Natya Sodh Sansthan, Kolkata

Natakdharmaprakash

Lal, Chandan · 2005/01/12

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॥ श्रीः॥
नाटकधर्मप्रकाश
अर्थात्
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
चंदनलालकृत।
8.B.A.
&vs. N. १८९२
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उसीको
kri N.TO/-
Don. by
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास
इनके " लक्ष्मीवेंकटेश्वर " छापेखानेमें
रामचन्द्र राघो इन्होंने मालिक के लिये
छापकर प्रसिद्ध किया.
शके १८३६, संवत् १९७१.
कल्याण-मुंबई.
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भूमिका. मैं उस ईश्वर परमात्माको धन्यवाद देता हूं कि जिसने मुझसे मतिमंदको एक उत्तम अग्रवालवंशमें जन्म दिया और अनुग्रह करके लाला जमैयतरायजी स्वर्गवासी. रोहतकनिवासीके गृहमें उत्पन्न किया कि जो श्रीगोस्वामीतुलसीदासजीकी रामायणके अत्यन्त प्रेमी थे, जिनकी उत्तम शिक्षासे मुझसे शठकोमी रामचरणमें प्रीति हुई. मैं देश और जातिकी उन्नतिके विषयमें ड्रामा लिखा करता था, परंतु मेरे ज्येष्ठ भ्राता लाला उमरावसिंहजी व लालाकुन्दनलालजीने मुझको यह उपदेश किया कि इस वाणीरूपी भवरीको रामचरित्ररूपी मकरन्दसे पोषण करना योग्य है और लालाकिशनलालजी, लाला प्यारेलालजी, लाला मुन्शीलालजी, पं. जैरामदासजीने जो अति- सजन पुरुष हैं और अपने वैष्णवधर्मपर सावधान है. तन मन धनसे उद्योग करके धर्मके प्रचारके निमित्त एक कम्पनी बना दी जिसका नाम रामलीला थिएट्रिकल कम्पनी रखकर इस दासको इसका मॅनेजर बना दिया. प्रिय सजनी ! इसी कारण यह श्रीराम जानकीजीका चरित्र रचा गया है, आशा है कि जो कुछ भूल चूक हो गई हो उसको बुधजन सुधार लेंगे. और इस दासको अपना पुत्र लखकर कृतार्थ करेंगे, सज्जनोंकी सेवामें यहभी निवेदन है कि विवाह आदिक उत्सवपर जिस किसी भक्तजनको रामचरित्र श्रवण करनेकी अभिलाषा हो वो यह कम्पनी उसके ग्राममें आके श्रीरघु- नाथजी महाराजके गुणानुवाद वर्णन कर सकती है. सज्जनोंका सेवक- चन्दनलाल मॅनेजर. रामलीला थिएट्रिकल कम्पनी पुत्र डाला जमैयत रायजी शरिस्तेदार स्वर्गवासी. रोहतक मोहल्ला-बाबरा.

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जिन पुरुषोंका वर्णन इस नाटकमें लिखा है उनके नाम. १ श्रीमान् राजा दशरथजी अयोध्यापुरीके नृपति और श्रीरामचंद्रजीके पिता. राजा दशरथजीके गुरु. एक ऋपिका नाम. २ वशिष्ठजी ३ शृंगिऋषि ४ विश्वामित्रजी ५ मारीच एक राक्षसका नाम. . ६ मुवाहु ७रावण ८जनक ९ परशुरामजी १० शतानन्दजी ११ श्रीरामचन्द्रजी लंकाका नृपति. मिथिलापुरीकं नृपनि और जान- कीजीके पिता. एक ऋषिका नाम. राजा जनकके पुरोहित. राजा दशरथजीके पुत्र और अयोध्याके नृपति. राजा दशरथजीके पुत्र. १२ भरतजी १३ लक्ष्मणजी १४ शत्रुघ्नजी १५ नारदजी १६ जैकंवार १७ सुमंत १८ निषाद १९ रणधीर २० बलवीर २१ सुरणधीर देवर्षि. प्रजाजन. राजा दशरथके सचिव. एक भील. निषादका सेनापति.

२ रावणका भाई. २२ खर २३ दूषण २४ जटायू राजा दशरथजीका मित्र. किष्किन्धापुरीका नृपति. २५ सुग्रीव २६ वालि " २७ हनुमान सुग्रीवका मंत्री. वालिका पुत्र. सुग्रीवका सेनापति. " •" २८ अंगद २९ नल ३० नील ३१ मयंद ३२ संपाती ३३ जांववंत ३४ विभीषण ३० टिबियां ३६ महोदर ३७ अनी ३८ अकंपन ३९ अक्षयकुमार ४० मेघनाद जटायूका भाई. सुग्रीवका सेनापति. रावणका भाई. एक मसखरा. रावणका सेनापति. रावणका पुत्र. रावणका दूत. ४१ शुक ४२ सारण ४३ सुषेण ४४ कुम्भकर्ण ४५ कुमुख वैद्य. रावणका भाई. रावणका सेनापति. एक राक्षस. एक ऋषि. ४६ कालनेमि ४७ वाल्मीकिजी जिन स्त्रियोंका वर्णन इस नाटकमें लिखा है उनके नाम. १ कौसल्या राजा दशरथकी भार्या और रामचन्द्रजीकी माता. २ कैकेयीजी राजा दशरथकी भार्या और भरतजीकी माता. ३ सुमित्राजी राजा दशरथकी भार्या और लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नकी माता. ४ जानकीजी गजा जनककी पुत्री और राम- चन्द्रजीकी भार्या. ५ शिरोमणि जानकीजीकी सहेली. ६ उर्मिला ७ मांडवी ८ अहल्या गौतमऋषिकी भार्या. ९. ताडका १० देवांगना एक अप्मग. ११ सरस्वती रानी कैकयीकी दासी. १३ शूर्पणखा १४ तारा वालिकी मार्या. १५ बामा पातर. १६ देवांगना देवकन्या. १७ मन्दोदरी रावणकी भार्या. १८ त्रिजटा १९ लंकिनी एक राक्षसी. एक देवी. १२ मंथरा रावणकी बहन. एक राक्षसी.

पातर.
२० कामकन्दला
२१ श्यामप्यारी
२२ सुलोचना
२३ योगिनी
२४ वनचरी
मेघनादकी भार्या.
एक राक्षसी.
२५ शरमा
विभीषणकी भार्या.
CHAR
पुस्तक मिलनका ठिकाना-
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
लक्ष्मीवेंकटेश्वर " छापाखाना,
कल्याण ग-मुंबई.

नाटकधर्मप्रकाश मर्थात् श्रीरामजानकीजीचरित्र। काण्ड प्रथम भाग। अॅक्ट नं. १. सीन नं. १. (सम्पूर्ण देवतागणका रावणके भयसे दुःखित होकर श्रीसच्चि- दानन्द विष्णुभगवान्की प्रार्थना करना.) (तर्ज-भये प्रकट कृपाला, दीनदयाला, कोशल्याहितकारी.) देवतागण- जय जय प्रभु स्वामी, अंतर्यामी, प्रणतपाल सरारी। खलदुष्टनिकंदन, सुरगणरंजन, गोद्विजके रखवारी ॥ प्रभु दीनदयाला, नाथ कपाला, जड चेतन हितकारी। अब करहु सहाई, विपता भाई, मेटोचिंता हमारी ॥ तेरा नामन रूपा, अजरअनूपा, निर्गुण तो निर्विकारी। प्रभु भवभयभञ्जन, जनमनचंदन, दुष्टदलन असुरारी। (सुरसमूहका नैन मूंदकर ईश्वरका ध्यान करना.) (आकाशवाणी) प्रिय देवतागण धैर्य धरो, मेरी वाणीको श्रवण करो, मैं तुम्हारे हितकारण नरदेह धारण करूंगा, तुम्हारे सम्पूर्ण केश or श्रीरामजानकीजीचरित्र। हरगा, देखो मैं अयोध्यापुरीके नृपति दशरथका पुत्र बनूंगा, अपनीशक्तिसहित अववरूंगा, नरलीला करूंगा,तुम सब वानर भालूकी रेह बनाओ, किष्किंधापुरीके पर्वतोंकी कन्दरामें जामो, मैं शीघहीमाकर मिलूंगा और तुपसे सहायता लूंगा. सीन नं. २. (श्रीमान् राजा दशरथजीका राजमंदिरमें उदास पेठना.) गजल धुन जिला, ताल कवाली। (तर्ज-मवें तानी है, खबर हायमें है, तन बैठे हो.) राजा दशरय- यह प्रभुता द्रव्य धन माया मेरे क्या काम भावेगी। चलूंगा जबके दुनियासे नहीं यह साथ जायेगी। अयोध्याकी यह रजधानी श्रीसरयू बहे जिसमें । मेरे पीछे नहीं मालूम यह किसकी कहावेगी। हुआ है चौथापन मेरा बुढापा छागया तनमें । धरूं कैसे मैं अब धीन कर्मगति क्या दिखावेगी। (वसिष्ठजीका गिऋषिसहित आना, राजाका दण्डवत् करना.) वसिष्ठजी-राजन् ! संदेह त्यागो, परमात्माकी प्रभुताईको देखो, अभी पुत्रयज्ञ करता हूं, आपका सदेह मिटाता हूं, धैर्य धरो, आपके चार पुत्र उत्पन्न होंगे, जो आपको अनेक प्रका- रसे सुख देंगे. (शृंगिऋषिका पुत्रयज्ञ करना, अग्निका प्रगट होकर एक हषिका पात्र देना.)

मंक १ ला.
३
पन्ही भूपति दान में, हर्ष न हरय समाय॥
सहित प्रिया चरणन गहो, बहुविधि विनय बखान ।
तुम्हरे घर कह टहलवी, कन्या दीन्ही दान ॥
में सेवक तुम्हरा पक्ष, सहि सब राजसमाज ।
तुम भूपति रघुकुल कम , सबविध मम सिरताज ॥
(श्रीरामचंद्रजी और श्रीजानकीजीका बहावरी देना देवताओंका
आनंद होकर पुष्प बरसाना.)
ठुमरी धुन खनाच ताल पंजाबी ठा।
(तजाम विना आराम नहीं.)
सहेली-
गरी मनोहर विधना बनाई रामसरिस बर दुलहन सीता।
याम गौर सुंदर छवि सेवा सुभग अंग शुचि परम पुनीता ॥
शरथ प्रभुता बर्ण सके को कर जोर सुरदिसिप विनीता ।
ग जुन जीवें बर दुलहन यह गावें चंदन मंगल गीवा ।
ड्रापसीनका आहिस्ते आहिस्ते गिराया जाना ।
प्रथम भाग समाप्त।

नाटकधर्मप्रकाश
मर्थात्
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
अयोध्याकाण्ड द्वितीय भाग ।
अॅक्ट नं. २.
श्रीरामवनगमनलीला.
सीन नं. १.
( श्रीमान् महाराजा दशरथका राजभवन में विराजमान होन
देवांगनाओंका नृत्य गायन• करना.)
देवांगना दोहरा।
कर जोरे विनती करे, चरण निवावे माथ।
चन्दन तब अधीन है, रघुकुलपति महाराज ।
ठुमरी।
(तर्ज-आज तो आनन्द मोरे शामजीका आवना.)
राजा तोरे अंगमें फूलोंकी बहार है।
मोतिया गुलाब गैंदा जुही केतकी अनुप ।
प्यारी चम्पा चमेलीका विराजे हार है।
धन्य धन्य भाग तव भूप मन जमतपती ।
रामचन्द्र पुत्र जाके कीर्ती अपार है।

मंक १ला.
शृंगिऋषि-राजन् ! जो कुछ बसिष्ठजी महाराजने
विचारा था सो सिद्ध हुआ, यह हषि ले जाओ, रानियोंको
भोजन कराओ. ईश्वरकी पासे चार पुत्र होने जो संसारको
भानन्द मे.
(रानाका हविका दोना लेकर रानियोंको भोजन कराना.)
सीन नं.३.
(विधामित्रऋषिका वनमें तपस्या करना और ईश्वरके गुणानुवाद गाना.)
गजल धुन बिहाग, ताल पवांली।
(तर्ज-गमसे जिगर है जलाता ननोंसो नौर जारी।)
विश्वामित्रजी-प्रभू दीनबन्धु स्वामी, संकट मिटानेहारे।
दंडवत् तुमको मेरी, मृष्टी रचानेहारे ॥
रवि वोर तमको नाश, शशि रैनको प्रकाश
ईश्वर है धन्य तोको, सब कुछ बनानेहारे ।
मुनि संत और उदासी, नृप रंक बनके वासी।
पाया न भेद तेरा, करने करानेहारे ।
भब तो शरीर धारो, भूमीका भार तारो।
सृष्टीमें भर रहत, मुनिजन सतानेहारे ।
( मारीच और सुबाहुका आकर मुनिकी तपस्या वाधा करना.)
गजल धुन देसकार, ताल चाचर।
(तर्ज-अव समर्गका गम है जिदा वशरको।)
विश्वामित्रजी-अरे दुष्टो वृथा न मोको सतायो।
तपस्पामें हूं ध्यान क्यों तुम डिगावो ।

४
।
न
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
किसीको सताना न अच्छा है पापी ।
न छेडो मुझे तुम चले भाई जायो।
मैं बैठा हुवा याद ईश्वर करूं हूं।
क्या कहता हूं मैं तुमको यह तो बतायो ।
अंग्रेजी वजन धुन सुन्दरा ताल कहरवा ।
तर्ज-दर दर ओ मगरूर. )
मारीच-बातें बहुत बनाता, हमको हैं अब रिझाता ।
न उठ यहांसे जाता, खोवेगा अपनी जान ।
सुबाहु-मुझको नहीं पहचाना, बलको न मेरे जाना।
दे छोड यहां आना, बस कहना मेरा मान ।
सीन नं. ४.
श्रीरामजन्मउत्सव ।
( श्रीमान् राजा दशरथजीका वसिष्ठजीमहित राजभवन में
विराजमान होना.)
राजा-महाराज ! आपकी रुपासे आज मनवांछित फल
मिल गया है, हृदयरूपी कमल खिल गया है, अब इनके नामभी
घर दीजिये, मुझको कृतार्थ कीजिये.
वसिष्टजी-राजन् ! आपके ज्येष्ठ पुत्र जो श्रीमती
कौशल्यादेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए हैं; यह संम्पूर्ण सृष्टिके
नायक हैं, मुनिजनके सुखदायक हैं, यह दुष्टोंका संहार करेंगे,
सजनोंका उद्धार करेंगे, इनका नाम राम है, जो सर्व सिद्धिका
,
धाम है.

अंक १ला.
.
राजा-अच्छा महाराज!
वसिष्ठजी-दूसरे कुमार जो श्रीमती कैकयीके उदरसे
प्रकट हुए हैं यह सम्पूर्ण संसारका पालन करेंगे, विश्वको भरेंगे,
उनका नाम भरत है.
राजा-महाराज!
वसिष्ठजी-जो दो पुत्र श्रीमती सुमित्रासे हुए हैं उनमें
जो बडा कुमार है वह आपके ज्येष्ठ पुत्रका बडा हितकारी
है, सब लक्षणों से सम्पन्न है, इसी कारण इसका नाम लक्ष्मण
है, दूसरे कुँवर जिनके स्मरण करनेसे शत्रुका नाश होता है,
बल तेज अत्यंत बढता है, जो उसका ध्यान करेगा
उसको धन्य है, उसका नाम शत्रुघ्न है. (राजाका दण्डवत् करना.)
सीन नं.५.
( विश्वामित्रजीका वनमें ईश्वरका भजन करना.)
अंग्रेजी वजन, धुन सिन्धग, ताल कवाली.
(तर्ज-जैसी करनी वैसी भरनी. )
विश्वामित्र-मोको पापी दुष्ट सतायें, सुध लीजे मेरी महाराज ।
यन्त्र नहीं होने दी पूरी, कष्ट दिया है भारी भाज ।
हे जगदीश दयानिधि स्वामी, राखो तुम अब मेरी लाज।
टेर सुनो भव प्रभुजी मेरी, बेग संवारो मेरा काज ॥
दे दीनबंधु राम, मोको नहीं माराम ।
बलता हूं भाठों याम, कैसे लूं तेरा नाम ।

श्रीरामजानकोजीचरित्र ।
भकोंके हो आधार, आवो भनी खरार।
तुमसे मेरी पुकार, अब राखो जनकी लाज ॥
(नेत्र मूंदकर ईश्वरका ध्वान करना.)
विश्वामित्रजी-मैं इसी समय जाता . और राजासे
दोनों कुमार मांगकर लाता हूं.
सीन नं. ६.
(श्रीरानादशरथका चारों पुत्रोंसहित राजभवन में विराजना
विश्वामित्रका आना.)
राजा-(दण्डवत् करके) महाराज ! बड़ी रुपा कारणे
दर्शन दिया, दासको कतार्थ किया, सिंहासनपर विराज जामो,
जो चरणसेवा हो सुनाओ, अपना मुझको दास जानो, इन
चारों पुत्रोंसहित चरणसेवक मानो.
मुनि-महाराज!आपकी पशुताई दूनी बढे,ईश्वर मनकामना
पूरी करे, मैं वनमें यज्ञ करता हूं, परंतु निशिदिन उरता हूं,
क्योंकि मारीच और सुबाहु दो दुष्ट मुझको सताते हैं, मेरी
यज्ञकोविध्वंस बनाते हैं और नाना प्रकारके उपद्रव करके माम
जाते हैं,आज मैंने ईश्वरका ध्यान किया तो मालूम हुमा कि
उनका नाश आपके पुत्रोंके हाथसे हो जायेगा, फिर मुझे कोई
न सतावेगा। इस कारण राजन् ! तुम्हारे पास आया हूं, यह
फरियाद लाया हूं, सो आप मेरा उद्धार कीजिये, थोडे
दिनोंके वास्ते श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीसहित दे दीजिये

मंक १ला. ठुमरी। (तर्ज-चले सिया राम लान वनको.) मुनीश्वर कीजे जरा विचार, नहीं मुझको है कुछ इन्कार । वह निश्वर अतिघोर हैं, युद्ध करनेसे काम ॥ पुत्र मेरे यह लाडले, क्या जाने संग्राम । ममी भोले भाले सुकुमार, किया नहीं मृगकामीहै शिकार । जान माल ले लीजिये, जो कुछ हो दरकार । चौथेपनमें पाये हैं, नाथ यह सुत मैं चार ॥ यही मेरे प्राणाधार, मुनीश्वर कीजे जरा विचार । वसिष्ठी-राजन् ! क्या संदेह करते हो ? क्यों मोहमें फंसते हो ? आपके नजदीक कुंवर अभी नादान है, परन्तु एनके सितारे बडे बलवान हैं, इनकी जन्मकुंडली बता रही R, साफ दिखा रही है कि, यह दुष्टोंका संहार करेंगे, सज्ज- लोका उद्धार करेंगे, निःसंदेह दोनों कुमार मुनिको दे दीजिये, कुछ वहम न कीजिये, यह दोनों भाई उनको संग्रामशय्यापर मुलावेंगे, मुनीश्वरका कष्ट मिटावेंगे. राजा-(विश्वामित्रसे) अच्छा महाराज ! आपको अख- त्यार है, पासको क्या इनकार है, मगर इनपर अपनी कपा रखना, जल्दीही लौट भाना, ये दोनों मुझको प्राणोंसेभी प्यारे हैं, मेरी भांखोंके तारे हैं..

८ श्रीरामजानकीजीचरित्र। विश्वामित्रजी-राजन् ! मैं शीघही आऊंगा. आपके पुत्रों- को कुशलपूर्वक लाऊंगा. राजा-(श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजीसे ) मेरे पाण- पियारे नैनोंके उजयारे । धनुष बाण उठाओ, मुनीश्वरके संग जाओ, इनका कष्ट मिटाओ, जल्दी आकर अपना चन्द्रवदन दिखाओ. (श्रीरामचन्द्रजीका लक्ष्मणजीसहित सबको दण्डवत् करके विश्वामित्रके संग चलना.) सीन. नं. ७. ( श्रीरामचन्द्रजीका लक्ष्मणजीसहित विश्वामित्रजीके सग वनमें विचरना, मार्गमें ताडकाका मिलना, महाराजका एकहीं बाणसे उसके प्राणं हर लेना, विश्वामित्रजीका अपने आश्रमपर आकर यज्ञ करना, महाराजका धनुषबाण धारण करके बंधुसहित यज्ञकी रक्षा करना.) ठूमरी। (तर्ज-रामको अधार बन्दे रामको आधार रे.) विश्वामित्रजी-हरिनाम ना विसार बंदे जन्म ले सुधार तू। छोड द्रोह मोह कोह, बासना जहानकी। लोग मोह, फांसी जीव, गल न अपने डार तू ॥ जीव ाश, वास नाश, ईसी मद भारि मान । भोग रोग, सोग छोड, आत्मा संवार तू । (मारीच और सुबाहुका राक्षसीसेना लेकर आना, श्रीरामचन्द्र- जीका मारीचको बाण मारकर शत योजन समुद्रके तीर गिरा देना, लक्ष्मणजीका सुबाहुको अग्निवाणसे भस्म करके सम्पूर्ण राक्षसीसे- नाका नाश कर देना, विश्वामित्रजीका भानन्द होना.)

अंक १ ला.
ठुमरी धुन जिला, ताल पंजाबी ठेका ।
( तर्ज-एक चतुर नार कर कर सिंगार.) .
विश्वामित्रजी-
तेरी माया न ईश्वर जान परे, एक पलमें रंकसे राव करे।
सबका आधार करे बेडा पार, अवगुण न काहू के चितमें धरें ।
तरी अमबथान, सके कौन जान, भरतेको रोता रीतेको भरे।
लीला अपार ऐसा दातार, तेरे दरसे न कोई निरास फिरे ।
हीनोंके नाथ, तोहे नाऊं माथ, जनके केशको तूही हरे ॥
विश्वामित्रजी-हे रघुराज ! मापने मेरे सम्पूर्ण केश
मिटा दिये हैं. मेरे शत्रु रणभूमीमें सुला दिये हैं, इस वनके
मुनि अभय बना दिये हैं.
रामचन्द्रजी-महाराज ! हम क्षत्रियोंका तो यह परम
धर्म है, कि मुनीश्वरोंकी सेवा करें, उनके संकट हरें.
(मुनिका कंद मूल फूल लाकर देना. महाराजका भोजन करना.)
विश्वामित्रजी-हे रघुराज ! भाजकल तो मिथिलापु-
में बडी तयारी हो रही है. जनकदुलारी स्वयंवर रच रही है.
चलो हमभी देखें स्वयंवरको भव ।
जमा हो रहे नामपर वहां सब ॥
रामचंद्रजी-हमें हुकम मंजूर है आपका ।
भताअत करें भापको सिर झुका ।
(विश्वामित्रजीका श्रीरामचंद्रनी और लक्ष्मणनीसहित चलना, पनमें
एक पत्थरकी शिला पटरी हुई दृष्ट आना.)

१० श्रीरामजानकीजीचारित्र। रामचंद्रबी-यह क्या मामला है महाराजगी। यह पत्थ- रका शिला क्यों यहां है पडी ? कोई भादमी नजर भाता नहीं, परिंदानी उडतान फिरता कहीं। विश्वामित्र-हुए हैं मुनि एक गौतमजी नाम। उन्हीको है यह श्री सुनिये राम । हुई शापसे यह शिला संगकी । करो दूर दुख इसका रघुबर अभी॥ (महाराबके चरण लगनेसे उस पत्थरकी शिलाका फट जाना और एक सुंदररूपवती स्त्री अर्थात् अहल्याका उसमें से प्रगट होकर महा. राजके चरण पकडना.) ठुमरी रखता। (तर्ज-बुरा में क्या किया तेरा त् दुशमन बन पः मेरा. अहल्या- प्रभु तुम जगतहितकारी, दयालू नाथ असुरारी। तुम्हीने हिरनाकुश मारा, भक्त प्रहलाद निस्तारा । चीर खम्ब दुष्ट संहारा, तुर्त नरसिंह देह धारी। पकड गज माह जब लीन्हा, तो गजने ध्यान तब कीन्हा। बचाया पलमें आकरके, सुनी तुम टेर खरारी॥ (अहल्याका आकाशमार्गको उड जाना, महाराजका आगे चलना.) सीन.नं.८. (विश्वामित्रजीका श्रीरामचंद्रजी व लक्ष्मणनीसहित जनकपुरीकी फुलवारीमें बैठकर ईश्वरके गुणानुवाद गाना.)

अंक १ला.
११
पद धुन पर्ज ताल पंजाबी ठेका ।
(तर्ज-देखो ऐसी चतुर नार डिगमिग परत जात.)
चामित्रजी-
देखा झूठा व्यवहार, तेरा सब असंसार ।
मोह बोह फैल रहा धन्य है तोको करवार ।
सांचा तू है सरजनहार, बेडा सबका करता पार।
दुष्ट मारे जन उबारे, नेक न लगावे बार ॥
(राजा जनकका आना.)
राजा-महाराज ! आपको दण्डवत् करता हूं, चरणोंमें
र धरता हूं.
मुनि-राजन् ! चिरंजीव रहो, मनकामना पूरी हो.
राजा-महाराज ! आज तो मेरा जन्म सफल हो मया
है, जो मापने चरणकमल फेरकर मेरे ग्रामको पवित्र किया
अब कपा करके यह और पता दीजिये. मेरा संदेह मिय
बीजिये कि यह दोनों कुंवर जिनकी सुंदरताईके आमे पूर्ण
अंदमानी लजाता है, मेरा मन जिनके स्वरूपको देखकर
हित हुआ जाता है, किस प्रतापीके प्राणपियारे हैं. उसको
न्य है, जिसकी आंखोंके यह वारे हैं.
मुनि-राजन् ! इनका रामचन्द्र और लक्ष्मण नाम है,
नयोध्यापुरी इनका धाम है, श्रीमान् राजा दशरथके दुलारे
1, मेरे संग आकर मारीच और सुबाहु रणमें संहारे हैं, अब
सयंवरसमाके कारण आपकी पुरीमें पग धारे हैं.

१२
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
राजा-महाराज ! बडी रूपा की. जो चरण फेरकर स्वयं
वरको शोमा दी, अब दासकी यह प्रार्थना कबूल कीजिये
मेरे स्थानकोभी पवित्र कर दीजिये, कुछ दिन सेवकके पास
बास कीजिये.
मुनि-अच्छा राजन् ! चलिये, कोई स्थान बता दीजिये
( राजाका महाराजसहित चलना और एक सुंदर स्थानमें बास देना
सीन. नं.९.
(श्रीरामचन्द्रजीका प्रियवन्धुसहित राजा जनकके बागमें पृजन
कारण पुष्प लेने जाना.)
ठुमरी धुन जिला ताल पंजाबी ठेका।
(तर्ज-एक चतुर नार करके सिंगार.)
केसरकी क्यार, नरगिसकतार, देखो बहार, ,
झिंगार । गुलका अजीब सुंदर सिंमार ॥ केसरकी *
कोकलका शोर, है चारों ओर, कूकें हैं मोर, कीजे तो गौर
करते किलोल फिर डारडार ॥ केसरकी क्यार । सुंदर तडाम
रचा मध्य बाग, निर्मल है नीर, देखो तो वीर । मंदिर भनूए
मिरिजाका मार ॥ केसरकी क्यार ।
(श्रीजनकनन्दिनीका सखियोसहित पार्वतीजीका पूजन कर
आना, उर्मिलाका फुलवारीमें टलहना और दूसरे रामचन्द्रजीके दर्श
करके हर्षित होकर जानकीजीके समीप आना.)
चौबोला धुन किदारा ताल पंजाबी ठेका ।
(तर्ज-सुन रे काले देव रे.)
शिरोमाणि-का तोको आली मिला, जो हर्ष न हृदय समाय
बेन पियारी ऐ सखी, कारण हमें सुनाव

मंक १ ला.
१३
अमला-कौशलपति दशरथसुवन, वय किशोर सकुमार।
सुंदर श्यामल गौर तन, सुखमा अंग अपार ॥
पुष्प तोडने कारने, फिरत है केशरक्यार ।
मोहनी मूर्त माधुरी, दिखलाई कर्तार ।
मांडवी-सुन सीता प्यारी मेरी, मैंभी सुनी यह बात ।
मुनिकौशिकके संगमें, आये हैं दो भात ॥
जिन स्वरूपकी मोहनी, डार स्ववश किये लोग।
अवश देखिये हे प्रिये, वह तो देखन योग ।
( श्रीजानकीजीको लताओंकी भोटसे महाराजके दर्शन करके
चकित हो जाना.)
रामचन्द्रजी-(लक्ष्णजीसे ) भाई लक्ष्मण ! देखो यह
नही विदेहकुमारी जनकदुलारी है, कि जिसके कारण स्वयं-
और रचा गया है, सम्पूर्ण बह्मांडके राजाओंको जमा किया
अया है, अब यह सखियोंसहित पार्वतीजीका पूजन करने
भाई है, विधाताने कैसी मोहनी मूर्ति बनाई है, रतिसेमी
अधिक छबि पाई है, मुहकी कांति पूर्णचन्द्रमाको शरमाती
है, मतवाली चाल मस्त हाथीको लज्जित बनाती है, दांतोंकी
बतीसी मोतियोंकी लडीको खाकमें मिलाती है. मृगके नैनझी
उसके कटाक्षनेत्रके आगे सकुचाते हैं, कैसी अलौकिक शोभा
है, कि जिसको देख मेरा मनमी मोहित होता है, भाई ! मेरा
मग अंगभी फडकता है देखो विधाता क्या करता है.

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
लावनी धुन विहाग ताल कवाली।
(तर्ज-मुख चंदाकासा कालनेन रतनारे.)
सखी-( जानकीजीसे-)
हुई आलि हमको देर महल पलो प्यारी।
कल भावें फिर इस जमह जायें बलिहारी।
यह लीजे चम्बेलीका हार मूंद लाया माली।
पूजनका बीते समय पियारी भाली।
अब तोडो प्यारी पुष्प झुकायो डाली।
प्रिय चलो गवरजापूजन कर लो थाली ।
प्यारी तकती होगी माता गह हमारी।
कल आओं फिर इस जगह जावें बलिहारी ।
(श्रीजानकीजीका पार्वतीके मंदिरमें भाकर पूजन करना.)
अंग्रेजी वजन.
(तज-तोरे छलबल है न्यारी ती कलबल है न्यारी.)
श्रीजानकीजी-
मजाननमहतारी, शिवशंकरकी पारी।
मय्या लीला तुम्हारी, है अपरम्पार ॥
हम है चेरी तुम्हारी, कीजे रक्षा हमारी ।
भवसागरसे हमको उतारो पार।
नावे नावें माथ हम, जो हाथ हम ।
करो माना हमारामी भव निस्तार ।

अंक १ला.
१५
प्यारी जननी गनेश, काटो जनके क्लेश ।
शिव शंकर महेश।
पिय जै जै जै जै जै जै जै ।
(श्रीजानकोजीका पूजन करके चला जाना.)
॥
सीन नं. १०.
( विश्वामित्रनीका ईश्वरके गुणानुवाद गाना.)
लावनी धुन जिला ताल कवाली ।
(तर्ग-चमनमें फसले बहारी है.)
विश्वामित्रजी-
यह माया तेरी न्यारी है। कोई हर्षित काहूके नीर
जारी है। मृगीको कैसे दिये सुंदर नैन नवीन । उज्वल
परम सुहावने पर युगलेको दीन ॥ करी कोयल क्यों
कारी है। यह लीला तेरी न्यारी है ॥ सुंदर जल नदि-
यन भरा, उज्वल परमसुहात । पान किये तिर्षा मिरे,
मजनतें श्रम जात ॥ किया सागर क्यों खारी है,
यह लीला तेरी न्यारी है ॥ ऊनड खेडे थे जहां, बैठे
गीदड नाग । मनुष्य कोई भावे नहीं, निरि दिन
उडते काग ॥ वहां फूली फुलवारी है। यह माया तेरी
म्यारी है।
(रामचन्द्रजीका लक्ष्मणजीसहित आकर चरणों में सिर निवाना,
विश्वामित्रनाका पुष्प लेकर पूजन करना.)

१६
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
गजल धुन उन्द.
(तर्ज-परसे वरण कर प्रेम पूर्ण प्रणतपाल खारके.
विश्वामित्रजी-
प्रभु दीनबंधु दयालु नाथ कपाल जगत माघार है।
गो विज मुनि जन संतका तूही हरि रसवार है ।
धरनी मगन जल थल बसे सबमेंही तेरा रूप है।
चेतन चराचर जीव जड मृष्टीका पालनहार है।
जब जब विपत संतन परी तब तब सहाय तुम करी।
तेरे नाम अमणित हैं हरि निर्गुण नही निर्षिकार है।
सीन नं. ११.
( श्रीजानकीजीका महलमें उदास बैठना.)
गजल धुन जिला विहाग ताल कबाली ।
(तर्ज-एक तीर फेंकता जा बांकी कमानवाले.)
जानकीजी-शिवका धनुष कठिन है रावण सरीखे हरे।
तोडेंगे कैसे इसको, सुकुमार प्यारे बारे ॥
कैसा कठोर यह पन, प्यारे पिता किया है।
समझाया काहूमी ना, मतिमंद हुये सारे ॥
शंकरधनुष न टूटे, दुनिया पिता हंसेगी ।
सब हैं तमाशा देखू, कहलावें जो हमारे ॥
गजल धुन विहाग।
(तज-चेकली है आज दिल किनके लिये.)
शिरोमणि-त्यागो संशय सुन्दरी मानो कहा।
तोडेगा शिवका धनुष वह सांवरा ।

अंक १ला.
जिसने मारे शत्रु विश्वामित्रके।
क्यों न भजे वह धनुप सोचो जरा।
याद कीजे देवऋषि बानी पिये।
काहेको संदेह यह भाली करा ।
-
सीन नं. १२.
(विश्वामित्रजीका ईश्वरके गुणानुवाद गाना.)
मजन।
(तर्ज-यह जग हे गोरखधन्धा.)
पामित्रजी-
नर रामनाम गुन गाले, परलोककी राह बनाले ।
यह दुनिया रैन बसेरा, यहां कौन मूर्ख है तेरा ॥
क्यों फंसा मोहके फंदे, हरिनामसे चित्त लगाले।
पप समय कुंचका आवे, सब छोड अकेला जावे।
सब झूठा जगका नाता, कोई संग न तेरे चाले ॥
रामचन्द्रजी-देखो लक्ष्मण । सूर्यनारायण उदय हो गये
अपनी लाल किरणोंसे जगतको प्रकाशित कर रहे हैं,
कमा चकपीके शोकको हर रहे हैं.
लक्ष्मणजी-महाराज ! सूर्य भगवान्के उदय होनेसे
पण मलीन हो गये है, इसी प्रकार मापके मानेसे सम्पूर्ण
बहीन हो गये हैं, वे चापसपी अंधकारको नहीं
सकते हैं, शिवधनुषको नहीं उठा सकते हैं.
.

१८
श्रीरामजानकीजीपरित्र ।
(शतानन्दजीका आना.)
शतानन्दजी-महाराज! स्वयंवरका समय आ गया।
इस कारण महाराज विरेहने मुझको पठाया है, आप
दोनों कुमारोंसहित बुलाया है
विश्वामित्रजी-(महागजमे ) उठो रघुराज ! जनक
नन्दिनी के स्वयंवरमें चलें, राजाओंका पराक्रम देखें, को
शिवधनुष उठाता है, विदेहकुमारी पाता है.
टक्ष्मणजी-महाराज! जिसपर आप रुपा करोमे, व
शिवधनुष उठायेमा, स्वयंवरमें बडाई पावगा.
मीन. नं.:३.
(सब राजोंका सभामें विराजमान होना. विश्वामित्रजीका श्रीर
चन्द्र लक्ष्मणजीसहित आना. राजा जनकका दण्डवत् करके एक ऊं
सिंहासनपर महाराज को विराजमान करना. श्रीजानकीजीका सनि
बाँसहित जयमाला लेकर आना.
ठुमरी धुन पर्न ताल पंजाबी ठेका ।
(तर्ज-जागो जागो ए दिलप्यारी सखियां तुमें जमाक्त है.)
सदेली जानकीजी-
देखो देखो कमां यह शिवकी, जो कोई इसे उठाया।
अपनी ताकत बाजूसे फिरतोह पीप पिरावेना।
यह सुकुमारी जनकदुलारी राजकुमारी सीया प्यारी।
बान उजागर सबननामर भाज समा पारेवा।
(सम्पूर्ण राजोंका उठउठकर शिवधनुषपर बल करना, परन्त ध
पका न उठना, राजाभोंका लज्जित होकर बैठ जाना..

अंक १ ला. १९ गजल सोहनी। (सर्ग-परहवाऐ आशिक सादिक हमारे.) पिाजनक- तोडा न काहू शिव धनुष, अंधेर यह कैसा हुआ। सोचूं मैं क्या जाऊं कहां, होय वाम विध कीन्हा कहा । भाये स्वयंवर सुनके सब, कहलावे थे जो सूर्मा । रहा तोडना तो अतिकाठन, तिलभर न कोई उठा सका। भब जावो सब निज निन भवन, पुत्री कुमारी रह गई । निश्चय मोहे अब हो गया, योधा नहीं कोई रहा। इटको न अपनी त्यागई, विपता पडे सो सब सहूं। पल पेठ पुत्री भवन अब, पति वेरे कर्ममें ना लिखा । लक्ष्मणजी-( रामचन्द्रसे ) महाराज ! राजा जनकको है मुनिजन विद्वान् पताते हैं, यह तो विदेह कहलाते हैं, बाल कैसे अनुचित वचन सुनाते हैं, सबको कायर ठहराते पृथ्वीको योधाभोंसे हीन बताते हैं, यद्यपि जानते हैं कि व स्वयंवरमें रघुकुल के तिलक श्रीरामचन्द्रजी महाराज राजमान हो रहे हैं, दुष्टोंको संहार रहे हैं, पृथ्वीका भार मार रहे हैं, जो आपका आता पाऊं तो भनी ब्रह्मांडको पचार उठाकं, काचे घटके समान फोडकर शत खडबवाऊं, वंची कुलकी प्रभुताई प्रगट करके दिखाऊं. रामचन्द्रजी-माई ! तुम जो कुछ कहते हो सोई कर

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
२०
दिखाओगे, देर न लगाओगे, जरा बैठ जाओ, को कर
स्वयंवरका उत्सव देखो, राजाभोंके बलको परेखो.
( लक्ष्मणनीका दण्डवत् करके बैठनाना, किसी राजाका धनुषः
करने न उठना, श्रीजनकनन्दिनीका अति कष्टको प्राप्त होना.)
विश्वामित्रजी-हे रघुराज ! अब विलम्ब न करो, चं
कनन्निनीका कष्ट हरो, शीघही शिवधनुष के दो खंड पनाम
विदेहका संकट मिटाभो.
(श्रीरामचन्द्रजी महाराजका शिवधनुषकं दो खण्ड करके पृष्ठ
गिरा देना, श्रीजानकीजीका आनन्द होकर महाराजको जयम
पहिराना.)
ठुमरी ( तर्ज-होवे जयजयकार.)
सहेली जानकीनी-
जय हो सीताराम, जय हो सीताराम, जय हो
सीताराम, जोडी गौरश्याम । गवरजामाई, कीन्ह
सहाई, भावो माली भव मंगल गावो । हमें ईश्वरने
यह दिन दिखाया, पूर्ण हुये सारे काम हांहा पूर्ण हुए
सारे काम॥
(परशुरामनीका भाना, सबका दण्डात् करना.)
परशुरामजी-यह देशान्तरके राजा किस का
आये हैं ? किसने बुलाये हैं?
राजा जनक-मराराज ! आपकी दासी जानकीने त
वर रचा था इसी कारण सम्पूर्ण रामाभोंको जमा किया

अंक १ ली. २१ रामजी यह शिवका धनुष तोड किसने दिया। यह नपराध ऐसा है किसने किया। ऐ राजा तू क्या सोचता है खडा सुना जल्द मनको है गुस्सा बडा॥ याद रख जो देर लगावेगा। तो अपनी सम्पूर्ण रजधानीका नाश करावेगा। रामचंद्र- दोहा। खोजत हो महाराज तुम, धनुष तोडनेहार । सोमी तो एक है प्रभु, सेवक चरण तुम्हार ॥ । परशुरामजी-सेवकका काम है, कि सिवकाई करे, न रमाव करके लाई करे. सुनो मैं पुकारकर कहता हूं, विको हुनाता हूं. दोहा। जाने यह शंकरधनुष, दिया सभामें तोर । सोई सहस्रबाहुसप, अब शत्रु है मोर ॥ उसको उचित है कि पंगतीसे उठ जावे, अपने साथ को न भरवावे, जल्दी मेरे सामने आये, इस वक्त मुझको गगुस्सा छा रहा है, क्रोधरूपी भमिसे हृदय जला पा रहा है. लक्ष्मणजी-महाराज ! मैंने लड़कपनमें अनेक धनुष तोड हैं, एक एकके सौ सौ टुकडे कर दिये हैं, अपने कुछमी हनहीं दया, कभी ऐसा कोष नहीं किया.

२२
.
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
इस धनुषपर ममता है किस कारने।
जिसके बदले अब लगे हो मारने ॥
परशुरामजी-राजकुमार मुह सँभालकर नहीं बोलना
मालूम होता है कि तेरे दिमागमें चक्क पा गया है, क
सिरपर मंडला गया है, क्या उनको इस धनुषके सम
मानता है ? मूर्ख ! यह शिवजीका धनुष है, जिसको सम्पू
ब्रह्मांड जानता है.
लक्ष्मणजी-(हँसकर ) महाराज | आप तो ठीक बद
हैं, मगर हमको तो सब एकही नजर आते हैं, यह पुरा
धनुष छूतेही टूट गया है, इसमें रघुनाथजीका अपराध
क्या है ? महाराजने तो इसको नवीन जानकर हाथ लगा
था, अपने बलकी परीक्षा करना चाहा था, वृथा कोष
करो, थक गये होगे, बैठ जाओ.
परशुरामजी-क्या तू मेरे पराकमको नहीं जानता
जो ऐसा निडर होकर बातें करता है, मैंने इन भुजामें
बलसे भनेक बार पृथ्वीको राजाओंसे छीन लिया है, बा
पोंको दान देदिया है, इस कुठारसे क्षत्रियोंका नाश
दिया है.
लक्ष्मणजी-महाराज ! आप तो बग घमंड दिखाते
पहाडको फूंकसे उठाना चाहते हो, भापके गलेमें यज्ञोप
नजर आ रहा है, जो आपको विषवंशसे बता रहा है,
.

अंक १ला. २३ रव आपकी कठोर पानी सहता हूं, वजके समान दुर्व- नसुनता हूं. पाशुरामजी-चुप हो नादान. कैसी चिड चिड बातें वा है, बहादुरीमें पैर धरता है, मुझको ब्राह्मणही मानता यह नहीं जानता है, कि मैंने इस कुठारसे अनेक राजा- का सिर उड़ा दिया है, शूरमाओंको रणभूमि सुला दिया सात्रियोंकी प्रभुनाईको खाम मिला दिया है, दृझोभी थोडीही देर में मजा चखाऊंगा. इस कुठारसे तेरा सिर अगा. लक्ष्मणजी-महाराज ! आपने तो घरमेंही कुठार चलाया संग्राममें किसी शूरमासे हाथ नहीं मिलाया है. शुरामजी-जरा होशसे बोल अबे शहूर । कर दूं अभी तेरा सिर तनसे दूर। (परशुरामजीका कुठार उठाना.) मचन्द्रबी-यह बच्चा भजी नाथ अनजान है। अभी कम समझ है यह नादान है। क्षमा इसका अपराध कर दीजिये। कृपादृष्टि इसपर प्रभु कीजिये। रामजी-यह भाई तेरा कैसा शैतान है। भनीतकमी हँसता यह नादान है । मेरे सामनेसे हटा दो इसे । भेराजोर बाजू सुनायो इसे ॥

२४
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
लक्ष्मणजी-जरा आंख अपनाही बंद भबकरो।
न आवे नजर कुछभी फिर भापको।
परशुरामजी-( रामचन्द्रजीसे ) धनुषको ऐ मूर्स
तूने तोर, आर अब छलसे विनती करे हाथ जोड. बस
संत्रामके लिये तैयार होजा, रणमामिमें पराकम दिखा.
दोनोंका इस कुठारसे सिर उठाऊमा, तब चैन पाऊंना.
रामचन्द्रजी-महाराज ! कोप त्याग दो, अपराध
करो, हमें आपसे लडाई शोभा नहीं देती है, इसमें हमारे हे
कीति घटती है, क्योंकि आप भृगुकल के कैवल हो,
कपा करो, जो और कोई होता तो हमारे हाथमेंमी
बाण था शीघही युद्धको तैयार हो जाते, संग्राममें पी
दिखाते, चाहे रणमें प्राणही वाते, सूर्यवंशियोंने आ
कुलको कलंक नहीं लगाया है, कोई संग्रामसे भामक
भाया है,
परशुरामजी-जरा इस धनुषको चढा दीजिये।
शुषा मेरे जीका मिटा दीजिये।
(श्रीरामचन्द्रजीका धनषका चढा देना, परशुरामनीका
विस्मित होकर चरणों में गिर पहना.)
मजन धुन जिला गौरी ताल पंजापी ठेका ।
(सर्ज-दाता कर त् स्याका फेरा.)
परशरामली-प्रभजी मैं नहीं बने mmm

अंक १ला.
२५
तुमस्वामी महाराज प्रभु हो तीर लोकके सांई।
भार उतारन भसुरसंहारन प्रमट हुये भगवाना ॥
माया अपरम्पार तुम्हारी मोहित सब संसारा।
क्षत्रीकुलका भूप कोई हरि मैंने तुमको जाना।
बोट कर जोर्स चरण गहत हूं दीनबंधु रघुराई ।
क्षमा करो अपराध हरि सब चूक हुई अनजाना ॥
(परशुरामजीका दंडवत् करके चला जाना.)
सीन नं० १४.
(रानी कौशल्याजीका भवनमें उदास बैठना.)
गजल धुन जिला बिहाग तालकव्वाली।
(तर्ज-गमसे निगर है जलता नैनोंसे नीर जारी.)
रानी-
मेशिकमुनीम आये लेकर प्राण प्यारे ।
किस बनमें फिर रहे हैं भांखोंके मेरे वारे ॥
बबसे मुनी गये हैं कुछमी न सुध मिली है।
पर रहें कुशलसे मेरे लाडले दुलारे ॥
देतो सखी पियारी यह सोच मोको भारी।
कवेलने रनमें सुकुमार प्यारे बारे ॥
(श्रीमान राजा दशरथजीका माना.)
राचा-प्रियकौशल्या! आज उदास क्यों हो रही हो?
सकारण भांसुओंसे मुह धो रही हो ?
रानी-महाराज ! मेरे प्राणप्यारे नैवोके उजियारे बबसे

२६
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
मुनिके संग सिधारे तबसे उनकी कुशलकी कोई सुध
मिली है, इसी कारण देह व्याकुल हो रही है
राजा-पाणप्यारी ! अब तो विधाताने पूर्ण की है मः
मना तुम्हारी, देखो यह मिथिलापुरीसे पत्रिका भाई।
राजा विदेहने पठाई है, लिखा है कि जल्दी बरात सज
आओ, मेरी पुत्री जानकीको श्रीरामचंद्रनीकी टहलवी बन
सो प्यारी! हर्ष मनाभो, मंगल गाओ, सहेलियोंको बुल
भाषण सजाओ, मैं तो अब जाता हूं, बरातकास
बनाता हूं.
( महाराजका चला जाना, रनवासक कौशल्याके पास भान
ठुमरी धुन पर्ज ताल पंजाबी ठेका ।
(सर्ज-जागो जागो ऐशहजादा फल बहार दिखावत है)
कोशल्या-देखो देखो राम व्याहकी लपपत्रिका भाई
मिथिलापुरके राजा जनकने दूतके हाप पठाई
आली आवो मंगल गावो विधना बात बनाई।
जनकदुलारी सीया प्यारी भाज वधू मैं पाई
सीन नं. १५.
(श्रीमान राना दशरथजीका बरातिय सहित जनकपुरीम ।
मान होना.)
गजल.
(तर्ज-वाह किस हुसनसं दूल्हाने बंधाया सेहरा.)
पातर-गलमें फूलोंका वेरे हार मुबारिक होवे ।

मंक ? ला. रांचा अब दिलका खुला फसले बहार आई। शादीका यह जशन शहर यार मुबारिक होवे ॥ अरशसे फर्शतलक धम मची शादीकी। हमको महाराजाका दीदार मुबारिक होवे ॥ विश्वामित्रजीका श्रीरामचंद्रजी और लक्ष्मणजीको लेकर आना. राजा दशरथजीका विश्वामित्रजीके चरणों में सिर निवाना.) राजा-महाराज! आज मेरा जन्म सफल हो गया,आपकी मासे मुद्यको जीनेका फल मिल गया है. (क्विामित्रजीका राजाको उठाना, श्रीरामचंद्रजीका और लक्ष्म- का पिताको दंडवत् करना, राजाका दोनों पुत्रोंको हृदयसे लगाना.) बसिष्ठजी-राजन् ! अब विलम्ब न करो, राजाके मह- में चलो, देखो लमका समय आ गया है, सायंकाल हो है. ना दशरथका सम्पूर्ण वरातसहित राजा जनकके महलों में चलना.) सीन नं. १६. श्रीमान राजा दशरथजीका चारों पुत्रों और प्रजाजनोसहित पर विराजमान होना, सखियोंका श्रीजानकीनीको लेकर माना.) ठुमरी। (तर्ज-स्ठा जगव्योहार प्यारे.) की-राम मिले भार सीता। सुंदर शामल गात मनोहर, मुखमा अंग अपार । सीता राम मिले भरि २८ श्रीरामजानकीजीचरित्र । दशरथ जावे सजन हमारे, गली करी कार । सीता राम मिले भार॥ संकटहर्ता आनन्द करता, मुनिजनके रसवार । सीता राम मिले भर्तार ॥ दुष्ट संहारन देव उबारन, सकल जगत हितकार । सीता राम मिले भार ॥ (श्रीजानकीजीका मंडपमें विराजमान होना.) वसिष्ठ- शाखोच्चारण. श्रीशारद मणपति सुमिरि, गुरुका धर उर ध्यान रामचंइके विवाहकी, शाखा करूं बखान ॥ रघुकुलतिलक दशरथनृपति, सकल गुणनकर धा चार पुत्र ताके भये, कहूं तास कर नाम ॥ भरत शत्रुहन भात दो, और लपन श्रीराम । अतिसुंदर सुकुमार सब, देखत लाजत काम ॥ एक समय कौशिकमुनी, माम लपन श्रीराम । निश्चरवधके कारणे, ले आने निज धाम। खल मारीच सुबाहु दो, परम सुभट रणधीर । करें जो मख विश्वंस मुनि, सब मारे रघुवीर । सहित मुनी माये बहर, जनक भूपके ग्राम । सब राजन देखें खडे, धनुष तोड दियो राम । धनुा भङ्ग कर शब सुन, परशुरामवहां भाये।

अंक १ का.
२९
सब राजन बलहीन हो, गवने निज निज मेह ।
पक्याला मल मानके, डारी सुता विदेह ॥
लमही लम कर पत्रिका, लिखी जनक हर्षाय ।
व बुलाकर दीन्ह तब, और कहो समझाय ॥
कहो श्रीदशरथ भूपसन, बहुविध सीस निवाय ।
परम सुमट रणधीर हैं, राम लपन दो भाय ॥
मोर लाज राखी जगत, मेटा कष्ट अपार ।
सब राजनकर मान मथ, भज्यो धनु त्रिपुरार ॥
बांच पत्रिका भूप मुनि, सकल समाज बनाय ।
बाहरीतिक कारणे, आवहु मुनि हर्षाय ॥
चले दूत हर्षात मन, माये अवधपतिधाम ।
नृपदसरथसे जायकर, कीन्ही दंड प्रणाम ।
पांच पत्रिका भूप मुनि, गुरुहिं सुनाई जाय ।
जनकनगर कह पुन चले, रथ गज लेन बनाय ।
भगवानी कीन्ही जनक, मिले हृदय अतिप्रीत ।
'परमानन्द और चावसू, करी व्याहकी रीत ।
गन्दजी-
कन्यापन
शुभ मुहूत शुभ दिन, शुभ लग्न है आज ।
जो अब भूपति गहमें, घरे चरण रघुराज ॥
एक समय भानन्दयुत, सिया व्याहके काल ।
सब भूपन कहि पत्रिका, लिखी हर्ष निमिराज ।
रको स्वयंवर भूप मुनी, नृप माये हाय ।

३०
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
जनकनृपति सबसन कहो, याविध वचन सुनाय ।
सुनो भूप परवीन सब, जो धनु मै आज ।
सीता पुत्री कुँवार मम, सोइ व्याहे सिरताज ।
सुन प्रण अभिलाषे सकल, लागे धनुष उठान ।
भूमि तजत नहिं शिवधनुष, बैठे तन अभिमान ॥
रावन भादिक अपाट, गवने निज निज गेह ।
देख दशा अस नृपनकी, भयो संदेह विदेह ॥
का उपाय अब मैं करूं, कीन्हो हृदय विचार ।
कोउ जगमें प्रगटै नहीं, धनुष अंजनेहार ॥
रही कुमारी कुँवारि मम, भयो दुख हृदय अपार ।
चलत विचार न अब कछु, काह कीन्ह कर्तार ।
जो बिन भंजे धनुष अब, कवरी करूं विवाह ।
पुण्य तेज बल सुयश तो, सकल नाश हो जाय ।
ताहि समय रघुराज नृप, तासु लारे भान ।
सब राजनके मध्यमें, धनुष तोड दियो तान ।
सुमन वृष्टि नमते भई, बाजें गगन निशान ।
मायें किन्नर अप्सरा, नाचे चढ़े विमान ॥
जनकनंदिनी इर्ष सन, जयमाला दीगर ।
मिथिलापुर आनंद भयो, जयजयकार पुकार ।
हर्ष आनंद मन चावयुत, तब आये रघुराज ।
भुप जनक चरणन महो, हर्षसमेत समाज।
कपिला धौरी घूमरी, और सुरखेनुमाय ।

मंक २रा. १३ पुणगुणनिधान जमकसली जानकी । अपराशि नागरी लक्ष्मी अवतार है । महाराजाका मुकुरमें मुखारविंद विलोकना और श्रवणोंके समीप खित केश निहारके किसी चिन्तामें मग्न हो जाना.) सुमन्त-महाराज | क्या ध्यान आया है, क्या किसी के राजाको दंड देनेका खयाल समाया है. राजा-प्रिय सुमन्त । देखो मेरे कानोंके समीप सित केश भावे. जो यह बताते हैं कि जबानी व्यतीत हो गई वृद्धावस्था आ गई है, देखो स्याहीमें सफेदी छा गई है, यह उपदेश करती है कि अब राजकाजसे हाथ उठा, सरयूके तोर बैठकर ईश्वरके गुणानुवाद गा, इस कारण "चत है कि रामचन्द्रको युवराज बनाऊ और मैं परमा- से ध्यान लगाऊं जो तुमको मेरी सम्मति भाती हो तो मैं चीके चरणों में शीस निवाऊं और आज्ञा लाऊं. सुमन्त-हा महाराज ! श्रीरामचन्द्रजी अब राजपद के गा. क्योंकि उनसे आनन्द सम्पूर्ण प्रजावासी लोग हैं. कपालु दयाके निधान हैं. शूरवीरताईमें निपुण स- की सान हैं, श्रीजनकनन्दिनकि स्वयंवरमें सम्पूर्ण ब्रह्मां- राजाओंको नीचा दिखाया है. सबके दिलोंपर अपनी ताईका सिक्का जमाया है. मारीच और सुबाहु जैसे दुष्टोंको भूमिमें मुलाया है. मेरी तो यह सम्मति है कि विलम्बन जि. भीरामचन्द्रजीको युवराजपदवी दे दीजिये. ३

श्रीरामजानकीजीचरित्र।
राजा-अच्छा तो तुम गुरुजीके स्थानपर
भानमन जतावो.
सीन नं. २.
( श्रीसरस्वतीजीका क्षीरसागर के तीर विराजमान हो
देवगणका आकर पुकार करना.)
देवतागण-हाय माता । मर गये, दुष्ट रावा
सम्पूर्ण अंग भंग कर दिये. माताजी रक्षा करो, हमारे
ठुमरी।
(तर्ज-पति मगरेसमें कटरे..)
सरस्वती-
सीतापति रघुनाथ मियावर मुखसे प्यारे उच्चार
दुष्टदलन अरिमरीन रघुवर प्रिय नाम यह आप
शिरीराम रघुराज हमारे संकट विपत मिटावंग
घरा है नरतन काज हमारे निर्भय हमें पनावेंगे
रावण भादिक पापीको रणमागरमध्य खपावेंगे
मुनिजन सज्जन ध्यान धरेंगे ब्रह्मादिक गुण गावें
प्रिय अमर त्यागहु सब चिंता धीरज मनमें अर
सीतापति रघुनाथ सियावर मुखसे प्यारे उच्चार
देवता-हे माताजी ! जो श्रीरामचन्दनीअयोध्य
काजमें लग जावेंगे तो फिर हमारे क्लेश किस प्रकार
इस कारण आप अयोध्या में जाओ, कोई ऐसा उपाय

अंक २ रा.
दोहा।
श्रीरामचन्द्रजी राजपदवी न पावे और जनकनन्दिनी-
त बन जावें.
सरस्वती-अच्छा मैं अयोध्या जाती हूं और पुरस्वा-
काज किसी निर्दोषके कलंक लगाती हूं. देखो रातही
क्यासे क्या कर दिखाती हूं. प्रभात होतेही रामचन्द्र
जानकीसहित वनमें पठाती हूं, धीरज धरो, मैं तुम्हारी
। मिटाती हूं.
(सरस्वतीका चला जाना.)
सीन नं. ३.
दशरथजी महाराजका सुमन्तसहित वसिष्ठजीको दंडवत् करना.)
एजी-
चिरंजीव राजन रहो, पूरण हो मन काज ।
कारण निज आगमनकर, कहो प्रिय रघुराज ॥
-नाथ कपा मनकामना, पूरी सब जगदीश ।
एक अभिलाषा हृदय अति, कहूं नाय पद शीश ॥
केश भये सित देखिये, वृद्ध भयो महाराज।
मापस दो तो राम कहि, देहुँ अवधकर राज ॥
-धन्य धन्य दशरथ तोहे, रघुकुलके सिरताज ।
भल कारज यह भूप मन, देहो रामकहँ राज ॥
राजा-पिय सुमन्त । तुम नगरमें जावो, प्रजावासियोंको
पुना कि कल रामचंदजी अयोध्याके नृपति बनेंगे,
पी मनकामना पूरी करेंगे.
(सुमन्तका दंडवत् करके चलना.)

श्रीरामनानकीजीचरित्र
सीन नं.४.
(मंथराका भयोध्यानीमें विचरना और पुरीकी शोमा देखदे
चकित होना.)
गजल धुन जिला ताल कवाली.
(तर्ज-भवें तानी है खंजर हायमें है तकते बैठे हो."
मंथरा-क्या कारण है विधाता आजक्यों पुरको सजाते है
पुरुष वनिता युवा आनन्दमन बाजे बजाते हैं।
बसन भूषण सजे तनमें फिरें आनन्द गलियनमें।
प्रजावासी ममन हर्षित नहीं फूले समाते हैं।
अमित शोभा है नृपमंदिर बनी वीथी परम सुंदर ।
मची है कीच केसरकी सुगंधित पुर बनाते
रुचिरताके करे वर्णन सभीके अंगमें चन्दन
है
विधाता आज कहीं कारण सियावर जय मा
जैकवार-मंथरा ! तू क्या करती है ? कहां पर
पचाप
मंथरा-महाराज! मैं पुरीकी शोभाको देख रही
दिन हो रही हूं, समझ नहीं आता है,आज
नानाया जाता है. जो पूछती हूं तो कोईली कुलकर
पतावा है, इसके निकल जाता है.
जेकवार-ठीक तो है जो हँसके पछिा नहीं छुड़ावे वो क्या
त तो जानबूझकर मचलाती है, लोगोंके कान तो है

अंक २रा.
३७
*
अपर-महाराज! मैं कान खाती हूंजानके मचलाती हूं?
अकवार-और नहीं भी क्या तू नहीं जानती है कि
मचंद्रजी कल युवराज बनेंगे. प्रजाको आनंद देंगे.
मंथरा-सस्य कहते हो या हसी करते हो ?
जैकवार-वाह इसी कैसी अभी वो मुनादी हुई थी क्या
नहीं सुनी है ?
मंथरा-महाराज ! मैं सौगंध खाती हूं, चरणोंमें, सिर
जकाती हूं जो मैं जानती हूं तो परमात्मा मुझे उठा ले. मेरी
आप दुनिया से मिटा
जेकवार-मोमंच क्यों खाती है नाइक कोहराम मचावी
न्याको बही खबर होगी अब वो जान गई.
यसनांतो रामचंद्र राजपदवी पावेगा. अयोध्यानाथ
वार-भरी तु कैसी बातें करती है क्या नशेमें
बामा को महाराज ! मैं नशेमें बुडबुडाती हूं, को
तती है?
कि जो मैं तो जाती हूं.
(मंथराका चला जाना.)
सीन नं.५.
रानी कैकेयी के भवन में विराजमान होना, मंथराका मलीनमन माना.)
की सीमों वेरे मुँइपर है प्यारी बता मैनों से

श्रीरामजानकीजीचरित्र । क्यों है नीर जारी, तेरे रोनेसे मेरा जी दहलता, कहो आनन्द- सूत है राम सीता? मंपरा-सिवा ये रामके पूछेगी किसको, मिलेगा क्योंकि अब तो राज उसको. वह होगा राजा हम उसकी हैं परजा, किया जो कुछ के है ईश्वरने अच्छा. ठुमरी धुन खम्माच ताल पंजाबी ठेका. (तजाम बिना आराम नहीं.) रानी- पन धन हैं आली आज भाग प्रिय सुंदर बात सुनाई है। है राम पियारे मेरे दुलारे तू क्यों मन घबराई है। ले मांग पियारी रुची जो तुम्हारी बात तेरी मन भाई है ३१ अनुवा बहावे जियरा जलावे काहे उदासी छाई है। मनपत पूजू देव मनाऊं विधना बात बनाई है। हे और कुछ तो बोल, चांडाली जिह्वा खाल, चुपचाप api , या तुझपर बिजली गिर पड़ी है. सच कहा है जिन मनुष्योंके खोर होती है उनको आनन्दकी बात नहीं माती है, बस जो कुछ कहना है तो कह सुना, नहीं तो मेरे भागेसे चली जा. बांदी-नहीं रालीजी! मुझको क्या कहना है क्या आपको पोष दिलाना है, अच्छा उल्टा जमाना है. हितकारी मोही कहलाते हैं. शत्रु मित्र बन जाते हैं, मैं यूंही रंज उठाती है, मैं

अंक २ रा.
१९
इकी साती हूं, कहने योग्य तो वह होती हैं जो बराबरकी
हाती हैं, मैं तो एक नीच खिदमतगार हूं, क्या कहूं स्वभावसे
चार हूं, यह नहीं हो सकता, कि मालिककी बुराई देखें
र खामोश रहूं.
रानी-पंथरा। मेरी समझमें नहीं भाती है कि तू कैसी
तें बनाती
बांदी-माजी । कल जब रामचंद्र राजा हो जावेगा तो
कुछ सभा जावेगा, जो इस वक्त कुछ कहूंगी तो
दृष्ट भाभी, मेरे भोरसे कोई राजा हो, मेरे क्या हाथ
बंगा मैं तो बांदीही रहूंगी, कोई रानी थोडाही बनावेगा ?
या कहूं भापका अन्न खाती हूं आनन्द मनाती हूं इस
कारण दुःख हुआ था, बस माताजी क्षमा करो, मैंने कुछ
नहीं कहा था. " होवे सोइ जो राम रच राखा.
(मंथराका रोना.)
रानी-प्यारी मंथरा। मैं नहीं हूं खफा में भरतकी सौगंध
सावी हूं, मुझको तुझपर बडा भरोसा है परन्तु नहीं समझी
कि तेरा मतलब क्या है जल्द सुना प्यारी देर न लगा.
बांदी-रानीजी। सत्य तो यह है कि आप भोलीनाली हैं,
इनियासे निराली हैं, शत्रुओंको हितकारी मानती हो,
यह नहीं पावती हो कि स्वार्थके कारण सब प्रीति करते हैं,
मित्रता और परते हैं, परन्तु जब मतलब निकल जाता है
तो फिर को सभी नहीं आता है.

श्रीरामजानकोजीचरित्र। रानी-हवं हो ठीक है, मैं दुनियाकी मक्कारी नहीं जानती हो टोली उच्च जानती हूं, मी सोचती हूं कि अवश्य मुझपर कोई विपता आवेगी, नहीं मालम कर्मगति क्या दिखावेगी क्योंकि मेरे दहने अंग फरकते हैं, रात्रीको खोटे स्वाभाते हैं। बांदी-रानीजी ! में चुप तो नहीं रहूंगी, इतना जरूर कहूंगी कि कौशल्याने खूब फंदा लगाया है आप जैसी मोलीनालीको धोखेके जालमें फंसाया है इस करण मुझको कलहारी जानती हो. कौशीलयाको हितकारी मानती हो. रानी-नहीं प्यारी ! मुझको तो भाती हैं बातें तुम्हारी, था मेरे ममीप बैठ जा सम्पूर्ण भेद बता. गादी-तो रानीजी! गौर करो, ध्यान धरो. जब रामचंद्र राजा बन जावेगा, तो तुमको अनेक प्रकारसे सतावेमा, पर- को जलवा बनावेगा, नीच काम करवावेगा, उस समय कारालल्यांगा हाथ पैर संभालेगी, जी लोलके दिलके म मानिका लेगी, कारण यह कि महाराज आपसे पीविं सके वह दिलही दिलमें रहती है, चिन्नामें रहती है, परंतु साकरे उसकी पार नहीं पाती है। इस सवय उसने रानाको भने जालमें पोसा लिया है। इस कारण इतने परतीको बरिहाल पठग रिसा है, और पीसे समय नको राज देनेपर महाराजको नाम लिपति

अंक २रा.
४१.
रांनी-दहा में जान गई, तेरी बात मान नई, बेशक
कौशल्या वडीः अस्यारा है, पूरी मक्कारा है, मुझे सतानेको
तैयार है, वरना नहीं प्यारी । मेरामी ईश्वर मददगार है.
बांदी-रानीजी ! जो आजकी रात्री बीत गई तो फिर
कुछ बनाये नहीं बनेगा, कोई जादू नहीं चलेगा, फिर वो
भापको कौशल्पाकी लौंडी बनकर रहना होगा. नहीं तो यह
राजमहल त्यामन करना होगा और नाना प्रकारका केश
सहना होगा.
रानी-हाय तो अब में कौशल्पाकी टहलवी कहाऊंगी.
सौतके चरण खाऊंगी.
बांदी-पेशक रानीनी ! जो रामचंद्रको राज हो गया,
हमारा नसीवा सो गया, तो नहीं मालूम कौशल्या क्या क्या
कर दिखावेगीं, किस किसके रुधिरसे सौतसाळरूपी भषिको
शान्त बनाली?
। गजल धुन बिहाग ताल कबाली.
स-एक बार फैकता ना बाकी कमानवाले.)
रानी जाती हं दिलखे त खैरखा है प्यारी।
बेशक हैं सच पियारी बातें तुम्हारी मारी।
ही समाज में न तदबीर क्या बरं में
अमालो गई है तकदीर अब हमारी ।
लिखित बाळ हाय कहां में जावं।
हो गई अब दुनिया में मेरी खारी..

४१
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
सब हो रहे हैं शादां पागे जपान तिफलां
एक मेंही रो रही हूं कमाकी आहहारी।
(केकईका पृथ्वीपर गिरना, मंथराको पकडना.)
बांदी-रानीजीपी धरो, चिन्ता न करो, भगवान
कपा करेंगे, हमारे सम्पूर्ण क्लेश हरेंगे.
गजल धुन बिहाग ताल दादरा
(तर्ज-गैर तन तुझको आई ऐयार बेशर्म.)
रानी-दे छोड प्यारी प्राण मैं अपने गवाऊंगी।
अब सौतकी मैं टहलवी होय कहाऊंगी।
जीतब मेरा क्या अब रहा तू सोच तो जरा।
दासी बनूं न सौतकी में जीसे जाऊंगी।
मैं केकसुता केकई ईश्वरने विपत दी।
डंक प्यारी न मैं तो लगाऊंगी।
बांदी-रानीजी! मैं चरणों में सीस निवाती हं. सौगंध खाती
ई. यह आपको सुनाती हूं, कि रामचंद्र राजपदवी नहीं पायेगा
- नृपति तो आपकाही पुत्र कहावेगा,
रानी-भरत किस प्रकार राजपदवी पावेगा, रामचन्द्र
पोकल युवराज बन जावेगा.
बांदी-रानीजी ! मैं एक सुगम उपाय बताती हूं. देखो
भापको याद दिलाती हूं, एक समय जब महाराज आपकी
चतुरताईपर प्रसन्न हुए थे जो आनन्द होकर दो वरदान दिये
थे अब वह दोनों वर महाराजते मांगो और अपना कार्य

मंक २रा. सिद्ध करो. बस भव सब शृंगार उतार दो, एक पुरानी सारी पांच लो, पब महाराजा भायेंगे और आपको इस दुर्दशामें पावेंगे तो व्याकुल हो जावेंगे, नाना प्रकार से आपको मना. देने परन्तु उस समय गम्भीरताईसे काम लेना, घबरान माना, जब महाराज सब प्रकार वशमें हो जावे और रामच- पकी सौगंध सा जावें तो यह मांग लेना कि भरत राज- विलक पावे और रामचन्द्र चौदह वर्ष वनमें वास बनावे. राग-अंग्रेजी वजन. रानी- पाह रीमाली घाह दिल प्यारी, मृतक जियावन गिरा उचारी। पन्य धन्य पिय बुद्धि तुम्हारी, तन मन डार्क तोपर वारी। पोसी पिय हितकार, दूजी न कोई नार । तोरे मेरा यह हार, फैको सभी सिंगार आनी मोहे दे सारी । ~ सीन नं० ६. (श्रीकौशल्यानीका आनन्दयुत राजभवनमें विराजमान होना.) कोशल्या-राम प्यारे पुत्र मेरे पति कहावेंगे. धन्य पम्प भाग मम कौन जगत मोह सम सीसताज विलकराण भाउ पकरायेंगे, गणपति सहाय करें उमापती का करें पावशाल मेरे लाल नृपति कहे जायेंगे. सीन नं. ७. (श्रीमार राजा दशरथका सायंकाळमें केकईके भवन में प्रवेश करना) मासको शोभापुष्ट विलोक चकित होना.)

श्रीरामजानकीजीचरित्र।
राजा-ऐ मथरा! ऐसी तू क्यों भयभीत खडी है ? कुछ
दर्द है या किसीसे तू लडी है ?
मंथरा-न दर्द है मुझको न किसीसे मैं लडूं हूं. यूंही
किसी खयालमें महाराज खडी हूं.
राजा-दीपकभी क्यों न जलता है अंधेरा छा रहा, कारण
है कौन जल्द अब ऐ मंथरा सुना.
मंथरा-कारण श्रीमहाराज | क्या मैं आपसे कहूं, हैरान
परेशान मैं सरकार खुदही हूं.
राजा-हैरान परेशान क्यों बहूदा बकंती है. जो बात
वह क्यों नहीं तू मुंहसे कहती है ?
(महाराजका मंथराके लात मारना, मंथराका रोना.)
मंथरा-महाराज ! क्या कहूं आज रानीजी कोपभवनमें
भी कुछ नहीं बोलती है, जो कोई पास जावा
है तो दनकाता है झिडकी देती हैं.
( महाराजाका केकई के समीप जाना.)
अंग्रेजी वजन.
(तर्ज-दहीवालीका तौर दिखाना.)
राजा-अलबेली छैल सुन्दरी खोलो आंखें जरा मतवारी।
रानी-जावो जावो सम्यां मत गहो वय्यां ।
राजा-रही क्यों रिसा मोहे तू सुना ।
रानी-छूवो छुवो न पिया मोरी सारी।

अंक २ रा.
राजा-अलबेली छैलसुंदरी खोलो आंखें जरा मतवारी।
रानी-जिया घबरावे कछू न सुहावे ।
हट पिया जा मोहे न सता ॥
राजा-उठो बैठो मेरी प्रिय प्यारी।
अलबेली छैल सुंदरी खोलो आंखें जरा मतवारी॥
मृगवतिनैनी कोकिलबैनी।
मोहे तू सुना बतियां बता॥
प्रिय नैनोंसे क्यों नीर जारी अलबेली छैल सुंदरी।।
ठुमरी खम्माच ।
(तर्ज-एक दो तीन चार.)
रानी-जावो जावो जी पिया मेरा फूको न जिया ।
नहीं मानूंगी मानूंगी मैं तुम्हरी बात ॥
तुम सौतपे जावो हर्ष मनावो
मोरे काहेको आवो मत छूवो मोरा गात ॥
राजा-प्यारी मैं चकोर मुख चन्द्र तोर ।
तोहे देख दुखित मोहे कछु न सुहात ॥
रानी-जावो जावो जी पिया मेरा फूको न जिया।
झूठी बतियां बनावो सय्यां मोको रिझावो ॥
मोहे काहेको जलावो मत लावो मोरे हाथ ॥
राजा-प्यारी विधुवदनी, मृगनैनी, गजगामिनी ! अपने
कोपका कारण बता, इतनी न रिसा, हां यह तो सुना

श्रीरामजानकीजीचरित्र । तुम्हारा कंवलरूपी मुखारविंद आज क्यों कुमलाया है ? किस कारण भूमिपर गिराया है ? रानी-बस महाराज ! बय्यां न गहो, कपा करो, जाओ, किसीके संग आनन्द मनाओ, मेरे पास बैठकर अपना जी न जलाओ, मुझको न सताओ, मैं तो जिंदगीसे बेजार हूं, मरनेको तैय्यार हूं. हुई हूं तंग मैं जीनेसे, अब तो उठा ले जल्द अब मालिक तू मुझको. नकिा भूमिपर गिरना, महाराजाका उठाना.) राजा-आह प्यारी! क्या करती हो ? क्यों जी जलाती हो ? कंवलनैनोंसे जल धार बहाती हो, चन्द्रमारूपी मुखार- विंद मेघरूपी काजलमें छुपाती हो. रानी-बस महाराज ! क्यों बातें बनाते हो ? हँसी उडाते हो. जो यह मुख चन्द्ररूपी होता तो यह दिनही क्यों देखना जी तो वह है जिसपर मोहित हो रहे हो, जिसका सरदस तन मन धन अर्पण कर चुके हैं. राजा-प्राणप्यारी ! मैं नहीं समझता हूं बातें तुम्हारी, में क्या समाया है, जरूर तुमको किसीने बहकाया है रानी-महाराज! कौन है जो मुझको बहका दे, झुठ मडका दे, मैं भली प्रकार जानती हूं, सब कुछ पहचानती हूं कि अब

अंक २रा.
तुमको मुझसे प्रीति नहीं दी है, किसीकी भोलीमाली सूरत
मनमें बस गई है.
राजा-वाह क्या करती हो ? कैसी तोहमत धरती हो।
मला यह तुम किस प्रकार कहती हो कि अब मुझको तुमसे
प्रीति नहीं रही है, किनी आमे मोहब्बत कर लई है ?
रानी-जो तुम्हारा दि. मुझसे नहीं फिरा है तो उसका
कारण क्या है ?
दोहर.-1 था.
दो वर देने थे किये, मोइ न अबलग दीन ।
और करूं क्या आप में, नुन राजन परवीन ॥
राजा-भूल गया था प्यारा मैं. याद रहे मोह नांह ।
दोई के चार सय नांगलो, जो रुचि हो मनमांह ।
रानी-धन्य धन्य तो हे जामुनि, धन्य प्राण आधार ।
शपथ करो प्रिय रामको, तो मांगूं भर्तार ॥
राजा-रामचन्द्र कर सपथ मोहे, सुन भामिन मृगनैन ।
जो रुचि हो सो माग लो, कहो पियारी बैन ।
रानी-मांगू एक वर नाथ, सुन मेरे सिरताज ।
वर्ष चार दरबन, रामचन्द्र महाराज ॥
वर दूसर दो यह मह, जरत होंय युवराज ।
सत्यसिंधु तुम नागमति, रघुकुलके सिरताज ॥
राजा हैं हैं प्यारी। य: । सा कह रही हो कैसी
सी कर रही हो?
है

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
रांनी महाराज ! हँसी नहीं करती हूं सत्य कहती हूं,
अपने बचनोंसे फिर जामो, धर्मसे गिर जाओ.
राजा-
दोहा.
भरत करूं युवराज मैं, सुन संशय कुछ नांह ।
बर पहला पुनि हे प्रिये, मांम समझ मनमांह ॥
मैं भरतको अवश्य युवराज बनाऊंगा, पात होतेही दूत
पठाऊंगा, परन्तु यह बता कि रामको किस कारण वनवास
देती है ? कैसा अनर्थ करती है ? याद रख जो राम वनमें
नावेगा वो मेरा प्राणशी इस शरीरमें नहीं रहने पावेगा.
रानी-मैं इन चालोंमें नहीं आऊंगी, कौशल्याको भली
प्रकार दिन दिखाऊंगी, या तो वचनोंका पालन करो, नहीं
वो महाराज असत्यवादी बनो.
( राजाका भूमीपर गिरना.)
अंग्रेजी वजन धुनसुंधरा ताल कवाली.
(तर्ज-जैसी करनी वैसी भरनी करनीको त् कर कर देख.)
भारी यह मक्कारी किसको तुम सिखलाते हो।
मीठी मीठी करके बातें क्यों मुझको फुसलाते हो।
मैं नहीं ऐसी डरनेवाली दहशत क्या दिखलाते हो।
कैसी धोखाबाजी करते कुछभी नहीं शरमाते हो।
जरा इस तर्फको ध्यान अब कीजे शाह जहां ।
सुन लो लगाके कान कहे चाहे सब जहां ॥

अंक २ ग.
.
मानूं न मैं जिन्हार करते हो क्यों इसरार ।
कहते हो क्या हरबार मुझको बहकाते हो ॥
गजल घुनजिला बिहाग ताल कवाली.
(तर्ज-गमसे जिगर है जलता नैनोंसे नीर जारी.)
राजा-था वैर किस जनमका, मुझसे तेरा ऐ भामिन ।
जो बनके भार्या अब, बदला लिया ऐ पापन ।
प्रिय राम प्यारे आवो, मैं क्या करूं बतायो।
कटती नहीं है हाये, वैरन हुई है यामिन ॥
मिटता नहीं मिटाये, काँका लेख हाये।
मुझको न मुंह दिखा तू, हट दूर बैठ नागन ॥
(राजाका भूच्छित भूमिपर गिरना.)
सीन नं.८.
(सम्पूर्ण प्रजावासियोंका सभामें आनन्द मनाना.)
लावनी क्वाली.
(तर्ज-खिली हरजा फुलबारी है.)
वासी-
पमत मानन्द है छाया, विधाता दिन यह दिखलाया।
सीतापति श्रीरामजी, दीनानाथ दयाल ।
सुररजन भजन असुर, दुष्ट दलन किरपाल।
बनें रघुकुकके अब राया, जगत आनन्द है छाया।
श्याम घटा श्रीरामजी, दामिन जनककुमार ।
नित नव वरपौवार सुख, धन्य धन्य करतार ।

१० श्रीरामजानकीजीचरित्र । प्रजाने जनमफल पाया, जगत आनन्द है छाया ॥ हेमसिंहासन मुदितमन, शोभित हो सिय राम । विधना कीन्ह सहाय अब, पूरे सब मन काम । मनोरथवृक्ष फल लाया, जगत आनन्द है छाया । वसिष्ठजी- दोहरा. पातकाल नित उठत हैं, रघुकुलपति रघुराज । भाये अजहुँ न भूप मन, क्या कारण है आज ॥ प्रिय सुमन्त परवीन तुम, नृपमंदिरमें जाय । सोबत होंगे जगतपती, आनहु वेग बुलाय । (सुमन्तका दण्डवत् करके चलना.) सीन नं.९. (सुमन्तका केकईके घरमें प्रवेश करना और महाराजाको कित विलोक विस्मित खडा हो जाना.) दोहा. परी न राजहिं नींद निशि, हेतु न जानहुँ तात । प्रिय राम कह, सकल बिताई रात । तुम बेग अब, आनहु राम बुलाय । सोइ बूझेगा मर्म सब, सचिव न वार लगाय । (सुमन्तका चकित होकर चलना.) सीन नं. १०. (श्रीरामचन्द्रजीका राजभवनमें शयन करना और श्रीजनक- नन्दिनीका महाराजको जगाना.)

अंक २ रा. ठुमरी. (G-म स्वाग जगतपती दीनके आधार हो.) नानकीजी- दीनबन्धु दीनानाथ जागिये कपानिधान । निशा गई प्रभात भई तारागण मलीनमन, चन्द्र दुखित ज्योतिरहित देखिये उग्यो है भान ॥ (श्रीरामचन्द्रजीका जागना, जानकीका दण्डवत् करना.) जानकीजी-महाराज ! मुमन्तजी द्वारपर आये हैं, आप मीमहाराजाने माता केकईके अवनमें बुलाये हैं. रामचन्द्रजी-अच्छा प्रिये ! मैं जाता हूं, पिताजी के दर्शन ता हूं. ( महाराजका चलना.) सीन नं. ११. श्रीरामचन्द्रमहारानका केकईके भवन में प्रवेश करना और महा- राजाको मूच्छित देखकर माता केकईको दण्डवत् करना.) रामचन्द्रजी- दोहा, हाथ जोड विनती करूं, केहि कारण प्रिय मात । तन विवरण मूर्छित विकल, अवधपती मम तात ॥ केकई-हे राम ! कारण तो यह है कि राजाको तुमपर परम स्नेह है, राजाने मुझको दो वरदान देने किये थे, आज जो मुझको भाये सो मांग लिये, सो पिताका कष्ट दूर करना चाहो तो मुनिवेष धारण करके वनमें जाओ. भरतको युव- राज बनामो, विलम्ब न लगाओ.

रामचंद्रजी-हे माता! वनगवनम ता मेरा पति कल्याण है, क्योंकि वहां तो कषिमुनियोंका स्थान है कि जिनके दर्शनसे पापोंका नाश होता है, परलोकका पंथ संवरता है, भरत जो मुझे प्राणोंसे प्यारे हैं, मेरी भांखोंके तारे हैं, बड़े बुद्धिमान हैं, तेषवलके निधान है, अतिचतुराईसे राज करेंगे, प्रजाको मानन्द देंगे, परन्तु हे माता! मुझको विश्वास नहीं आता कि पिताजी इस तुच्छ बातके कारण दुःखित हो रहे हैं, मूञ्छित अवनीपै सो रहे हैं, अवश्य मुझसे कोई भारी अपराध हुआ है, जो माताजी ! तुमने नहीं बताया है, इस कारण मैं अपनी सौगन्ध दिवाता हूं, चरणों में सीस निवाता हूं, छपा करके सम्पूर्ण वृत्तांत सुनाओ, मेरा संदेह मिटाओ. केकई-हे पुत्र ! मैं तुम्हारी शपथ और भरतकी आन करती हूं, और तो कोई हेतु नहीं जानती हूं, परन्तु यह बार बार समझती हूं कि अवश्य पिताके वचनोंका पालन करना, सmaa अमन्यवादी न बनाना. द्राका पिताको दण्डवत् करना.) रामचन्द्रजी-पिताजी! चिन्ता त्यागन करो, आनन्द- मन धर्मका पालन करो, मैं अपनी जननीसे मिल आता हूं, रगोंमें सीस निवाता हूँ, और आनन्दयुत बनगवन करता हूं. सीन नं. १२. (माता कौशल्याका श्रीजानकीजीसहित रानभवनमें पार्वती- जीका पूजन करना.)

अंक २रा. कौशल्या चौपाई. मनपतमात गिरीशकुमारी। शिवशंकरअर्धगी ध्यारी॥ महिमा अपरंपार तुम्हारी। मोहित हैं सब नर औ नारी । जीव चराचर पालनहारी। सकल विश्वकी तू रखवारी। पूरी मन अभिलाष हमारी। धन्य धन्य प्रजेशकुमारी। (श्रीरामचंद्रजीका सचिवपुत्रसहित आकर माताजीको दंडवत् करना.) कौशल्याजी-हे पुत्र! राजकाजमें तो बहुत समय लगेगा, तुम्हारा कोमल वदन क्षुधासे कुमला जावेगा, इस कारण कुछ मधुर भोजन खाओ फिर अपने पिताके समीप जाओ. रामचंद्रजी-माताजी ! पिताने आज मुझको वनका राज्य दिया है, अति अनुग्रह किया है, प्रियजननी! आनन्दमन भाज्ञा दो, कुछ चिन्ता न करो. कौशल्या-हाय पुत्र! यह क्या सुनाया किस अपरा- धका यह दंड पाया ? सचिवपुत्र-माताजी! पापन केकईने यह दुष्ट कर्म किया है, राजासे यह वर मांग लिया है कि भरतजी तो युवराजप- रखी पावे और श्रीरामचंद्रजी चौदह वर्ष वनमें वास बनावें. गजल. (तर्ज-हाथमें लेके जाम गदाई शाम सबेरे फिरते हैं.) कौशल्या- पैरन पापन ऐ कलहारी कबका बदला तूने लिया।

श्रीरामजानकीजीचरित्र । क्या यह समाई कुमत कमाई संकट दारुण मोहे दिया। रामपियारे भूपदुलारे वनमें काह पठाबत है। प्रजा दहेगी तोहे क्या कहेगी कैसा कठिन किया तने हिया। दिनकरकुलकर विटपकुठारी केकई पापन हत्यारी । आह करातन मंद अमापन काहे सतावे मेरा जिया। रामचंद्रजी- चिन्ता त्यागो धीरज धारो काहे जीव जलावत हो। कर्म लिखाया सो फल पाया, क्यों तुम नीर बहावत हो। यह संसारा मोह अँधियारा, जीव भ्रमत नित डोलत है। लेख विधाता मिटत न माता, किसको दोष लमावत हो। कौशल्या-आह पापन केकई! क्या किया, किस जन्मका सौत बनके बदला लिया ? राम जैसे प्यारे पुत्रको वनवास दिशा द्वाय पिया। तुमनेभी कुछ न विचार किया कुमतिको रामचंद्रजी-माताजी ! कर्ममति अति बलवान है, मेरा - कार कल्याण है, चिन्ता त्यागो आनंदमन ना कौशल्या-हाय क्या करूं? जो आज्ञा न दूं तो कुलको दाग लगेगा, राजा असत्यवादी बनेगा, जो वनगवन करनेको कहूं तो आह मैं किस प्रकार तुम्हारा वियोग सहूं (कुछ सोच- कर) जिस प्रकार बनेगा चौदह वर्ष बिताऊंगी, पतिको सत्य-

अंक २ रा.
शान
से विमुख न बनाऊंगी, हे पुत्र आनन्दमन वनमें जायो।
नवणके दर्शन पाओ, अपना जन्म सफल बनाओ.
पारी
( श्रीजानकीजीका माता कौशल्याजीको दण्डवत् करना.)
ठुमरी.
जिय
(तर्ज-यह जग है गोरखधंदा.)
निकीजी-
वन । मैं पाणनाथ संग जाऊं, जो आयमु माता पाऊं।
रबर मोहे अवध न अब प्रिय लागे, मन पतिचरण अनुरागी।
तर कर जोरूं विनय सुनाऊं, मैं प्राणनाथ संग जाऊं ॥
लमा वन आनन्द मंगलदाता, नहीं कष्ट मोहे कुछ मावा ।
पतिसेवामें मन लाऊं, मैं पाणनाथ ग जाऊं ॥
किर
शिल्या-
विधि कैसी विपता डारी, मैं आज हुई नै मारी।
सुन रघुकुलके सुखदाई, मैं कौन अब करूं उपाई ॥
चहे संग चलन वन प्यारी, प्रिय जनकसुता सुकुमारी ।
पान सिय बसे विपिन के भांती, कपिचित्र लिखतसे डराती।
यो । मैं कनकवेल इव लाली, सींचा स्नेहके बारी।
मचंद्रजी-
तो सुन कमलनैन प्रिय प्यारी, वन विपत कष्ट अति भारी।
वनः निश्वर वन घोर फिरत हैं, नाना उत्पात करत हैं।
(का कहैं निराहार सुरआरी, सुन कमलनैन सुकुमारी ॥
तिर लागे पहाडकर पानी, नहीं जाने विपत बखानी ।
ܕܫ

-
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
तुम चंद्रवदन सुकुमारी, वन विपद कष्ट आते भारी।
निशि सोवत डांस सतावें, नित कंद मूल फल खावें ।
वन महन मिले नहीं वारी, सुन कमलनयन सुकुमारी।
मग कांकर कंटक नाना, नहीं असन वसन परत्राणा।
रहें भाल कराल भयकारी, वन विपत कष्ट अति भारी॥
जानकीजी-
पति अवध न मोहे सहावे, कानन मोको अति भावे ।
जहां बसें मुनी संन्यासी, संग प्राणनाथ सुखरासी ।
सोचो को मोहे सतावे, पति अवध न मोहे सुहावे ।
बहे शीवल मंद बयारी, सब रोग नशावनहारी।
पुष्पनकी सुगंधी आवे, कानन मोको अति भावे ॥
जहां बहे श्रीगंगाजी, रहैं शिवशंकर कैलासी।
इनमे पातक जावे, कानन मोको अति भावे ॥
निकरणा-देखो प्रिया! मार्ग अति कठिन है, उसका
नाम वन है, जिसमें अनेक प्रकारके भयंकर निशिचर वास
के भयसे तपेश्वरी डरते हैं, जो बियोंको
TAPाल जाते हैं, मनुष्योंको जहां कहीं देख पाते हैं,
भक्षण कर जाते हैं.
जानकीजी-मार्ग तो प्राणनाथके संम कोमल बन जावेमा,
कोई दुष्ट मुझको नहीं सतावेगा, आपकी प्रभुताईसे भय
सावेग, मेरे सन्मुख नहा भावेगा.
-

मंक २ रा.
रामचन्द्रजी-वनमें वस्त्र आदिक कुछ नहीं मिलेगा,
टोमें शयन करना पडेगा.
जानकीजी-कुशाको सुन्दर साथरी बनाऊंगी, उसपर
मल पुष्प बिछाऊंगी, आपके चरणकमल दबाउंगी,
पावन्द मनाऊंगी.
रामचन्द्रजी-वनमें अन्नादिक भोजन नहीं पाओगी,
चासे व्याकल हो जाओगी.
जानकीजी-वृक्षोंमें मधुर फल फूल लगे हैं, जो उचीस
कारके भोजनसे भले हैं.
रामचन्द्रजी-महावन देखके भय खाओगी, कोई संभी
हेली नहीं पाओगी, किससे जी बहलाओमी, किस प्रकार
बौदह वर्ष बिताओगी.
जानकीजी-प्राणपतिक सङ्ग भय नहीं खाऊंगी, आपकी
वरणसेवामें मन लगाऊंगी, मुनियोंकी स्त्रियोंके दर्शन पाऊमी,
भानन्दमन दिवस बिताऊमी, जो सङ्कनहीं ले जावोगे तो
गण गवाऊंगी, पतिवियोगका कष्ट नहीं उठाउंमी.
रामचंद्रजी-अच्छा प्रिये ! विवाद न करो मेरे सङ्ग चलो.
( श्रीजानकीजीका कौशल्याके चरणमें दण्डवत् करना.)
जानकीजी-हे माता ! सेपाके समय दैवने वनवास दिया,
मेरे मनोरथको सफल नहीं किया, सो कपा करो, मेरा यह
अपराध क्षमा करो, जब चौदह वर्ष बिताकर भाऊंगी, तो
भापकी चरणसेवामें मन लगाऊंगी.

श्रीरामजानकीजीचरित्र कोशल्याजी दोहा. जबलग रवि शशि मगनमें, तबलग रहो अहिवात । करो मगन वन गमन अब, पार न होय बसात । (श्रीरामचन्द्रजीका भार्यासहित माताजीकी आज्ञा पाकर वनग- मन करना, कौशल्याजीका भूमिपर गिरना.) सीन नं० १३. (श्रीरामचन्द्रजीका जनकनन्दिनीसहित केकईके भवनको चकना, मार्गमें लक्ष्मणजीका मिलना.) लक्ष्मणजी-हे सच्चिदानन्द निर्विकार ! तेरी लीला अपार है कि जिम के वशमें सब संसार है, मनुष्य दैवगतिथी पहचान सकता है, परन्तु त्रियाके चरित्रोंको नहीं जान सकता है. रामचन्द्रजी-माई ! धैर्य धरो, कोई ऐसा उपाय करो जिससे पिताजी कष्ट न पावें, मेरे वियोगमें प्राण न गवावें. दी-महाराज! मेरे तो बाता पिता सर्वस्व हित- का का नाही हैं खरारी, महाराज ! मैं तो वनमें सङ्क चाऊंगा, आपके विना अयोध्यामें क्या बनाऊंगा ? वी-भाई ! जो मैं तुमको सङ्कले जाऊंगा तो नपाच्या अनाथ हो जावेगी, प्रजा अनेक प्रकारसे कष्ट उठा- वेगी, क्योंकि भरत शत्रुघ्न तो ननिहाल हैं और महाराजा मेरे विरहमें विकल हैं, जिस राजाकी प्रजा दुःख पाती है, उस नृपतिका सम्पूर्ण सुकत नाश हो जाता है, इस कारण तुम अयोध्या रहो, सबको धैर्य दो.

अंक २ रा.
लक्ष्मणजी-महाराज ! मैं किसीको नहीं जानता हूं, में
वो पापकोही अपना हितकारी मानता हूं, जो आपही त्या-
मोपे तो कहां जाऊंगा ? किसके चरणमें सिर निवाऊंगा?
(लक्ष्मणजीका चरणमें दण्डवत करना, महाराजका लक्ष्मण.
जीको कण्ठ लमाना.)
रामचन्द्रजी-अच्छा पियबन्धु ! विलम्ब न लगाओ,
अपनी जननीसे आज्ञा ले आओ.
उक्ष्मणजी-महाराज ! आज्ञा ले आया हूं. मावानेही
बनमें आपकी चरणसेवाके निमित्त पठाया हूं.
रामचन्द्रजी-चलो पिताजीके दर्शन कर आवे. चरणमें
सीस निवा आवं.
सीन नं. १४,
(प्रजाकी स्त्रियोंका राजभवन में केकइको उपदेश करना.)
गजल.
(तर्ज-अच्छे :पया यही देश बुला ले बन्द जी बररावत है.)
मामकी त्री-
सुमुखि सयानी केकईगनी रामको वन क्यों पठावत हो।
भूप दहे है कष्ट सहे है क्यों तुम जीव जलावत हो ।
राम जो वन चले परजा मरे रो रो सारी।
काहे उत्पात करो सोचो जरा देखो प्यारी।
राव व्याकुल हैं निरख नीर हैं नैनों जारी ।

श्रीरामजानकोजीचरित्र । असित अवनीमें परे देख तू प्यारी वारी । समवतिनैनी कोकिलबैनी हमको काहे सतावत हो। सुमुखि सयानी केकईरानी रामको वन क्यों पठावत हो। केकाई-बस मुझको न सताओ, चली जाओ, मेरे भव- बमें क्यों भाई हो ? किसने बुलाई हो ? (श्रीरामचन्द्रजीका प्रियबन्धु और भार्यासहित आकर महाराजाको दण्डवत् करना.) रामचन्द्रजी-पिताजी धैर्य धरो, नैन उपारो, हमको भाबा दो, चिन्ता त्यागन करो. (केकईका मुनिवस्त्र लाकर रामचन्द्रजीको देना.) केकई-हे राम ! राजा अपने प्राणोंको तो त्यागन कर देवा, परन्तु अपने मुखारविंडसे तुमको वनगमनको नहीं है कि अब सब भूषण वसन उतार दो, यह मुनिक्य धारण कर लो. रामचन्द्रजीका प्रियवन्धु और भार्यासहित राजेश्वरी शृंगार निवस्त्र धारण करना, महाराजाका श्रीजनक नन्दिनीको गोदीमें बिठाकर शिक्षा देना.) गजल धुन जिला बिहाग ताल कव्वाली. (तर्ज-यह न थी हमारी किसमत कि तू नेककार होता.) राजा-वैदेही जानकी सुन, मोहे पाणसे तू प्यारी। गम्भीर वन कठिन है, मेरी लाडली दुलारी॥ निश्चर फिरै भयंकर चिंधारे घोर करवर ।

अंक २ रा.
1
सुनकरके नाद केहर, डरपे हैं धीर धारी ॥
बनमें से किरातन, पुत्री फिरै हैं डाकन ।
तुम वय किशोर लाली, महेलोंके रहनेहारी ॥
वनमें न हाय जावो, विपताके दिन बितावो।
पितुमेह रहो या माप, रुचि हो जहां तुम्हारी ।
जानकीजी-पिताजी ! आपकी कपासे वन आनन्ददा-
क बनेगा, किसी प्रकारको व्याधी नहीं करेगा.
(श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणनी और जानकीजीका वनगमन करना,
महाराजाका मूच्छित पृथ्वीपर गिरना.)
ठुमरी.
(तर्ज-चले सिया राम लषण वनको.)
जा-चलो वन सङ्ग राम भाई, अवध भई बेरन दुखदाई ।
अह आभागिन केकई, काह कुमति यह कीन्ह ।
जो रघुनन्दन जानकि कह, सुख अवसर दुख दीन्ह ।
विकल है खुकुलक राई, चलो वन सङ्घ रामभाई ।
राम लपण रघुकुलतिलक, शील स्नेहनिधान ।
त्याग चले अब अवधके, राई काह कीन्ह भगवान ।
चली वन हाय जनकजीई, चलो वन संम रामभाई ॥
(सम्पूर्ण प्रजावासियोंका महाराजके संग चलना.)
राजा-(सुमन्तसे) हाय सुमन्त राम । लक्ष्मण तो वनमें
बले गये और मेरे प्राण शरीरमें रह गये, हाय मंदमति इससे
कठिन कौन केश पडेगा जिससे प्राण तजेगा.

श्रीरामजानकोजीचरित्र। सुमन्त-महाराज ! आप वो बुद्धिमान हैं, सम्पूर्ण सुक- तीकी खान हैं, धीरज धारण करो, परमात्माका ध्यान धरो, ईश्वर सर्वशक्तिमान है, भापका तो सदा कल्याण है. राजा-सुमन्त ! तुम शीघही रथ लेकर जाओ, विनवी करके जनकनन्दिनीसहित राम लक्ष्मणको यान चढाओ, वन दिखराके सुरसरीमें स्नान कराओ, अपने संग अयोध्या डे आओ, जो कदापि दोनों भाई न आवे, वनमेंही जावें तो हे सखा। तुम कोई उचित उपाय करना, जिस प्रकार बने जनकनन्दिनीको अवश्य लाना. (सुमन्तका दंडवत् करके चलना.) राजा-देखो सुमन्त। जिस समय गम्भीर वन आवे और बनकदुलारी भय खावे, तुम उस समय बनके क्लेश वर्णन करना, मेरी ओरसे यह कहना हे पुत्री ! अयोध्याको फिरो, ना! जो जानकीनी न आवेगी, वनमें जावेगी मानव शरीरमें नहीं रहेंगे,अवश्य पयान करेंगे. सुमन्त-महाराज! धीरज धरो, श्रीरामचंद्रजीको कुशल- आपकी सब चिन्ता मिटाऊंगा. (सुमन्तका दडवत् करके रथसहित चलना.) सीन नं. १५. (श्रीरामचन्द्रजीका प्रनावासियोंको धीरज देना.) रामचंद्रजी-प्रिय प्रजावासियो । तुम अयोध्यामें जाओ, अंक २रा. ६३ पिताजीको धोरज बंधाओ, मेरे वियोगमें नैनोंसे नीर न बहाओ, मैं चौदह वर्ष बिताऊंगा, तुमको आनन्दपूर्वक कंठ लनाऊंगा. प्रजावासी-महाराज ! हम तो अयोध्या में नहीं जायेंगे. आपके संग वनमें वास बनावेंगे, चौदह वर्ष काननमें बिता- बेंगे, नगरमें जाकर कौनसा सुख पावेंगे. आपके वियोगमें नीर बहावेंगे, अन्तमें प्राण मैंवावेंगे. (.सुमन्तनीका रथसहित आना.) सुमन्त-महाराज ! प्रनावामी इस प्रकार नहीं फिरेंगे, सब आपके साथ चलेंगे, उचित है कि रथमें विरान जाओ, अश्वोंको पवनवेगी चलाओ. (श्रीरामचन्द्रनीका बंधु और भार्यासहित रथमें विराजमान होना.) रामचन्द्रजी-देखो मेरा हितकारी वह कहावेगा जो अयोध्या जावेगा, ऐसा उपाय बनावेगा, जिससे पिताजी आनन्द पावें, मेरे वियोगमें कष्ट न उठावे. ( रथका पवनवेगी चलना और महाराजका सबको छोड- कर अदृष्ट हो जाना.) प्रजावासी-हाय महाराज तो वनमें चले गये, हम सब अयोध्या में रह गये, अब कौन उपाय बनावें, किस प्रकार श्रीरामचंद्रजी महाराजके दर्शन पावें. (सबका विकल होकर भूमिपर गिरना.)

श्रीरामजानकीजीचरित्र । सीन नं. १६. (श्रीरामचन्द्रजीका प्रियबंधु और भार्यासहित सुरस- रीके तीर पूजन करना.) प्रार्थना श्रीगंगाजीकी । जानकीनी- क्या सुन्दर नीर निर्मल है सकल दुख पाप अघहारी । श्रीगंगे श्रीमाता तूही है मोक्षकी दाता । विराजे शीस शिवशंकर अमित महिमा है महतारी ॥ भागीरथी नाम अति पावन मुनिजन संतमन भावन । सकल कलिमल कलुष भंजन दलन संताप तो बारी ॥ (निषादका महाराजके सन्मुख भेट धरके दंडवत् करना.) निषाद-अहोभाग्य हैं महाराज | जो आपने चरणकमल फेरकर इस भूमिको पवित्र किया, मुझसे खल अधमको दर्शन दिया. ( महागजका निषादको कंठ लगाना.) बी-हे सखा। मैं भूषण वसन अंगमें नहीं सजा नै गाई जन आदिक भोजन खाऊंमा. निषाद-महाराज ! छपा करके ग्राममें पग धारो, इस और निहारो. रामचन्द्रजी-सखा ! मैं किसी ग्राम देशमें नहीं जाऊंमा. चौदह वर्ष वनमें बिताऊंगा, छपाकरके नौका मंगा दो, श्रीमं- गाजीसे पार लंपादो.

अंक २ रा. ६५ सुमन्त-महाराज ! कौशलनाथने यह आज्ञा दी थी कि थ लेकर संग जाओ और श्रीगंगाजीमें स्नान कराके अयो- पामें ले आओ. रामचन्द्रजी-आप पिताके समान हो और बुद्धिमान् है, मुझको उचित शिक्षा दो ऐमा उपाय करो जिससे कीर्ति- पी चन्द्रमा कलंक न लगे और दिन दिन दूना प्रकाश करे, चौदह वर्ष अयोध्या नहीं जाऊंगा, आपके प्रतापसे वनमें मानन्द मनाऊंगा, पित जीको सब प्रकार धीर्य देना, चरण कडकर मेरी ओरसे विनय करना, परमात्माका ध्यान धरें, आनन्दमन सत्यवता | पालन करें. पिय निषाद ! विलम्ब न लगाओ नैय्या मंगा. (श्रीरामचन्द्रजीका प्रियबन्धु और भार्यासहित नौकामें विरा- जमान होना.) सुमन्त-हाय क्या करंस, कौन उपाय बनाऊं, किस प्रकार अयोध्या जाऊं, महाराजको क्या मुख दिखलाऊं, उचित है कि श्रीगंगाजीके तीर प्राण गवाऊं. (सुमन्तका भूमिमें मूर्छित गिरना.) सीन नं. १७. ( श्रीमान् राजा दशरथजीका कौशल्याके भवनमें मलिन- मन बैठना.) राजा-प्रिय कौशल्या!

श्रीरामजानकीजीचरित्र । रानी-महाराज! राजा-मेरे प्राणपियारे नैनोंके उजियारे नहीं आये. सुम- न्तने बहुत दिव ये. रानी- दोहा। सत्यसिंधु रघुकुलकमल, धीरज धरो नरेश । दिवस जात नहिं बार कछु, त्यागहु नाथ कलश ॥ पति। देखो शिबि दर्धाचिन सत्यके कारण अनेक प्रकारसे संकट सहे, जो धर्मपर सावधान रहे तो अंतमें आनन्दही प्राप्त हो गये. राजा- दोहा। कानन योग कि घोर सुन, जनकसुता सुकुमार । विधिगति वाम कठोर भति, का: कीन्ह करतार । आह प्रिय रामका वियोग किस प्रकार सहूं उचित है कि - " रानी- दोहा। धर्मधुरंधर भूपमुने, धीर धरो भरतार । सेय आ मिलें, दिवस जात नहिं बार ॥ हे पाणनाथ ! विचार करा, धीरज धरो, देखो चौदह वर्ष शीघही बीत जावेंगे, राम लषण जानको आनन्दयुक्त आवेंगे. राजा-हाये तो रामचन्द्र चौदह वर्षमें आयेंगे और मेरे पाण इस शरीरमें रह जायेंगे. (राजाका विकल होकर भूमिमें गिरना, कौशल्याजीका उठाना.)

अंक २ रा.
६७
रानी-हाय प्राणनाथ ! क्या करते हो ? यह तो बताओ
झको किसके आसरेपर छोडते हो.
राजा-
दोड़ा।
राज देन कह दीन्ह वन, तदपि न हृदय मलान ।
सो सुत बिछडे जिवतहूं, अधम को मोह समान ॥
आह मंदमति रामको राजके बदले वन दिया ऐसा कठोर
हृदय किया.
कोशल्पा-महाराज! कर्ममति अति बलवान् है, तुम्हारा
किधर ध्यान है?
राजा-प्रिय कोशल्या ! अब मैं इस अधम शरीरको
त्यागन करता हूं, इस कारण तुमको एक गुप्त भेद बताता हूं,
मैं एक समय चतुरंगिनी सेनासहित मृगया कारण वनमें गया
था, और रात्रीको एक सरोवर के निकट विश्राम किया था
निशाके समय सखननामी पितुभक्तने उस सरोवरसे जल
लिया था और मैंने उसको मृग जानकर वध किया था.
उसके अंधे माता पिताने पुत्र के वियोगमें योगअनिसे शरी-
रको भस्म कर दिया था और मरते समय मुझको यह शाप
दिया था कि रामा तभी पुत्रवियोग सहेगा और हमारी नाई
प्राण त्यागन करेगा. प्रिय कौशल्या वह समय तो आ गया है
परंतु प्राण शरीरमें रह गया राम राम हा राम प्रिय राम राम
हा राम.
(राजाका स्वर्गवास होना.)

६८
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
गजल धुन सोहनी।
(तर्ज-मरहबा ऐ आशिके सादिक हमारे मरल्या.)
कौशल्या-
उठ जाग पीतम खोल अंखियां नींद किस सोवो पिया।
सोचूं मैं क्या जाऊं कहां व्याकुल पति मेरा जिया ॥
पुत्र तो वनको गये पति हाय दुनियासे चले ।
मैं ना मरी दुख सह रही कैसा कठिन मेरा हिया ॥
मेरे राम प्यारे पुत्र आ पिता देख तेरा चल बसा ।
अब क्या मेरा जीतब रहा विधि वान हाये क्या किया।
( वसिष्टजीका ज्ञानउपदेश करना.)
वसिष्ठजी-सदा न पिर कोई रहा, देखो हृदयविचार ।
निशारूप प्रपंच यह, नाशमान संसार ॥
हे कौशल्या । देखो सगर, भगीरथ, दिलीप जैसेभी सदा
न रहे, कालने भक्षण कर लिये, जो दुनियामें आया है सो
गया है हे कौशल्या। शोक त्यागन र रो, ईश्वरका ध्यान धरो,
गि मान्न तम शीघही धावन पठाभो, भरतको बुलाओ,
हवाओ, राजाके शरीरको यत्नपूर्वक उसमें
रखवाओ.
शानुन-गुरुजी! मैं जाता हूं, शीघही भरतजीको लाता हूं.
तो भरतको कोई समाचार न सुनाना, केवल
यह कहना कि एक कठिन कारण पडा है. गुरुने तुमको
बुलाया है.
(धावनका दण्डवत् करना.)

यंक २ रा. " सीन नं. १८. (भरतजीका केकयदेशके राजभवन में मलिनभन बेना.) भरतजी-नैनोंसे क्यों नोर हाय आता है, हा विधाता दिल क्यों बैठा जाता है. दृष्ट आये स्वममें मुझको पिता, अङ्गमी है बाम मेरा फरकना, क्या है कारण कुछ समझ भाता नहीं, जी उचाटी है न दिल लगता कहीं. (अयोध्यापुरीके घावनका आकर दण्डवत् करना.) भरतजी-निपचारा! तुम किम कार आये हो, क्या पिताजीने पठाये हो. धावन-महान की ने पाया हूं, आपको सङ्ग ले जाने के निमित्त आया हूं. भरतजी-पहनो बामोरामदेह निटालो कि मेरे प्रियबन्धु आनन्दयुत है ? धावन-हां महाराज ! विलम्ब न माओ, शीघ्र ही गव- नकी ठहरायो, जिस प्रकार बने पवनवेगी अयोध्या जाभो. कोई कठिन कारण पड़ा है गुरुजीने आपको याद किया है. (भरतजीका धावनसहित अयोध्याको गमन करना.) काम सीन नं. १९. (केकईका मन्थरासहित राजभवन में बैठना.) केकई-प्रिय मन्थरा । यह क्या हो गया, पति तो सच- मुच मर गया, रामके विरहमें प्राण त्यागन कर गया.

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
बांदी-रानीजी ! जो दुनियामें आया है सो गया है.
सदा कोई नहीं रहा, सबको कालने खाया है. महाराज वो
अतिवृद्ध थे उनके तो मरनेके दिन थे, अपने पुत्रको अब
राजगद्दीपर बिठाओ. आनन्द मनाओ, भूपतिमात कहानी.
(मरतजीका आना.) देखो भरतजी आ गये हैं, उनकी धीर
बंधाओ
(भरतजीका आकर माता केकईको दण्डवत् करना.)
माता-प्रिय पुत्र ! तुम्हारा मुख मलिन क्यों हो रहा
है ? किस कारण नैनोंमें जल भर रहा है. शीघही मेरे पितु.
गेहकी कुशल सुना, मेरा संदेह मिटा.
भरतजी-पिय जननी ! तुम्हारे पिताके तो सब प्रकार
आनन्द हो रहा है. परन्तु मुझको अपने पितुगेहमें उत्पात
है. मैं देखता हूँ कि सम्पूर्ण नगरमें सन्नाटा छा
इहाँ है की जो अत्यन्त घबरा रहा है माताजी। छपा करके
इसका कारण बताओ, पिताजीके दर्शन करा.
पुत्र ! तुम्हारे पिताने तो इस मृत्युलोकको
त्याग दिया है, सरपुरमें निवास कर लिया है.
(भरतजीका भूमिपर विकल गिरना.)
भरतजी-हाये मैं दुनिमामें वृथाही आया, अन्तसमय
पिताके निकटभी न पाया.
केकई-हे पुत्र धार्य धरोआनन्दमन प्रजाका पालन करो.
।

अंक २ रा. भरतजी-हे माता पिताका मृत्युको कारण तो बता, म्पूर्ण वृत्तान्त सुना. केकई-पुत्र । विधाताने इमारी अति सहायता करी है, बचारी मन्थराने बडी मदद दा है, मैंन राम लक्ष्मण जान- हीको तो वनवास दिषा दिया है. इस कारण राजाके पर- लोकको कुछ ध्यान न लाओ, आनन्द मनाओ, अयोध्या- गति कहावो. भरतजी-हाये अभागिन, डंकनी, नागन, मन्दमति, करा- तन । तूने क्या किया, सम्पूर्ण अयोध्याको उजाड दिया. निर्लज्ज | उज्जानी न आई कैसी कुमति कमाई. ( मंथराके केश पकडकर ) हत्यारी! तूने खूब की सहाई, अच्छी बुद्धि भ्रष्ट बनाई. ( केकईसे ) बस चांडाला मेरी आंखोंके आगेसे चली जा, अपना मुँह न दिखा, मुझको कोष न दिला, आह तूने पेड काटके पल्लवको सींचा, मीनके जीवन के हित वारिको उलीचा. दोहरा। हंसबंस मम जनम भा, राम लषणसे घात । जननी मोहे तोसी मिली, विधिसे काह बसात । (भरतजीका माईत अवनीपर गिरना.) "

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
सीन नं० २०.
(कौशल्याजीका राजभवन में विलाप करना.)
गजल धुन जिला बिहाग ताल कवाली.
(तर्ज-गमसे जिगर है जलता नैनौसे नीर जारी.)
कोशल्याजी-
विधनाने जो लिखा है मिटता नहीं मिटाये।
पूर्व जनम किया जो सोई यह जीव पाये।
राम और लषण पियारे फिरते हैं मारे मारे।
संग जानकी दुखारी पति प्राण हा गंवाये ॥
पतिमाही पाया कमें यह लिखाया।
सोच करूं क्या आली अजहूं भरत न आये ।
(भरतजोका आकर चरणों में डवत् करना.)
भरतजी दोहा.
"केकई, काह प्रगट जग कीन्ह ।
- तो वाम विधि, क्यों न बांझ कर दीन्ह ॥
सब अनर्थकर मूल जिन, कुलकलंक अघखान ।
। जन द्रोही मैं, विधिगति अति बलवान ।
कौशल्याजीका भरतको कंठ लगाना.)
कोशल्या-चिन्ता त्यागहु पुत्र प्रिय, धीर धरो मनमांह ।
कर्म किया सोइफल लिया, दुख काहू कर नाह।
भरतजी-हे माता! जो मनुष्य गोशालामें आग लगाते है,
पराया धन चुराते हैं, माता पिताको सताते हैं, प्रिय मित्र

अंक २. ७३ और महीपतिको छलसे विषपान कराते हैं, पराई स्त्रीसे रति करते हैं, क्षत्रोतन धरके संग्राममें पीठ दिखाते हैं, अबला और बालकको वध बनाते हैं और जो महापातक कहाते हैं हे माता। जो मेरी इसमें मुम्मति हो तो मैं उनकी गति पाऊं, घोर नरकमें वास बनाऊं. कौशल्याजी-हे पुत्र ! जो इसमें तुम्हारी सम्मति कहेंगे वह अनेक प्रकार के कष्ट नहंगे, जो तुमपर शेष धरेंगे वह घोर नरकमें वास करेंग, गिय लाल ! उठो, धीरज धरो, अपने पिताके मृतक शरीको दा: करो. (सुन्दर विमान में करन क मृतक शरीर स्मशान भूमि में जहर निक वाह देना.) १ सीन नं. २१. (भरतजीका सम्पूर्ण प्रजावाली और वसिष्ठजीसहित माता कौशल्याके भवन में शोकयुत विराजमान होना.) गजल धुन विहाग. (तर्ज-है बहारे बाग दुनिया चद रोज.) भरतजी-हाय पापन मात तूने क्या किया। बीज कैसा विपतका यह बो दिया ॥ मांगते वर नागिरी रसना तेरी बजसेभी है कठिन तेरा हिया । थे सकल आनन्द अब दुनिया सभी किस जन्मका वैर यह तूने लिया॥ कौशल्याजी-मेरे लाल धीरज धरो, अपने पिताके वच-

७४
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
नोंका पालन करो, प्रजावासी अति दुःखित हैं, उनका शोक
इरो.
भरतजी-तो माताजी! अब मैं राजपदवी पाऊं, कीट
मुकुट संजाऊं, अयोध्यानाथ कहाऊं.
कौशल्याजी-हां पुत्र ! प्रजाका कष्ट मिटा, सबको
धीरज बंधा.
भरतजी-माता! मेरे राज्यसे प्रजाका श के नहीं मिटेगा,
विपतरूपी वृक्षमें फल लगेगा. जो प्राका कष्ट मिटावो तो यह
आज्ञा दो कि मैं वन्में जाऊं, श्रीराम चद्रजी महाराजसे अपना
अपराध क्षमा कराऊं, विनती करके अयोध्याम लाऊं.
वसिष्ठजी दोहा.
धन्य धन्य मति बुद्धि तो, धन्य जन्म जग तोय
सुक्रतरूप दशरथसुवन, काह न गुणनिधि होय ॥
उपन्तस)
चला नगन आनन्द बन, सजो सकल समाज ।
विनहिं देहिं मुनि राम कह, अवधपुरी कर राज ॥
धन्य भरत जंग जन्म तो, को जग तोह समान ।
ग्यानउदधि परिजन सुखद, सरगुणशील निधान ।
(भरतनीका सव माता और सम्पूर्ण प्रजासहित वनगमन करना.)

अंक २ रा. सीन नं. २२. (निषादका राजदरवारमें विराजमान होना.) चौबोला धुन किदाग ताल पंजाबी ठेका. (तर्ज- नरे काले देव रे।) रनधीर-हाथ जोड विनती करूं, चरण निवाऊं माथ । चित्रकोट गवने भरत, सेन अमित है साथ ॥ तरकस कटि सब वीरके, हाथ कठिन कोदंड । जात उतायल बाज गज, कांप रहा ब्रह्मांड ॥ बलवीर-केकइसुत है मंदमति, भरत सकल अबमूल । अति कठोर निर्लज्ज है, चले विश्वप्रतिकूल ॥ रनवीर-भरत संम चतुरंगिनी, सेना अमित अपार । राम संग प्रिय बंधु एक, और सिया सुकुमार ॥ निषाद-विषवेल कदापि अमी फल नहीं देगी, अबुलमें सदैव शुलही लगेगी, भरतके मनमें अवश्य कुचाल है, मूर्ख यह नहीं जानता कि रामचंद्रजीका स्वरूप दुष्टोंके वध कर- नेको भयानक काल है, मेरे शूरवीर ! देखो दुनिया में सदा कोई नहीं रहा है, सबको कालने भक्षण किया है, उन पुरुषोंको धन्य है जोस्वामीके निमित्त शरीर त्यागन करते हैं, रणभूमिमें शत्रुके हाथसे मरते हैं, भाइयो। देर न लगाओ, जलदी सुरस- कि तीरपर जाओ, सम्पूर्ण नौका जलमें डुबाभो, भरतके सन्मुख होकर युद्ध करो, जीते जी श्रीगंगाजीसे पार न उतरने

७६
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
दो, देखो जो मर गये तो मोक्ष पाओगे और जो भरतको
जीत लिया तो शुरवीर कहाओगे.
सेना-महाराज | आपके प्रतापसे पीछे पैर नहीं घरेंगे,
पृथ्वीको रुंडमुंडसे भरेंगे,सियावर रामकी जय उच्चारण करेंगे,
भरतकी सम्पूर्ण सेनाके प्राण हरेंगे.
(युद्धके बाजोंका बजना, बांई ओरसे छींकका होना.
सुखेन-महाराज । सगुन परीक्षा तो यह कहती है कि,
भरतसे रार नहीं होगी, क्योंकि वाम अंग छींक होना यह
बताता है कि भरत निष्कपट महाराजसे मिलने जाता है.
निषाद-अच्छा नेट सजाओ और तुम सब योधा श्रीसुर
सरीके तीरपर जाओ जिस समय मेरा अनुशासन पाओ
भीटी सम्पूर्ण नौका जलमें डुबाओ और सजग होकर
नाश बनाओ.
(निषादका भेंट लेकर चलना.)
सीन नं. २३.
(भरतजीका प्रजावासियोसहित सुरंगवीरपुरके निकट आना.)
ठुमरी जैजैवंती.
(तर्ज-आंगनमें मत सोवे री सुंदर आजकी रैन चंद्र गहगो।)
भरतजी-
दोष देहूं कहुँको जगमाही मैं केवल अनस्थकर मूला ।
मूढ मंद खल अधम अभागी लोक वेदश्रुतिपथप्रतिकूला ॥

अंक २रा. मोर जन्मते राम राज तज वसत विपिन सह आतप सूला। धिक २ मात कहूं का तोको भई दिनकरकुल विटप बसूला ॥ (निषादका भेंट धरके दंडवत् करना.) सुमन्त-महाराज : यह गुहराज श्रीरामचंदजीका सखा है इसकी प्रीतिके कारण रघुनाथजीने प्रथम दिवम उस कुशाकी साथरीपर विश्राम किया है. (भरतजीका आनन्द होकर निपादको कंठ लगाना और कुशाकी साथरीको प्रदक्षिणा करना और श्रीजानकीजीकी एक मस्तककी बिदी सांथरीपरसे उठाकर भरतजीका सीसके लगाना.) भरतजी-हे मन्या ! जिस समय यह कनकविंद श्रीजन- कननिन के मस्तकपर विराजमान थी तो सुरजकी नाई प्रकाशवान् थी आज श्रीजानकीजीके विरहमें द्युतिहीन हो रही है. देखो कैसी नलीम हो रहा है. हाय महाराज के वियो- गमें जड वस्तुकीनी यह दशा ह, मेरा कैमा कठोर हिया है कि प्रियबंधुका वियोग सहता है, निर्दई फट क्यों नहीं जाता है। (भरतजीका भूमिपर गिरना, निषादका उठाना.) निषाद-महाराज ! धीरज धरो, करुणा त्यागन करो, में शीघही आपको सम्पूर्ण प्रजावासियोसहित श्रीगंगाजीसे पार लंपाता हूं, चित्रकोट पर्वतपर ले जाता हूं,श्रीरघुनाथजी महा- रामसे मिलाता हूं. (भरतजीका श्रीगंगार्ज से पार उतारना.) 4

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
19८
सीन नं. २४.
(श्रीरामचंद्रजीका चित्रकोटपर्वतपर पर्णकुटीमें शयन करना.
श्रीजनकनन्दिनीका जगाना.)
ठुमरी.
(तर्ज-वारी जाऊं जो सांवरिया तुमपर वारनाजी)
जानकीजी-
जागो जागो जी महाराज, पक्षी बोलते जी।
देखो उगो हैं पीतम भान, जागो जागो उपानिधान ।
मुनिजन करते कीर्तिगान, वनमें डोलते जी ॥
चकवा चकवी हर्ष मनावे, मिल मिल ईश्वरके गुण मावे ।
पंकज सुन्दर छबि दिखलावें, कलिये खोलते जी ।
(श्रीरामचन्द्रनीका उठकर विराजमान होना लक्ष्मणजी और
श्रीजानकीजीका महाराजको दण्डवत् करना.)
जानकीजी-महाराज ! आज तो रात्रीको एक विचित्र
का नहीं मालूम ईश्वरकी क्या माया है ?
रामचन्द्रजी-माणप्रिये ! विलम्ब न लगाओ, शीघही
सम्पूर्ण स्वम सुनाओ.
दोहा।
सहित प्रजा परिजन प्रिय, भरत दुखित अति दीन ।
चित्रकोट आये मनहु, कशतनु परम मलीन ॥
मातु सकल देखी प्रभु, दुखित आनु अनुहार।
तबते अति व्याकुल जिया, कल न परत खरारि ॥

अंक २ रा.
रामचंद्रजी-
नीक स्वपन नहिं बन्धु यह, अवश होय कुछ हान ।
दोष काह दोजे प्रिय, विधिगति अति बलवान ॥
(रामचन्द्रजीका प्रियवन्धुसहित नान करके मुनिगणके संग
पर्वतपर विराजमान होना और उत्तरदिशाकी ओर
निहारके चकित होना.)
रामचंद्रजी-उनगदशा विलोकह का कारण प्रिय बात ।
खग मृग परा पक्षी विकल, देखो भागे आत ॥
(एक भीलका आकर दण्डवत् करना.)
भील-चित्रकट आवत भरत, महु अपार ।
करत कुलाहल वीर साधि पदचर असवार ।
रामचंद्रजी-कवन हेतु आवत भर, तह नियबंधु विचार ।
रथ गज वाहन सङ्ग हैं, पदच औ असवार ।
लक्ष्मणजी-
कुटिल कुटिलता ना तजे, नाहिं निचाई नीच ।
कदली काट तौ फरे, कोटि यतन बरु सींच ॥
मधुर असन दे पालिये, वायस अति अनुराग ।
होवें कबहुँ कि नाथ शठ, मूढ निरामिष काग ॥
राजनीति नहिं भरतमन, आनी नाथ सुजान ।
तब कलंक लिया जगतमें, अब हो जीवन हान ।
महाराज ! दुष्ट भरतने यह विचार किया कि श्रीरघुना-
थीको चौदह वर्षका वनवास तो दिवा दिया, परन्तु जो

श्रीरामजानकीजीचरित्र । अवधि बिताकर आनन्दयुत आ जायेंगे तो अवश्य अयो- ध्यानाथ कहावेंगे इस कारण उचित है कि इस कुअवसरमें रघराजकी हानि बनाऊं और फिर अकंटक राज्यका आनन्द उठाऊं, निस्संदेह राजनीति तो यही है जो भरतने विचार करी है, परन्तु मूर्खने यह नहीं सोचा कि रघुपतिका एक सवक उसकी सम्पूर्ण सेनाका नाश कर देगा, दोनों भाइयोंको संग्रामशय्यापर सुला देगा. ( महाराजके चरणोंमें दण्डवत् करके ) महाराज! आपके प्रतापसे भरतको शत्रुघ्नसहित यम- लोकमें पहुँचाऊंगा, सम्पूर्ण योधाओंको रणसागरमें बहाऊंगा, जो कुटिल बन्धुको वध करक न आऊंगा तो कदापि धनुष हाथमें न उठाऊंगा. आपका सेवन न कहाऊंगा. ( श्रीरामचन्द्रनीका लक्ष्मणजीको कण्ठ लगाना.) स्त्री-प्रिय बन्धु ! तुम्हारे पराक्रमको सम्पूर्ण ब्रह्माई जानता है ऐसा कौन है जो तुम्हारे क्रोधसे भय नहीं मानता है, परंतु हे लक्ष्मण ! भरत कदापि अनुचित कर्म अलंकका भाजन नहीं बनेगा. ( श्रीजानकीजीका फल फूलका दोना भरके देना.) जानकी-लक्ष्मण ! आओ बहुत दिवस बीत गया है. कुछ मधुर फल खाओ. ( लक्ष्मणजीका जानकीको दण्डवत् करके फल फूल भोजन करना.)

अंक २ रा.
८१
सीन नं. २५.
(भरतजीका सम्पूर्ण प्रजावासियोसहित चित्रकूट के निकट माना
भार महाराजके चरणकमलकं. चिह्नकी रेनुकाको शीशपर रखना
भोर पर्वतको दण्डवत् करना.)
गजल धुन विहाग ताल कवाली.
(तर्ज-गस्त न तुझके आई यार बेठार्म.)
भरतजी-पर्वत पहाड कंदरा, तुमको है धन्य धन्य ।
विन वाण फिरें जापे मिया राम और लषन ॥
बडागी कोल भील यह पक्षी पशु मृगन ।
विचरें जो रुङ्ग रामके आनन्द मन मगन ॥
उपवनका शोभा कीर्ति को करे वर्णन ।
जामें रहें रमापति यह भाग्यवंत बन ॥
हाय जगतमें कौन अयोध्याती अमागन ।
त्यागी जो सिया रामने मुझ दुष्टके कारन ।
प्रिय निषाद ! ऐसा न हो कि श्रीरामचन्द्रजी मुझ अभा-
मीका आगमन सुनके चित्रकूट त्याग दें, किसी और वनमें
वास कर लें.
निषाद-नहीं महाराज ! चिन्ता न करो, देखो पर्वतकी
शिखरपर फुलवारीके मध्य श्रीजनकनन्दिनी फिरती हैं, अपने
चंद्रमारुपी मुखारविंदसे सम्पूर्ण पर्वतको प्रकाशित करती है.
(भरतजीका श्रीजानकीजीको दंडवत् और शीघ्रताईसे
निषादसहित पर्वतपर चढना.)
भरतजी-
दोहरा.
मूढ मन्दमति कुमति मैं, पशु परिपूरणकाम ।

१.
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
त्राहि त्राहि आरतहरण, जनसुखदायक राम ।
मोसम छीन न दीनहित, तुम समान रघुनाथ।
शोकहरण संशयदलन, करहू मोहिं सनाथ ॥
(श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय बन्धु और भार्यासहित पर्वतकी शिखरसे
उतरकर भरतजीको कण्ठ लगाना और सब माताओं और प्रजावासियों
सहित आश्रमपर आना.)
कौशल्याजी दोहा।
पुत्र तुम्हार वियोगमें, भूपवि तज्यो शरीर ।
भरत विकल पारजन विकल, कौन बँधावे धीर ।
रामचन्द्रजी-आह सूर्यवंशी कुलका सूर्य अस्त हो गया,
सम्पूर्ण अयोध्यामें अंधेर छा गया, मैं अभागी अन्वसमय
विकटनी न पाया, हाय पिय पिता मेरे वियोममें प्राण गँवाया.
वसिष्ठजी-हे राम! तुम तो बुद्धिमान हो, सम्पूर्ण विद्याके
निधानाहो, वैर्य धरो, कोई ऐसा उपाय करो कि जिससे
ज्यों का कल्याण हो, तुम सद्गुणकी खान हो.
रामचन्द्रजी-महाराज ! जो आप आज्ञा दोगे सोई
स्वीकार करमा, सत्यवतसे विमुख न बनूगा.
दोहा।
भरत दुखित अति विकल है, सुनो राम अक्वेत ।
तुम करुणाकर धर्मध्वज, मेहु कठिन कलेश ।
रामचन्द्रजी-प्रिय भरत सोचो जिस धर्मधुरंगरलेली-
रको तो साग रिया परन्तु सत्यवतका पालन किया, देखो

अंक २ रा. ८३ सोनी अवश्य उचित है कि उस प्रतापीके वचनोंका पालन करें, धर्मसे न मिरे, यद्यपि अनेक प्रकारके कष्ट सहें, भस्तनी-अच्छा महाराज ! यह कृपा करो, कोई ऐसा अक्लम्ब दें कि जिसके आसरे चौदह वर्ष बिताऊं, अवधि- रूपी सागरसे पार हो जाऊं. रामचन्द्रजी-पिय बन्धु ! मेरी यह पादुका ले जाबो, उनसे ध्यान लगावो, माताओंको धीर बंधावो, प्रजाका कष्ट मिटायो, मैं चौदह वर्ष बिताकर आनन्दयुत आऊंगा, गुरु- जीके चरणकमलमें सीस निवाऊंगा, तुमको कण्ठ लगाऊंगा, देखो जो शीघही अध्योध्या न जावोगे, कुछ दिन मेरे समीप बनमें वास बनाओगे तो प्रिय प्रजावासी कष्ट उठावेमे, नैनोंसे नीर बहावेंगे. (भरतजीका महाराजकी पादुका सीसपर धरके श्रीरामचंद्रजी और जानकीजीको दण्डवत् करना, सम्पूर्ण अयोध्यावासियोका दैव- मायाके वश होकर महाराजसे मिलकर अयोध्योका गमन करना.) सीन नं० २६. (भरतजीका अयोध्याके राजसिंहासनपर महाराजको पादुकाको विराजमान करना.) भारतजी-प्रिय शत्रुहन ! तुम राजभवन में रहा करो और मामूर्ण मावाओंकी चरणसेवा किया करो. शत्रुहन-अच्छा महाराज | आपकी भाज्ञा पालूंगा, भाताभोंकी सेवामें मन लगाऊंगा.

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
भरतजी-( गुरुजीसे ) महाराज ! मैं चौदह वर्ष नन्दी-
ग्राममें बिताऊंगा, अपने हाथसे एक सुन्दर वाटिका बनाऊं-
गा. जब प्रिय बन्धु अवधि बिताकर आगे तो उसके मधुर
फल खावेंगे, इस कारण महाराज ! आप संपूर्ण प्रजाका
पालन करें, सबके शोक हरें.
( भरतजीका गुरुजीसे दण्डवत् करके नन्, ग्राममें कठिन
तपस्या करना.
।
,
सीन नं. २७.
(श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय बन्ध और भार्यासहित चित्रकूट पर
विराजमान होना, नारदजीका आना.)
गजल धुन जिला ताल काली.
( तर्ज-भवे तानी है खंजर हाथमे है तनके बेटे हैं।
नारदजी-
कहा रसना सियावर रामकी जय, और शिरी लछमन ।
पाप अवहारी, मुनिजन संत मनरंजन ॥
मतदा दह नर धारी, तेरी जय हो खरआरी।
मेरे मनमें बसे निशिदिन, श्रीरघुकुलपतिनन्दन ।
पितु मातके कारन, किया मुनि वेष है धारन।
सहा वा विपत आतप, फिरो सीतासहित पन वन ।
सकल कलिमलकलुषभंजन, दलन खल भक्तमन चन्दन ।
(ड्रापसीनका धीरे धीरे गिरना.)
द्वितीय भाग समाप्त.

नाटकधर्मप्रकाश
अर्थात्
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
वनकाण्ड तृतीय भाग।
अॅक्ट नं. ३.
सीन नं. १.
( श्रीरघुनाथजीमहाराजका श्रीजनकनन्दिनीसहित पंचवटीमें
गोदावरीनदीके तीर पर्गकुटीमें विराजमान होना और देवतागणका
भाकर स्तुति करना.)
अंग्रेजी वजन.
(तर्ज-तोरी छलबल है न्यारी तोरी कलबल है न्यारी ।)
देवतागण-प्रभु तुम हो खरारी, मेटो चिन्ता हमारी,
प्रभु लीला तुम्हारी, है अपरम्पार ।
कीजो हमको सनाथ, नावे चरणों में माथ,
प्रभु दीनोंके नाथ, टारो भूमिभार ॥
सुनो सुनो स्वामी, अंतर्यामी,
करें तेरे सिवा कासे जाके पुकार ।
हमें निश्चर सतावें, पापी निसदिन जलावें,
चंदन हम कहां जावे स्वामी हाहाहाहाहाहाहाहाहा ।
(सुरसमूहका दंडवत् करके चला जाना.)

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
(सूपनखा रावणकी भगिनीका सुन्दररूप धारण करके महारा-
नके सन्मुख हाथ जोडकर खेडा होना.)
राम-सुन्दरी ! तू कौन है और किस कारण इस मम्भीर
बनमें विचरती है?
सूपनखा-महाराज ! मैं सुकुमारी राजदुलारी अबतक
कुमारी हूं, परन्तु अब दासी तुम्हारी हूं.
राम-मुझको नहीं ऐ भामिनी! खाहिश है तुम्हारी, मौजूद
है मुझ पास तो यह सुन्दरी नारी.
सूपनसा-दासी मुझेभी लो बना यह अर्ज लीजे मान,
बरन अभी महाराज ! मैं खोदूंगी अपनी जान.
राम-( लक्ष्मणनीकी तर्फ हाथ उठाकर ) वह देख पुरुष
खूबरू बैठा है माहजबीं, लाखोंमें लाजवाब है सानी कोई
नहीं, उससे कहो तुम हाल सब जावोअब उसके पास, शायद
क्षेत्री। पूरी हो तेरी आस.
गजल धुन जिला बिहाग ताल कवाली।
(तर्ज-गमसे जिगर है जलता नैनोंसे नीर जारी।)
। लक्ष्मण के निकट जाकर)
सूरत प्यारी प्यारी दिलमें बसी तुम्हारी।
चितवनकी अब कटारी मेरे लगी है कारी॥
मुंह चांदसा तुम्हारा मुझको लगे है प्यारा ।
भूली हूं काम सारा जाऊ मैं तुमपर वारी ।

संकरा.
लेलो मुझेगी साथ अब तुमपर फिदा हूं नाथ
अब जौंडूं मैं दोनों हाथ अब चेरी मैं हूं तुम्हारी ॥
लक्ष्मणबी-मुझसे न होगी पूरी, खाहिश अनार तेरी।
तू मान बात मेरी, अपनी करे क्यों खारी।
मैं तो हूं दास उनका रघुराज नाम जिनका ।
प्रभूही करेंगे पूरी, मनकामना तुम्हारी।
(सूपनखाका श्रीरामचंद्रजीके समीप आना.)
चौबोला धुन किदारा ताल पंजाबी ठेका ।
(तर्ज-सुन रे काले देवरे।)
सूपनखा-तुम स्वामी महाराज हो, मैं चरणकी धूल ।
हाथ जोड आगे खडी, मुझको करो कबूल ।
राम-ऐ तिरया तुमसे कहूं, मान मेरी यह बात ।
नहीं वह नौकर है मेरा, वह है मेरा भात ॥
(मूपनखाका फिर लक्ष्मणजीके पास आना.)
सूपनखा-स सूरत और शकलपे, मैं भदकै कुर्बान ।
लौंडी मुझे बनाय लो, नहिं तो खोदूं पान ॥
लक्ष्मणजी-मरे कोई कोई जीये, कोई खोवे जान ।
मुझको इससे गर्न क्या, बतला ऐ नादान ।
सूपनखा-किसमत तेरी खुल गई, मनमें जरा विचार ।
जो मोहित तुझपर हुई, मुझसी सुन्दर नार ।

८८
श्रीराम जानकीजीचरित्र ।
देख तो मेरे रूपको, मैं चन्द लजावनहार ।
करले मुझे कबूल अब, मत कर तू इसरार ।
लक्ष्मणजी-जा अपना रस्ता पकड, क्यों करती तकरार ।
लाखों ठोकर खाय है, तुझसी नार हजार ॥
(सूपनखाका भयंकररूप धारण करके श्रीजानकीनीकी तर्फ
दौडना लक्ष्मणजीका उठकर उसका नाक काट लेना.)
सीन नं. २.
(खरदूषणका दरबार में बैठना और सूपनखाका रोकर सिंहास.
नके आगे गिरना.)
सूपनखा-है लानत तेरे ताकत बलको भाई ।
तेरे होते मेरी यह मति बनाई ॥
कालो किमने सताया प्यारी खाहर ।
गा, अभी सिर उसका जाकर ॥
सुपनखा-चली जाती थी मैं जंगल में भाई।
अजदीक दण्डकवनके आई ॥
नहा दखी में बैठी एक औरत ।
निहायत खूबरू थी हूरसूरत ॥
खडी में हो गई उस पास भाई।
और पूछा क्यों तू इस सहरामैं आई।
उसी दम दो जवां रानाने आकर ।
कलाई पकडली मेरी दबाकर ॥

अंक ३रा.
--
दिया फिर जोरसे झटका उन्होंने ।
जमीपर बादमें पटका उन्होंने ॥
बहुत मारा मुझे दोनोंने मिलकर ।
एवज ले उनसे भाई जल्द चलकर ।
खर-मेरी तीरो कमां अब जल्द लावो ।
बहादुर और दलेरोंको बुलायो ।
करो सामान जलदी जंगका अब ।
चलो हमराह मेरे मिलके तुम सब ॥
(युद्धके बाजोंका बजना खरदूषणको राक्षसी सेना
लेकर चलना.)
सीन नं. ३.
(श्रीरघुनाथजीका बन्धु और भार्यासहित पर्णकुटीमें
विराजमान होना.)
ठुमरी धुन जिला ताल पंजाबी ठेका ।
( तर्ज-एक चतुर न कर कर सिंगार )
जानकीजी-
कैसी छाई घटा अब काली घोर तुम देखो नाथ पूर्वकी ओर।
हुमा नाथ आज इंदरका राज बदराकी गर्न सुन कूकें मोर ॥
मगनकी डार देखो खरार ऐसी पौडी आत जैसे भागे चोर ।
पक्षी अपार मुँह फारफार देखा तो नाथ कैसा करते शोर ॥
बिजली करके बादल गर्जे चन्दन सुन जिवरा डरत मोर ।

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
रामचन्द्रजी-
नहीं है यह घटा दिल प्यारी जान,आवें दुष्ट मूढ सोने अपने पान
पायनकी घुर नामें भरपूर, दिखत है सोई पारिरसमान ।
सेना अपार आवेप्पारी नार, बिजली से चमकर उबवान।
बिजली करके नहीं ना गर्ने, कूदे हैं सुमट बायें निशान ॥
सब करते शोर दिखलाते जोर, भावे मुझसे लाने मूर्स नान॥
लक्ष्मणजी-हुकम अब दीजे महाराज ! मुझको, अभी
मारूं मैं रणमें जाके सबको.
रामचन्द्रजी-तुम अब सीताको लेकर माई जावो,
किसी जाअमनसे इसको बिठावे वहां होशियार रहना तुम
बिरादर, करूंगा जंग मैं उनसे यहांपर.
(लक्ष्मणजोका श्रीजानकीजीको लेकर पर्वतकी कन्दरामें छप
जाना, राक्षसी सेनाका महाराज रामचंद्रजीको घेर लेना.)
अंग्रेजी वजन.
(तर्ज-जैसी करनी वैसी भरनी.)
राक्षसीसेना-
मारो मारो पकडो इसको नहीं जाने पावे जिन्हार।
दौडो दौडो इसके पीछे भाग न जावे यह मक्कार ।
घरोघेरो मिलके इसको करदो तीरोंकी बूछार ।
हमपर तीर चलता है यह डालो जल्दी इसको मार ।
करता है हम वार डरता नहीं मकार ।
सिर इसकालो उतार खंजरसे जल्द पार ।
--

मंकरा. अबतकमी है. अकडता, हमसे नहीं यह डरचा । आता है कार करता, हो जावो होशियार । ( महाराज रामचन्द्रके वानोंसे पीडित होकर राक्षसी सेनाका पृथ्वीपर गिरना.) हाय मारे हारा खाये कैसे बचायें अब हम जां। वाय क्यों लडने हम आये जान गवाई आके यहां । बह तो मालिक उलमौत है भाई नहीं यह हरमिज इन्सान । हमसे लडै मैदान जंगमें आदममें यह ताव कहां ॥ (खरका घायल होकर विलाप करना.) गजल धुन सोहनी. (तर्ज-मरहवा ऐ आशिक सादिक हमारे मरहवा. ) खर-तूने हाय पापन बहन हमसे कबका यह बदला लिया। मेरे सब कुटम परवारको अब रनमें आह खपा दिया। कलं आह क्या तदबीर अब मेरी फूटी है तकदीर अब । मेरे मर गये सब सूरमा नहीं जिन्दाहा एकभी रहा ॥ हाय सोचूं क्या जाऊं कहां उठनेके नहीं काबिल रहा । मेरे भाई राषन जल्द आ अब मरता हूं मुझको बचा। (राक्षसी सेनाका प्राणत्याग कर मुरलोकको प्राप्त होना. श्रीना- नकीजीका और लक्ष्मणजीका कन्दरासे निकलकर महाराजको दर- पत करना. भारदनीका आकर महाराजके गुणानुवाद करना.) भजन. नारदजी- सियावर रामगुण मावो, भवसागर पार हो जावो। भको रघुनाथ रघुराई, यही फल जन्मका भाई ॥

काट लिया.
परी जिन्नो मलक हूर, बता तू जल्द नाम अब उसका मुझने,
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
कहो जय हो सियापरकी, जो मार्ग मुक्तिका पावो।
यह सब झूठा है संसारा, यूंही फैला है अंधियारा॥
नहीं कोई बंधू सुत दारा, क्यों फँसके मोहमें भरमायो।
सीन नं. ४.
(सूपनखाका रावणके लंका में जाकर विलाप करना.)
रावण-हैं हैं बहन ! जल्द बता बता तेरा नाम किसने
गजल धुन सोहनी.
( तर्ज-जान दी उल्फतमें तूने हाय प्यारे मरहबा.)
सूपनखा-हाय भाई क्या कहूं, मुझको बहुत आजार है।
एक जवां बदमस्तने मुझको किया अब खार है।
मैं कहा उससे बहुत, हमशीरा हूं रावनकी मैं।
रौब मानें उसका सब, लंकाका वह सिर्दार है ॥
तब कहा यह उसने, न छोडूंगा तुझको अब तोहें।
डर मुझे रावण नहीं, कहती तू क्या हरबार है ।
जब किया इसरार मनें, तब तो उसने नाकमी।
काट नशतरसे लिया, अब जिंदगी हा खार है ।
रावण-मेरी बाकत सभी दुनियामें मशहूर,
.
डरें मुख
चखाऊं मैं मजा अब जाके उसको.
सूपनखा-किसी राजाके दो फरजिंद खुरातर,
रहे सह

अंक ३ रा.
राय दण्डकवनमें भाकर, उन्होंनेहीं है काटा नाक मेरा, नहीं
डर दिलमें माना कुछभी तेरा, खर और दूषण मेरी इमदाद
आये, बहुतसी फौज अपने साथ लाये, लडे आकर वह भाई
उनसे रनमें, मंगर मारे गये सब एक छिनमें.
रांवण-नहीं तायन है यह इन्सांमें जिन्हार, कर जो
मेरे खादिमसभी तकरार, खर और दूपन बहादुर सरमा थे,
बलो ताकतमें मेरेही समान थे, हुई ताकत यह इन्सांको कहांसे,
कि मारा उनको रनमें तन्हा आके.
, सूपनखा है उनके साथ एक सुकुमार पियारी, नहीं
देखी कोई जैसी वह नारी, तक मैं कर उसकी बडाई,
गजब आंखें अजब मुंहकी सफाई, वह दौलते हुशनसे है
बसके मामूर, खिजल हो देख उसकी शकलको हूर.
रावण-रखो दिलमें तसल्ली तुम ऐ रबाहर, किसी सूरतसे
लाऊं उसको जाकर.
(रावणका दरबारसे उठकर चला जाना.)
सीन नं. ५.
(मारीचका सागरके तरि बैठना, रावणका आना.)
मारीच-कहो सैर्यतसे हो शाहे जहां, सबब क्या है जो
भाप भाये यहां.
रावण-हमें आज एक काम तुमसे पडा, जो कर दो तो
होभहसां हमपर बडा.

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
ऐ
लक्ष्मणजी-ऐ माता मेरी सुनो, अर्ज करूं सिर नाय।
कुछ दहशत मानो नहीं, कुशलसहित रघुराय ॥
जानकीजी-मतकुछ देर लगावे अब, जल्द लखन तु जाय ।
प्राणनाथ पतिम मेरे, मुझसे बिछडे हाय ॥
लक्ष्मणजी-इस वनमें माता फिरें, दुष्ट निशाचर घोर ।
नहीं जाऊं मैं छोडके, कहूं दोऊ कर जोड ॥
ठुमरी धुन खम्माच ताल पंजाबी, ठेका.
( तर्ज-राम बिना आराम नहीं.)
जानकीजी-
आज अलमका रोज विधाता बचों मुझको दिखलाया है।
दुष्ट तुम्हारा क्या मैं बिगा। विपतामें मोह सताया है
मैं देख विचारा या संसारा नहीं साथी दुखमें पाया है ।
लछमन हट जावो मुँह ना दिखावोक्यों वनमें संग आया है।
चंदन मर जाऊं, अवधन जाऊं क्या मन में तेरे कमाया है।
लक्ष्मणजी-न गुस्सा दिलमें तुम मानाजी लावो, न
रंजो गमकी यह बातें सुनावा, तेरे माता चरण सिरसे लगाऊं,
अभी महाराजके मैं पास जाऊं, यह रेखा बैंच देता हूं यहांपर,
न आना इससे तुम माताजी बाहर.
(लक्ष्मणनीका श्रीजानकीजीको दण्डवत् करके चला जाना. राव
णका मुनिरूप धारण करके आना.)
चौबोला धुन किदारा ताल पंजाबी ठेका.
(तर्ज-सुन रे काले देवरे.)
रावण-रे भिक्षा मोहे सुंदरी मैं भूखा दरवेश ।
सदा याद ईश्वर कर देख बढे हैं केश।

अंक ३ रा. सीन नं. ६. - (श्रीरामचन्द्रनी महाराजका लक्ष्मणजीसहित पर्णकुटीमें विराज- गन होना, श्रीजानकीजीका फुलवाडीमें टहलना, मृगरूप मारी- का आना.) जानकीजी-मृग यह कैसा सुन्दर आज आया, सुन- हरी जिसकी है महाराज काया, चर्म इसकी मुझे अब लाके जे, अर्ज महाराज मेरी मान लीजे. रामचंद्रजी-ऐ भाई तुम यहांपर रहना हुशियार, मैं लाता हूं अभी इस मृगको मार. (श्रीरामचन्द्रजीका मृगरूप मारीचके पीछे चलना, मृगका गंभीर इनमें दूर जाकर महाराजका बाण खाकर पृथ्वीपर गिरना और घोर शब्द करके महाराजकी बोलीमें लक्ष्मणजीको बुलाना.) रागनी. (तर्जन जी लगे भवनमें री न वनकी छब सुहावे.) मारीर-हाय प्यारी सीता मुझे घेर अब लिया। इन माळमोंने मुझको तो जखमी बना दिया ॥मैं क्या करूं कैसे पाचूं लछमन तू जल्द आ । बेवश हूं हाथ पैर बन्धे मुझको लाडातर्कश तो छिन गया मेरा खंजरभी न रहा। मुंह भाजलके में हूं हा भाई मुझे बचा ॥ प्यासा मेरे खूका यह भाहसफाक है खगा। आ दौड जल्द भाई मेरे देर ना लमा । सीन नं.७. (श्रीजानकीनीका लक्ष्मणजीसहित पर्णकुटीमें विराजमान होना.) दोहरा-तल थाप. जानकीजी-हाय मुसीवतमें फंसे, मेरे प्राण आधार । जाडो बसन तुम जल्द अब, बुरी करी करतार -- श्रीरामजानकीजीचरित्र। (रावणका जटाकी फांसी गलेमें डालना. श्रीजानकीका दौर- कर बाहर आना.) पद धुन मांड ताल दादरा. (तर्ज-प्यारी बात हमारी मानो.) रावण-ईश्वर अजब है तेरी माया तेरा भेद न काहू पाया। चंद लजावनहार सुन्दर कैसी छैल छबीली । मन है चकित देखके मोरा नैना परम रसीली । सुंदर मोहनी रूप दिखाया, ईश्वर अजब है तेरी माया ॥ जानकीजी- जोगी ईश्वर ध्यान लगावो, परत्रिम देख न पार चढावो जप तप संयम नेम करो, और ईश्वरके गुण गावो ॥ परनारीको निरखके स्वामी, काहे धर्म घटाबो। सिरपै पापकी पोट बघावो, जोगी ईश्वर ध्यान लगायो । रावण-नहीं साधू प्यारी में रावण हूं तेरे कारण आया। छोडके रजधानी लंकामें जोगी वेश बनाया ॥ तेरा रूप मेरे मन भाया, तज तब राजपाट मैं आया। जानकीजी- आवन चहत हैं अब रघुराई, निज आश्रमको जावो । नहीं मानो जो वचन हमारा, तो पाछे पछतावो ॥ अपने घरको तुम फिर जावो, काहे नाहक जी ललचायो । ( रावणका श्रीजानकीजीको बरबस रथमें बिठा लेना, जानकी- जीका विलाप करना.)

अंक ३ रा.
आज द्वारे सुन्दरी तेरे निकला आन ।
भोजन ना मैंने किया निकले जावे पान ।
जानकीजी-फूल रहा उपवन सुनग मुनो गुसांई नाथ ।
खावो फल अब जायके तुम्हें निवाऊं माथ ॥
रावण-मैं साधु हूं सुन्दरी तेरा जला कर भगवान ।
नहीं फल तोडूं हाथसे चाहे निकल जां प्रान ॥
( श्रीजानकीजीका भिक्षा देना.)
रावण-भिक्षा दे तो सुन्दरी। बाहर आकर दे, बन्धी हुई
इस भीखको यह जोमी नहीं ले.
जानकीजी-बाहर आनेका नहीं हुकम मोहे ऐ नाथ,
लेलीजे फल फूल यह कहूं जोडके हाथ.
(रावणका आसन मारकर पृथ्वीपर बैठ जाना.)
रागिणी.
( तर्ज-मैं कबकी धनमें डौलं जाये बोल बोल बोल.)
रावण-मेरे भूखसे निकले जावें सुंदर पान पान पान ।
मोहे क्षुधा लगी है नारी, मिर्मत है काया सारी।
शिक्षा दे मोको नारी, अर्ज यह मान मान मान ।
दिन तीनसे अन्न न खाया, नहीं तर्स किसीको आया।
तेरी जानी न जाये माया, अजब तेरीशान शान शान।
मैं चंदन अब कहां जाऊं, किसके घर अलख जगाऊं।
में फांसी जटाकी खाऊं, खोदे जान जान जान ।

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श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
जटायू-ऐ दुष्ट तू इस नारको दे छोड जल्द अब ।
वरना मैं तेरे सीस भुजा तोड दूंगा सब ॥
रावण-तुझसे परिन्दोंका करूं हररोज मैं शिकार ।
उड जा बचाके जान अब डालूंगा वरना मार ॥
जटायू-मरनेका डर मुझे नहीं जालिम ऐ नाबकार।
पर छोड दे इस बामको यह रामकी है नार ॥
(जटायूका रावणसे घोर संग्राम करना, रावणका जगयूको पायक
करके पृथ्वीपर गिरा देना और श्रीजानक, जीको विमानमें विधकर
माकाशमार्ग से चला जाना.)
सीन नं०८.
(लक्ष्मणजीका श्रीर मचन्द्रजीका वन्में मिलना.)
रामचन्द्रजी-ऐ माई तुमने क्या दिलमें विचारी।
दई क्यों छोड तनहा प्राण प्यारी॥
फिरे हैं दुष्ट वनमें देव बूंखार ।
सतावेगा कोई प्यारीको बदकार ॥
लक्ष्मणजी-कर्मरेखा नहीं मिटती मिटाई ।
न बिगडी बात बनती है बनाई॥
मैं आया हूं यहां मजबूर लाचार ।
खता मुझसे हुई बेशक ऐ खरआर ॥
(लक्ष्मणजीका महाराजके चरणों में गिरमा.)
रामचन्द्रजी-पों होते हो इतने गमगों बिरादर ।
चलो गोदावरीपर हूढ़े चलकर ॥

मंक ३रा.
गजल धुन बिहाग ताल दादरा.
(तर्ज-दुनियाको मैं गारत करूं एक अदना तीरसे)
जानकीजी-मुझसे फिरा है चर्ख सितम्गार हाय हा ।
देखू दिखावे क्या क्या अब आजार हाय हो ।
किसमत तबहीसे फूटी थी जब केकईने आह ।
छुडाया था हमसे सनी घरबार हाय हा ।
क्या पर्दा अकलपर पड़ा अफसोस सद अफसोस ।
लछमनकीजी मानी न मैं गुफतार हाय हा ॥
क्या अब गिला चंदन करे महरूमिये किसमत ।
गुलकी एवज मिला है मुझे खार हार हा ॥
(गृध्रराजजटायूका श्रीजानकीजीका विलाप सुनकर
पर्वतकी खोहसे निकलना. )
मसनवी धुन जोगिया आसावरी ताल पश्तो.
( तर्ज-ऐ गुलबदन चमन तो है लेकिन.)
जटायू-हालत तुम्हारी देख मुझे रंज है कमाल ।
तुम कौन हो क्यों रो रही हो इस कदर बेहाल ॥
जानकीजी-ऐ पक्षी मेरे स्वामी हैं रघुकुलपति महाराज।
तुझसे अगर जो हो सके बचा तू मुझको आज ॥
जटायू-इस दुष्ट मूढ पापीसे बेशक लढुंगा मैं।
मर जाऊं चाहे रनमें न पीछे हटूंगा मैं ॥
जानकीजी-गुजरे है एक पलभी आज जैसे सौ बरस ।
क्यों अब लगावो देर तुम मुझपर करो तरस ॥

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%
१०२
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
गजल धुन बिहाग.
( तर्ज-बेकली है आज दिल किनके लिये)
लक्ष्मणजी-जानकी मिल जायगी धोर्ज परो।
उठके बैठो नाथ क्यों करुणा करो।
ध्यान कीजे वनमें आये किसलिये।
तुम जगत आधार जनके दुख हरो॥
ढूंढकर लावें अभी मावाको हम ।
खोजें सागर कन्दरा भाई चलो ।
सीन नं. ९.
( रावणका श्रीजानकीको अशोकवाटिका में ले जाना.)
ठुमरी धुन जिला ताल पंजावी ठेका.
{ तर्ज-एक चतुर नार.)
रावण-मेरी देख शान और आन बान ।
मुझसा जवान नहीं मिले जान ।
मेरी तर्फ जरा कर प्यारी ध्यान ।
मेरी देख शान.॥
जानकीजी-मूर्ख नदान छोड अब यह ध्यान ।
तेरी देखी शान सब आन बान ॥
लाया है चोर मुझको शैतान।
मूर्ख नदान०॥
रावण-दिलप्यारी जान चितवनके बान ।
तूने मारे तान जावें निकले प्रान ॥

अंक ३रा.
१०१
(श्रीरघुनाथीका लक्ष्मणजीसहित गोदावरीनदीपर आना भौर
पर्णकुटीमें श्रीजानकीजीको न पाना.)
रागिणी धुन देस ताल सोरठ.
इनर्ज-उधो दुनिया रैन बसेरा !
रामचन्द्रजी-
प्यारी सिता प्रान हमारी, अब देश कौनसे सिधारी।
फूल रही अब वनमें सरसों, खिल रही केसरक्यारी ।
मोहे सुहावत नेक न भाई, बिन देखे प्रियप्यारी ।
देख अकेली आके कोई, ले गया प्राण पियारी ॥
कैसे अब जीऊं मैं भाई, यह दुख है अति भारी ।
थी आई वन संग हमारे, प्यारी राजदुलारी।
मोहे भय्या अब दृष्ट आवत, सो सुन्दर सुकुमारी ॥
( महाराजका व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिरना.)
ठुमरी.
( तर्ज-पुत्री नादान बीयाबान त कसे आई.)
लक्ष्मणजी-
जागो महाराज हाय, आज कैसी विपता आई।
खोई वन सीता माई, व्याकुल हैं अब रघुराई ॥
चेहरे जाई छाई, हाये क्या करूं उपाई ।
कहां अब जाऊं, किसे बुलाऊं, विपत सुनाऊं ॥
क्या मैं बताऊं बोलो तो मुखसे भाई ॥
(श्रीरामचन्द्रजी महाराजका उठकर बैठना.)
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श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
जानकीजी-हट पापी परे हट पापी परे।
सुरतको देख मेरा जिवरा जरे ।
पिताने मेरे रचा स्वयंवर आये थे सब शाह ।
तूपी तो मौजूद था उनमें लाया क्यों ना ब्याह ।
हट पापी परे०॥
रावण-रावण मेरा नाम है प्यारी दुनियामें मशहूर ।
दहशतसे डरते हैं मेरी जिन मलायक हूर ॥
प्यारी मानो मेरी०॥
जानकीजी-बनारूप जोगीका मुझको लाया छलके आज ।
देखी तेरी शानो शोकत आती क्यों ना लाज ॥
इट पापी परे॥
रावण-मेरी ताकत बाजको सब जाने है संसार ।
करले मुझे कबूल ऐ सुन्दर मत कर तू इस रार ।
प्यारी मानो मेरी॥
जानकीजी-मत कर ऐसी बातें मुझने होशमें आ नापान ।
मेरे स्वामी है ऐ पापी रामचन्द्र भगवान ॥
हट पापी परे०॥
सीन नं. १०.
(श्रीरामचन्द्रजीका श्रीजानकीजीके वियोगमें पर्णकुटीके
सामने लक्ष्मणजीसहित बैठना.)
रामचन्द्रजा-जरा मेरा धनुष तो उठाकर ला,
तीक्ष्ण

मंक ३ रा.
मेरी अर्ज नार अब ले त मान ।
दिलप्यारी जान० ॥
बानकीजी-हट बेशहूर रहो मुझसे दूर।
कर दिलमें गौर जो था तो जोर ॥
क्यों बना मुनी मांगी भीख आन ।
मूर्ख नदान० ॥
रावण-कर मुझसे बाम तू अब कलाम ।
ऐ नेकनाम तेरा मैं गुलाम ॥
अब काहे करे प्यारी गुमान ।
मेरी देख शान ॥
जानकीजी-पति भर्ता नार मैं हूं विचार।
मत दे आजार मूर्ख गंवार ।
तोसे न बोलूं चाहे खोदूं जान ।
मुर्ख नदान॥
ठुमरी।
(तर्ज-शबो जानी मी.)
रावण-प्यारी मानो मेरी प्यारी मानो मेरी।
मोहिन हुवा देख सूरत तेरी॥
तेरे कारण प्यारी मैंने सजा जोग सामान ।
महल चलो आराम करो अब देखो मेरी शान ॥
प्यारी मानो मेरी०॥

श्रीरामजानकोजीचरित्र । अब तो अंतसमय हो रहा है, प्राण कंठ भा रहा है, अपना सं दिखावो, भवसागरसे पार लंघावो, दुष्ट रावणने मेरी यह दशा करदी है, उसी मूढने जनकनन्दिनी हर लई है. रामचन्द्रजी-घबराओ मत मैं तुम्हारा सम्पूर्ण दुख हर लूंगा, तुमको अमर कर दूंगा. जटायू-महाराज ! जिसका नाम लेनेसे मोक्ष प्राप्त होता है, भवसागरमे नय्या तिर जाती है, सोई प्रभु साक्षात् दृष्ट आ रहे हैं, पूर्ण चन्द्रमारूपी कंवलवदन दिखा रहे हैं, इस कारण मैं अब इस नाशवान् शरीरको नहीं चाहता हूं, चरणार- विंदमें सिर झुकाता हूं. छंद । रामचन्द्रजी- परहित बसे जिन तात मन तिनको जम दुर्लभ कहा। परहितके कारज कारने तुम तात दारुण दुख सहा ॥ तन त्याग अब मम धाम गवनहु जाय जहां जोगी मुनी। इहते अधिक नाहीं कछु का देऊं मैं तोको गुनी । दोहा। सीताहरण सुतात जनि, कहो पितासन जाय । जो मैं राम तो कुलसहित, कहै दशानन आय ॥ (जटायूका प्राणोंको त्यागन कर देना.)

अंक ३रा. १०५ बाणोंका तर्कश मेरी कमरमें सजा, मैं अभी इस पंचवटीको बाणोंसे पूरित कर दूंगा, ब्रह्माकी सृष्टि को मारकर मरूंमा. लक्ष्मणजी-महाराज । क्षमा करो. जानकीजी मिल जायगी. रामचन्द्रजी-हाय चन्द्रवदनी, मृगनैनी, गजगामिनी, पिकबैनी, जनकनन्दिनी! तेरे वियोगमें संपूर्ण ब्रह्मांड विपरीत हो रहा है. चन्द्रमा अनि बरसा रहा है, कवली विपिन कुन्त- बन दृष्ट आ रहा है, शीतल पवन उरगश्वासके समान चलती है, पंचवटीको देखकर हृदयमें विरहकी अग्नि उत्पन्न होती है, यह वही पर्णकुटी है जिसमें मेरी प्राणपियारी किलोल करती थी, अपने पूर्णचन्द्रमारूपी मुखारविंदसे रतिकी छविको इरती थी. ( महाराजका लक्ष्मणसहित घनमें विचारना.) रामचन्द्रजी-लक्ष्मण! देखो यह रुधिर कैसा बह रहा है। लक्ष्मणजी-महाराज | किसीका संग्राम हुआ है. रामचन्द्रजी-देखो तो यह सामने कौन पडा है, इसीके शरीरसे तो शोणित बह रहा है. लक्ष्मणजी-महाराज ! यह तो गृद्धराजजटायू है. रामचन्द्रजी-हाय मेरे पिताके मित्र ! यह तुझपर कैसी विपता आई किसने तेरी यह गति बनाई ? बटायू-हे प्रभु, दीनबंधु, रक्षक भगवान् कपानिधान ।

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
गजल.
(तर्ज-कोई ऐसी सखी चातर न मिली.)
जानकीजी-
अरे पापी त बातें बनाता है क्या,
तेरी चालोंमें मूर्ख न आऊंगी मैं ।
चाहे कितनाही करले तू जौरो सितम,
अपना धर्म न हरगीज घटाऊंगी मैं ॥
तूने समझा है क्या जरा होशमें आ,
किसी औरको जाके यह धमकी दिखा।
मैं तो सब कुछ सहूंगी यह रंज अलम,
अपने कुलके न दाग लगाऊंगी मैं ॥
मुझे नादां क्या दहशत दिखाता है तु,
किसे मरनेके डरसे डराता है तू ।
अभी पायाही,चाहें है रघुकुलपती,
पापी तुझको मजा अब चखाऊंगी मैं ॥
तूने जालिम सताया है संसारको,
प्रभु अब तोरेंगे भूमिके भारको।
में तो आई हूं वनमें इसी कारण,
तेरे कुलकाभी नाश अब कराऊंगी मैं ॥
(ड्रापसीनका धीरे धीरे गिरना.)
तृतीय भाग समाप्त.

यंक ३रा.
सीन नं. ११.
(रावणका मशोवाटिकामें श्रीजानकीजीसे मोहबतभरी बातें करना.)
रागनी।
( तर्ज-होवे जैजैकर )
मानकीजी-
पापी मूढ जा पापी मूढ जा पापी मूढ जा मोहे ना सता ।
सुन ऐ नादां खोदूं अब जां ऐसी बातें ना मोको सुनावो ।
दूमी तो था स्वयंवरमें आया तोडा धनुष ना उठा।
पापी मूढ जा पापी मृद जा पापी मढ जा० ॥
लाया छलके जोगी बनके शानो शौकत ना अपनी जतातू ।
क्यों था जोगीका वेश बनाया रनमें ना काहे लडा ।
पापी मूढ जा० ॥
गज न आवे मुंहमी दिखावे हट ऐ मूर्ख ना मोको ।
चला तू करता फिरता है नारोंकी चोरी नादांन बातें बनाए
पापी मूढ जा पापी मह जा० ॥
ठुमरी ।
(तर्ज-दहीवालीका तौर दिखाना. )
P
विसमें बसी बसी मेरे भोली भोली सूरत तेरी प्यारी।
सदर चितवन मनको भावन तेरी तिर्थी जूं बौँ ।
देसी देखी अनोखी तू नारी ॥ दिलमें बसी० ॥
गोरी मारी बयां निबुवा छतियां, मुखचन्दा मोहे दिखला।
बहो मेटो मेरी आहो जारी ॥ दिलमें बसी मेरे ॥

११०
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
प्रभुताई ॥ धनुषवाण दोनों चढाये हुये हैं, क्रोधित हैं नैनो
है भरुनाई । मेरे षधका वालिने भेजे न हों यंह, कहो भाई
क्या मैं करूं अब उपाई॥
हनुमानजी-महाराज ! चिन्तासागरमें न पडो, भैय
परो, मैं अभी जाता हूं, सम्पूर्ण भेद लेकर आता हूं.
सुग्रीव-भाई। विलम्ब न करो, शीवही मेरी दुचिताई हरो
सीन नं. २.
(श्रीरामचन्द्रजीका प्रियवन्धुसहित उपवनकी शोभाको देख.
कर दुःखित होना.)
मजल धुन जिला विहाग.
(तज-गमसे जिगर है जलता नैनोंसे नौर जारी.)
रामचन्द्रजी-
देखो भाई लछमन, कुशमित विटप मनोहर ॥
प्यारी वसंत शोना, फले फले हैं तरुवर ।
विकसे हैं कुंज नाना, शोजित परम सरोवर ॥
मृगी मृगनके वृन्दा, मेरी करें हैं निन्दा।
देहैं मोहे सिखावन, ले सङ्गकरनी करिवर ॥
(हनुमान्जीका विप्रवेशमें आकर दंडवत् करना.)
हनुमानजी-महाराज! आप कौन हैं, आपके तो चक्र
वर्तीक चिह्न हैं, यह तो बडा गम्भीर वन है, भूमि अनि
कठिन है, किस कारण पर्वतोंपर विचरते हैं. मार्गमें अने
प्रकारके कष्ट सहते हैं.

नाटकधर्मप्रकाश
अर्थात
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
किष्किंधाकाण्ड चतुर्थ भाग।
अॅक्ट नं. ४.
मीन नं.१
(सग्रीषका ऋष्यमूकपर्वतपर हनुमान्जी आदिक वानरीसहित
ईश्वरके गुणानुवाद गाना.)
भजन.
( तर्ज-आत्मामें गंग बेहे क्यों न मन न्हावे.)
सुग्रीव-दीनबंधु दीनानाथ नाम तो कहावे हैं ।
जीव जंतुका आधार, बेडा करे सबका पार ।
मोकोभी ले अब उनार, बार क्यों लगावे है ॥
निरासको तू भास दे, मुनिजनक्लेशको हरे।
एक छिनमें कासे का करे, को पार तेरा पावे है ।
घरणी गगन जल थल बसे, सबमयही तेरा रूप है।
चंदन कहे सगुन स्वरूप, मोको नाथ भावे है।
(सुग्रीवका पूर्वदिशाकी ओर देखकर भयभीत होना.)
गजल धुन देसकार ताल चाचर.
(तर्ज-जवानीमें क्या होमा जोबन किसीका.)
गहभाते हैं दो कौन देखो ऐ माई। कोई सर्मा हैं दिस

-- ११२ श्रीरामजानकीजीचरित्र। सीन नं. ३. (सुग्रीवका ऋष्यमूक पर्वतपर विराजमान होना.) मजन घुन मांड. (तर्ज-बादिला वेगी आयो जी) सुग्रीव-मेरी दहनी भुजा फर्कत है ईश्वर काज बनावेगा। अब शगुन तो यह है कहता सब मिटेगी मनको चिन्ता। कोई बने सहायक मेरा नय्या पार लंघावेगा। हनुमान अंजनीजाया, नहीं मुडके अबतक आया। है चौदा विध्यानिधान, मित्रता उनसे करावेगा। ( हनुमान्जीका श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजीसहित आना.) हनुमानजी-( रामचन्द्रजीसे ) महाराज ! यह मेरे स्वामी सीवनामी, किष्किंधापुरीके नायक हैं, जो इस आप- चिकालमें आपके सहायक हैं. (सुग्रीवसे) राजन् ! यह बलनिधान श्रीमान् महाराजा राजादशरथनृपति अयोध्या- पुरकि कुमार, मुनिजनके रखवार भूमिका भार उतारने और आपजैसे प्रेमीजनोंको उभारनेके कारण इस महावनमें विचरते हैं, गोद्विजके निमित्त संकट सहते हैं सो आप इनके मित्र बनें, यथाशक्ति सहायता करें, (हनुमानजीका अग्नि प्रगट करना और सुग्रीवका पावक साखी देकर रामचन्द्रजीसे मित्रता करना.) दोहरा ताल थाप. सुग्रीव-अहो भाग्य रघुरान मम, धन्य पड़ी है आज । जा मोपर किरपा करी, दीनबंधु महाराज ॥

अंक ४ था.
रामचन्द्रजी-रेखा कर्मको आह न मिटती है मिटाई,
कौशलपुरीके भूपके हैं पुत्र हम भाई, इस वनमें पिताजीके
वचनोंका पालन करने के कारण आये थे और अपने सग
अपनी सुन्दर रूपवती चीनी लाये थे, सो उसको कोई दुष्ट
चुराके ले गया, खोजा पहाड कंदग पर खोज न चला.
हनुमान्जी-यह मामने पर्वन जो दृष्ट नाथ आता है,
स्वामी मेरा सुग्रीवनामी इसपर रहता है, उससे मिलो वह
वह काममें महाराज अवेगः, भेजेगा दूत सब जगह वह सुधि
मंगावेगा।
रामचन्द्रजी-माई : मैं किस प्रकार उससे मिलूं ? सहा-
यता लूं, वह क्यों मेरा नहायक बनेगा, संकट सहेगा ?
हनुमान्नी-महाराज ! कुछ संदेह न करो, अवश्य
उससे मिलो, क्योंकि वही एक दुष्टका मताया हुआ है,
उसकि भयमे अपने आपको उसने पर्वतपर छुपाया हुआ है,
सो महाराज ! उसको अभय करें, वहभी तन मन धनसे
श्रापका चरणसेवक बनेगा, निश्चय आपकी प्राणप्रियाका
खोज करेगा.
(हनुमान्जीका अपना असलरूप प्रगट करके दंडवत् करना.)
हनुमान जी-महाराज ! मुझको अपना सेवक बनाओ,
मेरी कांधपर विराजमान हो जाओ, मैं आपको अपने स्वामीके
पास ले चलूंगा, उससे आपकी मित्रताई कराऊंगा.
(हनुमानजीका महाराज रामचंद्रजीको लक्ष्मणजीसहित
अपनी कांघपर विराजमान कर लेना.

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
लक्ष्मण-श्रवणकुंडल नाथ ना पहचानुं मैं।
यह अवश्य नूपुर सियाकी मानूं मैं ॥
मुख नहीं देखा प्रभु माताका मैं।
कुंडले शोजित रहे थी कानोंमें ॥
चरणों में दंडवत् निशिदिन में करूं।
इसलिये नूपुर वहीं यह मानूं मैं ॥
( रामचन्द्रजीका श्रीजानकीजीके आभूषण हृदयसे लगाना.)
आनावरी।
( तर्ज-मृगाने खेत उजाडा जतन बिन.)
रामचन्द्रजी-
सिया प्यारी केहिं विध पाऊं हाय सीता कैसे तोको पाऊं।
कित खोजूं किस देशमें जाऊं कौन उपाय बनाऊं ॥
ढूंढ चुका बन खोह कंदरा कमे भेद लगाऊं ॥
आह प्यारी जनकदुलारी ! तू किस दुष्टका त्रास सहती
होगी निशिदिन चिन्तामें रहता होगी?
( महाराजका विकल होकर भूमिपर गिरना, सुग्रीवका उठाना.)
सुग्रीव-महाराज ! धीरज धरो, करुणा त्यागन करो, मैं
शीघही कोई उपाय बनाऊंगा, आपकी प्राणपियाका खोज
लगाऊंगा.
रामचन्द्रजी-अच्छा प्रिय मित्र ! प्रथम तो यह बताओ
मेरा संदेह मिटावो, कि तुम किस कारण इस पर्वतपर बसते
हो, अनेक प्रकारके केश सहते हो, चिन्तामें रहते हो !

अंक ४ था. ११३ सेवक हूं महाराज मैं, जोरूं दोनों हाथ । दया करी मो दीनपे, दर्श दिया जो नाथ ॥ वन है प्रभु गम्भीर यह, कैसे आये यहां । समझावो महाराज तुम, अब जावोगे कहां। रामचद्रजी-मेरी प्यारी नारको, ले गया कोई चोर । खोज मोहे पाया नहीं, ढूंढा चारों ओर ॥ विधुवदनी मृगनैनी है जनकमुता सुकुमार । अधर अरुण दामिनद्युति, मुखमा अंग अपार ॥ (मुग्रीवका पर्वतकी कंदरासे अंजानकीजीके आभूषण लाना.) सुग्रीव-महाराज ! में एक दिवम इम पर्वतपर बैठा कुछ विचार कर रहा था, बडा दुःसित हो रहा था, क्या देखता हूं कि कोई दुष्ट एक रूपवनी बीको आकाशमार्गसे ले जा रहा है, नाना प्रकारसे उस परिवताको सता रहा है, वह विचारी कुररीकी नाई विलाप कर रही थी, उसके कमल- वोंसे जलधारा बह रही थी हा राम ! हा लक्ष्मण । बार बार कर रही थी, मुझको देखकर उसने अपने आभूषण गिरा दिये थे, सो रघुराज ! मैंने इस खोहमें यत्नपूर्वक रखवा दिये थे, अवश्य वोह आपकी नार्या जनकनन्दिनी थी, जो सम्पूर्ण जीवजन्तुओंसे सहायता माग रही थी. रामचन्द्र-लक्ष्मण ! देखो क्या यह आभूषण मेरी जनकदुलारीके हैं ? (लक्ष्मणजीका आभूषण लेकर देखना.)

अवश्य ११६ श्रीरामजानकीजीचरित्र। सुग्रीव-महाराज आपका तो सत्यवचन हैं, परन्तु वालीका वध अतिकठिन है, वालि बडा शूरवीर है, संग्राममें अतिरणधीर है, आजतक किसी भी यह सामर्थ नहीं हुई है कि उससे युद्ध करे, उसके प्रहारको सह सके. रामचन्द्र-सखा मेरा वचन मृषा न होगा, मैं वालिका वध करूंगा, जो कदापि संदेह हो तो परीक्षा ले लो, जिस प्रकार तुमको विश्वास हो सोकर लो, सुग्रीव-देखो महाराज ! वह जो सात ताडके वृक्ष चन्द्र- मंडलाकार दृष्ट आ रहे हैं, जिनमें नवीन पत्ते लहलहा रहे हैं, जो उनको एकही बाणसे गिरा दोगे तो मेरा सन्देह मिटा दोगे. ( श्रीरामचंद्रजीका सातों वृक्षोंको एकही बाणसे गिरा देना.) सुग्रीव-महाराज ! आप अवश्य वालीपर जय पावोगे, उसको रणभूमिमें सुलावोगे. रामचंद्र-मखा ! विलम्ब न करो शीघही चलो. (सुग्रीवका श्रीरामचंद्रजी और लक्ष्मणसहित चलना.) सीन नं. ४. (पालीका राजमंदिरमें अपनी स्त्री ताराके संग प्यार करना.) सुग्रीव-दुष्ट वाली ! तू कहा छुपरहा है, क्या कर रहा है, सन्मुख तो आ, सुग्रीवसे हाथ मिला, आज तुझको रणभु- भिमें मुलाऊंगा, छोटे भाईकी स्त्रीसे प्यार करनेका मजा चखा- ऊंगा, तेरे रुधिरसे अपनी कोधरूपी अमिको शान्त बनाऊंगा, ( वालीका क्रोध करके चलना, ताराका भुजा पकड लेना.)

अंक ४ था.
चौबोला धुन किदारा ताल पंजावी ठेका.
(तर्ज-सुन रे काले देव रे.)
सुग्रीव-सुनो श्रीमहाराजजी, दीनबंधु भगवान ।
मेरा भाई वालि एक, शूर वीर बलवान ।।
उसने है मुझको दिया, घरसे नाथ निकाल ।
छीन लिया मेरा सभी, राजपाट धन माल ॥
इस पर्वतपर शापवश, नहिं आवत महाराज ।
तदपि रहूं भयभीत मैं, निशिदिन श्रीरघुराज ॥
रामचन्द्रजी-सोच सखा त्यागन करो, सकल सवारो काज ।
एक बाणसे मार हूं, मैं वालीको आज ॥
जे न मित्र दुखतें सखा, हो हैं जीह दुखार।
तिनहिं विलोकत हानि अति, होय है पातकभार ॥
आपन दुख गिरिसम जिहीं, जानहिं धूरसमान ।
मित्रका दुख रज मेरु सम, कहैं श्रुति वेद पुरान ॥
गुण प्रगटें निज मित्रकर, अवगुण करहिं दुराव ।
देत लेत मन शंक नहीं, यह सतमित्र स्वन्नाव ॥
आगे कह मृदु वचन प्रिय, पाछे अनाहित हान ।
असको मित्र संग त्यागहु, जो चाहो कल्यान ॥
मुग्रीव-प्रभु स्वामी मैं दास हूं, चरण निवाऊं माथ।
महाघोर रणधीर है, वाली सुनो भम नाथ ।।
रामचन्द्रजी-चिन्ता त्यागहु हे मसा, देखा व.न कराल ।
प्राणघात करहूं अवशि, मैं वालीका काल !"

११८ श्रीरामजानकीजीचरित्र। है मेरा है यह काल. नहीं जाऊंमा लडने मैं तो अब नाथ, करो मुझपर कृपा जोडूं मैं यह हाथ. रामचन्द्र-सखा एक रूप हो तुम दोनों भाई, नहीं पह- चान तुममें कुछभी पाई, इसी कारण नहीं मैं मारा उसको, यह माला पुष्पकी पहराऊं तुझको. (रामचन्द्रजीका अपनी कण्ठकी पुष्पमाला सुग्रीवके कण्ठपर शोभित करके अपने करकमळसे सुग्रीवके अंगके स्पर्श करना.) अभय होकर करो तुम युद्ध प्यारे, बनाऊंगा मैं सब कारज तुम्हारे. सीन नं. ६. , ( बालिका रणभूमिमें गर्जना.) वालि-मेरा पराक्रम सम्पूर्ण ब्रह्मांड जानता है, सुग्रीव मेरा क्या कर सकता है, दशकंधर रावणभी मुझसे डरता है. सुग्रीव-नहीं नहीं, सुग्रीव नहीं डरेगा, अभी तुझसे युद्ध करेगा, तेरे प्राण हरेगा. (सुग्रीवकः बालिसे मल्लयुद्ध करना, महाराज रामचन्द्रका पालीके हृदयमें बाण मारना, वालीका व्याकुल होकर भूभिपर गिर रामक न्द्रजीके दर्शन करना.) वालि-महाराज! आप तो मर्यादापुरुषोत्तम पूर्ण ब्रह्मअवतार मुनिजनोंके हितकार हो, मुझको व्याधकी नाई किस कारण वध किया, कौनसे अपराधका दण्ड किया? रामचन्द्रजी-देखो मूर्ख । मैं समझाता हूं, तेरा अपराध बताता हूं, जो पुत्र और छोटे भाइका स्त्री, भगिनी और

अंक ४ था.
११७
लानी धुन विहाग ताल काली.
(तर्ज-मुख चन्द्रकासा नैना तेरे कटारी.)
तारा- प्राणप्यारे कंथ चरण सिर नाऊं।
सुन गुप्त भेद एक तोहे कंथ समझाऊं ।
है राजा दशरथ एक अवध बलकारी।
और उसके हैं दो पुत्र महाबलधारी ।
सुग्रीव करी है उनसे मित्रता मारी।
प्रभु युद्ध करनसे हानि होगी थारी।
यह मानो मेरी विनय चरण सिर नाऊ ।
सुन गुप्त मेद एक तोहे पति नमज्ञाऊं।
वालि-मेरा वालि प्यारी नाम भुनाब र जाने ।
प्रिय तारा सुन्दरी काहे वृथा भय माले ॥
मैं बिन ईश्वर नहीं किसी प्यारी हार ।।
वैरीको जाके अबही रममें मारुं ॥
में जाके अबही युद्ध बीच ललकार ।
और तोड तीन शत्रुको भूमिरर डारूं ॥
मेरा नाम जगत ख्यिात पिया त जाने ।
मेरी प्यारी तारा काहे भय माने ।
सीन नं.५.
( सुग्रीवका पर्वतपर रामचन्द्रजीको दण्डवत् करना.)
सुग्रीव-मैं तुमसे था कहा रघुवीर कपाल, नहीं यह भाई

१२०
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
सोचूं क्या जाऊं कहां सूना लगे सारा जहां ।
जीके हाये क्या करूं मरूं मैंनी सिरको फोडके ।
पुत्र अंगद लाडला रोवे पति तरा खता।
हाय तुम तो चल वसे सब नेह नाता तोडके ॥
रामचन्द्रजो-तारा! क्यों विलाप करती है, मोहमें
पडती है, देख मैं तुझे समझाता हूं, तेरा संदेह मिटाता हूं, ध्यान
पर मेरी वाणीको श्रवण कर.
दोहा।
क्षिति जल पावक औ गगन, एक मिलाप समीर ।
पञ्चरत्नसे है रचा, यह सुन अधम शरीर ॥
सो तन तो आगे पडा, वृथा रही तू रोय ।
जीव नित्य सुन ल मिनी, तामु नाश नहिं होय ।
दाह देह पतिकर करो, त्यागहु चिंता नार ।
सदा न थिर कोई रहे, नाशमान संमार ॥
(सुग्रीवका वालिके मृतक शरीरको दाह देना.)
सीन नं. ७.
( अंगदका राजसभामें विलाप करना.)
। अंगद-हाय ! इस दुनियाकानी अजब रंग है, निरालाही
म है, कहीं मातम होता है, कहीं शादीका डंका बजता है,
कोई शोकवश आंसू बहाता है, कोई हर्षयुक्त आनन्द मनाता
है, एक जानसे जाता है, एक राजपदवी पाता है, कभी हमनी
The

अंक ४ था. ११९ - कुंवारी कन्याको कुदृष्टि से विलोकता है उसके मारनेका पातक नहीं होता है. मूढ ! तूने अपनी वीजा कहा न माना, यह नहीं जाना कि सुग्रीव मेरी भुजाओंके अधार युद्ध करने आया है, उसको मैनही पठाया है. वालि- दोहा। सुनो राम म्वामी प्रभु, दीनदन्धु खरारि। हरि अजहूं मैं पातकी, अन्त शुरण हूं तिहारि ॥ (रामचन्द्रजीका वालके संसके अपने करकमलसे स्पर्श करना.) रामचंद्रजी-अचल करूं तोह बात मैं, राखू तेरे प्रान ! वचन मृषा नहिं होय मम, दहुँ जीव तोहे दान । वालि-जिसके नाम के स्मरण करनेसे जोव मोक्ष पाते है, संसारसागरसे बिना श्याम पार उतर जाते हैं सोई प्रभु इस अन्तसमय मुझ को साक्षात् दृष्ट आते हैं, अपने मुखार- विदसे कोमल वचन सुनाते हैं, हे प्रभु ! इस कारण अब मुझको इस शरीग्में प्राण नहीं चाहते हैं. गजल सोहनी. ( तर्ज-मरहवा रे आशिक सादिक हमारे मरहबा.) बारा-चल दिये हाय पति मुझको तडपती छोडके। स्वर्गका माग लिया दुनियासे मुँहको मोडके । हा पिया व्याकुल जिया फटता नहीं मरा हिया। आंख खोलो देखो पीतम मैं कहूं कर जोडके ॥

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
तारा-हे महाराज ! यह राज्य तो सुग्रीवकोही उचित है,
मेरा हृदय तो केवल इस भयसे कंपित है, किं राज्यमद सुग्री-
बको मतवारा न बनादे, मेरे पुत्रका शत्रु करा दे.
लक्ष्मणजी-नहीं तारा ! यह कदापि नहीं होगा, राज्यमर
सुप्रीवको कभी मतवारा नहीं करेगा, आवो सुग्रीवको किल्कि-
धापुरीका राजतिलक करावो और अंगदको युवराज बनावो.
(लक्ष्मणजीका सुग्रीवके राजतिलक करना.)
ठुमरी.
( तर्ज-मजा देते हैं क्या यार तेरे बाल घूघरवाले.)
बामा-सुख सम्पति नित नो हो तेरी प्रजाके बसानेवाले ।
सोहे शिरपर सुंदर ताज मुखछाया जगतमें आज ॥
हो दूना तुम्हारा राज्य सबका कष्ट मिटानेवाले।
कहो राम राम सिया राम भजो निशि दिन आठों यामा
ईश्वर सिद्ध करे सब काम हमको सुख दिखानेवाले ।
सीन नं. ८.
(श्रीरामचंद्रमहाराजका लक्ष्मणसहित पर्वतपर विराजमान होना.)
रागिनी.
( तर्ज-यह जग है गोरख धंदा.)
रामचन्द्रजी-वर्षाऋतु सुंदर आई देखो प्रिय लछमन भाई ।
नभ उमड घुमड गरजत है मेहा रिमझिम बरसत है ।
चहुँ ओर घटा है छाई वर्षाऋतु सुंदर आई ॥

अंक ४ था. १२१ गुवराज कहाते थे, प्रजावासी सिर झुकाते थे, आज कोई यहभी नहीं पूछता है, कि तू क्या करता है, जीता है या मरता है. तारा-आह मेरे लाल ! क्यो बिलक बिलककर रोता है, पान खोता है, सब कर, जो ईश्वरको मंजूर है वहीं होता है, सोचेसे क्या बनता है. अंगद-हाय माताजी ! मैं क्योंकर न रोऊ, आंखोंसे मांसू न बहाऊं, जालिम ! तने क्या किया, वाली जसे शूर- वीरको खपा दिया, छर करके मरवा दिया, आह जरामी न तर्स आया, भाई केही रुधिर मे क्रोधरूपी अनि को शांत बनाया, बस अब मेरा सिरशी तलवार से उडा दे, उस हमेशा सोनेवाले- की गोदमें सुला दे, अस्मान ! त क्यों नहीं फट जाता है, हा यह तखता जमीन किसवारने नहीं उलट जाता है ? ( अंगदका भूमिमें गिरना लक्ष्मणजीका उठाना.) लक्ष्मणजी-हे अंगद ! क्या करता है, क्यों घबराता है, इस दुनियामें अमर कोई नहीं रहा है, सबको कालने खाया है, एक दिन हमकोभी चलना है, सदा स्थिर नहीं रहना है, वरा चचा सुग्रीव निर्दोष है, इसकोभी बडा क्लेश है, पर क्या परे ? कर्ममति बडी बलवान है, तेरा किधर ध्यान है, बस कर, ठंडी ठंडी आह न जर, मैं अनी तुझको राजतिलक रिचा हूं, महाराजसे आज्ञा लाता हूं.

१२४ श्रीरामजानकीजीचरित्र। मुंहसे चन्दा शर्मा नाजो अदां निराली। जुल्फें काली नाग हैं भवें तरी शमशीर । चितवन तेरी तीर हैं जांय कलेजा चीर ॥ आहाहा सुन्दर प्यारी ओहोहो जोबनवारी। सुरत है मोलीनाली कैसी चञ्चल चलती चाल ॥ ( मयंदका मयभीत आक र दण्डवत् करना.) मयंद-हाय । अब क्या होगा, किस प्रकार हमार। प्राण बचेगा? सुग्रीव-क्यों क्यों शीघ्र बता क्या हुआ विलम्ब न लगा. मयंद-महाराज ! लक्ष्मणनी बड क्रोध भरे आ रहे हैं, बाण धनुषमें चढा रहे हैं, ललकारके सुना रहे हैं कि क्षणभ- रमें किष्किधाका नाश करूंगा, सपके प्राण हरूंगा. सुग्रीव-हाय क्या करू, कहां जाऊं, किस प्रकार प्राणों- को बचाऊं. तारा-महाराज ! धीर्य धरो, चिंता न करो, मैं लक्ष्मण- जीका क्रोध निवारण कर दूंगी, विनती करके मना लूंगी. सुग्रीव-हनुमान् ! तुमभी ताराके संग जावो, जिस प्रकार बने लक्ष्मणजी के कोध की अनिको शांत करावो. (हनुमान्जीका तारासहित चलना.) सीन नं. १०. (लक्ष्मणजीका सुग्रीवके द्वारपर क्रोधवन्त आना.) लक्ष्मणजी-मैं इस किष्किंधापुरीको अनिवाणसे भस्म

अंक ४ था.
१२३
है
दामिनि करकत है घनमें दादुर ककन है वनमें ।
जल पूरित नदी तलाई वर्षाऋतु सुंदर आई ॥
नव पल्लव विटा अनेका शोजिन नडाग सर सरिता।
बहे त्रिविध समीर हाई वर्षाऋतु मुंदर आई ॥
कुसुमित वन भोः उपवन मोहे नेक न भावे लछमन ।
हाये सुधि मीता नो पाई वर्षाकनु मुन्दा आई ॥
सुधीवने मोहे विम.ग न ममदमें हुवा भतवारा।
नहीं खोज प्रिया करबाई वर्षाकनु सुंदर आई।
लक्ष्मणजी-प्रभु में किष्किंधा जाऊं जो आयमु तुम्हरी पाऊं।
सुधीवने छ र किया भारी मिला राज कोष पुर नारी॥
लोभ मोहमें अंधा मुर्खको मैं ममझाऊं ॥
जो कपट मित्रम करेगा मा संकट विपत भरेगा।
धनुषबान कर मेरे मैं रघुपति श्चात हाऊं ॥
रामचंद्रजी-प्रिय बात नगरमें जावा केवल यही दिखलायो।
सुग्रीव सखा है मेरा बन गया कामका चेरा।
अवगुण चितम नहि लावा प्रिय बात नगरमें जावो ।
हुवा
सीन नं.९.
(मुग्रीवका राजभवनमें तारा आदि स्त्रियोंसे प्यार करना.)
ठुमरी.
( तर्ज-चलती चपला चंचल चाल सुन्दर बल अलबेली।)
मुग्रीव-कैसी चंचल चलती चाल सुंदर तू मतवाली ।
जोबनरस मदकी माती फिरती कैसी इतराती :

श्रीरामजानकीजीचारत्र ।
सीन नं. ११.
(श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय जानकीके वियोगमें पर्वत पर
दुःखित विराजमान होना.
गजल धुन बिहाग ताल कवाली,
(तर्ज-गमसे जिगर है जलता नैनोंसे नीर जारी.)
रामचंद्रजी-दुखमें न कोई संगी मतलबका सब जमाना ।
जाको बनावो अपना वहही बने बेगाना ॥
सुखयाके सबही साथी बन जावें लाखों नावी ।
दुखियाको या जगतमें मिलता नहीं ठिकाना ॥
ईश्वर काहूपे विपता करके कृपा न डारें।
सब यार मित्र प्यारे करते फिरें बहाना ॥
( सुग्रीवका लक्ष्मणजीसाहेत आकर दंडवत् करना.)
सुग्रीव-महाराज ! तरी मायाका अमित विस्तार है, कि
जिसके वशमें सब संसार है, तेरी लीला अपार है.
दोहरा।
श्रीमद वक्र न जेहिं करे, प्रभुता बधिर न जाह ।
मृगनयनी के नयन शर, लगे न धन्य है ताह ॥
(रामचन्द्रजीका सुग्रीवको कंठ लगाना.)
गजल घुन जिला कल्यान ताल पेइता.
( तर्ज-घरसे यहां कौन खदाके लिये लाया मुझको. )
रामचंद्रजी-तूने तो मित्र मोहे दिलसे भुलाया हाय ।
कैसी विपतामें मोहे ईश्वरने फंसाया हाय ॥

यंकरा ४ था.
१२९
बनाऊंगा, सवको यमलोकका पंथ दिखाऊंगा, सुमीवको
मित्रद्रोहीका दण्ड दूंगा, मूर्ख के प्राण हरूंगा.
(ताराका रानभवनसे निकलकर लक्ष्मणजीको दण्डवत् करना.)
-
तारा-महाराज | क्रोध निवारो, हम दीनोंकी ओर
निहारो, अपराध क्षमा करो, इम अबलापर छपा करो,
सुधीव महाराजका सखा है, इस समय बडा भयभीत हो रहा
है, हम पामर जीव अतिकामी हैं, प्रभु कपासागर स्वामी हैं,
पासोंके अवगुण चित्त न लावो, चरणकमल फेरकर इस
स्थानको पवित्र बनावो.
(लक्ष्मणजीका तारामहित भवनमें प्रवेश करना, हनुमानजीका
चरण धोकर लक्ष्मणजीको कमल शय्यापर विराजमान करना, सुग्री-
पका सीस निवाना.)
सुग्रीव-महाराज ! विषयरूप मदिराने मुझको मतवारा
बना दिया, सत्यवतमे विमुख करा दिया, हे दोनबन्धु नाथ !
क्षमा करो, मेरी बुद्धि की मलिनताई हरो.
(लक्ष्मणजीका सुग्रीको कंठ लगाकर प्यार करना.)
लक्ष्मणजी-माई ! विलम्ब न करो, ऋष्यमूकपर्वतपर
चलो, श्रीरघुराजसे मिलो.
(सबका चलना.)

१२८
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
सीन नं. १२.
(पानरोंका श्रीजानकीजीको खोजते हुए महावनमें आना
और तृषासे व्याकुल होना.)
गजल धुन जिला ताल कवाली.
( तर्ण-भवे तानी हैं खंजर हाथमें है तनके बैठे हो.)
पानरगण-तृषासे प्राण ऐ भाई रहे अब कण्ठ में आई।
अधर सूखे जिया व्याकुल अंधेरी आंखोंमें छाई ॥
नहीं कोई कूप दृष्ट आवे सरोवर तो कहां पावे !
चला अब तो नहीं जावे हृदय में पीर आधिकाई ।
मरे बिन मौत इस वनमें लगी है आग अब तनमें ।
तपै धरणी गगन सारा मृतु हमको यहां लाई ॥
(वानरोंका विकल होकर भामिपर गिरना, हनुमानजीका एक
पर्वतकी शिखरपर चढकर चारों दिशाओंमें दृष्टि करना.)
इनुमान्जी-भाइयो । सामने जो एक पर्वतकी खोह
दृष्ट भाती है वह यह बतलाती है कि उसमें अवश्य कोई
जलका आश्रम है, क्योंकि उसके पार चक्रवाक आदिक
जलजन्तु उडते हैं, किलोल करते हैं, सो धीर्ज धरो, चलो
उस खोहमें प्रवेश करो, भगवान् सम्पूर्ण क्लेश हरेंगे, हमारी
सहायता करेंगे.
(सबका पर्वतकी कंदरा में प्रवेश करना.)

अंक ४ था.
१२७
सोचं क्या जाऊ कहां तडपूं हूं व्याकुल निशिदिन ।
खूब विपतामें मेरे काम तू आया हाय ॥
जीव मर्म है यूंही करता है सो सो तदवीर ।
लेख कौका नहीं मिटता मिटाया हाय ॥
गजल धुन देसकार ताल चावर.
। तर्ज-अब समर्गका गम है जिदा वशरको । )
सुग्रीव-चहूं दिश विदिशको मैं वानर पठाऊं।
में जल्दी सियाजीकी सुधि अब मंगाऊं ॥
सकल खोह सरिता नदी कन्दरा गिर ।
वन और देश परदेश खोज अब कगऊं ॥
तनो स्वामि चिन्ता धरो धीर रामा ।
बुलाऊं मैं योषा न बार अब लगाऊं ॥
प्रिय हनुमान ! योधागण बुलाबो, माताजीकी
सुध
लमावो, चारों दिशाओम जावो.
(वानरगणका भाकर सुग्रीवको दण्डवत् करना.)
सुग्रीव-देखो मन कर्म और वचनमे जतन विचारो,
जिस प्रकार बने जानकोजोका खोज लगावो, मास दिवसमें
मुडकर आवो, जो कदापि जनकनन्दिनीका खोज नहीं करोगे.
अवर्धाको यूंही बितावोगे तो सम्पूर्ण मेरे हाथ से मारे जावोगे,
(हनुमानजीका रामचन्द्रजीको दण्डवत करना.)
रामचन्द्रजी-मेरी यह मुदिका सीनाको देना, प्रिय
लक्ष्मण कुशलसे है यह कहना.
(सबका दण्डवत् करके चलना.)

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
हनुमानजी-माता ! हम श्रीजनकनन्दिनी श्रीरघुराजको
भार्याके खोजमें फिरते हैं, अनेक प्रकारके क्लेश सहते हैं जो
आपको कुछ सुधि हो तो बतावो, हमारी चिंता मिटावो.
देवांगना-
दोहा।
मूंदहु नैन अब तात तुम, त्यागहु सोच विचार ।
अवश तुम्हें मिल जायगी, जनकसुता सुकुमार ।
मैं अब जावत हूं तहां, बसत जहां रघुराज ।
जाय कमलपद राममें, हर्ष निवाऊं माथ ॥
(वानरोंका नयन मूंदना, देवांगनाका ईश्वरका ध्यान करना.)
सीन नं. १४.
(हनुमान् आदिकका समुद्रके समीप चिंता करना.)
ठुमरी धुन जिला पीलू ताल कहरवा.
( तर्ज-ऊयो दुनिया रैन बसेरा।)
नलनील-सुधि सीताकी नहीं पाई अब कीजे कौन उपाई ।
बीतत हैं दो मास सखा अब कित खोजें हम जाई।
ढूंढ चुके सब ग्राम देश पुर का अब करें उपाई ।
उत्तर कौन देह हम जाके जब पूछे रघुराई ॥
हा विधना जीवें हम केहि विध मरे मौत बिन आई।
मंगद-प्रिय बंधु ! अब तो सागरके तटपर आवो, कुशाके
आसन बिछावो, ईश्वरसे ध्यान लगावो, निराधार बैठकर
पाण मँवावो.

अंक ४ था.
सीन नं. १३.
(देवांगनाका अनेक वाटिकामें ईश्वर का मजन करना.)
अंग्रेजी वजन धुन सिंधुग ताल कवाली.
(तर्ज-जैसी करनी वैसी भरनी करनीको त् कर कर देख.)
देवांगना-
हे दुखमंजन जनमनरंजन दीनबंधु स्वामी खरार ।
कपा करहु हरि मो दासीरे नाथ नहीं अब लावहु वार ।
मैं तुम्हरी शरणागतमें हूं तुम हो दासोंके रखवार ।
पूरहु मन अभिलाष मेरी हरि जीव जंतुके तुम भाधार ।
प्रभु दीनबंधु राम तुमको मेरी प्रमाम ।
मैं मंदमति वाम रटती हूं तेरा नाम ॥
अब तो करो कपा मोहे आस । तेरा।
अपना दर्श दिखा दानीकी यह पुकार ॥
( अंगद हनुमान आदिक वानरगणका आकर दंडवत् करना..)
देवागना-तुम कौन हो, किस कारण इस वाटिकामें
माय हो, किसने पठाये हो ?
हनुमानजी-भामिनी ! हम श्रीरघुनाथ जी महाराजके
द्ध है, इस समय तुषासे अत्यन्त दुखित हैं, आना दो तो
इस सरोवरमें स्नान करें, जल पान करें.
देवांगना-हां हां आनन्दसे मज्जन करो, मधुर फल
भोजन करो.
(वानरोंका भानंद होकर स्नान करके वाटिकाके फलोको भोजन
करना भऔर सबका देवांगनाके निकट भाना.)

१३२
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
है
सम्पाति-यह देखो सिंधु जो खारी बहे है, उसी
मध्यमें लंका बसे है, तहांका भूप है एक दुष्ट रावण, है इस
सिर वीस बाहु खल अपावन, सोई पापी सियाको ले गया
बस अब जावो पता मैं दे दिया है, में तो जाता हूं अब महा-
राजके पास, बहुत मुदतमें अब पूरी हुई आस.
(सम्पातीका पक्षयुत होकर ईश्वरके गुणानुवाद गाना..)
छन्द।
रघुकुलकमल दशरथसुवन दीनोंके तुम्हही आधार हो।
तव नाम जो एक बार ले भवसिंधुसे सो पार हो ।
धरणी गगन जल थल बसो चेतन चराचर नाथ तुम।
खलदलनिकंदन जगतपति दीनों को करहु सनाथ तुम ।
तेरी माया अपरम्पार है छिनमें विपत संकट हरे।
मतिमंद चंदन मोहवश संसारमें मरमत फरे ।
(सम्पातीका आनन्द होकर आकाशमें उड नाना.)
(डापसीनका धीरे धीरे गिरना.)
चतुर्थ भाग समाप्त.

अंक ४ था.
"
सम्पाती-ईश्वर ! तेरी लीला अपार है, तू मम्पूर्ण जीवांका
रखदार है, मैं क्षुधासे अत्यन्त व्याकुल हो रहा था, प्राण
कंठ आ रहा था, परमात्मा ! तोको धन्य है, मेरी चिन्ताको
मिटाया, वानरोंको समुदका तटपर लाया, अब वह सब प्राण
त्यागन करेंगे मेरा भोजन बनंगे.
अंग्रेजी वजन धुन सिंधुग ताल कवाली.
(तर्ज-जैसी करनी वैसी भरनी करनीको त करकर देख. )
वानरगण-देखो देखो तुम एनाई गीध यह सबको खावेगा।
हम तो सब अब पाण तजेमे यह क्षण कर जावेगा॥
मंगद-कहि सोच करो तुम नाई ध्यान धरो अब श्रीममवान।
देखो जटायूने ती त्यागे रानकाज लग अपने प्रान ॥
सम्पाति-
क्यों मन चिन्ना करो वानर निकट मेरे अब तुम आवो।
था वह जटायू मेर। भाई कैमा मरा यह समझावो ।
(वानरोंका सम्पातिके निकट आना.)
अंगद-श्रीसरयूनदीके तीर भाई अयोध्यानामी एक
बसती सुहाई, तहांके राजाके दो पुत्र सुन्दर, रहे मुनिवेष
संकलनमें आकर, सो उनकी स्त्रीको कोई पापी, लिये जाता
था उलकरके प्रलापी, तुम्हारा बंधुनी उससे लड़ा था, उसीके
हाथसे रनमें मरा था, सो उसको खोजते हम रुब फिरे हैं,
विनय तुमसेमी अब एक यह करे हैं, जो तुमको खोज हो
वो कुछ बतायो, हमारी चिन्ता यह भाई मिटावो.

श्रीरामजानकीजीचरित्र।
रात दिन रहती हूं बेदार, चोरोंको जहन्नुममें पहुँचाती हूं
और उनके खूनसे पेटकी आग बुझाती हूं, अभी तुझको
मुल्के अदमका रास्ता दिखाती हूं, चारीका मजा चखाती हूं,
हनुमानजीका लंकनीके मुष्टिक माना और उसका रुधिरसे
पूरित होकर पृथ्वीमें गिरना, हनुमान्जीका लंकामें प्रवेश करना.)
सीन नं. २.
(हनुमाननीका विभीषणके भवनके समीप मलीन मन बैठना.)
ठुमरी धुन जिला पीलू ताल कहरवा.
(तर्ज-उधो दुनिया रैन बसेरा.)
हनुमान्जी-
हाय सोचूं क्या कहां जाऊं कैसे दर्शन सीता पाऊं ।
निश्चर घोर वसे लंकामें किसको हाल सुनाऊं ॥
नहीं कोई सज्जन सन्त न ग्यानी कैसे भेद लगाऊं।
मंदिर मंरिर ढूंढ चुका हूं कौन उपाय बनाऊं ॥
पिन देख सीता रघुपतिको कैसे मुख दिखलाऊं ॥
(विभीषणका अपने भवनमें सन्ध्या करना.)
दोहरा ताल थाप.
विभीषण-हे प्रभु दीनदयाल हरि, कपासिंधु खरार ।
भूमिदुखित मुनिजन त्रसित, बेग उतारो भार ।
(हनुमानजीका विप्ररूपमें विभीषणके भवनमें प्रवेश करना.
विभीषणका हनुमानजीको दण्डवत् करना.)
विभीषण-महाराज ! आप कौन हो, कहांसे आये हो,

नाटकधर्मप्रकाश अर्थात् श्रीरामजानकीजीचरित्र। सुन्दरकाण्ड पांचवां भाग. अॅक्ट नं. ५. सीन नं. १. (श्रीमंजन कुमारका मगरके तीर एक पर्वतकी शिखरपर चर- कर श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करना.) प्रार्थना (तर्ज-आत्मामें गंग बहे क्यों न मन न्हावे.) तुमाननी-दीनबन्धु नाथ स्वामी जगत के आधार हो । मीर जब संतन परी, महाय नाथ तुम करी। स्याल हो मोपे हर्ग सागरमे पार तार हो । पाह पकड मज लिया ध्यान तब करियर किया। भाके तुर्त बचा लिया ऐसे प्रभू खरारि हो । प्रहलादको संकट पड़ा नरसिंहरूप तो धरा । दुष्टसे लिया बचा चन्दनको अब निहारहो ॥ (हनुमानजीका पर्वतसे समुद्रमें कूदना, एक राक्षसका सागर, अमर होना, हनुमान्जीका उसको मारकर सागरके पार जाना और राखपकी राजधानी में प्रवेश करना, लंकनीका रोकना.) संकिनी-ओ नाहंजार मक्कार कैसा बेखौफ किलेमें चालेको हो रहा है तैय्यार, जानता नहीं मैं हरवत हूं होश्यार श्रीरामजानकीजीचरित्र। सो आप छपा करके यह बताव, मेरा संदेह मिटावो, भाप भीरघुनाथजी महाराज के दूत तो नहीं हो, जिनकी प्रिया बनकनन्दिनीको दुष्ट रावण हर लाया है, अशोकवाटिका छुपाया है. हनुमाननी-हा में श्रीजानकी नीकोही खोजता हूं, इस कारण तुम्हारे पास आया हूं कि कुछ सहायता करो, मेरा शहरो, कोई ऐसा उपाय करो कि जिस प्रकार मैं जगज- बनीके दर्शन पाऊं, महाराजको जाकर सुध सुनाऊं. विभीषण-महागज । मैं यह तो नहीं कर सकता हूं कि भापको साथ ले जाऊं, जगजननीसे मिलाऊं, हां सब मेरे सुना सकता हूं, वह स्थान बता सक्ता हूं, जहां श्रीजानकीजी सती हैं, पतिवियोगका संकट सहती हैं. हनुमान्जी-पिपमित्र ! मैं तुमसे यह भेद लेना चाहता है कि वह कौनसा स्थान है, जहां श्रीजानकीजी विराजमान हैं. विभीषण-इस लंकामं एक अशोकवाटिकानामी बा रमणीक स्थान है, जिसकी यह पहचान है कि उस उपवन में विवने वृक्ष लगे हैं, सब फल और पुष्प आदिक लताओंसे लले हैं, सुगंधीसे सम्पूर्ण वन महक रहा है, राक्षसोंका पहरा कम रहा है, उसके मध्यमें गुफाके द्वारे एक सुंदर स्थान बना है, जो सब प्रकार की सम्पदाले भरा है, जहां अनेक राक्षसी सब लिये फिरती हैं, रातदिन उपवनकी रक्षा करती हैं, जो

अंक ५ वां.
१३५
स्पा किसी दुष्टके सताये हो, क्योंकि आपका मन मलीन हो
रहा है इस कारण विदित होता है कि आपपर अवश्य कोई
विपता आई है जो चेहरेपर उदासी छाई है.
हनुमानजी-हां में अन्यंत चिन्नामें डबा हूं, इसी कारण
तुम्हारे पास आया हूं, कि अपनी विपता सुनाऊं और तुमको
सहायक बनाऊं, क्योंकि आप जमे सज्जनांसे की कार्यमें
बाधा नहीं पड़ती है, अवश्य कुछ न कुछ लाम होता है.
मुनिजनने कहा है.
दोहरा-तरुवर सरवर संतजन, चौथे बाइल मेंह।
परस्वारथक कारणे, चारों धारें देह ।
विभीषण-महागज ! मैं तो अति दुष्ट पापी हूं, क्योंकि
निशिचरपुरीका निवामी हूं, परन्तु इस समय मेरे पूर्व
भन्मका कोई पुण्य उदय हो गया है, जो आप जैसे महापु-
रुपने दर्शन दिया है, निस्संदेह मैं तन मन धनसे चरणसेवा
करना, आपका टहलवा बनूगा.
बनुमान्जी-प्रियमित्र ! नीतिशास्त्रमें लिखा है कि जो
सज्जनोंसे दुराव करेगा वह पुरुष नरकका भागी बनेगा.
विभीषण-हां महाराज ! यहभी कहा है.
बोदरा-संतसमागम हरिकथा, जगमें दुर्लभ दोय
सुत बारा और लछमी, पापिनकेभी होय ॥

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
सहूंगी जो पडे विपता नहीं मानूं तेरा कहना।
पतिवतधर्म ना त्यागू न कुलकीरत नसाऊंगी।
मेरे स्वामी हैं रघुराई दय लु नाथ सुखदाई।
मेरा संकट मिटावेंगे उन्हींसे लौ लगाऊंगी।
ठुमरी।
(तर्ज-अत्मामें गंग बहे क्यों नहीं मन न्हाये.)
रावण-मान प्यारी जान मेरी क्यों करे गुमान तू।
कहता हूं मै हाथ जोड बैठे ना त मुहको मोड ।
देख जरा मेरी ओर कर तो उधर ध्यान तू ।
देख मेरी आनबान दे व राजपाट शान ।
छोड दे तपर्वका ध्यान मुझको पती जान तू ॥
अंग्रेजी वजन धुन सिंधुग ताल कहग्वा.
(तर्ज-जैसी करनी वैसी भरनो करनीको त करकर देख.)
जानकीजी-
हट जा मूर्ख पापी नादां मन कर अब मुझसे तकरार।
जोगी बनके लाया छलक शर्म नहीं आती बदकार ॥
देखी तेरी शानो शौकत छलिया जालिम तू मक्कार ।
यहां न तेरी दाल गलेगी कहती हूं तुझसे हरबार ।
पापी यहासे जा मुझको न तू सता ।
बातें न अब बना सूरत न त दिखा।

अंक ५ वां
१३७
कोई पाता है, उसको अक्षण कर जाती है, आनन्द होकर
रावणकी जयजयकार सुनाती हैं, उसी स्था में श्रीजानकीजी
रहती है, दुष्ट रावणका त्रास महती है, सो महाराज कोई
बल बनावो, जिस प्रकार बन उन वाटिका के मध्यमें जावो,
भीमानकीजीका दर्शन पाचो.
(हनुमान्जीका विभीषणसे मिळकर चलना.)
बैठना, राधा
सीन नं.३.
(श्रीनानकीजीका अशोकवाटिकामें
उदास
पका मंदोदरी आदिक स्वास लेकर आना.)
गजल धुन निठा ताल क्वाली.
(वर्ज-बहार आई है गुटशनमें अजव रंगत निराली है. )
रावण-प्रिय भामिन कहो का 'ण यह कैमी बेकरारी है।
दुखित है क्यों तेग तन मन गन से नीर जारी है।
अलौकिक शोना मृगनयनी हरणातचंद्र पिकचयनी।
अनोखी रूपकी राशी विधान ने सँवारी है।
पियारी माधुरी मूरत बनी क्यों गमकी अब सूरत ।
उठ ऐ पिय त्याग मन चिंतः मोहे प्राणोंसे प्यारी है।
पह लंका मेरी रजधानी बनो निश्वरपतीरानी।
मेरी मंदोदरी प्यारीभी अब चेरी तुम्हारी है।
बानकीजी-तेरी चालोंमें ऐ पापी नहाँ हरगिज मैं आऊंगी।
सताले जितना जी चाहे धर्म नहीं मैं घटाऊंगी।

१४.
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
किधर ख्याल है, मुझको तेरा खुद यह जिंदगी वबाल है,
हाय देर न लगा अपनी तस्व.रकी मेरे खूनसे प्यास बुझा.
रावण-बस दो महीने की मोहलत देता हूं, अगर मान
पावेगी तो आराम पावेगी, पटरानी कहावेगी, वरना पछता-
बेमी, भांखोंसे आंसू बहावगी, अपने सरको मेरी तल्वारसे
जुदा करावेगी.
(रावणका रनवाससहित चला जाना.)
गजल.
(तर्ज-वेकली है आज दिल किनके लिये.)
जानकी-इस विपनमें कोई अब साथी नहीं।
मौतभी तो सं गई आती नहीं ।
हाय जालिम मार दे तल्वारसे ।
वज्रसम बानी सुनी जाती नहीं।
क्या करूं कैसे मैं खोऊं जन अब ।
जो जरूं तो अमानी पाती नहीं।
भूमि माता गोदी में तूही सुला।
जिंदगी अब मुझको यह भाती नहीं ॥
(श्रीजानकीजीका विकल होकर पृथ्वीपर गिरना.)
गजल धुन सोहनी ताल परतो.
(तर्ज-माहम ऐ आशिके सादिक हमारे मरदवा.)
जानकीजी-
हाय स्वामी तुम विना लखवे जिगर खाती हूं मैं।

अंक ५ वां.
लाया मुझे चुरा जब स्वयम्वर रचा।
तभी तो उसमें था दिलमें जरा विचार ।
रावण-चुप अय्यारा ! छटी हुई मक्का । मैं ! तेरा अनी
फैसला करता हूं, तल्वारकी तेर खून मे प्यास बुझता हूं.
(रावणका तल्वार संतकर जानकीजीपर तल्वार उठाना,
मंदोदरी का राषणका हाथ पकड लेना.)
मंदोदरी-महाराज ! क्षमा करो. त्रियाके खूनमें हाथ
न भरो.
मैं
रावण-खैर तुम्हारे कटने मे इस वक्त छोड़ देता हूं. मगर
खब जानता हूं कि जबतक यह अच्छा तरह सजा न
पावेमी, अपनी शरारतसे बाज न आवेगी.
जानकीजी-ओ नाबकार तू मुझको क्या धमकाता है,
पर दिखाता है, मैं खुद जिंदमासे बेजार हूं, मरनेको तैय्यार
हूं, उरती नहीं सफाकमें तेरे इताबसे, ले आके मार डाल तो
मुटुं अजाबसे.
रावण-क्या तू मेरे क्रोधको काल नहीं मानती है जो
ऐसी बेखौफ होकर बातें करती है, यह नहीं जानती है कि
भव तू मेरे फंदेसे छुटकारा नहीं पा सकती है, मेरी रषषा-
बसि बाहिर नहीं जा सकती है.
जानकीजी-यह तो मैंभी मानती हूं कि तू मेरा काल
है, मगर यहां मरनेका किसको पलाल हैं, जालिम तेरा

१४२
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
कर, मेरा क्लेश हर, तेरी नवीन कोपलेंभी अनिके समान दृष्ट
भाती हैं, यह मुझका क्यों नहीं जलाती हैं, हाय मौतभी तो
पास नहीं आती है, मेरे नामसे कोसोंही भाग जाती है.
(जानकीजीका व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिरना हनुमा-
नजीका वृक्षपरसे श्रीरामचंद्रनीकी अंगूठी फेंकना.
जानकीजी-अशोकवाटिका ! धन्य है, जो मेरी चिन्ता
मिटाई, मेरे पास अनि पहुंचाई. ( जानकीजीका अंगूठीको देख
कर चकित होना.) हाय यह तो अंगूठी मेरे भतार प्राणों के
आधार रामचंद्रजी महाराजकी है, इस लंकामें किस प्रकार
आई है?
ठुमरी धुन खम्माच ताल पंजाबी ठेका.
(तर्ज-राम विना आराम नहीं।)
जानकीजी-
नानी न जावे आह विधाता अद्भुत तेरी माया है ।
यह अंगूठी प्रीतमकी है कोन यहांपर लाया है ।
हा ईश्वर क्या और एक तूने गुल यह नया खिलाया ह।
हैं अजीत प्रभु पीतम मेरे मो छलने कोई आया है।
यह किसी छलियाने आकरके जादूका जाल बिछाया है।
हनुमानजी- (वृक्षपरसे)
रामचंद्र महाराज प्रभू हैं भक्तन हित नरतनु धारा ।
मुनिकी यज्ञकी रक्षा कीनी दुष्ट सुबाहू संहारा॥

अंक ५ बां.
१४१
यासो हसरतके सिवा अब कुछ नहीं पाती हूं मैं॥
एक दिन वोह था कि खिदमतगार थे लाखों खडे ।
कौन पूछे भाज हा तनहाही विल्लाती हूं मैं ।
क्या करूं जाऊं कहां किससे कहूं दररे जिगर ।
आके स्वामी देखलो अब जानसे जाती हूं मैं ।
( श्रीजानकीनाका पृथ्वीसे सिर मारना त्रिजटाका पकडना.)
त्रिजटा-सुन्दरी धीर्य धरो, करुणा त्यागन करो, अमवान्
तुमपर कृपा करेंगे, तुम्हारे सम्पूर्ण देश हरेंग.
जानकीजी-हाय माता ! पतिवियोग नहीं सहा जाता,
कहींसे अमि ला दे, चितामें लगा दे, मेरी यह योनी छुडा रे.
त्रिजटा-क्या तुम रघुनाथजी महाराजके प्रतापको नहीं
पानती हो, जो इतनी घबराती हो, मरनेकी जीमें ठहराती हो.
जानकीजी- ( हाथ जोडकर ) हे माता । थोडीसी अधि
गदे, मेरा संकट मिटा दे.
त्रिजटा-अब तो रात्रि बहुत व्यतीत हो गई है, कहीं अधि
नहीं मिल सकती है,
(त्रिजटाका चला जाना.)
जानकीजी-आह आकाशमें अंगारे चमकते हैं, पृथ्वीपर
क्यों नहीं मिरते हैं, मुझको भस्म क्यों नहीं बनाते हैं, हाय
पहली तरसाते हैं, अशोकवाटिका ! तूही अपना नाम सत्य
.

१४४ श्रीरामजानकीजीचरित्र । जानकीजी-कहो आनन्दमे हैं प्राणाधार, पोहे भूले हैं स्यों पीननके रखवार. हनुमानजी-महाराज नियबन्धुमहित सब प्रकारचे मानन्दित हैं, परन्तु तुम्हारे विरहमें अत्यन्त दुःखित हैं, निशिदिन वियोगका संकट सहते हैं, चिन्तामें रहते हैं, जो कदापि सुधि पा जाते तो छिमावती विलम्ब न लगाते, लंकामें आकर दुष्टोंको यमलोक पहुँचाते, सो माता । कुछ दिन धीर्य धरो, सोच त्यागन करो, महाराज शीघही वानरीसेना- सहित आवेंगे, पापियों को रणभूमिमें सुलावेंगे, तुम्हारा सम्पूर्ण कष्ट मिटावेंगे. जानकीजी-भाई ! मुझको यह संदेह हैं कि तुम्हारी तो बहुत छोटीसी देह है. क्या सब वानर तुम्हारेही समान हैं ? यातुधान तो बड़े बलवान हैं. (हनुमान्जीका अपना असली रूप प्रगट करके श्रीजानकीजीको दिखाना और फिर लघु स्वरूप धारण करके चरणों में सिर मिवाना. हनुमानजी-हे माता! हम वानरोंमें तो कुछ पराक्रम नहीं है, परन्तु महाराजके अधिवाण छिनमात्रमें सम्पूर्ण राक्ष- सीसेनाको भस्म बना देवेंगे. यमपुरीका पंथ दिखा देवेंगे, मैं इस समय क्षुधासे अत्यंत व्याकुल हूं, जो आना पाऊं तो इस बाटिकाके कुछ फल फूल खाऊं.

अंक ५ वा.
१४३
पनुष तोड दिया बीच मा के राजनके मदको मारा।
मात पिताकी आज्ञा मानीवनका कारज मारा ॥
चन्दन दो कर नोर कह तेरी लीला है अपरम्पारा।
जानकीजी-श्रवणअमृत कथा जिसने सुनाई, नहीं वह
सामने आता क्यों आई.
(हनुमान्जीका वृक्षसे उतर कर ज'नकी जीके सन्मुख हाथ जोड.
कर स्वडा होना, जानकी का मुंह फेर लेना.)
हनुमान्जी-मैं हूं मेयक श्रग्घुनाथजीका, में ही लाया हूं
अंगूठी यह माता.
जानकीजी-मैं किस प्रकार तुमको महाराजका सेवक
जानूं , कोई भेद बतावो तो मैं मायूँ.
हनुमान जी-देखो माताजी ! जिस मनय दुष्ट रावण तुमको
भाकाशमार्गसे ले जा रहा था, तो तुमने उस समय ऋष्यमूक
पर्वतपर अपना आभूषण गिराया था, जिनको हमारे राजा
सुधीवने उठाया था, जय श्रीरघुनाथजी महाराज तुम्हारे
• वियोगमें प्रियबंधुसहित ऋष्यमूकपर्वतपर आये तो सुग्रीवने
बहभाभूषण दिखाये और श्रअयोध्यानाथ अपने मित्र
बनाये, महाराजने उसके सम्पूर्ण क्लरा मिटाये, फिर सुग्रीवने
चारों दिशामें वानर तुम्हारे खोज पठाये, सो माताजी इन.
मेंसे एक में हूं, खोजता हुआ इन लंकामें आया हूं. निशा-
नीकी यह मुद्रिका लाया हूं.

श्रीरामजानकीजीचरित्र । निशि दिन छतियां लगा मत प्यारे जला तू ॥ दिल- बर आ मत मोको सता तू । पल छिन मोको कल ना परत है दर्श दिखा पिया अव न रुला तू ॥ दिल. बर मा मत मोको सता तू ॥ गजल धुन जिला ताल कव्वाली. (तर्ज-भ तानी हैं खंजर हायमें है तनके बैठे हैं। शामप्यारी- बहार आई है गुलशनमें सब फिरती है इतराती। किसीकी जुल्फ नागन खाके बल मुखडेपे लहरावी ॥ इजारों दिल कुचल जावमे तडफेंगे पडे लाखों। जरा तो रहम कर मत शोख चल तू चाल इठलाती ॥ तेरी यह मांगही दिल मांगे लेती है मेरा जालिम । बला शोखी गजब तिरछो निगाह खंजरको शरमानी ॥ नजाकत देख तू चन्दन मेरे महबूब दिलबरकी। पडा जो बार गेसका कमर लचकी तो बल खाती ॥ ( वाटिकाके राक्षसोंका रोते पीटते आना.) राक्षस-हाय मर गये, हाय मर मये, दुहाई है महाराज हाय मजब हो गया. रावण-क्यों रोते हो सबब जल्दी बतावो, हुवा है क्य तुम्हें क्यों गुल मचावो. राक्षस-महाराज ! एक बदरने अशोकवाटिकामें कोई

अंक ५ वां.
१४५
बानकीजी-यहां गक्षम बहुत रहने हैं योधा, करे हैं
रातदिन उपवन की रक्षा.
बनुमानजी-नहीं उनमे नो डरता हूं में माता! में तो
एक भापकी चाहता हूं आजा.
जानकीजी-श्रीरघुरानका ध्यान धरके जावो, मधुर
पल वृक्षपर पावो मो ग्यावा.
(हनुमान्जीका जानकी जीको इटवर कर चलना और वाटि.
काम फलोंको खाना और वृक्षांको तोडकर भूमेपर गिराना, राक्ष
सोका चिल्लाना.)
अनी
-कौन हैं जो इस तरह बखाफ फेरता है, खाता है
फलोंको नहीं कुछ दि में डरता है. बतला तू अपना नाम
वो आया है क्यों यहां, शायद तुझे अजीज नहीं लगती
अपनी जां.
अकंपन-नादां : उसी ताहमें मुंह चलाये जाता है,
रहशत नहीं जरानी त हमारी खाता हे.
( हनुमानजीका राक्षसीको पकड पकडकर पृथ्वी पर गिराना.
सीन नं, ४.
रावणका राजभवन में बैठना अप्सराओंका नाच करना.)
ठुपरी.
( तर्ज-शाम रे मोरो वय्यां गहो ना.)
कामकंदळा-
दिलबर आ मत मोको सता तु । तेरी यादमें तडफँ

१४८
श्रीगमजानकीजीचरित्र ।
सिय खोज़न लंका आया रघुनायक मोहे पठाया।
लगी भूख मधुर फल खाऊं मैं रघुपतिदास कहाऊं ॥
जो मारे मोहे में मारूं नहीं तोहे खलसे हार ।
मैं रामनाम गुण माऊं सुन मूर्ख तोहे समझाऊं ॥
फल गूलरसम लंका कपि चंचल जीव अशंका।
अभी तोडके भूमि गिराऊं सुन मूर्ख तोहे समझाऊं ॥
( मेघनादका आकर हनुमान्जीसे युद्ध करना और ब्रह्मवाण
मारकर हनुमान्जीको नागफांसमें बांध लेना.)
सीन नं.६.
( रावणका दरबारमें बैठना, मेघनादका हनुमानजीको
नागफांसमें बांध लाना. )
मेघनाद-महाराज ! इस मरदूदने तमाम बागको उजार
दिया है, सब दरख्तोंको जडसे उखार दिया है, वाटिकाकी सब
पटडयोंको गिरा दिया है, एक कोहराम मचा दिया है, मैंने
बहुत चाहा कि नरमीसे पेश आऊं, आहिसतगीसे समझाकर
दरबारम ले आऊं, मगर यह ताबकार अपनी शरारतसे
बाज न आया, दोडकर मुझकोमी एक मुक्का मार जमीनर
गिराया, नहीं मालूम यह कौन सौदाई है, शायद इसकी
शामत यहां बैंच लाई है.
रावण-ओ बेवकूफ ! तू कौन है, कहांसे आया है
किसवास्ते अशोकवाटिकाके दरख्तोंको गिराया है ?
है

अंक ५ वा. राम मचा रखा है, मारा उपवन उजाड दिया है, मनोहर वृक्ष सब बरसे उखाडे, बहुत योषा पकडकर उसने मारे. रावण-( अक्षयकुमारसे ) प्यारे पुत्र । तुम उपवनमें जावो, भनी जिंरा पकडकर उनको लावो. (क्षक मारका राक्षसी सेनासहित चलना.) मीन नं.५. (हनुमानजी का अशोकवाटिक'के फलों को खाना. अक्षकुमा- रका र क्षमी सेनासहित आना.) ठुमरी धुन खम्माच ताल पंजाबी ठेका. ( नरम विन' माराम नहीं. ) मक्षकुमार- उपवन सुंदर सुभग हमारा, क्यों ऐ मूढ उनारा है। विटप मनोहर लता सुगंधित सबको भूमि डारा है । तू कीन कहांभे आया है क्यों रखवारनको मारा है। यह लंका रावणरजधानी जाने सब संसारा है। शारिक यहां नोर भरत हैं तू तो कौन विचारा है ॥ (हनुमान जीका भक्षरमारक भूमिमें पछाडकर छातीपर पद नाना. राक्षसीसेनाका भयभीत होकर भागजाना.) मजन. (तर्ज-यह जादै गोरख धदा.) माननी- हुन मूर्ख तोहे समझाऊं मैं रघातिदास कहाऊं ॥

श्रीरामजानकीजीचरित्र। मारनेसे धर्म घटता है, अधर्म बढता है, बहादुरीके नामको पम्बा लगता है, बेहतर है कि इसको दण्ड देकर निकाल दिया जावे ताकि यह जाकर अपने मालिकको सब हाल सुनावे, उसको यहां ले आवे और वह खुद इस गुसताखीकी सजा पावे, मेरे खयालमें यह बेकसूर है, आइंदा मर्जी हजूर है, क्योंकि कासिदका फर्ज है कि मालिकका हुकम बजा लावे, उसका फर्मान दुशमनको सुनावे. रावण-अच्छ। इसकी दुममें रूई लिपटा दो और तेलमें भिगोकर आग लगा दो, शहरपनाहका चक्कर देकर निकाल दो, मुश्के खोल दो (राक्षसोंका हनुमान्जीकी लूममें रूई लपेटकर तेलमें भिगोकर भान लगा देना और बाजे बजाना. हनुमान्जीका कूदकर राजमंदिरपर चट नाना और सम्पूर्ण राजधानीको भस्म करके सागर में कूदकर शरी- रसे अग्निको बुझाना, नल नीलआदिक बंदरोंसे सागरके तीरपर मिल- ना भौर सबका चलकर किष्किधापुरीमें मधुवनके वृक्षोंके फलोंको मोजन करना.) सीन नं. ७. (श्रीरामचंद्रजी महारानका लक्ष्मणनीसहित ऋष्यमूक पर्वतपर श्रीजानकीके वियोगमें दुःखित बैठना.) ठुमरी धुन जिला पीलू ताल कहरवा. ( तर्ज-उधो दुनिया रैन बसेरा.) रामचंद्रजी- प्रिय सीता पाणपियारी तो बिन देह व्याकुल है सारी उठत हृदेमें भाग विरहकी बिन तेरे सुकुमारी ।

अंक ५ वा. हनुमान्जी-मैं उनही श्रीरामचन्द्रजी महाराजका सेवक कि जिनकी प्राणपियरी स्त्रीको तू चोर लाया है. अशो. बाटिकामें छुपाया है. रावण-मालूम होता है कि त जिन्दगीसे बेजार है, मर- की तैयार है, जनूम तेरे सरपर सवार है. हनुमान् नी-नहीं मालूम कौन जिन्दगीसे बेजार हो रहा है, किसके सरपर जनूम सवार हो रहा है. मेरे खया- तो इस मजलिसकोहा यह आजार हो रहा है. रावण-ओ नाबकार नाहंजार, खबरदार खामोश हो चा. एसताखीसे पेश न आ, वगरन अर्धा शम्शेरसे गर्दन गा. जहनुममें पहुंचा दूंगा. इनुमानजी-क्यों तैशमें आता है, पहाडको फंकसे आता चाहता है, जो ऐसाही जोर था तो क्यों फकीरका बनाया, पराई औरतको मक्कारीसे चुरा लाया, मैदान समें क्यों न कदम बढाया, चारीही करके घर चला आया, - होशयार हो, खाबगफलतसे बेदार हो, महारानी महाराजको सौंप मा, वादिम होकर सर झुका, वगरन याद रख पावावेगा, जाडोहशमत खाकमें मिलावेगा, जानसे जावेमा. रावण-मेरे दलेरो उठो, देर न लगावो, अभी इसको बासीका मजा चखावो, मद का सिर जमीनपर मिराबो. (राक्षसीका उठना विभीषणका रावणको दण्डवत् करना.) विभीषण-महाराज ! नीतिशास्त्रमें लिखा है कि इतके

श्रीरामजानकीजीचरित्र।
ठुमरी धुन रेवता ताल कवाली.
(तर्ज-बुरा मैं क्या किया तेरा तू दुशमन बन गया मेरा )
हनुमानजी-सुनो तुम जगत सुखदाई दयालू नाथ रघुराई ।
प्रभु एक टापू है लंका कि जिसका कोट हैं बंका।
वहांका राजा है रावण असुर एक मढ दुखदाई ॥
भुजाहैं बीस दस सिर हैं निशाचर उससे सब कां।
वह छलके ले गया सीता छुपाई लंकमें जाई ॥
न प्रभु अब तो कगे देरी विनय यह मान लो मेरी।
संहारो दुष्ट मूर्खको दुखित है जानकी माई ।
(रामचंद्रजीका आनन्द होकर हनुमानजीको कंठ लगाना.)
रामचंद्रजी-मेरी प्यागकी मुध मुझको सुनाई, नहीं
भूलूं तेरा अहसान भाई.
हनुमानजी-तुम्हारीही कृपा मुझपर है स्वामी, मैं तो हूं
एक बंदर नाथ कामी.
(वानरीसेनाका आकर पर्वतको घेर लेना टिबियांका एक लक
डीका डंडा लेकर मान और दूरसे दंडवत करना.)
विषियां-अजी श्रीरघुनायजी महाराज ! दासकीजी
रखवत मंजूर हो ताके यह मुर्दारमी मुल्कोंमें मशहूर हो,
सरकार तो मुझको नहीं पहचानते हैं, मेरे बलको नहीं
बानते हैं, इस बास्ते मैं खुदही सुना देता हूं, सबको बता देता
ई में वह हूं जब अफीम घोलकर पी लेता हूं, चुस्की लगा
लेता हूं, तो दीन दुनियासे बेखबर हो जाता हूं, पीनको सोता
।

मंक ५ बां.
१५१
खास समीर चलत है भारी फूके तनको क्यारी।
विशिदिन मोको कल न पडत है सुधबुध सकल बिकारी।
कित खोजू कह विध तोहे पाऊं देश कानसे सिधरी।
दोहरा ताल थाप.
देखो यह उपवन सुभग, फूल रहा ऐ धात ।
दिना पियारी दर्शके, मोको नाहिं सुहात !
खोज कहूं पाया नहीं, करहूं कौन उपाय ।
विरहअनि तनमें उठत, जीव रहा घबराय ॥
आई ऋतु सुंदर सुभम, फूलः केसर क्यार ।
बहुत वसंत सुहावना, मन ह दुखित हमार ॥
गजल धुन जिला बिहाग ताल काली.
( तर्ज-गमसे जिगर है जलतः नेनोसे नीर जारी. )
हाये वसंत तूने मुझे साकमें मिलाया ।
बरबाद करके मुझको कसरा हाथ तेरे आया ॥
एवज यह कबका तूने मुझसे लिया अनालिम ।
इतना हंसा न था मैं जितना कि अब रुलाया।
क्या था हुआ है क्या अब कुछभी रहा न बाकी ।
एक पलमें मिट गय। सब नकसा जमा जमाया ।
(हनुमानजीका मुग्रीव और जांबवंत आदिक सेनापतियों
सहित आकर महाराजको दंडवत् करना.)
रामचंद्रजी-सुना देखी कहीं मेरीप्यारी, विरहमें जिसके
पनीर जारी.
.

पाण्या
१५४
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
,
मजाल है जो मेरे पाससे निकलें और जान बचाकर चलें,
बड़े बड़े खटमलोंका मार देना तो मेरे बायें हाथका खेल है,
देखते जावो मागे आगे कैसा कडियल जवान बनूंगा अभी
तो मेरी उनी अलील है.
नर-शाबाश, शाबाश.
टिबियां-हां महाराज ! अभी तो मेरे दूधके दांतजी नहीं
टूटे हैं. देखो तो सही मसूढे कैसे मोटे हैं. महाराज | मैं लंकामें
तो अवश्य जाऊंगा, रावणपर जयभी पाऊंगा, परन्तु मुडकर
नहीं आऊंगा, क्यों महाराज भाषा तो ठीक है
नील-हां हां सुनावो.
टिवियां-महाराज ! सुना है कि लंकाखी बडी मोहनी
मूर्त है और मर्द काले भुजंगेदेवकं सूरत हैं, ऐसा न हो कि
कोई मेरी शोभापर रीझ जावे और सोते को उठा ले जा.
नल-(तमांचा मारकर ) चुर.
टिबियां-(खुजाकर ) खैर सर्कारही थे जो मैं चुप हो.
मया, क्रोधरूपी अमिको शर्बत जानकर पी गया, जो और
कोई होता तो मजा चखा देता, पैर पकडके वृक्षमें लटका देता.
नल-अच्छा यह तो बतायो तुम्हारा नाम क्या है ?
टय्या-बस महाराज ! मैं तो सुना चुका, कहींकामी
नहीं रहा, हाय मर गया, मैं तो यह सुनकर आया था, कि
महाराजकी सेनामें लाडू बटते हैं, यह नहीं खबर थी कि
सिरमें चांटे लगते हैं.

पंक ५ वां.
१५३
तो मुर्दोसे शर्त लगा लेता हूं, लेकिन महाराज ! मात नहीं
झेता हूं, जब लडाईके मैदान में चलना हूं, तो इतना अकडता
हाकि बाजेको आवाजसेभी दम कदम पीछे रहता हूं, जब
लडाई खतम हो जाती है, अपनी फेज कनह पाकर आती है
बोअकेलाही आगे बढता हूं,सिसकने वायरर तल्वार चलाता
हूं,महाराज! मैं फारसी खूब जानता हूं, हां असल बात तो भूल
मषा, मुर्दोपर तल्वार चलाता हूं. चिताने मूतोका खून बहाता
हूं, सरोही और चाकेके हाथ दिखाता हूं. क्यों महाराज अब तो
मान गये होगे, कि मैं लडाईके सब करतव्य जानता हूं, बुलंद
भावाबसे ललकारकर सुनाता हूं कि वबर्दार जागते रहो,
नहीं नहीं खबर हो जावो, किसी ताकत है तो सामने
भायो, हमसे जवांमर्द से आंख मिलवो, कुछ फन सिपाहमरी
दिखावो, मगर अगर उनमें से कोई अधमुवा करवटभी बदल
लेता है तो मेरे बदनमें इतना जोश आ जाता है कि उसी
मचक्कर खाकर धरणीपर गिर पडता हूं, फिर महाराज
किसीके उठायसेभी नहीं उठता हूं.
नल-बडे सूरवीर हो.
लिविया-सूरवीरताईका कुछ न पूछो. जो रात्रीकी
विडीमी किवाड खडका देती है तो मेरी जान निकल
ली है, चुपकेसे चक्की तले दबक जाता हूं. परोलेसे मुँह
लेता हूं, और बलका यह हाल है कि मक्खियोंकी क्या

श्रीरामजानकीजीचरित्र। महोदर-सुनो निशाचरकुलपति काहे करत विचार। नर और भालू कीश सब नाथ हमार अहार । विभीषण- सचिव सकल कहें नाथ अब जो मन ठकुरसुहात । मोरा विनय मानो प्रभू होय न भल इह भात ॥ एक वानरने आकर उपवन दिया उजाड । मारा अक्षकुमारको लंका दी सब जार ॥ क्षुधा न तब काहू रही अब कहें गाल फुलाय । नगर जारते ताहिको किसनेही लीन्हा खाय । रावण-सुन भाई प्यारे मेरे देख तो धरके ध्यान । मोसम को है जगतमें शूर वीर बवान ॥ इंद्रादिकसे तात में भरवावतहूं नीर । भुजबल जग विख्यात है कुम्भकरणसे बीर ॥ विभीषण- तात चरण सिर नावहूं और कहूं कर जोर । सीता दो महाराजको विनय मानिये मोर ॥ कालरात्रि कुलनिश्चरन यह सीता सुन भात । चौथचंद्रसम त्यागहू तासु वदन सुनतात । रामचन्द्र महाराज है ब्रह्मरूप भगवान । वैरभाव त्यामन कसे जो चाहो कल्याण ॥ रावण-मूर्ख ! कैसी बातें करता है क्या येस पराक्रम

बंक ५ वां.
१५५.
नील-अच्छा कोई गाना सुनावो.
टय्यां-तो महाराज ! बाजा बजवावो.
अंग्रजी वजन.
( तर्ज-मन मैल मिटे तन तेज बड़े दे रंग भंगका लोटा.)
मैं रावण मारूं सीता लाऊं तब पाऊं आराम ।
मैं तोपको छोडूं किलेको ताई सुनो श्रीधनश्याम ॥
अब अफीम खालं नशा जमालूं तो होगा यह काम ।
दुख दूर गम दुर है दुनिया नेको नाम ॥
मेरी चुनिया बेगम प्यारी तेरी सुरतपर बलिहारी।
हर एक अदां तेरी न्यारी मेरी अकल गई है मारी।
ऐजान रियारी हूर दिखा दे नूर आवे सरूर चकनाचूर।
फिरूं मैं मस्त सुबह और शाम ॥
( महाराजका वानरसेनासहित लंका पर चढाई करना.)
सोन नं.८.
(रावणका दरवारमें बैठना.)
चौबोला धुन किदारा ताल पंजाबी ठेका.
( तन-सुन रे काले देव रे.)
मनी-हाथ जोड विनती करूं सुनो निशाचर ईश ।
सिंधु पार सेना पडी अमित भालु और कीश ।
रावण-कहो सचिव प्यारे मेरे अब का करूं उपाय ।
सिंधुतीर नृपसेन अब देखो पहुँची भाय ।

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
सीन नं. ९.
(विमीपणका महाराज रामचन्द्रजीके दर्शनोंकी अमि-
लाषामें चलना.)
विभीषण-अहो भाग्य हैं, जो मैं श्रीरघुनाथजी महारा-
चके दर्शन पाऊंगा, करोडों जन्मके पातक मिटाऊंगा, अयो-
ध्यानाथका सेवक कहाऊंगा, उन चरणोंमें सिर निवाऊंगा,
जो शिवजीमहाराज के हृदयरूपी कमलमें वास करते हैं,
जिन्होंके सम्पूर्ण क्लेश हरते हैं, ब्रह्मारिक जिनका ध्यान
घरते हैं.
दोहा-जिन पायन कहि परसके, तरी अहल्या नार ।
ते पर आज विलोकहूं, दीनबन्धु खरआर ॥
--
सीन नं.१०.
(विभीषणका सागरपार महाराजकी सेना में आना और वानरोंका
विभीषणको शत्रुका दूत जानकर पकडकर सुग्रीवके पास लाना.)
सुग्रीव-तू कौन है, क्यों आया है, मतलब है तेरा क्या,
अहवाल मुना जल्द, अब देर ना लगा.
विभीषण-रावणका छोटा भाई हूँ मैं वानरोंके नाथ,
भाया हूं शरण आपकी मैं जोडूं दोनों हाथ.
सुग्रीव-रावणकी खैरखाहीसे क्यों मुह लिया है मोड,
भाया हमारे पास क्यों कुटुम्बको अपने छोड.
विभीषण-जौरो सितम वहां तो महाराज हो रहा,
सुनता नहीं है मेरी कोई मैं बहुत कहा. अब तो हूं शरण

१५७
अंक ५ वां
वहीं जानता है, मैंने अपनी भुजाओंके बलसे सम्पूर्ण ब्रह्मां-
उको वशमें कर लिया है, बड़े बड़े शूरमाओंको पृथ्वीमें मिला
दिया है, बस भलाई इसमें है कि मेरी सभासे निकल जा,
दृष्ट अपना मुँह न दिखा.
(रावणका लात मारना, बिमोपणका हाथ जोडना.)
विभीषण-एक तो पाप पिताके समान हो, दूसरे
निशाचरपति बलवान हो, इस कारण मैं आपके चरण दबाता
हूं, दण्डवत करता हूं, महाराज ! मान जावो जानकी रघु-
नाथजी महाराजको माँप आवो, नहीं तो पछतावोगे, इस
निशाचरकुलको रामकी कोधरूपी अनिमे भस्म करावोगे.
रावण-चुप मुदार खबरदार, जबान न बढा, उठकर
चला जा, फिर कभी मेरी सभामें न आ, जो और कोई ऐसी
बातें करता तो अभी खड्गसे सिर उतार देता.
विभीषण-अब इस कुल के नाशका समय आ गया है,
काल तेरे सिरपर मडला गया है, इस कारण तू मित्रको द्रोही
जानता है, शत्रुको हितकारी मानता है, अच्छा मैं तो श्रीरघु-
नाथजी महाराजकी शरण जाता हूं, मूर्ख ! फिरभी तुझको
समझावा हूं.
अबभी अगर समझोगे तो आराम पावोगे।
वरन कुटुम्ब परिवारको रणमें खपावोगे।
(विभीषणका चला जाना.)
.
-

श्रीरामजानकोजीचरित्र।
दोहा ताल थाप.
विभीषण-मूढ मन्द खल कुमति में, प्रभु परिपूरणकाम ।
त्राहि त्राहि आरतहरण, जनसुखदायक राम ॥
मो सम दीन न दीनहित, तुम समान रघुवीर ।
करुणासागर नाथ हरि, हरहु विषम भवभीर ॥
( महाराजका विभीषणको कण्ठ लगाना.)
राम-रक्ष्मणतेंभी अधिक हो, सखा प्रिय तुम मोह ।
त्यागहु चिन्ता लंककर, राज देहुँ मैं तोह ॥
( महाराज रामचन्द्र का बिभीषणको लंकाका राजतिलक करना.)
राम-देखो सिंधु गम्भीर यह, दुस्तर अगम अपार ।
कौन भांति लंकेश मैं, उतरूं सागर पार ॥
विभीषण-महाराज ! यद्यपि आपका अनिवाण सम्पूर्ण
ब्रह्मांडका जल सुखा दे, रावणकी रजधानीकी भस्म बना दे,
तदपि नीति तो यह है कि सागरके तटपर जावो, उससे
ध्यान लगावो, क्योंकि जलधिनी आपका कुलगुरू है, अवश्य
कोई सुगम उपाय बता देगा, आपको सेनासमेत विना प्रयास
पार लंघावेगा.
रामचन्द्रजी-सखा । सत्य कहा है राजनीतिमें ऐसाही
लिखा है.
( श्रीरामचन्द्रजीका सागरके तीर कुशाका आसन
बिछाकर समुद्रसे सहायता मांगना.)

मंक ५ बां. भापकी यह मान लीजिये, अपनी गुलामांमें मुझे मंजूर कीजिये. सुग्रीव-ठहरो जरा महाराजके मैं पास जाता हूं. अहवाल सब तुम्हारा मैं प्रभुको सुनाता हूं. ( सुग्रीवका श्रीरामचन्द्रजीके समीप आना.) चौबोला धुन किदाग ताल पंजाबी ठेका. ( तर्ज-सुन रे काले देव रे.) सुग्रीव-रावणका एक भात है जासु बिमीषण नाम । शरण हमारी आया है करे दण्डप्रणाम ॥ रामचंद्र-शरणागतमें आवे जो उचित तासु सतकार । कारण समझायो सखा का मन सोच विचार । सुग्रीव-रावणका वह बात है दुष्ट कपटकी खान । भेद लेन हित आया हो कौन सके छल जान । रामचन्द्रजी- भेद लेन जो आया हो, तोनी नहीं कुछ हान । छिनभरमें खलदल हा मम चाताके बान । शरणागतको जे तजहि हित अनहित अनुमान । ते नर पामर पापमय कहं श्रुति वेद पुरान ॥ हनुमानजी- जय जय प्रभु कृपानिधान। । शरणागत रक्षक भगवाना । मंगद भौर हनुमान्जीका विभीषणको आदरपूर्वक रामचन्द्र- भीके समीपलाना, विभीषणका दण्डवत् करना.)

wam- १६२ श्रीरामजानकीजीचरित्र । सीन नं. ११. (रावणका रानमांदरमें बैठकर श्रीजानकीनीकी शोभा वर्णन काना.) गजल. ( तर्ज-नजर लह गई, खाबमें सोते सोते.) रावण-किसी शोखसे दिल लगाये हुये हैं। मेरी नजरों में वह समाये हुये हैं। नुकीले जहरीले खरंगे मिजाको। कमां अवमें बढ़ चढाये हुये हैं। निगाहे कहर आलूदासे ताकते हैं निशाना मेरा दिल बनाये हुये हैं। कोई जुल्फपेचामें फंसकर न निकले। मजबके यह फंडे बनाये हुये हैं॥ न चन्दन बचे मार गेसूका काटा। यहां तंग आमिलमी आये हुये हैं। (शुक सारनका आना.) शुक-महाराज ! बडी अपार सेना आई है, टिड्डीदलके समान सब पृथ्वीपर छाई है, जिधर देखो सब वानरही वानर आते हैं, महाराज ! हम तो उनको भयानक सूरतसेनी यं खाते हैं, बडे बडे पर्वत आमार शरीरवाले योधा गरज है और सब यह कहते हैं अभी हम रावणको पकड लायेंगे, मारकर समंदरमें बहा देंगे, विनीषणको रामचन्दने अपना मंत्री बनाया है और उसने मागरपार उतरनेका यह उपाय बताया है कि प्रथम तो जाकर जलधिसे पंथ मांगो, उसका

..
अंक ५ वां.
(शुक और सारनका पानरीरूप धारण करके वानरीसेना. विच
रना, मलका उनको पकडकर सुग्रीवके समीप लाना.)
नट-महाराज ! यह दोनों रावणके दूत हैं जो कपटता
धारण करके वानरी सेनामें विचरते हैं.
सुग्रीव-प्रथम तो, उनको सम्पूर्ण सेना दिखावो, फिर
कोई अंगभंग बनावो.
(वानरोंका शुर. सारनको सम्पूर्ण य.पिदल दिखाना और नाक
कान काटनेपर तय्यार होना.)
शुक सारन-हाय मर गये, रुपा करो, छोड दो, अब
भूलकरभी इस सेनामें नहीं आवंगे, कपटरूप नहीं बनायेंगे,
सीधे लंकामें चले जावेंगे, दुष्ट रावणको समझायेंगे, जिस
प्रकार बनेगी, श्रीजानकीजी लागे, देखा जो कोई हमाग
नाक कान काटेगा वह श्रीरघुनाथ का सेवक न कहावेमा,
अधर्मीकी पदवी पावेगा.
लक्ष्मणजी-इनको अंगभंग न बनावा, हमारे समीप लादो.
(शुक सारनका लक्ष्मणजीको दण्डवत् करना.)
लक्ष्मणजी-यह मेरी पत्रिका दुष्ट रावणको देना, यह
कहना कि परिघुराजके प्रियबन्धुने यह पत्रिका दी है और
यह कहीं है कि या वो श्रीजानकीजीको लेकर महाराजकी
सरप आवा, अपना अपराध क्षमा करावो, नहीं तो रामको
कोषसपी अमिमें तेरा पतंगरूपी कुल भस्म हो जावेगा.
(शुक सारनका पत्रिका लेकर दण्डवत् करके चलना.)
"

५५० छन्द ( तर्ज-भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी.) द- जय जय सुतसागर सवगुणागर प्रणतपाल रघुराई। खलदुष्टनिकंदन भवभयशंजन दीननके सुखदाई। तेरा नाम नं रूपा अकथ अनुपा भेद न काहू पायां। मैं जड मतिहीना तप आधीना मायामें भर्माया॥ अब क्रोध निवारो मोह उमारो नाथ बन्धावो सेता। चंदन सिर नावे विनय सुनावे उतरहु सेनसमेता ॥ (ड्रापसीनका धीरे धीरे गिरना.) पश्चम भाग समाप्त.

मंक ५ वां.
१६३
निरादर न करो, जो नहीं मानेमा तो अमिबाणसे भस्म हो
बावेमा, सो उसका मंत्र मानकर रघुनाथजी सागरके तटपर
गये हैं, उससे पंथ मांग रहे हैं.
रावण-बस बस में सब कुछ समझगया, जियारा न
सना. जिसके बिनीषण जैसे वजीर हैं तो वह बडेही रणधीर
है. बड़े पूरे मक्कार हैं, देखो तो केमे अय्यार हैं, समुद्रको
धमकाते हैं, जडवस्तुपरभी निक्का जमाते हैं, रस्ता मांगते हैं,
मेरी लंकामें आना चाहते हैं, यह नहीं जानते हैं कि मौत
यहां उठा लाई है, कहांकी मारी फर ई है.
सारन-लीजे महागज ! रामवन्दनी के माईने यह पत्रिका
दी है और जबानी यह कहीं है कि माझ जावो नहीं तो
पछतावोगे, रजधानीका नाश करावागे.
(रावणका पत्रिका पढना और ऋ धमें आकर फाड देना.)
रावण-अभी इस गुस्त वाकी मजा चखाऊंगा. इस
सल्वारकी उनके खूनसे प्यास बुझाऊंगा.
सीन नं. (२.
(रामचन्द्रजीका सागरके तीर विराजना.)
रामचन्द्रजी-लक्ष्मण ! मेरा य प बाण लावो, विलम्ब
लगावो, मैं अभी अमिबाणमे सम्पूर्ण जल सुखाऊंगा,
सेनासहित पार जाऊंगा.
श्रीरामचन्द्रजीका अग्निवाण संघाना समुद्रका विप्ररूप
धारण करके प्रकट होना.)

...-
१६६
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
• .
मारती.
रामचन्द्रबी-जय भोले शिव शकर जम संकटहता।
गणनायक वरदेवा त्रिभुवन सुख कर्ता
नीलकंठ तन सुनर शशि मस्तक सोहै।
शीश जटामें राजै पावन सुरसरिता ॥
जीवजन्तु हितकारी तुम त्रियलोकपती।
कामभारि खलमर्दन दुष्टन संहरता॥
(श्रीरामचन्द्रनीका प्रियवन्धु और सुग्रीवसहित शिवजीको प्रणाम
करके सेनासहित सेतुबन्धके द्वारा सागरसे पार उतरकर सुवेळपर्वतपर
विराजमान होना.)
सीन नं. २.
(मंदोदरीका राजभवनमें सहेलियों सहित उदास बैठना.)
ठुमरी.
(तर्ज-यह जग है मोरख धन्दा.)
मंदोदरी-
मेरा जीव सखी घबरावे । कोई विपता हमपे आवे॥
क्यों बहन अंग फरकत है। मेरा आह जिया घरकत है।
काहे आज उदासी छाई । ईश्वर अब क्या दिखलावे ॥
मोहे खोट स्वपन निशि आया।व्याकुल है मेरी काया।
होह मशगुन भयकारी । रोनाही मोको भावे ॥
निश्चरी-
महाराजने हठ बिय ठानी। नहीं बांत विभीषण मानी।

नाटकधर्मप्रकाश अर्थात् श्रीरामजानकीजीचरित्र। युद्धकाण्ड षष्ठ भाग. अक्ट नं.६. सीन नं. १. (श्रीरामचन्द्रजी महाराजका प्रियबन्धु और वानरीसेनासहित साग- रके तीर विराजमान होना, सुरसमूहका आकर, स्तुति करना.) ठुमरी धुन सारंग. (तर्ज-धन्य तिहारो व्योहार उवोजी.) देवतागण- रावणने संसार सारा सताया । देवमुता मन्पर्व किचरा । सबकोही पापीने लंका पहुंचाया । मो द्विज धेनु देव मुनिवृन्दा । व्याकुल हैं जालिमने सबको रुलाया ॥ शुभ कारज कहुँ होन न पावे । भूमिपै मूर्खने दुइ एक मचाया ॥ भार उतारो भासुर संहारो। चन्दन तुम्हारी शरण स्वामी भाया । (देवतागणका दण्डवत् करके चला जाना, श्रीरामचन्द्रजीका सेतुबन्धके निकट शिवमंदिरमें पूजन करना.)

१६८
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
रावण-तू सुन ऐप्यारी क्यों मन भय है खाई।
जमतमें विदित है मेरी प्रभुताई ॥
मंदोदरी-पह छांडो गर्व दिटमें सोचो विचारो।
नहीं चाहिये करनी उनसे लडाई ।
रावण-चलूं तो मेरे बोझसे डोले धरनी।
कहो काह कारण तू का मन डरानी ॥
लावनी धुन विहाग ताल कवाली.
(तर्ज-मुख चंदा कैसा नयना तेरे कटारी.
मंदोदरी-तुम देवो प्यारे कंथ रामकी नारी।
मत करो युद्ध यह मानो बात हमारी॥
एक वानरने पिया आके सब बाग उबारा ।
रण बीच तुम्हारा अक्ष पुत्र संहारा ॥
एक छिनमें उसने सब लंकाको जारा ।
जो था तो जोर तब उसको क्यों नहीं मारा ।
क्या लडोगे उनसे कहां है ताब तुम्हारी ।
अब देवो प्यारे कंथ रामकी नारी।
रावण-क्यों खाती दहशत सुन तू प्राणपियारी ।
है जोधा कौनसा मेरे सम बलधारी ॥
तू जाने मेरा जोर भुजा बल रानी ।
मैं अगणित डाले मार भूप अभिमानी ॥
सब दिगपालनसे भरवावत हूं पानी ।

-
Myt
मक ६ ठा.
१६.
हित मंत्र कहत धमकाया । कायर उसको ठहराया।
फिर राजसभासे निकाला । सुन निश्वर कुलपति रानी।
मंदोदरी-
प्यारी वेग समामें जावो। महाराजको यह समझायो।
मयसुता विकल है भारी । तन मनकी सुरत बिसारी ।
चलो राजभवन सुरआरी । दर्शन अपना दिखलावो ।
(वनचरीका दंडवत् करके चलना.)
योगिनी-महारानी ! हमारे शत्रुओंने तो अब समुद्रपर
सेतु बांध लिया है, सुवेलपर्वतपर डेरा कर लिया है, सम्पूर्ण
रजधानीको घेर लिया है.
(रावणका राजभवन में आना, मंदोदरीका दंडवत् करना.)
चौबोला धुन किदारा ताल पंजाबी ठेका.
(तर्ज-सुन रे काले देव रे।
मंदोदरी-सागर बांधा सेतु है सुनो निशाचर ईश ।
सिंधुपार सेना भई सकल भालु और कोश ।
रावण-कुम्भकर्णसे बंधु मम सुत प्रसिद्ध शकार ।
मम भुजबल जाने प्रिय का मन सोच विचार ।
गजल धुन देसकार ताळ चाचर.
(व-जवानीमें क्या होगा जोवन किसीका.)
मंदोदरी-सुनो प्यारे पीतम जो चाहो मलाई ।
तो मानो पिया उनसे कर लो मिताई ॥

श्रीरामजानकीजीचरित्र
सीन नं.४.
(रावणका रानसमामें आनन्द मनाना.)
गजल धुन जिला ताल कवाली.
( तर्ज-भवें तानी हैं बज हाथमें है तनके बैठे हो.)
कामकन्दला-
पिला दे अब कोई मुझको मये गुलनार ऐसा की।
तरंग हो चौगनी पर होवे कम मिकदार ऐसा की।
सबा करती है अटखेली सनम पहलू बपहलू है।
चखादे चाशनी तभी न कर तकरार ऐसा की ॥
मजा है जिंदगीका यह कि मिल बैठे से बोलें।
हो दौरे बाद ये गुलगू बिलाइसरार ऐसा की ।
रहे वाकै अबद आबाद चन्दन मैकदा तेरा
समनके साथ मैं पीया करें हरबार ऐसा की।
(अंगदका भाना.)
ठुमरी।
रावण-तू कौन तू कौन कपी है रहे कहां है क्या है तेरा नाम ।
अंगद-मैं वाली मैं वालीका हूं बेटा रावण अंगद मेरा नाम ॥
रावण-तूआया तू आया क्यों है बतासमाक्या है तेरा काम।
अंगद-मैं हूं कासिद उन्ही रघुनाथजीका कि । जिनकी
प्यारी तू हर लाया सीता । न कुछभी शर्म दिलमें
तुझको आई। कि होके शाह एक औरत चुराई ॥ नहीं
भवनकली कुछ बिगा है तेरा । तू जल्दी मान
ले

अंक ६ ठा. १६९ प्यारी जान वृथा त काहेको भय मानी ॥ मैं निश्चरपति लंकेश विदित सुरारी। हैं जोधा कौनसा मेरे रुम बलधारी ॥ (रावणका मन्दोदरीको कण्ठ लगाकर प्यार करना. ) सीन नं. ३. (श्रीरामचन्द्रजीमहाराजका व.नरीसेनामें विराजमान होना.) अंग्रेजी वजन धुन सिंधुग ताल काली. (तर्ज-लपको लपको मारो इसको पावे मिनहार.) वानरगण- सृष्टी रचता पालनकर्ता संकटहर्ता सुखराशी । निगुण निराकार सर्व व्यापक चिदानन्द घटघटवासी । मुनिजन सज्जन ध्यान धरत हैं र उमापति कैलासी। सगुणरूप सचराचरनायक अजर अमर प्रभु अविनाशी। रामचन्द्रजी-सखा सुग्रीव ! अब कौन उपाय करूं? किस प्रकार रावणसे लडूं ? मुग्रीव-महाराज ! वालिकुँवरको दूत बनावो, रावणकी संघाम पठावो, जो सब प्रकार उसको समझावे, राजनीति दिखावे. रामचन्द्रजी-पिय अंमद ! तुम बलबुद्धिके निधान, बालिक समान बलवान् हो, रावणकी सन्नामें जावो, ऐसा उपाय बनावो, जिसमें मेरा काज और उसका कल्याण हो. (अंगदका दण्डवत् करके चलना.) - २७२ श्रीगमजानकीजीचरित्र। जमींप डालो इसको जल्दी बल दिखलावो ललकारो। पडे है जितने बंदर बाहर जल्दी सबको संहारो। हनुमान सुग्रीव विभीषण पकड बंदीखाने डारो। क्यों देर तुम करो सब मिलके चल पडो। दिलमें न कुछ डरो जल्दी अभी लडो । खावो सभीको जाकर फिर सिर झुकावे आकर। तपस्वाको यहां लाकर सिर उसका तुम उतारो। (राक्षसोंका अंगदका पाप उठाना, परन्तु किसीसे पाव न उठना और सबका बैठ जाना.) मंगद- देखा तूने मूर्ख नादां मेरे ताकत बलको अब । नहीं किसीसे पांव उठा है हार चुके यह जोधा सब ॥ बुला कोई अब और सूरमा फिर वह काम आवेगा कब । लानत मूर्ख नारा तुझको शर्म नहीं आती है अब ॥ (रावणका अंगदका पर उठाने झुकना, अंगदका पैर उठाकर ललकारना.) अंगद-मूर्ख । मेरे पांवमें क्या पडता है, महाराजके चरणोंमें सिर क्यों नहीं निवाता है, कि जिससे वेरा कल्याण हो, तेरे जीवका दान हो. (रावणका सिंहासनपर विराज जाना.) मेघनाद-महाराज | चिंता न करो, मुझको आना था, अभी जाकर सम्पूर्ण वानरी सेनाका नाश कर दूमा, प्राण हर लूंगा. सबके

ऐ
अंक ६ ठा.
१७१
कहनायह मेरा॥ी महाराजजीसे मिल तू जाकर।
देसीता और कहो यह सिर झुकाकर ॥ हुई है मुझसे
मलती बखश दजे । मेरी जानिबसे दिल अष
साफ कीजे॥
रावण-कहां है अकल ऐ नादान तेरी । अभी देखेंगा मैं
उनकी दलेरी ॥ मेरा है नाम रावण सुन तू नादां ।
लडेगा मुझसे क्या नाचीज इंसां ॥ कजा उसको
उठा लाई यहांपर । नहीं हो सकता है हरागेज
वह जांवर॥
मंगद-तेरी ताकत सभी मैं जानता हूं । तू है रावण
मैं सब पहचानता हूं ॥ सहस्रबाहूसे लडने गया था।
बगलमें तूही वालीके रहा था ।
रावण-चुप ऐ शैतान क्यों बातें बनावे । सिफत
वालीकी क्या मुझको सुनावे ॥ अभी दोनों फको
रोंको में जाकर । पकडकर कैद कर दूंगा यहांपर ॥
जगद-जमाता हूं कदम मैं देख नादां । उठावेमा कोई मर
सको इस ॥ तो सीता हारकर मैं उलटा जाऊं।
ही फिर लाने तुमसे हरमिज आऊं।
अंग्रेजी बजन धुन सिंधुरा ताल कहरवा.
(वर्ज-जैसी करनी वैसी भरनी करनीको त करकर देख.)
-उठो उठो ऐ मरदानो पकडकर इसको दे मारो।

श्रीरामजानकीजीचरित्र।
-
सीन नं. ६.
(मेघनादका लंकाके कोटके द्वारपर खडा होकर ललकारना.)
मेघनाद-मैं उस प्रतापी रावणका पुत्र हूं कि जिस
कैलासपर्वतको हाथपर उठा लिया, कबीर आदिक देवतान
णको कैदी बना लिया, बडे बडे वसादुरोंको खाकमें मिल
दिया, अपनी प्रभुताईका जहा में निक्का बिठा दिया, आ
यह मेघनादनी घोर संग्राम मचायगा, अपनी उन भुजाआंक
पराकम दिखावेगा कि जिनके बली इंद्रका मान मारा
ऐरावत हस्तीका दांत उखाडा ह, वह रामचंद्र कौन है जिसमें
यह कोहराम मचाया है, लंकापर धावा करने आया है, वह
नाबकार बिभीषण कहां छुप गया है, जो राक्षसी कुलसे
विमुख हो रहा है. होश्यार 31, नामने अबो, मैं अभी
तल्वारसे सबका सिर उडा दूंग, मुलके अश्मका रास्ता
दिखा दूंगा.
लक्ष्मणजी-दुष्ट कैसो बात लाता है, पहाडको फूंकहूँ
उडाना चाहता है, देख मैं आत.. अभी तुझको यमलोई
पहुँचाता हूं, श्रीरघुनाथनी मह र जका प्रताप दिखाता हूँ
मैंनी रघुराजका प्रियवंधु कहता हूं.
(लक्ष्मणजी और मेघनादका यु
लक्ष्मणजीके हृदयमें ब्रह्माकी दी हुई शाक्त मारना, लक्ष्मणजीका बेस
होकर पृथ्वीमें गिरना.)
मेघनाद-वह मारा वह मर सरे मैदान पछाडा, को
है जो मेरे मुकाबलेमें आ सके, रणभूमिमें कदम जमा सक
रेघनादका घोर संग्राम कर

अंक ६ ठा.
१७३
रावण-अच्छा प्राणप्यारे ! जावो, शत्रुओंको मारकर
चल भावो.
सीन नं. ५.
( श्रीरामचन्द्रजीका पर्वतपर विराजमान होना, भंगदका
आकर दण्डवत् करना.)
अंगद-महाराज ! रावणको बहुत समझाया परन्तु
मूर्खकी समझमें कुछ नहीं आया.
रामचन्द्रजी-लक्ष्मण! धनुष बाण उठावो, अंगद हनु-
मान आदिक योधाओंके साथ जायो, रणभूमिमें सूर्यवंशी
कुलकी प्रभुताई दिखावो.
( लक्ष्मणजीका महाराजको दण्डवत् करके रणभूमिमं चलना.)
1
अंग्रेजी वजन.
(सर्ज-तोरी छलबल है न्यारी तोरी कलयस है न्यारी.)
लक्ष्मणजी-आवो आवो ऐ भाई कदो लंकाकी खाई।
करो जल्दी चढाई न लावो बार ॥
देखो किला कठिन रहा सोरनसे बन ।
जापै सूरजकिरन देव कसी बहार ॥
दौडो दौडो आवो पर्वत उठावो।
करो जल्दी अब चलकरके रावणपे वार ॥
खञ्जर नेजा उठावो तीर कमां चढावो।
कुवत बाजू दिखावो प्यारे वाह वाह वाह ।
वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह।

श्रीरामजानकोजीचरित्र ।
मिटता नहीं मिटाये कोंमें जो लिखा है।
सोरनका मृग बनके लक्ष्मणका काल भाया ।
माताजी जब सुनेंगी तो मुझको क्या कहेंगी।
एक स्त्रीके कारण प्रियबन्धुको मँवाया ॥
(हनुमान्जीका सुषेण वैद्यको लंकासे उठाकर लाना और वैद्यका
लक्ष्मणजीकी नाडी देखना.)
सुषेण-महाराज ! लक्ष्मणजी अच्छे हो जायेंगे, शत्रुपर
फतह पावेंगे. क्योंकि कलेजा बदस्तूर गर्म जल रहा है, गोसांस
रुकरुककर चल रहा है, नबज अगर्ने सुनाई नहीं देती है,
मगर दिलकी हरकत बता रही है, कि अभीतक कोई बात
नहीं बिगडी है, अलबत्ता एक दिक्कत पड़ी है वह यह है, कि
कोई द्रोणाचलपर जावे, सूर्य निकरने न पावे, रातही रातमें
सजीवनमोर ले आवे, घोटकर पिलावे, थोडी कूटकर घावपर
लगावे तो लक्ष्मणजीका कष्ट दूर हो जावे, मगर यहनी ध्या
रहे जो सूरजनारायण उदय हो जायेंगे तो फिर लक्ष्मण
पाण न रहने पावेंग.
पद धुन मांड.
(तर्ज-बादला वेगी मायो रे.)
रामचंद्रजी-
कोई गिरि द्रोणाचलपर जा सजीवनमोर पिलावे ला।
भरत अयोध्या बसे व्याकुल मेरा शरीर ।

अंश६ ठा १७५ अभी उसको उठाकर लंकामें ले जाता हूं, महाराज रावणको दिखाता हूं, बडा जवाम बनके आया था, मुझसे शेर दिलसे लडनेका खबत समाया था, नहीं जानता था कि मेरा बाण कालके समान है, देख लिया ना भाखिरको मेरेही हाथ मैदान है. (मेघनादका लक्ष्मणको उठाना, हनुमान्जीका दूरसे ललकारना.) हनुमान्जी-भो जालम ठर, क्या करता है, कहांकी बहादुरीमें पैर धरता है, दुष्ट में आना हूं, अभी तुझको यम- लोकका पंय दिखाता हूं, दखं तू कम प्रकार जान बचाकर जावेगा, क्योंकर मेरे ह थ न छुटकार पावगा. ( मेघनादका भयभीत होकर नाग जाना, हनुमान्जीका लक्ष्मण को उठा लेना. ) दीन नं. ७. (रामचन्द्रनीका मांछत लक्ष्मणजीको हृदयसे लगाकर विलाप करना.) गजल धुन जिला वाल कवाली. रामचन्द्रजी- अफसोस हाय किस पत यह गुल नया खिलाया। बाउं कहां क्या सोचं केता यह दिन दिखाया । सीताको संग न लाता वनमें अकेला आना। बछमनको क्यों खपाता तकदीरने रुलाया ॥

श्रीरामजानकीजीचरित्र
पार पार बार मोरे प्यारे । दशरथका बेटा कोका
हेटा रोरो करे पुकार पुकार पुकार मोरे प्यारे ।
राजमी खोया भाई खपाया खो बैठा प्यारी वह नार
नार नार मेरे प्यारे॥
मेघनाद-महाराज ! एकको तो मैदान जंगमें सुला दिया
इस मेघनादने तल्वारकी आगको लक्षणके खूनसे बुझा
दिया है, रामको अकेला बना दिया है, उसका पियबन्धु खपा
दिया है, राक्षसीकुलकी प्रभुताईको रणमें प्रगट करके दिखा
दिया है, वैरीको खाकमें मिला दिया है, अपनी शूरवीरता-
ईका सिक्का दुरामनके दिलपर बिठा दिया है.
(राषणका मेघनादको कण्ठ लगाना.)
महोदर-महाराज | हनुमान् सजीवनमोर लेने छोणाच
छपर मया है, सो कोई ऐसा उपाय करो कि सूरज उदप है
भावे और सजीवन मोर न आने पावे,
रावण-मैं अभी कालनेमिके पास जाता हूं और उसके
समझाता हूं.
(रावणका उठकर चलना.)
.
सीन नं. ९.
( कालनेमिका अपने भवनमें उदास बैठना.)
कालनेमि-आन मेरा कलेना क्यों उछलना है, दि.

मंक ६ ठा. , तुम विन हनुमत अब मेरी कौन बंधावे धीर । मेरे बंधुके प्राण बचा अभी गिरिद्रोणाचलपर जा ॥ अनुमानजी-महाराज ! मैं जाता हूं, अभी सजीवनमोर कावा हूं, चरणोंमें सिर निवाता हूं, आपके प्रतापसे जो हुक्म हो तो रातभरमें सम्पूर्ण ब्रह्मांडके समुद्रोंको सुखा दूं, पर्व- बोकी जगह दरिया बहा दूं, गवणकी राजधानीका नाश बना ई, मगर यह बता दीजिये, मेरा संदेह मिटा दीजिये, कि सजीवनमोर कैसी होती है, किस रंगकी उसकी पत्नी होती है, पर्वतपर किस तर्फ उगती है. सुषेण-द्रोणाचलकी जो सबसे ऊंची चोटी है उसीपर सजीवनमोर लगती है और उसकी यह पहचान होती है, कि उसके पास निशिदिन दीपकके समान रोशनी रहती है, जिस औषधीके पास प्रकाश पावो जान जावो कि सजीवन- मारे है, उसीको उपाडकर ले आवो, अच्छा देर न लगाओ. (हनुमान्जीका दंडवत् करके चलना.) सीन नं. ८. (रावणका राजसभामें बैठना, राक्षसीसेनाका भानंदित आना.) - ( तर्ज-गलशनमें आई बहार बहा. वहार मेरे प्यारे.) राक्षसीसेना- लछमनने खाया कटार कटार कटार मोरे प्यारे । खून हुवा जारी गश हुआ तारी त्योराके गिरा एक १२

श्रीरामजानकीजीचरित्र।
सीन नं.१०.
(श्रीजानकीनीका अशोकवारिकामें मळीनमन बैठना.)
गजा घुन बिहाग.
(तर्जकली है भाज दिल, किनके लिये )
बानकीजी-खुदबखुद उमडा कलेजा आता है ।
दिल मेरा हाये क्यों बैठा जाना है ॥
आह ईश्वर क्या है कारण आज यह ।
किसलिये गेनाही मुझको भाता है ।
निशि लगे अंधेर खिल रहा चन्द्रमा ।
कमे यह उत्तात विधि दिखलाता है।
(त्रिजटाका भान'. )
दम .
( दर्ज-0ो जयजयकार.)
जानकीजी-मोरी प्यारी आ मोरी प्यारी मा मोरी
प्यारी आ मोह अब पुनः । गणका हाल अब मोहे
सुना सब किम किसका संग्राम हुवा है। मैं तो
तकती थी राह अब तुम्हारी प्यारी न देर अब लगा।
मोरी प्याग आ मोरी प्यारी आ मोरी प्यारी भा॥
क्यों न बोले लय नहीं बोले क्या कारण है बेग
सुनावो । तर चेहरे क्यों छाई उमामी जल्दी मोहे
तू सना।

अंक.६ ठा.
१७९
पालता है, मालूम होता है कि जरूर कोई विपता आवेमी,
आंखनी फडक रही है, देवो क्या दिखावेगी.
(रावणका आना, काटनेमिका दण्डवत् करना.)
रावण-देखो रामचन्द्र के भाई लक्ष्मणके सीनेमें बहादुर
लवादने शक्ति मारी है, जिसने उसपर आलिमबेखुदीतारी
जो सुबहतक सजीवनकोर न आवंगी तो उसका जान
कल जावेगी. सुना ह कि हनुमान् द्रोगाचलपर जावेगा,
सनही रातमें सजीवनमार लामा, इस वास्ते तुभ जावो,
में जादूका बाल बिछावो, रेती तस्वीर बनावो, कि सूरज
एप हो जावे और सजवननार न आन पावे.
कालनेमि-देखो महाराज । जिस दिलावरने आकर
प्रसकुमारको मार दिया है, ओव.टिकाका उजद दिया
बहरको खाकस्तर बना दिया है, हरान हूं कि क्या करूं,
प्रकार उसको रोक, क्या तशीर तोचूं.
रावण-अव्वल तो द्रोणाचलपः जावो, सम्पूर्ण पर्वतपर
के जलावो ताकि वह आपली न पहचानने पावे, हैरानीमें
जाये, फिर मुनिका भेष बनवो, उसको अपने पास
खो, देर लगावो.
कालनेमि-अच्छा रहाान ! जाता हूं, चरणों में
लिवाता हूं.

१८२
श्रीरामजानकीजीपात्र.
इनुमानजी-हैं हैं यह प्यारी पारी। भावाज कहांसे
भा रही है, कानोंमें अमृतरस पहुंचा रही है, कौन है वो इस
बियाबानमें रहता है, महाराज के गुणानुवार माता है, जसर
पहभी विभीषणकी तरह रावण का मताया हुआ है, उसी दुष्टके
अयसे उसने अपने आपको पर्वनमें छाया हुआ है. मुझको
उसके पास वलना चाहिये और उसमे मिलना चाहिये.
( हनुमान्जीका कपटी मुनिके समीप आना.)
कालनोमि-महाराज अइये, विन गाइये, जल पाच
कीजिये, विश्राम लीजिये.
नुमानजी-
दोहरा.
हाथ जोड चरणन गई, नाथ करूं परणाम ।
रामकाज कीन्हें बिना, मोहे कहां विश्राम ॥
कालनेमि-महाराज | यह तो मैंनी जानता हूं, कि बम
णबीको मृ• आई है, दुष्ट मेघनादके हाथमे शक्ति खाई है
सपेण वैद्यने सजीवनभोर द्रोणाचलपर बताई है, सूर्यनम
पान के उदय होनेसे पहिले लकर जावोमे, लक्ष्मणजीको पिग्म
पोले, महाराजका कष्ट मिटायगे, परन्तु अभी तो कुछ
रापि नहीं गई है, सिर्फ चार घरी व्यतीत हुई है, में जाना
हिसे सब कुछ देखता हूं और जानता है कि अंतमें मूर्त
रावण पाण मवावेमा, कुटुंबसहित यमलोकको बारेमा
बनुमानजी-महाराज पहतोपतापो, मेरा संदेह मिटायो
सजीवनमार केसीओवी, किस शामवीरे।
-

मंक ६ठा.
१७९
दहलता है, मालूम होता है कि जरूर कोई विपता आवेमी,
बाई आंखमी फडक रही है, देखो क्या दिखावेगी.
(रावणका आना, कालनेमिका दण्डवत् करना.)
रावण-देखोरामचन् के भाई लक्ष्मणके सीने में बहादुर
घननादने शक्ति मारी है, जिसने उसपर आलिमबेखुदीतारी
है, जो सुबहतक मनीवनमोर न आवेगी तो उसकी जान
निकल जावेगी. सुना ह कि हनुमान् द्रागावलपर जावेगा,
रातही रातमें सजावनमार लावगा, इस वास्ते तुम जावो,
कोई जादूका जाल बिछ।यो, सी तस्वीर बनावो, कि सूरज
उदय हो ज वे और मजा बनना न आन पावे.
पालनेमि-देखो महाराज । जिस दिलावरने आकर
अक्षकुमारको मार दिया है, वाटिकाको उजाड़ दिया
है, शहरको खाकस्सर बा दिया है, हरान हूं कि क्या करूं,
किस प्रकार उसको रोके, क्या नदशीर मोचूं.
रावण-अव्वल तो द्रोणाचलपा जावो, सम्पूर्ण पर्वतपर
दीपक जलावो ताकि वह आपथी न पहचानने पावे, हैरानीमें
पड जाये, फिर मुनिका भेष बावो, उसको अपने पास
बिठावो, देर लगावो.
कालने मे-अच्छा महाराज ! जाता हूं, चरणोंमें
सिर निवाता हूं.

१८४
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
सीन नं. १२.
(हनुमाननीका सम्पूर्ण द्रोणाचळपर्वतपर दीपक प्रकाशित देल.
कर अचम्भित होकर विचार करना.)
अमवियात तातुललफा.
तुमानजी-है कौनसी बूंटी वह न पहचानता हूं मैं ।
उसकी निशानी कुछ न माह जानता हूं मैं।
अफसोस सदअफसोस हुवा हाय यह मजव ।
हैरतमें हूं के क्या करूं तस्बीर आह अब ।
सुनसान बियाबान है भादमका ना निशां ।
वह कौनसी बूटी है हा हूँ उसे कहां ॥
बेहतर ह इस तमाम कितेकोही ले चलूं ।
नाहककी शशोजमें क्यों देर अब कर।
(हनुमानजीका सम्पूर्ण प्रकाशित गिरिको उपारकर उठाना.)
सीन नं. १३.
(भरतजीका अयोध्यापुरीकी नन्दीग्रामनामी वाटिकामें मुनिवेपन
श्रीरामचन्द्रजी महाराजका स्मरण करना. हनुमाननीका आकाशमा।
से प्रकाशित गिरिको लेकर माना, भरतजीका उनको राक्षस समान
करमाण मारना, हनुमानजी का विकळ होकर पृथ्वीपर गिरना.)
गजल सोहनी.
(वर्ज-मरहया ऐ माझिके सादिक हमारे मरावा.)
मान्-भाइ मजब अफसोस मेरे वीर यह कारी बना।
स्पा कर सबीर बाये भावो न पाये।

मंक ६ ठा.
ठुमरी.
(
तमो गोरसवदा )
त्रिजटा-सुन प्यारी राजदुलारी। पड़ी आज मुसीबत मारी।
धननापने करी लगाई। रणभूमिमें धूम मचाई ॥
लक्ष्मणके शक्ति मारी । हुआ खून बदनसे जारी ॥
हनुमान सजीवन लावे । अनी गिरि द्रोणाचल जाये।
तज संशय अब सुकमारी । विय मानो बात हमारी।
( श्रीजानकीजीका विकल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ना
त्रिजटाका आना.)
गजल धुन सोहनी.
(त-कोई ऐसी सखी चातराम मिली मोहे पीके द्वार पहुंचा देती.)
जानकीजी-मैं कसे सहूं यह रंज अलम मरने दे मुझको
ऐप्यारी । ईश्वरने किया है मुझपे सितम कैसी हाय
विपत मोपे डारी ॥ लछमन मोहे अपने पास बुला
मुखचन्द्र किरण अब मोहे दिखा । प्यारी बतियां
सुना और बेग बता पापीने कहां बीं मारी ॥ मैंने
तोहे लपन कटु वचन कहा तूने हाथ जोड परनाम
किया। माह निकले ना पापी मेरा जिया करूं कौन
जतन कमाँ हारी॥
सीन नं. ११.
(काम्नेमिका मुनिरूप धारण करके ईश्वरका भजन करना.)
कालनमि-
सीतारामां रामां रामां रामां सिया रामां।
रामां रामां रामां रामां सीता रामां।
लारा खमाच.

१८६
श्रीरामवानकीजीचरित्र।
भौषधीको नहीं पहचानता हूं, इस कारण यह पर्वतही लिये
जाता हूं.
भरतजी-हाय ! जब दिन बुरे आते हैं तो मित्र वैरी
बन जाते हैं, मैंने तुमको राक्षस जानकर बाण मारा था,
मुझे क्या मालूम थी कि मेरे प्राणप्यारेका प्यारा था.
हनुमानजी-महाराज | आज्ञा दो विलम्ब न करो, जो
सूर्य निकल आवेगा तो सब बना बनाया खेल बिगड जावेगा.
भरतजी-तुमने मेरा बाण खाया है, बडा कष्ट उठाया
है, भावो मेरे बाणपर बैठ जावो, अभी तुमकोलंकामें पहुँचा-
ऊंगा, सब चिंता मिटाऊंगा.
हनुमान्जी-नहीं महाराज ! मेरी मूळ जाती रही,
सपि आ गई है, महाराज के प्रतःपसे बाणकेही समान नाऊंगा.
अभी रणभूमिमें पहुँचाऊमा.
(हनुमान का दण्डवत् करके पकना.)
सीन नं. १४.
(रामचन्द्रजीका वानरी सेनामें दुःखित विराजमान होना.)
गजल धुन बिहाग.
(तर्ज-कळी माज दिछ किनके लिये.)
रामचन्द्रजी-जाम माई बोल मैं हूँ बेकार मिर रहे।
पराक बूं भवरे बहार । हाय सीता मानी मा मेरा
कामैंने समझाया था तुमको वारपार पर

अंक ठा. १८५ कालनेमि- जीवनबुटी तो इस पर्वतमें बहुत म रही थी. इस मंदिर के पाछेनी उग रही थी परन्तु थोडी रे ई कि दुष्ट रावणने सब आप इस पर्वतसे उखाडली है, लंकामें पहुँचा दी है. हनुमान्जी-हाय अब क्या करूं ? कहां जाऊं ? कालनेमि-महागज ! घबरबी नहीं, मैं तुमको एक मंत्र सिखाऊंगा, सब विधि बताऊंगा, जाकर श्रीलक्ष्मण- जाके कानमें कह देना, परमात्माकी प्रभुताईको देखना. हनुमानजी-अच्छा नहाराज ! मैं जस स्नान कर आता हूं, अभी आकर चरणोंमें शीस वि.ता हूं. ( हनुमान्जीका सरोवरमें स्नान करना और एक मकडीनामी ग्राहकी स्त्रीका हनुमान जीके चरणोंको पकडना और मछलीकी योनी श्यागन करके सुंदर अप्सरा वनकर आकाशमार्गमें उड जाना) अप्सरा- बोहरा. मुनि न हो महाराज यह, है यह निश्चर घोर। निशि बीतत करना चहत, विनय मानिये मोर ॥ (हनुमान्जीका क्रोषयुत होकर कपट, मुनिके समीप आना.) बनुमानजी-महाराज | प्रथम अपनी गुरुदक्षिणा पायो, पछि मंत्र सिखावो. (हनुमाननीका कालनेमिको पकडकर पृथ्वीमें दे मारन मोर उसका प्राण त्यागन करके मुरलोकको प्राप्त होना.)

..
'१८
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
गजल धुन देसकार ताल वापर.
(तर्ज-जवानी में क्या होगा जोबन किसीका.)
रावण-कहूं क्या मैं भाई सताया हुवा हूं।
बहुत सरमये मम उठाया हुवा हूं ॥
किया एक जालिमने बरबाद मुझको।
मैं लखते जिगर ममसे खाया हुवा हूं।
खपी है सनी फौज मैदोंमें भाई।
तुम्हें भव जगानेको आया हुवा हूं।
कुम्भकर्ण-तुम अब अहवाल मुझको सब सुनावो,
सपब क्या जंगका भाई बतावो.
रावण-बशकले पारसाई दो बिरादर, रहे सहराय पंडा-
बनमें भाकर, उन्होंने एक वहां महशर मचाया, समी सहराने
बस सिरपर उठाया, पकडली एक दिन हमशीरा भाई, और
उसकी नाक नश्तरसे उडाई, पह रोती दूषन त्रिशरापे भाई,
उन्होंने जाके की उनस लडाई, दिया जालिमने सबको मार
रनमें, लगाई आग मेरे तनबदन में, तब भाखिरमें उसी सह
रामें जाकर, ले आया थी उनकी चुराकर, वह भव सेनाको
लेकर दोनों भाये, बहादुर मेरे सब रनमें खपाये.
कुम्भकर्ण-गजब तूने किया अफसोस बाई, नहीं मुझको
सबर पहले सुनाई. हाय तूने क्या किया, जमतमाताको दुरा
लिया, देख मैं तुझे समझाता हूं, एक एस भेद बताता

मंक ६ठा.
मैं
करते होंगे इन्तजारी सीतापति रघुनाथजी ।
मैं कसं अफमोम क्या उठने के नहाँ काबिल रहा ।
कौन ले जावे मर्जवनमार रस्तेमें रही।
कैसे अच्छे होवे लछमन हाये हाये हाये हा ॥
(हनुमानजीका मूर्छित हो जाना, भरतजीका व्याकुल
होकर हनुमानजी को जगाना. )
भरतजी-पुझमा नहीं है कोईभी जालिम वजफाकार ।
जल्लाद हूं बेरहम हूं मशहूर हूं खूखार ॥
वह हूं जिसने रामको जलावतन किया ।
उसपरभी न की इकजका दी और यह आजार ॥
बदनामनी में हो चुका सब कुछ सहा पर आह ।
अब तो न मता और तू ऐ चर्ख कजरफतार ॥
रनुमानजी-सीतापति रामचन्द्र रघुपति रघुराई.
भरतनी-माई ! तुम कौन हो, अपना नाम बतावो,
सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनावो, हाय यह तुमने क्या कहा था,
पापप्यारे लछमनका क्या हुवा ?
हनुमानजी-महाराज! दुष्ट रावण माता जानकीजीको
पुराकर ल गया है, अपनी राजधानी में छुपाया है, श्रीरा-
मचन्दनी महाराज लंकाके किलेपर युद्ध कर रहे हैं, दुष्टोंको
संहार रहे हैं, आज लक्ष्मणजीने मेघनादके हाथसे शक्ति खाई
है, मूर्ण आई है, सुषेणवैद्यने सजीवनमोर मंगाई है, मैं छत

९.. श्रीरामजानकीजीचरित्र। कि पंचवटीमें एक कालरूपी सी भावेगी, यह हमारे कुखका नाश करावेगी, उसपर रावणने मुझको धमकाया और मार- कर निकाल दिया, सभा निरादर किया. कुम्भकर्ण-विभीषण तुझको धन्य है, जोतने मेरे वच- नोंका पालन किया, पुलस्त्यमुनिको निवंश न होने दिया, बस अब मेरे सामने से चला जा, रघुनाथ नी महाराजके चर. गोमें ध्यान लगा, मैं अब काल के वश हो गया हूं, अपने परायेको भूल गया हूं. (विभीषगका :डवत् करके चला जाना.) - सीन नं. १७. (कुम्भकर्णका कपिदळपर धावा करना.) कुम्भकर्ण-मैं आज इस वानरी सेनाका नाश बनाउंगा, यमलोक पहुँचाऊंगा, छिनमात्र सबको क्षण कर जाऊंगा, रावणकी चिन्ता मिट ऊंगा, इन भुजाओंका पराकन दिसा- ऊंगा, कोई शूमा हो तो भावे, हाथ मिलावे. (कुम्भकर्णके प्रहारसे वानरो सेनाका व्याकुल होकर भागना, महाराज रामचंद्रजीका कुम्भकणसे युद्ध करना और घोर संग्राम करके कुम्भकर्णको मारकर उसका शश लंकामें फेंक देना.) (देवतागण . पुष्प बरसाना.) श्री वन. (तर्ज-रो छलचल है न्यारी तोरी कलबल है न्यारी.) प.पा समाज रण संहारा। देवनागण-दुध

मंक ६.
१८७
मतभी तो हा आया नहीं क्या तुझेमा पहुँची है
कोई मजार ॥
(हनुमान्जीका आना, सुंघणवद्यका पधी उपारकर उपाय
करना, लक्ष्मणजीका जाग उठना, रामचन्द्रजीका लक्ष्मणजीको कण्ठ
गाकर हनुमानजीसे मिलना.)
धुन जिला ताल कवारी.
( तब-टुवा है पुत्र दशग्यो मकदर हो तो ऐसा हो.)
रामचंद्र-बचाये प्राण लछम के महल्या हो तो ऐसा हो ।
उलांघा खारीगरको तिरस्या हो दो ऐता हो।
अकेलाही गया लंका न दिलमे की जरा शंका ।
संहारा पुत्र रावणका लड़य्या हो तो ऐसा हो ॥
लमाकर पूंछमें अनी जलादी तारोही लंका।
रहा एक घर विभीषण का बचय्या हो तो ऐसा हो ।
कहां गिरिद्रोणाचल चंदन हां लंकाकी रणभूमी।
ले आया छिनमें सरजीवन चलय्या हो तो ऐसा हो।
सीन नं. १५.
(रावणका कुम्भकर्णको जगाना.)
कुम्भकर्ण-यह कैसा शोर व गुल मचाया है, क्यों
मुझको पेवक रूवाबशीरीसे जमाया है, जल सुना क्या
माफत भाई है जो ऐसी गममान सूरत बनाई है, चेहरेपर
मुनी गई है, कैसी भष तरी फैलाई है ?

श्रीरामजानकोजीचरित्र ।
अंधेर हो गया मेरी भांखोंमें क्या कर।
हा मरांदशे परतूंने अब मुझको रुला दिया ।
काँथे तेरे रौबसे नर नाग किन।।
इंसाने तुझको आज आह रणमें सुला दिया।
तकरिका लिखा न मेरै क्या करे चन्दन ।
तुझसे पियारे भातको मैंने सपा दिया ।
ताळ थाप.
दोइरा।
मेघनाद-क्यों व्याकुल मनमें हो, देखो मेरा जोर ।
अबही रणमें जायकर, युद्ध करूंगा घोर ॥
रावण-कुमुख अकम्पन सप गये, मरा कुलकर्णसा पीर ।
एक तृझहीपर लाल मैं, बांध रहा हूं धीर ।
मेघनाद-पैर तात लेहूं सकल, कहूं चरण सिर नाय ।
आयम पीजे अब मोहे, युद्ध करूं मैं जाण ।
सीन नं. १९.
(श्रीरामचन्द्रजी भोर रक्ष्मणनीका वानरी सेनामें विराजमान
होना, मेघनादका यानोपमें बैठकर माकाशमार्गसे बाणोंकी वर्षा
करके सम्पूर्ण कपिदलको व्याकुल करके श्रीरघुनाथनीको नागफांसमें
बांधकर प्रगट होना.)
मेघना-मेरी भुजाओंके बलको सम्पूर्ण ब्रह्मांड जानता
है, इंद्र मेरे नामसे भय मानता है, कोई है जो इस मेघनादके
सन्मुख भावे, हाथ मिलाये.

मंक ६ ठा. . १८ जिमको तू चुराकर लाया है, लंकामे छुपाया है, वह स्त्री नहीं है, मयानक काल है, तेरा किधर ख्याल है, नारदमुनिने मुझको पताया था, यह सुनाया था कि पृथ्वासे एक मोहनी मर्त उत्पन्न होगी, जो इण्डकारण्यमें आवेगी, वह सम्पूर्ण राक्षसी- कुलका नाश करावेगी, मो अब वोह समय आ गया है, काल सिरपर मंडला गया है मैं युद्धम तो जाऊंगा, घोर संग्राम करके दिखाऊंगा, मगर मुडकर नहीं आऊंगा, इस कारण जी खोलकर मिल ले, कंठ लगाकर प्यार करले, फिर यह सूरत तुझको दृष्ट नहीं आवेगी, यमलोकमें चली जावेगी. (रावणका मदिरा और मांस कुम्भकर्णको भक्षण कराना.) कुम्भकर्ण-मैं अभी रणभूमिमें जाता हूं, शत्रुओंका नाश बनाता हूं, अपनी भुजाओंके बलसे कपिदलको गर्दमें मिलाता हूं, दुश्मन के खूनसे दरिया बहाता हूं, दोनों भाइ- योंको रणभूमिमें सुलाता हूं, थोडीही देरमें क्यासे क्याकर दिखाता हूं, मैं अपनी भुजाओंपर सब कुछ भरोसा रखता हूं, सेनाभी नहीं ले जाता हूं. सीन नं. १६. (कुम्भकर्णका रणभूमि बिभीषणसे मिलना.) विभीपन-आई में मई, औरघुनाथजी महाराजकी शरणमें हूं, मैंने रावण तमाशाय. था, भारदजीका वह वचन सुनाया था, जो एक समय आपने मुझको बताया था

१९१
श्रीरामजानकोजीचरित्र।
अंधेर हो गया मेरी आंखोंमें क्या करें ।
हा गरदिशे मरहूंने अब मुझको रुला दिया ।
काँथे तेरे रौबसे नर नाग किन्नरा।
इंसांने तुझको आज आह रणमें सुला दिया ।
तकदीरका लिखा न मेरै क्या करे चन्दन ।
तुझसे पियारे भातको मैने खपा दिया।
ताल थाप.
दोहरा।
मेघनाद-क्यों व्याकुल मनमें होवे, देखो मेरा जोर ।
अबही रणमें जायकर, युद्ध करूंगा घोर ॥
रावण-मुख अकम्पन खप गये, मरा कुलकर्णसा बीर ।
एक तुझहीपर लाल मैं, बांध रहा हूं धीर ।
मेघनाद-बैर नाव लेहूं सकल, कहूं चरण सिर नाय ।
आयसु दीजे अब मोहे, युद्ध करूं मैं जाण ॥
सीन नं. १९.
(श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजीका पानरी सेनामें विराजमान
होना, मेघनादका यानलोपमें बैठकर आकाशमार्गसे बाणोंकी वर्षा
करके सम्पूर्ण कपिदलको व्याकुल करके श्रीरघुनाथनीको नागफांसमें
बांधकर प्रगट होना.)
मेघनाद-मेरी भुजाओंके बलको सम्पूर्ण ब्रह्मांड जानता
है, इंद्र मेरे नाभसे भय मानता है, कोई है जो इस मेघनादके
सन्मुख भावे, हाथ मिलाये.

अंक ६.
मुनिजन को उभारा प्रोकी नाथ ॥
प्रभु स्वामी खरारि नुमही जग के आधार ।
तेरी लीना अपार नावं चरणन माय ॥
सुनो सुना रामा पूर्णकामा।
पापी गवणको माग कग अनसनाथ ।
मिया कट मिट वा देव निर्भर बनावो ।
बंदीगण । छुट्टाको हेि धन धन धन ॥
4
धन धन धन धन धन ध।
गर नं १८.
(रावणका राजसभामं बैठना आ कुम्भकर्णकं शोसका समामें
महारानका फेंका हुआ आकर पडना रावणका विलाप करना.)
ठु । धुन जि पं.लू.
(तर्ज-उधो दुनिया रेन बसेरा.)
रावण-हाये भाई प्राणांपयारा कहां भोको छोड सिधारा।
तूही था एक विपतकालमें धीर बन्धावनहारा ॥
कह भाई अब कैने जीऊं डूबत हूं मझधारा ॥
नाव पडी रणसागरमाही सझत वार न पारा।
तो विन अब अय्याजी मोको कोन लंघावनहारा ॥
गजल धुन विहाग' ताल दादा.
( तर्ज-गैरत न तु को आई कुछ ऐ बेशरम.)
यह आज फकने अला मुझा दिवा दिया।
भाई पियारा
भज्ञ छुड़ा दिया ।

१९४
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
पडी यह देख आवो, मेरा प्रीतम गया है आज रणमें, उदासी।
छा रही है मेरे मनमें.
(चम्पाका भुजाको देखकर चकित होना.)
सुलोचना-प्रिय चम्पा ! क्या कारण है सुना तो, चकित
क्यों हो रही है यह बता तो.
चम्मा-सुना यह तेरे प्रीतमकी है रानी, विधाताकी नहीं
गत जावे जानी.
(सुलोचनाका उठकर भुजाको पहचानना.)
सुलोचना-हाय केहिं विध मर गये मेरे प्राणाधार,
लिख मेटो संदेह को हे प्यारे भार.
(सुलोचनाका खडिया मृतकमुजाके हायमें देना और उसका
श्रीलक्ष्मणनीकी को लिखकर युद्धका सम्पूर्ण वृत्तांत लिख देना,
सुलोचनाका विकल होकर भूमिपर गिरना.)
अंग्रेजी वजन धुन सिंधुरा ताल कहरवा.
(तर्ज-जैसी करनी वैसी भरनी करनीको त करकर देख. )
सुलोचना-
हां हा ईश्वर हा हा ईश्वर कसा किया यह मुझपे सितम ।
क्यों मुझको दिखलाया है अब ऐसा सख्त पहरंजो अलमा
प्राणपियारा पीतम छुटा कैसे सहूं मैं हाय यह गम ।
किया कसूर क्या ईश्वर मैंने जो हो गया ऐसा बेरहम ।
हाय मैं कहां जाऊं पीतमको कैसे पाऊ।
अब जहर मैंसी खाऊं अपनी मैं जां गवाऊं।

बंक ठा.
.
जांबवन्त-ऐ दुष्ट । बातें न बना, जरा ठर जा, अभी
तुझको श्रीरघुनाथजी महाराजका प्रताप दिखाता हूं, तुझको
यमलोकका पन्थ बताता हूं.
। जांववन्तका मेघन इसे युद्ध करके उसको भूमिपर पछडकर
कामें फंक देना, गरुड का आकर सम्पूण नागोंके भक्षण कर जना,
रघुनाथजीका वानरी सेनाम हर्षयुत विराजमान होना
विभीषण-महाराज ! दुष्ट मेघनाद पर्वतकी कंदरामें अगरा-
उन यज्ञ करता है, जैसे और रुधिरकी आहुती देता है, जो
कदापि सिद्ध कर लेगा तो किसीका मारा न मरेमा, इस
करण योधाओंको पठावो, उसकी यज्ञको विध्वंस कराओ.
रामचन्द्रजी-प्रिय लक्ष्मण! अंगद हनुमान के संग जावो,
उसकी यज्ञको विध्वंस बनावो, दुष्टको मारकर आवो, मुनि.
जनके कष्ट मिटावो.
(लक्ष्मणजीका दंडवत् करके चलना.)
सोन नं. २०.
मेघनाद-ॐ नमो चण्डिकायै नमः
(लक्ष्मणजीका यज्ञको विध्वंस करना और घोर संग्राम करके
उसके शीसको काट लेना और भुजाको लंकामें फेंक देना.)
सोन नं. २१.
सुलोचनाका राजभवन में बैठना, मेघनादको भुनाका
आंगनमें गिरना.)
मुलोचना-प्रिय चंपा सखी ! तुम वेग जावों, भुजा कैसी

.
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
करूं आह मैं तदबीर क्या लावल्द मुझको कर गया।
भाई मुवा बेटा खपा सेनानी सब मारी गई।
किस किसको रोऊं क्या करूं गमसे कलेजा भर गया।
मतलबका सब संसार है गरदिशमें न कोई यार है।
करूं औरका अरमान क्या भाईनी मुझसे फिर गया।
(सुलोचनाका आकर दण्डवत् करना.)
सुलोचना-महाराज! आज मेरे प्राणप्यारे अरिको
श्रीलक्ष्मणजीने संपामशय्यापर सुला दिया है, मुझको विधवा
बना दिया है, उनकी मृतकभुजाने सब कुछ लिखकर बता
दिया है, यहभी जता दिया है कि उनका धड रणभूमिमें पडा
है और शीश श्रीरघुनाथजीमहाराजके दर्शनोंको गया है, सो
आप रुपा करके कोई उपाय कीजिये, जिस प्रकार बने
पतिका सीस ला दीजिये.
रावण-आह पुत्री ! त उस मृतक सीसका क्या बना-
वेगी, वह तो सब मिट्टी है, यूंही देख जी जलावेगी.
सुलोचना-नहीं महाराज ! जी नहीं जलाऊंगो, हर्षयुत
सती हो जाऊंगी.
रावण-हाय काँका लिखा नहीं मिटता है, सोचेसे क्या
बनता है, सदा कोईभी नहीं रहा है, सबको कालने खाया है,
पुत्री। चार घडी धीर्य धर, करुणा त्यागन कर, तू एक मेघना-
थका सीस मांगती है, मैं अभी सम्पूर्ण कपिदलको संग्राममें

अं.६ टा.
१९५
किया बडा गनः : मारे तने रच ।
क्या कहा रह वह सम ॥
पा-
होगा।
जवान जे बम लिन ईन्दा जगदीश ।
माई पडे कि नाना, यि ऊसास ॥
मदः म्य- कोर्ट
जो हृदय विचार ।
कदिन ब ये कालसर, ना.मान संसार ॥
नरेला बने, तुर ऐ राजकुमार ।
बनने पीकदीन नही जगत व्योहार ॥
हुरी जयन्ती.
(सज-गनभ मत सोचेरी सुन्दर आजको रैन चन्द्र गोगो.)
कमे धीर धरं मोरी आली विवि मोपे बिपता है डारी ।
प्राणपियारा पीतम मोरा मोहे छोड अब आह चलारी।
कान उपाय कर क्या सोचं कहां जाऊं मैं कमाँ हारी।
तो बिन पीतम सब जग सूना आंखियनमें छाई अंधियारी
जाऊं पिता शीश भंगाऊं जरूं सङ्ग अब मैं दुखहारी ॥
सीन नं. २२.
(रावणका राजभवनमें दुःखित बैठना.)
गजल धुन सोहनी.
(तर्ज-तरा कवका मुझसे वैर था तूने पेट पड बदला लिया.)
रावण-लले जिगर घननाद प्यारा आज रणमें मर गया।

१९८
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
असुर संहारो देव उभारो दुख टारो कारज सारो।
मैं तुम्हारी शरणागत आई राखो लज्जा रघुराई ॥
विभीषण-महाराज । यह नागसुता रावणकी पुत्रवधू
मेघनादकी स्त्री है, जो पतिव्रतधर्मके आभूषणसे आभूषित
हो रही है, दशकंधरके दुष्ट कर्मसे इसकी यह गति हुई है, जो
आज वानरी सेनाके सन्मुख खडी है.
सुलोचना-महाराज!श्रीलक्ष्मणजी महाराजने मेरे पतिको
रणभूमिमें संग्रामशय्यापर सुला दिया है, उनका तामसी शरीर
छुडा दिया है, उनकी मृतक भुजाने सब कुछ लिखकर बता
दिया है, मेरा संदेह मिटा दिया है, आप कपा करके मेरे
पतिका सीस मंगा दो, मेरी चिन्ता मिटा दो, मैं पतिके
संग चितामें बैठकर जर जाऊंगी, संसारसमुद्रसे पार उतर
जाऊंगी.
रामचन्द्रजी-प्रिय सुग्रीव ! मेघनादका सीख लावो, इस
पतिव्रताकी चिन्ता मिटावो.
(सुग्रीवका मेघनादका सीस लाकर देना, सुलोचनाका दंडवत् करना.)
सुलोचना-कपाल नाथ आपको दंडौत मैं करूं ।
दिलकी मुराद पा लई चरणों में सिर घरूं।
दर्शन के लिये आपके जप तप मुनी करें।
सब छोड माल देशको जंगलमें वह फिरें।
लेकिन न दृष्ट आता है उनकोनी यह स्वरूप ।
नैनोंसे देख में लिया सोई अनूप रूप ॥

मंक ६ ठा.
१९९
अब नाथ मुझपे इतनी दया और कीजिये।
सागरसमीप अब चिता बनवाय दीजिये ।
(वानरोंका सागरके तीर चिता बनाना, सुलोचनाका
पतिके सीसको लेकर चितामें बैठ जाना.)
गजर सोहनी.
(तई.-तेरा कवका मुझसे बैर था तने पेट पड बदला लिया.)
सुलोचना-तज मोह बंदे राम भज झूठा यह सब संसार है।
कोमात है को तात है को भात है को यार है।
कैसा प्रपंच बनाया है तूही जगत आधार है।
एक रोरोजीको जलाता है एक हँसके बातें बनाता है।
एक पैदा एक मरता है तेरी माया अपरम्पार है।
तूने भाके चन्दन क्या किया कभी नाम नहीं हरका लिया।
वृथाही जीवन खो दिया चलनेको अब तय्यार है।
(भागका प्रचंड होना और सुलोचनाका पतिधामको प्राप्त होना.)
सीन नं, २४.
(मंदोदरीका राजभवनमें दुःखित होना.)
गजल धुन देसकार ताल चाचर.
(तर्ज-जबानीमें क्या होगा जोबन किसीका.)
मंदोदरी-यह दुनिया नहीं जी लगानेकी जा है।
जरा देखो सोचो यह मिसले.सरा है।
रहा इसमें कोई न कोई रहेगा।
चलाचलका सौदा यह यूही लगा है।

श्रीरामजानकीजीचरित्र। मजे जो हैं दुनियाको सबही रहैगे। कोई आया है और कोई चल दिया है ।। न चन्दन यहां तेरा न तू किसीका । यही जीते जीका यह नाता बना है ॥ ( मंदोदरीका भूमि गिरकर माछत हो जाना.) सीन नं. २५. (रावणका राक्षसीसेनामें शोकयुत बैठना.) गजल धुन जिला बिहाग ताल कवाली. ( तर्ज-एक तर फेंकता जा बांकी कमानवाले.) रावण-लख्ने जिगरको मैंने आह रणमें अब खपाया। अफसोस चर्स जालिम क्या क्या तू रंग लाया ॥ जिन्नो परी फरिश्ते काबमें सब थे मेरे । ना चीन एक इंसां जिसने मुझे रुलाया ॥ उठो मेरे दलेरो तीरो कमां संभालो। यातो मरूं या मारूं अब तो यही समाया ॥ (रावणका राक्षसीसेनासहित चलना.) सीन नं. २.. ( श्रीगम और रावणका युद्ध.) ( अंग्रेजी वजन धुन सिंधुरा ताल कवाली.) ( तर्ज-लपको लपको मारो इसको नहीं जाने पावे जिन्हार.) सेनाराक्षसी और कपिदल- मारो मारो पकडो जाबो मिलके करो अब भाई वार । कमां चढालो जल्द संगालो संजर नेजा और तल्वार ॥

मंक ६ ठा. २०१ देखो अवधाम जब है करदो तीरोंकी बूछार । या वो मरो या मारो दलेरो पीछे हटो नहीं अब जिन्हा।। (रावणका अनेक प्रकारका घोर संग्राम करके श्रीरघुनाथजी महा- राजके वाणोंसे प्राण त्यागन करके सुरलोकको प्राप्त होना, देवताग- णका पुष्प बरसाना.) अंग्रेजी वजन धुन सिंधुरा वाल कबाली. ( तर्ज-जैसी करनी वैसी भरनी करनांको त् करकर देख.) देवतागण- जय रघुनायक जगसुखदायक प्रणतपाल जनहितकारी। मुनिजन सज्जन ध्यान धरत है जपत उमापति त्रिपुरारी । यह दुष्ट पावन देव सतावन मह मंदमति हंकारी। रणबीच संहारा पापी मारा कीर्ति पावन विस्तारी॥ प्रभू दीनबंधु नाथ चरणोंमें नावे माथ। जोडै यह दोनों हाथ हुये आज हम सनाथ ॥ रघुकुलपति महाराज चंदनकी राखी लाज । पापीको मारा आज जय जय हरी खरारि ॥ (सुरसमूहका दंडवत् करना.) (ड्रापसीनका धीरे धीरे गिरना.) षष्ठ भाग समाप्त.

नाटकधर्मप्रकाश
अर्थात्
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
'.
राजकाण्ड सप्तम भाग.
अॅक्ट नं. ७.
श्रीरामराजलीला.
सीन नं. १.
(श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय बंधु और वानरीसेनासहित रणभूमिमें विना
राजमान होना, देवतागणका पुष्प बरसाना, महाराजकी स्तुति करना.)
श्यामकल्याण.
(तर्ज-हेरो सखी आरती कीजे आज.)
देवतागण-प्रभु तुम जगरक्षक रघुराज ।
माया अपरम्पार तुम्हारी, देवनके सिरताज ॥
बीस भुजा दस शीश अपावन, मारो रावण आज ।
देव उमारे असुर संहारे, राखी जनकी लाज ॥
चन्दन मस्तक तिलक विराजे,शोभा अति महाराज।
(मन्दोदरीका सम्पूर्ण रनवाससहित आकर विलाप करना.)
गजल धुन जिला बिहाग ताल काली.
(तर्ज-यह न थी हमारी किसमत के त नेकरार होता.)
रावणरणवास-किस नींद सो रहे हो, जागो पती हमारे ।
दासी हैं हम तुम्हारी, मुखसे तो बोलो प्यारे ।

मॅक७वा.
योणित बहे है तनमें, केसे पडे हो रनमें ।
छेदन हुहें हाये, बाणोंसे अंग सारे ॥
यमराज काउ इंदर, कां थे तुमसे निश्वर ।
जम्बुक सियार खावे, शिर बाहु अब तुम्हारे ॥
मन्दोदरी-हाय पति। तुमने मेरा कहा न माना, त्रिलोकांक
नाथको मनुन माना, तिसी कारण इस दुर्गतिको प्राप्त हुए हो
कि अनाथकी नाई संघाममें पडे हो, पति रघुनाथजीके
द्रोहका यह फल पाया कि कोई कुलमें रोनेहारामी न रहा.
(विभीषणका रावणके मृतकशरीरके निकट जाना.)
विभीषण-हाय प्रियबंधु ! तेरे भयसे सम्पूर्ण ब्रह्मांड
कांपवा था, यमराजानी तेरी भुजाओंके पराक्रमसे भय खाता
था, इंद्र पानी भरता था, चंद्रमा दीपककी नाई भवनमें प्रकाश
करता था, हाय प्रतापी भाज इस दुर्दशाको प्राप्त हो रहा है,
वेरे सम्पूर्ण अंगोंसे शोणित बह रहा है, सच कहा है, मिटवा
वहीं मिटायेसे तकदीरका लिखा, सोचे हजार लाख कोई
बन सके है क्या.
रामचन्द्रजी-प्रिय विभीषण ! धैर्य धरो, करुणा त्यामन
करो, सरा कोई नहीं रहा है, सबको कालने भक्षण किया
है जो पैसा हुआ है मो मुवा है, उठो चन्दन आदिक भार
अयो, इस भवापीके मृतक शरीरको बह वनामओ अंगद तुम
बामणके संग बबरमें जामो, विकीपकको सजगदीपर

२०४ श्रीरामजानकीजीचरित्र । बिठाओ, हनुमान् ! तुम अशोकवाटिकामें जनकनंदिनी मेरी कुशल सुनाओ, अच्छा विलम्ब न लगाओ. (बिभीषणका चंदन आदिक भार लाकर सागरके तटपर रावण शरीरको दाह देना और मंदोदरी आदिकका उसको तिलांजलि देकर लंकामें प्रवेश करना.) Date सीन नं. २. (श्रीजानकीका अशोकवाटिका दुःखित बैठना.) मांड. (तर्ज-ननदी धारे बोलो जी.) जानकीजी-मेरा जीव रहा घबरा पीतम नेक तो दर्श दिखा। पीतम तोर वियोगमें तडफत हूं दिन रैन । उठत विरहको आग उर दर्श पियासे नैन । मेरा प्राण कंठरहा आ पीतम नेक तोदर्शदिखा। तजन चहत तन प्राण अब नाहि जियनकी आशा देश पराया ना कोई संगी साथी पास ॥ मोको कौन जरावे हा पीतम नेक तो दर्श दिखा। ( हनुमानजीका आकर दंडवत् करना.) हनुमानजी-माताजी! काहेको दुःखित हो, किस कारण मलीन हो, आज श्रीरामचंद्रजी महाराजने दुष्ट राव- णको संग्रामशय्यापर सुला दिया है, पापीको कुलसहित यम- लोकका पंथ दिखा दिया है, मुनिजनका कष्ट मिटा दिया है, देवनाओंको अभय बना दिया है, उसके मृतक शरीरको मक ७वा. २०५ ग्रहमी करा दिया है, भीलक्ष्मणनीको बिभीषणके राजति- सकके निमित्त लंका पठा दिया है, माताजी | अब तो आनन्द मनावो, ईश्वरके गुणानुवार गावो. (हनुमाननीका दंडवत् करके चलना.) ठुमरी. (तर्ज-आज तो आनन्द मोरे श्यामजीका आवना,) बानकीबी-धन्य धन्य भाग आज मुवो दुष्ट रावणा ॥ कौन जगत भाग्यवन्त मो समान भाज है। देखहूं मैं नयनसे रूप मन भावना ॥ हुँ का मैं पुत्र तोहे ना कुछ वाणी समां । रोग विपत कष्ट नाश पूरी हुई कामना ॥ (श्रीनानकाजीका हनुमाननीको कण्ठ लगाना.) हनुमानजी-माताजी ! आज मैं त्रैलोक्यका राजपा लिया है, जो आपने मुझको पुत्र मानकर कण्ठ लगा लिया है, बानकीजी-प्रिय हनुमान् ! अब शीघही कोई ऐसा यन करो कि श्याम सरोजरूपी मुखारविंदके दर्शन पाऊं, इन तपावन्त नैनोंको दर्शरूपी अमृत पान कराऊं. हनुमानजी-मावाजी। मैं श्रीरघुनाथजी महाराजको आ- पकी कुशल सुनाता हूं, पीर्य घरो, शीघही लिवा ले जाता हूँ (हनुमाननीका दण्डवत् करके चलना.)

२०६
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
सीन नं. ३.
(श्रीलक्ष्मण का राजसभामें बिभीषणके लंकाके राजका तिलक
करना, देवतागणका बन्दीखानेसे छूटकर स्तुति करना.)
ठुमरी रेखता.
(ज-बुरा मैं क्या किया तेरा.)
देवता-
मिटे दुष्ट आज भय भारी मुवा खल दुष्ट मुरआरी ॥
हुये हैं काज मन चीते विपत संकटके दिन बीते ।
करें नित नौ का तुमपर सियापति राम हितकारी।
बढे दूनो प्रभुताई दयालु जगत सुखदाई !
करे आनन्द मन निशि दिन विधाता तेरी रखवारो॥
(सवका विभीषणको शीस निवाना.)
सीन नं.४.
(त्रिजटाका अशोकवाटिका में श्रीजानकीजीको स्नान कराकर
दिव्य वसन और आभूषणसे आभूषित करना, सरमा और मंदोदरी
आदिक रनवासका आके महारानीको दण्डवत् करना.)
गजल धुन जिला ताल क्वाली.
(तज-भो ताना है खंजर हाथमें है तनके बैठे हो.)
मंदोदरी-
जगतजननी द्युतिदामिनहरण दुख शोक मुख करनी।
पतिव्रतधर्मस भूपित श्रीरघुकुलपतिघरनी ॥
सहे दुख त्रास अति भारा तजा नहीं धर्म सुकुमारी।
जगतमें कौन अस नारी तोहे धन धन सुता धरनी ।

मंक ७वां. मुनिजन देवहित कारण किया है रूप यह धरणी । सही विपता रही कानन सकल संताप अघ हरनी। (मंदोदरी,मादिक रनपासका श्रीजानकीजीको दंडवत् करके रन जटिल आभूषण महारानीके कंठमें शोभित करना.) सरमा-महारानीजी! इस शिविकामें विराज जावो, श्रीरघुनाथजी महाराज के दर्शन पावो. (श्रीजानकीजीका आनन्दमन पालकोमें विराजमान होना, विज- टाका जानकीके चरण पकडना.) त्रिजटा-माताजी! हमारे अपराध क्षमा करो, हम दोनोंको कपादृष्टि से निहारो, रावणके भय से हमने आपको अतित्रास दिये हैं, अनेक प्रकारके दुष्ट कर्म किये हैं, (जानकोजीका त्रिजटाको कंठ लगाना.) जानकीजी-प्रिय त्रिजटा! तुम तो मुझे प्राणोंस भी प्यारी हो, मेरी आपत्तिकालको हितकारी हो. (श्रीजानकीजीकी अपने कंठसे रत्नजडित आभूषण उता- रके त्रिजटाको पहराना, राक्षसोंका पालकी उठाना.) सीन नं.५. (श्रीरामचंद्रजीका लक्ष्मणजीसहित हर्षयुत वानरसेनामें विरा. मान होना, बिभीषणका श्रीजानकोजीको लेकर आना.) ठुमरी (तर्ज-यह जग हे गोरखधंधा.) देवकन्या- प्रभु जय जय जय खरआरी लीला है वेरी न्यारी। : खल दुष्ट मसुर संहारे मूरख सब रणमें मारे।

२०८ श्रीरामजानकीजीचरित्र। मुनि सज्जन कीन्ह सुखारी प्रभु जय जय जय खरभारी॥ पापीन सिया सताई तो अपनी जान गंवाई। मिटे आज त्रास अय भारी प्रभु जय जय जय खरआरी॥ सहे दुष्ट त्रास अति भारी तजा धर्म न सीता प्यारी। धन धन तोहे जनकदुलारी प्रभु जय जय जय खरआरी॥ (जानकीजीका श्रीरामचंद्रजीको दंडवत् करना.) रामचन्द्रजी-जनकनन्दिनी अब तुम इस योग नहीं हो कि मेरे अंगको स्पर्श करो. जो कुछ अपने धर्मकी परीक्षा देगी तो मेरे चरण गहोगी. जानकीजी-लक्ष्मण आवो, चिता बनावो, विलम्ब न लमावो, अनि प्रचण्ड बनायो. (लक्ष्मणजीका श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाके चिता बना. कर अग्नि प्रचण्ड करना.) गजल धुन बिहाग. (तर्ज-है बहारे बाग दुनिया चन्द रोज.) जानकीजी-देवी अनि तू जगत आधार है। ज्वाला तीक्षण ज्योति अपरम्पार है ॥ जीव जन्तुकी गती तूही करे। तेज तेरा जाने सब संसार है॥ जो कलंकित हूं तो मुझको भस्म कर । ज्वालामाई तू जगत आधार है॥ (जानकीजीका प्रदक्षिणा करके प्रचण्ड अग्निमें प्रवेश करना, पाव- कका शीतल हो जाना. रामचन्द्रजीका श्रीजानकीजीको पाणिग्रहण करके वाम अंगमें विराजमान करना, देवतागणका पुष्प बरसाना.)

अंक ७वां. १०५ ठुमरी. (G-जरा पेचनवाठी नादान यह तेरा नखरा.) देवकन्या-पवित्रता न तोसी है नार धन धन धन । सपञ्चावर सब एणनागर प्यारी धरणीसुता सुकुमार सपनपन । पती मन लामा धर्म न त्यागा सहे संकट पित है अपार धन धन धन । रामपियारी जनक- दुलारी तेरी महिमा विदित संसार धन धन धन । (देवकन्यामोंका दण्डवत् करके चला जाना, विभीषणका मणि और दिव्य वसन भूषणसे पुष्पकविमान भरके महाराजके सन्मुखघरना.) विभीषण-महाराज ! यह वह पुष्पकविमान है जिसको रावण कुबेरके युद्ध करके लाया था, इसीके प्रभावसे मूखने सम्पूर्ण ब्रह्मांडमें दुंद मचाया था हे प्रभु। यह आकाशमार्यमें पक्षीकी नाई चलता है, किसीको दृष्ट नहीं आता है, बडे बडे अपार समुद्रोंको छिनमात्रमें उल्लंघन कर जाता है, हे कपालु ! इस दासकी ओरसे यह मणि आदिक तो श्रीजनक कन्दिनीपर निछावर करें और यह वंसन भूषण योषा वान- रमणको भेट (विभीषणका आकाशमार्गसे वसन भूषणकी वर्षा करना. वानरोंका भानंद होकर उठाना, महाराजका श्रीजनकनंदिनीसहित वानरोंके संग विनोद करना.) विभीषण-महाराज | अब तो छपा करके नगरमें पर पारो, सम्पूर्ण राजकोश निहारो. रामचन्द्रजी-हे सखा ! तुम इस सम्पूर्ण राज. कोशसे आम उठायो, अभय होकर लंकामें आनन्द मनावो,

श्रीरामजानकीजीचरित्र।
मैं तो अब अयोध्यापुरीको जाऊंगा, प्यारे भरतका कंठ
लगाऊंगा, अपनी माताको शीश निवाऊंगा, गुरुजीके दर्शन
पाऊंगा, जो कदापि दो दिवस चौदह वर्ष में बाकी हैं बीत
जायेंगे, तो मेरे प्रियबंधुके प्राण तनमें नहीं रहने पात्रो, प्रिय
बामरमण मैंने तुम्हारी सहायता और पराक्रमसे रावणका
नाश किया है, विभीषणको राज दिया है, अब तुम अपने
अपने स्थानको जावो, आनन्द मनावो.
(सम्पूर्ण सेनाको विदा करके रामचंद्रजीका प्रियबंधु और भायाँ-
सहित पुष्पकविमानमें विराजमान होना. विभीषण, सुग्रीव, अंगद,
हनुमान आदिक योधाओंका श्रीरामचन्द्रजीके चरण पकडना.)
सुग्रीव-महाराज! हम तो आपके संग जावेंगे, माता-
ओंको शीश निवावेंगे, करोडों जन्मके पातक कटावेंगे, कुछ
दिन अयोध्याजीमें वास बनावंगे.
. रामचन्द्रजी-अच्छा प्रिय! आवो विमानमें विराज जाओ.
(बिभीषण, सुग्रीव, अंगद, हनुमान् आदेक सेनापतियाका महा-
राजके संग विराजना, विमानका आकाशमार्गमें उडना, सेनाका जय.
--
सीन नं. ६.
(भरतजीका नन्दीग्राममें श्रीरामचन्द्रजीके वियोगमें
दुःखित विराजमान होना.)
ठुमरी.
(तर्ज-राम मिलनेको जाता माता.)
भरतजी-राम विना मोहे कछु ना सुहावे ।
तिल मंद सुगंध बयारी अगवास सम जिवरा जलावे ।

मंक ७.
असली नितिन दुलन मोको कालनिशा समरी सबाले ।
गावकिसाप मनहुं कसानु चंद्रकिरण अब आग लगावे।
पर विपरीवा विन प्रभु सीता चंदन वोर सुमंधी न पाये।
माह चौह वर्षको अवधीमें तो केवल दो दिवस रहे हैं
भौर महाराज भवतक नहीं आये हैं.
रागनी देस.
(तर्ज-उधौ सौ साल दुखदाई.)
को मोसम दुष्ट अभागी बन बसत राम जेहिं लागी ।
रहे दिवस दो अवधीमें काह करूं मैं हाये ।
भाये नहीं रघुकुलकमल जीव रहा घबराये ॥
उर पीर विरहकी जागी को मोसम दुष्ट अभागी॥
बीते अवधी न आये हैं प्रभु रहे जो तनमें प्राण ।
मूढ मंद मति कुटिल तू अधम को मोह समान ॥
(भरतनीका विकल होकर भूमिपर गिरना.)
सीन नं.७.
(वाल्मीकिजीका ईश्वरके गुणानुवाद गाना.)
मजन.
(तर्ज-सावन के बदरवा कारे.)
वाल्मीकिणी-नर रामनाम गुण मा ।
ममता तृष्णा मान इर्षा भवसागर नदी नाले ।
लोग मोह मद अमित भयंकर ग्राह नाम हैं काळे ॥
सातारा परिवार कुटुंब सब कर दे राम हवाले।
रामनामकी अपने तिरवको नय्या जीव बना ले।

२१२
श्रीरामजानकीजीचरित्र।
(पुष्पकविमानका आकाशमार्गसे उतरना और श्रीरामचन्द्र
लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित वाल्मीकिजीको दण्डवत् करना।
मुनिका आनन्द होकर महाराजको कण्ठ लगाना.)
रामचन्द्रजी-प्रिय हनुमान् ! तुम अयोध्या जावो,
प्यारे बन्धुको मेरा आगमन जनावो, माताओंको मेरी कुशल
सुनावो, मैं महाराजकी चरणसेवा करके शीघही आऊंगा।
( मारुतसुतका दण्डवत् करके चलना.)
सीन नं. ८.
(भरतजीका श्रीरामचन्द्रजीके वियोगमें नन्दीग्राममें बैठना.)
गजल धुन जिला बिहाग ताल कवाली,
( तर्ज-जापान कह रहा है सुन हिन्दुस्थानवालो.)
अवधीमें एक दिवस है अजहू न बात आये।
कल बीते वर्ष चौदह मैं अब करूं क्या हाये ।
माता तोहे कहूं क्या नहीं दोप है किसीका ।
विधनाने जो लिखा है मिटता नहीं मिटाये ॥
लछमन है धन्य तोको धिक्कार आह भोको ।
सिया राम विन जियत हूं नहीं पार कुछ बसावे ॥
(भरतजीका मूर्छित अवनीपर गिरना.)
सीन नं. ९.
(श्रीरामचन्द्रजीका सुग्रीव आदिक सहित श्रीगंगाजीके तीर
विराजमान होना, जानकाजीका पूजन करना.)
अंग्रेजी वजन धुन सुंदरा ताल कवाली.
( तर्ज-जैसी करनी वैसी भरनी करनीको त् करकर देख.)
जानकीजी-जय जय गंगा सब दुख भगा प्रणतपाल तुम
महतारी । जय जय माता जगसुखदाता शीश विराज

अंक बां.
त्रिपुरारी। महिमा अपरम्पार तुम्हारी नीव चराचर
हितकारी। कलिमलइरणी भवनिषि तरणी कीरति
पारन विस्तारी। तब ध्यान गो पर जल पान को
कैरें। संसारसे तरै भक्कूप ना परें । अघरोमनाशनी
सब पापगकिनी मुनिसंतपालनी शिव गौरजाप्यारी।
जयजय मंगा सब दुख भंगा प्रणतपाल तुम महतारी ।
(निषादका माकर दण्यत् करना, रामचन्द्रजीका
उसको कण्ठ लगाना. )
सीन नं. १०.
(श्रीकौशल्याजीका राजभवन में दुःखित होना.)
ठुमरी जैजैवन्ती.
(तर्ज-आंगनमें मत सोवे री सुन्दर आजको रेन चन्द्र महेगो.)
कोशल्याजी-काह करूं सखी चेन न आवे पुत्र विना
मोहे कछू ना सहावे । रोवत बीतत सब निशि वासर
सान पान मोहे नेक न भावे ॥ बिन देखे रघुवर
वैदेही मोर हदेकी जरन न जावे । राम विना सबही
कम सूना आंखनमें अधियारी छावे। जन्म जन्म
गुण मानूं मैं वाका जो पियपुत्रसे मोहे मिलावे ।
ठुमरी.
(तर्ज-पुत्री नादान बियाबानमें तु कैसे आई.)
शवनजी-बोलो तो मात आवें भात बैठो धीर धारो।
चिन्ता काठको छाई त्यागो माता बिकलाई।
॥

श्रीरामजानकीजीचरित्र।
आवेमे आज भाई फरकै शुभ अंग माई ।
शगुन जना रघुवर आवे भूप कहांवें क्रीट सजावें।
माताजी नैन उघारोबोलोतोमात आश्चात बैठोधीर धारो
(कौशल्याजीका शत्रुघ्नको कंठ लगाना.)
सीन नं.११.
भरतजीका श्रीरामचंद्रजीके विरहमें नन्दीग्राममें बैठना.)
मांड.
( तर्ज-मेरा जोबन बीता जाय बादला वेगी जायो रे.)
भरतजी-
मेरा सुभग अंग फरकै है प्यारे धाता आवेंगे।
दहिन भुजा है फरकती उड उड बोले काग ।
निश्चय मुझको होत है अब होहि उदय मम भाग ॥
रघुपति कंठ लगावेंगे । मेरा सुभग अंग फरक है प्यारे
माता आगे॥
(हनुमानजीका आना.)
हनुमान्जी-
दोहा।
जासु विरह सागर प्रभू, रहे मगन मन होय ।
लषण जानकी सहित हार, आवत है अब सोय ।
भरतजी-भाई ! तुमने तो अति पिय वचन सुनाये हैं,
जिनके श्रवण करनेसे मेरे मृतक शरीरमें प्राण आये हैं.
अपना नाम बताओ और प्रिय बंधुकी कुशल सुनावो.
हनुमान्जी-महाराज ! श्रीरघुनाथजीने सम्पूर्ण दुष्टोंको

.
महापा, मणिका भार उतार दिया है, मेरा नाम हनु-
मान है, प्रथमची सजीवन मोर लाते समय भापका संग
किया है, अब हर्षयुत महलोंमें जावो, माताओंको महारा-
जका भागमन पनावो.
( मरतनीका आनन्द होकर हनुमाननीको कंठ लगाना.)
ठुमरी
(तर्ज-मको माधार बंदे रामको आधार रे.)
भरतजी-धन्य धन्य भाग आज कौन जगत मोसमान ।
कमलनयन शामवरण दुष्टदलन कष्टदहन ।
भंगसे लगावें मोह आज तो पानिधान ।
सीन नं. १२.
(श्रीकौशल्याजीका रानभवनमें दुःखित बैठना.)
लावनी
धुन
बिहाग ताल कवाली.
( तर्ज-मुख चंदा कैसा नैना तेरे कटारी.)
कौशल्याजी-नहीं आये प्यारे पुत्र जिया घबराये।
मैं कौन भव करूं उपाय चैन नहीं आवे ॥
विपि कैसी विपता हाये मोपै डारी।
मेरे लगी हृदमें आग लाई अंधियारी।
अब आ त प्यारे लाल दुखित महतारी।
बीते है चौदा वर्ष जाऊं बलिहारी।
मोहे तुम विन प्यारे पुत्र कडू न सुहावे ।
काहे भाये न मेरे लाल जिया चपरावे ॥

२१६
श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
(कौशल्याजीका दुःखित भूमिपर गिरना, शत्रुघ्ननीका उठाना.)
-
दोहा।
शघ्रजी-
दहन अंग भुज नयन मम, फरकत पारम्वार ।
मन हर्षित प्रिय मात मोहे, हो, सगुन अपार ॥
उड उड बैठे काग अब, देख भवनपर मात ।
अवश आज आवै अवध, राम लषण प्रियन्त्रात ॥
कौशल्याजी-जनकसुता सिय कुशलयुत, जो आवेदोउ भाय।
रत्नजटित तो आलना, नोहें दूं काग बनाय ॥
(भरतजीका आनन्दमन आकर दंडवत् करना. )
भरतजी-अनुज जानकीसहित प्रभु, रघुकुलकौरवचंद ।
आवत है अब अवधमें, मात मगन आनन्द ॥
(कौशल्यानीका भरतजीको कंठ लगाना.)
ठुमरी.
(तर्ज-आज विपत कष्ट मिटे पूरी मनकामना.)
कौशल्याजी-धन्य धन्य धन्य आज पुत्रको मैं पाऊंगी।
मोरी प्यारी आली आवो भूषन वस्त्र सजाऊंगी।
आज प्यारे रामको मैं कंठसे लगाऊंगी।
जानकी रघुवर लषण आज मिलें धन धन ।
जीवना सफल हुआ नैन फल उठाऊंगी।
कष्ट दुख संकट मिटैबिछडोपियारे मिल गये ।
रामकी मैं मात सखी आज फिर कहाऊंगी।
(सम्पूर्ण प्रजावासियोंका आनंद होकर श्रीरामचंद्रनीके
दर्शनोंके कारण चलना.)

का.
सीन नं. १३०
(मरतनीका सम्पूर्ण प्रनावासियों और माताभासहित महारा-
के पर्शनकी भमिकापामें पुरीके बाहर खड़ा होना.)
ठुमरी.
(तर्ज-यह जम है गोरखा पदा.)
बामनी-पिव भाली मंगल मावो दर्शन रघुपतिके पायो।
मिटे भाव कष्ट भय भारी मिलेरघुवर सीवाप्यारी।
विषनाने कीन्ह सहाई सब हर्ष भानन्द मनायो।
वनवास राम बीताहै हुवा कारण मनचोता है।
प्रिय भाग हमारे जाने मनवांछित फल अब पायो।
(पुष्पकविमानका आकाशसे उतरना, श्रीरामचंद्रनीका वसिष्टनी
भौर सब माताभोंको दंडवत करके भरतनीको कंठ लगाना, विमीषण
मादिकका श्रीकौशल्यानीको दंडवत् करना.)
रामचन्द्रजी-पिय जननो! यह मुझको पाणीसेभी प्यारे
है, उनकीही सहायतासे मने दृष्ट निशाचर मारे हैं.
(कौशल्यानीका सुग्रीव विभीषण और हनुमाननी मादिकको
कंठ लगाना. सबका मानन्दयुत नगरमें प्रवेश करना.)
सीन नं. १४.
(श्रीकौशल्याजीका आनन्दयुत सम्पूर्ण प्रजामास
योसहित राजभवन में विराजमान होना.)
ठुमरी अंग्रेजी बजन.
(तर्ज-जावो जी जावो बडे दानके दिलानेवाले.)
देवकन्या-आयेजी आये प्रिय रामा पियारे बनते आये।
सुंदर सुकुमार सहाये सजा दशरथके जाये।

श्रीरामजानकीजीचरित्र ।
निश्चर रणभूमि सुवाये मुनिजन हैं अभय बनाये।
भूमिका भार दीन्हा टार सबके कष्ट मिटाये ॥
ईश्वरने करी सहाई विधनाने बात बनाई।
उजरी यह पुरी बसाई हिकी तपत बुझाई ।
आली भावो मंगल गावो हर्ष मनावो।
धन धन हैं भाग पियारे आज सीता राम आये ॥
सीन नं. १५.
(सम्पूर्ण प्रजावासियोंका राजसभामें आना, श्रीरामचन्द्रजीका
श्रीजनकनन्दिनीसहित सिंहासनपर विराजमान होना, वसिष्ठजीका
राजतिलक करना, देवतागणका पुष्प बरसाना.)
ठुमरी.
(तर्ज-आज शाम मोह लियो बंसरी बजायके.)
देवतागण-सिर छत्र सोहै शाम तन शोना अपार है।
दामिनद्युति श्रीजानकी मेघवर्ण रामजी ॥
छबिसीव रूप देखके सकुचावे मार है।
माधुरी मूर्त अनूप मोह लेत जगतरूप ॥
चन्दन तिलक है भाल पै सुन्दर शृंगार है।
(ड्रापसीनका धीरे धीरे गिरना.)
सप्तम भाग समाप्त.
इति नाटक धर्मप्रकाश
अर्थात्
श्रीरामजानकीजी चरित्र समाप्त ।

अनर्घनलचरित्र महानाटक. महाशय ! इस मननलचरित्रनाटकमें महामारतोक नक- दमयंतीकी समग्र कथा लिखीगई है. नलदमयंतीकी कथा जैसी कुछ सारगर्मित तथा अनेक प्रकारसे शिक्षाप्रद है उस- का समग्र संसार जानता है और सभी लोग इस कयाके जानने तथा सुनने में रुचि रखते हैं। ऐसा किसका हृदय पत्थर होगा जो नलदमयंतीकी करणकथाको पढसुनकर पिघलन जाय । मौर भाषामें भाजतक महानाटक नहीं बना यह मझ- नाटक है । और आजकलके नाटकोंमें मनमाने गर्मोक दिये जाते हैं इसमें संस्कृतके नाटयशासकी रीतिसे गर्मोक दियाग- याहै। संस्कृतनाटयशाबसे अनमिझलोग इस अनर्घनलचरि- प्रनाटकको पढकर संस्कृतके नाट्यशास्त्रकी मर्यादाको तथा गमाककी मर्यादाको मलीमांति जानसकते हैं, क्योंकि यह नाटक संस्कृतनाट्यशास्त्रकी मर्यादासे बतायागयाहै। और इस ग्रंथके पढनेसे संस्कृतभाषाका बोधमी बहुत कुछ होसकताहै। महाशय ! माजदिन साहित्यशास्त्रके परमाचार्य काशीके महामहोपाध्याय सी. बाई. ई. विद्वरश्री ७ श्रीगंगाधरशा- बीजी महाराजही है ऐसा कौन पुरुष है जो उक्त श्रीशास्त्री- जीमहाराजको विद्यासमुद्र न जानताहो यह नाटक उक्त श्रीशा- श्रीजी महाराजके एकवात्सल्यपात्र छात्र पंजाबी पंडितसुदर्श- नाचार्यशास्त्रीने बनाया है और क्या लिखें भाप एक बेर देखिये तभी पाप कविके चातुर्यको जानसकते हैं। कविने मौरमी मनेक ग्रंथ संस्कृतमें तथा भाषामें लिखकर विद्वत्समा- जमें नाम पाया है। कविने भूमिकामें नलदमयंतीकी मूलक- वामी समग्र लिखदी है। सभकी मुलमताके कारण इसका दाम केवल १ एकही मुद्रा नियत कियाहै । जिसके हाथमें यह ग्रंथ गया उसने फिर छोडा नहीं।

सिद्धांतचन्द्रिका उत्तरार्द्ध
भाषाटीकासहित।
लीजिये संस्कृत व्याकरणके विद्यार्थियोंका सौभाग्य न
कहें तो और क्या कहें ? जिसको कि वर्षोंसे लोग तगादेपर
तगादे मेज रहे थे कि भाषाटीका चंद्रिकाका उत्तरार्द्ध मेजो
उसको वर्षांसे तैयार कराते कराते बड़े परिश्रमसे तैयार
कर अब छाप सके इसके साथही साथ हम अपने परम
पूज्य पंडित काशीरामशास्त्रीजीको अनेक धन्यवाद देते हैं
जिन्होंने स्वयं महान् एवं अविश्रांत परिश्रम कर इस अमूल्य
ग्रंथकी अत्यंत सरल सुबोध भाषाटीका कर संस्कृत विद्याका
अनन्त उपकार किया है । इस भारतवर्ष में प्रायः कोई
संस्कृत विद्वान् न होगा जो महत् व्याकरण ग्रन्थको न जा-
नता हो परन्तु थोडी व्याकरणताके जाननेवाले तथा नवीन
विद्यार्थिगण विचारे इसको यथार्थ न समझ सकनेके कारण
इस अनुपम ग्रन्थरनसे अपरिचितही नहीं वरन् नितांत
अनभिज्ञ थे । इसमें भ्वादि समस्त धातु, चुरादि सम्पूर्ण
प्रक्रियाओं और पूर्व कृदंत तथा उत्तर कृदंतका पूरा पूरा
वर्णन है फिर विशेषता यह है कि सूत्रोंका पदच्छेद और
स्पष्ट वृत्तिके पश्चात् विस्तारित भाषाटीकासे यथार्थ अर्थ देकर
अनेक उदाहरणोंद्वारा समझाया गया है जिसको कोईमी
कसाही अल्पातिअल्प पढा हुआ विद्यार्थी अल्प कालमें
स्पष्टतया समझकर थोडेही दिनोंमें एक योग्य व्याकरणी
हो सकेगा। सफेद, मोटे मोर चिकने कागजकी सुंदर कपडेसे
जिल्द बंधे हुए ग्रन्थका मूल्य केवल ग्लेज ३॥ रु. रक्३.
लगता मात्र डाकव्यय अलग।

वैद्यशिरोमणि। अर्थात् बृहत्रयीसार. धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् । धर्म अर्थ काम मोक्ष ये चार फल मनुष्यरूपी वृक्षसे उत्पन्न होते हैं. उस मनुष्यरूपी वृक्षका मूल आरोग्य है. और आरो- ग्यका मूल कारण सावधानी है अतः सबका मूल सनातन मायुर्वेद है. आयुर्वेद (वैद्यविद्या ) के ग्रन्थोंको सामान्य पुरु- षोंने नहीं बनाया, वरन् जो महात्माजन अपने योगबलसे भूत मविष्य वर्तमानकालको क्षणमात्रमें ध्यान करके जान लेते थे उन त्रिकालज्ञ ज्ञानियोंने अति परिश्रमसे आयुर्वेदके ग्रन्थोंको निर्माण करके समस्त प्राणियोंपर उपकार किया है. आधुनिक समयमें जितने वैद्यकग्रन्थ इस भारतखंडमें प्रचलित हैं उनमें सुश्रुत, चरक, वाग्भट ये तीन ग्रन्थ बड़े कहे जाते हैं इसीसे इनको बृहत्रयी कहते हैं और कहाभी है कि “ निदाने माधवः श्रेष्ठः सूत्रस्थाने तु वाग्भटः ॥ शारीरे सुश्रुतः प्रोक्तः चरकस्तु चिकित्सके ॥ १॥" यहां सुश्रुतका शारीरस्थान, वाग्भटका सूत्रस्थान, चरकका चिकित्सास्थान मुख्य माल्न जाता है. इन्हीं तीनोंको लेके ज्योतिर्वित्पंडित नारायणप्रसादमिश्रलखीमपुरखी- रीनिवासीने वैद्यशिरोमाणे (बृहत्रयांसार) नामसे यहग्रन्थ लिखकर सरल देशभाषासे अलंकृत किया है और इस ग्रन्थको तीन खंड अर्थात् पूर्वखंड, मध्यखंड, उत्तरखंड करके लिखा है. तहां पूर्व खंडमें सुश्रुतका शारीरस्थान, मध्य खण्डमें वाग्काभट सत्रस्थान, उत्तर खण्डमें चरकका चिकित्सास्थान लिखा, मावार्य यह कि आयुर्वेदके सम्पूर्ण ग्रन्थोंमें बृहत्रयी मुख्य है और बृहत्र- यीका सार यह वैद्यशिरोमणि ग्रन्थ है इस एकही ग्रन्थसे सुश्रुत, चरक, वाग्भट इन तीनों ग्रन्थोंका काम निकल जायगा. तीनों अन्योंके पृथक् २ खरीदनेकी मावश्यकता नहीं रहेगी और सबके सुमीतेके लिये मूल्यभी बहुतही अल्प रक्खा जायगा।

THE PRONOUNCING ENGLISH AND HINDI DICTIONARY शब्दोचारणमहित इंग्लिश हिंदी कोष. प्रथम तो सवहीं मन्य भाषाओंका सीखना बहुत कठिन है, परन्तु इन सबमें मंग्रेजी भाषाका ययावत् शान होजाना तथा उसके मुहावरे और शन्दोका चारणका ठीक २ शान प्राप्त कर लेना बहुतही कठिन है, कारण यह है कि इसमें एकही वर्णका सञ्चारण कई प्रकारका होता है, कितनेही सन्द ऐसे हैं कि जिनके लिखनेमें ऐसे कितनेही मक्षर होते हैं कि इसी शन्दके उच्चारणमें उनका लेशमात्रमी अनुभव नहीं होता है, और एकही शन्दके सच्चारणको मंग्रेजभी मिन्न ३ प्रकारसे नोलते हैं, हमारे स्वदेशवासियोंमेंभी बंगाली लोग एकही मक्षरके उच्चारणको मौर रीतिपर करते हैं तथा महाराष्ट्री, पजाबी मदरासी मादि अन्य रीतिपर करते हैं, इन सब बातोंके कहनेका प्रयोजन बहो कि मंग्रेजी शब्दोंके ठीक चार बतानेवाला कोष (Dictionary ) ममीतक नहीं बना, कि जिससे मंग्रेजी शब्दोंके उच्चार सुगमतासे समझे जावेंगे. इस उत्कट न्यूनताको दूर करनेके लिये यह उच्चारणसहित इंग्लिश हिंदी कोष तैयार किया है. इस कोषमें अंग्रेजी शब्दोंका उच्चारण देवनागरी भक्षरों में दिया है और जो कुछ अंग्रेजी शब्दोंके प्रचार हिंदीभाषामें नहीं हैं उनके लिये कुछ संकेत करके उनके करनेकी रीतिभी दिखाई है. कीमत 5. काव्यमंजरी, यदि अनेकों अलंकारशाखोंके समस्त अलंकारोंका पूर्ण वर्णन एकही ग्रन्थमें देखना हो । यदि काव्यके पूर्ण अंगकी छटा देखनेकी कामना हो। यदि नवरसका वर्णन देखना हो दौ इसी ग्रन्थमें मिलेगा। माषाके काव्योंमें आजतक ऐसा प्रमावोत्पादक ग्रन्थ नहीं छपा । इस पुस्तकके जिस विषयको पढो उसीका मसर चित्तके उपर पस्ता है।०१० भीयुत पाडू जगजायजसाद (भानुकविकृत काव्यप्रभाकर सटीका मर्याद भागाकाव्यका परिपूर्ण एवं अत्यन्त अनूठा अन्य उपकर तैयार है. इस ग्रन्थको अन्य करें, ग्रन्थराज कहें, चम्पू करें, महा- काव्य करें, काव्यमहोदधि को मथवा साक्षात् हिन्दीमा- पाका कविकुलकल्पतरु करें, सो कुछ कहते नहीं बनता। हां जिन महाशयोंने श्रीमानुकविकृत "छन्दःप्रभाकर नामक छन्दोग्रन्थको देखा होगा वे इसको साम्प्रत बिन- देखेही अनुमान कर सकेंगे कि जिस प्रकार छन्दःममाकरमें उक्त कविने हिन्दी, मराठी, संस्कृत भादिकेकोई छन्द लिख. नेको मवशेष नहीं रक्खे उसी प्रकार 'काव्यप्रभाकर' गयपथ काव्यके सम्पूर्ण मंग अर्थात् छंद, ध्वनि, उत्तम मध्यम, नाटक, उपन्यास, चंपू, मात्र, विभाव, मनुभाव, संचारी,स्थायी,रस,महंकार,पट्ऋत, न्याय, संगीत,पहेली कट, काव्यगुण, काव्यदोष काम्यमेद,काव्यनिर्णय काव्य कोष, बोकोक्तिहजारा, समस्यापूर्ति, कविपरिपाटी, कवि- काव्यमादिवया इन समस्त विषयोंके सम्पूर्ण मेदोपमेद सहित कहांतक को कोई मा तथा कापसम्बन्धी कोई विप्रयोग नहीं है। यह अन्य स्कूलों तथा राजामहारा- जामोंके काईबरेरियोंका परम भूषण है. तथा यह प्रत्य मन्दाममाकरसे चौगुना अर्थात सुपररायलके लगभग पों में समा माहै. दाम ६९० महसूल मळग प्रस्तानिया विकासासंगाविष्णु मीशायदा, बालीवाटेवर पाखाना, त्यापनांपई. -

Natakdharmaprakash

Author
Lal, Chandan
Title
Natakdharmaprakash
File name
Natakdharmaprakash
Text
OCR done
Published
2005/01/12
Publisher
Gangabishnu Shrikrishnadas, Mumbai
Language
Sanskrit
Pages
231
Library
Natya Sodh Sansthan, Kolkata
Classification
Literature
Keywords
Drama
DLI number
292694
Barcode
4990010202582.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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