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Swadhinta Ke Shidhant

Makswini,teransh · 2011/01

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हिन्दी-प्रेमियोंसे अनुरोध
इस मएडलके स्थायी ग्राहक होनेके नियम
पुस्तफके अन्तमें दिये हुए हैं। आप उन्हें
एक पार अवश्य पढ ले और अपनी रुचिके
अनुसार स्थायी प्राहक होकर व अपने मित्रों-
को बनाकर इस मण्डलकी पुस्तकोंके प्रचारमें
सहायता पहुंचा।

।
[पुम्नक ५
स्वाधीनताके सिद्धान्त
आयलटके प्रमिदमान्मन्यागी पीर
टेरेन्म मैकम्विनी
भपादक
पं.हेमचंद्र जोशी पी०१०
+
प्रसाशप
सम्मामिटन
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. प्रकाशक- जीतमल लूणिया, मंत्री सस्ता साहित्य प्रकाशक मण्डल, अजमेर लागत का ब्योरा कागज छपाई १६७) ૨૨) वाइडिग लिखाई, व्यवस्था, विज्ञापन आदि खर्च २५३) कुल जोड प्रतिया २००० एक प्रति का मूल्य क टेरेन्स मैक्स्विनीकी संक्षिप्त जीवनी - १-बाल्यकाल कार्य लाई मेयर टेरेन्स मैक्स्पिनी ससारके उन थोडे महात्माओंमेसे हैं जो मरी हुई जातिको अपना प्राण देकर नया जीवन दे जाते हैं। जिस देशमें मेक्स्विनी पैदा हुए वह भारत के समान आत्मसम्मानरहित तथा चरित्रभ्रष्ट देश नहीं है। आयलॅण्डमें प्राय ३०० सालसे स्वाधीनताका युद्ध चल रहा है। इस अवधिमे पहा कई वीर ऐसे पैदा हु हैं जिन्हें पाकर कोई भी जाति गर्व कर सकती है। टोन, उल्फ, मिचल, माइ- केल डेविट आदि स्वाधीनताके उपासक जिस भूमिमें जन्मे हैं वह धन्य है। जिस जातिके लिये इमन डे चलेरा, काउन्टेस मार्केविग्ज, ओकेनल सरीरो नेता लहे और लड रहे हैं वह गुलाम नहीं रह सकती। किन्तु जिस राष्ट्रने एक टेरेन्स मैक्स्विनीको जन्म दिया है वह ससार भरको स्वतन्त्रताका पथ दिखानेका दम भर सकता है। टेरेन्स विस्वनी १८७६ ई०की २८ वो मार्चको कार्कनगरमें पैदा हुए। छोटेपन में ही उनके पिता मर गये। इससे सारे परि-

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वारके पालन पोषणका भार उनकी माताके सर पड़ा। इस वीर
महिलाने अपना धर्म नियादा। मैषिस्वनीको बचपनसे ही
राष्ट्रीय शिक्षा मिली। आयलॅण्डमें उन दिनों रेडमएडके दलका
प्रभुत्व होनेके कारण यद्यपि देशमें मनुष्यता कम रह गयी
धी तौमी इधर उधर कई लोग स्वतत्रताके भावोंको हृदयके
अन्दर ढककर हिफाजतके साथ बचाये हुए थे। कार्क नगरमें
ऐसे लोग बहुत घसते थे। उन दिनों वहीं यह एक रिवाज
सा पड़ गया था कि छोटे बच्चे सप्ताह भरमें कोई न कोई।
कविता याद करते थे और रविवारको अपने माता पिताको
सुनाया करते थे। कविता राष्ट्रीय होती थी। इसमें विद्रोहफे भाव
जितने अधिक होते थे उतनी ही अधिक वह पसन्द को जाती
थी। मैक्स्पिनीके पिता कट्टर देश भक्त थे। मैक्स्विनीने उनसे
राष्ट्रीयताकी शिक्षा ली । मैक्स्विनीने अपनी मातासे कई गुण
सीखे। उनकी आध्यात्मिकता, भगवानपर अटल विश्वास और
धर्ममें हद भक्ति-ये गुण उन्हें अपनी मातासे मिले थे।
उन्हें स्कूली शिक्षा भी अच्छी मिली थी। उस समय
मायले एडमें हजारों राष्ट्रीय स्कूल थे । उनका एक घोर्ड भी था
विन्तु इनकी हालत वर्तमान समयके भारतके राष्ट्रीय स्कूलोसे
कुछ ही अच्छी थी। राष्ट्रीय विद्यालयोंकी यह दुर्दशा देखकर
जातिके कई शिक्षाप्रेमी हितैपियोंने अपने स्कूल अलग खोल रखे
थे। फार्कमें कुछ रोमन कैथलिक पादरियोंने ऐसे कई स्कूल स्था
पित कर रखे थे। यह उन राष्ट्रीय स्कूलोंसे कई दर्जा अच्छे
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जो चन्दा वसूल करना और लडकोंको बिगाडना अपनाधर्म सम झते हैं। गैविस्वनीने इन देशके दुखसे दुखो पादरियोंके स्कूलमें शिक्षा पायो। ये देशप्रेमी धर्मात्मा अपनी स्वतन्त्र पुस्तकें पढाते थे किन्तु इएटरमिडियट दर्जे में घोर्डद्वारा निर्धारित इतिहासकी कुछ रही किताबें पढ़ानी पडती थीं । ये लाचार होकर उन्हें पढाते थे किन्तु अगर मगरके साथ ये पताते थे कि इन इतिहासोंमें जाति के विरुद्ध कौन कौनसी झूठी बात लिखी गयी हैं, इन झूठो धातोंके लिखनेसे लेखकको क्या लाभ हुआ है, छात्रोंकी क्या हानि होगी, आदि। ऐसे स्कूल में मेक्स्पिनीकी राष्ट्रीयताका बढना स्वामा विक था। मैक्स्विनी उन दिनों ध्यानमें मग्न रहता था और यह ध्यान सदा देशका होता था। वह स्कीमें बनाया करता था और ये स्कीमें देशोद्धारकी होती थी। उसके पिपपमें यह कहा जा सकता है कि जन्मसे ही उसे मातृभूमिकी लगन थी। एक बार उसके घरमें राकफेल्लरको अतुल सम्पत्तिकी वर्वा छिडी । सबसे पूछा गया यदि तुम्हारे पास इतना धन होता तो तुम क्या करते ? जय मैक्स्विनीकी यारी आइ उसने गम्भीरता- से उत्तर दिया "मैं आयलैंडको स्वाधीन करना।" दर्ज में जय आयरिश इतिहासपर पादविवाद होता था तो मैक्स्विनी में देशप्रेमका यह भाव बहुधा स्पष्ट रूपसे दिखायो देता था। मेक्स्पिनीने १५ सालकी उम्र में स्कूल छोड दिया और कार्क की डायर एण्ड कम्पनीके यहां नौकरी कर ली। वह सदा प्रसन्नचित्त और कार्य में व्यस्त रहता था। मैरिस्वतीको व्यापा

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(४)
रिक जीवन पसन्द नहीं था किन्तु उसकी सदा यह आदत रही
कि जो काम हाथमें लेता उसे पूरा कर छोडता। इसलिये वह
थोडे ही दिनों में एकाउण्ट एट हो गया और सन् १९११ ई० तक
यही काम करता रहा । १९११ में वह व्यापारका अध्यापक हुआ
उसे पढ़ने की धुन थी, इस यातकी प्रल इच्छा थी कि मैं पी०
ए० पास कर लूं। इसलिये वह पढने लिखने में सदा व्यस्त रहता
था। दिन भर आफिसमें काम करता, रातको माठ बजे । सो
जाता और दो बजे रातको उठकर अध्ययन फैरता । इस प्रकार
यडी चेष्टा करके सन् १९०७ ई० में उसने ची० ए० डिग्री प्राप्त
कर ली।
२-राष्ट्रीयताका उदय
मैक्स्विनी स्कूल छोडनेके,समयले ही विवार कर रहा था
कि कौन दल देशका उद्धार कर सकता है। उस समय फोनि.
यन दल सावशेष था। यह दल मायलैंण्डको स्वाधीन न कर
सका था किन्तु इसके सदस्योंको विश्वास था कि इस पीढोमें
नहीं, दूसरी पीढीमें नहीं, किन्तु कभी न कभी तो आयलण्ड प्रजा
तन्त्रवादी स्वतन्त्र राष्ट्र बनेगा ही । मैक्स्विनी यद्यपि विश्वास
फरता था कि राष्ट्रको स्वाधीन करनेका काम शीघ्र आरम्भ,क
रना चाहिये तौभी यह कुछ कुछ इसी दल में मिला । १८६६में इन्होंने
'यग आयलैंड सोसाइटी खोली । यह नवयुवक-दल-रचनात्मक
कार्य, देशी भाषाका प्रचार, आयरिश उद्योग धन्धोंका पोपण और
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ब्रिटिश फौजमें आयरिश सिपाहियोंको मरती न होने देनेका उद्योग करना चाहता था ! इस योव , सिनफिन आन्दोलनका जन्म हो रहा था। १८६६ में आर्थर ग्रिफिथने 'यूनाइटेड थायरिश- मन' नामक पत्र निकाला । इस पत्रके द्वारा यह सब समितिया सघपद्ध कर ली गयीं जो इङ्गलैण्डसे अलग होना और पुले आम आयरिश स्वतन्त्रताका प्रचार करना चाहती थी इस प्रकार सिनफिनका बीज बोया गया और नीति निर्धारित की गयी। विस्वनीको यह विश्वास हो गया था कि जयतक आयरिश भाषा देश भर में नहीं फैलेगी तयतका देशका कुछ काम नहीं हो सकता । 'गेलिक लीग'ामक सस्था आदिनों आयरिश भापाका प्रचार कर रही थी। मैक्स्पिनी इसमें भरती हो गया। उसने यदे कहे परिश्रमसे आयरिश भाषा सीखी और देहातमें रहकर उस- का प्रयोग समझा ।। १९१० में 'आयरिश फीडम' नामक पत्र निकाला गया। इसने सिनफिन दलको नीति भली भाति स्पष्ट कर दी। इसमें साफ लिखा गया कि हमलोग उस विचार पर म्पराको लेकर बडे हुए हैं जिसे हमारे पहले नेता हमें दे गये हैं। हम इङ्गलैण्ड और आयलं एका पूर्ण विच्छेद चाहते हैं, हम आय- रिश प्रजातन्त्रक पक्षपाती है। इस पत्र निकलते ही सब नवयुवक इसकी तरफ हो गये गौर रहना चाहिये कि सारा आयलैंड उसी तरफ गया। मैफिस्कनो भी इसमें था। मैषिस्त्र- नीकी पुस्तक 'स्वाधीनताके सिद्धान्ल' इसी क्रमश छपी थी। इस समय लोग आश्चर्य करते हैं कि मेविम्वनीको किस प्रकार

सदा सर्वत्र
होंगे।
आयलैंडकी भावी दशाका ज्ञान पहले ही हो चुका था। किन्तु
यह पुस्तक एककालीन या एकदेशीय नहीं है। इसके सिद्धान्त
लागूह
३-आयरिश स्वयंसेवक
आयलैंडके लिये वह समय बडे सौभाग्यका था जब ब्रिटिश
सरकारने अल्टरवालोंको स्वयसेवक दलमें भरती होने का अधि
कार दिया । यह रियायत इसलिये की गयी थी कि अल्प्टर मग.
रेजी साम्राज्यकी छत्रछायामें रहना चाहता था। किन्तु इङ्गलेण्ड
के बडे बडे राजनीतिज्ञ ऐसी चूक कर गये कि इसके लिये वे
अबतक पछता रहे है। आयलैंडके नवयुवकोंने इस बाझाका
स्वागत विया । वे ताड गये कि आयलैंडका अप मौका आगया
है । जब अल्टरमे स्वयसेवक भरती हो सकते थे तो और
जगह उन्हें कौन गेक सकता था। बस धूम मच गयी।
जो नवयुवक रात दिन सोचा करते थे कि मायलैंडकी
पटने किस प्रकार खडी की जा सकती हैं वे हर्षसे नाचने लगे।
सारे भायलैंडमें स्वयसेवकोंकी भरती होने लगी। थोडे हो
दिनों में ३० हजार स्वयसेवक भरती हो गये। इसमे सन्देह नहीं
कि उनके पास हथियार बहुत थोडे थे किन्तु उनमें उत्साह था,
वे शिक्षा प्राप्त कर रहे थे और उन्हें विश्वास था कि समयपर
हथियार भी मिल जायगे। यह उत्साह देखिये, फई बूढे भो
इसमें भरती हो गये।
मैघिस्लनीके लिये भरतीका यह मान्दोलन ईश्वरकी महान्

रुपा थी। भगवानने उसे स्वभावसे ही सैनिक पैदा किया था। वह जी जानसे इस भान्दोलनमें कूद पडा। सप्ताहमें एक यार डिल होती थी किन्तु यह सारे सप्ताह रणनीतिका अध्ययन करता था। उसे पूरा भरोसा था कि आयलैंण्ड का उद्धार ये म्वयसेवक ही करेंगे जो समय आनेपर नियमित रूपसे सेनामें भरती किये जाते हैं। मैकिस्बनीको अपनी विजयपर पूरा विश्वास था । उसे कभी यह सन्देह नहीं होता था कि आयर्लएड वन न्त्रताके युद्ध में हारेगा । उसने अपना उत्साह, उमङ्ग और आशा स्वयसेवकों में भर दी। आयलैंडमें धडाधड स्वयसेवक भरती होने लगे किन्तु नरमदलगालोंने अपना सारा जोर इस आन्दोलनके विरुद्ध लगाया। किन्तु जिस जातिमें स्वतन्त्रताके भाव पैदा हो जाते हैं वहा पुछ इने गिने स्वार्थी लोगोंको छोडकर सभी मातृ-भूमिके सैनिक हैं । उन्हें भरती होनेसे कौन रोक सकता है। नरमदलवाले कुछ न कर सके । अन्तमें उन्हें स्वय भी भरतीमें भाग लेना पड़ा। कुछ दिनों बाद इङ्गलैण्ड की जर्मनोले लडाई छिड गश । मैक्स्विनी आदि प्रजा तन्त्रवादियों ने समझा कि अब मौका आ गया। इस वक्त यदि इङ्गलैण्ड दबाया जाय तो उसे भागने में देर न लगेगी। किन्तु रेडम. एडने इन स्वयसेवकोंका प्रयोग गलैण्डकी सहायता करने के लिये करना उचित समझा। बस सय स्वयसेवक इङ्गलेण्डकी तरफ होने लगे। मैक्स्विनी घबराया और उसने इङ्गलैण्ड के विरुद्ध आन्दों ल्न शुरू किया। स्वयसेवकोंमें दो दल हो गये। २ लाख स्वयसेवकोंमेंसे फुल ८००० प्रजातन्त्रवादियोंकी तरफ. रहे । कार्ककी स्थिति और भी खराब थी। किन्तु मेक्स्विनीने घड़ी शान्तिसे काम लिया। वह जितने स्वयसेवक मिले अन लेकर गाव गाव फिरा और नये स्वयसेवक भरती करनेकी चेष्टा की। यह उत्साह देखकर अन्य स्थानोंके और स्वयसेवकों ने भी रङ्ग- रूट भरती किये। -१६२४ की १६ वी सितम्बरसे कार्कसे 'फायनाफेले' नामक साताहिक पत्र निकला। इसका सारा भार मैपिस्वनीपर था। इसके लेखोसे आयरिश जातिमें नया उत्साह । पैदा हुआ। जो पीछे हट गये थे वे आगे बढे। इसके पहले अङ्कमें मैक्स्विनीने लिखा कि - "वर्तमान सकटके कारण यह पत्र निकाला जा रहा है । यह समाचारोका नही, सिद्धान्तोंका प्रचार करेगा। हम भायलैंण्डके लिये कमसे कम यह चाहते हैं कि वर्तमान अवसरसे भायलेण्डके लिये वह राजशक्ति प्राप्त कर लें जिससे यह बाहर भीतरका अपना इन्तजाम निज ही करे।" एक दूसरे अद्दमें उसने लिया, "हम आयलैंडमे आग लगा देना चाहते हैं। हमारा विचार है कि हमारा व्यक्तिगत बलिदान इस कार्यके लिये बहुत कम है । जरा घलिदानका अर्थ तो सम झिये । आयलै एडमें शत्रुका रक्त यहाया जा सकता है किन्तु पहले उसका नहीं बहाया जाना चाहिये क्योंकि इससे प्रति. हिसावृत्ति जागृत हो सकती है। किन्तु आयरिश भूमिमें पहले आयरिश रक्क बहाना चाहिये। फिर आप देखेंगे, स्वाधीनताका - उद्धार करने के लिये ऐसा जहाद आरम्मा होगा जिसे शैतान की सारी शक्तिया नहीं हरा सकतीं। हमें मिचलके वे शन्द याद रखने चाहिये जो उसने फासीपर चढ़ते समय वीर गर्जनके साथ लार्ड क्लारेण्डनसे कहे थे, 'माइ लाई। मैं जानता था मुझ फासीपर लटकना पडेगा, किन्तु मैं यह भी भली भाति जानता था कि विजय मेरे साथ रहेगी और मेरे साथ है। हम इस विजयका महत्व नहीं समझे हैं किन्तु अब शीघ्र समझ जायगे। हमें समझना चाहिये विजय दो प्रकारकी होती है और मिचल. की जैसी विजय सासारिक विजयकी सीढी है। हमारे स्वय सेवक अभी तत्पर नहीं हैं, उन्हें पूरी शिक्षा नहीं मिली न उनकी परीक्षा दी हुई है। आवश्यकता है कि मिचलके उक्त सिद्धातका प्रचार हो जिसमें वे कार्यसाधन या मरण के लिये सदा तैयार रहें। एक शुद्ध बलिदान यह काम कर सकता है। यह उनकी आत्मामै नयी रह फू केगा और देवी ज्योति जलावेगा और आप लैंडका भाग्य उनके हाथों में सुरक्षित रहेगा।" इस पत्रका अन्तिम अडू उसी मालकी पाचवीं दिसम्बरको निकला । उसके बाद सम्बन्धविच्छेदी पत्र मायलंडमें बन्द कर दिये गये । इस पत्रके लिये मैक्स्पिनीको अपना प्यारा पुस्तकालय वेंच-देना पडा । शायद ही कभी वह इन पुस्तकोंको वेचता किन्तु देशके नामपर उसने यह पलिदान क्यिा:- पनके फुल ११ अङ्क निकले पर वह अपना काम कर चुका था। १९१५ में मायरिश जातिको मा खुली। उसने देखा, कि प .

साम्राज्यके लिये स्वयसेवक बनना 'नादानी है। इस बीच मैक्स्विनीने पूरी चेष्टा की कि उसके दिलमें स्वयसेवक भरती हो । अबतक वह फुरसत निकालकर स्वयसेवक भरती करता था किन्तु उसने अब नौकरी छोड दी और सारा समय इसी काममें लगाया । वह अपनी घाइसिकलपर कार्कके जिले भरमें दौरा करता था और जहा 'जाता था वही आग भडका देता था। १९१६ के आरम्भमें ही उसने कार्क जिलेको उत्तम रूपसे सङ्गठित कर दिया । उसका उन दिनोंका परिश्रम देखकर मुहसे यही शब्द निकलते हैं-'यदि स्वाधीनताका उपासक हो तो ऐसा हो । । ४-पहली गिरफ्तारी। गवर्नमेण्ट फोरन ताड गयी कि मैक्खिनीने आयलैंडमें राज- विद्रोहको आग फैलायी है । वस, १३ जनवरी १९१६ को मैक्स्विनी अपने घरपर गिरफ्तार कर लिये गये। मकानकी तलाशी ली गयी कि कहीं हथियार छिपे हुए न हों। माल बरामद नहीं हुआ किन्तु पुलिस कागज-पत्र उठा ले गयी। मैविस्वनीके ऊपर यह अभियोग लगाया गया कि तुमने दूसरी जनवरीको बालिनोमें राजद्रोही भाषण दिया। मैस्विनी महीनों हवालातमें सडते रहे । पालीमेएटमें सवाल पूछा गया उत्तर मिला कि मैविस्व नीका अपराध बहुत बड़ा है किन्तु धीरे धीरे रहस्य खुला कि मरिस्थनोके पास उनके छोटे भाई जानकी विहिपा थी जो उस समय बर्लिनमें था । सन्द यह हुआ कि आयरिश स्वयसेवक नर्मनीसे मिले हुए हैं और उनके फोपमें जर्मनीका रुपया है। बुफिया पुलिसके पडे घडे दिग्गजोंने माथा लडाया कि इन पत्रों में शब्दों का इन मों में प्रयोग हुआ है । जान में विस्वनी गिरफ्तार कर लिया गया। उसके कागज पत्रोंकी तलाशी हुई। किन्तु कहीं भी इस जर्मन पडयंत्रका पता न चला । यह यर्लिन जर्मनीकी राजधानी नहीं किन्तु एक अन्य स्थानका नाम था । मामला शुरू हुआ। बड़े दाव पेंच खेले गये। किन्तु मजिष्ट राष्ट्रीय दलके थे। उन्होंने हसी मजाककी तौरपर मैरिस्पनीको एक शिलिग जुर्माना किया। इस निर्णयसे माय रिश स्वयसेवक भरती करने में बडी सहायता मिली। उपर जनता में इङ्गलेण्ड की ओरसे लडनेका उत्साह धीमा पड गया। आयरिश रिपब्लिकन प्रदरहुड यथाशीघ्र घल्या करने की तैयारी करने लगा गवर्नमेण्ट यह देखकर घबरायी कि आयलें ण्डमें ब्रिटिश सेनाके लिये रङ्गकट तो मरती नहीं हो रहे है और आयरिश स्वय सेवकों का दल बढ रहा है । २३ अप्रेल सन् १९१६ ई० का दिन सारे देशमें एक माथ गदर करनेका नियत किया गया। मैक्स्विनी यगावतका पूरा पक्षपाती था। जय दिन निकट आने लगा उसकी नींद और भूष हराम हो गयी। यह दिनभर दौड धूप मचाता था और रातको सोचता था कि किस प्रकार सफलता प्राप्त होगी। उसके भाग्यसे वह दिन आ गया था जिसके घन वह छोटेपनसे देखा करता था ! सब तैयारिया हो चुकी थी, ( .१२) म्वयंसेवक माशा लगाये हुए थे भर, कलको देश उठ खडा होग किन्तु २२ अप्रेलके पत्रों में स्टाफके मुखिया प्रोफेसर मैक्नी लकी सूचना छपी कि "फिसी बड़े सकटके कारण। वह आश रह फी जाती है जो आयरिश स्वयसेवकों को फल के लिये दी गय थी।" इस माहासे २३ तारीखकायलया रुक गया। आयरि रिपब्लिकन ब्रदरहुडने आमा निकालो कि २४ तारीख बलवा किया जाय । इस गडयडीसे कहीं यलगा हुमा, कहीं नहीं हुआ। कार्कमें कुछभी नहीं हुआ। कार्कके लार्डमेयर पहा स्वयंसेवकोंस सन्धि करने आये और उनस, इथियार सौर देनेको कहा । शर्त यह थी कि स्वयसेवकोंको दण्ड न मिलेगा किन्तु बचन तोडा गया और तीसरी मईको मैक्स्विनी गिरफ्तार कर कार्कफे जेल में बन्द कर दिये गये । हफ्ते भर यादवे डब्लिन भेजे गये और वहासे चेकफिल्ड जेलमें पहुचाये गये और अन्तमें उत्तरी वेल्सकी फगाफ छावनी में नजरबन्द किये गये । सारे देशमें सनसनी फैल गयी और यही यात बलवाई चाहते थे। वे खूध जानते थे कि बलवा वर्तमान यलहीन स्थितिमें सफल नहीं हो सकता। किन्तु जब कई बढे बहे देशमक स्वतत्रताके इस युद्धमें अपने प्राणोंकी आहुति देंगे तो उन मदों में भी जान आ जायगी जो जातिद्रोही और कायर हैं। फल यही हुआ देशको चेतनता विजुली दौड़ गयो । आयरिश लोकमत यलोके पक्षमें अगस्त महीने में गवर्नमेएटने समझा कि इन नेताओं को लोगोंकी पहुबसे बाहर रखना चाहिये । इसलिये ये लोग रीडिंग हो गया । जेर में रखे गये । दिसम्याकी २४ तारीखको ये सप छोड दिये गये । इङ्गलेएड के प्रधानमंत्रोने कहा कि हम इस कार्यद्वारा माय- एडमें ऐसी स्थिति पैदा करना चाहते हैं कि यहाका लोकमत सन्धिके अनुकूल हो जाय । छुटे हुए नेताओंने फिर वही काम हाथ लिया जिसे ये छोडवार गये थे। फल यह हुआ किधी फरवरी सन् १९१७ ई०को मेविस्वनी फिर गिरफ्तार कर लिये गये और इनलैएडके वामयाई स्थानको भेजे गये । यहा ये नजरबन्दीमें ग्रो गये । जूनके अन्तमें यह आशा रह की गयी और मैक्स्विनी कार्कको लौट आये। उनकी रफ्तार घही रही जो पहले थी। अपतूबर में घे फिर गिरफ्तार किये गये। ६ माइकी जेल की सजा मिली। उन्होंने जेल के अन्दर भोजन छोड दिया और नबम्परमें वै बरी कर दिये गये । १६१८ के मार्च महीने में फिर गिर. फ्तार कर लिये गये। उनसे कहा गया अपनी ६ महीने की सजा पूरी करो। चौथो सितम्यरको उनके ६ महीने पूरे हुए और घे लके फाटकपर पाचते ही गिरफ्तार कर लिये गये और इगले एडकी लिङ्कन जेल में भेज दिये गये। इस जेलमें डे वेलेरा आदि नेता भी रपे गये थे। अभियोग यह था कि ये लोग जर्मनीले मिलकर पड्यन्त्र रच रहे है। इन सब बातोंसे आयलैंण्ड में प्रजातन्त्रको लहर बढती गयी। ५.--आयरिश प्रजातन्त्र - - -- जिन दिनों सिनफिनमें कम 'मादी ये उन दिनों उसकी $ - नीति पालीमेण्टको अस्वीकार करके आयरिश प्रतिनिधियोंको हटानेकी थी। किन्तु अय जयकि इसका जोर बन गया तो इसने अपने मेम्मर खड़ेकर मायरिश शासन-सभा बनानेकी सोची। इसका अर्थ यह था कि जय देशका बहुमत प्रजातादियोंको अपने प्रतिनिधि चुनकर इलेएडका राज्य नहीं चाहता है तो उनसे जयरदस्ती मनवाना असम्मर है। इस प्रकार 'डेल इरान' अर्थात् मायरिश शासन समाकी उत्पत्ति हुई। दिसम्बर १६१८ के चुनावसे मालूम हुआ कि १०५ मेम्परोंमसे ७३ मेम्बर प्रजा- तन्त्रवादी चुने गये हैं और अधिकाश चे हैं जो गजरबन्द इनमें मैम्धिनी भी चुना गया था। १६१६ के मई महीनेमे सत्र नजरबन्द छोड दिये गये। मायरिश शासन-सभाने अपनी मदालतें, अपनी पचायतें तथा बोर्ड स्थापन किये। मायरिश समयसेवक प्रजातन्त्रकी सेनामें परिणत हो गये । अत्र इगलैण्ड. के साथ नियमित रूपसे युद्ध भारम्भ हो गया। कार्कके चुनावमें टामस कर्टिन लार्ड मेयर चुना गया। किन्तु कुछ छद्मवेशी गु डोंने उसे गोली मार दिया। आयलैंडवाले कहते है ये गु'डे पुलिसवाले थे। जूरीने लायड जार्जको अपराधी बताया। इस स्थानकी पूर्तिके लिये मैक्स्विनी चुने - गये। मैक्स्विनी पदका भूखा नही था, किन्तु यह समय सकटका आगया था और लोग घबरा रहे थे। पहले लार्ड मेयर टामस कर्टिनकी हत्यासे यह आशका हो रही थी कि लाई मेयरका पदन्या तो खाली रह जायगा या इसपर अगरेज सरकारका कोई पक्षपातीरखा जायगा। ऐसी स्थिति मेक्स्विनीने जनताको ढाढस बंधानेके लिये यह पद स्वीकार किया। इस अवसरपर मैक्स्विनीने जो भाषण दिया उसमें उसने कहा था-"मैं एक सैनिकके रूपमें यह पद स्वीकार कर रहा ह। पहला लाई मेयर मारा गया है उसकी पाली जगह भरने के लिये मैं माया हू । यह समय साधारण नहीं है। पहले लार्ड मेयरको हत्यासे यह मालूम पडता है कि हमें भयमीत करनेका प्रयत्न किया जा रहा है। इस धमकीका उत्तर देना हमारा पहला कर्तव्य है। इसका उचित उत्तर यही है कि हम निर्मय, शान्नचित्त और अपने उद्देश्यमें हटे रहें। । यही बात दिखलाने के लिये मैं यह पद स्वीकार कर रहा है।x+xx हमारा यह संग्राम प्रतिहिंसावृत्तिको चरितार्थ करनेके लिये नहीं है। यह तो सहिष्णुताका युद्ध है। इसमें उनकी विजय नही होगी जो शत्रुको अधिक यन्त्रणा पहुंचायंगे किन्तु उनकी जो अधिक यन्त्रणा सह सकेंगे। साथ ही साथ हम अपना यह अधिकार भी नहीं छोड़ेंगे जिससे दुष्टों और हत्यागेको अपने अपराधका दण्ड दिया जाता है | Axx कमी२ अपने वर्तमान दु खसे छटपटाकर हम विना विचार मूर्ख- तासे चिल्ला उठने है कि हम घेहुत बडा बलिदान कर रहे हैं। 'किन्तु इसका कारण यह है कि जातिके शूरवोर और सबसे श्रेष्ठ रत्नोंको ही जीवनदान करना पड़ता है। इससे छोटा बलिदान "सका उद्धार नहीं कर सकता । इस कारण ही हमारा समाम धर्मयुद्ध है। इसे देशी रिये मरे हुए इन चीरोंके रकने - । " - पवित्र कर दिया है और यह शहीद हमारी विजयको पक्की , कर गये हैं। जो काम उन्होंने अधूग छोड़ा है यह हम उठा रहे ३, निभाना भगवानके हाथ है। हम तो अपनी वारीमें अपना बलिदान चढानेको आये हैं। हम निरपराधका रक बहाने नहीं पाये, हम तो अपना खन बहायंगे और यह सब अपने देशके उद्धारके लिये। शत्रुसे हम साफ साफ कहेंगे हमको दया नहीं चाहिये और न हम आपसे कोई समझौता करेंगे। किन्तु दयामय गवानसे हम हाथ जोड प्रार्थना करे गे 'हे भगवन् । हमें शक्ति जिये जिससे धैर्य के साथ काम कर सकें, चाहे कितने ही कर इयों न पाय देशको विजयी घना दें," , पाठक इससे मालूम करेंगे कि किस भयानक समयमें मैक्स्विनीने लार्ड मेयरका कटपूर्ण पद स्वीकार किया था। मेक्स्विनीने जी जानसे प्रयत्न किया कि कार्क नगरमें प्रबन्ध रहे। सुबह दस बजे वह माफिस जाता था और रात इस बजे वापिस माता था। उसे दिखाना था कि प्रजातन्त्र- आदी आयलें एडमें स्वराज्य ही नहीं किन्तु सुराज्य भी रख सकते हैं। इस पदके साथ साथ मैक्स्विनी उन दिनों कार्क ब्रगेडका कमाडिंग अफसर भी था। जहा कहीं प्रजातन्त्रवा- देयोंने म्युनिसिपलिटियों तथा अन्य योडों को अपने हाथमें लिया ही इमानदारी, कमखर्ची और अपने अच्छे । इन्तजामसे जनताको अपने वश में कर लिया। यह देखकर ब्रिटिश विर्नमेण्टघबरायो । उसने उनकी अदालतें बन्द कर दी, म्युनि- - 1

सिपलिटीके पडे बडे पदाधिकारियोंको गिरफ्तार कर लिया
और प्रजातन्त्रवादियोंको दयानेकी प्रबल चेष्टा की।
१२ वीं अगस्तको रातके ८ बजे कार्कके सिटी हालको भी
सेनाने घेर लिया। मैक्स्विनी और उसके दस साधी गिरफ्तार
कर लिये गये। इनपर न कोई अभियोग लगाया गया न
तलाशीमें कोई सदेहजनक वस्तु वहा मिली। रातको १२ बजे
सिटी हालपर फिर दूसरा धाया हुमा और मैक्स्विनीकी
चिट्ठियोंका निजू दराज खोला गया जिसमें कुछ कागजपत्र
मिले । इन कागजोंके आधारपर ४ अभियोग लगाये गये। कोर्ट
मार्शलमें इनका मामला किया गया। इस मामलेकी रिपोर्ट
'कार्क इग्जमिनर' नामक स्थानिक पत्रके १७ वीं अगस्तके अड्डमें
इस प्रकार छपी थी.-
"लार्ड मेयर राइट मोनरेबल टेरेन्स मैक्स्विनीने गिरफ्तारीके
बाद भोजन नहीं किया था। उनमें दुर्वलताके चिह्न प्रकट हो रहे
थे। एक आराम कुसीपर वह पिठलाये गये। दोनों तरफ
बन्दूकधारी दो सिपाही खड़े थे। इनके कई मित्र और साथी
वहा उपस्थित थे। जो भादमी अदालतमें आता था उसका
नाम धाम पूछकर रजिस्टरमें लिखा जाता था और उसकी
तलाशी ली जाती थी। जव लार्ड मेयरसे पूछा गया "क्या
तुम्हारा कोई वकील भी है ? तो उन्होंने उत्तर दिया "मैं तुम्हारी
कार्रवाई के बारेमें एक यात कहना चाहता हु। तुम्हारा और
मेरा सम्पन्ध यह है कि मैं कार्कका लार्ड मेयर, इस

( १८ ) रका सबसे बड़ा मजिष्ट्रट ह और मैं घोषणा करता है कि नारी अदालत गैरकानूनी है। आयरिश प्रजातन्त्रक कानूनों के सार इसमें भाग लेनेवाले गिरफ्तार किये जा सकते हैं।" इसके बाद सरकारी वकीलका ययान हुआ और कई की गवाहिया हुई। अन्तमें मजिष्ट्रटने मेपिस्वनीसे पूछा "आपको कुछ कहना है ?” मैक्स्विनी कुर्सीसे उठने लगा तु मजिष्ट्रटने कहा-"नहीं, आप कमजोर हैं, धैठे रहिये।" मेयरने उत्तर दिया- आपकी कार्रवाई समाप्त होनेतक मैं रह सकता है। उसके बाद मैं जीऊ या मक एक बात मैं कह चुका है कि आपकी कार्रवाई गैरकानूनी है। मैं कुछ कहना चाहता इ वह अपने बचायके लिये नहीं। आप समझेंगे और बहुत शीघ्र समझेंगे कि आयरिश प्रजातन्त्र तवमें विद्यमान है । मैं आपको स्मरण दिलाना चाहता हूँ कि अपराध किसी राष्ट्रके प्रधानके प्रति किया जाता है वह से बडा है और उसकी अवैधता और भी बढ़ जाती है जब ऐसे पुरुषको गिरफ्तार करने के साथ साथ उसका मकान :कमरा जबरदस्तीखोला जाता है और वहासे उसके कागज- उठा लिये जाते हैं। महाशयो। मैं थोडी देरके लिये स्थिति ट कर मापको कटघरे में रखना चाहता है। मेरी तलाशीमें कागज़ ऐसा मिला है जिसमें जूरीने मेरे भूतपूर्व पक्षधि. की हत्याके विषय में ब्रिटिश गवर्नमेण्ट और उसकी पुलिस- एकमत होकर उनका अपराधी बताया था। अब आप स्पष्ट रूपसे समझ सकते हैं कि आज इस गैरफानूनी अदालतमें भी पहले इस.यातका फैसला होता, किन्तु यह कागज छिपा दिया गया है। ऐसा करना उन खूनियोंका अपराध सिद्ध करना है। इससे आप समझ सकते हैं कि मेरी स्थिति सकटपूर्ण है क्योंकि मैं किसी समय मारा जा सकता है । माप शायद पहले कागजको छिपाकर किसी दूसरे आदमीपर अभियोग खडा करना चाहते हैं, किन्तु मैं कहगा कि इन सपका जिम्मेवार मैं है । आप लोगोंने एक मजेकी पात और की है। मैं एक चिट्ठी पोपको लिखी थी। वह भोलिपर प्लकेटको दीक्षा देने के समय लिखी गयी थी। वह पोपके पास पहुच चुकी होगी। जब वह पह सुनेंगे कि यह पत्र भी मेरे पास रहनेसे राजविद्रोही गिना गया है तो क्या ही हंसेंगे।" इसपर सरकारी वकीलने कहा--"इस पत्रके कारण आपपर कोई अभियोग नहीं लगाया गया है। यह पत्र आपको लौटा दिया जायगा । "यह सुनकर लाई मेयर बोले" --अय इतने दिनों बाद इस भूलसुधारसे कोई लाभ नहीं। हा, मेरी एक और चिट्ठी पुलिस ले गयी है। वैरिसफी म्युनिसिपल काउन्सिलके अध्य- यह पत्र मेरे पास भेजा था जिसमें कार्कके घदग्गाहके विप. यमें कई बातें पूछी गयी थी। मैंने इसका उत्तर दिया और जवायकी एक नकल अपने पास रख ली। अब ञ्च सरकार यह सुनकर खूब ह संगी कि पैरिसको म्युनिसिपलिटीके अध्यक्ष- के लिये यह अपराध है कि वह मुझसे पत्रव्यवहार करे और मेरी 1 (२०) जयमें रहनेसे यह पत्र राजविद्रोही हो गया है। और लीजिये। ई विदेशीपन-संपादकोंके विजिटिंग कार्डस तलाशी में मिले और वे भी राजविद्रोही गिने गये । मुझे इन बातोंकी कुछ परवा नहीं है। किन्तु यह मनुचित है कि दूसरोंको फंसानेके लिये एक स्था. नपर मिले हुए कागज दूसरे स्थानपर मिले हुए बतलाये जायं । इस विपपमें सैनिकों और अफसरों ने विश्वासघात किया है। मैं साफ साफ कहूंगा कि मुझे यह देखकर बडा दुख हुआ क्योंकि मैं आयरिश प्रजातन्त्रका सैनिक हू और प्रत्येक सैनिकका मादर करना चाहता हूँ। मैं फिर उन राजविद्रोही शब्दोंकी याद दिलाता ह जो मैंने अपने निर्वाचनके समय कहे थे। मैंने कहा या "मैं किसीसे दयाकी मिक्षा नहीं मागता और न समझौता ही करना चाहता हू । मैं यही सिद्धान्त मानता है, मैं कोई दया नहीं चाहता।" लार्ड मेयरको कैदकी सजा दी गयी। उन्होंने कहा-"मैं यह कह देना चाहता हूं कि आप मनवाही सजा दीजिये किन्तु में शीघ्र ही इसका अन्त कर दूगा । मैंने वृहस्पतिवारसे कुछ नहीं आया है इसलिये मैं महीने भरमें ही मुक्त हो जाऊगा।" इसपर अजिष्ट्रट बोला--"क्या कैदकी सजा मिलनेपर आप भोजन करना छोड़ देंगे १०लाई मेयरने उत्तर दिया-"मैं सिर्फ इतना को कहना चाहता हूँ कि मैंने अपनी पराधीनताका समय निश्चित कर लिया है। अब आपकी सरकार चाहे जो करे। जिन्दा रह मर जाऊ किन्तु महीने भर भीतर स्वाधीन हो जाऊंगा।"

( २१) उनको दो सालको सजा हुई। दूसरे रोज सुबह तीन और चार बजे के बीच जहाजपर सपार कराफर घे बेल्स पेरोक एकपर पहुचाये गये और लएडा मेज दिये गये। १८ अगस्तकी उपदको ४ यजे पे प्रिक्सटन जेलके गवर्नरको सौंप दिये गये। अप उस यन्त्रणाका भारम्भ हुमा जो ससार, उथल पुथल मचा गयी। ६-महात्माका अनशन व्रत निक्सटन जेल में जो धीरता मरिस्थनीने दिपलायी वह उसे ही नहीं सारे आयलैंडफो अमरपरगयी है । मेक्सिनीने प्रण किया था कि महीने भरमें स्वाधीन हो जामगा। पतितोंके उद्धारक भगधानने कहा-"तुम सदा स्वाधीन हो, किन्तु उन गिरे हुए लोगोंको अपने अपूर्व त्याग और सहिष्णुताके उदाहरणसे उठा जामो जो गुलामीको गलेका दार समझ कर उससे चिपटे हुए है।" इसलिये महात्मा मैपिस्वनीने तिल तिल करके अपना मास और अपनी हसी उन देवताओंको पिला दी जो यिना इतने घडे फूर यलिदानफे पराधीन देशको जगानेको तैयार नहीं रहते । इस विषयपर लार्ड मेयरके पादरी फादर डोमिनिकने अपनी माखों देखी जो थातें लिखी है हम यहा उनमें से कुछ देंगे। पाठक ध्यानसे पढ़ें और मनन करें कि देशका कार्य उन लोगोंसे नहीं होता जो जेल्में जाकर चोरीसे भी पूरी फचौडी पाते हैं, माल- पुवे उडाते है और इतना साहस नहीं करते. कि कमसे कम

( २२ )
ग्रेट, तमाखू आदि दुर्गुण तो छोड़ दे जिनका व्यवहार करनेसे
धारणसे साधारण नौकरशाहीके कर्मचारी-जेल दारोगाके
नमने उनकी त्यागी महान्-मात्मा झुक जाती है। सुनिये,
दर डोमिनिक क्या कहते हैं-"मैं वीसवीं तारीखको लेडी
परके साथ लण्डनके लिये रवाना हुआ। दूसरी सुबह वहा
इचा । लाई मेयरको देखते ही मालूम हुआ कि इनकी हालत
हुत पराय है। चेहरा पीला पड़ गया था, मुह सूख गया था
र कमजोरी अपना राज्य जमा चुकी थी।
किन्तु बुद्धिति
ल स्पष्ट थी और वह दूढप्रतिज्ञ थे कि भले ही उनकी जान
ली जाय किन्तु वे जेल के बाहर निकल कर रहेंगे। वह अस्प
लके उस, कमरे में थे जहाँ आयलैंण्डका सिंह रोजर केसमेण्ट
दी था। कई अगरेजी पत्रोंने छापा था कि लार्ड मेयरने भोजन
कर दिया है या उठनेके योग्य हो गये हैं, आदि । यह सब
तें सरासर झूठ थी। लार्ड मेयरने गिरफ्तारीके याद भोजन
या ही नहीं। लार्ड मेयर मैक्स्विनी निकतटन जेलमें
दा शान्त होकर पलगपर लेटे रहते थे। कारण यह था कि
अपनी जीवनी शक्तिको सुरक्षित रखना चाहते थे। देशके
ये मरनेको तैयार रहते हुए वह यह देखनेको यहे इच्छुक थे
आयरिश झडेको ससारकी जातिया सलामी दें।"
"कलम दम नहीं रखती कि उनकी दारुण यन्त्रणाओंका वर्णन
। सोचिये और अनुभव करनेकी चेष्टा कीजिये कि तुम्हारे ,
धेर्मे, पीठमें, घुटनोंमें तथा बदनके प्रत्येक जोडमें कितना दर्द
-
-

( २३ ) होगा यदि एक दिन भी लेटे रहना पड़े। ऐसी स्थिनिमें घुटनों- को हिलाने डुलानेसे कितना आराम मालूम पडता है किन्तु इस चीर सैनिकको यह माराम भी न मिला । उसके घुटनोंका मास सूख गया था और उसमें इतनी ताकत भी न थी कि वह अपने यदनके कपडोंका भार ही उठा सके । एक दिन नही सत्तर दिन तक लगातार इस वीरने यह यातना सही। इस कार और यन्त्र णाके साथ साथ अनशन व्रतको तकलीफ थी। मुझसे कहा गया था कि कुछ दिन भूसे रहने के बाद फिर खानेकी इच्छा ही नहीं रहती। मैंने लार्ड मेयरसे इस विषयपर प्रश्न किया । उहे येहोश होनेके दिनतक भोजन करनेकी इच्छा थी । एक बार तो उन्होंने कहा कि मैं एक प्याला चायके लिये इस भूवकी हालत. में एक हजार पाउण्ड भी दे देता । ज्योज्यों भोजन न मिलनेसे खून फम होता गया उनको स्नानिक दुर्घलताने घर लिया उनको हृद्रोग हो गया, सिरमें सू चुभनेके समान दर्द होने लगा, मा अन्धी होने लगी और कान बहरे होने लगे। उस समयकी मानसिक व्यथाका विचार कीजिये जब वह अपनी पतो, बहन और माइयोंको देखते थे ।इनके उपस्थित रहनेसे उन्हें आराम भी था, किन्तु इनसे अलग होनेका दुख और यह विचार कि मेरा दुख देखकर इन लोगोंके हृदय में क्या भाव उठते होंगे उन्हें घोर कष्ट दे रहा था। इसपर भी वह न कभी गिडगिड़ाये और न नाममात्रको डगमगाये। उन्होंने ईश्वरको धन्यवाद दिया कि उसने उन्हें यह मौत दी है जो संसारमें कम लोगोंके भाग्य- - ( '२४ ) िहोती है । डाक्टरों और दाइयोंने अच्छी सेवा की किन्तु अन- न व्रतके कारण यह लोग भी उनसे नाराज थे। वे इस घेव. कफी समझते थे। लार्ड मेयरको समझाने बुझाने की चेष्टा करके, नके परिवारकी याद दिलाकर और यह कहकर कि यदि आप तीते रहते तो आयलैंण्डके लिये कितना काम कर सकते थे न्होंने इनको घडा दुःख दिया। अपनी यन्त्रणा 'भूलकर गर्ड मेयरको उन साधियों को याद थाती थी जो कार्ककी लमें कैद थे। वे नितप्रति उनका समाचार पूछने थे और उनके लिये प्रार्थना करते थे। उन धीरोंके विषयमें हि कहते थे कि जबतक हमारे पास ऐसे नवयुवक और से पुरुष है आयरिश प्रजातन्त्रको कोई भय नहीं । इनकी तुलना गरेजोंसे कीजिये, शिक्षित अगरेजोंसे कीजिये, इन डाक्टरोंसे जिये जो हमारे पास हैं तो आपको मालुम हो जायगा कि कितने श्रेष्ठ हैं। वे नितप्रति ईश्वरकी धन्दना करते थे और कहते थे कि मुझे इससे शक्ति मिल रही है। धन्य है रेन्स मैक्स्पिनी । धन्य है आयरिश प्रजातन्त्रकी सेनाका कार्क ब्रिगेडका कमाडिग अफसर ।। धन्य है कार्कका लार्ड - यर 12 अनशन व्रतके चौहत्तरवें दिन लार्ड मेयर नैक्स्विनी परलोक संधारे । उनके मित्र मो हेगार्टी कहते हैं कि यदि-डाक्टर उन्हें होशीकी हालतमें कुछ दिन पहले भोजन न कराते तो वह छ दिन और जीवित रहते।' इस वीरने अपना वचन । -- -

रत और जेलका ट्रघाजा तोड डाला। लण्डनके टाइम्सने
ठीक ही कहा था "इस चीने मौतको घरण करके अपना
साहस और दृढ निश्चय ससारको दिपला दिया।" त्रिटिश
गवर्नमेण्टने उनके मरने कुछ दिन पहले उनकी दो बहनोंको
बलात्कार जेल्से बाहर कर दिया । जर चे मर गये तो उनकी
लाश उनको खीको देने में आनाकानी की। जर लाश मिली भी
तो रास्ते में रोक ली गयो। कामे जय यह लाश पहुची तो
अजीर हालत थी। सिटी हाल में जहा यह रखी गयी थी दर्शकों-
का मेला लग गया। ३१वीं अक्तूबर सन् १९२० ई० को अपने
४१ वे वर्षमें मैक्स्विनी ममाधिस्थ हुए । इनकी पत्रपर आयर्लं-
ण्डके राष्ट्रपतिने कहा था कि "जोन माफ माई स्वर्गमें अपने
इस सहयोद्धाका स्वागत कर रही होगी। इनसे उपयुक्त शब्द
और कहा मिलेंगे।
।

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स्वाधीनताके सिद्धान्त
प्रथम परिच्छेद
+-+.
स्वाधीनताका मूल
( १ )
हमें स्वाधीनताके लिये संग्राम क्यों करना चाहिये ? क्योंकि
स्वाधीनताके इस सग्रामका वास्तविक अर्थ और इसकी ओर
प्रवृत्त करनेवाली असली शक्तिको बहुत कम लोग समझते हैं
ओर इस कम समझनेका विचित्र फल देखने में आ रहा है।
एक ही पक्षके लोग अपने आदर्श और कार्यक्रम के विषयौ महान्
प.गम्भीर भेदोंके कारण विठुड गये हैं।
( २ )
मैं अपनी मातृभूमिमें देख रहा है कि कार्यके परिणामसे
उसके सामनोंको मला या बुरा यतानेका सिद्धान्त सर्वत्र काम में
लाया जा रहा है। निन्दनीय फूटनीतिको काममें लाने के लिये एक
पक्ष दूसरेको दोप देता है किन्तु ऐसे उपायोंको काममें लाने से
यदि उसे गर्हित विजय प्राप्त हो तो उसे पुछमी सकोच नहीं होता
इसलिये गावश्यक है कि साफ यात कही जाय । वह युद्ध जिसमें

स्वाधीनताके सिद्धान्त
शुद्ध साधनोंसे काम नहीं लिया जाता विजयको पराजयसे
अधिक कलंकित कर देता है। मैं यह यात स्पष्टरूपसे कह र
ह क्योंकि
हम ब्रिटिश राज्यसे अलग होने के पक्षमें हैं और में :
दलील भी सुन रहा ह यदि हो सके तो भग्रेजोंकी शक्ति
चकनाचूर कर देने के लिये हमें किसी विदेशी राष्ट्रसे सन्धिक
लेनी चाहिये । भले ही वह राष्ट्र किसी दूसरे देशको स्वाधीनत
को नष्ट भ्रष्ट करने में लगा हुआ हो। यदि देश प्रत्यक्ष अथर
मप्रत्यक्ष रूपसे दूसरी जातिको स्वाधीनताका हरण करके स्वत
बने, तो उसके सिरपर वही श्राप पडेंगे जो यह युगोसे स्वर
अत्याचारके ऊपर परसाता मा रहा है।
मैं समझने लगा है कि हमारे लिये यह सम्भव है कि नी
उपार्योसे स्वाधीनता पा लें । इसलिये यह और भी मावश्यक
कि हम अपनी नीतिकी घोपणा करें और समझे कि हम
पड़े हैं। मैं तो इस सिद्धान्तको पकड़कर खडा है कि आत्मि
पराजयका मूल्य घडीसे बडी सासारिक विजय भी नहीं चुक
सकती। जो पक्ष इसके विरुद्ध है वह पक्ष मेरा नही हो सकता
कह
हमारी स्वाधीनताका दावा किस बुनियादपर है ? बालकोंके
स्वाभाविक उत्साह और वृद्धोंके अनुभवपर ।
प्रथम जब कि
लडके स्कूलोंसे ताजे बाहर निकालते हैं, उनकी आयु यीसके नीचे
ही होती है, वे प्रत्येक मनुष्य और प्रत्येक वस्सुफे विरुद्ध आक्रमण

स्वाधीनताका मूल करने को तैयार रहते हैं, तोखो यातें कहने में आनन्द लेते और स्माधीनताके विषयमें छाती खोलकर खूब बातें करते है किन्तु इतनेहीमें सतुष्ट हो जाते हैं कि हम बडी निभीकता पूर्वक याते छाट रहे हैं। इसके बाद बचपन चला जाता है, स्थितिकी भलीभाति परीक्षा करनेके लिये हम मैदानमें आते हैं और ससारमें अपना निश्चित कार्य ग्रहण करते हैं। कई वर्षतक ससारका अनुभव प्राप्त करते हैं, जीवनके कठोर सग्राममें पडते है और घोर सकटोंके बाद हममें स्थिरता आ जाती है। हमारा हृदय गहरी बातों में पैठने के लिये उत्सुक होता है । तब इतना हो यथेष्ट नहीं समझा जाता कि हम पराक्रमकी बात करें। हमारी यातोसे सत्यकी ध्वनि निकलनी चाहिये । ये दो कारण न होते तो शायद ही कोई मनुष्य प्यारी मातृभूमिपर वलि जानेके लिये तत्पर होता। हमारी प्रबल इच्छा है कि हमारी आत्मा उन्नत हो। इसी लिये हम स्वाधीनताका दावा करते है। सासारिक उन्नति हमारे लिये प्रधान विषय नहीं है। जोवन सग्रामके लिये परमा- त्माने मनुष्यको कुछ आत्मिक और शारीरिक शक्तिया दे रखी है। यह बात मनुष्य तथा समाजके लिये बहुत मावश्यक है कि इन शक्तियोंका विकास करने और योग्यतापूर्वक अपना कर्तव्य निधाहने के लिये इनसे पूरा फाम लिया जाय । स्वाधीन राष्ट्रमें प्रत्येक मनुष्य और समाजको पूरी उन्नति करनेके लिये सहज स्वाधीनताके सिद्धान्त घात परिस्थिति मिल जाती है । पराधीन राष्ट्रमें टोक उसका उलया होता है। जप एक देश दूसरे देशको अपने अधीन रक्ताहै तो दाल देशका साम्पत्तिा और नैतिक नाश होता है और लूट खलो. टका शिकार बनने के कारण उसको सम्पत्ति घटती है। विजयोजाति अपनो प्रभुता जमाने के लिये जिन दूपित माचरणोंका व्यवहार करती है उनसे विजित जातिका नैतिक पतन होता है। इस नैतिक नाशसे राएको बचाने के लिये गुलामीसे लडना पडता है । दास देशमें दोप फलते और फूलते है । जो आदमी या भलीभाति हृदयङ्गम कर लेता- हे उसके लिये इसके विरुद्ध लड़नेके सिवा और चारा ही नहीं रहता । दासताके साथ हम मन्धिानहीं कर सकते। राज्यमे शासनकर्ताओंका कर्तव्य होता है कि वह प्रजाके उत्तमसे उत्तम गुणोंका उत्कर्ष करें। विदेशी शासन घृणितसे घृणित दोषोंको बढ़ाने में सहायता करता है। हमारे इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं । जब राज- घरानके लोग यहा पधारते है तब अपने शासनको जड मजवून करनेवालोंपर रिवायतों और उपाधियोंकी बौछार करते हैं। कृपा उनपर की जाती है जो राष्ट्रीय हितका घात करते हैं। जरा सोधिरे तो सही। जिन मनुष्योंका सम्मान किया जाना चाहिये था में ऐसे लोगों की तुलनामें कुछ नहीं समझे जाते जो निन्दाके पात्र है । दुराचारी राजनीतिज्ञके भीतर भी कुछ सद्गुण छिपे रहते हैं। स्वतत्र राष्ट्र इन्हें जगाकर इनका उत्कर्ष करता है पर विदेशो सरकार नीच वृत्तिया काममें लाने के लिये उसे उपाधि स्वाधीनताका मूल देती है। ऐसे प्रलोभनसे अवश्य ही दुर्नीति बढ़ती है। मनुष्य देवता नहीं है और उत्तमसे उत्तम परिस्थितिमे मी उसे उचित कार्य करना कठिन मालूम पडता है। जव धुरा काम करने के लिये चारों तरफसे प्रलोमन मिलता है तो उसमें स्वत नीच भाव प्रकट होने लगते हैं। देशके सौभाग्यसे हममेंसे अधिकांश इस बुरे प्रभावके यश नहीं होते । किन्तु हमारा विश्वास अपने ऊचे शादर्शसे हट जाता है । हम आदर्शकी अवहेलना करने लगते हैं। हमारे भीतर सम्वृत्तिया रहती हैं किन्तु हम उन्हें विकसित नही होने देते। प्रत्येक मनुष्यका हृदय महान् और सुन्दर आपके लिये उत्सुक रहना चाहिये किन्तु जो भूमि सर्वत्र जकडी हुई है और' वरवाद हो गयी है वहा इस यातकी आशा करना निराशाके गढेमे गिरना है । स्वतनाके दावेका गूढ अर्थ यह है कि पल प्रयोगसे हमारी आत्मीका हनन कोई नहीं कर सकता। (५) यदि हमारा उद्देश्य यदला लेना होता तो सबसे अच्छी नीति यह होती कि हम जैसे हैं वैसे ही बने रहें । मौजूदा हालतमें हमारा देश इङ्गलैंडके लिये भयका घर है। यह बात सिद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि इङ्गलैंड अपनी मूर्खताके ढगसे हमें शान्त करनेकी यारयार चेष्टा करके रचय इस बातको स्वीकार कर रहा है । यदि इगलैंड चैनसे रह सकता तो हमारी यह क्या परवाह करता। यदि हम गलैंडसे अलग हो जानेके उद्योगमें . 1:1- --

६
स्वाधीनताके सिद्वान्त
है
सफल हो जायगे तो हमारे बाद सबसे अधिक लाभ इङ्गलैंडका
ही होगा।
यह यातन सी जान जान पडतो है कित सत्य
यही है । इसकी सत्यतामै इसलिये याधा नहीं पड़ती कि अग्नेज
लोग इस समय शायद ही इसे समझते अथवा इसका मूल्य
जानते हैं। हमारे मुल्ककी सैनिक शक्ति इस समय हास्यप्रद
स्वाधीन आयलैंड इसे ठीक करेगा-शत्रुके आक्रमणों के विरुद्ध
अपना सन्यवल बढायेगा। इससे इङ्गलैंड आयलैंडकी ओरसे
होनेवाले शत्रुके आक्रमणासे बच जायगा। मेरी समझमें इतना
बडा मूर्ख कोई न होगा जो यह विचार करे कि स्वतत्र आय
लैंड बिना किसी मतलब दूसरोंसे झगडा करेगा। हम निष्पक्ष
रहेंगे। हमारी सहज वृद्धि हमें निष्पक्ष बनाये रखेगी और हमारा
सत्यप्रेम भी हमें झगडेसे अलग रखेगा।
स्वाधीन राष्ट्रके ऊपर यह जिम्मेदारी होती है कि वह दूसरे
राष्ट्रको स्वाधीनताका शत्रु न बना रहे। मर्वजानीय स्वाधी.
नता सार्वभौमिक रक्षाका पथ साफ करती है। यद्यपि यह
सत्य है कि जबतक संसारमें जालिम सरकारें हैं एक राष्ट्र
चाहे वह फितना ही भला क्यों न हो ससारकी दशा नहीं सुधार
सकता तो भी उसका कर्तव्य है कि अपना राजकाज इस ढगसे
चलावे कि वह सार्वभौमिक स्वतत्रता और भ्रातृत्वके अनुकूल
हो। आश्चर्यजनक होनेपर भी ठीक बात यह है कि इङ्गलैंडसे
सम्बन्ध टूट जानेपर ही हमारी उससे टिकाऊ मित्रता हो
सकती है क्योंकि आयलंडका..कोई भी 'निवासी इतना मूर्ख
-

- स्वाधीनताका मूल नहीं है जो चिरकालके लिये इगलैंडसे लडते रहना चाहे । यह बात धुद्धिके बाहर है। हमारी स्वाधीनता सग्रामके स्वच्छ अभिप्रायका प्रमाण यह है कि हमारी स्वतत्रता शत्रु को हानि पहुंचानेके यदले उसका उपकार करनेके लिये होगी। यदि हम शत्रु को क्षति पहु चाना चाहते हैं तो हमें आज कलकी ही हालतमें अर्थात् उसके लिये भयका अहा बनकर रहना चाहिये । ऐसे अवसर मिलने रहेंगे किन्तु ये हमें शायद ही सुखी धनावं। यथार्थमें विचार किया जाय तो कुछ देशोंको स्वतत्र कर देनेमे ही स्वाधीनताका कार्य पूरा ना होता। स्वाधीनताके द्वारा नाना जातियों में मामञ्जस्य और ससारमें सच्चा घधुत्व स्थापित होना चाहिये । (६) मैंने बहुत सोच विचार कर लिखा है जिससे कोई इस अवधका अर्थ समझने में भूल न करे । मेरा प्रयोजन स्पष्ट है । हमारी अंतरात्मा हमें पतला रही है कि हम व्यक्ति तथा राष्ट्रका उद्धार न कर सकनेसे पिना हयाके घुट घुटकर मर रहे हैं। यदि हम आगे नहीं यढे तो अवश्य ही हमें गिरना होगा। स्पतत्रताका प्रश्न हमारे लिये जीवनमरणका प्रश्न है। इसीमें हमारी आत्माका मोक्ष है। यदि सारी जाति स्वतन हो लेनेके लिये कटिबद्ध है तो सुख हमारे सामने है। हमारी महान विजय होगी। यदि कुछ ही लोग सत्यप्रतिश पाये जाते हैं तो उन्हें स्वाधीनताके सिद्धान्त - सख्या कम होनेपर भी युद्धक्षेत्रमें इंटे रहना चाहिये। वह मनुष्यत्यके जन्मसिद्ध अधिकारके लिये लड़ रहे हैं। बहुसंख्यक लोगोंको न तो इस स्वत्को मेटने का कोई अधिकार है और न इसे नाश करनेकी हो ताक्षत है। अत्याचारी लोग सत्यके इन सैनिकोंको तग कर सकते हैं, देश निकाला दे सकते हैं, फांसी पर लटका सकते हैं पर स्वतत्रताका नाश नहीं कर सकते । आवश्यकता नहीं है कि पलटने स्वाधीनताको रक्षा करें और महात्मा इसकी घोषणा करें। हा कवियों ने सदा इसकी महिमा गायी है और अलख्य जनता अन्त इसे स्वीकार करेंगी। केवल एक व्यक्ति स्वतत्रताकी रक्षा करके सिद्ध कर सकता तिमनुप्यते इसे कोई जुदा नहीं कर सकता ।। और चूकि ऐसे अकेले आदमीकी हार कभी नहीं होती इसालये स्वाधीनता तथा सत्य सदव अमर रहे हैं। आयलैंडकी ऐसी दशा कभी नहीं गई कि सारे देशमे केवल एक ही आदमी स्वतंत्रताका भक रहा हो। उसकी ऐसी दशा कमी हो भी नहीं सकती। हम सदियोरो इसलिए जीविन नहीं है कि हमपर किसी दूसरेका आधिपत्य हो। प्रस्तुत संग्रामका वास्तविक अर्थ, इसकी अध्यात्मिकता तथा यह ज्ञान कि उचित साधनोंसे स्वतन्त्रता प्राप्त करना मनुष्य जातिमें भ्रातृभाव फैलानेके लिये उद्योग करना है प्रत्येक देशवासीफा यह कर्तव्य बना देता है कि वह अधिकाश लोगोंकी उपेक्षा करके सत्यका अवलंघन करे । 'जिसपर यहुमतके विरोध करनेका ।

स्वाधीनताफा मूल ६ . कठिन अवसर आता है उसे बहुत बड़ा मार रहन करना पडता है किन्तु यह यह जानते हुए डटा रखता है कि उसकी विजय अधिराश लोगों को उस प्रिय मादर्शकी ओर ले जायगी जिसका उन्हें पता भी न था। यह अपने आदर्श लिये गुप्तरूपसे तिर- स्कन छोक्र, प्रफटमें भ्रमपूण सिद्धात फैलानेका दोषी समझा जाकर, आपत्कालमें अटल रहकर और कमी न हारकर, कभी हताश न होकर तथा अपने थोडेसे सहयोद्धाओंको आनेवाले शुभ दिनके लिये उत्साहित करते हुए अच्छी अवस्थामें अमीएको सिद्ध करते हुए, रडता रहेगा । यदि ये घोडेसे स्वतन्त्रता सैनिक प्रेत रह जाय तो प्राण देते समय अपने गादर्शकी उच्चताको ससारके सामने उउन्नल रूपसे रख जाते हैं। उनके वलिदानसे देश उनके आदर्श प्रति चौकना हो जाता है और जिसने देशको जगाया तथा भादर्शकी रक्षाकी उसकी सत्यता सिद्ध हो जाती है । सत्यता सिद्ध होती है उसी सारी जातिकी आवाज विरुद्ध जिसके विरुद्ध यह एक समय अकेला खा हुमा था। जिस समय यह मैदानमें अपने प्राणसी आहुति देता है उसी समय वह सारी जातिका ग्राणफर्ता यन जाता है।

द्वितीय परिच्छेद सम्बन्ध-विच्छेद . जर हम ब्रिटिश सा अलग होनेके लिये यह दलील पेश करते हैं कि सम्बन्ध टूटनेपर ही हमारा देश पूरी उन्नति कर सकेगा और इसीके द्वारा इगलैएडके साथ हमारी पक्की सन्धि हो सकेगी तो हमारे शनुओं में नाना प्रकारके भाव देख- नेमें आते हैं। कुछ लोग इसपर सरसरी तौरपर और जोशमें आकर विचार करते हैं और अपने दलका ध्यान रखते हुए सम- झते हैं कि यह नरम अथवा निष्पक्ष दलपर आक्षेप किया गया है । दूसरे लोग इसपर मोटा विचार करते हैं, किन्तु अपने दिल में सोचते हैं कि हम वैज्ञानिक रूपसे इसकी आलोचना कर रहे हैं और मुस्कुराकर इस प्रश्नको बेहूदा समझ अपने दिलसे चाहर कर देते हैं। अपने ही देशके नरम तथा निष्पक्ष दलसे वर्तमान समयमें इस विषयपर लडना ठीक नहीं है। किन्तु इन लोगों के कारण हम लोगोंका दिल नहीं टूटना चाहिये क्यों कि यह लोग भी जनताके साथ खिचे हुए चले जायेंगे। शुभ दिन आयगा जय एक महत्कार्य या एक वीरोचित वलि दानसे देशकी चेतनतामें बिजलीसी दौड जायगी और जनता सम्बन्ध विच्छेद अपनी कु भणी मिदा और दुराग्रहसे एकाएक सम्यन्ध तोड देगी और सत्य, वीर तथा साधु रूपसे स्वतन्त्रताको जय मनाते हुए आगे पढेगो। हमें उस शुभ मुहूर्त के लिये काम करना और तैयार रहना चाहिये। २ ) ब्रिटिश साम्राज्यसे याहर हो जाने के प्रश्नपर यारीक मालो. चना करनेवाले सजनके भावों के लिये कुछ अशमें हम भी दोषी हैं। क्योंकि हमने कभी यह समझानेकी चेष्टा नहीं की कि सम्बन्ध विच्छेदकी नीति उत्तम और बुद्धिमानीको है। हमने अबतक विच्छेदको नीतिको अपना अधिकार समझकर छातीसे 'लगा रखा है। इसके लिये लडाई की है, आत्मत्याग किया है और प्रतिज्ञा की है कि प्राण जानेपर भी इस प्राप्त करेंगे, किन्तु हमने जीवनविज्ञानमें इसका निर्दिष्ट स्थान नहीं समझा है । चाहे दार्शनिक विचारफने इसपर अधिक विचार न किया हो तोमो उसने एक त्रुटि सुझायी है। हमें इस प्रश्नपर तात्विक रूपसे भी अवश्य विचार करना चाहिये-प्रश्नके भीतर घुसकर न कि सर तौरपर। दर्शन और विज्ञान इस सत्यकी घोषणा करते हैं कि सारा ससार अखण्ड और अविरोधी है और ज्ञानकी वृद्धि के साथ साथ ऐसे नियम माविष्कृत हो सकते है जिनसे विश्वकी व्यवस्था और एकताका और भी निरूपण हो जायेगा। इसलिये यदि हम विच्छेदवादियों का पक्ष उचित सिद्ध करना चाहते हैं तो हमें दिखलाना चाहिये कि यह विच्छेद २२ स्वाधीनताके सिद्धान्त 4 हमारे राष्ट्रीय जीवनमें सामञ्जस्य, एकता नथा उन्नतिका प्रचार करेगा। यह मसारके अन्य राष्ट्रोंमें हमें उचित स्थान दिला. यगा और हमें अपने उस राष्ट्रीय उद्देश्यको पूरा करने में सहा- यता देगा जिसे हम स्वाधीनता संग्राममें सदा यह सोवने हुए सामने रखते आये है कि वह महान् आदर्श हमारे उद्योगकी प्रतीक्षा कर रहा है वह श्रेष्ठ सङ्कल्प जा हमारे जीवनका सर्वस्व है, जो हमारे सामने कठोर कर्तव्य निर्धारित करता है, जिसका अर्थ भात्मबलिदान, परमप्रवास वर्षांतक धैर्य और लभवत' उद्देश्य. सिद्धिसे पहिलेही मृत्युका आलिङ्गन करना है, इतना शक्तिशाली होना चाहिये कि - इसकी सत्यता उन सिद्धान्तोंको स्पष्ट करनेसे प्रमाणित हो जाय जो उसके मूल में हैं, तथा उसका औचित्य दिखाते हैं अन्यथा हम उसके लिये आत्मसमर्पण नहीं कर सकते। अब हम स्पष्ट करके बतलायगे जिससे मालूम हो कि यह नीति देशसियोंमें नयी जान डालनेवाली तथा उन्हें उत्तेजना देने- वाली है। किन्तु इसपर विचार करनेके पहिले हमें कई ऐसे दुराग्रहोंको छोडनेके लिये तैयार रहना पडेगा जिन्होंने चिर- कालसे हमारे दिलपर जड कर रखी है। यदि हम ऐसा करना नहीं चाहते तो सत्यको जलाञ्जलि देनी होगी। - इस कार्य में आगे चढते हुए हमारा उत्साह भी बढ़ता जायेगा और जब हम यह बात सदा ध्यानमें रखेंगे। ८

सम्बन्ध विच्छेद
-
वताका व्येय सब जातियों के लिये सुख तथा मोक्ष प्राप्त करना
है और देशको, न कि स्वार्थमें डूबे हुए इसके किसी छोटे टुक
डेको मनुष्यके लिये. अधिक मनोरम निवासस्थान बनाना है
तो हम अन्त में अवश्य विजयी होंगे।
इस विचारसे या विषय सब विचारशील पुरुपोंके लिये
महत्वपूर्ण तथा चित्ताकर्षक बन जाता है। हमारा जो आलोचक
मुस्कुराकर इसे टाल देता यह अय उत्सुकतासे इसपर विचार
'करेगा तो भी उसका विश्वास इसपर जम नहीं सकता । वह
उजाड की हुई जन्मभूमिकी ओर अगुली उठाकर शत्रुके बलके
साथ इसकी दुर्यलताफी तुलना करके यह प्रतिपादित कर
सकता है कि तुम्हारे विचार अच्छे हैं, किन्तु चे स्वप्नमात्र है।
इसके मानी है कि उसके दिलमें हमारी बात कुछ न कुछ जमी
है। यह भी एक लाम है।
-
,
हमारा वैज्ञानिक समालोचक देशकी उजडी हालत दिखाकर
एक साधारण भूल करता है। वह बिना हेतु मान लेता है कि
देशभक्त मातृभूमिके भलेके लिये जो काम करता है उसका फल
उसे अपने ही जीवनकालमें मिल जाना चाहिये । यह निम्सन्देह
झूठ बात है क्योंकि मनुष्य जीवन वर्षों से गिना जाता है और
जातिका जीवन सदियोंसे। और, च कि राष्ट्रका कार्य भविष्य में
उसे पूर्णावस्थाको पहुंचानेके लिये हायमें लिया जाता है देश

स्वाधीनताके सिद्धान्त - भक्तको ऐसे ध्येयके लिये परिश्रम करनेका तयार रहन चाहिये जिसको प्राप्ति दूसरी पीढी में हो। देखिये, व्यक्ति अपने जीवनका कार्यक्रम किस प्रकार निर्धा- रित करता है । पचपन तथा किशोर अवस्थामें यह तैयारी करता है जिससे उसका यौवन और प्रौढावस्था जीवनका सर्व. श्रेष्ठ युग हो सके । शरीर हट पुष्टहो, मन सपल हो जिससे बुद्धि निर्मल यने ; उद्देश्य महान रहे और उच्चाकाक्षा हृदयमें वास करे तथा इन गुणों की सिद्धि एक निश्चित महान कार्यकी सफल्ता- द्वारा प्राप्त की जा सके। उसी मनुष्यकी प्रौढावस्था उत्तम होती है जिसने जीवनका पहिला भाग भली प्रकार विताया हो और शक्ति समय की हो। प्रारम्भिक अवस्थामें खेत तैयार किया जाता है और बीज योया जाता है जो निभवके समय पूर्णावस्थामें पहु- चता है । यही बात जातिके लिये भी लागू है । हमें पूर्ण उन्नतिके लिये खेत तैयार करना और बीज घोना चाहिये । हमें यह बात ध्यानमें रखकर देशके कार्यमें उद्यत होना चाहिये कि जातिकी अभिलाषा एक पीढी में नहीं बल्कि कई पीढियोंमें पूरी होगी। इसका मानन्द आनेवाली पीढियां भोगेगी। इसका यह अथ नहीं है कि हम ध्येयको अपनी दृष्टिसे परे समझ कर निरुत्साह तथा निरानन्दसे काम करें । हम अपनेही जीवन में इस आशास्थलपर पहुच सकते हैं यद्यपि हम इसके सव महान् चमत्कारोंका इस क्षुद्र जीवनमें पता नहीं लगा सकते। यह मानन्दके दिन कई युगोंमें आयेंगे। कई लोग हमारी उस महान् विजयका उत्सव मनाने के सम्बन्ध विच्छेद लिये जो हमारी पूर्ण स्वतत्रताको स्थापित करेगी जीवित नहीं रहेंगे तौभी वे विना पुरस्कार पाये न रहेंगे क्योंकि उन्हें भाषी विजयकी मूर्तिफे दर्शन प्राप्त होंगे। जर जान बूझकर ऐसे भवि- प्यके लिये परिश्रम किया जाता है तय आत्मा ऊ ची उठती है। जय हम समझते हैं कि हमारे उद्देश्यको जनताने भलीभाति समझकर ग्रहण कर लिया है तो अत्याचार इस उद्देश्यका नाश नहीं कर सकता । हमारे देशका भाग्य यन गया और उसकी स्वाधीनता अटल रहेगी यह जानकर षया मान्मा कम मानन्दित होती है ? ऐसे एक नेताके विरुद्ध मनमाने आक्षेप करते जाइये किन्तु उसका हृदय आनन्दमें मग्न रहता है और यह उसे अदम्य उत्साह देता है और अन्तमें सिद्ध हो जाता है कि वही यद्धिमान रहा। उसके विचार भूनकालके विपयमे स्पष्ट होते हैं। अपने समयके छिपे हुए सत्यका यह पता चला लेता है और जीवनक श्रेष्ठ अनुभवसे इस सत्यकी तुलना करके काममें जुटता है। इससे उसकी सत्यता प्रमाणित हो जाती है, क्योंकि भन्तमें उसका कार्य प्रकट होता है, परिपक होता है और सौगुना फलता है। यह थोडे समयमें फल न दे किन्तु जब वह अपने प्राणोकी आहुति देता है तुरन्त उसकी महिमा फैल जाती है। उसका जीवन आदर्श रहता है क्योंकि उसके प्राण धर्मयुद्धमें गये हैं । वह थोडे ही समयका बलिदान करके मानत फालकी सेवा कर चुका है। वह महात्माओंकी सङ्गति करो स्वर्ग चला गया है और उनके साथ उसका नाम सदा स्मरणीय बना रहेगा। .

१
स्वाधीनता सिद्धान्त
-
-
।
-1
यह सय पढ चुकनेपर भी लोग आजकल की भीषण देशा
देखेंगे और इसी धुरी स्थितिसे होश हवास खोकर कह गे"ब्रिटि
साम्राज्यको ताकत देखिये और साथही अपनो वर्वाद हालत
आर निगाह कीजिये । तुम्हारो सर आशा निरर्थक है ?" उन
मैं कहगा,"इस शुद्ध सत्यको ध्यानमें रखो, जातियां जोति
रहती हैं और साम्राज्य नाट होते चले जाते हैं। प्राचीन काल
साम्राज्य आज कहा हैं ? आजकलके साम्राज्यों के भीतरमी उन
नाशका बीज छिपा हुआ है। जिन जातियोंने प्राचीन साम्राज्यों
उठते हुए तथा राज्य करते हुए देखा हे आज उनके वध
उनके प्रतिनिधि बनकर नियमात है। पर इन जातियोंका जि
अत्याचारी शासकोंसे पाला पडा था व मरगये हैं और दफ़ना
जाचुके हैं। जालिया जीवित रह गयों और साम्राज्य उजड गये
समारकी वर्तमान जातियों के वशवर उस समय भी जिन्दा रहें।
जय कि वे साम्राज्य जो इस समय प्रभुताके लिये लहरहे है सव
मिट्टीमे मिल जायेंगे। हमारा अस्तित्व बना रहेगा और हमारे
कार्यकी सफलताका परिमाण तथा हमारे मावी पदका गौरत
बतायेगा कि हममें मातृभूमिके प्रति कितनी भकि थी।"
(६.)
क्या सय दलों के विचारशील पुरुपोको यह अभिलापा नहीं
है कि हमारी इस लम्पी लडाईका अन्त हो जाय और प्रतिष्ठा-
।

समय विशेष 7 पूर्षक स्थायी सन्धि होजाय !स सन्धिकी शान्ति धेशका प्राण दम लेसकता है, उसमें मपी जान मा सफती हे गौर यह अपनेको व्यक्त कर सकता है। इस शान्तिमें ही संगीत, कला और काव्य स्पतत्रताके भाइलादको अनवरत मानन्दके साथ प्रवाहित कर सकते हैं। हमारे आजकलफे दमनका साक्षीस्वरूप यद पगाध साहित्य ज्योति पाफर जगमगा सकता है। हम सय यही स्थम देख रहे हैं, क्योंकि जयतक हमारा प्रिटिश साम्राज्यसे किसी प्रकारका सम्पन्ध रहेगा तयतक हम कुछ न कुछ पराधीन थने रहेंगे। इसका प्रतिवाद कोई नहीं कर सकता। ऐसा मूर्य कौन है जो माशा करे कि जबतक ब्रिटिश साम्राज्यकी अधीनता जतलानेवाला सम्बन्ध है तबतक ब्रिटिश पारलामेन्टके साथ धमारी टपर न होगी। यदि कोई ऐसा है तो यह ससारके अनु. मन तथा इतिहासके विरुद्ध जाता है। इस सम्बन्धक भीतर दो स्वार्थ छिप रहेंगे । अगरेज अपना स्वार्थ चाहेंगे और हम अपना, मोर ये दोनों एक दुसरेके विरुद्ध होंगे। सोचिये, यूरोपफे प्रत्येक राष्ट्रके भीतर सकीर्ण और उधार दलोंमें कैसा यखेडा होता है। एफ दलकी आपोंमें दूसरे दलके विचार सदाही छल कपटसे भरे हुए, शकाजनक तथा उलटे जचते हैं गौर ये दल किमी तरह सहमत नहीं होते। कभी २ तो ये एक दुसरेके ऊपर विश्वासघातका दोष मढ़ते हैं। इनमें सुलह कमी नहीं होती। दलयन्दीका यही नियम है। ऐसी स्थितिम जवकि इस झगड़े में दो जातियोंका प्रश्न आपडता है, स्वाधीनताके सिद्धान्त - जयकि जनता दलोंमें विभक्त नहीं,बल्कि जातियोंमें घटी हुई होर है तब सन्धिकी आशा कहा ? यह निश्चयही निष्फल आशा है यह बात ध्यान रखनी चाहिये कि हमारी जाति इसलिये भिर नहीं है कि हम नलिक वशके हैं किन्तु हम इसलिये अलग कि हमारे देश अलग अलग है और हम मानवजातिके मिन्न मिट परिवारोंसे यने हुए हैं। यदि हम सब अगरेजोंके ही वशः होते तो भी हममें भेद रहता । इसका ऐतिहासिक उदाहरण अमेरीकाका सयुक्त राज्य है। इससे मेरी वात सहज समझा यासकती है। जप किसी आदमीके लड़के बडे हो जाते हैं वे अपनी अलग कुटुम्ब कर लेते हैं और स्वच्छन्द होकर रहते हैं। उनका अपने पूर्वजोंके प्रति सदा प्रेम रहता है। किन्तु यदि पिता अपने लउकेकी गृहस्थी में हस्तक्षेप करना चाहे और उसके कार्यको अपनी मर्जीपर चलाना चाहे तो उसी वक्त टएटा खडा हो जाता है। इस विषय- पर अधिक विचार करना आवश्यक प्रतीत नहीं होता। यदि माय लैंडके सर लोग अप्रेजोंके घशज होते और इस रिश्तेसे इलैंड दावा फरताकि उससे आयलैंडका सम्बन्ध बना रहे और उसका उसपर आधिपत्य रहे,तो फौरन झगडा शुरू हो जाता और इसका एकही परिणाम होता अर्थात् हमारा सयन्ध विच्छेद हो जाता। हम चाहे किसी जातिके होते, इंगलैंडके साथ स्वभावत, 'पडोसी घनकर रहते। किन्तु अंग्रेजोंने हमें धोखा देना और तर करना पसन्द किया। और अब यह दशा हो गयी है कि को १ .

, सम्बन्ध विच्छेद- पीढियों तक आपसमें सद्भाव रहनेपर इन ,यातोंकी स्मृति धुलेगी। मैं फिर,फिरयही यात कहता जिससे टिकाऊ सन्धिके विषयमें हमारे विचारों में अस्पष्टता न रहे। जबतक पराधी नताका दिखलापटी संयन्ध भी रहेगा, शान्ति नहीं रह सकती। इस सम्बन्धके प्रति रोष प्रकट करने तथा इसे ललकारनेके लिये हमारे मनुष्यत्वका तेज प्रदीप्त हो उठेगा। इंगलैंडसे सबन्ध. विच्छेद तथा समानताही उससे मित्रताका तयन्ध फिर स्थापित कर सकती है और कोई बात शान्ति स्थापित नहीं कर सकती। पोंकि मानव चरित्रका इतिहास यही शिक्षा देता है कि व्यक्तिगत उन्नतिसे ही सर्वसाधारणमें सद्भाव फैलता है। हर भले पडोली हो सकते है किन्तु सापही साथ भयंकर शत्रु भी हो सकते हैं। हमारा परम्पराका शत्रु अर और अधिक हमें अपनी यगलमें रखकर चैनसे नहीं रह सकता। वर्तमान समय हमारे लिये आशाप्रद है। हमारा भविष्य प्रगतिकी ओर जा रहा है। हम अमीष्टको प्राप्त करेंगे। हमें चेष्टा करनी चाहिये कि हम योग्य निकलें। (७) हमें यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि हम अयोग्य न पाये सच बात यह है कि हमें इसी बातका बडा अन्देशा है। यदि अपनी स्वाधीनता प्राप्त करने में, देशको समृद्ध करने में, भविष्यको उन्नत करने में हम अन्य राष्ट्रोंकी भूलोंसे सपकन जाधे।

२०
स्वाधीनताके सिद्धान्त
Tw
सीरों और महाशकियोंकी अपेक्षा अपना जीवन अच्छ।
बनावें तो हम एक उत्तम अवसरको हाथसे गवा देंगे।
इतिहासके पृष्टोंमें हम असफल गिने जायगे। भाज
वाहविचारको दृष्टिसे हम असफल गिने गये हैं, यह
सदियों तक स्वतन्त्रताके संग्रामको जारी रखनाही हम
जाज्वल्यमान विजय है। मैदान मारने पर भी यदि
जीतका दुरुपयोग करेंगे तो हमारी असल हार हो जायगी।
एक समय हम यूरोपके अग्रणी थे! स्वाधीनताको भ
भाति उपलब्ध करके हम फिर एक चार इसे रास्ता दिखलाय
हमें उस भ्रमसे सतर्क रहना चाहिये जो सर्वत्र फैला
हुमा
पाने आज कल जैसे इगलैंड, फ्रांस तथा जर्मनीपर किसी
दयाव नहीं है उसी प्रकार हम भी यावसे छूटना चाहते हैं में
कुछ नहीं चाहते ।। हमें इस भ्रमसे भी बचा रहना चाहिये।
यदि हम किसी प्रकार स्वाधीनता तक पहुंच जाय तम
मनुष्योचित जीवन व्यतीत करना आरम्भ कर सकते हैं। फिर
इस यीच हम अपनी जीवनचर्या विषयमें विशेष साषधा
नहीं रह सकते। यह भ्रमकी विकट छाया हमारे पपर्ष
अन्धकारमय कर देती है और सुन्दर मनुष्य जीवन तथा हमा
बीचमें पर्दा डाल देती है। यह भ्रम ही हमें उस भीषर
जीवनकी भोर घसीट सकता है जिसने संसारमें भाजदिन
तबाही मचा रखी है। हमें सावधान रहना चाहिये। मैं यह
नहीं कहता कि हमें धनी, निर्धन, मालिक, मजदूर, मादिके लग

सम्बन्ध विच्दै
२१
-
भाजही तय कर देने चाहिये, कि'तु मेरे मसमें प्रत्येक पक्तिको
समझ लेना चाहिये कि उसका कर्तव्य उचविचारयुक्त तथा
उदारचरित धनना है। हमें यह सोचना चाहिये कि हमारा
साथी हमसे ठगे जानेके लिये नहीं धल्कि भाईकी तरह हमारी
सहानुभूति प्राप्त करने के लिये तथा गिरी हुई दशासे उठाये जाने.
के लिये पैदा हुआ है।
न तो स्वराज्य, न साधारणतन औरम अराजकात्र हो
हमारा उद्धार कर सकते हैं। हमारी स्वतन्त्रता हमें शुद्ध हत्य
और महान् आदर्शक ही डाग प्राप्त हो सकेगी। यही तत्वज्ञान
जिसका प्रचार करना अत्यन्त आवश्यक है।
धर्मे इस समय इसकी अवदलना नहीं करनी चाहिये क्योंकि
हमारा आजका काम हमारे भविष्य जीवनका निर्णय करेगा।
यदि स्वाधीनताके इस सग्राममें हम सतर्फ न रहेंगे तो
भविष्यमें निर्मल न रह सकेंगे। मैं ऐसे कई लोगोंको जानना
न जो उदार चरित्र के प्रति उदासीन नहीं है किन्तु इस माशका-
से कि
शुद्ध
जीवन हमारे कार्य अडचन हालेगा और सफलता-
को असम्भय बना देगा, निष्ठुर नैनिक जीवनसे डरते हैं। हमें
यह विचारकर अपनी गलती सुधार लेनी चाहिये कि
समय हमारे अनुकूल हो रहा है। हमारे देशको नाफत यह रही
है और शत्रुको मुट्ठी ढीली पड रही है।
जनता किश्तोंसे अधिकार लेने में सन्तुए नहीं है। उसकी शक्ति
अपने स्वत्वोंको प्राप्त करने के लिये अधिकाधिक बढ़ रही है और

स्वाधीनता सिद्धान्त वह इन्हें लेने के लिये उपयुक्त हथियार से सुसजित है। अपने ही समयमें हम बहुत आगे पढ गये हैं। एक घटना इसे स्पष्ट कर देती है। चीससे भी कम साल हुए कि देशी भाषा तिरस्कारकी दृष्टिसे देखी जाती थी। माज इसके उद्धार करनेका आन्दोलन इनमा प्रपल हो गया है कि राष्ट्रीय विश्वविद्यालयमें इसे भावश्यक पाठ्य विषयों में रखना पड़ा है। इस शुभ चिहको देखफर क्या किसीको भय भी सन्देह हो सकता है कि समय स्वाधीनताका मार्ग नहीं बना रहा है और हम विजयकी भोर कूच नहीं कर इसमें मुझे नाममात्र भी सन्देह नहीं है कि हम म्वाधीनता लेंगे किन्तु इसका मुझे पूरा भरोसा नहीं है कि हम इसका सदुपयोग कर सकेंगे। क्योंकि जगतमें सर्वत्र देखा जाता है कि इसका कितना शोचनीय दुरुपयोग किया जा रहा है। यह हमारा सुनिश्चित विचार होना चाहिये और हमें इसका बीडा उठा लेना चाहिये कि हमारा भावी इतिहास किसी भी तत्कालीन राष्ट्रसे कम गौरवपूर्ण न हो। निस्सन्देह हम समृद्धि बढ़ानेकी चेष्टा करेंगे पर हमारी उत्कट इच्छा भादर्श बननेकी रहेगी। हम अपनी शक्ति बढायगे दूसरे देशोको गुलाम बनाने के लिये नहीं बल्कि उनसे मातृभावको बढाने तथा ससारकी निर्मल जातियों की रक्षा करने के लिये , हम अपनो ससामोंका गौरव बढायगे इस लिये नहीं कि उनसे राष्ट्र को सिरताका निश्चय हो पनिक नागरिकोंका सुख बढाने के लिये । भी हम प्राचीनकालके - सम्बन्ध विच्छेद २३ समान यूरोपके पथप्रदर्शक बन सकेंगे। हम सारी हुनियाको मर्थलोलुपता, निष्ठुर शासन तथाईर्ष्यापूर्ण और क्रूर राजनीतिक दु स्वप्नसे जगा देंगे। ससार हमारी फिरसे जगी हुई मात्मा तथा एक नवीन और सुन्दर आदर्शको देखकर आश्चर्य में मग्न हो जायगा और हम अपने राष्ट्र की नीय वास्तविक स्वाधीनतापर रखेंगे जो सदा पनी रहेगी। 7

-
-
तृतीय परिच्छेद
नैतिक बल
(१)
किसी महत्वपूर्ण प्रश्नपर विचार करने में सबसे बड़ी कठि-
माई यह पडती है कि शब्दोको तोड़ मरोसफर उनका मौलिक
तथा पास्तविक अर्थ विगाह दिया जाता है। इसलिये यदि हम
मफल विचार करना चाहते हैं तो हमें पहिले अपने शोका
अयं निश्चित कर लेना चाहिये । हमारी दुलतासे उटपन प्रत्येक
भूलको क्षमा करने के लिये देशभक्तिका नाम बदनाम किया जाता
है, किन्तु वेशमकिके यदि कुछ माने हैं तो वह यह है कि यह
मनुष्यको पूर्ण आत्मबलपाला तथा सफटके समय प्रतिह
मनाये। जहा स्थानिक स्वराज्यको जरा भी पद्धि हुई लोग
आयरिश आसिकी विजयघोषणा करने लगते है और होमरुलको
पूर्ण स्वाधीनता समझेफर उसकी महिमाफे गीत गाते हैं। लेकिन
जबतक हमारे ऊपर पडोसी राज्यका कुछ भी दयाय है और हम
उसे अपनेसे घटा मानते हैं तबतक हम कुछ हदतक गुलाम ही
हैं। इसलिये जो स्वाधीनताके लिये सप्राम कर रहे हैं ये
इस सिद्धान्तको मानते हैं और पूरी आजादीके लिये इंटे
रहते हैं। माशिक स्वाधीनता कोई वस्तु नहीं है।
जय

नैतिक बल
२५
-
हम स्वाधीनताको मुर्शदिल भादमियों के हाथमें छोड़ देते
हैं तो हम अपने कार्यको दूपित कर देते है तथा परिणाममें
बाधा डाल देते हैं।
दूसरी ओर अटल सिद्धान्तवाला मनुष्य है। सर्वसाधारण
उसे किस दृष्टिसे देखते हैं ! जय उसके हाथमें स्वतंत्रताका
काम बाजाता है तय यह सदा ही समझौतेसे दूर रहनेवाला
जगली तथा उजडू भादमी समझा जाता है। हम यहुधा उसका
नाम सुकर ही नाक भौं सिफोहते है और उसकी घीरताकी
प्रशसा करनेके यरले यही समझते रहते हैं कि क्या कमी
युक्तिपूर्वक यातें धरनेपर उसकी समझमें हमारा सिद्धान्त
आ सकता है। यह नही जानते कि सद्या अनमेली आदमी सत्य
का निष्कपट उपासक है।
पराधीनताफे विरुद्ध लडनेघालों में कई लोग स्वतंत्रताके पक्षमें
इस लिये कार्य करते है कि लिएड, फान्स और जर्मनी इसके
द्वारा ऐश्वर्यशाली धन गये। किन्तु जब हम उन साधनोंपर
विचार करते हैं जिनके द्वारा इन देशोंने शक्ति प्राप्त की है तो
मालूम होता है कि हमारे यह मित्र सधी स्वाधीनता तथा स्वे
च्छाचारी जीवन में फर्क नहीं समझते। मेरी समझमें तो किसी
विषयपर विचार करनेके पहिले हमें विशेष अर्थयुक्त शब्दोंकी
परिभाषा ठीक कर लेनी चाहिये। एक ऐसे ही शब्दको परि-
भाषा मैं यहा गलीमाति पता देना चाहता है। आजकल
धादविषादमें जितने चिक्ने चुपदे शब्द काममें लाये जाते है
1
,

स्वाधीनताके सिद्धान्त उनमें सबसे अधिक गडयडी "नैतिक पल' के 'मर्धके विषय में फैली हुई है। - (२) मायएडमें प्राय: सौ वर्षसे प्रत्येक ऐसे राजमोतिनको दुर्य- लता छिपाने के लिये जो मातृभूमिकी पूरी स्वाधीनताके लिये लडनेको अनिच्छुक अयना भयभीत रहता है 'नैतिक थल' शब्दका निरन्तर दुरुपयोग किया जाता रहा है। वर्तमान समयमें ऐसे आदमी देखने में आते हैं जिनमें नैतिक साहसका समाव होनेपर भी चे नैतिक घलफे नामपर काम कर रहे हैं। दूसरी ओर ऐसे आदमी है जिनकी नस नसमें नैतिक बल भरा हुमा है पर घे पशुचलके उपासक बतलाये जाकर हसीमें उड़ा दिये जाते इस गडयाडोको साफ करने के लिये हमें नैतिक बल और नैतिक दुर्बलताका भेद समझ लेना चाहिये। यह मेद महरायका है। चाहे हम नैतिक साहस कहें, चरित्र- बल कहें या नैतिक शक्ति कहें सबका अर्थ एक ही है। यह मन और हदयका यह श्रेष्ठ गुण है जो मनुष्यको पशुबलको प्रत्येक शक्तिके सामने अजेय खडा रखता है। मैं इसका नाम नैतिक पल रखता हूँ और इसकी परिमापा यों करना चाहता है कि नैतिक-चली वह है जो किसी कोमको उचित, आयश्यक तथा श्रद्धा योग्य समझ फलकी परवा न . कर सत्यके समान, इसकी करनेको डटा रहता है। वह चञ्चल सिडी नहीं है - 1

-नैतिक बल
14
.
२०
जिसे अपने पागलपनके परिणामकी नाममात्र भी परवा न हो,
जो एक चापलेपनकी आशा कर रहा हो और इससे जो तबाही
फैलेगी उसके प्रति उदासीन हो। कदापि नहीं, उसका मुख्य
सिद्धान्त यह है कि सधी यात ही अच्छी यात है और उचित
कासे पालन को हुई इस भली घातका पुरा परिणाम नहीं हो
सकता। ऐसा वीर अपने कार्यकी भली या घुरी गतिको शान्त
चितसे देखता है। किसी पछी परीक्षाके समय अपने साइसपर
पूरा भरोसा म होने के कारण चाहे वह घपड़ावे किन्तु अपने
पक्षको धेष्ठता और अपने कार्यके परिणामकी महत्तापर
वह सदा शान्तिसे विश्वास रखना है । ऐसे यली पुस्पकी
अपने साहसके प्रति घबडाहट शीघ्र दूर हो जाती है
क्योंकि महान कार्य महान् आत्माओं को पैदा करता है। ऐसे
कई लोग जो डर डरकर काम हाथमें लेते है पीर गतिसे
मरते है।
यह बात महान् भादर्शों की रक्षाके लिये
लडनेवाले मनुष्योंकी आश्चर्यजनक तथा अपूर्व प्रसन्नचित्तताका
रहस्य पतलाती है। दुर्घलप्रतिके लोग इस रहस्यको कम
समझते हैं। स्वाधीनताका
निक समझता है कि सत्यके
मप्राममें वह आगे बढ़ा हुआ है। वह जानता है कि उसकी
विजय संसारको सुन्दर यनायगी। यह भी उसे मालूम है कि
पनि उसे दूसरोंको कष्ट देना पडे या स्वय कष्ट भोगमा पडे
तो यह पोहिनोंके उद्धारके लिये, पराधीनताकी जजोरसे जकडे
होंके पन्धनोंको तोरने के लिये, जो देशके लिये जान दे रहे हैं
-

२८
स्वाधीनताके सिद्धारत
उमका गौरव बहानेके लिये, तथा देशको भावी सन्तानको सम्बो
तथा निश्चिन्त पनानेके लिये होगा । इस सप्रामके प्रत्येक पहलूमें
जो शक्ति उसे सम्हाले हुए रखेंगी उसके लिये सबसे पहले
दह तथा धीरवित्तकी भाषश्यकता है। सार यह है कि उसमें
नैतिक पल अघश्य हो । उस पुरुषको जो सेनाफे साथ भागमण
करने में ही धीर रह सकता है जब अकेला खडा रहना पढेगा तब
उसकी घोरता फाफूर हो जायगी । सय देशयन्धुओंको यह बात
भली भाति समझ लेनी चाहिये कि जबतक मातृभूमि अपनी
निजकी पलटने नहीं खडी कर सकती ऐसे आदमियोंकी घरायर
आवश्यकता पडेगी जो अकेले खडे होकर लडनेकी परीक्षामें
उत्तीर्ण हो सके। यह सबसे विफट, सरसे श्रेष्ठ और
वह परीक्षा है जो निश्चित तथा महान् विजय दिलाती है क्योंकि
एक सशस्त्र पुरुष असत्य जनताका सामना नही कर सकता
और न एक सेना अगणित दलोंपर विजय प्राप्त कर सकती
है। लेकिन संसारके सब साम्राज्योंकी सारी सेनाए एक सचे
आदमीकी आत्माको नहीं जीत सकतो, यह अकेला आदमी
घाजी मार ले जाता है।
(३)
प्रत्येक दाल भाषका विरोध करनेकी जिले नतिक पलके
नामसे भाभप मिलता है हमने इतनी घडी मावश्यwarसमझी
फि हमसे वे लोग जो अपनी मनुष्यताका
17

नैतिक बल . -- हमने शत्रु के ये गला फार फाडकर चिल्लाने लगे कि साथ साथ शारीरिक बलकी भी परख होनी चाहिये। विपरीत समयकी नीचतासे हम जितना अधिक जलने लगे उतना ही अधिक तथा धार धार हम शारीरिक बलकी परखके लिये पुकार मचाने लगे कि फिर नया जीवन दान करने वाला समय मा पहुचा है और दूषित पायु शुद्ध की जानी चाहिये। हमने अजेय आत्मावाले पुरुषकी सबसे कडी परीक्षाकी ५को जाच वह रखली है जो अत्या- चारीकी एक मात्र शक्ति है अर्थात् पशुयलका अवलम्बन । हमने युद्धक्षेत्रोंकी मारकाटके झूठे गीत गाये हैं। रक्तसागरको तैरनेकी प्रशमा की है मानो रक्तमय युद्धक्षेत्र मतीय सुन्दर है। हमने शान्तिके प्रति यडी घृणा दिखलायी है मानो प्रत्येक रण पुलकित करनेवाला है। किन्तु पुर- क्षेत्रमें एक प्रसिद्ध सेनापतिने कहा था कि समर रौरव है। यह भले ही भत्युक्ति हो किन्तु इस चेतावनी यह भीषण सत्य है जो सदा ध्यानमें रहना चाहिये। यदि हमसे कोई अप भी ऐसी यातको छोडने के लिये निवेदन किये जानेपर नाक भौं सिकोडता है जिसे वह प्रतिहिसाके लिये परम भाषश्यक समझता है तो उसे अपने हृदयके भीतर टटोलना चाहिये और विचार करना चाहिये कि किसी पदनाम विश्वासघाती अथवा दोपीको मृत्युसे उसके वृदयपर से भाव उत्पन होते हैं। ऐसे अवसरपर हृदयमें शान्ति प्राप्त नहीं होती, किन्तु भयका भार प्रधान होता है। मृत्यु हम सपको --

स्वाधीनताके सिद्धान्त
बमका गौरव बढानेके लिये, नथा देशको भावी सन्तानको सखो.
तथा निश्चिन्त बनानेके लिये होगा। इस सग्राम के प्रत्येक पहलूमें
जो शक्ति उसे सम्हाले हुए रखेगी उसके लिये सबसे पहले
दह तथा धीरवित्तकी भाषश्यकता है।
सार यह है कि उसमें
मेतिक पल अवश्य हो । उस पुरुषको जो सेमाके साथ मालमण
करने में ही धीर रह सकता है जय अकेला खडा रहना पड़ेगा तब
उसकी घीरता फाफूर हो जायगी । सव देशबन्धुभोंको यह बात
भली भाति समझ लेनी चाहिये कि जनतम मातृभूमि अपनी
निजकी पलटने नहीं पडी कर सकती ऐसे आदमियों की घराघर
आवश्यकता पडेगी जो अकेले खडे होकर लडनेकी परीक्षामें
उत्तीर्ण हो सकें। यह सबसे विकट, सबसे श्रेष्ठ और
वह परीक्षा है जो निश्चित तथा महान् विजय दिलाती है -ममोंकि
एक सशस्त्र पुरुष असंख्य जनताका सामना नही कर सकता
और न एक सेना अगणित दलोंपर विजय प्राप्त कर सकती
है। लेकिन ससारफे सब साम्राज्योंकी सारी सेनाए एक सच्चे
मादमीकी आत्माको नहीं जीत सकतो, यह अकेला आदमी
घाजी मार ले जाता है।
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प्रत्येक दास माधका विरोध करनेकी जिसे नतिक बल
मामले भाभप मिलता है हमने इतनी घड़ी आवश्यकता समझी
कि हममें से थे लोग जो अपनी मनुष्यताका प्रमाण देना चाहते
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नैतिक बल - उनका कारी है। येह नश्वर है, आत्मा अमर है। जीवन में इससे बडा अनिष्ट कोई नहीं हो सकता कि इस अधिनाशी अशका पतन हो जाय । जरा उन सब घृणित धातों तथा नीवताफी मोर ले जानेवाली वृत्तियोंका विचार तो कीजिये जो गुलामीकी हालतमें पडे हुए लोगोंका खून चूस लेती हैं। अधिकारी लोग अपनी प्रभुता स्थिर रखनेके लिये घूस देते हैं । समय देख अपना स्वार्थ सिद्ध करनेवाले लोग प्रत्येक सिद्धान्तका मोल ठहराते हैं सार्वजनिक जीवन फलुपित हो जाता है। व्यक्तिगत जीवनमें मुर्दादिली छा जाती है । उन्ध आदर्शवालों के लिये कठिन अवसर मा पडता है । उन्हें जघन्य आचरणसे मुठभेड करनी पडती है । धैर्य जाता है और अन्त में उन्हें स्वाधीनताका यह झएडा जो कमी याडी घोरताके साथ ऊ चा फहराया गया था, चुपचाप छोड देना पड़ता है। फल यह होता है कि निरुत्सा- हियोंकी सख्या यढ जाती है और सर्वसाधारणमें अन्धेग, निगनन्द और निराशा फैल जाती है। मातृभूमि सर्वत्र उजहती हुई दिखलायी देती है। जिस देशकी स्वतंत्रता हरण होगयी है। चहा दुगनार, नीचता, कायरता, असहिष्णुता, तथा प्रत्येक पामर वृत्ति अधेरे खडकी तरह सेरामर फलती फूलती है और देशको मुलस देती हैं। पराधीन देशका दृश्य और पराधीन लोगोंकी पात्मा घृणास्पद ग्न जाती है। उन्हें देख तरियत फिर जाती है और चे भयानक मालूम पड़ते है-मयानक इसलिये कि उनके द्वारा उन्य सिद्धान्त गिराये गये हैं और गौरवपूर्ण स्वाधीनता सिद्धान्त विचारशील बना देती है। किन्तु मोतसे दूर रहनेपर बहुधा यह पात विश्वासयोग्य नहीं जचती और मनुष्य स्वतन्त्रतारूंपी जहाजको शत्रुफे रक्तको चीरते हुये पार करनेकी स्तुति गला फाडकर करता रहता है। मैं उससे कहता "पस रुक जा। त अपनी भूलको साधारण दुर्घटनाको भर्यकरता तथा मुर्गे मेढों भादिकी लडाईपर विचार करके सुधार सकता है। (४) हां, युद्धका सामना करना पड़ता है और घून यहाना पडता है। आनदसे नहीं-किन्तु दारुण भावश्यकता के कारण-क्योंकि जातिमें ऐलो घोर नैतिक वीभत्सता वर्तमान है जो दारुण शारीरिक वीभत्सतासे बहुत गिरी हुई है। निभीक आत्माके लिये स्वाधी- नता अपरित्याज्य है और इसलिये घोरसे घोर यत्रणा सहकर भी स्वतंत्रता प्राप्त करनी चाहिये। आत्मा शरोरसे बडा हे। और युद्धको न्याय्यताका यही प्रमाण है। यदि लडाई करने में जागा पीछा सोचने प्रस्तुत स्वाधीनताका हरण होता है या हम विद्यमान गुलामी में हो अकर्मण्य होकर पढे सडते है तो प्रत्येक मनुष्य का धर्म है कि यदि वह खडा है तो लड़ पड़े, यदि गिराकर शाया हुआ है तो यागो वन खडा हो । जबतक स्वाधीनता पक्की न हो जाय उसे शान्तिसे क्षणभर न रहना चाहिये क्योंकि जिस जातिकी आजादी छिन गयी है उसको जो नैतिक महामारी माना ग्रास बना लेती है वह मनुष्यों के शरीरके एक अंगको दूसरे अगसे काट धेनेसे जो अनर्थ पैदा होता है उससे 'अधिक' अनर्थ नैतिक दल दिखलाते हैं तथा ल्डाईके सियारोंको दुर्बलता तथा जगली. पनको चरम सीमा तक पहुचने देते हैं और वह चरित्रहीनता तथा विभीपिका पैदा करने देते हैं जो अन्तमें हमारा नाश कर देगी। आजादोका पका सिपाही पूरे जोरमे चोट माग्ने । और अच्छी तरह शत्र को पटकनेमें आनाकानी नगें करेगा। यह जानता है कि उसको दृढ निधारी साधीनतामा उद्धार तथा उसकी रक्षा निर्मर है। किन्तु वह मदा याद रखेगा कि अप- नेको कायम रखना हो वह उत्तम गुण है जो मनुष्यको जानवरोंसे अलग करता है। प्रतिहिमावृत्ति गत्याचारी और गुलामोका कापरतापूर्ण आश्रय है और उदारचरित्रता : मनुष्यताका स्वच्छ मलकार है । तथा वह सदा यह ध्यानमें रखेगा कि वह शत्रुकी जान लेने के लिये हथियार नहीं उठा रहा है कितु उसके दुष्कर्मों का नाश करनेके लिये, तथा इन दुष्कर्मों का नाश करनेसे वह केवल अपनेहीको स्वाधीन नहीं करता, किन्तु अपने शनुमा भी उद्धार करता है। हममे अधिकाश लोगों के लिये सम्भवत यह ' स्वप्न बहुत रहा हो किन्तु उसको जो हमारे देशकी समस्याके मर्मको पहचानता है और अपने चरित्रको सामार्गपर रखना चाहता है यह उचित जचेगा। वह घोरमे घोर सग्राममें यह कदानि नही भूलेगा कि आज नया फलका शत्रु यादका हमारी संस्था सहयाडा म सकता है। (५) यदि यह परम आवश्यक है कि हमको विना तैयारी किये - 4 3

स्वाधीनताके सिद्धान्त
"
भविष्य संकटम पड जाता है। यह फम भयंकर होता यदि
भूचाल ऐसे देशको चूर चूर करके महासागरमें बुधो देता।
गुलामीको नैतिफ महामारीसे अपनी रक्षा करने के लिये मनुष्य
अचानक हथियार पकहते हैं इसकी परवा नहीं करते कि
संसारमें इसका परिणाम क्या होगा।
जो लोग पार्थिव फलपर अधिक जोर देते हैं यह भी इससे
अपनी रक्षा नहीं कर सकते क्योंकि नैतिक अस्वस्थतासे ही
शारीरिक घंस
शुरू
होता है । इसमें कुछ पिलम्प भले ही होजाय
किन्तु फल अनिवार्य है। इस प्रकार शारीरिक शक्ति उचित व
न्यायसगत सिद्ध होती है । स्वय नही, कितु नैतिक दलको प्रकट
करनेके कारण। जहा शारीरिक शक्ति उच्च सिद्धातोंकी नींव
पर बही नहीं रहती वहा दुष्टताकी मूर्ति बन जाती है।
सच्चा विरोध नेतिक और शारीरिक पलके बीच नहीं है किन्तु
चरित्रपल मौर चरित्रकी दुर्घलताके बीच है। यही प्रधान भेद
सप तरफसे भूला जा रहा है। जब अवसर आ पडता है और
समय हमें पाध्य करता है तो हथियार उठाना अत्यन्त आवश्यक
होजाता है। किंतु इस घोर संकटमें हमें अपना संयम नहीं
सोमा चाहिए। यदि हम शत्रुका खून यहानेको उछलते है, 'पशु-
यलकी कीर्ति गाते हैं तो हम स्वय अत्याचारी घनफर इसकी
पताका फहराते हैं और अपने सिरपर कलकका टीका
लगाते हैं । दूसरी ओर यदि हम ऐसे अवसरपर इस निठुर
कार्य को करने में हिचकते है तो हम आत्मिक बलका प्रभाव
--
-- 4aniy

नैतिक पल प्रत्येक ऐसी छोटो टि और दुर्बलताका ध्यान रखना चाहिये जो स्वाधीनताके समय हमारी मात्माको अशान्त न सके। प्रत्येक कठिनाईका माखोंके सामने आनेका समय ही उसके निर्णयके लिये उपयुक्त है । इस कार्य में टालमटोल करना विपत्तिको निमन्त्रण देना है। हमारी अनेक कठिनाइयोंसे हमें दृढ़ निश्चय ही पार उतारेगा। किन्तु किसी विशेष तथा माव- भ्यक समस्यासे साफ निकल जानेके लिये नीतिका यहाना ढूंढा जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि सब लोग इस प्रश्नपर सहमत नहीं होंगे। दूसरी ओरसे मायाज आती है कि मूर्ख लोग यहक जायगे। ऐसे टालवाजोंस कोई न कोई यहाना मिल ही जाता है। कठिनाई यह है कि प्रत्येक पक्ष सत्यके एक अशको पसन्द करता है। कोई पक्ष मोलहों आने सत्य नहीं चाहता। लेकिन हमें विशुद्ध पत्य अक्षर अक्षर ग्रहण करना चाहिये । हम यह अर्थ नहीं मानना चाहते जिसे अक्ष जनता मला समझे। और न दार्शनिकों की काट छाट ही हमें पसन्द है। हम सत्य -विशुद्ध सत्यके सिवा कुछ नहीं चाहते । प्रत्येक ऐसे कार्यके लिये जो जनताके प्रति हमारा धर्म है और जिसपर विचार करनेका सर्व साधारणको अधिकार है, हमें यही नियम पालन करना चाहिये। चूकि हमें ज्वलन्त प्रश्नोंका निर्णय करनेमें घोर कठिनताका सामना करना पड़ता है और इस काममें हम सक्टमें भी पर ३४ स्वाधीनताके सिद्धान्त , लढाईमें कूदने से पहिले अपना प्रमुख सिद्धान्त निश्चित रूपसे स्थिर करलेना चाहिये, तो यह और भी परम आवश्यक है कि हमें इस समय अपना चित्त शुद्ध करके सत्यकी ओर लगाना चाहिये, क्योंकि हमें यह हानिकर अभ्यास पडगया है कि समयको अनुपयुक्त बननगर महत्पूर्ण प्रश्नोंको दूसरे समयके लिये स्थगित कर देते हैं । साफ यात यह है कि हममें चरित्रबलका समार है और वह गुण जो समरकालमें हमारी रक्षा करेगा गुलीमीफे समय हमारा उद्धार करनेके लिये उत्तम नीतिका काम देगा। इसपर अधिक लिखना फिजूल है कि दासताकी दशामें नीच वृत्तिया बढती हैं । जय हम यह स्वीकार कर लेते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसी दशामें हम अपनेको वाध्य समझकर प्रत्येक अवगुणको सचेष्ट होकर भगा। स्वाधीनताकी सामान्य अवस्थामें कई क्षणिक दुर्गुण उत्पन्न हो सकते हैं, लेकिन वे अनर्थकारी नहीं होते। जनताको स्वाधीनताकी उज्ज्वल ज्योतिमें घे उसी प्रकार मस्म होजाते है जिस प्रकार सूर्यके मालोको रोगके कीटाणु । जहा स्वाधीनताका गला घोंटा जाता है और लोगोंका चरित्र भ्रष्ट हो जाता है वहा छोटीसे छोटी पुराईको भी बढनेके लिये अच्छी भूमि मिल जाती है। वह पन- पती और फैलने लगती है । इस प्रकार बुराइयोंकी सख्या बढ़ती है और मुल्क चौपट हो जाता है। यही कारण है कि उदार- घरित नेताओं को जो पतित जातिके उद्धारकी चेष्टा करते हैं नैतिक बल प्रत्येक ऐसी छोटो त्रुटि और दुर्यलताका ध्यान रखना चाहिये जो स्वाधीनताके समय हमारी आत्माको अशान्त न कर सके। प्रत्येक कठिनाईका आखोंके सामने आनेका समय ही उसके निर्णयके लिये उपयुक्त है। इस कार्यमें टालमटोल करना विपत्तिको निमन्त्रण देना है। हमारी अनेक कठिनाइयोंसे में दद निश्चय ही पार उतारेगा। किन्तु किसी विशेष तथा माव- श्यक समस्यासे साफ निकल जाने के लिये नीतिका यहाना ढा जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि सप लोग इस प्रश्नपर सहमत नहीं होंगे। दूसरी ओरसे आवाज आती है कि मूर्ख लोग बहक जायगे । ऐसे टालवाजोश कोई न कोई यहाना मिल ही जाता है। कठिनाई यह है कि प्रत्येक पक्ष सत्यके एक अशको पसन्द करता है। कोई पक्ष मोलहों आने सत्य नहीं चाहता। लेकिन हमें विशुद्ध सत्य अक्षर अक्षा ग्रहण करना चाहिये । हम यह अर्धनहीं मानना चाहते जिसे अश जनता मला समझा और न दार्शनिकों की काट छाट ही हमें पसन्द है । हम सत्य-विशुद्ध सत्यके सिवा कुछ नहीं चाहते । प्रत्येक ऐसे कार्यके लिये जो जनताके प्रति हमारा धर्म है और जिसपर विचार करनेका सर्व साधारणको अधिकार है, हमें यही नियम पालन करना चाहिये। चूकि हमें ज्वलन्त प्रश्नोंका निर्णय करने में घोर कठिनताका सामना धरना पडता है और इस काममें हम सफ्टमें भी पड । ।

३४ स्वाधीनताके सिद्धान्त लडाई में कूदनेसे पहिले अपना प्रमुख सिद्धान्त निश्चित रूपसे स्थिर करलेना चाहिये, तो यह और भी परम आवश्यक है कि हमें इस समय अपना चित्त शुद्ध करके सत्यकी ओर लगाना चाहिये, क्योंकि हमें यह हानिकर अभ्यास पडगया है कि समयको अनुपयुक्त पतलावर महत्वपूर्ण प्रश्नोंको दूसरे समयके लिये स्थगित कर देते हैं । साफ बात यह है कि हममें चरित्रवलका अभार है और वह गुण जो समरकालमें हमारी रक्षा करेगा गुलामीके समय हमारा उद्धार करनेके लिये उत्तम नीतिका काम देगा। इसपर अधिक लिखना फिजूल है कि दासताकी दशामें नीच वृत्तिया बढती है । जय हम यह स्वीकार कर लेते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐमी दशामें हम अपनेको वाध्य समझकर प्रत्येक अवगुणको सचेष्ट होकर भगावें। स्वाधीनताकी सामान्य अवस्थामें कई क्षणिक दुर्गुण उत्पन्न हो सकते हैं, लेकिन वे अनर्थकारी नहीं होते। जनताको स्वाधीनताकी उज्ज्वल ज्योतिमें घे उसी प्रकार भस्म होजाते है जिस प्रकार सूर्यके मालोको रोगके कीटाणु । जहा स्वाधीनताका गला घोंटा जाता है और लोगोंका चरित्र भ्रष्ट हो जाता है वहा छोटीसे छोटी पुराईको भी बढने के लिये अच्छी भूमि मिल जातो हैं। यह पन- पती और फल्ने लगती है । इस प्रकार बुराइयों की संख्या बढ़ती है और मुल्क चौपट हो जाता है। यही कारण है कि उदार- चरित नेताओं को जो पतित जातिके उद्धारकी चेष्टा करते हैं ,

नेतिक पल
३६
।
प्रकृतिको विगादेगा। प्रत्येक मम्टमें या अधिरित रता
है और प्रत्येक कार्य उसकी शुद्धताका परिचय देता है।
घोर सहयोद्धामो। मानन्द मनाओ कि हमारी पात्माओं-
पर अभी हमारा ही अधिकार है। इस निर्जीव तथा आनन्द.
शून्य समयमें भी हमारे पुराने तेजकी एक झटक फिरसे दिखायी
देने लगी है यह सागर्म पुगना जोश में फिरसे जगा रहा
है। हम मातृभूमिके अधिकारों की रक्षा करने, उसको स्वतन्त्रताके
लिये जूझने और वर्तमान पीढीको गौग्यका पद दिलानेको भागे
यद रहे हैं। हमारी जीत होगी। शत्रु अपने लडाईफे जहाज तथा
असख्य सैनिकोंका गर्व करता रहे । रोम और काजकी फौज
बाज कहा है? पर स्वतन्त्रताको यह लहर जिसको उनाने
ललकारा था आज भी मौजें ले रही हैं और तरुण जानिमें
जीवन डाल रही हैं। आओ, हम सप अपना सिर ऊचा करें।
हम संग्राममें अपने महेको यहादुरोके साथ पकडे रहेंगे। हम
अपनी आत्माको पृथक्, सिद्धान्तानुकूल, निष्कपट और निर्भीक
थनार्वे मौर इसे महान कार्यों के लिये उपयुक्त बनाकर अदम्य
ध्रना। अदम्य उत्साहके द्वारा ही हमारी पूरी विजय निश्चित
होगी।
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स्वाधीनताके सिद्धान्त अव मैं दो बात अपने धार्मिक 'निराशावादीले करूंगा। में धर्मका गहरा अर्थ लगाताह । जीवनके प्रश्नों को योंही छोड देना नहीं बल्कि उनको हल करना मैं धर्म समझता हू । मैं नतीजेकी लापरवाहीके सबब नहीं किन्तु अपने दृढ विश्वास के सामने सिर नवाकर उससे निडर होने को कहता है। भय और धर्म परस्पर विरोधी हैं। (६) मारे परिच्छेदका सार यह है कि आजकल तथा मानेवाले संग्रामके प्रत्येक स्वरूपमें मशक्त शरीरसे मात्र आत्माकी अधिक आवश्यकता है। हममें जोश होना चाहिये, किन्तु यह चित्तके द्वारा सयत और नियत्रित होना चाहिये । वर्तमान समय में हमारा मुख्य काम वीरता तथा तेज बढानेका है। यह गुण प्रत्येक मनुष्यकी आत्माको अजेय दुर्ग बना देंगे। सेनाए हार सकती है, किन्तु बीर और तेजस्वी आत्मा सदा अथक रहती है। जिस चोलेमें यह आत्मा वाम करती हैं चरचूर चूर किया जा सकता है। पर यह आत्मा शरीर छाड़ते समय दूसरों में जान डाल देती है जिससे उनके हृदयों में कार्य करनेके लिये माग सी भडक उठती है। बस इस समामका परिणाम पूरी विजय । दृढप्रनिश और मशा आदमी अन्तमें अवश्य विजयी होता है। शब्दजाल उसे पैदानसे नहीं भगा सकता, किसी प्रकारको दुर्घलता उसे पाशविक प्रतिहिसाको भोर नहीं झुका सकती, न तो वह अपना जन्मसिद्ध अधिकार छोडेगा और न अपनी

शत्रु और मित्र
पैतृक सम्पत्ति है। हमें उन आशामों और आशकाओंपर भी
ध्यान देना चाहिये जो मनुष्यजातिमें समान है और सबसे अ
धिक इस बातका ख्याल करना चाहिये कि जगतकी सय जाति-
योंका स्वार्थ भापसमें उलझा हुआ है।
उक्त बातोंको दिलसे निकाल कर यदि कोई जाति अपने
अधीन भूभागको अनीतिपूर्ण शासन तथा पामरताके कार्यों से
कलङ्कित करती है, तो वह ससारकी शातिको सङ्कट में डालती है।
उक्त सिद्धातको न जानते हुए भी जब एक पराक्रमी जाति अपने
ऐसे पडोसीसे भिड जाती है जो इस समय उसका वैरी बना
हुआ है और वह अपने सहज चरित्रकी आज्ञाके अनुसार वीरता
तथा उदारतासे लडती है तो वह जाति अपने शत्रुके ध्यानको
पचित्र जीउनकी ओर लगा देती है। यह भी सम्भन है कि वह
अपने शत्रुका जीवन सुखमय बना दे, उस सुखस्वप्नकी ओर
उसका मुह फेर दे जिस ओर उसकी पापमें डूची हुई मलीन
मात्मा कदापि न जा सकती थी।
स्वतत्रता देवीके मदिरकी ओर जानेवाले यात्रियों के मेल की
कठिन परीक्षा होगी। देशवासियोंकी मित्रता मी एक दिनमें
नहीं स्थापित हो सकती विदेशियोंसे तो बहुत दिनों में मेल हो
सकता है।
- हमें पथसे हटाने के लिये तथा जो थोडेसे सैनिक दुई
विश्वासके साथ झडेको पकडे खडे हैं उन्हें तितर बितर करने के
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चतुर्थ परिच्छेद 关 1 शत्रु और मित्र h शत्रु हमारे वे धाई हैं जिनसे हम न्यारे हो गये हैं। मौलिक सत्यके आधारपर ही हम स्वदेशके सघ दलोंमें यथार्थ देशभक्ति तथा अपने पुराने शत्रु इङ्गलैंडके साथ स्थायी सधि म्थापित करने की आशा कर रहे हैं। दुराग्रहके भावोंके कारण अपने ही लोगोंके भिन्न भिन्न दलोंमें बिल्कुल विरोधी विभाग हो गये हैं और आयलैंण्ड और इङ्गलैंडके बीच घृणाकी ऐसी दीवार खडी हो गयी है जिसे पार करना. प्राय असम्भव है। यदि मातृभूमिको पुनर्जीवित करना है, तो देशमें एकता होनी चाहिये । यदि ससारको पुनर्जीवित करना है, तो हमें सारे सं. सारमें एकता स्थापित करनी चाहिये । यह एकता एक शासक- के अधीन रहनेसे नहीं, किन्तु सब जातियों में भाईचारा फेलानेसे हो सकती है। इस उच्च लक्ष्यको प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति व राष्ट्रका कर्त्तव्य है। इस लक्ष्यको हम न भूलें, इस हेतु हमें बार बार अपने विचारोंका सशोधन करनेके लिये इस सिद्धांतको मनन करना चाहिये कि मनुष्य जातिकी उत्पत्ति एक आदि पुरुषसे हुई है। हमें संसारकी उस सुन्दरतापर गौर करना चाहिये जो सबकी ६ । । । रे शत्रु और मित्र सबकी ता चहारदीवारीसे बाहर फैला हुआ है और जिसके भीतर हम एक आशा,एक उच्च मनोरथ तथा एक सुन्दर आदर्शसे प्रेरित होकर आपसमें समझौता कर, सहयोद्धा बन परस्पर मिले हुए हैं। हा मकता है कि पृथक पृथक् मतवालोंके लिये देशकार्यका महत्व कम या पेशा हो, हो सकता है कि आदर्शकी उत्पत्ति और उसका अन्तिम ध्येय दोनों के लिये एक हो न हो, किन्तु वह सुन्दर और अभ्रान्त पदाथे जिसके लिये चे लड रहें है, विशुद्ध, सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन, परस्पर अधिक शिष्ट व्यवहार, समाज और जानिके लिये उच्च आदर्शों की स्थापना उत्कृष्ट सहनशक्ति, माहस तथा स्वतत्रताके विषय में सबका एक मन है। उक्त बातोपर चोट पडनेपर सपमें नैसर्गिक चेतना जागृत होजाती है । इसलिये जो सहानुभूति भिन्न २ मतगलोंको मिला रखती है वह प्रचण्ड प्रगाढ तथा पकी होती है। इनलोगों- की मेल मुलाकात ध्यानसे देखिये, यह किस प्रेमसे आपसमें मिलते है ज़रा गौरसे देखिये, एक यडा काम करने वाला है जिसके मुहर्मे झरिया पदी हुई हैं। उसका कैसा हार्दिक अभिवादन करते हैं। दूसरेकी आखें काममें व्यस्त भाईके लिये भातुर हैं, तीसरेकी माखें विजय आदर्शसे चमक रही है। आप देखेंगे कि इन सबमें परस्पर मान्तरिक श्रद्धा है, ये एक दूसरेको उत्सा. हित करते है तथा स्पर्य कर उठाते हैं निरुत्साहका चिन्द इनमें कमी नहीं पाया जाता, किन्तु सदा महान् विजयकी शुम - स्वाधीनताके सिद्धान्त लिये कितने ही प्रलोमन दिये जायंगे। इसलिये हमें वह सम्बन्ध भली भाति समझ लेनी चाहिये जो हम लोगोंको अनेक चिन्न पाधाओंका घोर सामना करते हुए भी स्वतन्त्रताकी मोर मागे बढ़नेमें एक किये हुए है। सचा भाईचारेका सम्बन्ध ही ऐसी एकता स्थापित कर सकता है। किन्तु हम इस सत्यको बहुत ही कम हृदयङ्गम करते हैं। जब प्रगाढ और प्रचण्ड देशभक्ति भिन्न भिन्न मतोंके लोगों में सहयोद्धाओंका भाव भरके उन्हे स्वच्छन्दतापूर्वक एक उद्देश्य के लिये मिला देती है तथा जब सब सच्चे मतोंमें यह मेल देखने में आता है, तब दूसरे मुर्शदिल और कम मुस्तैद लोग इस ऐक्यको सन्देहकी हुष्टिसे देखते है, और यदि वे हममें शामिल मी होते हैं तो अनिच्छा- पूर्वक । और लोग तो पास ही नहीं फटकते और समझते हैं कि स्वतन्त्रताके भक्त भ्रनमें भूठे हुए हैं। वे यह सोचते हैं कि इस समय मिले हुए इन भिन्न मिन्न मतोंके लोगों में देने के लिये मौका पडनेपर किसी पुरानी बातको उखेड देना ही काफी होगा और वे इतने हीसे पुराने उपमें नया जहर मिलाकर एक दूसरेपर टूट पडेगे । इन विचारोंका हमें अपने कार्यासे खएडन करना चाहिये। हमारे अपने देशका ही उदाहरण लीजिये । यहा तीन मतोंक लोग हैं। कुछ केथोलिक है, कुछ प्रोटेस्टेण्ट है और कुछ नास्तिक हैं। एक मतके सम्पूर्ण आधार विचार दूसरे मतवालोंको पूर्णतया मान्य न हो, किन्तु इन भाचार विचारों का एक अंश ऐसा है जो पैदा कर शत्रु और मित्र ४३ सपको तग चहारदीवारीले थाहर फैला हुआ है और जिसके भीतर हम एक पाशा,एक उच्च मनोरथ तथा एक सुन्दर आदर्शसे प्रेरित होकर मापसमें समझौता कर, सहयोद्धा बन परस्पर मिले हुए हैं। हो सकता है कि पृथक पृथक् मतवालोंके लिये देशकार्यका महत्व कम या वेशा हो, हो सकता है कि आदर्शकी उत्पत्ति और उसका अन्तिम ध्येय दोनों के लिये एक हो न हो, किन्तु वह सुन्दर और अनान्त पदार्थ जिसके लिये वे लड रहें है, विशुद्ध, सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन, परस्पर अधिक शिष्ट व्यवहार, समाज और जानिके लिये उच्च प्रादों की स्थापना उत्कृष्ट सहनशक्ति, साहस तथा स्वतनाके विषय में सबका एक मत है। उक्त गतीपर चोट पड़नेपर सपमें नैसर्गिक चेतना जागृत होजाती है । इसलिये जो सहानुभूति भिन्न २ मतवालोंको मिला रखती है वह प्रचण्ड,प्रगाढ तथा पक्की होती है । इनलोगों- की मेल मुलाकात ध्यानसे देखिये, यह किस प्रेमसे आपस में मिलते जरा गौरसे देखिये, एक बडा काम करने वाला है जिसके मुहमें अरिया पडी हुई हैं। उसका कैसा हार्दिक अभिवादन करते हैं। दूसरेकी आखें काममें व्यस्त भाईके लिये भातुर है, तीसरेकी आखें विजय आदर्शसे चमक रही हैं। आप देखेंगे कि इन सबमें परस्पर मान्तरिक श्रद्धा है, ये एक दूसरेको उत्सा. हित करते हैं तथा स्वयं कष्ट उठाते हैं। निरुत्साहका चिन्ह इनमें कमी नहीं पाया जाता, किन्तु सदा महान् विजयकी शुभ ।

४४ स्वाधीनताके सिद्धान्त n आशा और महासमरका परम आनन्द ही देखा जाता है । भिन्न भिन्न मतवालों का यह सहयोग दिखाऊ मित्रताका नहीं है, तो भी और लोग यह मेल देखकर आश्चर्य और सशयसे सहम जाते हैं। भिन्न भिन्न मतोंके यह स्वतन्त्रताके पुजारी अपने अपने मजह बोंके पूरे पाबन्द है, फिर भी इनमें आपसमें इतनी अधिक घनि- ठता है कि मानो वे सब एकही देवताके सामने सर झुकाते है। सकीर्ण रिनारवालोंकी दृष्टि में भिन्न भिन्न मजहबवालोंमें मारकाट हानी चाहिये, पर स्वतन्त्रताके इस सप्राममें व सब साथ साथ आगे बढ़ रहे हैं। यह सब क्यों है? सम्भवत इस प्रश्नका सबसे अच्छा उत्तर वही दे सकेगा जिसका धर्म सबसे कट्टर है। वह कहेगा कि जिस क्षेत्रमें हम सब मिलकर काम कर रहे हैं वहा जिस सत्यने हम सबको मिला रखा है उसका अनुसरण करनेका एक ही सन्मार्ग है और सहज बुद्धिसे इस सन्मार्गमें आकर हम मिल गये हैं। (३) किन्तु भिन्न भिन्न मतोंके वे लोग जो मजबूती और ईमान दारीसे मेलको पक्का रखते है कम हैं। xxx,xxxx उनके धैर्यकी कठिन परीक्षा होगी और मनुष्योंके लिये यह जायकी कसौटी है।xx xx धर्म अलग अलग होने के फारण शत्रुता रखनेसे ससारको वर्तमान समयमें विद्यमान दुर्मनता । - . - ।

शत्रु आर मित्र
४५
और दुपटना घटनेके यदले और भी ढेगी। इतिहासका कोई
उदाहरण उठा लीजिये, प्रतिहिसाकी निस्सारता तथा मूर्खता
साफ प्रकट हो जाती है | xxx निरी हि सा प्रत्येक उदारचरित्र
पुरुपके हृदयमें घृणा पैदा कर देती है। सुनिये, मैजिनी क्या कहता
है--"हमें हि साफे द्वारा देशमें नयी व्यवस्था स्थापित नहीं करनी
है। इस प्रकार स्थापित की हुई व्यवस्था पुराने ढंगकी व्यवस्थासे
भलेही सुन्दर हो, किन्तु उसकी नीव जुल्मपर रहती है।" xxx
हमें खूध तग किया जायगा कि हम अपने सिद्धान्त छोड दें
और पुगने झगडे फिर खडे करें, किन्तु उस समय हमें डटे
रहना होगा। उस समय हमें उस दैवी आत्म सयमसे रहना
होगा जिसके भीतर हमारी शक्ति का रहस्य छिपा हुआ
(४)
हो,
भले ही स्वतन्त्रताके ध्वजा फहरानेगालोंकी मख्या कम
नोभी हम जोरसे कह सकते हैं कि हमें अन्त सफलताको आशा
है। जनता विना परिणामकी आशासे न लडेगी। यह पूछेगी कि
देशकी उन्नति के क्या लक्षण दिखाई दे रहे हैं और विजयकी
ज्योतिकी झलक का है। हमारे सौभाग्यसे यदि हम सूक्ष्म
दृष्टिसे देखेंगे तो हम उन्नतिके कुछ चिह्न अवश्य दूढ निकालेंगे।
निस्सन्देह हम पुरानी अदावतके बुरे लक्षण देवेंगे। हो सकता
है कुछ लोग क्रोध आकर दगा भी कर दें, किन्तु अब उपद्रवी
लोग कम रह गये हैं और क्रोधमें यह तीव्रता भी नहीं रह

स्वाधीनताके सिद्धान्त - गयी है। जो लोग पहले दगा करते थे अब भी करते है, किन्तु उनमें अप वह उन्मत्तता नह रह गयी है और आजकलके नवयुवक भलेही हमारे आदर्शसे विमुख हों, किन्तु चे विपक्षियोंकी बातो. की ओर भी उदासीन है। ये इन बातोंसे अलग हैं और उनपर किसी पक्षका प्रभाव नहीं पड़ा है। इन बातोंको ध्यानमें रखकर हमें निराश न होना चाहिये। जग विचार कीजिये कि जो इस समय देशका काम कर रहे है उन्होंने धीरे धीरे बटोरते हुए वर्तमान नोति निश्चित की है। हमसे पहले गजनीनिक जीवन अपने समयके लोकमनका अनुसरण करता था, किन्तु आज. कलको ज्योनिमें यह यात मन्द पड गयी है, हमने उन नियमोंको कृत्रिम समझा और उन्हें छाड दिया । यह हमारे पूर्वजोपर आक्षर नहीं है। xxx जो काम वे अधूग छोड गय हैं में उसे हाथमे लेकर पूरा करना चाहिये । हर पीढीका यह कर्राव्य होता है कि वह अपने पूर्वपुरुषोंके अधूरे छोडे हुए कामको उठाये और उसे पूरा करके यह पैतृक सम्पत्ति अपने घशजोंके सुपुर्द कर दे। नवयुवक स्वयं यह कर्तव्य पहचान लेने हैं और हरेक पीढी अपने सकोर्ण विचारोंको छोडकर सत्यका विकास करती हुई अपने बाप दादोंसे एक कदम आगे ही बढ़ती है। इस बातको प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभवसे ही समझ सकता है कि इस समय जो गडे मुर्दे उखाइ रहे हैं वे शीघ्र नष्ट हो जायगे और उनका स्थान लेने कोई नहीं आयगा।

और मित्र (५) सीमाग्यसे देशवासियों में भाईचारा स्थापित करनेकी दलीलें देनेकी भप आवश्यकता नहीं रही, विन्तु साथ साथ हमारे दुर्भाग्यसे जनता न यह बात स्वीकार करती है और न इसे समझती है कि जिन कारणों से हमें अपने देशवासियों के बीच मित्रताका सम्बन्ध स्थापित करना चाहिये पन्नों कारणोंसे गलैंड या किसी दुसरी जातिसे-जिससे हम लहर है या मागे लड़ेंगे-मा मित्रता करनी चाहिये । पडोसियों में स्नेह हाना स्वामायिक है। एक ही गली या एक ही मुहल्ले में रहनेवाले दो पड़ोसियों में व्यक्तिगत प्रीतिका सा मनोहर दृश्य देखने में माता है। घे एक दूसरेके सुखमें सुखी होते है, आपत्कालमें एक दूम. रेकी सहायता करते हैं और अपने प्रतिदिनके काम यन्धुमावसे मिलकर करते हैं। घे हरवक्त एक दूसरेके हितमें मेलकी सार्थ कता देखते हैं। मान लीजिये, किसी बुराई के कारण यह मित्र विड गये। ऐसे समय पुरानी मैत्री उपमें परिणत हो जाती है । जो पडोस हमदर्दीके वक्त उन्हें प्रफुल्लित कर देता था आज उनकी शत्रुताको उतना ही अधिक बढाता है। जय जय उनकी भेंट होती है उनकी धातें एक दूसरेके दिलमें चुभनेवाली होती है, उनके भाव परस्पर तग करनेके होते हैं। जीवनके मानन्दको भ्रष्ट करनेवाला यह तीता रस उनके सात्विक स्माघको विद्रोही जचता है। उनके हदय घृणाको बाहर निकाल डालनेको तथा पुरानी सौहार्दताको फिरसे स्थापित ।

-४८ स्वाधीनताके सिद्धान्त करनेकी प्रबल लालसा होती है। हृदयके भीतर मेल करनेकी इच्छा रहनेपर भी यह बिछुड़े हुए मित्र एक दूसरेके खूनके प्याले बने हुए हैं। कभी कभी खराबी इस सीमातक पहुच जाती है और द्रोह इतना बढ़ जाता है कि पुराना मित्रभाव फिरसे स्थापित न होता हुआ प्रतीत होता है। किन्तु जबतक कुछ भी' आशाकी झलक वाकी रहती है सच्ची मात्मा इस बातर ध्यान लगाये रखती है, क्योंकि यदि जीवन के पूर्ण सौन्दर्यको फिरसे प्राप्त करना है और उसे सदाके लिये सुरक्षित रखना है, तो, पुराना मित्रभाव पुन स्थापित करने के लिये सदेव सचेष्ट रहना- चाहिये। व्यक्तियों के समान जातियोंके लिये भी यही बात कही जा सकती है। यह बात जानकर हमें भविष्यमें नयी भूलसे यचा रहना चाहिये । यह भूल अर्थात् साधनको परिणाम समझ लेना पुरानी है किन्तु सदा नये रूपमें दिखायी देती है। व्यापकसन्धिका लक्ष्य प्रत्येक जातिको, पिशुद्ध स्वाधीनता देना, आत्मिक सिद्धि, मनुष्यके भीतर छिपे हुए गुणों और, जीवनके आनन्द और उसकी पूर्णताको प्राप्त करना है। इसका मतलब यह नहीं है कि चाहे जैसे भो हो कुछ सिद्धान्तोंका हनन करके वह निकृष्ट सन्धि की जाय जो गुलामीके ही समान है। इसका सदेशा उस जातिको होशमें लाना है जिसने अपने उत्पातोंसे दूसरी जातिको दुर्दशाको ओर धकेल दिया है । यह स्थायी और सम्मानयुक्त सन्धिके लिये खुला मार्ग छोड देती है। इसके माने हैं मात्माफे देवतुल्य सयमकी रक्षा करना।

शत्रु और मित्र- . नुक्ताचीनी करनेवाले यह भी कहेंगे कि हमलोग महान् युद्ध में फसे हुए हैं। इसलिये देशवासियों में उदात्तवृत्तिया जागृत करने की चेष्टा करनेसे उनमें दुर्यलता आ जायगी, क्योंकि जिस जोश देनेवाली हिसावृत्तिले रणमें प्रचण्ड प्रोत्साहन मिलता है वह न रहेगी, किन्तु जो वृत्ति न रहेगी वह हमें प्रोत्साहित करनेवाली नहीं है । जर भाई भाइयों के हो वीच युद्ध छिड जाता है; घरेल सग्राम ठन जाता है, एकही कर्तव्यके कई प्रकारके तात्पर्य आप सके लोगोंको न्यारा न्यारा कर देते हैं, पुत्र पिताके विरुद्ध, भाई भाईके विरुद्ध उठ खड़ा होता है, तनमी उनका झगडा एक घंशके होने के कारण अथवा इस कारण कि छैप और घृणाको छोडकर उनके हृदयके भीतर निकट सम्बन्धका पूरा ज्ञान है ढीला नहीं पड़ता। इसलिये जब तुम मनुष्यको यह शिक्षा देते हो कि उसका शत्रु गहरा विचार करनेपर उसका भाई निकल आता है तो तुम उसे सग्रामसे नहीं हटाते वरन् तुम उसके सामने उसके ध्येयका नया अर्थ रखते हो और उसे एक श्रेष्ठ आदर्श दिखलाकर उत्तेजित करते हो कि वह अपनी धुनमें लगा रहे और लक्ष्यको प्राप्त करें। यदि व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्वतत्रता प्राप्त करनेके बाद संसारमें भ्रातृभाव फैलानेके आदर्शके लिये उद्योग करना याकी रह जाता है तो हमें इस ध्येयको संसारिक जीवोंकी पहचके ५० स्वाधीनता सिद्धान्त बाहर न समझना चाहिये ।। यह आदर्श ध्रुव-तारेके समान हमारा मार्गनिर्देशक होना चाहिये जो हमें भरसक सत्पथपर, चलावे । हम हाथमें लिये हुए कार्यको तभी निभा सकते हैं जब हम इस कार्यको उस उद्देश्यके अनुकूल बनावे जो हमें उत्साहित करता रहे। इस उच्च उद्देश्यसे विचलित करनेको हमें कई प्रकारसे फुसलाया जायगा परन्तु जो आत्मिक दल हमारे पक्षको निर्मल और दृढ बनाये रखता है,प्रत्येक नष्ट करनेवाली शक्तिका प्रतिरोध करेगा। xxx जय एक मजहबवाला दूसरे मजहबवालेको अपना माई सम- झने लगे तब यह आदर्श हमें उमाडेगा और स्वतत्रताकी पताका- हमें अपनी गोदमें उठा लेगी। बस समझ लीजिये कि सग्राम- का पहला खेत हमने मार लिया । जय देशके भीतर पूरी एकता स्थापित करने में हम कृतकार्य हो जावेंगे तो स्वतन्त्रता हमारी पहुचके भीतर आ जायगी। इसपर समालोचक प्रश्न उठा सक्ता है कि "भाई, तुम इसलैण्डके साथ मित्रता करनेपर क्यों जोर डाल रहे हो? वह तो अपना आधिपत्य जमाये रखनेकी शार्तपर ही सुलह करेगा।" इसका समाधान इस प्रकार किया जा सक्ता है। यदि ताली बजानेके लिये दो हाथोंकी जरूरत पड़ती है तो क्या इसमें सन्देह है कि मित्रता करने के लिये भी दो हाथ मिलानेकी आवश्यकता होती है । हा, यह दूसरी बात है कि कोई गुलाम बनकर अपने हाथोंसे फर्राशी सलाम करनेका, काम - . -

,
'शत्रु और मित्र,
है।
.
-
ले। किन्तु इस बातमे हम घेफिक हैं । म दूसरोंको वाध्य करके
स्वाधीनता ले सकते हैं और हमें अपनी जियपर पूरा
विश्वास है। दोस्तीका रास्ता अव भी खुला
इस अस
मतमसे कई लोगोंकी बुद्धि चकरमें पड जायगी कि एक ओर
हमें अपने उदार स्वभावको जीवित रखना पडेगा और दूसरी
भोर हमें सप्राममें कट्टर और दृढप्रतिज्ञ रहना पडेगा, हमें एक
ओर शातिकी कामना करनी पडेगी और दूसरी ओर पूरी लडाई
लडनी होगी। एक ओर हम हृदयमें बन्धुताकी लालसा रखेंगे
और दूसरी ओर हानिकर मित्रताको नष्ट भ्रष्ट कर देंगे। इङ्गलएडके
साथ साहित्यिक, राजनीतिक, व्यापारिक तथा सामाजिक मेल
जोल यिल कुल तोड देना होगा, यदि यह मिलाप स्वाधीनता,
समानता और सर्वजातीय स्वतन्त्रताक्षी नोंपर खडान किया
जाय। जिस समय हम इस कार्यमें जोरसे लगे रहेंगे सम्भव
है कि लोग इसमें स्थायी मित्रताका आभास न पायें,
किन्तु हमें इस चेष्टामें सदा लगा रहना चाहिये । सबसे पहले
स्वतन्त्रताको नितान्त आवश्यकता है । हम जब अपने ही पक्षके
सैनिकोंमें अपने ध्येयके इस अर्थका निरन्तर प्रचार करते रहेंगे तो
शत्रुके हृदयमें भी यह बात जम जायगी। प्रारम्भमें हमारे शनु इसे
भ्रम वा राजनीतिक जाल समझेंगे, किन्तु एक ऐसाभावपूर्ण समय
मायगा जय उनके हृदयों में हमारा सिद्धान्त प्रकाश फैलावेगा
और एक नये युगका आविर्भाव होगा। ऐसे शुभ अवसरपर दुष्ट
।

स्वाधीनताके सिद्धान्त गुलाम बनाये -- ताका लोप हो जाता है, घृणा भस्म हो जाती है और मित्रता नया जन्म लेनी है। कुछ लोगोंके दिलों में यह डर है कि उनकी आत्मरक्षामें बाधा पड जायगी। यह डर तय दूर हो सकता हैं जर यह विश्वास हो जाय कि हमको जपरन् रखने की अपेक्षा हमारी आजादीसे शत्रु की और अधिक रक्षा होगी। इन सन्देहके बादलोंको फाडकर ज्योतिकी किरणे प्रकाश फैलावेगी और तेजमय सूर्य ससारको पुलकित करेगा। मानपूर्वक सन्धि करनेके लिये हमारे शत्रुका आदर्श भी उतना ही अचा होना चाहिये जितना हमारा। इसके बाद यदि यह किसी प्रकारका विरोध भी फरेगा तो न्यायका पक्ष लेकर । किन्तु शत्रु की घोर स्वार्थपरता और साम्राज्यलोलुपता जो कि आजकल उसपर भूत सी सार है यह आशा नहीं दिलाती कि शीघ्र ही यह परमार्थवादी, साधुचरित और उदार बन जायगा । चाहे कुछ हो, हमें अपने आदर्श को नहीं त्यागना चाहिये । वर्तमान इङ्गलेण्ड भले ही आनो पामरता और अत्याचारों, हमारी युक्तियोंकी उपेक्षा करे और हमारी दलीलोपर पानी फेर दे किन्तु हमारी आत्मा हमारे कार्यो में गूढ मन्तोष प्राप्त करती है। इतना ही नहीं, हमारे शत्रुओं के बीच से ही प्रतिभाशाली आत्माए चिल्ला उठनी है और साक्षी देती हैं कि मनुष्यमात्र एक हैं। वे सिद्ध करते हैं कि पन्धुताका भाव उनके भीतर भी सजग है । यह आदर्श हमें आगे बढ़ाने में उजाले का काम देता है। इस पधपर हमें सत्यका अगलम्पन करके चलना चाहिये । शत्रुके चाहे । कारण - 1 - । + - शत्रु और मित्र । कसे ही विचार हों हमें परवा न करनी चाहिये। इस कार्यमें कठिनता अधिकाधिक पयों न बढती जाय किन्तु यह कार्य सफल हो सकता है । राष्ट्रीयताकी न्याय्यता तथा इसका गौरवपूर्ण अर्थ 1 इस भ्रातृत्वके सिद्धान्तमें छिपा हुआ है। सारे जगतको अपना घर समझनेवाले लोगोंके पक्षकी यह लाजवाब दलील है। जीवनकी जो श्रेष्ठता और सुन्दरता सब जातियों का लक्ष्य होना चाहिये उसे जगत भरमें एक जातिके अतिरिक्त और सब जाति या अस्वीकार करें, तोभी वह एक जाति अपने देशके भीतर तबतक उस उद्देश्यको छातीसे लगाये रहेगी जबतक उसका जादू तमाम दुनियापर न चल जायगा। यदि यह चरम लक्ष्य अमी हमसे बहुत दूर हो, फिर भी इसका अनुसरण करने में हमको एकके याद एक पराक्रमके कार्य करने पड़ेंगे और विक्र- मपूर्ण कार्यों की सिद्धिर्म ही सदा सौन्दर्य और मानन्द मिलता रहेगा। वोर लडाकको सर्वदा उचित पुरस्कार मिलता है । उसकी बुद्धि शुद्धं रहती है पूनमें जोश रहता है और कल्पनाशक्ति तत्पर रहती है। यह जीवनका अर्थ समझता है, उसे काम करने में आनन्द मिलता है और परिणाममें यह सुख्यातिके शिपरपर अपना अधिकार जमा लेता है। इस उच्च चोटीसे कट्टरसे कट्टर सशया त्माके कानों में यह सर्वश्रेष्ठ सन्देशा गूजता हुआ मायगा कि “जब हम आकाश छुनेका प्रयत्न करेंगे तय हम पर्वत शिखर- पर पहुच सकते हैं।

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पञ्चम परिच्छेद
1
--
द
शक्तिका रहस्य
(१)
स्वतत्रता प्राप्त करनेके लिये हमें समर्थ धनना चाहिये। किन्तु
इस सामर्थ्यका भेद क्या है ? इसे भली भाति समझना और
समझकर व्यक्तिगत जीवनके आधारपर राष्ट्रीय जीवनकी नींव
धरना सारे प्रश्नकी कुजी है। अपने विरोधी अल्पसख्यक लोगों-
को शारीरिक शक्तिले दया देना अवाधित शक्तिका ऐसा पका
लक्षण माना गया है कि इस विषयपर सत्य यातको स्पष्ट करनेमें
धैर्य, सूक्ष्मदृष्टि और कुछ मानसिक अनुशीलनको आवश्यकता है।
लेकिन यह काम घडा-भारी है। हमें अत्यन्त महत्वपूर्ण युद्धक्षेत्र
की सूक्ष्म परीक्षा -करनी है, शत्रुको प्रकृतिका पता चलाना है,
अपने साधनोंकी शक्तिका भन्दाजा करना है और तिल तिल करके
तधतक शक्ति संग्रह करते रहना है.जबतक इम. अजेयताका
अमेध कवचन धारण कर लें
(२)
सधे पलके भेदको जानना अत्यन्त आवश्यक है। -दो निम्न
प्रकारकी लडनेवाली सेनाओं की तुलना करनेसे यह बात साफ
-1
.
र

शक्तिका रहस्य MVM मालूप हो सकती है। एक, सुसंगठित सेना जिसका परिचालन यडी योग्यतासे हो रहा है और जो आशा और उम्मेदसे उछलती हुई मागेको यढ़ रही है और दूसरे, म भ्रष्ट होनेके बाद किसी सेनाफे थोडेसे यचे सुचे सैनिक जो फि भग्गी पडनेपर अपने सहयोद्धाओं के समान भगाये नहीं जा सके किन्तु जिनकी आत्मा एक ऐमी आशाके साथ जूझ रही है जिसे सपने निराश होकर छोड दिया है। अय हम इन दोनोंपर विचार करेंगे क्योंकि इन दोनोंके मिलानले हम रहस्यको समझ सकेंगे। सुसंगठित सेना फा साहस उस उश कोटिका नहीं है जिसने पोडेसे बचे खुचे. सैनिकों को आखिरी दम तक लडनेके लिये हिम्मत दे रखी है।। पहले सुसंगठित सेनाको ही लीजिये। उसका पल इसलिये है कि उसने युद्ध शिक्षा पापी है, उसमें धने मेलका भाव है, उसके सैनिक अपने अफसरोंकी आशाफा पूर्णतया पालन करते हैं जिससे सारी पलटनमें एकता हो जाती है। इन बातोंके अतिरिक्त अधिक सख्या होने के कारण अपने सुरक्षित होने का विश्वास रहता है, दल बनाकर धावा 'फरनेमें उमङ्ग रहती है और अपने सेनानायकोंकी योग्यतापर विश्वास रहता है। इन सैंप बातोंसें सेनामें साहस और शक्ति रहती है। संगठनसे सेनामें ऑटमा विश्वास बढता है, इसीलिये पलटनोंमें फटेसे कड़ा दण्ड देकर भी फायदोंकी पावन्दी करायी जाती है। - सेनाकी शक्ति उसको सम्याधिकता, एकता, परस्पर तथा सरों पर निर्भरतामें ही है। जब इस सेमापर अचानक आफत टूट मावार व्यवहारमें सिद्धान्त 1 स्थय अपनी जान खतरे में डाल रखी है उसे दूसरोंको, निर्दोष बतलानेका मार अपने ऊपर नहीं लेना चाहिये। यह तो कदापि न होना चाहिये कि डरपोक लोगों को हृदयमें माने हप सिद्धान्तको भोर पढाने के लिये खुले आम नरम सिद्धान्तका प्रचार किया जाय। वे जहां तक सिद्धान्तको मानते है उन्हें उसपर अमल करनेके लिये उरोजित कीजिये। अपने सिद्धान्त- में कमी न करनी चाहिये क्योंकि ऐसा आदमी थादको समझता है कि वह ऐसी यातें धक गया जिनको यह बिल्कुल नहीं मान सकता, और यदि तुम किसी मनुष्यसे यह करनेको कहोगे जिसे तुम स्वीकार नहीं कर सकते और ऐसी बातें दूसरोंसे कहते हो जाओगे तो यह तुम्हारे हृदयका पल क्षीण कर देगा और जिस घातको तुम पहले घोर घृणाकी दृष्टिसे देखते थे उसके प्रति धीरे धीरे उदासीन यन जाभोगे। तुमको मालूम नहीं होगा फिन्तु तुम यदल जाओगे। पुराने मिन तुमपर रोष प्रकट करेंगे। यह देखकर तुम भी उनपर झुक. लामोगे, यह नहीं जानोगे कि तुम कैसे बदल गये हो। विश्वासी पुरुप जिन सिद्धान्तोंपर विश्वास करता हे उन्हें कुछ समयके लिये छोड नहीं देता। 'या अपने सिद्धान्तके विरुद्ध धात नहीं करता। यदि वह ऐसा करे तो कुछ दिनों बाद वह अपने सिद्धान्तको प्रकट करनेमें घपड़ायगा। दो प्रतिकूल वातोंका सामनस्य करना प्राय असम्भव है। ' हमें आधे दिलसे काम करनेकी नाति छोड देनी चाहिये। - - - स्वाधीनताके सिद्धान्त 4- - Ahme- -- Mrvie हमारी नीति पूर्ण, स्वच्छ, अक्रोिधो तथा अशान्त और जिला हृदयोंको सन्तुष्ट करनेवाली होनी चाहिये। जब हम ! अशान्त जिज्ञासुओंको अपनी ओर कर लेंगे तो अकर्मण्य'लं स्वय उनके पीछे चले आवेंगे। यह बात भली भाति सम लेनी चाहिये कि कोई भी मनुष्य अपनेको या अपने साथी गुरु कर्तव्यसे बरी नही कर सकता। इसपर भी हमने वर्तक भ्रष्टनाको बुरा नहीं समझा है । इसले हम गड़बडमें पड़े हैं, हमने हानि उठायी है । इस मतिसे कि हम भविष्य में वीर मया बनेंगे हम वर्तमान समयमें मनुष्य बननेसे भी वञ्चित रह जाते । हम उस धुंधले भविष्यका दृश्य देखते हैं जब हम महान कार करनेको प्रेरित किये जायगे । हम यह नहीं देखते कि प्रेरणा समय भी वर्तमान है, युद्ध छिड गया है, हमें गुप्त स्थानसे पता उठा लेनी चाहिये और वीरताके साथ इसे फहराना चाहिये सग्रामकी इतनी समीपताले हृदय दहल सकता है, किन्तु युज छेडनेके इस भयका अर्थ पराजयके सब बुरे परिणामोंको पिन विरोध किये सहन करना है। यह पराजय ऐसी है जो विजयां परिणत हो सकती थी। यदि हम वीरतापूर्ण भविष्य के लिए अपनेको योग्य बनाना चाहते हैं तो हमें वर्तमान समयमें ही उट खड़ा होना और मनुष्य बनना चाहिये। ( ७) कमी कभी हमारा वास्ता निष्पक्ष लोगोंसे पड जाता है। । .

माचार व्यवहार में सिद्धान्त युद्ध में ऐसी आवश्यकता मा पडती है। हमारे दुर्भाग्यरे अपने धीच ऐसे भी लोग है जो मायलें एडको पुगनी स्वाधीनताको फिरसे स्थापित करनेपर विश्वास नहीं करते। फिसी समय हम डिगन जाये इसलिये यह अच्छा है कि हम ऐसे आदमियोंके। निकट भी रहें, क्योंकि इनका स्पष्ट सत्यप्रेम हमको ठीक रास्ते- पर लानेके काम आ सकता है। हमें इन निष्पक्षपादियोंको अपनेमे मिलानको चटा करनी चाहिये। जयतक यह नहीं होता इन लोगोंसे हमें निष्पक्ष स्थानपर आपसमें समान प्रयोजनके लिये मिलना चाहिये। किन्तु स्वाधीनताका झंडा हमारे साथ साथ चलेगा। और यह यात सयसे मुस्य है। जय निरपेक्ष लोगोंसे मिलनेमें हम अपना झंडा साथ लिये चलते हैं तो क्या जिस स्थानमें विरोधी मतके लोग मिलते है वहा हमें अपनी ध्वजा गिरा देनी चाहिये? अपने साथ साथ सिद्धान्तरूपी झडा ले चलनेका अभिप्राय यह नहीं है कि हम दूसरोंमें यलाहकारसे अपना मत ठूसना चाहते हैं, यलिक यह है कि हम अपने चित्तमें सदा इन सिद्धान्तोंको स्पष्ट- तया रसना चाहते हैं जिससे प्रतिकूल मत हमपर जबरदस्ती न लादा जा सके। इस बातका हमें ध्यान रखना चाहिये किनिष्प- क्षतामें कोई फर्क न आने पाये। हमें ,इस, गढे में गिरनेसे भी सावधान रहना चाहिये कि ऐसे अवसरपर वह बात जिसे हम अपने सिद्धान्तके अनुसार नहीं मानते हमारे द्वारा स्वीकृत समझो जाती है क्योंकि उसका खण्डन करनेसे, निष्पक्षता नहीं रह स्वाधीनता सिद्धान्त । जातीनिष्पक्षताका आशय यह नहीं है कि हम जिस यातका विरोध नहीं करते उसे मान लेते हैं। निष्पक्षता दो विरोधी पक्षोंमें समभावसे रहनेका नाम है । मोरचूकि गम्भीर विषयोंपर हम विभक्त हो रहे हैं इसलिये यह हानिकर विचार हमें दिलसे निकाल डालना चाहिये कि इस मेलके स्थानपर एकत्र होनेसे हम निष्पक्षताके विरोधी सिद्धान्तोंको चुरा बतलाते हैं। दोनों पक्षके लोगोंके लिये जो अपने सिद्धान्तोंको जीवनका अग बनाये हुए हैं यह प्रशंसाकी बात नहीं है कि वह अनायास ही सिद्धान्तोंको घगलमें दया लें। नहीं, निष्पक्ष लोग अपने सिद्धान्त भूल जाने- को नहीं कहते किन्तु एक दूसरेके सिद्धान्तोंका सम्मान करते हैं।' निष्पक्षताका यह सिद्धान्त यहुत ऊ चा और गौरवशाली है। निष्पक्षपातियोंकी सभामें मनुष्यसे अपना सिद्धान्त छोडनेको नही कहा जाता, यलिक पक्षपातहीन मनुष्य और उसके सिद्धान्त पवित्र समझे जाते है। . - (८) जब हम समझ लेते हैं कि राष्ट्रीय भाव जीवन के प्रत्येक कार्यसे सम्बन्ध रखते है, तो हम मालूम करने लगते हैं कि इन भावोंकी रक्षा करनेके लिये पार बार हमपर अचानक भौर आ पडता है। जो लोग राष्ट्रीय विचारोंका प्रसङ्ग छेडते हैं वे जानबूझकर इनका तिरस्कार करने के लिये ऐसा नहीं करते, उनमें सस्कारही ऐसा पड जाता है कि अनजानमें यह बात 1 आचार व्यवहारमें सिद्धान्त ठीक समझ लेते हैं कि वर्तमान या भविष्य काल में हमारे प्रधान सिद्धान्त के लिये कहीं और नहीं है और वे यह आशा करते हैं किसय लोग उनसे सहमत हों। उनसे पहला और भीषण संघर्ष उनकी इस धारणापर ही हो जायगा कि वर्तमान दशा बदल नहीं सक्ती। हमें इससे उल्टी धारणा लेकर लडनेके लिये शान्तिसे कटिबद्ध रहना चाहिये और अपने पुराने सिद्धान्तोंपर भटल रहकर उनकी न्याध्यता प्रमाणित करनी चाहिये। हमें इस बातका भी पक्झा अनुभव कर लेना चाहिये कि हमारे विरुद्ध जिन लोगोंके विचार निश्चिन, दृढ तथा सधे हुए हैं उनको साया हमारी तुलनामें बहुत कम है। यह थोडी साया शक्तिशाली अगरेज सरकारको छातीसे लगाती है, बिना हेतुके इसकी अझायें शिरोधार्य करती है और जनसाधारणार अपना प्रभाव डालनेको कोशिश करती है । (जनसाधारणके विचार मनिश्चित होते है, जिस समय जो शासन करता है उसीके साथ बहते रहते हैं। हमें इस जनताके भीतर ही सत्य सिद्धान्तोको फेलाना है जिससे उनमें अधिक स्थिरता, अधिक उत्साह, अधिक जात्य- भिमानका सञ्चार क्षे और वे अपनेको जातीयताके योग्य सिद्ध कर सके । उनको स्नातन्यवादमें तभी पूर्ण विश्वास हो सकता है जब ये देखने लगेंगे कि हमारे पक्षको रक्षा पग पगपर की जा रही है। हमारा एक मात्र कर्तव्य अपने सिद्धान्तकी रक्षा करना ही होना चाहिये। यह कर्तव्य हमें खोजना नहीं पड़ेगा। यह स्वय उपस्थित होगा और इसके साथ हमारी परीक्षा हो जायगी।

स्वाधीनताके सिद्धान्त इसका एक उदाहरण लीजिये। जव नाना मतके मनुष्य किसी कामके लिये एकत्र होते हैं और महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा नहीं होती, अकस्मात् अनजानमें या आजमाइशी तौरपर एक भादमी ऐसा सवाल उठा देता है जिससे सभामें मतभेद हो जाय । मान लीजिये वह आयलैंडमें अगरओंकी प्रभुना स्वीकार करता है और आर्थिक लाभकी मूर्खतापूर्ण आशासे हमारा स्वा. धीनताका दावा छोड देता है। चस, इस विषयपर एकत्रित सभ्य बहुदा बातें यक जाते हैं और कुहराम सा मच जाता है। ऐसी स्थितिमें बहुत सम्भव है कि अयलेंण्ड की पूर्ण स्वाधी- नतापर विश्वास करनेवाला मनुष्य अपने साथ ऐसे मनुष्योंको देखेगा जिन्हें उसका साथ देना चाहिये था किन्तु मातृभूमिके अधिकारोंके विषयमें उनके विचार अस्पष्ट । रह गये हैं। ऐसी मनुष्य देखेगा कि दुसरे पक्षके विषयमें भी उनके विचार उतने ही अस्पष्ट हैं। वे किकर्तव्य विमूढ है ओर जो जिधर घसीटता है उधर ही चले जाते हैं। इसलिये जब लडानेवाला मत पेश किया जाता है उस समय यदि वह चतुर और पच्छ बुद्धि- घाला हो तो उस राजनीतिक दावपेंचकी कलई खोल सकता है और उन्हें हीन, निकम्मा और अपमानकारी सिद्ध कर सकता, इन यातोंसे है वह समामें और सरोका मन अपने ढाचेमें ढाल सकता है। सबसे बडी बात यह है कि उसे इसके लिये तैयार रहना चाहिये । यह बात हमें भलो भाती समझ लेती चाहिये कि वार्तालापमें बहुधा एक मार्केका शब्द किस प्रकार - आचार व्यवहारमें सिद्धान्त । ढग पलट देता है और जिस मनुष्यके विचार जोशीने और साफ होते हैं उसका कैसा रोव जम जाता है। उधर दूसरे लोग उदासीन व अनिश्चित रहते हैं। सिद्धान्तका कट्टर मनुष्य एक भी अच्छा है। कोई नहीं कह सकता जीवनकी घटनायें उसे कहा डाल देंगी। उसके सिद्धान्त उसके मुहपर ललकारे जा सकते हैं। उसे अपने मतका स्पष्टीकरण करना होगा। ऐसे अन. सरपर लोग किसी प्रकार अपना पिण्ड छुडाना चाहते हैं । किन्तु हमें अपनी ओरसे आक्रमण न फर अपने सिद्धान्तोंपर डटे रहना चाहिये पर जब दूसरा पक्ष आक्रमण करता है तो उसके लिये तैयार रहना चाहिये। इससे भी कमजोर लोगोंके हृदयमें सिद्धान्तके प्रति विश्वास उत्पन्न होता है । हमें दोषारोपण करने की शादतसे सक्रामक रोगकी तरह वचना चाहिये,किन्तु हम अपने पक्षकी बातें साफ साफ कहेंगे और शत्रु मिश्के साथ लडनेके लिये तैयार रहेंगे। किसी समय ऐसा होता है कि ठीक उस जगह जहा इस यातको सरसे कम आशा होती है इधर उधरसे भटकता हुआ एक मिथ्या सिद्धान्त चटकीले भडकीले शब्दों के भीतर छिपकर हमारी वातका खण्डन करने के लिये मा पहुंचता है। तत्काल घायुमडलको साफ करनेके लिये एक दो उचल शब्द कह दिये जाय। इससे हमारे मित्रोंकों ढाढस मिल जाता है और वे समल जाते हैं। जब हम विरोधियों के बीच अकेले रहते हैं और विरुद्ध सिद्धान्तवाले यह समझते हैं कि हम उनके साथ है और हमारे सहयोगकी आशा रखते हैं, तो हम उन्हें एक

-
स्वाधीनता सिद्धान्त ..
शब्द कहकर रास्तेपरला सकते है। यह शब्द उन्हें रोक देगा।
च समझ जाय गे कि हमारे श्या: सिद्धान्त है जिनके लिये हम
लडनेको कटिबद्ध हैं। फल यह होगा कि सब हमारा सम्मान
करने लगेंगे। चाहे लडाई लडनी पडे हम उक्त-ढगसे काम
फरनेपर अपनी स्थिति स्पष्ट कर देते हैं। इसे हम सरल शब्दों-
में कह सकते हैं कि हम अपना मडा फहरा रहे हैं।
(8)
जो मनुष्य अपने जीवन को धीरतापूर्ण भावोंसे भर देना
चहना है उसका किस प्रकार विरोध किया जाता है यहापर
हम उसका थोडा उल्लेख करेंगे। उससे लोग कहेंगे कि
तुम
किस मायाजालमें पडे हो; सपनेकी सी बातें कर रहे हो, या तो
तुम्हारा दिमाग पराय है, नहीं तो तुम मूर्ख हो । ऐसे मौकेपर हमें
यह देखना चाहिये कि हमारे समालोचक स्वय मायाजालमें
पडकर अन्धे तो नही बन गये हैं और हमें अपनी मूर्खताका
उनको धुद्धिमत्ताके साथ मिलान करना चाहिये।
x
x
X
उस सम्पन्न पुरुषको लीजिये जो सुखप्राप्तिको खोजमें इधर
उधर भटकता फिरता है और दूसरे लोगोंसे कहता है-"मूर्ख मत
घनो, मेरा उदाहरण प्रहण करो।" थोडी देरके लिये उसे
अपना पथ-प्रदर्शक मान लीजिये। कुछ समय तक उसके साथ
रहने आपको मालूम हो जायगा कि उसका अवकाश हुल्लडया-

आचार व्यवहारमें सिद्धान्त " जीमें ही कटता है, मानन्दसे नहीं। उसकी उस समयकी दशा देखनेसे जर किवह बेखबर रहता है पता चल जायगा कि उसका जीवन ग्लानि और सुस्तीमें पीतता है। यह भोग-विलासका पुजारी जीवनके हीन या श्रेष्ठ जिस मार्गपर चले उसे वह भार प्रतीत होगा। श्रेष्ठ जीरन यितानेके लिये वह एक या दो बढिया क्लयोंका मेम्बर बनेगा, और भी अधिक विषयासक्त होगा, अधिक अवकाश और अधिक आनन्द दू ढेगा, किन्तु इस प्रकार के पुरुषका ढग आप सर्वत्र एक्साही पावेंगे। जीवन उसके लिये भारी योम सा बन जाता है, उसके हृदय में किसी प्रकारका आनन्द नही रहता, कोई उत्तेजना नहीं रहती, शक्ति नहीं रहती और न उमग ही रहती है। इस दशामें रहनेकी इच्छा कौन करेगा एक और मिन आपकी पीठ ठोककर कहता है ऐसे भोग पिलासी मत बनो किन्तु कामकाजी बनो, भ्रममें मत पडो, अन- होनी यातोंमें मत फैसो-भविष्यकी यात कौन जानता है ? हमें तो वर्तमान समयसे काम निकालना है। हमारे इस विश्वासी मित्रमें विचार शक्ति का अभाव है। वह दूसरेको भविष्यसे सम्य. न्ध तोडने की शिक्षा देता है और स्वय ऐमा प्रस्तान कर रहा है जिसका परिणाम हम भविष्य में हो जान सकेंगे। हमसे तो वह कहता है कि कौन जानता है कि भविष्यमें स्थिति हमारे अनु. कूल होगी और अपने विषयमें भविष्यको अपने अनुकूल माने बैठा है। लेकिन हमारा तो यह दावा है कि भूत कालके समान ६२ स्वाधीनताके सिद्धान्त भविष्यमें भी हमारे सिद्धान्तोंकी प्रभुता रहेगी। भविष्यकी घट- नाओं के लिये कोई कुछ नहीं कह सकता। जो पुरुष हमारे सिद्धान्तोंके लिये हमें स्वप्न देखनेवाला कहता है वह वर्तमान या भूत कालका ऐसा एक भी उदाहरण नहीं दे सक्ता जिससे सिद्ध हो कि उसके ढगके लोगोंने कुछ कर दिखाया हो। संसारमें सभी स्वप्न देखते हैं। हा. कुछ लोग दुःस्वप्न देखते हैं और कुछ लोग स्वच्छ नक्षन खचित आकाशके नीचे संगीतमय सुन्दर संसारका दृश्य देखते हैं 7 - + (१०) नवीन उत्साहीको जिसने हालहीमें सिद्धान्तको ग्रहण किया है जानना चाहिये कि उसे ऐसे निराश करनेवाले अवसरोंका सामना करना पडेगा जिनका मुकाबला सबसे उत्साही, सबसे साहसी और सबसे ढचित्त मनुष्यों को भी करना पड़ा है। हमारा कार्य मनुष्योंका कार्य है और इसमें ऐसे परिवर्तन हुआ ही करेंगे जैसे मनुष्यके कायों में सदा हुआ करते है। इसलिये प्रत्येक ऐसे कार्यमें भाग लेनेवाले सैनिकको चाहिये कि वह सदा दारुण दुख सहने और ऐसे समयका सामना करने को तैयार रहे जिसमें उसे अपने चारों ओर अन्धकार ही गन्धकार दीख पडे। ऐसे समय निराशा भयानक अधेरे कुहरेकी तरह प्रत्येक सुन्दर वस्तुको और प्रत्येक आशाकी किरणको ढक देती है। इस निराशाके कई कारण हो सकते हैं। दुल

आचार व्यवहारमें सिद्धान्त
मनुष्यफे अधिक परिश्रम करने अथवा कई घर्षों से ऐसा
प्रयत करनेसे जो निरर्थक सा दीखता हो या जिसे लोग
भूलसे गये हों यह खिन्नता पैदा हो सकती है। यह म्लानता
अपनी ओर ऐसे मनुष्योंको देखकर भी पैदा हो सकती है जिनका
इस कार्यमें भाग लेना ही एक पहेली है, जिनका न तो चरित्र
ही ठोक है, न ये सिद्धान्नका महत्व ही समझते हैं और जिनकी
जघन्य, कुत्सित तथा कुटिल नीति तुम्हें निर्जीर बना देती है
क्योंकि
तुम समझने हो कि जिस मनुष्यके हाथमें हमारी जैसी
"निष्कलङ्क पताका हो उसे स्वभावत धोर, चीर और गम्भीर
होना चाहिये। यह मुर्दनी तुममें शनुके दिखाऊ अतुल चल और
उन हजारों मनुष्यों की लापरवाहीके कारण फैल जाती है जो
गद्गद् होकर स्वतन्त्रताके गले तो चिपट जायगे पर इस समय
हताश होकर हाथपर हाथ रखे बैठे हैं। इनके अलावा अपनी
यातों में मन्न रहनेवाले उस कामकाजी मनुष्यका विरोध भी हमें
खिन्न कर देता है जो सदा प्रत्येक उच्च विचार और अटल
सिद्धान्नोंकी आलोचना किया करता है।
यह सय कठिनाया स्वतन्त्रताके सैनिकको झेलनी होंगी।
जो सनामसे थक गये हैं उन्हें समझ लेना चाहिये कि जिस
समय सङ्कटको घडी आती है उस समय अन्धकारपूर्ण आका-
शमें एक चमकता हुआ तारा भी दिखलायी देता है । जहा एक
या दो सैनिक है घहा वह व्यर्थ मालूम हो पर यदि घे गुढ रहे
तो उनकी सख्या वृद्धि होगी। सत्यका प्रेम संसर्गसे फैलता

निस्वाधीनताके सिद्धान्त है। जिस समय उन्नतिके मार्गमें बाधा उपस्थित होती है उस समय इस घातपर विचार मत करो कि हमारी इस धक्त पया स्थिति है, पर इस घातको सोचो कि हमने एक समय कैसे उशता प्राप्त कर ली थी। इस समय हमारे लिये क्या धचा है और हम आगेको कितना प्राप्त कर सकते हैं। यदि कुछ लोग, शिथिल पड गये हों और समयके अनुकूल अपने सिद्धान्तोंको यदलने लगे हो तो अधिक दूर होकर उनसे सहानुभूति दिखलाओ। मृत्युको आलिङ्गन करनेकी अपेक्षा सिद्धान्मोंको पूर्णतया पालन करते हुए जीवित रहना कठिन है। कई उदारचरित्र पुरुष कठिन अवसर आ पडनेपर पूर्ण साहसके साथ उद्देश्यकी सिद्धिके लिये अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं। पर जीवित मनुष्यको सिद्धान्तके लिये समय समयपर बिना चेतावनी मिले ही अग्नि-परीक्षाका भार वहन करना पडता है, और कि सिद्धान्तके पालन करने में जीवनकी सारी शक्ति होम देनी पडती सिद्धान्तकी मागे इतनी जबर्दस्त होती है कि कई मनुष्य हिम्मत हार देते हैं। हमें जनसाधारणके दिल में यह जमा देना है कि जीवित रहना उतना ही साहसका काम है जितना कि जानपर खेलना। किन्नु वर्तमान समयमै हमें भ्रममें डालने के लिये यह चिकनी चुपड़ी यात कही जाती है कि "तुमसे मातृभूमिके लिये प्राणोत्सर्ग करने- फो कौन कहता है तुमसे तो प्रार्थना की जाती है कि उसके लिये जीवित रहो ।" इसके साथ इस नातपर जोर नहीं दिया जाता ।

आचार व्यवहार में सिद्धान्त
६५
कि जीवनका उद्देश्य तेजस्वी तथा सत्य आदर्शके लिये प्राण
धारण करना है। निरी क्षमा-प्रार्थनामें ही अस्तित्व गवा देना
जीवन नहीं है। यदि जीवनके विषयमें जनतामें ऐसे तुच्छ विचार
फैल जाय तो हमें मातृभूमिमें मनुष्यों के स्थानपर ऐसे जीव दिख
लायी देंगे जिन्हें भयसे कम्प छूट रही हो। ऐसे प्राणियों में न तो
जीवित रह सकनेकी शक्ति रहेगी और न जान देनेका साहस
ही रहेगा। वास्तव में महान् सकट मा उपस्थित होगा। इन सब
वातोंसे देशमें निराशा छा जायगी। इस उदासीनता और
विश्वासघातको, साहसहीन मित्र और लडाके शत्रुओंको तथा
अपने जीर्ण शरीर और चकरमें पड़ी हुई बुद्धिको देखकर
हममें से जो पुराने सिद्धान्तोंका प्रवार कर रहा है वह अपनी
भावाजको अवश्य हो अरण्यरोदन समझ सकता है। जरतक
पूनमें फिर गर्मी नही आजाती और विचारों में फिरसे तेजखिता
नहीं समा जाती तबतक इस अरण्यरोदनसे हो काम होता
है। हजारों वर्ष पहिले जो यातें नकारखाने में तूतीकी आवाज
समझी जाती थीं उनमें इस समय यल और उत्तेजना दिखायी
देती है किन्तु कामकाजी आदमीकी आवाज न पदले उत्तेजित
कर सकती थी, न अय कर सकती है
(११)
अरमन्तमें हम विचार परेंगे कि हमारा निश्चित मत फ्या
होना चाहिये । - अपने विचारोंको आचारमें परिणत करना ही
-
"
।
-

स्वाधीनताके सिद्धान्त x x हमारा मत है। जब हम ऐसा करते हैं. हमारा स्वाधीनताका संग्राम गूढ तथा सार्थक रूपमें आरम्भ हो जाता है। हमें भविष्य- में अधिक सुगमता देखकर अपना कर्तव्य स्थगित न करना चाहिये। स्वाधीनता प्राप्त करनेके विषयकी बातचीत छेडनेको चाध्य होना उतना ही सम्भव है जितना कि साधारणतया सैनिक सगठन कर युद्ध छेडनेको मजबूर होना। हम जय लडाई छेडने- को मजबूर होनेका उल्लेख कर रहे हैं, कोई यह न समझे कि हम सन्धिको यातचीतको भुला देनेकी भयानक भूलके अपराधी हैं । x हम नहीं कह सकते कि भविष्यमें हमारे ऊपर अचानक कौनसी घटना टूट पडे स्न्तुि जब हम सर्वदा यह ध्यान रखेंगे कि वर्तमान समय ही मार्मिक समय है तो हम हर घडी तत्पर रहेंगे। हमको वीरताके साथ अपना सिद्धान्त ठीक कर लेना चाहिये और अपने जीवनको उसके अनुसार चलाना चाहिये। । प्रत्येक मनुष्यको अपनी सेनाके साथ बना रहना चाहिये और अपना झण्डा किसीके सामने न गिराना चाहिये । ऐसा करनेसे- ही हम अपने चारों ओर अपनी जड फैला सकते हैं और इति- हासलेखक हमारे विषयमें लिग्वेगा कि हमारा काल तेजहीन नहीं बल्कि तेजपूर्ण था । मैं फिर कहूगा कि युद्धके चढाव उता. रके चकरमें पड़कर हमें समय देख अपना स्वार्थ सिद्ध करनेवाले पुरुषको हीनता और शत्रुके विश्वासघातसे व्याकुल न होना चाहिये। हमें शान्त तथा सयत रहना चाहिये और यहुनसे आचार व्यवहार में सिद्धान्त लोग जो साफ नीयतसे या आनेवाले आकस्मिक मयके कारण हमारे दलमें नहीं हैं उन्हें अपने जीवन के ढंगसे अपने सिद्धान्नमी सुन्दरता, सत्यता तथा नित्य व्यावहारिकता दिखा देनी चाहिये। इससे वे लोग हमारे पक्षमें आजायगे जिनके दिलपर हमारी यातका असर हो सकता है और हमारा मतभेद यथासम्भव घट जायगा। इससे वे लोग मली भाति समझ लेंगे कि जो अविचलित हो महान् सिद्धान्तको रक्षा करता है वह अवसरको ताक्ते रह- नेवालसे अधिक अच्छा काम कर सकता है। तब चे समभंगे किनमें भी इन्होंने जिस घातको सोवनेका साहस नहीं किया था उसने कितना अधिक काम होना सम्भव है । वे ध्येय- को आँखों के सामने देखेंगे और इस दर्शनसे उनमें स्थायी उत्साह, स्वच्छ बुद्धि और आत्माकी दृढता उत्पन्न होगी। जय इतना हो चुफा तो देशका उद्धार दुरफा स्वप्त नहीं रह जायगा, चिन्तु यथार्थ रूपमें भारम्भ हो जायगा, सय हृदयोंमें फिरसे जीवन शक्तिका सञ्चार हो उठेगा और आयलैंण्ड स्वतंत्रताके अन्तिम संग्राममें प्रवेश करके सफलतापूर्वक बाहर निकल आयगा तथा ससारके राष्ट्रों में अपना उचित स्थान फिरसे ग्रहण करेगा।

म , सप्तम परिच्छेद । हदभक्ति (१) मनुष्य की प्रशसामें सबसे बडी यात यह कही जा सकती है कि वह अपने सिद्धान्तका पक्का है। चूकि हमारे सारे इतिहास- में मातृभूमिकी दृढभक्ति ही देशवासियोंका प्रधान गुण रहा है इसलिये इस यातको निर्णय करनेका उपयुक्त समय आ गया है कि कौन म्मतृद्रोही हैं और कौन दृढ देशभक्त। जब मन्दमति सरकारने भली भाति जान लिया कि हम पूरे राजभक्त है तो उसने हमारे वीर नेताओंको राजद्रोही बतलाकर न्यायसे वञ्चित करनेकी चेष्टा की। जब मनुष्य ऐसी बुराईके विरुद्ध उठ खड़ा होता है जिसने देशमैं घर कर लिया हो तो हम इस मनुष्यको पददलित सत्यके प्रति जो ढभक्ति है उसकी प्रशंसा करते हैं। हम ऐसे यागीकी सराहना नहीं करते जो सिर्फ यगावतके लिये ही राज उलटना चाहता है । हमे यह विषय भली माति समझ लेना चाहिये, नहीं तो जब हम सदियोंकी चेष्टाफे बाद स्वतन्त्रता फिरसे स्थापित करेंगे तो प्रत्येक दुर्शन और विश्वासघातीको इमारी स्तननापर दोष लगानेका अवसर मिलेगा और वह x x x

।
है
ढमति ।
शत्रुको फिरसे हमारे देशमें घुसानेका पिड्यन्त्र रचेगा।
सिद्धान्तके प्रति दृढमति साधुस्वभाव पुरुषत्री सद्गुण
'मायलेण्डमें दूढभक्ति (Loyahty)शब्दका दुरुपयोग गुमा है और
इसको व्यर्थ ही बदनाम किया गया है। यह स्मरण करके कि
हमारे सय कालके वीर पुरुषों में यह गुण वर्तमान रहा है हमें
फिर इसे उचित सम्मानका पद देना चाहिये । इस दृष्टिसे
विचार करनेपर हमें कई ऐसी मार्मिक स्थितियोंका उल्लेख
करना पडेगा जिनके कारण हमें हैरान और परेशान होना पड़ा
है। हमें सरकारके उपकरणों का उपयोग करते हुए अपने उन
स्वत्वोंका प्रतिपादन करना पडेगा जिन्हे यह इन्कार करती है।
एक घातपर स्थिर रहनेका जो सबसे बड़ा प्रश्न आजकल
उपस्थित है उसपर भी ध्यान देना होगा। एक ओर राजनीतिमें
भाग्यपर खेलनेवालोंके प्रति और दूसरी ओर निरुत्साहसे
काम करनेवाले सत्य हृदय मनुष्य के प्रति अपने भावोंका
विचार करना होगा ढक्तिके अन्दर यह सब बातें समा
जाती हैं और इससे यह भी मालूम होता है कि-जो- आदमी
स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके-लिये चंगावत करता है ठीक वैसा ही
सा स्वतन्त्रताफी रक्षा करने के लिये प्राण देनेवाला । ऐसा
-आदमी बदलते हुए समयके साथ साथ अपने रेंग रंगको नही
अदलता। वह सदा सिद्धान्तका भट्टर भक्त रहता है क्योंकि
घोर अन्धकारके समय जय शासक उसे जङ्गली, दुष्ट और
राजद्रोदी यताराकक्ति करते है तब भी वह पहिलेके समान
है
1
1

स्वाधीनताके सिद्धान्त
है
अपने पक्षका दूढमत बना रहता है और मन्ततक वैसा ही
बना रहेगा। हा, देशके लिये मृत्युको आलिंगन करनेवाला चीर
वास्तवमें राष्ट्रका दृढभक्त है और शत्रुका प्रत्येक सहायक
और प्रोत्साहक आयलँएडका और आयरिश जातिका द्रोही है।
(1)
जब आप स्वार्थसाधक विरोधीसे अनुरोध करते हैं कि
तत्वों
आधारपर इस विषयकी आलोचना करे तो वह
फोरन अपनी दलीलोंकी कमजोरी मालूम कर लेता है और
प्रसङ्ग बदलकर आपके आचार और विचारों की स्थिरतापर
'चोट करता है। इसलिये हमें पहले ही समझ लेना चाहिये
कि किसी विषय की व्याख्या फ़रनेमें जो युक्तिया दी जाती
हैं उनका सापेक्ष गौरव और महत्व कितना है। सिद्धा
तोंका सबसे अधिक महत्व इसलिये नहीं है कि उनके
द्वारा किसी विषयमें प्रवीणतासे युक्तियां दी जा सके किन्तु
उनका महत्व इसलिये है कि उनके भीतर "एक महान् तत्व
छिपा रहता है जो सारे जीवनको उज्वल बनाये रखता है और
प्रत्येक छोटे बड़े कार्यको नियममें रखता है। सिद्धान्त व्यक्तिके
मनपर प्रकाश डालता है। वह हृदयको उत्साहित करता है,
निर्मल बनाता है और घल देता है। वह चित्तको एकाग्र करता
है और जीवनकी सब घटनाओंको एक सीधमें लाकर भाखोंके
सामने स्पष्ट कर देता है जिससे प्रत्येक मनुष्यको हर बातका
-
३

ढमक्किा ।
उचित स्थान और पास्पर सम्मन्ध मालूम हो जाता
सिद्धान्त मनुष्यको उस दर्जेपर पहुचा देता है जहां यह
शास्त्रार्थ नहीं करता किन्तु विश्वास करने लगता है। अबतक
1. वह इच्छा और उद्देश्यहीन होकर इधर उधर भटक रहा था,
सय शास्त्रोंका रसास्वाद ले चुका हो पर फिर भी घोर निराशा-
में
दूवा हुआ रहता था। वह नहीं समझता था कि उसकी
आत्मामे किस वस्तुका अभाव है। , यह इस अभावरूपी
व्याधिको दूर करनेके लिये संजीवनी बूटीको इधर- उधर, वोज
कर रहा था कि इतने में महान ज्योतिका उसपर प्रकाश पडता
है और चादरसे बल प्राप्त करने के बदले वह अपनी आत्माको.
पहचान लेता है। बस, अधेिको दो आखें मिल गयी। हमारी
तत्वयोधकी शक्ति अरनक भ्रमके बादलोंसे छिपी हुई थी।
सत्य सिद्धान्तने इन यादलोंको छिन्न भिन्न कर दिया और इस
दृष्टिको स्वच्छ, सुन्दर और नवजीवन दान करनेवाली धना
दिया। जिसने यह दृष्टि पा ली तर्कफा उसपर असर नहीं
होता। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह दलीलीको मानता ही
नहीं, बल्कि इसके विपरीत यह प्रमाणों का पूरा पूरा उपयोग
करता है। हा, उसको आत्मामें ऐसा योध हो जाता है जिसे
निरा नैयायिक प्राप्त नहीं करा सकमा और यह दुर्जेय पदार्श ही
उसके नवीन जीवनका रहस्य खोलता है। वह माजतक
नास्तिक था, निर्धल था और उसका जीवन निष्फल था। अब

स्वाधीनताके सिद्धान्त
.
.
है। जो उसे केवल भावुक समझता है उसने उसका पूरा महत्व
नहीं समझा। भावुक ऐसे विचारका प्रचार करता है जिसके
अनुसार वह समारको पलटना चाहता है, किन्तु सिद्धान्तका
अनुयायी जीवनके एक ऐसे नियमको मानता है जिसके अनु'
सार उसे काम करना पड़ता है। उसकी बात्मा इतनी तेजीले
आगे बढ़ती है कि कोई भावुकता उसे रोक नहीं सफेती।
इसके अतिरिक्त उसके पास अपने सिद्धान्तके अनुकूल मौलिक
और दिलमें जम जानेवाली दलीलें होती है और उसके खून में
नवीन और चमत्कृत करनेवाली जीवन शक्ति होती है। सिद्धा-
न्तशून्य व्यक्ति अपनी निकम्मी युकियों में फंसा हुआ तबतक वाद
विवादमें पडारहता है जबतक कि उसको धुद्धि चकरा नहीं जानी।"
उसकी समझ नहीं आता कि प्रत्युत्पन्नमतिवाला मनुष्य
किसी भी साध्यको योग्यताके साथ सिद्ध कर सकता है और
फौरन अपनी घात लौटाकर उतनी हो योग्यताके साथ दूसरी
पक्ष भी सिद्ध कर देता है। हम- गतदिन देखते हैं कि
सभा में विषय निर्धारित कर दिया जाता है और दोनों
पक्षोंके समर्थकोंको नियुक्त करके वादविवाद हुआ करता है।
यह वाक्चातुर्य है, घुद्धिका कौशल है, - किन्तु तत्वज्ञान
मात्माको उत्तेजना देनेवाला है। इसलिये सिद्धान्तको सत्यता
सिद्ध करने के लिये वाक वातुर्यको आवश्यकता नहीं है। यह
सत्यता सिद्धान्तके उस गुणमें वर्तमान रहती है जिससे
उसपर विश्वास करनेवालेके लिये सारे जीवन का रहस्य
+
.

दृढभक्ति
खुल जाता है, जिससे उसका हृदय फडक उठता है और, वह
प्रफुल्लिन, सुन्दर, बुद्धिमान और साहसी बन जाता है।
.
(३)
भर हम सिद्धान्तकी स्थिरताका जी प्रश्न उठाया जाता है
उसपर विचार करेंगे। हमारे विरोधी कहते हैं "अच्छा
महाशय | जब आप आगरेजी राज्यको नहीं मानते तो उनके
सिकों और स्टाम्पोंको व्यवहारमें क्यों लाते हैं ? आप पारला
मेंटको नहीं मानते तो फिर पारलामेंटफे कानूनद्वारा स्थापित
को हुई काउन्टी कौंसिलोंसे क्यों काम लेते हैं ? स्थानिक शासनसे
क्यों लाम उठाते है ?” इत्यादि । यह तर्क सुपरिचित हैं और
इनका उत्तर भी कुछ कठिन नही है। यद्यपि इस समय तो
नहीं गरज रही हैं तो भी मायलेण्ड यथार्थमें युद्धकी दशामें
है। हम स्वाधीनताको फिरसे प्राप्त करने के लिये लड रहे हैं।
संग्राममें संकटके समय शत्रुको ढीला पडना पडा है और
स्थानिक शासन और अन्य कार्यों के मोर्चे लाचार होकर हमें
सौंप देने पड़े हैं।
हम इनको लडाईमें जीते हुए स्थानोंकी
भाति समझते हैं और इनके द्वारा अपनी शकि घढाने, अपने
देशको जागृत करने व उठाने और शत्रु-सेनाको अन्तिम चौकी
छोन लेने की तैयारी करेंगे। यह सर्गथा उपयुक्त है। रणक्षेत्रमें
उस सेनापतिकी सदा प्रशंसा की जाती है जो शत्रु के अपर
फजा जमाकर उसका अन्तिम विजयके लिये प्रयोग करता है।

स्वाधीनताके सिद्धान्त
करते कुछ है, हमें उनको यह मुहतोड़ जवाब देना गहिय
कि हम शत्रुफे मोर्चों पर कब्जा कर रहे है।
17
.
"
सिद्धान्तको स्थिरताको मिथ्या धारणाका- खण्डन कर
चुकनेपर भी हमें एक ऐसी दूसरी धारणाका निरूपण करना है
जिसे अभीतक सर्वसाधारणने नहीं समझा है। - यदि हम
स्वतन्त्रताको सशक्त सेना तैयार करना चाहते हैं तो हमें ऐसे हो
सैनिक मत्ती करने चाहिये जो उद्देश्यको भली भाति समझे हुए
हों, जो लक्ष्यके लिये पूरे दिलले सर्वस्त्र न्योछावर करनेको तैयार
रहते हो और जो सदा यह प्रण किये रहते हों कि हम अपने
झंडेकी प्रतिष्ठा बनाये रखनेके लिये युद्धसे कभी मुंह ने मोडेगे।
इस बातकी महत्ता तभी मालूम हो सकती है जब हम संसारकी
ऐसी घटनाओपर विचार करते हैं।
जबतक मनुष्यका स्वभाव
नहीं यदलता प्रत्येक आन्दोलनको ऐसे राजनीतिक बहुरूपिये
धेरै रहेगे जो समयको देखकर अपना काम निकालनेके लिये
एक दल छोडकर दूसरे में जा मिलते हैं। ऐसे लोगोंका एक ही
सिद्धान्त होता है-जिस दलको प्रभुता हो उसीका पक्ष सम.
र्थन करना-और इस उद्देश्यको-सिद्ध करने के लिये.चे -किसी
मी दल में मिलने और किसी भी दलको धोखा देने में देर नहीं
लगाते। ऐसे आदमीको सब लोग भेली भांति जान जाते हैं। ऐसे
निष्कपटे पुरुषको जो आजतक उल्टे रास्तेपर, चल रहा था और
7

- -~~ "द्वदक्तिः " --- अब सच्चे दिलसे सत्यकी खोज करने के बाद हमारे झ डेके नीचे आजाता है, हम फौरन पहचान जाते हैं। किन्तु जिस उद्योग, राजनीतिक यहुरूपिया अपने दलमें भर्ती कर लिया जाता है और उसको प्रभुता दी जाती है वह उद्योग अवश्य विफल होगा। यह यात कुछ विचित्र सी मालूम होगी कि ऐसे लोग भी बहे घहे मान्दोलनोंमें भी किये जाते है। इसका यही कारण है कि नेता तत्काल लोगोंको अपने दलमें मिला लेना चाहते हैं और जो अभीतक अपने दलमें नहीं आये हैं उन्हें अपनी बढती हुई सख्यासे विश्वास दिलाकर उनके दिलों में धाक जमाना चाहते हैं। हम अपने बढ़ते हुए चलकी भावी हानिका ख्याल 'नही करते क्योंकि जब राजनीतिक चालबाज सिद्धान्तकी दुहाई देता हुआ हमारे दलमें घुसता है तो - वह यहा सुशील और सच्चा मालूम पडता है और हम उसे अनुभवी पुरुष-समझकर उसका स्वागत करते हैं। अपने घलको पढानेकी. चिन्ता उसे बिना भेद भावके मिला लेते हैं। किन्तु हमें अपने आदमी पर पूरा विश्वास होना चाहिये। हमें स्मरण रखना चाहिये कि इस चालयाजसे शत्रुताकी अपेक्षा मित्रता अधिक हानिकर है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिये कि जनता -जिसका भ्रम दूर करके हम अपने सिद्धान्त की ओर लाना चाहते है-चुप चाप हमारी कार्रवाई देख रही है । सम्भव है हमारे सिद्धान्तोंसे जनता हमारी ओर खिच रही है और हमारी जाच पडताल करने. के लिये हमारे पास भा रही है। जनता कुछ न जाने, पर वह

१०८
स्वाधीनता सिद्धान्त
.
सिद्धान्तभ्रष्ट पुरुपको अवश्य पहचानती है । जब हमारे दल औ
समानों में वह ऐसे पुरुषको पाती है तो वह हमारी दलीलें सुन
या हमसे प्रश्न करने के लिये न ठहरेगी। वह हट जायगी औ
हमसे दूर रहेगी। किसी आईमीको पहचान उसकी संगति
होती है । इस पुरानी कहावतकी व्यापकता जितनी हम समझ
हैं उससे बहुत अधिक है। इसके अतिरिक्त उस राजनीति
चालयाजको भत्ती करनेसे हमारे विचार व्यवहारके बीच कुछ
अन्तर आ जाता है।
हम स्वतन्त्रताके लिये लड रहे हैं, न कि सासारिक लाभ य
सुखकी आशासे । हम इसलिये लड रहे हैं कि मनुष्यकी उदा
वृत्तियां वाध्य करती हैं कि मनुष्य अपना स्वतन्त्रताका स्वत्त
प्राप्त करे जिससे उसका. जीवन सुन्दर और पराक्रमी बने
वास्तव में इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात कोई नहीं हो सकती कि
ऐसे धमयुद्धमें पामर, कपटी और कोरे स्वार्थों मित्र हमारे दल में
हो। हमें सोलहों आने अपने सिद्धान्तका भक्त होना चाहिये
और इस वांतकी आशका नही करनी चाहिये कि आरम्भमें
हमारी सख्या बहुत कम है । उस जनसमूहकी अपेक्षा जिसकी
दृढतापर हम निर्मर नहीं रह सकते सच्चे आदमियोंका छोटासा
दल अधिक काम करनेवाला होता है। इस दलकी संख्या और
शक्ति घटती जायेगी । अन्तमें इसके चारों ओर वह सेना एकत्रित
हो जायगी जिले कोई न हरा सकेगा।

। ढभक्ति - - विचार और व्यवहारको एकताफे यथार्थ ज्ञानके कारण हम राजनीतिक चालयाजले जिस प्रकार पचे रहते हैं उसी प्रकार इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि निरुत्साही किन्तु शुद्ध दृदय मनुष्यसे चौसा व्यवहार होना चाहिये । निरुत्साही पुरुष कहता है कि इङ्गलैण्डसे अलग हो जाना इस समय सम्भव नहीं है और होमरूठ या आयर्लएडके लिये स्वतन्त्र पारलामेंट स्था- पित करने का प्रस्ताय करता है। साधारण दूष्टिसे यह बात उचित जचती है और हमारी इच्छा इस आधारपर अपने देशके दूसरे दलवालोंसे सन्धि करनेकी होती है और सन्धि कर भी ली जाती है। फत यह होता है कि ऐसे लोग एक स्थानपर आकर जमा हो जाते हैं जिनमें से कुछ तो पूर्ण स्वतन्त्रतापर विश्वास करते हैं, कुछ आशिक स्वतन्त्रताको पूर्ण स्वतन्त्रताकी पहली किश्त मान लेते हैं और कुछ केवल माशिक स्वतन्त्रता को ही अपना ध्येय मान कर उससे सन्तुष्ट हो जाते हैं। थोडे दिनों में ही यह सन्धि टूट जाती है और सब लोग मतभेदके कारण कामसे अपना हाथ पींच लेते हैं। दीर्घ दृष्टिवाला पुरुष जानता है कि प्रत्येक प्रस्तुत कार्य अन्तिम ध्येय और सिद्धान्तके अनुकूल होना चाहिये, इसीसे हमारे उद्देश्यकी सिद्धि हो सकती है। उसे यह भी मालूम रहता है कि इस समय हम जो काम कर रहे है उसके भीतर हमारा सिद्धान्त छिपा रहता है। ऐसे समय उसे अपने पक्षका कट्टर मनुयायी बना रहना चाहिये और ।

स्वाधीनताके सिद्धान्त . वह सिद्धान्त भी मानना चाहिये जिसे और लोग भले ही न मानें किन्तु वह अपने जीवनका व्रत समझता है। किन्तु उसके नये मित्र ऐसे सिद्धान्तसे बधना अस्वीकार करते हैं जो उसके लिये कानून के बराबर है पर औरों के लिये जिसका कुछ मूल्य नहीं है। सारे झगढेको जड यही है । जो मित्र किसी समान उद्देश्यको लेकर मिलकर काम करनेका विचार करते हैं ये देखते हैं कि उनके बीच ऐसे विषय छिड जाते हैं जो विवादास्पद हैं। वाद- विवाद भारम्भ हो जाता है और बहस गरम हो उठती है, यापसमें गाली गलौज होने लगती है, मनोमालिन्य पैदा हो जाता है और सभा भङ्ग हो जाती है। अपना मन मारकर जो मित्रता की जाती है उससे मनोरथ तो सिद्ध नहीं होता बल्कि इसके द्वारा जो शुद्धहृदय मनुष्य एकत्र किये गये थे उनके बीच अविश्वास उत्पन्न हो जाता है। इस प्रस्तावको कार्यमें परिणत करनेसे कुछ लाभ नहीं हुआ। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिन लोगोंको अपनी पूर्ण मांगोंकी स्वच्छ धारणा है उन्हें सावधानी तथा दृढतासे अपना प्रोग्राम तैयार कर लेना चाहिये और अपने ही वल्पर आगे बढना चाहिये। इसपर कई लोग दुहाई देने लगते हैं-देखिये ! फिर आपसमें फूट पड गयी, फिर वही बात आगयी, यह लोग मापसमें मिल हासनहीं सकते, इत्यादि । हम इन लोगों की बात सुनकर मुह नही मोडेगे। किन्तु ध्यान रहे कि काम पडने. पर हमाग पूरा पूरा साथ न दे सकनेवाले शुद्धहदय मनुष्योंसे - दकि धिना सिद्धान्तों की हत्या किये भी मेल हो सकता है। ऐसा स्वतन्त्र मेले हमारा यह मनोरथ सिद्ध कर सकता है जिसे पूरा फरनेके लिये हमने सब दलोंको मिलाया था और अन्त में जिससे हमारा सारा काम चौपट हो गया था। इस विषय पर सबसे मुख्य बात यह है कि उस सच्चे भादमीकी नीयत घुरी न यतानी चाहिये जो हमसे मिन्न मार्गपर जाना ठीक समझता है । जिस आदमीसे हमारा मतभेद होता है उसकी नीयतपर आक्षेप करना किसी प्रकार भला नहीं कहा जा सकता । बहुधा यह देखने में आता है कि वह उतना ही सच्चा है जितने हम। उसने हमसे अधिक समयतक और हमसे अच्छी सेन की है और दूसरोंसे मेल मिलाप रखनेकी फिक्रमे उसने मित्रता का दङ्ग स्वीकार किया है। हम उसके ढगको पसन्द नहीं कर सकते किन्तु उसपर पुरी नीयतका दोष लगाना सरासर अन्याय है और इसका परिणाम सदा हो भयकर होता है। फर्मशून्यताको दूर करने के लिये कई बार हम आपसमें ही लड पैठते हैं । हमें ऐसा न करना चाहिये और सबके समान-शत्रुसे ही मतलय रखना चाहिये । हमें ध्यान रखना चाहिये कि यह पदे पराक्रमका काम है, - इसमें स्थिति म्वय धीरे धीरे अधिकाधिक निश्चित होती जाती है और ऐसा मालम होता है कि हमें अपनी सारी शक्ति इसके पीछे लगा देनी होगी। मान लीजिये कि एक इञ्जिनियर एक बड़ी इमारत तैयार कर रहा है। वह किसी जगह कुछ असावधान रहा या किसी कठिनतासे नजर यचा गया,

११२
खाधीनताके सिद्धान्त
.
उसकी इस भूलसे सारी इमारत भद्दी हो जायगो योर हो
है कि सारी इमारत गिर जाय । इसलिये हमें निघड
सिद्धान्तपर डटे रहना चाहिये। “जय उक्त सव बातें।
एक अविरोधी पूर्ण सिद्धान्तमें परिणत हो जाती है तो देश
ज्योति फैल जाती है और पुराना तेज फिर स्पष्ट हो जाता है
मनुष्योंको नीचता धुल जाती है, डरपोक लोगों में उच्च ।
की वीरता आ जाती है और निडर लोगोंको पक्ष सिद्ध हो
है। मातृभूमि जाग उठती है, उसमें सिद्धान्त के लिये ल
जोश आ जाता है और वह विजयकी ओर प्रयाण करती।
सिद्धान्तभक्तिका निस्सन्देह यही सुन्दर अर्थ है । हमे यह
पताफाओं में लिख लेना चाहिये और सारे ससारमें इसकी घो
कर देनी चाहिये। यह अर्थ दुविधाहीन, गौरवपूर्ण, भय
और 'अपरिवर्तनीय है। इस परिच्छेदमें उत्साह, यथा
और सावधानी के साथ जो कुछ लिखा गया है उसके संशं
और परिवर्धनकी कभी आवश्यकता न पदेगी, भले ही
कालके लिये भाग्यके पलटनेसे हम अपराधी समझे जाय।
स्वतन्त्रताके सग्राममें शुद्ध हो जानेके बाद हम मन्तिम युः
ससारको चौंधिया देनेवाली विजयको प्राप्त करके बाहर निक
तो हमारी यह दृढभक्ति फिर भी धनी रहेगी। यह मध्या
सूर्यके समान चमकती है। इसमें वही रम्यता और स्थि
"
+4

म ON Tढमति रहती है जिससे हमारे समामके पद पदपर प्रकाश पडना गया था। पूर्ण विजय प्राप्त होनेके बाद भी सम्भव है कि यह दृढमक्ति राष्ट्र के विधिनियम धनानेके समय और राजाओं, राष्ट्रपतियों तथा राजनीतिज्ञोके चघरमें पड़े हुए इस संसारमें राष्ट्रका नया सगठन करने में हमें पथ दिखायगी। इसपर एक चवित्त मनुष्य जिसके हृदय में कुछ तो नयी ज्योति पडी हुई है और कुछ पुराना डर बना हुआ है कहता है "आप बडी भारी आशा किये हम मनुष्य हैं देवता नहीं।" यह विरकुल ठीक है कि हम देवता नहीं है । चूकि हममें मनुष्यस्वभाव सुलभ त्रुटिया हैं, हमारा मन भ्रान्त है, हमारा चित्तका वेग सहसा उचल पड़ना है, इसलिये हमसे सबसे अधिक आत्मविश्वासी पुरुप भी अपनेको किसी समय दुर्बलतासे सना हुआ पाता है। जब वह आवार तथा विचारमें डामाडोल दिखायी पडता है तो उसे कौन ठोक रख सकता है। वह असहाय, अपमानित तथा भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे पुरुषको समझ लेना चाहिये कि हम इस चमडसे एक उत्तम सिद्धान्त अपने सामने नहीं रख रहे हैं कि हम सुगमता से उसका पालन कर सकेंगे, किन्तु भली भाति यह समझकर कि हमारे लिये इस सिद्धान्तसे दूर रहमा सम्भव नहीं। अटल सत्य यही है । जय ससारमें विश्वासी पुरुष पैदा होता है तो जन्मसे ही उसे हृदययलका इतना सहारा है कि यह पल उसे कमी धोखा नहीं देता। उसका सिद्धान्त उसे पथ दिखाता है और नये युद्धमें कूदने के लिये तथा नयी दुनियाओंको जीतनेके

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अष्टम परिच्छेद
*+260
नारी-धर्म
(१)
भविष्यमें जो महान् युद्ध होगा उसका पहला मोरचा भाज
मार लेना है। यह यात स्त्रियों को भी समझ लेनी चाहिये ।
ससारमें इतनी नीचता है कि कभी कमी मनुष्यको ऐसा सिद्धान्त
पकडना पडता है.जो ऊचा नहीं है और कमी अपनी मनुष्यताका
परिचय देने के लिये लडना पडता है। ऐसे अवसरोंपर स्त्रीको
उसका साथ देना चाहिये, नहीं तो यह उसे गिरा देगी। स्त्रीके
यद यात समझनेपर उसया कर्तव्य महत्वपूर्ण यन जाता है और
उम सामो मा राडा होता है। मनुष्य पहुधा सन्मार्गके
सकीर्ण किनारपर जाकर विवलित हो जाता है, उस समय स्त्री
ही उसे निश्चयपर लाती है। यदि यह पत्ति शुद्धचरित्र है तो
वह उसे अपने गुणोंमे अलकृत मग्गो और यदि वह उससे नीच
होगी तो पतिको और नीरे गिरा देगी शार दोनोंकी आत्माए
एक सी होती है और दोनों उच्च प्रतिके होते हैं तो
संसारमें उनका ऐला, ते7 ला जाता है कि हम परमात्मा
अस्तित्वपर पूरा विश्वास हो जाता है । इससे हमें यह भी-यदि
Modi
-
-

११४ स्वाधीनताके सिद्धान्त लिये उसकी शक्ति इतनी अधिक बढा देता है. कि जगद्विजयी सिकन्दरकी घुद्धिमें भी इस शक्तिका ध्यान न आया होगा। किसी मनुष्यको उसके हृदयका विश्वास और उसका सिद्धान्त योग्य बनाते हैं। यदि नीचसे नीच पुरुप भी सच्चा है और अच्छी सेवा कर रहा है तो वह बसे बड़े पुरुपके समान है। हमें निकम्मी पाते और क्षुद्र हृदय मनुष्योंकी कुटिल नीति छोड देनी चाहिये और अपनेको मुक्त करने की माशासे दिव्य पताका तथा मनुष्य व देवताओंकी दृढ सत्यभक्तिका अवलम्बन करना चाहिये।

।
अष्टम परिच्छेद
*+ke+
नारी-धर्म
(१)
भविष्य में जो महान युद्ध होगा उसका पहला मोरचा शाज
मार लेना। या पात लियाको भी समझ लेनी चाहिये।
समारमें इसनीनीचता कि कभी फमी मनुष्यको ऐसा सिद्धान्त
पपना पता है जो ऊचाना है और कमो अपनी मनुष्यताका
गरिचय देने के लिये लड़ना पड़ता है। ऐसे अवसरोंपर सीको
उसका साथ देना चाहिये, गहों तो यह उसे गिरा देगी। बीके
यह यात समझनेपर उनका फर्तव्य महत्वपूर्ण पा जाता है और
उसके मामो भा राडा होता है। मनुष्य यातुधा सन्मार्गके
समीर्णमिनारंपराफर विदित हो जाता, उस समय सो
ही उसे निश्चयपर लाती है। यदि घर पतिस शुद्धचरित्र है तो
बात उसे अपने गुणोंमे अलशन गरेगो और यदि यह उससे नीच
होगी तोपको और नीचे गिरा देगी जब दोनोंकी आत्मा
एया सी होती है, और, दोनों उच प्रतिके होते हैं तो
संसार में उनका प्रेमा,तेज छा जाता है कि हमें परमात्मा
अस्तित्पर पूरा विश्वास हो जाता है। इससे हमें यह भी-यदि
m--
-
-

स्वाधीनताके सिद्धान्त
आजतक न हुमा हो तो-विश्वास हो जाता है कि उनका
आश्चर्यमय जीवन अनादि कालसे अनन्त फालतक मगलमय और
सुन्दर है, इससे हमें पता लगता है कि पति और पक्षीके
आश्चर्यपूर्ण सम्बन्धको उत्पत्ति और भविष्य क्या है। एफका
रहना दूसरे के लिये अत्यन्त आवश्यक है। यदि एक दूसरेसे अलग
रहता है, यदि वे मेलके साथ नहीं रहते तो एक भी जीवनकी
रमणोकता और उसकी ज्योतिकी पूर्णताका अनुभव नहीं कर
सकता। प्रत्येक पुरुष और खोको यह बात भली भाति देख
लेनी चाहिये, उन्हें यह भी जान लेना चाहिये किन मालम
किस समय, सत्यताके यलपर नहीं किन्तु अपने कर्मचारियों के
वलपर शासन करनेवाला कोई छोटा मोटा अधिकारी उनसे
किसीको भी ललकार दे। हमारे ऊपर ऐसे ही शासकोका
राज्य है। हमारे कई भाई मोग विलासमें दिन व्यतीत करते हैं।
और शासकोंकी हा में हा मिलाते हैं। ऐसे आदमो मनुष्य बन
कर तगहालतमें नहीं रह सकते, घे तो येकार रहकर मजा उडा.
ना चाहते हैं। ऐसे मनुष्योंके लिये वरनाडेशाने थाहा ठीक कहा
है कि उनकी आत्मा गुलाम है।"यदि हमें धीरतापूर्ण भविष्यके
लिये तैयारी करनी है तो इस चुराईसे लडना पडेगा। यदि हम
राष्ट्रकी दासताको भगाना चाहते हैं तो पहिले प्रत्येक व्यक्तिकी
खुशामदखोरोकी आदत छुडानी होगा-। मापी युद्ध के लिये
यही हमारा शिक्षाक्षेत्र है। हमारा ललनाओको भी यह यात
हृदय में रख लेनी चाहिये । महिलाओंकों
पहचात
।
६

नारी धर्म -- - हृदय गम फर लेनी चाहिये जो मानन्दपूर्ण घृणित जीवनको अपेक्षा मात्म-सम्मानके साथ भूखों मरना पसद करती हैं। इस- लिये हम सय कार्यकर्तामों को राष्ट्रीय भावोंसे पूर्ण समझकर निघेदन करेंगे कि यदि तुम्हारे हाधमें स्त्रीशिक्षाका कार्य है तो उन्ह' यताओ कि दासभावले भरी हुई आत्मावाले मनुष्यका' निरस्कार करें और उसं ऐश्वर्य से हार्दिक घृणा करें जो ऐसी मात्माका मूल्य है। (२) मैं अपनी घोर नियों के विषय में कुछ लिखना चाहता हु । जय हम किसी महान कार्य के लिये अपनेको या दूसरों को उत्साहित करना चाहते है तो उन धीर स्त्रियों और पुरुषोका उदाहरण देते है जिन्होंने इसी तरहको कठिनाइया झेली हैं, जो शूरताके साथ युद्ध में कूदे हैं और छाती दिखाते हुए लडाईके मैदानसे बाहर हो गये हैं। इन सूरमामोंने ही हमारे लिये जीवन धन्य करनेवाली बपौती छोडी है। यह हमारे लिये कम लजाका विषय नही है कि हम अपने घीर पुरुषोंका इतिहास कम जानते हैं इससे भी अधिक लजाका विषय यह है कि हम अपनी धीर नियोंके विषयमें कुछ भी नहीं जानते। और जब कमी हम किसीकी महि मा कीर्तन करते हैं तो हमारा चुनाव ठीक नहीं होता। xxx हमारे जीवनपर कविताने प्रभाव डाल रखा है। देशमतिके - हितमें यह प्रभाष ठीक नहीं है। हम किसी प्रेयसीकी सर्वनाशकी

--
स्वाधीनताके सिद्धान्त
कथा सुनकर दयासे पिघल जाते हैं। हममें अपने लिए और
सपके लिये सहानुभूति उमड पडती है। भावकी लहरोंमें
बहकर हम अपनी नसे ढीली कर देने हैं। यह करणा हमें
दुर्वल कर देनेवाली है। इसमे मालूम होता है कि खनके अन्दर
खोलनी हुई गरमाहट नहीं है,, जीवनपर हमारा पूर्ण अधिकार
नहीं है और हममें दृढ निश्चय नहीं है कि झण्डे को पकड़कर
एक स्थानपर डटे रहे और युद्धको समाप्त करें। अब समय
आ गया है कि जिस पीढीने सारा फ्यूरानको कीर्ति के गीत
सर्वत्र सुने हैं वह अय, उससे भी अधिक, वीर तथा सुन्दर
आदर्शवाली टोनकी धर्मपतीका गुणगान करे। -
(३)
जय हम त्रियों के विशेषता-प्रदर्शक गुणोंपर विचार
करते हैं तो सौजन्य, कोमलता, सहानुभूति तथा करुणाके भाव
ध्यानमें आते हैं। और जब किसी स्त्रीमें यह गुण अपना
जमाते हैं और उनके साथ सहनशीलता, साहस एवं
वीरताके मनुष्योचित गुण रहते हैं, तो ऐसी स्त्री वीर समश्री
जाती है । यायरिश नेता टोनकी पत्नी ऐसी ही थी। हम उसकी
प्रशंमा निर्भय होकर कर सकते हैं । उसकी हर तरहसे परख हो
चुकी और वह हर तरहसे बिल्कुल सत्य उतरी। अपने पतिकी
भक्ति कर और उसे,देशके कार्यमें उत्साह प्रदानकर उसने जो
काम किया उसकी महान् प्रशसा की जानी चाहिये। यद्यपि
.
गाढा रङ्ग

नारी-धम उसका पति मारा गया और यह पति प्रेम और उसके उत्साह- पूर्ण जीवनसे रचित रखी गयी, तिसपर भी उसकी सत्यताने लोगोंको माश्चर्य में डाल दिया। प्रश्न उठ सकता है कि टोनकी जीवित अवस्थामें उसकी स्त्रीका पनिके प्रति प्रगाढ प्रेम था इसीलिये यह पतिव्रता रही। किन्तु नहीं, उसके इस प्रारम्भिक जीवनमें दयाभाव प्रधान था, लेकिन यादको जय उसके ऊपर दुख पडा उसने ऐसे धैर्यका परिचय दिया कि उसकी वास्तविक महत्ता चमकने लगी। जिम प्रेममें वे दोनों बधे हुए थे वह साधारण नहीं था । इन दोनोंकी जीवनी पढनेसे स्पष्ट और सुन्दर मालूम पडती है। टोन धीर, सगठनकर्ता, जबरदस्त लडाका, दूरदर्शी, सोचनेवाला, अदम्य उत्साही और जन्मसेही नेता था। प्रेममें मग्न बच की तरह यह प्रेममरी सादगीसे अपनी स्त्रीको लिखता है "मुझे सदा तुम्हारा और यच्चोंकाही ध्यान रहता है । इस पत्रका अन्त यों है "मेरो मोरसे पद्योंका मुह घार घार चूम लेना । ऐ जीवनधन और प्राणप्रिये ! भगवान तुम्हें सदा सुखी रखे।" यह आश्चर्यको यात नहीं है। जप अपने कार्यके आरम्भमें टोन अमेरिकासे प्रचार- कार्यके लिये फास जानेकी तैयारी कर रहा था,तो उस समय भी उसे अपने असहाय याल पच्चोंकी याद आनेसे कष्ट हो रहा था। उसे प्याल आता था कि इस सकटमें मेरी स्त्री क्या करेगी। क्या घर में होनेपर मुझे छातीसे लगाकर सेवेगी और रोते हुए बाल बच्चोंकी हालन सुनायगी और मेरी प्रतिज्ञाकी पात छेडेगी

स्वाधीनताके सिद्धान्त
तथा मुझे प्रेमकी याद दिलाकर गिडगिडायगी कि अंत्र देशका
काम भूल जाओ? सुनिये, इस सकटके समयमें अपनी स्त्रीकी
धीरताके विषयों टोन क्या लिखते हैं:-"मेरी प्रतिष्ठा और
डितके लिये जरी स्त्रीका साहस और उत्साह नाममात्रको भी
नहीं घटा था । उसने मुझसे निवेदन किया 'आप अपनी प्रतिक्षा
पर डटे रहिये और देशके प्रति अपने धर्मको निभाइये। आपकी
अनुपस्थितिमें घरका काम काज मैं सभालूगी । देशके कामके समय
बाल पच्चोंकी तथा मेरी तनिक भी चिन्ता न कीजिये। वह
परमात्मा जिसने समय असमय आश्चर्यजनक रीतिसे हमारी
रक्षा की है इस दुखमें हमें न छोडेगा। सच्ची स्त्रीकी यह
अचूक वाणी है । जिस समय वह टोनको विदा करती है उसका
शरीर कांपता है किन्तु आखोसे यह ज्योति निकलती है कि
जिसके सामने मनुष्य भी लजिन हो जाय ।
वह ज्योति उसके
अद्वितीय पति टोनमें ही देखी गयी, किन्तु और कोई मनुष्य उसे
पा नहीं सका । इस स्त्रीकी अटल धीरताकी अग्निपरीक्षा
भीषण भविष्य में ली गयो जव देशका काम नष्ट भष्ट गया :
और टोनको अपने प्राण अर्पण करके प्रायश्चित्त करना पड़ा।
जब उसका अन्तिम समय आया और उसके भाग्यका निर्णय
चुका था उसने अपनी स्त्रीको पत्र लिया। उसकी वीरताका
इससे ओजस्वी प्रमाणपत्र और कोई नहीं हो सकती । “टोनने
लिखा “ये प्राण प्यारी
अब विदा दो। -मेरे लिये यह पत्र
।
.

मारी धर्म - समाप्त करना असम्भव हो गया है। ,मेरी [Mari ] को मेरा प्रेम जताना और सबसे अधिक यह यात स्मरण रखना कि चाल यद्योंकी मा याप भय तुम्ही हो। मेरे प्रति अपने प्रेमका पका प्रमाण तुम इन बाल यचों की शिक्षाके लिये अपनी रक्षा करके ही दे सकती हो । शक्तिमान ईश्वर तुम सयका भला करे।" क्या ही सुन्दर पत्र है! जो यात लिखी हुई है उससे अधिक जोर उस वातपर है जो नहीं कही गयी है । स्त्रीके लिये रोना नहीं, अपना नाममात्र दुख नही। इस पत्र में एक म्पलपर लिखा है-"तुम्हारे और पश्चोंके लिये हृदय में जो भाव उठ रहे हैं शब्द उन्हें प्रकट नहीं कर सकते। इसलिये यह चेष्टा न करूगा। किसी प्रकारके दुखहेका रोना तुम्हारी और मेरी धीरता यहा लगाता है।" इसीलिये तो टोनकी स्त्रीने अपने कप्टमय जीवन में इस दारुण परीक्षाका शान्त चित्तसे सामना किया। टोनका अपनी स्त्रीके प्रति पूर्ण विश्वास यत- लाता है कि यह घोर स्त्री पतिको आज्ञाओंका किस प्रकार पूरा पूरा पालन करती थी। श्रीमती रोनका बादका जीवन पग पगपर साक्षी देता है कि उसने पतिकी अमानतमें खयानत नहीं की। टोनके लडकेने जो पिताके मरते समय निरा वचा था अपनी जगातीमें उसने अपनी स्मृतिया लिखीं। एक स्थानपर वह अपनी माताकी सीधी सादी प्रशसा करता है । देखियेस सादगीमें कैसा ओज भरा हुआ है "मेरी बची हुई माने मेरा पालन पोषण पिताके सब भावों और सिद्धान्तोंके अनुसार किया।" माको प्रशंसा

१२२
स्वाधीनता सिद्धान्त
१
1
यह शब्द यथेष्ट है। आगे सुनिये ।। , उसने सन्तानकी सेवा में
अपनेको मिटा दिया और गर्व के साथ अपनी तथा अपनी
सन्ततिको स्वतन्त्रताका पूरा ध्यान रखा। यह फासो एक
सेनापतिकी स्त्री थी।
उसने सहायता स्वीकार नहीं की।
फासके सपूतोंने उसको सम्मान किया।
टोनको मृत्यु के सालभर योद लूश्या योनापातने फासकी
राष्ट्रीय समामें उसकी प्रशसा करते हुए मोजस्वी भाषण दिया
था कि यदि टोनकी सेवा आपके भावोंको उत्तेजित करनेके
लिये यथेष्ट नहीं है, तो मैं उस उच्च विचारवाली स्त्रीके' स्वतन्त्र
विचार तथा दृढताका उल्लेख करूगा जो अपने पति तथा अपने
भाईकी कवार आयलैंण्डकी मुक्तिकी लालसा अपने आसुओं के
साथ यहा रहा है। मैं चाहता है कि उसके चेहरे पर दुखके
भावों के साथ २ आयरिश तेज किस प्रकार सना हुया है यह में
आपको बतला सकता। वह स्पार्टी (प्राचीन यूनानका एक
मान्त ) की उन रमणियों को याद दिलाती है जो अपने देश-माइ
योके युद्धक्षेत्रसे लोटनेपर उत्सुकताभरी दृष्टिले सेनाको देखने
के लिये दौड पडती थों और जर देखनी थी कि उनके पति, पुत्र
और भाई लापता हैं तो आनन्दसे कहती थीं उसने अपने देश के
लिये प्राण दिये हैं, वह प्रजातन्त्र के लिये मरा है। जब मासमें
प्रजातन्त्रका पतन हुआ, नेपोलियन सम्राट घना और इस हलचल
में उसके स्वत्वोंपर ध्यान ने दिया गया, तो वह स्वय
अपने
पुत्र
को लेकर नेपोलियनके पास गयी और टोनकी सेवाओंको स्मरण

, नारी धर्म
दिलाते हुए उससे प्रार्थना को कि यह उसे पलटनमें मती फर ले।
सयको देवकर यहा माश्चर्य हुआ कि नेपोलियनने उसकी पात
यदे पादरसे सुनी और तहगल उसे स्वीकार कर लिया।
उसने यह प्रार्थना अपने पफमात्र बचे हुए पुषके लिये फी थी।
उसके दो यो पहले ही मर चुके थे। लडकीको मृत्युफा
दृश्य यहा दृदयविदारक था। भयावह एक लडफेको लेकर
खड़ी थी। किसी बच्चेफा सरक्षण इतने अधिक अनुरागसे न
किया गया होगा और न किलोको गर्व के साथ जीवन प्रारम्भ
करनेका ऐसा पथ सुझाया गया होगा। इस तत्वको मली
भाति समझने के लिये इस चालकके स्मृतिपत्र पढने चाहिये
और स्थान स्थानमें इस यातपर विचार करना चाहिये कि इस
रमणीने अपने पतिको फैसी घीरता साथ बचन दिया था कि
वह सपने । पञ्चाका उत्तरदायित्व ग्रहण करती है और अपने
घोर कष्टके दिनों में उसे अपने वचनोंका किस प्रकार अक्षरश
पालन करना पडा । यह सत्यपर दृढ रही। उसकी
शक्ति और भक्तिको उपमा नहीं मिलती। उसके दो बच्चे
रोगसे फालके ग्रास बन गये थे और बचे हुए लड़फेको
उसने किस प्रकार रात दिनको हिफाजनसे यमके घरसे लौशया
था। इस लडफेको उसने किस प्रकार शिक्षा दिलायो और
किस प्रेमपूर्ण गर्व के साथ उसे सैनिक कार्य में नियोजित किया।
। एक बार किसी नीचहदय पुरुषने इशारेसे कहा कि तुम रुपया
मागनेको हमारे पास आयी हो। उस समय उसके हश्यसे धीरो

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7 नारीधर्म । चकर काटने लगी। ओह ! वह इंचामें कैसा सुन्दर और प्रफु लित करनेवाला गान गा रही थी। उसकी ध्वनिने मुझे शान्निदी और बेहोशीसे जगाया। मेरे हदपने आवाज दी, यह टोनने तेरे पास भेजी है। मैं अपने निर्जन घरको चापस चली आयोग यह दृश्य है जो हमारे दिलको मोम बना देता है। फैली पति प्रता स्त्री थी धूपमें पिटकुल अकेली सर झुकाये घासपर बैठी हुई है , लगाका गान सुनकर समझती है कि पतिने मीठा आश्वासन देने के लिये इसे भेजा है। ऐसी लोको देखकर हममें कमजोरी पैदा करनेवाले भाव उत्पन्न नहीं होते। हमें मात- भूमि और उसके निवासियोंपर गर्व होता है, हमारे विचार दृढ़े और निश्चित बन जाते है, हमारा हृदय कार्यक्षेत्रमें अवतीर्ण होने की पुकार मचाता है, हम रोते गिडगिडाते नहीं है किन्तु देशका हित करने के लिये हमारा खून खौलने लगता है। (४) नारी धर्मका यह चीरतापूर्ण उदाहरण हमारी नियोंहीफे नहीं किन्तु हमारे पुरुपोंके सामने भी रखा जाना चाहिये । पाठकोंको इससे मालूम होगा कि देशति हदयके कोमल भावों का नाश नहीं करती पलिक,उल्टा उन्हें जगाती है और विस्तृत करती है। हमको ऐसा विचारनेका अभ्यास पड गया हकिसिपाही में प्रेम और फरुणाया माय नहीं रहता। इम समन्यते हैं कि यह गुण उसको दृढता नष्ट कर देंगे और उस १२४ स्वाधीनताके सिद्धान्त चित अभिमान यह शब्द निकले कि मैंने इतने सकट झेले किन्तु दूसरेके आगे हाथ फैलाना कभी नहीं सीखा। अपने सब कष्टोंमें वह तेजस्वी, साहसी, शिष्टाचारी और अपने कर्तव्यके प्रति सदा सजग रहती थी। समय पडेपर वह कभी अपने फर्तव्यसे च्युत न हुई। उसने अपना धर्म पूंग पूरा नियाहा । वर्षों बाद फिर जब वह अपने लडकेको सेना में भर्ती करनेको भेजती है, तो उसी प्रकार काप कापकर उसे बिदा करती जिस प्रकार कुछ साल पहिले उसने अपने पतिको आश्वासन देकर देश के प्रति धर्म नियाहने भेजा था । आज वह अपने इक. लौते बेटेसे अलग हो रही है। उसका हृदय उसके शब्दोंमें ही देख लीजिये- आजतक मैंने अपनेको यह सोचनेका अवसर भी नहीं दिया था कि मेरा विलियम मेरा है, मेरा इकलौता बेटा है। मैं यही सोचती रहो कि टोनका, लड़का मुझे सौंपा गया है, किन्तु बिदाईके समय प्रकृतिने अपना जोर दिखाया। मैं एक खेतमें बैठ गयी। मेरे सामने सफेद और लम्बी सडक थी। मैं सडक भर वेटे हो बेटेको देखती थी। मेरी विचारशक्ति लुप्त हो गयी। उस समय ऐसा मालूम पडता था कि जीवन भरकी सथ यन्त्रणाए एक साथ मेरे ऊपर आ टूटी हैं और मुझे धेरै बडी हैं। मुझे उस वक्त एक जबरदस्त चाह हुई और वह चाह सदाके लिये माखें यन्द फर देनेकी थी। मैं उसी हालतमें रहो, मुझे यह नहीं सूझ रहा था कि घरको भी लौटना है।' इतने में एक छोटी लगा मेरे पासको माहीसे उड़ी और मेरे सरके ऊपर

"नारी धमे
ऐसे निष्कपट हृदय मनुष्य भी वर्तमान है जो स्वयं अपनी-देहमें
सब कष्ट सहने को तैयार है, किन्तु घे अपने कुटुम्मियोका काट
नहीं देख सकते। इनको परिवारका स्नेह जरूड लेता है और
पतनको भोर घसीट ले जाता है। ऐसा कभी न होना चाहिये।
यदि कर्तव्यको पालनेसे पुन और क्लभपर आपत्ति आनेका
अन्दशा हो और इसीलिये उसे ताकपर रख देना पड़े तो स्त्री,
धर्मपनो नहीं, मार बन जाती है और सन्तान पतित जीव चन
जाती है जो त्रिशकुकी तरह अधर लटका हुया है, जो सर अचा
नहीं उठा सक्ता और भावान तथा मनुष्यके प्रति अपना पर्तव्य
नियाहने के अयोग्य है।
मनुष्यका घराना न चाहिये कि उसके प्रेमियोंको अग्नि.
परीक्षा हो रही है। उसे शकिभर ऐसा बनने की चेष्टा करती
चाहिए कि वे जाचर्म पर उतर आयें। इसके बाद सत्यका महिमा
और सत्याग्रही स्वभावकी सत्यताके भगेसेपर अपने प्रेमि-
योंकी विजय छोड देना चाहिये। परिणाममें ऐसे पुरुष तथा
ऐमे प्रेमियों को यह पुरस्कार मिलता है जिसका उन्हें स्वप्नमें
भी ध्यान न था।
सुनिये, जिस युद्ध में इतनी परीक्षा ली जा रही है वह उनके
जीग्नमें उन गये और स्वच्छ भानोंको लायगा जिनका समाजके
उसे आजतक पता न चला था। इससे उन्हें अधिक
परदु खानुमत्र, विनय और शक्ति प्राप्त होगी।
नये पर्दे खुलेंगे और समाजके प्रति हृदय
.
N
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१२६ स्वाधीनताके सिद्धान्त - का काम,चौपट कर देंगे।, किन्तु हमें ध्यान रहना चाहिये कि मनुष्योचित गुणों का अभाव हमारे सब कार्य निरर्थक कर देता जस्तक हम सयाने नहीं होते और हमारी नसों में कविता. का रस नहीं यहता तपतक तो हम किसी भी सिद्धान्तके अनुसार काम करनेको तैयार रहते हैं, किन्तु जर प्रकृति हमारे पर अपना, राज्य जमाती है तो कट्टर सिद्धान्तवादी किसीको अपने चशमें रख नहीं सकता। हमें यह बात याद रखनी चाहिये मोर मनुष्य बनना चाहिये । हम शब्दों में नहीं तो 'फार्थतः कह (हे हैं"मायलैंडफे लिये कृपया घर गृहस्थीके जालमें मत कसिये।" इस दृष्टिसे तो हम यह भी कह सकते हैं "आयलैंड- के लिये कृपया अपनी रगोंमें रक्तका प्रवाह रोक लीजिये " ऐसा होना असम्भव है। यदि सम्भव भी होता तो यह घृणित गत होती। स्त्री-और पुरुषको कन्से कन्धा मिलाकर अपने जीवनमें महत्वपूर्ण और स्वच्छ धम्मका पालन करना हाना है। इस धमेके स्थानपर ऐसा प्रकृतिविरुद्ध जोवन व्यतीत करना जसमें न तो तपोवन एकान्त घासका हो आनन्द मिले और । संसारमें हो हम कुछ कर सके विर्कट और पुरा है। हमारा सौभाग्य है कि टोनको स्त्री आयलैंड में पैदा हुई। इस उदाहरणसे कोई भी स्त्री सीख सकती है"फि बहादुरसे.. यहादुर'आदमीकी टक्करको वैसे वना जाता है। मनुष्यको इस ईशान्तले सयफ लेना चाहिये कि स्त्री और पुत्र भले ही कष्ट पर्चि किन्तु उन्हें गुलाम और कायर बनाना पाप है। सलारमें -1 नारी धर्म: १७ ऐसे निष्कपट हृदय मनुष्य भी वर्तमान है जो स्वय अपनी देहमें सब कष्ट सहने को तैयार है, किन्तु घे अपने कुटुम्चियोंका कष्ट नहीं देख सकते। इनको परिवारका स्नेह जगह लेता है और पतनको ओर घसीट ले जाता है। ऐसा कभी न होना चाहिये। यदि कर्तव्यको पालनेसे पुत्र और क्लत्रपर आपत्ति मानेका अन्दशा हो और इसीलिये उसे ताकपर रख देना पड़े तो स्त्री, धर्मपतो नहीं, भार बन जाती है और सन्तान पतित जीप बन जाती है जो त्रिशकुकी तरह अधर लटका हुआ है, जो सर ऊचा नहीं उठा सकता और भगवान तथा मनुष्य के प्रति अपना कर्तव्य नियाहनेके अयोग्य है। मनुष्यको घराना न चाहिये कि उसके प्रेमियोंकी अग्नि परीक्षा हो रही है। उसे शक्तिभर ऐसा बनने चेष्टा कानी चाहिय किये जाचमै पछ उतर आयें। इसके बाद सत्यको महिमा और सत्याग्रही स्वभावकी सत्यताके भरोसेपर अपने प्रेमि- योकी विजय छोड देना चाहिये।, परिणाममें ऐसे पुरुष तथा ऐसे प्रेमियों को यह पुरस्कार मिलता है जिसका उन्हें स्वनमें भी ध्यान न था। सुनिये, जिस युद्धमें इतनी परीक्षा ली जा रही है वह उनके जीपनमें उन नये मोर स्वच्छ भावोंको लायगा जिाका समाज समागममें उसे आजतक पता न चला था। इससे उन्हें अधिक सहानुभूति, परदु खानुभव, विनय और शक्ति प्राप्त होगी। इस परीक्षासे जीवन के नये पर्दे खुलेंगे और समाजके प्रति हृदय - स्वाधीनताके सिद्धान्त देना कितना भयकर है । साम्राज्यको हम जितना जानते हैं और उसके साथ सम्बन्ध रखनेसे हमें जो ज्ञान प्राप्त हुआ है उससे हम कह सकते हैं कि साम्राज्य बुरी चीज है और हमें स्वयं ही इससे मुक्त होना और आगेको इसके जालमें फसनेसे बचना नहीं चाहिये, बलिक ससारके हर किसी ऐसे राष्ट्रका उत्साह और भाशा बढानी चाहिये जो साम्राज्यके विरुद्ध लड रहा हो। माखें होते हुए (२) माकियाघेली एक स्पष्ट लेखक हुआ है। उसने सामाज्य- वादपर एक पुस्तक लिखी है। इस पुस्तककी पड़ताल करनेसे साम्राज्यवादको माया कट जायगी। हा, जो देखना चाहे उसे कोई नहीं दिखला सकता। साम्राज्यके कई पक्षपाती माकियावेलीकी दुष्टतापूर्ण पातोंको पढकर एकदम घबरासे जाते हैं । इस घबराहटसे हमें भ्रममें न पडना चाहिये। जिन लोगोंने माकियावेलीको "राजकुमार" नामक पुस्तक नहीं पढी है वे निम्नलिखित अवतरणोंको ध्यानसे पढ़ें और देखें कि ये बातें आयलैंडमें अग्रेजोंके शासनपर किस प्रकार घट जाती हैं । इन बातोंको पढ़कर समझे कि साम्राज्य स्वय ही बुरा है, हर तरहसे दुष्टतापूर्ण है, इसका पग २ पर विरोध किया जाना चाहिये, इससे निरन्तर युद्ध जारी रहना चाहिये और उत्साहके साथ तथा बिना हीले हवाले के उसका त्याग करना चाहिये।- हमसे शैतान, उसकी शान और उसके कार्मोसे दूर रहने के, रिये , 4 -- ।

साम्राज्यवाद
।
पचपनसे हो कहा जाता है। वही बात इसके लिये भी लागू
है। पहले विदेशो, शासकके आक्रमणकी यात सोचिये ।
माकियावेली 'कहता है-"आक्रमणकी साधारण रीति
यह है। ज्योंही विदेशी राजा किसी प्रदेशपर आक्रमण करता
है तो यहाके दुर्यल और कृतघ्न निवासी उसके साथ मिल
जाते हैं। कारण यह है कि उनमें अपने वर्तमान प्रभुओं के प्रति
ईर्या और द्वेषका भाव रहता है। ऐसे छोटे छोटे रजवाडोंको
अपनी और करने के लिये कोई कष्ट उठान रखना चाहिये । वशमें
आते ही ये लोग तुरत मिलकर आक्रमणकारीके साथ एक हो
जाते हैं। विजयी राजाको विशेष ध्यान इम यातका रखना
चाहिये कि यह कभी शक्तिशाली न बन जाय । इनके हाथमें
विशेष सत्ता भी न दी जानी चाहिये। ऐसा करनेसे विजयी
राजा यही भासानी के साथ अपने सैन्यवल और अपनी ओर किये
हुए इन राजाओं और रजवाडोंकी सहायतासे अपने पड़ोसियों
की शक्ति कम कर सकता है और विजय किये हुए प्रदेश में
एकत्र राज्य चला सकता है।" यह देशको फोड़कर उसपर
शासन करनेकी पुरानी नीति है।
किसी देशमें अपना प्रवेश करनेके लिये कोई बहाना चाहिये।
माकियावेलीने एक राजाकी प्रशसा की है जो सदा धर्मका
बहाना निकाला करता था। किसी देशपर अधिकार हो चुकनेपर
उन नीतिसे काम लिया जाना चाहिये। माफियारेली कहता
है.--"जो पशुपालका प्रयोग करके किसी राष्ट्रका शासन अपने

स्वाधीनताके सिद्धान्त . हाथमे ले लेता है उसे वे सय निष्ठुरतायें । काममें लोनी चाहिये जो तुरत फलदायी हों।" यह लेखक आगे चलकर लिखता है- "यदि राजा फ्रूरताको सहायतासे प्रजाको चशमें रखता है तो उसे बदनामीकी परवा न करनी चाहिये, क्योंकि जो राजा एक स्वाधीन देशको जीतता है और उसे नष्ट भ्रष्ट नहीं करता वह वडी भारी भूल करता है और उसे अपने नाशकी प्रतीक्षा करनी चाहिये । कारण यह है कि जय बहाके निवासी धगावत करनेको तैयार होते हैं तो वे सदा स्वाधीनता और अपने पूर्वपुरुषोंद्वारा बनाये हुए कानूनोंका नाम लेते हैं । इस विप्लवको अधिक समय- का शासन वा सदय व्यवहार शान्त नहीं कर सकता ।" यदि राजा देशको भली भाति न उजाड सके तो, उसे,राय दी गयी है कि, वह चापलूसी और रियायतोंसे काम ले । "या तो प्रजाकी चापलूसी की जाय, उसपर रियायतोंको यौछार की जाय, नहीं तो वह भली भाति तबाह कर दी जाय ।" इस वाक्यपर हमें घूस और उपाधियों ( टाइटलों )का स्मरण हो आता है। और सुनिये, "जो प्रदेश प्राचीन कालसे स्वाधीन रहा हो उसे अधीन रखनेका सबसे सहज तरीका यह है कि वहींके नागरिक नौकर रखे जाय। यह वाक्य देखकर हमें बहे बडे मोहदोंपर मरनेवालों, दृश्यारों और राजभकोंके अमिनन्दनपत्रोंको याद थाती है। विजयको स्थायी बनाने के लिये लेखक बतलाता है-“जब एक राजा नयी रियासत जीतता है और उसे अपने राज्यमें मिला लेता है तो उसके लिये यह आवश्यक है कि प्रजाको निरस्त कर ।

साम्राज्यवाद
।
दे। केवल उन हथियार रणने दे जो विजयके समय उसको
तरफ आगये थे। किन्तु धीरे धीरे उन्हें भी निकम्मा बना देना
चाहिये और उनको मारस्य तथा जीवताकी उस हालतमें डाल
देना चाहिये कि कुछ समय बाद उसकी सारी शक्ति अपनी फौज
के भरोसे ही पड़ी रह सके।" यह यात हमें मार्मस एफ (हथियार न
रखनेके कानून ) और अपने निहत्थे लोगोंका स्मरण कराती
है। किन्तु यह सम्मति देनेपर भी कि आधी प्रजा निरस्त कर
दी जाय और आधी उपाधि, नौकरी आदिमे अपने वशमें कर ली
जाय माकियावेली कहता है कि विजयी राजाको इन दोनोंमसे
एकको भी अपना विश्वासपात्र नहीं बनाना चाहिये। उसके
शब्द पढिये-"बुद्धिमान और नीतिज्ञ राजाको चाहिये कि वह
अपना वचन पूरा करने की चिन्ता न करे जबकि ऐसा करनेसे
उसका अहित होता हो और जिस कारणसे वचन दिया गया था
यह दूर हो गया हो।" इस विषय में कोई गलती न हो इसलिये
उक्त लेखक अधिक स्पष्ट मापामें लिखता है-"अपने भावोंको
छिपाना और सफलतापूर्वक मनमें कुछ तथा बाहर कुछ
दिवाना बडे महत्वकी पात है।" इन वाक्योंसे तोडी हुई सन्धिया
और असत्य विश्वासघात आपोंके सामने आ जाते हैं।
दुनियाकी नजर में प्रतिष्ठित यना रहना अच्छा है किन्तु माकिया
वेली इस विषयपर भी राजाको सतर्क करता है-"सजन,
दयालु, शिष्टाचारो,धार्मिक तथा निष्कपटसा बना रहना सम्मान
प्राप्त करना है, किन्तु तुम्हारा मन इतना ठीक और अभ्यस्त रहना

स्वाधीनताफे सिद्धान्त हाथमे ले लेता है उसे चे सय निष्ठुरतायें 'काममें लानी चाहिये जो तुरत फलदायी हों।" यह लेखक आगे चलकर लिखता है- "यदि राजा फ्रूरताकी सहायतासे प्रजाको वशमें रखता है तो उसे बदनामीकी परवा न करनी चाहिये, क्योंकि जो राजा एक स्वाधीन देशको जीतता है और उसे नष्ट भ्रष्ट नहीं करता वह घडी भारी भूल करता है और उसे अपने नाशकी प्रतीक्षा करनी चाहिये । कारण यह है कि जब वहाके निवासी बगावत करनेको तैयार होते हैं तो वे सदा स्वाधीनता और अपने पूर्वपुरुषों द्वारा बनाये हुए कानूनोंका नाम लेते हैं । इस विलयको अधिक समय- का शासन वा सक्ष्य क्याहार शान्त नहीं कर सकता।" यदि राजा देशको भली भाति न उजाड सके.तो, उसे राय दी गयी है कि, वह चापलूसी और रियायतोंसे काम ले । "या तो प्रजाकी चापलूसी की जाय, उसपर रियायतोंको यौछार की जाय, नहीं तो वह भली भाति तबाह कर दी जाय ।" इस वाक्यपर हमें घूस और उपाधियों (टाइटलों)का स्मरण हो पाता है और सुनिये, “जो प्रदेश प्राचीन कालसे स्वाधीन रहा हो उसे अधीन रखने का सबसे सहज तरीका यह है कि वहींके नागरिक नौकर रखेंजाय।" यह वाफ्य देखकर हमें बहे बडे मोहदोंपर मरनेवालों, दरवारों और राजभक्तोंके अमिनन्दनपत्रोंकी याद आती है। विजयको स्थायी बनानेके लिये, लेखक बतलाता है-"जय एक राजा नयी रियासत जीतता है और उसे अपने राज्यमें मिला लेता है तो उसके लिये यह आवश्यक है,कि प्रजाको निरस्त कर साम्राज्यशद साम्राज्यवादियों का यह वास्तविक चित्र है, इसलिये हमें साम्रा- ज्यसे कोई वास्ता न रखना चाहिये। यह कहा जायगा कि अब मागे हमपर पुराने हथकण्ड काममें न लाये जायगे। साम्राज्य वादियोंकी हम यता देना चाहते हैं कि वे इस नयी मित्रतासे बल पाकर दूसरे देशोंपर यह चालबाजिया चलेंगे। यह भी हमारे नाम पर कलंक है। हम क्रिमी देशको अपने अधीन नहीं रखना चाहते। हम उन्हें साम्राज्यका विरोध करने के लिये उत्साहित करेंगे। यदि उसके लिये हमें भविष्य में लडना पडेगा तो यह भ्वय यथेष्ट प्रोत्साहन है। हमारा दमन नीचताके साथ होनेसे दूना कडवा पन गया है। जबरदस्तके अत्यावारसे हमारा रोष प्रचण्ड हो उठता है, किन्तु नीवका अत्याचार असह्य हो जाता है । क्रोमवेलका अत्या. चार आसानीसे भूला जा सकता है किन्तु मेकालेकी पाखण्ड- पूर्ण बातें नहीं । जब हम मेकालेकी कुछ पतिया पढ़ते हैं तो पदनमें मागसी लग जाती है। और यह माग तमी बुझेगी जब हम विरोधको बिल्कुल मिटा देंगे। मिल्टनपर लेख खिता हुआ मेकाले इङ्गलेण्डकी राज्यकान्तिपर बडी २ यात छाट गया है और उसकी विशेषता यतलाता है कि "साम्राज्यका एक भाग ऐसी दुखदायी स्थितिमें था कि उस समय हमें सुखी यनाने के लिये उपकी महान् यन्त्रणा आवश्यक थी और हमें अपनेको स्वाधीन बनाने के लिये उसे गुलाम धनाना आवश्यक था।" संसारमें शायद ही किसीन ऐसी घेशर्म बात कही हो। 6

स्वाधीनताके सिद्धान्त
MAnmom
,
-
चाहिये कि अवसर पडनेपर उसके सोलहों आ विरुद्ध कार्य
कर सको।" जो भद्रपुरुष इन यातों को पढकर दुविधामें पड
गया है वह ध्यानसे सुने- यदि इन दोषोंके कारण उसका नाम
यदनाम होता है ता उसे ततिक चिन्ता न करनी चाहिये क्योंकि
ऐसा न करनेसे उसका राज्य सुरक्षित नहीं रह सकता।"
यहा तक हमने प्रसिद्ध राजनीतिक लेखक माकियावलीके
सिद्धान्त लिखे हैं। इन सिद्धान्तोंकी नीतिप्रष्टता देखकर हमारे चे
साम्राज्यवादी दग रह जाते हैं जिन्होंने जगली और अर्द्ध सभ्य
जातियोंको सभ्य बनानेका यीडा उठाया है। हम तो अब अपनी
आंखें खोल रहे हैं और देख रहे हैं कि दोनों नीतिम्रप्ट और दुरंगे
हैं। हमें तो माकियाचेलीकी पुस्तककी यातें ठीक ऐसी लगती
हैं मानी किसी विवेचकने आयलैंडमें अगरेजोंका शासन देख.
कर उसकी विशेषताओंकी भली भांति निरीक्षण किया है और
उनसे ये सिद्धान्त निकाले हैं। माकियावेलीने अपनी पुस्तकमें
जो पोल खोली है उसके लिये हमें उसे धन्यवाद देना चाहिये ।
उसने राजाको जो सम्मति दी है वह उसके युगके डाकुओंकी
कलई खोल देती है और हमें अपने समयके साम्राज्यको घुराइया
दिखाने में सहायता पहुचाती है ।
(३)
इस बातसे हमें शिक्षा लेनी चाहिये कि ४०० वर्ष पहले
इटली में लिखा हुआ यह अन्य आज भी पूरी तरहसे 'लागू है।
प
दा

साम्राज्यवाद निरूपण किया है। यह कोई दोष नहीं है कि उसने इस पुरे विचारों को अपने हृदय में स्थान दिया। बात यह है कि दिल्में चाहे कुछ सोचिये मगर ढोंग दूसरा रचिये। मेकालेकी घोर घृणा और आश्चर्य देखिये और साथ साथ उसी प्रबन्धकी यह यात पढिये-"जिस पुरुषो ससारका अनुभव प्राप्त किया है यह जानता है कि साधारण सिद्धान्त विकुल निकम्मी चीज है । यदि वह नीतिमूलक और विरकुल सत्य है तो अनाथ बालोंको सिखलाने योग्य बात है, और कुछ नहीं" पाठक समझे ? नीतिमूलक और सत्य यातको अनाथा- लपमें शरण मिगी। कई लोग कहेंगे, यह व्यग है। हमें इसपर विश्वास नहीं। किन्तु यदि मान भी लिया जाय तो ऐसे ध्यगमें हृदय उतना ही स्पष्ट प्रतीत होता है जितना गम्भीर प्रलापके कई पडफे ग्रन्थको पढकर नहीं हो सकता। हमें तो यह बात अगरेज शासनकी पहचान करानेवाली नीनिसी मालूम पडती है । अगरेज जातिको इस यातका अभ्यास पड गया है, यह यह नीति काममें लाती है और इसके साथ उसका सम्बन्ध जुडा हुआ है। किन्तु भायरिश जातिको इस नीतिसे पाला नहीं पडा है, न पडता है और न पडेगा। हम इससे कदापि सम्पन्ध नहीं जोड सकते। पुराने अत्याचार ज्यों ज्यों अधिकाधिक पुराने होते जाते हैं हमारा क्रोध शान्त होता जाता है, किन्तु पुरानी कपटी बातोंको फिर.२ दोहराना, इतना ही नहीं, किन्तु यह चेष्टा करना कि उनकी सत्यता हम स्वीकार करें, हमारी सारी देहमें . + स्वाधीनताके सिद्धान्त . भूलियेगा मत कि यह सिद्धान्त साम्राज्यके "बडे साझीदार" का है। यदि मेकाले हमारा गला घोंटने के लिये ईश्वरसे प्रार्थना करना और भगवानको धन्यवाद देते हुए क्रोमवेलके समान हमारा गला घोंट देता तो बादकी पीढिया आग बबूला हो उठनी, किन्तु मेकालेके भाव जहरमें कडुवापन है । लीजिये, और सुनिये !' मेकाले माकियावेलीकी पुस्तक पढकर वाक रह गया था। माकियाचेलीके विषयमें भाप लिखते हैं "जिस पुरुषको इटलीके इतिहास और साहित्यसे परिचय न हो उसके लिये यह अल- म्भव वात है कि उस पुस्तकको जिमने माकियावेलोके नामपर कलकका टीका लगाया है बिना घोर घृणा और आश्चर्यके पढ सके। दुष्टताका बिल्कुल नग्न लेकिन निर्लज चित्र है । ऐसी शांत, विचारपूर्ण और वैज्ञानिक निष्ठुर क्रूरताका वर्णन नीव- से नीच प्रकृतिका पुस्प भी नहीं कर सकता । 'मालूम पडता है कि यह किसी नर-पिशाचने लिखा है ।", "किन्तु यह प्रबन्ध साम्राज्यवादपर महत्वपूर्ण उज्ज्वल प्रकाश डालता है। मेकाले माकियावेलीके विषयमें लिखता है कि "उसका एकमात्र दोप यह था कि उसने उस समयके कुछ प्रचलित सिद्धान्तोंको स्वीकार कर उन्हें ज्वलन्त और अन्य लेखकोंसे अधिक ओजस्वी भापामें लिसा" यहा सत्य बात स्त्रय प्रकट होगयी, यद्यपि मेकालेका यह इरादा नहीं था। मामले की बात है!माकियात्रेलीका अप- राध यह है कि उसने ज्वलन्त और मोजस्वी भाषामें उनका + , . 1

साम्राज्यवाद
.
यरनार्डशा मिधमें जो अत्याचार हुआ था उसकी पोल जीती
जागती और चुभनेपाली भाषामें भले ही खोले, फिन्तु जिन्हें
दूसरे देशोपर हमला करना है उनका पितको पीस डालने
घाले वाश्याशले काम सघ जाता है। ऐसा स्वाधीनताका
पक्षपानी और प्रसिद्ध लेखक जय लिखना है-"मैं मोरको,
ट्रिपोली, साइनोरिया धीर गाफिफाफे लोगोंको "सभ्य"यनाने के
लिये फास, इटली, रूस, जर्मनी और इगलेण्डके साथ सहयोग
करनेको तैयार है" तो मिथके अत्याचारफे ऊपर उसने जो
गाली बरसायी है वह व्यर्थ हो जाती है । अत्याचार हो चुकनेपर
वह भले ही रो लें किन्तु दिना फ्रूरता किये वे लोग "सभ्य"
नहीं बन सकते।
परनार्डशाके इन वाश्योंको पढकर और साथ ही साम्राज्यके
विरुद्ध उसके जो सच्चे उद्गार हैं उन्हें देखकर साम्राज्यके हिमा-
यती मन ही मन हसते होंगे। साम्राज्यको
घरा
बतलाते
लिखते हैं-"यह नाम ऐसा है कि जिम आदमीके हृदय में अपनी
मातृभूमिके प्रति पवित्र भाव है और जो पुरुष दूसरोंके हृदयों में
इन भावों को पवित्र और अविच्छेद्य समझता है इस नामको
सुनकर अत्यन्त घृणाके साथ इसपर लानत भेजेगा।" अपनी
"प्रतिनिधि शासन" नामक पुस्तकमें जा मिल लिखता है कि
"अगरेज एक ऐसी जाति है जो स्वतंत्रताको समझती है। भले ही
इसने भूतकालमें भूलें की हो, किन्तु अब इस जातिने निदेशियों के
साथ व्यवहार करने में अन्य जातियोंसें बहुत अधिक विधेक प्राप्त
हुएशा
.

स्वाधीनताके सिद्धान्त
आग भडका देता है। यह आगे इतनी जबरदस्त होती जाती है
कि अगरेज जातिके साथ सम्पन्ध टूटनेपर ही यह भी बुझेगी।'
.
मेकाले तो आयलैंडवालोको धोसमें नहीं डाल सकता,
किन्तु हमें भय है मिल और बर्नार्डशा जैसे लेखकोंसे ।, बहुधा
ऐसा होता है कि जब कभी हम किसी निष्कपटी आदमीकी
बातोसे घपलेमें पड़ जाते हैं और हमें उसकी प्रकृतिका परिचय
नहीं मिलता तो हमारा विवेक हमें ढोंगसे यवा देता है और
हृदयमें उसके प्रति घृणा पैदा हो जाती है।
जय आक्रमणकारी
देश आक्रमणका मौका पोजता है तो वह पहले कोई बहाना
दूढता है। हमको खतरा इसमें है कि लोग आक्रमणकारी देशको
बहानेका मौका दे देते हैं। मिलने जो यह वाक्य लिखा है वही
काफी बहाना है । "स्वेच्छाचारी शासन असभ्य समाजोंके लिये
उक्ति और न्यायसगत है। हा, उद्देश्य यह होना चाहिये कि:
उनको उन्नत किया जाय।"
शासाहन अपनो एक पुस्तककी भूमिकामें लिखते हैं-"मैं
तिव्यत निवासियोंको मशीनके भीतर दवाकर पीस डालू
यदि वे मुझे सर्वजातीय स्वत्र देनेसे इन्कार करें।"
अपने राज्यके भीतर किसी स्वत्यको पलपूर्वक प्रचलित
करना तो हमारे अधिकारमें हुआ, किन्तु "यर्थर' कहकर दूसरे
लोगोंके ऊपर इसका प्रयोग करना सरासर दुसरी बात है।
-

मात्राज्यवाद
१४१
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि अगरेज लोग ऐसे सीधे सादे
होते हैं कि ये ऐसी बातॉपर ट विश्वास कर लेते हैं । इतिहास
गौर अनुमन इन यातों के विरुद्ध जाते हैं। सम्भवत होमकल
दलके नेता समझते हैं कि दस पोस सालमें ही उनका काम पूरा
होजायगा और इसी मयधिके भीतर होपाल प्राप्त होजायगा।
ये लोग शायद इसी कालके भीतरफो यात करते हैं।
किन्तु इस अवधि के याद हमारी सन्तान शक्तिशाली और
लड़ाकी यन जायगी और यदि हम उस समय तक न सम्पले
तो यह हमारे काम के लिये तैयार होजायगी। वर्तमान समयके
लिये मै तो यही कहगा कि चूद कार्यकर्ताओं की सीमा मारे
लिये यस नहीं है। जो कोई आगे बढने से हिचकता है उसे धमारा
अर्षाचीन भोर प्राचीन इतिहास देखना चाहिये। दयाने और

१४० स्वाधीनता सिद्धान्त . - कर लिया है और नैतिक उन्नति की है। यह शब्द सुनकर अंगरेज भाई “चर्यर" जातिको सभ्य बनाने के लिये आगे पढ़ते हैं ; किन्तु उनके भाव मेकालेकेसे रहते हैं। यह सब बातें पढ सुतकर हमें स्वभावत क्रोध होआता है, साथ ही आश्चर्य होता है और हसी भी आती है। '11'. साम्राज्यके पक्षमें जो कुछ लिखा गया है उसे पढकर क्रोध आता है, घृणा पैदा होती है, किन्तु स्वाधीनताके लेखक मिलके ग्रन्थ रत्नोंमेंसे यह वाक्य देखकर जी खोलकर ह से बिना नहीं रहा जाATI मिल अपनी स्वाभाविक गम्भीरतासे कहते हैं- "दूसरे देशों को हडपना ऐसी अभिलापा है जो जातीय दृष्टिसे देखनेपर अगरेजों के लिये अस्वाभाविक है।" जब निष्कपटहृदय अगरेज ऐसी बात लिख सकता है तो हम सबको होश हवाश दुरुस्त रखना चाहिये, और जर आजकल की तरह साम्राज्यके पक्षमें महितकर, बेगी यातें चारों ओरसे यकी जा रही हैं हमें सोचना चाहिये, इन सब बातोंपर ध्यानसे विचार करना चाहिये और चौकन्ना रहना चाहिये। - r ~ - 1 क (५) अय इस परिच्छेदके अन्तमें हम होमरूल दलवालोंपर अपनी सम्मति , लिखेंगे। यह भविष्यवाणी सुनकर हसी आती है। कि होमकल मिलनेपर मायलैंण्ड साम्राज्यका भक्त रहेगा। हमें आश्चर्य है कि आयरिश रोग मी ऐसे बेवकूफ होते हैं , यद्यपि साम्राज्यवाद १४१ Www- इसमें कोई सन्देह नहीं है कि म गरेज लोग ऐसे सीधे सादे होते है कि ये पेसी पातोपर विश्वास फर लेते है। इतिहास भार अनुमच इन पातोंके विपक्ष जाते हैं। सम्भवत होमरूल दल के नेता समझते हैं कि दम योस सालमें ही उनका काम पूरा होजायगा और इसी साधिके भीतर होमसल माप्त होगायगा। ये लोग शायद इसी कालके मौतरको यात पाहते है। पिन्तु इस भयधिके याद हमारी सन्तान शक्तिशाली और लहाकी यन जायगी और यदि हम उस समय तक न सम्हले तो घह हमारे पामके लिये तैयार होजायगी। वर्तमान समयके लिये मै तो यही कहगा कि चूद कार्यकर्ताओं की सीमा हमारे लिये यस नहीं है। जो कोई आगे बढ़ने से हिचकता है उसे हमारा अांचोग और प्राचीन इतिहास देखना चाहिये। दबाने और उजाटनेको पुरानी चेष्टा विफल होनेपर हमें पुचकारनेका नया प्रयन भारम्भ हुमा । पहले छोटी छोटी रियायतें घरशी गयौं, फिर यडी। पहले यह समझा गया था कि कठोर शासनसे होमरूल दयोचा जायगा, फिर दयासे इसके प्राण लेनेकी ठहरी और हमें स्थानीय स्वराज्य दिया गया। स्थानीय स्वराज्यले पूरा स्वराज्य प्राप्त करना अनिवार्य होगया और अब जयकि होमरूल प्राय पाप्त होगया है तो हम आगे यह रहे हैं।

Ag J दशम परिच्छेद सशस्त्र प्रतिरोध। T - (१) स्वाधीनतापर विचार करनेसे अवश्य ही इसके लिये हथि- यार उठानेका प्रश्न उठता है। यदि जातिके स्वत्वोंकी सत्यता और न्याय्यता प्रमाणित करना यथेष्ट होता तो ससारमें अत्या- चार बहुत कम रह जाता, किन्तु अत्याचारी सत्ता सत्यके प्रति अंधी हो जाती है, दलीलोंसे इसका दिल नहीं पसीजता, इसका सामना पशुषलसे करना पड़ता है। इसलिये इमें विद्रोहका नैतिक विचार करना आवश्यक है (२) चिडचिडे, नुक्ताचीन और नीम हकीम खतरे जानका, मस- ला चरितार्थ करनेवाले सजन सर्वत्र मिलते हैं। - ऐसे आदमी आपत्ति करेंगे-"मायलॆएड में हथियार लेकर लडनेका सवाल कैसे उठ सकता है ? यदि कोई इस प्रकार युद्ध करना चाहे तो उसे मालूम होगा कि यह बात असम्भव है, और न कोई लडना ही चाहता है। यति गपको .. जाकर देख रुखी ना हो तो खुद F व्याव- १ 1 सशस्त्र प्रतिरोध । - हारिक नहीं है। ऐसी बातोंकी तो परवा मी न की जानी चाहिये, किन्तु इससे मालूम होता है कि बहुतसे लोग ऐसे हैं - जो तुरत लडकर हमारी लम्बी लडाईको तय कर देना चाहते है, पर ये समझते है कि यह सम्भव नहीं है। व्यावहारिक यातोंका विचार करने के लिये हमें कुछ बातें ध्यानमें रखनी चाहिये यद्यरि आयलैंड हारनेपर भी कई बार लड़ा है और फिर लडने. को तैयार हो सकता है, किन्तु इस समय नीतिका सहारा लेकर प्रश्न उठाया जाता है कि निरस्त्र आयलैंण्ड दुर्जय इङ्गलैण्डका सामना किस प्रकार करेगा ? इङ्गल एडके लिये तो यह सबसे आसान लडाइ होगो। हम जिस पातपर जोर देना चाहते हैं वह यह है-निष्क्रिय रहकर और यहायकी ओर बहते जानेसे हम उस स्थितिको जा रहे हैं जहा इङ्गलैंड लपेटमें आ ही जायगा। हमें या तो उसके लिये लडना पडेगा या उससे साफ अलग हो जाना पड़ेगा । उसके साथ सम्बन्ध रहनेसे हम किसी प्रकार निरपेक्ष होकर नही रह सकते। इसलिये सैनिक नीति बिल्कुल व्यावहारिक है। इसके अतिरिक्त हमारे लिये यह अत्यन्त आच श्यक है । इङ्गलेण्डके सफटमें उसकी सहायता करना ही हानिकर है जितना उससे सम्बन्ध तोडनेका दुस्साहसपूर्ण कार्य। सबसे बडी बात तो यह है कि स्थिति आश्चर्यजनक रूपसे यदल गयी है । इङ्गलैण्ड भीतर और बाहर दोनों तरफसे सकटमें है। यहा हर तरह के मजूरोंके झगडे मचे हुए हैं जिनका क्या परिणाम होगा कुछ ठिकाना नही । एक दूसरा झगडा इन उतना

४४
स्वाधीनताके सिद्धान्त
लैएडमें ऐसा मचा हुआ है जिसके कारण इगलैण्डकै प्रधान मन्त्री
रूसके जारके समान सुरक्षित होकर बाहर निकलते हैं। इनले
एडमे इस समय जो अशान्ति फैली हुई है इससे वहाके अधिकारि-
योंकी बुद्धि हरण होने की सम्भावना है । इस मुसीबतमें अकेला
इङ्गलेण्ड ही नहीं है, सब महाशक्तियों की यही हालत है । कमसे
कम यह तो बहुत सम्भव है कि घरेलू लडाईसे यह उसी प्रकार
अवाक हो सकते हैं जिस प्रकार चाहरी शक्तिसे लडाई करने की
आवश्यकता पड़नेपर। इन बातोंका साफ शब्दों में निचोड यह
है- हम इस चैनीसे दूर जाकर शान्तिसे बैठे रह नहीं सकते।
हमें सडा होना पड़ेगा और अपने देशके लिये लडना पडेगा,
नहीं तो दूसरोंकी सहायता करनी पड़ेगी। हमें तैयार हो
जाना चाहिये और अधिकारों के लिये डट जाना चाहिये।
जो हो, यह बात कोई अस्वीकार नही कर सकता कि हमारे
वर्तमान आन्दोलनके समय विद्रोहकी नैतिक स्थितिपर विचार
करना व्यावहारिक तो अवश्य है।
(३)
हमें उस अल्पमतपर विश्वास है जो हमारी इन वानों में
बुद्धिमत्ता देखता है। हमारा
होना चाहिये
तर्कसे जनतापर कुछ प्रभाव
और
.
1
M

सशस्त्र प्रतिरोध गाली गलौज करके उन लोगोको अपने दलसे अलग कर देते हैं जो अभीतक कुछ निश्चय नहीं कर सके हैं और हमारे पक्षमें आ सकते हैं। बहुत सम्भव है किसी खटके या किसी निर्यलता के कारण यह माई पिछड रहे हों और सत्यकी स्फूर्तिदायक समीर और स्वामाविक सयमसे हमारे सम्चे, श्रेष्ठ सैनिक घन जाय । अमेरिकन गृहयुद्धके समय एमर्सनने युद्ध में हत सैनिकोंका स्मारक खोलते समय ऐसे वीरोंका हृदयग्राही उरलेख किया था। उसने नवयुवकका जिक्र किया जिसे वह जानता था। इस नव युवकको आशङ्का थी कि में डरपोक है । इसलिये उसने सफटमें रहनेका अभ्यास डाला । वह जबरदस्ती सकटके स्थानों में जाया करता था और उसका सामना करता था । एमर्सनने कहा है-- “यह वीर न्यूयार्कमें भर्ती हुआ, युद्धक्षेत्रको गया और जाते ही खेत रह गया।" उसने इस घटनापर जो टिप्पणी की है वह हमारे लिये महत्वपूर्ण है। "इस भावपूर्ण हृदयसे हो बडे २ चीर बने हैं।" हम देशमाइयोंको शरीरसे हुए पुष्ट यनानेके लिये जो फप्ट उठा रहे हैं वही कष्ट हमें उनका चित्त दृढ बनाने के लिये मी उठाना चाहिये। हम शारीरिक शिक्षा, कवायद आदिका बडा ध्यान रखते हैं। यह उचित है, क्योंकि इससे हुल्लडशाही सुसगठित सेनाके रूपमें परिणत हो जाती है और स्वावलम्बन- हीनता शक्किमें बदल जाती है। हमें उन मनुष्यों के हृदयोंसे चडी सावधानीके साथ काम लेना चाहिये जिनकी ममी परीक्षा नहीं हुई है। यह दुर्यल हो, चिन्तित हों और विवेक विषयमें , १४४ स्वाधीनताके सिद्धान्त लैएडमें ऐसा मचा हुभा है जिसके कारण इगलैएडके प्रधान मन्मी रूसके जारके समान सुरक्षित होकर बाहर निकलते हैं । * इङ्गले एडमें इस समय जो अशान्ति फैली हुई है इससे वहाके अधिकारि- योंकी बुद्धि हरण होनेकी सम्भावना है । इस मुसीबत में अकेली इङ्गलेण्ड ही नहीं है, सब महाशक्तियोंकी यही हालत है । कमसे कम यह तो बहुत सम्भव है कि घरेलू लडाईसे यह उसी प्रकार अवाक् हो सकते हैं जिस प्रकार बाहरी शक्तिले लडाई करने की आवश्यकता पड़नेपर। इन यातोंका लाफ शब्दों में निचोड यह है- हम इस बेचैनीसे दूर जाकर शान्तिसे बैठे रह नहीं सकने । हमें पड़ा होना पडेगा और अपने देशके लिये लडना पडेगा, नहीं तो दूसरोंकी सहायता करनी पडेगी। हमें तैयार हो जाना चाहिये और अधिकारोंके लिये डट जाना चाहिये। जो हो, यह बात कोई अस्वीकार नहीं कर सकता कि हमारे वर्तमान आन्दोलनके समय विद्रोह की नैतिक स्थितिपर विचार करना व्यावहारिक तो अवश्य है। -- -1 (३) हमें उस अल्पमतपर विश्वास है जो हमारी इन बातोंमें बुद्धिमत्ता देखता है। हमारा उद्देश्य यह होना चाहिये कि इस तर्कसे जनतापर कुछ प्रभाव पड़े। हमें धीर, और दृढ़निश्चयी चनना चाहिये। , हम शीघ्र धीरज खो देते है और जल्दबाजी में - * या त्रिीक मताधिकारक आन्दोलनके विषय में है। बाजकल यह पान्दोलन धीमा पड गया है किन्तु इसका स्थान कम्युनिन्मने ग्राप कर लिया है-अनुवादक ।

सशस्त्र प्रतिरोध १४७ यगे। इतना हम अवश्य करेंगे कि जहातक हो सकेगा न्याय- शास्त्र अनुसार अपनी दलीलोंके लिये पुष्ट प्रमाण देंगे। तोभी सदा ध्यानमें रखियेगा कि स्वाधीनता प्राप्त करनेका. हमारा कारण वादविवादसे बहुत ऊपर उठा हुआ है। कोरा तर्कशास्त्र ज्योतिकी उस रहस्यमय चिनगारीको धारण नहीं करता जो हमारा जीवन है। इसलिये हम अपने शत्रुओंसे बहस करते समय उतनी ही अच्छी, बलिक उससे भी अच्छी, दलीलें देनेका वचन देते हैं जितनी अच्छी उनकी युक्तिया है। किन्तु हम अपने सिद्धान्तकी याजी इन दलीलोंसे अधिक महत्व रखने. घाली बातोपर लगाते हैं । इस आधारपर मैं युद्धकी न्याय्यतापर सामान्य वादविवाद नही करूगा किन्तु किसी शासनके विरद्ध विद्रोह करनेपर विशेष जोर दूगा। इस विषयपर एक यडा प्रथ लिपा जा सकता है, किन्तु दिखाऊ दार्शनिक उलझनों- को छोडकर हम उसी घातपर विचार करेंगे जिससे हमारा साक्षात् सम्बन्ध है। यह बात साफ है कि हमारी स्थिति घडी नाजुक और टेढी है। इस विषयपर इन प्रारम्भिक शब्दोंकी लिखते समय हमें एक घातपर विशेष जोर देना है। हमें किसी कठिनाईस इसलिये नहीं भागना चाहिये कि वह नाजुक और खतरनाक है और न हमें उसस समझौता हा करना चाहिये । रणभूमिपर शारीरिक सग्राममें कूटनीति और रणनीतिका प्रयोग धर्मसगत माना गया है युद्धक्षेत्र में आगे बढना और पीछे हटना ठीक समझा जाता x x x x १४६ स्वाधीनताके सिद्धान्त - बारीक छानवीन करनेवाले हों, किन्तु एमर्सनके नवयुवकके समान वे लोग युद्धक्षेत्रकी सबसे आगे बढ़ी हुई पक्तिमें पहुच सकते हैं, किन्तु उनके साथ तर्क करने में हमें धीरजसे काम लेना चाहिये। उन्हें अपनी बात समझानेमें हमें अपना दिमाग ठण्डा रखना चाहिये और पूरी सहानुभूतिके साथ छोटी छोटी बातोपर भी विचार करना चाहिये । इस बातकी आवश्यकता निस्सदेह स्पष्ट है कि हम शारीरिक बातोंपर जिस सावधानीसे विचार करते है मानसिक यातोपर उससे अधिक सावधानी चाहिये। (४) सबसे पहले विद्रोह करनेका विरोध धार्मिक दष्टिसे किया इस तर्कमें सय शंकाए और दुविधाए आ जुटेंगी और यही टेढी खीर भी है । प्रत्येक स्वतत्र राष्ट्रको अधिकार है कि वह किसी दूसरेसे लहे, किन्तु न्यायप्तगत कारण होनेपर भी विद्रोह करनेका अधिकार किसी पराधीन जातिको नहीं मिला है। हम आयलैंण्डवालोंको भी यह अधिकार नहीं मिला है और सदा यह अस्वीकार किया जाता है। इसलिये हमें अपने विरोधियोंको शब्द प्रतिशब्द उत्तर देना है और क्रमश: उस स्थानपर पहुंचा देना है जहा वे हमारे सिद्धान्तोंको मानने लग जायगे। किन्तु कोई यह न समझे कि स्वाधीनताशास्त्रार्थका विषय है। यह उससे अधिक है। युद्धके विषय में हम बहुधा अपनी प्रतिमाओं का उल्लेख नहीं करेंगे किन्तु अपने निश्चय बता- जायगा।

एकादश परिच्छेद - कानूनका सन्चा अर्थ जय हम गधसत्ताका विरोध करते हैं तो हम वैधसत्ता- को क्यों मानते हैं और उसका क्या अर्थ समझते हैं यह बतला कर हमें अपनी जड मजबूत कर लेनी चाहिये । इसलिये हमें कानून शब्दका अर्थ भलो भाति समझना चाहिये। फानूनकी परिभाषा यों की जा सकती है कि कानून शुद्ध बुद्धिकी वह माशा है जिसका उद्देश्य लोकहित है और जो शासक शक्तिद्वारा प्रचा- रित की जाती है। इस मम्बन्धमें हम प्रामाणिक लेखफोंके कुछ धाक्य उद्धत करेंगे। "आदमीके यनाये हुए कानूनपर कानूनकी छाप तभीतक रहती है जबतक कि वह शुद्ध वुद्धिके अनुसार हो। इस दृष्टिसे इसकी उत्पत्ति स्पष्टतया ईश्वरी नियमसे है।" [पपपीनास एथिक्स प्रथम खण्ड पृ० २७६] सेण्ट टामसने ऐसे कानूनों के विषयमें लिखते हुए जिनका उद्देश्य, प्रचार कर्ता अथवा स्वरूप अधार्मिक है लिखा है- ऐसी कार्रवाइया कानून नहीं कही जा सकती, यह तो अत्याचारकी कृति है। क्योंकि सेएट आगस्टीनने लिया है कि 'जो कानून धार्मिक नहीं है वह कानून 4

१४८
स्वाधीनताके सिद्धान्त
है ; सम्मुख आक्रमण करना और दांव-घातसे काम लेना नीति-
सम्मत समझा जाता है। किन्तु जहा सिद्धातकी बात माती है
वहा कूटनीतिका कोई काम नहीं, वहा तो सीधे रास्तेका अ.
नुसरण करना पड़ता है और यह रास्ता दूढकर निकाला जाता
है तथा अत तक अटल रहकर निभाया जाता है
.
14

कानूनका सचा अर्थ
१५१
(.
इस विषयपर सभी मतके और सभी समयके लोगोंकी.
एक राय रही है। जबतक यह सब बातें हमारे देशमें पूरी पूरी
नहीं हो जाती हम युद्धकी दशामें हैं। जब स्वाधीन और
चास्तविक आयरिश सरकार स्थापित हो जायगी तो हम उसका
पूरा और हार्दिक अभिनन्दन करेंगे। उस समय कानूनको
भी जलता सहर्ष मानेगी। हम इस समय राजसत्ताका खण्डन
करनेके लिये यह सब नहीं लिख रहे हैं, किन्तु हम यह
बतलाना चाहते हैं कि इस समय जो लोग हमारे ऊपर
शासन कर रहे हैं वे अनधिकारी हैं और जो झडा हमारे देशमें
फहग रहा है वह हमारा नहीं है।
(२)
विद्यमान शासकोंका विरोध करनेके विषयमें यालमेज लि-
खता है कि "हमें उन सय दलीलोंको चकनाचूर कर देना
स पिता पितरस्तेषा कैवन जन्मईतव ॥ रघुवश ।
"राजा प्रततिरश्चनात्" इत्यादि ।
मनने राजाके विषय में कहा है 'कामात्मा विषम चद्री दहेनेव निहन्यते ।
अथात कामी, कोधी, नीच राजा दशसे ही मारा जाता है।
'शुक्रनीतिम एक स्थानपर लिलामी राजा प्रजाका पालन नहीं करता उलटा
सात करता है वह देव सोन्मादमातुर । पागल कुत्नेको तरसम्मिलित प्रजा
दारा मारा जामा चाहिये।
अनुवादक।

१५०
स्वाधीनताके सिद्धान्त
ही नहीं है। [एक्वीनास एथिक्त प्रथम खण्ड पृ० २९२]
वालमेजने लिखा है कि "किसी भी कानूनमें मुख्य बात यह रहनी
चाहिये कि वह शुद्ध बुद्धिसगत हो, वह शुद्ध वुद्धिका ही प्रकाश
हो अर्थात् वह समाजमें शुद्ध बुद्धिके प्रयोगका साधन हो।"
(यूरोपियन सिविलिजेशन म०५३) इसी अध्यायमें घालमेजने
सेएट टामसको पातको पुष्ट करते हुए लिखा है कि "राज्य
राजाके लिये नहीं होता बल्कि राजा राज्यके लिये होता है।"
और उसने इसका स्वाभाविक परिणाम निकाला है कि "लव
सरकारें समाजके हित के लिये स्थापित की गयी हैं। चाहे किसी
तरहकी सरकार हो, जो उसका शासन चलाते हैं उन्हें इस
वातको सदा अपना पथप्रदर्शक समझना चाहिये। 'प्रतिनिधि-
शासन' नामक अपनी पुस्तकमें मिलने लिखा है कि सरकारका
एकमात्र उद्देश्य प्रजाका हित करना है। ईसा मसीहके पैदा
होनेसे पहले प्लेटो भी ऐसी ही बात कह गया है। यह एक आदर्श
नगर स्थापित करना चाहता था जिसमें सारी प्रजा अत्यन्त
सुपी रहे । (रिपब्लिक पण्ड ४) फेल्डरयुडने लिखा है कि
"नीतिपूर्ण शासन तभी न्यायपूर्वक स्थापित किया जा सकता है
जब मनुप्यके सहज कर्तव्य और अधिकार अविच्छेद्य समझे
जाय।" (अर्वाचीन दर्शन शास्त्र अध्याय ४) 1*
-
.
उमारे यो मौवाका स्थान ९ पर मिलते, यया
प्रमाना विनयाधानात् रखपाट् भरपादपि।

कानूनका सथा अर्थ
इस विषयपर सभी मतके और सभी समयके लोगोंकी
एक राय रही है। जबतक यह सय यातें हमारे देशमें पूरी पूरी-
नहीं हो जाती हम युद्धको दशामें हैं। जय स्वाधीन और
वास्तविक आयरिश सरकार स्थापित हो जायगी तो हम उसका
पूरा और हार्दिक अमिनन्दन परेंगे। उस समय कानूनको
भी जनता सहर्ष मानेगी। हम इस समय राजसत्ताका खण्डन
करनेके लिये यह सय नहीं लिख रहे हैं, किन्तु हम यह
यतलाना चाहते हैं कि इस समय जो लोग हमारे ऊपर
शासन कर रहे हैं वे अनधिकारी हैं और जो भडा हमारे देशमें
फहरा रहा है वह हमारा नहीं है।
(२)
विद्यमान शासकोंका विरोध करनेके विपयमें घालमेज लि-
खता है कि "हमें उन सर दलीलोंको चकनाचूर कर देना
स पिता पितरस्तषा कवल जन्मइतव ॥ रघुवन ।
"राजा मकशिरचनात्" इत्यादि।
मनुने राजाकै विषयमें कहा है 'कामात्मा विषम द्रो दडे नव निहन्यते ।
अर्थात् कामी, क्रोधी, नीच राजा दणसे ही मारा नाता है।
'शुक्रनीतिमें एक स्थानपर लिखा है जो राजा प्रजाका पालन नहीं करता चलटा
उतम करता है वह 'ग्देव सोन्मादमातुर । पागम्द कुलेकी तर सम्मिलित प्रजा
बारा मारा जामा चाहिये।
अनुवादक।

- 1 १५२ स्वाधीनताके सिद्धान्त वाहिये जिन्हें जिस समय जो सरकार स्थापित हो उसीके अध उपासक हमारे विरुद्ध पेश करते हैं ।" (यूरोपियन सिविलिजे- रान अ०५५) इस प्रसिद्ध स्पेनिश धर्म से अधिक स्पष्ट बात इम नहीं लिख सकते। इन जीहुजूरोंकी दलीलोंके जवायमें हम उसीका निम्नलिखित लम्बा और ओजस्वी वाक्य उद्धृत करते हैं-"न्यायविरुद्ध शासन कोई शासन नहीं है। जहाशक्तिके भाव होते हैं वहा अधिकारके भाव भी होने चाहिये। यदि ऐसा न होगा तो शारीरिक शक्ति पशुबल में परिणत हो जायगी।" उसने फिर लिखा है कि "जिस शासकने सिर्फ तलवारके ही जोरसे किसी जातिको अपने अधीन कर रखा है उसे अपने इस कार्यले यह अधिकार नहीं मिल जाता कि उस जातिपर उसका ही कब्जा रहे । वह सरकार, जिसने घोर अन्यायसे नागरिकोंकी सर श्रेणियोंको लूट खसोट लिया है, उनसे मनुचित कर बल किये है, न्याय्य अधिकार छीन लिये है, अपने कामोंको केवल इसी कारणसे न्यायपूर्ण नहीं बतला सकती कि उसे इन अत्याचारों- को कार्यमें परिणत करने की योष्ट शक्ति है ।" इस पुस्तकमें ऐसी ही स्पष्ट और निश्चित बातें बहुतसी हैं। हमारे विरोधी लोग जो ऊचे ऊचे अधिकारोंपर हैं, इस विषयमें जो बेहूदी बातें यक्ते हैं यह हम सब जानते ही हैं। बालमेजने इसी पुस्तक और अध्याय में ऐसे अधिकारीका एक बडा अच्छा उदाहरण उसकी दलीलोंके उत्तरके साथ दिया है-"पालमायराके धर्मा- चार्य डोन फिलिपस मामाटने अपने 'लडाका ईसाई सम्प्रदाय'

कानूनका
सचा अर्थ
१५३
नामक ग्रन्यमें लिखा है कि ईसा मसीहने अपने सरल और भार
पक्षक शब्दों में कहा है कि राजाका हक राजाको दो । इससे
उसने (ईसाने) भली भाति सिद्ध कर दिया है कि शासकका
देवलमान अस्तित्व ही यथेष्ट है कि प्रजा जबरदस्ती उसकी
आशा माननेको बाध्य की जाय , यह पुस्तक मी रोममें जन्त कर
ली गयी थी।" वालमेजके यह अन्तिम शब्द ही इसकी खुलासा
टिप्पणी है । और वह आगे लिखता है कि इस जन्तीका चाहे जो
कारण हो, हम निस्लकोच कह सकते है कि ऐसे सिद्धा
नोंका प्रचार करनेवाली पुस्तकके अनुसार प्रत्येक मनुष्य जो
अपने अधिकारों की रक्षा करना चाहता है पोपको इस माशासे
सहमत होगा।" यह तो हुई पशुरलपर स्थापित सरकारके विषयको
बातें ।' यई बलात्कारसे दुसरेके अधिकार छीनना है।
इसकी जद जम जानेसे यह न्यायसगत नहीं हो जाती। जय
इसकी माशामोंका उल्ल घन नहीं किया जाता तो कोई यह न
समझे कि हम सिद्धान्तरूपसे उन्हें मानते हैं हम तो दिखलानेके
लिये भी उन आशाओं को स्वीकार नहीं कर सकते, किन्तु यह
समझना चाहिये कि अभी समय नहीं आया है कि इनका विरोध
किया जाय । यह तो लडाईकी एक चाल है।
+--
हम यह मानते हैं कि भायलैंण्डमें अगरेजीका राज्य यला-
वारसे दूसरों के स्वत्व छीनकर स्थापित किया गया है । अत:

१५४ स्वाधीनताके सिद्धान्त . . हम उसकी सत्ता स्वीकार नहीं करते। किन्तु यदि कोई यह युक्ति उपस्थित करे कि बलात्कारसे स्थापित की हुई सत्ता यदि धीरे धीरे प्रजाद्वारा स्वीकृन हो जाती है तो वह एक प्रकारसे न्यायपूर्ण समझी जाती है । इसका मुंह-तोड उत्तर हमारे पास है । आयलैंडके विषयमें तो हम इस धारणाको निर्मूल बताते है । हमारा इस वातका साक्षी आयलैंडका इनिहास है जो यह बताता है कि पशुवलपर स्थापित ब्रिटिश अधिकारके सामने हमने कभी सर नहीं झुकाया । किन्तु जो हमारी इस निरी अस्वीकृतिको स्वीकार नहीं करते उनसे हम कह सकते हैं कि वह राजसत्ता जो भारम्भमें न्यायपर स्थापित की गयी थी, जब राष्ट्रका नाश करनेके लिये अपनो शक्तिका दुरुपयोग करती है तो उसका विरोध किया जाना चाहिये। हम अब भी यह बात मान रहे हैं कि गङ्गरेज सरकार प्रजामतके विरुद्ध पशुवलपर स्था- पित है, किन्तु हम इससे भी बढी चढी हुई अन्यायकी धातें सिद्ध करके सय आपत्तियोंका निराकरण कर सकते हैं। इस विषय- पर डाक्टर मरने भली भाति विचार किया है । वह लिखता है- "सुप्रतिष्ठित और न्यायसगत शासन जय अपनी शक्तिका दुरुप- योग करता है तो उसका विरोध किया जाना चाहिये या नहीं यह प्रश्न उठता है । हमारे धर्माचार्यों का बहुमत तो यह है कि ऐसे अवसरपर पशुयलके ही सहारेसे सामना करना धर्म- सगत है और यदि आवश्यकता पड़े तो यह भी उचित है कि स्वेच्छाचारी सम्राट् या राजाओंको सि हासनसे उतार दिया -

कानूनका सचा अर्थ
-
-
जाय I पिन्तु ऐसी स्थिति तय माती है जय अन्याय वरम
सोमाको पहुच जाता है। इस लितिके लिये निम्नलिखित बातें
उपस्थित रहनी चाहिये
१-अत्याचारकी मात्रा मतितक पहुच जानी चाहिये मर्थात्
जर यह असा हो जाय ।
-अत्याचार खुल्लमखुल्ला हो, कमसे कम उनकी माखों में जो
सजन हों और जिनके विचार सच्चे हों।
३-अत्याचारीद्वारा किये हुए पाप उनले यो हो जो उसका
विरोध करने और उसे सिहासनच्युत करनेसे पैदा होंगे।
४-जर अत्याचारसे छूटनेका इस चरम उपायकी शरण
लेनेके अतिरिक्त और कोई मार्गन रहे ।
र-जय धर्मकी दृष्टिसे विजयका निश्चय हो।
६-यह क्रान्ति ऐसी होनी चाहिये कि सारी प्रजा मिलकर
इसमें भाग ले या मदद दे । यदि एक छोटा दल जनताके समूह
का साथ देना अस्वीकार करे तो इससे विद्रोह धर्म विरुद्ध
नहीं हो जाता।
('धार्मिक निधन्धमाला', रिकाधीशन नीति दर्शन'का ८ वा
परिच्छेद भी पढने योग्य है।)
इनमें से कुछ बातें डाकृर मरेने यडे विस्तारके साथ लिखी
हैं। मैंने उनका साराश दे दिया है। साधारणसे साधारण
.
+हमारे यहां भी धर्माचार्यों ने इसी सिद्धान्तपर राभा वेनको सिहासन से उतार
दिया था। यह कथा इतिहास प्रसिह पनुवादक।
+-

स्वाधीनताके सिद्धान्त आदमी भी आसानी साप देख सकता है कि यह बातें आय. लैंण्डपर किस प्रकार पूरी पूरी घटती है। मुझे तो ऐसा मालूम पडता है कि यदि हमारे नेताओंसे कहा जाता कि क्रान्तिके लिये अपनी शर्ते यतलाइये तो वे इससे और भी अधिक कडे नियम रखते। सच तो यह है कि उनके विषयमें यह कहा जा सकता है कि वे धर्म की दृष्टिसे निश्चित विजयसे भी कुछ अधिक चाहते हैं। वे सब प्रकारसे पूर्ण निश्चय चाहते है। लडाईमें ऐसे पक्क निश्चय की भाशा कभी नहीं की जा सकती। जब कोई राजसत्ता अपने अन्यायके कारण मिट जाती है तो हमें सत्याऔर न्यायके आधारपर नयी सरकार स्थापित करनेके लिये नागरिक सत्ताके मूलमें जाना चाहिये। - अव यह बात कोई नहीं मानता है कि राजामें ईश्वरका अश है, किन्तु इस कि- पयपर पुराने जमानेमें जो वादविवाद हुआ उससे शासनके सम्बन्धमें कुछ नयी यातें मालूम होती हैं। राजाकी शक्ति साक्षात् ईश्वरसे प्राप्त होती है इस विषयपर लिखते हुए "स्वारेजने बड़ी वातका विरोध किया कि स्वत , राजाको जन्मसे ही शासन करनेका अधिकार प्राप्त है। प्रजाकी सम्मतिसे. ही सब प्रकारको राजसत्ता उत्पन्न होती है । इसी तरहसे मे- लकथानके सर्वशक्तिसम्पन्न राजसत्ताके सिद्धान्तका विरोध करते वीरताके साथ इस कानूनका सन्था अर्थ हुए स्वारेजने परिणाम निकाला है कि जनताको ऐसे राजाको गहीसे उतारनेका अधिकार है जिसने अपनेको उस धरोहरको सम्हालकर रावनेके अयोग्य सिद्ध कर दिया है जो प्रजाने उसे सौंपी है।" (डिवुल्फकृत 'मध्यकालीन दर्शनका इतिहास,' तीसरा “सस्करण, पृ०४५) इस अगरेजी सिद्धान्तका स्वारेजने जो खण्डन क्यिा है उसे प्रसिद्ध लेखक हलमने स्पष्ट, सक्षिप्त और निष्पक्ष यतलाया है। इन युक्तियोंकी सर्वत्र धाक जम गयी है । अगरेज धर्माचार्यों की अयोग्यता सिद्ध करनेके लिये इलमने उसके वाक्य उद्धृत किये हैं । 'यूरोपका साहित्य' नामक अपनी पुस्तकमें उसने लिखा है- "अत यह शक्ति स्वत अपनी प्रकृतिसे एक मनुष्य नहीं किन्तु मनुष्य समूहके अधिकारमें रहती है । सिद्धान्त है। हमारे सब प्रामाण्य लेखक इसे पुष्ट कर गये हैं। सब इस धातपर सहमत हैं कि राजाको कानून बनानेकी यही शक्ति है जो जनताने उसे सौंपी है। इसका कारण स्पष्ट है, क्योंकि सब मनुष्य समान पैदा हुए है इसलिये किसीको भी किसी दूसरे आदमी या राज्यके ऊपर राजनीतिक अधिकार नहीं है। और न हम इस विषयकी वस्तुतासे ही कोई कारण दे सकते हैं कि क्यों एक मनुष्य दूसरेके ऊपर शासन करे । हा, इसके विरुद्ध कारण दे सकते हैं।" (इलमकृत 'यूरोपका साहि- त्य' पण्ड ३ अ०४)। डाकुर मरेने अपनी पुस्तकमें सर जेम्स मेकिनटोसकी तारीफों यह निश्चित

'स्वाधीनताके सिद्धान
।
कहा है कि अगरेजी सिद्धान्तका खण्डन करनेवाले लेखकों में यह
सबसे योग्य है, देखिये। मेकिनटोस क्या कहते हैं। वह
बताते हैं कि पर-आज्ञापालनको विना अपवादके धर्म बतला
देना चेहूदगी है। डाक्टर मरेने अपने मुख्य शासन शक्तिका
विरोध' शीर्षक प्रवन्धके अन्तमें
प्रवन्धके अन्तमें मेकिनटोसका एक
लम्बा चौडा अवतरण उद्धृत किया है और इसकी महत्ता
तथा बुद्धिमत्ताकी बडी प्रशसा की है। इस अवतरणके
अधिकांशमें लिखा गया है कि विद्रोहको सफल करनेके लिये
कितनी कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है और उन घोर
बुराइयोंपर भी जोर दिया गया है जो असफलतासे पैदा होती
हैं । यहा मैंने जो कुछ लिखा है उसमें मुझे अधिक कष्ट
बुराइयों को खोलनेमें हुआ है छिपानेमें नहीं । किन्तु जब
विद्रोह अनिवार्य और आवश्यक हो जाना है तो समको डाक्टर
मरेके “उद्धृत किये हुए इस वाक्यका अनुमोदन करना
चाहिये । “वह विद्रोह, जो दमनके कारण आवश्यक हो जाता
है और जिसके कारणोंपर विचार करनेसे अधिक सम्भावना
यह हो जाती है कि उसका अन्त अच्छा होगा, एक सार्वजनिक
पुण्यका
उसको सकट चारों ओरसे इस
प्रकार घेरे रहते हैं कि इसके सचालक प्रशसाके योग्य समझे
जाने चाहिय। जब क्रान्ति सफल हो जाती है तो जनतापर
यह भार पडता है और उसका यह अधिकार रहता है कि वह
नयी सरकार स्थापित करें।
काम
:

कानूनका सद्या अर्थ (५) इन सबका निचोड यह निकला कि वही सरकार न्याय. सगत है जो न्यायपर स्थापित की गयी हो और सर्वसाधारण- के हित के लिये हो । पशुयलपर स्थापित शासनका विरोध किया ही नहीं जाता यहिक किया जाना भी चाहिये । घद राजसत्ता जो आरम्भमें नियमानुकूल थी जब धीरे धीरे अत्याचारी यन जाती है नो उसका विरोध करना चाहिये और उसे उलट देना चाहिय। और अन्तिम यात यह है कि जय अपनी शक्तिके दुरुपयोग या अत्याचारके कारण एक विशेष शासनका अस्तित्व नहीं रहता तो हमें वास्तविक राजसत्ताका पुनरुद्धार करना चाहिये । कभीर कुछ लोग पिना समझे घूझ कह देते है कि "स्वतत्रता अराजक- तासे प्राप्त होती है।" किन्तु यह घोर हानिकर सिद्धान्त है। इससे अधिक सत्य तो यह है कि अराजफतासे निश्चय ही ग. त्याचारकी उत्पत्ति होती है। अराजकता जनताको शानेके लिये कोई न कोई अत्याचारी शासफ निकल आता है। किन्तु जय दृढप्रतिज्ञ और सयमी जनता स्वेच्छाचार और अराजकता नहीं पर स्वाधीनता प्राप्त करने का निश्चय कर लेती है तो वह प्राकृतिक नियमके अनुसार काम करती है । सेण्ट टामसने यह सि द्धान्त भली भाति समझा रखा है और टर्नरने अपनी पुस्तक 'दर्शनशास्त्रका इतिहास में इसे उद्धृत किया है-"अत्याचारी शासककी प्रजा जो सुख शान्ति चाहती है उसे प्राप्त करने की

स्वाधीनताके सिद्धान्त
चेष्टा किसी व्यक्तिविशेषको नहीं किन्तु जनताद्वारा सात
और धर्म के अनुसार काम करनेवाली अस्थायी राजसत्ता
करनी चाहिये ।" जब कुछ मनहूस और बेवकूफ लोग पा
लोकी तरह चरते हैं कि हम राजसत्तामात्रको चुरा यता
हैं, तो हमें शान्तिपूर्वक बता देना चाहिये कि हम राजसत्ता'
जडको भली भांति समझते हैं। इसके मूलमें सत्य है और
इसके प्रधान का पूरा सम्मान करते हैं। यह मुख्य भ
स्वतत्रता है।
।
५

. . द्वादश परिच्छेद । सशस्त्र प्रतिरोध । - कुछ आपत्तियां। (१) विद्रोहफा पक्ष पाठकों के सामने उपस्थित फरने याद यह मनुचित न होगा कि हम इस विषयकी मापत्तियोंपर विचार करें। कई निसासु सिद्धान्तको इस स्पष्ट मालोचनासे प्रसन्न दोंगे, किन्तु पुछ चालाक विरोधी नीतिको दुहाई देते हुए अपना मान्तिकारियों का पेदा उल्लेप करते हुए उनकी हंसी उढायेंगे, सम्मयत घे किमी पढे आदमी के नामको दुदा या ऐतिहा- सिक घटनाओं का जबरदस्त वासरा लें। यह विचित्रसी पान फिम इस पातफा तो ध्यान रपते हैं कि जर हम किसी व्यवहारसिद्ध सिद्धान्तसे लोगोंकी नजर बचाना चाहते हैं तो गूह तत्वकी शरण लेने है, किन्तु यह यस अभीतक हमारे ध्यानमें फम आयी है कि जब हम किसी सिद्धान्तको सत्यताको स्वीकार करनेको चेष्टा करते है तो हम अमलो पातीका सहारा लेते हैं। ऐसे समय हमारी मानों में प्रस्तुत और कष्ट- स्वाधीनताके सिद्धान्त चेष्टा किसी व्यक्तिविशेषको नहीं किन्तु जनताद्वारा संगठिन और धर्म के अनुसार काम करनेवालो अस्थायी राजसत्ताको फरनी चाहिये।" जब कुछ मनहूस और येवकूफ लोग पाग- लोकी तरह वपते हैं कि हम राजसत्तामात्रको धुरा पता रहे हैं, तो हमें शान्तिपूर्वक यता देना चाहिये कि हम राजसत्ताको जडको भली भाति समझते हैं। इसके मूलमें सत्य है और हम इसके प्रधान भारका पूरा सम्मान करते हैं। यह मुख्य भाव स्वतनता है।

सशस्त्र प्रतिरोध-कुछ आपत्तिया - सिद्धान्तका यह कहकर खण्डन नहीं किया जा सकता कि लाप- रवा लोग इसका दुरुपयोग करते हैं अथवा यह कहकर कि यदि अमुक सभा या अमुक स्थिति में इसका खुल्लमखुल्ला प्रचार किया जायगा तो हानिकी सम्भावना है।" यह वाक्य सत्तम है। सिवा दूसरों के शब्द दुहरानेके विरोधी इसका कोई ठीक उत्तर नहीं दे सकता। हम बालमेजके शब्दों में उससे कहेंगे- "लोगोंसे नीतिश मननेको कहते हुए हमें झूठे सिद्धान्तोंकी आड़में छिपा नही रहना चाहिये। हमें लायधान रहना चाहिये कि जनताके दुर्भाग्यके रोपको शान्त करने के लिये हम ऐसी भ्रम- पूर्ण यातें न फैलायें जो सब सत्ता और समाजको जड खोखली करनेवाली हों। ('यूरोपियन सभ्यता' १० ५५) ऐसे प्रश्नोंकी तहमें जानेसे जो धयराते हैं उनके बारेमें यालमेज लिखता है कि "मैं नम्रतासे काहगा कि ऐसे आदमियों की नीतिछता यरयाद चली जाती है, उनकी दूरदर्शिता और सतर्कता किसी कामकी नहीं रहती। वे इन बातोंकी जांच करें या न करें "उनकी जाँच हो चुकी, उनका मन क्षुब्ध है और वे उस मार्गपर जिस तरह जा रहे हैं उसका हमें बडा खेद है।" ( 'यूरोपियन सभ्यता' अ०५४) फ्रान्सके पुराने राज्यमें जनताको जो २ पट थे उनपर लिखता हुआ टर्नर नाम लेखक कहता है-"पुरोहितोका धर्म यह था कि वे न्याय और सहनशीलताका प्रचार करते किन्तु जनता समझती थी कि भा उस राजास मिले गये जिससे वह उरतो घी और जिससे उसको वही घृणा थी।" (दर्शनशास्त्रका स्वाधीनताके सिद्धान्त - - प्रद सकट, चाहे घ६ क्षणिक हो हो, ऐतिहासिक घटनाओं अधवा आनेवाली विपत्तिसे घड़ा, मालूम होता है। यह बात यदि हम समझ जाय तो उक्त भ्रममें पड़े हुए मनुष्यको हम इस यातमें सहायता देकर उसके दिलमें अपनी यात जमा सकते है कि स्थायी और अस्थायी हितमें कमा भेद है। इस प्रकार आफ- सियोंको हटाकर हम अपना पक्ष प्रयल कर सकते हैं। (२) ऐसा देखने में आता है कि बिल्कुल लापरवा आदमी भी बहुधा सावधानीकी दुहाई देते हैं । ऐसे लोगोंकी,जिनकी एकमात्र चेष्टा कठिनतासे पिएड छुडाना होता है, जो अपनी कमजोरी छिपाने के लिये धैर्यपर व्याख्यान देते हैं, इस बातपर भली भाति विवार करनेकी सलाह देनी चाहिये कि किस प्रकार उन. निष्कपटी पुरुष इन बहानेयाजियोंसे मुझला धीरजको त्याज्य पदार्थ बतलाकर उसपर अपनी सारी घृणा बरसाते हैं। ऐसी युक्ति सफल नहीं होती, यह कुछ कालके लिये उनका बड़प्पन घटा देती है। धैये दुर्यलोंका नहीं किन्तु बलवान आत्माओंका । गुण है। प्रतिपक्षो कहता है-“आपकी यात बहसमें तो ठीक हैं किन्तु देखिये, व्यवहार में लोग किस प्रकार इनका दुरुपयोग कर रहे हैं।" "ह दलील सुनकर इसका उचित उत्तर तुरत स्मरण हो आता है। डाकर मरेने एक स्थानपर लिखा है-"किसी नैतिक

सशस्त्र प्रतिरोध-कुछ मापत्तिया
उसका यह कार्य मेकिनटोसके शब्दों में 'सार्वजनिक पुण्यका,
कार्य' यन जाता है। इस कार्यसे सत्यको मनुष्य समाजमें
उचित भादरका स्थान मिलता है।
.
(४)
.
-
"
T
पालमेजने योसेके विषय में कहा है कि उसने उन अधिकारों
को अस्वीकार किया है जिनका यहा प्रतिपादन किया गया है।
इसलिये हम यहा योसेके कुछ और वाक्य देंगे जो उसने किसी
दूसरे प्रसगपर कहे है किन्तु जो हमारे विषय में लागू हो सकते
है। साम्राज्य के विषयमें घोसे लिखता है-
Il revolutions des empires sont reglees par la
providence, et servent a humiller les princes
अर्थात् साम्राज्यकी कान्तिया विधातासे निर्दिष्ट की जाती हैं
और इनके द्वारा,राजाओंका मिजाज ठडा किया जाता है । इस
वापसे हम स्वाधीनताका युद्ध करनेसे रोके नहीं जा सकते।
यदि हम और आगे बढते हैं और वह बातें पढते हैं जो उसने
इसी शीर्षकमें लिखी है तो हम उस वीरता, स्वातन्त्रय प्रेम तथा
देशभक्तिको प्रशसा ओजस्वी भाषामें देखते हैं जिसने प्राचीन
यूनान
और रोमका भेद यता रखा है। इसे पढकर कोई भी,
जाति स्वतन्त्रताके लिये उन्मत्त हो सकती है । स्वतन्त्र, अजेय
और भ्रष्टताहीन यूनानफे विषयमें बोसे लिखता है-.
"fais ce que la Grece avait de plus grand etait-une
।
-

स्वाधीनताके सिद्धान्त
wwwmun.
AA--
इतिहास' अ०५६) यात यह है कि जर अन्याय और पापका
चोलयाला होता हो तो उसका स्थायी राज्य नहीं होना
चाहिये, उस समय कोई ऐमी कमजोरी न रहनी चाहिये
जो पुण्यका रूप धारण कर सके । हम जिस चातका फौरन
सामना नहीं कर सकते उमका वएडन तो सदेव कर सकते हैं।
इन बातोंकी अवहेलना करना घुद्धिहीनताका सबसे बुरा स्वरूप है-
यह ऐसी अदूरदर्शिता है जिसको हम इस अवसरपर कमसे कम
अपनी ओरमे पूरे जोरफे साथ अस्वीकार करते हैं।
-
--
N
(३)
कान्तिकारी शब्दका प्रयोग उसके अर्थको यिना विचारे हुए
किया जा रहा है। हमें सदा ध्यान रखना चाहिये कि यह शब्द
सरस्पर सापेक्ष अर्थ रपना है। यदि किसी जातिकी स्वाधीनता
बलात्कार और विश्वासघातसे छिन ली गयी है और उसके भून.
कालमें समद्धिशालो रहे हुए देशमें दमनकारी उपायोंसे काम लिया
जा रहा है तो यह भी क्रान्ति है और बहुत धुरी क्रान्ति है । यदि
अत्याचारसे शासित और दमनके भारसे उजड़ते हुए किसी देशके
लोग उठ खड़े होते हैं, और अपने स्वाभाविक साहस,उत्साह और
धैर्यसे पुरानी स्वाधीनता प्राप्त करके, न्यायपूर्ण शासन स्थापित
करते हैं तो यह भी काति है और अच्छो क्रान्ति है । कान्तिका.
रीका विचार उसकी नीयत, उसके साधन और उसके उद्देश्यसे
होना चाहिये ओर जव । इन सबमें सत्य विद्यमान रहता है तो
।

'सशस्त्र प्रतिरोध । । T "Voila de fruit glorieux de la patience Romaine Des peuples qui s enliardissaient et se fortifiaient par leurs malheurs wajent bien cuson de croire qu'on sauvait tout pourvu qu on pneerdit pas l'esperance" रोमन दृढताका चकित करनेवाला परिणाम देखिये। जो जाति अपने दुर्भाग्यके समय वीर और शक्तिशाली पन गयी उसका यह विश्वास विल्कुल ठीक था कि जयतक यह माशान खो बैठेगी तबतक यह सब कुछ कर सकती है। और सुनिये- "Parmi eux dans les etats les plus tristes, jamus le faibles conseils n'ont ete seulement ecoutes" गिरीसे गिरी दशा में भी उन लोगों में दुर्यलतासूचक विचार कमी नही सुते गये। प्राचीन स्वाधीनताके इस सुस्वर गुण- गानको पढकर हमारी स्वाधीनताको इच्छा घटती नहीं, बल्कि हमारे अपूर्व इतिहाससे हमें जो सहज उत्तेजन मिलता है वह बढता है और, हमारे कानों में यह आवाज गूजती है-"लडते जाओ और विजय प्राप्त करो, निकट भविष्यमें ही तुम्हारा कट्टर शत्रु लडाई हो चुकने और विजय प्राप्त कर चुकनेके याद तुम्हारा उतनाही कट्टर प्रशंसक बन जायगा . "हमते अटल सिद्धान्त निश्चित कर लिये है। व्यावहारिक क्षणिक और सदा यदलनेवाली होती हैं। यह निम्नलिखित अवतरण मली भाति वर्णन की गयी है।

स्वाधीनताके सिद्धान्त olitique ferme et preroyante, qui avait abandonner, asarder et velendrc, ce qu'il fallait, ct ce qui est plus, zrand cncore, un courage que l'amour de la liberte ct celui de la patrie rondaient invincible" अर्थात् यूनानमें सबसे बड़ी बात यह थी कि उसकी राजमत्ता द और सुसज्जित थी। यह जानती थी कि कर्शके लिये केस प्रकार त्याग किया जाता है, सर्वस्वकी बाजी लगायो जाती है और उसकी रक्षा की जाती है। इन सबसे बडी घात तो यह थी कि स्वातन्त्र प्रेम और देशभक्ति के कारण उनका साहस अजेय था। निर्दोष रोम और उसकी स्वाधीनताके विषयमें घोसे लिखता है "La liberte leur etait donc un tresor qu'ils preferont i toutes les richesses de l'univer's अर्थात् स्वाधीनता उनके लिये इतनी अनमोले थी कि वे विश्व की सारी सम्पत्ति उसके सामने तुच्छ समझते थे। घोसे फिर लिखता है Sur La mavme fondamentale de la republique etait de egarder la liberte comme une chose anseprrable du nom Roman's अर्थात् रोमन प्रजातन्त्रका मूलभूत सिद्धान्त यह था कि वह स्वाधीनताको रोमन शब्दसे मविच्छेद्य पदार्थ समझता था। देखिये, उसको इस दृढभक्तिका क्या परिणाम हुआ- " n -- । १ .

सशस्त्र प्रतिरोध न Voila de fruit glorieux de la patience Romaine Des peuples qui s'enhardissaient et sa fortifiaient par leurs malheurs aviſent bien raison de croire qu'on sauvait tout pourvu qu' on pneerdit pas l'esperance" रोमन हृढताका चकित करनेवाला परिणाम देखिये। जो जाति अपने दुर्भाग्यके समय वीर और शक्तिशाली बन गयी उसका यह विश्वास बिल्कुल ठीक था कि जपतक यह आशान खो बैठेगी तस्तक यह सब कुछ कर सकती है। और सुनिये-- "Parmı pur, dans les etats les plus tristes, jamais les faibles conseils n'ont ete seulement ecoute गिरीसे गिरी दशामें भी उन लोगों में दुर्यलतासूवक विचार कमी नही सुते गये। प्राचीन स्वाधीनताके इस सुस्पर गुण- गानको पढकर हमारी स्वाधीनताको इच्छा घटती नहीं, यलिक हमारे अपूर्व इतिहाससे हमें जो सहज उत्तेजन मिलता है वह बढता है और हमारे कानों में यह मात्राज गूजती हे-"लडते जागो और विजय प्राप्त करो, निकट भविष्य में हो तुम्हारा फट्टर शत्रु लडाई हो चुकने और विजय प्राप्त कर चुकनेके बाद तुम्हारा उतनादी कट्टर प्रशंसक बन जायगा।" (-५-) हमने अटल सिद्धान्त निश्चित कर लिये है। उपावहारिक परिस्थितिया :क्षणिक और, सदा बदलनेवाली होती हैं। यह यात निम्नलिखित अवैतरणने मली भाति वर्णन की गयी है- 1

स्वाधीनताके सिद्धान्त
--
।
य यह भी है कि वे जीवितावस्थामें मताधिकार प्राप्त करने
मरनेपर स्मारक बनानेकी इच्छा न रखकर देशका काम
के लिये पूरे तेगार रहने थे । अन्नमें जर जागृत जाति अपने
नज स्वमाय, संयम, देशभक्ति और उत्साहसे सेनामें परिणत
नायगो और स्वतत्रता प्राप्त करनेके लिये कूच करेगी तो वह
विजयके अवसरपर समझेगी कि यह सेना उनके द्वारा
यी बतायी गयी है जिन्होंने जातीय विवादके समय आशा-
ज्योति जगा रखी थी।
( २ ).
सीमाग्यसे जय हम सलारके सबसे बडे वक्ताके प्रोजस्वी
णको भोर दष्टि डालते हैं तो, उसके भाषणके उस अशको
कर जिसमें उसने उनका गुणानुवाद गाया है जिनका ससार
से ज्यादा- ऋणी है हमारा हृदय कृतज्ञतासे भर जाता है।
ने सर्वोत्तम भापणमें -यूनानके प्रसिद्ध वका डेमोस्थनीजने
क युग और जातिके उन वोगेका पक्ष प्रतिपादन किया है
व्यक्त आशाको पकडकर लडते रहते हैं । एसकाइनोज नामक
के एक विपक्षीने आक्षेप किया कि डमोस्थनीजने एथेन्सनि;
सयोंको ऐमी सम्मति दो कि उनकी हार हो गयी। इसका
र डेमोस्थनीज यों देता है- "यदि देश परिणामको, पहलेहीसे
ता तोभी वह अपना कार्यक्रम नहीं छोडता, यदि उसे अपनी
ति, प्राचीनता अथवा भविष्यका कुछ भी ख्याल होता। हा;
+

গরিম इस समय यह अपने परामममें असफल हो गया है। सफलता असफलता भगवानको इच्छापर निर्भर है। हेमोसनीज एथेन्स निवासियोंसे प्रश्न करता है कि "जिस पदार्थको प्राप्त करनेके रिये हमारे पूर्वजोंने सय सकटोंका सामना किया यदि हम गिना उसके लिये युन्द किये उसकी आशा दी छोड देते तो पमा हमपर सारा ससार नहीं एकता" या मागे कहता है कि उन परदेशियोंका विचार कीजिये जो तुम्हारे देशमें आते हैं, तुम्हारी इस गिरी हुई हालतको देखकर क्या कहते होंगे, "विशेषकर जय पे जानेंगे कि प्राचीन समयमें हमारे देशमें कीर्ति के लिये लदे हुए संग्रामके सामने लजाजाक जीवनरक्षाको कमी ऊना स्थान नहीं मिला है। और यह यहे गर्वके साथ इस उच्च विचारपर पहुचता है कि “कोई भी फिसी समय हमारे राष्ट्रको शक्तिशाली और अन्यायो राजाको सुरक्षित अधीनतामें नहीं रख सकता । हमारे राष्ट्रने सदा ही सम्मान और कीर्तिमें सयसे आगे थढने के लिये भयकर युद्ध में जानेका प्रयत्न किया है ।" डेमोस्थनीजने थेमिटोक्लीजकी स्मृतिकी दुहाई देते हुए अपने देशवासियोंमे कहा है कि उन्होंने ऐसे वीर पूर्व पुरषोंका सदा सम्मान किया है। पुराने पथसिनिवासियों ने ऐसे वका या सेनापतिको भग्ना पथदर्शक नहीं समझा जो उन्हें सुखप्रद 'पराधीनताकी और ले जाय। यदि जीवन स्वतत्रता नहीं यीत सका तोचे उसे तुच्छ समझते थे।" डेमोस्थनीज इस मापणमें अपने श्रोताओंकी प्रशंसा करते हुए करना है कि "मैं जिस यातकी घोषणा करना स्वाधीनता सिद्धान्त . रहस्य यह भी है कि वे जीवितावस्थामें मताधिकार प्राप्त करने और मरनेपर स्मारक बनानेकी इच्छा न रपकर देशका काम करनेके लिये पूरे तैयार रहते थे। अन्नमें जजागृत जाति अपने सहज स्वभाव, संयम, देशभक्ति और उत्साहंसे सेनामें परिणत हो जायगी और स्वतत्रता प्राप्त करने के लिये कूच करेगी तो वह पूर्ण विजयके अवसरपर समझेगी कि। यइ सेना उनके द्वारा विजयी बनायी गयी है जिन्होंने जातीय विपादके समय माशा- की ज्योति जमा रखी थी।" 7 AN सौभाग्यसे जब हम संसारके सबसे- बडे वक्ताफे भोजखी भाषणको -मोर दष्टि डालते हैं तो, उसके भाषणके उस अशको देखकर जिसमें उसने उनका गुणानुवाद गाया है जिनका संसार सबसे ज्यादा. ऋणी है हमारा हृदय कृतज्ञतासे भर जाता है। अपने सर्वोत्तम भापणमें यूनानके प्रसिद्ध वका डेमोस्थनीजने प्रत्येक युग और जातिके उन घोरोंका पक्ष प्रतिपादन किया है जो आशाको पकडकर लडते रहते हैं। एसकाइनोज नामक उसके एक विपक्षीने आक्षेप किया कि डमोस्थनीजने एथेन्सनि: वासियोंको ऐमी सम्मति दी कि.उनकी हार हो गयी। इसका उत्तर डेमोस्थनीज यो देता है-"यदि देश परिणामको पहलेहीसे जानता तोभी वह अपना कार्यक्रम नहीं छोडता, यदि उसे अपनी कीर्ति, प्राचीनता अथवा भविष्यका कुछ भी ख्याल होता। हा; - । ।

7
अन्तिम शब्द
ऊपर उठे। इस दृष्टिसे हम उस शिलालेखका अर्थ समझते है
जिसके विषय में रस्किनने फटा है कि यह ससारका अद्वितीय
शिलालेख है, जिसके विषयमें हिरोडोटसने कहा है कि यह
स्पार्टके उन वीरोंकी, कनपर खोदा गया है जो थर्मापीलीमें चीर
गतिको प्राप्त हुए और जिसे मीचलके जीवनी लेखकने मीच.
लकी जोवनीका बहुत उपयुक्त सक्षिप्त सारस्वरूप समझकर
उद्धृत किया है। वह शिलालेख यह है-" हे बटोही । तुम
लसीडिमोनियन रोगोंसे कहो कि उनकी आज्ञा शिरोधार्य
करके हम यहा पडे हुए है।" मीचलकी जीउनीके लेखकने बहुत
हो उचित कहा है कि इन वीरतापूर्ण पक्तियोंका भीतरी अर्थ जो
समझता है वह इनसे पराजयका नहीं किन्तु विजयका सदेशा
पाता है।
३
अपने आदर्शकप'इन महात्माओंका उचित गुणानुवाद कर.
ते हुए हमें यह भी उचित है कि हम अपनेको इस महान्
परम्पराक वारिस समझे । हमारे योग्य बात तो यह है कि जो
झडाहमारे हाथमें है हम उसकी शान ही लोगोंको न दिखा किन्तु
यह भी सिद्ध करें कि हम उसे फहराने के योग्य है, क्योंकि उसकी
विजय और उसका सम्मान इस यातपर निर्भर है कि हम उसकी
महत्ता कहातक समझते हैं, उसकी विजय इस विचारपर निर्भर
और सर्वत्र उसके लिए लड़ना चाहिये, उसकी
"
है कि हमें सदा
-

स्वाधीनताके सिद्धान्त । र वह यह है कि यह सिद्धान्त, आपके अपने है , मैं दिखाता, कि हमसे पहली पीदीमें राष्ट्रमें यही तेज विद्यमान था ।" एक एक बातपर उसका तेज अधिकाधिक, बढता जाता है और अन्तमें वह अपने ऊपर कटाक्ष करनेके , लिय एसकाइनीजको ललकारता है और जनतासे निवेदन करता है-"एथेन्सके निवा. सियो । राष्ट्रकी रक्षा और स्वतन्त्रताके रिये युद्ध करके तुमने कोई दोपका । काम नहीं किया है जिन तुम्हारे , पूर्वपुरुषोंने भरेथोनके सफ्टका मुकाबिला किया, जिन्होंने पलाटियामें शत्रुसे लोहा लिया, जिन्होंने सालमिसमें सामुद्रिक लडाई लडी, जिन्होंने आर्टीमिजियममें सर्वस्व होम दिया तथा जो वीर सार्व- जनिक स्मारकोंके भीतर सोये हुए हैं उनकी शपथ खाकर मैं तुम्हें यताता हूँ कि इन सबको देशने सम सम्मानके योग्य समझा। एसकाइनीज! हमारे पूर्वजोंने सफल और विजयी वीरोंका ही सम्मान नहीं किया ।" हमारे नेता प्रोनील, टोन, ओडोनेल और मीचलकी कीतिकी धाक जमाने के लिये इन ओजस्वी वाक्यों की आवश्यकता नहीं है, किन्तु इनके पढनेसे नयी स्फूर्ति आ जाती है और पून गरम हो जाता है। कैसे मर्मस्पर्शी वाक्य हैं। हम इनसे समझ जाते हैं कि,यदि हममें तेज बना रहा तो हमारी वास्तविक विजय होगी। इस सत्याग्रही सिद्धान्तकी हमने और हमारे पूर्वजोंने प्रशसा की है, यह यात मानवी हृदयका स्थायी सिद्धान्त है कि वह महान कार्यकी प्रशसा करें और शारीरिक पराजयसे. ८

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स्वाधीनताके सिद्धान्त
विजय इस ज्ञानपर भी निर्भर है कि न मालूम किस समय
उसे फेंक देनेके लिये ललकारे जाये, वह इस विश्वासपर
निर्भर है कि हम अपने व्यवहारसे उसकी कीर्ति और साख
सकते हैं अथवा उसे बदनामीकी मोर खींच ले जा सकते
मैं कहूंगा कि हमें यह बात भली भांति समझ रखनी चा
क्योंकि आजक र प्राचीन समयके पुरुषों की प्रशंसा कर
और उनकी स्वतन्त्रताके आदर्शको न मानना फेसन बन
जो
इस प्राचीन तेजसे हो जीवित हैं, जो इसका प्रा
करते हैं, इसके लिये लडते है और कहते हैं कि अन्तमें इस
पूर्ण विजय होगी, नवजवान, मूर्प और अव्यवहारी यताये
है। हम इसका क्या उत्तर देने है ? हमारा उत्तर हमारे ।
उसके इतिहास और उसके भविष्यके अनुकूल हैं जो हमारी
उडाते हैं या हमारे ऊरर तरस खाते हैं उन्हें देखना चा
कि हम उनके पक्ष को तुम समझते हैं और घृणाको दकि
देखते हैं। यदि हमारे चुनावसे उनमें कोई भ्रम न फैला हो
वे हमारे कामोंसे जान सकते हैं कि झझट न रहनेपर हम उम
उच्च पदोंके लिये योग्यताके साथ खड़े हो सकते हैं।
.
x
x
x
7
हमें अपने पक्षको उन्नति के साथ साथ महान् बनना
क्या हम नीचतासे क्षमा याचना करके इस झडेका आदर =
सकते हैं ? कदापि नहीं । जहा कहीं यह गिरा हुमा होगा हम
उठायगे, जहा कहीं इसे ललकारा जायगा हम इसे और जा

अनिमशन
फहरायगे, जहा कहीं यह गाडा हुआ होगा हम इसका अभिवादन
करेंगे, जहा कहीं यह विजयो होगा हम इसकी कीर्ति गायगे
और आनन्द मनायेंगे। हम सदेव इसके नामपर गर्व करेंगे,
उत्साह दिखलायेंगे, प्रयत्न करते रहेंगे, आनन्द मनायेंगे और
दूसरोंको आज्ञाका उल्ल घन करेंगे। हम इसके लिये सुप्त स्मृति.
योंको जागृत करेंगे, बुझती हुई भागमें फिर घी डालेंगे, जनताके
सत्य विचारोंको पुनर्जीवित करेंगे। इस प्रकार सबमें पुराना
तेज भर देंगे वह तेज भर देंगे जो कभी हार स्वीकार नहीं
करता, जिसको महिमाका बखान हजारों वोर कर चुके हैं, जिसे
आपरिश देशभक्त एमेटने एक पकिके भीतर अति सुन्दर रूपसे
व्यक्त किया है । वह लिखता है-"जय मेरा देश ससारके राष्ट्रोंमें
अपना उचित स्थान ग्रहण करे तत्र
मेरी फनपर कुछ
लिखा जाना चाहिये, अन्यथा नही। उसने 'यदि' नहीं कहा
किन्तु 'जय' कहा। इसका मतलय यह है कि यह यात
अनिश्वित नहीं किन्तु निश्चित है। प्रत्येक युगमें
ऐसे आदमी पैदा हुए हैं और आज भी वर्तमान हैं जिनकी
समझ मोटी और हृदय निष्ठुर होनेसे वे इस यातपर विश्वास
नहीं करते, किन्तु हम इसपर विश्वास करते हैं, हम इसके
सहारे जीवित है और इसे भलो भाति समझते हैं। हम इसे
ठोक एमेटको भाति समझते है और भविष्य हमारी यह बात
सिद्ध कर देगा। जय इतिहास लेखक कार्य सिद्ध हो चुकने-
पर इतिहास लिनेगा तो उसे हमारी सफलनापर आश्चर्य नहीं
.

स्वाधीमताके सिद्धान्त
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होगा । उसे तो इस बातपर आश्चर्यचकित होना पड़ेगा कि
हमारी आत्मा सदा दृढ यनो रही हमने निर्दोष यूनान
और रोम
समयके उत्तम गुणोंसे टक्कर ली, हम आपत्तियों, यत्रणाओं
और अत्याचारको सहकर भी डटे रहे, नीचभावपूर्ण समयमें
हम किसीके फुसलावेमें नहीं आये, यह सब झेलते हुए हम
अपना उद्देश्य साष्ट रूपसे देखते रहे । इतिहास लेखक यह सब
गातें लिखेगा और आश्चर्यमें पडकर गर्व और आनन्दके साथ
उस लक्ष्यको देखेगा जिसे अदम्य उत्साहने प्राप्त किया है। इस
लक्ष्यके विषय में वह लिखेगा
"स्वाधीनता अनिवार्य थी।"
इन दो शब्दों में उस जातिका सारा इतिहास आ जायगा जो
ससारके इतिहासमें अपना सानी नहीं रखती।
-
॥ इति ॥
1
-
म

असत्य, श्र १ मालव-मयूर । राजस्थान ( मध्यभारत और राजपूताना ) का सचिन मासिक पत्र, 'पाका बड़ा, पृष्ठ-पख्या ४०, मूत्य । वार्षिक । सम्पादक 4. 10 हरिभाऊ उपाध्याय, महात्मा गाधीके "हिन्दा नवजावन"के उपसम्पादक मयूरका जीवन काये और अन्याचारका निर्भयता, शान्ति और विनय-पूर्वक विरोध करना तथा राजस्थानकी आन्तरिक शक्तिको जागृत और विकसित करना। मयूरकी विशेषतायें सन्य, शाति और प्रेम इसके जावनका धर्म है। यह विश्व पधुन्धको प्रेमी, गष्ट्रीय धर्मका उपासक और भारतीयताक' अभिमानी है यह विवेक पूर्वक प्राचीनताका रक्षा करता है और ननिताका स्वागत । देशी-नाज्योंको यह ममत्वकी दृष्टिसे देखता है । विज्ञापनबाजाके अनथसे समाजको बचाने के लिये इसम विज्ञापन नही नये जाते । सिर्फ लोकोपयोगी विज्ञापन मुफ्त छाप दिये जाते हैं । ६ लालित कलानोंके नामपर विषय विलास-पाक सामगीका कानेकी प्रवृत्तिका यह विरोधी है। छपाइ, कागज तथा पोस्टेजके अलावा किसी किस्मका खना इसपर नहीं मंगाया जाता नोट-समता-साहित्य-मढलको उन्नति के सम्बन्ध तया कौन कौनमी पुस्तक की और मिल रही है मादि पर भातोंका उलस इस पत्रमें .. मत रहता है। २ ३ ४ ५ पूचार ७ ।

- । 1 - कुछ सम्मतियोंका सार पू० ५० महावीरप्रसादजी द्विवेदी मालव-मयूर बहुत अच्छा निकला । छपाई और कागज उत्तम है। भाषा और विषय-योजना भी ठीक है। सरदार माधवराव विनायक किरे-मेरा यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि पद्द एक उच्च कोटिका मासिक-पत्र है। सर्वन्ट आइडिया ने एक महत्वपूर्ण पत्रको वृद्धि की है। इस मासिक पत्रका मम्पादन वे विशेष योग्यता और पूरी जिम्मेवारीके साथ करते हैं, मओ कि हमें महात्मा गाधीकी प्रत्यक्ष देख-भालमें तालीम पाये मजनोंमें दिखाई देती है। प्रताव-"मालव-मयूर" में मौलिकता और माविकता है। अधिक विचार पौर विवेकके साथ चुनी हुई बहुतसी टिप्पणियां इसमें रहती हैं । हमें विश्वास है कि "मयूर" का मीठा और सात्विक ढग अपना रंग अवश्य लावेगा और उससे म० भा० और रा० पू० के लोगोंकी अत्यन्त निर्बल और निर्जीव यात्माको पल मिलेगा। मतवाला-सभी सख्यायें एकसे एक बदकर है। कवितायें और लेख बड़े ही सुन्दर, सरस और निर्दोष होते हैं । मपादकीय अश अत्यन्त प्रशसनीय होता, है। अधिक पृष्ठ-सख्या वाले पत्र मयूर' से शिक्षा ग्रहण करें। सयाजी प्रताप-लेख उच्च कोटिके हैं। उनपर दृष्टि रखते हुए अगला मवर पिछलेमे पढा चढा मालूम होता है। की टिप्पणियोंमें sense of pro. portion और sense of responsibility होती है, जिसकी इस समयके बहुतसे सपादकोंमें कमी नजर भ्राती है। फपिकीमुदो-इसके सम्पादक हिन्दीके अच्छे और विचारशील लेखकोंमें, हैं। सपादकीय नोटोंमें, उनको स्पष्ट-वादिता, निर्भीकता और उत्तम विचारशैली देखकर चित प्रसन्न होता है। पना-मालव-मयूर, अजमेर, (राजपूताना) - । ३ - लागत मूल्यपर हिन्दी पुस्तकें प्रकाशित करनेवाली एक मात्र सार्वजनिक मस्या सस्ता-साहित्य-प्रकाशक-मंडल, अजमेर उद्देश्य-हिदी साहित्यमें उन्च और शुद्ध साहित्य के प्रचारके उद्देश्य से इस मण्डल. का जन्म हुआ है। विविध विषयोपर सवसाधारण ोर शिक्षित समुदाय, त्री और बालक सपके लिए उपयोगी और सस्ती पुस्तके इससे प्रकाशित होगी। इस मण्डलके सदुद्दे, महत्व और भविष्यका अदाज पाठकोंको दोनेके लए हम सिर्फ उसके सस्थापकों के नाम दे देते हैं- मडलके सस्थापक-.) सेठ जमनालालजी बजाज वर्धा, (२) सेठ घनश्यामदासनी बिडला कलकत्ता (सभापति ) (३) स्वामी यानन्दजी (v) पावू महावीरप्रसादजी पोद्दार (५) डा. अम्बालालजी दाच (६)प. हरिभाऊ उपाध्याय (७) या जीतमल लूणिया अजमेर (मत्रो) पुस्तकोंका मूल्य-(१) प्रथम श्रेणीके स्थाइ ग्राहकोंके लिये लगभग जागत मात्र रहेगा अर्थात् उन्हें लगभग १६०० पृष्ठोकी पुरत ३) में मिलेगी। स तरह उन्हें १) में ५०० से १०० पृष्ठों तककी पुस्तकें मिलगी। अर्थात् पुस्तकपर छपे मूल्यसे पौनी कीमतसे भी कुछ कममें उन्हें मिलेंगी। (२) द्वतीय श्रेणीक स्थाइ ग्राहकोंसे पुस्तकपर छपे मूल्यपर ( सवसाधारणके लिये) तीन आना रुपिया कमीशन कम करके मूल्य लिया जायगा अथात् उन्हें १) में लगभग पाढे चारसो पृष्ठोकी पुस्तके मिलेंगी (३) सर्वसाधारणको १) में लगमग चारस्रो पृष्ठोको पुस्तकें मिलेंगी । सचित्र पुस्तकोंका कुछ मूल्य अधिक रहेगा। हमारे यहासे प्रकाशित होनेवाली दो मालाएँ हमारे यहांसे सस्ती साहित्य माला और सस्ती प्रकीएफ पुस्तक माला ये दो मालाए निकलती है। वर्ष भरमें प्रत्येक मालामें लगभग सात पाठ पुस्तकें कम या ज्यादा )निकलती और इन सय पुस्तकोकी पृष्ठ-सल्या मिलाकर लगभग १६०० पृष्ठोंकी होती है। प्रथम श्रेणीक स्थाई ग्राहक स्थाई ग्राहक होने के नियम नोट-मालासे निकली हुइ पूर्व प्रकाशित पुस्तकें चाहे थे लें या धागे पकाशित होनेवाली परतफोकी एक एक प्रति उन्हें अवश्य लेनी - -- १ - कुछ सम्मतियोंका सार पू. ५० महावीरप्रसादजी द्विवेदी- मालव-मयूर बहुत अच्छ निकला | छपाई और कागज उत्तम है । भाषा और विषय-योजना भी ठीक है। सरदार माधवराव विनायक किये-मेरा यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि पह एक उच्च कोटिका मासिक-पत्र है। सर्वन्ट आइडिया- ने एक महत्वपूर्ण परकी वृदि की है। मासिक पत्रिका मम्पादन वे विशेष योग्यता और पूरी जिम्मेवारीके साथ करते हैं जो कि हमें महारमा गाधीकी प्रत्यक्ष देख-भालमें तालीम पाये सजनोंमें दिसा: देती है। प्रताव-"मालव-मयूर" में मौलिकता और सात्विकता है। अधिक विचा पौर विवेकके साथ चुनी हुई बहुतसी टिप्पणियां इसमें रहती हैं । हमें विश्वास । कि "मयूर" का मीठा और सात्विक ढग अपना रग अवश्य लावेगा और उस म. मा० और रा० पु० के लोगोंकी अत्यन्त निर्बल और निर्जीव प्रात्माक पल मिलेगा। मतवाला--सभी सरूपायें एकसे एक बदकर है। कवितायें और लेख बने ही सुन्दर, सरस और निर्दोष होते हैं। मपादकीय अश अत्यन्त प्रशसनीय होर है। अधिक पृष्ठ-सस्या वाले पत्र 'मयूर' से शिक्षा ग्रहण करें। जयाजी प्रताप-लेख उच्च कोटिके हैं। उनपर दृष्टि रखते हुए अगल नबर पिछलेमे पढ़ा चढा मालूम होता है। की टिप्पणियोंमें sense of pro portion मोर sense of responsibility होती है, जिसकी इस समय बहुतमे सपादकोंमें कमी नजर आती है। कविकौमुदी-इसके सम्पादक हिन्दीके अच्छे और विचारशील लेखकाः हैं। सपादकाय नोटोंमें, उनकी स्पष्ट-वादिता, निर्भीकता और उचम विचारशैई देखकर चित्त प्रसन्न होता है। पता-मालव मयूर, अजमेर, (राजपूताना) .

लागत मूल्यपर हिन्दी पुस्तकें प्रकाशित करनेवाली
एक मात्र सार्वजानिक मस्या
सस्ता-साहित्य-प्रकाशक-मंडल, अजमेर
द्देश्य--हिंदी साहित्यमें उन्च और शुद्ध साहित्य के प्रचार के उद्देश्य से इस मगरल.
जन्म हुआ है। विविध विषयोंपर सर्वसाधारण और शिक्षित समुदाय, खी
र चालक सबके लिए उपयोगी और सस्ता पुस्तकें इससे प्रकाशित होगी।
इस मण्डलके सदुद्देन, महत्त्व और भविष्यका अदाज पाठकों को होने के
ए हम सिर्फ उसके सस्थापकों के नाम दे देते हैं-

Swadhinta Ke Shidhant

Author
Makswini,teransh
Title
Swadhinta Ke Shidhant
File name
Swadhinta Ke Shidhant
Text
OCR done
Citation
1926
Published
2011/01
Publisher
Sasta Sahitya Prakashak Ajmer
Language
Sanskrit
Pages
191
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546657
Barcode
4990010025110.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
7VxAf1p4Tkv
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