मंने कॉलिज मे बनायी थो"प्रथम पुरस्कार मिला था। पतझर उजड़ता है तो बसन्त संवार देता है पाकर मेरे पतझर को कौन संवारेगा, कौन संवारेगा अव? अय कुछ नहीं हो सकता." कुछ नहीं हो सकता । इन बन्द दरवाजों से मेरी आवाजें टकराकर मुझी तक लौट पाती है। इन दरवाजों में कंद आवाजों को खोल दो... सोल दो, मेरा दम घुट जायेगा, अमित ! मैं मर जाऊँगी । (बैठ जाती है) में इन बन्धनों को नहीं झेल सकूँगी, नहीं झेल सकूँगी (पलंग पर बिछे बंड कवर को उठाकर तहा देती है, मेत फा मेजपोश उतार देती है) किसी प्रावरण की ज़रूरत नही किसी को भी। बंड कवर इसलिए विछाया जाता है कि खाट की टूटी हुई सुतलियोन दिखायी दें मेज़पोश इसलिए इस्तेमाल होता है कि मेज़ को स्थान-स्थान पर उतरी हुई पॉलिश से उसका विकृत रूप'न दीखे और आदमी भी अपने ऊपर न जाने कितने आवरण लपेटे रहता है, और दम्भ भरता है कि वह कितना उदार है. छलिया कही का.. भेड़िये की खालोढ़े हुए ये इन्सान न जीते हैं न जीने देते है... (उत्तेजित हो जाती है) पिता नहीं रहे अम्मा भी चली गयों उस देश भय्या इङ्गलैण्ड क्या गये वहीं के ही हो गये।"और रह गयी में अकेली. कितनी अकेली. कौन दर्द जानेगा... ? (रोती है)। ..."ये जीवन के विरोधाभास..'अन्तर मे निरन्तर चलते रहनेवाला यह द्वन्द्व इसने मुझे कही का न छोड़ा। झूठे आभिजात्य को में कब तक ढो सफेंगी."सुनी मर गयी, ....... मर गयी.. रह गयी है केवल उसकी लाश । पर्वत से गिरा एक मन' 'पर्वत से गिरा एक मन.....' (अन्दर भाग जाती है हाँफती हुई...)। रंगमंच एक मिनट के लिए खाली रहता है, तभी डॉ० सहाय के साथ अमित और चन्दन का प्रवेश । तीनों थके से हैं, बैठ जाते है, अमित और चन्दन कुसियों पर और डॉक्टर साहब सोफे पर । एक क्षण तीनों चुप रहते हैं। एक ज़िन्दगी बनजारा : चन्दन : मने सब सुन लिया है अमित "भाभी की सारी बातें में सुन चुका हूँ। तुम लोग सचमुच भाभी को पागल बना डालोगे... डॉ० सहाय : मुझे लगता है सुनीता जी को फिट्स पाते है कभी-कभी और वे इस प्रकार के प्रलाप करती हैं। चन्दन : नही डॉक्टर साहब ! सुनी भाभी विल्कुल ठीक हैं। शादी के पहले उनके कुछ स्वाव थे, जो यहां आकर पूरे नहीं हुए, और अवचेतन में जाकर प्रन्थि वनकर उन्हें समय-समय पर प्रपीड़ित करते रहते है। अमित : तब क्या करना होगा, चन्दन ? चन्दन : कुछ नहीं, केवल प्यार दो उन्हें । कुछ व्यक्तित्व इतने शक्ति- शाली होते हैं कि वे आसानी से अपने व्यक्तित्व का दूसरों में विलयन नहीं कर पाते, और तब वे फस्ट्रेटेड-सा-अपने को---टूटा-टूटा-सा--अलग-अलग-सा महसूस करते हैं । ऐसे रोगियों की एकमात्र औषधि है प्यार । वे उपेक्षा नहीं झेल पाते...। अमित : उपेक्षा कसी? कौन उपेक्षा करता है सुनी की ? चन्दन : तुम "मां.. कान्ता, यहाँ तक कि घर का नौकर चन्दू" भी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अंग्रेजी की पोस्ट.... ""ग्रेजुएट सुनीता के व्यक्तित्व को तुम लोगों ने खिलौना समझा "सब कुछ कहा-कुलच्छनी, जल्लाद, पागल' और भाभी के अन्दर का विद्रोही मन इन छद्म नामों को नहीं प्रोढ़ सका। स्वच्छताप्रिय होना कुछ इन्सान चाहते हैं, तो यह तो उनका स्वभाव है, तुम्हें क्यों अखरता है ? फिर वे स्वयं ही तो सफ़ाई करती हैं। "तुम क्यों अडंगा लगाते हो ? अमित : और वह डब्बू को क्यों मारती है ? चन्दन : तुम सबसे प्रतिशोध लेने के लिए। तुम उन्बू को उनके पास जाने नहीं देते । डब्बू तुम सबका प्यारा है इसलिए वे डब्बू को मारती हैं, ठण्डे पानी में रात को डुबो देती हैं, जिससे तुम्हें कप्ट हो। ऐसा ही एक केस लखनऊ में डॉ० माथुर के पास प्राया था। मैंने उस केस की पूरी स्टडी की थी। वह औरत केवल एक महीने के उपचार से ठीक हो गयी। डॉक्टर सहाय : ऐसा ही एक केस हमारे यहां मनोवैज्ञानिक संस्थान में भी प्राया था। चन्दन : तुम्हें अपने को बदलना होगा, अमित ! भाभी को जितना ..... : पर्वत से गिरा एक मन
प्यार ये चाहती है देना होगा, उब्बू को उनके पारा छोड़ना
होगा, और तुम देखना भाभी को स्थिति में पाशातीत परि-
वर्तन हो जायेगा।
डाक्टर सहाय : ठीक कहते हो, चन्दन ! अमित ! अब मुनीता जी को लेकर
चलेंगे डॉक्टर पन्त के पाम। वे मनोवैज्ञानिक संस्थान के
डायरेक्टर है । राव ठीक हो जायेगा।
सब एक साथ रठते हैं। पर्दा गिरता है।
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एक ज़िन्दगी बनजारा
५
तूफ़ान और शहनाइयाँ
।
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पात्र
माँ (आयु ४५ वर्ष)
संजू (संजय) पुत्र
मालो (मालती) पुत्री
दिलीप संजू का मित्र
हरि नौकर
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के पास जाकर किताबें झाड़ने लगता है। एक किताब खोलकर देखता है। किताब में शायद कोई तस्वीर है । तस्वीर देखकर) हे मेरे राम ! आदमी है कि घनचक्कर" इतनी बड़ी-बड़ी मूछे? (अपनी मूछों पर हाय फेरता है । किताबें रखकर भाड़ लगाने लगता है।) संजू का प्रवेश । रंग गोरा, नीलाभ नेत्र, नयी रोशनी का पढ़ा-लिखा युवक प्रतीत होता है। संजू : हरि दादा ! इतनी देर हो गई ! अम्मा समझ रही हैं, तुम अभी दूध लेकर नहीं लौटे । अभी तक चाय भी नहीं बनी। हरि : दूध तो कब का पा गया, छोटे राजा ! डिब्बे में रख पाया अम्मा जी के पास । ''ग्राज बड़ी ठण्ड है, छोटे भय्या ! हाथ जमे जाते है भाड़ लगाते "लगाते । संजू : जल्दी चाय लाकर दो हरि दादा ! बिना चाय के तो अपने राम के कुछ बस का नहीं। हरि : (जल्दी-जल्दी हाय चलाफर) अभी जाता हूं, छुटके राजा ! सजू : छुटके राजा ! बड़के राजा ! यह सब क्या कहते हो, हरि दादा? राजा शब्द का प्रयोग हम जैसी स्थिति के लोगों के लिए''अपने राम को तो जंचता नहीं भाई ! हरि : तो फिर" फिर''क्या कहूँ ? संजू : केवल संजू "क्या इतना काफी नहीं ? हरि : ना भय्या, मुझसे तो यह नहीं होगा... केवल सं...... संजू. भय्या राम राम, तोबा तोबा "भला कहीं अच्छा लगेगा संजू...."ना बाबा....."ना...... | चला जाता है । मालो का प्रवेश । मामूली छोंट को साड़ी पहने है । बाल अस्त-व्यस्त हैं, प्राकृति से प्राभिजात्य टपकता है। मालो : लो भय्या ! चाय... (कप हाय में पकड़ाती है)। संजू : (चाय का प्याला हाथ में लेकर एक चूंट पीकर) अब तो चाय भी अच्छी नहीं लगती, मालो! सब कुछ फोका... फीका सा लगता है। यह दुनिया कितनी रंगीन, सपनों सी मोहक पर मुझे तो मुझे तो, क्या कहूँ वस... । मालो : तुम तो, भय्या ! हमेशा दार्शनिकों की-सी बातें करते हो। दुनिया को रंगीन मानो तो रंगीन, मायाजाल मानो तो मायाजाल । दुनिया तुम्हें गोरखधन्धे से अधिक लग भी क्या सकती है "तुम ठहरे पूरे फिलॉसफर.. एक ज़िन्दगी बनजारा :
गगनी व गैर-ore : म: देवारी "मीकोनीमा प्रमागी सारी राजू : तू तो मजाक करती है मालो ! यही कहना चाहती है... मालो : भाभी ला दो। संजू : और पपा विल्ली को स्वाव में... मालो : यस भय्या! बिल्ली बन्दर की गाली मत देना.....नहीं तो....... संजू : नहीं तो.. पर से निकाल दिया जाऊंगा? (हंसता है, फिर सोचता है) मालो को भाभी चाहिये... | अम्मा को यह चाहिये."दादी मां को...। मालो : संजू भय्या ! सोचकर भी देखा है तुमने ! दादी गो को उग्र में जब पहुंचोगे, तब पता चलेगा। हर नयी पीढ़ी पुगनी पीढ़ी या मंजार बनाती है."उसकी भावनाओं को जानने की प्टा नहीं करती. "अम्मा और दादी मां के मन की पीड़ा को समझ कर तो देखो "तुमने तो रट मगा मी.. "दुनिया गोरगया है--सपनों का नाम है। याद नहीं करूंगा".."जरूर, तय तो क्यार कोटला चिनयामोग। संजू : प्रोही "अय तो मुंह मुला है"मड़ी नही र गली उपदेशों की । हाँ माली; तुझ मालूम है राना पोट पापी है. अपने गांववाले नये पर गे? मालो : रत्ना दी सोट पायी है ? मगुगल गे? मय नभ्या? मंजू : परमा...। मालो : परसों.."रत्ना दी सोट प्रायी हैं ? यातावरण में निानग्यता छा मानी। तभी प्रामा का प्रवेश माती देकर अभी जाती। अम्मा : क्या कहता है ना मोर माय? यह 4.गे हो संजू : हो, माँ ! ला प्रा गई। एक मिनट काम छापी गमी है। , . • - गया? (मू पोंगी। मंड: दामो! दहीमा वळी पडाका जीवन तूफान और संजू के दोस्त दिलीप का प्रवेश । वह संजू-जंसा हो सौम्य-दर्शन है। दिलीप : किसकी चर्चा हो रही है, संजू ? बड़े मशगूल हो और, माँ ! आप... | आपकी आँखें क्यों लाल हैं ? क्या बात है ? (मां के चरण छूता है)। मा : जियो बेटा! बहुत दिनों बाद आये (सिर पर हाथ फेरती है)। संजू : पोहो, दिलीप ! आज आप पाये हैं इतने दिनों बाद ! मैने भी कसम खाई थी कि जब तक तू नहीं पायेगा, मैं भी तेरे पास"1 दिलीप : नहीं जाऊँगा'"तेरी भीमप्रतिज्ञा की परिधि को तोड़ने ही तो में पाया हूँ। (मां से) देखो माँ ! इसको वात.. इसे तो वस लड़ना आता है । जव देखो' 'तव लड़ाई...मिलना बाद में 'लड़ना पहले। मां : (हंसती है) तुम बातें करो, बेटा ! मै अभी पाती हूँ। जाती है। संजू : दिलीप ! रत्ना लौट आयी है । दिलीप : रत्ना रत्ना लौट आयी है ? कैसे ? क्या कहते हो संजू ? संजू : हाँ, दिलीप ! मुझे लगता है आज अाकाश प्राकाश नहीं रहा. 'घरती 'घरती नहीं रही. 'वेदर्द तूफानों ने जिन्दगी को खानाबदोश बना दिया है। इनमें में कितना भटक रहा हूँ, दिलीप ! .."इन प्रत्यावर्तनों ने मेरे मन को कितना भर- माया है ? दिलीप : जानता हूँ, संजू ! सब कुछ जानता हूँ। मेरी माखों में प्राज वह दिन तैर रहा है जब दादी मां ने अपना भाचल फैलाकर रत्ना के द्वार पर जाकर अपनी प्रांखों की रोशनी मांगी थी. अपने प्राणों का दान मांगा था."मिन्नतें की थीं... चिरीरियां की...पी। • संजू : पौर"अपना खाली आंचल समेट कर यों ही लौट प्रापी थी, दादी मो! यहीन ? हिंसता है)। दिलीप : इतनी सोखली हेसी मत हेसो, संजू! .."मत हेमो. "मेरा दिल वंट रहा है। संजू : मटा चलो थोड़ा पूम पायें, स्वस्थ हो लें. (दोनों का प्रस्थान)। हरिभाकर मेज पर तमी को प्रापोभक रस जाता है। मालती का प्रये । पत्रों को मोर देखती है। एक जिन्दगी बनजारा - "दूसरा पन खोलकर मालो : मोह ! प्राज की डाक पा गयी...."(एक पत्र उठाकर देखती है...."रख देती है...... । मुख पर कमी प्रसन्नता छलकती है, कभी विस्मय' पढ़ती है।) मालो! तुम्हें मेरे बारे में पता चल गया होगा ! मैं आ गयी हूँ, मालो फिर आ गयी है। जीवन की उस कहानी को में दुहराना नहीं चाहती। इन्सान जो चाहता है सब उसे मिल ही जाये-इन्सान के सारे सपने सच हो ही जायें, यह तो जरूरी नहीं है, मालो !.... पर मुझे आज लगता है कि मेरे अन्तर का कोई कक्ष किसी के लिए देवदास बन गया है, मालो ! देवदासबन गया है..... इतनी उदासी.. इतना सूनापन"। तुम्हारी रत्ना मालो : अन्तर का कोई कक्ष किसी के लिए देवदास बन गया है." देवदास बन गया है। .."रला दी के अन्तर का कोई कक्ष... देवदास' देवदास जैसा सूना....."वीराना (प्रांखों से आंसू पोंछती है)। पहला पत्र सोलकर पढ़ती है- पढ़कर बेचन होकर इधर-उधर घूमती है । माथे पर पसीने की बूंदें झिलमिलाती हैं-~पसीना पोंछती है । मालो : उफ़ यह पत्र ! क्या भय्या की कहानी की पुनरावृत्ति मेरी जिन्दगी में भी होने जा रही है"नहीं"नहीं"नहीं, ऐसा नहीं होने दूंगी..."(मां का प्रवेश)... मां : क्या है, मालो? किसका पत्र है बेटी? मालो : (संयत होकर चेहरे का भाव बदलकर) रत्ना दी का पत्र है, मा! मां : (विस्मय से) रत्ना बेटी ने फिर पत्र लिखा है, मालो? फिर पत्र लिखा है ? कहानी की समाप्ति हो जाने पर भी क्या कहानी का प्रारम्भ हो सकता है ? नहीं, नहीं, मालो ! ... अब रत्ना के पत्र की कोई जरूरत नहीं थी। संजय और दिलीप का प्रवेश । दिलीप : ऐसी कठोर बात मत करो, माँ ! हर कहानी का अन्त एक-सा नहीं होता । कोई कहानी समाप्त होकर फिर प्रारम्भ होती है। कोई अपने सूत्रों को प्रारम्भ में ही समेटकर समाप्त तूफान और शहनाइयां । मालो हो जाती है। संजू : अपने वर्ग के ग्राभिजात्य से बाज वे लोग नीचे उतर पाये हैं, अम्मा, नीचे उतर पाये हैं। बड़ी हवेली का गर्व धरती पर गिरकर चकनाचूर हो गया है, मां ! मां : और उस गर्व का शिकार बने वह भोली लड़की, जिसकी प्रांखों में अभी तक बचपन का भोलापन अंगड़ाइयां लेता है, जिसके पोठों पर भोलो मुस्कान" मालो : लेकिन अम्मा !...अब तो वह सवेरे की मुस्कान असमय में ही सांझ बन चुकी है......ढली हुई सांझ । बचपन की भोली उमंगें उजड़ गयीं, मां ! संजू : साँझ क्या फिर अगले दिन सबेरा नही बन जाती, माँ ! मुस्कान उजड़कर क्या फिर आवाद नहीं होती? इस दुनिया में सब कुछ होता है, मां ! सब कुछ होता है । उजड़कर बसना और बसकर उजड़ना, यही तो इस ज़िन्दगी का क्रम है । माँ : हाँ बेटे ! यही इस ज़िन्दगी का क्रम है (जाती भी पीछे-पीछे जाती है)। संजू : बेचारे राजा साहब ब्याह के पांच महीने बाद ही मृत्यु को अभिप्राप्त हो गये दिलीप : होते भी क्यों नहीं शराब क्या कम पीते थे? फिर नयी- नयी वीवी के रूप की मादकता ! शराब से अपने जीवन का गम गलत करना चाहते होंगे, संजू ! संजू : हाँ, और क्या? मुझे उस दिन का रत्ना का मासूम चेहरा भुलाये भी नहीं भूलता, दिलीप ! वह विदाई की साँझ ! लगता था ब्याह की रोशनियाँ कितना बड़ा अन्धेरा लेकर आ रही हैं ? रत्ना सचमुच रो रही थी। मैंने कहा था, रत्ना! रो मत, और वह हँस पड़ी थी। उसकी वह हँसी... "वह हँसी तू क्या जानेगा, दिलीप ! तू नही जान नहीं जान सकता। दिलीप : और रत्ना का वह मगरूर पिता, जिसकी बेटी उसके देखते- देखते अाज जिन्दा लाश बन गयी......। संजू : अपने अपराधों की क्षमा मांगने भगवान् के दरबार में चला गया, दिलीप ! ब्याह अगले दिन ही उसका हार्ट फेल हो गया। दिलीप : ....."और रत्ना अकेली रह गयी...."ससुराल में कोई नहीं, मां के घर भी बूढ़ी मां के अतिरिक्त और कोई वह हंसी सकता- एक जिन्दगी बनजारा 1 एक बच्चा तक नहीं। संजू : अपने पति को सारी सम्पत्ति एक अनाथाश्रम के नाम कर रत्ना ने अपने पति का नाम अमर कर दिया। मालो का प्रवेश। माली : पति ही की सारी सम्पत्ति नहीं, यहां पिता को भी सारी सम्पत्ति से एक कन्या पाठशाला की संस्थापना का संकल्प कर लिया या रत्ना दी ने। दिलीप : प्रोह ! रत्ना महान् है । . संजू : मैं पाता हूँ, दिलीप! मालो! तब तक तू दिलीप से वातकर। संजू का प्रस्थान । दिलीप बैठ जाता है। मालो जाने लगती है। दिलीप : (पुकारता है) 'मालो ! - (मालो के कदम हक जाते हैं) एक .: बात सुन जाम्रो मालो। मालो : बात तो मै सुन चुकी हूँ, दिलीप वायू ! मैं क्या करूं? रोने लगती है। , दिलीप : पांसू बड़े अमूल्य हैं, मालो ! यो मत बहारो। मालो : आप जानते हैं, दिलीप बावू ! संजू भय्या कितने दुखी हैं ? दिलीप : हर वफ़ादार दोस्त अपने दोस्त के ग़म से दुखी रहता है, 1.मालो ! क्या तुम सोचती हो मुझे दुःख नहीं मालो : ऐसी स्थिति में अपने मन का राग अलापना क्या उचित लगता है ? दिलीप : उचित्त-अनुचित की वात में नहीं जानता, मालो ! में प्रतिज्ञा- बद हूँ । जव तक मेरे दोस्त की पीड़ा पीड़ा रहेगी, मैं अपने : सपनों को प्राबाद करने की विल्कुल कोशिश नहीं करूंगा, मालो ! नहीं करूंगा पर.........मेरे मन के एक प्रश्न का उत्तर तो दे दो, मालो......... मालो : प्रश्नों के समाधान खोजने की हर इन्सान चेष्टा करता है, दिलीप बाबू ! प्रश्न जितने उलझते हैं उतना ही जीवन कंचन बनता है। पर क्या प्रश्नों का उत्तर केवल वाणी द्वारा ही दिया जाता है ? अन्तर को मथनेवाले प्रश्न जब आँखों में पाते हैं, तो आँखें ही इसका उत्तर दे दिया करती हैं दिलीप वाबू.........! दिलीप :मालो भालो : हाँ दिलीप बाबू! दिलीप : "तुम्हारे प्रति मेरे बचपन का वह भोला कौतूहल प्राक- तूफ़ान और शहनाइयाँ .. : . पंण बन जायेगा, मैं नहीं जानता था। मालो : मै जानती थी, दिलीप वावू ! मैं जानती थी बहुत पहले से जब मैंने पहली पहली वार तुम्हें देखा था और तुम मुझसे" दिलीप : रूठकर झगड़कर घर के बाहर चले गये थे."यही न ? (हसता है) और वह भी भगड़ा किस बात पर हुआ था याद है ? मालो : करम की 'क्वीन' पर । तुम कहते क्वीन मेरी है और में कहती थी मेरी। मैने क्वीन ले ली और तुम रूठकर चले गये। दिलीप : और फिर दूसरे दिन । संजय का प्रवेश । मालोपोर दिलीप खड़े हो जाते हैं। दिलीप : मैं अव चल रहा हूँ, संजू ! अभी आऊँगा, जरा दादी मां के पास हो पाऊं (दिलीप का प्रस्थान)। मालो : में भी अभी पाती हूँ, भय्या! (मालो का प्रस्थान)। संजू : (घूमता है। घूमते-घूमते एकाएक पत्रों को प्रोर दृष्टि जाती है। (रत्ना का पत्र खोलकर पढ़ता है ।) रत्ना ने लिखा है-"पर मुझे ग्राज लगता है कि मेरे अन्तर का कोई कदा किसी के लिए देवदास बन गया है, मालो ! देवदास बन गया है ।" रत्ना ! क्या यह सच है-सच है रत्ना?... तुम भव भी... (योड़ी देर सोचता है, दूसरे पत्र को प्रोर दृष्टि जाती है "खोलकर पढ़ता है) प्रिय प्रभुशंकर जी ! पत्र मिला ! पाकर प्रसन्नता हुई । आपकी वेटी मालती का सम्बन्ध मुझे अपने पुत्र दिवाकर के लिए स्वीकृत है। माशा है इस रविवार को प्राप हमारे यहाँ आकर टीके की "रस्म अदा कर देंगे। विनीत चन्द्रसेन संजू : मालती का सम्बन्ध दिवाकर के साथ ? वह दिवाकर जो ‘गल्सं 'कॉलिज की लड़कियों के पीछे चक्कर लगाता हुआ पुलिस के एक सिपाही के द्वारा बुरी तरह पीटा गया था? वह दिवाकर जो अपनी मां के गहने लेकर घर से भाग गया था और छः महीने बाद बम्बई को जेल से छूटकर पाया था ?"नहीं, नहीं, यह नहीं होगा। मां ! मां ! मा, मालती और दिलीप का प्रवेश । संजू : यह क्या हो रहा है, मौ? दिवाकर के साथ मालती का एक जिन्दगी बनजारा .
सम्बन्ध? दिलीप : मालती का दिवाकर के साथ सम्बन्ध ? मालती : हाँ भय्या ! इस देश की यही परम्परा है । हर लड़को यदि वह समर्पिता भी है, तो कुल की पान के नाम पर बड़े घर में ब्याही जाती है। रला दी की बात आप नहीं जानते क्या? संजू : सब जानता हूँ और अब मैंने सोच लिया है। इन थोथी मर्यादाओं की दीवारें अब नहीं खड़ी रहेंगी"नहीं खड़ी रहेंगी। रत्ना को मैं अपनाऊँगा। समाज यदि रास्ते में चीन की दीवार-सा अड़ भी जाय, तब भी में नहीं रुकूँगा। मैने जो सोच लिया है, वह पत्थर की लकीर बनकर ही रहेगा......। मा : संजू ! बड़ी हवेली की विधवा वेटी रला मेरे घर की बहू बनेगी? दिलीप : हो, मा ! हर संकल्प एक नया सबेरा लेकर आता है। रत्ना इस घर की बहू बनेगी। झूठी छलनाओं के ये धेरे टूटकर ही रहेंगे। मालती : रत्ना मेरी भाभी बनेगी ? मेरी हमजोली सखी रत्ना, जिसके प्राणों में करुणा की लहरें आलोड़ित होती रहती हैं, जिसकी आँखों में स्नेह, ममता और पवित्रता को त्रिवेणी लहराती है। हां, रना मेरी भाभी थी पहले भी एक तूफ़ान आया था, मां ! वह तूफ़ान अव शान्त हो गया है। तूफान के बाद की-सी यह निस्तब्धता अब मंगल की शहनाइयों से गुंजरित हो उठेगी । में आज कितनी खुश हूं."कितनी खुश हूँ। संजू : और दिलीप इस घर का दामाद बनकर इस घर में पायेगा ..दिवाकर नहीं। दिलीप और मालो सर झुका लेते हैं । मा : प्रोह, अगर मेरे बच्चों को खुशी इसी में है, तो मुझे कोई प्रापति नहीं। कल तक तुम्हारे पिताजी भी कलकत्ता से लौट पायेंगे । वे भी खुश होंगे इन समाचारों से । सबके मुखों पर प्रसन्नता का भाव है। । ... पर्दा गिरता है। तूफान और शहनाइयाँ ६७
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६ सूली पर चढ़ा एक और मसीहा
पात्र
मां (प्रवस्था लगभग ५५ वर्ष)
पुनीत छोटा पुत्र
दीपक पुनीत से बड़ा पुत्र
रम्भा पुनीत से छोटी बेटी
रतिका रम्भा की सहेली
[पर्दा खुलता है। . घर का आंगन है। एक ओर एक खाट विछी है। खाट के आगे एक छोटी मेज है, जिस पर प्लेट में एक प्याला रखा है। रंगमंच के दाहिनी ओर वाहर जाने का द्वार है। बायीं ओर दो दरवाजे हैं, जो दो कमरों में जाते हैं । सामने एक दरवाजा है, जो रसोई में खुलता है। खाट के पास में घटाई विछी है । चटाई पर उल्टा लेटा हुमा दीपक एक किताव पढ़ रहा हैं । सामने दीवार की ओर रसोई के दरवाजे तक एक अलगनी बँधी है, जिस पर कुछ कपड़े सूख रहे हैं । सूखे कपड़े एक ओर खिसका दिये गये हैं। प्रातःकाल लगभग ६-१० बजे का समय है। - गर्मी का मौसम है। पात्रों को वेशभूपा मध्यमवर्गीय परिवारों जैसी है। । रसोई से बर्तनों के खड़कने की आवाज़ सुनायी देती है। शायद एक साथ दो-तीन वर्तन किसी के हाथ से गिर पड़े हैं। रसोई के दर- वाजे से माँ का प्रवेश । वह लंगड़ाती-सी आकर खाट पर बैठ जाती है । पाँव पकड़ती है । •मो : मरा भगौना पांव पर गिर गया। 1 • दीपक : (खड़ा होकर, मां का पाय पकड़कर) क्या चोट लग गई, ... मां? मैं प्रायोडैक्स लाता हूँ। बायीं ओर प्रस्थान-शीघ्र ही प्रवेश । दीपक : मैने लाख वार कहा है, मां ! काम में जल्दी मत करो, सूली पर चढ़ा एक मौर मसीहा पर तुम मानती ही नहीं । अब लगता है, तुम थकने लगी हो । (मां के पांव में प्रायोडेक्स मलता है)। मां : भरे जाने भी दे, ठीक हो जायेगा। ऐसी तो छोटी-मोटी चोटें रोज लगती ही रहती हैं। दीपक : (मायोडेक्स मलता रहता है) कुछ आराम मिला ? माँ : हाँ कुछ लग तो है। दीपक : मां ! मैं आज रात को देर से घर लौटूंगा। शेखर की शादी है। प्रायोडेक्स मलना बन्द कर देता है। मां : (खाट पर से उठते हुए) शेखर की शादी है? ले यही तो तेरा एक दोस्त बचा था। आज उसकी शादी भी हो जायगी। । दीपक : हां, मां ! शादी तो शेखर की बहुत पहले हो जाती, पर मानता ही नहीं था शेखर । मा : तू भी तो नही मानता, और अब तो तेरा कोई काम ही नहीं है । जब काम था, तभी तूने कब सुनी ? लड़कीवाले सिर रगड़-रगड़ कर लौट गये। दीपक : मैने कितनी बार कहा है, मां ! पुरानी कहानी मत दोह- रामो, पर तुम मानती ही नहीं । अच्छा, तो मै जा रहा हूँ, अब ! (पास प्राकर, धीरे से) क्या १५ रुपये दे सकोगी, मां ? शेखर को शादी में और कुछ नहीं तो तिलक तो देना ही होगा। माँ : (कुछ सोचती-सी है) रुपये." पन्द्रह ..? मेरे पास तो, बेटे, दस का नोट है बस। दीपक : लायो,,माँ ! यही सही। । माँ : (प्रांचल से खोलकर देती है।) अरे हाँ, तेरी उस नई नौकरी का क्या हुआ तू तो कहता था कि शेखर के ; ऑफ़िस में ही है। दीपक : अब तो शेखर की शादी के बाद ही कुछ होगा । कमरे की ओर प्रस्थान । मां कुछ देर खाट के पास खड़ी रहती है, कुछ सोचती है। कमरे के दरवाजे को प्रोर बढ़ती है, फिर कुछ सोचकर लौटती है। तैयार होकर कमरे से दीपक का प्रवेश । दीपक : अच्छां, माँ ! मै जा रहा हूँ? माँ : जा वेटे ! दरवाजा मिलाकर भेड़ता जइयो । .. . ? - एक जिन्दगी बनजारा .. : दीपक का प्रस्थान दायों भोर से मां रसोई में जाती हैं। बर्तनों को उठाने-धरने को प्रावाज सुनायी पड़ती है। सभी बाहर दरवाजे पर थपथप होती है। मा : (रसोई से निकलकर) कौन है ? कोई बोलता ही नहीं, किन्तु फिर भी थपथप जारी है। मौ दरवाजे को ओर बढ़ती है, तभी दरवाजा खोलकर रतिका का प्रवेश और मो को प्रणाम । मा : प्राओ बेटी ! प्रायो, खुश रहो । प्राज तो बहुत दिनों बाद पायी हो ! रतिका : हां, मां ! इम्तहान करीब पा रहे हैं । कॉलिज से लापत्रेरी चली जाती हूँ। देर हो जाती है लौटते-लौटते । (इधर- उपर देखकर) रम्भा कहाँ है, मां ? मां : कॉलिज गयी है। रतिका : और कोई भी नहीं दीखता । मां : दोखे कोई कहाँ से? दीपक अपने दोस्त की शादी में गया है, और पुनीत रात लोटा ही नहीं। मरी जान चिन्ता में अटकी रहती है। धूमने की नौकरी बड़ी बुरी होती है, वेटी ! पर क्या करो? पेट के लिए तो सब कुछ करना ही पड़ता है। रतिया : अच्छा अब चलती हूँ, माँ ! कॉलिज जाना है । भो : ऐसे ही चली जानोगी क्या? एक कप चाय लाती हूँ। रतिका : नहीं माँ ! चाय घर से लेकर ही चली थी। माँ : अच्छा बेटी ! बड़ी उमर हो। आया करो कभी-कभी। तबियत खुश हो जाती है देखकर (रतिका के साथ-साथ दरवाजे तक जाती है, फिर लौटती है) कैसी देवी-सी लड़की है । देखे से भूख भागती है । (थोड़ी देर खड़ी रहती है । ऊपर को प्रोर देखकर) कितनी धूप चढ़ आयी है ! खाना बनाना है । (रसोई की ओर जाती है। डिम्ये खोलने बन्द करने की आवाज होती है। तभी दरवाजे (दायीं पोर) से पुनीत का प्रवेश, हाय में प्रीफकेस है। वह किसी गीत को कड़ी गुनगुना रहा है। गीत क्या है कुछ सुनायी नहीं .. *. देता। मां :पा गया, वेटे ! रात बड़ी देर तक तेरा इन्तजार करती रही। सूली पर चढ़ा एक और मसीहा ७३ पुनीत : हां माँ ! मै चलते समय कहना भूल गया था। मुझे रकना -ही था। सारे काम जो वाक़ी थे, निपटाने थे। काम करके ही लौटा हूँ। और कोई भी नहीं है क्या घर में? दीपक भय्या कहाँ गये? रम्भा कहाँ है ? माँ : रम्भा कालिज गयी, और दीपक शेखर की शादी में। पुनीत : क्या शेखर दा की शादी है ? चलो अब दीपक भय्या भी तैयार हो ही जायेंगे । धीरे-धीरे उनके सब दोस्तों की शादी हो गयी। पुनीत का यायों मोर प्रस्थान। मां खाट के पास खड़ी रहती है। फिर अलगनी से सूखे कपड़े उता. रती है, खाट पर रख देती है, एक-एक को तह बनाकर रखती है। दायों भोर से पोस्टमन का स्वर सुनाई पड़ता है। पोस्टमैन : पुनीत पण्डित... । मां दरवाजे की ओर से दो पन लेकर लौटती है । पुनीत का कमरे से प्रदेश। पुनीत : किसकी चिट्ठियाँ हैं, मां ? माँ : ले तू ही देख, मुझे तो नजर कम पड़े है । पुनीत : एक तो सुमीत भय्या का पत्र है, मां ! माँ : देख क्या लिखा है ? पुनीत : (पत्र पढ़कर) मां, सुमीत भय्या का विजनेस फेल हो गया। उन्होंने दुकान बन्द कर दी। अब वे बिल्कुल खाली हैं। मां : बिजनेस फेल हो गया? लो बोलो, अब क्या होगा? भगवान् भी मरते को मार है। पुनीत : और मां, पम्मी का रिश्ता भी टूट गया। लड़के वाले ने 'भय्या के बिजनेस के फेल होते ही रिश्ता तोड़ दिया। माँ : (चुप रहती है एक क्षण) पाजकल कितनी महंगाई का जमाना है ! चार बच्चे, दोनों आदमी खुद । कैसे गुजारा होगा? बड़ी मुश्किल में जान है। भगवान् भी तो नहीं देखता । मै किसकी सुनूं, किसको नहीं ? (सिर पकड़कर बंट जाती है। पुनीत : मै आज ही भय्या को यहां पाने के लिए लिखे देता हूँ, मां ! परदेश में कौन अपना है ? जब गाड़ी चल रही थी, तो सब अपने थे। अब....."कौन" मा : हाँ बेटा, लिखना तो पड़ेगा ही। मरता क्या न करता? एक जिन्दगी बनजारा - दूसरा सत किसका है, वेटे? पुनीत : (दूसरा पत्र खोलकर पढ़ता है ।) यह पत्र सतीश दादा का है, मां ! वे दो वर्षों के लिए जर्मनी जा रहे हैं। भाभी अपनी तीनों बच्चियो को लेकर आ रही हैं । यही रहेंगी। मां : सुमित्रा पा रही है बच्चों को लेकर? सतीश जर्मनी जा रहा है ? (सोचती है कुछ)। पुनीत : क्या सोचने लगीं, मा.? मी : कहाँ... .."क्या सोच रही हूँ बेटा! तू इतनी मारी जिम्मेदारियाँ कसे सम्भालेगा? सुमित्रा भला कैसे निभेगी यहाँ ! पैसा उसे प्यारा है। खर्च करते दम निकलता है, फिर तीनों लड़कियां बड़ी बिगड़ी आदतों को हैं । कैसे होगा सब कुछ ? सबसे ऊपर बात है कि सुमीत और सतीश के बच्चो की पटेगी नहीं। पुनीत : तुम भी कहाँ दूर-दूर की बातें सोचने लगी. माँ ? राम-राम करके साथ रहने को मिलता है। मां : (सोचती-सी खड़ी रहती है) कितने लोग घर में बढ़ जायेंगे ? मुमीत...."सुभीत की बहू..."चार बच्चे,' सुमित्रा... तीन बच्चे, दस आदमी एक साथ ? न घर में जगह है न इतना पैमा। पुनीत : सब कुछ करना ही पड़ेगा, मां ! और सुनो, मां ! अब तो पम्मी की शादी की भी चिन्ता करनी पड़ेगी, रम्भा की चिन्ता तो थी ही। कितनी बड़ी हो गयी रम्भा ? माँ : अब की फागुन की पूनो को २४ बरस की हो जायेगी। छोटी थोड़े ही है, और फिर दीपक का कोई काम नहीं । पुनीत.: .: राशन कार्ड पर भी सबकी यूनिट बढ़वानी पड़ेंगी, माँ ! माँ: हाँ बेटे ! सो तो करना ही है । पुनीत : मां ! मेरे पीछे कोई मुझे पूछने तो नहीं आया था ? मां : तुझे तो पूछने कोई नहीं आया । रम्भा की सहेली पायी थी। क्या नाम है उसका? पुनीत : ..."रतिका आयी होगी। मां : हाँ रतिका ही। बड़ी भली लड़की है। बोलती है तो फूल झरते हैं। पुनीत : जानती हो किसकी लड़की है, माँ ? लखपति वाप की इकलौती बेटी । सात भाइयों की अकेली बहन । माँ: पर गुमान तो उसे बिल्कुल नहीं है। मुझे तो बड़ी प्यारी मूली पर चढ़ा एक और मसीहा . ..
लगती है। पुनीत : अच्छा मा, लामो झोला दे दो। सन्जी ले पाऊँ । फिर मुझे फुरसत नहीं मिलेगी। मां भोला लाकर देती है, पुनीत का प्रस्थान । मां खाट पर बैठ जाती है। बाकी कपड़ों की तह बनाकर रखती है, फिर खड़ी हो जाती है, अंगड़ाई लेती है। ? माँ : हे भगवान् ! कौन-से पापों को सज़ा दे रहे हो? वे नहीं रहे तो मैने सन्तोप कर लिया था कि मेरे चार वेटे मेरे चार हाथ हैं । किस बात को चिन्ता है मुझे ? चारों भाई मिलकर रम्भा को पार लगा देंगे, पर पर.."सय सोचना बेकार चला गया। (सर पकड़कर बैठ जाती है) बेचारा पुनीत ! क्या करे क्या न करे? इतनी लम्बी गृहस्थी की गाड़ी कैसे खीचेगा अकेला वेचारा? हे भगवान् ! रम्भा का प्रवेश रम्भा : क्या कह रही हो, माँ ? कैसी गाड़ी? मां : कुछ भी तो नहीं, बेटी ! तू कॉलिज से जल्दी आ गयी ! रम्भा : हाँ माँ ! आज हम लोगों ने स्ट्राइक की है। माँ : स्ट्राइक, कैसी स्ट्राइक रम्भा : मॅहगाई के खिलाफ़, पे बढ़ाने के लिए । माँ : मँहगाई तो आकाश को छू रही है। मौत है हम वीच के मादमियों की । क्या खाएँ, क्या पहनें ? तेरी नौकरी कितने दिन की और है, बंटी? रम्भा : मेरी तो केवल तीन महीने की नौकरी थी, माँ ! इस महीने की वीस तारीख को पूरे हो जायेंगे तीन महीने । अरुणा दीदी की मैटरनिटी लीव समाप्त हो रही है। वे मा जायेंगी इक्कीस तारीख से। मा : तेरी भी नौकरी खत्म हो जायेगी ? रम्भा : मेरी नौकरी थी भी कहाँ । वह तो दीपक भय्या ने कह सुनकर काम करा दिया था, वरना एक जरा-सी जगह साली होती है, ढेर सारी एप्लीकेशन्स मा जाती हैं। सिफ़ारिश वाले किला जीत लेते हैं, हम जैसे लोग मुंह ताकते खड़े रह जाते हैं। मा : मच्छा, चल कुछ खा-पी ले। पुनीत को पूछना ही भूल गयी। रम्भा : हो मां ! सुना है घर में बड़ी चहल-पहल होनेवाली है। : .. . एक जिन्दगी बनजारा : सतीश दा की श्रीमती जी अपने बच्चों के साथ तशरीफ़ ला रही हैं । सुमीत भइया भी सपरिवार पा रहे हैं । उनका विज़नेस" मां : फेल हो गया। रम्भा : यह खूब रही ! जब तक बिज़नेस चला तो सुध भी नहीं ली कि कौन कहां पड़ा है। अब बिजनेस फेल हो जाने पर घर की याद आयी है । यह भी एक ही रही ! मां : रम्भा !.. रम्भा : रहने दो, मां! क्या मैं अपने भय्या-भाभियों को जानती नहीं। सतीश भय्या कितने बदल गये, शादी के बाद से ? शादी क्या हुई, सारे रिश्ते टूट गये। भाई भाई नही रहे, माँ मां नहीं रही और बहन:-उसकी तो बात ही छोड़ो। अब जर्मनी जाते समय घर की याद पायी है। माँ : रम्भा! चुप रह, बेटी ! रम्भा : कह लेने दो, माँ ! सुमीत भय्या, श्रीमती सरला देवी तथा उनके बच्चे आज फिर इस घर में तशरीफ़ ला रहे है, जहां सभ्यता नहीं है, जहाँ के लोग असंस्कृत जिन्दगी जीते है, जो भद्दे ढंग से रहते हैं, जिन्हें बात करने की तमीज़ नहीं, जो.. मां : चुप नहीं होगी तू, रम्भा ? रम्भा : मत रोको मुझे, मां ! दिल में इतना भर गया है कि गुवार निकलेगा नही, तो मैं पागल हो जाऊंगी। किसी ने सोचा था अब तक कि छोटे भाइयों की पढ़ाई है, बहन की शादी है । (थोड़ा रुककर) अपनी पम्मी का ब्याह रचाने बैठ गये थे, पर सोचा कभी कि पम्मी से बड़ी रम्भा है । मां : चुप कर, बेटी ! चुप कर । अपने मन पर इतना वोझ मत डाल। रम्भा : वोझ न डालूं, पर जो बोझ पड़ा हुआ है, उसे भी न उतारूं क्या ? याद है, एक बार कुछ रुपयों के लिए सतीश भय्या को लिख दिया था। दीपक भय्या, पुनीत भय्या और मेरी फीस जानी थी, तो क्या उत्तर भाया था, सतीश भय्या का?--अपनी पे का पूरा चैक प्रापको भेज दूंगा, मेरे बिलों की अदायगी पाप कर दें। मो : अधिक मत बोल, रम्भा ! यह ठीक नहीं है । रम्भा : क्या ठीक है, क्या ठीक नहीं है, मां ! म अब जान गयी हूँ। तुम्हें समझाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, पर तुम कहती हो .. मूली पर चहा एक और मसीहा ७७ चुप रहूं? बहुत दिन चुप रह चुकी हूँ। कभी भाइयों ने सोचा घर में विधवा मां है"जवान बहन है और दो मासूम से अनाथ भाई हैं। मी : (शोध से) चुप रह, रम्मा ! आगे कुछ न बोल । तेरे बड़े भाई हैं, भाभियां हैं। रम्भा : मो, वे लोग बड़े हैं, मैं इसे अस्वीकार तो नहीं कर रही ? और हम छोटे है, तो इसलिए अत्याचार ही सहते रहें, यह नहीं होगा। वे बड़े थे तो कहीं तो अपना दायित्व निभाते ? मा : हे भगवान् ! क्या होगा? इस घर को नया अव डूबने ही वाली है। रम्भा : भगवान् को याद करते-करते बूढ़ी हो गयीं, मां ! पर भगवान् कभी तुम्हारे काम नहीं आया। भगवान् को आड़ में तुम अपने मन को छलती रहीं। वास्तविकता से सदा मुख मोड़े रहीं । दुखों से भागना चाहती थीं तुम, और दुःख थे कि पीछा ही नहीं छोड़ते थे। कोई छलिया चुपके से आता था, और तुम्हारे दामन में दुःख डालकर चला जाता मा : (रोती है)। रम्भा : रो रही हो, माँ ! तुम ? मेरो बहादुर मां रो रही है आज, जो झुकी नहीं कभी। जो टूटकर भी टूटी नहीं। जिसकी जिन्दगी में संघर्षों की बाढ़ पायी, पर जो अचल ह्मिानी- सो रही । वही मां आज रो रही है, मेरी मां ! माँ : (सुपकती है)। रम्भा : "जिन्दगी रोने के लिए नहीं है।" जिस मां ने सदा यह उदा- हरण दिया था, वहीं मां आज रो रही है ? हम तो जिन्दगी भर हमे है, मां ! मांसू भी हमारी आँखों में नहीं पाते अब तो। मां उठकर रसोई में जाती है। रम्भा : आज तक अपने को कितना छला है मां ने? कितना छला -- . मां का प्रवेश, खाट पर से चादर उठाकर । मां : ले, रम्मा! अब तू घर मा गयी है। मुझे रामकिशन भय्या की दुलहन ने बुलाया था कल । कोई जरूरी काम था। हो पाऊँ जरा। मौका प्रस्थान। एक ज़िन्दगी वनजारा - . रम्भा : जामो मां ! यह भी तो दुःसों से भागने का एक ढंग विशेष ही है ! दुःखों से सब भागते हैं । दुःख किसी को अच्छे नहीं लगते और दुःस बेचारे अनचाहे मेहमान-से जिन्दगी में प्रा ही जाते हैं । (हँसती है) मेरी भोली माँ ? कहाँ तक छलोगी अपने को? कहाँ तक भागोगी असलियत से? कब तक अपने असली परिवेशों को झुठलाती रहोगी? कब तक सच्चाई को नकारती रहोगी ? (हंसती है) हम तो सचमुच अब रोना भी भूल गये । रतिका का प्रवेश रतिका: हलो, रम्मा ! क्या भूल गयीं ? रम्भा : रोना और क्या? रतिका': (प्राश्चर्यचकित-सी मुंह फाड़े रम्मा को देखती है ।) रम्भा : अरे, मुंह फाड़े यया देख रही है तू? तू बहुत बुद्ध है। हम बुद्धिजीवियों की बात तू नहीं समझ सकती। रतिका : क्या मतलब है, तुम्हारा ? मैं समझी नहीं । रम्भा : कह दिया तू नहीं समझ सकती, नहीं समझ सकती। तू मूर्ख है। रतिका : मया कह रही हो, रम्भा? मेरी तो सचमुच कुछ समझ में नहीं पा रहा। रम्भा : हो, मैं ठीक ही कह रही हूँ। हमारे, 'पुनीत भय्या पूरे गृहस्थ हैं, क्या तू यह नहीं जानती ? इतने सारे बच्चे हैं ' उनके। उनके बिना वे सब अनाथ हैं । अब और कोई बच्चा इस घर में नहीं लाना चाहते हम । देख रतिका ! चाहे इस कान सुन, चाहे उस कान । रतिका : अरे बाबा ! दोनों कान खुले हैं मेरे । कह तो सही (रम्मा को देखती है)। रम्भा : मुझे क्या 'घूरती है, पगली ! में ठीक कह रही हूँ। तू अपना रास्ता नाप । यहाँ तेरी दाल नहीं गलेगी। रतिका चुप विस्फारित नेत्रों से रम्मा को देखती है। रम्भा : मुझे ऐसे देखकर तू। समझती है, मैं अपना निर्णय बदल ! " दूंगी? नहीं, नहीं, ये प्यार-व्यार का चक्कर छोड़ यहाँ । रतिका : प्यार-व्यार..? रम्भा : तू पुनीत भइया को 'प्यार करती है न! इसी प्यार की ही बात में तुझसे कह रही हूँ। और कोई राह खोज तू प्यार की। तूझे प्यार का राजपथ चाहिये । कहाँ पगडपडी पूली पर चढ़ा एक और मसीहा ७६ .
पर चलने तू आ गयी है ? रतिका : अगर किसी को पगडण्डियों पर ही चलना अच्छा लगे तो...? रम्भा : तो पगडण्डी उसे खूब सतायेगी, उसका टॉरचर करेगी, उसे मार डालेगी...। रतिका : तू क्या कहना चाहती है आखिर? मुझे पुनीत ने सब बता दिया है। .. ! रम्भा : यही कि वह विवाह नहीं करेंगे ? रतिका : नहीं ! नहीं ! यह तो नहीं। सब लोग घर पा रहे हैं, यही बात । - रम्भा : सुन लिया तो तूने सब कुछ। अब बोल, क्या इरादे हैं ? रतिफा अपनी पुस्तक उठाती है। उराको किताब से एक चित्र गिर पड़ता है। रम्भा चित्र उठाती है। देखती है। रम्मा : मूली पर चढे मसीहा का चित्र ? यह तो तेरी तस्वीर है । प्लास्टर ऑफ पेरिस की सहायता से तूने मसीहा का मूली पर चढ़ा हुमा यह रूप धारण किया था। फैन्सी ड्रेस कॉम्पीटीशन में तू फर्स्ट प्रायी थी । सव कह रहे थे, जानती है, क्या? खर, जाने दे। सच, तुने कमाल कर दिया था, उस दिन ! तू सचमुच में मसीहा लग रही थी। रतिका : अरे हटा, बना नही । रम्भा : बना नहीं रही। तस्वीर बड़ी प्यारी प्रायी है। रतिका : तू तो उल्टी-सीधी बातें करने लगी। रम्भा : उल्टी-सीधी वात ? तू कहाँ समझ सकती है, इन बातों की गहराई फो? रतिका ! सच तू नहीं जानतो। मेरा दिल कितना दुःसता है-~-कितना दुःसता है (थको-सी यंठ जाती है, फिर सड़ी हो जाती है)। मुझे ईमा ममीह का यह रूप बहुत भाता है। तुझे मगीहा की कहानी याद है. रतिका ? रतिका : ईगा मसीह की कहानी? रम्मा : यहूदियों ने रोमन राजा पाइलट से जाकर प्रार्थना की कि जोमस को प्रापदण्ड दिया जाये। रनिका : क्योंकि वह अपने को ईन्धर का पुत्र कहता था। रम्भा : यहूदियों ने गा को फटे-पुराने कपड़े पहनाकर नगर में घुमाया । उनके मोहे मगाये गये। उन्हें चोटों का मुगुट पहनाया गया, पोर फिर उन्हें येलदरी नामक स्थान पर म पर मटका दिया गया । एक जिन्दगी बनमारा रतिका : हाँ, उस समय कहते है कि धरती हिल उठी थी, वेलवरी की चट्टाने फट गयी थीं। प्रकृति मानो ईश्वर के पुत्र के साथ किये गये दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर अपना दुःख प्रकट कर रही थी। रम्भा : तुझे तो सब पाद है, ईसा की कहानी का हर पहलू । रतिका : इसमें याद करने लायक क्या है ? सीधी-सादी कहानी है। रम्भा : अच्छा रतिका, एक बात बता, क्या तू किसी और मसीहा की बात भी जानती है ? रतिका : ना बाबा ! मसीहा तो एक ही हुआ है, क्रूस पर लटका दिया गया था जिसे। रम्भा : नहीं, तू नहीं जानती इस नये मसीहा को, जिसे नियति ने मंघों के क्रूस पर लटका दिया है, जो टूट कर भी सब कुछ सहता रहा है, सहता रहेगा। जो आँसू पी-पीकर मुस्काता रहा है, मुस्काता रहेगा। रतिका : किस मसीहा की बात कर रही हो, रम्भा ? रम्भा : अपना पुनीत, जो जीते जी सूली पर चढ़ा दिया गया है, जिसके सामने दो भाइयों का परिवार है, दो क्वारी जवान लड़कियों की जिसे शादी करनी है, जो सुबह से शाम तक ज़िन्दगी की चक्की में पिसने के लिए छोड़ दिया गया है, जिसे बेरहमी ने अपने निर्मम हाथों से दबोच डाला है। जो जीकर भी मर रहा है। मसीहा तो मरकर भी जी उठा था पर यह नया मसीहा'..."पह नया मसीहा'' हॉफ जाती है। रतिका : रम्भा ! (अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छिपा लेती है ।) रम्भा : ठीक कहती हूँ, रतिका! मेरी बात मान जा, यहाँ अपनी खुशियों का खून न कर । काँटों की राह पर अपनी फूल-सी जिन्दगी को मत ला, रतिका! लौट जा यहाँ से, वापिस चली जा ! महाँ तो अभावों के जलते हुए श्मशानों के अतिरिक्त तुझे कुछ नहीं मिलेगा । यहाँ सपने नही महकेंगे। रतिका सुबकती है। रम्भा : लौट जा, रतिका, यहां से ! उस पंछी की बात सोच जो रात को गलत जगह बसेरा ले ले और रात भर छटपटाता रहे । तू गलत जगह पाकर टकराई है, रतिका! अभी तो कुछ भी नहीं विगड़ा । अपनी जिन्दगी बरवाद न कर । एक -सूली पर चढ़ा एक और मसीहा ८१
दिन भी सुख का नन्हा-सा कण तू नहीं पायेगी
'यहाँ"
रतिका सुबकती है।
रम्भा : ये आंसू न यहा, रतिका ! यहाँ तो मिट्टी में गिरकर वेकार
हो जायेगे। कहीं किसी दूसरे दामन में गिरेगे तो फूल वन
जायेंगे। रतिका ! ....."रतिका! .."सच कहती हूँ, अपने
पांवों में कुल्हाड़ी मत मार, अपने भविष्य को कुहासों के गहरे
धुंधलकों में भटकने के लिए मत छोड़ । यहां के लोगों की
जिन्दगी बेगानी है, यहाँ रस के झरने की आशा कर तू
आ गयी थी, पर यह तो मरुस्थल है, मरुस्थल.....
रतिका : नहीं रम्भा..."नहीं। नदी की धारा को विपरीत दिशा
में मोड़ दिया जाये तो......सोच........'बेचारी नदी का
क्या होगा? क्या होगा? ऐमा मत कह रम्मा" "ऐसा
मत कह
रतिका की सुबकियां सुनायी पड़ती हैं, पर्दा गिरता
....
एक जिन्दगी बनजारा
अलविदा, मेरे दोस्तों!
पात्र
ज्ञानसिंह (अवस्था ३५ वर्ष)
सल्लो ज्ञानसिंह की पत्नी
सन्तिया ज्ञानसिंह की बहन (अवस्था २४ वर्ष)
मां ज्ञानसिंह की बहरी और बूढ़ी मां
शामो, लाजो ज्ञानसिंह की बेटियां (अवस्था क्रमशः
१६, १२ वर्ष)
कन्तू, मण्टू ज्ञानसिंह के बेटे (अवस्था क्रमशः १०,
वर्ष)
लड़का (अवस्था १२ वर्ष)
बन्तू, सन्तू, गातो, चम्पो ज्ञानसिंह के पड़ोसी
सिपाही नं०१
सिपाही नं०२
{समय-- सायंकाल ५ बजे । पात्रों की वेशभूषा से दन्य टपकता है। वस्त्र सभी के मैले हैं, स्थान-स्थान पर पैबन्द लगे हैं । वस्त्रों से शरीर ढक रहा है बस । जैसे कन्तू की कमीज उसके शरीर के माप से बड़ी है, तो मण्टू की शरीर में मुश्किल से अंट रही है। यही स्थिति अन्य पात्रों की भी है। रंगमंच पर पर्दा पड़ा है। प्रकाश केवल रंगमच के पर्दे के प्रागे के भाग पर पड़ रहा है । यह शहर की कोई सड़क है। लोग प्राजा रहे हैं । बड़े व्यस्त-व्यस्त-से लोग हैं, जैसे किसी को किसी से कुछ भी लगाव नहीं। देखते-ही-देखते किसी की जेय कट जाती है, शोर उभरता है कुछ, पर फिर लोग चलने लगते हैं। एक स्त्री चलते-चलते चीख उठती है --उसका लॉकेट खिच गया। चलते- चलते लोग रुकते हैं, एक-दूसरे को सन्देह-भरी नजरों से देखते हैं, पर फिर थोड़ी देर बाद आगे बढ़ जाते हैं । धीरे-धीरे एक बुलन्द, स्पष्ट आवाज़ पीछे से उभरती है -] "मुझे आप नहीं जानते । नहीं ही जानते । जान भी कैसे सकते हैं ? मैं मामूली-सा एक प्रादमी, व्यक्तित्व में कोई खासियत नहीं । समाज में कोई स्टेटस नहीं । भीड़ में धीरे- धीरे चल रहा हूँ खोया-खोया-सा । सच मानिये, मैं पहले बहुत ईमानदार था। पहले मालिक का सर्टिफिकेट भी मेरे पास है, पर मैने वह नौकरी छोड़ दी। मेरा मन खाना- बदोश जो ठहरा । मालिक ने मुझे रोका, में नहीं रुका और न जाने क्या हुअा कि मेरा ईमान डोलने लगा। दूसरे मालिक का दूध उबालता, एक गिलास दूध स्वयं पी जाता और अलविदा, मेरे दोस्तों!
. - मालिक के दूध में पानी मिला देता। शुरू-शुरू में मेरी आत्मा ने मुझे बहुत धिक्कारा, पर फिर तो आत्मा ने भी धिक्कारना छोड़ दिया। अभी तो दो महीने जेल में रहकर छूटा हूँ। दोप मेरा इतना ही था कि मुझे मालिक की सोने की घड़ी की चैन ने लुभा लिया था। कितने सकल्प किये हैं मैने जेल में कि अब में ईमानदार रहूँगा। कभी भी कोई तुरा काम नहीं करूंगा, पर मेरे संकल्प तो वालू की दीवार बन गये हैं । मेरे मन का शैतान मुझ पर हावी हो जाता है। मैं हार जाता हूं। मुझे लगता है मेरी वदनियती के पीछे मेरी गरीबी रही है। कितनी गरीवी" उफ़ "भीपण गरीवी 'पाप अनुमान नही लगा सकते। सुनिये, क्या आप आज सिनेमा जा रहे हैं ? हां, तो आज मत जाइये न! मेरे घर चलिये, मेरे घर के पास का माहोल देख लीजिये। खून के आंसू बहाती, घुटनों के बल रेंगती-सिसकती ज़िन्दगी से मै आपका परिचय कराऊँगा। आप अगर क्लव जा रहे है, तो आज मत जाइये न ! मेरे साथ चलिये । पाइये भी। देख रहे है ये घण्टाघर से स्टेशन की ओर जानेवाली सड़क, स्टेशन के पास बनी हुई मिट्टी की वीसियों झुग्गियां । यही एक झुग्गी में मेरा घर है । पर्दा उठता है। रंगमंच पर अंधेरा है। फिर वही बुलन्द आवाज धीरे-धीरे उभरती है श्राइये, पाइये, आप तो बहुत ही संकोची हैं। पहले अपने परिवार का परिचय तो करा दूं। (प्रकाश आवाज के साथ- साय घूमता है) ये जो . एक टूटी-सी चौकी पर गठरीनुमा- सी चीज़ रखी हुई है, मेरी मां है-बीमार मां ! जानते है कव से बीमार है ये? (प्रकाश चौकी पर बैठी मां पर केन्द्रित है) पूरे १० वर्षों से अपने बीमार शरीर का बोभा ढोती हुई मेरी ये माँ! मैंने इसे रोज दवा दी है लाकर और दवा से इसे लाभ भी हुआ है। आप कहेंगे दवा कहाँ से लाते रहे ? तो सुनिये, खड़िया और चीनी साथ पीसकर कभी होमियोपैथिक दवा की पुड़िएं बन गयीं तो कभी साने के सोर्ड में नमक मिलाकर वैद्य जी की दवा बना दी। और मेरी भोली मां विश्वास के साथ ग्राज तक उस दवा में लाभ पाती रही है।"पौर देखिये यह जो पंवन्द-लगी गन्दी साड़ी पहने पढ़ी है कुछ सोचती-सी, यह सल्लो है । (प्रकाश एक जिन्दगी बनजारा ।
सल्लो पर केन्द्रित हो जाता है) आप नहीं जानते सल्लो को? मेरी औरत है । ब्याह हमारा कभी नहीं हुग्रा । यूं ही साथ रहने लगे और अब तो यह मेरे चार बच्चों की मां है । ये मेरे बच्चे हैं (प्रकाश बच्चों को प्रोर घूमता है) बड़ी लड़की शामो, छोटी लड़की लाजो और ये बीच में खड़े दो लड़के कन्तू और मण्टू (बच्चे सहमे-सहमे से खड़े हैं) और ये है मेरी क्वारी जवान वहन सन्तिया "शान्ति । (प्रकाश शान्ति को ओर है अब) मुझे इसके लिए वर की तलाश है वर्षों से, पर पेड़ पर तो टॅगे नहीं हैं वर । पैसा चाहिये, पंसा.. और ये है मेरे पड़ोसी सन्तु, वन्तू, गातो, चम्पो । (प्रकाश धीरे-धीरे सब पर घूमता है) आखिर या ही गये याप यहाँ । प्राइये, पाइये, घर चलते है यब । प्रकाश से पूरा रंगमंच भर जाता है। रंगमंच पर दापी भोर एक झुग्गी है फूस की। बीच में दो खाटों को प्राडा-पाड़ा खड़ा करके झोंपड़ी की शक्ल दे दी गयी है। बाघों पोर भी एक झुग्गी है। दायों पोर की झुग्गी के आगे टूटी चौकी है, जिस पर गठरी जैसी प्राकृतिवाली मां बैठी है, लिहाफ़ के नाम पर खाली रूपड़ प्रोढ़े। बीच की झुग्गी और बालों पोर को झुग्गी के लोग झुग्गी के अन्दर नहीं हैं। शायद पाहर गये हुए हैं। तीनों झुग्गियों के प्रागे कुछ बच्चे ढिबलियों से खेल रहे हैं। एक बच्चा टूटी पीपी वजाता है, पर पीपी बजती नहीं। एक बच्चा गुब्बारा फुलाता है, पर वह फूलता नहीं। तभी एकः लड़के का एक रोटी लिये हुए प्रवेश । लड़का : अवे यार ! मजा प्रा गिया । कुत्ते के मुंह से मैंने ये रोटी छीन ली। फन्तू, मष्ट्र तथा और बच्चे रोटो पर टूट पड़ते हैं । लड़का : रोटी मेरो है हरामियों ! मैने कुत्ते के मुंह से छीनी है। एक बच्चा : ला वे, सबको वाँट कर खा । तू ही कैसे खा जायेगा ! कुत्ता तो सबका है। सब रोटी पर टूट पड़ते हैं। लड़का रोटी को दूर उछाल देता है। शान्ति : (दौड़कर रोटो उठा लेती है) खा लूँ मैं? पर नई, में नई खाऊँगी। तुम सब छोटे-छोटे हो। तुमें ज्यादा भूस लगी है। अलविदा, मेरे दोस्तों!
अब मैं बड़ी हो गयी । प्रानो, सबको दे दूं। (वह टुकड़े तोड़-तोड़ कर सबमें बांटती है।) लड़का : देख ले सन्तिया की बच्ची ! मेरी रोटी दे दे, नई तो। शान्ति : नई तो तू मुझे खा जायेगा? (हसती है) ले तुझे सबसे ज्यादा रोटी दूंगी। (आधी रोटी देती है।) लड़का श्राधी रोटी लेकर शान्त हो जाता है। तभी ज्ञानू (जानसिंह) का प्रवेश। सब बच्चे खेलते रहते हैं, कुछ देर बाद चले जाते हैं। रह जाते हैं केवल सन्तिया, शामो, लाजो, कन्तू, मण्टू । ज्ञानू : (मों के पास जाकर जोर से) मो माँ ! कैसी है तू ? गठरी में हरकत होती है। वह उठकर बैठ जाती है। माँ : अरे, तू पा गया ज्ञानू ! मै तो इन्तजार कर रही थी कि तू मेरी दवा लायेगा। ज्ञानू : (जोर से) हाँ मां, और दुनिया के काम चाहे भूल जाऊं, पर तेरी दवा कैसे भूल सकता हूँ? ले, वैद जी ने दी है दवा । (दवा देता है, मां ले लेती है।) माँ : क्या कहवै है वैद ? ज्ञानू : (ऊँचे स्वर में) कहेगा वया, माँ ? दवा दे देता है, बस । ला एक पुड़िया दे दूं । (एक पुड़िया खोलकर मां के मुंह में डाल देता है 1) माँ . कब की पानी मांग रही हूँ इस सन्तिया की बच्ची से, पर यह सुन कव है ? सन्तिया : (जोर से) तू भी खूब झूठ बोल है, माँ ! तूने कव पानी माँगा? पानी लाकर देती है । बुढ़िया अपना एल्मुनियम का कटोरा बढ़ा देती है, और गट-गट पानी पी जाती है। फिर चौकी पर लुढ़क जाती है। ज्ञानू : सल्लो का है ? सन्तिया : भाभी अभी कां पायी है काम पर से । पूरे तीन घण्टे लगते हैं । २ बजे की गयी है, अब ५ बज रये है । आती ही होगी। ज्ञानू अपना झोला खोलता है। डबल रोटी के सूखे टुकड़े चारों बच्चों को देता जन्तु : मण्टू का टुकड़ा बड़ा है, मुझे छोटा क्यो दिया? मण्टू : तुझे मेरी हर चीज बड़ी दिखायी देव है सदा । ज्ञानू : साले, कुत्ते के पिल्ले ! टुकड़े-टकड़े पर मर है। ले शामो, - एक ज़िन्दगी बनजारा लाजो, तू भी ले और सन्तिया, तू भी ले। शामो, लाजो रोटी के टुकड़े ले लेती हैं, किन्तु सन्तिया खड़ी रहती है, आगे नहीं बढ़ती। ज्ञानू : अरी ले, दूर क्यों खड़ी है ? सन्तिया : अव में बड़ी हो गयी। बच्चों को ही दे दे न ! ज्ञानू : और ले, तू बड़ी हो गयी। कब से रे? हरामखोर ! लेती क्यों नहीं? सन्तिया आगे बढ़कर रोटी का टुकड़ा ले लेती है। सन्तिया : सूख गयी रोटी, भय्या ! ज्ञानू : लो और सुनो महारानी की बात ! सूखी ना होती, तो तुझे तो रोटी ही मिलती। सन्तिया झुग्गी में चली जाती है। चारों बच्चे भी इधर-उधर खिसक जाते हैं। सल्लो का प्रवेश। हाथ में थैला है। थैले में से कुछ निकालकर रखती है। शानू : क्या ले आयी रे? सल्लो : अरे, और का लाती? तुझे तो कुछ चिन्ता है नई घर की। थोड़ा-सा मकी का, चने का और गेहूं का मिला पाटा है । सुवह को रोटियाँ संक दूंगी बच्चों के लिए। शानू : और शाम की छुट्टी? सल्लो : धरी तो है डिब्बे में रोटियां । दो तेरी, एक माँ की, सन्तिया की, चार चारों बच्चों की और एक मेरी । ज्ञानू : कुल नौ रोटियाँ ? खानेवाले आठ ! (थोड़ा रुककर) अपन का तो विजनस आज फेल हो गया री, सल्लो ! सल्लो : फेल हो गया? ज्ञानू : हाँ और क्या? सल्लो: कैसे? ज्ञानू : देख ले तू ही । एक परस हाथ लगा, तो खाली और जंजीर निकली लिली गोल्ड की। साले कितने होशियार हो गये है आज के लोग ! सोने के दाम क्या चढ़े कि लोगों ने... सल्लो : नकली सोना पहनना शुरू कर दिया । पर सुन, इसलिए नई, इसलिए शुरू किया कि तुझ जैसे जेवकतरों का डर -जो है। ज्ञान : ए सल्लो ! जवान संभाल कर बोला कर । साली.."हाम- जादी "छिनाल कहीं की ! : एक .. अलविदा; मेरे दोस्तों !
सल्लो : गाली बकनी खूब आती है, तुझे रे ! मैने क्या गलत कह दिया कि तुझे छौंक लग गया ? ज्ञानू : क्या करू सल्लो? कोई रोजगार नहीं है न, इसीलिए ये धन्धा करना पड़ता है । अव की नौकरी मिले तो सच""" सल्लो : अजी तुझ जैसे आदमी का कौन भरोसा? ज्ञानू सल्लो को धोती पकड़कर खींचता है। धोती फट जाती है। ज्ञानू : हाय राम ! तेरी धोती फट गयो, अव क्या पहनेगी? दूसरी तो है भी नई... सल्लो : और क्या करेगा तू ? करने का न धरने का । ले वोल, अव मैं क्या पहनूं ? अरी सन्तिया ! सुनियो बीवी, जरा हमार पिटरिया में से सुई-धागा ले आ । सन्तिया का सुई-धागे के साथ प्रवेश । सन्तिया : ला भाभी ! मैं सी दूं, क्या सीवै है ? सल्लो : ले तू सी दे वोव्बो ! (फटा धोती का टुकड़ा आगे कर देती है।) सन्तिया सल्लो को फटी धोती सौंती है। ज्ञानू बैठ जाता है। अपने झोले में से डबलरोटी का सूखा टुकड़ा निकालकर सल्लो को देता है। शानू : ले तेरे लिए घर रक्खा था हरामी बच्चों से छुपाकर । साले देख लेते तो छोड़ते थोड़ी। सल्लो : अरे बच्चों को ही दे देता। क्या दुवली हुई जा रही हूँ इसके बिना। डबलरोटी का टुकड़ा ले लेती है, खाती है । सल्लो : (खाते-खाते) अरे, तेरे झोले में और क्या है, दिखा तो सई। ज्ञानू : (झोले को छिपाता है) अरे, कुछ भी नई। सल्लो : (बढ़कर झोला छीन लेती है, झोले में से सस्ती शराव की बोतल निकालकर) बोल यो का है ? शानू : तेरी कसम, सल्लो ! यह मेरी नहीं है। यह तो ससुर बकरीदी से पाया रहा। सल्लो : ला में इसे ठिकाने लगा दूं। साने को रोटी नहीं मिलती। - इसे सराब रोज चहिये । (शराब की बोतल फेंकने को होती है।) ज्ञानू : (सल्लो के हाय से बोतल छीनकर) प्ररी छोड़ भी ! कह एक जिन्दगी बनजारा रया हूँ मेरी बोतल नई है। अजीव औरत है। यकीन तो करती ही नई। प्रो सन्तिया, सुन बड़ी ठण्ड है । समुर हवा कित्ती तेज चल रही है। हड्डियां फोड़े डालं है । सर भी बड़ा दुख है री! जरा रामजी को दुकान से एक चाय ला दे। सवन्नो फेंकता है सन्तिया की ओर । सन्तिया : (सिलाई छोड़कर) दूध लियाऊँ ? पत्ती है थोड़ी-सी । माँ भी चाय मांगती थी। बसन्ता की घरवाली रोटी पका रई है । वहाँ वना लाऊँगी। गुड़ भी जरा सा धरा है । जाती है। सल्लो : जवान सन्तिया को अकेले-दुकैले न भेजा कर । मै तुझसे कई वार कह चुकी हूँ। पर एक तू है कि तेरी अकल पर पत्थर पड़ गये। जानू : अरे ले, सन्तिया काम नहीं करेगी तो कौन करेगा? सल्लो : तू जानता है, किसनू इसके पीछे लग जाता है, इसे छेड़ता : ज्ञानू : किसनू छेड़ता है ? साले किसनू का सिर न काट कर फेंक दूंगा । कोई बात है ? नाली का कीड़ा साला ! सल्लो : नाली का कीड़ा किसनू है ? और तू" "सराय तू पिय, जुया तू खेल, चोरी तू कर, जेव तू काट, छोकरियों को तू छेड़े। ज्ञानू : ना, सल्लो ! ऐसी वात मत कह । जब से तू घरवाली वनी, किसी छोकरी को नई छेड़ा, राम कसम ! (कुछ रुककर) तू कहती तो ठीक है। मैं भी नाली का कीड़ा.. हूँ...... सचमुच कीड़ा हूँ...... ..."गन्दा कीड़ तभी तो सब मुझसे घिरना करते हैं । माँ, बच्चे, सन्तिया, पोर तू भी तो........ राल्लो : (थोड़ी नर्म होकर) अच्छा, अच्छा, छोड़ । किसनू से सन्तिया की सादी कर दे। ज्ञानू : किसनू से सन्तिया की सादी ? करेगा किसनू सन्तिया से सादी? सन्तिया तीन हैण्डिल टूटे मग्गों में चाय लाती है। सबको एक-एक मग्गा देती है। ज्ञानू : (सन्तिया से) क्यों री सन्तिया ! सादी करेगी किसनू से... सन्तिया लजाती है, झुग्गी की ओर चली जाती है। अलविदा, मेरे दोस्तों : .. .. सल्लो : सन्तिया से क्या पूछता है ? सन्तिया को ही तो छेड़ता है, किसनू । वह सन्तिया से मौहब्बत करता है। ज्ञानू : मै आज ही साले किसनू से वात करूँगा। अभी जाता हूँ। सल्लो : तू तो हवाई घोड़े पर सवार रहै सदा ! इतनी उतावली की बात क्या है ! कल वात कर लीजो। ज्ञानू : अरी, सुभ काम में देरी नई करनी चाहिये । चाय का खाली मग्गा सल्लो के पास रख देता है, और तीव्र गति से चला जाता है। सल्लो : हाय मेरे राम ! इसके दीमाग में तो बड़ी जल्दी है । गातो और चम्पो का प्रवेश । गातो : अरी सल्लो ! गजब हो गया ! रात ठण्ड में जैकिसन ऐंठ गया, मर गया बेचारा ! सल्लो : अरे राम राम ! बड़ा गजब हो गया यू तो ! चम्पो : अभी गर्मियों में तो ब्याह करके लाया था । गातो : वेचारी परबतिया बीस बरस की होगी वस ! सन्तिया झुग्गी से निकलकर प्राती है। सन्तिया : जैकिसन को तो मैने परसों ही देखा था । परवतिया के साथ धूप में बैठा हँस रया था। गातो : अरी जिन्दगी का का भरोसा ? चम्पो : और फिर हम जैसे लोगों की जिन्दगी..।। सन्तिया : जाड़ों का यह मौसम बड़ा जल्लाद है हमारे लिए। हर साल दो-चार भेंट ले लेता है। सल्लो : पिछले बरस सरवतिया मर गयी थी। गातो : एक सरबतिया क्या? फुलमतिया, बनारसी, सब जाड़ों में ठण्ड खाकर ही मरे हैं। चम्पो : अरी गर्मी प्राव तो लू चलें । यादमी लू खा जावै तो भी बचना मुस्किल । सन्तिया : बरसात में झुग्गियां गिर जावं हैं । यहाँ-वहाँ दौड़ते फिरो। ऐसे जीने से तो मौत भली। सल्लो : बरसाती कीड़ों का डर क्या कम रहवं है । गातो : पास के खेतों से रेंगते हुए सांप मा जावं झुग्गियों में । सल्लो : सन्तिया ! मै तो परवतिया के पास जाऊँ हूँ। तू यहीं रहियो। गातो : चल, में भी चलू हूँ। चम्पो : हाँ, हाँ, तीनों जनी चलेंगी। जरा मुंह में तो एक बूंद पानी .. एक जिन्दगी बनजारा डाल लूं। चम्पो वीच याली झुग्गी में चली जाती है। गातो बायीं ओर की झुग्गी में प्रवेश करती हैं। सल्लो उठती है, अंगड़ाई लेती है । चारों बच्चों का प्रवेश । कन्तु : (चाय के खाली मग्गों को देखकर) में भी चाय लूंगा, माँ ! सल्लो : बच्चे चाय नहीं पीते, बेटा ! लाजो : भूख लगी है, मां ! सल्लो और सन्तिया झुग्गी में जाती हैं। सन्तिया झुग्गी के अन्दर से रोटी का डिब्बा लाती है और सबको एक-एक रोटी देती है । सब बच्चे खाने लगते सन्तिया : (मां के पास जाकर जोर से) ले माँ ! तू भी रोटी खा ले। माँ : प्ररी, पहले सहारा दे दे, मोरी पै जाऊँगी पहले। सन्तिया बुढ़िया मों को सहारा देकर उठाती है। मां हांफ-हाफ कर सन्तिया का सहारा लेकर रुक-रुक कर चलती है। बैठ जाती है एक कदम चलकर । सन्तिया उठाती है, बुढ़िया फिर चलती है। माँ : भगवान् भी छांट-छांट कर लेवे है । मरी मुझकू ही मौत ना पाती। सन्तिया : (जोर से) ओ माँ ! ऐसा मत बोल । तू नहीं जानती तेरा कितना मां : अरी सबको दुख दे रई हूँ मैं । सन्तिया के सहारे माँ बायीं ओर को झुग्गी के पीछे चली जाती है। शामो : मोरी लाजो ! (डिब्बे की रोटी की पोर संकेत करके) लेगी पह रोटी? .. लाजो : (रोटी गिनती है) एक''दो तीन.. मण्टू : दो रोटी वप्पा की हैं और एक दादी की। तू क्यों लेती है री शामो! शामो : भूख बड़ी जोर की लगी है रे ! सब बच्चे सारी रोटियां खा जाते हैं। कन्तू : पानी दे री, लाजो ! लाजो : है ना बड़ा नबाब ! पानी भी लेकर नई पी सकता? मण्टू : तू ही दे देगी तो क्या बिगड़ जायगा ? मलविदा, मेरे दोस्तों!
शामो : हम क्यूं देव ? तेरे हाय क्या पीछे को लगे हैं ? कन्तू : वेसरम.कहीं की !..... लाजो : वेसरम कहेगा, बोल ? (धप्प जमाती है कन्तू के) चारों बच्चे प्रापस में गुंध जाते हैं । मार-पीट होने लगती है। झुग्गी में से सल्लो का.प्रवेश । सल्लो : अरे मरो ! क्यों लड़ रहे हो ? एक-दूसरे को देख नहीं सकते, कमबखत कहीं के ! सल्लो एक-एक चांटा सबको रसीद कर देती है। बच्चे गाली देते हैं। बच्चे : (एक साथ सल्लो को) साली 'हराम मारती है हमें । सल्लो : मुझे गाली देते हो! माँ को गाली ? मारने को दौड़ती है, बच्चे भाग जाते हैं। सन्तू, बन्तू का प्रवेश । सन्तू : अरी सल्लो:! गजब हो गया ! राम राम ! ... सल्लो : (घबरा फर) क्यों क्या हुआ रे ? वन्तू : ज्ञानू ने किसनू को मार डाला। सल्लो : हाय राम ! हाय, मै.क्या करूं ? अरे, ये कैसे हुआ रे ? सन्तू : ज्ञानू किसनू से कह रहा था कि सन्तिया से सादी कर ले। सल्लो : (रोती है)। बन्तू : किसनू ने साफ मना कर दिया कि ऐसी लड़की से सादी कैसे करेगा, जो सड़कों पं आवारा घूमै है, जिसके घरवाले दहेज नाही दे सके हैं ! रान्तू : जानू ने गुस्से में किसनू के सिर पर लाठी मार दी. यह कहते हुए" वन्तू : साला मोहब्बत करेगा सन्तिया से और सादी करेगा जो साथ में दहेज लायगी। सन्तू : और किसनू वही देर हो गया। सन्तिया का दौड़ते हुए प्रवेश । सन्तिया : भाभी, यह क्या कर डाला भय्या ने ? सल्लो : (रोती है) उसके सिर पर खून सवार हो गया। उसने किसनू को मार डाला। तेरे किसनू को, सन्तिया ! तेरा किसनू तुझसे मोहब्बत नई करता था। तुझसे सादी करने को उसने मना कर दिया । इमीलिए...। सन्तिया : भय्या ने किस को मार डाला "(रोतो है) मच्छा ही किया एक जिन्दगी बनजारा : भय्या ने। किसनू झूा था। मक्कार था। मेरी अस्मत से खेलना चाहता था। लुटेरा कहीं का ! भय्या ने बहुत .अच्छा किया। किसनू गुण्डा था.' ...किसनू गुण्डा था.. भय्या नई मारते तो मैं मार देती.. उसे । किसनू झूग था. साला हराम''सोर ! गातो चम्मो झुग्गी से निकल पाती हैं। चारों बच्चों का भी प्रवेश। दामो : माँ, वप्पा ने किसनू को मार डाला । लाजो : पुलिस बप्पा को पकड़कर ला रही है । कन्न : उसके हाथों में हथकड़ियां पड़ी हैं । मण्टू : पुलिस उसे जेल ले जायगी। सन्तिया : ज्ञानू भय्या को फांसी हो जायगी। ज्ञानू भय्या अब हम लोगों के बीच में नहीं आयेगा (रोती है)। सल्लो : (सुबकती है) अब हमारा कोई नई रया (रोती है)। सन्तिया : रो मत भाभी, रो मत ! भय्यां ने बहुत अच्छा किया। किसनू गुण्डा था' कहता था मन्तिया नू मेरी औरत बन जा। मैं तुझे गहना बनाऊँगा, तुझे साड़ी लाकर दूंगा । मक्कार कही का! अपने किये का फल पा गया । बार्थी मोर को झुग्गी के पीछे से मां का घिसटते .. हुए प्रवेश। मा : अरे मेरे भानू को छोड़ दो । मेरे ज्ञानू को छोड़ दो रे ! पुलिस के दो सिपाही ज्ञानू के हाथों में हथकड़ियां डालकर लाते हैं झुग्गी के प्रागे से । सल्लो : अरे मेरे मनई को छोड़ दो, उसने कुछ नई किया कुछ नई किया। दौड़कर ज्ञानू के पांव पकड़ लेती है । सन्तिया ज्ञानू के पास प्रा जाती है, बच्चे भी । घिसट-घिसट कर मो भी वहीं पा जाती है। सन्तू, यन्तू, गातो, घम्पो भी पास प्रा जाते है। सिपाही सब पर डण्डा चलाता है। सिपाही नं० १ : हटो, हटो, हरामियों ! यह खूनी है । सिपाही नं० २ : इसने वेकसूर किसनू का खून किया है । सब सिसकते हैं। सिपाही नं. १ : इसे फांसी हो जायगी । सिपाही नं० २ : इसका गुनाह बहुत बड़ा है । अलविदा, मेरे दोस्तों!
सब लोग रोते हैं।
पर्दा गिरता है। पर्दा गिरने पर वही सड़क दिखायी
देती है। लोग वैसे ही प्रा-जा रहे हैं । पृष्ठभूमि से
धोरे-धीरे वही बुलन्द आवाज उभरती है ।
आपने देख लिया न ! मेरा घर, मेरे बच्चे । मैं जा रहा
हूँ। मेरो दो रोटियां अब मेरे बच्चे खा सकेंगे। आप कैसी
नजरों से मुझे देख रहे हैं ? आप भी मुझे बुरा समझने लगे
है । पर मैं सचमुच बुरा नहीं हूँ। किसनू जैसे आदमी से
में चिढ़ता हूं। साला कहीं का, कमीन... ! मैंने उसे मार
डाला मार डाला..
.."मुझे फाँसी हो जायगी अब, पर मेरी
माँ को अब कौन दवा लाकर देगा? मर जायगी मेरी मां...
मर जाएगी। सन्तिया से कोई ब्याह नहीं करेगा। सल्लो
.."धेचारी सल्लो 'अव कहाँ जायेगी ?.. मैं जा रहा हूँ...
मुझे इतनी घृणा भरी नजरों से आप क्यों देख रहे हैं ?
सचमुच में बुरा आदमी नहीं हूँ।
मुझे बुरा बना दिया आपने, समाज ने, मेरी ग़रीबी ने ।
सच दुनिया का सबसे बड़ा पाप है-गरीब होना । मुझे
माफ़ कर देना। यह मेरी आवाज़ थी-मेरे अन्दर
की आवाज थी, जो आप सुन रहे थे। में जा रहा हूँ।
अलविदा, मेरे दोस्तों!
एक जिन्दगी चनजारा
८ ओ रे ओ सहयात्री !
पात्र
सुजाता एक नवयुवती, किसी डिग्री कॉलिज में
प्रवक्ता
लज्जा सुजाता की समवयस्का सखी
शम्भू सुजाता का नौकर (प्रवस्था ५० वर्ष)
सावित्री सुजाता की मां (अवस्था ४५ वर्ष)
निर्मल सुजाता का पति
[स्थान-गुजाता का ड्राइंग रूम । सामने दायों पोर एक खिड़की है, जो सड़क की ओर खुलती है । खिड़की में हरे रंग का पर्दा लगा है। सामने की दीवार पर बीच में एक बड़ा चित्र टंगा है। इधर-उधर दो छोटे चित्र हैं । बीच में सोफ़ा सेट है। सोफा सेट के बराबर में दो साइड टेबिल्स और बीच में एक लम्बी मेज़ है । बाहर जाने का रास्ता बायीं ओर है और दायीं ओर से घर के प्रांगन में प्रवेश होता है । सोफ़े के बरावर को दायीं ओर वाली साइड टेबिल पर फ़ोन रखा है। पास ही एक ईजल पर अधूरी पेण्टिग लगी है । एक ऊँची टेबिल पर रंग खुले रखे हैं । : ममय-प्रात.काल १० के लगभग । पर्दा खुलता है । स्टेज साली है। फोन को घण्टी लगातार बज रही है। । मुजाता का शीघ्रता से प्रवेश । सुजाता की प्राकृति आकर्षक है । उसको वेशभूपा सुरुचिपूर्ण है। लगता है वह कही जाने को तैयार । सुजाता फ़ोन उठाती है। है सुजाता : (फ़ोन पर) हलो ७३७१६."सुजाता स्पीकिंग । (कुछ एककार) अरे लज्जा ! तू? कब लौटी लन्दन से? कैसी है ? (कुछ रुककर) आ रही है न? कम-से-कम एक खत तो लिख देती, मैं पालम पहुँच जाती । ...."हूँ''हूँ... नही, मैं नहीं सुनती तेरी बातें । तू पा यहाँ, तभी बातें होंगी। ' सावित्री का प्रवेश । सावित्री : किसका फ़ोन था, वेटी ? ' सुजाता : लज्जा का । लन्दन से आज ही आई है सुबह चार बजे । । मो रे ओ सह्यात्री ! '३६ सावित्री : ग्रच्छा हुआ, लज्जा पा गयो। तू अकेली वोर होती थी। अय तेरा मन लगा रहेगा । (कुछ रुककर) वेटी ! काली बाड़ी हो पाऊँ जरा । अखण्ड कीर्तन हो रहा है वहां कल से । सुजाता : हो आयो, मां ! पर जल्दी लौटना । लज्जा पाती होगी। सोफे पर श्राफर बैठ जाती है, और अखबार की सुखियां देखती है। फिर अधूरी तस्वीर में रंग भरने लगती है। सावित्री : हाँ २०-२५ मिनट में ही आ जाऊँगी (अन्दर से चादर लाती है, पोड़कर फिर बायें दरवाजे से बाहर निकल जाती है । एक मिनट बाद ही फिर लौट पाती है।) सावित्री : देखियो सुजाता ! किसका खत पाया है ? सुजाता खत लेती है, पहले हैण्डराइटिंग को गौर से देखती है, फिर सोलकर पढ़ती है। सावित्री : किसका खत है, वेटी ?. सुजाता : उन्ही महाराज का, मां ! सावित्री : क्या निर्मल का खत है ? (उत्सुकता से) क्या लिखा है ? सुजाता : पढ़ने दो, मां ! लम्वा खत है। सावित्री लाचार-सी सोफे पर बैठती है सुजाता : ११ बजे तशरीफ ला.रहे हैं जनाव आज, मां ! सावित्री : (खुश होकर) निर्मल पा रहा है ? (फिर अचानक धीमे स्वर में) इस बार झगड़ा मत करियो, बेटी! पति अाखिर पति ही है ! जाने कब क्या कर बैठे? हम औरतों को थोड़ा झुकना ही चाहिये । सुजाता : मुझे उपदेश मत दो, माँ ! मुझे क्या करना है, मै जानती हूँ। निर्मल को वापिस लौटना होगा । अब कोई जगह यहाँ वाकी नहीं है निर्मल के लिए। सावित्री : (समझाते हुए) ना, वेटी ! ऐसा मत कह । औरत के लिए यह दर्प-यह अभिमान ठीक नहीं। सावित्री का अन्दर प्रस्थान । बायें द्वार से शम्भू का प्रवेश । हाय में सब्जियों से भरी टोकरी है। शम्भू : (सुजाता से) ग्राज क्या बनाऊ, बेटी ? शिमला मिर्च हैं, कटहल, मालू, प्याज, टमाटर और लोको। सुजाता : प्राज उर्द की दाल बनाना, दादा ! कटहल के कोपते, शिमला मिर्च भरवां, ""और वाममती चावल की खीर। सम्भू पर"पर तुम्हें तो उद.को दाल अच्छी नहीं लगती। जब एकः जिन्दगी बनजारा ... . कहती ही हो तो वनाऊँगा। अन्दर की ओर प्रस्थान । सुजाता : मैने शम्भू दादा से उर्द की दाल बनाने को कहा है। उदं की दालं निर्मल को बहुत अच्छी लगती है। नहीं." 'उर्द की दाल नहीं बनेगी शम्भू दादा....... "शम्भू दादा....."उर्द की दाल मत बनाना। मूंग की दाल बनाना । शम्भू का प्रवेश । शम्भू : क्या कहती हो, विटिया ? मूंग की दाल ? (हँसता है) तुम कुछ मत बाहो, मैं खुद बना लूंगा । यह मेरा सरदर्द है, अब ! शम्भू का प्रस्थान सुजातां खड़ी होती है । खिड़की को प्रोर बढ़ती है। खिड़की का पर्दा एक ओर खिसका देती है । थोड़ी देर खिड़की से बाहर की अोर झांकती है, फिर अधूरी तस्वीर बनाने में लग जाती है। तस्वीर में उसका ध्यान नहीं लगता, तो फिर सोफे पर पाकर बैठ जाती है । प्रखबार उठाती है । जोर से अखबार मेज पर पटक देती है। निर्मल का खत उठाती है, जोर-जोर से पढ़ती है, कुछ रुक-रुककर । सुजाता : "हम लोग अपने..... अपने......"अभिमानों में दरख्त के ठूठ-से अलग-अलग खड़े हुए हैं, सुजाता ! अजनबी-से, जैसे एक-दूसरे को जानते ही न हों। मुझे लगता है तुम्हारे शब्द-कोश में 'क्षमा' शब्द है ही नहीं। सुबह का भूला यदि साँझ को घर लौट आये, तो उसे भूला नहीं कहते, पर.. पर "तुम भूले पथिकः को घर लौटने हो नही देती। ऐसी निर्मम मत बनो, सुजाता! तुम्हारी जिन्दगी को मैने उजाड़ने का पाप किया था, अफ़सोस है, पर उसके लिए इतनी बड़ी सजा मुझे मत दो। बहुत सज़ा भोगी है, मैने सुजाता ! आशा है मुझे तुम माफ़ कर दोगी। दर्प को इन दीवारों को तोड़ दो, तोड़ दो, सुजाता पत्र रख देती है, खड़ी हो जाती है। इधर-उधर घूमती है। सुजाता : दर्प की दीवारों को तोड़ दूं? अपने ... अपने अभिमानों दरख्त के ढूंठ-से हम अलग-अलग खड़े हुए हैं। नही..."नहीं, निर्मल ! 'तुम यहां आने का दुस्साहस कैसे कर रहे हो ? तुम्हें शर्म नही ग्राती ? तुम इन्सान नहीं यो रे प्रो सहयात्री! .. ! " हो..."हैवान हो..... हैवान..." तेजी से बाहर की ओर प्रस्थान । एक मिनट स्टेज झाली रहता है। सावित्री का प्रवेश। पीछे-पीछे शम्भू प्राता है । सावित्री सोऊं पर बैठ जाती है। मावित्री : शम्भू दादा ! क्या होगा? मेरा मन काँप रहा है । अाखिर निर्मल कितना झुकेगा? यह लड़की तो..." (इधर-उधर देखकर) कहाँ चली गयी? अपने ग्राप लोट पायेगी। शायद बाजार चली गयी है। शम्भू : बड़ी गहरी चोट बिटिया के मन पर लगी है, मलकिन ! क्या कमी रही हमार बिटिया में, जो निर्मल बाबू उस कुलच्छनी डाक्टरनी के पीछे चल दिहिन । हमार बिटिया उससे लाख दर्जे सुन्दर और गुनवन्ती रहिन । सावित्री : मर्द का मन तो भौरा होता है, शम्भू दादा ! स्त्री बेचारी क्या करे? उसे तो सहना पड़ता है । कितने प्यार से लड़की को मां-बाप पालते हैं ! कैसे लाड़ से ब्याह रचाते हैं अपनी लाड़ली का, पर भविष्य में क्या लिखा है कौन जानता 1 - शम्भू : मालिक तो लड़कों से बढ़कर विटिया को मानत रहे, क्या हम देखित नाही रहिन । सावित्री : अाज लगता है, शम्भू दादा !' 'अच्छा हुआ वे समय से पहले ही चले गये। अाज होते तो क्या देख पाते इतना बड़ा दुख ? (स्वर भारी हो जाता है) मेरे ही पिछले पापों का फल मेरी बेटी भुगत रही है। अब तो ऐसा लगता है." (ऊपर देखकर) हाय भगवान् ! यह क्या किया तूने ? शम्भू : जो न दुखायो मलकिन ! भगवान् सबका है। बारह बरस वाद तो कूड़ी के भाग भी जाग जावै। हम तो आदमी हैं । अच्छा हम जात हैं। अन्दर की ओर प्रस्थान । लज्जा का प्रवेश । लज्जा एक सुन्दर युवती है, वेश- भूपा से आधुनिक लगती है। सावित्री (खड़ी होकर) प्रानो.बेटी लज्जा ! कसी हो गयी है अरे तू ! पहचानी भी नहीं जाती।. लज्जा : (माँ के पांव छूकर) मोटी हो गयी हूँ न, माँ.! सावित्री : घत् पगली ! ऐसे थोड़े ही कहते है। लज्जा का हाथ पकड़कर सोफे पर लाकर बैठाती है। -२ एक जिन्दगी बनजारा . लज्जा : सुजाता कहां है ? मैने तो फोन कर दिया था। सावित्री.: आती ही होगी। बाजार तक गयी है। कुछ सामान खरीदना है उसे । निर्मल आनेवाले हैं। लज्जा.: यह क्या हुया, मा.? निर्मल बाबू मौर सुजाता तो दोनों ही एक-दूसरे को पसन्द थे। दोनों की इच्छा से ब्याह हुआ था। दोनों साथ-साथ पढ़ते थे, तभी से......... सावित्री : सब किस्मत के खेल हैं, बेटी! और फिर सुजाता भी तो नहीं मानती। निर्मल..आ रहे हैं, तो यह नादान लड़की अपना अलग दर्प लिये बैठी है । (कुछ रुकफर) अरे, तू क्या अकेली यायो है ? बच्चे और भुवन बाबू कहाँ हैं ? लज्जा : वे इस बार नहीं आये। मेरा मन उचट रहा था, अकेली ही या गयी। सावित्री : मन तो उचटता ही है। पराया देश, पराये लोग । कभी- कभी तो अपनों की याद याती ही है । लज्जा : सुजाता के लिए मेरा मन बहुत तड़पता है, माँ ! बेचारी ....."लड़की! किस जन्म के पापों का फल भोगना पड़ रहा है उसे ? सावित्री : क्या करें, बेटी ? लाचारी है यहाँ तो। सुजाता का प्रवेश। पीछे-पीछे रिक्शावाला हाथ फलों के थले, छः कोकाकोला की बोतलें लेकर पाता है। सावित्री उठती है, रिक्शेवाले से सब सामान लेकर मेज पर रखती है। सुजाता दौड़कर लज्जा से चिपट जाती है। सुजाता : आ गयी तू ! मैने सोचा कुछ खरीद लाऊँ ! तू पा रही है। दोनों साथ बैठकर कोकाकोला पियेंगे । लज्जा.: घरे भाई, में तो ठण्डा लेती ही नहीं, गला खराब हो जाता है। कॉफ़ी लूंगी। सुजाता : (सावित्री से) मा.! दो कप कॉफ़ी शम्भू दादा से बनवाकर भिजवा दो। सावित्री का प्रस्थान । दोनों सहेलियाँ पास-पास बैठ जाती हैं। रिक्शावाला खड़ा रहता है। रिक्शावाला : बीबी जी ! सुजाता : अरे में तो तुझे पैसे देना भूल ही गयो। हाँ कितने पैसे देने हैं ? एक रुपया न? रुपया निकालकर देती है। रिक्शावाला सलाम प्रो रे यो सहयात्री! १०३ r - 1.
-- । करके चला जाता है। सुजाता फिर लज्जा के पास प्राकर बैठ जाती है। दोनों कुछ देर चुप रहती हैं। लज्जा : यह क्या कर डाला अपनी हैल्य का, सुजाता? कैसी हो गयी है तू गम्भीर-गम्भीर-सी? कल की चहकती बुलबुल अाज एकाएक खामोश कसे हो गयी इतनी ? सुजाता : लुट गया पाशियां, 'निशा बाकी है। शम्भू का प्रवेश । ट्रे से दो कप कॉफ़ी निकालकर । सुजाता और लज्जा की ओर बढ़ाता है और नाश्ते को प्लेटें मेज पर रख देता है। शम्भू : (लज्जा से) कैसी हो लज्जा विटिया? हम सब लोग तो तुम्हें बहुत याद करत रहिन । लज्जा : अच्छी हूँ, शम्भू दादा ! बड़ी जल्दी कॉफ़ी बन गई? शम्भू : अरे, हम पहले से ही काफी फेटत रहिन तोहार हम जानत हैं कि तू ठण्डा नाहीं पियव । . शम्भू का प्रस्थान । 'दोनों सहेलियां कॉफ़ी सिप 1 करती हैं । सुजाता बिस्कुट की प्लेट लज्जा की ओर बढ़ाती है । लज्जा एक बिस्कुट उठाती है । सुजाता : शम्भू दादा कॉफ़ी अच्छी बनाते है ।। 1, लज्जा ही बहुत अच्छी बनी है कॉफी । अच्छा यह तो बता ऐसे 'कव तक चलेगा? अब जब निर्मल बाबू लौट रहे है, तो तू अपने अभिमान में चूर है, माँ कह रही थी। ऐसा न कर, 'सुजाता! सुजाता : क्या करू, लज्जा में निर्मल को भूलना चाहती हूँ। उसके द्वारा बनायी गयी अतीत की हर तस्वीर को मिटा डालना 'चाहती हूँ। पर..."पर" "मेरा अतमन......कितनी लाचार हूँ लज्जा, मैं ? मेरा अन्तर्मन जितना ही निर्मल की ओर झुकता है,' वाह्य उतना ही नफ़रत की आग में सुलगने लगता है। लज्जा : तेरी स्थिति स्वाभाविक है। पुरुष औरत को माटी की 'मूरत बनाकर पाले में सजाकर रख देना चाहता है और भूल जाता है कि इस पत्थर की मूरत के पास भी दिल है... दिल मे अछूते प्यार की भूख है..."निर्मल वायू ने जो कुछ किया, बहुत बुरा किया, पर तू.... अव... । सुजाता : मान छोड़ दे। यही न ? नहीं, नहीं, मुझसे यह नहीं होगा। में निर्मल से घृणा करती हूँ "घृणा करती है। एक जिन्दगी बनजाग T - 1" - .
., खज्जा : यह नैचुरल स्टेट नहीं है तेरी, सुजाता ! तू निर्मल को नही भूल सकती..... नही भूल सकती। सुजाता : मैं निर्मल को भुला दूंगी, उसकी हर निशानी को मिटा डालूंगी..."यादों का एक एक दाग। लज्जा : यह तूं नहीं बोल रही....तेरा दर्प बोल रहा है, सुजाता! सुजाता सुबकती है, मुंह छिपाकर अन्दर चली जाती है। तभी एक छोटी अटैची लिये निर्मल का प्रवेश । लज्जा की पीठ यायों ओर है । यह देख नहीं पाती। निर्मल स्तम्भित-सा खड़ा रहता है। प्रटची धीरे-से रख देता है । सुजाता कुछ अस्त-व्यस्त मुद्रा में दायों ओर से प्रवेश करती है । निर्मल : सुजाता ! मैं आ गया हूँ। सुजाता : सो तो देख रही हूँ। तशरीफ़ रखिये। . लज्जा खड़ी हो जाती है। लज्जा' : बहुत दिनों 'वाद मिल रहे है, निर्मल वाबू ! पहचाना आपने ? मै लज्जा हूँ। निर्मल : प्रोह लज्जा जी! आप तो लन्दन थी। लज्जा : हो आज ही लौटी हूँ । आज शाम को आप दोनों मेरे घर ग्रा रहे हैं ५ वजे । 'मै प्रापका इन्तज़ार करूंगी। जरूर .... जरूर पाना है। निर्मल : (सुजाता को ओर देखता है।) सुजाता : नही लज्जा'! इन्तार न करना । पर तुम कुछ देर रको तो। खाना खाकर जाना । अभी तो कुछ बातें भी नहीं की। लज्जा नहीं,"नहीं, मैं इन्तजार करूंगी। तुम दोनों को पाना है । वहीं बातें होंगी। लज्जा का बाहर की ओर प्रस्थान | सुजाता किंकर्तव्य- विमूढ़-सी खड़ी रहती है। निर्मल विस्फारित नेत्रों से सुजाता को देखता रहता है । निर्मल : बैठो सुजाता! सुजाता : माप वैठिये । मां को आपके पास भेजती हूँ। सुजाता का द्रुतगति से प्रस्थान। सावित्री का प्रवेश पीछे-पीछे शम्मू एक बड़ी प्लेट में सेब, प्राम और केले, तया परीघ कोकाकोला को दो बोतलें लेकर पाता है और मेज पर रख देता है। मा र प्रो महयात्री! - ..
: निर्मल : (सावित्री को देखकर खड़ा होता है और हाथ जोड़कर) प्रणाम माँ ! और शम्भू दा, पापको भी। शम्भू और सावित्री : (एक साय) जीते रहो । बैठो बेटा ! निर्मल : शम्भू दा ! सुजाता को भेज दो। शम्भू : (जाते-जाते) बेटी सुजाता अपने हाथों से तुम्हारी पसन्द की ये चीजें लायी है। शम्भू का प्रस्थान । - सावित्री ; कसे हो बेटा? निर्मल : (कोको हंसी हंसकर) ठीक हूँ, माँ ! मुझे मापने माफ़ कर दिया होगा.। मुझे सचमुच अपने किये पर बड़ा अफसोस है.। जिस सोने को पीतल समझकर मैं उपेक्षा करता रहा, वह तो असली था और पीतल पर पालिश की हुई चमक के पीछे में दौड़ता रहा । आज मेरी आँखों के ऊपर जो पर्दा पड़ा हुआ था, वह हट गया है, माँ ! सावित्री : वेटी वालों की समाज में बड़ी खराब दशा है, वेटे ! बेटी को घर मे रखो तो चूहे खाते हैं, बाहर भेजो तो कुत्ते नोचते हैं। तुमने मणि को नाली में फेंक दिया और कांच के मोतियों की माला पिरोते रहे । तुमने बहुत बड़ा अनर्थ कर डाला, बेटा! निर्मल : वस करो, मां ! पिछले घावों को मत कुरेदो । रिसने लगेंगे तो नासूर बन जायेंगे । सुजाता का प्रवेश सुजाता : और जिसके रिसते घाव नासूर बन चुके हैं, उसकी क्या दवा लाये है, आप ? (निमल के पास आकर कठोरता से) बोलिये.... बोलते क्यों नहीं है आप,? सावित्री : शान्त हो वेटी ! रोप मत कर। सुजाता : रोप न करूं ?. मजबूरी और विवशतानों के उफनते हुए सैलाब में लावारिस भटकती छोड़ दिया गया मुझे और अब कहा जा रहा है रोप न करूं ? ""नहीं"नहीं, पाप जैसे आये है, वैसे ही लौट जाइये । आपके लिए यहां कोई जगह नहीं है......" निर्मल : (शीश झुका लेता है।) सावित्री : ऐसा मत.कर, बेटी, ! निर्मल को अपने किये पर बहुत अफ़सोस हो रहा है। -सुजाता : अफ़सोस हो रहा है अाज ! (ध्यंग से) मैडम डॉक्टर के - एक जिन्दगी बनजारा साथ रास रचाते अफ़सोस नही हुआ, मुझे राजरानी से भिखारिन बनाते अफ़सोस नहीं हुअा? वह दिन भूल गये, जब मैं आपके द्वार पर दस्तक देते-देते लौट आयी थी, पर अापके दरवाजे बहरे हो गये थे मेरे लिए और आज आप मेरे घर में मेरी विना इजाजत के घुस आये हैं। बोलिये कैसा सलूक करूं आपके साय?. सुजाता का प्रस्थान । सावित्री : उसकी कही बातों का बुरा मत मानना, बेटे ! दहकते अंगार तो धीरे-धीरे ही बुझेगे। जो आग तुम्हारी लगायी हुई है, उसे समय ही धीरे-धीरे ठण्डी करेगा। निर्मल : (प्रांखों से आंसू पोंछता है) मेरे लिए क्या कहती हो, माँ ? सावित्री : निर्मल बेटे ! सुजाता तुम्हें अब भी प्यार करती है । तुम्हारे लिए ही उसने उर्द की दाल बनाने को शम्भू दादा से कहा है । तुम्हारी पसन्द की चीजों को आज भी उसे पूरी-पूरी जानकारी है। कोकाकोला, सेब, आम... कटहल के कोफ्ते, शिमला मिर्च, बासमती चावल की खीर... धीरे-धीरे ठीक हो जायेगा सुजाता का मन भी । सावित्री का प्रस्थान । निर्मल खड़ा होता है। सामने को दीवार में लगे 'चित्रों को गौर से निहारता है। ईजल पर लगी अधूरी तस्वीर को देखता है, और धीरे-धीरे उस तस्वीर को पूरी करने के लिए भागे बढ़ता है। सुजाता का प्रवेश । सुजाता : तो अधूरी तस्वीर को पूरी किया जा रहा है । इन तस्वीरों को देखकर भी क्या तुम्हें नहीं लगा कि अकेलेपन का अहसास....कितना बोझिल बना देता है इन्सान को.. तुम क्या जानो? तुमने अकेलापन भोगा हो, तब न ! निर्मल : भोगा है, सुजाता ! बहुत भोगा है। जीवन को हर रात तुम्हारी यादों से भीगी है। हर सवेरा तुम्हारी कल्पनामों से नम हुआ है । हर दोपहर तुम्हारे विरह से तपी है। सुजाता : (व्यंग से) तो कविता करनी भी सीख ली है अय? निर्मल : सीखी नहीं है, सिखा दी है तुमने । सुजाता : (जोर से) मुझे ये चापलूसी बिल्कुल पसन्द नहीं है, निर्मल बाबू ! माप चले जाइये यहाँ से । मेरी शान्ति को भंग करने का अधिकार अब आपको नहीं रहा । .. मो रे मी सह्यात्री! १०७ निर्मल : मुझे माफ़ करो, सुजाता ! मुझे गुमराह करनेवाली जड़ था-सा ! उस जड़ को मैने जड़ से उखाड़कर फेंक दिया है । आज मेरे पास केवल दिल है, इन्सान का दिल । मेरी आँखें खुल गयी है। सुजाता : और आपका हैवान दिल ? आप भी खूव है ! दिल न हुआ क्रिकेट की गेंद हो गया । कभी हैवान तो कभी देवता" कभी इन्सान तो कभी...... निर्मल : मेरी वेवसी का नाजायज़ फ़ायदा मत उठायो, सुजाता ! अन्धेरों ने मुझे कितना गुमराह किया है ? कब से अन्धेरों से उजालों में पाने के लिए मेरा मन भटक रहा है। कितनी वार कितनी 'वार''तुम तक...'पाकर..." सुजाता : और वेचारे उजाले ही कसूरवार हैं। उन्होने आपको आगे नहीं बढ़ने दिया। दरवाजे बन्द कर लिये। यही न? (हंसती है) आप भी खूब हैं !, निर्मल : तुम्हारा दुःख बहुत बड़ा है, सुजाता! तुम्हारे दुःख की कहानी इस कमरे की हर तस्वीर कह रही है । (किनारे की तस्वीर के पास जाकर) ये नदी का खामोश किनारा।...... किनारे पर बैठी एक स्त्री-प्राकृति'..."डूवता सूरज, झुकती साँझ .."यह और कोई नहीं, तुम हो सुजाता तुम हो । (दूसरे किनारे की तस्वीर को पोर बढ़ता है।) यह ....."अन्धेरी रात के पालम में यादों के दिये जलाये बैठी तुम हो, तुम" 'सुजाता वीच का बड़ा चित्र...... सुजाता : (हंसकर) बस करिये, महाशयं ! आपके दिमाग का यह दिवालियापन अब भी नहीं गया। हर वरवाद तस्वीर की नायिका में आप मुझे ही टटोलने लगे हैं । यह भी खूब रही ! मेरी स्थिति के सबसे अच्छे व्याख्याता शायद प्राप और यह .. . .. निर्मल : दर्प की दीवारों को तोड़ दो, सुजाता ! हम दोनों के बीच की ये दीवारें हम दोनों के बीच में खाई पंदा कर देंगी। शम्भू का प्रवेश। शम्भू : साना मेज़ पर लग गया है, बिटिया ! दोनों पा जानो। साम्भू का प्रस्थान। सुजाता : हो जाना तो है ही आपको। खाकर ही जायें। सुबह के भूसे हैं । कोकाकोला भी रया ही रह गया । किसी ने खोल एक जिन्दगी बनजाग कर भी नहीं दिया। निर्मल कोकाकोला की बोतलें उठाकर खोलता है, सुजाता को और बढ़ाता है, पर सुजाता नहीं लेती। .. सुजाता : समय-समय का फेर है । सेठ रतनचन्द्र का एकलौता दामाद अपने हाथ से बोतल खोलकर पी रहा है। निर्मल : और कुछ बाक़ी हो तो वह भी कह लो, सुजाता ! में सुनने के लिए तैयार हूँ। सुजाता : (लाचार-सो कुर्सी पर बैठ जाती है) कभी आपने सोचा ? कितने दुखों से दामन भरता गया है मेरा, और अब तो दामन इतना भारी हो गया है कि.... निर्मल : अपने दामन के दुखों को मेरी झोली में डाल दो, सुजाता मै तुम्हारे दुखों का सहभागी वनकर तुमसे भीख मांग रहा हूँ। प्रायो, हम दोनों मिलकर दुखों को बाँट लें। सच, मैंने तुम्हें कितना सताया है कितना छला है...?.... प्रागे बढ़कर सुजाता का हाथ पकड़ता है। सुजाता सूनी-शूनी निगाहों से निर्मल को थोर देखती है। निर्मल : इतनी सूनी निगाहों से मुझे मत देखो, सुजाता ! लगता है तुम हँसना भूल गयी हो. 'तुम्हारी यह गम्भीरता "तुम्हारे दिल की गहराई में उतर गयी है । चलो हम दोनों फिर से नये मिरे से हँसना सीखेंगे। दुख-दर्द के लम्बे सिलसिलों को नयी परिभाषा देंगे-~~-सुख की परिभापा ! हमारे दामन के दुख झर जायेंगे-सूखे पत्तों से । जिन्दगी का नया सफ़र अाज से हम शुरू करेंगे। मुजाता : जिन्दगी के फैसले इतनी जल्दी नहीं हुआ करते, निर्मल बाबू ! मुझे सोचने के लिए समय चाहिये । निर्मल : हाँ, हाँ, यह तुमने ठीक कहा ! सोचने के लिए समय तुम जितना चाहो ले लो, पर मेरी यूं उपेक्षा करके मुझे दुत्कारी मत, मुजाता ! मैं दुनिया में सब कुछ झेल सकता हूँ, पर तुम्हारी उपेक्षा का विप''मेरे लिए मौत बन जायगा, -सुजाता,''मौत वन जायगा ! सावित्री का प्रवेश। सावित्री : निर्मल ! चलो बेटे ! थके हुएं हो रात भर के । यह सब तो तुमसे पूछा ही नहीं कि कैसे पाये ? निमल : हवाई जहाज़ से बॉम्बे से दिल्ली तक और दिल्ली से यहाँ प्रो रे ओ सह्यात्री! १०६ TAM तक के लिए टैक्सी ले ली थी। थकान कहाँ हुई, माँ ? और फिर थकान तो यहाँ पाकर पूरी मिट गयी पाप सव लोगों के दर्शनों से। सावित्री : अच्छा चलो, सब चीजें ठण्डी हुई जा रही है। निर्मल : सारी दुनिया के स्वाद फीके हो गये, माँ! अब तो स्वादों की पहचान भी कहाँ रही है मुझे ? सावित्री : (लम्बी सांस लेती है) चलो भी दोनों। मुजाता : रुको माँ ! जल्दी न करो हताश भाव से सावित्री का प्रस्थान | सुजाता : (कठोरता से) में तो तुम्हारे खिलवाड़ का एक खिलौना मान रही। जब चाहा खैल लिया और जब चाहा आल- मारी में बन्द करके रख दिया। नहीं निर्मल ! मेरा मन इन स्थितियों से समझौता करने को तैयार नहीं है । मुनो! सुजाता तुम्हारे हाथों की कठपुतली बनकर नहीं रह सकती। मैने मर-मर कर भी जीना सीख लिया है, निमल ! और अब तो यूं जीना भी सुख देता है। मेरा मन अभ्यासी हो गया है, निर्मल ! सब कुछ सह सकता है। निर्मल : (ईजाल पर लगी अधूरी तस्वीर के पास जाकर) तुम्हारी यह अधूरी तस्वीर में पूरी करूंगा, सुजाता ! में ही इसका नामकरण करूंगा। तुम्हारे चित्रों के नाम हैं (क्रम से एक-एक के पास जाता है)..."निर्वासिता..."हम अकेले नहीं हैं- अँधेरा साथ है'...'वेबस साँझ अकेली' । में तुम्हारे चित्रों को नये नाम दूंगा । (अधूरी तस्वीर के पास पाकर) इस अधूरी तस्वीर का नाम होगा 'यो रे सो सह्यात्री !'...... (सुजाता के पास प्राफर) हम सहयात्री हैं, सुजाता ! हम कभी अपनी राह से भटकेंगे नहीं । मुजाता : (शिथिल-सो सोफे पर बैठ जाती है) थोड़ा सोचने की मोहलत दो, निर्मल ! में कुछ समझ नहीं पा रही हूँ मुझे क्या करना है । मेरी बुद्धि 'मेरा साथ नहीं दे रही है, निर्मल ! इतना अपाहिज मुझे मत बनानो ! मेरा विवेक मत छोनों ! (प्रावल से मुंह ढाप लेती है)। निमल : हमारी बुद्धि अलग-अलग नहीं है। हमारा अस्तित्व एक- दूसरे से भिन्न नहीं है, हमारा विवेक भी एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है, सुजाता! पापो हम प्रतिज्ञा करते हैं "हम अपनी राह से भटकेंगे नही "एक-दूसरे का साथ नही एक गिन्दगो वनमारा
छोड़ेंगे। साथ मरेंगे साथ जियेंगे एक-दूसरे का दुख
झेलेंगे."साथ-साथ ! हम एक मंजिल के राही..."हैं...
हमराही.....!
आगे बढ़कर सुजाता का हाथ पकड़ता है। सुजाता
उठती है । मन्द गति से दोनों का अन्दर की ओर
प्रस्थान । धीरे-धीरे पर्दा गिरता है।
मो रे मो सहयात्री!
No text on this page.
or
."और एक नया सूरज
..
--
पात्र
डा० विक्रमसिंह विश्वविद्यालय के वाइस चान्सलर
डा. गुलाटी विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार
सोहनलाल डा. विक्रमसिंह का पी०ए०
महेन्द्र विश्वविद्यालय छात्र संघ का सेक्रेटरी
(अवस्था २० वर्ष)
रहमान विश्वविद्यालय छाय-संघ का प्रेसीडेण्ट
(अवस्था २१ वर्ष)
गरिमा महिला छात्र-प्रतिनिधि (अवस्था १६ वर्ष)
डा० भटनागर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के महामन्त्री
डा० रत्नाकर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के प्रेसीडेण्ट
सन्तु चपरासी
डा० गुप्ता, डा. वैजल अग्रवाल महिला विद्यालय के सेक्रेटरी एवं
प्रेसीडेण्ट
- स्थान-विश्वविद्यालय कैम्पस । पर्दा खुलता है। विश्वविद्यालय कार्यालय में डा० विक्रमसिंह का कक्ष दिखायी देता है। सामने दीवार है, जिसमे बायीं ओर एक खिड़की है, जो वाहर कैम्पस की ओर खुलती है । दाहिनी ओर लकड़ी का एक रैक है, जिसमें कुछ मोटी-मोटी किताबें सजी हैं बीच में एक सोफ़ा सेट है । सोफ़ा सेट के आगे एक बड़ी टेबल है जिस पर फूलदान में नये ताजे फूलों का गुच्छा सुन्दर ढंग से सजाया गया है । बायीं ओर बाहर जाने का द्वार है । दाहिनी ओर किताबों के रैक के पास एक दरवाजा है, जो एक छोटे-से कक्ष में खुलता है, जिसमें एक कुर्सी पर बैठे सोहनलाल को अंगुलियां टाइप- राइटर पर बड़ी द्रुत गति से चल रही है । सन्तू चपरासी एक-एक करके कुर्सियां ला रहा है और सोफ़ा सेट के दायी पोर रख रहा है । समय--प्रातःकाल १० लगभग बजे । . सन्तू : क्यों लाल जी वावू ! (सोहनलाल से) छः कुसियाँ बहुत होंगी न? सोहनलाल : (टाइप करते-करते) हाँ, हां, और क्या कुर्सियों की बारात लगानी है ? डा० विकसिंह का प्रवेश । सन्तू सर झुकाकर सलाम करता है और चला जाता है । सोहनलाल भी छोटे कक्ष से बाहर निकलकर झुककर नमस्ते फरता डॉ. विक्रमसिंह : नमस्कार'नमस्कार (सोफे पर बैठ जाते हैं)। कुछ चिन्तित-से मेज पर रखा प्रखबार उठाते है । सुखियों पर सरसरो नजर डालकर प्रसपार रख ...मौर एक नया सूरज ११५ देते हैं । फिर कुछ देर सोचते हैं । डॉ. विक्रमसिंह : (सोहनलाल से) क्या सारे पेपर्स टाइप हो गये ? सोहनलाल : जी! डॉ. विक्रमसिंह : फ़ाइल कर लो सबको, और हां, यह कल का अखबार नहीं हटाया। इसकी यह कटिंग काटकर भी फ़ाइल में लगा दो। सोहनलाल : (डा० विक्रमसिंह से प्रखबार लेता है, फटिंग के लिए उस स्थान पर निशान लगाता है) अच्छा सर ! (प्रस्थान)। डा० विक्रमसिंह पुनः चिन्तित मुद्रा में कुछ सोचते हैं । घड़ी को परेर देखते हैं। तमी सन्तू का ट्रे में एक पानी का गिलास लिये प्रवेश । सन्तू खड़ा रहता है। डा० विक्रमसिंह पानी पीकर ट्रे में रख देते हैं। माये से पसीना पोंछते हैं, फिर घड़ो देखते हैं। सन्तू गिलास लेकर बाहर चला जाता है । तभी फोन को घण्टी बजती है। सन्तू फोन उठाकर डा० विक्रमसिंह के पास लाता है। डॉ. विक्रमसिंह : हलो, में विक्रमसिंह वी० सी० विश्वविद्यालय । "श्रोह तुम हो तोपी ! .."हां"हाँ.. मेजर गुप्ता के लड़के की शादी है आज ? ठीक है पर मैं तो ग्राज बहुत बिजी हूँ। देखो सन्तोष ! प्राज तुम्हीं ऋतु को लेकर चली जानो । आज का दिन तो सचमुच "हूँ हूँ"हाँ, हाँ, ठीक है, ठीक है, तुम बहुत समझदार हो (फोन रख देते हैं)। डा० गुलाटी का प्रवेश । डॉ. विक्रमसिंह : आइये गुलाटी साहब ! मैं आप की ही प्रतीक्षा कर रहा था। १० बज रहे हैं । १० बजे का ही समय तो उन्हें दिया है । डॉ० गुलाटी : आते ही होंगे वे लोग । आज १० से १ तक टीचर्स और छात्रों के प्रतिनिधियों को मिलना है। तमी दूर से कुछ शोर सुनायी देता है। शोर नारों का सा लगता है, शायद कोई जुलूस है, जो धीरे-धीरे यूनिवर्सिटी कैम्पस में प्रवेश कर रहा है। डto विक्रमसिंह खड़े होकर खिड़की के पास जाते हैं और पर्दा हटाकर बाहर झांकते हैं । डा. गुलाटी भी पीछे-पीछे जाते हैं। डॉ. गुलाटी : काफ़ी बड़ी संख्या में ये लोग पा रहे हैं। डॉ. विक्रमसिंह : पर हमने तो सेक्रेटरी और प्रधान को ही मिलने के लिए बुलाया था। एक ज़िन्दगी बनजारा १६ . .. नारे जोर पकड़ते जा रहे हैं और अब साफ़ सुनायी दे रहे हैं। शायद सब लोग विश्वविद्यालय कैम्पस में कार्यालय के पास तक मा गये हैं। डॉ. विक्रमसिंह : कुर्सी छोड़ो डॉ० गुलाटी : मुर्दाबाद हमारी मांगें : पूरी करो डॉ. विक्रमसिंह : मुर्दाबाद सन्तू उत्तेजित-सा प्रवेश फरके । सन्तू : वे लोग पा गये, साव ! डॉ. विक्रमसिंह : उनके रिप्रेजेन्टेटिज को ही आने देना । डॉ. गुलाटी : आज की युवा पीढ़ी कितनी गुमराह हो गयी है लक्ष्य-हीन ""पथभ्रष्ट अराजकता की शिकार । रास्ते से भटके हुए ये लोग....."अपने भविष्य को ये खुद विगाड़ रहे हैं... डॉ. विक्रमसिंह : इन्हें ही तो रास्ते पर लाना है । महेन्द्र, रहमान और गरिमा का द्रुत गति से प्रवेश । डॉ. विक्रमसिंह : आइये, प्राइये, हम अापको ही प्रतीक्षा में थे। सब बैठ जाते हैं। सन्तू छः-सात गिलासों में पानी लेकर पाता है, सोहनलाल छोटे कक्ष से फाइल लेकर, बाहर पाकर एक अोर साइड में कुर्सी पर बैठ जाता है, मिनिट्स नोट करने के लिए। महेन्द्र : हम तब तक जल ग्रहण नहीं करेंगे, जब तक हमारी मांगें पूरी न होंगी। रहमान : हमने प्रतिज्ञा की है कि...... गरिमा : हम अपने रास्ते से डिगेगे नहीं । चाहे कुनियां देनी पड़ें। हमें क्रान्ति की इस नन्ही-सी चिंगारी को बुझने नहीं देना है। सन्त का प्रस्थान। बाहर से फिर नारे सुनायी देते हैं- छात्र एकता : जिन्दाबाद डॉ. विक्रमसिंह : मुर्दाबाद डॉ. गुलाटी : मुर्दावाद मांग हमारी : कुर्सी छोड़ो नारे के स्वर धीमे हो जाते हैं। डॉ. विक्रमसिंह : नारे तो प्राप सचमुच बड़े माकूल दे रहे हैं। भापकी यदि यही इच्छा है तो कुर्सी से हमें कोई मोह नहीं, लेकिन क्या : "भौर एक नया मूरज कुर्मी छोड़कर हम अपनी समस्याओं को गुलझा सकेंगे ? हाँ! जरा अपना मांग-प्रपत्र तो दीजिये । महेन्द्र मांग-प्रपत्र प्रागे बढ़ाता है। डॉ. विक्रमसिंह : (मांग-प्रपत्र ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं) आपको ये सभी मांगें सच- मुच में जेनुइन हैं । शिक्षा का पैटर्न वदले', 'परीक्षा-पद्धति विल्कुल सड़-गल गयी है, इमको नया रूप दिया जाये', '५० प्रतिशत सीटम का रिजर्वेशन अन्यायपूर्ण है'-प्रापको सभी मांगें वजनदार हैं। आप लोग सचमुच अब इतने जागरूक हैं कि जबरदस्ती थोपा हुअा कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर सकते । आप क्रान्तिद्रष्टा हैं। देश के विकास का यह गुभ लक्षण है । मैं आपका स्वागत करता हूँ। महेन्द्र : शिक्षा जीविकाप्रधान भी होनी चाहिये । रहमान : क्या लाभ है, ऐसी शिक्षा से जो ६० प्रतिशत लोगों के काम की नहीं, जो केवल दस प्रतिशत लोगों को रोजी देती है ? नव्वे प्रतिशतं छात्र सड़कों पर अपनी चप्पल घिराते-घिसते.थक जाते हैं, पर रोजी और रोटी की समस्या हल नहीं होती। डॉ. गुलाटी : पर शिक्षा का पैटर्न एक दिन में तो नहीं बदला जा सकता। प्रापको मांगें . अपनी जगह दुरुस्त है, पर आप हमारी परेशानियों को भी तो देखिये। ऊपर-ऊपर से ही तो यह पद्धति नहीं बदली जा सकती। इसके लिए तो सारे स्ट्रक्चर को ही बदलना होगा। गरिमा : हम भी तो शिक्षा में आमूल परिवर्तन चाहते हैं । डॉ० विक्रमसिंह : मैं इसके लिए जी-जान से कोशिश कर रहा हूँ। सभी विश्वविद्यालयों के वाइस चान्सलरों, समी.प्रदेशों के शिक्षा- मन्त्रियों एवम् शिक्षा-विशेषज्ञों की एक मीटिंग जून में शिमला में होने जा रही है । आपको समस्या समूचे देश की समस्या है। डॉ० गुलाटी : इसलिए समाधान भी पूरे देश के छात्रवर्ग के हित को ध्यान में रखकर ही निकालने हैं। बाहर से फिर नारों का शोर उभरता है- डॉ. विक्रमसिंह : मुर्दाबाद डॉ. गुलाटी : मुर्दावाद शिक्षा पद्धति : बदलकर रहेगी हमारी मांगें: रोजी दो, रोटी दो एक जिन्दगी बनजारा - १. गरिमा : आप एयर-कूलर का सुख ले रहे है, डॉक्टर साहब ! आप क्या. जाने मई की, दोपहरी की तपिश का दुख । रहमान : वह दुख हम जानते हैं, जो वर्षों तक सड़कों की खाक छानने पर भी वेकार रहते हैं। नारे उभरते हैं- , इन्कलाब जिन्दावाद छोन-त्रान्ति : नही दबेगी ., महेन्द्र : (उठकर खिड़की के पास जाफर गरजता है। मेरे साथी भाइयो ! आप लोग धूप में खड़े है -तप रहे हैं । लू के थपेड़े झेल रहे हैं। यहाँ एयरकूलर की ठण्डी हवा में मैं खड़ा हूँ, पर मुझे यह हवा भी तपा रही है क्योंकि मेरे दोस्त : जलती धूप में खड़े है। हम आपके प्रतिनिधि है, आपने हमें अपना विश्वास दिया है । भाप लौट जायें। हम माज कोई समझौता करके ही लौटेंगे । आज जो क्रान्ति का नया सूरज उगा है, उसे हम डूबने नहीं देंगे। भीड़ नारे लगातो हुई कैम्पस से बाहर की ओर बढ़ती है-- छात्र-शिक्षक एकता : जिन्दावाद महेन्द्रसिह : जिन्दाबाद रहमान : जिन्दावाद : विक्रमसिंह : मुर्दावाद धीरे-धीरे नारे दूर होते चले जाते हैं । डॉ. विक्रमसिंह : सबसे पहले तो आप यह तम करें कि परीक्षाएँ कय होंगी ? आप क्या चाहते हैं-मई में, जून में या जुलाई में ? गरिमा : परीक्षाएं छात्र-हित को ध्यान में रखकर मई में ही होनी चाहिये, २० मई के आसपास, महेन्द्र : पर इसका यह मतलब नहीं है कि परीक्षाओं के बाद यह चिंगारी ठण्डी हो जायेगी:.....। रहमान : हमारा कदम जो एक बार आगे बढ़ा है, पीछे नहीं हटेगा। महेन्द्र : अापकी नीति छात्रों के लिए ठीक नहीं है, सर ! यह देखिये अखवार में क्या छपा. है-- हमारा आपसे कोई समझौता नहीं हुअा । श्राप पुलिस के जोर से चाहते, तो परीक्षाएँ करा सकते थे, परन्तु आपने यह नहीं चाहा । डॉ. विक्रमसिंह : देखिये, समाचार-पत्र क्या छापता है क्या नहीं मुझे इसको सफाई नहीं देनी है। कभी-कभी समाचार-पत्रों में : - .."और एक नया सूरज बड़े गलत-ग़लत स्टेटमेण्ट्स छप जाते है। उनसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं होता। आप लोगों को समाचार-पत्रों पर विश्वास नहीं करना चाहिये । विवेक से काम लेना चाहिये। रह्मान : माफ़ कीजिये विवेक से काम अाप नहीं ले रहे हैं, सर ! किसके आदेश से आप बार-बार परीक्षाएं पोस्टपोन करते रहे अब तक? हम प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बने स्टैचूज नही हैं कि आप हम पर जो चाहें लाद दें-थोप दें गरिमा : हम भी हाड़-मांस के इन्सान है। हमारी भी अपनी ज़रूरतें हैं, अपनी अलग स्वतन्त्र चिन्तन-धाराएँ हैं । परीक्षाओं की डेट हमें दीजिये। अगले वर्ष हम इस दूपित परीक्षा-पद्धति का शिकार नहीं बनने जा रहे हैं। महेन्द्र : हमारा यह आन्दोलन सार्वदेशिक है। हम झुकेंगे नहीं। परीक्षा की तारीख २० मई निश्चित कीजिये। डॉ. विक्रमसिंह : २० मई सम्भव नहीं। आज दस है। १५ दिन का समय कम-से-कम नोटिफिकेशन के लिए चाहिये। डॉ० गुलाटी : आप ठीक कहते है २५ ठीक रहेगी। रहमान : खैर, २५ मई ही सही । सन्न कोका कोला को छः बोतलें एक ट्रे में रखकर प्रवेश करता है। तभी डॉ० भटनागर और डॉ० रत्नाकर का प्रवेश। डॉ. विक्रमसिंह : पाइये, माइये, रत्नाकर साहब ! हम आपकी प्रतीक्षा ही कर रहे थे । सन्तु, दो बोतलें कोका कोला की और लामो। अरे, रहमान, महेन्द्र, तुम लोग रोष छोड़ो। खाने-पीने से कैसी नाराजगी? संकोच के साथ महेन्द्र, रहमान और गरिमा कोका कोला की बोतलें उठाते हैं । सन्तू दो बोतलें और लाता है। सब कोका कोला लेते हैं । महेन्द्र, गरिमा और रहमान खड़े होते हैं। रहमान : अच्छा सर ! परीक्षा की तारीख २५ मई रही। आपने यदि हमारी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, इन्हें पूरा नहीं किया, तो फिर हम डॉ. विक्रमसिंह : अरे नहीं, नहीं । मुझ पर विश्वास रखो। तीनों का प्रस्थान। डॉ. विक्रमसिंह बैठते हैं। डॉ. रत्नाकर : तो परीक्षा की २५ तारीख निश्चित कर दी है, 'किन्तु .. : . एक ज़िन्दगी बनजारा क्षमा करें धृष्टता के लिए, डॉक्टर साहब ! आप छात्र-हित की बात करते हैं और शिक्षक का हित भूल जाते है। डॉ० भटनागर : दरअसल बात यह है कि आप छात्र से शिक्षक को अलग करके देखते हैं । शिक्षक और छात्र एक ही हैं. एक ही सिक्के के दो पहलू । विश्वविद्यालय की नीति का निर्धारण दोनों के हितों को ध्यान में रखकर होना चाहिये । डॉ० विक्रमसिंह : प्राखिर आप लोग चाहते क्या हैं ? मुझे तो सभी के हितों का ध्यान रहता है । आप सब लोग मेरे सहयोगी हैं । आपका कोनॉपरेशन मुझे न मिले, तो क्या मैं कुछ कर सकता हूँ? डॉ० रत्नाकर : देखिये, इस बार तो हमारा फुल कोऑपरेशन है । अगली बार अगर हमारी वेकेशन्स खराब हुईं, तो हम लोग भी परीक्षा का बहिष्कार करने मैदान में आ जायेंगे। डॉ. विक्रमसिंह : माफ़ करें, डॉ० रत्नाकर ! पाप लोग वेकेशन्स को अपना अधिकार मानकर चलते हैं। वेकेशन्स आपका अधिकार नही है। डॉ०. भटनागर : वेकेशन्स हमारा अधिकार नहीं है ? डॉ० रत्नाकर : तो फिर क्या है ? डॉ. विक्रमसिंह : यह तो पापको दी गयो प्रिविलेज है । खैर छोड़िये इस बार तो कुछ विशेष परिस्थितियां थीं। छात्र-हड़ताल, टीचर्स स्ट्राइक, साम्प्रदायिक दंगे, इलेक्शन्स । कॉलिजेज बहुत दिनों तक बन्द रहे, इसलिए कोर्स पूरे नहीं हुए। विद्यार्थियों ने ही परीक्षामों के पोस्टपोनमैण्ट की बात उठायी थी, इसीलिए यह कदम उठाना पड़ा। डॉ० रत्नाकर : परीक्षा में इन्विजिलेशन का कार्य ऐच्छिक होना चाहिये । डॉ. विक्रमसिंह : यह कैसे हो सकता है, डॉक्टर साहब ? परीक्षा का कार्य भी तो ड्यूटी का एक पार्ट ही है। अगर इसे ऐच्छिक कर दिया जायेगा, तो कौन परीक्षा में इन्विजिलेशन का कार्य करेगा? फिर भी....... डॉ० भटनागर : हमारे संघ द्वारा पारित प्रस्ताव की एक प्रतिलिपि आपके लिए है । (डॉ० विक्रमसिंह को देते हैं) डॉ० विक्रमसिंह : (प्रतिलिपि लेकर सरसरी निगाह डालते हैं) ठीक है आपके प्रस्ताव पर भी हम विचार करेंगे। अभिवादन करके दोनों का प्रस्थान। डॉ. विक्रमसिंह सन्तोष की सांस लेते हैं। डॉ. गुलाटी : पता नहीं क्या · होनेवाला है भविष्य में ? सब कुछ . .""और एक नया सूरज १२१ .. अव्यवस्थित हो रहा है। आन्दोलन, स्ट्राइक, प्रदर्शन, नारे—यही सब कुछ तो रह गया है। डॉ विक्रमसिंह : दरअसल बात यह है कि ड्यूटी के प्रति आस्था लोगों में नहीं रही। लोगों की दृष्टि में पैसा बड़ा हो गया है । सारे असन्तोष का एक मुख्य कारण लगता है आज को वेरोज- गारी और बेकारी । यह समस्या इतनी भयंकर है कि बहुत जल्दी ही कुछ सोल्यूशन्स निकालने होंगे। डॉ. गुलाटी : तो २५ मई का नोटिफ़िकेशन पेपर्स में करा रहा हूँ। डॉ. विक्रमसिंह : हाँ, हां, यह तो आज ही करना है । डॉ. गुलाटी का प्रस्थान । तभी कॉल बैल बजती है, सन्तू के साथ दो व्यक्तियों का प्रवेश । डॉ. विक्रमसिंह : आइये, आइये । पहला व्यक्ति : मैं अग्रवाल महिला विद्यालय का सेक्रेटरी गुप्ता हूँ, डॉ. साहब ! और ये हैं प्रेसीडेण्ट डॉ० बैजल । डॉ० विक्रमसिंह : प्रोह, ठीक है । आपको फ़ाइल आ गयी है । पैनल रिपोर्ट्स भी आ चुकी हैं । आपका मामला विचाराधीन है। डॉ० वैजल : हमने सारी कण्डीशन्स भी पूरी कर दी हैं। इस सत्र से डिग्री कक्षाओं को खोलने की अनुमति हमें दे ही दीजिये। डॉ. विक्रमसिंह : आप चिन्ता न करें। अगर कन्डीशन्स पूरी कर दी है, तो अनुमति मिल ही जायेगी। डॉ० गुप्ता : धन्यवाद, डॉक्टर साहब ! (उठते हैं दोनों) दोनों : (साथ-साय) अच्छा नमस्कार ! डॉ. विक्रमसिंह : (खड़े होकर) नमस्कार ! नमस्कार ! दोनों का प्रस्थान । डॉ. विक्रमसिंह उठते हैं, इधर- उधर चिन्तित मुद्रा में घूमते हैं। फिर फुसी पर बैठ जाते हैं। फ़ोन को घण्टी बजती है । सन्तू कोन उठाकर डॉ. विक्रमसिंह को लाकर देता है। डॉ० विक्रमसिंह : (फोन लेकर) हलो ! विक्रमसिंह' स्पीकिंग। हो, हाँ, नमस्कार ! ऐं क्या कहा ? आपकी यूनियन भी हड़ताल करने जा रही है। ""माज तो मेरे साथ बहुत सारे एपॉइष्टमेण्ट्स हैं । कल की तारीख दे दूं? प्रातःकाल ६ वजे मेरे निवास स्थान पर प्रा जाइये । नहीं ! नहीं, कोई बात नहीं । क्या कहा ? असुविधा केसी ? ये तो मेरी ड्यूटी है । प्रच्छा नमस्कार ! २२ एक जिन्दगी बनजारा मैं तुम्हें फोन रखते हैं। तभी फोन को घण्टी फिर बजती है । डॉ० विक्रमसिंह कोन उठाते हैं। डॉ. विक्रमसिंह : हां विक्रमसिंह बोल रहा हूँ। अरे सन्तोप.. फोन करने की सोच ही रहा था । देखो सन्तोप ! १ बज रहा है। अभी कुछ लोग मिलने आनेवाले हैं। हाँ, लंच पर माज मेरी प्रतीक्षा न करना। हाँ..."हाँ..."हां ठीक है। सच, अच्छा तो नहीं लग रहा, तीपी ! पर क्या करूं? मजबूरी है ।..."हाँ....."हां, क्या कह रही हो, इस्तीफ़ा दे दूं? अरे इतने से ही घबरा गई । नहीं तोपी ! ."इस्तीफ़ा समस्या का हल नहीं है । अंधेरे की घाटियों में से जो एक नया मूरज उग रहा है, उसे कैसे डूब जाने दूं? हाँ."हूँ"हूँ"कितने बजे लौटूंगा? ५॥ बजे शाम को ऑल इण्डिया साइन्स एसोसिएशन की मीटिंग अटैण्ड करनी है। ...'नहीं "नहीं.. लंच यहीं ले लूंगा, चिन्ता मत करो। अच्छा...."हाँ"हाँ. ""रात ही हो जायेगी लौटते- लौटते...(फ़ोन रख देते हैं)। डॉ. विक्रव सिंह भंगड़ाई लेते हैं । डॉ. विक्रमसिह : (सोहनलाल से) सोहनलाल ! जरा डायरी देखकर बतानो ४॥ बजे तक का क्या-क्या प्रोग्राम है ? सोहनलाल : (डायरी खोलकर) जी, तीन बजे प्रोफ़ेसर बख्शी पा रहे है । डॉ० विक्रमसिंह : हां प्रास्ट्रेलिया से कल ही तो लौटकर आये हैं । ठीक है एजुकेशन पैटर्न पर वे कुछ सुझाव दे सकेंगे। सोहनलाल : ४ बजे महिला महाविद्यालय से डॉ० श्रीमती अंजनी मेहता आयेंगी, अपने विद्यालय की कुछ टीचर्स का डेपुटेशन लेकर । उसके बाद ४ बजे सभी प्रिसिपल्स को आपने मीटिंग के लिए बुलाया है। डॉ. विक्रमसिंह : ठीक है, सोहनलाल ! आज के दिन तो दम मारने की भी फुरसत नहीं मिलेगी । फिर भी मैं खुश हूँ क्योंकि अंधेरे की घाटियां, जो अब तक सो रही थीं-जाग रही हैं । हमारे जीवन में एक नया दिन पा रहा है नया सूरज लिये.... क्रान्ति का सूरज इन्कलाब का सूरज । यह सूरज कमी नहीं डूबेगा........ कभी नहीं डूबेगा । सोहनलाल : (मुंह फाड़े डॉ. विक्रमसिंह को देखता है)। डॉ. विक्रमसिंह : क्या पागल से देख रहे हो, सोहनलाल ? मै आज बहुत खुश हूं। मुझे जितनी गालियां मिलती हैं, उतनी ही एक ""और एक सी सूरज .१२३
नयी चेतना मुझमें जाग जाती है। चलो आज का मसला
तो हल हुआ। अाज ही से आनेवाले कल के लिए
समाधान टटोलेंगे तो क्यों नही समस्याएं हल होंगी। जरूर
होंगी। हमें इस उगते हुए सूरज को डूबने नहीं देना है.
नहीं डूबने देना है। जलते हुए सूरज का लाल-लाल
गोलक ! अन्धेरे में जगती हुई रोशनी ! मैं जिस भविष्य के
सपने देख रहा था, वह दूर नहीं है, सोहनलाल ! अन्धेरे
की वादियों से निकल कर लोग- उजालों की मशाल लिये
धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं । आने वाला कल हमें अब गुमराह
नहीं करेगा....."वह हम सबका होगा...."हम 'सबका ।
सोहनलाल विस्फारित नेत्रों से विक्रमसिंह को देखता
है । पर्दा गिरता है।
एक जिन्दगी यनंजारा
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