Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Parisist Tirloksar
Front matter
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प्रकाशक,
विहारीलाल कठनेरा
नोपाईटर-हिन्दी जनमाहित्यममारक कार्यालय,
हीराबाग पो. गिरगाँव-दम्बई ।
मंगन नारायण कृषकी
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निवेदन । यह महान् प्रथ हमने स्व० पंडित-प्रयर टोडरमलजीकृत भाषा-यवनिका सहित ही उपाय है । संस्कृत टीका इसमें इस लिए नहीं दी कि यह 'माणिकचन्द्र ग्रंथमाला में मूलसाहित छप चुकी है। कुछ लोगों की राय है कि पुरानी भाषा स्य वर्तमान हिन्दीमें परिवर्तित कर दिये जाने चाहिये। परन्तु हमें भाषाकारके गौरवको रक्षा करना इष्ट था; अतएव हमने उसका परिवर्तन कराना रचित नहीं समझा। हमारी बड़ी इच्छा थी कि इसके यत्र-भागको थके साथ लगा दिया जाता; परन्तु कुछ ऐसे कारण उपस्थित हो गये जिनसे तकाल पत्रका तैयार करवाना कठिन हो गया। यत्रों के तैयार कराने में कुछ विलम्ब अवश्य होगा; परन्तु तैयार होते ही उन्हें हम सब प्राहकों के पास पोष्ट द्वारा भेज देंगे। हम उन सजनोंसे प्रार्थना करते है कि जिन जिनके पास यह प्रेथ पर ये फार्ड द्वारा अपना पता टिस भेजने की कृपा करें। इसका सम्पादन तथा संशोधन-कार्य श्रीयुत १० मनोहरलालजी शास्त्रीने किया है। हमें जहाँ तक विश्वास है पंडितजीने अपनी जिम्मेवरीका ध्यान रख कर ही इस कार्य सम्पादन किया है और इस टिए दृष्टि दोपको साधारण भूलोको छोड़ कर सैद्धान्तिक भूलों का रहना मान फम संभव है । अतःपर भी कोई भूल रह गई हो तो उसका संशोधन कर हमें भी उसकी मूपना देनेकी कृपा करें जिससे दुसरी आवृत्तिमें उसके संशोधनका ध्यान रखा जाये। एक उदयलाल कागलीवाल । मूल्य कपाडी जिन्द हमारी छपाई पुस्तक। रनकरंडश्रावकाचार-स्व. पं. गदामुगजीत मापाटीराहिन । प्राचारसम्बन्धी मार के जितने ग्रंथ हम समय मिलने है, उन सबमे यह बहुन वा प्रत्य है । यह मुले पोंमें, आहे कारण मोटे टाईपमें बडी मुन्दरतासे छपाया गया है । पृष्ट मंण्या ५५५ के लगमग है। मय पांच साया। पुण्यालय-इसमें मनोरंजक और धार्मिक भावोंसे परिपूर्ण कोई ५६ छोटी मोटी कथायें है । इन्ने यह दूसरी पार पाया है । पृष्ठमथ्या ३४० के लगभग ! मून्य तीन करया । भक्तामर कथा-(मत्र-यंत्र सहित ) यह प्रन्य स्वर्गीय प्रमचारी रायमरके बनाये महामरके पार बड़ी सीधी-साधी हिन्दी-भाषा छपाया गया है। अन्तमें मन, ऋद्धि और उनकी मापनविधि दक्ष नालीस यंत्र भी दिये गये हैं। मूल्य कपड़ेकी जिल्दका एक रुपया छह आने, मादी निन्दका एक रुपया। चन्द्रप्रमचरित-महाकवि-धीवीरनन्दी आचार्यकृत, मंस्कृत जैन कायोंमें यह उच कोटीका शान इसमें आठवें तीर्थंकर श्रीचंद्रप्रभ भगवानका पवित्र चरित वर्णन किया गया रुपया; साधी जिल्द एक रुपया । नेमिपुराणयह ब्रह्मचारी नेमिदत्तके संस्कृत नेमिपुराणका हिन्दी अनुवाद है। इसमें शवीमवें तीर्थर नाथ भगवानका पवित्र चरित है । मूल्य कपड़ेकी जिल्द सवा दो रुपया, सादी जिन्द दो रुपया। सभ्यपत्यकौमुदी -यह भी कथाश एक सुन्दर प्रन्थ है। इसमें सम्यक्त्व प्राप्त करनेवाले, राजा तोदय, सुयोधन, अहंद्दास, चन्दनश्री, विष्णुधी, मागधी, पघलता, कनकलता और वियुलताको अड ये हैं । मूल्य कपको जि० एक रुपया छ:आने, सादी जि० एक रुपया दो आने । सुदर्शनवरित--यह सकलकीर्तिकृत संस्कृत सुदर्शन चरितका हिन्दी अनुवाद है । मुदर्शन बड़ा -निश्चयी था, कामी स्त्रियोंने उसके साथ अनेक प्रकारकी बुरी चेष्टा की उसे शीलधर्मसे गिरानका सूत्र ही ल किया परंतु सुदर्शन अपने शीलधर्म पर सुमेरुसा अचल-अडिग बना रहा। मूल्य नौ आने । नागफुमारचरित-पटूभापा कवि चकवती मलिपेण सूरिके सस्कृत ग्रंथका अनुवाद । मूल्य छः आग्ने। यशोधरचरित । महाकवि वादिराज सुरिक एक मुन्दर सस्कृतकाव्यका हिन्दी अनुवाद । इसमें घरका मुन्दर चरित वर्णन किया गया है । पुस्तक कदण रसमे भरी हुई है । पढते पड़ते हृदय मर ता है । मूल्य मात्र चार आना। पवनदत (काव्य) कालिदासके मेघदूतके समान रखा गया है, हिन्दी भाषा है । कीमत चार आना। श्रेणिकचरितसार वाचारी नैमिदत्तकै संस्कृत श्रेणिककथासारका यह अनुवाद है । मूल्य तीन आने। अकलंफचरित । इसमें अक्लक-स्तोत्र और उसका भावार्थ तथा हिन्दी पद्यानुवार भी शामिल कर या है । मूत्य सीन भाने । सुकुमालचरितसार । इसके बनानेवाले ब्रह्मचारी नेमिदत्त है । उन्होके अन्धका यह अनुवाद है। य है भाना। पंचास्तिकाय-समयसार । मूलप्रन्यके बनानेबारे भगवान कुन्दकुन्दाचार्य है । उस पर स्व. पं. रानन्दजाने दोहा, चौपाई, कवित, मया आदिमें छन्दोबद्ध टीका लिखी है । कीमत एक रुपया । चा सटाणा-चर्चा-यह गोम्मटमारके आधार पर लिखी गई है। इसमें चोवीस दण्डक भी शामिल दिये है । मूल्य भार माने। एपदाला--(साध) स्व. पं. दोसन रामजी कृन । शीतलप्रसादजीकृत अर्थगहित है। तीन माने । नियमपीपी में भी प्राचारी शीतलप्रमादजीने मग्रह किया है । मूल्य माधा आना। हिन्दी महामर-यह मत भामरका मी बोलीकी विनामै मुन्दर अनुगह है।मूल्य सका आना। हिन्दी कल्याणमन्दिर । भनामर ममान यह भी बड़ी बोलीकी कवितामें सस्कृत कल्याण मंदिका है। य एक भाना। रहन-विधान । इममे मन 'पा आदि मब को है । मुल्य पनि भाने ।
मापाटीकाकार परितवर टोडरमलनी लिखित भूमिका इस शास्त्रको सहत टीका पूर्व भई है तथापि सहा सात गणितादिकका मानविना प्रदेश होइ सफता नाही । सात स्तोक इनवालोंके त्रिलोकके स्वरुपका ज्ञान होनेफे मार्थ तिसही मर्थको भाषा फरि तिलिए है। यावि मेरा कम्य इतना ही है जो क्षयोपशमफे अनुसार लिस शाखका अर्थको जानि धर्मानुरागत औरानिके जाननेके भाई से कोऊ मुख बार उघारि कार देशमापारूप म्यास्यान करे तैसे में हन्तत सक्षरनिको स्थापना करि लियो । बहुरि दिनिका जोदना नर्शन युक्ति अटकारादियका प्रगट करना इत्यादि नवीन प्रथयारयनिक कार्य है मी मोते बने होनहासात प्रथका फर्तापना मेरे है नाही. हा फोऊ तुम सो अमूताफ मामा हो म करि दिखनेका कार्य से यभंगा साका समाधान । मैं जहाँ सामान्य सो मत गुण पर्यायनिका पुग हो तिनि वर्षे श्रुतज्ञान भर धर्मानुराग भर शक्तिपना इन मेरे पापनि निमि. स लिसनेस्प कार्य बने है। सात कारणगिरी कार्यका उपचार कार में लिवोगा। ऐसा पहार मात्र बन जानना निधय विचारते में मेरे नानादि भावनिहाँका कर्ता हो । सिनेमा काम नाही हौं । हरिप्रभ । इनके निमित्त नमित्तिक संबंध कैसे होइ है सो कहो ! कहिर है। मेरा हान स्वभाव है सोमानावरणको निमित्तते हीन हो मतियुत पर्शयम प गया है। मनि. शान करि शायफै अक्षरनिका जानना भया । मरि मोहफे उदयते रे पाधिक भाव रागारिक पाईए है | महा प्रस्तराग कार मेरे ऐसी छा भई जो शासका अर्थ भारुप मानिकी शिपिए तो इस क्षेत्रकालविय मद मुनि धने । तिनका भी कल्याण हो । अर इस कार्यको परसे अप्रशस्त भाषफे अभाव करि किए धर्म नि होने मेरा भी एल्थान हो । तारें मैने साका लिगना बन सौ करना । यहरि प्रदेशनिको चटानेका शक्तिपनो मी पर है। लिस इण्टा पक्षात असे तिस कार्ययो सि हो । स में मेरे प्रदेशानियों च करो। इतने पर्याय तो मेरे होई हैरी पुनल दम्य भी सानिए भार है सो समार- निया पिड १ । नामयमये, निमित शरीरके सर मेरे एक स्थानमनाने मेरे प्रदेश में होमते निनको मादिक के अंग भी चंचल है। वह Prit! गोर ant in मर fait जाय नसे दि... हवन " निका आप पर स्थापन करने ... He:
४ । ताका उत्तर-जो अर्थ प्रत्यक्ष अनुमान गोचर होइ ताको तो प्रत्यक्ष अनुमान करि प्रमाण करना । बहरि जो प्रत्यक्ष अनुमानते अगोचर होइ ताको आगम प्रमाण करि मानना । कोऊ कई है कि अन्यमतके आगम अप्रमाण तुम्हारा आगम प्रमाण ऐसा कैसे मानिए ! ताका उत्तर । आगम विर्षे केई अर्थ प्रत्यक्ष अनुमान गोचर हैं केई अगोचर हैं । तहाँ प्रत्यक्ष अनुमान गोचर अर्थ करि माग मसी परीक्षा करनी । जिस मतके आगम विर्षे प्रत्यक्ष अनुमान गोचर ही अर्थ विरुद्ध मासै तौ तिसका कह्या अगोचर अर्थ कैसे प्रमाण करिए । अर जिस मतका मागम विर्षे प्रत्यक्ष अनुमान गोचर अर्थ सत्य ही कहै भास तो तिसका कह्या अगोचर अर्थ भी सत्य ही होसी सो ऐसे परीक्षा कीए अन्यमतके आगम अप्रमाण जैनमतके प्रमाण प्रतिभासे है । सो यहू शास्त्र जैनमतका आगम है ताते प्रमाण है । या प्रकार इस शास्त्रकों फलदायक जानि वक्ता श्रोताका लक्षण युक्त होइ बाँचो सुनो अर प्रमाणीक जानि याका श्रद्धान करो । याके अभ्यासते तरव श्रद्धानी होइ तस्व- ज्ञानकों वधाइ रागादिककों घटाइ मोक्षमार्गी होऊ । बहुरि तिस साधनतें तुम्हारे निरुपाधि आरम- स्वभावकी सिद्धि है लक्षण जाका ऐसा सिद्ध अवस्था प्रगट होऊ । । समाप्त।
त्रिलोकसारकी विषयसूची। १ ... ... ... ... ६२ ... ... विषय. पृ. शोकमामाग्याभिधार ॥१॥ कि भादिक विधानके जाननेको रण मूल सबमिल्याण परि पर रहे। संवा र गिरनिगूगना परि... मोरके म्यागादिका भर हो जितना ग्यास पर्य मानिर्णन गरि लोक- पाए तास वर्णन कायापार अधोलोरा भाउ प्रचार कर कई लोकका पांच तदा प्रगंग पाइएम्भासिरान प्रहार गरि क्षेत्रफलका वर्णन है मानसावर्णन तनारे मौसि भलीनिक वही चतुरयानि भेयके क्षेत्रफल करनेका विधान मेदारिद वर्णन है असमरमाननियामानरेडपन्य मंग्या- बहुर लोकका परिधिका वर्णन है तहाँ हरणा- दाकिरा मेदनिश वर्मत कि जानने के कारण सूत्र है Frt अपम्प परीत मर्मस्वातरा स्थापनेको बहुरि बातवलयनिका वर्णन है। तहाँ तिनके निका क्षेत्रात १ दक्षिका पर तिनकी वहाँ जैसी मुटाई है साका' तह गरसोया प्रमाण बदनेको पात क्षेत्रफल... भर इनकार जेता क्षेत्र रोया है ताका वर्णन है । एपी क्षेत्रफलमरगोनिया पायारियों कारण बहुरि तनुशतदलयमें सिख विराजे है तिनको ११ भवगाहनावा वर्णन है... ७१ धुनहानाशिक विषयनिता प्रमाणकान... २१/ बहुरित्रगनाली के स्वरूप स्थान प्रमाणादिका वर्णन ५१ मंग्यामान विशेष सीए सर्वधारा भादि द. बहुरि ताके भयो भागवि सात पृथ्वी है तिनके पारानिमा बर्णनातहानिरपाननिधन. ७३ मुखमा पर जिस पागध स्थानविष नाघ भर तहां पदली पृथ्वी पिरी तीन भाग है प्रमाण भारतासभरसर्व स्थाननिप्रमागवर्णन २४ जिनके नाम पर मुटाईके प्रमाणका भर पहला नि विर्य द्विरूप आदि तीन पारा तिनके भाग विष सोलह पृथ्वी तिनके नामका भर स्थाननिका विशेष वर्णन है द्वानो मागनि विर्ष जेबस है तिनका भर ज्द ३ तदा मिस वर्गपाराधा कपनके अन्तरि भई. पृप्तीनिकी मोटाईका वर्णन है... उदवर्गालाका जानने के करण मूत्र... १५ बहुरि पहली पृथ्वीमा तृतीय भाग पर छह भर द्विरुप पनापन धारा विर्ष अमिकायिक मौवती पृथ्वोनि कि नासनिके विल है। तहाँ जीवनिरा प्रमाण विशेषगरि कसा लिन पृथ्वीनि विर्ष पटलनिकी वा क्लिनिकी वा २८ दपमामानोपल्यादिकमाठ मेदनिय वर्णन... ४१ तो शीत उष्ण ग्लिनिकी पाइन्दकादिक दिल- वही पस्यके रोमनिकी संख्या जानने सूक्ष्म निधी संख्या वर्णन है सात फल करनेके वरण पुत्रा भर रोम भंगुला. बहुरि इन्दक पिरनिके भर तिनके समीप श्रेणी. दिसा प्रभागकी उत्पतिका अनुकमा वर्णन है पर है जिनके नाम का वर्णन है मार संहाकरि मा जानने टकंच सूत्र भाषा बहुरि प्रेगीवानिकी संख्या क्यावने रिपान है। तदा समान चयरि वधता गचा जोर सागरोपम सार्थक कहने के बा लवण समुद- देनेचा वा पृथ्वीनि पिपै इन्द्रमनिकी संख्या का क्षेत्र फलादिकका वर्णन है ल्यावनेका कारण मध हैं हैं ... सय्यंगुलादिका वर्णन है। ४९बहुरि प्रकीर्णकनिकी संख्याका वर्णन है। बहुरि पत्यादिकती वर्गालाधर भदछेदके प्रमा. विलनिका विस्तार अर वाहुल्य अर भतरालका एका वर्णन । तहाँ तिनके जानने का प्रास- नामका... ... ... ... ... ... . ८. .
त्रिलोफसारकी विपयनी। घट. ... ... . . ८७ विषय. शिरय. बहुरि पृथ्वीनिा मंत भादि पटलनिका अंत. बहुरि मयन वामी म्यंगाना राल मरविलनिका तिर्यक अंतराल अर थारा. बदुरि मानवामीनिक कलने माग दिक तिनका वर्णन है ८५/ देवी अर तिनके अंगरसाकि तिनके जा बहुरि तहाँ दुर्गधताका अर उपजनेके स्थाना विगेर कया है। अर तिन स्थाननिके प्रमाणका भर उपजनेका अरविन कुलनिरि उथाम आहारका अनुश्न स्वरूपका पर तहांते पडि उछलनेके प्रमाणा अर तिनके शरीरको उचाईका वर्णन है। ... अर नवीन पुराण नारकीनिका कर्तव्यका अर ध्यंतरलोकका अधिकार तिन विलनि विप क्रूर पर्वत नदी आदि पाइए है तिनका अर तहाँ नारकीनिकी प्रवर्तिका अर तर्दा तिनकर प्रमाण करि गर्मित मंगल करे । तिनके कुलनिका अतिन कुल मेदनि वि वक बाध दुःस साधनका अर तिनके दुःमका अर अर चैन्य वृक्षकर मर तह प्रतिमा माननमादिक विनके आहारादिकका अर तीर्थकर सत्ववाला । वर्णन है। वहां जब दुःस निवारण हो है ताका अर नार- बहुरि तिनके कुल मेदनि विर मेद पाइए । कीनके मरणका वा दुःसु मेदनिका वर्णन है। तिनका मर कुलनिक इंद्र है तिनकी देवोनिके बहुरि पृथ्वी प्रति वा तिनके पटल पटट प्रति प्रमागका अर कुलमेदनिविर्ष मेद है अर तिने नारकीनका जघन्य उत्कृष्ट आयुका अर शरीरकी वित्र जे इंद्र अर इदनिकी महादेवी है जिनके उचाईका वर्णन है। नामका वर्णन है। बहुरि नारकीनके अवधि क्षेत्रका अर नारकी निति जहां उपजे भर जे पद न पावं तारा बहुरि इंदनिके जुदे नाम कहि विन गनिका भर जे जीव जिस पृथ्वी ताई उपजे ताश अर महनरी है तिनके नामका पर सामानिकादि देव- निकी संख्याका तहां अनीके विशेषका वर्णन है 11 जिनके दुःसकी अधिकताका वर्णन है ५६ | बहुरि इंदनिके नगरनिका स्थान नाम आयान- ऐसें नरक वर्णन करि लोकका सामान्य वर्णन का अर तिनके कोटादिकका वर्णन है। समान कीया है। भर गनिकानिके नगरनेिका अर कुल मेद अपेक्षा भवनाधिकार ॥२॥ स्थाननिय वर्णन है। तही मंगल करि भवनवासीनिके कुल मेदनिके बहुरि नीचोपपादादि वान ब्यंतरनिका स्थान नामका मर तिनके इंदनिके नामका घर परस्पर नाम आयुश वगंन है। चा जिनकें है सारा अर अमुगदिनिके जे बहुरि य्यंतरनिके रहने के निलय तिनके नेदका चिन्द तिनच भर चरयानिके मेदनिका वा अर म्यंतरनिके सर्व क्षेत्रा भर ते निलय जैसे वहां प्रतिमा मानस्तंमादिका भर तिनके भव. पाईए ई ता अर निलयनिक म्यासादिकका ननिशी संध्याशसम्पका र स्थानध वर्ण. मा दम्पा अर म्यनरनिके आहार उश्वासका वर्णन है। गरि देवनिके सादिक नेद है तिनका भर ऐसें दिनीय अधिकार ममाम हो है। जिनके संवा वर्णन है। गरि भवनवासी- ज्योतिलोकाधिकार ॥ ४॥ निवि कादिक परमेशपाईए है जिनकी मंश्या. नहा ज्योतिष विवनि प्रमाग गर्भित मंगल निशान है। १०३ करि ज्योनियनिक पचमेस कहि प्रमंग पाह सह सेनाको मस्दा म्यादनेको गुनधारम्प हो जिनके आधार भूत केते दीर ममुनिके स्थान दिई र देना राणमत्र रहा है। 104 नाम हिम आपममुनिक वलयभ्याग मुची. बारिसरका अन्य देवना प्रममा याम म्याने विधान का प्रमागा भर मिना वादा गाम परिधि मा वादर मूक्ष्म ... ... ... ... ... १४ -- ... ...
प्रिलोफसारको विषयमूची। । . 7 .. विषय. विपर. पृच. क्षेत्रात त्यावनेका विधान प्रमाणादिकका का देवांगनाके उपप्रनेके स्थान भर वैमानिसनिके अंपसीप रामान भीरनिके संघ प्रमाण स्मारनेके । प्रदीवार विक्रिया अवधिज्ञान अतराल पर तह विधानका वा समुदनिके रसादिक विशेषका भर उपजनेपाळे जीव भर तिनका भायु । र सो. तिनि विष भोगभूमि कर्मभूमि क्षेत्र के विधानसभा पातिक देवनिका स्थान लादिक भर देवीनि. कर्म भूमिविष उतर अवगाहना प्लीएं एवंदिया का भायु देवनि के शरीर उभाप भाारादिका सजीवनिक प्रमाणादिका यादिवर्णन है। १२७ प्रमाण पर स्वर्ग जाने भावनेवाले गौर एका बहुरि प्रसंग पार पृथ्वीकायादिध भायु वा घेद भववारी जीप शलाका पुरपनिकी भागी देर. निका वर्णन है। ऐमै प्रासंगिक वर्णन है। १५५ निके उपबने रहनेका विधान परि मनिका ऐम प्रासंगिक वर्णन करि ज्योतिष्कनिराम्पान. स्थान स्वरूप हायादि अनेक वर्णन है। भर तारानिता अंतरालमा भर विसनिक मनुष्य तिर्यग्लोकका अधिकार स्वापका भर पौराई मोटाई के प्रमाना भर किरणनिके प्रमाण चंद्रमाची निहानि होने तही मंगल परिचमेरनिका रपान कमर- विशेषका विवनिक बलाबरेवाले देशनिके प्रमा• सादि क्षेत्र भर दिमरत् मारितापनगर गका गमन करनेके विशेषका गंबूद्वीपादि बिर्य कुलापलानिले उपरिहनिवि कमसनम. तिनके प्रमाणावर्णन। सनिक उपरि मंदिरनिवि परिवारसहित सनी १४) तही प्रगंग पाद राजभदद पम्नेके स्थान देवी पर हनित किती गंगादि नदी पर कहि सर्व ज्योतिकनिका प्रमाणका वर्णन... मदौके परने भर मदीनिक गमन भा परि एकचन्द्रमाके परिवारका प्रमाणका प्रया- समुदविर्ष प्रवेशद्वारादिना साप - सीपहनिए मामा दीप तारानिके विभा. मासिकान। गका पन्द्रमा मूक भतराल पारक्षेत्रभर बहुरि क्षेत्र कुलाहालानिया प्रमाण स्मारने दिन राधिक प्रमाण स्पारने विधान हो विधानसीमर मेरगिरि पर तारेनर ताप तम फैलने पर सूर्य दीखनेश त्यादि बननिरि मदिराविक सिगरे प्रमाण सम्पति भनेकपर्णन है। वर्णन है।... १५० बहुरि पदमा सूर्य महानिके मात्र मुक्तिस्यार बहुरि परिवार सहित आदि निका नेका विधान भर भयन लिपि मागाशिका विधान ११ स्थान हासिधा पर। भर माननिके तारा भामरादिसनारनी गरि भोग भूमि कर्मभूमि माग TET गरि पदमादिर बायुमर देवोनिका वर्णन मिर भर होता दरम गरि भरनडि पि उपरनेवाले औरनिका भनि निसरिन निरन्तर पर्वतमान पर्व निधन। वन ऐतीय अध्याय समाप्त है बहुरे शिव रेशनियमित वापर मानिक लोकका वर्णन ॥५॥ गि भगा नदी बरदान सह मंगल र स्वर्गाको नामबारपारमा बहुरि गिरजनि वि मामा र सर तरी ग्मिाननिषारयावामाम रानी. भर मायादितौनापासांERA मा विस्तारादिया प्रमाण भार था भारतीयारहोगी माय.. इननिता ना ना नगर गुदि प्रसार भाषामा भर सामग्य | amrtermat निसा प्रमभानगा वरना kutte दिस RTR प्रमा.. 16 भारपान मसाला karate.rat ... ... ... NICE 14 - ... + ... विश्य. पृट. विषय. । बहुरि विजयादकी श्रेणी विणे नगरादिक है घर परटे है ताका वर्णन है म्लेच्छ सुंड विपमाचल है। पर आर्य मंड बहुरि द्वीर ममुनिका अंत कि नागिरद बेटी वित राजधानी नगर है। बहुरि मोग भूमि है तारा वर्णन है। ऐमें बुद्धी वन पी विविधते नामिगिरिनका स्थान प्रमाणादिक सयन समुद्रका वन है। आ कुलावलनिक कूट या चनादिक तिनका दर्गन २८५ / तहाँ ताके अभ्यंतर पाताल है तिनका भरमा बहुरि जेवू द्वीप वि पवंत नदीनिकी संख्या धा जठको उचाईबावधने घटना परताके व्याम- जिनकी वैदानिकी मेल्यास वर्णन है । बहुरि का या नाश जलके पर चंद्रमा के अंतरा- माव ऐरावतका विजयादके कूट अर गनदंत लाटिकका भर पातालनिके अंतराटायर निम निके कूट पर मार गिरिनके कूट लिनश नाम ममुद्रविष वेलंघर नागकुमार वर्म है तिनका भर प्रमाण स्थानादिक पर तिन कुटनि उपर धर्म पर्वतादिक है अर विन विष देव बम निका है तिनके नामादिक तिनका वर्णन है। २१ पर दीप है तिन वि वेलंघर मागहमार बसे है बहुरि गंगादि नदीनिकी परिवार नदी पर सर्व जिनका सर नीन द्वीप है तिन विन मागधादि देव नदीनिका प्रमाण वर्णन है। २९९ दस है तिनका अरद्वीपनिवि कमोगभूमियां बन बहुरि पूर्व पधिम अपेक्षा मेरु आदिकाव्यास वर्गन ३..। है जिनका म्यान नाम प्रमाणादिका वर्णन है। बहुरि धातुको संद पुष्कराई विर्य मेव माताल बहुरि घातकी सड पुष्कराईका वर्णन है नहीं विदेह देश गजदेत है तिनके व्यासादिकका वर्णन है ३० घ्यारि साकार पर्वतनिका अर तहाँ पाई है बहुरि अंदीपवित्र देवर सत्तरकर आ कला. कुठानल आदि जिनके प्रमाचा भर कुलावट पठ मर क्षेत्र भर मरत ऐरावत संबंधी विज क्षेत्रनिके आकारकाभर तिनि द्वीपनिका परिचिका पार्ट विनका पनुः पृष्ठ वाम जीवा वृत्त विष्कम प्रमाग म्याय कुलाचल क्षेत्रनिके म्यामका पर बुद्धिा पाच भुवाका प्रमाण वर्णन है। ३०३, विदेह देवादिको मायामका अर कुरु म अर तही छनेक प्रकार जीवादिल्यापनेके करण सूत्र. नदीनिशगमन विशेष है नाश न है। ...३६ निका वर्णन है। १.५/बहुरि मानुगतर पर्वत के प्रमागादिकका भरताके हुरि भरत ऐरावत क्षेत्र विकासादिक पलटनि टपरि कूट है नहीं देवादि वमें है जिनका वर्णन है ३५ हो।।मर तदा में प्रति हो है ताका वर्णन ३१६ बरि कुंडलगिरि रचक गिरिका स्थान प्रमाणा- दिशा र तिनके उपरि कूट है दिन विजे ठहो इस मरन क्षेत्र वि इस अवमारिणी काठ वर्म हैं तिनका वर्णन है। २७० वि चौदह पट पर चौवीस वीर दारह बहुरि दौरसमदनिके स्वामीनिका वर्णन है पतं नव नारायण प्रीिनारायण बसमा परि नंदीवर दीर यि पावन पर्वत जिन उ. परदसमए निनिधनाम आयु आदिशा फार वयालय अर सोना वावड़ी चौसदिन घर एर भए ताप भर तीर्थराध क्य है।जिना स्थान प्रमाणादिका वर्णन है। वर्ग भर दुखमाल बि स बर ली तो अारिक पांघ महोत्मय देवरे है तोटा भर भादि मनरेलीय. वा अर चन्यालयनिके जपन्यादि प्रमाणा सभा समापट मति धादि नाश होने और चैन्यालयनि विर्षे अनेक रचना देताच अर कामा दुममतमा पाटी प्रशमिश घर जिन विदा वर्णन है। प्रिलय नेसला युगलबनेगा बहुरि अगमगल हरि कनां अपना नान मुबन पर हर दुखमा भी चादर पुनरनिराधादाम मुममा हाल नाय. ही व परम गुप्त अभीष्ट फल कीया वारि पर गया पर बदमा प्रथ ममामा। गिरा हा नगा पनि अमिमानार कदि प्रथ पूर्ण। tari Tamhi m पदम गिवान। इनिसियभी ममाप्त। ... ...
त्रिलोकसारका परिशिष्ट । समय अर्थ जाननेको गणितका मान समय चाहिए । जाने यह करणानुयोग- या विना सह गागिनमा प्रयोजन पाईर है । ताने पहने गणित शानिका अत्याग करना । गई शावनिसा न होनेको कारणभूत दोय विद्या है। एक अक्षरपिया एक कविता । सो प्यासरणादि फरि अभर ज्ञान भए अर गणितशावनि फरि अंकज्ञान भए अन्य भागनिका अभ्यास गुगम हो है । पहले श्रीरभदेवजी एक पुत्रीको अक्षररिया एक पुत्रको कविधा मिलाई । सो दोऊ ही विद्या कार्यकारी है। तहाँ जे तुम्बुद्धी व्याकरणादि पालि लिनके अधि पर भाया रचना परी। अब इस शिप जे जीव गणितज्ञानरहित निनो वि इहाँ प्रोजनमात्र शास्त्रोक्त गणित विधान वर्णन फारए हैं । यहुरि अन्य शास्त्र- निने विशेष जानना । तो एकादिक गणना भर तिनके अंक मांडनेका विधान प्रवृत्ति विमें प्रसिद्ध है सो माग्दना । परि प्रति विर्ष पहले अंफफा नाम इकवाई दूसरे अंकका . नाम दाहायो तृतीयादि कनिका नाम मेंकरा हजार दाहजार लारा दशदात कोडि कहिए है। मंचन विथ इनका नाम एफ दा धारा सहल भयुत क्ष दालक्ष कोटि ऐसे नाम हैं। यहार पाफे टपरि दशकोडी शतकोटि महरकोडिइयादि नाम जोडिने । बहुरि अंफनिकी याई तरफासो पनि है। ताने इकबाईका अंक टिग ताके पी पी दाहाकी आदिकके अंक लिखने । मैं दोपसे एपन टिखन होइ सहाँ इकाईका एका लिखना साकें पीठे दाहाकीका पांचा भर ताके पी सैकड़ाफा दूना लिखना । यहरि तहाँ एकाको पहला अंक फहिए पांचों दूसरा औफ फहिम दूसार्को अंतका अंक कहिए में परिपाटी जाननी । यहरि परिकर्माटकको सीसना । सो मंकटन १ म्यरफलन १ गुणकार १ भागहार १ वर्ग १ पर्गमूल १ घन १ घनमूल इनों परिफर्माएक कहिए है। तहाँ मति विष जाका नाम जोर देना है साका नाम इहाँ संकलन जानना । जापों जोडिए ताका नाम धनराशि कहिए, जाविय जोडिए सो मूलराशि जानना । मो मूटराशिको धनराशित अधिक कहिए । यहुरि मन राशिके उपरि धनराशि लिविर में पांच अधिक पिचाणवे ऐसे लिमिए . तहाँ मद्रराशि धनराशिके अंफनिकों पथास्थान जोदिए । इकाईका अंक दाहाकीका अंय वि दाहकीका ऐसे क्रम जोडिए जो इकबाई आदिकके अंक जोडे अधिक प्रमाण आय तो तहां इकवाईका अंक मादि दाहकी आदि- फका अंक अवशेष रह ताको दाहकी आदिकके अंकनि वि. जोडि दीजिए । याका नाम प्रत्ति वि हाधिलागा कहिए है । इहाँ उदाहरण । जैसे दोयस एमनविय चौरासी जोडना होइ तहां इकाईके अंक छह प्यारि जोडे दा भए सहा इकाईकी जायगा बिंदी मोडि अवशेष एका भर दाहकी के अंक पंच आठ जोडे चौदह भए सो एकाके पीछे दाहकाको जायगा चौका लिखि भारोप एफा अर दोय जो तीन भए सो ताके पी सैकडाकी जायगा लिराना । ऐसें इनका जोड़ तानसे चालीस ३५० भया ! अथवा दूसरी तरफमै जोडिए तो सैफाली (२) जागा दूग मादि दाहकोक अंक पनि भाउ मेरे तेरह मर ने दाहसोमा बारमा सामा दिनि एक कहा विरेज. ऐसा मया ३३१ बरि इकाईका ए ग्यार जो दश होइ सहा इकाईको जायगा विदो लिनि एक दाइका अंक जो ऐमा ३४० मायाकार औरनिकामी मंकरन जानना । बहरि अकरन नाम रागिरिमाका है प्राति विपासा नाम पारोका काटना है। नहीं जाली घाई नासा नाम ऋग गशि है । जसमापनासा नाम धनराशि है वा नगगि है। तिन अपरामि फरि नाशिको सन या सो नीना मो मागणिके मारे गरागिकों गिरी गा आने गागा आकार दो सहित र दोर की दोरम में शिनि अमूलागि भाग में -- मानानी की मागी मिनिट। अ ताकी दे दि २.०-२ अ Fin. Air faa - कामी र नासो ग बहुरि भगत प्रहार भी frame के भनिनी भागात अंधार नमी पाई, भाई कनिम्मी नारो sinel मा unde ve et profile for a long जाकरि गुणिए ताका नाम गुणक वा गुणाकार है। पहरि गुण्य हूया राशिका नाम गुणित या हत यामइयादि जाननें । सो गुण्य आर्गे गुणको लिखिए जैसे चौसरि गुणा एफसी अठाईसको ऐसे लिखिए १२८।६४ अव गुणनेका विधान कहिए हैं। गुणफारके अंकनिकरि पहरे गुण्यका अंत अकको गुणिए तहाँ गुणकारका इकाईका अंक करि गुणें अंक पाये तिन वि इकवाईफा अंकयो तिस अंत अकके उपरि लिलिए । दाहको आदिके अंक आय सौ ताके पीछे पी लिखिए । परि जो गुणकारका अंक दाहकीका होइ ही तिसकरि सिस गुण्यका अंन अंककों तैसें ही गुणिर तहाँ पूर्व इफवाईफा अंक आया था साके पीछे तिसकों लिखिए। या पूर्व सहा अंक होइ ती जोड़ दीजिए। बहुरि ऐसे ही गुणकारके सैकरा आदि अंक होइ तौ तिनकरि कामत गुणि जो प्रमाण आरे ताको पीठे पोलिसिर वा जोडिए । ऐमें अंत अंकका गुणन किया । बहुरि जो गुण्यके अनेक अंक होइ तौ से ही सपति आदि अंकनिकों क्रमते सहा गुणे इकाईका अंक आ सो सी पूर्व इफपाईका अंक सिरया था ताके आगें लिखिए अर अन्य अंक आ तिनकों पूर्व अंकनि वि अनुकमत नोरते जाइए । ऐसें कीएं जो प्रमाण आपै मो गुण्य एवा राशि जानना । हा उदाहरण । जैसे एकमो अठाईसकों चोमठि फरि गुणना तहां प्रथम गुण्या एकाओं चौसटि फरि गुणिए तहां गुणकारका चौका करि गुणें प्यारि भया सो एमा उपरि लिख्या छमा फार गुणें छह भया मो ताके पाछ टिपया तब ऐमा भया । बरि गुण्यका रपति अंक दुवा ताफों पीमठि करि गुणिए । तहां चौका करि गुणे पनाम हो तो दूवा ती अंकनिके आगे दिल्या अर हाथिलगे तीन सो र्य अंकनि वि जोया । पारि BE करि गुणे अतालीस होइ सो पूर्व अनि विर्ष जोडिए तर ऐसा भया ने गुण हुषा प्रमाण इत्यासीसे याणरे भया । ऐसे ही अन्यत्र जानना । बरि अन्य विधान कहिए हैं । गुणाकारके अनि पारि गुण्यके प्रथम अंकों गुणे जो प्रमाण आ सो स लिमर भर गुपका रितीय अंककों गुणे जो प्रमाण आये ताके आगे एक विदी अदा लिखिए ऐमैं ही क्रमत गुपफा धनुर्धादि अफनिकों गुणे जो जो प्रमाण आय ताके श्रा प्यारि आदि विधी देइ जु जु लिगए । यहरि तिन सपनिकों जोडिए जो प्रमाण बार सो गुण्य हया राशि जानना । मैं चौमीठ परि एकसौ अाईमो गुणना तो गुपका बारों गुणें पांच यारह भए सोलिया अर दुवाको गुणें आगे एक विदा दारं पारही असा भर मी लिल्या अर एकाको गुणें आगे दोष विदो दौर पौसाटन होई इनको जोडे 11 मोहामा पाणी आये । अयया यरविधान करि गुणन तो है मो से गुपके अंक रोइ निशानी तिनि विगजेने गणकार, कोलिनने पतन कोटे करने । बहुरि तिन कोटानिको न्यो? रहरि गणार 4.7 अब के. का प्रथम अयको गुणे जो जे अय. आई तिनको प्रथम पनि केशमा । यादा चीराधान मानधन मप44 ar -- .
(४) अंक आये तो दाहकीका अंक उपरिम भाग विप इकवाईका अंक द्वितीय माग विन लिदिए । बहुरि ऐसेही गुणकारके प्रयमादि अंकीन करि गुण्यके द्वितीयादि संकनिकों गुणि द्वितीयादि पंक्तिनि विर्षे लिखनें । बहुरि तिस यंत्रका ड्योढा जोड दीजिए जो प्रमाण आये सो गुणित राशि जानना । उदाहरण-जैसें एक अटाईसको चीसठि करि गुणना होइ तहां ऐमा यंत्र करिए। वहरि याकी ऐसे व्योढा चोरिए.........बद्दरि याविर्षे छका चौका करि गुण्यका प्रथम अंक एककों गुणि प्रथम पंक्ति वि द्वितीय अंक दूवाकों गुणि तृतीय पंक्ति वि लिम्वने...... वहरि इनका ड्योढा जोड दीजिए तब दूवाका दूवा लिख्या अर आठ तीन आठकों जोड़ें उगणीस ताका पीछे नांवां लिख्या हाय एकलागा सो अर च्यारि दोय च्यारि जोडे ग्यारह.भए ताका ताके पीछे एका लिख्या बहुरि हाथि लागा एक अर एका एका जोड़ें आठ भया सो वाके पीछे लिख्या ऐसे इक्यासीसै वाणये प्रमाण आये हैं। अथवा संभेदन करि गुणन हो हैं । तहां जैसे मुगम गुणन होय तैसे गुण्यका बा गुणकारका खंडफार जुदे जुदे तिन खंडनिकों गुणि जोड दीजिए । उदाहरण । जैसें एफसौ अठाईसको चौंसठि कार गुणना होइ तहां चौसठिकों दोय खंड कीये साठि अर च्यारि तहां साठि करि गुणे छिहंतरिसै असी-होइ अर च्यारि करि गुणें पांचवें बारह होइ, बहुरि ताकों सोलह करि गुणें इक्यासीस वाणवै ही होइ । बहुरि जहां गुण्यगुणकार बहुत होइ तहां परस्पर गुणन करना । जैसें थ्यारि सोलह चौसठ दोय ऐसें च्यारि राशि ४।१६।६४।२ गुण्य गुणकार हैं । इनकों परस्पर गुणिए तहां च्यारिकों सोलह करि गुणे चौंसठि बहुरि याकों चोंसठि करि गुणे च्यारि हजार छिन याकों दोयकरि गुणे इक्यासीसै वाणवै । अथवा गुण्य गुणकारनि वि काहूका गुणकार रूप संभेदन करिए । काहूको फिसी करि गुणि लिख दीजिए पाछै तिनकों परस्पर गुणिए । जैसे तिन गुण्य गुणकारनि विर्षे चौसठिका संभेदन करि च्यारि गुणा सोलह लिख्या । वहरि पूर्व च्यारिका अंक था ताकों इस च्यारिका अंक करि गुणे सोलह भए । ऐसें कीएं ऐसा १६।१६।१६।२ राशि मया इनकों परस्पर गुणें भी इक्याससीसे वाण होइ । ऐसें विधान जानना। संभेदनादि करनेका प्रयोजन इस शास्त्र विर्षे आवैगा तिसते इहां स्वरूप दिखाया है। ऐसे वा अन्य प्रकार भी गुणन विधान जानना । वहरि इहां इतना जाननां गुण्यगुणकार विर्षे कोई गशि वि एक घटाईए या वधाईए तो अन्य राशि एक ही होइ तो तितनेही घटें वर्धे । अर अन्य गशि बढा होइ ती तिनकों परस्पर गुणे जितने होइ तितने घटें वधैं । जैसें चौसठ कार एकमा अटाईसकों गुणे इक्यासीस वाणये होइ अर जो चौमटिमस्यों एक घटाईए बधाईए तो तिम प्रमाण मेंप्यो एकमों अाईस घटै वथै । भर एकसी अठाइसमेंस्यों एक घटाए यथाए चामठि घ. वये । बहरि जैमें च्यारि सोलह चीसठि दोय ऐसे गुण्य गुणकार होइ तिनकों परस्पर गुणे इक्याममि वाणये होइ । बहुरि जो मोलहमें एक घटाए वधाए अन्य राशि व्यारि चौमटि दोष इनको परम्पर गुणे जितने होइ नितने घटें वर्षे । वहुरि एक घटाए क्याए जेता प्रमाण पं. या तहाँ आधा आदि वा दोय आदि घटाए बधाए तिस प्रमाणते आधा आदि (५) का सारि माग पो पर ऐमा जानना । मैं और भी विशेष अनेक प्रकार हैं । ते यथा. गभर जानने । मारि भाग दो प्रमाण त्यापनेका नाम भागहार है। जैसे प्रति विर्ष टकाभियो रपये फाइए। परि राभिके घट करनेकी पद्धति है । सो भाग हार रूप जाननी । भने दोया आठ वट पोर पचीस फदा तहां दोयसको आटफा भाग हार जानना अर जाकों भाग दीजिए साया नाम भाग्य है या हार्य है। जाका भाग दीजिए ताफा नाम भाजक पार वा भागार यादि काहिए है । बहुरि भाग दौए राशिका नाम भक्त वा भाजित पादि कादिर। यहरि शिानेमें भाग्यकों उपर लिखिए भाजको ताफे नीचे लिखिए। जैसे इपासीस पापा चौमटिश भागकों ऐसे लिखिए । अब याका विधान कहिए हैं-भाग्य राषिके अनादिक जेते अंकनिफरि भाजक राशित प्रमाण पधता होइ तितने अंकरूप राशिकों भाजकमा भाग दीजि । बहरि जिस अंक करि भाजरुको गुणें जाको भाग दीया था तामें घटाइ अवदोए तहाँ लिग दीजिए और यह पापा अंक जदा लिखिए । यहुरि जे भाग्यके अंफ रहे तिनफे अतादि अंपनिकों से ही भाग दे जो अंक आय ताको तिस पाया अंकके आर्गे लिखिए । देही यापम भापके अंक नि:शेष होइ तावत् विधान फर तहां पाए अंक- नियरि जो प्रमाण मार मो तहो भाग दौर जो राशि भया ताफा नाम लम्धराशि है ताफार प्रमाण जानना । इहां उदाहरण । इत्यासीसै बागरेको चौसटिका भाग दीया तब पापों दोय आदि अंक करि गुणें तो बहुत प्रमाण होइ ताते एक करि गुगें चौसठि या साकों इत्यासीमें घटाप तहां सतरह लिख्या अर पाया अंक एका जुदा यहरि यह गारी ऐमा १७९२ भया तहाँ आदि तीन अफ कार एफसों गुण्या भाज- फर्ने वधता प्रमाण होइ ताको चौमटिका भाग दीजिर . तर सीन आदिकरि साकों गुणें जो यथता प्रमाण होइ सातै भाजफकों दोय फरि गुणे एकसो अठाईस होय सो घटाए तहाँ इत्या. पन रहा सो टिख्या भर पाया अंक वा तिस एकाके आगें लिख्या । बहुरि यह राशि ऐसा ५१२ मपाताको चासटिका भाग दीजिर १ तहां ताको आठ गुणा कीएं पांचसे यारह होइ सो भाग्यमेस्यों घटाए राशि निशेष होइ पर पाया अंक आट तिम वाके आगें टिख्या ऐसे पाया अंकनिकरि लन्धराशि एफमी अठाईस होइ ऐमें ही अन्यत्र जानना । वहरि जहाँ भाग दृष्टि जाय माजककों किसी अंक करि गुणे भाग्यके अंक भाये पहले ही अंक नि:शेष होइ जाय सहाँ अंक घटनेने भाग या कहिए सो जहाँ भाग टूटै तहाँ पाया अंकके आगें विदी तिरी बहुरि से विधान करना । जैमें छह हजार च्यारिसे चोईसकों आटका भाग दाया तो चीसटिको आटका भागदीएं आठ पाया सो आठकों आटकरि गुणें चाँसहि होइ सो चौसटिमें घटाएं निःशेष भया तहा पाया अंक आठके आगे विंदी लिखि बहुरि चौईसकों आठफा भाग दीरं सोया पाया सो लिल्या तर टन्धरागिका प्रमाण आठमै तीन आया । ऐमैं ही अन्यत्र जाननां । बहुरि कहीं भाग देते भाष्यराति निःशेष न होइ कि अवशेष रहिजाय तहाँ टन्धराशि प्रमाणके आगें अवशेपरों भागहारकर भाग लिन देना। जैसे इक्यासीसै चौराणवैकों चौसटिका भाग दीया तहाँ (१२) दूणा कारे तहां आठ छठा भाग मिल्या या विष दोय छया भाग मिल्याए दर्श छटा भाग तिनका जोड भया । याका दोय करि अपवर्तन कीएं पांच तीसरी भाग प्रमाण हो हैं । अयया छह हारनिकों आधा कोएं तीन हार होइ तब समान छेद होइ ताते छह हारनिकों और याके दोय अंशनिको आधा करि तहाँ एकका तीसरा भाग लिख्या ४, याको प्यारि तीसरा भाग विमें मिलाएं पांच तीसरा भाग मात्र प्रमाण आया । बहुरि हजार चवालीसवां भाग विर्षे दोयसै वाईसा भाग पचीस ग्यारहवां भाग घटायना होय तहाँ बाईसकों दूणा कीए ग्यारह, ग्यारहको चौगुणा कोएं समान छेद होइ। तति दोयसै अंश अर बाईस हार इनके दुणे कीए प्यारिस चवालीस भाग भए अर पच्चीस अंश ग्यारह हार इनकों चौगुणे करिए सब चबा- लोस भाग भए बहरि च्यारिसे अर सब जोडें पांचसै भए सो हजारमें घटाएं अवशेष राशि पांचसै चवालीसवां भाग हो है । ऐसे ही अन्यत्र जानना । इहाँ इतनी जानना । अंश अर हार इन दोऊनिको समान प्रमाण करि गुणें समानका भाग दीएं जेतेका तेसाही प्रमाण रहे है । जैसे जो पंद्रह आठवां भागका प्रमाण सोई दोयसै सत्तरि एकसी चालीसवां भागका प्रमाण है । दोऊ जायगा अष्टमांश करि हीन दोय प्रमाण हैं । इहो अंश अर हारनि विपं दोऊनि वि अठारहका गुणाकार या भागहार है । बहुरि समान छेद करनेका प्रयोजन यहू है सो समान छेद भए पछि समानरूप अंश होइ जाय तहां पीछे अंशनिकों अंशनि वि मिला. यना होइ ती जोड दीजे । घटावना होइ ती घटा दीजे । बहुरि जहां कोई राशि हार न होय सहां हारका प्रमाण एक कल्पना | जाते ऐसा कह्या है 'कल्पो हरो रूपमहारराशेः' जैसे दश अर पाच तृतीय भागका समछेद करना होइ तहाँ दशके नीचे एकका हार लिपना का यहार पूर्वोक्त विधान कोएं तिनका जोड पैतीस तृतीय भाग भाया । अर दश विर्षे पांच तृतीय भाग घटाएं अवशेष पीस तृतीय भाग प्रमाण आये है । बहुरि जहां ऐसी राशि गुणकारादि विधान विष होइ तहां पहले ऐसे विधान परि पीछे गुणनादि करना । जैसे गुणकारादि विषे कोई राशि एकका मोलदो भाग अधिक पंद्रह प्रमाण होइ तहाँ समझेद विधानते पंद्रह विय एकका मोलहदा भाग जोडे दोयमै इकतालीसका सोलहा भाग हो है सो तहाँ स्थापि गुणनादि करना। बहुरि भिन्न गुणकार वि गुण्य गुणकारको अंशनिका अंशनि कार अर हारनिका हारनि फारि गुणन करना । जैसे पंदह आटवां भागका पाच तृमीय भाग कार गुणना होइ2x3 सहा पंद्रह अंशनिको पाच अंस करि गुणे पिचहतरि अंश होइ अर आट हारको तीन हार करि गुणे चाईम हार होइ ऐमैं तिनका गुणन कीएं पिचहत्तार चोईसई भाग आया । सहुरि एक हजारकों दीय नतीय भाग नीन दश भाग कार गुणना होइ तहाँ एक हजार भाग हार नाही है ताते तहत एक भागहार कानि मा तहाँ अंशनिको भशनिफार हारनिको हारनि को पार गुगन कौर या हमारका सीमा भाग आपा दोयम है । यहुरि एकका तृतीय भागको एक अट माग कार गुणना होइ महा पूर्वोक्त पियानंने एकका पीसको भाग प्रमाण हा इतना नना पकते हीन कार गुमन की गुथ राशिका प्रमाणने पटा प्रमाण है। पारिज एफका पीथा भाग अधिक योसों पांच फार गुणना होइ तहाँ समछेद विधान बीग वि एकमा चीया भाग जोडें इस्पासोका चौथा भाग भया अर पांचके भाग हार नाही है । तहाँ एक भाग हार पालि पूर्पयत् गुणन कौएं प्यारिस पाचका पौधा भाग प्रमाण हो। अन्यत्र जानना । बहारे भिन्न भाग हार विन भाग्यके अश हार होंइ तिनकों सौतेने ही रगिए अर भानफके अंग हार होंहि तिनको पटि दीजिए । अंशनिकों हार कीजिए भर हारनिकों अस कीजिए । में स्थापि अंशनिकों अंशनि कार अर हारनिकों हारनि कार गुगिर को करने जो प्रमाण आचै सो नभ राशि जानना । जैसे पिचहत्तरि चौईसयां भागकों पाच तृतीय भागका भाग देना तहां भाजकके पाच अंशनिकों हार कीजिए अर सीन हारनिको अंश कीजिए ता परि अंशनिकों अंगनि करि अर हारनिकों हारनि करि गुणन कीजिर तब दोपमै पचीमकों एक सौ घौसका भाग आया। तहाँ पंद्रह करि अपवर्तन कीएं पंह आठवा भाग प्रमाण स्वराशि आय है । यहुरि दोयमकों दीय तिहाई अर तीन दशव भागका भाग देना 3 तहाँ संवत् दोऊ भाजानिके अंशहारानिकों पलटना अर दोय सके हार हैं नाही साने तहाँ एक हार फल्पा I में स्थापि अंशनिका अंशनि करि हारनिका हारनि करि गुगन कोर एए हजारका छठा भाग आया सो एक हजार लब्धि राशि जानना । बहुरि जैसे एकया चौईसा भागको एफका आठयां भागका देना सा तहां पूर्ववत् माजकके अंशहार पटिगुणन कोएं आठया चौईसा भाग हो है। बहुरि इहां आठ करि अपवर्मन कीएं एकया तृतीय भाग मात्र लन्धराशि हो है । इहां इतना जानना एकते घाटिका भाग दीएं भाग्य रागिते लम्बराशिका प्रमाण बहुत आये है। वहरि जैसे दोयसैकों सात सोलहा भाग अधिक सोलहका भाग देना होइ तहां दोयसैके नीचें भागहार नाही ताते तहाँ एक भागहार फल्पना भर सात सोलहा भागों सोलह विर्ष समछेद विधानत जोड़ें दोपसे तरैमटिका सोलहा भाग भपा मो लिखना "f बहुरि भाजकके अंशहार पलटि पूर्ववत् गुणन कीएं यत्तीसर्सेको दोपमै तरेसटिका भाग आपा मो लन्धराशि जानना । ऐसे ही अन्यत्र जानना । यहरि भिन्नवर्ग वि जेतेका वर्ग फरना होइ ताका अंश अर हार दोऊ दोय जायगा मांडि गुणकारवत् शनिकों अंशनिकरि हारनिकों हारनि करि गुणन करना जैसे पचीस छठा भागका वर्ग फरना तहाँ तिस प्रमाण दोय राशि मांडि A अंशनिकों अंशनिकरि हारनिकों हारनि करि गुणन कीएं इस पचीसका लत्तीसो भाग भया ताफा तेरह छत्तीसवाँ भाग अधिक सतरह प्रमाण वर्ग भया ! बहुरि एकका आठवा भागका वर्ग करना या तहां पूर्ववत् विधान पीएं ताका वर्ग एफका चौसठियां भाग हो है। बहुरि दोषका आटवा भाग अधिक सीनका वर्ग करनां तहां समछेद करि निनकों जोड़ें छतीसका आठवा भाग भया ताका पूर्ववत् विधान काएं उसे वितरिका चौसाठिचा भाग भया ऐसे है। अन्यत्र जाननां । बहुरि भिन्न घनविय जेनेका घन करना होइ ताका अंग अर हार दोऊ तीन जायगा स्थापि गुणकारवत् अंशनिकों अंशनिकरि हारनिकों हारनि फरि गुणन करना । जैसे पच्चीसका चौधाईका घन करना होइ त तोह प्रमाण तीन राशि स्थापि अंशानको अंगनिकारि हानिको हानिसीर गुने पर हजार से पचीमका चीसठियां भाग प्रमाण घनगाशि हो । बरि एकका आटयां मागा धन कीएं पूर्ववत् विधाननं एकका पांच बारह भागमात्र धनगगि हो है । बाँ चतुर्थ भाग अधिक दोयका धन करना । तहां ममछेद करि जोडें नयका चतुर्थ माग मया तारा पूर्ववत् घन कीएं । सातमै गुणनीमका चीमठियां भाग मात्र नाका धन भया । ऐसे ही अन्यत्र जाननां । बरि भिन्न वर्गम्ल वियें जाका वर्गमूल करना होड ताके अंगनिका वर्गमूल काटें जो प्रमाण आवै सो ती ताके वर्ग मलविय अंश जाननां । आहारनिका वर्गमूल काटें जो प्रमाण आप सो तहाँ हार जानना । इहां भी वर्गमूल काढनेविष विषम मममी महनानी कार अंन विश्न वि वर्ग घटावनां इत्यादि पूर्व विधान कद्या सोई जाननां । जैसे उसै पचीसका छतीसा मागका Fr' वर्गम्ल करना तहां पूर्ववत् विधान कीएं उसे पचीस अंगनिका वर्गम्ल पचीम सो नौ अंश अर छतीसका वर्गमूल छह.सो हार ऐमें ताका वर्गमूल पच्चीम छटा भाग मात्र आवे है । वहरि जहां राशि निःशेप न होय तहां अवशेषके अंग करने जैसे दोयसैका छठा मागका वर्गम्य करना होइ तो पूर्वोक्त विधानतें दोयसैका वर्गमूल चौदह अर किंचिदून न्यारिका अटाईसवां भाग- मात्र आवै है | तहां अपवर्तन कोएं एकका सातवां भाग मात्र मया । इहां समछेद करि जो किंचिदून निन्याणवैका सातवां भाग मात्र आया सो ९ती अंग जाननां अर छहका वर्गमूल किंचिदून दोय अर दोयका चौथा भाग आवै है । इहा भा अपवर्तन करि अर समछेदतें जो. पाचका दोय भाग मात्र आवै है सो हार जानना ३ अर इहा निन्याणका पांच अर सात दोऊ हार भए तातै तिनकों परस्पर गुणे पैतीस तौ हार हूवा अर भागहारका भागहार राशिका गुणकार होइ इस न्याय करि निन्याणवैकों दोय करि गुणें एक सौ अठ्याणवै अंश हवा में तिस रशिका वर्गनल किंचित ऊन एकसो अठ्याणवैका पैतीसवां भागमात्र हो है । ऐसे ही अन्यत्र जानना । बहुरि भिन्न घनमूल विर्षे जाका धनमूल काढना होइ ताके अंगनिका घनमूल कीए जो प्रमाण आवै सो तो ताके घनमल्के अंश अर हारनिका घनमूल कीए जो प्रमाण आवै सो तहां हार जाननें । इहां भी घनमूल काढनेका विधान पूर्व जैसे घन अघनकी सहनानी कार अंत घनस्या- नते घन घटावनां आदि विधान कह्या था सोई जानना। इहां उदाहरण-जैसे च्यारि हजार छिन का सताईसवां भागका धनमूल काढना होइ " तहां पूर्वोक्त विधानते च्यारि हजार छिन अंगनिका घनमूल काटें सोलह आए सो तो अंश अर सत्ताईसका धनम्ल काढ़े तीन हार भए ऐमें ताका घनमूल सोलहका तृतीय भगमात्र आया ' बहरि जहां राशि निःशेष न होइ तहां अवशेष विष अंश कल्पना जैसे वर्गमूल बि कही धा तैमैं इहां यथा संभव करना । या प्रकार भिन्न परि कर्माष्टक जानना । अब शन्य परिकर्माष्टक कहिए हैं । इहा विदीका संकलनादि जाननां तहां मंकटन विय अंक अरविंदीका जोट दीए अक ही रहै कछू वर्षे नाही। में पचावन विष दश जोड़े एफम्थानीय पाचा वि4 विदा जोडे पाच ही रह्या अर दशस्थानीय पांचा अर एका जोरे यह भया देमैं पैमटि हो हैं । भर विंदी विर्षे विदा जोडें विंदो ही रहे ३.
जमें देश विधाम जोडिए तहा एकम्थानीय विदीविष विदी जोडे विदो होइ । अर दास्थानीय एक अर दोय जोर्ड सीन होइ ऐस तिनमा जोड नाम हो है । वरि व्यासलन शिव अंकवि विदी घटाएं अंक हो रहे । फयु घटे नाही असे पंगटि विदा पटाएं कथानीय पचा वि विदी घटे पांच हो रहा अर दशस्थानीय या वि एक घटें पांचा भया में अमेर पारन रहे हैं । बहुरि बिंदी वि बिंदी घटाएं विटी रहे हैं। जैसे तीस वि दा घटाएं एकदानीय हिंदी वि बिंदी घटाएं विदी है। अर दशथानीय तीन विरें एक घटाएं दूबा ना अवशेष वीस हैं है । महरि गुणाकार दिन विशकों अंक परि या अंकों विटी कार गुणे विदा हो हो है । जौ पचामको पाचकारि गुणना ५०iart गुण्यर अंत अंक पाचनायो गुणाकार पांच परि गुणें पचीम भया अर ताके आगे रिटाको पाचारि गुणे विंटी भई ३२ टोयम धाम भया । अघया में पांचों बीम परि गुणना ५१. सहा दूना पारि पचिरों गुणे मया अर आग विधी यार पांचों गुणे विदी भई में एक मी दया । बरि विटीको विचारगुणे विदो ही होइ । में घीसको तीम फरि गुण्या तहां दूयाको तीम परि गुणे मटि या भर विदाको गुणे दी भई मो आर्ग दिली में एम भया । यरि गुष्पा भर गुणय.far. नके आगदी होइ ती निन सर्व विधानको मिय परि भागे मिरजे गुर गुणकारनिफे अंक रहे तिनको परस्पर गुण जो प्रमाण आप मा लिन सpिiri मैं गुणित राशि आरे है । और बोम पार पायी इनका गुणन पारमा २०४५..तो राशिकी एक दीय विदा मिलाएं तीन विदा भई गो आगे गयी । राषयों पर गुणे दाभया सोनिनके पीलिया में गणित राशि दश नार प्रमाण मापा । पर भाट पर दोयम अर पंह साप परम्पर गुणन मारना ८४२००४ १५००... नको विदा मिलाए माग विदी भई सो भाग लिअर निको पार गुणे दोपपाया सो पी लिया। ऐमें दोयम चालीग कोहि प्रमाण गुणित गमियTI पदीर भागहावि विदाको अंगमा भाग दो विदाई। पचागको पात दीया : हा भाग्य राशिका पांचों पचिका भाग दीए का पयास nिa था विदीयो पापका भाग दाएं कि इमो जिपी नियम है। अंकों कोष विका भाग दोएं. अशान्य प्रमाण है। जब मा भर दोएं सम्परा भायमाने ना मोफका त माया rrrror भारत लग गुणा हो । (सको यो भागमा भाग दो दिन र पटने पता होता जाय । विधाका भगदोपा ar मार करत.. ने घटना भया नाम हो है । ६ मार सो है हर कहिए भागार जाया गया ना .. । दोलनका माहरण आहे. वर्गम पमrat FE पारिज भार वा भागार के 10 (१६) निननी विदोनका अपवर्तन करना । जैमें बारह हजारको आठसका भाग होइ तहाँ दोष विदनिका अमानन कारं एकसौ बीसको आठका भाग रह्या तहां उन्ध राशि पंदह आये है देने ही अन्यत्र जानना । बहुरि वर्ग अर घनविौं गुणकारवत् विधान जानना । जाते दोप जाना ममान रामि माडि परस्पर गुगन कोर वर्ग हो है । तीन जायगा राशि माहि परस्पर गुणन किरं चन होई है । जै दोयमै एकका वर्ग चाटीस हजार ग्यारस एक हो है, यहुरि एकसी धन दगाव तीम हजार तीनों एक हो है। यहरि जिस राशिके आगे विंदी होय तिस राशिका वर्ग करना होर नौ अंकनिका वर्ग कार आगे जेनी दी थी तिन तिगुना बिदी लिरा देंगे। दोन वर्ग करना होय तहां दोपका वर्ग पारि लिगि आगे दोयतें दूणी प्यार विदी गि अर निनका घन फरना होय ती दोपका धन आठ लिपि आगे दोपत तिगुनी र Anी में ही अन्या जानना । बहार वर्गन अर धनम्न शिजैसे सहनाना नना काइने का विधान कन्दा था सोई जानना । इही विदको अंकमा म infinit देना । जैगै चातगम हजार प्यारिमै एकका वर्गमूल काढना होता ::: गोकाका दोपहिया साके आगे सम विदीताको पाया अंक दोपताको TrahATI भाग दो सपाई यहार इम निशका थर्ग दिसाको ग्यारमें पटाई Farh Tीमा गहित अगिता सम मातम सास नदी पति वियोग में . * भाग दाप एका पाया यहरि अपशेष एका स्थानिस सि एफका वर्ग Prammar भारताका वर्ग दोपी एक हो है। यहरि जगे दमनाय सोम rrrr. ८.धनात काहना :- नही अंतान एकका पनात एका मिनि एकादरी 44. FAI ST का हा वर्गगुणा नान मामा भाग दाएं हा पाई Maritagोना आम भवन है। सीमा नापाई दी साको RIP भईarit fagणा किं.प. जनायो पाई मौत .itri न मापनमनपा (मापन infote ETAIमल अगिला मानतीन नान नानिको १.TURE भाग देर पका आगा गोदाम For " AA antar मा महिला अपन तता r: # 1a1 FAI .MAnni ari | प्रती 15TTE Or, '- :: Int, in want . ..
. नाम दुवा आगे यिनी । ऐमैं दोयसै धर्गमूल आया । बहुरि सत्ताईस हजारका घनगड काढना होर वहां धनम्न काटें साया पाया अर मसाईस निःशेष हया । आर्गे तीन विदी थी ताकी निहाई एक विदा सापाके आगें विरानी ऐसे घनमूल तास आया सो पूर्व विधानते भी ऐसे । मिद हो है। परंतु मुगमताके आधि एक यह भी विधान कहा है। ऐसे ही अन्यत्र जानना । या प्रकार एन्य परिकर्नाटक को ।। बहुरि अज्ञात राशि आदि जाननेको भनेक विधान गणित प्रय विर्षे हैं मो इही विशेष प्रयोजन न जानि न कया । बहुरि राशिकका स्वरूप इस शास्त्र विरें प्रयोजन भूत जानि कहिए है। तहाँ प्रमाण फल इया ए तीन राशि जानने । जिस प्रमाण करि जो फल निपजे सो सो प्रमाण राशि अर फल राशि हैं । बहुरि जितनी अपनी इच्छा होइ ताका इष्टा राशि है। यहां प्रमाण राशि इष्ठा राशिको तो एक जाति है । अर फल राशिको अन्य जाति है । सो ऐसें ए तीन राशि स्थापि तिन विर्ष फल राशिको इच्छाराशि फरि गुणिए बहुरि साको प्रमाण राशिका भाग दीजिए जो प्रमाण आवै सो इहां लन्ध प्रमाण जानना । फट राशिकी अर इम सध राशिकी एक जाति जाननी । इहां उदाहरण । जैमैं प्यारि हायके दिन अंगुल होयं तो दश हायके केते अंगुल होयं । ऐसें प्रैराशिक किया। इहां ममाण राशि हाय प्यारि अर अर फल राशि अंगुल दिन अर इच्छा राशि हाथ दश । वहां दशकों दिन करि गुणि प्यारिका भाग दीएं दोयसै चालीस अंगुल लन्ध राशि भया । बहुरि में तिहाई अधिक पंदह रुपैयानिका सा पचीस मण अन्न आवै तो आध पाव दश रुपैयोंका फेता आय इहां भिन्न गणित आश्रयते अंशनिकों जोडे प्रमाण राशि छियालीसका तीसरा भाग फल राशि एकमा एकका चौथा भाग इच्छा राशि इक्यासीका आठवो भाग प्र ... यहां भिन्न गणित विधानत फलको इरडा करि गुणे आठ हजार एकसी इक्यासीका यत्तीसत्रा भाग भया याको प्रमाणका भाग दाएं चौईस हजार पाँचसै तियालीसकों चौदही यहत्तरिका भाग आया । ताका सोलह अर किंचिन दोय तिण मात्र प्रमाण आया । ऐसे ही अन्यग्र जानना । बहुरि जहाँ जिम राशिका प्रमाण वधै फल थोरा होइ प्रमाण घटे फल बहुत, होइ तहाँ व्यस्त त्रैराशिक हो है। इहां प्रमाण राशिको फल करि गुणि इण्याफा भाग दीएं सन्ध राशिका प्रमाण हो है। जैसे जिस यस्तुका दोय घरस पुगणीका सौ रुपैया आवे तो दा घरस पुराणीका केता रुपैया आपै । इहां प्रमाण राशि दोयकों फल राशि सी करि गुणि इण्टा राशि दशको भाग दोएं बीस रुपैया आप सो लय- राशि जानना । ऐसे ही अन्यत्र जानना । पर पांच राशि समराशि आदि यि प्रमाणराशि संबंधी दोय तीन आदि राशि होय सो तो एक तरफ नीचे नीचे लिखिए अर याही नाँचे फल राशि लिखिए । भर इष्अ राशिसम्बन्धी दोय तीन आदि राशि होइ सो दुमरी तरफ लिखिए। पहरि प्रमाणका फल राशि होइ ताफों इष्ठा राशिकी तरफ लिपि दोऊ तरफ जे राशी होई तिनका जुदा परस्पर गुणन फरि यहुन प्रमाणको स्तोक प्रमाणका (१८) म भाग दौएं जो प्रमाण आवै सो इन्छा राशिका फलभून लब्धरागि जाननां । इहां उदाहरः जैसे एक मास विप सी रुपैयाँका दोय रुपये व्याज आचै तो पांच मासवि दोयस सठि योंका कितना व्याज आ3 | ऐसे पंचराशिक भया । तहां एक अर सौ तौ प्रमाण राशि त एक तरफ लिखे अर ताके नीचें दोय फलराशि लिग्वे अर पांच दोयस पेंसटि इन्छाराशि एक तरफ लिदै । ५ बहुरि फलराशिकों तहांतें दूसरी इच्छाकी तरफ लिखे । बहुरि परस्पर दोऊनिकों जुदे जुदे गुणे एक तरफ सौ भये एक तरफ छब्बी पचास भए । बहुरि बहुत राशिकों तुच्छ राशिका भाग दीएं साढा छन्वीस रुपैया आए । इच्छा राशिका फलभूत लब्धराशि जाननां । बहुरि जो प्रमाणादि अंश अर हाररूप होइ तौ । पूर्ववत् फल राशिको पलटि पीछे दोऊ तरफके हारनिकों परस्पर पलटि दीजिए । बहुरि दोऊ फके जुदे जुदे हार अंश होहिं तिनी परस्पर करि गुणि बहुत राशिकों अल्पराशिका । दीएं । लन्ध राशिका प्रमाण आये है । इहा उदाहरण । जैसे---सयामास विय साढार रुपैयोंका आधा रुपैया व्याज आये तो साढा छह महीना विर्यै सवाधारह रुपैयौंका वे व्याज आये । इहां भिन्न गणिततै अंश अंशनिकों मिलाएं प्रमाणराशि पांचका चौथा : अर पंद्रहका दूजा भाग भया फलराशि एकका दूजा भाग है इच्छा राशि तेरहका दूजा अर गुणचासका चौथा भाग भया । सो ऐसे लिख | फलराशिकों पलटि हारनि पलटें ऐसा भया १ बहुरि अंश हारनिका गुणन कीएं एक तरफ तौ बारहरी आए । एकतरफ पांच हजार छिनये आया। बहुरि बहुत राशिकों अल्प राशिका भाग दीएं किनि ऊन सया प्यारि रुपैया लन्धराशि आया ऊनका प्रमाण एकका तीनस भाग कीजै तामें एक भी माय जानना । ऐसेंही अन्यत्र जानना । बहुरि इसही विधानते सप्तराशिक नवराशिक ए. दशराशिक हो है । सो इहाँ विशेष प्रयोजन न जानि नाही लिखें हैं । बहुरि मिश्रक व्यवहार विशेष प्रयोजन इहां नाही लिल्या हैं । कहीं प्रयोजन आवेगा तो तहां ही वर्णन लिखेंगे । बहुरि श्रेढी व्यवहार लिखिए है । जहा अनेक राशिनि यि समानरूप वधता य घट प्रमाण होइ अथवा गुणकार होइ तहा श्रेटी व्यवहार गणितका विधान हो है। जैसें आ विर्य पांच अर स्थान प्रति प्यारि च्यारि यचता या घटता होइ अथवा घ्यारिका गुणाकार हो। ऐमें दशस्थान होर तहाँ आदि श्रेढी व्यवहार गणितका विधान हो है तहा संज्ञा कहिए है जो आदि यि प्रमाण होइ ताका नाम आदि है वा मुख है या प्रभव है। यहरि अंत ममा होइ ताका नाम अन है या भूमि है। बहुरि स्थान स्थान प्रति जितना वधै या । ताफा नाम चय है वा उना है। बहुरि जो स्थान स्थान प्रति गुणकार होय नी जेनेका गुणकार होप नाका नाम उत्तर वा गुण है। यर चयकार वधता या बटना अषया गुणः पर मिसान होइ नाका नाम पद या गा। यहरि सर्व स्थानानके अं'' नाम मचन। यान है। वहरि चानको मुदगशि आदि धान प्रमाण स्थान किनक 14. नाम भादि यन है। बहर मर्य पनिको गाई जो प्रमाण होप मा पाया नाम पपरन है पा उतरधन है। यहुरि मापस्थान विर्ष जेता प्रमाण होर साफा नाम मापन है। यादि ऐमें संता जाननी । परि अनेक प्रमाण जाननेके सामनभूत फरणसूत्र गणित साम्रनि सिक हैं तहां जानने। अर इस शास्त्र विर्ष जाका प्रयोजन आगा साका फरणसूत्र इन शासह विडिखे हैं। तातें जहाँ प्रयोजन आ वहां हा तिनकों जानि देने । बारि क्षेत्र व्यवहार काहिए है। इस शास्त्र विष क्षेत्रका अधिकार है तात क्षेत्रव्यवहारका Pान अवसि चाहिए । तहां प्रथम संज्ञा शाहिए है। लंबाई चौडाई उचाई इन तीनो विर्षे जहाँ एक ही की विवक्षा होइ दोयको न होइ तहाँ सूची क्षेत्र कहिए । बहुरि जहाँ दोमको विवक्षा होइ एकको न होई तहाँ प्रतरक्षेत्र कहिए या वर्गरूप क्षेत्र फहिए। यहुरि जहाँ तीनोको विषक्षा होइ नहीं खात क्षेत्र कहिए या घन क्षेत्र कहिए । ऐमैं तान प्रकार क्षेत्र का । तिनमें सूची क्षेत्र वि ती आकारादि विशेष का क्षेत्रालीदक विशेष हैं नाही । जेता लंबाईका प्रमाण सोई तिस सूची क्षेत्रका प्रमाण है। जैसे-पचीस हाथ डोरि कहिए । बहुरि प्रतर क्षेत्र विरें आकार विशेष है सो कहिए है । तान प्यारि कूणे जिनमें पाईए तिन क्षेत्र निका क्रमते त्रिकोण चतुकोण नाम जानने। यहुरि एक फोगते दूसरा कोण पयंत जेता क्षेत्र होइ ताका नाम भुजा है सो त्रिकोण क्षेत्रवि तीन भुजा हो हैं तात ताका नाम त्रिभुज भी काहिए । चतु:कोण वि प्यारि भुजा है ताते ताका नाम चतुर्भुज भी कहिए । बहीर इन भुजनि विर्षे कारका नाम भुज वा काहूका नाम कोटि भी काहिर है । जैसें त्रिभुज क्षेत्र विर्षे एक भुजाकों कोटि कहिए दोय भुजानिकों भुज कहिए। चतुर्भुज क्षेत्र विष मन्मुस दोय भुजानिका नाम कोटि कहिए । अवशेष दोय मुजानिका नाम भुजा कहिए । यहार इन त्रिभुज आदि क्षेत्रनिका तिल चतुस आदि भी नाम है । भाषा वि निटा चौकोर इत्यादि नाम है । यहरि ए त्रिभु- आदिक क्षेत्र अनेक प्रकार हैं । सहा जिस त्रिभुज क्षेत्रके दोय भुजा सूधी एफ ठेढी ऐसी........ होय सार्को जाति त्रिभुज कहिए । सही जो यह टेढी भुजा है ताका नाम कर्ण है वा श्रुति है। जैसे पांच हाथ ऊंचा यासके उपरित सूत्र लगाय तिस पामते सात हाथ परे पृथ्वी वि सूत्र स्थाप्या तिस सूत्रका जेता प्रमाण ताका नाम कर्ण जानना । बहुरि जहां एक मुज स्वी दोय डेढी होय तहाँ........निघाशकासा ऐसा त्रिभुज क्षेत्र होई। याका मन्यसे दोय भाग करिए सोदाय जाति त्रिभुज होइ जाय । बहुरि इन तीनों भुजानि वि समान प्रमाण होइ वा अधिक हीन होइ तौ तहा सम विषम संज्ञा ययासंभव जानना । वहरि चतुर्भुज क्षेत्र वि जहाँ समान प्रमाण टीएं प्यारौं भुज ऐमैं होइ........ताको नाम सम चतुर्भुज काहिए । बहुरि लंबाई चौटाई विर्षे एकका प्रमाण हान एकका अधिक ऐसा........होइ ताका नाम आयत चतुरस्त्र कहिए। बटुरि जहा प्यारौं भुजानि विर्षे काहूका प्रमाण हान काइका अधिक ऐसे........होइ ताका नाम विषम चतुर्भुज है । बहुरि जिम क्षेत्रके पोच कूणे छह कृणे आदि होइ ताका नाम पंचकोण पटकोण कहिए । भाषाविषे पच पहल छह पहल इयादि नाम हैं। तहा पच कोणादि क्षेत्रनि वि सम प्रमाण भएं समसज्ञा विषम प्रमाण भएं विषम संज्ञा इत्यादि संज्ञा जाननी। इन क्षेत्र- (२०) निके गिरदका जो प्रमाण ताका नाम परिधि है। बहरि जहाँ गोलाकार प्रिय क्षेत्रमा हा ताका नाम वृत्त क्षेत्र या गोलक्षेत्र कहिए । निम क्षेत्र विष वीचमें जेना प्रमाण तासा नाम हट विकम है या विस्तार है या व्याम है। बहुरि इमकं गिरदका जेता प्रमाग होड़ मार परिधि है । बडीर जो गोन्टक्षेत्रके चौगिरदा गोदक्षेत्र ऐमा होइ तहा या अन्यंतर नटते कार तटपर्यंत जेता प्रमाण होइ ताका नाम यलय व्यास है । बहीर सभ्यंतर दोऊ ननि वीचि के प्रमाण होइ ताका नाम अम्यंतर सूची व्यास है । अर याय दोऊ तटनिक याविजेता संतगड ताका नाम बाह्य सूची व्यास है। वहरि अभ्यंतर तटके गिरटका जो प्रभाग ताका नाम अयंटर परिधि है । याह्य तटका गिरदका जो प्रमाण ताका नाम वाद्य परिधि है । इत्यादि संज्ञा आननः । वहरि जो धनुपके आकार ऐसा........क्षेत्र होड ताका नाम धनुषाकार क्षेत्र कहिर पा चारक्षेत्र कहिए तितक्षेत्र वि जो सूधा प्रत्यंचावत् छंबाईका प्रमाण ताका नाम जीवा है वा ज्या है। बहुरि तिस जीयाको एक तरफत लगाय दूजी तरफ धनुषको पाठिवत् माधा गोल क्षेत्रको परिधि रूप गिरदका प्रमाण ताका नाम धनुःपृट है । बहुरि तिम जीयाकी मध्यतें लगना धनुटा मध्यवर्तपर्यंत वाणपत् सूधा क्षेत्र ताका प्रमाणका नाम वाण है । बहरि जो जीवाकी चौडाई बहुत होय तो तिस जौवाको छोटा तटतै वड़ातट दोऊ तरफ जितनां जितनां ववता होइ ताका नान चूलिका है । बहुरि बड़ा तटनैं छोटा तटपर्यंत जेता परिधिका प्रमाणरूप धनुः पृष्ट रूप होर ताका नाम पार्श्वभुजा है । इयादि संज्ञा आननी । वहरि अन्य अनेक आकार लीए क्षेत्र है तिनका स्वरूप मंज्ञादिक गणित शानि वि क्षेत्रव्यवहार वि कया है या इस शास्त्र वि जाका वर्णन होइगा ताका तहांही स्वरूप मंदादिक लिखेंगे ते जाननें । बहुरि ऐसे जे ए क्षेत्र है तिनिका विवक्षित योजनादिरूप चौडा लंवा खंड कल्पना करि प्रमाण कीजिए ताका नाम क्षेत्र फल है। प्रवृत्ति विण याका नाम मुरुसर करना कहिए हैं। जैसे च्यारि हाय लंवा पांच हाय चौडा क्षेत्र ताका क्षेत्रफल वीसहाथ हवा । तहां ऐमा भाव जाननां । तिसक्षेत्रके एक हाथ लंबा एक हाथ चौडा ऐम खंड कीजिए तो वीस होइ । ऐसे ही अन्यत्र जानना । ऐसे प्रतर क्षेत्रका स्वरूप संज्ञादिक कहे । अब धन क्षेत्रका कहिए है। जहां ऊंचाई तथा ओंडाई भी होइ तहाँ धन क्षेत्रहो है ऊंचाई औडाईका भाव एक है। नीचेने अरको विवक्षा होइ तो उंचाई कहिए। ऊपर से नाचेकी विवक्षा होइ तो ओडाई कहिए । सो याका नामा वैध है वा खात है वा उद्दव है इत्यादि नाम हैं । बहरि जो याका क्षेत्रफल करिए ताका नाम ग्वात फल वा घन फल जानना । इहां विवक्षित चौडा लंबा ऊंचा बंद कल्पना करि प्रमाण कीजिए । मैं प्यारि हाय लंबा च्यारि हाय चौटा पांच हाथ ऊंचा क्षेत्रका खान फल अम्मी हाय होइ नहा ऐसा मात्र जानना । एफहाय रंबा एक हाथ चौटा एक हाथ उना ऐने बंड कीजिए तो अम्मी होइ । वहरि जो ममभूमि उपर अन्नादिकका गशि करिष नाका क्षेत्रफलको सूची फल कहिर है । बहरि कोई गिददीके आगराई कोर्ट बापडाँके आकार दोद यदि धनम्प विमा अनेक आकार पाईप है। दन है। और भी मझा बाप जानना । बीर जो क्षेत्र अनेक आकार टी होइ तिमक्षेत्र विय - (२) संभवते जुदे जुदे माफार कल्पना करने । जैसे ऐसा........आकार रूप क्षेत्र वि एक चतुर्भ एक त्रिभुज........ऐमें दोप खंड कसने बहुरि तिनं संडनिकै जुदे जुदे क्षेत्रफल करि जोडे तिसको क्षेत्रफल हो है। महरि कही त्रिभुज क्षेत्र विरे अनेक प्रकार राज कल्पना परि तिनके क्षेत्रफल फरि जोर तिम क्षेत्रका क्षेत्रफल काहिये है। मैं क्षेत्र व्यवहार विष फेता इक मंशावा तिनका स्वरूप इहा कहा यहरि इन कि किसीका प्रमाण जानि किमीका प्रमाग जाननेके आर्य करणसूत्र हो है। जैसे त्रिभुजक्षेत्र विसं भुनकोटि कहि करणं जाननेकों करणसूत्र काहिए। या गोट क्षेत्रवि भ्यास कहि परिधि जाननेकों फरणसूत्र पाहिए. सर्व विधि क्षेत्रनि दिन प्रमाण जानि देव फल जाननेकों फरणसूत्र फाहिए । सो फरणसूत्र गणित शाखानि विष कोठे है । भर इस दान वि जिनका प्रपोजन पाईए है ते फरणसूत्र इस हो शास्त्र विय भी कहे है । मो जात वर्णन होइगा नहाँ तिनको जानने । प्रेस क्षेत्र म्पबहार कक्षा । या प्रकार का गणित वर्णन कर गणित अपेक्षा कीया ॥ महरि भटौकिक गणित अपेक्षा अलौकिक गणितनिको संरि या मंकटनादियोध्या पर्णन गोमासार शाखको भाषा टीपा वि संघष्टि अधिकार पीया लिलामोशीजन। रही विशेष प्रपोजन जानि विशेष लिया है । इस स्तोष प्रयोजन जानि लोपमा वर्णन किर है। तहाँ अटौकिक गणित लिखने में ऐसी संघट जाननी । सामान्यरन सरुगतामा..... तकी ऐसी....अनंतकी देसी स । विशेषपने जपन्य संस्थात दोष ताकी देगी २ मप्पम अनेक प्रकार र सरन्यातको ऐसी १५ अपवा ऐसी हो जपय परीनागरम्यान घटाबनेकी उपर सहनाना है में ही अन्यत्र जानना परि जपाय गानमा १६ मध्य परीतासरयातको नाना प्रकार उर परीता संपातको देगी जपन्य ताप ऐसी २ यह हा भावलीको सहनानी है । मध्य पुनसंस्थानको माना प्रकार I Tita. तकी र जपन्य असतारपातको देगी । सोई मारावतीको राहनानापन संरथात विष भाउ उपमा प्रमाण पाईए है । तिन जि पल्पको ऐसी प सागरकी देशी सा एक गुलपी ऐसी २ प्रतरांगुरको ऐगी ५ पनागुटकी ऐसी ६ जगपोनीको माग ऐसी पनयोकपी देसी बारित ही जगधगीयो साशा भाग सरो। ताको ऐसी 9 जगमतरको गुणपासका माग दाएं तर राग हो। ताकी देसी तीनस तिपातीसका भाग दाएं पनरूप राज हो है ताकी देसी ११ दि मदन अनेक प्रकार TT असेयतासरनालया ऐसी २५५ वा सो सरर. नंतर ऐसी २५६ मप सेनानंतको नाना मर ST पानेको गोजर पुतानंतकी देसीज हुम मम पुतानंत नाना ETY STE ताना देई.. जपन्य भनसानलको जब मर अनेगाने शिEET FE और राधिका देशी १३ सिराको सो मार पोप अनेक प्रसर सर नाम जान पाम र (२२) गणित विय संघष्टि जाननी । बहुरि इनके संकलनादि वि जैसे लौकिक गणित विष लिखने रिधान कह्या तैसे ही इहाँ जानना । जैसे पंच अधिक. हजार ऐसे लिखिए । तैसे ही सध्यंगलं अधिक जगछेगीकों ऐसे लिखिए २ । बहुरि जेसे पांच गुणा हजार ऐसें १००० लिखिए तैसें ही असंख्यात गुणा लोक ऐसें लिखिए -9 इत्यादि जाननां । बहुरि रागि उमर किचित् मिलावना होइ तहाँ उपरि ऊभी लीक करि दीजिए। जैसे किंचित् अधिक लोककी संदी ऐसी । बहुरि राशि वि किंचित् घटावना होइ तहां आर्गे आडी लोक करि दीजिए। जैसे किंत्रि- इन डीव राशिको संघष्टि ऐसी १६-बहुरि गुणकारादि विर्षे जैसे लौकक गणित विष वर्णन किया है तैसे ही जानना । विशेष इतना इहां जैसा जहां संभवे तैसा तहां अलौकिक संघट कर प्रमाण जानना । बहुरि कहीं अक्षरादि रूप सहनानी है । जैसे अर्द्धछेदनिकी संदृष्टि ऐसी (2) बदुरि अन्य अनेक प्रकार लौकिक संघष्टि जाननी । ऐसें अलौकिक गणित विय सरूपं दिखाना सो इस शास्त्रवि जहां प्रयोजन आयेगा तहां लिसन होगा सो जानना ॥ इति परिशिष्ट समाप्त
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मारपरभण्डाग मेडिया न प्राथालय. बीकानेर, (राजपुताना.) श्रीमग्नेमिचंद्राचार्यविरचित निलोकसार पंडितयर श्रीटोटरमहशत हिंदीभापाटीका मदिन । । दोहा-निगुयनगार अपारगुन, ज्ञायया नायफर्गन । त्रिभुवनहितकारी नर्मी, श्री भरत मान ।। १ ।। सानभान के मुयुट मनि, गुन अनामय गुन् । नों मिस परमागमा, धीनगग भगिद्ध ॥२॥ सानभुवनथिनि जानिय, आप भारगर कोय । परतें भये विगत पनि, गगों महागुनि गीय ॥३॥ सानभुवन मंदिर विय, अर्थ प्रकासन हार | जनरचनदीप नो, जानवग्न गुगधार ॥ ५॥ सीनभवनमा जे एरी, पर यहगार से राय बदी भाष जुन, गुभयाग्न गुगपार ॥ ५॥ ऐ मंगलमय सय, निम, य? पाय। अब विपना पालो, गागारि ॥६॥ अध गंगाधरण परिधीगत किसार गारफी भावा. टीका अनुसार पिए गूगशास्त्रका अर्थ लिए । फाषित-तीनगुपन सि जिनयि of inाय Arm, दध निवसारपीटीया परक्षामो गित । विचिन्गा पास भम्प जापा, नरे, सपोधनको कारण ऐसा माना परि ॥१॥ अधित-अर'पादिया गरि भूरि गुण, अनु. 47 ! जिनमत मिला नि शारे पुनियो हिमपा, अशी भई । दोस निममोदीको मत ETELarrier! "Meronmentarea प्रिलोकमार- । ऐसे संस्थत टीकाकार मंगलागण करें ।। श्रीमान प्रतिमान जो मर्यादारप प्रमाग ताकरि रहा या कmari रहित बरि इद्रियवत् अनुक्रमने जानी रहन ऐमा जी arti अवलोके हैं सफल पदार्थनिका समूह निहिं पंगा, गरि मंगान्दी गरेका समूह निहिं ऐसा, बहुरि तीर्थकर प्रतिमा पुष्पकी महिमाका माग पत्र मागमा रण आठ प्रातिहार्य चौतीस अनिमय आदि गहिरंग लामीको जादमा रोकि कार हैं अठारह दोष जाने ऐसा, यहरि मागपने करि आगिन" वर्ग ? अचमी गुण समूहररूप अतरंग लक्ष्मी ताकरि प्रकट किया है परमामारण प्रभार जान माजाश्रय मान नामा तीर्थकर देव तीह तो सर्व भागमई दिल्ययानि कर जामा किया। सात ऋद्धिनिफरि संपूर्ण जी गोतमस्यामी ममस्न विधाका परमईश्वर की नीद नारा गन्दार नाका विशेष रय्या है। यहरि तिस अर्थका ज्ञान अर कवियादि विज्ञान करि मन बदरि पाई भयभीत ऐसो जु गुरु तिनकी परंपराका अनुक्रमाकरि विच्छेदरहिन प्रनिरूप है। अहरि भूमर अर्थ अन्यथा होइ नष्ट न भया है ताने केवल ज्ञानहींके समान है-ऐमा जु फरमानुयोग नान परमागम ताहि काटके अनुसार संक्षेपरूपकरि निरूपण करनेका है अभिप जाका ऐमा जो भगवा नेमिचंद्र नामा सैद्धांतदेव चारि अनुयोगरूपी चारि समुदनिका पारगामी सो चामुंडरायके मबोचने मिसकरि समस्त शिष्यजननिकै संबोधनके अर्थ त्रिलोकमार नामा प्रथको रचतामता तारी आदिवि प्रथम ही निर्विघ्नपर्ने शास्त्रकी समाप्तता होइ इत्यादि फटसमूहको विचार विशिष्ट जो अपना इष्टदेवन ताहि स्तयै है; चलगोविंदसिहामणिकिरणकलावरुणचरणणहकिरणं । विमलयरणेमिचंदं तिहुवणचंदं णमंसामि ॥१॥ बलगोविन्दशिखामणिकिरणकलापारुणचरणनखकिरणम् | विमलतरनेमिचंद्र त्रिभुवनचंद्रं नमस्यामि ॥१॥ अर्थ-कहिये हैं। नमस्यामि कहिए नमस्कार करौ हौं । किसहिं नमस्कार करौ हौं । विमलतरनेमिचंद्रं विगत कहिए विनष्ट भया है मल कहिए द्रव्यभाव भेदको लिए आ- रमाके गुणका घातक कर्म वा शरीरका मल धातु जातै सो विमल जानना । बहुरि आप विशु- दुताका जु उदय ताकी परम उत्कृष्टताको प्राप्त होतसता अन्य जे आएको आश्रित भए भव्य जीव तिनिके भी कर्ममलके दूरि करनेको कारण है ताते अतिसय करि विमत है सो विमलतर जानना । इस विशेषणकर अपाय अतिशय प्रगट किया | अपाय नाम नासका है सो इद्राठिक भी जाके नाश करनेकौं समर्थ नाहीं ऐसे कर्ममलका नाश किया ऐमा अतिशय भगवतविप ही है। ऐसा इस विशे- पणका अभिप्राय है । बहुरि नेमिनाथ नामा वावीसयां नीर्थकर परमदेव सी नेमिचद्र जानना | विमटनर जो नेमिचद्र ताहि नमस्कार करौ हो । कैसा है बिमलतर नेमिचद्र । त्रिभुवनचंद्र त्रिभुवन कहिये तीन लोक तिनका चद्र कहिए चद्रमावत् प्रकास करनहारा है। भावार्थ-तीन लोकके । - लोफसामान्याधिकार। ३ । स्वरपका उपदेस दाता है वा तीन लोकके स्वरूपका ज्ञाता है। इस विशेषणकर याक् अतिशय या प्राप्ति अतिशय प्रगट किया है । तहां वाक् नाम यानीका है, सो गणधर इंद्रादिकनिकै पचन मगोचर ऐमा सीन लोकशा स्वरूप वानीकरि कहिपे हैं ऐसा घाफ अतिशय भगवंत विर्ष है । यहरि प्राप्ति नाम साभका है सो गणधर इंद्रादिकके ज्ञानते अगोचर ऐसा तीन लोकका ज्ञायक केवल भानका लाभ भया है ऐसा प्रानि अतिशय भगवतविर्षे है। बहुरि त्रिभुवनचंद्र' ऐसा विशेषण इस अवसर मिर्षे योग्य है जाते तीन टोकके स्वरूपका निरूपण वि किया है उद्यम जानैं ऐसा जी आचार्य साकै शम्द ज्योतिकरि वा ज्ञानभ्योतिकरि तीन लोकके स्वरूपका प्रकाशकों ही नमस्कार करना योग्य ही है। वहरि कैसा है विमलतर नेमिचंद्र। पलगोविंदशियामणिकिरणकलापारुण. धरणनवकिरणं बटगोविंद फहिए अपने चरणकमलकों नमस्कार करते जे बलभद्र नारायण तिनका शिखामगि कहिए मुकुटका अप्रभागवि लागा हुआ एभरागमणि ताकी जु किरणकलाप पहिये प्रभातका सूर्यवत् फिरणनिका समूह साकरि अरुण कहिए अतिरक्त भया चरणनखकिरण फहिए चरणकमळके नरानिकी फिरणनिफा पुंज जाका ऐसा है । इस विशेषणकर भगवतका पूजा अतिशय और अतिशयनिका सहचारी प्रगट किया । पूजा नाम पूजनेका है सो जिनको टोकवि पूज्य मानिर हैं ऐसे बलभद्र नागयण तेऊ भगवंतके चरणकमलकों पूजें हैं ऐसा पूजा अतिशय भगतविन है । इहां प्रासंगिक शोक कहिए हैं “ अपाय " इत्यादि । याका अर्थ-अपायप्राप्ति याक् पूनारूप अतिशय बहुरि निरालंब विहार वा स्थिति वा आहारादिफ विना शरीरको प्रवृत्ति इत्या. दिक ये प्रगट जिनदेयके अतिशय हैं । अथवा अन्य अर्थ कहिए हैं 'नमस्यामि' कहिए नमों हौं। माहि "विमलतरनेमिचंद्र" नेमि ऐसा नाम 'चकधुग जो पमाको धुर ताका है। सो जैसें चक्रधरा रथ चलनेको कारण है तैसें धर्मरयके प्रवृत्तनेकों कारण हैं ताते नेमि कहिए । बहुरि चरपति कहिए तीन लोकके भव्य जीवनिक नेत्र पर मनको आल्हाद फर है ताते चंद्र यहिए । भारार्य- इंद्रादिक भी न संभवे ऐसा जो रूप अतिशय ताकरि संयुक्त हैं । नेमि अर सोई घर सो नेमिचंद्र भर विमटतर कहिए अतिशयकर निर्मल ऐसो जो नेमिचंद्र सो विमलतर नेमिचंद काहिए । अपवा नयति कहिए यथार्थ पदार्थ ताकौं जानें ऐसा जु नेमि कहिए ज्ञान महरि गित भया है मल कहिर अज्ञान जाने सो रिमल अतिशय फर रिमल होइ सो विमलतर पाहिए। विमलतर जो नेनि सो विमलतर नेमि सकल विमल केवलज्ञान जानना। सिंह करि संयुक्त जो चंद्र कहिए आलादकारी सो विमटतर नेमिचंद्र कहिए । अथवा विमलतराः कहिए रसायकर परित्र भया है आमा जिनका ऐसे जु आचार्यानिक तेई भए नेमि कहिए नक्षत्र तिनका चंद्र काहिए जैसे नक्षत्रनिका स्वामी चंद्रमा है तमे जो म्वामी मी विमलता नमिचट कहिए । ऐमें रिमलतर नेमिचंद्र जो अंतसा पर्द्धमान तीथ. कर देव वा चोवीस तायकनिका मनदार नाहि नमो हो। केमा है । त्रिभुवनच: त्रिभुवन करिए तानाच | तासान निरा नामावत् अडान कार नाग कोमा । बहुकि.माह। 'ब'. है, वृद्धाको परिवर्तन से पराक्रम मामय सार या नी. द्रादिक दवनिया में सोचा अनिमनाहरप मा बाजा पाइरन बरकरार ४ त्रिलोकसार- । । । । बल प्रासंगिक श्लोक " व " इत्यादि है । याका अर्थ-शक्ति अर मैन्य अर स्यूलपनी अाप इल नाम बल है सो यह बल शब्द नपुसकलिंगी है बरि बल वीर्य अर दैन्य सरकार पर यट्यान् इनर नाम बल है । सो यहु बल शब्द पुरुपलिंगी है सो यहां बराब्द करि पनि सैन्य रूप-मद अर्थ ग्रहे । बहीर गां कहिए स्वर्ग ताहि विदति कहिए पाद सो गोविंद देवनिका इंद्र जानना । छ भर सोई गोविंद सो घटगोविंद ताकी शिसामणिकी किरणनिका समूहकार अरुण भए हैं चर्मने नखनिका किरण जाकी ऐसा है । भावार्थ-भक्तिके सम्हत नम्रीमूत भए इंद्रादिक समस्त दे तिनिकी मुकुटमणिकी फिरणनिकी पंक्तिकार रक्त किया है चरणक नवनिकी किग जावी भगवंत हैं । अथवा अन्य अर्थ कहें हैं। नमस्यामि कहिए नर्मी हौं । काहि ? विमटनरनिद पचीसमलरहित सम्यक्ततें युक्त हैं वा विशुद्धज्ञानकरि पूर्ण है या अतीचार रहन मनोज्ञ चारित्र के पवित्र भया है तातें विमलतर कहिए। विमलतर जो नेमिचंद्र नामा आचार्य सो विमलतर नै चंद्र कहिए ताहि नौ हौं । ऐसें चामुडराय अपने गुरुकों नमस्कारपूर्वक इस शास्त्रको प्रारंभ है। कैसा है । ' त्रिभुवनचंद्र' तीनलोकके जीवन चंद्रमासमान धर्मरूपी अमृतके श्रयनेते चंद्र समान है। अथवा चंद्र सोनां सिंह समान आदर करने योग्य है । वहीर कैसा है। बल कहिए बहत्तरि नियोगकी प्रवृत्तिरूप पराक्रम वा हस्ती आदि सैन्य जाके पाइए ऐसा चामुंडर वहरि गां कहिए पृथ्वी ताहि विदति कहिए पालै ऐसा गोविंद कहिए राचमल्लदेव राजा इन दोउनिः मुकुटमणिकी किरणनिका समूह करि लाल किया हैं चरणनिकै नखनिकी किरण जाकी ऐसा है ऐसें प्रथमसूत्रका अर्थ जानना ॥१॥ आगें पहली दूसरी जो दोय गाथा तिनकरि किया जो जिन अर जिनबिंब अर जिननंदिर नर्की नमस्कार तीहकरि अर्हत सिद्ध आचार्य बहुश्रुत साधु जिनवच जिनधर्म जिनवित्र जिनमंदिर- जो नवदेवता तिनको नमस्कार करता संता इस प्रथविर्षे पांच अधिकार है ताकी सूचना कर संता गाथा कहै है- भवणबितरजोइसविमाणणरतिरियलोयजिणभवणे । सव्वामरिंदणरवइसंपूनियर्वदिए वंदे ॥२॥ भवनन्यंतरभ्योतिर्विमाननरतिर्यग्लोकजिनभवनानि । सर्यामरेंद्रनरपतिसंपूजितबंदितानि वंदे ॥ २ ॥ अर्थ-भवनवासीनिक भवन वहरि व्यतरनिके स्थान वहरि ज्योतिष्कनिके विमान बहुरि मानुपौत्तरके अभ्यंतर मनुष्यटोक, बाह्य तियचौक इनविय जे जिनभवन हैं सर्व देवेंद्र भर नरपति राजा तिनकरि पूजनीक है अर वंदनीक है तिनकों में वंदो हौं । इस ही क्रमतें इस प्रथविर्ष भत्रः नवासी य्यंतर जोतिषी बमानिक मनुष्य तियेच लोकका वर्णन पांच अधिकार जानने । बहुरि पहले जो ( भूमिका ) मान आदिकका या टोकादिकका वा नारकनिका वर्णन किया है सो प्रसा पाइ किया है ॥२॥ आगें निन जिनमंदिरनिका आधारभूत लोक सो कहां है ऐसी आशंका होत संतें सूत्र - सोफसामान्याधिकार। -- । सच्चागासवर्णनं नस्म य यहुपनटेमभागम्हि । लोगोसंखपदेसो नगमेटियणापमाणों ॥३॥ सर्वाफारामन तस्य च मामध्यसभागे। टोकोऽयंग्यप्रदेशो जगणिधनामागो हि ॥३॥ अर्थ-सर्व आपाम अनंत प्रदमी है ताका बहुमयप्रदेसमाग, यायः कादिर निगम या रचनाम्प असरयाने जे आगामके मध्यप्रदेश मौर्ट भाग यदिए धायागया कि है अथवा यह पाहिए आठ जे गऊका स्तनो माया भाका माध्यप्रदेश में माहिर गरे ऐगेवि सोया है। सोयरे, प्रदेश रमाए विणता लिएर मा मदिर - माही साने दोय प्रदेश मध्य काहने । भर लोक धनगपसा टोय प्रशनिस धनगर प्रदेश प्रमाण होताने आट गपश जा पंगा टोपा का remit हाप या पोटासहपऊंचा क्षेत्र मध्यती भाटायटायल जानना , wrt. रयान प्रदेशी र सो थामें जाया स्यम्स काहिए जो जगणी गाया शुधन जानना 11३॥ भागे लोया के स्यापका अन्यथा अमान की पारी को लोगो अपिहिमो पर अणाणिाणां पाणिप्पणी । जीवाजीवरि पटी पयागागयययो गिगां ॥४॥ टोफः भरिमः भनालिनिधनः माओत्त । जागानीयः एसगर्वाफासावय: RAV॥ अर्ध-टीका ती अधिकार पास ही गाद NEPAL पारंवार पारि शून्य परीके अर्थ रास मि.!' पयो गाने जो सत्यराताका निप.रण वि.पा १ मा for at: किरानादीग करिष.काईपरी २.नी गानेmarati पाया है। अनादिनिधनः करिए भारत सहित | firmatars देतापा निराकरण किया । परी सात दिन rafarsti सNिषण करि परमाणुनिकर का सामान marria हमारजीपाजा राममाए और पनि म फाचो मानेर ताका निराकरण किया है। गर्भ - Ri. है. वयापक भार का है। निय. बाहिर मामपर भरा . 11: विचार . सपनाntrol RAM REAKett- ६ त्रिलोकसार- धम्माधम्मागासा गदिरागदि जीवपांगलाण । जायत्तावल्लोगो यायाममदो परमर्णनं ॥५॥ धर्माधर्माकाशा गनिरागतिः जीवादलयोः च । पावत्तावलोक आकाशे अतः परमनंतम् ॥ ५॥ अर्थ-धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य आकागद्रव्य अर जीव पुटनिका गमनागमन अर वन कालाणू जे ते आकाशकों अभिव्यापक होइ यते तितनं आकामी लोक रहिए, पाक परे उन्हें काकाश है सो अनंत है संख्यानादिरूप नाही है ॥ ५ ॥ आगें मन्यवादीनिकरि कल्पना किया हुया टोकका आकार ताके निगकरश करनेकों हैं हैं। उभियदलेकामुरवद्धयसंचयसणिदो हवे लोगो । अद्भुदयो मुरवसमो चोइसरजूदनो सयो ॥६॥ उद्धृतदटैकमुरजम्वनमंचयसन्निभी भवेत् लोक. । अर्थोदयः मुरजसमः चतुर्दशरदयः सर्गः ॥६॥ अर्थ-ऊभी करी हुई आधी मृदंग सहित ऐमा योद मृदंगके आकारि लोक है। के जानेंगा जैसे मृदंग वीचिमें सून्य है तैसें लोक मी शून्य होगा तहां कहै हैं कि घजानिका जु सन्न ताके समान मध्यविर्षे भरितावस्था लिए लोक है। तहां अर्धमृदंगका उदयसमान अधोटोकन एक मृदंगका उदयसमान ऊर्बलोक मिलि सब लोक चौदह राजू ऊंचा जानना ॥ ६ ॥ आर्गे प्रसंग पाइ रान्के स्वरूपको प्रतीतिके अर्थ सूत्र कहें हैं;- जगसेढिसत्तभागो रजू सेढीवि पल्लछेदाणं । होदि असंखेजदिमप्पमाणविंदंगुलाण हदी ।। ७॥ जगच्छेणिसनमभाग: रज्जुः श्रेणिरपि पल्पच्छेदानाम् । भवति असंख्येयप्रमाणहुँदांगुलाना हतिः ॥ ७॥ अर्थ-अंकसंदृष्टि दिखावनेके द्वारि गाथाका अर्थ वगिए हैं । जगच्छ्रेणीका प्रमाण रग्ज है। ऐसे अंकसैदृष्टिकर जैसे जगच्छेनीका प्रमाण वादालकारे गुण्या हुआ एकडो प्रभार ताकी सातका भागदिएं एक भाग प्रमाण रज्जु होइ १८८४२-३ बद्दरि जगच्छेणी कहा सो कहि है । पल्यके जेते अर्धच्छेद हैं तिनको असंरयातका भाग दिएं एक भागविर्ष जो प्रमाण आवै निद्ध घनांगुल मांटि तिनको परस्पर गुणें जगच्छेणी हो है । अंक संदृष्टिकरि जैसे पल्यका प्रमाण सोटा ताके अर्धच्छेद पारि ताको असंख्यातकी सहनानी दोय ताका भाग दिएं पाया दोय तहां धनांगुलम प्रमाग पगट्टी फरि गुण्या हुवा वादाल प्रमाण इनको दोय जायगा मांडि परस्पर गुणें बादाटको गुगित एकड़ी प्रमाण जगन्ष्ट्रेणी ही है ॥ ७ ॥ आगे धनांगुटका स्वरूपकी प्रतीनिके अर्थ कहै है। पहाडिटिमेत्तपटाणप्णोपणहदीए अंगुलं मूई । नव्यग्गयणा कममो पदरयणंगुल समरखादो ॥८॥ सातवा भर 1 लोकसामान्याधिकार । ७ -- पल्यच्छेदमात्रपल्यानामन्योन्यहत्या अंगुलं सूची । तर्गघनौ क्रमशः प्रतरधनांगुले समाख्याते ॥ ८॥ अर्थ-पल्यके जेते अर्धच्छेद होहि तिनने पल्प मोडि तिनकों परस्पर गुणें सूभ्यंगुल हो । जैसे पल्यका प्रमाण मोलह ताके अर्थच्छेद चारि सो चारि जागा सोटा सोला मांडि इनको रस्पर गुणे ६५५३६ होइ सोई सूच्यगुटका प्रमाण जानना । बहुरि सूय्यंगुलका जो वर्ग सो तरांगुल जानना । जैसें पाणहीका वर्ग बादाल होइ सो प्रतरांगुल है। बहुरि सूच्यंगुलका धन नागुल जानना । जैसे पणहीका धन है सो पण्णही करि गुणा हुवा जो बादाम तिह प्रमाण हो सो धनांगुल होय। ऐसे मर्ने कहें हैं। इहां एकट्टी आदिक वा अर्धच्छेद आदि जे कहे हैं तिनका अरूप मागे कहिएगा सो जानना ॥८॥ आगे मानको प्रतीतिके अर्थ प्रक्रिया कहें हैं;- माणं दुविहं लोगिग लोगुत्तरमेत्य लोगिगं छदा। माणुम्माणामाणं गणिपडितप्पडिपमाणमिदि ॥९॥ मानं द्विविध लौकिकं लोकोत्तरमत्र लौकिर्फ पोदा। मानोन्मानावमान गणिपतितत्यतिप्रमाणमिति ॥९॥ अर्थ-मान दोय प्रकार है लौकिक मान भर लोकोत्तरमान । इहो टौकिकमान छह प्रकार -मान, उन्मान, अवमान, गणिमान, प्रतिमान, तत्प्रतिमान, ऐसें जानना ॥९॥ आगें इन छहानिको दृष्टांतपूर्पक उतपत्ति कहे हैं- पत्यतुलचुलपएगप्पाहुदी गुंगातुरंगमोल्लादी । दवं खित्त कालो भावो लोगुचरं चदुधा ॥१०॥ प्रस्यतुलाचुटकैयाभूति गुंजानुरंगम्ल्यादि । द्रव्ये क्षेत्र का भानो लोकोत्तरं चतुर्था ॥१०॥ अर्थ-प्रस्थ जो मागी इत्यादिको मान कहिए जैमें पाई मागी इत्यादिक धरि अन्ना:- का प्रमाण फरिए । बहुरि तुला जो साराड़ी इयादिको उन्मान कहिए । जौ साखडीकरि तौति प्रमाण फरिए । धुलुक जो घर स्यादिकाफी अपमान कहिए, जैसे पद प्रमाग जोयादिक कहिए । यहरि एक इत्यादिकाको गगिमान कहिए, जैसे एक दांप सीन भादि गगना परि मान पारिए । बटुरि गुंजा जो चिरमटी इत्यादिको प्रतिमान कहिए, जैमें रत्ती मासा दयादि प्रमाग करिए। परि सुरेगमोलि जो घोडेका मोठ इत्यादिफनो समतिमान करिए, जैसे अादिक देशि घोडेका मोल करिए । ऐसे टोकियमान जानना | वहरिलोकोत्तरमानके भेद अब करिए है। इस क्षेत्र का भाव-देस लोकोत्तरमान पारि प्रवर है॥१०॥ भागे तिन चारोंकी शमते उपन्य उसकी प्रतीति के सई चारि माया का है- परमाणु सपलदचं एगपदेसो य सम्बपागास । इगिसमय सप्वकालो मुहुमणिगोदगु पूणेगु ॥ ११ ॥ .
१० म त्रिलोकसार- ल x x १००० यो । इहां तीन टक्षकी सहनानी ऐसी ३ ल, लक्षकी. चौथाईकी ऐसी ल, हजारकी ऐसी १००० इनकी चौथाईतै परिधिकौं गुणे क्षेत्रफल कहा सो ताका विधान- रूप वासनाका वर्णन संस्कृत टीकातें जानना ॥ १७ ॥ आगें स्थूल खातफलविर्षे जे प्रमाण योजन कहे तिनका व्यवहार योजन करता संता सूत्र कहै है- थूलफलं ववहारं जोयणमवि सरिसवं च कादव्यं । चउरस्ससरिसवा ते णवसोडस भाजिदा वह ॥ १८ ॥ स्थूलफर्ल व्यवहार योजनमपि सर्पपश्च कर्तव्यः । चतुरस्रसर्पपास्ते नवपोडश भाजिता वृत्तम् ॥ १८ ॥ अर्थ तारतम्य विना स्थूलपर्ने करि जो क्षेत्रफल होइ सो स्थूलफल कहिए । सूर परिधिकरि सूक्ष्म क्षेत्रफल हो है सो ताका विधान आगें वर्णन होईगा। इहां स्थूल क्षेत्रफलकी अपेक्ष ही वर्णन है सो इहां स्थूल क्षेत्रफलवियु प्रमाण योजन इतने हैं-३ ल २,१०००। तहां । प्रमाणयोजनके पाचसै व्यवहार योजन होइ तौ इतने योजननिका कितने व्यवहार योजन होइ ऐ राशिक निविकरि इनके व्यवहार योजन करनें । तहां अंगुल तीन प्रकार है- उत्सेधांगुल, प्रमा गांगुल, आरमांगु । तहाँ उत्सेधांगुलते जहां योजनका प्रमाण होइ सो व्यवहार योजन जानना यहरि प्रमाणागुलते योजनका प्रमाण होय सो प्रमाणयोजन जानना । सो उत्सेधांगुठौं प्रमाणांगुर पांच गुणा है तातें योजनविौं भी पांचसै हीका गुणकार कन्या । बहरि अपि शब्दसे राशिक विधिकरि ही एक योजनके प्यारिकोश, एक कोशके दोय हजार धनुष, एक धनुषकै प्यारि हार एक हापका अंगुल चौबीस १, ४, २०००, ४, २४, इनकी परस्पर गुणें एक योजनके सा पास अइसठि हजार अंगुल भए, ते करनें । यहरि एक अंगुलका आठ यव, एक यवका भी सरमा करने सो धनराशिक गुणकार या भागहार घनरूप ही होइ, जैसे एक हाथ लंबा चौडा है होई ताकी अंगुट करिए तब एक हायका चौईस अंगुल । सो इहां चौईसका धनकीएं जो प्रमाः होद जितना एक अंगुल लंबा चौडा ऊडा खंद होइ तैसें इहां भी जो ए गुणकाररूप राशि कार तिना घन करना सो धन फरनेकै अर्थ तीन तीन जायगा माडि परस्पर गुणन करना । सा क्षेत्रफल ऐसा ३ ल ।। १००० याकै गुणकार ऐसे ५००, ५००, ५०००, ७६८००० ७६८०००, ७६८०००, ८, ८, ८, ८, ८, ८, इनको परस्पर गुणें चीफोर सरसोका प्रमा होइ, इनको नयका सोरहां भाग दिए जून जो गोल सरसोंका प्रमाण होइ । सो " हारस्य ।। गुषकोंगी " इम वचन भागहार का भागहार सो राशिका गुणकार होइ । जैसे हजारत सोश का भाका माग देना नहा रनायो प्यारिफर गगिए अर मौका भाग दौगिर । A मादा का भागमा योक शिको माया गुणाकरि नयका भाग दनोट माया : 1 41 पाने म. गुणा गुणाकार मा भया ३००.००, १००००१ १५.० ५०, १००, ५... .६८०००, ७६८०००, ४६८०००, ८,८,८,८,८५ ।
सोफमामान्पापिफार। १६ get ear पा. मा सारिका र नाफा भागार देना १, ९ गुगा- प, Ratnारा दोपरि विन परि बाटी जायगा तान दूस २२, २, मालपो पर पूर्ण भी मार दी है। परिनि सोनी दानिकार नमन मारला या पि. गुण सीन माया हजार हजार वाहर एक माया मायापार गाग ३०००००, १०००००, १०००, १०००, १०००, ७६८०००, ७६८०००,७६८०००,८८,८८,८,१६ । परि इन यि ने इकतीग को पाहिए पर एफफा गुणकारने किए घरे नाही ताने एक जहा होइ या परिए तय पंगा होद ३,७६८,७६८,७६८,८,८,८,८,८,१६, क्षिी ३१॥ पनिक. भाटका करो दोपपरि करि मिल्न करि तहाँ जे तीन दूना भर तिन फरि भारपान पनि गर्ने आशा री तीन वापगा सोयह सोहका अंक होइ पर एक भारया मा रहद पर एफ सीटहका अक गुणकारा पा ही। ऐसे पारि जापगा सोला . भर १६, १६, १६, १६। इनको परपर गुर्गे पगी ओइ । पैसाठ हजार पाँचस नाम पहा तिरंगा भया ३,७६८,७६८,८,६५५३६, हिंदी ३१॥ यहरि तीन गा भरमटिका अफ पानिको जापमा दीप पल भर सीनसा अंक करना, मोटोपनको तीन पार गुगें सामने अपराहो । पारि सोन जायगा दोयसै छप्पन गि तिन शिटोर जापगार दोन सपनको परस्पर गुर्गे पगही होइ अर एफ आगे पणती थी, इन दाइनिजी पगार गुण पादाट होइ । पारिस गुगनीम फोडि गुगचास लारा सतसटि हजार दोपहिया पार पदिए । तापी सहनानी ऐसी ४२= । ऐसें करने ऐसा भया ३,२५६, २,२,३,८,१२८ दि ३१ बरि दोय जापगा सीनका अफ है लिनी परस्परगुर्गे नर होइ । परि एक जायगा भाटपा और है साको भागदारवि चारिका फ था सीहकरि अपवर्तन कीए पाट की जायगा दीयका अंक भया तीहकरि नाको गुणे अटार भए, तर ऐसा २५६,३,३,१८ ५२८, २१ विदा । यहरि दोष जापगा तीनका अंक है निनकी परस्पर गुणें नव भए, साकों भागहाव नाका अक था ताकरि अपनन कार रोप भया । ऐसे करते ऐमा भया ४२%, २५६,१८, दिदी २१1 या प्रकार यादाटयाँ दोपस उपन अर अटारहफारि गुणि आगें इकतीस हिंदी दीजिए । इतना मर्व गोउ सरमौनिकरि सो कुंड भरिए हैं ॥ १८ ॥ आगें नवका सोलहा भागका भाग दीए गोल होइ इसका वासनाए निपन्या पातालको फहे हैं;- चासदयणं दलियं गवगुणियं गोलयरस घणगणियं । सव्वेसिपि पणाणं फलचिभागप्पिया ई ॥ १९ ॥ प्यासाधन. दखितः नवगुणितः गोटकस्य धनगणितम् । सर्वेषामपि धनानां फलविभागामिका सूची ॥ १९॥ अर्थ-जितना व्यास होइ ताके भाषाका घन करिए यहरि ताकौं आधा करिये । परि नव करि गुणिए ऐमैं करनै गोल वस्तुका घनफट होइ । तहाँ वियक्षित प्यास एफ ताका आधाका १८ त्रिलोकसार- विपास कुंड ति गरिर । बहरि तिस शलाका कुंडकी रीता करि पूर्वोक्त प्रकार को बकता यामको टारे अनाया कुंड करि करि भरिए तब एक सरसौं शलाका दुइ लिन देने करने की दूसरी बार भी शलाका कुंड भरे तब एक सरसों और प्रतिशलाका कुंडन पर कार में ही एक एक बार शलाकाकुंडकी रीता करि फरि भरिए तब तब एक TTF- कार िमांगले जाईर ॥ ३३ ॥ म मरे भी कहा सो करें हैं:- एवं सावि य पुष्णा एग णिखिव महासलामि। एमावि फमा भरिदा बचारि भरति तफाले ॥ ३४ ॥ सापि प पू एक निशिप महाराटाकायाम् । पाणी माता सारि नियंते स.काठे ॥ ३४ ॥ -10 मा पता अनास्था कुंड विप जैते सरसौं भरे गए 4 दिन म RAIT भए प्रतिशतका युड भी मन्या जाय तब एक सरसो महा न । मानिस प्रतिशतका मुटको भरि तारि पूर्वोक्त प्रकार अनदस्या - wril अर शाका फुडनिकै भरणे करि प्रतिशलाका कुकी का 71. AA MATI छ गिरो जाईये । देसे करते जप महासभा Tी व्यापी ही कु भरिय है। पहला अनपस्या कुंड पि ३१ हा at in Eमा न पन ताके समान अनवस्था मुंड भर महाशलाका युवा मायाना यता ध्याम प्रमाणको सार है । जाने मनाया , sr writr पा गाविस एक एक सरमा दीए निगद्वीप वा मन Printi माया सूची प्याक समान नीन कोमा :::Tीयाका नाम भनवदित है। शई सई इनिरी . भरममावा गिटम्या मिया माणं तं । भारमंगसंगत ।। ३५॥ Hari प्रमा kartictriमम् ॥ ३५॥ । ९.indiation लोकसामान्याधिकार। अबरपरित्तस्सुपरि एगादीवहिदे हचे मम्झं । भघरपरित विरलिय तमेव दादण संगुणिदे ॥ ३६॥ अवरपरीतस्योपरि एकादियादिते भवेन्मध्यम् । अवरपरीत विरसय्य तदेव दत्वा संगगिते ॥ ३६ ॥ अर्थ -जघन्य परीतासंख्यातक उपरि एकादि वधाएं मम परीतासख्यान होइ यहरि जवन्य परीतासंख्यातों एक एक फरि रिलन करि रूप प्रति तिस ही जघन्य परीनासत्यातको देई परस्पर गुगन करिए । जैन प्यारिको रिटन करिए सय प्यारि जायगा एक एक माहिए। १।१।१।१ । बहुरि रूप प्रति प्यारिकों दीजिये तब एक एकको जायगा प्यारि प्यारि रिलिए १४।४। अब इनका परस्पर गुणन फरिए तब दोपसे उत्पन होइ ऐसेही इहाँ विधान जानना ॥३६॥ सो ऐसे गुणनफीऐ कहा सो फहै हैं:- अवरं जुत्तमसंखं आवलिसरिसं तमेव रूजर्ण । परिमिदवरमावलिकिदि दुगवारवरं विरूष जुत्तवरं ॥ ३७॥ अवर युक्तमर्स पावटिसशं तदेव रूपोनम् । परिमितपरं भावलियनिर्दिकवारावर विरूप युक्तपरम् ॥ ३७॥ अर्य-पूर्वोक्त विधान कीए जघन्य युक्तासंख्यात होइ यह ही आपली समान है । जाने घिन्य युक्तासन्यात समयनिका समाफी भारली काहिए है । सोई यह एक घाटि हया उराट हरीनासम्झ्यात जानना । बहरि आपली जो जघन्य युक्तासस्यात साकी जु कृति काहिर वर्ग कारें जो 'माण होइ सो जयन्य भमख्यातासस्यात है । सोई जो घाटि होइ सो राष्ट्र युनामरूपात अवरे सलागविरलणदिजे रिदिय तु विरलिदण सहि । दिज दाऊण दे सलागदो रूवमणि ॥३८॥ अरे साकाविरलनदेये दिनीयं तु विरटप्य तस्मिन् । देय दहा हले दायाशातः रूपमपनेतव्यम् ॥ २८॥ अर्य-जघन्य असंख्यामामापातको शयका विरलन दीपमान माप करि तीन प्रकार परिए दूसरा रिटन राशिको विरष्टन फार सीह एक एक विलित यि एक एक दीपमान राशिको परर गुगन करिए से करने शराफा गाशित भए कादि सीजिये। भावार्थ -जघन्य अस्पातासंस्थातके समान तीन राति करिए । सकारात, रिटन. देय नह' शिलनगसियो एक एक करि जुना राबपि दीजिए, परि निम एक एक पदेयाका मार महा तिनि देवगामिनि र गुहिए। ऐने भिन्न परिवारका समस्यौ एक पाय दी HC | 4 • र प्रमाण. . I fन १५ * . विग्न गा" को ।। करि ।११।। 14 एच. ८३ 14.
त्रिलोकसार-
HARI पर गुनिर र टोस पन होई । से सिान परि मर
दोपहने एक घटाइ दिदा भी हो विधान जानना ॥ ३८॥
नयुपगं गिरलिय तमेन दाऊण संगुणं किया ।
आगय पुगरवि रुवं पुलिसलागरासीदो ॥ ३९ ।।
तोपि सरदना संगु ला ।
सानो की काशितः ॥ ३९ ॥
- गुगन कर भागा जो गशिशाको नि की
न करिसमा गतिौ महरि एक घटानी ।
भासागर गुणन का जो गनि भगा सोर प्रमाण निशिारे
एकपा की योनि । यरिए एक जागा एक एक देवागि
Traigan ऐसीन करि जोशकागगि पाता एक
* Pी पार गुणन कोए दोग, सपना
....... TERINT OF गए । यही एक एक की जायगा दो।
है . ! . . एफ. और नान जानना ॥ ३
गग गिळायणमहारागि।
free fiगरिजादी दि पूरा ॥ ४० ॥
Tr" tarमातगतिम
है:॥१०॥
लोकसामान्याधिकार। . . अर्य- 1-पाकार दूसरी गराका भारि तीसरी दागकाको निधापनरूप होत संत सहा जो माय पसरातारपातमप प्रमाग भपा सीह प्रमाग चिप ए मागे काहिए है राशि से प्रक्षेपण फरने मिसावने जोइनें ॥११॥ पम्मापम्पिगिनीरगलोगागासप्पदेसपत्तेया। तपो असंखगुणिदा पदिष्दिा उप्पि रासीभो।॥ ४२ ॥ धर्माधर्भकाजीवकरीकाकाराप्रदेशमयेकाः । सतः असेल्यगुणिता प्रतिद्धिताः पडपि रारायः ॥ ४२ ॥ अर्य-धर्मदाय अधर्मन्य एक जीवदम्म लोकाफारा इन प्यारोनिका प्रदेशनिका प्रमाण महरि प्रतिष्टित मयेरु षनरपति जीवनिका प्रमाण तिस लोकाकाराके प्रदेशनि असंख्यात गुगा । परि तातें भी प्रतिष्टित प्रत्येक वनस्पती जीवनिका प्रमाग असंख्यात लोक गुणां ए छहीं राशि पूर्वोन मध्य असंख्यातासंख्यातरुप प्रमाण विपै मिलाइ दीजिए ॥ १२॥ तं कयतिप्पदिरासि विरलादि करिय पदमविदियसले । नदियं च परिसमाणिय पुर्व वा तत्य दायबा ॥ ४३ ॥ सं कृततिःप्रतिराशि रिलादि कृत्या प्रथमक्तिीपशलाम् । तृमीयो व परिसमाप्य पूर्व या सत्र दातव्याः ॥ ४३ ॥ अर्थ-तिनको मिलाएं जो मध्यम असंख्यातासंख्यातरूप प्रमाण भपा सीह प्रमाण नि: प्रतिगरी कहिए शलाका आदि तीन राशि फरियारि विरलादिं कृत्वा कहिए विरटन देय करि परस्पर गुणे शलाका राशिमें एक एक घटाइ प्रथम शलाका राशिको समाप्त करि बहरि तहों जो प्रमाण होई तोह प्रमाण पूर्वोक्त प्रकार शलामादि फरि द्वितीय शलाका राशिको समाप्त फरि बहुरि तहां जो प्रमाण होइ सीह प्रमाण शलाकादि करि पूर्वोक्त प्रकार तृतीय शटाका राशिर्को निटापन करि सहा जो प्रमाण होइ साह विपए राशि दैनं मिलावने ॥ ५३ ।। कप्परिगदेवयपचयरसचन्मसिदा असंखगुणा। जोगुकरसविभागप्पडिपिउदा विदियपक्सेवा ।। ४४ ॥ फल्पस्थितिधमत्यपरमधाप्यवसिता असंख्यगुणाः । योगोयाविभागप्रतिष्ठेदाः द्वितीयप्रक्षेपाः ॥१५॥ अर्थ-उत्सर्पिणी अवसापणी मिटिकरि भया जु कल्पकाल साके समपनिका प्रमाण संख्यात पल्पमात्र । बहुरि सार्ने स्थिति पंधाप्यवसायस्थान असंख्पात लोक गुणां, बहुरि सातै योगका सह अविभाग प्रतिच्छेद असत्यात लोक गुणा ए प्यारि राशि दूसरा प्रक्षेप जाननें । दूसरी भार ए प्यारि राशि मिलाइनें ॥ ४॥ तं रासिं पुर्व वा तिप्पडि विरलादिकरणमेत्य किदे । अवरपरिचमणतं रूऊणमसंखसंखवरं ॥४॥ .
रएट नय ही हैं। यद्यपि दसकी आदिदै परिस हां एकवा वर्ग एक मो प्रथम स्थान दायरा वर्ग च्यारि मोमग स्थान तीनका वर्गमाग हामा स्थान केवटहानका वर्गमूल अंकमटि करि प्यारि ताका वर्ग सोलर सागर २६ त्रिलोकसार-- इहां अंक संदृष्टि अपेक्षा समधाराविप आदिस्थान दोय अंतस्थान सोलह तहां सोलह मैं दोय घर रहे चौदह याको स्थान स्थान प्रति वृद्धिका प्रमाण दीयका भाग दीएं पाए सात या एक मित्र पाए आठ, सो पाठ समधाराके स्थान हैं । वहुरि विषमधारा विषे आदि स्थान एक अंतस्थान पेदर मादिकौं अंतमैं घटाएं अवशेष चौदह वृद्धि दोयका भाग दाएं सात तामें एक मिलाएं आठ कर जाननें । ऐसे ही जहां समान प्रमाणों टीएं स्थान स्थान प्रति चय वधती होइ तहां स्थानकन्धि प्रमाण ल्यावनेको करणसूत्र जाननां ॥ ५७ ॥ आगे कृतिधाराको कहैं हैं:- इगि चादि केवलंतं कदी पदं तप्पदं कदी अवरं । इगिहीणतप्पदकदी हेहिममुक्कस्स सव्वत्य ॥५८ ।। एक चत्वार्यादिः केवलांता कृतिः पदं तत्पदं कृतिः अपरं । एकहीनतत्पदकृति: अधस्तनमुन्कृष्टं सर्वत्र ॥ ५८ ॥ अर्थ-एक प्यारि इत्यादि केवलज्ञानपर्यंत कृतिधारा हो हैं । एक आदि एक एक वधता के शानका प्रथम वर्गमूल पर्यन ने वर्गमूल तिनका वर्ग काएं जो जो राशि होइ सो सो इस पारने स्थान जाननें । सो वर्गमूलनिका प्रमाण फेवलज्ञानका प्रथम वर्गमूल प्रमाण जाननां । नितने है इस धागके स्थान है । अदुरि इस धारा वि संख्यातकों आदिदै करि संख्याक भेद सिनराम न्यभेद तो यर्गस्थान स्वरूप ही है । बहरि संख्यातादिकनिका जो जघन्य भेद ताका वर्गमूटने है एक घटाय अवशेष रहे ताका वर्ग कीएं जो प्रमाण होइ सो इस धारा विसं तिस संस्यो । अधातनवना जो संयानादिक शिनिका उत्कृष्टपनां जानना । उदाहरण । जैसे अकसंदृष्टि और जघन्य अमत्यानका प्रमाण सोलह सो ती च्यारिका वर्गस्थानरूप है हो । यहरि सोलहका वर्णन मार ताम एफ घटाएं तीन हे ताका वर्ग कोऐ ना भए सो असंड्यातक ना जो प? है। मायान मो इम धागविणे मन्यात पर्यंत संम्यात हाँके भेद है तथापि ते भेद इस धारा विर्य संभ नहीताने इहां सामा। करा । मैं ही अन्यत्र भी जानना । अंकमरिक पाके स्थान ऐसे १,४,९, कपटशन १ बनना ॥ ५॥ मागे आनिगम कहिए दुपदि वाजिदयेचलणाणायगाणमफटीए । मंगविटी निगमं या मरणं फेवल आणं ॥ ५९ ॥ 4-42.मामात । rriपमा मन !! ५० ॥ --
लोफसामान्याधिकार।
२७
।
अर्थ-दोयको भादि द फरि एक घाटि केवल ज्ञानपर्यंत मातिधारा है । यहरि या शिप
पवर गिन संरपानादिकका जघन्य उकृष्टपनो सो विषम धारावत् जानना । जघन्य भेद विरें
एक मिटाएं हो जपन्पभेद हो । दमट भेद जो है सोई इहा है । जाते इस धाराविपै पर्गरूप
स्थाननिमा रहितपना है । परि इस पागके सर्व स्थान फेवलज्ञानका प्रथम मूल फरि हीन ऐसा
फेपलदान माग जानना । कादि विष याके स्थान ऐसे हैं । २,३,५,६,७,८,१०,११,१२,
१३,१४, एक घाटि फेवल १५ । इहो सर्व धाराके स्थानकनि विप कतिधारा के स्थान दूरि करि
अवमेर भरतिधाराके स्थान फहे हैं ॥ ५९॥
आगें धनधारा काहिए :--
इगिअरपोदि फेवलदलमूलस्मुपरि चडिदाणजुदे ।
सम्पणमंतं विंदे ठाणं आसण्णपणमूलं ॥६०॥
एकारप्रभृति फेवलदलमूलस्योपरि घटितस्थानयुते ।
सदनमत दे स्थान आमनघनमूलम् ॥ ६०॥
अर्थ-एक आटकों आदि दै करि १,८,२७ अंत घन स्थान जाईये ।
भावार्य -एफसा धन एक सो पाका प्रथम स्थान दोयका घन आठ सो याका दूसरा
स्थान तीनका धन सताईस सो पाका तीसरा स्थान ऐसे अनंत धनस्थान जाइ फरि केवटज्ञानका
आधा प्रमाण है सो घनस्यानरूपही है । ताफा जो घनमूल ताकै उपरि चढितस्थान कहिए; उपरि
उपरि प्रान भए जो घनमूलके स्थान तिनकी संख्या तिस घनमूल विष मिलाएं जो प्रमाण होइ सो
हा भासन धनगल फाहिए ताका धन कीए जो प्रमाण होइ सोई इस धाराका अंतस्थान जानना ।
जाने आसन्न धन ते एक अधिकका भी घन ग्रह केवलज्ञानते अधिक प्रमाण होइ जाइ सो है
नाही । इस कपनों अकसदृष्टि फरि दिग्वाईए है । जैसे फेवलज्ञानका प्रमाण पणही ६५५३६
ताका आधा ऐगा ३२७६८ । सो यह घनस्थानरूप हैं। याका घनमूल बतीस । ३२ । ताक
उपरि घनमूल स्थान ऐसे ३३,३१,३५,३६,३७,३८,३९,१० । ए आठ स्थान बत्तीस में
मिलाए चालीस हवा याकी इहो आसन्न घनमूल कहिए । यामा धन ६४००० । मोही इस धाराका
अंतस्थान है । जाते आसन्न घनमूल त एक अधिक इकतालीस ४१ । साका भी धन प्रहें भडसटि
हजार नौसें इकईम होय सो फेवलज्ञान अधिक राशि उपजे सातै आसन्न घनमूलका जु धन
६४००० सोई घनधाराका अंतस्थान है । इसको आसन्नघन कहिए है । याका घनमूलकों आसन्न
घनमूल कहिए है । बहुरि इस धाराकै सर्पस्थान केवलज्ञानकै आसन्न घनमूल प्रमाण जाननें ॥६०॥
मांग केवलज्ञानका भद्धप्रमाण घनधारास्वरूप कसे जानिएं, ताका व्यवस्थानी पूर्व आग
सून फार दिखावता संता उत्तर आधामूत्र करि अघनधाराकी कहैं है:-
समकादिसल विकदीए दलिदे पणमेत्य विसमगे तुरिए ।
अघणस्स दु सव्वं वा विषणपदं फेवलं टाणं ॥६१ ॥
त्रिलोकसार-- समकृतिशला द्विकृतौ दलिते घनः अत्र विषमके तुरिये । अघनस्य तु सर्व वा विधनपद केवलं स्थानम् ॥ ११ ॥ अर्थ-द्विरूप वर्गधारा विषै जिस वर्गस्यानरूप राशिकी वर्गशलाका सम होइ, दोय याति इत्यादिरूप होइ तिस राशिका आधा प्रमाण घनरूप होइ ही होइ । दोयका वर्ग से लगाय पूर्वपूर्वका वर्ग करते जतीचार होइ तितना ही ताकी राशि सोलह ताकी वर्गशलाका टोय सो समरूप। ताका आधा प्रमाण आठ सो दोयका घनरूप हैं। बहुरि राशि पणही ताकी वर्गशलाका च्यारि के समरूप है, ताका आधा प्रमाण बत्तीस हजार सातसे सडसटि सो बत्तीसका घनरूप है । ऐसे है एकट्टी आदि विप भी जानि लेनां । बहुरि इस ही द्विरूप वर्गवारा विप जिस राशिकी त्रिपा वर्गशलाका होइ तिस राशिका चौथा भाग धनराशिम्प हो है । जैसें द्विरूप वर्गधाराविौ राशि भ्यारि तासी वर्गशलाका एक है सो विषमरूप है । याका चौथा भाग एक सो एकका धनरूप है। ऐसें ही बाठालादिक विर्षे भी जानना । ऐसें कया न्याय तीह करि केवटज्ञानकी वर्गाटाका समम्प ही हैं, तात तीह केवटज्ञानका आधा प्रमाण घनस्थानरूप है ऐसा सिद्ध भया । बहुरि का. रज्ञानको यर्गशलाका समम्प हैं ऐसा कैसें जानिए ! तहां कहिए है । जो केवलज्ञानकी वर्ग. कासप राशि भी द्विरुप यर्गधारा ही विप उत्पन्न है, द्विरूप वर्गधारा विपै जो राशि है सो सन- रूप ही है । यहरि प्रश्न, जो केवलज्ञानकी वर्गशटाका द्विरूप वर्गधारा विष ही हैं ऐसा केने जानिए ! तहां कहिए है जो 'अबरा खाइयलद्धी वग्गसलागा तदो सगछिदी, ऐसा सूत्र ने फदिएगा, तिस सूत्र करि केवटज्ञानकी वर्गशलामा द्विरूप वर्गधारा थियै ही कहिएगी। बदरि अर धनधाग कहिए है । अपनधाराके स्थान आदि प्रक्रिया सर्वधागवत् जाननी । इतना विशेष, विचन- पर फाहिए जो धनधाराविषे जे जे स्थान है त ते धाग चिप नाही है और सर्वस्थान सर्व धागर जाननें । परि काकमा नेत्रका गोठक जैसें एक नेत्र विप पाईए, नसें जे सी धाराके स्थान १ तिन यि जो म्यान घनम्प मो अधनरप नाही, अघनरूप है सो धनम्रप नाही, तात इन धारा के मर्व स्थान धनम्यानकनिका प्रमाण रहित केवलज्ञान समान है । अकसरि किया स्थान में हैं २,३,४,५,६,७,८,९,१०,११,१२,१३,१४,१५,१६ ॥ ६१ ॥ आने वर्गमातृक घागको द हैं:- इह वग्गमाउपाए सवगधारप परिमरासी दु । परर्म केवलमूल नहाणं नापि नव ॥ २ ॥ १५ कमातृका काग ख चामगि । परम केवट नम्पानं माीि नोक ॥ १२ ॥ प्रयंदम कामातृका याग कि मगन नादिकाको प्रक्रिया जाननी, from हा अतम्भन मनाम जानना । वानी ने नाम 411 मा म. 11 भी बनाdin लोकसामान्याधिकार। ती फेवलहान टटेपि प्रमाग होइ सो है नाही, जैसे फेवल हानका प्रमाग सोलह साका वर्णनून प्यार तहाँ पर्यंत तो र्ग होइ र परि पाँचका वर्ग करिए ती फेमशान से अधिक प्रमाण होइ जाय । तात याका अंतस्थान केवलदानका प्रथम मूलही काम पागके मत्र स्थानक तितने ही फेवटहानका प्रथम मूल प्रमाण ही जानना । और मेटिविर या स्थान में १.२,३, फेवल प्रथममूल १ ॥ ६२॥ আম গামা বা থাই ~ अदीमा आठी फेरमूलं सम्यमनं तु । फेरलमणेय पन मूलूणं केवलं टाणे ।। ६३ ।। মামাহা গা ধনু সমন । फेवलमनेफ मर्प मून केस्ट स्थानम् ॥ १३ ॥ ---মহাপমাফ খান যেন থান ইমাম মখম ॥ ক খ গ जानना । जाने केवलज्ञानका प्रथम मूल पर्यंत मी सर्य अंक वर्गमूल गर र माया धर्म होस । परि जिनका धर्म फार फरहान अधिक प्रमाण मानिस न इस धारा दिए हैं, ताते याका प्रथम स्थान एक अधिक यारलाना प्रथम मुष्ट hit स्थान पाका फेवरदान है, मध्यस्थान अनेक प्रकार है। इस धारा सर्व समान लामा मयममूल रहित सेयलमान प्रमाण जानने । भैरम व पो भान है, ५,६,७,८... १०,११,१२,१३,१४,१५,१६१ हा केकरालका प्रमाण सोला साया प्रम पूरी ताने अधिरने लगाय स्थान कई हैं ।। ६३ ॥ मागे पनमातृका धाराया यह है यणसागरस सम्बगधार रामवधिमो रामी। आमपणदिमूले समेर टार्ण रिजाणा ॥४॥ पनमा मायाः सर्वसाधार एव समागमो राशि । भारताने विजानीहि ॥ ११ ॥ अप--पनमाय. पाराको दियो प्रक्रिया सधारावर , yि पाका सर्व धिम गति कहिए का स्थान सोरानमा पासन पनमूलने। इहा दिनमा पन होई से धनगर irar विहे है सो RE KE SPER पर्वत सोमनिया नहोस र एक किका भी जानो अधिक प्रमाग जाय , अनि म मान्न -- . . a- .
३०
त्रिलोकसार-
मागें अपनमातृक धारा काहिर है:-
तं स्वसहिदमादी केवलमवसाणमयणमाउस्स ।
आसप्णयणपणं केवलणाणं हवे ठाणं ॥ ६५ ॥
सत् रूपसहित आदिः कालमवसानमधनमातृकायाः ।
आसन्नवनपदोनं केवटज्ञाने मोत् स्थानम् ॥ ६५॥
अर्थ-दहा मिनका धन कार केवल जानने अधिक प्रमाग होइ जाइ ऐमे संस्थात
रिसेपनिका प्रहा है । सो धनमातृक धाराका जो अतका स्थान सो रूपसहित कहिए, एक अधिक
होइ तो इस सघन मानुकगाराका प्रथम स्थान होइ, इहां से लगाय केवल ज्ञानपर्यंत सर्व स्थान
इम धागति जाननें । याके सर्व स्थान केवलज्ञानका आसन घनमूलरहित केवलज्ञान प्रभाग
जान्ने । *क संधि विषयाके स्थान ऐसे ४१,४२,४३, इयादि अनस्थान ६५% । इहो धन
माराला #TPान पास, तामें एक अधिक फोर याका आदि स्थान इकतालीस, अंतस्थान फेरर
नसी पनी माग । पाके सौ स्थान कालज्ञान पणी प्रमाण. ६५५३६, सा प्रामन्न पन
संग ना पालीम घटाए सठि हजार प्यारिसे छिनौ ६५४९६ जानने ॥६५॥
र वर्गमगी सात गापानि करि कहे :-
पेम्यागपारा पर सोलस विसदसहियछापणं ।
पानी पादालं एक पुचपुषकदी ।। ६६ ।।
किमयाग गणार. पोदश दिशतसहित चारात् ।
पदा दाय गरिदा एकापी पूर्व हरिः ॥ ६६ ॥
अयंग कमि है। दोयका वर्ग ते लगा पूर्ण स्थानकको वर्ग मोर
मामन इन बाहिर, तान याका नाम लिप वर्गधारातही याका भारिपान
दोरी, नाम का दमग स्थान गोला १६, मामा वर्ग तीसरा स्थान दोष से
न २५६, नाम व पायान पणही, पणी करा! 'पाणी पंचगया एनीमा'
मुनम न कति पणी प्रमाण हो , १५५३६ या समिमी।
मन माटा। बाट कहा ! 'यादार पी. विलय
Parti, नो, या, हिना इन अनि करि मादा है।
१२:४११०२९ (११%)। बीमा यान Rinat
!! परनयममा मन गिमग । मुलगा NCERTria
PRER,.,,, मान, , , नग, मान, मौन, मान, ग,
R,Pा, र, अनि १८४१६७४०७३
(1.5 ||॥
म.414-
मे गटामार्ग नगमागमा
शाम प्राराची ॥१७॥
लोफसामान्याधिकार। ११ - तत सेएपस्थानगमने यशटामा रहेदमधमपदम् । अवरपरीतासख्यं आलिः प्रतरावती च भवेत् ॥ ६७ ।। अर्थ---ताले पूर्वपूर्वका वर्ग करते सत्यात धान गए जघन्य परीतासंन्यातका वर्गशलाका राशि सपने है । दोयका वर्ग से लगाय जेती बार वर्ग कोए जो राशि उपजे विम राशिका नितनां वर्गशलाका राशिक हो है । जैमें सोलहकी वर्ग शटाका दोप, जाते दोपका वर्ग पारि अर पारिका वर्ग सोरह, ऐसें दोष बार वर्ग भए सोलह राशि हो हैं, ऐसे ही अन्यत्र जानना । बहरि साते संख्यात स्थान गएँ जघन्य परीतामेल्यातकी अर्द्धछेद गारी हो हैं । जिस राशिको जना चार आधा की एक अवशेष रहें तिस राशिक तितने अछेद जाननें । जैसे सोलह मई- छेद प्यारि है । जाने एक बार सोमहकी भाषा कीए आठ होइ, दूसरी बार प्यारि होद, तीसरी मार दोष होइ, चौथी बार एक होइ, ऐसेही अन्यत्र भी जानना । बरि लाने परै सम्यात स्थान गएं जघन्य परीतासहपातका प्रथम मूल ही हैं । राशिका एक बार वर्गमूल कीभिए सो प्रथम मूल यहिए, जैसे सोलहका प्रथम मूल प्यारि हो है, ऐसेंही अन्यत्र भी जानना । हरि तिम प्रथम मटका एक बार वर्ग पाए जघन्य परीनासंख्यात राशि उपज है । बरि सात पर सख्यात स्थान जाइ जघन्य जुकासस्थात प्रमाण भारटी उएजें हैं । इहां उपग्जदि जो रासी इत्यादिक मूत्र मार्ग काँग तिस कार आपलीकी बर्गशलाकादिकया इस धारा विष निषेध जानना हो संख्यात स्थान जाइ करि आरली उपज है। ऐमा दा सो फैसे है ! सह कहिए है । देप राशिफ टपरि विरटन रूप करी जो राशि, ताके जेते अर्धस्छेद हि तिने वर्ग:भान जाइ कार विवक्षित राशि उपजे है । जैसे देशराशि पारिता उपरि लिन राशि प्यारिके पद दौड़, सो दोय भार वर्गस्थान गएं विवक्षित दोयसै सपन हो है । जाने च्यारिका वर्ग संसह सोरहका धर्म दोयसै छपन हो । सोई व्यरिया विरलन करि एक एक जायगा प्यारि प्यारि दो, ५,५,४,५ पररपर गुणे दोष से सम्पन हो हैं । तैसेंही पहा देय राशि जपन्य पनामा अईद मल्यात, सो संख्याते स्थान गएं ही विवक्षित राशि भारती उपज है बरि लिग मावलीमा एक भार वर्ग भए प्रतावली हो है ॥ ६७ ॥ गमिय असंखं टार्ण वग्गसलगिदी य पदमपदं । पाई प अंगुल पदरं नगसेटिएणमूल ।। ६८॥ गया असंख्य स्थान वर्गगरिदिय प्रथमपदम् । पन्य व मध्यंगुलं मत जगष्ट्रगिधनमूलम् ॥ ६८।। अर्थ -नाने पर समायान स्थान जाइ अापल्यका वर्गशलाका सिप ने - स्थान म्यान जा .1112 अगम हो है. माने यात स्थान RAHE BER मुद। साकार, २ . ar AIR 1 है । यह तातै परे असंस्थान मन ना ग २ १. आन ( ant अप्रमाग धाधान गर विशित १६ मा का प्रभा पन्य है। शिलन गरी पल्सव :- ..
- त्रिलोकसार- पठेद असंख्याते हैं । तातै पल्यकै उपरि असंख्यात वर्गस्थान भएं सूच्यंगुल होइ ऐसा कया है । इहां भी उपजदि जी रासी इत्यादि सूत्रका अभिप्राय फरि विरलनटेयका अनुक्रम करि यह राशि भया है । तात याके वर्गशलाका अर्द्धच्छेद राशि इस धारा विप नाहीं कहे हैं । बहुरि तिस सूर्य- गुलका एक बार पर्ग भएं प्रतरांगुल उपजै हैं । बहुरि तातै असंख्यात स्थान जाइ करि जगछे. गीका घनमूल हो उपजे है | जाका घन कीएं जगन्छेणी होइ ऐसी प्रमाण हो हैं ॥ ६८ ॥ तिविह जहण्णाणंतं वग्गसलादलछिदी सगादिपदं । 'जीवो पोग्गल कालो सेढीआगास तप्पदरं ॥ ६९ ।। विविध जघन्यानंतं वर्गशलादलन्छेदाः स्वकादिपदम् | नीयः पुद्गलः कालः श्रेण्याकाशं तत्प्रतरम् ॥ ६९ ॥ अर्थ-~~ताते असंख्यात स्थान जाइ जघन्य परीतानंतका वर्गशलाका राशि उपजे हैं, सात घसंख्यात स्थान जाइ साहीका अर्द्धच्छेद राशि उपजे हैं, ताते असंख्यात स्थान जाइ साहीका प्रथम मूग उपने है । ताका एक यार यर्ग भएं जघन्य परीतानंत हो हैं, ताते असल्यात स्थान जाइ जघन्य पुकाना उपन है । जाते देय राशिक उपरि विरलन राशिक अग्छेद प्रमाण वर्गस्थान भए विव- शित गशिहो, सो इहां देयराशि जघन्यपरीतानत है ताक उपरि विरलन राशि जघन्य परीतानत तास अदद भसाम्यात है, सो इतने ही वर्गस्थान भए जघन्य युक्तानत हो हैं । इहा भी पूर्वोक्क मगार वर्गसमकादिकका निषेध जानना। यहरि तिस जघन्य युक्तानतका एक यार पर्ग भए जयन्य मनात हो। यहरि तात अनंतरयान जाइ जीयराशि प्रमाणको वर्गशलाका हो हैं, सातै भने- साशन जाइ काही अदायद हो है, सात मनतत्यान जाइ ताहीका प्रथम मूल हो है, ताफा एक पार वर्ग भाजावराशिका ममाण प है। इस गापा विष वर्गशलाकादिकनिका उपलक्षण कार कपन र सान इम जीवशिन पर पुलादिक जो जो राशि कहिए । तिनका जीवराशिविर में कान वर्गादाकादि जाननें । यहरि निस जीवराशि अनंतस्थान गाइ पुलराशिका प्रभाग दामा मनतस्यान जाइ श्रेणी आकाश निपजे है। सर्व आकाशका या प्रदेशनिकी पलिया मागमा अंगी आकाश करिए। यहरि माका एक यार वर्ग भए प्रागकाश उपते हैं । काका दंश वा चौदा प्रसानिका मु प्रमाण मो मनराकारा काहिए । इहो उचाई नासोन्ही ॥६॥ धम्मापामागुरुयगिनीयागुरुलगुस्म होति नदो। मुहमणिभणगाण अवर भविभागादिदा ॥ ७० ॥ माधर्मगुपयो की गागुस्टयोः भवनि सनः । मामाने अग्भिानिया ॥ ७० ॥ यं- नान .. म ४थ, मणिक अलग अविभाग मानमा काया रानाको भविमा । HTRA 11.॥
लोकसामान्याधिकार। ३३' भवरा खायलदी घग्गसलागा तदो सगछिदी। भरसगएप्पणतुरियं तदियं विदियादिमूलं च ॥ १ ॥ भारा क्षाविफलन्धिः वर्गशलाका ततः स्वफार्थपिदिः। अमितपट्प चतुरीयं तृतीय रितीयादिमूल च ॥१॥ अर्थ-पहरि ताने अनंत वर्गस्थान जाइ तिर्यच गति विय असंयत सम्यग्टीकै क्षायिफ सम्यस्यमप जो सन्धि ताके अविभाग प्रतिष्ठेदनिका प्रमाण हो है । बहुरि तात अनंत यास्थान जाइ फेषमानको वर्गशलाका हो है, तात अनंत वर्गस्थान जाइ साहीके भईछेद हो हैं, ताते अनंतवर्गस्थान जाइ साहीके अर्स'छेद हो है, सात अनंतरथान जाइ साहका अष्टम मूल हो हैं । साका एफ बार वर्ग भए ताहीका सप्तम मूल हो है, ताका एक पार वर्ग भए साहीका षष्टम मूल हो है, साफा एक भार वर्ग भए ताहीका पंचम मूल हो है, साका एक धार घर्ग भए ताहीका चतुर्थ मूल हो है, ताका एक भार वर्ग भए ताकिा तृतीय मूल हो है । साफा एफ वर्ग भएं साहीका द्वितीय मूल हो है, ताका एक बार वर्ग भए ताहीका प्रथम मूल हो है, राशिका घर्गमूलकौं प्रथम मूल कहिए, प्रथम मूटके पर्गमूलको द्वितीय मूल कहिए, द्वितीयमूलके पर्गमूलको तृतीयमूल कहिए, तूनीपमूलये वर्गम्टी चतुर्थ मूल काहिए ऐसेंही पंचमांदि मूल जाननें । जैसें एकीका प्रथममूल पादाल, द्वितीपमूल पगड़ी, सृतीयमूल दोपसे छप्पन, चतुर्थमूल सोलह, पंचममूल प्यारि, पष्टममूल दोय ऐसे ही अन्यत्र जानना ॥ ७१ ॥ सइमादिमूलवग्गे फेवलमंतं पमाणजेहमिणं । घरखइयलदिणामं सगबग्गसला हवे ठाणं ॥७२॥ सदादिम्लवर्गे केवलमतं प्रमाणजेष्टमिदम् । परक्षापिकलन्धिनाम स्वकवर्गशला भवेत् स्यानम् ॥ ७२ ।। अर्थ-तिस फेवल ज्ञानके प्रथम वर्गमूलका सरत् कहिए एक बार वर्ग पहें केवलज्ञानके अविभाग मनिच्छेदनिका प्रमाण हो हैं । एतावन्मात्रही द्विरूप वर्गपारा विर्षे अंतस्यान हो हैं । पह ही उत्कृष्ट प्रमाण है-यहही उत्कृष्ट क्षायिक लब्धि नाम है । बहुरि इस द्विरूप वर्गधाराके सर्वस्थान केवल ज्ञानको पर्गशलाका प्रमाण हैं ।। ७२ ॥ आगै दिरूप वर्गधारादिक तीन धारा वियं सर्वत्र विशेषरहित' पर्गशलाकादिककी प्राप्ति वि नियम है सो कई हैं:- उपजदि जो रासी विरलणदिजम्मेण तस्सेत्य । घग्गसलद्धच्छेदा धारातिदए ण जायते ॥७३॥ उत्पचते यः राशिः विरटनदेयक्रमेण तस्यान । वर्गशलार्धच्छेदा धारात्रितये न जायते ।। ७३ ॥ अर्थ-जिस धारा विर्षे विरलन देयका अनुस्म करि जो जो राशिका वर्गशलाका अर्द्ध- म्छेद तिसही धारा विर्षे न होइ, अन्य धारा विषै होइ, ऐसी यह नियमरूप भ्याप्ति सो द्विरूप वर्ग
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लोकसामान्याधिकार।
३५
लाका जाननी, यहरि परस्थान कि जैसें हिप वर्गधारा विष प्रथम स्थानकी एक यर्गशलाका
तैसेंही द्विरूप धनधाराका प्रथम स्थान पाठ ताको एक वर्गरालाका है । बरि जैसे द्विरूप
नधारावि द्वितीय स्थान सोरहको दोय वर्गशलारा तैसेंही निरूप पनधारा विकदिनीय
पान चीसठि ताकी दोय धर्गशटाका है। ऐसे परस्थान अपेक्षा स्वसमान वर्गगलाका जाननी ।
हर अपनी वर्गशलाका जेता प्रमाग तितना दुवा मांहि परस्पर गुणें अग्छेद हाहि । जैसे
रोपसे छप्पन्नको वर्गशयाका तीन सो तीन जागा दया मांडि २।२।२ परस्पर गुणें आठ हो
कई दोपसे एप्पनकै आट अईद है। ऐसे अन्यत्र भी जाननां । सो यह नियम द्विरुप यर्ग-
रा ही विर्षे सो पाईए है । यहुरि दिरूप धनधारा र रुिप धनाधनधाराविक नियम ऐमा
ही हैं। यहरि राशि जेते अछेद होहि नितने दूर्व माहि परस्पर गुणे राशि हो । जमे
यसै एप्पनके अर्द्ध'छेद आट सो आठ जायगा दोपका अक माहि (२,२,२,२,२,२,२,२, 1
'रस्पर गुणें दोयसे एपन हो है । ऐसेंही अन्यत्र जाननो, सो यह नियम सानो धारा विष
ना॥७५॥
माणे वर्गशटाया भर अर्द्धछेद नया स्वरूप पाहै हैं:-
पग्गिदवारा पग्गसलागा रासिस्स अदछेदसस ।
अदिदवारा पा खलु दलवारा होहि भषिदी ।। ७६ ॥
पर्गितगारा वर्गशलामा राशेः अदस्य ।
अतिवारा या पर दलपारा भवंति भईछेदाः ॥ ६॥
अर्थ-शिफा जो यान्तवार कहिए दोषका वर्गले गाय का मन.पार वर्गका
| राशि ताया तितना धर्मशालाका राशि जानना । जैसे प्यारिको वर्गमा एक
र वर्ग कीए पारित हैं। पगाको प्यारि जाने दोपका वर्ग परि, ताया वर्ग सोशल
न दोयस एपन, ताफा वर्ग पणदी। से पारियार वर्ग भए म ।
द नियम तीनों भाग यि है। रोर इतना सिरप पनधारा कि दोया पनी पारमा
सप धनायनभाग विषै दोया पनते गाई का वर्ग जर्मशार कर
की वर्गालामा जाननी । अधरा राशि जने भईद हिन बानिय ME
हि तितनी तिम गसिक पापा जाननी । असे दोपरी एन.
पर तीन सो टोपरी पनकी सोनी का जानन।। सो पानिपम Eिrrehen
की गतिया दरबार पहिए कितनी हार राशिको आ पा र रस
नेतना सि राशिका अदद जानना । जैसे दोस एपनका IN (वी आस, सर
गधा पोमटि, ताका माया बत्तीग, ताका भार सो, तामा का TET पादर,
का भाषा दोष, तास आपाय। ने भार पार मायामा
र भईरहा भी गनना , सोर निम सानो रानि॥६॥
।
जाननां । बहुरि ताका एकवार वर्ग कीए जगप्रतर उपजे है, तातें अनंतस्थान जाइ जीवराशि
वर्ग भए सर्वआकाश हो है। ठंबा, चौड़ा, ऊँचा ऐसा सर्व घनरूप भाकाशके प्रदेशानिय
त्रिलोकसार-
आगें छह मायानि करि द्विरूप घनधारा को कहे हैं:--
वेख्वविदधारा अड चउसट्टी चडित्तु संखपदे ।
आवलियनमावलिया कदिविंदं चावि जायेज ॥७॥
द्विरूपदधारा अष्ट चतुःषष्टिः चटित्या संख्यपदानि ।
आवलिधन आवस्याः कृतिद्वंदं चापि जायेत ॥ ७७॥
अर्थ-द्विरूप वर्गवारा विषै जो जो राशि वर्गरूप है तिनि राशिनिका जु धनम्प पनि
तिनकी जो धारा सो द्विरूप धनधारा है । सो याका प्रथम स्थान आठ है, जाते दोयका धन आर
है । बहुरि याका वर्ग द्वितीयस्थान चौसठि जाते च्यारिका घन चौसठ ही है । बहुरियारा के
तृतियस्थान च्यारि हजार छिनौ, जातें सोलहका घन च्यारिहजार छिन हो हैं । ऐसे ही पूर्व पूर्व
स्यानरूप राशिका वर्ग करते उत्तर उत्तर स्थान होइ, संख्यात स्थान जाइ जघन्य परीतासंख्याहय
घन हो हैं । बहुरि देयराशि उपरि विरलन राशिका अर्द्धच्छेद प्रमाण वर्गस्थान गएं यह राशि है
हैं, सो जघन्य परीतासंख्यातके अर्दच्छेद संख्यात ही हैं। तात जघन्य परीतासंख्यातका धन
संख्यात जाइ आवलीका घन उपजै हैं । ताका एक,वार वर्ग मए आवलीका वर्गका धन हो हैं ।।७७७
पल्लघण-चिदंगुलजगसेढीलोयपदरजीवधणं ।
तत्तो पदमं मूलं सव्वागासं च जाणेजो ॥७८ ॥
पल्यघन वृंदांगुलजगच्छेणीलोकप्रतरजीवधनम् ।
ततः प्रथम मुलं सर्वाकाशं च जानीहि ॥ ७८ ।।
अर्थ-तात असंख्यात स्थान जाइ पल्यकी वर्गशलाकाका घन हो हैं, तात असंख्यात
स्थान जाइ पल्यका अर्द्धच्छेद राशिका धन हो हैं, तातें असंख्यात स्थान जाइ पल्पका प्रथमम्टक
धन हो हैं । ताका एकवार वर्ग भए पल्यका घन हो हैं । वहरि तात असंख्यात स्थान जाइ धनांगुन
हो हैं । इहां 'उपनदि जो रासी' इत्यादिक सूत्र करि घनांगुटकी वर्ग शलाकादिकका अन
इस धारा विषे जाननां । बहुरि तात असंख्यात स्थान जाइ जगच्छेणी उपज है । इहां भी उपजीर,
जो रासी इत्यादिक सूत्रके अभिप्राय करि जगष्टेणीको वर्गशलाकादिकका अभाव इस धारा दिन
वर्गशटाकाका धन हो हैं, तातें अनंतस्थान जाइ जीवराशिका अर्द्धच्छेद राशिका धन हो हैं, टने
असंख्यात स्थान जाइ जीवराशिका प्रथममूलका घन हो है, ताका एकवार वर्ग भएं जीवराशिश्न
घन हो हैं । वहीर टपञदि जो रासी इत्यादिक सूत्रका अभिप्राय करि सर्व आकाशकी वर्गशला
दिकनिका तो अमाव है, तातै जीवराशि अनंतस्थान जाइ सर्वाकाशका प्रथम मूल हो हैं । साथ
प्रमाण हो है॥७८ ॥
संखमसमणतं यग्गहाणं कमेण गंतूण।
संसासंखार्णवाणुप्पची होदि सम्वत्य ॥ ७९ ॥
लोकसामान्पाधिकार। ३७ AAma संस्थमसंस्थमन पर्गस्थान प्रामेण गत्वा । संपासल्यानेगानामुत्पतिः भवति सर्वत्र ॥ ७९ ॥ अर्थ -जघन्य असेलातासस्थातरुप राशि पर्यंत सो मेल्यात वर्गस्थान जाइ कोरे, बहीर सात उपरि जघन्य अनामतबए राशि पर्यंत असंख्यात वर्ग स्थान जाय करि, बहार ताते उपरि फेवरहान पर्यंत अनंतबर्गस्थान जाइ करि यथासंख्य क्रमते सरूपात या अमेल्पात या अनंतानंत सप राशि उपने है सर्वत्र तीनों धारा विर्षे जानना । भावार्थ-संरूपातरूप राशिकी उत्पत्ति विय पूर्वस्थान, महशत वर्गस्थान जाइ कार राशिको व्त्पत्ति कहिए । बरि ऐसे ही अमाल्यात वा अनंतरूप राशिकी उत्पत्ति विवस्थान असल्यांत चा अनंत वर्गस्थान जाइ करि उपजनां कहिए। पन्तु इतना विशेष है, जो देय राशिन उपरि लिन राशिका अर्द्धश्छेद मात्र वर्गस्थान गए राशि हो है, साले जघन्य असंस्थानासंस्थात पर्यंत असल्यातरूप राशि वित्र भी संख्यात वर्गस्थान जाई करि ही राशिका पजनां कहिए का जघन्य अनंतानंत पर्यंत अनंतरूए राशि विप भी असंख्यात वर्गस्थान जाइ कार हो राशिका उपनना कहिए ॥ ७९ ॥ मरघुपैसे नापदि जो जो रासी विख्वधाराए । पण तोसे उपजदि तस तस्स पणो ॥८॥ यत्रोदेदो जायते यो यो राशिः द्विरूपधारायां । घनरूपे तदेशे उत्परते तस्य तस्य धनः ॥८॥ अर्थ-~-निस टदेश शिग, द्विरूप वर्गधारा विषै जो जो वर्गरूप राशि होइ तिस देश पि, निरूप धनधारा विपै निस लिस गारीका घन उपने है । जैसे निरूप धर्मधारा विप दोषका वर्ग प्यारि ये हो दोयमा घन आठ है, तहां च्यारिका र्ग सोलह थे इहो ताका घन चौसादि जानना । ऐसें जो जो रासि हिरूप वर्गधारा विय कही है तिनका इहां सर्वका धन जानना 1000 एवमर्णनं ठाणं णिरंतरं गर्मिय फेवलरसेव । विदियपदविदमतं विदियादिममूलगुणिदसमं ॥८॥ एवमनेत स्थान निरंतरं गला केरलव । मिनायपददमतो दितीयादिमम्लगणितसमः ॥ ८॥ अर्थ-ऐसें सर्वाकाशकै उपरि अनंत वर्गस्थान निरंतर जाइ केवल ज्ञानका दितीय मूलका घर हो है । सोई इस दिरूप धनधाराका अंत स्थान है, सो कितना है ! द्वितीय मूल अर अपम मूद को परम्पर गुणे जो प्रमाण होइ सोह समान है। जैसे पनीका प्रथम मूल दोयसै एपन, द्वितीय मूल मोलद, इनको परस्पर गुणें प्यारि हजार छिना होइ सोई पगहीका दितीय मूठ मोलह नाका धन भी च्यारि हजार दिन ही होइ ऐसे ही इहा जानना ८१॥ यह ही अल न केमेसो को है चरिपस्स दुरिमस्स य व पर्ण फेवलम्बादिकमदो।' नम्हा विस्वहीर ग्गसता हवे गणं ॥ ८२.
त्रिलोकसार- चरमस्य द्विचरमस्य च नैव धनः केवलव्यतिक्रमतः । तस्मात् द्विसपहीना स्वकवर्गशला भवेत् स्थानम् ॥८२॥ अर्थ-द्विरुप वर्गधाराका चरम राशि केवलज्ञान अर विचरम राशि केवल ज्ञान प्रथम मूल, तिनके घनका इहां प्रहण नाही हैं । काहे तें, जो इनके घनका ग्रहण करिए तो केवल इ. अधिक प्रमाण होइ जाइ । बहुरि इस द्विरूप धनधाराके सर्व स्थान दोय घाटि केवल ज्ञानसी वा शलाका प्रमाण जाननें । इहां अंक संदृष्टि भी जाननी । जैसे केवल ज्ञानका प्रमाण पगडी राज धन या ताके प्रथम मूल दोपसे छप्पनफा घन करिए तो पणहीते अधिक प्रमाण होइ जाइ ताते प्रहण करनों ॥ ८२॥ आगै अब दिरूप धनधाराको आठ गाथानि करि कहै हैं:- तं जाण विरूवगयं घणाघणं अर्विदतव्यग्गं । लोगो गुणगारसला वग्गसलद्धच्छिदादिपदं ॥ ८३ ॥ तं जानीहि द्विरूपगतं घनाधनं अष्टबंदतर्गम् । टोको गुणकारशला वर्गशलार्धच्छेदादिपदम् ॥ ८३ ॥ नेउपाइयजीवा वग्गसलागतयं च कायग्दिी । वग्गसलादित्तिदयं ओहिणिवद्धं वरं खेत्तं ॥ ८४ ॥ तेजस्कायिकीया वर्गशलाकात्रयं च कायस्थितिः । वर्गशलादित्रितम अवधिनिषद्धं वरं क्षेत्रम् ॥ ८४ ॥ अर्थ-द्विम्प वर्गधारा जो जो राशि वर्ग रूप हैं ताका धनाधन इस द्विरूप पन धाग विष है । घनका जु धन ताको घनाघन कहिए । कैसे सो कहे हैं । याका प्रथम २ आटका धन जो पाचमै चारह सो जानना, जाते दोपका धनाधन इतना हो हैं । यहरि तारा' दोय टाग यासटिहजार एक सौ धवालीस ( २६२१४४ ) सोयाका दूसरास्थान जानना । प्यारिका धनायन इतना हो हैं । ऐसेंही पूर्व पूर्व स्थानका वर्ग काएं उत्तर उत्तरस्थान है। इम ग्रने अनायात स्थान जाइ लौकाकाशके प्रदेशनिका प्रमाणम्प लोक उपजे हैं। वासादिक इस धाग यि नाही हे ताने न य । यहीर ताते असल्यात स्थान जाइ हे मासिक बीमाशिका मामा स्याक आय लोमका परस्पर जैतीपार गुणन होइ सीह भाप गुणकाराला संजे है। तने असम्यात स्थान जाइ तेजस्कायिक जीयराशिका वर्ग रो, ता. अमेगात स्थान जाइ नाहीका अोर हो है, ताने असम्यान स्थान जाता मनर तो है । तारों क.चार वरप की जमाविक जी गाशिको माया उपरे है। मगि कमिक वर्गश कास्किनि माया भयो T] Remia THEHIो मोकका मन Diana मा frre •ा ... 40 प्रति लोप्रमागदपत PITRAधार :: prani. Amrits meir reminarami ME HAR orderinार Arsert inापक सारे Imtaire simaran, tra anta:ोलियो REET Errier tit tat mari Mir me intereove (RY..v ) RE NA HEART. : १.१.१.mratundar. ५,५.१.१ पद से दोन भर, net mma maaa r.1 गा foti si , ranfit aks. Weोर पर नरमबहार Enarनि Ram सारियो गुगे परे भार भए, 7 HRohitentional EE MORN ने REn framerikanापिएनक्षिया गिटन की भरप tegना पिता और पाई, Eauty गुप्यार का दौर गते दम पार गुपन भया । aurat aur पर भगरपात सोय. मानसमावि वर्गला. Jai iram प. पुणे म । मरे र गुणना जो जो महाराशि तर प्रमाण AMAnी.ए राशि भरि टन रासिया सिटन करि सप प्रति देय का मन कर एस. एस. याशिमे पट पाते हो सोक माग TET परमार भरत RR मन से भी महाराति भया मामी गुगकार टाका तो বিঃ ৫। এল এ যুগাৰ মৰ। বি খায়া যা ক্ষম in FIR हरान अधिक है सरिभाग सान टोक प्रमाण पाहिए। ऐसे पहिलो पार रन था जो मा शितानिन जो समापना सो भया । बरि तहाँ परस्पर गुणें I am भा सापों का विरसन, देय र सान प्रकार स्थापिर । महरि जैसे प्रथम बाबा निया, सही अनुमने मी बार स्थापन गरी यह माला ताका रन बना परि तहां पर गुणन ने जो महागाशि साह प्रमाण शलाका, विरटन, पति शेन प्रकार की सामरी पार स्थापन करी जयह शलाका राशि ताया REETA RE | मरि तहाँ पर गुणे जी महाराशि भया साह प्रभाग II, विरटन, देय For M. S प्रकार परि जी चौधी aran सलाका राशिका प्रमाण माता पूर्व सीन लगाया प्रमाण पग: अवशेष गाया मागको सामान्याने आश शलाका कही ताका C. गट तान दागका निशान भण् अनिकायिक जीवनिका प्रमाण हो ru ३ मा । यसकादिकका कादिक ने अल्प । कायिक समिति मायात स्थान - ड जाननी । वहरि तात असंख्यात स्थान जाइ निगोद कायस्थितिकी वर्गशलाका हो है, ता असलर त्रिलोकमार- जाइ कायस्थितिकी वर्गशलाका हो है, ताने अमन्यात सान नामक है, असंख्यात स्थान जाइ ताहीका प्रथम मूल ही हैं, तामा पर गार वर्ग मर फायनियन्त्र हो है । सो कहा ! अन्यकापर्ने आय करि अग्निकारिकरि कोई जा टपण्या, मोटा यावत् काल अग्निकायिकपणा छोडि अन्य काय विश न उप तोही आम्पित , अनिल पर्याय धर्या कर, तिसकाटके समयनिका प्रमाग मो इहा कारिपतिका प्रमान गनना । हरे तात असंख्यात स्थान जाइ अपविक्षेत्रको वर्गशलाका हो है, ताने अमंध्यात स्थान जाइ नहर अर्द्धच्छेद हो हैं, ताने असंख्यात स्यान जाइ ताहीका प्रथम मूल ही है, ताकी एक बार वर्गवार सविधिका विषयभूत उत्कृष्ट क्षेत्रके प्रदेशनिका प्रमाग हो हैं. यपि अघि सपाहीको गर्ने कम रूपी पदार्थ लोक विषे ही है । तथापि शक्ति अपेक्षा असंख्यात लोक प्रभाग क्षेत्र पाया है। ८३.31 वग्गसलागत्तिदयं तत्तो ठिदिवंधपचयहाणा। वग्गसलादीरसबंधज्झवसाणाण ठाणाणि ।। ८५ ॥ वर्गशलाकात्रितयं ततः स्थितिबंधप्रययस्थानानि । वर्गशलादिरसबंधाप्यवसाना स्यानानि ।। ८५॥ अर्थ-तात असंख्यात स्थान जाइ ताहीके अर्द्धश्छेद हो हैं, सार्ने असंख्यात स्थान में ताहीका प्रथम मूल हो है, ताका एकवार वर्ग कार ज्ञानावरणांदिकर्मनिका स्थितियों कारगन्न जे कपाय परिणाम तिनके स्थानकनिका प्रमाण हो है । वहरि ताने असंख्यात स्थान जाइ अनुन बंधाध्यवसाय स्थानकी वर्ग शलाका हो है, तात असख्यात स्थान जाइ तहांके अच्छे हो है, दाई असंख्यात स्थान जाइ तहांके अर्द्धच्छेद हो हैं, ताते असंख्यात स्यान जाइ ताहीका प्रथम मूड है है, ताकौं एक बार वर्ग कौएं ज्ञानावणादि कर्मनिका तीघ्रादि शक्तिकों टीएं रसबंध जो अनुमान ताको कारण भूत कपाय परिणामनिके स्थानकनिका प्रमाण हो है ।। ८५ ॥ वग्गसलागप्पहुर्दा णिगोदजीवाण कायवरसंखा। वग्गसलागादितयं णिगोदकायहिदी होदि ।। ८६ ॥ वर्गशलाकाप्रभृति निगोदनीवानां कापवरसंख्या । धर्गशलाकादित्रयं निगोदकायस्थितिर्भवति ॥ ८६ ॥ अर्थ-ता” असंख्यात स्थान जाइ निगोद शरीर संख्याको वर्ग शलाका हो हैं, तातें अमस्या स्थान जाइ ताहीके अर्द्धग्छेद हो हैं तातें असंख्यात स्थान जाइ ताहीका प्रथम मूल हो है, ताको एक बार वर्ग रूप किए निगोद जीवनिके सर्व शरीर तिनकी उत्कृष्ट संख्या हो हैं,। नियत जे अनंत संख्या धरै जीव तिनको गां कहिए क्षेत्र ताहि ददाति कहिए देव सौ निगोद कर्म कहिए तीह संयुक्त जीव ते निगोद जीव कहिए, तिनके माधारण शरीर जेने लोकविषे टत्कृष्टपर्ने होहि तिनको संख्या देतो स्थान जाइ नाहीके अईच्छेद हो हैं नाते असल्यात म्धान जाइ ताहीका प्रथम मूल हो हैं, ताको एकार वर्गरूप कार निगोद कायस्थिति हो हैं । सो यहा निगोद कायस्थिति ऐसा कहने करि एक औषधी ।
लोकसामान्याधिकार । ४१ निगोद विष उत्कृष्ट रहनेका काल न महण करना । जाने एकजीव इतरनिगोविौ उत्कृष्ट रहे तो मदाई धदल परावर्तन काल पर्पत है सो फार अनंत है। तो कहा ग्रहण करना ! निगोद शारीररूप परिणए जे पुगल ते तोह शरीररूप आकारको यावत्काल उत्कृष्ट पर्ने छा नाही सो काउ हा प्रहण फरना ॥८६॥ वतो असलोग कदिाणे घडिय वगसलतिदयं । दिस्सति सम्बजेहा जोगस्सविभागपडिछेदा ।।८।। सतो समस्यटोक कृतिस्थाने चटित्वा वर्गशटात्रितयम् । पश्यते सर्वश्पष्ट योगस्याविभागप्रतिच्छेदाः ॥ ८॥ अर्थ--यहरि तोह निगोद काय स्थितित उपरि असंख्यात लोक प्रमाण वर्गस्थान पति- फरि सर्वोकर योगके उत्कृष्ट अविभाग प्रतिवेदनिकी वर्गशलाका हो हैं, सात असलात लोक ममाण वर्गस्थान चहिकरि ताहीके अर्द्धस्छेद हो है, सात असंख्यात टोकमात्र कतिस्थान पदिशरि ताहीका प्रथम मूल हो है, ताको एकभार वर्गरूप कीए सर्वोत्कृष्ट पांगके स्तष्प अविभाग प्रति. छेदनिका प्रमाण हो है। कर्म भाकरण करनेको शक्ति सो योग कहिए, ताके अविभाग प्रतिछेद काहिए जिनका विभाग न होइ ऐसे सूक्ष्म अंश तिनका प्रमाण हो है ॥ ८७॥ जो जो रासी दिस्सदि विरूवरग्गे सगिहाणादि । तहाणे तस्सरिसा पणापणे परणवृदिशा ।। ८८॥ यो यो राशि: पते विरूपवर्गे स्केटस्पाने । तस्थाने तत्साशा पनापने नव नव रदियाः।।८८॥ अर्थनिरूप धर्गशरा पि अपना इष्ट स्थान जो विवक्षित स्थान सो जो जो सारी वर्गरूप दी है, तोह स्थान किया निरूप नाथन धारा विहिरूप वर्गधाराका स्थान- के समान रानि न नावार परस्पर गुणें राशि हो है ऐसा का है। जैसे दिए राशि कि रितीय स्थान प्यारिका वर्ग मोटा हो पारिको नत्रवार मांडि (४,५,११,११,४,७,४) इनकों परस्पर गुणें दोय सार वासाठि हजार एक सो घाम होइ, सोहम धारा विमिनार स्थान जामनो। में ही सर्व दिग्प वर्गधाराकै सानक वर्गरूप है तिनको नकधार पER पणे दिप पनापन धारा स्थान हो है ऐमा जानना ॥८८॥ पहिषमणेत वाणं केवटपरत्यपदरिद । सगरगगुणं परिमं हरियादिपदाहदेण समं ।। ८९ ॥ घस्वियमनत स्थान केवलचतुर्भपादन। घकवर्गगुणमाम मुरोपादिपाहलेन सम । ८९॥ अर्थ नाह योगा ? अविभाग तो सामने लान बहिबार केवलसनका चीमा नाम इस चोदा मायनस ETA: हम भागका असम-जन- 4 भर मनापर्क शिरभूत दमी हु चार धाग निना सविस्तर दिसा मति: त्रिलोकसार- समान जाननां । याको अंकसंदृष्टि करि कहिए है । जैसें केवल ज्ञान पट्टी प्रभाग(६५. ५३६) ताका चौया वर्गमूल दोप (२) ताका धन आठ (८) तार्को इस धनका की चौसठि करि गुण पांचसे वारा होइ (५१२) सोई पणहीका चौथा मूल दोय (२) अर प्रश्न मूल दोयसे उप्पन (२५६ ) इनकों परस्पर गुणें भी पांच सौ बारा होय (५१२) ऐसे यह में. स्थान जाननां ।। ८९ ॥ औरनिके अंत स्थानपनां कैमें न संभवे सो कहै हैं:- चरिमादिचउकस्स य यणायणा एत्य व संभवदि । हेद मणिदो तम्हा गणं चउहीणवग्गसला ॥ ९० ॥ चरमादिचतुष्कस्य च धनाधना अत्र नैव संभवति । हेतुः मणितः तस्मात् स्थानं चतुहीनवर्गशलम् ।। ९० ॥ अर्य-केवलज्ञानादिक नीचैक द्विरूप वर्गधारा विप कहे च्यारि स्थान केवलज्ञान १ टाक प्रथम मूल १, द्वितीय मूल १, तृाय मूल १ इन प्यारोंका धनाधन इस दिरूप धनायन घर विष न समय है। जो इनका घनाघन करिए तो केवल ज्ञानते अधिक प्रमाग होइ । अनी फरि जैसें केवल ज्ञान पणही प्रमाण (६५५३६) ताका प्रथम म्ल दोयसै छम्पन (२५० दिलीप मूल सोटह (१६) तृतीय मूल प्यारि (४) इनके घनका धन करिए तौ पणहीत अधिक प्रदान होइ जाइ, ताते इस द्विसप धनाधन धाराकै सर्वस्थानकनिका प्रमाण प्यारि घाटि केपटात वडाका प्रमाग जाननें ॥९॥ आगे कहीं जु ए धारा तिनका संहार कहे हैं: ववहावनोग्गाणं पाराणं दरिसिदं दिसामेतं । पित्यरदो वित्यसिस्सा जाणंतु परियम्मे ॥ ९१ ।। म्यवहारोपयोग्यानां धारामा दर्शित दिशामानम् । विस्तातो विस्तरएचिशिया जानतु परिकर्मणि || ९१ ।। वर्ष-मस्या व्यवहारको टपयोगी मे जुधाग तिनका स्वरप इहां दिशा मात्र दिएर दने पोर अंगुली करि पूर्वादिक दिमायों दिखा तैसे इहा अनि संक्षा धारानिका सा दिया है। पिम्दार विग रधिक धारक शिष्य है, ते विस्तार से वृहत्यारा परिकर्मा नामा विधानिया मापसे जानह ॥ २१॥ ऐमें संध्याप्रमाग समार मया । - . टाना नगर अटक नाको निमपा को १:- पड़ी गायर मां पढगे प पगंगुष्ठो प नगमेटी । रायपटगे य लोगो यमरमा एवमरिहा ॥ ९२ ॥ पर मार दीना च धनमायागी । दायक सामग्रमा यम १.२ ।। * लोकसामान्याधिकार। । अर्थ -~-पल्य १, सागर २, सूध्यंगुल ३, प्रतरांगुल ४, पनागुल ५, जगण्ठेगी ६ जगपतर ७, धनलोक ८ ऐसे रपमा प्रमाण आठ प्रकार हैं ।। ९२ ॥ श्रागै इन विषै पल्पका भेदको अपना अपना विषयका निर्णय पूर्वक पाहै है:- ववहारुद्धारदापल्ला विष्णेय हॉति णायचा । संखा दीवसमुद्दा फम्महिदि पिणदा जेहिं ।। १३ ।। व्यवहारोद्धारासाल्यानि श्रीया भवति ज्ञातव्यानि । संख्या द्वीपसमुद्राः कर्मस्थितयो वर्णिता यः ।। ९३ ।। अर्थ व्यवहार पल्य १, उद्धारपल्य २, पापल्य, ३, ऐसें पल्य तीन प्रकार ही है. ऐसा जानना । जिन तीन प्रकार पल्पनिफरि क्रम संख्या अरदीप समुद्र पर कर्मस्थिति आदि वर्णन कोए है । सहा व्यवहार पत्य करि तो रोमनिकी संख्या पहिए हैं, अर उद्धारपल्पफीर द्वीप समु. दनिकी संख्या धर्णिए है, पर अापल्य करि फर्मको स्थिति णिए है, मादि शन्दते और भी पा- - समर जानना ॥ ९३ ॥ था, पल्पफे जाननेको विधान कहै है:- सतमजम्मावीणं सचदिणभंतरमिह गरिदेहि । सण समिचिदं भरिदं वालग्गकोडीहिं ।। ९४ ॥ सहमजन्मायीनां सप्तदिनाम्पतरे गृहीतः । सनई संनिचित भरित बाठाप्रकोटिभिः ॥९॥ अर्थ-सातवां जन्म जुक्त ऐसे जु ऊरण गाडर तिनो जन्मते सात दिन मही महेतु राम तिनके अप्रभाग सप रड तिनके कोडिनिकरि संयुक्त किया पहुत संघयदप किया भन्या ।। ९९ ऐसा कामा सो कहै हैं:- न जोपणपित्पिर्ण तत्तिर्ण परिरयेण सरिसेसे । संजोयणमुग्विदं पई परिदोवर्म णाम ॥ ९५ ॥ पत् पोजनपिन्तीर्ण तत्रिगुणे परिधिना सविशेषम् । सात पोजनामुद पल्प परिमोम नाम ॥ ९५॥ अर्थ- जो एक योजन प्रमाण तो विस्तीर्ण करिए चौडा, यही ताने लिगुगा परिधि पर - सविशेष भावार्य---- जो सूक्ष्म परिधिको अपेक्षा पास निगुण मिळू अधिक प्रभाग फरि सेजुत, बहुरि एक पोजन रडा सा कुछ सो गमनि करि भन्या निजी रोमनि- का प्रमाण सायोपल्यापम कहिए वा परिनोपम या९ि५६ आगे एरिका विशेष ऐसा भिषण बहार भागनेंस सम परिपिरका विभवग्गदरगुणकरणी काम पग्रियो दि । विवसभरउम्भाग परिम्पणिदारं गणिय ॥
त्रिलोकसार विष्कमवर्गदशगुणकरगिः वृत्तस्य परिधिः भवति । विक्रमचतुर्भाग परिधिगुणिते भवेत् गणितम् ॥ ९६ ॥ अपं-विधम्म कहिए चौड़ाईका प्रमाण तीहका वर्ग करिए, तार्को दसगुणो करिरहे करते जो प्रमाग होइ सो पृत जो गोउ क्षेत्र तामा करणिरूप परिधि जानना । जिस राशिक वर्ग प्रदान करना होइ तिस राशिका तहां करणि ऐसी संज्ञा जाननी । बहुरि मिरद भर कि जेता प्रमाग होइ सो सूक्ष्म परिधि जानना । जो तारतम्परूप परिधि होइ सो सूक्ष्म महिर । सो इहा कुंडका विकरम एक योजन है । विष्कम्भ १ ताका वर्ग फीए भी एक योजन। हो, सानी दगगुगा कीए दश योजन होइ सो इतना करगि राशि भया, सो का इहाँ बत डन करना । मो दश योजनका वर्गमूल तीन योजन अर एक योजनका छठा भाग इतना भर (३) कामे मम फरि जो उगणीसका सटा भाग भया (1) ऐसे इस कुंउका मन परका हो । मारि पगिरिकों शिफम्भका चौथा भागते गुणें क्षेत्रका होइ सोह FREE एक फेलन ताका चौथा भाग ३ फरि गुणे उगणीसको चौईसका भाग दौजिगर ET (2) परि पानी षेध जो दंडाई एक योजन प्रमाग सीह करि गुणें भी तितक। (B) इग साधनमा समान मूक्ष्म क्षेत्रफल उगणीसका चौतीसमा भाग का पर यह कहा ओ प्रमाण योजना नाम क्षेत्रफल ताके प्याहार योगनादिक कारे में! एक प्रमाणयोजन पदोन ताका पोयगे म्याहारयोजन होइ तो उरणार करनाtest मागको कितने ध्याहार योजन होइ ऐमें त्रैराशिफ करना, सहा. PHOTTHI भार पनना होइ तानिन प्रमाण योजननि भागनिको पाँधमान तीन जागा मिलिए । यहीर मेंही एक प्यवहारयोजन के कर marwaran अंगुट, एक अंगुटके घाट या, एक या आठ नित, एक नया *ग, ४ मा कमि गेम, एक कर्मभूमिपाक गेमके आट जय भोगभूमि नजन्य मक भूमिमी आदमपम भंग भुनिया के गेम, एक मध्यम 2 2 242 *ग गिर गम, मो इना गरि करि धनमत गनि नारि (१,५००,५००,५००,७६८०००,७१८५ १८...८.८,१४,१८,८,८,८,८,८,८८,८,८,८,८,८८,८,८ इनमनिकों पर afterinar मो भागना " ਮੀ मी ? पहीही माग गटा। रियामा १७ ॥
रोकगामान्याधिकार। -मी (१८४४६१०७७०९५५१६१६) पर प (६५५३६ ) TREntr (१९) Tी मा (१८१ नो पर पुणे रे अंक हा निको माग शिक मन्यो समान करि संपून. करिए पर परिजोपमकै रोमनिती सदया गनी (१८-६५-१०,१८,१८)॥ २७ ॥ पसर गुमें भी प्रमाण पर साधा दिमाव:- पटलरपरोरगोनगनगरनगंगासससपथमपरफधर । पिगुणणगुणमाहिद पारगद रोमपरिसंसा ॥ ९८ ।। हिगुमनामपरहित पन्पस्य तु रोमपरिसरया ॥ ९८॥ अर्थ-ent र महाले अफ जानने । साफा उक्त व सूप-'कटपयपुरस्थवर्णेनव नर कापतिः परा: । सरमनशून्य संगम मातोपरिमाक्षर स्पाये ॥ माका अर्थ-कारा- कि नर, भर टकारादिक नए, पर दिफ पाच, अर सकारादिक पाठ । इन अक्षरनि कि? कमी पक कर होद गोसाय जाननी । परि मागदिक र घर प्रकार, नकार ए Raat जानना हरि क्षनिये, जो मात्रा होइ अपवा कोई संजोगी अक्षर होइ at anा कि प्रयोजन न मरण करना । सो इस सूच फरि कहिए प्यारि जाते এখন প্রায় ঘা সহ {{ বহি ছি দুজ না জোর গল্প অল্প है । परि स कहिए सीन जाते यकारते टकार सीसरा अक्षर है । बहरि व ৎৈ বা তার যোং অধ্যা ঘঁধা যায়। যা ল ববি আর কোঠ গঙ্গায় पांचा महार है। ऐसे ही शमत रोधगो नानजर नर्गकास ससप ध मपर फवनि इन अक्षर- करि दोय, र, तीन, विदी, सीन, एक, सात, सात, सात, पारि, नव, पांच, एक, दोय, एक, नव दोषो क जानने । बहार मा दिगुण नव शान्य कहिए अटारह विटानि करि सहित करिए। दमें जो प्रमाण रोइ सो पन्यो रोमनिकी सरया जाननी । ( ११३५५२६३०३०८२०३१७ ७७४९५१२१९२००००००००००००००००००)॥९८॥ मा व्यवहार पत्यके समयको दिसारे है:- घस्ससद वस्ससदे एक वहिदम्हि जो कालो। हालसमपसंवा या ववारपद्धस्स ।। ९९ ।। वर्षशते वर्षशते एककस्मिन् अपहते यः कालः । कादममयसंग्या झपा व्यवहारपन्यस्य ।। ९९ । अछ-क, मो वर्ष, एक में वर्ष गएँ श्क एक गेम तिन रोमनिस्यो महण करिए । रमाकानन म ममाम जितन काल कार होनाकमात्र काटक जने समय सो व्यवहार पल्यय, मन्यमय' मा या हाइ मा कमका प्रहण विषे मौवर्ष रोड, ना पूर्वोक्त प्रमाण मर्य मम tara र एम मशककीर बहार एक, अपके तीनमें साटिदिन, एक
में इतने (११-88) होइ तो इतने ममयनिक केले पल्य होइ तहां ऐसा (११:83)
प्रमानश भावन कारगम, थर टाव गुणा प्यारि लाख मर हजार इनको परस्पर गुर्गे दो
त्रिलोकसार-
विष केते कुंड होंहि, ऐसा त्रैराशिक करिए, तहां प्रमाण राशि ऐसा ( १० ॥
पाल राशि १, इच्छाराशि ऐसा (६ लल, ६ रल, १०) इच्छाओं फल करि गुणि प्रमाणात
दीएं दशका गुणकार वा भागहारका अपवर्तन काएं सब्धराशि ऐसा होइ (६ लल,३६)।
बहुरि 'हारस्य हारो गुणकोंशराशेः' इस बचनतें भागहारका, भागहार राशिका गुणकार होइ के
यहां मागहार एक, ताका भागहार च्यारि है सो राशिका गुणकार मया तव ऐमा भया ( २१.
एल, २४ टल ) ऐसें वर्गरूप शलाका होहे, याका वर्गमूल ग्रहण करिए तब एक लाड
चौवीस लाख हूवा ( २४ टल ) याको टवण समुद्रकी रंडाई हजार योजन प्रमाण करि पुर्व
सर्व कुंदनिका प्रमाण ऐसा भया (२४ लल १०००) ॥ १०३ ॥
आगै अन्यगुणकारको दिखा हैं:-
रोमहदं छकेसजलोस्सगे पाणुवीससमयात्ति ।
संपादं करिय हिदे केसेहिं सागरुप्पत्ती ।। १०१ ॥
रोमहतं पट्केशजलोसके पंचविंशसमया इति ।
संपातं कृत्वा हिते केदौः सागरोत्पत्तिः ॥ १०४ ॥
अर्थ-बहुरि व्यवहार पल्यकै रोम च्यारि, एक आदि अंकरूप तिनकी सहनानी है।
(११) बहुरि तिनि ते असंख्यात गुणे रद्धार पल्यके रोम तिनको सहनानी ऐसी (११४)
यहरि अदापत्यके रोम तीह स्योभी असंख्यात गुणे तिनकी सहनानी ऐसी (११-55
इहां असंन्यातको सहनानी ऐमी g जाननी, सौ एक कुंटमैं इनमें रोन पाईर
पूर्योक प्रमाग कुंडनि वियं के रोम पाईए ऐमें त्रैगशिक कोर पूर्वोक कुंडन
प्रमाणको रोमनिकै प्रमाण करि गुणिन करे लवण समुद्र पिप कल्पित किए सर्व कुंडल
शिप रोमनिका प्रमाण होइ (२४ टल १०००, ११=3g यहुरि छह रोम जितना है।
रो, तितने क्षेत्रका जठकों काढतै पर्चास समय होइ तौ पूर्वोक्त प्रमाण रोमनिका क्षेत्र संर
जउको निमिचन करने के ममय हो हिं, ऐसे राशिक करनां । तहां प्रमाण राशि रह से
(६), पटराशि पचीम समय ( २५), इप्याराशि सर्व रोम ( २४ , लछ १०००११
हा इष्टा गशि वि चौवीमको प्रमान राशि छह कार अपवर्तन कौर, अर फार की
हटा लियो गुग लब्ध राशि ऐमा (२५,१, छठ १०००,११=gg ) बहरि पत्यक का
समिया मो इतने पय भई एक मागाकी टपनि हो है ॥ १० ॥
निए वागवि मागगामी नि नाही ताने सागरमक भोटको जग
बा मग मूत्र -
गुगयाटगंदा गुणितमागम्म मददनुदा ।।
स्टामदाता अहियम्म दगा यि ॥ १०५॥
गोकमामान्पाधिकार
४९
गुणा गुरमाना ।
TIPS अधिरना नामित ॥ १०५॥
अर्थ-Ter, जो महिने गुमानसिक अनिकार जोडिए सर
marriगुणकार आर गुरमा सो गुणसार करि गुपको गुपों सध.
Prer माग riyार मार, अर मीन भर गुप्य सोई अदप्यारि ।
1ोडको को rountacमो माईगके समान हो । नेमे रहा भी गुणकार
॥ पो सरगुप्प पाय मो गुफरार करि गुल्मको गुने सागर होइ तही गुणकार दर
हापारिक. arren से गुस्य को पन्य ताके भनि करि जो राशि सगर
फ, tारि जाने सविपकी सेना नाही है। सात सागरोपमको पालाका
10. भावार्थ.---गुगपारमादि मध परि गुपके सदनि विष गुणकारके अछेद
मागे गुणया दोई गिनयों अधिक ऐन पाहिये तिन अधिक छेदनिके अर्दछेद
। तुजन नाही। ताले देसा फसा कि अधिक दिन के अमद नाहीं । प्रयोजन तो
गारिप, जैसे भनीद हो हिलिन भनि ते पद हों हि सावमात्र वर्ग-
लिका र सोसी पहा प्रयोजन है नही जाने यह राशि वर्गगल नाही है सात सागरोपमकी
शलकाका अभाव जानना ॥१०५॥
भाग गुप्पगुणकारये. अनिका स्वरूप दिसते प्रसंग पार भाग्य भाजकफे भी भर्द्ध-
दनिका स्यसपको दिपार है.-
भनम्मदच्छेदा हारदच्छेदणाहिं परिहीणा ।
अदरसलागा सदस्य वनि सम्पत्य ॥ १०६ ।।
भाग्यम्यादा रारष्ठेदनाभिः परिहानाः ।
भराटाका यस्य भवति सर्वत्र ॥ १०६॥
अर्थ-भाग्यके मेने भर्दछेद हो हित हार जो भाजक ता भईछेदनिकरि हीन करिए
व शिवा अदालाका सर्वत्र होइ । अंक संशति यि जैसे भाग्य धासठि ६४ हार
प्यारि १ हारका भाग भाग्यको दर सम्पयारी सोलह १६। तहा भाग्य घोसटिके अर्दछेद
Br६ से भाजक प्यारिके भड़द दोय तिन करि हीन किए अवशेष राशि सौलहफे भई.
और प्यारि जाननें । ऐसे ही अन्यर भी जानना ॥ १०६ ।।
आगे मध्यगुटके मर्सदको दिसावता सून कई है:-
विगलनमाणगसि दिण्णम्माच्छदीहि संगुणिदे ।
अछटा हानि हु सम्बन्धुप्पण्णरामिस्स ॥ १०७॥
१५२ नमाया दिन मागते ।
दावान र सत्रानराशे ॥१०७॥
. । ५० प्रिलोकगार- अर्थ-विरलनमान जी गनिसाको टेय गणिक अटन की मुटा अर्द्धछेद सर्वत्र होहि । जैसे विग्टन गमि ग्यारि, देय गनि मोटर, पिन गरि करि देयराशिकों मप प्रति देइ १६।१६।१६।१६ 1 पर गुण पाठी ६५.३६ प्र- तहां विरटन राशि प्यारि ताकों देयराशि मारह अर्दमोद पारि तिन कार में सन्न - पणही ताके अर्द्धन्छेद सोलह हो हैं । तैसे हा विग्टनगगि पके अनोट तिनगेरे- पल्य ताके अर्द्ध छेदनि करि गुणें उत्पन्नराशिफे अर्दछट पन्यके अदम्दानिका यमनाम ही है। आगें सूयंगुलको वर्गालाकाकी दिसावता मूत्र कहैं :- विरलिदरासिच्छेदा दिण्णदञ्छेदछेदमंमिलिदा । वग्गसलागपमाणं हॉति समुप्पष्णरासिम्स ॥ १०८ ॥ विरटितगशिग्छेदा देयार्थप्छेदछेदसंमिलिताः । वर्गशलाकाप्रमाणं भवति ममुपनरागः ॥ १०८ ।। अर्थ-विरटम राशिके जेते अर्द्धच्छेद हाहि ते देवगशिके अनुच्छेदनिके अर्द्धग्छेदनि मिलाईए जोडिए । तब रिटनदेयका ऋम करि उत्पन्न भया जो राशि ताकी वर्गालाका होइ । जैसें विरटनराशि च्यारि ताके अग्छेद दाय बहुरि दयराशि सोलहके अर्द्धच्छेद च्यारिक अर्द्धच्छेद दोय इनकों मिलाएं उत्पन्नराशि जो पणही ताकी वर्गशलाकाका प्रमाण च्यारि होइ ।। इहां विरलनराशि पल्पके अर्द्धच्छेद ताके अनुच्छेद पल्यको वर्गशलाका प्रमाण बद्दरि देयराशि ताके अर्द्धच्छेदनिके अच्छेद भी पल्यको वर्गशलाका दगी हो हैं | बहरि-चग्गादुपरिमा दुगुणा दुगुणा हवंति अछिद्धी । इम पूर्वोक्त सूत्रके न्याय कर मयंगुलके अर्द्धच्छेदन दूगे प्रया गुलके अर्द्धच्छेद हो हैं । बहुरि-वग्गसला स्वहिया-इस पूर्वोक्त मूत्रके न्याय करिब गुलकी वर्गशलाकातें एक अधिक प्रतरांगुटकी वर्गशलाका हो है । वहुरि द्विरूप वर्गधाराविर्ष टन जो सूच्यंगुल सो जिस स्थानविौं उपजें है तिसहोके समान स्थान विर्य द्विरूप घनधाराविर्ष धन- गुल उपज हैं तात 'तिगुणा तिगुणा परहाणे'-इस पूर्वोक्त सूत्रके न्याय करि सूच्यगुलके छेदनितें तिगुणें घनांगुलके अर्द्धच्छेद हो हैं । बहुरि 'सपदे पर सम'—इस पूर्वोक्त न्यावर सूच्यंगुलकी वर्गशलाकाके समान ही घनागुलकी वर्गशलाका है । वहरि घिरटजमागरासिया सूत्रके न्याय करि विरलनमानराशि पल्यका अर्द्धच्छदनिका असख्यासवां भाग ताों देयराशि धनांगुर अर्द्धच्छेदनि करि गुणें उत्पन्नराशि जगच्छेगी ताके अर्द्धच्छेद हो हैं ।। १०८ ॥ आगें जगच्छ्रेणीकी वर्गशलाका दिखावनी सूत्र कहे हैं:- दुगुणपरीतासंखेणवहरिददारपल्लवग्गसला । विंदंगुलबग्गसलासहिया महिस्स वग्गसला ।। १०९ ॥ दिगुणपरीनामख्येनापहनादारपल्यवर्गटालाः । वृदगुटयगशनासहिमा श्रेभ्या वर्गगला ॥ १०९ ॥ अर्थ-दूणा जघन्यपगतामख्यान करि भाजित जो अदापयका वर्गगलाका सो धनगु- लको वर्गगटाकामहित जााच्छंगाकी वर्गगलाका ही है । । ।
लोकसामान्याधिकार। भावार्थ-पल्यकी वर्गलाकाकों जघन्य परीतासंस्थातते दुणे प्रमाणका माग दौर जो प्रमाण होइ ताकी धनांगुटको वर्गशदाफासहित जोडिए तब जगदेणाकी वर्गाटाकाका प्रमाण हो है। इहो दूणो जघन्यपरीतासंख्यातका भाग फैसे दीया सो काहिए हैं । अदापल्यका अर्द्धच्छेद गनिके अर्द्धच्छेदपल्यको वर्गशलाका प्रमाण है । बरि पत्यका अर्द्धोदराशिका प्रथम वर्गम्टक भोट पल्पकी पर्गशराफा आईप्रमाण है। परिवाहीका दितीय मूल के अर्द्धोद ताने आधे हैं । तृतीय मूल के सातै भाधे है ऐसे वर्गमूल वर्गमूल प्रति मा भाधे अछेद सायन करने पान पस्यका अईयोद- राशिके नीचे जघन्य परीतासेस्यातका अई'छेद एक अधिक प्रमाण वर्गमूलपर्यंत जाइ अन किन जो वर्गम्ल होइ ताके दो जघन्यपरीतासल्यात फरि भाजित अद्धापत्यका वर्गाका प्रमाण आईपछेद होहि । हात उपरि उपरि धर्म की जैसे दूणे दूणे भोर होहित टपरि ती नाचे वर्गमूलनि विर्षे आधे आधे अच्छेद होहिं । इस जुक्ति पारि जघन्यपरीनामन्यातया पर एक अधिकप्रमाण वर्गमूल के अर्धच्छेद इतनै भये । एक अधिक नघन्य परीतासायात प्रमाण या मारि परस्पर गुर्गे दुर्गा जवन्य परीतासंस्थान होइ ताका भाग अद्धारपल्पको वर्गशलाकाठी दीर भी प्रमाण होइ तितने भए । भाग-~-जगजीविस्टिनाशि पत्यके अदनिय मारयात मागिर सो पल्यको अग्छेदाशिक नाचे जघन्यपरांतासंरयातका एक अधिक अर्दछेद प्रमाण जे के अछेदनिके वर्गमूल तिन वि बनके वर्गका प्रमाण जानना । साये मद मां अपन्यप. रांतात्यातका भाग पल्यकी वर्गशलाराको दीए जो प्रमाण होइ लिगना भया । परि 'दिपण. छेदछेदसम्मिलिदा म पवन फरि देपराशि धनागुल ताके अनिक मले। जो पन'गुको पर्गशलाका सो तिन वि जोडिए मिलाईए ऐसे करते टापन्न राशिनी नगरेजी लायी बाग. काका प्रमाण हो है ऐसे मनविय विचारि 'दुगुणपरीतारांचे 'दादादि गुपकाचार्यने ।। यहरि 'यग्गादुरिमवग्गे' इत्यादि गत्र न्याय करि जगदीपेः बताने दो जग के अगद है। महरि 'पगसला परिया-क्याति प्रम. न्याय करि जापाया वर्ग समकाल एक अधिक जपतरको वर्गमलाया है । म निगुणा निगुणा परिहाण -म गरफे न्याय परि जगणांक अग्छदानित तिगुणें निलोकके भर है। परि 'सपदे पागम' इस सूत्रफ न्याय करि जगदलीयो वर्गमालाका समान ही पनोवा वर्ग है ॥१९॥ आगै 'तम्मेलद्गे गुणे रामी' इस सूत्र करि नितना अदिनिका मान दूषा माडि परस्पर गुणें राशि हो । जो माधिक भलस होइ सोचने र सोहे-- विरलिदरासीदो पुण जेसियमेशाणि अपियरूवाणि । नेमि अण्णोष्णादी गुणगारागिरस ।। ११०॥ । रहिनने पाक- मायामा मेरा॥११०॥ भ .......... गार पाबमा पनि ३ ... 't OTM CAINE र अननः । सार त्रिलोकसार- च्छेदनिका प्रमाण संख्यात अधिक पल्यका अर्द्धच्छेद प्रमाण है। तहां पल्यके अच्छे- विरलनरूपराशि कहिये । अर ताके उपरि संख्याते अर्द्धच्छेद तिनकों अधिक मप कमि अधिक रूप प्रमाण दोयका अंक मांडि परस्पर गुण दश कोडाकोडि प्रमाण सो विरलनरा दोयका अंक मांडि परस्पर गुणें भया जो पल्य प्रमाण लब्धराशि ताका गुणाकार जान पल्यप्रभाग गुण्यको दश कोडाकोडि प्रमाण गुणकार करि गुणें सागरोपम हो है । अंक जैसे सागरके अर्द्धच्छेद सात तहां विरलनराशि तो पल्यका अर्द्धच्छेद च्यारि ताके टपरि तीनसो तीन जायगा दीयका अंक मांडि परस्पर गुणे आठ भया सो विरलनराशिप्रमाग परस्पर गुणें भया जो पल्यका प्रमाण सोलह लब्धराशि ताका गुणकार हो है । तहां सोल करि गुणें सागरोपमका प्रमाण एकसो अठाईस हो हैं । ऐसे ही अन्यत्र भी जानना । भावार्थ-इहां ऐसा है कि जैसे केतेइक अर्द्धच्छेदनि विर्ष केतेइक अर्द्धच्छेद - मिटाए अर्द्धच्छेदनिकों अर्द्ध एकरूप कहे तैसें निन मिटाए अर्द्धच्छेद प्रमाण दूधा मांडि प जो राशि होइ सो मूल अर्द्धच्छेद प्रमाण दूवा माडि परस्पर गुणें जो लन्धराशि होइ तिस नि योग्य न हो है गुणकाररूप हो हैं ।। ११० ।। आगै प्रसंगपाइ हीन अर्द्धच्छेदनिका कहा सो कहें हैं:- विरलिदरासीदो पुण जेत्तियमेत्ताणि होणरुवाणि । तेसिं अण्णोप्णहदी हारो उप्पण्णरासिस्स ॥ १११ ॥ विराटितराशितः पुन: यारन्मामाणि हानरपाणि । तेषामन्यान्यहतिः हार उत्पनराशेः ॥ १११ ।। अर्थ-विस्टनरूपगशित यावन्मात्र हीनम्प होइ तिन हीन रूप प्रमाण दूबे मां मुझे जो प्रमाण होद मो टत्पन्नगशि जो लन्धराशि ताका भागहार होइ । अक संदृष्टि स्वाहा ऐसा । जैमें पगट्टी ६५५३६ अर्द्धच्छेद सोला तिन ते प्यारि घाटि अ हजार दिनांक हो । तहा पगडीके अद्धंग्छेदानिको विरित राशि कहिए, अर घाटि अछेद सिनका हीनम्प कहिए। मो हीनारपत्रमाण वा माडि २।२।२।२ । परस्पर भर । मोई विग्टनगशिप्रमाण दूवा माडि परस्पर गुण भया जो पगही ६५५२६ प्रमाण माश भारदार हो है। नहा माश्य पगढी ६५५३६ को भागगशि सोलहमा भाग दी प्रहार डिना हो। मावायं-अग्वेदनि विग केलेयक अयद घटाए तिन घटाए अर्द्धोदनिकों बार। मो नाममाग वा माहि परामर गुण जो गमिहोइ सो म अदम मान जोगामि दिन का भारदारही है। भागीर जी गशि आरे दो अन द हेमा गुमे गनमा जानना । यह कारनामा, नगमंरीप बग्गा नगपाशदि नापणी गो। पद वायगंगागागंना पद पम्मी ।। ११२ ॥ ।
लोकसामान्याधिकार। नगण्या वर्ग: जग मारो भाति सदनो लोकः । ति बोषितसंन्यानस्य इतः प्रान प्रापयामः ।।११२॥ अर्थ-आर प्रकार उपमा प्रमाण सिंपन्य और सागरका सौ वर्णन कीया ही। यहरि गुर प्रागुल पनागुर जगीफा पर्शन पूर्व ही जगछाका धनप्रमाण लोक है इस कश- का प्रसंग पाइ वर्णन कीया था । यहरि जगदगीका वर्ग सो जगप्रतर है । बहरि तिस जगहे. का पन मो धनलोफ है। तहाँ पत्यके समपनिका प्रमाण सो ती पल्प जानना । दश कोडा- दि पन्यका समूह सो सागर जानना, पत्यका अईप्छेद प्रमाण पल्प मांडि परस्पर गुणे सूच्येगुल इ सी एक अंगुल छंचे प्रदेशनिका प्रमाग जानना । साका पर्ग प्रतरांगुल सो एक अंगुल लेवा संगुल चौदा प्रमानिका प्रमाण जानना ।तिम मध्यंगुटका धन सो धनागुल है सो एक अंगुल लंका स अंगुल चौदा एक अगुल ऊंचा प्रदेशनिका प्रमाग जानना ।वहरि पत्यका अर्द्धच्छेदनिका असंख्यातका प्रमाण धनांगुल मादि परस्पर गुणे जगष्ठेणी होइ सो लोकका मध्यते ऊर्भ या अधः पर्यंत दंवे ति राजू के प्रदेशनिका प्रमाण जानना । बटुरि तास वर्ग जगातर सो जगन्छेणी प्रमाण लंडे या हे क्षेत्रके प्रदेशनिका प्रमाण जानना । यहरि तिसही जगष्ठेणीका घन सो घनलोक है सो जग-- रेणी प्रमाग लंबा ऊंचा क्षेत्रका प्रदेशनिका प्रमाग जानना । सो इहां ऐसा प्रमाणहीका ग्रहण करना छ समय प्रदेशदियौं प्रयोजन नाही । जैसें काल वर्णन विर्षे जगव्हेणी प्रमाणकाल कहै तहा नने समयनिका ग्रहण करना कि प्रदेशनिने प्रयोजन नाही । ऐसेंही अन्यत्र जाननो । ऐसें हम रि जान्या है संख्याका स्वरूप जाने ऐसा जु शिष्य साके ताई यात परै अब प्रकरणभूत जो लोकका जन साहि प्रमाणाप करें हैं ॥११२ ।। ऐसे उपमा प्रमाणका प्रकरण समाप्त भया ॥ आगे जो कथन करिए है ताकी पातनिका गाथाही करि कही सो जाननी:-- उदपदले आयाम वासं पुवावरेण भूमिमुहे । सचेक पंचएम य रज्जू मझम्हि हाणिचयं॥ ११३ ।। उदयदले आयाम: व्यासः पूर्वापरेण भूमिमुसे। सप्तक पंचैक च एजुः मध्ये हानिचपम् ॥ ११३ ॥ अर्थ-लोकका उदय जो उंचाईका प्रमाण सो चौदह राजू में कहा था ताका दल यहिए बधा सात गज प्रमाण आयाम करिए दक्षिण उत्तर दिसा वि चौडाईका प्रमाण जानना जाते पूर्व धम विय चौडाईका हानिधयरूप आगे कथन करिए है तात इहां दक्षिण टत्तर दिमा विर्षे नीचे गाय उपरि चोदह गजकी उंचाई पर्यंत सर्वत्र मात राज् चौडा टोक जानना बीमाधिक ही । बरि व पायम दिमा विर्य व्यास भूमि पर मुख चगन, रक गन्, जानना ।
त्रिलोकसार- भावार्थ-पूर्वते पश्चिम पर्यंत लोक नीचे ही नीचे तो सात राजू चौड़ा है । उ घटता मव्यलोक विर्षे एक राजू चौड़ा है । उपरि क्रमतें वधता ब्रह्मस्वर्गके निकटि पांच र है उपरि क्रमते घटता अंतविर्षे एक राजू चौड़ा है । तहां आदि प्रमाणको भूमि के प्रमागकों मुख कहिए निन विर्षे हानि अर चय हैं ते साधनें । हानि नाम घटनेका है चय- जितनां जितनां वधै ताका नाम है ॥ ११३ ॥ आगे तिन हांनि चयके साधर्नेका विधान कहता संता मूत्र कहैं हैं: मुहभूमीण विसेसे उदयहिदे भूमुहादु हाणिवयं । जोगदले पदगुणिदे फलं घणो वेधगुणिदफलं ॥११४ ॥ मुलभूभ्योः विशेपे उदयहिते भूमुखतः हानिचयं । योगदले पदगुणिते फल धनो वेधगुणितफलन् ॥ ११४ ॥ अर्थ ~मुस अर भूमि विर्षे अधिक प्रमाणमें स्पी हीन प्रमाण घटाएं जो अवशेष उचाईका भाग दीए भूमि मुग्यतै हानिषय हो है । सो इहां अधोलोक विपै नीचे चौड़ा मो भूमि कहिए । टपरि घटता घटता एक राजू रमा सो मुख कहिए मो भूमिमें स्यो पागन हे सहा सात राजकी उचाईमें छहराज् घटै तो एक राज् की उचाई में कितन राशिक. को उचाई सात राज्का भाग छहराकों दीजिए इतनो इतनां प्रमाण एकर बार चौटामि पनी हुवा तहां नीचेही नीचे सातराजू चौडा है ताने एक गज् उपरि ज चरक पृथ्वी के निकादि यह राका सात भाग घश्या ताको समछेद विधान कार घटा- मगन्ना सात भागमें स्यों यहाका मानयां भाग घटें नियालीस राका सात माम सदमें ही एक एक गजू उपरि जाइ रह राका सातमा भाग घटात - पदा के निकट मैतागका सानवा माग पंचमी के निकदि इस्तीसका सागयाभाग चौथी मा माता भाग तोमरी के निकट दगीमका सातमा भाग दुमके निकट तेरह भर न पीर ति मध्यटोक. निकाटि मातरा मातयां भाग प्रमाण य्याम बद्दी मा टोरका चय त्यावनें कि मुग तो मप्य लोकके निकटि एकगन अर मक निकी पांच ग तहां भूमिमें म्यौं मुग घटारं अशर प्यारि गन् । यही मप सो मंत्री माननग चा था मौसम सुगर टेटगत् ऊचा । मोजो मामा तीन गन र गत् को नीद गर्ग ना तिना यो ग गगिक करिए मत्र मिल र माता भागप्रमाण पती आपा। पाकीगनका प्याग मध्य ने मशिन र मापन या अनिकरिना मार मा मा मनमान 4 am at लोकसामान्याधिकार। आधा राज्में कितना यधे ऐसे त्रैरामिक फाएं प्यारे राका सातवा भाग प्रभाग व सो चप इफलीत गफा मातवा भाग प्रमाण मिलारे ब्रह्मयुगरको अतके निकटि पैतीन रानका साना भाग प्रमाण व्यास भया । बरि अब उपरिका उर्दलीक वि हानि ल्याईए हैं। तहाँ प्रहावर्गके निरी ती पोचगन्याम सोभूमि काहिए। भर कसा अंतविर्षे एकमन व्यास मो मुग काहिए। भूनिय ती मुराधार अवगेर प्यारि गन् । यहीर सादा तीन गगकी ऊंचाई में पारि राज् घरेसी आधागमको उचाईमें कितना घंटे ऐसे शिक करतें प्यारि रागूफा साना भाग आग, सो प्रसगुगलने होतात युगल आर आध राज् ऊंचे हे सात महास्वर्ग निकाटि पैतीसा सातवा भाग प्रमाण चोदी भासाने प्यार राजूका सात भाग घटाएं टांतय युगलका अंतके विष इकतीस राजुका मातको भाग प्रमाग ल्यान । यामें प्यारि राजूफा सातयो भाग पटाएं शुम युगल का अंत निकादि सताईम राजका माना भाग प्रमाण म्यास रहा या तितनाही घटाएं सतार युगलया औतर नियदि मेईम रानका मानना भाग प्रमाग पाम रक्षा पा तितनाही घटाएं आगत युगच्या जतके निमटि गीम गदकामा भाग प्रमाण व्यास रक्षा । या नितना ही घटाए आरण युगरका अनफे निकट पर गदका गाmat भाग प्रमाण व्याम रक्षा । बहार हात लोकका भं एक गन् पाई गोगादान गरी रंचाईमें पारि गज घंटे मी एक राजको उचाईमें कितना टी any; 4 रन सातवा भाग आपा सो पंद्रह गफा मातो भागमें स्पो पठाएं सात गया मायो भाग 1 अपवर्तन कारे लोकका अंत वि एक राज प्रमाग व्यास जानना । ऐसे rat ke लोकका व्याग हानाधिक जानना । यहरि धोरोफया समान क्षेमाल परिसर भूमिका योग करिताको माया पारि पदयोग सार करि गुगि तय त्रिफयोग गुणिए सब पनाल होइ गोहपूर्व भिम अपेशा ना होना म्यास भागमाप भूमि सोसासगरमा अधो लोकका त विम्यामका प्रमान मो मुग एक राजू इन दोऊनिको निभाना सायो आधा कीएं प्यारि गज दया । यदरि सदिक्षिण उत्तर अशा सम्पारयो र परिदमो माग प्रमाग सीह फार गुर्गे अगि राज प्रमाग क्षेत्रमा भया । मरि पालो मी अधोगेशको पत्र प्रमाण सागरात सी. प.रि गुणे (कसी हिनौ राज प्रमाण पगार कर राज ममाण या चौर ऊँचा र पपिए ती एकमा लिन होई सय शनन ११॥ भागे अयोगशशेरशमा प्रसार भेदयारि को:- पण दोभायद नमसुर नरमात मदरं दुर्म । गिरिगरगेण निनाण भाषियापी अपोलोगी ।। ११५॥ सामान्य साने गुर परम स । निरिकटन विभकिन्योल ॥ ११५॥ ६-सामान्य १ मा १ रज १ मा १११ गिरिफटका मार ngit र शि का पलिम पासी मम सरस र हिर निm भ ars.'"" AT HIमाग । त्रिलोकसार- की कमी दिनी रस्तु प्रमात धनक्षेत्र जानना । तहां सामान्यपर्ने क्षेत्रकी चोदाई कीन परिन है मा सामान्य जाननां सो इहो ' मुहभूमी जोगदले, हर के अनुसार मुर सो एक रम्नु, भूमि सातरम्नु इनका योग आट रम्जु तामा भाग भी पाजलाई सात मनु करि गुणे अठाईस रज्जु क्षेत्रफल भया । यहरि जो मेर कमिार जोशमा हो कहिर है मोजयत जानना । सो अगर समान दोन करिए। यदीर एक सेडको उपरि नी उलटा फार में भा- मे सिर पर क्षेत्र मारि राग चौडा सातराजू उंचा ऐसा आपन चात गरगाहमा करि क्षेत्रफल करना। तहो आम्ही साम्ही दोय दिमा सर.' र करि दिमा मेची प्रमाणकों कोटि कहिए इनको परस्पर गुणी म अटाईस र प्रमाण क्षेत्रफल भया । बहुरि निगर 27 mins करिए सो निर्यगायत जानना, सो ' मुसभूमि सम tran भूमि मानका ममाम जी जोद सो आठ Tam REET गान पीएम चौडाईका प्रमाण होई। पीर सात की इस 4 hitni rif ताके गरि भगक्षेत्र था ताको चौडाई माया fryinआस मारके दो पानि विण चौपाई क्षेत्र स्थारिता मोडा मा तिगायन क्षेत्र भया ताका 'गुज कोरिया, म॥११५॥ MEmail:-- योगाणं गन्दी नदि वेज परो । पिदि कई गंगाद पानउमेहमाणमिणं ॥ ११६ ॥ ATM मापी यदि भान् पकम्य । Earममे माननिय ॥ ११६ ॥ ri-r.ra! Wis. भाम या कि terrurt: An USA नातnt गान in EASTI मृदया था। Marate . . से हर 4..
लोफसामान्पाधिकार। ५७ . ररूप क्षेत्रका क्षेत्रात ' मुहभूमी जोग दले, इत्यादि सूत्र करि कहिर हैं। मुन्व तौ शून्य जाते तिकूटा रवि मुखको चौडाईका अभाव है । बहार भूमि एक रन मोहें भी एकरज्जु ताका आधा पावरग्नु "को उचाई सातका छटा भाग करि गुणे सात राजूका पारव्हा भाग प्रमाण आधा यसका क्षेत्र- ल भयायाको अटारह गुणा कोई सादा दस रग्ज प्रमाण क्षेत्रफल तो यथाकार क्षेत्रीनका भया । हरि आधा मृदंगाकारका क्षेत्रफल 'मुह भूमी जोग दले, इत्यादि सूत्र करि कहिए हैं। मुख ती स रज्जू भूमि प्यारि रग्ज जोडें पांच रज ताका आधा अढाई रग्नु तार्को पद जो टंचाईका प्रमाण ढा तीन ररजु करि गुणे पोगानव रग्ज क्षेत्रफल भया । याको दुर्गा कीमाहा सत्रह रग्ज गण सम्पूर्ण मृदंग क्षेत्रका क्षेत्रफल भया यामें साढा दस रज यव क्षेत्रफल मिठार अाईस जु प्रमाण क्षेत्रफल भया । इहां यह भाव जानना । अयोओक जहां पारि राग चौहा है तहा देगका मध्य टहराया ताके उपरि अनुक्रमतें हनि चौडा हेही मी माया मृदंग सी टपरि भया । हार जैसे उपरि चौडाई है तैसे ही नीचे चौडाई मध्यते क्रमहीन रूप फलाना फरी मो आधा मृग चै भपा ऐसे दोनिको मिलाए सम्पूर्ण प्रदेश क्षेत्र भया ! महरि नीचें दौड पनि ३२ चौडाई वती रही तहां अठारह निकूटा क्षेत्र अर्द्ध पवाकार कल्पना की । इहाँ ऐसा आकार जानना rt चेतें एक राज्की चौड़ाई जहाँ घटी तहा पर्यंत अर्द्ध पर टहरायो । सो मा सात राजूको पीडाई सहा मध्य विष एक राज सो मुर्दगाकार वि रमा भर एक पार्थ वि तीनि रान राहत नौना ते कमहीनम्प साधे यव टहगए । भर तिनके पोधि दोय परिते श्रम होनमयाचे हराए । ऐसें पांच माथे पर भए । बहुरि तिनके उपरि सात राजूपा एटा भाग प्रमाण वाई चेत भरे जहा दोय रानकी चौडाई रही तहो । तैसेंही दोयती नाचते ऋमहानगए एक उपनि महानरूप में तीन आरे यब टहराए, ताके उपरि तहाते तितना ही रचाई भए जहा एक की चौदाई रही तो एक नीयते क्रम हानरूप आधा व टहरामा । एही दूसरे पार्थ जिना धेि पर जान से अटारह आधे यव भए। ऐसे एक मृदंग नायव कल्पना कार क्षेत्रफल का रि यहीके आकार क्षेत्र फरिपरि इहा क्षेत्रफल पाहिए है सो यत्र मप जानना सी अमो. कलि बोईस पाकार क्षेत्र के एंड याल्पिर है। तहो भाषा का क्षेत्रमा सात रस रम्हो भाग कया था सायों दूणा कीए सात रग्जका एटा भाग प्रमाग एक परका क्षेत्रफल हो। कों बोईस गुणा या अटास र प्रमाण व मर क्षेत्ररल हो है। यह भार अनन। पूर्व पावनि वि पवाकार फरराना कीया से हा सर्व ही अधोलोक कि भलाम धर्म फार देस कल्पनें । इहा नाचे सात राज धौर सहा ते व ना ते शमान हो सात भर निर वाचि उपरित धमीन Tह आधे पर गए । तिनके परि वर उचाई ,, पाच, अर पाच, प्यारि प्यारि मान अर तीन दोप आ दोप, एक, माथे पर कपना हार एक चांना समय गय याला ॥११६॥ आगे म पावन अद्ध नउत्यभागी मगरसम विदास पारंगों। मग वारण विवर एजुदो मंदरे बरे॥१ A ५८ त्रिलोकसार- अर्ध चतुर्थभागः तसद्वादश त्रिचीरंशत् द्वादशागः । सप्त द्वादशांशं द्वयर्धे रज्जूदयो मंदरे क्षेत्रे || ११७ ॥ अर्थ-मंदर जो मेरु ताका आकार कल्पि क्षेत्रफल जो इहां कहिए है सो मंदर जानना । तहां अधोलोककी सात राजूकी उचाई है । तामै आधारज्जु चौथाई रज्जु मिलाएं पौगरम्नु । बहुरि सात रज्जुका बारव्हां भाग बहुरि तियालीस रज्जुका वारव्हां भाग बडीर व्योद राजू इतनां प्रमाण लाएं जुदी जुदी उंचाई मंदर क्षेत्र विष कल्पिए । बहुरि 'मुहभूमीण विसेसे उदयहिदे, इन्यादि पूर्वसूत्र के अनुसारि मुख एकराजू भूमि सातराज्, । भूमिमै स्यों मुख घटाएं छहराजू भया सो सात राजूकी उंचाई विर्षे छहराजू घटै तौ पौणराजूकी उंचाईमें केता घटै ऐसें त्रैगशिक करि नवराजूका चौदहा भाग प्रमाण घश्या सो सात राजूमें स्यौं घटाएं निवासी राजूका चौदहा भाग अवशेष रखा इतना नीचे पौणराजू उपरि जाइ चौडाईका प्रमाण जाननां । ऐसेंही ताके उपीर सातराज- का बारव्हां भाग उपरि जाय सातराजूका चौदन्हां भाग घटि बियासीका चौदव्हां भाग प्रमाण आयाम रह्या ताके उपरि तियालीस राजूका बारव्हां भाग उपरि जाय तियालीसका चौदव्हा माग घटि गुणतालीस राजूका चौदव्हां भाग प्रमाण आयाम रह्या ताके उपरि सात राजूका बारव्हा भाग उपरि जाय सातराजूका चौदव्हां भाग घटि वतीस राज्का चौदन्हां भाग प्रमाण आयाम रह्या ताके उपरि ड्योढ राजू उपरि जाय नवराजूका सातवां भाग घटि चौदह राजूका चौदहा भाग ऐसा एक राजू प्रमाण आयाम मध्यलोकके निक रखा। तहां चूलिका ल्यावनेंके अधि सातराजका वारव्हां भाग प्रमाण उचाई रूप दोयक्षेत्र तिनकों लंबा चौकोर जैसे होइ तैसें एकको मुलटा एककों उलटा स्थापि तिन दोऊ क्षेत्रनि विर्षे अपनी अपनी भूमिमस्यों मुख घटाए सातराजुका चौदव्हा भाग प्रमाण घाटि होनेंका प्रमाण कह्या । सो अपवर्तन कीएं आध आध राजू भया तहां एक एकके दीय दोय खंड कीएं च्यारि खंड भए तहा एक खंडकी भूमि पाव राजू प्रमाण तार्को तौ उपरि स्थापिए अर अवशेप तीन खंडनिका भूमि पौणराजू प्रमाण ताकी उपरि स्थापिए अर अवशेष ती. नि खंडनिकी भूमि पौणराजू प्रमाण सो नीचे स्थापिए इतना तो चौडाईका प्रमाण । अर सातराजूका वारव्हा भाग उचाईका प्रमाण जाका भया ऐसी चूलिका करिए पीछे विषम चतुर्भुज क्षेत्रका तो क्षेत्रफल ' मुहभूमी जोग दले, इत्यादि सूत्र करि ल्याईए । अर आयत चतुरस्र क्षेत्रका क्षेत्रफल 'भुजकोटि वेध, इत्यादि सूत्र करि ल्याईए । बहुरि छहों क्षेत्रफलनिकों समच्छेद विधान कार जोडिए तर पौराणवै सै आठ राज्को तानसे छत्तीसका भाग दौनिए इतना भया सो अठाईस रान प्रमाण क्षेत्रफल भया । इहा ऐसा भाव जानना । जैसे मेरगिरि नीचतें केनीइक उचाई पर्यंत तो चौडाई कमते हीन रूप है ताके उपार केलीइक उंचाई पर्यंत चौडाई समान रूप है। ताके उपर केली इक उंचाई पर्यंत चौडाई क्रमने हीन रूप है ताके उपीर केनीयक उचाई पर्यंत चौडाई समान रूप है नाके उपरि केतीदक उचाई कमने हीन मप है नाके उपर चूलिका हे मो कम हॉनरूप चौहाई र ऐमें यह प्राकार है नमै अधोलोककी उंचाई विषे पाच भाग कौं तहा पोग गरको उचाई पर्यन ता पौड़ाई कम हीन मप ही प्रहण काही इहा है कि नांचे में केती .
लोफसामान्याधिकार। - उचाई पर्यंत तो भूमि विष फैद है । ताके उपरि भूमि उपरि उचाई है पैसे दोय भाग हैं। | आध राजू पावराज उचाई रूप दोय माग काएं परंतु हा पर्यंत क्रमते चौड़ाई हीन रूप ही + सात मिरप पौण रान कही। बहुरि ताके उपरि सात गड्का बारम्हा भाग पर्यत अमहीन बाई है। तिस चौडाई वि उपरि बियालीसका चौदन्हो भाग प्रमाण चौडाई रही तिस प्रमाण मान चौडाई कल्पी । अर दोऊ तरको बधती चौडाई रही सो जुदी राखी सी यह चौरई दोऊ फकी मिलाएं नीचे आधगज उपरि ममत हनि निकुंटी जाननी । बरि ताके टपरि नियालीस राजका व्हां भाग पर्यंत चौहाई क्रमते होनसप हैं सोई महण कीन्हीं। वहरि साके उपरि सातराजुका पारा 7 पर्यंत चौडाई क्रमने हीन रूप है । तिस वि पूर्ववत् बत्तीसराज चौदहा भाग प्रभाग समान डाई ग्रहण फोही । अर दोउ तरफोकी चौडाई पूर्ववत् प्रमाण लोएं शदी राशी । बरि साके रपरि ओट राजू उचाई पर्यंत कम हानरूप चौडाई है सोई ग्रहण काही। महरि जो दोय नायगा चोदाई ही राखी थी तिस वि एक जायगाको चौडाई मुस्टी एक जायगा रस्टी स्थापै आधा राज चौदा त राजका मारही भाग प्रमाण ऊंचा क्षेत्र भया । तहाँ उपरिकी चौडाई घटाप नाव मिटाए के पौणरान् चौटा उपरि पावरान बौदा क्षेत्र कल्पना कीया पर पाया रचाई सातरानका मारहा ग प्रमाण है सो यह क्षेत्र मेरकी चूलिफायी जायगा सपना का से मेरगिरि गमान भयो. कका आफर कल्पि क्षेत्रफल फटा है। बहुरि अय दूष्य क्षेत्रफल कहिए है । ईपरको चाई सात राज्या छठा भाग कहा था सो सात राग समछेद विधान कार पटार गया ॥ भाग रहा । सो एक तो रोड या भया यही भूमिका प्रमाण सात राम् भर मुग्या प्रमाण नीस रानका छटा भाग जानना । यहरि दुसरा गट विय भूमि तो पैतीम गफाटा भाग भर में सात राजूका एटा भाग घटाएं मुखका प्रमाण अटाईस राजका छय भाग । देही पूर्व इथिये जो मुस होइ सो उत्तर उत्तर पवित्र भूमि जाननी । पूर्व पूर्व या मुगल सीबई रको उचाईको प्रमाण घटाएं उत्तर उत्तर वदनि वि मुप जानना भए । मुह भूमी जोग दढे ' स्यादि मूत्र करि इन छहों पैदानिका क्षेत्रकार या जोदिए सा दोषी उनका पारव्हा भाग भया सीइफईस राज था। या सात रान मिटा दमकल क्षेत्रफल अटाईस राजषा । सो इम दूष्पक्षेत्रफटका भाव मौको भी ना. नाही झाला नाही शिल्पा युदिान जानियो । महरि तिरिफटकका ऐपल करिएKari यस क्षेत्र कल्पना परिसर सो एक भई पश्या दोरल सात रानमा भारत को अस्तास गुणा मार गिरिफाय क्षेषकर भी भटास रा प्रमाण आता । निकट पार कर अधोलोकपा क्षेत्रफल गाया। पर भाव जाननौ । सेमी -रिफटक, जानना । नारदीय दीय नि मिलतर पर mrter का ति पर अनार. ५३तार को भाकार से जाना ॥ ११ ॥ अब 32144 को, गायण नंय अन्य न पिण्णहो । पद पपपारा गर्मागणापया || ८ ॥
६० त्रिलोकसार- . . सामान्य प्रत्येक अर्धस्तंम तथैव पिनटिः। एते पंचप्रकाराः लोकक्षेत्रे ज्ञातव्याः ॥ ११८ ॥ अर्थ सामान्य १ प्रत्येक १ अर्धस्थंभ १ स्तंभ १ पिनष्टि १ ऐसे उर्द्धलोकके क्षेत्री ए पांच प्रकार जानने । सो इहां पूर्वपश्चिम अपेक्षा चौडाई अर उचाईकी अपेक्षा करि क्षेत्रका इकईस राज कहिए है । पार्को दक्षिण उत्तर अपेक्षा सात राजूकी चौडाई करि गुणे एकमो . टीस राज् घनरूप क्षेत्ररूप ऊर्द्धलोकका जाननां । एक एक राज्का लंबा चौड़ा ऊंचा ऊलोकन संद को एकसौ सैंतालीस हो है । तहाँ सामान्यकौं समीकृत भी कहिए । जातें होनाशिक चौडाईको समान करि क्षेत्रफल इहां कहिए हैं । सो ' मुहभूमी जोग दले, इत्यादि सूत्र करिम तो इहां मन्यलोक निकटि एक राज् अर भूमि ब्रह्मस्वर्गनिकटि पांच राम् तिनको सौ आग कार तो राज् ताकी उचाई साढा तीन राज् करि गुणें साढा दश राज् प्रमाण है। फल भाषा लोकका भया । याकी दूर्गा कार इकईस रान प्रमाण सब ऊर्द्रलोकका क्षेत्रका झा। उपरिका आधा ऊलोकविय मुख तो लोकके अति एक रान् अर भूमि मास्वर्ग के निरी काम गन् जानना । उईयोकका आफार ऐसा जानना । सो इहां नी ते ब्रह्मस्वर्गपर्यंतका जुदा ही. क. पाय ताने उपरि रोकपर्यंतका जुदा क्षेत्रफल कीया दोनिको मिलाप ऊर्द्धलोकका देकर पसा है। मा प्रत्येक क्षेत्रफल कहिए है। तहा मध्यलोकत सौधर्मकि चोद राज ऊचा सो ' भूमामि । यानि पूर्वोक्त मूलका अनुसार इहाँ मध्यलोकके निकटि एक राजू सो तो मुरा रतना । परि माटा तीन राज्को उचाईमें प्यारि रान् यथै ती न्यौट राम्फो उचाईमें कितना हो। सिक का दाह गानका सातयां भाग प्रमाण यधाएं उगणीस रातको सातवा भाग चौता सो धाक नितिभया सो एक सौ यह राह भया इस वि मुगतौ एक राजू भूमि उगणास मक भाग प्रमाण है। यहरि ऐमैंही नाके उपरि घोट रान ऊचा मंडरिक मुगटी उगगीम पर माप वाहका मातवा भाग मि भूमि इकासीम गका सातवा भाग प्रमाण हो । Pी मात्र गन का भी मुगमी इकतीम समा सात भाग भर मामें प्यारि गएर भूमि पार गन् प्रमाग हो है। वही नाके उपरि भाग गत् उat. कि मी व गत् लाने मादा सी गको उचाईमें पारि गर पो तो मा गार में कितना पटे में ग्रेगनिक करि प्यारिका सात भाग घार मु मग इ. गरम मला भाग । बट्टी में ही ता. उपर आ गए गई . सामान: भाग या रागात भाग पर मामला सामना ! भारत भूमि गामा, FA मा UAA Mel ! SEE THE rst Ri. HIT in -- म ran state file लोफसामान्याधिकार। पर राज्का सातवा भाग सामें थाटफा सात भाग घटै मुग एकराजू प्रमाण हो है । ऐसे भूमि मुरका प्रमाण जानि गुरुभूमी जोगदले, इत्यादि सूत्रकरि सब मंडनिका जुदा जुदा क्षेत्रफल जो होइ सायो जोडिए राव दीयसे चौराणयेका चौदहा भाग ऐसा इकईस राज् प्रमाण प्रत्येक क्षेत्रफ- र होरो पर भाष जानना जुदा जुदा क्षेत्रफल कहि करि जोग्या सात याको प्रत्येक क्षेत्रफल काया है। परि मईस्तम अर स्तंभ क्षेत्रका क्षेत्रफल मुगम है इहाँ ऐसा भाव जानना । ऊर्द्धलोक- का आकारको मध्यविष हेदि तहां पीचिका एकराज् क्षेत्र ताका तो आधा आधा राजू दोऊ पानि विप स्थापिए । अर जो दोऊ पार्श्वनिका अवशेष क्षेत्र तहां उपरला नीचला क्षेत्रकों उलटा मुटा स्थापन योएं चौकोर क्षेत्र होइ सो मध्यविय स्थापन करिए ऐसे अर्द्धस्तंभ क्षेत्रका जुड़ना हो है। तहाँ भाकार ऐसा जानना । हा स्तमाकार लोकका मध्यवि छेदि स्थापन किया तातें याका नाम अर्द्धस्तंभ है । यहरि ऊलोकका आकार वि पि एक राजू चौडा क्षेत्र तो पीचिमें लिखना अर दोऊ पार्श्वनिका वधता क्षेत्र मध्यविौं दोय दोप राजू रहा था तिसविरें दोय खड करि दोऊ पार्श्वनिका उलटा मुलटा जोडे दोय टंचे चौकोर क्षेत्र होइ सो दोऊ पानि विर्षे जोडिए ऐसे स्तंभ क्षेत्रका जुड़ना हो है । ताका आकार ऐमा ! यहरि अर्द्धस्तंभ षास्तंभ क्षेत्र विर्षे जोड्या हूवा क्षेत्र तीन राजू उचा हया सौ भुनकोटिका घ करि इकईस राज् हुवा सो यह क्षेत्रफल सुगम है ॥ ११८॥ पद्दरि पिनाटि क्षेत्रफल जाननेको त्रिभुजकी उंचाई आदि जानी चाहिए सो कहै हैं:-- रज्जुदुगहाणिठाणे आउडदवो जदीह पकिस्से । फिमिदि तिरासियफरणे फलं दलोणं तियाहुदओ ॥ ११९ ॥ रज्जुरिकहानिस्थाने अर्धचतुर्थोदयो यदीह एकस्य । किमिति त्रैराशिककरणे फलं दलोनं त्रिबाहूदयः ॥ ११९ ॥ अर्थ-एक पार्श्वकी अपेक्षा चौडाई करि दोय राज्का घटनेका स्थान विर्षे साढा तीन राज्की रचाई होइ तो एक राजूका घटने विर्षे केली उचाई होइ ऐसे त्रैराशिक करने विर्षे सातका चौथा भाग आया । यामैं आधा राज् घटाएं सवारा प्रमाण त्रिभुजको उचाईका प्रमाण आया ॥ ११९॥ तिभुजुदयूणुदयुचं मूईखेत्तस्स भूमिमुहसेसे । भूमी तप्फलहीणं चदुरस्सघराफलं सुद्धं ॥ १२० ॥ त्रिभुजोदयौनोदयोच्च सूचीक्षेत्रस्य भूमिमुखशेषे । भूमिः तत्फलहीन चतुरस्रधराफलं शुद्धम् ॥ १२० ।। अर्थ-यहुरि उचाईका प्रमाण वि त्रिभुजकी उचाईका प्रमाण घटाएं बाह्य सूची क्षेत्रकी उचाईका प्रमाण आया । बहरि भूमिमें स्यों मुख घटाइ अवशेष भूमि होइ ताका क्षेत्रफल करि हान शुद्ध चौकोर क्षेत्रका क्षेत्रफल होइ ! सो यह कथन नीकै मेरे समझनेमें न आया है । तातै पिनीर क्षेत्रके क्षेत्रफलका विधान इहां नाही लिख्याहै संस्कृत टीकातें जानना । ऐसे उर्द्धलोकका पाच प्रकार करि क्षेत्रफल कया है।। १२०॥ - त्रिलोकसार- आमैं पूर्व पश्चिम अपेक्षा करि व दक्षिण उत्तर अपेक्षा करि लोकका परिविकों दिसावन संता कहै हैं:- पुवावरेण परिही उगुदालं साहियं तु रज्जूणं । दक्खिणउत्तरदो पुण वादालं हॉति रज्जूणं ॥ १२१ ॥ पूर्वापरेण परिधिः एकोनचत्वारिंशत् साधिका तु रज्जूनाम् । दक्षिणोत्तरतः पुनः द्वाचत्वारिंशत् भवंति रज्जनाम् ॥ १२१ ॥ अर्थ-पूर्व पश्चिम अपेक्षाकरि लोकका परिधि गुणतालीस राजू सौ साधिक कहिए तिक टीस राज्का एकसो वीसवां भाग करि अधिक प्रमाण जाननां । बहुरि दक्षिण उत्तर अशा विपाटीस रान् प्रमाण जाननां । गिरहका नाम परिधि है सो दक्षिण उत्तर अपेक्षा तौ पगिरि जानना मुगम है । जाते लोक दक्षिण उत्तर दिशाको अपेक्षा सात राजू तो नीचें चौडा सात स- टपरि चौड़ा, एक तरफ चौदह राम् ऊंचा ताहका दोन्यों तरफो अठाईस राज हा सर्व नित मियादीम राम् प्रमाण परिधि भया ॥ १२१ ॥ महरि पथिम अपेक्षा साधिक गुणतालीस राज् परिधि कैसे है ताके जाननेंको कर अयं- मुजफाडिकदिसमासो कण्णकदी दोदि वग्गरासिस्स । गुणपारमागहारा यग्गाणि हवंति णियमेण ॥ १२२ ॥ मुनयोटिकनिममासः कर्णकृतिः भवति वर्गराशेः। गुणकारमागहागे यौँ भवतः नियमेन ॥ १२२ ।। -गुन और कोटिका जो वर्ग ताका समास कहिए जोड़ मो कर्णका वर्ग हो है । ने कोर वाम गा है। मो वाम वीचमें स्यों टूटिकरि पृथ्वी आनि लागा तहां पृषी भर साम भर टूटा वामक पीचि जो निमुन क्षेत्रमया तहां पहा यामका प्रमाण अर टूटा यांस जहा पूर्ण निदान ताने टाय जहा बाम गदा है तहां पर्यंत पृथ्वीका प्रमाण इन दोउनि पिस एक की मु कहर एक कोट कदिर है । वही जहा ते दहा महा ते गाय पृया मित्र आनि सा पाटा बमकाजी प्रमाण मा कर्ग कहिए है। नहा ऐमा आकार जानना । म भुज और कोशिश दोमामा दा हुदा वर्ग करिए। इन दोऊनिकों और जीप्रमाग सो कार्गक प्रकार पर बर्न जानना का मल को कर्गका प्रमाण मार है। बरि वर्गशिक गुणाका (rint हो है। बोरगति योग होइतको किसी गुणकार की गना FREE TRोनिन ! भाग itart tranaki Ti APR को दो कार गुना Tarapar on को ant - 1. At : Natri' ta; प्रको 't a... - SAHARA AT:
लोकसामान्याधिकार। कहिए । बहुरि नीचे तो सात राज पौड़ा अर उपरि एक राज् घोडा तहाँ नीचे एक राज तो उपरिके समान चौड़ा पगां हुवा । अवशेष दोन्यों सरफा तीन सीन रान् वधता भदा सो एक पार्थ. दिय जी तीन राज् बधता भया सो तीन राज् प्रमाण कोटि कहिए हैं। यहरि भुजका वर्ग तो गुणचाम राज अर कोटिका वर्ग नव राज इन दोऽनिकों मिटाएं अधोकका उपरित गाय मी पर्यंत एक पार्थवि जो परिधिका प्रमाण सो फर्ण महिए नाका धर्ग असायन रान प्रमाल हो है। बहुरि जो एक पार्श्वविर्षे इतना भया तो दोऊ पार्थनिवि फेता होइ ताने दोषका गुगकार फरना सो इहा वर्गरूप राशि है । साने इहो दोयका वर्ग कार गुणे दोन्यौ तरफमा पके वर्गका प्रमाण दोयस यत्तीस राज हया । याका वर्गमूल रहे अधोटोफके दोऊ सरफ उचाई विष पालका प्रमाण पंद्रह राजू भर सात राजका तीसा भाग मान भया । ऐमैं ही आधा उर्द्ध करिव पुरमा प्रमाण सादा तीन राजू ताका पर्ग संवा यारा राजू भर कोटिका प्रमाण दोय गजू ताका वर्ग ध्यारि राजू इन दोऽनिकों समछेद फरि मिलाए पैमटिका घोश भाग प्रमाग भया । यहार एक पाची इतना होइ तो दोय पार्थ ती आधा उम्र सोकः अर दोय पार्भ आधा ऊर्म लोकों में प्यारि पाश्र्धनिरि कितना होइ ऐमें विचारतें प्यारिका गुणकार पहिए सोपान तात प्यारिका वर्ग फरि गुणे सर प्यारिका भागहार था तारि भएपनि कार दोयगी मागिन प्रमाण उर्दलोकके प्यारथी कर्णनिके धर्गका प्रमाण भया याका वर्गमूल है. उस्लीपाशी राई यि दोऊ सरको परिधिका प्रमाण सोलह रान अर प्यारि राजूका यत्तीसयो भागमात्र भया । माती सर्व लोक माचे पाईका प्रमाणरूप परिधि सात राज अर खोकका अधेि पोईका प्रमाण- रूप परिधि एक राज । ऐमैं मा जोड दीए गुगतास सोग र आदि प्रमाण मरा राजका तीस भाग पर पारि राजका पत्तीसयो भाग इन दोऊनिक हायो गम किन आधा भाग्य भाजक मारि। जोडियारिका अपवर्तन दाद किया गया एका बीसा भाग भया। ऐसे पिलिम अपेक्षा लोफया परिधि गुगतालीम गा र म राजका एक.सौ बीसवर भाग प्रमाण जानना ॥ १२२॥ आगै लोकके सर्व तरफने परिवचिन जी का बलय विन शाकका निर्गम सूत्र फहै है:- गोमुखमुग्गणाणारण्णाण पर्णपुषणतषण हो । पादाणे पलपतये सारस्स तर मोगरस ॥ १२३ ।। गोमत्रमुगनानावना धन धनानमा भने । PAR गिरफ॥१२३ ।। वाना गया अपना तन ने ."
त्रिलोफसार- आगे ताकी उपरि पाश्रीनविय क्षेत्रल ल्याउने अर्थि कह है;- किंचूणरज्जुवासो जगसेटीदोहरं हवे वेहो। जोयणसद्विसहस्सं सत्तमखिदिपुचवरे य ॥ १२८ ] किंचिदनरम्जुन्यामः जगन्द्रगिदैर्घ्य मोत् वेधः । योजनाधिसहसं सप्तमक्षितिर्वापरे च ॥ १२८ ॥ अर्थ-लोकके पानि कि नीचर्ने लगाय एक सन्की उचाईपर्यंत यान वयम हजार पोजन मोटे है सो तहां क्षेत्रात कहिए है । उचाई एक राज तामें साठि हजार योजना अन्ननयिका कदा क्षेत्रफल तामें आय गई तात इहां किंचित उन रग्नु प्रमाण म्याम मोते मुन जनना । हीरे दैवाई लोकरी संगई के समान जगन्द्रेणी प्रमाग सो फोटि करि गरे मेगनों साडि हजार पोजन सो येध फदिए । तहो भुज और कोटिकों परस्पर गुणें जगह मार मार माताको साठि हजार योजन करि गुणे माती पृर्यापर्यंत पूर्व पश्चिम रेशर र भा1१२८॥ एक पाश ना क्षेपात भया तो दोऊ पानि पिस मेता होइ देस राशिक कार हो। rin साना सो कितना फा गिद्ध भया मो यो :- नगरदरामार्ग सहिसहस्सहि नोयणेहि गुणं । विगगुणिमुभयपासे यादफल पुचभवरेप ॥ १२९ ।। जगमनागमभागः परिमहर्षः यो जनः गुणः । हित. उभयमा वातार पूर्यापापोः ॥ १२९ ॥ प्रयं-मागमा सानया मागको मादि हजार योजन यी गुणिम यही तास की पर लान कर हजार पाउन गुणा जनताका माता भाग प्रमाग दौरा Enा पत्रिम दिशालिग है॥ १२० ॥ +man नाम गानाधान को- उदयश्मृमि गनुगममधरानुगडी य । प्राय गदिमागं गनगिदिदक्षिणमादी ॥ १३॥ राभूत या ममममपए प्रेयः । पं. सलमान ॥१३०॥ - Ruri arth, टम गरमी से ht AATrfora #ETSMART EXPEne . . ।
लोकसामान्याधिकार । क्षेत्रफल होइ योका दूणा कीए सप्तम पृथ्वी पर्यंत होऊ पाश्वनि वि दक्षिण उत्तर पकी बावल्यका क्षेत्रफल होइ !! १३०॥ आगे जो पहू फल भया साकों कहें हैं;- तस्स फल जगपदरो सहिसहस्मेदि जोपोह दो। पाणउदिगुणो सगपणसमनिदो उमयपासम्हि ॥ १३१ ।। तस्य पार्ट जगातरः पटिमहसः योजनः हतः । द्वानतिगुणः सप्तधनसमक्तः उभयपा ॥११॥ अर्थ-ताका क्षेत्रफल जगप्रतरयों साठि हजार योजन गरि गुणिय, यही मायो पागः करि गुपए तब पचायन लारव पास हजार योजन गुणा जगमता भया सायों मातका धन समोर लियालीस साया भाग दौनिए इनाना क्षेत्राट दोऊ पार्श्वनि वि भया। इतना क्षेत्रालय में भया मो फहिए हैं । मुग ती समद करि जोया या तिपाटीय गनका गातो भाग भर भूमि मा रान् सी गुणघास रानूका सानयां दोउनिकी जोडे पाणी गन्फा मानयो भाग: पायो भाग फरना पर दोऊ पानिका महणक भार्थ तणा करना सर कितनाही रहा पर तत्र है ताते जगप्रतरको तानस तियाटीसका भाग सोई एफ प्रतर रागका सातयो भाग है । यही यात घटयनिकी मोटाई साटि हमार योजन करि गुणे पूर्वोत्तर क्षेत्रपाल भाई ५१३१।। आगे टपरि पधिम संबधि पानि विष यातवटयका क्षेत्र पो ..- संढी घरज्जु घोसनोपणमायामबासमुस । पुलवरपासजुगले सतमदो तिरियलोगोति ॥ १२ ॥ श्रेणी पदयः चतुर्दशयोजने आपामप्यास सेधम् । पूर्वापरपार्ययुग सरमनः निर्षकोत ।। १२२ ॥ अर्थ- FARम पृथ्वीन एगाय निर्गक पर्यत पानि वि दारया पूर्व पमिम अपेक्षा करि लोको पाईयो समान वयाईया प्रमाग अग को पाहिए । परि सप्तम पृष्पी गिर उंचा द रान सो म्याग है। तो । परि तीनों पातालय धाटि बाधिको ममान कार मोटा बोदर दोमन सी घी मार कहिए । सो भुज और कोटियों परस्पर गुणे जो प्रमाग होइ नाक धार कम भपतन गरिए तर एफ. पाव पल रोहा परि दो पानि माद पर मार ल्याना ॥ १३२।। मानामा नियात्राना। तवादादासंग मोरणपरमणिपटर । उपदयामणिः जादप्प गणितम: । .:.marATa पर ।
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- लोकसामान्याधिकार । अर्धचतुर्थरग्जुश्नणिः योजनचतुर्दश च व्यासमुजवेधः । महांत पूर्वापरे फलमेतत् चतुर्गुण सर्वम् ॥ १३६ ।। अर्थ- तिर्यग् लोकते मलस्वर्ग पर्यंत पूर्व पाश्रमका एक पात्रं वि क्षेत्रफल कहिर है तिर्यग् लोकते मलस्वर्ग साढातीनि रान ऊंचा है सो यह ध्यास है ताकों तो इहा कोटि कहिए महरि जगणी प्रमाण सर्वत्र चौडा है सो इहो भुज कहिए । बहुरि तीनी बात यलय चौदह योजन मोटा सो वेध कहिए सो 'भुजकोटि ' इत्यादि सूत्र करि मुज अर कोटिकों परस्पर गुणि वेध करि गुणें एक पार्श्व विर्षे क्षेत्रफल सो इहां सादा तीनि राज है सो जगष्ट्रेणीका आश है २ याों जगष्ट्रेणि अर चौदह करि गुणें सात गुणा जगप्रतर भया । बहुरि मलस्वर्ग पर्यंत आधा ऊर्वलोकके दोय पर्व पर ताके तपरि आशा ऊर्द्धकोको दोय पार्थ ऐसे प्यार पार्च है तिनको अपेक्षा पूर्वोक्त फलको चौगुणा कीरं सर्व क्षेत्रफल होइ ॥ ११६ ॥ आँगै उर्द्धलोक विय दक्षिण उत्तर संचाधि प्यारों पावनि विर्षे धानका क्षेत्रफटकों याहै है- पंचाहुष्टिगिरज्जू भूतंगमुहं विसचनोयणयं । वेहो तं पउगुणिदं खत्तफल दक्षिणुत्तरदो ॥ १३७ ।। पेचाचतुर्थंकरजयः भूतुंगमुख दिसप्तयोजनकः । धेधः तच्चतुर्गुणित क्षेत्रफल दक्षिणोत्तरतः ।। १३७ ॥ अर्थ-प्रशस्वर्गके निकटि पांच राजू चौडा सो इहाँ भूमि कहिए । परि निर्भर होकने समस्यर्ग साढा सीनि राज ऊंचा सौ तुग है । सो इहाँ पर कहिए गष्य जानना । निर लोक निकटि एक राजू चौडा सो इहा मुख जानना तीनों बातवलपयो मोटाई चौदह पोजन सोय जानना । सो 'मुह भूमी, इत्यादि सूत्र करि मुग अर भूमिको जोडि ताका आधाकों पर फरि गुणिए सो प्रमाण होइ साकों वेध करि गुणे एक पार्श्व विष क्षेत्रफल होइ मोरया मुग भूमिय जोर देव आधा कीए सीनि राम् सो तिगुणा जगोणीका सात भाग ७३ पाको सादा तीन राज सो आधा जगाऐगी ताकरि पर चौदह फरि गुणें चौगुण जगत्मतर भपा =५ पाको फागुन फाएं दक्षिण उत्तर अपेक्षाने सर्व ऊर्द्ध सोक वि वानका क्षेत्रफल होइ । इह प्रभ उप है कि लोकका वर्णन विर्षे तो पूर्व पश्चिम अपेक्षाने म्पासका होनाधिकपनो कहा। दक्षिण रघर अपेक्षा सर्वत्र जगपरेणी प्रमाण समान व्यास घसा था हो यानवलपफा करनई किम अपेक्षा ग्यास सर्वत्र समान कारण दक्षिण उत्तर अपेशा होनाधिक म्पास मा सो पारण कहा। ताका समाधान जैसे को मंदिर है ताकी दक्षिण वा उत्तरकी तरफ जे भौति दिनको दास जहा प्रमाण करना होता पूर्व दिशाशी तरफ जो दूट सोसाय विसी रोमानिया कूट तौह पर्यंत मापिए । परि पूर्व या पमिमी तरफ जे भौति मिनी बाईका ही मान फरना होइ तहा भीतिको दक्षिशकी तरफको फूटते उत्तरको कूट पर्यंत माहिती होषका दक्षिण वा उत्तर दिशाका बाक्लपका प्यास शहना भv ati तो शेषका दिम गरि भ्यास करि कपन कोपा अरोकके वर्ष लक्षिम दिशाका वारपा पास करना भयात्रा ७० त्रिलोफसार- लोकका दक्षिण उत्तर संबी व्यास करि कथन कीया । अर लोकके पूर्व पश्चिम दिशाका बानरल यका व्यास कहना भया तहां लोकका दक्षिण उत्तर सम्बन्धी व्यास करि कथन कीया है ।।१३७] आँगै लोकका अग्रभाग विर्षे घायुका फटकों कहें हैं। वासुदयभुज रज्जू इगिजोयणवीसतिसदखंडेमु । सतितिसदं सेढी फलमीसिपभारुवरि दडवाऊणं ॥ १३८ । व्यासोदयभुजा रज्जुः एकयोजनविंशत्रिशतखंडेषु । सत्रत्रिशतं श्रेणिः फलमीपत्प्राग्भारोपरि दंडवायूनाम् ॥ १३८ । अर्थ-पूर्व पश्चिम अपेक्षा लोकका व्यासके समान तो इहां वातवलयका एक र प्रमाग व्यास जानना ताको कोटि कहिए बहुरि तीनों वात वलयकी मोटाई एक योजनकै तीनिस वीस खंड करिए तिनविर्षे तीनि तानि खंड.प्रमाण सो इहां रदै जाननां । ताको येघ कहिए। वहरि दक्षिण उत्तर अपेक्षा लोकका व्यासके समान वातवट्यकी जगप्ठेणी प्रमाण मुजा डाननी । इहां मुज और कोटिकों परस्पर गुणि करि ताकी वैघ करि गुणे ईपत्यागभारनामा अष्टम पृथ्वीके टप. रिका धनुषनिकी मोटाई टीएं जु वायु तिनका क्षेत्रफल हो हैं इहां एक योजनके तीनस वीस खंडनि विर्षे तीनसै तीन खंड प्रमाण तीनों वातवलयका मोटापना कह्या ताका वीज कहिए है । धनोदधि तौ दोय कोश मोटा ताके च्यारि हजार धनुष अर घनचात एक कोश मोटा नाके दोय हजार धनु अर तनुवात सवा च्यारिसै धनुप हीन एक कोश मोटा ताके पंद्रह सै पिचत्तरि धनुष इन सअनिको मिलाएं सात हजार पांच से पिचहत्तरि धनुप भए । अर एक योजनके आठ हजार धनुप हैं । सो इहां पचीस करि अपवर्तन कीएं सात हजार पांचसै पिचहत्तरि की जायगा तीनसै तीन मया मर आठ हजारकी जायगा तीनसै वीस भया । ऐसें करि एक योजनके तीनिस वीस भागनि विर्षे तीनिस तीनि भाग प्रमाण लोककै उपरि तीनों वातवलयनिका मोटापना कह्या है सो इहां जगच्छे णीको एक राजू जगच्छेणीका सातवा भाग ताकरि गुणे जगत्प्रतरका सातको भाग ताको वैध करि गुणें ऐसा गुणें ऐसा क्षेत्रफल हो है। -३०३ बहुरि इहां लोकका अप्रभाग विर्षे कह्या जु वायुका फल ताको छोडि और सर्व वायुफल ऐसे भए । इहा जगत्प्रतरकी सहनानी ऐसी = जाननी । छोकके नीचे सप्तम पृथ्वीपर्यंत सप्तम पृष्ापर्यंत नियंग्शेरपर्यंत तिर्यग्लोकपर्यंत ऊदलोकपर्यंत पूर्वपश्चिम दक्षिण उत्तर पूर्वपश्चिम दक्षिण उत्तर । ३२. पूर्वपत्रिम 324 ५५१-... -२४ ४९ बरलोकपर्यंत ऐसे ( भए क्षेत्रफल तिनको समग्छंद विधान करि मिलावनें सो इन सातनिके हार- दक्षिण उत्तर निकों सातका धन आ मातका वर्ग अर एफ भर मातका धन अर सात अर सातका धन करि कम गुगिएं मर्वय सानका धन का भाग दीजिर | भागर्थ ॥ पूर्वोक्त साती क्षेत्राटनिति जहां मागहा न था तहा मानका यन करि गुप्या जहा मातका भागहार या नहा मानका वर्ग कर गुण्या जहानीनम तिवादीमका भाग हार था तहाँ एक कार गुण्या जहा गुपचासका भागहार था तहा पर ८111 १४॥ - लोकमामान्याधिकार। ७१ गुपन जा समरोद निधान कि निम गुणकार पारि गुणे हानिकी समानता होइ तिरा गवार करि निको गुणने सोहागु करनेके थाई से कोपा तर ऐसे भए॥१-५..... 21 ९१.४ इन सबनिको जोदिए तय सीनि २० १४॥ की पीगग मार एफ.गो पारणको तीन निया सफा भाग दानिए इतने भए ११..९.५५ पशि रोकका समभागवि क्षेत्रफल मा . हा भाग हार सात भर सोनसे दोगको गुगे वाईग से पास हो । यहरि समग्र विधान करना । साते इस राशि पि हार तीनस तीन अर मा पाईस स धाम इन दोऊनिकों सातफा वर्ग गुणचास ५९ फार गुणें ऐसा भपा =rer. अर ओक्त राशि ऐसा १.११५५ पाके हार शनिकों सीनस पीस करि गुणें १४॥ ऐगा ... से करने दोऊ राशिनके समान भागहार भए पहरि इन दोऊ राशिनके हनिकों मिलाएं ऐसा भया १.४४४. ऐमैं इतना सर्व वानवलपनि करि रोया हुवा क्षेत्रका १.१५६. एघार हो ॥ १३८॥ आने सिद्ध भपा क्षेत्रफलताको यह है:- सपासीदिनदुस्सदसहस्सतेसादिलक्खउणवीसं । पीसहियं कोडीसहस्सगुणियं तु जगपदरं ।। १३९ ।। समातिचतुःशतसहमध्यशानिटक्षकोनविर्श । चतुरिताधिक मोटिसहयगुगिन तु जगव्यनरम् ॥ १३९ अर्थ-चौर्यास अधिक एक हजार फोडि उगणीस हारर तिपाटीस हजार प्यारिस सियासी करि जग प्रतरकों गुगिए ।। १३९॥ मंडरियाका भागहार कहें हैं:- सहीमवसरहिणवयसहस्संगलरखभजियं तु । सध्वं पादारदं गणिय भणियं समासेण ॥१४॥ पटिसप्तशः नवकसहसंकटक्षमतं तु । सर्व पातारद्ध गणित भगिन समासेन ॥ ११०॥ अर्थ-एक लाग्य बहत्तर हजार सातसे साटिका भाग दीजिए । इतना: सर्व पातक्लप करि रोश्या हवा क्षेत्रका गणित कहा है जोडि करि लोकके चौगिरद यानबटय है। तिनका क्षेत्र महण कीया है। अष्टपृष्यानिके नीचे वातवस्य है तिनका क्षेत्र ग्रहण न कीया है ॥ १०॥ आगे लोकका अप्रभाग वि सनुवातत्रलयमें विराजमान सिद्ध भगवान् तिमका जघन्य या उष्टि अषगाहका क्षेत्रों को हैं:- णवपण्णारसलक्खा सयाण खंडाणमेयखंडम्हि । सिदाण तणुवाद नहष्णमुझस्सयं ठाणं ।।१४१ ॥ ii
७२
त्रिलोकसार-
।
नवपंचदशलक्ष शताना खंडानामेकखंडे ।
सिद्धानां तनुवात जघन्यमुत्कृष्टं स्थानम् || १४१ ॥
अर्थ-तनुवातवख्यका बाहुल्यका नव लाख खंड कीजिए तहां खंड वि सिद्धनकी
जघन्य अवगाहनाका प्रमाण जानना अर ताहीका पंद्रह से खंड कीजिए तहां एक खंड विर्ष सिद्ध-
निकी उत्कृष्ट अवगाहनाका प्रमाण जानना । ऐसें तनुवातवलय विर्षे सिद्धनका जघन्य टकृष्ट
स्थान है ।। १४१॥
आगै तिस अवगाहनाको व्यवहाररूप करता संता कहें हैं:-
पणसयगुणतणुवादं इच्छिदउग्गाहणेण पविमत्तं ।
हारो तणुवादस्स य सिद्धाणोगाहणाणयणे ॥ १४२॥
पंचशतगुणतनुवातः इच्छितावगाहनेन प्रविभक्तः ।
हारस्तनुवातस्य च सिद्धानामवगाहनानयने ॥ १४२ ॥
अर्थ-तनुवातवलयका बाहुल्य तौ प्रमाणांगुल अपेक्षा है अर सिद्धानकी अवगाहनाका
प्रमाण व्यवहारांगुल अपेक्षा है । ताते तनुवातका बाहुल्य पंद्रहसौ पिचत्तरि धनुप प्रमाण ताकौं
पांचसे गुणा कीएं ताके व्यवहार घनुपनिका प्रमाण सात लाख सित्यासी हजार पांचस होइ ।
७८७५०० । याकों विवक्षित जघन्यादि सिद्धानकी अवगाहनाका माग दीएं सिद्धनिकी अवगा-
हना ल्यावनी विर्षे भागहारका प्रमाण हो है । भावार्य 1 सात लाख सित्यासी हजार पांचसैकों
जघन्य अवगाहनाका प्रमाण सात धनुपका आठवां भाग दीए भागहारका प्रमाग नव टाव आपा
सो नव लाखका भाग तनुपात यलयका बाहुल्यकों दाएं एक भाग प्रमाण सिद्धनिकी जघन्य मा.
गाहनाका प्रमाण हो है । बहुरि सात लाख साढा सित्यासी हजारकों उत्कृष्ट अवगाहनाका प्रमाण
पांचसे पचीस धनुष ताका भाग दीएं भागहारका प्रमाण पंद्रहसे आया सो पन्द्रहसका भाग तनु
यातके वाहुल्यको दाएं एक भाग प्रमाण सिद्धनिको उत्कृष्ट अवगाहनाका प्रमाण हो है । सहा
भागहारका भाग दैना ऐसें जानना जो नत्र लाख खंडनिका सात लाख साढा सित्यासी हजार
प्यवहार धनुप होइ तो एकसंडके कते धनुष होइ ऐसे त्रैराशिक करिए । बहुरि इहाँ माग्य और
भागहारको एक लाख बारह हजार पांचसे करि अपवर्तन करिए तब भाम्य सात साख साहा
सिस्यामी हजारकी जायगा तो सात होइ र मागहार नव टावकी जायगा आठ होइ ऐसे सात
धनुषका आठवां माग प्रमाग जघन्य अवगाहना होइ । ऐसे ही उनष्ट अवगाहना जानना । गरि
प्यारि प्रकार अपवर्तनका विधान जानना ॥ ११२॥
मागे असनाटीका स्वरूपकों पर है:-
शेयवहुमझदसे रुबसे सारव रज्नुपदरजुदा ।
चौरसरग्नु गा तमणाली होदि गुणणामा ॥ १४३ ।।
टोकमप्पा वृक्षे सार इस एजुमतायुना।
धनुशागनगा जमनाली मपति गुणनामा ॥ १३॥
। सोकमामान्याधिकार। पोषाकाराया पात मध्य प्रदेशनि यि प्रस माली है । सो फैसी है, रग्नुमतर की गुफ है। भावार्थ । एक रान सौ सी है भर एक राज पौडी है । बहुरि चतुर्दश राम् et | भावार्थ । लोकके अधौभागत रमाय अप्रभागपर्यंत चौदह राम् ऊंची है। कौन दृष्टान्त। पार एव । जाहिरयादिक ती उपरि उपरि है । जिनके मध्य सार लकड़ी पारने सोक यि मध्य प्रसनारी पाई है। यहरि यह प्रसनाटी फैसी है। गुणनामा करिए मार्षिक नामको धनहार है नाने वैरियादिक ने प्रस जीव ते इसही दिसें पाईए है । याके कार समोर लोक क्षेत्र विष स्थावर जीरही पाईए है प्रस जीव नाही है । उपपाद वा मारणान्तिक पंगमस्यायाले बीरनिके प्रदेशनिका प्रस नाली मान भी सत्व पाईए है परन्तु तिनकी गुरया नारी। मैं राहा प्रस भावनिका सहार अस नाटी शिर्ष ही जानना पाय नाही। बहुरि हा प्रस नाटीया बाई चीराई एक राजू सो तो भुज र कोटि जानना उचाई चौदह राजू सो मेध जानना यरि फोटियों परस्पर गुणि ताको उचाई करि गुणे ग्रस नालीका क्षेत्रफल धन- कर चोदर राज् प्रमाग है । भावार्थ । तानसे नियाास घनरूप रजु प्रमाण लोक है । तामें चौरह राज्में तो प्रस नादी है । अवशेष सोनमै गुणताटीस राज विर्षे प्रस नाई पाईए है इहा ऐसा आकार जानना ॥ १३ ॥ भागे उस नालीया अधोभाग वि तिरता पृथ्वी भेदादिको कहै हैं:- मुखदले सघमही उपरीदो रपणसधारापालू । पंका धूमतमोमहतमप्पहा रग्नुभंतरिया ॥१४४ ॥ मुरजदले सप्त मयः उपरि रत्नपार्करा वालुः । पका पूमतमोमहातमप्रभा रगवंतरिताः ॥ १४ ॥ अर्थ-योदय मृदंगके आकारि सर्व लोक फसा या सामें आधा मृदंगके आकारि अधो सोक फाटा था । तीह भाषा मृदंगका भाकार विर्षे सात पृथ्वी पाईए है तिनका आकार ऐसा । टपरत टगाय एनप्रभा १ शर्कराप्रभा १ वाटकाप्रभा, १ पेकप्रभा १ घूमप्रभा १ तमप्रभा १ महातमप्रभा १सैं तिनके नाम जानने इहां प्रभा शब्द प्रत्येक लगाइ लेना ताते रत्नप्रभा इत्यादि नाम हैं। परि ए नाम सार्थिक हैं जानें इन विय रत्न मिश्री रेत कादो धूवा अंधकार महा अंधका- रको समान अनुक्रमते प्रभा पाईए है । बहुरि ते सर्व पृथ्वी एक एक राजूके अंतर संयुक्त जाननी । भावार्थ । मध्य लोकने लगती तो पहली रत्नप्रभा पृथ्वी है । बहुरि तात एक राजू नीचें शर्कराप्रभा है सार्ने एक राज् नावाट का प्रभा है ऐसेही अन्य पृथ्वीनिका एफ एफ राज्का भंतराल जानना ।। १४४ ॥ आगै तिन पृथ्वानिके अन्य नाम फहैं हैं:- धम्मा पंसा मेया अंजनरिहा य हॉति अणिउज्झा । उही मघवी पुढवी सत्तमिया माधवी गामा ॥१४५ ॥ धर्मा वैशा मेघा अंजनारिष्टा च भवति अनियोभ्याः । पष्टी मघवी पृथ्वी सप्तमिका माधवी नाम ॥ १४५॥ त्रि.१०
७४
त्रिलोकसार-
aman
।
अर्थ-धर्मा १ वंशा १ मेघा १ अंजना १ अरिष्टा १ बहुरि छटी पृथ्वी मी !
सातमी माधवी नाम पृथ्वी ऐसें अनियोध्या कहिए अर्थरहित अनादि रूढि रूप नामको धेरै ए सात
पृथ्वी हैं ॥ १४५ ॥
आगें तहां प्रथम पृथ्वीके भेद कहैं हैं:-
रयणप्पहा तिहा खरभागा पकापबहुलभागाति ।
सोलस चउरासीदी सीदी जोयणसहस्सचाइल्ला ॥ १४६ ॥
रत्नप्रभा त्रिधा खरभागा पंकापवहुलभागा इति ।
पोडश चतुरशीतिः अशीतिः योजनसहस्रबाहुल्या ॥ १४६ ॥
अर्थ-
रत्नप्रभा नामा पृथ्वी तीन प्रकार है । खरभागा १ । पंकभागा १ अन्वहुलभागा ।
ऐसे हैं । बहुरि सोलह चउरासी असी हजार योजन वाहुल्यरूप है । भावार्थ । रत्नप्रभा पृथ्वी एक
लाख अस्सी हजार योजन मोटी है तोह विर्षे उपरित सोलह हजार योजन तौ खरभागा है। चौरामी
हजार योजन पंकभागा है । असी हजार अबहुल भागा है । ऐसे एक पृथ्वीस्कंध विर्षे तोनि
भाग जानने ।। १४६॥
आँगै खरभाग वि सोलह पृथ्वी पाईए हैं तिनकी संज्ञार्को दोय गाथानि करि कहै हैं:---
चित्ता वजा वेलरियलोहिदक्खा मसारगल्लवणी ।
गोमेदा य पवाला जोदिरसा अंजणा णवमी ॥ १४७ ॥
चित्रा वन्ना वैडूर्या लोहिताख्या मसारकल्पावनिः ।
गोमेदा च प्रवाला जोतिरसा अंजना नवमी ॥ १४ ॥
अर्य-चित्रा १ पन्ना १ पैडूर्या १ लोहिता १ कामसारकल्पा १ गोमेदा १ प्रवाटा ।
ज्योतीरसा १ अंजना १ नवमी पृथ्वी है ।। १४७ ॥
अंगणमूलिय अंका फलिहा चंदण सवत्यगा यकुला ।
सलक्खाय सहस्सा एगेगा लोगचरिमगपा ॥१४८॥
अंजनलिका अंका सटिका चंदना सर्वर्यका बकुला ।
शलाल्या च सहस्सा एकका लोकचरमगता ॥ १४८॥
अर्थ-अंजनमुलिका १ अंका १ स्फठिका १ चदना १ सर्वका १ बकुला १ शैला ?
ऐसे ५ सोलह पृषी हैं। एक एक पृथ्वी हजार हजार योजन प्रमाण मोटी है। भावार्थ । परमाण
सोलह हजार योजन मोटा कया था तामें उपरि ती हजार योजन मोटी चित्रा पृथ्वी है । ताके नीचे
हजार पोजन मोटी कमा पृथ्वी है ऐसे ही हजार हजार योजन मोटी सोलह पृथ्वी नाननी । बहुरि ते
कवी टोकका अंतकों प्राप्त जाननी । भावार्थ । लंबाई चौदाई इन पृथ्वानिकी लोकके समान
जाननी सी इम वरमाग वि आ पंक. भाग यि ती भवनवामी व्यंतर देशनिका बाम है सो वर्णन
पान होगा। वही अन्नदृस्ट भाग विष प्रथम नाक पिर पार भाग शौर.
लिनकदीच कोर ठेवत नाही है। जैम एक पर्वन पि कोई अपेक्षा भाग करिव ती भाग
कार॥ १४८॥
लोफसामान्याधिकार। -- आ दिनांपादि पृथ्वीनिका पाल्प फहे हैं:- पचीसमहवीस परवीस बीम सोलसहाणि । हेहिमपुटवीणं सहस्समाणेहिं बाहुलियं ॥१९॥ द्वात्रिसदारिंशतिः परिगतिः शिति पोडशायो। अधस्तनपानां सहसमानः बाहुल्य १ १४९ ।। अर्थ मित्तम हजार अठाईस हजार चौबीस हजार बीस हजार सोलह हजार आठ हजार योजन प्रमाण दितीयादिक नीचन्दी छह पृथ्वोनिका पाल्म फहिद मोटापना सो क्रमते जानना ॥ ११९॥ आगे तिन पृथ्वीनि यि तिने ज पटठ तिनके स्थान फहें हैं..- सत्तमखिदरहुमझे रिलाणि सेसासु भापरलाच । ऐड्वारिं च सहस्सं पजिय पडलकमे होति ॥ १५० ॥ सतमशितिब्रमप्पे बिलानि शेषामु अन्बटुलांत । अध उपरि च सहसं यर्जयित्वा पटलक्रमेण भवति ॥ १५०॥ अप-सातमी टीका तो महु मध्य भाग वि विठ है । बहुरि अवशेष पृथ्वीनि विरें मन्बहल भाग पर्यंत नीचे वा उपरि हजार हजार योजन छोडि पदलनिका अनुक्रम करि बिल पाईए है। भावा-सातमी पृथ्वी आठ हजार योजन मोटी है तामें नीचे पा उपरि बहुत मोटाई छोडि बचि विर्षे र पाईए है । बरि अन्य पृथ्वी या प्रथम पृर्खाका भबहुल भाग तिनकी मोटाई विर्षे नीचे वा उपरि हजार हजार योजनको डोडि चि विर्षे जेते जेते पटल पाईर तिन विर्षे अनुक्रम फरि विल पाईए है॥ १५०॥ आगै अपमादि पृथ्वोनि वि विरानिकी संख्या करें हैं:- वीसं पणुवासं पप्परसं दस तिणि पंचणे । सर्व सुदं पंच य पुढचीसु कमेण णिरयाणि । १५१॥ त्रिंशत् परिशतिः पंचदश दश आणि पैवहीनक । एई शुद्ध पंच च पृथ्वीर क्रमेण निरयाणि ।। १५१॥ अर्थ---सीस धारा पचास लाख पैदह टारर दश साव सीनि टाप पाच पाटि एक लाख ऐसे एतौ क्ष विशेषणसहित दिल है । अर मातमी पृषी विर्षे शुर कहिए लक्ष विशेषणरहित पांच ही बिल है । ऐसे प्रथमादि पृथ्वीमि वि अनुभम करि निरय कहिए मिल पाईर है ॥१५॥ आगे तिन विन अति शीत अति उष्णका विभाग कहें है:- ग्पणपापुदीदो परमतिरस्त्यमोचि अतिउण्डे । परमतुगिए छ सत्तामिए हदि अदिसीदं ।। १५२ ।। रना बीत पंचमविचतुति अयुष्णम् । एचमतुरीये षष्टया सप्तम्या भवति अनिर्यातम् ॥१ .
- । त्रिलोकसार- अर्थ रत्नप्रभा पीत टगाय पंचम पृथ्वीके तीनि चीया माग पर्यंत तो अति उच्य है। पंचम पृथ्वीका चौथा भाग अर छठी सातवी पृप्ती किय अति शीत हैं । भावार्थ- पहटी दूमर्स तीसरी चौके तौ सर्व विउ अर पांचमी पृष्पीके बिलनिका प्यारि भाग फरिए तहाँ तीन मा प्रभात विउ ए तो अति उस पाईए है । इन वि आन्यादिकते भी यहुत अधिक उष्णता जादनी । बहरि पाचई पृथ्वीका चीयाई विज अर छटी सातवी पृया के सर्व विउ अति शीत पाईर है। विदिनादिक से भी बहुत अधिक शीतता जाननी । जैसी इहाँ उत्कृष्ट शीतता पाईए है न टमने कोई पदार्य नाही। तहाँ शीतता वा उष्णताकी महा वेदना है ॥ १५२ ॥ आने तिन पिलानि विर्ष इन्द्रक गीपद विलनिकी संख्या कहैं है । सो इन्द्रकादिरनिर हमर जाननेको मि इस भाषा टीका यि वर्णन करिए है । सो प्रथम दृष्टान्त फहिर है। पूजयिकेने इक सगका भूमिमा यनाईए । परि एक एक गण विश ऐसे कोठे यनाईर तोचि करित पारि साकी प्यारि दिशा भर प्यारि विदिशानि विष पनिबंध के मिरिदिशा दिशान के बीच फेते इक कोटे मारिए यहरि जे ए कोठे कार माने जानेको दागरिक न रामिए । ऐसे जो भूमि गृह य ताका दृष्टान्त नरक रचना ही न जगण कसे हो नरचना में उपरि नये पार जान REPार जानना । बरि सही से राण से कोटे कोटदी यह तर जानने । वहरि सही से दीपिका कोटा दिशादी For इमक बिन यार दिशा या पारि विदिशानि पनि rid को इस गम अंगीबद्ध है। यहरि तहाँ दिशा दिशानिकी योनि को को Netra अतर दिशानियल जानने इनका नाम प्रकार्णक ant mere भूमिगर इस माग ते कया है जो भूमिगृह पृथ्वी से हो । मारानी। जो पृषी टगरि आया कि मसि हो १ ते ना! Artiem द्वारा अनार इस पाने का है। भी आपने गाने बारा याद गर गोरखना MARA NEET का नाम नाम जानना | Teri Airitraना मना है | Ham Ethermग गरम मा wifinitin देगा।' । देगटि टायगटीवदा दिगागरिदिगागु । माणसालाही पणया ॥१५३ ।। Timriknxn: 4mmitry vrritargin-१५६।। Ranaurat TAIT REArtimraft सोफसामान्याधिकार। इंद्रफ है सी पटल भी इसने पाईर है । यहरि धेगीवर दिल दिशा पर विदिशानि कि गुणधाम भर अटतालीमकों आदिदै फरि पटल पटल प्रति एक एक पटता प्रमः जानना । भावार्य प्रथमादि पृथ्र्यानिक तेरह ग्यारह नव सात पांच सीन एक पटल मिडार हप गुगचाम पटल है. सहा प्रथम पृथ्वीका पहला पटल तामें एक एक दिशानि विर्षे ती गुणवाम गुगयाम श्रेणीबद्ध है। अर एक एक विदिशानि कि अटता स अटलान्टीस श्रेणीया है । यहरि तीपाति पटट ने मनम पृथ्वीका पटल पर्यंत एक एक दिशा भर विदिशानि विर्ष एक एक अंगांप्रद घटता घटना जगनन । ऐसें करि भतका गुणचासा पटल वि दिशनि वि एक एक श्रेर्णावर पाई।विदिशानि विप श्रेणीबद्धका अभाव है ॥ १५३ ॥ मागे तिन पृथ्वानि विष याहे जुद्रक तिग माम ह गायानि फरिया :- सीमनणिरपरीरप भम्भमिदया यमनो। नावि असमंतो पीभंतो गरमओ सत्यो ।। १५१ ॥ सीमननिरयरीरातातिटका; च संभागः । सगोपि भागातः विधात: नश्मः अनः ॥ १५५ ।। अर्थ-गोमन १ निरप १ रौरव १ मा १ रातमागाईप ! असमात १ विर्भात १ नवगा ईदक प्रस्त सगिदो पतपरखो दि अप.मणाम किती। पठमे सदगो थणगो पणगो मणगो परा पटिगा ॥१५५ ॥ प्रमितो यमातारयः भवति अपतिनाग वितत प्रथमा तराय: स्तनयाः धनकः मनका.॥१५५॥ अर्थ-प्रसित १ यातनामा दया १ विकात १MRधम roiler | पारि ततक १ हानका १ नक १ गनक १ का १ ॥ १५५ ।। जिम्मा मिभिगसण्णा तो मोरिगोलपत्य पणराग। शिदए तपो नषिदो तरणो वारणिय ॥१५६ ।। निदा निस्किहा तो सोषिक गेय समान । दिलीगयो तपः तपितः तपनः तारननिताना ॥१५॥ भई-निरिकनाम १ तहाँ दो सीरिक र म १११ पि पृषी क जाने। परिता सति सान १ जिलिदो पर्माग्दो मजनिती गरिदकामा । नदिए भारा मारा नारा पपा परमीप ॥१५॥ HENir, सgnnar या मा ami R१५७ ॥
। ७८ 'त्रिलोकसार- अर्थ-उज्वलित १ प्रज्वलित १ संज्वलितनाम १ ऐसें तीसरी पृथ्वी विर्षे नव इंद्रक है। बहुरि आरा १ मारा १ तारा १ चर्चा १ तमकी ।। १५७ ।। पाडा घडा चउत्थे तमगा भमगा य झसग अद्धिंदा । तिमिसा य पंचमे हिमवद्दललल्लगितयं छठे ॥ १५८ ।। घटा घटा चतुर्थ्यो तमका भ्रमका च झपगा अर्धेद्राः । तिमिश्रा च पंचम्यां हिमवादलिललकित्रयं षष्ठयाम् ॥ १५८ ॥ अर्थ -घाटा १ घटा १ ऐसे चौथी पृथ्वी विर्षे सात इंद्रक हैं । वहुरि तमका १ भ्रमका १ झपका १ अंधेद्रा १ तिमिश्रका १ ऐसे पंचम पृथ्वी वि पांच इंद्रक हैं । हिम १ याठि । लल्लाकि ऐसे छठी पृथ्वी विर्षे तीन इंद्रक हैं ॥ १५८ ।। ओहिहाणं चरिमे तो सीमंतादिसोडविलणामा । पुवादिदिसे कंखा पिवास महकख अइपिवासा य ॥ १५९ ।। अप्रतिस्थाने चरमे ततः सीमतादिश्रेणिबिलनामानि । पूर्वादिदिशायां कांक्षा पिपासा महाकांक्षा अतिपिपासा च ॥ १५९ ।। अर्थ-अवधिस्थान १ वा दूसरा नाम अप्रतिष्टित स्थान सो अंतकी सातवीं पृथ्वी विर्षे एक इंद्रक है । ऐसें क्रमः इंद्रक विलनिके नाम कहे । अथ जो आगे अर्थ कहिए ताकी पातनि- काकों गभित करि तीन गाथा कहैं हैं । सो तहां पीछे अब सीमतादिक ईद्रक संबंधी पूर्वादि दिशानि- विर्षे जे श्रेणीबद्ध हैं तिनके नाम कहिए हैं । भावार्थ-प्रथमादि पृथ्वीका पहला पहला जो इंद्रक ताके समीप यती जे पूर्वादि दिशानि विप च्यारि च्यारि श्रेणीबद्ध हैं तिनके नाम कहिए हैं। इन अटाईस विना और श्रेणी वद्ध या प्रकीर्णक विलनिक नामका वर्णन इस शास्त्र विर्षे नाही हैं तहो धर्मा पृथ्वीका सीमत इंद्रककी पूर्वादि दिशानि विर्षे कांक्षा १ पिपासा १ महाकांक्षा १ महापिरासा १ए प्यार है ।। १५९॥ सातदगे अणिच्छा अविज महणिच्छ महअरिजा य । तचे दुक्खा वेदा महदुक्ख महादिवेदा य ॥ १६० ॥ वंशातनके अनिच्छा अविद्या महानिम्छा महाऽविद्या च । तले दुःला वेदा महादुःसा महादिवेदा च ॥ १६०॥ अर्थ-वंशाका तत ईदक विय अनिम्छा १ अविधा १ महानिन्छा १ महापिया १९ प्यारि है । यहरि मेघाका सप्त !दक वि दुःगा १ वेदा १ महादुःपा १ महायेदा १९ प्यारि है।॥ १६०॥ आराए दणिासह गिरोह अणिसिद्ध महणिरोदा य । नमग गिद्धरिमाण भावणिम्द्ध माविमणया ॥ १६१॥ आरतु निष्टा निगमा अनिष्टा महानिगेग। नमक निमनिमदनभनिगनिद्धमहागिर्दना ॥१६१ ॥ ।
लोकसामान्याधिकार। अर्थ-बहरि अंजनाफा आर इंद्रक विर्षे निसृष्टा १ निरोधा १ अनिसृष्टा र १९ च्यारि हैं । बहुरि अरियाका तमक इंद्रक विष निरद्ध १ विमर्दन १ अनिरुद्ध १ नक १९ प्यारि हैं ॥ १६१॥ हिमगाणीला पंका महील महादिपंक सत्तमए। पढमो कालो रउरवमहकालमहादिरउरवया ॥१६२ ।। हिमके नीला पंका महानीला महादिपंका सप्तमायाम्। प्रथमः कालः रौरवमहाकालमहादिरीरवाः ।। १६२ ।। अर्थ---मघवाका हिमक इंद्रक विर्षे नीला १ का १ महानीला १ महाका १५ हैं । बहुरि सातमी पृथ्वी विर्षे पहला श्रेणीबद्ध काल १ बहुरि रोरव १ महाकाल १ महागैरव ए च्यारि हैं। ऐसे इनके नाम जानने ।। १६२ ।। माग पृथ्वी पृथ्वी प्रति प्रथम पटल संबंधी श्रेणीबद्ध विलनिका. प्रमाणपए जो धन स. धरि फरि अंतके पटटका धन ल्याउनेकों अर अंतके पटटका धनकों धरि प्रथम पटटके धन स्पान नेकों फरण सूत्र कहे हैं;- वेगपदं चयगुणिदं भूमिलि मुहम्मि रिणधनं च फए। मुहभूमीजोगदले पदगुणिदे पदधणं होदि ॥ १६३ ।। व्येकपद चयगुणितं भूमी मुग्वे ऋणं धनं च कृते । मुखभूमियोगदले पदगुणिते पदधनं भवति ॥ १६३ ॥ अर्थ-जे ते स्थान होहिं तिनको पद कहिए वा गष्ट कहिए । परि स्थान स्थान प्रतिजेते षधते जाहिं या घटते जाहिं तिनको चय कहिए । यद्दरि भादिस्थान या अंतस्थान कि जोहान प्रमाण होइ साकों मुस कहिए अधिक प्रमाण होइ सो भूमि कहिए सो इहा एक पाटि जो पता चयकरि गुणें जो प्रमाण होइ तितना भूमि विर्षे ऋण एिं घटाएं मुख हेराइ । अथवा मुख बिष धनकाएं जोडे भूमि होइ बहुरि मुख और भूमि इन दोऊनिका योग यहिए जोड ताओं दटे शहर आधाकीए बहुरि ताको पदगुणिते फहिए परफार गुणें पश्यनं कहिर सर्य रक्षानयानिका जोडरुप प्रमाण हो है । ऐसें जहाँ आदिस्थान वि किट प्रमाण होइ अर पाई स्थान प्रति रोकी घटते जाहि या पधते जाहिं सहा इस सूत्रको प्रति जाननी । ताका इहा उदाहरण, प्रथम पारि प्रथम पटल सहा दिशा वि गुणचास भर विदिशा बि अटतालीस घेणार है दिनको नि सेत्याण भए । बहुरि दिशा वा विदिशाका प्रमाण प्यारि है माने इनको चौगुणा का सम पटल - सर्व श्रेणीबद्धानेका प्रमाण तीनिम अगासी भया सोमो इहां भूमि करिए। परि त ना पटल वि दिवि मे ta?.mfa नीम अंगीयर जोडे किनार भर गुमः दोयम वाणः अन सभामा कहि दालन पदका प्रमाण तीह वाणि.... भाग ३३', क." "रापन ८० त्रिलोकसार- इ । कम मुन दोन का हिनकर धनकार जो भूमि सानिने मानी। पर मुगदी ने कालो र भूमि तीनिमें मामी इनको जो हमे भी का है न इनमें पर तेन्ह कार गुहार हजार मारिमै वाम सर्व प्रथम पृषी सिन रोदनिका मत है। बीदक सहित श्रेणीदनिका प्रमाण भी कर मग मर मिमिक एक और भागना तर मुस दो तरेगी भूमिका कमर प्रकार का प्रयम पीक मरण श्रेणीय पारि हजार पारिम न ११३३ मीमही दिली जान से भी प्रमाग स्थापना । पारि समस्त Tat TAIT मैं ही सवाना को मुग तो सपन शेगार पारि भूमि हिनी मी पटा गुणाम था आठ जानना हो गया १THE भी दो ही लाना। इस मुम पांच भूमि निभ निसर HTRA ॥ १९॥ TATERT EET पानेको गनर अय करण गप पर है:- पागली भागद गरेण संगुणिः । पारपरगनि पगि न मिाणाहि ॥१६४ ॥ fruit गरेण गंगुणितं । EMrfota नानी ॥ ११५ ॥ xiii yoni दोगा भाग alra महार दत्ता भी मार 14 HR125 for ify यमक नगरको 2: .... 117 है" frameोई भATAP *ti irrfan कति नानि मोर ............. " ranा आप भी ...! नाही ...NETri, 18 . । t गिमा सय गन fr:१६ ॥
लोफसामान्याधिकार। भूल छह मिलार रियालीस इनको मारगुणा काएं तानिस छत्तीस इनमें प्यार मिलाएं तानिस पाटीस इनकों इंदकका प्रमाण तेरह करि गुणें ध्यारि हजार प्यारिस पास प्रथम पृथ्वी विदं सर्व प्रेणीपद्धनिका प्रमाण हो है। ऐसे ही द्वितीयादि पृथ्वीनि विभी प्रमाणल्यान । म हा ऐसा सूत्र कैसे कहा सो जाननेकों याकी वासनाका स्वरूप संस्कृत टीकात जानना या प्रकार प्रथमादि पृथ्वीनि विर्षे चौवालीसमै बास, छवाससै चौरासी, चौदासै उहत्तरि, साततै, दोपसे साठि, साठि, पारि । ४१२०२६८४१५७६१७००।२६०६०४/श्रेणीवर जाननें ।सर्व मिलाएं नव हजार उस पारिश्रेणीबद्ध हो हैं । द्रिक तेरह ग्यारह ना सात पाच तीन एक जानने । मिलाएत सर्वरक गुणचास होइन दोऊनिकों मिटार इंदक सहित श्रेणीबदनिका प्रमाण हो है ॥ १६५ ।। श- प्रकीर्णकनिकी संख्या स्थापनेकों फहै हैं- साणं विधाले पुप्फपदण्णय इव दिया णिरया । होति पदण्णपणापा सेटिंदयहीणरासिसमा १६६ ॥ प्रेमानो तराले पुष्पप्रकीर्णकानि इव स्थितानि निरयाणि । भवति प्रकीर्णकनामानि श्रेणीदकहीनराशिसमानि ॥१६॥ अर्थ-जैसे पुष्पप्रकीर्णक यहिए पुष्पांजलि कार इल परे हुए पृथ्वीविय ते फूल पकि रहित जहां तहां पाईए सैसे श्रेणीवनि पीचि दिशा विदिशानका अत्तराळ वि पति रहित जहाँ जहाँ जे बिल पाईए ते प्रकीर्णक नाम विल हो है ते श्रेणीवन और इंद्रकको संख्या हत सीम जो सर्व बिलनिकी संख्या ती समान जानने । तहाँ प्रथम पृथ्वीषि पारि हजार पारिस येणायद पर इंद्रक तेरह इन दोऊनिकों राशि तीस लाए तामें घटाएं गुणांस टास पिण्यागो हजार पोचस सतसटि रहे सो इतने प्रथम पृथ्वी वि प्रकीर्णक विल जानने से ही द्वितीयादि पृथ्वोनिवि जानना ॥ १६६ ॥ आर्गे नरक विलनिका विस्तार कहने के भाई कहै हैं;--- पंचमपागपमाणा णिरयाणं होत संखवित्यारा। सेसचउपचभागा असंखवित्थारया गिरया ॥१६७॥ पंचमभागप्रमाा निरयाणा भवति संरूपविस्तारा: शेपचतुःपंचभागा असस्यविस्ताराणि नराणि ॥१६॥ अर्थ-पृथ्वीमि वि जो पूर्व विटनिका प्रमाण का दिन वि चियाँ माग मा दिल तो संध्यात योजन विस्तार करि संयुक्त हैं | जर अवशेष प्यारि पौधा भाग प्रमाण संस्पात योजन विस्तार कार मयुक्त है । तहां दया तो सर्व ही सायात पोजन विस्तारपुत. । अरणी पद्धम असत्यात योजन विस्तारयुक्त जानने । अवशेष सहयात दायात विस्तारयुक्त प्रकोणक जाम नहा प्रथम पृथ्वीविरं वि नौस या निनक पाचका भार दी एक भाग प्रमाण , ल तो मान योजन EिAR युक्त है। मेरी मामा चौईस लाख बिल ARE मन युिन जानने ! मह सपान पोइन विस्तारन र त्रिलोकसार- टारा विलनि विर्षे तेरह तो ईदक अर अवशेष पांच लाख निन्यानवै हजार नौसै सियासी प्रकार जानने । बहुरि असंख्यात योजनं विस्तारयुक्त चौईस लाख विलनिविर्षे च्यारि हजार आदि बीस ती श्रेणीबद्ध पर अवशेष तेईस लाख पिच्याणवै हजार पांचसै असी प्रकीर्णक आननें । । ही द्वितीयादि पृथ्वीनिविय भी जानना । या सर्व पृथ्वीनिके सर्व विटनिधि भी ऐसे ही प्रचार त्पावनां ।। १६७॥ आगे संख्यात असंख्यात विस्तारविर्षे नियम दिखायता कहें हैं;- ईदयसेहीपदापदण्णयाणं कमेण वित्थारा । संखेजमसखेज उभयं च य जोयणाण हवे ॥ १६८ ॥ इंद्रकपीबद्धप्रकीर्णकानां क्रमेण विस्ताराः । संख्येयमसंख्येयमुमयं च च योजनानां भवेत् ॥ १६८ ॥ अर्थ-द्रक भर श्रेणीबद्ध अर प्रकीर्णक इनका विस्तार अनुक्रमते संख्यात पोजन भर FHD पोनन अर उभय फहिए संख्यात या असंख्यात मोजनका है।।१६८ ॥ मागे एकनिके विस्तारका विशेष को हैं;- माणुमसेरापमाणं पदम परिमं तु जंयुदीवसम । उभयविसेसे रूणिदयभजिदमि हाणिरयं ॥१६९ ।। मानुपक्षेत्रमाणं प्रथमं घरणे तु जैबूद्वीपसमम् । उमपरिशेरेबपीनदयभारे हानिच ॥ १६९॥ अर्थ मदक मनुशात्र प्रमाण है । अत ई-क जंबूदीप समान है। दोऊनिका है पटकका माग दीप हानि घर हो है । सो पहला पटल संबंधी पहा METE योजन पर है। गुणधागा पटल गयी तफादक एकता और PM गाण्यों एक दाम घटाए, अपशेष पवाटीग लाग रहे होला KEEP का प्रमाण अटीम ताका भाग दीप प्रत्यारे लार छौं छपारि योर मोल भटमा भाग थाया नतीमा पटता गयो मागका मोठा नमकी या दोर भर अटलादीमकी जायगा तीन भाग कर मोरन देश यो वनमा सीमा भाग प्रमाण हानि पर भागा । सारा नाम हानि पप जानना मो यो त बरामन मनमें 4 योजन अर एक मीना नाम - Funnat faमाण ना TER पर RTR:: पता बनना ॥ १६ ॥ १. 42,. लारणामु परिरमगादातागंग। राणसध्यम 10. ॥
लोफसामान्यापिकार। गादिपु प्रनिपृष्लीमुगासहितकोरोतु । पनि भनेर रिफणीप्रकीर्गानाम् ।। १७०॥ अर्थ- बाट चोदाने भादिदै फार पृथ्वी प्रनि मुगका अर्थ प्रमाण संयुक्त जे निकों का भाग दीपक भीषद प्रकीर्णकनिका बाहुल्य हो । इहां बिलनिकी भू ध्यार पानि पया उचाईका प्रमाग ताका नाम पारस्य जानना । सो प्रथम पृथ्वी विर्षे छह को Cइका भागदए एक कोश भपा सो दकनिका बाटुल्प जानना । बहुरि आठकों छहका दार प्यारि कोशका सीसग भाग सो श्रेणी बसनिका बाहुल्य जाननां । यहरि चौदहकों छह माग दी सानफाशका तीसरा भाग भपा सो प्रकीर्णकनिका बाहुल्य जानना । । । ऐसें प्रध पृथ्वी लिम दिकादिकका यात्म कमा ताका नाम इहाँ मुस जानना ताका आधा कीएं जो प्रमा रोइ तितना तितना उपरिकी पृथ्वी के इनकादिकनिका बाहुल्प वियें जोडे नीचली पृथ्वीके इंद्रका- दिकका पाल्प हो है । सो इंदकनिविर्षे तीनका छटा भाग अंगावद्धनिविर्षे प्यारिका छटा भगा प्रकीर्णकान व सातका छठा भाग पृयो पृा प्रति जोडना सो प्रथम पृथ्वी विर्षे छह आठ चौदह जिनमें सौन प्यारि सात अर एह आठ चौदह अर नव वारा इकईस भर बारा सोलह अठा- ईस अर दह बीम तीस अर अठारह चाईस शून्य इतने अनुक्रमते मिलाएं छहका भागदीए दिनांपादि पृथ्वीनि वि इंदकादियानि बाटुल्यका प्रमाण आप है। तहो सप्तम पृथ्वी वि प्रकीर्ण- कनिका अभाव है । ताते तीसरी जायगा शून्य कहा है। सहाँ छै आठ चौदह विर्य तीनि ध्यारि सात नोटे सब नौ बारा इकईस या इनको छहका माग दीएं अपवर्तन कोएं द्वितीय पृथ्वीविय इंद- कनिका योदपोश श्रेणीयद्धनिका दोय कोश प्रकीर्णकनिका साढा तीनि कोश बाहुल्य [1] हो है। समीयादि पृथ्वी वियें जानना ॥ १७० ॥ मार्ग बहुरि इस पाल्यकों अन्य प्रकार फरि कहे है- पहियपुरिसंखं तियवउसत्तोहि गुणिय छन्भनिदे। कोसाणं येहुलिय इंदयसेढीपदण्णाणं ॥ १७१ ।। सपाधिकथ्यिसंख्या त्रिकचतुःसप्तभिः गुणयित्या पड्भक्ते । पोशानां वाइल्प इंदकप्रेणीप्रकीर्णानाम् ।। १७१ ॥ अर्थ-जेथवी पृथ्वी होइ सीह संख्या विर्षे एक अधिक काएं जो संख्या होइ, ताफों तीन गरि सात करि गुणे छहफा माग दीए जो प्रमाण होइ तितनी कोशनिका याहुल्य उचाईफा Tसो जानना । तहाँ प्रथम पृथ्वी विर्षे एक अधिक कीएं दोय भए सो तीन जायगा दोय दोय है तिनको प्यारि मान करि गुणे बह आठ चौदह भए तिनको उहका माग दीर [१008) आदिकनिका कोशम प बाहुल्य आये है । म द्वितीय पृथ्वी वि एक अधिक संख्या तीन सो जायगा मारि ना- मन 4 गुणे नव बारह वाईस होइ इनकों छहका भाग दीएं 3 काशरूप उद्रकार कानका बार-य प्राय है । मे ही तृतीयादि पृथ्वीनि विय जानना ॥१७१|| इद्रकाटि विमानका अनमको प्रमाण कह है, भागे ८४ त्रिलोकसार- पदराहय विलबहलं पदरहिदभूमिदो विसोहिता। रूऊणपदहिदाए विलंतर उड्गं तीए ॥ १७२।। प्रतराहतं विलबाहल्यै प्रतस्थितममितः विशोच्य । रूपोनपदहृतायो बिलांतरं सर्वगे तत्याः ॥ १७२ ॥ अर्थ-प्रतर कहिए पटल तिनका प्रमाण करि आहृत कहिए गुण्या हया ऐसा वाहुल्य कहिए इंद्रकादि विलनिका बाहुल्यका प्रमाण सो प्रतरस्थित भूमितः कहिए. प संयुक्त जो नरक पृथ्वीका प्रमाण तात विशोधयित्वा कहिए घटाय करि अवशेषकों एक घाटि पटलका प्रमाण रूप गच्छ ताकरि हतायां कहिए माग दीएं संत तीह विव विर्षे ऊर्द्धग विलांतर कहिए उचाई विर्षे प्रात ऐसा विलानिके अंतराल हो है । मंदिर बने हैं। तिन दोऊ मंदिरनिके बीचि छांति हो है। तिस छातिकी मोटाईका सो ऊर्द्धग मंदिरांतर कहिए तैसे उपरले नीचले पटव संबंधी रिलनिके वीचि ओता पृथ्व ईका प्रमाण सो इहां ऊर्द्धग मंदिरांतर कहिए तैसे उपरिले नीचले पटल विलांतर जा प्रथम पृथ्वी विर्षे पटलनिका प्रमाण तेरह ताकरि इंद्रक विटका बाहुल्य एक कोश श्रे घ्यारि कोशका तीसरा भाग प्रकीर्णकनिका सात कोशका तीसरा भाग इनकों गुणें वावन कोशका तीसरा भाग इक्याणवै कोशका तीसरा माग भया (१३१३११] बहुरिया एक योजन होइ तौ इतने कोशनिका केते योजन होय ऐसे तिन कोशनिकै योजन पोजनका चौथा भाग बहुरि बावन योजनका बारव्हा भाग वहरि इक्याण योजनका वा भया [ANI] | बहरि इहां अव्वहुल भाग असी हजार योजन छोडि वाचि पटल पाईए। स्थित भूमि अठहत्तरि हजार योजन तिनमें पूर्वोक्त योजननिकों समच्छेद विधान करि घटा विर्षे तानि लाख ग्यारह हजार नवसै मित्यासी योजनानिका चौथा भाग अर श्रेणी प्पारिका अपवर्तन पीएं दोष लाख तेतीस हजार नौसै सित्यासी योजननिका तीसरा प्रकीर्णकनि विर्ष नौ लाख पैंतीस हजार नौसे नवका वारम्हां भाग प्रमाण आया बहुरि । घाटि पटटका प्रमाणरूप पदका प्रमाण बारह ताका माग दीए उपरले नीवले इंद्रकनिक वी टाख ग्यारह हजार नबसै सित्यासी योजनका अडतालीसर्वा भाग प्रमाण अंतराल है। बहुरि श्रेण भांचि दोष लाउ सेतीस हजार नौसे सियासी योजनका रत्तीसवां भाग प्रमाण अंतराल प्रकीर्णकानिके पीचि नय लाख पैतीस हजार नबसे नौका एक सोचवालीसवां भाग प्रमाण [M] ऐसे ही द्वितीयादि पृथ्वीनि विथै तीस हजार छसि हजार आ स्थित भूमि विर्षे अपना अपना पटल प्रमाण करि गुण्या हुवा विठ बाहुल्य घटाइ एक धा प्रमागका भाग दी, उर्द्ध गन अनरालका प्रमाण आवे है। ऐसे एक पृथ्वी वि तिश्ते तिनका परस्पर अंतराल वर्णन किया ॥ १७२ ।। आगे उपरटी पृथ्वीका अतपटर भर नीची पृथ्वीका भादि पटल तिन विर्षे अंतरा पा करें - लोकसामान्याधिकार। ८५ । उपरिमपन्छिमपडला हिहिमपटमिल्लपत्थरतरयं । रज्जू तिसहस्णिदधम्मा बंगुदयपरिहीणा ।। १७३ ॥ सपरिमपक्षिमपटलात् अधस्तनप्रथमप्रस्तरोतरका । रतुः त्रिसालोनितधर्मा यशोदयपरिहाना ॥ १७३ ॥ अर्थ--उपरिकी धर्मा पृथ्वी साका पश्चिम पटल कहिए अतका पटल अर ताके अधस्तन पाहिए नाचती पेशा पृथ्यो ताका प्रथम पटल इनरिये एक रज्जु अंतराल है। सो रज्जु कैसा । तीन हजार पाटि धर्मा पर शफी मोटाईका प्रमाण जामें घटाईए ऐसा एक रज्जु प्रमाण अंतराल है। फसे सो फहिए है । इहांत एक हजार पोजन पर्यंत चित्रा पृथ्वी है मो चित्रा पृथ्वीको मोटाई तो उर्द्ध होकफी उचाई विपे गिनी है । भर ताके नीचें वैशा पृथ्वीका अंतपर्यंत एक राजू उचाई है। महरि एक साख असी हजार योजन धर्मा पृषीकी मोटाई विर्षे चित्रा पृथ्वीकी हजार योजनकी मोटाई माय गई है ताते हजार योजन तो चित्रा पृथ्वी संबंधी घटाए बहुरि धर्मा पृपीका भेत पटलके नीचे हजार योजन वि पटल नाही सो घटाए बहुरि वंशा पृथ्वीका प्रथम पटलके उपरि हजार पोजन वि पटल नाही सो घटाए ऐसे तीन हजार योजन धर्मा र शाकी मोटाई विर्षे घटाईए तहाँ धर्माकी मोटाई एक लाख असी हजार योजन वैशाकी मोटाई बास हजार योजन दोनिको मिलाए दोय साख बारह हजार योजन घटाएं दोय लास नव हजार रहे सो इतने एक राजू विष घटाएं धर्माका अंत पटल पर वंशाका प्रथम पटट विर्षे अंतरालका प्रमाण हो है। इस सराल विहगार योजन धर्माकी नीचली पृथ्वी पर हजार योजन वंशाकी उपरली पृथ्वी पर अवशेष सर्व यौचिमें अवकाश पाईए है ।। १७३ ॥ आगे साते नीचली पृथ्वीनिया अंतादि पटलानि विर्षे अंतराल निरूपण करें हैं- फमसो विसहस्मूणियमेघादीणं च वेहपरिहीणा । चरिमे वितिभागाहियजोयणतिसहस्सपरिवना ॥ १७४ ।। मामशो दिसहस्रोनितमेधादीनां च वेधपरिहीना । घरमे निविभागाधिकयोजनत्रिसहस्रपरिवर्ना ॥ १७१ ॥ अर्प-अनुक्रमते दोय हजार योजन घाटि मेघादि पृथ्वीनिका वेधकरि हीन ऐसा रजु प्रमाण अंतर है। तहा मेघादि पृथ्वीका मोटाईका प्रमाण अठाईस हजार पोजन तिनमें दोय हजार घटाएं एवीस हजार योजन तिन करि हीन ऐसा एक रम्नु प्रमाण अंतराल वंशाका तपटल पर मेधाका भादि पटलके वाचि जानना । बहुरि भेजना पृथ्वीको मोराई चौडाई चौईस हजार योजनमें दोय हजार योजन घटाए वाईस हजार योजन रहे तिन करि हीन एक राज् प्रमाण मेघाका तपटल मा अजनाक। आदि पटल विषै अनगल जानना । वहरि अरिष्टा पृथ्वीको मोटाई बीस हजार योज- नमें दोय हजार याजन घटाए अटारह हजार योजन रहे तिनकरि हान एक गन प्रमाण अंजनाका अंत पटल र आग का प्रथम पटल धीचि भतग है । बहुरि मघरी पृथ्वीको मोटाई मोलह हजार योजनमें दोय हजार पाजन घटाए चौदह हजार योजन तिन करि हान एक रानू प्रमाण अरि- त्रिलोकमार- मागे तिन उपपाद स्यानकनिका ध्याम या बाईन्य करें :- इगिवितिकोसो वासो जोयणमपि जोयणं गये हैं। उहादीणं यह सगवित्यारे िपंचगुणं ॥ १८० ।। एकद्वित्रिकोग; व्यासः योजनमपि योजनगरी ज्येष्टे। उदादीनां याहल्यै स्वकविस्तारेभ्यः पंचगुणम् ॥ १८० ।। अर्थ-एक कोश दोय कोग तीन कोश बद्दरि योजनमपि कहिए एक योजन टोय तीन योजन बहुरि योजनानां शतं कहिए सौ योजन इतना धर्मादि सप्त पृथ्वीनिका क्रम आकारके धारक जे उपपादस्थान तिनका उत्कृष्ट च्याम जो चौडाई ताका प्रमाण जाननें। अपना अपना प्रमाणते पांच गुणा बाहुल्य कहिए उचाईका प्रमाण जानना ॥ १८॥ आगै तिन उपपाद स्थानकनिवि उपजे जे जीव कहा करें है सो कहें हैं- अंतोमुहुनकाले तदो चुदा भूतलाम तिरसाणं । सत्याणमुपरि पडिणुहीय पुणोषि णिवडंति ॥ १८१ ।। अंतर्मुहूर्त्तकाले ततश्चुता भूतले तीक्ष्णानाम् । शस्त्राणामुपरि पतिया उद्दीय पुनरपि निपतति ॥ १८१ ।। अर्थ-अंतर्मुहूर्त कालविर्षे तहां पर्याप्ति पूर्ण करि तिस उपपाद स्थान छुटि नरक निका पृथ्वी तल विर्षे जे तीक्ष्ण शस्त्र हैं तिन उपरि पडें हैं । वहरि तहाँस्यों टट्टीय कहिए करि बहुरि तिनही उपरि निपतंति कहिए पड़ें हैं ॥ १८१ ॥ आगें कितना उछठे हैं सो कहैं हैं;- पणयणजोयणमाणं सोलहिद उप्पडति रइया । पम्माए चंसादिसु दुगुणं दुगुणंति णादव्वं ॥ १८२॥ पंचधनयोजनमानं पोडशहृत उत्पतति नैरयिकाः। धर्मायां वंशादिषु द्विगुणं द्विगुणं इति ज्ञातव्यम् ॥ १८२ ॥ अर्थ-पांचका धन एक सो पचीस ताको सोलाका भाग दीए जो आवै तितने योजन धर्मा पृथ्वी विर्षे नारकी उछलें हैं । बहुरि यात वैशादिक पृथ्वीनि वि क्रमते दूणे दूणे उ ऐसा जाननां ॥ १८२।। आगै तहां तिष्टते थे जु पुरातन नारकी ते उलि करि पडे जे नवीन नारकी तिनको करें हैं सो कहैं हैं। पोराणिया तदा ते दणइणिटुरारवागम्म । खोचति णिसिचंति य वणेमु बहुसारवारीणि ॥ १८३ ।। पौरागिका तदा तान् दृष्ट्वा अतिनिष्टुरारवा आगम्य । नंति निपिंचति व वने वदृक्षारवाराणि ।। १८३॥
लोकसामान्याधिकार। अर्प-पुरातन नारको तह तिन नवीन नारकोनिको दोसे करि अन्यन्त कठोर वचन कहते २ साप फार तिन नवीन नारकीनको घात है। पारि शनि उपरि पपनेते भर शरीर विरें ET पहिए धान तिन वर्ष पान सारा जननिकों सारे है ॥ १८३ ॥ मागे ते नवीन नारको कहा करे है सो कहै है- सेवि विहंगेण तदो जाणिदपुवावरारिसंबंधा। अमुहापुरविणारया इणांति इण्णति वा तेहिं ।। १८४ ॥ तेपि विभंगेन ततः हातापिरारिसंबंधाः । अशुभापग्यिक्रिया गति हन्यते या तैः ॥ १८४ ॥ भर्य-से नवीन नारकी भी विभंग जो कुअवपि तीह करि तहां पति पूर्ण भए पङेि या है पिउला पिणाका संबंध जिननें ऐसे बहुरि अशुभ अपृथक् विकिया जिनके पाईए ऐसे त संत भन्न नारफीनिकों हनें हैं। वा तिन नारान करि आप हनिए हैं। ऐसे परस्पर ति प्रपन है ।। भावार्थ ॥ नारानि ऐसा दुअवधि हो हैं । जाकरि परस्पर वैरकों आनि परपर रोध रूप ही प्रयतै बहुरि जो पूर्वभव विर्षे कोई उपकार किया होय तौ ताको जानि सहां परस्पर तिरूप न प्रयते । बरि तिनके अशुभ जो आपापरको दुःसदायक ऐसी ही विक्रिया होप सकै । परि सो अदा तिमिया हो है। अपने शरीरको तौ अनेक रूप परनवाये अपने शरीरसे जुदी किया करनेकी सामर्थ्य नाही । ऐसे ए नारफी परस्पर घात करें है ॥ १८ ॥ आगै अपर विक्रिया करनेका विधान कहे हैं- वयवग्यघूगकागहिविरिष्यभन्लूकगिदमुणयादि । मुलग्गिोतमोग्गरपहुदी संगे विकुर्वति ॥ १८५ ॥ तृफम्पामधूफकाकाहिधिकमल्टकगृधनकादि । मालाग्निकुंतमुद्रप्रभृति स्वांगे विकुति ॥ १८५ ॥ F-वृफ कहिए स्पाट बहुरि व्याम कहिए वरा धूक कहिए धू काफ कहिए कागला हि माहिए सर्प अधिक फाहिए घोट्र भल्लूफ कहिए रोठ गभ पाहिए प्रभ पंसी शुनक फहिए कफारा पादि अपने शरीर वि शिया कर है। भाषार्थ । नारको परस्पर दुःख देनेको अपने शरीरकों साल पादिदुःखदायक निचनिके आकाररूप विक्रिया करि परनमाइ परस्पर साणा बूटना काटना इत्यादि तरूप प्रवते हैं। बहुरि शूल फहिए त्रिशूल पर। अनि कहिए जलावनेको कारण अग्नि पर स कहिए सैल भर मुद्र कहिए मोंगरा इत्यादि दुखदायक दानादि सामिग्री अपने शरीररिय किया करें है। भावार्थ । नारकी परस्पर दुख देनेकों अपने शरीर ही वि त्रिशूल सादि शस्त्र या IF आदि दुःखदायक वस्तु विक्रिया करि उपजाय तिनि करि परस्पर घात करे है। ऐसे भशुम श्या फरि मारकी परस्पर दुःख दैनको प्रवते है । ऐसा ही तिस नारफ पर्यायका स्वभाव है। पहरि म सर्व पापी हैं काहेको परस्पर वैर कार दुःखको रदी हैं ऐसा विचार सहा नाही उपजै है१८५ अर्थ- अर्थ-अग्निक मयते दोडता ऐसें जु ते नवान नारका ते इहां शीतल पानी है। त्रिलोकमार- आगै क्षेत्र संबंधी पदार्थनिकी कानाको टोय गायानिक १;- वेटालगिरी भीमा जनमाडगुहा य पदिमात्री। लोणिहग्गिकणा परमहरिगामिपनाणं ।। १८६ ।। येताटगिरयः मीमा यंत्रशनो कटगुहाथ प्रतिमाः । साहनिमानिकगायाः परगुरिकामिपत्रपनम् ।। १८६ ॥ अर्थ-येताटकीमी आकृनिकों पर ऐसा महाभयानक ती तहार फरिट पर्वत है। बहुरि सैकड़ा दुःखदायक यंत्रनिकरि उन्कट ऐमी गुहा है। बहुरि निती तु प्रदिना कहा आदिकका आकाररूप प्रतिवित्र मो लोहममान है अर अमिका कनिकरि संयुल है । बहरेद असिपत्र वन हैं सो फरसी छुरी खड्ग इत्यादि शम्रसमान पानिकोर मयुक्त है ॥ १८६ ॥ कूडा सामलिरुक्खा वयिदरणिणदीउ खारनलपुन्गा । पूहरुहिरा दुगंधा हदा य किमिकोडिकुलकलिदा ॥ १८७ ।। कूटाः शामिंटिवृक्षाः वैतगगिनयः क्षारजन्दगीः । पूयरचिरा दुर्गंधाः हृदाश्च कृमिकोटियुटकारिताः ॥ १८७ ॥ अर्थ-बहरि तहां कूटा कहिए असन्य झूठे ऐसे शामली वृक्ष हैं नाम वृक्ष कमर दुःखदायक हैं । वहरि तहां वैतरिणी नाम नदी है सो ग्वाग जल करि सम्पूर्ण मरी है । पूय कहिए विनावनां ऐसा रुविर करि संयुक महा दुर्गध ऐसे द्रह हैं ते कोटिक क्रनिनिश कर करि व्याप्त होइ रहे हैं । भावार्थ । विक्रियादि कार विना निजाया क्षेत्रस्वभावकरि तिन विदने विर्षे महा दुःखको कारण पर्वतादि पाईए हैं ॥ १८७ ॥ आगै तैसी नदीको पाइ कहा हो है सो कहैं हैं;- अग्गिभया घावंता मण्णंता सीपलंति पाणीयं । ते वइदरणि पविसिय खारोदयदइसव्वंगा ।। १८८ ।। अग्निमयाद्धावंत: मन्यमानाः शीतटमिति पार्यि । ते वैतरणी प्रविश्य क्षारोदकदग्धमवीगाः ॥ १८८ ॥ माता तरणा नामा नदी प्रति प्रवेश कर anter भया है सर्व जिनका ऐसे हो हैं ।। १८८ ॥ वहरि ऐसे होत मर्ने ते नारकी कहा करें हैं मो करें :- उट्टिय वेगेण पुणो असिपत्तवणं पयांनि छायति । कुंनामिमतिनहिहिं छिन्नने वाटपडिदेहि ।। १८९ ॥ टत्याय बंगन पुन अमिपत्रवन प्रयानि छायेति । कुनासिशनियष्टिमिश्छिद्यने वातपनिने ॥ १८९ ॥ ।
लोकसामान्याधिकार। अर्थ-ते नगीन नारकी वेग करि शीघ्र ही तहाँस्यों सठि करि इहाँ छाया है ऐसा मानते संते असिपर नामा यनको प्राप्त हो है । तहाँ पवन करि पहे रोट या सद्ग या शक्ती या परि फहिर लाटी इत्यादि समान जे पत्रादिक तिनकरि शरीर भेदिए है ।। १८९ ॥ आगे तिन नारकोनिक बाय दुसका साधनका कहै है- लोहोदयभरिदाओ कुंभीमो नचबहुकडाहा । संतमलोहफासा भू मसालाइण्णा ॥ १९ ॥ सोहोदकभरिता: कुंभ्यः सतबदफटाहाथ । संतप्तलोहस्पर्गा भूः सूचीशाट्यमका ।। १० ॥ अर्थ -साना रोह समान जल फरि भरे ऐसे तहाँ कुंभी है जैसे हायि अन्न पचार तैसे नारकोनिको मुभी विमें पचा परि मत साता कहा है । ॐ या विमान सेवा फरि मन्न आदि पचाई से नारानियों काटाह विर्षे पचाईए है यादि अनेक माय गयो कारण सामिनी सहा पाईए है । बरि तह भूमिका है सोनपापमान गोहयो गमान जागा ऐसी है । महरि सूई साग्दिी दाल कारपदीय लिनकारि आणि कदिए पार है ॥ १९॥ भाग क्षेत्रका स्पर्श करि हो, जो दुग साको घटान्त कार का - विच्छिपराहस्सवेपणसमधियदुपखं परिणिपागादो। कुपसपियरसीसरोगगहुपतिरामयपेयणा मिया ॥ १९१॥ वृमिकमहमवेदनारामधिक परिप्रोस्पर्मान् । पुश्यविशीपरोगगभुधापाभयवेदना तामाः ॥ १९ ॥ अर्थ-हजार थीर पारें बेदना होइ साहस्यों भी पर भविष, पदमा धरित्री जो भूमिका साया पनि हो । परि तिन नारयोनि वृशिर र कर पाहिए नेत्र र शार्प करिए गम्तया प्यादि संबंधी भनेक रोग करि संयुक्त पापा भर साव घेदना तहाँ पाईर है ॥ १९१ ॥ भाग ते नारया सुधादि करि पारित बाहा भोमन पर है सो - सादिपुरिदानिर्गध पणिमप्प महिय विमंनि। धम्मभरा पंसादिगु असंग्रगुणितागुतसो ॥१९२ ॥ पारिधिनागिय अरनिको रिझो। धर्मभषा शारि सारस्पणिमातरः ॥ १२ ॥ अर्थ- ओकरा तायो wetषा मित्रा निका सीहस्यों भी श्री अमिष दुप मोरनि परिभागिन अपेक्षा दोगे विमानों मांगामिरा शापिकनि रिसात पुगीभ पुस्तकारो१९॥
त्रिलोकसार- आर्गे क्षेत्र संबंधी पदार्थनिकी क्रूरताको दोय गाथानिकरि कहें हैं;- वेदालगिरी भीमा जंतसयुक्कडगुहा य पडिमाओ । लोहणिहग्गिकणट्टा परमूरिगासिपत्तवणं ॥ १८६ ।। वेतालगिरयः भीमा यंत्रशतोत्कटगुहाच प्रतिमाः । टोहनिमाग्निकणान्याः परशुछुरिकासिपत्रयनम् ॥ १८६ ॥ अर्थ-वेतालकीसी आकृतिको धेरै ऐसा महाभयानक तौ तहां गिरि कहिए पर्वत है। बहुरि सैकड़ा दुःखदायक यंत्रनिकरि उत्कट ऐसी गुफा हैं। बहुरि तिष्टती जु प्रतिमा कहिए की आदिकका आकाररूप प्रतिबिंब सो लोहसमान हैं अर अग्निका कणनिकरि संयुक्त है । बहुरि टा असिपत्र वन हैं सो फरसी छुरी खड्ग इत्यादि शस्त्रसमान पत्रनिकरि संयुक्त है ॥ १८६ ॥ कूड़ा सामलिरुक्खा वयिदरणिणदीउ खारजलपुणा । पूहरुहिरा दुगंधा इदा य किगिकोडिकुलकलिदा ॥ १८७ ॥ कूटाः शाल्मलिवृक्षाः वैतराणिनयः क्षारजटपूर्णाः । प्रयरुधिरा दुर्गधाः हृदाय कृमिकोटिकुलकाटिताः ॥ १८७ ॥ अर्थ-बहरि तहां क्टा फहिए असत्य झूठे ऐसे शाल्मली वृक्ष है नाम दृश पर मा सदायफ है । यद्दरि सहाँ चैतरिणी नाम नदी है सो खारा जउ करि सम्पूर्ण भरी है । बहर पूप काहिए विनापना ऐसा रुधिर करि संयुक्त महा दुर्गंध ऐसे दह है ते कोटिक ऋमिनिका करि म्यान होइ रहे हैं। भावार्थ । विक्रियादि करि विना निपजाया क्षेत्रस्यमारकरि तिन दिन वित महा दुःगको कारण पर्यतादि पाईए हैं ।। १८७ ॥ भागे तैमी नदीमा पाइ कहा हो है सो कहे हैं- अग्गिमया घावंता मण्णंता सीपलंति पाणीय। ते बदराणि परिसिप सारोदयदसव्यंगा ॥ १८८ ॥ अग्निभयादात: मन्यमानाः शीतलमिति पानी। ने बतरणी प्रशिक्षारोदकदायमांगाः ।। १८८॥ अर्य-अकि मपर्ने दोहता देनेच ते नवीन नारकी से इहाँ शीतक । मटा सना बटरगी नामा नदी प्रति प्रवेश करि त राजद करि दध - बिना न हो ?।। १८८॥ बरि देने होत मनेगरी का कोई मो को है:- उष्ट्रिय वगंग पृणां अमिपगरणं यानि अपेनि। ठंजामिनिन छिनने यादपदिद।।१८१ ॥ सातापनि। पुन.."":21 amrat ||१८९॥
सोफसामान्याधिकार।
अर्य-
-
मागे तिन नारकोनके शरीरका विलय होनेका विधान हैं हैं:-
अपसगाउस्से पुणे वादाइदम्भपडले वा ।
रहयाणं पाया सब्चे सिग्यं विलीयते ।। १९६ ।।
अनपवर्त्य स्वकायुष्ये पूर्ण वाताहतालपटलमिव ।
भैरयिकाणा कायाः सर्वे शीघ्र विलीयते ।। १९६ ॥
-भुज्यमान आयुका अपवर्तन जो घटना तीह करि जो कदली घात मरण होइ सो
“पर्यायु कहिए । मुश्यमान भायुका अपवर्तन दिना भए जो प्युत मरण होइ सो अनपवायु कहिए
मो नारकांनके शरीर मनपवयं जो अपना आयु ताको पूर्ण होत संत जैसे पवन करि हने मेघपटल
विश्य जाप से सर्य ही शाम विलय हो है। जैसे ही मनुक्ष (य) निकं शरीर मरण भए पीछे
पहे रहै तेसै नारकीनके शरीर पड़े नाही रहे हैं ।।१९६ १
आगे तिन नारकीन करि भोगवनेमें आई हैं जे दुश्व तिनके भेद कहैं है;--
खेचणिदं असादं सारीरं माणसं च असुरफर्य ।
मुंजति महावसरं भवहिदीवरिमसमयोति ॥ १९७ ।।
क्षेत्रजनितं असात शारीरे मानसं च अमुरष्कृतम् ।।
मुंजते यात्रसरं मवस्थितेश्वरमसमयांतम् ॥ १९७॥
अर्थ-क्षेत्र जनित १ शारीर १ मानस १ अमुरहत १९ प्यारि प्रकार असाता यथा अवसर
लिए अपनी पर्यायका संतसमय पर्यंत भोगवे हैं तहां नरक क्षेत्र करि उत्पन्न जो आवरपादि दुःख
सो क्षेत्र जनित कहिये । नरक शरीर करि उत्पन जो रोगादिक दुःख सो शारीर कहिए। आकुल परि.
णामनि करि उत्पन जो आर्त ध्यानादि रूप दुःस सो मानस कहिए तीसरी पृथ्वी पर्यंत संक्लेस परिणा-
मनि करि संयुक्त में असुरखुमार जानिक भवनवासी देव तिन करि कोपा हुवा जो परस्पर लडावना
धात करना इत्यादि दुःख सो अमुरहल दिए । पैसै दुःखके प्यारिभेद जाननें । १९७ ॥
आगे पटल पटल प्रति लिन नारकीना जपन्य उत्तर आयुफो तीन गाथानिकार
पदमिदे दसणउदीवाससहस्साउग जहपिणदर।
तो दिलवस जे असंखपुल्वाण फोडी य॥ १९८ ॥
प्रथमेंद्र के दानयतिवर्षसहसायुका जश्न्येतरत् ।
तात. नवतिला ये असल्पपूर्वाणा कोय ॥ १९८॥
अयं-प्रम पृथ्वीका प्रथम पटल विष जघन्य आयु दश हजार वर्ष है । इनर काहिए
का आयु मोनोरमार वर्ष प्रमाण है । बहुरी गाने पर जो कहिए ? आयु सो सर्व घट
आयु जानना । हा दृ२१ पटल विनि लाख वा प्राय है । तीमग परल वि अमायात
कोडि पूर्व वध प्रमाज यु ? { Arrana Bापन कोटिका पूर्व कहि ॥ १९८ ॥
त्रिलोकसार- सायरदसमं तुरिये सगसगचरमिंदयम्हि इगि तिण्णि । सत्त दस सत्तरसं उचही वार्यास तेत्तीसं ॥ १९९ ॥ सागरदशमं तुरीये स्वकस्वकचरमेंद्रके एक प्राणि । सप्त दश सप्तदश उदघयो द्वाविंशतिः त्रयस्त्रिंशत् ॥ १९९ ॥ अर्थ- चौथा पठल विर्ष एक सागरका दशयां भाग प्रमाण आयु है । इहां से आगै प्रय- मादि सप्तमी पर्यंत पृथ्वीनिका अंतका पटल विर्ष आयु कहिए है सो प्रथमादि पृथ्वीनि वि अन्त एक तीन सात दश सतरह बावीस तेतीस सागर प्रमाण आयु जानना । ११३१७।१०।१७/ २२।३३ ॥ १९९॥ आदी अंतविससे रूऊणद्धाहिदम्हि हाणिचयं । उवरिम जेटं समयणहियं हेहिमजहणं तु ॥ २००॥ आदौ अंतविशेष रूपोनाद्वाहिते हानिचयं । परिमं ज्येष्ठं समयेनाधिकं अधस्तनजघन्यं तु ॥ २००। अर्थ-आदि विर्षे जो प्रमाण हो ताकों अंतकै प्रमाणमें स्यों घटाएं जो प्रमाण होइ तार्को रूपोनाद्धा कहिए एक घाटि पटलका प्रमाणरूप गच्छका भाग दीए हानिचयो कहिए नीचले पटलः पटल पटल प्रति वधनेका प्रमाण हो है । सोई कहिए है-प्रथम पृथ्वी विर्षे चौथा पटल विर्षे आयु एक सागरका दशवां भाग सो तौ आदि कहिए, अंत पटल विपै एक सागर सौ अंत कहिए अंतमेस्यों आदि समछेद विधान करि घटाएं नव सागरका दशमां भाग रह्या तहां तीन पट- टका तौ आयुका जुदा प्रमाण कह्या तातै तिनकों छोडि अवशेष पटल रहे सो इहां गच्छ जाननां । यद्यपि चौथा पटलका भी आयु जुदा जुदा कह्या था तथापि इहां चौथा पटलका आयुकों आदि विर्षे स्थाप्या तार्त भेलि लीया सो गच्छमें एक घाटि कीएं नव सो नव पटलनि विर्षे नव सागरका दशवां भाग वधै तो एक पटल विर्षे कितना वधै ऐसे त्रैराशिक कीएं नवका दशवां भागों नवका भाग दाएं एक सागरका दशवां भाग प्रमाण चय आया सो इतना चय चौथा पटलका आयु गिन मिलाएं पांचवां पटलका आयु दोय सागरका दशवां भाग हो है तामें चय मिलाएं छठा पटल आयु तीन सागरका दशवां भाग हो है ऐसे ही एक एक चय मिलाएं सप्तमादि पटलनिवि-- ध्यारि पांच छह सात आठ नव दश सागरनिका दशवां भाग प्रमाण आयु हो है । वहुरि द्वित यादि पृथ्वीनि विर्षे जो उपरटी पृथ्वीका अंत विर्षे जो आयु कह्या सो तौ इहां आदि स्थापिए ता आदि तो क्रमते एक तीन सात दश सत्रह वावीस सागर प्रमाण है । बहुरि जो विवक्षित पृथ्वीव अंत पटल विर्षे आयु सो अंत स्थापिए तातै क्रमते अंत तीन सात दश सत्रह वावीस तेतीस साग प्रमाण है। तहा अंतमेस्यौ आदि घटाए दोय च्यारि तीन सात पाच ग्यारह मागर रहे । बहु इहा पटटनिका प्रमाण ग्यारह नव मान पाच नीन एक है । मिन वि इहा पूर्व पृथ्वीका अ पटलका आयुकों आदि स्थापन काया ना एक एक और मिलाप वाह दश आठ छह च्यारि प्रमाण गच्छ भया तामें एक घटार कमर्ने ग्यारह नव सात पाच तीन एक रहे मो ग्यारह न दोषमापापधिपार। । -ney न. निदोर रतन मार पाय मागर प्रमान आयु पथै ती 5. Crafana गोनदि पवानिरिक प्रमो दीप साग- TERT पारि मागरमा म र हीन मरा माता भाग सात सागरका mमागरमाभाग भर म्याग मागर प्रमाण पर झापा । सो एक पपको दिन मोटे न लिन पनि पिसाप प्रमाण मार है । सहा दितीय कृषी र की पिटो मागका पाप भाग प्रमाग पर जो प्रपम पटरी पामे तार माग पप गोरेखनीय पटल विर भाउ हो पप फरि वधता पता टीमा जानना | परीचार सूतावादि पृप्यानि कि यमने तीन सात दश सत्रह ग निवि अपना अपना पय जो प्रथम पटल निभाउ होइ । परि अपना अपना - पानिया बायु विक्षमा भपना अपना पप पाएं अपना अपना दिलीपादि पट- आयुरोपरि परि उपरिका पर शिप जो टार भायु फा सो एक समय विकासोनवानीपला पटल विष जपन्य आयु हो है। ऐसा तहाँ प्रथम पटल यि मायु T: नि हजार बरं हा एक ममर अधिक भर दिलीप पटल विश जपन्य भायु हो है । ऐसे ही गयामा पट जानना॥२००॥ लिन मारवानिक पद पटः प्रति हारिफी टपाईका प्रमाण यह है- पहमे मा ति एम उदयं पणुरपणिभेगुल सेसो। दुगुणाम पमिदे रयणितिय नाण हाणिपयं ।। २०१॥ प्रथमे सप्त विप टपः धनरल्गुनि शेरे। शिगुगमन प्रपत्र के निप्रपं जानीहि हानिधपम् ॥२०१॥ अर्प-दम पृयाका मत पटल विष हरीरका टासंघ सात धनुष सीन हाथ छह भंगुल माग है । मारिदिनीयादि पृप्पोका भन-भतपटट दि शरीरया उत्सेध दूणा दूणा क्रमते पांघसै नुए पर्यत जालना | बहरि प्रथम पृथ्वीका प्रथम इंदफ यि रत्नत्रय काहिए सीन हाथ उत्सेध हैं। सधरि करि मुझ तू हानि पप जानि । हानि धयका साधन फेसे सो कहिए है। प्रथम पृथ्वी २ प्रथम पटल विष तीन हाय रमेध सो सो भादि जानना । भर अंतपटल विर्षे सात धनुष नाप सह गुट दामंध सो न जानना तहां तस्यों आदि सीन हाय घटाए सात धनुष *गुल रहे । बारिश पटल प्रमाण रूप गश्च सेगह तामें एक घटाएं बारह ताफा भाग दौनिए हा सात धनुषका भटाईस हाथ या तार्को बाराका भाग दीए दोय पाया तो दोप सौहाथ महरि विशेष प्यारि हाय रहे तिनके गुल कीए छिन भंगुल भए भर छह अंगुल में थे मिलकर कसो दोप भंगुट भए तिनको वाराका भाग दोऐ आठ भेगुल भए अर अवशेष छह भेगुलका हा भागको छह फरि अपवर्तन कोर एक अगुटका दूसरा भाग भया ऐसे प्रथम पृथ्वी हानि चय दोय हाथ सादा आठ भंगुल प्रमाण आया सो उपरि पटटका उत्सेध पि पनी अपनी दंडादिक जानिका क्रम करि मिलाएं वा हस्तादिक कौए नीचले पटल -
९६
त्रिलोकेसार-
कि उसेघ होइ तहां प्रथम पटटका उसेघ होइ तहां प्रथम पदलका उत्सेघ विर्ष का
मियर च्यारि हायका एक धनुष कीरं द्वितीय पटल विय एक धनुष एक हाय साहा आठ अंगुल
प्रमाग उन्सेप हो है । बहुरि यामें सोई चय मिटाएं तृतीय पटल विर्षे एक धनुष तीन हाय सब
मंगुल रसेप हो है । ऐसेंही सर्व पटटनि वि जानना । बहरि द्वितीयादि पृथ्वीनि विर्षे पूर्व पृष्वाच
अंत पटल विषे जो उत्सेध सो तौ आदि पर विवक्षित पृथ्वीका अंत पटल विषे उत्संध सो और
स्थानि र मादिमस्यों अंत घटाईए । बहुरि इहो पूर्व पृथ्वीका मेतपटलकों आदि कया ताले वि.
क्षित पृथ्वी विष जितना पटटका प्रमाण ताते एक अधिक गच्छ करि तामें एक घटाएं विवक्षित
पृथ्वी विय जितना पटलनिका प्रमाण ताका साफी भाग दीए हानिचयका प्रमाण मात्रै तैसे दिदी
पादि पृथ्वी किन आदि तो सात धनुष सीन हाय छह अंगुल भर अंत पंद्रह धनुप दोपहर
बारह भंगुर सहा आदिमेंस्यों अंत घटाए सात धनुर तीन हाय छह अंगुट रहे तिनशे
पर प्रमाण ग्यारह तामा माग दीएं धनुपादिकके हस्तादिक कौएं दोय हाय वीस अंगुठ मार
दोष अंगुटका पारन्ही भाग प्रमाण हानि घय आया। ऐसे ही तृतीयादि चीनिविय मी हानि पर
सान। महरि वारि पृथीका अंगपटलका उसेध विमें अपना अपना चय मिलाएं अपने अपने
कम उमेय होइ । यहरि माना अपना प्रथमादि पटलनिधि मते अपना अपना
Antarन माना द्वितीयादि पटसनि विष उत्सेध होइ। जैसे प्रथम पृथ्वीका अतपरका
उमेरमत नुकसान हाय अगुल तामें दोय हाय दौरा अंगुष्ठ दोप अंगुरका पारम्हा भाग मिगर
RAMEम प23 भाट धनुष दोय हाय दोष भेगुल भर दोय अंगुरका पारम्हा भान
नामा पायों पर मिग द्वितीय पटल में दसैध होइ स अतपास पर्पन
रामहरि ने लिीय पृथी कि विधान का सें हो तुनीयादि पृथ्वीनिवि और
र ॥२.१॥
ने नारसनो भाविज्ञानका पिम्त क्षेत्रका प्रमाण की है
रयग पर पटवीए परी फोमा य माहिरी
नेग पर परिपाली कांगदग्विनियं हदि ॥ २०२ ।।
मानियाधमारः प्रोगाभारित।
मलाप गाजिन माति ॥ २०२।।
अन्ना व पनि था. कोम भnिik भारिशान कर पर
Tihatiश्रा कमो frrent Tte
म711:देव कम भाव मानना ॥ २.२ ॥
मा fulfare 21,-
मिाया गिरमादी मार्ग।
मानो या मनमारिए ॥२.३॥
पणापापाधिपार। from: मासिभी: Fri ! मम ॥२०३ ॥ ६- Ram rat HEART वर्मभूमि में परम गर्भन Meauth merगर मानविन उप । परि समम पीका कि भूमि पनि मिनुक्ष मीन हो ॥२०॥ पदमा नियम मानेका का तर! या सई पसी भाका पिरपपरो परिप रा परपणे तरियपादिणिररारिदो । निरपपरमंगसंमद पिरगनियं परिप पिपमेण ॥ २० ॥ निपपरी मारिरिक परपरिणी मुर्गपरनिनिःएलः । सीमा मित्र मानि नियमेन ।। २०४॥ अर्य-निरपरः करिए मर मिकरा जब सो नारापन पटमद परवाल न हो। परि पाप भाटिया पर महोदापांचमी भारिपात निफस्पा परम शारीरी मोर It : Enापा सकार मी न होसातवी पृष्पीत निकासा मित्रप पर मिश्रा या पासवत महोइ निपम करि । इहा अपलपणा निषेप्या सात सासाद- मवा भीषभाय जानना ॥२०॥ को नरक.पो दाता जानिरा पृथ्वी प्रीि निपम रहे है। ममणसरिमपजिगमफाणिसहियाण मछमणुवाणं । परमादिमु उपची भरपारादो दु दोणियारोचि ॥ २०५॥ यमनस्कसरामपरिहंगमानसिहागा मस्समनुप्पागाम् । अपमारिपु राति: भरधारतस्तु सिधार इति ॥ २०५ ।। अर्प 1-अमनाक करिए असंही पदी भर सरोएप पदिए कृपलास गोधरे आदि जीव भर निगम करिए र आदि सी भर फणी कहिए सर्प भर सिंह फहिए नाहर अरती हरिए मनुक्षणी भरमस्य मनुष्य कहिए मोरटा या मनुक्ष इन प्रथमादि पृथ्वीनिधि अनुकमत नितिर राति भाट पते माप दीप बार पर्यंत जाननी। तहाँ अमनरफ प्रपम नरफि जाय तहस्पिों निकमि मारोई मरिपरि परि इहो ही असंही होइ मरिकरि प्रथम नरक जाय सब एक बार रोप । अमही दाट आठ बार प्रथम नरक जाय । नरकमा निफस्या असंही न होइ साते पाधि एक सही पर्यावा एक अतर जानना । बहुरि सरीसपादिव िएफ अंतर .न महण करना । मरीस्प दूसरे नरकि नाप तहाँस्यों निवासि सरीसप रोइ फेरि दूसरे नरकि जाय ऐसे निरंतर सातवार जाइ । से ही निस्तर विहंगम तीसरे नराक एह पार । फणी चौधे नरफि पांच पार | सिह पांच नावि प्यारि चार खी छठे नराक तीन चार निरंतर उपजे । बहुरि मस्य मनुष्य एय. तर करि साना नरपि. दोय पार उपजे सहा मस्य सातवें नरकि जाय तहांस्पो निकास १.-1 ..९८ त्रिलोकसार- गर्भज तिर्यंच होइ मरि करि फेरि मत्स्य होइ सात नग जाय। इहां नरकका निकम्मा सन्न होइ । मत्स्य सन्मूर्छन हैं तात एक अंतर करा | बहरि ऐसे ही मनु म वि एक संता कर जात सातवां नरकका निकस्या मनुष्य न होई तात वीचिमें एक अंतर कया । ऐमें दोय वा जना जानना । इहां जीवनिक उपजनेका मी ग्यिम जानना । असंनी प्रथम पृथ्वीवित्र हो । द्वितीयादि पृथ्वीनि विर्षे न उपजे। सरीसृप दुनरी पृथ्वी पर्यंत ही उपजै तृतीयादि पृथ्वी । उपजै ऐसे ही विहंगादिकका नियम जाननां । वहरि स्कृष्ट जैतीवार उपजे सो नियन मन असंज्ञी आठ वार ही निरंतर नरक जाय नवमी वार न जाय इत्यादि नियम जानना ॥ २०५६ इहां असंही आदिकके एक वार अंतर होते भी निरंतर ही कहिर है;- चवीसमुहुत्तं पुण सत्ता पक्रमेकमासं च । दुगचदुछम्मासं च य जम्मणमरणंतरं णिरये ।। २०६॥ चतुर्विशतिर्मुहूर्ताः पुनः सप्ताहानि पक्षः एकमासश्च । द्विकचतुःपमासाश्च च जननमरणातरं निरये ॥ २०६ ॥ अर्थ-प्रथमादि पृ निविर्षे क्रम चौवीस मुहूर्त अर सात दिन अर एक पक्ष भर मास अर दोप मास पर ध्यारि मास मर छह मास जन्म अर मरण विर्षे अंतर जानना। भावार्य प्रथम पृथ्वीविर्षे कोई जीव न उपजै तो उत्कृष्टपर्ने चौईस मुहूर्त पर्यंत न उपजे न मेरे चौईन । पीछे कोई टपजै ही उपजै या कोई मरे ही मरै ऐसे ही द्वितीयादि पृथ्वीविय जाननां ॥ २०६ आगै तिन नारकीनिके दुःखका आधिक्य कहें हैं;- अच्छिणिमीलगमेत्तं णत्यि सुई दुक्खमेव अणुबद्धं । णिरए जेरइयाणं अहोणिसं पचमाणाणं ।। २०७ ॥ अक्षिनिमीटनमात्र नास्ति मुखं दुःखमेव अनुबद्धम् । निरये नैरयिकाणी अहनिदर्श पच्यमानानाम् ॥ २०७॥ अर्थ-नेत्रका टिमकारनां मात्र भी मुख नाहीं है दुःख ही निरंतर संबंधरूप पर ' नरफ विर्ष नारकी जीवनि । कैसे है नारकी । अहर्निशं काहए निरंतर दुःखअग्निकरि पप्पमान भावार्य-मिथ्यात्र हिंसादि रोदयान बहुत भारंभ परिग्रह इत्यादि पापनिकरि जीव नरकि - सहा ऐमै दुःख पार है । तातै मिथ्यावादि पापनिका त्याग ही करना योग्य है ॥ २० ॥ ॥ इति नरकके सरुपका वर्णन सम्पूर्ण मया ।। इति श्रीन मिचन्द्राचार्यविरचित मिलाकमार लोकमामान्याधिकारः ॥ १ ॥ ।
भवनाधिकार।
भवनाधिकार ॥ २॥
अथ लोकका सामान्य वर्णन करित भवणबेतर' त्यादि पूर्वोक्त गांधामूत्र फरि पंच अधि-
कार सूचन कौए तिन वि से ही अनुक्रमकरि भवनाधिकारको आरंभ करताः संता तिन भव-
ननिका आधारभूत जो रत्नप्रभा पृष्पी बहरि साह रत्नप्रभा पृथ्वौकी सहचारिणी जे शर्करा प्रमा
प्रादि पृथ्वी बहरि तिन पृथ्वीनिवि भान जे नरनिके पटल बहुरि तिन पटलनि प्राप्त जे नारकी
तेनका भायु आदिक इन सबनिको प्रसंग पाइ म्याल्यान फरि विवक्षित प्रथम भवनाधि.
कार ताों कहने की है इग्छा जाय ऐसा भाचार्य मो तौह भानाधिकारकी आदि वि भवनठोक
संबधी जे चायालय तिनकों वंदना करता संता ऐसा मंगल सूत्र कहै है-
भवणेमु सत्तकोडी यावत्तरिलक्ख होति जिणगेहा ।
भवणामरिंदमहिया भवणसमा ताणि वदामि ।। २०८॥'
भवनेषु सप्तकोश्या द्वासप्ततिलक्षाणि भवति जिनगेहानि ।
भवनामरेंद्रमहितानि भवनसमानि तानि वंदे ॥ २०८॥
अर्थ-भवननिविय सात कोहि पहचरि लय जिन मंदिर है भवनवासी देव वा तिनके
दिनिकरि पूजनीक है । यद्दरि भवनवासी देवनिके जे ते भवन है तिनहीके समान संख्याको धेरै
।। जाते एक एक भवनवि एक एक च.यालय है । तिन चैयालयनिकों में पैदा हो ॥२०॥
मागें भवनिवासी देवनिका कुलभेद आदि तीन गाथाकरि फहे हैं-
अमुरा णागवण्णा दीपोदाहिविजुपणिददिसअग्गी ।
वाददुमारा पढमे चमरो वइरोइगो इंदी ॥२०९ ।।
अमुरो नागमुपर्णो दीपोदविवियनस्तनितदिगमयः ।।
यातकुमारः प्रथमे चमरी वैरोचन दः॥२०९॥
अर्थ-अमुरकुमार १ नामकुमार १ सुपर्णकुमार १ दीपकुमार १ उदधिकुमार १ विधु-
कुमार १ स्तनितकुमार १ दिवकुमार १ अमिकुमार १ पातकुमार १ देस भवनवासी देवनि के दा
इल है । तिनि विर्षे पहले अमुरखुमार पुरविण समर भर वैरोचन ए दोय र १२०९ ॥
भूदाणंदो परणाशंदो वेश् य वेणुधारी ।
पुण्णवसिह जलापह जलफनो पोसमपोसो ॥२१०॥
भूतानो परणानंद: वेणुध रेणुधारी च ।
पूर्णवशिष्टौ जटप्रभः जटपतिः घोपमहायोगी ॥ २१०॥
१०० बिलोकसार- अर्थ-नागकुमार कुलविय भूतानंद धरणानंद ए टोय इंद्र हैं । मुर्गिकुमार कुल दिने येशु अर वेणु अर वैगुधार्ग दोय इंद्र हैं। दीपकुमार कुछ विष पूर्ण वशिष्ट ए टीय इंद्र है। टरि- कुमार कुल बिय जलप्रम जलकांत ए दोय ईं हैं। विद्युकुमार कुल वि घोष महायोग टोय इंद्र है ॥ २१० ॥ हरिसेणो हरितो अमिदगदी अमिदवाहणग्गिसिही । अगीवाहणणामा बेलंधपमंजणा सेसे ॥ २११ । जुम्म । हरिपेणः हरिकांत: अमितगतिः अमितवाहनः अग्निशिखी। अग्निवाहननामा घटबप्रमजनौ शेपे ॥ २११ ।। युग्मं । अर्थ-स्तनितकुमार कुल वि हरिषेण हरिकांत ए दोय इंद्र हैं । दिक्कुमार कुट वि. अमितगति अमितवाहन ए दोय इंद्र हैं। अग्निकुमार कुल विर्य अग्निमिग्वी अग्निवाहन नाम ए देश इंद्र है। यातकुमार कुलविर्ष वेठ्य प्रमंजन ए दोए इंद्र है। ऐसे शेषनागादि कुळ वि ई- जानने || २११॥ आँगै तिनके परस्पर ईपीका स्यान कहें हैं;- चमरो सोहम्मेण य भूदाणंदो य वेणुणा तसि । विदिया बिदियेहि समं ईसंति सहावदो णियमा ॥ २१२ ।। चमरः सौधर्मेण च मूतानन्दश्च वेणुना तेषां । द्वितीया द्वितीयैः समं ईयेति स्वभावतो नियमात् ।। २१२ ॥ अर्थ-धमर इंद्र तो सौधर्म इंद्र सहित अर भूतानंद इंद्र वेणु इंद्र सहित अर लिन द्वितीया जे दूसरे वैरोचन और धरणानंद ते द्वितीयैः समं कहिए दूसरे ईशान इंद्र अर वेणुधारी हैं। तिन सहित ईयन्ति कहिए ईपी करें हैं । स्वभाव ही ते कारण विना ही नियम करि इनके देखें पर्दा हो है ॥ २१२ ॥ भाग लिन असुरादिकनिके चिन्ह कहें हैं;- चूडामणिफणिगरुडं गजमयरं वडमाणगं यज । हरिकलसस्सं चिई मरले चेत्तमहमाह धया ॥ २१३ ॥ चूडामणिमणिगाई गजमकर वर्धमानक वन । हरिकलशाव चिह्न मुकुटे चैन्पद्रुमा अप घनाः ॥ २१३ ॥ अर्थ-अगुर कुमारादिकनिकै अनुक्रमर्ने चूडामणि रत्न अर सर्प अर गण्ड अर हाथी की ...! साथिया भर या मर सिंह कलश अर घोडा मुकट वि चिन्ह जानना । मुट ... है सो निनका चिन्ह हैं । अथवा जुद्दी जुदा जातिय चन्यवृक्ष यहरि मजा लि. tatas चिद है ।। २१३ ॥ Mi बयाशनिक भेदनिको कहें हैं- ।
भवनाधिकार। १०१ अस्सत्यसत्तसामलिजपूर्वनसकदंबकापियंम् । सिरिस पलासरायमा य असुरादिचेचतरू ॥ २१४ ॥ अश्वत्यसप्तउदशाल्मलिजवेतसकदंबकप्रियंगवः । शिरीषः पटाशराजदुमौ च अमुरादिचैत्यतरवः ॥ २१४ ॥ अर्थ-अवय वृक्ष अर सप्तपर्ण वृक्ष अर शाल्मली वृक्ष अर जे वृक्ष भर घेतम वृक्ष अर कदैव वृक्ष भर प्रयंगु पक्ष अर सरिसौं वृक्ष अर पलाश वृक्ष अर राजद्रुम कहिए किरमाला वृक्ष अनुक्रमते असुरकुमारादिकानिके चैत्यक्ष है ॥ २१४ ॥ आगे चैत्यरक्षानिके साधिकपनांकों व करें हैं;- चेचतरणं मूले पत्यं पडिदिसम्हि पंचेव । पलियंफठिया पडिमा सुरश्चिया ताणि वंदामि ॥२१५॥ चैत्पतरूणां मूले प्रत्येक प्रतिदिश पंचैत्र । पर्यकस्थिताः प्रतिमाः मुरार्चिताः ताः पैदे ।। २१५ ॥ अर्थ-चैयक्षानिके मूल विर्षे प्रत्येक प्रतिदिशा विर्षे पांच पांच प्रतिमा पर्पक भासन कार स्थित देवनिकरि एजित हैं । तिन प्रतिमानिकों पैदों हों । भावार्य । एक एक चैत्यक्ष नी एफ एक दिशावि पांच पांच जिनबिंब पंक्ति करि विराजमान हैं। तातें वृक्षनिकों चैत्यक्ष काहिर है ।।१५॥ आगै तिन प्रतिमानिके भागे तिटते जु मानस्तंभ तिनका स्वरूप कहें हैं:- पडिदिसयं णियसीसे सगसगपडिमाजुदा विराजति । तुंगा माणत्यमा रयणमया पडिदिसं पंच ॥ २१६ ॥ प्रतिदिश निजशी सप्तसप्तप्रतिमायुता विराजते । तुंगा मानस्तंभा रत्नमपा प्रतिदिस पंच ॥ २१६ ॥ अर्य-दिशा दिशा प्रति अपने उपरिम भागविर्षे सात सात प्रतिमा संयुक्त उत्तुंग रन- मई मास्तम दिशादिशा प्रति पांच पाच विराजे हैं ॥ भावार्थ । एक एक प्रतिमाके आगे एफ एक मानस्टम हैं मान दूर करनेकों समर्थ उंचा पांभा है । सो पैयक्षकी एक एक दिशा ति पाच पांच मानस्तंभ भए । यहरि तिन मानस्तभनिके उपरि एक एक दिशा प्रति सात सात बिनर्षिय विराम है॥ २१६॥ आगे भवनवासी इंद्रनिकें भरगनिकी संख्या जगापना मूत्र कहे हैं; पोसिं पउदाल अस्तीस छवि ताल पण्णाम। घउपविहीण साणि य इंदाणं भवणलपखाणि ॥ २१७ ॥ चतुर्विंशचतुश्चवारिसदाशित् पट्म भरि पचारिंशत् चाशत् । पतुचविहीनानि सानि च दागा भश्नरशागि ॥ २१ ॥ अर्प-चौतीस अर वशीस भर भलीम र एनिविद पारीत भर पचास कर र ईदनि प्रति प्यारि पारि पाटि ऐसे इदनिके भवननिके एस जानने । भारार्थ । एक एक कुट :- १०२ त्रिलोकमार- - वि दोय दोय इंद्र कहे थे तहां दोऊनि विर्षे पहले जाका नाम कहा सो दक्षिणेंद्र है अर पीछे जाका नाम कह्या सो उत्तरेंद्र है । दक्षिण दिशाके भवन विर्षे जाका यास पाईए सो दक्षिणेंद्र जाननां । अर उत्तर दिशाके भवन विर्षे जाका वास पाईए सो उत्तरेंद्र जानना | तहां अमुर कुमार कुल वि दक्षिणेकै तौ चौतीस लाख भवन हैं.1 उत्तरेंद्रके तीस लाख हैं मिलि करि चीसठि लाख भए । बहरि नागकुमार कुल विर्षे दक्षिणेद ती चवालीस लाख हैं उत्तरेंद्रके चालीस लाख हैं मिटकर चौरासी लाख भवन भए । बहुरि मुपर्णकुमार कुल वियें । दक्षिणेंद्र भटतीस लाख है अर उत्तरेंद्र के चौतीस लाख हैं मिलिकरि बहत्तर लाख भवन भए ।दीप कुमारादि छह कुलनि विर्षे एक एक कुल वि दक्षिणेंद्रके चालीस लाख है उत्तरेंद्रकें छत्तीस लाख हैं मिलिकरि छिहचरि लाख भवन भए । बहुरि वातकुमार कुल विर्षे दक्षिणेंद्र, पंचास लाख हैं उत्तरेंद्र छियालीस लाख हैं मिलिकरि छिन लाख भवन भए ऐसे दशौं कुटके सर्व भवन सात कोडि वहत्तरि सास जाननें ॥ २१७ ॥ आगै तिन भवननिका विशेष स्वरूप कहें हैं;- ससुगंधपुप्फसोहियरयणघरा-रयणभित्ति णिचपहा । सबिदियसुहदाइहिं सिरिखंडादिहिं चिदा भवणा ॥ २१८ ।। ससुगंधपुष्पशोभितरत्नधरा रत्नभित्तयः नित्यप्रभाः । सर्वेदियसुखदायिभिः श्रीखंदादिमिश्चिता भवनाः ॥ २१८ ॥ अर्थ सुगंध फूलनिकरि संयुक्त सोभायमान रत्नमयी जिनकी भूमि हैं । बहुरि रत्नमई ही जिनकी भीति हैं नित्य प्रकाश संयुक्त हैं सब इंद्रियनिको मुखदायक जे चंदनादि वस्तु तिनकरि सिंचित हैं ऐसे भवनवासी देवनिके भवन हैं ॥ २१८ ॥ आगै तिन भवननिविर्षे जे देव हैं तिनका ऐश्वर्य कहैं हैं;- अहगुणिडिविसिहा णाणामणिभूसणेही दिवंगा। अँजति भोगमिदं सग्गपुवतवेण तत्य मुरा ॥ २१९ ॥ अष्टगुणविविशिष्टाः नानामणिभूषणैः दीतागाः । मुंजंति भोगामिष्टं स्वकपूर्वतपसा तत्र सुराः ॥ २१९ ॥ अर्थ-तहाँ जे देव हैं ते अणिमा महिमा आदि आठ गुण ऋद्धि करि विशिष्ट है बडुर नाना प्रकार मणिका आभूषणनि करि प्रकासमान है अंग जिनका ऐसे हैं । ते अपना पूर्व कीया तपका पल करि इटभोगकों भोग है ॥२१९ ॥ आम ते भवन भूमिगृह की उपमा धरै हैं जैसे इहा पृथ्वीविर्षे मदिर यनाईए ताका नाम प्रवृत्ति विौं तहखाना करिए है। तैमैं परभाग पकभागम्प रत्नप्रभा पृथ्वीविय भवन जानने । हा प्रश्न । जो नरक पिट भी मैं ही पृथ्वी वि को नहा विट मशा भई इहा भग्न महा भई मी कारन कहा । नाका समागन । जमे हा विष नियंचादिक पारी जोगनिक स्थान निनको विट वहिर है । भर पुन्यरान मनुशानक रहने के स्थान निनका भूमिगृह काहिए है। तेमै नारकी - भानाधिकार। Marathi भानामा परेर पुज्यवान देवनिक, रहने के स्थानानिको भवन को मार लिया वर्णन कि भूमिगृहात याहेको दाया विरनि. Nrnrani गाका मान (ो भूमिका र परि पटरानिया का इद्रयादि निमिया मा. पानिप है, ता! गमिगृहका न दिया । में भूमि की उपमा धेरै भवन निनया मागादिक को है, भोपणगंग्यागनाकोडी मचित्य परस्सा। तिमयं पाले मनपरि सयगर च ॥ २२० ॥ पोरनमयासत्याप्रसारस्तु चतुगाः । दिसत धान्य मध्य प्रति मागेकस्टम ॥ २२० ॥. अर्थ -उपन्य तो मत्यात कोटि योजन पर टप असंस्थात फोडि योजन प्रमाण तिन भवनानिका विस्तार । धौलई या हयाईका इराना प्रमाण है। यहरि से भवन चौकोर है । यहरि लिनका मानसे पोजन पारल्य है। भूमि सानि पर्यत इलने उधे हैं । बहुरि एक्स एफ भवन प्रति मध्यबिगी पोजन ऊंचा एक पर्यत है। ताफे उपरि चयालय हैं ।। २२०॥ गनिन भवननिका पानकनिकों दोय गाथानि पर याहै है- तर अप्पमहरियमग्निममपणामराण मरणाणि । भूमीदोषो इगिदुगपादालसहस्सइगिलखे ॥ २२१ ।। म्यतराणा अल्पमहर्षिकमध्यमभवनामराणा भवनानि । भूमितोमा एफरिफदाचारिशसहसएफरक्षाणि ॥ २२१ ।। अर्थ-चित्रा भूमि एगाय ना नीचे एक हजार योजन जाइ करि तौ व्यतरानिके भावास है । परि दोय हजार पोजन आय थल्प माद्धियः धारक भवनवासानिफे भवन है । बहुरि वियालीस हजार भोजन जाइ महासादिके धारक भवनवानिके भवन है। बहुरि एफ टक्ष योजन जाद मध्यम अाद्धिके धारक भवनषासनिक भवन हैं ॥ २२१ ॥ रयणपहपंकटे भागे अमुराण होति आवासा । भौम्मेमु रखपसाणं भवसेसाणं खरे भागे ॥ २२२ ॥ रत्नप्रभाषकाढो भागे अमुराणां भवति भावासाः। भीमेषु राक्षसानां 'अयशेषाणा खरे भागे ।। २२२ ॥ अर्थ-रत्नप्रभाफा पैकमाग चिपै अमुरकुमारानिके भयन हैं। यहरि प्यंतरनि विपें राक्षश- निके सहाही भावास है । महरि अवशेष नागकुमारादि भवनवासीनिक भवन या राक्षस विना सात नातिके व्यसनिक आवास खरभागविर्षे पाईए हैं ॥ २२२ ॥ भार्ग देवनिक इंद्रादिफ भेद कहैं हैं;- इंदपटिददिगिंदा तेत्तीससुरा समाणतणुरक्खा । परिससयआणीया पडण्णगभियोगकिन्भिसिया ॥ २२३ ॥ 1 १०४ त्रिलोकसार- इंद्रप्रतीददिगींद्राः त्रयस्त्रिंशसुराः सामानिकतनुरक्षकौ । परिपत्रयानीको प्रकर्णिकाभियोग्यकिल्विपिकाः ॥ २२३ ॥ अर्थ-ईद्र १ प्रतींद्र १ दिगींद्र कहिए लोकपाल १ प्रायस्त्रिंशदेव १ सामानिक १ तनुर- क्षक १ तीन प्रकार पारिपत् १ अनीक १ प्रकीर्णक १ आभियोग्य १ किल्यिषिक १ ऐसे भेद जाननें ॥ २२३ ॥ आगें इन इंद्रादि पदवीनिका दृष्टांत कहैं हैं;- रायजुवतंतराए पुत्तकलत्तंगरक्खवरमझे । अवरे तंडे सेणापुरपरिजणगायणेहि समा ॥ २२४ ॥ राजयुवतंत्रराजैः पुत्रकलबांगरक्षवरमध्येन । अवरेण तंडेण सेनापुरपरिजनगायकैः समाः ॥ २२४ ।। अर्थ-जैसे इहां राजा तैसें इंद्र हैं । बहुरि जैसे युवराजा तैसैं प्रतींद्र हैं । बहुरि जैसे तंत्रादि राजा कहिए सेनापति तैसें लोकपाल हैं । बहुरि जैसे राजाका पुत्र तैसें तेतीस देव हो हैं ते वायस्त्रिंशत्क हैं । बहुरि जैसे राजाक कला तैसें इंद्रकीसी समानताको धरै सामानिक हैं । बहुरि जैसे राजाके अंगरक्षक तैसें तनुरक्षक हैं । वहुरि जैसे राजाके सभाविर्षे तिष्टने पोग्य होहिं तैसे पारिपत् हैं। ते तीन प्रकार-तहां जैसे उत्कृष्ट माहिली सभा विष तिष्ठने योग्य तैसें अतः पारिपद जानने । बहुरि जैसे मध्य वीचिकी सभा विर्षे तिष्टने योग्य तैसे मध्य पारिपद जानने बरि जैसे जघन्य बाह्य समावि तिष्टने योग्य तैसें याह्य पारिषद जाननें । ऐसे तडसेन फहिए तीन प्रकार समा फरि समान जाननें। बहुरि जैसे राजाकें हस्ती आदि सेना ऐसे अनीक है अनीक जातिके देव ही हस्ती आदि आकाररूप अपने नियोगते हो हैं। बहुरि जैसे पुरजन व्यापारी से प्रकीर्णक हैं । बहुरि जैसे परिजन दास आदि तैसै आभियोग्य हैं | बहुरि जैसे गायक गावने आदि क्रियात आजीविकाके करन हारे से किल्यपक हैं। ऐसे देवनिके भेद जानने ॥ २२५ ॥ भागे प्यारि प्रकार देवनि वि इंद्रादिक भेदानकै संभवनेका विधान कहें हैं। पेतरजयसियाणं तेत्तीससुरा ण लोयपाला य । भवणे फापे सच्चे इति अहमिदया तत्तो ॥ २२५ ॥ प्यंतरण्योनिशाणा प्रयस्त्रिंशत्मरा न लोकपालाः च । भवने कल्पे सो भति महमिंद्रयाः ततः ॥ २२५।। अर्य-यंतर भर ज्योतिषी इनके तौ वापत्रिशत् देव यद्दरि लोकपाल र दोय भेद नाही हैं । बहरि भवनवामी भर स्वर्गवामानि विग सर्व पूर्वोक्त, भेद है। यहरि ताते महमिद है ने सर्व ही ममान है । हीनाविकपना तहा नाही है ॥ २२५॥ आग भानवामीनिमिप हुदायिक पारिपत् नानप्रकार पर्यन्त देवनिकी सध्या तीन गाथानि- की कहे १,- -- स्वर्गनिके उपर । अर भवनाधिकार। १०५ इंदसमा हु पडिंदा सोमो यम वरुण तह कुवेरा य । पुख्वादिलोयवाला तेत्तीससुरा हु तेतीसा ॥ २२६ ॥ इंद्रसमाः पलः प्रतीदाः सोमो यमो यरुणस्तथा कुवेरथ । पूर्वादिलोकपालाः प्रपत्रिशमुराः हि प्रायविंशत् ।। २२६ ॥ अर्थ-इंद्रके समान प्रती हैं। एक इंद्र एक प्रतीद जानना । बहुरि पूर्वादि दिशानिर पारि लोकपाल हैं। सोम १ यम १ यरुण १ कुबेर १ तिनके नाम हैं। बहुरि प्रायस्त्रिंशत् देव तेतीस हैं ॥ २२६ ।। चमरतिये सामाणिपतणुरपखाणं पमाणमणुकमसो । अहसोलफदिसहस्सा घउसोलसहस्सहीणकमा ॥ २२७ ।। चमरत्रिके सामानिकतनुरक्षाणां प्रमाणमनुक्रमशः । अटपोडशकृतिसहस्राणि चतुःपोडशमहस्रहीनत्रमाणि ।। २२७ ॥ अर्थ- -~-चमर आदि तीन ईदनिविणे सामानिफ अर सनुरक्षक अनुक्रमः भाट सोटहका वर्ग प्रमाण हजार बहरि प्यारि हजार अर सोलह हजार घटता क्रमतें जाननें । भावार्य घमरेंद्रके सामानिक देव तो चौसठि हजार है । भर सनुरक्षक दोय टास एप्पन हजार है। यहीर वैरोचन के सामानिक साठि हजार हैं। अर तनुरक्षक दोय लारा चालीस हजार है। यदि भूतानंद इदफे सामानिक छ रन हजार है । तनुरक्षक दोय लाल चौईस हजार है ॥ २२७ ।। पप्णसहस्स बिलवरखा सेसे तहाण परिसमादिल्छ। अहरवीस उपउसहस्स दुसहस्सबाहिकमा ॥२२८ ॥ पंचाशत्सहस्राणि हिट शेषे तस्थाने परिषदादिमा । भरपडर्विश पट्चतुःसहस्राणि दिसहसरधिक्रमाः ।। २२८ ॥ अर्प-शेप जे अवशेष नागकुमारादिकके सत्रह दतिनवि सामानिक चास हजार हैं। तनुरक्षक दोय राख है । यहरि तिनही स्थानकनिविर्षे परिपत् कहिए है। मादिको भर परिपत् घमरेंद्र अटाईस हजार, धेरौचनकै उम्मीस हजार, भूतानंदको सह हजार, अपरोप सानिय प्यारि हजार है। पहरि श्रतः परिपत्का प्रमागर्ने मय परिपन दोष दोय हजार पधने जाने महरि मय परिपत्ते मात्र परिषत् दोप दोय हजार पचने जाननें ॥२२८ ।। मागे सोनों परिपत्का विशेष नाम फहें है- पहमा परिसा समिदा रिदिया चंदोति णामदो होदि। तदिपा जदुअरियाणा एवं सन्ने देवेसु ।। २२९ ॥ प्रपमा परिपन समिन द्वितीया पैदा इनि मामतो भवति । तृतीया जमाभिधाना एवं सतु देवेषु ।। २२९ ।। अर्थ-प्रथम परिपत् समिन ऐसे नाम ५ है । दूसरी पा से माने दुभ है। तीसरी जतु ऐसे नाम युन है । ऐसे सर्व देवानी समानि माम जानने ॥ २२९॥ -- नि०११ त्रिलोकसार- - अब आनीकके भेद अर तिनकी संख्या को है;-- सचेव य आणीया पत्त्यं सत्तसत्तकक्खजुदा । पडर्म ससमाणसमं तदुगुणं चरिमकक्सोति ।। २३० ।। सप्तैव च आनीकाः प्रत्येक सप्तसप्तकमयुताः । प्रथम स्वसामानिकसमं तद्विगुणं चरमफलं इति ।। २३०॥ अर्ध -सात ही आनीकके भेद है.तहां एक एक भेद विर्षे सात सात कश फहिए और हैं। तहां प्रथम आनीकका कक्षधिय प्रमाण अपने अपने सामानिक देवानिके समान है। तातें दूणां दूणां प्रमाण अंतका कवधिय पर्यंत जाननां । तहां चमरेंद्र के भैंसानिकी प्रथम फौजी चौसटी हजार भैसे हैं । ताते दुणे दूसरी फौजवि मेसे हैं । ऐसें सातई फौज पर्यंत दूगें इनें जाननें । बहुरि ऐसे ही इतने इतने ही घोटकादिक जाननें । याही प्रकार औरनिकों यया संमत्र प्रमाण जांनि टेना ॥२३० ।। मागें गुणकाररुप उच्चरका अनुक्रम करि भया जो साती आनीकमा प्रमाण ताके सार- नेको जहां स्थान स्थान प्रति गुणकार होइ ताके जोड देने का कारणसूत्र कहें हैं;- पदमेते गुणयारे अण्णोणं गुणिय स्वपरिहीणे । रुऊणगुणेण हिए मुहेण गुणियम्मि गुणगणियं ।। २३१ ॥ पदमानान गुगकारान् अन्योन्यं गुणयिन्या रूपपरीहिणे । रूपोनगुणेन हते मुसेन गुगिने गुणगणितम् ॥ २३१ ॥ अर्थ-स्थानकनिका प्रमाणरूप जो गच्छ सो पद कहिए भर स्थान स्थान प्रति जितने गुणकार मो गुणकार कहिए सो पदका प्रमाणके समान गुणकार माहि तिनकों परस्पर मुगिर बहरि जो प्रमाग होइ तामें एक घटाईए यहरि ताको एक पाटि गुणकारका भाग दीजिए । बारि टन्य प्रमाणको मुग्व डॉ आदि पि प्रमाण ताहिं करि गुगिए । ऐसे करने गुण संकलन हो है। सो इहाँ सात का है ताते पदका प्रमाग सात है । पर इहां दुर्गा दूर्गा क्रम का तात गुगर दोर है । मो सात नायगा वा माडि ARAR२२ परस्पर गुणें एकसी अटाईस हो। पाने एक पटार एकमो मनाईम होइ । यद्दरि एक पाटि गुणकार एक ताका माग दौर से मटाईम इनको भरम कशापा प्रमाण मा मुग चौमटिहजार करि गुणें इस्लामी साा भत हजार एक बादिकी सना भई पाकों सात करि गुणे मानों आतिक समस्त मानीक देवनिय मच की मरमट टास टिनो हजार चौरेंद्र में जानना । हो गचन आदि में रसा जानि रैना । बहरि हाँ पदमेने गुगार इत्यादि करण मूत्र की या जिनमत दमदाराबर्गन मगत टीका मानना ॥ २३१ ।। अब मार्ग मंदका समय दर यानिशी - भगुरम्म पहिसानुगायपादानी मंग गंपा। मिपानीय महामार्ग हा पाय॥ २३२ ।। 1 भवनाधिकार। १०७ भररस्य महिपतुरगरथैभपदातयः क्रमेण गंधर्षः । नृयानीक महत्तरा महत्तरी पट एका च ॥ २३२ ॥ अर्थ-~भमुरकुमार भैसा १ घोडा १ रथ १ हाथी १ पयादा १ गंधर्ष १ नृस्पकी १ सान प्रकार सेना है। सहा पहली छह सेना विर्षे महत्तर है एफ नृत्यकी सेना विर्षे महत्तरी है भावार्य | भेमा मादिक छह जातिकी सेना विषे ती प्रधान देव हैं । पर नृत्यकी सेना विर्षे धान देवांगना हे ।। २३२॥ णावा गरडिभमपरं फरभ खग्गी मिगारिसिविगस। पदमाणीयं सेसे सेसाया हु पुज्यं व ॥ २३३ ॥ नोर्गरदेभमकर फरमः सङ्गी मृगारिशिविकाश्चम् । प्रथमानांक शेपे शेपानीकास्तु पूर्व इव ॥ २३३ ॥ अर्थ-अमुरनिकें प्रथम आनीक भैसा कह्या था भवशेष नागकुमारादिक क्रम” नाय १ सर्प १ गरुट १ हापी १ मांउटा १ ऊट १ सूर १ सिंह १ पालिका १ घोडा १ प्रथम रानीक हैं। ऐसे प्रथम आनीकवि तो भेद हैं अन्य अवशेष भानीक पूर्वोक्त असुरनिके तमान है ।। २३३ ॥ मार्ग भवनवासी देव असंख्याते हैं ताते प्रकीर्णादिक देव गाथानि विर्षे विना कहें भी असं- यात जानिए यात तिनका प्रमाणको न कहि करि अब अमुरकुमारादिनकि देवागनानिकी संख्या य गाथानिकरि फहे हैं;- असुरतिए देवीओ छप्पण्णसहस्स तत्थ वल्लभिया । सोलसहस्सं एकसहस्सेशृणकमो होई ॥२३४॥ अमुरत्रिके देव्यः पट्पंचाशसहस्राणि सत्र पट्टभिकाः । षोडशसहस्राणि पट्सहस्रेणोनक्रमो भवति ।। २३४ ।। अर्थ-अमुरादिक सीन विर्षे अमुरफुमारका इंद्र देषागना छप्पन हजार है तिनवि सोलह हजार बलभिका प्यारी देवांगना है पांच महादेवी हैं सो पार्टी कहेंगे । भर पांच घाटि चालीस जार परिवार देवी हैं । बहुरि औरनि विर्षे छह छह हजार घाटि है सो नाग कुमारका इंद्रकें चास हजार देवी हैं । मुपर्णकुमारका ईदकें चवालीस हजार है ॥ २३ ॥ पनीस घे सहस्सा सेसे पण पण सहदेवीओ। तिगु अह छस्सहस्सं विगुचणामूलतणुसहियं ।। २३५ ।। द्वात्रिंशत् वे सहस्राणि शेपे पंच पंच स्वज्येष्ठदेश्यः । त्रिषु अष्ट पट्सहस्रं विकुर्वणामूलतनुसहिताः ॥ २३५ ॥ अर्थ-शेप द्वीप कुमारादिकवि इंद्रके बत्तीस हजार देवांगना है सिनविर्षे दौय हजार बलमिका हैं । बहुरि कही जु देवागना तिनविर्षे पाच पांच ज्येष्ट देवी कहिए पटराणीवत् महा- देवी हैं । बहुरि तिन अमुरादि तीनविषै भर अवशेष द्वीपादि विर्षे ज्येष्ठ देवीके माठ हजार उह - त्रिलोकसार- हजार म्ह सारीर सहित विक्रिया है । अनुरादि तीन विय एक एक जेष्टदेवी विक्रिया करै तौर हजार देवांगना रूप होइ तामें एक बार म्ल अर अन्य विप्रियारूप देवी होइ देसे ही सबसे नि एक एक पेटदेवी विक्रिया करै तौ मूल शरीर सहित छह हजार देवांगनारूप होइ ॥२३ में चर और वैरोचन इंद्रके पादेवीनिके नाम कहे हैं;- किह मुमेघ मुझड्डा रपणि य जहित्यि पउम महपउमा। पउमसिरी फणयसिरी कणयादिममाल चमरदुगे ॥ २३६ ॥ या सुमैया मुकाया रानी च ज्येष्ठातिपः प पहा पीः कनकसी: कनकादिमाला चमरदिक ।। २३६ ॥ अर्य-या १ मुनेघा १ मुका १ मुकामा १ रंनी च चमरेद्र उपे सौ पज १ मगरात्री १ कनरुती फनकमा १९ पंच थैरोचन ईद उपे । में मार रिकी पेट ली है ॥ २३६ ॥ नोकपाड प्रायग्निशरसामान्यक इनकें ईदके ममान ही देवांगना पर में समान कहि औरनि देवांगनाका प्रमाग तीन गापानि करि कर, भाइन निसय पणामणे कर्म तु पपरदुगे। पारिमदेशी जागे विमयं तु ससहितालसये ॥ २३७ ॥ hai विशन पंचाशनः क्रमम्नु धमकि । पादियः नागे ति तु साटिचयाशित ॥ २३७ ॥ अर्ग-प्रदान गरी पचास पाटि मर्ने चमतिकति पारिवानि में देगी जानन माग 7th पारिपनि माईम मय पारिवानिक दोगे यापारिनिar मदद : पारिपनि तीन मय परिणाम के बहाने दिया? पर नगमा भर: पारिदिनिका दोर मय पारा म तिपकमा भाग देना ॥ २३७ ।। गार मंग गोष्टग गदगदगगंगुण तु बीगणा। मयमरावी पंगमानगगंगाकमार्ग ।। २३८ ।। दाना। र Trear ॥ २३८।। -- inar भाग 4 १२ - Teter 17 Maratti ............ । - भवनाधिकार। सेणादेवाणं पुण देवीयो तस्स अद्धपरिमाणं । सव्वणिगि मुराणं पचीसा होति देवीओ ।। २३९ ।। सेनादेयाना पुनः देव्यः तस्य अर्धपरिमाण । सनिमुराणां शाशियति देव्यः ॥ २३९ ।। अर्थ-सैना देयनिक देवी तिन सेना महत्तरकनै अर्द्ध प्रमाण है। भावार्थ-मानीक देवनिके पचास देवांगना है, यहोर सर्व निकृष्ट देवनिक पचीस देवांगनी है कोई ही देव बत्तीममों पाटि देवांगना न होय ॥ २१९॥ भागे भवनासीनिकै था आगे पाहिए जे ध्यंतर तिनकै जघन्य टटट आयु करे - अमुरादिचदुमु सेसे भोम्मे सायर तिपक्षमाउम्स । दलहीणफर्म ने दसवाससहससमयरं तु ॥ २४० ॥ अमुरादिचतुर्प शेषे भौमे सागर त्रिपल्यं आयुष्यम् । दटहीनक्रमः ज्येष्ठं दशवर्षसह अय ॥ २४० अर्थ-अमुरादि प्यारनिविर्षे, शेप भवनवासी नियिय, भीम जो तर साह विच प्रमा सागर सीन पल्प आधी पाटि क्रम लिए उत्कृष्ट मायु है । भावार्थ-अमुरकुमार िएक मागर नागयुमार वि सीन पत्य मुपर्णकुमारविय अढाई पल्प द्वीपयुमारविष दोय पन्य भर CE जातिके भवनवासीनिवि न्यौह पल्य म्पतर देनिवि एक पत्य भाय है ।बरि पनि ही विष जघन्य भायु दशहजार वर्ष प्रमाण है ॥ २४०॥ आगे जिनके जो भायु कासा ताको विशेष सहित पहें है- भगुरपउो सेरो उदही पदपियं दलूणकम् । उसरदाणादिय सरिरी इंदादिपंचएं ॥२४१॥ भगरधनुष्य शेषे उदधिः पत्यविकं सोनामः । उत्तरेदाणामधिक सास दादिपचानाम् ॥ २१॥ अर्थ-अमुरादि परि विष भर अयशेष भयन पासीनिय एक सागर तान पर आध पल्य पाटि आयु कापा मोई उत्तर दियो रमनिका विर अधिक भायु जानमा भाग भमुरकुमारविष घमरेद्रका एक सागर भायु १, रोचनवा किए अधिक एक सार है। मागमावि भूतानंदा सीन पल्पका भाषा परणानका लिए किसन पत्य यु है। ऐसेही तुपर्णकुमारादिविष जानना । पर इद प्रमोद लोकपाल प्राति सामानक इन पंथनिका आयु समान है ।। २५१॥ भाग तिसही समानताशी विशेरवार को 15- आऊपरिमारिष्टोरिदिरियादि परिदयादि पऊ । संगमगादेहि समा दारासादिसंजपा ॥ २४ ॥ 1 ..
११० त्रिलोकसार- आयुःपरिवारधिविक्रियाभिः प्रतीदादयः चत्वारः । सकसकेदैः समा दभरपत्रादिसंयुक्ताः ॥ २२॥ अर्थ:--आयु परिवार ऋद्धि विकिया इनकार प्रनीन्द्र लोकपाल प्रायविंशत सामान या ए प्यारि अपनें अपनें इन्द्र करि समान हैं इतना विशेष दक्ष घाटि हैं तात छत्रादिक करि सत्र है ॥ २४२॥ आगै अमुरादि इन्दनिकी देवांगनानिका आयु कहे हैं;- अट्टाइज्जतिपल्लं चमरदुगे णागगरुडसेसाणं । देवीणमहर्म पुण पुवावस्साण कोडितयं ॥ २४३ ॥ अर्थतृतीयनिपल्य चमरदिके नागगरुडशेषाणां । देवानामएम पुनः पूर्वपर्याणां कोटित्रयम् ॥ २४३ ॥ अर्थ-धमर रिकवि चमरेन्द्रकी देवांगनाका आयु अहाई पल्य है । वैरोचन का सन पर है ग्रहरि नागेन्द्रकी देवोनिका आयु पल्यका आठयां भाग है। महरि गरेकी देगानिका आयु सीन फोदि पूर्व प्रमाण है । अवशेष इन्द्रनिकी देवांगनानिका आयु सीन की पमा ॥ २४३ ॥ er मंगरक्षाक सीन जातिय परिषर तिनका आयु ग्यारि गाधानिकार पर है। परंगरगसमेणामहाराणाउगं ये पर्छ। माणीकपाहणाणं दले त यहरोयणे अहियं ॥ २४४ ।। धम गरशसेनामहतरागामायुष्य भौत् पल्प । सानीकपाहनाना दल तु यरोपने अधिकर ॥ २५४ ॥ भयं--यमा इन्द्र के अंगरक्षक भर रोगामहत्तर इनका मागु एक पन्ग है यही मानी। मलेगा देश लिन सहित वाहन पारिए गगादि ना होने योग्य देव तिनका आयु भारपाय है। मार मार के योपन इन्द्रय अंगरक्षकादिनित किए अधिक मागु है ॥ २४ ॥ फगिगारगेगपाणं नहाणे पुग्यपराकोटीय । सम्मान कोहि या याच मदद कमगी ॥ २४५ ॥ पगारपानाम्याने हि । गाव: लपत प्रमशः ॥ २५ ॥ अनि किन नHEMANT aaii and मी an mahala मामा HTTER Farin की TRANSATो। ri rine ki प्रो । निमोनि marahti ATTRathwat - दिसा। नाग मा arel पाम Miririn ritrमाएFE|| prt-1 * Prime"mar ॥ raute.femmenापारा- firmiritकार roatianit ki tairwain Austratim " animalTirutale: " Niti awat .:.mame Ritika पा , भाग मान गारगो निगाले नि पुजाण । पणाणवीसीमानापानादी ।। २४७ ।। mar on ९ मी पूर्णगा। Tarantential || २४७ ॥ imran Menit मान दर ९. नको माग arrianttratoangभारा गुमा र परिमानिय तीन imafreef. या दोपमा मारि main rififast include न मय परिनिय दो पार परिरहै ।। २४७ ।। wintent. भाग १ SEA समय- भगुरे मिति पागाराग पप समागार्ग । गया पदिणाण नगग दलूणाई ।। २४८॥ arjunामाrin समास गगनदिनको भनारम ॥ २१८॥ भर्प- रतन न गिरधाम भर माहार पर वर्ष हजार भर सो मुहूर्त भागापाग पाएमा माय मागर एक बार हो। पारार्थ । प्रमुग्नुमार. प. प भए एमवार धाम यागार वर्ष गए एक पार आहार हो है । यहरि माग. पुमार मालान जानिय सादा पारा मुर्ग भए म सादा पारा दिन गए आहार intin: मार आदि तीन आनिश्मि माटा सात मुहूरत भर उपास होरे सादा सात दिन गर मार ॥२४८।।
११२ त्रिलोफसार- मागे भवनत्रिक देवनिका उस्सेध कहैं हैं;- पणवीसं अमुराणं सेसकुमाराण दसधण चेव । वितरजोइसियाणं दशसत्त सरीरउदओ दु ॥ २४९ ॥ पंचविशतिः अमुराणां शेषकुमाराणा दशधनुषां चैव । ध्यंतरज्योतिश्कयोः दशसप्त शरीरोदयः तु ॥ २४९ ।। अर्थ-अमुर कुमारनिका पचीस धनुष अवशेष नव जातिके भवनवासी कुमारनिरा र धनुष तर देवनिका दश धनुष ज्योतिषी देवनिका सात धनुष शरीरको उचाईका प्रमाण है ॥२१९ इति भी नेमिचंद्राचार्य विरचित त्रिलोफसारमें भवनोकका अधिकार समाप्त भया । भारद भैरोदाग सेटियां र मन्यालय पोशानेर, (पुतानी प्यंतर लोकाधिकार। व्यंतर लोकाधिकार ॥३॥ . अब भतरलोक निरूपण फरनेको है मन जायत असा आचार्य सो प्रथम ही ध्यंतरलोक वि तिने शु पैत्यालयनिकों प्रमाग पूर्वक नमस्कारको विस्तारै है;- .तिष्णिसपजोयणाणं कहिदपदरस संखभागमिदे । भौमाणं जिणगेहे गणणातीदे णमंसामि ।। २५० ।। शितयोजनानां कृतिहतप्रतरस्य संख्यभागमितान् । भीमान जिनगेहान् गणनातीतान् नमस्पामि ।। २५० ॥ अर्थ-सीनर्स पोजनके वर्गका भाग जगत्प्रतरको दीए जो प्रमाण होइ ताके संख्यात धमामि प्रमाण जे व्यतर देय संबंधी जिनमदिर तिनहिं नमस्कार करौ हौं । कैसे हैं जिनमदिर, गण- नातीतान् कहिए असंख्यात है लोकिफ गगित करि गिणे न जा है ! सो तीनस योजनका वर्ग किर नि हजार योजन भए । बहुरि एक योजनके सात सात अडसठि हजार अंगुटते नि हजार योजनके केते भंगुल होइ १ ऐसे त्रैरासिक फरि तिनके अगुड करिए सो वर्ग राशिका गुणकार भर भागहार वर्गसप ही होइ इस न्याय करि सात लाख अइसठि हजारका वर्ग करि निव्ये हजा- रफी गुणिए ९००००१७६८०००।७६८००० महरि अंगुलनिका अकनिकौं तीन फरि भेदिए तब सातसै अडसटिकी जायगा दोयसै छप्पन भर मागें तीनका भक भया। यहरि गुण्य भर गुण- कारविपै दश हिंदी पी निनकों जुदी स्थापी तब पैसा भया ९।२५६।२२५६।३। बहुरि दोय जायगा दोय से छप्पन ये निनकों परस्पर गुणे पणही ६५५३६ भई अर दोइ जायगा तीन तीन धे तिनकों परस्पर गुणे नव भए तिनको गुण संबंधी नवफा अकरि गुणे इत्यासी भए ऐसे करते ऐसा भपा ६५-८१ पहार या आगे जुदी राशि थी दश विन्दी ताकी सहनानी ऐसी१० फाए ऐसा भया ६५-८१-१ इतने अंगुल भए । महरि एक अंगुटफा एक सूप्यंगुल होइ तो इतने अगुलनिका फेने होइ सो इहां वर्ग राशि है ताने सूर्यगुलफा मर्ग जो प्रतरांगुल ताकी सहनानी ऐसी ताकरि गुणिए तब ऐसा होइ ४१६५८८११ बरि पाका भाग जगातरफी सहनानी ऐसी-साकों दीजिए तब ब्यतरनिका प्रमाण पगडीफो इक्यासी फरि गुणि ताकै आर्गे दस विदी धरिए इतने प्रतरांगुल्फा जगातर दिए ऐसा होय है ५-६५८८११: सोई कहा है "निणि सपजीपणाणं येमदछप्पणभंगुलाणे च फदिहदपदरं तरजोइसियाण च परिमाणं ।" सीनसे योजन भर दोयसे छम्पन भंगुलका वर्गका भाग जगत्प्रतरकों दिए ऋमतें ध्येतर मर ज्योतिषी- निका प्रमाण हो है भैसा सिद्धात पचन है । यहरि संख्याते प्यंतर देवनिकै एफ एफ जिनमंदिर पाइए सौ पूर्वोक्त प्रमाण ध्यंतर देवनि के जिन मंदिर पाईए । अगै करि पूर्वोक्त पंतर प्रमाणों संख्यातकी सहनानी ऐसी ! साका भाग दिए भ्यंतरनिकै जिन मदिरका ममाग ऐसा होप है ४=१६५-८१११:' ।। २५०॥ त्रि.-१५ त्रिलोकसार- आगें व्यंतरिनका कुल भेद कहें हैं;- किंणरकिंपुरिसा य महोरगगंघव्वनक्खणामा य । रक्खसभूयपिसाया अहाविहा वैतरा देवा ॥ २५१ ॥ किंनरकिंपुरपौ च महोरगगंधर्वयमनामानः च । राक्षसभूतपिशाचा: अष्टविधा ध्यंतरा देवाः।। २५१ ।। अर्थ-किनर, किंपुरुष, महोरग, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, भूत, पिशाच, ऐसे नानके धारक आठ प्रकार व्यंतर देव हैं ॥ २५१ ।। आगै तिनके शरीरका वर्णको निरूर्षे हैं,- तास कमसो वण्णो पियंगुफलघवलकालयसियामं । हेमं तिसुवि सियाम किण्हं वहुलेवभूसा य । २५२ ।। तेषां क्रमशः वर्णाः प्रियंगुफटघवटकालझ्यामाः । हेमः त्रिष्वपि श्यामः कृष्णः बहुलेपभूपा च ।। २५२ ॥ अर्थ-तिनका अनुक्रमतें शरीरका वर्ण कहिए है। किंनरनिका प्रियंगुफल समान वर्ण है। किंपुरुषनिका धवल वर्ण है। महोरगनिका काला स्याम वर्ण है । गंधर्वनिका सुवर्ण समान वर्ग है यक्ष राक्षस भूत इन तानोंका साम वर्ण है पिशाचनिका कृष्ण वर्ण है वहरि ते देव बात अगर इत्यादि टेप आभूषणनिकरि संयुक्त हैं ।। २५२ ॥ आगै तिनके चैत्य वृक्षनिका भेद कहैं हैं- तेसिं असोयचंपयणागा तुपुरुषहो य कंटतरू । तुलसी फदवणामा पेचतरू होति हु कमेण || २५३ ।। तेषां अशोकचंपकनागा: तुयुषटाच कंटतरः । तुटसी कर्दवनामा चैत्यतरवो भवति स क्रमेण ॥ २५३ ॥ अर्थ-तिन किलरादिक य्यंतरनिकें अशोक १ चंपा १ नागकेसरि १ वही ११ कंटतर १ तुटसी १ कदंब । पैसे नाम धारक चैत्य वृक्ष अनुक्रमते पाईए है ॥ २५३ ।। आगे तिनि चेय वृक्षके मूल बि नि है। जिन प्रतिमा इत्यादि कथन करें - तम्मले पलियंकगनिणपटिमा पडिदिसम्हि पनारि । घउतोरणनुत्ता ते भवणेमु च माणदा ।। २५४ ।। सन्म्टे पसंकगजिनप्रतिमाः प्रदिदिश चतसः । चतुम्नारगयुनाम्नाः भवने च जमानाः ॥ २५॥ अर्थ-विन चेय शनिक मूपिरे पय॑क सामनको माग में दिन प्रतिमा एक एक दिगति पर प्यारि ६.३र है बरि ते प्रतिमा परि तोग्ग हानिकी संयुनारी भवननिवि ने पेय पूरा है ते पा वृदिला वर्णन के परिकाका प्रमाण लेममा जाननें ।। २५१। - ध्यंतर सोफाधिकार। आगे तिन प्रतिमानिके लागे लिएता मानम्तमको विशेष सहित निम्पर पो- पडिपडिम एकेग माणत्यंपा तिवीदसाल जुदा । मोधियदामं सोहर घंटानासादियं दिलं ।। २५५ ।। प्रतिप्रतिमा एफफो मानस्तमा: रिपीटायुताः । मोतिपदाम शोभते घंटाजानदिक टिप्पम् ॥ २५५।। अर्थ-प्रतिमा प्रतिमा प्रति एफ एफ भाग मानम्नम है से मानर्मम हीन पोरगीन शालनिकर संयुक्त है । भावार्थ-सीन पीटर रि मानस्लम है मानमरे तीन पोट पार है बरि तिस मानम्तमविणे मोतीनियो माला या दिप्य घंटा जार यादिक गो र ॥ २५५ ॥ भागे आठ प्रकार ध्यंतरनिक एक एक फुल पनि भेद का.. फिरपर दसदसपा सेसा पारमगरमचोदगमा । दो रोईदा दो रो पल्लभिया र सामादेपिनुहा ।। २५६ ।। किनरचत्वारः दशदाया रोपाः रामचतुर्दशा। hी परमिक पृपा संदेषीयो । २५६ ॥ अर्थ-किन्नरादिषा ग्यारि पुट तो दादा प्रकार पदिष. मोग মা যাস 'সুন্ধার মাস মাং এ সং । ঐ মুখ বিশ্ব ইদাখি, পু भेद पाईए है पर एक क्षत्रिय मूल विष हा मोम शादि भेद पाईए AIRAY भैर है। एक एक कुल किया जादि अनर भद जागने दोष दोष है । तिन दिनिक एक एक दोप दोष पमिका देदना ME एक एक देवांगना हमार हजार परिवार देवांगना परि सगुन है ॥ २५६ ॥ भाग लिनफे नाम मोलद गापानि करि पद- किंपुरिमणिराधियदिपंगमगा पहरा किंणारिणरणिदिन मपरम्मा फिजाएगा ॥२५॥ पकिनरापिगमय । बिनपिनरः अनिक्ति मनोरम: शिवगतम ॥२५॥ अर्थप १ कि.मर दमय ११ नगरि ना ! Nat मनोरम १ पिजरीतम १॥ २५७ ॥ सतिपिपासा सिंगिगारिणरामा । तुमनी गमगंणा गपिपारिधिपा ॥२५८ ।। अर्प .
त्रिलोकसार- पुरुसा पुरुमुत्तपसापुरुसमहापुरुसपुरुसपहणामा । अतिपुरुसा मरुओ मरुदेवमरुपहजसोवंता ।। २५९ ।। पुरुषः पुरुषोत्तमसपुरुषमहापुरुषपुरुषप्रमनामानः । आतिपुरुषः मर्मरदेवमरुप्रभयशस्वतः ।। २५९ ।। अर्य-पुरुष १ पुरुषोत्तम १ सत्पुरुष १ महापुरुष १ पुरुषप्रिय १ अतिपुरुष । मरत्र १ मस्त्रम १ यशस्वान १ पैसे दश प्रकार किंपुरुष हैं ॥ २५९ ।। सापुरुसमहापुरुसा किंपुरिसिंदा कमेण वल्लभिया । रोहिणिया णवमी हिरि पुष्फवदी य इयरस्स ॥ २६० ॥ सत्पुरुषमहापुरुषी किंपुरपेद्रो क्रमणे यहभिकाः । सोहगी नरमी ही पुपाती च इतरस्य ।। २६०॥ अर्य-तिनविय स पुरष र महापुरुष दोय किंपुष म्यतरके इन्द्र है निनकी 3 सत्पुरती तो रोहिनी भर नामी पदमिका देवी है भर दूसरा महापुरुषको ही अर पुपाती मिसा देवी है ॥२६॥ मुनगा भुजंगमाली महकायनिकाय संघसाली य । मणहर असणिनवरसा महसरगंभीरपियदरिसा ॥ २६१ ।। मुगः मुनगशाली महामायो भतिकापः स्कयशाली । मनोदरः अशनियाभ्यः महेन्चर्पगमीरप्रियदर्शिनः ॥ २६१॥ अर्थ-गुजा र गुगशायी महाकाप १ अनिकाय १ स्पशाली १ मनोर। निसर्गभीर १ मिपदश १ को दस प्रकार महारगः ॥२१॥ मसायो अनिकायो मोरगेंदा भोग भोगवदी। दरम्म पुगंधी अणिदिता हॉनि यद्यमिया ।। २६२ ॥ मदारयो अतिताप: महोगटील मोगा भागवनी । इलाम्य Year भनिदिता भातः परमिरे ॥ २२ ॥ - महाकाय आ माप ए दोय महोय ? दाईको मोरनी १ अर की पुण १ अनिदिलाए पनि १॥ २६२।। राहणारयतुंपलाशगया । मामा गांवानीरिय गीतगादाता दगमा ।। २६३ ॥ TVानाAANE | BEHArihnाम ॥२१॥ -१११११११ मा १ F११Tratak !! २१३ १
व्यंतर लोकाधिकार ।
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गीतरती गीतजसो गंधविदा हवंति पल्लमिपा।
सरसति सरसेणावि य णंदिणि पियदरािसणादेवी ॥ २६४ ॥
गीतरतिः गीतयशा गंधर्वेन्द्री भवतः महभिकाः ।
सरस्वति स्वरसेनापि च नंदिनी प्रियदर्शनादेवी ।। २६४॥
अर्थ-तिन विपै गीतरति मर गीतयशा ए दोय गंधर्शनके इन्द्र है तिनकी बल्लाभिका देवी
मरस्वती १ स्वरसेना १र नंदिनी १ प्रियदर्शना १ हैं ॥ २६ ॥
अह माणिपुण्णमैलमणोभहा भगा मुभहा य ।
तह सबभह माणुस धणपाल सुरूवजक्खा य ।। २६५ ।।
अय मामिपूर्णशैलमनोभदाः भद्रकः मुभद्रः च ।
तथा सर्वभदः मानुपः धनपाल: मुरूपपक्षच ।। २६५ ॥
अर्थ --अप अर्ब माणिमट १ वर्णभद्र १ शैलभद्मनाभर १भद्रक १ मुभर १ सर्वभद्र १
मानुष १ धनपाट १ मुरूपयक्ष १ ॥ २६५॥
जपखुचमा मनोहरणामा तह माणिपुण्णमरिंदा ।
कुंद बहुपुचदेवी तारा पुण उत्तमा देवी ॥ २६६ ॥
यशोत्तमो मनोहरनामा तत्र माणिपूर्णभदौ ।
कुंदा यहुपुत्रदेवी सारा पुनरत्तमा देवी ॥ २६६ ॥
अर्थ-पक्षोत्तम १मनोहर १ ऐसे बारह प्रकार यश है लिन वि मागिभर पूर्णभद्र ए दोय
र तिन दिनिकी कुदा १ पटुपुत्रा १ देवी है भर तारा उत्तमा देवी है ।। २६६ ।।
भीम महामीम विग्यविणायक वह उदक स्वखसा य नहा ।
रपखसरवखस तह यमरक्खसा होति सत्तमया ॥ २६७ ॥
भीमो महाभीमः विविनायक तथा उदकः राक्षसच तथा।
राक्षसगक्षसः तथा मराक्षस: भरति सप्तमकः ॥२६॥
अर्थ-भीम रमहा भीम १ विनविनायक उपकर राक्षस राक्षसराक्षस १ ममराक्षस सातवा
ऐसे सात् प्रकार राक्षस है। २६७ ॥
भीमो य महाभीमो रक्खसदा हनि बडभिया।
पउमा पसुमिचावि य रपट्टा फणयपह देवी ॥ २६८ ।।
भीमच महाभीमो राइसेंदा भवतः पट्टभिकाः।
पमा पसुमित्रापि च रत्नान्या कानरममा देयौ ॥ २६८ ॥
अर्थ-तिनधि भमि अर महाभीम ए राक्षनिके इन्ट है, तिनको पमिका देशी पहा
मुमित्रा १ बहुरि रत्नामा १ फनकप्रभा १ है ॥ २६८ ॥
मृदाणं तु मुरूपा पहिस्वा भूदानमा तत्तो।
पढिभूद महाभूदा परिणागासभूद इदि ॥ २६९ ॥
११८ त्रिलोकसार- भूतानां तु मुरूपः प्रतिरूपः भूतोत्तमः सनः । प्रतिमूतः महाभूतः प्रनिछनः आकाराभून इति ॥ २६९ ॥ अर्थ-यहुरि भूतनिकें मुरूप १ प्रतिरूप १भूतोत्तम १ प्रनिम्तर प्रनिछिन १ आकारा- भूत १ असें सात प्रकार है ।। २६९ ॥ ईदा य मुपडिरूवा बल्लमिया तह य होदि रुवपदी । बहुरूवा य मुसीमा सुमुहा य हवंति देवायो।। २७० ॥ इंद्री च मुप्रतिरूपौ यालभिकाः तथा च मति कपवती । बहुरूपा च मुपीमा मुमुवा च भवनि देव्यः ॥ २७० ॥ अर्थ-तिन विर्षे इन्द्र स्वरूप भर प्रतिरूप है तिनकी वल्लामिका १ रूपवती १ बहुरूया सुसीमा १ मुमुखा १९ देवी हैं ॥ २७० ॥ कुम्भंड रक्ख जक्खा संमोहो तारका अचोक्खा य । काल महकाल चोक्खा सतालया देह महदेहा ॥ २७१ ।। कुष्मांडो रक्षो यक्षः संमोहः तारकः समुचिश्व । काल: महाकालः शुचिः सताटकः देहः महादेहः ॥ २७१।। अर्य-कूष्मांड १ रक्षा १यक्ष संमोह १तारक १अशुचि १काल१ महाकाल १ शुचि १ सता- टक १ देह १ महादेह १ ॥ २७१ ॥ तुहिय पवयणणामा इंदा तेसि तु कालमहकाला। कमलकमलप्पहुप्पलमुदरिसणा होति वल्लाभिया ॥ २७२ ।। तूष्णीकः प्रवचननामा इंद्रौ तेषां तु काटमहाकाटौ । कमलाकमलप्रभोत्पलामुदर्शना भवति वल्लामिकाः ॥ २७२ ।। अर्थ-तूष्णीक १ प्रवचन १ ऐसें नाम लिऐं चौदह प्रकार पिशाच हैं। तिन वि तिन पिशाचनिके काल अर महाकाल इन्द्र है । तिनकी कमला १कमलप्रमा बहुरि उल्पला १ मुदर्शनार ए वल्लमिका हैं ॥ २७२ ॥ आगै बहुरि इंद्रनिहीं के नाम जुदे दोय गाथानिकरि कहे हैं;- किपुरुस किंणरा सप्पुरुस महापुरुसणामया कमसो । महकायो अतिकायो गीतरती गीतयसणामा ॥ २७३ ।। किंपुरुषः किन्नरः सत्पुरुषः महापुरुषनामा क्रमशः । महाकायः अतिकायः गीतरती गीतयशोनामा ।। २७३ ॥ अर्थ-क्रमते किंपुरुष किन्नर बहुरि सत्पुरुष महापुरुष वहरि महाकाय अतिकाय बदरि गीतरति गीतयशा ॥ २७३ ।। तो माणिपुण्णभद्दा भीममहाभीमया मुख्वा य । पडिस्वो काल महाकालो भाम्मेमु जुगलिंदा ॥ २७४ ।।
प्यंतर लोकाधिकार
११९
ततो माणिपूर्णभद्री भीममहाभीमै मुरूपय ।
प्रनिरूपः फाउ: महाकालः भौमेषु युगलेंद्राः ।। २७४ ॥
अर्ध -तहां पीछे माणिभद्र पूर्णभद्र बहुरि भीम महाभीम बहरि मुरूप प्रतिरूप बहुरि काल
महाकाल ए सर्प व्यंतरनिविय एक एक कुलके दोय दोष इन्द्र जानना ।। २७१ ॥
भाग किंपुरष इन्द्रनिकै गणिका महत्तरीकों प्यारि गायानि फरि कहैं हैं;
गणिफामहचरीयो इंदं पडि पल्लदलठिदी दो हो ।
मधुरा मधुरालावा मुस्सर मउभासिणी कमसो ॥२७५ ॥
गणिकामहत्तयः इंदं प्रति पल्पदलस्थितयः दे।
मधुरा मधुरालापा सुस्वरा मृदुभाषिणी क्रमशः ॥ २७५ ॥
अर्य --एक एक इन्द्र प्रति दोय दोप गागिका महत्तरी हैं । जैसे इहाँ वेश्या हो हैं तेसै
तहां जो देंयागना होंहि तिनकों गणिका फहिए तिन विर्षे जो प्रधान सो गणिकामहत्तरी जाननी
महरि ते आध पल्प प्रमाण आयुफों धेरै हैं तिनको नाम अनुक्रमते कहिए हैं। तहां एक एक किंपुरुषादि
इन्द्र संबंधी दोय दोय गणिका महत्तरीनिका नाम जानना मधुरा मधुरालाप बहुरि सुस्वरा
मृदुभाषिणी ॥ २७५॥
पुरिसपिया पुंकता सोम्म पुंदरिसिणी य भोगयखा ।
भोगवदी य मुजंगा भुजंगपिया तो मुघोस विमलेति ॥ २७६ ।।
पुरुषप्रिया पुंकाता सौम्या पुदार्शनी च भोगाख्या ।
भोगयती व भुजंगा मुजंगप्रिया सतः मुधोपा विमला इति ॥ २७६ ॥
अर्थ-बदुरि पुरुषप्रिया पुंकाता बहरि सौम्य पुंदर्शिनी बहुरि भोगा भोगवती बहुरि भुजंगा
मुजगप्रिया बहुरि मुघोषा विमला ।। २७६ ॥
मुस्सर अणिदियक्खा भ६ सुभपा य मालिणी होति ।
पउमादिमालिर्णावि य तो सव्वरि सवसेणेति ॥ २७७॥
मुस्वरा भनिदिताख्या भद्रा सुभद्रा च मालिनी भवति ।
पादिमालिनी अपि च ततः शर्वरी सर्वसेना इति ॥ २७७ ॥
अर्थ-बहरि मुस्वरा भनिदिता बहुरि भद्रा मुभद्रा बहुरि मालिनी पममालिनी बहुरि शर्वरी
सर्वसेना ॥२७॥
रुद्दक्ख रुदरिसिण भूदादकिंद भूद भूदादी।
दत्त महामुज अंबा फराल मुलसा मुदरिसणया ॥ २७८ ॥
रुद्राख्या रुद्रदर्शना मूतादिकांता भूता भूतादि ।
दत्ता महाभुजा अंबा कराला सुरसा मुदर्शनका ॥ २७८ ॥
अर्थ-बहुरि रुद्रा रुद्रदर्शना बहुरि भूतकाता भूता बहुरि भूतदत्ता महामुजा बहुरि मंबा कराल
बहुरि सुरसा दर्शना । जैसें सोलह इन्द्र संबंधी वर्तास गणिका महत्तरनिके नाम क्रमतें जाननें ॥२७॥
१२० त्रिलोकसार- - 1 मागें किंपुरुषादि इन्द्रनिकै सामानिक आदि देवनकी संख्या कहैं हैं:- इदसमा हु पडिंदा समाणुतणुरक्खपरिसपरिमाणं । चउसोलसहस्सं पुण असयं विसदवडिकमो ॥ २७९ । इन्द्रसमाः खलु प्रतींद्राः सामानिकतनुरक्षपारिपदप्रमाण । चतुःपोडशसहस्र पुनरष्टशतं द्विशतवृद्धिक्रमः ॥ २७९ ॥ अर्थ-इन्द्रनिके समान प्रतीन्द्र हैं एक एक इन्द्र संबंधी एक एक प्रतीन्द्र है बहुरि सामा निक तनुरक्षक पारिपदनिका प्रमाण च्यारि हजार सोलह हजार आठसै दोयसै वधता क्रम लीए है। भावार्थ-एक एक इन्द्रकै सामोनिक देव च्यारि हजार है । तनुरक्षक सोलह हजार हैं । अभ्यंतर परिषद आठसै हैं । मध्य परिषद हजार हैं । वाध बारहसै हैं ॥ २७९॥ मागै तिनकै सात आनीक कहैं हैं, कुंजरतुरयपदादीरहगंधग्या य णचवसत्ति । सत्तेवय आणीया पत्तेयं सत्त सत्र कक्खजुदा ॥ २८० ॥ कुंजरतुरगपदातिरयगंधर्वाश्च मृत्यषभाविति । सहर भनीकाः प्रत्येक सप्त सप्त कक्षयुताः ॥ २८०॥ अर्थ-हाथी १ घोड़ा १ पयादा १ रथ १ गंधर्व १ नृत्यकी १ वृषभ १ ऐसे सात प्रकार मानीक एफ एक के हैं । बहुरि एक एफ आनीक सात सात कक्ष जो फौज तिन कार संयुक्त है ॥ २८०॥ मागे तिस सेनाके महत्तर कहे हैं;- सेणामहचरा सुनेहा मुग्गीयविमलमरुदेवा । सिरिदामा दामसिरी सत्तमदेवो विसालक्खो ॥ २८१॥ सेनामहत्तराः मुग्येष्टः मुनीयविमलमल्देयाः । श्रीदामा दामधी: सप्तमदेयो विशालाख्यः ।। २८१ ॥ अर्थ-दायी आदिक जे सेना साके महतर कहिए प्रधान अनुक्रमने मुम्पेष्टा १ मुपीर परिमाण १ मरदेव १ श्रीदामा १ दामग्री १ सातवा विमाल नाम देव जानना ॥ २८१ ।। माने तिस आनीसको संझा कर है- अहावीमसहस्म परमं दुगुणं फमेण परिमोत्ति । सबिदाणं सरिमा पदणपादी असंसमिदा ॥ २८२ ।। असिहमामि प्रयम हिगुर्ग कमेगा घामातम् । मादाय मा प्रकीर्गकादपः अर्मश्यमिताः ॥२२॥ प्रयं-अाईम बार प्रथम का है। परि दुगा दगा कर अंत 1 मानना मा! हामी प्रपन र वि घटाइम बार दमग निसन बाद गाय कोर पर सदन । मेरी पटरिक मानने। म म नि समान मानक यनामोशापार। - पाप प प क मानिनीय विधिक एक RAT २८॥ amriनिमा ममा पनि निक, माम फरे- अंगणापमपारगुरणपणगिरगरजरनदेगु । गिदाल दर साम्पिदणपराणि ॥ २८३ ॥ पावागमनमा frmiri दौरे भीमनगमागे ॥ २८३ ।। पथगनक. १ मा १ गुवर्ण १ मनः शिटक १ बम १ रजा गुम्फ Trन माine मा चिनादियानिक कामरे नगर १ ॥भावार्थ सिन्नर पुरि नर पिपिदै गर है 1 तह रि. तो दक्षिण दिशाविन अर विजय र निविद नगर जानने हा दिनिषित कि पुरयादिकति :- बि.कविय या टर िनगर जानने ॥ २८३ ॥ न मानिक माम पर थायाम है- भोपिदक मग्ने पापंवारषमज्न परिमंका । पुच्चादिगु पुगमा पणपणणपराणि समभागे ॥ २८४ ॥ भीमेशा मधे प्रभयानामप्याः परमोकाः । पूर्णक्षित जगगानि चरचनगगणि ममभागे ॥ २८ ॥ अर्प-र या मी अफ कहिए नाम सो तो मध्यका नगर नि जानना भर ताहीको पूरिमानिवि का नाम आगे हमने प्रभात मार्च मध्य ऐसे अंतर्षि नाम संयुक्त मगरीय नाम जानने ।। भावार्थ ॥ किलर नामा ई ताके पांच नगर है तहाँ मप्य वि जो नगर हैलर नाम विलापुर बार ताकी पूर्व देशावर फिलरमभ नगर है। दक्षिणावर्षे किन्नर- बार नगर । पक्षिम शिरि किन्नगर्न नगर है। टनरवि फिनरमप्य नगर है। ऐसे ही और दिनिक नगानिक नाम जानने । एक एक के पांच पांच नगर हे ते जंबूदीप समान हैं। भाषाएं । क्षयोजन विस्तारयों पर है। बारि से नगर समभूमि विगै पाइए हैं पृथ्वी ना, या पर्वतादिक उपर नहीं है ।। २८५ ।। भाग लिन नगरनिका कोट तार तिनका उदयादिक यह है;- तपापादयति पणहत्चरिपाणवीसपंचदलं । दारुदो वित्यारो पंचपणदं मददं च ॥ २८५ ॥ तमाशारोदयत्रयं पंचसप्तनिपंचविंशतिपंचदलम् । दारोदयो विस्तारः पंचपना तदर्थं च ।। २८५॥ अर्थ-तिन नगरनिका जो प्राकार कहिए कोट ताका उदयादि तीन पिचहत्तरि पच्चीस पाचका साधा है। भावार्थ ! कोट सादा सैंतीस योजन ऊंचा है सादा बारा योजन चौड़ा है त्रि--16 १२२ त्रिलोकसार- बढ़ाई योजन मौटा है बहुरि तिस कोटके द्वार कहिए दखाजे तिनको उदय अर विस्तार पंच घन सवासो ताका आधा अर ताइका आधा प्रमाण है । भावार्थ ॥ द्वार साढा वासठि योजन ऊंचा है स इकतीस योजन चौड़ा है ॥ २८५॥ आगै ताके ऊपरि जो प्रासाद है ताका स्वरूप कहें हैं;- तस्सुपरिं पासादो पणहत्चरितुंगओ सुधम्मसहा । पणकदिदल तद्दल णव दीहरवासुदय कोस ओगाहा ।। २८६ ॥ तस्योपरि प्रासादः पंचसप्ततितुंगः सुधर्मसभा । पंचकृतिदलं तद्दल नव दीन्यासोदयाः क्रोशः अवगाढः ।। २८६ ।। अर्थ-तिस द्वारकै ऊपरि पिचहत्तरि योजन ऊंचा प्रासाद है सोई प्रासादके अन्ये: मुधर्मा नामा समा कहिए सो पंचमी कृति पचीस ताका आधा बहुरि ताइका आधा बहुरि - प्रमाण दीर्घ व्यास उदय संयुक्त है।। भावार्थ ॥सुधर्मा सभा साढा बारा योजन लंबी है । सबा योजन चौड़ी है । नव योजन ऊंची हैं। बहुरि तिसका अवगाद कहिए अधिष्टान भूमि सो र कोश है ।। २८६ ॥ आगे तिस प्रासादके जे द्वार तिनके उदयादि कहैं हैं;- तिस्से दारुदओ दुग इगि वासो दक्खिणुत्तरिंदाणं । ससि गगराणं पायारादीणि सरिसाणि ॥ २८७ ।। तस्याः द्वारोदयः दिकमेकं व्यासः दक्षिणोत्तरेंद्राणाम् । सर्वेषां नगराणां प्राकारादीनि सहशानि ।। २८७ ॥ अर्थ-तिस मुधर्मा समाका द्वारका उदय जो ऊंचाई सो दोय योजन है । बदरिका जो चौड़ाई सी एफ योजन है । बहुरि दक्षिण इंद्र वा उत्तर इंद्रनिक सवनिहींके सर्य नगनि- प्राकारादिक समान है।॥ २८७॥ आगे तिन नगरनिकै वाय यन कर है- पुरदो गंतूण यहि चाहिसं जोयणाणि सिहस्से । इगिलपसायद तालयासजुदा रम्मवणखंडा ॥२८८ ।। पुरावा यदिः चतुर्दिर्श योजनानि दिसहस्से । एकलवापता तलव्यासयुताः रम्पानाखंडाः ।। २८८ ।। अर्थ-नगाने बाहरे दीप दोष हजार योनन पर जाई प्यारि दिशानिरि एक पोजन व हात पचाम हवार योजन पोहे रमाक बना कादिर याग है ॥२८८॥ श्रो दिन दानविय पाईर मे गणिकानिक नगर तिनकं विस्तार मध्यामिक निस्तर नायव प गणिकाणं गुमटिमहम्मविउलणयराणि । मंमाण माग्माण अणेयदीर गहरे य ।। २८९ ।।
ध्यंतर लोकाधिकार १२३ सौर च गणिकानां चतुरशीतिसहस्रविपुलनगराणि । शेषागा भौमाना अनेकद्वीपे समुद्रे च ॥ २८९॥ अर्थ-तिसही अपने अपने इंद्र संबंधी दीपवि. गणिकामहत्तरीनिके नगर हैं। ते अपनी अपनी ईदपुरीकै दोऊ पार्थनिविणे जाननें । परि ते चौरासी हजार योजन लंबे चौड़े हैं। महरि अपशेष जे भ्यतर है तिनके नगर भनेक द्वीप या अनेक समुद्रनि विर्षे पाईए हैं ॥२८९॥ आगे कुलभेद अपेक्षा निलयभेद कहे हैं;- भूदाण रक्खसाणं पउदस सोलस सहस्स भवणाणि । सेसाण वाणवेंतरदेवाणं उपरि णिलपाणि ॥ २९० ॥ भूतानां राक्षसानां चतुर्दश पोडश सहस्र भवनानि । शेषाण घानन्यतरदेवानां उपरि निलयानि ॥२९॥ अर्थ-भूतनिका भर राक्षसनिका चौदह सोलह हजार भवन हैं ।। भावार्थ ॥ रत्नप्रभा पृथ्वीके खरभागवि भूतानिके चौदह हजार भवन है। बहुरि पंक भागविर्षे राक्षसनिके सोलह हजार भवन है। परि अवशेष पान व्यतरदेव है तिनके पृष्वाक ऊपरि निलय फहिए स्थान पाईए हैं ॥ २९० ॥ भार्गे नीचोपपादादि वान व्यतरनिके विशेष दोय गाथानिकरि फहैं हैं;- हत्थपमाणे गिच्चुववादा दिगुवासि अंतरणिवासी । कुभंटा उपपणाणुप्पण पमाणया गंधा ॥ २९१ ॥ हस्तप्रमाणे नीचोपपादाः दिग्वासिनः भेतरनिवासिनः । मांदा: उत्पन्ना मनुत्पनाः प्रमाणफा गंधाः ॥ २९१ ।। अर्थ-हरतप्रमाणविपै नीचौपपाद है बरि दिवासी १ अंतरनिवासी १ कूष्मांड १ उत्पम १ अनुत्पन्न १ प्रमागक १ गंध १॥२९१ ।। महगंध भुनग पीदिग आगामुववष्णगा य उवरुवरि । तिमु दसहत्यसहस्सं वीससहस्संतरं सेसे ॥ २९२ ॥ महागंधा भुजगाः प्रीतिका आकाशोत्पन्नाच उपर्युपरि । त्रिषु दशहस्तसहसागि विशतिसहस्रांतर शेषे ॥ २९२ ।। अर्थ -महागंध १ भुजेग १ प्रीतिफ १ आफासोपन १५ सर्व उपरि उपरि तीनविय दश दश हजारक मातिरै भर अवशेष बीस बीस हजारके आतिरै जाननें । भावार्य-पृथ्वीत एक हस्त उपरि क्षेत्रवि नीचोपपाद ध्येतर है। विनफै उपरि दश हजार हाथ ऊँचे क्षेत्रभित्र दिग्पासी है। तिनकै ऊपरि दश हजार हाय उंचे क्षेत्रवि भतर निवासी हैं। तिनके ऊपर दस हजार हाथ ऊंचे क्षेत्रवि कूष्मांड है । तिनकै उपरि बीस हजार हाथ ऊँचे क्षेत्रविध उत्पन्न म्यतर है। भार्ग ऐसे ही ऊपरि ऊपरि पीस बीस हजार हाथका भतराउ जानना ॥ २९२ ।।
१२४ त्रिलोफसार- आर्ग,तिन नीचौपपादादिकनिकी आयु क्रमतें कहै हैं;- दसवरिससहस्सादो सीदी चुलसीदिकं सहस्सं तु । पल्लहमं तु पादं पल्लवं आउगं कमसो ॥ २९३ ।। दशवर्षसहस्रात् अशीतिः चतुरशीतिक सहस्रं तु । पल्याष्टमं तु पादं पल्यार्धमायुष्यं क्रमशः ॥ २९३ ।। अर्य -दश हजार वर्पत टगाय दश दश हजार वधता असी हजार वर्ष पर्यंत बहुरि चौरासी हजार वर्ष वहरि पल्यका आठवां भाग चौया माग पल्यका आधा प्रमाण आयु तिनका क्रम जाननगं । भावार्थ-नीचौपपादनिका दश हजार दिग्वासोनिका बीस हजार अंतरनिवासी- निका तीस हजार कूष्मांडनिका चालीस हजार उत्पन्ननिका पचास हजार अनुत्पन्ननिका साठि हजार प्रमाणकनिका सत्तरि हजार गंधनिका अस्सी हजार वर्ष प्रमाण आयु है। महा गंधनिकर चौरासी हजार वर्ष प्रमाण आयु है जुगलनिका पल्यका आठवां भाग प्रीतिकनिका चौथाई पल्ल आकाशोत्पन्नानिका आधापल्य प्रमाण आयु है ॥ २९३ ॥ आगें व्यंतरनिका निलय भेद कहें हैं;-- वेंतरणिलयतिपाणि य भवणपुरावासभवणणामाणि । दीवसमुद्दे दहगिरितरुम्हि चित्तावणिम्हि कमे ।। २९४ ॥ व्यतरनिटपत्रयाणि च भवनपुरायासमवननामानि । द्वीपसमुदे द्रगिरितरी चित्रापन्यां क्रमेण ।। २९४ ॥ अर्थ- -भवनपुर अर आवास अरमान ए विंतरनिके भवननिके तीनही नाम हैं तहां कमी द्वीप समुद्रनिवि भवनपुर पाईए है। बहुरि दह पर्चत वृक्ष इन विसं आवास पाईर बार चित्राधिवाविप नीचें मान पाईए हैं ।। २९४ ।। भागें तीन प्रकार निलपनका वर्णन कहे हैं- उहगया आवासा अधोगया वितराण भवणाणि | भवणपुराणि य मग्झिममागगया इदि तिर्य णिलयं ॥ २९५ ॥ उर्षगता: आवासा अधोगता म्पतरागा भयनानि । भवन पुराणि च मध्यनमागमतानीति अनिव्यम् ।। २९५ ।। अर्थ-जे पृथ्वीने उंचे स्थानक नि पाईर ते आवास जाननें। महरि जे पृषीत और पार ने स्पटानिक भवन जानने । यहरि ने मध्य लोककी समभूमि A पाईर ते मानर बदिर में तीन प्रकार निय है ॥ २९५ ॥ अमे म दानिश या संमन रहनेका य है है- चिमवागद नारप मेदयं निम्पिमोरित्यारं । मामा नि मवणे पाणपुगवामगे नोग्गे ॥ २९६ ।। -
ध्यंतर लोकाधिकार ।
१२५
चित्रापभातः यावत् मेरुदर्य तिर्यग्लोक विस्तार ।
भोमा भवति भवने भवनपुरावासके योग्य ।। २९६ ॥
अर्थ-चित्रा भर पमा पृथ्वीका मभ्य संचित लगाय यावत् मेरु गिरिको उचाई है तहां
पर्पत ऊँचा भर तिर्यक् लोकका नेता विस्तार सहो पर्यंत विस्तारकों धरें जो क्षेत्र तिहवि भौम
कहिए तर देव ते :अपने अपने योग्य भवनवि वा भवन पुरविध वा आवासविरें वास
करें हैं।॥ २९६ ॥
भवणं भवणपुराणि प भवणपुरावासपाणि केसिपि ।
भवणामरेमु असुरे विहाय केसि तियं णिलयं ।। २९७ ।।
मवन भवनपुरे च भवनपुरावासानि केषांचित् ।
भयनामरेषु अमुरान् विहाय केपो प्रर्य निटयम् ॥ २९७ ॥
अर्थ-ई म्यतरनिकै तो भवन ही है के ईनिकै भवन अर पुर हैं केईनिकें भवन भर भवन-
पुर र भावास हैं । ऐसे म्पेतरनिके स्थान जाननें । बरि भवनवासी देवनिवि अमुर कुमार विना
अन्य कुलयाले केईक भवन यासोनिक भवन वा भवनपुर वा आवास सीन निलय पाईर है इस
कपनते पृथ्वीत नीचे खर भाग पंक भाग विर्षे अर पृथ्वी से उपरि पर्वतादि विर्षे भर सम-
भूमि पृथ्वीविय व्यतरनिके मर भवन पासीनिके स्थान पाइए हैं ऐसा जानना ॥ २९७ ॥
मानें तीन प्रकार नियनिका न्यासादिक तीन गाथानि करि कहें हैं;-
जहावरभवणाणं पारसहस्सं तु सुद्धपणुसिं।
पहलं तिसप तिपादं वालविभागुदयकूडं च ॥ २९८ ।।
ग्यष्टावरमवनयोः द्वादशसहस्रं तु शुद्धपंचविंशतिः ।
पाइल्प नियत त्रिपाद बाल्पत्रिभागोदयक्ट च ।। २९८ ।।
अर्य--पेष्ठ मर जघन्य भवननिका विस्तार अठारह हजार भर शुद्ध पचीस योजन है ।
बाहुस्य तानसे मर त्रिपाद योजन है । बाहुल्पका तीसरा भाग प्रमाण अंधा कूट है। भावार्थ
उत्कृष्ट भवन है सो तो धारह हजार योजन चौड़ा तीन से योजन पृथ्वीते छाति पर्यंत उंचा है।
महरि तिन भवननिविय जेता उचाईका प्रमाण काया साके तीसरा भाग प्रमाण ऊँचा फूट पाइए
है। इस बूट उपरि जिम मंदिर है ॥ २९८ ॥
नेहमवणाण परिदो वेदी नोयणदलच्छिया रोदि ।
अपराणं भषणाणं दंडाणं पण्णुर्वासुदया ॥ २९९ ।।
ज्येष्टभवनाना परितः वेदी योजनदोष्ठिता भवति ।
भवराणां भवनानो देशनो पैचविंशत्युदया ॥ २९९ ।।
अर्थ--उत्कृष्ट भवननिके यौगिरद भाध योजन ऊँची वेदी है। जघन्य भवनार पोस
अनुष उंची वेदी है। जैसे घागके चीगिरद भीति हो है तैसे जो होइ ताका नाम वेदी जानन ॥२९॥
त्रिलोकसार- वहादीण पुराणं जोयणलक्खं कर्मण एकच । आवासाणं विसयाहियवारसहस्स य तिपादं ॥३०॥ वृत्तानां पुराणां योजनलक्ष क्रमेण एक च । आवासानां द्विशताधिकद्वादशसहसाणि च त्रिपादम् ॥ ३०० अर्थ-गोल आदि आकार रूप जे पुर तिनका क्रम करि उत्कृष्ट विस्तार लक्ष योजन है। जघन्य विस्तार एक योजन है । बहुरि गोल आदि आकार रूप जे आवास तिनका उत्कृष्ट विस्तार दोयसै अधिक बारह योजन है। जघन्य विस्तार पौण योजन है ।। ३००।। भागें तीनप्रकार निलयनिका विशेषस्वरूप अर व्यतरनिके आहार उधास ताकी कहैं हैं, भवणावासादणिं गोउरपायारणचणादिघरा। भोम्माहारुस्सासा साहियपणदिण मुहुत्ता य ॥३०१॥ भवनासादीनां गोपुरमाकारनर्तनादिगृहाणि । भौमाहारोच्छासः साधिकपंचदिनानि मुहूर्ताश्च ॥ ३०१ ॥ --भवन आवासादिकनिकैं दरवाजे कोट नृत्य आदिक ग्रह पाईए है। बहुरि भौमते यंतर तिनके माहार किछू अधिक पांच दिन भए अर उपवास किछ अधिक पांच मुहूर्त भए जाननां ॥ इति व्यंतरलोक आधिकार समाप्त भया ॥ ३०१॥ इति श्री नेमिचंद्राचार्य विरचित त्रिलोकसारमें व्यन्तरलोकका अधिकार समाप्त भया ॥३॥ अर्थ-
ज्योतिलौंपाधिकार।
१२७
अप ज्योतिलोकाधिकार ॥ ४॥
सप तरफफे अधिकारको निरुपम फरि ताक अनतर उसको प्रात ज्यो ज्योतिश्क-
लोकपा अधिकार निरुपण करनेका है. अभिन्न जाके ऐसा आचार्य सौ ताकी आदि प्रथम
ज्योरिष्यानिय बिदनिकी मेरया दिखायने लिए ज्योतिष्क सोफके पयालयनिकों नमरफार रूप
मंगल कार -
पेसदएप्पणंगुलफदिहिदपदरस्स संखभागमिदे ।
जोइसमिणिदगेहे गणणातीदे णमंसामि ।। ३०२॥
शितपद्पयासदगुलातिहतप्रतरस्य संख्यातमागमितान् ।
ज्योतिष्यनिने गेहान् गगनातीतानमस्यामि ॥ ३०२ ॥
अर्थ-दोपसे छप्पन भेगुटका वर्गका भाग जगत्प्रतरको दिए जो प्रमाण होइ ताके
संस्थान भाग प्रमाग असरयाते जिनेन्द्र मंदिर तिनकों नमस्कार करौं हों। भावार्थ-दोपसे
एपनफा वर्ग पक्षी ६५५३६ गप्पगुटका वर्ग प्रतरांगुल सो पणही प्रमाण प्रतरांगुलका भाग
जगमतरको दिरं जो प्रमाण होय तितने ज्योतिषी है । यहुरि संख्यात ज्योतिषी एक बिंबविपै
पाइए एक एक विवर्षि एक एक पैन्याय पाइए ताते ज्योतिपनिकै प्रमाणको संख्यातका भाग
दिप दिनिका पायालयनिका प्रमाग था है तिन चैत्यालयनिकों नमस्कार करौं हों ॥३०२॥
आगे निन बिबनिवि तिरते ज्योतिष्कनिका भेद कहे हैं;-
चंदा पुण आइसा गद्दणक्खचा पदण्णतारा य ।
पंचविहा जोइगणा टोयंतषणोदहि पुहा ॥ ३०३ ॥
चंद्राः पुनः आदित्या प्रहा नक्षत्राणि प्रकर्णिकनाराय ।
पंचविधा ज्योतिर्गणा लोकांतघनोदाध स्पृष्टवतः ॥ ३०३ ।।
अर्थ-चंद्रमा १ मूर्य १ मह १ नक्षत्र १ प्रकर्णिक तारा १ ऐमें पांच प्रकार ज्योतिष्क
समूह है । ते लोकफे न घनोदधि पातवलयको स्पर्शते हैं । भावार्थ पूर्ण पश्चिम अपेक्षा घनो.
दपि पातबलय पर्यंत ज्योतिर्वित्र पाईए हैं ॥ ३०३ ।।
आर्गे दीप समुद्रनिक निरूपण विना ज्योतिष्क निरूपण संभव नाही सातें ज्योतिष्क बिंब.
निके आधारभून जे द्वीप समुद्र तिनकों प्यारि गाथानिकरि कहै हैं;-
अंधादगिपुरखरवारुणिखीरपदखोदवरदीओ।
गंदीसररुणभरुणभासा वर कुंडलो संखो ॥३०४ ॥
जबूधातकिपुष्करवारणिक्षीरघृतक्षौद्रवरद्वीपाः ।
नदीश्वरारुणारुणाभासा घराः कुंडल: शंखः ॥ ३०४ ॥
- १२८ त्रिलोकसार- अर्थ-~-जंबूद्वीप १ धातुकीखंडद्वीप १ पुष्करवर १ वारुणिवर १ क्षारवर १ धृतवर क्षौदवर १ नंदीसुर द्वीपवर १ अरुणवर १ अरुणाभासवर १ कुंडलवर १ शंखवर ॥ ३० ॥ तो रुजगभुजगकुसगयकोंचवरादी मणस्सिला तत्तो । हरिदालदीवसिंदुरसियामगंजणयहिंगुलिया ॥३०५ ।। ततो रुचकमुजगक्रुशगौंचत्ररादयः मनःशिला ततः । हरितालीपसिंदूरश्यामकांजनकहिंगुलिकाः ।। ३०५ ॥ अर्थ-~-तहां पीछे रुचकबर १ मुजगवर १ कुशगवर १ क्रौंचवर १ ९ अभ्यंतरके सोटा द्वीप हैं तात परै वीचमें असंख्यात द्वीप समुद्र है तिनकों छोड़ी अंतके सोलह द्वीपनिके नाम कहे हैं । तहां पीछे मनः शिलाद्वीप १ हरिताल द्वीप १ सिंदूरवर १ श्यामवर १ अंजनवर १ हिंगु- टिकवर १ ॥ ३०५॥ रूपसुवण्णयवजयवेलरिययणागभूदजरखवरा । तो देवाहिंदवरा सयंभुरमणो हवे चरिमो ।। ३०६ ॥ रूप्यमुवर्णकवनपैदूर्यकनागभूतयक्षपराः । ततो देवाहीद्रयरौ स्वयंमूरमणो भवेत् चरमः ॥ ३०६ ॥ 1-अप रूणवर १ मुवर्णवर १ वमबर १ वैदूर्यवर १ नागयर १ भूतवर १ पक्षवर । देववर १ महीन्द्रयर १ स्वयंमूरमण १ त विप जानना ॥ ३०६ ॥ लवर्णयुहि फालोदयजलही तत्तो सदीवणामुपही । सव्ये अटारज्जुद्धारवहीमेत्तया होति ॥ ३०७ ॥ टवायुधिः फालोदफजलधिः ततः स्वदीपनामोदधयः । सर्वे अर्थतृतीयोद्वारोदधिमात्रा भवति ॥ ३०७ ॥ अर्थ-समुद्रनिके नाम कहे हैं जबूद्वीपकै परिक्षपी टयणसमुद्र । महरि धातुको घरके काटोदक समुद बहरि अन्य दीपनिकै अपने अपने द्वीपका जो नाम तिसही नामके धारक सनु जानने । वहरि ते सर्व दीर समुद्र कितने है अढाई उद्धार सागर प्रमाग है। भावार्थ-दर कोरा कोदि दूसरी उद्धार पसका एक उदार सागर होइ । ऐसे भदाई सागरके ते रोम लिन र समुद्र है ॥ ३०७॥ अब निन दर समुद्रनिका विस्तार का आकार निरूर है- नं जोयणटायों कहो तहणद्गुणरासेहि । सवणातिर परिपिता सर्व मुरमणुरहियमा ।। ३०८ ॥ * पोजनमः न तद्विगुरिगुणत्यामः । लयमादिमिः परिनि सभामणोदः ॥ १०८॥ अ- e पोजन है वहरि वन कहिएगा है। वहरि साले दूगा पायाम संपुन २ मा महक सभा मा पनी समुद्र किनकी परिक्षण परित अर्थ- ज्योतिलोकाधिकार। १२९ है । भावार्थ-सन द्वीप समुद्रनिके पीचि बूद्वीप है सो गोल है । ताकी मप्य वि चौड़ा- ईका प्रमाण लक्ष योजन है ताको चेहें स्वण समुद्र है सो तातें दूणा दोय लास योजन ध्यास संयुक्त है। ताको घेढे धातुकोखंड द्वीप है । सो तातें दूणा प्यारि टास योजन म्यारा संयुक्त है याही प्रकार द्वोपकों समुद्र घेव्यों समुद्रकों द्वीप वेढ्यां दूणा दूणा विस्तार लिए स्वयंभूरमण समुद्र पर्यंत द्वीप समुद्र गोल आकार जानने ॥ ३०८॥ आगै तहाँ इस्थित द्वीपका पा समुद्रका सूची व्यास भर पलय व्यास ल्यायनेकी फरणमूर पहु है:- रूऊणाहियपदमिददुगसंबग्गे पुणोपि लयखहदे । गयणतिलवखविहीणे वासो घलयस्स सूइस्स ।। ३.९॥ रूपोनाधिकपदमितरिकसवर्गे पुनरपि लक्षहते । गगनप्रिलक्षविहीने व्यासो पटयस्य सूचेः ।। ३०९॥ अर्य-द्वीप समुद्रनिका इट गच्छका जो प्रमाण ताको एक जायगा एक घाटि भर एक जायगा एक बांधि करि तितने हुए इनिकों परस्पर गुणे जो प्रमाण होइ ताको साख करि गुणि एक जायगा शून्य एक जापगा तीन लाख घटाइये तब पलयका अर सूचीका ध्यास होइ । भावार्थ- इस द्वीप या समुद्रतें पहला जो समुद्र या दीप तिहका अंत तट पर ताके सन्मुरा इस द्वीप समुद्रका त तट इन दोऊनिकै पीचि जो क्षेत्रका प्रमाण सो वटय म्यास जानना, बटुरि इस दीप या समुद्रका सन्मुख दोऊ अंत तटनिके बीच जो क्षेत्र सो सूची व्यास जानना । जैसे फालोदफ समुद्रतें पहला धातुकीपेड द्वीप है सो धातुफीसंघका अंत तट भर कालोदकका अंत सटके पीचि जो क्षेत्रका प्रमाण सो तो वलय ध्यास है । बहुरि कालोदकका सन्मुपदीय अंत सट तिनिके पीचि जवूद्वीप अर दोऊ दिशा सबंधी लवणोद धातुकीरोड फाटोदका म्यास जोडें जो क्षेत्र होइ सो फालोदका सूची न्यास है। ऐमेही सर्वत्र जानना। अब इनके ल्यायनेका विधान कहिर है। संदीप य समुद्र जैथवा होइ साह प्रमाण इहाँ गच्छ जानना । तामें एक घटाएं जो प्रमाग होइ ताका विर- छन पाहिए एक एक फरि यसेरिए । बहुरि एक एक प्रति दोय दोय दानिये बहुरि निनको परस्पर गुणिए ऐसे फरत जो प्रमाग होइ ताको रक्ष करि गुणिए सामें हिंदी घटाइये ऐसे करते र दीरया समुदका पट्य ध्यास बाव है। ताका उदाहरण--जैसे जैन्दीपर्ने टगाय पालोदक समुद्र पौधा है सो गक प्रमाण प्यारि भया सामें एक घटाएं सीन सो सानका विरटन पारिए २।१।१। बहुरि एक एक प्रति दोय दोय दानिए ।२।२।२। बहुरि इनकों परस्पर गाणि सब आट होइ । इनको लस करि गुणे आठलाप होइ सा बिन्दी घटाए भी तितने हो र सो पालोदक का यलय पास मारलाग योजन है बरि इए दोष या समुद्र जेको होइ तिस प्रमाण गछले एक अधिकार विरलन करि एक एक प्रति दोय दोइ परर गुण जो प्रभाग होइ ताको सक्ष करि गाशि तामें तीन सारा घटाए इस द्वीप पा समुद्रका सूची म्पास हो है । ताका उदाहरण- जैसे कारक मान चौथा है । सो गच्छका प्रमाण प्यारि तामें एक मिलाए पाच सो पारका रिटन करि १।११।११॥ एक एक प्रति दोय २।२।२।२।२। सर परशर गुणें बतास होइ इनको दक्ष हरि गोपनीम नगर -- -- वि.
त्रिलोकसारं- लवणदि ४ तीन स्थान. होइ इनमें तीन लाख घटाए गुणतीस लक्ष योजन प्रमाण कालौदक समुद्रका सूचीब्यास ई अव यह करण सूत्र कैसे कया सो वासना कहिए हैं । तहां वलय व्यासकी वासना ऐसी अंबूद्वीपका व्यास टक्षयोजन ताते दूणा दूणा लवण समुद्रादिकका व्यास है तातें एक गछ प्रमाण दुवा परस्पर गुणि रब्ध प्रमाणकों जंबूद्वीपका व्यास करि गुणे इष्ट स्थानविदै व्यास ही है इहां किछु हीन अधिक करना नाहीं तातै गगन हीन कहिए त्रिंदी घटावना क बहुरि सूचीन्यासकी वासना ऐसी है । इट द्वीप वा समुद्रका जो वलय ब्यास ताको दोऊ स. दिशा संबंधी न्यास मिलाइनें। दूणा स्थापिए बहुरि तातें पहले जे द्वीप वा समुद्र तिनका दिशा संबंधी न्यास मिलाइ दूणा दुणा वलय व्यास स्थापिए। यहरि जंबूद्वीपकै दोय दिशा में कालोदि। व्यास नाही सातें वलय व्यासका प्रमाणही स्थापनां । बहरि दूसरे स्थानि । धातुकी ८ स्थापन करना जैसे कालोदकका सूची व्यास ल्यावनेका ऐसे स्थापन कर ऐसे स्थापन किए द्वितीय स्थानविर्षे शून्पकी जापगा दोष लाग्नु मिः गछते एक अधिक स्थानभए ऐसे चारि एक अधिक गछका परस्पर गुरु फया । यहरि पदमेत्ते गुणयारे इत्यादि सूत्र करि जोड दिए सहा दोष र तो दूसरा स्थानका भर रूवपरिहाणे इस यचन करि एक लाख ए इन दोऊ ऋण घटावनेकों है सासका घटायना कहा ऐसे करते इष्ट स्थानविय सूचीयास हो है ॥ ३०९॥ तसे ही अभ्यन्तर भव्यम बाह्य सूचीत्र्यास ल्यायनेकों फरण सूत्र कहें हैं- लवणादीणं यासं दुगतिगचदुसंगुणं तिलपस्तूणं । आदिममग्झिमवाहिरमुइत्ति मणंति आइरिया ॥ ३१० ।। लपणादीनां ध्यास विकनिकचतुःसगुण निटक्षीनम् । आदिममध्यममासमूची इति भणेति आचार्याः ॥ ३१०॥ अर्थरावणादिक समुद्र या द्वीपनिका वलय ध्यासको दोय सान प्यारि गुणा कार रहने तीन टाउ घटाए, अन्यन्नर मध्य वा सूची प्यास होद ऐमे अर्थ कहै है। भावार्य- वा समुद्री सन्मुख भादिक दोऊ तदनिके पचि जी क्षेत्र प्रमाग अभ्यन्तर सूची व्यास जानना । महरि इट द्वीप पा समुफे समुप दोऊ दिशा सती मध्य प्रदेशनिक चि जो क्षेत्र प्रमाण मो मम मुची प्याम जानना । यहरि इट दीप या समुदक सगुम दो तनिकै वीयि जो क्षेत्रमाण सो यामागुची प्याग जाना तही सपा समुद्रादिक यि इष्ट दीप या गदका वएप माना ला की नामें सीन साल पहा यापतर These art -दिति राममाया दौड दिशा मिया गावगाम मो. मनिका टोSETHEAUTIो मा tarinaniममुद्रामा दोs firm that म O ग्पोतिनोपरि। month Anm मा पभ्यार गुपौयास हो। दो दिशामा Emबीर पापा पागको पूणा परि सामगीन ग घटार अभ्यन्तर TOTRAM फा। परिवार र गगुटका परप म्यागको निगुणा फार सामे Aamir मण्यम पी समोई पाहिए। शिक्षित दीप या समुनका em मा लिए गामें तीन पाप पा अम्पार गुपी प्याग हो है। लिह अभ्यन्तर गयी या प्रमानि रिशिप पा सगुस्सा दोय दिनिका बल्य पासफा भाषा प्रमाग पूर्ण पार पण या गायो सिधार निगुणा बम्प प्यारा तीन लारा पाटि प्रमाण कमी प्रम? 1 पारि वियक्षिक दीप या समुद्रका पटप म्पासफो भौगुणा परिसमे नाम पर पोनन पटाएं पास भी प्यार हो है सोई कहिए है। बक्षित द्वार पा गगुमा मा बटय म्याग तीन सय पटाएं अम्पन्तर गूची म्याग हो ? तिरिय विशित समुदवा दो सिंधी पाप पारा मि दणा पश्य म्पास मिलाएं चौगुणा पटप याम सान मा पाटि पोगन प्रमाण पाय गूची प्यार हो है। ऐमा आचार्यका अभिप्राय है ॥३१॥ हा पदा जो पीराग ताया अपेक्षा करि निग तिस क्षेत्रका यादर सूक्ष्म परिधि परिमार गाम क्षेत्राट स्पायनेको परण मूग फहै है- विगुणिपवास परिशी दगुणरित्यारवग्गमूलं च । परिविदासतरियं पादर मुर्म प खेपफलं ॥ ३११ ॥ त्रिगुणितम्पामः पगिधः दागुगविस्तारवर्गमूले घ । परिधितव्यासमुरीय पादर गर्म प क्षेत्रफलम् ।। ३११ ॥ अर्य-तिगुणा पासप्रमाण पादर परिधि है यहरि दश गुणा प्यासका जो वर्ग साका मूल प्रमाग मूक्ष्म पगिरि दो है। परि परिविको प्यासको चौथाई करि गुणें यादर या सूक्ष्म क्षेत्रफल हो । भावार्थ-परिधका गिरदया जो प्रमाण सो परिधि काहिए पारि समकोरका जो प्रमाण सो क्षेत्रफल फदिए । जैसे योजन रूप क्षेत्रफल रोई मो एक एक योजनके संड जेते होहि तितना क्षेत्र फल जानना । ऐसेही भंगुग्दादि म्हप जानना तहाँ जो स्थूटपने करि कहिए सो पादर जानना यहुरि सारतम्य करिझमपने करि पाहिए सो मूक्ष्म जानना तहाँ प्यामका जो प्रमाण साफों तिगुणा करि पादर परिधि हो । सो जीपका लक्ष योजन प्रमाण म्यागको तिगुणा किए सीन ला योजन प्रमाण परिधित है यहरि म्यासका जो प्रमाण ताका वर्ग करिएरहरि ताको दस गुणा करिए जो प्रमाण होइ साया यर्ग मूल फारिए सब मूक्ष्म परिधि हो है सो जंबूद्वीपका टक्ष योजन य्यास ताका वर्ग हजार कोहि योजन हो । ताफा दश गुणा किए दस हजार योदि होइ है । १कारमामा परि श्रत विषम कृति कोडि स्यादि विधान परि याका पर्ग मूल पारिए तब तीन लाख सोलह दोप में सत्ताईस तो योजन होइ-३१६२२७ बहुरि अवशेष प्यारि लाख चौरासी हजार चार से इकहत्तरि योजन रहे. तिनको चौगुणा करि कोश करिए तब उगणीस लाख सतीस हजार । - - १३२ प्रिलोकगार- आटसे चौरासी १९३७८८४ कोश हुए तिनकों दगा मल अंग मानिरा प्रमाला एटा धत्तीस हजार प्यारिस चौवन ६३२४५४ साफा माग दिए सीन करो यहरि मगर चाटीस हजार पाँचसै वाईस कोश रहे-४०५२२ लिनको दोय हजार गुगा की इनके घना करिए तव पाठ कोडि दग लाग चमार्गन हजार घनुप होइ तिनको पूर्व माग दिए एक सौ अठाईस धनुष भए यहरि अब शेष धनुप निपामी हजार आटमै अगामी निन्छ चौगुणा करि हाथ करिए सब तीन लाप गुणसिठ हजार पाचन बारह हम्म होइ सो इन दि पूर्व भागहार समरे नाही तातें इनकों चीनीस गुणा करि अंगुल करिए तब लियामी टास गुगत हजार दोयसै अद्वतालीस ८६२९२४८ अंगुल होई इनका पूर्व भागहारका माग दिई तरह र होइ । बहुरि अवशेष भंगुल प्यारि सास सात हजार तीनसे छियालीस सो तो माम्य अर पूर्वोक हर लाख बत्तीस हजार च्यारि हजार चार से चौवन दोयनिकों तीन लाग सोलह हजार दोइ से सदाश्त करि अपवर्तन किए भाग्य कि अधिक एक अर भाग हार दोइ होइ ऐसे किछु अधिक अंगुल भया । या प्रकार जंबूद्दीपका सूक्ष्म परिधि तीन लाग्य सोलह हजार दोपमै सटात योजन तीन कोश एक सौ अठाईस धनुष कि अधिक साढा तेरह अंगुल प्रमाण आकर । बहुरि स्थूल परिधिका प्रमाण करि व्यासका चौया भागको गुणे बादर क्षेत्रफल हो है। सो जंबूद्वीपका स्थूल परिधि तीन लाख योजन तीह करि व्यास एक लाखको चौथाई पच्चीस हजार योजन गुणें सातसे पचास कोहि योजन प्रमाण जंबूद्वीपका बादर क्षेत्रफल हो है । बहुरि सूक्ष्म परिचि प्रमाण करि व्यासका चौथा भाग गुणें सूक्ष्म क्षेत्र फल हो है । सो जंबूद्वीपका सूक्ष्म परिवि दिने तीन लाख सोलह हजार दोयसै सत्ताईस योजन तिनौं व्यासकी चौथाई पर्चास हजार करि हुने सातसै निवै कोड़ि छप्पन लाख पिचहत्तरि हजार ७९०५६७५००० भए बहुरि तीन कोशस्त्रे व्यासकी चौथाई कर गुणें पिचहत्तरि हजार कोश हुआ इनको च्यारिका भाग दिएं अठारह हजार सात से पचास योजन भए तिनको पूर्वोक्त योजननिमें मिटाइए ७९०५६९३७५० बहुरि एक सौ अठाईस धनुप तिनों व्यासकी चौथाई करि गुणे वत्तीस लाख घनुप हूवा इनको आठ हजार रका भाग देइ योजन किए च्यारिसै योजन होइ सोभी तिन योजननविष मिलाइये ७९०५६ ९४१५० बहुरि तेरह अंगुल भर किछु अधिक आध अंगुल इनको समछेद करि मिलाए सदा- ईसका आधा हुवा , बहुरि दोप करि तिर्यग अपवर्जन करि पच्चीस हजारका आधा साढा बाई हजार करि सत्ताईसको गुणे तीन लाख सैतीस हजार पांचसै अंगुल भए इनकों एक कोशके अंगुल एक लाख वाणवे हजार तिनका भाग दिए साधिक एक कोश होइ । या प्रकार जंबूद्वीपका सूक्ष्म क्षेत्रफल सातस निवे कोडि छप्पन लाख चौराणौ हजार एक सौ पचास योजन कर साधिक एक कोश प्रमाण आया। ऐसे ही सर्व द्वीप समुद्रनिका स्थूल सूक्ष्म क्षेत्रफल ल्यावनां ॥३११॥ आर्गे जंबूदापका सूक्ष्म परिधिका सिद्ध भए अंक कहे हैं; जोयण सगदुदु छफिगि तिदयं तिकोसमडदुगि दंडा । अहियदलंगुलतेरस जंए मुहमपरिणाहो ।। ३१२ ॥ - ज्योतिर्लोकाधिकार। - योजनानां सप्तद्विदि पडके प्रयं त्रिकोशा अष्टदयेके दंडाः । अधिकदलागुटत्रयोदश जंबो सूक्ष्मपरिणाहः ॥ ३१२ ।। अर्थ-योजननिके सात दोय दोय उह एक तीन ए अक है ३१६२२७ बरि तीन कोश बहुरि आठ दोय एक इन अंक १२८ रूप धनुष बहुरि साधिक आपा तेरह अंगुल इतना सर्घ जंबूद्वीपका सूक्ष्म परिधिका प्रमाण है ॥ ३१२ ॥ आगें तिसही जंबूद्वीपके सूक्ष्म क्षेत्रफलके सिद्ध भए अंक कहे हैं;-~- पण्णासमेकदालं णव छप्पणासगुण्ण णवसदरी । साहियफोसं च हवे अंदीवस्स मुहमफलं ॥३१३ ।। पंचाशदेकत्वारिंशनवपद् पंचाराष्ट्रन्य नवसप्ततिः । साधिककोशच भवेनंबूद्वीपस्य सूक्ष्मफलम् ॥ ३१३ ॥ अर्थ-पचास इफतालीस नप छप्पन शून्य गुण्यासी ए तो योजनानिक अंक है ७९० ५६९४१५० बहुरि साधिक एक कोश इतना जंबूद्वीपका सूक्ष्म क्षेत्रफल है ॥ ३१३ ।। आगे जेबूद्वीपका परिधिकी अपेक्षा फार विवाशित द्वीप या समुद्रका परिधि ल्पाचनेकों करण सूत्र यह है- जंउभयं परिही इच्छियदीउवादिस्इ संगुणिय । जंयवासविभत्ते इच्छियदीउवहिपरिही दु ॥३१४ ॥ जंबूभये परिधी इश्चितद्वीपोदधिसूध्या संगुष्य । जबूभ्यासविभक्ते इसितद्वीपोदविपरिधी तु ॥ ३१४ ॥ अर्थ-बूद्वीपका स्यूल सूक्ष्म दोउ परिधिकों विवक्षित दीप पा समुद्रका सूची म्यान फरि गुणि बूद्वीपके म्यामका भाग दिए विवक्षित दीप पा समुद्रका स्थूल या मूक्ष्म परिचितो है । ताफा उदाहरण । जंबूद्वीपका स्थूल परिधि तीन साग ३ योजन ताको टपण समुद्रका सूची व्यास पांच लास योजन फरि गुणे १५ सक्ष जंबूद्वीपका ध्यास लास पोजन साका भाग दीए टपण समुद्रका स्यूल परिधि पंद्रह योजन प्रमाण हो है। महरि जोरका स्थूल परिधिकों धातुको रारा सूची ब्यास तेरह साख योजन फरि गुणे जंबूदीपका म्यासका भाग दिए धानुको सडमा स्थूल परिधि गुणतालीस लास योजन हो है । यहरि जीपका सूक्ष्म परिधि तीन लाख सोरह हजार दोयसै सत्ताईस योजन तीन कोश एकसे पटाईस धनुप किट अधिक साढा तेरह अंगुट तिनकों लवण समुद्रका सूची व्यास करि गुणे जंजूदीपक भ्यासका भाग दिए या समुद्रा सूक्ष्म परिधि पंद्रह सार क्यासी हजार एफ सौ गुणतालीस योजनादि प्रमाग हो है। मेरी जेन्दीपके स्थूड परिधिका धातुको पडका सूची प्यास करि गुणे महापके म्यासमा भाग दर धातुको संडका सूक्ष्म परिधि हो है । ऐसेही अन्य द्वीप वा समुद्रनिका स्थूट मुश्म परिधि स्थापना ३११ श्रय स्थूल सूक्ष्म क्षेत्रफलको स्यावनेको करण मंत्र है -
१३४
त्रिलोकसार-
अंताइसइनोगं रुंदद्ध गुणित्त दुप्पडि किचा ।
तिगुणं दसकरणिगुणं वादरमुहुर्म फलं वलये ॥ ३१५ ॥
अंतादिसूचियोग द्रार्थेन गुणयित्वा द्विःप्रतिं कृत्वा ।
त्रिगुणं दशकरणिगुणं वादरसूक्ष्मं फलं वलये ॥ ३१५ ॥
अर्थ --अंत सूची तौ बाध सूची व्यास भर आदि सूची अभ्यंतर सूची ध्यास इन दोउनिके
प्रमाणका जु योग कहिए जोड़ ताको रुद्र कहिए वलय व्यास ताका अर्घ प्रमाण करि गुगिर
जो प्रमाण होइ ताहि दिः प्रति कृत्वा कहिए दोय जायगा स्थापि करि तिस प्रमागको एक
जायगा तो तिगुणा करिए तब वादर क्षेत्रफल होई एक जायगा दश करि गुणा करिए जो प्रमान
या ताका वर्ग फरि ताको दश गुणा करि ताका वर्गमूल प्रहण करिए । जिस राशिका वर्ग
ग्रहण करना होइ ताकों करणि कहिए । ऐसे किए सूहम क्षेत्रफल हो है या प्रकार वल्य वृत्त जो
गोटका परिक्षपी गोल क्षेत्र तिह विर्षे वादर अर सूदन क्षेत्रफल हैं ताका उदाहरण टपण समुदाय
बाह्य मूची व्यास पंच लाख योजन अभ्यन्तर सूची व्यास एक लाख योजन इन दोनिकों जों
छह लाख भए इनकों रुंद जो वलय व्यास इनकों दोय लाख योजन ताका आधा एक लारा विद
कर गुणिए तब छह हजार कोड़ि भए सो इनकों दोय जायगा स्थापि एक जायगा तिगुगा करिर
सब लवण समुद्रका वादर क्षेत्रफल अठारह हजार कोड़ि योजन प्रमाण हो है । यहुरि एक जापान
तिह छह हजार कोहिका वर्ग करि दश गुणा करिए तब उत्तीस कोदा कोहि भर इनका
वर्गमूल प्रहण किए अटारह हजार नबसे तहेतरि कोडि छासठि लाख गुणसठि हजार छैनै दन
१८९७३६६५९६१० योजन प्रमाण समुद्रका सूक्ष्म क्षेत्र फल हैं ऐसे ही अन्य दीप वा समुद-
निका बादर सूक्ष्म क्षेत्रफट स्यानां ॥ ३१५॥
भाग असूदीप प्रमाण करि टयण समुद्रादिकनिके खंड स्यावनेंकों करण सूत्र कद हैं;--
बाहिरमूईवगं अम्भंतरसुइबग्गपरिहीणं ।
जंयवासाबिभत्ते तत्तियमैत्ताणि संडाणि ॥ ३१६ ॥
वागमूचीवर्गः सम्यन्तरमूचित्रर्गपरिहीनः ।
जबूभ्यामश्मिनः तान्मात्राणि संडानि || ३१६ ॥
अर्थ-वान सूची व्यामका जो वर्ग तामें अभ्यन्तर सूची म्यासका वर्ग घटाए जो प्रनार
होइ तारों बंदीरके म्यामका माग दीजिय मो यर्ग राशिके गुणकार भाग हार वर्ग गप हो।
इस न्याय करि इहां भी वर्ग गमि है ताने जीप व्यासका जो यो मामा भाग दौदिर में
करता जो प्रमाण या नावमात्र जडदार ममान र मानने। ताका उदाहाय-यण समुदा
बार सूची याम व लाम योजन ताफा वर्ग पाग बार कोधिनाने बाथम्पन्नर गूची दर
टोन भाका वर्गक हवार बोहि घटार चौरमा हजार कोदिहे वाकों का
हर साल पेटन टाका वर्ग एक हजार को नामा भाग दिएचोपोग भर गई स सदरे
भरे मन मेहरिनी चौकीमा हो है ।मे ही धान्य द्वीप वागदनिकी जान ॥२१॥
ज्योतिलोकाधिकार। - on अन्य प्रसार करि जर गमान गास्थानको परण च गप दोष गाथा फहे है; जमला पारससलागगुणिदे द पलयरसंहाण । पादिरयामलागा फदी सदनाखिला संवा ॥ ३१७।। पानासायाकगुणितानु पलपाडानि । पासचीसलाका को सस्तामिनि पानि ।। ३१७॥ भर्य-विदित दीप पा समुदया पन्य प्याग जितने एस प्रमाण कमा सोई हा सागराया प्रमाण जानना सो एक पाटिलकाका प्रमागयों यारह करि गुणिए । वरि साको का प्रमाण फरि गगिए सब जीप समान गोटमंड हो है । साफा उदाहरण । लयण समुद्रका पटप म्याग देोप लायोजन है सोटाकाया प्रमाण दोय जानन परि एफ घाटि शलाकाका प्रमाग एक साया बारह गुणा किए मारह साको शलाफा प्रमाण दोय फरि गुणे चौतीस भए सोई षण समुद्र किन जाप समान र सल्में चौवीम हो है । ऐसेंही अन्यत्र जानना । यहरि बाह्य सूची प्याम जितने लक्ष प्रमाण होइ तीर प्रमाग सूची शलाका कहिए ताका वर्ग किए जो प्रमाण होइ नितना जापन स्त्रगाइ तिस शिवाशित दीप वा समुद्र पर्यंत क्षेत्र वि सर्व जद्वीप समान पनिका प्रमाग जानना । साया उदाहरण-सवणसमुद्रका वाम सूची म्यास पांच लाख योगन है सो एवण ममुद्रको सूची शालाका पांच जाननी ताका यर्ग पचीस सौई जेबूद्वीपते लवण समुद्र पर्यंत सर्व क्षेत्र यि जाप समान पचीस पंड हो है। एक जयद्वीपका चौईस सुषण समुद्रफे ऐसे पचास जानने ।। ३१७॥ पाही प्रकार अन्यत्र भी जानने- पाहिराई वलपवारणा पउगुणिहवासहदा । इगिलपखवग्गनिदा जंपूसमवलयखंडाणि ॥ ३१८ ॥ पाहगूची मलयव्यासोना चतुर्गगितष्टव्यासहता । एक्टक्षपर्गभत्ता जंयममवटपर्दानि ॥ ३१८॥ अर्थ-विवक्षित दीप या समुद्रमा बास सूची ग्यासका प्रमाणमैंसौ पलय म्यासका प्रमाण घटाइए । बहुरि ताफों चौगुणा इट यलय प्यास फरि गुणिए । बरि एक लाखका वर्गका भाग दीजिए जो प्रमाग होइ तिनने जदीप समान गोल संह जानने । ताका उदाहरण । यण समुद्रमा पाह्य सूची म्यास पाच लास योजन तामें यलय प्यास दोय टाख योजन घटाएं तीन लाख पोजन सायों चौगुणा यलय म्यास पाटलाख करि गुणे चौईस हजार कोहि इनको एफ लारउफा वर्ग एक हजार कोहि ताका भाग दिएं चौईस भए । सोई स्वण समुद्र विष जंबूद्वीप समान संड पाल्य चोईस हो हैं । ऐसें अन्यत्र जाननें ॥ ३१८ ॥ मार्ग समुद्रनिका रमविशेष कहें हैं;- लवणं वाणिनियमिदि कालदुगंतिमसयंभुरमणमिदि । पचेयजलगुवादा अवसेसा होति इच्छुरसा ॥ ३१९ ।।
[--टयण सनुमति जी त्रिलोकमार- टयणं याणित्रयमिति काद्विकर्मनिगमरममिति । प्रत्येकजलवादा आशेषा मांति शुरमाः ।। ३१९ ॥ अर्थ -लवण समुद्र पारगी आदि तीन समुद्र मे प्यारि ममुद्र बहरि कादोदक पुरु वर अतका स्वयंभूरमण समुद्र ए तीन क्रमते प्रत्येक अपने अपने नाम अनुमारि साद घरे हैं। यहरि जल स्वाद घरै है । अवशेष इक्षुरस सादको धरै है। भावार्य- जल है ताका स्वाद लयण समान है । यारणीयरवि साद मदिरावत् है। क्षीरयरविष स्वाद दुग्धयत् है । धृतपरविर्षे स्वाद घृतवत् है ऐसे प्यारि तो अपने नामके अनुसारि रसको धेरै हैं। बहुरि कालोदक पुष्करवर स्वयंभूरमण इन तीनों विष जल है ताका स्वाद जल समान ही है। बहुरि असंख्यात समुद्र तिनविय जो जल है ताका स्वाद सोठेका रस समान है ।। ३१९॥ आगें तिन समुद्रनिविर्षे जलचर जीवनिका संभवने न समबनेकों हेतुर्वक कहे हैं;-- जलयरावा लवणे कालेयंतिमसयंमुरमणे य । कम्ममहीपडिवद्धे ण हि सेसे जलयरा जीवा ॥ ३२० ॥ जलचरजीया लबणे कालेंऽतिमस्वयंमुरमणे च । कर्ममहीप्रतिबद्ध न हि शेष जटचरा जीवाः ॥ ३२०॥ अर्थ ---जलचर जीव लवण समुद्रवि वहरि कालोदकवियें बहुरि अंतका स्वयम् रमश विर्षे पाईए हैं । जाते ए तीन समुद्र कर्मभूमि संबंधी है । बहुरि अवशेष सर्व समुद्र भौगभूनि संबंधी हैं भोगभूमिविर्षे जलचर जीर्वोका अभाव है। तातें इन तीन विना अन्य जलचर जीव नाहीं हैं ॥ ३२०॥ भागै स्थान निर्देश करि तीन समुद्रनिवि मत्स्यनिका शरीरको अवगाहना कहें हैं। लवणदुगंतसमुद्दे णदीमुहुवहिम्हि दीह णव दुगुणं । दुगुणं पणसय दुगुणं मच्छे वासुदयमद्धकमं ॥ ३२१ ॥ लवणद्विकांत्यसमुद्रे नदीमुखोदधौ दैये नव द्विगुणं । द्विगुणं पंचशतं द्विगुणं मत्स्य व्यासोदयो अर्धक्रमौ ॥ ३२१ ॥ अर्थ-ठवणादि दोय समुदनिधिधैं बहुरि अंतका समुद्रवि जहां नदी प्रवेशका मुखरित बहुरि समुद्रका मध्यविप क्रमते नव ताका दूणा तिनका दूणा पांचसै ताका दूणा मत्स्यनिका शरीर लंबा है । तातें अर्द्ध प्रमाण व्यास है व्यासतै आधा शरीर ऊंचा है । भावार्थ-मत्स्पनिक दारीरनिकी लंबाई टयण समुद्रवि जहां नदीनिका प्रवेश हो है तहा तीरवि तो नव योजन है । बहरि समुद्रका मध्य भागविर्षे अटारह योजन है । वहरि कालोदक समुदविप नदी प्रवेशरूप तौरविरे सौ अठारह योजन अर मध्य भागविपै छत्तीस योजन है बहुरि स्वयंभू रमणविष पांचस योजन मध्यविष हजार योजन है । यहरि सर्वत्र जो लंबाईका प्रमाण कया तातें आधा चौड़ाईका प्रमाण है। बहुरि चौड़ाई के प्रमाणते आधा इंचाईका प्रमाण है ॥ ३२१ ।। समुद्रनिविय ज्योतिर्लोकाधिकार। अब मनुष्य क्षेत्र इतर क्षेत्रके विभागका अर कर्मभूमि भोगभूमिकी मर्यादाको प्राप्त होते जे दोय पर्वत तिनका स्वरूप निरूपण करता संता तिनहीके विभागकों दृद्ध करनेकों तीन गाया पुक्खरसयंभुरमणाणदे उत्तरसर्यपहा सेला । कुंडलरुचगदं वा सव्वे पुर्व परिरिखचा ॥ ३२२ ॥ पुष्करस्वयंभुरमणपोर) उत्तरस्वयंप्रभो शैटो। कुंडलरुचकाध या सर्वे पूर्व परिक्षिप्ताः ॥ ३२२ ।। अर्थ-पुष्करावि स्वयभ्रमणाविप मानुषोत्तर स्वयंप्रम पर्वत है। भावार्थ-- नाम द्वीपका बलय न्यासका अई भागविषै पीचि मानुषोतर नाम पर्वत है। बरि स्वभूरमग द्वीपका बलय भ्यासका अर्द्धभागवि बाचि स्वयंप्रम नामा पर्वत है। कैसे हैं ! कुइठ चकार्ध मिव कहिए जैसे कुंदत पर दीपवि वीचि कुंडल गिरि है । बहुरि रचक पर दोपर बीचि रचरु गिर है तैसे ही जाननें । बहुरि ए सर्व पर्यत पूर्व अपने अपने अभ्यन्तरयनी जे दीर का समुदनिकों परिक्षेप करि वैदि कार जैसे मगरकों वैदि कोट हो है सैसे तिट है ।। ३२२ ।। मणुसुत्तरोत्ति पशुसा मणुगुत्तरलंघसचिपरिहोणा। परदो सर्यपहोति य जहमोगावणीतिरिया ॥ ३२३ ॥ मानुपौत्तरात मनुष्याः मानुपोत्तररघातिपरिहीनाः । परतः स्वयंप्रमात व जघन्यभोगापनितिचः ।। ३२३ ।। अर्प-मानुषोत्तर पर्वत पर्यंत महाई दोपविष ही मनुष्य है से मनुष्य मानुपौत्र, पर्व. सको उलंघन शक्तिकार हीन हैं। मानुषोत्तर पर्वतको उलपि किसी मनुष्पकी जानेको साप नाही । बरि इस मानुपोत्तर पर्वतकै परें स्वयमम नामा पर्वत पर्यत दधन्य भोगभूमिया तिर्थव है।३२३ ।। फम्मावणिपतिपदो पाहिरभागो सयपहगिरिरस । घरोगाहणजुत्ता तसनीमा होति वत्येव ॥३२४॥ कर्मावनिप्रतिपद्धो मानभागः स्वयमगिरे। घरावगाहनयुक्ताः प्रसजीवा भाति तवेष ॥ ३२ ॥. अर्थ-स्थपंप्रम नामा पर्षतते परे जो बास भाग सो कर्म भूमि संबधी है। भारा- स्वप्रम पर्वतके परे कर्मभूमि पाइए है बरि उतर शरीरको भगाना संयुक अम संग सहा हा मानविध पाइए हैं ॥ ३१ ॥ आगे इस गाथाका अपर अविकासा जो सहर माहन ताको एक इन्द्रिय भा. गाहनाक को है- अधियसारसंक्षारस तिवस्य. साम्मयं परमे। संखे गोगिय भमरे मरणे परदादीहोद॥ ३२५॥ -- १३८ त्रिलोकसार- अधिकसहस्रं द्वादश त्रिचतुर्थमेकं सहस्रक पद्म । संखे प्रेष्मे भ्रमरे मत्स्ये वरदेहदी तु ॥ ३२५ ॥ अर्थसाधिक हजार वारह तीन चतुर्थ भाग एक एक हजार योजन प्रमाण सख प्रेम भ्रमर मच्छवियै उत्कृष्ट शरीरका दीर्घपना हो है । भावार्थ-एकेन्द्रीविष कमलफा साविक हर योजन वेदीविप शंखका बारह योजन तेन्द्रीविष श्रेष्म जो सहस्रपद्य नामा जीव ताका पौग योजन चौन्द्रीविषै भमरका एक योजन पंचेन्द्रीविष मनुष्यका एक हजार योजन शरीरको टेवाईका का प्रमाण जाननां ।। ३२५ ॥ आगै तिनहीके व्यास अर उदय कहैं हैं- वासिगि कमले संख मुहुदओ चउपचचरणमिह गोम्ही । वासुदओ दिग्धहमतदलमलिए तिपाददलं ॥ ३२६ ॥ ध्यास एक कमले शंखे मुखोदयौ चतुःपंचचरणं इह प्रैष्मे । व्यासोदयौ दीर्घाष्टमतइटमलौ त्रिपाददलम् ॥ ३२६॥ अर्थ-कमल नालवि न्यास एक योजन है सो समान गोल आकार है तातें हर बाहुल्य मी तितना ही जानना । बहुरि शंखवियै मुख व्यास प्यारि योजन भर ददय जो उँचाई है पांच घरण फहिए पांचका चौथा भाग ताका सया योजन प्रमाण जानना । बरि इहाँ प्रेमविय म्यामते देय ताके आठवें भाग सो तान योजनका बत्तीसवां माग प्रमाण र उदय दीर्घ ताके सोने माग सो तीन योजनका चीसठियां भाग प्रमाण जानना । बहुरि भ्रमरविपै म्यास विचरण कहिद तीन चौथा माग ताकी पौण योजन प्रमाण अर उदय दंघाई सो दल कहिए भार योजन प्रकल जानना । तहाँ वासो तिगुणी परिही इत्यादि करणसूत्र फार कमलका क्षेत्रफल ल्याईए हैं ।तहार पोजन प्यास ताको तिगुणा किए तीन योजन परिधि हो है। पाको म्यासकी चौपाई पार योजन करि गुणे योग योजन होद । याकों हजार मोजन लंबाईकरि गुणे सादा सातसै योजन प्रान फमटका क्षेत्राल हो है ।। ३२६ ॥ आगे खका क्षेत्राल स्थापनेकों फरणमूत्र कहें हैं- आयामकदी मुहदलहीणा मुद्दवासभदवग्गनुदा । पिगुणा बेहेण इदा संसावत्तस्स पेत्तफलं ।। ३२७ ॥ आयामहतिः मुपदलहीना मुपश्यामअवगंयुना। निगुमा वेन हला संसारतस्य क्षेत्रपाटम् ॥ ३२७॥ अर्थ-लंबाई मानका वर्ग करिए तामें मुग प्यामका भई प्रमाग पार जो प्रमा हमें मका मई प्रमाणका वर्ग मिटर जी प्रमाग होइनाको दूणा करिए से मना होइ नाकों की गुमि मे किर गवत शेवगवास हो है। मोहो या बार देर एक मोमीन योग्न नामें मुम प्याम पाती योजनका भागदौर योजन परत
ज्योतिर्लोकाधिकार।
१३९
सौ रिसालास योजन तामें मुरा ध्यासको आधा दोय योजन ताका वर्ग परि मिलाएं एकगो छियालीस
योजन माको दुर्गा किर दोपरी माण योजन इनको षेधका प्रमाण पाय चौथा भाग तिनकरि गुणे न्यारि
करि अपवर्तन किएं सेहत्तरिको पांच गुणा फरिए तीनसे पैसाठ योजन प्रमाण संखका क्षेत्रफल
हो । इहाँ रह सूत्र कैसे पाया ! सो वासनारूप मुरज क्षेत्रफल मादि करि विधान है सो संस्कृत
टीयानै जानना । परी सेइन्त्री चौइन्द्री पंचन्द्रौनिका धनरूप क्षेत्रफल भुजकोटि य इत्यादि फरण.
सूत्र मारि हो है सो सैबाई चौड़ाईको परस्पर गुणें जो जो प्रमाण होइ तितना तितना क्षेत्रफल
जानना | तो दन्द्री भैष्मका सत्ताईस योजन इक्यासीस पाणथैका माग दौनिए इतना क्षेत्रफल
है। चौइन्द्री अमरका तीन योजनका भाठवां भाग प्रमाण क्षेत्रफल है पंचेन्द्री मत्स्यका १२५०००
००० सादा मारा कोहि योजन प्रमाण क्षेत्रफल हो है। अब इहां एकेन्द्रियादि जीवनिका धनरूप
क्षेत्रफलनिका अल्प घट्ट प्रदेश जाननेंको कहिए है । सहाँ अति अल्प तेइन्द्रीका धनफल है । यहाँ
एक योजनके सात साख महासेठ हजार अंगुलं होई तो सत्ताईस योजनका इस्यासीसे वाणये
भागवि एक भागके फेते गुल होहिं । तहाँ धनरूप राशिके गुणकार घनरूप ही होइ सो सात
लाख मसिट हजारका धनकरि गुणिए तब अगुल होई ४७६८०००७६८००७६८०००
बहुरि सूपंगुल तो प्रमाणांगुट है अर इहाँ शरीरका प्रमाण व्यवहार अंगुलौं है । सो पांचस
म्यवहार अंगुटका एक सूप्यंगुल होइ । अर धनरूप राशिका भागहार भी घन रूप होइ ताते
पासका घनका भाग दीजिए ५००/५००।५०० बहुरि इहाँ तीनों जायगा की छह बिन्दी उपर
अगुटानके प्रमाणकी छह विदीका अपवर्तन किए ऐसा भया १५-६८ ...बहुरि दोप
जायगा मात से अमसिट थे तिनको जायगा सीन करि संभेदन किए दोयसै छप्पन भर तीन भए
१७६८००० यहरि दोय दोयसै छप्पनकों परस्पर गुणे पणही ६५५३६ भए
तिनकों सत्ताईसके ना, इक्यासी बाणवेका भागहार या तिनकरि । अपवर्तन किए आठ भए।
बहरि तीन जायगा पांचफा परस्पर गुणे एफसी पधीसका मागहार भया तिनकरि सात लाख
मसटि हजारका गुणकारका अपवर्चन किए इकसटिसै चवालीस भए । अर दोय
जायगा तीनका गुणकार था तिनको परस्पर गुणें नव भए तब ऐसे भया २१८६४४९ ऐसे
सत्ताईस आठ इकसटिस चवालीम नव इनकों परस्पर गुणें जो प्रमाण होइ ताको एक बार
संख्यात स्थापि तिहकरि घनांगुलको गुणे तेन्द्रीका खात फल हो है। ताकी सहनानी ऐसी ६ । इहां
धनांगुटकी सहनानी ऐमी ६ संख्यातकी ऐसी । जाननी । बहुरि ऐसेही चौइन्द्रीका सात फल
करना । तहाँ इकासिटसै चवालीस गुणाकारको तहाँ घनकलविष आठका भागहार है तातें आठका
अपवर्तन किएँ सास अहसटिका गुणकार होइ ऐसे पैसठि हजार पाँचस छत्तीस अर सातसे
अडसटि अर नव तीन इनका परस्पर गुणनेते जो प्रमाण होइ तितना धनागुटका भया । सौ ते-
इन्द्रीके गुणकारते संख्यात अधिक भया ऐसे चौइन्द्रीको धनांगुटका दोय बार संख्यातका गुणकार
जानना । ताकी सहनानी ऐसी ६ ॥ ऐसेही वेन्द्रीके तीन बार ६ । चौइन्द्रीके चार बार ६.
॥ पंचन्द्रौके पाच भार संख्यातका गुणाकारपना गुणको जानना ॥ ३२७॥
त्रिलोकसार- ऐसे कर वगाहनाका प्रसंग करि एकैदियादिक जीव पृथ्वी आदि विशेषरूप है तिनश रखर वा जघन्य आयुका कहने के आर्थ तीन गाया करें :- मुदसरभनलाणं पारस बासि सच य सहस्सा । तेउतिर दिवसतियं सहस्सतियं दस य जेहाओ ॥ ३२८ ।। असारभूजलाना द्वादश द्वाशतिः सप्त च सहसागि । तेजनये दिवसायं सहसा दश च ज्येष्ठम् ॥ ३२८॥ अर्थ- सर पृथ्वी जर इनका यारह याईस सात हजार वर्ष भर सेज आदिको दोन दिन तीन हजार दश हजार वर्ष RTE मायु है । भावार्थ-मृत्तिका मादि Teri परिका मारह हजार वर्ष, पाराग मादि सर पृथ्वी कापिफमा पाईस हजार वर्ष 3 कारिका काहगार वर्ग, सेन कापिकका तीन दिन, यात कापिकका सीन हमार वर्ष, वनस्पति कारिसका पर वरप प्रमाग राय भागु है ॥ ३२८॥ पारादिणमास पारससुगुषणं कपिलनेटाभो। मागण पुनकोरी पर पुणेगा सरिसपाणं ।। ३२९ ।। बदिनमामाः द्वादशेशोनाचाशत् परकाः रिकार योग । मसानो को ना पूपागानि सरीरापाणाम् ।। ३२९ ।। – নি মা সনাত দে বঙ্গবনকা ও চতু। মা- ३, दादी का मुणभागदिन, घौइन्द्रीका छह महिना प्रमाण, अ आरोपी प्रमाण ट? आगु है तो एक पूग चौगोला प्रमाण जानना ११ पाररि पादाल सागमागाह परिमार्ग । अंगोमपरं फम्मपरीणानिरिणगा: ।। ३३० ।। हामी काम-वारिक सहममानानि परमाणाम् | r-giant कर्ममहानाविभामागु ॥ ३३ ॥ बवामी बिना प्रमाण सागरिका श्राप है।-मा- Freीरावर्ग, टम: Sant fake examl रदेशमभूमि मावा Anml का मित्र untuk: fat fat- मिया निगिया ममष्टगनाति । संगमग मरमा गिरोहगा गनगाईया || ३३१ ।। pr:htra Ti.in ज्योतिलौफाधिकार। अर्थनारफी एफेन्द्री विकलार सन्नरचेन्द्री ए नसरु घे मिपा मनुक्ष तिर्यंच भर देव ए नपुंसक गिना दोय घेटी ही है। बहुरि लियेच तीनों येदके धारक हो है प्रसंगमा प्रारूप अर्थका ! ज्योतिष्टोंकका अधिकारका प्रतिपादन करें हैं ॥ ३३१॥ तहाँ तारादिकनिका स्थिति स्थान तीन गायानि करि कहें हैं:- गउचरसरसए दस सीदी पदुद्गे तियRE तारिणससिरिक्खपुरा मुफगुरुगारमंदगढी ।। नवापुत्तरसतानि दा अगातिः पदके किचन तारेनशसिमक्षायुधाः पुत्रागारमातयः ॥ १३२ अपनि अधिक सातग चिरपरि दाम पर दीय ফি ব র ব ন হ্যাং * যুখ গ য ব রাশি चित्रा पृथ्वीन लगाइ मातसे नि योजन उपरि मी तारे हैं। यनि- काहिर सूर्प है। परि तिनते असी पोजन अपार शशि फदिर धमा पोजन उपरि साक्ष फदिए नमन है। महरि तिन यारियोजन तीन पोजन उपरि परि निनो तीन योजन की गुर २ विनते तीन योजन ऊपर अंगार काहिर मगर ait निसान शनीयर है। ऐसे व्योतिषी ति है ।। ३३२।। अवसेसाण गहाण परमो उपरि पिणभूप गंपूण पुराणीणं विधाले होति णियामो। अवशेषाण नगर्य उपरि विभूमितः । गया धान्योःचा भनि नियाः ॥ २१ अर्थ--भासी मानिवि अप शेप दिन नगरी उपरि 3 भान दोउनके दायितराल क्षेत्रवासी है। अस्थागणी वसये पिसादी सारगारिता मोमपसमा समय जोरणाण गरे 11रि । म 1164 T अर्थ Jio . .
१४२ त्रिलोकसार- आगें प्रकीर्णक तारानिका प्रकार अंतराल निरूपण है- तारंतरं जहणं तेरिच्छे कोससत्तभागो दु । पण्णासं मज्झिमयं सहस्समुक्कस्सयं होदि ।। ३३५ ।। तारांतरं जघन्य तिर्यक् कोशसप्तमागस्तु । पंचाशत् मध्यमकं सहस्रमुत्कृष्टकं भवति ।। ३३५ ॥ अर्थ-तारात ताराके वाचि तिर्यगरूप बरोबरिवषै अंतराल जघन्य एक कोशका साता भाग, मध्यम पचास योजन, उत्कृष्ट एक हजार योजन प्रमाण हो है ॥ ३३५ ॥ अब ज्योतिषीनिके विमानस्वरूप निरूपै हैं;- उत्ताणाहियगोलगदलसरिसा सव्वजोइसविमाणा। उवरि सुरणगराणि य जिणभवणजुदाणि रम्माणि ॥ ३३६ ।। उत्तानस्थितगोलकसदृशाः सर्वज्योतिष्कविमानाः । उपरि सुरनगराणि च जिनमवनयुतानि रम्याणि ॥ ३३६ ।। अर्थ-गोलक जो गोला ताफा दल कहिए तिस गोलाकों वीचिमैं सौं विदारि दोप संड करिए तिसविषै जो एक खंड सो उत्तान स्थित कहिए तिस आधा गोलाकों ऊंचा स्थापित किया होय चौड़ा ऊपरि अर ताकी भणी नीचे ऐसे घस्या होइ ताका जैसा आकार तिह समान सर्व ज्योतिषीनिके विमान हैं । बहुरि तिन विमाननिके परि ज्योतिषी देवनिके नगर है । ते नगर जिन मंदिरनिकरि संयुक्त हैं । बहुरि रमणीक हैं ।। ३३६ ॥ मागे तिन विमाननिका व्यास भर वाहुल्य दोय गाथानिकरि कहें हैं;- जोयणमेकाहिकए छप्पण्णउदाल चंदरविवासं । मुकगुरिदरतियाणं कोसं किंचूणकोस कोसदं ॥ ३३७ ।। योजन एकपष्टिकृते षट्पंचाशदष्टचत्वारिंशत् चंदरविव्यासौ । शुक्रगुषितरत्रयाणां क्रोशः किंचिदनकोश: क्रोशार्धम् ॥ ३३७ ॥ अर्थ-एक योजनका इकसिट माग करिए तहां छप्पन भाग प्रमाण तो चन्द्रमाकै विमा- नका प्यास है । वहरि अटतालीस भाग प्रमाण सूर्पक विमानका व्यास है । बहुरि शुक्रका एक कोश, वृहस्पतिका किंचित उन एक कोश, इतर तीन युध मंगल शनैश्चर इनका माध कोश प्रभाग विमान प्यास जानना ।। ३३७ ।। कोसस्स तुरियमवरं तुरियादियफमेण जाय फोसोत्ति । ताराणं रिक्साणं कोसं यहलं तु यासदं ॥ ३३८ ॥ प्रोगस्य तुरीयमवर तुर्याधिककमेण पावत् क्रोश इति । तागां ऋक्षा मोसं वाहम्मे तु म्यामार्धम् ॥ ३३८ ॥ अर्थ- तारानिश रिमाननिका उपन्य च्याम कोशका चौथा भाग प्रमाण है । गरि चोदाई पिक कोश पर्वत जानना । तहां आय कोश पागे कोश प्रमाग मध्यम माम
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देव चन्द्रमा भर सूर्य इनके तो प्रत्येक सोलह हजार
१वन १ मग्गी १ वृनिका १एच नात्र गमन को है। अपराग काहिए ताणत
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त्रिलोकसार-
चंद्रो निजयोडर्श कृष्णः शुक्रश्च पंचदशदिनांतम् ।
अधस्तनं नित्यं राहुगमनविशेपेण वा मवति ॥ ३४२ ।।
अर्थ -चन्द्रमण्डल है सो अपना सौलम्हां भाग प्रमाण कृष्ण अर शुरु पंद्रह दिन पर
है। भावार्थ-चन्द्रविमानका जो सोलह भागविर्षे एक एक भाग एक एक दिनवि कृष्णपक्षविर
श्यामरूप होइ भर शुरूपक्षविर्षे श्वेतरूप होइ स्वयमेव पंद्रह दिन पर्यंत परिनमैं है । तहां चन्द्र=
विमानका क्षेत्र योजनका छप्पन इकसठित्रां भाग प्रमाण है तो एक कलाका केता होइ ।
ताको सोलहका माग दिएं आठ करि अपवर्तन किए एक योजनका एकसौ बाईस भाग
तामें सात भाग प्रमाण एक कलाका प्रमाण आया - बहुरि एक कलाका इतना प्रमान
तो सोलह कलानिका केता होइ ऐसे दोयका अपवर्तन करि गुणें छप्पन इकसठिवां माग
आवै । बहुरि अन्य कोई आचार्यनिके अभिप्रायकरि चंद्रविमानकै नीचे राहुविमान गमन और
तिस राहुका सदा काल ऐसा ही गमन विशेष है जो एक एक कला चंद्रभाकी क्रमते माग
उपाद है तिहकरि वृद्धि हानि है ॥ ३४२ ।।
मार्ग चन्द्रादिकानिके विमानके याहक कहिये चलायनेवाले देव तिनका आकार विशेष
तिनकी संख्या फहें हैं;-
सिंहगययसहजडिलस्सायारसुरा वहति पुन्वादि।
'इंदुरवीणं सोलससहस्समददमिदरतिये ॥ ३४३ ॥
सिंहगजपमजटिलासाकारमुरा वहति पूर्यादिम् ।
इदुरवीणां षोडशसहस्राणि तदर्धार्धक्रममितरत्रये ॥ ३४३॥
अर्य-सिंह हाथी पम जटिटगप भाकारको धारि देव हैं ते विमाननिको पूर्वादि कि
प्रति वहति कहिए खेइ चा है।
तार तीनके आये आरे हैं। सहा महानिके आठ हजार नक्षत्रनिके प्यार हजार तारनिक ।
हजार विमान वाहक देव जाननें ॥३१३ ॥
माने आकाशविन गमन करने जे ई नक्षत्र तिनके दिशाभेद कहें हैं।-
उत्तरदक्षिणट्टायोमग्झे अभिनिमूलसादी य ।
भरणी फिचिय रिक्सा चरति अवराणमेवं तु ।। ३४४ ॥
दत्तादशियो गोमध्ये अमिनिन्मूलस्वातिम ।
भागी निशा अभागि चालि भवरागामे तु ॥ ३४ ॥
प्रधटना १ शिन १ ददं १ अधः १ मध्य १ इन मते अमिति ।
भनिन आदि पर भत्र निनकी ऐगी अपरियति है ॥ ३५॥
भोनिन कि हर वै.मे गमन को है-
इगिनीमपा शिप मे पनि माइगणा।
पंदनिय निमा मंगा टु पनि ॥ ३४५ ॥
ज्योतिर्लोकाधिकार । १४५ एकविसैकादशरातानि विहाय मेहं चरति ज्योतिर्गणाः । चन्द्रत्रयं पीयेत्या शेपा हि चरंति एकपये ॥ ३४५ ॥ अर्थ-कईस अधिक ग्यारहरी योजन मेहकों छोडि ज्योतिषीसमूह गमन करें हैं। भावार्थ-मेह गिरित ग्यारहर्स इफईस योजन उपरै ज्योतिषी मेरुकी प्रदक्षिणामप गमन करे हैं मेरते ग्यारहरी इकईस योजन पर्यंत फोऊ ज्योतिषी न पाईए है । यहुरि चन्द्रमा सूर्य ग्रह इन तीन विना अब शेष सर्व ज्योतिषी एक परिपै गमन करें हैं। भावार्थ-चन्द्रमा सूर्य मह तो कदाचित् कोई कदाचित् कोई परिधिरूप मार्गविौ भमण फरें हैं। बहुरि नक्षत्र अर तारे ए अपना अपना एक ही परिधिरूप मार्गविप गमन करें हैं । अन्य अन्य मार्गचिौ नाही भ्रमण करें हैं ॥ ३४५॥ अब जेबूद्वीपते लगाय पुष्कगई पर्यंत चन्द्रमा सूर्यनिका प्रमाण निरुपै है।- दो दोवग्गं पारस पादाल यहत्तरिंदुइणसंखा । पुरखरदलोति परदो अवटिया सबजोगणा ॥ ३४६ ॥ द्वी दियर्ग दादा दायत्वारिंशत् दासप्ततिरिदिनसंख्या । पुष्करदात परतः अवस्थिताः सर्वयोतिर्गणाः ॥ ३४६ ॥ अर्ध-दोय दोय वर्ग बारह विपालीस बहत्तरि चन्द्रमा सूर्यनिकी संख्या पुष्कराई पर्यंत है। भावार्य-जगूद्वीपवि दोय लवण समुद्रवि च्यारि धातुको पंडविष घारह फाटोदकवि पिया- टीस पुष्कगवि बहसरि चन्द्रमा हैं । भर इतने इतने ही सूर्य है । बहुरि पुष्करात परै के ज्योतिपी देयनिफा गण है ते अवस्थित है। कदाचित अपने अपने स्थानतें गमन नाही पर है जहां ही स्थिररूप निट है ॥ ३४६।। आगे सहा तिहें हैं जु ध्रुव तारे तिनको निरम है;- उपादि गवतीससयं दसयसहस्सं खपार इगिदाले । गयणतिदुगतेवणं घिरनारा पुक्खरदलोति ॥ ३४७ ।। पति: नवशिशत दशकमहर्स राबादश एकचत्वारिंशत् । गगननिदिकतिपंचाशत् स्थिरताराः पुष्करदटोतम् ॥ ३४७ ॥ अर्थ-एपी इति ३६ भर गुणतालीस अधिक सौ १३९ कर दा अधिक हजार १०१० अर विदी यारह इकतालीस ४११२० अर विवी तीन दोष तरेपन ५३२२० इसने पुष्करा पर्यंत स्थिर तारे हैं । भावार्थ-जापविय एतसि रक्षण समुद्रपिपै एक सौ गुणता- टीस धातुकी ऐडविर्षे एक हजार दा कालोदकवि काताटीस हजार एफ.सौ बीस पुमरारिष सरेपन हजार दोयसै सीस ध्रुव तारे हैं । ते कर अपने स्थानतें गमन नाही करे हैं। जहां तहां स्थिररूप हैं हैं ॥ ३४७ ।। भागें ज्योतिषी समूहनिक गमनरा श्रम विचार है- सगसगजोगणद एफे भागम्हि दीरउवहीणं । एफे भागे अदं परति पंतिकर्मणेर ।। ३४८॥ शि.-९.
१४६ बिलोकसार- । । स्कफकीयम्योनिर्गमा एकस्मिन् मागे दीपोदवीनाम् । एकस्मिन् भाग अर्थ चरति पनि कमैगेर ॥ ३४८ ॥ अर्थ-अपना अपना ज्योतिषी गगका अई तो द्वीप समुद्रनिका एक माग िसर कई एक भागविर्ष पंक्तिका अनुक्रम करि चिचर हैं । मावार्थ-जित दीप या समुद्रात जेते ज्यौनिकी हैं तिनयिप आधे ज्योतिरी तो निह द्वीप वा समुद्रका एक मागवि गमन करें है आधे एक माग विष गमन करें है। ऐसे पक्ति लिऐ गमन जाननां ।। ३४८ ॥ आगें मानुषोत्तर पर्चतते परे चंद्रमा सूर्यनिकै अवस्थानका अनुक्रम कसे है।--- मणुमुत्तरसेलादो वेदियमूलादु दीवउवहीणं । पप्णाससहस्सेहि य लक्खे लक्खे तदो वलयं ॥ ३४९ ।। मानुषोत्तरगलात् येदिकामूलान् द्वीपोदधीनाम् । पंचाशत्सहवैध लक्षे लो ततो वलयं ॥ ३१९ ॥ अर्थ-मानुपोतर पतते पर अर द्वीप समुद्रनिकी वेदीनिक पर ती पचास हजार योजन जाइ प्रथम घटय है। बहुरि तिस प्रथम वलयत पर लाख लाख योजन परें जाइ द्वितीयादिक वलय है । भावार्थ-मानुपौतर पर्वतते पचास हजार योजन व्यास पर जो परिधि सो बाह्य पुष्कराई द्वीपका प्रथम वलय है । तिह पर एक लाख योजन ब्यास जाइ जो परिधि सो दूसरा वलय है ऐसे लाख लाख योजन व्यास जाइ जो परिधि सो वलय जाननां । बहुरि पुष्कर द्वीपकी अंत वेदिकाके पर पचास हजार योजन व्यास जाइ जो परिधि सो पुष्कर समुद्रका प्रथम वलय है। तात परै लाख योजन व्यास जाइ जो परिवि सो द्वितीय वलय है। ऐसे लाख लाख योजन व्यास पर जाइ जो परिधि सो वटय जाननां । ऐसे ही अन्य द्वीप समुद्रनिविर्षे वलय जाननां || ३४९ ॥ आगै तिन वलयनविपै तिष्टते जे चन्द्रमा सूर्य तिनकी संख्या कहैं हैं;- दीवद्धपढमवलये चउदालसयं तु वलयवलयेसु । चउचउवड्डी आदी आदीदो दुगुणदुगुणकमा ॥ ३५० ॥ द्वीपार्धप्रथमवलये चतुश्चत्वारिंशच्छतं तु वलयवलयेषु । चतुश्चतुर्वृद्धयः आदिः आदितः द्विगुणद्विगुणक्रमः ॥ ३५० ।। अर्थ-मानुपोत्तर पर्वत बाह्यस्थित जो पुष्कराई ताका प्रथम वलयविपै एक सौ चवा- लीस है। भावार्थ-जो मानुषोत्तर पर्वत परे पचास हजार योजन परे जाइ जो परिधिविर्षे एक सौ चवालीस चन्द्रमा एक सौ चवालीस सूर्य है। ऐसे ही द्वितियादि वलय वलयविपै च्यारि च्यारि वधती चन्द्रमा सूर्य जाननें । ११८ १५२।१५६।१६०।१६४।१६८११७२ । बहुरि उत्तरोत्तर द्वीप वा समुद्रका आदिविर्षे पूल पूर्व द्वीप वा समुद्रका आदितै दुणे दुणे। क्रमतें जाननें । जैसे पुष्कराईका आदिविपै एकसौ चवालीस, ताते दुणे पुष्कर समुद्रका आदि विर्षे हैं, तातै द्वियादि वलयविर्षे च्यारि च्यारि वधती हैं। ऐसे ही सर्वत्र जानने ॥ ३५० ।। ।
ज्योतिलाशधिशार। १४७ । लालिम पन्द्रमाने धमाका नराउ पूर्वी गर्यका तराज परिधि लिव- सगगगरिधि परिधिगरविभनिदे द अनर होदि । पुग्नम्हि मध्यरहिया चंदा य अभिनिम्हि ।। ३५१ ॥ परमपनि परिवारोदुभक्त नु अतर भागी। पुष्य सांगाः पिता हि चंगम समिनिति ।। ३५१ ॥ अर्ष-अपना अपना दम परिधिको परिधिविष प्राम जे पन्द्र वा सूर्य जिनके प्रमागका भागलितग हहै । तहां प्रथम अंदाने लगाय दोऊ तरफफा अभ्यन्तर द्वीप समुदनिका सानिका बाम मिगर पाल पुष्पगमा प्रथम वर पका ची भ्यास छियालीस सारा योजन हो।मानुपानर पर्मतया पूर्वी पास दैतालीम टाए पोजन सामें दोऊ सरफका यउयका म्यास पास हजार पोजन मिटार रियारीस लारा पोजन हो है। याका विष्फमवग्गदहगुण' इत्यादि करणाप्रकरि गक्षम परिविविष एक कोहि पैतालीस साख रियालीस हजार प्यारि योजन प्रमाण होइ तापों परिमिति प्राप्त मूर्य या पदमाका प्रमाग एक सौ पवाटीस साफा भाग दिए एफ साग एक हमार मतरा पोजन भर गुणतीस पोजनका एक सौ चालीसा भाग प्रमाण १०१० १७ सूर्यने पूर्पका पन्ने चन्द्रका अतराल परिषिविय विसहित जाननां यहरि शिव जो चंद्र का सूर्पका र सीह गिना अतराल ल्याइये है जो विरसहित भतरालविष पोजन थे तिनमें सों एक घटाइए. १०१०१६। यहरि निस एक योजनको गुगतीसका एकसौ चालीसयो भाग सहित समछेद विभान करि जोडिए तर एस्सी तहेतरिका एकसौ चवालीमयो भाग होइ तामें चन्द्रका यि उपना इफमठिवा भाग सो समवेद विधान फरि घटाइए Pornoarana चोईम निवामीको मित्यासोने चौरासीका भाग दीजिए इतना भया ऐसे कार चन्द्रमा चन्द्रमाका बिध रहित अंतराल एक लाख एक हजार सोन्दह योजन भर चौईसै निवासी योजनका मिन्यासीस चौरासी भागविष एक भाग प्रमाण आया । बहुरि सीह एकसौ सहेतरिका एकसी पालीम भागवि अनालीसका इकसठियां भाग प्रमाण सूर्यत्रियकों सम- छेद विधान परि घटाए छत्तीस इकताटीसका सिन्यासीसै चौरासी भाग आया IR सो इतनै करि अधिक एक लाए एक हजार सोलह योजन प्रमाण सूर्यन सूर्यका अंत- राल जानना । ऐसे ही अन्य घलपनिधि अंतराल ल्यावना | पहरि सर्व घटयसंबंधी सूर्य तो पुष्य नक्षत्रवि स्थित है । अर चन्द्रमा अभिजित नक्षत्रवि स्थित है । भावार्थ-र्यका विमान अर पुष्य नक्षत्रका विमान नीचे उगरि तिहे हैं । अर चन्द्रमाका विमान अर अभिनित नक्षत्रका विमान नीचे उपरि है ॥ ३५१ ॥ आगें असंख्यात द्वीप समुद्रनिवि प्राप्त जे चन्द्रादिक तिनकी संख्या ल्यायनेकौं गछका प्रमाण ल्यावता थका ताका कारणभूत असंख्यात द्वीप समुदनिकी संख्याको आठ गाथानिकार काहै है- १४८ त्रिलोकसार-- रज्जूदलिदे मन्दिरमशादो चरिमसायरतोत्ति । पडाद तदद्धे तस्स दु अभंतरवेदिया परदो ॥ ३५२ ॥ रज्जूदलिते मंदरमध्यतः चरमसागरांत इति । पतति तदर्धे तस्य तु अभ्यंतरवेदिका परतः ३५२ ।। अर्थ-राजूकों आधा किए मेरुका मध्यसे लगाय अंतका सागर पर्यंत प्राप्त हो है भावार्थ- मध्यलोक एक राजू है तिस एक राजूकों आधा करिए तब मेरुगिरिका मध्यते लगाय अंतका स्वयं- भरमण समुद्रपर्यंत एक पार्श्वविधै क्षेत्र हो हैं । बहुरि तिसकों आधा किए तिसकी अभ्यन्तर बेदि- फाके परै ॥३५२॥ कहा सो कहें हैं;- दसगुंणपण्णत्तरिसयजोयणमुवगम्म दिस्सदे जम्हा । इगिलवरसहिओ. एको पुन्वगसव्वुवहिदीवहिं ॥ ३५३ ।। दशगुणपंचसप्ततिशतयोजनमुपगम्य दृश्यते यस्मात् । एकलक्षाधिकः एकः पूर्वगसर्वोदधिद्वीपेभ्यः ।। ३५३ ॥ अर्य- -दश गुणां पिचहतरिसै योजन जाइ राज् दीस है। भावार्थ-स्वयंभूरमण समु. द्रकी अभ्यन्तर वेदति पिचहत्तर हजार योजन परै जाइ तिस आघ राज्का अर्द्धभाग हो है । काहेते जाते सर्म्य पूर्व द्वीप या समुद्रनिके व्यासकों जोड़े जो प्रमाण होइ ताते उतर द्वीप या समुद्रका प्यास एक लास योजन अधिक हो है । सो इसही कथनको स्पष्ट करें है-स्वयंभूरमण समुद्रका पत्तीस सास योजन प्रमाण प्यास कल्पि करि जयदीपका आध लारा सहित सर्व द्वीप समुद्रनिका वलय म्यासके अंकानिकों जोडिए ५००००। २ ल । ५ ल । ८ ल । १६ ल । ३२ लातर कल्पना कर आप राजूका प्रमाण सादा यासठि लास योजन भर, यहरि याको आश किए इकतीस साख पचास हजार योजन प्रमाण दूसरी यार आधा किया राज्का प्रमाण होइ तिहार पूर्णर समुदनिका यटय न्याम ५००००१२ल।१।८ ल। १६ ल । जो जो तीन साग पचास हजार योजन प्रमाण भया। सो घटाए तिस स्वयंभ्रमण समुद्रका अभ्यन्तर येदिकात परे पिचहत्तर हजार योजन समुद्र में गए आध राज्का अर्थ हो है। बहरि साह द्वितीय यार भाषा दिया रान प्रमाग ३१२५०० को आधा किए पंद्रह सास बामठि हजार पाच से योजन तोगत बार आया रिया गन्या प्रमाग हो है । नाविणे पूर्य द्वीप समुद्रनिका पदप प्यारा ५००... २११८१८ ट मिलार सादा चौदह या योजन भए । मो पाए तिम स्वयंभूगमग सम्पन्तर वैदिवान एक ठाठ बारह हजार पांचम योजन पर दीपरि जाइ गुनायगार भाम रिया रया गन् क्षेत्रमा प्रमाण हो है नही व्यर्थको आग करि तीही पूर्वी समुद्रनिया पर दाम घटार, जो नो मार निवना जितना निम सिम 17 या ममुकी पलार की परेशानुस्वार आदि या पिया शमा मानना ॥ ३५॥ पुगवि हि पष्टिमटीयम्भनारमरियापदो। मगटल दागनग्मिाम्ममोगरिय गिरदिगा ।। ३५४ ।।
ज्योतिलाशाधिकार। १४९ पुनरपि छिनायो पथिमहीपाभ्यंतरवदिकापरतः । स्वदटयुरापंचसप्ततिसहस्रमपस्त्य निपतति सा ॥ ३५ ॥ अर्थ-बद्दरि भी दूसरी पार उिन कहिए आश फिया राज् ताको आश किए साके पीछे जो द्वीप साकी अभ्यन्तर वैदिकात पर अपना आधा साठा सतीस हजार फरि संयुक पिचहत्तर योजन पर जाइ सो राज पडे है । संघटि-दितीय चार दिन राज्मा प्रमाग इकाम याग पचीम हमार योजन साका आधा किए पंद्रह लाग यासटि बजार पांच से योजन होन सौ सर्व ग्मनने पाउला स्वयंभू रमण द्वीप साकी अभ्यन्तर घेदिकात पर लस पिविष अपना गाया करि अधिक पिचहत्तरि हजारफे मए एक लारा धारह हजार पाँचसे सो इतने योजन जाइ मो रानू पदे ॥३५॥ अर्द्ध चतुर्थ भएमादि राज्के अंश किए जहाँ जहाँ मध्य क्षेत्र होइ सहा तहा गया पाना फहिए है।- दलिदे पुण तदगंतरमायरमझतरत्यवेदीदो। पडाद सदलचरणणिदपण्णचरिदमसयं गता ।। ३५५ ।। दलिते पुनः सदनतरसागरमध्यांतररथवेटीतः। पतति स्वदलचरणान्वितपंचसप्ततिदनातं गत्या ॥ १५५।। अर्थ-वरि सायों आधा किए ताफ अनतरि अहीरनामा गमुद्रा सम्पन्तर दिया. ते परे अपनी भाषा र चौपाई करि संयुक्त पिघहतरि दागका प्रमाण योजना कोमल पई है। संघटि-सीसरी पार पाधा फिया संह पहा यागटिरभार पाचौ १५६२५.. ताको आधा किए सात लाख रुपासी हार दोपस पघाम योजन न मने An स्यामा दीपके अनतरि महीन्दारनामा समुद्र ताका सभ्यन्तर ते लिग समुदाय विचार सफदाका विपहतरि हजार भए ताका भाधा सादास तीस हजार र चौपाई पौणा राग र इनकों मिलाए एफ लाए इयांस हजार दोपसे पधास १३१२५० भर । सो हमने पोरन L सौरान पदे ॥ ३५५॥ इदि भन्भन्तरतरदो सगदालतरियामादिगंशु । पण्णारि सहस्सं गंतूण परदि सा ताप ।। ३५६ ॥ इनि भाभ्यन्तरतरत स्वकालतुष्मिादिसपुनम् । पेपसानिसहर गया पतति माता ॥ २५६ ॥ अर्थ-देसेही अभ्यन्तर तट सपना कई बार भाग बारा भाग स्म Eि. सरि हजार पोजन ना गइ सो गन तावत् पहे है । talkin AIRTEar माम दापका भम्पत्तरस्ट सपना STE] १७५०००पाई १८७५. काम ९९७५ संयुक्त पिपहरि ७५०००गर दोमन ४०६२५ मा एक पोलि किरात समुह पता wrot akel लाई SEEr ran संयुक्त विहार हार पोम्म परे गा गम् , Reten we' REPRE त्रिलोसार- जिला की सम्पन्तर वेहीने अपना भई चौथाई आठ सोलयां बत्तीसयो भाग संयुन तिल. हनारे हमार योजन परै जाइ रान् पड़े है ऐसेही पूर्व जता अधिक होइ नाते आधा भागभी. का अनुम्म करि मिडटा समुद्र या दीकी अम्पन्तर वेदीत परै जाइ सो राज् पई है। तमा बागरा भनुम करि जहाँ एक योजना अधिकारमा उरै तहाँ पर्यंत शिवहरि हजरके अरे. के स्तरह हो है। बहरि सहां पीउ उवर्ग जो एक पोजन ताके अगुल फरिए सब सामा महरि हजार हो लिनका आश आग क्रम करि एक अंगुल उपरे तहाँ पर्यत उगगीम म. हैरोलिन मन सेनिकों मिलाय ताका नाम संध्यात किया । यहरि उर्ग पाएक र ताके प्रोश करि माश आश अनुगम लिए अधिक करी सूध्यगुनके अर्थ निको लिन मार मारेक प्रदेशका अधिकपणा आनि रहे सो संस्थात अर सूप्पामा म मिर इयादि गारा कहे हैं ॥३५६ ।। मंगेतरूपसंदईभंगुलडिदिप्पमा जाय । गगांति दीमलही पदि तदो सादलपसेण ॥ ३५७ ।। सम्पप गुगाच्याप्रमा पात् । ना: पतनि ततः साधिशेण || ३५७ ।। xt-RT की मयुक ऐगे सूध्यगु के भदनिका जो प्रमाण माप ETEE Tir अनुक्रम यरि अस्पताल पर जाइ गका पानावर मी ममुद्रनिति चौदला। १५०००० योजन पर भ.ग 4:12 है। .गे मी कानिट है। अनपणं गुणगुगिर भातिमा * का मन किनभरि हमार ताको गुणकार दोग करि गुमे । era :प्रमाण एक प्रदेश पादर एकया गुणकामा प्रमाण एक * 7.1 गायोजन प्रमाग भए । META TRY गुणा yth: म7 | अन्नतिने नोजाइगर है। 4th any ............................" * Firms f. मकाने turn •i ortant farming at I Thirt म." ALRAM ... . A ":"
ज्योतिर्लोकाधिकार । १५१ योद लास ब्योद लाख योजनका क्रम करि लवण समुद पर्यंत असंख्यात झोप समुद्रनिकों जाइ करि ॥ ३५७॥ कहा सो कहें है;- लवणे दु पडिदेषं जंचुए देजमादिमा पंच । दीउदही मेरुसला पयदुवजोगी ण एचेदे ॥ ३५८ ।। लवणे दिः पतितः एक जैबो देहि आदिमाः पंच। द्वीपोदधपः मेरुशलाः प्रकृतोपयोगिन; न षट् चैते ।। ३५८ ।। अर्थ ---लवण समुद्रवि दोय भई छेद पड़े है। फैसैर राजूको आधा आधा करते जहाँ दोय लाखका अर्द्ध छेद करिए तय सतरह १७ वार भए एक योजन उपरै बहुरि एक योजन उर्वर । वहरि एक योजनके अंगुल सात लास अडसटि हजार तिनके अछद करिए तब टगणीस पार भए एक अंगुट उवरै। बटुरि राजूका अर्धछेद किए प्रथम अछेद मेरके मध्य पच्या सो मे सतरह टगणीस एक अर्द्धछेद मिलि संख्यात अर्द्धछेद भए । बहुरि एक अंगुल रयस्या था सो वह सूर्यगुल है । सो सूध्यगुलके अर्द्धछेद इतने छेछ । इहाँ पत्यके अर्दछैदानिका वर्ग प्रमाण सूपंगुलके अर्धछेद जानने । इनको मिलाए संख्यान अयिफ मूवंगुटके अर्द्धछेद प्रमाण एक लाख योजनके अर्द्धछेद भए तिनको सहनानी ऐसी उ हा संख्यात अधिककी सहनानी ऊपरि देने १ जाननी । इतने अर्द्धछेदनिवि अपनयन प्रेराशिक विधि फरि घटाएं जो प्रमाग मा नितनी द्वीप समुदनिकी संख्या जाननी । अपनयन त्रैराशिक विधि फैमें सो रहे है। राजूया मनालने पहे सहाँ पल्यके भर्द्धदनिका संख्यातयां भाग प्रमाण ती गुण्य जानना से पारि पल्पके । अछेदनिका वर्ग तिगुणा सो गुणकार जानना । ३ तहाँ जो इतने हे ३ गुणकारको देखि फरि गुणकार प्रमाण सारी घटावनेकों गुप्पवि, एक पटाइए तो इतना १ पटाने आप स गुण्य में कितना घटाइये ऐसे राशिफ करिए सही प्रमाण राशि ऐमा रहे ३ पलानिया राशि ऐसा १ फल फरि पछाको गुणि प्रमाणया भाग दीजिए सहाँ भाग्य राशि भर भागार राशि दोऊनिवि पल्प अर्द्धदनिका वर्ग ऐसाठे तिनको समान देखि भागहारवि वर्षा सीनका अफसाका भाग्यविष असरयात उषरे सीह करि साधिक एकायों भाग लिए । इस गुण्यवि घश्या । ऐस करि अपना साधिक एकका सीमरा भाग करि हान पाईदनिध असन्यात भाग प्रमाण गुप्पको पल्पका अदनिका पर्ग पर तीन करि गुगें जो प्रमाण होई इतने सर्च द्वीप समुद्र निनको सहनानी देमे छे ऐ३६ साधिक ताप भाग पाइने १५२' त्रिलोकसार- सहनानी ऐसी 1) जाननी इनविय आधै द्वीप आधे समुद्र जानने ७ ) ऐसे द्वीप समुद्रनिकी ३ १ । संख्या कहि अब जाका अधिकार है ताकों कथनविय जोड़े है। जंबूद्वीप लाख योजन प्रमाण तासौं लाख योजन रहै । तहां लवण समुद्रका अभ्यन्तर तटते ड्योढ़ लाख योजन पर ठवण समुद्र- विर्षे जाइ अर्द्ध पड़े है । ऐसें दो बहरि ताका आधा लाख योजन भए ठवण समुद्रका अभ्यंतर तटते पचास हजार योजन पर जाइ अर्द्धच्छेद पडै है ऐसे दोइ अर्दछेद जाननें । बहुरि तहां एक जंबूद्वीप देहु । भावार्थ-- दोय अर्द्ध छेदनिधि एक अर्द्धछेद तो ठवण समुद्रका गिनना । अर एक अई विर्षे पचास हजार योजन जंबूपके मिलाएं लाख योजन होइ सो इस अर्द्धछेदकों जंबूद्वीपहीका गिननां ऐसे ए अर्द्धछेद कहे । बहुरि इन अर्द्धछेदनिविय आदिके जंबूद्वीपादि पांच द्वीप समुद्र संबंधी पांच अर्द्धछेद अर मेरुशलाका कहिए राजूको आधा करतें प्रथम अर्द्धछेद कह्या सो ऐसे ए छह अर्द्धछेद इहां अधिकाररूप ज्योतिपी विवनिका प्रमाण ल्यावनेविर्षे उपयोगी कार्यकारी नाही जाते तीन द्वीप दोय समुद्रनिके विवनिका प्रमाण जुदा ग्रहण करेंगे तातें पांच अर्द्धछेद तो ए कार्यकारी नाही अर मेरुदालाका रूप प्रथम अर्द्धछेदनिविर्षे कोई द्वीप समुद्र आया नाही तातें सो कार्यकारी नाहीं ऐसे छह अर्द्धछेद आर्गे घटायेंगे ॥ ३५८ ॥ कहां सो कहैं हैं;- तियहीणसेटिछेदणमेत्तो रज्जुच्छिदी हवे गच्छो । जंयूदीवच्छिदिणा छरूपजुत्तेण परिहीणो ॥ ३५९ ।। त्रिकहानश्रेणिछेदनमात्रः रजुछेदः भवेत् गच्छः । जंबूद्वीपछेदेन पपयुक्तेन परिहीनः ।। ३५९ ।। अर्थ-तीन घाटि जगररेणीका अईप्रमाण एक राज्के अर्द्धछेद हैं । तिनमें जंपूर्वीप राप योजन प्रमाण ताके अर्द्धछेद छह अर्द्धछेदनि करि संयुक्त घटाएं ज्योतिषी बिनिकी संख्या त्यावनेवि गष्ठका प्रमाण हो है। तहां जगच्छेणी अर्द्धछेद इतने है छे छे छे ३ इहाँ पत्यके अछेदनिकी सहनानी ऐसी छे भर नीचे असंख्यातकी सहनानी ऐसी ७ ताका भागहार जानना । वहरि मागै पत्यक अर्द्धछेदनिका वर्गका गुणाकी सहनानी ऐमी हे ३ ताका गुणकार जानना । बहुरि इनमें तीन मद घटाएं. राजके अईद होहिं जाने जगष्ट्रेणी के सात भाग ग है। मो सानके तीन अर्द्धछेद होहि नाका सहनानी ऐगी छे से ३ इहाँ उपरि घटा• बनेका महनानी दमाई जाननी बट्टार इन पदनिका प्रमागति वृद्धापक अभ्यन्तर पचाम हमा योउन श्राबाट पचास हजार योजन मिति एक साप योजन प्रमाग जाप संबंधी मई- संद कदा का भी इन टाप योजननिक भर पटादर तो एक सापक अर जिनमें ४६ ७ योगिगाधिकार। १५३ Firman योनि र हरे एक योदन के अंगुर सात सदसदि - मार भई एक अंगुल उपर सफा मनोद mriti irnमी में गह उगगीय एक ममिति सरपात - trit मा का गुहै। मी गपंगुरके भने imiriनिका माग गुर. अमोद जाननें । इनको मिग संरमारा f thiमाग एक गाव योजनो अर्धन्द भए । निनको सहनानी ऐसी) Part मा गानो र परिमो? माननी।लने मां सन्के मर्धपोनि. Raat पार पा जी प्रमाग ला तिनी समनिकी सरस जाननी । Parn Hritra ! गो पा, १–ग मोर इतने फहे से ३ तहाँ प. fami anicalnet भाग प्रभाग गी गुर जानना । पटार पत्रके अर्धदनिका figार माना जो इतने ऐसे ३ गुगकारको देखि करि गुणarren पानेको गुष्पदिन एक घटाइए तो इतना पटायने के मर्षि गुण्यसो कितना राशिय. य. तह प्रमाग गगि ऐसा ३ फराशि एफ ११च्या राशि mit कर कर की गुमि प्रमागका माग दानिए, तहाँ भामराशि अर भागहार दोसि पयफा अनिका वर्ग ऐसा ऐ । तिनको समान देशि भागहार कि errint. ताका भावि गरात टबरे साहकरि साधिक एकर्को भाग दीजिए, इतना गसि पर सारिक एकका तीसरा भाग करिहीन पल्यका अर्धच्छेदनिका असरूया. + प्रमाण पुश्वपो पल्पमा भर्पोनिका वर्ग र सीनिफरि गुर्गे जो प्रमाण होइ साने तीन राए । ने सीप समुलिनको सहनानी देसी ३॥ इहां साधिक तृतीय भाग घटाने सहनानी ऐसी जाननी 1 इन विष आधे दौर आधे समुद्र जाननें । ऐसें दीप समुद्रनिही सन्त कहि रजाका अधिकार है साकौं कपन वि जो हैं । जीप दास पोजन मायबरेद निनमें सह अदद और मिलाइए, इनको जोदि जो प्रमाण होइ निमें मागमूक मसरामनियों घटाएं जो प्रमाण होइ तिला सर्व दीप सामुद्र संबंधी चंद्र पूशियनिक प्रमाग ल्याइनेको गच्छा प्रमाण जानना भावार्थ-यहु पूर्व द्वीपसमुद्रनिको संख्या कर। सामे या घटाए हो गमुका प्रमाण हो। ॥ ३५९॥ भागे तिन ज्योतिरादिनिकी संख्या त्यावनेवि जो गछ कहा ताकी आदि कहे हैं- पुक्खरसिंधुभपधणं घपणगुणसयछहत्तरी पभो। घरगुणपचओ रिणमवि अहफदिमुहमुवरि दुगुणफर्म ।। ३६० ॥ पुष्करसिंधूभयधन धनुर्घनगुणशतषट्सप्ततिः प्रभवः । धनुर्गुणप्रचय. ऋणमपि अष्टकृतिमुखमुपरि द्विगुणक्रम ॥ ३६० ।। अर्थ-यानिकनिका जो प्रमाण मो गाछ कहिए या पद कहिए । हरि ग िजो पहला स्थानविय प्रमाण सो आदि कहिए या प्रभव कहिए वा मुख कहिए । बहुरि स्थान स्थान .
त्रिलोकसार- - प्रति जितनां जितनां व सो प्रचय कहिए। वहरि सर्व स्थानकां संवैधा वृद्धिका प्रमाग कि आदि ताकी जोड़ें जो प्रमाण होइ सो आदि धन कहिए । बहुरि सर्व स्यानां संबंधी जोड़ें जो प्रमाण होइ सो उत्तर धन कहिए । सो इहां पुष्कर नामा समुद्रका आदि धन मः धन मिलाएं च्यारिका घन चौंसठि नहि करि गुप्या हूवा एक सौ रिहत्तरि प्रमाण टमय = है सा इहां प्रमव जाननां । बहुरि एक एक द्वीप वा समुद्र प्रति चौगुणा चौगुणा वधती धन प्रचय जाननां । बहुरि ऋणविर्य आटकी कृति चौसठि तीह प्रमाण तो मुख जानना । क्रमते हिगण द्विगुण वधता है सो प्रचय जाननां । ऐसे धनराशि ऋणराशिकी जानि पनरा कृणराशिकों घटाएं स्थान स्थानविय प्रमाण जाननां । तहां पुकर समुद्रका आदि धन उत्तर कैसें त्यावनां सो कहिए हैं----आदित आदि दूणा दूणा क्रम” कहे थे तातै पुकराई द्वीपका घट्यविष एक सौ चवालीस थे तिनतें दूणे पुष्कर समुद्रका आदि वलयविध हैं। १४१॥ इहां मुख जाननां । वहुरि पदहतमुखमादिधनं इस सूत्रकार गडकरि गुण्या हुना प्रमाग सी आदि धन है । सो इहां बत्तीस वलय हैं। ताने गच्छका प्रमाग बत्तीस तिह मुखकी गुणें जो मुखविणे दोयका गुणकार या ताको वास करि गुणि अर एकसो चवाटी आँगै चीसटिका गुणकार स्यापिए । १४४६४ इतनां तौ आदि धन जानना बहुरि “ब्येका- भचयगुणो गया' उत्तरघनं इस सूत्रकरि एक घाटि गएका आधा परि चयकों गुगि तोह गठको गुणें उत्तर धन हो है । सो इहां एक घाटि गछ इकर्तास ३१ ताका आधा करि च प्रमाण एक एक वलयविष प्यारि च्यारि वधती है, ताते च्यारिकरि गुणिए । बहुरि इनको बनीसकरि गुगिए, "। १३२शबहुरि भागहारका दूधा करि गुणकारका चौका अपवर्तन किए दोष। साहकार बत्तीसका गुणकार गुणें चौमठि होइ । ऐसे इकतीसकी चौसठि गुगां करिए ३१॥ इतना उत्तरधन हुया । यहरि इस उत्तर धनविय चौसठ ऋण मिलारनां सो उत्तर धनविय चौसा- गुगकार जानि गुश्यविप एक मिलाया तय बत्तीसकौं चौसठि गुणां करिए। इतना उत्तरधन भया३२१६ इहाँ कगका मिलावनां बहुरि याहीका घटावनांसो मुगम गणित आवनेफे आय फरिर है। 4 आदि धन पर उत्तर धनविष गुप्य बत्तीस इनको मिलाइ एक सौ छिहतरि गुण्य किया भर चौर गुणकार किया । ऐमे चौमटि गुमा एक सौ हितरि १७६।६१ प्रमाग पुष्कर समुदका उभय । सो पोलिविनिशा माग ल्यारनेके आय जो गल का था ताका प्रभर कहिर आदि मानन वहरि यात चौगुना बारगीवर दावि धन जानना । कैमें सो करिए हैं । पूर्य आदिTE आदि बटपविष है मा मात्र १४१॥२॥२ जानना । महरि पदातमममादिधन इग मूष के परों का इलय चौमटि है ना सका प्रमाण चौमति माहरि गुगिर १४४।२।२।६ वर टोय दुनिया यार में दिन भपा । बडी " सदगुमो । नायन "म मर कर य? माग नामटि ६३ नार आको वय 424 1 4 4-11 ... aff : ५ ब्रही पार मी test ५६ मी.'' का ira अमरनन कारगर 1 के
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त्रिलोकसार- 1 भया । बहुरि छह अर्द्धछेद इहां उपयोगी न कहि घटाए थे तिन प्रमाण दोयवार वानिकों पर- स्पर गुणें चौसठिका वर्ग होइ । बहुरि जगच्छेणीका अईछेदमैस्यों तीन घटाएं राजूके अद होहिं ऐसा कहि घटाए थे । तिन प्रमाण दोयवार दूवानिकी मांडि परस्पर गुणें सातका वर्ग मत। ऐसे ए सर्व अर्द्धछेद घटाए थे तिन प्रमाण दोयवार दोयका अंक मांडि परस्पर गुर्गे जो जो प्रमाण मया ताका मागहार जाननां । जातें "विरलिजमाणरासि जैत्तियमचागि होणसवागि। नि अण्णोष्ण हदी हारो टप्पण्णरासिस्स " ऐसा करणमूत्र पूर्व कहि आए हैं। ऐसे गलनाम गुणकारका परस्पर गुणना भया । बहुरि यामें एक घटाइए ताकी सहनानी ऐसी बहुरि पायें एक घाटि गुणकार तीन ताका माग दीजिए । बहुरि मुखका प्रमाण चौसठ गुणां एकनौ छिहतर तीहकरि गुणिए तव धन राशिका जोड़ दिएं जगत्प्रतरकों चौसठि गुणां एकसा लिहंतरि करि गुणिए अर ताको प्रतारांगुलकों सात लाख अडसठि हजारका वर्ग अर लाखका वर्ग अर चौसटिस वर्ग अर सातका वर्ग अर तीन करि गुण ताका माग दीजिए तामें एक घटाइर इतन्त्र संकलित धन=१७६।६४। हो है। इहां जगत्प्रतरकी सहनानी ऐसी प्रतरांगुलकी ऐसी । ४७६८.००1७६८...1१ल। १ल। ६४ | ६४।७।७।३। जाननी । बहुरि ऋण राशिका संकलित धन ल्याइए तहां गुणाकारका प्रमाग दोय है ताने पूर्वोक्त गण्डका जितनां प्रमाण तितनां द्वा मांडि परस्पर गुणिए। तहां टपरितन राशि प्रमाण वा मांडि परसर गर्ने जगच्छेणी होइ । बहुरि नीचे ऋणरूप राशि तिहविष सतरह आदि प्रमाण या मांडि परहार हो एक लक्ष अर सात लाख अडसठि हजार अर चौसठि अर सात होइ इनका भाग दीजिए। बड़ी इनमें एक घटाइर, बहुरि मुख चौसटि करि गुणिरं, बहुरि एक घाटि गुणकार एक ताका मान दीजिए ऐसे करते ऋग राशिका संकलित घन चौंसठि गुणां जगछेणीको मूच्यंगुटको सात टाल अहसठि हजार अर एक लाख अर सात अर चौसठि भर एक करि गुगि ताका भाग दीमिर । तामें एक घटाइए इतना भया ६४ २१७६८०००।१०।६४/७१ इहां जगच्छेगीको सहनानी ऐसी-- मूच्यंगुटका ऐमी २ जाननी । अब तिम धन राशिविषै जो एकसौ छिहतरिकर गुणकार पाभर नीचे चौसठिका भागहार था तिन दोऊनिकी सोलाकार अपवर्तन किए एकसौ डिहनारिय जायगा ग्यारह दृधा, चौसटिकी जायगा प्यारि हुवा। वहरि गुणकारके चौसटिकौं भागहारके चौन? करि अपवर्तन किए दोज जापगा अभाव भया। वहरि दोय जायगा सात लाख अहसटि या अर दोय जायगा टारा तिनकी सोलह विन्दी स्थापिए। बहरि अंगुलनिका दोय जाएगा साग्ने अइसटिका अंक रहा तिनको तानकीर संभेदन करि तिनकी जायगा दोयसै छपन दिन पा, तीनका अंक लिखिर । वहीर दोय जायगा दोयसै छप्पन भए तिनकों परस्पर गुणे पर होइ । वहरि दोप जापा तीनका अंक मर अर एक जायगा तीनका अंक आ पा इन पर गुमें मनाईम होइ । बरि मनाईसको सातका वर्ग गुणचाम करि गुणें तेरहम देईन होइ इनमें जो चौमटिकी जाएमा प्यारि मर तिन करि गुणे यापनम वागी हो । देने कार जगन्नताको साहका गुणकार र तरागुटकों पगडी और पांच हजार दोप में पानी है ज्योतिर्लोफाधिकार। आगै सोलह चिन्दी तिनकरि गुणें जो प्रमाण होइ ताका भागहार दिए धन राशिका गुगर- टित धन हो है १६५-५२९२००००००००००००००००। वहरि जन्तीपते टगाय पु- राईपर्यन्त दोदोवगा इत्यादि चंद्रादिकका प्रमाग का २।४।१२।१२।७२ । तिनको मिगर एक बत्तीस भए । बहुरि मानुपोतर पर्वत पर पुष्करा दीपविष चंद्रमानिसा प्रमाग ल्याउनको हैं । “पदमेगेण विहार्ण दुभाजिदं उत्तरेण संगुाणदं । पभवजुद पदगुगिद पद गगिर्द ते कि णाहि " इस फरण सूत्र फरि इहो वलय आठ है। ताते गरका प्रमाग आठ ताम एक घ ७ ताका आधा करि । उत्तर जो पलप क्लय प्रति वधर्तीका प्रमाण प्यारि लिहकरि गुनिए १ अपवर्तन फरिए तर चौदह भए ११ इनवि प्रभव जो प्रथम पलयविणे प्रमाणप मुख ए सौ चवालीस जोगिए १५८ । बहुरि इनको गड आटकारे गुणिए तब बारहसी चीसठि भर विषै एकसी बत्तीस जंबूद्वीप आदिकके मिलाए रहसै उिनो होइ सो इनको जो परे: संकलित धन भया था तिन घटाइए हैं। जाते ऋणस्पक्षणं राशेदन इस पचनपरिक स्यों घटायनां भर गतिमै मिलारना इन दोनिका एक अर्थ है । तो ऋग संकरित पन सा तेरहस छिनका समद करिए सय ऐसा हो:--१३९६ । २ १७६८००० । १८ ६४७१। सू २१७६८०००।१।६४ार सो यह गुणकार भागारादिकका भरना किए भाग्य राशिको परस्पर गुणें संख्यात मूल्यंगुल प्रमाण भया । सो इनयों पूर्वोक कम संका धनका भाग्यपि घटाईए तय ऐसा भया ।२।७६८०००।१७।७।६।१ हा सत्यात गपगु" सहनानी ऐमी २! जाननी । पर आगे घटायनैको सहनानी ऐसी-जाननी । भाग सकार धनीवर एक जगणी है । सारा सहित ऋण सहित जो धनसंकलित पन पूर्व कहा सोहर समान छेद करिए तर ऐसा- २ । ६१ । ०६८००० । १ ।।९।।३ ७६८०००। ७६८०००।१।१७।६॥६॥श भया । इमरिक मूल्यगुड रिना सर्व गुणफारनिको सल्यातरूप मनि इस प्रमाणको सल्यान गुपंगुल गुगिन जोगीमा ऋणराशि भपा । ताकी सहनानी ऐसी-२ इनको वोक्त धन समालित देमा-४६५-५२९२।१ हा सौरह बिदानिकी सहनानी ऐसी १६ जाननी । सो रहा जगत्मतर िनाय श्रेणीका गुनाक है ताते दोय पार श्रेणी है । तहाँ एक जगमोगीकों का राशिको जगोलोके समान देखि तात दूसरी गुणकारस्प जगणीविय घटाएं शिक्षित न्यूनरणा भाषा ऐसे कर गुग संवटित धन की गुणकार विष नोइका प्रमाण ताको स्पा वचित न्यून किर संरपान गुरभि मगरणीवर हीनता वि.वि.यून ग्यास गुणानाको प्रगगुर पE प्रमाको वाहन आगै सोलणकर नाका भा. दीना प्रमाण भर . जाननी 1. . ब चन्द्रानका प्रमाग :
१५८ त्रिन्टोकसार- फरि गुणे महानिका प्रमाण होई । एक जायगा अटाईमकार गुणे नक्षानिका प्रमाण होड एक जाना यासठि हजार नवस पिचहत्तरि कोदामोदि की गुणे तागनिका प्रमाग होइ इन सबनिकों गई। 30-२।११।१०२१११।१%D०२११११८८ १६५-५२९२।१६।१६५-५२९२।१६१६५-५२९२।१६ -०२१११२८०२११११६६९७५।११ १६५८५२९२।१६ ४।६५-५२९२।१६ जगत्पतरफों सांत तीन उह सात दोय पांच अंक अर दा विटी अर आमें बारहसे अमानैद इनका गुणकार अर प्रतरांगुल पणही आगें बायनस वाण सोलह विंदी इनका मागहार मया । सो इतने सर्च ज्योतिषी विंध हैं।७३६७२५००००००००००१२९८ १६५-५२९२०००००००००००००००० बहुरि स्थान सदृश अपवर्त्तन कहिए हीन अधिक अंकानिकों नगिणिकरि दाहकी वियै दाहकी सैंकड़ा कि सैकड़ा इत्यादि यथास्थान अपवर्तन करना तिसन्याय करि सात तीनने आदि दै करि गुणकार के वीस अंक पर पांच दोयने आदि देकर भागहारके सि संकनिका अपवर्तन कर दोय जायगा अमात्र करना । ऐसा मनविय विचारि 'वेसदछप्पण्णंगुल' इत्यादि सूत्रकरि दोयसै छप्पन अंगुलका वर्ग जो पगडी गुणित प्रतरांगुल ताका भाग जगत्पतरकों दीजिए इतने ४६५.. ज्योतिषी विव है । ऐसा आचार्य- कहा। सोई असंख्यात द्वीप समुद्र संबंधी सर्व ज्योतिषी विवानिका प्रमाण जाननां ।। ३६१ ॥ मागै एक चंद्रमाका परिवाररूप ग्रहनक्षत्र तारे तिनिका प्रमाण हैं हैं, अडसीदहावीसा गहरिक्खा तार कोडकोडीणं । छावहिसहस्साणि य णवसयपण्णतरिगि चंदे ।। ३६२ ।। अष्टाशात्यष्टाविंशतिः प्रहऋक्षयोस्ताराः कोटिकोटीनाम् । पट्पष्टिसहस्राणि च नवशतपंचसप्ततिरकस्मिन् चंद्रे ॥ ३६२ ।। अर्थ-अठ्यासी अर अठाईस प्रह अर नक्षत्र हैं। भावार्थ-प्रह अध्यासी हैं नक्षत्र अटाईस है। बहुरि तारे छ्यासठि हजार नवसै पिचहत्तरि कोड़ाकोड़ी हैं। ६६९७५०००००००००००००० इतना एक चंद्रमाका परिवार है ॥ ३६२ ।। आगें अठ्यासी ग्रहनिका नाम आठ गाथानिकरि कहें हैं;- कालविकालो लोहिदणामो कणयक्ख कणयसंगणा । अंतरदो तो फचयव सुंदुभि रत्तणिह स्वणिन्भासो ॥ ३६३ ॥ कालविकालो लोहितनामा कनकाख्यः कनकमस्थानः । अंतरदस्ततः कचययः दुंदुभिः रत्ननिभ रूपनिर्मासः ॥ ३६३ ।। अर्थ-कालविकाठ १ लोहित १ कनक १ कनक संस्थान १ अंतरद १ कचपत्र । रूपनिर्भास १॥ ३६३॥ - ज्योतिलोकाधिकार । गीलो जीलम्भामो अस्सस्सहाण फोस फसादी। पणा कमी संखादिमपरिमाणो य संखवणोवि ॥ ३६४ ॥ भीगे नौलामामोऽवोतरपानः कोशः सादिः। पर्णः सः शेगादिपरिमाणः पखवर्णोपि ॥ ३६४ ॥ अर्प-नील १ नागभास १ अश्व १ अवस्थान १ कोश १ फसवर्ण १ फंस १ दौरापरिमाग १ दशेरावर्ग ॥ ३६४ ।। तो उदय पंचवप्णा तिलो य तिलपुरछ छाररासीओ। तो धूम धूमफेदिगिसंठाणरखो फलेवरो विपडो ॥ ३६५ ॥ तत उदयः पंचवर्णस्तिलच तिलपुष्टः क्षारराशिः । मतो धूमो घूमकेतुः एकसंस्थानः अक्षः फलेवरो विकटः ॥ ३६५ ॥ अर्थ-उदय १ पंचवर्ण १ निल १ सिटपुछ १ क्षारराशि १ धूम १ धूमकेतु १ एक संस्थान १ अक्ष १ कटेयर १ विफट १ ॥ ३६५॥ इस भिण्णसंधि गंठी माण उपाय विज्जुजिन्भणमा । तो सरिस णिलय फालय कालादीफेउ अणयक्खा ॥ ३६६ ।। इहाभिन्नसंधिः प्रथिः मानमतुःपादो विद्युजिहो नमः । सतः साशो निलयः काल काडादिकेतुरनयाख्यः ॥ ३६६ ॥. अर्थ-अभिन्नसंधि १ ग्रंथि १ मान १ चतुःपाद १ विधजिह १ नभ १ सदृश १ निलय १ काल १ फाल फेतु १ अनय ॥ ३६६ ॥ सिंहाउ विउल काला महकालो रुदणाम महरुद्दा । संताण संभवरखा सयहि दिसाय संति वत्थूणो ॥ ३६७ ॥ सिंहायुर्विपुलः कालो महाकालो रुद्रनामा महारुद्रः । संतान: संभषाख्यः सर्याधी दिशः शातिरस्तूनः ॥ ३६७ ॥ अर्य-सिंहायु १ विपुल १ फाल १ महाकाल १ रद १ महारुद १ संतान १ संभव १ सर्वार्थी १ दिशा १ शांति १ वस्तून १ ॥ ३६७ ॥ णिचल पलंभ णिम्मंत जोदिमंता सर्यपहो होदि । भासुर विरजा तत्तो णिहुपरखो चौदसोगो य ॥ ३६८ ॥ निवटा प्रटमो निर्मत्रो ज्योतिष्मान् स्वयंप्रभो भवति । भामुरी विरजस्ततो निर्दुःखो यौनशोकथ ॥ ३६८॥ अर्थ-निवल १ प्रलंभ १ निम्मंत्र १ ज्योतिष्मान १ स्वयंप्रम १ भामुर १ विरज १ निर्दुःख १ बीतशोक १॥ ३६८ ॥ सीमंकर खेमभयंकर विभयादिचउ विमलतत्या य । विजयाहु वियसो करिकटिगिनडिग्गिनाल जलफेद् ॥ ३६९ ।। १ त्रिलोकसार- तिटते सूर्प सूर्यनिके वीचि अंतराल अर वेदी सूर्यनिविय अंतराल ल्यावनां । मावायं-टपण समु वि च्यारि आदि सूर्य हैं तिनविर्षे एक एक परिधिविय दोय दोय मूर्य जाननें तहां वशE वि अभ्यंतर वेदीत गुणचास हजार नवस निन्याण योजन अर संतीस इकसठियां भाग पर परिवि है तहां सूर्यका विमान है । सो अटतालीस इकसठियां भाग प्रमाण है । बहुरि तात परै निन्य हजार नवसै निन्याण योजन भर तेरह इकमठिया माग पर जाइ पगिये है तहां सूर्य बिमान है अठतालीस इकसठियां भाग प्रमाण है। बहुरि तात परै गुणचास हजार नबसै निन्याण योजन सैंतीस इकसटिवां भाग पर जाइ ल्यण समुद्रकी बाह्यवेदी है। जैसे इनकी मिलाएं दोय टाख यां प्रमाण लवण समुद्रका व्यास हो है । याही प्रकार धातुको खंडविर्षे च्यारि लाख योजन व्यास तामें छह जायगा एक एक परिधिविय दोय दोप सूर्य है । तिनि छही परिधिनि बाँचि सूर्यवि पांच अंतराल हैं । तिनका प्रमाण ल्यावनां । यहीर तिस प्रमाणत आधा आधा अन्य वेदो सूर्यविर्षे अर बाह्मवेदी मूर्यवियै अंतराल है सो ल्यावनां । याही प्रकार कालोदक स पुष्करार्द्ध द्वीपविर्षे भी अंतरालका प्रमाण ल्यावनां ।। ३७३ ।। अब चार क्षेत्र कह है दो दो चंदरविं पडि एकेक होदि चारखेत्तं तु । पंचसयं दससहियं रविविवाहियं च चारमही ॥ ३७४॥ द्वौ द्वौ चंद्रवी प्रति एकैकं भवति चारक्षेत्रं तु । पंचशतं दशसहितं रविविवाधिकं च चारमही ।। ३७४ ।। अर्थ-दोय दोय चंद्रमा वा सूर्यप्रति एक चार क्षेत्र सो कितना है ! पांचसै दश योजन भर विवका प्रमाणकरि अधिक है। भावार्थ-चंद्रमा वा सूर्यको गमन करनेंका जु क्षेत्रगली सो = क्षेत्र कहिए ताका व्यास पांचसै दश योजन अर योजनका अठतालीस इकसठियां भाग प्रमाण ५१० तिस चार क्षेत्रवि गलीनिका प्रमाण आमैं कहेंगे तहां जिस गलीविपै एक चंद्रमा सूर्य गमन करै तिस ही गलीविर्षे दूसरा गमन करै है । ताते दोय दोय चंद्रमा व सूर्य प्रति एकर चार क्षेत्र है ॥३७४ ।। आगै तिन चंद्रमा सूर्यनिका जो चार क्षेत्र ताका विभागका नियम कहें हैं;--- जंपुरविंद् टीवे चरंति सीदि सदं च अवसेसं । लवणे चरंति सेसा सगसगखेने व य घरति ॥ ३७५ ॥ जंबूरवीदव द्वीपे चरति अशीति शतं च अवशेषम् । टवणे चरति शेषाः स्वकम्यकक्षेने एय च चरति ॥ ३७५ ॥ अर्थ-जबूद्वीपसबधी मूर्य या चंद्रमा ती कमी असी योजन तो द्वीपविय विचरे । अवशेष लवण समुद्रवि विची है। वह अवशेष सूर्य चंद्रमा अपना अपना क्षेत्रही विष विच हैं भावार्थ -~~चार क्षेत्रका जो व्याम कहा तामें जवृद्धीपमबंधी चंद्रमा मूर्यनिका एकमी अमी १८ योजन तो नंबूदीपवियं भर नीनमी तीस योजन अर अटना म योजनका इकसठिवा भाग व - , ज्योतिर्लोकाधिकार - समुद्रवि धार क्षेत्रका व्यास जानना | अरोर पुकराई पर्यंत द्वीप पा समुदसपी चंद्र गर्ग चार क्षेत्र अपना अपना द्वीप पा समुदही वि जानना ॥ ३७५ ॥ भागें सूर्य चंद्रनिके पीथी जो गली तिनका प्रमाण कहें है;- पडिदिवसमेफीथि चंदादया परति हु कमेण । चंदस्स य पण्णरसा इणस्स पउसादिसय वीयी ॥ ३७६ ।। प्रतिदिवसं एकाधि चंद्रादित्याः चरनिहि क्रमेण । चंद्रस्य व पंचदश इनस्य चतुरशीतिशत बीयः ।। ३७६।। अर्थ-दोय दोय मिटि करि एक एक दिन प्रति एक एक पीया प्रति चदमा या रिचरे हैं क्रम फरि। तहां चंद्रमाको पंद्रह धीयी है बहुरि इन फहिये पूर्व तायी एकमी की गती है। भावार्थ-जो चार क्षेत्र काया साहविय चद्रमाको तो पंद्रह गली है, गर्पको एक चौरासी गली है। तहाँ एक एक दिन प्रति एक एक गरीवि दोर चंद्रमा पा दोष मूर्प - फरें हैं ।। ३७६ ॥ मागे वाधीनिका अंतराल करि दिवस प्रति गतिविशेषकों याहै है:- पयवासपिटहीणा पारखेचे पिरयपथभनिदे। चीयीणं विच्चालं सगरियजुदो दु दिवसगदी ॥ ३७७ ।। पधल्यामपिंडहीना चारक्षेत्र निरकपषमत। बीना विचाउ स्यकाधियुतं तु दियसगतिः ॥ ३७७॥ अर्य--पथ म्यास पिंड कहिए बियका म्यासपरि गुण्या या बोधीनिक माग करि हीन जो चारक्षेत्र तायो एक पाटि पाधीनिका प्रमाणमा भाग लिए पायनिका तरा प्रमाग हो है । बहुरि स्वयि विरप्रमाण तामें जोड़े दिषस गतिका प्रमाण है। भ्यास योजनका षटमाटीस इयमटियां भाग नसीह करि पोयानिका प्रमाग एकासी योगी गुणिए राम अयार्मास यत्तीसका इकसटिषा भाग प्रमाण होई पाको समांदरिधान धारक्षेत्रका प्रमाणवि पटाइए सहा पचिस दरा योजनायो मानिए इस हमर । सौ दराफा कमटिलो भाग रोप . यामें सूर्यविर प्रमाण अधिक ८१, सो गोरे' हमार एफसी भटापनका इफराटियो भाग भया - पानि पपायाम: RATE सी पत्तीसका इकसटिचा भाग "धगर तर पाईस हमार सोनरी भीमका गरिम र दागे एक पारि atter प्रमाण कमी निवासी नाका भाग : भागहार फ.मी " एसियो म्याग.. पोजन पा', सा जो मुरबमा प्र. इकमाएका भाग । " भी. भा ८ प . H पापा पिलोकसार- तीनका पांचवां भाग प्रमाण होइ ९४८६ ऐसे किरे जो जो प्रमाण आवै सो सो ताप तय विषयभूत क्षेत्र जाननां । भावार्य-मेरुगिरिका परिधि इकतीस हजार छस वाईस योजन है ३१६२२ तीहवियै श्रावण मासविध जहां अठारह मुहूर्तका दिन वारह मुहूर्तकी रात्रि हो है तहां चौराणवैस लियासी योजन भर योजनका तीन पांचवां भागविय तो एक सूर्यक निमित्त तावड़ा पाईए है। भर ताके सन्मुख इतना ही दूसरे सूर्यके निमित्ततें ताबड़ा है। कर तिनके वीचि अन्तरालयिष तरेसठिसै तेईस योजन अर दोयका पंचम भागवि अन्धकार है, और साके सन्मुख दूसरा अन्तरालविय इतनाही अन्धकार है इन सबनिको जोड़ें९४८३।०६३२०॥ ९४८६॥६३२४२ ॥ इकतीस हजार उसै वाईस योजन प्रमाण परिधि हो है । ऐसेंही अन्य परिधिनिविप जानना । वहुरि विवक्षित परिधिको साठिका भाग देइ एक मुहूर्त करि गुर्गे जे प्रमाग आवे तितना मास प्रति ताप तमका घटती बघती क्षेत्रका प्रमाणरूप हानिचय जानना सहा विवक्षित मेगिरिका परिधिकों साठिका भाग देइ एक मुहूर्त करि गुणें पांचस सताईन योजन अर एफका तीसा भाग प्रमाण हानिचय होइ । एक मासपिपै एक मुहूर्त रात्रिदिन कैसें घटे बरे सो फहिए है । एक दिनविय दोय इकसठिया भाग प्रमाण हानि चय होय तो साहा तीस दिनी स्तिना हानिचय होइ से करते अपवर्तन किए एफ मुहूर्त एक मासविषे आऔ है । महरि साल मुर्तविणे सर परिधिप्रमाणवि गमन करे तो एक मुहूर्तविय कितनां क्षेत्रपिपै गमन कर ऐसे परिरमा माटियाँ माग प्रमाग एक मुर्तपिप गमनक्षेत्रका प्रमाण आये है । भावार्थ-मेरगिरिका परिक्षा धारण मासते भादव मामपि पांचसै सताईस योजन अर एफका तीसयो माग प्रमाण सार पता तम क्षेत्र वस्ता पार है । सहाँ एक सूर्यसंबंधी तापक्षेत्र निवासी गुणसठि पोजन कर मटा सीमा भाग अर इतना है। दूसरा सूर्यसंबंधी। यहरि एक मन्तगयी तमा अहमटिम इक्यावन योजन अर ग्यारह सत्तरहा भाग अर इतनाही दूसग अन्तगरी म सई नि मेरगिरका परिवि प्रमाण हो है। मेंही म मास पर्यंत दक्षिणायनकिरी तो माम मान पर्वत पास सत्ताईम योजन अर एका तामा भाग प्रमाण आतापत्र सौ घातापा अर टमक्षेत्र ददना जाननां । बहरि माने फाल्गुनादिफ अपाद पर्यंत टनरापणानि माम माग पर दिनही टाच वावरता र तमोर घटता घटता जानना मेही स परियनितिन विध प्रकार विवक्षित मामविस्थावना । वहरि इहां पांच परिति नाग मागनिको मोशन लिम हा प्रकार विनिश्वका पनि विवामित दिन भोशाता तमाम स्वनादर हा पूर्वीप मधी मनिका टपण ममुक ध्यागका एटा भाग पर्वतारो लेटर पर्वत किया है। वरि बिगनि दिन जानना जरा मो । सामानकापानको;- पहिमि मिचित गर्ग नागा नाश्मागर्म । fदा पमपदि सामागं प गंग: ।। ३०३ ॥ ५.
ज्योतिर्लोषाधिकार। १६ परिषौ यस्मिन् तिष्ठति सूर्यः सस्यैर तापमानदटम् । वित्रपुरत: प्रसती पधादागे च शेषाम् ॥ ३८३ ।। अर्थ-जिस परिधिविप मर्प ति है तिस परिधिहीका सापका जो प्रमाण ताका मा गी एक पिने आगे फैरे है, अवशेप आधा पीछे फैल है । भावार्थ-परिधिनिविप जो तापक प्रमाग कथा साहविरे जहाँ मूर्पका चिंच पाईए तिह क्षेत्रकै भाग तिस प्रमाणते आधा ताप ६, भर आधा पी3 फील है । इहाँ प्रश्न । जो मेरगिरिको परिधिने आदिदै फरि जिन परिधिनिधि सूर्पका गमन नाही सहा ताप फेसे फैले है ! साका समाधान-सूर्यबिंबते सूधा सन्मुख जोतिस वि= क्षित परिधिरि क्षेत्र ताने मागे पीठे आधा आधा ताप फैले है । बहुरि ऐसा जानना जैमै चिराकन भाग पाउँ प्रकाश हो है । बहुरि जैसे जैसे चिराफ आगाने चाले तैसे तैसें आगार्ने सौ प्रकाश होत जाय पीते अन्धकार होता आये तैसेही मूर्यविच जैसे जैसे आगे चले तैसें तैसे आगें ताप फेट जाय पी पी सम होता मात्र है ॥ ३८३ ॥ भव ताप तमकी हानि पृद्धिकों कहें है;- पणपरिधीयो भनिदे दसगुणमूरंतरेण जल्लदं । सा होदि हाणिषट्टी दिवसे दिवसे च तावतमे ॥ ३८४ ॥ पचपरिधिषु भक्तेषु दशगुणसूपातरेण यद्धम्ध । सा भपति हानिद्धिर्दिवसे दिवसे च तापतमसोः ॥ ३८४ ॥ अर्थ-पांचों परिधिनिविर्षे दश गुणां सूर्यके अन्तरालानका भाग दिएं जो लन्धराशि हो: मो दिन दिन विधे तार तमकी हानि वृद्धिका प्रमाग जानना | तहाँ पंच परिधिनिविय विवक्षित मेट गिरि परिधि तहां साठि मुहूर्तनिर्षि इकतीस हजार उहसै वाईस योजन प्रमाण क्षेत्रविथ गमन करे तो दोय मुहूर्सका इफसठियां भाग मात्र दिनका वृद्धि हानिका जो प्रमाण सामैं कितना गमन कर ऐसे तिस परिविप्रमाणको साठिका भाग दिए दोयका इकसठि भागकरि गुणे दोय फरि अपवर्तन किए सत्रह योजन भर पचिसौ बाराका अठारहस तीसा भाग प्रमाण मात्र सोई सूर्यके गमन मार्गनिका अन्तराल एफमा तियासी ताको दस गुणो किए अठारहसै तीस ताका भाग विवक्षित मेरगिरिक परिधि प्रमाणको दिए प्रमाण भावै ताते ऐसा विचारि आचार्यले ऐसा कया कि विवक्षित परिधिको दश गुर्णा सूर्योतरालका भाग दिए ताप समका वृद्धि हानिका प्रमाण आरै है। ऐसे सतरह योजन पर पांचसै बारहका मटारहसे तीसरा भाग प्रमाण दिन दिन प्रति उत्त- रायणवि ताप बध है सम घंटे है, दक्षिणायन ितम है ताप घटे है। याही प्रकार अन्य परिधिनिविष दिन दिन प्रति ताप तमका घटना बना ल्यावना ॥ ३८॥ आगै पाचौं परिधिनिके सिद्ध भए अकनिकों दोय गाथानिकार कहैं हैं;- पास सोल तिण्णिय उणणउदी पण्णमेपतीसं च । दुखसातहिगितीसं धोइस आदि इगितीसं ।। ३८५।। वि.२२ प्रिलोकसार- पाति: घोडगा गि एकोननातिपचारादेशिप! दिगमपाकाशन पश प्रकाश ॥३८५ ॥ ई-नईम सो तीन ३१९२२ इन * मरि इकतीस हजार ना नमा मेरिका पाती है। परि निवासी पगास इस्तीग ३१५०८९ लभ मातार हजार निकामी योजन प्रमाण भम्पनर सीधी का पी है। परिसर म ३१६७.२ इन *क कमरि तान लाग सोह हमार सो नारीका नि है । पारि गोह तिगासी इमीग ३१८३१४ कन हमार तीन पौर योजन प्रमाण याच पापीका पति पदाचगुष्णमायार्ण होति मेरुपदी । मर्ग परिधी भो कमेण अफगामेणे ॥ ३८६ ।। परमायगाकादिरगाश गति मेरमाना। AR: मेग कमेगा ॥२८॥ wi-मा बाम ५२७०५५otफ जमकर पानात internयोजन प्रणा " पर भागमा परिरि है। ऐसे में आसानी 10 AMT.पकी मानना ।। ३८५ ॥ HAMAR RAHAT भगतदिपको समान को गीगना गिागदी निर्गता रनिगमीददगती। frमपाणि सिगाणगानि गमाहालेण ॥ २८७॥ Prertaintainगनीमली। TIMR: समानानि ॥ ३८॥ wi-FAME MI TAim arrait rik air मान am al - rani गान MARATMA RATHI Hairani..॥ PARAHIM - सामाग्ममर्ग काय मागि माण। inामना मनिfirst In १४ ॥ r", "retatutif with ... #: Premi .
ज्योतिर्लोकाधिकार। १७१ विविष धोटकवत् ताते शीघ्न गमन को है। यहरि बार परिविकत मिहात् मति शीम गमन करें है। यहरि अब सूर्य चन्द्रमानिके परिधि परिधि प्रति एक मुइनविय गमनका प्रमाण ल्यापना। कैसे सो कहिर है । तो मूर्पका परिधिविष भमणको समानताका काठ साटि मुहूर्त है । यहरि अभ्यन्तर परिविका प्रमाण सीन खास पद्रह हजार निवासी योजन है सो सूर्यके साट मुहर्तनिका गमन क्षेत्र तीनलाख पंद्रह हजार निवासी पोजन हो तो एक मुहूर्नका कितना होइ । ऐसे परिधि प्रमाणको साटिका माग दिए पोच हजार दोयसो इसावन योजन र गुणती- सका साटियो भाग मात्र सूर्यका बम्पन्तर परिधिविष एफ मुकिरि गमन क्षेत्रका प्रमाण हो है। ऐसे ही अन्य विवक्षित परिधि के प्रमाणकों साटिका भाग दिए सूर्यका विवक्षित परिविवि एक मुइर्त फरि गमन क्षेत्रका प्रमाण साधना । बटोर ऐसे ही चंद्रमाका भी राशिक विधान करि स्थापना । सहां चंद्रमाका परिधिवि भ्रमणको समाप्तनाका पाल वासटि मुहूर्त घर सेमिका दीपों कई सो भाग प्रमाण है ६२।२३ थाका विधान भाग भाही सत्तरम इयादि करि योग । पाको समोद करि मिलाएं सेरह हजार सातसे पपीसका दोपरी इपईसयो भाग मात्र भया को में काटविय अयंतर परिधिमा प्रमाण तीन लाख पंद्रह हजार निवासी योगन प्रमाण गमनक्षेत्र होइ सौ एक मुहूर्तविप कितना होइ । प्रमाण १३७२५ फल ३१५०८९४ा ग १ देबी टन्ध राशि पांच हजार हत्तार योजन पर सात हजार सातसे चादीका हर सातसे पचासयो भाग मात्र ५०७७७४५ चद्रमाया सभ्यता परिधिविध एक का मन क्षेत्रका प्रमाण मापा । ऐसे ही अन्यविवक्षित परिचिके प्रमाण वासहि मर सका दोषी इफईसया भागका भाग दिए विवक्षित परिधिषिय एक गुहर्तका गमन क्षेत्रका प्रमाग को है ॥२८॥ आगे अभ्यतर बीपीविय मिटता सूर्य ताका पy: स्पर्श ध्यान ओलिपि भापरेका मार्ग ताकी तीन गाथानिकर अनाये है।--- सहिदिदपतमपरिद गरगुणिदे पाएफासभदाणे । सेणं णिसापलपारदं जं पमाणमिणं ॥ २८९ ।। पलिहितप्रमारियो नगुणिते घनःस्पर्शापा । सेनोन निराधावलपारा प्रमाणमिदम् ॥ ३८९ ।। भर्य-प्रथम परिधिका प्रमाणपत्रे साटिका भाग दो नर गुगिए got भमान है। तदा साटि गर्तनिका मधम परिषि तीन लय परमार निरासी पोजन मानकर क्षेत्र महतोमा मुहूर्तनिका कितना गमन क्षेत्र इस प्रम पतिको माnिmमर गुणाकार भया । इनकी सोनवारी अपवर्तन कोर गका भागार तीनमः गुजर - १७२ प्रिलोफसार- - 1 प्रथम परिधिकी ३१५०८९ वीसका माग देइ ३१५०८९ तीन करि गुणिए २४५२६७ । लन्धराशि सैंतालीस हजार दोयसै तरेसठ योजन भर सातका धीमवां भाग मात्र चक्षुःस्पर्शाचा हो है । भावार्थ-अयोध्या नाम नगरका बासी महत पुरषनिकरि उत्कृष्टपने संतालीस हद दोयसै तरेसठि योजन अर सातका वीसवां माग मात्र क्षेत्रका अंतराल होत सूर्य देखिए है इतन ही चक्षु इन्द्रीका उत्कृष्ट विषय है याहीका नाम चक्षुःस्पर्शाधान है । बहुरि इहां अटारह महः का जु दिन ताका आधा भएं मध्यान्हविर सूर्य अयोध्याकी वरोवरि आय अर इहां ददय होत सूर्यका महण है ताते नवका गुणकार किया है । अर परिधियिषं भ्रमण काल साठि मुहूर्त है ताई साठिका भाग हार कीया है । वहीर निषध नामा कुलाचल ताका चापका प्रमाण एक टाख टैई हजार सातसै अडसटि योजन अर अठारह उगणीसयां भाग ताका आधा इकसठि हजार आठसै चौरासी योजन अर नवका उगणीसवां भाग तामि पूर्वोक्त चक्षुःस्पर्शायानका प्रमाण १७२६३ ॥ घटाइए अवशेष जो प्रमाण रहे ॥ ३८९ ॥ सो अगली गाथा विपै कहैं है, इगिवीसछदालयसं साहियपागम्म णिसहउपरिमिणो। दिस्सदि अउज्झमझे तेशृणो णिसहपासभुजो ॥ ३९० ॥ एकविंशतिषट्चत्वारिंशष्ठतं साधिकं आगत्य निषधोपरि इनः । दृश्यते अयोध्यामध्ये तेनोनः निपधपार्श्वभुजः ॥ ३९० ॥ अर्थ-इकवीस एकसौ छियालीस अंक क्रमकरि चौदह हजार छसै इकईस तौ योस अर साधिक कहिए किछ अधिक सो अधिक कितना १ चक्षुःस्पर्शावानका अवशेष सातका विद भागों निषध चापका अवशेष नवका उगणीसवां भागवि समछेद विधान करियर सैंतालीसका तीनस असावां भाग ४७ मात्र अधिक जानना । सो निषध कुलाचटके ऊपरि १५६२१ १७ आइ करि सूर्य है सो अयोध्याकै मध्य महंत पुरुपनिरि देखिए हैं । भाग- प्रथम पीथीपिप भ्रमण करता सूर्य सौ निषध कुलाचलका उत्तर तटते चौदह हजार कैसे . ईस योजन अर संतालीसका तानसे अरसीवां भाग उरें आवै तब भरत क्षेत्रवि उदय भयोध्याके यासी महंत पुरुषनिकरि देखिए है । बहार निको पार्श्वभुजा वीस हजार एक छिन योजन प्रमाण तामै निषध तरे आइ सूर्य देखने का जो प्रमाण १९६२१११७ . । घटाएं ।। ३९०॥ आगे कहिर है सो है- णिमहुवरि गंतव्वं पणसगवण्णास पंचदेरणा । तेत्तिपमेत्तं गत्ता णिसह अत्यं प जादि रवी ॥ ३९१ ।।
ज्योतिर्लोकाधिकार । १७३ निषधोपरि गंतव्य पंचसप्तपंचाशत् पेचदेशोना । तावन्मात्र गत्वा निषधे अस्तं च याति रविः ॥ ३९१ ॥ अर्थ-निपधके उपरि जाना पांच सतावन पांच इन अंक क्रम फरि पांच हजार पाँचसै पेचहत्तरि योजन देशोन कहिए कि पाटि इतना निषध पर्वत ऊपरि जाइ सूर्य अस्तपनों मात्र हो है । भावार्थ-परिधिविपै भमण करता सूर्य जय निषध पर्वतका दक्षिण तटतै परे किछू पाटि पचायनसे पिचहत्तरि योजन जाइ तब अस्त हो है । अजोध्यादिक भरत क्षेत्रके वासोनि. करि न देखिए है ॥ ३९१ ।। अब जाका प्रयोजन तिस चापके स्यावनकों तिसके वाण ल्यावका विधान कहैं हैं, चापा- दिकका वर्णन सो आगे होइगा इहाँ प्रयोजनभूत वर्णन फरिए हैं;- जंबूचारपरूणो हरिवस्ससरो य णिसहवाणो य । इह वाणावई पुण अभंतरवीहिवित्यारो ॥ ३९२ ॥ जंबूचारधरोनः हरिवर्षशरः च निपघयाणय । इह बाणवृत्तं पुनः अभ्यंतरवीधीविस्तारः ।। ३९२ ॥ अर्थ-धनुषाकार क्षेत्रवियै जैसे धनुषका पीठ हो है तैसें जो होइ ताका नाम धनुप है पाताका नाम चाप भी है। बहार जैसे धनुषकै चिला हो है तैसें जो होइ ताका नाम जीवा है । बहुरि जैसे तिस धनुषका मध्यर्ते जीवाका मध्यपर्यंत तीरका क्षेत्र हो है तैसें जो होइ ताका नाम वाण है। सो इहां जेबूद्वीपकी वेदी अर हरि क्षेत्र वा निषध पर्वतकै पौचि जो क्षेत्र सो धनुषाकार क्षेत्र हो है। तहां हरि क्षेत्र या निपध पर्वतते लगाय वेदी पर्यंत अंतराल क्षेत्र सो वाण कहिए वेदी ताका प्रमाण ल्याइए हैं तहां भरत क्षेत्रकी एकसटका हिमवन् पर्वतकी दोय इत्यादि विदेह पर्यंत दूणी दूणी पीछे आधी २ शलाका जोडे सर्व जंबूद्वीपरिपै एकसा निवै भलाका कहिए विसबा हो है। तहा भरत क्षेत्रतें लगाय हरि वर्ष पर्यंत जोड इकतीस शलाका हो हैं। कैसे ! " अंतधर्ण गुणगुणियं आदिविहीण रूऊणुत्तरभनिये । " इस सूत्रकरि अंतविर्षे हरिवर्षकी शलाका सोलह ताकौं भरतादिकतें दोयका गुणकार है। ताते गुणकार दोप फरि गुणे बत्तीस सामैं आदि भरतक्षेत्रकी शलाका एक सो घटाएं इकतीस, पार्को एक पाटि गुणकार एक ताका भाग दीएं भी इकतीस, ऐसे हरिवर्ष शलाका इकतीस हैं । बहुरि पाही प्रकार निषध शटाका तेरसयि हो हैं । बहुरि एकसौ नि शलाकानिका एक लाख योजन क्षेत्र होइ तौ इकतीस वा तेरसठि शलाकानिका केता होइ ऐसे किए हरिवर्पका वाण तो तीन लाए दश हजारका उगणीसा भाग प्रमाण हो है । बहरि निपधका घाण छह लाख तीस हजारका उगणीसा भाग प्रमाण हो है । वेदीके अर हरिवर्ष का निषेधके वीचि इतना अंतराल है । बहुरि इहाँ चक्षुः अचान क्षेत्र कहना । तहां अभ्यंतर वाथी अर हरिक्षेत्र या निषध पर्वतके बोधि जो धनुषाकार क्षत्र तहाँ पोथीकी परिधि सो तो धनुष है । बहुरि बौथी अर हरिक्षेत्र वा निफ्धके वीचि अंतराल क्षेत्र सो वाण है । हरिक्षेत्र पा निपधका पूर्व पश्चिमकी तरफ़ लेवाईका प्रमाण सो जीधा है । सहाँ एवं जो हरिवर्ष वा निषध पर्वतका वाणका प्रमाग काया तामें जंबूद्वीपसबरी चार क्षेत्र एकसो १७४ त्रिलोकसार- असी योजन ताकों उगणीसका मागहार करि समच्छेद किए चौतीसरी वीसका उगणीसा भाग मया । सो इतनां घटाएं चक्षुः स्पर्शावान क्षेत्र स्यावनेंविषै तीन टाख छह हजार पाँचसै असोय उगीसवां भाग प्रमाण ती हरिक्षेत्रका वाग हो है । यहोरे छह लाख छवीस हजार पाँचस असीक उगगीसा भाग प्रमाग निश्वका वाग हो है अब इनका वृत्तविष्कम जो ऐसा क्षेत्र गोल होइ तब चौडाईका प्रमाण सो कहिए है- तहाँ जंबूद्वीपका वृत्तविझम एक लाख पोजन तामें द्वीपसंबंधी चार क्षेत्र एकसो असी ताकी दोऊ पार्बनिका प्रहण अपि दूणाकरि ३६० पटारे सम्पतर वीथीका सूची न्यास निन्याणौ हजार उसे चालीस पोजन हो है ९९६९०१ पाको समछेद करनेके अपि उगगीसका भाग दीए अठारह सास तरेणी हजार एक सौ सार्यका टगगीसा भाग होइ महरि इहाँ प्रथमहरि क्षेत्रवि कहिए है । इमुहीन विभ चगुगिदिमुगा हेद हु जीवकदी वागकदि छह गुणिदे तत्य जुदे घगुकदी होदि १ ऐसा फरग सूत्र आगे कहेंगे ताकरि बागका प्रमाग को विक्रमका प्रमाण 22 में घटाइर १५८६५८० नयानका जो प्रमाग" ताको चौगुणा किर १२२६३२० जो प्रमाग होइ तोइकरि गिर १९५५६५४७८५६०० तप जीगकी कृति होई। पाका वर्गमूल किए जोराका प्रमाग हा गरि पाना प्रभाग ३०६ ५८० ताका यर्ग फरिए ९३१९१२ ९६९६१००बहार याको गुना करिर५६३ ९४७७७८१०० यहरि पासी जीवाका कति कही तिसरी जोतिर २५०९. ६०२५६१००० में किए धनुपकी कृति होइ, पाका वर्गमूल प्रहण किए माना माग भदिर निशाना हजार तीनमे सतहत्तार योजन अर ना दगणीसा भाग प्रमाणी एका पार हो है ८३३७७,३ । बडार निरय पर्वतका कहिए है । इगुहाग विक पारि गर करवितका बागको ६२६५८. योन, इन विम" मा घटाइये माहे " हा गुण बरा प्रमाण करि गुमिर Pr" तनिका कोही है।घटना नियको गोबर निलका वाणी औEn दE06 men पाशा कति की निगो मोरि तह घटः पतिले चलून काम कर """मानt माहामा भाग लिएकसान ET EXने बानी इन मा अारा दम भाग प्रमाण १२३४५८ free एयरत है। इन राज्य पनि मसंग ने इस बाnel नगर - Kyaना पर लोग ET ना nit गोदी मार्ग दस-दंगा:९२॥ iframera 41,- ज्योतिलोकाधिकार। हरिगिरिपशुसेसद पासभुजो सचसगतितेसीदी। हरिवस्से णिसहयण भइछस्सगतीस वारंप ।। ३९३ ॥ हरिगिरिधनुःशेषा पार्श्वभुजः सप्तसप्तवियशीतिः । हरिव निषधधनुः अष्टपट्सप्तसिद द्वादश च ॥ ३९३ ॥ अर्थ-निपधपर्वतया चापविय हरि क्षेत्रका चाप घटाइ ताका आधा फरिए इतना निप पर्वतकी पार्थ भुजा है । दक्षिण तटते वचर नट पर्यंत चापका जो प्रमाण ताका नाम इहाँ पा= भुजा जानना । सहाँ निषध पर्वतका धनुः १२३७६८१८ विपै हरि क्षेत्रका धनुः ८३३७७ ॥ १९ घटाइए सर भयशेष चालीस हजार तीनसे इक्याण योजन पर नर उगणीसो भाग प्रमा होह १०३९११९ याका आधा करना तहाँ योजन प्रमाणभैया एक घटाइ आधा करिए स बांस हजार एकसौ पियाणवे योजन होइ । बहरि जो एक घटाया था ताफा आधा १ रन उगणीसवी भागका आधा . इनों समग्छेद करि जोई २८ दोयका अपपर्सन किए चौदा १ उगणीसो भाग भए । सो पाकों किछ घाटि एक योजन मानि जोड़ें किछ् पाटि बीस हजार एक सौ छिन योजन प्रमाण निषध पर्वतकी पार्श्वभुना हो है। सो इहो पार्श्व भुजावि उत्तर तट चौदह हजार से इकईस योजन तरै यावत सूर्य है सावत भरत क्षेत्रवाले पासोनिकों दीसै पीछे दोसै सात पार्श्व भुजाविषे इतना घटाइ अवशेष किछ घाटि पचावनसै पिचहत्तरि योजन दक्षिण सट निषधफै उपरि वाप विप परै जाइ सूर्य अस्त हो है ऐसा भावार्थ जानना । अब हरिक्षेत्रके निषध पर्वतके धनुपके सिद्ध मए अफ कहे हैं । तहाँ सात सात तीन तियासी इन कनके श्रम कार ८३३७७ तियासी हजार तीनसे सतहत्तरि योजन तो हरिवर्षका धनुः है। बहर आठ छह से- सौस पारा इन मेकानिके काम करि १२३७६८ एक सास तेईस हजार सातसे अइसठि योजन का निषधका धनुष है ॥ ३९ ॥ आगे कहे जु दोऊनिकै धनुपका प्रमाण तहो अब शेष अधिकका प्रमाण या पार्श्व गुजाके अंक तिनकों कहें हैं- माहषचंदुरिया गवयफला गयपदापमाणगुणा । पासमुनो पोइसफदि वीससहसं घ देरणा ॥ ३९४ ।। माधषचंद्रोदृता नवककटा नपपदप्रमाणगुणाः । पार्श्वभुजः चतुर्दशतिः रिशसहस्त्र व देशोनानि ।। ३९ ।। अर्थ:-हा पदार्थ नामकी संज्ञा कर अंक कहे हैं । सो माधव घर कहिए उगांस जाते माधव जी मारायण सो नव है। भर समान वेद एक है। इन दोऊ कनिकरि उगणांस १७६ त्रिलोकसार- भए तिनकार उदृत नव कला । मावार्य-एक योजनको उगणीसका माग दीजिए । तहां नत्र । प्रमाण ती हरिक्षेत्रका चापका प्रमाण पूर्व कह्या तामें अवशेष अधिक जानना | बहरि इहां स्थान कहिए नय नत्र हैं ताते नवकी जायगा नव ताको प्रमाण कहिए प्रमाणका मेद दोय है दोय करि गुणिए तब एक योजनका उगणीस भागविय अठारह भाग प्रमाण होइ । सो इतना नि पर्वतका चापका प्रमाण पूर्व योजनरूप कशा तामें इतनां अवशेष अधिक जाननां । बहरि नि पर्वतकी पार्श्व मुजा चौदहकी कृति एकसौ छिन तिहकरि अधिक बीस हजार योजन२०१ प्रमाण है ॥ ३९४ ॥ आर्गे अयन विप विभागों न करि सामान्यपर्ने चार क्षेत्रवि उदय प्रमाणका प्रतिपादन आर्थ यह सूत्र कहैं हैं;- दिणगदिमाणं उदयो ते णिसहे णीलगे य तेसही । हरिरम्मगेसु दो दो सूरे णवदससयं लवणे ॥ ३९५ ॥ दिनगतिमानं उदयः ते निषधे नीटके च त्रिषष्ठिः । हरिरम्यकयोः द्वौ द्वी सूर्ये नवदशशतं लवणे ॥ ३९५ ॥ अर्थ एक दिन विपै चार क्षेत्रका व्यासविषै सूर्यका गमनका प्रमाण एकसौ सत्तरिका इकन ठिवां भाग प्रमाण कहा था सो इतना दिन गति क्षेत्रीवपै जो एक उदय होइ तो चार क्षेत्रका पांचमैदर योजन विषै केते उदय होइ । ऐसे किए लब्ध प्रमाण एकसै तियासी उदय आए । बहुरि पर्दताव 'चार क्षेत्र विर्षे अवशेष सूर्य विंव करि रोक्या हुया अटताटीस इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र तिहति एक उदय है ऐसें मिलि एकसी चौरासी उदय हैं । जाते एक एक बीयी प्रति एक एक ददय सेन है। तहां निषध नीटवियै प्रत्येक तरेसठि अर हरि रम्यक क्षेत्रविष दोय दोय अर लषण समुद्र किन एकसौ उगीस उदय हैं। भावार्थ -समस्त चार क्षेत्रविष सूर्यका उदय एकसी चौरासी हो है। तहाँ भन्न अपेक्षा तरेसठि सौ निषध पर्वतविष दोय होर क्षेत्रविपै एकसौ उगणीस यण समुद्रावर उदय स्थान हैं। अयंतर वीथीते टगाय तेरसठिवी वीयो पर्यंत विष तिष्ठता सूर्य तो निष पर्वतकै उपरि उदय हो है भरत क्षेत्रके वासीनिकरि देखिए है । बहुरि चौसठि सठिया वादा विष तिष्टता सूर्य हरि क्षेत्र ऊपरि उदय हो है । वहरि छयासठिवीत लगाय अंतपर्यंत वीयौनिषित तिष्टता सूर्य रयण समुदकै उपरि उदय हो है। ऐसेंही ऐरावत अपेक्षा तरेसठि नीलपर्वतरि दोष रम्यक क्षेत्रपिप एकमा टगणास लवण समुद्रवि उदय स्यान जानने ॥ ३९५ ॥ या दक्षिणायनविप चार क्षेत्रका द्वीप वेदिका समुद्रका विभाग करि उदय प्रमागरी प्ररूपणके अर्थी त्रैराशिककी उत्पत्ति कहै है- दोउयहिपारसित्ते घेदीए दिणगदरिदे उदया। दीचे घर घंदस्स य स्वणसमुपति दस उदया || ३९६ ॥
ज्योतिलोकाधिकार। १७७ द्वीपोदधिचारक्षेत्रे येयो दिनगतिहिते उदयाः । द्वीपे चतुः चंद्रस्य च लरणसमुद्रे दश उदपाः ।। ३९६ ॥ अर्थ:-द्वीप समुद्र संबंधी चार क्षेत्र भर दी इनको दिन गति प्रमाणका भाग दिए उदयनिका प्रमाण हो है । भावार्थ-चार क्षेत्रका भ्यासविष पीथीनिविपै सूर्यका जहाँ जहाँ जितनें उदय पाइये हैं सो कहिए है। तहो जंबूद्वीप संबंधी धार क्षेत्र एकसा असी योजनमैत्यों जंबू- दोपकी वेदीका म्यास ध्यारि योजन है सो रि किए द्वीप चार क्षेत्र एफसी रिहत्तार योजन है। बहुरि प्यारि योजन घेदी उपरि चार क्षेत्र है । बहुरि तीनसे तीस योजन पर अटतालीस इकस- टिचा भाग प्रमाण लवण समुद्र उपरि चार क्षेत्र है इनको दिन गतिका प्रमाण एकसौ सत्तरिका एकसटियां भाग प्रमाण ताका भाग दिएं जितना जितना प्रमाण आौ तितना उदय जाननें । सो कहिए हैं । दिन गतिका प्रमाण एकसौ सत्तरिका इकसठियो भाग " सो इतना क्षेत्र विप एफ उदय होय तो वेदिका रहित दीप चार क्षेत्र विपै केते उदय होहिं ऐसे त्रैराशिक किए तरेसठि रदय पाए । तिन विष अभ्यंतर चीयोका उदय पूर्वला उत्तरायणवि गिनिए हैं ताते वासठि उदय भए अर अवशेष छवीस एक सौ सत्तरियां भाग प्रमाण उदयके अंश रहे । इहाँ द्वीप संबंधी भतका सूर्य सूर्य विषै अंतराउ पर्यंत आए । यहार अवशेष छसि एकसौ सतरियो भाग उदय अंश रहे थे तिनका योजन अशरूप क्षेत्र करिए हैं। एक उदयका एकसौ सत्तार योजनका इकसटिवां भाग प्रमाण क्षेत्र होइ ती छवीस एकसौ सत्तरिया भाग प्रमाण उदय अशनिका केता क्षेत्र होइ । त्रैराशिक करि फल राशि इच्छा राशिको गुणें छवीस योजनका इकसठियां भाग प्रमाण क्षेत्र भया। द्वीप संधी योजन अंश अगले विद करि रोक्या हुवा क्षेत्रविय देना । पहार एफसी सतरिका इफसठियां भागवि एक उदय होय ती ध्यारि योजन प्रमाण वेदिका क्षेत्रवि फेता उदय होइ ऐसे त्रैराशिक फार भागहारका भागहार इकसटि करि प्यारिकों गुणे दोयस चवा- लीस भए । इनको एकमो सत्तरि भागहारका भाम दिए एक उदय पाया अवशेष चहौ चरिका एकसौ सत्तरियां भाग प्रमाण उदय अंश रहे । इनका पूर्वोक्त न्याप करि क्षेत्ररूप किए पहोत्तरि योजनका इकमठियां भाग प्रमाण क्षेत्र भया इस विय वाईस पोजनका इकसठियो भाग प्रमाण क्षेत्र महि पूर्वोक्त द्वीपका भंत अवशेष क्षेत्र छत्रीस योजनका इकसठिवा भाग प्रमाण सिंह विष मिलारे। अटतालीस योजनका इकमटियां भाग प्रमाण मूर्य त्रि फार रोक्या हुआ क्षेत्र संर्ण हो है। ऐसे अभ्यंतर वीथी स्थिति सूर्य किंवते चौसटिवी वीथीस्थित सूर्यविवका ध्यास उनीस इकसटिवो भाग ती द्वीप चार क्षेत्रके अर वाईस इकसटिवां भाग वेदिका चार क्षेत्रको मिटिकरि सिद्ध हो है। इहां चौसठियी वीथी द्वीप भर घेदिकाकी संधिविष है ऐसा तात्पर्य जानना । ताके आगे दोय योजनका अतराल है, ताके आगें सूर्यकार रोश्या हुवा भरतालीस इफसठियां भाग प्रमाग क्षेत्र है । तातै परे वावन योजनका इकमटिवा भाग प्रमाण क्षेत्र रह्या सो आगिला दोय योजनका अंतपल. विष देना । ऐसें द्वीप वेदिकाका संधिविपै प्राप्त जो मूर्य बिमका म्यास ता प्राप्त भया बाईस योजनका इकसटिया भाग प्रमाग क्षेत्र निहिस्पो लगाइ वेदिकाका प्यारि योजन प्रमाण क्षेत्र समाप्त बि.२३ पिलोकसार- भया । बहुरि टयण समुद्रविष एकसी सत्तरिका इकसठियां मागविष एक दृढय होइ दो दि रहित समुद्र चार क्षेत्र तीनस तीस योजन तिहाविप के उदय होड में त्रैरागिक करि पार उदय एकसौ अटारह । बहुरि अवशेष उदय अंश सत्तरि एकसी सत्तरियां भाग प्रमाग इन पूर्वाक्त प्रकार क्षेत्र किए सत्तार योजनका इकसठियां भाग प्रमाण क्षेत्र मया । इनिकी वैदिकाना अंतरालविपै प्राप्त वावन योजनका इकसठियां भाग मिलाएं मागहार इकमटिका भाग हि दोन योजन प्रमाण अंतराल संपूर्ण हो है। बहुरि यात परै रविविध सहित अंतर प्रमागरम दिन गतिशलाका अंतका अंतरालपर्यंत एकसी अठारह हैं ते मुगम हैं। तहां उदय भी एकसौ अग्रह है। ताते पर बाह्य पीथीवि तिष्ठता सूर्यविका व्यासविष एक उदय है। ऐमें सर्व मिडि टवान समुद्रविप एकसौ उगीत उदय हैं। ऐसे दक्षिणायनविय एकता तियासी उदय जाननें। इहां ऐसा भावार्य जाननां वीयीविष तिष्टता हुआ मूर्यका वित्र प्रमाण औ क्षेत्र ताका नान पर न्यान है सो अटतालीस योजनका इकसठिवां माग प्रमाण है। अर बीयी वायीनिकै वीचि विनन्द चार क्षेत्र विषै अंतराल ताका नाम अंतर है सो दोय योजन प्रमाण है। तहां एक सौ छिहंटर योजन प्रमाण द्वीप संबंधी चार क्षेत्रविष प्रथम अभ्यंतर पय व्यास है ताकै आगे प्रश्न अंतराल है । ताकै आर्गे दूसरा पथभ्यास है। ताकै आगें दूसरा अंतराल हैं। ऐनै हो क्रमत अंतवि तेरसठियां पय व्यास अर ताके आर्गे तेरसिटवां अंतराल हो है । अर ताकै म छब्बीस योजनका इकसठिवा भाग प्रमाण क्षेत्र अवशेष रह्या । बहुरि च्यारि योजन प्रमाग वोदेय संबंधी चार क्षेत्र है तामें वाईस योजनका इकसठिवां भाग काहि तिस द्वीप संबंधी अवशेष क्षेत्रावर जोई चौसठियां पय व्यास हो है। चौसठिवीं वीयो द्वीप अर वेदिकाकी संविविौ है । बहुरि निन पथ व्यासकै मागें चौसाठिवां अंतराल है ताके आगै सठियां पयन्यास है ताके आने वाचन योजनका इकसठियां भाग प्रमाण क्षेत्र वेदिका चार क्षेत्रवि अवशेष रसा। बहुरि पथ न्यास रहित समुद्र चार क्षेत्र तीनसै तीस योजन प्रमाण है । तामै सत्तार योजनका इकसठियां भाग काडि वैदिका अरोर क्षेत्रवि जोडे पैसठियां अंतराल हो है। बहुरि ताकै आगै पय व्यास है ताके आर्गे अंतर है। ऐने। क्रम अंतविथै एकसौ तियासीवां पय व्यास आगै एकसा नियासीयां अन्तराल हो है। वरि तक आर्गे पय व्यास प्रमाण अवशेष समुद्रचार क्षेत्रविय एकसौ चौरासीवा पथ न्यास है। बहर इहां नहोस व्यास है तहां वायी जाननी । एक एक वीविय प्राप्त होइ मर्यका दृष्टिविय आवनां ताका नाम टार जानना। ऐसे एकसौ चौरासी वीयोनिवि एकमौ चौरासी उदय भए । तहा टचरायणस्यों आना आवता मर्य अभ्यन्तर वीथीविय आ सो वह टत्तरायणषि गिनि लिया पर लगता हो मर्ग बरहा उदय होइ नाही ताने दक्षिणायगविौ माही गिना में करि एकसौ नियामी उदय जाननें। आगे उन यवि कहिर है-टयण समुद्रविष रविविध सहित चार क्षेत्र तीन तीन यांजन अर अनाम इकसठियां भाग प्रमाग है ताका समच्छेद कार जोई योम हजार एकमो अहरिका इमाटवा मार प्रमाग होइ - वहरि एकमा सरिका इकमटिग भाग क्षेत्रको एक दिनानिहाका होइ तो वास हजार एकमी अह तरिका इकठिया मागकी केती होद ऐसे प्रेरामिक किए एकी
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१८० त्रिलोकसार- है। आगे एकसौ बीसवां भतरा है ताकै माग बाईस योजनका इकसटियो भाग नागरिका रहे हैं। बहुरि दौर चार क्षेत्रीय छवीस योजनका इकसटिको भाग हि ताने मिस सौ ईसा पयास हो है। ताके आगे एक सौ इकईसका अंतर है ऐसे क्रमते ती सौ लियासीको संरके आगे एफसी चौरासीको परयास है तहां एफसी चौरासी पर प्रमान रदपनितिन बार वीथीका उदय दक्षिणायण विनिनिर हैं। अर टगता सहारून न हो है ताते समुदका आदि उदय घटार उतरामावि के उदय एकसौ निवासी देने जाने। दादिकका वरून पूर्वोक काही था। महरि पदमाका भी अपन भेद किए बिना र क्षेत्र १८० पिच उदय भर समुद्र पार क्षेत्र ३३017 दस उप है । मिहिर पर हो है। माग दक्षिगारगति की है। हाँगे इत्यादि शोर माही पटममा दिनपति क्षेत्र पर हजार पाँचसै हमारन योगनका परिस मचाईमा भाग को मोनोरे जो एक उदय होय तो एकमी अस्मी योजन प्रमागर लिने डास होरदो राशिक किर पारि उदय पार । महरि माशेष चौदह वरने रहर पानी इकान भाग ममाग उत्प अश रहे । यद्दरि एक उपाय minानका पागि सत्ताईमा भाग प्रमाग क्षार ती पाहम मार चौहान भाग प्रमाग उदप अनिका फेनार होई में are मा करि इन्टागशिक भCE अयन कर चोर नजना माग समाईगो भाग प्रमाण र मयशेष रमा । बरि मा पर KHATER योजनामा !ि भाग नाफा मा करि राम ने मागयो भाग प्रमाण भगा मो नमो विग मी पर ध्यान देना ! तो उदय पफ, की जो पाचौ टप १ ranमाण ताले तनहग की ३। हमार शर्मा याममा पनि समानामा hiriwn feet पजन आ ९.मीनार माको भर देना । माग गी : zx-PATER मा Anti Parv aai RITAINMENT :: THE Ori vi 74. Mr. It marat 4 darina Lifa"
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। १८२ त्रिलोकसार- आगें द्वीप चार क्षेत्रवि पूर्वोक्त प्रकार उदय च्यारि अर अवशेष चौदह हजार छसै छप्पनका पंद्रह हजार पाँचसै इकावनवां भागप्रमाण उदय अंश रहे इनका पूर्वोक्त प्रकार क्षेत्र किए चौदह हजार उसै छप्पनका च्यारिसै सत्ताईस योजनका प्यारिसै सत्ताईसवां भागप्रमाण होइ यामें प्रत्तीस योजन अर एकसौ तहेत्तरिका च्यारिसै सत्ताईसवां भागका समछेद किए चौदह हजार दोपसे चीसठिका च्यारिसै सत्ताईसवां भाग होइ सो प्रहि करि दशयां अंतरालयिष देना। ऐसे पैतीसे योजन अर दोयसै चौदहका च्यारिसे सत्ताईसवां भाग प्रमाण दशयां अंतराल संपूर्ण हो है । बहुरि अब शेप तीनसे बाणवै योजनका च्यारिसे सत्ताईसवां भागप्रमाण रखा । ताकी सात करि अपर- तन किए छप्पनका इकसठियां भागप्रमाण होइ सो यहु अभ्यन्तर पय व्यासविरें देना । इसचिर्प एक उदय ऐसे द्वीपविय चंद्रमाका उत्तरायणविय पांच उदय हैं इहां ऐसा भावार्य जाननां । चंद्रमाका पथव्यास अंतरादिकका स्वरूप प्रमाणती पूर्वोक्त जानना तहाँ ख्यण समु चार क्षेत्रवि प्रथम बाय पथ व्यास है । ताकै अभ्यतरर्वती आगे माग प्रथम अंतर है। ताके आगे द्वितीय पथ ब्यास है । ताकै आगे द्वितीय अंतर है। ऐसे अमर्ने नया अंतरकै आगे दशयों पय व्यास है। ताकै आगें दोय योजन भर इकतालीसका यारि सत्ताईसवां भाग प्रमाण क्षेत्र भवशेष रखा । यहरि आगे द्वौप चार क्षेत्रवि तेतीस योगन भर एकसा सहेत्तरिफा प्यारिसै सत्ताईसवां भागप्रमाण क्षेत्र महि अर समुद्रका अवशेष क्षेत्र महि दायां अंतरालको दीए समुद्र भर द्वीपकी सपिरि दशा अंतराल संपूर्ण हो है । साके भागें पारम्हा पथ प्याग है ताके आगे ग्यारव्हां अंतराल है। ऐसे क्रमते अंतरि चौदहा अंत आगे पंद्रा सम्पनर पप ग्यास है। ऐसे इन पंद्रह पथ भ्यासनिविणे पंह उदय है। तिनिधि समुद्रमरी प्रथम म्यासपियें जो उदय है सो दक्षिणायन संधीहा है । जाने लगता दूस• राधार तहाँ उदय न ही है ताते चंद्रमाका उत्तरायणविगे ना समुद्रविण पाय द्वीप ऐसे चौदह उदय जानने बहरि हां मूर्य व चन्द्रमाका उत्तगयणपिय उदयका विभाग मूल गुर कनि कता तथापि दक्षिणायणमा उदय मार्ग फरि टीकाकार विचार कर कया ॥३९॥ अव दाग रत्तर उई अपवित्र सूर्यके भातापा क्षेत्र विभाग करें - पन्दरगिरिमम्झादो नाश्य लयहरहभागी दु । हा अहरमसपा उपरि सपनायणा तापी ॥ ३९७ ॥ मंदानिमियात् यावत् लामोशियभागातु । मानगे अाददाशतानि उपरि शनयोजनानि तापः || ३९७ ॥ अर्थ-मियो समय पान साग समुद्रका Pा भारत का ? का साग यन्यता र निता गोशाकसि | Khatri म हर इन नगरपमा अामी यो मन माग मनमो समय अपनी 21m in है। भारत mERENA ज्योतिलोंकाधिकार। तेतीस योजन भर एकका तीसरा भाग प्रमाण या द्वीप चार क्षेत्र एफसौ भर- तेतीस हजार पाँचसे तेरह योजन अर एकका तीसरा भाग प्रमाग अभ्यंतर वीथी. समुद्रका छठा भाग पर्यंत दक्षिण दिशाविर्षे आताप फैले है । बहुरे असंही अन्य जानना । बहुरि सूर्य विवत नाचे अटारहवें पोजन पर्यंत सधः दिशा विषै भाताप फैट -सूर्यवियते नीचे आटस योजन तौ समभूमि है अर ताने नीचे हजार योजन पर्यंत । तहां पर्यंत सूर्यका आताप फैले है । बहुरि सूर्य बियत उपरि सौ योजन पर्यंत ऊई दिश केले है । भावार्थ- सूर्यविनै उपरि सौ १०० योजनपर्यंत ज्योतिौक है तहा आताप केले है । भैसे परिधिनि विर्षे तो आताप फैटनेका प्रमाण पूर्व कहा था इहो दा ऊद अध. दिशा विषै आतार फैलनेका प्रमाण फा।॥ ३९७ ।। आगे चंद्रमा सूर्य ग्रह इनके नक्षत्र मुक्ति के प्रतिपादन करने को चाहता आचार्य एक एक नक्षत्र संबंधी मर्यादारूप गगन संडनिकों कहें है:- अभिनिस्स गगणखंडा एस्सयतीसं च अवरमज्झबरे । उपप्णरसे छके इगिदुतिगुणपणयुतसहस्सा ।। ३९८ ।। अभिजितः गगनखंडानि पातत्रिंशत् च अवरमप्पारागि। पट्पंचदशे पट्के एफरित्रिगुणपंचयुतसहस्राणि ॥ ३९८ ॥ अर्ध-अभिजित नक्षत्रके गगनरोड उसै तीस हैं। यहरि जघन्य मध्य उत्तए नक्षत्र से छह पंद्रह छह प्रमाणको धेरै तिनके एक दोय तीन गुणा पाच संयुक्त एक हजार प्रमाण एड हैं। भावार्य-परिधिरूप जो गगन फहिए आकाश ताके एक हारा नर हजार मा संड करिए तामें एक चंद्रमा सेवधी अभिजित नक्षत्रके उसे सीस गगन खंड है। उसे तीस : प्रमाण परिधि रूप ाकारा क्षेत्र विष अभिनित नक्षत्रकी सीमा मर्यादा है। पर हो । जघन्य नक्षत्र तिन एक एकके एक हजार पाँच गगन संड है । बहुरि पंद्रह मध्य नक्षत्र तिन एक एकर दोय हजार दश गगन रोड है। बदर छह घर नक्षय तिन एक एफके सीन हजार पदह गगन हैं। परि इनमें इतनेही दूमरा चंदमा संबंधी है । इहाँ नक्षत्रनिके जघन्य मर सपना गान संडनिका थोडा बहुत अति पतकी अपेक्षा काहा है स्वरूपादिक अशा नाही का है॥३९८॥ आर्गे तिन जघन्य मध्यम टए नक्षत्रनिकों दोष गायानि करि कहै - सदभिस भरणी भरा सादी भमिलेस्स नेहमवर परा। गहिणि विमा पुणवगु निउन पनिया मेमा ।। ३९९ ।। 14. भर पात 12 अगागदागि। अर्थ भाग . . " N
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ज्योतिलौफाधिकार। ठियां भाग आया । या प्रकार एक बार संपूर्ण एक परिविवि भमण करनेका काट प्रमाण कहा ॥ ४०१॥ आगै सो एक मुहूर्त कार अपना अपना गगन पंडनिविष गमन करनेका प्रमाग कहा सो कहें है:- अटी सनरसयहिंदू पावहि पैचअहियफर्म । गति मूररिक्खा णभखंदाणिगिमुहुनेण ॥ ४०२ ।। भएपष्ठिः सप्तदशशतं ईदुः दापष्टिः पंचाधिकामाशि । गति सूर्यशक्षागि नभागनि एकमुहर्तेन ॥ ४०२ ॥ अर्थ-अडसहि अधिक सतरहसे १७६८ गगन खंडनियों पदमा एक मुद्दई करि गमन फर है । यदुरि तिनते वासठि अधिक ताका मटारहसे तीस गगन पनियों मूर्य पर नो पास अधिक ताका अटारहरी पतीम गगन निको नक्षत्र एक मुहूर्त फार गमन परे है ॥ १०२। भागे चंद्रमादि सारापर्यंत ज्योतिषीनिक गमन विशेपका स्वरूप कहें :- पंदो मंदो गमणे रो सिग्यो तदो गहा तलो। तत्वो रिपया सिग्या सिग्यपरा तारया मत्ती ॥ ४०३ ॥ पदो मंदो गमने सूरः शीघ्रः ततो प्रहाः ततः । ततः प्राणि शीमाणि सीपतराः तारकाः ततः ॥ १०॥ अर्थ-रात गमनविध चंद्रमा मंद मंद गमन पर है। हाते पूर्पकर्ष गमन पर है। सात मह म गमन फरे, साते नक्षत्र काम गमन पर है, साते तितम तारे मन करे है ॥ १०३ ॥ आगे भय चंदमा सूर्यके नक्षत्र अस्तिकों काहै है- दरवीदो रिपसा सत्ताही पंच गगणसंसदिया। भरिपदिदरिपरवसंता रिपसे दुरविमायणरता ॥१०॥ ईदुरित: ऋशागि ससपटि: पंच गगनासधियानि । भषिकहितकानि ऋो इदुविभस्तमममार्गः ॥ १० ॥ अर्थ-मा गर्व गगन सदनित प्रमते सहसडि पर ले गगन रोड करिक मानिय एक मुहूर्ण परि गमन अपेग गगन २१ । सो इस अधिकाया भाग भने भने :. निको दिए नक्षत्र मर चंदपा गया भासन मानिय प्रमाण का है । सो करिताको पार घरमा भर नक्षत्र सावि गमनका प्रारंभ रिका हा एक मुवि संप्रमात सह . सहि न निगमन निशा भर नप बटारसे नाम गगन नियमन तहमा नमवत सनसदिन पीया हो भनि भर पा रोड साथि गमनका मारभ की एक गुहरि मिमिती पत्रमा सामान AIR दसरा मुरलर सतसटि गान रहा मैं दोई हानि
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१८८ त्रिलोकसार- एकपथटंधनं प्रति यदि दिवसैकषष्ठिभागं उपलब्धं । किं त्र्यशीतिशतस्येति गुणिते ते भवति अधिकदिनानि ॥ ४०८ ॥ अर्थ-वीयी रूप जो एक सूर्यका मार्ग ताका उलंघन प्रति जो एक दिनका इकसरि भाग पात्र तो एक सौ तियासी मार्गनिका उलंघन प्रति केते दिवस पावै ऐसें त्रैराशिक करि इफसठि कीर अपवर्तन करि गुणें अधिक दिन तीन हो हैं। बहुरि एक अयन विथे। सो विपासी दिन कैसे हैं सो कहिए हैं। एक मुहूर्त विपै गमन योग्य सूर्यके अठारहरी तीस और नक्षत्रके अठारहरी पैतीस खंड तात सूर्यके नक्षत्रते पांच खंड छोडनविय एक मुहूर्त । तौ अभिजित नक्षत्रके उसैतास खंड छोड़नैविय केते मुहूर्त होइ ऐसे मुहूर्त करिए. सार्को सात भाग देइ दिन करने की बहुरि भाग्य मानकों तीस करि अपवर्तन किए इकईस दिनका पार माग प्रमाण अभिजितका मुक्तिकाल आया । ऐसेंही उघन्य मध्य उत्कृष्ट नक्षत्र श्रवण आदि पुन पर्यंत तिनके त्रैराशिक विधिकरि मुहूर्त या दिन करि क्रमते पंद्रह तीस पैदह कार अपवर्तन गरि जोपावे सो सो तिस तिस नक्षत्र पिप स्थापन फरनो ॥ १०८॥ मागे पुष्यविये विशेष है साके प्रतिपादनके मार्थ कहै है सतिपंचमचउदिवसे पुस्से गमियुत्तरायणसमत्ती। सेसे दक्खिणआदी सावणपडियदि रविस्स पहमपडे ॥ ४०९॥ सत्रिपचमचतुर्दियसान् पुष्य गत्या उत्तरायणसमाप्तिः । शेषान् दक्षिणादिः धायणप्रतिपदि सेः प्रथमपये ॥ १०९ ।। अप-सीन दिनका पाचवा भाग महित प्यार दिन पुष्य नक्षत्रका मुक्तिका इधर उत्तरापाकी समानता हो है । ऐमें करि पूर्वोन प्रकार पुष्य नक्षत्र मुक्तिका कालको म महिना पांचवा भाग प्रमाण स्याइ तामें सीनका पांच भाग सहित पारि दिनमा सम- शिर ईम दिनका पंचा माग भपा सो प्रहि करि उत्तरायणको ममामता पदनामा घवाढीन दिनका चिर्ग भाग रमा सामें कोट पूरण करण के शितना ही ईमदिनका पार भाग शरि दक्षिणायनका प्रथम कोट पि दिए यह ही प्रावण मास पी दिन मूर्दशा पदम मार्गनि विगायनका आदितो है । यईम दिनका पyat भाग ft- पटरिदैन । दी ऐसी दोन प्रकार आला आदि टमाटा पर्यत नशानिशी पूर्ण मनिका बाल साद निधि सर पिस्तान करना । पारायं-मरा टन्नगया जिम भनिक्लिनी न होनाकाम प्रकार किम दिनका पाना माग प्रमाण है। कमो प्रपा १ पनि म ११ टगामासाठी १ अपिनी १ भागोमा १द है|ला ? मान १ नयी ९६ करा 47 RARA E rritat जारी की Bran.
ज्योतिलोकाधिकार । । का एक एकका मुक्ति कासतसटि दिनया पाचरा माग प्रमाण है । महरि उत्तरामादपद हेणी पुनर्यमु ए तीन स्पृष्ट नक्षत्र हैं । सो इनका एक एका मुनिका टोयम एक इनका वो माग प्रमाण है । पहरि पीछे पुष्य नक्षत्रका गुति, काल महमटि दिनका पाचन माग माण तामें तेईस दिनका पाचर्या भाग मात्र फाट पर्यंत पुष्य नक्षत्रका मुनि इग अपनयि हो । ऐसे सर्व फाटकों समाप्रद करि जो सूर्यके रमरायण बिग एकमा नियामी दिन हो रहार क्षणायनका प्रारंभ श्रावण कृष्णकी पदियाफे दिन हो । सह प्रथम पुत्र पत्र भोगिए । तदा पुष्य नक्षत्रका मुक्ति पार मरमटि हिनका पांच गविणे तेईस दिनका पाचा भाग सो उत्तगयग विष भर थे अपोष चौपालीम दिनका चयां भाग इस अयनकी शादि पि भोगिए है । राहो उत्तरायण ममान कोटे पूर्ण करने को अपम ट सा गया पाचयां माग देना । मग फोर विभिनितकी माना गया चा भाग देना में प्रथम पुण्य गशप्रका मुनिपार भए पनि ममी मारमा पूर्ण ल्गुनी १ उत्तरा फाल्गुनी १ त १ चिरा १ यानि १ विशाग्दा १ अगग १ ल १ पूर्वागट १ उसरापाटन नशानियों भोग 1 पायात रहन पन्य नक्षत्र है । मोहनका सी एक एयाका अनिपार गरि नया दशा म EATI हरि मपा पूर्ण पाल्गुनी हस्त विधा अनुगधा गुन्द्र पूर्वागत मध्य नक्षत्र है। फ एफपा मुनिफार मतमटि दिनका पाच भाग प्रमाण है । पपा PET तसाद तीन एनक्षत्र है। सोदन एक एप.शा मुनिफार सोपा पार |ग प्रमाण है । देने इन पर्व भुमिका नियों मोदे गया दक्षिणायन rnfant न। यहरि अब चाफा दिए जाना प्रकार : yaminine समटिया भाग प्रमाण ल्याइ ति गायि अपाप गण मनिका Appam दिपु पर्प मापनिको पूशेत प्रकार यतिया निमित्र सभा यिका भवन करिबारि भाजक तौर पर गाम्प जपाय 1ए गारनियाnterreir परमपमनिष तार, अपर्सन परि जी नागपो सोसिस नाम । हरिपुष्यवि पूर्पके शुति सनस दिनका वाचा ग मार कि म माण होई तो पुष्परिष गर्दक ईग दिनका पापया भागमा रामो का सतराटियो माग गाय भनि सो सगी सम्मान ही गिायनविध विमान का । भारा--ग. रसागर ताका बाट पनि सताको भाग मात्र है। पु .. प्रभागित। न उप-4 मारपनि प Ag' .. - मा पनि एक पा लिया एक दिन : AP . लिप न । cher : Pre निकारक. RRRRRRA Awer मार कर पा * १९० त्रिलोकसार-- - हैं। असे सर्व काल जोड़ें चंद्रमाका उत्तरायण विर्षे तेरह दिन अर चवालीसक सडसठिया माग मात्र काल हो हैं । बहुरि दक्षिणायन वि. पहले पुष्य नक्षत्र भोगिएं हैं तहां पुष्य नक्षत्रका मुक्ति काल एक दिन विर्षे तेईस दिनका सतसठियां भाग मात्र काल उत्तरायण वि4 गया अब शेष चवाली. सका सडसठिवां भाग प्रमाण काल इहां भोगिए हैं । बहुरि अश्लेषा आदि उत्तरापाड पर्यंत नक्षत्र क्रमतें भोगिए हैं। तहां तीन जघन्य नक्षत्र सात मध्य नक्षत्र तीन उत्कृष्ट नक्षत्रनिका मुक्तिकाल क्रम एक एकका आध दिन एक दिन ड्यौढ दिन जाननां । सर्व काल मिलाएं चंद्रमाका दक्षिणायनविौ तेरह दिन मर चवालीसका सड़सठियां भाग प्रमाण काल हो है। अव राहुका कहिए हैं राहुकै अभि- जित आदि पुनर्वसु पर्यंत नक्षत्रनिको मुक्ति ल्याइ तिस तिस नक्षत्रविप स्थापना करनां । बहुरि पुष्य विप सूर्यके सतसठि दिनका पांचवां भाग प्रमाण भुक्ति होत राहुके आठसै च्यारिसैका इकसठियां भाग प्रमाण मुक्ति होइ तो सूर्यके तेईस दिनका पांचवां भाग प्रमाण मुक्ति होने राहुकै केती होइ ऐसैं ल्याइ अपवर्तन करें दोयसै छिहतरि दिनका इकसठिवां भाग प्रमाग मुक्ति उत्तरायणकी समाप्तित्रिपै पुष्यको स्थापन करनी । बहुरि पूर्ववत् दक्षिणायनविपै विधान करनां । भावार्थ-राहुकै उत्तरायणविर्य प्रथम अभिजितकी मुक्ति हो है ताका काल दोयसै बावन दिनका इकसठियां भाग मात्र है पीछे श्रवणादि पुनर्वसु पर्यंत नक्षत्रनिकी मुक्ति क्रमते हो हैं। तिनविय तीन जघन्य सात मध्य तीन उत्कृष्ट नक्षत्रनिका मुक्तिकाल क्रमत च्यारिसे दोयका इक. सठियां भाग आठसै च्यारिका इकसठियां भाग बारहसै छैका इकसठियां भाग प्रमाण हो है। पीछे पुष्यकी मुक्ति हो है ताका काल आठसै च्यारि दिनका इकसठियां भागवि दोयसै रिहंतरि दिनका इकसठिवां माग मात्र पुष्यकी मुक्तिका काल हो है । ऐसें सर्वकाल मिति राहुकै उत्तराय- गविपै एक सौ असी दिन हो है । बरि राह दक्षिणायनविपै प्रथम पुष्यका मुक्तिकालविर अवशेष पांचस अठाईस दिनका इकसठिवा भाग प्रमाण कालपर्यंत तो पुथ्यको मुक्ति हो है। पीछे आश्लेषादि उत्तरापाढ पर्यंत नक्षत्रनिकी मुक्ति क्रमते हो है। तहाँ तीन जघन्य सात मध्य तीन टत्कृष्ट नक्षत्रनिका मुक्तिकाल क्रमते प्यारिसे दोयका इकसठियां भाग आटमै प्यारिका का सटियां भाग बारहसे का इकसठियां भाग मात्र है । ऐसे सर्वकाल मिलि राहकै दक्षिणायन दिपै एकसा असीदिन हो हैं । या प्रकार नक्षत्र मुक्तिको समछेद करि जोड़ें चंद्रमाके भयन दिन तेरह मर चवालीसका सतसठियां माग हो है। बहुरि दोऊ अयन मिलाएं यर्षके दिन सत्ता. इस अर इकईसका इकमटिवा भाग हो है । यद्दरि मूपके अपनदिन एक सौ लियासी वर्ष दिन तीन सयासठि हो है । बहुरि राह अपनदिन एक सौ असी वर्ष दिन तीन साटि हो है।४०९॥ भाग अधिक मामका प्रतिपादन आर्य सूत्र कहे हैं, इगिमासे दिणवट्टी घम्से थारए दुवस्सगे सदले । अहिओ मासो पंचयवामपरी दुमासदिया ॥ ४१०॥ एकन्मिन् मामे दिनादिः वर्षे द्वारा दिवा सदछे । अकि मामः पचवर्ग मकयुगे दिमामा भरिको।।११०॥
ज्योतिलोकाधिकार। १९१ -- -एक मासविौ एक दिनसी वृद्धि होइ एक वर्षकि यारह दिनकी वृद्धि होइ अदाई यविये एक मास मधिर होइ। पंच वर्षका समुदाय सोई है सम्प जारा ऐमा युग तीहविष दीय मास अधिक हो है । तहाँ एक वर्षविर चारह दिन वध तो बदाई वर्षविप कितने दिन वध ऐसे किए टन्धराशि तीस दिन होइ। ऐमही युग मी प्रेमिक करना । भावार्य एक वर्षके बारह मास एक मासके तीम दिन हो इकमटि दिन एक तिथि घंटे सात वर्षके तानसे चीवन दिन होइ । पर सूर्यके वर्षके सीन छासटि दिन है । मी बारह दिन एक वर्षविौ वधती भए सो अढाई वर्ष व्यतीत भए एय. अधिक मास होद तर मेरह मासका पर्व होइ । बहरि ऐसेही अदाई वर्ष और भएं एक मास अधिक होदा या प्रकार पांच वर्ष प्रमाण जो युग तिहविष दोय अधिक मास होइ ॥ ११० ॥ अब पूर्व गापाका जु अर्थ नाहीको भाट गाथानि परि वर्णन करे - आसादपुण्णमीए जुगणिपत्नी दु सावणे फिण्डे । अभिनिशि चंदजोगे पारिवदिवसाम पारंभी ।। ४११ ।। आपदपूर्णिमाया युगनियत्तिः तु धावणे कथ्ये । अभिनिति चंद्रयोगे प्रतिपदयसे प्रारंभः ॥ १११॥ अर्थ-आराद मासविष न्योक दिन अपरान्ह समय टनगरको समाप स्वरुप युगको नियत्ति वाहिए मेपूर्णता हो हो । परि घायण माग गरे भनिन नक्षन भर चन्द्रमाका योग होने पहिवाफ दिन दक्षिणायनका प्रारंभ है । भाग-IIT मुदि यो अपरान्हविर सोपू युगकी समानता भई । परि भाषण परि ५ दिन चन्द्रमा अभिजित नक्षत्रका मुक्तिकाल होइ तहां सूर्य का दक्षिणायनका भार हो । नयान पंच वर्ष स्वरूप जो युगताका प्रारंभ जानना ॥ ४११॥ भागें पिर बोधीकि किम अपना प्रारंभ हो है सो प- पटमंतिमीहीदो दक्षिणउपरदिगपणारंभो। आरही पगादी गुत्तरा दरिसणाही ॥ १२ ॥ प्रपमातिमयोपातः दक्षिणोत्तरदिनयनप्रारंभः । भाति एकादितिया नराशिमाहसि ॥१२॥ अर्थ-प्रथम अतिम बाधीन दक्षिण उत्तर दिशाका अपना प्रारम भागा- एकसी घोरासी बोधीनिवि प्रथम अम्बर बीपीवि निता पूर्वक दक्षिण अपनwit है। नवाच वाधीविध विष्टना पूर्व उत्तर अपनका प्रारंभ हो। रिसरमन र मराको प्रमानि है। पूर्व अपनों समर सरि नन भन Re मानि जाना । । २. आदि कर दुगुना दोर Emirefa उमरगा परभानी दया भर में परमाण भासीant tmntreो । ' १९१ त्रिन्टोकसार- जके पंह गुस्टके दाहिन हो है। बहुरि दक्षिगारनसि बीचि जे भाद्रपदादि उत्तरपनि योचि फागुन आदि मास जिनविय आदिरिये एक एक घटता भर मेताः वरता दिन स्थापन गरिर में एक एक मासरिौ इकतीस शियि स्थान किए सीह । वा तह तीह अपना अधिक दिन आ है। भावार्य 1-मयम धारणी यदि पंद्रह निधि कृशानी हर पंदह गुमटाकी अर एक मादारका रुगको मिति होइ । बहरि मापने पहले साविशी पंह तिथि फही थी तामें एक धदार चौदा कर रह शुस्वासको र अतरित एक कृष्णसकी फही थी ताम एक पिन के Tी मिनार इमलीस तिथि हो है। यहरि अधिनितिन आदिमें एक कार की एक मग सीन का शासकी हो। ही कामगिरी यारह कृष्णको पंद्रह अस्को पारि कृष्णको मगर गुरको पार की पौगि दस की पर THAN हो । परि उरारा माप यही गाने से माहिगना रिए वहरि दक्षिणायनशिप Prarti wीन पxx रोम की काली मानिए मार्मा अपनी शिकदिन १६ मा गुणी दो शिकागो है ।। ५१८५ r:ना प्रामीनपाका पिन क:- गुर्ण इगिगीदिगदे हित इगिणी। गिदि मोगा गिणिपाणि framणि ॥ ४१ नयाfindi it निianfe If १०॥ अर्ग--*Tamil अनि मी प्रमाण * नगर आना- नन 4... !! - nt 107 attain - • :- 1. Atif . . ...
ज्योतिलोकाधिकार साधन किए स्तरापाट आये परंतु सूक्ष्मपन साधन किए अभिनित नक्षत्र जानना । भागें भी सचिनी मादिकतै या कार्तिकमादिकले नक्षत्र गणनाविप अभिजित नक्षत्रका प्रहण करना ही 1 या प्रकार दक्षिणायनका प्रारंभाविये प्रथम प्रावणमासविपै नक्षत्र स्यायनैका विधान कदा । व दूसरा उदाहरण कहिए हैं । विवक्षित दूसरी आवृत्ति सामैं एक घटाएं एक रहा तीह फारि कमी इक्यासीको गुणे एफसी इक्यासीही या इनमें इफईस मिलाएं दोपसे दोय भए इनकों पत्ताईसफा भाग दिएं अपशेप तेरह रहे सो अधिनी नक्षवते तेरव्हां नक्षत्र हस्त सो उत्तरायणका सारभधिषे प्रथम माघमासविष हस्तनक्षत्र पाईए है। ऐसेही तीसरी पचिरी सातवीं नवमी आ. तेविौ दक्षिणायनका प्रारंभ श्रावणमासविध हो है । तहां अर चौथी उटी आठवों दशवी आवृत्ति पै उत्तरायणका प्रारंभ माघमासविष हो है । सहा नक्षत्र साधन फरना ॥ ११९॥ मागै दक्षिणायण उत्तरायणकै पर्व या तिधि ल्याउनैविथै सूत्र कर हैं- वेगाउटिगुणं तेमीदिसदं सहिद तिगुणगुणरुवे । पण्णरमजिदे पन्या सेसा तिहिमाणमयणस्स ॥ ४२०॥ म्पकात्तिगुणं यातिशत सहित त्रिगुणगुणरूपेण । पंचदशभक्त पर्याणि शेष तिधिमान अयनस्य ॥ १२०॥ अर्थ-व्येका वृत्ति कहिए जेधवा विवाशित भाति होइ तामें एफ घटाएं जो प्रमाण रहे तेह करि एकसौ निपासीको गुणिए, बहुरि जितने गुणकारक एकसौ तियासीको गुफरि ताकों गुणा फरि तामें जोड़िए । यद्दरि एफ और जोदिए ओ प्रमाण होइ साकों पंद्रहका भाग दीजिए ओ टम्पप्रमाण आवै तितने तो पर्व जाननें, अवशेष रहे सो तिथि प्रमाण जानना । दक्षिणायन वा उत्तरायणका ऐसेंही जानना । उदाहरण विवक्षित आति प्रथम तामैं एफ घटाएं विदी रही तिह करि एकसा लियासीश गुणे विदा करि गुणे विदी ही होइ इस न्याय फरि विदी ही आई। बहुरि हो गुणकार विदी ताने तिगुणां किर भी विदीविष विदो जोड़ें विंदी ही भई । बहुरि तामें एक भया यायौं पंद्रहका भाग लागै नाही साते पर्वका तो अभाव जानना । अर अवशेष एक रहा सो तिथिका प्रमाण जानना ऐसें प्रथम भारति दक्षिणायनका प्रारंभविष प्रथम श्रावणमास. विष पर्वका तो अभाव भाया पक्षको पूर्णता भए पूर्णमा वा अमावस्या जो होइ साका नाम पर्व है । सो पुगका आरंभ भए पछि अते पर्व व्यतीत होइ सोई इहाँ पर्वनिकी संख्या जाननी । सो प्रथम आवृत्तिविपै कोऊ भी पर्व ध्यतीत भया तातै पर्वका अभार जानना । अर तिथिका प्रमाण एक जानना । बहरि दुसरा उदाहरण-विवक्षित भारति दुमरी तामें एक घटाएं एक रहा तोह कार पासी पिासाको गुणों रफास या ए ! सहर पुकारका प्रममा एक ताको तिगुणा किए नीनों मिलाय एक सौ छियासी भये । बहुरि तामैं एक और जो एकसा मित्यामी भए । उनको पहिका भाग टि दारह पाए सो घारह सौ पर्वका प्रमाण भया । युगका प्रारभनै बारह पर्व क्यान भए प िदूसरी भात्ति हो है । पर भरोष सात रहे सो सात तिथि जाननी । ऐसे दुसरा हात उत्तरायणक। प्रारंभ होते प्रथम माघ मामविय हो आरंभ एक जोड़ें १ १९६ त्रिलोकसार- वारह तौ पर्व व्यतीत भए जानने पर सात तिथि जाननी । याही प्रकार अन्य आवृत्तिनिवि भी पर्व वा तिथिका प्रमाण त्यावनां ॥२०॥ आगें दिन वा रात्रिका प्रमाण निहिं कालविपै समान होइ ताका नाम विषुप हैं सिंह विर. विप पर्व वा तिथि या नक्षत्रनिको छह गाथानि करि युगके दश अयनिविय कहै हैं:- छम्मासद्धगयाणं जोइसयाणं समाणदिणरत्ती। तं इसुपं पटमं उसु पव्वसु तीदेमुतदियरोहिणिए ॥ ४२१॥ पण्मासार्धगताना ज्योतिष्काणां समानदिनरात्री। तत् विपुर्व प्रथम पट्सु पर्वसु अतीतेषु तृतीयारोहिण्याम् ॥ १२१॥ अर्थ-उह मासका अर्द्ध ज्योतिषीनिके गए समान रात्रि हो है सोई विएप है । भावार्थ- एक अयन छह मासका हो है तहां आधा अयन भए दिन अर रात्रिका प्रमाण समान हो है। जिस कालविये दिन रात्रि समान होइ ताका नाम दिएप है। सो पंच वर्ष प्रमाग युग- विप दश मिथुप हो है। पांच सौ दक्षिणायनका अर्द्धकालविष भर पांच उत्तरापणका अईकाटीर हो है। तहां पहला रिपुप दक्षिणायनका अर्द्धकालविय दूसरा उत्तरायणका अर्द्धकागि देने क्रमते मिप जानने । सहा प्रथम विशुप युगके आरमते छह पर्व व्यतीत भए तृतीय तिलिपि रोहिणी नक्षत्रकी मुक्ति चन्द्रमाके होत होत सो हो सत हो है ॥ २१ ॥ रिगुणणवपन्चऽतीदे णयमीए विदियग पणिहाए । इगितीसगदे तदियं सादीए पण्णरसममि ॥ ४२२॥ दिगुणनपर्वातीत नवप्पा द्वितीयकं धनिष्टायाम् । एशिगते तृतीय स्वाती पंचदश्याम् ॥ १२२ ॥ अर्थ- -दुगुग ना जो युगके आश्रम पी अटारह पर भ्यतीत भए नरमी शिपिविष धनिया नक्षत्र योग चंद्रमा के होते दुनिय पिपुर हो है । वहरि इस्तास पर प्यतीत भर लिग ATT स्थानि न त नि पचनी लिथितिर हो है । मो कृष्णाश पनले भने भमागास है॥१२२॥ नेदाटगदे तरिय हिणवगुगपं तु पचमर्य । पगगाबाद पारसिए उनरामरे ।। ४२३ ॥ शिवनागिहा दुर्गय पान मुगत तु पंचमम् । चारपारप! रनगमा ॥ १२३ ॥ अर्थ-विमान पनी भावी Eि पुन नामक है। परिवानपीन मरा भATE PART ॥ १२३॥ अहिगो टिप दिनई प्रीतिः । माश्मिराए मनमा गागि माप ॥ ४२४ ।।
ज्योतिर्लोफाधिकार । १९७ मारपष्टिगते तृतीयायो मैत्रे पठे अशीतिगतेषु । नवीमघायो सप्तम इह विनातिगतेषु तु अष्टमम् ।। १२४ ।। अर्थ-अइसठि पर्व गए तृतीय तिथिवि मैत्र जो अनुराधा नक्षत्र नाकों होत संत छया विपुप हो है । बहरि भसी पर्व गएं नवमी तिथिविपै मघा नक्षत्र होते सातवां विषुप हो है। पहरि इहाँ तेरणय पर्व गएं आटयो विषुप हो है ॥ ४२ ॥ अस्सिणि पुष्णे पन्चे णवमं पुण पंचजुदसए पन्चे । तीते छहितिहीए णक्खचे उत्तरासाटे ।। ४२५ ।। अधिनी पूर्णे पर्वणि नवम पुनः पंचयुतशतेच पर्वेषु । भतीतेषु पष्टीतिथौ नक्षत्रे उत्तरापाढे ॥ ४२५॥ अर्य-सो आठवां विपुप अश्विनी नक्षत्र होते पूर्ण पर्व जो अमावस्या तीहविपै हो है। बहुरि नवमा विपुप एकसौ पांच पर्व व्यतीत भएं पष्टी तिधिविर्षे उत्तराषाढ नक्षत्र होते हो है ।।४२५।। चरिमं दसम विमुपं सत्चरसुत्तरसएसु पवेमु । तीदेसु पारसीए जाइदि उत्तरगफग्गुणिए ॥ ४२६ ॥ चरम दशम विपुर्व सप्तदशौचरशतेषु पर्वेषु । अतीतेषु द्वादश्यां जायते उत्तराफाल्गुन्याम् ॥ १२६॥ अर्थ-अतका दशवां विषुप एकसी सतरह पर्व व्यतीत भएं शदशी तिथिविष उत्तर पाल्गुनी नक्षत्र होते हो है ।। ४२६ ॥ आगे विशुपवित्र पर्व या तिथि स्थावनैकों सूत्र कहै है;- विगुणे सगिट्टइमुपे रूऊणे उग्गुणे हवे पव्वं । तप्पन्यदलं तु तिथी पवमाणस्स इसुपस्स ॥ ४२७ ॥ दिगुणे स्वकेटविषुपे रूपोने षड्गुणे भवेत् पर्व । सत्पर्वदल सुतिथिः प्रवर्तमानस्य विधुवस्य ।। १२७ ॥ अर्थ-अपना इष्ट विषुप जेथवा होइ तीह प्रमाणको दूणा फरिए तामें एक घटाइए बहुरि अवशेषकों छह गुणा किए पनिका प्रमाण आवे है । यहरि तिस पर्व प्रमाणका आधा सो प्रवर्तमान विवक्षित विषुपका तिथि प्रमाण हो है। सीह पर्वका आधा प्रमाण पंद्रहत अधिक होई तो पंद्रहका भाग दिए जो सम्ध प्रमाण होइ सो तो पर्व संख्याविपै जोडिए भर अवशेष रहे सो तिधिका प्रमाण हो है । इहां उदाहरण-इष्ट विषुप पहला साफी दूगा किए दोय तामैं एक घटाए अवशेष एक ताकौं छह गुणा किए छहसो प्रथम विषुप विष युग बारमते म्पतीत पर्व- निका प्रमाण छह है । बहुरि सीह पर्व प्रमाणका आधा तीन सो प्रथम विपुपविष तिथि तृतीया है। दूसरा उदाहरण-इष्ट विषुप दशा ताफों दूणा किए वीसतामें एक घटाएं गर्णास सामों छह गुणा किए एकसौ चौदहसो पर्व प्रमाण ताका आश सत्तावन साकों पंद्रहका भाग दिए तीन
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ज्योतिलोपाधिकार। है । सानामा नक्षत्र हा प्रहण किया। इहाँ गणनावि अभिनितका ग्रहण करना । ऐसही अन्य विपनिवि नार साधन करना । बहुरि आइति या विपविौ पर्व प्रमाणकौं पंद्रह गुणा कार सा निति प्रमाण मिलाई समस्त दिननिका प्रमाण हो है। उदाहरण-दूसरी भागृत्तिरिौ पी- प्रमाण पारह लिनकों पंद्रह गुणा किए एफसी असी भए, सहा तिथि प्रमाण सात मिलाएं एकसौ सियामो भए सोई मुगके आरंभ एकसौ सित्यासी दिन व्यतीत भए दूसरी आवृत्ति हो है । इहाँ एकमोलिपानी दिन म्पतीत भए ही दमरो भाति हो है तयापि घटती तिथिको विवक्षा न फरि पक्षके पही दिन गिगि ऐसा करन किया है। ऐसेही अन्य भारतिया विशुपनिविप साधन करना ॥१२९॥ आगे रिशुपविष नक्षत्रका ल्यावना अन्य प्रकार फरि दोय गायानि करि फहैं हैं;- आउटिरिक्खमस्सिणिपहुदीदो गणिय तत्य अहजुदे। इसुपेगु होति रिक्खा इह गणणा फिनियादीदो ॥ ४३०॥ आइत्तिऋक्ष अश्विनीप्रभृतितः गणयित्वा तत्र अपयुते । विपेषु भवनि ऋक्षाशि इह गणना कृत्तिकादितः ।। ४३०॥ अर्थ- आइत्तिका नक्षत्रको अश्विनी नक्षते लगाय गिगिए जेथवा होइ तिहविपे आठ मिलाएं जो प्रमाण होइ तेधया नक्षत्र विद्युपविष जानना इहां गणना कृत्तिका आदित करनी । उदाहरण-विवक्षित तासरी भारत्तिका नक्षत्र मृगशीर्पा सो अस्विनी मृगर्पि नक्षत्र पांचयो है । बहुरि पांचविष आठ मिलाएं तेरह होइ सो कृत्तिका नक्षत्रते तेव्हा नक्षत्र स्वाति है । सोई गणना किए तीसरा विपविष स्वाति नक्षत्र जानना ॥ ४३०॥ आर्गे आत्ति नक्षत्रका प्रमाणविप आठ मिलाए नक्षत्र प्रमाणते राशि अधिक होई तो कहा करिए सो कहैं ;- अहियंकादटवीसं छडेजो विदियपंचमहाणे । एफ णिपिखव छठे दसमे विय एफ.मणिलो ॥ ४३१ ॥ अधिकांकादष्टविन त्याग्याः द्वितीयपंचमस्थाने । एक निक्षिप पठे दशमेपि च एकमपनेयम् ॥ ४३१ ॥ अर्थ-आवृत्ति नक्षत्रकों अधिनीत गिर्ने जैथवा होइ तामें आठ मिलाएं जो अटाईसमें अधिक राशि होइ ती तीमैस्यों अटाईस घटाइए । भर दूसरा पांचवों आत्ति स्थानविय आठ मिलाए जो राशि होद सामें एक और मिलाइए । भर छटा दशयो आपत्ति स्थानमेस्यों एक घटाइए इनका उदाहरण चौथी आवृत्तिविष शतभिषक नक्षत्र है सो अश्विनीत पासवां है। तामें आठ मिलाए तेतीस होइ निनमेंसों मठाईस घटाए पांच रहे सो कृत्तिकात पोचवों नक्षत्र पुनर्वमुहै। सोई चीया विषुपविष जानना ऐसे अन्यत्र भी जानना । बहुरि दूसरी भादृत्तिवियै हस्त नक्षत्र है सो अश्विनीत तेरहा है तामें आठ मिलाएं इकईम होइ एक और मिटाएं वाईस होइ सो वृत्ति- कात बाईसवा नक्षन धनिय है सोई दूसरा विषुपविष जानना । ऐसे पांचवां स्थानविष जानि लैना । बहुरि छही आत्तिविष पुष्य नक्षत्र है सो अधिनात आटवा है । तामै आठ मिटाए सोलह -
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ज्योतिर्लोकाधिकार। २०१ --- मार्गे नक्षत्रनिको स्थिति विशेषका विधान कहें है- फिजियपतिसमये अहम मपरिवखमेदि ममगई। अणुराहारिवसुदओ एवं सेसे वि भासिनो । ४३६ ।। कृत्तिकापतनसमये अष्टम मघाशं एनि मध्याह्नम् । अनुराधामोदयः एवं शेषेषु अपि भाषणीयम् ।। १३६ ॥ अर्थ-गतिका नक्षत्रका पतन समय फाहिए अस्त होने का काल तीवि इम कृतिकाते भाटयां मघा नक्षत्र सो मध्यान्ह कहिए पीचि प्राम हो । परि तीह मघाने आठयां अनुगमा नक्षत्र सो उदप हो है। ऐसेही रोहिणी आदि नक्षत्रनिवि जो नक्षत्र अस्त होद तीह ममप तीह नक्षसों भाया नक्षत्र मध्यान्हको प्राप्त होइ । भर तीहमी आठया नक्षत्र उदयकों प्राम हो। ऐसा कहना ।। ४३६॥ मार्गे चन्द्रमाके पंद्रह मार्ग है तिनविय इस इस मार्गविष ९ नक्षत्र निट है। ऐगा तीन गाथानि फरि कहें हैं;- अभिजिणव सादि पुप्युपरा य पंदस्म पदममग्गमि। तदिए मघापुणवगु सत्तमिए रोहिणी पिता ॥ ४३७ ।। अभिनिन्नव स्वाति: पूर्वोत्तरा व चन्द्ररप प्रथगमागें । सृतीये मघापुनर्वगू सप्तमे रोहिणी चित्रगः ॥ ४५७ ॥ अर्थ-अभिजित भादि नव सो अभिजित १ श्रयण १ धनिया मिरा भा.. पदा १ चरा भाद्रपदा १ रेपती १ अश्विनी १ भरणी १ भर ए नय स्वाति १ पूर्वानी उप्रराफाल्गुनी १९ मारहमी पन्द्रमाके प्रथम मार्गविष विर है। जो पद्माषा प्रथम अभ्यन्तर बीयी सप परिधि सोय उपरि जो परिधि तिहावि भूषण पार है । सेही तोमरा मारे मघा १ पु म ९ दोष मात्र विच है । सातको मार्गकि रोहिणी चित्राए दोप मात्र विवरे है॥ १३७॥ एहमदसमेयारसमे फितिय विसाद अणुराहा । हा फमेण सेसा पण्णारगर्माल भव॥४३८॥ पाटारमाभकादो प्रतिया विशारा अनुराधा । हा क्रमेण हानि पंचदशे व ॥२८॥ अर्थ-एटा मावि त्रिया माटमावि विमा दावि भनुराधा पार पाम कर विधर है । अवोर आट गश्य पाया का मानो गरि रिचर ? ॥१॥ से शेष भाट नारकोन सो को :- त्य मूलतिय शिप मिपमिरग महोष्णि गोर। पो गररचा मिनि दुपारमाया ।।४३९ ॥
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- ज्योतिरोफाधिकार। २०३ मेणागयपुप्यावरगचे गाया हयस्स सिरसरिसा । गुल्लीपासाणणिभा कित्नियादीणि रिवखाणि ॥४४४॥ मैनागमपूर्वावरगाने नाया हयस्य शिरसा:सदशाः । शुढीपागनिभाःकृतिकार्दानि अक्षाणि ॥ ४५ ॥ अर्थ–सेना १ हम्तीफा भागिला शरीर १ हस्तीका पाछिला शरीर १ नार १ घोडेका मम्तक १ पूनाका पारा १ समान आकारफो धेरै हैं तारे जिनके ऐसे कृतिकादि नक्षत्र जानतें ॥ १४ ॥ आगै कृतिकादि नक्षत्रनिके परिवार रूप तारानिकों को है;- एकारसयसहस्सं सगसगतारापमाणसंगुणिदं । परिवारतारसंखा फित्तियणवखत्तपहुदणं ॥ ४४५॥ एकादशरातसहस्र स्वकस्वकताराप्रमाणसंगुणितम् । परिवारतारासंख्या कृत्तिकानक्षत्रप्रभृतीनाम् ॥ ४४५ ।। अर्थ-पारह अधिक एकसा सहित एक हजारको अपनें अपने सारानिका प्रमाण करि गुणें जो प्रमाण होइ सो कृत्तिका नक्षत्र आदि नक्षत्रनिके परिवाररूप तारेनिकी संख्या जाननी । उदाहरण-कृत्तिका नक्षत्रके मूल तारे उह है इनिकों ग्यारहसै ग्यारह करि गुणे छह हजार छह से छासटि तारे कृत्तिका नक्षत्रके परिवारके हैं । ऐसे ही रोहिणी आदिके भी जानने नक्षत्रनिके जे आधिदेवता तिनिके अनुसारी इनिविपै यसै हैं ॥ ४४५ ॥ भाग पंच प्रकार ज्योतिषी देवनिका आयु प्रमाण कहें हैं;- इंदिणमुफगुरिदरे लयख सहस्मा सयं च सहपल्लं । पल्लं दलं तु तारे वरावरं पादपाददं ॥ ४४६ ।। इदिन शुक्रगुतिरेषु रक्ष सहस्र शतं च सहपल्ये । पल्यं ददं तु तारामु घरमवर पादपादार्धम् ॥ १४६ ॥ अर्थ–दमा सूर्य शुत्र बृहस्पति इतर इनविय क्रमते लाख हजार सौ वर्ष सहित पल्य अर्द्ध पल्प प्रमाण आयु है । भावार्थ-चंद्रमाका आयु लाख वर्ष सहित पल्प प्रमाण है । सूर्यका आयु हजार वर्ष सहित पल्प प्रमाण है । शुभका आयु सौ वर्ष सहित पल्य प्रमाण है। बृहस्प- तिका मायु पल्य प्रमाण है । इनर बुध मंगल शनवरादिकका आयु आध पल्प प्रमाण है। वहरि तारे कहिए तारा थर नक्षत्र इनका आयु उत्कृष्ट ती पाद कहिए पन्यका पौया भाग प्रमाण है। भर जघन्य पादार्थ कहिए पल्यका आठवा भाग प्रमाण है ॥ ११६ ॥ भागें चन्द्रमा सूर्यनिकी देवांगनानिकों दोय गाथानि करि कहैं हैं- घंटाभा य मुसीमा पहंफरा भचिमालिणी चंदे । मुरे दुदि मूरपहा पहंकरा अचिमालिणी देवी ॥४४७॥ चन्द्राभा च मुसीमा प्रभंकरा अर्चिमालिनी चंद्रे । सूर्ये युति सूर्यप्रभा प्रभंकरा अर्चिमालिनी देन्यः ॥ १४७ ।।
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त्रिलोकगार-
अर्थ-चामा १ मुनामा १ प्रभाग १ नमामि ११ परियन
गना है। यहरि सूर्य के दुनि १ मा १ प्रभाग सर्विमादिनी प्यार पर
नेहा ताओ पुट पुट परिवारनाम्गदम्गवीर्ण ।
परिवारदेविसरिस पगमिमा विउनि ॥ ४४८॥
जेष्टाः ताः पृय पृषा परियार:महम सीनान् ।
परिवारदेवामा प्रत्येकामिमाः पिलि ॥ ११८॥
अर्थ-से स्पष्ट काहिए पर देवी प्रयर प्रयक प्यारि हजार परिवार देवी-
भावार्थ-यारि प्यारि हजार परिवार देवांगनानिकी एक एक पर देयांगना है । बरि
यार देवी समान संध्याको प्रयेक किया की है। भावार्य-एक एक पर देवांगना
करे तो प्यारि हजार हो हैं ।। ११८॥
भागें ज्योतिक देवांगनानिफा आयु प्रमाग करें -
जोइसदेवीणाऊ सगमगटेवाणमदयं होटि ।
सवाणिगिहमुराणां यत्तीसा होति देवीओ ।। ४४९ ।।
ज्योतिकदेवीनामायुः स्वकम्मरदेवानाम भवति ।
सर्वनिष्टमुराणा द्वारिंशत् मर्वति देव्यः ।। ४१९ ॥
अर्थज्योतिष्क देवांगनानिका आयु अपने अपने मार देवनिका आयुर्ने मई
प्रमाण जाननां । बहुरि इहां सर्वत निकट हीन पुन्यवान देव तिनकै बत्तीस देवांगना हो है।
मध्यविपै यथायोग्य देवांगनानिकी संस्था जाननी ॥ १४९॥
आर्गे भवनत्रिकवि जे जीव उपमें है तिनको कहें है;--
उम्मग्गचारि सणिदाणणलादिमुद्दा असामणिजरिणी ।
कुदवा सवलचरित्ता भवणतियं जंति ते जीवा ॥ ४५०॥
उन्मार्गचारिणः सनिदानाः अनलादिमृता अकामनिर्जरिणः ।
कुतपसः शबटचारित्रा भवनत्रये यांति ते जीवाः ॥ ४५०॥
अर्थ-उन्मार्गचारी कहिए जिनमत विपरीत धर्मक आचरनेवाले, बहुरि सनिदा
कहिए निदान जिनने किया होइ, बहुरि अनलादिमृता. कहिए अग्नि जल अंपापार आदिकत में
बहुरि भकामनिरिणः कहिए विना अभिटाप बंधादिकके निमित्तते परीपह सहनादि करि जिन
निर्जरा भई बहुरि कुन्तपसः फहिए पंचाग्नि आदि खोटे तपके करनेवाले बहुरि शवटचारित्रा. कहिर
सदोष चारित्रके धरनहारे जे जीव हैं ते भवनत्रय जो भवनवानी व्यतर ज्योतिषी तिनविय जाय
सपने है।। ४५०॥ ऐसें ज्योतिर्लोकका अधिकार ममान भया ।
इतिश्री नेमिचंद्राचार्य विरचिन त्रिलोकमारमें चोथा ज्योतिर्लोकका अधिकार
समाप्त भया ॥४॥
॥अथ चैमानिकलोकाधिकार ॥५॥
अथ अनुक्रम फरि मात भया वैमानिक लोकमा वर्णन करनेंका है अभिलारा जाके ऐर
भाचार्य सो प्रथम विमाननिकी संस्थाका प्रतिपादनकै माध तिन विमाननिविष तिष्ठते जे भरि
नाशी जिन मंदिर तिनको प्रमाणपूर्वक नमस्कारकों पर है-
गुलसीदिलक्खसत्ताणउदिसहस्से तहेव तेवीसे ।
सचे विमाणसपणगनिर्माणदगेहे णमंसामि ॥ ४५१ ॥
चनुरातिरक्षसप्तनवतिसहस्तान् तथैव त्रयोर्वशान् ।
सर्वन विमानसमानजिनेंदगेहान् नमस्यामि ॥ ४५१ ॥
अर्थ-चौरासी लाख सियाणवै हजार तेवीस सर्व विमान संख्याकै समान जिनेश्वर
मंदिर में जाते एक एक विमानविये एक एक जिन मंदिर पाईए हैं तिनको नमस्कार करौं हौं १५
मानें इन विमाननिका फल्प अर फल्पातीत भेद करि तहां प्रथमही फल्प जे स्वर्ग तिनं
नाम दोय गायानि करि कहें है;-
सोहम्मीसाणसणरकुमारमाहिंदगा हु काप्पा हु
पम्हल्यम्हुत्तरगो लांतवकापिटगो छहो ॥ ४५२ ॥
सौधर्मशानसनकुमारमाहेंद्रक हि कल्पा हि ।
महमलोतरको सोतवकापिष्टको पष्ठः ।। १५२ ॥
अर्य-सौधर्म १ ईशान १ सनत्कुमार १ माहेन्द्र १९ प्यारि कल्प कहिए स्वर्ग है
बहरि महा १ ब्रहोचर ए दोय फल्प मिलि करि इनका इंद्र एक ही है सीह अपेक्षा एक र
कल्प है। बहुरि लोतव १ कापिष्ट ए दोय भी एक इंद्रकी अपेक्षा छटा एक कल्प है ॥ १५२
मुझमहामुकगदो सदरसहस्सारगोटु वनो दु ।
आणदपाणदारणअच्चुदगा होति कप्पा हु ॥४५३ ।।
शुक्रामहाशुक्रगतः शतारसहसारगो हि ततस्तु ।
मानतप्राणतारणायुतगा भाति कल्पा हि ।। १५३ ॥
अर्थ --शुक्र १ महाशुक १५ दोप भी एक इन्द्र अपेक्षा एक कल्प है, बहुरि शता १ सह-
पार १९ दोय भी एक इंद्र अपेक्षा एक कल्प है । बहुरि तहाँ पा आनत १ प्राणात १ भारण
१ अध्युत ९ च्यारि कल्प हैं ॥ ४५३ ॥
मज्झिमरउजुगलाणं पुच्चावरजुम्मसु ससेमु ।
सव्वस्थ होवि इंदा इदि पारस हॉति कप्पा हु॥ ४५ ॥
२०६ त्रिलोकसार- मसमचतुर्युगटाना पूर्वापरयुग्मयोः रोच। सर्वत्र मति वा द्वादश भवति फल्पा हि ॥ १५४ ।। अर्य-सोटह स्वनि भाउ युगल तिनविौ मायका प्यारि युग्मनिमिष दोर 57 तो ब्रह्म मोटर र टांतर कापिट अर मार दोर गुगल गुरु सता महामुक पर सहमर १ पारि युनिके एक एक इंद्र हैं । बहुरि अवशेष साठ काय तिनिकिय सर्वत्र एक एक है। ६ने ईद मोगा करि कल वारह है ।। १५१॥ सो पनि उपरि जे कलातीत शिमान निमम नाम कहे हैं;- हिहिमग्निमवरिमतित्तिय गेवेन णवणुसिगा। पंचाणुत्तरगा विप कप्पादीदा अहमिंदा ॥ ४५५ ॥ स्तनमममोपरिनगिनिमामि देवयागि नर अनुदिशानि । पवानुगरकागि अपि च फन्मानीता हि महानंदाः ॥ १५५ ।। भर्य-सन भर मपम अर उपरिम सीन सीन दीयक है दिन ना कर। परि ना अनुगमन हैं। यहरि पंच मनुगर विमान है । म ए कमानीत मिान है। मारिदा??॥ १५५॥ ना अनुदिश रिमान भर पंच अनुनर मिान विनफे नाम दीप निको - भीप गिमालिगि पहरे पहरोयणा अभिमगा। गोमाय गोपच्चे भी फलिप भाइये ।। ४५६ ।। मा मानिी या बोगन: अनुदिशकानि । ममममम, श्रमशरिक आरि॥ १५ ॥ - अलगानी बोचन गरि अंगीनान gif 17मन ? १tkm2. या क. fe श्रीमान है । है ए ना wifer fri franो नयंती जयंत आगरिदीय पाई। ममिरिणापा मार्ग म अगुना ॥४५७ ।। 4-in- HTER Or -2 ? : - 1:44" মানায়। witterfme for firr मंदिष दिमा पाणमागमा गया." intmumtaar Trimrati.si..। भ-inviting ominatini Patni Om भाषा - i.......... it.itri vham Nirgutil7 . ' Primar nanciation.in Sinm wenly miltimor Ankur || wintinuilt fit from ni...'.'." पगागा Anilmamiri म rai MRP !' .. . . , 1. १ ." . in Hin... i. must ram i... . .. Indian anti ki it .. (1 min a Rim .......... भीमाण (nm me na mumme main मा ।।। 1 " PHELEr FICE जाननें ।। १६१ ॥ अर्थ-एक एक ईदक पीचि अंतराल असम्यान योजन प्रमाण है| TRAL अर्थ-वर १:१ बगबर १ भाग १ नदन पनि tre त्रिलोकसार- सात अर तीन ऊर्द्ध त्रयकनिविर्षे इस्याणवै भर अनुदिशविषै ना अर अनुत्तरविौ पांच किन अब प्रयमादि स्वर्गनिधियै प्रत्तरनिकी संख्याका प्रतिपादनकै अर्थि इंद्रकानका प्रमाण नि है। जाते एक एक प्रतरवित्र एक एक इंद्रक विमान है- इगितीससत्त चत्तारि दोणि एकेक छक चदुकापे । तित्तिय एकेकिंदयणामा उडुआदितेवही ॥ ४६२ ।। एकत्रिंशत्सप्त चलारि कै एकमेकं पकं चतुःकल्पे । प्रीणि त्रीणि एकमेकं इंद्रकनामानि त्वादित्रिषष्ठिः ॥ ४६२ ।। अर्थ-सौधर्म युग्मविौ इकतीस इंद्रक हैं सनत्कुमार युग्मविय सात इंद्रक है जान विष प्यारि इंद्रक हैं लोतय युग्मत्रिपै दोय इन्द्रक हैं शुक्र युग्मरिौ । नक है शतार युग्मविष एक इंद्र है । आनंतादि च्यारि कल्पनिवि छह इदक। अपस्तन आदि तीन प्रकार प्रैवेयफनिरिय तीन तीन इंद्रक है ना अनुदिशवि एक ईको पंच अनुसरवि एक ईदक है ऐसे ए सरेसठि इंदक है सो इनके ऋविमान आदि से नाम है ॥ १२॥ में इन फिनिका उड़ अपेक्षा अंतराल पर तिनका नाममा अवतार है है। पकमदपस्य य विच्चालमसंसजोयणपमार्ण । एदाणं णापाणे पोच्छामो माणुपुयाभो ॥ ४६३ ॥ एकैमिंद्र फस्य च विचार्ड संख्यातयो जनप्रमाण । पतंग नामानि वक्ष्यामः भानुषा ॥ १६३ ॥ गन अदा करि नाचने गाय क्रम करि कहीं ॥ १६३ ।। को एक जिनके नाम छह गापानि करि कर है- उविमटचंदवग्ग पीररुगं गंदणे पणालणं च । कंचण रोहिद गं मरुदै रिट्टिाप पैरिय ।। ४६४ ।। श्वमिटचागुरागमनन मठिन थ। कावन गतिं वचन मस्तु ही पैदर्य ॥ १६ ॥ . - १५१ ईन १ मा १ ली १ ॥११॥ पनग अनि पसिनाणी शमम्मrti पर सदिय दान पाच ॥ ४५ ॥ रसा:Arr.nition अर्थ- वैमानिकलोकाधिकार । अर्थ-रचक १ चिर १ अंक १ स्फटिक १ तपनीय १ मेर, १ अभ्र १ हरित १पन लोहित १ प १ नयावर्त १ प्रभकर ॥ ४६५ ॥ पिडफ गन मिच पहा अंगण यणमाल णाग गर च । लंगर घलभदचय च परिमं च अरनीसो॥४६६ ॥ पृष्टक गर्न मि प्रभं भजन धनमार्ड नाग गरदं च । सांगलं बटम प ध परमं च अष्टात्रिंशत् ।। १६६ ॥ 1-पृष्टक १ गज १ मित्र १ प्रभ १ भजन १ वनमाउ १ नाग १ गरः १ टाग बलभद १ अतका ईदकं चत्रा १ ऐमें सौधर्मादि प्यारि स्वर्गविध मिलार हुए अनीम फ.. के नाम हैं ।। ४६६ ॥ रिहारसमिदि पलं यावर पाहिदयटनिययं । मुलं खल मुझदुगे सदरविमाणं तु सदरदुगे । ४६७ ॥ अरिटमुर समिति प्रा प्रमाता महाददयटीतवर्ण । शुक्र ग्नल शुक्रतिके रातारविमान दातारपुगे ॥ ४६७ । अर्थ-अरिए १ गुरम १ मा १ ब्रह्मानर १ ए ग्यारि प्रक्ष युग यानि माम । परि अमददय १ लांतर १ ये दोय सालय पुगलविय दयानि नाम है | परिपुर यि शुक नामा एक इदक है । परि शतार दियावि दातार पिमान माम प. १९७॥ आणद पाणदपुप्पय सातफ ता मारणापुदरगाणे। तो गेरेज गुदरिषण अमोर तह पुप्पपुर ।। १६८॥ माननप्राणतपुष्पक शालय तथा धारणामासाने । सनः वयके गुदर्शन भमो तथा गुपयुद्ध ।। १६८ ॥ -आनत माणत १ पुष्प, १ सातक. १ मारण १ मा PETERS.. ग भानतादि भायुत पर्यंत पारि पाल्पनिविय है । बारितहा पाउ म पनि मोप १ गुप्रबुद्ध १है।॥ ४६८ ॥ जमहर गुभरणामा गुपिसालं गुमणस प सोपण । पादिपरपाइप परिमे पम्पहरिद्धी दु॥ ४६९ ।। पशोधन गुमनाम मुविशार गुमनस सोमनस । प्रतिक माहिय परमे सर्वासिनि १९॥ अर्थ-पोर १ गुभद गाम १ गरिधार १ गमनस १ सौमनस (स कनिक माम है। याना मनुशिवि भारिपनामा की aligarh सधिमिलिनामा क है ॥ ४६९ ।। भाने मेरादि . गाय मिLti अली र अर्थ- त्रिलोकसार- णाभिगिरिलिगुवरि वालगंतरहियो हु उडुइंदो । सिद्धीदो धो वारह जोयणमाणह्मि सन्बई ॥४७० ॥ नाभिगिरिचून्टिकोपरि बालानांतरे स्थितः हि ऋविंद्रकः । सिद्वित: अयः द्वादशयोजनमाने सर्वार्थः ॥ १७० ॥ अर्थ-नाभिगिरि जो वीचि तिटता मुदर्शन मेरुगिरि ताकी चूटिकाकै परिवार अप्रभाग प्रमाग अंतराल छोडि पहटा ऋतु नामा इंद्रक विमान ति है। वहरि सिदभव है। भारह योजन प्रमागविणे अतका सर्वार्थसिद्धि नामा इंद्रक विमान ति है ॥१७॥ मागे कल्प अर कल्पातीतनिकै विक्रियादिकनिकी मर्यादाको कहे हैं;- सगसगचरिमिंदयघयदंड कापावीणमंत सु । फपादीदवाणिस्स य अंतं लोयंतयं हादि ॥ ४७१ ।। स्वकसकचरमेंदकमजदंडः फल्पावनीना अंगः सद्ध । कल्पातीतारनेच अंतः सोमांतकः भवति ॥ ४७१॥ अयं-माना अपना अंतका ईकया जु पजादंड सो कल्पमधी पृथ्वीरान अनन्य मम गुगली इकतीसा भतका देकका पनादेड जहा है तहाँ सौर्म युगमा ही हो भन्या जानना । यहार फल्पातीत संबंधी पृथ्वीका अंत मो ठोकका भने । मरान हा फरमातीत ध्यीका अत है ॥४७१।। आदिकनिका विनार कहे है- मागुमिपमाणं बहु सव्य तु नंयुदीवसमं । उमपरिमेसे अणिदयभनिदे दुहाणियं ॥ ४७२ ॥ मानुपक्षेत्रनमा त मर्यि तु जबुतीसम । टनपरिमोदकभनतु हानिवपम् ।। १७२ ।। वयं-स्त्या प्रमाण नादान गयोमन म्यागको धो नामाक) मान र ममान एक. ला यो जन प्यागको । हरि दोsathe प्रम ला मी मा पा घटा अयोति मान aarth प्रमाग गदिमी एक पर मामा की art att मोबन मामा मत माग प्रमाण HIT आता : कान या योजना का मान याने marat-AT HE RATER 4 घi AL.MIREET HTTERTISEME" HTTER THAT 10 १५.६Ruditi 14 UTTr .
वैमानिफलोफाधिकार। २११ इहाते मागे घेणीवीनका अवस्थानका स्वरूप निरुपै हैं- पासही सेहिगया पहामिदे पउदिसामु पञ्यं । पदिदिसमेवेकणं अशुदिसाणुत्तरकोत्ति ।। ४७३ ॥ द्वापटिः श्रेगिगतानि प्रथमेन्द्रे चतुर्दिशामु प्रत्येक । प्रतिदिशीकैकोनं अनुदिशानुत्तरे एकमिति ॥ १७३ ॥ अर्थ -पहला ईदक विप च्यारि दिशानिविप प्रत्येक श्रेणीबद्ध विमान बासठि हैं। ताक चारों दिसानिविषै दोयस अटनालीस भए। पाने उपरि द्वितीयादि पटलनिविपै एक एक दिशा प्रति एक एक श्रेणीवद् घटाएं ऊपरि परि विवक्षित प्रेणीबद्धनिका प्रमाण हो है सो पटक पटल प्रति च्यारि प्यारि घटते श्रेणीयद्ध जाननें । यावत् अनुदिश वा अनुत्तरवि दिशा प्रति एक एक श्रेणी- पद अवशेष रहै तावत् ऐसें जानना । इहां दक्षिण इंद्र उत्तर इंद्रका भेद करि धेगीपद्धनिका संकलित धन ल्याव का विधान कहिए है। सौधर्म ईद प्रथम पटलविथै एक दिशासंबंधी अंगीबद्ध बासठि हैं अर दक्षिण इंटकै उत्तर दिशा विना तीन दिशासंबंधी श्रेणीबद्ध पाईए हैं तात तीन करि गुणे प्रथम पटलविप एकसा छियासी श्रेणीबद्ध भया सो यद् तो आदि मया, अर पटल पटल प्रति तीन तीन श्रेणीवच घटे हैं तातै ऋण रूप धय तीन । वहुरि पटल इकतीस हैं सात गछ इकतीस। अब इहां हीन संकलनको आश्रयकरि धन स्याईए हैं । पदमैगेण विहीणं दुभाजिदं उत्तरेण सगुणिर्द पभव. शुदै पदगुणिदे पदगणिदं त वियाणाहि । । इस सूत्रकरि पद जो गछ सो इकतीस यामें एफ घटाएं तास याको दोयका माग दिए पंद्रह इनकी उचर जो चय तीन तहकरि गुणें पैता. टीम इनको प्रभव जो आदि एकमा छियासी तामैं इहां ऋण रूप चय है तातें पैंतालीस घटाएं एफसी इकतालीस रहे। इनको पद जो गछ इकत्तीस साहकरि गुणें प्यारि हजार तीनसै इकहत्तरि सौधर्मके श्रेणीबद्ध विमान भए । बरि इन विष इकतीस पटल संबधी इकतीस इंद्रक मिलाएं प्यारि हजार प्यारिस दाय विमान हो हैं । यहरि ऐसे ही ईशान विष उत्तर इन्द्रनिकै एक उत्तर दिशा संबंधी श्रेणीबद्ध पाईए है पर ईसान रत्तर इन्द्र है तातें मादि वासटि उत्तर एक गह इकतीस फरि संकलिन धन ल्पाएं ईशानकै चौदहमै सत्तावन श्रेणीबद्ध हो है । इहाँ ईशानविपै इन्द्रक न मिलापने, जाते उत्तर इंद्रनि उत्तर इन्द्र विमानका अभाव है । वहरि सोधर्मर एकदिशा सबंधी श्रेणीबद्ध वासठि तिनमें अपना गछ इकतीस घटाएं अबशेष इकतीस रहे सोई सनत्कुमार माहेन्द्रवि प्रथम पटटविष एकदिशा संबंधी श्रेणी- बद्धनिका प्रमाण है । ऐसे ही पूर्व पूर्व युगटके प्रथम पटलके एक दिशासंबंधी श्रेणीबदनिका प्रमाण विपै अपना अपना पटल प्रमाण गळ घटाएं उपरि उपरि युगटके प्रथम पटट के एक दिशा संबंधी श्रेणीबद्धनिका प्रमाण हो है। सौ सौधर्म ईशानवि वासठि ६२ सनत्कुमार माहेन्द्रविषै इकतीस ग्रह ब्रह्मोत्तरवि चौदस लातव कापिष्टविय घीस शुक्र महाशुपापिय अठारह शतार सहारविष सत्तरह आमतादि प्यारि कल्परिप सोटह अधोवैयकत्रिपै दश मध्य प्रैवैयक विषे सात उपरिम अवेयकवि च्यारि भवानुदिशविौ एक श्रेणीबद्ध विमान एक दिशामबंधी जानना । इस श्रेणी- पद्धनिके प्रमाणको दक्षिण इंद्र अपेक्षा करि तीन करि गुणें उचर इंद्र अपेक्षा कार एक कार - त्रिलोकसार- पाभिगिरिचलिगुरिं वालग्गंतरहियो हु बहुइंदो । सिीदो धो पारद जोयणमामि सम्बई ॥ ४७० ॥ नाभिगिरिनलिकोपरि बालानांतरे पितः हि ऋविंदकः । सिक्ति: अमः द्वादशयोजनमाने सर्वार्थः ।। १७० ॥ अर्य-नामिगिरि जो वोनि तिष्ठता सुदर्शन मेरगिरि ताकी पूलिका र अभाग प्रमाग अंतराउ छोडि पहला ऋतु नामा इक मान तिष्ट है। परि सिस परह योग्न प्रमानि मेतका सधिमिदि नामा इदक विमान विष्ट है ॥ ४७०॥ माने कन्य भर कल्पातीतानिक क्रियादिकनिकी मर्यादाकी यार हैं- सगसगरिमिंदयघयदंडे कापावणीणमंत रा । कपादीदवाणिस्स य अंतं लोयतय होदि॥ ४७१ ॥ साराागररकम फल्पारनीनो अंग गए। कलासाभि अतः लोकातकः भाति ॥ ४७१॥ wi-मन सपना का इतकका गुमनाईड सो फगस 4. Anाम Firmirm कतीग) अंतकारकका बगादेड जरा तहो गाधर्म का मा नागना । यहरि की सा पीका १ मा लोहा । Malकपातीन पृषी का मत है ॥ ४७१॥ Traft करें - मागितामाण र सात गुदीयगर्म । भीगंगे रणिय पनि हाणिनम् ॥ ४७२ ॥ माना मिनिमम । माननमोनियम ४७२।। या प्रमाण न मागको मनाया। ::... मान ५.१ बोजन भागोत. rrrrrI LEART 111 र Here / ... ... ... ... • Her Fan Hit Ite: र: PAK 1.. ......!! 41 42 440 ."
वैमानिफलोफाधिकार। २११ इहात भाग घेणीबदनिका अवस्थानका स्वरूप निरूपै हैं;- पासही सेदिगया पटामिदे चउदिसासु पतेयं । पडिदिसमेफेकूणं अणुहिसाणुत्तरकोति ॥ ४७३ ।। द्वापछिः श्रेगिगतानि प्रथमेन्द्रे चतुर्दिशामु प्रत्येक । प्रतिदिशमेकैकोनं अनुदिशानुत्तरे एकमिति ॥ १७३ ॥ अर्थ-पहला इंद्रक विष प्यारि दिशानिविप प्रत्येक श्रेणीबद्ध विमान बासठि है । ताके चारों दिशानिवि दोयस अटतालीस भए। यार्ते उपरि द्वितीयादि पटलनिविपै एक एक दिशा प्रति एक एक श्रेणीवद् घटाएं ऊपरि उपरि विवक्षित श्रेणीबद्धनिका प्रमाण हो है सो पटल पटल प्रति च्यारि प्यारि घटते श्रेणीबद्ध जाननें । यावत् अनुदिश वा अनुत्तरविष दिशा प्रति एक एक श्रेणी- यद्ध अवशेष रहै तावत् ऐसें जाननां । इहां दक्षिण ईद उत्तर इंद्रका भेद करि श्रेणीबद्धनिका संकलित धन ल्याव का विधान कहिए है । सौधर्म इंद्रकै प्रथम पटलविर एक दिशासंबंधी अंगीवद्ध वासठि हैं भर दक्षिण इंद्रकै उत्तर दिशा विना तीन दिशासंबंधी श्रेणीबद्ध पाईए हैं तात तीन करि गुणें प्रथम पटलविय एकमा छियासी श्रेणीबद्ध भया सो यह तो आदि भया, अर पटल पटल प्रति तीन तीन श्रेणीव घटै हैं तातै ऋण रूप घय तीन । बहुरि पटल इकर्तास हैं सातै गछ इकतीस । अब इहां हीन संकलनको आश्रयकरि धन ल्याईए हैं । पदमेगेण विहीण दुभाजिदं उत्तरेण संगुणिदै पभव- जुद पदगुणिद पदगणिदं त वियाणाहि । १। इस सूत्रकरि पद जो गछ सो इकतीस पामें एफ घटाएं तीस याको दोयका भाग दिएं पद्रह इनको उत्तर जो चय तीन तीहकरि गुणें पता- टीस इनकों प्रभय जो आदि एकसौ छियासी तामैं इहाँ ऋण रूप चय है तातें पैंतालीस घटाएं एकसौ इकतालीस रहे। इनको पद जो गर इकत्तीस तीहकरि गुणे घ्यारि हजार तीनसै इकहत्तरि सौधर्मकै श्रेणीबद्ध विमान भए । बहुरि इन विपै इकतीस पटल संबंधी इकतीस इंद्रक मिलाएं प्यारि हजार प्यारिसै दाय विमान हो हैं । यहरि ऐसे ही शान विष उत्तर इंन्द्रानिकै एक उत्तर दिशा संबंधी श्रेणीबद्ध पाईए है । पर ईसान उत्तर इन्द्र है तात आदि वासठि उत्तर एक गछ इकतीस करि संकलित धन ल्याएं ईशानकै चौदहस सत्तावन श्रेणीबद्ध हो है । इहां ईशानविय इन्द्रक न मिलारने, जाते उत्तर इंद्रनिके उत्तर इन्द्र विमानका अभाव है । बरि सौधर्मकै एकदिशा संबंधी श्रेणीबद्ध धासठि तिनमें अपना गछ इकनीस घटाएं अबशेष इकतीस रहे सोई सनत्कुमार माहेन्द्रविषै प्रथम पटविषै एकदिशा संबधी श्रेणी- बद्धनिका प्रमाण है ।ऐसे ही पूर्व पूर्व युगलके प्रथम पटटके एक दिशासबंधी श्रेणीबद्धनिका प्रमाण विषै अपना अपना पटल प्रमाण गछ घटाएं उपरि उपरि युगटके प्रथम पटल के एक दिश संबंधी श्रेणीवद्धनिका प्रमाण हो है। सो सौधर्म ईशानविय वासठि ६२ सनत्कुमार माहेन्द्रविौ इकर्तास ब्रह्म ब्रह्मोत्तरवि चौईस लांतव कापिटविष घीस शुक्र महाशुकविय अठारह शतार सहधारविपै सत्तरह आनतादि प्यारि कल्पविष सोलह अधोवेयकविपै दश मध्य प्रवेयक विषै सात उपरिम अवेयकवि च्यारि नवानुदिशविष एक श्रेणीबद्ध विमान एक दिशासंबंधी जानना । इस श्रेणी. वद्धनिके प्रमाणकों दक्षिण इंद्र अपेक्षा करि तीन करि गुणें उत्तर इंद्र अपेक्षा करि एक कार -२१२ त्रिलोकसार- - गुणें भर जहाँ दक्षिण उत्तर इंद्रको विवक्षा नाही तहाँ चारि करिए भादिका प्रमाण हो है । सो सनत्कुमारकै तरेण माहेन्द्रकै इकतीस प्रमझोत्तरांव हिनं टांतय कापिष्टविय असी शुक्र महागुक्ररिप बहत्तरि सतार सहस्रारयिपै अडसठि आमतादिति चौसठि अधो मैवैयकरिष चालीस मध्य प्रैवयकत्रिपै अठाईस उपरिम अवेयकवि सोयह न अनुदिशवि च्यारि ऐसे आदिका प्रमाण है । बहुरि उत्तर जो भणरूप चय सौ सनतकुमारी तीन माहेन्द्रविप एक उपरि सर्वत्र प्यारि प्रमाण हैं। यदुरि गछ अपना अपना पटल प्रमाण सनताम यदिवि क्रमतें सात सात च्यारि दोय एफ एफ छह तीन तीन तीन एफ एक है। ऐसे आदि वार गछ जानि तीह वाहका संकलित धन दक्षिण इंद्र या उत्तर इंदनिकै ल्यारना । सो सनत्कुमाराप्ति विष ऋमतें श्रेणीवदनिका प्रमाण ५८८।१९६।३६०।१५६७२।६८१३२४।१०८१७२।३५ १ जाननें ॥ १७३ ॥ मागे सहा प्रथम इन्द्रक संबंधी श्रेणीयनिका अवस्थानका वर्णनकों कहे हैं। उडुसेटीपददलं सयंभुरमणुदहिपणिधिभागलि । आइल्लतिणि दीये तिणि समुद्दे य सेसा ॥ ४७४ ॥ अनुप्रेणीपबदल सयभरमणोदधिप्रणिधिभागे। आरिमत्रित दीपेषु विपु रामुद्रेषु च शेहि ॥ १७ ॥ अर्थमा रक संबंधी प्रेणीवनिका एक दिशा संबंधी प्रमाण पासठि ताका TE सधेनीवर तो सयंमूरमण नामा समुद्रका प्रणिधि माग करिए निकटयणी उपरिमभाग लिद है। बशेष पर्वाचीन सीन द्वीप पर तीन समुद्रनिविष निय। भायाधरण पटल एक दिशामची वागठि श्रेणीयद है। किनपिग इकनौरा तो सग्मण सपुर उपर १६ स्वरभूमण दीप ऊपर है । आट सोहस्यों टगता समुद्र उपरियार सीहौ माता टीदीय जिमों माता ममुद्र टपरि है एक, तीहसो टगा दीप उपरि। एक मोथता भनेक द्वीप समुद्रनिर उपरि है।। ४७४ ।। कनिका समाया प्रमाण है- मंडीगं विरमाले पुफपणय इस हिपरिमाणा। शनि परणामामा सेरिदयगिरागिरामा ॥ ४७५ ॥ नाना शनि feafमानानि । नरनामानि नसिममान ॥ १.५॥ प्रयदमिनारमा firy far kuti EMARAT fri is a form train Trm CTERNMinet मे ! at Pyasi ki है।
मानिसलोकाधिकार । २१३ प, ग. गारनिशा पार इनिफा प्रमाग पटाए जो जो राशि अवशेष रहे मान मातीमधर्मातिषवि प्रपोर्णय, विमान जानन ॥ ४७५॥ मा दक्षिणभर रक्तर निफरक श्रेणीरम प्रकीर्णकनिका विभागको दिखाये है। उगरमेयिला पापच्चीसाणकोणगपाण्णा । उत्तरांदगिरदा संसा दरियणदिसिंदपटियदा ।। ४७६ ॥ दरणीबला वापशान योगगकीर्णानि । उसरेन्द्रनिमहानि शेषाणि दक्षिण दिगारप्रतिरमानि ॥ ४७६ ॥ अप-उराशामा जीपम विमान परि वापदी भर ईशान कोणों प्राप्त भए प्रकर्गिक किमान ए सी उरारदिशाका मध है। यहरि भयशेष सर्व विमान दक्षिणदिशामा मेथी। असई रोकफी रचनावि स्वादिकका अयस्थान वा इन्द्रकादिफ विमा- निफा वरप युमिनिक समशनेर अधि पाहिए है । मेस्तराते टगाय सात राजू ऊंचा टोक है। सीरि छह राजूकी टंचाई विष सोरह स्वर्ग है । तहाँ मेस्तलते टगाय ड्योढ गनको पाइरिये मी माधर्म शान युगट है ताफे इकतीस पटट हैं । पटल पहा पहिए ! तिर्य- पाप धरोपरि क्षेत्रविय जहाँ विमान पाईर ताफा नाम पटल है। सहा मेरुकी चूलिकाते बाला- प्रका तराउ छोरि प्रथम पटल है। ताफे उपरि याचि असंख्यात योजन प्रमाण अंतरालविष भयारा है। परि सहा टपरि द्वितीय पटट है। ऐमें ही पीचि याचिों असंख्यात असंख्यात योज- मका अयफाशप अंतराल छोड़ि रपरि उपरि पटल जाननें । इकतीसा अंतका पटल व्यौद राज् क्षेत्रका अविष पाईए है । यहरि पटट पटल प्रति याचिमें जो एक एक विमान पाईए तिनका माम कि विमान है। सो मेर उपरि ती प्रतु इद्रक है । ताकी सूधिरि उपरि उपरि पटल पटल पनि एक एक टक जानना । परि पटल पटल प्रति तिस इंटक विमानको पूर्वादिक प्यारि दिशा- निविणे जे पंक्तिबंध विमान पाईए तिनका नाम श्रेणीयर विमान है। बहुरि पटेल पटल प्रति तिन तिन श्रेणीबद्धनिक वाचि विदशानिविय जे खरे हुए लकी ज्यो जहां तहां तिष्टते विमान हैं तिनका नाम प्रकीर्णक विमान है ते ऐसें जाननें । सहा पटल पटटसंबंधी उत्तरदिशाका श्रेणीबद्ध विमान वाया शान विदिशाका प्रकीर्णक इनविय तो उत्तर इंद्र ईशान ताकी आज्ञा प्रव है। बहुरि अवशेष सर्व इंद्रय विमान अर तीन दिशाका श्रेणीबद्ध विमान पर नैऋति आग्नेय रिदिशाका प्रकीर्णक इनविय दक्षिण ई जो सौधर्म ताकी पाहा प्राते है। तहां जिनि विमाननिविय सौधर्म इंद्रकी आजा प्रवत है तिनके सम्हका नाम सौधर्म स्वर्ग है । बहुरि जिन विमाननिविष ईशान इंद्रकी पाहा प्रवृत्त है तिनका समूहक नाम ईशान स्वर्ग है । जैसे इहाँ एक नगरवि अपने अपने स्वामी के नामकी अपेक्षा वमतानिका नाम हो है तैसें जानना । बहुरि ताकै उपरि व्यौद राजकी उचादीव सनत्कुमार माहेन्द्र युगल है । सहा सात पटट है सो सौधर्म युगलके अंत पटलते असंख्यात योजन अंतराल छोड़ि प्रथम पटल है । ताकै उपरि उपरि तेसे ही अंतराल लिए द्विति- यादि पटल हैं । तिनविर्षे इंद्रकादिक विमान पूर्वोक्त प्रकार जाननें, तहां उत्तर श्रेणीबद्ध वायवी - ।
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वैमानिकलोफाधिकार। कप्पेसु रासिपंचमभाग संखेजवित्थडा होति । तत्तो तिण्णद्वारस सचरसकेकय कमसो॥ १७८॥ कल्पेषु राशिपचममार्ग संख्येपविस्तारा भवति । ततः त्रीण्यष्टादश सप्तदशैकमेकं शमशः ॥१७८॥ अर्थ-कल्पनिवि अपना अपना बत्तीस लाख अठाईस लाख इत्यादि विमाननिका प्रम रूप राशि ताका पचिर्वा भाग प्रमाण चिमान संख्यात योजन विस्तारकों पर है। जैसे से स्वर्गविष यतीस लाख विमान ताका पांचवा भाग छह लारा चालीस हजार विमान संप योजन विस्तार धरै है । ऐसे ही अन्यत्र जाननां । तात परै अधो वयकवि तीन मध्य रेपर अठारह उपरिम मेवयफविपै सतरह नवानुदिशविषै एक पैचानुत्तरविषै एक विमान मेर योजन विस्तार धेरै है ॥ ४७८ ॥ सगसगसंखेज्जूणा सगसगरासी असंखवासगया । अहवा पंचमभाग पउगुणिदे होति कप्पेगु ।। ४७९ ।। स्वकस्वकसंख्येयोनाः स्वकस्वकराशयः असरपन्यासगताः । भपया पंचमभागे चतुर्गुणिते भवति कल्पे ॥ १७९ ॥ अर्थ-स्वकीयस्वकीयसेस्यात योजन म्यास धेरै विमाननिको सेत्याकार होन जो म अपनां यत्तीस द्वारा विमाननिका प्रमाणरूप राशि सो असंस्थात पोजन विस्तार पर है, जैसे मविप पत्तीस डाख राशिमसौं संरयात म्यास विमानको संरया छह साग पाडीसह घटाए भयशेष पच्चीस लाख साठि हजार विमान असेल्यात योजन प्रमाग निस्सार है। है। भन्यत्र जानना । अथवा राशिका पावरी भागको धौगुणा किए फन्पनिरिसात योजन विस्तार धरै रिमाननिकी संख्या हो है । जैसे सौधर्मविष राशि बतीस हासका पर भाग छह लाख चालीस हजार ताका बीगुणो पास लारा साठि हजार रिमान भरपात पो विस्तार धेरै है। ऐसे ही अन्यत्र जानना ॥ ४७९ ।। भाग लिन रिमाननिका माहस्य यह है- एग्जुगल सेसफप्पे विचिमु सेसे विमाणालपाल । इगिधीसेपारसयं परणउदिरिणयमा होति ॥ ४८० ।। पड्युगडे शेरका विविध शेष विमानतटबह । एफरिदायफादारात नवनतिश्यकमा भवति ॥ १८॥ अर्थ-साधर्म गुगलादिक छह पुगनिके छह स्थान भर भोर मानवारिपालिका स्थान अर तीन सीन भयो भैयादिकनिका एक एक स्थान तिन वाय. तीन स्थानमा मनुदिश अनुत्तरका एक स्थान ऐसे इनग्यारह स्थाननिधि विमान उत्सरहिमान भूमिकी मोटाई सो आदिविय इकाईस अधिक पाररान योजन प्रमाण र उरि सक निपाणी निन्याण योजन घाटि प्रभाग । ११२११०२२१९२४८२४४७२५५१२९५२ प्रिलोकमार- * Frma Remानकीकी, विति नानोमनायरित्यार फोमदीगुहा। निगरापरगनिहा करंध्या रगामधिपा || ५२०॥ MIRER Nokgr in का ||५२०॥ ri-Merium IT पर एक को: rit: MARATHI-Rak series tram AARAAT ** है। लिगाको मोगमा Er. Hartmमार है ।। ५२. ।। mumtra Tift पयोगिता READ माया ॥ ५२१ ॥ Haritalirt न मोहा। ...: mantumma ॥ ५२१ ।। wittent मोगा mity आ + gram.? भा + : {11 140 मानवारा नारा figuri inार 14..॥ . 1 " . औ 4 .....
- वैमानिकलोफाधिकार। २२९ कोटि जो धारा कोणका अंतराल सो मानस्तंभकी परिधके बार माग प्रमाण है । सो कोश प्रमाण जानना इहाँ मानस्तंभनिविय करंडक ऐसें जाननें ॥ ५२२ ।। मागै इन्द्रकी उत्पत्तिके गृहका स्वरूप कहें हैं;- पासे उपवादिगई हरिस्स अडवास दीहरुदयजुदं । दुगरयणसयण मज्झं वरनिणगेदं च बरडं ।। ५२३ ॥ पार्वे उपपादगृह हरेः अष्टभ्यासदेर्योदययुतम् । द्विकरत्नशयन मध्य धरजिनगेह च बहुकुटम् ।। ५२३ ॥ अर्थ-तिह मानस्तमके पामि भार योजन चौड़ा इतना ही या ऊंचा उपपाद प्रह, बहरि तीह उपपाद प्रावि दोय रममई शय्या पाईए है । हाँ इन्द्रका जन्मदान है रे इस उपपाद गृहकै पानि बहुत शिखरनिकरि मयुक्त टर जिन मंदिर ॥ ५२३ ॥ अब कल्पवासिनी वानिक टत्पचिस्यान गाथा दोयकरि को, है- दपिखणउत्तरदेची सोहम्मीसाण एव जायते । नहिं मुद्धदेविसहिया एवउलयग्वं विमाणाणि ।। ५२४ ।। दक्षिणीचरदेव्यः सीधशान एव जायते । सत्र शुददेवीमहितानि पधनुर्ली विमानानि ।। ५२५ ॥ अर्थ-दक्षिण उत्तर देवांगना सौधर्म शानविपं ही उपमा देषामतिर पर परि लाख विमान है । भावार्थ-कल्पवासिनी देवांगना सर्व गाधर्मशान परिपत्र । उपरि नाही उपजे है सहा दक्षिण दिशाके फापसंबंधी देवांगात गौरवि । पर उत्तर दिशाक काल्पसंबंधी देवांगना ईशानवि उपरे है । सहा जिन विमानन कोडदेव पाईए केवल देयोगना ही जहाँ उपज ऐसे सौधर्मयि यह विमान है, र पविमान है॥५२५ ॥ तरेवीभो परछा परिमदेवा गर्यनि सगटाणे । सेराविमाणा एगदपीसलपप देवदेविसम्मिम्सा ॥ ५२५॥ तदेवीः पादुपरिमया: नात स्वाया। शंपरिमानाः पवितरक्षा. देवसिमिश्राः ॥ ५२५ ॥ अर्थ- देषी तहा धर्म या ईमानवि उपजे पौ3 मिनि देशनिक नियोग र ते परिप स्वर्गगसी देव अपने अपने टिकाने ले जाइ है । पारि भोष सौधामिण मान भर शानविष योग हात किमान से देवदेशी समिध है। भी रगना भी उप है ॥ ५२५॥ भव बाल्यवानि, प्रवीधारको हिसार :- दुगु दुगु तिपउपेगु प पाये पारो परमो । विपरि प परिपारा परिधारा भाति । ५२६॥ - २३० त्रिलोकसार- द्वयोर्द्वयोः त्रिचतुष्केषु च काये स्पर्शे च रूपे शब्दे च । चित्तेपि च प्रवीचारा अप्रवीचारा हि अहमिंदाः ॥ ५२६ ॥ अर्थ-दोय दोय तीन चतुष्कनिविप काय, स्पर्श, रूप, शब्द, मनविषै प्रचीचर है । बहुरि अहमिंद्र अग्रवीचार हैं। भावार्थ-प्रवाचार नाम कामसेवनका है सो सौधर्मादि दोन स्वर्गनिविपै तो कायकरि प्रवीचार है। जैसे मनुक्ष काम सेवन कर है तैसे देव देवांगना तहां कामलेवन करें हैं । बहुरि उपरि दोय स्वगीनविपै स्पर्शकरि प्रवचार है । देव देवांगनाकै परस्पर अंग स्पर्श करि तृप्ति हो है । वहरि उपरि च्यारि स्वर्गनिविय रूपकरि प्रवीचार है । देव देवागनारे परस्पर रूप देखने ही करि तृप्ति हो है । बहुरि टपरि च्यारि स्वर्गनिविप शब्दकरि प्रवीचार है। देवदेवांगनांक परस्पर शब्द मुननेंकार ही तृप्ति हो हैं । वहुरि ऊपरि च्यारि स्वर्गनिविय मनकी प्रवीचार है। देव देवांगनाकै परस्पर मनका परिणमनहीत तृप्ति हो है । बहुरि उपरि वेदकीर विप अहमिंद्र हैं ते अप्राचार हैं-काम सेवन रहित हैं ॥ ५२६ ॥ अब इस कथनकै अनंतरि वैमानिक देवनिक विक्रियाशक्ति र अवविज्ञानका पिन गाथा दोपकरि कहै हैं;- दुम दुसु तिचउकेमु य णवचोदसगे विगुव्वणा सत्ती। पढमरिखदीदो सत्तमखिदिपेरंतो त्ति अवही य ।। ५२७ ।। द्वयोर्दयोः त्रिचतुकेषु च नवचतुर्दशमु विकुर्वणा शक्तिः । प्रथमक्षितितः सतमशितिपर्यत इति अवधिश्च ॥ ५२७ ।। अर्थ-दीय दोय तीन चतुष्क अर नव चौदहनिविय वैक्रियक शक्ति प्रथम पृथ्वीते साती पृष पर्यंत है अर ऐमही अवधि ज्ञानका विषय है। भावार्य-अधो दिशाविप विक्रिया करि जहां पर्यंत गमनाति करने की शक्ति है बहरि अवविज्ञान करि जहापर्यंत पदार्थ जानकी शक्ति है सो दोऊ क्षेत्र कल्पवासोनिक ममान है । तार्ने दोऊनिका एका वर्णन कीजिए है । सो विक्रियाशक्ति अर अयविज्ञान सौरमर दोय स्वर्गनिविष तो प्रथमनरकपृथ्वी पर्यंत है। दोय स्वर्गनिविष दूसरी नरकपृषी पर्यंत है। दी स्वर्गनिविय तोमरी पर्यंत, प्यारि स्वर्गनिवि चाची परत, प्यारि स्वर्गनिविय पाचवीपर्यंत, नागर निविय स्टी पर्यंत अनुदिश अनुत्तर चौदह रिमाननिविप साती नरकपृथ्वी पर्यंत जानना । उपरि दिशापिं अवविज्ञान केस है सो कहिर है । सौधम्मादिकदेव अपने अपने स्वर्ग के निमारको जो पगर्द साह पर्यन अवधिकरि देगे है उपरि न देश है। यहरि नर अनुदिशवागी देव ते भार ना किमानका गाने नांधे यावत् नायटा मन्तवात वप है तो पन ति पाटि चौता जवी एक गत् चौही मी मर्म लोक नाटी अमरिकीदी॥ ५२७ ॥ मयं च गोयणालि पम्मति भणुगांगु जे दया। गगन य माम्मे स्वादमतमागां य ।। ५२८ ।। मी च लोकपिपति अनोखा । सर में तमनंतनाः च ।। ५२८ ॥
वैमानिकलोकाधिकार । २३१ अर्थ-पंघ अनुगर विमाननिविप ने देव है ते सर्व सोनाली कहिए प्रसनारी ताकौं माधि करि देगे है। पारि भवारिक जानने का विधान कहिए है । अपने क्षेत्रविण एक प्रदेश घटाना तर अपने फर्मणि एक बार ध्रुवहारफा भाग दैना यावत सर्व प्रदेश समाप्त होइ तावत ऐसे करना । इस कपनकोरे सरधिज्ञानका विषय भूत दम्यका भेद फया । इस अर्थकों विपद फरहै । मानिफ देयनिरे अपना अपना जेता जेना भरि ज्ञानका विपय भूत क्षेत्र कमा साके जेते असे प्रदेश होहि ते एकात्र स्थापन करनें । बरि अपने अपने सत्तारूप कार्माण स्कंधके परमाननीवर जे परमा कर्मरुप न परणए स्वभावही कर जे तिस कार्माण स्कंधरिये एफ स्पंधराप होइ परणए से एक एक फर्म परमाणूको साथि अनैत अनंत परमाणू हैं। तिनका नाम विश्रसोपचय पाहिए । तिनकार रहित अवधिज्ञानावरणरूप जे परमाणु परणाए हुए सत्ता जेते तिी है लिनको एकत्र स्थापन करनें । तहाँ तिस अवधिज्ञानावरण द्रव्यको एक पार लिद्ध राशि अनंत भाग प्रमाण ध्रुवहार है ताका भाग दैना । तब तिस क्षेत्रके प्रदेश प्रमाणमैं- सौ एफ प्रदेश घटारना बहरि भाग दीएं जो लन्धराशि भया साकों दूमरीवार ध्रुवहारका भाग दैना तय दूसरा प्रदेश निस क्षेत्र प्रदेश प्रमाणभैसों घटावना । जैसे जितने तिस अवधिज्ञानके विषय- भूत क्षेत्रके जेते प्रदेश होंहि तितनी पार तिस अवधिज्ञानावरणके परमाणुनिक प्रमाणों भाग देते देत अंस विप जेते परमाणूनिया प्रमागरूप सम्धराशि होइ तितर्ने परमाणनिका स्कंधों सो मानिक देव जाने हैं । ताका उदाहरण-सौधर्म युगलविर्षे अवधि क्षेत्र ऐसा ३ इहाँ ३४ार पनटोकफी सहनानी ऐसी ताको तीनस तियाटीसका भाग दिएं घनरूप एक राजू आया ताको व्यौद गुणा करनेको पागे सहनानी यहरि अवधि ज्ञानावरण द्रव्य ऐसा स १२ इहा · उत्कृष्ट समय प्रबद्धको सहनानी ऐसी स ७ ता किंचिदून ड्यौढ गुण हानि करि गुणनेकी सहनानी ऐसी १२. सामें सातफम्मनिका भाग करनेको सातका भाग अर एक ज्ञानावरणविौ सर्व घतियाका द्रष्य स्तोक जाणि न गिणिकरि देशवातियाविषै एक अवधिज्ञानावरणका प्रहणकै अर्थ प्यारिका माग जानना । तहा अवविक्षेत्रविपै एक प्रदेश घटाएं ऐसा ३ इहां उपरि एक घटावनाकी २४R सहनानी ऐसी १ बहुरि अवधि द्रव्यों एकबार ध्रुवहारका भाग दिए ऐसा स ७१२-इहां ध्रुवहारकी सहनानी नवका अक है । ऐसें एक एक बार ध्रुवहारका भाग अवधि द्रव्यकों देइ देइ एक एक प्रदेश भवधि क्षेत्रमेम्पों घटावते जहा सर्व अवधि क्षेत्रके प्रदेश समाप्त होइ सहा जो तविष अवधि द्रव्यको भाग देते देते ते परमाणु लम्धराशि होइ तितर्ने परमाणूनिकै स्कंधों सौधर्म युगल वासी देव जाने हैं याने सूक्ष्म स्कंधो न जाने, स्थूल स्कध जाननका किछ विरोध नाही । ऐसे ही अन्य वैमानिक देवनिकै अवधिका विषयभूत द्रव्यका प्रमाण जानना ॥ ५२८ ॥ भार्गे वैमानिक देवनिके जनम मरणविर्षे अतराल कहें हैं,-- ७४ VIVIS २३२ त्रिलोकसार- - दुसुमु निचउकेसु य सेसे जणणंतरं तु चवणे य । सत्चदिण परस मासं दुगपदुछम्मासगं होदि ॥ ५२९ ॥ इपोईयोः त्रिचतुषु च शेगे जननांतरं तु पाने च। सतदिनानि प मा दिकचःमासकं भवति ॥ ५२९ ।। अर्यदोष दोर तीन चतुर इनकी जननांतर अर पाने फरिर मरगत मो सात दिन पक्ष माम दीप पारि छह माम प्रमाग है । भावार्थ-जी कासिम जन्म तहां न होइ तासौं जननांतर कहिए । बहुरि नेते कालि किसीहीका हो मग तामे र कहिर । सो ९ दोऊ उपने सौधम्मादि दोप सनित सात दिन मोक, पारि सानिगि एक मास, पारिसर्मनि दोष मास, परि सभी सारिका हमारा प्रमाण जानना ॥ ५२९ ॥ मास्मिनिका उता. अंतर को है:- परिमार्ग दमहादेरिलायवालाणं । पर गोमगुराण मणसमममाणारिसाण ॥ ५३० ॥ TITAमहासीयोकपालानाम् । पा शिगुगणी तनुरागमानारिमदानाम् ॥ ५३॥ माह कहि न माण भई पी सीहको मागगा और न म माण मा इन्द्र ठार की महादशा मोकार र Pree er म नि । यही बाब आ भगाफ आसामानित भा परत finानि ॥ ५३० ।। * मान प्रतिपादन को- বাসবাণীবি মল সি লুণ। हिरिमामय मामिनोगा गगनामिदिया ।। ५२१।। iTER.1 मी. I nि fir Humfarnam || ५११॥ xtarrमग काय BARAT Arrital अ मान 42 4: १.. - . ::.:... ! •ite.. ... ..." ...
वैमानिकलोफाधिकार। है |हा भी अभियोग्य देव हो हो है । सात टपरि नाही उपमें हैं । ए सा अपने अपने सर्ग- सभी जपाय आयुकरि सहित सपने है ॥ ५३१ ॥ भाग प्रम युगादिविर स्थिति विशेष कहे हैं:- सोहम्म घरं पठं वरमुगहिचि सत्त दस य चोइसयं । पाचीसोति दुचट्टी एकैकं जाव तेनीसं ॥५३२ ।। सौधर्म पर पल्प अवर उदधिदिक सप्त दश घ चतुर्दशकं । दाविशतिरिति द्विवादिः एफै यावत्रयस्त्रिंशत् ।। ५३२ ॥ अर्थ-सौधर्म युगल युगट वि जघन्य आयु एक पल्य है । उत्कृष्ट मायु प्रत्येक दोय प्रमाण है पाते टपरि उत्कृष्ट आयु ही कहें हैं सनतकुमारविषे प्रत्येक सात सागर सागर प्रमाण आयु है। महयुगरविप प्रत्येक दश सागर प्रमाण आयु है। टातर युगलविणे प्रयेक चौदह सागर प्रमाण आयु है । यार्ते उपरि बाईस पर्यंत दोय दोयफी वृद्धि है। सो गलरियै सोलह, सतार युगलवियु अठारह, आनत युगल. विप वीस, क्षारपर युगलविणे बावीस सागर प्रमाण भायु है । बहुरि याते उपरि तेतीस पर्यंत एक एफकी वृद्धि है सो प्रथमादि नव नैवेयक निविय क्रमते तेईस चौवीस पच्चीस उध्वीस सत्ताईस अाईस गुणतीस तीस इकतीस सागर प्रमाण आयु है, नव मनुदिशविषै बत्तीस सागर आयु है।पंच अनुत्तरवि तेतीस सागर आयु है ।। ५३२ ॥ मार्गे घातायुष्फ सम्पकटीके पटल पटल प्रति उत्कृष्ट यु कहे हैं;- मम्मे पादेऊर्ण सापरदलमहियमा सहस्सारा । जलहिदलमुडुवराऊ पटलं पडि जाण हाणिचयं ॥ ५३३ ।। समाधि घातायुपि सागरदटमधिकमा सहस्रारात् । जलधिदल ऋतुवरायः पटले प्रति जानीहि हानिचपम् ॥ ५३३ ॥ अर्थ-सम्यग्दृष्टी होइ अर घातायुश्क होइ सो निस जीवके अपने अपने स्वर्गके पूर्वोक्तउत्कर मायुते अंतरमुहूर्त घाटि पाधा सागर प्रमाण अधिक आयु हो है। जैसे सौधर्म युग्मविष घातायुष्क सम्यग्दर्शका उत्कृष्ट आयु अंतरमुहूर्त घाटि अदाई सागर प्रमाण होइ । ऐसें सतार सहस्त्रार युगल पर्यंत जानना । तीह सहस्रारत उपरि घातायुष्ककी उत्पनि नाही है, भावार्थ-निस जीवने पूर्व मवविध पहलें आयुफा मेघ अधिक किया या पाई परणामानके वश ताको घटाइ थोड़ा अणि राख्या तिस जीवको घातायुष्क कहिए । तात आयुका पात दोय प्रकार है-एक अपवर्तन घात एक कदली घात । सहाँ बध्यमान आयुका घटावनो सो अपवर्तन घात है। बहुरि उदीयमान आयुका घटाबना सो फादली घात है। सो इहाँ कदटी घात तो संभौ नाही तार्ने अपवर्तन घानहाँमा प्रहण किया है । सो ऐमा पातायुष्क होय भर सम्पादृष्टी होय तौ तिस जीवके पूर्वोक्तउत्कृष्ट युते भाध सागर अधिक आयु सहस्रार पर्यंत होइ । बहुरि सौधर्मयुगलका प्रथम पटल ऋतुनामा इंद्रक साहविपै उत्कृष्ट मायु आध मागर प्रमाण है । सो आदि जानना । और अन्य युगलनिविय पूर्वयु. त्रि.-1.
२३४ त्रिलोकसार- । मनालय मातु सा आदि जानना । बहुरि अपना अपना उत्कृष्ट मायु सो त जानना सौधर्म गुगली तो अपना साना पटटका प्रमाग सो गछ जानना, अन्य युगलानी स्त लातु ता आदि प्रहग किया तात अपने अपने पटल प्रमागते एक का गन्छ मानन्न । मैं जानि मादी मते मुदे उगो हिदमि हागिचप, इस सूत्र करि पा हानिकर जानहु । सौ कै ! पातायुफ अशा सौधर्म गुगनादि माठ युगलनि त माई सादा मात दन सामा चौदह साहसोरह सात अद्वारह मीस सागर प्रमाग की। परिभाई महा मात सदा सादा चौदह साह सोह सा मटारह बीस पाईन राज है। सो तसो भादि घटाइ गुम किए दोय पांच तीन पारित रोड मार रहै। इनको एक धादि का भाग देना सो सौर्म गुरमीत मी एक मार सोम र अन्य युगानि पूर्णगुमाका भैग पटासा उमा mire प्रमाग सारा प्यारि दोष एक एक सीन तीनका माग ARE है। परीक्षामा सना भागु उपरिको अपेक्षा घटती मागोको माल है। मानना है । सो सौधर्म गुग्मतिर दोरका तीगा भाग, रानमा पुरुष PRENT भा, मा तीनका पीया माग, लता गुग्गी दोग, शुरू एमपी १. मोग, मानन गुमणी , आग्ण गुम्मी दोरका तोमग नि पर प्रतिभा प्रमाण लगाना । सो सो मुग्मकार HT मा है। पर हानिगा दोगका सामगो भाग समान कर PROFITERA माग प्रमागतिक पानी आग हो है । पानिनानि wi orat भाग प्रमाण माजी प्रमो hirt • आग हो । पा समयमा गुगलका हानिगा दमा भार Sumanari लाग माTalent भाग प्रमाग माही मादा मत माग प्रमाण भाग हो । पाने ATTRI निक Sarन परमार है | Tihr. Thi Rem It ar arrent भानु मानिन +Treat ki rani ET RAJAti prathi wity म Ruri Hit ----E- HTET ...retatute that .: .., Animal ' --.--: Amit kutted वैमानिफलोकाधिकार मागे कातिक देवनिक भतरपानफा ठिकाना फहे है- णिपसंति पनलोयरसने लोयंतिया मुरा अह। ईसाणादिसु अवगु पसु पदण्णएमु कमा ।। ५३४ ॥ निवसति अझलोकस्यति लोकांतिकाः सुरा भए । ईशानादिषु अधमु वृत्तेषु प्रकीर्णकेशु क्रमात् ।। ५३५ ॥ अर्थ-मामलोकका अतविष आठ कुलभेद सेयुक्त टोकांतिक देव यस हैं । भाव मामयुगटका मंदिरविर्ष जो अंतस्थान सहा टोकांतिक देवनिकै विमान है। महरि तहाँ ते ली देव ईशानादि भाठ दिशानिवि गोल जे प्रकीर्गक विमान तिनाव यथाक्रम बसे हैं ॥ ५३ भाग तिन भार कुलनिकी संज्ञा अर संख्या दोय गाथाकरि यहे हैं;- सारस्सद आइया सचसया सगजुदा य घण्हरुणा। सगसगसहस्समुवरि दुमु दुसु दोदुगसहस्सवडिकमा ॥५३५।। सारस्वता आदित्याः सप्तरातानि सप्तयुतानि च यहयरुणाः। सप्तसप्तसहसमुपरि दयोदयोः मिसिहसद्धिक्रमः ॥ ५३५॥ अर्य- -सारस्वत अर आदित्य तो प्रत्येक सात युक्त सातसा प्रमाण हैं । वहरि यहि अब प्रत्येक सात अधिक सात हजार प्रमाण हैं। ताते टपरि दोय स्थान विप दोय दोप हजार वृद्धिका अनुक्रम जानना ॥ ५३५॥ तो गहतोयतसिदा अव्वावाहा अरिहसण्णा य । सेतीपदे रिहा विमाणणामं च तचेव ॥५३६ ।। ततो गर्दतोयपिता मञ्यावाधा अरिष्टसंज्ञाथ । श्रेणीय परिष्टा विमाननामे च तदेव ॥ ५३६ ॥ अयं-तहां पीछे गर्दतोय १ सुपित १ अन्यावाघ १ अरिष्ट १ जैसी संज्ञाधारक । भावार्थ-सोकांतिक देय पाठ कुल भेद संयुक्त हैं । सारस्वत १ आदित्य १ पहि १ १ गर्दतीय १ पित १ अन्यायाध १ मरिष्ट १ इन देवनिका अनुक्रम प्रमाण सातस सातस सात, सात हजार सात, सात हजार सात, नव हजार ना, ना हजार नव, ग्यारह हजार ग्यारह हजार ग्यारह ११०११ जाननां । इन विपै अरिष्ट है ते श्रेणी बद्ध विमान विपै तिष्ट है। विशेष जानना । अबशेष गोल प्रकीर्गक विमाननिविषही तिटै है । बहुरि जे कुटके नाम तेई । विमाननिके नाम हैं ॥ ५३६ ॥ मार्गे सारस्वत आदिकनिके दोष दोयका अंतराल विष तिष्टते जे कुछ तिनके नाम तिन देवनिकी संख्या गाया दोयकोरे कहें हैं। सारस्सदाइचप्पहुदीर्ण अंतरालए दो हो। जाणग्गिरचंदयसचामा सेयखेमकरा ॥ ५३७ ॥ सारस्वतादित्यप्रभृतीना अंतरालके द्वे दे।
ग विमान जानने । सो आठ अंतरालनि विपे सोलह कुल भए ।तहां अग्न्याम देव सात हजार करा विषयनिविषै विरक्त हैं। यहुरि देवतानिविपै ऋपि समान हैं। ताते देव ऋषि है नाम निक २३६ पिलोकमार- जानीहि अग्निपूर्यचंद्रकमायामाः यःमकगः ।। ५३७ ।। अर्थ~सारस्वत मादित्य आदिकनिके आठ मनरामनिषित टोय दोय युल मन्ह दिन कौन सो कहै हैं । अग्न्याभ १ सूर्याम १ चंगम १ सन्याम १ श्रेयस्कर र १ ॥१५, पसहिदकामघरणिम्माणरना भिगतमपमयादी। रक्खिदमखमुअस्सविसा दमणमम पुच्चयमुवरि ॥ ५३८ ॥ वृषभेष्टकामधरनिर्मागरजोदिगंतान्ममर्यादिः । रक्षितमद्वस्वश्वविश्वाः प्रथमअरुणममाः पूर्ववयमुपरि ५३८ अर्थ -प मेट १ कामघर १ निर्माण रजा ? दिगंतरिक्षत १ आनहित । रक्षित १ मरत १ चमु १ अन १ ऐसे ए अपने अपने कुल नामकरि संयुक देव प्रथम . अरुण समान संख्या धेरै हैं सात हजार सात है। यहरि इस प्रमाणकै उपरि पूर्णक अधिक दोय हजार प्रमाण चय मिल सूर्यामादि कनिकी संख्या हो है । भावार्थ- अर आदिमकै विमानिके योचि अग्नाम अर सूमिके विमान है । वहरि आदित्य कर दी विमाननिके वीचि चंद्राभ सत्यामके विमान हैं । वहि भर अरुणके विमाननि श्रेयस्कर क्षेमकरके विमान हैं। ऐसे ही अन्य अंतरालनिर्षि दोय दोय पुणे सूर्याभनव हजार नव हैं । चंद्राम ग्यारह हजार ग्यारह है । सत्याम तेरह हजार तेरह हैं ।' क्रमते मार्ग विश्व पर्यंत दोय हजार दोय वधती प्रमाण क्रमतें जानना ॥ ५३८ ॥ आगे कहे जु लोकांतिक देव तिनका विशेष स्वरूप गायादोयकार कहें हैं।-- ते होणाहियरहिया विसयविरचा य देवरिसिणामा । अणुपिक्खदचचित्ता सेसमुराणच्चणिना हु॥ ५३९ ॥ ते हीनाधिकरहिता विषयविरक्ताश्च देवर्पिनामानः । अनुप्रेक्षादत्तचित्ताः शेपमुराणामर्चनीया हि ॥ ५३९ ॥ अर्थ ते टोकांतिक देव परस्पर हीन अधिकता करि राहत है। सर्व समान है।। ऐसे हैं । बहरि अनित्या दि अनुप्रेक्षानिका चितवनविय दिया है चिनिने ऐसे हैं । बहुरि कामे इंद्रादिक देवनिकरि पूजनीक हैं ॥ ५३९ ॥ घोसपुचघरा पडिवोहपरा तित्यपरविणिकपणे । एदेसिमनलहिहिदी अरिहस्स णव चेव ।। ५४० ॥ चतुर्दशपूर्वधराः प्रतियोधपराः तीर्थकरविनिःक्रमणे। एतेशामटजलधिः स्थितिः अरिएप नव चैव ॥ ५४०॥ -
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२३८ त्रिलोफसार- - अधो तीन प्रैवैयकविपै अढ़ाई हाय मध्य तीन अवेयकरिषै दोय हाय उपरिम तीन प्रैवेयकवि डया हाय शेष अनुदिश अनुत्तरविर्षे एक हाथ है ॥ ५४३ ॥ आगै तिनकै उश्वास अर आहारका काल निसपै हैं;- पक्खं वासंसहस्सं सगसगसायरसलाहि संगुणियं । उस्सासाहाराणं कमेण माणं विमाणेसु ॥ ५४४ ॥ पक्षो वर्षसहस्र स्वकस्वकसागरशलाभिः संगुणितं । उच्छ्वासाहाराणा क्रमेण मान विमानेषु ॥ ५४४ ॥ अर्थ-पक्ष कहिए पंद्रह दिन अर हजार वर्ष सौहम्मवर पलं वरमुहि विसत इत्यादि पूर्वोक्त गाविप जितनां जितनां सागर प्रमाण आयु कया तितना प्रमाण सागर शाकानिकार गुण्या हुवा क्रम करि विमाननिविथै उश्वासका प्रमाण हो है । तहां उदाहरण-सौधर्मतिकारी मायु दोष सागर है। तहां दोय पक्षके अंतराल लिए उश्वास अर दोय हजार वर्षकै भतराठ निराहार है। ऐसे ही अन्यत्र भी जाननां ॥ ५१४ ॥ आगे गुणस्थानौं माश्रय करि देवगतिविष जै उपज हैं तिनका स्वरूप गाया तीन करे कहें हैं- परतिरिय देसअयदा उकस्सेणचुदोति णिगंया । ण य अयद देसमिच्छा गेवेनंतोचि गच्छंते ॥ ५४५ ॥ नरतियचः देशायता उत्कृष्टेनाच्युतांत निग्रंथाः । न च अयता देशमिथ्या वेयांत इति गछति ॥ ५१५॥ अर्थ असयत या देश संयत मनुक्ष अर प्रियंच उटपर्ने अगुप्त कल्पपर्यंत जाप ।। साते रपरि नाही । बहुरि द्रव्य करि मिय अर भाव करि असयत वा देश संपत या मध्या मनुक्ष ते टपरिमवयकपर्यंत जाय है । ताने गरि नाही ॥ ५४५॥ सव्यहोति मुदिही महई भोगभूमिना सम्पा। सोहम्मदुर्ग मिच्छा भयणनियं तारसा य परं ।। ५४६ ॥ सर्वार्थात मुष्टिः महारती भोगभूमिमा सम्पचः । मौवर मिया भवनत्रय समापवर ।। ५१६॥ अर्य-गमपारी य या मात्र करि मानी मनु मो मनमिति नाप। रहरि मोगनिया सम्पनी * युग ताने गरिन । भर भोगभूमि मियादी भवनवामी म्पन्ना 1 जरिन Arift. को मारक, मी ने टन . -- 9 वैमानिकलोकाधिकार २३ घरकाम परिबाना ग्रोच्युतपदात आजोवा। अनुदिशानुत्तरतः युता न केशयपद न पान्ति ॥ ५१७ ।। अर्थ- -मड है लक्षण जिनका ऐसे चरक से अर एक देवी निदेवी आदि क्षण धरें परिवारक संन्यासी ते उत्कृष्टपने भकल्पपर्यंत जाय हैं। तातै उपरि नाहीं। बहरि कांजी आदि कके भोजन करनहारे ऐसे आजीव ते सपने अध्युत फल्पपर्यंत जाय है । ताते उपरि नाही अब देवगतित चय करि जे उपने तिनका स्वरूप कहें हैं । अनुदिश अर अनुत्तर विमानते च कर फेशष पद कहिए नारायण प्रतिनारायण पदको प्राप्त न हो है ।। ५४७ ॥ आगे जे जीव देवगति पय करिनिर्वाण ही जाप तिनके नाम कहे हैं। मोहम्मो वरदेवी सलोगवाला य दक्खिणरिंदा। लोयंतिय सव्वहा वदो चुदा णिचुदि जति ॥ ५४८ ।। सौधर्मों परदेवी सलोकपालच दक्षिणामरेंद्राः । लोकातिकाः सर्वाः ततधुता निति याति ॥ ५४८ ॥ अर्थ-सौधर्म नामा इन्द्र बहार ताही की शची नामा पर देवी अरताहीके सोम मा पारि लोकपाल बहुरि सनत्कुमारादिक दक्षिण इन्द्र बहरि सर्व लोकातिक देव बहुरि मर्व सी सिद्धिविष उपजे देव ९ सर्व तहास्यों प कार मनुक्ष होय नियमकार निर्माणको प्रास हो। M H- भागै सेरसठि शलाका पुरुपनिकी पदवको जे न प्राप्त होहि तिनके नाम कहै है। परविरियगदीहितो भवतियादो य णिग्गा नाया। ण लहते ते पदर्षि वहिसलागपुरिसाणं ।। ५४९ ।। नरनितिम्पो भवनस्पा निर्गता जीवरः। नसभने ते पदवी रियटिभाटाकापुरुषाणाम् ॥ ५४९ ॥ अर्य-मनुमति घर तिर्येच गतितै अर भवनत्रिय निकसिकार पाए जे जीव । तासहि शलाका पुरुषनिकी पदाको न पा है । चौवीस सीकर मारह चक्रवर्ती ना नRIES नव मलमा इनको रसटिशवाका पुरुष पहिए हैं ।। ५१९ ॥ आगे देवनिकी उत्पत्तिका स्वरूप कहें है- सुइसयणग्गे देवा जायते दिपपरोच पुम्वणगे। अंतोमुहुरा पुण्णा सुगंधिमुहफाससुचिदेश ।। ५५० ॥ मुखशयनामे देवा आयते दिनकर । पूर्वनगे। भनमर्ते पूर्णा भुगंधिमुपस्पर्शविदेहाः ।। ५५०।। अई.में लय वि सूर्य उदय होय ते तर मुहूर्त विय ह पक्षिनिकी पूर्ण मुगध मुस्वार : पवित्र है शरीर जिनका असे ते देव मुरम या परिजन है ।। ५५० ॥ d.
, २४० त्रिलोकगार- मागे सही स्पन मर देव लिन के उपजने के अनारि कार्य, सो गामा परि है - आणंदतुरनय दिरवेण नम्प वियुग्म म पर्न । दहण सपरिवारं गयनम्मं मोहिणा णिचा ॥ ५५१ ॥ आनंदतूर्य जपम्नुनिश्वेग जन्म पिबुरा त पाने । दृष्ट्या सपरिवारं गतजन्म अवधिना माया ॥ ५५१ ।। अर्थ-जन F-जनम होने भया जे आनंदरा यानिनिमा शन्द अर जयकारादिस्तुति मगरल निन करि यदु देवरूप जनम है ऐसा जानि बहुरि प्राप्त मया जो विभव अर अपना परिवार नाहि देसि बडार माधि ज्ञान करि पूर्व गत पर्यायोंको जानि ॥ ५५१ ।। कहा सो कहे है- धम्मं पसंसिद्ग हादण दहे भिसेयलंकारं । लद्धा निणाभिसेयं पूर्ण कुवंति सदिष्टी ॥ ५५२ ॥ धर्म प्रशंस्य स्नात्वा हदे अभिषेकालंकार । लम्या निनाभिषेक पूजां कुर्वति सदृष्टयः ॥ ५५२ ॥ अर्थ-धर्म प्रशसि करि जल मरे तदपि स्नान करि परूप अभिषेक अर अलं- कारकौं पाइ सम्यगदृष्टि जीव स्वयमेव जिनदेवका अभिषेक अर पूजा ताहि करै हैं ।। ५५२ । सुरघोहियावि मिच्छा पच्छा निणपूनणं पकुवंति । सुहसायरमज्झगया देवा ण विदंति गयकालं ॥ ५५३ ॥ सुरबोधिता अपि मिथ्या पश्चाजिनपूजनं प्रकुर्वति । मुखसागरमध्यगता.देवा न विदंति गतकालं ॥ ५५३ ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टी देव अन्य देवनिकरि संवोधे हुए भी पीछे जिन पूजनौं करें हैं। ते सर्य ही सुखसागरके मध्य प्राप्त हुवा थका गए-कालकों न जाने हैं ॥ ५५३ ॥ आगै तिन देवनिकै समीचीन कार्य कहैं हैं; महपूजासु जिणाणं कल्लाणेसु य पति कप्पमुरा। अहमिदा तत्य ठिया मंति मणिमउलिपडिदकरा ।। ५५४ ॥ महापूजासु जिनानां कल्याणेषु च प्रयांति कल्पसुराः । अहमिंद्राः तत्र स्थिता नमति मणिमौलिघटितकराः ॥ ५५४ ॥ अर्थ-जिन तीर्घकर देव तिनकी महा पूजा अर तिनका पंच महाकल्याण तिनविर्षे कल्ल वासी देव जाएँ हैं। बहुरि अहमिंद्र देव तहां अपर्ने स्थान ही विषै मणिमई मुकुटनित लगार हैं हाथ जि. ऐसे होत सते नमस्कार करें हैं ।। ५५४ ॥ मागें देवादिककी संपदा किनके हो है सो कहैं हैं;- - वैमानिकलाफाधिकार। २४१ विविहतवरयणभूसा गाणसुची सीलपत्यसोम्मंगा। जे तसिमेव वस्सा सुरलच्छी सिद्धिलच्छी य ॥ ५५५ ॥ विविधतपोरत्नभूपाः ज्ञानशुचयः शीलवतसौम्यांगाः । ये तेषामेव घश्या सुरलक्ष्मीः सिद्धिलक्ष्मांश्च ॥ ५५५ ॥ अर्थ-जे जीव विविध तपश्चरण करि आभूषित है बहुरि ज्ञान करि पवित्र है । बहुरि शील रूप बन्न संयुक्त सौम्य है अंग जिनका ऐसे हैं । तिन ही जीपनि देव लक्ष्मी अर मुक्ति लक्ष्मी वश्य हो है ॥ ५५५॥ अब भष्टम भूमिका स्वरूप कहें हैं;- तिवणमुगारूदा इंसिपभारा घरहमी रुंदा । दिग्घा इगिसगरज्जू अहनोयणपमिदवाहल्ला ॥ ५५६ ।। त्रिमुवनमूर्धारूढा ईषत् प्राग्भारा धराष्टमी स्टा। दीर्घा एकसप्तरग्नू अष्टयोजनप्रमितवाहल्या ।। ५५६ ॥ अर्थ-तीन भुवनका मस्तफ करि आरूढ अर ईपत्प्रारभार है नाम जाका ऐसी आठवी पृथ्वी है । ताकी चौड़ाई एक राजू लंबाई सात राजू मोटाई आठ योजन प्रमाण है । भाव यहु- लोकका अतपर्यंत है अर आठ योजन मोटी है ।। ५५६ ॥ आगे तोह आटवीं पृथ्वीरि तिष्टता सिद्धक्षेत्रका स्वरूपको गाथा दोय फरि कहें है- तम्मन्छे रूपमयं छत्तायारं मणुस्साहिवासं । सिद्धरखे मझडवेहं फमहीण येहुलियं ॥ ५५७ ।। तन्मध्ये रूप्यमयं नाकारं मनुष्यमहीव्यासं । सिद्धक्षेत्र मध्येप्टवेय क्रमहान बाटुल्यम् ।। ५५७ ॥ अर्थ-तीह आठवीं पृथ्वीकै मध्य रूपमई श्वेत एपके आकारि मनुक्ष क्षेत्र समान गोल पैंतालीस लाख योजन प्रमाण व्यासको धरै सिम क्षेत्र है । ताकी मोटाई मध्यवि भाठ योजन प्रमाण है । अन्यत्र सर्वत्र भत पर्यंत अमतें घटती घटती मोटाई है। भाव यहु-जैसे पृथ्वीविषे शिला हो है तैसे पाठवीं पृथ्वीविप वीचि सिद्धक्षेत्र रूप सुपेद शिला है। सो बीचिमें आठ योजन । है क्रमने घटती घटती अनविय थोडी मोटी है । सो उपरि तल तो समानरुप है नीरे घाटि माधि है ऐसा जानना ॥ ५५७ ॥ उत्ताणहियमंते पतं व तणु तदुवरि तणवादे । अगुणट्टा सिदा चिटंति अर्णनमुहतिदा ॥ ५५८ ॥ उत्तानस्थितमते पात्रमिय तनु सदुपरि तनुपाते। मष्टगुणान्याः सिद्धा. तिष्टति अनंतमुस्तताः ॥ ५५८ ॥ अर्य-अतविपै तनुरूप है थोड़ा मोटा है। जैसे उचा ओंकानिटया पात्र कहिए कटोरा ताह समान है । बहुरि तीह सिद्धक्षेत्र उपरिवनी जो तनुवात तिहारै सम्पयादि अष्ट गुगनि करि संपूर्ण अनंत मुग्न करि तृप्त ऐसे सिम भगवान विष्ट है ॥ ५५८ ॥ त्रि.-1 २४२ बिन्टोकमार- आगे अनत मुग करि नृमपगावि शान टोय मायानि करि यो- एयं सत्यं सर्व सत्यं वा सम्ममत्य जाणता । तिचं तुस्सति जरा फिष्ण समत्यत्यनगष्ट ॥ ५५९ ।। एक शान्त्र सर्व शनिं वा सभ्यगत जानतः । तात्र तुष्यति नराः किं न समानार्थनवताः ५५९ ।। अर्थ-एक शास्त्र या सर्व शास्त्रको सम्यक प्रकार इस लोकपि जानते थके मध संतोष पात्र है । सो समस्त पदार्थनिका तन्वयम्पके हायक सिद्ध ते कैमें सनी न पाई की त पार्षे ही पा । भावार्य-मुख है सो सन्यज्ञानजनित है । इहां संसारविपै मी सन्यशन होते हैं मुख हो है । तो सिद्ध अनंत ज्ञानवान है तिनके मुख होय ही होइ ॥ ५५९ ।। चकिकुरुफणिमुरिंदेसहमिदे जं मुहं तिकालमत्र । तत्तो अणंतगुणिदं सिद्धाणं खणमुई होदि ॥ ५६० ॥ चक्रिकुरुणिमुरेदेषु अहमिद्रे यत् मुखे त्रिकालमत्र । ततो अनंतगुणितं सिद्धानां क्षणमुखं भवति ॥ ५६०॥ अर्थ-चक्रवर्तीका मुख भोगमियाक मुख अनंत गुणा है । तात धरणेन्द्रकै मुख गन्त गुणा है । तातें देवेन्द्रकै मुख पर्नतगुणा है । तातें अहमिदनिके मुख अनंत गुणा है । ऐसें इन्वर जो अनंत अनंत गुणा मुख है । तीह अतीत अनागत वत्तमानकालसंबंधी सर्व मुखको एकटा करित ताते सिद्धनिकै क्षणमात्र करि टपया सुख अनंत गुणा है । सो यह भी उपदेश मात्र कथन है। वहीर औरनिकै मुख साकुल है सिद्धानकै सुख निराकुल है । ताते सो मुख वचन अगोचर हो जानना । इति वैमानिकदेवनिका अधिकार समाप्त भया ॥ ५६० ॥ इति श्रीनोमिचंद्राचार्यविरचित त्रिलोकसारमें पांचमां वैमानिकदेवानके टोकका अधिकार समाप्त भयाः ॥५॥ ।
नरतियंग्लोकाधिकार। २४३ ॥ अथ नतिर्यग्लोकाधिकार ॥६॥ . रघं भैरोंदान पद पार पाया है मसर जाने ऐसा मनुक्ष लोक तिर्यक लोकमा निरूपण करनेका अभिशाप संयुक्त भाचार्य सो प्रथम ही दोऊ टोकविपै तिएते जिन मंदिर तिनकी स्तुतिपूर्वक संपया पदे है- णमा परलोपमिणघर पचारि सयाणि दोविशीणाणि । पावणे पट पउरो गंदीमुर कुरले रुचगे ॥५६१ ।। नमत नरलोकजिनगृहाणि चत्वारि शतानि दिविहीनानि । द्वापंचाशत् पचारि पचारि नदीचरे कुरले रुचके ॥ ५६१ ।। अर्थ-मनुक्ष टोकवि दीप पाटि प्यारि से जिनमंदिर हैं। बहुरि नंदीश्वरदीप कुंडलगिरि रघकापीय प्रमते तिर्यक् लोकसंबंधी यावन परि पारि जिनमंदिर हैं । तिन सर्व जिनमदिरनिकों तुम नमस्कार कर ॥ ५६१ ।। भाग मनुश टोकविपै जिनमंदिर कहाँ कहाँ है सो कह है:- मंदरकुलवपखारिसुमणुमुत्तररुप्पजंबुसामलिसु । सीदी तीसं तु सर्प घर पर सत्चरिसर दुपणं ।। ५६२ ॥ मंदरकुटवक्षारेएमानुषोत्तरजंगगल्मलिन । अशीतिः विंशत् शत पवारि चत्वारि सप्ततिशत दिपंच ॥ ५६२ ।। अर्थ-मेह पांच कुलाचल तीस गजदंत सहित यक्षारगिरि एकसोइयाकार प्यारि मानुषोत्तर एक विजपाईपर्यत एकसौ सत्चरि जंयूक्ष पांच शाल्मली वृक्ष पांच इनविषे अनुक्रमते असी तीस एकसी प्यारि पारि एकसौ सतरि पाच पांच जिनमंदिर है ॥ ५६२॥ आगे अब कहिए है अर्थ ते सर्व मेरुका कथनके आश्रय है तातें प्रथम हो तिन मेरगिरि- निको प्रतिपादन करें है- जयदीवे एको इमुफयपुग्ववरपारदीवदुगे। दो दो मंदरसेला बहुमज्नगविजयबहुमझे ॥ ५६३ ।। जबूद्वीपे एकः इपृक्तपूर्वापरघापद्वीपदिके । दो दो मंदरशैली बहुमध्यगविजयबहुमध्ये ।। ५६३ ।। अर्प-दीपविष एक मेरगिरि है, बहुरि धानुको खंड पर पुष्कराई इन दोऊ द्वीपनि विपै दक्षिण उत्तर दिशान दोय दोय इषाकार पर्वत हैं । तिनि करि दोप भाग होइ पूर्व पश्चिमवि दोय दोय धनुषाकार क्षेत्रविपै दोय दोप मेरुगिरि हैं । वहाँ भी से मेरु कहाँ तिष्ठं है। भरतादि क्षेत्रनिकै अतिशय करि मध्य तिष्ठतो विदेहक्षेत्र साहका अत्यंत मध्य प्रदेशविर तिटै हैं।। ५६३ ॥
+ -- - २४४ त्रिलोकसार- आँगै तिन मेरनिका दोङ पार्श्वनिविौ तिटते क्षेत्रनिके नाम कह हैं; दक्षिणदिसादु भरहो हेमवदो हरिविदेहरम्मो य । हइरण्णवदेरावदवस्सा कुलपचयंतरिया ।। ५६४ ॥ दक्षिणदिशातः भरतो हैमवतः हरिविदेहरम्यश्च । हैरण्यवंदरावतीः कुलपर्वतांतरिताः ॥ ५६१ ॥ अर्थ-तिन मेहनिको दक्षिण दिशाते लगाय क्रमते मरत १ हेमवत १ हरि रम्यक १ हैरप्यक्त १ ऐरावत १ ऐसे ए वर्ष क्षेत्र है। ते ए वचि वाचि हिमवन आदि। सनिकरि अंतराटको घरै हैं । भरत हैमवतकै वीचि हिमवत कुटाचल है, हैमवत हरिके "३.१९ है। ऐसे ही सात क्षेत्रनिकै वीचि छह कुलाचल जाननें । जंबूदीपधातुकीखंड पुकरात्रिी कुलाचल ऐसें जाननें ॥ ५६४ ॥ आर्गे तिन कुलाचदानका नामादिक गाथा दोय करि कहें हैं;- हिमवं महादिहिमवं णिसहो णीलो य रुम्मि सिहरी य । मूलोवरि समवासा मणिपासा जलणिहिं पुधा ॥ ५६५ ।। हिमवान महादिहिमवान् निपयः नीटश्च स्वमी शिखरी च । मुलोरि समयसा मणिपाव जलनिधि स्पृश्यः ।। ५६५ ॥ अर्थ-हिमवत १ महाहिमवत १ निषध १ नील १ सम्मी १ शिखरी १९ घर है। ते ए सर्व भूलते टपरि पर्यंत सर्वत्र समान व्यासकौं धेरै हैं । मीनि समान नीचे से उप- समान चौहे हैं । वहरि मगि पार्धाः कहिए जिनका अंत प्रदेशमणिनय है । बरि ते । तो है। जिनका दोऊ पार्श्व समुद्रकों स्पर्श कर रहे है । तहो जद्वीपनि कुटाचटनि पार्थ या समुद्र हीकों परौ है । धानुकी खंडविर टवणोद कायेद समुदको र पुकगविय काटोद समुद्र मानुषोत्तर पर्यनरी परे हैं इतना जानना ॥ ५६५ ।। हेमग्नुणतरणीया कमसो वेलुरियरनदहेममया । इगिदुगवउ उदुगडगिसयतुंगा होनि हु कमेण ॥ ५६६ ।। हेमार्नुनतपनीयाः क्रमशः वैरिज हममयाः । एकदिकचनुधावकराततुंगा मरनि हि मे ॥ ५६६॥ अर्प-हिमवत् आदि कुलाचः हेम कहिए मुवर्ण समान वर्ग धेरै है महिला रहिर सभाममान भेनवर्ण धौ है निपर तरतीय कदिर तापा मोना समान दूकाको महा वापर है। नवर्य बाहिर पन्ना समान मोरका की सहा वर्ग यो । कदिर मा मानवतको धौ । म कहिट सोना गमान वर्ग धरै।। पनि वने का है। वह हिम आदि ननिका क्रमने एकमो दोपर . दोन दोजन रनाईका का है ॥ ५६६ ॥ उ हिमवत् परि पारदगि टासिन नाम :- - नरतिपालोकाधिकार। एउमाप महापउमा तिगिंछ फेरि महादिपुरिया। पुररिया ए दहाभो उपार अणुपचदायामा ॥ ५६७ ॥ को महाएमा निगम सेमरिः महादिपरीकः । सकिय हदा परि मनुपर्वतापामाः 11 ५६७ ॥ अर्थ-तिन हिमयत् भादि पर्वतनिकै टपरि धमते पभ १ महापम १ तिक १ मा पुरक १ घुटरांक १९ह है ते पर्वत अनुसारि हीन अधिक सम्पाईका प्रा १॥५६७॥ आगे तिन द्रनिका पासादिफको प्रतिपादन परत संता तिन निविप निनया स्वरपको निम्त्य है- घासायापोगाई पणदसदसमहदपवदुदयं पु। कपलस्मुदओ चासो दोषिय गाहस्स दसभागो ।। ५६८ प्पासापामामाधाः पंचदादामहत्पर्वतोदया: राल । कमठस्योदयः पासः शारपि गावस्य दशभागौ ।। ५६८॥ অনিন দুনিদাদ ও বাম সব সময়ে জমা ন ন এনী गुगो दशगुणां दश भाग प्रभाग जाननें।भावार्थ-हिमवत आदि पर्वतनिफा रचाईक सी दोपस पारिस पारिस दोयमै एकमी योजन प्रमाण है । तोहस्पों पांच : .. मनिकी चोदाईका प्रभाग जानना । सो क्रमसे पांचस हजार दोष हजार दोप पांचस योजन प्रमाण चौहे है । बरि दश गुणा लंबाईका प्रमाण जानना । सो क्रम दोय हजार पारि हजार प्यारि हजार दोपहजार एक हजार योजन प्रमाण देबे हैं। बहुति उडाईका प्रमाण जाननो । सो क्रमते दश वीस चालीस चालीस बीस दश योजन हैं। बहुरि तिन निविष कमल हैं। तिनका उचाईका प्रमाण भर चौड़ाईका अपने अपने द्राका अगाध प्रमाणकै दश भाग प्रमाण है । मोपमादि दहनिविपे का प्यारि प्यारि दोय एक पोजन प्रमाण कमल उंचे अर इतनेही चौड़े जाननें ॥ ५६८ आगै तिन कमलनिका विशेषस्वरूप गाया दोप करि कहे हैं:- णियगंधवासियदिसं चेलरियविणिम्मिउधणालजुदं । एफारसहस्सदलं णववियसियमस्थि दहमाझे ॥ ५६९ ॥ निजगंधवासितदिश वैयविनिर्मितीचनालयुतम् । एकादशसहयदलं नवविकसितमस्ति हदमध्ये ।। ५६९ ॥ अर्थ-निमें मुगंध करि वासित करी है दिशा जानें ऐमा बहुरि पैडूर्यमणि पित जो उंची नाटी तीह करि संयुक्त बहुरि ग्यारह अधिक एक हजार पत्र जाकै पाईए विकसायमान सारिखा ऐसा कमल तिन द्रहनिकै मध्य हैं । सो कमल पृथ्वी सार स्पतारूप नाही है ॥ ५६९ ॥ । २ त्रिलोकसार- - मागे इस ही अनुसारि गुण धरै प्रक्षेप गाया है- दामझे अरविंदयणालं वादालकोसमुलिहं। इगिकोसं वाल्लं तस्स मुणालं तु रजदमयं ॥ ५७० ॥ हमये अरविंदकना वाचवारिंशकोशो.सेधम् । एककोश बाहल्यं तस्य मुगाई निः रजतमयम् ॥ ५७०॥ अर्थपत्रहकै मय कमठको नाली मिपालीस कोश उंची है एक फोश मोटी है। निसका मनाउ तीन कोशका मोरा रुपामई श्वेतार्ग है ।। ५७०।। कमलदलजलविणिग्गयतरियुदयं वास फणिय तत्य । सिरिरपणगि दिग्धति कोसं तस्सदमुमपनोगदल ।। ५७१ ॥ कमसाजमिनितोदयः म्यासः कनिकापाः तत्र। दमी कोशः तम्या मुभमशेगदः ॥ ५७१॥ प्र-कमा उन्मेषमा माग सोही नालीको जनत। माग Freोनी चा है ताके सामा दश योजन भर । तदादा पोजन तो नायगी भाजन मा परि है गोई फम की उवाई एक योजन कही थी। मार योगन है। गरि काम कमठको जो कनिका ताकी उपाई व घोड़ा कमर मोकमत एक योजन उदय म्याग धौ ताकी चौपाई एक को म मानां । बीरतिम काका उपरि श्रीदेवीकारतमई मार है। Nareer आग उभा योगमा आज प्रमाण है। माना PLE | माहाग काग भा है। ऐपन (1 दान बानने प्रमाग पर जानन ॥ ५७१।। र नि बोलिन के नाम . TREATRA:- मिति निदि किनीशिय पदी लीय पारिदिगाभी। हार्मममगार्ग सदा उमारियाग ॥५७२ ।। st. ५ र मन पमिता । AMETE: ॥५७१।। - RAM ४८.१.१ferti.hirman माग अनुस metre Me Hit Frtiuint rat20- गि गरा म मरगपागप ॥ ५०१।। Fre नरतिपग्लोकाधिकार । शादियचंद्रजप्रमतयः त्रिपारिषदाः मनियमन त्यो । द्वाविशत् यत्वारिंशत् भष्टच गारिशमहाणि कम गनि अमरसमानि ॥५७३ । अर्थ-आशिप १ पन्द्र १ जतु इनको आदि दै करि जे तीन प्रकार परिषद देव है। मूल कमटी अनि यमने ऋति दिशानिवि तिट है । ते अम्पनार परिपद देव मत्तीस हजार हैं। मम परिषद देव पालीस हजार है। पास पारिपद देव भटतालीस हजार है । बहुरि तिनके रहने कमल तिन देवान के समान जाननें । एक एक कमल टपरि एक एक पारिपद देवका मंदिर है ५७३ आणीयगेहफमला पच्छिमादिसि सग गयस्सरहवसहा । गंपवणपती पचेयं दुगुण सत्तारखजुदा ॥ ५७४ ॥ श्रा कगेहकमलानि पश्चिमदिशि सप्त गजाश्वरपवृषभाः। गंधर्वनृत्यपत्तयः प्रत्येक दिगुणसप्तकरयुताः ॥ ५७४ ॥ अर्थ-भानीक जातिके देवनिके मंदिर सहित सात कमल मूल कमलते पक्षिम दिशाविष है से मानीक हादी १ घोड़ा १ रप बैल १ गंधर्व १ नृत्यको १ पयादा १ ऐसे सात प्रकार है तहाँ एक एक मानीकविप मात सात कक्ष है। तहां प्रथम कक्षविणे अपना सामानिकनिके समान प्परि हजार है । बहुरि दितीयादि फसविष दूणा दूणा प्रमाण जानना ॥ ५७४ ॥ उत्तरदिसि कोणदुगे सामाणियफमल घदुसहस्समदो । अभंतरे दिसं पडि पुह तेचियमंगरपरखपासादा ॥ ५७५ ॥ उत्तरदिशि कोगदिक सामानिककमलानि चतुःसहस्रमतः । अभ्यंतरे दिदश प्रति पृथक् तावन्मात्रांगरक्षप्रासादाः ॥ ५७५ ।। अर्य-उत्तर दिशाका भागविष तिटते दोऊ कोण तिनविष सामानिक देवनिके कमल- प्यारि हजार है । बहुरि इन कमलानकै अभ्यन्तर मूल कमलकी तरफ एक एक दिशा प्रति तिनके होभ्यारि प्यारि हजार अंगरक्षकनिके कमलनि उपरि मंदिर है ॥ ५७५॥ अम्भतरदिसि विदिसे पटिहारमहत्तरहसयफमलं । मणिदलमलसमणालं परिवारं पउममाणदं ॥ ५७६ ॥ अभ्यन्तरदिशि विदिशि प्रतिहारमहत्चराणामयशतकमलानि । मणि जलसमनाले परिवार पप्रमानार्थम् ॥ ५७६ ।। अर्थ-तिन अंगरक्षक कमलनित अभ्यन्तर मूल कमलके समीप दिशा या विदिशानिविष प्रतीहार महतरनिके एक सो भार कमल हैं। भावार्थ-एक एक दिशाविप वौदह पौदह पर एक एक विदिशाविषे तेरह तेरह मुख्य प्रतीहारनिके कमल हैं । इहाँ ए कमल ऐसे जाननें । बहरि ए सर्व परिवार कमल मणि मई रसनि करि संयुक्त हैं । भर जलकी उडाई समान उंची है नाली जिनका ऐसे है। जल उपरि उंचे नाही है । बहुरि परिवार कमलनिका भ्यासादिकरूप जो विशेष स्वरुप सो मुख्य कमलते भई प्रमाण सर्व है ।। ५७६ ॥
२४८ त्रिलोकसार- सिरिगिहदलमिदरगिहं सोइम्मिदस्स सिरिहिरिधिदीओ। कित्ती बुद्धी लच्छी ईसाणहिवस्स देवीओ ।। ५७७ ॥ श्रीमहदलमितरगृहं सौधर्मेन्द्रस्य श्रीहीधृतयः । कीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः ईशानाधिपस्य देव्यः ॥ ५७७ ॥ अर्थ-श्रीदेवीका मंदिरका जो व्यासादिक प्रमाण ताका आधा परिवार के प्रहनिका कर दिक प्रमाण है ऐसे ही अन्यत्र जाननां । बहुरि श्री १ हो १ धृति १ ए तीन तो सौधर्म देवी हैं। कीर्ति १ बुद्धि १ लक्ष्मी १ ए तीन ईशान अविपकी देवी हैं ।। ५७७ ॥ आग तिन दहनिविष उत्पन भई जे महानदी तिनके नाम गाया दीय करि कहें हैं। सरजा गंगासिंधू रोहि तहा रोहिदास णाम णदी। हरि हरिकता सौदा सौदोदा णाारि गरकंता ॥ ५७८ ॥ सरोजाः गंगासियू रोहित्तथा रोहितास्या नाम नदी । हरित् हरिकांता सीता सीतोदा नारी नरकाता ।। ५७८ ।। अर्थ-सरोवरनित टापन्न भई ऐसी नदी गंगा १ सिंधु १ रोहित १ रोहितास्मा ११ १ हरिकांता १ सीता १ सीतोदा १ नारी १ नरकांना ॥ ५७८ ॥ सरिदा सुवण्णरुप्पपकूला रत्ता तहेव रत्तोदा। 'पुलावरेण कमसो गाभिगिरिपदपखणेण गया ॥ ५७९ ।। सरित: मुवर्णरप्याला रक्ता तथैर रक्तोदा । पूर्वापरेण क्रमशो नाभिगिरिप्रदक्षिणेन गताः ॥५७९ ॥ अर्य-गुवर्णाला १ रूपकूला १ रता १ रतोदा है ते कमर्ने कही गंगा रोहित सीता नारी मुवर्णस्टा रमा ए तो पूर्वदिशा मुरा करि भर र 43 कही सात नदी ते पश्चिम मुप करि क्षेत्रनिक पीधि तिते में पति तिनको - करि समुद्रको प्रात मई हैं ।। ५७९ ।। मागे तिन नदीके दोउ तनिका समय :- पुष्णागणागपुगी केल्लितमाललितही । एक्टीलगमलीपदी सयलणदिहुनडेगु ।। ५८० ॥ पुनागनागलोकहितमालकदीनाबटी। बटगमटारभूतयः सकलनदीरिती ॥ ५८०॥ -दुभाग नागरे मुरारी अशोक तमा फेरित गमा TR मन नदीनिक दोनिगि पादर है ।। ५८०॥ भने म हासिल नही रन मई मो को, गंगाद गरिदग्गा पा रसद गुरागमतदा। मेगे दोनोयगदमदिन गाभिगिरि ॥१॥ ९ सरितः कहिए चौदह - अय- नरतिर्यग्लोफाधिकार । २४९ गंगारे रोहितास्पा पमे रक्ताई मुवर्णा अतहदे। शेपेपुढे योजनदटमंतरित्वा नाभिगिरिम् ॥ ५८१ ।। अर्थ- --गंगा सिंधु रोहितास्पा ९ तीन नदी तो पद्मद्रहविष उपजी हैं। बहुरि का रक्तोदा मुत्र- "क्ला ए तीन नदी अंतका पुंडरीक दहाविप टापन्न भई हैं। अवशेष द्रहनिपि दोय दोय नदी टापन्न भई हैं।तहां गंगा सिंधुरक्ता रक्तोदा इन पारि नदीपिना अवशेष नदी क्षेत्रनिके पीचि तिरता जो नाभिगिरि ताको आध योजन छोदि समुद्रको गई है । इहां विदेहविर्य मेरगिरिका नाम इहा नानिगिर जानना । हेमवत हरि रम्यक हैरण्यवतयि नाभिगिरि है ही सो दहनि सो नदी निकमि नाभिगिरिक सन्मुग्य सूधी आइ आध योजन टरेत मुहि तीह नाभिगिरिको अई प्रदक्षिगा परि समुद्रको प्रात हो है । पहरि भरत ऐरावतविय नाभिगिरि नाही सात गंगासिंधु रक्तारक्तोदा इनका वर्णन किया है ॥५८॥ आमें तिनविय गंगानदीकी टत्पत्ति अर ताके गमनका विधान गाया तीन करि फरे- वनमुहदो जणिता गंगा पंचसयमेत्य यहई । गचा गंगादूई अविपत्ता जोयणदेण ।। ५८२ ।। घरमुगतः जनित्या गंगा पंचशतमत्र पूर्वनुत । गत्वा गंगाट अप्राप्य योजनार्थेन ॥ ५८२ ।। अर्थ -मनामा दहका पूर्व दिशावि जो धमार सीहरयों गंगानदी उपनि-निकमि पर ग हिमयत् पर्वतफै उपरि पूर्व दिशा सनमुरा पाचस योनन जाइ हिमपत् पर्यत उपरि गंगा मागा जो कूट है ताको आध योजन भप्राप्त होइ गंगा कूटसा मा योजनाहर रात मुहि फाग। ५८२ ॥ कहा सो कहें हैं- दक्षिणमुई पलिता नायणतेवीसपियपचराय । साहियफोसदजुदै गत्ता मा विविएमणिरूपा ।। ५८३ ।। दक्षिणमुख परित्वा पोमनत्रयोविंशतिसहितपयशतम् । साविकोशायुतं गत्या या विविधमणिरूपा ॥ ५८३ ॥ अर्थ-तहाँसो दक्षिण दिशा सनमुष तिगरिमयत पर परिवारमा संग अधिक पचिस योजन भर साधिक भाव फोश जाइ पर्षत तरि गई । पानी कामना भरतका प्रमाण पाचरी ४ास योभन भर ९८ उगणीसा भाग तायो दणा विर हिमपत् . तका म्यास एक हजार पावन पोजन अर बारह उगणीसा भाग सानै नग्न एक फोश पटाए एर मार निशीस पोजन रहे ताकै सो भाषा किसे सपोरन भए अमोर पा रगनीसा भागको भौगुना करि पो कि मन पर.. जीसका भाग भया नाके दोय पोम अर दाया रगीसको भाग भया ताकत मदीका म्यारापिका शेष एक कोश भर का मीसा मानताका साथ कोरा मर पाच मिमा भाग भरा। पा से देग पारन भर सादर कर रहा। भारा- नदी मु. REATE ANTA re rit दि.-11 २५० पिलोकगार- भाषा ती उत्तरने रया अर आग दक्षिण मा मो मंगामाग प्राप्त भई । सहा पर्वतका तरी निदिका नामा प्रमादी नानाप्रकार मनि५८३॥ फोसद्गदीइयहला वगहायारा य निम्डिया डा। छनोयणं सकोसं तिस्मै गनूण पडिदा मा ॥ ५८४ ।। मोगयटीयाहल्या याभाकारा च निधिका । पड़योजनं सोश तस्यां गया पतिता सा ॥ ५८४ ॥ अर्थ-सौ निहिका मामा प्रगाली दोय कोम यी । अर दोप ही कोग ऊंची है । बहुरि सूपमाकारा कहिए गऊमुखकै आकार है । कोश सहित छह योजन चौड़ी है ! तिह प्रणालीविष जाइ सो गंगानदी तिस हिमयत पर्यन पड़ी है ॥ ५८४ ॥ आगें प्रणालीका वृपभाकारको साथीक करें है;- केसरिमुहमुदिजिम्मादिही भूसिपहुदिगोसरिसा । तेणिह पणालिया सा वसहायारेति णिदिटा ॥ ५८५ ।। केशरिमुखश्रुतिजिहादृष्टयः भूशीर्षप्रभृतयः गोसदृशाः । तेनेह प्रणालिका सा वृषभाकारा इति निर्दिष्टा ॥ ५८५ ॥ अर्थ-प्रणालिकाकै मुख कान जीभ नेत्रनिका आकार तो सिंहके समान है । अर में? मस्तक आदिका आकार गऊ समान है । तीह कारण करि इहां सो प्रणालिका मुख्यपने वृना- कार ऐसी कही है ॥ ५८५॥ आगें पड़ी जो नदी ताके पड़ने का स्वरूप गाया पाच करि कहें हैं;- भरहे पणकदिमचलं मुच्चा कहलोवमा दहन्यासा । गिरिमूले दहगाई कुंडं वित्यारसहिजुदं ।। ५८६ ।। भरते पंचशीतमवलं मुक्त्वा काहलोपमा दशव्यासा । गिरिमूले दशगाधं कुंडं विस्तारपष्टियुतम् ॥ ५८६ ॥ अर्थ- ~भरत क्षेत्रवि पंचकृति कहिए पच्चीस योजन हिमवत् पर्वतको छोड़ि रै काइलाई आकार होइ दश योजनकी चौड़ाई लिएं गंगानदी पड़े है । कहा पहै है सो कहैं हैं । हिमपात पर्वतका मूलविपै दश योजन ऊडा साठि योजन चौड़ा गोल कुंड है ॥ ५८६ ॥ मञ्झे दीओ जलदो जोयणदलमुग्गओ दुघणवासो। तम्मज्झे वजमओ गिरी दमुस्सेहओ तस्स ॥ ५८७ ॥ मध्ये द्वीपः जलतः योजनदलमुद्गतः द्विधनव्यासः । तन्मध्ये बनमयः गिरिः दशोत्संधः तस्य ॥५८७ ॥ अर्थ-तीह कुंड मध्य जली उपरि आध योजन ऊंचा र द्विधन कहिए आठ योग चौड़ा ऐसा गोल द्वीप कहिए टापू है । तीह दीपक मध्य वज्रमई दश योजन ऊंचा पर्वत है तिरू पर्वतका १५८७ ॥
नरतिपग्लोकाधिकार। २५१ । करा सो कई १;- भूमगमगे पासो पदु दुगि सिरिंगेहमुगरि तनासो । पापाणे तिटुगेकं सहस्समुदभो दु दुसहरसं ॥ ५८८ ॥ भूमप्या भ्यामः पतुः द्विक एक धागहमुपरि तपासः । चापाना विधिक सहाममुस्पष्ट दिसहस्वम ॥ ५८८ ॥ अर्थ-भूमप्य साविय म्याम पारि दोप एक पोजनका म्यास है । भावार्थ-सो पर्वत भी मारियोजन मध्यविष दीप पोजन उपरि एक योजन धौरा है। वहरि तिह पर्वतकै उपरि श्री देवीका मरि । तिस धीमदिरफा घापनिका तीन दोय एफ सहस्र है उदय दोय सहस है । भावार्थ- धीमदिर ना तीन हजार मपविध दोष हजार उपरि एक हजार धनुप प्रमाण चौदा है। अर दोय हजार धनुष ऊँचा है || ५८८॥ पणसयदल सदतो तदार साल वास दुगुणुदयं । सच्चत्य पणू णेयं दोष्णि कवाला य वजमया ॥ ५८९ ॥ पंचशतल तदंतरे तदार धचारिंशत् म्पास दिगुणोदय । सर्वत्र धनुः शेयौ कपाटौ च वनमयौ ।। ५८९ ॥ 'अर्थ-तिस श्रीमदिरका अभ्यंतरीधरै म्यास पोचस भर साका आधा प्रमाण है । भावार्थ- अभ्यंतर श्रीदेवीका मंदिर सादा सातस धनुष प्रमाण चौदा है। बहुरि तिसका द्वार चालीस व्यास दुणा टदप संयुक्त है । भावार्थ-श्रीमंदिरका द्वार चाटीस धनुष चौडा असी धनुर ऊंचा है। ऐसे सर्वत्र श्रीमंदिरका प्रमाण धनुष प्रमित जानना सिंह द्वारफें दोय पन्नमई कपाट है ५८९ ॥ सिरिगिहसीसठियंपुजफाणियसिंहासणं जडामउलं । जिणमभिसेचुमणा वा ओदिण्णा मत्यए गंगा ।। ५९० ।। थीगृहशा स्थितांबुजकणिकासिंहासनं जटामकुट । जिनमभिषेकुमना या अवतीर्णा मस्तके गंगा ॥ ५९० ॥ अर्य-श्रीमंदिरया मस्तक रपरि तिष्टता कमलको फाणिकाविर्ष तिरता सिंहासन जटा मुफट जिनबिंब ताहि अभिषेक करनेका मानों याका मन है ऐसे निनायिके मस्तक परि अवतरै है । भावार्थ-श्रीमदिरकै उपरि कमल है ताकी फर्णिका उपरि सिंहासन है 1 तहाँ जिन- वि विराजे है । ताकै उपरि सो गंगा नदी तिस पर्वतसौं पड़े है ।। ५९० ॥ आर्गे कुंडसों निकसि चाली जो गंगा ताका स्वरूपकों का ताहका स्थान स्वरूपको गाथा छह कार कहें हैं- कुंडादो दक्षिणदो गत्ता खंडप्पवादणामगुहे। अडजोपणवित्यिण्णा विणिग्गया कुदवहिवादो ॥ ५९१ ।। कुंडान् दक्षिणतः गत्वा खंडमपातनामगुहाम् । भष्टयोजनविस्तीर्णा विनिर्गता कुतपाधस्तात् ।। ५९१ ॥
२५२
त्रिलोकसार-
अर्थ- कुंडसों निकसि दक्षिण दिशा सनमुख सूची जाइ विजयाई नामा पर्वत
प्रपात नामा गुफा ताकी कुतप कहिए देहली ताकै नाचे होय तिस गुफाविौं प्रवेश में
योजन चौडी होत संती गंगा तिस ही गुफाका उत्तर द्वारकी कुतप कहिए देहली ती
होइ करि ही सो गंगा तिस गुफात पारें निकसै है ॥ ५९१ ।।
दारगुहुच्छयवासा अड वारस पन्चदं व दीहत्वं ।
वजछवासकवाडदु वेयहगुहा दुगुभयंते ॥ ५९२ ।।
द्वारगुहोच्छ्यव्यासौ अष्ट द्वादश पर्वत इव दीर्घत्वे ।
बजपव्यासकपाटद्वयं विजयागुहा द्विकोमयांते ॥ ५९२ ।।
अर्थ--गुफाका द्वार भर गुफा ताकी उचाई तौ प्रत्येक आठ योजन है अर चौड़ा
योजन है । बहुरि विजायाध पर्वतकी चौडाईका जो प्रमाण तितना ही गुफाका लंबाईका
पचास जोजन है । बहुरि विजयाको गुफाके दौऊ अंत द्वारनिवि प्रत्येक छह छह मो-
दोय बज मई कपाट हैं ॥ ५९२ ॥
उम्मग्गणिपग्गणदी गुहमझगकुंजा दु पुचवरे ।
जोयणदुगदीहाओ पुसति उमयंतदो गंगं ।। ५९३ ॥
उन्मग्लानिमग्ननयौ गुहामध्यगकुंडजे तु पूर्वापरस्याम् ।
योजनयदै स्पृशत: उभयांतत: गंगाम् ।। ५९३ ॥
अर्थ-उन्मग्न निमननदी पूर्व पश्चिमविप गुफा मध्यके कुडते उपनि दोऊ तटों दो
चौडी होत सेती गंगाको स्पर्शे है । भावार्य-गुफाको पूर्व पश्चिमविष भीतिक निकटि
है । तिनने उनमग्न भर निमन नामा नदी उपजे हैं। सो तहांसी चालि सूची मैगाके दोऊ के
भाइ गंगाविय प्रवेश कर हैं । ते नदी दोय योजन चौडी हैं ॥ ५९३ ।।
णियनलपवाइपदिदं दत्वं गुरुगपि णेदि उपरि तडं ।
जम्हा तम्हा मणदि उम्मग्गा वाहिणी एसा ।। ५९४ ।।
निजजलप्रवाहपतितं द्रव्ये गुरुकमपि नपनि उपरि तटम् ।
यस्मात् तस्मात् भण्यते उन्ममा वादिनी एपा ॥ ५९१ ॥
थर्य-अपना जन्द्रका प्रवाहरि पत्या हुया मारा भी द्रव्यों जाते टपरि ती
को दबने दे नही ताने यह रमननामा नदी कहिए है ॥ ५९४ ॥
पिप जलमरउपरि गर्द दवं महुगंपि दि दिम्मि ।
जेणं तन्गं पद एमा सरिया जिमगति ।। ५९५ ॥
निमगार गर्न द्रव्ये उधुकमपि नपति अपमान ।
देन तेन मयता सग निममा ति ॥ ५९५ ॥
अन सा गोराटा भी में
त्व है। विकास की मदमो वा नदी निममा देगी करिहै ॥५.५॥
नरनियालोकाधिकार २५३ गणी परिषणभरहरा गंदण पुच्चदिसरदणा। पागादावरदो भवणराम परिहा मा ॥ ५९६ ॥ ধী লিসা মা দুখাবিয়ানাে। मागधारोतरत: पगमा प्रविध सा ॥ ५९६ ।। मर्य- गुणागा निकामि करि दक्षिण भरतका अर्स पर्यंत तो सूधी दक्षिण सन्मुग गई गो एफसी रगणीग पोजन भर सीन अग्नीसयो भाग प्रमाण गई। फेसै ! भरसका प्रमाणमें ५२६६ + १०. सौ विजपाका म्याग५० पाइ मबर १७६६-१९ साधा किए २३८ १९ भरतका प्रमाग हो ।ताका बाया कि १९९३+१९ वर्ष दक्षिण भाडफा ममाग हो है। महरिताह भई दणि भरत ताई आप मुहि करि पूर्व दिशाको सनमुख होइ द्वीपके फोटका मागध मामा द्वार तक मोही गाय सो मेगा टयण समुद्रको प्रवेश पर है ॥ ५९६ ॥ अब मिथुनदी के स्वरूपको निरूप है- गंगसमा सिंधुणदी अबरमहा सिंधुदविणिपित्ता। तिमिसगुहादपरंपुहिमिया पभासक्खदारादो ॥ ५९७ ॥ गंगासमा सिंधुनदी मपरमुखा सिंधुकुटविनिता । तिमिसागुहादपरोबुधिमिता प्रभासास्यदारतः ॥ ५९७ ॥ अर्ध-गाशि जो वर्णन कदा तीह समान ही सिंधु नदी है । सो सर्व वर्णन सिंधुषि जानना । इतना रिशेप, जो यह सिंधु नदी पमहके पक्षिम द्वारत निकास पश्चिम सनमुख मिधु फूटने रै मुहि फरि पर्या पर्यंत भाइ कुंडविरे पति तहाँसों निकसि विजया पर्वतको तिमिय नामा गुफाविप प्रवेश फरि हाँसों - निफसि जनुपिके कोटका प्रभास नाम द्वारते पश्चिम समुद्रको प्राम भई। और सर्व वर्णन मैगावत जानना ।। ५९७ ॥ मांग भवरोर नदीनिका स्वरूप कहें हैं। सेसा रूपंता दहवित्थारूणचलरंददलमुवरि । गंतूण दक्खिणुचरमणुपुटा पुलपरजलाहिं ॥ ५९८ ।। शेषा मप्यता हदविस्तारोनाचटरंद्रदलमुपरि । गत्या दक्षिणोत्तरमनुरपृथाः पूर्वापरजलधिम् ।। ५९८ ॥ अर्थ-अपशेष रोहित मादि सप्पालापर्यंत नदी अपना अपना दहका विस्तार करि उन जो पर्वतका विस्तार ताका आश प्रमाण साई पर्वतर्फ उपरि दक्षिण उत्तर सनमुख जाइ पी क्षेत्रविष भाधक्षेत्र ताई मूर्धा जाइ नाभिगिरिके से मुहिकरि पूर्व पश्चिम समुष होइ पूर्व पश्चिम ममुद्रको प्रवेश कर है। तहो भरतक्षेत्रका जो प्रमाण ५२६६२१९ ताको दोय आठ बत्तीस यत्तीस माठ दोय जो हिमवत् आदिकी शलाका तिन करि क्रमते गुणे हिमवत् १०५२।१२-१९ महाहिमवत् ४२१०।१०-१९ निषद्ध १६८४२।२-१९ नील १६८१२।२-१९ रुखमी ४२११ १०-१९ शिपरी १०५२।१२-१९ का विस्तार हो है पामें अपने अपने द्रहफे विस्तारका प्रमाण - भाग ताई आइ हरिक्षेत्रविथ पड़ि निकति सूधी नाभिगिरिक उरे ताई जाइ मुदि की गधी नीट पर्वतके तटपर्यंत चहौत्तरिसे इकईस योजन एकका उगणीसा भाग पर्यंत माइक विवि कुंडवि पडि सूची मेरगिरिका उरां ताई आइ मुडि पूर्व सनमुरा होइ इस सी धारने निकमि सूती नीट पर्वतमा तट पर्यंत चहात्तिरमे इकाईम योजन एफ.का टम त्रिलोकसार- ५००।१०००१२०००।२०००१०००।५०० घटाएं जो अवशेष रहै ५५२।११. ३२१०११०१९/१४८४२१९ | १४८४२।२-१९ । ३२१०।१०-१९॥ ५११: *१९ ताका आधा किएं जो प्रमाण होय २७६६-१९।१६०५।५:१९७४२९॥ ७४२११% १९।१६०५/५२ १९।२७६।६* १९ तितनी दूर तो नदी पर्वत उपरि का है। अपना अपना क्षेत्रविपै होइ समुद्रकों प्रवेश कर है। भावार्यरोहित नदी ।. निकास सूची महा हिमवत्के तटपर्यंत सोलहसै पांच योजन उगणीसवां मागं ताई । क्षेत्रविप कुंडत्रिपै पडि तहांत निकसि सूधी नाभिगिरिक ठरे ताई आइ मुडि पूर्व सनमुरा होइ. विप प्रवेश कर है। बहुरे रोहितास्या नदी पद्मद्रहके उत्तर द्वारत निकति सूधी : पर्यंत दोयसै छिहतरि योजन छह उगणीसवां माग ताई आइ हैमवत क्षेत्रवि कुंडगि : निकसि सूधी नाभिगिरके उरे ताई जाइ मुडि करि पश्चिम सन्मुख होइ समुद्रवियै प्रवेश करा: हरित नदी तिगिंछ द्रहके दक्षिण द्वारत निकास सूधी निपलके तटपर्यंत चौटरिने २० योजन एक उगणीसवां माग ताई आइ हरि क्षेत्रवि कुंडरिष पहि निकसि सूधी नाभिरले. ताई जाइ मुदि करि पूर्व सनमुख होइ समुद्रवि प्रवेश कर है । बहरि हरिकांता नदी मात दहके उत्तर द्वारते निकसि सूधी महा हिमवतके तट पर्यंत सोलहस पांच योजन पांच मार सन्न होइ समुद्रविये प्रवेश कर है । वडार सीता नदी कसरि दहके दक्षिण द्वारा प्रवेश का है। यहरि सीतोदा नदी कि दहके उत्तर द्वारत निकमि सूधी निपद्धका घदोनरिसे इकईस योजन एकका गणीसा भाग ताई आइ विदेह क्षेत्ररिप कुंडगि पीर मेतिरिका टरां ताई जाइ मुहि पश्चिम सन्मुस होइ समुद्रक्रि प्रवेश करे है। यही कार महादरीक दहके दक्षिण द्वारतें निकसि सूची रकमी पतिका तट पर्यंत सोहसे पात्र है। पाव टानामयो माग पपैन आइ रम्यक क्षेत्रवि पदि निकसि सूची नाभिगिरिका उपाय आर मुनि सन्मुग होइ समुद्रवि प्रश करे है । बडीर नरकाता नदी केरारी के टाई भाइ रम्यक क्षेत्रयि कुरिय पछि निकमि सूची नामिगिरिका म मुहिम मन्ननु होइ समुद्रविश कर है। बरि मुर्ण या नदी पुनर दर दnि antar मूना पदका तट परत दोष दिला योजना गाया भाग it war बत शनि दुरवि परि निकमि भी नानिरिका दाई भाइ मुनि काम र म मा को । वह य यानी मा. प्रार ने निरनि मायदा Intent मिपूर्ण ENTREPREN नरतिर्यग्लोकाधिकार । २५५ गगुण होइ गमुवि प्रवेश कर है । इहो पर्वत उपरि नदी आपने आदिवि योजननिका प्रमाण तीर पेशामा अन्य भानुकोपर पुष्पराविषे प्रमाण भी ऐसे ही यथासंभव जानन ॥५९८॥ श्रांग ररका रतोदा आदि नदीनिका प्रणालिका आदिफका प्रमाण कहै है;- गंगादुर्ग व रचारपोदा निमिहयादिया सके । सेसाणं पिप या सेवि विदेहोचि दुगुणकमा ।। ५९९ ॥ गंगारिक य रक्तारक्तोदा जिदिकादिका सर्वे । शेषाणामपि च झेपाः सेपि विदेहात रिगुणक्रमाः ॥ ५९९॥ अर्थ-गारिक जो गंगासिंधु तिनका जैसे वर्णन किया वैसे ही रक्ता रक्तोदाका वर्णन जानना । विशेष इतना पमहकी जायगा पुंडरीक दह कहना हिमवत पर्वतकी जायगा शिखर कहना । परि अवरोप निहिफा आदि प्रमाण विशेष समान जाननें । बहुरि सर्व अवशेष नदी- निफे भी प्रगाटिका कुंड आदि विशेपनिकाम्पासादिकका प्रमाण सो भरत ऐरावत संबंधी नदीनितें अनुक्रमते विदेह संबंधी नदीपर्यंत दूणा दूणा जाननो ॥ ५९९ ।। सागै तिन नदीनिके तीरनिका सरूप गाया दोय करि कहें हैं;- गंगदु रचटु पासा सपादधप्णिग्गमे विदेहोत्ति । दुगुणा दसगुणमंते गाहो वित्यार पणंसो ॥ ६००॥ गंगादयोः रक्तात्यो: म्यासाः सपादपद् निर्गमे विदेहांतम् । हिगुणा दशगुणा अंते गापः विस्तारः पंचाशदंशः ॥ ६०० ॥ अर्थ-मा तिन नदनिका विस्तार कहें हैं । गंगादिक फहिए गंगासिंधु अर रक्ताद्धिक कहिए रक्तारक्तोदा इनका पास जो चौड़ाईका प्रमाग सो निर्गमे कहिए दहौं निकसित सवा छह पोजन है । भर अन्य नदीनिका विदेह संबंधी नदीनि पर्यंत दोय दोय नदीनिका दूणा दूणा क्रमतें है । बहुरि सर्व नदीनिका भंते कहिए समुद्रधिपे प्रवेश करनेंरिप बहते निकसनेते दशगुणा प्पास है। जैसे गंगाका सादा पासठियोजन यहुरि सर्व नदीका गाध फाहिए उड़ाईका प्रमाण सो अपने भरने म्यास के प्रमागर्ने पचास माग प्रमाग है जैसे गंगाका आधयोजन । ऐसे ही अन्यनदीनिका जानना ।। ६००॥ पदिणिग्गमे पवेसे कुंढे अण्णत्य चावि तोरणयं । विवजुदं उपरि तु दिकष्णावाससंजुचं ॥६०१॥ नदीनिर्गमे प्रवेशे कुई भन्यत्र चापि सारणकम् । बिंबयुतं उपरि तु दिइन्यावाससंयुक्तम् ॥ ६०१॥ अर्थ-नदीनिका निर्गमे कहिए निकसनैका दहका द्वार भर प्रवेश कहिए समुद्रविपै प्रवेश पारनेका दीपके कोटका बहुरि कुडे कहिए कुंडते निकसनेका द्वार बहुरि अन्यत्रापि कहिर और भी जायगा इनवि उपरि जिन सिंध करि संयुक्त अर दिककुमारनिके मंदिरनि करि संयुक्त तोरण है॥६०१॥ .
- क्षेत्र पर्यंत दूणे दूणे हैं। तहां गुणकारका पिंड अर द्वीप अर स्वकीय गुणकार इनको दर विलोमगार- यामें कहे जे वर्ष भर वर्षपर पति निनो विभागका प्रमाण कह हैं- तत्तोरणवित्यारों सगमगणदिवामरिमगो उदयो । यासादु दिवट्टगुणों सम्बत्य दलं हवं गाही ॥ ६०२ ॥ तधोरणविस्तारः समयमनटीभ्याममहाक: उदयः । ध्यातान् द्वधगुण्यः सर्वत्र दले भोन् गायः ॥६०२॥ अर्थ-तिन तोरणद्वारनिका विस्तार जो चौदाईको प्रमाण मो ती अपना अपना व्यास समान है । यहरि न्यासते याद गुणा रदय कहिए उचाईका प्रमाग है। मेर कका निर्गम द्वारका तोरण सवा छह योजन चौदा अर ना योजन तीन आठवां भाग ऊंचा है । ऐसे ही अन्यत्र जाननां । बहुरि सर्वत्र तोरणनिका गाघ कहिए टदाई -1, .twisit . योजन प्रमाण है । इन गंगा आदि नदीनिका ऐसे गमनादि जानन ६०२ ॥ ऐसे कया त्रैराशिक करि ल्याया हुवा भरत क्षेत्रवि व्यासकों कह हैं;- विजयकुलदी दुगुणा उमयंतादो विदेहवस्सोरि । गुणपिंडदीवसगगुणगारो हु पमाणफलइच्छा ।। ६०३ ।। विजयकुलादयः द्विगुणा टमयांततः विदेहवन्ति । गुणपिंडद्वीपस्वकगुणकारो हि प्रमाणकटेच्छाः ॥ ६०३ ॥ अर्थ-विजय कहिए क्षेत्र अर कुलाचट पर्वत ते दोऊ दक्षिण उत्तर दिशाते कनते है । फल इच्छा कीजिए इसतै त्रैराशिक करि तिस तिस क्षेत्र वा पर्वतनिका विस्तार जो चौड़ाईका प्रमान ? ल्यावनां । भावार्थ-सर्व गुणकारनिका जोड़ दिएं एकसौ नित्रै होइ सो तो सर्वत्र प्रमा राशि करिए । वहुरि जंबूद्वीपका व्यास लाख योजन सो सर्वत्र फलराशि करिए। बहरिदोऽ टर विदेह पर्यंत दूणा दूणा गुणकार सो भरतका एक हिमवत्का दोय हैमवतका प्यारि महा हिमवद आठ हरिका सोलह निषदका बत्तीस विदेहका चौसठ नीलका वतीस रम्यकका सोलह सन आठ हैरप्यवतका च्यारि शिखरीका दोय ऐरावतको एक गुणकार है । सो इच्छाराशि करिर र फल राशिको इच्छा करि गुणि प्रमाण राशिका माग दिएं अपना अपना क्षेत्र वा मुलाच्छ चौदाईका प्रमाण आये है ॥ ६०३ ॥ आगें तैसे ही त्रैगशिक करि सिद्ध मया विदेहके विक्रमका अंक ताहि प्रतिपादन की संता इहात उपरि कहिएगे जे विदेह क्षेत्रादिक तिनके प्रमाण त्यावर्नेका विधान कहें है।--- भरहस्स य विक्खंभो दीवस्स गउदिसदमागो। पंचसया छन्वीसा छच्च फला ऊणवीसस्स ।। ६०४।। भरतस्य च विष्कंभो जंबद्दीपस्य नबतिशतभागः । पंचशतानि पदिशानि षट् च कला एकोनविंशतः ॥ ६०४ ।।
। नरतिर्यग्लोकाधिकार। २५७ अर्थ- F-भरत क्षेत्रका विष्कंभ जो व्यास सो जेद्दीपक भ्यासकै एकमो निचा भाग प्रमाग । सो फैसा है ! पाचमै छन्बास योजन भर एक योजनका रगर्गस मागविष यह कला प्रमाण रतका विष्कम है ॥ ६०१॥ चुलसीदि छतेतीसा पत्तारि कला विदेशविक्खंभो णदिहीणदलं विजयावरसारविभंगवणदीहा ।। ६०५ ॥ चतुरशीतिः पट्नयत्रिंशत् चतस्रः कामा विदेहविष्यामः । नदीहीनदल विजयवक्षारम्भिगवनदी ॥६०५॥ अर्थ-चौरासी छह तेतीस इन अंकानि करि तेास हजार सहम चौरासी योजन ३३६८१ भर एक योजनकी उगणीस फाटाविप च्यारि कला इतना विदेह क्षेत्रका विष्कम पाहिए. चोदाईका रमाण है । तिहकै बीपि सीता या सीतोटा नदीका प्रयाह है । ताने विविष्यभमैगी नदीका वेश्कम घटाए अवशेषका आधाका जो प्रमाण सोई यत्तीस विदेह क्षेत्र मोटर वशार गिरि भागद भगा नदी देवारण्यादि यन इनका लंबाईका प्रमाण है । सो विदेह विष्कम ३३६.८४१४+१०मों पच से पोजन नदी ध्यास घटाएं अवशेष ३३१८४४१९ को भाधा किए सोनदानार पाच वाण योजन दोय काला तहां दर्घिताका प्रमाण होई ॥६०५॥ भव विदेह क्षेत्रके मध्य रिश्ता ऐसा जु मेरगिरि ताया कहे हैं;- मेरू विदेहमञ्झे णवणादिदहेफागोयणसासा । उदयं भूमहवासं उबरपरिगवणघउपाजुदो ॥ ६०६ ॥ मेरः विदेहमध्ये नवनवतिदशेफयोजनसहाराणि । उदयः भूमुग्वव्यासः उपमुपरिगषनधनुष्पयुतः ॥६०६॥ अर्थ-विदेच्या मध्य प्रदेशविौ मेरगिरि है ताका निन्यारे दहा एकरगर पोजन र भूमुग्न भ्यास है। भावार्थ-मेश मिण्यार हजार योजनती उपा है । दागिर पोजन चौदा है। उपरि एक हजार पोजन घोराहे । यार सो मेस रपरि टपार करताना से भोपारि पन तिन फरि संयुक्त है॥६०६॥ भय पन घटयो नाम र तिनका तरको प्रतिशन को- भू भरमाल माणुग गंदणसोमणसपागं पपर्ण । इगिपणपणपाएपरिषद पसयाणि गहूर्ण ॥ ६.७॥ गुवि भाल सानु, नेदमसौमनसाहुप, च परम् । एक पंचनामतीहतरपसतानि गरा।।६०७ ।। अर्थ-सा नामा न तो भूना करिए मेरेममि डी और है । मदन सौमनस पडिक ९ न मेरो करनी है। विवि मेरा शिव से गिरविनीता पाई है । सो एक पन तर पर समान २५८ त्रिलोकसार- जाइ तिट है । भावार्थ-मेरगिरिकै चौगिरद भद्रसाल नामा वन ती पृषी पर तहांत एक गुणित पांचसै ताका पांचस योजन उपरि जाइ नंदनवन है । वहरि टाई- एकसौ पचीस तीह करि गुणित पांचसै ताका वासठि हजार पांचस योजन उपरि र वन है । बहुरि तहान बहतार गुणित पांचसै ताका छत्तीस हजार योजन टपर वन है॥ ६०७ ॥ आगै तिन वननित्रिम विष्टते वृक्षनिकों कहें है,- यंदारदपयचंदणयणसारमाचचोचोहि । तंयूलिपूगनादीपहुःसुरतरुाद कयसोई ।। ६०८ ।। मंदारचूनपफचंदनधनसारमोचचौः । तांथलीगजातिप्रभृतिमुरतरुभिः कृतशोमानि ॥ ६०८ ।। अर्थ-मैदार अर आंव चंपा चंदन धनमार नाडियर ताबूली मुपारी जाप इत्यादि देव शनि करि कोनी है शोमा निनिनें ऐसे ते वन है ॥ ६०८ ॥ मर और मेरनिका यननिक अंतराल निरुपणकर मिम करि उचाईका प्रमालको पणसप पणसयसहियं पगवण्णसहस्सयं सहरमाण । अहावीसिदराणं सहस्सगाई तु मेरुण ।। ६०९॥ पंचरात पंचरातसहित पंचांचाशतसहम्मकं सहवागा अधाशतिरितरेषां सहसगावख मेगशाम् ॥ ६०९॥ अर्य-इतर में धातु की पैड पुकगई मंधी प्यारि मेर निन पृथ्यो । बनाताने पांच योजन उपरि जाइ नंदन है । तो पांच सस्ति पचान हा ५५५०० टरि जाइ माननग यन है । बदर तहान अटास हजार योजन टपरिमा वन में वनिका अगक इनका जोड दिए भागमा हना यो जन से कि उनका प्रमान जानना । वहरि पापिही नि गार करिए मसर दोन नाम जाननः ॥६०९ ॥ दिन वनरा मिनाको नि, पाशंगं घमामा परयोगगर्प पाम। পদার্গ যান নগণাগ অগালি গালাগি ?! व महापानसभा मनाने का मनालापन मान ॥ ६१० ॥ अETERNMENT ki mastri Pre? . . . Trni niti ५.in Finis...!
. . नरतियालोकाधिकार। २५९ साने लिस पन चतुष्पविषं निरते जे चैयाम्प तिनकी संख्या कहैं हैं; एपं.कवणे पडिदिसमैकेफजिणालया सुसाइति । पडिमेरुमुचरि तेसिं वण्णणमणुवण्णइस्सामि ॥ ६११ ॥ एकैफवने प्रतिदिशामकैकजिनालयाः मुशोभते । प्रतिमेग्मुपरि तेपी वर्णनमनुरर्णयिष्यामि ॥ ६११ ।। अर्थ- मेरु प्रति एक एक वनविषे एक एक दिशा प्रति एक एक चैयालय है । ते मे प्रति सोलह चयाटय सोभ है । तिन घेयालयानका वर्णन उपरि पौठे मैदीश्वर दापका नया अवसरवि वर्णन करोगा ।। ६११॥ आगै मुदर्शन मेगकै दक्षिण उत्तर भद्रसाल घनका प्रमाण कहें हैं;- पढमपणइसीदंसो दक्खिणउत्तरगभहसालवणं । पिसदं पण्णासहियं गुलपमंदरणगेरि तहा ॥ ६१२ ॥ प्रथमवनासाशीयंशः दक्षिणोत्तरगभद्रशाटयनम् । द्विशत पंचाशदधिक क्षुलकर्मदरनगेपि तथा ॥ ६१२ ।। अर्थ-मुदर्शन मरके पूर्व पश्चिम भद्रसाल वनका प्रमाण वाईम हजार योजन कह्या ताका दयामीवा भाग प्रमाण दक्षिण उत्तर भदसाल वनका प्रमाण है । सो पचास सहित दोयसै . जन है । भावार्य-मुदर्शन मेरकै चारयों गजदंतनिके वाचि प्यारों दिशानिविपै भद्रसाल घन सो पूर्व पधिमपि तो बाईस हजार पोजन चौड़ा है । दक्षिण उत्तरविषै अदाईस योजन हा है। परि क्षुल्लक मंदर नग फहिए छोटे च्यारि मेरगिरि तिनविषै भी तथा कहिए तैसे ही गै कहिए है । पूर्व पश्चिम भद्रसालका विष्कम ताकै अन्यासी भाग प्रमाण ही दक्षिण उत्तर पदसालका विष्कम है ॥ ६१२ ॥ वेदी वणुभयपासे इगिदलचरणुदयवित्थरोगाढो । हेमी सपंटघंटाजालगुतोरणग घगुदारा ।। ६१३ ॥ वेदी बनोभयराधे एकदलचरणोदयविस्ताराचगाधाः । हेमी सर्घटघंटाजालमुतोरणका बहुद्वारा ॥ ६१३ ॥ अर्थ-मसालादि वननिकै बाह्य अभ्यन्तर दोऊ पार्थनिविष वेदी हैं। जैसे बागकै गुरा बिना भीति हो है से जो होइ ताका नाम वेदी है । सो वेदी एक योजन ऊंची आध गगन चौड़ी पाय योजन जाकी नीव ऐसी है । बरि मुवर्णमई है । यद्दरि महा [टा भर सोटी घटानिकर सोभित है ऐसे भले सोरणनि करि संयुक्त जे बहुत द्वार जाकै पाईए है मी दी है। आगे मेहका चित्रा पृथ्वीके तलविप व्याम ल्यारिप बहुरि नंदन सौमनस धनका यामादिक वा तिनके निकट मैग्का ब्यास उच्चवादि ल्याबविौ हानिचय स्याक्नेकौं गाया दीय करि कहें हैं । तहा प्रथम ऐसा घराशिक जानना । मेरका उपरि मुग्न व्यास हजार योजन तो तिसको मूलवि। भूमि व्यास दश हजार योजन ता घटाएं नव हजार रहे । सो निन्याग ।
अर्यमेरु गिरिक तीह तीह कटनीका भू व्यास कहिए नीचला चौड़ाई का प्रमाण उपरिका चौड़ाईका प्रमाण तिह तीहावि अपना अपना चयका प्रमाण मिलाएं मेलगिरिका । जो मेरतविपै हानिचय नियोजन अर दश म्यारवहां भाग याकों मेरुका पृथ्वीविष म्यामा २६० नियोकसार- हजार योजनकी उचाइविप नव हजार योजन प्रमाण धानि चय होइ ती एक १९, फेता हानि चय होइ ऐस करि ना कर अपवर्तन किर एक योजनका पार प्रमाण आया। एक योजनकी उचाई मएं व्यासरिय इतना घटे॥ ६१३ ॥ बहरि याको धरि और त्रैराशिकका विधान कहिए है;- इगिजोयण एगारहभागो जदि वड्दे पहादि का। तलणंदणसोमणसे किमिदि.चर्य हाणिमाणिनो ।। ६१४ ॥ एक योजनस्य एकादशमागः यदि वर्धते प्रहीयते या। तलनंदनसौमनसे किमिति चर्य हानिरानेतन्यम् ॥ ६१४ ॥ अर्थ-एक योजनकी उचाई विपै एक योजनका ग्यारव्हां भाग जो नाचको घंटे वा उपरि अपेक्षा नीचे बधै तो मेरुका तलको उचाई हजार योजन पांचसै योजन समझन्द्रत ऊपरि सौमनसकी साढा इकावन हजार योजन तोहतिये । व या ऐसे रैराशिक करि हानिक्य त्याना र उपरि अपेक्षा प्रटने का नाम हानि अपेक्षा वध का नाम चय ताते हानिचय ऐसा नाम कहा सो तीनों जायगा प्रमाण : योजन फलसशि एकका ग्यारव्हां भाग इच्छा राशि पांच हजार सादा इकावन हजार व्यासनिावपै वृद्धि निपै योजन अर दश ग्यारव्हा माग हो है । नंदनविप हानि पैंतालीत ' पांच ग्यारव्हां भाग हो है । सौमनसविपै हानि च्यारि हजार छसै इक्यासी योजन ना . भाग हो है ।। ६११ ॥ सगसगहाणिविहीणे भूवासे चयजुदे मुहव्वासे । गिरिवणहिरभंतरतलवित्थारप्पमा होदि ॥ ६१५ ।। स्वफस्यकहानिविहीने भूम्यासे चययते मुखव्यासे । गिरिवनवाह्याभ्यन्तरतलविस्तारप्रमा भवति ।। ६१५ ॥ विष अपनी अपनी हानिका प्रमाणको घटाएँ । बहुरि तीह तीह कटनीका मुख व्यास विस्तार हो है । वा बनका बाल अम्यन्तर विस्तारका प्रमाण हो है। सोई फहिए है । पूर्व हजार योजन तामें मिटाएं दश हजार नियोजन पाहा भाग प्रमाण वित्रा पृष्ट अंत जहाँ है तहां नीचे मूलविर मेहका तल व्याम है या तितही योजनका दश म्यान भाग प्रमाण हानि घटाएं दश हजार योजन प्रमाण इस सम पृष्ीय निकांट मेका र है । बहरि एक योजना पारव्हो माग घटनेषिक एक योजन उचाई होइतो नियोजन दश पार माग घटनायेय केनी उचाई होइ प्रेमाशिक करि समन्द करिशहानिकी मिलाइ९.९० + १९४१ *११ ग्यारहका अपवर्तन किए मेद तो गाय इस वी पर्यंत मेगको उचाई एक हजार योजना ।
मार्गाषाधिकार 1 {htarinirm r rarrt माग गो गम्म ९.rammar farm in EET Trim amit ना ५-११ १५निकी .- Mitramatam RR ARTI भाग कि writerat mm पर शक की Painterim नया मा दिनाना Primar तामोदर पाtitre स्वधि लागार Irri Cral कोमन कानन Art भागनान अमातर froin.rait मोगमा मानना एक पलीक रचाई मागिरि मान: मा॥६१५॥ ARE चा या चार पो पागामार्ण पगुदमो दमगपगुभिः । पदणामणगुर गुरगणे गरिमरदमी ।। ६१६ ॥ Ester पर किए। मानमीमनमा रोय ॥६१६ ।। अर्थ 1-पपा ग्यारह भाग पटरिक योजन उचाई रोदसी दास १००० का Cी राशिकविरह हजार योजन एशि भया सोई गुदर्शन ir परमाननगमिमा पाईका प्रमाण है। भावार्य-मग्न गाय मी ? maint रिहा गर्यत्र निरशिपायो पोरन मोदी कानी एटी मिनबन र बन गय मर ग्यारह हजार पोजनी रचाई पत समान यौरा रामानन मनमा पानिका हजार पोजन साधि मापामपिया सोधमा FM राकार योजनका ध्यास घटना निननी उचाई ताई फिट भी पश्या नाही समान पोहा धन्या गरि प्रम र धरना । परि सोमनमपर्यंत हानिएपका पूर्वोक प्रमाण TH सारी योजन नव ग्यारम्हा भाग ताशे मैदनवन र भन्यन्तर र पास ८९५४४६-११ पटार पारि हजार दोगस पहत्तरिपोजन भर बाट ग्यारम्हां भाग प्रमाण सौमनस पन सहित में पागल भीमनगरिय बादाम्पाम हो है। यहार सीमनमका शानिचय १६८१९११ #ti fie:: ५१५००-११ का मारहा भाग घटनेत्रि एक पोजन ठश्य होपतो सादा पान का पारा भाग घरि केता उदय राइ । ऐसे बैगशिक फार ग्यारहका अपara AE RE- बनय. समः मधन उपर सामनम बन पर्वत उचाईका प्रमाण सादा इकावन THदोन पहा सामनमा बादर ४२७२,८ -१ विष सोमनमका म्यास पाचस पाजन नाकीद 5 वानका प्रहण धि दशा कोर १००० घटाए तीन हमार दोयम बहनरि पारन आट ग्यारह मा प्रमाण मोमनम बनके अतर मेरुका म्यास हो है। इ। भी वोक्त - २६२ त्रिलोकसार- प्रकार ल्याया हुया समान चौड़ाईका प्रमाण धेरै सौमनसते लगाय ग्यारह हजार योजन मेरुकी उचाईका प्रमाण जाननी । ताकै उपरि बहुरि क्रमते घटता है। बहुरि एक योजनका ग्यारव्हां माग घटै तौ समरुद्र उपरि पच्चीस हजार योजनकी उचाईविषै कितनां घटै ऐसें त्रैराशिक किएं दौर हजार दोयसै वहत्तरि योजन आठ ग्यारव्हां भाग प्रमाण पांडुक वनविष हानिचय हो है। इनकी सौ- २२७२।८+ ११ मनसकै अभ्यन्तर मेरु व्यास ३२७२१८२११ विष घटाएं वनसहित मेरु व्यासरूप पांडुकवनका बाह्य व्यास एक हजार योजन प्रमाण हो है । बहुरि पांडुकवनका हानिचयका अश ८.११ अंशी २२७२ को मिलाइ २५००८-११ पूर्वोक्त प्रकार एकका ग्यारव्हां भाग इत्यादि विधान करि त्रैराशिक किएं सौमनसके समरुद्रः परि पांडुकयन पर्यंत व्यास लिए क्रमते घटता मेरुका उचाईका प्रमाण पच्चीस हजार योजन प्रमाण हो है ।। ६१६ ।। आरौं क्षुल्लक च्यारि मेरुनिका हानिचय ल्यावनेकौं सूत्र कहैं हैं;-- भूमीदो दसभागो हायदि सुल्लेसु णंदणादुवरि । सयवग्गं समरंदो सोमणसुवारिप एमेव ।। ६१७ ।। भूमितः दशमभागः हीयते क्षुल्लकेयु नंदनादुवरि । शतवर्गः समरंद्रःसौमनसोपरि अपि एवमेव ।। ६१७ ॥ अर्थ-भूमितः कहिए नीचैते एक योजनका दशवा माग प्रमाण विष्फंभ घटनैविषै एक योजन उचाई होइ तौ दोऊ पार्श्वनिका वन व्यास एक हजार योजन विष्कम घटनैविय केती उचाई चाहिए। ऐसें त्रैराशिक कीएं सौका वर्ग जो दश हजार तीहरूप उचाईका प्रमाण पाया । सो क्षुल्लक छोटे च्यारि मेरुनिविष नंदन वनतें उपरि समान चौड़ाईका प्रमाण लिए दश हजार योजन उचाई है । ऐसे ही सौमनस वनकै उपरि भी समान विष्कम लिऐ उचाई दश हजार योजन प्रमाण ही है । इन क्षुल्लक प्यारि मेरुनिविय उपरि व्यास हजार योजन सो तौ मुख अर समभूमिविप व्यास नव हजार च्यारिसे योजन सो भूमि तहा भूमिमैसौं मुख पदार चौरासीसौ होइ । बहुरि क्षुल्लक मेरनिको चौरासी हजार योजन उचाईविष चौरासीसे योजन विष्कम घटे तो एक योजनकी उचाईविय कितना घटै। ऐसे वैराशिक करि चौरासी करि अपर- तन किए एक योजनकी उचाईविपै एक योजनका दशवां भाग प्रमाण हानिचय हो है। धरि एक योजनकी दचाई विष एक योजनका दशां भाग घटे तो एक हजार योजनको उचाईविरे कितना घटै ऐसें त्रैराशिक किए सौ पाए सो क्षुल्लक मेनिका आमैं कहिए है । जो चौराणाने योजन भू व्यास तामै मिलाएं नव हजार पांचसे योजन प्रमाण चित्रा पृथ्वी तल मानिका ना ही नीचें विष्कम है । यहरि यामें सोई सी योजन घटाएं चौरासे योजन समभूमि म्याम हो है । बहरि एक योजना दशां भाग घटनेविगे एक योजनको उचाई होइ तो सौ योजन घटनैविय केनी रचाई होइ देम राशिक करि मन्त- समभूमि पर्यंत उंचाई हजार योजन प्रमाण आये है। वहरि एक योजनको उचाईगि एक योजनका दावा भाग घ? तो पाश्रम योजनकी रचाईविय कितना घटे में राशिक की अपवर्तन किए पचास योजन भार 1 या नरतियंग्लोकाधिकार । २६३ भ्यासमैंसो घटाएं नंदनवनफै बाह्य भैरु व्यास तेरणसै पचास योचन हो है । बहुरि एकका भाग घटनेविषे एक योजन उचाई होइ तौ पचास घटनेविषै केती होइ ऐसें राशिक फरि चिस योजन पाए सो भद्रसाल नंदनवन इतना ऊचा है । बहुरि नंदनवनका दोऊ पार्श्वसंबंधी हजार योजन न्यास नंदनवन मास मेरु व्यासमसौं घटाएं तियासीस पचास पोजन प्रमाण ६. अभ्यन्तर मेर व्यास है सो इहाँ भी एकको उचाईविप एकका दश भाग घंटे ती ५० हजारको उचाईविपै केता पटै। ऐसे त्रैराशिक किए हजार योजन पाए सो ए हजार योजन एक साधि घटे ताते नंदनवनते लगाइ दश हजार योजन पर्यंत समान उचाई साढा तिया- जोसे योजन प्रमाण व्यास है । बहुरि एकका उदयविष एकका दावा भाग घटे तो सादा पैताटीस योजन रचाईविप केता पटै ऐसे राशिक फरि अपवर्तन किए सादा पैंतालीस योजन भाए सो इतने तिस सम विष्कम व्यास ८३५० मैसो चटार अडतीसस पोजन सौमनस बनक यास न्यास हो है । यहुरि एकका दसवां भाग घटनेविष एक योजन उचाई होइ सादा पता- जीसस योजन घटनेविष फेती होइ । ऐसें पैराशिक फिर सादा पैंतालीस हजार पाए सो इतना भदनसंबंधी समदत उपरि सौमनस ऊंचा है। परि एककी उंचाईविण एक दशा भाग घटे ती दहा हजार योजनकी उचाईविप केता घटै ऐसे त्रैराशिक कोई हजार योजन होइ सोई सीम. नसवनका दोऊ पार्श्वसंबंधी हजार योजन व्यास एके साथि सौमनस के बाह्य म्यास ३८०० ममी घटें अठाईस योजन प्रमाण सोननसके अभ्यन्तर मेरु म्यास हो है । सो इतने ही प्रमाग समान ध्यास लिए उचाईका प्रमाण दश हजार योजन पूर्व स्पाये ही थे। बहुरि एककी रचाईवि एफया दायाँ भाग घटे ती अटारह हजार योजन उचाई विष येता ऐसे घराशिक करि अपवर्तन किए मयारह पाए सो सौमनसका अम्पन्तर ध्यासमैसों घटाएं हजार योजन प्रमाण मेरंका उपरि व्यास हो है । बरि एकका दसवां भाग घटनेविष एकवी उचाई होइ त भारस घटने- विप फेती होई। ऐसे पैराशिक करि अटारह हजार पाए सो इतना संगमनस संरधी समम्पासने उपरि पाहुकान है। महरि सर्व मेरनिका पट्टिकानकै मप्प चूटिका है। साको उचाई वा ना ऊपरि व्याम सो आगे रहेंगे ।। ६१७॥ आगे मेरनिका वर्ण विशेषको नियपे हैं। णाणारयणविचिचो इगिसहिसहस्सगेम परमादो। सत्तो उपरि मेरू मुवष्णवण्णाणदो होदि ।॥ १८ ॥ नानारत्नविचित्र एकपष्टिसहयर प्रयमत । नत उपरि मेर• मुवर्णवान्वित भगति ॥ ६१८॥ अर्थ--मे प्रथम नाचने लगाय कसरि मार दोजन कोई पनी नानाकार बनेका बल्लनि करि चित्रह | रताने :पी. मर घाट मग मा करिमन है॥ ६॥८॥ मागे मदनादि बनाना निधन हो न तनक नामा दायर की।
२६४ त्रिलोकसार- माणीचारणगंघव्वचित्तणामाणि वहभवणाणि । गंदणचउदिसमुदओ पण्णासं तीस वित्थारो ॥ ६१९ ॥ मानीचारमगंधर्वचिननामानि वृत्तभवनानि । नंदनचतुर्दिा उदयः पंचाशत् विंशत् विस्तारः॥ ६१९ ॥ अर्य-मानी १ चारण १ गंधर्ष १ चित्र १९ हैं नाम जिनके ऐसे मोर मंदिर नाना दि धारि दिसानिवि हैं। तिनकी टंचाई पचास योजन चौड़ाई सीस पोजन प्रभाग १ सोमणसदुगे वनं वनादिप्पा सुवण तप्पडयं । लोहिदभनणहारिइपांडुरा दलिददलमाणा ॥ ६२० ॥ सौमनसादिके व पनादिनभ मुरर्ण सप्रभ । टोहितजनहारिद्रपाडुरा दलितदलमानाः ।। ६२० ॥ अर्य-सामनम पाठक इन दोऊ यननिनिय भी पूति दिशानिति पारि पारि भान है। में कौन ! पन १ मप्रभ १ मार्ण १ मुवर्गप्रम १ ए सीमनसहित मदिरनिके माम।। बन १ हरिब १ पार १ ९ परिसिौ मंदिरनिके नाम है । सहा नानीमा in में टप मोडाईस प्रमाण कया ताने सौमनसआिण भर तीहसों मी पोडी भाग मन भानि मामी आ निनको दी लिनको करें - नामरगादी गोमो यमयम्णवरलोयवालपमा । पुमादी नेमि पुर गिरिकणी साद्धकोहिनि ।। ६२१॥ वनपतग माम; पमाणामेरा: रूपादाम्याः । Tient मा गिरिकन्यकाः साकारिताम् ॥ १२१ ॥ थां-नि मानिक अधिनि मामी मोम १ यम १ बाय १ र १ मामला * निरि नि है। मंदिर पनि दिन पर महादेनकी कन्या की भतीदेवांगना पार॥ १२१॥ Enw आदि को,- मापद वागदगाउ मलपहार्य नगर्ण । महिमामगाडिया पगी ।। १२२ ॥ म.मनम् । Emairfal ! ॥ १२२ ॥ ४-Rumourniruttire R18RE: H Iri Feri नरतियग्लोकाधिकार २६५ मे प गपंपारिजलापहवागुपहा विमाणाप्ता । कापेमु भोपवाला पाहुणो बहुमयविमाणाणं ॥ ६२३ ॥ से च सयममारिएचउमभवल्गुममा विमानेशः । फा सोकपाल प्रभवः यामातविमानानाम् ॥ ६२३ ।। अर्ध-तो सीधर्मक लोकपाल सपिये स्वप्रम १ मरिष्ट १ जम्प्रभ १ बल्गुप्रभ १ विमाननिय शमत ईम-स्वामी है । भावा-फपानिका स्वर्गविर वसनेके विमान है । अर मेर उपरि भी तिनके भवन पाए हैं। परि ते सोकपाल बहुत से कहा विमाननिकै प्रभु है। एह सराव सपासटि हजार से उपासठि विमानानफे सावि अधिपति है ।। ६२३ ॥ घा नदनपनविपतिएता पतरदेवको परिवारसहित को है। पलभरणामहरे पंदणगे मरुपव्वसाणे । उदयमहियसपदलगो ताणामो तरो वसई ॥ २४ ॥ बटमदनामटे नेश्नगे मेरपर्वतशाम्याम् । उदपमहीकरातालकः तन्नामा म्पतरो वसति ॥ ६२४ ॥ अर्थ-~मेर पर्वतको ईशान विदिशाविप नदनविष पाइए ऐसा सौ योजन नीचे चौडा ताका भाषा पचास योजन उपरि चोदा जो बलभद्र नामा कूट है । तीह उपरि बलभद्र नामा पन्तर देय यस है ॥ २४ ॥ श्रागै नदनवनविय तिष्ठते जो भवन तिनके दोऊ पार्श्वनिविपै तिष्ठते जे कटादिक तिनकों गाथा तीन फरि को है-- णंदण मंदर णिसहा हिमवं रजदो य रुजयसायरया । वना धडा फमसो गंदणवसईण पासढुंगे ।। ६२५ ॥ नंदनो मंदरः निपधः हिमवान् रजनभरचकसागरफो। घर: कुटाः क्रमश: मानवसान पाचदिक ।। ६२५॥ अर्थ-नदन १ मदर १ अनिश्व १ हिमान अर रजत १ रुचक १ भर सागर १ यम निए भाट वूट क्रमते नंदनवनविष लिटते जुषसती कहिए पूर्वोक्त प्यारि भवन तिनके दोऊ पार्श्व- १वय पाईए है ॥ ६२५॥ हेममया तुंगधरा पंचसपं तहलं मुहस्स पमा । सिहिरागहे दिकण्णा पसंति तासिं च णामिणं ॥ २६ ॥ हेममयाः तुगधरा परशतं तहलं मुसस्य प्रमा। शिखरगृह विकन्या, यसति सासां च नामानीमानि ।। ६२६ ॥ अर्थ- कट मुवर्ण मई है । वहरि तिनको उचाई पाचस योजन है। नो भू ग्यास पाचसे योजन है। ताका आधा अद इमे योजन उपरि मुग्प व्यास है । तिन कुटनिक शियर मदरनिविषे दिक्कुमारी वमे है ।। ६२६ ।। त्रि.४
२६६
बिलोकसार-
तिनकै ए नाम आगें कहिए है:-
मेहंकर मेहवदी मुमेह मेहादिमालिणी तत्तो।
तोयंधरा विचित्ता पुप्फादिममालिणिदिदया ॥ ६२७ ॥
गेकरा मेघवती १ मुमेधा मेघादिमालिनी ततः ।
तोयंघरा विचित्रा पुष्पादिममाला अनिदितका ॥ ६२७ ॥
अर्थ-मेघकरा १ मेववती १ मुमेवा १ मेघमालिनी १ तोयंवरा १ विचित्रा १ पुषमाला
१ अनंदिता ए नाम है ।। ६२७ ।।
आगे नंदनविप जे वावड़ी हैं तिनका स्वरूप गाथा तीन करि कहें हैं।-
अग्गिदिसादो चउ चउ उप्पलगुम्मा य णीलाण उप्पलिया।
वावाओ उप्पलुज्जल भिंगा छही दु भिंगणिभा ।। ६२८ ।।
अमिदिशः चतस्रः चतस्त्रः उत्पटगुल्मा च नटिनी उत्पलिका ।
वाप्यः उत्पलोग्वला भुंगा पष्टी तु भुंगनिभा ॥ ६२८ ॥
अर्थ-अग्निदिशातें लगाय च्यारौं विदेशानिविय च्यारि च्यारि वावड़ी हैं । तिनके नाम
क्रमतें कहिए हैं । उत्पल गुल्मा १ नलिनी १ उत्पला १ उत्पादकला १ बहुरि भुंगा १ उटी
गनिभा १ ।। ६२८॥
कजल कजलपह सिरिभूदा सिरिकंद सिरिजुदा महिदा।
सिरिणिलय पलिणि पलिणादिमगुम्मिय कुमुद कुमुदपहा ॥ ६२९॥
कज्जला कज्जलप्रभा श्रीभूता श्रीकांता श्रीयुता महिता ।
श्रीनिलया नलिनी नलिनादिमगुल्मी कुमुदा कुमुदप्रभा ॥ ६२९ ।।
अर्थ-कज्जला १ कज्जल प्रभा १ वहुरि श्रीभूता १ श्रीकांता १ श्रीमहिता १ श्रीनिडया
१ बटुरि नलिनी १ नलिनगुल्मा १ कुमुदा १ कुमुदरमा १ ए वावड़ाके नाम हैं ॥ ६२९ ॥
मणितोरणरयणुम्भवसोवाणा हंसमोरजंतजुदा ।
पणदलदीहयासा दसगाहा सोलवायीओ ॥ ६३०॥
मणितोरणरत्नोद्भवसोपानाः हंसमयूरयंत्रयुताः ।
पंचाशद्दलदीर्घन्यासा: दशगाधाः पोडशवायः ॥ ६३० ॥
अर्थ ते सोलह वावड़ी मणिमई तोरण द्वार अर रत्ममई सिवाणानकार मयुक्त हैं । वहीर
स मोर आदिनिके यंत्र करि संयुक्त है । बहरि ते पचास योगन देवी ताकी आधी पास
जन चौड़ी दश योजन उंडी वावड़ी है ।। ६३० ॥
आगे तिनके मध्य प्रासाद है तिनका स्वरूप गाथा दोय करि कहे हैं-
दपिसणउत्तरवावीमज्झे सोहम्मजुगलपासादा।
पणपणदलचरणुच्छययासा दल गाहयउरम्सा ॥ ६३१ ॥
नरतियंग्लोकाधिकार । २६७ दक्षिणोत्तरवापीमध्ये सौधर्मयुगमासादाः । पंचघनदलचरणोच्छ्यव्यासाः दलगाढचतुरस्राः ६३१ ॥ अर्थ-रुको अपेक्षा दक्षिण उत्तर वावड़ानिस मार सौधर्म अर ईशान इंद्रके भासद मंदिर है। तहां अग्नि नरुति दिशानिविष आठ याबडी है जिनविपै सौधर्म के मादर है। अर वायु ऐमानवि दिशानिवियं आठ चापड़ी हैं तिनिधि ईसानके मंदिर है। ते मामाद पाच घनका आधा सादा वासठि योउन तो उचे हैं। अर ताहीका चौथा भाग सा इकता। योजन चौड़े हैं। अर भाध योजन जिनकी नीव है।ऐसे चौकोर मंदिर ६३१॥ सोचिदठाणासिदपरिवारोगिंदो टिदो सपासादे । सम्वमिणं पदियव्वं सोमणसवचि सविमेणं ॥ ६३२ ।। स्वोचितस्थानसितपरिमारणेदः स्थितः स्वप्रसा। सर्वमिदं कथितयं सौनमयनेमि सविशेष ॥ ६३२ ।। अर्थ-वर्गमित मुधर्मा नाम सभाविप सति है। से अपना अपना योग्य आम्दानी तियता अपना परिवारसहित अपना प्रमादविध हा इंद्र आहे तर ति है। यहरि जी भरलनिक पार्थनिविप कटादिक व अनादि दिशानिवि यापही या ति मन्य प्रासाद से दिनाना फहे तैसें ही सर्व विशेष सहित सीमनस पनरिप भी जाननें ।। ६३२ ॥ अब याकै अनतरि मेरफा शिरार उपरि तिनी जे शिरा निनफा नाम स्थान बगे पांडुकपांडपंपलरचा तह रत्तकंचलवस मिला । ईसाणादो फंचणरुपयनवणीपरहिरणिहा ॥ ६३३ ॥ पाय.पाहुयायटरसा तथा रतयारया: शिलाः । ईशानात् पाचनप्यसपनीपरविरनिभाः ॥ ६३३ ॥ अर्थ-दान गाय पारयो विदिशानिवि मामत यांचन कहिए सोनी Profie रूपो सपनीय फरिए सायो सोनों रुचिर फ.हिए ही सीह समान वर्ग पर ऐसा एक. १९४५ - पला १ का १ रक्तपांबला १९ नाम निनको ऐसी शरि शिरा मेर. मरिन । तहाँ पाइए हैं।। ६३३॥ भागे ते शिला कौन सा है नयी स्पिति है सो हैं :--- भरहररविदोरावदपुप्चविदेश निणापरदाभी । पुचवरदपिवणुत्तरदा अधिरधिरभूपि ॥॥ ३४॥ भरतापरविसरतादिमिननियमाः । पिरशियोत्तरदा सरिराधिरभूमिः ॥ ६ ॥ अर्थ- २५ यदि शिव भरवि दिम मित सधिकार है नकार | नका मानिस हो है। रमि
प्रियोगार-
पश्रिम विना दियानि प्रीमी गार गालि मन मा मन।।
विगंगा अर्थ मेरे सामने न माया गाना॥२३॥
टान करि निन जिना आमार ,
अद्धिदुणिहा गो सयपणागदामुदया।
आमणनियं तदुवीर निगमोहम्मदुगरदियद ।। ६३५ ।।
अदुनिभाः मीः शानामदीनच्यामोरया. ।
आसनवयं तदुपरि मिनमोधर्मयप्रतिपद ॥ १३५॥
अर्थ- म शिला अदं चन्द्रमाके आकार ? । यहार सी योजन लंबी है।
पचाम योनन चौड़ी हैं। आठ योजन मोटी है। न शिधानिक टपरि तौकर सोन
संबंधी तान सिंहासन है ॥ ६३५॥
आगे तिन सपरि तन सिंहामननिकै स्वामी इत्यादिक विशेष कर है-
मझे सिंहासणयं निणम्स दरियणगये तु सोहम्मे ।
उत्तरासाणिंदे मदासणमिह तयं च ।। ६३६ ।।
मध्ये सिंहासन मिनस्य दक्षिगगनं तु सोचमें।
उत्तरमीशानेंद्र भद्रासनमिह अयं वृत्तम् ।। ६३६ ॥
अर्थ-तिन तीन सिंहासननिवि मध्य वीचिता मिनेन्द्र देवका मिहासन है । ताकी दहित
दिशाको प्राप्त सौधर्म इंद्रका भद्रासन है। उत्तर दिशाको प्रात ईशान इंद्रका भद्रासन है। इहाँ एट
आसन है ते गोल है।। ६३६ ॥
आर्गे तिन आसननिका उदयादिक अर मेरुकी चूलिकाका स्वरूप कहें हैं;
उदयं भूमुहवासं घणु पणपणसय तददपुचमुहा ।
वैलरिय चूलियस्स य जोयण चत्तं तु वार च ॥ ६३७ ।।
उदयं भूमुखन्यासं धनुः पंचपंचशतं तदर्धर्वमुखानि ।
वैडूर्यचूलिकायाश्च योजनं चत्वारिंशत् तु द्वादश चत्वारि ॥ ६३७ ॥
अर्थ-तिन आसननिको उचाई पावमै धनुष अर नीचे चौटाई पांचसै धनुष टपरि चौह
अदाईसै धनुष प्रमाण है । वहुरि ते आसन पूर्वदिशाओं सनमुख है। बहुरि पांढुकवनकै मध्य मेरी
थैर्य रनमई चूलिका है ताकी उचाई चालीस योजन नीचे चौड़ाई वारा योजन उपरि चौड़ाई
च्यारि योजन प्रमाण है ।। ६३७ ॥
आर्गे कहे जु ए सर्व तिनका किछू विशेष कहे हैं।
पवद्यावीकूड़ा सव्वाओ पंडुगादिय सिलाओ
वणवेदितोरणेहिं णाणामणिणिम्मिएहिं जुदा ॥ ६३८ ॥
पर्वतवापीकूटाः सर्वे पांडुकादिकाः शिलाः ।
वनवेदीतोरणेः नानामणिनिर्मितैः युताः ॥ ६३८ ॥
नरतियग्लोकाधिकार। २६९ अर्थ- पापी पट पाक आदि शिरा ए सई ही नाना प्रकार माण कर निर्मापित जन पर कर तोरण तिन पारि संयुक्त जानने । पर्वतादिफक चौगिरद यन है तिनकै घेदी । ती संदीप मोरगसहित चार पाईए है ॥ ६३८ ॥ माने जमका स्थानादिक परिवारसहित ग्यारह मायानिकरि फहै है,- पीलममीचे सादापुचतटे मंदराचलीसाणे । उत्तरकुरुमिद यूथली सपंचसयतलवासा ॥ ६३९ ।। नीरसमीपे सीतार्वतटे मैदराचमान्यो । उतरकुरी जपूयटी सपंचशततटम्पासा ।। ६३९ ॥ अर्थ-नील नामा पुलाचल पर्वतक समापि दक्षिण सन्मुस जाती सीतानीका पूर्व दिशासंबंधी मेर पर्वतनै ईशान नामा दिशा तहाँ उत्तरकुर नामा भोगभूमिका क्षेत्रविष जेबूनामा वृक्षकी टी है। जैसकै पाटा इहो हो है तैसें तहाँ स्थली जाननी सो यह स्थली पांचसे योजन नाम है । तरन्यास कहिए नीचे चोदाई जाकी ऐसा है ॥ ६३९ ।। अंते दलयाहा मझे अहुदय वह हेममया मज्झे पलिस्स पीटीमुदयति अवारयऊ ।। ६४० ॥ भते दयाहत्या मध्ये असोदया वृत्ता हेममया । मध्ये स्पस्या: पीटमुदपत्र अपवादावतुः ॥६४०॥ अर्य-यहुरि सो स्थटी अंतविप रेहडे तो बाध योजन प्रमाण मोटी है । यहरि मध्यविप चि भाट योजन ऊंची है गोल आकार लिए है अर मुरर्णमई है। महरि तीह स्थलीकै मध्य वीचि आठ पोजन उंचा बारह योजन नाचे चीड़ा प्यारि योजन उपरि चौड़ा ऐसा पीठ है पीठ नाम पीढका है ।। ६४०॥ तत्यलिउपरिममागे पाहि पाहि पवेदिऊण ठिया । फंचणवलयसमाणा पारंपुजदिया णेया ।। ६४१ ॥ तस्थत्युपरिमभागे बहिर्वहिः प्रवेष्टय स्थिताः। कांचनवलयसमानाः दादशायुजवेदिकाः हेपाः ॥ ६४१ ।। अर्थ--तीह स्थलीका उपरला भागविप यास वेदि कार मुवर्णका घलय समान आर योजन उंची साकै भाठवें भाग चौड़ी नाना रत्ननिकरि व्याप्त ऐसी धारह अंबुज वेदिका जाननी । मावार्थ-स्थलीकै उपरि प्रथम वेदीकों वैदि दूसरी वेदी है। दूसरीको वेदि तीसरी है । ऐसे बारह बेदी जाननी । ते सर्व वेदी मुवर्णमई रानजदित हैं आध योजन ऊँची है । एक योजन सोलम्हा भाग प्रमाण चौड़ी है ॥६११॥ चाउगोउरवं वेदीपाहिरदो पडमारदियगे गुण्णं तदिए मुरुत्तमाणं अहदिसे अहसयरुश्खा ॥ ६४२ ॥ -
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नरतिर्यग्लोकाधिकार । २७१ अर्थ भनामहत्तराणा द्वादशे पश्चिमायां सतर। मुख्ययुता: परिवारा: पम्पः पंचाभ्यधिस ॥ ६४६॥ धारव्हा अंतरालगिरी पश्चिम दिशापि सात प्रकार सेनाका तु महतर प्रधान मनके माल जेयूरक्ष है। ऐसे एक मुख्य वृक्ष संयुक्त सर्व परिचारक वृक्ष पर नामा हरि जी श्री. देवी कमलनिका प्रमाण कसा था तात पाच अधिक जाननें । इहाँ चौधा अलगलयि ध्यारे देश- गनानिक वृक्ष अर एक मुख्य वृक्ष ऐस पाच अधिक जानने । १०८१४:१६०००1४०००३२०००) ४००००१४८०००१७१११ सर्व जंक्ष एक लाख चालीस हजार एकसी पौस भए । ६१६॥ दलगाढवासमरगय जायणदुगतुंग मुत्थिरवरवंधों पाठिय स्वार जंयू पन्जदलवासदी रउसाहा ।। ६४७ ।। दलगाढव्यासमरकत योजनकितुंग मुस्थिरस्कंध ! पीठादुपरि र पत्रदलाव्यासदी प शारद ) ६४७ ॥ अर्थ-आध योजन है गाय पाहिए वारिफ द की गरि मरकत मागमई शर पोटत उपरि दोय योजन ऊदा यहरि मले प्रकार स्थिर है पंड आका ऐगा मुख्य जेवट बहरि स्कंध जो पंड हाक उपरि वनमई आध योजन चाही शाठ योजन की पारिहिए हल्ली हैं ॥६॥ णाणारयणुवसाहा पयालमुमणा मिदिंगसरिमफला। पुढविमया दसतुंगा मनग्गे उपवासा ।। ६४८ ॥ नानारनोपशार. प्रयालगुमनाः मृदंगसाराम:। वीमय: दशग मध्येप्रे पट्यास. ॥ ६५८ ॥ अर्थ-बहरि सो जेयूक्ष नाना प्रकार रनमई उपशायर पारिएको पाइप ऐसा है । वरिप्रभाउ करिए मना समान वर्णन पर है गुमन करिए किया परि मृदंग समान है पर जाक ऐसा है। परि पाई पानीमा जामणि शकामा आकार है मान अस नाम है । मादा पोजन चाम: योजन बीमा है। ऊपर प्यारि यांजन बहा है। इस पूरी दीया अरCH में स्थान जानन ॥१८॥ परकुलगिरिमा जिनहो मेगातिदपि । आदरभणादरा नारालुत्थाणमारामा ॥ ६५९॥ उसरपुरि रिशशारा जिन पाये। अनादरयो पश्योर' । ६४९ ॥ अर्थ maitri tip Marsha पर तोपी जिनमत। | eh तीन I, . ६ र ५:१८ ने आदर र अनादर गाम ५" देव नियम है । ६.६,
२७२
त्रिलोकसार-
आगें परिवार वृक्षनिका प्रमाण अर तिनका स्वामित्वको कहैं हैं-
जंबूतरुदलमाणा जंबूरुखस्स कहिदपरिवारा।
आदरअणादाणं परिवारावासभूदा ते॥६५०॥
जंबूतरुदलमाना जंबूवृक्षस्य कथितपरिवाराः ।
आदरानादरयोः परिवारावासभूतास्ते ॥ ६५०॥
अर्थ-मुख्य जंबूद्वीपका जो उर्चाई आदि प्रमाण कह्या तीहसों परिवाररूप अन्य जंबूवृक्ष-
निका आधा प्रमाण है बहुरि ते आदर अनादरनिका परिवारके आवास रुप हैं । भावार्थ-
परिवाररूप जंबूवृक्षनिकी शाखानिक उपरि आदर अनादर देयनिका जो परिवार तिनके मंदिर
पाईए हैं ॥ ६५० ।।
आर्गे शाल्मली वृक्षका स्वरूपको गाथा दोय करि कहैं हैं;-
सीतोदावरतीरे णिसहसावे सुरद्दिणेरदिए ।
देवकुरुम्हि मणोहररुप्पथले सामली सपरिवारो ॥ ६५१ ॥
सीतोदापरतारे निषधसमीपे मुरादिनन्यां ।
देवकुरौ मनोहररूप्यस्थले शाल्मली सपरिवार ।। ६५१ ॥
अथ--उत्तर सनमुख जाती सीतोदा नदीका पश्चिम दिशा संबंधी तटवियु निपद्ध कुलाचटके
समपि मेरुपर्वतर्ते नैऋत दिशाविषै देवकुरु भोगभूमिका जो क्षेत्र तहां मनोहर रूपामई शाल्मडी
वृक्षानकी स्थली है। तहां अपना परिवार वृक्षनिकार सयुक्त शाल्मली वृक्ष हैं ।। ६५१ ।।
जंयुसमवण्णणो सो दक्खिणसाहम्हि जिणगिहं सेसे ।
दिससाइतिए गरुडवइवेश्वेणादिधारिगिहं ॥ ६५२ ॥
जबूसमवर्णनः स दक्षिणशासायां जिनगृह शेपे ।
दिगाशाखाये गरुडपतिवेणुवैण्यादिधारिगृहम् ॥ ६५२ ॥
अर्थ-यह शाल्मली वृक्ष जयूक्ष समान है वर्णन जाका ऐसा है सो वर्णन जाशका
किया सौई सर्व याका जानना । विशेष इतनां याकी दक्षिण शाखा उपरि जिनमदिर है । अवशेष दिशा
संबंधी तीन शासनिकै उपरि गरुड कुमारनिके स्वामी ऐसे येणु अर वेणुधारीदेय तिनके मंदिर
है। परिवार वृक्षानकी दाजानिके उपरि इनहीके परिवाररूप देवादिकनिके मंदिर जानने ॥२५२॥
आग भोगभूमिकर्मभूमिका विभाग फहे हैं-
कुरुमओ हरिरम्मगभू हेमवदेरण्णवदसिदी फमसो ।
भोगधरा परमज्झिमवराय कम्मावणी सेसा ।। ६५३ ॥
तुम हरिरम्पकमुयो हैमवतरणवतशिती क्रमशः ।
भोगराः परमभ्यमावगः कविनयः शेराः ॥ ६५३ ।।
भई-देवर या उत्तर कुरक्षेत्र व दोय उतम भौगभूमि है। बहरि हरि अर म्पक
भविष दोय मध्यम भोगभूमि है । वरि मस्त भर देण्यात याविषदीय नयाप भोग भूमि है।
भदोष मई मरत एरावत विदह क्षेविष फर्मभूमि है ॥ ६५२ ॥
नगोशातिर २७३ riminar mmmदो र यो :-- feng गा मागमभप नर परणा। मग पुगो विगो प्रबरो विवितायो । ६५४ ।। Primetmurमये नो दाम। (1 घिर wr. विनर 11 ६५१ ॥ itg1 सर को मार योजन जाह हा सीता सीतादा PRATनिधि दोन सिनामा तिमविर प्राप चित्र माEि RE विगामा ॥६५५ ।। गमग मी पंचगनरठिया नदपपरा । पाणं गायलं गिरिणाममुग पनि गिरिहरे॥ ६५५ ।। पस, 2 m alien पाया ! HEATRESनामपुरा बाटे || ६५५॥ अर-यषि पमका र धिम ताव मेघनामा पति है। ए । शिविचित्र दीपि पर पमफ मेप बीपिकाची योजनका Irrier गालोदा नसी जाननी । बरि लिन पारयो पर्वतनिकी राई र दोनमा चौध हजार योजन पी पीलाई पनि पोजन प्रमाण है। महरि निरपी अपना अपना जो पनि नाम लिमही नाम धारक देव यम है ६५५ पाथिम दक्षिण उत्तर दिशानिवि चिन जे इह तिनका प्रमाण यारि एका एकदा दोनिविध नियते ऐसे कांचन पर्षत तिनकी माया ताको तिनका उत्सेध साहित पारिपरिक गमिय तहो पाय पंचमरा पंचसपपिनरिया । रुपसालमग्ने अणुपादिदीदा परमदइसरिसा ।। ६५६ ।। गावात परावति प्रचामिनांतरिताः । शुरभद्रशारमध्ये मनुनदिदीणि हि पदसशानि ।। ६५६ ॥ अर्थ---मरिजही पाईए तोहयों पाचन योजन जाइ सीता र सीतोदा नदीवर थपुर रसाकुर भोगभूमिका दोष क्षेत्र र पूर्व पधिम भद्रशालके दोष क्षेत्रतिमा पार पांच नर से दह पांच पाची योजन प्रमाण पर अंतराल धेरै है । यहुरि ते दह नदीके मनु- सारि पपायोग्य दीर्घ १ | आयाम यमलाहिक कार पमद्रह समान है माया -पमक गिरि जहां नानिक टि पाईए पेमा क्षेत्रप्पो पचिस योजन पर मैरकी तरफ सीता या सोतोदा नदीविर एक पथ, दार । सीह यी पास योजन पर जाय और एक दह है। ऐगे पांच पाच दंचकुछ आ उत्तर क्षत्रय मानने । बहुरि तिनही सीता साना नदीकिन याद पश्चिम मसाल पर जाननें । ऐसे ए बीस द्रह 1 ।
२७४ त्रिलोकसार- सीता सीतोदा नदीकै वाचि वीचि जाननें । तहां जितनां नदीका चौड़ाईका प्रमाण तितना ही दह- निका चौड़ाईका प्रमाण जाननां । बहुरि पद्म द्रह समान हजार योजन तिन द्रहनिकी लंबाई प्रमाण जानना । सो इन द्रहनिकी चौड़ाई तो नदीनिकी चौड़ाईविष अर लंबाई नदीनिका प्रवाइ. विप जाननी । वहुरि जैसे पद्मद्रहविप कमलादिक कहे है तैसे इन द्रहनिविप भी कमलादिक जाननें ॥ ६५६ ॥ णीलुत्तरकुरुचंदा एरावदमल्लवंत णिसहा य । देवकुरुमग्मुलसाविज्जू सीददुगदहणामा ॥ ६५७ ॥ नीलोत्तरकुरुचंद्रा ऐरावतमाल्यवंती निषधश्च । देवकुरुमूरमुटसविद्युतः सीतादिकहदनामानि ॥ ६५७ ॥ अर्य-नील १ उत्तर कुरु १ चन्द्र १ देरावत ? मान्यवत १९ पैच बहुरि निपद । देवकुरु १ सूर १ मुलस १ विद्युत १९ पंच सीता अर सीतोदा नदीनिविप जे द्रह है तिनके नाम जानने ॥ ६५७ ॥ गइणिग्गमदारजुदा ते तपरिवारवष्णणं चेसि । पउमब कमलगेहे णागकुमारीउ णिवसति ॥ ६५८ ॥ नदीनिर्गमद्वारयुतानि तानि तपरिवारवर्णनं चयो । पप्रमिय कमलगेहेषु नागकुमार्यो निरसति ॥ ६५८॥ असे सर्व दह नदी के प्रवेश करने का अर निकसका द्वारनि करि संयुक्त है। भाग-दानिका प्रवाह के यावि द्रह है अरविन दहानिक येदिका है। सो वेदिका नदी के प्रवेश करने के भर निकमने के द्वारनि करि संयुक्त है। परि इन दहनिका कमलादिकम्प सर्थ परिकार वर्णन पम नामा दह समान जानना । इतना विशेष, इन दहनिविय जे कमल है तिनके पर जमन्दिर है जिनकी अपना अपना परिवार सहित नागयुमारी बरी है ।। ६५८ ॥ दृनडे पण पण पंचणसेला सपसपनददमुदपतियं । ने दहमुहा नगरमा मुरा यगंनीह सुगवण्णा ।। ६५९ ।। हितो पंच पंच काचनगा शतशततदर्भमुदपरपम् । ने दरमुग्ग नगायाः मुग वर्मनिह सुकवर्गाः ॥ ६५९ ।। अर्य-निन हानिक दोऊ तटनिी मिल पाच पाच काचनालन तानिकी टचाई मो पोरन है। म् म्याम सो पोजन टी मुमन्याग ताका भाग दोन है। मा पर्वत याने अन्न के मनमा । -नानि गनगमायो । दारा मनमान-नन पनि उरि देवनिक नागनार निगम मारको दर माग को बनी मान मन int मनी घाट बने। माग HT१५५ *ARH, - - नरतिर्यग्लोकाधिकार। २७५ दहदो गंतूणग्गे सहस्सदुगणादिदोणि वे च फला। णदिदारजुदा वेदी दक्खिणउत्तरगभ६सालस्स ।। ६६० ॥ ह्दत: गत्वाने सहसद्विकनप्रतिद्विद्वे च कले। नदीद्वारयुता वेदी दक्षिणोत्तरगभद्रशालस्य ॥ ६६०॥ अर्थ-द्रहत भागें दोय हजार वाणी योजन भर एक योजनका उगणीस भागनिविय दोय कला प्रमाण जाइ नदीका प्रवेश करनेंके जो द्वार तीह करि संयुक्त दाग भद्रसाल अर उत्तर भद्रसालकी घेदी तिष्ट हैं। मैं सो याकी वासना कहिए है। दक्षिण भद्रसाल अदाईस योजन उत्तर भद्र- साल भदाईसे पोजन मेरु व्यास दश हजार पोजन इनको जोड़ें दश हजार पांचसे योजन भए । सो इनको विदेहका ध्यास तेतीस हजार से चौरासी पोजन पारि कटा तीहमेंसों घटाइ २३१८४१४-१९ ताका आधा करिए तब ग्यारह हजार पांचसै याण योजन दोय कला होइ । रेयामें यमकगिरि कुलाचटका अंतराल हजार योजन भर यमक गिरिका व्यास हजार योजन यमक गिरि द्रहके अतराल पावसे योजन अर पाचौं दहनिकी टैबाई पांच हजार योजन भर वो दहनिक वीचि प्यारि भतराल तिनके दोय हजार योजन इस सबनिकों जो नय हजार चस योजन होइ सो घटाएं दोय हजार याण योजन दोय कला प्रमाण अतका दह अर भद्र- नालफी वेदी पीचि अंतराल जानना ।। ६६०॥ मागे दिग्गज पर्वतनिका स्वरूप गाथा दोय करि कहें हैं;- कुरुभ६सालमज्झे महाणदाणं घ दोमु पासेगु । दो दो दिसागइंदा सपतत्तिपतलुदयतिया ।। ६६१॥ कुरुभद्रशाटमध्ये महानद्योध द्वयोः पाया। दो दो दिशागजेंद्री शततावतद्दल मुदपत्रपाणि ।। ६६१ ॥ अर्थ-देवकुर उत्तर कुरु भोगभूमिनिविप यदुरि पूर्व पधिम भदसालनिधिय महानदी मांग सीतोदा तिनके दोऊ तटनिवि दोय दोय दिग्गजेन्द्र पर्वत हैं। एसर्व भाठ भए सो तिनमा दिग्गज पर्वतनिकी उचाई सौ योजन सर नीचे चौडाई सौ योजन उपरि घौडाई पयाम यो है॥६६१॥ सण्णामा पुच्चादी पउमुत्तरणीलसोस्थियनणया। कुमुदपलासवतंसयरोपणमिह दिग्गनिंदगुरा ॥६६२॥ तन्नामानि पूर्वादे. पोत्तरनीटस्वस्तिकांजनकाः । कुमुदपलाशावतंसरोचनमिह दिग्गजेंद्रमुरा ॥ ६६२ ।। अर्थपूर्वादि दिशानिविय तिनके नाम काहिए। भामानविय सोत्तर देवकुरुवि स्वस्तिक १ अंजन १ पधिम भटमालीप कुमुद १ पारा १ उत्तर पुरवि १ रोचन पनि दिग्गजानिके नाम है । तिन परेनानिक उपरि दिग्गजेन्ट देव है॥ मागे गजदन परतानका नामादिश, या दोप कार है- - ૨૬ त्रिलोकसार- मल्लव महसोमणसो विज्जुप्पह गंधमादाणिभदंता । ईसाणादो वेलुरियरुप्पतवणीयहेममया ॥ ६६३ ।। माल्यवान् महासौमनसः विद्युयमः गंधमादन इमर्दताः। ईशानतः वैडूर्यरूप्यतपनीयहममयाः ॥ ६६३ ॥ अर्थ-माल्यवान १ महासौमनस १ विद्युप्रम १ गंधमादन १ ऐसे नामधारक गनर्दव पर्वत हैं 1 ते क्रमते वैडूर्य मणि अर रूपो पर तायो सोनों अर सोनों तीह समान वर्ग धरै है। बहुरि ते क्रमतें मेल्का ईशानने लगाय च्यारयों विदिशानिवि तिटें हैं ।। ६६३ ॥ णीलणिसहे सुरहिं पुहा मल्लवगुहादु सीदा सा । विज्जुप्पहगिरिगुहदो सौदोदा हिस्सरितु गया ॥६६४ ॥ नीलनिषधी मुरादि स्पृष्टाः माल्यवद्हापाः सीता सा। विद्युत्प्रभगिरिगुहातः सीतोदा निसृत्य गता ॥ ६६४ ॥ अर्थ ते गजदंत पर्वत नील या निषद्ध कुलाचक अर मेहगिरिको स्परौं है । भावार्य- मेरकी प्यारयों विदिशानिविय मेरुपर्वती लगाय नील वा निषध कुलाचटपर्यंत वे गवदंत पर्पत है। बहुरि तहां सीता नामा नदी मुडि करि माल्यवत नामा गजदत पर्वतकै नदी निक सनकी गुफा है तामें होइ मेरुकी अर्द्ध प्रदक्षिणा देइ पूर्व मद्रसाटादिविषै गमन कर है । बरि सीतोदा नदी मुडि करि विद्युत्प्रम नामा गजदंतकै नदी निकसनेंकी गुहा है । तामै होइ मेरको अर्द्ध प्रदक्षिणा देइ पश्चिम मसालादिवि गमन करे है ॥ ६६४ ।। यब विदेह देसनिका विभागों कहें हैं- उभयंतगरणवेदियमझगयेभंगणदितियाणं च । मन्मगरक्सारचऊ पुव्यपरविदेहविनपद्धा ।। ६६५ ॥ टमयांतगवनवेदिकामध्यगविमंगनत्रयाणां च । मध्यगरक्षारचमिः पिरविदेहविजयार्थाः ॥ ६६५॥ अर्थ-दोउ नविय तो वन वेदिका अर मयपिये मान सीन निमगा नदी भर गया विष प्रात प्यारि वक्षारगिरि पर्वत तिन करि पूर्व पश्रिम विदेहके देश सीता सीतोदा नदीनिके दोर स्टनिधि मा बाधे है । मावार्य-मम्की दिशावि देह है। पभिम विणतो पनि विदेह है। बरि ई विदेहविक योधि माता दी है। अर पभिम बाविस नदी है । मोहन दौत्र ननिक दक्षिण उत्तर तर करि पारि मिाग हो। यही एक भिरदिय बाट विदा दशौ । हावा धिम भदमाकी देदी ता. भोर लार आदि में भारत मे fy आशा आगे गि ट. . वक्षर टारे में देवाय या मायानी 0 ने नार। नचि दवि भार दिसा गनिने ॥१९५॥ दाना दिनिका नामकीय- Pok मरतियंग्लोफाधिकार। २७७ तमामा मोगरतीरादो पदमदो पदविवणदो। पगादिरपउमादिपारा परिण एगसंलगगो ।। ६६६ ॥ मामानि तान प्रपात: प्ररक्षिगतः । चित्रकारमारिमाटी गारिन एकरकमः ।। ६६६॥ अप-सीतानीका सर सट लाको प्रथम पर प्रदक्षिणा लिन क्षार पर्वत या विभगा मस है। सहा मी नहीपर उतर यि भासाको केटो आगे गाय मत विराट टप मलिन र यौट १ माम धारक पारि पधार पति है ॥ ६६६॥ गाददाशयदिणाद तिहरवेगवणभंजणप्पादि। अंगणगो तत्सनला मत्तमरम्मत्तल सिंधू ॥ ६६७ ॥ गाघापरुयतीनमः बिष्टप्रवणानामादिः । जनपर ताजा मत्तला उन्मत्तजदा सिंधुः ।। ६६७ ।। अर्प-पनी हसती करती १ नाम धारक तीन विभगा है महरि सौताया यि दधारस्य दान आ गय क्रमते निकट १ वैश्रवण : अंजनामा १ अंजन १ नाम धारक परिवार पर्वत है। यहरि सजा १ मत्तजला । उनमत्तजला १ नाम तीन । सहावं विनदार आसचिस सुहवा य वरखारा । पारोदा सौदोदा सोदोवाहिणि नदी मझे ।। ६६८ ॥ घसापान् विजदागन माजीविरः मुसाबहस पक्षाराः । क्षारो सातोदा धोतोवाहिनी नयः मध्ये ।। ६६८।। अर्प-पधिर विदेह सीतीदा नदीका दक्षिण तटविणे भद्रसाद देदीत भाग लगाय क्रमते असावान १ बिजटापान १ आशीविष १ मुखा १ नाम धारक प्यारि क्षार पर्वत हैं । बरि क्षारोदर १ सीतोदा १ बोतोवाहिनी १ नाम धारक तीन विभंगा नदी क्षारनिकै चापि धीचि है।। ६६८॥ तो दमरणागादिमपाला देवमाल पसारा । गंभीरमालिणी फेणमारिणी उम्मिमालिणी सरिदा ।। ६६९॥ ततः चमूर्यनागादिममारदेवमा क्षारा गंभीरमालिनी फेनमारिनी ऊर्मिमाटिनी सरितः ॥ ६६९ ॥ अर्थ-तहां पाई पक्षिम विदेह सातोदा नदीका उत्तर तटवि देवारण्य मंदीत आगें लगाय अमन बदमाल १ सूर्यमाल १ नागभाल १ देवमाल १९ च्यारि वक्षार पर्वत हैं । बहुरि गरमा- लिनी । फेनमालिनी । कर्मिमाटनी सीन विभा नही है ॥ ६६९ ।। हेममया वारा वेभंगा रोहिमग्सिवण्णणगा। ताहि परेसतारणगेहे णिवसंति विकणा 11 ६७ ।।
२८. त्रिलोकसार- पञ्चाशदतरद्वीपाः पड्विंशसहस्रं रत्नाकराः । रत्नानां कुक्षिवासाः सप्तशतानि उपसमुद्रे ।। ६७७ ॥ अर्थ --एक एक विदेह देशविर्षे एक एफ उपसमुद्र है सो मुख्य नगरी अर महानदी के वीचि आर्यखंडविप पाईए है । तीह उपसमुद्रकैवियु टापू है। तहां छप्पन तो अंतरद्वीप हैं । वहुरि छवीस हजार रत्नाकर हैं तहां रत्न उपजे है । रत्ननिके वेचने टैंनके स्थानभूत काश्विास सातसे हैं ॥ ६७७ ॥ आगें मागधादि तीन देवनिका स्थान कहैं हैं;- सीतासीतोदाणदितीरसमीचे जलम्हि दीवतियं । पुवादी मागहवरतणुप्पभासामराण हवे ॥ ६७४ ।। सीतासीतोदानदीतीरसमीपे जले द्वीपत्रयं । पूर्वादिना मागधवरतनुप्रभासामराणां भवेत् ॥ ६७८ ॥ अर्थ-सीता सीतोदा नदीकै तीर समीप जलविपै पूर्व पश्चिम करि मागघ १ वरतनु १ प्रभास १ देवनिकै तीन द्वीप हैं । भावार्थ-~-चक्रवर्ती करि साधने योग्य मागध वरतनु प्रभास देव तिनके स्थान जैसे भरत एरावतके समुद्रवियै हैं । तैसे विदेह देशनिके सीता सीतोदा नदीविौं है । पूर्व विदेहके सीता नदी के तीर जलविपै है। पश्चिम विदेहके सीतोदा नदीकै तीर समीप जलविषे है । तहां एक एक देशसंबंधी दोय दोय नदी जिन द्वारनि करि सीता सीतोदाविप प्रवेश करें हैं। तिन द्वारानिकै अर तिन द्वारनिकै वीचि द्वार है ताकै समीप जलविषै तिन देवनिकै द्वीप जाननें ॥६७८॥ आगै विदेह क्षेत्रविष प्राप्त वर्षादिकका स्वरूप माथा दोय करि कहें हैं;- वरिसंति कालमेहा सत्तविहा सत्त सत्त दिवसवही । वरिसाकाले धवला वारस दोणाभिहाणभा ॥ ६७९ ।। वर्षति कालमेघाः सप्तविधाः सप्त सप्त दिवसायधीन् । वर्षाकाले धवला द्वादश द्रोणाभिधाना अभ्राः ॥ ६७९ ॥ अर्थ-सात प्रकार काल मेघ हैं । ते सात सात दिन मर्याद लिए वर्षाकालविष वर्षे हैं । बहुरि खेतवर्ण द्रोण नामा बारह अभ्र कहिए बादले ते तैसेही सात सात दिन मर्याद लिए वर्षे हैं। ऐसें वर्षाकालविपै एकसौ तेतीस दिन वर्षा हो है ॥ ६७९ ॥ देसा दुम्भिक्खीदीमारिकुदेववण्णलिंगिमदहीणा। भरिदा सदावि केवलिसलागपुरिसिडिसाहहिं ॥ ६८० ॥ देशा दुर्भिक्षेतिमारिकुदेववर्णलिंगिमतहीनाः । भृताः सदापि केवलिशलाकापुरुषर्विसाधुभिः ॥६८० ॥ अर्थ-विदेह क्षेत्रवि तिटते देश ते अतिवृष्टि १ अनावृष्टि १ मूसा १ टीडी १ मा १ अपनी फौज १ अन्य वैरीकी पोज १ ऐसे सात प्रकार ईति करि रहित हैं। बहुरि गाय मनुशा. दिक जाते अधिक मरें ऐसी मरी लिन करि रहित है । वहरि जिनदेवर्ने अन्य कुदेव जिनलि.
नरतिर्यग्लोकाधिकार। २८१ यदुना जिनमतने अन्य दुमत किन फरि रहित है । यहरि से देश सदा ही केवलज्ञानी परि तीक्ष्फराति या पुरुष परि ऋमिधारी साधु तिन फरि भरे हैं।। ६८०॥ पाताभर सफा पकी भई चीनिकी पंचमेर अपेक्षा फरि जघन्य उगट संख्या फार भवन प.हे - तित्पदसयल चपी सहिसयं पुइ वरेण अवरेण । बीस बीस सयले खेचे सचरिसर्य वरदो ॥ ६८१ ॥ सार्याधसफर किणः पष्टिशत पृथक् घरेण भवरेण । विशर्शि सफले क्षेत्रे सप्ततिशत परतः ॥ ६८१॥ अर्थ-फिर भर भर्द्धचत्री नारायण प्रतिनारायण भर सकल घझी चक्रपती ए प्रथफ मपपा एफ एका विदेह देशविपै एफ एक होइ सब उत्कृष्टपर्ने करि एकसौ साटि होइ । बहुरि जघन्यपने करि साना सांसोदाका दक्षिण उत्तर तटविषे एक एक होइ ऐसे एक भैरु अपेक्षा प्यारि होहि मिलि फरि पंच मेरके विदेह अपेक्षा करि बीस हो है बहुरि ते उत्पथकी पाच भरत पाच ऐरायतसम्बन्धी मिलाएं तीर्थफरादिक एकसौ सत्तरि हो हैं ।। ६८१॥ पर पक्रयताकी संपदाका स्यरूप फहे हैं;- पुलसीदिलवसभहिम रहा हया विगुणणवयकोडीओ। णवणिहि पोद्दसरयणं चरित्याभो सहस्सछण्णउदी ॥ ६८२ ॥ चतुरशीतिटक्षभदेभाः रथा हया दिगुणनयकोव्यः । नवनिधयः चतुर्दशरत्नानि पक्रिस्त्रियः सहसे पण्णवतिः ॥ ६८२ ।। अर्थ-पौरासी लाख फल्याणरूप हायी है । नितनेही चौरासी लास रथ है । घोडे दुगुणा मर कोदि ताके अटारह कोडि है। परि छह ऋतु योग्य वस्तुका देनेवाला काउनिधि है भाज- नराप्रका दायफ महाकालनिधि है। अन्नका दायक पहिनिधि है। आयुधका दायक माणवफनिधि है। यानित्रका दायफ सनिधि है। मंदिरका दायक नैसनिधि है । यत्रका दायक पभनिधि है। आभूपणका दायक पिंगटनिधि है । नानाप्रकार रत्नसमूहका दायक नाना रनानिधि है। ऐसे नयनिधि है। गाडाके आकारिनिधि है तामैं ऐसे वस्तु निकम्पा कर है । परि चक १ असि १ स्त्र १ देह १ मणि १ चर्म १ काकिणी १ ए सात अचेतन भर प्रहपति १ सेनापति १ हाथी १ घोड़ो १ सिलप १ श्री १ पुरोहित १ ए सात सचेतन ऐसे चौदह रत्न हैं। यहरि छिनरें इजार स्त्री हैं । ऐसें चक्रवताक संपदा हैं ।। ६८२ ।। भष राजाधिराजादिकनिका रक्षण गाथा तीन फरि फहें हैं- अण्णे समपदविलिया सेणागणवणिजदंडवा मंती । पहपर तलयर वण्णा चउरंगपुरोहमपमहमचा ॥ ६८३ ॥ अन्ये स्वकपद स्थिता सेनागणवगिर्दडपतिः मंत्री। महत्तर तलवर वर्ण चतुरंगपुरोहितामान्यमहामान्यः ॥ ६८३ ॥ त्रि.-18 .
२८२ त्रिलोकसार- अर्थ-अन्य राजाठिक हैं ते अपनी अपनी पदवीविप स्थित हैं। तहाँ सेनापति की सेनाका नायक यहरि गगक पती कहिए ज्योतिषी आदिकका नायक बहुरि वशिकपति की म्यापारानिका नायक वहरि दंडपति कहिए समस्त सेनाका नायक बहरि मंत्री कहिए पयोग मेरी प्रण वहरि महत्तर फहिए कुलविष बड़ा बहरि तलवर कहिए फोटवाल बहरि वर्ग की क्षत्रियादिक प्यारि प्रकार वर्ण बहुरि चतुरंग कहिए ब्यारि. प्रकार सेना यहरि पुरोहित की हितकाका अधिकारी बहुरि आमात्य कहिए देशका अधिकारी यदुरि महामाय कहिए सारा गर्दा अधिकारी॥ ६८३ ॥ इदि अहारसेटीणीहमओ राजो हवैजमउडपरो । पंचसयरायसामी अहिरानो तो महाराजो ॥ ६८४ ॥ इनि अधादशश्रेणीनामधिशे राजा भवेत् ममुटधरः । पैनशनराजस्वामी अधिराजः रातः महाराजः॥ ६८४॥ अर्थ-ऐमें अटारह श्रेणीनिका जो खामी सो राजा कहिए सोई मुकुटधारी हो है । मानिका सामी सो अधिराजा हो है । यद्दरि हजार राजानिका गमी महाग सर भदमंडलीभो मंडलिभो तो महादिमंडलिभो। निपछाहादिया पाहुणो राजाण दुगुणगुणार्ण ॥ ६८५ ॥ सामालिक: माटिक सतो महादिमडमिः । विकानामपिता प्रमाः राज्ञा लिगुणमिगुणानाग ॥ ६८५ ॥ भई- जागजानिकासामी मईक । महाभारि हजार मात •rth. वही आट नार गानानि स्वामी महाडीक ही है। यही सो रहर amernatगामी गपण या प्रतिनारा हो है। यही नीम हमार राति trange rn अEिHi T कम yntinuT22,- मानमारमा निममता का। पार माग गर frमनीगो ॥ १०॥ Ai ? 4.2 k: ॥ १८ ॥ - in-: 72 datina ! १८. ।
नरतिर्यग्लोकाधिकार। कच्छा सुकच्छा महारुच्छा चउत्थी कच्छमावदी। आवत्ता लांगलावत्ता पोपखला पोयसलावदी ॥ ६८७ ॥ का मुकम्मा महाकाया चतुर्थी फाटकावनी । भारत टोगटावर्ता पुमला पुष्कलारती ॥ ६८७ ॥ अर्थ - फछा १ मुकठा १ महाफमा १ चौथी फरफायनी १ आवर्नाटगावती । पुष्कला १ पुष्कलावती १ ए आठ देश सीता नहीका उत्तर सर्विय भरमार हान आमा करि ममतें जाननें ॥ ६८७ ॥ वच्छा सुवच्छा महावरछा उत्थी परायी। रम्मा गुरम्मगा घेव रमणेजा मंगलावदी ।। ६८८ ॥ परसा मुबत्सा महावासा घी पत्सकायसी । रम्या मुरम्पका चैव रमणीया मंगलायती ।। ६८८।। अर्थ-वसा १ गुरसा १ महायासा१पापी वामका पार गुरम्पका एम. जीया १ मगरावती १ ए पाठ देश साता नदीका दक्षिण तटरियं देवारको काम करि मत जानने ॥ ६८८॥ पम्मा गुपम्मा महापम्मा पउत्पी पम्ममावदी। संखा प णलिणी पेप पुमुदा गरिदा ना ॥ ६८९ ।। पमा मुपमा महापमा घथी पकायती । दोसा च नलिनी र नुमा सरितया ॥ ६८० ॥ अर्थ-पा १ मुपा १ महापा १ पोपी पकाती ११ मा १ सरित १९ भाट देश सीतोदा नदीया दक्षिण तबिक भगा PIERE जाननें ।। ६८९ ॥ पप्पा गुपप्पा महारप्पा पउत्थी पपकापनी। गंधा बल गुगंधा पगंपिला गंधमारिणी ।। ९९०॥ पमा गुषमा महायग्रा पक्षी बनकामी । गया बदमुनधार माधय गाली...॥ अर्य-या मुरमा रमारमा १ पौधोपनकापनी या १९ बाट देशागतोदामीया तर किदवारका MERE ..!' मानदेशानिने जागिरोहन का उत्तर- रिमय पहियटो गंगामिधुमर दोणि दणि । तरिकपा एम रिक्ष पनास बिनपाणं ॥ ६९१ ॥ [ATE Aye। TApr ९१।
अर्थ-ते विजयाई र्व पश्चिम लेने हैं । बहार जनपद जो देश तीहकै मध्यमानी है। गननी । यहरि एक एक देशस्पैि दोय दोय नदी हैं। तहाँ सोता या सीतोदाका दक्षिण तर देश निनधि जे दोय दोय नदी है तिनका नाम गंगा सिंधु है । यहरि उत्तर मी गुलाम होइ सीता या सीतोदाविप तिसकी बेदीका सोरण द्वारिष प्राम होइश दक्षिा मनमुग निकसि गधी आइरिजपाकी गुफामें होइ मीता या सीनोहाशिमको टीममनमोहै। बढी गीदम योजन गरी धेगी। २८४ त्रिलोकसार- अर्थ-देश देश प्रति एक एक विजयाई पर्वत है । कुलाचलते लगाय महानदी पर जो देशनि की लंबाई तोहके मध्य प्रदेशविगै विजयाई पर्वत जाननां । सो विजय कहिए देश के इस करि आधा किया ताते याका विजयाई ऐसा सार्थीक नाम है । वहुरि तिनही देशनिक गंगा सिंधुसमान निकसते सवा छह योजन चौड़ी प्रवेश करते सादा वासठि योजन । इत्यादि गंगासिंधुका जो प्रमाण ताह सदृश दोय दोय नदी हैं । तिन नदी अर विजपानि ही विदेह संबंधी बत्तीस देशनिधिपै प्रत्येक छह छह खंड किए हैं ॥ ६९१ ॥ आगें तहां तिटते विजयाईनिका वा नदीनिका व्यास गाथा दोय करि कहैं हैं; ते पुब्बावरदीहा जणवयमज्ने गुहादु पुन्वं वा । गंगादु नीलमूलगकुंडा रत्ततुग णिसहणिस्सरिदा ॥ ६९२ ॥ ते पूर्वापरदीर्घा जनपदमध्ये गुहाद्वर्ष पूर्व वा । गंगाइयं नीलंमूलगकुंडा रक्तादिकं निषधनिःसृताः ॥ ६९२ ॥ महरि राहा विजयाद्रीयौ दोय गुफा है सो गुफा पूर्व भरतका विजयायिप कही से हो । दाना ने दोष दीप नदी किनारा तहाँ गंगामि दौर में नोट पनि निकटि मूलगि स्थित जी कुंड सीइसौं उत्तर सनमुरा निफसि सूधी भार है। परि ता रनोदा दोय नदी निषध पर्वतक निकट मूलबिरे स्थित जो मेगा माविमान होइ प्रवेश कर है ॥ ६९२ ॥ दगदमपणोति पणं मीसं दसय प रुप्पगिरियासा । गयराभिनांग सेही मिहरे सिदादिाई तु ॥ ६९३ ।। दादा पंचानं पंचागत् त्रिशत दशकं च पगिरियामा। मनगभियोग्या श्रेणी शिवरे मिजादितु ।। ६९५ ॥ - या योन प्रमाण की . है। मारा-पान TATA MATEL 1ोगा पोको चोही बनी 41 नरतियंग्लोफाधिकार। पै प्रात प्रथम श्रेणीविष विद्याधर बसे हैं । यहुरि द्वितीय श्रेणी जो कटनी तिह विपै आमियोग्य च घस है । बहुरि शिसरविष सिद्धायतन आदि नवक्ट हैं॥ ६९ ॥ भागें तहाँ ही द्वितीयादि श्रेणीविये विशेष कह है।-- सोहम्मआभिजोग्गगमणिचित्तपुराणि विदियसैदिम्हि । वेयकुमारवई सिहरतले पुण्णभक्खे ॥ ६९४ ॥ सौधर्माभियोग्यगमणिचित्रपुराणि-द्वितीयश्रेण्याम् । विजयार्धकुमारपतिः शिखरतले पूर्णभद्राख्ये ॥ ६९४ ॥ अर्थ-तहां ही द्वितीय श्रेणीविय सौधर्म संबंधी आभियोग्य देवनिके मणिमई नानाप्रकार गिर है । यहुरि तिस विजयाईफा शिखरविषे पूर्णभद्र नामा कूट सीह उपरि विजयाई कुमार पति व यस है ॥ ६९४ ॥ आगै तहां प्रथम दोऊ श्रेणिनिविपै तिटते विद्याधरनिके नगर तिनकी संख्या वा तिनके नाम पंद्रह गायानि करि कहें है;- पणवणं पणवणं विदेहवेपदपदमभूमिम्हि । णयराणि पण्यसही जपूउभयंतवेयड्ढे ।। ६९५ ॥ पंचपंचाशत् पंचपंचाशत् विदेहविजयार्धप्रथमभूमौ । नगराणि पंचाशत् पठिः जेयूभयांतविजयाथै ॥ ६९५ ॥ अर्थ-विदेह संबंधी विजयानिकी दक्षिण उत्सरस्प प्रथम दोऊ घेणी तीहविष पपावन पचापन नगर विद्याधरानिफे हैं । बहुरि जंबूद्वीपका दोऊ त जे भरत ऐरावत तिनि संबंधी विजयाई तहां प्रथम दोऊ श्रेणीविष पचास साटि नगर हैं ।। ६९५ ।। सेलायामे दविखणसेटीए पण्णमुत्तरे सही । तष्णामा पुवादी किंणामिद किंणरंगीद ॥ ६९६ ॥ पीटायामे दक्षिणश्रेण्या पंचाशदुत्तरस्या पष्ठिः। सन्नामानि पूर्वादित: किनामित किनरगीत ।। ६९६ ॥ अर्थ-भरत ऐरावत संबंधी विजयाई तीहकी पूर्व पथिम सेमाईपि दक्षिण मेणापि तो पचास नगर है । उत्तर. श्रेणीविषे साठि नगर हैं तिन नगरनिके नाम पूर्व दिशाते गार अनुगमने फदिए हैं। किनामित १ किनरगीत १ ॥ ६९६ ॥ परगीदं पहुफेद गरिय सीहसेदगरुधर्म । सिरिपयर लोहग्गलमरिजर्व बलभग्गलपुर ॥ ६९७ ॥ नरगीतः बहु केतुः पुरी सिंहश्वेतगराम । श्रीप्रभर सोहार्ग:मरिंजय बार्गटारं ॥ ६९७ ॥ अर्थ-नरगीत १ बरकेतु १ क १ सिहज १ गपज १ गरापन १ मिम १ बाधर १ सोहार्गल १ अरिजय १ यमार्ग १ बामपुर ॥ ६९७।।
अर्थ-अपगजित १ मिपुष्प १ गगनगिनवरी १ गुर. १ मेडन्य। अर्य-क्षेमंकर १ चंदाभ १ मूर्याभ १ चित्रकुट १ महाकूट ? हेमकुट विन्ट! अर्थ-सूर्यपुर १ चन्द्रपुर २ नित्योद्यौतिनी १ विमुखी १ नित्यवाहिनी १ मुमुखी उंट नगरी १ ऐसे दक्षिण श्रेणीविये पचास नगरी है । अब उत्तर श्रेणीवि पश्चिम भागर्ने लगायतम अर्थ-कैलाश १ वारुणीपुरी १ विद्युप्रभ १ किलिफिल १ चूड़ामणि १ शशिप्रम २८६ गा-- हो तिमो नग मी ग माना। विरमामा र रगर 11.॥ मगति मानिनmixer TIMITE निरजपा Artinatim९९८॥ अर्थ-भाति कहिए नगर । मोर ? ? सर १ . १ मा १ रनरका १ पिरजाका १ १ मे १॥ ६८॥ अपराजिद कामादीपुर गगरि गिरि गुहें । नो सनयंनिणगर नगनि विनया गानयती य ॥ ६९९ ।। अपराजित फामा गगननरी स्निपरी गुर। सत: मेज सनगर जाति पावनती न ॥ १०॥ जयंती १ विजया १ येजपती खमंकर चंदाहं मराई चित्तर महार्ड। हेमतिमेहविचित्तयाई येसवणहाइमदो ॥ ७०० ॥ क्षेमकर चंद्राम मूर्या चित्रकूट महााट । हेमत्रिमयविचित्र फूट वैधरणकूटमतः ॥ ७०० ।। मेघकूट १ विचित्रकूट १ वैश्रवणकूट १ ।। ७०० ॥ सूरपुर चंदपुर णि जोदिणि विमुहि णिचवाहिणियो । सुमुही चरिमा पच्छिमभागादो अजुणी अरुणी ॥ ७०१ ॥ सूर्यपुरं चंदपुरं नित्योद्योतिनी विमुखी नित्यवाहिनी । सुमुखी चरमा पश्चिमभागात् अर्जुनी अरुणी ॥ ७०१ ॥ नगरीनिके नाम कहिए हैं। अर्जुनी १ अरुणी १ ॥ ७०१ ॥ केलास वारुणीपुरि विज्नुपह किलिकिलं च चूडादी । मणि ससिपह वंसालं पुष्फादी चूलमिह दसमं ॥ ७०२ ।। कलाशो वारुणी पुरी विद्यु-प्रभं किलिकिल च चूडादिः । माणिः शशिप्रभं वशाल पुष्पादि चूलमिह दशम ॥ ७०२ ।। पंशाल १ पुष्पचूलनामा दावा नगर है || ७०२ ॥
नरतिपालोकाधिकार। २८७ मगोवि मगन्भं पलागं तेरमं सिकरयं । गिरिमोध घपर पिवर्माटेर वमुमका चमुपदी य ।। ७०३ ॥ राशिमगर्भ के प्रयास शिवकर । सामी यम शिवमंदिर घामका बमुमती च ॥ ७०३ ॥ अप-दादी सगर्भ १ गय १ शिवयर १ शेरवहाँ है श्रीसौष १ चमर १ मंदिर १ गुमफा १ घमुमती १ ॥ ७०३ ॥ सिदत्य सयुंजय धयमाल मुरिंदपंत गयणादि । गंदणमपि पीदादिमसोगो अलगा तदो तिलगा ॥७०४॥ मिटा राजय पजमाल मुरेंद्रशांते गगनादिः । मनमपि दानादिमशोकः मटका सतस्तिटका ।। ७०४॥ अर्थ-मिदार्थ १ सजय १ पजमाउ १ मुरेरकांत १ गगननंदन १ अशोका १ वेगोका १ पीतशोका १ भलफा १ तहाँ पीठे तिटका १ ॥ ७०४ ॥ अंपरतिलगं मंदर बु.मुद कुंदं च गयणवल्लभयं । तो दिवतिलय भूमातिलयं गंपवणयरमदो ॥ ७०५ ॥ अपरतिलक मंदर पुमुद कुंद च गगनपदों । तमो दिम्यतिल के भूमीतिटकं गंधर्वनगरमतः ।। ७०५॥ अर्प--अवरतिश्क १ मदर १ युगुद १ कुंद १ गगनवल्लभ १ तहाँ पीछे दिव्यतिलक १ भूमिनिष्टक १ गंधर्वनगर १ इहात पारे ।। ७०५ ॥ मुत्ताहारं गेमिसमग्गिमहालसिरिणिकेदवुरं । जयपह सिरिवासं मणिवनं भस्सपुरं पणजययं ॥ ७०६ ॥ मुनाहार नैमिपमानिमहाग्वाल श्रीनिकेतपुर । जयावह श्रीवासं मणिव मद्रायपुरं धनंजय ।। ७०६ ।। अर्थ-मुनाहार १ नैमिष १ अग्निभाल १ महान्याउ १ श्रीनिकेनपुर १ जयावह १ धानिवास १ मगिवन १ भद्राश्वपुर १ धनंजय १॥ ७०६ ।। गोखीरफेणमक्खो गिरिसिहरं च धरणि धारिणियं । दुग्गं दुद्धरणयरं मुदंमणं तो महिंदविजयपुरं ॥ ७०७ ॥ गौशीरफेनमक्षोभ गिरिशिखरं च धरण धारिणिक । दुर्ग दुर्धरनगर मुदर्शन ततो महेंद्रविजयपुर ।। ७०७॥ अर्थ-गोक्षारफेन १ अक्षोभ १ गिरिशिखर १ धरगिपुर १ धारणीपुर १ दुर्ग १ दुर्द्धर- नगर १ मुदर्शन १ सहा पीछे महेन्द्रपुर १ विजयपुर || ७०७ ।। णगरी मुगंधिणी पन्जद्धनरं रयणपुलायरयं । रयणपुरं चरिमं ते रयणमया राजधाणी ॥ ७०८ ।।
।
-
सो
-कुलाचल विजयाई दोय नदीनिक मीचि मध्यका जो म्टेछ खंड सीहका बहुत मन
उदयादिनीन तिनक है। सो उचाई सायोजन, नी भन्याम सौ पोजन, उपरि मुखमाम
२८८
त्रिलोकसार-
नगरी मुगधिनी वार्धतर रत्नपूर्वमाकरं ।
रतपुरं चरमं ताः स्नमया राजधान्यः ॥ ७०८ ॥
अर्थ-सुगंधिनी नगरी १ वाईतर २ रत्नाकर १ रत्नपुर १ इंतका नगर है ।
साठि नगरी उत्तर श्रेणीविषे हैं । ते ए सर्व नगरी रत्नमई हैं। बहुरि राजानिका जहां वाल पादर
ऐसी राजधानी हैं ।। ७०८ ।।
पायारगोउरहलचरियासरवण विराजिया तत्य ।
विजाहरा तिविजा वसति छकम्मसंजुत्ता ।। ७०९ ।।
प्राकारगोपुराहाटचर्यासरोवनः विराजिता तत्र ।
विद्याधरा त्रिविद्या वसंति पटकर्मसंयुक्ताः ॥ ७०९ ॥ :
अर्थ-कोट दरवाजा मंदिर मार्ग सरोबर वन इनकरि ते नगरी विराजित हैं । उहाँ तिन
नगरीनिवि विद्याधर बसे हैं । ते विद्याधर साधित कुल जातिविद्यानि करि त्रिविध हैं । गो
आप साधिए सो साधित विद्या १ वहरि पितृपक्ष कुळक्रमते चली आई सो कुलविद्या १ बड़ी
मातृपक्ष जातिविपै चली आई सो जाति विद्या र सो तीन विद्यानि करि संयुक्त हैं । बई
इभ्या वार्ता दत्ति स्वाध्याय संयम तप इन पट कर्मनि करि संयुक्त हैं । तहां पूज्यका पूजन्य
-इण्या, असि मपि आदि जीवनैका उपायरूप व्यापार सो वार्ता १ दान दैनां सौ दति १ टन
पाठन करना सो स्वाध्याय १ अविरति त्याग करना सो संयम १ तपश्चरण करना सो तप जाननindu
भागे विजयाई फर किया पट खंडविय म्टेच्छखंडविष तिटता जो वृषमाचल सारा
स्वरूपको निरूपै है-
सत्तरिसयवसहगिरी मझगयमिलेच्छखंडवहुमज्झे ।
फणयमणिकंचणुदयति भरिया गयचकिणामहि ॥ ७१०॥
सप्ततिशत वृषभगिरयः मध्यगतम्लेच्छखंडबहुमध्ये ।
कनकमणिकांचनोदयत्रिक भृता गतचक्रिनामभिः ॥ ७१० ॥
अर्थ-
प्रदेशविौ वृषभाचट है सो एक एक देशविय एक एक है । सो पानी मेहसंबंधी विदेह देश भर भात
ऐरावतविष एकसौ सत्तरि पमाच हैं । ते मुवर्णवर्ण र मणिमई हैं । कांचन पनि समान
पयास योजन जानना । यहार अतीत काटावि भर के नामनि करि भरपा है।
जो चक्रवती होइ सो निम पर्वतविौ अपना नाम अक्षर लिग है ॥ ७१०॥
या ने ही आर्दक मध्य तिष् है जो राजधानी
नया आयाम करे -
मगरिमयणपराणि प उपजणगि भन्जटमाप्तहिन ।
पीण गवप पारस पासायामेण होति फमे ॥ ७११॥
नरतिर्यग्लोकाधिकार । २८९ सप्ततिशतनगराणि च उपजलधिगार्यखंडमध्ये । चक्रिणा नव द्वादश व्यासायामाभ्यां भवति क्रमेण ॥ ७११ ॥ अर्थ -उप समुद्र काहिए खाड़ी समुद्र साकी प्राप्त जो मार्यखट सीह मध्य व्यास जी चौड़ाई भर भायम जो लंबाई तिनकार क्रमते नव यारह योजन प्रमाण पंच मेरमबंधी विदेह देश भर भरत ऐरायतनिवि एफसी सत्तरि चक्रपतीनिके ध्यास योग्य मुख्य नगर हैं ।। ७११ ॥ आगै तिन नगरनिकै नाम गाया या श्लोक प्यारि फरि कहें है। खेमा खेमपुरी चेव रिहापुरी सहा । खग्गा य मंजुसा पेव ओसही पुंडरीकिणी ॥ ७१२ ।। क्षेमा क्षमपुरी चैव अरिष्टा रिटपुरी तथा । खड्डा घ मनपा चय औषधी पुरिकिणी ।। ७१२ ॥ अर्थ-पूर्वोक्त कण्ठादि विदेह देशनिविय मुख्य राजधानी नगरीनिक श्रम नाम कदिर है। क्षमा १ क्षेमपुरी १ अरिष्टा १ भरिटपुरी १ खगा १ मनपा १ औषधी १ पुर्गकिला १ ॥१२॥ मुसीमा फुटला वापराजिद परफरा । अंका पउमावदी पेव मुभा रयणगंधया ॥ ७१३ ॥ मुसीमा पुंडला ये अपराजिता प्रभेकरा । अंका पावती व शुभा रनसंघया ।। ७१३ ॥ अर्थ-मुसीमा १ कुंडला १ अपराजिता १ प्रभाग १ का १ पाती १ मा १ एनसंचया १ ॥ ७१३॥ अरसपुरी सोहपुरी महापुरी तह य हीदि पिनयपुरी। अरया विरया पेय असोगया पीदसोगा य ॥ ७१४ ॥ अश्वपुरी सिंहपुरी महापुरी तथा च भवति विजयपुरी । भरमा रिजा व अशोका यीतशीका व ॥७१५ अर्थ-वपुरा १ सिहपुरी १ महापुरी १ जयपुरी १ भरमा ११ अशोका १ बीसोफा १॥७१४॥ विजया ए बामयती भयंत अपरामिदा योपना। पफपुरी मग्गपुरी चोदि अपोग्ना अपना य ।। ७१५ ॥ विजया जयंती जयंता अपराजिता व बोनम्या । पापुरी गपुरी भी अयोध्या अपप्या ॥१५॥ अर्थ-विजपा १ जती १ जा १ अराजिता १ जाननी १ पुस १ मा १ भयो भा र ९ वीस नाम जानने । पारि भात मा. रनिका माम कोई एक नियमापन ना निक नामनि मामास शुस नाम न || ७१५ ॥
एक नामि गिरि गोल है। यहार हजार योजन ऊंचे हैं। बहुरि नी या उपरि तिननेही
२९०
त्रिलोकसार-
आगे तिन नगरनिका विशेष स्वरूप गाथा दोय करि कहैं हैं;-
रयणकवाडवरावर सहस्सदलदार हेमपायारा ।
वारसहस्सा वीही तत्थ वरप्पह सहस्सेकं ॥ ७१६ ॥
रतकपाटवरावराः सहस्रदटद्वारा हेमप्राकाराः।
द्वादशसहस्राणि वीथ्यः तत्र चतुष्पथानि सहस्रकम् ॥ ७१६ ॥
अर्थ-तिन नगरनिकै द्वारनिविप रत्नमई किवाड़ हैं । उत्कृष्ट बड़े हजार द्वार हैं।
छोटे ताके आये पांचसै द्वार हैं सुवर्ण मई कोट है तोह नगरकै अभ्यंतर बारह हजार
गली है । तहां एक हजार चतुष्पथ चौपटा मार्ग हैं ॥ ७१६ ।।
गयराण वहिं परिदो वणाणि तिसदं ससहि पुरमज्झे ।
जिणभवणा गरवइजणगेहा सोहंति रयणमया ॥ ७१७ ।।
नगराणां चहिः परितः पनानि त्रिशतं सषष्ठिः पुरमध्ये ।
जिनभवनानि नरपतिजनगेहानि शोभते रत्नमयानि ।। ७१७ ॥
अर्थ-नगरनिकै बाय चौगिरद साठि सहित तीनस वन कहिए बाग हैं । बहर
मध्य जिन मंदिर भर नरपति राजाका मंदिर अर अन्य जननिक मंदिर रत्नमई सौभै हैं । इस
क्षेत्रविय मेरु आदिका अवस्थान ऐसें जानना ! ७१७ ।।
अब नामि गिरिनिका अवस्थान अर तिनका उसेघ आदिक गाथा दोपरि को है।
पिरभोगावणिमझे णाभिगिरीओ हवंति वीसाणि ।
वटा सहस्सतुंगा मूलपरि तत्तिया रुंदा ।। ७१८॥
स्थिरभागावनिमध्ये नाभिगिरयः भवति विशतिः ।
ताः सहस्रतुंगा मूटोपरि तावतः संद्राः ॥ ७१८ ।।
अर्थ-स्थिर भोग भूमि हैमवत हरि रम्यक हैरण्यवत क्षेत्र तिनके मध्य प्रदेश
याजन बोई है । भाव यह उभा टोलके आकार है ते पंच संधी यीस नामि मिरि ।
माढावं विना पउमगधयण्णाम मुकिला सिहरे।
सादगणुचर गादीचारणपउमापहास पाणमुरा ॥ ७१९ ।।
श्रद्धावान् विनदावा- पवनामानि मा ।
कानुचा सानिमारमा प्रभामा: पानमुः ॥ ७१९ ॥
अर्थ-मानादि सिंप्रदायान् जान REGiri
ht A नाम वही
मान
FA मान १५ या चाकर सातिर वा 4 भ
देश मे ॥१९॥
नरतिर्यग्लोकाधिकार। २९१ -- अब हिमवत् आदि कुचल अर रिमयाई पर्वत तिनो उपरि निटने जे कुट तिनको रयादिक यहैं हैं;-- एकारसहणवणव अष्टेफारस हिमादिङलागि । वेयवहार्ण गव णव पुन्चगहलमिनिणमवणं ।। ७२० ।। एकादशाट नव नव अटेकाददा हिमादिक्टानि । विजयार्थाना नव नव पूर्वकटे जिनभवनानि ॥ ७२०॥ अर्थ-ग्यारह ११ माठ ८ नव ९ नव ९ मा ८ पारह ११ प्रमाग प्रमा मात्र सादि कुलाचटनि उपरि यूट है । बहुरि विजयार्ध पर्यगनिकै रपरि ना ना गट है । नारा चौडे उपरि थोडे चौटे गोल आकार पर्वसनिक टपरि ए फूट जाननें । तहां पूटिशायिने भान सिदायतन नामा फुट तिन उपरि जिन मंदिर है।। ७२० ।। भाग फाहे कूट तिनके नाम भादिय गाथा दश करि पो हैं- फमसो सिदायदर्ण हिम भरहेडला य गंगा प । सिरिएरोहिदमा सिंधु गुरा हेमवदय गयणं ।। ७२१ ।। क्रमशः सिद्धायतन हिमयान् भरने ला च गेगा च । श्रीकूट गेहिताम्या सिंधुः गुराहमयतय, वैश्रवण ॥ ७२१ ॥ अर्थ -प्रमरि तिनके नाम कहिए है । मिदायतन टिगत १ भात १ धीरट १ रोहितास्या १ सिंधु १ मुराकट १हमपतक १ धवण १ मे उपरि पारह पट॥७२१॥ पहमे निणिदगेई देवीभो जुपदिणापागु । सेसेगु पूरणामा येतरदेवारि णिपसमि ।। ७२२ ॥ भयमे जिनेंद्रगढ़ देप्यो युक्तीनाम। दोषे पटनामान: व्यरदेवा समिनिवसति ॥ ७२२ ॥ अर्थ -तहां प्रथम सिद्धायतन पट उपरि जिनेः मरिम नेपूट है जैसे दिमयन पर गाली रोहितmar feng गुरा किन र पर है। पर अशेष टनिये रपरि भपने अपने दावे. माम भाव, कर ॥२२॥ पहा राप्चे पूरा रपणमया सगणगस्य हरिपुरता। मारिप भविश्यारा नादपदणा समाय ॥ २३ ॥ मता मटारमा स्नातया । ताबवितारा. तावाना दिसत ॥ ७२३ ।। अर्पता मोहनाई है। पर्वको रक्षा का माम माम मार २९२ त्रिलोकसार- नाननें । तिस भूमिविस्तारत आधा उपरि मुख व्यास है । असैं इन दोय गापानिकरि कह्या विशेष सो सर्वत्र महाहिमवदादिकनिकै कूटनिविय भी जाननां ॥ ७२३ ।। तो सिद्ध महाहिमवं हेमवदं रोहिदा हिराकूडं । हरिकंता हरिवरिसं वेलुरियं पच्छिमं कूडं ॥ ७२४ ॥ ततः सिद्ध महाहिमवान् हैमवतं रोहिता हीकूट। हरिकांता हरियर्षे पेड्र्य पश्चिम कूटं ॥ ७२४ ॥ अर्थ-तहां पाई सिट १ महा हिमवत् १ हैमवत् १ रोहिता १ होस्ट १ हरिसाना पोखर्ष १ वैडूर्य अंतका क्ट १ असे महा हिमयत् टपरि आठ कूट हैं ॥ ७२४ ॥ सिद्ध णिसहं च हरिवरिसं पुनविदेह हरिघिदीकूई । सीतोदा णाममदो अवरविदेहं च रुनगंतं ।। ७२५ ॥ सिद्ध निषधं च हरिवः पूर्वविदेहं हरिकृतिकूट । सीतीदा नाम अतः अपरविदेहं च रुचकांतम् ॥ ७२५॥ अर्थ-सिट १ निषध १ हरिवयं १ पूर्वविदेह १ हरितूट १ धृतिपट १ सीता नाम युट १ पाते पर अपर विदेह कूट अतापिय रुचफ कूट भैसे निपद पर्वत उपरि नयाट है।।७२५॥ सिद्ध गीलं पुष्यविदेई सीदा य फित्ति गरफता । अपरविदं रम्मगमपदसणमंतिम णाले ।। ७२६ ॥ मिदं नोट पूर्व विदेह सीता च काति: नरफीता । अपर विदेह रम्पक अपदर्शने अनिम मोठे ।। ७२६ ॥ अर्थ-मिड १ नाल १ पूर्व विदेह । सोनी १ दौति र नरकाता १ भाग १ भार. १ अंतका मापदर्शन १९ नीट पनि उपरि नबाट है ॥ ७२६ ॥ गिर्द कम्मी रम्मग गार्ग युद्धी य रुपामगा। दरणं हमदो मणिचणममं हादि ॥ ७२७ ।। मिकामा रम्पक नाग बुदिध मप्पालाया। हाय कूटमनी मणिकांचनमम भवति ।। ७२७ ।। अर्य-नि १ मा १ रम्यक. १ मार्ग १ दिया नाम पाया। नजिवन भटवा वटही है.प.मीटर आर पर ।। ७२७ ।। मि मिरि परामदेवी नही या टरटी गुवन रभरती पाटीय करपदी ।। ७२८ ।। fER माना। मान: are मन || ७२८ ॥ भयं- Emitram ! ! वंदनी raria को २०८॥
नरतिर्यग्लोफाधिकार। २९३ एरापदमणिकंचणाडं सिहरिम्हि सबसेलाणं । मूले सिहरेवि हवे दहेवि वणखंडमेदस्स ।। ७२९ ॥ ऐराषतमगिकोचनटे शिखरे सर्वशैलानाम् । गले शिखरेपि भवेत् हदेपि वनसंडमेतस्य ।। ७२९।। अर्थ- ऐरावन १ मगि कांचन १ कूट ए शिरारी पर्वत उपरि ग्यारह फट हैं । ऐसें ९ वट कहे इन कूटनिका ऐसा भाकार जानना । बहरि सर्व ही पर्वतनिकै मूलविप नीचे भर शिख. रिवि उपरि अर दहनिविथै चौगिरद पन खेड हैं ।। ७२९ ।। याका कहा सो कहै हैं- गिरिदीहो जोयणदलचासो वेदी दुकोसतुंगजुदा । घणुपणसपवासा जगवणणदिदहपादिएसु समा ॥ ७३० ॥ गिरिदीर्य योजनदलण्यास वेदी दिकोशमुंगयुता। धनुःपंचशतन्यामा नगवननदीहदप्रभृतिषु समा ॥ ७३०॥ अर्थ---इस धनखटका जितना अपनें अपने पर्वतका लंबाईका प्रमाण है तितना लंबाईका प्रमाण है । बहुरि भाध योजन चौदाईका प्रमाण है । बहुरि तिस पन खंडफी वेदी सो पचिसै धनुप चौरी दोय कोस उची है । सो ९ घेदी पर्वत वन नदी द्रह आदिविपै उचाई चौदाईका प्रमाण करि समान है । जैसे धागकै चौगिरद पिनां कांगुरां भीति हो है ताका नाम घेदी जानना ॥७३०॥ अब पर्वतादिकनिविप सर्वत्र पेदिकानिकी संख्या कहें हैं;- तिसदेकारससेले गउदीकुंडे दहाण उन्धीसे । तावदिया मणिवेदी णदीसु सगमाणदो दुगुणा ॥ ७३१ ॥ त्रिशतकादशशैलेषु नवतिकुंडैपु हदानों पतिशतौ । सावत्यः मणिवेधः नदीपु स्वकमानतः दिगुणाः ॥ ७३१ ।। अर्थ-बूदीपविौ तानसे ग्यारह पर्वत हैं तहां तितनी ही मणिमई दी है। परि निवे कुर है तहां तितनी ही मणिमई येदी है । बहुरि रवीस द्रह हैं । सही तितनी ही गणिमई बेदी हैं। बहुरि जे नदी में सहाँ दोऊ पानिविप वेदी पाईए है । तार्ते अपने ननिका प्रमागर्ने तुणी मणिमई दी है । याने इस कहे अर्थको विशेष पणे हैं । जैदीपविणे एक तो मे १ छह फुलाचल ६ व्यारि यमक पर्वत ४ दोयसै कांचनगिरि २०० आठ दिग्गज पर्वत है ८ सोलह यक्षार है १६ प्यारि गजदंत है १ चौसास विजयाई हैं ३१ चौतसि पृषभाचल हैं । पारि नाभि गिरि हैंइनों मिलाएं तानसे ग्यारह पर्वतनिफी संख्या हो है। महरि गंगादि महानदी जहां कुलाचलने पड़े हैं ते कुंड चौदह १५ विभगानही जिन उपजे है से कुछ धारह १२ गंगासिंधु समान विदेह देशनिविर्ष दोष दोय नदी जिनने उपने हैं ते दुर चौसठि ९ मि. नि कुंड हो हैं। बहुरि कुलाचलनिकै उपरि दह छह ६ सीतानदीधि द्रह दशा १० सीनोदा नदीवि दह दस १०९ सर्प मिले छवीस द्रह हो है। बहुरि गंगा सिंधु रक्ता रसोदा इन एक एककै परिवार नदी चौदह हजार २९६ प्रिलोफसार- अर्थ-सिद्ध फूट १ माल्यवत १ उत्तर कौरव १ का १ सागर १ रजत १ वर्गभग १ सीता १ हरिसह फट नवा ही है। ए माल्पवत गजदंत उपरि नर फूट हैं। ७३८॥ तो सिद्धं सोमणस कूडं देव कुरु मंगलं विमलं । फंचण वसिहमते सिद्ध विज्जुप्पई तो ॥ ७३९ ॥ ततः सिद सौमनस फूट देवकुरु मग विमरा । कांचन अपशिष्टमने सिर विशुप्रभ रातः ॥ ७३९ ।। अर्य-तहां पर सिमट १ सौमनस कूट १ देव कुर कट १ मगर परिमन ! पाचन १ त पिप वशिष्ट कूट से ए सोमनस गजदंत उपरि सात एट हैं। परि तड़ो पो मिद कर रिप्रभ ।। ७३९ ।। देवगुरु पउम तवणं सोस्थिपाई सदजलं सतो । सीतोदा हरि गरिमं तो सिदं गंधमादणयं ॥ ७४० ॥ देवास: प रापन सस्तिफाट शातपाल राराः । मानोराहरि परम ततः मि मादनक।। ७४०॥ भ- १ १ १ सपन १ सास्तिफहट १ शाह 13 ekin ! ऐने परिपुत प्रभ गर्दन उपरि ना गट है । मदीर सहा 3 Aart पाक गंधादीमालिाण तो लोहिया फलिई । भादं गागाग निगा गुभोगा य मोगमामिणिपा ॥ ७५१ ॥ MIT शादिमालिनी नोलोहिना सकिने । आमा) गुभोगा गोगमानिन ।। ७५१ ।। अर्थ iगार मानी १ नमानिनामा ! ! vie मन 21 गाए.. Attar Prit HART1 भा भीमानी ना ॥७॥१॥ पिपलगे कपणाटीमिन मुमिना य नारिंगण पला । नागदगे भागा भांगाटी गालिदिनी ॥ ७॥२॥ fraff निगा। -[.. : + 14 -1 4-1 ; u . n ;RI VA 1 + with againing fruRituenPM । हाम: HTET THI.॥
२९७ नरविर्यग्लोकाधिकार। सिद्ध पक्षाराम्य अधस्तनापरिमानामाव्यं । दिनव पय पोटदा रिकका प यक्षारदर्षिया ।। ७१३ ॥ अर्थ-याने टपरि सोरह पक्षार गिरिनि उपरि प्यारि प्यारि पट एक मोनिट फूट है। बहर एक जो जो अपने अपने यक्षारका नाम तोह नामका धारक वृट । वह दोर जो जो अपने अपने पक्षारके पूर्व पश्चिम पावविय दीय विदेह, देगनिका ने नाम लिन नमान १ । ऐसे प्यारि प्यारि कट जाननें । जे चित्रपट यशार टपर निहायान १ मिट १ कहा १ मुफया ए प्यारि वृट है । ऐसे ही अन्यत्र जानने । यही क्षार पनि गई दीय नय पांच सौदा सा सोलह हजार पाच याणी योजन भर एय.या टगतामा भाग दोय कला इतने प्रमाण जाननी । यह ! सेतीस हजार एम पीगगी योजन AREATE रिका है । साम साना मीतादानदीका विभिन्न ध्याम पांच योजन ५०० पा र ३३१८१४-१९ को आशा किर. १६५९२।२+१० पक्षार ... निया धारक बूट आये है ॥ ७४३ ॥ फुलगिरिगमीबाई दिपण्णाओ घगनि मंगंगु । घाणा टपमाहिद गढीही पूरभनयं ।। ७४४ ॥ बुद्धनिमिमीपरटे दिवन्या' यानि पे । थानाः कूटप्रमादिम नगीर्थ यूटान ॥ ७५४ ॥ अर्थ-पुलगिरि यहिए पुन्याच तिन, समीप ने यशाप.faq TH: 4 उपरि जो कूट है सही दिशुमारी यी है । भवसंप दोष गनिसातमा xnire पांच गट क्षार निरिनिके दोय दीय वट न उपरि तर ६५ बरी:R.fr मंदिर पर अपना अपना यथे, प्रमाणया भाग ! arcitment जाए जी जो प्रमाण भावे तिनना तितना बुर बटानिषदीपि 7 | Hrter: ना नाट दोष गमतनि. सात मा RAR ARTS री: गन देतनिका बाई सी हजार दोयसै मरयोजन पर दार वापसे पानी योजन दौर का नया HEN .. योजन पद का प्रमाण गत व पाय in 41REE राशिफ नि तन नारीपन यो मन भर गari PETN न भाग. समोरी किए ९५.१७१६-१७१५. : Fair या भाग THE] या 100841 पर परी ती -11.24TART- २९८ त्रिलोफसार- गिरिका क्षेत्र हाइ ती एक बूटके अंतरालका केता क्षेत्र होइ असे प्रैशिक फरिश भाग देइ निटार च्यारि हजार एकसौ मटताटीस योजन अर एफका सतारीसमा भाग प्यारि कूटनिकै चि अंतराउ हो है ॥ ७१४ ॥ मागे वक्षारनिकी टवाई तहां तिस्ते मात्रिम चैत्यालयंनिका स्थान ताहि निरा करे। वक्सारसयाणुदओ कुलगिरिपासम्हि चउसयाणा पाइमेरुस्स य पासे पंचसया तत्य जिणगेहा ॥ ७४५ ॥ यक्षारसतानामुदयः कुटगिरिपावें चतुःशत वृदया। नदीमेरोम पार्ने चशतानि त जिनगेहाः ॥ ७४५॥ अर्थ-पांवमेग्मबंधी गज देतसहित वक्षारगिरि एकसौ है । तिनको उचाई कुरामा निकी सो मारने योजन प्रमाण है । बहुरि गति पर अनुक्रमरि यते यते विहीर ती सीता गा सीतोदा नदी के निकट भर गनत मेह गिरिकै निकट पाची 1 पागस पोजन उचाई जहाँ पाईर तहां सिमट जानना । सीह दापर । ॥७॥५॥ भाना माहि फरनिको उचाई स्यागको फरणगर कहे हैं;- गिरितरिय पार्मनिमदभो उभयरोसमहरिद । येगादेग गपो सो गुणो मुगुदो रहे ।। ७४६ ।। FIROM मानिमाटोदयः उभपोषपदन । मन परः स गुण मुगगुन' ः ॥ ७४९।। अ- Anाका चौगाभाग प्रमाण तोता दर ATAL BIHAR का आना । बी इनदिने प्रथम गुटकी इंचाई का प्रमाण भएको -'.inो महानिाि मनात है। ampur पर मनमा भाग निहानियका प्रमाण भी है। माहानिया were गुग्गा प्राम भी मार गिरा। म 24taamanा भाम: १r ? म योन इन दो1Hreat र: Pahat Frmanan 26.m............ -TRE MAP
-
नरतिर्यग्लोकाधिकार।
२९९
चपको गुणें द्वितियादि कूटविणे जो जो प्रमाण होइ ३३१८६९-१९।३८।१२।१२।१५
५.८।१८।३-४।२१७-८।२५ साकौं मुख जो आदि फटको उचाई सौ योजन तीह करि जो. द्वितो.
यादि फूटनिकी उचाईका प्रमाण आय है १०३।१-८।१०६।१-४११०९।३८।११२।१२।
११५।५-८।११८३-४।१२११७-८।१२५। जैसेही सात फूट च्यारि कूटनिकी उचाईका
प्रमाण ल्यावना ।। ७४६॥
अब भरत आदि क्षेत्रनिका आश्रयकरि परिवार रूप नदीनिका प्रमाग गाथा प्यारि करि कहे हैं,
भरहइरावदसरिदा विदेहजुगले च चोइससहस्सा ।
परिवारा ततो दुगुणा हरिरम्मगखिदिति ।। ७४७ ।।
भरतैरायतसरितः विदेहयुगले च चतुर्दशसहस्राणि ।
नदीपरिवाराः ततः द्विगुणा हरिरम्यकक्षेत्रात ॥ ७४७ ।।
अर्थ-भरत ऐरावतविष प्यारि नदी पर पूर्व पश्चिम विदेह युगलवि गंगादि चीसठि नदी
तिन एक एक नदीकी चौदह हजार परिवार नदी हैं । ताते परे भरतते हरिक्षेत्रपर्यंत ऐरावतते
रम्यकपर्यंत दूणा दूणा अनुक्रम जानना | भावार्थ-हैमवत हरण्यवत संबंधी प्यारि नदीनिक
एफ एफकै मटाईस हजार परिवार नदी है । अर हरि रम्यक क्षेत्रसंबंधी प्यारि नदानिक एक एफकै
छप्पन हजार परिवार नदी हैं ॥ ७१७ ॥
वादालसहस्सं पुह कुरुदुणदी दुगदुपासनादणदी।
चोइसलवरखडसदरी विदेहदुगसवणइसंखा ।। ७४८ ॥
दाचत्वारिंशसहस्राणि पृथक् कुरपनद्यः विकदिपाश्रजातनयः ।
चतुर्दशलक्षाटसप्ततिः विदेहतिकमर्वनदीसल्या ॥ ७१८॥
अर्थ-देवकुर उत्तर पुरवियै नदीनिका दोय पाश्वनितें उपजी प्रथक प्रथक विपास
हजार नदी हैं । भावार्थ-देव कुरुविष सीतोदा नदीका पूर्व पार्श्वविष विपालीस हजार पश्चिम
पापि विपालास हजार परिवार नदी है । औसे देव कुरविपै निपजी चौरासी हजार नही है ।
बहार उत्तर कुरविय सीता नदीका पूर्व पार्शविरे वियालीस हजार पश्चिम पायपि रिपाटीस
हजार परिवार नदी है । जैसे उतर कुरविणे निपी चौरासी हजार नदी है । बहरि सिंह क्षेत्रदिप
प्राप्त सर्व नदीनिकी संख्या अटहतरि अधिक चौदह राव है । सो के ! विदेहविर प्राम गंगासिंधु
समान चौसटि नदी तिनकी प्रत्येक परिवार नदी चौदह हजार है। परि विभगा नदी पारा
तिनकी प्रत्येक परिवार नदी अठाईस हजार । देव कुरु उत्तर पुरविष सीता सीतोदाको प्रक
परिषार नी चौरासी हजार इन परिवार नदानिका प्रमाणको मूल नदीनिका प्रमागरूप अपना
अपना गुणफार गुणें तहां मूटनदी महत्तरि मिलारे सर्व मिटी हुई विक्षारिय बौदह लगा
अटहसरि नदी हो है ॥ ७४८ ॥
लक्खनियं पाणउदीसहस्स पारंप सचणसंग्रा ।
भरहरावदपाहुदी हरिरम्मगखेत भोति गादप्या ॥ ७४९ ॥
३०४ त्रिलोकसार-- की चौसठि शलाकानिका केता क्षेत्र होइ रैस त्रैराशिक करि दश करि अपवर्तन किएं छह चालीस हजारका उगणीसवा भाग प्रमाण विदेह क्षेत्रका व्यास हो है । याम मैह गिरिका मू दशहजार योजन समछेद करि घटाएं साढा च्यारि लाखका उगणीसवां भाग होइ या किए दोय लाख पचीस हजारका उगणीसवां भाग प्रमाण कुरु क्षेत्रका व्यास हो है । कुछ अरु मेरुविपै इतना अंतराल है सोई यह कुरु क्षेत्रका वाण जाननां || ७५९ ॥ अब याी धरि जीवाको कृति अर चापकी कृति की ल्यायें हैं;- इसुहीणं विक्वंभं चउगुणिदिमुणा हदे दु जीवकदी । वाणकदि छहिं गुणिदे तत्य जुदे घणुकदी होदि ॥ ७६० ॥ इपुर्हानं विष्कमं चतुर्गुणितेषुणा हते तु जीयाकृतिः । वाणकृति पड्भिः गुणिते तत्र युते धनुःकृतिः भवति ।। ७६० ॥ अर्थ i-वाण करि हीन जो वृत्त विष्कम ताको चौगुणा वाण करि गुर्गे जीवामी हो है । बहरि वाणकी कृतिकों छह गुणी करि तिस जीवाकी कृति विष मिलाएं धनुपको हो है । जिस राशिका वर्गमूल प्रहण करना होइ असा जो वर्गरूप राशि ताका नाम कृति सो जंबूद्वीप विप देव कुरु या उत्तर कुरुका आगै कहिए हैं जो वृत्त विक्रमका प्रमाण एक क इकईस लाख सठि हजार घ्यारिस नियोजनका एकसौ इकहत्तरिया भाग१२१६५४९०-१७१६ सौं याणका जो प्रमाण दोय लाख पच्चीस हजार योजनका उगणीसवां भाग २२५०० १९ तायम भाजक नव गुणांकरि समछेद करि २०२५००० - १७१ घटाइ अवशेष एक कोहि एक.. पालीस हजार प्यारिसे निवैका एकसौ इकहत्तरित्रा भाग रह्या १०१४०४९०-१७१ ताकी चर वागका प्रमाण नव लाखका उगणीसवां भाग करि गुणिए तहां गुणकारकी पांच विदी ग सागै स्थापिए १०१४०४९०००००० - १७१ । बहार गुप्यका भागहार एकसौ इनर चौगुणा यागविप नवका अंक था तीह सहित अपवर्तन किए टगणीम भए । बहीर चौगुना गुपविष टगीसका मागहार था तिसकरि याको गुण तीनसौ इकसटि भए । अस एक सात हजार पारिम प्यारि फोडि नि लासका तीनसे इकमठियां भाग प्रमाण कुरक्षेत्रको जीपायी कृतिक पाका वर्गमूल प्रहण किए दशाम सात हजारका उगणीमां भाग भया सो अपना भामहारका दिर तरेपन हजार योजन प्रमाण देवकुर वा उत्तर कुम्की जीगा हो है । यहरि दोय टाग पचीन । योजनका टगनीमा भाग प्रमाण जो वाण २२५०००. १८ तासीति करिर ५०६२५.." .०० + ३६१ वहरि दायों ए गुणा कर पाको ३०३७५०००००० - ३६१ ।" थीनी जीवा कृति १०१९०४९०००००० - ३६१ ना जोडिर, १३१७७२९.००० - ३६१ तब धनुषको कृति ही है । पाका वर्गम् प्राण करि ११४७१५४ + १९भ भारदारका मार दि मटिहार पनि भारत योजन आ या गोमा भाग १ १२- १९ मा देवडर वा उना कुरका चार हो । योनी की बात :०६२५०००००० - २६१ साा ा गरि २२५..., १९ भारत - - भ- मनियंग्यशापितार र! Em: स्थापि योमन अर दाग टगणीसा भाग प्रमाण देय Antarmin७६०।। griऐनिस न कि त्यावको कारण र पहें - मुर पगुणिदं जीवारांग परिग्यविगाणं । पगुणिदिगुणा भनिदे पिपमा पहरम विश्वंभो ।। ७६१॥ ए नीराव शिष्य । भगा भागे. निसमा यगर लिकमः ।। ०६१ ।। -गोवाग तारा भी पताको चौगुणा फरिए परि या जीग पर्गविष माmira) पौगुणा पाणका भाग दागिर श्री परत निपमते वृत्तक्षेत्रका विष्क- Friवि पुरुषेत्रका बाग दोपग पचीस हजारका उगणीसा ५१ वर्ग ५०६२५००००००-२६१ पाको भौगुणा परिए २०२५०००००००० ३६१ र मपी पी पी जागी शी १०१४०४९००००००२३६१ ताम नारा तय का पर्दा हजार चौरन कोलिनी का सीनसे इकसठिया भाग होइ २१६५४९००००००-२६१ परि जो प्रमाण भया सातौं चौगुणों याण ना लासका नामयभाग १०००००-१० ताका भाग दीजिए सहा इस भागहारकी पंचरिती भर या पंचविदा पर्मन प.रिए १२१६५५९०-३६११९ यहरि हारस्प हारो गुणकोइ से: इस पचन गारफा भागहार भाग्पा गुणकार होइ सो इहां भागहारका भागहार गणी मी भायफे गुणफार भपा । यहरि इहाँ भागार सीनसे इफसठि थे साकौ भाग्यका गफार उगमाग परि अपवर्तन किए उगास भए १२१६५४९०-१९।९ बहरि गगास र नय भाग हारको अकानिकों परस्पर गुणें एक फोदि फईस लास साठ हजार पनि निकाफी वसरिया भाग भया सो अपना भागहारका भाग दिए इकहत्तर हजार कमी निदालीम योजन भर सेताम एफसी इकहत्तरिया भाग प्रमाण फुरक्षेत्रका वृत्त विष्कम हो । कृत विकभका स्वमए कहा सो पाहिए है । गोल क्षेत्र के ग्यासको वृत विष्कम जानना सो हपुर क्षेत्रविर गोल क्षेत्र तो नाही परंतु जीवादिकका हान होने के अधि वृत्त विष्कम क्षेत्रका माग फायना कर कहा है। सोयाका मेरा अभिप्राय जानन इकहत्तर हजार सौ तियालीस जिन घर सेनाम एवमी इकहत्तरियां भाग प्रमाण ध्यासको धेरै जो गोल क्षेत्र होइ तिस वियै हो तरेपन हजार पोजन व्यासया प्रमाणरूप जीवा होइ तहात अतपर्यंत ग्यारह हजार आठस पार्टीम योजन भर टोप उगणीसा भाग प्रमाण वाग हो है । ऐसही अन्यत्र साधन करना ॥७६॥ मागें कुरु आदि क्षेत्रनिका स्थूल सूक्ष्म क्षेत्रफल ल्यावको करण मूत्र कहें हैं;- जीवादमुपादं जीवाइमुजुददलं च पत्तेयं । दगकरणिवाणगुणिदे गुहुमिदग्फलं च चणुखेने ॥ ७६२ ।।
त्रिलोकसार- ताको जीचाहतेयुपादं जीवाइंयुयुतदलं च प्रत्येक । दशकरणिवाणगुणिते सूक्ष्मतरफलं च धनुःक्षेत्रे || ७६२ ॥ अर्थ--जीवा करि गुण्या हुवा याणका चौथा मागी जुद्रा स्थापिए । यही घाणी जोड़ि ताका आधाओं जुदा स्थापिए। तहां पहले स्थापन किया ताका विक्रम सूत्रत वर्ग करि दश गुणां करि मूल प्रहण योग्य राशि रुप करिए ताका वर्ग मूल धनुषाकार क्षेत्रका सूक्ष्म क्षेत्रफल हो है । बहुरि पीछे स्थापन कीया ताको वाण करि क्षेत्र फल हो है । सो जंबू द्वीपके कुरु क्षेत्रनिविपै दोय लाख पचीस हजारका उगः प्रमाण वाण है ताका चौथा भाग ५६२५०. १९ की जीया तरेपन हजार कोरे २९८१२५००००+१९ वहरि विश्कंभ बग्गदह गुण इत्यादि सूत्रने याका वर्ग कति करि करणि करिए है । ८८८७८५१५६२५०००००००००-३६१ याका वर्ग मूल नवसै वियालीस कोडि पिचहत्तीर लाख चालीस हजार दोयसै चौहत्तर योजनका उग प्रमाण कुरु क्षेत्रका सूक्ष्म फल हो है | तार तम्य करि एक योजनकै लंबे चौड़े खंड कन् है। वहरि जीवा तरेपन हजार योजन ताको उगणीस करि समछेद करि १००७०००-१ प्रमाण दोय लाख पचास हजारका उगणीसवां भागमें जोड़ि १२३२०००-१९ ६१६०००:१९ बहुरि याकों वाण २२५०००१९ करि गुणें तेरह हजार अ कोडिका तीनसै इकसठियां भाग प्रमाण कुरु क्षेत्रका स्थूल क्षेत्र फल हो है । स्थूल परे एक योजन लंबे चौड़े खंड फल्पे इतनें हो हैं ।।७६२ ।। आगें अन्य प्रकार करि वृत्त विष्कम अर वाणके ल्यापनेकौं करण सूत्र कहै है;- दुगुणिसु कदिजुद जीवावग्गं चउवाणभाजिए वह । जीवा धणुकदिसेसो छन्भत्तो तप्पदं वाणं ॥७६३ ।। द्विगुण्येषु कृतियुतं जीवावर्ग चतुर्वाणभक्ते वृत्त । जीवा धनुःकृतिशेषः पड्मक्तः तत्पद वाणम् ।। ७६३ ।। अर्थ-दुगुण वाणका वर्ग करि जोड्या हुवा जीवाका वर्गको चौगुणा वाणका वृत्त विष्कम हो है । बहुरि जीवाकी कृति चापिकी कृतिमेसों घटाइ अवशेषकों छहका जो प्रमाण होइ ताका पद कहिए वर्गमूल सो वाण हो है । सो जंबूद्वीपके कुरु क्षेत्रनि टाख पचीस हजारका उगणीसवां भाग प्रमाण वाणकों दूणा करि ४५००००-१९ ताक २०२५००००००००३६१ यामैं जीका तरेपन हजार प्रमाण ताका वर्ग २८०९०. सम छेद करि १०१४०४९०००००० जोदिए १२१६५४९००००००-३६१ ये चाँगुणा याणका प्रमाण ९०००००-१९ का वॉक्ति अपवर्तन विधान करि भाग दीए ए इकाईस साप पंसटि हजार च्यारिस निवैका एकसौ इकहत्तरिया भाग प्रमाण कुरुक्षेत्रका र हो है । वहीर पूनि जीवाका वर्गको ४ ममठेद करि १०१४०४९०००००० धनु १३१७७१९००००००-३६१ मा घार ३०३७५०००००००३६१ माशेप नरतिर्यग्लोकाधिकार । भाग दिएं जो प्रमाण ५०६२५००००००२३६१ होइ ताका वर्ग मूल प्रहण किए दोय लाख पचीस हजारका उगणीसवां भाग प्रमाण कुरु क्षेत्रका पाण हो है ॥ ७६३॥ आगै अन्य प्रकारका करि वाण ल्याउनेकों फरण सूत्र कई हैं;- जीवाविरखंभाणं वग्गविसेसस्स होदि जम्मूलं । तं विखंभा सोहय सेसद्धमिमुं विजाणाहि ।। ७६४ ॥ जीयाविष्कभयोः वर्गविशेषस्य भवति यन्मूल । तत् विष्कभात् शोधय शेषामिपुं विजानीहि ।। ७६४ ॥ अर्य-जीवाका वर्ग वृत्त विष्कमका वर्गमसौं घटाएं अवशेष जो रहे ताका जो वर्गमूल ताकौं वृत्त विकभका प्रमागमसौं घटाएं अबशेष रहै ताका आधा वाणका प्रमाण जानह । सो जबूद्वीपके कुरु क्षेत्रविष जीवा तरेपन हजार ताका वर्ग २८०९०००००० कों वृत्त विकभ एक फोड़ि इक ईस लाख पैंसठ हजार च्यारिसे निवैका एक सी इकहत्तरिया भाग प्रमाण ताका धर्ग १४७९९९१४६०४०१०० मेसों जीवाका वर्गका समठेद करि ८२१३७९६९०००००० -२९२४१ घटाएं अवशेष जो रहे ६५८६११८७ ९४०१००-२९२४१ ताका वर्गमूल का जो प्रमाण ८११५४९०२१७१ साकों पूर्वोक्त वृत्त विकभका प्रमाण १२१६५४-९०-१७१ मैमी घटाएं अबशेष जो रह ४०५००००६-१७१ ताका आधा बीम लाग पचीस हजारका एकसौ इकहत्तरियां भाग मात्र होइ सो इहां भाग हार एफसी इकहत्तरिकों नव गुणा उगणीस रहे सो स्थापि पूर्वोक्त अर्द्ध प्रमाणके भाज्यकों २०२५००० नवका भाग दिए दोय लाख पचीस हजार भान्य होइ भर अवशेष रगणीस भागहार रहे सो इतनो फुरक्षेत्रका याण जानना ॥७६४॥ आरौं भन्य प्रकार करि वृत्त विष्कंभ अर घाणके ल्याव को करण रात्र काहे हैं:- दुगुणिमुहिदघणुवग्गो बाणोणो अद्धिदो हवे वासो । वासफदिसहिदधणुफदिदलस्स मूलेचि वासमिमुमेसं ॥ ७६५ ।। द्विगुणे हितधनुर्वर्गो याणानः अर्थितो गवेत् व्यासः । व्यासतिसहितधनुष्कृतिलस्य मूलपि व्यासमिधुशेयं ॥ ७६५ ।। अर्थ-दूणा घाणका भाग धनुषका वर्गको दिए जो प्रमाण हाइ साम पागका प्रमाण घटाइ अवशेपकों आधा किए वृत्त विष्कमका प्रमाण हो है । यहरि वृत्त म्यासका वर्ग करि जाग हुवा ऐसा जो धनुपके वर्गका आधा प्रमाणका वर्ग मूल तामसी वृत विष्कमका प्रमाण घटाए याणका प्रमाण हो है । सो जवपिके कुरक्षेत्रविौ वाण दोपहारा पर्चास हजारका उगीमया भाग ताको दूणा फरि ४५००००-१९ याला भाग पूर्वोक्त धनुषका वर्गको १३१७७९९०००००० ३६१ पूर्वोक्त प्रकार अपवर्तन विधान कार दीएं एक लारव चौवन हजार एकसो भठाम भर असर प्यारिस साठफा आठसै पचावनया भाग होइ सी अपशेषके भाग्य भागको पंचकरि भरवर्तन किए पाणवका एकसौ इकहत्तरिया भाग होइ सो इनकों समठेद करि मिठाइ २६३५५९८०-१७१ याने समछेद विधानकरि पाणका प्रमाण २०२५०००-१७१ घटाएं भवोर २५३३०९८०-१०१ रामा 11 नीmttwitnet . कर गुगं घनुपकी कृति हो है। बहार याणकी कृतिको छह गुणी करिताको निस धनुषा १०१२५००-१७१ मित्त विकभका प्रमाण १२१६५४९०+१७१ जोर १३१७९.९९०+१७१ चौगुणा याण ९०००००१९ फरि गुणिर सहो गया हार पानी इस हनरिकों उगणीम ना गुणाकार दीप जायगा स्थापिए १९९ पर गुगर' पांच दि गुप्य राशिक आगे स्थापिए १३१७७९००००००० यहार गुणकारका माan की गुन्या महारदीय जायमा स्थापन किया था सामगवफा अंककर भगान पत्रिका हराया भागहरीम भर गुणकारका भागद्वार परस्पर गुसीनगरमा में दाने पनुरी लिए प्रमाण १३१७७०९००००००।३११हो। भीम १३१७७९९००००००-३६१ अंगी घार अमर १०१.१९.' ०००-३६..मानवी इतिहा। गुण भRIA सभी पाप हो।मी में मोर Minuart बिलोकसार- की आवाकरि १२१६५४९०२१७१ अपना भाग हारका भाग दिएं ७११४३३७-१ कुरुक्षेत्रका वृत्त विष्फंभ हो है । वडार समछेद करि अपने अंशकरि जोड्या हुवा जो वृत्त विक्रम प्रमाण १२१६५४९०-१७१ ताका वर्ग करि १४७९९९१४६९४०१०० २९२०१६ पूर्वोक्त धनुषकी कृति १३१७७९९००००००-३६१ ताफा अर्द्धप्रमाण ६५८८९१५.. ००२३६१ को भाज्य भाजको इक्यासी गुणां करि समछेद करि ५३३७०८५९५०० * २९२४१ जोड़िए २०१३७०००६४४०१००:२९२४१ याका वर्गमूलका जो १४१९०४९० - १७१ तामै वृत्त विष्कंभ १२१६५४९०११७१ को घटाइ अवशेष लाख पचास हजारको एकसौ इकहत्तरियां भाग होइ सो इहा भाग हार उगगीस नाका नय करि तिस भाज्यको माग दिए दोय लाख पचीस हजारका उगणीसवां भाग होइ सो पद प्रमाण है ॥ ७६५॥ आगें अन्य प्रकार करि धनुषकी कृति अर जीवाकी कृति ल्याव को करण सूत्र इसुदलजुदविक्खंभो चउगुणिदिमुणा हदे दु धृणुकरणी। चाणकादि छहिं गुणिदं तत्पूणे होदि जीवकदी ।। ७६६ ॥ इपदव्युतविष्कमः चतुर्गणितेपुणा हते तु धनुःकरणी । बागमति पइमिः गुणितं तत्रोने भवति जीवकृतिः ॥ ७६६ ॥ अर्य -~~~याणका भई प्रमाग करि जोड्या या विकम ताकी चौगुणा वापर कर यो पटा जीवाको कृति हो है । सो इस जंबूद्वीपक कुरुक्षेत्रयिय याण दोप छाप परम पाटगागा भागताको आधा फार ११२५००१ याको नय फार समोर पकी ५०६२५००००००-३६१ नाकों पद गुणाकी ३०३७५०००००० का पनि मन भरि अचानका भी काम ! (M 10 मानिपग्लोषाधिकार। । rammt.:-सिमानामा गरा प्रमाण जार्यको जग 1. I FIIT न भागमाया टगर समाप्रमाण Irrma Hrrinamit माया प्रमाय मरती जीग है । महाहिमवत के -Ramaiयो माग निकल गाररिया प्रमाग हरिको जीरा है। PREमाया जिसका नाम क्षेत्रका मसिहा प्रमाग Fire at पामय माग प्रमाण ती जैसे भगुपको विटा है से जीना I Rimi का एक पायने माय मरे पाई त नापका जो R: HTTी बार जानना । या पामे पर या धनुः पृट भी पदिए । यहार जैसे ROIN कर भापकर गिजीवाका मध्यो गाय सनमुरर जीपका समाजमो पाय जानना । ही उत्तर ऐरावत मारि क्षेत्र मादि कुत्रा- या गापमा रहा टसर तारका फसा है, सहा दक्षिण सट जानना । "पानिया ओनम गोरी नाम जानन ॥ ७६६ ॥ an अय दणि भराभर विजयाई र उनर भरत क्षेत्रके पाग स्पारनेको सूत्र कहे हैं- रुपगिरिणिभरावासदलं दरिग्पणभराइए । गगुद जगसरमगरभरा जुर्द भरासिदिवाणो ॥ ७६७ ।। समिनिभातम्यामद रिमा भरतेयः । नायुत नगारः उत्तरभरतयुते भरतसगागः ॥ ७६७॥ अर्प -प्य गिरि गोविजपा ताफा पास योजन पचाम सो भरतका व्यास पांचर्स एम ए कामिनी पटाइ भयशेर १७६६-१९ को आया फिर दोपसे अटास योजन तीन घाममा दगि भाषा भानका याग है। या विजपाई पनिका ध्याम पचास योजन गदे दीप पटासी योजन तीन पाया प्रमाग विजयका बाग हो है । यामै उत्तर गरतका व्यास दोयन अमास पोजन सीन काला जोहे पाच जाग योमन छह कन्म संपर्श भरतका याण है। इन तीनों पागनिक समद फार अपना अपना अंग मिटार दक्षिण भरतका प्यारि हजार पांच पदामका रगीमा भाग जिया पाच हजार प्यारिस पिचहतरिका उगणीसांभाग सर्ग भातका दश हजारका दगीमा भाग प्रमाण जानना ।। ७६७ ॥ आगे हिमवत आदि पर्वतनिया भर हेमवत आदि क्षेत्रनिका वाग ल्याव की फरण सूत्र दिमणगपाहुयासो दुगुणो भरहूणिदो य णिसहोति । ससवाणा णिसहसरो सविदेहदलो विदेहस्स ॥ ७६८।। हिमनगप्रतिव्याम. द्विगुणः भरतोनितश्च निपानम् । स्सम्यवाणा निपधशर सविदेहदट विदेहस्य ।। ७६८ ॥
. तीस हजारका उगणीसयां भाग तामैं विदेहके व्यास छह लाख चालीस हजारका उगीमद भाग ताका आधा तीन लाख वीस हजारका उगणीसा भाग जोड़े अर्द्ध विदेहका वाण नाम ०००००-१९ यासों घटाइए १८९५४७५-१९ अब शेषकों चौगुणा वाण १८१००+१२ ५२२४५१९ अपना भाग हारका भाग दीए ना हजार सातसै अठतालास योजना मारहाण मा भाग प्रमाण दक्षिण भरत क्षेत्री शुद्ध जीवा हो है। परि वाण ४५२५-१९सई पनि ३४३०८०९७५०० को जी ३४४३०९५१२५०-३६१ धनुपकी कृति हो है। धर्ग गूढ माण करि १८५५५५-१९ अपना भागहारका भाग दिए नाहजार सात से ही योजन एक रमणीसको भाग प्रमाण दक्षिण भरतका धनुष हो । बरि शिजपाई. दमप वोग पांच हमार ग्यागिसे पिचहत्तरिका रगणीसो भाग प्रमाण सादि समय 1 विभागीय टासका उमणीमा भाग प्रमाणी घसाइ अरशेष १८२४५२५-१५ ६ गुणा वागश प्रमाग २१९००-१० पारि गुणे ४१४९०.९७५००-३६१ सिपाही नगरीती। पाका यग 'पट प्राण करि २०३६९१.१०.अपनो भागमा दीर माजा मग बाम योजना ग्यास उमणीय भाग प्रमाण रिमा हो । बढी माग ५४७५-१९. या वर्ग करि २००७५६२५.111 मशेर १०८५३७५०-३६१ मीकि जी.... ७५००-३६.४.१९९२५१२५०-३६१ धनपीपारा Fan त्रिलोकसार- अर्थ-हिमवत पर्वत आदिका व्यास दूणा करि भरतका व्यास घटाएं 11 स्वकीय स्वकीय वाण हो हैं । सो एकसौ नि शलाकानिका एक लाख योजन क्षेत्र होइ तौ आदिकी दोय च्यारि आठ सोलह यत्तीस शलाकानिका कीत क्षेत्र होइ जैसें त्रैराशिक करि १११ किए हिमवत आदिका व्यास हो है । सो हिमवतका वीस हजारका हैमवतका चालीस . हिमवतका असी हजारका हरिका एक लाख साठि हजारका निषधका तीन लाख वीस हजारका दर सवां भाग प्रमाण व्यास है । सो याकों दूणा करि या सर्वत्र भरतका वाण दश हजारका उगीना भाग घटाएं हिमवत आदिका क्रमते तीस हजार एक लाख १००००- १९॥ ८००००-१६ १६००००: १९। ३२०००० १९॥ ६४०००० १९॥ पचास हजार तीन लाख दश हजार लाख तीस हजारका उगणीसा भाग प्रमाण वाण जानना । बहुरि निषधका वाण छहरा पचास हजारका उगणीसा भाग प्रमाण हो है। अब इन वाणनको धार तिन क्षेत्र या पर्वतनिध जाया कृति र धनः कृतिको हसुहाग विष्का इत्यादि करण सूत्र करि ल्याईए सो कहि । दक्षिण भरत विष समछेदरूप बाण च्यारि हजार पाँचसे पचीसका उगणीसयों भाग ताओं में द्वीपका व्यास टाय योजन सो इहाँ वृत्त विष्कम जाननां । ताको उगणीसकरि समझेद कीर ११ परि गुणे ३४३०८०९७५००:३१ जापाको कृति हो है । याका वर्ग भूल प्रहण करि १५ प.रि २०१७५६२५-३६१ याकी छह गुणा करि १२२८५३७५०-३६१ पाम तोह कर ३.४१३२:१: MarrinTTAR ( 14 दोन ।
नरतिर्यग्लोषाधिकार। ३११ .अर पंद्रह उगणीमयां भाग प्रमाण विजयाई पर्वतका धनुष हो है । बहीर उत्तर भरतका समदम्प यांण दश हजारका उगणीमयों भाग ताको समवेदरूप वृत्त विष्कम उगीस लाखका उगणीसवा भाग प्रमाणमैंसों घटाइ अवशेष १८९०००-१९ को चौगुणा याग ४००००-१०. करि गुणें ७५६००००००००-३६१ जीवाफी कृति हो है। पाका वर्ग मूल प्रहण करि २७५०- ५४.१९ अपना भाग हार १९ का भाग दिए चौदह हजार प्यारिसे इकहत्तार योजन पांच उगणीसा प्रमाण उत्तर भरत क्षेत्रकी जीवा हो है । यही याग १००००-१९ का यगं फरि १००००००००-३६१ ताको यह गुणा परि ६००००००००-३६१ पात्रिी जीवाकी कृति ७५६००००००००-३६१ जोड़े ७६२००००००००-३६१ धगुपकी रति है। याका वर्ग मूल प्रहण करि २७६०४३-१९ अपना भाग हार १९ फा भाग दिए चौदह हजार पांचस अदाईस योजन भर ग्यारह उगीसा भाग प्रमाण उत्तर भरत क्षेत्रका धनुषही है। बहरि हिमवत पर्वतका धाण तीस हजारका उगणीसयो भाग ताकी न रिकभ ग. णीस सक्षका उगणीसा भाग में सौ घटाइ अपशेष १८७००००-११ या धीगुणापाग १२००००-१९ फरि गुणे २२४४०००००००-३६१ जीवाको कृति हो । याका पर्व मूल ग्रहण फार ४७३७०९-११. अपना भाग हार १० का भाग दिए पाईग हजार नवसे पत्तीस योजन अर किछू पाटि एक रगणागया भाग प्रमाण हिमपायी जागा महार पाण ३००००-१९ फा पर्ग फरि ९००००००००-३६१ याको छह गुगो पार ५१०००००००-३६१ ताह विष जीकी कृति २२४४००००००००-२६१ जो धनुपकी कृति हो है । पाका वर्ग मूल प्रहण परे ४७९३७४.१९ सपनो भाग हार गणांस १९ का भाग दिए पचास हजार दोष से तास पोजन भर प्यारि गमय भाग प्रमाण हिमयत पर्वतका धनुपही है। यहीर हेगवत क्षेत्रका याग हजारया गायी भाग साफी वृत विष्कम उगणीसा भागभैसों घटाइ अवशेष १८३००००-१९ को चौगुणा वाण २८००००-१९ करि गुणे ५१२४००००००००-२६१ की हो है । याया वर्ग मूल मण परि ७१५८२२-१९ अपना भाग हार १९ मा भाग लिए सास हजार से यहरि योजना भर. किंचिदन सोरह उगास भाग प्रमाण मरतको जाया हो है। परि ७००००-१०वर्ग करि ५९००००००००-३६१ताको गुणकी २९४००००००००-३६१ या जीपाको पनि ५१२५००००००००-२६१ जोडे ५४१ ८००००००००-३६१ धनुषयी ति हो है। पाफा वर्ग मूल मरण करि ७३६०७०-१९ अपना भाग हार १० या भाग दिए अटतीस हजार सातो पानीमा योजना समय भाग प्रमाण हैमषन क्षेत्रका पनप है। हार मा हिमश्त पर्वतया बायका पदाम जारफा उगनीमा भाग नायकमा उगणीसा गर्ग.मया मामला १७५००००-१० वी वागणा पाण ६०००००-१९ प.रि गुण ३६१ जीना iit | याका धर्म ATRE it १०२४६. नामा
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नरविर्यग्लोशाधिकार। ही दक्षिण मरतवत् उत्तर ऐरावतका विजयावत् विजयादया मंपूर्ण भरतर संपूर्ण रायनका हिमवन शिवरी पर्वतका हेमवत हरण्ययत्क्षेत्रका महाहिमात् एवमी पर्वतमा हरिवत् रम्यकक्षेत्रका निषत् नील पर्वतका अर्धविदेह वत् मई विदेहका पाण जीया धनु. पृटका कथन जानना ।। ७६८॥ आर्गे दक्षिण भरतादि क्षेत्र या पर्यतनिका जीवा धनुपनिक पूर्व ल्यार क नए गायानि फरि कहे हैं;- विखणभरहे जीवा अडचउसगणवय होति धारकला । चापं छछयासगसपणयपसहरसं प एककला ।। ७६९ ।। दक्षिणमरले जीया अष्टचतु:समानव भयंति द्वादशकटाः । चापं पट्पट्सप्तशरानवसहर घ एकया ।। ७६९ ॥ अर्थ-दक्षिण भरत क्षेत्रविौ जीया आठ प्यारि सातमा नफनि कर ना हजर सातस अटतालीस योजन भर घारह कला प्रमाण है । पदी तिमहीका पाप जो धनुष मायामा अधिक सात कार सहित नय हजार योजन भर एक कला प्रमाण ॥७६०॥ पहते नीषा मदुगसगदासहस्सेगारफा । तेदालसगणक पण्णरसफला य नपार ॥ ७७०॥ विजयाधी जीवा नभांतिकमादशमहाकादराका । निचत्वारिंशत् सस नभःएफ पंपदाकटाच रागा ॥ ७७०॥ अर्थ-विजपाईफा अत किये जीवा विदी दोह गात इन भकानिबार मार्ग बंग सहित दश हजार योजन भर ग्यारह कला प्रमाण । परि ताका चार या I नकनि करि दश हजार मातम तियारस पोगन भर पहला प्रमा...॥ भरहसते जीवा इगिसगपउपोदर पाला। पावं मददुगपणचउरेक एकारसकला प ॥ ७७१ ।। भरसरयांने जीया एक सा पधश प पकगः । पाएं अतिकधचतुर एकादशकलाः च ॥ ७७१।। अर्थ-भरत का अंत विप एक सात पार पनि परि ध्यार यहत्तार योजन भर पापकरण प्रमाण है । यह ताप थाप भार दोप पर एक इन अंकानि करि चौदह हजार पाँधी भाईस पोजन भर पार HAR ||१|| हिमरणात नीषा दुगतिगणवपरदगंब पणा । पार गभनिपगपणाममा पचारिप ॥ ७७२ ।। हिमनगात जाव। बिना धोना । पानापास ७०२ ॥ भ-nि Ra kali ४१५ पीई रमार नबर्ग - Ut...
नपसे एक याजन अर सत्तरह कटा प्रमाण हे । बहार ताका चाप सोलह विन्दी इन की
अर्थ-निपढ़ पर्वतका अतविष जीवा हर पांच एक पारि नर इन कनिकी
पहजार एक मापन पोजन कर दोय कला प्रमाण है। यहीर धनु राम
चामक.इन निरि ०२.दामचौरममारतानमे रियादीम पोजन भरना
३१४
त्रिीलाकसार-
तीन दोय पांच इन अंकनि करि पांच हजार दोयस तास तीह करि अधिक वीस हजार
अर च्यारि कला प्रमाण है ।। ७७२॥
हेमवदंतिमजीवा चउसगछस्सगति उणसोलकला।
धणुह णभचउसगअडतिणि विसेसहियदसयकला ॥ ७७३ ।।
हेमवतांतिमजीवा चतुःसप्तपट्सप्तत्रयः ऊनपोडशकला ।
धनु: नभश्चतुःसप्ताश्त्रीणि विशेषाधिकदशकला || ७७३ ॥
अर्थ-हैमवत क्षेत्रका अंत विष जीवा च्यारि सात छह सात तीन इन अंकनि की
तीस हजार छसै चहौत्तरि योजन अर किछु घाटि सोलह कला प्रमाण है । बहुरि ताका
विंदी च्यारि सात आठ तीन इन अंकनि करि अठतीस हजार सातसे चालीस योजन भर ।
यधिक दश,कला प्रमाण है ।। ७७३ ।।
महाहमयचरिमजीवा इगतिणवचिदयपंच छककला।
तच्चावं तियणवदुगसगवण्णसहस्स दसयकला ॥ ७७४ ॥
महाहिमवच्चमरजीया एकत्रिनवत्रितयपंच पदकलाः।
तचापं त्रिनवद्विसप्तपंचाशत्सहस्रं दशकलाः ।। ७७४ ॥
अर्थ-महाहिमवत पर्वतका अंत किय जीवा एक तीन नव तीन पंच इन अनि
तरेपन हजार नवस इकतीस योजन अर छह कला प्रमाण है । बहुरि ताका चाप तीन नव
इन अंकनि करि दोयसै सेरणौ तिन करि सहित सत्तावन हजार योजन अर दशक
प्रमाण है ॥ ७७१॥
हरिजीवा इगिणभणपतियसत्तयमिह कलावि सत्तरसा।
चावं सोलसणभचउसीदिसहस्सं च चारि कला ।। ७७५ ।।
हरिजीवा एकनमानवत्रिसप्तक इह कला अपि सप्तदश।
चापं षोडशनभश्चतुरशांतिसहस्रं च चतस्रः कलाः ।। ७७५ ॥
अर्थ-हरिक्षेत्र विष जीवा एक दी नव तीन सात इन अनि करि तेहतर ।
सौरह निन करि अधिक चौरासी हजार योजन भर च्यारि कला प्रमाण है ॥ ७७५ ।।
जिसहावसाणजीवा छप्पणइगिचारिणयय दोणि कला।
घणुपुहं छादालतिचउचीसेकं च वय फला ॥ ७७६ ॥
निराधावसानजीवा परपंचकचतुर्नवक दे कळे ।
धनुःष्ट पच वारिस निचतुर्विशाय च ना करा ॥ ७७६ ॥
प्रमा॥६॥
मरविर्यग्लोकाधिकार। २१५ जीव विदेहमरो परखा परिहिदलमेवमपरदे । मारचंदुरिया गुणधम्मसिद्ध सत्रफला ।। ७७७ ॥ जीचा विवामध्ये परिधिदत एवमपगर्थे । माधानाः गुणधर्ममसिदाः सर्वकालाः ॥ ७७७ ॥ अर्थ-विदेहरी, मध्य जी भर धनुष ए दोऊ प्रमो जी तो सक्ष योजन प्रमाण मर मनुष्य कीपको परिदिया जो प्रमाण ३१६२२७ कोश ३ ८८ १२८ गुल १३६ साफ पर्स प्रमाण किए पाटि एक ला भटावन हजार एक सौ चौदह योजन प्रमाण है । ऐसे ही ऐरा. बारिक क्षेत्र वा पननिका कपन भर दूसरी सरफका आधा अंदीप विष जानना । बहरि गुण पहिए चिता जावा मर धर्म यहिए धनुर तिनविर प्रसिद्ध कहिए पूर्व कही ऐसी जु सर्वकला कहिए पोजनका असे माधय माहित नारायण नब भर चंद्र कहिए चंद्रमा एक इन अनि करि उगणीस भए निनपरि रखा पाहिए भागरूप जाननी । भावार्य- जो जीपा भर धनुपका कपन विष पारा करी । सो एफ फराका प्रमाण एक योजनफा उगणीसा भाग जानना । यहरि गुण धर्म यादि पापा दुसरा अर्थ कहिए हैं-गुग ज्ञानादिक धर्म अहिंसादिक विष प्रसिद्ध ऐसी श सर्व पाया थाई ताले माधवचंद्र नाम विच देव ताकरि उदृत कहिर प्रकाशित हैं । भावार्थ- माधव व माघार्पने गुण धर्म संबंधी सर्वकला प्रगट करी है ऐसा दूसरा अर्थ भी जानना ॥७७७॥ भागै जीवानिकी पूटिका पर धनुपनकी पार्श्वभुजाफो कह है। पुच्चपरजीवसेसे दलिदे ह लियाचि णाम हवे । घणुगसेसे दलिदे पासभुना दक्षिणुत्तरदो ॥ ७७८ ॥ पूर्यापरजीवाशेपे दलिते इह चूलिका इति नाम भवेत् । धनुर्तिकोष दहिने पार्श्वगुजः दक्षिणोत्तरतः ॥ ७७८ ॥ अर्थ-दक्षिणविय ती भरतादिक विये भर उत्तरविौ ऐरावतादिविणे जो पूर्वापर जीवा कहिए पहले भर पीछे कही जे जीवा तिनविय अधिक प्रमाणमैं सौ हान प्रमाण घटाइ भयशेष रहै ताका आधा फिर जो प्रमाण होइ साका पूटिका पैसा नाम हो है। यहरि पूर्व अपर धनुपनित्रिपै अधिकमेसों दोन घटाइ अयशेरको आधा किए जो प्रमाण होइ ताका नाम पार्श्वभुजा है सो इसहीको कहे हैं। पह कहा दक्षिण भरत साकी जीग नर हजार सातसे अटताटीस योजन बारह फटा पर ताके पाई काहा विजयार्द्ध ताकी जीवा दश हजार सातसै बीस योजन ग्यारह फला इन दोऊनिविय अधिक प्रमाण विजया की जांग तामें हीन प्रमाण दक्षिण भरतकी जीरा घटाइए तब अवशेष नवसे बहत्तरि योजन रहे मर ग्यारह कलाम यारह काला घटे नाही ताते एक योजन घटाइ ताकी उग. गीस कलामैसौं बारह फला घटाइ अपशेष सात पटा ग्यारह फलागि मिलाएं नवस इकहत्तर पोजन अर घटारह कला होइ ताका आधा करना सो विषम राशिका आधा न होइ ताने योजन प्रमाण#मौ एक पटाइ अवशेष नबस सतरिका आधा दिए प्यारिसै पिप्यासी तो योजन होई भर घटाया एफया आधा , अर भटारह कलाका आधा तिनका समछेद करि ।। मिटाएं - । है। निलयकी चूटिका दश हजार एकसौ सताईस योजन दोय टमपीसो भाग भर पार बीम हजार एकमो पैसठ योजन पांच भटतीसयां भाग प्रमाण है। अरिदेहको पूठिया बर मिग निवादि हा अवमीकारि हानि हो, माजी त्रिलोकसार- सेंतीस अटतीसवां भाग होइ सो विजयाई पर्वतको चूलिका च्यारिसै पिच्यासी योजन अर अटतीसवां भाग प्रमाण है । विजयाका उत्तर तटको सूधित दक्षिण तट एक तरफ इतना थोटे हैं। बहुरि दक्षिण भरतका चाप नव हजार सातसै छ्यासठि योजन एक कला अर विजयाड़ा। दश हजार सातसे तियालीस योजन पंद्रह कला सा अधिकर्मसी हीन घटाइ अवरोध नवस .. हत्तरि योजन चौदह कला होइ ताका पूर्ववत आधा किए प्यारिसै अध्यासी योजन अर है अटतीसवां माग प्रमाण विजयाकी पार्श्वभुजा हो है। विजयार्द्धका उत्तर तटते यशाप माने प्रमागते विजयाईका दक्षिण तटर्ते लगाय चाप एक तरफ इतनां घाटि जानना । सही विकास जीवावा चाप संपूर्ण भरतकी जीवा चापवियै घटाइ अवशेषकों आधा किए संपूर्ण भरतस्य पुष्टि या पार्श्वमुजा हो है । संपूर्ण भरतकी जीवा चाप हिमवत पर्वतकी जीवा चापविष घटाइ आगे आधा किए हिमवत पर्वतकी चूलिका या पार्श्वभुजा हो है । सो हिमवतकी चूटिका परि वर दोपमै तीस योजन पंद्रह अटतीसा भाग अर पार्श्वभुजा पांच हजार तीनसे पचास पोइन । तीस मटनीसयां भाग प्रमाण है । महा हिमवती चूलिका आठ हजार एकसौ अटाईस पोजन का अटतीसया भाग अर पार्श्वभुजा नय हजार दोयसै रिहतरि योजन गणीस अस्तासयो भाग प्रकार हजार नयस इकाईम योग्न अटारहटगामा भाग र पार्श्वमुना सोलह हजार अपने नियमी योजन टगाम भासा भाग प्रमाण हो है। ऐसे ही अन्या चूलिका पा प्रमारपाना ।। ७७८॥ आगे भरत गायन प्रनिर्षि काटके वर्तनेका अनुक्रमको प्रतिपादन करे । भरमुरेवदेगु य ओराप्पुस्सप्पिणित्ति कालदुगा। उम्मेघाउबला हाणीयट्टी य होतित्ति ॥ ७७९ ।। भनेर गयो घ अवमर्मियुगागीनि कार्य । टापुर्वाना हानियली न भरत इति ॥ ७९ ॥ अर्थ-पांच गयी पाच भग्न शेष पांच ऐगातशेयनिषि भयमा HTTA की दाल में है । दिन कानितिन तिमि मा यो चाई मापुतार पान मग बटन।। ७९॥ मनवाट निकायम मुमरमुगः प मुगर्म गुममादी भाग करनी । सम्मानिस्गनिदि पासी विडियों लिपite.' मन माम प्रमाण कम, . म ATTRframefu...
नरतिर्यग्लोकाधिकार । ३१७ अर्थ---सुषम मुपम १ भर सुपम १ अर मुरम दुःपम १ अर दुःपममुपम १ अर दुःपम अर अतिदुःपम १ असे ऋमकार पहला अवसर्पिणीकाल छह भेद संयुक्त है । बहरि दूसरा उत्सापिणी काल इसते विपरीत अनुक्रम करि छह भेद संयुक्त है। तहाँ अति दुःपन १ दुषम १ दुःपम सुपम १ मुपम दुःपम १ मुपम १ मुपम मुपम असा क्रम जानना ॥ ७८० ॥ आगें प्रथमादि फायनिका स्थिति प्रमाण हैं हैं। चदुतिदुगफोडकोडी पादालसहस्सवासही । उदघीणं हीणदलं तचियमेचहिदी ताणं ।। ७८१ ॥ चतुनिरिककोटिकोटिः वाचत्वारिंशत्सहस्रवर्पहीनकम् । उदधीना हीनदल तावन्मात्रा स्थितिः तेषां ॥ ७८१॥ अर्थ-तिन छहों काटनिकी क्रमते स्थिति सुपम मुपमको प्यारि कोडा पोड़ी सागर, एपमकी तीन कोडाकोड़ी सागर मुपम दुःपमकी दोय कोड़ा कोड़ी सागर दुःपम पुर- मकी प्यारि कोडाफोडी सागर मुरमको सीन कोडाकोडी सागर, मुषम दुषमकी दोय कोडाकोटी सागर दुःपम मुषमकी विचालीस हजार वर्ष घाटि एफ फोडाफोडी सागर, दरमको घटाया प्रमाण ४२००० का आधा इकाईस हजार वर्ष, अतिदुःयमको भी कईस हजार वर्ष प्रमाण जाननी ।। ७८१ ॥ भाग छह काल संबंधी जीवनिका वायु प्रमाण फहैं हैं- तत्यादि अंत आऊ तिदुगेकं परपुष्चकोरीय । वीसहियसर्य पीस पाणरसा होति वासार्ण ॥ ७८२ ।। तपादो भते भायुः निरिककं पल्प पूर्वकोतिः । विशाधिकरतं विश पंचदश भवति पर्याणां ॥ ७८२॥ अर्थ-तहाँ इन कालनि कि प्रथम कारक भादि विषै जीवनिया भायु तीन पल्प है। ताके अंत विष दीप पल्य है । महरि सोई दोय पल्प भाउ बसीय फाके भादि विहार पि एक पत्य है । बहीर सोई एक पल्प आयु माययालय आदि है ताकि कोटि पूर्व वर्ष प्रमाण महीर सोई कोटि पूर्व वर्षफा मासु पनु काटका मारिसितारे विष एक सौ बीस वर्ष प्रमाण है। परि सोई एकसौ र्याम धर्मका आयु एबम बार का विष है ताके भविष बीम वर्षका भायु है । बरि सोई बीसवर्षका बायु पश्म का बाद विप है ताके भत शिप पदह वर्ष प्रमाण वायु है ।। ७८२ ॥ सही मनुक्षनिकी रचाईका प्रमाण को है निगेहकोसमुदर्य पणस्य चापं तु सघरदी य । दुगमेक पप रदणी पारगर्दिनि अनमि ॥ ७८३ ॥ विचिकोसमुत्य पUTTE T मपरमर. । नियमक व रनि पत्याशी की || ८ || त्रिलोकसार- अर्य-मनुक्षनिक शारीरको उचाई प्रथम फालकी आदि पि तीनकोश साके अंत वि सोई दूसरा कालकी आदि विष दोय कोश ताके अंत विष एक कोश सोई तृतीय काली प एक कोश ताके अंत विप पांचसे धनुष सोई चतुर्थ कालकी आदि विष पांचसे धनुष सात हाय सोई पंचम कालकी आदि विष सात हाय अतविष दोष हाथ सोई पटम आदि विषै दोय हाय भर अंत विष एक हाय प्रमाण है । ऐसे छह कालनिका आदि अन्न शनिका उत्सेध जानना ।। ७८३ ।। आगै उह काल या मनुक्षनिका वर्णका अनुक्रम कहें हैं;- उदयरवी पुष्णिद पियंगुसामा य पंचवण्णा य । लुक्ससरीरावणे धूमसियामा य छकाले ॥ ७८४ ।। उदपरक्यः पूर्गेदियः प्रियगुस्यामा पंचपथ । रुभशरीरावर्गाः धूमश्यामाः च षट्काले ॥ ७८४ -प्रथम पासव मनुक्ष उदय होता सूर्यके ममान वर्ण युग है। दूसरे का मा समान वर्ग युग है। सीमरे काली हरित श्याम वर्ण संयुक्त है। चौथा कालो संपुग है। पाच कार कानि कर हीन दगा मिश्र रूप पांच वर्ण युग है। पिपुरत् श्याम वर्ग संयुक्त । ऐमें छह कानि विग वर्णका अनुक्रम मर्य- दिन, EART भनुम क... - अहमउपरीणाहरी पडिदिणेण पाण। अनियेण य कममा एमालणराति ॥ ७.५॥ मनार प्रतिदिनन प्रारोगा भनितानुग चक्रमा पटकामना मनि ॥ ७८५ ।। पर्याय बन बैंग करिए सीन दिन भी भाग कोसी रविन र दीरनामा आग की। सीमाका fil free मा भाग कोही नीता नदि rainr की वी कालगति नामको में कर अनानि को भारत की। ६.......... म १७८५॥ बामपदिदिमाग। पाना हरपागा frim॥७.६॥ ...........।
नरतिर्यग्लोफाधिकार।
३१९
अर्थमुपम सुपमादि तीन कालनि विय उत्कृष्टादि सीन भोग भूमिकै उपने मनुश मते
दरीफल भर अक्षफल अर ओवला प्रमाण कल्पवृक्षनिकार दीया दिव्य आहार ग्रहण करे हैं।
बहुरि ते मंद कपायी हैं । बहरि मल मूलादि नीहार फरि रहित हैं ॥ ७८६ ।।
भाग तिन भोगभूमियानिक कल्पवृक्षनिका प्रमाग कहें हैं;-
तूरंगपत्तभूसणपाणाहारंगपुष्फनोइतरू ।
गेहेगा पत्थंगा दीवंगैहिं दुमा दसहा ।। ७८७ ॥
तूयोगपात्रभूपणपानाहारांगपुष्प-योतितरवः ।
गेहांगा यस्रोगा दीपांगैः दुमा दशधा ॥ ७८७ ॥
अर्थ-वाजित्रनिके दाता तूोग अर पात्रनिके दाता पात्रांग भर आभूषणनिकै दाता
पांग भर पीवनेको यस्तुके दाता पानांग अर माहारके दाता आहारांग पर फलनिक दाता
प्पांग भर उचोतमई ज्योतिरंग अर मंदिरनिके दाता गृहांग अर यत्रनिके दाता योग अर
पिकोनेके दाता दीपांग कल्प वृक्ष हैं | जैसे कल्प वृक्ष दश प्रकार हैं ॥ ७८७ ।।
भागे भोगभूमिका स्वरूप फ है;-
दप्पणसम मणिभूमी चउरंगुलमुरसगंधमउगतणा।
खीरेच्छुतोयमापदपूरिदवायीदहाइण्णा ॥ ७८८ ।।
दर्पणसमा मणिभूमिः चतुरंगुटमुरसगंधतृणा।
क्षीरेक्षुतोपमधुएतपूरितवापी-हदाकीर्णा ।। ७८८ ॥
अर्थ-दर्पण जो पारसा तीह समान मणिमई भोगभूमि जाननी 1 बार मी पारि
अगुड ऊंचे भला रस गंधसहित कोमल तिणानि फरि संयुक्त है । अर दुग्ध या मिस का 1
। मधु समान रस वा घृतकार पूर्ण भैसी पाबड़ी या द्रह लिन करि पास है 1 ०८८ ।।
मागें भोगभूमियानिक उपजनें मरणका विधान गाथा सीन करि यहै है;-
जादजुगलेमु दिवसा सगसग अंगुहलेद रंगिदए ।
अपिरपिरगदि फलागुणनोवणदसणगरे नि ।। ७८९ ॥
जातयुगलेषु दिवसा: सप्तसप्त अंगुहे रमिते।
अस्थिरस्थिरगत्योः कलागुगयौवनदर्शनग्रहे याति ॥ ७८९ ।।
अर्थ-माताके गर्भते शुगपत स्त्री पुरष युगर उपमें है । तिनग उपति दिनमी साप
सात दिन पर्यंत अनुक्रमते अंगूठाका घाटनां यहरि उवा दा नीचा होगा वारि गिता अन्न
बहरि स्थिर सपना चलना यहरि कला गुणका माग होना परि दोश्ना र नो परि
पारसर दर्शनका महण होना हो है । बसें गुणचास दिननि करि सार्वता हो।। ७८९॥
तपणमादिमसंहदिसंठाणममणामजुदा ।
गुलागुरि णो निती तमि पंचविगएगु ॥ ७९०॥
२० त्रिलोकसार- तपतीनामादिमसंहतिसंस्थान आर्यनामयुताः । सुलभेषु अपि नो तृप्तिः तेषां पंचाक्षविषयेषु ।। ७९० ।। अर्थ-तिन दंपति कहिए स्त्री पुरुष जुगलनिकै आदिका संहनन संस्थान हो है । बत्र वृषभ च संहनन हो है समचतुरस्र संस्थान हो है । बहुरि ते मंद कपायी है तातें आर्य ऐसे नाम (क्त हैं । बहुरि तिनकै सुलभ पाए हैं पंच इन्द्रीनिकै विषय तौभी तिन विष तृति न है । भावार्थ यह जो विषयनिस्यौं अरुचि न हो है ।। ७९० ॥ चरिमे खुदर्जभवसा परणारि विलीय सरदमेघं वा । भंवणतिगामी मिच्छा सोहम्मदुनाइणो सम्मा ।। ७९१ ॥ चरमे क्षुतजूंभवशात् नरनार्यो विलीय शरन्मेषं वा । भवनत्रिगामिनः मिथ्याः सौधर्मद्वियायिनः सम्यंचः ॥ ७९१ ।। अर्थ-आयुका अंत विर्य पुरुष तौ छींक करि, स्त्री जमाई करि मरण पाइ शरद कालका वत विलय हो हैं । तिनकै शरीरका अंश भी पड़ा न रहै । बहुरि ते मरिकरि मिथ्यादृष्टि तौ न वासी व्यंतर ज्योतिष्क विप उपजै हैं । अर सम्यगदृष्टी सौधर्म ईशान विषै उपनैं हैं अन्यत्र ही उपजें हैं । असे प्रथम कालकी आदि विष उत्कृष्ट भोग भूमि है। वहरि क्रमते घटि द्वितीप छकी आदि विपै मध्य भोगभूमि है । बहुरि क्रमते घटि तृतीय कालकी आदि विष जघन्य भूमि है । क्रमत घटि अंत विपै कुलकरादि होइ कर्मभूमि हो है । ।। ७९१ ।। सो कर्मभूमिके प्रवेशका अनुक्रम अर तहां तिष्टते कुलकरनिका स्वरूप तीन गाथानि करि गदन करें हैं; पल्लवमं तु सिद्धे तदिए कुलकरणरा पडिस्सुदिओ। सम्मदि खेमकरधर सीमंकरपर विमलादिवाहणओ ॥ ७९२ ॥ पल्याष्टमे तु शिष्टे तृतीये कुलकरनराः प्रतिश्रुतिः । सम्मतिः क्षेमकरधरः सीमकरधरः विमलादिवाहनः ॥ ७२२ ॥ अर्थ-तृतीय फाल विपै पल्यका आठवां भाग अवशेष रहै कुलकर मनुक्ष उपज हैं। फॉन ! प्रतिश्रुति १ सन्मति १ क्षेमकर १ क्षेमंधर १ सीमकर १ समिधर १ विमलवाहन १ ७९२ ॥ चक्युम्म जस्ससी अहिचंदो चंदाहओ मरुद्देभा । होदि पसेणजिदंको गाभी तणंदणी वसहो ।। ७९३ ।। चक्षुष्मान् यशस्वी अभिचंद: चंद्रामः मन्देयः । भवति प्रमेनजिताक: नाभिस्तदनो मृषभः ॥ ७९३ ॥ अर्य-चक्षुम्मान १ यशस्वी १ अभिचंद्र १ चदाम १ महदेव १ प्रसननित १ नामि । । चारह कुलकर हो है IA नाभिकुलकर का नदन नाय प्रशम सापकर है ॥ ७९३ ॥ - नरतिर्यग्लोकाधिकार। वरदाणदो विदेहे वद्धगराऊय खइयसंदिटी । इह खत्तियकुलजादा केइनाइन्भरा ओही ॥ ७९४ ।। वरदानतो विदेहे यदनरायुषः क्षायिकसदृष्टयः । इह क्षत्रियकुटजाताः केचिजातिस्मरा अवधयः ।। ७९४ ॥ अर्थ-समीचीन पात्रके दान देनेके फटते बांधी है मनुशायु निनि भर पीछे शाविक सम्पादृष्टी भए जैसे जीव भाइ कुलकर उपजे हैं। ते इहां क्षत्रिय कुल विप सपने है। पथरि कुलादियकी प्रवृत्ति अप हीन भई पर होनहार विपै हुएफा उपचार करि इनके कुटके क्षत्रिय हों, हिंगे तातें इनको क्षत्रिय कुल विष उपजे कहे । वहरि ते कुलकर फेई तो जातिस्मरण संयुन है, फैई भवधिज्ञान संयुक्त हैं ॥ ७९४ ।। भागें कुलकरनिका शरीरका रत्सेध कहै हैं;- अहारस तेरस अडसदाणि पशुवीसहीणपाणि तदो। चायाणि कुलयराण सरीरतुंगवणं फमसो ॥ ७९५ ।। अधादश प्रयोदश अष्टशतानि पंचविशतिहीनानि ततः। चापानि कुटकराणा शरीरतुगत्वं प्रमशः ।। ७९५ ॥ अर्थ-अठारहसै धनुष १८०० तेरह से धनुष १३०० धनुष्य पाटम धनुर ८०० पीछे पचीस पचीस पाटि धनुष ७७५/७५०७२५१७००।६७५।६५०६२५।६००५७५१५५०। ५२५। प्रमाण प्रतिध्रुत आदि कुटकरनिके शरीरका उच्चत अनुभमने जानना ॥ ७९५ ।। भागें तिनका आयु फहे हैं;-- आऊ पल्लदसंसो पदमे सेसेस दसहि भनिदफर्म । परिमे दु पुवफोदी जोगे किंपूण तण्णवर्म ॥ ७९ ॥ आयुः पल्पदाश: प्रथमे शेषेषु दशभिः भत्तानमः । घरमे तु पूर्वकोटि: योगे किंचिन तनवम ।। ७९६ ॥ अर्थ -पहला कुलकरफा भायु पल्पका दावा भाग प्रमाण है । मिनीपादिपु. नफा आयु श्रमते दश दश गुणा भाग पल्या दानिए तोह प्रमाण है । ११+१०० ११. ०००।११+१०००० १११० ११+१८० ५१+१ को० प१+१.ति९१- ०० फो० । ११+१००० को०११.१००००० को० १५१ला को०९१-१.. 20 । यहरि तका नाभिकुल करका भायु पूर्व कोहि वर्ष प्रमाग है मोई कोर का पु नो और कुलकरनिका भायुको समझेद विधान परि मिलाए तब पन्यके दशकमा नये ऐसा होइ ११११११११११११११-१०००००००००००००। परि मुरमान नेकै बर्ष या पल्पका न लाख कोरिया भाग प्रमाण पण मिगहर पल . दि ११ समद करनेके भवि राशिके भार भागहरको मा पुग विमा हो ..... २९९९९९-९ विदी १३ या विय कग प्रमाण सार 1 ३२२ त्रिलोकसार- भाग्यकों तेरह बिंदीनि करि भाग हारकी तेरह विदानिका अपवर्तन किए एक पल्सका नाम भाग आया प१ विदी १३:९ बिंदी १३ । बहुरि याम पूर्व जो ऋग मिलाया था ता• ज्यूंका रयू घटाइ दिएं एक पल्यका नया भागमें पल्यका निधै लाख कोड़ियां माग धया असें सबनिका जोड किंचिदून पल्यका नवा भाग प्रमाण हो है। अब याका जोड़का विधान करण सूत्र करि साधै है । अंत धणं गुण गुणिय आदि विहीणं सऊणुत्तर भजियं । अंतका धन पल्यका दावा भाग ताकौं गुणकार दशकरि गुणे पल्स भया । यामैं आदिका प्रमाण पल्य दशका लक्ष कोडिवां भाग समछेद करि घटाएं असा होइ प ९९९९९९९९९९९९९.१ विदी १३ याकौं एक घाटि गुणकारका प्रमाण नवका भाग दीजिये तब जैसा होइ १९९९९९९९९९९९९९-९ विदी १३ इहाँ पूर्वोक्त प्रमाण ऋण मिलाएं जैसा होइ प१ बिंदी १३:९ बिंदी १३ याका अपवर्तन किएं पल्य प१:९ बिंदी १३ का नवमां भाग भया यामैं। पूर्व मिलाया था ऋण सो घटाएं किंचिदून पल्प हो है । अत्र याका विधान अंक संदृष्टिविप दिखाये हैं । राशिविपै ऋण घटाइ अवशेषकों भाग दिएं जो पावै सोई तिस राशिविपै भागहारको अधिक करि भाग दिएं पावै । सो इहां राशि साठिका चौथा भाग ' तामें वीसका चौथा भाग प्रमाण ऋण घटाएं चालीसका चौथा भाग रहे ताको अपना भागहारका भाग दिएं जो दश पाए सोई तिस राशि साटिका चौथा भाग विपै भागहारवि दोय अधिक करि भाग दिएं साठिका छठा भाग होइ सो इहाँ भी भाग दिए दश ही पाए। भागहार विरे अधिकका प्रमाण कैसे जानिए ! ऋण राशिकों पाया राशिका भाग दिएं जानिएं सो इहां ऋण राशि वीसकों पाया राशि दशका भाग दिएं दोय पाए सोई मागहारविपै अविकका प्रमाण जानिए । बहुरि जो ऋणका प्रमाण न जानिएं तौ भागहारविपै जेता अधिक होइ तीह करि लम्ध राशिकों गुणें ऋणका प्रमाण जानिए । इहां अधिक दोयको लन्ध दश करि गुणें ऋण राशि वीस जाननां । सो इहाँ राशि पल्यका नवमां भागभैंसों पूर्वोक्त ऋण घटाइ अवशेषकों भाग दिए जो पावै सोई पाया राशिका भाग ऋण राशिकी देइ जो पावै तितना अधिक भागहारका भाग राशिको दिए पावै भैसा प्रयोजन जानना ।। ७९६ ॥ आगै तिन कुलकरनिका अंतरालका काल कहैं है;- पल्लासीदिममंतरमादिममवसेसमेत्य दसजिदा । जोगे बावत्तरिमं सयलजुदे अहम हीणं ॥ ७९७ ॥ पल्याशीतिममंतरमादिममयशेपमत्र दशभक्त । योगे दासप्ततिः सकल्ल्युते अष्टमो हीनः ।। ७९७ ।। अर्थ-पूर्व फुटकरका मरण भए पी पिठला कुलकर जिनमें काल गएं जनम धरै सो इहां अंतर काल जानना । सौ चौदह कुलकरनिके तेरह अतराठ है । तिन विय पहटा अंतर पत्यका असीवां भाग प्रमाण है । प्रथम कुलकर भएं पीछे पत्यका असीयां भाग भए दुसरा कुर कर उपग्या है । असेही अवशेष बारह अंतर दश दश गुणा भागहार करि माजित पस प्रमाण जाननें । ११-८०० १११-८००० १५१-८००००।११.८२ ११८०छ ।
नरतिर्यग्लोकाधिकार ३२३ १.८ को।प१-८० को । ११-८०० को। प १८००० को। प१.८ सको। -८० टको। इनको पूर्वोक्त प्रकार समझेद करि मिलाएं ११११११११११११११-८०००- ००००००००० होइ याचिरी मुगमता आवनेकैअर्थ पल्या का वहत्तार लाखकोडिवो भाग डावना सहां समडेद करनेके भर्थि पूर्वराशिके भाग्य भागहारको नव गुणां किए ऐसा प ९९९९९९९९९९९९:१ हिंदी. १३ यामैं ऋणराशि मिलाइए प १ विदी १३-७२ विंदी ३ बरि तेरह विदनिका अपवर्तन करिए तब पत्यका वहत्तीरवां भाग होई यामैसों पूर्व गाया या ऋण सो व्यूका त्यू घटार सर्व भतरनिका जोड़ किचिदून पल्यका यहत्तरियां भाग पग हो है । अब इस हीर्को अंत धर्ण गुणगुणियं आदिविहीणं रुऊणुत्तरभनिये इस कारण सूत्र रे साधे हैं। अतका धन पल्यका असीवां भाग ताको गुणकार दश करि गुणि प १०.८० में आदि धन पल्पका असी सारा कोडिया भाग ११८ विदी १३ समठेद करि ११ बिंदी 1-८ बिंदी १३ तामें घटाइए। १९९९९९९९९९९९९९+ ८ बिंदी १३ । बहार याकों घाटि गुणकार नव ताका भाग दीजिए प९९९९९९ ९९९९९-७२ विदी १३ ति प्रमाण ऋण ११-७२ विंदी १३ मिटाइ अपवर्तन किर पत्यका महत्तोरवा भाग होई पामें स ऋणी का त्यू घटाएं किंचिदून पल्यका प १ बिंदी १३+७२ विदी १३ यहत्तरिवां भाग बहार सर्व आयुका जोड़ किंचिदन पल्यका नवमा भाग प१९ अर सर्व अंतरनिका जो कि न पल्पका बहत्तरिया भाग प १७२ इनको आठफा समछेद करिनेके अर्थ आयुके जोदशा ज्य भागहारनिकों अठ गुणां किए ऐसा प ८-७२ ताको जोडि ५९-७२ नव करि अपवर्तन र किछु घाटि पल्यका आठवा भाग प्रमाण फाल हो है ।। ७९७ ॥ भाग कुलकरनि करि किया हुवा दंड वा तिनले शरीरका वर्णों कहे हैं;- हा हामा हामाधिकारा पण पंच पण सियामलया। चपसुम्मदुग पसेणांचंदाहो धवल सेस फणयणिहा ।। ७९८ ।। हा हामा हामाधिकाराः पंच पंच पंच श्यामली। चक्षुष्मरिक प्रसेनचंद्राभी धवली शेषाः फनकनिभा ॥ ७९८॥ अर्थ-आदिके पांच कुटकर अपराधीनिकों हा भैसा वचन काहि करि देते है याका अर्थ पर पुरा किया इतनी उलाहना मार दंड दे हैं। बरि तहाँ पाछै पाच फुलबर हामा अमा वचन कहि है । याका अर्थ यह हाप मति करै इतना उलाहना धावाना मात्र दंड देह । बरि तह पार भ देय सहित पाच कुटफर हामा धिक भैसा पचन कहि दंड है। पाका अर्थ पर हार मान करे को विकार होहु इतना उलाहना वर्जना खिजना मात्र देख दे हैं। बहरि चक्षुष्मान १ यसरी ए दोय फुलकर श्याम वर्ण हैं । बहुरि प्रसेन जित १ पंदाभ १९ दोय धवल वर्ग है। शेष कुलकर मुवर्ण समान वर्ण धरै है ॥ ७९८॥ आगे तिन तिनके काल विप लिन कुलकरनि करि किया कार्यको गाथा पारि करि कहे है- इणससिनारासावदविभयं दंदादिसीमचिण्डार्दि, तुरगादिवाहणं सिमुमुहदराणणि भयं त्ति ।। ७९९ ॥
- - ३२४ त्रिलोकसार- इनशशिताराश्वापदविमय दंडादिसीमचिह्न कृति । तुरगादिवाहन शिशुमुखदर्शननिर्मयं युवति ॥ ७९९ ॥ अर्थ-पहला कुटकर है सो प्रजानिक ज्योतिरंग जानिके कल्प वृक्ष मंद होते चंद्रमा दीखने लागा तात उपजा जो भय ताकू निवार है । बहुरि दूसरा कुलकर तारा दीखुनै उपध्या भयकौं निवार है । बहुरि तीसरा कुलकर ने मृग आदि जीव कर भए तिनका धेरनेका उपाय करि भयकों निवार है । बहरि चौथा कुलकर मृग आदि जीव अति क्रूर भए तिनका दंडादिक उपाय करि भयको निवौर है । बहीर पांचयां कुलकर कल्प वृक्ष थोड़ा फल दैनं लो तहां प्रजानिकै परस्पर झगड़ा देखि सीमा जो अपनी अपनी मर्यादा तार्को करै है । बहुरि छय कुलकर कल्प वृक्ष बहुत मंद फल देने लगे तहां प्रजानिकै तिस मर्यादा भएं भी झगड़ा होते ते तिससीमा विष चिह्न जो सहनानी ताकौं करे हैं। बहुरि सातवां कुलकर गमन करनेंविधै घोड़ा आदि वाहनको करै है। बहुरि आठवां कुलकर बालकका जन्म भए पीछे भी किछू काल माता पिता जीवनै लगे तहां बालकनिका मुख देखनेंते भया जो भय तातें निर्भयपणांकों कहै हैं ॥ ७९९ ।। आसीवादादि ससिपहुदिहिं केलिं च कर्दिचिदिणोति । पुत्तेहिं चिरं जीवण सेदुवहित्तादि तरणविहिं ॥ ८०० ॥ आशीर्वादादि शशिप्रभृतिभिः केलिं च कतिचिदिनांतम् । पुत्रैः चिरं जीवनं सेतुवहित्रादिभिः तरणविधिम् ॥ ८०० ।। अर्थ-नवमां कुलकर बालक जनम भएं पीछे माता पिता बहुत काल जीवने लगे तहां वालनिकै ताई आशीर्वादादिक देनी शिखा हैं । बहुरि देशवा कुलकर बालक जनम भए पीछे के तेइक दिन पर्यंत माता पिता जीवनें लगे तहां बालकनि सहित चंद्रमा दिखावना आदि केलि क्रीडा यिस खावे हैं। बहरि ग्यारहयां कुलकर बालक जन्म भएं पीछे माता पिता बहुत घने काल जीवने लगे ताका प्रजानिकें भय भया ताको निवारे है । बहुरि बारहां कुलकर मेघवृष्टि होनेते नदी आदि जल स्थान भए तिनके तरगेका विधान जिहाज नाव आदि बताये हैं ।। ८०० ॥ सिक्खति जराउछिदि णाभिविणासिंदचावतडिदादि । चरिमो फलअकदोसहिति फम्मावणी तत्तो ।। ८०१ ।। शिक्षयति जरायुछिदि नाभिविनाश इंद्रचापतडिदादि । चरमः फलातोपरिमुक्ति कर्मावनिस्ततः ।। ८०१ ॥ अर्थ-तेरहां कुलक जरा सहित बालकनिका जनम होने लगा तहाँ जरायुके हैदनको सिखाये । वहरि अंतका कुलकर नाल मति बानिका जनम होने लगा तहाँ नाभि छैदने शिवाये है 1 अर इन्द्र धनुष बाजुरी इत्यादि होने लगतनके देखने प्रजातिका उपन्या भपा निवारे हैं । अर वृक्षानेके पटनिकी आकृति विष यह औषध है, यह भोजन योग्य है, इयादि मिला है। वहरि इति परै कर्मभूमि प्रवर्ते है ।। ८०१ ॥ 1
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३२५
मानिनोकाधिकार।
पुगापणाटीसपिपगाय पोपहारो।
पासोरियाम्लो रिणिम्मियो भादिपरहेण ।। ८०२ ।।
YEARTना मगर कम्पबहारः।
मदिरा निर्मित आदिमाया ॥८०२॥
अर्थ ---राम परान आदि रचना स्वर किफ कार्य संबंधी हात पर भसि मसि
या र यान माया प्रेमा धर्म सो आदिमा श्री परम सीधैकर देव
पारन पा॥८०२॥
का सीमा बारियों ने लाफा पुगप लिनको निरूप है-
पडरीगारतिधर्ण नित्यपरा छतिसंभरावई ।
तुरिए पानि रहिमलागपुरिसा से ।। ८०३ ॥
पासिनि विपनः तीर्थकराः पत्रिसंडभरतपतयः ।
दुर्ये का भी नि पिटिशयकारणास्ते ॥ ८०३ ॥
अर्थ-वादीम तीर्थकर भर पारह पदावर भरतका पति चक्रपती भर तीनका पन
सत्ताईन नि भरतका पति तहा नव नारायण नर प्रतिनारायण नव बलभद्र भैसें ए सरेसठि
सला पुप पाये काट विय हो है ॥ ८०३ ॥
मागे ताफरनिका शरीरका उत्सेध कह है-
पशु तणुतुंगो नित्ये पचसय पण दसपण्णकर्म ।
भटम पंचगु अगु पासद्गे परपसत्तफरा ।। ८०४ ।।
पनि तनुतुंगः ती पंचशत पंचाशदशएंचोनत्रामः ।
अष्टमु पंचमु अरमु पार्थदिकयोः ना सप्तकराः ॥८०४॥
अर्थसकिरनिके शरीरको उचाई क्रमते असे धनुष प्रमाण है । पहटा तीकरके पांचसै
बार हिलीपादि पाठ के पचास पचाम धाठि १५०1१००।३५० । ३००।२५० । २००
१५०।१०० । परि दो भादि पांच दश दश घाटि ९०1८०७०।६०। ५०।
बरि पहा आदि बाटक पांच पाच पाटि १५/४०।३५। ३०१२५/२०॥१५॥
१० । धनुर प्रमाण शरीर उचा है। यहरि पार्वद्विक विष पार्श्व जिनका नव हाथ पर्द्धमान
जिनका सात हाय शरीर उंचा है ।। ८०४॥
भागे तीर्थकरनिका आयु गाया टीय करि कहे है.-
नियाज चुलसीदारिहत्तर्गसहि पणसु दसहीणं ।
गि पुबलकवपत्तो नुलसीदि विहत्तरी सही ।। ८०५ ॥
नार्थायुः चनुरानिकाममतिपष्टि पचम दशहीन ।
दशक पूर्वलक्षमात्र चतुरशांति दामभनि पष्टि ॥ ८०५ ॥
३२८ । . अर्थ- त्रिलोकसार- अर्थ-तीसरा कालका तीन वर्ष आठ महीना एक पक्ष अवशेष रहे वृषम भए । बहुरि चौथा कालका सेईि तीन वर्ष आठ मास एक पक्ष अवशेष रहें वीर जिन पहरि पहटा पहला तीर्थकरका अंतर विषै उत्तर उत्तर तीर्थकरका आयु प्रमाण असा जाननां । पहला अंतर वृषभ देवका तीर्थकाल है । तामैं उत्तर अजित जिनका आयु ! संयुक्तपना जानना । जैसे ही अन्य जानना । वीर जिन मुक्ति होने का काल्ते चतुर्थ कालक तीन वर्ष माठ मास एक पक्ष सो पार्श्व तिनका अंतर विषै मिलाएं भदाईसै वर्ष होइ सर्व अंतर मिलाएं संत एक कोड़ा कोहि सागर प्रमाण हो है ॥ ८१३ ॥ भब जिनधर्म उछेद होनेका फाल कहैं हैं;- पल्लतुरियादि चय पल्लंतचउत्थूण पाद परकालं । ण हि सदम्मो सुविहीदु संतिते सर्गतरए ॥ ८१४ ।। पल्यतुर्पादिः चपः पल्यमत चतुर्थोन पादपरकाले । न हि सद्धर्मः मुविधितः शोत्येते सप्तोतरे ।। ८१५ ॥ ~पत्यका चौथा भाग आदि भर तितनाही चप प्रतिस्थान यधनेंका प्रमाण * एफ पाय सात पर चौथाई घोचाई पल्प पाटि यापत चौथाई पत्य अपि होइ इन्ध पायनियर युधि जो पुष्पदंत सात लगाय शांतिनाथपर्यंत सात अंतरनिविष यता श्रोता पाटनिकै ममायत समीचीन जैनधर्म नास्तिकप हो है । भावार्थ-नयमा पुपात भने पात्र पाय शीतल श्रेयोका अंतरवि माध पत्य यो यासपूज्यका भतरीय प- पायल्प मिटका अंतरि एक पल्य विमल मतका भतरविध पौण पन्य मनन धर्मका २२ भारिपत्य धर्मशातिका भतरविर पाय पत्यप्रमाण काय जिनधर्मका अभार था भा॥ ८१४॥ पकी मरहो मगरो मघय सणकुमार संतिधूमिणा । अरनिण गुमीममहपामा हरिगणनपग्रमदरसा ॥ ८१५ ॥ परिणः भरत: सगर: मघवा सनत्कुमारः शानिमिनी । श्रादिनः गुमीममहारी हरिपेग नयादत्तायाः ॥ ८१५॥ अर्थ -~-भात १ मा १ मघवात् १ सनकुमार १ शाति जिन १ पनि दिन १ मुर १ मRE १ ग १ जय र मदन १ ९ बाद पानी ? ॥ ८१ १२ वटा टोय कर को- भावमाशा पथरद सम्मानो नादा। निनिगा मुपापरी भापडाणतो दि॥ ८१६ ॥ भाRAME मनी तो मामी। 22 girat Atो मति ॥ ८१५॥ -
नरतिर्यग्लोकाधिकार।
३२९
अर्थ-भरत सगर ए दोय सौ क्रमने वृपभ अर अजित जिनके.कालविणे भर। बहुरि
मघवान् भर सनत्कुमार ए दोप धर्म शांति जिनके वीचि अंतर कालरिय भए। बहुरि शांति कुसु
भर ए तीन आप ही तीर्थकर भी भए ताने जिनांतर कहना न आवै । बहरि मुभीमचको भर महि
जिनकै पीचि अंतर फालविपै भए ॥ ८१६ ॥
मल्लिदुमज्झे णवमो मुणिमुन्बयणमिजिणंतरे दसमो ।
पमिदुविरहे जयरखो पझो मिदुगर्भतरगो ।। ८१७ ।।
मटिद्वपमध्ये नवमो मुनिसुव्रतनमिजिनांतरे दशमः ।
नमिदिविरहे जयाख्यो ब्रह्मो नेमियांतरगः ।। ८१७ ॥
अर्थ-मल्लि मुनिमुत्तकै मध्य अंतरवि नरमा महापमची भया । परि मुनिमुश्त नमि
जिनका अंतरवि दशा हरिषेण चक्री भया । यहरि नमि मेमि जिनका अंतरवि जपनामा परी
भया नेमि पार्धका अंतरविर्य प्रलदत्त चमी भया है ।। ८१७ ॥
भागै चक्रवर्तिनिका शरीरका वर्ण उचाई तिनका आयु गाथा तीन परि यह है-
सचे मुवणवण्णा तहेहुदा धणूण पंचपर्य ।
पप्णाम्र्ण सदलं पादालिगिदालयं तालं ।। ८१८ ॥
सर्वे सुवर्णवर्णा सदेहोदयो धनुषा पंचवात ।
पंचाशन सदल पाचत्वारिंशदेकचत्यारिंशत् पत्यारिदात् ॥ ८१८॥
अर्थ-सर्व ही धावती मुवर्ण समान वर्ग संयुक्त है। परि तिन भरतादि चीनिके
शरीरफी उचाई क्रमकरि पचिस भर पचास घटी ताका सादा पारिस भर भाषा सहित रियादीग
भर आधा सहित इफताडीस भर चालीस भर ।। ८१८ ॥
पणतीस तीस अदुवीस पण्णरसगाउ पुलामीदि ।
पावधरिपुवाणं पणतिगिवासाणमिह प्लगाया ।। ८१९ ॥
पंचशित् विशद दिदिशतिः पंचदशकमायुः परति
दासमतिपूर्वाणा पंचत्रिकपर्पाणामिह लक्षाणि ॥ ८१९ ॥
अर्थ-पैंतीस भर तीस अर अटाईस पर थाईस अर बोस र पमह भर सात भाग
है। पाते पर तिनका आयु पते पहिए है । धौराली माल भर बानिर लाय पूर्ण कर
पांच टाख अर तीन लास भर एक सय वर्ष प्रमाग । बरि । ८१९॥
मवरहरा सहस्सा पणणउदी परसोदि सही प।
तीस दसपं सिदयं सचमपा पगदत्तम ॥ ८२०॥
मेरमा सहा वचनानि च पश्चि।
1ि1 34 समानानि महानाय ।। ८२० ।
अर्थ--रियाग हमार भर हजार REET र BEFarm
हजार भर तीन बार आREE, सातसेव: माग आयु ॥ ८२०॥
त्रिलोकसार- आगे तिन चक्रवर्तीनिकै नवनिधि हो हैं तिनके नाम करें; कालमहकालमाणयपिंगलणेसप्पपउमपांडु तदो । संखो णाणारयणं णवणिहिओ देति फलभेदं ।। ८२१ ॥ काटमहाकालमाणवकपिंगलनैसर्पपमपांडुस्ततः । शेस: नानारत्रः नवनिधयः ददति फलमेतत् ।। ८२१ ।। अर्थ-काल १ महाकाल १ माणवक १ पिंगल १ नैसर्प १५ पम १ पाहु १ शेख नाना रत्न १५ नव निधि हैं । ते ए आर्गे कहिए है फल ताको देवे हैं ।। ८२१ ॥ आगे नवनिधिनिकार दिया हुवा फलको फहै हैं;- उडु जोग्गकुसुमदामप्पगुदि मानणयमाउहाभरणं । गेई यत्यं धणं तूरं बहुरयणमणुकमसो ८१२॥ ऋनुयोग्यमुमुमदामप्रमृति भाजनायुधामरण । गेई यन्न धान्य तूर्य बहुरतमनुक्रमशः ॥ ८२२ ॥ भर्ग-रो कालादिक निधि अनुक्रमर्ने ऋतु योग्य पुषमाल आदि यस्तुको बहुरि भावना दहार भातुधा यही आमरगको यहरि मंदिरकों यहरि यन्त्रको महरि धान्यकी यहरि वानिकी पहार पहन प्रकार ला देई है । भावार्थ-निधि आठ पयां सहित गाहौफ माकारि लिनेनों एवम् निशानिय ॥ ८२२ ।। भनिन के चौदह रननिका संज्ञा पूर्वक उपननेका स्थान कहै है:- गंणगियादि पुरहो गयहपशुपई पनि येपट्टे। मिग्गेि कागिणिमणिरम्माउहगेसिदंदछगमरो ।। ८२३ ।। मेनागृहम्पपतिः पुगेधा गो हपो युवतिः भनि निपाय। श्रीन वाकिगीममिच युवक अमिदंयमरः ॥ ८२३ ।। শ—শি নাকা লাক প্রগণি সী গণ কী বলীয়া? रहर पोती भर युवति श्री एन आर टा. पिन गिने आदिको कारण कामी ग्न आगुराग माdि कारण चूरन भाम मंडावरानि को कारण बल 1738411 मासान आदिको काम TER का धाम नि.rastamp frre का? ॥ ८२३ ॥ समगामागं गगपा मुर्गम समाप । मनमा मा गर्ग माग ||८२४ ॥
नरविर्यग्लोकाधिकार। भीम ES मान् मनामारः सनकुमार मुभीमो माय । ममादिक्षी प्राणो मोक्ष दोघाटचक्रधराः ॥ ८२४ ॥ --मान् समायुमार ए दोय तो सनतबुमार नामा स्वर्गको प्राप्त भए । यहीर टोय माफ पृष्णाको प्राण भए । बरि भशेष माठ ची मोक्ष पदकों माम भए।। ८२९॥ परमईपकी नागपण तिनके नाम यह है:- तिरिविहसयंभू पुरिमुत्तमपुरिससिंहपुरिसादी । पुररियदा णारापण फिदो अद्धयफहरा ।। ८२५ ॥ विविधस्वयंभूः पुरषोत्तमः पुरपसिंहः पुरपादिः । पुरीकरतः नारायणः कृष्ण. अर्थचक्रधराः ॥ ८२५ ॥ भयं-निट १ दिपृष्ट १ स्वयंभू १ पुरपोचम १ पुरपसिंह १ पुरुष पुंडरीक १ पुरुष स्त १ नारायण (सिमन) १ कृष्ण १९ नर अर्द्ध चक्री है । इहा प्रसंग पाइ पलभद्र नारायण. निक भायुध रन कहिए है । असि १ ख १ धनुष १ घर १ मणि १ शक्ति १ गदा १ ए सात नागपके मायुध रल है। परि र ननिकी माा १ हल १ मुसील १ गदा १ ए च्यारि परभदफे भायुध रत्न है ।। ८२५ ॥ भागे तिन नारायणनिका वर्तनाकाल कई है। जो नारायणनिका वर्तनाकाल सोई घर भद या प्रतिनारायणका वर्तना काल श्रमते जाना;- सेयादिपणगु हरिपण छहरदुगविरह मल्लिदुगमज्झे । दतो अहम मुखयदुगविरहे णेमिफालमो किण्हो ॥ ८२६ ॥ योभाविपंचमु हरिपंच पष्टः अरदिकविरहे महिदिकमध्ये । दशः अरमः मुव्रतस्यविरहे नेमिकालजः कृष्णः ॥ ८२६ ।। अर्थ-धेयो जिन भादि पाच तीर्थकरनिविप क्रमते त्रिपृष्ट आदि पांच नारायण भए हैं। बहुरि छया पुग्प पुंडरीक नारापग मरहमल्ल तीर्थकरनिका अंतरविय भया है। वहीर पुरषदत्त है सो महि मुनिमुस्तफै मध्य अंतरवि भया.है । यहरि आठवें नारायण मुनिमुद्रत नमि जिनका विरहकाल जे अंतर तीहविपै भया है। वहरि कृष्ण है सो नेमीश्वर जिनका कालविपै उपग्या है ॥८२६॥ भागे घलभद प्रतिनागयणनिका नाम गाथा दोय कर कहें है। घलदेवा विनयाचल मुधम्मसुप्पमुदसणा गंदी। नो दिमित्त गमा पउमा उनि तु पडिसत्त् ।। ८२७ ॥ बलदवा विजयाचलमुधर्ममुप्रभमुदर्शना नदी । नता नदिमित्र गम पम उर प्रतिशत्रव ॥ ८२७ ॥ -- विजय । अवल. १ मुधम्म १ मुप्रभ । मुदर्शन १ नदी १ नदिमित्र १ राम १ पा १ असे नव बलदव ॥ ८२७॥ . भर्य- ३३२ त्रिलोफसार- वहरि यात उपरि तिन नारायण बलिभद्रनिके प्रतिशत्रु जे प्रति नारायण ते कहिए हैं;- अस्सग्गीओ तारय मेरयय णिसुंभ कइडहंत मह । पलि पहरण रावणया खचरा भूचर जरासंधो ।। ८२८ ।। अश्वनीवः तारक: मेरकश्च निशुभः फैटभातो मधुः । बलिः प्रहरणः रावणः खचराः भूचरो जरासंधः ॥ ८२८॥ अर्थ-अश्वप्रीव १ तारक १ मेरक १ निशुंभ १ मधुकैटभ १ पलि १ प्रहरण ? रावण १९ आठ सौ विद्याधर हैं। अर जरासिंघ भूमि गोचरी है । असे ए नव प्रतिनारायण है ।।८२८॥ भाग वटदेय आदि तीनोंका उत्सेध समान है सो कहें हैं। देहुदओ चापाणं सीदी तिमु दसयहीण पणदालं । णवदुगवीसं सोलं दस घलफेसव ससत्तूणं ।। ८२९ ।। देहोदयः चापाना अशीतिः त्रिशु दशहीन वचचत्यारिंशत् । नयद्विकविंशतिः पोटश दश बलकेशयानां सशत्रूणां ॥ ८२९ ॥ अर्थ-शत्रु जो प्रतिनारायण तिन सहित बलिभद अर नारायण तिनका समान शरीरका शय प्रथमादिकका फगते असी धनुप यद्वरि तीन विष दश दश पाटि साके सत्तरि साठि पपास धनुष यहरि पैतालीस गुणतीस याईस सोला दश धनुष प्रमाण है ।। ८२९ ॥ मागे नारायण या प्रतिनारायणनिका समान भायु है ताको कहें हैं। सम गुलसीदि यहचारि सही सीस दस लक्स पणसही । यत्तीसं पार सहस्रामाउस्मसदचफीर्ण ॥ ८३० ।। समा धतुरशीतिः दासप्ततिः पष्टिः त्रिंशत् दश एक्षाणि क्षष्टिः । द्वात्रिंशत् द्वादशे सहस्र आयुष्यमर्धचक्रिणाम् ॥ ८३०॥ अर्थ-अर्थ चकी जे नारायण या प्रतिनारापण तिन प्रमादिकका आयु क्रमने धौगगा एग वर्ग यहत्तर लाख वर्ष साठि लार वर्ष मास लाप य दश लाख वर्ग सदि हजार वर्ष बनाम हजार वर्ष बारह हजार वर्ष एक हजार वर्ष प्रभाग है।। ८३०॥ भागे बदेवनिका भायु को है- सगागादि दृगु दगणं सगतीसं सप्तरससमा लयमा । मगगहीनीस सत्तर सहरम पारसपमाउ परे ।। ८३१॥ मनातीनियोः दशानं समत्रिदशत् मगदश समा शाणि । सनमटिः शित् ममदश महर्म वापरासतमायुः ॥ ८३१॥ अर्थ-वाका मा प्रथम दिकके क्रम सियामा माग गरि दोषence ? ममानी सा र मनमटि साप बट्टार मोगमा मनाह ements at Zamam माग॥ ८॥१॥ -Rafaa rai नाatir 4 नरतिर्यग्लोफाधिकार। ३३३ ----- परमो गपिपणे पण एही पंचमि गदो दलो। पारायणो पउरी फसिणो सदिय गुरुयपाया ।। ८३२॥ अयमः रातमीमन्ये पैच पठी वचमी गतो दत्तः । मागपणः पर्षी कृष्ण. ग्रसीयां गुरुपापात् ॥ ८३२॥ अ-पाटा त्रिए सातवी मरक पृष्पीको प्राप्त भया दितीयादि पाच नारायण छठी को भए । पुरषा पाचदी पृष्याको प्राप्त भया नारायण चौथी पृथ्वीकों प्राप्त भया। कृष्ण पृषीको प्राप्त भए । ९ नारायण महत पापते नरफ पृथ्वीको पात भए हैं ॥ ८३२ ॥ गिरयं गया परिरिको पलदेरा मोक्खमा परिमो दु । पल कप कि तित्ययरे सोचि सिझेदि ।। ८३३ ॥ निग्य गताः प्रतिस्पियो पलदेवा मोर्स अप चरमस्तु । मह पाप कृष्णे तीर्थकरे मोपि सेत्स्वति ॥ ८३३ ।। अर्प-नके प्रतियरी प्रतिनारायण सेउ तिस मारापणको प्राप्त भई जोजो नरक पृथ्वंतााकों स भर है। परि पलदेय आदिफे आट ती मोक्ष पदको प्राप्त भए है । अंतका नौमा पत्र मा बाटिमद म स्यर्गको प्राप्त भया । सोभी वृष्ण नारायणका जीव तीर्थकर होसी तिस समय पदकों पागी॥८३३॥ मागें नारदनिके मामादिक गाथा दोय करि कहें हैं;- भीम पहमि रुदा महरुहो कालओ महाकालो। को दुम्मुह गिरयमुहा अहोमुरो पारदा एदे ।। ८३४ ॥ भीमो महाभीमः रद्रो महारदो कालो महाकालः। सतो दुर्मुरा निरयमुखः अधोमुसो नारदा एते ।। ८३४ ।। मर्य-भीम १ महाभीम १ २ १ महारुद्र १ काल १ महाकाल १ दुर्मुख १ नरक मुख अधोमुख १ऐसे ए नव नारद है ।। ८३४ ॥ फलहप्पिया कदाई धम्मरदा वासुदेवसमकाला। भवा पिरयगदि ते हिंसादोसण गच्छंति ।। ८३५ ॥ कलहप्रिया कदाचिद्धर्मरता वामदेवसमकालाः । भन्या नरकगनि ने हिंसादोपेण गछति ॥ ८३५॥ अर्थ-- नारद कलह जिनको प्याग औमे है । वहरि कदाचित धर्मविषे मी रत है। र नारायणादि होते ५ । । । नाने नारायण ममान हे वर्तनाकाल जिनका असे है। बहरि है। परपरा मुक्तिगामी है। बढी ते नारद हिसादोष करि नरक गति ही को प्राप्त ॥८३५॥ अव रुदनिकी म । पूवक सख्या कह है,- - ३३४ त्रिलोकसार- भीमावलि जिदस रुद्द विसालणयण सुप्पदिहचला। तो पुंडरीय अजिंदघर जिदणाभीय पीढ सच्चइनो ।। ८३६ भीमावलिः जितशत्रुः रुद्रः विशाटनयनः सुप्रतिष्ठोऽचलः । ततः पुंडरीक: अजितधरो जितनाभिः पीठः सत्यकिजः ॥ ८३६ ॥ अर्थ-भीमावलि १ जितशत्रु १ रुद्र १ विशाल नयन १ मुप्रतिष्ट १ पल । अजितं घर १ जित नाभि १ पीठ १ सत्यक्यतनय ऐसे ए ग्यारह रुद्र हैं ॥ ८३६ ॥ आगे तिनका वर्तनाकाल फ. हैं;- उसहदुकाले पदमदु सत्तण्णे सत्तसुविहिपहुदीसु । पीदो संतिजिणिदे धीरे सचइसुदो जादो ॥ ८३७ ॥ वृषभरिकाले प्रथमदो सप्तान्ये सप्तसुविधिप्रभृतिषु । पाठः शांतिजिनेंदे वारे सत्यकिमुतो जातः ॥८३७ ॥ अर्थ -~पम अजित जिननिके कालनि विप क्रमते पहला भर दूसरा रुद भया। परे अन्य नृतीयादि सात रुद्र ते पुष्पदंतादि सात तीर्थंकरनिका कालीनीवर्ष क्रम भए । पर शांति जिनेदका काल विष भया ।। ८३७॥ भागे तिनके शरीरका रत्सेध है है;- पण्णसय पण्णुणसपं पंचसु दसहीणम चवीसं । तकायपणुस्सेहो सबइतणयस्स सचकरा ॥८३८॥ पंचशत पंचाशदूनशतं पंचमु दशहीनं अट चतुर्विशतिः सत्यायधनुमत्सेधः सत्पकितनयाय सप्तफरः ।। ८३८॥ भयं-तिन सदनिके शरीरका उच्चत्र क्रमते पाचस धनुष भरते पचास पारित में पचम धनुप बहार मा धनुष यही पांच विमें दश दश पाटि साफ निक सादि पयाम धनुप बहार अाईग धनुष चौवीस धनुष, महरि सत्यकितनपका सात । ॥ ८३८॥ मानि दनिका आयु कहे - नर्मादिगिगारिधिगि लयापुष्पाणि यासलपसाभो। मुलमादि महि दगु दाहाणलिगि यसणराही ॥८३९ किमान दोक गाणि यशानि । पाति. लि. या कहानी वानवाः ॥ ८३९ ॥ पर-नना मयु ! Hit : 5.4 मी दम, मदिरा पारित 474) 4.? .. 1 पी Ent
नरतिर्यग्लोफाधिकार।
३३५
सागै तिन रद्रनि कार प्राप्त भई गतिको कई हैं;-
पदमदु मापविमपणे पण मघरि भमो दु रिहमहि ।
दो अंजणं पवण्णा मेयं सभइतणु जादो ।। ८४०॥
प्रथमझौ माधवीमन्ये पंच मघवीमष्टमस्तु भरिटमहीं।
दौ भजनों प्रपन्नी मेघां सत्यकितनुर्जातः ।। ८१० ॥
अर्थ-तिन रुदनि विथै पहला दूसरा सौ माघवी नामा सप्तम नरफ पृथ्वीको प्रान भय
तृतीयादि पांच मघवी छठी पृथ्वीको प्राप्त भए । आठवां परिघा पाचवी पृथ्वीको प्राम भया।
परे नपा दशवो ए दोय अंजना चौथी पृथ्वीको प्राप्त भए । सन्यकितनय मेघा तोमरी पृथ्वीको
भया है ।। ८४०॥
भागै तिन रदनिका विशेष स्वरूप फरें हैं;-
विजाणुवादपटणे दिइफला णसंजमा भन्या ।
फदिाचे भवे सिज्झीत हु गहिदुग्मियसम्ममाहमादो ॥ ८४१॥
विद्यानुवादपठने इएफला नएसयमा भन्याः ।
कतिचिद्भवेषु सिध्यति हि गृहीतोशितसम्यमहिम्नः ॥ ८४१ ॥
अर्थ-ते रद विद्यानुषाद नामा पूर्वका पटन होत इह लोक संबंधी फालये भोका भए ।
- नष्ट भया है अंगीकार किया हुवा संजम जिनका असे है । परि मन्यते दिनार
का जो सम्यक्त्व साके महात्म्यनै फेने इक पर्याय भए सिद्ध पद पायरिगे ।। ८५१ ॥
भागे मी अर्द्ध घी रुद्र इनफा वर्तना काटफौं महरि रचना विशेष करि पुगपत पाच
नि करि कहें हैं;-
जिणसमफोहविदा समकाले सुण्णहडिमे रचिदा ।
उहयजिणंतरजादा सपणेया पकिारिता ॥ ८४२ ॥
जिनसमकोटस्थापिता: समकाले शून्याधस्तते रचिताः ।
उभयजिनतिरजाता संज्ञेया पनिहारिवाः ।। ८५२ ॥
अर्थ-जिनदेयनिका समान कोटानि विष स्थापित किए ची गई पीते Aनके
र काल विषै भए जाननें । यहरि पन्यकै नीचे स्थापे ते दोर जिननिके सर विक भए शनने ।
पर्थ-प्यारि पक्ति करि एक एक पति विय चौतीस चौतीस कोटे परिए । तापनि
जैसे पहिए हैं फ्रमते जिनका पा शन्या स्थापन करना सो जिस मोर किजिन स्थान
- हाय नाच तीन वक्ति कोटानि विष जो पो भई चा रद स्थापन बिरमा परी
- तिन जिननिक काल विच भए जानने । महरि जो नीषदे होयनि निन्य स्थान परीके
फा पनी तहां प्रभाष जानना बरि जिस ऊपरला कोटा शिशप स्पापन बिताई।
वत्री भादि स्थापे तो लिन छिग आगिण दोर जिननिका दौचि बर का कि
- भए जाननें । बहरि जो शून्य स्थापन किया तो जानिक भार शानन ॥ १२॥
त्रिलोकसार- माने तिन कोरनिके स्थापनेका क्रम कैसे है सो कहें हैं;- पण्णर जिण खदु तिजिणा सुण्णदु निण गगणजुगल निण खदुर्ग निण सं जिण खं दुजिणा इदि चोचीसालया गया ।। ८४३ ॥ पंचदश जिनाः सव्यं त्रिजिनाः शून्यदय जिना: गगनयुग बिनः साप । जिनः खजिनः खे द्विजिनौ इति चतुत्रिंशदालया शेपाः ॥ ८५३ ।। अर्थ-वृषभादि पंद्रह जिन तातै भागें दोय शून्य सात आग सीन जिन आगे शून्य दो मागे जिन काग शून्य दोप आगै जिन आगे शून्य आगे जिन आँगै शून्य भाग दोप बिन कम करि चौतीस कोठे प्रथम पंक्ति दिये जानना ॥ ८४३ ॥ ताकै नीचे दूसरी पंक्ति विौ कहा सो कहें हैं। चकिदु तेरस सुण्णा छन्चकी गयणतिदय चकी सं । चमी गमदुग चकी गपणं चकार सुष्णदुगं ।। ८१४ ॥ चकिती प्रयोदश शून्यानि षट्चारिणः गगनत्रितयं पकी है। घसी नभोदिक यकी गगने परुथरः शल्पाप ॥ ८४४ ॥ अर्थ-पकी दोय गान भागे तेरह शून्य साते भागे एह पकी आगे शून्य तीन मा पत्री मान्य मागे पकी आग मन्य दोय मार्ग पत्री आगे शून्य भाग चक्री मा गल्प दोष मेम करताप पानी कोट जानने ॥ ८१४॥ दमगयणपंचोमाघरगुण्णा पउमगाभणभविष्ट । गपणाने फेमर सुण्ण मुरारि गुणनि कमसो ॥ ८४५ ॥ दामन पंचगगः पाल्पानि पमनामनभोरिष्णुः । मानवर्ष के.गरः शून्यदर्प मुगरिः शून्याय कामशः ॥ ८५५॥ अपनीमनी दगान्य दाने माने पनि नारायण मागे साम्प वन पन्य माने नागाला मा मूल्पतीन आगे नागपण भाग पर भामा मोना टीन में जमकर कोसान काने ॥ ८१५॥ मार्ग धम्मुग्या ममग गयणनुगममीमागी । पार गमागिनना गणानगी मा॥८५६ ॥ रही पदनानि मनमान पानिपत सदा मा जारी मा u वायोमीप नामा: RAIHIRAAT टी। साल का Mainam Awran mamal- नरतिग्लोकाधिकार । .... परम्पारगुजा रा धवला चंदपायविही । णीय गुपामपामा पीमुणिगुन्चया किहा ॥ ८४७॥ पप्रभारी सी धवल चंदप्रभमुविधी । मागमापारी नेमिमुनिगुती कृष्णी मई-पम चामुप ए दोय रक वर्ण हैं। परि चंद्रप्रभ पुपात ए दोय श्वेत वर्ण है। परिवार टोय मीर वर्ण है। यहरि नेमि मुनिमुरत ए दोय कृष्ण वर्ण हैं |८४७॥ मेगा सोलग हेमा यमुपुजो मल्लिणेमिपासनिणा । शेरो मारसवणा महवीरो णाकुलविलओ ॥ ८४८॥ रोका पोरस हेमा शालग्यो मतिनमिपा जिनाः । पौर युमारश्रमगा महारो नायकुलतिरकः ॥ ८४८॥ अर्प-अवशेष सोयह तार्थिकर मुवर्ग समान धेरै है। बहुरि वासुपूज्य मलिनेमि पार्य पर्समान ए पाप कार्यकर कुमार श्रमण है । मिना विवाह किए दीक्षा ग्रहण किया है । अपशेप गणीम सपियर वियाह राग भएं पीछे दीक्षा ग्रहण किया है। बहरि महावीर तौ नाथ वंशके निक।। ८१८॥ पासो दुरग्गवंसो हरिवसो मुम्बओ वि णेमीसो। धम्मनिणो कुंषु अरा कुरुना इपखाउपा सेसा ।। ८४९ ॥ पार्थस्त उप्रशः हरिवंदा मुवतीपि नैमीशः । धर्मजिन कुYः अरः कुरुजाः इक्ष्वाकरः शेषाः ॥ ८४९ ॥ अर्थ-पहार पार्धजिन उप्रवंशी है। मुनिमुद्रत नेमि हरिवंशी हैं । धर्म कुंथु अर जिन पुरवशषि उपने है । भशेष सतरह सार्थकर इश्यकु शविष उत्पन्न है ।। ८४९ ॥ भव शक भर कल्कीकी उत्पत्ति कहे हैं- पणास्सपवर्स पणमासजुर्द गमिय धीराणिबुझ्दो । सगरामो तो काफी पदुणरतियमहियसगमासं ।। ८५० ।। पंचपदशतवर्ष पंचमासयुतं गत्वा पीरनितिः । शकराजो ततः फल्यो चतुर्णवत्रिकमधिकमप्तमास ।। ८५० ॥ अर्य-श्री वीरमाय चौदासवा तीर्थकरको मोक्ष प्राप्त होने पाई छसै पांच परख पांच मास सहित गए विक्रम नाम शक राजा हो है । बहुरि ताते उपरि च्यारि नव तीन इन अंपनि करि तीनस पौराणो वर्ष अरमान माम अधिक गए कल्की हो है॥ ८५०।। भब काकीका कार्य गाथा करि कोहे- मो उम्मग्गाहिमुहो चउम्मुहा मदग्विासपरमाऊ । चालीस रज भी जिदभूमी पुउद समंनिगणं ॥ ८५१ ।।
३३८ त्रिलोकसार-- । - स उन्मार्गाभिमुखः चतुर्मुखः सप्ततिवर्षपरमायुश्यः । चत्वारिंशत् राज्यः जितमूमिः पृष्ठति स्वमंत्रिगणं || ८५१ ।। अर्थ-सो कल्की उन्मार्ग जो विपरीत आचरण तीह विष सन्मुख है । बहुरि चतु जाका नाम है। यहरि सत्तरि वर्ष प्रमाण जाका परम आयु है। तीह विषे चालीस वर्ष प्रमाण कर है । बहुरि सो कल्की जीता है पृथ्वी जाने ऐसा होत संता अपनें माके समूहकों ऐसे है ।। ८५१॥ अम्हाणं के अवसा णिग्गंया अत्यि फेरिसायारा। णिदणवत्या मिक्खामोजी जहसत्यमिदिवयणे ।। ८५२ ।। अस्माकं के अवशा नियाः संति कीदृशाकाराः । निधनवना भिक्षामोजिनः ययाशास्त्रमिति वचने ॥ ८५२ ।। अर्थ-हमारे यश नाही ऐसा कौन है ! तब मंत्री कहे हैं । निय जैन गुरु अवरा तब बहरि कल्की पूछे है । ते कैसे आकारि हैं ! तब मंत्री कहै है धन वस्त्र रहित है । । अनुसारि भिक्षा वृत्ति करि भोजन करें हैं । ऐसा मंत्रीका प्रतिवचन मुणि ॥ ८५२ ।। कहा सो कहे हैं, तप्पाणिउडे णिवडिद पढमं पिंड त मुकमिदि गेझं । इदि णियमे सचिवकदे चचाहारा गया मुणिणो ॥ ८५३ ॥ तत्पाणिपुटे निपतितं प्रथम पिंड तु शुल्कमिति प्राग । इति नियमे सचिवकृते त्यक्ताहारा गताः मुनयः ॥ ८५३ ।। अर्थ-तिन निरपंथनिका पाणिपात्र विप स्थापित किया पहला पिंड प्रास सो पुन है हासिल है । बैंसें करि सो प्रथम पिंड ग्रहण करना असे राजाकै मंत्रिनि सहित नियम कि संतें आहार समप तैसें ही करने करि छोट्या है आहार जिनिने से होने संत मुनि बना विषे गए है।। ८५३॥ तं सोदुमपरखमो तं णिहणदि बजाउद्देण अमुरवई । सो सुंनदि रयणपहे दुक्खग्गाहेकालरासि ॥ ८५४ ॥ त मोदुमक्षमः सं निहति यमायुधन अमुरपतिः । स मुक्त रतप्रभायां दुःखमाझंकजला॥ ८५० ॥ अर्थ-निम अपराध महर्नेकों समर्प न भया अमा अमुर कुमारनिका सामा धरा इन्द्र मो वन मायुध करि तिम कल्वी राजाको हने है। सोकाको मार रमप्रभा नाम नरक भूमि कि दुप करि महा मप एक मागर प्रमाग थायुको भौगये है ।। ८५५ ।। तम्मपदो नस्म मुदो अनिदंनयमणिदो मुरारि है। सरणं गच्छर पेट पसगाए सद समदिलाए ।। ८५५ ।।
नरतिर्यग्लोकाधिकार ।
सदपतः तस्य मुतः अनितंजपसज्ञितः मुरारि त ।
शरणं गच्छति घेलकासंज्ञया सह स्वमहिल्या ॥ ८५५ ।।
अर्थ-तीह अमुरपतिके भयते तिस कल्की राजाका अजितजय नामा पुत्र सो चेलका
मा अपनी खी सहित तिस अपने पिताका बैरी घमर देवेन्द्रनकै शरण प्रात हो है ।। ८५५ ॥
सम्मईसणरयणं हिययाभरणं च कुणादि सो सिग्य ।
पचखं दणिह सुरफपजिणधम्ममाडपं ॥ ८५६ ।।
सम्यग्दर्शनर हृदयाभरणं च करोति स शी।
प्रत्यक्ष या इह मुरकृतजिनधर्ममाहात्म्य ॥ ८५६ ।।
अर्थ-बहुरि सो अजितंजय प्रत्यक्ष जिनधर्मका माहाम्पको दोख शीघ्र ही जैनश्रद्धानरूप
ग्दर्शनको अपने हृदयका आभरण कर है ।। ८५६ ।।
आगै अतके फल्फीका स्वरूप गाथा पांच फरि कहें हैं;-
इदि पडिसहस्सवरसं वीसे फकोणदिक्षमे परिमो ।
जलमंधणो भविस्सदि फफी सम्मग्गमत्यणभो ।। ८५७ ।।
इति प्रतिसहस्रव विशतो कल्कीनामतिकमें घरमः ।
जलमंधनो भविष्यति फल्ली सन्मार्गमयनः ॥ ८५७ ॥
अर्थ-पैसे हबार हजार वर्ष प्रति एक एक कल्की होइ । फल्यानिक वीषि यानि एक
स्पफल्की होइ इतना विशेष अन्य अंधते जानना सो बीस फल्को अतिप्रम भए बता
सवा जलमयन नामा फरकी भले मार्गका मपर्नेवाला पिनासनेशला होमी ।। ८५७ ॥
इह इंदरायसिस्सो वीरंगद साहु परिम सबसिरी ।
अजा अग्गिल सावय परसाविय पंगुरोणावि ॥ ८५८ ॥
इह इंदराजशिष्यो धीरांगदः साधुश्वरमः सर्वधी. ।
भार्या अगिलः धावकः परश्राविका पंगुमेनापि ॥ ८५८ ॥
अर्थ-सीह कालदिपै इन्द्रराजा नामा आचार्य शिष्य धागिर नामा 41का साधु 11
सर्वश्री नामा अर्जिका होसी। बहुरि अमिट नामा श्राश्क होसी । बरि गुमेना नामा
का होमी॥८५८॥
पंचमचरिमे परसरमासतिगांसावसेसए सेण ।
मुणिपदमपिरगहणे मण्णसणं फरिय दिवसनिय ।। ८५९ ।।
पंचमचरमे पक्षाएमासविषर्षे अवशे सेन ।
मुनिप्रथपिरणे संन्यसनं कृत्वा दिषसत्रयं ।। ८५९ ॥
अर्य-ते मुनि भादि प्यारयों पंचमाकाल के अति एक पक्ष भार मामान र
ह कल्सी राजाकरि पूर्वोक्त प्रकार मुनिका पहला माम माग करत सरेन दिन परे मन
करि ॥ ८५९ ॥
मा भाग नाहनपीसमनसोक आंगहो।" ३४० त्रिलोकसार- कहा सो कहे हैं;- सोहम्मे जायंते कत्तियअमवास सादि पुव्वण्हे । झगजलडिटिदी मुणिगो सेसतिए साहियं पल्लं ॥८६० ॥ सौधर्मे जायते कार्तिकामावस्यायां स्वाती पूर्वाने । एकजलपिस्थितयो मुनयः शेषत्रयः साधिकं पल्यै ॥ ८६० ॥ अर्थ-तहां मुनि ती कार्तिक मास अमावास्या तिथि साति नक्षत्र पूर्वाह समपरित मरिसर एक सागर आयुके धारी सौधर्म स्वर्गीय उपमें है। यद्दरि अवशेष अनिका प्रावक श्राविका दोन नहीं हो सौधर्म स्वर्गवि साधिक पन्य आयुके धारी उपने हैं ॥ ८६० ॥ तव्यासरस्स आदीमझते धम्मरायअग्गीणं । णासो ततो मणुसा जग्गा मच्छादिआहारा ॥८६१ ॥ सदासरम्य आदिमच्याते धर्मराजानीनां । नागः ततो मनुष्या नग्ना मास्याचाहाराः ॥ ८६१ ॥ भयंता दिनका शादि मध्य अंतरि क्रमते धर्मका अर राजाका पर अनिका नारा पर मनु मो ना यत्रादि रहित भर मछली आदिका है आहार दिन ॥८६१॥ ही धर्मादिकमा नागका कारण यह है;- पोग्गल भाकामादो गलणे धम्मे गिरासरण हदे । अगुरवणा गरिंदे सयलो लोभी हये अंघो॥ ८६२ ।। पदागिश्यात् मा धर्मे निगप्रयेण हुने । भनिना नोटे मोटीको भवेत् ॥ ८६२ ॥ अ-कार नि पृटाल द्वारा अनिमा भायए पग्णया साने अग्नि का नाम दामा मागको प्रभावन धर्मका नाभा यही अना कुमा १ ... REANI मामला पल मृटा पिायदा गिरयतिवमा नगमेगा । गाजलदार मागिम्मा गग निरा ।। ८६३ ॥ *. E-matuममा। 'म ॥८११॥ 7 ... ....... Aart । - नरतिर्यग्लोकाधिकार । न्यका न हो है । बहीर इस काल विष मेघ है ते लोक जलके देने वाले हो है। पृथ्वी रनादि रिवस्तु रहित हो है । मनुक्ष तीन कषायादि युक्त हो हैं ॥ ८६३ ।। अब अति दुःपम कालका भत विषै जो वर्ते है ताका अनुक्रम गाया प्यारि करि को है; संवत्तयणामाणलो गिरिसरुभूपहदि चुण्णणं करिय । भयदि दिसंतं जीवा मरति मुच्छति उहुँते ।। ८६ ।। संवर्तकनामानिटः गिरितरुभूमभूतानां चूर्णनं कृत्वा । भमति दिशात जीवा नियते मूति पष्टीते ।। ८६४ ॥ अर्थ --उठाकालका अंत विप संवर्तक नामा पवन सो पर्वत वृक्ष पृथ्वी आदिकका चूर्णको रि स्वक्षेत्र अपेक्षा दिशानिका अंत प्रति भ्रमण कर है । महरि तहां नित जीव तीह पपन कर जको पावै हैं बहुरि मरे हैं ॥ ८६४ ॥ खगगिरिगंगदुवेदी सुविलादि विसंति आसप्णा । गति दया खचरमुरा मणुस्सजुगलादिरहुजीचे ॥ ८६५ ॥ खगगिरिगंगापवेदी क्षुदविटादि विगंति भाममाः । नपति दयाः वचराः मुरा मनुष्ययुगलादियनीयान् ।। ८६५॥ भर्य-विजया पर्वत पर गंगा सिंधुनदी पर इनकी वेदी पर निनक भुट बिटमाटर उन प्रति तिनहीके निकट पर्ती प्राणी प्रवेश स्वपमेव पर है । यहरि दयावान विचार कर मनुक्ष युगल आदि देकरि बहुत जीवनिको तिम बाधा रहित म्यानयो ग्राम पर ११८६५॥ छामचरिमे होति मरुदादी सचमत्त दिवसी। अदिसीदखारविसपरसग्गीरजधूमपरिसाभो ।। ८६६ ।। षष्ठचरमै भवति मरुदादयः सप्तसप्त दिवसागवि। अतिशीतक्षारविषपरपाग्निरजोधूमपाः ।। ८६६ ॥ अर्थ -एटा काटका अंत विष पचन आदि सात वर्षा सात सात दिन पर। न ! पवन १ अत्यंत दीन १ क्षार रस १ सि १ कटोर पनि १ लिन मार. EV परिणए पुलनिकी वर्षा गुणचास दिन विष है ॥ ८६६॥ तेरियो सेसनणा णस्मांत विसग्गिररिसदासी। इगिमायणमेसमधो पुण्णीफिजिदिर कालपा ।। ८६७ ॥ शेम्पोषजनाः नस्पति विवानिवमी। एकपोजनमानमध पूर्णारियत हि काला ॥ ८६७ ॥ अर्थ-तिन वर्षानित शेष रहे मनुशादिष, ते भी न हो। बहुति र . नवनि करि दग्ध भई पृथ्वी लोक पोरन मात्र या सरकारले पूर्णator भर रसपा कारक प्रवेशका अनुमान करो, त्रिलोकसार- उस्सप्पिणीयपढमे पुक्खरखीरघदमिदरसा मेघा । सत्ताहं वरसति य णग्गा मत्तादिआहारा ॥८६८ उत्सर्पिणीप्रथमे पुष्करक्षीरवृतामृतरसान् मेयाः । सप्ताह वपति च नाना मृतायाहाराः ।। ८६८।। अर्थ-उत्सर्पिणीका अति दुःपम नामा प्रयमकाल विर्य आदि ही मेघ १ धीव १ अभृत १ रसानको क्रमते सात सात दिन पर्यंत वर्षे है । बहरि । जीव ते वनादि रहित नम हैं । बडीर मृतिका मादिका माहार जिनिकै जैसे उण्हं छंडदि भूमी छवि सणिद्धत्तमोसहि घराद । वल्लिलदागुम्मतरू बड्डेदि जलादिवरसेहिं ।। ८६९ उणं त्यजति भूमिः छवि सस्निग्धत्वमौषधि धरति । बल्लिलतागुल्मतरवो वर्धते जलादिवः ।। ८६९ ॥ अर्थ-~-जलादिकनिकी वर्षानिकरि पृथ्वी है सो पूर्व भया था जो करि उष्णपणा ताकौं छोड है । बहुरि छवि जो शोमा ताकौं धौर है । बदर धार है । बहर मन्न आदि औषधिकौं धार है । बहुरि वेलि आदि ये हैं। मडविना ले ताको घेलि कहिए । वृक्षका आश्नय करि जो फैलै ताको लता क स्थूल पेटको जे न प्राप्त होई तिनको गुल्म कहिए । स्थूल पेड़ रूप होने योग्य कहिए । जलादिकनिकी वर्षानि करि ए वधे हैं ।। ८६९ ॥ दिवीरगुहादिठिया भूसीयलगंधगुणसमाहूपा । पिग्गमिय तदो जीवा सव्वे भूमि भरति कमे।।८ नदीतारगुहादिस्थिता मूशीतलगंधगुणसमाहूताः । निर्गत्य ततो जीवाः सर्वे भूमि मरति क्रमेण ।। ८७० ॥ अर्थ-गासिंधु नदीके तीर या विजयाकी गुफा आदि विष पूर्व प्राप्त को भया जो पृथ्वी वि शीतल मुगंध गुण तीह कार पुलाए हुए सर्व ही तहार कर पृथ्वीकों मेरे हैं। बहरि इहात प्रमों भायुकायादिक जीयनिकै कमने यधे अब रासर्पिणीका दूसय काल मादि विप वर्तनाका अनुकम करें हैं;- उस्सपिगीयविदिए सहस्ससेसेगु कुलयरा कणयं । फणयप्पारायदयपुंगव ता पालण पम महपउमा टासगिदिनाये सामशेष कुरकग कनकः । कनसभरावधांगवा तथा नदिन पन महापम ८५ अर्थ- अतिदृ पम प्रथम कारन पीछे दुमग दुयम नामा नाक बार अवर सो कुरा हो । बहरन कनक १६ नरतिर्यग्लोकाधिकार। ३४३ पुंगव १ पम १ पम प्रभ १ पन राज १ पन पज ११ ग १ महा पम १ मे नाम धारक सोलह कुटकर हो हैं ।। ८७१॥ आगें तिनका कार्य था तृतीय काल दिपै तिष्ठते तेरसठि माटाका पुरुष तिनको गाया प्यार कार कहें हैं, तस्सोटसमणुहि कुलायाराणलपकपडदिया होति । तेवहिणरा वदिए सेणिपचर पठमवित्यपरो ।। ८७२ ॥ तत्पोडशमनुभिः कुटाचारानटपरप्रभृतयो भाति । विपटिनास्लुतीये श्रीणकचरः प्रथमतीर्थकरः ॥ ८७२।। अर्थ-तिन सोटह मनुभिः कहिए कुटफरनि करि क्षतिपादि कुन्टये आधार अनि की अनादि पचायनका विधान इत्यादि कार्य शिवार एए प्रश्न है । परि तहा पी: तीसरा दाम मुखमा नामा काल प्रपते है । सीह विपै सेरसठि शलाका पुरुष हो है । हाणिक नामा गराध जीप सौ प्रथम तीर्थंकर देव हो है।। ८७२ ॥ महपउमो मुरदेवो मुपाराणामो सयंपठो तरियो । सव्वापद देवादीपुतो होदि कुलपुत्तो ।। ८७३ ॥ महापमः मुरदेवः मुपानामा स्वयंप्रभः वः। सर्यामभूतो देवादिपुत्रो भवति पुलपुत्रः ॥ ८७३ ।। अर्थ-महापन १ सुरदेष १ सुपार्श्व १ स्वयंम धौधौ १ सर्वामिभून १ पु ! कुल पुत्र ।।८७३ ॥ तित्यपरदंफ पोहिल जयकिती मणिपदादिगुपदमी। अरणिपावसापा विउलो फिडरणिम्मषभो ।। ८७४ ।। तीर्थकर उदकः प्राटिल: जपकीर्तिः मुनिपदादिगुतः । अरनिष्पापकराया रिपुः कृष्णवरो निर्मः ॥ ८७१।। अर्थ--उदफ सायबर १ मोटिल १ अपकोई १ गुमिगु १m Art निःकपाय १ विपुल १ कृष्ण नारायणका जीव निर्मल तीर्थकर १॥ ८७४ ॥ वित्तसमाहीगुतो सयंभु अनियमो पअप पिये। तो देवपाल सपायरोऽणतरिरितो ।। ८७५ ॥ चित्रसमाधिगुप्तः स्वयंभूरनिवर्तक यो विमए । nal देवपाल सपरिचरोऽनतान्त ।। ८७५॥ भई-चित्र गुप्त १ समापि १ स्वरभू । मानव कि ११ मि - १ सदकितनप रदका जीव ka Rina ममस Enter भागे हा प्रथम कमि भायु है:- बर्षOT : १ शुभ १ श्रीयंदर में एना Enterमाँगाकटा भागापमोगीरा॥c.in पिलोफसार- पदमनिणो सोलससयवस्साऊ सचहत्यदेहुदओ।' चरिमो दु पुन्यकोडीआउ पंचसयधणुतुंगो ॥ ८७६ ॥ प्रथमनिनः पोदशशतायुः सप्तहस्तदेहोदयः । घरमः तु पूर्वकोश्यायुः पंचशतधनुस्तुगः ॥ ८७६ ॥ अर्थ-पहला महापम जिन एकसौ सोलह वर्ष प्रमाण भायु सात हाय शर र है । बहुरि मनका अनंत वीर्य निन कोहि पूर्व वर्ष प्रमाण आयु पाचसे धनु उन पर है ।। ८७६ ॥ मागे धकी मईयको बनिमानिके नाम गाथा ग्यारि करि करें - नकी मरहो दीहादिमदतो मुत्तगूढदंता य । सिरिपुनसेणभूदी सिरिफंतो पउम महपउमा ॥ ८७७ ॥ भरिणः मरतः दीर्घादिमदतो मुक्तगूढदतौ च । धीर्षरोनभूती श्रीकांत: पमो महापमः ।। ८७७ ।। भ-मही करता कहिए है । भरत १ दीर्घ देस १ गुरु दैत १ गर ११ वीमून १ पम १ महापा १॥८७७ ॥ तो चिपविमलयाइण अरिहरोणो यलो सदो पदो। महर्षद पदहर हरिचंदा सीदादिचंद परदा ।। ८७८ ॥ ततः विप्रमियानी भरिटरोनः पलाः ततः वः। महार: धरः हरिचंदः सिंहादियद्रो परदः ॥ ८७८॥ पहा चित्र पाहन मिल पान १ अरिट सन १९ मारहा wrt मिद करि है। द १ महायर १ पदयर १ हरिपा १ ६६५९ तो पुणचंदगुपदा सिरिचदो य केसवा दी। नयमिनसेगा नदी भूदी पपलगापा ।। ८७९॥ पर शुभर श्रीः प .शा दी। नामेनी नारनिभावनामा ८७१।। for TRAण ? रिम मटा निरिमा विपरिगणगोप गिरियो। finitar nage 141 ८८.
। नरतियंग्लोकाधिकार । अप-महा १ अनियर १ रिपृष्ट १ द्विपृष्ट १ से ९ नय वासुदेव हो हैं । या. पनि प्रनिशा ने प्रतिनारायण से कहिए है। श्रीकंठ १ हरिकेट १ भश्वकंठ १ सुकट १ सिलिट १ अभद्रीय १ हपदीव १ मयूर प्रीव भैसे ए नव प्रतिवासुदेव हो है ॥ ८८० ॥ सप कहे अर्थ तिनका उपसंहार कहै है; एसो मचो भेभो परविदो बिंदियतदियकालेमु । पुर्व य गहीदनो सेसो तुरियादिभोगमही ॥ ८८१ ।। पः सयों भेदः प्रपितः द्वितीयतृतीयकालयोः । पूर्वमित्र गृहीतव्य. शेषः तुर्यादिभोगमही ॥ ८८१ ॥ अर्थ--पर सर्व ही भेद उत्सर्पिणीके दूसरे तीसरे कालनिका प्ररूपण किया वहरि अवशेष चतुर्थ भादि फालनि विष भोगभूमि है असा पूर्वोक्त प्रकार ग्रहण करना । तहो अनुक्रमते आयु कायादि करि वृद्धि मप धतुर्थ मुपम दुपमकाल कि जघन्य भौगभूमि है । पंचम मुपम काल विये मध्य भौगभूमि है । परम मुपम मुपम काल विष उत्कृष्ट भोग भूमि है ॥ ८८१ ॥ में भरत ऐरावत क्षेत्रनि विर कहे जे छह काल तिनकों अन्य क्षेत्र विष जोइनको गाथा तीन कहे -- पटमादो तुरियोति प पटमो कालो अवहिदो कुरवे । हरिरम्मगे य हेमवदेरण्णवदे विदेहे य ।। ८८२ ॥ प्रथमत तुर्यातं च प्रथमः कालः अवस्थितः कुर्योः । हरिम्पकै च हैमवद्धरण्यवतयोः विदेहे च ॥ ८८२ ॥ अर्थ पहरा कालतें लगाय धौथा काल पर्यंत नियम कहिए हैं । सहा पहला काल सो देव- कुर रत्तर कुर विय अवस्थित है। भावार्थ--पहला मुपम मुपम कालको आदि विष जो वर्तना है सौ वर्तना देव कुरु उत्तर धुरु किस सदा काल पाइए है। बहरि ऐसे ही दूसरा काल हरि अर म्यक क्षेत्र विष अवस्थित है। यहरि तासरा काल हैमवत भर हैरण्यवत क्षेत्र विषै अवस्थित है। हरि चौथा काल विदेह क्षेत्र विषै अवस्थित ही है ।। ८८२ ।। भरह इरावद पण पण मिलेच्छखंडेमु खयरसेटीसु । दुस्समयसमादीदो अंतोचि य हाणिवट्टी य ।। ८८३ ।। भरत. ऐरावतः पंच पंच म्लेष्ठांडेषु सवरश्रेणिपु । दु पममुपादित अत इति च हानिकृद्धी च ॥ ८८३ ॥ अर्थ --भात ऐरावत संबंधी पाच पाच मलेच्छ खंइ अर विजयाकी विद्याधर रहने की मी तिन विष दृ वम मुपम कालका आस्तैि लगाय ताह का अन पर्यंत हानि वृद्धि हो है । सो जवसर्पिणी विर्य ना वो-श कालकी आदिने लगाय अंत पर्यत आर्य खंडवत् अनुक्रमते भायु आदि- ककी हानि हो । ना पाचवा उटी का नाही प्रबने ।। भावार्थ-जो आर्य खंड कि अब मपिणीया चोथा का रका अनवि वर्मना । माई आय विष असागांका पांचया छटा भर त्रि.४४ ३४६ त्रिलोकसार- उत्सपिणीका पहला दूसरा फाल प्रवर्तते मी तहां एकरूप पर्तना है। वहरि रत्मायणीका कालका आदि ते लगाय नाहीका अंत पर्यंत आयु आदिकको वृद्धि हो है । तहाँ चोया छठा काल नहीं पत्तै है {भावार्थ-इहां आर्य खंड वियें उन्सपिणीका चौथा पांचवां छठ सापणीका पहला दुसरा तीसरा काल प्रवर्तते मी उत्सार्पणकि तीसरा कालका अन नि पर्तना पाइए सो तहां एकरूप वर्तना है 11 ८८३ ।। पदमो देवे चरिमो णिरए तिरिए गरेवि उकाला। तदियो कुणरे दुस्समसरिसो चरिमुवहिदीवद्ध ॥ ८८४ ॥ प्रथमः देवे चरमः निरये तिरश्चि नरपि पट्टकालाः । तृतीयः कुर्नर दुःपमसदृशः चरमोदविद्वीपार्थे ।। ८८४ ॥ अर्थ-देव गतिविध प्रथम काल वत्र्त है। नरक गतिविषे अंतका छटा काल व भावार्य-इहाँ अति सुख अति दुखकी अपेक्षा पहला छठा कालका वर्तना कया है । आयु अपेक्षा न कह्या है । वद्वीर ऐसे ही तियेच गति अर मनुक्ष गतिविष छहों काल वत्ते है । बही मनुष्य भोगभूमि समुद्रनिविप हैं । तहां तीसरा काल पते है । वहुरि आधा स्वयंभू रमण द्वीप सर्व स्वयमूरमण समुद्रविप दुःखम समान सर्वकाल वर्त है ।। ८८४ ॥ से बूद्वीपके वर्णनकों समाप्त करि लवण समुदके वर्णनकों आरंभ करत सता दोनिक वीचि तिष्टता जो कोट ताका स्वरूप निरूपणके मिस कीर समस्त द्वीप समुद्रनिके विपै पाईए हैं जे प्रकार तिनकी गाथा दोयकरि प्ररूपै है;--- घउगोउरसंजुत्ता भूमिमुहे वार चारि अहुदया। सयलरयणपया ते वेकोसवगाडया भूमि ।। ८८५॥ चतुर्गोपुरसंयुक्ता भूमौ मुखे द्वादश चत्वारः अष्टोदयाः । सफलरसात्मकास्ते विकोशावगाढा मूर्मि ॥ ८८५ ।। अर्थ-प्यारि गोपुर द्वार तिन करि संयुक्त है। बहरि भूमी कहिए नीचे बारह यो- चौड़े हैं । मुखे कहिए उपर ध्यारि योजन चौडे हैं। बहुरि आठ पोजन ऊँचे है । बहुरि सक नाना प्रकार रत्नमई हैं ऐसे ते प्राकार हैं। बटुरि ते दोप कोश भूमिकों अवगाहि करि तिटे । भावार्थ-पृथ्वी विष दोष कोश इनकी नीव हैं ।। ८८५ ।। बलमयमूलमागा वेलरियकयाइरम्मसिहरजुदा । दीवोवहीणमंते पायारा हॉति सम्बत्य ॥८८६ ॥ पत्रमपमूलभागा चैर्यतातिरम्यशिखरखताः । दीपोदीनामते प्राकारा भवंति सर्वत्र ॥ ८८६ ।। अर्थ-मई निनका मूल भाग कहिए नीव है। वहरि वैर्य न कर निर्मापित भी रमणीक शिवरनि करि संयुक्त है । अमे मारा कहिए, वेदिका दियाल सो टीपनिका पा समुह निका अंत विष परिवरूप मात्र है। ८८६ ॥
नरतिर्यग्लोकाधिकार । ३४७ लागै तिन प्राकारनि उपरि तिरती जु वेदिका ताकी निरुपै है- पापाराण उचरिं पुह मझे एउमदिया हेमी । पेकोसपंचसयपणुतेगा वित्यारया कमसो ॥ ८८७ ॥ प्राकारागामुपरि पृथक् मध्ये पनवेदिका हैमी। रिमोशपंचशतधनुस्तंगविस्तारा कमरा || ८८७ ॥ भर्य-तिन प्राफानिकै उपरि माप विर्य पृथक पृथक पम वेदिका कोगुरेनिकी पंक्ति है। सो मुवर्ण मई है दोष को रची है पाचसे धनुष चौड़ी है ।। ८८७ ॥ आगे निस पनवेदिकाकै माही भरवार दोऊ तरफा तिष्टते जु पनादिक तिनको गाथा पारि विस्से अंतो पाहि हेमसिलातलजुदं वणं रम्म । वापी पासादोवि य चित्ता अत्यति तर्हि वाणा ||८८८॥ तस्या. अतहि हेमशिलातटयुत वन रम्यं । वाप्य प्रासादा अपि च चित्रा आसते तत्र पानाः ।।८८८॥ अर्थ-तिन दियानिके मोही बार पैली पा वैली दोऊ तरफो सुवर्णमय शिलातल करि संयुक्त रमणीक बन हैं। तहाँ चित्र नाना प्रकार पारदी या प्रासाद कहिए मंदिर है। तहाँ मंदिरनि विवान म्पतर देव तिट है ॥ ८८८ ॥ परमज्मजहण्णाणं वावीणं पाव विसद वित्यारा । पण्णासूणे कमसो गाढा सगवासदसभागो।। ८८९ ॥ परमभ्यजघन्यानो वापीना चापा. दिशत विस्ताराः । पंचाशन क्रमशो गाधः स्वकव्यासदशमभागः ॥ ८८९ ॥ अर्थ-लष्ट मभ्य जघन्य बावड़ीनिका विस्तार जो चौडाईका प्रमाण दोयसै भर पचास पाटि क्रमते है सो दोयसै ब्यौदस एकसौ योजन प्रमाण है । बहुरि तिनका गाध जो ऑडाईका प्रमाग सो अपने ध्यासकै दश भाग है । से क्रमते वीस पंद्रह दश योजन प्रमाण जानना ॥८८९॥ वासुदयादीहतं जहष्णपासादपस्स चावाणं । पण्णपणसदरिसपमिह दारे एवार चउ गाहो ॥ ८९० ॥ प्यामोदयदीर्घत्वं जघन्यप्रासादस्य धापानां । पंचाशत्पंचसप्ततिशते इह द्वारे पट् द्वादश चतुतः ॥ ८९० ॥ अर्थ- जघन्य प्रासादनिकी चौड़ाई उचाई लंबाईका प्रमाण क्रमते पचास पिचहत्तरि एफसी धनुए प्रमाण है। बहुरि इनके द्वारनिविणे चौड़ाई उचाई उह अर बारह धनुरा प्रमाग है भर गाय जो अवकाश कप इनकी नींव सो ध्यारि धनुष प्रमाण है ।। ८९० ॥ मझिमउकसाणं विगुणा तिगुणा कमेण वासादी। दोहोदारा माणमय तहकाडादिगेहावि ।। ८९१ ।।
अयं-निन पर मयुन द्वापनि उदय पीजन चौहा परि पोरन अप त्रिलोफसार- मप्यमोहटानां द्विगुणा त्रिगुणाः क्रमेण व्यासादिः। द्विद्विद्वाराः मणिमया नर्तनक्रीडादिगेहा अपि ॥ ८९१ ॥ अर्थ |--मण्यम भर उत्कृष्ट प्रासादनिका व्यासादिक जघन्य प्रासादनिक न्यासादिक क्रम में भर तिगुगे हैं । अर तिनके द्वारनिके भी सैसे ही जवन्य प्रासादनिके द्वारनित अर तिगुणे व्यासादिक है । बहुरि ते जघन्य भ्यासादिक धरै प्रासाद दोप दोय दारनि करि सड़ हैं। तहां मणिमई नर्तन गेह क्रीडा गेह आदि रचना पाइए है। तहां मध्य प्रसादनिकी चौर टंचाई वाई सौ न्यौदसै दोयमै योजन, उत्कृष्ट प्रासादनिकी न्यौदस सवादोस सीनसे पोजन प्रमान है । बहुरि मध्य प्रासादनिके द्वानिकी चौड़ाई उचाई गाध बारह बोईस भाग धनुरो, स्कृष्ट प्रसादनिके वारनिकी चौईस छत्तीस बारह धनुष प्रमाण है ॥ ८९१ ॥ अव अधिकार भूत प्राकारनिके द्वारनिकै नाम या तिनके व्यासादिक के हैं- विजयं च वैजयंत जयंतमपराजियं च पुल्बादी । दारचउमाशुदओ अडजोयणमद्धरित्यारो ॥ ८९२॥ विजय च वैजयंत जयंतमपराजितं च पूादि । द्वारचनुकाणामुदयः भरपोजनानि अर्थविस्ताराः ॥ ८९२ ॥ अर्थ- १ जपत १ अर्पत १ अपराजित १ ऐसे नाम धारक तिन प्राकारनिके Fiदिदिशानि गिद्वारा निन पारि द्वारनिका उच्च माठ योजन है, विस्तार तो 7 पर पवन है॥ ८९२ ॥ भाग लिन दारनिक उपरि रचनाका सरपको आदि का वर्णन मामा तीन की नोरणनुददाम्बार दुगवास पउतुंग पामादो । बारमारमापददलयासं विनयपुरमुगरि गपणाने ।। ८९३ ।। तोमतदागेपरि तिच्यामः यतुभाग प्रागाद । वादगमहम्मायनालयाम विजयपुरमुपरि गगनाः ॥ ८९३ ॥ सदर Emerama Ear नगर.३॥ पूर्व मनिता विनयादिरिदी र मारि पद । अगदीमर बारम दागा नहींग गिगाम ॥ ८९४ ॥ समर mangal- बटन::समान ॥ ८॥ घर-OFARE Atarranti 2 मार लिटो ..., 1 भाम ::lam - नरतिर्यग्लोकाधिकार। ३४९ of जी जनारका ही साके मूल विपै सीता सीतोदा पिना अपशेष पारह नदी निकस के रहार गीता सातारा पूर्व पश्रिम द्वार कर ही समुद्र विषै प्रवेश कर है। सारे इनके जुदे हारनिया भाव है ॥ ८९४ ॥ पायारतम्भागे पेदिजुदं जोयणदवास वणं । दारुणपरिपितुरियो विजयादीदारअंसरयं ॥ ८९५ ॥ प्राफारातर्भाग घेयुत योजनार्धव्यास पन । द्वारोनपरिधितुर्यों विजयादिवारांतर ॥ ८९५ ॥ अर्थ-तिस प्राकारक माहिली तरफ वेदिका सहित आध योजन चौड़ा पृथ्वी उपरि बन है। महरि निस माकारके धारयों द्वारनिका म्यास सोलह योजन सो शैय्दीपका सूक्ष्म परिधि प्रमाण २१६२२८ यि घटाइ अवशेष ३१६२१२ के पारि भाग किए गुप्पासी हजार तेरपन योजन प्रमाण विजयादिक द्वारनिको परस्पर अंतराल है । जैसे ही अन्यत्र जानना । जैसे द्वीप भर समुद्रक बाचितिएता जो प्राकार ताका वर्णन सहित जंबूद्वीपका वर्णन समाप्त भया॥ ८९५ ॥ आमैं एवण समुद्रके अम्यतरवर्ती जे पाताल तिनका स्थान या तिनफी संख्या वा तिनके यामादिकका परिमाण कहे हैं।- लक्षणे दिसविदिसंतरदिसासु घउ च सहस्स पायाला । मसुदयं तलपदणं लवखं दस तु दसमकमं ।। ८९६ ।। टपणे दिशाविदिशातरदिशामु चचारि सहस्त्र पाताटानि । मध्योदयः सटवदनं टॉ दशमं तु दशमक्रम ॥ ८९६ ॥ अर्थ -लयण समुद्र के मध्यभाग परिधिविपै च्यारि दिशानिविष भर पारि विदिशानिरिय भर इन भारनिकै बीचि आट अतर दिशा विष अनुक्रमते प्यारि पारि एक हजार पाताल है गर्म खाड़ा साफा नाम पाताल है | तहा दिशासंबंधी प्यारि पाताल तिनका उदपका मध्य भागविष ध्यास एफ लाग्य योजन है । यहुरि उदय जो उचाई ताका प्रमाण तैसेंही एक लाख योजन है। नीचे ही ना सल म्यास साका दशवा भाग दश हजार योजन है । उपरि मुख पास से ही दक्ष हजार योजन है । भावार्य-ए पाताल ऊभा मृदंगकै आकारि हैं। सो समभूमित नाचेका जो उदाईका प्रमाण सौ उचाई जाननी । ताका मध्यविौ तौ व्यास अधिक है। भर ताकै उपरि या ना क्रमते घटता घटता नीचे ही नीचे अर टपरि समभूमिविपै समान प्यास है । इहा प्रश्न जो लक्ष योजन पर्यंत टंडाई कैसे सभवै । ताका समाधान-रत्नप्रभा पृथ्वी एक लाख असी हजार योजन मोटी है। सहा खरभाग पकभाग पर्यंत ते पाताल ऊडे जाननें । बहुरि विदिशासंबंधी च्यारि पातालनिकै दिशासबंधी पाताल नित दावा भागका अनुक्रम जानना सो मध्य म्याम दश हजार उदय दश हजार नल न्यास एक हजार मुग्व व्याम एक हजार पोजन प्रमाण है। बहुरि अंतर दिशा संबधी हजार पातालनिका विदिशा संबंधः पातालनिने दशा भागका अनुक्रम जानना । सो मध्य प्यास हजार नल न्यास एकसा मुए व्यास एकसी योजन प्रमाण है ।। ८९६ ॥ - -Paru ग्रिलोकसार- या दिशा संबंधी पातालनिका नामादिक कहें हैं:- वडवामुई कर्दवगपायालं जूबकेसरं वहा । पुवादिवजकुड्डा पणसयवाइल्ल दसप कपा ।। ८९७ ।। घडवामुख फर्दवकं पातालं यूपकेशर वृत्तानि । पूर्वादिवाकुड्यानि पंचशतवाहल्यं दशम क्रमात् ।। ८९७ ।। अर्थ-बड़वामुख १ कर्दवक १ पाताल १ यूपकेसर १ ऐसे पूर्वादि दिशा संबंधी पाता- लनिक नाम हैं | बहरि ते सर्व पाताल वृत्त कहिए गोल हैं । वहीर वज्रमई कुट्यकरि संयुक्त है । वहाँ दिशा संबंधी पातालनिकै कुख्यका बाहुल्य जो मोटाईका प्रमाण सो पांचसै योजन है । बीर याका दशा अंश पचास योजन विदिशा संबंधी पातालनिका कुख्य वाहुल्य है ।। ८९७ ।। आगै तिन पातालनिकै सम्यंतर यती जल भर परन तिनके प्रवर्तनका क्रम कहैं हैं, हेहुचरिमतियभागे णियदं वादं जलं तु मज्झम्हि । जलवादं जलबड्डी किण्हे सुझे य वादस्स ।। ८९८ ॥ अधस्तनोपरिमत्रिभागे नियतः वातो जल तु मध्ये । जलयातः जलवृद्धिः कृष्णे शुझे व वातस्य ।। ८९८ ॥ अर्थ-तिन पातालनिकी उचाईका तीन भाग करिए तहां दिशा संबंधी पातालनिका तीसरा माग तेतीस हजार तीनस तेतीस योजन भर एक योजनका तीसरा भाग प्रमाण है । विदिशा संबंधानिका तीन हजार तीनस तेतीस योजन एक योजनका तीसरा भाग प्रमाण है । अतर दिशा संबंधानिका तीनसे तैतीस योजन एक योजनका तीसरा माग प्रमाण है। तहां नीचला तीसरा भाग विपै तो केवल पवन ही पाइए है । वीर उपरिका तीसरा भाग विप केवल जल ही पाईए है। महरि मध्यका तीसरा भाग विपे जल पवन मिश्ररुप पाईए है। तहां कृष्णपक्ष विप सीह मध्या तृतीय माग विषे तिटता जलकी हानि हो है। बहर शुभ पक्ष विथै तहाँ ही तिराना पवनका । वृद्धि हो है।। ८९८॥ अब तिस हानि वृद्धिक प्रमाण को कहे हैं; तम्मझिमतिपभागे लवणसिहा परिमपणसहस्से य। पण्णादिहि मनिटे इगिदिण जलवादवष्टि जलवडी ।। ८९९ ॥ तन्मध्यमतिमागे व्यशिया चरमपंचासह । पचदशदिन भने एकदिने जलयात वृद्धि. जहादिः ।। ८९९ ॥ সলিন থারানিক নব নব মাকা পুর মদ বাঙ্গী সনিক। মাস দই जो प्रमाण होइ । दिशा ३३३३३१ १-३ दिशा ३३३३११-३ अरदिशा ३३३11+2 नितना मध्य तृतीय भाग विष क. १३. दिन प्रति दिला २२२२१-९२२२६ भतर दि २२ पक्ष को पक्ष विपनको प्रमाण है। पानामनिका मननीय भार शिव नाचे एन पी मोदिन दिन प्रति कृष्णा - नरतिर्यग्लोकाधिकार। पनसी जागा जो होगा जाय है । अर शुभ पक्ष विष जलकी जायगा पवन होता जाय है ऐसा 74 जानना । परि लवण समुद्रकी जो शिमा सममित उचा जटका प्रमाण ताका अंतफा जो चहजार पोनन साई पंद्रह दिननिका भाग दिए तीनसै सेतीस पोजन एक तृतीय भाग आया एयण समुद्रयो शिगा वि दिन दिन प्रति जल वधर्नेका प्रमाण हो है । समभूमित हारह बार पोजन ऊंचा जल है ताफे उपरि शुक पक्ष विषे इतना इतना जल ऊंचा चदि पूर्णिमाके निमौला हजार योजन ऊंचा जल हो है । कृष्णपक्ष विपै तैसे ही घटि तितना ही आनि रहे ऐसा भाव जानना । अब इस ही अर्धको पर्ने हैं। पंद्रह दिननिकों तेतीस हजार तीन से ततीस जन एक तृतीय भाग घटनें यधनें रूप हानिचय होय तो एक दिन के फेता होइ । ऐसे त्रैराशिक रे ममद विधान- अशी ९९९९९-३ शनिकों मिलाय १००००-३ भागहार तीनकों arm राशि कप पंहका भाग हार फरि गुणें पैंतालीस होइ १०००००-४५ इस भागहारका ग दिए दोप हजार दोय से वाईस योजन भए अर अवशेष १०४५ को पांचकार अपवर्तन दोय नयां भाग भया सो इतना मध्य तृर्ताय भाग विपै दिन दिन प्रति जल पवन घटै यधै ऐसें ही लवण समुद्रकी शिक्षा विष वा विदिशा अंतर दिशा संबंधी पातालनि विपै क्रमकरि जलपातका शिखाका हानि वृद्धिका अनुक्रम जानना ॥ ८९९ ॥ से हानि वृद्धि युक्त जो लवण समुद्र साको भूमुख म्यास कहै है;- पुण्णदिणे अमवासे सोलेफारससहस्स जलउदओ। वासं मुहभूमीए दसयसहस्सा य लक्खा ॥ ९००॥ पूर्णदिने अमावास्यायो पोडशकादशसहस्र जलोदयः । प्यासः मुखभूम्योः दशसहस्रं च द्विलक्ष्यं ॥ ९००।। अर्थपूर्णिमाकै दिन तो सोलह हजार योजन लयण समुद्र विपे जल ऊंचा हो है। बहुरि वस्याकै दिन ग्यारह हजार योजन जल ऊंचा हो है । भावार्थ-लवण समुद्रका मध्य भाग विषे वस्याकै दिन समभूमित ग्यारह हजार योजन जल उंचा रहै है । बहुरि दिन दिन प्रति तीन तास योजन भर एक तृतीय भाग प्रमाण जलको उचाई वधै सो पूर्णमासांके दिन सोलह र योजन होइ सहा पाउँ दिन प्रति तितनी ही घटै भैसें जलकी उंचाईको हानि वृद्धि है। र सौलह हजार योजनकी उचाई विषे मुख व्यास दश हजार योजन है । अर भूम्यास दोप योजन है । भावार्थ-समभूमि उपरि सोलह हजार योजन जल उंचा है । तहां तिस जलकी ईका प्रमाण दश हजार योजन है सो मुख व्यास जानना । बहुरि समभूमि विषै दोष पोजन समुद्रकी चौड़ाई है मो भूव्यास जानना । बहुरि सोलह हजार पोजनकी उचाई एक लाख निवै हजार योजन चौड़ाईका प्रमाण घट्या तौ पाच हजार योजनकी उचाई निर्य मा घच्या से अपवर्तन करि गुणे ९५०००० अपना भागहारका भाग दिए गुणसठि हजार की पिचहार योजन भए । या विषे मुग्व व्यास दम हजार जोडें ग्यारह हजारकी उंचाई विगै ध्यास हो ह । भावार्य-समभूमिर्ने ग्यारह हजार पोजन उचा जल है। तहा तिसकी ।
३५४ त्रिलोकसार- पीछे जो पिच्याग योजनका सोलहा भागमात्र तटते पर जल एक योजन ऊंचा होइ तौ वेदिकाका संतराल ३०१९७६:६१ मात्र तट पर जल केता ऊंचा होइ ऐसे त्रैराशिक फार प्रमान राशिम्प भागहारके छैद लवनिकी पलटि परस्पर गुर्गे देसा १८७९९६१६:५७२५ मजा! इहां भागहारका माग दिए चौरासीने वीस योजन अर सत्तायनसे सोटहका सत्तारनसे वियागौन भाग ८४२०१५७१६:५७९५ मात्र लवण समुद्रसंबंधी सूनिकै निकटि पण समुद्रका जा ऊंचा है इहां अटके वाचि सूर्यादिक विचरै हैं ऐसा जानना ॥ ९०१॥ अब पातानिका अंतरालकी निरुपै हैं;- मज्झिमपरिधिचउत्य विवरमुई संवि मझमुहमदं । सयगुणपणपणहीणं तं सयछच्चीसमानिदे विरई ॥ ९०२॥ मध्यमपरिधिचतुर्थ रिसरमुरो तदपि मम्पमुसमः। शतगुगपंचधनहीने तत् शतपड्रािभाजिते विरह ॥ ९०२ ॥ अयं-टाग समुद्रका मन्यम सूची श्याम तीन साय योजन ताका स्थूल परिसी नजर पनि ताका मा भाग दोय टार पचास हजार योजन मार दिशा सची एक पाटफे मुगाए । र मरे पानाटके मुपका अंत पर्पत क्षेत्र है । या पातालका मध्य म्याग एक भाग नारी लिन पानादनिकी उनाईका मध्य परस्पर मंतरा एक सौगाबर मारही है। भर ताही पातालका मुग म्याम दश हजार योजन घटार लिन पालन माना 4. अंगर दीप दाप पंद्रह योजना मार हो है। यहरि पा शिदिशा में पाया दागा योजन पाइ अवशेष २११००० का आमा सिए दिशा से पाला र पिलानका मुगानिक यानि अगर एक लाल मात हजार योजन हो है। जी मा पनका घन बार बार पानी लिनकों घटाइ अवशेष २१५०० को दो PRE: विमानात बीवि पाना लिना गुनो। rम वाम मोबन मात्र हो ।। २०२॥ म. ममुद्रो, पाट में नागमा देव नि माननिती या साका पीक- बरंभा मृजगविमागाग गमागि याीि गिरी। अंबामा प्रस्तामं पादाद मागं ॥ ९.३॥ ..... बियो। - art t.
नरनिलोफाधिकार। दृतरातो मगम दुकामभरियं च होइ सिहरादो। पराणि गपणतरे नायणदसगुणसहस्सवासाणि ॥ ९०१ ॥ ना समान धिोशाधिक च भवति शिखरात् । माणित गगनाले योजनदशगुणसहसव्यासानि ॥९०१ ॥ अर्थ- ममुटये. दोउ तर सास योजन भर साफ शिसरते दोयकोस अधिक दोजन गरि परि ना खासगरि दश हजार पोजन म्यास लाए नगर हैं । भावार्य- जमका पार सम्यगर जो तट ताके उपरि सातसै योजन जाइ अर टवण समुद्रकै पार ता, पीर सातमै योजन अर दोय कोश जाइ घेलंधर जातिके नागकुमार नभयं नारनगर मायापि जरी उपरि जानने । तिनका प्रत्येक व्यास दश हजार न मात्र जानना ।।१०।। आधी पासाउनिक दोऊ पार्थनिविष तिपते पर्वतनिकों भर तहाँ वास करते कि तिनको माया पारि करि को है;- परयामापणं पासढुंगे पचदा हु एफेका । एवं कौत्थुमसेलो इय विदियो कोरधुभासो दु॥ ९०५ ॥ पटवामुरामभूतानो पार्यस्य पर्वता हि एकैका. । पूर्वस्या कौस्तुभरोलः इह दितीयः कौस्तुभासस्तु ।। ९०५ ॥ -काया मुरा आदि जे दिशा संबंधी पाताल तिनके दोऊ पार्श्वनिविपे एक एक तहाि संबंधी पातारको पूर्व दिशावि कौस्तुभ नामा पर्वत है बहुरि इहां दूसरा मदिसा विरे भौस्तुभास नामा पर्वत है ।। ९०५॥ तहि तणामवाणा दरिखणदो उदगउदगवासणगा। इस सिवसिवदेवमुरा संखमहासंख गिरिदु पच्छिमदो ॥ ९०६ ॥ तत्र तमामदियानी दक्षिणाये टदकउदकवासनगौ। दह शिवशिवदेवमुरी समहाराखौ गिरिदयौ पचिमद्ये ।। ९०६ ।। अर्थ-तिन पर्वतनिक उपरि तिन पर्वतनिकै समान नामके धारक दोय व्यंतर देव यसै परि दक्षिण दिशासंबधी पातालके दोऊ पार्श्वनिविपै उदग अर उदक वास नामा पर्वत नफै उपरि शिव भर शिवदेवनामा व्यतर देव धस । बहुरि पश्चिम दिशासंबंधी पातालके पार्थनिविषय भर महाशंख नामा पर्वत है ॥९०६ ॥ तत्युदयुदवासमरा दगदगवासहिजुगलमुत्तरदो । लोटिलोहिट अंका नहिं वाणा विविवण्णणया ॥ ९०७॥ नाटकादयासामी दकटकवामादियुगलमुत्तरदये । पाहतारिनाका नत्र बाणा विविधवर्णनका ॥ ९०७ ॥ अर्थ- तिन सपरि ६५ ा उदराम नामा व्यतर देव चमै है । बहरि नर बधी पाना पाश्चनिविदर दसवान नामा परत युगल नक उपरि भर्य- .
अर्थ-45 मरेमा सरोद बाजारापोवन LPAM त्रिलोकसार- टोहित भर टोहतांक नामा व्यतर वसे हैं। ते सर्व व्यंतर विविध नाना प्रकार वर्णना जो विभ्या- दिक ताकरि संयुक्त हैं ।। ९०७॥ घवला सहस्समुग्गय सव्वणगा अद्धघडसमायारा) उभयतडादो गना बादालसहस्समत्यति ॥ ९०८॥ घराः सहसमुद्गताः सर्वनगाः अर्धघटसमाकाराः । उभयतटात् गत्ला द्वाचवारिंशसहसमासते ॥ ९०८॥ अर्थ ते सर्व पर्वत धवल वर्ण है । अर जलते हजार योजन ऊंचे हैं । अर भाग के समान इनका आकार है । पर याद्य तटते उ अर मम्यंतर तटते पर ऐसे उभय राटी वियाम हबार योजन जाइ निठे हैं ॥ ९०८॥ आगे टयग समुरकै अभ्यंतर जे द्वीप है तिनकों अर तिनके व्यासादिकौं गाया पर करि को, सउदो गवा चिपचियवासा हु विदिस अंतरगा । भइसोलरा से दीया बहा रक्खचंदरसा ॥ ९०९॥ राडतः गया सागन्मात्रन्यासा हि विदिशु तरकाः । अपोश से दीपा गृताः सूर्याष्ट्यसंग्रामयाः ॥ ९०९ ॥ अर्ग-उभय तानिने तितने ही योजन जाइ नितनेही पास के धारक दशा भर में शिनि आर अर सोलह सूर्य नामा भर पानामा दी वृताकार है। भावार्य-अन्य ही बागा सप्ते रियादीम हजार योजन जाइ नियालीम हजार पोजन मारमा कर में एक विमा अर अंतर दिशानिधि द्वीप । है | HE प्यारपो दिशानिक दो पानि नामा द्वीप है। पर दिन में मार दिशा नि ! ना मला पहनामा दी है। सांदीप गोल आकार है | raman नदी वारमहरगं गणिह निपुदपविग्यारी । गोदपदीभी चिहदि वापदिम्हि पदुष्टी ।। ९१० ॥ हटली जाददागर्म सातदुदपरिम्ना: । PREPH वायलिसि वयः ॥ ९१०॥ यामाहा गांडीशियनगुटीपा। म. गा गगीगाया में ॥ ११।।
नरतिर्यग्लोकाधिकार। अर्प- सर्व होप पन अर घेदिकानि फरि सहित हैं । तिनविषै बहुत वर्णना कर मदिर है। पर लिनही पनि स्वामी थेलंधर जातिके नागथुमार हैं । से अपने अपने पनाम समान नामके धारक है ॥ ९११ ॥ मागातिदेवदीवचिदर्य संखेजनोयणं गता। तीरादो दविवणदो उत्तरभागेपि होदित्ति ॥ ९१२ ॥ मागपत्रिदेवीपत्रित संस्पातपोजनं गया । सारात् दक्षिणत. उत्तरभागेपि भवतीति ॥ ९१२ ॥ अर्थ -भरत क्षेत्रवि जो समुद्रफा दक्षिण तट तात परै संख्यात योजन पर जाइ मागध भर थरता पर प्रमास नाम धारक जे सीन देव तिनके तिनही नाम धारक तीन द्वीप हैं। भावार्य -भरत क्षेत्रको दोष नदीके प्रवेश द्वार अर एक जैबूद्वीपका द्वार इन तीनों द्वारनिकै सनमुरा के इफ योजन जाइ मागधादिक देवनिके द्वाप हैं । इनकौं चक्रवर्ति साधै है । बहुरि सही प्रायन क्षेत्रका उत्तर भागविणे भी तीन द्वीप है ॥ ९१२॥ भर टयणोदक समुद्र काटोदक समुद्रक अभ्यंतर तिष्टते उिन कुमनुष्यनिके दीप तिनकों - दिसिविदिसतरगा हिमरजदाचलसिहरिरजदपणिधिगया । एरणदुगे पल्लटिदी कुमणुसीवा हु छण्णउदी ॥ ९१३ ॥ दिशाविदिशातरयाः हिमरजताचटशिखरिरजतप्रणिधिगताः । एपरिके पल्परिपतयः कुमनुष्यदीपा हि पण्णवतिः ॥९१३ ।। अर्थ-षण समुदकी दिशानि विपै प्यारि भर विदिशानि विप प्यारि भर दिशा विद. पानिक याचि जे अंतर दिशा लिन विप पाठ भर हिमवन कुलाचल भरत संवैधी घेतादपशिखर बालाघट ऐरावत संबंधी पैताव्य इन पर्वतनिके दोऊ अंतनिकै निकटि दोय तिनके मिले हुए भाठ में सर्व मिलि एयण समुद्रका अभ्यंतर तट विष चौईस द्वीप हैं । वहरि बाह्य तट विप भी ऐसे ही बाईस है। मिलिफरि भलाटीस भए । ऐसेही कालोदक समुद्रफे दोऊ सटनि विपै भटतालीस उप हैं। ऐसे सर्व मिलि उिन कुमनुष्यनिके दीप जाननें । बहुरि तहा तिष्टते मनुष्य एक पल्य माग मायुके धारक है ॥ ९१३ ।। भागें दोउ तटमि विष तिनका अंतराल पर तिनका विस्तारको क्रम करिफहै है;- दसगुण पण्णं पणं पणवण्णं महिमुहिमहिगम्म । सय पणवण्णं वण्ण पणवीमं विघटा कमसो ।। ९१४ ॥ दशगुण पचास पचाशत पंचपचागन् पहिरदाधिमाधिगम्य । दाते पचपचारात पचाशत पचबिगनि विस्तार कमश ।। ०११॥ भर्य ने दीप क्रमने टम •णा पचास पचास र पञ्चायन आ साठि योजन नटिनने मुद्र विर जाइ मा पचान पान मा याजमयुर 1.1 जानने । भावार्य अभ्यता ३५८ त्रिलोकसार- तटते परे अर बाह्य तटते ठरें दिशा संबंधी द्वीप पांचसै योजन विदिशा सबंधी द्वीप पांचर्से योजन अंतर दिसा संबंधी पांचसे पचास योजन पर्वत निकटवर्ती छस योजन जाय समुद्र कि द्वीप हैं । तहां दिशा संबंधी सौ योजन विदिशा संबंधी पचावन योजन अंतर दिशा संबंधी पचास योजन पर्वत निकटवत्ती पचीस योजन प्रमाण विस्तार धरै गोल आकार द्वीप जानने ॥ ९१४॥ आगै तिन द्वीप रूप पर्वतनिका जलते उपरि वा नीचे उच्चत्व कहें हैं;- इगिगमणे पणणउदिमतुंगो सोलगुणमुवरि किं पयदे । दुगजोगे दीउदओ सवेदिया जोयणुग्गया जलदो ॥ ९१५ ।। एकगमने पंचनवतितुंगः पोडशगुणमुपरि किं प्रकृते । द्विकयोगे द्वीपोदयः सवेदिका योजनोद्गता जलतः ॥ ९१५॥ अर्थ-इहां जैसा जाननां सम भूमिकी बरोवरि तो टयण समुद्रके जलका व्यास दोर लाव योजन है । अर क्रमते घटता घटता सम भूमिते नीचे एक हजार योजन ऊंटा जल है । तह जलका व्यास दश हजार योजन है अर सम भूमित उपरि सोलह हजार योजन ऊंचा जल है। सहां जलका ब्यास दश हजार योजन है सो हानिचयका प्रमाण ल्याइ जहां ए द्वीप हैं तहाँ सम भूमित नीचेकों जो जटको उडाईका प्रमाण होइ सो तो जलका नीचे उयत्र जानना । अर सम भूनिन टपरि जो जलकी ऊंचाईका प्रमाण होइ सो जलका उपरि उच्चन्य जानना सौ कहिए है । सम भूमिकी यरावरि जल व्यास दोय लाख योजन सो तो भूमि अर घटता पटता नीचे जटव्यास दर हजार योजन मो मुख भूमिमें मुखको घटाइ भयशेष १९०००० फौं एक पार्श्व प्रहण करने की भाग फिर पिप्याणवै हजार योजन भए । यहरि पियाणये हजार योजनकी जलयास कि हानि होन हजार योजन जलको नात उचाई होइ ती एक योजनकी हानि विर केली होई असें त्रैराशिक किए सस्ते एक योजन गएं सम भूमिते नीचे जलकी उंचाईका प्रमाग एक योजनका पिघ्यावा भाग आया १९५ यहुरि तटते एक योजन गएं जो एक पोगमका पिप्पागवा माग मात्र अटकी उचाई हाइ तो पांचसे या सादा पांच या छहमै योनन तर गर कता उचाई होइ । सें त्रैराशिक किए तहां प्रमाण राशिय भागहारका भाग लि. मर अवशेष छैदलद रहे तिनका पाच करि अपवर्तन किए तटते पचिस आदि योअन गरे, तह सम भूनिन नीचे जटका रदय क्रमने पांच पोजन पांच गाणीमर्ग माग भर पाच पोजन व मामा माग र पाच योजन पंद्रह टम्गामा भाग वा छह पोजन एदामा भाग प्रमाग मात्रै है। मो दिशा मी आदि दानिय निकट इतना सो सम भूमि माय जानना । नान यह नहा इतना है | सम भूमिमी मनको र 4. ध्याम दीय ला दोन गो भूमि वाहन ! मन मुम पर भस ....... म योजन Mirit य . . .4 . .. .. 1 .
नरतिर्यग्लोकाधिकार ! किए पिच्याणका सोलदो भाग प्रमाण भाया । बहुरि नसते पिप्यागा सोलहा भाग मार जल परै भए एक योजन जट उंचा होइ तो सटते एक योजन पर भर जउ केता होइ असे त्रैराशिक किए तटते एक योजन पर जल है सो सोरहका पियाणवो भाग मात्र ऊँचा जटका माग आया । यहरि तटतै एक योजन पर जल भए सोलह गुणा पियाणवैवर भाग जर या होइ सो पचिस या सादा पचिस पा इसे योजन सटते पर जल केता उंचा हौद में प्रशिक किर पर पांच फरि अपवर्तन किए पैसा । १६००-१९ १६००.१९ १७६०-१९ १९२० १९हा भागहारका भाग दिए पांच आदि योजन तटते पर अरकी रचाई प्र.मने धौगमी योजन प्यारि उगणीसो भाग अर चौरासी योजन पार उगणीसा भाग भर याण योजन पारह टगामा भाग अर एकसी एक योजन एक उगणीसा भाग मात्र जाननी । दिशा मिटिमा निक निकटि समभूमित जल इतना ऊंचा है। यही समभूमि नीचे भर टपरि जो जया देवाई. को मिलाएं जलका अवगाह प्रमाण तिस तिस दीपकी रचाई जाननी भर येदिका को नि ते दीप जलने उपर एक योजन ऊँचे है । तटने एक पोजन भी जर विचे मार राई मिलाए । भूमि सलने दिशा संबंधी दीपनिया मित्र योजन ना उगणीसा भाग भरा संधौनिका नियोजन ना उगणीगयो भाग अर र दिशा निका नियाण योजना भार उगणीसा भाग अर पर्वत सनमुग्वनिका एक सौ आठ पोजन सात उगीगा भागात्र व जाननां भैस पा सई विधान सो कौस्तुभ आदि पर्वत दीपनि विक भी माना जिन योजन तर यह है ना अनुसार यथा संभने उधाईका पा जया रचा RATEE ॥९१५॥ अब तिन कुभोगभूमिनि वि उत्पन मनुनिको आतिनका स्थान पर गान है :- पगुरुगा लगलिगा वेसणगाभासगा प चादी। सकुलिकण्णा कण्णप्पाररणा लपकण मगफण्णा ॥ ९१६॥ एफोरया नदिया. पाणिका अभावका व दिए । आधुलिकर्णाः फर्णप्रावरणा कर्णाः सवर्णाः ॥ ९१६॥ अर्थ-कोरका कहिए एक ही जोपया र गुलिका बीए संपुन र Arts हिए सोग गुरु अर अभावका करिए न बोने का गोरारिता पनि । परि धुरिमा कहिrajf समान ? कान fat art मापरणा कहिए कान दर या कान जिन 8 जिनका Pr 4N M शितानि बि . माप्यमाणागिरगामn R. नामकारप्रमगामुाममा जुमभा।
त्रिलोकसार- सिंहासनाहिसराहनुशाः न्यामारुकापपदनाः । शाकागोमुसजनगाः सिदभावनाः ॥ ९१७ ॥ अर्थ नवर घोडा कुता भैमा र पधेरा ना मोदरा समान है मुगनिम मे Hि मुम कर कर मुग र मुना मुग सर मदिक मुश भर पराड मुश भर मात्र याना पान र की कान है । ते ९ आठ भए । परि मीन फाउ मोटा मा माया मनान हे मुन्न मिना ने मुग अर गोनुमा भर मेर मुरा भर दिन भर बन कर इन बरन हैं तेन बार कोशिस कसा आकार अन्य समाचार ANE ९१०॥ अग्गिदिमादी मालिकणादी सिंहारणगरपा। पगागमालिक्षिपदीर्ण अंगरे गा ।। ९१८ ॥ अधिशामिसिसि. मिहपानाप्रमुणाः । कोतिapital olat पा ॥ ९१८॥ wi-famiदिशा निजी कमी गति कर्णादि को मारी Tagrat Hit भा, माल मोमक शकिणनिका और गिरिमयी तुना रागणाग पुनदिगे। TEE मणिहा गरिरामभाग भयनि ते पपगो ॥ ९१५।। Birt: Tirl साना Tirti न मिनाग भागोकमाः ॥१॥ xi ma नाका मानिमा मन IMift antitient man Hi Aन तह TANTRIKya wif it ...ने माने titamin को * मग मुराग पनि तिमि गदानामा दिलायमानी ॥ १.२. ।। wati kiRAE " . Y नरतियंग्लोकाधिकार । चतुर्विशं पतुर्विशे सरणहितौरयोः कानिटपोररि। द्वीपाः तावदैतरम्पासाः पुनरा अधि मन्नामानः ॥ १२१ ।। अर्थ-~-टयण समुद्रके दोय तीरनि कि चीवाम पार्शम दी है। बरि कारक मनुके, दोय तटनि विप भी चौबीस चोवीम द्वीर है। हा दिशा विदिशा तर मिशनर तौरनिकी दिशा विदिशा अंतरदिशानि विष है हो। यहरि पन मधी दरम्य मनु म सर तट विष ती अशी संबंधी पर्वतनिके दोऊ अंतनिधि पित 1 मा टया मामुटके मार सद विन भर कालोदक अभ्यंतर तट विष धातुयी या संबंधी पर्वतनिका एक एक स्थित है असा जाना। बहर दीपनिका सटने अगल अर प्यास एयण मगुष्टयन लिने ग प्रमाण जानने । बरि तिन द्वीपनि विर वमते चुमनुश भी निम तिमR MEREान माम जिनका ऐसे हैं ।। ९२१॥ आगे तिन कुभोग भूमि रूप वुमनुक्षनिक प्रविनि वि में शिको माया निगलिंगे मायावी मोहरामनोवापि एणग्या । अगरवसष्णजुदा करोंसे में परविवापि॥ ९२२ ।। जिनायो मायापिनो ज्योतिमोपामिनः नः | अतिगारवसहायुताः कुर्यति ये परविवारगरि ॥ ९२२॥ अर्थ-जे जीव जिन पर सीह मिन गिवि कप पुनः Halan गो मोतिष मंत्रय मासिकार भAY राजीरिया को tatre न पाई है। वा जिन लिगगि यि पर AAI Kए गाया arganik Pr क आहार भय मैथुन परिमहाप संहानि कर संयुक्त है। Kaafnew tmar रस्पर विधि मिन्दार मिराह कर है ॥ ९२२ ॥ दसणविरारिया ने दो गालोपपति गणगा। पंचणिया पिया मोर्ण परिरिप मनि ॥९९१। निदिनानि । पंचामिन सि पcिati भर्यज जिन HAIR, विराक्ष Afor loft.rter को बा गुरमिय, नि. भागचना afar for free emer ramma.. भाष पापियागपETTE पताणा (Rm Ton't...।
त्रिलोकसार- अर्थ-खोटे भावकरि वा अपवित्रताकरि वा मृतादिकका सूतक करि वा पुष्पवती स्वीका संसर्ग करि था परस्पर विपरीत कुलनिका मिलनें रूप जो जातिसंकर ताको आदि देकरि संयुक्त दान कर हैं । वहरि जे कुपात्रनि विपै दान कर है ते ९ जीव कुमनुक्षनि विष उपजै हैं जाते ए जीव मिथ्यात्व पाप सहित किंचित पुण्य उपार्जन करें हैं || ९२४ ॥ अथ धातुकी खंड अर पुष्करार्ध द्वीपनि विष रचना विषका एक विधान है तातें आगे करिए हैं जे क्षेत्र तिनके विभागको कारण भूत ऐसे जे तिन द्वीपनिके दोऊ पानि विथ लिष्ते इष्याकार पर्वतनिकों कहै हैं:- चउरिसुगारा हेमा चउड सहस्सवास णिसहुदया। सगदीववासदीहा इगिइगिवसदी हु दक्खिणुत्तरदो ॥ ९२५ ॥ चतुरिष्वाकारा हेमाः चतुःक्टाः सहस्रव्यासा निषधोदयाः । स्वकद्वीपव्यासदी; एकैकरसतयः हि दक्षिणोत्तरतः ॥ ९२५॥ अर्थ-धातकी अर पुष्करार्थ विपै मिलाए हुए चारि इध्याकार पर्वत हैं ते सुवर्ण मय है } . अर च्यारि प्यारि कूटनि करि युक्त हैं पूर्व पश्चिम विौ हजार योजन चौडे हैं । निषध कुटाना समान ध्यारिस योजन ऊंचे हैं । दक्षिण उत्तर विष अपनें अपने द्वीपका ग्यास समान प्यारि । पाठ साख योजन लंबे है । एक एक क्षेत्रादि रचना रूप यसती लीई हैं । ऐसें इष्याकार तिन दोऊ दीपनिकी दक्षिण भर उत्तर दिसानि विप तिष्टै हैं ॥ ९२५ ।। आगे तिन दोऊ द्वीपनि विष तिष्ठते कुलापल आदि तिनका स्वरूप निरूप हैं;- फुलगिरियक्रवारणदीदहवणकुंडाणि पुरखरदलोति । ओवेगुस्सेदसमा दुगुणा दुगुणा दु विस्थिण्णा ॥ ९२६ ।। कुलगिरिवक्षारनदीदानकुंडानि पुष्करदरा इति । अवमाधोसेघसमा द्विगुणा द्विगुणाः तु विस्तार्णाः ॥ ९२६ ॥ अर्थ-यानको संहने गाय पुष्करा पर्यंत तिस एक एक द्वीप पर नियते दोर मेर सर्वधी कुटाच: यारह बहरि गजईतनि करि सहित यक्षार चालीस महीर meg आदि कर विभगा अर कठादि विदेह संबंधी दोय दोय मिटाई हुई नदी एकसी भसी। परिकार चनिकै उपरि निष्टने अर भोग भूमि भदसायले ए वह मान बहुरि नदी आदिनिके पति न संध्या र गादिकाने भर भिगार मानिक टपजने के लिए कुछ एकमी असीएम रचाई यादि फार तो भार सिरिने कुटायल आदिकनिक ममान जानने । कतार जो चौडाईका प्रमाण सो और दर मबन्नेि दगे । तीन मी सादिकनिका तार ती धातुका सानिका सा पालकी . .14 ने प्रथम मनिका दूणा है ॥ ९२५ ॥ 3 42112 पनि आकारको नि मय दिगिमा यम्गा दियटीयाग तन्य महाभा । मन मा गुरापाणया याति ॥ ०.२७ ।। । ।
मातिपालकातिर ३६३ अएं- reनिमा पसारे राजग । * PatrATan ।। ९२७ ।। -New स्वर मा पुसा ये तोहदोषि क्षेत्र से सो टो- Ram मन गर्ने भर नहा और कुदामात ते मम्यतरविय सौ akoartmrit great | मोहन आकार ऐमा जानना । हा धातकी ts 41,8 tỷ cư; a: 4/ 39 / #inistr पुष्यनि दिन पर्व पनि के क्षेत्रादिकका भाकारको रचना करि रोम्प, TEAMलनिकी --- दुपारमागि दुफला घरपंचपणनिषिण। पानगरपरा नाणादिममग्नचरिपपरिहिं प॥ ९२८ ॥ yिari हिकले धष्टपर्पचरचागि । NITER जान दिममध्यचरमपरिधीन च ॥ ९२८॥ भ-दीप हर बार बार सात एक इनके अकनि करि एक लाख अटहत्तरि हजार Intentinभर एक दोगनो रगयाम भागनिरिक दोय कटा इतनो ती धातकी खडका पर्व- निगरि यात्रा मारे बाट सह पाच पोच सीन इनके अनि फरि पैतीस लाख वानरामी पोग्न पर गनीस भागनिविष प्यारि कला इतना पुष्करार्द्धका पर्वतनिकरि यानिनिविष भरतादि क्षेत्रनिका व्यास जानने के आई तिनको दामिन पावर शिष्य तू जोनि । हा पर्वतनि करि रोक्या हुवा क्षेत्र पानेमा विधानको मर को। पातको संदविष क्षेत्रनिका विस्तार तो विषमरूप है र तनिका सितार जाप संधानित दूणा ही है। ताने जंबूद्वीप संबंधी पर्वतनि करि रोक्या रात्र पनि संबंधी पर्वतनि करि रोया हुया क्षेत्र कहिए है। भरत आदि क्षेत्रनिकी टमा सो मी एक पारि सोडह धीमठि सोयह प्यारि एक सी मिलाई हुई एकसौ छह भई भर सपन आदि पतनिषा शरणका क्रमते दोप बाट बत्तीस आठ दोप सो मिटाई हुई चौरासी हुई सई पर्वत सर्व ध्वनियो शलाका मिन्टाइए सो मिश्र शटाका फहिए है । सो मिश्र शलाका बमोनिय भई । प्रालिको शटाकाया नाम विमवा है। से इन एकमौ नि मिश्र शलाकानिका सर्वननिया मिया का क्षेत्र एक लाग्द योजन होइ सो क्षेत्र रहित शुद्ध पर्वत शलाका चौरासी उनका मा क्षेत्र से शशिक किए जंबूद्वीपविध पर्वतनिकरि रोक्या हुवा क्षेत्र चौरासी गुणा राजको ३.faat भारदीजिए इतना भया १९८४-१९० बरि एक शटाका या पानही दाद या विस्तार हाइ नो इतने १ ल ८४-१९० भलाका क्षेत्रका कितना से प्रेस गत ॥ स पडक! एक मेर, सबधी एक भागविये पर्वननि करि १८. आप ! बहार एक भागविषै इतना २ ल ८४-१९० मन कता है। ऐसे वेगशिक किए ताने दणा ऐमा - 1411 4 मा २४२९.०८.८ममा 7 त्रिलोकसार- अयंतर आयाम पांच लाख नत्र हजार पांचसै सत्तरि योजन अर योजनके दोयसै वारह अंनि विपै दोयसै अंश प्रमाण हो है ॥ ९३१ ।। अब कलादिक देशनिका मध्यविौ आयाम अर अंतविषै आयाम ल्याउनेको व्याख्यान गाथा दोय करि कहें हैं;- विजयावक्खाराणं विभंगणदिदेवरण्ण परिहीओ। विण्णिसयवारभजिदा वत्तीसगुणा तहिं बड्डी ॥ ९३२ ॥ विजयवक्षाराणां विभंगनीदेवारण्यानां परिधयः । द्विशतद्वादशभक्ता द्वात्रिंशगुणा तस्मिन् वृद्धयः ॥ ९३२ ।। अर्थ-विदेहनिके देश भर वक्षार पर्वत अर विभंगा नदी अर देवारण्य बन इन पारिनिकै जे परिधि तिनकों बत्तीस करि गुणें दोयसै बारहका भाग दिए तहां तहां आयामविषै पृद्धिका प्रमाण हो है ॥ ९३२॥ सगसगवड्डी णियणियपदमायामम्हि संजुदा मज्झे । दीहो पुणरवि सहिदो तिरिए णिपचरिमदीहत्तं ॥ ९३३ ॥ स्वस्वकवृद्धयः निजनिजप्रथमायामे संयुता मध्ये । दीर्घः पुनरपि सहितः तिर्यक् निजचरमदीर्घत्यम् ॥ ९३३ ॥ अर्थ-देश आदि कहे जे च्यारि तिनका अपना अपना आयामविपै जो जो वृद्धिका प्रमाण ताको आप आपकै पहले जो था ताका आयामविपै जोड़ें अपना अपना मध्यविष आपा प्रमाण हो है । यहरि तिस तिस मध्य आयामविौ वृद्धिप्रमाण जोड़ें तहां तहां अपना अतारित आयाम प्रमाण हो है । सौ इन दोऊ गाथानिकै अर्थकों यणे हैं। धातकी संडका स्याम पारि लाग्य योजन तामें मेह अर दोय भद्रसासनिका व्यास दोय लाख पचीस हजार एकसो घटाया योजन घटाएँ विदेहका भद्रशानिक पर पूर्व पश्चिम विश अंतका क्षेत्र एक लाख बहीनी हजार आठसे वियालीम योजन प्रमाण हो है । याको आधा किए एक तरफका आपा अंतर मिन्यासी हजार प्यारिस इकईस योजन प्रमाण हो है । पूर्व पश्चिम विय भदशाङको बैदोन ११ ममुद्र पर्यंत या विदेहनिका इतना क्षेत्र है या प्यारि यशारनिका ध्यास ध्यारि हजार पोइन भर तीन विभंगा मटीनिका म्याम साढा सातमै योजन अर देवारण्यका प्यास भटापन, या टीम योजन इनको मिटाइ १०५९५ घाई अवशेष चिहतार हजार आटस मत्ताईस योजन प्रमा विदहर एक तरफ. पर्वतादि रहित देश मधी युद्ध क्षेत्रका प्यार हो है । यायों धारि बारिमार देशनिका मुद क्षेत्र इतना ७६८२७ भया तो एक देशका जितना हो । मैं अंगशिक रिर नमा पनि प्यानमा पोजन तीन भा HERE THERE Tी मन • पति का काम पर , 1 ।
नरनिर्यग्लोकाधिकार इहां भागहारका भाग दिऐ कहा देशके व्यासका परिधि तति हजार तीन अडसठि योजन अर आधा पोजन प्रमाण भया। इहा अंश अशीनिकों समोद कार मिलाएं साठि हजार सात सैतीसका भाषा ६०७३७-२ भया। बहुरि धातकी खडका एक भाग विष कछा देशका शसकी इतना ६०७३७१२ परिधि भया तो दोय मेह संधी दोऊ भागनिका केना होइ ऐसे ताको दोय करि गुगें ऐसा ६०७. ३७१२-१२ भयावहीर पीछे पर्वतनिका ती समान व्यास है तातें वृद्धिका अभाव जानि पर्वतनिकी एकसौ मइसठि शलाकानिकों धातकी खंडकी सर्व मिश्र शलाका तीनसै असीनिमें घटाइ अवशेर क्षेत्र 'सलाका दोयसै बारह रही सो दोयसै यारह शलाकानिका पूर्वोक्त ऐसा ६०७३७।२ पृद्धि क्षेत्र होइ तो चौसठि विदेहफी शलाकानिका केना होइ ऐसे त्रैराशिक करि चौप्सटि करि गुणं दोयसै बारहा भाग दिए ऐसा ६०७३७।२।६१ -२२२१२ विदेहका सर्व पृद्धि क्षेत्र प्रमाण भया। बहर नदीनिका दक्षिण उत्तर सट रूप दोष प्रतिनिविणे इतना ६०७३७२१६४-२१२।२ दिक्षत्र मेसी एक मात विदै कितना होइ ऐसें त्रैराशिककरि साकों दोयका भाग दिए भाशालकी वेदीका माय- मते फटा देशका अत विषै थायामका वृद्धि प्रमाण क्षेत्र ऐसा ६०७३७।२।६१-२१२।२।२।२ भया। बहरि मुखभूमिसमासाई मध्यफल इस न्यायकरि आदितें अंत विष निका जो पर प्रभाग मपा साकों आधा करनेको दोपका भाग दिए ऐसा ६०७३७।२।६४१२१२।२।२।२ भाt पथा योग्य अपवर्तन किए साठि हजार सातसे सतीसफा भाग प्रमाण जो काम देशके यार परिधि ताको बत्तीस करि गुणिए आर दोपसै चारहका भाग दीजिए इतना ६०७३७१३२-२१२१२ दिका प्रमाण आया याप्रकार गापा विष कामाचा जो देशके व्यासका परिधिको पक्षीप्त गुणा करे दोयसै बारहका भाग दिएं वृद्धि प्रमाण होइ सो सिद्ध भारि इस पाहा देशका रिमाल पासका गुणकारको दोपका भागहारकरि अपवर्तन किए सोरहका गुणकार भया ताफार गुणें ऐसा ९७१७९२-२१२ हा भागहारका भाग दिए देश संधी हरि देव नारीसमेनिया पोजन पर दोयस मारह अंशनि विवे एफसो छिनो अंश प्रमाण आपापा मासा आपाम समान जो पूर्वोक्त फछा देशका अभ्यंतर आपाम ऐमा ५०९५७०१२००+२१२ मा जोड़े कछा देशका मध्य विप आयाम पांचटाए चौदह हजार एफसी चोपन योजन पर एकमा चौरासी श प्रमाण हो है । यहरि याविष पूर्वोक्त देश संबंधी क्षेत्र वृद्धि प्रमाण जो पाचन भटारह हजार सातसे भरतीस योजन भर एकमी भासठि ओस प्रमाण पाठा देशका अंतर पायाम हो है । बहार अब पक्षार पर्वतका प्यारा हजार योजन दाका विष्यभवादET rest सूत्र करि करभि परिधि किर ऐसा १००००००० पाका वर्गमूल कार भामा इकतीस मासठि योजन भपा । बहुरि एक महिना ३१५२ कि भार भाग वि फितना होइ मे ताका दुणा भया ३१६२२२ बरि दोषौ बारह बालबानिका ऐमा ३१६२२२ दिक्षेत्र होइन विदेहका रोमटि साकानिका के दिल परिधिका ददि क्षेत्र मा ३१६२१२१६, २१२ भया । यही नाके तार दो विषे इतना ३१६२१२१६४ २०२२ मा नाath nिा
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नरनिपग्लोकाधिकार । ३७१ arm ५९८५८० १९६५२१२ या भिंगाचा वृद्धि प्रमाण जोड़े विभंगाका अंत विपै मायाम मा ५:१०९९।१५८-२१२ पारे पो महा कठा आदि देशनिका भायाम भर वक्षानिका REAभानिया बापाम पूर्व पूर्व दिये अपना अपना पृद्धि क्षेत्र जोड्ने करि ल्यायनें। बहुरि देवाय मागायन धगर्गम पोजन सास विष्कम वागदहगुण इत्यादि सूत्र करि फराण Katha मा ३५१५२१९६० पाया वर्गमूल म्हें देवारण्यका परिधि अटारह हजार प्यारिस असी पोजन प्रमाय हो । परि द्वापका एक भाग विप इतनां १८४८० क्षेत्र भया तो दोऊ भागनि वितार दे ताको दुर्गा करना १८५८०२ महरि दोयसै बारह शलाकानिका इतना १८५८०२२ होइ तो चौमटि शलाकानिका केता होइ असे साफै चौसठि फरि गुणे दोरी दाहका भाग लिए विदेश क्षेत्र विष प्राप्त देवारण्यका वृद्धि क्षेत्र प्रमाण असा १८५८०1 २१६४+२१२ पारि न तट रूप दोऊ प्रतिनिविषै इतना १८४८०।२।६४२१२ वृद्धि रत्र प्रमाण वाया तो एक प्रति विप फेता होइ भैसे साकों दोपका भाग दिएं असा १८४८०। २०६४-२१२२२ देधारण्यका आदित अंत विष द्धि प्रमाण माया । बहुरि मुखभूमिसमासाई पर इस म्यारकरि ताफा आधा किए असा १८४८०।२।६४-२१२।२।२ इहाँ यथायोग्य अपवर्तन किए देवारण्यका परिधि अटारह हजार पारिस असी योजनको बत्तीस फरि गुणें दोयसै बारहवा भाग दिए देवारण्य संबंधी दृद्धि क्षेत्र प्रमाण गायोक्त सिद्ध भया । इहाँ गुणकार बतीस करि गुण असा ५९१३६० - २१२ मागहारका भाग दिए सताईससै निवासी योजन भर बनके दोपसे बारह अशनि विप पाणवै अंश प्रमाण देवारण्य संबंधी वृद्धि क्षेत्र प्रमाण आया । बहार पुकसावती नामा देशका जो बाह्य आयाम सोई देवारण्यवनका आदि आयाम पांच लाख मेन्यासी हजार प्यारिसे सेता स योजन अर योजनके दोयस बारह अशनि विपै सौ । अंश प्रमाण -। इस प्रमाण स्यायनका विशन कहैं हैं । नदीका एक तट विष आठ देश च्यारि वक्षार तीन -भंगा है । यहुरि आदित मध्य विषै अर मध्यने अंत विष औसे एक एक विषै दोय दोय वार पना अपना वृद्धि प्रमाण वध है ताने देश वृद्धिका प्रमाण असा ४५८३६१९६ - २१२ याको लिह करि गुणे असा ७३३२८ । ३१३६ - २१२। बहुरि वक्षार वृद्धिका प्रमाण भैसा ७७१६० २१२ यार्को पाठ करि गुणे औसा १८१६।९८० - २१२ बहुरि विभंगा पृद्धि नाण पैसा ११९।५२ - २१२ यार्को उह फरि गुणे असा ७१४।३१२ + २१२ इहां जे ना है लिन सर्व प्रशनिकों जोड़ि तिनमें कछा देशका आदि मायाम विपै जे दोयमै अंश कहे ये नको जोड़ें सर्व अंश इफतालीससे अठाईस भए इनकों दोयसै वारहफा भाग दिए उगणीस जन पाए अर अब शेष सौ अंश रहे । तातें देवारण्यका आदि आयाम विषे सौ तो अंश जाननें । हरि गणास ती ए पोजन अर वृद्धिनिके योजन भर का देशका आदि आयामके पांच लारा याणवैसे सत्तार योजन इन सबनिकों जोड़ें देवारण्यका आदि आयाम विपै पाच लाख सित्यासी बार प्यारिसे संतालीस योजन जाननें । बहुरि इस देवारण्यका आदि आयाम विपै ५८७११७॥ ०००-२१२ देवारण्य संबंधी वृद्धि क्षेत्र ऐसा २७८९।९२-२१२ जोड़ें देवारण्यका मध्य ।
૨૭૨ त्रिलोकसार- भापान मा ५९०२३६१९२२१२ पाने बहुरि तिस देवारण्य संबंधी पनि क्षेत्र में कान्दोः सनुदकै निटि देवारस्यका बाय सायाम भैसा ५९३०२६।७२ - २१२ हो । प्रकार से सीता नदीश उचर तट विष वर्णन किया वैसे ही सीतामा दक्षिण int देशवशर निमगा देवारम्पनिका न्यात भर परिधि भर परिक्षेत्र पर मायाम सहा तहाँ स्था। बरि नै यह महकी ई दिशा विष भधिक अधिक अनुकम फरि कपन किया है और पनि दिशा यि मसालने हीन हीन अनुकमरि वर्णन जानना । तहाँ हानि प्रभात प्रनगर जानना । बहुरि पाही प्रकार पुष्करा वि भी देश भार भिंगा देवार यानि र सामनिका परिधि ल्याइ दीपका दो भागनिके प्रण निमति गुणकार दोर करिने दोभ बारह क्षेत्र शवामाका भाग देव चौसठि पिदेश शसफाफा भाग देभ प्रभात कि साको दोपका भाग दिए जो एक प्रति संबधी वृद्धि क्षेत्र भया को मुग- मा म पार करि भाषाकरि अपारीनकार तहां तहां लय मा दिसा अन्न भरनो अपना भारि मायाम से जो भानी अपनो मध्य भागम हो। नोभान! मय मागम अपना अपना मित्र जो अपना भाना मार र गरिका यार मायाम सोई उतर उत्तरका आदि भाषाम जानना । मेकी परिप Randम जानना ॥९३३ ।। मोड कर पनि किछ विशेष समय गाया दीयफीर है - पादणापरदीय पादागतरूहि सनुना । Alina वाणगा Tण मरण पारे ।। ९३४ ॥ Prartो पातमाय संगी। गो. पण पुनः नामवर्णना समोर ॥ ९३४ ॥ --hten Tणा वीर प्रमो धाnt मा पुजा ETAन Artifiinा मानना " मागंगारा हिगिरणगोपरि मादि। नागनितिमि भरना गांगुर्ण ॥ ९१५ ॥ FuTufaitin Arthattrai fiam|| •३॥ - AmaranMIM:14thi ०६. faran manti:44.* • - Urdi६५ मा - Art' - नरतिर्यग्लोकाधिकार । ३७३ ऐसे पुष्करार्द्ध पर्यंत जो मनुक्षलोक ताका व्याख्यान करि पाते वाम जो तिर्यग्लोक साकों प्रतिपादन करत संता ही प्रथम ही मनुक्षलोक वा तिर्यगलीक विषे निघते पर्वत अर समुद्र तिनका अवगाहकों जनावै है- मेरुणरलोयवाहिरसेलोगाई सहस्सपरिमाणं । सेसाणं सगतुरियं सयुवाहीणं सहस्सं तु ॥ ९३६ ।। मेरुनरलोकबाह्यशैलावगा, सहसपरिमाण । शेषाणां म्यकतुर्य सर्योदधीनां सहन ४ ॥ ९३६ ॥ अर्थ-मेरु गिरिनिका अर मानुपोत्तर विना सर्व मनुक्ष लोककै याद्य निटते जे पर्वत तिनका तो अवगाध हमार योजन प्रमाण मानना । बहुरि मनुक्ष टोफकै अन्यतर निटने अवशेष हिमवत भादि पर्वत तिनका अवगाध अपने अपने उचाईका प्रमाणकै चौथा भाग प्रमाग जानना। इहाँ जैसे मंदिरके नीव हो है तैसे पृथ्वीके मध्य जो टेडाई ताका नाम भवगाध जानना । वहरि सर्व जे समुद्र तिनका अवगाध जो उडाईका प्रमाण सो हजार योजन जाना । सात लवश समुन विपै आदि मप्य अंत विपै विशेष पूर्व कया है सो जानना । अन्य ममुद्र पर्षत्र ममान मा युक्त है ॥ ९३६ ॥ भय मानुषोत्तर पर्वतका म्वरूप गाथा तीन फरि पहें है- अंते टंकरिछण्णो पाहिं कमट्टिवाणि कणपणियो । णदिणिग्गमपहचोइसगुहाजुदो माणुगुप्तरगो ॥ ९३७ ॥ अंत: टेफग्छिन्नो बारी क्रमदिहानिकः कनकनिम | ननिर्गमपथचतुर्दशगुहायुतः मानुषोत्तर ॥ ९३७ ।। अर्थ-पुष्कर दीपके मध्य मानुषोत्तर नामा पर्षत निटे है । सो अगर मनुश लोकपा तरफ तो टंकछिन है। नीगाय उपरि पर्वत भी तिम समान एकगार पर तिर्यक लोककी तरफ शिखरने लगाय प्रमते वधता भर मुलते एगाय क्रम पटताता आकार ऐसा जानना । बहरि सो मानुषोत्तर पति मुषर्ण मारिणा वर्णन है। हरि ननिक. सके मार्ग से चौदह गुहा दार तिन करि युक्त है। भारार्थ-मानुगनांक RTER है। तिन पानि करि चौदह महा नदी निकसि बाहा जाय है। ऐसा मानुसोत्तर मनन ! मणुगुचरुदयभमुहमिगिर्सि सगसर्य सहरमं । पावीसहियसहस्सं पउवासं पउसय पसमा ।। ९३८ ॥ मानुषोत्तरोदयभूमुखमेका समशत सहरी छ । द्वाविनाधिकसहित 41 यमा ॥ ९.८॥ अर्थ- मानपाना एतका १४ सा महाक माम दुन. कर योजन प्रमाण है। है। यह भ ..... सो CRETAR बोमन प्रमाण है।०२। कार" .... और काम में पोजन प्रमाण है || ।
३७४ त्रिलोकसार- तण्णगसिहरे चेदी चावाणं चदुस्सहसतुंगजुदा । सोहइ वलयापारा चरणपिणदकोसवित्यारा ॥ ९३९ ।। तनगशिखरे वेदी चापानो चतु:सहसतुंगयुता । शोमते वलयाकारा चरणान्वितकोशपिस्ताग || ९३९ ॥ अर्थ-तिस मानुषोत्तरका शिखर विष उपरि प्यारि हजार घनुप टचाई कोरे युक्त कर सवा कोस चौडी ऐसी जैसे पर्वत वलयाकार है तैसे ताके उपरि वलयाकार वेदी सौभ हैं।९३९॥ . आगें इस पर्वत उपरि तिटते कूटनिकों कहें हैं;- णइरिदिवायचदिसं पनिय छस्मुवि दिसासु कूडाणि । तियतियमावलियाए ताणमंतरदिसामु चउपसई ।। ९४० ॥ नैऋतिवायत्र्यदिश वर्जयित्वा पवपि दिशामु कूटानि । त्रिकत्रिकमावल्या तेपामभ्यंतरदिशामु चतुष्कयसत्यः ।। ९१० ॥ अर्थ-नैऋती अर वायवी इन दोय दिशानिकों वर्जि करि अवशेष छह दिशानि विपैपी रूप तीन तीन कूट हैं । पर्वतकी परिधि विपै तिनकी पंक्ति जाननी। वहरि तिन कूटनि अभ्यंतर मनुक्ष लोककी तरफ च्यारि दिशानि विषै जिन मंदिररूप परि वसतिका हैं ॥ ९१० आगै तिन कूटनि विपै वसते जे देव तिनकों कहें हैं; अग्गीसाणउडे गरुडकुमारा वसंति सेसे दु। दिग्गयपारसकूडे सुवष्णकुलदिक्कुमारीओ ॥ ९४१ ॥ अाशानपट्कूटे गरुड़कुमारा वसति शेषेषु तु । दिग्गतद्वादशक्टेषु सुवर्णकुलदिकुमार्यः ॥ ९४१ ।। अर्थ-आमेय दिशा अर ईशान दिशा संबंधी जे छह क्ट तिन विषै तो गरुड़ कुमा देव बसे हैं । बहुरि अवशेष दिशा संबंधी वारह कूट तिन विष सुपर्ण कुमार देव भर दिकुमार देवांगना घसें हैं ॥९४१ ॥ आगें मानुपोत्तरका स्थानादिक कहैं हैं- पणदाललक्खमाणुसवेत्तं परिवेटिऊण सो होदि । उदयचउत्योगादो पुक्खरविदियद्धपदमम्हि ॥ ९४२ ॥ पंचचत्वारिंशद्धक्षमानुपक्षेत्र परिवेष्टय स भवति । उदयचतुर्थावगायः पुष्करद्वितीयार्थप्रथमे ॥ ९४२ अर्थ-पैतालीम लक्ष योजन ग्यास प्रमाण जो मनुक्ष क्षेत्र ताको वेढि करि पुष्कर द्वीपक दूसरा आधा ताका प्रथम भाग जो आदि क्षेत्र तीह विप मानुषोतर है । ताका अगाध जो पृष विष ठहाईका प्रमाण सो उचाईका चौथा भाग मात्र हो । सो प्यास तीस योजन अर चौपान योजन प्रमाण जानना ।। ९४२ ।। भाग कुंटल गिरि अर रुचक गिरि तिनका उदय भूम्याम मुग्वव्यास को हैं;- - नरतिर्यग्लोकाधिकार । ३७५ पुटरगो दमगुणिभो पणसदरिसहरस तंगो रुजगे। परामोदिसहरमा सप्परपुभयं मुवष्णमयं ।। ९५३ ॥ कुलगी दागुणिनी पंचसाप्ततिसहसे तुंगो रुचके । परानिमहम्राणि सर्वगोमयो मुवर्णमयौ ॥ ९५३ ॥ अर्य-मानुपौराका भू भ्यास मुरा म्यासते कुंडल पर्वतका भू ध्यास मुख म्यास दस ना। भाषाप-पर गिरि मूल विष दस हजार दोयसै बीस योजन चौड़ा है। शिखर विषै पारि या दोपसे पागम योजन चौका है। महरि तिस कुंडल गिरिका उधत्व प्रमाण पचहत्तीर हजार पोवन । परि रचक पर्वत सर्वत्र उचाई विषे या भूव्यास मुखल्यास विपै समानरूप पौरासी गरपोजन प्रमाण है। परि ए दोऊ कुंडल गिरि भर रुचक गिरि मुवर्णमय है ॥ ९४३ ॥ अय कुल मिरिक उपरि जे फूट तिनकों गाया तीन फरि कहै हैं;- पउ घउ हा पदिदिसमिह कुंडलपव्वदस्स सिहरम्हि । साणभंतरदिग्गय पत्तारि जिणिंदडाणि ॥९४४ ॥ पारि पत्यारि बुढानि प्रतिदिशमिह कुंडलपर्यतस्य शिखरे । सेवामम्पतरपिग्गतानि चत्वारि जिनेंद्रकुटानि ।। ९४४ ।। अर्प -इस कुंडल पर्वतका शिखरविप एक एक दिशा प्रति प्यारि प्यारि कुट परिधिविषै पनिरूप है। दिन अभ्यंतर मनुक्ष लोककी तरफ दिशानिवि प्राप्त प्यारि जिनेन्द्र फूट है। ऐसे पास कूट है ॥ ९४४ ॥ घनं तप्पद फणयं कणयप्पह रजदकूड रजदाई। मुमहप्पर अंकप्पद मणिकूडं च मणिपहयं ॥ ९४५ ॥ धर्म सत्प्रभ कनक कनकमभ रजतकूट रजताभ। मुमहप्रभ कर्मकमभ मणिर्ट च मणिप्रभ ९४५ ॥ अर्थ- बहुरि बन १ वमप्रभ १ कनक १ कनक प्रभ १ रजतकूट १ रजताम १ मुनम १ महापम १ क १ अकरम १ मणिक्ट १ मणिप्रभ १ ॥ ९४५॥ राजगरुनगाह हिमवं मंदरमिह पारि सिद्धडाणि । अत्यति सेसि बूढे कूडवखमुरा कदावासा ।। ९४६ ।। रुपकरचकाभे हिमवत् मंदिरमिह चत्वारि सिद्धक्टानि । भासते शेषेषु कूटेषु कटाख्यमुरा कृतावासाः ।। ९४६॥ -~-रुचक १ रुचकाभ १ हिमवत १ मंदा १९ सोलह कट जाननें । इनत अन्य प्यार सिझकूट है । तिनविष चैत्यालय है । अर अबशेष सोटह कूट तिनविप कूट समान नामके थारफ देव पास करत सते तिट है ॥ ९४६ ॥ अधकधक पर्वतर्क उपरि जेट तिनको आ नहाँ बाम करती देवांगना तिनकौं अर मिनके देवांगनानिका कार्यको तेरह गाथानि कार कहे हैं, ३७६ चिलोकसार- पुवादिसु पुह अट अड अंते च चारि चारि कूडाणि) रुजगे सन्चभंतरचत्तारि जिणिदकूडाणि ॥ ९४७ ॥ पूर्वादिषु पृथक् अष्टौ अठौ अंत: चतसृषु चत्वार चचारि कटानि । रुचके सर्वाम्यंतरचत्वारि जिनेंद्रकुटानि ॥ ९४७ ॥ अर्य- -रुचक गिरिविष पूर्व आदि प्यारि दिशानिवि प्रथक् प्रयक् परिधिविर पनिरूपमा आठ क्ट हैं । बहुरि तिनकै अयंतर मनुक्ष लोककी तरफ च्यारि दिशानिविप एक बार प्यारि ! हैं । बहुरि तिनकै अभ्यंतर एक बार प्यारि कूट हैं । बहुरि तिनकै भी अभ्यंतर एक वार पारिएर हैं। ऐसे एक एक दिशा विथ तीन तीन क्ट ए भए ऐसे चबाटीस कूट भए । बहीरे तिन सयनिकै अभ्यंतर वर्ती जे ध्यारि क्ट कहे ते जिनेन्द्र क्ट है। चैयालय युक्त हैं। इनिका दसैं रन जानना ॥ ९१७॥ कणयं फंचण तवणं सोत्यियई सुमहमंजणयं । अंजणमूलं वजं तत्येदा दिपकुमारीओ ॥ ९४८ ॥ फना कोपर्न तपनं स्वस्तिकर्ट मुभदर्मजनक । भजनमूलं यम संरता दिक्कुमार्यः ।। ९१८ ॥ अर्य- कनक १ कांचन १ सपन १ स्वस्तिकस्ट १ मुमद्र १ अजनक १ अंजन १ १९ दिशारिश भाउ कट है । तदा र आर्गे कहिर है दिकुमारी ते बसे हैं ।। ९४८ ॥ पिनयाय पानयंती जयंति अवरनिदाप गैदेति । गंदरदी गंदुसर णामातो गंदिप्मेणेत्ति ।। ९४९ ।। जिया जयंती जयंती अपराजिता नहा इति । नंदवती नदोनरा नाम्यतो नंदिरेणा इति ॥ ९०९ ।। अर्य-विजया १ वैजयनी १ जना १ अगनिता १ मा १ नाती १ नोना । नाममार्गनको देवांगना वसे हैं ।। ९.१९ ।। फनिश रजदं य कृमुदं णालणं पउर्म सगीय पेसरणं। बेलुरियं देवीभी परछापठमा गमादारा ॥ ९५० ।। पीक र वा अमु मनि पाशा वादा वा देयः इण्ठायमा ममाहारा ॥ ९५० ॥ भयं-शिक जत ! यमुर १ टन शशि नाग १ तालिबाना वाम दामी देवांगना करियरममा ११५॥ गुणाय नमोहर यायी मंगादि पिनगुनि । चरिम राही मारमा गाभियं ॥९५१ ।। माग infanी। सनगर - Punfat.५॥
1 नरतिर्यग्लोकाधिकार । अर्थ-मुपकार्णा १ यशोधरा १ ९क्ष्मी १ शेषवती १ चित्रगुता १ वसुंधरा १ में। भाठ देवी वस है। बहुरि अमाघ १ स्वस्तिक कूट १ ॥ ९५१ ।। तो मंदर हेपवदं रज रज्जुत्तमं च चंदमपि । पच्छिम सुदंसणं पुण इलादियाय मुरादेवी ॥ ९५२ ।। सती मंदर हैमवत राज्य राज्योत्तम व चंद्रमपि । पश्चिम मुदर्शन पुनः इलादिका मुरादेवी ! ९५२ ॥ अर्थ-तहां पी मैदर १ हैमवत् १ राम १ गयोत्तम १ च १ मुदर्शन ११.भार पश्चिम दिशा विष कूट है । इहो तिटती देवी काहिए हैं । इटादेवी मुरादेवा ॥ ९५२ ॥ पुढवी पउमपदी इगिणासो देवी य मिया मीदा। भदा तो विजयादीपउई कुंडल एजगं ।। ९५३ ।। पृथ्वी पावती एकनासा देवी च नवमिया सीता । भद्रा सतो विजयादिचतुष्पटानि कुडले कचः ॥ ९५३ ॥ अर्थ-पृथ्वी १ पमावती १ एफनामा देवी १ नथमिफा १ सय १ मा १९ भार देवी यसे हैं। बहुरि तहाँ पा विजय १ पेजयत १ नयेत १ अपराजित र प्यारि भर दुरल रुचक १॥९५३ ।। तो रयणवंत सन्वादारयणं उत्तरे अलंपूसा । विदिया दु मिस्सफसी देवी पुण इंटरीगिणिमा || ९५४ ।। सनी रत्नवत् सर्वादिरत उत्तरे मलभूरा। द्वितीया । मिथकेशी देवी पुनः पुराकिनी सा ॥ ९५४ ॥ अर्थ-तहां पी त्नवत् १ सर्व एन १ ९ आठ उत्तर दिशा विकट है । म निष्टती देवी कहिए हैं । अभूषा १ मिश्रोशी देवी १ पुर्राफिणी १ ॥ ९५४ ।। पारुणि भासा सपा हिरि सिरि पुषगपदिापारीभो । भिंगारं परिणि दमिरपणदेवीभो घरदै ।। ९५५ ।। धारणी भाशा सत्या ही धी: पूर्षगतसिगापः । भंगार धृत्वा इह दक्षिणदेम्पो गुरंदै ।। ९५५॥ अर्थ-वारणी १ मा १ सया १ ही ११ ए आर देवी Nि. देश संबंधी दिकुमारी है 1 भगार को शाम लाको धारिकरि भर दक्षिण दिल सEिET कुरद जो भारसोताको धारि करि ॥१५५॥ पशिमगा उत्सतयं उत्तरमा पामरे पमोदजदा । तिव्यपरमणि मिणमणिमाले पार्वति ॥९५६ ।। पमिमगा रगा पामर मोदए। तरकारजननासे निरनिका ॥ ९५६ ।। वि..
१रुचक कांता १ रुधक प्रमा १५ प्यारि देवी हैं। तीर्थकरका जन्न विपे जात कर्म करने त्रिलोकसार- अर्थ-~-पश्चिमदिशा संबंधी देयो तीन अरनिकों धारि करि भर टन्दर दिशा मर्दको देदै चामरनिकों धारि करि महा प्रमोद करि संयुक्त होती ते सर्व देवी तीर्थकरया टापनि कार निक तीर्थकरकी जो माता ताकी सेवा कर है ॥ ९५६ ॥ पुचे विमलं कूलं णियालोयं सर्यपई अवरे । णिचुनोदं देवी कमसो कणया सदादिदहा ।। ९५७ ।। पूर्वयोः विमल कुट नियालोक अपरयोः । नित्योद्योत देव्यः क्रमशः कनका शतादिङ्वा ।। ९५७ ।। अर्थ-रेचक पर्वतके अभ्यंतर कूटनि विर्ष पूर्व दिशा विष तो विमटयूट दक्षिण दिशा विप नित्यालोकक्ट पश्चिम दिशा विप स्वयंप्रमकूट रचर दिशा विष निन्यौद्योत कूट देते च्यारि कूट हैं । इहां तिष्टती देवी क्रमः कनका १ शतदा १॥ ९५७ ।। कणपादिचित्त सोदामणि सबदिसप्पसम्णदं देति । तित्ययरनम्पकाले कूलं वेलरियरुजगमदो ॥ ९५८ ॥ कनकादिचित्रा सौदामिनी सर्वदिशामसनना दयते । तीर्थकरजन्मकाले क्ट वैडूर्य रुचकमतः ।। ९५८ ॥ अर्थ-कनकचित्रा १ सौदामिनी १ ऐसे र च्यारि देवी घसै है ते तीर्थकरय जनम काल विथै सर्व दिशानिकों प्रसन्न धार है निर्मल करें हैं । बहरि इनत अभ्यंतर पूर्वादि दिशानि विपै पैडूर्य १ रुचक १ ॥९५८ ॥ मणिकूई रज्जुत्तममिह रुजगा रुजगीत्ति रुजगादी। कंता रुजगादिपहा जिणनादयकम्मादिकुसला ॥ ९५९ ।। मणिष्टं राज्योत्तममिह रुचका रुचककीर्तिः रुचकादिः । कोता रुघकादिप्रमा जिनजातकर्मकृतिकुशलाः ॥ ९५९ ॥ अर्थ-मणिकूट १ राज्योत्तम १ ए प्यार कूट है । इहां तिष्टती रुचका १ रुचक की कुशल है ।। ९५९ ॥ आर्गे कुंडल रुचक संबंधी कूटनिका न्यासादिक कहे हैं- ससि कूटाणं जोयणपंचसय भूमिवित्यारो । पणसयमुदओ तहलमुहवासो कुंडले रुजगे ।। ९६० ॥ सया कुटानां योजनपंचशत भूमिविस्तारः । पंचरातमुदयः तइन्टमुखव्यासः कुंडले रुचके ॥ ९६० ॥ अर्थ-कुंडल गिरि भर रुपक गिरिविषे कहे जे र कूट निन समनिका पांचसै भोजन । भूमि विस्तार कहिए मूली चोड़ाईका प्रमाण है । भर उदय जो टंचाईका प्रमाण सोभी पांचने योजन है। अर तिनका मुम व्यास जी उपरि चौड़ाईका प्रमाण सीता अदाईस दौरन है।
:- नरवियग्लोकाधिकार। ३७९ इहां जैसे पुष्कर दीएकै मध्य वलयाकार मानुषोतर पर्वत है वैसे ही कुंडल दौर मन्य कुंदलगिरि अर रुचक दीपकै मध्य रुचक गिरि घलयाकार जानना ॥ ९६० ॥ आगै द्वीप समुद्रनिकै जे देव स्वामी है तिनको पांच गाथानि करि कहैं हैं- नंदीवे वाणो अगादरो सुटिदो य लवणेपि । पादइखंडे सामी प्रभासपियदसणा देवा ॥ ९६१ ॥ जंबूद्वीपे वानी अनादरः मुस्थितध वगेपि । धातकीरसंडे स्वामिनी प्रभासप्रियदर्शनी देवौ ॥ ९६१ ॥ अर्थ-जंबू द्वीप अर लवण समुदाय तो स्वामी भनादर भर मस्थित नामा तर देर है। धातकी खेडविप स्वामी प्रभास अर प्रियदर्शन देय है ॥ ९६१॥ फालमहकाल पउमा पुंहरियो माणुमुत्तरे मेले । चपयुमसुचवसुम्मा सिरिपहपर पुखरुवादिम् ि॥ ९६२ ।। फाटमहाकाली पमः पुररीकः मानुरोत्तरे शेले । चक्षुष्ममुचक्षुष्मागौ श्रीममधरौ पुष्परोदधौ ॥ ९९२ ॥ अर्थ-कालोदफ समुद्रविष स्वामी काल महाफाट देव है। पुकराई पर मानुरवि स्वामी पम अर पुंडरीक देव हैं । पुष्कर द्वीपका बाह्य दुसरा अर्धविधै स्वामी चभुष्मान भर पY. प्मान है । पुष्कर समुद्रविप स्वामी श्रीप्रभ पर श्रीधर है ॥ ९६२ ।। वरुणो घरुणादिपहो मम्मो मम्मिममुरो प पंदुरभो । पुष्पादिदेत विमला विमलप्पा गुपदा महपाभो ॥ ९५ ॥ घरणो परुणदिमभो मध्यः मध्यममुरः च पादुरः । पुष्पादिदतः विमलो विमानप्रभः सुप्रभः महाभ ।। ९६३ ॥ अर्थ-वारणी दोपविष स्वामी परण पर वरुणप्रभ है। धारणी समुवि t र मध्यम देव हैं । क्षीर दीपविर स्वामी पार पर पुष्पदंत है । और सगुदक्षिक सामा मलप्रभ है । घृत दीपविौ स्वामी गुप्रभ भर महाप्रभ है ।। ९६३ ॥ फणय फणयाह पुणा पुष्णपह देवगंधमार्गमा । तो गंदी गंदिपहो भरगुभदा य अरुण भरणा ॥ ९६४ ।। कनकः फनकाभः पुष्पप्रभो देवरोधमागधे। ततो नदी मंदिप्रमः भनाभनी व अरण भरणामः ॥ ९६ ॥ अर्थ-मृत समुद्र रिष स्वामी कनक भर कनकप्रभ है। स्वामी पुन र पुण्य प्रभ है । क्षौर समुद किमी देवर र महा! | eAnil नामी बदमप्रभ है । पर समुद्र पिन शामी मा पर गुभः ।। नामी भर भरण भरणप्रभो॥९६४ ।। ससुगंध सनर्गयो भरणामुगि दिए दो। दीसरे पापो पिरणभागिपरे रिदियो ।९६५ ॥
३८०
त्रिलोकसार-
-
समुगंधः सर्वगंधः अरुणसमुद्रे इति प्रभू द्वी दी।
द्वीपसमुदे प्रयमः दक्षिगमागे उत्तरे द्वितीयः ॥ ९६५ ॥
अर्थ अरुण समुद्र विष नायक समुगंध पर सर्वगंध देव हैं । असे हो र अर,
विपै दोय दोय स्वामी व्यंतर देव है। तहां दोय दोय विष जाका नाम पहले कहा सो द
भाग विषे मर जाका पछि नाम लिया सो टचर भाग विप स्थित डाननां ।। ९६५॥
अब नंदीश्वर द्वीपकों विशेष रूप प्रतिपादन करत संता आचार्य प्रथम साका वध्यम
कह है।
आदीदो खलु अहमणंदीसरदीववलयविक्खमी ।
सयसमाहयतेवटीकोडी चुलसीदिलक्खा य ।। ९६६ ॥
आदितः खलु अष्टमनंदीश्वरोपवलयविक्रमः ।
शतसमधिकत्रिपष्टिकोटिः चतुरशीतिरक्षश्च ।। ९६६ ॥
अर्य-आदिका जंबूढीपत लगाय आठवां नंदीश्वर द्वीप है। ताका विलय विकन
वलयाकार विप चौड़ाई सो सौ अधिक रसाठ कोडि चौरासी टास योजन प्रमाण है। कै
कहिए हैं । नंदीश्वर द्वीप सहित याते पहले द्वीप वा समुदनिकी सम्या पदह है सो पंद्रहा
करि रुऊणाहियपद इत्यादि पूर्वोक्न सूत्र करि एकमा सरमठि कोड़ि चौरासी टाउ योजन
भ्यास आवे है ॥ ९६६ ॥
आगे इस द्वीप विप व्यारयों दिशानि विषै तिटते पर्वत तिनके नाम अर संका
स्थानकी निरूपें हैं-
एकचउकनणददिमुदरइयरणगा परिदिसम्दि ।
मज्ने चदिसवावीमझे तम्बाहिरदुकोणे ॥ ९६७ ।।
एकचतुकार्शजनदधिमुखरतिकरनगाः प्रतिदिशं ।
मध्ये चतुर्दिग्यापीमध्ये तद्वादिकोगे ॥ ९६७ ॥
अर्थ-एक एक दिशा प्रति मध्य विप अर प्यारि दिशा सबी वावडीनिकै मध्य कर
वावनिका वाय दोय दोय कोणादिविध मते एक प्यार आठसम्मातिर अंजन दधिमुगु र
नामा पर्वत नदीवर बार विप जानने । भावार्य-नंदीश्वरको चारों दिशा सहा एक एक
विष वाचि तो एक अंजन गिरि है । तिस अनगिरको प्यारों दिशानि विपरि दादी
लिन बावडीनिकै वीचि परि दधिनुष पर्वत है। वहार न वाडानिक दोप योग तो है
गिरिको टरफ अर दोय कोण दुर्ग तरफतहा दू तरफ से दोय दोय या काग तिनकै नि
आट रतिकर पर्वत है। मैं कवि नरपान प्यार बावड़ी भई । प्यागे दिर
विदावन पर्वन मोलह वावड़ी बननी ।। ९६७ ॥
आने तिन पर्वनिका वग वा परिमा
अंगणकणर्याणहा गुलमीदिदीक जायणमाम्मा ।
वहा वामुदण्णय ग्मिा पावलानी ॥ ९६८॥
२८१ मरतिर्यग्रोफारिपार। मानिमा पानिदरीफयोजनगहमाः । gm. पोरन Em: पंचायः ॥ ९६८।। भर्प-AAR कोनन नोकरल सीह समान स्याम वर्ग है। दधिमुख दही समान और गुर्ण समान mतार पौत पर्ण है। यहरि भजन गिरिका प्रमाण nirm rat दोन yिeका दरबार योजन रनिकरका एक हजार पोजन है । परि ते नवसाचार है । म्याग रदपरि समान है । अंजनादिक चौरासी दश एक हजार नपर हमारा मूट दिया उपरि ममान चौहे हैं। उमा दोलके आकार Recent हो गई मिटर बावन पति हैं ॥ ९६८।। कामिन पनि नाम गापा दोय कर कह गंदा पदवदी पुण गंदूपर दिसण अररिया। पपीदमोगरिनया नियंती जयंती य ॥ ९६९ ॥ मंदा नापती पुन: नंदोतरा नंदिपेणा अरविरजे । गोकाविजया बेजयती जपेती ॥ ९६९ ॥ अर्पा १ नदयनी १ बहार मेदोत्तरा १ नंदिपेगा १ ए पारि पूर्व दिशाविय है। ती मामा १ विरजा १ तोफा १ बीतशोका ए प्यारि दक्षिणविषे हैं । बरि विजया १ जना १ जनी १॥ ९६९ ॥ अवगनिदा य रम्मा रमणीया गुप्पभा य पुवादी। रयणतहा स्वरवपया परिमा पुण सन्ददाभदा ।। ९७० ।। अपराजिता प रम्या रमणीया मुप्रभा प पूर्वादितः । सतय. सममा. घरमा पुनः सर्वतोभदा ॥ ९७०॥ अर्थ-अपराजिता १ ९ पारि पश्चिमदिशा विपे हैं । वहरि रम्या १ रमणीया १ सुप्रभा २ त कि पोभमा १९ प्यारि उत्तरविपे हैं । औसे र सर्व पावको रसमय तट युक्त हैं लक्ष नौगन प्रमाण है। पूर्णदिक दिशानिविय क्रमत जाननी ।। ९७० ॥ मब तिन पापडोनिका म्वरूप कहै है- सप्वे समचउरस्सा टेकुकिण्णा सहस्सयोगा। वेदियचउवणजुत्ता जलयरउम्मुशमलपुण्णा ।। ९७१ ।। सर्वा समचतुरखा टंकोन्कोणा सहस्रमवगाधाः । वेदिकाचतुर्वनयुक्ता जलचोन्मुक्तजलपूर्णाः ॥ ९७१ ॥ अर्थ-ते सर्व वा ममचतुराय है । लाख योजन ही देबी भर इतनी ही चौड़ी समचौकोर कार एक्त है । वह टकाकोण है । परि मी एकरूप है । वहुरि एक हजार योजन अंडी । बहर बदिका आ घ्याग्धा निशानिविय स्थारि वन तिन करि सयुक्त हैं। बहुरि जलचर पनि काररहिन ज' का सपूण भी॥९७१ ।। ।
- ३८२ त्रिलोकसार- आर्गे तिन बावडीनिक वननिका स्वरूप कहें है- वावीणं पुन्वादिसु अतीयसत्तच्छदं च चंपवणं । चूदवणं च कमेण य सगवावीदीहदलवासा || ९७२ ।। वापीनां पूर्वादिषु अशोकसप्तच्छदं च चपवनं । बूतवनं च क्रमेण च स्वकवापीदीर्वदलव्यासानि ॥ ९७२ ।। अर्थ-तिन एक एक वापीनिकी पूर्वादिक दिशानिविय अनुक्रम करि अपनी अर वागड़ी समान एक लाख योजन लंबे अर ताते आधे पचास हजार योजन चौड़े असे अशोक सप्तछद मर चंपक भर आम्र वन हैं । असे नंदीश्वर दीपविष सर्व चौंसठि वन जानने ॥ ९७२ अब अंजनादि पर्वतनिकै टपरि प्रत्येक एक एक चैयालयों कहत संता आचार्य सोई चैत्याट्यनिविप चतुर्णिकाय देवनि करि काल विशेष विष किया हुवा पूजा विशेष ताक कहने अर्थि पांच गाथानिकरि कहें हैं;- तव्यावण्णणगेसुवि यावणजिणालया हवंति तहिं । सोहम्मादी वारसकप्पिदा समुरभवणतिया ॥ ९७३ ।। तवापंचाशनगेष्वपि दापंचाशजिनालया भवति ते । सौधर्मादयो द्वादशकल्पेंद्राः समुरभवनत्रिकाः ॥ ९७३ ।। अर्थ-तिन वावन पर्वतनिवि उपरि वाचन जिन मंदिर हैं । तिनविथै अन्य कवाडी देव पर भवनत्रिक देव तिन करि सहित सौधर्म आदि बारह स्वर्गनिके इन्द्र है ॥ ९७३ ।। ते कहा करें हैं ते फैसे हैं सो फ« है;- गपहयकेसरिवसहे सारसपिकहंसकोकगरुडे य । भयरसिहिकमलपुप्फपविमाणपहुदि समारूढा ॥ ९७४ ॥ गायकेसरिदृषभान् सारसपिकहंसकोकगडान् च । मकरशिखिकमपुष्पकविमानप्रभृति समारूढाः ॥ ९७१ ।। अर्थ--हस्ती र घोटक सिंह र पभ र सारस १ कोकिटा १ हस १ चको ? गरर १ माउली १ मोर १ कमल १ पुश्पक विमान इयादिकनि उपरि समाबद्ध हैं। भावार्थ-- सौधर्मादिक यारह ईवनिक हस्ती आदि मुख्य वाहन है। तिन टपरि चढ़े हैं ॥ ९७१ ॥ दहरि कैसे है- दिवफलपुष्फहत्या सत्यामरणा सचामराणीया । परपयतूरारावा गत्ता सुचति कलाणं ।। ९७५ ।। दियालपुष्पहना शम्नाभग्गा मचामनाका । बदृषनागरा गत्वा कुर्वति कन्या ॥ २७५ ॥ अय-दिव्य का पुष आदि बडी प्रान भाभा मो । पामगर मन मनायुन । बहुत लना प्रा पाजिनिक कार मयु-है। में है नरतिर्यग्लोकाधिकार। ३८३ होन गो अपने स्मानितं तहां मंदीवर दीपविय जाइ ऐद्रपा आदि जो जिन पूजनम्रप कल्या साहि परे है।॥ ९७५॥ परिवरिस आसाटे तह कत्तियफग्गुणे य महमिदो। पुष्णदिणोचि यभिपस दो दो पहरं तु समुरेहिं ।। ९७६ ।। प्रनियमापाढे सपा कार्तिक पाल्गुने च ममीनः । पूर्णदिनात चाभीक्ष्ण द्रो द्वौ प्रहरी तु समुरैः ॥ ९७१ १ अर्थ-वर्प प्रति आषाढ मास विपै अर तेसे ही कार्तिक मास विष अर फाल्गुन माम विच भटमी दिने लगाय पूर्णिमा दिन पर्यंत अभीषण कहिए निरंतर दोप दोष पहर अपने अपने देवनि करि सहित ।। ९७६ ॥ पोन कहा करे हैं सी कहै है:- सोहम्मो ईसाणो चमरो वहरोयणो पदविखणदो। पुस्चररदरिषणुचरदिसासु फुव्वंति कलाणं ॥ ९७७ ॥ सीधर्म ईशानः चमरो वैरोचनः प्रदक्षिणतः । पूर्यापरदक्षिणोरारदिशाम कुर्वति कल्याण ॥ ९७७ ।। अर्य-प्रथम वर्ग युगलके इन सौधर्म भर ईशान बहरि मगर पुमारनिके इन्द्र धमर भर परोधम ए प्यारपी प्रदक्षिणा सप पथिम दक्षिण उत्तर दिशानि विषै फल्याण जी मिन पूजन हि कर है। पूर्वयाटा दक्षिण जाइ तब उत्तरपालाको बाये ऐसें प्रदक्षिणासप महोत्सव युत पूजन कर है ।। २७७ ॥ अब तीन लोक विश तिएते शु भत्रिम पैत्यालय सिनका सामान्य फार व्यासादिक भायामदल यासं उभयदल निणपराणमुग्यो । दारदयदर्म पास भाणिाराणि नस्सद ।। ९७८॥ जापागदई म्यासे उभगा जिनमणागुपये। द्वारोपसम्पास माणुबाराणि तस्याथै ॥ ९७८ ॥ अर्थ-~-arre ne यागनिका गो मायाम ताफा आश तो तिनका म्यास है । मदीर भायाम भर भ्यास दोउनिका मिTE mai MY जिन मंदिरनिका ३ पार्ष-उत्कृष्ट मम्प जघन्य फायरिक ईमोशी पपास पचीम पोजन साफा भाषा पचास एजीम मा बाम गोगन प्रमाण दिनी पोहाईका । परि माई चौडाईको मिलाइ १५०/०५/७५ २ मा परि । उगणीस योजन प्रमाण निनः उपमना धानिका मामा वार्म बानिकी उधाई सोटर आर Ale निसरीचौer की उपाई आध! Jig म hd.IN
-
अयं-
ती मना दिसा विष। अर दिन मंदिरनिके दोऊ पार्थनि विष दीप दोय पर।
सट आदि विशेष हित में वमतिका करिए बिनाप लिन मापन र
३८४
त्रिलोकसार-
जाननां । वहरि अन्य छोटे द्वार ते तिस बड़े द्वारतें आधा प्रमाण उदय व्यास संयुक्त हैं । भावार्थ-
उत्कृष्ट मध्य जघन्य चैत्यालयनिके छोटे द्वारनिकी उचाई आठ प्यारि दोय योजन है। चौड़ाई
प्यारि दोय एक योजन है ॥ ९७८ ॥
इस ही फहे अर्थको विषेशते गाथा दोयकार कहे हैं;
वरमझिमअवराणं दलकम भइसालणंदणगा।
गंदीसरगविमाणगजिणालया होति जेहा हु ॥ ९७९ ॥
वरमध्यमावराणां दलकम मद्रशालनंदनकाः ।
नंदीश्वरकविमानगजिनालया भवति ज्येष्ठा हि ॥ ९७९ ।।
--उत्कृष्ट मध्य जघन्य चैत्यालयनिका व्यासादिक क्रमते आधा आधा जाना हो
भद्रशाल पर नंदनवन पर नंदीश्वर भर दीप वैमानिकनिके विमान इन विष प्राप्त जे बिनायो
ते तो म्यासादिक करि उत्कृष्ट हैं ॥ ९७९ ॥
सोपणसरुनगकुंडलवक्खारिसुगारमाणुमुत्तरगा ।
कूलगिरिजा वि य मज्झिम निणालया पांडगा अवरा ॥ ९८० ॥
सौमनसरचककुंडलयक्षारेष्वाकारमानुपोत्तरगाः ।
कुलगिरिजा अपि च मन्यमा जिनालया पांडगा अवराः ॥ ९८० ॥
अर्प-सौमनस वन भर रुचक कुंडल यक्षार इयाफार मानुषोत्तर पर्यत भर बुद्धाचन हत
विष प्राम निनालय है ते मध्यम है। पांडक यन विष प्राप्त जिनालय है से जघन्य है ॥ ९८० ॥
पाकै मनंतर टहट जिनालयनिका आपाम अबगाध द्वारानका उच्चव के हैं-
जोपणसय आयाम दलगाई सोलसं तु दारुदयं ।
जेहाणं गिहपासे आणिदाराणि दो दो दु॥ ९८१ ॥
पोजनशतमायामः दटगाय: पोडश तु दारोदयः ।
येष्टाना गृहपा माणुद्वारे देदे तु ॥ ९८१ ॥
अर्थ-2 मिनालयनिका आयाम सौ योजन प्रमाण है । अर आप पोरन मा
पीर की महा नाव है । वहीर मोटह योजन तिनके द्वारनिका रच्चन्य है। महरिया सात
शेदार है नही ।।०८१ ।।
है मौका है:-
वेपालमापरिनिगमरणाणं तु कोस आपा ।
मंमागं मानोग्ण थापामगति निगदित ॥ ९.८२ ।।
पिजिनमवनाना को मापाम ।
PARमा मामि बिनाए ॥९८२॥
नरतियग्लोकाधिकार।
३८५
अर्य--विजयाई पर्वत जंक्ष शाल्मली वृक्ष इन विष जिन मंदिरनिका आयाम जो लंबाई
सो
एक कोश प्रमाण है । अवशेष भवनवासानिके भवन व्यतरनिके आवास इत्यादिकानि विर्य प्राप्त
रे जिनमवन तिनका अपना अपना यथा योग्य आयाम जिन देव देखे हैं। बहुत प्रकार है ताते
इहां न कहा है ॥ ९८२ ॥
आगे कहे जे जिन भवन तिनका परिवार गाथा सात करि कहें हैं:-
चउगोउरमणिसालति वीहिं पडि माणयंभ णवथहा ।
वणघयचेदियभूमी जिणभवणाणं च सन्वेसि ॥ ९८३ ॥
चतुर्गापुरमणिशालाये वीयर्थी प्रति मानम्नंभा नवस्तूपणः ।
वनवजाचैत्यभूमयः मिनभवनानां च सर्वेषां ॥ ९८३ ॥
अर्थ-सर्व जिन भवननिकै च्यारि द्वारनि फरि संयुक्त माणिमई तीन कोट हैं। बहार
पीयी जो दार होइ करि जानेकी गटी तिन एक एक वीपी प्रति एक एक मानस्तंभ है । पर नत्र
नव स्तूप है । बरि तिन सीन कोटनिक पीचि याचि अंतराउ तिन विष बासते माप पहला
दूसरा कोटक पीचि पन है, दूसरा तीसरा कोटकै वीचि पजा है। तीसरा कोटक मीधि बयालय
चैत्यभूमि है ।। ९८३ ॥
जिणभवणे अहसया गभगिहा रयणथंभवं तस्य ।
देवरउंदो हेमो दुगहचउपासदीहुदभो ।। ९८४॥
जिनभवनेषु अष्टशतानि गर्भगृहाणि रत्नस्तंभयान सत्र ।
देवदो हैमः द्विकार चतुर्यासदोघोदयः ।। ९८५॥
'अर्थ-तिन जिन भवननि विष एकसौ पाठ गर्भ ग्रह है। जैसै वास करने काय
नादिस्थान तैसे गर्भ मह जाननें । बहुरि तहां जिन मंदिर मध्यवि गनिया स्तभनि फरि पुन,
नुवर्ण मई दोय योजन चौड़ा आठ योजन लया प्यारि योजन ऊंचा देवद करिए सदर मर
सिंहासणादिसहिया विणीलकुंतल गुरजपयदेता ।
विदुमहरा किसलयसोडायरहस्यपायनला ॥ ९८५॥
सिंहासनादिसहिता विनील कुसलाः मुवनमयदेशः ।
विदुमाधराः किसलयशोभाकरहस्तपादतलाः ॥ ९८५ ॥
अर्थ-सिंहासन प्रादिक करि संयुक्त पहरि रियोरपन नील है मस्तकानिविदा जिनके
र भले पममई देत जिन पर विट्टम जो मुंगा तिस सारिखे रक्त होठ है जिनभर रिमो
नि कूपल तिस सारिखे हैं रसता निर शोभा युक्त हसत भर पारा निनक ऐसी र
मा है । इहा केशादिककामा आकार RP पु पाणा है ऐसा जानना ॥ ९.५॥
दसतालमाणलपवणभरिया पंपरखेत परवा पा ।
पुरुजिणतुगा परिक्षा गणमया भगिया ॥ ९८६॥
३८६ त्रिलोकसार- . दशतालमानलक्षणमरिताः प्रेस्यमाणा इस वदंत इव । पुजिनतुंगाः प्रतिमाः रत्नमया अष्टाधिकशताः ॥ ९८६ ॥ अर्य दश ताट प्रमाग रक्षणनिकार मरी है । तालका प्रमाण बारह अंगुल जानना ते प्रतिमा तीर्थकर वत जानों कि चौधै हैं जानों बोले हैं। बहरि पुरजिन जो पहला धन कर तीह समान पांचसै धनुष उंची है । बहरि रल मय हैं । ऐसी एकसौ आठ जिन प्रतिन गर्भ प्रइनि वि एक एक विराज मान हैं ॥ ९८६ ॥ चमरकरणागजक्खगवतासंमिगुणगेहि पुह जुत्ता । सरिसीए पंतीए गभगिहे मुटु सोहंति ॥ ९८७ ॥ चमरकरनागयझगद्वात्रिशन्मियुनः पृथक् युक्ताः । सदस्या पंक्त्या गर्भगृहे मुटु शोभते ॥ ९८७ ॥ अर्थ-वहार ते प्रतिमा कैसी है ! चमर है हाय विष जिनके ऐसे ज नागकुमारी पनि बत्तीस युगट तिनकार संयुक्त जुदै जुद एक एक गर्म गृह विष सरा रूप वरोधी करि मले प्रकार सोभे हैं । मावार्य यत्तीस नाग कुमार वा यशनिक युगल तिनकै हस्त विष घमर है लिन करि योग्यमान है।। ९८७॥ सिरिदेवी मुददेवी सव्याण्डसणकुमारनपसाणं । स्वाणि य निणपासे मंगलमहाविहमाव होदि ।। ९८८ ॥ श्रीदेवी श्रुतदेवी साहसनकुमारपक्षागां । मपाणि च निनपा मगद्रमष्टनियमपि भवति ॥ ९८८।। अर्य-तिन जिन प्रतिमानि पाव व श्री देवी अर सरखनी देवी भर साद मनकुमार पक्ष इनकै सजे आकार ते निट है। भाचार्य-जिनप्रतिमा निकटि इन का प्रतिविष ही है। न--जो थी तो धनादिक है अर मस्ती निशानी है। FARE THE RITER मरना दो लोकपिटतट है। सात देगनास साकार कप प्रतिबिंब हो है । यहीर दो पक्ष विशेष भक्त है । साते तिनके । हा। बहर आठ प्रकार मगल द्रव्य जिनपतिमानि निरटि सोन॥९८८ ॥ सिंगारकलगदप्पणीयणयय यामगदरतमा । मुना मगनाणिय अडियमयाणि परोपं ।।९८९॥ মুসানপশ্বমানান। मनिष्ट रानि च परिकशनानि कम ॥९८९।। भयं-१ का १ भागमा वीदना १ पग , चामर ११ १८ मटर भगा UP BATA८' नेमकी को- भनिगरप.गोहिया पृषही मान्ने । ग: पनगामामानिमांग ।।...॥
1. . नरतिर्यग्लोकाधिकार । ३८७ मणिकनकपुष्पशोभितदेवईदस्य पूर्वतो मप्पे । वसन्या रूप्यकांचनघटसहस्राणि द्वात्रिंशत् ॥ ९९० ॥ अर्थ---मणि अर सुवर्ण मय पुष्पनिकरि सोभित ऐमा जु देवरद ताके पूर्व विष का वसती जो जिन मंदिर ताका मध्य विषै रूपा अर सोनामई पत्तीस हजार घटे हैं ॥ ९९० ॥ महदाररस दुपासे चउवीससहस्ममत्यि पुवघटा । दारवहिं पासदुगे अहसहस्साणि मणिमाला ॥ ९९१ ।। महाद्वारस्य द्विपाचे चतुर्विशसहस्र सति धूपघटाः । द्वारबहिः पार्शद्वपे अष्टसहस्राणि मगिमालाः ॥ ९९१ ॥ अर्थ---महा द्वार जो बड़ा द्वार ताके दोऊ पार्श्वनि विर्षे दाहिणी बाई नरम. चौईम हमार धूपके घड़े हैं । बहुरि तिस महा द्वारके याच दोऊ पार्श्वनि वि. बाट हजार मगिमप माला है।॥ ९९१ ॥ तम्मज्य हेममाला चवीस वदणमंरवे हेमा । फलसामाला सोलस सोलसहस्साणि धूवघरा ॥ ९९२ ॥ तन्मध्ये हेममाला चतुर्विशतिः पदनमदपे हेमाः । कटरामालाः पोटश पोडासहस्राणि धूपघटाः ।। ९९२ ॥ अर्थ-तिन मणिमय मालानिके पीधि चौईन हजार गुवर्णमय माला है। हरि महा. द्वारके भागें सन्मुख मुरा मंडप है तिस विष सुवर्णमय कल्दश भर मुवर्ण मय माग सोहर मोच हजार है । बहुरि तिसही वियै सोलह हजार धूपके घहे हैं ॥ ९९२।। महुरझणझणणिणादा मोत्तियमणिणिम्मिया सकिंफिणिपा। . पहुविघटाजाला रइदा सोहंति तम्मग्झे ॥ ९९३ ॥ मधुरहानसननिनादाः मौनिकमणिनिर्मिता: गर्थिकिगिकाः । बहुविधघटाजाला रचिताः शमते तन्मध्ये ॥ ९९३ ॥ अर्थ-तिस ही मुरा मडपका मध्य विप मीटा है कण कण शन्द निनया भर को माणिनि करि निपजी किंकणी जे छोटी घंटा तिन करि सहित नाना प्रकार घशानिक समाज रचना करि युक्त सो) है ॥ ९९३ ।। बहरि तिम मंदिरके शुद्धक द्वारादिकका हरप कहै :- वसईमग्नगदपिखणउत्तरतणुदारगं नदर्द । तापुढे मणिकरणमारपीरागगास ॥ ९९५ ।। वसतिमध्यमदरिणीतरतारे ताई। तपो मणिकासन amajiमरमागि.. अर्थ-बसती जी जिन मEिRA churm IS A FEnant तिसविध मुस्य महार at ... ... . है ' माना। -
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नरतियग्लोफाधिकार । पुरतः प्रासादद्वयं स्फटिकासिमसारमारपाईये । अभ्यंतरं शतोदय दलण्यास वसंघटितम् ॥ १००७॥ अर्थ-तिस तोरणकै आग स्फटिकमय जो प्रथम कोट तांक अम्पेनर कोटके द्वारका दोऊ पावनि विथ मो योजन ऊँचे ताका आधा पचाम योजन चौड़े न निर्मापित दोष मंदिर है। ऐमें प्रथम कोट पर्यंत वर्णन किया ॥१००७ ॥ जे परिमाणं भाणदं पुन्चगदामि मंत्वादी । दरिखणउत्तरदारे तददमाणं गहीदवं ।। १००८ ।। यत् परिमाण भणित पूर्ववारे मंदरादीनाम् । दक्षिणोचरशारे तदर्धमान महीतये ।। १००८॥ अर्य-पूर्व द्वार विषै मस्पादिकनिका जो परिमाग काया ताने आया प्रमाण दक्षिण भार पर उत्तरदार विर्य महण करना । धन्य वर्णन तीनों तरफ समान है ॥१००८॥ वंदभिसेयणपणसंगीपरलोयमंदि मुदा । कोहणगुणणागहेदिय विसाष्टयरवासाले ॥१०.९॥ पदनाभिषेकनर्तनसंगीतापलोयमंडपः पुतानि । फीनगुणनगृहेच विशालपरपाशालेः ॥ १००९ ॥ अई-बहुरि ते चन्याय सामायिकादि क्रिया करने के स्थान 4गा माप भर काम करने स्थान अभिषेक मंडप पर नृत्य करने के स्थान नर्गन मर भर सात गायन कमेका मरप र अवलोकन करने के स्थान अवलोकन मप लिन करि रंगुन, का स्थान पोरन गृह शास्त्रादिक अभ्यासनेके रशन गुणनाइ तिन करी भाग TRA भादि दिसायने के स्थान पाशाला तिनकार प्रयुक्त हैं ॥ १.०५॥ भर पहला और दूसरा कोटक पीवि जो बतराठ ताका सापकी :- सिंहगयरसहगाडीगादिणागारपिंदपपपया। TE अहमया पदिसमपंग माग पुरा १०१.॥ বিলেরথমানীনভঙ্গল। पृथर तानि चासमककस्मिन् बETA UN ॥ १.१.n अ-सह ११ली १ पभ १ १ १ गपूर १ पदमा १ सूर्प १ म ! ...१ चदनिका आकार की संयुक्त मजा है से पृथप एक पल जिन मंदिरको पनि वियं है । मुस्य । इहा एक मुख्य बजा कि भारी मनदीविको বগম - त्रिलोकसार- चतुर्वनमशोकसप्तरछदचंपकचूतमर कल्पतरयः । कनकमयकुमुमशोभाः मरकतमयविविधपत्राव्याः ॥ १०११ ।। अर्थ-अशोक भर सप्तद अर चंपक भर आम्र इन मई च्यारि वन हैं । बहुरि इह सुवर्ण मई फलनि करि शोभित भर मरकत मणिमय नाना प्रकार यंत्रनिकरि पूर्ण ऐमे कल्प वृक्ष हैं ॥ १०११॥ वेलरियफला विदुमविसालसाहा दसप्पयारा ते । पल्लंकपाडिहेरग चदिसमूलगय निणपहिमा ॥ १०१२ ।। वैडूर्यफला विद्रुमविशालशाखाः दशप्रकारास्ते । पल्यंकप्रातिहार्यगाः चतुर्दिशामूलगता जिनप्रतिमाः ॥ १०१२ ।। अर्थ-बहुरि ते वैर्य रत्न मय फल संयुक्त हैं । बहुरि विद्रुम मूंगा मय डाली युक्त है। ऐसे कल्प वृक्ष भोजनांग आदि भेद लीएं दश प्रकार तिन वननि विष हैं। बहुरि तिन वननिविर चैस्यवृक्षानिक निकटि पल्यंक आसन छत्रादि प्रातिहार्य संयुक्त प्यारों दिशानि विषे वृक्षनिका मूलक निकटि प्राप्त ऐसी जिन प्रतिमा हैं ॥ १०१२ ।। सालत्तयपीढत्तयजुत्ता मणिसाहपत्तपुप्फफला। तचउवणमझगया चेदिगरुक्खा सुसोहंति ।। १०१३ ।। शालत्रयपीठत्रययुक्ताः मणिशाखापत्रपुष्पफलाः । तचतुर्वनमध्यगताः चैत्यक्षाः सुशोमते ॥ १०१३ ॥ अर्थ-तीन कोट तीन पीठ करि संयुक्त भर मागमय डाली पान फल फल युक्त ऐसे ध्यारयों धननिकै मध्य प्राप्त जिन विंब सहित चैत्य वृक्ष भले प्रकार सोभै हैं ॥ १०१३ ॥ आगै नंदादिक वापी अर मान स्तंभ तिनका विशेष स्वरूप कहें हैं;- गंदादीय तिमेहल तिवीदया भंति धम्मविहवादि। पडिमाधिहियमुट्टा घणभूचउवीहिमज्झम्हि ॥ १०१४ ॥ मंदादिकाः विमेखलाः निपीठका भांति धर्मविभवा अपि । प्रतिमाधिष्टितमूर्धानः वनभूचतुवा थीमध्ये ॥ १०१४ ॥ अर्थ- कही जै नदादिक सोलह बावड़ी ते तीन कटनीनि करि संयुक्त सौभ हैं वहीर यननिकी जु भूमि ताके निकटि द्वारनित आवनेंका मार्गरूप जो वीथी तिनका मध्य वि जिन प्रतिमाका स्थान भूत है मस्तक भाग जिनका असे धर्म विभवा अपि कहिए धर्म रूप भित्र संजुक्त मानस्तंभ है ऊ तीन पीठ युक्त सौभ हैं। ऐसे जिनालयका वर्णन जानना ॥ १.१४॥ इतिश्री नेमिचंद्राचार्यविरचित त्रिलोकसारमें छटा नरतियग्लीकया अधिकार समाप्त भया ।। ६॥ ..
ग्रंयकारका वक्ताय। मुलग्रंथकारका वक्तव्य। आगे प्रथका अंत विषै मंगल करनेको सर्व जे सर्वहके प्रतिबिंब तिनको वंदना की है। निणसिद्धाणं पहिमा अफिट्टिमा किहिमा दु अदिसोहा । रपणमया हेममया रुप्पमया ताणि वंदामि ।। १०१५ ॥ जिनसिद्धानां प्रतिमा अत्रिमाः कृत्रिमात अतिशोभाः । रत्नमया हेममया सप्यमया ताः वैदे ।। १०१५।। अर्य-अकृत्रिम तो अनादि निधन भर कृत्रिम करी दुई भैसी रनमय वा मुवर्णमय समय जे भरहतनिकी र सिद्धनिकी प्रतिमा तिन विवनिकों में बंदी हो ॥ १०१५ ॥ बहरि अन संबंधी मंगलके ही भर्धि संख्या करि संयुक्त जे समुदायम्प जिन मंदिर तिनको नमस्कार करत सेता सूत्र कहें हैं;- कोटी लरख सहस्सं अध्य छप्पण्ण सत्तणउदी य । घउसदमेगासीदी गगणगए दिए बंदे ॥ १.१६ ॥ कोव्यः रक्ष्याणि सहस्राणि अष्ट पपंचाशत् सप्तनपतिः । चतुःशतमेकाशीतिः गगनगतानि चैन्यानि धंदे ॥ १.१५॥ अर्थ -आठ कोडि छप्पन लाख सत्याणवै हजार पारिम हायासी लोकापाशविक चयालय तिनकों में मंदों हों । यह भवनवासी वैमानिक देव भर में माहि मध्य का चैत्यालयनिकी संख्या जाननी । ज्योतिष्क ध्यंतरसंबंधी चचालय भर्मरया साने गणना न कहे ॥ १०१६॥ अब इस शास्त्रको समाप्त करता संता आचार्य मतसंबंधी मग बाणिकवित सात जे अनिम या कृत्रिम मिन मंदिर संबंधी बदना परत सता गाया सूत्र है - सिहयणमिणिंदगेहे अकिहिमे पिहिमे तिमासभरे। पणकुमरविरंगामरणरखेघरदिए पंदे ॥ १०१७ ॥ विभुषनाबिनेदगेहान् भातिमान् हरिमान् कि भगन् । पानमारविद्युतांगामर नरश्रेचरवदितान् ॥ १.१७॥ अर्थ आत्रिम अर पिम मतीत भनागत धर्तमान निकाल ज्योतिष्फ कासव मनुक्ष विनि करि ति रिभुवन AR ॥१०१७ ॥ Kanthi. " अतार प्रका दिमिपंदमुणिणा गयो निर्णयसारो ३९४ त्रिलोकसार- इति नेमिचंद्रमुनिना अल्पश्रुतेनाभयनंदिवरसेन । रचितस्त्रिलाकसारः क्षमंतु तं बहुश्रुताचार्याः ॥ १०१८ ॥ अर्थ -इस प्रकार करि अल्प श्रुतज्ञानका धारी अर अमयनंदि नामा सिद्धांत चक्रवर्तीका वत्स शिष्य जैसा नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य ताकरि यहु त्रिलोकसार नामा ग्रंथ रच्या है । ताको बहुश्रुत धारक आचार्य हैं ते कहीं चूक भई होइ तहां क्षमा करौ ॥ १०१८ ॥ संस्कृत टीकाकारका वक्तव्य भव तिस त्रिलोकसारकौं अलंकार रूप जानें किया असा माधवचंद त्रैविध देव सो भी अपनी उद्धतताकों त्यागै हैं;- गुरुणमिचंदसम्मदकादेवयगाहा तहि तहिं रइदा । माहवचंदतिविजेणिणमणुसरणिजमजेहिं ॥१॥ गुरुनेमिचंद्र संमतकतिपयगाथाः तत्र तत्र रचिताः । 'माधवचंद्रविद्येनेदमनुसरणीयमार्यः ॥ १ ॥ अर्थ-अपना गुरु नेमिचंद्र सिद्धात चक्रवर्ती तिनके सम्मत लिए उपदेश लिए अथवा ग्रंथकरता नेमिचंद्र सिद्धांती देव तिनके अभिप्रायका अनुसार लिएं केती एक गाथा इस प्रथविषे माधवचंद्र विद्य देव करि भी तहां तहां रची है । पैसा भी आर्य जे प्रधान आचार्य तिन करि अनुसारि जाननां ॥ १॥ अव ग्रंथका अलंकार रूप सोधनादि रूप कर्ता श्री माधयचंद वैविध देय सो भी भेतसं. बंधी मंगल करतसंता अपना अभीष्ट फलकी यांचा कर है- अरहंतसिद्धाइरियुवज्झयासाहु पंचपरमेही । इय पंचणमोकारी भवे भवे मम मुई दिंतु ॥ २॥ अरहतसिद्धाचार्योपाध्यायसाधवः पंचपरमेष्टिनः । इति पंचनमस्कारः भवे भवे मम मुसं ददतु ॥ २॥ अर्थ--प्यारि पानि कर्म रहित अनः चतुष्टय युक्त अरहत, भर सर्व कर्म रहित कृतरूप दशाको प्रात मिद्ध, भर मुनि संघ विरै प्रगन आचार्य, अर ग्रंथाभ्यास अधिकारी उपाप्याय, भर सामान्यमुनि साधु ए पच परमेष्टी है । आमाके सर्व प्रकार हितसाधक परम इष्ट है ताने नों परमेटी वाहिए । म प्रकार इन पंच परमेष्टिीनका नमस्काए जो पंच नमाकार मंत्र है मो भर भव विथ मोकई मुघ देह । मुख्य नाम निगकुलताका है निराकुलता वानरागभावनित हो । हाने परमवीतराग भावरूप युद्धामावा जनित परम आनएको मानि फरहु ॥ २ ॥ ।
ग्रंथकारका वक्तव्य। ३९५ भापाटीकाकारका यक्तव्य । कवित्त-ध त्रिलोकसारकी भाषाटीका पूरन भई प्रमान, याके जानें जाननु है सब नानाम्प लोक संस्थान । ताते ध्या धर्म ध्यानको पावै सकल प्रकाशक ज्ञान, पाय त्रिलोकमार गुनमहिमा अविचल पद पईए निरवान ॥ १ ॥ चौपाई- -वाचक शब्द वाप्य है अर्थ, इनिकै यहु संबंध समर्थ । इनिका कर्ता नाही कोय, जानें इनिको ज्ञाता होय ॥ २ ॥ सवैया इकांसा। पृथ्वी शन्द पृषी अर्थ इनके संबंध ऐसौ पृथ्वी शब्द जानने पृथ्वी अर्थ जानिए, ऐमैं साचे शन्द भर साचे अर्थ जगमाहि तिनिकै संबंध सो स्वभाव ही ते मानिए । ताते इस मंय माहि जेते शब्द जेते अर्थ तिनको नवीन कर्ता फोऊ नाहिं मानिए, तिनको जो जाने पर भाप गरि शब्दनिको म्यवहारमात्र सो तो कर्ता पहिचानिए, ॥ ३ ॥ ऐसी परिपाटी माहिं इहो वर्धमान जिन भए तिनिहूनें तिनिको स्वरुप जान्यों है, इच्छा विन दिव्यध्वनि तिनके प्रगट भयी ताकरि स्वरूप किट तैसी ही वखान्या है। गोतम गणेश मुनि ऐसो उपकार कीनों ताको अनुसार सब ग्रंथनिमें मान्यों है, तिनिकरि ज्ञानवत होइ छोटे पंथ जोरि किनि. नाना भौति अर्थ प्रमान्यों है ॥ ॥ इति श्रीपंडितवर टोडरमल्लजीकृत त्रिलोकमारकी भापावनिका समाप्त हुई।
३९४ त्रिलोकसार- इति नेमिचंद्रमुनिना अल्पश्रुतेनामयनंदिवरसैन । रचितत्रिलोकसारः क्षमंतु तं बहुश्रुताचार्याः ।। १०१८ ॥ अर्थ-इस प्रकार करि अल्प श्रुतज्ञानका धारी अर अभयनंदि नामा सिद्धांत चक्रवर्तीका वत्स शिष्य औसा नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य ताकरि यहु त्रिलोकसार नामा प्रथ रण्या है । ताको बहुश्रुत धारक आचार्य हैं ते कहीं चूक भई होइ तहां क्षमा करौ ॥ १०१८॥ संस्कृत टीकाकारका वक्तव्य -- । भव तित त्रिलोकसारको अलंकार रुप जानें किया जैसा माधवचंद्र विद्य देव सो भी अपनी उद्धतताको त्याग हैं;- गुरुणमिचंदसम्मदकादेवयगाहा तर्हि तहिं रइदा । माहवचंदतिविजेणिणमणुसरणिजमजेहिं ॥१॥ गुम्नेमिचंद्रसमतकतिपयगाथाः तत्र तत्र रचिताः । माधवचंद्रविद्येनेदमनुसरणीयमायः ॥ १॥ f-अपना गुरु नेमिचंद्र सिद्धोत चक्रवर्ती तिनके सम्मत लिए उपदेश लिए अपना प्रथकाता नेमिचंद्र सिद्धाती देव तिनके अभिप्रायका अनुसार लिए केती एक गाथा इस प्रथरिष माधवचंद्र विद्य देव करि भी तहां तहा रची हैं। जैसा भी आर्य जे प्रधान आचार्य तिन कोरे अनुसारि जानना ॥ १॥ अब प्रथका अर्टकार रूप सोधनादि सप कर्ता श्री माधवचंद वैविध देव सो भी अतसं. बंधी मंगल करतसता अपना अभीट फलकी यांचा कर है; अरहंतसिद्धाइरियुवझयासाहु पंचपरमेही । इय पंचणमोकारो भये भये मम मुई दिंतु ॥२॥ अरहतसिद्धाचार्योपाध्यायमाश्वः पंचपरमेष्टिनः । इति पचनमम्कार भरे भरे मम मुलं ददत ॥ २॥ अर्थ-प्यारि पाति कर्म रहित अन1 नतुटप युन आहेत, भर सा फर्म रहित इतक दशाको प्रात निद्ध, सर मुनि मेघ विप प्रगान आचार्य, आ पाण्याम अधिकारी उपाध्याय, भर मामान्यमुनि साधु ए. पच परमी है। आमाके स प्रकार हितगायक परम द है ता इनों परमेटी कहिए । इस प्रकार इन पच परमेशिनमा नमक जीवच नमार है मो भर पिं मोबई गुम्म दे । म नाम गाला लाभानि होती मनगम, न की प्राति का।।२॥
ग्रंथकारका वक्तव्य । ३९५ भापारीकाकारका वक्तव्य । कविरा-थ रिलोकसारकी भाषाटीका न मई प्रमान, याके जाने जानतु है सब नानारूप लोक संस्थान । तात घ्यावे धर्म प्यानको पात्र सकल प्रकाशक ज्ञान, पाय त्रिलोफमार गुनमहिमा अविचल पद पईए निरयान ॥१॥ चौपाई वाचफ शद वाष्य है अर्थ, इनिकै यह सैध समर्थ । इनिका कर्ता नाही कोप, जानें इनिको ज्ञाता होय ॥२॥ सवैया इफनसिा पृथ्वी शब्द पृषी मर्थ इनकै संबंध ऐसौ पृथ्वी शब्द जानने पृथ्वी अर्थ जानिए, ऐसें सांचे शब्द अर सांचे मर्थ जगमाहि तिनिके संबंध मो स्वभाव ही से मानिए । ताते इस देय माहि जेते शब्द जैतै अर्थ तिनको नवीन कर्ना कोऊ नाहि मानिए, तिनको जो जाने भर भाषे औरि शब्दनिकौं म्यवहारमार सो सौ फर्ना पहिचानिए ॥३॥ ऐसी परिपाटी माहिं इहां वर्धमान जिन भए तिनिहूने तिनिको स्वरूप जान्यों है, इच्छा दिन दिव्यध्वनि तिनके प्रगट भयो ताफरि स्वरूप किट सैसी ही बताया है। गोतम गणेश मुनि ऐसो उपकार कीनों ताको अनुसार सब प्रधनिमें मान्यों है, तिनिकीर हानवत होइ छोटे ग्रंथ जॉरि किनिहूनै नाना भांति अर्थ प्रमान्यों है ॥४॥ इति श्रीपंडितवर टोडरमल्लजीकृत त्रिलोकमारकी भापावचनिका समाप्त हुई। .
३९४ त्रिलोकसार- इति नेमिचंदमुनिना अन्यश्रुतेनामयनंदिवसेन । रचितस्बिलोकसारः क्षमंतु तं बहुश्रुताचार्याः ॥ १०१८ ॥ अर्थ-इस प्रकार कारे अल्प श्रुतज्ञानका धारी अर अभयनंदि नामा मिहान चक्रवर्तीका वत्स शिष्य औसा नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य ताकरि यह त्रिलोकमार नामा ग्रंथ रच्या है। ताको वहुश्रुत धारक आचार्य है ते कहीं चूक भई होइ तहां क्षमा करी ॥ १०१८ ॥ संस्कृत टीकाकारका वक्तव्य , भव तिस त्रिलोकसारकों अलंकार रुप जानें किया असा माधवचंद्र विद्य देव मी मी अपनी उद्धतताको त्याग हैं। गुरुणमिचंदसम्मदकादेवयगाहा तहिं तहिं रइदा । माहवचंदतिविजेणिणमणुसरणिनमन्जेहिं ॥१॥ गुरुनेमिचंदसंमतकतिपयगायाः तत्र तत्र रचिताः । माधवचंद्रविद्येनेदमनुसरणीयमार्यः ॥ १॥ अर्थ-अपना गुरु नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती तिनके सम्मत दिएं उपदेश लिए अथवा ग्रंथकरता नेमिचंद्र सिद्धांती देव तिनके अभिप्रायका अनुसार लिएं केती एक गाथा इस प्रथविय माधयचंद्र त्रैविद्य देव करि मी तहां तहां रची है । औसा भी आर्य जे प्रधान आचार्य तिन करि अनुसारि जाननां ।। १॥ अब ग्रंथका अलंकार रूप सोधनादि रूप की श्री माधवचंद विद्य देव सो भी असं. बंधी मंगल करतसंता अपना अभीष्ट फलकी यांचा कर है- अरहंतसिद्धाइरियुवज्झयासाहु पंचपरमेही । इय पंचणमोकारो भवे भवे मम मुहं दिंतु ॥ २॥ अरहतसिद्धाचार्योपाध्यायसाधवः पंचपरमेष्टिनः । इति पंचनमस्कारः भवे भवे मम मुखं ददतु ॥ २ ॥ अर्थ-प्यारि घाति कर्म रहित अनंत चतुष्टय युक्त अरहंत, अर मर्च कर्म रहित कृतकृत्य दशाको प्रान सिद्ध, अर मुनि संघ विष प्रधान आचार्य, आ ग्रंथाभ्यास अधिकारी उपाध्याय, अर सामान्यमुनि साधु ए पंच परमेष्टी है । आमाके सर्व प्रकार हितसाधक परम इष्ट है नाले इनकों परमेष्टी काहिए । इस प्रकार इन पच परमेष्टिनिका नमस्कारम्य जो पच नमस्कार मंत्र है मो भर भव विरे मोकहुँ मुख दंड । मुख नाम निगामाका है निगकुटना चीनगगभावनित हो । ताने परमानराम भारम्प शुद्धा मम्बम्प जानन परम आनाकी मानि कर ॥२॥ ।
प्रयकारका वक्तव्य । ३९५ भापाटीकाकारका पफम्प । - नियोकगारकी भाषाटीका पूग्न भई प्रमान, पाय गर्ने जानतु मब नानारूप लोक संस्थान । गाने धर्म पानको पनि सकल प्रकाशक झान, पारगार गुनमहिमा अविचल पद पईए निरवान ॥१॥ पोपा आपण दाद वाच्य है अर्थ, इनिकै पर संबंध समर्प । निका बा मोही कोय, जाने इनिको माता होय ॥२॥ सवैया इफर्तासा। दारी मप इन सब ऐसी पृषी शन्द जानने पृथ्वी अर्थ जानिए, याद र सांचे भय जगमाहि तिनिकै संबंध सो स्वभाव ही हैं मानिए। माने राय माहि जो शन्द ने अर्थ तिनको नवीन कर्ता कोऊ नाहिं मानिए, लिनी ओजाने पर भारे शेरि सदनिको म्यवहारमात्र सो तो कर्ता पहिचानिए ॥ ३॥ देसी परिपाटी माहि हो वर्धमान जिन भए तिनिहूनें तिनिको स्वरूप जान्यों है, Pा किन हिम्पपनि तिनके प्रगट भपी साकार स्वरूप किछ तैमो ही वखान्या है। गोतम गणेश मुनि ऐमी टपकार कीनों ताको अनुमार सब मपनिमें आयौं है, लनिकरि जानत होइ छोटे प्रथ जोरि किनिने नाना भांति अर्थ प्रमान्यों है ॥ ४॥ इति श्रीडितवर टोडरमल्लनीकृत त्रिलोकमारकी भापावनिका समाप्त हुई।