Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shrimadbhagwatmahapuranam Khand-2

Vedvyas, Maharshi · 2011/08

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पापा Y १७-कपी और मामापुरम स्मारपा नारद १८-कौरवोपर बरामजीप मौर साम्पका द्वारा पानी शुति १८-अपीय पात्रा .. ११-देवर्षि नारदका भावान प्रामा देखना मीणा मयुरागमन मान् भोरणी निस्वसया मोर उनए पास पूरा माता भीरमधे स्मृति स्पमापके देरी राममोके दूतमा भाना पापा ममुगम प्रसा १०८ ४१-श्रण भगवान्चनपल पधारना -सम का पनुपमा भौर समय पारगर ३८४ ७२ पापक रामप या मायोम में -सपासर यार मोर मनाइमें प्रा स्वरुपका ठसार ५०४ -पार, मुशिश भारि मतमतमा सच -यस पो समसे पूरे हुए यम्भोगी विदाई स्वर मोर भगवान्ना मप्रस और आला --एमा पोपलीय मोर गुम्फुप ७४-मगवान् ममय मौः शिशुपामसार प्रवेश ७५-रायमूप मन्त्री पूर्ति मोर दुर्गेपनप भपमान ४६-उसमीरमा -णबार पारयोम पुर र तथा गोपियों की बातचीत मौर प्रमणात ४१५ "स्व-पार १८-परमानन्ध कुम्भ भौर ममरी र पना ४२५ ॥८- और रिप सर BN वीर्ष ४-बारबीच स्तिनापुर बना मात्रामें बम्मी हायवे मापार पसम साम्प ( उत्तरार्ध) ०९-परमम्पसार और सम्यमनीतीपात्रा १८ ५ - दुर भोर रमपुरीप निर्माण ८ कम्मरा मधमाशीप सागत ६१२ ५१मानध मस दोना, मधुकुममा ८१-मरामामीने ऐसय माति .२-पारगमन भीनमामीन विवाह वण ८२-भगवान् भीकम्प-पम्पमसे गोप-गापिका र १२३ भीप पाठ क्मिणीन मेणा र ३-मनमानी पटपनि गाय द्रोपरी बाय १ प्राणप्रमाना ८r-मनुदेवीध पोरन ५३-पक्मिणी रस ८५-भीमगवान्केर समुरेवमी प्रसन १४-विपास सया बोषी मोर मामा उपदेश वमा देवी पुनो वा जाना ५४॥ दार सपा भीरम्म फरिमपी-विगह १० ८५-समप्रारम मोर भावान्ध मिपिमपुरीम राम ५५-प्रयुम्मस एम मोर एयरस पर बमा मोर भवरेप सप पर एक ही १६-सम्म्ममममिय और सपना परबमामारे गप भीकन बिया ८-दसति १२ वाम ८८-धमका नामोचन भगम लिने परम पुष्पमा ८ -पगमीय निदेगी पर्वमा तपा मगवान ५८-पपर भीरमभायापतिबाहीकपा ४९ दुए कामपाको बाफ्ट पता ५८ ५. भोमानुराम भार मोर सोम र एक ९-मवान् पिक गेमविवारच वन पापा मावा बार १.-ब-रक्मिणी बार १-समाको अपियोश्च शाप ११-मागनी संततिका वन तथा मनिमय २-मारेषके पस पीनारररीन भामी भोर विशद कामीच मायचा में एच कनक पा मो मागमा सबार ६२-उपामनिरस मिसन ५१८ -पगाराम् भीरपणम बालामुरन पर -माया मापासे पर ऐन सपान सपा प्राप भौर ममोरा निकाय १५-भारपमनीषा यामर ४-माधानके मामपन और प्रणिपाप रसार +-मविलीन पुयाय गति मोर मापनी पतिपिता न सर मेर मम्पाय विषय पृप-सा मनाव विषय पूर-संसा ५-देवतामों की मगशन्से सवाम सिधारने के लिये २९-मागवत धमाका निस्मण भोर ठम्बनीमा प्रार्थना तपा याइयोंचे प्रमामक्षेत्र माने टैयारी परिचभमगमन ८८४ मते देखार नयन मावान के पास भाना ३ -पापम्प हार -अवमूटोपायमान-गप्पीसे छेकर सरतक ११-भीमावान् विपामगमन ८९० माठ गुस्मात्री कपा . द्वादश कप ८-अवतोपास्मान-मारसे सेन पिहगतक १-पटियुगके बांधोन पर्णन मौ गुस्मोकी कपा ०१७ २-पत्रिमुगके धर्म ९-मममूटोपास्यान पुररसे लेकर पीक ३-राग्य, युगधर्म और कलियुगके रोयोसे सात गुरमोधप्पा ०५२ वचनेष उपाय-नामसङ्कीर्तन १ -किक तमा पारमेकिक मोगों की मस्परताका ४-चार प्रपरके प्रम्प निरूपण ०१९ ५-भीमदेवी मन्तिम उपदेश ९२६ ११-पर मुक मोर मकानो पक्षम ७७५ ६-परीसिये 'परमगति, मनमेम्पा सर्पसत्र १२-मसाकी महिमा और कर्म सपा मोर मोकासामेद १२८ -मपवरणवाएं मोर पुरानो सप कर्मत्यागकी विधि ८-मपराकी तपस्या मोर पर-प्रासि १५-सरूमसे सनपरिने दिये हुए उपदेशन ९-मापेमचीप मापन वर्णन ०८६ १०-मायने मवान् शहरका परदान १४-भकिमोगकी महिमा क्या मानसिपिचवर्णन ७९२ ११~भगवान् मा, उपार और मापुत्र १५-मिन्न-भिन्न सिदियों के नाम और पास ७९८ रस्थ तपा विभिन्न सूर्यगोत्र पर्वन १५-भगवानकी विभूतियों वर्णन ८३ १२-भीमाभागवकी सरिस विपन-सूची १०- मम-पम-निरूपण ८८ १५-विभिन्न पुराणोंकी जोक-ठम्मा मौर १८-बामप्रस मोर सन्यासीक धर्म ८१५ भीममक्की महिमा १०५ १९-मकिशन और स्म-निपमादि मानो वर्णन ८२२ श्रीमद्भागवतमाहात्म्प २ -पान पर्मयोग और मकियोग ८२८ १-परीधित् भोर पानामन समागमः पाणिस्प २१-गुपयोपप्यवस्माका स्वरूप और यम ८१७ मुनिके मुलसे भगवानकी काफे यम और २२-पालकी सम्मा मोर पुरुष-प्राति निक प्रमभूमिके मायका वर्णन २५-एक विनिमु बामणका विकास २-यमुना मोर मीकम्पपस्नियाँ बानोत्तष २४-स्पयोग ८५० मैं उम्परीन प्रमोना २५-तीनों गुणी-सीरियाका निस्मय ८६१ ३-भीमामाकी परम्परा भौर उसका मारम्प, २५-पुरुषवाकी रायोक्ति ८६५ मागम्भवपसे श्रोतामोघे भाषामकी प्राप्ति ९८५ २७-क्रियायोगध पर्मन ८५. ४-भीममागमतका सम्म प्रमाण, भोतामका २८-परमार्थनिरूपण माम, भवन-विधि मौर मातरम्प ८४ ११२ (पारंग) २-भीमामा मामी कधी (मुनदप) -अमृतमाम (बहुरंगा) ४-पोगमापा ५-मैमासे परे हुए भगवान् मागीली मावान्से दीनापूर्ण समाप्रार्थना -कया गम चपन बत ८-अभिप नागपर चित्र-सूची ३ ९-भीम-वरप पा भीरापा-बरण (पपुरंगा) १ -महारास-रसमम मगवान्धी १५२ मम्तरीय ११-हणेवर मनपी भगाराम १७९ १२-स-सदार १५-पूरधिरोमणि भीष्म २१४ १४-मुवामा-भर २२५ १५-परमपाममनके पूर्वी ना २५५ १६-मागयर पारीश्रीमा २०२ " , " , ७५ " "

भीणा र मम
बंधीविमूप्तिकरामवनीरदाभात्
पीताम्बरादसापिम्मफलाधरोष्ठात् ।
पूर्वेन्दुमुन्दरमुस्वादरविन्दनेत्रा
कृष्णात्परं किमपि तस्वमईन माने ।
जिनके कोमल हाप मुरीसे मुशोमित हो रहे हैं, दिव्य भोंकी
मा नरत नधुरके समान पछी है तथा स्निके पीले कर,
मिलके समान SIR-STठ चोठ, पूर्ण पदमाक सश सुन्दर मुस
और कम पैसे किए बड़े-बड़े नेत्र है उन श्रीकृष्णसे पाकर में
दूसरे किसी तपको नहीं जानता ।

महरित विषय-सूची पम्प सिर ७ ८. २६ नयम स्कन्ध माकर मविप्यवाणी करना १-वैवस्वत मनुके पुत्र रामा मधुप्री या ३ ५-गोकुळमें मगवान् मममम्म २-पत्र मादि मनुके पाँच पुत्रौत्र षश ६-पूतना उमार १४८ -महर्षि प्पन भोर मुकन्याका चरित्र राय ७-भर मान और तणाव वदार १५६ हायतिन पंप ८-नामकरण सस्मर मौर मामीम्म नामाग और ममरीपती या ९-श्रीकृष्णन उससे माँभा गाना १०५ जुर्मासाथीकी दुसनिधि २२ १ -यमयईनका व्यार १८४ -स्वाइके पंशन वर्णन, मान्धाता मौर ११-गोकुमसे न्दिास्न मना क्या मत्स्यपुर भोर सोमरि ऋषि ध्या बकासुरचार ७-रामा भिण्ड और हरि पन्द्री च्या १२ १२-अपामुरध उदार ८-सगर-परिक १५-प्रमाबीच मोर और उसय माप ९-मगीरथ-चरित भौर गायवरण १४-मामी रा भगवान्की सति भगवान् भीयमी मीसामान वर्णन १५-पेनुघसुरम मोर म्बाम्बा १-भगवान श्रीरामकी शेष स्मभोन वर्णन कामिनागके विपसे बचाना २२४ २-नस्वाफुमशके रोप रायमोका वर्गन । १५-अखिमपर पा - निमि एवर्णन १७-प्रसिपके शमिमवामें मानेत्री कथा तथा ४-चन्द्रमाधवर्णन १२ मगधन्य मयासियों द्वापानसे क्याना ५--हावीकममदमि मौर परशरामी परिष १८-असम्मापुर-व्यार -परप्रामवीर मा पत्रिप-सहार मोर १९-गोभो भौर गोपात्रेयानम्मे पचाना विवामित्रजीके शी कथा ૨ २.वर्षा भोर घर धनुष पणन २५२ :-समार रवि आरि राबायोंके पत्र वर्णन ६ २१-येणुगीव २५८ ८-पाविपरित ७८ २२-पीरारम २५५ ९-पपवित्र पास्याग २५-यपधिपर मा -पूरके पंध प्पत मौर मतके २४-मया निवारण २८२ परिमय वर्णन ८० २५-गोपनपारण २८५ ११-मण्यत्र वर्णन राम रश्मिरी कपा ९२ २६-मन्दबाबासे गोपोंकी श्रीकृम्म प्रभार विपक्म १२-पाक श्रेप मोर मायदेशीर राबाभोक बावचीव २८९ पंपप्रवर्मन २०-भीड़प्पन्न ममिक ३-मनु, पुमु तुईस मोर पके शत्र वर्णन २८-पस्मोसे नन्दी सुमारामा १४-विरात्रि वर्णन २९-रामीप्यम मारम्म २१९ पराम कम्य (पूर्वार्ष) ३ -भीमणके नियमें गोपियोङ्गी दण १- अपवान् के एराप्रपाको माथन वसुदेव २१-पेपिधगीव देवीमा पिसाद मौर सके धरा देवक १२-भगवान्का प्रकार र गोपियाँको खम्बना देना १९ पुमोदी स्या ११-महाराम २-भगवान्का गर्म-मण मोर देखतामोदारा परन मोर पाप स्मार गर्मस्वति १२५ ३५-मुगगीत २-मग भीकम्पकामालम्प १२८ १५-परिणमुरमा स्मार भोर सत्र भीमरणी -सरे हायसे एम योगमावान मामा प्रेस मेमना २४९ . १२३ अपाय विषय विपर पा-संसा Y 10-केयो और म्पोमामुरम क्षार वा नारी ६८-रिवोपर बसामग्री मोर सम्मका बाग मगवान्की स्तुति ३५४ विवाह ५४८ २८-भरी प्रयामा ११-देवर्षि नारी मगवान्की शो देखना 1 -भीमप्प-पसरामका ममुरागमन ७ -भगवान् श्रीकृष्णधी निस्पा मोर उनके पास 1 -प्रमोरे दारा मावान् भीषण मुसि मयसम्परेरी रामाप्रोके दूतका माना ४१-भीमप्र मपुगम प्रवेश ३०८ ४१-श्रीकृष्ण भगवान्ध न्द्रिप्रस पधारना ४२-नुष्यपर पा धनुपमा भोर तक पपपर ३८४ ४२-पाण्योंके रामय्य या मागेन और ४३-रामपाका दार मोर भन्नामें प्रवेश २८९ मासम्मका उधार ४४-पागूर मुशि भादि पहलमानोरा तया सका ७३-म्पस पई सेससे यूटे हुए रामाभोंकी निदाई उद्धार और मगवानमा इम्पस मेर भाना ५८ ४५-भीमप्प-मरामा पोपपीत मौर गुरफुल ७४-भगवान्धी भमपूजा और शिशुपारन हमार प्रवेश ४५-रायम्य साधी पूर्ति मोर दुर्योधमका अपमान vt-उपग्रीको प्रापत्रा स-पास के गाय मारयोंम पुर -रवपा गोपियॉक पतपीत भोर भ्रमरगीत ४१५ ४-शस्व-उमार ४८-भगवानम कुम्म भोर मजूरमीक पर पाना ४२६ ४८-यात्र मौर किरपा उमार प्रथा तो ४९-भारतीय सिनापुर बना मामा रम्यममी के हापसे सूतका पप पशम सत्य (उत्तरार्ध) ७१-स्वमन मार भौर पब्यमत्री तीर्थयात्रा • -अगसम्म पुर मोर सरकापुरम निर्माण ४३९ ८.-मीराम परा सुरामागीच स्वागत ५१-ालपन मम ऐना, मुघुती कपा ८१-मुडद्यमापने ऐपदी मासि ११८ ५२नारामान भौरवामान विधा तथा ८२-मावान् भीकृष्ण-सम्पमसे गोप-गोपिया भेंट १२॥ भीगणरे पाम पक्मिणीरीका रे देवर ८३-भगवान्की परगनियों के साप द्रोपरीकी बावपीव ५ नामममभाना ८४-पमुदेवचीका पोस्मा नरिमामी दर ८ -भीमगवान्के घरा समुदेवीचे प्रमशान -युगमो मापी पराभोग भोर समाधी उपरेश वषा देवमके B: पुोन मेग माना १४ रवा भीषण-परमपी शिवार ४० ८५-मुभद्राहरप मोर भगान्ध मिपियपुरीम राय ५. अयुम्न बम भोर एमरानुरप अप मना भोर भवरेष बामपरे पर एक ही ५६-माम्मरममिती सपना मपमामापीरप्पन RE ४०९ ८७रसति ६६२ ५०-मतान ८८-शिषरा हारमोचन ५८१ मारो सिमे पुराना ४८४ ८ -मगुराग बिगो परीक्षा या भगवान्ता ५८-मगार भापो भयाम्प रिगोपीप्पा भरे हुए ग्रामभ-पासो पापाठ दाना • -भीमरा उमा भौर पर या एकको ९ -भगवन् पफे बीम निवारण वन गापा मार मतान्ता गिर स्मिनी मगर १-पमा ऋषियो पार ११-पानी पर तपा भनिसके २-यमुस्कीले पान श्रीनारदा भाना भोर (MAबाना .१४ गगे ग मा पा नो योगीधन ममार -भरारमिसन ८१८ मुनाना -मापा पुम १-मापा मापामे पार होने पर वमा बम 1.गा भौर पमपाकाम्पस Partyामन ०१० t-भगा माताप्रपाम ३२५ परinfrrnमा -ममिशीन पुरा गर भोर मापान INTER पूरीपिडा रमन ०११ YOY म्सार भोर ७८ H .२३ विषय भमान ७५ विषय पए-मसा बयान पृ-संसा एमवामोंकी मगगनसे स्वधाम सिधारने के लिये २.-मागत पमान निरूपम और स्ववीच मार्थना सपा यावषेपमामात्र माने दैयारी परिचममगमन ८८४ करते रेसर उदयम मापान के पास भाना ५ -पद्धारा संसार •-मधूठोपारखान-पृथ्वीसे सेकर भूपतक ११-भीमगवान्ध्र सपामगमन ८९० भाठ गुरमीकमा पारा स्कम्प ८-भगोपस्पान-मारसे लेन पिङ्गम्मतक १-कवियुगकेरावार्थोन पर्णन नौ गुम्मोकी मा ७.७ २-कठिमुगके धर्म ९-मवपूतोपाम्पान--कुररसे लेकर सातक ३-पन्स, युगधर्म भोर कठियुगके दोयोसे साप्त गुस्मीकी क्या ६५ बचनेन स्पाम नामसाहीन १.-मैविक तपा पारविक मोगांकी भसारताप ४-पार मभरके प्रम्प १२. निरूपण ५-भी पुकारेगमीच मन्तिम उपदेश ૨૧ ११-पर, मुक मोर मकानों के प्रमाण ५-परीसित् 'परमगति, अनमेमन सर्पसत्र मौर किशालामेद १२८ १२-ससाकी महिमा भौर र्म व्य ७-अपरात्री पासाएँ और पुराणों मण १५८ कर्मण्यागकी पि .८२ ८-मारहेकी तपस्य मौर पर प्राप्ति १५-सरूपसे सननदिको रिये हुए उपदेणन ९-माईपममीन मापा-वर्णन वर्णन ७८६ १ -मागेयत्रीने मावान् धारण करवान १४-मफियोगली मीमा पया प्यानविषिश्रम .१२ ११-मगवान् के मा, उपार मोर मापुर्षोत्र १५-मिन्न भिन्न सिदियोंकि नाम मौर ममत्र ०१८ रास्य तपा मिन्न स्संगपोचपन १५-मगवानी विमूहियोन वर्षम १२-श्रीमद्भागवतकी संलिस विषय-सूची १ -भम-पमै मिस्सम ८८ १३-विमिन पुराणोषी मोक-संम्पा मोर १८-पानमम मोर सम्बासीक धर्म ८१५ भीमाभागवतकी महिमा ९७३ १९-मकि, खन मौर यम-निपमादि सामनोन वर्णन ८२२ भीमनागवतमाहात्म्य २.-भानयोग, कर्मयोग और मकियांग ८२८ १-परीहिद भौर गानामन समागमा पापिस्म २१-गुप-दोपम्पबमाका स्वरूप और यस्स ८१७ मुनिके मुखसे मगवान्की मेबारे पस्प मोर २२-तत्वोंकी संम्पा मोर पुरुषप्राति पिया प्रभूमिके महत्वका वर्णन २५-एक विलिनु प्रासमका विहान २-यमुना मौर मीरुप्पपस्नियाँ बानोत्सव २४-पसमाग ८५० में खपीन प्रधना २५-तीनों गाविस निम्मण ३-HAठकी परम्परा मोर म मातम्या ८५१ २५-पुरुरवाती पैराग्योकि मागर-भरपसे भोतामा भावामी प्रति १८६ २-क्रियायोगनवन ८९ ४-भीममागपतन सम्म प्रमाण मोवा-यकाके २८-परम्पर्मनिरुपम ८०६ मम्मा भवम-विपि भोर माहसम्म ९०७ Y २१२ ३२५ २-भीम्यामास्वामकी माफी (सुनहप) २-ममताम (बहुरंमा) ४-मोगमाया ५-मैया रे दुए मायान्. -पानीपी मावान्मे दीनवापूर्ण समा-प्रार्थना -पीया गर परापन पत ८-असिन नागर चित्र-सूची ३ ९-मोकण-वरण सपा भीरपा-परम (पारंग्य) १ -महारास-समय मगवान्की ११२ मम्मरणीय ११-सरोवरमें मममी भगवान १०९ १२-स-रसार १५-एशिरोमणि भीष्म २१४ १४-गुदामा-सस्पर २२५ १५-परमभामगमनके पूर्वीही १५-मागसपर परीक्षा " " ०५ 1 "

श्रीहरिराम
श्रीमद्भागवतकी आरती
आरति अतिपावन पुरानकी ।
धर्म भक्ति-विज्ञान खानकी ॥
महापुरान भागवत
निरमल ।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प फल ।
परमानन्द-सुषा-समय कल।
लीला-रतिस रसनिघानकी ॥आ.
कलि-मल-मयनि त्रिताप निवारिनि ।
जन्म-मृत्युमय भव भय-हारिनि ।
सेवत सतत सकल मुख कारिनि ।
समहौषधि हरि-चरित-गानकी ॥आ.
विषय विलास विमोह विनाशिनि
विमल विराग विवेक विकाशिनि ।
भगवत्तस्व-रहस्य
प्रकाशिनि ।
परम ज्योति परमात्म ज्ञानकी ॥आ.
परमहंस मुनि मन उल्लासिनि ।
रसिक-हदय रस-रास विलासिनि ।
भुक्ति, मुक्ति, रतिप्रेम सुवासिनि ।
कथा अकिपन प्रिय सुजानकी ॥आ.

श्रीरापारुणम्पो नमा
श्रीमद्भागवतमहापुराणम्
नवमः स्कम्पः
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लोकशोफापहाराय रावण ठोकरावणम् ।
रामो मूत्वावभीपस्सं गोविन्द विना मन ।
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بل E ० TRE Fभीमशागवत - - परावरपां भूतानामारमा य पुरुष परें । पुरुष परमात्मा अटे-बड़े सभी प्राणियोंके वात्मा है, प्रलयके समय केवल यही थे, यह विम सपा और कुछ स एवासीरिद विश्व कल्पान्तेऽन्पन्न किमान ॥ ८॥ भी नहीं पा ॥ ८॥ महाराज ! उनकी नामिसे एक तस्य नामे समभवत् पयकोशो हिरण्मय । सुपर्णमय कमलकोष प्रक्र था। उसीमें चतुर्मुख अमानीका वारिप या ॥९॥ ब्रह्मात्रीके मनसे तमिचम महाराज स्वयम्मतुरानन ॥९॥ | मरीचि और मरीचिके पुत्र कश्यप हुए । उनकी धर्मपत्नी मरीचिमनमस्तस्स जमे तस्सापि कम्पप । दक्षनन्दिनी भरितिसे विवस्वान् ( सूर्य ) का बन्म हा ॥ १० ॥ विवस्वान्की संन्न मामक पत्नीसे धारदेव दाक्षायण्या तवोऽदिस्यां विवस्वानभवत् सुत ॥१०॥ मनुका जन्म हुआ। परीक्षित ! परम मनस्थी राना मायदेपने अपनी पही प्रमाके गर्मसे दस पुत्र उत्पन ततो मनु भाइदेम - मनायामम्म भारत । किये । सनक नाम थे. नक्वाकु, मृग, शनि, दिष्ठ, यद्धार्या बनयामाम दश पुत्रान् स आत्मवान् ॥११॥ धृष्ट,कल्प, नरिष्पन्त, पृघ्र, नमगवीर कवि ॥११ १२॥ स्वास्नृगप्पयाविदिएधृष्टकरूपकान् वैवस्वत मनु पहले सन्तानहीन थे। उस समय सर्वसमर्प नरिप्यन्त पंप प नभगं च कविं विसः ॥१२॥ भगवान् वसिष्ठने उन्हें सम्तान प्राप्ति करानेके लिये मित्रावरका पर पराया पा ॥ १३ ॥ पाके अप्रयस्य मनो पूर्व वसिष्ठो भगवान् किल । भारम्भमें केवम दूध पीकर गनेवारी पैस्वत मनुकी धर्मपत्नी श्रद्धाने अपने होताके पास जाकर प्रणामपूर्वक मित्रावरुणयोरिष्टिं प्रजामकरोत् प्रभुः ॥१३॥ पाचना की कि मुसे क्यारी प्राप्त हो ॥ १५॥ तय तय अदा मना पसी होतारं समयायस । वयुकी प्ररणासे होप्ता यन हुए ब्राह्मणने धमाके फफ्नका दुहियर्थमुपागम्प प्रणिपस्य पयोगवा ॥१४॥ स्मरण करके एकाम चित्तसे काट कारफा उचारण करते हुए याकुणमें भाहुति दी ॥ १५॥ जब होताने इस प्रपितोऽनयमाहाता घ्यायम्त मुसमाहितः। प्रकार विपरीत कम किया, तप यझके फलस्वरूप पुश्के हेविपि प मरद वेन वपट्कारं गृगन्दिन ॥१५॥ स्थानपर इम नामकी कत्या हुई । उसे देखकर थाददेश मनुका मन कुछ विशेष प्रसम महाभा । ठमोंमे वपने हातुम्तभिषारेमकन्येला नाम साभवत् । गुरु वसिष्ठमीसे कहा ॥ १६ ] 'मगवम् ! बाप मेग सां विरोप मनु प्राह नाविष्टमना गुरुम् ॥१६॥ दनेवाग कैसे हो गया । वरे, ५ तो या दुसकी तो ब्रमवादी है, वापका कर्म इस प्रकार विपरीत फल भगवन मिमि बात फम पो प्रमवाग्निाम् । बात है। दिक फर्मका ऐसा विपरीत फल तो भी मही होना चाहिये ॥ १७॥ वाफ्यागोंका महान पिपपपमहा मंत्र म्याट प्रमावित्रिया ॥१७) । सा पूगी, इसके अतिरिक्त आपलोग मिसेन्द्रिप भी युम मन्यरित पुक्तानपमा दम्भरितिपा । १, तपा तरस्पाके करण निप्पाप हो चुके है। देवपलम रत माल्पयंपम्पमन्त विपुषिव ॥१८॥ | अमत्यकी प्रालिके समान भापके सहपका यह उष्टय फल कैमे हमा! ॥ १८ ॥ पीसित् ! हमारे पद सग्निशाम्य यगम्नम्प भगान् प्रपितामर । प्रपितामह भगवान् पमिण्ने उनकी यह बात मनपर - मर 1 .मनाया। परिवाने म०१] नवम स्कन्ध होतुर्व्यतिक्रमं मास्वा पमापे रनिन्दनम् ॥१९॥ नान लिया कि होताने विपरीत माम किया है। इसखिये उन्होंने वैवस्वत मनुसे कहा ॥ १९॥ राजन् ! तुम्हारे एतत् सझल्पवैपम्मे होतस्ते व्यभिचारत । होताके विपरीत सकल्पसे ही हमारा साल्प ठीक-ठीक स्थापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त स्वतेजसा ॥२०॥ पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने तपके प्रभासे में सुम्हें श्रेप पुत्र दंग ॥ २० ।। परीक्षित् ! परम यशस्वी मावान् एपम्पमसितोराजन् भगवान स महायशा । पसिष्ठन ऐसा निमय करके उस इटा नामकी त्याको अस्तीपीदादिपुरुपमिलायाः पुंस्त्वकाम्पया ॥२१॥ी पुरुप बना देने के लिये पुरुषोत्तम भगवान नारायणकी वस्म कामयर तुष्टो भगवान् हरिरीधरः । सति की ॥ २१ ॥ सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिने सन्तुष्ट होकर उन्हें मुंहमांगा वर दिया, निसके प्रभावसे ददाविलाभयत् सेन सुषुम्ना पुरुपर्पभ ॥२२॥ काया ही मुपुम्न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी॥ २२ ॥ स एकदा महाराज विचरन् मृगयां बने । महाराज । एफ यार राना सुपुत्र शिकार म्नेस्टने के तः मासिपयामात्यैरयमारम सैन्धवम् ॥२३॥ लिये सिन्धुदेशके घोड़पर सवार होकर कुछ मन्त्रियोंक साप स्नमें गये ॥ २३ ॥ वीर सुपुग्न करच पहनकर प्रगृप रुचिरं चाप घरांम परमानुवान् । और हायमें सम्दर धनुप एम वस्यन्त अमुत बाण लेकर दशिवोऽनुमृग वीगे जगाम दिसमुचराम् ।।२४॥ हरिनोंका पीछा करते हुए उत्तर दिशामें बहुत बागे बस सकुमारो पर्न मेरोरवस्तात् प्रविवेश ।। गये ॥ २१ ॥ मन्तमें सुकुम्ल मेरुपर्वतकी सबटीके एक बनमें चले गये । उस बनमें मगवान् शहर पार्वतीके यत्रास्ते भगवाम्छर्यो रममाण सहोमपा ॥२५॥ साप विहार करते रते हैं ।। २५ ॥ उसमें प्रवेश करते तमिन् प्रविष्ट एषासो सुपुम्न परवीरहा। ही पीरम उपुमने देखा कि मैं भी हो गया और अपश्यत् नियमात्मानमश्च पवरवा नृप ॥२६॥ घोड़ा घोपी हा गया है ॥ २६॥ पीधित् ! साप ही उनके सब अनुचरोंने भी अपनको बीरूपमे दमा । ये तथा तदनुगा सर्व आत्मलिङ्गाविपर्ययम् । सब एक-दूसरेका मुंह देखुने एगे, उनका चित्त बहुत रना रिमनमोऽम्बन्धीक्षमाणा परस्परम् ॥२७॥ । उदास हो गया ॥ २७ ॥ राबोवार राजा परीक्षितमे पूजा-मावन् ! उस भूखण्डमें ऐसा विचित्र गुण कैसे वा गप्पा । किसने उसे एमा कयमेवं गुणो दश केन वा भगवन् रुत । मना दिया था। बाप का कर हमारे इस प्रश्नकर उत्तर दीमिये, क्योंकि हमें वहा कोरम हा हा प्रभमेनं समावस्व परं कौतूहल हि न ॥२८॥ है ॥२८॥ श्रीशुक उपाय मीशुकदेवनाने कहा-परीक्षित् । एक नि भगवान् एफदा गिरिक्ष मप्दुमपपस्तत्र सुप्रदा । शहरका दशम भरनके रिम्ये बाम सधारी भी अपमे तुमसे रिणाओंका बधकार मिगत हुए उस दिनो पिसिमिराभासा कुर्वन्त समुपागमन् ॥२९॥ में गये ॥ २० ॥ उस समय लम्पिका देवी बसहीन तान् विलोक्याम्बिका देवी विवासा पीरितामृश्चम् | पी । अपियोको मासा आया देख्नु ये लपत छमित हा २ प - गङ्गावतरण शियमीने सायभान दायर गहामीन मपन मिरपर धारण किया श्रीमद्भागवतमहापुराणम् अथ प्रथमोऽध्याय पेपमत मनुके पुम राजा सुपुनकी कथा रामोपाव पजा परीक्षितने पूण-भगवन् ! मापने सब मन्यन्तराणि सपाणि त्वमोक्कानि भूतानि मे । मन्यन्तरों और उनमें जनस्त शक्तिशाली मगवान्के द्वारा किये हुए ऐमयपूर्ण चरित्रोंका वर्णन किया, और मैंने वीर्याण्यनन्तपीर्यस्य हरस्ता कतानि च ॥ १ ॥ ठनका प्रण भी किया ॥१॥ बापने कहा कि पिछले योऽसौ सस्पग्रतो नाम राजपिद्रविस्परः । कम्पके बन्तमें द्रविध देशके स्वामी राजर्षि सन्यासन शान योऽतीतकल्पान्ते लेमे पुरुपसेक्या ॥ २ ॥ मगवान्की सेबसे शान प्राप्त किया और बड़ी इम कम्पमें सबै विषम्यत पुत्रो मनुरासीदिति भुतम् । देखनात मनु हए । वापने उनके प्रसाकु मादि नरपति पुत्रों का भी पणन किया ॥ २३ ॥ नमन् ! अम भाप त्वत्तस्तस्स सुतायोका इस्याप्रमुखा नृपा ।। ३ ।। क्या करके उनके वंश और बशमें हानबोका भरण- सपा व पृथग् ममन् पश्यानुचरितानि च । मला चरित्र पर्णन कीजिये । महाभाग 1 मारे एपमें सर्पदा ही कपा मनमेकी दरमुकता बनी रहती है ॥2॥ कीर्सयस्त्र महाभाग नित्यं शुथूपो दिन ॥४॥ वसत मनुक बरामें मो हो चुके हों, इस समय पिपमान ये ये भषिप्याय भवन्त्यपतनाम मे । हो और भागे होनेवाले हों.-उन सब पत्रिकीर्ति तेपो न पुण्यकीींना सर्पपी चंद विझमान् ॥ ५॥ पुरुषों के पराक्रमका वर्णन कीनिये ॥ ५ ॥ सूतजी कहते है-शौनकादि पियो । माटी पर्व परीक्षिता रामा सदसि प्रमषादिनाम् । अधियोंकी सम्पमें राजा परीशिवन मा या प्रश्न किया, पृष्ट प्रोयाम भगवाछुक परमधर्मपित ॥ ६॥ तब धर्मके परम ममा भगवान् भीशुकदेवजीने का॥६॥ मीभुत उपाय श्रीशुकदेवजीमे कहा-पशिद ! तुम मनुशका धूयतां मानवो पत्र प्रापुर्येण परतप । पर्णन संक्षेपसे सुनो। पिस्तारसे तो सैकड़ों गमि भी न शम्पसे विस्तरतो सात वर्षशतरपि ॥ ७॥ उसका वर्णन नहीं किया जा सकता [[ ७ ॥ जो परम १ वारिपरि सूत उमाष 1२ समनुप्माव।

४ TE श्रीमद्भागवत [१०१ , परावरेप भूतानामात्मा य पुरुष पर पुरुष परमारमा अटे-बड़े सभी प्राणियोंक वात्मा है, मलय के समय केरल सही में यह विम तपा और कुछ मण्वामीन्दिवि कल्पान्तेऽन्यन्न किञ्चन ।। ८॥ मी मही पा॥ ८॥ म्हाराज ! उनकी नामिसे एक तस्य नामे समभवत् पमकोशो हिरण्मय । मुवर्णमय कमव्योष प्रकट इमा। उसीमें चतर्मुस मसानीका भाषिर्माव मा ॥ ॥ अमामीके मनसे तम्मिअम महाराज म्वपम्मतुरानन ॥९॥ मरीचि और मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। उनकी धर्मपली मरीचिर्मनसस्तस्म जन्मे वस्पापि कश्यप । दक्षनन्दिनी अदितिसे विवस्वान् (सूर्य) का जन्म हुआ ॥ १० ॥ विवस्वान्की संझा नामक पनीसे धारदेव दोधायप्पांदतोऽदित्या विवस्वानमवत् सुतः॥१०॥ | मनुफा बन्म हुआ। पीक्षित् ! परम मनस्वी राना 'भाइदेवने अपनी फी प्रवाके गर्मसे दस पुत्र उत्पन सवो मनु भादेव मनापामाम भारत । किये । उनके नाम पे-स्क्वाकु, नूग, शति, दिछ, भदायां जनयामाम दश पुत्रान् म आत्मवान् ॥११॥ पृथ,कल्प, नरिम्परत, पृषघ, नभग सौर फति॥११ १२॥ इस्वारगमयासिदिष्टपुष्टफरूपकान् वैवस्वत मनु पाले सन्तानहीन थे। उस समय नरिप्यन्त पंपधं च नभग च कवि विशः ॥१२॥ लये मिनावरण का मन कराया था ॥ १३ ॥ यत्रके सर्वसमर्थ भगवान् बसिष्ठने उन्हें सन्तान प्राप्ति करानेके अप्रनम्प मनो पूर्व पसिष्ठा भगवान किल । बारम्ममें केवल दूध पीकर यनेवामी यस्वत मनुकी धर्मपनी प्रदाने अपने होताफ पास जाकर प्रणामपूर्वक मित्रावरुणपारिष्टि प्रजामको प्रभु ॥१३॥ याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो ॥१४॥ सब तर पदा मनो पसी दोवार ममयाचत । सम्पयुकी प्ररणासे होता बमे हुए ग्रामणने श्रद्धाके कपनका दुहियर्थमुपागम्प प्रणिपस्प स्मरण करके पयाम चितसे मरट कारका उचारण करते पयोग्रता ॥१४॥ हए याकुरा में आहुनि ती ॥ १५॥ मग ताने इस प्रेपितोऽधपुणाहाता घ्यापस्तन सुसमाहितः। प्रकार विपरीत कम फिल्पा, तब यहके फलस्वरुप पुरके स्थानपर इश नामकी कम्पा दुई। उसे देखकर आपदव हविपि पपग्त् तेन यपटुकार गृगन्दिज ॥१५॥ मनुका मन कुछ विशेष प्रसम नहीं हुआ। उन्होंने अपने हाम्तव्यभिचारण फन्पेला नाम साभवत् । गुरु पसिष्टचीसे कहा ॥ १६ ॥ 'मगवन् ! जाप प्रेग सोमादी, बापका फर्म इस प्रकार विपरीत फल तो पिरोग्य मनु प्राह नातिरमना गुरुम् ॥१६॥ दनगग कैसे हो गया । बरे, पर तो यह दुसकी भगवन तिमिर जात कम वा ममत्राग्निाम् । बालदिव कर्मका ऐसा विपरीत फल तो पमी नहीं होना चाहिये ॥१७॥ आपलोगोंका मचान विपपयमा पर्ष मई म्पाट प्रतिक्रिया ॥१७॥ सो पूरा है ही, इसके अतिरिक आपयोग मितेन्द्रिय भी गुप मन्यपि यूनाम्नरमा दम्पपिरिसपा । है, तया तपस्याफे कारण निप्पाप हो चुके है। देपामि अमापकी प्राणिके गमान आपके सहस्पकर या ठस्टा हर मामपम्पमन्न विपुपविय ॥१८॥ पर पैमे हुआ। ॥ १८ ॥ परीक्षित् ! हमारे पद मिाम्प पणनम्य भगपान प्रपितामर । प्रपितामद भगवार अमिग्ने उनकी यह पात सुनकर । । . पानात पिरिमाल - म० १] नषम स्फान्ध होतुर्यविक्रम ज्ञात्वा पभाषे रविनन्दनम् ॥१९॥ जान लिया कि होताने विपरीत सङ्कल्प किया है। इसठिये | उन्होंने वैवस्वत मनुसे कहा ॥ १९ ॥ गनन् ! सुमारे एसत् सकल्पपम्पं होतस्ते व्यभिचारत । | होता विपरीत सकल्पसे ही हमारा माइस्प ठीक-टीक तथापि साधयिप्प ते सुप्रजाम्त्व म्यतेजसा ॥२०॥ | पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने सपके प्रभावसे मैं तुम्हें एवम्यवसितो रामन् भगवान् स महायशा । ग्रेष्ठ पुत्र दूंगा ॥२०॥ परीक्षित ! परम यशस्वी मायन् यमिएन एसा निमय करके उस इला नामफी पस्याको अस्तौपीदादिपुरुपमिलायाः पुंस्त्वकाम्पया ॥२१॥ी पुरुष बना देने के लिये पुरुषोत्तम भगवान् नारायणकी तस्मै कामबरं तुष्टो भगवान् हरिरीधर । स्तुति की ॥ २१ ॥ सर्वशकिम्मन् भगवान् श्रीहरिने सन्तुए होकर उनं मुंहमांगा पर दिया, जिसके प्रमापसे ददाविलाभवत् तेन मुपुम पुरुपर्पभः ॥२२॥ह कम्या ही सुपुम्न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी॥ २२ ॥ स एफदा महाराज विचरन् मृगयां षने । महारान | एफ वार राना मुपुम शिकार ग्रटने के वृत फतिपयामात्यरचमारून सन्धवम् ॥२३॥ रिये सि घुदेशके घोड़पर समार होकर कुछ मश्रिोंक साथ मनमें गये ॥ २३ ॥ वीर सुपुम्न फरच पहनकर प्रगृप रुचिरं चाप शराम परमाबुवान् । और हापमै मुटर घनुष एवं अस्पत भद्मन वाण रेफर उशितोऽनुमृग पीरो जगाम दिसमचराम् ॥२४॥ हरिनोंका पीछा करते हुए उत्तर दिशामें यात मागे या स कुमारो बन मेरोरधन्तात् प्रविवेश ह । गये ॥ २१ ।। अन्तमें सुयुम्न मेरुपर्वतकी सम्पटीके एक पनमें चले गये । उस पनमें भगवान् शहर पार्वतीक यत्राम्ते भगवाम्यो रममाणः महोमपा ॥२५॥ साप विहार फरते यते ॥२॥ उसमें प्रवेश फरसे ससिन् प्रविष्ट एवासी मुघुम्न परवीरहा । ही बीरपर मुघुम्नने देखा कि में श्री हा गया बार अपश्पत् नियमाम्मानमस्य च यडया नृप ॥२६॥ वादा घाफी हा गया है ॥ २६ ॥ परीक्षित् ! साप ही उनके सव अनुबरोंने भी अपनेको सीपमें दम्प । ये तथा सदनुगा मर्वे आरमलिङ्गविपर्ययम् । सब एक-दूसरेका मुंह दम्पन सगे, उनका विच मात या निमनसोऽम्बन् यीभमाणाः परस्परम् ॥२७॥ उदास हो गया ॥ २७ ॥ रामोवाच पजा परीसिट्ने पूज-मगन् ! उस भूमण्डमें ऐसा विचित्र गुण से भा गया । किसने उसे पमा कथमेव गुणो दश फन पा भगवन् रुस । बना दिया था ! आप क्या कर हमार म प्रश्नका उत्तर दीजिये, क्योंकि हमें मग कालहसा रहा प्रश्नमेन समाधव परं कौतूहलं हि नः॥२८॥ ॥ २८ ॥ भीम उपाय मीशुकदेवमामे कहा-परीक्षित् ! एक नि मायान् एकदा गिरिश तृप्टुमृपयस्तत्र मुग्रता । शाररका दशन करमके निये पापा तयारी अपि अपने सेबसे शात्रोंका बन्धकार मिगते हुए उम हिमोवितिमिराभामा कुर्वन्त समुपागमन ॥२९॥ नमें गय ।। २० ॥ उस समय चम्किली पत्रहीन वान् पिलास्माम्पिका देवी पिपासा पीरितामृशम् । पी। ऋषियोंका सहसा नाया टेम्प वे अपन जित हा - . २ यि - . ६ श्रीमहागवत भरिशद समस्याप नीचीमाश्वथ पर्यधात् ॥३०॥ गयी । अटपट उनहोंने भगवान् शहरकी गोदसे उठकर भस प्रारण कर लिया ॥ ३० ॥ अपियोंने भी देखा कि अपमोऽपि तमोक्ष्यि प्रसस रममाणया । भगवान् गौरीशहर इस समय विहार कर रहे है, इस- नित्ता प्रयपुस्तसाम्भरनारापणाभमम् ॥३१॥ लिये हाँसे सौरकर वे मगवान् नर-नारपाके वाश्रमपर चले गये ॥ ३१ ॥ उसी समय मावान् शारने पनी सदिद भगवानाइ प्रियाश प्रिपाम्पमा । मिया माती अम्बिकाको प्रसन्न करनेके लिये कहा कि म्यानम प्रविशेदेवत्मवै योपिद् भवेदिति ॥३२।। मेरे सिमा जो मी पुस्य इस स्थानमें प्रवेश करेगा, ही की हो जायगा ॥ ३२ ॥ परीक्षित् । प्तमीसे पुरुष उस तव कर्ष यनं तद्य पुरुषा बजेयन्ति हि । स्थानमें प्रवेश नहीं करते । वामम ही हो गये थे। सा पानुपरसयुक्ता विचार यनाव पनम् ॥३३॥ इसलिये ये अपने स्त्री बने हुए मनुपरेके साप एक अथ तामाश्रमाम्पाशे परन्ती प्रमदोत्तमाम् । इनसे दूसरे इनमें विचरने लगे ॥ ३३ ॥ उसी समय शक्तिशाली बुधने देखा कि मेरे बाप्रमके पास ही स्त्रीभिः परिश्ता वीक्ष्म धक्रम भगवान् बुध ||३४|| सात-सी त्रियोंसे घिरी हुई एक सुन्दरी श्री विचर रही मापि त पकम सम् सोमराजसुत पतिम् । है। उनोंनेइमकी कि यह मुझे प्राप्त हो जाय ॥ २५ ॥ उस पदरी सीने मी पदकुमार बुधको पति मनाना म वस्पां ननयामाम पुरुरवसमात्मषम् ॥३५॥ पाहा । इसपर युधने उसके गर्मसे पुरुरवा नामक पुत्र एव स्त्रीत्यमनुप्राप्त सुपुम्नो मानमो नृप । उत्पन्न किया ।। ३५॥स प्रकार मनुपुत्र रामा मयुम मी ही गये । ऐमा सुनते हैं कि उन्होंने उम अस्मामें मम्मार स्वालाचाय कमिष्ठमिति शुश्रुम ॥३६॥ अपने फुरुपुरोशित पसिनीका स्मरण किया ।। ३६ ॥ म मस्प वा दशा या रुपमा मुसपीरित । सानकी मह दशा देखकर पसिनीके में पारा मुगुम्नम्पायन पुग्न्वमुपापापस नहरम् ।।३७।। अत्यन्त पीड़ा दुइ । शेने सुपुत्रको पुन पुस्य बना ।दनेक लिये भगवान् शाहरकी तुम्तम्म म भगवानृपय प्रियमावान । की ॥ ३७ ।। भगवान् शहर वसिष्ठजीर प्रसम म्याच वाचमृता कुमिमा विपते ॥३८॥ छ । परीक्षित् ! उनोंने उनकी अभिप्रपा पूर्ण जनक लिपे अपनी वाणी को सस्प रमाते हुए ही माम पुमान् म भविता मोम सी सम गोत्रम । या यात कड़ी ॥ ३८ ॥ श्रमिट ! तुम्हाग यह यममान थिम्पबम्पपा कार मुपुम्नाऽजतु मेरिनीम् ॥३०॥ एक महीनेता पुस रहेगा और एक महीनेनय भी। इस म्पश्सासे मुद्यन्न इष्टानुमार पप्पीन पालन आनायानुमहान काम सम्पापुम्स्य पवम्भया । कर ॥ ३० ॥ इस प्रकार बसिष्ठनीके अनुपइसे म्पासा पालयामाम जगती नाम्पनन्नमवप्रया १४० पूर्ण भभीष्ठ पुरुषस्य नाम करके सफल प्रपीका पालन करने मगे । परन्तु प्रना उनका अभिनन्न नहीं मारती मम्मीकमोगपागजन पिमतममुनाप । पी॥ २०॥ उन तीन पुन हुर-उत्यस, गय और पशिगाधिराजाना सम्पर्धमपन्समा ॥४॥ मिर । पाक्षित् । मय क्षिणापथके राना हुए ॥१॥बत मोक बार इसरावस्या आनेपर सन परिणत कामे प्रविशनपति पम् । प्रतिणन नगरी भविशति सुश्मने जान पुत्र पुगरणा वाराधना 4 १ मी म म०२] नयम कध ७ % 3D पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गसो पनम् ॥४२॥ | को राज्य दे दिया और स्वयं तपस्या करनेके लिये कनकी यात्रा की ॥ १२ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्पा संहिताय नमस्कत्धे इस्योपाम्याने प्रथमोऽध्याय ॥१॥ अथ द्वितीयोऽध्याय पृषभ मावि मनुके पांच पुत्रोंका वश श्रीशुक बाप भीशुकदेवमी कहते है-परीक्षित् ! इस प्रकार जब मुपुर तपस्या करनेके लिये क्नमें चले गये, तम वैवखत एप गतेऽथ सुपुम्ने मनुवैवम्बत सुते । मनुने पुत्रकी कामनासे यमुनाके तटफ्र सौ वर्षतक पुत्रकामस्तपस्तेप यमुनायो श्रत समा ॥१॥ तपस्या की ॥ १ ॥ इसके बाद उन्होंने सन्सानक लिये सबशकिमान् भगवान् श्रीहरिकी धाराष्मा की खतोऽयज मनुषमपत्यार्थ हरि प्रसम् । और अपने हीसमानस पुत्र प्राप्त किये, जिनमें सबसे पा इक्ष्वाकपूर्वजान् पुत्रोक्लम स्वसम्मान् दक्ष ॥ २ ॥ | इस्वाकु थे ॥ २ ॥ उन मनुपुमसे एकका नाम था पृषघ्र । गुरु बसिराजीने उसे गायोंकी रक्षा नियुक्त कर प्रपत्रस्तु मनो पुत्रो गोपालो गुरुणा रुस । रमस्या पा, अत का रात्रिके ममय पनी सावधानीसे वीरासनसे बैठा राता चौर गायोंकी रक्षा करता ॥ ३ ॥ पालयामास गा यचो राम्या वीरासनव्रत ॥३॥ एक दिन रातमें पाहो दी थी । उस समय गार्योंके एकदाप्राविश्व गाष्ठंबाईलो निशि वर्पति । मुरमें एक बाघ पुस आया । उससे उरकर सोयी गोरे ठर सभी हई । के गोशालामें ही इधर-उधर भागन शयाना गाव उत्थाय भीवास्ता मनमुर्वज ॥ ४ ॥'मी ॥ ४ ॥ बलवान् गधने एक गायको पकड़ लिया। एक अग्राह पलवान् सा चुमोश भयातुरा । बह भक्त भयभीत होकर चिल्लाने लगी । उसका बहकदन सुनकर पृपध्र गायके पास दौर थापा ॥५॥ तस्यास्तव क्रन्दितं श्रुत्वा प्रपत्रोऽभिसमार ह॥५॥ एक तो रातका समय और दूसरे घमघोर घटाओंसे सजमादाय तरसा प्रलीनोडुगण निति । आग्मदित होने के कारण तारे भी नहीं दीमते थे । उसने दापमें तलवार उठाकर अनजानमें ही बा वेगसे अधानमनद् वम्रा शिर झा लगाया ॥६॥ गायका सिर काट Pया । वह समझया था कि यही व्याघ्रोऽपि स्मभपणा निखिशाग्राइसम्तत । वाप है॥६॥ तसबारकी मोकसे बापका मी कान नियमाम मृश भीतो रक्त पधि समुत्सनन् ।॥ ७॥ कर गप्प, वह अपत मयभीत होकर गरमें पून | गिया एवा होसे निकल भागा ॥ ७॥ शमन मन्यमानो इस व्याघ्र प्रपध्र परसीरहा। | पृषश्न यह समन्ना मि बाप मर गया । परतु राम भद्राधी स्वस्तां प प्युटायां निशि दुखित ||८|| बीरमेपर उसन दहा कि मैंने सो गायको ही मार दाण ८ श्रीमद्भागवत [म०२ से शशाप मुलाचाः कवागसमकामतः । है, इससे उसे बड़ा दुस हुआ ॥ ८॥ यपपि प्रपनने जान-बूमकर अपराध नहीं किया था, फिर भी फरपुरोहित न धबधुः शूद्रस्त्व कर्मणा भविताना ॥ ९॥ अशिष्ठनीने उसे शाप दिया कि "सुम इस फर्मसे क्षत्रिय महारहोगे, जाओ, शव से जालोर ।।२॥ ने अपने एष शप्तस्तु गुरुणा प्रत्पगृहात् कृतालि । गुरुदेक्का यह शाप अलि गाँधकर स्वीकार किया और इसके बाद सके लिय मुनियों को प्रिय गनेपाले नैष्ठिक अधारपद मत वीर ऊपरेता सुनिप्रियम् ॥१०॥ मचर्य व्रतको धारण किया ॥ १०॥ समस्त प्राणियों वासुदेवे भगवति सर्वात्मनि परेऽमले । का भौतुक हितैषी एवं सबके प्रति समान मावसे युक होकर भलिके द्वारा परम विशुद्ध सामा मायान् एकान्तित्य गतो भस्मा सर्पमतमुहत् सम ॥११॥ मासुदेषका अनन्य प्रेमी से गया ॥ ११ ॥ उसकी सारी बासकियों मिट गयो । पपियों शान्त हो गयी। विमुक्तसरः शान्तात्मा समतायोऽपरिणा । इन्द्रियों परामें हो गया है या कमी किसी प्रकारका संग्रह परिग्रह नहीं रखता था। जो कुछ देवश प्राप्त हो पहलहयोपपमेन कल्पमन् वृतिमात्मनः ।।१२।। नाता, उसीसे अपना जीवन निर्वाह कर लेता ॥ १२ ॥ वात्मन्यात्मानमाधाय शानदप्त समादित । पर आतमानसे संतुष्ट एव अपने पितको परमात्मामें सिप्त करफ प्रस्य समाधिस्स यता । कभी-कमी नर, विचचार महीमेतो बगभफिराकृतिः ॥१३॥ अषे वीर बहरेके समान पृष्पीपर विचरण करता ॥१३॥ इस प्रकारका नीक्न म्पतीत करता दुखाइ एक दिन एषाचो बन गस्था राष्ट्रा दायामिमुत्पितम् । वनमें गया | पहाँ उसने देखा कि सामान चक्क या है। मननशील प्रपत्र अपनी न्द्रियोको उसी भनिमें तनापयुक्तकरणा प्रम प्राप पर मुनि ॥१४॥ मस्म करके परम परम्पहपको प्राम हो गया ॥ ११ ॥ कवि कनीमान् विपयेषु निःस्पृहो मनुका स्पसे छोटा पुत्र पा फषि । किश्योंसे छ विसृज्य राज्यं सह बन्धुमिर्पनम् । मपन्त नि स्पापा । वह राम्य भेरकर अपने कामों के साप बममें चला गया और अपने हममें सर्यप्रकाश निवेश्य विचे पुरुष स्वरोधिप परमात्माका विराजमान कर किशोर अवस्थामही परम विदेश मोरमयाः परं गतः ॥२५॥ पदको प्राप्त हो गया ॥ १५॥ करूपान्मानबादामन् कास्मा पत्रातयः। मनुपुत्र कापसे कारुप नामक क्षत्रिय सत्पम हुए। ये मर ही प्रामणमत, धर्मप्रेमी एवं उचगफ्पके रक्षक उच्चरापथगोप्तारो प्रमया धर्मवत्ससाः ॥१६॥ ॥ १६॥ पटके मार्ट नामक क्षत्रिय हुए। पृष्टा धार्टमम धनं प्रभम्पं गत क्षितौ । वन्तमें वे इस शरीरसे ही प्रामण बन गये । नगका नृगस्य मंसः सुमतिकज्योतिस्ततो पसु ॥१७॥ पुत्र मनु वा ॥ १७ ।। मसुका पुत्र प्रतीक गौर पुत्र हुमा मुमति, उसका पुत्र मूतम्योति घोर भूसम्योति- पसो प्रतीकस्तत्पुत्र मोघवानोपयस्पिता। प्रतीकका पुत्र मोक्वान् । बोपवान्के पुत्रका नाम मी मन्मा पौषपसी नाम सुदर्शन ठवाह ताम् ॥१८॥ नान् ही घ । उनके एक मोमबती नामकी काया मी थी, पिसका विवाह प्रदर्शमसे मा॥ १८ ॥ चित्रसेनो नरिप्यन्ताम्यस्तस्य सुवोऽभवत् । म्नपत्र मरिपतसे चित्रसेन, उससे अष, अज १शमाए। ।

अ०२] नवम स्कन्ध वस्प मीवास्तव कुइन्द्रसेनस्तु वत्सुस ॥१९॥ ! मीढ्वान्, मीत्वान्से च और उससे इन्द्रसेनकी उत्पत्ति हुई॥ १०॥इन्द्रसेनसे वीनिहोत्र, उससे सत्पा, घोतिहोत्रम्विन्द्रसेनात् तस्स सत्ययवा अभूद। सस्पवासे उहवा बौर उससे देवदत्तकी उत्पति उम्भमा सुतस्तस्य दषदत्तस्ततोऽभवत् ।।२०॥ ॥२०॥ देषदचके अग्निवेश्य नामक पुत्र हुए, सतोऽग्निवेश्यो भगवानग्नि स्वयममूत् सुस । जो स्वर्य भनिदेव ही थे। भागे चलकर ये ही कानीन कानीन इति विख्यातो जावूफर्यो महानपि ॥२१॥ एवं महर्षि जातकर्ण्यके नामसे विड्यात हुए ॥ २१ ॥ पीक्षित् ! ब्राझोका 'आग्निवेश्यायन गोत्र उन्हीसे चन्ग ततो प्रमालं जातमाग्निवेश्यायन नृप । है। इस प्रकार नरिप्यन्तके पशका मैने वर्णन किया, नरियन्साय प्रोक्तो दिएपशमत भृणु ॥२२॥ भव विष्टका वश सुनो ॥ २२ ॥ नाभागो दिएपुत्रोऽन्य कर्मणा पैश्या गत । रिएके पुत्रका माम पा नामाग । या उस नामाग से कया है, जिसका में भागे पणन करूंगा। वह मलन्दन सुतस्तस्य वत्सप्रीतिर्मलन्दनात् ॥२३॥ अपने कर्मके कारण वैश्य हो गया । उसका पुत्र वत्सप्रीते सुत' प्रांशुस्तत्सत प्रमति विदुः । मुआ मदन और उसका पासप्रीति ॥ २३ ॥ पासप्रीतिका प्रांशु और प्रांगुका पुत्र गुना प्रमति । स्खनित्र प्रमतेस्तमाघाापोऽथ विविशतिः ॥२४॥ प्रमति के सनित्र, सनिपके चार और उनके विविंशति विविंशतिसुतोरम्भ सनिनेत्रोऽस्स धार्मिक । हुए ॥ २१ ॥ विविंशतिक पुत्र रम्म और रम्मके पुत्र फरन्धमो महाराज तस्यासीदात्मजो नृप ॥२५॥ सनिने दोमों ही परम धार्मिक हुए। उनके पुत्र तस्पात्रीधित् मुत्तो यस्स मरुत्सबक्रवर्त्यभूत् । करन्धम और करन्धमके पत्रीशिद । महायम पीक्षित् ! बीभितके पुत्र मरुत्त चक्रवर्ती राजा १९ । उनसे संवर्वोऽयाजयद् य है महायोग्यािमुत ॥२६॥ अगिराके पुत्र महायोगी संवर्त अपिने या कापा मरुतस्प यया यनो न तपान्यस्य कश्चन । था ॥ २५-२६ ॥ महरका या जैसा इना, पैसा सर्ष हिरण्मयस्वासीय किशिपोस्य शोभनम्।।२७॥ भौर किसीका नही इमा । उस परक समस्त भेटेका पाम अस्पन्त सुन्दर एवं सोनेके बने हुए ॥२७॥ अमापदिन्द्र सोमन दक्षिणाभिटिजातयः । उप महमें इन्द्र सोमपान करके मलयामे हो गये थे भार दक्षिणामोंसे मामण वप्त हो गये थे। उसमें परसनेवाले मस्त परिमेटारा विश्वेदेवा सभासदः ॥२८ मझगण और विश्वेदेव समासद् थे ॥ २८॥ मरुत्तस्य दम पुत्रस्तस्पासीद् राज्यपर्धन मझके पुत्रका नाम पादमादमसे सम्पवर्वन, उससे सुतिस्तत्सुतो बन्न सौतयो नर सुतः ॥२९॥ । मुनि और मुतिसे नर मामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई ॥२९॥ तत्सुतःफेयलस्तस्मात् यन्धुमान घगवास्ततः । नरसे कोण, कवठसे बन्धुमान् पधुपान्से वगवान् वेगवान्- से बन्नु नौर बन्युसे राना तृणविन्दुका नाम एषा ॥३०॥ पपुस्तस्याभवद् पस्प खगरिन्दमहीपति ॥३०॥ तृणबिन्दु आदर्श गुणोंके मण्डार थे । अप्सराओंमें त मेजेऽलभ्युपा दयी भजनीयगुणालयम् । श्रेष्ठ मठम्युपा दवीन उनको वरण किया, जिससे उनके कई पराप्सरा यत' पुत्राः कन्या पेरपिराभवत् ।।३१॥ पुत्र मौर हरविड नामकी एक स्या उत्पन्न दुइ ।। ३१ ॥ तस्मामुत्पादयामास विभवा भनदं मुखम् । मुनिश्र वियाने वपने पागेपर क्लिा पुलस्पचीसे उच्म - १ पात्रा २ बायण । यम्पा । ग १० भीमहागवत य०३ प्रादाय विया परमामृपियोगेश्वरात् पितुः ॥३२॥ | विषा प्राप्त करके इरविग गर्भसे स्नेकपाक पुरको पुत्रलपमें उत्पन्म किया ॥ ३२ ॥ महाराज सृणबिन्दुके विशाल भूपय घुष म्रकेतुम तत्सुताः । अपनी धर्मपत्नीसे तीन पुत्र हुए---विशाल, शुम्पयम्भु विशालो वंशक राजामंशाली निर्मम पुरीम् ॥३३॥ और पुत्रकेतु । उनमेंसे राना विशाल वशभर हुए और उन्होंने वैशाली नामको नगरी बसायी ॥ ३३ ॥ विश्वससे हमचन्द्र सुवस्तस्य घनामस्तस्स चात्मज । हेमचन्द्र, हेमचन्द्र से धूम्राक्ष, धूम्राक्षसे संपम और संयमसे तत्पुत्रात् संयमादामात कशाम सादेवज ॥३४॥ दो पुत्र हुएश्यश्व और देषन ॥ ३१ ॥ कशाशके पुत्रका नाम पा सोमदच । उसने मश्वमेघ योंके द्वारा कन्नाभात सामगधोऽभूत् योऽसमधेरिबस्पतिम् । यापति भगवान्की माराधना की और योगेसर संलोका इना पुरुषमापारयां गति योगेमराभिवः ॥३५॥ बाध्य लेकर उचम गति प्राप्त की ॥ ३५॥ सोमदत्त का पुत्र हुआ सुमति वौर मुमसिसे अनमजय । ये सौमदतिस्तु सुमतिस्तस्तुतो जनमेजयः । नृणबिन्दुको कीर्तिका पकानेवाले शिायशी गजा एते वैशालम्पालास्तमकिन्दोर्यशाधरा ||३६॥ हुए ॥ ३६ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहस्यो संशिताया नषमस्करघे दितीयोऽध्याय ।। २ ।। - अथ तृतीयोऽध्याय महर्षि यमन मोर मुकम्पाका परिष पाशाविका षा श्रीशुक उवाच भीगुरुदेषगरी करते है-परीमित् सर्यातिमानमा राजा ममियः में बमष ह । राना शाति वेदोका निछयान् विद्वान् था । उसन वहिरा गोत्रके अषियोंके यामें दूसरे दिनका कर्म वसाया या या महिरसा सत्र दिसोयमा चियान ॥१॥॥१॥ उसकी एक कमलपोजना कन्या पी । उसका मुरुन्पा नाम सस्पासीत् फन्यामललोचना । नाम प समन्या । एक दिन राना शाति जपनी फ्ल्याक माप कनमें चूमते-यूमते प्पान प्ररिक मानमपर तया साप पनगतो पगमच्यवनाथमम् ॥२॥ गा पहुँच ॥२॥ मुकम्मा अपनी ससियोंके साप पनमें सामसामि परिवता विमिन्नस्पस्पिान् पन। घूम-घूमकर एशोफा सौन्दर्य दस रही थी। उसने एक स्थानपर देखा कि यावी (दीमकी एकत्रित की मिली) पत्मीकर ध दाश सपाते इस ज्याविपी ॥ ३॥ के मेमे उगनकी सर दो पालियों दीस ही नपादिवा पालराज्यातिषी पष्टफन वै । है॥३॥वकी कुछ ऐसी ही प्रेरणा दी, मुकल्याने अविष्प मुग्धमान मुमाषामु तवा यह ॥ ४॥ मेघ दिया। इससे उनसे बहुत-मा म्यून बह चला ॥४॥ मारमुसम पपतासे एक कोरेके शास उन ज्योतियों को पानिराधान्भून् मनिकानां पसरवणान् । उसी मगप राना शतिक सैनिक मन-मूत्र एक १ मोसप । २ मवर ।

अ०३] नषम स्कन्ध ११ राजर्पिस्तमुपालस्य पुम्पान् विमितोऽत्रवीत् ॥ ॥ गया । राजर्षि शातिको यह दस्पकर बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंन अपने मैनिफोंसे कहा ॥ ५ ॥ 'अरे, तुम्योगोंने अप्पभद्र ने युष्माभिभार्गषम्य विचेष्टितम् । पही महपि ग्यानजीक प्रति काइ अनुचित व्यहार नहीं कर दिया । मुझ तो यह स्पट वान पड़ता है कि व्यक्त पनापि नम्तस्प कृतमाममदूपणम् ॥ ६॥| हममेगामसे किमी-न-किसीने उनके आश्रममें को अनप किया है।॥ ६॥ तव मुफ्ल्यान अपन पिनासे ररते- सुकन्या प्राह पितरभीसा किश्चित् रुतं मया । गरते कहा कि पितानी । मैंने कुछ अपराध अवश्य रेज्योतिपी अजानन्त्या निमिमेकण्टफन वै ॥७॥ किया है। मैंने अनजानमें दो पोतियोंको कोटेसे छद दिया है।॥ ७ ॥अपनी कन्याकी यह बात सुनकर शर्याति दहितुम्तद् पच श्रुत्वा धाति वसाधसः । घबरा गये । उनोंने धीरे-धीरे स्तुति करके बाँधीमें छिप ए म्यान मुनिको प्रसन्न किया ॥ ! तदनन्तर मनि प्रसादयामास यल्मीकान्तरित झनै ॥८॥ यवन मुनिका अभिप्राप नानकर उनोंने कपनी फत्या गर्ने समर्पित कर दी और इस सङ्कटसे छूटकर बड़ी क्दभिप्रायमाझाय प्रादा दुहितर सुने । | सापधानीसे उनकी अनुमति लेकर वे अपनी राजधानीमें चल पाये ॥ ९॥ रुपान्मुक्तस्तमामन्य पुर प्रापात् ममाहिस ॥९॥ । मुफन्या म्पयन प्राप्य पति परमकोपनम् । इघर मुकन्या परम कोधी प्यान मुनिको अपम पनिके सपमें प्राप्त करके यही सावधानीसे उनकी सेवा प्रीणयामास चिचना भप्रमचानुचिभि ॥१०॥ करती हुई उन्हें प्रसन्न करने स्थी । यह उनकी मनो इधिको जानकर उसके अनुसार ही बपि करती कस्पषित् त्वथ कालस्प नासत्यावाश्रमागती। पी ॥ १० ॥ कुछ समय बीत जानपर उनके साभमपर दोनों अधिनीकुमार माये । म्यान मुनिमे उनका यपोषित तो पूजपिरवा पापाच पयो मे दसमीपरी ॥११॥ सकार किप्पा और कहा कि 'आप दोनों समप है, इसलिये मुझ पुमा यवम्पा प्राम कीमिये । मेरा रूप ग्रा ग्रीप्पे मोमस्स या वामप्पसोमपो । एवं वासा एसी कर दीमिये, विसे युवती सियों चाहती है। मैं जानता हूँ कि मापत्न्मेग सोमपानके अधिकारी मही, क्रियता म यो रूपप्रमाना यदीप्सितम् ॥१२॥ फिर भी मैं आपका पहमें सोमरसका माग दूंगा ॥११ १२॥ पाशरोमणि मरिनीकुमारोंन महर्षि पानका अभिनन्दन वाढमित्युचतुषिप्रमभिनन्य भिपक्तमौ। करके कहा, 'ठीक है।" और इसके बाद उनसे कहा कि-या सिझेक शरा पनाया हुआ कुर , भाप निमजतो भवानमिन् द सिविनिर्मिते ॥१३।। ' इसमें स्नान कीजिय' ॥ १३ ॥ पवन मुनिक शरीरका इस्युक्त्वा जरया अस्वद हो धमनिसन्तस । मुडापने घर रस्सा था । सब ओर मसें दीस सी पी, मुरियों पर मान एवं माल पक जानके कारण ये देखने में ए प्रवेशिताऽचिम्पां बलीपलितविप्रिय ॥१४॥ बहुत मई मगते पे । अश्विनीयुमारोंने उन्हें वपन माप १० श्रीमहागवत [अ०३ पुरुयात्रप उत्स्युरीच्या पनिवाप्रिया । लेकर हमें प्रवेश किया ॥ १५ ॥ उमी ममय कुणसे पिन पुरुष बाहर निकले। ये तीनों ही काम की माला, पप्रमश कुण्डलिनस्तुल्यस्पा मुवामम' ॥१५॥ कुण्डल और सुन्दर घस पहने एक-से माटम होते थे। वे बड़े ही सुनर एव सियों को प्रिय लगनेवाले थे॥१५॥ वान् निरीक्ष्य परारोहा मरूपान् सूर्यवर्च । परम साथी सुन्दरी मुकम्पाने जब देखा कि ये तीनों ही एक आकृतिके तया सूर्यके ममान तेजस्सी है तब अपने अमानदी पति सापी अधिनी शरण यया ॥१६॥ पनिको न पहचामकर उसने अश्विनीकुमारोंकी शरण ही ॥१६॥ उसके पातिवस्यसे पश्विनीकुमार बहुत दायित्वा पतिं तस्य पातिप्रत्येन सोपितो। सम्तए पुर। उन्होंने उसके पतिको पतला दिया वीर मिर प्यान मुनिसे माड़ा कर विमानके द्वारा वे स्वर्गको पिमामन्य ययसुर्विमानेन विविटपम् ॥१७॥ | चले गये ॥ १७ ॥ पुन समयके माद पा करनेकी पचासे राजा शर्याति यक्ष्यमाणाध्य नातिन्ययनस्याश्रम गतः । पवन मुनिके आश्रमपर बाये । वहाँ उन्होंने देखा कि दर्ग दहितुः पायें पुरुष सूर्यवचेसम् ।।१८।। उनकी कन्या मुफरपाके पास एक सूर्यके समान तेजसी पुरुष कैय हुआ है ॥ १८ ॥ मुफ्त्याने उनके घरों की राजा दुहितर प्राह तपादाभिवन्दनाम् । पनना की । शशिने उसे भाशीर्वाद नहीं दिया और पुस असम से होकर मोले ॥ १९ ॥ दुगे ! पहने आभिषमाप्रपाना नाविनीसमना व ॥१९॥ क्या किया । क्या तूने सबके बन्दनीय प्यान मुनिको घोम्य दे दिया । नत्य ही उन उनको मूहा और चिकापित ते किमिद पतिस्त्मया वपने काम म समझकर और दिया और बम ए इस प्रलम्भिता लाग्नमस्तता मुनि । यह घटसे जार पुरुषकी सेवा कर रही है ॥ २० ॥ सेय नम तो मा उपे पुलमें हुआ पा । यइ उस्टी प जराप्रम्तममन्पमम्मत पुदि तुझे पैसे प्राप्त हुई ! तेरा यइ म्पहार तो पुाम्मे पनाह मानेवाण है। अरे राम-राम ! निर्लन होकर पिाय जारं भजसऽमुमध्यगम् ।।२०॥ नार पुरुषकी सेवा कर रही है और इस प्रकार अपने फा मनिम्न वगवान्पथा सा पिता बार पनि दोमौके पशको घोर नरममें से जा रही है ॥ २१ ॥ रामा शनिके इस प्रकार करने एउपमने पुन्दपर्ण विदम् । पर परिन मुमानवान्टी पुग्न्यान मुमपाकर कहा- विभनि जा पदपप्रपाल 'रिमाची ! ये आपस जामाता म्पर्य मुगुनन्न महर्षि पिनुप भतुप नपम्पधनम || पान दी ॥ २२॥ इसके बार उमने करने शिनासे पं पान रित पयमाना गुपिम्मिता। मनापानपोन और गोन्पकी प्रापिर मारा उपान मान सामाना तरप भृगुननन ॥२२॥ गगन पर गुनाप । मा पुनम गना शक्ति नमपि नव गांगाराभिलम्भनम् । परिस्मिन एए । उदॉन या प्रमसे जानी पुत्रीका रिचित परमपानानना परिपम्पन ||२३|| गतरे या पिा ॥ २३ ॥ मापन पासपन पी प्ररे मामम पाप्रदात । प्पानन पीर दानिये मोमपनका अनुमान Prict. पुपान ग । भान 11 पार . ।

१०३] नवम स्फन्त्र १३ असोमपारप्पमिनोश्च्यवन स्वन तजसा ॥२४॥ करवाया और सोमपानके अधिकारी न होनेपर भी अपने प्रम्पमसे परिसनीकुमारोंको सोमपान कराया ॥ २४ ॥ इन्तु तमाददे पत्रं सयोमन्युरमपित । इन्द्र बहुत गल्दी क्रोध कर बैठते हैं । इसलिये उनसे या सह न गया। उन्होंने विफर शयतिको मारनके रिये का उठाया । महर्षि मनने पक साप उनके सप स्तम्भयामास मजमिन्द्रस्य भार्गव ॥२५॥ हापको वही स्तम्मित कर दिया ।। २५ ॥ तब सब (देवनामोंने मस्विनीकुमारीको सोमया माग देना स्वीकार अन्वमानस्तत मर्वे ग्रह सोमस चापिनो। कर लिपा । उन गोंने वैप होनके कारण पहले बशिनीकुमारोंका सोमपानसे बहिष्कार कर रस्सा मिपजापिति यत् पूष सोमाहुत्या पहिष्कतौ ॥२६॥ पा) २६ }} अचानपहिरानों मृरिपेण इति प्रय । पीक्षित् । शासिके तीन पुत्र ये-उत्ताना, शर्यावरभवन् पुत्रा मानर्वाद खतोऽभवत् ॥२७॥ मानत और रिपेण । आमसे रेपत हुए ॥ २७ ॥ सोऽन्त समुद्र नगरी विनिमाप शम्पतीम् । माराम ! रेवतने समुद्रके मीतर कुशमसी नामकी एक नगरी बसायी थी। उसी समर वे मानव वादि देशों- भास्थितोऽमा विपयानानादीनरिन्दम ॥२८॥ न राध्य करते थे ॥ २८ ॥ उनके सी श्रेष्ठ पुत्र थे, तस्स पुत्रश्चर्स बझे फपिज्येष्टमत्तमम् । निनमें सबसे बो पे कभी । ककुभी अपनी कन्या (रेतीको लेकर उसके लिये कर पूछनेके उमेश्यसे प्रभाजीके कएपी रेवती कन्यां म्यामादप विसंगतः ॥२९॥ पास गये । उस समय बसोकका रास्ता ऐसे ग्रेगोंके फन्यावरे परिप्रम्हें प्रमलोफमपातम् । लिये मेरोक-टोक था। प्रमसमेफमें गाने बजानेकी धूम मची पी । बातचीतके लिये बासर म मिग्नके आवर्तमाने गान्धर्वे स्थितोऽलम्भक्षणः क्षणम् ॥३०॥ कारण मे कुछ क्षण वहीं ठहर गये ।। २९ ३० ॥ उरसबके पतमें प्रामीका नमस्कार करके उन्होंने तदन्त आपमानम्म म्यामिप्रर्प यवेदयत् । अपना अम्ब्रिाय निषेदन किया । उनकी बात मुमपर सस्वा भगवान् प्रमा प्रास्य तमुवाच ॥३॥ मगमान्ममामीने ईसकर उनसे कहा ॥३१॥ महार! तुमने अपने मनमें मिन सोगों के विषयमें सोच रक्क्षा पा, अहोराजन निख्वास्त फासेन रदिय रसाः । वे सब तो कालके गाल घले गये । अब उन पुत्र, पनि पपा नालियों की तो पान ही त्या है गोत्रों के सरपुत्रपौषनप्तणां गात्रागि च न भृण्महे ॥३२॥ नाम मी नहीं बनायी परते ॥ ३२ ॥ स बीपमें पालोऽभिपातनिणवतुर्यगविकल्पितः । सईस पपुगीका समय बीत चुका है।इसलिये तुम जामो । इस समपमगवान् मारायणके असामनार महाबली तद् गच्छ देवदवांशो घरदगो महापल' ॥३३॥ बलदेवजी पृप्पीपर विद्यमान है ॥ ३३ ॥ यमन् ! फन्पारस्नमिद राजन् नररत्नाप दरि भो । उम्ही मरगनको या कत्यारान हुम समर्पित कर दो। मिनक नाम, घीग माबि ब्राण कीनन पहा ही सदो भ'रावताराप भगवान् मनमायना ॥३४॥ | पवित्र हैनेही प्रागिर्योरे जीनमत्रम्य पगवान् पीका मार उतारने के लिये अपन अंशस भक्तीर्ण हुए।" ममतीनों निशन पुण्यमयणकीर्वनः। रामा काशीने समानीका याबादेश प्रास करके ठमके भीमद्भागवत [अ०४ इस्पादिष्टोऽभिवन्याम नप स्वपुरमागतः । घरणों की पदना की और अपने मगरमें चल भाये। सनके पशोंने पोंके मयसे पा नगरी र दी पी स्पर्क पुष्पजनप्रासाद् मादभिर्दिक्ष्याम्पितैः ॥३५॥ | बौर महाँ-तहाँ यों ही निवास कर रहे थे । ३४३५ ।। यमा ककुमीने अपनी सर्वापसुन्दरी पुत्री परम पलशादी सुखा दवानवपाङ्गी पलाय बलशालिने । परामचीको सौंप दी और स्वयं तपस्या करनेके लिये भगवान् नर-नारायणके वाश्रम बदरीकनकी भोर 'चल पदर्यास्पं गतो रामा तणु नारायणाभमम् ॥३६॥ दिये ॥ २६ ॥ इति श्रीमवागमते महापुरामे पारमहस्यों सहितायां नपमस्कत्चे तृतीयोऽध्याय ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थोऽध्याय माभाग मोर मम्वर्गकी कया श्रीशुक उपाय मीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित । मन्त्र ममात्र पुत्र पा नामाग । बम वा दीर्घकासक सम- नाभागो नभगापस्पं य व मावर फषिम् । चर्यका पान करके पैटा तब घड़े माइयोंने अपनेसे भेटे फिन्त विवान् भाईको हिस्समें फेवल पिताको ही यविष्ठं व्यभवन दार्य प्रभचारिणमागतम् ॥ १॥ दिया ( सम्पति तो नोंने पहले ही वापसमें बाँट ली भातरोऽभा किं मर्म भजाम पितरं तव । पी) ॥ १ ॥ उसने अपने भायोंसे प्रम—माइयो ! पापलोगोने मुझे हिस्सेमें क्या दिया है। सा उन्होंने स्मा ममार्यास्ततामासुमा पुत्रफ वाया ॥२॥ उत्तर दिया कि हम तुमारे हिस्सेमें पिताजीको ही तुम्हें देते। उस्ने वपन पितासे जाफर काा-पिताजी। | मेर यो मायने हिस्से मेरे लिये लापको ही दिया इम अभिरम सत्रमासतऽध सुमेधमा । है।" पिठाने कहा-'टा । तुम सनकी बात म | मानो ॥ २ ॥ देसो, पे वा मुद्धिमान् वाहिरस-गोत्रके पर पष्ठमुफत्पाद का मुमन्ति फर्मणि ॥ ३ ॥ इस समय एक बहुत बड़ा या कर रहे हैं। परन्तु मरे शिान् पुन ! ये प्रत्येक के दिम अपने स्त्वि शंसय सके। पंचदये महास्मनः । फर्ममें भून कर वटते हैं ॥ ३ ॥ तुम उन महामाभोंक पाप्त बाकर उने योगसम्बन्धी दो सूफ पतम दो, व स्वपन्वा धन सत्रपरिमपितमात्मन ॥४॥ सब ने मर्ग मान मेंगे, तव कासे बचा हवा अपना सारा धन तुमें दे देंगे । इसलिये वय तुम उहाके पास दास्पन्ति सऽथ सान् गप्छ तयास कवयान् पपा। घरे गाजा ।' उसने अपने पिताके बाहानुसार वैसा ही किया | उम मागिरमगोत्री ग्रामों ने भी पलका बना वस्मंदया यह स्वगत सत्रपरिशपितम् ॥ ५॥ हुमा धन उसे दे रिया और ये म्यगमें घसे गये ।। ५॥ , मये । २ गम्। , १५ अ०४] नवम स्कन्व -- सं कधित्स्वीकरिष्यन्त पुरुप कप्पदर्शन । सब नामाग उस पनका लेन लगा, तब उचर दिशा- से एक काले रंगका पुरुष माया । उसने कहा -एस यामिमें जो कुछ बचा हुभा है, पर सब पन उपायोपरतोऽम्पेत्य ममेदं वास्तुकं वसु ॥६॥ मे है ॥ ६ ॥ ममेदमृपिभिर्दचमिति सईि म माना । नामागने कहा-प्रवियोंने यह धन मुह दिया है, इसध्येि मे है।' इसपर उस पुरुषने कहा -हमारे स्वामी से पितरि प्रश्न पृष्टवान् पितर तपा ।। ७11 विवादके विषयमें तुम्हारे पितासे ही प्रश्न किया नाय ।' तम नामागने नाफर पितासे फ्छा || ७ || पिताने कहा- यमपास्तुगर्व सर्वमुच्छिष्टम्पय फचित् । 'एक वार दक्षप्रजापतिके या ऋषिलोग यह निमय कर चुके कि याभूमिमें जो कुछ बब रहता है, घकृर्विमाग रुद्राय म देव मर्षति ॥ ८॥ सब सददेवका हिस्सा है। इसलिये का घन तो महादेवनीको ही मिलना चाहिये |॥ ८ ॥ नामागने नाभागस्त प्रणम्पार सवेश फिल वास्तुरम् । भाफर उन काले रगके पुरुष सदभगवान्को प्रणाम किया और कहा कि 'प्रभो ! फहमिकी समी वस्तुएँ आपकी है, इस्पार मे पिता प्रमध्लिरसा त्यो प्रसादये ॥९॥ मेरे पिताने ऐसा ही कहा है । भगवन् ! मुझसे अपराध यत् वे पिसावद धम त्व घ मत्प प्रभापसे । इला, में सिर झुकाकर वापसे क्षमा माँगता हूँ ॥९॥ तब मगवान् रुदने कहा-'तुमारे पित्यने धर्मके मना दवामि ते मन्त्रशे पान प्रम सनावनम् ॥१०॥ निर्णय दिया है और तुमने भी मुझसे सस्य ही कहा है! तुम वेदोका अर्थ तो पहलसे ही जानते हो । अब गहाण द्रविण दचं मम्सने परिक्षेपितम् । में हममें सनातन प्रमतत्तका बन देता हूँ॥ १० ॥ को यहमें बचा ए मेरा गो वंशय घन मी में इस्युक्त्यान्तर्हितो रुद्रा भगवान् सत्पवत्सलः ॥११॥ | तमें ही दे रहा है। तुम इसे स्वीकार कर ।। इतना शार सत्यप्रेमी भावान मक्तर्मन से गये ॥१९॥ य एत् संमरेत् प्रातः साय च मुममाहितः । जो मनुष्य प्रात धौर सापकाठ एकाग्रचिचसे इस वाल्यानका स्मरण करता है, पर प्रतिमाशाली एवं वेदा कनिर्मवति मन्त्रनो गति चैप तथाऽऽस्मनः॥१२॥ सा होता ही है, साथ ही अपने खरूपको भी जान लेना नाभागादमरीपाऽमन्महाभागवत कती । है।॥ १२ ॥ नामागके पुत्रए गम्भीर | वे भगवान्के यो प्रेमी एवं उतार धर्मारमा पे । यो अनशाप कमी कही रोका नहीं मा सका, कर भी नारीपका स्पर्श नास प्रमशापोऽपि यन प्रतिहत फचित् ॥१३॥ न कर सका ॥ १७ ॥ रागोवा राजा परीसित्मे पण मगवन् ! मैं परमानी रामर्षि अपीपका चरित्र मुनना चाहता हूँ । ग्रामगन भगरम्पोतुमिच्छामि रामस्तस्स धीमत । कोषित होकर उनं एसा दण दिया, मो किसी प्रकार टाला नहीं जा सकता, परस्तु मह भी उनका कुछ न न प्राभूत् यत्र निर्मुक्ता प्रमदप्पा दुरत्ययः ॥१४॥ विगार सका ॥ १५ ॥ २ माई। ।

श्रीमहागवत [अ०४ भीमुक उपाष भीशुमदेवजीमे कहा-परीक्षित् ! अमरीष बड़े अम्बरीपो महाभागा सप्तमीपषी महीम् । माम्यवान् थे । पृथ्वीफे सातों दीप, अचल सम्पति और बतुलनीय ऐर्य उनको प्रत पा । यधपि ये सब अम्पांच प्रिय लन्या विभवं चातुल मुवि ॥१५॥ साधारण मनुष्यों के लिये अत्यन्त दुर्छम पस्तुर है, फिर मेनेऽतिदुर्लम पुमो सौ सत् स्वप्नसंस्तुतम् । भी वे इन्हें स्वप्नतम्य समझते थे।पोंकि वे जानते थे कि मिस धन-मरके स्पेनमें पपकर मनुस्य पोर मरकमें विद्वान् विभवनिर्शतमा विशति यत्पुमान्॥१६॥ बाताह केश्ठ चार दिनकी चाँदनी है। उसका घासुदेवे भगवति तदक्तेषु च साधुए। दीपक तो मुभा मुलाया है॥१५१६॥ मगलान् श्रीकृष्णमें और उनके प्रमी सापुओंमें उनका फ्रम प्रेम पा । उस प्राप्तो भाष पर विश्वयेनेद लोटवन स्मृतम् ॥१७॥ प्रेमके प्राप्त हो मानेपर तो यह साय शिव और इसकी सबै मनः कृष्णपदारविन्दयो समस सम्पत्तियों मिपीके दलेके समान जान पाती पचासि पैकुण्ठगुणानुवर्णने । है॥१७॥ उन्होंने अपने मनको श्रीकृष्णचन्द्र के चरणा- फरी हरेमन्दिरमार्जनादिपु | रविन्द मुगलमें, पाणीफो भगवडणानुवर्णनमें, हार्यों को भीहरि मन्दिरके मार्बन-सेवनमें और अपने कानोंको भगवान् श्वति परान्पुतसत्कयोदये ॥१८॥ वयुतकीमङ्गलम्पीकपाके प्रवर्णमें प्रणा रक्सा पा॥१८॥ सान्दलिङ्गारपदर्शने यो उन्होंने अपने नेत्र मुकुन्दति एवं मन्दिरोंके दर्शोंमें समृत्यगावस्सर्वेभसङ्गमम् । था-सा भाकरोंके शरीर-स्पर्शमें, मासिका उनके चरणकोपर पड़ी धीमती तुम्सीके दिम्प गन्ध और प्राण १ वस्पाइसरोजसौरमे रसना (मिहा ) को भगवान्के प्रति अम्ति मैवेष श्रीमत्तुसस्सा रसना तदर्पिते ॥१९॥। प्रसादमें संसम्म फर दिया पा॥ १९ ॥ बम्परीपके पादो हर क्षेत्रपदानुसर्प (पैर भगवान्के क्षेत्र मादिकी पैदल यात्रा करनेमें ही लगे रहते बोर व सिरसे मगषान् श्रीकृष्णके चरणकमकी शिरो सीपचपदाभिवन्दने । क्दना किया करते । राजा धमरीषने माम, चन्दन कामं च दास्ये न तु कामझाम्पमा आदि मोह सामग्रीको मगमानकी सेवामें समर्पित कर यथासमश्लामजनाममा रति ॥२०॥ दिया पा। मोगनेकी [असे महीं, बम्कि इसलिये कि एवं सदा कर्मकलापमान्मना | इससे यह भाटोम प्राप्त हो, ओ पत्रिकीर्ति भगवान्फे निम-बमि की निग्रस करता है ।। २० । इस प्रकार परऽधियाई भगवस्पधोक्षजे । उनोंने अपने सार कर्म पापुरुष, इन्द्रियातीत मायान्के सबत्मभाचे विदामहीमिमा प्रति उन्हें सर्वारम्प एवं सर्वस्वरूप समसकर समर्पित कर वधिविप्राभिहित सशस ह ॥२१॥ दिये थे और मगध प्रमोकी मात्रा के अनुसार जिऽधमघरधिपनमीश्वर इम पृषीका शारुम करते थे ॥२१॥न्होंने 'चन्दा मामके निर्मल देशम साखती नदीम प्रबाहके महाशिमृत्पारचितादक्षिणैः। सामने सिम मसिन, गौतम पारि भिम-मिग्न बापायों तसर्पमिष्ठामितीवमादिमि द्वारा प्रान् ऐभर्यके कारण सापतिपूण नया यदी-बड़ी पन्यन्यभिम्रातममी सरम्पतीम्।।२२।। | दक्षिणायल भनेको अयमेव यह करक यवाधिपनि १ पयानुग । पो ।। मि. सम्पमिसामनी मर ।

नवम स्कन्ध १७ पस्स ऋतुप गीण सदस्या ऋत्विोमना । भगवान्की आराधना की थी ॥ २२ ॥ उनके यज्ञोंमें देवमायोके साथ जब सदस्य और भूचिब बैठ नाते थे, तुस्परूपापानिमिषा व्यस्य त सुवाससः ॥२३॥ तब उनकी पलकें नहीं पाती थी और ये अपने सुन्दर क्स वोर बसे ही रूपके कारण देवताओं के समान स्वर्गो न प्रार्थिता यस्स मनुजैरमरप्रियः । दिसायी परते थे ॥ २३ ॥ उनकी प्रजा महात्माओंके द्वारा गाये हुए भगवान्के उत्तम चरित्रोंका किसी समय मृगशिरूपगायद्भिरुतमश्लोकचेष्टितम् ॥२४॥ बड़े प्रेमसे भ्रमण करती और किसी समय उनका गान करती । इस प्रकार उनक राम्यके मनुष्य देवताओंके समईयन्ति तान् कामाः स्वारान्यपरिमाविता । भत्यन्त प्यारे स्वर्गकी मी इच्छा नहीं करते ॥ २५ ॥ वे अपने दयमें अनन्त प्रमका दान करनेवाले श्रीहरि दुर्लभा नापि सिद्धानां महन्द रदि पश्यतः ॥२५॥ का नित्य-निरन्तर दर्शन करते रहते थे। इसलिये उन मेगोको वह मोग-सामग्री मी हर्षित नहीं कर पाती पी, स इस्पं भक्तियोगेन पोयुकेन पार्थिवः । यो मड़े-बरे सिदोंको भी दुर्छम है। ये वस्तुएँ उनके भारमानन्दके सामने अस्पन्त तुष्ठ जोर तिरस्कृत स्वधर्मेण हरि प्रीणन् सङ्गान् सर्वाग्छनैहो ॥२६॥ | पा ॥ २५ ॥ रामा मम्बरीप इस प्रकार क्पत्यासे युक्त महियोग धौर प्रनापालनरूप सधर्मफे द्वारा मगवान्को गृहेषु दारेषु सुतेषु पन्धुप प्रसम करने लगे और धीरे-धीरे उन्होंने सब प्रकारकी वासक्तियोंका परित्याग कर दिया ॥ २६ ॥ घर, सी, दिपोचमसन्दनवाजिपत्तिषु । पुत्र, माई-बन्धु, बोबर हाथी, रप, घोड़ एवं पैदलोंकी घसुरक्षिणी सेना, वझय रन, बाभूपण बौर आयुध अधपपरमाभरणापुधादि भादि समस्त पस्तुषों सपा की समाप्त न होनेवाले कोशोंके सम्बन्धमै उनका ऐसा प निधय पा कि ये प्वनन्तकोशेषकरोदसन्मतिम्॥२७॥ सब के सम असत्य है ॥ २७ ॥ टनकी अनन्य प्रेममयी मकिसे प्रसन्न होकर भगवान्ने उनकी रक्षाके निय वसा अदापरिचर्चा प्रस्पनीकभयावहम् । सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर दिया पा, बो दिरोपियोंको मपमीत करनेवाला एवं भगवनकोंकी रक्षा करनेवाला एकान्तमतिमापेन प्रीतो मृस्माभिरक्षणम् ॥२८॥ बारिरापयिषुः कष्ण महिन्या तुस्पनीलया । रामा अबरीषको फही मी उन्हींके सम्पन धर्मशील, संसारसे विरक्त एम मजिपरापण थी। एक बार उन्होंने युक्त सांवत्सरं वीरो दधार द्वादशीम्रतम् ॥२९॥ अपनी पत्नीके साथ भगवान् श्रीकृष्णकी बाराधना करने के लिये एक मर्मतकारशीप्रधान एकाशी प्रत करने का भवान्ते कासिके मासि त्रिरात्रं सम्पोक्ति । नियम प्रहण किया ॥ २९ ॥ मनकी समाप्ति होनपर कार्तिक महीनेमें उन्होंने तीन रातका उपवास किया सात फराषित् कालिन्यां हरिं मधुवनेऽर्धपत्॥३०॥ और एक दिन यमुनाभीमें स्नान करफ मधुवनमें भगवान् १ मेशिता । २ पानाम् ।। मिलन । ४ भूतामि 1 पुर्विम् । मा है २ - भीमद्भागवत [4.४ महाभिपेक्रविधिना सर्वोपस्करसम्पठा। श्रीकृष्णकी श्मा की ॥ ३०॥ उन्होंने महाभिषेककी विषिसे सब प्रकारकी सामग्री और सम्पचिताय भगवान् का अभिषेक किया और वयसे सनाप होकर पस, अभिपियाम्पराकल्पैर्गन्धमारपाईपादिमि ॥३॥ आभूषण, पन्दम, मात्र एव मर्य भादिके द्वारा उनकी पूना की । यपपि महाभाम्पवान् प्रमोंको इस नाकी सद्वान्तरभावेन पूजयामास कशवम् । कर्स शवश्यकता नहीं थी, स्वयं ही उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी पाये सिर पे स्थापि राचा मामांपमहाभागान् सिद्धार्धानपि भक्तिवः॥३२।। अम्बरीषने महिमावसे उनका पूजन किया । तत्पपात पहले नामों को सादिष्ट और मत्यन्त गुणकारी भोजन गोरुक्मविपाणीनोरूप्पाघ्रोणां वाससाम्। कराकर उन गोंके घर साठ कोष गौएँ मुसत्रित करके मेन दी । उन गौवोंके साँग प्रवर्णसे और सुर पयापीलवयोरूपवत्सोपस्करसम्पदाम् ॥३॥ चाँदीसे मद हुए थे। मुन्दर-सुन्दर बस उन्हें भोका दिये गये पे | वे गौएँ भनी सुशील, छोटी बरसाकी, प्राहिणोत साधु मिप्रम्यो गृहेषु न्यर्पदानि पट् । देसनेमें मुन्दर, बछवाली और खूब दूध देनेवामी पी। उनके साप हानेकी उपयुक्त सामी मी ठनोंने मेजवा भोमपिन्या विजानन स्वाइन्न गुणवचमम् ॥३४॥दी पी ।। ३१-३९ ॥ मब प्रामणोंको सब कुछ मिळ पुका, तब सनाने उन भागोंसे मारा कर प्रतका लन्धकामैरनुपात पारगायोपचक्रमे। पारण करनेकी तैयारी की। उसी समय शाप और तस्प वर्मतिथि साक्षात् दुर्वासा भगवानभूत् ॥३५॥ परवान देनेमें समर्प सप दुर्वासाजी भी उनके पहा पतिपिक रूपमें पधारे ॥ ३५॥ समानर्धातिथि भूपः प्रस्पुत्थानासनाई । राना बम्परीप उन्हें देखते ही उठकर सोहो गमे, बासन देकर बैठाया और विविध साममियोंसे बसिपिके ययाऽम्पवहाराम पादमूलमुपागतः ॥३६॥ रूपमें पाये हर दुर्वासानीकी पूमा की। उनके पर- में प्रणाम करके बम्परीने मोनमके लिये प्रार्थना प्रतिनन्य स या कर्तुमावश्यकं गत । की ॥ २६ ॥ दुर्गासामीने बम्वरीपकी प्रापना स्वीकार कर ली और इसक पाद मागत्पक फसि नित होनेके निममम पदध्यायन् फालिन्दीससिल सुमे॥३७॥ लिये ये मदीत पर चले गये। वे मनका ध्यान करते ए यमुनाके पवित्र नछमें स्नान करने लगे ॥ २७ ॥ मुहर्ताधावशिष्टापा बादश्यां पारण प्रति । घर हादशी केवल पडीमर शेष रह गयी थी। धर्मझ अम्बरीपने धर्म साइटमें परकर मौके साप परामर्श पिन्वपामामु धर्ममा दिजस्तदर्मसस्टे ॥३८॥ किया ॥ १८॥ उन्होंने कहा-मामणदेवतायो ! प्रामणको बिना भोजन पराये सय मासेमा भार मानणातिकम दापा तादयो यदपारण । पदशी इसे पारण म परना-दोनों ही दोर है इसमिय इस समय जैसा करनेसे मी मनोर यत् स्यामा म भूपादधर्मोपान मारपशन्।।३९॥ मुझ पाप मलो, ऐसा काम करना चाहिये ॥ ३९ ॥ पम्प ।२ गुरु पम्मधु । ३ तास I४ नमै ।५. एथे।

अ०४] नवम स्कन्ध । अम्भसा केवलेनाप करिष्ये प्रतपारणम् । तब ग्रामोंके साप विचार करके उनाने कहा- प्रामणो । श्रुतियोंमें ऐसा कहा गया है कि जल पी प्रारम्भक्षण विप्रा मशित नाशिव व सत् ॥४०॥ लेना मोचन करना मी है, महाँ मी करना है । इसलिये इस सम्प केवल नलसे पारण किये लेना ॥१०॥ इस्पप प्राश्य राबपिपिन्सयन् मनसायुतम् । ऐसा निधय करके मन-ही-मन मगवान्का चिन्तन करते हुए समर्षि अम्बरीपने मल पी लिया और परीक्षित् ! प्रत्यचष्ट कुरुभेष्ठ हिजागमनमेव स ॥४१॥ ये केवल दुईसानीके आनेकी बाट देसन लगे ॥११॥ दुर्वासामी बावश्यक फोसे नित होकर यमुनातटसे | लौट माये । बव राजाने बागे वदकर उनका अभिनन्दन दुर्वासा यमनाक्लात् कतावश्यफ आगत । किया तब उन्होंने अनुमानसे ही समझ लिया कि रक्षाभिनन्दितस्तस्य पुपुषे घेटितं पिया ॥४२॥ रागाने पारण कर लिया है ॥ १२ ॥ उस समय | दुर्वासाची महत भूले थे। इसलिये यह जानकर कि मन्पुना प्रचलनात्रो प्रकटीकरिलानन । रागाने पारण कर लिया है, ये क्रोषसे पर-पर कॉपने छगे। मौके पर मानेसे उनका मह विकट हो गया। मुमक्षितम सुतरी तालिममापत ॥४३॥ उोंने हाप चोपकर दे अम्परीपसे गैरकर कहा ॥१३॥ 'भो! देखो तो सही, यह कितना फर है। यह घनफे अहो अस्य नशंसस्प नियोन्मवस्य पश्यत । | मदमें मतवाला हो या है। मगवान्की भक्ति तो इसे छतक नहीं गयी और यह अपनेको यहा समर्थ मानता धर्मम्पतिक्रम विष्णोरमक्तस्पेशेमानिन ॥१४॥ है । धान इसने धमका उठान करके का न्याय किया है ॥१०॥ में इसका अतिपि होकर बापा यो मामतिथिमायातमातिथ्येन निमन्ध्य च । है। इसने अतिपिसरकार करने के लिये मुस निमन्त्रण मी दिया है, किन्तु फिर भी मुझे मिलाये बिना ही स्थ अदया सतवांस्तस्प सपस्ते दर्शये फलम् ॥४५॥ छिपा है । जय देख, तसे अभी इसका फल घम्साला क्॥१५॥ यों करते-करते वे कोषसे नल उठे। उन्होंने अपनी एक ना उद्यमी और उससे अम्मी- एवं वाण उक्तत्प अटो रोपविदीपित । को मार सस्नेके लिये एक हत्या उत्पन की। प्रमयकायकी भागके समान दहक रही पी ॥ १६ ॥ तैया सनिर्ममे तस्मै हत्या कालानलोपमाम् ॥४६॥ वा मागके समान मत्स्ती हुई, हायमें तलवार सेवर राना भारीपर टूट पड़ी। उस समप उसके पैरोंकी सामापतन्ती नदीमसिहस्ता पदा सबम् । भमफसे प्रपी कोप सी पी। परन्तु यमा बम्बीर देश- कर ठमसे तनिक भी विचलित नहीं हुए। मे वेपपन्ती समीक्ष्य न घचाल पदान्नृप ॥४७॥ मी नहीं हटे, म्यों के त्यों सो रहे ।। १७ ॥ परम्पुरुष परमात्माने अपने सेवकमी रक्षाके लिये पहलसे दी प्राग्दिर्ष मृत्परथायां पुरुपेण महात्मना । मुदर्शनचक्रको नियुफ पर रम्मा पा । जैसे भाग प्रोषसे १ मिया मवस्य । २ स्पेश्मानिनः ।।पमा ४ ममि । एक पग भीमनागवत ૨૨ [.५ पनीर्वन्ति मां भक्त्या सत्सिर सत्पति यय॥६६॥ पन्धनसे बाघ रहनेवाले समद साधु मक्तिके द्वारा मुझे अपने पशमें कर लेते हैं ॥ १६ ॥ मेरे मनन्पप्रेमी मत्सेपया प्रतीत पसालोक्पादिचतुष्टयम् । मत सेवासे ही अपनेको परिस्म-कृतस्य मानवे है। | मेरी सेवाके फलसरूप जम उमें सम्प-सारूप्य वादि मेप्सन्ति सेवयापूर्ण स्वोऽन्यत् कालविद्वतम्।६७।। मुकिया प्रश्न होती हैं, सम वे ठम्हें मी सीकार करना नहीं पाहते, किन समयके फेरसे नष्ट हो मानेवारी यस्तोंकी ते साधनो दयं मी सानो हदय त्वम् । चात हीस्या है॥ ६७|| दुर्वासानी ! मैं आपसे और क्या को, मेरे प्रमी मत सो मेरेदप भौर उन प्रेमी मकोका मान्यत् ते न जानन्ति नाई तेम्पो मनागपि ॥६॥ दस सय में हूँ। मेरे नतिरिक्त और कुछ नही मानते तत्र में उनके अनिरिक और कु मी नही उपाय स्थपियामि तव वित्र भूगुप्य तत् । मानता ॥ ६८ ॥ दुर्वासाजी ! मनिमे, में लापको एक उपाय बताता है। निसका बनिष्ठ करनेसे भापको इस अम प्रात्माभिचारस्ते यतस्तं पातु वै भवान् । विपरिमें पड़ना पाहै, बाप उसीके पास भाइये । निरपराध साभुक बनिष्ठकी श्रेष्ठसे घनिष्ट करनेवाले साघुए प्रहितं तेज प्रति॒ इस्तेऽचिवम् ।।६९॥ काही अमल होता है ॥ ६९ ।। इसमें सन्देह नही कि मास के लिये तपस्या और मिषा परम म्याणके वपो विधा च विप्राणां निापसफरे उमे) साधम । परन्तु यदि प्रामण ठरण और अन्यायी चे वे एम दुर्विनीवस्य फरपेते सुरन्यया ॥७०॥ आय, तो ये ही दोनों सम्य फम देने टगते है ||७०॥ दुर्वासाजी 1 वापका कल्याण हो । भाप मामानन्दन प्रमस्ता गन्छ भत्र ते नामागतनप नृपम् । परम माम्पशास्ी राजा भम्परीक पास बाइये और उनसे धमापय महाभाग सव शान्तिमरिम्पति । ७१॥ क्षमा मागिये । तब आपको शान्ति मिलेगी ॥ १ ॥ - इति श्रीमदागवत महापुराणे पारमहंस्या सरितायो नमस्कफे- वरीपरित चतुणेऽप्याप ॥ १ ॥ अथ पञ्चमोऽध्याय दुर्षामाजी पुतनिधि मोशुक उपाय श्रीशुकदेषजी इ ईपीक्षित चिप मान्ने | इस प्रकार वाला दी, तब सदशम पक्रकी मालासे व भगपचाऽऽदिष्ट दुनामामातापित । सते र दुर्गासा छौटकर रामा धापरीपके पास आये और उन्होंने सम्पन्त दुखी होकर राबाके पैर पका अम्मरीपमपाश्त्य सत्पादा दलिताऽप्रोत् ॥१॥लिये ॥ १॥ दुर्गासानीकी यह पेय दसार वीर सस्प मोगमन पोल्य पारम्परिलजित । उनके चरण पकानेसे मति रोकर राग वमरीर मगअन्के पश्की स्तुति परमे लगे। उस समय उनका अन्नावात बदररस रुपया पीरितोमाम् ॥ २॥ य दयाश अत्यन्त पीडित हो रहा था ॥ २॥ १ माम् । २ सपन । ३ पनि ।

अ०५] - सम्परोप उगाच मस्वरीपने पहा प्रभो सुदशन ! बाप अमिनारूप है। आप ही परम समय सूर्य है। समस्त नक्षत्रमार- स्वममिर्मगवान् सूर्यस्त्वं सोमोज्योतिषां पति । के अधिपति चन्द्रमा भी आपके स्वरूप है। जल, पृथ्वी, त्वमापस्त्व लिवियोम वायुर्मात्रन्द्रियाणि च ॥३॥ भाकाश, वायु, पञ्चतन्मात्रा और सम्पूर्ण इन्द्रियों के रूप मी भाप ही है ।। ३ ।। मावान्के प्यारे, इबार दाँतपाले सुदर्शन नमस्तुम्प सहस्रारान्युतप्रिय । चक्रदेव ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। समस्त अस शों को नष्ट कर देनेवाल एवं पृथ्वीके रक्षक ! माप इन सर्यासपातिन् विप्राय स्वस्ति भूया इरसते ॥४॥ प्रामणकी रक्षा कीजिये ||१|| माप ही धर्म है, मधुर धर्मम्तमृत सत्य त्व यसोऽखिलयमसम् । पर्व सस्य वाणी है, आप ही समस्त योंके अधिपति और स्वयं या भी हैं। भाप समस्त छोक रक्षक एम लोकपाल' सर्वास्मा व वैज पौरस परम्॥५॥ सर्वलोकवरूप भी है । आप परमपुरुष परमात्म्पके श्रेष्ठ नमः सुनामाखिलधर्मसतरे तेग है ॥ ५॥ मुनाम ! माप समस्त पोंकी मर्यादाके रक्षक हैं। अधर्मका आचरण करनवाले भमरोंको भस्म अधर्मशीलासुर धूमकेवषे करनके लिये आप साक्षात् अग्नि हैं। बाप ही तीनों प्रैलोक्पगोपाय विशदपर्चसे सोकोंके रक्षा एवं विशुर तेजोमय हैं। बापकी गति मनके बेगक सम्पन है और आपके कर्म अद्भुत है। मनोज्यायालुतकर्मणे गणे ॥६॥ म वापको ममस्कार करता , आपकी स्तुति करता स्वचेजसा धर्ममयेन संद है।॥ ६ ॥ दवाणीके अभीपर ! भापफे धममय सेबसे अन्यकारका नाश होता वर सूर्य बादि महापुरुषों के वम प्रकाराय तो महात्मनाम् । प्रकाशकी रक्षा होती है। भापकी महिमाका पार पाना दुरत्पपस्ते महिमा गिर्य पदे वस्यन्त कठिन है। उचे नीचे और छोटे-योमे भेद-मावसे पुक या समस्त कार्यकारणरमक संसार भापकर ही स्वपमेतत् सदसत् परावरम् ।।७॥ ॥ ७॥ मुदशन चक! भापर कोई विजय यदा विसृष्टस्त्पमनानेन नहीं प्राप्त कर सकता । जिस समय निरनन मगवान् मलं प्रविष्टोऽजित देस्पदानवम् । आपको घटाते है भीर माप देस्य एवं दानवोंकी सेनामें प्रवेश करते हैं उस समय युभूमिमें उनकी मुभा, बाहदरोवहिशिरोभराणि दर, मघा, परण और गरदन मादि निरन्तर काटते प्रष्णनजर्स प्रधने पिरानसे ॥८॥ ए भाप बापत मापमान ऐते हैं। ॥विधक रक्षक! बाप रणभूमिमें सबका प्रहार सा सेते है, स से जगवाण सलपाणये बापका कोई कुछ महाँ बिगार सफ्ता । गदापारी निरूपित सर्वसहो गदामृता। मायान्न दुणेक माशके छिपे ही भापको नियुक्त किया विप्रस चासत्कुलदेवोस है। भाप पा करके हमारे कुपके माम्पादयरे लिये विघहि भद्रं तदनुग्रहो हि नः ॥९॥ दुर्गासानीका कल्याण कीजिये । हमारे अपर यह भापका महान् अनुमा होगा ॥९॥ पदि मैंने कुछ मी दान पपति चमिष्ट मा स्वधर्मो मा स्वनुष्ठितः। किया हो, या पिया हो अपश अपने धमका पालन

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- २१ अ०४] नवम स्कन्ध और समय मानेपर फिर ठनका पता भी नहीं चलता, जिनमें भवन्ति झाले न भवन्ति हीशा हमारे-जैसे हजारों चकर काटते रहते हैं---उन प्रमुक सहस्रशो या पय म्रमाम ॥५६॥ सम्बन्धमें हम कुछ मी करनेकी सामर्थ्य नहीं एक्से ॥५६॥ आं मनरकुमारष नारदो भगवानज । में, सनत्कुमार, नारद, भगवान् बझा, कपिलदेव, फपिलोऽपान्तरसमो देवलो धर्म आसुरि ॥५७॥ मपान्तरतम, देश्ल, धर्म, मामुरि तमा मरीधि आदि दूसरे सर्वन सिझेपर--ये हम समी भगवान्की मापाको मरीषिप्रमुखाधान्ये सिदेशा पारदर्शना । नही जान सकसे कि म उसी मम्पाके घेरेमें विदाम न घय सर्वे यन्मायां माययाऽऽाता ॥५८॥ है ।। ५७-५८ ॥ पर चक उन विश्वेश्वरका शम है तस्प विश्वेश्वरस्येद शान दुर्विपहं हिन । यह हमलोगों के लिये भसम है। तुम नहीं की शरणमें समेव शरण याहि हरिस्ते श विधास्पति ॥५९॥ नाओ । मे भगवान् ही तुम्हारा महल करेंगे ॥ ५९ ।। वहाँसे मी निराश होफर दुर्गासा भगमान्के परमवाम ततो निराशो दुर्वासा पदं भगवतो पयो । | मैकुण्ठमें गये । लक्ष्मीपति मावान् लक्ष्मीके साप पही हाट्यम्प यदष्पास्ते श्रीनिवासः भिया सह॥६०॥ निवास करते है ॥ ६० ॥ दुर्वासानी भगवान्के सदममानोऽजियशसवहिना चक्रको भागसे नम रहे थे। वे काँपते हुए भगवान के उत्पादमूले पतिस सवेपषु । घरों में गिर पड़े। उन्होंने कहा-'हे क्युत आहे आहाच्युतानन्त सदीप्सित प्रभो अनन्त ! आप संतोंके एकमात्र मान्छनीय है। प्रमो। कृतागर्म माव हि विधभावन ॥६॥ विश्वके नीवनदाता ! में मपराधी हूँ । माप मेरी रक्षा अबानता ते परमानुभावं कीमिये ॥ ११॥ वाफ्का परम प्रभाव म जाननेके कतं मयाप भवत प्रियाणाम् । कारण ही मने बापक प्यारे मळफा अपराध किया है। प्रभो ! बाप मुझ ठससे बचाइये । आपके तो मामका विधेहि तस्यापचिति विधात ही वचारण करनेसे मारकी जीव भी मुक हो जाता र्मुच्येत यमाम्न्युदिते नारकोऽपि १६२॥ ॥ ६२ ॥ भीभगवानुमान भीभगवान्ने कहा-दुर्वासामी I में सर्यया भक्तों मा भक्तपराधीनो भस्वतन्त्र र द्विज । के मधीन हूँ। मुनमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है मरे सीधे-सादे सरस मोंने मरे दपको अपने हापमें साधुभिग्रस्तरदया भक्तैर्मक्तजनप्रिय ॥६॥ कर रहा है। मकन मुझसे प्यार करते हैं और में । मनसे ॥६३॥ प्रान् ! अपने मोंका एफम्पत्र वाश्रय नाहमारमानमाशासे मदतै साधुभिविना । में ही है। इसलिये अपने साघुलमा भोंको छोपकर में म तो अपने भापको चाहता हूँ और न अपनी भामिनी श्रिय पात्पन्तिकी प्रमन् येपो गतिरई परा॥६४॥ विनाशरहित सश्मीको ॥ ६१ ॥ गो भक्त श्री, पुत्र, गृह, गुरुनन, प्राण, मन, हलोक भार परलोक- ये टारागारपुत्रामान प्राणान विनमिम परम् । समका होकर कमर मी दारण भा गये है,टा हिवामा शरम याता कथ तांस्त्पश्तुमरसहे ॥६५॥ से सती ती अपने पातिप्रापसे सदापारी पविको पशमें छोरनेका सकल्प भी म कसे कर सफ्ता हूँ॥६५॥ मयि निर्वत्या साधव समर्मनाः। | सर सती है, वैसे ही मरे साप अपने हापको प्रेम , मामय विध। २ शिन । । .

૨૨ श्रीमागवत [म०५ पशीर्वन्ति मा भक्त्यासन्मिय सत्पति यमा॥६६॥ बन्धनसे बाँध रखनेवाले समदर्शी साधु मक्तिके द्वारा मुझे अपने काम कर लेते हैं ।। ६६ ॥ मेरे मनन्यप्रेमी मत्सेवया प्रतीत घ सालोफ्यादिपतुष्टयम्। मक सेघसे ही क्पनेको परिपूर्णकलाप मानते है। मेरी माके फलस्वरूप सब ठने सम्लोम्प-सामप्य मादि नेच्छन्ति सेपया पूर्णाः योऽन्यत् कालविद्वतम्।६७१] मुक्तियाँ प्राप्त हाती हैं, तब वे उन्हें भी सीकर फरमा नहीं पाहते, फिर सम्पके फेरसे नष्ट हो जानेवामे वस्तमोकी ले साभवो हदय मर्म सानो एदर्य वहम् । बात हीश्या है।। ६७॥ दुर्थसानी ! मैं आपसे और स्पा , मेरे प्रेमी मच तो मेरे यार और टन प्रेमी मौका मदन्यत् से न जानन्ति नाई तेम्पो मनागपि ॥६॥ दय मर्म में है। वे मेरे अतिरिक्त बोर कुछ नहीं मानते तप में उनके अतिरिक वीर कुछ भी नहीं उपाय फयपियामि तव विप्र भूषण तत् । मानता ॥ ६८ ॥ दुर्वासानी ! मुनिये, म पापको एक उपाय बताता हूँ। बिसका बनिष्ट करनेसे आपको इस अब मात्माभिचारप्ते यवस्त पातु भवान् । रिपरि पाना पड़ा है, थाप उसीके पास बाइये। निरपराध सावोंके बनिएकी चेयसे धनिष्ठ करनेवाले साधुपु प्रहित तेज प्रतः कुरुतेऽशिषम् ॥६९॥ काही माल होता है ॥ ६९ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि ग्रामों के लिये तपस्या और मिषा परम कम्पपणके हपो विधा प विप्राणां निःमेयमकरे उमे। साधन है। परन्तु यदि बामण उदम मोर पन्यासी हो से पर दुनिीतस्य कल्पते कसुरन्पया १७०॥ नाय, तो ये ही दोनों उल्टय फम देने लगते हैं ॥७०॥ दुर्वासानी ! बापका कल्याण हो। बाप नाममनन्दन नमस्ता गच्छ भद्र ते नाभागवनय नृपम् । परम मापशाली राजा वी पास गाइये और उनसे धमापय महामार्ग धत शान्तिर्मविप्पति । ७॥ । क्षमा मागिये । तब पापको श्यन्ति मिरगी ।। ७१ ॥ इति श्रीमदागपते महापुराणे पारमईस्या संहिसायो नमस्कन्धे अमरीचरिते चतुर्थोऽप्याप ॥१॥ अथ पञ्चमोऽध्याय दुर्षासासीकी दुलनिधि मोमुरु उपाय भीशुध्येवजी कहते हैं--परीक्षित ! जब मगधन्मे इस प्रकार माझा दी, तब सुदर्शन चक्रकी मामसे एय भगववाऽऽदिया दुर्वासापरवापिस । जमते हुए दुर्वासा मेटकर राना मगरीषके पास बाये पौर उन्होंने अपन्त दुसरी दोकर राजाके पैर पका अम्परीपमुपास्य सत्पादौ लियोऽग्रहीत् ॥ १॥ लिये ॥ १॥ दुर्वासामीकी यह पेय देसार और तस्प सोपमन पीय पादसविसमित ! दमो परण पानेसे मसि शेकर रामा अमीर माधानके पक्रकी पतुति करने लगे। उस समय उनका अनापीत बदररख रुपया पीरितोमृशम् ॥२॥प दयाश जयन्त पारित हो रहा पा ॥ २ ॥ १ पाम् । १ मगमनं ३ धन मि.।

म०५] नवम स्कन्ध २३ - ३। अम्बरीप उपाय मम्बरीपने कहा--प्रमो मुदशन ! आप अमिस्वरूप है। आप ही परम समय सूर्य हैं। समस्त नक्षत्रमाल- सममिर्मगवान सूर्यस्त्वं सोमोज्योतिपा पति । के अधिपति चन्द्रमा भी आपके खरूप है। नल, पृषी, त्वमापस्त्वं वितियोम वायप्रिन्द्रियाणि च ॥३॥ माफाश, वायु, पस्तन्मात्रा और सम्पूर्ण इन्दियोंके रूपमें भी छाप ही है ॥ ३॥ भगवान्के प्यारे, हजार दाँतपाले सुदर्शन नमस्तुम्म सहस्राराच्युतप्रिय । चक्रदेव ! मैं पापको नमस्कार करता हूँ। समस्त मम शों को नष्ट कर देनेवाले एवं पृथ्वीके रक्षक! भाप इम सनिषाविन् विप्राय स्वस्ति भूया इरस्पते ।। मामणकी रक्षा कीजिये ॥ ॥ आप ही धर्म है, मधुर स्पं धर्मम्त्वमृसं सत्य त्व यज्ञोऽस्विलयनमुक् । एवं सस्प पाणी है, वाप ही समस्त यहों के अधिपति और मयं या भी हैं। भाप समस्त लोकोंके रक्षक एप त्वं लोकपाल सस्मिा व तेज पौयं परम्॥५॥ सर्वश्रेकखरूप भी हैं । आप परमपुरुष परमात्म्पके श्रेष्ठ नम सुनाभाखिलधर्मसेवधे तेमौ ॥५॥ सुनाम ! माप समस्त धोकी मर्यादाके रक्षक है । अधर्मका बावरण करनेवाले मसुरोको मस्म पधर्मशीलासुर धूमकेत करनेके लिये आप साक्षात् अग्नि हैं। बाप ही तीनों प्रैलोक्यगोपाप विवषर्षसे सोकि रक्षा एवं विशुद्ध तेजोमय है । बापकी गति मनके वेगके सम्पन है और पापके कर्म मनोज्यायालुतफर्मणे गृण ।।६॥ | में वापको ममस्कार करता हूँ, आपकी स्तुति करता स्वचेक्सा धर्ममयेन संह हूँ॥ ६ ॥ वेदवाणीके अधीघर मापके धमाय तेनसे अधकारका नाश होता है और सूर्य आदि महापुरुषों के सम प्रकाशम पृतो महात्मनाम् । प्रकाशकी रक्षा होती है। भापकी महिमाका पार पाना दुरत्पयस्से महिमा गिरी पर वस्फन्त कठिन है। ऊँचे-नीचे और छोटे-मोके भेद-मापसे पुक या समस्त कार्यकारणात्मक संसार भाफ्का ही स्वपमेतत् सदसत् परावरम् ॥७॥ है॥७॥ मुदमान चक्र ! भापपर कोई विजय यदा विष्टस्स्वमनजनेन नहीं प्राप्त कर सकता । जिस समय निरमन मगमान् पलं प्रविष्टोऽजित देस्पदानपम् । माफ्को चलते हैं और माप देस्य एवं दामोंकी सेनामें प्रवेश करते है उस समय युवभूमिमें उनकी मुबा, पाहदरोवहिनिरोपराणि | उदर, जंघा, परल और गरदन बादि निरन्तर काटवे मममनर्स प्रधने पिराचसे ॥८॥ हुए भाप अस्पत्त शोमायमान होते हैं ।। - ॥ विपके रमक ! बाप रणमूमिमें सबका प्रहार सर सेते है, स से बगत्याण खलप्रहाणये बापका कोई कुछ महा वियर सकता । गदापारी निरूपित भगवान्न गुणेक माशके लिये ही नापको निपुक किया विप्रस्स चासत्तलदेषहेतवे है। माप कृपा करके हमारे पुमके माम्योदयके लिये विघहि भई तदनुग्रहो हि नः ॥९॥ दुर्गासानीका कल्याण कीजिये । हमारे उपर यह भापका महान् भनुम्ह होगा ॥ ९॥ पदि मैंने भी पपस्ति दवमिष्ट पा स्वधर्मो पा स्मनुष्ठितः। किया हो, यह किसा ही अपवा अपने षम का पालन १ सो। सर्वसहो गदामृता । दान २४ भीमासारत [अ०५ कलं नो विप्र घेद दिजो भवतु पिन्वर ॥१०॥ किया हो, यदि हमारे पशके अंग नामको ही अपना भाराष्पदेव समाते रहे हों, तो दुर्थसाजीकी नलन मिट पति नो मगवान् प्रीत एका सर्वगुणाभमः । जाय ॥ १० ॥ भावान् समन गुणों के एकमात्र माप है। यदि मन समस्त प्राणियोंक मारमाके रूपमें सर्वमतात्मभावेन दिजो भवतु विन्वर ॥११॥ उन्हें दसा हो धौर पे मुमपर प्रसन हो तो दुर्वासायी- के दयकी सारी जलन मिट जाय ॥ ११॥ धानुक उपाय मौतुकलयमा महत है-जब राजा बम्बरीपने इति संस्सुषतो राम्रो विष्णुष सुदर्शनम् । दुवासामीको सब बोरसे जलानेवाले मगवानके मुदर्शन चमकी इस प्रकार स्तुति की, तब उनकी प्रापनासे या अधाम्पत् सर्वतो विप्र प्रहहए राजपाच्यया ॥१२॥ शान्त हो गया ॥ १२ ॥ मन दुर्वासा पकाकी बागसे समुतोऽखामितापेन दुर्वासा स्वस्तिमस्तितः । मुक हो गये और उनका विध म्बस हो गया, तब ये राना मम्बरीयको जनकानेक उत्तम बाशीवाद देते हुए प्रशास तीश गुञ्जान परमासिपः ॥१३॥ ठमकी प्रशंसा करने पगे ॥ १३ ॥ दुर्यास्त उपाय वर्षासाशीने कहा-पन्य है! बाब मैने मावान्के प्रमी मकोका महल देसा । राजन् ! मैने माफ्का अपराध जो अनन्तदासाना महल टमप मे। किया, फिर भी आप मेरे लिम माल कामना ही कर रहे फतागसोऽपि पद राजन् मङ्गलानि समीइसे॥१४॥ ॥१॥ जिन्होंने मकरसठ मावान् श्रीहरिक परणकमको व प्रेममावसे पकर लिया है- दुष्करःको नु सापूर्ना दुस्स्पयोषा महात्मनाम् । साधुपुरुषोंके लिये कौन-सा कार्य कठिन है। चिनका में संग्रहीयो भगवान् सातवामूपमा हरि ॥१५॥ एप उदार है, मे महारमा मन्म, किस पस्तुका परित्याग नाही कर सकते ॥ १५ ॥ मिनके मङ्गलमय नामक यभामभुतिमात्रय पुमान् भवति निर्मठः । घाणमाप्रसे नीच निर्मल हो माता है उन्दी वीपाद सस्स शीर्थपठः किंवा दासानामबलिप्यते ॥१६॥ मगवान्के चरणकमलों जो दास हैं, उनके लिये कौन- सापर्तव्य शेय र बाला।। १६ । बाराब राजमनुगृहीतोऽहं त्वयातिफरुगास्मन् । सम्मान ! भापफा लय फरणामावसे परिपूर्ण है। माघ प्रातः कस्वा प्राधा य मेऽभिरक्षिता ॥१७॥ मेरे अपराधको मुनाकर मेरे प्राणों की रक्षा की है ॥१७॥ जापने मरे उपर महान् मनुयह किस्म । हो, मापने रावा समरुवाहर प्रत्यागमनकापमा । परीक्षित ! जबसे दुर्मासानी भागे थे, तरसे तक रामा सम्पयन मोनन नहीं किया था। उनके लौटने परमामुपसंगम की बार देस ए थे। म उनहोंने दुर्वासाचीक घरण प्रसाप समभाजयत् ॥२८॥ पका सिये और उन्हें प्रसम फरक विश्विक भोजन कराया ॥ १८॥ पजा अम्बरीय बर बादरसे भविपिके साऽशित्वाऽऽतमानीतमातिथ्यं सालम्पमिकम् । योम्प सब प्रकारको मानन-सामग्री ले लाये । दुर्वासानी मोगन करके तुम गये। जब उन्होंने वादरसे वसम्मा नुपति प्राह मन्पतामिति साररम् ॥१०॥ करा-- -राजन् ! अव वाप मी भोगन कीजिये ॥१॥ १ सि] -तम य०५] नवम स्कन्ध २५ प्रीतोऽस्म्पनुगृहीतोऽसि तव भागवतस्प वै । अम्बरीप ! भाप मग्नान्के परम प्रमी भए हैं। मापके दर्शन, स्पर्श वातचीव और मनको मामान्फी मोर प्रस दर्शनस्पर्शनालापैरातिष्पनारममेधसा ॥२०॥ करनेशले मातिथ्यसे में अत्यन्त प्रसम और अनुगृहीस कौवटासमेतत् ते गायन्ति स्वासियो मूहु । हम ॥२०॥ स्वर्गकी देयागनाएँ बार-बार आपके इस उगम्मल चरित्रका गाम करेंगी। यह पृथ्षी भी आपकी कीर्ति परमपुम्यां च फीतयिप्यति भूरियम् ॥२१॥ परम पुण्यमयी कतिका संकीर्तन करती रहेगी |॥ २१ ॥ मीशुरु उपाय श्रीशुकदेवजी कहते हैं-दुर्वासानीने बहुत ही प्प संकीर्त्य राजानं दुर्वामा परितोपित । सम्तुष्ट होकर राना अमरीके गुणों की प्रशंसा की और उसके बाद उनसे अनुमति कर भाकाशमागसे उस ययौ विहायसाऽऽमन्य प्रलोकमहेतुकम् ॥२२॥ ब्रह्मलोककी यात्रा की, जो केवल निष्काम कर्मसे ही प्राप्त सवस्सराऽत्यगात् सावन मावता नागतोगत । होता है ॥ २२॥ परीमित् ! चव सुदर्शन चक्रसे मनिम्तदर्शनाफाते राजाऽम्मयो पमृच ह ।।२३।। मयभीत होकर दुर्वासानी मगे थे, तबसे लेकर उनके प्टोग्नेतक एक वर्षका समय बीत गया । इतने दिनोंतक गते च दुर्वाससि मोम्वरीपो राना अमरीर उनके दशनकी जाकाहासे केवर जम दिजोपयोगीतिपवित्रमारत । पीकर ही रहे ।। २३॥ जव दुर्वासाजी पले गये, तब पेविमोक्षं व्यसनं च पुच्चा उनके मोमनसे बचे हुए अस्पत पवित्र भाका उन्होंने मोदन किया । अपने कारण दुर्वासानीका दु समें पाना मेने स्वनीर्य च परानुभाषम् ॥२४॥ और फिर अपनी ही प्रापनासे उनका छूमा-इन दोनों एवंविधानेकगुण स राजा वार्ताको उन्होंने अपमेशारा होनेपर भी भगवान्की परात्मनि प्रमणि वासुदेखे । ही महिमा सम्बा ॥ २१ ॥ रामा अम्परीपमें एसे-ऐसे भनेकों गुण थे। अपने समस्त को शय वे परनाम क्रियाकलाप समबाह भक्ति । परमात्मा श्रीभगवानुमें भक्तिभाकी अमिादि करते यते ययाऽऽविरिऽध्यान् निरोपकार ॥२५।। पे। उम मजिके प्रमावसे उमोंने ममनातक समस्त अथाम्रीपस्तनयेपु मोगोंका नरकक समान समझा ॥२५॥ सदनन्तर राजा अमरीपने अपने ही समान भक्त पुोपर राज्यका भार समानशीलेषु पिसज्म धीरे । छोर दिया और वप र वनमें चले गये । वहा के वकी वर्न विषेशात्मनि वासुदेव धीरताक साप बामसरूप मगमानमें अपना मन स्टगाकर मनो दमा ध्वस्तगुणप्रयाः ॥२६॥ गुणों के प्रवाइप संसारसे मुफ हो गये ॥ २६ ॥ परीक्षिस् ! महाराज अम्बरीषका यह परम पवित्र भाम्यान इत्पसन् पुग्यमारम्पानमम्बरीपस्स भूपते । है। जो इसका सहीर्तन और स्मरण करता है, वह संकीर्वयाननुपायन् भक्तो भगवसो भवेत् ॥२७|| । मगवामय भक्त हो जाता है ॥२७ ॥ इति श्रीमद्भागवते म्हापुराणे पारम्हस्यां संहितायां नश्मस्फरपमरीपरित माम पथमोऽध्याय ॥५॥ ++- १ अति वा परमो पुमा त ।२ गोऽय ।। गाभिरपि ।४ महानुपात्रम् 1 ५ पौरा। परिते ।

२६ भीमसागवत । अथ पष्ठोऽध्याय पाकुफे पराव वणन मान्धाता मोर सौभरि अषिकी कथा थीभुक उवाच भीशुकवेयजी कहते है-परीक्षित् । अम्बरपके तीन पुत्र ये—निरूप, केतुमान् और पाम् । विरूपसे विरूप केतुमालम्पुरम्परीपसुसासय । पृपदर और उसका पुत्र रपीतर दुसा ॥१॥ रथीतर पिरूपाद पृपदयोऽभूत् तत्पुत्रस्तु रपीकर ॥१॥ मसानहीन था। वंशपरम्पराकी रक्षाके लिये उसने अनिय ऋषिमे प्रापमा की, उनहोंन उसकी पत्नी से प्रासेज रसीवरम्माप्रजस्म भार्यायां तन्तयेऽथित । | से सम्पन्न कई पुत्र उत्पम दिये ॥२॥ यपपि ये सब रपीरकी मासे उत्पन्न हुए थे, इसलिये इनका गोत्र अनिस अनपामास प्रमवम्विन सुतान् ॥ २॥बही होना चाहिये व मो स्पीतरका था, फिर भी वे बाहिरस ही कालाये। ये ही रपीत्तर पशिपोंके प्रभ एते क्षेत्रे प्रस्ताव पुनस्स्वाङ्गिरसाः स्मृता । (कुममें सर्वश्रेष्ठ पुरुष ) कहलाये । क्योंकि ये क्षत्रोफेत मामण ये--क्षत्रिय और मामण दोनों गोत्रोंसे इनका रभीवराणां प्रवरा धनोपेता दिखातपा ॥३॥ सम्बन्ध पा ॥३॥ धुवतस्तु मनोर्जो इस्लाइर्माणतः सुत । परीक्षित् । एक बार मनुनीके कनेपर उनकी मासिकासे इस्मा नामका पुत्र उपम राया । इक्याफुत्के सस्स पुरशवन्येष्ठा विधिनिमिदणका ॥४॥ सौ पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े तीन थे— विकुक्षि, निमि और दण्फ ॥ १ ॥ पीक्षित् ! उनसे भेटे पचीस पुत्र तेपा पुरम्नादभवमार्यावर्से नूपा नृप । मार्यावर्तके पूर्वभागके मोर पचीस पश्चिममागके तपा उपर्युक्त तीन मप्पमागके भविपत्ति हुए । शेष सतास्मस पञ्चविंशति पयाप प्रयो मम्मे परेऽन्पत ॥५॥ दक्षिण बादि जय प्रान्तों के अधिपति हुए ॥ ५ ॥ एक | बार राजा इस्माकुने भाका-भादफे समप अपने बड़े स एकदाफाभार स्याफः मुखमादित् । पुत्रको बाझा दी-विकुसे ! शीघ्र ही माकर आरके योग्य पवित्र परमोंका मांस मो' ॥६॥ वीर मांसमानीमा मभ्यं विधगम माविरम् ॥ ६॥ विकुक्षिने पाहत बम' कहकर पनकी यात्रा की। यहाँ उसने नाइके योम्प बहुत से पोंका शिकार किया। तपेति सपन गस्पा मगान् हत्या क्रियाईलान् । र पक सो गया ही पा, भू मीण मापी पी समिये यह बात मूम गया कि भारके लिये मारे हुए पशुको भान्ता पुरुधिताबीर पर्श पाददपस्मृति ॥७॥ सर्प म खना चाहिये । उसने एक भगोश व लिया ॥ ७॥ विभिने बघा दुध मांस कर निवेदयामास पित्र वेन च सद्गुरुः । अपने पिताको दिया । इस्वाकुने जब अपने गुस्से उसे प्रोग करनेके लिये कहा, सब गुस्मी- मादितः प्रासगाया दुष्टमेवदफर्मकम् ।। ८॥ न मत्ाया कि यह मांस तो दूषित एवं मादके भयोम्य १ पम् ।२ प्रयदत् ।

*०६] नयम स्कन्य । जास्वा पुत्रस्य तत् कर्म गुरुणाभिहितं चप' । है ॥ ८ ॥ परीक्षित् ! गुरुजीफे कहनेर रामा इक्वाकु को अफ्न पुत्रकी करवतका पता चल गया । उनोन देशाभिःसारयामास सुर्व स्पतषिषि सा ।। ९॥ शासीय विधिका उल्सहन करनेवाले पुत्रको क्रोधवश अपने देशसे निकाल दिया ॥ ० ॥ सदनम्सर राना स तु विप्रेण संवाद जापकेन समाचरन् । इस्माकुने अपने गुरुदेव वसिष्ठसे बानविषय चर्चा की। फिर योग के द्वारा शरीरका परिस्पाग करके उन्होंने परम त्यक्त्वा फलेबर योगी म सेनाषाप यत् परम् ॥१०॥ पद प्राप्त किया ॥ १०॥ पिताका देहान्त हो मानेर पितयुपरसेऽम्पेत्य विकृषिः पृथिवीमिमाम् । विकुक्षि अपनी रानधानीमें लौट आया और इस पृथ्वीय शासन करने छाप । ठसने महे-यो योंसे मगवान्की पासदीजे हरि पदै भन्माद इति विभुतः ॥११॥ माराधना की, और संसार, शश्वदके नामसे प्रसिर हमा ॥ ११॥ विकुक्षिके पुत्रका नाम था पुरचय । पुरजयस्तस्स सुत इन्द्रवाह इतीरिव । उसीको फोई 'इन्द्रवाइ' और कोई 'ककुरस्म' करते है। मिन कर्मकि कारण उसके ये नाम पड़ थे, उन्हें फकुत्म्प इति चोप्युक्तः भृणु नामानि फर्ममि ॥१२॥ सनो ॥ १२ ॥ रुवान्त मासीत् समरो देवानां सादानवैः । सस्पयुगके अन्तमें देवताओं का दानों के साप घोर संप्रम पुला पा। उसमें सबके सब देवता देयोंसे हार पाणिग्राहो तो वीरो देव स्पपराजितैः ॥१३॥ गये । तब उन्होंने वीर पुरमयको सहायताके लिये अपना मिश्र बनाया ॥ १३ ॥ पुरमयने कहा कि पदि देवान वपनाद् देवदेवस्य विष्णोनियात्मन प्रभोः । इम्र मेरे पाहन गर्ने, तो में युद्ध कर सकता हूँ। पहमे तो इन्द्रने अस्वीकार कर दिया, परन्तु दक्षता पाहनत्ये इतस्तस्य पभूपन्द्रो महापः ॥१४॥ आराध्यदेव सर्वशक्तिमान् विचारमा भगवान्की बात मानकर पीछे ये एक बड़े भारी मैल बन गये ॥१५॥ सौम्तर्यामी ममनद्धोधनुर्दिष्पमालय विशिम्बाम्छितान् । मगवान् पिणुने भपनी शक्तिसे पुरप्रपको भर दिया । उन्होंने कसप पनकर Pम्य धनुप और तीखे बाण स्तूयमान समोरूम युयुत्सु फादि म्पित ॥१५॥ ग्रहण किये । इसके बाद पपर पाकर ये उसके पद (गैल ) के पास मैर गये । जब इस प्रकार ये युरके तेइमाऽऽप्याक्तिो विष्णो पुरुषस्य परस्मन । लिये तत्पर गए, तब देवता उनकी स्तुति करने लगे। देवताओंको साप लेकर उनोन पश्चिमकी ओरसे रेस्पया प्रतीयां दिशि दस्पानान्परुण विदर्शापुरम्॥१६॥ मार घेर लिया ॥ १५१६ ॥ बीर पुरजपका दैत्योंकि सैम्तस्स चामल प्रधन तुमुल लामहर्पणम् । साप बस्यन्त रोमाञ्चकारी घोर संग्राम एवा । युद्धमें मो-जो देस्य उमके सामने भाये, पुरप्रयमे बारे द्वारा यमाप भरलॅरनयन दैत्पान् येऽभिपयुर्मधे ॥१७॥ उन्हें यमराजके हजारले कर दिया ।। १७ ।। उनक बाणों की क्या थी, प्रठयकामकी धधकसी नागपीना तस्पेपुपादाभिमुम्ब युगान्तामिमिवारणम् । मी उसके सामने बाता, छिम-मिम हो जाता । पोपट १ प्रातः । २ म गाव । ३ भस्ममात् ।

२८ [अ०६ भीमद्भागवत पिसज्य दुव्दैत्या हन्यमानाः स्वमालयम् ॥१८॥ साहस नाता था। वे रणभूमि छोड़कर अपने अपने घमि घुस गये ॥ १८ ॥ पुरछपने उनका नगर, धन जिस्वा पुरं धनं सर्व सभीक पमपाणये । और ऐमर्य—सब कुछ नीतकर इन्द्रको दे दिया । इसीसे ठम रानर्षिको पुर जीतने के कारण 'पुरमय', इन्द्रको प्रत्ययच्छत् स राजपिरिति नाममिराहतः ॥१९॥ | पाहन यमानेके कारण 'इन्द्रवाइ' और पैसके कमर पर फैरनेके कारण फरस्प' कहा जाता है ॥ १० ॥ पुरसपस्य पुत्रोऽम्दनेनास्तत्सत पृथुः । पुरनपका पुत्र पा अनेना । उसका पुत्र पृथु पुआ । पूयुके विश्वन्धि उसके चन्द्र गौर चन्द्र के युक्नाम ॥२०॥ विचरन्धिस्ततमन्द्रो युषनाश्चम वत्सुप्त ॥२०॥ युननायक पुत्र हुए शामस्त, जिन्होंने शामस्तीपुरी यसायी। शापम्तस्तत्सुसो येन पावस्ती निर्ममे पुरी । शाबसके वृहदन और उसके कुवल्यान र ॥२१॥ ये बड़े बली थे । इन्होंने उस ऋषिको प्रसन्न करनेके पृहदश्वस्तु शावस्तिस्ततः वलयाचकः ॥२१॥ लिये अपने इकीस हमार पुगेको साप लेकर घुन्सु या प्रियार्थमुतबस्स घुन्युनामासुर बली । नामक दैस्फका वध किया ॥ २२॥ इसीसे उनका नाम हुमा 'धुन्धुमार | पुन्धु दैस्पके मुख्यी मागसे उनके सुतानामकविनत्या सदरहन पृतः ॥२२॥ सब पुत्र मल गये । फेवल सीन ही कच रहे थे ।२३। धुन्धुमारराति सम्पातस्तरसुवास्ते च जन्यछ । | पीक्षित् । बचे हुए पुत्रोंके नाम पे--दाभ, कफिमय और भवाय । पावसे हर्यश्च वऔर उससे निकुम्भका धुन्धार्मुलामिना सर्वे प्रय एषावशेषिताः ॥२३॥ जन्म हुमा ॥ २१ ॥ निकुम्मके पहणाव, उसके कशाम, प्रायः फपिसाधम भद्राय इसि मारत । पशापके सेननित् वौर सेननित्क युवनाथ नामक पुत्र हा। युवनाप सन्तानहीन पा, इसलिये वह मदत रायपुत्रो इर्यधो निकुम्भस्तत्सुत स्मृस ॥२४॥ दुसी होकर अपनी सौ मियोंके साप घनमें चला पडणाधोनिकुम्भस कसौधाऽधास्स सेनम्मित् । गया । वहाँ अपियोंन बड़ी मा करके युवनापसे पुन प्रासिफ लिये वही एकामताफे साप इन्द्रदेवताका का युवनाथाऽभवत् तस्य साऽनपत्या पन गतः ॥२५॥ | पराया ॥ २५ २६ ॥ एक Pन राना युनासफो रात्रि- भार्यानतेन निर्षिष्ण अपयोऽस्य पालय । के समय पकी प्यास स्मी । बह पहशारगमें गपा, किन्तु पहा देया कि अपिलोग सो सो रहे हैं। तब जा ष्टिं मम पर्वपाश्चमुरंन्त्री से मुसमाहिताः ॥२६॥ किनेका वीर कोई उपाय न देस उमने वह मन्त्रसे रामा त यमदन प्रपिटा निशि सर्पित । अभिमन्त्रित मम दी पी उिया || २७॥ पीशित् । नय नामयानान पिप्रास्तान पपामन्यनल म्ययम्॥२७॥ प्रात काम अविष्ोग सोकर उठ और उन्होंने देखा कि करशमें तो जल ही नहीं है, तब उन लोगोंन पूसा कि उस्थिताम्त निशम्पायपदकं फलम प्रभा । यह किसका काम है। पुत्र उत्पम करनेवाय जर पप्रन्ट कम्प फर्मेदं पातं घूमबन अलम् ॥२८॥ किसने पी पिया ॥ ॥ २८ ॥ अन्तमें जब उन्हें यह माश्म दया कि भगवानकी प्ररणासे राजा युवनापने ही गन्ना पीतं विदित्वाध परमदितेन । उम उसको पी लिया है तो उन शेगोन मसालान्म । २ गा| ३ प्रभास | २९ २०६] नवम स्कम ईपाय नमधनुरहो देवपलं पलम् ॥२९॥ | चरयिं नमस्कार किया और कहा- भगवान्का वर ही वास्तबमें बल ।॥ २० ॥ इसके सतः काल उपाधत्तं इक्षि निर्भिद्य दक्षिणम् । यार प्रसस्पर समय भानपर युफ्नामकी माहिनी कोम्ब युवनाश्यस्य सनपथकवी बेजान ह ॥३०॥ | फालकर ठमके एक चक्रवर्मा पुत्र उत्म्म हुआ ॥३०॥ उसे रोते देम्बु पियनि कहा~या पालक दूषके लिये कंधास्पति समारोऽम स्तन्य रोरूयते भृशम् । बहुत रो रहा है, का किसका दूध पियेगा !' तब मांधाता वत्स मा रोटीरितीन्द्रो देशिनीमात्।।३१।। इन्नने काा, 'मेय पियेगा ( मां धाता ), धैग ! व रो मनयह करकर ने अपनी तजनी अंगुली उसके न ममार पिठा तस्स विप्रदेवप्रसादस । मुहमें गल दी॥ २१॥ वाक्षण और देवताओं के प्रसार से युवनाश्योऽथ तव तपसा सिद्धिमन्यगात् ॥३२॥ उस गायबरे पिता युवनायकी मी मृग्यु नहीं हुई। बइ मही तपस्या करके मुक्त हो गया ।। १२ ।। परीक्षित ! प्रसदस्युरितीन्द्रोऽन विदघे नाम तम्प ये । इम्मन उस मामका नाम रममा प्रसदस्य, क्योंकि यत्रण था दस्यु (रे) उससे उनिम्न मपभीत यते पमा प्रसन्ति मुद्रिमा दम्पदो रावणारयः ॥३३॥ ये ॥ ३३ ॥ युवनायक पुत्र मान्धाता ( प्रसरस्य) यौवनायोऽय मान्धाता पम्वपिनी प्रमः। | चक्रवर्ती राना दुए । भगवान्फे तेरसे तेमसी होकर उन्होंने भले ही मातों दीपवाटी पृथ्वीका शासन सप्तद्वीपषतीमेक शामाच्युसतेजसा ॥३४॥ किया ॥ ३४ ॥ थे यपरि आममानी , गनें कम- करणकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं पी- फिर भी जि प प प्रतुभिरात्मविद् भूरिदक्षिणः । उन्होंने पीसी दक्षिणावाले पोंसे उन यसमा धर्मदेवमय एष सर्वात्मकमतीद्रियम् ॥३५|| प्रमुकी भाराधना की नो मर्पप्रकाश, सर्वदेवसम्प, सर्वारमा एवं इन्द्रियातीत है ॥ ३५॥ भगवान्फ अतिरिक दृष्य मन्त्रो विधिर्यमो सममानस्तपस्विन । और ही क्या ? यही मामग्री, मय, विधि-विधान, याम, यजमान, भूमिम, धर्म, देश बोर कार---यह भर्मा देशम काठम सर्वमेतद् यतात्मकम् ॥३६॥ सत्र-का-सब भगवान्का ही रूप हो है ॥ ३६ ॥ भाषद सूर्य उदेवि स यापन प्रतितिष्ठति । परीक्षित् ! नहाँसे सूर्य उदय होना और जोय मस्त हासे है, वह सरा-या-माय भूमग युफ्नाथ पुत्र मव तद पौवनावस्स मान्धातुः घेत्रमुच्यते ॥३७॥ माम्बानाक ही अधिकारमें पा || ३७ ॥ अमरिन्लाईहितरि बिन्दुमस्पामधान्नृप । राना मग्यापकी पी शशविन्दकी पुश्री मिन्दुमती भी। ठमक गमसे उनक तीन पुत्र ए---पुरुएस, पुरुममम्परीपं मुचुकुन्दं च योगिनम् । नम्बरीर ( ये दूसरे अम्बरीप हैं) और योगी मुनु । इनकी पनास यहने पी। उन पयामोंने बस मौमति तेपम्बिसारः पाप्छन् मौभरि पबिरपतिम् ॥३८॥ रिका पनिष पन वरण किया ॥ १८ ॥ परम यमुनान्तर्बल ममम्मप्पमान परतप 1 तपस्वी सामरिनी एक बार यमुनाजर की स्ट्रगान सपस्या कर रहे थे | उनान शिव निति मीनगमस्य वीक्ष्य मयुनधर्मिण ॥३९॥ गम अग्नी पनियोंक साप बारी हो रहा है।३० १ पापा । र, पस । ३ मम्मत् । - भीमद्भागवत - जातपाहो नृपं विनः फन्पामेकामपाचत । उसके इस मुसको देखकर मामण सौमरिक मनमें में विवाह करनेकी इछा जग उठी और वनोंने राम मान्यताके पास जाकर उनकी पचास कपामिसे एक मोऽप्यार रामाप्रपन् काम कन्या स्वपपरे ॥४०॥ पम्पा मांगी । रागामे कहा--प्रमन् । कम्प्य सपक्से पापको पुन ले, तो नाप उसे ले लीचिये ॥२०॥ से विचिन्त्याप्रिय स्त्रीणां जरठोऽयमसंमतः । सौमरि अति रामा मान्धाताकर अमिप्राय समझ गमे उन्होंने सोचा कि रामाने इस लिये मुझे ऐसा सूख्य माप वलीपलित पबत्क इत्यई प्रत्युदाहतः ॥४१॥ दिया है कि वर्ष में बड़ा हो गया हूँ, शरीरमें हरियों पर गम्पी है, बास पक गये है और सिर कॉपने भगा है। षय कोई भी मुमसे प्रम नहीं कर सकती ॥ ११ ॥ साधपिये तथाऽऽत्मान सुरस्त्रीणामपीप्सिसम् । पछी बात है । मैं अपनेको ऐमा सुन्दर बनाऊँगा कि रानकापार तो स्पा, देशगनाएँ भी मेरे लिये यमपित किं पुनर्मनुजन्द्राणामिति व्यवसितः प्रमः ॥४२॥ मागी ।' ऐसा सोचकर समय सीमरिमीने वैस ही किया ॥ १२ ॥ मुनिः प्रवेशिका पत्रा कन्यान्तापुरमदिमत् । फिर क्या पा, अन्त पुरके रक्षक्ते सौमर मुनिको काम्यायोंके सफे समाये महसमें पहुंचा दिया । फिर ते परभ राजकन्माभिरेक पञ्चाशता परः ॥४३॥ उम पचासो राजक्योंने एक सौभरिको ही वफ्ना पति पुम मिया ॥ १३ ॥ उम फस्याओंका मन सामा कलिरभू भूयास्ततर्थेऽपोल सौहदम् । सौमरिनीमें इस प्रकार पासक हो गया कि वे उनके ममानुरूपो नायं व इति तद्गतचेतसाम् ॥४॥ लिये भापसके प्रममाक्को तिम्मानछि देकर परस्पर फास्त्र मलने सगी और एक-दूमीसे कहने लगा कि ये सम्हारे गाचस्ताभिरपारणीय पोम्प महा, मेरे योम्प है ॥ ११॥ भग्वेदी सीमरिने उम सभीका पाणिग्रहण कर लिया । वे अपनी पार सप थियानग्रंपरिन्छ देर तपस्याके प्रभारसे वाहुम्म्य सामग्रियोंसे पुसभित,वनेत गृहे नानापपनामलाम्भ: उयानों और निर्मल अस्से परिपूर्ण सरोवरोंसे पुक्त एवं सरस सोगभिकाननपु ॥५५॥ सौगन्धिक पुयोंके बगीचोंसे घिरे महमें में बहुम्स्प शप्या, आमन, बस, बाभूपण, मान, अनुलेपन, सुम्हादु भोप्रन महामायामनवसभ्षण वौर पुपमात्मभोंके हारा अपनी पतियों के साप विहार स्मानानुलेपाम्पवदारमात्पर्क करने लगे। समार-मुन्दर बाभूपण धारण किये सी पुस सब ठमकी सेवा मगे इसे । कहाँ पक्षी म्यततधीपुरुपए निस्पदा पाक्ने रहते, ता कही मारे गुनार करते रहते । मोर कही-कही नीमन उमपी रिदारीकन मसान परते रमऽनुमादिबावन्दिषु ॥४६॥ एत || १५१६ ॥ सप्तडीपानी पृथ्वीक सामो पगाईभ्यं तु मंसीप सप्तमीपयतीपति । म्ममता सामरिनीकी इस गासीका सुम दम्पर स अ०६] नवम स्कन्ध ३१ विमित स्तम्भममहात् सार्वभौमश्रियान्वितम् ।४७। आश्चर्यचकित हो गये । उनका यह गई कि, मैं साई- मौम सम्परिका सामी हूँ, जाता रहा ॥ १७ ॥ इस प्रकार सौमरिनी गावीक मुखमें रम गये और अपनी एव गृहप्पभिरता विषयान् विवि सुम्पै । नीग इन्द्रियोंसे अनेकों विषयोंका सेवन करते हे। फिर भी नैसे धीकी दोसे आग सृप्त नहीं होती, वैसे सेवमानो न चातुप्यताज्यस्तोरिधानल ॥४८॥ | ही उनें सन्तोष महीं हुआ ॥ १८ ॥ अग्वेदाचार्य सौमरिनी एक दिन स्वस्थ चित्तसे स कदाचिदुपासीन आत्मापहवमास्मनः । (बैठे हुए थे । उम समय उनाने देख कि रस्पराब ददर्श पहचाचार्यो मीनससमुस्थितम् ॥४९॥ क्षणम्रके राङ्गसे में किस प्रकार अपनी तपस्या सपा अपना भापास्क खो बैठा ॥ १९ ॥ सोचने लगे अहो इमं पश्यत में विनाश 'भरे, मैं तो मा तपस्सी था । मैन मलीमोति अपने तपस्विन सपरितम्रतस्य । तोका अनुणन भी किया था। मेरा या भव पतन तो देखो । मने दीर्घकानसे अपने प्रमतेजको अक्षुण्ण रस्म अन्तर्जले वारिचरप्रसाद पा, परन्तु जलके भीतर विहार करती गई एक मछलीने प्रच्यावितं प्रम मिर धृत यत् ॥५०॥ समर्गसे मेरा यह ब्रह्मतेन नए हो गया ॥ ५० ॥ अत जिसे मोशकी इज है, उस पुरुषको चाहिये कि यह सहस्पजेस मिथुनमसिना मुमा | मोगी प्राणियोंका सा सर्वपा छोड़ दे और एक क्षणके लिये भी अपनी इन्द्रियोंको पहिर्मुख न होने दे। मकेला सर्वात्मनान पिसजे पहिरिन्द्रियाणि । हीर और एकान्तमें अपने पित्तको सर्वशकिमान मगवान्में ही मगा दे । यदि सा करनेकी भावस्यकता एकमरन् रहसि नित्तमनन्त ईश ही हो, तो भगवान्के अनन्य प्रेमी निष्यमान् महारमानोंका युञ्जीत तद्रतिप साधुपु षेत प्रसमा५१॥ी सङ्ग करे ॥ ५१ ।। में पहले एकान्तमें अलादी सपस्यामे संलग्न पा । फिर मटमे मस्तीफा साहोनेसे एफस्तपस्व्यामधाम्भसि मस्स्पसात् विवाह करके पचास हो गया और फिर सम्तानोंके रूप में पाँच हजार । बिस्पोम सत्ययुति होनेसे मायाके पञ्चाशदासमत पञ्चसामसर्गः । गुोंने मेरी मुदिर स्टी। या तो रोक और परलोक्के नान्त प्रभाम्पुभयास्पमनोरपाना सम्मधर्म मेरा मन इतनी सासमाभोंसे भर गया है कि में किसी तरह उमर पार ही नहीं पाता ।। ५२ ॥ मायागुमौसमतिम्पियेऽर्धभार ॥५२।। इस प्रकार विचार करते हुए ये कुछ दिनोंतक तो घरमें ही रहे। रिरिक होकर उन्होंने संन्यास ले लिया एर पसन् गहे कालं पिरतोन्यासमास्थितः। वीर देनमें चले गये। मपने पतिको ही सर्वस पन जगामानुपयुस्वस्पस्न्प पतिदेवता ॥५३॥ माननवासी उनकी पम्भिर्येने भी उनके साथ ही पनकी पात्रा की ॥ ५३ ॥ गौ माकर परम संपमी सत्र तप्स्वा सपस्तीक्ष्णमात्मकर्सनमात्मवान् । सौमरिगीने पही दोर तपस्या की, शरीरको मुख दिया १ सदा । २ मर्म । ३ वीर ।४ मिन् ।

३२ भीमबागपत सहवामिभिररमान पुयोज परमात्मनि ॥५४|| | तप बाहवनीय आदि अग्मियों के साथ ही अपने आपको परम्पामामें छीन कर दिया ।। ५५ ।। पीक्षित । उनी सा स्वपत्यूमहाराज निरीक्ष्याच्यात्मिकींगतिम् । पनियने नब अपने पति सौमर मुनिफी माध्यामिक गति दी, तब जैसे मान्मएँ शान्त भमिमें लीन हो जाती है-वैसे ही उनके प्रभावसे स्ती होकर अन्वीयुस्वत्प्रभावेण ममि शान्तमिवार्षिपः ॥५५॥ उन्हम लीन हो गपी, उन्होंकी गतिको ग्राम ॥५५|| इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या संहिताप नवमस्कन्धे मौमर्यास्याने पष्ठोऽध्याय ॥ ६ ॥ अथ सप्तमोऽध्याय रामा विश भोर हरिमकी क्या श्रीसुर उवाप भीशुक्रवमी कावे-पीक्षित् 1 में वर्णन कर चुका है कि मान्धाताके पुत्रोंमें सबसे षष्ठ गम्भीय थे। मान्धातः पुत्रप्रषगे योऽमरीपः प्रकीर्तितः। उनके दादा युवनापने उन्हें पुररूपमें स्वीकार कर पितामहेन प्राता यौवनामय सत्सुत । किया । उनका पुत्र तुला योपनाए और यौवनामका हारीत । प्रधानावे वंशमें ये तीन मचान्सर गोक हारीतन्तस्य पुत्रोऽम्मान्धावप्रवरा इमे ॥१॥ प्रवर्तक हुए ॥ १ ॥ नाोंने अपनी यहिन मर्मदाका विवाह पुरुषरससे कर दिया था। नागरान अमकि नर्मदा भ्राएमिर्दता पुरुमसाप पोरगः । की भागासे नर्मदा अपने पतिको सातलमें ले क्या रसासले नीतो समगेन्द्रप्रयुक्तया ॥२॥ | गयी ॥ २ ॥ बझै भगवान्की शक्तिसे सम्पम होकर पुरुकुरसने अप मरनेयोग्य गत्ययो मार गए। इसपर गन्धर्चानवधीत तत्र पन्यान् विष्णुशक्ति । नागयरने प्रसम होकर पुरुवस्सको कर दिया कि जो इस प्रसार स्मरण करेग्य, ए साँसे निर्भय हो नागाल्लम्धपर साइभय मरतामिदम् ॥ ३॥ आयगा ॥ ३ ॥ रामा पुरसका पुत्र असदस्य पा । प्रमरस्य पौरुन्सो योऽनरण्यस्य देहरु । उसके पुत्र हुए अनरण्य । अनरण्यके हर्पस, उसके मरण और नमक त्रिवम्धन हुए ॥ १ ॥ निधनके हर्यश्वसत्सवतसादरुणोऽध विन्धनः ॥ ४॥ पुत्र सत्यार हए । यही सत्पात निशङ्करे मामसे विल्पात हुए । यपरि विशा वपन पिता और गुरुके सस सत्यग्रतः पुत्रनिरिवि निवत । शापसे चाणार हो गये थे परन्तु नियामित्रमी प्रमावसे प्राप्तबारा शापाद् गुरो कोशिकतेमसा।। ५ या बार वे नीचेको सिर किये हुए भार पर। से सशरीर ममि बल गये । दमानाने उन्हें महामे सभरीरो गत वर्गमयापि दिशित परम्नु धामित्रणीने पान नपोवासे उहें आकाशम हीस्पिर पर रिया I .. दिति २०७] नवम स्कन्ध २३ शक्यो हरिचन्द्रो विश्वामित्रवसिष्ठयोः । त्रिशके पुत्र थे हरिचन्द्र । उनके लिये विभामिन और वसिष्ठ एक दूसरेको शाप देकर पक्षी हो गये और यमिमित्तमम् पुर्व पक्षिणोर्षहुवार्पिकम् ॥७॥ बहुत पोतफ लाते रहे ॥ ७ ॥ हरिचन्द्र के कोई सम्तान न पी । इससे वे यहुत उदास हा करते थे। सोऽनपत्यो विपणास्मा नारदमोपदेशत । नारदके उपदेशसे वे परम देक्साकी शरणमें गये मौर वरुणं धरण याता पुत्रो मे बापतां प्रभो ॥८॥ उनसे प्राप्ना की कि 'प्रमो ! मुझे पुत्र प्राप्त हो ॥८॥ महारान ! यदि मेरे वीर पुत्र होगा तो मैं सीसे बापका यदि पीरो महाराज तेनैव त्वां यजे इति । यनन फलंगा । करुणने कहा- ठीक है । सब वयेति परपेनाम्प पुत्रो नातस्तु रोहित ॥९॥ कणकी कपासे हरिश्चन्द्र के रोहित नामका पुत्र पुषा ।। पुत्र होते ही पाणने पाकर कहा-हरिश्चन्द्र ! हमें बातः सुतोषनेनारामा यमस्वेति सोऽनधीत् । पुत्र प्राप्त हो गया। पर इसके धरा मेरा यह कये।" हरिश्चन्द्र ने कहा- 'प्रय मापका यह यापच (रोहित) पदा पश्चनिर्देश स्यादप मेभ्यो भवेदिति ॥१०॥ दस दिनसे यक्षिका हो मायगा, तम या योम्य होगा ॥१०॥दस दिन बीतनेपर वरुणने आकर फिर निर्दशेयस आगत्म यमस्वेस्याह सोऽप्रवीत् । कहा-'अब मेरा पा करो । हरिश्चन्द्र ने कहा- 'भब वापके यापनके महमें दाँत निकल जायेंगे, तर दन्ता पशोर्यमायेरमय मेन्यो भवेदिति ॥११॥ या पाके योग्य होगा ॥ ११ ॥ दोत उग बानेपर वरुणने कहा-अब इसके दाँत निकल बाये, मेय या जाता दन्ता यमस्वेति स प्रत्याहाम सोऽप्रवीत् । करो।' हरिचन्द्र ने कहा -'नव इसके दूधके दाँत गिर यदा पतन्त्पस्प वन्सा मय मेभ्यो भवेदिति ॥१२॥ गायेंगे, कब यह पाके योग्य होगा ॥ १२ ॥ दूधके दाँत गिर मानेपर वरुणने कहा-'अब इस पापशुके पष्टोमिपतिताइन्सा यजस्वेत्याहसोऽप्रवीत् । दाँत गिर गये, मेरा पा करो ।' हरिचन्द्र ने कहा- अब इसके दुवारा दाँत मा भायगे, तब यह पशु याके यदा पठो पुनर्दन्ता चायन्तेऽय पनुः कृषिः॥१३॥ योग्य हो नापगा' ॥ १३ ॥ दानाक फिर उग थानेपर | करुणमे कहा-'अब मेरा पा करो। हरमन्द्र ने कहा- पुनर्माता यमस्वेति स प्रत्याहाप सोऽप्रवीत् । परुणमी महारान । क्षत्रिय पद्ध तब यहके योम्प होता सामादिको पदारामनराज पोऽध पशु शुधि१४॥ है, नब पा करच धारण करने लगे। ॥ १५ ॥ परीक्षित ! इस प्रकार राजा हरिश्चन्द्र पुत्रके प्रमसे हीता- इति पुत्रानुरागेण स्नेहयन्त्रितधेतसा । हवामा करके समय टालते रहे । इसका कारण या पा कालं वप्रयता सं तमुको देवस्तमषत ॥१५॥ गोमो समय बताते, करुण देवता उसीकी बाट कि पुत्र-स्नेहकी फाँसीने उनके दपको मका रिपापा। रोहितस्तदभिशाप पितु फर्म चिकीर्पितम् । देखते ॥ १५॥ जब रोहितको इस बातका पता पण कि तिमी तो मेरा बलिराम करना चाहते तब प्राणप्रसुनुप्पाणिररयं प्रस्पपपत ॥१६॥ नपने प्राणों की रक्षाके लिये हार्मे धनुन कर मा ६४ २५- १४ भीमागमत [१०७ पितांबरुणग्रस्त भुत्या बातमहादरम् । पनमें चला गया ॥ १६ ॥ कुछ दिन बाद उसे माछा हुषा कि मणदेवताने रुट होकर मेरे पिताजी रादितो प्राममेयाय नमिन्द्र प्रस्थपभत ॥१७॥ बाक्रमण किया है जिसके कारण वे महोदर रोग पीमित हो रहे है, तब रोहित अपने नगरकी भोर च मूमे। पर्यटनं पुण्य तीर्थक्षेत्रनिपेषणे । पमा । परन्तु इन्द्रने आफर उसे रोक दिया ॥ १७ रोहितायादिशन्छनासोऽप्परण्येऽवसत् समाम्।१८। उन्होंने कहा-'पेटा रोहित ! यापनु बनकर मरन अपेक्षा तो पवित्र तीर्थ और क्षेत्रोंका सेवन करते एवं द्वितीये मृतीये चतुर्थे पञ्चमे तथा । पृथ्वीमें विचरना ही पछा है। इन्द्रकी बात मानक अम्येन्याम्मेत्य स्थपिरोविग्रो मृत्वालापहा॥१९॥ एक पतक पौर पनमें हो रहा ॥ १८ ॥ प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे दौर पाँच वर्ष भी रोहित अपने पिताके पास जानेका विचार किया, परन्तु । पप्ठे संवत्सरं वत्र परित्या रोहित पुरीम् । डामणका बेप धारणकर हर बार इन्द्र पाते और 3 उपप्रशमनीगर्वादक्रीणान्मम्मम सुतम् ॥२०॥ रोक देते ॥ १९॥ इस प्रकार छ पतक रोहित कन ही रहा । सात वर्ष मय वह अपने नगरको स्मैट भुनाशेपं पहुं पित्रे प्रदाय समपन्दन । लगा, तब उसने मनीगतसे उनक माले पुत्र कुन शुपको मोस ले लिया और उसे यापट मनानेके 8 ततः पुरूपमेन हरिमन्द्रो महायशाः ॥२१॥ अपने पिताको सौंपकर उनके परमि नमस्कार किया तब परम मशस्वी एमष्ट चरित्रवाले राजा हरिचन्द्र मुक्कोटरोऽयबदेवान् वरुणादीन् महस्मयः । महोदर रोगसे छूटकर पुरझमेव साय कण ला | देवताका पजन किया । उस या विभामित्रनी हो विभामित्रोऽभषस् तस्मिन् होता चाध्य'रास्मयान्।२२॥ ए । परम संपमी जमदमिने वर्पका काम पिसा चमदमिरम्दु प्रथा बसिष्ठोऽयास्य सामगः । मसिष्ठनी ब्रमा स्ने पौर स्यास्प मुनि सामगान कर वासे उद्गाता बने । उस समय इन्दने प्रसन हरोष तसे तुष्टी उदाविन्द्रः पातझौम्भमर्म रभम् ॥२॥ हरिपन्द्रको एक सोनेका रप दिया पा || २०-२३ परीक्षित् ! भागे चलकर में गुन शेपका माहारा सुनावपस्स माहात्म्पमुपरिटात् प्रयक्षपसे । वर्णन करगा। हरिचनको अपनी परीके साप सत्य सत्पसारा पति दृष्ट्रय सभार्यस्य च म्पतेः ॥२४॥ पतारीफ स्थित देसकर विवामिनी बहुत प्रस हए। उनोंने उन्हें उस बानका उपदेश किपा, निसा विवामित्रो मृश प्रीतो ददावविदवा गतिम् । कमी नाश नहीं होता। उसके अनुसार राजा हरिश्चन्द्र अपने मनको पृषीमें, पृषीका जमे, सस्को तेम मना पूपिम्पा तामस्तेिजसापोऽनिसेन वत् ॥२५॥ तेजको वायुमें वीर वायुको बाकाशमें स्थिर कर खे पाएं धारयस्तच भूतादौ तं महात्मनि । वाकाशको बारमें लीन कर दिया । फिर मार महत्तपमें मीन करके उसमें हाम-साका पान कि तसिम्मानका पात्यासयामान मिनिन्॥२६॥ और उससे पानको मस्म कर दिया ॥ २१-२६ इसके बाद निर्वाम-मुसकी अनुभूतिसे उस पान-कार हिस्सा तो स्वेन भावेन निममुलसंविदा । भी परित्याग कर दिया और समस्त बन्धनोंसे मुक्त होत १ रोवि वरिप ।२ पद।

म.८] नयम स्कन्ध अनिर्देश्याप्रतम वस्सो विभ्यस्तयन्धनः ॥२७॥ वे अपने उस स्वरूपमें स्थित हो गये, जो न तो किसी प्रकार बतलाया जा सकता है और न उसके सम्म घमें | किसी प्रकारका अनुमान ही किया जा सकता है ॥२७॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमईस्या सहितायां नमस्कन्चे इरिन्द्रो पाल्पान नाम सप्तमोऽध्याय ॥७॥ अथाष्टमोऽध्याय सगर-चरित्र धीशुफ उपाय भीगुकदेवजी कहते हैं रोहितका पुत्र पाहरित । | हरितसे चम्प हुआ । टसीने चम्पापुरी पसायी थी । हरितो रोहितसुतमेम्पस्तमाद् विनिर्मिता । चम्पसे मुदेव और उसका पुत्र विजय हुमा ॥१॥ | विजयका महक, महसका एक और अफका पुत्र हुआ चम्पापुरी सुदेवोऽतो विजयो यस्य चात्मनः ॥१॥ बाहुक । शत्रुओंने माहुक्से राम्य छीन लिया, तब वह मैस्कस्तत्सुसस्तसाद फस्तस्यापि पाहुक । अपनी पहीके साप पनमें चला गया ॥२॥ पनमें जानेपर सुदापेके कारण जम बाहुक्की मृत्यु हो गयी, सोऽरिभितम् राजा समार्यो वनमाविशत् ॥ २॥ तब उसकी पत्नी मी उसके साथ सती होनेको उपत । परन्तु महर्षि औषको यह मालम था कि इसे गम पूछ त पञ्चवां प्राप्त महिप्यनु मरिम्पती । है। इसलिये उनोंने उसे सती होमेसे रोक दिया ॥३॥ औषेप जानवाऽऽत्मानं प्रजातन्त्र निवारिता ॥३॥ बब उसकी सौगोंको यह बात माझ्म , तो उनोंने | उसे मोबनके साप गर ( बिर) दे दिया । परन्तु आझायाम्प सपस्नीभिर्गरोदचोन्यसा सह । गर्मपर उस विरका कोई प्रमाव महीं पड़ा, बल्कि उस सिक्वे लिये हुए ही एक बालपका जन्म हुआ, जो सह सेनैव संभात सगराम्पो महायशाः ॥ ४॥ गरके साप पैदा होनेके कारण 'सगर कहप्रपा । सगर बड़े यशस्वी राना हुए ॥ १ ॥ सगरचक्रवासीत् सागरो यस्सुतं कृत । सगर पाती थे। ठहींके पुत्रोंने पृप्पी सोर पर समुन्द्र बना दिया था। सगरने साने गुरुदेव औषकी यस्वालमवान् मयनाम्छफान् देहपपर्मरान् ॥ ५॥ वादा मानकर ताउमा, पान, शक, हैहय और बार नावधीत् गुरुवाक्येन चक्रे विकसषेपिण । जानिके व्यगोंका बघ मही किया, बल्कि विम्प बमा दिया । उनमें से कुछ के सिर मुहमा रिये, पुसये मंदादी मुण्डाम्ममुधरान फभिन्मुक्तकशामुण्डिवान् ।। रसा दी, पुटको सुने पानेवाल्म बना लिया तो पुरको बाधा मुहका या ॥५६॥ कुण सागोको मारने पा अनन्तवासस काभिदबहिवापसोऽपरान् । बस बोरनेकी ही वासादी, पहननकी नहीं। और १ बादपपपिपजाय । २ मारतेन । स । ४ नहवस्सन। सम्राट ।

भीमागपत [अ०८ सोऽयमेषैरयजत सर्ववेदसुरात्मकम् ।। ७ ।। | कुटको केवल गोरी पहननेको ही कहा, ओदनेको नहीं । इसके बाद राजा सगरने और्ष पिके उपदेशा- और्षोपदिएयोगेन हरिमात्मानमीश्वरम् । नुसार वयमेव याके द्वारा सम्पूर्ण वेद एवं देवताम्य, वारमहरूप, सर्पशजिम्मन् मगवान्की वाराधमा की । तस्पोत्सृष्ट पशुं यझे महाराश्व पुरन्दरः ॥८॥ उसके यसमें जो घोडा छोड़ा गप्प पा, उसे इन्द्रने 'पुरा रिटया ॥ ७-८ ॥ उस समय महारानी मुमसिके गर्भसे सुमन्माम्नया रप्ता पितुरादेशकारिणः । उत्पन्न सगरके पुत्रोंने अपने पिताके बाहानुसार धोरके हयम वेपमाणास्त समन्तान्यखनन् महीम् ॥९॥ लिये सारी पृष्पी अन गली । जब उन्हें कहीं घोस न मिटा, तब उन्होंने मह पासे सब भोरसे पृथ्वीको प्रागुरीयां दिशि इयं दा कपिलान्तिक । खोद पा ॥ ९ ॥ स्वोदते-सोदते उन्हें पूर्व और उसरके कोनेपर कपिल मुनिके पास अपना घोडा एप वाजिहरचौर आम्ल मीलिवलोचन ॥१०॥ दिसायी दिया । घोहेको देखकर वे साठ हजार राजकुमार शम उठाकर यह करते हुए उनकी भोर दौड़ पड़े कि इन्पा पवा पाप इति पटिसहस्रिण । प्यही हमारे घोडको पुरानयाग चोर है। देखो तो सही, इसने इस समय कैसे वो मंद रही है। यह उठापुपा अमिपयुरुन्मिमेप सदा सनिः ॥११॥ पापी है । इसको पर गला, मार गयो । उसी समय कपिल मुनिने अपनी पछके सोरी ॥ १.११ ॥ म्पसरीरामिना सामन्महेन्द्रातचेससः। इन्द्रने रामकुमारों की युति हर ली पी, इसीसे उन्हेंनि कपिलमुनि-जैसे महापुरुषका तिरस्कार किया । महदम्पतिकमहता भम्मसादभनन् क्षणात् ॥१०॥ इस तिरस्कारके फरवरूप उनके शयरमें ही बाग जस उटी, प्रिससे क्षणभरमें ही वे सब-के- न साधुवादा मुनियपमचिंता सब मरकर स्पफ हो गये ॥ १२ ॥ परीक्षित् । सगरके लड़के फपिरमुनिके फोधसे जल गये, ऐसा फस्ना नृपन्द्रपुत्रा इति सचधामनि । उषित नहीं है। ये तो मुदसतगुणके परम भामय है। उनका शरीर ता जगदको पवित्र करता रहता है। की तमो रापमपं विभाम्पते | उनमें भा, मारनप समोगुणफी सम्मापना कसे की जा सकती है। भय, पहा पृषोकी भूमा भी जगन्पविधानमनि म रमा सबः ॥१॥ बाराशसे समन्ध होता ! ॥ १३ ॥ यह समार-सागर एक मृत्युमप पप समय पर जाना अभ्यस्त बहिन पम्परिता माग्म्पमयी र नौ । परन्तु बीमुनिने इस जगत्में सौम्पशाखकी एक ऐमी , मान बना दी है, निमसे मुहिकी परम्पने पपा समभुनाते दापयम् । मारा का भी पकि उग ममुदप पार गा सस्ता है। भरा मयप पिपिन म पर पाम हामी दीमही, मर्ग परम्पग्मा हैं। उनमें मग पर है और यह मिर-ग प्रकारको भर पगमनम्म पनि ॥११॥ पुटि गहामा ५॥ है अ० ८] नवम स्कन्ध ३७ योऽसमन्जस इत्युक्त स केशिन्या नृपात्मज । सगरकी दूसरी पतीका नाम पा केशिनी । उसके गभसे उन्हें असमप्रस नामका पुत्र हुआ था । असमानस- वस्य पुत्रोंऽशुमान् नाम पितामहहिते रत ॥१५॥ के पुत्रका नाम या अनुमान् । यह वपने दादा सगरकी भाषाओंक पालन तथा उन्हीकी सेवा में लगा राता॥१५॥ असमञ्जस आत्मान दर्शपन्नममन्जसम् । असमानस पहले जन्ममें योगी ये । सहके कारण वे योगसे विपरित हो गये थे, परना पब मी ठहे भन्ने जातिसर पुरा सङ्गाद योगी योगाद विघाटित ॥१६॥ पूर्वज मका स्मरण बना हुआ पा । इसलिये वे ऐसे काम किया करते थे, जिनसे माइप उन्हें प्रिय म समझें। याचरन् गहित लोकशातीनां कर्म विप्रियम् । ये कमी-कभी तो अत्यन्त निन्दित कर्म कर बैठते भौर सरवों कीरतो यालान् प्रास्पदभयानम् ॥१७॥ अपनेको पागल सा दिखनसे~~यहाँ तक कि स्लेटते हुए वोंको सरयूमें गल देते ! इस प्रकार उन्होंने लोगोंको एवं परित्यक्तः पित्रा स्नेहमपोस । उनि कर दिया था ॥ १६१७॥ अन्तमें उनकी ऐसी करत देखकर पिताने पुत्रस्नेहको तिलामडि दे दी और उन्हें स्पाग दिया । तदनन्तर असमास योगेश्वर्येण पालांस्तान् दर्शयित्वा ततो ययौ ॥१८॥ ने भपने योगक्ससे उन सब बालकों को मीषित कर अयोध्यावामिन सर्षे बालकान पुनरागसान् । दिया और अपने पिताको दिखाकर घे बनमें चले गये ।। १८ ॥ अयोप्याके नागरिकाने जग देखा कि हमारे बामक तो फिर लौट भाये, तब उन्हें असीम रमा विसिमिरे रामन् राजा चाप्यन्यसप्पत ॥१९॥ आश्चर्य हुआ और राजा सगरको भी बका पदाचाप शुभा ॥ १९॥ इसके बाद राना सगरकी माहासे भशुमाधोदितो राजा तरकान्येवणे गयो। अशुपान् घोडेको नेके लिये निकल। उन्हेनि अपने | बाधाओं के द्वारा सोदे हुए समुदके किनारे-किनारे पिसृष्यस्वातानुपर्थ ममान्सि दर हयम् ॥२०॥ घलकर उनके शरीरके महमके पास ही घोडेको | देस्य ॥ २० ॥ वहाँ मगलान्के मस्तार फपिल मुनि सपासीन मुनि वीक्ष्य कपिलारपमधोक्षजम् । बैठे हुए थे। उनको देखकर उदारादप भनुमान्ने उनके चरणों में प्रणाम पिसा वरदाय जोड़कर एकाम मनसे उनकी स्तुति की ।। २१ ॥ मस्तोत् समादितमना। प्राअलि प्रणतो महान्।।२१॥ अंशुमानुपाच भानुमान्ने सामगवन् ! आप भवनमा प्रभावी से मी परे हैं। इसीलिये वे लापको प्रस्फा नही दस न पश्यति त्यो परमात्मनोम्जनो पाने । देसनेकी बात तो सपा रही- समाधि करते. न पुम्पतेऽपापि समाधिपक्तिभि । करते एवं युति हासेमहासे हार गपे, किन्त मान नक आपको समझ मी नहीं पाये । हमत्येग तो समझ कुतोऽपरे तस्प मनासरीरधी मन, शारीर भोर युनिसे हानेवाली सरिक द्वारा बने विमर्गसण घयमप्रकाशा ॥२२॥ए अहामी जीव हैं । तर मरा हम आपको से ममा ।२ सप्यायप्रसाप ।

भीमहागरत [1०८ ये देहमामलिगुणप्रधाना सकते ॥२२॥ संसारके शरीरधारी सत्वगुल, रजोगुण या तमोगुणप्रधान है। वे जापर मोर स्वप्न वस्वामि गुणान् विपश्यन्स्पुत पा समय । केवळ गुणमय पदामों, सियोंको नोरममि-अस्सामें केस यन्मायया बज्ञान-ही-बहान देखते हैं। इसका कारण यह है कि मोहितचेतसस्ते वे मापकी मायासे मोहित हो रहे है। व महिर्मुख होनेके विदुः स्वसंस्यं न परिप्रकाशा ॥२३॥ कारण बाइरकी वस्तुओं को तो देखते हैं, पर अपने ही द्वपमें मित नापको नहीं देख पाते ॥२॥ भाप ई त्वामहं शानधन समाव- | एकरस, शानघन हैं। सनन्दन यादि मुनि, जो भारम- प्रचस्तमायागुणमेदमौई सहपके अनुमसे मापाके गुणोंक द्वारा हानेवाले भेदभावको घोर उसके कारण भानको नर कर सनन्दनापैर्मुनिभिर्विभार्य युके हैं, आपका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं। मायाके कर्ष हि म्ह परिभाषयामि ॥२४॥ गुणोंमें ही भूम मा में मह किस प्रकार मापका चिन्तम कर ॥ २५ ॥ माया, उसके गुण और प्रशान्तमायागुणकर्मलिश गुणों के कारण होनेवाले कर्म एवं कमोकि संस्कारसे मनामरूपं सदसहितम् । बना हुआ कि शरीर आपमें है ही नही । न सा भापका नाम है और न तो रुप । धापमें न कार्य है और न तो ज्ञानोपदेशाय गृहीदेव करण 1 बाप सनातन मारमा है। मानका उपदेश करने के लिये ही आपने पर शरीर धारण कर रस्था नमामहे लां पुरुप पुगणम् ॥२५॥ । हम भापको नमस्कार करते हैं ॥२५॥ प्रमो यह त्वन्मापारचिते लोके वस्तुषुधा मृदादिपु । संसार थापकी मामाकी रामात है। इसको सत्य समझकर काम, म्येम, ईर्ष्या और मोहसे लोगों का वित्त भ्रमन्ति कामलोमेर्पापोहविप्रान्तपेठसः ॥२६॥ शरीर तथा म आदिम मटकने गता है । मेग इसीके घसारमें पस मावे ॥२६॥ समस्त प्राणियों के भारम्प अप नः सवभूतास्मन् कामफर्मेन्द्रियाशय । प्रभो । नाम बापके दर्शनसे मेरे मोदकी कदर फांसी मोहपाशो दमिछमो भगवस्तष दर्शनात् ॥२७॥ कर गयी जो कामना, फर्म और इन्द्रियोंको भीवन-दान देती ॥२७॥ श्रीमुक उपाय भीष्यपसी कहते हैं परीभिस् । सव अंशुमान् इत्यगीवानुभाषम्त भगवान् कपिल मुनिः । ने मगवान् फपित्रमुनिके प्रभाव इस प्रकार गान अंशुमन्तमगापेदमनुगृप पिपा नृप ॥२८॥ किपा, तब उन्होंने मन-ही-मन-अशुमान्पर बसा मनुष्य किय वीर कहा 1॥ २८॥ भीभगमनुवार अपोऽयं नीयवां परम पितामहपानुस्ता । भीमगवानमें कहावटा । यह घोषा तुम्हारे पिताइफा यापमुहै। इसे तुम से नायो । तुम्हारे इम परिवरी दग्धा गहाम्भोईन्ति नेचरत् ।।२९॥ अरे हुए पाषाओंका उदार फेवर गहानलसे होगा, १ प्रप ।२ मपम उमेरे ।। त्रियुतम् । । ति। वन गरि । ।

भ०९] नवम स्मन्य स परिक्रम्य शिरसा प्रसाप हयमानयत् । और कोई उपाय नहीं है।॥ २९ ॥ अंशुमान्ने बड़ी नम्रतासे उन्हें प्रसन्न करके उनको परिक्रमा की और सगरस्तेन पशुना क्रतुशेप समापयत् ॥३०॥ घे घारेको ले आये । सगरने उस यहपशुके द्वारा याकी शेष क्रिया समाप्त की ।। ३०॥ तब राजा राज्यमशुमति न्यस्य निःस्पृहो मुकपन्षन । सारने अनुमान्यो राज्यका भार सौंप दिया और ये सय विषयोंसे नि स्पृह एव मन्धनमुक्त हो गये। उन्होंने महर्षि और्वोपदिष्टमार्गेण लेमे गतिमनुचमाम् ॥३१॥ और्वक मतलाये हुए मार्गसे परमपदकी प्राप्ति की ॥ ३१ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारम्हस्यों सहितायां नमस्कत्धे सगरोपारल्यानेष्टमोऽध्याय ॥ ८ ॥ अथ नवमोऽध्याय भगीरय-परिष भोर गतवतरण यीशुक उवाप भीशुकदेवजी कहते है पीक्षित ! अशुमान्न गङ्गाजीका सानेकी कामनासे बहुत पोतक घोर तपस्या अशुाम तपस्तपे गहानयनकाम्पया। की । परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिमी, समय आनेपर | उनकी मृत्यु हो गयी ॥ १ ॥ अंशुमान्के पुत्र दिलीपने कालं महान्तनाशझोत तप्त कालेन सस्थितः॥१॥ मी पैसी हो तपस्या की । परन्तु वे मी मसफल ही रहे, दिलीपस्तत्सुतस्तवदशक्त कालमेयिवान् । समयपर उनकी भी पशु हो गयी । दिलीपके पुत्र थे भगीरय । ठगहोंने गुत बड़ी तपस्या की ॥२॥ उनकी मगीरथन्तस्य पुत्रस्तेपे स सुमहत् तप ॥२॥ तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवती गङ्गाने उहें दशन दिया और कहा कि--में तुम्हें वर देनेके लिये भायी हूँ।" दर्शयामास से देषी प्रसन्ना परदासि से। उनके ऐसा कहनेपर राना मगीरपने बड़ी नमनासे अपना अभिप्राय प्रकट किया कि आप मर्यनोको चलिये इत्युक्त स्वमभिप्राय शशसापनता नृपः ॥३॥ ॥३॥ [गजीने कहा-] मिस समय मैं सर्गसे पृष्णी. कोऽपिधारयिता पतन्स्पा मे महीतले। तस्पर गिरे, उस समय मेरे बेगको कोई धारण करने बाम्म होना चाहिये । भगीरप ! एसा न हानेपर में अन्पयाम्वल भित्ता नृप यास्पे रसावलम् ॥ ४॥ पृषीको फोरकर रसातसमें चली गाऊँगी ॥१॥ | इसके पतिरिक इस कारणसे भी मैं पृषीपर नहीं किंचाई न मुर्य यास्ये नरामय्यामृजन्स्पषम् । नाऊँगी कि मोग मुझमें अपने पाप धोयेगे । फिर मैं उस पापको कहीं घोगी । मगीरप । इस विषयमें तुम मृवामि तदपं कुन रानम्ता विपिन्स्पताम् ॥५॥ सायं विचार कर स्ले ॥५॥ भगीरम उवाच भगीरपने कहा-मा-- ! जिन्होंने मेक-परलोक, धन-सम्पति और श्री-पुत्रकी कामनाका प्रयास कर साथयो न्यासिन शा वा ममिष्ठा लोकपापना । दिया है, जो संसारमे उपरत होकर क्यने आपमें शान्त श्रीमद्भागवत [अ०९ । ६ परन्त्यष वेशासगाव तेप्यास्ते सपभिदरिः ॥६॥ हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ बार पत्रका पवित्र करनेवाले परोपकारी सन्न है-धे अपने स्पर्शसे तुम्हारे पापोंको नए भारपिप्पति ते वेगं रुद्रस्त्यास्मा शरीरिणाम् । पर देंगे। क्योंकि उनके हृदयमें अधम्प अघासुरको मारनेकले मागन् सबदा निवास करते हैं ॥ ६ ॥ यसिमोतमिद प्रोत विश्व शाटीव तन्तुम् ॥ ७॥ समस्त प्राणियोंके आरमा स्वदेव तुम्हारा वेग धारण कर लेंगे । क्योंकि जैसे सापी सूतॊमें बोतप्रोत है, इस्युक्त्वा स नृपो देव तपसातोपरम्छियम् । से ही पइ सारा विश्व भगवान् सदमें ही बोदप्रोत १) ७ || पीक्षित ! गलागीसे इस प्रकार काकर फासेनाल्पीयसा राजस्तस्पेशे समतुप्पत ॥८॥ यमा मगीरफ्ने सपस्याके द्वारा भगवान् शहरको प्रसन किया । पोरे ही दिनमि महादेवनी उनपर प्रसन हो तपेसि राजाभिहित सर्वलोकहितः निषः। गये ॥ ८॥ भगवान् शार तो सम्पूर्ण विश्वके हिती दधारावहिसो गर्न पादपूतजला हरे ॥९॥ है, रानाकी बात उन्होंने 'तथास्तु' कहकर स्वीकार कर छी। फिर शिवनीने सावधान होकर गानीको अपने मगीरपः स रामपिनिन्ये सुपनपावनीम् । सिरपर धारण किया । क्यों न हो, भगवान्के चरणोंका सम्पर्क होने के कारण गहानीका बस परम पवित्र जो पत्र स्वपिता रेरा भसीमता स शेरते ॥१०॥ || ||९|| इसके बाद रामर्षि मगीरप त्रिभुवनपावनी गङ्गा- नीको कहा ले गये, महाँ उनके पितरोंके शरीर यस्के रखेन पायुपेगेन प्रान्तमनुधावती। रेर बने पदे ॥१०॥ये वायुके समान वेगसे चलने वाले रपपर सवार होकर बागे-आगे चल रोपे वीर देशान् पुनन्तीनिर्दग्भानासिवत्सगरात्मनान्।।११॥ उनके पीछे-पीछे मार्ग, पदनेशले देशोंको पवित्र करती हुई गङ्गानी दौर ही पा । इस प्रकार गङ्गासागर-सहम- जलस्पर्शमात्रेम प्रमदमाता अपि । पर पहुंचकर उन्होंने सगरके चले हुए पुत्रोंको अपने जसमें सुना दिया ॥ ११॥ यपि सगरके पुत्र प्रामण- सगरारममा दिप जगतः केवलं देहममभिः ॥१२॥ के तिरस्कारके कारण भस्म हो गये थे, इसलिये उनके उद्धारका कोई उपाय न पा-फिर मी के शरीरकी भस्मीभूतासङ्गन स्वर्माता: सगररममाः । राखे साथ गङ्गाप्रथका स्पर्श हो जानेसे ही ये सर्गम चले गये ॥ १२ ॥ पीशित् ! सब गलामलसे शरीरकी कि पुनः भदया देवी ये सेमन्ते तव्रताः ॥१३॥ रासका स्पर्श हो बानेसे सगरके पुत्रों को स्वर्गकी प्राप्ति हो गयी, तब वो होग प्रदाके साप नियम लेकर मीगङ्गानीका सेवन करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो काना नवत् परमापर्य स्पर्धन्या यदिहोदितम् । ही स्पा है ॥१३॥ मैने गङ्गाजीकी महिमा के सम्बन्ध में मो कुछ कहा है, उसमें भाचर्यकी कोई बात नहीं भनन्तपरमाम्मोवप्रएतामा भवच्छिदः ॥१४॥ है। क्योंकि गलागी मावान्के ठम परणकममें से निकली है, निमका प्रमाके साप चिन्तन करके बड़े संमियप मनो पसिमाल्या मनपोऽमलाः । बड़े मुनि निर्मको माते और तीनों गुणों के कठिन १ समानत ।२ रोऽपए | देगा।

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४२ भीमलागवत सोऽप्यपोऽञ्जलिनाऽऽदाय गुरुशप्तुं समपतः॥२३॥ बार पपके लिये कर दिया । उस समय राजा सौदास भी अपनी बळिमें जल सेकर गुरु पसिष्ठको शाप पारितो मदयन्यापा सतीः पादयोर्चही । देनेके म्पेि उपत हुए ॥ २३ ॥ परन्तु उनकी पनी मदतीने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया । इसपर दिशः समवनी सर्व पश्यञ्जीवमयं नृप ॥२४॥ सौदासने विचार किया कि दिशाएँ, वाकाश बोर पृषी-सब के सब तो जीवमय ही है। तब या राक्षस भावमापन्न पादेकरमापां गत । तोरण बछ कहाँ हो ! बातमें उनोंने उस नको अपने पैरोंपर राम मिया। [इसीसे उनका नाम 'मिप्रसहा पवायकाल दरले धनौकोदम्पती दियौ ॥२५॥ या ] ॥ २४ ॥ उस बसे उनके पैर काले पर गये सुधार्को जगृहे विप्र तत्परन्याहाकतावत् । थे, इसलिये उनका नाम 'फन्माषपाद' भी शुमा । या वे राक्षस हो चुके थे। एक दिन राक्षस बने हुए रामा नभवानराधस साक्षादिक्ष्याणां महारथः॥२६॥ कम्मापादन एक मबासी ब्राह्मण-दम्पतिको सहपसके समय देस लिया ॥ २५ ॥ परमानवको मूख सो मदयन्स्या पविीर नाधर्म फर्समईसि । ली ही पी, उसने मामणको पका सिपा । ग्रामण- परीकी काममा कभी पूर्ण नहीं पी । ससने कहा- देहि मेऽपत्यकामाया अफसार्थ पति विचम् ॥२७॥ राजन् ! बाप राक्षस नहीं है। भाप महारानी मदपती- के पति और इस्याकुलशक बीर महारपी । । वापको देहोऽय मानुपा राजन पुरुपस्पासिलार्षदः । ऐसा मधर्म नहीं करना चाहिये । मुझे सन्तानकी कामना है और इस बामणकी मी कामनाएँ भभी पूर्ण माही ससादस्म पधो पीर पर्पिषध उम्पते ॥२८॥ है। इसलिये नाप मुझे मेय यह सामण पति दे | दीजिये ।। २६ २७ ॥ रामन् ! य मनुष्यावर जीवको एपहिामणा विस्तपानीलगुणान्वित । | वर्म, बर्थ, काम और मोक्ष-बायें पुष्पापोंकी प्राति कराने- प्रम है। इसलिये मीर ! इस शरीरको नर कर देना समी आरिगयिपुर्ण महापुरूपसंशितम् । फुलापोंकी हत्या काही माती है ॥ २८ ॥ फिर पा प्रमण तो विद्वान् है ।तपस्या, शीठ और को-पो गुणों से सर्वभूतारममावन स्तेप्वन्तर्हिस गुणे ॥२९॥ सम्पम है । यह उन पुरूषोत्तम पराकी समस्त प्राणियों के वारमाके रूपमें नायधना करना चाहता है, जो समस्त सोऽयं प्रमपिवर्यस्त राजर्षिप्रवरा विभा। पदामिविषमान रहते हुए भी उनके पृषक् पृषक गुणों- से छिपे हुए है ॥ २९॥रामन्! बाप शनिशाणी ।। भाप घमका मर्म मीमांति जानते है। जैसे पिताके कमर्हति धर्मम वर्ष पिसुरिबास्मम ॥३०॥ हायों पुत्रकी मृत्यु प्रषित महां, से ही बाप-जैसे मेष्ठ रामर्षिके हापों मेरे मंष्ठ अर्षि पतिका बब किसी प्रकार वस्य माधारपापस्प भ्रूणम्प प्रमवादिनः । सचित मही है ॥ ३० ॥ आपका साधु-समानमें बड़ा सम्मान है। मम माप मेरे परोपकारी, निरपराध, कर वर्ष यथा मनार्मन्पते सन्मयो भवान् ॥३२॥। मोत्रिय एवं प्रभारी पतिका षघ कैसे टीक समझ रह १।२ गाहो मम्मते मतान् ।

अ०९] नवम स्कन्ध । यद्ययं क्रियते भक्षस्तहिं मां स्लाद पूर्वतः । है। ये तो गौके समान निरीह ॥ ३१ ॥ फिर भी पदि आप इ. साही गलना चाहते है तो पहले मुझ स्प न बीविप्ये विना येन क्षण च मृतकं यथा ॥३२॥ गरिये । क्योंकि अपने पति के विना में मुर्दे समान हो जाऊँगी बार एक क्षण मी मीषिप्त न य सगी।३२॥ एवं करुणमापिण्या बिलपन्त्या अनाथवत् । प्रामणपनी यही ही करणापूर्ण वाणीमें इस प्रकार कहकर मनापकी माँति रोने लगी । परन्तु सौदासने शापसे मोहित दो के कारण उसकी प्रार्थनापर कुछ भी ध्यान म्याघ्रः पशुमिवाम्बादत सौदास शापमोहित ॥३३॥ म दिया वौर पर उस ब्रामणको पैसे ही सा गया, जसे बाघ किसी पशुको सा नाय ॥ ३३ ॥ जब ग्रामणीने ब्राह्मणी पीक्ष्य दिधिषु पुरुपादन भधिवम् । देखा कि राक्षसन मेरे गर्माधान के लिये उपत पतिको सा ल्या तप उसे बड़ा शोक कुमा। सती मामणीने कोष सोचन्त्यात्मानमींसमपत् कुपिता सती ॥३४॥ करफ राजाको शाप दे दिया ॥ ३१ ॥ रे पापी ! मैं भमी कामसे पीड़ित हो रही थी। ऐसी अवस्सामें मे यमान्मे भक्षित: पापकामातायाः पतिस्त्वया। मेरे पतिको सा नाम है । इसलिये मूर्ख ! जब त् सीसे सहवास करना चाहेगा, तमी सेरी मृत्यु हो जापगी, पह तवापि मृत्युराधानादकतप्रज्ञ दर्शित ॥३५॥ बात में तुप्त सुपाये देती हूँ ।। १५ ।। इस प्रकार मित्रसहको शाप देकर ग्रामणी अपने पतिकी अम्भिों- एवं मित्रसह शप्स्वा पतिलोकपरायणा । को धधकती हुई चितामें रालकर स्वयं भी स्त्री हो गयी और ठसने वही गति प्राप्त की, जो उसके पतिदेवको सदम्पीनि समिदेऽनौ प्रास्य भर्तुर्गतिं गवा ॥३६॥ मिमी थी । क्यों न हो, वह अपन पतिको अपर पौर किसी लोकमें जाना मी तो मही चाहती थी॥ ३६ ।। विणापा द्वादशामगन्ते मैथुनाप समयत । बाय पर्ष बीतमेपर राजा सौास शापसे मुफ हो गये । जब वे सहबासके लिये अपनी पत्नीके पाम गये, विमाप प्रामणीशापं महिप्या स निवारित ॥३०॥ सब ठसन इन्हें पेक दिया । क्योंकि उसे उस प्रामगीके शाफ्का पता पा ॥ २७॥ इसके बाद उन्होंने प्री-मुस- तत ऊब स तत्पाज सीमुख कर्मणाजा । का लिम्बुर परियाग ही कर दिया । इस प्रकार अपने कर्मके फलसरूप ये सम्तानहीन हो गये। सब बमिष्टनी वसिष्ठस्त नुमावो मदमन्त्यां प्रजामधात् ॥३८॥ न उन कहनेमे माक्सीका गर्माधान फत्पपा ।। २८ ।। मदपम्ती सात पर्यनक गर्भ धारण पिये रही, परन्तु सपा सामे सप्त समा गर्ममपिम्रन म्यजायत पैदा नहीं हुमातब सिप्टनीन पायरसे उस पर नापाव किया । इससे जो बाफ पुमा, मा मम (पपर) बनेऽम्मनादर तस्सा सोऽश्मझम्तेन कप्यते॥३९॥ की चोटसे पैदा होना कारग 'आमा' पहलाया ॥३०॥ अश्मकसे मलबार जन्म एमा । जब परनुपमत्री पृषी- सम्मकान्मूलका जनय स्त्रीभिः परिरक्षित । को भप्रियहीन कर रहे थे, तब सिर्पोन टमे हिमायत १ मर्तृगति । रिगाप्या प्रय। - । । ।

भीमद्भागवत म०९ -- । नारीकवच इस्पको नि भत्रे मूलकोऽभवत् ॥४०॥ | रस लिया था । इसीसे उसका एक नाम 'नारीकवच' मी वा । उसे मूक इसलिये करते हैं कि वह पृथ्वी- समो दशरथस्तमात् पुत्र ऐठेपिरस्तत । के क्षत्रियाहीन हो जानपर उस वंशका मूह ( प्रयाक ) पना || १० ॥ मूलकके पुत्र हुए दशरप, दशरपके रामा विश्वसहो यस्प स्लवायक्रपबंद ॥४१॥ ऐरविश और प्रेमविरके राजा विश्वसह । विश्वसहके पुत्र ही पकती सम्राट् बटवागाए ॥ ११ ॥ युद्धमें उन्हें यो देवैरपितो देस्पानवधीद् यषि दुर्जयः । कोई जीत नहीं सकता पा । उन्होंने देवताओं की प्रार्थना से दैत्योंका बघ किया था । जब उन्हें देवताओंसे या महर्तमापुर्यात्वत्प स्वपुरं सदधे मन ॥४२॥ माल्म [था कि अब मेरी वायु फेक दो ही पक्षी बाकी है, सब वे अपनी राजधानी र भाये और न मे प्रमाला प्रापालदेवाम चात्मना। भपने मनको ठनोंने मगमान्में म्गा दिया ॥ १२ ॥ मम-ही-मन सोचने लगे कि मेरे कुलके इष्ट देवता हैं न मियो न मही रान्य न दारापारिवहभाः ॥४३॥ ग्रामण ! ममसे मकर मेरा प्रेम अपने प्राणोंपर भी महाँ है। पत्नी, पुत्र, लक्ष्मी, राज्य और पृष्पी भी मुझे उतने न बास्मेऽपि मतिर्मममधर्मे रमते कचित् । प्यारे नहीं लगते ॥ १३ ॥ मेय मम बचपनमें भी कमी अधर्मकी बोर नही गया । मने पवित्रकीर्ति मगवान्के नापश्पमतमोकादन्यत् किसान मस्यहम् ॥४४॥ अतिरिक्त वौर कोई भी वस्तु कहाँ महीं देसी ॥ १४ ॥ तीनों लोकोंके सामी देवताओंने मुझे मुंहमांग पर देने- देश कामवरो दचो मर्म त्रिभुवनेश्वरै । को कहा। परन्तु मैंने उन मोगोंकी छालसा विकुछ नहीं की। क्योंकि समस्त प्राणियोंके जीवनदावा श्रीहरिकी नणे पमई फाम भूतभावनभावनः ॥४५॥ माक्नामें ही मैं मग्न हो रहा था ॥ १५ ॥ मिम देवताओं की इन्द्रियाँ और मन विषयोंमें भटक रहे हैं, वे मे विक्षिप्तेन्द्रिमपियो दयास्ते म्बहदि सितम्। सत्त्वगुणप्रधान होनेपर भी अपने पयमें विराजमान, सदा सर्वदा प्रियतम के रूपमें रहनेवाले अपने भात्मसरूप न बिन्दन्ति प्रियं शश्वदात्मानं किमुतापरे ॥४६॥ | मगवान्को महाँ नामते । फिर मान्म मो रजोगुणी और तमोगुणी है, वे तो माम ही कैसे सकते हैं॥१६॥ इस अपेशमापारचितेषु सह लिये अब इन विषम में नही रमता। ये तो मायाके स्वेत है। आकाशमें छाछ प्रतीत होनेवाले गन्धर्वनगरोंसे का गुणा गन्धर्वपुरोपमेषु । कर इसकी सता नहीं है। ये तो बहानक्श पिचपर पर गये थे। संसारके सम्चे रचयिता भगवान्की माझ्मान रूले प्रत्याऽऽत्मनि विधातु में स्पन होकर में विययोको मेष रहा है और केवल उनकी शरण ले रहा हूँ ॥ १७ ॥ परीक्षित मगवान् भावेन हिस्वा तमई प्रपये ॥४०॥ ने गना सट्माकी मुनिको पहरुम्से ही अपनी मोर आकर्षित कर रखा। इसीसे वे अन्तसमपमें इति म्पबसिवो मुठ्या नारायणगृहोतया । ऐसा निमय कर सके । अब उन्होंने शरीर मादि १ ऐमितिम । २ सिरे गमपुरोगोषु ।

१०१०] नवम स्कन्ध हित्वान्पमाषमान तत स्वं भावमाभित ॥४८॥ } बनारम पदामि जो अभाममूलफ आरममाव पा, उसका परित्याग कर दिया और अपने वास्तपिक आत्मसम्पमें स्पित हो गये ॥ २८ ॥ वह स्त्रमप साक्षात् परम है। यद समय पर सूक्ष्ममगून्य गून्पकल्पितम् । पए सूक्मसे भी सूक्ष्म, शून्यके समाम ही है। परन्तु यह शून्य मही, परम सत्य है। मफजन उसी पस्तुको भगवान यासुदेवेति य गृणन्ति हिमात्यता ६४९॥ | मगवान् बासुदेव इस नामसे वर्णन करते हैं ॥१०॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराण परमहा सहिताय नषमस्मरधे सूर्यवंशानुवर्णने नमोऽध्याय ।। ९ ॥ अथ दशमोऽध्याय भगवान् श्रीरामकी सीसामोका षमन भीमुक उवाच भीशुकदेषजी कहते है-परीक्षित् । खवाझाद दीर्घनाभरघुम्तमात् प्रयुयवा । पुत्र दीर्पणा और दीर्घनामुके परम यशस्वी पुत्र रघु हुए । खुके अब और बजके पुत्र महाराज दशरप अजस्तसो महाराणम्तस्माद् दनरयोऽभवत् ॥१॥ हुए ॥ १॥ देवतानों की प्रार्थनासे साक्षात् पयक्ष वस्थापि भगवानेप साक्षात् मममयो हरि । परम्परमा भगवान् श्रीहरि ही अपन शशिसे चार रूप अधिन चतुर्धागात् पुत्रत्वं प्रार्थितः सुरै । धारण करके रामा दमपके पुत्र हुए । उनके नाम ये-राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुप्त ॥ २॥ फीक्षित ! रामलक्ष्मणमरसभामा इति समया ॥२॥ सीतापनि मगवान् श्रीरामका चरित्र तो तत्वदी अपियों तस्मानुचरिव रामन्नृपिभिस्तमपटर्शिभि । ने पास कुछ पन किया है और तुमने भनेर वार भुर्व हि षणित गरि त्वया सोतापते ॥३॥ उसे मना भी है ॥ ३ ॥ भगवान् श्रीरामन अपने पिता राजा दशरपके सस्प- गुर्वय स्थकराज्यो व्यपरदनुवनं की रक्षाके रिपे राजपाट छोड़ दिया और वे पन-वनमें फिरते रहे । उनक परणकमर इतने मपुमार कि पप्रपद्म्यां प्रियापा परम सुकुमारी श्रीमानकीनीक करफमका स्पा भी पाणिस्पषिमाम्यां मृजितपथरजो ठमसे महन नहीं होता पायेही चरण यह वनमें धनते-चलते पक जाते, तब हनूमान् और सामग उन्हें यां हरीन्द्रानुजाम्पाम् । दवा-दवाकर उनकी पकार मिटावे पणग्याका माय- काम काटकर मिलाप र देनके कारण उम्भानी पैरप्यान्हर्पणख्या प्रियविरहरूमा प्रिपामा श्रीनानकीनीका वियाग मी मुहमा पाइस वियोगक कारण मोधवश उनकी महि तन गी, जिन्हें ऽऽरोपितविचम्भ दमकर ममुदतक मपमीम हो गया। इसके बार उन्होंने प्रमाधिदसेतु बलदबदहन समुद्रपर पुम बौधा और एश गाकर दुए राक्षसोंग मंगलका दानिक समान दग्धत नियम:- कोमरेन्द्राऽवतान्न: ॥४॥ नरेगा परी रक्षा करें ॥१॥ १ नमामा ४६ भीमागपत [अ०१० विवामित्रावरे येन मारीपाया निशाचराः। भगवान् श्रीरामने विवामित्रके यहमें लक्ष्मणके सामने ही मारीच भादि राक्षसोंको मार जगत्म । वे सबमे-यो पश्पसो लक्ष्मणस्पैव एता नैतपुङ्गवा ॥५॥ राक्षसोंकी गिनतीमें ॥ ५ ॥ परीक्षित् ! सनकपुरमें सीतामीका स्लपर हो रहा था । संसारके चुने ए यो लोकसीरसमिती धनुरेशम पीरोंकी समा मगवान् शहरका पद मयार धनुष ससा एला पाए इतना मारी बा कि सीन सौ वीर बड़ी सीतास्वयंवर विशवोपनीतम् । कठिनाईसे ठसे सयबरसमा म सके थे। मगवान् श्रीरामने उस धनुमको मात की बातमें तस्कर उसपर आदाय पालगजलील इवेष्टिं गरी बम दी और साधकर बीचोबीघसे उसके दो टुको पार दिये--ठीक वैसे ही, जैसे हापीका मन्या सखीकर नृप विरुम्प पभन्न मन्ये॥६॥। सेमते-सेलते ईस सोप गले ॥ ।। भगवान्ने चिन्हें अपने दक्ष स्परम्पर सान देकर सम्मानित किया है, वे जित्वानुरूपगुणष्ठीलषयोजरूपा श्रीलक्ष्मीची ही सीताके नामसे बनकपुरमें यक्तीर्ण हई था। वे गुण, शील, अस्सा, शरीरकी गठन वीर सीताभिषोभियमुरस्सभिठन्धमानाम् | सौन्दर्यमें सर्वपा मगवान् श्रीरामके अनुरूप पी । मगवान्न धनुष तोपकर उनै प्राप्त कर लिया । अपोप्पा- मार्गे प्रवन् भृगुपतर्मनात् प्रसव को छोटो समय मार्गमें उन परपुरामनीसे मेंट, जिन्होंमे मीस बार पृथ्वीको रामयश मीनसे मी रहित दर्प महीमरुत पविररामबीबाम् ॥ ७॥ कर दिया था। भगवान्ने उनके बड़े हुए गर्वको मठ कर दिया || || इसके बाद पिताके पचनको सत्य य सस्पपाशपरिवीतपिसुनिदेर्श करमेके लिये उमाने पनयम स्वीकार किया । पपपि महारान दशरफ्ने अपनी पत्नीके अधीन होकर ही उसे झैपस चापि शिरसा मगोसभार्य।। पैसा वचन दिण पा, फिर मी ये सुस्पक मन्वनमें ष गये थे। इसलिये भगवान्न वपने पिताकी बाबा शिरोधार्य राज्य भियं प्रणपिन मुहदो निवास की। नोम प्राणों के समान प्यारे राम्य, यमी, प्रमी, हितैषी मित्र और महलोंको कोरकर अपनी पत्नीके साथ त्यस्वा ययौपनमनिष मुफसङ्ग ।।८ की यात्रा की, क्योंकि उमें किसीके प्रति कोई वासकि न वी ॥ ८ ॥ बनमें पहुँचकर भगधन्ने रक्ष स्वसुर्मकस रूपमालपुढे राक्षसपन रावणकी बहिन शूर्पणशको विरुप कर दिया | मेकि उसकी मुदि बात ही कक्ति, तसा सरनिश्चिरणमुस्म्पभून् । कामवासमाके करण वाद थी। उसके पक्षपाती रस, दूषण, त्रिशिय वादि प्रधान प्रधाम भाइयको यो अध्ने चतुर्दशसहसमपारणीय- संस्था में चौदह हजार पेराव महान् धनुस लेकर मगवान् भीरामने नए कर गला और भनेक प्रकारकी मोदणापाभिरटमान उमास रुपम्॥९॥ कठिमाइयोसे परिपूर्ण नमें वे वर-उघर विवरते १ अरु ।

अ०१० नयम स्कन्ध . सीमाकथाश्रवणदीपिताम्छयेन सुए नियस करते हे ॥ ९॥ परीक्षित् ! नय राक्गने सीतानीके रूप, गुण, सौन्दर्य आदिकी पात पुनी तो सद विलोस्प नृपते दशकन्धरेम । उसका हृदय काम-वासनासे बाहर हो गया । उसने क्मत हरिनके वेपमें मारीघको उनकी पर्णकुटीके पास बध्नेयुतणवपुपाऽऽभमतोऽपको मेगा पापीरे-धीरे मगवान्को यहाँसे घर ले गया । अस्त- | में मगवान्ने अपने पाणसे उसे वात-की-वाममें वैसे ही मारीचमाशु विभिखेन यथा कमग्रः ॥१०॥ | मार राय, भैसे दक्षप्रजापतिको धीरभाने मारा था॥१०॥ जब भगवान् श्रीराम बाममें दूर निकल गये, तब रसोऽधमेन प्रकाद् विपिने समक्ष (समणकी जनुपस्थितिमें ) नीष राक्षस गणने मेदियेके समान विदेहनन्दिनी सुकुमारी श्रीसीसामीको वंदेहराजदुहितर्यपयापितायाम् । हर लिया । तदनन्तर वे अपनी प्राणप्रिया सीतानीसे विठुरकर अपने माइ सक्षमणके साप क्न वनमें दीनकी प्रापा पने कपणपत् प्रियया वियुक्तः माँति घूमने लगे। और इस प्रकार उन्होंने या शिक्षा दी कि नो नियमि भासकि रहते हैं, उनकी यही गति खीसङ्गिना गविमिति प्रपयंपाचारा॥११॥ होती है ॥ ११ ॥ इसके बाद भगवान्मे उस जटायु का दाह-संस्कार किया, जिसके सारे कर्मबन्धन दरयाऽऽस्मस्म्यहतकस्यमहन कर भगवत्सेवाइप फर्मसे पहले ही भस्म हो चुके थे। फिर मगवान्मे कल्पका सहार किया और इसके मनन्तर सम्यं विधाय कपिभिर्दयिता गति। सुप्रीम वादि वानसे मित्रता करके वापिका वध क्यिा, तदनन्सर पानरोके दारा अपनी प्राणप्रियाका पसा पुयाफ्यालिनिहले प्लषगेद्र सैन्यै- प्रणवाया। प्रमा और शहर निमके चरणोंकी बदमा करते १, रे मावान् श्रीराम मनुष्यकी-सी मीम करसे लामगात् स मनुखोऽनभवार्षिताधि ।१२। दरोंकी सेनाके साथ समुद्रतपर पहुँचे ॥ १२ ॥ (ो उपवास और प्रार्थनासे सब समुदपर कोई प्रभाव मद्रोपषिप्रमविश्वकटाक्षपात न पड़ा तत्र) मगवान् क्रोधकी लीसा करते हुए अपनी उप्र एवं टेढ़ी नजर समापर गली । उसी समय सम्मान्तनक्रमफरोभमगीर्णपोप । समुद्रके दो-यो मार बोर फछ साना ठठे । र गामेके कारण समुद्रकी सारी गर्जना शान्त हो गयी। सिधु सिरपण परिगृप रूपी तर समुद्र शरीरधारी बनकर और अपने सिरपर बहुत- सी मेंटें लेकर भगवान्के चरणकमलोंकी गरणमें आपा पादारविन्दसपगम्य पभाप एतत् ॥१३॥ और इस प्रकार कहने लगा ॥ १३ ॥ वनन्त ! हम मूर्स है, इसलिये नापके पास्तविक स्वरुपको नहीं नसां वय अरधियो नु विदाम मन् बामसे । जाने मी कसे भाप समस्त नगरके एकमात्र मामी, धादिकारण एवं जगदके समस्त परिर्मनमि फूटस्थमादिपुरुप बगवामधीशम् । एकरस एमबाल है। बाप समस्त गुणों के मामी 'म ।२ मध्यसरियल्पात ।। । - ४८ भीमद्भागवत [अ०१० । मत्सत्वत सुरगणा रबस प्रजेशा हैं । इसलिये ना आप सत्वगुणको स्वीकार कर लेते है तब देवताओंकी, रनोगुणको स्वीकार कर लेते मन्पोम मतपतयः सभवान् गुणश ॥१४॥ तब प्रनापतियोंकी और तमोगुणको स्वीकार कर लेते है तब बापके कोषसे रसगणकी उत्पत्ति होती है ॥१०॥ काम प्रयाहि पहि विश्वसोऽयमेह वीरशिरोमणे ! आप अपनी इछाके अनुमार मुझे पार कर जाइये और प्रिलोकीको मानेवाले विधवाके कुम्त प्रैलोक्परावणमवाप्नुहिषीर पस्नीम् । रावणको मारकर अपनी पत्नीको पिरसे प्रात कीजिये। परन्तु मापसे मेरी एक प्रार्थना है। बाप यहाँ मुमपर एक पानीहि सेतुमिह ते यषसा विवत्यै पुल बाँध दीजिये । इससे भापके यशका विस्तार होगा और भागे चलकर जब बड़े-बड़े नरपति दिविनय करते हुए यहाँ आयेंगे, तब ये भाफ्के यशका गान गायन्ति दिम्विबपिनो यमपेस्म भूपाः।१५। | करेंगे ।। १५ ।। पतचोदपो रघुपतिविषिधाद्रिस्टै माषान् श्रीरामनीने अनेकानेक परतोंके शिससे समुद्रपर पुल बौधा । जब बड़े-बड़े दर वस्ने हासे सेतु कपीन्द्रकरफम्पितमूहाः। परत उठा-उठाकर लाते थे, तब उनके पक्ष और बीमती मुग्रीवनीलहनुमत्प्रमौरनी- पाने पर-पर काफ्ने माती पी । इसके बाद विमीयण- की समहसे मरवाने Bीव, नील, इनमपम् वादि ठा विभीपणमाऽऽविशददग्धाम् ॥१६॥ प्रमुख वीरों वीर मानरीसेनाके साप लामें प्रदेश सा चानरेन्द्रक्लस्दविहारकोष्ठ किया । पर तो श्रीहनूमान्नी के द्वारा पहले ही जनम्यी चा चुकी थी ॥ १६ ॥ ठस समय बानररानकी सेमाने भीवारगोपुरसदोषलभीषिटहा । महाक सैर करने और सपने के स्थान, मनके गोदाम, निर्मन्यमानधिपगष्यममाम्भ सबाने, खाजे, फाटक, समामान, सजे वीर पशि- पाटका गवसईदिनीव घूर्ना ॥१७॥ के रनेके स्थानक्कको घेर लिया । उन्होंने यहाँकी वेदी, पनाएँ, सोनेके कमश और नीरा तोफोर रक्षापतिस्तदवलोक्म निकुम्भकम्म गमे । उस सम्प मदा ऐसी म्प्रदम पर दी थी, जैसे धमाधीस्वसुरान्तनरान्तकादीन् । मुंग-के-र हाफ्यिोंने किसी मदीको मप गरम हो ॥ १७ ॥ यह दसकर राक्षसरान राक्णने निकुम्म, पुर्व प्रान्तमविकायमिकम्पनादीन कुम्भ, धूमाक्ष, मुस, पुरान्तक, मगन्तक, प्रास्त्र, सर्वानुगान्समहिनोदयकुम्भकर्णम्।१८ माद और तमें भाई कुम्भकर्णको भी युद्ध करने के मतिकाय, विकम्पन वादि अपने सब मनुअरों, पुत्र, वा यासुधानपवनामसिभूलधाप लिये मेमा ॥ १८ ॥ राक्षसोंकी यह विशाल सेना प्रासटिंशक्तिशरवोमरसङ्गडुर्गाम् । सम्यार, त्रिशूल, घनुस, प्रास, ऋषि, शक्ति, माण, माले, सण मादि शम-वससे सुरक्षित वर कापत दुर्गम मुग्रीवलक्ष्मणमरुत्सुतग धमाद थी । मानवान् भीरामने सुमीव, खमण, हनुमान, गन्ध- मादम, मीठ, बा, नामवान् और पनस बादि वीरोंबरे नीलादर्सपनसादिभिरन्वितोऽगात् ।१९। अपने साथ लेकर राक्षसोंकी सेनाका सामना किया ॥१९॥ १ ।२।

२०१०] नपम स्फय ४९ . तेनीकपा रघुपतेरभिपत्प सर्वे सुर्वशशिरोमणि भगवान् श्रीयमके मद आदि सब सेनापति राक्षसोंकी चतुरक्षिणी सेना-हापी, इन्द्र वरूपमिभपचिरथाचयोधैः । रप, पुरसकार और पैदोंके साथ इन्द्रयुद्धकी रीतिसे मिद गये और राक्षसोंको वृक्ष, पर्वतशिखर, गदा और वासेि मारने लगे। उनका मारा माना तो म्बामाषिक बघ्नुर्द्धमैगिरिगदेपुभिरङ्गदाद्या ही पा। क्योंकि वे उसी रावणके अनुचर थे, जिसका मास श्रीसीतानीको स्पर्श करनेके कारण पहले ही मर सीवाभिमर्शसमङ्गलरावणेशान् ॥२०॥ हो चुका था ॥ २० ॥ रन पति स्ववलनटिमवेक्ष्य रुष्ट जब राक्षसराज रावणने देख कि मेरी सेनाका तो नाश हुमा ना रहा है, तब षह मोधर्मे भरकर पुप्पक पारा योनकमयाभिमसार रामम् । विमानपर मारा हो मगवान् श्रीयमके सामने भाया । उस समय इन्द्रका सारपि मातसिपाही वेजली दिम्य रप रेकर भाया और उसपर मगवान् श्रीरामनी विरान स्वास्पन्दने घुमति मातलिनोपनी मान हुए । रावण अपने तीचे बाणोंसे उनपर प्रहार करने लगा ॥ २१ || भगवान् श्रीरामजीने रावणसे षिनाबमानमहनमिति सुरगैः ॥२१॥ कहा--नीच राक्षस ! तुम कुकी तरह हमारी अनुपस्थितिमें हमारी प्राणप्रिया पनीको दर लाये ! तुमने रामस्तमार पुरुपादपुरीप यमः | दुपताकी हद कर दी ! तुम्हारे-जैसा निलम तपा कान्तामममममतापरवाश्येषत् ते । निन्दनीय वौर कौन होगा । जैसे काम्फो फोई टार नहीं सफला-फर्तापमके भमिमानीको बा फल दिये बिना स्पतापस फलमप मुगुप्सितस्स एनहीं सकता, वैसे ही भान में तुम्हें तुम्हारी करनीका यच्छामि काल इस फतुरलायवीर्यः ॥२२॥ फल घस्यता है ॥२२॥ इस प्रकार रावणको फरकारते हुए मगवान् श्रीपमने अपने धनुषपर चढ़ाया हुआ पाग एवं विपन् धनुपि संक्तिमुत्ससर्ज उसपर होगा । उस बाणने बनके समान उमके एय पाण म यमिव सदय पिमेद । को विदीर्ण कर दिया । बा अपने दमों मुर्मोसे म्यून उगता हुमा मिानसे नगर पा–ठीक वैसे ही, जैसे सोऽमग बमन् दशमुम्बैपत विमाना पुष्पास्मालोग भोग ममाप्त होनपर बसे गिर पड़ने है। उस समय उसके पुरजन-परिमन हाय-हाया परके दाहेति बल्पसिजने सुझतीष रितः॥२३॥ भने स्गे ॥ २३ ॥ ततो निष्फ्रम्प लहाया यातुधान्यः सहस्रश । तदनन्तर हजारों राममियों मोरीके माप रोती हुई सासे निकस पी और रणभूमिमें आया ॥ २१॥ मोर्या समं तस्मिन् प्रदत्य उपाद्रवन् ॥२४॥ उन्होंने देख कि उनके स्वमन-सम्बन्धी एमगनीक बागोंसे छिम-मिल होकर पड़ रहै। वे अपने हाथों म्वान् म्वान् म पून परिप्यन्य लामणेषुभिरदिवान् । अपनी हाती पीट-पी-फर वोर अपन मग-मम्बन्धियोंको पद: मुम्या दोना मन्न्य आ मानमात्मना ॥२५॥ हायसे स्टया-गाकर उँचेम्बरसे विणकरने लगी||२५|| । २ महति ।। म्यते । ४ परापना । पाक भ म २७- श्रीमद्भागवत [अ०१. । साहता स पर्य नाप लोफरापण रावण । हाय ! मामी ! भान हम सब येमीस मारी गया। एक दिन का पा, जब वापके मपसे समस्त लोकमि प्राहि त्राहि मच जाती पी। भाम वइ दिन आ पहुँचा के मायाम्छरण लहा त्वविहीना परादिता ॥२६॥ | कि आपके न इनेसे हमारे शत्रु ब्याकी दुर्दशा कर रहे हैं और यह प्रश्न उठ या है कि मन मा किसके अधीन रहेगी ।। २६ ॥ आप सब प्रकारसे सम्फन में, नैव पद महाभाग भवान् कामवश्यं गतः । किसी भी बातकी कमी न थी। परस्त पाप कामके वश हो गये और मह नहीं सोचा कि सोतानी कितनी तेजखिनी है और उनका कितना प्रमाव। आपकी तेमाऽनुभाष सीताया येन नीसो दशामिमाम्॥२७॥ यही भूल मापकी इस दुर्दशाका कारण मन गयी ॥२७॥ कमी पापके काम से हम सब भौर समस्त राक्षसर्वश कपा विधवा लला पर्य चकुलनन्दन । आनन्दित होता पा और लान हम सब क्या यह सरी ला नगरी विया हो गयी । बापका शरीर, निस- के किये आपमे सम कुछ कर पत्र, मान गी|का देर कताऽन्नं गृध्राणामात्मा नरफहेतवे ॥२८॥ बाहार बन रहा है और अपने बारमाको लापने मरकका अधिकारी बना सन्य । यह सब भापकी ही नासमझी जोर कामुकताका फल है ।। २८ ॥ श्रीशुक उपाय भीशुकदेवजी कहते है परीक्षित् ! कोसम्पधीश भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी आबासे विभीषणने अपने बाना विभीपणपके कोमले द्रानुमोदितः । स्वजम सम्बन्धियोंका पित्याकी विधिसे शासके अनुसार अस्येशिकर्म विस्य ॥ २० ॥ इसके माद मावान् श्री- पिठ मेधविधानेन यदुक्त माम्परापिकम् ॥२९॥ रामने अशोकवारिफाके मामममें अशोक रखके नीचे । दुइ श्रीसीताजीको देसा । ये उन्हींके रहकी तता ददरी भगवानगोकवनिकायमे । मारिसे मेरित एवं वरपन्त दुर होगही पा ॥ ३०॥ अपनी प्राणप्रिय अर्धाङ्गिनी श्रीसीताजीको अत्यन्त दीन सामा म्वविग्हम्माधि निशपामूलमाम्यिताम् ॥३०॥ अम्मामें देम्पकर श्रीराम य प्रेम और कृपासे मर समः प्रियतमाभापादीनां पीरूपान्याम्पठ। प्राय । इधर भगवान्फर दर्शन पाकर सीताजीका दय प्रम और बाना से परिपूर्ण हो गया, उनका मुक्कम भारममदर्शनाहादविक्रम सम्बपजाम् ॥३१॥ मिठ उग्र ॥ ३१ ॥ मगवान्ने विभीषणको राक्षसोंच पारित, पदापुरीश राय वौर एक कस्पफी वायु ी और इसके पार पइसे सीनाजीर विमानपर बैठकर आराप्यार पार्न प्रादम्पां इनुमपुत्त । अग्न गानों माई रमण तया सुपीय एवं सेवक विभीपाप भगरान दया रथागणाताम् ॥३२॥ हन्मान्वीफे साप श्यप भी विमानपर सघर पुए । इस पोह का का पूरा हो जानेर उनि अग्ने नगरी यात्रा की। उस ममय मामि रमा आरि समापपरयान्तं पपी पीणमन पुरीम् । प्रयया माण उनपर या प्रेममे पुगोरी पर्ग पर रहे परम्पमासगुमनापागनि पधि ॥३३॥ ॥॥२३॥ - प्रपार २०१०] नवम स्कन्ध उपगीयमानचरित शतधृस्पादिमिर्मदा। इवर तो मझा बादि यो आनन्दसे भगवानकी लीलप्योंका गान कर रहे थे और उपर नम मगवान्को गोमूत्रयावक भुत्वा प्रातरं परफलाम्घरम् ॥३४॥ यह मालम हुमा कि भरतजी केवल गोमूत्रमें पकाया हुला जौका दलिया से है, कल पहनते हैं और महाकारुणिकोऽतप्यसटिल सण्डिलेशयम् । पृप्पोपर राम विकर सोते हैं, एवं उन्होंने जटाएं क्दा | रस्मी हैं, तब वे बनुत दुखी हए । उनकी दशाका भरतः प्रासमाफW पौरामात्पपुरोहितः ॥३५॥ स्मरण कर परम करुणाशील भावान्का इदय मर पाया । जब मतको मालम हुआ कि मेरे मो माई भगवान् पादुके शिरसि न्यस्स रामं प्रत्युपतोऽग्रजम् । श्रीरामजी वा रहे है तब वे पुरषासी, मन्त्री चौर पुरोहितोंको साप लेकर एवं भगवान्की पटुकाएँ सिरपर नन्दिप्रामावस्खशिबिरादगीववादित्रनिःसनः॥३६॥ रसकर उनकी वगवानी के लिये चल । सब मरम्नी अपने गनेके मान नन्दिप्रामसे घले, तय गेग उनके प्रपोषेण च मुहुः पठनिमवादिभिः । साप साप माम्गान करते, मात्र बजाते चाटने लगे। वेदवादी मामण मार-मार बेदमोंका उबारण करने लगे स्वर्णकक्षपताकामिमिमित्रध्वजे रथैः ॥३७॥ और उसकी पनि चारों ओर गूंजने लगी। मुनहरी फामदार पताकाएँ फहराने छगी। सोनेसे मदे हुए सपा सदन समसभाहेमरे। पुरटवर्ममिः । रंग-बिरंगी प्वमाओंसे सजे हए रप, मुनहले सामसे सनाये हुए सुन्दर घोह तथा मोनेके कसच पहने हुए भेणीभिरिमुस्माभिम॒त्यैश्चैध पदानुगः ॥३८॥ सैनिक उनक साफ-साथ चळने छगे। सेठ साहूकार, श्रेष्ठ पाराङ्गनाएँ, पैदल चलनेवाले सेक्क और महा- राचार्योके योम्य भेटी-बसी समी बस्तुएँ उनके साप पछ पारमेठवान्पुपादाय पप्पान्युवापचानि । यी पाँ। भगमान्को देखते ही प्रेमके उदेकसे भरतनी- का उदय गनद हो गया, नेमि भोस् छपक भाये, वे पादयोन्मपतत् प्रेममा प्रमिन्नादयेषणः ॥३९॥ मगवानके घरोपर गिर पड़े ॥ ३४-३९ ॥ होने प्रमुके सामने ठमकी पादुकाएँ रसदा और आप मोकार पादुफे न्यस्म पुरतः प्राञ्जलिप्पिलापनः । से हो गये । मेनोसे मौसकी धारा बहती ना यी थी। माषान्ने अपने दोनों हापोंसे पकाकर बहुत बमालिप्पचिरं दोाखापयन् नेवलः ॥४०॥ ) देस्तक मरासनीको दपसे छाये रसख । भाषान्के मंत्रमबसे मरतनीका स्मान हो गया ॥ १०॥ इसके रामो लक्ष्मणसीताम्पा विप्रेम्पो मे ईमचमा । बाद सीत्यमी और छक्ष्मणचीके साप भगवान् श्रीरामजीने प्रामण और पूजनीय गुरुजनोंको नमस्कार किया । सपा तेम्पा वर्ष नमधन प्रजामिम नमस्ततः ॥४१॥ सारी प्रजाने पड़े प्रेमसे सिर मुकाकर मगवान्के परम प्रणाम मिया ॥ ११॥ उस समय उत्तरकोसल देशको घुनन्द उपरासङ्गान्पति पीप चिरागतम् । एनेवाली समस्त प्रना अपने साम्ये भगवानको पात १ प्रस्थाले । २ सहि ।। मूनी । ४ मा।

५२ भीमहागवत [अ०१० . उत्चग कोसला माल्यैः किरन्सो ननृतर्मदा ॥४२॥ दिनोंक माद आये देख अपने दुपो हिन्य-हिन्यात पुर्पोकी का करती हुई मानन्दसे माचन लगी ॥ १२॥ पादुक भरतागृहाचामरम्पयनोचमे। मरसमीने भगवान्की पादुकाएँ , विमीपणने श्रेष्ठ घर, मुभीवने पंख्य और श्रीहनूमान्नीने श्वेत छन विभीपण ससुग्रीय श्वसच्छर्य मरुत्सुतः ॥४३॥ ग्रहण किया ॥ १३ ॥ परीक्षित् ! शत्रुप्ममीने धनुष और तरकस, सीसानीने तीयोंकि जम्से मरा फारक, धनुर्निपशम्भुनः सीता तीर्थकमण्डलुम् । जादने सोनेका लग और चाम्पवान्ने ढाल ले श्री ॥ १४॥ इन लोगोंके साथ भगवान् पुप्पक विमान भविनदादः सर्ग हैम धर्मराम् नृप ॥४४॥ पर विराजमान हो गये, चारों तरफ यबास्मान नियों बैठ पुष्पकम्पोऽन्वितः स्त्रीभिः स्तूयमानम पन्दिभिः। गयी, न्दीबन स्तुति करने लगे। उस समय पुष्पक विमानपर भगवान् श्रीरामकी ऐसी शोमा , मानो विरजे भगवान् रामन् ग्रहमाद्र इवोदितः ॥४५॥ मोंके साप पन्द्रमा उदय हो रहे हों ॥ १५ ॥ प्राइभिनन्दितः सोऽपि सात्सयां प्राविश्चत् पुरीम् । इस प्रकार मगधन्ने भाइयों का बमिनन्दन सीकर करके उनके साप पयोध्यापुरीमें प्रनेश किया । उस प्रविश्य राजभवन गुरुपस्नीः स्वमातरम् ॥४६॥ समय र पुरी भानन्दोत्सनसे परिपूर्ण हो रही थी । गण- महळमें प्रमश करक उन्होंने अपनी माता कौसम्पा, क्य माताओं, गुरुमनों, सामरके मित्रों और छोटोका ययायोग्य गुरून् ययस्सावरजान पत्रिता प्रस्पपूजयत् । सम्मान किया तथा उनके द्वारा किया हुमा सम्मान सीकार किया। श्रीसीताजी बोर ख्यमणनीने भी भगवान्क साफ-साम पददी लक्ष्मगन यथावत् सापेमतुः ॥४०॥ सबके प्रति पपायोम्प म्यवहार किया ॥ ५६ १७ ॥ उस समय जैसे सतकशारीरमें प्राणों का सार हो नाय, पैसे पुमान् स्वमावरम्तास्तु प्राणस्तित्व वोत्थिताः । ही माताएँ अपने पुत्रोंके आगमनसे हक्ति हो धठौं । उन्होंने ठमको अपनी गोदमें मैठा लिया और वपने आरोप्याभिपिश्चन्त्यो पाप्पौधेर्षिबहुःशुषः॥४८॥ वाँमुजोसे उमका बमिक किया । उस समय उनका सारा शोक मिट गया ।। १८॥ इसके बाद पसिम्मीने मग निर्मुन्म विधियत् लाई समं गुरुः । दूसरे गुरुचोंके साप विधिपूर्वक मगवान्की नट उपरायी और वृहत्पतिने से इन्दका भमिक किया अम्पपियर यवेन्द्र चतु:सिधुबलादिभिः॥४९।। से ही चारों समुद्रोंके अम वाहिसे उनका पमिक किपा ॥ १९ ॥ इस प्रकार सिरसे स्माम करके मगवान् एव मतसिगास्नाना मुवामा सग्पतहत । { श्रीग्रमने सुन्दर बस, पुष्पमालाएँ और बाहर धारण किये। सभी भाइयों और श्रीजानकीनीने भी सुन्दर मुन्दर बस और बझार धारण किये। उनके साप म्पलत गुवामाभिनादभिर्पिया बभौ ॥५०॥ भगवान् श्रीरामवी मन शाभायमान हुए ॥ ५० ॥ मरतत्रीने उनके घरों में गिरकर ठरें प्रसन्न किया अप्रदादामनं माया प्रणिपत्य प्रसादित । और उनके मामा करनेपर भगवान् धारामन रामसिंहासन 1 1१ मा पY पनि बामभिः।

म० ११ ] नवम स्कन्ध प्रया स्वधर्मनिरसा पर्णाश्रमगुणाचिता । स्वीकार किया । इसके बाद वे अपने-अपने धर्ममें तत्पर तया वर्णाश्रम माघारको निमानेवाली प्रजाका पिताके जुगोप पितृवत् रामो मेनिरे पितरं च तम् ॥५१॥ समान पालन करने लगे। उनकी प्रगामी उन्हें अपना पिता ही मानती पी॥ ५१ ॥ परीक्षित् | नव समस्त प्रेतायो धर्तमानायां काल कृतसमोऽभवत् । प्राणियोंको मुख देनेवाल परम धमा भगवान् श्रीराम राना हुए तब पा सो प्रेतायुग, परन्तु माटम होता था मानो रामे राजनि धर्मझे सर्वभूतसुरवामहे ॥५२॥ सत्ययुग ही है।। ५२ ॥ परीक्षित् ! उस समय बन, नदी, पवत, वर्प, डीप और समुद्र-सन के सम प्रमाफ वनानि नयो गिरयो वर्षाणि द्वीपसिन्धष । लिये कामधेनुके समान समस्त्र कामनाओंका पूण करने पाले बन रहे थे ॥ ५५ ॥ इन्द्रियातीत भगवान् श्रीयमके सर्वे फामदुपा आसन् प्रजानां भरतर्षभ {१५३।१ ) राज्य करते समय किसीको मानसिक चिन्ता या शारीरिक रोग नहीं होते ये 4ा बुवापा, दुर्बलता, दुख, शोक, नाधिष्पाधिजराग्लानिदु खशोकभयकमा । मय बोर पावट नाममात्र के लिये भी नहीं थे। यहाँ मृत्युधानिच्छा नासी रामे राजन्यधोक्षजे ॥५४॥ तक कि मो मरना नहीं चाहते थे, उनकी मृत्यु मी नहीं होती थी ॥ ५५ ॥ मगवान् श्रीरामने एकपनीका एकपत्नीव्रतधरो राजर्षिचरित शुधि । गत धारण कर रम्य पा, उनके चरित्र अत्यन्त पवित्र एवं राजर्पियो से थे । वे गृहस्पोषित ववर्मको शिक्षा स्वधर्म गृहमेधीयं शिक्षयन् स्वयमाचरत् ॥५५॥ देनेके लिये स्वयं उस धर्मका आचरण करते थे ॥५५।। सतीशिरोमणि सीताजीनपने पति के दफ्फा भाव मानती प्रेम्णानुमाया शीरेन प्रभपावनता सती । रहती। ये प्रेमसे, सेवासे, शीलसे, अस्क्स विनयसे सपा अपनी युदिौर रमा बादि गुणों से अपने पति भगवान् पिया हिया च भावमा भर्स सीताहरन्मन ॥५६॥ धीरामजीका चित्त बुराती हती पा ॥ ५६ ॥ - । इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारम्हस्पो सहितायां नवमस्क घे रोमचरिते दशमोऽध्याय ॥१०॥ अथैकादशोऽध्याय भगवान् भीपमकी शेष लीलामान यमन श्रीशुक उपाप श्रीगुकदेयजी कहते हैं-परीशित् ! भगवान् भगवानात्मनाऽऽस्मानं राम उसमपर्क । धौरामने गुरु बमिष्ठत्रीको अपमा आचाप यनाकर उसम सामग्रियोंसे गुरू पहाके दारा अपने-आप ही मरन सर्वदेवमय देवमीज आचार्यवान् माये ॥१॥ तयियम्प म्ययंप्रकाश माग्माया पान रिया ॥ १ ॥ होऽददा दिशं प्राची प्रमाण दक्षिाप्रभुः। उन्होंने हाताको पूर्व पि, प्रमाको दक्षिग, अपयुको अम्वर्यये प्रतीची च उदीची मामगाय स ॥२॥ पसिम और टगायो उत्तर शिा देसी ॥२॥ १ नाधिमाधि मनि । २ गमानुचरित नभ।३ मा 1. ON ५४ भीमद्भागवत [५० ११ आपार्याय ददो शेपो यावती भूस्तदन्तरा । उनके बीचमें जितनी भूमि बच रही पी, पर उन्होंने पाचापको दे दी। उनका यह निषय पाकि सम्पूर्ण मन्यमान इद कृत्स्नं प्रामणोति निस्पः॥३॥ मूमळका एकमान अधिकारी नि स्पृह मामण ही है ॥ ३ ॥ इस प्रकार सारे भूमणका दान करके उन्होंने अपने शरीरके वस्त्र और भगदार ही अपने पास इत्पय उदलदारपासोम्मामवशेपितः । रस्से । इसी प्रकार महारामी सीतानीके पास भी केवल मालिक पत्र वोर मभूषण ही बच रहे ॥ १ ॥ ना तपा रापपि पैदेही सौमङ्गल्यावपिता ॥४॥ भाचार्यवामिमणोंने देखा कि भावान् श्रीराम तो बामणों- को ही अपना इष्टदेव मानते हैं, उनकेादसमें ग्रामों के प्रति ते सु प्रेमम्मदेवस्प पात्सत्यं वीक्ष्य संस्थतम् । क्नन्त स्नेह है, तब उनकाय प्रेमसे इति हो गया। ठोंने प्रसन होकर सारी पृषी मगवान्को हटा प्रीताः सिमधियस्तस्मै प्रत्पदं बमाषिरे ॥५॥ दी और कहा ॥ ५॥ 'प्रभो! बाप सब के एकमात्र सामी है। भापता हमारे स्वपके भीतर सफर मार्त नस्त्वया किं नु मममन् सपनेवर । अपनी ज्योतिसे महानायकारका नाश कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें मत्र, आपने में क्या नहीं दे ससा योऽन्तदर्य विश्य समो हंसि स्वरोचिपा ॥६॥ है ॥ ६॥ आपका ज्ञान प्रान्त है। पवित्र कीर्तिपाळे पुरुषमि बाप सर्वश्रेष्ठ है । ठन महामानोंको, जो किसी- नमो समयदेवाय रामायाष्ठमेधसे | को किसी प्रकारफी पीका मही पहुँचाते, बापने अपने चरणकमळ दे रस्ते हैं। ऐसा होनेपर भी वाप प्रमणे- उत्तमश्लोकधुर्याय न्यस्तदण्णार्पिताधये ॥ ७॥ | का सपना इष्टदेव मानते है । मगन् । बापके इस रामहपको हम ममस्कार करते ॥ ७ ॥ कदाचिस्लोफमियासुर्गो राज्यामलपितः । परीक्षित् ! एक बार अपनी प्रमाकी सिविमाननेके | शिये मगवान् श्रीरामनी रातके समय छिपकर बिना परन् बायोऽभणोद रामो मार्यादिश्य कस्यचित् ।८। किसीको कामये घूम रहे थे । उस समप उनोंने किसीकी यह बात मुनी । अपनी पत्नीसे फारसा नाई विमर्मि त्वां दुष्टामसती परवेश्मगाम् । प॥ ८॥ श्री | दुध और कुछटा है। पाये परमें बापी।बी-मेमी राम मले ही सीताको रथ नीलोमी विमृपात् सीता रामो नाई भजे पुनः॥९॥ सब गोको प्रसन्न रसना टेली खीर है । क्योंकि है, परन्तु म स फिर नहाँ स्स सकता ॥ ९॥ सचमुष म्सोकी तो कमी नहीं है। अब भगवान् श्रीरामने प्रति लोका पाससाद दरारामावसंविदः। बाकि इसे ऐसी बात हनी, तो वे कमेकापडादसे फुल मपमीत से हो गये । नमोने श्रीसीसगीका परित्याग कर पत्मा भीवेन सा त्यक्ता प्राप्ता प्रापेतसाभमम्॥१०॥ दिया और वे माम्मीकि मुनिके धामममें रहने गा॥१०॥ सीताजी उस समय गर्मक्ती । समय बानेपर उन्होंने मन्तर्वन्यागते काले यमौ सा सुपुष मुतौ । एक साप ही दो पुत्र उत्पम किये। उनके माम :ए-मुश १ प्रामण रेवस । २ परे ।। सोनपि ।

म. ११) नवम समन्य शो लगाइति स्यातौ सयोमके क्रियामुनिः ॥११॥ और ख्य। वास्मीकि मुनिन उनके भातकदि संस्कार किये।रामणमीके दो पुत्र पुर-आद और विश्वेत। अङ्गदेभित्रकेतुष लक्ष्मणस्यात्मजौ स्मृतौ । परीक्षित् । इसी प्रकार मरतमीके भी दो ही पुत्र येसम वक्ष पुष्फल इस्पाम्ता भरतस्स महीपते ॥१२॥ और पुष्कळ ॥ १२ ॥ तथा शत्रुनके भी दो पुत्र हुए-- मुगाह और श्रुतसेन । मरतमीने दिग्विजयमें करोड़ों मुबाहुः वससेनम शत्रुघ्नस्स भमूवतुः। गम्बयोका संहार किया ॥ १३ ॥ सहोंने उनका सव गन्धर्वान् कोटिशो बने भरतो विजये दिशाम्॥१३॥ धन प्रकर अपने बड़े माई मगवान् श्रीरामकी सेवामें निवेदन क्त्यिा ! शत्रुमनीने मधुपनमें मधुके पुत्र लवण तदीयं धनमानीय सर्व राधे न्यवेदयत् । नामक राक्षसको मारकर वहाँ मयुरा नामकी पुरी शशुमध मपो पुत्र लवण नाम राधम् । मसापी॥११॥ मगवान् श्रीरामके निर्वासित सीतानीने अपने पुत्रोंको पाम्मीकिनीके हामि सौप दिया और हत्वा मधुवने चने मपुरा नाम मैं पुरीम् ॥१४॥ भगवान् श्रीरामके चरणकमलोंका ध्यान करती हुई वे मनौ निक्षिप्य वनयौ सीता मे; विषासिता। पृष्पीदेवीके लोकमे चली गयीं ॥ १५॥ यह समाचार सुनकर भगवान् श्रीरामने अपने शोकादेशको मुसिके द्वारा म्यायन्ती रामचरणौ पिवर प्रविवेश ह॥१५॥ रोकना पाहा, परन्तु परम समर्प होनेपर भी वे उसे रोक न सके। क्योंकि उ, बानकीजीके पवित्र गुण मार-मार सात्वा मगवान् रामो रुन्धमपि धिया शुच । स्मरण हो पाया करते थे॥१६॥ परीक्षित् । यह स्त्री सरस्तस्सागुणांस्तांस्ताभाशकोदोधुमीधरः॥१६॥ और पुरुषका सम्बन्ध सय कड़ी इसी प्रकार दु सफर कारण है। यह बात बड़े-बड़े समर्थ लोगोंक विषयमें भी स्त्रीप्रसङ्ग एतापसर्वत्र प्रासमारह । ऐसी ही है, फिर गृहासळ विषयी पुरुपके सम्बन्धमें सो अपीघराणां फिमत ग्राम्यस्प ग्रावसः ॥१७॥ काना ही क्या है ॥ १७ ॥ खत ऊर्य प्रमचर्य धारयमजुहोत् प्रमः । इसके बाद भगवान् श्रीरामने प्रमचर्य धारण करके सेहबार पतक असारपसे अग्निहोम किया ॥१८॥ प्रयोदशाम्बसाइस्रमनिहोत्रमखण्डितम् ॥१८॥ तदनन्तर वएना स्मरण करनेवाले भोंके ट्रयमें अपन मारमा एदि विन्यस्य विद्ध दण्डकाप्टफै । उन घरगकमको सापित करके, जो दरक्सनके कोटसे बिंध गये थे, अपने म्वर्यप्रकाश परम ज्योतिर्मय खपादपल्लव राम आत्मन्पोतिरगाव तस ॥१९॥ | धाममें चले गये ॥ १९ ॥ नेदं यशो रघुपतेः सुरयासपास परीक्षित् ! मगवान्के समान प्रतापशानी और कोई मही, फिर उमसे वाकर तो हो ही कैसे सकता है। उन्होंने देताओंकी प्रार्थनासे ही यह लीग-विग्रह धारण लीलात नोरधिकसाम्पषिमुकधाम्नः । किपा पा । ऐसी स्पितिमें रघुवराशिलोमणि मगवान् श्रीयम् | केमिये यह को बड़े गौरवकी बात नहीं है कि उनोन अन शासोंसे राममोंको पर शसा या ममुरपर पुम बाप रोवधो जसपिए धनमसपूर्ण रिया । मसा, उग्दे शत्रुओं को मारनेके लिये पदोंकी सहायताकी भी आपत्यकता पी क्या है यह सब उनकी किं तम्य शत्रुानने फपय सहायाः॥२०॥ त्येसा ही है ॥२०॥ १ सदमे । २ मरिता ।। सत्रोतापमगत् । ४ अपाये।

६ बीमागवत [२०११ --- यस्सामलं नृपसदस्सुयशोऽधुनापि मान् श्रीयमका निर्मल यश समस्त पापोंक न कर देनवाला है। इतना फैल गया है। गायन्स्पषनमूपयो दिगिमेन्द्रपनम् । दिग्गजोंका श्याम शरीर भी उसकी उम्मस्त से चमक उठता है। मान भी बरे- पिमहा सं नाकपालषसुपालकिरीटजुष्ट रानामोंकी समामें उसका गान करते रहते है। स्वर देता और पृषीके नरपति अपने कम्नीम किरीय पादाम्मुख रघुपति शरम प्रपपे ॥२१॥ उनके चरणकमलकी सेना करते रहते हैं । में उन रघुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीरामचन्द्रकी शरण प्रहण करत सये सोऽभिष्टोपामविष्टोऽनुगसोऽपिषा। है।। २१ ॥ जिन्होंने भगवान् श्रीरामका दशम में स्पर्श किया, उनका सहवास अपषा अनुगमन किया- कोसलास्ते ययुःस्मान यत्र गच्छन्ति योगिनः।।२२।। वे सा के सब तया कोसलदेशके निवासी भी उसी स्लेव में गये, यहाँ बड़े-बड़े योगी योगसाधनाके द्वारा चा पुरुपो रामचरित भवगैरुपधारयन् । १॥ २२ ॥ मो पुरुष अपने कानोसे मगवान् श्रीराम चरित्र सुनता है-उसे सरळता, कोमलसा आदि गुण प्राष्टि होती है। परीशित् ! केवल इतना ही नहीं, । आनुशस्सपरो राजन् फर्मपन्पषिमुपते ॥२२॥ समस्त कर्म वचनोंसे मुह हो जाता है ॥२३ ॥ रागोपन पमा परीक्षितने पूण-भगवान् श्रीराम समक कर्म स भगवान् रामो मातॄन् मा स्खममात्मनः। भाइयोंके साप किस प्रकारका म्पबहार करते थे। त भरत भादि माई, प्रमाजन और सपोप्यासी भगवा वमिन् पा सेऽन्ववतन्त प्रजा पौराध वर॥२४॥ भीरामके प्रति कसा बर्ताव करते थे ! ॥ २४ ।। भीक उपाय मीधुवजी कहते हैं-त्रिमुचनपत्ति श्रीरामने पनसिंहासन स्वीकार करने के बाद अपने भाइर अधादिशद् दिम्बिजये भ्रामिषनेश्वरः । को दिविजयकी भाशा दी और सर्य अपने नियनों आत्मानं दर्शयन् स्वानां पुरीमैधत सानुगः ॥२५॥ टशन देते हुए अपने अनुघरों के साथ वे पुरीकी वेसरे करने लगे ॥ २५॥ उस समय भयोध्यापुरीके मम आसितमागो गोदः फरिणी मदशाकरे । सुगन्धित मस और हापियोंके मदकोंसे सिंघे पते ऐमा जान परता, मानो यह मगरी अपने नामी भगवा म्वामिन प्राप्तमालोक्य मत्ता वा सुतरामिष ॥२६॥ प्रोगमको देखकर वत्पन्त मतवाली हो रही है ॥२६ प्रासादगोपुरमभाचैत्यदयगृवादिषु उसके मइम, फाटक, समामपन, बिहार बोर देवास्त आणि सुवर्णके कदा रस्स्से हए थे और स्थान-स्थामा विन्पस्तहेमकलशैः पताकामिम मण्डिताम् ॥२७॥ पताका फहरा रही थीं ॥ २७ ॥ यह समसमेत सुपार कलेके स्वभे और सुन्दर बों परोंसे सनायी दुई थी गै सपन्तरम्भामिः पहिफाभि सुवाससाम् । दर्पण यस और पुष्यमागओंसे तपा माङ्गरिक शि कारियों और कानकारीसेसारी मगरी जगमगारही पी।२८ परशुभ सम्भिः कृतकौतुम्तोरणाम् ।।२८il नगखामी अपने हाथोंमें तरह-सरहकी में और मावान वमुपपुस्ता पम पारा अगिपाणय । के पास आते और उनसे प्रार्थना करते कि देव 1 पर १ नमो। र बारापषिवाम।। मरम्ममात्परमारिए । ४ गुमतमम् । महारा २०११] नवम स्कन्ध ५७ वाशिपोयुगनुर्देय पाहीमा प्राप्त्वयोवृधृताम्।।२९॥ आपने ही पराहरूपसे पृथ्वीका उद्धार किया था, अब आप हो इसका पान कीनिये ॥ २९ ॥ परीक्षित् ! उस खत प्रजा वीक्ष्य पनि चिरागतं समय जब प्रनाको मालूम होता कि बहुत दिनों माद दिक्षयोस्पष्टगृहा खियो नराः। भगान् श्रीरामजी इधर पवार है, तब सभी स्त्री-पुरुष उनके दर्शनकी लालसासे घर-बार छोड़कर दौड़ पड़ते। आम्म हाम्परविन्दलोचन वे उची-उंची भारियोंपर चा जाते और अतृप्त नेत्रोंसे कमटनयन भगवान्को देखते हुए उनपर पुष्पोंकी बर्ग मठसनेमा फसमैरवाफिरन् ।॥३०॥ करते ॥ ३०॥ अप प्रविष्ट स्वगृह जुष्ट स्वैः पूर्वराबभि । इस प्रकार प्रयाका निरीक्षण करके भगवान् फिर अपने महर्लोम या जाते । उनके वे महरा विर्ती रानाओं अनन्ताखिलफोशाममनोरुपरिच्छरम् ॥३१॥ के द्वारा सेक्ति थे। उनमें इतने बड़े-बो सब प्रकार के सवाने थे, जो कभी सम्पप्त नहीं होते थे। ये बड़ी-बड़ी विठुमोदुम्बरदारैर्यस्तम्भपडिमि बहुम्म्प बहुत-सी साममियोंसे सुसक्रित ये ॥ ३१ ॥ सलमारफतः स्वच्छैर्भातस्फटिफमिचिमिः ॥३२॥ महर्लोके दार तपा देहलियाँ मंगेकी बनी हुई थीं। उनमें जो बम थे, ये वैदूर्यमणिके थे । मरकतमणिक बा चित्रसभि पविकाभिर्वासोमणिगणांशुः । सुन्दर-सुन्दर फर्श थे, तपा स्फटिकमणिकी दीवारें चमकती यती पी॥३२॥रंग-बिरंगी मम्मओं, पताकानों, मुक्ताफलेपिलासैः फान्तकामोपपचिभि ॥३३॥ मणियोंकी चमक, शुद्ध चेतनके समान उज्वल मोती, पूपदीपे मुरभिभिर्मण्ठितं पुप्पमईने । मुनर-मुन्दर मोग-सामप्री, मुगन्धित धूप-दीप तथा फलों के गहनोंसे ने मइस म्यूम सजाये हुए थे। बाम्पोको सीपुम्भि मुरसंकाचैर्नुट भूपणम्पणैः ॥३४॥ मी मूपित करनेवाले देवताओंक समान सी-पुरुष उसकी सेमामें लगे रवे ये ॥३३३१ ॥ परीसिद ! भगवान् तस्मिन् स मगलान् रामः स्निग्धया प्रियपेट्या । श्रीराममी बारमाराम जितेन्दिय पुरुषोंकि शिरोमगि थे। रेमे वारामधीराणामृपभ सीवया फिल ॥३५॥ नीके साप विहार करते थे ॥ ३५ ॥ सभी मी-पुरुष | उसी महलमें वे अपनी प्राणप्रिया प्रमापी पी श्रीसीता सजे च यथाकाल फामान् धर्ममपीरयन् । निनके चरणकमका प्यान करते रहते हैं, वे ही मावान् श्रीराम मात बों तक धमकी मर्यादाका पारन वर्षगान् पहन् नृणामभिभ्यासाधिपष्टय ॥३६॥ करते हुए समयानुसार भोगोंका उपभोग करने यह ॥३६॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या संहितायो मममस्कार धोरीमोपास्पाने एकादशोऽप्पाप ॥ ११ ॥ । ४ मापसे ५ - १ तबाजवम् । २ पर्न न म ।। ता म्पसैमारम्दैमात्र पाम्पनन्पानी यन् । प्राचीन प्रतिमें भीयमगरम्पाने पवना भय ना है। उमा म भीमाभागवत [२०१२ , अथ द्वादशोऽध्याय यावशके शेष रामाभोंका वर्णम भीशु उपाय श्रीगुकदेवजी कहते है-परीक्षित् ! कुशका पुत्र कुशस चातिपिम्तमाभिपषस्तत्सुतो नभ । दुमा अतिथि, उसका निथ, निषधका नम, नमका पुण्डरीफ और पुष्पीकका क्षेमधन्मा ॥ १ ॥ क्षमताका पुण्डरीकोऽथ सत्पुत्रः धेमधन्वाभषचतः ॥१॥ देवानीक, देवानीका अनीह, अनीहफा पारिपात्र, देवानीकम्तताऽनीहं पारियात्रोऽथ वत्सुतः । पारिपात्रका बलम्पल और बलस्पसका पुत्र हुमा यमनाम । स्तो पलम्पलम्तमाद वज्रनामोऽर्फसम्भव ॥२॥ यह सूर्यका अंश या ॥२॥ पानामसे स्वगण, स्वाण से विति और विकृतिसे हिरप्यनामकी उत्पत्ति हुई। खगणस्तस्सुतम्तमान वितिभाभवत् सुतः । घा जैमिनिका शिष्य धीर योगाचार्य पा ॥ ३ ॥ खतो हिरण्यनाभोऽभूत् योगाचार्यस्सु जैमिने ॥३॥ कोसलदेशवासी याझमय अपिने ठसकी शिष्यता स्वीकार कर उससे पप्यारमयोगकी शिक्षा प्रहण की थी। शिप्याकोमल्म प्राध्यात्म पाइपलयोऽभ्यगाव यत । पा योग एपकी गाँठ काट देनवाला तथा रिम सिदि योग महोदपमृपिदयग्रन्धि मेदकम् ॥ ४॥ | देनेवाण है ॥ १ ॥ हिरण्फ्नामका पुष्प, पुष्यका भुवसन्धि, ध्रुवसन्धिका सुदर्शम, सुदर्शनका अमिपर्ण, पुग्यो हिरण्मनाभस्य धुवसन्धिस्ततोऽभयत् । अग्निश्यका शीघ्र और शीघका पुत्र मा मह ॥ ५ ॥ सुदर्शनोऽयामिवर्ग शीघ्रस्तस्स मरु मुत ॥५॥ महने योगसाधनासे सिद्धि प्राप्त कर ली और वह इस समप भी कलाप नामक माममें बसा है। कमियुगके पोऽसागास्ते पागसिद्ध कलापप्राममाश्रितः । मस्तमें सूर्यशके नष्ठ हो मानेपर स उसे फिरसे कलेरन्ते स्यवंश नष्ट भायमिता पुनः ।। ६॥ चणयेगा ॥ ६ ॥ महसे प्रमुखत, उससे सन्धि और तस्मात् प्रमुश्रुतस्तस्स सन्धिस्वस्याप्यमर्पण । सन्विसे धमर्पणका जन्म हवा । अमर्पणका माखान् मास्वस्तित्सुप्तस्तमा विश्वमाहोन्यजायत ॥७॥ और महम्यान्का विश्वसाह ॥ ७ ॥ विद्यमावका | प्रसेनजिर प्रसेनमित्का सक्षक और तक्षकका पुत्र पता प्रसेनजित् समात् यसका मविता पुन । पृहक हुआ । परीक्षित् ! इसी वृहदको तुमारे पिता सतो परमला यस्तु पित्रा ते समरे इस ॥८॥ | अमिमन्युने पुरमें मार गटन वा ॥ ८ ॥ पतहीश्याम्पाला अतीता भूषनागतान् । परीचित् ! श्वाकुवश्य इतन नरपति हो चुके है। अब धानेवारोंफे विम्यमें मुनो । वृद्धाका पुत्र होगा पहलस्प भयिता पुत्रो नाम वृहद्रम ॥९॥ उरुफियस्ततम्तम्प पत्मादा भविष्यति । धम ॥ ॥ पृावणा ठरक्रिय, उसका वरसाय, परमारका प्रतिम्याम, प्रतिस्पोमका भानु कार मानुका प्रतिम्पामम्तता भानुपियाका वाहिनीपतिः ॥१०॥ पुत्र होगा सेनापति Pपाफ ॥ १० ॥ दिपायका पीर महदवनता पीग पादचाऽभ भानुमान् । महदयका हरस, गृहरमा म्पनुमान्, प्रतीकामा भानुमत गुप्रताकाऽथ तत्मतः ॥११॥ | भानुमान्या प्रतीकाध और प्रतीकापका पुत्र हगा १दौमः। २ मिरिभाभरनत । ३ दनम् । ४ सम्मात् अभूतपुषस्तु मधि । प्राचीन प्रश्मि त पुनः पर पूमानी BIRTY पर्ममान पतम भाया हुआ महिला मिपन्'ि पर पारदपों को दिया? इममें भी मादक म्यानमें मनरेगी पार है। सार अ०१३] नषम स्कन्ध भषिता मरुदेवोऽथ सुनक्षत्रोऽय पुष्कर । सुप्रतीक ॥ ११ ॥ सुप्रतीक्का मटेय, मरुदेवका तस्पान्तरिक्षस्तत्पुत्र सुतपास्तदमित्रजित ॥१२॥ मुनक्षत्र, मुनक्षत्रका पुष्कर, पुष्करका अन्तरिक्ष, कन्तरिक्ष- का सुतपा और उमफा पुत्र होगा अमित्रजित् ॥ १२ ॥ दाबस्तु सस्यापि वर्हिस्तसात् कृतञ्जय । ममित्रजित्से वृहद्रान, वृहदाजसे वर्हि, यहिसे क्तजय, रणजयन्तस्य सुतः सञ्जयो भविता तत ॥१३॥ कृतजयसे रणचय और उससे समय होग्न ॥१२॥ समयका सेमाच्छाम्पोऽथ शुद्धोदोलालस्तत्सुतास्मृव । शाक्य, उसका मुझोद और शुदो का लागल, लाङ्गलका ततः प्रसेनजित् समात् क्षुद्रको मविता सत ॥१४॥ प्रसेनबित् और प्रसेनजित्फ्य पुत्र क्षुदक होग ॥ ११ ॥ रणको भविता तसात् सुरथस्तनयम्ततः । क्षुदकसे रणक, रणकसे सुरथ और मुरय से इस वंशके मन्तिम राजा सुमित्रका जम होगा । ये मव खलफे सुमित्रो नाम निष्ठान्स एते पाईदलान्वया ॥१५॥ वंशधर होंगे ॥ १५ ॥ इक्ष्वाकुका यह अंश समितक वाणामय वंश सुमित्रान्तो भविष्यति । ही रहेगा। क्योंकि सुमित्रा ना होनेपर कलियुगमें यवस्व प्राप्य रामान सस्यां प्राप्सतिय कलो ॥१६॥ यह रा समाप्त हो जायगा ॥ १६ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमाईस्या संहिता नमस्कट इसाकुवर्णन नाम शाशोऽप्याय ॥ १२ ॥ अथ त्रयोदशोऽध्याय रामा मिमिके पशका वर्णन भीमुक उवाच मीशुक्वेषजी कहते है-परीशिद ! इश्याकुल पुत्र थे निमि । उन्होंमे या आरम्भ करके महर्षि पतिको निमिरिक्ष्वाकुतनयो पसिष्ठमसर्विजम् । अविवके रूपमें वरण किपा । पसिष्ठजीने कहा कि भनन् । इन्द्र अपने यबके लिये मुझे पहले ही रण बारम्पसत्रं सोऽप्यारशरण प्रागतोऽसि भोगा॥ कर चुके हैं॥१॥ ठनका या पूरा करके में तुम्हारे पास नाऊँगा । तपतक तुम मेरी प्रतीक्षा करना। यह वनिर्वामिप्यामि सामन्मा प्रतिपालय । वात सुनकर यजा निमि चुप हो ये और वसिष्ठमी इन्द्रका या कपने फ्ले गये ॥ २ ॥ विचारवान् निमिने तूष्णीमामीद् गृहपतिः सोऽपीन्द्रस्यारोन्मग्वम्।।२॥ | यह सोचकर कि बीवन तो क्षणभङ्गुर है, किम करना उचित म मममा और यह प्रारम्म कर Pया। मयनक निमिथलमिद विद्वान् सत्रमारभवात्मवान् । गुरु बसिष्ठबी न लौटें, तवतका लिय ठनोंने दूसरे विजोंको बरण कर Pिया ॥ ३ ॥ गुरु पमिमजी विम्भिरपरस्तावमागम मारता गुरु ॥३॥ अव इन्द्रका या सम्पन्न करके लाट, ता उन्होंने देखा कि उनके शिम्प निमिन तो उनकी बात म मामकर यज्ञ शिप्यम्पतिझम वीक्ष्य निर्त्य गुरुरागवः । प्रारम्भ कर किया है। उस समय उन्होंने पाप Pा कि निमिको रुपमी विचारशीना और पाहिल्या पहा बापत् पतवान् हो निमेः पण्डिसमानिनः ॥ ४॥ धर्म इसप्पिये इसका शरीरपात जाया ॥ १ ॥ १ रस्त । २ तस्मात्साम्पोन । ३ मा स्मृताः । ४ पणनुष्यने श्रीरामचरित ।

भीमद्भागवत निमि प्रविददौ पापं गुरवेऽधर्मवतिने । मिमिकी दरिमें गुरु पसिष्ठका यह शाप धर्मके मनुक्ल मही, प्रतिकूल पा । इसलिये उनोंने मी शाप दिया कि धवापि पतसाद देहो लोभाव धर्ममवानस ॥५॥ बापने प्रेमवश अपने धर्मका नादर नहीं किया, इसलिये आपका शरीर भी FR माया ॥५॥ यह कहकर इत्यत्ससर्व स्व देह निमिरमात्मकोविदः । भारमनिपामें निपुण निमिने अपने शरीरका त्याग कर दिया। परीक्षित् ! इकर हमारे पूर प्रपितामह पसिष्ठबीने मी मित्रावरुणयोर्मझे उर्वश्या प्रपितामह ॥६॥ अपना शरीर त्याग कर मित्रावरुणके द्वारा उशीके गर्मसे जन्म ग्रहण किया ॥ ६ ॥ रामा निमिक यसमें बाये गन्धवस्तुप तदेह निधाय मुनिसचमा । ए श्रेष्ठ मुनियोंने एमाके शरीरको मुगन्धिस पस्तोंमें रख दिया । जव सत्रयागकी समामि हुई और देवतामोग समाप्ते सत्रयागेऽध देवामनः समागसात् ।। ७१ जाये, तब उन लोगोंने उनसे प्रार्थना की ॥७॥ महानुभावो ! बाफ्लोग समर्प हैं। यदि आप प्रसन राखो बीरतु देहोऽम प्रसमाः प्रभवो यदि । तो रामा निमिका या शरीर पुन जीवित हो उठे। वक्ताओंने कहा-'ऐसा ही हो । उस समय निमिने सपेस्युक्ते निमिः प्राह मा भूमे देशमन्धनम् ॥ ८॥ कहा --'मुस दोका धन मही पाहिये ॥ ८॥ विचार- शीठ मुनिबन मफ्नी मुद्धिको पूर्णरूपसे श्रीभगवान्में ही यस्व योग न पाम्छन्ति वियोगमयकातरा । लगा देते है और उन्होंके चरणकमलोमा ममन करते हैं। एक-न-एक दिन या शरीर मपश्य ही छ्टेग्य-- --स भवन्ति परणाम्भोज मनयो हरिमेयस ॥९॥ भयसे मीत होनेके कारण ये इस शरीरका भी संयोग ही नहीं चाहते, ये तो मुक ही होना चाहते है॥०॥ देई नावालस्सेst दुःखसोकमयापहम् । वत मैं मग दुग्छ, शोक और भपके मूल कारण इस शरीरको धारण करना महीं चाहता । जैसे जलम माली- सर्वत्रास मतो मृत्पर्मस्पानामदके यथा ॥१०॥ के लिये सर्वत्र ही मृत्युके मासर हैं, जैसे ही इस शरीरके लिये मी सव कही मृत्यु-ही-मायु ॥ १० देवतामे कहा- -मुनियो ! रामा निमि बिना विदेह उप्पयां कार्म लोचनेषु शरीरिणाम् । शरिकेही प्राणियोंके नेत्रमि अपनी इअक अनुसार निवास करें । थे वहाँ राकर सूक्ष्मशरीरसे भगवान्का उमेफ्णनिमेषाम्पा लक्षितोऽध्यात्मसंसितम।११।। चिन्तन करते हैं । पलक उठने और सिनेमे सनके मस्तित्वका पता चलता रहेगा ।। ११ ।। इसके बाद अरामकभय नृपां मन्यमाना महर्षयः । मयिने यह सोचकर कि रानाके न रानेपर ठोमि देह ममन्युः म निम कुमारः समवायठ ॥१२॥ धरानकता फैल जायगी । निमिके शरीरका मन्पन किया, उस मबनसे एक कुमार उत्पम ना ॥ १२ ॥ स्न्म जन्मना जनकः सोऽभूत् वैदेहस्तु विदेशवः । लेने के कारण उसका नाम मा जनम । विदेइसे उत्पम १।२ बाभयात् । देषा वपुः २०१३] नवम स्मन्ध मिथिलो मथनामातो मिथिला येन निर्मिता ॥१३॥ होनेके चरण मेंदेह और मन्पनसे उत्पम होनेके कारण उसी वाटका नाम 'मिपिल दुआ । ठसीने मिफिल्मपुरी क्सायी ॥ १३ ॥ तसादावमुन्तस्स पुत्रोऽममन्दिवर्धन | परीक्षित् | उनका उपस, उसका नन्दिन, सतः सुफेतस्तस्यापि देवरावो महीपते ॥१४॥ नन्दिवर्धनका मुकेतु, उसका देवरान, देवगतका वृहदप, वृहद्रपया महावीर्य, महावीर्यका सुति, मुतिका धृष्टकेतु, वसाद पृहद्रयस्तस्य महावीर्य सुत्पिता। धृष्टकेतुका इर्यच और उसका मरु नामक पुत्र सुरतेईएकेतु हर्यश्वोऽथ महन्तत ॥१५॥ प्रभा ॥१११५॥ मल्से प्रतीपक, प्रतीपक्से कृतिश्प, मरो प्रतीपकन्तम्मामात कैतिरथो यत । कृतिरथसे देवमीठ, देवमीवसे विद्युत और विश्रुतसे देवमीठम्तम्म सुतो विधुतोऽथ महाएति ॥१६॥ महातिका जन्म मुभा ॥ १६ ॥ महानिका कृतिरात, विरातम्ततस्तसान्महारोमाप उत्सुतः। पतिरातका महारोमा, महारोमाका स्वर्णरोमा बौर स्वर्ण म्वर्णरीमा मुसम्तस्म इस्वरोमा पजायत ॥१७॥ रोमाका पुत्र हवा इसरोमा ।। १७ । इसी इसरोमाके पुत्र महाराज सीरप्पन ये। जब पडके लिये धरती बस सोरचजो समे यज्ञार्थ कर्पतो महीम् । जोत रह थे, तब उनके सीर (ल) के समभाग सीसा सीराप्रताजावातमात् सीरच्या स्मृतः॥१८॥ (फास ) से सीतानीकी उत्पत्ति पूई । इसीसे उनका नाम शम्यजन्तस्य पुत्रस्ततो धर्मचनो नृप । 'सीरपज पा॥१८॥सीरपरके कुशवम, कुशधन धर्मध्वजस्म दो पुत्रौ कसध्वजमितचौ ॥१९॥ के धर्मपत्र और धर्मपत्रके दो पुत्र हुए-नयन कृतचजात् केशिध्वज खाग्रिक्यस्तु मितम्बमात् । और मितपत्र ॥ १० ॥ कतपत्रके केशियन बोर स्वचजसुतो राजमात्मवियाविधारद ॥२०॥ मितजनके माणिक्य हुए । केशिप्पन मारमविपा मा साणिक्य फर्मतत्वझो भीस फशिभ्यबाद हतः । प्रवीण पा ॥२०॥ साण्डिस्य था क्सकायका मर्म । पा केशिपबसे भयभीत होकर माग गया । फेशियमका भानुमस्तिस्य पुत्रोऽभूछतपुम्नस्तु वत्सुकः ॥२१॥ पुत्र भानुमान् और भानुमानका सातधुन्न पा॥ २१ ॥ शुधिस्तचनयस्तमात् सनदानस्ततोऽमवत् । शतयुग्नसे अधि, शुचिसे सनाज, मनहानसे उम्रकेतु, ऊर्चकेतु सनदाजादवाऽप पुरुजित्सुत ॥२५॥ उम्वकेतुसे अञ, वासे पुरुजित्, पुरुजित्से अरिष्टनेमि, मरिएनेमिस्तस्यापि वायुस्तत्सुपाफ । अरिटनेमिसे शुायु, श्रुतायुसे मुपावक, सुपालकसे चित्ररप और चित्ररपसे मिथिलापनि क्षमधिका जन्म वतमित्ररयो यस्स धेममिमिथिलाधिप ॥२३॥' हुआ ॥ २२ २३ ॥ मधिसे समरप, समरपसे सस्यरप, तमा समरथस्तस्प सुत सस्यरथस्ततः । सरस्परपसे उगुरु और उपगुरुसे ठपगुम नामय पुत्र आसीदुपगुरुम्तम्मादुपगुप्तोऽमिसंभव ॥२४॥ दुमा । यह अग्निका वैश पा ॥ २१ ॥ उपगुप्तका रक्षामन्त, वसनन्तका पुयुष, सुधका मुमपण, मुमायण वस्खनन्साऽथ सत्पुरो युयुधो यत् मुभापण । । पर मृतभुतका भय, नयका विजय और विजय प्रस श्रुतम्ततो जयम्तसाद विषयोऽमारत मुतः ॥२५|| गामक पुत्र हुआ ॥ २५ ॥ ऋता शुनक, गुनक्सा शुनफन्तत्सुतो अग्ने चीतदम्या विम्तत । बीमाइन्यबीनण्यास प्रति, भूतिका बयप, पाम मलामा प्रतेन्तस्य कृतिरस्य महावनी ॥२६॥ का पति और पतिका पुत्र हुषा महावशी ॥ २६ ॥ १ पो । प्रतिग्पा ।। रिनायो माधवि ।५ शिखरमुताम्मा । ५ सम्मान् । • मोरपसमूता रामन् पसः । ८ साभूत् । ९ गुरुवस्ति ।१ पोरया ! ११ माफ्यो ।

६२ भीमद्भागवत [अ०१४ पते थे मैथिला रावनात्मविपाविश्वाग्दा । परीक्षित् | ये मिमिलके वंशमें उत्पम सभी नरपति मैपिमा फाइल्पते हैं। ये सव-के-सब बामझानसे सम्पन्न एवं गृहस्थाश्रममें रते हुए मी मुस-दस बादि इनोसे योगेधरप्रसादेन इन्र्सका गृहेष्वपि ॥२७॥ | मुफ ये । क्यों न हो, यामवस्क्य वादि बरे-बड़ योगेवरों- की इनपर महान् कपा मो पी ॥ २७ ॥ इति श्रीमनागक्ते महापुराणे पारमाईस्यां सहितायां नमस्कम् निमिवंशानुवर्णन नाम प्रयोदयेऽप्याय ॥ १३ ॥ अथ चतुर्दशोऽध्याय सन्द्रवशका वर्णन भीमुक उवाच भीगुब्वेषजी कहते हैं-परीक्षित् ! मन मे तमें चन्द्रमाके पावन बंशका वर्णन सुनाता हूँ। इस मंशमें अधात भूपता राजन् वंशः सोमस्य पावनः । पुरुरवा आदि बोपने पवित्रकीर्ति यवाओंकन कीर्तन पमिभेलादयो भूपा कीर्त्यन्त पुष्पकीर्तयः ॥१॥ किया जाता है ॥ १॥ सहसों सिरपाले विराट् पुरुष नारायणके मामि-सरोक्रके ममउसे प्रमाणीकी उत्पत्ति सहस्रतिरम पुसो नामिहदसरोरुहात् । इई । पानीके पुत्र हुए अभि । वे अपने गुणों के कारण धावस्पासीद सुवोधातरनि पिसमो गुणे ॥२॥ ममानीक सम्पन ही थे ॥ २ ॥ उन्ही पत्रिके नेत्रोंसे अमृतमय पदमाका जन्म हुआ। प्रमानीने चन्द्रमाको सस्परम्पोऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमय किल । मामण, मोपधि मोर मक्षोंका अधिपति मना दिया || सोने तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त की और राजसूप विप्रीपप्पुदगणानां मयमा फरिपस पतिः ॥ ३ ॥ पर किया । इससे उनका धर्मरगा गया वीर सन्होंने साऽपजा राजम्पेन विजित्प मुयनययम् । परपूर्वक पृहस्पनिकी पत्नी ताराको दर लिया ॥ १ ॥ | देवगुरु पृास्पतिन अपनी पत्नीको मौन देनेके लिये पी पृहस्पतदर्पान् सारा नामाइरन पलात् ।। ४ ।। 'उनसे बार-पार यापना की, परन्तु मे इतने मतवाले हो गये थे कि उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नीको नही पदाम दयगुरुणा मारिताऽभीष्णशो मदात् । तीयया । ऐसी परिस्थिनिमें उसके लिये देखना और नात्यजन् वक्तन सम्म पुग्दानाषिप्रद ॥५॥ दानवोंमें घोर समाम छिड़ गया ॥ ५ ॥ शुम्पार्यमीन पुरसतिनीक देपसे वसुरोंक साप चन्द्रमाका पक्ष शुका पदस्पतेपादग्रहाद मामुराइएम् । रिया और महावनीने स्नेहपाश समस्त भूमगोके माप वरने विपागुरु अहियजीक पुत्र पृहस्पतिका पक्ष हा गुग्गुनं स्नात् माभूतगणारत ।। ६॥ दिया ॥ ६॥ देपान इन्वने भी समस्त देवताओंके मरगणापता माना गुरुमन्वयान् । माप अपन गुरु पृहस्पतिमीरी पक्ष लिया।ास प्ररर तायक निमित्तसे दाता और असुरोका मदार मुगारपिनामामृत ममरम्तारकामप ॥७॥ परनेचार बार संग्राम हुमा ॥ ७ ॥ माप्रपा ।२रिनुरोपम् ।

म०१४] नवम स्कन्ध निवेदितोऽथालिसा मोम निर्मप विवाद । मदनन्सर भनिरा भूपिन प्रधामीके पास जाकर यह युद्ध बंद करानेको प्रार्थना की। इसपर अमानीने चम्दमा तारा स्वभत्रे प्रायन्छइन्तपत्नीमवत् पति ॥ ८ ॥ को बहुत रोटा-फरफारा और ताराको उसके पति पृहस्पतिवीके हवाले कर Pिया । जव मृहस्पतिमीको त्पज स्पजाशु दुष्प्रझे मत्सेवादादित परैः। पर मालम मुभा कि तारा तो गर्भवती है, तब उन्होंने कहा ॥ ८॥ टुप्टे ! मेरे क्षेत्रमें या तो किसी दूसरेका नारस्वां भममा सो त्रिय सान्तानिक मति।।९।। गर्म है। इसे तू अभी त्याग दे, तुरंत त्याग दे । र मत, मैं तुझे मलाऊँगा नहीं । पोंकि एफ तो त् सी और तस्याज ब्रीडिता तारा कुमार कनकप्रभम् । दूसरे मुझे भी मन्तामकी कामना है । देवी होने के कारण ए निर्दोष मी है ही ॥०॥ अपने पतिकी बात सुनकर स्पृहामारिसमक्र हमारे सोम एव च ॥१०॥ तारा अत्यन्त लडित हुई । उसने सोनेके समन चमकता हुभा एक वाटफ अपने गर्मसे अग कर दिया । उस ममार्य न तयेत्युच्चस्तमिन् विवदमानयो । बालकको देखकर वृहस्पति और चन्द्रमा दोनों ही मोहित हो गये और चाहने लगे कि यह हमें मिल जाप ॥१०॥ पप्रच्छम्पयो देवा नैवोचे प्रोरिसा तु सा ॥११॥ अव ये एक दूसरेसे इस प्रकार बोर-जोरसे भगदा करने मगे कि यह तुम्हारा नहीं मेरा है। अपियों और कुमारा मातर प्राह पिताऽलीकललया । देताओंने तारासे फूला कि यह किसका का?" साराने सजायश को उचर न दिया ॥ ११ ॥ किं न वोचस्पमतच आरमावध पदाच मे ॥१२॥ बालकने अपनी माताको मुठो सासे क्रोधित होपर प्रया सारा आहूय समप्राचीन मान्त्ययन् । कहा-'दुस्टे 1 तू तखाती क्यों नहीं है तु जपना कुर्म मुझे शीम-से-शीघ्र बता दे ॥ १२ ॥ उसी सोमस्पेत्या शनके मोमस्तं तापदग्रहीत् ॥१३॥ सम्य ब्रह्माजीने त्यसको एकान्समें मुलाकर बहुत कुछ सममा बुधाकर पूछा । तप ताराने धीरेसे कहा कि 'चन्द्रमा- तस्पारमयोनिररूत पुध इस्पभिर्धा नृप । का। इसलिये चन्द्रमाने उस बालकको ले लिया ॥१३॥ | परीक्षित् ! प्रमानीने उस भाष्यका नाम रमय 'मुध', पुदधा गम्भीरया येन पुत्रेणापोहराम मदम् ॥१४॥ स्पोंकि उसकी पुति धनी गम्भीर पी । ऐसा पुत्र प्राप्त करके पन्द्रमाको बहुत बानन्द मा ॥ ११ ॥ तत पुरुरवा मझे इलापा य उदारतः । परीधित् । पुधक दारा इम्मके गर्भसे पुरुरवाका जन्म हुवा । इसका पणन में पहले ही कर चुका है। रूपगुणौदार्यशील विणविक्रमान् ॥१५॥ एक दिन स्न्द्रकी सभा मेवर्षि नारदमी पुरूरवाक साप, गुण, उदारता, शील-समाष, धन-सम्पति और पराक्रमका सुस्वोर्वशीन्द्रभवने गीयमानान् सुरपिंगा । गान कर रहे थे। उन्हें मुनकर उर्वशी दपमै काम- मायका वश्य हो आया और उससे पीपित होकर वदन्तिकमुपयाय देवी सरक्षरादिसा ॥१६॥ देवाना पुरवश्यक पाम पस्यै पायी ॥ १५१९॥ । पिसाट । २ वाय ममाप ।

भीमहागवत [अ० १४ मित्रावरुणयोः शापादापना नरलोकताम् । | यपपि उर्वशीको मित्रावरुणके शापसे ही मृत्युलोकमें व्यना पा पा, फिर भी पुरुषशिरोमणि पुरुरवा मूर्तिम्पन् निशेम्प पुरुषमेष्ठं कन्दर्पमित्र रूपिणम् । कामदेवके समाम सुन्दर है-यह पुनकर मुर-सुन्दरी पृति विष्टम्प ललना उपसस्पे सदन्तिके ॥१७॥ उर्वशीने धैर्य धारण किया वीर यह उनके पास पी | भापी ॥ १७ ॥ देवाना उर्वशीको देकर राग समापिलोप नृपतिर्दपेणोफल्ललोचनः । पुसरमाके नेत्र से खिल उठे । उनके शरीरमें रोमा। उचाप समया वाचा देवी एएसनलः ॥१८॥होगापा । उन्होंने कड़ी मीठी वाणसे कहा-॥ १८ ॥ সুবী राजा पुरुरवाने कहा--मुन्दरी । तुम्हारा सात स्वागतं ते परारोहे वासवा करपाम किम् । है। बैठो, में तमारी क्या सेवा कर तुम मेरे साथ विहार करो और हम दोनों का यह विचार मनन्तका संरमस्य मया सौर्फ रविनी शामती समाः ॥१९॥ तक पता रहे ॥ १९ ॥ उर्वस्सुवान ठबंशीमे कहा-मानन् ! आप सौन्दर्यके मूर्तिमान कस्सास्त्वयि न समेव मनो पहिच सुन्दर । ससप । मय, ऐसी कौन कामिनी है जिसकी पशि चौर मन बापमें मासक म हो जाय ! क्योंकि बापके समीप भाकर मेरा मन रमणकी इचासे वपना धैय तो यवनान्तरमासाप व्यक्त हरिरसपा ॥२०॥ य है ॥ २० ॥ राजन् ! नो पुरुष सम-गुण आदिके कारण प्रशंसनीय होता है, वही लियोको अभीष्ट होता एवापरणको राजन न्यासो रसख मानद । है। अत में आपके साम वय विहार कमी। परन्तु मरे प्रेमी महाराज ! मेरी एक शर्त है । मैं माफ्को सरस्पेभावासार्क साध्यासीमांवरः स्मृतः॥२१॥ धरोहस्के रूप मेमके दो बच्चे सौंपती हैं। वाप इनकी रक्षा करना ॥ २१॥ पीरशिरोमणे 1 में फेवन भी घृत मे वीर भस्मान्नेक्षे त्वान्पत्र मैपुनात् । साऊँगी और मैथुनके अतिरिक्त और किसी भी समय आपका कमहीन न देख सकेंगी। परम मनसी पुरूरवाने ठीक-ऐसा कहकर उसकी शर्स सीकार कर विषासस स्पेति प्रविपेदे महामनाः ॥२२॥ श्री ॥ २२॥ और फिर उर्वशीसे कहा-म्हारा यह सौन्दर्य महत है। हमारा मान असीकिक है। यह आहा रुपमहा भावो नरलोकविमोचनम् । तो सारी मनुप्पसृष्टिको मोहित करनेवाल्म है। और | देवि स्पा करके तुम सब यहाँ वायी थे। फिर कौन कान सेवेत मनुमा ठेवी स्वां स्वपमागताम् ॥२३॥ ऐसा मनुष्य है, जो तुम्हारा सेवन न करेन । ॥ २३ ॥ तपा स पुरुपभष्ठो रमयन्स्पा यथाईतः । पीक्षित् ! तब उपशी कामशासोक पद्धविसे पुरुष श्रेष्ठ पुस्तयाके साप विहार करने स्गी। मी पेक्तामों- की रिहारस्वती पैमाप, मन्दनम्न मादि उपनाम रमे मुरविवारे काम क्षेत्ररथादिपु ॥२४|| उसके साप वन्द विहार करने लगे ॥ २९ ॥ देवी उर्वशीके शरीरसे कमानेसरकी-सी गन्ध निकम रममाणम्तमा दय्या पमफिनसकगन्धया। करती थी। उस साम राना युसराने गत वोक्क सा । २ नर मुरी छ । ता पसयामप्यः | ४ सपा पति । ।

अ०१४] नयम स्कन्ध , व मुखामोदमपितो समुदेहर्गणान् पहुन् ॥२५॥ , मानन्द-विहार किया । वे उसके मुसकी सुरभिसे वफ्नी सुष-युध सो वैठते ये ॥२५॥ वर नव इन्द्रने उपशीको सपन्यन्नुर्वशीमिन्द्रो गधर्वान् समघोदयत् । नही देखा, तब उन्होंने गच्चोंको उसे छानेके लिये भेजा और कहा- 'उर्वशीके बिना मुझे यह स्वर्ग फीका उर्वष्ठीरहित मघमासानं नातिशोभते ॥२६॥ बान पाता है। ॥ २६ ॥ ये गन्धव आधी रात के समय घोर अन्धकारमें वहाँ गये और उर्वशीके दोनों भेदोंको ते उपेत्य महाराने समसि प्रत्युपस्सिते । जिन्हें उसने राजाके पास घरोहर रखा था, चुराकर चन्से बने ॥ २७॥ उशीने जब गन्धक दाय लेनाये उर्वश्या उरणौ जायस्तो राजनि बायया ॥२७॥ नाते हुए अपने पुत्रके समान प्यारे मेगोंकी - मुनी, तब यह कर उठो कि 'भरे, इस कायरको अपना सामी निष्ठम्याक्रन्दितं देवी पुत्रयोनीयमानयो । बनाकर मैं तो मारी गयी । यह नपुंसक अपनेको बा वीर मानता है, यह मेरे मेगोंको भी न वचा इतास्म्यहं कुनाघेन नपुंसा वीरमानिना ॥२८॥ सका ।। २८ ॥ इसीरर विश्वास करने के कारण लटेरे मेरे पोंका एटकर लिये गा रहे हैं। मैं तो मर गयी। यदिभम्भादह नष्टा इतापत्या च दस्युभि । देखो तो सही, यह दिनमें तो मद बनता है और यतमें त्रियों की तरह ररकर सोया रहता है। ॥२९॥ परीक्षित् ! य शेते निम्ति संप्रस्तो यथा नारी दिया पुमान ॥२९॥ से कई हाथीका अंकुशसे व गले, वैसे ही ठवशीने भपन गवन-वाणोंसे राजाको वाप दिया । राना पुरुरवाको इति पासायकर्षिद प्रतोस्त्ररिव फुलर । पा क्रोध माया भीर हापमें तलवार लेकर क्सहीन निष्क्षि निखिंशमादाय विवस्त्रोऽम्पद्रवद्रूपा ॥३०॥ अवस्थामें ही वे उस बोर दौड़ पड़े ॥ ३० ॥ गधर्मोन मनके प्रपटते ही मेरोको तोही मे दिया और सय ते पिसुन्योरपी तत्र व्यपोतन्त स विपुत । बिजलीकी तरह चमकने लगे । जय राग पुरुरवा भेदोको सेकर मौटे, तब उर्वशीने उस प्रकाशमें ठरें आदाय मपावापान्तं नममैवत सा पतिम् ॥३१॥ | वसहीन-अस्पामें देख रिया । (वस, वह उसी सम्प उन्हें छोस्कर चली गयी) ॥१॥ ऐलोऽपि अयने नायामपश्यन् विमना इस । परीक्षित् ! राजा पुरुरवाने नव अपन शपनागारमें अपनी प्रियतमा उपशीको नहीं देसा तो ये अनमने हो तविषो विहल शोषन् पम्रामोन्मत्वन्महीम् ॥३२॥ गये । उनका चित उपशीमें ही पसा हुआ था। वे उसके | छिये शोकसे भिम हो गये और ठमवकी मति पृषीमें स तां यीश्य कुरुक्षेत्र सरम्पत्यां च तत्सस्तो । इधर उधर मकने लगे ॥ २२ ॥ एक दिन फुरुक्षेत्रमें सरस्वमी नदीके सरपर ठन्होंने उर्वशी और उसकी पोच पत्र प्रहटवदना प्राह सूक्तं पुरुरवा ॥३३॥ | प्रसनमुखी सखियोंको देना और बड़ी मीठी पाणीसे महा--३३॥ 'प्रिये ! तनिक मर नाजो । एकवार अहा आये तिष्ठ तिष्ठ पार न त्यस्तुमर्हसि । मरी बात मान । । निष्ठुरे ! मब बाब तो मुस मुस्ली १ रिश्ता । २ किया । E

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नव . स्पाली न्यस्य बने गत्वा गृहानाच्यायतो निशि। ये॥१२॥ मम उन्हें होश षा, सब वे स्पालीको पममें ओस्कर अपने माळमें लौट आये एप रातफे सम्प तामां संप्रात्तायां मनसि अय्पवर्सत ॥४३॥ वर्षशीका प्यान करते रहे । इस प्रकार बव प्रेतायुगका प्रारम्म पुषा, तब उनके दयमें सीनों घेद प्रकट सालीसानं गतोऽवत्वं शमीगर्म पिलक्ष्य सः। पए ॥ १३ ॥ फिर थे उस स्थानपर गये, जहाँ उन्होंने पर मनिस्वाती छोकरी पी। अब उस स्पामपर शमीक्षके तेन दे अरणी फत्या उर्वशीलोककाम्पया ॥४४॥ गम एक पीपलका व उग भाया पा, उसे देस्कर सनोंने उससे दो परणियों ( मन्यमकाष्ठ) पनाया । उनी मन्यतो पायमधारणिमुचराम् । फिर उन्होंने उर्वशीलोककी कामनासे मीचेकी माणिको आत्मानमुभयोर्मध्ये यत् वद प्रजनन प्रभुः ॥४५॥ उर्वशी, उपरकी वरणिको पुरुरवा घोर पीचके काष्ठको पुत्ररूपसे बिम्तन करते हुए बनि प्रचलित करनेवाले तस्त्र निर्मन्यनामातो जातवेदा विभावसुः । मन्त्रोंसे मन्पन किया ॥१११५॥ उनके मन्मनसे भातदा' नामका वप्नि प्रकट हुआ । रामा पुरुरवाने प्रय्या स विधया राक्षा पुत्रत्वे फरिपतसि ॥४६॥ वमिवक्ताको प्रयीविधाके द्वारा बाइक्नीय,गाहफ्त्य और तेनायबत यो भगवन्तमधोषजम् । दक्षिणामि-म तीनों मार्गोंमें विभक्त करके पुत्ररूपसे सीकार कर लिया ॥ १६॥ फिर उर्वशीटमेफकी असे उर्षष्ठीलोकमन्विच्छन् सनदेवमय हरिम् ॥४०॥ पुरुरवाने उन तीनों बमियोद्वारा सर्वदक्खरूप इन्द्रियातीत यापति भगवान् श्रीहरिका पचन किया ॥ १७॥ एफ एष पुरा घेद प्रणव सर्वपाड्मयः । परीक्षित् । त्रेताके पूर्व सत्ययुगमे एकम्पत्र प्रणव (कार) ही वेद पा । सारे वेद-शाम उसीके अन्तर्भूत देखो नारायणो नान्य एकोऽपिवर्ण एव च ॥४८॥ ये । देवता ये एकमात्र मारयम और काई म पा । बमि मी तीन नहीं, केवळ एक पा वौर वर्ण मी केवल एक 'स' ही पा ॥ १८॥ परीक्षित् । ताके प्रारम्भमें पुरूवस एवासीत् प्रयी वामसे नप । पुख्रबासे ही वेदनपी और वामित्रयीका बानिर्मात्र हवा । रामा पुरुरपाने वमिको सन्तामरूपसे सीकार करके अपिना प्रबया राजा लोर्फ गान्धर्षमेयिवान् ॥४९॥ गन्धर्ममेककी प्राप्ति की ॥ १९ ॥ इति श्रीमहागवते महापुराणे पारमईस्या संहितापा मगमत्काधे ऐमेपास्याने चतुर्दशोऽम्याप ॥१९॥ मथ पञ्चदशोऽध्याय अधीक समदनि मौर परशुरामसीका परिम भी क उवाच भीगुफलेपजी कहते हैं-परीशित् ! सशीके ऐलस चोर्वशीगर्भात् पटासन्नात्मजा नृप । आय वायु सस्पाप रयोऽथ विजयो अपः ॥१॥ गर्भसे पुरुरवा पुत्र हुए-मापु, शुतायु, सस्पायु १ बिहोस । २ रेपेयं ।। प्राचीन मतिमें इसके पर प्रेमको पा पाठ मधिक है।४ पाररापविपर।

६८ श्रीमद्भागवत [अ०१५ ध्रुवापोर्वसुमान् पुत्र सत्यायोम भुवजय । स्य, विजय और जय ॥ १॥ वायुका पुत्र पा वसुमान, रयस्य सुत एफप जयस्प तनमोऽमितः ॥२॥ सत्यायुका शुतमय, स्यका एक और नफका अमित ॥२॥ विमयका मीम, भीमका कानन, काचनका होत्र, और भीमस्तु विजयस्साथ फायनो होत्रकम्तत । होत्रका पुत्र या मा । ये महु वही थे, ना गानीको सस्स चा मुखो गहां गड्पीरुत्य मोऽपिनत् । अपनी वाशिमें मार पी गये थे । महका पुत्र का जहोस्तु पूस्तत्पुत्रो षलाकथात्मजोऽबफ ॥३॥ (पूरु, फूलका बस्यक बीर बहाक्का भनक ॥ ३ ॥ ततः कुशः शस्यापि साम्मुस्वनयो बमुः। भनक्का फुश था । फुशके चार पुत्र ये--कुशाम्मु, हुमनाभय चत्वारो गाधिरासीत् कुचाम्पुजा ॥४॥ तनय, वा और कुशनाम । इनमें से कुशाम्मुके पुत्र गाषि ए॥१॥ तस्स सत्पषी कन्यामृचीकोऽपाचत द्विजः । परीक्षित् । गाषिकी कन्पाका नाम पा सत्पाती । चीक अपिने गाभिसे उनकी करया मगी। गाधिने परं दिसणं मत्वा गाभिर्भार्गवमप्रवीत् ।।५।। या समसकर कि ये कत्याफे योम्य र नहीं है, अचीकसे एकत श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् । कहा-॥ ५॥ 'मुनिकर हमलोग कुशिक पशके है। हमारी मया मिनी कठिन है। इसलिये भाप एक सहस्रं दीयता शुल्क कन्याया इशिका वयम् ।।६॥ हनार ऐसे घोड़े छाकर मुझे भुस्करूपमें दीमिये, बिनका सारा शधर सा श्वेत हो, परन्तु एक-एक काम श्याम पर्णका हो॥ ६ ॥ जय गाधिने यह बात कही, तब इत्युक्तम्तन्मतं मास्था गत स परुणान्तिकम् । चीफ मुनि उमका बाशय समझ गये वीर वरुणके पास गाकर से ही पोरे से बाये तथा उनै देकर आनीप दया तानधानुपम वराननाम् ॥७॥ सन्दरी सम्पतीसे विवाह कर रिमा ॥ ७॥ एक बार महर्षि अचीकसे उनकी पसी और सास दोनोंने ही स भूमि प्रार्थित पत्न्या अथ्वा चापत्यकाम्पया। पुत्रप्राप्तिके लिये प्रापना की । महर्षि चीकने उमकी प्राथना सीकार करके दोकि रिपे सामग-अलग मन्त्रोंसे अपयित्वाभयमन्त्रभर सातुं गतो मनि ॥८॥ घर पकाया मोर मान करनेके लिये चले गये ।। ८ ॥ सस्पवतीकी माने या समझकर कि अश्मेि वपनी परीके वायत् सत्यवती मात्रा स्वचरं याचिका सती । | जिसे श्रेष्ठ पर पकाया होगा, उससेवा पर मंग सिम्या । इसपर सम्पतीन वपना पर वो माको दे दिया और भर मत्वा तेयायन्छन्माने मातरदत् खपम् ।।९।। मका या यह सर्प स्थ गयौ ॥ ९॥ जब अधीक मुनिक इस बासका पता पम, ता धमोंने अपनी पत्नी वन विमाय मनिः प्राह पत्नी काटमारपी । स्पस्तीसे कहा कि तुमने बहा वन कर गया। पारा दणपरः पुत्रा माता व प्रमविचमः ॥१०॥ होगा और तुम्हारा माई होगा एक श्रेष्ठ प्रसवेवा ॥१०॥ भब तुम्हारा पुत्र तो यो दण देनेवामा भोर प्राम- प्रमादिन मृत्यवत्या मैप भूदिति भागर । सपनीने चीक मुनिको प्रसम किया भार प्रार्पना की कि 'सामी ! ऐसा नहीं होना चाहिये । म उन्होंन मध सहि भएन् पीया जमदनिम्नवाऽभवन् ।।११।। महा-'अछी बात है । पुत्रके म मे तुम्हारा पौत्र १ समदरमा माय ।

नवम स्मन्ध मा चाभूत सुमहापुण्या कौशिकी लोकपाचनी । पैसा (घोर प्रकृतिका ) होगा ।' सम्पपर सस्पत्तीके गर्भसे जमदमिका कम गुभा ॥११॥ सस्पवती समस्त रेयोः मुतां रेणुकां वै जमदमिरुषाह याम् ॥१२॥ लोकको पवित्र करनेवाली परम पुण्यमयी 'कौशिकी' नदी बन गयी। रेणुपिकी कन्या थी रेणुका । नगदमिने उसका तसा रे भार्गवश्वपः मुता पसुमदादयः । पागिमाण किया १२॥ रेणुकाके गर्मसे नमदमि पिके वसुमान् आदि कई पुत्र हुए। उनमें सबसे छोटे यत्रीयानम एतेषां राम इत्पभिविभुतः ॥१३॥ परशुरामजी थे । उनका यश सारे ससारमें प्रसिद्ध है ।। १३ । फाते हैं कि यवशा मत करनेके लिमे सयं भगवान्ने ही परशुरामके रूपमें शावतार पमाहुर्वासुदेवांश हेहपानां छलान्तकम् । | महण किया था । उन्होंने इस पृमोको इसीस बार क्षत्रियहीन फर दिया ॥ १५ ॥ यपपि क्षत्रियोंने उमका विसप्तमत्वो यामा चके नियत्रियां महीम् ॥१४॥॥ योगा-सा ही अपराध किया था-फिर भी वे लोग पो दु, प्राणों के अमल, रजोगुणी पौर विशेष करके तुएं पर सवो मारमममण्यमनीनश्चत् । तमोगुणी हो रहे थे । यही कारण पाकिये पुप्पीके मार हो गये थे और इसीके फलसरूप मगान् परायम- रमन्तमोत्तमान् फरगुन्पपि फसेंप्रसि ॥१५॥ में उनका नाश करके पृष्पीका भार उतार दिया ॥१५॥ राजा परीक्षितने पूछा-मान् ! लक्ष्य ही उस रागोबार समयके क्षत्रिय विश्पोटप हो गये थे, परन्तु उनाने हिं पदहो भगवतो रामन्यैरजितात्मभिः । परशुरामयीका ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया, मिसके करण उन्होंने बार-बार क्षत्रियोंके का संहार किया॥१६॥ हवं येन पर्ल नष्ट पत्रियाणामभीष्मः ॥१६॥ भीशुकदेवजी कामे ग्ये. परीक्षित् ! उन दिनों पशा अधिपति पा वर्जुन । एक श्रेष्ठ क्षत्रिय पत्रिपर्पभः । पा । उसने भनेकों प्रकारकी सेवा-सा करफे मगवान् नायपणके मंशमवतार दत्तात्रेयसीको प्रसन्न कर लिया दप नापणसांधमाराम्य परिफर्मभिः ॥१७॥ भोर उनसे एक हजार मुमाएँ वन को भी शत्रु पुर में परामित म कर सके-पह परदाम प्राप्त कर दिया। भइन् दशशत लेमे दुर्पस्वमरासिपु । साथ ही इन्द्रिका अबाध बल, मम सम्पति, असिता, वीरता, कीर्ति मौर शारीरिक बल भी उसने मप्पाहतेन्द्रियौन श्रीबोवीर्ययशोलम् ॥१८॥ उनकी कृपासे प्राप्त कर सिपे थे ॥१७-१८॥ यह योगेघर हो गय पा। उसमें ऐसा ऐप पा कि यह पागेपरत्वमेधर्य गुणा यत्राणिमादयः । समसे सम्म, त्यूल सेक्यूल रूप धारण कर मेना ! सभी सिद्धियाँ उसे प्राप्त पी । समारमै प्रयुकी तरह पचाराव्याहवगतिलोकेषु परनो यथा ॥१९॥ सब जगइ बरोकटोक निचरा करता ॥ १९ ॥ १ पाइरन् । १ मारण्पणिपार पाहोई ।। मेसम् । सानामधिपतिरर्जुनः - - ७० [२०१५ श्रीमड़ागवत सीरमैरासः क्रीडन् रेवाम्भसि मदोत्कटः । एक बार में पेमपन्ती मारा पड़ने सहसवार न मत-सी सुन्दरी सियोंके साथ मर्मदा नदीमें बस-विधान वैजयन्तीं सच पिसव सोप सरित सबः ॥२०॥ कर या पा। उस समय मदामत्त सहस्रबाहुने अफ्नी बोहोंसे नदीका प्रवाह रोक दिया ॥ २० ॥ दण्मुस रावणका शिविर भी वहीं कही प्रासमें ही पा । नदीकी विष्ठावितं स्खशिविरं प्रतिस्रोतासरिमले । घारा उल्टी यहने स्टगी, जिससे उसका शिविर इक्ने स्मा | राबण अपनेको महत परा धीर सो मानता ही पा, इसलिये सहसा नकन यह पराक्रम उससे साम नामृप्पद वस्य स भीर्य वीरमानी दशाननः ॥२१॥ नहीं था |॥ २१॥ नय रापण सहस्रबाहु पर्यनके पास माकर मुरा मठा करने ल्या, तब उसने सियों के सामने गृहीवो लीलया स्त्रीणां समर्थ रुतकिलिपः । ही सेल सेल्में रावणको पका लिया चौर सपनी एक- | पानी मारिणतीमें ले जाकर बंदरके समाम कैद कर लिया। पीछे पुलस्पनीके कहनसे सहसमाहुने रावणको माहिष्मत्यां संनिरुदो मुको मेन कपिर्मया ॥२२॥ र रिया ॥ २२ ॥ स एकदा मृगयो विचरन् बिपिने पने । एक दिन सहस्रबार असुन शिकार सेग्मेके मि बड़े घोर जंगलमें निकल गया प । देवश का मगदम भरच्याऽऽभमपद अमदमेवपाविष्ठत् ॥२३॥ मुनिके आश्रमपर जा पाँचा ॥ २३ ॥ परम तपक्षी समै स नरदेवाय मुनिरर्पणमाइरत् । | नमदग्नि मुनिके वामममै कामधेनु रहती थी । उसके प्रतापसे उगोंमे सेना, मन्त्री और पानोंके साप ससैन्यामास्पयाहाय इषिप्पस्या तपोधनः ॥२४॥ हमाधिपतिका खूब सागत-सत्कार किया ॥ २० ॥ वीर तयाधिपतिने देख कि बम्दमि मुनिका ऐश्वर्य से वीरस्तत्र वद् रा आत्मैपतिज्ञापनम् । को मुझसे भी बकाया है। इसलिये उसने उनके सागत-सत्कारको कुछ मी बादर न देकर कामनुकोही वमाछिमसामिहाश्यां सामिलाप स हमः ॥२५॥ मा पाहा ॥ २५॥ उसने बमिमानपस इविर्धानीसपेईमरान् इमियोदयत् । चम्यामि मुनिसे माँगा भी नहीं, भपने सेवकों को बाधा दी कि कामधेनुको मन ले पो । उसकी मासे ते घमाहिष्मती निन्युसिवत्सोक्रन्दती बलात् ।२६। सके सेवक पामेके साप पापा सकराती काम- अप राजनि नियति राम आश्रम मागतः । भेमको बर्षफ माहिष्मतीपुरी के गये ॥ २६ ॥ अब मे सब चले गये, तब परपराममी बाममपर वाये और सुस्वा वैव वस दौरात्म्मं चुभोपाहिरिषाहवः ॥२७॥ उसकी दुस्ताका सात मनकर पोट पारेर सॉफ्की तरह क्रोषसे तिलमिस्म उठे ॥ २७ ॥ अपना महर पोरेमालाप पर सतूण धर्म कार्यकम् । फरसा, तरकस, गए एक पनुष कर परे वेगसे उसके पीछे दौड़े-से कोई किसीसे न दबनेबाम सिंह मन्मपालव हुर्पो मृगेन्द्र व यूथपम् ॥२८॥ | प्रीपर टूट पड़े ॥ २८ ॥ १ लिने । २ वर्ष त । तम । ४ या फेरमाराप स नार्मकम् । ५ पुगे ।

२०१५] नवम स्कन्य . तमापरुन्त मृगुवर्यमोजमा सहसवान न वमी नपने नगरमें प्रवेश कर ही धनुर्मर रह पा कि उसने देखा परभुरामजी महाराज बड़े बेगसे मागपरमधायुधम् । उसीकी बोर मपटे भा रहे है। उनकी पती शिक्षण ऐणयचर्माम्बरमर्कधाममि प्रॉकी दी । ये हायमें धनुर-पाण और फरसा लिये हुए गुंत अटाभिर्दो पुरी विशन् ॥२९॥ ये, शरीरपर काला मृगचर्म धारण किये हुए थे और यचोदयदस्तिरपालपविभि- उनकी मटाएँ सूर्यको किरणों के समान धमक यी पा॥२९॥ उन्हें देखते ही उसने गदा, वाण, बाग, दासिपापवितभिशक्तिभिः । धि, शम्मी और शक्ति आदि मायु!से सुसभित अधौरिणीः सप्तदशातिमीषणा एक एपी, घोरे, रय सया पदातियोंसे युक्त अत्यन्त स्ता राम एको भगवानसदयत् ॥३०॥ मयदर सरह अक्षौहिणी सेना भेजी ! भामान् परशुरामने मात-की-बातमें मकेले ही उस सारी सेनाको नए फर यो यतोऽसौ प्रहरत्परथयो दिपा ॥ ३०॥ माश्वान परशुरामजीकी गति मन और मनोऽनिलौजा परचक्रपदना । मायुके समान पी । मस, घे शत्रुकी सेना काटते हीना ततस्तवश्छिमामलोस्कन्धरा ऐये । जहाँ-वहाँ ये वपन परसेका प्रहार करके, पॉवहाँ सारपि और बाहनोंके साप बड़े पर वीरोंकी निपेतुरुया हवम्मवाहना ॥३१॥ चोर, जोधे, कधे कर-कटकर प्रभीपर गिरते जाते राष्ट्रमा स्वसैन्य रुधिरोपफर्टमे ॥३१॥ इत्याधिपति वर्जनने देखा कि मेरी सेनाके रपाघिरे रामपठारसायकै । सैनिक, उनके धनुर, पमाएँ और दाल मगवान् परशुरामके फरसे और वार्णोसे कर-करकर खूनसे रूप- विवरणचर्ममनपापविग्रह पप रणभूमिमें गिर गये हैं तब उसे यहा कोष वाया निपातित हैहय आपद रूपा ॥३२॥ और मा सय मिजनके लिये मा धमका ॥ ३२ ॥ थपाईन पञ्चश्वेपु पाहुभि- उसने एक साप हो अपनी हजार मुभावोंसे पांच सौ धनुर्योपर बाण पड़ाये और परमुखमनीपर छोडे । परम्स निःषु पाणान् युगपत् स सन्दधे । परशुरामजी तो समस्त शसधारियों के शिरोमणि हरे । रामाय रामोऽस्मृता समग्रणी उन्होंने अपने एक अनुपपर छोर हुर वाणोंसे दी एक स्तान्येकमन्वेपुभिराच्छिनद समम् ।।३३।। साप सबको कार राण ॥ ३३ ॥ अव रेयाधिपति अपने हापोंसे पहार और पेश ठसाइपर था वेगसे पुन म्वइस्सग्घलान् भूपेऽछिपा युद्धमूमिमें परसुरामग्रीकी बोर सपा । परन्तु परशुरामनी- नुत्क्षिप्य वेगादभिधावतो युधि । ने अपनी तीम्य धारवाले फरमेसे मपी पुकि साप उसकी साँपोंके समान मुबाओंका कार गर ।। ३॥ समान् कुठारण कठोरनेमिना अब उसकी बाह कर गयी, तब उनोन पशारकी चिच्छेद राम प्रसम स्वोरिव ॥३४॥ चोटीकी तरह उमा उँचा मिर धपसे अग कर रुपाहा सिरम्तम्य गिर भामिवाहरन् । दिय । सिाके मर जानपर उमफ दस हजार साके त पिवरि तरपुत्रा अयुत खुपमयात् ॥३५॥ उरकर मा गये ॥ ३ ॥ १ रविनतम । २ मरे ।

७२ श्रीमन्नागपत [.० १६ बमिहोतरीमपावर्त्य सपत्सा परवीरहा । परीक्षित् । विपक्षी पीके भाशक परामजी पछरेके साप कामधेनु कोटा की रात ही दुर समुपेत्पाभम पित्रे परिशिष्टयं समर्पयत् ॥३६॥ हो रही थी। मोंने उसे अपने बामपर काम खामे सत्कृवं राम पिन प्रारम्प एष च । पिताजीको सौंप दिया ॥ २६ ॥ और माहिमती सहसवान सभा नोंने वो कुछ किया था, सबका वर्णमामास सन्षा जमदमिरभापत ॥३७॥ पिताजी तपा माइयोंको का एनापण । सब कुछ सुना जमदग्नि मुनिने करा-॥३७॥हाय, हाय, परनुपम राम राम महारानो भवान् पापमाकारपीत् । सुमने बड़ा पाप किया । यम, राम! तुम बड़े वीर । अधीमरदेवं यत सर्वदेवमयं परन्तु सर्वदेवमय नरदेस्का तुमने म्पर्ष हो । स्था ॥३८॥ किया ॥ २८॥ या हमलोग प्रमण । क्षमा वयं हि मामबास्ताप पममाईणतां गताः । प्रमाक्से ही हम संघारमें पूजनीय हुए है। और पया लोकगुरुदेवः पारमेष्ठयमगात् पदम् ॥३९॥ क्या, सपके दावा मानी भी क्षमाके बसे ही अझप को प्राप्त हुए है॥३९॥ नामों की शीमा क्षम धमया रोषते लक्ष्मीनोखी सोरी यथा प्रभा । द्वाय ही सूर्यको प्रमाक समान पमक उठती।स शक्तिमान् मगान् श्रीहरि भी क्षमावानोंपर ही श धमिमामा भगर्यास्तुप्पसे हरिरीधरः ॥४०॥ | असम होते हैं ॥ १०॥ केटा ! सामीम राजाका । राक्ष भाभिपिकस पयो प्रावधाद गुरुः । बामणकी हस्यासे मी महकर है । आयो, भगवान् स्मरण करते हुए वीयोका सेवन करके अपने पापो वीर्यसंसेषमा पाहो बमझान्युतमेवनः ॥४१॥ षो समे' ॥ ११ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईम्यो संहितायो नमस्कन्धे पंचदशोऽध्याय ॥१५॥ अथ पोडशोऽध्याय परशुरामजी मारा सत्रियसहार मौर विश्वामित्रसीके पशी कपा मोसुक उपाय भीशुकदेवजी कहते है-पक्षिस् ! मपने पिना पित्रोपविधितो रामस्तयेति कुरुनन्दन । या शिक्षा भगवान् परसुयाने यो माा' का सकार की । इसके बाद वे एक बरतफ सीया संवत्सरं वीर्यमात्रां परिवाऽश्रममावजत् ॥१॥ करके अपने नामपर कोट माये ॥ १ ॥ एक दिन मात है, परसराम बीकी माता रेणुका गमतटपर गमी . कदापित रेणुका माता गङ्गायां पचमालिनम् । यो । यहाँ उन्होंने देख किगम्पराम चिय कमर गन्मवराज फ्रीडन्तमप्सरोभिरपश्यत ॥२॥ की माला पहने वस्पोंके साथ पिार कर । है॥२॥ नल लाने के लिये मदीवटपर गयी विलोपन्ती फ्रीरन्तमदा नदी गवा । परन्तु वहाँ पम्कीग करते हर गयको देख्ने । १ प्राचीन प्रविमें इसके पहरे पमपरित साहनपये मामपिक पाठ।२ ।

मावृन्म पर सिसापपिपयो लम्वपिछद्रा उपागमन ॥१०॥ लिये सहसा हाके यहाँ मापाचे ॥ १० ॥ उस मारपुषमसोके बध्नुस्व पापनिमया ॥११॥ राम । उन्होंने पहलेसे ही ऐसा पापपूर्ण निमय पर होमपेलां न सस्मार मिश्चिचित्ररथसहा ॥ ३॥ वीर पतिदेवके हसनका समय हो गया है इस बातको मूळ गया । उनका मन फुटछ वितरक्की घोर सिप मलात्पर्य त विलोक्य मने पापषिपश्सिा। मी गया था ॥ ३ ॥ इनका समय बीत गया, यह मानकर वे महर्षि नमदपिके शापसे मपमीत हो गया बापत्य कलशं तम्यौ पुरोषाय फतालिः ॥ ४॥ वौर परत पहसि आश्रमपर ची वायी । पदो अलका फलश महर्पिके सामने रखकर आप जोर हदी हो भ्यभिचार मुनिर्धात्वा पत्याः प्रकृपितोऽयवी। | गया ॥2॥ बमदमि मुनिने अपनी पत्रीका मानसिक म्यमिचार नाम लिया और कोष करके कदा-~-'मेरे मनां पुत्राः पापामित्युक्तास्ते न पकिरे ॥५॥ पुत्रो । इस पापिनीको मार रालो ।। परन्तु समके किसी भी पुप्रने उनकी यह मात्रा सीकार नहीं की॥५॥ रामा सम्बोदित पित्रा मात्रा सहायधीत्। इसके बाद पिताकी भाषासे परसुरामसीने माताके साथ सब भाइयोंको भी मार रावा । इसका कारण था । अपने पितामीके योग और तपस्याका प्रमाण मतीमाति प्रभातको मने सम्पन समापेस्तपसेभ म ॥६॥ मानते थे || ६ || परशुरामजीके इस कामसे सस्पती- नन्दम महर्षि जमदग्नि मात प्रसभ र मोर ननि घरेपच्छन्दमामास पीठ मस्पयतीमुतः। कहा-बेटा ! तुम्हारी जो हो, क माँग मे ।' परशुरामनीने महा-पितानी ! मेरी माता मोर सब पत्र इवानो रामोऽपि जीवितं चास्मति वधे ।। ७ ।। माई नीक्ति हो जाये तथा उन्हें इस बाकी याद म हे कि मैंने छारें मरा पा॥ ७॥ मधुरामजीके इस उपस्सस्ते कालिनो निद्रापाप इमाचसा । प्रकार करते ही जैसे कई सोकर उठे, मनापास ही समुशल हट ठे। परशुरामजीने अपने पितुर्विशास्तपोचीय रामपझे सुहाधम् ॥ ८॥ पितामीका पोषस मानकर ही सो अपने मुहका बष किसा पा ॥८॥ मुवा राजन मरन्तं म्वपिसर्वधम् । पीक्षित सहनमा बर्मुनफे मो छाक परामशी से हारकर भाग गये थे, उन्हें अपने पिता के बकी पर रामवीर्य पराम्सा सेभिरे धर्म न चित् ।। ९ ।। निरन्तर बनी रहती थी । कहा एक क्षण के लिये भी उन्हें श्रम नहीं मिलता पा ||| एक दिनकी शत, एकदा ममता रामे मनातरि पर्न गते । परनुपमजी अपने मायोंके साप आग्रमसे बाहर पनी जोर गये हुए थे। यह बसर पाकर और साधनक समप मम ममदमि अपिशायम ठे र पे पगार मामीनमाषेशिवधिर्य मुनिम् । और अपनी समस्त सचिोसे परिप्रकीर्ति भगवान्के ही चिन्तनमें म्मो मे थे। उन्हें बाहरकी को धन दी। उसी समय उन पापियोंने नमामि प्रतिको मार अर्जुनस्य नाफाः पुमका सत्यता ते न । २ नमः | ३ महनस्य । ४ समपि । पस भीमहागाव माध्यमाना रुपणमा राममात्रातिदाख्याः । रख पा ॥ ११॥ परशुरामकी माता रेणुका यी दीनसासे उनसे प्रार्थना कर रही थी, परन्तु उन सबनि प्रसमविर उत्कृत्य निन्यस्त धान्यषः ॥१२॥ उनकी एक न बनी। वे बमपूर्वक महर्षि जमदशिका सिर काटकर ले गये। पीक्षित् 1 वास्तबमें वे नीच रेणुका दुःखशोकाः निमन्त्याऽऽत्मानमात्मना। षत्रिय अफरा कर पे ॥ १२ ॥ सती रेणुका दुस और शोकसे बातुर हो गयीं। वे अपने हा राम रामेहि वावेति विजुक्रोशोपकैः सती ॥१३॥ अपनी छाती मौर सिर पीट-पीटकर चोर-जोरसे रोने गी-'परशुराम ! बेटा परम्भुराम ! शिघ वाओ ॥१३॥ सदुपत्य धरम्पा हा रामेत्यार्तवत्स्वेनम् । परशुरामरीने बहुत दूरसे माताका था राम या करण-मन्दन पुन लिया। वे बही शीघ्रनासे बाभमपर स्वरसाऽऽभममासाद्य तो पितर इतम् ॥१४॥ बाये चोर वहाँ माकर देख कि पिताजी मार गले गये १ ॥११॥ परीक्षित् | उस समय परशुरामजीको बहा व दुम्स्वरोपामाविंशोकवेगविमोहिसः । दुमा । साप ही कोष, असहिष्णुता, मानसिक पीग और शोरके बेगसे वेमपन्त मोहित हो गये। हासात साधो धमिष्ठ स्पस्वासान् स्वर्गतो भवान्।१५। हाय, पितारी । बाप सो रहे महात्मा थे। पिवामी । नाप तो धर्मक सचे पुनारी । बाप हमओगोंको औषकर खिलप्पैवं पितुर्देई निधाय मादपु स्वयम् । मार्ग बल गये ॥ १५॥ इस प्रकार विपकर उन्होंने पिताका शरीर सो माइयों को सौंप दिया और सप हामें प्राम पर राम वान्ताय मनो दधे ।।१६।। फरसा समबर पत्रियोका संहार कर सामनेका निधप किया ॥१६॥ गत्वा माहिपावी रामो मममनिहतभियम् । परीक्षित् ! परमाराममीने म्पदिष्मसी मगरीमें ग्राफर तेपास शीर्षभीगछन् मध्ये षळे महागिरिम् ॥१७॥ सहलवा बनके पुत्रों के सिरीसे नगरके बीचों-बीच एक बड़ा मारी परत सपा कर दिया । उस मगरकी तबकेन नदी पोरामसम्मभवत्वाम् । शोमा तो उन पक्षपाती नीच क्षत्रियोंके कारण ही ना हेतु कस्वा पिषध षोऽमालकारिणि हो चुकी थी ॥ १७ ॥ उनके स्कसे एक की मपाएर नदी मह निकम, बिसे देखकर मामणानीहियोंका उदय वि.सप्ताव पृथिवीं कम्पा निःपत्रिमा प्रस। मपसे फॉप सठसा था। मगवान्ने देखा कि वर्तमान समन्वपके पम शाणियोवान् इदान नृप ।।१९।। क्षत्रिय अत्याचारी हो गये हैं। इसलिये गन् ! उन्होंने पितु फापेन मन्धाय शिर आदाय बहिपि । भपने पिता के पक्षको निमित्त मनाकर इकीस बार पृषी- को क्षत्रियहीन कर दिया और कुरक्षेत्रके समतपत्रको सर्वदेवमय दषमास्मानमयमन्मस्वैः ।।२०। ऐसे ऐसे पाँच तालाब बना दिये, गो रजक सम्से भरे दवी प्राची दिशं होने मपणे दक्षिणा विक्षम् । ए ये ॥ १८१९॥ परमसममीने अपने पिताजीका अध्ययवे प्रतीची सगात्र उत्तरी दिसम् ॥२१॥ सिर मकर उनके पसे जोर दिया और योगाय सदिक्मय आहामरूप भगवान्का यमन किया ॥२०॥ अन्पेम्पोऽवान्वरदिस फरमपाय च मम्पत । फोमें उन्होंने पूर्व Pशा होताको, दक्षिण Pशा पिया । परम । ३ ।। गर्ग।

२०१६] नवम स्कन्ध ७५ । गाविसमुपद्रष्टे सदस्येम्पस्तस परम् ॥२२॥ ब्रह्माको, पश्चिम दिशा वर्पको वौर उचर दिशा साम गाम करनेपाले उद्गाताको दे दी ॥ २१ ॥ इसी प्रकार सतनावमृथस्नानविधूताशेषकिचिप वग्निकोण मादि विदिशाएँ अधिोको दी, कश्यपनीको मप्यमूमि दी, उपदध्याको आर्यामर्स दिया तथा दूसरे सखस्यों प्रमनपां रेजे घ्यम्र इवांशुमान् ।।२३।। । सदस्योंको अम्यान्य दिशाएँ प्रदान कर दी ॥ २२ ॥ इसके बाद यहान्त-स्नान करके ये समस्त पापोंसे मुक्त बदेई जमदमिस्तु लाम्या संधानलषणम् । हो गये और अमनदी सरखतीके तत्पर मेवरहित सूर्यके समाम शोमायमान हुए ॥ २३ ॥ महर्षि जमदमिको सपीमा मणले सोऽभूत् मप्तमो रामपजिसः॥२४॥ स्मृतिरूप सङ्कम्पमप शरीरकी प्राप्ति हो गयी। परभुरामनी से सम्मानित होकर वे सप्तर्पियोंके मण्डलमें सात ऋषि बामदग्न्योऽपि भगवान् राम फमसलोचनः । घे गये ॥ २१ ॥ परीक्षित् ! फम्मलोचन नाम- मायामिन्यन्तरे राजन् पर्वसिम्पति वै परत ॥२५॥ नन्दम मगषान् परशुराम लागामी मक्त्तरमें सप्तर्षियों के मामलमै यफर वेदोंका विस्तार करेंगे ॥ २५॥ मावापापि महेन्द्रादौन्पस्तदण्ड प्रशान्तधी । भाब भी किसीको किसी प्रकारका दण्ट म देते ए शाम्त विचसे महेन्द्र पर्वतपर निवास करते हैं। बाँ उपपीयमानचरित सिद्धगन्धर्वधारणै ॥२६॥ सिम, गन्धर्ष वीर धारण उनके चरित्रका मधुर सरसे गाम करते रहते हैं ॥ २६ ॥ सर्वशक्तिमान् विवाथ्य पर मृगुप विश्वास्मा भगवान् हेरिरीधर । मगवान् धीहरिने इस प्रकार मृगुवंशियोंमें अफ्तार प्राण करके पृप्तीफे मार मूत रानाओंका बहुत बार बघ भवतीर्य परं भारं सुवोजन् पहुशो नृपान् ॥२७॥ कित्सा ॥ २७ ॥ गावरमन्महातेजाः समिद व पावकः । महाराज गाषिके पुत्र हुए प्रमस्ति बनिके समाम परम तेनस्ली विधामित्रजी। इन्होंने अपने तपोक्लसे उपसा वावमुस्सुज्य यो लेमे प्रयवर्षसम् ।।२८॥ क्षत्रिफलका त्याग करके नझसेन प्राप्त कर लिया ॥२८॥ विश्वामित्रस्म पैवासन् पुत्रा एफशतं नृप । परीक्षित् ! विभामित्रगीके सौ पुत्र थे। उनमें पिचले पुत्रका नाम पा मधुना । इसलिये सभी पुत्र मन्नमस्तु मधुच्छन्दा मधुन्छन्दस एव ते ॥२९॥ मधुच्छन्दा' के ही नामसे विन्यात हुए ॥ २० ॥ पिशामित्रमीने सगुवंशी बनीगर्तके पुत्र अपने मानने पुत्र कखा शुनाशेपं देवरासं च भार्गनम् । सुन शेपको, जिसका एक नाम देवरात मी था, पुश्वपमें बाजीगतं सुखानाह ज्येष्ठ एप प्रकल्प्यताम् ॥३०॥ सीकार कर लिया और अपने पुत्रोंसे कहा कि मग इसे अपना बड़ा माई मानो ॥ ३० ॥ यह रही प्रसिद यो पै हरिचन्द्रमले विक्रीव पुरुष पशुः । पगुवंशी सुन शेप था, जो हरिचन्दके यहमें यक्षपशुके स्तुवा देवान् प्रजेशादीन् ममषे पाशझन्धनात्।।३१।। रूपमें मोल मेकर म्पया गया था । विवामित्र मीन प्रयापति महण आदि देवताभोंकी स्तुति करक उसे पा राता रायमने देषैर्गाधिपु तापस । पाशवनसे मुसा पापा । दाभोंके पपमें यही 1 १रिययाः।

भीमहागपत देवरस्त इति स्पात शुन क्षेप स भार्गव ॥३२॥ अन शेप देवताओंशरा विश्वामित्रधीको दिया गया था, बत 'देव रात । इस न्युत्पत्तिके अनुसार गाशिमें मधुच्छन्दमोज्येष्ठाः मुसल मेनिरेन तत् । यह तपसी देवशतके नामसे विख्यात हवा ॥३१२२॥ विचामित्रनीके पुत्रोंमें जो बड़े थे, उन्हें पुन शेपको बग माई माननेकी छत पछी न लगी । इसपर विवामित्रजी- अश्वपत् तान्मुनिः मुद्धोम्सेच्छा भयत दुर्जनाः||३३॥ ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि दुष्टो ! तुम सब म्षा होगायो॥ ३३॥ इस प्रकार जब उन्पास स होपाच मधुच्छन्दा साचे पवावा तव । मई म्लेच्छ हो गये, तर विवामिप्रमीके विकले पुष मधुमपान अपनेसे छोटे पचासों माइयों के साप कहा- यमो भवान् संवानी तमितिष्ठामहे षयम् ॥३४॥ पितामी ! आप हमलोगों को जो बामा करते है। हम उसका पालन करनेके लिये तैयार ॥३०॥ ज्येष्ठ मन्त्राले पस्स्थामन्यत्रो वर्ष स हि । करार मधुष्छम्दाने मन्प्रदध पुन शेपको बना भाई सीकार कर किया और कहा कि हम सब तुम्हारे पियामित्र सुवानाह पीरपन्तो मषिम्पथ । अनुयायी-मेटे माई। वन विभाभित्रनीने अपने इन बाहाकारी पुत्रोंसे कहा---'तुममेोंने मेरी बात ये मान मेऽनुगृहन्तो धीरैपन्तमकर्स माम् ॥३५॥ मामकर मेरे सम्मानकी रक्षा की है, इसलिये तुमध्ये!- से सुपुत्र प्राप्त करके मपन्य हुवा। मैं हमें भाशीर्वाद एप यः छविका पीरो देवरावस्तमन्वित । | देता है कि तुम भी मपुत्र प्राप्त होंगे ॥१५ ।। मेरे प्यारे पुत्रो! यह देवरात मुन शेप भी तुम्हारे ही गोत्रका अन्ये चाफदारीवजयतुमहादयः ॥३६॥ है। सुमोग इसकी आगामें बना ' परीक्षित् । विश्वामित्रजीके रफ, हारीत, जय और ऋतुमान् धार भौर भी पुत्र थे॥ ३६॥ इस प्रकार विशमिजीकी एवं मौष्टिक्गात्रं तु विश्वामित्रः पृथम्विषम् । स्वानोंसे कौशिकगोत्रमें कई भेद हो गये और देवरात को बड़ा भाई माननेके कारण उसका प्रारही दूसरा प्रवरान्तरमापम सद्धि पर्व प्रकल्पितम् ॥३७॥ हो गया ॥ १७ ॥ इति भीमसागवते महापुराणे परमहस्पा महिताया मममस्कन्ध पोशोऽध्याय ॥ १६ ॥ अथ मतदशोऽध्याय सापूर जि मादि पनामाकेबराव पणन भी उपाय मीशुकदेवजी कहन-परीक्षित् ! राजेन्द्र य पुरवम पुत्र आपुम्नस्याभवन् मुता । पुगरवाका एक पुत्र पावायु । उमके पॉप छाके पुर- नाप यादम रजी रम्भप वीययान् ॥१॥, माप, पार, रनि, शहिमाली एम वीर बनेना बब १ल्लामा वाना ।। बीरमरम्मच्मा' ।। पचीन प्रतिमें इससे भागे एण्मपरित मामा इना मषित पर।५ पारपत्रमा नवम स्कन्म । बनेना इति राजेन्द्र शृणु धनषोऽन्वयम् । क्षत्रादका कश मुनो। प्रदके पुत्र पेसहोत्र । मोर एसवस्यासन सुदोषस्थात्मनाक्षया ॥२॥ के तीन पुत्र हुए-~-काश्य कुश और गस्समद । गृत्समदका प्राम' यो गृत्समद इति गृत्समदादभूत् । पुत्र हुआ शुनक । इसी शुभकके पुत्र श्रग्बेदियोंमें श्रेष्ठ मुनिघर शौनकजीए॥१-३॥ काश्यका पुत्र काशि,काशि- श्लका शौनको यस्स बचप्रवरो सनिः ॥ ३ ॥ का राष्ट्र, राष्ट्रका दीक्तमा बौर दीर्घतमाके धन्वन्तरि । यही सत्यस्व काशिस्तत्पुत्रो राष्ट्रो दीर्घतमः पिक्षा। आयुर्वेद के प्रतक॥॥ये यामागचे मोक्ता और भगवान् मन्वन्तरिदर्षसम आयुर्वेदप्रवर्सः ॥ ४॥ वासुदेवके अंश हैं । इनके स्मरणमात्रसे ही सब प्रकारके पसग वासुदेवांशः स्मृतमाघातिनाशनः । रोग दूर हो जाते हैं। मन्तरिका पुत्र हुआ केतुमान् सस्वा फेतुमानस जो भीमरपस्ततः ॥ ५॥ चौर केसुमानका भीमरप ) ५॥ मीमा दिवोदास दिवोदासो पुमास्तमात् प्रतर्दन इति स्मृतः । और दिवोदासका पुमान्-निसका एक नाम प्रतर्दन भी है। यही पुमान् शत्रुजित्, यस्स, ऋतपर वोर स एव शत्रुजित् यत्स प्रतवन इतीरित । कुक्लपासके मामसे भी प्रसिद्ध है। धुमपन्के ही पुत्र या वलयापति प्रोक्तोलादपस्तवः ॥ ६॥ मलर्क भादि हुए ॥ ६॥ परीक्षित ! मलर्क के सिपा परिवर्पसास्राणि पष्टिवर्पशवानि च। और किसी रागामे छाछठ इनार (६६०००)वर्पतक नासविपरो रन्नन् मेदिनी पुराने युवा ॥७॥। युमा सफर पृथ्वीका राज्य नहीं मोगा ॥ ७ ॥ अलका वसति सन्ततिस्तमात सुनीयोऽध सुकेसनः । पुत्र वा सम्तति, सन्ततिका मुनीप, समीपका केतन, एफेसनका धर्मकेतु और धमकेतुका सत्यकेत ॥ ८ ॥ धर्मकेनुः सुतम्तमात् सस्पफेसुरजायत ॥ ८॥ सस्यकेतुसे पृष्टकेतु, पृष्टकेतुसे रागा सकुमार, सुकुमारसे टिकेतुः सुतस्तमात् सुकुमार धितीश्वर । मीतिहोत्र, मीतिबोरसे मां बौर से राजा मार्गभूमिका वीतिडावस्प भर्गोऽतो भार्गमिरभून्नुप ॥ ९॥ जन्म हुवा [॥ ९ ॥ ये सब के मब क्षारके वंशमै काशिसे उत्पन्न इतीमे काष्ठयो भूपा पत्राद्वान्वयापिन । नरपति हुए । रम्मके पुत्रका नाम या रभस, उससे रम्भस्य रभमः पुत्रो गम्भीरमाक्रियस्तत ॥ १०॥ गम्भीर और गम्भीरसे अक्रियका नम पुआ ॥ १० ॥ सक्रियकी पीसे ग्रामगवश घमा । भव बनेनाका वंश तस क्षेत्र प्रम मच पृणु वंशमनेनस । मना । अनेनाका पुत्र था भुम, पुदका मुषि, शुक्किा बेस्टन गुचिम्तस्मात् त्रिम धर्मसारथिः ।।११।। विककुद् और विकसका धर्मसारपि ॥ ११॥ धर्म- पता प्रान्तरयो चरे कतकस्पः स आत्मवान् । सारपिके पुत्र थे शाम्तस्य । शान्तरय वात्मज्ञानी दोनेके कारण सत्य ये उन्हें मन्तामकी वावश्यकता न रखे पञ्चशतान्यासन् पुत्रापाममितौजसाम् ।।१२॥ या परीक्षद ! आयुके पुत्र रबिके बयत तेजसी देवरम्पर्पिता दैत्यान् इत्वेन्द्रापाटदाद दिवम् । पाँच सौ पुत्र थे ।। १२ ।। देवताओं की प्रार्थनासे रबिने दैत्योंका बब करके इन्द्रको मागका राज्य P। परन्तु फलस्वस्मै पुनर्दला गृहीत्वा परणौ रखे ॥१३॥ वे अपन प्रहाद बादि शत्रुओंसे मपमीत यते थे, इस लिये उनहोंने पा सर्ग रि रनिको नोटा दिया और प्रहादायरिभक्ति । उनके परम पकाकर उम्दाको अपनी रक्षाका मार मी पितईपरते पुत्रा याचमानाय ना इदु ॥१४॥ सौंप रिया। मम रनिकी सरयु हो गयी, तम इन्द्र के १ सम्म । १ मुवोच्म । नाम ममता १५ मा विकासमा पनि । वात्मानमर्पयामास भीमबागपत [4०१८ पर्यत्रापि मृगव शिप्पोऽस्या न पिसासुरः। क्दना बौर सति करते हैं उन्हीं माममि हम सबसे श्रेष्ठ मुगुपशी है। और इसका फ्तिय प्रथम तो मम्मदाय धृतमती भूद्रो वेदमिवासवी ॥१४॥ असुर है, फिर हमारा शिष्य है । इसपर भी इस दुयने बसे शुद्ध वेद, ले, उसी तरह हमारे कपरोको एव शपन्ती शर्मिष्ठा गुरुपुत्रीमभाषत । पहन लिया । ॥ १२१॥ जब धेश्यानी इस प्रकार गासी देने लगी, तब मिष्ट्य क्रोषसे तिलमिला उठी। रूपा श्वसन्त्पुरङ्गीय धपिता दष्टदग्छदा ॥१५॥ घोट सापी हुई नागिन के समान मंदी सोसलने गी। उसने अपने दाँतोंसे होठ दबाकर कहा-॥ १५॥ मात्मपुत्तमविनाय मन्यसे बहु भिफि । 'मिसारिन ! इतना बहक रही है। उसे कुछ भनी किन प्रतीयसऽमाक गृहान् पलि मजो यथा ॥१६॥ वातका मी फता है। वैसे कौए और कुवे हमारे दरवाजे पर रोटीके टुकोंके रिये प्रतीक्षा करते हैं, वैसे ही एवं विषं मुपप क्षिप्त्वाऽचायसुता सतीम् । क्या तुम भी हमारे घरोंकी मोर नहीं जाती रहती ॥१६॥ शर्मिणने इस प्रकार कली-करी पर कहकर गर शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् पे पास आदाप मन्युना ॥१७॥ पुत्री देवयानीका तिरस्कार किया और क्रोधाश उसके बस नकर उसे कुरमें दके दिया ॥ १७ ॥ तस्पां गतायां म्वगृहं ययातिर्मंगयां परन् । शर्मिनाके चले मानेके बाद संयोगवश शिकार खेलते प्राप्ता यत्छया कूप जलार्थी तां ददर्श ॥८॥ हुए गवा पपाति उधर वा निकरले । उन्हें माफी । वापरता थी, इसरिये करम पी ई देण्यामीका दसा म्यमुच पासस्तस्यै राजा विवाससे । उन्होंने देख लिया ॥१८॥ उस समय माहीन पी। इसरिये उन्होंने जस्ना दुपा उसे दे गया और गृहास्पा पाणिना पाणिमुसार दयापर ॥१९॥ दया करफ अपने हापसे उसका साप पकाकर उसे स पी.माहासनसी प्रमनिर्भरया गिरा। बाहर निकास न्यिा ॥ १९ ॥ देवयानीने प्रेममरी पाणी से वीर पपालिसे कहा-पीरशिरोमणे राजन् ! बाम राजम्बया गृहावा म पागिः परपुरअप ॥२॥ आपने मेरा साप पकड़ा है। जब मब आपने मेमा हाप हम्नमादाऽपगमा भूद् गृहीतापाम्बया दिम। पर रिया, सब कार मरा इसे म पकड़ । पीरप्रेष्ठ । पुरमें गिर गानेस मुम तो नापकर अचानक दर्शन पाता वीर ममपानी न पीरुप । ला. या भावान्करही किया जा सम्बर समाना चाहिये । हममें दमरोगों पा को किसी मनुष्य- यदिदं तालमापा भवता दर्जन मम ॥२॥ की कोई मेन महा है ॥२०२१ ॥ पारधष्ट पहने न प्रामणा म भरिता इनग्राहा महामन्त्र । मैने मृहसाविक पुत्र का शार' उसन भी मुझ गार दरियामी कारग बामग इ.पम्प पारम्पापम्प पा समनप पुरा ॥२२॥ मा पगिप्रहग नहाँ पर ॥२२॥ । - रिणाप, सिर मस्ता- •instीनी cिromपा | मन मानले माने पर Sar MRI Tी शो पर उतार र म! Entrtantre पारिपाnिer १ सपने भी गमे लिा To tender 4०१८] नवम स्कन्ध राविरनभिप्रेत देवोपहसमात्मनः। यपातिको शासप्रतिम्ल हानेक कारण यह सम्बन्ध अभीष्ट ता न पा, परन्तु उन्होंने देख कि प्रारम्बने स्वयं ही मुसे मैनस्तु सद्गत बुद्ध्वा प्रतिनग्राद नमः ॥२३॥ यह उपहार दिया है, और मेरा मन भी इसकी और सिंध रहा है। इसलिये ययातिने उसकी बात मान ली । २३ । गते राबनि सा पीरे सत्र म रुदती पितुः । वीर राना यपाति बम चले गये, तत्र देवानी रोती-पीटती अपने पिता शुक्राचार्या पाप्त पाँची और नदयत् ततः सर्वमुफ्त शर्मिष्ठया कसम् ।।२४॥ शर्मिष्यने जो कुछ किस्म पा, पच सत्र उन्हें कह | सुनाया ॥ २९ ॥ शर्मियके व्यवहारसे भगवान् मुक्रा- दमनन भगवान् काम्प पौरोहित्य विगर्हयन् । चार्यनीका मी मन उचट गया । वे पुरोहिताईकी निन्दा करने थ्यो। उन्होंने सोचा कि इसकी अपेक्षा तो स्नेत या बाजारमेंसे फलूतरकी तरह कुछ यीनकर स्स लेना स्तुवन इति च कापोती दुहिवास ययौ पुरात् ।।२५।। अन्य है । अत अपनी क्त्या देवयानीको साथ लेकर ये नगरसे निकल पड़ ॥ २५ ॥ जब धूपपर्वाको यह पपर्वा उमानाय प्रस्पनीकविषक्षितम् । माम हुक, तो उनके मनमें यह शङ्का मुई कि गुरुजी फहो शत्रुओंकी नीत न करा दें, भगवा मुसे शाप न गुरुप्रसादयन् मूर्ना पादयोः पतितः पपि ॥२६॥ दे दें। अतएव थे उनको प्रस्न करने के लिये पीछे-पीछ गये और रास्तेमें उनके चरणोपर सिरके का गिर गये ॥ २६॥ भगान् शुक्राचार्यजीका क्रोध तो धगार्घमन्युर्मगवान् शिष्यव्याघट भार्गवः । आधे क्षणका पा । उन्होंने प्रससे कहा- राजन् ! में अपनी पुत्री देवपानीको नहीं छोड़ सफ्ता । कामोऽस्माःक्रिया रामन् नैनी स्पस्तुमिहोत्सहे।२७। इसलिये इसकी जो इष्य हो, तुम पूरी कर दो। फिर मुस स्ौट चलने में कोई आपत्ति न होगी ॥ २७ ॥ जप वृषपनि ठीक है. यहकर उनकी आज्ञा म्बीकार कर तपेत्यवस्थिते प्राद देवयानी मनोगतम् । टी, सब देवपानीने अपने मनकी मान कही। उसने -पिताबी मुस स्मि पिसीको दे हैं और में चित्रादसा यतो यास्पे सानुगा यातु मामनु ॥२८॥ नहीं-को जाऊँ, शर्मिय अम्नी सहत्यिोंक साप म्मी सेवाके लिये वही घरे ॥२८॥ स्वानां तन महट वीक्ष्य तदर्भस्य य गौरवम् । शर्मियने अपने परिवारवाया सदर और उसक कार्य गौरव देशात देवयानीरी मान म्यीकर कर ली। दक्षपानी पर्यघरत् स्त्रीसहस्रेण दासवत् ॥ २९॥ यह अम्नी एक हजार सहश्यिोंके साप टासीक सम्बन उसकी सेवा करने लगी ॥ २९ ॥ गुमापापनीने देव. नाहपाप सुता दया सह शर्मिष्ठमोशना । पानीमा विवाह गजा पपातिके साय कर Pया और शर्मिक दासीक गए दया उनमे पर पिय- प्रसाद राकछमिष्टामाधास्तम्पेन कहिथित ॥३०॥ राजन् ! इसको अम्नी सेनार कमी न आन दना।३० । 'मानत २ ममम। नेता 1 ८२ श्रीमद्भागवत [भ०१८ मिलापाशनसी राजम्छपिष्ठा सप्रना कचित् । परीभित् ! कुछ ही दिनों याद देवयानी पुत्रवती हो गयी । उसको पुत्रवती देसकर एक दिन शर्मिष्ठाने मी तमेव वन रससि सरया पतिमृती सती ॥३१॥ खाने अतुकामें देवयानीके पति ययातिसे एकारतमें रामपुम्मार्थितोऽपत्ये धर्म पावेक्ष्य धर्मवित् । सहवासकी याचना की ॥३१॥ शर्मिष्ठकी पुत्रके रिये प्रार्थना धर्मसान है यह देखकर धर्म रामा सरन्छुकवच काले दिएमेवाम्पपयव ॥३२॥ ययानिने अमाचार्यकी मास याद रनेपर भी यही निश्चय यद् प तुर्वसु ष देवयानी व्यमायत । किया कि समपार प्रारम्बके अनुसार जो होना होग, हो जायमा ।। ३२॥ देवयानीके दो पुत्र हुए-या वर्प पार्नु च पूरु च शर्मिष्ठा पार्षपर्वणी ॥३३॥ और तुम तमा वृषाकी पुत्री शर्मिष्ठाके तीन पुत्र गर्मसम्भयमासुर्या भर्तर्विसाय मानिनी । हुए—गुपु, अनु और पूरु ।। ३३ ॥ जय मानिनी देवयानीको यह माश्म हुआ कि शर्मिष्ठाको भी मेरे पति- देवयानी पितुर्गेई ययौ झोपविमूर्छिता ॥३४॥ के द्वारा ही गम रहा था, तब वह क्रोधसे बेसुध होकर अपने पिताके घर चली गयी ॥ ३४॥ मम्मी फ्यानिने प्रियामनुगतः कामी पचोमिरुपमन्त्रयन् । मीठी-मीठी पाते, मनुनय विनय और धरण दबने न प्रसादयितु शेक पादसवाहनादिमिः ॥३५॥ आरिप द्वारा देवपानीको मनानेकी घेटा की, उसके पीछे पीछे वहातक गये मी, परन्तु मना न सके । ३५ । मुझम्तमाह कुपित स्त्रीकामानृवपूरुप । | शुक्राचायनीने मी फावमें भरकर पपातिसे कहा- अत्यन्त सीसम्पर, मम्युद्धि और झूठा है। बा, तेरे स्वां जरा विशता मन्द यिस्पकरणी नृणाम् ॥३६॥ शीरमै षह युमपा आ बाय, जो मनुष्योंको कुम्प कर देता है ॥ ३६॥ ययातिल्याप ययातिमे कहा-भान् ! आपकी पुत्रीके साप रिप-भोग करते-करते अभी मेरी कृमि नहीं हुई है। अदप्ताऽस्म्यय कामानां प्रान् दुदितरिम ते । इम शागमे तो आपकी पुत्रीका भी अनिर ही है।" इसपर गुमचायने पदा-अध्या जाओ नो प्रसमा म्पत्यम्यता पयाकार्म घपमा याऽभिधाम्यति॥३७॥ से उन्हें आनी चबानी द६, उससे अपना पुराणा इति लापप्पयम्पाना पुर्व न्यष्ठमयोचत । यह ॥३७॥ शुमाघापनाने जर ऐसी प्यास्पा देसी, सर भनी गजवानीमें आयर ययातिने अपन पदा सात प्रतीच्या प्रग दरि निर्भ वयः ॥३८॥ य पुत्र पसे या-प्टा ! तुम अपनी जननी मुझे दस और अपने नानार पिा हुआ यह मुद्दाम तुम मातामा वा यस्म न मा विपयेप्पहम् । मीकार पर। फ्पोकि मरे प्यारे पुत्र ! में भी पपमा भरदीयन पे पविपया! ममाः ॥३९॥ पियों न न एमआ है। इसठिये सुम्दारी आयु फार म पु पाता और अनम भोगूंग ॥३८ २९॥ पराम पतुन वाशिमी ! पिना समपरे दी प्राप्त नारमा जम्मा म्पासुमन्ना प्रामया सर । एमा अा गुना से जीना भी मही ०१८] नवम कध - अविदित्वा मुख ग्राम्य पैतृष्ण्य नैति पूरुषः॥४०॥ पाहता । क्योंकि कोई भी मनुष्य नक्नक विश्य सम्मा जनुभव नहीं कर लेना, तबतक उसे उससे आरम्प नहीं तुर्वसुमोदितः पित्रा दुषमानुम मारत । होता' ॥ १० ॥ परीचित् ! इसी प्रकार सुर्वसु, द्रुप और अनुने मी पिताकी भाशा अस्वीकार कर दी। स्प एलो सो टन पुत्रोंको धर्मका तस्त्र मान्छम नहीं पा । वाघस्पुरधर्मका पनित्ये निस्पपद्धयः ॥४॥ इस अनिस्य शरीरको ही नित्य माने बैठे थे ॥११॥ पत्र प्यातिने अवस्थामें सबसे छोटे शिन्तु गुणोंमें वो बपच्छेत् तनयं पूर्व क्यसोनं गुणाधिकम् । अपने पुत्र एको मुल्यवर पा और कहा---! अपने मरे माइयों के समान तुम्हें तो मेरी कत नलमप्रजवद् वत्स मा प्रस्याख्यातुमईसि ॥४२॥ नहीं टालनी चाहिये ॥ ४२ ॥ पुगने कहा-पिनाबी ! तिकी कृपासे मनुष्यको परम पदकी प्राप्ति हो सकती है । वास्तवमें पुत्रका शरीर को न लोके मनुम्पेन्द्र पितुरास्मरुतः पुमान् । पिताका ही दिया हुआ है । ऐसी अवस्पामें ऐसा कौन है, जो इस संसारमें पिताके उपकारोंका पदल्य चुका प्रतिक धमो यस्य प्रसादाद विन्दते परम् ॥४३॥ सके ॥ १३ ॥ उत्तम पुत्र तो यह है, नो पिताके मन की यत बिना कहे ही कर दे। करनेपर अदाके साथ उत्तमभिन्वितं कुर्यात् प्रोक्तकारी हुँ मम्ममा । भामापालन करनेवाले पुत्रका मध्यम कहते है । जो माझा प्रास होनेपर मी अनदासे उसका पालन करे, मनमोऽभरमा कादोपरितं पितुः ॥४४॥ पा अधम पुत्र है । और जो किसी प्रकार भी पिताकी माहाका पाठन नहीं करता, उसको तो पुत्र कहना ही इति प्रवदितः पूहः प्रत्यगृहाअरां पितुः । भूप है। यह सो स्तिाका मात्र ही है ॥ १५ ॥ परीक्षित् । इस प्रकार कहकर स्ने षड़ मानम्दसे अपने सोऽपि तदयसा कामान् पभावमुजुपे नृप ॥४५मुमपा स्वीकार कर लिया । रामा पनि भी उसकी जवानी लेकर यवत् विपर्योका सेवन करने सम्पपिपत् पालयन् प्रजाः । लगे ॥ १५॥ वे सातों द्वीपोंके एपल सम्राट ये यापजोपं विपयामुजुपेऽम्माहतेन्द्रियः ॥४६॥ किताके समान भीमति प्रजाका पाटन करते थे। उनपी इन्द्रियोंमें पूरी शक्ति पी और वे ययावसर पया- | प्राप्त विषयोंका यथेच्छ उपमोग करते थे ॥ १६ ॥ देय- मनोवाम्देहवस्तुमिः। यानी उनकी नियतमा पनी पी । पर अपन प्रिपनम यस परमां प्रीतिमुवाइ प्रयसी रह ॥४७| यपतिको अपने मन, वाणी, शरीर और वस्तुओं am रन-गिन और भी प्रसन्न करने स्थगी । और एकान्तमें भयन् यनपुरम क्रतुभिर्मुग्दिक्षिण । मुख देने लगी ॥ १७ ॥ राना ययातिन समन्न पदों के प्रतियप सर्वदेवम्वरूप यक्षपुर भगवान् श्रीहरिया महत- सर्वदेवमप देव सर्वघेदमय हरिम् ॥४८॥ ' से बड़ी बड़ी दक्षिणायासे योंसे यजन किया ॥ २८ ॥ र सतत । २२।३ कपमुये । ४ पास समीपपतिः N देवयानगप्पनुदिन ८४ श्रीमनागपत [अ० १९ यसिन्निई विरचितं मोम्नीव जलदावलिः। असे आशमें दल के दल बादल दीखते हैं और कमी नही मी दीयते, वैसे ही परमरमाके स्वमपमें यह बात स्वप्न, माय और मनोराज्यके समान कल्पित है। नानेव भाति नाभावि स्वप्नमायामनोरथः ॥४९॥ कमी अनेक नाम धौर सपोंके मपमें प्रतीत होता है, और कमी नहीं भी ॥ १९ ॥ घे परमात्मा स्यके एक- तमेव इदि विन्यस्प वासुदेव गुहाशेयम् । | में विराजमान हैं। उनका स्वरूप सूत्मसे मी सूक्ष्म है। उन्ही सर्वशक्तिमान् सक्ष्यापी भगवान् श्रीनारायणको नारायणमणीमांस निरामीरपबत् प्रसम् ॥५०॥ अपने दयमें स्थापित करके राजा ययानिने निष्काम भाषसे उनका यन्न किसा ॥ ५० ॥ इस प्रकार एक हजार वर्षातक उन्होंने अपनी उमाल इन्द्रियों के साथ एवं पर्पसहस्राणि मनापप्ठेमनःसुखम् । मनको जोड़कर उसके प्रिय त्रिपोंको मोगा । परन्तु इतनेपर भी चक्रपती सम्राट ययानिकी भोगोंसे तृमि न विदधानोऽपि नावृप्यत् सार्वभौमाकदिन्तियैः॥५१॥ हो सकी ॥ ५१ ।। इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्या संहितायां नवमस्या- प्रशादशोऽध्याय ॥१८॥ अथेकोनविंशोऽध्याय पपाति गृहस्पाग मीशुक उपाय भीशुकदेवजी करते है-परीक्षित् ! रामा फ्याति इस प्रकार बीके पशमें होकर विस्योंका उपमोग करते स इत्यमाचरन् कामान् स्त्रैणोऽपहवमारमनः । रहे । एक Pन जब अपने वध पननपर रि गयी तब उन्हें बड़ा पैराम्प हुआ और उन्होंने अपनी प्रिय पुमाप्रिपा निर्विष्णो गाथामेवामगापत ॥१॥ | फनी देक्पानीसे इस गयाफा गान त्रिमा ॥ १ ॥ भगु- मनिमी ! तुम यह गापा मुनो । पृथ्वीमे गरे ही समान गण भार्गप्पम् गाया मदिधाधरितां सवि । विम्पीरा यह सत्य इतिहास है। ऐसे ही प्रामवासी विपी पुरुषों के सम्पश्वमें पनयासी निसेन्द्रिय पुरुष भीरा यम्पानुशानन्ति पने ग्रामनिवामिनः ॥ २॥ दुमक साप विचार किया करते हैं कि इनका पल्याण पन एकायने कपित रिमिन्वन् प्रियमारमनः । पमे होगा ॥२॥ एक पापा । मायनमें अमेय ही अपने प्रिय प्यानेगर्ग नस्तुरे ला घूम ददन [प पवितां यकमवणगामझाम् ॥ ३ ॥ रहा था । उमन र Pि अन पमा एप परती पूर्णमे गिन पदी है॥३॥ या पाटा पा पार्म था । चम्पा उदाणापापं नमः कापी विचिन्तयन् । + सायने न्या शिग पी रिम प्रसार एंगे निगाय जाप । उमने अपने सागरो के पामरी प्परततायतरप रिपागाग्रण रापमी ॥४॥ गनी नारी और गम्ना संपर का पि ॥ ५ ॥ १५ । मानवी इनमे भगे पायो इला भाभपा।

पाई कपणा मुम्र भवत्या प्रेमपन्प्रिता। वामान नामिबानामि मोहितस्तव मायया ॥१२॥ मूल गया है। १२॥ नेपन्ति मनाप्रीति पुसा कामाउस ते ॥१३॥ उस पुरुपये ममरो सम्पर नहीं पा सयन, सोपामनाओं- ०१९] नवम स्कन्ध डोसीय पाद सुभोणी तमेव चकमे किल । जब वह सुन्दरी की फुरसे निकली, तो उसने उस यकरसे ही प्रेम करना चाहा । पर दाही मछमण्डित या समस्याहपोऽवाः कान्तमामिनीः॥५॥ करा ए-पुष्ट, जवान, वारियोंको सुस देनेवाअ, विहारकुशल और बहुत प्यारा पा । जब दूसरी बकरियों प्रवान श्मश्रुल प्रेमीडवांस यापकोविदम् । ने देखा कि कुममें गिनी । यकीने उसे अपना प्रेमपात्र चुन लिया है, तब उन्होंने भी उसीको सपना पनि बना सोऽवापस्तामा बहीना रतिषर्धन । लिया। वे तो पहलेसे ही पनिकी व्यशमें पी । उस करेके सिरपर कामरूप पिशाच स्वार पा । छह अकय रमे कमाइग्रस्त यात्मान नावसुभ्यत ॥ ६॥ ही बात-सी कारियों के साप विचार करने लगा और वमेव प्रेप्तमया अपनी सब सुध-बुध स्ये या ॥५६॥ जब उसकी रममाणमजान्पया। कुश्मसे निकाली गई प्रियतमा परीने देस कि मेरा निसोक्य पसंविग्ना नामुम्पद् पस्तकर्म तत् ॥ ७॥ है, तो उसे क्यरेकी यह करदन सान न हुए पति तो अपनी दूसरी प्रिफनम्म करीसे विकार कर रहा क हद सम्प कामिन क्षणसौखम् । उसने देखा कि यह तो वा कामी है, इसके प्रेमका कोई मरोसा नहीं है और या मित्रके सपमें शका काम इन्द्रियाराममुत्सृन्य स्वामिन दुःस्विता ययौ ।। ८॥ पर रहा है । अत पहनकरी उस इन्दियस्येलप करे को छोरकर बड़े दुमसे अपने पालनेमालेक पास घड़ी सोमपि पानुगतः पापणस्ता प्रमादितुम् । गयी ॥ ८॥ इदीन कामी या उसे मनाने के लिये में में करता एमा उसके पीछे पीछे वा । परम्स उसे प्रामण पा । उसने कोवम भाकर मक्के स्टकते हुए वसातच दिया कमिदवाखाम्पष्छिन रूपा। अमफोरको कार दिसा । परन्तु फिर उस बकरीका ही भव्य करने के लिये किसे उसे जार मी Pया। उसे तमन् पपस्य संदर्धाय योगक्षित ॥१०॥ इस प्रकारके महुत से उपाप मास ये ॥ १० ॥ प्रिय ! इस प्रकार षणकोप शुग धानेपर मा यारा सिर पुर्जी से निकलती हा परीके माय परत कि विश्य काले पनि भद्र कामै वापि सुप्पति ॥११॥ मोग करता रहा, परन्तु आजाय उसे सन्नोर न हवा ॥ ११ ॥ सुन्दरी । मेरी भी यही हशा है । तुम्हारे प्रेमपाशमें सफर मैं भी अस्पन्न दीन दो गा । हित दोका में जाने आपको भी प्रिये 1 पीमें जितन मी धाप ( थापर, प्रामादि), सुपर्ण, पशु और लिया है- सम्ये-सब मिया मी मन्तियविडाकार नाशक्नोत् पथि संधितुम् ॥९॥ मामि झमा म सकर ॥ ९ ॥ उस बकरीका स्वामी एक - समदापमा सोऽपि प्रनया कृपलब्धया। तुम्हारी मायामे यत् पक्षियों प्रोदियय हिरण्य पा लिया। १ र रकममान् विकिरा ।

श्रीमद्भागवत [अ०१९ न जातु काम कामानामुपभोगेन याम्यसि । के प्रहारसे अमर हो रहा है ॥ १३ ॥ वियों के मोगने से मांगवासना कमी शस्त नहीं हो सकती । मक्कि वैसे इविपा कृष्णवस्मय म्य एपाभिवर्धते ॥१४॥ | पीकी आहुति पाउनेर भाग और माक उठती है, से ही भोगवासनाएँ भी मोगोंसे प्रमक हो जाती हैं। १९ । पदा न कुरुते भाव सर्वमतेप्वमङ्गलम् । मव मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी मी पसाके साम एगीपका भाव मही रखता, तब वह समदर्शी हो माता समस्प्टेम्पदा पुंस सर्वा मुम्बमया दिशः ॥१५॥ तया उसके लिये सभी शव मुखमयी म बाट हैं॥१५॥ वियोंकी सृष्णा ही दु खोका उद्गमस्थान या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्जीयतो मान बीर्यते । है। मदमुदि ग्रेग पड़ी पठिनाईसे उसका स्पार कर सकते हैं । शरीर मम हो जाता है पर तृणा निस्ट तोता दु खनिवहां धर्मकामो त त्यजेत् ॥१६॥ नवीन ही होती माती है। अन बो भग्ना फापार चाहता है, उसे शीम-से-शीघ्र इस तृष्णा ( मोग-वासना माप्रास्वसाहियावा नापिविक्तासनो भवेव। का त्याग कर देना चाहिये ॥ १६ ॥ बोर सो क्या- खस्नी मा, पहिन जोर कन्याके साप भी अकेले एकमासन बलवानिद्रियग्रामो विदांसमपि कर्पवि ॥१७॥ पर स्टयर नहीं बैठना चाहिये । इन्द्रियाँ इतनी यम्यान् । कि घे गो-बड़े विशनोंको भी विधरित कर देत पूर्ण वर्षसहस्र मे विपयान् सेवतोऽसकत् । है।॥ १७ ॥ वियोंश पार-मार सेवन करते करते मेरे एक हमार वर्ष पूरे हो गये, फिर मी क्षण-प्रति-शण उन तथापि मानुमवन सृष्णा तेपूपमायते ॥१८॥ | भोगोंकी नासा पाती ही या रही है ॥ १८ ॥ इसलिये मे का मोगकी पासना राणा परिसयाग करके तसादेवामहे त्परता मण्यापाप मानसम् । भास्ना अन्त परण परमात्मके प्रति समर्पित कर ग | और शीम-उष्ण, मुमदु ख बादिके भावोंसे ऊपर उठकर निन्दा निरहमारपरिप्यामि मुर्गा मह ॥१९॥ महारसे मुक हा हग्निों के साप कनमें विचर्मणा । १९ । ठोक-परक नोंके ही मोग जसत् है, ऐसा समयका संवतममा पुरपानानुप्यायेमसपिझेत् । म सो उनस पिसन करमा चाहिये और न भाग दी समलना चाहिये कि उनके चिन्तनसे ही जम्ममृत्युगए समति पारमनाम पत्र विद्वान् स आत्माक॥२०॥ संसारकी प्राप्ति होती है और वना भोगसे तो मास्म नाश ही हो जाता है। थाम्नयमे उनके रहस्यको मान युक्या नागा जायोगदाय पूरष पयः। पर इनमे अग गनरागही आत्मपानी है ॥२०॥ पति ! यपीन भनी पनीसे इस प्रकार का दया मां ना सम्मादादद गितार ||२१||फर पूरी जवानी उसे गैस की ओर उससे जम्न पुद्वारा स रिया | सरियेबर उमर सितम दिगि दधिगपूर्पसा हुई, दक्षिणता पदम् । {पिनी नागना मी गद गपी ॥ २१ ॥ इमर प्रा टन्होंने लिंगमा हिप, शिमें पद प्रतीप्पो गु गर उदीपामनुपीमाम् ॥२२॥ भिमर्म दगु और उत्तरमें अनुर गयर दिया २२० १५।म! PERI ०२०] नवम स्कन्ध ८७ ममण्डलस्स सर्वस पूमईत्तम विनाम् । | सारे मूमण्डलयी समस्त सम्पत्तिर्योक योग्यतम पात्र पूरको | अपने राज्यपर अभिषिक करके तया वा माइयोंको उसके अभिपिन्यापनास्तस्य वशे स्याप्प वनं ययौ ॥२३॥ अधीन बनाकर वे कनमें चले गये ॥ २३॥ यमपि राजा ययातिने बहुत पोतक इन्द्रियोंसे विस्याका मुख्य भोग्न आसेविसं वर्षगान् पड्नर्ग विषयेषु सः । -परम्तु जैसे पाँख निकल आनेपर पक्षी भरना पगेन समचे नीरं जातपय इस द्विजः ॥२४॥ घोसय रोग देता है, जैसे ही उन्होंने एक क्षणमें ही सब कुछ ग्रेग दिया ॥ २९ ॥ कनमें जाकर राजा स तत्र निर्मुक्तसमस्तसझ ययातिने समस्त प्रासक्तियोंसे छुट्टी पाटी । भारम साक्षात्कारके झारा उनका प्रिगुणम्प पिसारीर नष्ट हो आत्मानुभूत्या विधुसधिलिङ्गः। गया। उन्होंने माया मउसे रहित परबा परमात्मा परेऽमले प्रमणि वासुदेवे वासुदेयमें मिग्यार वह मागवती गति प्राप्त की, बो बड़े- लेमे गति भागपती प्रतीतः ॥२५॥ बड़े भगवान् के प्रेमी सतोको प्राप्त होती है ॥ २५ ॥ भुस्वा गाय देवयानी मेने प्रस्तोभमास्मनः । चव देवयानीने बह गया सुनी, तो उसने समझा कि ये मुसे निवृत्तिमार्गक ठिये प्रात्साहित कर रहे है। क्योंकि स्त्री-पुरुषमें परस्पर प्रेमके कारण विरह होनेपर स्त्रीपुसौः स्नेहर्वक्लम्पात् परिहासमिरितम् ॥२६॥ विकता होती है, यह सोचकर ही इन्होंने यह बात हँसी-ईसीमें कदी है ॥ २६ ॥ वजन-सम्बन्धियोंका- सासनिवास सुरदा प्रपायामिव गम्छवाम् । जो ईश्वरके अधीन है-एक स्थानपर इकट्ठा हो माना पैसा ही है, जैसा प्याम्पर पपिकोका । यह सब विधापेश्वरवन्त्राणां मापानिरचित प्रभोः ॥२७॥ भगवान्की मायाका खेठ और स्वप्न सरीम्स ही है। ऐसा समझाकर देयपानीने सम पार्पोपी भासकि स्याग सर्वत्र सामसुन्य स्वप्नौपम्पेन भार्गयी । दी और अपने मनको भगान् श्रीपण तन्मय करके यन्धनके हेसु हिशरीरया परिस्याग कर Pया--पह हम्मे मनः समावेश्याव्यधुनोरिलङ्गमारमनः॥२८॥ मायान्या प्राप्त हो गयी ॥२७-२८॥ उसने मान् को नमस्कार परके पहा-'समान जगदके रमपिता, नमस्तुम्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे । सर्पान्तर्यामी, सयरे आध्रपरम्प सशक्तिमान् मगतान् वासुदेवा नमस्कार है । ला परम शान्त पार अनन्त सर्वमताधिवासाय शान्ताय पहते नमः ॥२९॥ । तत्र ६, उमे मैं नम्म्यार फटती ॥ २० ॥ -- इति श्रीमद्भागमते महापुराणे पारमईस्या सरितायो मरमस्पत्य एफोनविंशोऽप्याप ॥१९॥ अथ विंशोऽध्याय पूरके यश पमा दुप्पम्त मीर भरत गरिधश पणन भौगुक उपाप मीनदयनी पदन-पशिव ! बर में गता सम्पामि यत्र जासाऽमि भारत । पृहा पार नगन पर गा । इस गम तुम्हारा जन्म १ पैन्तिम् । २ तिमोः 11 प्रापीन प्रतिमें प्यास ला भरा पाठ है। राप।

८८ भीमद्भागवत [१० २० - पत्र रामर्पयो पश्या प्रमवश्याय बनिरे ॥१॥ हुआ है। इसी पेशके वंशघर बहुत से राजर्षि की ब्रह्मर्षि मी हुए हैं॥१॥ एका पुत्र हुआ जनमेजय जनमेवयो समूत् पुरोः प्रचिन्वांस्तत्सतस्ततः । जनमेजया प्रचिन्वान्,प्रषिन्धानका प्रवीर प्रवीरफा नम्र प्रवीरोग्य नमस्पर्धे तसाचारपदोऽभवत् ॥ २॥ और नमस्सुका पुत्र हुआ चारुद ॥ २ ॥ चारपदसे मधु वस सुपुरम पुत्रस्तरसाद पहुगषस्तत।। मधुसे यहुगत, यागयसे संयाति, संयातिसे यानि को संयाविस्तस्वाइयाती रौद्रायस्तत्सुतः स्मृतः ॥३॥ | महमाप्तिसे रौदाम हुआ ॥ ३ ॥ परीक्षित् । र भासेपुस्तम अधेयुः सण्डिलेयुः रुतेपुकः । विचारमा प्रधान प्राणसे दस इन्द्रियों होती है, वैसे घृताची अप्सराके गर्भसे रोदामके दस पुत्र हुए-अत्य बठेयुः सन्सतेयुप धर्मसत्पम्रतेपयः ॥४॥ कुशेय, स्पण्डिलेपु, फतेयु, नलेयु, सन्ततेप, धर्मेयु दतेऽप्सरसः पुत्रा वनेगुधाषमा स्मृतः । सस्पेय, मतेषु और सबसे छोटा बनेषु ।। ४-५॥ घसाम्मामिन्द्रिमाणीव मुरूपस्स बगदात्मनः ॥ ५॥ परीक्षित् ! उनमेंसे प्रत्युका पुत्र रन्तिमार हुआ बीन गोरन्तिभारोऽम प्रयस्तस्सात्मबा नृप । | रन्तिमारके तीन पुत्र हुर-मुमनि, हव और मप्रतिरप । सुमतिष्ठयोऽप्रतिरथा कम्योऽप्रतिरपारममः॥६॥ | अप्रतिरपके पुत्रका नाम पा करव ॥ ६ ॥ कायक वस्त्र मेधातिभिस्तमात् प्रकामापा दिखातयः । पुत्र मेधातिथि हुआ । इसी मेधातिपिसे प्रस्ताव साद ग्रामण स्पन हुए। मुमतिका पुत्र रैम्य पुआ, इसी रैम्यक पुत्रोऽमृद सुपते रैम्पा इम्पन्तस्तत्सतो मतः ॥७॥ पुत्र दुष्पत पा ॥ ७ ॥ दुप्पन्वो मृगयां पात: कम्वाभमपद गवः । एक बार दुष्यन्त क्नमें अपने कुछ सैनिकोंके साग तत्रासीनां स्वप्रममा ममयन्ती रमामिव ॥ ८॥ शिकार लेने के लिये गये थे। उधर ही वे का मुनिक धानभयर जा पोचे । उस आश्रमपर देवमायाय विलोम्प संयो सारे देवमायामिव सियम् । समान मनोहर एक सी बैठी हुई थी। उसकी ब्रामी बभाषे का पराराहां भटैः कतिपतिः ॥९॥ समान अमन्तिसे यह अमम नगमा या था। उस पुन्दरीको देखते ही दुष्पति मोहित हो गये और वानप्राविता संनिश्चपरिश्रमः। उससे बातचीत करने लगे ॥ ८-२॥ उसको देखने उनको बड़ा मानन्द मिम । मके मन में काम-वासन पप्रच्छ कामसन्तप्तः प्रामसलया गिरा ॥१०॥ जाग्रत् हो गयी । पककर दूर करने के बाद नहोंने कई मधुर वाणीसे मुसकराते हुए उससे पूछा-||१०॥ का तं फमतपत्राधि फसासि एदयङ्गमे । 'कमा ठके समान सुन्दर नेत्रोंवाली देवि ! तुम को किंवा विकीपितं त्वत्र भात्या निर्जने मने ॥११॥ कति करनेवाली सुन्दरी ! तुम इस निर्जन क्नमें हो और किमकी पुत्री हो । मेरे एपको अपनी ओर रहकर क्य करना चाहती हो।॥११॥ सन्दरी प्पक राजन्यतनयाँ वेदम्पह त्वां सुमभ्पमे। में सफर समझ रहा हूँ कि तुम किसी क्षत्रियकी कम्प नहितः पौरपामामधर्मे रमते कथित् ॥१२॥ नहीं सुफा' ॥ १२ ॥ हो। क्योंकि प्रशियोका पित्त कमी जर्मनी बोर मकुन्तत्प्रेगाव शस्तम्मने कहा-बापका कहना सुस्प है। विश्वामित्रास्मवैवाइ त्यका मेनकया बने । विश्वामित्रनीकी पुत्री हूँ। मेनका पसराने मुझे क्नमें १ रविनाऐ। २ २चितुप्प । मुमुझे म्यो। ।

म० २०] नषम स्कन्ध ८९ देतद् भगवान् कण्वो वीर किं करपाम ते ॥१३॥ छोड़ दिया पा । इस वातक साझी है मेरा पाग्टन-पोषण करनेवाले मर्द करवा पीरशिरामणे में आपकी स्या | सेवा करें।॥ १३ ॥ क्सटनयन ! आप यहाँ पैटिये आसवां परविन्दाक्ष गृपतामईण च नः । और हम जो कुछ भापका स्वागत-सत्कार करें, उसे | स्वीकार कीजिये । आश्रममें कुछ नीवार (तिनीका मात) मुन्पो सन्ति नीपारा उप्पा यदि रोषते ॥१४॥ । भापकी इच्छा हो तो मोजन कीजिये और जंचे तो यही ठहरिये ॥ ११॥ दुपन्त उपाय दुप्यन्तमे कहा- 'मुन्दरी ! तुम पुशिश्वशरमें उत्पन्न हुइ हो, इसरिये इस प्रकारका भातिय्य-मस्कार उपपन्नमिद मुमु बाताया शशिकान्वये । तुम्हारे योम्प ही है। क्योंकि गजपत्याएँ स्वयं ही अपने म्वय हि गते राक्षां कन्यका सदश वरम् ॥१५॥ ) योम्य पतिको घरण कर रिया करती हैं ॥ १५ ॥ शकुमपाकी स्वीकृति मिल जानेपर देश, काप और वामित्युक्त' ययाधर्ममुपयेमे शकुन्तलाम् । सनकी आमाको माननेवाले राजा दुप्पत्तने गान्धव गाधर्षविभिना राजा देवकालविधानचित् ।।१६।। राजर्षि दुप्यन्तमा वीर्ष अमाघ पा । रानिमें कहाँ रहकर विधिसे धर्मानुसार उसक साय विवाह कर रिया ।। १६ ।। अमोपीयों राणपिमहिप्पो वीर्यमादधे । दुप्यन्तने शकुन्तलाका सहवास किया और दूसरे नि सबरे वे अपनी राजधानी में चले गये । सम्प वानपर शोमते म्यपुरं यातः कालेनास्त सा सुतम् ।।१७॥ शकुत्ताको एक पुत्र छपन्न हुआ ॥ १७ ॥ महर्षि कावने कनमें ही राजकुमारक जातकर्म आदि मस्कार कम्बः कुमारसपने चक्रे समुचिताः क्रियाः । विधिपूर्वक सम्पन्न किये । यह वाउफ यचपन में ही इतना बयामृगेद्राम्तरमा क्रीडति मसपालकः ॥१८॥ | और उनसे म्मेय पाना ॥ १८ ॥ पान् या फि या-यह सिंहोंको यापूवक बाँध स्ता त दुरत्ययविक्रान्समादाय प्रमदोचमा । बह पाय मावान्या अंशाशकार था । उमका पर-मिक्रम अपरिमित था । उसे आन माय मर हरंशांशसम्भूत भर्तरन्तिकमागमत् ॥१९॥ ग्मगीरत्न शयुत्तय अपने पतिय पाम गपी ॥ १० ॥ जब गमा दुप्यन्नने अग्नी निर्गेर स्नी और पुप्रमा यदा न नगृहे राजा भार्यापुत्रापनिन्दितो । स्वीकार नहीं पिया, तय जिमका पता नहीं दीम्य रहा था और निमे सब लोगाने सुना, o भाषा पाणी गन्ना सर्वभूतानां खे पागाहाशरीरिणी ॥२०॥ ॥ २० ॥ पुत्र टरश्न करनर्म माना ता पर पौरतीय मुमन है । पानवमें पुत्र स्पिकरही है। माता मखा पितु पुत्रो येन जातः स एव सः। क्यॉरि मिनाही पुर मप उन हापि भरम्य पुत्र दुप्यन्त मावमम्या शन्सलाम् ॥२१॥ । दुष्पन ' मम कुल गया रिम्पार म पग, अम्म । पुत्रमा भग पार पग ॥ २५ ॥ गनन् ' की रखापा पुमो नयति नग्दव यमवयास । वृदि पाने । पुन पान निमा ग्यास र ना १ पागि । २ हो। कुमारसने पारा गमुदिता ।' - ।

२० भीमन्नागपत (०२० व पास धावा गर्मस्प सत्पमाह शकुन्तला॥२२॥है । शकुन्तलाका कहना बिन्कु ठीक है । इस गमको धारण करानेवाले तुम्ही हो ॥ २२ ॥ पित्युपरते सोऽपि धरुषी महापाः । परीक्षित् ! पिता दुष्यन्तकी मृत्यु हो मानेके बाद मह परम यशम्बी अश्क चक्र सम्राट पुआ। उसका महिमा गीयत तस्स हररंसमुवो सनि ॥२३॥ जन्म मगवान्के अशसे हुआ था । आम भी पृथ्वीपर उसकी महिमाका गान किया जाता है ॥ २३ ॥ उसके मक दक्षिणहम्नस्स पपकोशोऽस्प पादयाः। दाहिने हापमें चक्रका चिट था और पैरोंमें कमकोपका । महाभिपककी विधिसे गजानिराज पदपर उसका अभिषेक इज महाभिपकेण साऽभिषिक्तोऽपिरा विसः॥२४॥ आ । मत या शक्तिशमी गजा पा ॥ २१ ॥ मरतने ममताके पुत्र दोधतमा मुनिको पुरोहित बनाकर पसपञ्चाशता मेमर्गझायामनु पानिभिः । गढ़ातठपर गङ्गासागरमे सेक्स गोत्रीपर्यन्त पपान पकि अनमेध या किये । और इसी प्रकार यमुनाता पर म मामलेय पुराधाप यमुनामामनु प्रमः ॥२५।। प्रयागसे लेकर यमुनोत्रीतक उन्होंने अठहत्तर वचके यस किये । इन सभी यम उन्होंने अपार धनराशिक अष्टसप्ततिमामाधान पाप प्रददद् पसु । | दान मिपा पा । दुप्पन्तकुमार मरत। यहीय अग्नि स्थापन पड़े ही उतम गुणवाले स्थानमें किया गया था । भरतस्य हि दोप्य वेरग्निः साधीगुण पिता। उस स्थानम मरतन हनी गीर तान दी थी कि एक हजार बामणोंमें प्ररपेर प्रामगको एक-एक या साम पदयो यस्मिन् प्रामणा गा विमेगिर ॥२६॥ (१३०८४ ) गा मिरी यी ॥ २५-२६ ॥ इस प्रकार रामा मतने उन यमि एक सौ लीस प्रतिशत प्रसान् गमाविमापयन् नृपान् । (५+७८) घोई मांधकर ( १३३ या करक) समस्त नरपनियोंको असीम आश्चर्यमें सास गया । इन दोपतिरत्यगामापा देवानो गुरुमायया ॥२७॥} यॉक भाग इस को तो राना मरतको परम यश मिग्न ही, अत्तमें उन्होंने म्प्रयापर भी विजय प्राप्त के मृगायादव कृष्णान् हिरण्यन परीपमान । और दनाओंक परमगुरु भगवान् श्रीहरिका प्राप्त मात्र रिया || २७ ॥ मसमें एक कम होता है | मदान फर्मणि मणार निपुतानि चतुर्दश ॥२८॥ ममें भगमन सुपणमे विभूग्नि, वन तोलाउ तप पास गा चारह हाथी दान किये २८॥ भरतम्प मात फर्म न पूर्व नापर सपा । मान जा मार कम दिया, पर न तो पले कार नवापुर प्राप्यमिवादम्यो प्रियि यथा ॥२९॥ गन मा मा पा और न मा अगे ही पार मरण । श्या पी पार पायो मगरा, मास गितहमान यानान धान फडान मान। || २० ॥ भमन विनगर ममप गित, पुण, अग्ध पदा, आर राड आणि भमनपान नपामाइन महान दिग्विजय मिलान् म प्राडा गॉग मार मात्र ॥३०॥ 'R IMMITI पतन | मगर | - परन अ० २०J नवम स्प N धित्वा पुरासुरा देवान् ये रसौकासि मेगिर । पहले युग; वरयान् अमुगुने देवताओंपर विजय प्राप्त कर ली थी और ये रसागमे रहने एगे ध, टस समय ये दवतियारमा नीताः प्राणिमिः पुनराहरत् ॥३१॥ यहुत-सी देवानाओंको रसानउमें स गये थे । राना मरतने फिरसे उन्हें छा गया ॥ ३१॥ टन राग्य मर्वकामान् दुहतुः प्रवानां तस्स रोदसी । मै पृषी और आकाश प्रजादी सारी आवश्यकता पूर्ण कर देते थे । मातन सत्ताइस हजार पर्वतक समस्त समाविषवसाइसीर्दिसु चक्रमवयत् ॥३२॥ दिशाओंश एकछत्र शासन दिया ॥ ३२ ॥ अन्तम सावभौम सम्राट मरतने यही निध्य विस्य हिरोक- ससमालोकपालाख्यमै धर्यमधिरा भियम्। फाटोंको भी चक्ति पर दनेाग्य एश्वय, सार्वभौम सम्पत्ति अम्बा शासन और यह जीवन भी मिथ्या ही पर पास्खलित प्राणान् मृपेस्पुपरराम ह ॥३३॥ | । यह निश्चय करके व संसारसे उगसीन हो गये ॥३३॥ तस्यासन नृप बैदर्य पल्यस्तिस्रः सुसम्मताः । परीक्षित् ! बिरानी नान पत्याएँ सम्राट मरतकी पत्नियों थी। वे उनमा वहा आर भी करते थे। परन्तु जब भरतने उनसे कह Pया कि तुम्हार पुत्र मेरे बन्नुस्त्यागभया पुत्रान् नानुरूपा इतीरिते ॥३४॥ अनुरूप नहीं हैं, तब वे पर गयीं कि कहीं सम्राट हमें स्पाग न दें। इसरिये उन्होंने अपने यचोया मार राय ॥३१ ।। इस प्रकार सम्राट भरतका क्तिय उम्पेय पितघे पो तदर्थ यमवः सुतम् । अर्पाद विछिन्न होने एमा । तब उन्होंने स्तानम रिये मरुस्तोमा मामा या पिया । इससे मरुदणोंने प्रस्न हामर भरनको मागन नामका पुत्र रिया ॥३५॥ मरूस्तामन मरुतो भरदाममुपाददुः ॥३५॥ । भरद्वाजकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग यह है कि एक यार पृहस्पतिजीन अपने मा उनण्या गमवती परनीसे मैथुन करना चाहा । ठम समय गममें जा पाय अन्तर्वल्पा मातृपरन्या मधुनाय पृहस्पतिः । । (पीवनमा ) पा, उमने मना किया । रिन्नु पृदयनि- जीने उमरी यानपर ण्यन म पिया और टसे - अंधा हो जा यह पर देकर पार गर्भागन कर पाचो वारितो गर्म शप्त्वा वीर्यमवासनत् ॥३६॥ पिा ॥ ३६ ॥ टनप्पर पनी ममता इस पानमे र यी कि कही मर पनि मा स्याग न पानामपि टसने पृहस्पतिनीक गाना सहरसा लाग त्यातुममा ममा भईत्यागनिमशिवाम् । रना चाहा । टम समय मान गभर पुरे नामरा निमन करत ए पद पर। ॥२७|| सनि नामनिर्वाचन सम्प रोमन सुरा अगुः ॥३७॥ जी मान है कि अगरे । या मग ओग्ग र मारा यजम प्रगा "नॉय पुत्र (3) इमयि र मा, मिरा मामार ()। मिर मनग्न पा1-पृहन्म! दर गर । म भर द्वाजमिम मर द्वाम पारपते । १ पुद्रा प्रपि।।।

९२ श्रीमद्भागपत [२०२१ पातौ यदुक्ता पितरौ भरमाजस्ततस्वयम् ॥३८॥ नहीं, हम दोनों ही पुत्र है, इसलिये तुम्ही इसका भरण-पोषण करो। इस प्रकार मापसमें विट फरते हुए माता-पिता दोनों ही इसको ओस्कर चले गये। इसलिये इस मकेमा नाम भरवाजा खा ॥ ३८ ॥ देवताबोंके द्वारा नामका ऐसा निर्वचन होनेपर में चोधमाना सुरैरेवं मत्वा विवथमात्मवम् । मासाने यही समता कि मेरा यह पुत्र क्लिप धर्षत मायापसे पैदा हुआ है । पत उसने उस बन्छेको कर दिया । अब महमोंने उसका पालन किया और जब राना मरतका पेश नम होने लगा, हम उसे सकर उनको दे दिया । यही क्तिब (मरान ) म्पसबन मरुतोऽविनन्दचोऽय विवयेऽन्तये॥३९॥ | मरतका दत्तक पुत्र हुला ॥ ३९ ॥ इति श्रीमद्भागवसे महापुराणे पारमस्या संहितायो मवमस्कर' विंशोऽप्याप ॥२०॥ अथेकविंशोऽध्याय भरवशका वर्षम, राजा रसियेवकी कया भीमुक उमाप भीशुकदेषनी कहते हैं-पीक्षित् । स्तिष वपना विवपस्य सेता मन्पुरत्यत्रो धपस्ततः । महाजन पुत्र मा मन्यु । मयुके पाँच पुत्र हुए- पृहदान, जप, महावीर्य, मर और गर्म । भरका पुत्र महावीर्यो नरो गर्गः सतिस्सु नरारमशः ॥ १॥ पा सति ॥ १ ॥ संक्केि दो पुत्र हुए वीर रन्तिदेव । परीधित् ! रसिदेश निर्मल पा इस गुरुभ रन्तिदेवष सहते। पागनन्दन । ध्येय और परमेकमें सब जगा गया माता है ॥ २ ॥ रन्तिदेव बकाशके समम चिना उपोगके ही दैववश रन्तिदेवस हि यश शामत्र च गीयते ॥२॥ प्राप्त वस्तुका उपभोग करते और रिमोदिन उनकी सियविपस्स ददतो उन्ध सन्धं पुसक्षतः । पूंजी घटती ती । जो कुछ मिस मानम उसे भी दे सो वीर सप भूर यते । थे संग्रह-परिमा, ममतसे निम्कियनम्प धीरस समस्य सीदतः ॥३॥ रहित सय या पैर्यशटी पे और अपने फुटुम्बके साप दुःस भोग रह थे ॥ ३ ॥ एक पर तो यावर म्पतीपुरटपत्वारिंशदहान्पपिषतः किल । वाताधीस दिन ऐसे बीत गये कि उन्हें पानीक पीनेमे म मिश्र । उनचास Pन प्रात पाठ ही उन्हें पृवपापमसंपा तोपं प्रातरुपस्थितम् ॥ ४ ॥ पुछ भी, वीर, हवा और जर मित्र ॥ ५ ॥ उनका प्राप्त एम्सस्स भुताम्पा नातषपयोः । | परिवार मा साटमें पा । मूस बार प्याम मरे ये मग पप रहये। परम्स म्पों ही उन लोगोंने भाग्न भतिभिमानण काले भाग्नुकामस पागमत् ॥ ५॥ करना चाहा, त्यों ही एफ प्रामण मतिपिके मपमें मा मापीन प्रतिमें पुष्यानुन माम मा भग भधिक है। मुनाम् मापे मर ।

प० २१] नवम स्वध तम्मै संम्पभजन सोऽभमाटत्य श्रदयात्रितः। गया | ॥ रन्तिदेय सबमें धीमगवान्वे ही दमन फरते थे । अतण्य उन्होंने बड़ी अदासे मारपूर्वध हरि सर्वत्र संपश्यन्स सक्त्वा प्रययौ विज ॥६॥ सी अन्नामे प्राझणया मोजन काया । माझगदेवना मानन परके चले गये ॥ ६ ॥ अधान्यो भोल्पमाणस्य विमकस्य महीपते । परीक्षित् ! भव यचे हुए अन्नको रन्मिदपन आपसमें विभक्त ध्यभमत् तस्मै पलाय हरिम्मरन् ॥ ७॥ वार लिया और माजन यरना चाग । उसी समय एक दूसरा सूद अतिपि आ गया । रन्तिवन भगवान्या पाने शूद्रे तमन्योऽगादविधिः अभिराप्त । स्मरण करते हुए उस बचे हुए अन्नमेंमे भी कुछ माग राजन् मे दीयतामन्न सगणाय पुमुक्षते ॥ ८॥ | चद्रके म्पमें आये अतियिया सिम रिया ॥ ७ ॥ जय शद गीयर चरा गया, तब दुचाको रिय पए समारस्पारशिष्टं यद् बहुमानपुरस्कृतम् । एय और अतिथि आया । उसने कहा-'राजन् ! मैं और मरे ये कुछ मत भूखे है। हमें कुछ अनेर तपदाचा नममके स्वम्यानपतये पिसः॥॥ीजिये' ॥ ८ ॥ रन्ति वन अत्यन्त आरम्पबमे, जा कुछ बच रहा था, सब फा-मब ठसे दे दिया और पानीयमाप्रमन्छेसं सच्चैफपरिवर्पणम् । भगमप हार उन्होंने युत्ते भार पुच्चोंक स्पामीर पास्यतः पुत्कसोऽम्पागादपो देमार्मस्य मे॥१०॥ र पर्म आये हुए मगवान्या ममम्यार किया ॥ • ॥ भत्र पाठ बर ही बन रहा था और बद भी पाठ संस्प खा फरुगा पाच निशम्य विपुलभमाम् । व मनुप्पा पीनेभरना या । व उमे आसमें यौवन पीना ही चाहत थे पिण्प पाण्टारमा पहुँषा । रुपया भृशमन्तप्त इदमाहामृत वप ॥११॥ रमने पार-अपन नीब है। मुन जागि जिय' ॥ १० ॥ चाण्डाग्यी प. परमग यागी, नकामयेऽहं गतिमीश्वरात् परा जिमा उपारगर्म भी पा मस्क्त पा पा गाव, मुनमा रतिव त्यामे अपन मलना उर और ग मष्टर्दियुक्तामपुनर्मच अमृतमप पचन पान ॥ ११ ॥ म भगवान्म बारों मिद्वियोंगे मुक्त परम गति न पाना । भार मानि प्रपयेऽम्बिलठेहभावा सा स्या, म माभी भी फामना नपाना । म मन्ताम्यितो येनभवन्त्यावागा१२॥ | पाप क्या पण मि सम्म प्रानिगा एय स्थित सा जाऊँ और उनमा मुग दुग मी सुचद्धमो गायपरिश्रमय मन पर, निमम अर रिसर मी माग नतो ॥ १० ॥ पनप्र। राजीना दन्य फ्लमः शाकविपादमादा । नाना दम हमरु जीनी दी। 1री गगरी सीमा, म निश्मा कपणस्य बन्ता Pr, नि:, fry E-- मरत पिंप्रीविपामीर मनापणा मे ॥१३॥ 7 1 ग । मे गुर २ भार मे। २ री । पा।

भीमद्भागवत [अ०२१ इति प्रभाप्य पानीय निपमाणः पिपासया | इस प्रकार कहकर रन्तिदेयने वह क्या हुआ जठ मी उस चाणाको दे दिय । यपि जम्के बिना वे स्वयं पुरकसायाददाढीरो निसर्गकरुणो नपः॥१४॥ मर रहे थे, फिर भी स्त्रमावसे ही उनमा दय इतना फरणापूर्ण पा कि वे अपनेको रोक न सके । उनके धर्यकी भी कोई सीमा है।॥ ११ ॥ परीशिए । तस्प त्रिसपनाधीशाः फलदाः फलमिच्छताम् । ये अतिपि वास्तवमें मगवान्की रची ई माक ही विभिन्न मप ये । परीक्षा पूरी हो जानेपर अपने मोंकी पारमानं दरोमाचनुमायाविष्णुषिनिर्मिताः ॥१५॥ अमित्मपा पूर्ण करनेवाले त्रिभुझ्नस्थामी प्रमा, विष्णु चौर महशतीनों उनके सामने प्रष्ट हो गये ॥१५॥ समें सेम्पो नमस्तस्य निसिहोमिगतसा। रन्तिदेवने उनके चरम नमस्कार किया । उन्हें कुछ लेना सो पा नहीं । मगलान्की मासे वे भासक्ति और पासुदेवे भगवति भत्तमा पक मनः परम् ॥१६॥ स्पृहासे भी रहित हो गये तथा परम प्रेममय भकिमात्रसे अपने मनको मावान् पामुदेसमें समप कर Pया । ईश्वरालम्भनं विच कुतोऽन पराधसः | कुछ भी मांग नहीं ॥ १६॥ परीक्षित ने भगवान् के सिवा और किसी भी पस्तुकी दम तो पी नहीं, माया गुणमयी रामन् स्वप्नषत् प्रस्पलीयत ॥१७॥ न्होंने अपने मनको पूर्णरूपसे भगवान्म त्या दिया । इसलिये त्रिगुणमयी माया जागर स्वप्न सत्यक समान वत्प्रतमानुभाषेन रन्तिदेवानुपतिनः। मठो गयी ॥ १७ ॥ रन्तिदेवके अनुयायी भी उनके सङ्गके प्रमावसे योगी हो गये और सब भगवान्के ही अभवन् योगिनः सम नारायणपरायणा ॥१८॥ आश्रित परम मफ बन गये ॥ १८ ॥ गर्गाच्छिनिस्ततोगार्यक्षवा प्रेम पपर्वत । मन्युपुत्र गणसे शिनि और शिनिसे गम्पका जन्म दुरितक्षयामहावीयान सस्पत्रप्पारुपिफपि॥१९॥ हुआ । परि गर्य क्षत्रिय था, फिर भी उससे प्रमणवंश पन ) महावीर्यका पुत्र वा दुरितश्य । पुष्करारुमिरिस्पत्र ये प्राधणगति गताः । दुरितक्षपके तीन पुत्र ए-अप्यारुणि, कवि और पृहरवत्रस्प पुरोऽभवती पदस्तिनापुरम् ॥२०॥ पुष्पाणि । ये तीनों प्रमण हो गये । पहापार पुत्र मममीदा दिमीरय पुरुमीरम हस्तिनः । सुआ इस्ती, उसीने हस्तिनापुर यसाया पा!॥ १०-२० ॥ अजमीढस्प पंपास्युः प्रियमेधाइया विजापा२।। दम्नीके तीन पुत्र पे-अनमीर, रिमीत और पुरमीत । लनमीठय पुमे प्रियमेष वारि प्राह्मण हुए २१॥ अनमीनान पूरदिपुस्तस्य पुत्री पदनु । । इन्हीं अनमीय एक पुत्रमा नाम या पृहरिपु । पूहरवायम्तवम्नस्य पुष मासीअपद्रथ ॥२२॥ वृदिएका पुत्र मा पृहदन, हस्नुका पृहामध्य सरगुता विशदनस्य सेनमिन् समभायत । और पृहस्वापरा जपाय आ ॥ २२ ॥ अपमा मपिरापादानुः घश्या परसयत गुनाः ॥२३॥ पुत्र हुआ विश? बार विशडका सेननित् । रेनजितक रुमिगधमुत पार पधुसेनम्मदारमज । एचिराध, सहनु, फास्य और बम ॥ २३॥ रुधिराम पुत्र पर था और परमा पारम्प ननपा नीपम्तम्प पुत्र लम्न ॥२४॥ धुमैन । पारय समरे पुत्र माम मीप पा । उसके १२ तामपानरमा पसल ।

अ० २१] नवम स्कन्ध स रूपां शुभमन्यायां समदचमजीवनन् । सौ पुत्र थे ॥ २१ ॥ इसी नीपने (छाया) सुनसरी क्त्या इसीसे विवाह किया था । उससे प्रदत्त नामय पुत्र से यागी गपि मार्यायो विष्वक्सेनमधान सतम्॥२५॥ असम हुआ । अमदत्त यड़ा योगी पा । उसने अपनी फ्नी सरम्बनीके गर्भसे विष्वक्मेन नामक पुत्र उत्पम चिया ॥ २ ॥ इसी विष्वक्सेनने जेगीपपके उपदेशसे जंगीपन्योपदशेन योगतन्य चकार । योगशाम रचना की। विष्वासेनका पुत्र या उफ स्वन और उदयसनका मन्यद । ये सत्र हरिपुक वंशज उदकम्वनम्ततम्तमान् भल्लादो पाईदीपवा ॥२६॥ हुए ॥ २६ ॥ यत्रीनरा दिमीढस्य फतिमस्तिस्मत स्मृत । दिमीतका पुत्र था यबीनर, पीनरका कृतिमान्, नाम्ना सस्पतिर्यस्य ढनेमि सुपार्यकत्॥२७॥ कृतिमान्धत मत्यधृति, सत्यधृतिका रखनेमि और न्दनेमि- सुपार्यान् सुमतिस्तस्य पुत्र ममतिमांस्ततः । का पुत्र सुपाश्य हुआ ॥ २७ ॥ सुपावसे सुमति, मुमतिसे समनिमान् और सनतिमान्से पनि सम्म कतिहिरण्यनाभाद् पो यागं प्राप्य जगौ मा पट्।।२८॥ हुआ। उसने हिनष्पनामसे योगविधा प्राम की थी और सहिताप्राच्यसाम्नां बैनीपो मुग्रायुधस्तत । 'प्राम्पसामा नामय प्रचाओंशी र महिताएँ कही पी। वस्य क्षेभ्यः सुपीरोऽथ सुनीरस्य रिपुञ्जया ॥२९॥ इतिका पुत्र नीप पा, नीपयर उपायुध, ग्मायुका क्षम्प, क्षेम्यया सुधीर ओर मुधीरका पुय या रिपुनय ॥२॥ २०॥ वयो बहुरथा नाम पुरमीदा प्रयोऽभवत् । रिपुञ्जयका पुत्र था यग्य । दिमीठक माइ पुरमीत्यो नलि पामजमीदस्प नीलः सातिः सुतस्तत ॥३०॥ पोइ सन्तान न हुए । अनमी की मग 'प्लीका नाम धान्ते मुशान्तिम्तरपुत्रः पुरुमोऽस्ततोऽभवत् । था नरिनी । उसक गर्भस नीरका जन्म हुआ। मीणा शान्ति, शान्तिका सुश्पत्ति, मुश्यन्तिका पुरुन, पुरुजया भाभम्तनयन्तस्य पनास मुद्गलादयः ॥३१॥ भर र अपर पुत्र राजा माप । मम्पाभक पाँच पवीनरा गृहदिपु काम्पिल्या समय मुता । पुत्र धे--मुहर यानर, पृहरपु, याम्मिन्य र समय । भाधः प्राह पुत्रा मे पश्चाना रक्षणाप रि॥३२॥ माधन कहा- पे मरे पुत्र पोष दीया शासन पग्नमें ममर्य (पच अम् )है। सरिस पिपयाणामलमिम इसि पनालसहिताः । नाममे प्रमिद रानमें मुद्रामे 'मोदम्या मामा माग्नग मुहलाद मा निर्वच गाव मौल्पसमिसम्॥३३॥ गोत्री प्राप्ति ए॥ ३०-३३ ॥ मिथुने साद भाम्पात् दिवोदास पुमानभूत् । भापय पुत्र मुदामे पमन (यु) मनन 1। उनमें पुत्रया नाम या पिगम और फत्पा आल्याक यका पस्यां शतानन्दस्तुगीतमात्॥३४॥ अहम्या । अाम्या बिगर मा तम्मे हुआ । गतमा पुनह पलानन्द ।। ३९ ।। EPन"या पुत्र मम्पानिन, या मनुरिया अफ्न पुगगामापति तस्स मस्पति पुत्रा धनुदाविशारदः। पुरस माम या गारन् । प्य नि मग दान मे भारतमा दीप नर IT शिग गमग पर गरदांमत्सुता यम्मायणादाना फिट ।।३। इनार पुत्र अर पुर्वाग नमन १२ मा TIFY41. । TETभाग पर न त भ प UITTERNET प्ले में ! PROTI rean .. FRI ९६ श्रीमद्भागवत [२०२२ शरस्तम्मेऽपतद रेतो मिथुनं तदमूच्छुभम् । शन्तनुपी उसपर दृष्टि पर गयी, क्योंकि ये उपर शिकार खेलनके लिये गये गए थे। उन्होंने दयाश दोनोमो तद् घट्न रुपयागृहाच्छन्तनुर्मगया परन् । व्य ग्यिा । उनमें जो पुत्र था, उसका नाम काचर्य हुआ वीर जय कन्या पी, उसका नाम हुमा कृयी । की रुपा कुमारः कन्या च द्रोणपरन्मभवस्पी ॥३६।। । कृयी प्रोणाचायकी नी हुई ॥ ३५ ३६ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या संहितायां नवमस्कन्धे एकविंशोऽध्याय ॥ २१ ॥ अथ द्वाविंशोऽध्याय पाशास कोरष भौर मगपदेशीय राजामौके पशका वर्णम मीसुक उपाय भीशुकोषमी कहत है-परीक्षिस् । योगका मित्रयुष दिवोदासाम्ययनस्तरसुतो नृप । पुत्र था मित्रेमु । मित्रेयुके चार पुत्र हर-मन, मास, सहदेव और सोमक । सोमका सौ पुत्र थे, उनमें सबसे सुदास' सादयोऽप सोमको ज तुजन्मत् ॥ १॥ यहा क्तु और सबसे छोटा पृपत पा । पृफ्तक पुत्र वस्य पुत्रशत सेपो यवीयान् पृपत सुतः । मुपद थे, हुपके दौपदी नामकी पुत्री और पृम्पुम पदो द्रौपदी सस्य भएपुम्नादयः सुप्ताः ॥ २॥ आPि पुत्र हुए ॥ १२ ॥ धृष्टद्युम्नका पुत्र था पृष्टकेत। मायके वंशमें सपमए ये नरपति पाघाट पहायो पृष्टषुम्ना एकेतुर्मााः पचालका इम । बजमीठा दूसरा पुन पा अक्ष । उनके पुत्र पुष योऽममीसुता अन्य ऋक्ष संवरणस्ततः ॥ ३ ॥ संवरण ॥ ३ ॥ संपरणका चिाह सूपकी क्त्या तफ्ती- सपस्यां सूर्यकन्यायो रुक्षेत्रपति फुरुः । से जा ।म्हीके गर्मसे कुरक्षेत्रो स्वामी कुरुका जन्म पीथिन् सुपनियामकुरो सुनाए । ४५ हुआ. १ कुमक चार पुत्र हुएपीसिला शुधा, बा मुहानोऽभूत् सुघनुपरम्पयनोऽथ सत मुवी। और निपधाश्च ॥ १॥ मुक्यासे सहोत्र सुहोसे पवन, वमुम्तस्यापरिघरो प्पानसे क्ली, कृतीसे उपरिवरष वीर उपरिधरकमसे पृहद्रथमुम्बास्वत ॥५॥ वृदय भरि का पुत्र उत्पन हुए ॥५॥ उनमें पृझप, फुशाम्पमरस्यप्रत्यग्रदिपापाय पदिपाः । कुशाम्य, मत्स्य, प्रत्यम और रिप आनि चेदिदेशके राय पृहद्रयात कुशाग्राऽभूष्पमस्तस वरमुतः ॥ ६ ॥ हुए । पृलपका पुत्र या बुशाग्र, पुश्यप्रका अपभ, अन्न सस्पहिताऽपस्य॑ पुष्पांस्तत्सुता बहु । अपमा सस्परित, सत्पहितका पुष्पवान् और पुणवान्के अयस्यां चापि मायोपो शकले द पदयात् ।। ७॥ एष शरीरके दोटुपड़ ठाम हुए ॥ ६-७ ॥ उमें माता- जहु नामक पुत्र हुआ । मृतपकी दूसरी पत्नी गर्मसे व मात्रा पहिस्सष्ट अरया पामिसधिते। ने महर फैसा किया । तब 'मग' नामकी राक्षसीने जीन मीवति मोहन्त्या जरास घाऽममत् मुतः।।दा टुफॉर बाद Pया । उसी माह ए मामा माम मियो निया' इस प्रकार फहमर देवपमें उन दोनों सतप महदपाऽमन् मामापिर्यन्वभवा । त्रा समय ॥ ८॥ जरासन्धका सहदेव, सहदेवा पामे HITीतने इन्ना भ] भधिकार बानुमान् ।

५०२२] नवम स्फन्म १७ | परीक्षिरनपत्योऽभूत् सुरथो नाम बाहवः ॥९॥ सोमपि और सोममपिका पुत्र हुआ Vतमा । गुरुके स्पेष्ठ पुत्र परीक्षितके कोई सन्तान न ई । जहुका पुत्र उसो विदग्धस्तमास् सार्वभौमस्तमोऽभवत् । पा मुरप ॥ ९॥ मुरपका विदूरप, विदूरपमा सावभीम, सार्वभौमका क्यसेन, जयसेनका राधिक और राधिका अयसेनस्तचनयो राधिफोऽसोऽस्तो पमूत् ॥१०॥ पुत्र मुभा अयुत ॥ १० ॥ भयुनका क्रोक्न, मोक्नका सतम क्रोधनस्तमाद् देवातिधिरमप्य च । देषानियि, देवातिथिका अम्य, अध्यका दिलीप और विश्लफ- का पुत्र प्रतीप मुखा ॥ ११ ॥ प्रतीफ्के तीन पुत्र थे-- श्रेयस्तस्प दिलीपोऽभूत प्रतीपस्सस्स चात्मनः।११। देवापि, शन्तनु और पाहीक । देगापि अपना पैतृक राज्य शेषकर बनमें चला गया ॥ १२ ॥ इसठिये उसके देवापि सन्तनुस्तस्य माहीक इति था याः। सेटे माइ शान्तनु राना हुए । पूर्वजन्ममें शहनुका नाम म्हाभिय पा । इस मममें भी ये अपने हार्योंसे निसे छ पिठराज्य परित्पन्प देवापिस्तु पर्न गतः ॥१२॥ देते थे, इसे मान हो जाता था ॥ १५ ॥ उसे परम शान्ति मिल जाती थी। इसी करामातक कारण सभनन्छन्सन् रामा प्रामाभिपसमित । उनका नाम 'शम्तनु' मुआ । एफ पार शन्तनु के राज्यमें वारह वर्षसक इन्द्रने पर्या नहीं की । इसपर प्रामोंने यं यंफराम्यां स्पचति बीर्ण यौवनमेति सः ॥१३॥ शत्नुसे कहा कि तुमने अपने मा माइ देअपिसे पहले ही मिनाह, अग्निहोत्र भोर राबपदको स्वीकार कर प्रिया, शान्तिमामाति चैवायां कर्मणा तेन शन्तनुः । अत सुम परिवेसा हो, इसीसे तुम्हारे राम्पमें वर्ग नहीं होती । भय यदि तुम अपने नगर और राष्ट्रको उन्नति समा बादश तद्रान्मे न पपर्प यदा विसः ॥१४॥ चाहते हो, तो शीप से शीघ्र अपने या माझो राम्प लौटा दो ॥ १.१५ ॥ जय प्रमोंने शान्तनुसे इस शन्तनुप्रोमणरुक परिवेत्तायमप्रभम् । प्रकार कहा, तब उन्होंने बनमें नाकर अपने पड़ माई देवापिसे राम्प स्वीकार करनेश अनुरोध कित्सा । परन्तु राज्यं ठेमग्रजायाशु पुरराष्ट्रविषद्धये ॥१५॥ शन्तनुके मन्त्री कमरासन पहरेम्से ही उनक पास कुछ एसे प्रमग मेम Pय पे, यो पेदको पित करनेवाल एवमुक्कोदिनज्येष्ठ छन्दयामास साऽमयीत् । बचनोंसे दवापिका यम्से विचड़ित पर पुक य । इसका फष्ठ यह हुआ कि देवारि वेदोंके अनुसार गृहस्था- मन्त्रिप्रहिसैविपर्षदाद् विभ्रमिता गिरा।॥१६॥ श्रम स्वीकार करनेकी जगह उनकी निन्दा करने मगे । इसलिये ये राम्पक अधिकारसे पधित हो गये और तय घेदनादाविषादान् घे वेदा देवा वर्प ह। शन्तनुक राम्यमें पर्या हुई । वारि इस समय भी योग- साधना कर रहे हैं और पागियोंक प्रसिद निवासस्थान दवापियागमास्थाय कलापप्राममामित ॥१७॥ कायपप्राममें रहते हैं॥ १६ १७॥ जब युिगमें सामषश कला नट कठादा पापयिप्पति । पन्द्रवंशका नाश हो जापा, तम सत्पयुगक प्रारम्ममें वे ति उसकी स्थापना करेंगे। सतनुप छोटे माइ माफ पाहीका सामदसोऽमृद् मरिमरिभरास्तवः।।१८|| का पुत्र हुआ सोमदत । स्ममा तक तीन पुर १ ।२ समुस्सम्याला • दापमित्रमया परमे पोऽअऽ पिते । परिवेचा या परिरिसिम्यारा भपात या पुस भान से मार रहत हुए उनमे एम पिरा और ममताम गर मनाम परिसच्च मनना परिव मेर उमपामा परिशिक्षित है।

भीमागवत [अ० २२ । शलपयन्तनोरासी गङ्गायो भीम मात्मवान्। हुए—भूरि, भूरिप्रभा भोर शल | गातानुक द्वारा गायी- के गर्भसे नैष्ठिकममचारी मीमका जन्म एला । ये समस सर्वधर्मविदां भष्ठो महाभागवतः कविः ॥१९॥ धर्मों के सिरमौर, भगवान के परम प्रेमी भक्त और परम ज्ञानी थे ॥ १८१९॥ ने संसारक समत पीरोंके समाप वीरयूपागणीपेन रामोऽपि पुधि तोपितः । | नेता थे। औरोंकी तो बात ही क्या, उन्होंने अपने गुरु चन्तनोशिकन्यायो या चित्राङ्गद सुवः ॥२०॥ मावान् परशुरामको भी युद्धमें सन्तुष्ट कर दिया । शन्तनुके शारा धाशरानकी कन्या कगर्भसे दो पुत्र हुए- विचित्रवीर्यवापरजोनाम्साचित्राङ्गदोदतः । पित्रामद और विचित्रवीर्य । चित्रादको चित्राङ्गद नामक | गन्भने मार गव्य । इसी दाशराजकी काया सत्यातीसे यस्सो परामराव साक्षादषवीणों हरे फला ॥२१॥ | पराशरजीके द्वारा मेरे पिता, मगवान्क करतार सय भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन न्यासनी वक्तीर्ण हुए थे। गुप्तो पनि कप्पो पदोहामिदमपणाम् । उन्होंने वेदोंकी रक्षा की। परीक्षित ! मैंने उन्हीसे इस श्रीमद्भागक्तपुराणका अध्यपन किया था। यह पुराण फम दिस्वास्मशिष्मान् पेलाद्रीनभगवान् पादरायणः।२२ गोपनीय-अत्यन्त हस्यमय है। इसीसे मेरे पिता भगवान् प्यास्त्रीने अपने फैल आदि शिष्यों को इसका अध्ययन मम पुत्राप शान्ताय वर गुणमिद अगौ। नाहो काया, मुप्त ही इसक योम्प अधिकारी सममा एक ता में उनका पुत्र वा मोर दूसर शान्ति अनि गुण मिचित्रवीर्योऽभोगाइ काशिरामसुते पतात ॥२३॥ भी मुझमें विशेषरूपसे थे । शन्सनुक दूसरे पुत्र विधि- वीर्यने काशिरानकी कल्य अम्बिका और अम्परिकासे म्वपपरापानीते अम्पिकाम्बालिक उमे । विवाह किया । उन दानोंका भीयानी म्बपरसे काम ल आये थे। विचित्रवीर्य अपनी दोनों पन्नियोंमें इतना तमोरासकरदया गृहीतो यक्ष्मणा मृत ॥२४॥ आसक हो गया कि टमे गजपश्म राग हो गया और धेऽप्रनस्पद म्रातुमायाक्का बादरायणः । उसकी मृत्यु हा गया || २०-२१ ॥ माता सस्पतीक कहनेसे मगवान् म्पासनीन अपन सन्तानहीन मा धृतराष्ट्र च पाएं च विदुरं चाप्पभीजनत् ॥२५॥ बिर्योसे मृतराष्ट्र और पाण्डदा पुत्र उत्पम किये । उमकी रासीसे तीसरे पुत्र विदुरमी हुए ॥ २५ ॥ गा पाया राष्ट्रस्प यन्न पुरसत नप। परीक्षित् । धृतराष्ट्रको पनी थी गन्धारी | उसक गर्मसे सा पुत्र हुए, उनमें सबसे बड़ा था दुर्योधन । तप दुर्योधनान्येष्ठा दुस्मता पापि कन्यका ॥२६॥ कपाशा नाम पादुराम ॥ २६ ॥ पाणुफी पसी पी पुरती । सपश पाणु सी-सहपास नहीं कर सका थे। सापान्मपुनरुदस्य पाइन्या महारथाः। इसरिये उनकी पही कुताब गर्भसे धर्म, वायु और म्यू द्वारा प्रमश पुषिमि, भीमसेन और मन मामक मावा घमानिसेन्टेम्पायुपिष्ठिरमुखाम्रपः ॥२७॥ तीन पुत्र उत्पन पुए। ये तीनों के तीनों महारपी पे॥ २७ ॥ । • पाया रामाम उरिमर पमुक नीयम मायक गर्भमे उत्सम पी पिम् रामागयें। दाग पाश्चि एनम राना मनापी ।

म० २२] नवम स्कध ९९ राजमुतफर्मा ता नकुल सहदेषष माद्रयां नासस्पदसयोः । पाणुफी दूसरी पनीफा नाम पा मादी। दोनों अधिनीकुमागके द्वारा उसके गर्भस नकुर और द्रौपयाँ पन पत्रम्पः पुत्रास्ते पितरोऽभवन् ।।२८॥ महत्वका जन्म दुमा । पीभित् ! इन पाँच पाण्डोके युधिष्ठिरा प्रविनिम्म्य अतसेनोपकोदरात् । वारा द्रौपीक गर्मसे तुम्हारे पाँच चाचा उत्पन्न हुए।॥२८॥ इनमेंसे युधिष्ठिरके पुत्रका नाम पा प्रतिविम्य, भीमसेनका अर्जुनाम्मुतकीर्तिस्तु भवानीकस्सु नालिः ॥२९॥ फुत्र पा श्रुतसेन, अर्जुनका सुतकीर्ति, नकुलका शतानीक सहदेवसुतो तथापरे । और सहदेवका मुनकर्मा । उनके सिवा युधिष्ठिरके पौरखी नामकी पत्नीसे देयक धौर मीमसेनके हिडिम्पसे पोक्च पुधिष्ठिराव तुपौरम्पा देवकोऽथ पटोस्फयः॥३०॥ और कापसे सर्वगत नामके पुत्र हुए । सहदेवके भीमसेनादिरिम्पायां माल्या सांगतस्ततः । पर्वनकुमारी विजयासे महोत्र और नकुलके करेणुमतीसे नरमित्र हुआ । अर्जुनाग नागकापा तश्पीके गर्भस सहदेवात् सुदोत्र तु विषयापत पासी ॥३१॥ इगवान् और मगिर नरेशकी कत्यासे बभ्रुवाहनका पम फरेशमस्पां नहलो निरमित्र तपार्जुनः । हुआ । वभुषाहन अपने नानाका ही पुत्र माना गया । इराषन्तालप्पा चे सुवायां पद्मवाहनम् । क्योंकि पहलेमे ही याततै हो चुकी पी॥ २९-३२॥ मर्जुनकी मुभा नामकी पत्नीसे तुम्हारे पिता नमिमापु मणिपूरपतेः सोऽपि सरपुत्र पुत्रिकासुतः ॥३२॥ का जन्म हुवा । वीर अभिमन्युने सभीभनिरपियोंको जीत तावः सुभद्रायामभिमन्पुरमायस । लिया पा। ममिमम्युके द्वारा उत्तराके गर्भसे तुम्हारा साविरथजिद पीर उत्तरायां ववो भमान् ॥३३॥ जन्म हुआ ॥ ३३ ॥ परीक्षित् ! उस समय कुरुवंशका नामा हो चुका था । अप्रत्याम्के प्रमाणसे तुम भी क्ल परिषीणेषु कुरुप द्रोणेमारनवेजसा । ही चुके थे, परन्तु मगवान् श्रीकम्णने अपने प्रमाणसे त्व परुणानुभावेन समीषो मोषितोऽन्तकात्।३४। सुमें उस मुस्पुसे जीता जागता बघा लिया ॥ ३१ ।। तयेमे तनपास्तात जनमेजयपूर्वपरः। पीक्षित् । तुम्हारे पुत्र तो सामने ही बेटे हुए हैं-नक नाम हैं—पनमेजप, तसेन, भीमसेन और भुवसेनो भीमसेन उग्रसेनम पीर्यान् ॥३५॥ उग्रमेन । ये सम के मत्र बड़े पराक्रमी है ।। ३ बनममयस्स्यांविदिस्वावधकाभिधन गवम् । नमको कानेमे नुमारी मृत्यु हो जायगी, तब हम वातका जानका जनमेजप पहुत क्रोमित हाग और यह सर्पान सर्पपागाग्नीस होप्यति रुपान्वित ॥३६॥ सप-पाकी आगमें सोका हकन फरगा ॥ २६ ॥ पार कारपेये पुराधाय सुरं तुरगमधया । कायपय मुरको पुगहिन बनाकर भपमा पर करेग और मर आग्मे मारी पृणीपर विम्य प्राम करके यात्रि समन्तान् पृथिवीं सर्वामित्वा यत्पति चाचरैः।।३७॥ शग मायान्की आगवना करेग ॥ ३७॥ जनमेजपका तस्प पुत्र शतानीका यायलयात् प्रयीं पठन्। पुत्र हागा शनानीर । क पासप रिमे मीनों पर और कमाणकी तथा पाचायम कारिपारिभा असमान क्रियामान शौनकात् परमप्पति ॥२८॥ | प्राम करग व नकलीसे अत्मानमा मम्पान करण मामानीकस्सरपुषस्ततश्चैवायमेधमा समग्रमा प्राप्त होगा ॥ ३८|| नीश्मा ममानीत १ भुतहासिरसपा । २ नाम । ॥ जब भीमद्भागवत [२०२२ मसीमकृष्णस्तस्यापि नेमिचफस्तु उत्सुवः ॥३९॥ सहसानीकका अश्वमेक्न, अधमेक्का असीमकृष्ण और गजास्ये हवे नया फौशाम्म्यां साधु पत्स्यसि । असीमकृष्णका पुत्र होगा नेमियक ॥ ३९ ॥ सस हस्तिनापुर गानीमें रह पापग, सम वह कौशाम्बीपुरीमें उसस्तवविवरथस्तमा फपिरयः सुतः ॥४०॥ मुसार्वक निवास करेग । नेमियनका पुत्र होग्न चित्ररण, तसाच राष्टिमास्तस्स सुपेणोऽप महीपतिः । बिरफका करिय, फरिपका परिमान्, पटिमान्का मुनीयस्तस्प भविता नपार्यत् सुस्तीनलः ॥४१॥राज सुषेण, सुगका मुनीप, सुनीयका मृषा, सूचक्षुका | मुसीनक, मुखीनलका परिपत्र, परिठपका सुनय, पुनयका परिणय सुवस्तमा मेधावी सुनयात्मनः । मेवात्री, मेवाधीका नपचय, नुपअपका पूर्व और दूर्वका पुत्र नपञ्जपस्ततो स्तिमिस्तमावनिम्मति ॥४२॥ | तिमि होगा ॥ १०-१२ ॥ तिमिसे मुहलप, हापसे वि मेहद्रयस्तमान्छवानीका सुदासजा । मदास, सुदाससे शतानीक, धनानीकसे दुर्दमन, दुर्दम्न- सेकशीनर, बीनरसे पाणि, दमाशिसे मिनि और पवानीकाइ दुर्दमनस्तस्यापत्यं पहीनरः ॥४३॥ निमिसे राज क्षेमका बन्म होगा। इस प्रकार मैंने दमपाणिनिमिस्तस्य क्षेमको मविता नृपः । तुम्हें मामण और क्षत्रिय दोनों के उत्पत्तिस्थान सोमवसका वर्णन मनाया । बड़े-बड़े देवता और ऋषि इस पंशका ममपत्रस्म प्रोको शो देवर्पिसकतः॥४४॥ सत्कार करते हैं ॥ १३ १४ ॥ पर वंश कमियुगमें खेमकं प्राप्य रावानं संम्पो प्राप्स्यविवेकली। राज क्षेमक्के साथ ही समाप्त हो जाम । मन में भविपमें होनेवाले भगवदेशके रामाओंका वर्णन मनात अप मागधरामानो भवितारो पदामि ते ॥४५॥ ॥१५॥ भषिवा सहदेवस्य मारियष्टुवमवाः । परासपके पुत्र सहवेक्से मारि, मारिसे तमा, शुसमनासे अपुतायु और अयुतायुसे निरमित्र नामक पुत्र सतोऽपुतापुस्तस्यापि निरमित्रोध आत्मतः ॥१६॥ होग।॥ १६ ॥ निरमित्रके मनशत्र, मनभरके पूरसेन, सुनक्षत्र। मुनषत्राव हास्सेनोऽप कर्मनिन् । सहरसेनके फाजित, फर्मवितके सतअप ससत्रपके सत स्तनपाद विप्रा सुधिस्तस्प भविष्यति॥४७॥ धि और विपके पुत्रका माम होगा शुधि ॥ १७॥ शुचिसे क्षेम, क्षेमसे मुक्त, सतसे धर्मसूत्र, धर्मसूत्रसे धेमोऽप सुनतस्तमा धर्मस्त्रः मस्तवः । शम, शममे पुमरसेन, पुमसेनसे मुमति और समतिसे पुमत्सेनोऽप सुमतिः सुपलो मनिता ततः ॥४८॥ | मुकामा बम होगा ॥१८॥ पुलका सुनीप, मुनीपका सस्पमित, सस्पमित्कार विजित् और विश्वयिस्का पुत्र मुनीर्य सस्पमिदप विधजिद पद रिपुञ्जयः । रिपुश्य होगा । ये सब पृहमपशके राजा होंगे । इनका बाईपाय म्पाला माम्माः माइसनस्सरम् ॥४९॥ शसनकाल एक हजार पाक मीतर ही होगा ॥१९॥ इति श्रीमद्भागवत महापुरी फरमईस्व संहितायो नमस्कारपेशाविरोऽध्याय ॥ २२ ॥ १ विमसत्तुगतः । २ गरिरप ।। मिष | ४ हस्ती निमित्त । ५ मि ।। निगयो । . मा एमः1८ ता. मातु।१ वेमको शव मनितम् ।

म. २३] नबम कध समानरका अथ त्रयोविशोऽध्याय मनु हष्णु तुषसु पोर यदु के वंशका वर्णन मीसुक उपाय मीशुकदेवजी कहत है-परीक्षित् ! यपातिनन्दन भनो समानरमाः परोक्षम प्रया सुताः । मनुके तान पुत्र हुए--समानर, पशु और परोक्ष । कामनर, कानरका समय, समयका समानराद कालनर संजपस्तस्सुतस्ततः ॥१॥ जनमेजय, जनमेजया महाशील, महाशीका पुत्र हुआ घनमेजपस्तस्य पुत्रो महाशीलो महामनाः । महामना । महामनाके दो पुत्र दुर-उशीनर एवं उशीनरस्तितिक्षुप माामनस आरमजौ ॥२॥ तितिक्ष ॥ १२ ॥ उग्रनरके चार पुत्र थे-शिनि, पन, शमी और दक्ष । शिपिके चार पुत्र हुए- अगदर्भ, सिपिर्वनः समिधमत्वारोशीनरात्ममाः । सुधीर, मन और कैप । उशीनरके माई तितिक्षुके पादमः सुवीरम मद्रः कोप भात्मनाः ॥ ३॥ सदय, समयके हेम, हेमके मुता और मुनपाके शिवमत्वार एषासस्तितिक्षोभ रुगद्रयः । बलि मामक पुत्र हुआ |॥ ३१॥ राना मनिकी पत्नीके गर्मसे दीर्घतमा मुनिने छ पुत्र रमन कित्से-जा ववो हेमोऽथ सुतपा मलिः सुतपसोऽभवत् ॥ ४॥ वन, कति, सुम, पुग और अन्न ||५|| इन ग्रेगोने आरकलिया: सुपपुण्दा धमिताः । अपने-अपने नामसे पूर्व दिशाम छ देश सप्ताये । बाका अहिरे दीर्घतमसो पले क्षेत्रे महीक्षितः॥५॥ | पुत्र हुआ सनपान, पनपाना दिविरप, विषका धर्मस्प और धर्मरपका चिरप । यह चित्ररप ही पल खनाम्नाविपयान् परिमान् प्रान्यायते। रोमयदके नामसे प्रसिद पा । इसके मित्र ये स्तनपानोगतो मसे ससाद दिमिरथस्तमः ॥६॥ अपोप्याधिपति महाराज दशरप । रोमगदको फोई सुतो धर्मरयो या मन चिरयोऽप्रमाः । सन्तान म पी । सम्पेि दशरपने उन्हें अपनी सम्ता नामकी पत्या गोर दे दी। माम्साका विवाह प्या रोमपाद इति र पावस्तस्मै दशरयः सखा ॥ ७॥ मुनिसे हुआ। अप्यथा त्रिपाक पिके द्वारा शान्तो स्खकन्यां प्रायच्छरप्पमा उदारताम् । हरिणीके गर्भसे अमन हुए पे । एक मार राज राममा के देवेऽर्पति य रामा आनिन्यहरिणीसुतम् ॥ ८॥ राभ्यमें यहुत दिनोंतक वर्ग नहीं हुई। तब गणिकार अपने मुस्य, संगीत, अप, हाक मात्र, पाशिन और नामसाहीतवादिनषिम्रमालिङ्गनाईणैः विविध उपहारसे माहित करक अप्पाने यहाँ से स तु रामाऽनपत्यस्य निरूप्येष्टिं मरुत्वतः ॥९॥ पापा। उनके वाते ही बर्ग हो गयी। उन्होंने ही इन्द्र देवताश पत्र काया, मम तानहीन राजा प्रजामदाद दशरपोयेन लेमेऽप्रमाः प्रजा । रोमपादको भी पुत्र हुआ और पुत्रहीन दयारपने मी धतुरो रोमपादात् पृभुताक्षम्तु तस्मुसः ॥१०॥ उन्हींके प्रफनसे चार पुत्र प्राप्त किये । रामरा पर पुत्र परद्रयो पृहत्कर्मा पृरमानुष वत्सुता । हुआ चतुरग और शुक्र पृथुप्रभ ।। ६-१०॥ पुराशके पृहद्रप, गृहकर्मा और पृहदानु-नीन पुत्र मापा पर मनास्तमाअपद्रय उदारत ॥११॥ए । पृहदपा पुत्र हुआ पृइग्मना और पृहातारा विजयम्तस्य मम्भूमां सतो प्रतिरजापत । उपाय ॥ ११ ॥ जप्दयी पनीस मान पा सम्भूति। १ सस्नुन समारना । मरिना अमिर मामबार । ..

१०२ श्रीमद्भागवत घुमे नमः तसा घमवस्तम्प मस्फर्माधिस्थस्ततः ||१२|| उस गर्भसे विषयमा गाभि । विमान प्रति, धृतिका धृतान, मृतामा सम्पर्मा और मधर्मका पुत्र गोऽसौ गङ्गावर मीन मअपान्तर्गसं त्रिशुम् । या अधिरप ।। १२ ।। मक्षियको कोई सस्तान न की। इन्त्यापविद फानीनमनपत्योऽकरोत् सुतम् ॥१३॥ | फिी निकट गापा क्रोश कर रहा था कि दम ण्य गिरी नम्हा-सा शिशु यहा पा जा रहा है। अपसेनः सुवस्तस्य कर्णस्म जगतीपतेः । पह मान्य कग वा, निसे कुन्सीने मत्यवस्व में अपन होने कारण उस प्रकार हा Pया पा । अविरम्ने हुमोप तनयो पा सेतुस्वस्पात्मनस्वतः ॥१४॥। उसीका अपना पुत्र बना लिंक ॥ १३ ॥ परीरिए । आरपस्सप गान्धारस्तस्य धर्मस्ततोतः। गना फर्मक पुप्रमा नाम प पपसेन । मानिके पुत्र सम्म हसा । मभुफा मेतु, मेनुका भूतस्य दुर्मनास्तमात् प्रताः प्रापेतसं श्वेतम्॥१५॥ पारम्प, आरब्धका गन्धार, गान्धारका धर्म, धमका भूत, धृतका दुर्मना और वर्मनाका पुत्र प्रचेता हुआ । म्लेच्छाधिपतमोऽभूषन्नुरीची दिशमाभिताः । प्रोताके सौ पुत्र हुए, ये उत्तर शिामें के राब तुबेसोम सुतो वहिभिर्गाऽध मानुमान् ॥१६॥ दु । ययाति के पुत्र तुर्वमुमा बहि, महिका मा, माझा ममनुमान्, मानुमन्का विमान, त्रिभानुका उगारमुनि त्रिमानुस्सत्सवोऽस्मापि करन्धम उदारभी । करन्धम और कान्धमका पुत्र गजा मस्त । मास सन्तानहीन छ । इसलिये उसने पूवशी दुप्पत्तको मरुतस्तत्वोऽपुत्रः पुत्र पौरधमन्यम् ॥१७॥ अफ्ना पुत्र बनाकर रखा था ॥ ११-१७ ॥ परन्तु दुप्पन्तः स पुनर्मो संघर्ष रान्यकामकः । दुष्यात राज्यकी कामनासे अपने ही पेश डोट गये। परीक्षित् ! कम में गमा प्यासिके बड़े पुत्र यदुके रक्षा मयावेफेष्ठपुत्रस मदोषेध नर्मम ॥१८॥ वर्णन करता हूँ ॥ १८ ॥ वर्णमामि महापुग्मं सर्वपापहरं नृणाम् । पीक्षित् ! महाराय यदुका पश परम पवित्र और मनुष्योंके समस्त पापोको नष्ट करने मध्य है। जो पदोष नरः भुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१९॥ मनुष्य इसका श्रषण करेगा, र समस्त. पार्पोमे, मुरू हो पत्रापवी! भगवान् परमारमा नराकतिः । नायग ॥ १९ ॥ इस बशर्म सय मायान् परमम पोसासविस्फोष्टा नलो रिपुरिति श्रुता ॥२०॥ श्रीणने मनुप्पो से लपमें अक्तार ख्यिा पा । यदुके पार पुत्र थे--सहसजित, कोय, नत्र धौर रिम। चत्वारः एनपस्तत्र जैवमित् प्रपमारमनः । सहसनित्से शतजितका जन्म हम । प्रतमित्के मीन महापो वेणायो यति तत्सुताः ॥२१॥ पुत्र पे-हाहय, वेणुइय भऔर हाय ॥ २०-२१ ॥ धर्मस्तु रसुवो नेता हुन्। पिता ततः । हैहयका धर्म धमका नेत्र नेप्रका कुन्ति, कुस्तिका सोहजिरभरत छन्वेमहिप्मान् भद्रसेनकः ॥२२॥ माइनि साइभिका महिप्मान् और महिमान्का पुत्र 'पा ।। २२ ।। मसेन दो पुत्र दुर्म दुर्मदो भद्रसेनम्प भनक: हमीर्यसः । और नफके पार पुत्र पर-कमवीर्य नाम्नि, कताग्नि फववमापतौजापना २३॥ गौमा ।। २३ ॥ समीर्यका पुत्र पुन TA TrI न ।

नवम स्कन्ध म० २३] दचायादरेरमात् प्राप्तयोगमहागुण ॥२४॥ | मगमान्ने कामनार श्री धामनीसे योगरिया और मगिमा-पिमा मानि बदीपदी सिदियों प्राप्त की नमून कापीर्यस्स गति यासन्ति पार्षिया । यौ ॥ २१ ॥ सम सन्देह नहीं कि ससारका कोई भी सम्राट् पक्ष, दान, तपस्या, योग, समझान, पराक्रम पादानतपोयोगभूतवीर्यखयादिमि ॥२५॥ और बिबप आदि गुमि कार्तवीर्य अर्जुनकी बराबी नहीं कर सकेगा ॥ २५ ॥ महसवाह अर्जुन पचासी हनार पर्वतक छहों इन्द्रियोंसे अभय विषयोंका मग पनाशीविसासागि पम्मारवाला समाः। करता सा । इस बीचमें न तो उसक शरीरफा क्लही क्षीण हुआ और न तो कभी उसने यही स्मरण किया अनषिधमरणो प्रसवप्पपक्षम् ॥२६॥ कि मेरे घनका नाश हो जायगा । उसके धनके नाशकी तो बात ही क्या है, उसका एसा प्रभाव पा कि उसक सस्स पुत्रसासेषु पञ्चमार्षरिता मधे । स्मणसे दूसरोका खोया हुआ भी मिल जाता था ॥२६॥ उसके हजारों पुर्मिसे काट पाँच ही नीवित रहे। जमयमः शूरसेनो उपभो मधुरुमितः ॥२७॥ सब परशुगमनीकी क्रोधाग्निमें मस्म हो गये । पचे पुए पुत्रों के नाम पे-अपयज, शूरसेन, वृषम, मधु और सर्जित ॥२७॥ जपचयात् सालबास्तस्य पुषसत स्वमूत् । ज्यपक्क पुत्रका नाम पा ताजा । ताउमर मौ क्षेत्र यत् तालजसम्पमो देवोपमहसम् ॥२८॥ पुत्र हए । घ सामनर नामय क्षत्रिय कहलाये। महपि ओर्वकी शक्तिसे राजा सगाने उनका महार कर तेपो ज्येष्ठा वीविहोत्रो पप्णि पुत्राममोस्मृतः। राम ॥२८॥ ठन सौ पुत्राम सबसे पका पा मीनिहाय । तस्य पुत्रप्रत त्वासी प्णिज्येष्ठयत लम्॥२९॥ धीतिहासका पुत्र मधु हुआ । मधुक सौ पुत्र थे। उनमें सबसे यदा या वृष्णि ॥ २० ॥ परीशिव । इन्हीं मधु, माधरा वृप्मयो राजन् याउवापति संमिता । वृष्णि और यदुवं कारण यह पा माधव, पार्ष्णेय और यदुपुरस्स च फ्राण पुत्रा जिनपास्तवः ॥३०॥ यावर नाममे प्रमिद हुआ । यदुनम्न कोप्टुन पुत्रका | नाम पा वृमिनवान् ॥ ३० ॥ वृजिनदानका पुत्र पाहि, बाहिस्तता रुशेकषं तस्स विप्ररथस्तत । शाहिक शेतु रुशकुश पिग्य और चियग्यक पुत्र- शशपिन्दुमहायागी महाभाना महानन्द ॥३॥ का नाम या पाशविन्द । यह परम पागा मान मोगैमयाम्पम और अपन पगममी पा || ११॥ वा चतुर्दशमहारसमक्रवर्पपराजित | चौह रहाका स्वामी, चक्री बार युझमें अन्य था । तस्य पसीसहस्राणी दशाना मुमहायशा ॥३२॥ परम पशमी शतबिन्दुक दस हजार पत्तियों पी । उनमेंमे पलक्षसहस्राणि पुत्राणां साम्वधीमनत् । एकटकर मरम्पार मताना पी । उस प्रकार ठसक मी फरारक बरव मतान टाई। नेपा तु पट्प्रधानानां प्रभास पात्मजः ॥३३॥ उनमें पृथुधवा नाति पुत्र प्रधान ५ | पृथुधवाक भर्मों नामाशना तस्स हयमपतस्य पाट् । पुरानान पाम | भमका पुत्र माना एा । टमन । २ मस्य । १ हाच । १ प्रणापर । • मेरमापी पाप भी गाय मरामा माम्म भ कि, पारा माण मरमान । , बोग: म भीमादागपत [.२४ -- वत्सुतो उपकस्तस्म पश्चासभात्मशा शृणु ॥३४॥ सौ बयमेव या किये थे। उशनाका पुत्र गुमा रुक्क । रुक्कके पाँच पुत्र पुए, उनके माम मनो॥ ३२-३१ ॥ पुरुजिम्मामापुन्मामघसहिताः पुजित्, रस्म, समय, पृथु और मामम। ज्यामधली पनी- न्मामलस्वप्रमोऽप्यन्यो भार्या अम्मापतिर्मयात्॥३५ पर नाम पा शेम्पा । ज्यामपके बहुत दिनों तक को ससान नई। परन्तु उसने अपनी पीके मयसे दूसरा विवाह नही नापिन्दछभवनोद भोन्या कन्यामहारपीत्। नियम । एक बार वह अपने शत्रुके घरसे भोग्या नामकी कल्या हर गया । जब शेम्पने पतिके रपर सस रथस्सा या निरीक्ष्याहशेम्पा पविममर्पिता ॥३६॥ कल्याको देश, तब मा क्षिार अपने पतिसे घोटी- के का मस्सान रपमारोपिवेति है। 'कपटी 1 मेरे पेटनेकी नम्हपर भान फिसे पेटकार ठिये का हेो। म्यामधने कहा-'यह तो पुम्हारी स्नुपा वषेत्पभिहिते समती पतिमप्रवीत् ॥३७॥ पुप्रयम् है ' शैम्बने मुसकराकर अपने पतिसे पहा ॥ ३५-३७ ॥ मैं तो जन्मसे ही बोझ हूँ वौर मेरी मरम्यासपनी पस्नुपा म पुज्यते फयम्। कोई सौत मी नहीं है। फिर यह मेरी पुत्रका कैसे हो अनसिप्पसि यं राषितस्पेयमुपएन्पते ॥३८॥ सकती है। ग्यामवने कहा-रानी | तुमको बो पुत्र होगा, उसकी यह पी बनेगी ॥ २८॥ राजा ग्यापक अन्वमोदन्त बदिशेदेवाः पितर एव च । इस पनका विदेव भार पितरोंने अनुमोदन किस । फिर क्या पा, समपपर शैम्पाको गर्म या और उसने शैम्मा गर्ममघात् काले हमारे सुपुषे शुभम् । कम ही मुन्दर माश्य उत्पन पिया । उसका नाम मा विर्म । उसीने शेम्याकी साची पुत्रवधू भोग्यसे स विदम इति प्रोक्त उपपेमे स्नुपां सतीम्॥३९॥ विवाह किया ।। ३९ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे परमाईस्पो सहिसायो नवमस्कत्व यदुवशवर्णने प्रयाविंशोऽध्याय ॥ २३ ॥ अथ चतुर्विशोऽध्याय पिके र्षशका वर्णम भीमुक उपाय भीशुकदेवजी कहते है-परीभित् ! राजा किधर्म- सां निदर्भोऽमनपत् पुत्रौ नाम्नाइसक्यो। की मोम्पा नामक पतीसे तीन पुत्र हर-कुशा, कम और वतीय रोमपाई प पिदमकुलनन्दनम् ॥ १॥ रोमपाद । रोमपाद विदवशमें बहुत ही श्रेष्ठ पुरुष रोमपासुता बर्वप्रो कविरवायत । हुए ॥ १ ॥ रोमपादका पुत्र वनु, पभुका पति, कति का उशिक बौर उशिरा घेरि । रामन् ! इस चेदिके उपिकतत्गुतम्सस्माप्चदिपादयो नृप ॥२॥ मंशमें ही दमघोष एवं शिशुगाठ बारि र ॥ २ ॥ क्रपम्प पुराऽभूवष्टिस्तस्याय नि तिः । अपर पुत्र मा पुन्ति, कुत्तिरा धषि, परिसर निति, तवा दश नाम्नामत सम्मोमामुतस्ततः।।३॥ नितिश दाई घोर दईया म्योम ॥ ३ ॥ २ सुम्पेस में पम् । ३ प्रबमाइम्स। ४ नुरूपने । १ मारा।

२०२४] नवम स्कन्ध १०५ बीमतो विकृतिस्तस्स यस्य भीमरथ सुत । प्योमका जीमूत, जीम्तफा विकृति, विकृतिका मीमरय, सता नपरथ पुत्रो जातो दशरयस्ततः ॥ ४॥ भीमरपका नवरय और नपरयका दशरय हुआ ॥२॥ दशरयसे शकुनि, शकुनिसे करम्भि, फरम्मिसे देवरात, काम्मिा भनेः पुत्रो देवरातस्तदात्मज । देवरातसे देवक्षत्र, देवमत्रसे मधु, मधुसे पुरुषश और देवघात्रस्ततस्तस्य मधु कुस्वादनु ॥ ५॥ कुरुषशसे अनु हुए ॥५॥ अनुसे पुरहोत्र, पुलहोत्रसे पुत्रोत्रस्त्वनोः पुत्रस्तस्पायु सास्वतस्तत । आयु और मायुसे सात्वता जन्म हुआ । परीक्षित् ! भबमानो भनिदियो पूणिर्देवापोऽधक ॥६॥ साफनके सात पुत्र हुए--भजम्मन, मजि, Pिग्य, वृष्णि, सात्ववस्य सुता सप्त महाभोजम मारिस । देवाघ, मन्धक और महामोन । मममानकी दो पत्तियों भबमानस्स निम्लोषि किरिणो घृष्टिरेप च ॥७॥ यौ । एकसे तीन पुत्र मुए-निम्टोचि, किङ्गिण और एकस्पामात्मजार पस्न्यामन्यस्मा च प्रयासुता । पृष्टि । दूसरी पीसे मी तीन पुत्र हुए-तानित्, सइ साचित् और अयुताजित् ॥ ६-८॥ देवावृधके पुत्रका सवामिन सहस्रामिदयुतानिदिति प्रभो ॥ ८॥ नाम पा वभ्र । देवाघ और बन के सम्बन्धमे यह बात पनर्देवापसुतस्तयो श्लोको पठन्त्यम् । कही जाती है-हमने दरसे जैसा मुन रस्त या, पैप मुमो दाद सम्पश्यामस्तपान्तिकात् ॥ ९॥ | अब वैसा ही निफ्टसे देख्ते भी हैं ॥ ९॥ धनु यमु भेष्ठो मनुष्याणां देनैर्देषावृधः समः । मनुमि श्रेष्ठ है और देाष देवनावोंक समान ही पुरुपा पञ्चपष्टिम पट् सहस्राणि बाट च ॥१०॥ इसका कारण यह है कि वच और देवाधसे उपदा स्कर चौदह हमार पैसठ मनुष्य परम पदको प्राप्त कर येऽमृतस्तमनुप्राप्ता पम्रोषाषभादपि । चुक हैं।" सास्करके पु?में महामोन मी वा धर्मामा महामोजोऽपि धर्मास्मामाजोआसस्वदन्वये॥११॥ पा । उसीके मंशमें भोवर्षशी यादव हुए ॥ १०-११॥ सप्प सुमित्रः पुत्रोऽमद् युधामिध परंतप । परीक्षित् ! सृष्णिके दो पुत्र हुए-मुमित्र और शिनिस्तस्यानमित्रम निम्नोऽभूदनमित्रत ॥१२॥ | युघाचित् । युधानिके शिनि और अनमित्र-ये में पुत्र थे । अनमित्रसे निम्नश जन्म हुआ || १२ ॥ सत्राजिता प्रसेनध निम्नसाप्पासतु सुती । सअनित् चोर प्रसेन नामसे प्रसिद् यदुर्मशी निम्नक ही अनमित्रसुतो योऽन्य शिनिस्तस्याथ सत्यक ॥१३॥ पुत्र थे । अनमित्रका एफ और पुत्र था, जिसका नाम पुयुधानः सात्यकिवं बयस्तस्य कणिस्तवः। पा शिनि । शिनिसे ही सस्यमा जन्म हुआ ।। १३ ॥ युगन्धरोऽनमित्रस्य पृणिः पुत्रोऽपरस्तत ॥१४॥ | इसी स्त्यका पुत्र युयुधान थे, जो सापकिय नाम्मे प्रसिद हुए । सात्यमिता जय, जपत्र कुणि बीर पुगि अफरकमित्ररथम गान्दिन्यां च धफरकत । पा पुत्र पुग्घर हुआ । अनमिप्रके तीसरे पुत्रका नाम अरममुम्ना आसन् पुषा द्वादश विष्वया ॥१५॥ पृष्णि पा । पणिके दो पुत्र हुए-मार और चिनग्य । आसनः सारमेयम मृदुरो मृदुविद् गिरि । सफ्कमी पनीया नाम था गान्दिनी । उनमें सबसे श्रेष्ठ धर्मवद सुरुमा च क्षेत्रोमोऽरिमर्दन ॥१६॥ अरके अतिरिक्त पारह पुत्र यापम हुए-आसह, सारमय, मृदुर मृदुषिद् गिरि, घमार, मुसर्मा, क्षेत्रापेक्ष शत्रुभो गन्धमादप प्रविमाहुम द्वादश । अग्मिदन, शत्रुप्न, गन्धमादन और प्रतिपा । इनक पर तेपो म्वसा मुधीराम्पा दावमुतावपि ॥१७॥ पहिन भी दी, जिसस नाम पा मुधीरा । अम्कदा पम्ततः । २ बिमारि। सपा प।४ गेनिपमा । यमा । लाभारुन् । .

श्रीमनागपत [अ०२० देवषानुपदेवय तथा चित्ररथात्मघा । पुत्र वे देवयान् और उपदेव । सफस्कले माइ चित्ररपके पृपुर्विदयायाम बहयो वृष्णिनन्दनाः ॥१८॥ पृथु, विद्रप आदि बहुत से पुत्र हुए-मोवृष्णिवंशियोम श्रेष्ठ माने जाते हैं। ११-१८। सात्वतके पुत्र स्पर्क चार पुत्र कुकरो भजमानम शुषि फम्मलमहिपः । हुए-कुलर, मनमान, शुचि और फम्मलवहिं। उनमें अरस्प सुखो पहिविलोमा तनयस्तत ॥१९॥ फुकुरका पुत्र पति, परिकर पिलोम, विलोमाका कोत- फपोतरोमा वसानुः सखा यस्य च सुम्पुरु । रोम्म और कपोतरोमाका अनु नुमा । तम्मुरु गन्धर्वक अन्धको दुन्दुभिस्तसाद रिघोस पुनर्वसु ॥२०॥ साप अनुकी कड़ी मित्रत्म थी । अनुका पुत्र अन्धक, वस्पाइकमाहुफी प कन्या चैवाहुपास्मनौ । अपकका दुन्दुमि, दुदुमिका परिपोत, भरिपोतका पुन देवकमाग्रसेनध चत्वारो देवकारममाः ॥२१॥ पा और पुनर्वसुके पापा नामका एक पुत्र सपा माफी | नामकी एफ क्त्या पुर। माहुक्के दो पुत्र हुए- देववानुपदेवम मुदेको देषवर्धनः। देवर और उमसेन । देवासे चार पुत्र हुए । १९-२१। तेपो स्वमार सप्तासन् प्रेसदेवादयो नृप ॥२२॥ देववान्, उपदेव, मुदेव और देववर्धन । इनकी सास शान्तिदेवोपदेवा च भीदेवा दवरक्षिता । बहिनें भी पी-वृतदेषा, शान्तिदेषा, उपदेपा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी । मसुदेवनीने सहदेवा देवकी च पसुदेव उवाह वा ॥२३॥ इन सबके साप विवाह किया था ॥ २२-२३ ॥ संसः मुनामा न्यग्रोध का मुहस्तथा । उप्रसेनके नौ सके थे—कस, मुनामा, म्यग्रोध, कहा राष्ट्रपालोऽथ सृष्टिष तुष्टिमानोग्रसेनयः॥२४॥ शङ, छ, राष्ट्रवाल, सष्टि और सुम्पिमन् ॥ २१ ॥ उमसेनके पाँच कत्याएँ भी पा-कसा, कसक्सी, कार फमा फसवती फका भूरम् राष्ट्रपालिका । | शूरभू और राष्ट्रालिया । इनका पियाह देवमाग कर उपसेनदहिसरो वसुदेषानुपत्रिपः ॥२५॥ ममुदेवजीके अटे मार्योंसे हुआ पा ॥ २५ ॥ भूग विद्रपादामीद् भयमानः सुतस्ततः । चित्ररपके पुत्र विदूरपसे शूर, शूरसे मजमान, भजमान से शिनि, शिनिसे स्वयम्भोम और स्वयम्भोगसेसीक शिनिस्तमात् म्यपम्भोमो एदी कम्तस्सुवो मतः॥२६॥ हुए।२६। सीकसे तीन पुत्र हुए-देवगाह, शतधन्या और दवपाहु शवधनु स्वपति उत्सुमा । पत्पर्मा । देवमीटके पुत्र शूरफी पारिका नाम था मारिपा देवमोढस्स शूरस्स मारिपा नाम पत्न्पद ॥२०॥ ॥ २७ ॥ उदोंने उसके गर्भसे दस निपाप पुत्र उत्पम किये- पहरेग, देवमाग, देवयषा, भानक, समय, ससा स मनपामास दश पुत्रानझरमपान् । श्यामक, फसशम्म, मत्सर और वृप । ये सपके- पमुदेव देपमार्ग देवप्रासमानकम् ।।२८॥ सय पर पुण्यारम घे । पसुमजीके जन्म समय सृअप श्याम कई शमीर्फ यस्सर्फ बकम् । देवताओंक नगारे और मौत म्पयं ही बनने छगे पे । देशानुभयो नेदुरानका पस्स म मनि ॥२९॥ व 'आनन्दुमि भी पाये। ये ही भावान् पगुदेव हरेः म्यान पदन्त्यानामिम् । श्रीपणा तिाए । प्रमुरेर बादिकी पाच यइने भी यी--गृपा (पुन्ती ), श्रुतरेस, मार्मि, श्रुतश्रया प्रथा पशुतदेवा प भुतकीति भुवयाः ॥३०॥ भर गजाधि दी । यमुरेमक रिता गरसेना ण्य मित्र राजाधिदरी पनेर्पा भगिन्य पन फन्पका । घ--पुन्तिोष । पुन्तिभोमक कारस्तान म थी । १mwwer: २ पति । ४ ग । पीत ।। देसीप भीती। मुमगनगा। ८ र ९ मे । अत अ० २४] नवम स्कन्ध १०७ अन्तः सत्यापिताशूरोपपुत्रस्य प्रथामदात् ॥३१॥ इसलिये शूरसेनने उन्हें पृपा नामकी अपनी सबसे बड़ी पत्या गोद दे दी॥२८-३१॥ पृषाने दुर्वासा ऋषि- साप दुर्वासमो मियां देवहती प्रतोपितात् । को प्रसन्न करके उनसे देवताओंको घुस्यनेकी विषा सीस स्थ। एक दिन टस विपाके प्रमात्रकी परीक्षा लन संस्सा पोर्पपरीक्षार्थमाजुहाष रमिं शुधिम् ।।३२॥ के लिये पृषाने परम पवित्र भगान् सूर्यकत्र आवाहन किया ॥ २२ ॥ उसी समय भगवान् स्य यहाँ वा सदेवोपागतं देरं मीक्ष्य विसितमानमा । पहुंचे। उन्हें देखकर कुत्तीका दय विस्मयसे भर गया। उसने कहा- 'मगमन् ! मुझे क्षमा कीनिये । मने तो प्रत्ययार्थ प्रयुक्ता मे पाहि देव धमल मे ॥३३॥ परीक्षा करने के लिये ही इस विधाका प्रयोग किया था । अव आप पधार सकते हैं ॥ ३३ ॥ सूपदिधने कहा- अमोघे दर्शन देखि भाषिस्से त्वयि पात्मबम् । देवि 1 मेरा दशन निष्फल नहीं हो सकता । इसलिये हे सुन्दरी ! अव मैं तुमसे एक पुत्र स्पन करना चाहता है। योनिर्यपा न दुप्पेत फा. ते सुमप्यमे ॥३४॥ , अस ही तुम्हारी योनि दूषित न हो, इसका ठप्प में कर दूंगा ॥ ३४ ॥ मह कहकर भगवान् स्म इति तस्या समाधाय गर्म सूर्यो दिव गतः । ने गर्म स्थापित कर दिया और इसके बार में स्वर्ग चले गये। उसी समय उससे एक यहा मुन्दर एवं सपा मारः संझने द्वितीय इष भास्कर ॥३५॥ तेबसी शिनु उत्पन्न हुवा । मा दम्पने दूसरे सूर्यके समान जान पाता था ॥ ३५॥ पृष्पा लोकनिन्दासे तं सास्पनमदीवोमे रुमालोकस्स पिम्पती। पर गयी । इसठिये उसने बड़ दु ससे उस नाटकको नदीके उपमें छोर दिया । परीक्षित् ! उसी प्रपाका प्रपितामहस्वाममार पाणु सस्पपिडम ॥३६॥ विवाह तुम्हारे परदादा पाणुसे हुला पा, जो अस्तवमें बड़ साधे वीर ये॥ २६॥ भुतवेषां तु कारूपो शर्मा समाहीत् । पीक्षित् | पृपाकी छोटी बहिन भूतदयाका सिपाह कल्प देशाके अधिपति वृदशमासे खा पा । उसके यस्पाम दन्तवा पिशप्तो रिते सुत ॥३७॥ गर्भसे दन्तवस्त्रका कम हुआ । यह यी दम्तया है, जो शमन्ममें सनकादि प्रतियोंके शापसे हिरण्याक्ष हुआ कैफेयो पृष्टकमुष श्रुतकीर्तिमविन्दव । पा ॥ ३७ ॥ केवप देशके राजा पृष्टकेतुने मृतकनिमे सन्सदनाइयस्तस्य पनासन् कैकमा मुताः ॥३८॥ विवाह किया था। उससे सतर्दन पार पाँध पस राजकुमार हुए ॥ ३८॥ राजाधिदरीश विर जय राजाधिदेम्यामावन्त्यो बयसेनोऽबनिष्ट । मेनसे हुआ था । उसके दो पुत्र हुए-दिन बार अनुविन्द । दोनों ही भवन्तीके राजा हुए। चेदिगत्र दमपापश्चेदिराज श्रुतभवसमग्रहीत् ॥३९।। दमघोपने मृतथ्यावर पाणिग्रहण किया ॥ ३९ ॥ सभा शिनुपाला सुमस्तस्साः कथितस्तस्प सम्भव । पुत्र पा शिशुपाय, मिसया वगन में पहले (स्सम स्वस्थ- में ) कर चुका है। समुदेवजी के माइपोमसे पागली देनमागस्प कमायो चिप्रतिसाली ॥४०॥ । फनी साके गमसे दो पुत्र इए-चित्रकेतु भीर , क्या ।२ प ३ आदिदेव स्म १४ देष समाचस्पेस ।५ इतियोदि ।पमेनो। 1 १०८ भीमद्वागवत [अ० २४ - - कंसवस्या देवधासः सुवीर पुस्तिपा। मुखल ॥ १० ॥ देवप्रयाकी फनी कसक्तीसे सुधीर लौर पम्मन् नामके दो पुत्र दए । वानकी पत्नी पापामानकाआव: सत्पविद् पुरुबित् क्या।।४१॥ मकाये गर्भसे मी दो पुत्र पुरातुचित् और सृञ्जयो राष्ट्रपा व पदुर्मर्पणादिकान् । पुरविद ॥ ११॥ समयने मफ्नी पनी राष्ट्रपालिकाक गर्भस सूप और दुषण आदि का पुत्र उत्पन्न मिस । हरिकेशहिरम्माक्षी भूरभूम्यां च श्यामका ॥४२॥ इसी प्रकार श्यामभने शूरभूमि ( शूरम् ) नामकी फनीसे हरिकेश भौर हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन्न किये।१२। मिभफेश्यामप्रसि दीन वस्सकस्तपा । मिषकेशी अप्सराके गर्भसे यत्सकके भी एक भादि कई सधपुम्फाशालादीन दुईयां अफ आदधे ॥४३॥ | पुत्र हुन् । वृक्ने दुर्वार्धाकि गर्मसे सक्ष, पुष्कर और शाल मादि कई पुत्र सफ्न किये ॥ १३ ॥ शमीकी सुमित्रानपालादीम्छमीकातु मुरामिनी । पाली सुपारितीने मी मित्र और पर्जुनपाए कदि ई कदम फर्णिका सप्तभाममयावपि ॥४४॥ प्रालय उत्पन्न किये । परकी पत्नी कर्णिकाके गर्भसे दो पुत्र हुए-अतधाम और जय || १०॥ पोरवी रौहिणी भद्रा मदिरा गेषना इला । आनकदुन्दुभि सुदेकनीकी पौरनी, रोहिणी, मा, देवकीप्रमुखा आसन् फ्रन्प मानकान्दुमेः॥४५॥ | मदिरा, रोचना, इस्प और देवकी आदि मानसी पल गद सारम च दुर्मदं विपुलं वपम् । पस्नियों थी॥ १५॥ रोहिणीके गर्मसे वसुदेवजी क्याम, पसुदेषस्तु रोहिप्पो कतादीनुदपाइमत् ॥४६॥ गट, सारण, दुर्मद, विपुल, पुष और कल आदि पुत्र सुभद्रो भद्रपाइप दुर्मदो भतू एच प। हुए थे ॥ १६ ॥ पोरवीके गर्मसे उनके यारह पुत्र हए-- पौरल्यास्सनया मते मूताया भावनाभवन ॥४७॥ भूत, समद, मद्रवाह, दुर्मद और मत्र आदि ॥ १७ ॥ नग्द, यफ्नम्द, सक, घर अादि मदिराके गर्मसे उन्न नम्दोपनन्दकृतकशूराचा मदिरारमजाः। ए थे । कौसल्याने एक ही पेश-उजागर पुत्र उफ्न कौमस्या केशिनं स्वकमसूत कुलनन्दनम् ॥४८॥ किया था। उसका नाम था केशी ॥ १८ ॥ उसने रोषनापामसो बावा एस्तोमादादयः । रोपनासे हस्त और हमार आदि सभा दरमसे उठाव सायामुपकादीन् यमुस्पानचीमनम् ॥४९॥ | पदि प्रधान पदुर्भशी पुत्रोपो बन्म दिया विण्ठो पृतदेषायामेक बानकान्नुमः। पीक्षित् । पमुदेवमीरे धूत माके गर्भसे विध नामका धान्विदयारममा राजमप्रतिभुतादय ॥५०॥ एक ही पुत्र हुआ और शान्तिदेयासे श्रम और प्रति- राजानः परपवर्षापा उदयामुवा दश । स्त मा को पुत्र हुए ॥ ५० ॥ उपदेवाफ पुन पास आदि दस गजा हुए और श्रीदवाफ मु, ईस, पमुईसमुरमाथाभीदेवायास्तु पद मुठा ॥५॥ सुई वा पुत्र हुप || ५१ ।। देसरसिपके गर्भसे टेवरधिवपा सम्धा नप पात्र गदादयः । ए आदि ना पुरा हुए तथा जैसे स्वयं धर्मन आठ पुमो- परेप गुतानाबादष मादवया ॥५२॥ पो गमन रिसा पा, से ही यमुदयमीने सादापाके पुषिभुनसम्प्पोम्म साधार धर्मों वनिष । गर्भमे पुरवित आरा पुत्र उत्पन्न पिये । परम उपर पगुर पम्त दायामए पुमानमीमनन् ॥५३॥ यमुन्यजीन दया गर्भमे भी आट पुत्र दान किये श्रीनिमन्तं गुपणं प भद्रसनमुताधीः । जिनमें सात नाम है-श्रीनिम्पन् पुरण, मद्रमेन, 3, अर्नु सम्मदन भद्रं मर्पणमीपरम् ॥५४॥ सम्रन मद्र और रोपायतार श्रीपामजी ।।५२-५॥ १० ॥

३.०४]
नवम स्कन्ध
षष्टमस्तु तयोरासीत् खपमेन हरिः फिल । टन दोनोंके बाठा पुत्र स्वयं श्रीमगवान् ही ये।
परीक्षित् । तुम्हारी परम सौमाम्यवती दादी मुमया भी
मुभद्रा च महाभागा वप राजन पितामही ॥५५॥ देवकीजीकी ही त्या यो ॥ ५५ ॥
यदा यह धर्मस्प धयो पदिय पाप्मन । जय जव संसारमें धर्मका हास बोर पापकी छि
होती है, तब-तब सर्वशक्तिमान् मगवान् श्रीहरि भक्सार
सदा तु भगवानीश आत्मानं सूखते हरिः ॥५६॥ प्रहण करते हैं ॥५६॥ परीक्षित् ! भगवान् सक्के व्रण बोर
पास्तक्में नमामात्मा ही है। इसन्येि टनकी बामसरूपिणी
न सस्प बन्मनो इस कर्मणो पा महीपते ।
योगमायाके मतिरिक उनके बन्म भयषा फर्मका और कोई
मी कारण नहीं है ।। ५७ ॥ उनकी मापाका विलयस
आस्ममायां विनेशस्य परस्य द्रष्टुरात्मनः ॥५७॥
ही बीके नाम, चीक्न और मृत्युका कारण है।
पमापाचेष्टिसं पुसः स्मित्युस्परपप्पयाप हि।
और उनका अनुग्रह ही मायाको मग करके माम
स्त्रम्पको प्राप्त करानेवाथ्य है ॥५८ ॥ जय मसुरोंने
मनुप्रास्वमिषधेरास्मलामाय चेम्यते ॥५८॥ राजाओंका वेप धारण कर लिया और की मक्षौहिणी
सेना इफ्टी करके ने सारी पृथ्वीको रोदने मओ, तब
अधौहिणीनां पसिमिरमुरेपलान्छनै । पृथ्वीया मार उतारनेके लिये भगवान् मधुसूदन क्लराम-
जीके साथ अक्तीण रए । उन्होंने ऐसी-ऐसी टीलाएँ
सप माझम्पमाणापा अमाराय तोपमः ॥५९॥ की, जिनके सम्बन्धमें बड़ेबा देवना मनसे अनुमान
मी नहीं कर सकते शरीरसे करनेकी बात तो मष्टग
कोण्यपरिमेयाणि मनसापि सुरेश्वरै ।
रही ॥ ५९ ६० ॥ पृष्षीका मार तो उतरा ही, साय
सहमर्पणपर भगवान् मधुसूदन ॥६०॥
ही परियुगमें पैदा होनेवाले मकॉपर अनुप्राह परनक
लिये मगवान्ने ऐसे परम पवित्र यशफा विस्तार किया,
फली वनिप्यमागानां दुःसाप्पोकल मोनुदम् ।
जिसका गान और प्रवण करनेसे ही उनके दुस, शोष
और अमान सब के स्व नरो जायेंगे ॥ ६१ ।।
अनुग्रहाय भक्तानां मुपुग्म म्पवनोद यषः ॥६॥ उना यश क्या है, गोंको पवित्र करनेवाला थेष्ट
ती है। सतोंके पानोंके स्टये तो यह साक्षात् अमृत
यमिन् सत्कर्मपीयूपे पशम्तीर्थवर सफत् । ही। एक यार मी यदि पानकी वरिॉसे उसका
आचमन कर लिया जाता है, तो कवी वासना
भोताअलिरुपम्पृश्य घुनुते फर्मवासनाम् ।।६२॥ निमूल हो जाती हैं ।। ६२ ।। परीक्षित् । भोज, अष्णि,
मन्धक, मधु, शूरसेन, दशाह, पुरु, समय और
मानपूप्म्पन्धकमधुसेनदशाह
| पाणवी वीर निरन्तर मगवान्की प्लीन्यऑफी बार
सापनीयेहित शमत् कुरुसत्यपाण्डुमि ॥६३॥ पा सराहना करते रहते थे॥६३॥ उनका श्यामउ शरीर
सङ्गिमुन्दर पा। उन्होंने उम मनोरम मिग्रहसे तथा
स्निग्धमिवधिपोदारोक्पर्यिफमलीलया ।
अपनी प्रमभरी मुमपान, ममुर चितयन, प्रसार पूग पचन
वीर पराक्रमण धयक दाग सारे मनुप्पग्रेक-
नसाक रमयामास मूस्या सागरम्पया ॥६४॥ स आनन्दमें सराबार पर Pया पा ॥ ६१ ॥

श्रीमद्भागवत [अ० २४ यस्पाननं मफरकुम्हलचारकर्ण भगवान्के मुसकमकी शोमा तो निराटी ही पी। मायक्त कुणहारोंसे उनके कान व कमनीय मासूम म्राजकपोलसुमर्गसथिलासहासम् । परवे थे। उनकी आमासे कयो का सौन्दय और भी सिर उठता पा । जब वे विलासके साम इस देते, तो उनके मुख्पर निरन्तर रहनेमाले वानन्दमें मानो गाव-सी आ नित्योस्सप न तत्पुरथिमि पिपन्त्यो भाती। सभी नर-नारी अपने नेत्रोंक प्यागमे उनके मुझी माधुरीफा निरन्तर पान करते यते, परत वात नार्यो नराम मदिताः फुपिया निमम ॥६५॥ नहीं होते । वे उसका रस से लेकर आनन्दित तो होते ही, परन्तु पटक गिरनेसे उनके गिरानेकस निमिपर जाता गवः पितगृहाद प्रजमेषितार्यो | सीसते मी ॥ १५ ॥ लोख्यपुरुषोत्तम भगवान् सक्तीर्ण हुए म्युरामें सुदेक्नीके घर, परन्तु वहाँ रह नहीं, इस्वारिपन सुखनवानिरुतोरदार यहाँसे गोकुछमें नन्दगावाके घर चले गये। यहाँ वाना | प्रयोक्न—जो ग्याल, गपी और गोषोंको सुखी करना पा-पूरा करके मथुरा और माये । मजमें, मपुरामें उत्पाप तेषु पुरुषः प्रमिः समीने तया द्वारकामें यकर स्नेकों शत्रुषोंका संहार किया । पात-सी मिसे विमा फरके हमारों पुत्र उत्पन्न आत्मानमात्मनिगमं प्रथयअनेषु ॥६६॥ | किसे । साप ही में अपने खरबपका साक्षात्कार करानेवारी मानी पाणीस्वरूप श्रुतियोंकी मर्यादा स्पादित पृल्या सबै गुरुमरं धपयन् कुरूणा करने के लिये वनेक रोंके द्वारा स्वयं अपना ही पनन ॥ कौरम और पाप्पयोंके बीच उत्पन्न हुए वापसके कलहसे होने पृप्पीस पहुत-सा मार मन्तासमुत्यकलिना युषिभूपचम्मः। हाका कर दिया तपा पुदमें जानी रहिसे ही गनाओं- की बहुत सी अक्षौहिगियोंको प्यंस फरक संसार दएपा रिम्प विमपे जयमद्विषोप्य नगुनकी जीतश कर पिया दिया । सि उदबको मात्मतावा उपदेश किया और इस पर अपने प्रोन्योदमाय धपर समगार म्वधाम॥६॥' परम धामको सिधार गये ॥ ६७ ॥ । विस्या ॥ इति श्रीमगत मापुगणे पानिपामगारासादम्यो पारमईस्पा महिना नवमरसत्ये धीरपसोमा मनुकतने पदुश्मनुशीलन माम चतुतिऽप्याप ॥ २१॥ इति नाम कध सम्पूर्ण दति:

मीराधाकृष्णभ्यो नमा
श्रीमद्भागवत महापुराणम्
देशमः स्कम्का
(पूर्वार्ध)
मा
Rashim
देवपा पालितो गर्ने लालितोय यशोदया ।
पहोदयायुता बालो गोपालरी रमतां इदि ।।

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नमो भगवते वासुदेवाय श्रीमद्भागवतमहापुराणम् दशम, स्कन्ध (पूर्वार्ध) अथ प्रथमोऽध्याय भगवान् शारा पृथ्वीको माश्वासन, बसुदेव-देवकीका विवाह मोर कसर वाय देषकी के 8 पुषोंकी हत्या राबोषाप राखा परीभित्मे पूष्म-मगन् ! मापने चन्द्रवश और सूर्यवंशके विखार तथा दोनों पोंके राजाओंका कविता पशविस्तारो मयता सोमस्र्ययोः । वास्यन्त कदमृत चरित्र वर्णन किया । भगवान् के परम प्रेमी मुनिमर ! बापने स्वभावमे ही धम्प्रेमी यदुषशका भी राजां पाभयवश्माना परिसं परमानुतम् ॥ १ ॥ विशद वर्णन किया । अम कृपा करके उसी अंशमें धान अंश प्रीस्टामग्री के साथ अन्नीर्ण हुए भगवान् श्रीकृष्ण- पदोष धर्मशीलस नितरां मुनिसचम । के परम पवित्र चरित्र भी हमें सुनाइये ॥ १-२॥ मगवान् | श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके बीपनदात्म एव सरिमा है । सचिनावतीणस्य विष्णोपीणि स नः ॥ २॥ उन्होंने पतुर्मशमें भक्तार लेकर जो-जो लीअ की, उनका विस्तारसे हमोगोंको अषण कराये ॥ ३ ॥ मिनफी अवतीर्य यदावशे भगवान् भूतभावन । वाणाकी प्यास सम्दाफ किये पुन चुकी है, वे भीममुक महापुरुष निसका पूर्ण प्रेमसे अतृप्त रहकर गाम किया स्ववान् पानि विधारमा सानि नोषद विस्तरात् । ३ । करते हैं, मुमुक्षुजनोंके छिये नो भवरोगका रामग्रण पौष है तथा विषयी मेगोंके रिये भी उनके पान और निवसतरुपगीयमानाद मनको परम बाहा देनेवाश्य है, मगवान् श्रीकृष्णचन्द्र से छुन्दर, मुसद, रसीले, गुणानुपादसे पहुंघाती क्या मोपधान्छात्रमनोऽभिरामात भास्मघाती मनुष्य के अतिरिक और एसा कौन है जा मिमुस्म हो जाय, उससे प्रीति म करे ॥ १॥ (श्रीकृष्ण उपमनोकगुणानुवादात् तो मेरे कुपदेव ही है।) मा पुरुक्षेत्रमें महामारत-युद हो रहा पा और देवताओंको भी जीम स्नेवाले भीष्म- पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ ४ ॥ पितामह मादि अनिरपियोंसे मरे दादा पामयॉत्र युद पितामहा मे समरऽमरजी हो रहा पा, उस समय कौरोंकी सेना उनक म्यि भपार समुद्रके समान थी-विसमें भीष्म भार वीर परमा देवतावासिरपस्तिमिलि।। मोको भी निगल जानवास मिमिहिर माफी मति भामागवत दुरत्यय कौससैन्पसागर मय उत्पन्न कर रहे थे। परन्तु मेरे सनाम-न्य पितामह भगवान् श्रीकृष्णके चरण कमोकी नौकाका आम्रप कर कस्वासरन् परसपद म यत्मवा ॥५॥ उस समुद्रका मनायास ही पार कर गये –ीक वैसे ही द्रोग्यवषिप्लटमिद मदनं जैसे कोई मार्ग चन्ता हुवा स्वभावसे ही मके मुर का गहा पार कर जाय ॥ ५॥ महाराज मेग पर सवानवीय उरुपाण्डवानाम् । शरीर-जो मापके सामने है तथा जो औरख और पाप्मव दोनों ही वर्शका एकमात्र सहारा पा--भारमा मुगोप कृषि गत पाचचक्रा के प्रहालसे जल चुका था । उस समय मेरी म्रता जब मातुम मे या शरण गतापाः ॥६॥ भगवान्की शरणमें गपी, सब उन्होंने हायमें चक्र लेकर मेरी मताके गर्ममें प्रवेश किया और मेरी रक्षा की।६। षीर्याणि तस्सासिलदेहभाषा ( केवल मेरी ही बात नहीं, ) वे समस्त शरीरधारियों के तर आरमारूपसे रहकर अमृतकका दान कर रहे हैं मन्तति पूरुपकालरूपै । | घोर पाहर फालसपसे सफर मृत्युका है। मनुष्यक रूपमें प्रयच्छतो मृत्युमुतामृतं प्रतीस होना, यह तो टनकी एफ हीन्य है। पाप च | उन्हींकी एपर्य और माधुर्यसे परिएग स्पनाओंका वर्णन मायामनुप्पस्स पदस्व विदन् ॥ ७॥ | कीजिये ॥ ७॥ राहिण्याम्तनयः प्राक्तारामः सार्पणमस्थया। मगन् ! बापने भी बताया था कि बयामजी थे । इसक बाद देवकीक पुत्रोंमें भी वापन देवक्या गर्मसम्म कुता देहान्तरं विना ॥ ८॥ माताओंका पुत्र हाना कैसे सम्मत्र है ! ॥ ८ ॥ असुरों- | उनकी गगना की। दूसरा शरीर धारण किय बिना ने को मुक्ति दनवाले और मकोंको प्रम वितरण करनेवाले कसा कान्दा भगवान् पितुर्गेश नजंगत । भगवान् श्रीकृष्ण अपन पासम्प-स्न्इसे मरे हुए सिका घर छोकर जम क्यों चल गये । यदुवंशशिरोमणि कवास मातिभिा साप ठषान् सास्वापतिः॥९॥ भतरसर प्रमुने नन्द धारि गोप-मभुत्रोंक सब कहाँ | कहाँ निवास किया। ॥९॥ मझा और शहरका मम पसन् झिमझगमधुपुया च कशमः । भी पासन परनवार प्रमुन प्रजम तप मधुपुरीमै रहकर कान-पान-सी लगा की । और महाराज ! उन्होंने अपनी माफ भाइ मसम्म का अपन हाया क्या मन प्रावर पावपान फर्म मातुरातमम् ॥१०॥ राय । वह मम हानके कारण उनके शरा मारे जान योग्य ता मी प ॥ १० ॥ मनुप्पाकार सचिगनगम्य दह मानुपमाभिस्य कति पाणि वृष्णिमि । पिमा प्रफर करके शारकरपुरीम यदुर्षशियोंके साप म्होंने रोहिणीके पुत्र .ममन धारिगाफ मम मम मस्तरामीपम मित भगराम उनक बीमा कारन तया गार प्रसस्पम भी उन नागपरने हैं। श्राश भाग्मानीन मन्तारिशरा उन भन्सपामीरी उसममा परत है, 4 माध म भमरपर पान | भार निरापम भमानी पुग्न नामाश्मेि रिमिननमें दी मो बने २५ मम सरपम्प मुल मर्मभा। ।

सूत उपाय पद्पुर्या सहायान्सीत् पल्य कम्यभवन् प्रमो ॥११॥ कितने वर्षोंतक निकास किया । और उन सपशलिमान प्रमुकी पत्नियों कितनी पी ॥११॥ मुने! मैने श्रीकृष्ण- की स्तिनी सीटाएँ पछी है और जो नहीं ही हैं, प्रवदन्यच सर्प मे मने कृष्ण विषष्टितम । सब आप मुझे विस्तारसे सुनाइये, क्योंकि बाप सम कुछ जानते है भीर में बसी प्रदाके साथ उन्हें सुनना पक्तुमर्हसि सर्षण श्रहपानाय विस्तृतम् ॥१२॥ चइता हूँ ॥ १२ ॥ मगन् ! सनकी तो बात ही क्या, मैने जलका भी परित्याग कर Pण । ति भी पह असम मूख प्यास ( मिसके कारण मने मुनिक गलेमें नैपातिदुःसहा सुन्मां त्यक्तादमपि पाधते । मृत सर्प सलनेका मन्याय किया पा ) मुस तनिक भी नहीं सता रही है। क्योंदि में भापके मुखकमटसे पिपन्त स्वन्मुलाम्मोजन्युस हरिकथामसम् ।।१३।। भरती पर भगवान्की मघामपी सीन-यापाका पान कर रहा हूँ॥ १३॥ स्तमी कहते है-शौनकनी ! भगवान्के प्रेमियोंमें अग्रगण्य एवं सवा श्रीशुकदेवनी महाराजने परीक्षितका एंव निशम्य भृगुनन्दन साधुवाद | ऐसा समीचीन प्रश्न सुनकर (मो सनोंकी सभामें भगवान् वैयासकिः स मगवानपविष्णुरातम् । की हीष्यके वर्णनका हे हुमा करता है) उनका वमिनन्दन किया और भगवान् श्रीकृष्णकी उन नों- प्रस्पर्य कणवरित फलिकरमपघ्नं का पर्णम प्रारम्भ किया, नो समस्त कलिमयको सदाके म्पाइर्समारभत मागवतप्रधानः ॥१४॥ लिये घो गस्ती है ॥ ११ ॥ मीशुक उवाच भीयुकदेवीमे क्या-मावान्फे श्रीमा रसके रसिक रा ! सुमने जो कुछ निभय किया है, यह बदुत ही सम्पम्पपसिता पुद्रिस्तष रामर्पिसचम । सुन्दर वीर भादग्णीय है, क्योंयि सबके एयाराम्य श्रीरणकी स्यव्य-कपा प्रवण करनेमें तुम्हें सहन ए४ पासुदेवकथायां से पनाता नैष्ठिकी रति ॥१५॥ | सुदर प्रीति प्राप्त हो गयी है ॥ १५ ॥ मगवान् श्रीकृष्ण- की कपके सम्बन्ध प्रस्न करनेसे ही मका, प्रश्नकर्ता पासुदेवकथाप्रश्नः पुरुषस्त्रिीन् पुनाति हि । वीर प्राता तीनों ही पवित्र दो नासे है-जैसे गगानीका बकारं पुग्छभात तपादमलिलं पपा ॥१६॥ जर या भगवान् सामग्रामका चरणामृत मभीको पवित्र कर देता है ॥ १६॥ भूमिप्तानृपल्या बदरपानीकशतायुतः परीक्षित ' उस सम्प भसों स्पों स्ने घरी राजाओंका रूप धारण कर अपने मरी भारसे पृप्पीको भानामत र रक्स भा। उससे प्राण पानेके लिये पह भाक्रान्ता गरिमारण प्रमाणं भरण यया ॥१७॥ समानीकी शरणमें गपी ॥ १७॥ पृप्पीने उस समय गौका नप धारण कर रस्य या । उसके नेत्रोंसे बोस् गौमनाभुमुस्पी बिभा मन्दन्ती करुणं विमोः। छड्याहार मुंहपर आ रहे थे | उसका मन तो नि १ एवं २ मति।

भीमद्भागवत । उपम्पिवान्तिक तस्मै व्यसन ममवोषध ॥१८॥ था ही शरीर भी बहुत कृश हो गया पा । पह पर करण सरसे रमा रही थी । सनी के पास जाकर प्रमा वापधायाध सह देवस्वया सह । असने उन्हें अपनी फ्री कम ऋहानी मुनापी ॥ १८॥ प्रसनीने वही सहानुभूतिके साप उसकी दुम्स-गापा जगाम मपिनपनस्तीरं धीरपयोनिध ॥१९॥ मुनी । टसक माद वे भगवान् शकर, स्लगके अन्याम्प प्रमुख देवता तथा गौके रूपमें मायी हुइ पृषीको अपने वत्र गस्वा जगमार्थ देवठेव पाकपिम् । साथ लेवर क्षीरसागरके तपर गये ॥ १२ ॥ मगवान् देवताओंके भी माराप्यदेय हैं। वे अपने भक्तोंपी समस्त पुरुप पुरुषसूक्तेन उपतस्ये समाहितः ॥२०॥ अमिरापार पूर्ण करते और उनके समस्त क्लेशोंको मर गिर समाधो गगने समीरियां बार देते हैं। वे ही मारके एकमात्र स्वामी है। क्षीरसागरके तत्पर पRषकर ग्रमा मादि देवताओंने निशम्प घेधासिदनानुवाच ।। पुरुषसूक्कर के द्वारा ठम्ही परम पुरुष सन्तिमी प्रमुकी स्तुति की । स्तुति करते करते प्रमानी समाधिसह गां पौरुपी में भूशवामरा पुन गये ॥ २० ॥ उन्होंने समावि-अवस्थमें जाकशनाणी सुनी । इसके बाद पगत्के निर्माणकर्ता मानीने सिंघीयतामाशु सथैव मा घिरम् ॥२१॥ | देवताओं से कहा- देवतागो ! मैने मगवान्की पाणी सुनी है । तुमलोग भी उसे मेरे द्वारा अभी सुन लो मोर पुरष पुसापरतो धरान्वरो फिर ऐसा ही करो । उसके पाउनमें किरम्य नहीं होमा चाहिये ॥ २१ ॥ मगवान्को पृथ्वीके करपा पहलेसे भवकिशर्यदुपज पताम् ही पता है। ये ईपरों के मी ईभर है । बस अपनी स पारदुर्गा भरमीश्वरेश्वर काशक्ति द्वारा पृष्पीस मार हरण फरते पर तक पृथ्वीपर स्त्रीग फरें, साफ हमग मी अपने- स्वकालगत्तया धपयघरेद् मुवि ॥२२॥ अपने अंश साप पटुकुममें नम सेपर उनी मममें सहयात 1॥ २२ ॥ बसुदेवजीके पर सर्प पुरुओठम पमुदवगृहे माया भगवान् पुरुपः परः। | भगवान् प्रकट होंगे । उनकी और उनपी प्रिफलम (धीराधा)की सेवा के रिये देवगना बम प्रण परें । २३ । अनिप्यन नप्रिया मम्भन्तु गुरनिय ॥२३॥ सर्वप्रया भगवा र शेष भी, जा मानान्धी प्राण हाने पारण अनन्त (अनम्न। अश भी पम्प पागुरलानन्त महयवदन म्बराट् । १) और डिनो माय मुर, भगपानर प्रिय पाय अपना भविता पा र निपनिकीर्पया ॥२४॥ कसा उनमे ही उनके पर भाग में सरमा प्रयरंग ॥ २५ ॥ मगगानी पर रिणामापा भगरती पपा मम्मादि वगन् । गामिनी पागनापा भी, निसन सारे जगवर माग्निपर रम, उनी अनामे टनगर पाप सम्पन्न माशिप्रांगन फापा मम्भपिप्पति ॥२५॥ करने के निरामे जागार प्राण पण ॥ २५ ॥ PRALHARTI ५०१] दशम स्कन्ध ११० -- भीमा उपाय धीशुक्दयनी कहते है-परीक्षित् ! प्रजापनियोंके म्वामी भगवान् प्रमाजीने दक्ताओंका इस प्रकार आशा इस्यादिश्यामरगणान प्रजापतिपसिर्विसु । ही और पृष्पीयो समझा-मुहाफर दास वाया । इसके मायास्प प महीं गीर्भि स्वधाम परमं ययौ ॥२६॥ वाद व अपने परम धामको चले गये ॥ २६ ॥ प्राचीन फारमें यदुवंशी राजा थे शूरसेन । व मथुरापुरीमें राकर गुरसेना यदुपतिर्मपुरामावसन् पूरीम् । माथुरमाडल और शूरसेनमणय्या गम्पशासन करते थे माधुराम्रसेनांश्च विषयान् पुमुजे पुग ॥२७॥ ॥ २७ ॥ उसी समयमे मथुग ही समस्त यदुवंशी नरपतियों राजधानी हो गयी थी । भगवान् श्रीहरि सर्पता वहाँ राजधानी सत सामूत् सर्वयादवभूमजाम् । विराजमान रहने हैं ॥ २८ ॥ एक बार मधुरामें शूरफे मधुरा भगवान् यत्र नित्य संनिहितो हरि ॥२८॥ पुत्र वसुदेवजी पियाह करके वानी नवविवाहिता पली तस्यां सु कहिपिन्छौरिसुदवः रुतोदह । देवकीके साप घर जानेके रिये रपपर सवार हुए ॥२०॥ देषफ्या सूर्यया मार्घ प्रपाणे रथमारुत् ।।२९।। देवकी प्रसन्न करने रिये ठस्फे रपके मोदॉफी रास उग्रसेनपा पवा पा स । उमने अपनी चचेरी बहिन उग्रसेनसुत फंसं म्बसु प्रियचिकीर्पया। फ्याटी। मह ाप ही रप होक्ने ख्या, यपनि उसके रश्मीन् इयानो जमाह रोम रथयात ॥३०॥ साप सैकडों सोने यने हुए रप घछ रहे थे ॥ २० ॥ देवकी के पिता थे देवक । अनी पुत्रीपर उनका बड़ा चम्मत पारिपई गनानां हममालिनाम् । प्रेम पा । काया बिग करते समय उन्होंने उसे सोनेके अधानामयुतं मार्घ रथानां च त्रिपशवम् ॥३१॥ हारोंमे अमृत चार सौ हापी, पंद्रह हजार घोहे, अय दासोना सुरुमारीमाते समठकते । रह सौ रप तथा सुग्दर-सुन्दर पत्राभूपोंसे विभूषित दो दुनिने देवक प्रादाद याने दुदिपरसलः ॥३२॥ सौ सुकुम्वरी -सियाँ दहेममें दी ॥ ३१ ३२ ॥ विदाई क समय बर-पष्फे ममके लिये एक ही साप शक्षा, सातूपमृदङ्गाय नेदुन्दुमय समम् । तुरही, मृदा और दुन्दुमियों वमने लगी ॥ २३ ॥ मार्गम प्रयागप्रक्रमे धापद् वरषयो मुमालम् ॥३३॥ | मिस समप घोपोंकी रास पाकर फंस रप हॉक या पा, उस समय वाफाशवाणीने उसे सम्मोधन करके पथि प्रग्रहिणं ममामाम्पातासरीरवार । पा-'अरे मूर्स बिसका तरयमें टाकर लिये मा रहा है, उसकी भार- गर्भपी सन्तान तुझे मर गलेगी ॥३॥ मम्यास्त्वामटमा गर्भो न्ता यां वासेसुध ॥३४॥ कंस या पापी । उसकी दुस्ताकी सीमा नहीं थी। स्युक्तः म म्बन पापा भोजानां कुरूपासनः। मह भोजशका कामही पा । आक्रामणी सुनते ही उसने सबार सीच टी और अपनी बहिनकी चोटी भगिनीतुमारम्भ बहुपाणि फषेऽप्रवीत् ॥३५।। पकाकर उसे मारने के लिये तैयार हो गया ॥ १५॥ तं जुगुप्सितकर्माण नृशंसं निरपत्रपम् । यह अस्पत कर तो पा ही, पाप क्रम करते-करते निर्लन भी हो गया था। उसका यह काम देसकर महारमा वसुदेवा महामाग उवाच परिसान्तयन् ॥३६॥ समुदखजी उसको शान्त करते हए बोले-॥ १६ ॥ बमुदेव उवाप बसुरेशीमे करा-रामकुमर ! माप मोजशके सापनीयगुणः पूरैर्मवान् मोक्षपस्करः । होनहार शिवर या अपने मुल्की कीर्ति मानवाने १ समरिया प्रिय !एको। - भीमशागत [२०१ सक भगिनी इन्मात् नियमशाहपर्वणि ॥३७॥ है ।बोमई शूरपीर वापके गुणोंकी सराहना करते हैं। इधर यह एक तो सी, दूसरे आपकी बहिन पर तीसरे मस्पर्जन्मपता पीर दोन मा आयो । यह विवाहका शुम अवसर ! एसी मितिमें माप इसे | कैसे मर सकते हैं। ॥ ३७॥ वीरयर ! जो स्म लेने भय पाम्पसवान्ते या मत्युबै प्रामिनो तुवः ॥३८॥ हैं, उनके शरीरक माप ही मृत्यु भी उत्पम होती है। नाम हो प सौ पपक नाद-जो प्राणी है, उसकी हे पवस्वमापन्ने रेदी कर्मानुगोऽवयः । मृत्यु होगी ही।॥ ३८ ॥ जय शरीरका मत हो जाता है, तब जीप भपने कर्म के अनुसार दूसरे शरीरको ग्रहण करके अपने पहले गरीरको छोर देता है। उसे विवश देहान्तरमनुप्राप्य प्राक्तनं स्मयते वपुः ॥३९॥ होकर ऐसा करना पड़ता है ॥ ३९ ॥ जैसे पडसे सम्म प्रबस्तिष्ठान पठेकेन पवफेन गच्छति । मनुष्य एक पैर अमाकर ही दूसरा पैर उठाता है और जैसे नौकरिसी अगले तिनकेको पार स्पेती है, सब पथा तणजकै देही फर्मगतिं गत पहले के पको ए तिनकेको होती है. वैसे जीव भी ॥४०॥ अपने फर्मक अनुसार किसी शरीरको प्रश्न करनेके बाद हीस शरीरको छोरता || १०॥ जैसे कोई पुरुष पप्ने यथा पम्पति देहमीप्झ यात् वास्थामें रानाके ऐपयको देखकर और इन्द्रापिके ऐचर्यको सुनकर उसकी अभिनषा करने माता है और मनोरणेनाभिनिषिष्टचतनः उसका पिन्वन करते-करते उन्हीं यामि फुप्रमियर एक हो जाता है सपा सप्नमें अपनेको राजा पा इन्द्रके प्रभुताम्मा मनसानुपिन्तमन रूपमें अनुमत करने स्याता है, साप ही जाने दरिदा- पस्ताके शरीरको मूल जाता है। कभी-कभी सो चामत प्रपपते तत् किमपि मपस्मृति ॥४१॥ अस्मामे ही मन-ही-मन उन मानोंका चिन्तन करते-फरत तपाय हो जाता है और उसे स्यूस शरीरकी मुधि नहीं रहरी । वैसे ही नीष फर्मल कामना और फामनाकृत पवो पतो भापति देवपोविस फर्मक मश होकर दूसरे शरीरको प्राप्त हो जाता है और अपने पले शरीरको मूल जाता है ॥ ११ ॥ जीना मनो विकारात्मकमाप पत्रम् । मन अनेक विकारोबर पुत्र है । दाम्तो समय का बने मम्मोंके सचित और प्रारम्ब फोभी मामनाक गुणेषु मायारपिने उपमा अधीन होकर मायाव रा ग्च हुए अनम पाश्चतिक शीमिमे जिम मिमी सतीरक चिन्तनमें महीन हो जाता है वीर मान बैठना है पि या में है, उमे रही शरीर प्रपपमानः सा तेन जायते ॥१२॥ पारण करके सम्म ना पाता है॥ १२ ॥ बसे सूर्य पन्द्रम भार पमकीत्री मस्तुर जरसे भरे एए घमें मोतिपयवारकपार्थिवेप्याः पा तेउ आतिरस पाम प्रतिविम्ति होती हैं और हमारे मासे उनके जर आदि छिने-टोग्नेपर उनमें ममीरवगानुगत लिभाम्पते । प्रतिविमिन बस्तर भी पभर माम पाती है--सेरी - प्र..] दशम स्कन्ध एष म्यमायारचितवसी पुमान जपप अपने सरूप मानारा रचे हुए शरीरमें राग परफे उन्हें अपना आप मान बैठता है और मोहपश उनके माने जानेको अपना माना-जाना मानने लगता गुणपु रागानुगतो विमसि ॥४३॥ है॥ १३ ॥ इसठिये जो अपना कात्याण चाहता है, उसे किसीसे द्रोह नहीं करना चाहिये, क्योंकि नीव वर्मों तस्मान्न कम्पपिम् दाहमाघरद स तथाविधः । अधीन हो गया है और जो किसीसे भी दोह. परेम, उसको इस बीवनमें शत्रुसे और वीनके पाद परलोकसे मात्मन क्षेममन्यिम्छन् द्रोग्घुर्व परसोभयम्।।४४|| भयभीत होना ही पड़ा ॥ ११ ॥ यह मापकी | छोटी महिन अभी बची भर पहुत दीन है पता प्पा तषानुजा पाला कपणा पत्रिकापमा । आपकी फ्ल्पाक समान है । इसपर, अभी अभी इसका विवाह आ है, विाइक मालचिह भी इसके शरीरपरसे इन्तु नाहमिकल्याणीमिमा त्यं दीनमत्सलः॥४५॥ नहीं उतारे हैं । एसी दममें माप-जैसे दीनवप्सउ पुरुष कोस चारीका र बरना उचित नहीं है ॥१५॥ भीक उपाय भीशुकदेवमी कहते है-परीक्षित् ! इस प्रकार | वसुदेवनीने प्रशंसा आदि सामनीति और भप आटि भेट पव स मामभिमेंटाध्यमानाऽपि दारुणः। नीतिसे कसको बहुत समझाया । परन्तु वह पूर ता न न्यरत कारष्य पुरुपादाननुमतः ॥४६॥ | राक्षसोंका अनुयायी हो रहा था, इसठिय टसन अपन घोर साल्पर नही छोडा ॥ ४६॥ वमुपजीन पस- निर्य धतस्य तमावा विनिन्त्यानकदुन्दुमिः। श विष्ट हरु देखा पर विचार किया कि पिसी प्राप्त फार प्रतिष्यामि तपावपघठ ॥४७॥ प्रसार यह समय तो टाठ ही दना चाहिय । तर ये इस निभपपर पहुँच ॥ १७॥ युदिमान् पुरुषा, जहतर मृत्युपदिममापाया याद्युदिपलादयम् । उसरी युदि और गछ साप दें, मृत्युका टानका प्रपन्न करना चाहिय । प्रपन परमार भी कर मर सक, सा पचमा न नियतेत नापराधाऽस्ति रदिन ॥४८॥लि प्रपन पानवालेका काइदोर नहीं गता ॥ १८ ॥ प्रदाप म पर प्रयान माघय पणामिमाम् । इसरियाम मृत्युनए मसर बरन पुत्र दना प्रतिका परम मसानपका बना। य िमर मार गुमा म यरि जापग्न म पान नियत पन ॥४९॥ होग बनमा पर पम मप मदो मा जापा, म या गा॥ ५९॥ मम्भव है, उटाहामा विपर्यया पानि साइ गतिधातुग्रयया । Pाराहीम मार राल ! योरि धिताल विधानका ठरम्विना निवर्नेत निश्च पार पना बरन पनि है। मामु सामन पर भी र पुनरापतत् ॥५०॥ । जाती है और गरमी र अनी ॥५०॥ मग्नर्यथा रुपियागपागया निम ममय पन भग भाt, टग ममप पौन-मी "कदी जमान-सी न नर, मग जाप रण्तायन निमितमनि । रतम! बर -मन मा पो बसा मिग १२० भीमागवत [अ० १ -- एवं हि मन्तोरपि दुर्षिभाष्यः | और फो कारण नहीं होता है वैसे ही किस प्राणीका कौन-सा शरीर मना रहेगा और किस हेतुसे कौन-सा शरीरसंयोगवियोगहेतुः ॥५१॥ शरीर नए हो जायगा–स यातका पता लगाना एक विमृश्य व पापं यावदारमनिदर्शनम् । बहुत ही कठिन है ॥ ५१ ॥ मानी बुद्रिके जलस्तर | ऐसा निमय करके वसुदेवनीने बहुत सम्मानके साप पापी पूजामास में शौरिपमानपुरःसरम् ॥५२॥ कसकी बड़ी प्रशसा की ॥ ५२ ॥ परीभिए ! कम पड़ा मौर निर्मम पा, जत ऐसा करते समप षसुदेवची प्रसन्नवदनाम्भोनो नृशंस निरपत्रपम् । के मनमें वही पीना भी हो रही थी। फिर भी उन्होंने मनसा समानेन विसन्निदमापीत् ॥५॥ उपरसे अपने मुस-कसको प्रफुल्लित करके हँसते हुए पहाना ५३ ॥ वसुदेव उवाच पसुदेयसीमे कहा- -सौम्प ! आफ्फा देवकीसे तो नमस्खास्ते भर सौम्म पद मागाहारीरिणी। फो मप है नहीं, जैसा कि भाकाशवाणीने कहा है। भय है पुत्रोंसे, सो इसके पुत्र में भापको प्यार सौंप पुत्रान् समर्पयिमेऽस्या यवस्ते भयमुस्थितम् ॥५४॥ दूंग ॥ ५५ ॥ भीमुक उपाय भीशुकदवसी करत -परीक्षित् । स जानत्य पा कि सुदेवजीके पचन झूठे नहीं होते और इन्होंने स्वसुर्वधान्निवते सस्तवाफ्पसारवित् । यो कुछ कहा है, वह युक्तिसंगत भी है । इसध्येि उसने अफ्नी बहिन देवकीको मारनेका विचार छोड़ दिया । पसुदेकोऽपित प्रीतः प्रभस प्राविशद् गृहम् ॥५५॥ | इससे मुदेवजी बहुत प्रसन्न हुए और उसकी प्रशंसा करके अपने घर घरे भाये॥५५॥ देवकी बड़ी सती-साची अथ काल उपापच देयकी सर्वदेवता । वी। सारे देवसा उसके शरीरमें निवास करते थे। सम्य धानेपर देवकीके गर्मसे प्रतिपर्य एफ-एक करके भाळ पुत्रान् प्रसुनुप पाटौ कन्यो पैमानुपस्सरम् ॥५६॥ पुत्र तथा एक फरया उत्पन्न हुई ।। ५६ ।। पहले पुत्रका नाम पा कीर्तिमान् । वसुदेवनीने उसे कर सको कीर्तिमन्त प्रथमम पसायानकयुन्दुभिः । दे किया । ऐसा करते समय उन्हें कर सो अवश्य हुआ, परम्तु उससे भी वा का अहें इस बातका पाकि अपेपामास फष्ण मोऽनृतादतिविशालः ॥५०॥ कही मेरे पचन धूठ न हो जाय ॥ ५७ ॥ परीक्षित् ! सत्यसन्ध पुरुष बह-से-बड़ा कष्ट भी सह लाते हैं, पानियों कि दुःसहं नु साना विदुपा किमपेक्षितम् । को किसी मातकी वपक्षा नहीं होती, मीच पुरुष पुरे-से- धुरा काम भी पर सबसे और जो मित्तेन्द्रिय है- किमकाय कार्याणां दुस्त्मज पितास्मनाम् ॥५८॥ मिन्होंने भगवान्को एयमें धारण कर रक्स। ये सब कुछ त्याग सकते है॥५८ ॥ जब कसने देखा कि एना समत्व सम्छोरेः सरये चैव म्पबम्पितिम् । पसुदेवचीका पने पुत्रक जीवन और मृत्युमें समान माव है एव में सत्यमें पूण निष्टायन् भी हैं, सम पद यात फंसस्तुष्टमना राजन् प्रासभिदममवीत् ॥५९॥ प्रस्न हुआ और उनसे सकर बोय ॥ ५९ ॥ । - २०१] दशम समान्य प्रेवियातु छमारोऽयं न प्रसादस्ति मे भयम् । भासुदेवनी ! भापास नन्हे से मुकुमार पम्पको ले जाइये। इससे मुझे कोई भय नहीं है। क्योंकि बाकाशवाणीने तो ऐसा मप्टमा युवयोगभन्मत्यमें विहितः फिल ॥६०॥ कहा था कि देवकी अठये गर्भसे उपम सन्तानके द्वारा मेरी मृत्यु होगी ।। ६० ॥ अमुदेवजीने कहा-ठीक? और उस पाठ्यको लेकर वे पेट चाये । परम्त में समेति सुतमादाम ययावानकदुन्दुभिः। मम था कि कंस वड़ा दुध है और उसका मन उसके हायमें नहीं है । ह किसी क्षण बदल सकता है। नाम्पनन्दत वदाम्पमसतोऽपिनिवात्मनः ॥६॥ | इसध्येि ठनोंने उसकी मात्पर विपास नहीं किया ॥११॥ नन्दापाये बजे गोपायामामीपांच योपितः। पीक्षित् । इधर भगवान् नारद कसके पास जाये और उससे बोले कि 'पस जिमें रानेवाले मन्द एप्पयो पसुदेवाया दपक्याषा यदुनिय ॥६२॥ बादि गोप, उनकी स्त्रियों, पमुश्व शादि वृष्णिवंशी यादव, देवकी धादि यदुपएकी चिों और नन्द, बसुदेव सर्षे देवतापाया उभयोरपि भारत । दोनोंके सजातीय पन्धु-वापर और सो सम्बन्धी स्प के साथ देखता है, जो इस समय तुम्हारी सेवा कर मातयो पघुमुहदो ये च फंसमनुव्रताः ॥६३॥ रहे हैं, वे भी देखता ही हैं।' उन्होंने यह भी बताया एतत् कंसाय भगवान्छनसाम्पेत्म नारदः । कि 'दोके कारण पृथ्मीका भार पड़ गया है, इसलिये | देस्तालोंकी बोरसे नव उनके पक्की पारी की मा भूमेमारायमाणानां देस्पानां च पधोपमम् ॥६४॥ रही है ॥ ६२-६१ ॥ नम देवर्षि मारद इतना कहकर चले गये, सब कसको यह निमप हो गया कि यदुर्पी पेविनिर्गमे फंसो यन् मत्या मुरानिति । देवता हैं और देवकीके गर्भसे विष्णुमगमन् ही मुस देषक्या गर्मसम्मत विष्णु व स्वपघं प्रति ॥६५॥ मारनेके छिपे पैरा होनेवाले हैं। इस प्रिये उसन देवकी और वासुदेवको इफ्कही पेड़ीसे महका कैदमें पर देषी पमुरेष १ निगम निगह। दिया और उन दोनोंसे जो-जो पुत्र हाते गपे, उन्हें यह मारता गया । टमे हर बार यह शंका नी रहती खास बातमहन् पुत्र सपोरवनशलया ॥६६॥ कि यही विष्णु ही उस बारम्बके मपमें न वा गम्पा मावृन् मबाम मुंरदस्तथा। ॥ ६५-६६ ॥ परीशित् ! पृषीमें यह बात प्राप दम्बी जाती है कि अपने प्राणोकाही पोपण करमवारयस्येमी मन्तिपसुठपा लुम्मा राजाना प्रायठो मनि ॥६७|| गना अपने महाके लिये मना पिना, माइन्यु बार अपन अस्पम्न हिसपी इट-मित्रॉफी भी हत्या का समन आस्मानमिामजात बानन् प्राग विष्णुना इतम् । १॥ ६७ ॥ मम चानमा पा शि में पहल काम्नेमि महासुर कालनेमि यदुभि स परुम्मत ॥६८|| अमुर पा और विष्णुने मुझ मर गय था । इसमे | उसने यारियोंसे घोर विरात्र यन टिया ॥ ६८ ॥ उग्रसेन च पितर यंदभाजान्याधिपम् । कस महा स्वान् पा । रमन पद, मान भार पक्षक १ वीमांस। २ ' यान्वनमाम नार ५. बदूनाममा । मावर पितर या पुभारम् ।३ वाक्यानका । मुाद मलीन।

१२२ भीमद्भागवत (०२ वयं निगम पुसजे धरसेनान् महापलः ॥३९॥ | पशके अविनायक अपने पिता उप्रसेनको कैद कर रिया और शूरसेन-देशका राज्य मा स्वयं करने छणा ॥ ६९|| इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारम्इस्यो सहितायां दशमस्कंधे पूर्धि भीकृष्णाक्तारोपक्रमे प्रथमोऽध्याय ॥१॥ । अथ द्वितीयोऽध्याय भगवा गर्भ मपेश मौर देवतामोशाय गर्भ-स्तुति श्रीशुक सबाप भीशुकदेवजी कहते हैं-परीक्षित् । स एक तो प्रसम्माकमाणूरणावर्तमहाशनः सर्य यदा की पा और दूसरे, माफमरेश जरासकी उसे महुत सी सहायता प्राप्त पी । तीसरे, उसके साथी मुष्टिकारिष्टविविदपूतनाफेधिमेनुका ॥१॥-प्रसम्मसुर, सम्मुर, चाणूर, वणात, अघामर, मुष्टिक, मामासुरम्पाणिभौमादिभिर्मुस परिणामुर, विधि, सना, केशी पोर मेनुफ । तथा माणम्मुर और भीम्सुर यदि बहुत से दैत्य राजा उसके या फदन पके पली मागपसंभयः ॥ २॥ | सहायक थे । इनको साप कार पह फशियोंको नष्ट करने मया ॥ १-२॥ वे अग मपमीत होकर कुरु, ते पीरिता निविषिशुः इरूपबालकेकयान् । पाल, केराय, शास्व, विदर्भ, निषष, विदेह और कोमल भदि देशोंमें चा पसे ॥ ३ ॥ कुछ लोग उपर शास्वान् विदर्भान् निपधान् विदेहान् कोसलानपि।३। उपरसे उसके मनके नुसार काम करते हुए उसकी एके तमनुरुपाना पातयः पर्युपाससे । सेवामें लगे रहे । बम कसने एक-एक करके देवकीके छ मालक मार सले, तम देवकीके सातवें गर्भ में भगवान्के इतेषु पट्स वालेषु देवपमा यौग्रसेनिना ॥४॥ शम्वरूप भीशेपमी -जिरें मनन्त मी कहते हैं- पधारे । भानन्दसरूप शेषजीके गर्भ में आनेके कारण सप्तमो पैप्प भाम यमनन्स प्रचक्षते । देवकीको स्वाभाविध दीप गुआ। परन्तु केस शायद इसे भी मार सके, इस मपमे उनका शोक मी गर्भो पप देवक्या हर्षशाकविषघन ॥५॥ गप्पा ॥ १५ ॥ विचारमा मगवान्न दस मुसे ही जपमा स्वामी भगवानपि विधारमा विदिस्या सर्व भयम् । और सर्वस माननेवाले यदुवंशी कसक द्वारा बात ही पना निमनापानां मागमायां समादिक्षत् ॥ ६ ॥ सतये जा रहे हैं। तय नहोंने अपनी पागमायाको य बादेश दिफ-॥ ६ ॥ देवि ! कम्याणी! तुम ममें गण्ड देवि प्रम भद्र गोपगोमिरल रूपम् । जावो । र प्रदेश बालों और गोंसे थोमित है। रारिणी पसुदेपस भापोऽऽम्ने नन्दगाइले। यो मम्दगावके गोकुल बसुदेवकी पत्नी रोहिणी निवास • सम्प्रप ।२ हामुरैः।। मिद्रा । प मालान्ने विचार किया कि मामासर मैं डाय माई रमा इससे मुझे गरे मा माग माननी पड़ी भोर वन बनेसे में में राम नही सच । भीड़प्पबतर में पड़ा माई कनर माताम्की अपी सेवा र मंगा ।" इससिले रे भीतणमे पास से गर्मम मा गये ।

म०२] दशम कप १२३ अन्याय कमसविग्ना विवरेषु यसन्ति हिं॥७॥ | करती है। उनकी और भी पत्नियों कससे रक्त गुप्त देवक्या बठरे गर्म पासप धाम मामकम् । स्थानमें रह रही है।। ७॥ इस ममप मेरा बह अंश जिसे शेष फहते है, देवकीक उदरमें गर्मरूपसे स्थित त मनिफुष्प रोहिण्या उदरे संनिषेशम ॥ ८॥ है। उसे पहसि निफालयर तुम रोहिणीये फेन्में रस्त मयारमंशभागेन देवक्याः पुत्रां शुमे । ॥ ८ ॥ कल्याणी ! भव में अपने समस्त ज्ञान, कल भादि अंशोंके साप देवकीका पुत्र वा जोर कम प्राप्स्यामि त्वं यदोदायां नन्दपल्या भविष्यसि ।।९।। नन्दवायाकी पत्नी यशोदाके गर्मसे जन्म लेना ॥ ९ ॥ अचिम्पन्ति मनुम्पास्त्या सर्वकामवरेवरीम् । तुम लोगोंको मुँहोगे वरदान देनेमें समर्थ होओगी । धूपोपहारपलिभि सर्वकामपरप्रदाम् ॥१०॥ मनुष्य तुम्हें अपनी समस्त अभिप्रपाओंको पूर्ण करने पारी मानकर धूप-दीप, नैवेष एवं अन्य प्रकारकी नामधेपानि कुर्वन्ति स्पानानि च नग सनि । सामग्रियोंसे तुम्हारी पूना करेंगे ॥ १०॥ पृथ्वीमें लोग दुर्गति भद्रकालीति विजया वैप्पवीति च ॥११॥ सुम्हारे लिये बहुत से स्पान बनायेंगे और दुर्ग, मद्रकाली, विवया, वैष्णवी, कुमुगा, चणिका, कृष्णा, मावी, कुमदापतिका रुपमा माधवी फन्यकेति च फत्या, माया, नारायणी, शनी, शारदा और अम्बिका माया नारायमीशानी शारदेत्पम्बिकेति च ॥१२॥ आ िबहुत से नामोंसे पुकारेंगे ॥ ११ १२ ॥ देवकीके गममसे सींचे मानेके कारण शेषजीको ध्येग संसारमें गर्मसंफर्पणात् त यै प्राहुः संफर्षण मुवि । संकर्षण' करेंगे, खोक्रमन करने के कारण मामा परेंगे रामेवि लोकरमणाद् पलं बलवहुयात् ॥१३॥ और वठया में श्रेष्ठ होनेके कारण भद्र' मी करेंगे ॥ १३॥ संदिष्टे भगववा सपेत्योमिसि वचः । जब मगवान्ने इस प्रकार आदेश दिया, तब योग- | मायाने जो बाजार-ऐसा कहकर उनकी बात शिरोधार्य प्रतिगृम परिक्रम्य गां गठा पत् व्याकरोत् ॥१४॥ की और उनकी परिक्रमा करके में पृष्पीअक्में पटरी भापी ता मगधन्ने जैसा कहा था, वैसे ही गमें प्रणीते देवक्या रोहिणी योगनिद्रया। | किया ॥ १४॥ जव योगमायने देवीका गम ले जाकर रोहिणीके सदरमें रस दिया, तब पुरवासी मा दु सके साप आपसमें कहने लगे हाय ! बेचारी देवकीका आओ विनसिता गर्म इति पौरा विधुक्रुशु ॥१५॥ | यह गर्म तो नष्ट ही हो गया ॥ १५ ॥ भगवानपि विघात्मा भकानामभयरर । भगवान् माछाको अमय कानेपले हैं। वे सर्वत्र मम रूपमें हैं, उन्हें कही भाना-जाना नहीं है। इसरिये आविवेशांशभागेन मन आनकान्दमे ॥१६॥ ५ क्मुदेवभीय मनमें अपनी समस्त फस्यों के साथ प्रयट हो गये ॥ १६ ॥ उसमें विपमान् गहनेम मी अपनेको बन्यकम म्पक पाया । भगवान्मी पारियो स विभ्रत पौरुप घाम प्राजमाना यथा रवि । धारण करने पारण नमुत्पनी सूर्पक समान तेवमी हो गय, उन्हें दसवर गोंगी बोम्य चौधया जाती। द्गमदाऽतिदुर्घो मृतानां सम्मम् ॥१७॥ को भी अपने बउ, पारी या प्रमावसे उन या नहीं १ पा।२ कमरे । नानेर ।४ राग । मरमु ।

१२४ श्रीमद्भागवत [१०२ ससो जगन्मङ्गलमम्युतांश सक्ता प ॥ १७ ॥ मगवान्के ठस ज्योतिर्मय भशको, समाहित शूरसुतेन शूरसुतेन देवी। जो नगरका परम मॉल करनेवाय है, वसुदेवजीके द्वारा वाधान किये जानेपर देवी देपकीने प्राइण किया । दधार सर्यास्मकमात्मभूत वैसे पूर्वदिशा चन्द्रदेवको धारण करती है, जैसे ही सबसे सम्पन्न देवी देवकीने विभुद मनसे सामा काष्ठा यथाऽनन्दकर मनस्तः ॥१८॥ एवं धात्मस्वरूप मगवान्को धारण किया ॥१८॥ सा देषकी सर्वचगभिवास मगवान् सारे जगत्के निवासस्थान है। देषकी उनका मी निवासस्थान बन गयी । परन्तु घड़े आदिके भीतर निवासमता निसरों ने रेजे। पंद किये हुए दीपकला और अपनी विषा दूसरेको म भोजेन्द्र गेहेऽग्निशिखेष देनेवाले मानसाकी श्रेष्ठ विधाका प्रकाश जैसे चारों बोर | नहीं फैलता, वैसे ही कसके कारागारमें मंद देवकीकी सरस्वती मानवले पपा सती ॥१९॥ मी उतनी शोमा नहीं हुई ॥ १९ ॥ देवकीके गर्नमें वो वीप कंसः प्रभयामिवान्तरी भगवान् विराममान हो गये थे। उसके मुखपर पवित्र मुस्कान पी। और उसके शरीरकी कान्तिसे बंदी विरोषपन्ती भवनं सुधिभिवाम् । मामलने लगा पा । म कसने ससे देखा, बर आईप मे प्राणहरो हरिता मन-ही-मन करने या यकी बार मेरे प्राणों के प्राफ विष्णुने इसके गर्मम पस ही प्रवेश किया है, व भितो पन पुरेपमीसी ॥२० स्पोकि इसके पहले देवकी कमी ऐसी मबी ॥ २० ॥ किमय बसिन् फरणीपमाशु मे जब इस विषयमै शीम-से-शीघ्र मुझे क्या करना चाहिये। | देवकीको मारना तो ठीक न होगा क्योंकि मीर पुरुस सार्प- पदर्थतन्त्रो न विहन्ति विक्रमम् । पश बपने पराक्राको कसहित मही करते । एक तो खिया स्वमुर्गुरुमस्या वधोऽय प्प सी है, दूसरे दिन और तीसरे गर्मपती है। इसको मारनेसे पोतका ही मेरी कीर्ति, स्वामी और भामु पया भियं हन्स्पनुकासमायुः ॥२१॥ मट हो नाणी ॥ २१॥ वा मनुप्प तो जीवित राने- स एप जीवन स्मल सम्परेतो पर भी मरा हुवा ही मो कपन्त फरसाका म्यवहार वर्तेत योऽस्पन्सन्ससिकेन । फरता है। उसकी मृत्यु के बाद लोग उसे गाली देते हैं। इतना ही नहीं, या देहामिमनिकि योग्य बोर दरे मुसे तं मनुखा सपन्ति नरक भी नपरप-बश्य जाता है ॥ २२ ॥ यपपि गन्ता वमोऽन्यतनुमानिनोप्नुपम् ॥२२॥ कस देवकीको मार सकता था, किन्तु सपही वह इस इति घोरतमा भाषात् सनिश्चः स्वयप्रस । स्परत ताके विधारसे निाम हो । पत्र आस्ते प्रतीधंन्तम म हरेवरानुषपद ॥२॥ मान्के प्रति दस बेरका माप मनमें गोठकर उनके १रिने। ..सिले मदनपियों भारत की दुई देवगौरा गला काटनेरे उपोगमे म दिपरा बही भार बना सीपन रोगग मी मा त म वीमे देगा? उसो भरमें- - प०२] दाम कम - आमीनः मरिमनिटन समान पर्यग्न महीम्। ननी प्रीत पग्ने सा॥२३॥ उरी तिते, माते-जागते बार गभीग -गया नागा पित्तनमें बन रहना । जो उम चिन्तपाना पीफशमपश्यन समय बगन ||२४|नी, जर्गे यु' गरम हाता, यहां टमे श्रीन दीप बसे । इस प्रकार उमे सग मददी श्रीराम मय दीराने ॥२१॥ ममा भपथ वयस्य मुनिभिर्नारदादिभि । परीभित् ! भवन् शार बार मनी मर पेशान थपे । उनर सपकान भनुपरों सहित समस्त देवता और मरगति भये । मे ग दव' सानुपरैः मार गीभिपगमैटयन् ॥२५॥ मनपुर पयन से सुपरी अभिमा पाने इटिपी इस प्रकार स्तुति इग्न एगे ।। २५ ।। सत्यग्रत 'प्रभो! पनागर । मुप ही सीमिया मुत्यपर पिसत्य श्रेण सरन है । सृष्टि श्र, या पमर और समारती पितरे समर--नबनय भास्याम मी मापस योनि निति च माये । सम्परे। पी, बर, सन, पारा निदेय रमन सरकार और उनमें सन्तपसे गिरन । म सस्पम्प सन्पमृतमत्पनेन पस्न मदर मत । मधुर बरसना प्राता मान्ने बमासम्मी ममरीका सुम्पारमा स्वां उरण प्रपना ॥२६॥ ॥२६॥र पर नान ए । मार:-रमा 2-R2-Am, sh पनामो पिनगिन , - ग ?--JE . बनना प्रार(m, ना, HTTE मान-12 उपग्म परिप: परामा। THEME-F Pr" - मतसमरिया नराशा s' s t tr 2: rinti-rrrrrrr ---- 77 स्पादिगा दिया। उttrrrrrrrrr RRIrr Ki २६ श्रीमहागपत [म.. चमक ग्वाम्य मन प्रमति ३-जीव और ईपर ॥ २७ ॥ इस मसारम्प भी उत्पत्तिके वाधार एकसान आप ही है। आपमें ही मनिधानं त्वमनुप्राथ। इसका प्रत्य होता है और वापकही भनुम्हसे इसरी रक्षा भी जाती है। मिनका मिस आपकी मयासे आहत न्यमापया मातयेतमम्त्वा हा रहा , इस सस्पारे समानेकी शकि म य- वही उत्पति, स्थिति और प्रश्य करनेवाले प्रमादि पापन्ति नाना न विपपिता में ॥२८॥ दक्षताओंगे अनेक नेते हैं। तत्वज्ञानी पुरुष व सरक निभर्पि पाण्यवाय आत्मा म्पमें संपर वापका ही दर्शन परसे ॥२८॥ श्राप ज्ञानसम्पबामा है । चराचर नगस्फ प्रस्यार के धमाय लाव घरापरस्स। ठियेही भनेक मप धारण करते हैं। आपके वे रूप विशुद अप्राात मलमय दाते है और मंत पुरुषों मपापपमानि मुग्नावहानि परत सम्म देते हैं । माय ही योगा टनकी दरता मतामभद्राणि म दण्ड मी देते हैं। उनक लिये अमनगमप भी बाते ग्वलानाम् ।।२९॥ १ ॥ २९ ॥ यस सम्पन कोम जनुपामरे नेकले प्यम्पजाधाग्निमवधानि प्रभो ! पुरा सिर मग ही आपसे समस्त पगों और प्राग्पिोंके आयपश्चगप सप पूग यामतासे अपना ममापिनाऽतिपतमक चिव एगा पास और आपक परममापी जवाज- सस्पादपातन पर आधय सेवा स मंसारसागको परहके तुरा महत्ततेन गहो समान अनापस टी पार कर जाते हैं। क्यों म १०२] १२७ - स्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्मया मार्गस गिरते नहीं । प्रमो ! वे घड्या विन सलन- पाली सेनाके सरगारोके सिरपर पैर रसकर, निर्भय विनायकानीकपर्ध प्रभो ॥३३॥ विचरते हैं, कोइ मी विन्न उनके मार्गमें शकर नहीं मुस्वं विभुद अयते भवान् आठ सकते, क्योंकि उनक रक्षक आप जो है ॥ ३३ ॥ स्पिती भाप ससारफी सितिके ठिय समस्त देहधारियोंको परम परीरिणां भेयउपायनं पपुः । | पल्याण प्रदान करनपाल विशुद्ध सस्वमय, सचिरानन्द मय परम दिल्य मङ्गल-विग्रह प्रकट करते हैं। उस बेइक्रियायोगतपःसमाधिमि रूपके प्रफट होनेसे ही आपके मक ये, कमाण्ड, नायगायोग, तपस्या पौर समाविके द्वारा आपकी बारापना स्तवाईग येन जना समीहते ॥३४॥ करते हैं। बिना किसी वामपक ये किसीकी आराधना सख न घेदारिद निजं मवेद करेंगे।॥ ३१॥ प्रभो! आप सबके विवाता है। पदि वापका यह विमुद सस्काप निज सम्प न हो, सो पिभानमनानभिदापमार्जनम् मान और उसक द्वारा होनेवाले मेदभावको मष्ट करने वास्य अपरोक्ष पान ही किसीको महा । बगदमें गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान् दीपनेवाल तीनों गुण आपक है बार आपक द्वारा ही प्रशित होवे हैं, यह मस्य है। परन्तु इन गुणोंकी प्रकाशते यस्प च येन या गुणः ॥३५॥ प्रकाशक इत्तिपासे मापक सस्पयर क्यउ अनुमान ही न होता है, पास्तमित्र स्यम्पस साक्षात्कार नहीं होता । नामरूप गुणजन्मकर्ममि (बापक स्वरपका साक्षात्कार ता आपके इस विशुद निरूपितम्ये सम वस्स साक्षिणः । सत्यम्य स्वरूपी मेवा करनेपर मापनी पासेही होता है ) ॥ ३५ ॥ भगवन् ! मन और ये पाणीक मनोन चोम्पामनुमेयपद्मना द्वारा कार आपके म्यम्परा अनुमानम्मत्र होता है। स्पोंकि आप उनक शग रस्य नहीं, उनफ माशी है। देव शिपायां प्रतिपन्त्यथापि दि ३६॥ । इसरिये भाषक गुण, जम और का आन्कि धारा भापत्र नाम और मपका निगपण नहीं दिया जा अण्वन् गृणन मम्मरयम पि तपन् मातासि भी प्रमा आणि क्रियायागों द्वारा भारमा माभात्यार ना करत नामानि रूपाणि च मालानि त। ही है॥ १६ ॥ जय पुरुष आपक मन रमय नामा श्रीर एका श्रवण, कीनन, स्मरग और प्यान करता क्रियासु यस्त्वचरणारविन्दया अषक परस्मकी मेवामें ही अरना बितलाये गविष्टपेता न भवाय मल्पते ॥३०रहता है-उसे फिर राम-मायुनए संसरफ चक्र मही अना रस्ता ॥ २७ ॥ मग दुखक रिनार दिएपा हरऽम्पा भवत पदा सपा मान् । भर मॉपर ।। या पीना पार भागस्तरही। असक अवतारम मा भरदर भागऽपनातम्नर जमनतिः । गपा । धन्य है । प्रम इपर दिया या सामाय. १ गुणमम्मान 1९1 गुप्र I fees । - आपका भाग्न उपासना १३० भीमद्भागवत [१०३ नया प्रसभसलिला इदा मलकाभिया । मय हो रही वी ॥ २ ॥ नरियोंका बल निर्मळ हो गप्पा पा । रात्रिके समय भी सरोवरेमि कमल खिल रहे पे । कनमें वृक्षोंकी पतियों रंग-बिरंगे पुष्पोंके गुच्छेसे द्विचालिकलसनादस्तपत्र पनराजमः ॥३॥ रद गयी थी। कही पक्षी चहक रहे थे, तो कहीं भौरे गुनगुना रो मे ॥३॥ उस समय परम पवित्र और पवौषायुः सुस्वस्पर्शः पुम्पगन्धवहः शुचिः। शीतल-मद-सुगन्ध पायु अपने स्पर्शसे व्येगोंको मुखान करती हुई कह रही पी। प्रमोंक अग्निहोत्रकी कमी न मुमनेवाली मम्नियों जो कसके अत्याचारसे मुम गयी थी, मग्नयम विनातीनो शान्तास्तत्र समित॥४॥ इस समय अपने भाप जल उठा ॥ १ ॥ २ नदियों सम गायीसे पती पी—तुमने हमारे पिता पर्यत देसे । भाने पिता मावान् विष्णुके दर्शन पराभो। गझीने मुनी मनमुनी र दी । अम इसलिये प्रसन्न हो गी कि हम स्वयं रेल । २ यपपि मावान् समुद्र में नित्य निवास करते है फिर भी समुराम सेनेके कारण छ यहाँ देख नहीं पाती । भाउने पूर्व स्पसे देस सगी इसपिये में निर्मक होगी। ४ निर्मल एपने भगवान् मिसते है इसलिये वे निर्मम से गयी । ५ नदियों में सेमाम किसी मी अवतारमें नहीं मिल पम्पावतारमें मिम । भीरप्पी पर्व परयनी है-भीमसिन्दीसी । भक्तार सेते की यमुनापीके तटपर बना बाबा एवं गोपियों के साप मम्मीग करना समेमपनी पटरानी बनाना-नम सब बातोपो सोकार नदियाँ भानम्बसे भर गी । कासिम्प-दमन के अस्मि-दान पोषन बाबमामें मोर मयूरको नाम-रमें ही मफने स्वस्मो वर्णन भादि स्व-सम्पम्बी सीमोष भनुसम्बान पर होने कमलके पाने मपने प्रकृस्ति बसारे ही भीकृष्णके प्रति मर्पित कर दिया । उन्होंने भाकि 'प्रभो ! म ही हमें मेग मा समझा परें भाप हमें कमी स्वीकार करेंगे इस भावी मोमापके मनुसन्मानसे हम सहरम से रो।" १ इस भक्तारमें भीक्ष्णने मोमातुर तमाम अम्पिके दमनसे माप्रश, बासु भौर पसी आदि भी है। मृद् माणसे प्रषीपी मौर मप्निपामसे अग्निी । भावान् भीकमाने दो बार भनिने अपने मुंहमें धारण किया । इस भाषी मुलका मनुरूमान मग्निदेव शान्त र प्रमरिच होने मगे। २ देववाभोंके सिये पक्ष माग मादि रहो बनेके परष अनिदेव भूसे की । भर भीकृष्णाधारसे अपने मोक्न मिपनी भाषासे अग्निरेव प्रसन्न हो मम्मशित हो । पायु १ उमारशिरोमणि मगवान् भीकणके बमके मसरस पाने मुत्त हगना प्रारम्म पिया क्योंकि ममान गीबसे दी मैत्री हेती है। वैसे म्वामी के सामने सेवा प्रब भन्ने गुण प्रार करके उसे प्रान करती है से सेवामु भगवान के मामने माने गुण प्रष्ट पने मो । २ मानसा भीरुपायो मुताबिन्दपर म भममनित स्पेदपिन्तु मा गयेंगे तब में घीतक मम्द मुगाव गनिमे उम मुनाऊँगा-पर साचार परेसे ही मासु सेभ मम्पास रने स्या। । यदि मनुप्पमं प्रभु परमारफि पेन मठमा पोते उसे भी सेवा से परनी पारिये, मानो यह उपदेश करता दुभा वायु सबमे सेन परने मगा। ४ एमासारमें मर पुष हनुम्पनने मगगन मेगा की इनमे में हतार्थ हो परन्तु इस भक्तारमें मुझे सपदी मेपा र मनी पादिय । म विचारमे बामु मगों को मुग्न पर्युपाने माप । . नगन पिले प्राग प्रचुन समिती भोरमे भगवान पगम-समागमें प्रतिनिश्तिया।

म०३] दशम स्कन्ध मनास्पासन् प्रसभानि साधनामसुरहवाम् । | संत पुरुष पलेसे ही चाहते थे कि अनुरोंकी याती न होने पाये। अब उनका मन सहसा प्रसनतासे मर गया । बायमानेऽजने तसिन् नेदुन्दुभयो दिवि ॥ ५॥ जिस समय भावान्के आविक्किा बक्सर माया, स्वर्गमें देवताओंकी दुन्दुमियों अपने आप यज ठी ॥५॥ वगु किन्नरगन्धर्वास्तुएषः सिच्चारणाः । किमर और गन्धर्य मधुर स्वरमें गान हो तथा सिद्ध रियाधर्मष नन्तरप्सरोमिः समं सदा ॥६॥ और चारण ममावान्के मङ्गलमप गुणोंकी स्तुति करने छगे। सिपाधरियों अप्सराधोंके साप नाचने लगी ॥६॥ समपर्मनयो देवाः सुमनांसि मुदान्विताः। मानो देवता और ऋषि-मुनि भानम्दसे मरकर पुर्पोकी १ मारणी एकता, भाषारता विद्यालय मौर समयी उपमा सो दासे से भावान्के माम दी पाती थी परन्तु भव उसकी छी नीलिमा मी मानके मासे उपमा देनेसे परितार्य हो बगी, इसलिये मान- ने मानो मानम्दोस्सव मनाने के लिये नीसे दोपेमें पिरोके समान वाषी भामंटन। २ स्वामी के शुभागमनके मपरपर से सेक्स स्क्स वेष-भूषा पारण करते हैं मोर पन्त हो जाते। इसी प्रकार मायके सब नक्षत्र मा द्वारे प्रान्त एवं निर्मस हो गये । माता, मविचार मौर मुद गोहर भीकृष्णा स्वागत करने मो। मैं देसी गर्मसे कम हे या हूँ तो रोदिनी संतोपके लिये कम-से-कम रोहिणी नकनमें कम तो लेना सेबादिय । मधमा पन्द्रमै म के गानो पदमा ससे पारी पी गरिवीमें ही कम टेना उरित है। या सोचकर मावान्ने ऐरिणी मसमें कम मा । १ योगी मन निरोध करते हैं, मुमुद निर्विक्स करते हैं मोर मियतु भाव करते हैं । ववशेने तो मनच सस्पानाश ही कर दिया। मायान्के अवारण समय बनकर उसने साया है और वो में मपनी पत्नी नन्द्रिों भौर विप -पास-पाचे समके साप ही भगवान के साथ ले ग्गा । निरोप मौर पापमे मिस यूटा । इसीसे मन प्रसप रोगमा । २ निर्मोही मगवान् मिते इसलिये मन निर्मल हो गया। ३ से धन्द, पर्ण सम रत, गपन परित्याग कर देनेपर मगवान् मिस्ते । अबको स्वम मावान् पर सस नकर मा हे। मेकि मानन भी प्रमुमें मिमेगा । पर बेचान मन प्रसन्न हो गया । ४ मसुदेवके मनमें निवास के पे दी मालान् प्रर हो रोहै। ना हमारी ही सविध है, यह सोचकर मन प्रसस से गपा। ५ मुमन (रेक्ट भौर पर मन) सुन्न रेनेके सिने ही मावान अधर रहै। पर बनकर मुमम ममम रोगये। । संमि, स्वर्गम मौर उपासमें सुमन (एर मन देवता मोर पुप्प ) मानन्वित हो गये । क्यों न हो, मापन ( विष्णु मोर पसन्द ) मागमन ऐसे यहा। मदमास- मद भाव मापन देनेवाय है। रुप्मा सर्प हमसे सम्बद । भामी विपि पसके बीचोबीच सस्वि-सबपर पड़ी। पति योगीमनो प्रिय है। निर्णय पतियोंघ संम्पा मोर राधिके दो माली सन्धि है। उस समय भीरुप माविमावन मर्म है-मशामके पोर मधपरम पिस प्रमश । निधानाप पद्रके धर्म पम नारे, ये निधारे मप्पमागमें भी ऐना अषित मी है । मामीके पन्द्रोश्यका समय भी दी है। परि मरेको मेरा काम नहीं र सकते हो हमारे बंगले मादिपुरुष पन्द्रम्प समुद्रस्नान से सपने परविरसे ममता वितरण करें।

१३२ भीमश्रामवत । । मन्द मन्दं अलभरा बगरिनुसागरम् ॥ ७॥ वर्षा करने यो । जलसे मरे हुए यादव समुद्रके कम चाकर धीरे-धीरेगर्जना करने लगे। ॥ ७ ॥ बना पाउने निशीये चमतरते जायमाने मनार्दने । धफसे छुपानेवाले जनार्दनके अवतारमा समप । निशीप । पारों घोर अन्धकारमा साम्राम्य पा । मी देवयां देवरूपिमा विष्णः सर्वगुहाक्षयः । सम्प सपके दयमें विराजमान भगवान् विष्णु देवी देवकीके गर्मसे प्रकट १९, जैसे दिशामें सेबों याविरासीद् यथा मामा दिक्षीन्दुरिव पुष्कलः८॥ कबओंसे पूर्ण चन्द्रका उदय हो गया हो ॥ ८ ॥ वमनु पालकममजेषण पसुदेवबीने देख, उनके सामने एक मत याम है। उसके नेत्र कमसके समान फोम और विशस। चतुर्सद शागदामुदायधम् । चार सम्दर हार्पोमें सब, गदा, चक्र और कम्त भि र है। वक्ष बलपर श्रीवासका चिह-अस्पन्त सुना श्रीवस्सलक्ष्म गलशोमिफोस्तुम सुवर्णम्मी रस्सा है । गम्मै कौस्तुभमणि मिलमिला यी पीतामर सान्द्रपयाडसोममम् ॥ ९॥ है। वर्षाकाठीन मेधके समान परम सुन्दर श्यामल परिसर पर मनोहर पीताम्बर फहरा रहा है। यमल्प अव्यमणि- महाईवेटकिरीटकमल के विराट मोर कुमालकी कान्तिस सुन्दर-मुनर सुंघराले विपा परिप्पासइसकन्तलम् । गाल सूर्यको किरणों के समान चमक रहे। कमरमें चमचमाती करमीकी सदियो स्टक रही है। हम गामापादकारणादिभि- बामद गौर फरमायो पक्षण श्सभ्ययान हो ये हैं। इन सम आम्धोंसे सुशामित पाठयक मा-मासे विराचमानं पसुदेव एक्षत ॥१०॥ भोसी छटा छिटक ही है ।।९१०॥ व वसुदेवजीने स विमयोफल्मबिलापनो हरि वसा कि मेरे पुत्रके सपने तो तय मावान् ही जाये हैं, तब पहले तो उन्हें नसीम आचर्य हुआ, तिर जानन्दसे मुत पिलोकमानकदुन्दुभिसादा । उनकी यो रिस ठठी । म्ना रोम रोम परमानन्दमें १ गुणामयः । २ रापुरापुषम् । • अषि, मुनि भौर देवठा ब अम्ने मुम्नश्री वर्षा करने के लिये मपुराकी ओर दौरे ता उनम मानद मी पी र गमा भोर उनके पीछे-पीछे चैदने म्मम । उनोंने अपने मिरोप मोर भागतम्मनी खरे विचार सागर मन मोहम्मकी ओर बनेके लिये मुक र रिमा उनपर नौमर र दिना | + १ मेष मुके पास पर मर-मन्द मना करते हुए प्रते-मानिये । या तुमारे उपर (पास भाने) 7 फरमारे पास ही गय । मन ऐब कुछ उपदेश कर देते तुमारे भीर मात्रान् पठे से हमार भीतर मी है। २ बादल समाफे पास माते मोर पते 8 समुद्र । तुमारे एपमें माचन् पते। हमें मी समन एन प्यार प्रास करपा । समुद्र में थोड़ा-सा स स प देख-भमी उचास से दो देता सभो भी विध सेगा रे भनस रस का मानान्के दर्शन होंगे । म मगवान् मेगावाम पनर मनसे बाहर में माराम पमें उनपर सामागे मानी कार्यों परसार बोक्न म्पोभर ग मोर उनकी तुरीने सरपर पाडगे मरने इस मामन मनुलपान एक बार मनके पास पहुंचे मोर मन्द-मन्द गर्मना भने । मन्द-मन्द इमिया भनि प्यार भीडयो प्रोगकम पप गाय ।

and-a- Hav अभुत पालक

भीमहागपत
प आत्मनो एपगुणेषु समिति दीसते हैं)॥ १७, जो अपने इन प गुणोंको
सपनेसे पृषक मानकर सत्य समलता है, यह कहानी है।
म्पषसते सम्पतिरेकोऽबुध ।
क्योंकि विचार करनेपर ये देहलोह आदि का पारिपत्र
विनानुवाद न प व मनीपि
के सिवा और कुछ नहीं सिख होते । विचार के द्वारा
विस पस्तुमा अस्तित्व सिद नहीं होता, पस्कि ना बक्ति
सम्पग्यतस्त्यक्तमपाइदव पुमान् ॥१८॥
हो माती है, उसको सत्म भननेवाय पुरुष बुद्धिमान्
स्वघोऽस्प समस्थितिसंयमान् विमो
कैसे हो सकता है॥ १८ ॥ प्रभो । कहते है कि
वदन्स्पनीहादगुणादविक्रियात् ।
वाप सर्य समस्त क्रियाओं, गुणों और निकारोंसे रहित
हैं। फिर भी इस ज्याल्की सधि, सिति और प्रलय
त्वपीघरे प्रमाणि नो विरुमते
मापसे ही होते हैं। यह मास परम ऐपर्यशान्ी पराम
त्वदामपत्यापपर्य से गुगः ॥१९॥ परमात्म्य पापके लिये असंगत नहीं है। क्योंकि तीनों
गुमेकि आश्य नाप ही है, इसलिये उन गुणों के कार्य
स त्वं त्रिलोकस्सिवये स्वमायया
नादिका भापमें ही भारोप किया जाता है।॥ १९॥
विभर्पि शुक्ल खल वर्षमात्मनः । माप ही तीनों भेकों की रक्षा करने के लिये अपनी पसे
सत्त्वमय शुस्वर्ण ( पोषणकारी विष्णुरूप ) धारण करते
सर्गाप रक्त रजसोपरि
है, उत्पतिके लिये रज प्रधान रफपर्ण ( सननकारी
कणं च षर्ण समसा मनारपये ॥२०॥ प्रामारूप ) और प्रलपके समप समोगुणप्रधान कम्णवर्ग
( संहारकारी स्पाप ) स्वीकार करते है ॥२०॥
स्वमस्स लोकस्य विमा रिरक्षित
प्रमो ! बाप सर्वशक्तिमान् और सबके सामी है । इस
ग्रीऽवष्ठीर्णोऽसि ममासिलेबर । संसारकी रक्षाके स्पेिही भाषने मेरे घर असार लिया
रामन्यसमासुरफोटिथपै
है। आजकल कोटि-कोटि असुर सेनापतियोंने राजाका
नाम धारण कर रखा है और अपने अधीन पड़ी-बड़ी
निप्पमाना निहनिप्पसे थम् ॥२१।। सेनाएँ कर रही हैं। आप उन सपका संहार करेंगे॥२१॥
देवताओंके भी बाराप्पदेव प्रभो ! या फेस पहा दुए है।
अयं स्वसम्पस्तव मन्म नौ गृहे
इसे जप माइम दमा कि नापका भतार हमारे पर
सुस्वाग्रजास्ते पपीत् सुरेभर ।
होने वाला है, तब उसने बाप भपसे आपके मई मायों
स तेजवार पुरुष समर्पित
को मार राण । वमी उसके दूस वापके सवरका
समचार उसे सुनायेंगे मोर एमभी-अभी हापमै का
श्रुत्वाघुनवाभिसरस्पदायुधः
॥२२॥ स्पर दौमा आयगा ॥ २२ ॥
भीमा उपाप
भीशुकदेवमी कदत है-परीक्षित् । इपर देवकीने
देश कि मेरे पुत्रमें तो पुरुग्रेसम भगवान्वे सभी पक्षण
अधनमारमर्ज वीक्ष्य महापुरूपतषणम् । मौर है। पाले सो उन्दै कमसे कुरा भय मादम एमा,
परमति का पवित्र भागमे मुसकराती दुई लन
दवसी सम्पाधापन कसा भीता पिमिता॥२॥ याने ॥ २३ ॥

अ०३] दशम स्कन्ध १३५ , मावा देवकीने कहा-प्रो ! वेदनि आपके मिस रूपको षष्पक और सक्का कारण वाया है, नो रूप यत् पद माहुरख्यकमाप अम, ज्योति स्वरूप, समस्त गुणोंसे रहित सौर विकारहीन मग पोतिनिर्गुणं निर्षिफारम् । है, जिसे विशेषणरहित-अनिर्वचनीय, निष्क्रिय एवं केवल सचामात्र निर्षिशेपं निरीह विशुद्ध स्ताके रूपमें कहा गया है वही युति मारिके प्रकाशक विष्णु भाप स्वयं हैं ॥ २१ ॥ निस समय स स्व साधा विष्मरम्पारमदीपः ॥२४॥ माकी पूरी आयु-दो परार्ध सम्पप्त हो जाते हैं, नष्टे लोके दिपरार्धावसाने कालशक्तिके प्रभाषसे सारे ख्येक नष्ट हो जाते हैं, पञ्च महामतेप्यादिन गतेपु । महामृत सहकारमें, नाकार महतस्पमें और महत्तत्व प्रति- में लीन हो पाता है-उस समय एकमात्र साप दी शेयर व्यक्तऽध्यक्त फालवेगेन माते माते हैं। इसीसे बापका एक नाम 'शेप' भी है ।। २५॥ भवानेफः शिप्पते शेपसंज्ञः ॥२५॥ प्रतिके एकमात्र सहायक प्रमो । निमेयसे लेकर वर्ष योऽर्म कालस्तस्य तेऽव्यक्तान्यो पर्यन्त अनेक विमामि विमत नो काउ है, जिसकी चेयसे यह सम्पूर्ण विष सचेप्ट हो रहा है और निसकी कोई चष्टामाहुरसे येन पिमम् । सीमा नहीं है, यह आपकी लीलामात्र है। आप सर्वशक्तिमान् निमेपादिवत्सरान्तो महीयां और परम कल्याणके साम्रय हैं। मैं वापकी शरण खेती स्तं स्वेशानं क्षेमधाम प्रपये ॥२६॥ ॥२६॥ प्रभो ! यह जीप मृत्पुमस्त हो रहा है। यह मृत्युरुप कराल व्याउसे भयभीत होकर सम्पूर्ण लोक का सरोम मा मृस्पुष्पालभीतः पलायन् भक्ता गा, परन्तु इसे कभी कहीं भी ऐसा स्पान न मिल्छ लोकान् सनिर्मपं नाभ्यगम्छत् । सफा, हों यह निर्भय होकर रहे । आज बा मग्यसे इसे आपके चरणारविन्दोंकी शरण मिट गयी । अत क्य स्वत्पादाम्म प्राप्य परच्छयाय याइ सस्प होकर मुस्थी नीं सो रहा है । औरोकी शेते मृस्पुरमादपति ॥२७॥ तो मात ही प्या, स्वयं मृत्यु भी इससे मयभीत होकर माग गयी है ॥ २७ ॥ प्रम्प ! आप है भकभयहारी । स व पोरानसेनारमन्नान्न- और हमप्रेग इस दुष्ट कससे बहुत ही भयमीत हैं। अत साहि प्रस्तान् मृत्पवित्रासहासि । आप हमारी रक्षा कीजिये । मापका यह पसुर्मुम रिम्प- रूपं पेड़ पौरुपं मानविय सप ध्यानकी वस्तु है । इसे कलर मास मामय शरीर पर ही दृष्टि रखनेवाले देहामिम्पनी पुरुषों के सामन प्रकट मा प्रस्पक्ष मांसरसा फपीयः ॥२८॥ मत कीरिये ॥ २८ ॥ मधुसूदन | इस पापी सफा चन्म त मय्पसौ पापो मा पिपान्मधुसूदन । यह बात माइम न हो कि आपका जम्म मेरे गर्भस हजा समहिने भगतो फसादरमधीरपीः ॥२९॥ है। मेरा वैर्य टूट रहा है । भापके लिये में कमसे बहुत पर रही हूँ ॥ २९ ॥ विधामन् ! वापा यह रूप उपसंहर विश्वात्मन्नदो रूपमलौकिकम् । अरिक है। नाप शत, चक्र, गा और ममयी शाचागदापनिपा शुष्टं चतुर्रजम् ॥३०॥ मासे युक्त सफ्ना यह चतुमुझम्पप छिपा लीनिये ॥३०॥ १ गरी ।

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५०३] दक्षम स्कन्ध १३३ कृष्णावतारोत्सषसम्प्रमोऽस्पृशन् म्म हो गया । श्रीकृष्णका जन्मोत्सव मनानेकी उताकळीमें उन्होंने उसी समय प्रक्षों के लिये दस इमार गार्योफा मदा विजेम्योऽयुतमाप्लुतो गाम्॥११॥ सहस्य कर दिया ॥११॥ परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण मौनमस्तौदवधार्य पूर मानी मान्सिसे सूक्तिमागृहको सम्मा कर रहे थे जव वसुदेवनीको यह निमय हो गप्प नि ये सो परम परं नवाङ्गः कवधीः कताअलिः । । पुरुष परमारन ही है, तब भगवान्का प्रमाष नान लेनेसे सरोचिपा मारत सतिकागृह उनका सारा मय जाता रहा । भफ्नी पुद्धि स्थिर करके उन्होंने भगवान्के चरम अपना सिर मुका दिया और पिरोधयन्तं गतभीः प्रभाषषित् ॥१२॥ फिर हाप भोगकर वे उनकी स्तुति करने लगे-॥ १२ ॥ पसुदेष उपाय षसुदेवजीमे कहा-मैं समा गया कि आप प्रति- से अतीत साक्षात् पुरुषोत्तम है। बापका स्वरूपए केका विदितोऽसि भवान् साक्षात् पुरुपा प्रकते। पर।। जनुभव और केवळ भानन्द । माप समस्त पुद्रियोंके एकमात्र साक्षी है ॥ १३ ॥ पाप ही सर्गक बादिमें केरलानुभवानन्दस्वरूप सर्वपुदिरम्॥१३॥ अपनी प्रकृतिसे इस त्रिगुणमय जगत्फी सृष्टि परसे हैं। पित उसमें प्रविष्ट न होनेपर मी पाप प्रविटके समान स एव स्वप्रहस्पेद सामाग्रे त्रिगुणात्मकम् । जान पाते हैं ॥ ११॥ वैसे जातक माचत्व मादि कारण-तत्त्र पृपक्पप रहते हैं, तबतक उनकी शक्ति तदनु स्वं प्रविष्टः प्रविष्ट इस भाष्यसे ॥१४॥ | मी पृपक्मृएक होती है, जब से इन्द्रियादि सोय विकारों के साप मिटते हैं, सभी प्रमाणाकी रचना यमेऽपिकता भामास्तपाते विरुतः सह । करते हैं और इसे उपम करके इसीमें मनुप्रनिट से नान पाते हैं, परस्तु सभी पात सो पाए कि ये किसी भी नानाषीर्याः पपग्मता विराज खनपन्ति हि ॥१५॥ पदार्थमें प्रवेश नहीं करते । ऐसा होने का कारण यह है कि उमसे नी भी बस्तु है, उसमें से पहलेसे ही सभिपस्प समुत्पाप रश्पन्तेऽनुगता इस । विपमान सवे हैं ।। १५१६ ॥ ठीक वैसे ही पुस्तिके द्वारा के गुणों क्षणोंका ही अनुमान किया जाता प्रागेव विषमानस्लाम सेपामिह सम्भवः ॥१६॥ है और इन्द्रियोंके मारा केरल गुणमय नियमोंका ही प्राण होता है। यपि भाप ठनमें रहते हैं, फिर भी उम परं भवान पुरपनुमेयरधन- गुणोंक प्रहणसे आपका प्राण महीं होता । इसका प्रैिर्गुको समपि तद्गुणाप्रदा । कारण पाकिवाप सब कुछ है, सबके सामी र भौर परम्पर्प स्स्य, मारपसरप है। गुर्गोका बावरण मनाइतस्त्वात् पहिरन्तरं न ते मापको हक नहीं सकता । इसम्येि बाप म घर म भीवर । फिर भाप किसमें प्रवेश करेंगे। (इसरिये सर्वस सस्मिन वास्मवस्तुनः ॥१७॥ प्रदा न झरनेपर भी आप प्रवेश किये एके समान १ प्रापीन प्रविम पारेर बाचा या पाठ मही है ।।

१३४ भीमद्वागत [.३ य पात्मनो श्यगुणेषु समिति दीस्ते हैं)॥ १७॥ वो अपने इन स गुणोंको व्यवस्पते स्वम्यतिरेकसोऽधुधा। अपनेसे पृथक् मानकर सस्प समझता है, यह मानी है। क्योंयि विचार करनेर ये दानोर आदि पार्थ माम्बियस गिनानुवास न ष सन्मनीपिस के सिवा और कुछ नहीं सिख होते । विचारके द्वारा विस पस्तुका अस्तित्व सिद नहीं होता, पस्किनो माथित सम्पग्यवस्त्पत्तमपादवद पुमान् ॥१८॥ हो जाती है, उसको सस्प माननेवास्त्र पुरुष बुद्धिमान् स्वघोऽस म मस्सिविसंयमान् पिभो कैसे हो सकता है। ॥ १८॥ प्रभो ! करते है कि वदन्यनीहादगुभादतिक्रियाव । आप सर्य समय किस्मों, गुणों और विकारोंसे रहित है। फिर भी इस नगवकी सटि, स्थिति और प्रलय त्वपीघरे प्रपणि नो विरुभ्यते अपसे ही होते हैं। यह पात फ्रम ऐधर्मशाली परम वहाभयत्वापधर्म से गुणः ॥१९॥ | परमात्मा आपके प्रिये असंगत नहीं है । क्योंकि तीनों गुणों के भाभय बाप ही है, इसळिये न गुणों के कार्य स त्वं त्रिलोकम्पित्ये स्पमापया मादिका आपमें ही भारोप किया जाता है ॥ १९ ॥ विमर्षि शुक्ल खल वर्ममात्मनः । भाप ही सीनों छोकोंकी रक्षा करनेके छिये अपनी मायासे सर्गाप सत्वमय शुरुवर्ण ( पोषणकारी लिणुमप ) धारण करते रक रजप्तोपहिस है, उत्पत्ति के लिये राप्रधान रफर्ण (सूचनकारी कृष्ण च वर्ण धमसा मनात्पये ॥२०॥ मारूप ) वीर प्रपके सम्प तमोगुणप्रधान कृष्ण स्वमस लोकल विमो रिरक्षिप । ( संहारकारी सबप ) स्वीकार करते हैं ॥ २० ॥ प्रभो ! बाप सर्वशक्तिमान् और सबके स्वामी है । इस ग्रीनवीर्णोऽसि ममाखिलेश्वर । संसारकी रक्षाके लिये ही मापने मेरे घर मफ्तार किया रामन्यसंघासुरकोरि पृथपै है। वानल कोटि-कोटि असुर सेनापनियोंने राजाका नाम धारण कर रखा है और अपने अधीन पड़ी पड़ी निममाना निहनिप्पसे चमूः ॥२१॥ सेनाएँ कर रमची हैं । भाप ठम सभका संहार करेंगे॥२१॥ अर्थ स्वसम्मस्तन चन्म नौ गृहे देवताओंके भी आराध्यदेव प्रभो । यह कस पश दुए है। इसे जय मल्म हुआ कि व्यपका भवतार हमारे घर भुत्वानमास्ते पेवधीत् सुरेघर । होनेवाण है, सप उसने आपके मयसे आपके या माश्यों- स वेचतार पुरुषः समर्पित को मार गम भी उसके दूत वापके भक्तारका समचार उमे मनायेंग और वह अभी-अभी शाप शाय भुत्ताधुनवाभिसरस्पदायुषः ॥२२॥ लेयर दीपा बायेगा ॥ २२॥ श्रीमुक माप भीषदेयमी कहत है- परीक्षित् ! पर देवीन दाय कि मेरे पुरमें सो पुरतम मगमन्के सभी क्षण अर्थनमारमज पीस्य महापुरूपलधणम् । मर। पहले तो उन्हें कमसे मुझ मप मास भा, परन्तु पिर वे पर पवित्र मानमे मुसकराती सुति दपी यमुपाभार कसा भीवाशुचिस्मिता॥२॥ करने Pri || २३ ॥ १ लन् ।

१०३] दक्षम स्कन्ध " देवपयुवाप माता देवकी मे कहा-प्रमो ! पेनि मापके जिस सूपको अव्यक्त भौर सपका कारण बताया है, जो रूप यत् यत् प्राहुरव्यकमा जम, म्योति स्वरूप, समस्त गुणोंसे रहित और विकारहीन प्रम न्योसिनिर्गुण निर्विकारम् । है, जिसे विशेषणरहित-अनिर्वचनीय, निष्क्रिय एवं केवल सचामा निर्विशेष निरीई विमुख सत्ाके रूपमें कहा गया है-पाही मुदि आदिके प्रकाशक विष्णु आप स्वयं है॥ २१ ॥ जिस सम्प सत्व साक्षात् विष्णुरध्यात्मदीपः ॥२४॥ प्रझाकी पूरी आयु-दो फरार्ध समाप्त हो जाते है, नटे लोके द्विपरार्धाषसाने कालशक्तिके प्रमाणसे सारे लोक नष्ट हो जाते है, पच्च महामतेप्पादिभूत गतेषु । महामूत भाकारमें, महाकार महत्वपमें और महत्तवप्रकृति- में लीन हो वासा है—उस समय एकमात्र आप ही शेष रह ध्यक्तेऽष्य कालवेगेन यावे नाते हैं। इसीसे आपका एक नाम 'शेषा भी है ।। २५॥ भवानेक: शिम्यते पसंद ॥२५॥ प्रकृतिके एकमात्र सहायक प्रमो । निमेषसे लेकर वर्ष- योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो पर्यन्त अनेक विभागोंमें विभक्त ने काल है, जिसकी चेयसे यह सम्पूर्ण विष सचेष्ट हो रहा है और जिसकी कोई चटामाहुमत येन पिघम् । सीमा नहीं है, मह आपकी लीअमात्र है। आप सर्वशक्तिम्मन् निमेपादिस्सरान्तो मडीया और परम कल्याणके बाप हैं। मैं पापकी शरण लेसी स्तं त्वेशान क्षेमधाम प्रपये ॥२६॥ ॥२६॥ प्रमो ! यह जीव मृत्युप्रस्त हो रहा है। यह मृत्युरूप कराठ म्यासे भयभीत होकर सम्पूर्ण लेक लोकान्तरों में मर्मो मृत्युम्पालभीतः पलायन् भकता रहा है, परन्तु इसे कभी कही मी ऐसा स्पान न मिल लोकान् सर्षाभिर्मपं नाघ्पगन्छन् । सका, नहाँ यह निर्मय होकर रहे। भाज ६ माम्यसे इसे भापके चरणारमिन्दोंकी शरण मिल गयी । भत क्य स्वत्पादाम्वं प्राप्य पहच्छमाप यह सस्स होकर मुसकी नींद सो या। औरोंकी खस्सा शेत मुम्पुरमादपैति ॥२७॥ तो बात ही प्या, सय मृत्यु भी इससे भयभीत होकर भाग गयी है।॥ २७ ॥ प्रम ! आप हैं मकमपहारी । स त्वं घोरादग्रसेनारमबान्न- धौर हमलेग इस दुष्ट कससे बहुत ही मयभीत हैं । षत माहि प्रस्तान् मृत्पवित्रासहासि । आप हमारी रक्षा कीजिये । आपका या चतुर्भुज सिन्य- रूपं घेई पौलप मानधिष्म्य रूप प्यानकी वस्तु है । इसे फेमस मांस-मजामय शरीर पर ही घधि रणनेवाले देहामिमानी पुरुषोंके सामने प्रकट मा प्रत्यक्ष मांसर पीटा। ॥२८॥ मत कीस्पेि ॥ २८ ॥ मधुसूदन ! इस पापी कसको घन्म त मय्यसौ पापो मा विधान्मधुसूदन । यह बान मालम न हो कि आपका मम मेरे गर्भसे आ समदिखे भपदेवाः कंसादहमधीरपीः ॥२९॥ है। मेरा धैर्य टूट रहा है । भापक किये में कससे यहुत हर रही हूँ॥ २९ ॥ विचारमन् । बाफ्का यह रूप उपसंहर विश्वारमन्नदो रूपमलौकिकम् । पति है। आप ष, चक्र, गा और कमश्की शापगदापपभिमा मुष्ट चतुर्सबम् ॥३ ॥'शमासे युछ वफ्ना या चर्मकम्प छिया प्रिये ॥३०॥ १ गरी । ..

१३६ भीमागपत [१०३ । चेतसा। विश्वं यदेवत् स्वतनौ निशान्ते प्रष्पके समप आप इस सम्पूर्ण विषको अपने शरीरमें वैसे ही सामाविक रूपसे धारण करते हैं, जैसे कोई मनुष्प यथावकाशं पुरुषः परो भवान् । अपने शरीरमें रहनेवाले अिसप बाकाशको । श्री विमति सोऽयं मम गर्मगोऽम् परम पुरुष परमात्मा आप मेरे गर्भवासी ए, यह वाकी दहो नृलोकस बिडम्पनं हि यत् ॥३१॥ बहुत मनुष्य-लीन नहीं तो बौर क्या है । ॥ ३१ ॥ भीभगवानुपाप भीभगवानमे कहा-देवि ! स्वायम्मुव मम्फातरमें मत्र तुम्हारा पहस्य मा पा, उस समय तम्हारा स्वमेव पूर्वसर्गेऽभूः पृभिः सापम्मषे सति । माम या पृश्नि और ये परदेष मुतपा नामके प्रजापति वदाय मुतपा नाम प्रयापतिरकरमपः ॥३२॥ थे। तुम दोनोंके दय बड़े ही शुस थे ॥ ३२ ॥ जा मामाजीने तुम दोनोंया सन्तान उत्पन्न करनेकी माला दी, युगा रे प्रसणाऽऽदिष्टौ प्रजासर्गे यदा तयः । सब तुम लोगेंने इन्द्रियोंका दमन करके उत्तर तपस्या संनियम्पेन्द्रिमग्राम सेपाये परमं सपः ॥३२॥ फी ॥ १३ ॥ तुम दोनोंने वर्षा, वायु, घाम, शीत, उष्ण अर्पावासपहिमधर्मालगुणाननु आदि कालके विभिन्न गुणोंका सहन किया और प्राणा- यामक नारा अपने मनके मछ पो गरे ॥ ३१ ॥ तुम सामानौ वासरोधविनितमनोमठौ ॥३४॥ दोनों कमी सूखे पत्ते ख लेते और कभी खा पीकर ही र नाते । तुम्हारा चित्त महा शम्स पा । इस प्रकार धीर्णपर्णानिसाहाराषुपक्षान्सेन तुम नि मुमसे नमीठ वस्तु प्राप्त करनेकी इच्छासे मेरी मच फामानभीप्सन्तौ मदाराधनमीहतः ॥३५॥ वाराधना की ॥ ३५ ॥ मुममें विच लाकर ऐसा परम दुष्कर और घोर तप करते-करते देवताओंके पार इनार एवं पां तप्पतोस्ती तपः परमदुप्फरम् । पर्ष बीत ॥ २६ ॥ पुण्यमयी देवि ! उस सम्प तुम दोनोंपर प्रसन्न एबा । स्पोकि तुम दोनोंने तपस्या, दिम्पवर्षसहस्राणि द्वादशेयर्मदास्मनोः ॥३६॥ पता और प्रेममयी भकिसे वपन पदयमै निस्य निरन्तर बदा वा परितुष्टोजममना अपूपान। मेरी माश्ना की थी। उस समय तुम दोनोंकी अमिपा तपसाभट्या नित्य भक्त्या च इदि भाषितः ॥३७॥ हारे सामने प्रकट हुवा । न मैने कहा कि तुम्हारी र्ण करनेके लिये पर दनेवालोंका रामा में इसी म्पसे प्रादुरासं परदरार युषयोः कामदित्सया । जो इछा हो, मुझसे माँग लो,' ता तुम दोनोंने मेरे पैसा विया पर इस्युक्त माम्यो मा त सुतः ॥३८॥ पुत्र माँगा ।। ३७३८ ॥ उस समपतक विषय भोगेंसे तुम मेगोका कोई सम्बन्ध नहीं इखा था । तुम्हारे कोई ममुष्टयाम्पविपपावनपस्पो प दम्पती । सन्ताम भी न पी। इसलिये मेरी मापासे मोहित होकर तुम न पवायेऽपवर्ग मे मोहितो मम मायया ॥३९॥ दोनोंने मुझसे मोक्ष नहीं मांग ॥ ९॥तुम्हें मेरे-वैसा पुत्र गते मयि युवा लग्ना परं मस्सम सुतम् । होनेकार प्राप्त हो गया और मैं कहाँस पब गया । ज्य सफटमनोरप होकर उमडोग विषयोंका मोग करने प्राम्पान् मोगानसमाथी युवा प्राप्तमनोरयो॥४०॥ ॥ १० ॥ मैने देखा कि संसारमें शीत समाव, अरमन्पवर्म लोके शीलौदार्यगुम समम् । उदारता ता य गुमि मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं है १ परये । २ खेमंद।

१३७ अ०३] दशम स्कन्ध अई सुमो पामभवं पृश्निगर्म इति वेतः ॥४१॥ इसलिये में ही सुम टोनोंका पुत्र हुआ और उस समय में भिगमक नाममे विव्यात हुआ ॥ ११ ॥ सयो। पुनरेवाइमदित्यामाम कश्यपान । फिर दूसरे जन्ममें सुम हुई अगित भार प्रमुख हुए पश्यप । उस समय भी मैं तुम्हारा पुत्र हुआ | मरा माम उपेन्द्र वि पिस्पातो वामनत्याच वामन ॥४२॥ पा उपेन्द्र । शरीर छोटा होनेक कारण येग मुल धामन' वतीयेऽस्मिन् भवाह तनष पपुपाथ पाम् । भी कहते थे ॥ १२ ॥ स्नी देयकी । तुम्हारे इस सीसरे जन्ममें भी में उसी मपमे फिर सुम्हारा पुर दुआ मातो भूयस्तयोरेर सत्य मे घ्याइस सति ॥४३॥ हूँ। मेरी वाणी सका मत्य होती है।॥ १३॥ मैंने एव मां दर्शित रूपं प्रारम मसरणाय मे । तुम्हें अपना या मए इसउिये दिम्परा दिया है कि मुम्हें मेरे पूर्व मयतार्गेका स्मरण हो जाय । यमि में ऐसा नही नान्यथा मष भान महँलिशन जायते ॥४४॥ करता, ता पर मनुष्य शरीरसे मेरे भवनारकी पहचान युवा मो पुप्रभाषन प्रथमान चासकम् । नहीं हो पाती ॥ ११ ॥ तुम दानों मरे प्रति पुषमाष तया निरन्तर प्रझमाष रम्पना । इस प्रकार पासम्प-स्नान चिन्तयन्ती रुसस्नेही यास्यय मदति पराम् ॥४५॥ घोर चिन्तनके द्वारा तुम्हें मर परम पश्मी प्राप्ति होगी ॥१५॥ श्रीमुक उबाप श्री गुपदेयजी कहत है भगवान् इतना कहकर इत्युपत्याऽऽसीदरिस्तूष्णी मगयानारममायया । चुप हा गय । घर उम्दान मानी पागम्यासे पिता- पित्रो सम्पश्यतो सयो समय प्रातः शिशु ॥४६॥ माताक दाने-दम्पने मुरन्त एक माधारण शिशु मप भाग्ण पर लिया ॥ १६॥ तब पमुदेपनीन भगवान्नी पतम शारिर्मगवत्प्रचोदितः | प्रेरणासे अपने पुत्र स्मा सतिगृहसे बाहर निकलने मुत ममादाय स मतिकागृहात् । की प्य पी। उसी समय नन्दपनी यशा गर्मसे पदा पदिगन्तुमियेप वर्मा उस पागमायारा जन्म हुआ, जो मगवानगीक्ति हानेक पारण उनके सम्पन ही जन्मदित ॥ १७ ॥ उमी या योगमापायनि नन्दजायया ॥४७|| पोगापान पारपार और पुरसामियोंगी ममम्त टिप- हवप्रत्ययमषिप इमियोंकी नना हर सी, मग मा अननस्ट मास्यपु परिवपि दायितप्यथ । । सो गय । पगिय सभी दरपान | उनमें या द्वारस्तु सपोः पिदिता दुरस्पया यह स्मिार, महेनरी नरें और कार जाए थे। उनप याहर जामा यदा ही बन प, मन्नु पपनी परस्फपारायमकीरमा ॥४८॥ भगमन् श्रीमया में सर मने ही टना निस्ट ठा प्णशद मुदर आगत पहुँच, रोटी नगर पर असुर गए। म्वप म्पपपन्त पथा तमा रखे । घर मे दी मे गय पानसभा १ मा । २६ पुन । पुप •मा रम्नेमिनेइमा पर पाROTrmy गनरी र मात्र मानत M4-0re ननी । न । मनोना । + मिर नान भमर पर रेrir Ariमानस सपा .

१३८ श्रीमद्भागवत । वर्ष पर्जन्य उपांशुधियः जाता है। उस समय बादल धीरे-धीरे गरमकर कमी शेपोऽन्वगाद पारि निवारपन् फणे ॥४९॥ | फुहारें मेक रहे थे । इसलिये शेषनी बस्ने फोंसे नको रोकते हुए भगवान्के पीछे-पीछे घलने लगे ॥१८१९॥ मपोनि पर्षत्यसकद् यमानुका उन दिनों पर-वार वर्षा होती रहती पी, इससे यमुनानी गम्भीरखोपौषमपोर्मिफेनिला । बहुत यद गयी थीं। उनका प्रवाह गहरा और तेज भयानकावर्वषताइला नदी हो गया था । तरल रोके कारण बथ्पर फेन-ही-फेन हो रहा था । सैकड़ों मयानक भर पा रहे थे। जैसे मार्ग ददो सिन्पुरिष भिम पसेः ॥५०॥ सीतापनि भगवान् श्रीरामनीको समुद्रने माग दे दिय नन्दबजे शौरिरुपेत्य तत्र तान पा, वैसे ही यमुनामीने मगवान्को मर्ग दिया ॥५०॥ गोपान प्रसुप्तानुपलम्प निद्रया । | यमुदेवनीने नन्दबाबाके गोकुल में पाकर वेस्थ कि सम- कसम गोप नीदसे मत पड़े हुए हैं। नोंने भस्ने सुतं यशोदाष्ठपने निभाय त पुत्रको यशोदाजीकी शम्यापर मुख दिया और उनकी मुतामपादाय पुनर्ग्रहानगात् ॥५१॥ नवजात फाप्य लेकर वे दीगृहमें भेट आये ॥ ५१ ॥ १ थिए। २ सुवा समावा । • पलपामयीने विचार किया कि मैं बड़ा भाई ना वो क्या, सेमा ही मेरा मुस्प वर्म है । इसम्मेि ये भने गोल स्पसे भी एक बनकर बसन निमारप करते हुए स । उमाने मोचा : पदि मेर यते मेरे स्वामी पर्मासे या पहुँचा तो मुझे विकार है । इसखिये उनने माना सिम भागेर दिमा । अपना उन्होंने यह सोचा कि मे विशुपम (भाप्रप) बासी मप परोपकारके सिम भापतित होना स्वीपर लेते है। इसलिये पसि के समान मिसे कन्दनीय है। + १ श्रीकृष्ण शिाने अपनी ओर मावे ऐसार ममुनामीने विचार किया था। जिनके परमौकी भूमि सम्पुपोंके मानस-मानका विपयो केही भाग मेरे घर आ रोहै। मानन्द मोर प्रेमने मर गपी मोलासे हल्ने आँप निफसे किबद आ गयी । २ मुझे यमरामकी बदिन समसका भीषण अपनी मॉस म फर में, इसलिये वे अपने विशाम अपना प्रवचन करने ममी। । ये पालन के लिये गोकुममे बारे में सबस-सास परियों गौएँ। ये कि समान बनम्र भी पान ४ एक कालिम्पनाग मुममें पहलेसे ही दूसरे शोनाग या रोहै। मन मेरी क्या गति की-पा मोचार यमुनाने मपने यपेड़ोंसे उनन्त्र निवारण मनेके लिये सब गयी। + एभएक यमुनामी ममम रिचार आया है मेरे भाप मामा देलकर श्री श्रीकृम्म बन च । R में इसमें मेगा से इसलिये 4 तुरन्त भी षष्ठमर, कही मामिमर मेरी पुस्तक मामलेगी। २ से दुसी मनुम्प दमा पुरुषके सामने भफ्ना मन मोलकर रख देता है, ऐसे दी कासिमनारसे पता भपने समका नुन निषेवन र देनेके लिये यमुनाने मी भाना विष्ठ नोकर भीरप्पके सामने रख दिया। ३ मेरी मीरस्ता देतार भीम भी सामीम करना और पररामी नामा ममीपर नर इससिम पे उपाष्ठा होकर नही किनपसे मफ्ने एसकी सोचपूर्व रम्पति प्रमाने मी । ४ बस इम्हनि मरणमे रामास्तार प्रदान किया बम्पर्ग न देने पद्रमारे पिता समा गाँध दिया था। भाप पद्रपा पर हुप और मैं सूर्वी पुत्री । गदि में हमें मर्ग न गी ये ये मुझे मी घाम देंगे । इस रसे म्पनो यमुना मागोमे पैर गयी। ५ एम्पुरए दपमें मायान्क मा गनेस अस्पैटिक मुन्न । मानो उसीय उपमेग करने लिप पमुनाने मगवान भरने मंतर हे शिा। मग माम पुत्र मेरा सर कृप्या मरे पारर भीरम। फिर मरे इसमें ही उनधी सूति स्मॉन ? ऐना सोचम माग रेनेक बहाने यमुनाने भीमप्यतो भपने इसमें ले लिया।

ब०४] दशम स्कन्ध १३९ देवस्याः शयने न्पस यसुदेवोऽय दारिकाम् । जेलमें पहुँचकर यमुदेवीने टस कन्याको देवकीकी शम्यापर सुभ Pया और अपने पैरोंमें पेड़ियों मल ल्य प्रतिमुच्य पदोलॊहमास्ते पूर्ववदासः ॥५२॥ तपा पहलेकी तर ये यदीगृहमें पद हा गये ॥ ५२ ॥ उधर नन्दपती यशोगो इतना तो माश्म हुआ कि यशोदा नन्दपसी च बात परमपुम्मत । कोइ सन्तान हुइ है, परन्तु वे यह न जान सकी म पुत्र है या पुत्री । क्योंकि एक तो उन्हें वा परिश्रम हुमा था और दूसरे योगमायाने उन्हें अचेत कर Pिया न तल्लिा परिभान्ता निद्रयापगतस्मृतिः ॥५३॥ महापुराणे पारमाईस्या संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे कृष्णमनि तृतीयोऽध्याय ॥३॥ अथ चतुर्थोऽध्याय कसके हायसे छूटकर योगमायाका माकाशमें जाकर भविप्पयाणी करना मीशुक उवाच भीगुकोषसी करते हैं-परीक्षित् ! क्व वसुदेवजी पैर बाये, तम मगरके बाहरी और मीतरी सव दग्नाम पहिरन्तःपुरद्वार सर्षा पूर्ववदाता । अपने माप ही पहलेकी तरह पद हो गये । इसके याद नावात शिशुके रोनेकी पनि सुनकर द्वारपायकी नींद वसोपालप्यनियुत्वा गृहपालाःसहत्यिसाः॥ ॥ टूटी ॥ १ ॥ घे तुरत मोजरान कसके पास गये और देवकीको सन्तान होनफी यात कही। स तो वही ते तु तूर्णमुपग्रन्प देवक्या गर्ममन्म तत् । भाकुलता और घबराहटके साय इसी गानकी प्रतीक्षा कर रहा था ॥ २ ॥ झारफार्मोकी मात सुनते ही वह माघस्पर्मोजरामाय यद्विग्नः प्रवीधते ॥ २॥ अपर फगसे उप स्पड़ा हुआ जोर वही मनासे स्तिकागृहकी बोर फ्य । इस पर तो मेरे कालका दी स तत्पाद सूर्णसत्याप कालोऽपमिति विहल । जन्म हुआ है, यह सोचफर ए बिल हो रहा या वार यही कारण है कि उसे इस बार भी प्यान न रहा सतीगृहमगाव तूम प्रस्खलन सक्तमूर्धनः ॥३॥ कि उसके मार विधरे हुए हैं । रासमें कद माह का सखापर गिरते-गिरते यचा ॥ ३ ॥ श्रीगइमें पहुँचने पर स्नी देवकीने बड़े दुख और करुणाके साय अपने तमाह भ्रावरं देवी रुपपा फरणं सती। माइ ससे कहा- -मरे हितवी भार ! यह पाया तो तुम्हारी पुत्रवधक सम्पन है ! नानातिकी, तुम्हें स्नुपय तर फरपाण नियं मा इन्तुमईसि ॥४॥ बीकी हत्या फरापि नहीं करनी चाहिये ॥ १॥ १ पुषम १२ हप्तावतारे तृतीया ।। पीमम् ।।पी। • मगवान् भीरप्पने इम मस मै पर सम्म लिा B को मुझे प्रेमपूर्वक भान इसमें धारण करता है उसक पपन गुम गते । जसमे पुटपारा मिड बाता है परे पर हरले ६ पारगारों का पता नहीं पता मपनरी समन मधो गोमुस (इमिग-मुखास ) की पत्तियों तम (पती १ मोर माग रापमें भा रही है।

१४० श्रीमद्भागवत [4 पहला हिंसिता प्रातः शिवः पावकोपमाः। भैया ! सुमने दैववश मेरे महुत-से बनके समान तेज माय मार गले । अव फेवल यही एक फत्फ । त्वया देषनिसप्टेन पुत्रिका प्रदीयताम् ॥५॥ है, इसे तो मुझे दे दो ॥ ५॥ पश्य ही में तुम नन्या ते पपरवा दीना इससुता प्रभो । छोटी यहिन हूँ। मेरे बहुत से बम्ये मर गये है, इस में कस्यन्त दीन हूँ। मेरे प्यारे और समर्थ माई ! वातुमईसि मन्दाया आमा चरमा प्रमाम् ॥ ६॥ मुम्न मदमागिनीको या अन्तिम सन्तान भ दे दो ॥६॥ मीसुक उवाच श्रीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित ! फल्पाकोष मोदमें छिपाकर देवकीमीने अत्यास दीनवाके साप । उपगुप्मात्मजामेव दस्मा दीनदीनवत् । रोते याचना की । परन्तु स महा दुध प । त पावितस्तो विनिर्मप॑ हस्तादाचिन्छिदे सल॥७॥ देवकीचीको शिकार उनके हापसे कह पपा ! की ॥ ७॥ वफ्नी उस नन्ही सी नवजात मानर at गृहीस्वा परपयो|तमात्रा स्वम सुताम्। पैर पकाकर फंसने उसे पदे पोरसे एक बधनपर बपोषयष्ठिलापृष्ठे स्वार्षोन्मूलितसौददः ॥८॥ मारा । खाने उसके हदयसे सौहार्दको सम्छ ठर | फेला पा॥ ८॥ परन्तु श्रीकृष्णकी पर छोटी र्षा सा वदस्तात् समुस्पस्प सपो देख्पम्परं गवा । साधारण कया तो थी नहीं, देवी थी, उसके हम माश्यवानुमा विष्णोः सामुपाष्टमहासमा ।।९।। कर तुरंत वाकाशमें की गयी वीर अपने बो पाठ में वायुष छिपे हुए दीस पनी ॥९॥ दिव्यस्रगम्बरालेपरसाभरणमूपिता दिव्य माल, क्स, पन्दन और मणिम्य भाभूपर्ण विभूमित थी। उसके हामि धनुष, त्रिशूल, पण, धनुभूलेपवर्मासिष्ठायगदापरा ॥१०॥ तभार, ख, चक्र और गदा ये माठ भार सिहचारणगन्धबरप्सर किमरोरगैः | थे॥१०॥ सिख, पारण, गर्म, अप्सरा, किमर | नागगण यात-सी मेंटकी सामग्री समर्पित करके उस उपाहवोपलिभिा स्तूपमानेदमप्रवीत् ॥११॥ स्तुति कर रहे थे । उस समय देवीने कससे र कहा-॥ ११ ॥ पे मूर्स ! मुझे मारनेसे पुस किमयादवया मन्द माता सततपान्सकन् । मिलेगा। तेरे पूर्वयन्मका शत्रु तुझे मरनेके लिये किर पत्र के वा पूर्वशत्रुमा हिंसीः रुपणान पा ॥१२॥ पाठकोंकी हत्या न किस्म का ॥ १२ ॥ *ससे । स्थनपर पैदा हो चुका है ! अव म्पर्ष निद इति प्रभाप्प में देवी माया भगवती सपि । प्रकार कहकर भगानी योगमाया वहसि अन्तर्घाम । गयीं वीर पृष्पीके खनेक सामि विमिन नार्मोसे प्रति बहुनामनिफेत पहुनामा पम्प ॥१॥ हुई ॥ १३ ॥ हयाभिहितमाकर्ण्य स परमपिसिका। देवीकी यह अत सुनकर कसको असीम बाबर हुमा । उसने उसी समप देवकी और पसुदेवको दर देवी पसुदेवं प विमुन्य प्रभितोऽप्रपीत् ॥१४॥ 'छा पिया और बड़ी ममनासे उनसे कहा-॥ ११ ।

यांगमाया पह भपने पड़े-पड़ मार दायोंमें मायुध लिय दीरण पड़ी।

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म०४] दशम स्कन्ध १४१ । महो भगिन्पहो भाम मया मां पत पाप्मना । मेरी प्यारी बहिन और बहनोईजी ! हाय हाय, में पा पापी है। राक्षस जैसे अपने ही वर्षाको मार गळता पुरुषाद इवापस्य मेहलो हिसिताः सुताः ॥१५॥ है, पैसे ही मैंने तुम्हारे बहुत से लाके मार डाले। इस वातका मुझे बड़ा सेद ॥१५॥ में इतना दुरु सस्वास्थक्तकारुप्पस्स्पकमाविसहर पल । है कि करणाका तो मुझमें देश भी नहीं है। मैंने अपने माई-मधु और हितैषियोंतकमा रयाग कर दिया । फ्ता कॉलोकान् वैगमिप्यामि प्रमहेष मता असन् ॥१६॥ नहीं, अब मुसे किस नरकमें बाना पड़ेगा । वास्तवमें तो में अमघातीके समान जीवित होनेपर मी मुर्दा ही देवमप्यन्त पक्ति न मा एक केवलम् । ॥ १६ ॥ केवल मनुष्य ही ठ नहीं बोलते, विधाता भी मूठ बोलते हैं । उसीपर क्सिास करक मने परनी मदिनके मन्चे मार गले । भोइ ! में कितना पापी यदिभम्भादा पापः स्वमुनिहतवाञ्छिश्चन् ॥१७॥ ॥ १७ ॥ तुम दोनों महात्मा हो । अपने पुत्रों के लिये शोक मत करो। तुम्हें तो अपने कर्मका ही फल मा शोचत महाभागापास्मचान्स्वकतम्मनः। मिल है। सभी प्राणी प्रारम्बके अधीन है। इसीसे वे सदासर्वदा एक साप नहीं रह सकते ॥ १८॥ नैसे बन्तको न सदैकत्र देनाधीनास्तदाऽसते ॥१८॥ मिहीके बने हुए पदार्थ बनते और मिगड़ते रहते हैं, परत निधीमें कोई बदल-बदछ मही होती-वैसे ही सविभौमानि भूतानि यथा यान्त्पपयान्ति च । शरीरका तो मनना-मिगहना होता है राता " परन्तु भात्माफ्र इसका कोई प्रमाण नहीं करता ॥ १९ ॥ जो नायमारमा पर्यतेषु विपति तथैष मः ॥१९॥ लोग इस तत्वको नहीं मानते, वे इस अनास्मन शरीरको ही मामा मान बैठते हैं । यी उटी पुदि अपवा पघानेवविदो मेदो यत मास्मविपर्ययः । भान है। इसीके कारण सन्म और मृत्यु होते है। पौर बक्तक यह महान नहीं मिटता, तबतक पुरत- देहयोगनियोगो ससुतिर्न निवर्तते ॥२०॥ दुसरूप संसारसे छुटकारा नहीं मिश्ता ॥ २० ॥ | मेरी प्यारी वहिन ! यपपि मैंने तुम्हारे पुत्रों को मार गम तसाद मद्र स्वतनपान्ममा व्यापादिवानपि । है, फिर भी तुम उनके लिये शोक न करो। योनि सभी प्राणियोंको विवश होकर पाने कोका फल भोगना मानुशोच यत सर्वः स्वस्त विन्दतेऽवषः ॥२१॥ पता है ॥ २१ ॥ अपने सरूपको न जानने के कारण जीव मक्तक या मनता राता में मारनेवाग्र पाबदतोऽमिहन्तामोस्पात्मानं मन्यतेऽस्वर। या मारा जाता है, तबतक शरीरके कम और पस्पु- का वमिमान करनेवाय का बहानी बाप्प और बाधक सावपदभिमान्पो वाम्पबायकवामियात् ।।२२।। | मावको प्राप्त होता है । अत् यह दूसरोंक दुस देता , गुर।२ मुख । मुर। •नि गर्ममें मगमन्ने निवास किया कि मायान्के रान हुए, उन देवकी मसुरेखके दमका बिर सादपमें बिनप विचार, उदारणा मादि सहलेका उदय हो गम । परन्तु माता का उनके सामने पा वमीको मन रो। मनियों के प्रपमें पवे ही महिन्या-प्र-त्यों से गया । .

१४२ भीमद्भागवत ०४ क्षमन्यं मम दोरात्म्म साधवा दीनवस्सलाः । है और स्वयं दुस्ख मोगता है ॥ २२ ॥ मेरी यह दुष्टता तुम दोनों क्षमा करो, क्योंकि तुम यहे ही साधुस्वभाव और इस्युक्त्वावमुखः पादौश्याल म्वस्रोरयाग्रहीत्॥२३॥| दीनोंके रक्षक हो ।' ऐसा कहकर फंसने अपनी वहिन | देवकी और वसुदेवचीके चरण पका लिये । उसकी मोधयामास निगरा विभग्ध कन्यकागिरा। घाँखोंसे आँसू पाह-बकर मुंहतक वा रहे थे ।। २३ ॥ इसके बाद उसने योगमायाके पन्नोंपर विपास करके देवकी पसुदेवं च दर्शयनात्मसौइदम् ॥२४॥ देवकी और वसुदेशको कैसे छोर दिया और यह सरह तरसे उनके प्रति अपना प्रेम प्रकट करने लगा ॥२॥ प्रातुः समनुतप्तस्य धान्स्वा रोपं च देवकी । न देवकीनीने देखा कि माई कसको पचात्ताप हो रहा है, तब तमोंने उसे क्षमा कर दिया । ये उसके पहले ध्यसमद् बसुदेवष प्रास्स समाध ह॥२५॥ अपार्कोको मूछ गयीं और वसुदेवनीने हंसकर ससे कहा--॥ २५॥ मनस्वी स! आपनो करते है एवमेवन्महामोग यथा पदसि देहिनाम् । ठीक वैसा ही है। जीव मानके कारण ही शरीर वादि. को मा मान बैठते हैं। इसीसे अपने परायेका मेव अमानप्रभवाईधी स्वपरति मिदा यतः ॥२६॥ हो जाता है॥ २६ ॥ और यह मेदशि हो जानेपर सो वे शोक, हप, मप, देप, ध्येम, मोह और मदसे क्चे हो जाते हैं। फिर तो उन्हें इस बातका पता शोकार्पभयापलोभमोहमदान्विताः ही नहीं रहता कि सबके प्ररक मगवान् ही एक मावसे मिपो मन्तं न पश्यन्ति भावैर्भाव प्रथमः ॥२७॥ दूसरे भावका, एक वस्तुसे दूसरी वस्तुका नाश करा ये हैं ॥ २७ ॥ धीमुक उपार श्रीशुकदेवजी कहते हैं-परीक्षित् । जब बसुदेव और देवकीने इस प्रकार प्रस्न होकर निष्कासबसे फंस एप प्रमनाम्यो विशुदं प्रतिभापित । | कसके साथ यात्पीत की, तप उनसे मनुमति पर पाह अपने म्हटमें घय गत्या ॥ २८॥ र राति भीत दवकोपसुदधाम्यामनुशायोऽपिशद् गृहम् ॥२८॥ जानेर बसने अपने मन्त्रियों को मुआया और योगमापाने वस्था राम्यांम्पतीतायां फंस आहय मन्त्रिण । मो कुछ कहा था, यह सब ठरे का मुनापा ॥२९॥ पसा मनी पूर्णतया नीतिनिपुग मही थे। दैप घनेके तम्प आपष्ट तत् सप यदुक यागनिद्रया ॥२९॥। कारण म्यभाषसे ही वे देवनाओंके प्रति शाका माष भर्तर्गदित समूमुपपत्र । | रम्पत प | कपने स्वामी पमसी यात मुनकर थे देवताओं- दवान् प्रति फवामपादेया नातिकोविदाः ॥३०॥र और भी पित गप और कमसे पहन लो-॥१०॥ माजरान ! परि एसी यात है तो हम आज ही या एप पेत्तहिं भाजन्द्र पुरग्रामयज्ञादिए । य, नग्गगमें, एटे-छोटे गाँवमि, ईलाकी बस्तियोम वीर अनिदान निर्दशाप निप्पामोऽपय सिन्॥३१॥ दूसरे सानो जिनन यन्च हुए हैं, पाहे दस निसे किमुपमै फरिष्यन्ति दवा: ममरभीरव । अधिक्कहों या कमर, सबसमाजही मर मरेंगे ॥३१॥ मममीर दगग गुदापाग पार ही करेंगे। नेता निन्यस दिपमनमा ज्यापापभनुपम्नव ॥३२॥ अपर धनुरी टार सुनस्ट ही मुगा धाराप १।२ धा ।। ।

माझग, सस्पा और में या, जिनमें दक्षिपदी श्री म..] दशम स्कन्ध १४३ अस्सतस्ते शरमाईन्यमानाः समन्तत । रहते हैं ॥ ३२ ॥ मिस समय युद्धभूमिमें बाप चोट पर चोट करने लगते हैं, वाण-पपसि घायल होकर नपने मिमीविपय उत्सुन्य पलायनपरा ययु ॥३३॥ प्राणों की रक्षाके लिये सम्राङ्गण मेहकर देवतालेग फ्ययन-परायण होकर इधर-उधर भाग जाते हैं ॥३॥ फेषित प्रालयो दीनान्यस्तपना दिवौकसः। कुछ देवता तो मरने भत्र-शस जमीनपर राठ देते हैं और हाप मोड़फर मापके सामने अपनी दीनता प्रफ्ट मुक्काम्छशिवाः केचिद् भीता स इति वादिन|३४|| करने लगते हैं। कोई कार अपनी चोटीके बाल तष्प पष्ट खोकर आपकी शरणमें भायर कहते हैं कि- नत्व विस्मृतम्शनाखान् विरथान् भयसषतान् । हम मपभीत है, हमारी रक्षा कीजिये ॥ ३० ॥ भाप उन शत्रुओंको नहीं मारते जो शत-अम मूल गये हों, ईपन्यासक्तविमुस्लान् भमघापानयुज्यत ॥३५॥ मिनपा रप टूट गया हो, जो र ग्ये हों, जायेग युद्ध कि क्षेमप्ररिपुरैरसंयुगविकत्यनै । छोपकर अन्यमनस्य हो गये हॉ, विनफा धनुष टूट गया हो या मिनोंने युदसे बफ्ना मुंह मोर लिया हो- रदोजुपा कि परिणा शम्मना या पनौरसा । उन भी आप नहीं मारदे ॥ ३५॥ देखता तो मस नहीं पीर बनते हैं, वहाँ कोई माई-मगड़ा न हो। किमिन्द्रपाल्पयोर्येण प्रमणा वा तपस्सना ॥३६॥ रणभूमिके बाहर से यही भी डींग हाँकते हैं। उनसे तया एकान्तवासी पिणु, पनवासी शाहर, वम्पवीर्य इन्द्र तथापि देवाः सापल्यान्नोपेक्ष्माइति मन्महे। और तपस्ली प्रमासे मी हमें स्पा मय हो सकता !! ३६ ॥ फिर भी देवताओंकी उपेक्षा नहीं करनी ततस्तन्मूलम्बनने निपुश्याममाननुग्रतान् ।।३७॥ चाहिये-ऐसी हमारी राय है । मोति हैं तो ये शाप यथाऽऽमयोऽन समुपेक्षिता नमि- ही । इसलिये उनकी जद तयार पनेक ये बाप इम से निभासपात्र मेवाको नियुफ पर दीप्रिपे॥२७॥ ने शक्यते रूपदधिकित्सितम् । पर मनुष्य के शरीर रोग हो जाता है और उसकी विशिसा नहीं की जाती-उपेक्षा कर की भाती है, तब रोग अपनी वा जमा सेना है और क्ति बद असाप्य यपेन्द्रियग्राम उपेक्षितस्तथा हो जाता है । अपवा जैसे इन्दिपोंकी उपक्षा कर देनेवर रिपुर्महान् पपला न पास्यते ॥३८॥ उनका दम्न अमम्मत्र हो जाना पायी उपक्षा कर दी जाय भौर पर बना पौत्र बम्ब मूळ हि विष्णुदेवानां यत्र धर्म सनातनः । से, तो शिर ठमको हराना फटिन हा स्या है ॥३८|| दवताओंपी जा है विष्णु धौर पर यहाँ रहता है, जहाँ सस्य च मन गाविप्रास्तपो यमाः मुदक्षिणाः ॥३९॥ सनातनधर्म है । सनातनानी नाक, गो, सम्मान मवान्मनाराजन् प्रामणान् प्रयवादिन । है ॥ ३० ॥ इमटिर मामान ! हमाग गयी माग, तपस्वी, यारि बोर या यि तपपिनो यामीलान गायमारवि- है, जैसे ही यदि पहले m भीना।२।।

श्रीमद्भागवत [.५ विप्रा गावम दाम तपः सर्प दमा शमः । हामी ॥१०॥ प्रमण, गे, मेद, तपस्या, सत्प, भला दमा विविधा घ मतपय हरेस्तन्। ॥४१॥ इन्द्रियदमन, मनोनिग्रह, प्रदा, दया, तितिक्षा और पा विष्णुके शरीर है ॥ ११॥ विष्णु ही सारे देवतागों- स हि सर्वसुराध्यक्षो मसुरद्विर् गुहाशयः । | का स्वामी तपा भमरोंका प्रधान देपी है । परन्तु समसा देवताः सर्वाः सेश्वराः सचतुर्मवाः । किसी गुफामें छिपा रहता है । महादेव, ब्रमा और सरे देषतायोंकी नब वही है। उसको मार गलनेका उपाय अप धै तमधोपायो यहषीणां पिसिनम् ॥४२॥ यो कि प्रवियोंको मार राम बापा ॥ १२ ॥ भीमुक सवार भीशुकदेयमी कहते हैं-परीक्षित् ! एक तो क्स- की मुहि स्वयं ही विगली ईपी, फिर उसे मन्त्री ऐसे एवं दुर्मन्त्रिभिः फसः सहसम्मन्थ्य दुर्मतिः । मिले थे, मो उससे मी काकर दुष्ट थे। इस प्रकार उनसे सलाह करके कालके फंदेमें फंसे ए सुर कसने प्रमाहिसा हित मेने फालपाशासोऽसुरः ॥४३॥ यही ठीक समझा कि ग्रामणों को ही मार राम जाय ॥१३॥ उसने हिंसाप्रेमी राक्षसोंको संतपुरुषोंकी हिंसा करनेका संदिस्य साधुलोकस करने कदनप्रियान् । थादेश दे दिया । ये इअनुसार रूप धारण कर सकते ये। मय में इधर-उधर चले गये, ता कसने अपने कामरूपधरान् दिसु दानवान् गृमाविश्चत् ॥४४॥ ममें प्रवेश किया ॥ ११ ॥ उन अमरोंकी प्रकृति भी रयोगुणी । तमोगुणके कारण उनका पित उचित ते पे रवाप्रकतमस्तमसा मूटपेतसः । पौर अनुचित निमसे रमित हो गया। उनके सिरपर मौत नाच पी पी । यही कारण है कि नोंने सा विदेपमाषेमारादागतमृत्यष ॥४५॥ | संतोंसे रेप किया ॥ १५ ॥ परीक्षित् ! जो आग महान् संत पुस्मोंका भमादर करते हैं, उनका पकुर्म उनकी बायुः भिम यशो धर्म लोकनाशिप एव प। अत्यु, नमी, कीर्सि, धर्म, लोक परलोक, विषय-मोग और सब के सब पल्याणके साधनों को नष्ट कर देता हन्ति भेयासि सर्वाणि पुंसो मारविक्रमः ॥४६॥ ॥ १९ ॥ इति श्रीमप्रागवत महापुराणे परमईस्या संहितायो दशमस्पत्थे ब िचतुर्थोऽध्याय ॥ ॥ अथ पञ्चमोऽध्याय गोकुल्में भगवान जम्ममहोत्सव मीसुक उवाच भीशुम्वेषजी करते है पीलिस् ! नन्दनाय से मननी और उदार थे। पुत्रका मम होनेपर तो नका नन्दस्वात्मक उत्पन्ने मावाहादो महामनाः। ट्रय विश्क्षण अनादसे मर गया । मोनि स्नाम किया माय पिप्रान् पेदनान स्नातः शुधिरकत ॥१॥ और पवित्र होकर उन्दर-मुम्दर पलामूषण धारण किये । १ देगामा २ दिखी। ममुरम्मत्र नाम छ ।

अ०५] दशम रूप १४५ नाचमिस्वा स्वस्त्पयन जातफर्मात्ममय धै। मिर के प्रमोंको पुवाकर सस्तिपाचन और अपने पुत्रका जातकर्म-संस्कार करवाया । साप ही देवता और कारयामास विधिवत् पितृदेवार्चन तया ॥२॥ पितरोंकी विधिपूर्वक पूजा भी फरवायी ॥ १२ ॥ उन्होंने प्रमोंको वन और भाभूपोंसे मुसजित दो चेन्नो नियुसे प्रादाद विप्रेम्पः समलंकते । यस्ख गौएँ दान की। रमों और मुनहरे पोंसे ढके हुए मिलके सत पहा दान किये ॥ ३॥ ( संस्कारोंसे विलादीन् सप्त रनोपशातकौम्भाम्पराहतान् ।। ३॥ ही गर्मशुद्धि होती है पर प्रदर्शित करनेके लिये अनेक धन्तोंका सम्लेसा करते हैं-) समपसे ( नूतन जल, भशुस कालेन मानाचाम्पा सस्कारैस्तपसेन्यया। मूमि आदि ), मानसे (शरीर आPि), प्रक्षालनसे शुम्पन्ति दानै सन्तुष्टया द्रग्याण्यास्माऽऽत्मविद्यया। (क्सादि), संस्कारोंसे ( गर्मादि), तपस्यसे (इन्द्रियादि), से (ग्रामणदि), दानसे (धन-धान्यादि) और सन्तोपसे सौमजल्यगिरो विमा समागधवन्दिनः । (मन आदि)दम्प शुद्ध होते हैं। परन्तु मारमाकी शुद्धि तो मायानसे ही होती है ॥ १ ॥ उस समय ब्राह्मण, गायकाम नगर्नेदुर्मेर्यो दुन्दुभयो महः ॥५॥ स्त, मागंध और वंदीन मगरमय आशीर्वाद देने सपा स्तुति करने स्पगे । गायक गाने लगे। मेरी बोर द्वन्दुमियों वेज सम्मृष्टससितारामिरगृहान्सरः । वार बार वजने छगी ॥ ५॥ बजमणले समी रोंके द्वार, धोंगन और भीतरी भग भाइ-गुहार दिये गये, चित्रथमपताकास्रक्चैलपल्टनमोरमैः ॥६॥ उनमें सुगन्धित जखका छिराव किया गया, मन्द विप्र- विचित्र पवा पताका, पुष्पोंकी माराओं, रंग-बिरंगे बस गायो पृपा पत्सतरा इरिद्रासैलरूपिताः । और फ्लमोंकी पन्दनबारोंसे सजाया गया ॥ ६ ॥ गाय, मेर भौर पदोंके माम हन्दी-सेका लेप कर दिया विषिषधातुईस्रग्वस्त्रकाबनमालिन ॥७॥ गया और उन्हें गेल आदि रंगीन धातु, पोरस, के हार, सब-सहक सुन्दर पा और सोनकी महाईवस्त्राभरणकम्युकोष्णीपपिता जैनी से सजा दिया गया ॥ ७॥ परीक्षित ! सभी पाठ पहुमूल्य बस, गहने, आरम्य पार पारियोसे गापा: समायय राजन् नानापापनपाणय ॥८॥ मुसमित होकर और अपने दापोंमें भेग्पी मान-सी सामग्रियों स बार नन्दबाक घर आये || ८ ॥ गोप्यमाकप मदिता यशोदापाः सुतामयम् । यापेगरीके पुत्र हुआ है, या मुना गारियोंका मी वा मानन्द आ । उन्होंने मुदर-मुग्दर पप, भारमानं भूपयांश्चकुर्मखाकस्पाअनादिभि ॥९॥ आभूषण और बन्जन आदिसे भरना शृङ्गार पिया ॥ ॥ गोरिपाक मुम्पयर मड़ ही मुम्दा मान पात प । नरामकिझकमुस्लपममृत्यः उनपर ध्गी रखुम पसी यानी माना पानी पर हा। उनक नितम्य बन्य, यव मेंमी सामग्री - पसि भिस्त्वरित मग्मुः पृथुधापपलन्पुषा 1.|| स्पर नर्ग-जर्ग यागजी गस पी । उम समय १ पिना पितृ । २ पा सरकाश दरि । १ पोग।।२ पसरा पान करने ममपानुसर मिर्पोप सरनान भरपा- ममा गनिग ना मागमा रंगमाः । विनम्नम्म प्रभारमाना -- ।

१४६ श्रीमद्भागवत [4. गोप्य सुमएमणिकुणालनिष्फकण्ठय उनके फ्योवर हिल रहे थे॥ १० ॥ गोपियोंक कामि चमकती हुई मणियोंके कुमाल सिमिल रहे थे । गसमें चित्राम्पराः पपि शिवायुतमारपवर्षाः। सोनेके हार ( हेफळ या मैल ) जगमगा रहे थे। मई मुम्दर-सुन्दर रंग-बिरंगे बस पहने हुए पी । महर्गमें नन्दातयं सवलया ब्रजतीविरेज उनकी चोरियोंमें गुंथे हुए ड वरसते जा रहे थे। हामि नदाफ कंगन मग ही चमक रहे थे। उनके ालालकुण्डलपयोधरहारशोभाः ॥११॥ कानोंके कुमाल, पयोवर और हार हिस्ते जाते थे। इस प्रकार नन्दवाबके घर नाते समय नकी शोमा मी भन्छी जान पाती पी ॥ ११ ॥ नन्दनायके घर आकर वा आशिप प्रपुञानाधिरं पाहोति बालके । नवजात शिशुको माशीर्वाद देती यह चिरनीषी हो, मावन् ! इसकी रक्षा करो और लोगोंपर इल्दी उसे हरिद्रापूर्णवेलानि सिधन्स्यो मनमुअगुः ॥१२॥ मित्र हुभा पानी छिपक देती तपा ऊघि सरसे माल- गन करती दी ॥ १२॥ अवापन्त विवित्राणि पादित्राणि महोत्सवे । भगवान् श्रीकृष्ण समस्त नगदके एकम्पन्न स्वामी हैं। उनके ऐचर्य, माधुर्य, मरसत्प-समी कनन्त है। रुग्ने विश्वघरेऽनते नन्दस्स मममागते ॥१३॥ ) ये जय नम्दमावाके मनमें प्रकट हुए, उस समप उनके जन्मका महान् उस्तष मनाया गप्पा । उसमें मोबा गोपाः परस्परं रश दपिधीरघृताम्मभिः । विचित्र और मामय पाजे बनाये जाने लगे ।। १।। वानन्दसे मतवाले होकर गपगण एक दूसरेपर दही, आसिधन्तो विलिम्पन्सानयनीवेश्व घिक्षिपु॥१४॥ दूध, घी और पानी उइटने यो । एक-दूसरेके इसे मक्खन मरने लगे और मास्न फेकककर वानदासम मनाने लो ॥११॥ नम्दमावा समावसे ही परम नन्दो महामनास्तेम्यापासाऽलंकारगोपनम् । उदार भोर मनस्वी पे। उन्होंने गोपोंको गहुत-से पता, भामूषण और गौएँ दी। सूत-मागध-बंदीजनों, नूरप, स्तमागधवन्दिम्पो येऽन्ये विधोपचीविनः॥१५॥ पाप आदि वियाओंसे अपना जीवन निर्वाह करनेवायें तपा दूसरे गुणीजनोंको भी नम्दामने प्रसन्नताक वस्त फामरदीनारमा यथापिवमपचपन् । उनकी मुंहमांगी मस्तुर देकर उनका यथोचित सरकार रिसा । यह सब करनेमें उन उद्देश्य यही पा कि इन काँसे भगवान् विष्णु प्रसन हों और मेरे इस मा विप्मारारापनाथाय पपुषस्योदयाय च ॥१६॥ नात शगुन मला हा ॥ १५ १६ ॥ मन् मायके अमिनम्न फरनेर पम सौभाग्पयनी रादिणाजी पम्प राहिणा प महामागा नन्दगापाभिनन्दिता । पर मग और गम्फ मोनि-मनिफे गदोस पुरानित होकर गृम्यामिनीपरी मति माने जानेगरी रिपोया प्पपर दिम्पयाप मरण्ठामपणभूपिना ॥१७॥ मयार पाती हुद पिनर रही मी ॥ १७ ॥ परीशिद ! उमी निमे नन्दगाणा ग्रनमें सप प्रकारकी अदि इन मारम्प नन्दम्प यक्ष मयमदिमान । मिदिया भारियों काने एगी और भगवान् श्रीकृष्णके नि । मम्ममा पनैः । ।

म. ५] १४० दशम स्कन्ध हरेनियासात्मगुणे रमाक्रीडममन्नृप ॥१८॥ | निषास सया आने स्वाभाविक गुर्गो के कारण वह लक्ष्मी- जीश फ्रीगम्पल बन गया ॥१८॥ गोपान् गोइलरक्षायां निरूप्प मधुरां गतः । परीक्षित् ! पुछ दिनों बाद नन्दगान गायुटकी रक्षाश भार सो दूसरे गायोंको सौंप गया और प रूप नन्दः फसस्स पार्पिस्यं कर दातु पुरुदा ॥१९॥ सा पार्पिय का भुपानेके रिये मथुरा चले गये ॥ १९ ॥ चय यमुदेवनीको यह पदम हुआ गि वसुदेव उपभुत्प प्रावरं नन्दमागतम् । हमारे माड नन्दजी मधुरामें बाये हैं और राजा कमरो उसपर पर भी द चुके हैं, तय थे जहाँ नन्दनाया यदरे मास्वा दसफर राने यया पदवमोचनम् ॥२०॥ हुए थे, वहाँ गये ॥ २०॥ वसुदेयनीका दम्पते ही नम्पनी सहसा उकार खर हो गपे मानो मून दारीरमें ट्रा सहसोस्थाय देहः प्राणमिवागतम् । प्राग आ गया हो । उन्होंने मढ़ प्रेमसे पाने प्रियतम यमुपजीका दोनों हापोंसे पय पर एपसे एगा दिया । प्रीतः प्रियतम दोम्यो सम्पन प्रमविल ॥२१॥ नन्दामा उस समय प्रममे बिहट हो रहे पे ॥ २१ ॥ पर्गक्षित ! नम्म्याने बहरेपनीका बड़ा म्यागत-सत्कार पूजितः मुग्नमासीनः पृष्ठानामपति । स्पिा । थे आरक्षर आरम्मसे बैठ गये। उस समय टनका वित्त मग्न पुत्रों या रहा पा । ये मम्दयामासे प्रसकभीः बारममयारिदमाह विशाम्पते ॥२२॥ पुना मगर र पाने टगे ॥ दिस्या माव: प्रवयम इदानीमप्रजस्य से । [यसुदपसीने पदा .] मा! तुम्हारी अगम्यान्ट पीपी और अतर तुम्हें फोर मसान नदीहरपी। प्रभागया निश्चय प्रजा यत् समपयत ॥२॥ पातर रि अय तुम्हें सम्मानकी पाइ आत भी न पी। पर या सौभम्पको मानसिपर तुम्हें सन्तान दिष्टपा ससारपनऽस्मिन् वर्तमान पुनमम । प्राम दा गरी ॥ २३ ॥ प भी माजनम् पर रिप पनि आज हमया मिटना का गा । भने प्रमियों मना में पग दुम ६ । स संमपा उपलम्पो भवानप दुर्टम प्रिपदर्शनम् ।।२४॥ पर ही एमा।हमे मा पर प्ररमा पुनबन्म ही ममाना मारिये ॥२१॥मे नगरे प्रमा प्रपमें नस्य प्रिपमंबाम मुरदा चित्ररमणाम । त एरर तिना मा क मा म मात दी मगे मम्म। प्रना. मनस गना ना मनामुमा मापन पपमानानो भवानी मानमा यथा ॥ ॥ तिमी म FRIP 17 || 2011 रन रिम निमें अन्न पगन् परम निरुव भूपम्पनगरोग्यम् । भोगrmi, उग २ न! पनी पारनं तदपुना पयाम्न म्यं गुरतात ॥२६॥ 11 अदा म ।

१४८ भीमद्भागवत [अ०६ । मातर्मम सुतः चिन्मात्रा सह भवद्रजे । है। ॥२६ । माइ ! मेरा लइया अपनी मा (रोहिणी) के साप तुम्हारे में रहता है। उसका पालन-पालन वात भवन्तं मन्वाना भवदम्पासपलालिमः ॥२७॥ तुम और यशोदा फरसे हो, इसलिये पह तो तुम्हींको अपने पिता-माता मानता होगा । यह अच्छी तरद । न॥२७॥ मनुष्य के लिये ये ही धर्म, र्य और काम पुसखिवर्गो विस्तिः सहदो पनुभाषिता । शामनिहित है, निनसे उसके सपनोंको मुख मिले । जिनसे केवल अपनेको ही मुल मिलता है, किन्तु अपने न तेषु ग्लिश्यमानेषु त्रिवर्गोऽपि कल्पते ॥२८॥ सबनोंको दुप्स मिलता है, वे धर्म, वर्ष और काम हितकारी नहीं है ॥ २८॥ नन्द उपाय मन्दपायाने कहा-माइ पसुदेव ! कसने देश्कीके महो ते देषकीपुत्राः फसेन बापो हताः । गर्भसे उत्पन्न तुम्हारे कई पुत्र मार राखे । त्तमें एक समसे बेटी फरपा च रही थी, यह भी सर्ग सिधार एफावषिष्यपरमा फन्या सापि दिवं मता ॥२९॥ गयी ॥ २९ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि प्राणियोंका सुख-दुख माम्पफ्र ही अपम्मित है। माम्प ही प्राणी- नूनं पटनिष्ठोऽपमस्टपरमो बना। का एकम्पन आम्रय है । यो जान लेता है कि जीवनके अष्टमात्मनस्तरर्ष यो वेद न स सपति ॥३०॥ मुस-दु सका कारण माग्य ही है, र नके प्राप्त हानेर मोहित नहीं होता ।। ३० ।। पसुदेश सभा अमुषसीमे कहा-माई ! तुमने राना कसको करो ये पार्पिको दो राझे राबय पर उसका सामना कर चुका दिया । हम दोनों मिड मी चुके । मा तुमें यहाँ अधिक दिन नहीं हारना नेह स्पेन पाठियं सन्स्पुत्पावाम गोहले ॥२१॥ चाहिये, क्योंकि बानका गोकुलमें बड़े-बा उपाप्त हो रहे हैं॥३१॥ मीमुक सपा भीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित ! नन सुदा- इति नन्दादयोगोपाः प्रोझास्ते शौरिणामयः। जीने इस प्रकार कहा, तव नन्द बादि गोपोंने उनसे अनुमति ले, कैसे धुते हुए मनोपर सवार होकर अनोभिरनापुक्तस्तमझाप्प गोकुलम् ॥३२॥ | गोकुलकी यात्रा की ॥ ३२ ॥ ति भीम्पागवते म्हापुराणे फरमहस्यो संहितायो दशमस्काचे वधि नन्दवसुदेमसाम्मे नाम पञ्चमोऽध्याय ॥५॥ अय षष्ठोऽध्याय पूरमा दार मीमुक उपाय श्रीशुष्यषसी कहते --परीक्षित ! नन्दमाया जा नन्दः पधि पाशेरे मवेति विपिन्तयन् । मधुरासे घले, तप रास्तेमें विचार करन गे कि १ पसे । २ ममपसुदेषमागमा पत्र ।

ब०६] दशम स्कन्ध १४९ हरि बगाम शरणमुस्पावागमशदिसः ॥ १॥ | कसुदेवजीका कपन झूय नहीं हो सकता । इसमे उनके मनमें उपत होनकी आशा हो गयी । तब उन्होंने फंसेन पहिसा पोरा पूतना पालघातिनी । | मन-ही-मन भगवान् ही शरण है, ये ही रक्षा करेंगे शिपचार नियन्ती पुरग्रामवमादिपु ॥२॥ ऐसा निमय किया ॥ १॥ पूतना नामकी एक बड़ी र रावासी पी । उसका एक ही काम पा-पोफो न पत्र भषमादीनि रक्षोमानि स्वकर्मसु । मारना । कसकी भाषासे यह नगर, ग्राम और अहीरोंकी वस्तिोम चोंको मारनेक ठिये यूमा कमी थी ॥ २ ॥ कुर्वन्ति सात्वां भर्तुर्यातुधान्यम सत्र हि ॥ ३ ॥ जहाँक लोग अपने प्रतिदिनके काममि राक्षसोंये भयको दूर भगानेपासे भक्तवत्सल भगवान्क नाम, गुण और सा खेचर्येकडोपेस्य पूसना नन्दगोकुलम् । पओंका स्वण, कीर्तन और स्मरण नहीं करते- ही एसी राक्षसियों कर घटता है।॥ ३ ॥ यह यापिस्मा मापयाऽऽस्मानप्राविशत् फामचारिणी॥४॥ स्ना नाशमार्गसे घर सस्ती पी और अपनी इच्छाक तां फेशाधम्पतिपक्कमल्लिका अनुसार रूप मी यना लेनी पी । पफ दिन मन्दयामाके | गोकुल के पास पाकर टसने मयासे अपनेका एम मुरी पृहभिवम्पस्तनकुन्प्रमभ्यमाम् । पुक्ती मना लिया और गोकुरके भीतर पुम गपी ॥ १ ॥ सुवासस टसने वा सुन्दर रुप पनाया था | उसपी चोरियोंमें फम्पितफर्णम्पण लेके कुछ गुंथे हुए थे । मुम्दर मन पन्ने हुए पी। विपोल्लसकन्तलमनिताननाम् ॥५॥ जब उसके फर्ग हिलते थे, तम उनकी घमासे मुम्बकी बोर एटमी र म बोर भी शामायमान हो घरगुमितापाङ्गविसर्गयोसिन माती थी । उसो नितम्प और पुच-पाश कमेको थे और कमर पी पी ॥ ७ ॥ पह अपनी मधुर मनो हरन्ती पनिता प्रमोफसाम् । मुसकान और फटाक्षण चितानसे प्रमासियोफा विच अमंसवाम्भामकरण रूपिणी चुरा रही थी। उस रूपफ्ती ग्मगीका हायमें पमर सेपर नामे दम्य गोपियों एसी उप्रभा फग्ने ए, मानो गोप्याथिप द्रप्टुमिवागा पतिम् ॥६॥ स्वयं एमीनी अपन पतिका गान फरने पिये आ रही है ॥ ६॥ पालग्रहम्तष विचिन्वती शिन पृतना यागयोग मिग ममान दी । मा पर उबर यायोंग हानी " अनायाम ही नन्याय परन्छपा नन्दगृहऽमदन्तकम् । घर पुम गपी । पने मन ात्र कि पाय धीर प्रतिष्ठमनिमारतजर्म शपार माया । गदि । मगन् श्रीराम दुशेप पार । पर तो पग गरी गर्म भान ददर्श सम्पऽग्निमिवादित भसि ॥ ७॥, हिा मी ग ममा उनॉने भन्न प्रा नवरा तिमापा ॥ ७॥ गपन् ? विपम्प तो पालकमाग्किापार था अपर मभी प्रापिने है। मरि उनॉन चगपरा माऽऽम निमाठिवेक्षण । मी शगन गिया िमंग मर गनाय , मारा ।२ पानाभाम् । ।

भीमद्भागवत अनन्तमारोपपदहमन्तक पूतना-ह है और अपने नेत्र बंद कर लिये। जैसे कोई पुरुस भ्रमवश सोये गए सॉपको रस्सी समझ- कर ठम ले, वैसे ही अपने कालरूप मगमान् यपोरगं सुतमइदिन्मुधीः ॥ ८॥ श्रीमणको स्तनाने पनी गोदमें उठा लिया ॥ ८॥ • पूतनाको रेसर म्मावान् श्रीकृष्णने मफ्ने नेत्रद र मिसे, इसपर मक कवियों और बकने भनेको प्रकार की उपेक्षाएँ की है, जिनमें कुछ १ भीमव्यातमाचार्यने सोधिनीमें भाई-भविषा ही पूर्वना है। मावान् भीकमने खेचा कि मेरी पिके सामने मरिया टिक नहीं सकती फिर मेला रेसे रोग हसम्मेि नेत्र र सिये। २ या पूछना बाम्पादिनी रे पूतानपि मपति' । पा पविष पाठ भी बाती है। ऐसा मसम्म कम करनेवाग्मीर नही देखना चाहिये, इसलिये नेत्र परर किये। ३ इस मन्ममें सो इसने कुछ साचन बिमा नही। समवो मुझसे मिलने के सिमे पूर्पकममें हुए जिला के। मानो फूलनाके पूर्व-पूर्व मोके सक्न देखने के लिये ही भीड़पने नेत्र बदर किये। ४ भगवन्ने मपने मनमें विचार किया कि मैने पापिनीका पूप कमी नहीं दिया है। अब से मेप माँस बंद करके चिपटेम काला की माते है। से ही इस दून मी पी पा । इसरिम्प ने बंद कर सिपे । ५ मगवान के ठहरमें निवास करनेवाले मम्म्म प्रेटि प्राप्के बीच पा पानार पपरा गये कि समसुन्दर पूतनाके खन या हल विष पीने पारामतः हमें समझाने के लिये ही मीणने नेत्र पर किये । २ मीणाशिने विचार साल में गेम पर सोपार माया या B मालन मिमी साउँग । छो छठीके दिम सि पीनेन भक्कर भा गया । इससिमे माँस र करके मानो मारबीका काम किया कि माप भाकर मफ्ना मम्पस विप पान कीमिये, मैं दूध पीसेंग । • भीकृष्ण नेषोंने विचार किया कि परम स्वतन्त्र भर इस दुपये मपी-धुरी चाहेको गति दे दे, परन्तु हम रोनों इसे रनमार्ग भगवा सम्पन यनोंमसे एक मी नहीं देंगे । इसलिये उन्होंने मपने हार र कर मिम्मे । ८ माने सोचा पूतनारे नेको इमारी पतिको परम्त पे इस र समीकी शोभा बढ़ा है। इसलिये मपने होनेर मी ये दरानके योम्म महों है। इसलिये टनाने मपने पात से सिपा । . भीकपके नेत्रों में स्मित धर्मारमा निमने उस दुपये देखना उपियन समसर नत्र दर मिपे । भीक ने बस में पकी पूछनाफे रान परनेकी को उपप्ठा महाँ यी । इससिने नेत्र पर सिये। ११ मीणाने विचार किया कि पारसे तो इसने माताम-सा प पारण र रस्सा है परन्तु इसमें मत्पन्च करप भरे हुए है। ऐमी बीच हम देखना ही उचित है। इसलिम ने बंद कर किये। १२ उनाने सोचा कि मुझे मार देलकर भी यह ऐता म मन थप कि इसक रुपर मेरा प्रमाप मही घटा भोर पिरो भेट म बाप । इसिये नेत्र र सिके । १५ पास सीसरे प्रारम्भमें परमे पर बीसे ही मुठभेड़ हो गयी, इस विरारसे विरकिय नेम पर रसिये। १४ भीरप्परे मनमें यह बात भायी राणा रिसे रेप के इसे मागा से, मोर उम से देनग्न तो यह भी ममम हा साप । मीमा सिमिरे टिपे नव र मना ही नत्तम है । इसमिप नेम र सिये । १५ पर पापाचरेर पारण कमरे मापी है मारना उचित नहीं है । परन्तु या मोर गाहपाठो मारेगी। हरिवनय पामेर देने ना मार राम्ना पाहिये।हमतिय नेत्ररकिये। १५ बासे-पदा भनिरोगसे नाप पाता है। उनोने ने बरपासे मानो गरि सम्पादित की। १० पूतना पानिमय रे भावी पी है मैं के खरे शिशुमामे मार गगी परन्तु मकरमपरायण मपरी इसमे का एक भी गिय से रिजापी मा दिना मोर पास लोमती इरिटीमाठिकी १ म०६] दक्षम स्कन्ध तां तीक्ष्णचिचामविषामषेटिवा मखमली म्यानके भीतर छिपी हुइ तीसी भारपाली सलवारके सम्मन पूतनाका दय तो पड़ा कुटिल पा, चिल्ल वीभ्यान्तरा कोशपरिष्छदासियत् । स्परसे यह मदुत मधुर और मुन्दर न्यवहार कर रही थी। देखने पर एक मह महियके समान जान पड़ती पी। परघिय वत्प्रभया प धर्षिते इसठिये रोहिणी और यशोदागीने उसे घरक मीतर भायी देखकर मी उसकी सौन्दर्यप्रभासे हतप्रतिम सी होकर निरीक्षमाणे बननी पविष्ठताम् ॥ ॥कोई रोकटोक नहीं की, सुपचाप स्वकी सभी देखती तमिन् स्तन दुर्जरवीर्यमुल्षणं | रहीं ॥९॥ इधर मयानक राक्षसी पूतनाने वालक श्रीरणको अपनी गोदमें लेकर उनके मुँहमें अपना खान पोराइमादाय शिसोर्ददाय । दे दिया, जिसमें बड़ा मयार बोर किसी प्रकार मी पच न सकनेवास्य विष ख्या हुवा या । मगवान्ने क्रोक- गाढ फराम्यां भगवान् प्रपीय तत् को अपना सापी मनाया धीर दोनों हार्योंसे उसके स्तनोंको बोरसे दबाकर उसके प्राणों के साथ उसका प्रापैः सम रोपसमन्धिसोऽपिषत् ॥१०॥ म पीने सगे (ये उसका दूध पीने लगे और उनका साथी सा मञ्च सुम्चाउमिति प्रभाषिणी क्रोध प्राण पीने लगा ) ॥ १०॥ अब तो स्तनाके प्रा!क आश्रयमूत सभी संस्थान फटने लगे । यह निप्पीबगनाबिलजीवमर्मणि । पुकारने मी-अरे छोड़ दे, गो, पय यस कर !' प्रेरणासे सीधी नम्याम्पम मा पाँची, तब भगवान्ने वेचा 6 मेरे महरा करनेत्री मात तो दूर ग्री, यो मेरे मळा पुरा सेचता। उस दुका मैं मैं नहीं देलवा पास सभी प्रीकृष्ण सला, परम मत , पूछना उनको मारनेका सासरफे मापी है इसलिये उनि नेत्र परकर रिपे । १८ पूतना अनी मीपण भारतिको सिगार रामनी मामासे दिम रमनी म्म स्नाकर मामी है। मावान्की हरि पानेपर माया रहेगी मही मोर इसन मसी मपानकम प्रश्न से मामगा । उसे सामने देसार यदा मैपा र जाएँ और पुषी मनिवासे भी उनके ठात् माग निक य इस भापासे योन नेत्र पद र पिसे । १९ पूना सम्पूर्ण रायसे मापी , परन्तु मावान् उससाके ये उपयुक्त ग न कर उसन मन-अपमान करके परम सम्पाम फरमा पासे । मावान् समस मोके मण्डार हैं । उममें पृप्ता मारि सोयेन मेश मी महीं है। इसीसिपे पूतनाक स्मामार्प मी उसन प्राम-वर करने में या माती है । इस मासे से ननि नेत्र र कर लिये है। मगवान् मगरिम्ठा है-मनुर-रामारि मी उनकी सन्तान ही हैं। पर नपा उपाय मौर उरण ऐ गये। इसरिये उमेदण देना भातम्यक है। स्नेहमय माता-पिता स मम्ने ठम्हास पुत्रदा देतेतर उसके मनमें पुन पासा है। परन्तु वे उसे मम रितपनेरे लिये उसे बाहर मर नही करो । इवी प्रचार मगधन् मी मा ममुयमे मरते हैं पर सिके नाते उनन मी तुस वा पर पूरे भमु मम रितमनेके सिप में उसे प्रकार नहीं करने । मान् मा पूनानं मारनेवाले है परनु मा मुस्सुकाठीन पीस भनी माला देखना नहीं पाते हीसे उगाने ने मंदर सिपे । २१ बार पासप्रेम म्पमा मानी मा बमने खूब लेसर पर रिमी भररिरितमे देनार र गावे रे मोर नेप मर मरे है । मारिरित पूना देनार श्रीसिये पासलीम-पिहरी मतान्ने नेा पर समय । पर नारीपन मापुर्प है। • भगवान् गपके मात्र पूतनारे माहित बन-पान करने हो, इस पर मर्च प्रतीत हलाल ऐप (रोयाषिरात रेवना पा)ने प्रामोन पान मिा मोर भीमने माना। २ १५२ भीमद्भागवत [म०६ विकृत्य ने चरणों भुनी म या पार-बार अपने हाप भौर पर फरक पककर रोने | लगी। उसके नेत्र उलट गये । उसका सारा शरीर प्रस्विमगाना धिपसी करोद ॥११॥ पसीने से लपपप हो गया ॥ ११ ॥ उसकी पिछाहटका तस्याः स्वनेनाविगमीरसहसा वेग हा मयार पा । उसके प्रमावसे पहाड़ोंके साम साद्रिर्मही यौम चचाल सग्रहा। पृष्मी और ग्रहोंके साप अन्तरिक्ष डगमगा उठा । सातों रसा दिशष प्रतिनेदिरे बना पाताल और दिशाएँ गूंज उठी । यहुत-से लोग पल्यातकी नाशकासे पृष्पीपर गिर पड़ ॥ १२॥ परीक्षित । इस पेतुः क्षिती वमनिपासश्या ॥१२॥ प्रकार निशाचरी पूसनाके स्तमि इतनी पीड़ा हुई कि निशाचरीरथं व्यथितस्तना पसु पर अपनेको छिा न सकी, राक्षसीरूपमें प्रकट हो ादाय फसामरणो समावपि । गयी। उसके शरीरसे प्राण निकल गये, मुंह फट गय, प्रधार्य गोठे निजरूपमापिता साल मिस गये और झप पाव फैल गये । जैसे एमके पसे घायल होकर प्राप्मर गिर पड़ा पा, मैसे ही पा घनादता पत्र वापवन्नृप ॥१३॥ बाहर गोष्ठमें बाकर गिर पड़ी ।। १३ ।। पतमानाऽपि सालिगम्यत्पन्तवमान् । राजेन्द्र ! पूतनाके शीरने गिरते-गिरते मी छ कोसके भीतरके रोंको कुचल गया । यह बड़ी ही अदभुत घटना पूर्मयामास राजेन्द्र महदासीत् सदतम् ।।१४॥ हुई ॥ १९ ॥ तनाका शरीर पका मयानक प, उसका ईसामानोगदष्ट्रास्पं गिरिकन्दरनासिकम् । मुँह हलके समान तीम्डी और मयाहर दादोंसे युक्त पा । | उसके नधुने पहायकी गुफाके समान गहरे थे और खन गण्ठशैलस्तन रौद्र प्रभीर्यारुणमूर्षप्रम् ॥१५॥ पासे गिरी हुई चानों की तरह बड़े-यह थे । फल- समस बाछ चारों वोर विसरे हुए पे॥१५॥ माँ अपगभीराक्ष पुलिनाराहमीपणम् । | अंधे के समान गहरी, नितम्म नदी कारकी तरा मयार, मुनाएँ, अधि वौर पैर नदी पुलके समान तपा पदसेतुसुभाषधि शूपतायदादरम् ।।१६॥ | पे सूते हुए सरोवरकी भाँति मान पदला प ॥ १६ ॥ | पूरानाके उस शरीरको देम्पकर मब के सप वार और मतप्रसु म समीक्ष्य गापा गाप्याफलपरम् । गोपी र गये । उसफी मपार चिम्माहट सुनकर उनक पूरी तु नाभि म्बनितमिनस्वर्णमालकाः ॥१७॥ एप, काम क्षार सिर तो पहले ही फरसे रहे थे॥१७॥ अप गारियोंने देम्प पि पाय धीपस्य उसकी छातीपर पाल प तस्सा उगमि फ्रीडन्तमकुताभयम् । तिर्मय हायर स्मठ रहे, तब वे यही घबराहट और १ मिमिम । • पाना पाम्पसपर औरा पर हुए माना मन-ही-मन पर रहे 4- मनग्धपमा मन ए रीति स्वस्त्वया ग सपमानने मम । मगर पी प्रियन पदिएपा दिदा ममाग सरमरमप्यताम् ॥ दुषपुग! मनगन रोमी गादामन सर्प भम्ना मन मर मुंदमें रपिा भार मैन ति। म्म परम श्रीमती पाभा हममें मेरा भार" गरम पी रममपरमामा वामन भगगन देसार रसम पम पुषरना भार उदय मनम भभरिमुगपमा पर हो और उमममणिमुरारी मानता 1 ब०६] दमम स्कन्ध પરે गोप्पस्तूण ममम्पैस्य जगृहुतिसम्ममा ॥१८॥ । उतायक साथ सम्पर यहाँ पहुँच गयीं तथा श्रीकृष्णायन ठय लिया ॥ १८॥ इसक या यशादा बार रागिणी- यशोदारोहिणीम्पा जा: मम पालस्य सर्वसः। क साय गोपियोंने गाय छ घुमने आदि उपायोसे रक्षां विदधिर सम्पग्गोपुच्छरमणादिभिः ॥१०॥ मालक श्रीकृष्णक भोंपी सम प्रफारसे रक्षा पर ॥१९॥ उन्होंन पहले पापक श्रीगणको गगनसे स्नान पराया, गोमत्रेण म्नापयित्वा पुनरिमसार्मकम् । सिर सप आमें गोरम छायी और फिर बागहों मोमें रखा पापसाता बादसाय नामभिः ॥२०॥ गोमर लगाकर भगवान्प यशात बादि नामोसे रक्षा की ॥ २० ॥ इमय पार गपियोंने आचमन करय जना गोप्पा सस्पष्टसलिला अङ्गपु फरयोः पृथक् । आदि म्यारह मीत्र-मयोंमे अपन शरीरोंमें अटा-मग न्मस्पात्मन्यय पालम्प भीजन्यासमकुर्वस ॥२१॥ आल्यास एवं काम्पास किया और फिर पाठयास अमो- मम्पादबाऽमि मणिमांस्तव जान्वधोरु में पीसम्पास किया ।। २१ ॥ यंदोऽच्युता परिवर्ट जटां हयास्यः । थे फहने लगी-'अम्मा भगमान् वर पैरोंकी रक्षा हर फेसषस्त्यार इस इनस्तु पर्छ फरें, मणिमान् पुमोकी, यमपुरुष जोशी, अयुम पमाफी, हयग्रीय पेपी, पशय ददयी, श का स्पर- विष्णुर्सज मुम्ममुरुमम इधरः कम् ।।२२॥ की, सूर्य पायी, विष्णु बाहॉकी, उममम मुम्की और पक्रयप्रतः सरगदोहरिरस्तु पथात ईश्वर मिग्यी रमा परें ॥ २२॥ चयर मगमा रक्षाकम्यि त्वत्पार्ययोर्षनुरसी महाजनश्च । तरे वागे रहें, गाधारी श्रीक पीछ, ममश धनुष बीरमा धारण करन्याय भगवान् मधुसूदन और बमन दानों कोणेषु पच ठरुगाय उपर्युपन्द्र यग में पछाचारी टरगाप पारों पार्मि, उपन्द्र उपर, हम स्वार्यः क्षितीपर पुरुषः समन्तात।२३। धर प्रयीपर बीर भगवान् परमपुरुप से सय बार रक्षाक इन्द्रियाणि एपीपमा प्रावान नारायणाञ्च । । रिय रहें ।। २8 । हरीश भगवान रिपोती कार नारायण प्राप्गामा गभा को सनीपक बधिपति चिन- श्वेतदीपपतिथि मना यागपराऽभतु ॥२४॥ की आर यागपर मना रक्षा करें॥१॥ धिगर्भ मेग प्रभिगमस्तु वे पुदिमात्मानं भगवान परः । युटिसी भी परमारम भगया ] अमायगा । फ्रीडन्तं पातु गाबिन्दासपान पातु माधयः ।।२५।। । यस समय गाकि रक्षा कर, सान ममय माझ्या को ॥24॥ पाटन गमय भामान प्रयुम बार कान असन्तमम्पादन मासीनं त्वां भिया पतिः। ममय भगवान श्रीपमिमीक्षा करें। भाजनय मण्य सुनान यामुक पात मयप्रदभपफर ॥२६॥ । मान्न प्रकार मयभीत करनार पामाचा भगवान् भी सास्न्यिायाधायप्माण्डा यामाप्रहा । या फो॥ २६ ॥ टारिती, सभी बार रमण आश्मिामा भून, प्रत, रिप, यक्ष, गाम बार रतपिणापाय यक्षरयाबिनायका ॥२७|| दिनापत्र, पाटग, ग्पनी, पटा, नना, मफा अनि, कारा रखती ज्यण मुना माठफादयः । शागर, प्राग मपा इन्दियोंका नाश पानयार उग्मार उमादा य अपमाग दरप्राणन्द्रियगुरः ॥२८॥ ' ( पागमन ) of आग्मा ( मृगी ) वा गग, गा मुनम । ३ गए । ४ मनः । ५ र । पानी । बाम्न भगवाचन अान भा में पुश्रीपत मनारया मन-4 मा भनुमान { | परी नूतना मोर पग उन्धी प्रपन्न पूर्ण . गरा।

भीमसागवत पा, खप्नध्या महोत्सावा पदमासनहाय ये । सप्नमें देने हुए महान् उत्पात माह और वालाई आदि-ये सभी अनिष्ट भगवान् विष्णुका मामोधारण सर्वे नश्यन्तु ते विष्णोर्नामग्राणभीरवः ॥२९॥ फरनेसे भयभीत होकर मष्ट हो जाय ॥ २७-२९॥ पीमुक उपाय श्रीशुकदेवजी करते है-परीक्षित् । इस प्रकार इति प्रणयपद्धाभिर्गोपीभिः कवरक्षणम् । गोपियोंने प्रेमपाशमें बंधकर भगवान् श्रीकृष्णकी रक्षा की। माता यशोदाने अपने पुत्रको स्तन मिया पोर फिर पाययिस्वा स्सनं माता संन्यपेक्षपदास्मबम् ॥३०॥ पानेपर सुला दिया ॥ ३० ॥ इसी सम्प नन्दबम चोर उनके साथी गोप मथुरासे गोकुळमें पाघे । जय सावन्नन्दादयो गोपा मधुराया मजं गताः। म्होंने पृतनाका मपङ्कर शरीर देस्य, स्वये साधपचकित हो गये ॥ ३१॥ करने लगे--यह तो मोवामय विलोक्प पूतनादेह बभूवरविविसिवाः ॥३१॥ की बात है, माश्य ही मुदेवके रूपमें किसी शक्नेि नून पसर्विः संभातो योगेशो वा समास सः । कम प्रहण किया है। पपा सम्मत है रसुदेवची पूर्व- मममें कोई योगेर रहे हों, क्योंकि न्होंने बैस पहा स एव हो पुस्पातो यदापानकान्दुभि ॥३२॥ वैसा ही उत्पात यहाँ देखनेमें भा रहा है॥ १२ ॥ सक्सक नमामियोंने कुमाहीसे नाके शरीरको टुकड़े फलेवरं पर मिश्छित्त्वा सच्चे ममौकसः । टुपले कर गय और गोकुम्से दूर ले जाकर कलियों- पर रखकर का दिया ॥३३॥ मय उसका शरीर रे क्षिप्त्वावयवशायदइन् काष्ठविष्ठितम् ॥३३॥ पम्ने गा, स्य उसमेसे ऐसा धूओं निकल, जिससे कारकी-सी सुगन्ध आ रही थी । स्पों न हो, भगवान्ने दममानस्म देख ममागुरुसौरभ । बो उसका दूध पी लिया क -चितसे उसके सारे पप तत्काल ही मष्ट हो गये थे॥ ३० ॥ नना एक राक्षसी उत्थित कृष्णनिर्मकसपघाइतपाप्मनः ॥३४॥ यी । येगोंके क्योंको मार राना और उनका खून पी खाना-पड़ी उसका फाम । भगवान्कर भी उसन पूतना वारुपालनी राक्षसी रुधिराशना । मर कनेकी इनसे ही सन पिख्या पा । फिर भी विघसियापि हरय स्तनं दवाऽऽप सद्गतिम् ॥३५॥ उसे वह परम गति मिग्री, जो मत्पुरुषों को मिलती है ॥३५॥ ऐसी स्थिति को परम परमाता भगवान् श्रीवस्यको किं पुन:भदया मास्पारुप्माय परमात्मने । प्रदा और भफिसे माताक समान अनुरागपूषक अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु और उनको प्रिय हगनेवाटी पस्नु पच्छन् प्रियतम नि रक्तास्तन्मावरा यथा॥३६॥ समर्पित करते हैं, उनक समय ता कहना ही क्य है ॥३६॥ मगवान्क चरणकम सबक मदनीय प्रमा, पम्पा भक्तादिस्साम्पांपन्याम्पांसाफपन्दितः। शहर वारि देवता कारा में पन्दित है। ये मकों कदापी बी हैं। उन्हीं परोसे भगवाम्ने पूरानाका मा यसाः समाकम्प भगवानपिषत् स्तनम् ।।३७॥ शरीर दवाकर उसम खन-पान किया था ॥ २७ ॥ PATI .इस प्रसव परम माइ मा भगवान्ने प्रवा-वन् ! पन पदवार भापपी मात्र मी भापके नाम में पवित्र सीमा नियमेरी ते मोर माम मापन ख्यालया है।

म०६] दशम स्कन्ध १५५ यातुधान्पपि सा म्वर्गममाप बननीगतिम् । माना कि क गशसी पी, पम्तु उमे उत्तम मे उत्सम गति जो मतको मिलनी चाहिये- जिनके स्तनका दूष मगवान्ने वड़ प्रेममे फ्पिा, ठन फप्मसतस्तनक्षीरा फिपु गावो नु मावरः ॥३८॥ गौमों और माताखोकी तो बात ही क्या है ॥ ३८ ॥ परीधित् ! देवकीनन्दन मगवान् फैसस्य वादि सब प्रकार पांसि यासामपिवस् पुत्रस्नेहसता पलम् । की मुक्ति और सब कुछ देनेवाले हैं। उन्होंने प्रमकी गोषियों और गौओंका वह दूध, जो मगवान्के प्रति पुत्र भगवान् देषकीपुत्रः कैवल्यापखिलप्रद ॥३९॥ माप होनेसे वात्सल्य स्नेहकी वविकाके कारण सर्य की मरता रहता था, मरपेट पान किया ॥ ३९ ॥ राजन् ! वे गौर और गोपियों, जो नित्य-निरन्तर मापान् भीरम्ण- तासामपिरत रुप्पे कुर्वतीनां सुवेषणम् । को अपने पुत्रके ही रूपमें देखती थी, फिर चन्म-मृत्यु- रूप संसारके चक्रमें कमी नहीं पा सकती, पकि यह न पुनः करपते राखन् संसारोऽज्ञानसम्भवः ॥४०॥ संसार तो कानके कारण ही है॥१०॥ फटमस सौरम्पमवघ्राय बजौकसः । न्दकलाके साप आनेवाले अपासियोंकी नाकमें मम पिताके की पुगन्ध पहुँची, सब यह क्या है। किमिद इस एवेति पदन्तो व्रममाययुः ॥४१॥ कहसि ऐसी सुगन्ध मा रही है" इस प्रकार करते हुए वे उनमें पहुंचे ॥ ११॥ वहाँ गोर्पोने म्हें पूतनाके से तत्र पर्णित गोपैः पूतनागमनादिकम् । बानेसे लेकर मरनेतफा सारा पचान्त कर मनाया श्रुत्वा तमिपनस्वस्ति शिशोपासन्सुनिमिवा॥४॥ वे अग एनाको मृत्यु और श्रीकृष्ण के पुशपूर्वक वध मानेकी प्रत सुनकर बड़े ही वापर्यचक्ति हुए ॥ १२ ॥ नन्द म्बपुत्रमादाय प्रेस्पागमदारपीः । | परीक्षित् ! मारशिरोमणि नन्दवाने पत्यके मुमसे बचे हुए अपने मन्त्रको गोदमें उठा ठ्यिा वौर बार-पार मुप्पाघ्राय परमा मदं लेमे कुरूदह ॥४३॥ उसका सिरसँघकर मन-ही-मन पात मामन्दिस हुए॥१शा य एतम् पूतनामोक्षं कुप्पसार्ममत्वम् । यह पूतना मोक्ष' मगवान् श्रीगकी अमृत माम टीम है। जो मनुष्य प्रवाक सपा प्रत्रम करता है, उसे प्रमुपागम्या मो गोपिन्दे लमते रसिम् ॥४४॥ | मगवान् श्रीकृष्णके प्रति प्रेम प्राप्त होता है॥ ११ ॥ .. । पनि श्रीमागवते महापुराणे पारमईस्य संहितायो दशमस्यत्व पूर्वध षष्ठोऽध्याय ॥ ६ ॥ निशम्प भया । २ पृष्नामः। •पत्र प्रध्ययी मासबाट मौर बछडोम दर से गये तर मगवान् म दो पर मोर पामबम बन गये उस समय भपने विभिप पॉम उनीने मरने नापी मने गार भौर पनपी मायभमनन किया नमी पन पापम्नन प्रयाग ध्मिा गरा है।

श्रीमद्भागवत [अ०७ अथ सप्तमोऽध्याय शकट-भवन भोर पणापर्व-शार राजोवाय राजा परीक्षितने पूज-प्रभो ! सर्वशक्तिमान् भगवान् येन येनावतारेग भगवान् हरिरीधर । श्रीहरि अनेकों बवतार धारण करके यहुत-सी सुन्दर एवं सुननेमें मधुर छील्यएँ करते हैं। ये सभी मेरे हदयको फरोति फर्गरम्याणि मनोज्ञानि च नः प्रभो ॥१॥ बहुत प्रिय थ्ाती हैं ॥ १ ॥ उनके भषणमत्रसे मावत सम्बन्धी कणसे अधि और विविध विपर्योफी तृष्णा भाग पन्यतोऽपैत्परतिकृिष्णा नाती है । मनुष्यफा क्त करण शीघ्र-से-शीम शुद्ध सम्वं च अपत्पचिरेण पुसः । पासा है । भगवान्के चरणों में मक्कि और उनके भजनों- से प्रेम भी प्राप्त हो जाता है । पदि बाप मुसे उनके भक्तिर्दरी सत्पुरुपे च सख्यं प्रवणका अधिकारी समझते हों, तो भगवानको उन्हीं मनोहर जोंका वर्णन कीनिये ॥२॥ मान् सदेव हार षद मन्यसे पेत् ॥ २॥ | श्रीकृष्णाने मनुष्य-लोकमें प्रकट होपर मनुष्य जाति के अपान्पदपि कृष्णस्य सोकापरिसमनुवम् । स्वभाका अनुसरण करते हर मो मालीखएँ की है अवश्य ही थे अत्यन्त अमृत है, इसलिये बाप थव उनकी मानुप लोपमासाप समातिमनुरुन्धतः ॥३॥ दूसरी पाठ श्रमोंका भी वर्णन कीमिये ॥ ३ ॥ श्रीमुक समान भीशुकदेवजी कहते है-पीक्षित ! एक बार . | भगवान् श्रीकृष्णके फरफर बदसनेका अभिय-असम कदाचिदौत्यानिफकौतुकासवे मनाया ना रहा था। उसी दिम उमका भन्मनक्षत्र भी जन्मईपागे समवेसपोपिताम् । या । घरमें बहुत-सी वियोंकी भीद मी गई थी। गना-यनामा हो रहा पा । उन्हीं वियोंके चमें खड़ी वादित्रगीतदिनमन्त्रवाय. एई सती साप्पी यशोदानीने अपने पुत्रमा अभिषेक रित्या । उस समय मामलोग मन्त्र पापर भाशीर्वादे भकार मनोरमिपचन सवी ॥ ४ ॥ रहे थे॥१॥ मन्रानी यशोरामीने मामों का खूब नन्दस्स पमी कवमन्मनादिर्फ | पूजन-सम्मन किया । उन्हें अन्न, वस, म्य, गाय । आदि मुंहमांगी वस्तुएँ दी । मम पोदाने उन मामयों- विप्रेः फलम्यम्त्ययन मुपमित । द्वारा सस्तिवाचन कराफर स्सप पाउनके नहनने • यह सचित् (पकर ) मे गार है मौतर महीने के सम्मनपुर कापगे । उग गमय भीमा प्र ऐना मन मिला है- स्निग्या पापन मेमरीति मुगायुग्म मुटुमागपनारप मपुर मममी परिपताप याना। पमा मायामुप सी पी पापो परारम्तमा भीिपी पुन मम्मुर् पfin नाम र भोग उगार देने और मुमारानो भुया परसरामधुर सर inग मे भान यमी पापार मग नगर भोर न मिनेगे नमी प पीर गोश भोर रि यगार मानत परत।।

२०७] दशम स्कध अन्नायवास स्रगभीरधेनुमि आदिका कार्य सम्पन्न कर लिया, तब वह टेसका कि सम्बावनिद्राक्षमशीपयछन ॥५॥ मेरे लम्स्यके नत्रोंमें नींद भा रही है, अपने पुत्रको पोरेसे शप्यापर मुख्य दिया ॥ ५ ॥ याही देरमें मौत्थानिफोरमुफ्यमना मनस्विनी स्पामसुन्दरफी मासे खुणे, सो वे स्तन यान के लिये रोने समागतान् पूखपती प्रजौकस । लो। उस समय मनस्सिनी यशोदाजी उत्सबमें भाये नेवामणोद् पे रुदित मुतस्य सा पुए प्रमवासियोंके स्वागत-सत्कारमें बहुत ही सम्मय हो रही पी। इसलिये उनें श्रीकृष्णका रोना मुनायी नहीं रुदन् स्तनार्थी परणादविपत् ॥ ६ ॥ पड़ा । तव श्रीकृष्ण रोते-रोते अपने पाँव तपने टगे बधा भयानस्थ शिशोरनोऽस्पक ॥ ६ ॥ शिशु श्रीकृष्ण एक छकरके नीचे सोये मुए थे। उनके पास कमी छाक-पट कपके समान पड़े प्रपालम्वनिहतं व्यवर्वत । ही कोमल मौर नन्हे-नने थे । परन्तु वा नन्हा-सा विष्यसनानारसप्यभावन पाव टावे ही विशाल छकता उलट गया । ठस कोपर दूपदही वादि भनेक रसोंसे मरी इमटकियों म्पत्पस्तधमाधषिभिन्नछपरम् ।। ७॥ और दूसरे मन रम्से पुए थे । ये सब के सब रहा यशोदामाला प्रमनिय फस्ट गये और छकड़ेके पहिये सपा पुरे अस्त-म्पस्त हो गये, उसका जूमा फट गया ॥ ७॥ फरपट बदलनेके मौत्यानिके फर्ममि पा समागताः । उसपमें जितनी भी लिया पापी पर पी, वे सब, और नन्दादयमामृतदर्शनाइलाः पोदा, रोहिणी, नन्दयावा बौर पगण इस विभिन्न फ्टनाको देखकर म्याकुल होगये। वे भाफ्समें करने लगे- फचं स्वप रे षटं विपर्यगात् ॥ ८॥ अरे, ह क्या हो गया । यह एका अपने-बाप से उष्ट गया ? ॥ ८॥ वे इसका कोई कारण निमित सपुरष्यवसितमतीन् गोपान् गोपीपपासका। न कर सके। महाँ खेते हुए बालकोंने गोपों और गरियोसे कहा कि मस हणने ही तो रोते-रोते अपने दवानेन पादेन धिप्तमेतम संशयः ॥९॥ पॉक्की टोकरसे इसे उलट दिया।समें कोई सन्देह नहीं नमापिरे गोपा पाउमापिवमित्यत । ॥९॥ परम्सु गोर्पोने उसे प्यारेकी बात मानकर उसपर विश्वास नहीं किस्म । ठीक ही है, वे गांप उस भप्रमेय पल तस्स पाठकस्स न ते पिदुः ॥१०॥ यसले अनन्त क्सको नहीं मानत ये॥ १० ॥ कदन्तं सुखमादाय यशोदा प्रहलहिता । यशोदाजीने समझा या किसी प्रह वादिफा उत्पात है, उन्होंने अपने रोते हुए मासे अयो गोदमें •रिम्पासा पुत्र था उस पर बहुत बब्यान् एवं मोग-तगड़ा पा । एक पर यात्रा करते समय उसने योमा अषिके भाममके सोंचे कुचम राय । योमा भूपिन रेप करके शाप दे दिया-भरे हुए 1 मा देहर्यरत गि। उसी समय सापके गुबके समान उसका शरीर गिरने टगा । पर पड़ामसे मोमग अपि परपॉपर गिर पड़ा मोर माना की-कमसिग्यो । मुझपर प कीस्मेि । मुझे मापक प्रमार हान ना या । मेण पर मोय दीमिये । ओमानी प्रसन्न । गमे । ममामामोध पाप मी पर हो गया है। उन्होंने मा- स्वत मनसमें मीकणके परम-स्पर्शसे टेरी मुक्ति सेनामा । वही ममुर छाडे भार बैठ गया था मौर मगवान् भीमके परपस्पर्शसे मुक्त हो गया।

भीमद्भागवत [अ०७ कसम्वम्त्ययनं विप्रैः सूक्तै सनमपापयत ॥१२॥ सेयर प्रामणोंमे वेमन्त्रों के द्वारा शान्तिपाठ माया धोर | फिर ने नये स्तन पिपने गी ॥११॥ पलयान पूर्ववत म्पापित गापर्वलिभि सपरिसादम् । मेने उपलको फिर सीधा कर गया । उसपर पहले की तरह सारी सामग्री रख दी गयी । बामणोंने इन विप्रा हुवायांचम्पयतकशाम्मुभि ॥१२॥ किया धौर टही, अक्षत, कुश तथा नळके द्वारा मगवान् येऽस्पान तदम्मेाहिंसामानविनजिता । और उस छफोकी पूना की ॥ १२ ॥ नो किसीके | गुमि दोष नहीं निकालते, झूठ नहीं पेस्ते, दम्म, न रोपां सत्पशीलानामाशिपो विफला कुता ॥१३॥ इर्ष्या और हिंसा नहीं करते तथा अमिमानसे रहित हैं-उन सत्पशीठ प्रामणोंका आशीर्वाद कमी विफल इति पालकमादाय सामनैमुरुपाकतेः। मही होता ॥ १३ ॥ यह सोचकर नम्दवाचाने कसक को गोद में उठा लिया और ब्राह्मणोंसे साम, शाक् पौर जल पवित्रौपषिभिरभिषिष्य विमोचमः ॥१४॥ यदके मनोदारा संस्कृत एवं पवित्र झोपधिोसे युज जसे धमिफेक कराया १. ॥ उन्होंने बी वापयिरवा स्वस्त्पयन नन्दगोपः समाहितः। | एकामनासे खस्स्फ्फ्नपाठ और हपन कराकर ग्रामोंको इत्या चामि द्विजातिम्पः प्रादादनमहागुणम् ॥१५॥ अति उस्म अन्नका मोक्न कराया ॥ १५॥ इसके पद नन्दयावाने अपने पुत्रकी उम्नति बोर वमिति- गाय सर्वगुणोपेता मासासगुल्ममालिनीः। की कामनासे मामयो सर्पगुणसम्पन पास-सी गएँ दी। गौएँ वस, पुष्पा और सोनेके हारोंसे सजी बारमजाम्युदयार्याय प्रादाते धान्ययुनत ॥१६॥ हुई थीं। प्रमोंने उन्हें बाशीर्वाद Pया ॥ १६ ॥ यह बात स्पा है कि जो वेदनेता और साचारी विनामन्यविदो युक्तास्तैर्गा प्रोकाम्तयाऽऽधिपः। मामग होते है, उनका बाशीर्वाद कमी निष्फल मही तानिष्फला भविप्पन्ति नकदाचिदपि स्फरम्।१७ होता ॥ १७ ॥ एकदाजराहमारूदं रालयन्ती सुत मती। एक Pनकी पत है, स्नी यशोदानी अपने प्यारे स्साको पद स्पर दुम्मर रही थी। सहसा श्रीकृष्ण गरिमाणं शिनार्यो? न सेह गिरिस्टवत् ॥१८॥ बहानके समान मारी यम गये । ये टनका मार म साह समी ॥ १८॥ उन्होंने मारसे पीड़ित होकर श्रीसम्ण- ममानिधापत गापा विम्मिया भारपीरिता । का पृषीपर बेटा लिया । इस नपी पन्नासे ये कपात । चरित हो रही थी। इसके बार उन्होंने भगवान् मगपुम्पमालयी भगतामाम धर्मगु ॥१०॥ पुरुपासमा म्मरण दिया और घरफ काममें या पणी ॥१०॥ पानाम्ना उगारत: मभूम्याप्रगाति । मुगपत मामा यस्य परम निजी मेर 11 मी प्रागाही पण गपमें जहारागीनममाम् ॥२०॥ में नया मापय श्री उदारत - -- पातम्परपण म०७] १५० दसमस्क गोस्ल मर्षमापण्वन मुष्णपक्षप रेणुभि । आगामें से गया ॥२०॥ उमन मनग्जमे मार गार- पन् सुमहापारशन्दन प्रदिशा दिसे ॥२१॥ । कार रिया और गावी दानी गनिहर। । टसय अग्यन्त मपार से रसों दिार पारी मुहर्तमभवद् गोप्ट रनमा समसाऽऽतम् । ॥ २१ ॥ सारा न दा घीता रज और तमसे या सुतं पद्मोदा नापक्ष्यचम्मिन् न्यस्तवती यस ॥२२॥ । रहा । पाणदानीने आन पुरा जा Pata यदी नार दाणमा धारण या ना ॥२०॥ नापश्यत् फवनारमान पर चापि विमाहित उस समय सुगपतन वडामे इतनी पर 3 राणापर्वनिमुष्टाभि शर्कराभिरुपह्रस ॥२३॥ रमी दी कि म ग अपन उदिम अर ममुर । इति म्मरपवनपपासुवर्षे गय य । टन्हें अपना गया पुट भ नहीं चूम गा मुतपदनीमपठाविलय पा ॥ २३ ॥ उस जारकी बों और पूरी पनि माता। अस्न पुरा पता न पारा पशाग यहा र अतिकरुणमनुसरन्त्यवोचद् एमा । ये अपने पुरसी पद पार पल ही रह मुविपतिठामवरस्सका यथागी ॥२४॥ ' गपों और महार मा जानार गयी जा ret रुदितमनुनिगम्य तत्र जाती, पणा उनी । गयी । य गृFr गाप्पा पर ॥२०॥ यरर शन्न जानर पर भूगी भृशमनुवाधियोऽवपूर्णमुग्न्यः । पर्गमा पग पत पा, मर नयनी गनाय रुरुतुरनुपरम्प नन्दसनु सुनकर मरी गान्पिो न दा. अपनान सम्युय धीमरा न दार उना पर्म भी उपाठपामुपदेगे ॥२५॥ यदा मंगपा, ओम अगरी धग पनी । पर गन ॥२५॥ छणापर्वः शान्तरपा यात्यारूपधरा दरन । इस गत यामागनर मपन्m अगा रय गनर मम रुपनभागतागन्तुं नाशमा प्रिभारभूत् ।।२६॥ मम ए और ' न 10५ ॥ ग' मीना 4-1-1-1-1 नमन्मान मन्पमान मा मना गुग्मनपा । Agn wry- गर गात उन्माष्टु नानगाहवामएम 1-30 ॥२७॥ नन 7 MITr 2rF . गरप्रतनिरपरा दस्पा निगलगपन । ज - 1 T . . . 1 बनरारा पपना मागप्पगुम३-८ll trt Fr न 141tt प •era Tv recorri. mir-be H te . Arti- १६० भीमागपत तमन्सरिक्षात् पतितं मिलायां यहाँ जो सियों इकटठी होकर रो रही पी, विशीर्णसर्वावर्ष उन्होंने देखा कि यह विकराठ देस्य आकाशसे करालम् । एफ पानपर गिर पड़ा और उसका एक-एक पुर यया रुद्रसरेण पिट भा चकनाचूर हो गया- ठीक वैसे ही, नेसे भागन् सियो रुदस्पो दान: समेवाः ॥२९॥ शहरके वा!से आहत हो त्रिपुरासुर गिरकर पूर पूर प्रादाप माने प्रविरस्य विमिताः | हो गया पा ॥ २९ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण उस्के पक्ष सम्पर लटक रहे थे। यह देखकर गोपियों विसित कुम च तस्सोरसि लम्बमानम् । हो गयीं । उन्होंने मटफ्ट कहाँ माकर भीकृष्णको गदमें स्वस्तिमन्तं पुरुपादनीव ले लिया और अफर उन्हें माताको दे दिया । मक विहायसा मृत्युमुसा प्रसक्तम् । मृत्युके मुससे सकुशल भेट पाया । यपि उसे राक्षस आकाशमें उठा ले गया पा, फिर भी यह मच गया । गोप्यम गोपा। फिल नन्दसख्या इस प्रकार वाटक श्रीकृष्णको फिर पाझर यशोदा मादि लम्बा पुनः प्रापुरतीव मोदम् ॥३०॥ गोपियों सया नन्द वादि गोपोको प्रयन्त मानन्द आ महो बवास्पछुतमेप रक्षसा ॥ ३० ॥ ये कहने मो-ओ! यह तो बड़े भापर्य- फी पास है। देखो तो सही, पर कितनी बद्भुत पालो निपत्ति गमितोऽम्पगाव पुन । घटना घट गयी 1 यह पाक राक्षसके द्वारा मुस्पुके हिंस स्वपापेन विहिसित खलः मुखमें गठ दिया गया पा, परन्तु फिर जीता-जागता साधुः पमस्वेन भयाद् विमुच्यते ॥३१॥ आ गया और उस हिंसफ दुष्टको उसके पाप ही स कि गये ! सच है, साधुपुरुप अपनी समतासे ही सम्पूर्ण नस्तपमीर्णमधोक्षजार्चन भोंसे बच जाता है॥ ३१॥ हमने ऐसा कौन-सा पर्सेप्टदचमत भूतसौददम् । | तप, भगवान्फी पूजा, प्याठ-पौसत्य, मो-यमी, वाग यस्सम्परेसः पुनरेष पालको माचे वार त, यश, दान या नीमोंकी मजा की पी, जिसके पसे हमारा यह बालक मरकर भी दिष्टयाम्बवन् प्रणय नुपम्पित ॥३२॥ अपने स्वारनों का मुखी करने के लिये किस लोट आप ! अवश्य ही यह बड़ सौभाम्पकी बात है। ॥ ३२ ॥ जम नसतानि पहुशा नन्दगोपो पृदइने । नन्दयावाने दस कि महापनमें महुत-सी अद्भुत घटनाएँ घमुदेवाचा भूपा मानयामास विमितः ॥३३॥ धरिन हा रही हैं तब भाचर्य चक्ति होकर उन्होंने पसुदेयनीकी यातका पार-यार समर्थन किया ।। ३३ ।। एफदामक्मादाय म्वादमाराप्य भामिनी । पप निकी यात है, यशानी अपने प्यारे शिशु- को अपनी गो में स्कर या प्रेमसे सन-पान करा रही पो। पारसस्पस्नासे इस प्रकार सराबोर हो रही थी प्रस्तुतं पापयामास स्तन माहपरिप्लुता ॥३४॥ कि उनक स्तोंसे अपने आप ही दूध भरत जा रहा पा ॥ ३९ ॥ जब पे प्राय दूध पी पुष मीर माता पावपापम्प जननी सा तस्स रुपिरसितम् । पर उनक रुपिर मुमकानसे मुफ मुवा घूम रही पी १ गए । २ भुना मुसम्म । - - अ०८] दशम स्फ १६१ मुख लालपती रानम्बृम्भतो ददृशे दम् ।।३५॥ उसी समय श्रीकृष्णको जमाइ आ गयी और माताने ख रोदसी ज्योतिरनीमाशाः उनके मुखमें यह देश * |॥ ३५॥ उसमें भाकाश, क्न्तरिक्ष, पानिमण्डल, दिशार, सूर्य, चन्द्रम्प, अम्नि, सूर्येन्दुपहियसनाम्मुर्धाम पायु, समुद्र, दीप, पर्वत, नदियों, पन और समस्त दीपान् नगांस्तदुहितृर्वनानि चराचर प्राणी स्थित हैं ॥ ३६ ॥ परीक्षित् ! अपने भूतानि यानि स्थिरसङ्गमानि ॥३६॥ पुत्रके मुंहमें इस प्रकार सहसा सारा जगत् देसका मृगशाकनपनी यशोदाजीया शारीर काँप उठा । उन्होंने सा पीक्ष्य विश्व सहसा रामन् संजावषेपपुः । अपनी मड़ी-बड़ी माँ बंद कर ली+। वे अस्पात सम्मीस्म मृगशावादी नेत्र मासीत् सुषिमिता।।३७॥ आश्चर्यचकित हो गयीं ॥ ३७ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारम्हस्यां संहितायां दशमस्काये धि लगातमोक्षो-नाम सप्तोऽध्याय ॥ ७ ॥ - अथाष्टमोऽध्याय मामकरण-सस्कार मौर चाललीय भी क माप भीगुकदेवजी कहते है-परीभित् ! यदुवंशिपोंक कुछ-पुरोहित थे श्रीगर्गाचार्यगी । वे बड़े तपस्वी थे । गर्गः पुरोहितो राबन् मनः सुमहातपा । बसुदेवचीकी प्रेरणासे ये एक दिन नन्दवान गोकुल्लमें आये ॥१॥न्हें देखकर मन्दयामाको बड़ी प्रसन्नता बजे बगाम नन्दस पसुदेवप्रथोदितः ॥१॥ ई। वे हाथ जोरकर छ स्वइ हुए । उनके घरणाम तस्य परमप्रीसः प्ररपुरथाय वाजलि।। प्रणाम फिया । इसके बाद 'य स्वयं भगवान् ही है- इस माणसे उनकी मा की ॥ २॥ जप गर्गाचार्पनी आनधिोपमपिपा प्रणिपातपुरस्सरम् ।। २ ।। बारामसे बैठ गये और विविपूर्वक उनका आतिथ्य स्पपिप्टं कवासिष्प गिरा मनुवया मनिम् । सत्कार हा गया, तब नगदपायने यही ही मधुर वाणीसे उनका अमिन म्दन किया और कहा- भगवन् ! आर नन्दयित्वाप्रवीद् प्रमन् पूर्णस्य फरसाम किम् । ३ ॥ तो म्वर्य पूर्णकाम है, सिर में आपकी क्या सेवा १ राप्रपा २ बारम्पपिरमाय । १ भम्यप्पामा । • स्नेहमयी कानी मौर स्ले श मूने भगवान ! उमें पूप पीनेसे तृप्ति मही हावी भी । माझ मनमें पना हुई-ही मपिक पीनेसे मरम न रोमन । प्रेम सर्वदा मतिर मात्र सम्न परखा है। भीरप्पने मरने मुनमें शिवरूप दिलार प्रा--मरी मैया । रोग दूध में मोशे ही मही पाता है। मरे मुतमें पेटार सपूर्व पिच ही इसम पान पर पान परराव महा- सम्म रिपत् पिबसि भूमरिति पतिप्पमासमा बननी रिमाम्य । वित मिगि परमेऽस न केमसम्मारिन सिमसिमास्ये ॥ सस्यमयी पोश माता मरने म्पहार मुतमें पिप रेसर र गगे परनु परणय प्रेमरम मावि एय एनेमे में विधाम मते हुमा । माने या विचार रिमा मि पर रिसा पोशायर में पहमि भाषामो पर मे इन मगही मौतोरी गाती है। नो इमीत नोंने मरने नेत्र र रमये। २२१- भीमागवत [अ०८ गर्ग उपाय महविचलनं नृणां गृहिणां दीनषेवसाम् । ॥३॥ भाप जैसे महाताओंका हमारे-मैसे गृहस्पोंके घर मा नाना ही हमारे परम फस्पाणका नि मेयसाप भगवन् कल्पते नान्यथा कचित् ॥ ४॥ कारण है । हम तो घमि इतने उजा रहे है और इन प्रपोमि हमारा चित्त इतना दीन हो रहा है कि हम वापके थाश्रमसक जा भी नहीं सकते। हमारे कम्पाणके सिद ज्योतिपामपन साक्षात् यत्तदानमतीन्द्रियम् । आपके पागमनका वौर कोई छ नही है ॥१॥ प्रम्प ! नो मत साधारणत इन्द्रियोंकी पहुँचके बाहर है प्रणीत ममता येन पुमान् वेद परावरम् ॥ ५॥ अपवा भूत और मविष्यके गर्भमैं निहित है, छ मी ज्योतिष शासके द्वारा प्रत्यक्ष बान की जाती है। अपने सं हि प्रमषिदा श्रेष्ठः संस्कारान् फर्जुमईसि । उसी म्पति शासकी रचना की है ॥५॥ भाप अमवेताओंमें श्रेष्ठ है। इसलिये मेरे इन दोनों मारकोंक | नामकरणादि संस्कार भाप ही कर दीजिये, योनि पासपोरनयोनगा षन्मना प्रामणो गुरुः ।। ६ । प्रमण कमसे ही मनुष्यमात्रका गुरु ॥ ६ ॥ गर्गाचार्यजीने का नन्दनी ! में सप बगह या पंशियोंके माचार्यके सपमें प्रसिद्ध है। यदि में मुम्हारे पदनामामाचार्यः स्पातम मुवि सर्पतः । पुत्रके संस्कार फागा, तो वेग समझेंगे कि या तो देवकीका पुत्र है॥७॥ सकी मुदि युरी है, पर मुख मया संस्कृत ते मन्यते ठेवकीमुसम् ॥ ७॥ पाप ही सोचा करती है। यमुदकनीके साप सुम्हारी सपी धनिष्ठ मित्रता है । जबसे देवकीकी फम्यासे उसने कसः पापमति सम्यं तव चानफदुन्दुमे । या पात सुनी है कि उसको मारनेवाव्य और कही पैदा देवया अष्टमो गर्भो न स्त्री भवितुमर्हति ॥ ८॥ हो गया है, तबसे पह पही सोचा करता है कि देसीके माठ गर्भसे करपाका सम्म नहीं होना चाहिये । पर इति संचिन्तपस्या देवक्या दारिकाषचः । | मैं तुम्हारे पुत्रका संस्कार कर हूँ और माह इस बायको पसुदेवमीका लड़का समझकर मार गले, तो हमसे बड़ा अपि हन्ताऽगतातहि सन्नोऽनयोमषेत्।। ९ ॥ क्याय हो जापग ॥ ८९॥ मम्दयावाने कहा-आधार्पजी ! माप सुपचाप इस एकान्त गेगमें केवर स्यम्निवाचन परके इस पाकर अठपिताऽसिन् गहसि मामकरपि गायज । फा द्विजानिसमुषित नामकरण-संस्कारमान कर दीजिये। जोरॉयी पोन पहे, मेरे सगे-सम्बन्धी इस समको कुरु रिजातिमस्कार म्वस्तिवाचनपूर्वफम् ।।१॥ न मानने पायें ॥ १०॥ भीमुक उपाप भीशुगरपजी रहत-गर्गाचार्यमी ॥ संस्कार पर सम्प्रापिता विम म्यधिकीपिंत मेष ठत् । फरना चाहते ही था जब नदयारान उनसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब उन्होंने प्रशान्त दिपकर गुमाएपसे पसार नामकरण गहा गहमि पारपोः ।।१॥ दानों पायाश नामकरण-मस्कार कर लिया ॥ ११॥ १२ १२ बार। नन्द उपाय अ०८] दशम स्कन्ध १६३ गर्ग उपाप गर्गाचायजीमे कहा-यह रोहिणीपा पुत्र है। इमलिये उसया माम होगा रोहिणेप । यह अपन सगे- भय हि रोहिणीपुत्रा रमयन् सुहदो गुणे । सम्पन्ची और मित्रों को अपने गुणों से भक्त आनन्दित फरेगा । इसलिये इसश दूसरा नाम होगा राम' । इसके वथ्वी कोई सीमा नहीं है, अन इसका एक माम प्या आस्पास्पोराम इति पलाधिपया मल विदुः । भी है। यह यादवोम और तुमलोगामें पाा मे भाव नही रम्वेगा और ग्रेगोंमें फट पपनेवर मे फरावेग, यद्नामपथग्भारात् सर्पणमशन्स्युप्त ॥१२॥ इसटिये इसका एक नाम 'संपर्यण' भी है ॥ १२ ॥ और यह लो साँवला मौवन पर प्रत्येक युगमें सारीर आसन् पर्णाश्रयो सस्स गृहतोऽनुयुगं उन्ः । प्रहण करता है। पिछले युमें इसने ममा “येत, । रक और पीन-ये सीन विभिन्न रंग स्वीकार किये थे। मुसो रक्तस्तथा पीत इदानी कृष्णां गतः ॥१३॥ अक्की यह पृस्णवर्ण हुआ है । इसरिये इस नाम 'कृष्ण' होगा ॥११॥ नम्दनी ! यह सुमारा पुत्र प्रागम पसुदेवस्स कचिमातम्तवारमजा। पहले कमी बसुदेवबीके घर मी पेग हुआ था, इसठिये इस रहस्यका जाननेवाले लोग इसे 'श्रीमान् पामुदेव भी बासुदव इति श्रीमानभिझा सम्प्रचक्षते ||१४|| कहते हैं ॥ १९ ॥ सुम्हारे पुरके और मी यहुल से नाम १ तम रूप मी अनेफ है । इसके निसने गुण हैं और पहनि सन्ति नामानि रूपाणि घ सुतस्प ते । जितने कर्म, उन सपके अनुसार अध्या-अठा नाम पर जाते हैं। मैं तो उन नामोको नानता हूँ, परन्तु संसार गुणफमानुरूपाणि सान्पई पेद नो बनाः ॥१५॥ के साधारण रोग नहीं जानते ॥ १५॥ पद तमोगोंका परम पल्याण फरेगा। समस्त माप जोर गाओंको पर एप ष थप आधाम्यद् गापगोकुलनन्दन । बहुत ही वानन्दित परेगा । इसकी सहायतामे तुम अंग भी-कभी विधियों की मुगामे पार पर लोगे ।१६॥ अनेन मर्षद्गाणि । अजरान ! पाले पुगकी बात है । एप मार पृष्पीमें कोई यूपमअन्तरिम्पथ ॥१६॥ रामा मही रह गया पा । टापुओंने चारों बार घर- एमार मचा रम्गी पी । म मुम्हारे सी पुनने मनन पुरानेन प्रमपत साधयो दस्पपीडिता । पुरुषोंकी रक्षा की और इसमे पर उन गाने स्टेम रिचय प्राम पी॥१७॥ जा मनुष्य तुम्हारे अराजकरस्यमाणा विग्युर्दस्मन् समधिवा ॥१७॥ इस सौरम्मान गुमे प्रन परमे है, ने यद माय- बन् है । मे रिमपना पासमी प्रप में पपसम्मिन महाभागाःप्रीति फ्रान्ति मानवा । ग्दनाले दरगागा अमुर नही जीत मुरत, देमटी उममे प्रम माना मेरा भीमर रिमी मी प्रसा नारयाऽभिमवन्न्येठान् विष्णुपशानिरायुग ॥१८॥ क यु मा श्री मात ॥१८॥ नारी जिम सिमे -गुमें, मन मोमे, वमामन्दारमनाऽर्प त नारापगममा गुन । It ने माग Ter भगान । - । . है १६४ श्रीमद्भागवत [ब०८ . मिया कीानुभावेन गोपायस्थ समाहितः ॥१९॥ मारापणके सम्झन है । तुम बड़ी सावधानी और तत्परतासे | इसकी रक्षा करो ॥ १९॥ इस प्रकार नन्दकायको मटीमाति सम्माकर, आदेश देकर गर्गाचार्यमी अपने इत्यात्मान समादिश्य गर्गे च स्वगृह गते । माश्रमको मैट गये । उनकी मात मुनकर नन्दयावाको बड़ा ही आनन्द हुना । म्होंने ऐसा समय कि मेरी नन्दः प्रमुदितो मेने पारमा पूर्णमाशिपाम् ॥२०॥ सब पाश-अप्साएँ पूरी हो गयीं, मैं अब हलकाप हूँ॥२०॥ कालेन प्रस्तारपेन गोहले रामकेशयो । परीक्षित् ! कुछ ही दिम राम धौर श्याम पुग्नों | और हार्योंके कल क्यों चम्पकार गोकुम्मे खेल्ने बानुम्पा सह पाणिम्पो रिझमाणौ विजहतुः ॥२१॥ लगे ॥ २१॥ दोनों मई अपने नन्हे-मन्हे पावोंको | गोकुकी कीघरमें घसीन्ते ए पलते। उस समय वापरुधियुग्ममनुरुप्प सरीसृपन्तो उनके पाँव और कमरके घुघरू स्नमुन पचने लगते । वह शम्द वा मला मायम पत्ता । वे दोनों स्वयं का पोपप्रपोपरुचिरं प्रबकदमे । पनि पुनकर सिए उठले। कभी-कमी के रास्ते चम्चे किसी भवास म्पतिके पीछे हो सेवे। फिर चव देसवे वमादाटमनसावनुसत्प लोक कि या तो कोई दूसरा है, सब मकसे यावे धौर सरकार भानी मातामों-रोहिणीनी और यशोदानीके पास मुम्भप्रभीतमपेपरन्ति मात्राः ॥२२॥ | थेट आवे ॥ २२ ॥ ममताएँ पप सब देख-देखकर स्नेहसे मर जाती । उनके स्तनोंसे दूधकी धारा बहने लगती तन्मावरौ निजसुती पूणमा स्नुपन्त्यौ पी । बस उनके दोनों नर-मन्हे से शिनु नपने शरीरमें कीचमका बाग लगाकर लोटते, तब उनकी सुमारता पशङ्गरागरुचिराषुपगुप दोर्पाम् । और भी बढ़ पाती पी । मताएँ उन्हें आते ही दोनों हापसे गोदमें लेकर इदयसे छा देती और मान दवा म्तनं प्रपिरतो. म सुखं निरीक्ष्प पान कराने स्गती । मब वे दूध पीने लगते चोर बीच मीचमें मुसकरा मुसकराकर अपनी माताओंकी बोर देसने सम्पमितास्पदसनं ययता प्रमोदम् ॥२३॥ गते, तब वे उनकी मद-मन्द मुसकान, छोटी-छोटी सुछियों और भोप माल मुंद देसकर बामन्दके समुद्र बने-अराने ख्याती ॥ २३ ॥ पब राम और श्याम पर्मङ्गनादर्शनीयकुमारलीला । दानों कुछ और बड़े एए, तब गजमें घरके बाहर ऐसी ऐसी पम्मएँ करने स्त्रो, मिनें गोरियों देखती ही वन्तजे तपसा प्रशीतपुच्छै । रह माती । अब ये किसी मैठे हुए छोकी छ पका स्ते पोर मछो ररकर इधर उधर भागते, तब ये दोनों बस्मरितम्तत उभावनुरुप्पमाणी और भी जोरमे पंछ पा से और ना उन्हें घसीटते हुए दौड़ने लगते । गोरिया अपने घरफा काम- प्रशन्त्य उन्मिवगा जहपर्वसन्त्य ॥२४॥ धंधा टोपर पड़ी सप देती राती और इसके हसते बवत गो 1२ प्रप। ।

म०८] दशम स्कन्ध . पनिदष्ट्रयसिमल द्विजफप्टफेम्प लोटपोट होकर परम भानन्दमें म्म हो जाती ॥ २१॥ फरया और दाल दोनों ही बड़े चचल भौर बड़े चियही ये। ये कही हरिन, गाय मादि सीगाले फ्रीरापरापतिपली स्वमुतौ निषेधुम् । पशुओंके पास दौर जाते, तो वही घाती हुई भागसे खेलनेके लिये कूद पाते । कमी दाँतसे काटनेपाले | कुत्तों के पास पहुँच नासे, सो कभी भाँख बचाकर तर बार उठा लेते । कभी ऎ या गठेके पास नमें गिरते- गृपाणि कर्तुमपि पत्र न समनन्यौ गिरते बघते, कमी मोर जादि पक्षियोंके निस्ट पसे चाते और कभी कोटकी भोर बह जाते थे। माताएँ उन्हें बात परजती, परन्तु उनकी एक म घरती । ऐसी सितिमें ये परका काम-बंधा भी नहीं सम्हाल शेकात प्रापतुरलं मनमोऽनरस्साम्॥२५॥ चिन्तासे अत्यन्त चचल रहता था ॥ २५ ॥ पासी । उनका विस पोंको मयकी पस्तुओंसे पचानेकी फालेनास्पेन रान रामः कृष्णम गाइले । राजर्षे ! कुछ ही दिनोंम पशोदा और रोहिणीके साहले घठ मुटनोंका सहारा लिये बिना मनापास ही अघृष्टवानुभिः पशिपिंचक्रमतुगलसा ॥२६॥ बड़े होकर गोकुछमें चलने-फ्टिने टगे. २६॥ - ० मा वाममुगर घुटनोंष सहाय लिये निा पटने भो हमने अपने परमें भनेचे प्रभारी एमपी चय करने मो- एत्य फोरक्त म्वर्व निबाई सालीन मपिसम्मे स्वातिविम्बमीशिवरवस्नेष सारे मिया । माधर्मा पर मातरं मम सम्ये मागस्त्रापदिको मुम्नेस्पासमतो हो यो म्पका र भूपसे ।। एक दिन स्वरे-सध्येने बरामकुमार मीनपाठारयी मपने सूने परमें स्वयं ही माखन पुरा रो थे। उनमे रसि मपिके सम्मेम पो हुए भपने प्रतिविमपर पड़ी। अब तो देर गये । मपने प्रतिविम्पसे नाम- मरे भय ! मेरी मेपासे पहियो मत । ठेरा भाग भी मरे पर ही मुझे हीघरहे लाला से मैय। मधेशमामा माग्ने साधी ततस्य बोली मुन ग्री की। उमें पड़ा भापर्य हुभा वे परमे भीतर पुस मासी । माता देखते ही भीषणने माने प्रतिविमो रिसार बात बदल दी- माता पर नवनीतमिदं सदी मेन रयितुमय पर मपिश । महारण म मनुते मपि ऐपमाथि रोष नोति म र मे नमनीयम ।। मैया ! मेया !! या पौन है। मपण तुम्हारा मावन धुपने रिपे भाव परमें पुम भाया है। में मना पणा मानता नहीं है मौर में भरता है तो यह भी कोष करता है। मैपा 1 तुम कुछ भोर मत बना । मेरे मनमें मापन तनिक भी स्प्रेम मही है। मरने दुध मोशिप प्रतिमा देतार मैण बास्तस्स-रने मानन में मन हे गती। x एकमि पाममुम्दर माताके पर जानेर परमेरी मापन-परी पर रो पसनेमें ही देय परगी और मापा मोर भरने पाले स्पस न देतार पुमरने स्त्री- पण ! पति पणी मिरिति मोर मनुबंध EUE नम्लीयप भिम तामात् । मरप्रगगम'मा पनिर्ममतप्यते पना मपनीमारे रिन्पस नि पनीया ! मेसा ! भरे में मेरे !रों है क्या पर पारे। -मीरपत मुलतमपनरी भाण र गये भौर मनन-परीमे भाम् । मि पेदी रे मुर एप सारमे ८५- मैया 1 x x x x !

१६६ श्रीमद्भागवत [१०८ ततस्तु भगवान् कृष्णो पपस्पैपालो। ये ब्रजवासियों के क्या अर्य भगवान हैं, परम सुन्दर और परम मधुर ! भव थे और राम अपनी ही मासे म्वाध्यायको अपने साप लेकर सेनेके म्येि मनमें सारामो घबस्रीणां चिफ्रीरे बनपन मुदम् ॥२७॥ निफाड पड़ते दौर मनकी माम्यवती गोपियोंको निहाल करते दुए तरसरके से खेश्ते ॥ २७ ॥ उनके वानकी पश्चलताएँ पड़ी ही क्नोखी होती पी । रुपास गोप्यो रुचिरं वीक्ष्य कौमारचापलम् । गोपियों को तो वे मी ही सुन्दर और मधुर गती । एक दिन सब-की-सब इफटी होकर नन्दगापाके घर मणस्पाः किल वन्मातुरिति होचुः समागताः॥२८॥ बायीं वौर परपेदा मताको मुना-मुनाकर कीयाके माको तुमने मेरे हममें पाराग बहा दिया है, इसकी परसे मेरा हाप या था। इसीसे मैने इसे माननके मरको सकार गुमाया पा। मात्र मा मपुर मपुर औलामी बोली बोली सुनकर मुग्ध हो गयी और 'मायो पेठा। ऐसा सफर सामने गोदमें उठा लिया और प्यारसे घूमने लगी । x x x x ॥ - झुण्याम्पो करफरमन गिनाप्पाम्मुरम्य दम् हु इमिति सपष्ठकारादत्तानाम्निम्मा । म्पत्रासो नमनीतचीयतके प्राम्भसितः स्वायमेनामुम्बास्स मुसं सतवस्तिक पस्सेति काठे क्वा || एक दिन माताने माखन चोरी करनेपर श्यामसुन्दर पमप्रया गॅसफरपरा । स दोनों से मामुमोदी सादीमा गमी । रकमसे माँस मम्ने सगे। - रो रोने लगे । गम प गया । मुहसे पोम महीन पा। बस, माता पास दूर गला । अपने भाषसे मपने अब मात्र मुंद पंग और पो पारसे गले मगार योग-मम्म ! यह सब तुमाराही पा पोरी नहीं। एक दिनी बात है-पूर्वचन्द्रकी बोवनीसे मपिम्प माँगन पुर गता पा । यशोदा मेयाके सप गोपियोंकी गोरी र दी थी। वहीं सेब्वे-सख्ते कृष्णचन्द्रकी शिकसम्मपर पड़ी। ठमोंने पीछेसे भाकर योग मैयाम पर स्वर ख्यिा । भौर मपने प्रेमस कसे उनकी प्रेरी सोकर सोचने को मोर बार-बार पीठ पपपपाने हो। में सुंगा, मैं नंगा-तोली पोष्ठीसे इतना प्रवे । स मैयाश्री एमझम पाव नहीं भागी तब उसने स्नेह रपिमे पास बैठी मरिनोकी भोर रेला । भय थे विनयसे प्यारसे फुमार भीरप्पा मपने पास है मानी मौर पोसी-म्पन्न । म पा पादसे हो दूध | भीषण-मा' । पमा बदिया दी! ना' या मुरफ्ना' । (ममा ! मा'। वाय मायम ! ना' । पारिननि प्रा-पेय | मनो मत, रोभो म । मौगोगे सो गी । भीणने पारसे बरा-परपी पतु नही पाहिये मौर भंगुम उठार ममा मार संमत कर दिया । गोपियों दोहीमो मेरे बाप ! पर मातम मौरा पोहे है। सप । म यह कैसे गी । यह प्यारा-म्परा सभामागे मोपरमें हर याहै। भीषणने मा- में भी ये रोख्नेके लिये इस सन्चेरी माँग गा पीया परो। पार ने पूर्व ही मुझे हा थे। भव भौर भी पपा गमे । परतीपर पांच पीर पीरमर भोर पोसे गला पा-पाएर होममे सो भोर पागे मी मभिः पने सो । दुमरी गोरिपोने प्रा-पेरा 1 राम-राम । इन्होंने तुमो पदमा दिला है। पर पानी पर तो मामय ही एनेपाहा पल्मा है। भाप ट र बैठे-मुग पीसो मेरे मनमें इमोगप पोख्ने हो त्यसमा है। ममी रो ममी का बहुत एने Rगे तब ममदा मावान ममें उठा विभौर पर परोसी-मरान परम भौर म तो भद्रमा । ३. मानम हो परनु तुमने देमे मारेगा इनमें पर प्रणमामा रि सगा भा है।इम दिया होने पर भी हमे कोई मी साय है। भाजपा-मेगा मेपा हममें शिमे गया । मा बाम गयी । मेपाने सदमें मेहर मपुर-मपुर मरमे सालाना मरम्मामा-में प्रश्नोसर ने सगे।

अ.८] दशम स्कन्ध १६७ पत्सान् सञ्चन् कचिदसमये क्रोशसजातहास: फरस्त करने लगे ॥ २८ ॥ भरी पशोदा ! पहरा काहा यदा नटष्ट हो गया है। गाय दुहनेका सम्प न होनेपर भी यह पछयोंको खोल देता है और हम रगटती है, तो ठमठयार हंसने लाता है। यह स्तेपखादरपथदधिपय करिसतःस्तेययोगैः। चोरीके पह-यह उपाय करके हमारे मीठे-मीठे दही दूध चुरा चुराकर खचाता है। फेसा अपने ही खाता तो भी एफ पात थी, यह तो सारा दही-चूब वानरोंको मोट | देता है और जब वे मी पेट भर जानेपर मही स मकान् मापन विभबति समाधि भाण्ड मिनचि । पाते, तब यह हम्मरे माटोको ही फोर मारता है। पदि घरमें कोई पस्तु इसे नहीं मिनी सो यह पर और घरबाट पर बहुत स्वीमता है और हमारे पोंको रुगकर माग जाना है ॥ २९ ॥ जब हम ददी-दूधको ठीकॉपर दम्पालामेस गृहकृपिता यात्युपक्रोश्पदोकान्॥२९॥ रख देती हैं और इसके प्रते-लेटे हाप पहातक नहीं पहुंच पाते, तब यह यह यड़े उपाय रचता है। कहीं दो चार पीछेको एफके ऊपर एक रस देता है। यही सरपर पा जाता है सो पदी ससटपर पीहारख देता है, हस्ताग्राम रषपति विधि पीठफोपवलाये (कमी कभी तो अपने किसी सायीके पेपर ही घर जाता है।) जय इतनेपर मी काम नहीं पता, सब यह मीचेसे ही उन निमि से कर देता है । इसे इस पातकी पनी पहचान रहती है कि रिम छीपेपर रिस पिछद्रं पन्तर्निहितवपुनः शिपभाण्डेषु सतिन् । फनमें क्या रम्ग्य है । और ऐसे दंगमे छेद पाना पाश-प्रय ! कभीर-सागर है।' भीषण-मेपा! परसा है। नगरा-भय । महो तुम चूप देख रहे । इसान एक ममुद्र है।' भोरण-भैया ! किती गायोंने दूध दिया दोगा कर समुद्र ना हगा । पारा-मनसा । मर गापा दुप नहीं है। भीष्म-मरी मग ! तुम मुझे पाला दी है मन स्निा गरे दूप मे ! पयन-पस ! चिगने गायोंमें दूध पनापा र बागापरे बिना भी बना गया। पीन मेपा । परोन । पान- पर मगगन् । परन्तु मग ( टन पनवर्ग मही माना । भपग मा भारत) भाग-'मा ठौर भागे । परा-एक पार देना भीर रेस्रों में समाई हुई । भमुरका मारित रनेर मान्ने र मा मन्दगरणी र पनी । पामि मागणी रस्मी । एकभर मागे मी मरना। पाच-मे गारियों दही मपणी गे मै! पाच-दो रे ! उसीमे पातार नामा रिपे मा । माग-भग! nिdi में मे निम्म पण-भय ! बर पर भगान्ने राशि दी कि तर उमर पाना EMPT मान्दोमी - शिम भने तिमिरण। भोप- भार। 1-7' (फ भर मिR) नामित nिr ताच देगल से 5 दुम पारा । पनो मुनोरममुनगाभाग भर - Rr.fi १६८ भीमहागवत [१०८ पान्तागारे घृतमगिगर्म स्वाङ्गमर्थप्रदीप जानता है कि किसीको फ्तातक न चले । जव इम मफ्नी वस्तुओंको वात अंधेरेमें आि देती । म नन्दरानी ! हमने जो इसे बहुत-से मगिमप वामपण पहना रस्से है, उनके प्रकाशसे अपने आप ही स्व कु काले गोप्यो महि गृहरुत्येपु सुम्पग्रचिचाः ॥३०॥ जिससे इसे सब कुछ दीस बाता है । यह इतना | देस लेता है । इसके शरीरमें भी ऐसी ज्योति है कि पाष्यक है कि फस कोन कहाँ रहता है, इसका पता रखता है और जब हम सप घरके काम-बम उसकी । रहती है, तव या अपना काम बना लेता है॥३०॥ एवं पाष्टीन्युश्चति इलवे मेहनादीनि पास्ती ऐसा करके भी निठाईकी बातें करता है-अटे हमें ही पोर बनाता और अपने घरका मालिक बन जाता है। इतना ही नहीं, यह हमारे लिपे पुसे स्वछ घमें भूत्र आदि भी कर देता है । तनिक देखो तो इसकी घोर, यहाँ तो चोरीके भनेकों उपाय फरक काम पनात स्तपोपायविरपितरुतिः सुप्रतीकोपथाऽऽस्ते । है और पहों मङ्म हो रहा है मानो पपरकी मूर्ति भी हो ! माह रे मोसे माले साधु । इस प्रकार गोपियों कहती खाती और श्रीकृष्णके भीत-चमित नेत्रोंसे मुळ मुसकमको देखती जाती । उनकी पदशा इरथं सोभिः समपनमनभीमुस्सालोकिनीभि | देखकर नन्दरानी यशोदाबी उनके मनका माप ताम लेती और उनके बदमें स्नेह और मानन्दकी बादशा पाती । ये इस प्रकार सने छाती कि अपने करले कीयको इस बातका साना मी न दे पाती, गटने- स्मिाता प्रहसिवानी न भुपालम्पुमैच्छत्।३१।। को बारुतक नहीं सोच पाती * ॥ ११ ॥ • मायान्की सीलापर विचार करते समय यह पत स्रण रखनी चाहिये कि भगवान्का सीधाम, भगवान्क लीलपात्र, भगवान्का कीसशरीर और उनकी मित्र प्राकृत नयाँ होसी । भगवान्में येहन्देहीका भेद मही। महाभारतमें जम्पा है- म भूतसपससानो देवस्य परमारमनः । पो षेति भौतिक देह कृष्णस्य परमात्मना । स सर्वमा पहिष्का: मौतमातपिपागतः । मुस तस्यापळोफ्पापि सपैठापानमाचरेत् । "परमात्माकर शरीर मूतसमुदायसे बना हम नहीं ऐप । चा मनुष्य श्रीक्षण परमपके शरीरको मौलिक पानता मानता है, उसका समय भौत-स्मत कसे बहिष्कार कर देना चाहिये सर्पात् उसका किसी मी शनीप काम अविकार मही है। यहाँतक कि उसका मुंह देखनेर मी स्पैछ (पमसहित ) स्नान करना चाहिये ।' श्रीमग्रामसमें ही प्रमानीने म्मावान् श्रीकृष्ण की स्तुति करते र कहा है- मस्यापि देव पुणे मनुप्रहस्य स्पेठसमपम्प न तु भूतमपन्य कोऽपि । 'भापने मुझपर एम करनेके म्येि ही यह स्पेश्यमय सचिदानन्दस्वरूप प्रकट किया है, यह पात्रमौखिक पदापि नही है।"

म०८] दलम सन्म १६९ - एकदा मीरमानास्ते रामाया गोपदारकाः। | एक दिन काम नादि ग्माबाल श्रीकृष्णके साथ इससे यह स्पष्ट है कि भगवान्का समी कुछ बात होता है। इसी प्रकार या मास्तचोरीकी लीला मी म्यारत-दिम्य ही है। यदि भगवान्के निस्य परम घाममें ममिनरूपसे नित्य निमास करनेवाली निस्यसिका गोपियोंकी दृष्टिसे न देकर केवळ साधनसिमा गोपियोंकी रष्टिसे देखा जाय तो मी उनकी तपस्या इतनी फटोर थी, उनकी प्यासा इतनी मनम्प थी, उनका प्रेम इसना व्यापक पा और उनकी ख्यान इतनी सबी पी कि मक्ताम्फारतरु प्रेमरसमप भगवान् उनके अनुसार ठने मुम्म पाँचाने के लिये मासनचोरीकी लीय करके उनकी इनि पूजा प्रहण करें, चीरहरण करके उनका रहा-सहा य्यपधानका परदा उदय दें और रासटीय करके उनको दिन्य मुख पहुँचायें तो काई बड़ी बात नहीं है। भगवान्फी नित्यसिहा चिदानन्मयी गेपियोंके अतिरिक्त बहुत-सी ऐसी गोपियों और थी, जो अपनी महान् साधना के फलस्वरूप भगवान्की मुक्तनन माञ्छित सेवा करनेके श्येि गोपियोंके रूपमें अक्तीर्ण हुद पी । उनमें से कुछ पूर्वनन्मकी देक्का पाएँ पा, कुछ चुतियों पी, कुछ तपखी ऋषि थे और कुछ अन्य भक्तन । इनकी कपाएँ विभिन्न पुराणेमेिं मिटती है । मृतिरूपा गोपियों, जो 'नेति नेप्तिके द्वारा निरन्तर परमात्म्पका वर्णन करते गनेर भी उनें साक्षावरूपसे प्राप्त नहीं कर सकती, पोपियोंके साप भगवान्के दिम्प रसमय बिहारकी बात जानकर गोपियोंकी उपासना करती हैं और अन्तमें बर्य गोपीरूपमें परिणत होफर भगवान् भीषणको साक्षात् अपने प्रिफ्तमम्पसे प्राप्त करती हैं। इनमें मुख्य भुतियोंये नाम है---उद्गीता, सुनिता, कामगीता, करस्कण्ठिका और विपकी आदि । मगमान्के श्रीरामावतारमें उन्हें देखकर मुघ होनेवाले अपने आपको उनके सरूप-सौन्दर्यफ्र न्यौछावर पर देनेवाले सिद्ध ऋषिगण, निनकी प्रार्थनासे प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें गोपी होकर प्राप्त करनेका पर दिया था, जनमें गोपीरूपसे ववतीर्ण हुए थे। इसके अतिरिक्त मिमित्रकी गोपी, फोस्की गोपी, अपोप्याकी गोपी-- पुटिन्दगोपी, रमाबकुण्ठ, हवेतदीप भादिकी गोपियों बोर बालश्वरी गोपी आदि गोपियों के अनेकों यूप थे, किनको बही तपस्या करके भगवान्से परदान फकर गोपीरूपमें अवतीर्ग एनेका सामान्य प्राप्त हुआ प । पापुराणके पासप वार से ऐसे ऋपियोंका मन है, जिन्होंने बड़ी कठिन सफ्स्य आर फरक बनों कायों के बा- गोपीवलपको प्राप्त किया पा । उनमेंसे पुछके नाम निम्नलिखित है- १ एक उमापा नामक ऋषि थे। मे अग्निहोत्री भौर बड़े हाती घे। उनकी तपस्या अमृत पी । उन्होंने पञ्चदशाक्षरमन्प्रका नाप और रासोम्मत्त ममकिशोर श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका प्याम किया था । सो कापों- के बाद ये पुनन्दनामक पकी त्या 'सुनन्दा हुए । एक सत्पतपा मामके मुनि थे। सूत्रे पास एकर दशभरमश अप और श्रीराधाक दोनों एप पकाकर नापसे गए मीणश प्यान करते थे । दस सपके वार ये मुमदनामक गपकी पम्या 'मुमदा' हुए। ३ हरिभामा नामके एक अपि । निराहार एकर काम नसे युक्त शिक्षरी मत्रमा नगर पाते थे और मम्पपीनगर कोमसोमउ पत्तोषी शव्यापर लेटे हुए युगा-सरगमका प्यान परत ये । तीन पल्या पक्षात् में सारा मामक गोपा घर परवेगी' नाम्मे अवतीर्ग पर । १ वाचन मामरे एक महानी भी थे, उन्होंने एक पर गिर पनमें पिग्मे विधाते एप मार परत पड़ी बापड़ी देखी । टस पावरे पभिम टाम बहकमी सेमम्बिनी गुस्ती स्री पटो तनया फर दी दी। . . 'DD भीमद्भागवत [१०८ महसी एन्दर पी । चन्द्रमकी शुन्न किरणों के समान उसकी चांदनी चारों भोर छिटक ही थी । उसमा बायाँ बाप अपनी कमरपर पा और दाहिने आपसे कहानमुद्रा धारण किये हुए थी । भावशिके मसी नम्रताके साय कानेपर उस तापसीने बताया- प्रमविधामा पोगीन्द्रयो १ मृग्यते । साई परिपदाम्भोगकाम्पया सुतिरं सपा । प्रमानन्देन पूर्णाहं तेनामादेन दप्तधी पराम्पसिन पने पोरे भ्यायम्ती पुरुषोतमम् । ध्यापि शून्यमारमानं मम्पे रुप्मरति बिना। में कामविया हूँ, निसे बड़े-बड़े योगी सदा म परते हैं। में श्रीकृष्ण के चरणकमौकी प्राप्तिके क्रिये इस घोर वनमें उन पुरुषोत्तमा प्यान करती हुई दीर्घकासे तपस्या कर रही हूँ। मैं प्रमानन्से परिपूर्ण हूँ और मेरी पुद्धि भी उसी आमन्दसे परितृप्त है । परन्तु श्रीमणका प्रम मुझे बमी प्राप्त नहीं हुआ, इसरिये म अपनेको शूम्य देखती हूँ ।। समानी जामछिने उसके चरणोंपर गिरकर दीधा छ और फिर अभीपियोंमें विहरनेवाले भगवान्का प्यान करते हुए ये एक पैरसे सड़े होकर पड़ी फटोर तपस्या करते रहे । नौ पोके पद प्रचणनामक गोपके घर पे चित्रगन्धा के सपमें प्रफट गए। ५ फुयषननामक समर्षिके पुत्र शुविधवा वौर पुर्ण देवामन थे। उन्होंने शीर्षासन परके ही ईस मन्त्रका जाप करते हुए और सुन्दर कन्दर्प-सुस्य गोकुलवासी दस वर्षकी उनके भगवान् श्रीकृष्णका प्यान करते हुए घोर तपस्या की। कल्पके बाद वे ममें सुधीरनामक गोफ्के पर उत्पन्न हुए । इसी प्रकार और भी बहुत-सी गोपियों निमकी फसाएँ प्राप्त होती हैं, विस्तारमपसे उन सम्पा उस्लेम यहाँ नहीं किया गया । मगवान्के लिये इतनी तफ्स्प करके इतनी मानके साग कार्पोतफ साधना करके बिन त्यागी माध्यमियोंने गोपियोंका तन-मन प्राप्त किया , उनकी बमियया पूर्ण करनेके लिये, ठो भानन्द दान देनेके लिये यदि मगवान् उनकी मनचाही लीम करते हैं तो इसमें आधर्य धौर बनाधारकी कौन-सी बात है । रासलीला के प्रसङ्ग स्क्यं मगनान्ने प्रीगोपियोंसे कहा है- न पारपेऽई निषपसयुर्मा लसापुहर्त्य विद्युगपुणपि वा। पा माभमा पुगेश्यमाः सारथ्य तद वा प्रतियातु साधुन्ध । (१ ।१९।२२) गोरियो ! तुमने मेक और परमेकके सारे सपनों को काटकर मुमसे निष्कामा प्रम किया है। यदि हममेंसे प्रत्येकले रिम्ये ममा मग वमत कहतक चीक्न धारण करके हमारे प्रेमका मदम काना भार तो भी नहीं कर सकता । मैं मुम्हारा ऋणी र अणी ही रांग । तुम मुझे अपने सामुस्वभाबसे अगरहित मानकर और मी ऋणी बना दो। यही उत्तम है।" सर्वोकमहेनर भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं प्रिन मामगा गोपियों ने प्रणी राना चाहते हैं, उनकी इछ, हानेसे ही भगवान् पूर्ण कर दें या तो स्वाभाविक ही है। मन मिचारिये तो सही भीकनगाप्राणा, श्रीकृष्णरसमानितभनि गोपियोंकि मनकी क्या सिति की। गोपियोंका सन, मन, धन-सभी कुछ प्राणप्रियतम मीणा य । संसारमें नीती पी भीकरणके शिये, परमें राती पी श्रीकृष्णके लिये गौर करके सारे काम करती पी भीरुणके थ्येि । उमकी निर्म और योगार्मम परित्र मुछिमें श्रीकृष्णके सिवा कफ्ना कुछ पा ही नहीं । श्रीकृष्णके ये ही, श्रीकृष्णको पुरा पहुंचानेके लिये ही, भीकृष्णकी निन सामग्रीसे ही भीक्ष्णको पूनकर--भीमणको पुती देखकर ये मुसी होती थी । प्रात:काळ निवा टूटनेके सम्पसे लेकर रातको सोनेतक ये बो कुछ भी करती थी, सब भीमणकी प्रीति के लिये ही करती थी । पतिक र टनकी निदा मी भीडम्णमें ही होती दी। खप्न वीर सपनि दोमि ही में श्रीकृष्णकी मपुर मौर म०८) ८ शस्त सीन देससी और अनुभव करती यौ । रातको दही जमाते समय श्यामसुन्दरकी माधुरी छमिका प्यान करती सुई प्रेममपी प्रत्येक गोपी यह अमिनपा करती थी कि मेरा दही सुन्दर नमे, श्रीकृष्णके छिये उसे विग्रेकर में पहिया-सा और यहुस-सा मसन निकाः मोर उसे उतने ही ऊचे छीकेयर रमस, नितनेपर श्रीपणके हाय मासानीसे पहुँच सकें। सिर मेरे प्राणन श्रीकृष्ण अपने ससानोंको साप कर हँसते और क्रीडा करते हुए घरमें पदार्पण करें, माखन में और अपने सम्माओं और मंदरोंको स्टायें, आनन्दमें मत होकर मेरे बगनमें माचे और में किसी कोनेमें शिकार इस स्टीअको अपनी मासे देखकर जीवनको सफल करें और फिर मचानक ही परकर दयसे लगा लें। सूरदासनीमे गया है- मेवा ही मोहि माखन मानो मेवा पम्मान पतिप, मोहि नही अधिनाये। सम्बनी इक पाई मी, पुवत त्यम की बात । मब-मन बाति पार्नु भपने पर, देवी मावन सात । at बार मपनिक बिग में ही पानी । स्वास प्रमु वरमामी मालिनि-मन की बानी । एक दिन श्यामसुन्दर पर रहे पे, 'मैपण ! मुझे मारून भाता है। मेवा-परमानके रिये कहती है, परन्तु मुझे तो ये रुचते ही नहीं । यही पीछे एफ गोपी सही श्यामसुन्दरफी यात मुन रही पी । उसने मन-ही-मन कामना की--में कम इन्हें अपने घर प्रपन लाते देगी, ये मपानीके पास जाकर ठगे, सय में छिप रहूँगी " प्रमु तो वम्तमी है, गोपीके मनकी जान गये और उसके पर पहुंचे तपा उसके घरका मारून स्पकर उसे मुस दिया-गये श्याम मदि पाछिनि घर ।' उसे इतना भानन्द मा कि पहली न समायी । सूरदासनी गाते हैं- शी किति पाहि मममें री । पति सती परसर ते पायो पायो छ801 पुलकित रोम रोम गदगद मुन पानी कात मायामोमा मारि सो सहि समयी न सुमारे । तम पारा सिप एक हमारी हम तुम प प । प्रवास बाहि समिनि सौ रेपो म भनूप । मह सुशीसे बकर मनीमटी सिरने गी। भानन्द उसके उपमें समर नहीं रहा या सदलियोन पूछा-अरी, तसे कहीं कुछ पड़ा धन मिल गया क्या ? बह तो यह सुनकर और भी प्रेमविस हो गयी । उसस्त्र रोम-रोम विउ उय, पाह गद्गद हो गयी, मुंहसे बोधी नहीं निकी । सपियोंने कहा—'सम्धि ! एसी क्य मात है, में एनाती क्यों नहीं । हम्परे तो शरीर ही दो है, हमारा जी सो एक ही है-हम-तुम दोनों एक ही समय, हमसे घिरानेकी फोन-सी बात है ! तय उसके मुंहसे इतना ही निकम-'मैंने बान अनूए गए देय है। म पिन पाणी रूस गयी और प्रमके आँसू बहने लगे ! सभी गोपियोंकी यही दश पी। पर पर-पर प्रारी पर रात । रपि मान चोरी तो है ही Ae सना An खात . प्रम-बनिता पर मुलि मनापित, सपनामा मामबाव नप पारे मुग भरि गए। मनही मन भमिलाप पनि सबम पति पाप्पान । सूरदाम प्रभु भर में 2 री मात्र नाम । पातामुन संग सना मे चोरि मासन पर पति मरे भरण भीतर भरि पाइरति मोति विहार र गप पराए । और पनि भि भौति हरिकी माने भाम ।तर मामन wit, म भितमी पाम । कोर कति में पति पा र परी र पालि म बोधि भी म. लिवार । मूर मभुमिम पारन परतिनिधि तिर । गरिर रिधि मबारति पुप सुमार। रातो गरियाँ नाग नागा मान कार हानी बार दरपती । उनरा मन श्रीरणमें ला रहता । नकार गादी-जही दही मदत, माउन निशयर टीकार गनी, पहा प्रारधन नापा र म ा, इसरिय सर पाम प्रेस सरसे पास पी पाम बता भार सम्मुम्दसी प्रतिभा म्पकुर हाती समन-दी-मन सोचती-11 मात्र प्ररप्रियम क्यों नही माप । इतनी देर पो ! स्त्र भाग इस दासपा पर चित्र १७२ भीममागपत [अ०८ कष्णो मई भधितमानिति मात्रे न्यवेदयन् ॥३२॥ | खेल रहे थे। उन ध्येोंने मा पशोदाके पास बाकर पहा-महेयाने म्पिी खपी है.॥ २२ ॥ न करेंगे! क्य पात्र मेरे सर्पण किये गए इस सुच्छ मास्ना भोग लगाकर स्वयं मुखी होकर मुझे मस न देंगे। कहीं यशोदा मैपाने तो ठने नहीं रोक लिया। उनके घर तो नौ अस गौर है। मनकी क्या कमी है! मेरे घर तो ये क्या करके ही जाते हैं। इन्हीं विघारेमि बाँसू बहाती हुई गोपी क्षण-क्षणमें दौड़कर दरवाजेपर माती, अब बकर रास्की ओर देखती, ससियोंसे कती । एक-एक निमेष उसके रिये युगके समान हो पाता । ऐसी मान्यक्ती गोपियोंकी मनकामना माकन उनके घर पधारकर पूर्ण करते। सूरदासबीने गाया है- प्रथम श्री हरि माबोरी । बाणिनि मब इस पर पुरम, अपु म प्रयोरी मनमें रिचा व हरि प्रम पर-पर मवई मेक बनम दियौ मुम-परम, सब मावा बारें। नासम्म मुमति मोहि माने गोपिदि मिलि मुख मोग। दास प्रभु का प्रेम सौ पे मर मेग। अपने लिगमन प्रवासियोंको मुखी करनेके लिये ही तो भगवान् गोकुलमें पधारे थे । मारून तो नन्दकपके परपर फम न पा । सास असा गौएँ पी वे चाहे मितना खाते-एटासे । परन्तु घे तो केवल मन्दबाबाके ही नहीं, समी मनसियोंके अपने पे, समीको मुष्ट देना चाहते थे । गोपियोंकी लालसा पूरी करनेके किये ही वे उनके पर माते पौर मुरा-मुराकर मसन खसे । या पास्तवमें चोरी मही, यह तो गोपियोंकी पूजा-पातिका भगवान्के करा लीकार पा । मजकमाल भावाम् मळकी पूना स्वीकार कैसे न करें। मगवान्की इस दिम्पनील-मसनचोरीका रास्म म सामनेके करण । छ मेग इसे भादर्शक विपरीत पात्रते हैं। उन पहले समामा पारिये चोरी क्या वस्तु है, किसकी होती है और कौन करता है। पोरी उसे कहते हैं सब किसी दूसरेकी कोई चीन, उसकी इजके बिना, उसके गमनानमें भौर जागे भी पर जान न पाये-ऐसी इस रखकर ले ली जाती है। मगवान् श्रीकृष्ण गोपियोंके घरसे मान लेते ये उनकी असे, गोपियों के क्नजानौ महीउनकी बानमें, उनके देखते-देससे और भागे पनानेकी कोई बात ही नहीं-उनके सामने ही दोपवे पुए निकल माते थे। दूसरी मात मइपकी यह है कि संसारमें पा संसारके महर ऐसी कौन-सी वस्तु है, चो श्रीमगमान्की नहीं है और वे उसकी चोरी करते हैं। गोपियों का तो सर्वस्व श्रीमगधन्का वा ही, सारा भात् ही उनका है । वे मम, किसकी चोरी कर सकते है ! हो, चोर सो बास्तवमें थे मेग हैं, जो भगवान्की बसाको भपनी मानकर ममतप्रवासत्तिमें फंसे रहते हैं और दणके पात्र मनते है । उपयुक्त समी प्रष्टियोंसे यही सिब होता है कि माखनचोरी चोरी न पी, मगवान्की दिम्य म्पल पी । यसमें गोपियोंने प्रेमकी अविकतासे ही भगवानका प्रेममा नाम चोर रख दिया था, क्योंकि उनके पिच्चोर तो थेगी। नो मेग मावान् श्रीकृष्णको मगमान् नहीं म्पनते, पचपि उनै श्रीमशागकनमें वर्णित मगवान्की मनपर विचार करने को वधिकार नहीं है, परन्तु उनकी रहिसे भी इस प्रसङ्ग में कोई पापफिक्नक मास नहीं है। क्योंकि श्रीकृष्ण उस समय लाभग दो-तीन पके पन्चे थे वीर गोपिया क्पषिक स्नेहके कारण उनके ऐसे-ऐसे मधुर से देखना चाहती पी। माश्य है, इससे शंका करनेवागेको कुछ सत्तोप होगा। ननुमानप्रसाद पोदार *मद् मायके ख- १--भावान भीकम्पने विचार विमा वि मुत्तम पुर वावगुण ही गवारे मोर मागे बहुत-से रमेणी कर्म माने । सके पिये चोड़ा-सा रब मार। २-संतर-पहिलमें पपीच एक माम मा मोहै। भौतमने देखा कि माम्बा र मेरे साप मेस्से कमी कमी मपमान मी ठाम सखाप पाप बारग मारे ग यो मारिष बिससे पिण म परे। । ।

प्र.८] दशम स्कन्ध १७३ सा गृहीस्था करे रुष्णमपालम्य हितपिणी । हितैषिणी यशोगने श्रीकृष्णका हाप पा लिया । उस समप श्रीकृष्णकी ऑसे उरके मारे नाच रही पी + यशोदा भयसम्मान्तप्रेषणापमभापत ॥३३॥ यशोदा मैपाने सेंटकर कहा-॥३३॥ क्यों रे नास्ट ! तू बहुत पीठ हो गया है। दने अकेले में छिपकर निधी कमान्मदमदान्तात्मन् भवान् मधितवान् रहः । यो सायी ! देख तो तेरे दलके तेरे सस क्या कह रहे है। मेरे बड़े मैया मदाऊ मी तो उन्हींको भोरसे वदन्ति तापका घेते हमारास्तेऽप्रमोऽप्पयम् ॥३४॥ गही देहे ॥३०॥ भीकृष्ण उपाय भगवान् भीरुप्यने करा-मा । मैने मिही मही सपी । ये सब झूठ बक रहे हैं। यदि तुम इनकी नाई भविसबानम्म सर्वे मिथ्यामिसिनः । बात सच मानती हो तो मेरा मुँह तुम्हारे सामने ही है, पदि सस्पगिरस्तहि समई पक्ष्य मे सस्वम् ॥३५॥ तुम अपनी बॉोंसे देख मो' ॥ ३५ ॥ यशोगाबीने अटी बात । यदि ऐसा है, तो मुंह सोठ ।' गपे तहिम्पादेहीस्युक्तः स मगवान् हरिः। | माताके ऐसा करनेपर मगवान् श्रीकम्णने अपना मुंह सोल दिया है। पीशिव ! भगवान् श्रीकृष्णका ऐमर्य म्पादचाम्पारपर्यः क्रीडामनुबबालकः ॥३६॥' अमत है। केस छीलपके लिये ही मनुष्यके वाक १ याय करे पुत्रमुपा । 1- संस्कृत माषामें प्रवीको प्रसार मी प्रते हैं। मीणने सापा मम रस रोके ही जुन्न । मब रसा-राम भास्पारन कीं। ४-स मरवारमें पप्पीन वरना है। इसमये उस कुछ भपने मुस्स (मुलमें स्थित ) विनी (ोता ) पासे दान कर मेना चाहिये । ५-त्रामण पर मस्विक ममें समा रो मा मे अनुपैध संपर करनेके से कुछ राम कर्म मी करने भारिये । की सूचित करने के लिये मानो उन्होंने अपने मुसमें सिप हिरोको (दोता ) रसे मुफलिया । --पामे चिर मसग किया या मिट्टी सार उसी दवा की। ७-पहले गोपियोंच मावन साया पा उमाना देनेपर मिली लाली, मिसे मर साफ सप । ८--मापन पीकप्यके उदरमें पनपा टि-कोटि प्रमाणात जीव रय-माफ्पिोक परणी रम-ग्रास करने के लिये । म्याकुल रो रो मे । उनी भमिमान पूर्ण करने के लिये मगधन्ने मिट्टी लापी। ~भगवान् स्वर्य री भने मनोधीपरण-रम मुलकेशारा मने पसमें धारण करते हैं। १-छोटे गाण्ड समावसे ही मिहीसा लिया । • पर्याशायी बानटी यी कि इस दापने मिही खानेमें मापा की है। पोरन नापा मी पोर दी है। इसम्मेि उनोंने सपही पकड़ा। + मगवान् नेत्रमें सूर्य भौर समाध निवास है कि साधी है। सोने पेश 8 पन्त महा भीषण मिही लाना सीपर करेंगे कि मुकर गयेगे । म हमारा सम्म क्या है। इसी मारने परित करते हुए नो नेष पाने हो। +१-म् ! पिटी खाने के समय पे मुन्न भनी नाम से रो। मैंने तापी तो बने तापी रेत स्मो मुन्नमें सम्पूर्ण नि! २-भीरप्पने पार मिया कि उस दिन मेरे मुसमें दस देसर सबने मरने नेत्रलिये थे । माय मी मम ममा महलादग्या तर या भन्ने नै हो । इस विचारते मुस सोपा |

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भीमसागपत
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सातपदण्क्षे विश्वं जगत् मास्तु चर्सदिश । पने ॥ ३६ ॥ यशोदानीने देखा कि उनके मुंह
चर-अचर सम्पूर्ण जगत् विपम्पन है । माकाश (-
माद्रिदीपान्धिमूगोल समाय्यग्नीन्दुतारफम्॥३०॥
शून्य जिसमें किसीकी गति नहीं), दिशाएँ, पा
न्योतिम बल तेजो नभवान् वियदेव च । द्वीप और समुद्रोंके सहित सारी पृथ्वी, बहनेवाली बाबु
कारिकाणीन्द्रियाणि मनो मात्रा गुणात्रयः॥४८॥ | पैयुत, अम्नि, चन्द्रमा और सारों के साथ सम्पूर्ण म्योतिर्मत
चल, तेज, पपन, वियत् ( प्राणियों के पसने फिरनेका
एवद् विचित्रं सह जीवकाल
आकाश ), कारिक माहारके फर्य देवता, मन-पत्रिका
स्वभाषकर्मापयरियमेवम् ।
पवतमात्राएँ बौर तीनों गुण श्रीकृष्णके मुसमें दीस
फा ॥ ३७-३८ ।। पीक्षित् ! बीर, कस, समार
सुनोस्तनौ बीक्ष्य विदारितास्ये
कर्म, उनकी सना और शरीर भादिके बारा सिमिम्म
प्रर्ब सहारमानमवाप शाम् ॥३९॥ रूमि दीदनेपास्त्र यह सारा विचित्र संसार, सम्पूर्ण मन
और अपने आपको भी पशोदानीने भीमणके नरे से
किं स्वप्न एतदुत देवमाया
मुले हुए मुखमें देखा । वे पड़ी शामें पड़ गयीं ॥१९॥
किंवा मदीयो पठ मुदिमोह । घे सोचने लगी कि यह कोई सप्म है या भगवान्की
भयो भाप्पैव ममार्मकस
माया ! कहा मेरी मुदिमें ही तो कोई भम नहीं हो गया
है। सम्मप है, मेरे इस पाकर्म ही कोई कमत
यापनौस्पचिक मारमयोगः॥४०॥ योगसिदि हो ॥ १०॥ जो पिच, मन, कर्म और
अया पथारम वितर्फगोचरं
पणीके द्वारा क-ठीक तथा सुगमतासे अनुमानके रिस्प
| नहीं होते, यह सारा सि जिनके नामित है, जो इसके
चेतामनकर्मपचोभिरवसा ।
प्रेरक हैं और दिनकी सत्तासे ही इसकी प्रतीति होती
पदापर्य येन यता प्रतीयते
है, जिनका स्वरूप सर्पपा बचिप है—उन प्रमुको में
मुर्विमान्य प्रणमामि तद्पदम् ॥४१॥
प्रणाम करती हूँ ॥ ११ ॥ यह मैं हूँ और ये मेरे पनि
तथा यह मेरा का है, साप ही में मनरामकी समस्त
बई ममासी पविरेप मे मुठो सम्पतियों की स्वामिनी धर्मफनी है, ये गोदिया, गोप
व्रजेपरस्पासिलविधपा ससी।
और गोधन मेरे मधीन है-जिनकी मापासे मुझे इस
प्रकारकी कुमति घेरे हुए है, वे भगमन ही मेरे एकमात्र
गाप्पय गोपाः सहगोधनाम मे भाप में उन्हींकी पारणमें हूँ॥ १२ ॥ जग इस
प्रकार यशोदा माता धीक्षणका तल सम्झ गयी।
पन्मापपेत्य इमविः स म गणिः ॥४२॥ सर्वशक्तिमान् सर्मप्पापक प्रमुने वफ्नी पुत्रस्नेहमय
रस्य विदितसखायां गापिफायां सस्पर ।
वैष्णभी योगमायाका उनके इयमें संपार कर दिया ॥३॥
वैष्णनीं प्यतना मायां पुत्रस्नेहमयी पिस ॥४३॥ यशोदानीको तुरंत मह घना भूठ गयी । म्होंने वने
दुलारे सालका गोद में उठा लिया । जैसे पहले उनके
सपानष्टस्मृतिॉपीसाऽप्रोप्पारोमात्मवम् । ज्यमें प्रममा समुद्र माता रहता था, भैसे दी सिर
प्रादस्नामलिलादयाऽऽसीत् यथा पुरा ॥४४॥ उमाने या ॥ १७ ॥ सारे मेद, उपनिषद, साम्प,
पप्पा पारनिपक्षिय साम्प्पयागपसास्वतः।
योग और मकान जिनके माहसम्यका रित गगते
अपाते नहीं उन्हीं भगवान्पो यशोदात्री लामा पुत्र
उपगीपमानमाहारम्प हरि सामन्पवात्ममम् ॥४५॥ मनती दी ॥ १५ ॥

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१७६ श्रीमहागपत [२०९ अथ नवमोऽध्यायः भीरुप्मका मसम्से बांधा समा भी क सपाच भीशुकदेवजी कहते है-परीधित् । एक समा- एफदा गृहदासी' यशोदा नन्दगेरिनी । की बात है, नन्दरानी यशोदाजीने घरकी दासियोशे तो कर्मान्तनियुक्तासु निर्ममन्य स्वयं दधि ॥१॥ दूसरे काम लगा दिया और स्वयं ( अपने खसकने यानि यानीह गीवानि समालपारिवानि च। मारून सियनेके लिये) दही मपने मी ॥१॥ दधिनिर्मन्यने काले सरन्ती वान्पगायत ॥ २॥ वर्णन किया है, दधिमन्धनके समय वे उन सका मैंने हमसे जातक मगवान्की मिन-मिम धार-सीप्रवास धौम पासः प्रकटितटे स्मरण करती और गम्ती भी आती थी ॥२॥ विनती सूचन वे अपने स्थूळ कटिमागमे स्तसे बाँधकर रेशमी म्हंगा पुत्रस्नेहम्नुसहचपुरी पाने ए पी । उनक समिसे पुत्र स्नेहेकी अधिकटासे मारकम्प च मुम्। दूध घूम गा रहा था और वे कॉप भी रहे थे । नेती | सींचते रहने से बाद कुछ पक गयी थी। हार्पोके कान रमाकर्षभममुबचल और कानोंके कर्गल हिल रहे थे । मुंहपर पसीनेकी कडपो इमले च यूदै सडक रही थी। चोटीमें गुपे हुए मातीके एम्दर रिवर्मपत्र फारविगत- पुष गिरते जा रहे थे। सुन्दर माहाबाठी परदा इस न्मासती निर्ममन्य ॥३॥ प्रकार दही मप रही पा ॥३॥ १ बरामपि। •स पमहमें एक समपान तात्पर्य है कि मास । पुरापोंमें बसे पावरमा पते है। इन माग मवसरपर वासियोन सरे कामोमे ग बामा स्वामविक। मनमुक्तासु'–स परसे बानित हो चोदा मताने मन-हर वासियों को दूसरे सममें मप रिया । 'पोवा'-नाम मत करनेच ममिप्राय पाकिमपने विम पारसम्मप्रेमके म्पबारसे परधर्मणाम् भावान्को में प्रेमापीनवा मकवापताके भरप भपने मक सयो 11 बनेन काकीली । फ्यक नन्दके पात्ताप-प्रेमके भाम्पसे सविसर-परमानन्दस्वस्म श्रीमान् मनबनस्पमे मात्में मस्ती होकर बात के समको मानद प्रधान रहे हैं। मगर इस भपात परमानपत्र रसास्वादन कराने मम्दपाया ही कारण । मममी पर होनेसे बने रगेदिनी' मा गया है। खपी पाद गौमी' भौर स्व- पे दो पर इस बात के सूफाकिरषि-मपनकम उनके पोम्प नी । कर मी पुष-स्नाय भभिमासे या सोपान नि मेरे ममको मेरेशाका मासन ही मानवर्य ही रवि मप ग्री। +स रमेकमें मक्के सस्पस निस्पयो। परसे रषिमापनस्म काम से पायम स्मरमकी पाप मत प्रचारित ही पीपीमें बारम्परिश्रम संगत | भउके न, मन पास अपने पारेको सेवामें समान है। स्ना मम पापा सेबाके रूपमें ही मक ऐखा। स्नाके ही रिमसविरोष-मृत पौर मीत । पयोग मेपा- कबीकनमें इस समय मौर मेगोनो। + कमरमें रेशमी नगरोसे पर चा माई मर्यात् अनमें माम्स, प्रमार, मसयमानी ही सेवा- फर्मम पूरी पाता है। शमी सँगा इसीबिसे पाने किसी प्रपरमपविभताय गली के मरनवाले कुछ बापगा। मायादव रत-ए-ष सनके मुरमा मगजमा या बाहर हो या है। स्पामसुन्दर भावे उनी रमि परे मुहर पो मौर । पासे मातम मसार मुझे ही पी-पही उसकी मन्यो। उनके कापनेन मह उसे र महिनी मुत्तेमही पिणे।

..] १७७ पाखन्पकाम मासाय मप्नन्वी बननी हरि। उसी समय मवान् श्रीकृष्म वन पीनेके शिये दही | मपती भफ्नी माताके पास बाये। उहनि मपनी माताके गृहीस्था दधिमन्यानं न्यषेधत् प्रीतिमावरन् ॥ ४॥ इयमें प्रेम और आनन्दको और मी माते हुए दहीकी मपानी पका बतया उन्हें मनेसे रोक दिया | सममास्टमपापयत् स्तन श्रीकृष्ण माता पशफी गोदमें चढ़ गये । वास्तव्यम्नेहकी म्नास्लुतं समितमीपती पेरलम् । बक्रितासे उनके सनोंसे दूध तो स्वयं भर ही रहा था। वे उन्हें मिलने लगी और मन्द-मन्द मुसकानसे युक्त वनका मवतमस्तम्प बघेन सा पया मुख देख्ने टगी। इतनेमें ही दूसरी मोर अंगीठीपर पुत्सिम्यमाने पयसि त्वधिभिते । ५॥ रक्से हुए दूधमे उफान आया । उसे देशकर यशोदाजी उन्हें अतृप्त ही शेषकर नदीसे दूध उतारनेके छिये संघातकोपः स्फरिवारणार चली गयीं ॥ ५ ॥ इससे श्रीकृष्णको युछ क्रोध आ गया । उनके पाठ स्याल होठ फरफने लगे। उन्हें दाँतोंमे संदष्प दनिर्दधिमन्यभाजनम् । दबकर भीकृष्णने पास ही पाए देसे दहीका पवम् । २मा ।पर। पाप मोर गड मरनापर मैपाने पाई दे रहे हैं। सोश मेयाके हार्योके काम इसरिये संकार पनि पर रोक ये माब नहापोंमें यर पम्प हो कियेहाय भगवान्की सेवामें लगे हैं। और कुराह ययदा मैयाके मुखसे महा-गान सुनाम परमानन्दसे दिसते हुए धोने समस्या सूचना दे हैं । हाय पही पम्प १ बो भावान्की सेवा करें मोर पान वे कम्य है जिनमें मातान्के ठीय गुण-गानी मुपापारा प्रवेश करती रो । महार स्पेन मौर मावीके पुके मीचे गिरनेच पान माताको नहीं है। यह मार मौर पर भूम की है। मपया मारतीके पुप्प स्वर्य की पोरियस एफर घर पर कि ऐसी बास्सस्पमय माके परमि ही पना सौभाग्य है, हम सिरपर पनेके भविपरी नहीं। •समें साकी मुलस्मृति गाँसे रपिमम्पन भोर मुखसे सीमगान-पस प्रकार मन सन पान दीनामा भौरुप सप एवान संयोग होते ही भीकृष्ण साकर 'म-' पुकारने मगे । मक्कक भावान् भीरम माये हु-पसे पे। माझी स्नेह-साधनाने उने मा रिन । निर्गुनसे तगुप पुए, मचससे चल हुए, निमममे नकाम हुए. स्नेहके भूने-पासे मारे पास माये । सा ही मुन्दर नाम है-न्यकाम' ! मापन करते समय भर मेठी ठायीक पानी। वत्र मावान् सापन प्रेरणा देते हैं मनी पर मारप रते हैं परन्तु मयानी पार पाको रोग सिपा I ! मा तेरी माधना पूर्म हो गयी। रिट-पेपमरनेसे क्पा मम १ मर में मेरी सपनारा "नमें भरि मार नहीं द सना । म् प्रेमसे दस गपी-निहाल हो गयी-मेरा पाना मुझे इतना पाहता है। + मैया मना करती थी-भेला मालन किने । उ में त दूध पीऊँगा -दानों पापोंगे मेयाषी कर फार एक पाव पुरनेर रमना मोर गोइमें पद गपे । मनाए बरस पहा । मैया कप पिथने सरी स्यता मुसमाने लगे माले मुममनपर बम गी । यी पदम या ममिप्रय है कि मामा मैं उगर दंगगा मौर मेरी माल उसपर सम्मै मिमंगा सा मुन रंगा । खमने पाया गपन दूर गरम हो पाया। उसने सपा-नेहमपी मा पारा प सभी कम न गा पाममुमरी पान की पुसेगी नहरी ! उनमें परस्पर दी है । मैं ऐरा पुग-युगग म मरा सनमुरो पन्ठान र मनो पिये म्याकुर का नाम मर रहामा इन शेषनमे का माम मा भाग असम मारे। इसे मन्णम मौके अमने मागमें दूर परना। मके ने पहुँच गये । दपाउ माम भीरपा में मन न या में एक मोर रामर रोड़ पड़ी। मक्त मावन्धे एक भेर गपर रिपती पर रे । माग मक्ष दीप गये । परा मोहरप रहमे म्नामे उने पमी नृमि मी? । निग लग एप नाम । मा म २- भीमहागपत [.९ व भिवा मृपारंपदमना रहो मटका फोर-मार गाय, बनावटी बॉम बॉम मम छिये वौर दूसरे घरमें माकर स्केलेमें बसी मसन बषास हैमङ्गयमन्तरं गवः ॥६॥ स्ने को॥ ६ ॥ उचार्य गोपी सुमृत पयः पुनः परमेदाची बोटे र दूधको उतारकर फिर मपने प्रविश्य संरश्य च दध्यमत्रकम् । घरमें चली आयी । वहाँ देखनी है तो दहीका मटका (कम्बेरा ) टुको टुकड़े हो गया है। ये समय गी भय पिलोक्य म्वसुतस्य फर्म कि यह सम मेरे अषकी ही करवत है। साथ ही अहास सं चापि न तप पश्यती ॥७॥ उनें वहाँ म देखकर यशोदा माता इसने लगी ॥७॥ इधर-उधर इंपनेपर फ्ता पर कभीरण एक काटे उपस्वलालपरि व्यवस्थित र सलपर से है और छीकेपरका मामन से कर मर्काय काम ददर्स शिघि सितम् । बंदरोंको सूब लूटा रहे हैं। म्हें एमी डर है कि सार्व चौर्यविश्वहिरोषणं कहीं मेरी चोरी सुन माय, इसलिये चौकाने कर चारों भोर ताकते जाते हैं। यह देखकर पशोदारानी निरीक्ष्य पवाद सुतमागमग्छनैः ॥८॥ | पीछेसे धीरे-धीरे उनके पास जा पहुंची ॥ ८ ॥ वामाचयहिं प्रसमीक्ष्य सत्वर श्रीकृष्णने देस कि मेरी मा हापमें छपी किये मेरी ही स्ततोऽपरूमापसमार भीसवत् । ओर वा रही है, समरसे बोसठीपरसे द पो और • भीरपके होठ फाके । कोप होगेका स्पश पाकर स्वयं ऐ गया। स्म-म होठ कवेत श्वेत उपकी सम्मिोंसे वा दिये गये मानो सत्वगुष रखेगुणपर शासन र रह से प्रापण भत्रियो सिसा दे या हो । पा कोप स्वरा बपिमापन के मटकेपर । उसमें एक भमुर मा बैठा था । एम्मने मााम कोप और अप्ति के बाद मेरी बारी है। पा आँसू बनम्र भॊलोमें एक भावा । भीकरण मपने मकानों के प्रति मफ्नी ममताश्री पारा मेने के लिये पा-मा माय नही मनाते । ये काम कोष मेम और दम्म मी माग प्रम-संक प्राप्त करके वन्य रो गमे । भीषण परमें मुकर बामी मासम गटकने यो मानो माने दिला रोहों में कितना मूसा है। प्रेमी मौके पुरुषार्थ भगवान् नहीं है, भावान्की सेवा है। ये मगवान्की सेवा के लिये भगवान्न मी स्पाग कर सम्ने है । मैपाके माने पायो दुस हुमा या पागमा गाोध दूध भीरप्पके सिपे ही गरम हो या पा । योगी देरके पार ही उनको पिमाना या । वृष उफ्न पपगा वो मेरे ग भूले रोग-रोग, इसलिये माताने में नीचे उतारर म माम्म । + पोग माता के पास पहुँची । प्रेमका भात एएम | पुप्रने गोदसे स्पारकर उसरे पेबके प्रति बनी प्रीति क्यो । मानी जामीन प तो माना है यानी गावा नहीं है। परन्तु या दो च्य हुई गगोरे कसे पानित पागपा गसमा उप फिर मिसेप ! पनप यूप ममात सिम्मप प्रेममातम प-माने मावे रेलर पार्ममे स गया | मरे | भागमे रहनेका तस परके मैने माके स्नानदमें कितना पहा बिन राम । मोर मा मम्मा भानन्द मेरी रघरे मिये दोड़ी मा गरे। मुझे पिकार है । पूपा तम्मना और हो गया भोर पर वामभाने म्पानार बैठ गया। + म । म भम्नी गोमै मही ठाभागी तो समी गोदमे मा पेग्म-नही मेकर मानो भीरप पुरे गगो कर सरेठे उसार पुष मले ही सायकी मंगति मा २४ परंतु उनराधीस- बार बदम्ता नहीं है । जमर पेठकर भी ये पम्पो मानम पोरने स्यो । मम्भरा है रामासार प्रतियो हमारा मार उपएमा पा उमरे मारग भषय मभी-अभी कोप मा गया या उनमा मायभिचपरनेके सिपे। भीरणाने बोपानि पान परने साम्प । मे बेनके मलित मिन एमिन मिना पनि भारि मप्रमरक पेर नेत्र परम्नु प्रेमी नोंके समें गहरी र म्।। । -

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१८० भीमसागवत . . माता पदा बने न पान्सर्न पहिर्यस्स न पूर्व नापि वापरम् । चिसमें न बाहर है न मीतर, न वादि । पौर न क्त, जो जगत्के पहले भी थे, बदमें में पूर्वापरं पहिचान्तर्जगतो यो बगए यः॥१३॥ लंगे, इस जगत्के मीतर तो है ही, महरी रुमि में है, और तो क्या, जगदके रूपमें मी सर्य कही , . यही मही, नो समस्त इन्द्रियोंसे परे और अन्य !-- ने मस्वाऽऽरमबमष्पक्त मर्पलिङ्गमयोपनम् । ठन्हीं मगवान्को मनुष्यका-सा रूप धारण करके कारण पुत्र समझाकर यशोदारानी रस्सीसे असम केक गोपिकोखम्बले दाम्ना परन्ध प्राकस यथा ॥१४॥ वैसे ही बाँध देती है, जैसे कोई साधारण सा बलका हो ॥ १३१० ॥ तद दाम पप्यमानस्य वार्मकस्स तापसः । उममी और नटस्ट व्यको रस्सीसे देने नी, ता कह दो भैगुल छोटी पर गयी 11 दालोनमभूचेन संदधेऽन्यप गोपिका ॥१५॥ म्होंने दूसरी रस्सी कर इसमें बोगी ॥ १५ ॥ भीकृष्णका मेसाफ्न देखकर मैयाच एम म माया, मारसम्म-स्नोके समुद्र में म्बार मा गया । । सोचने मी-- छाम्म मस्पन्त र गमा है । कभी मेहनेपर पर भागकर वनमें घसा गया तो मोगा भटकसा किरेगा, मूला-प्यासा रहेछ । इसलिय थोड़ी देरवक गौभकर रस हैं। पूफ्-मासन तैयार होनेपर मना लूँगी । यही खेच-विचारकर मावाने बाँधनेम निकम दिया। बाँधनेमें बारस्त्यही हेतु था। भगवान्के ऐन महान दो प्रकार रोय है, एक तो स्वभारम प्राकृत योग्रे मोर दूसरा भागनके निल सिम प्रेमी परफरको । यद्योग मेवा मादि भावान्की स्कस्पभूता चिन्ममी भीरपके ममात नित्व सिर परिकर है। भगवान्के प्रति बास्सत्यम्मा णि प्रेम गादवाके भरण ही उनका ऐधर्म शान मभिमूव पाता है भन्यमा नमें माननी सम्बना ही नहीं है। इनमें स्थिति तुरीपारस्सा मनवा समाघिन मी मति मम करके साम प्रेममें राती है। प प्राध्य भवान, मोर रमोगुण भोर तमोगुणी तो बात ही क्या, प्रात सत्व में गति मत है। सम्मेि इनका मगन मी भगवानपी सीसामी मिरिक रिये उनी रीसायक्किमही एक सामरकिोष है। सभी एयम नासा रहती है पपता पेठना करम मही होता । भीरुप्पो हापमें भा मानेपर पोषण माताने पोमरी की दी-यह सर्वया स्वाभाविक है। मेरी तिमा पर मेरार मे मोटी पर री गमला केस महानि नहीं, इसे मी मातोसे मोमर पर देता है। परन्तु म फुछ छोरर मेरे पीछे दौड़ना मेरी प्राप्तिम खपा मैया परिसे हम पाती शिशा नही मिस्ती । मुर पागियोंगी भी पुरि नहीं का सम्ती परन्तु के रूप मोरसे मुंह म्हार मेरी मोर पोरता है, मैं उसी मुद्री माता । यही मेयर मावान् पणेशके हाथों को गर्म । • सम्में भीरकी स्पा बतायी गयी है। उपनिपदमि से समम पन है-माम मनपरम्भनन्तरम् भग्रामम् इस्पारि । पदी बध पर्चा भी सम्पपमें है। वांभिराम, सवशी वित, स्वामी, सोपान पर मत मादी परमेश मावारे प्रेमके गए पने सपा । स्पनरूर नेके परप सम्में ली प्रभारी भा-निपा मनोभिप भी मरी है। + या सिभी उपर मार म ठेके सिपे उससे बोपना दी उपित है। पाकिससच मषिक रोनम उममे मनमें उग दो सता है। प' ग म पार है कि हमने सारे पोरी ने माना है। रोनोगे रुपनयोम्प रेतर ही पोश मागाने दोनोधनेमा उपागरिया । 1 मप में माने ने ममा मारि गु ( गद्गुषों या रस्सिपो ) से भीमा पेट भरने मी भनी निस्पमुमाता रात वा भारिकरणोंगे मगगन माने पर पने लो।

१.९] पदाऽऽसीचदपि न्यून सेनान्यदपि संदधे । जब यह मी भेटी हो गयी, स्व ठसके साथ और जोपी । इस प्रकार के थ्यों-ज्यों रस्सी वदपि वपाल न्यून यद् यदारत मधनम् ॥१६॥ छाती और दोस्ती गयी, स्पों-स्पों जुझनेपर मी ये सब दो-दो अंगुळ छोटी पाती गयीं ॥ १६॥ यश्मेदा- | रानीने परकी सारी रस्सियों चोर राय, फिर भी वे एष खगेरदामानि यशोदा संदफ्त्यपि । । भगवान् श्रीकृष्णको न बाँध सकी। उनकी बसमयसापर | देसनेवाली गेपियों मुसकराने लगी और ये सयं मी गोपीनां सुमयन्तीनां सपन्ती विमिवाभवत् ॥१७॥ मुसकराती हुई वाचर्यचकित हो गयीं ॥ १७ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने देस कि मेरी माका शरीर पसीनेसे स्वमातुः स्थिमगाधापा निसस्तफवरनजः । उपपय हो गया है, 'चोटीमें गुयी हुइ मायएँ गर गयी • १ सकत-साहित्यमें गुण धम्के भनेक भयं । सगुण सत्व मावि गुम और रस्सी । सन मादि गुण भी भलिए पापनायक विमेनाथ भगवान सर्थ नहीं कर सकते । फिर पर छोरा-सा गुण (को विवेकी रस्सी ) उन से बाप क्या है। यही कारण है कि यहादा माती रस्मे पूरी नहीं पानी पी । २ संसारके विषम इन्द्रियाँधे ही वोपने में समर्प -विपिबन्ति इति विपा । मे दयमें खित मम्तयामी और स.पीने नहीं गॉप सम्वे । तब गएपक (इन्द्रियों या पोको पौधनेवाडी ) रस्सी या पति (इन्द्रों या गायों के स्वामी ) से पाँध सकती है। ३ वान्तके सिदान्तानुसार मध्यसमें ही पन्मन सेवा , अभिष्ठानमें नहीं । भगवान् भीरप्पन पर मनग्य- रेटि प्रमाणोच मशिन रे । उममें मम मान से से सस्ता है ? ४ मावान् निसले अफ्नी कृपाप्रसादपूर्व रिसे देल लेते हैं, वही दशके लिये बन्धनसे मुक होता है। मोदा मावा अपने हापम में रस्सी उठादी, उमीपर श्रीकृष्णकी रपि पा गाठी । वा स्वयं मुकदो पती फिर उसमें गाँठ कैसे माती। ५ सापक परि अपने गुणके द्वारा भावान्को पाना चाहे तो नही रिझा सकता । मानो सही समित करनेके सिम कमी गुण ( रस्मी ) मानके उदरको पूर्ण करने में समर्थ मही हुमा । रस्मी रोमगुरु राम क्यों इसपर प्रत:- १ भगभन्ने सोचा कि मैं सारस मकानों वर्णन देवा पर मेरे साप एकमात्र वस्पगुमसे सम्पपी पूर्ति होती है रर भोर तमसे नहीं । इससिपे उनोंने रस्सीम रो भैगुण कम करके माना मात्र प्रापिपा। २ उनाने विचार का नाम मौर स्म एते है वही बाभन भी देखा है। मुन्न परमारमा बबन मरम्ना से १ पर ये गानों ही नहीं । 0 मारुती कमीच पही पस्प है। परम उद्वार परना है। पीलिमा मस्ति बनेके लिये रस्सी से मंगुम म पर गपी। ४ भगवकासे रेसानुरगी मी मुझ से गली मैर मसा मी प्रेमसे कमाता है । यही में मात्र मुक्ति पने लिये रही दो कम हो गयी। ५ पणश माताने चोरी-पड़ी मनेने रस्सियों मध्य-महा भौर एक साप मी मापनकी कमरमें समायों, परन्तु मे पूरी म पहीं क्योकि भगवानमें पोटे-बरेका वर्ग मेद नहीं है । रसियाने मा-भगवान के समान मनम्बा ममादिता और विमुना मगमि नही है। इमलिये हमने पाँधनेची पात बंद करा | मपमा म मयों उमरमें समा बादी में से ही सारे गुण (मारी रस्सियों ) मनम्बगुग मायन्में लीन हो गये मना नम्मर को बेटे । यो से मार वितरने लिये रस्मियोंमें अंगुभकी न्यूनता हुई। मन-दी-मन सोनी पल्ली कमर मट्टीमर भी लिमी सेरो सप बी रम्मीमे पर नहीं पाय कम मात्र मी मेमे नही हो रपी एक गुम भी ऐये नही भी मि मी वाचतानी । माप र बार अंगुठी मी रखी है न तीनमे न पारधी, न एपी । पर गा मनि पमपर। - -- मैमासे मरे हुए भगवान् ०९] दपम फन्ध १७९ सं प्रद तमपिणी 1 गोप्यन्वधावन यमाप योगिनां रे हुएकी मति मागे । परीभित् ! म पागी तपस्यके द्वारा अपने मनको अत्यन्त सम्म और पुद धर्म प्रवेष्टु सुपसेरित मनः ॥९॥ नाश्त भी जिनमें प्रवेश नहीं पा राने, पानेकी बात तो दूर रही, उन्हीं भगवान के पीछ-पीछे उन्हें पाने मन्दश्चमाना जननी चल लिये यशोदाजी दौती॥॥ जय इस प्रकार माना यशदा श्रीकृष्ण के पीछे दौड़ने लगी, तम पुदी दरमें गोणीमराक्रान्सगतिः सुमभ्यमा । पापड़ एवं हिलते हुए नितम्बोंक पारण टनकी प3 धीमी पड़ गयी । घासे दौड़ने कारण पानीमी गोट जवेन विससितकेशपन्धन दीरी पर गयी। वे ज्यों-ज्यों आगे पढ़ती, पीपीछ घोटीमें गुप हुए घर गिरते जात । इस प्रकार मुन्दरी प्पुवप्रपनानुगति परामशत् ॥१०॥ यदा म्यों-त्यों करके उन्हें पर सरी ॥१०॥ श्रीकृष्णका हाप परपर ये उन्हें राने धमकाने लगी। रुवागम उस समय धीरन्गी धौनी पड़ी विशग हो रही पी। अपराध तो रिसा ही फा, इमरिये रगद रोफ्तार भी फपन्तमा मपिणी बपाणिना। म स्मती पी 1 हायोंसे अति मर रहे थे, इमरिये में पर पारसी स्पाही फै गयो दी। रिग्नेक मपमे उदीयमाण भयविहलेक्षण आप उपरपी बोर ठठ पदी पो, उनसे प्यावा चित होती थी ॥ ११ ॥ जा पोनीने दाग दस्ते गृहीत्या भिपपन्त्यवागुरत् ॥११॥ पिया पहन र गया है, सब उना पर्ने परमप्प स्ने उमप आपा । उन्होंने सभी से। इसके बार स्पस्वा यहिं मुतं भीस विनापार्मस्पस्सा। सोमानि इमाफ पार गस्तीगे पाना पागि (मदी सोपापी म्पग जापान)शित् !मासापो इयेप फिल से पपुं दानातवीर्पयोपिदा ॥१२॥ | मैपको अपने पापा पम पम ॥ १२ ॥ •मोर माप मगान १ । भागो एपो मतो मेरा गया परेपो दर पारे भनुर मार दम्न र मार लमु म मेरी दाम निरन रt frrt मार न ! मारकी पर मानी मारपप? ग मरो। +6 पनीर और नर नो Affer- SR 21. पारने पाहारी। +freef मारा गयो म rminor iran तरमतो मी 40-ARMEIre समे पाना Site for wो ना। सनी 14-१ र मेरो momentar bart 4न सी- मरrr1 मा-11 Airtetne Bhar. Erry tween IN Futtarra structur-ne ...। trangt u noge hrpetinireteras, rsTR १८० भीमद्भागवत [अ०९ माता पशोदा अपने न चान्तर्न पहिर्यस्स न पूर्ण नापि चापरम् । निसमें न पाहर है न मीतर, न मादि । और न पत्त, नो जगल्के पहले भी थे, बादमें मी पूर्वापरं परिमान्तर्जगतो यो बगप यः ॥१३॥ रहेंगे, इस जगत्के भीतर सो हैं ही, बाहरी रूमि मी १, और तो क्य, नगदक मपमें भी सय वही है, . यही नहीं, जो समस्त इन्द्रियोंसे परे और बम्पत है- मसाऽऽत्मममव्यक्तं मर्त्य लिङ्गमभोपनम् । उम्ही भगवान्को मनुष्यका-सा रूप धारण करनेके कारण पुत्र सम्भकर पश्मेदारानी रस्सीसे उसमें ठीक गोपिकोलूम्पले दाना परध प्राकव यथा ॥१४॥ वैसे ही याँध देती है, वैसे को साधारण-स्न बालका हो ॥ १३१९ ॥ जव सद्दाम पध्यमानस्य स्वार्मकस्य सागसः। उघी और नटस्ट लकेको रस्सीसे बोक्ने लगी, तब यह दो अंगुल छोटी पर गयी ! सप दघालानमभूसन मंदघेऽन्यप गोपिका ॥१५॥ उन्होंने दूसरी रस्सी स्कर उसमें बोली ॥ १५ ॥ भीरणका भोलापन देतार मेपाच प म माया, मासस्प-स्नोके समुद्र में मार मा गया । वे सोच्ने - मसा भास्पन्द र गया है। श्री छोड़नेपर पा मागर बनमें कम गया वो माँ की ममता मिरगा भूसा-प्पासा रोग । इमलिप पाड़ी देरतक बार रम । म मासन वैमार होनेपर मना गूंगी। मही खेच-विचारकर मावाने बोपने निम्न रियाबापने वात्सप्प दीपा। माग ऐश्वर्या अशान दो प्रकार होता है, एक यो समारण प्राव सोंग्रे मोर दृमा मावान्के निस्म सिद प्रेमी परिकरणो । यगदा मैया भारि मान्भी स्वस्मय किमयी मीसके मनात नित्य-सिर परिकर रे । मगवान्के प्रति पात्सपर विच प्रेमी गावाके भरण ही उनका ऐश्वर्य-शान मभिभूत हो जाता है मम्पपा उनमें मशानकी संम्पसना नदी तरी स्थिति तुरीमावस्सा अपना समाधिन भी अतिक्रमग करके पहम मममें राती है। मास भाना मा" रगेगुम और रामागुपये तो मारी या प्रकल यी मी गति नहीं है। इसलिये इनाम भान भी भगान्की सी पी मिदिरे रिये उनमे स्मयपतिपदी एक समस्परविशेष है। तभीगाएपमै मासा रतीरे मा वेदना हरा नहीं होता । भीरूप्यके आपमें आ जानेपर भगोरा मानाने नदी-पगमा स्वाभाविक है। मी मिशा अपन कोपर जेध मोरी पानुमाना रेषा मर्प सनिसरे ना मुझे भी भानोंमे भमस पर देय है। परम सत्र पुछ गर मेरे पीछे दोहना मेरी प्राप्ति हेतु सा मैनाके परितसे हम बाली बिगामी मिली। मुहा यागियों की मी पुटिनल पर सन्नी परतुन मोरसे मोरम मे भार ऐवा में रखना मी मा नापी मनर मागन् पोशों पये गये। •गरमें भी मम्सा सायी गयी है। उपनिपरमि मे समम पर्सनी-माप मनपर मनन्तरम् भरमन्नी भाउ पगे भी ना सम्पम्पमें है । पद नापियन राशी साना सान्तयामी, सयपान पर गौर मायणे । म प प्रेमो पपने यया है। ररपनन देने परम उनमें मी मप्रर भनी पर मोमिमी है। 1 पारिी पर रन पेठ इराके प्रिपे माटमे गापना ही निा माहितसा मरिक FOR उगम मनमें है। पर है गरेर परीपने नाम है। मोनोगे मनोग देतात -माने NATIपग किया। प. 7 मारे र ममा म ( ग मा रस्मिसो ) मे दम पर मरने " भनी AT TIE मरा मे भगान माने मारन मरने को। + १८१ दशम स्कन्ध . ૨ पदाऽऽसीत्तदपि न्यून तेनान्यदपि संदधे । जय षह भी छोटी हो गयी, तब उसके साप भौर नोपी । इस प्रकार के यो-यों रस्सी सदपि घालं न्यून यद् यहाइव पधनम् ॥१६॥ दो-दो अंगुल मेटी पड़ती गयी ॥ १६॥ यदा- प्रती धौर बोमती गयी, स्पों स्पों मुइनेपर भी वे सब एष नगेहदामानि पशोदा संदचत्यपि । रानीने परकी सारी रस्सियों नोड़ राय, फिर भी ये भगवान् श्रीकृष्णको न बाँध सकी । उनकी असमयसापर देखनेपाली गोपियों मुसकाने मी बौर वे खप भी गोपीनां सुमपन्तीना सयन्ती विमिसाभवत् ।।१७॥ मुसफरती हुई नाश्चर्यचकित हो गयीं ॥ १७ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने देश कि मेरी म्पका शरीर पसीनेसे खमातुः स्विमगाप्रापा विसस्तफावरस्रज । व्यपथ हो गया है, चोटीमें गुंथी पद मान्यएँ गिर गयी • १ संस्कृत साहिरयमें शुग' पदके भनेक भर्म । सगुण सत्म मादि गुप भौर रस्सी । सब, रम मादि गुण मी मशिष्ठ प्रमाणनायक निस्कीनाय भायन्का स्पर्श नहीं कर सबसे । फिर मा छोय-स गुण (को बितेकी रस्सी ) उनें से पाँच सवा है। यही कारण है यारोदा मावाली रस्सी पूरी नहीं पड़ी थी। संसारके विषय इन्द्रिोधे ही बॉबनेमें समर्थ है-विपिबन्ति इति विश्वाः । पे दस सित मम्वयामी भोर सही नहीं गौर सकते । तब गे-एमा ( इन्द्रियों या गायों को मापनेपान) रस्सी गा पति (इन्द्रयों पा गायो स्वामी ) से गोच सकती है। ३ वेदातर सिमान्तानुसार मध्पस में ही मन रोमा, भपिशनमें नहीं । भाषान् मीणा सदर मनन्त- कोटि प्रभाडोन मभिमान है। उसमें मया पवन से हे सस्ता है । ४ मावान् बिसने भपनी प्रसादपूर्ण रस्सेि देल सेसे हैं, नही दाके लिये मनसे मुल हो गता है। पपदा मासा मफ्ने पर्ने यो रस्सी उठाटी, उसीफर भीकृष्णकी रह पा माटी । मा स्वर्म मुक हो बली फिर उसमें गाँठ से माती। ५ो सापक यदि अपने गुणों के इरा मवान्को रिक्षामा पारे तो नही रमा ARI | मानो मी मित करने के लिये कई मी गुण ( रस्मी ) मगमानके उदर पूर्व में समर्थ न हुमा । + रस्सी रोमगुरु ही म पो दुईसपर प्रते- १ मगधन्ने मोगा कि सा मैं परम भकमनाचे दर्शन देखा है सब मेरे साप एकमात्र सरगुमसे दी सम्मपकी पूर्ति होती है, रय मोर तमसे नहीं । इखम्ये उनि रस्सी से भंगुस कम करके मना भाग मकमा। २ उनोंने विचार किया कियाँ नाम भौर कम होते हैं कमन मी देता है। मुझ परमारमा धनकी फरमा से १ या पाना ही नहीं । दो अंगुस ममीन पी ग्रस्त है। २ दो म पार करना है। पी क्रिया सूचित करने के लिये रस्सी से मगुरु मम पड़ गयी । ४ मापासे रेखानुस्मी मी मुक हो गया है और ममा मी प्रेमसे च बात है । पी बानो मार मुक्ति भनेके जिय रस्सी हो मंगुस कम हो गपी । ५ योदा मावाने छोटी-बड़ी मनेशे रस्सियों भमा-अम्मा भोर एक माप मी माझी मरमै आयो, मनु के पूरी न पड़ी मोति मावन्में छोटे-बोबा भई भेद नहीं है । रस्तिपनि मा-भगवान् के मान मनम्मा मनादित्य मोर पिमुता मटोमि नहीं है। इसलिये इनो गोपने बात बंद 40 | मपरा बेस मयों समुद्र में मा गाती है से ही सारे गुग ( मारी रस्मियों) मनन्तगुण मगग्रन्में लीन हो गये माना नाम समोठे । यसरी से मार सपित करने के लिये रस्मियामें से अंगुली म्यून हुई। + मन-ही-मन सोची-समर मुट्टीमर श्री मि मी मेरो राप मी रम्मीने पर मत बटा है।मर धिम्मात्र मी मी नहीं ली रस्मी एक भगुरु भी ऐये नही ली शिर मी ए पता नही । म भाभी है।रबार रो अंगुणी फी देती है न बनमे म पारमा म एपम । या मा मम्पनि पमत्पर है।

भीमद्भागवत [.. या परिश्रम रुपणरुपयाऽसीत् स्वपन्धने ॥१८॥ हैं और वे बहुत पफ भी गया है। वकमा फरके वे | स्वयं ही अपनी माके घनमें बँध गये ॥१८॥ एवं संदर्शिता भङ्ग हरिपा मृत्पपश्पता। परीक्षित ! मगवान् श्रीकृष्ण परम सतन्त्र। , इन्छ अदिफे साप का सम्पूर्ण जगत् उनके पशमें है। फिर भी इस प्रकार बकर उन्होंने संसारको यह बत स्वपशेनापि रुप्मेन पस्पेद सेपर पभे ॥१९॥ दिसाय दी कि मैं अपने प्रेमी मठोंके वश हैं ॥१९॥ . भगवान् भीकृष्णने स्प्रेचा कि कर माके हदयसे देस मबना दूर नही हो रही है, ता में मर्म मफ्नी भसाता क्यों मार करूँ। मुझे पर समझता है उसके म्पेि पर होना ही उचित है । इसलिये वे पंप गमे । २ मैं भपने मकर पोटे-से गुपये भी पूर्व र देता है पर सोषल मावान्ने भयादा महताके गुण ( रस्सी) प्रेमपने बॉमने भोम्म बना लिया। ५ वयपि मुझमें मनम्त, अधिस्म सम्मान गुण निगम रव है, क्यापि तक वे भपूरे दी यो । कारक मेरे भक्त मपने गुपोल मुहर उनपर नहीं पा देते । यही सेवार बोरा मैयाक गुणों (बालस्य, स्ले मावि मौर रमा) से मने पूोदर-मोवर-कना लिया। ४ मावान् भीकप्प इल्ने मापस लिभपने भकने प्रेम पुरा करनेवाध्म परिभम भी पन मही परसे है। वेभपने मकरे परिममसे मुह करने के लिये स्वयं ही पापन स्वीकार कर सेवे हैं। ५ भगधन्ने अपने मम्ममागमें वन स्वीकार कर पा सूचित किया कि मुझमें जयररिसे पन 0 नही सोको पस्ट भागे-पीछे, उपर-नीचे नहीं होती, केवल बीचमें मसती है, पर ही होती है । इस प्रपर , न्मन मी सका। ६ भगवान् फिसीकी शकि, सापन 4 घमपीसे नहीं पते । पोदाबीके रामो मामाघरो नपते देखकर पासपदोसकी बामिन सी हो गरी भौर ने भी–पणेवारी ! मी भार तो मुमरकी है मौर छोटी-सी ीिणी में स्न-एन रही। भव या इन्नी स्सिोसे नहीं पता मोबान पपा विपासाने इसके मसार कम्पन मिला ही नहीं है। इसम्येि भव तुम या उपोग हो। यशोदा मैमाने प्राचारे सन्या ऐ बय मौर गाँवमरी रस्सी क्यों न इसी करनी पो, पर मैंने इसे पॉपर मेरेगी । यशोदाबीका गाल पेसफर मावान्ने माना हठ मेष दिया क्योंकि बा मगवान् मोर मको ठमें विरोप घेता, पर्यों भकका से हट पूरा सेवा है। मालान् बिते तब का मकी पन देखकर पपरमय बते । भको भम और भगवान्की सम्र कम ही दो मेंगुकी कमी है। मथवा का भक मापार वो कि मैं मायाप एंगा कर मनसे एक म्गुरु पूर पर पाता है और मयार्थी माळ परनेपाछे मान् मी एक मंगुछ दूर हो जाते हैं। मपणेरा मावा पक गली स्नान गरीर पसीनसे सपपप हो गया र ममतामयी सर्व विपकनिी परम मास्वती मपाती मा राखिने मायके पद मासमके समान प्रक्ति र रिसा भौर स्वर प्रश्न ऐर उसने भगवान्की सप-सस्सिा भौर विमुखाने मन्तातिर दिया । इसीसे भामान् ध गरे । + पचपि भावान् सर्प परमेम । तथापि मम परमय होकर पंप बना परम पमरारी होने परप मावान्का भूपन ही पप नहीं । भारम्पराम इनाम मी भूल ना पूर्वप्रम हरेपर भी मतप्त पना पर सवलम्स सेनेपर भी शेष करना। स्वायम्प-शामीसे मुक्त होने मी पोरी ना मा यम मानिने मस देनेवाठे होनेपर मी गाना मोर मागना. मनसे में पीस गानेवाले होनेपर मी मावा पापों का ना मानन्दमय होनेपर मै दुली ऐना रोना सर्वमा नेम मी र माना-पर सप माथान्की लामाविक मकरास्ता है।रे मा भावान्को नहीं पाते हैं उनके सिम के इसन 3 उपग मी पखये भीकम भगवान्के रूपमें प्रचानवे । न हिये यह ममम्म पमतमरी पल भौर पर देखर-यनर उनका पति हेमता है, भक्रिोमो माबोर हो जाता है। भरे ! साधर प्रमु माने भको रापों उससमें पर हुए है।

न०९] षम स्कन्ध १८३ नेम पिरिन्दो न भयो न भीरप्यासंघया । ग्वामिनी यशोदाने मुक्तिदाता मुकुन्दसे बो कुछ पनिपमीप साप्रसाद प्राप्त किया पर प्रसाद ग्रमा पुत्र होनेपर भी, शर साध्य होनेपर मी चौर प्रसाद सेभिरे गोपी यचत् प्राप विमुक्तिदात् ॥२०॥ पक्ष सलपर विराममान छश्मी अर्धाङ्गिनी होनेपर भी न पा सके, न पा सके ॥ २०॥ यह प्रेषिकानन्दन भगवान् अनन्यप्रेमी मोंके लिये नाम मुस्तापोभगवान् देहिनां गोपिकासुतः । चितने मुलम हैं, उतने हामिमनी फर्मकाण्डी एवं तपक्षियोंको तथा अपने स्वरूपभूत बानियों के शानिना चात्मभूतानां यथा भक्तिमवामिह ॥२१॥ लिये भी नहीं है ॥२१॥ सम्मस्तु ग्राहस्पेषु पयार्या मासरि प्रमः। इसके बाद नन्दरानी यशोदाजी तो परक काम-धोम रममा गयी और उसमें रखे हुए मगधन् श्यामसुन्दरने मद्राधीदर्खनी पूर्व गुफो भनदात्मौ ॥२२॥ उन दोनों अर्जुन पोको मुक्ति देनेकी सोची, नो पहले यमान कुबेरके पुत्र थे ॥ २२ ॥ इनके नाम ये नछकर मौर मणिग्रीव । इनके पास धन, सौर्य पुरा नारदशापेन प्रक्षा प्रापितो मदाद । और ऐमर्यकी र्शता थी । इनका धर्म- देखकर ही देवर्षि नारदजीने इन्हें शाप दे दिया था और ये पक्ष नलारमणिग्रीमाविति स्पातौश्रियान्वितो॥२३॥ हो गये थे ॥ २३ ॥ पति श्रीमद्भागवते म्हापुरम्णे पारमहत्या संहितायां दशमस्कार ये वर्षि गोपीप्रसादो नाम नवमोऽध्याय ॥१॥ । पानीमयामुभूतमम्पो नाम । .इस पयको हीनो ममम मन्वय भिरेबिमाके साथ करना भारिप । न पा सके न पा मरे म पामरे। +शानी पुरुष भी भक्ति पर तो इन मुगुण मगवान्की माप्ति से मरती है, परन्तु बदी ठिनाईसे । सलमपे भगवान् सगुण है। निर्गुण प्रेमी से मिले। + समपार मी पपनमें पड़े हुए मझें मुसिको विन्धरना पुरषा नपा दोप्प है। सपोश माताश्री ररि मीकमसे हरम मेपर पड़ती है तप से मी कि मरेमे देखन मग । और ऐम्न अम मचाते 8 सीरि स्नी भोर मनीष भाये । रसिपे पूना शम्यानुर तृगापस माविध मम । मे प्रग्ने पक कुपेरके पुभ है इसलिये इनका मन नमम है । पे देवा गारक हाय रिसूत किये गरेर इसिये भागन्ने उनम मोर देता। (से पाले माडी प्रति रोपनी उम्र के लिये सय वर मी भान् गते ।

भीमसागवत [... अथ दशमोऽध्याय पममा नम्र व्यार रागोवा राजा परीक्षितने पम- भगान् । आप कृपया पह बताये कि नर और मणिग्रीको शप क्यों कप्यता भगवन्नेवघयोः वापस कारणम् । मिम । उन्होंने ऐसा कौन-सा निन्दित कर्म किया था, जिसके कारण परम शान्त देवर्षि नारदानीको भी शेष यच विगहित फम मेने या देवस्तमः ॥१॥ ना गया ॥१॥ भीशुक उपाय भीशुकदेवजीने कहा-परीक्षित ! नगर और मणिपीक ये दोनों एक तो नाम्पा कुबेरके माने स्द्रस्यानुपरी मृत्वा सुगौ धनदात्मयो। के थे और इसरे इनकी गिनती रो गयी समगवानक मनुवमि । इससे उनका परम गया। एक दिन लासोपाने रम्ये मन्दाकिन्यो मदोस्कटौ॥२॥ दोनों मन्दाकिनी के तटपर प्रसके रमणप्रय सफ्वनमें पारणी मदिरा पीकर मदोन्मतो गये थे। मशेके कारण पारुनी मदिरा पीस्वा मदापूर्णितलोचनी । उमकी बार धूम सी पी । पात-सी नियों उनके सप ग-बमारही थी। और ये पुर्पोसे लदे हुए क्नमें उनके साथ स्त्रीमनरलगायद्विश्वेरसु। पुप्पिते पने ॥ ३॥ मिशार कर रो पे ॥ २-३ ॥ उस समप गलागीमें पात-के- पात कमा लिए थे। वे सियोंके साप प्वलक मीनर अन्तः प्रविश्म गझयामम्भोगपनरामिनि । घुस गये और नैसे हापियोका बोका हमिनियोंक साप मष्कीग कर रहा हो, वैसे ही वे उम युवतिक साप विक्रीतुर्युवतिभिर्गमाविव करेमिः ॥ ४ ॥ | सह-तराकी कोरा करने लगे ॥ ॥ परीचित् । संयोग- पश तरसे परम समर्प देवर्षि नारदमी मा निकले । याप्छपा च देवर्षिर्मगस्तित्र कौरव । उन्होंने न पक्ष पुषकों को देस और समझ रिय कि ये इस समय मनवाले हो रहे ॥५॥ देवर्षि नारको अपश्पन्नारदो देवो धीवाणो समयुन्यत् ॥ ५॥ देशवर पसाहीन असराना गयी । शापक बरसे रस वीरिता देख्यो विरसा छापहिसार। होनि तो अपने-अपने क्याटफ्ट पहन मिये, परम्तु इन याने कसमे नही पहने ॥९॥ मम दवा मारद पासासि पर्यघुः शीघ्र विवस्रो नैव गुपको ॥ ६ ॥ जीने देस्स कि ये देवाओं के पुत्र होकर श्रीमदसे मे और मरिराफान परके उम्मत हो रहे हैं, तब उन्होंने सोन मदिरामचो भीमदाधी सुगरममौ । उनपर अनुप्ह करनेके ये शाप से ए या उपोरनुप्रताप शाप दाम्पनिद मगौ ॥७॥ कहा- ॥ ७ ॥ १ पेनानीय ।२ पावरपुष । •सरि मरदके शाप देने से पेपरने मनुमाउनके मन माश भरमा भौर लरा -भीम प्रालि पेन पीनला विमान देवर्षि नारने मम्मी नारिमे साबन मिया कि इनार मगाना ममुर नेणगीन मगगा मामे पाया नमार हो या नाप ऐष-सही।

ज०१०] दशम स्कन्ध १८५ नारद उपाय मारवजीने कहा-जो स्लेग अपने प्रिय विषयोंका सेक्न करते हैं, उनकी पुरिको सबसे कसकर नष्ट करनेवाला नपन्यो शुपतो जोप्यान् पुद्धिर्भधारजोगुणः। है श्रीमा-धन-सम्पतिका नशा । हिंसा वादि रजोगुणी फम और कुठीनता बादिका भभिमान भी उससे वायर मुभिशक नहीं है, क्योंकि श्रीमदके साप-साप तो श्रीमदादामिमात्पादिर्यत्र सी चूतमासषः ॥ ८॥ स्त्री, जूभा और मदिरा मी रहती है ॥ ८ ॥ ऐश्वर्यमद और श्रीमदसे धेि होकर अपनी इन्द्रियोंके पशमें रहनेवाले कर पुरुष अपने नाशवान् शरीरको सो अमर-अमर मान रपत पशयो पत्र निदरनितास्मभिः । बैठते है और अपने ही-जैसे शरीरवाले पशुओं की इत्पा करते हैं ॥ ९॥ जिस शरीरको 'भूदेवा नरदेव' 'देवा मन्ममानैरिमं देहमवगमृत्यु नवरम् ॥९॥ धादि नामोंसे पुकारते हैं उसकी अन्तमें क्या गति होगी। उसमें कीड़ पर मायेंगे, पक्षी सफर उसे विख पना देंगे या यह जलकर रामा ठेर पन जायगा । उसी देवसचिवमप्पन्वे कमिनिर्भमसंवितम् । | शरीरके लिये प्राणियोंसे द्रोह करनेमें मनुष्य अपना कौन सा स्वार्थ समझता है। ऐसा करनेसे तो उसे नरफकी ही प्राप्ति होगी ॥ १०॥ यतःप्रषो तो सही, यह शरीर भूतप्वक् वत्कृते स्वार्थ किं घेद निरयो यतः ॥१०॥ किसकी सम्पत्ति है ! अन देकर पानेवाले की है या गर्भाधान करानेवाले पिताकी ! यह शरीर ठसे नौ महीने फेटमें रखनाली माताका है अपना मात्पको भी पैदा देह किममदाता स्व निपेतुर्मातुरेप छ । करनेवाले मानाका ' मो कम्पान् फुरुप कर्शक इससे फाम करा लेता है, उसका पिया दाम देकर सारी मातु:पिसुर्वा पलिनः ऋतुरग्नेः नोऽपि वा ॥११॥ लेनेवालेका । चिताकी मिस व्यक्ती भागमें यह बल नायग, उसका विषमा यो कुचे-स्थर सको धीय-धीय- एवं साधारण देहमम्पकप्रभवाप्ययम् । कर स जानेकी माशा लगाये बैठे है, उनका ॥११॥ यह शरीर एक साधारण सी वस्तु है। प्रतिसे पैदा होता है और उसीमें समा जाता है। ऐसी स्पिनिमें मूर्व कोविद्वानात्मसात् कृत्वा हन्ति बन्तनतेऽसत ॥१२॥ पटुओं के सिवा और ऐसा कौन युम्मिन् । नो इसको अपना भारमा मनकर दूसरोंको पर पहुँचायेगा, उनके असतः भीमदाधस दारिद्रयं परमञ्जनम् । प्राण स्गा ॥ १२ ॥ जो दुष्ट धीम से अंधे हो रहे है, । उनकी मामि स्याति गलने के लिये दरिद्रता ही सबसे बड़ा अमन है। क्योंकि दरिद्र पर देख सकता है कि मात्मौपम्पेन मूतानि दरिद्रः परमीझते ॥१३॥ दूसरे प्राणी भी मेरे ही-जैसे हैं ॥ १३ ॥ जिसके शरीर में एक वार काँटा गा जाता है, द नहीं चाहता कि पिसी भी प्राणीको काँटा गानेकी पीडा सहनी पड़े, पया फटफविदामन्तोर्नेम्छतिापपाम् । क्योंकि उस पीका वीर उसके द्वारा होनेवाले विकारोंसे १ मुर्गा बसिमोडने पनो । म 8 २४- श्रीमद्भागवत [अ०१० बीवसाम्य गतो लिगर्न तथाविकप्टकः ॥१४॥, वह समझता है कि दूसरेको मी वैसी ही पीला होती है। परन्तु बिसे कमी पाँटा गया ही नहीं, ना उसकी दरिद्रो निरईसम्मो सकः सर्वमदरिद । पीपाका अनुमान नहीं कर सकता ॥ ११ ॥ दरिद्रम धर्मर और हेकली नहीं होती, प सम तबके मदोंसे फस्ट याच्छयाऽऽमोति तदिवस परं तपः॥१५॥ मचा रहता है । परिक दैववश उसे प्नो का उठाना परत है, वह उसके लिये एक पत वी तपस्या भी है ॥१५॥ नित्य क्षुरधामदेहस दरिद्रस्सामकाशिनः । विसे प्रतिदिन मोमनके लिये धन्न मुटाना पड़ता है, मूस- से विसका शरीर दुक्म-पता हो गया है, उस दरिखकी इन्धियों मी अधिक विश्य नहीं भोगना घाइती, सूर इन्द्रिपाम्पनुमुप्पन्ति हिंसापि विनिपर्तते ॥१६॥ जाती है और फिर वह अपने भोगोंके लिये दूसरे प्राणियों- को सताता नहीं उनकी हिंसा नहीं करता ॥ १६ ॥ दरिद्रस्यैष पुन्यन्ते साधा समदर्शिनः । यापि साधु पुरुष समदर्शी होते हैं, फिर भी उनका समगम दरिद्रफे म्येि ही मुरुम है। स्पोंकि उसके मोग सद्भिःषिणोसि सवतव माराव विशुद्धपति॥१७॥ | सो पहलेसे ही छठे हुए हैं । अब संवोंके सासे उसकी लम्सा-कृष्णा भी मिट जाती है और शीघ्र ही उसका साधूना समचिचाना मुकुन्दचरगैपिणाम् । यस्तकरण शुद्ध हो जाता है. ॥१७॥ जिन म्हाम - के वित्तमें सबके लिये समता है, जो केउ मगलान्के चरणारविन्दोंका मकरम्द-रस पीनेके म्पेि सदा स्मक उपेक्ष्यः कि भनस्वम्मैरसहिरसदाश्रयैः ॥१८॥ रहते हैं, म्हें दुर्गों के समाने भपया दुराचारियोंकी बीपिका चमनताले और धनके मासे मावाले दुणेकी सदह मचयोर्माम्या पारम्पा श्रीमदा धयोः । स्या वावश्यकता है तो उनकी उपेमाके ही पात्र ॥ १८ ॥ ये दोनों पक्ष पारगी मरिराफा पान करके मनाले बौर श्रीम से अंधे हो रहे हैं। वफ्नी तमाम हरिप्पामि रमपोरमितास्मनोः ॥१९॥ इन्द्रियोंके नवीन रानेअसे इन सी-स्टम्पट पोका मान बनित मद में चूर चूर कर दूंग ॥ १९ ॥ देखो तो यदिमी लाकपालस्य पुत्रौ मस्या समाप्ती । सही, कितना अनर्थ है कि ये कपाल फुमेरफे पुत्र घनेर मी मदोन्मत्त होकर वचेत होरो हे पोर इनको न विनाममात्मानं विमानीतः सुदुर्मदौ ॥२०॥ | इस मतका मी फ्ता मही है कि हम बिल्कुल नंग-रंग निप्प । - • पनी पुरुषमें तीन रोप होते हैं-पन पना भमिमान मौर बनी तृप्पा । रणि पुरुषमें पास ये मही ऐसे यम बीसवारी स यता है। इसलिये म्पुरगों से भनधी तृष्य मिर बानेम बनिरोगी मपे उन्म पीर पिन पर एक पार।बत स्वपमें मानसिनेमे फेर मर गप उमसे भपि भमा मामनेयास्म पर और परम पारदम लेना रकमान । मागन् भी पसे-मिर म मनुमा पला उगम पन छीन म सरगुल मापा त्रिपोंकी उम्प पते है।

क.१०] दशम स्कन्ध मतोता सावरवा स्याता नैष पथा पुनः । हैं॥२०॥ इसलिये ये दोनों का सपोनिमें जानेके योम्य हैं। ऐसा होने से इन्हें फिर इस प्रकारका अभिमान स्मृतिः सा मत्प्रसादेन तत्रापि मदनुग्रहात् ॥२१॥ न होगा। वक्षयोनिमें ज्यनेर भी मेरी कृयासे हमें वासुदेवस्य सानिध्य लम्ब्या दिष्परच्यते । भगवान्की स्मृति पनी रहेगी और मेरे अनुमहसे देता- नोंके सौ वर्ष बीतनेर इनें भगवान् श्रीकृष्णका प्रचे वर्लोका भूगो लम्धमकी भविष्यतः ॥२२॥ सान्निध्य प्राप्त होगा, और फिर भगवान्के चरम परम प्रेम प्राप्त करके ये अपने कमें चले आयेंगे।। २१२२॥ श्रीशुक उषाच भीशुक्वेषणी कहते हैं-देवर्यि नारद इस प्रकार एषाक्स्वा स देवपिंर्गतो नारायणाभमम् । करकर मगवान् मर-नारायणके माधमपर चले गये नल- कर और मणिग्रीक—ये दोनों एक ही साप भर्जुन पक्ष नलपरमणिग्रोषागाससुर्यमलार्जुनौ ॥२३॥ होकर यमार्जुन नामसे प्रतिम हर || २३ ॥ मान् श्रीकृष्णने अपने परम प्रेमी मक देवर्षि नारदमीकी पात अर्भागपतमल्पस सस्पं फर्मु पचो हरिः । सस्य करनेके लिये धीरे-धीरे उम्प घसीटते हुए उस खगाम घनकैस्तत्र यत्रास्ता यमलार्जुनौ ॥२४॥ ओर प्रस्थान पित्या, विधर यमगर्बुन पक्ष थे ॥ २० ॥ भगवान्ने सोचा कि देवर्षि नारद मेरे सस्यन्त प्यारे हैं देवपिमें प्रियतमो यदिमौ भनदात्मजौ । और ये दोनों मी मेरे मळ फुकेरके छाके हैं। इसक्रिय म्हारमा नारदने को कुछ कहा है, उसे में ठीक उसी तथा साधपिप्पामि यद्गीसंत महात्मना ॥२५॥ | रूपमें पूरा करेगा ॥२५॥ यह विचार करके भगवान् इत्पन्तरणार्डनयोः कृष्णस्तु यमयोर्ययो । श्रीकृष्ण दोनों शोंके मीचमें घुस गये है। वे तो दूसरी भोर निकल गये, परन्तु उस टेड़ा होकर भक आत्मनिर्षेशमात्रेण तिर्यग्गसमस्खलम् ।।२६॥ गया ॥ २६ ॥ दामोदर भगवान् श्रीकृष्णको कम्मरमें रस्सी पालेन निष्कर्षयतान्वगुलवल तद् फसीईपी । म्होंने अपने पीछे सफसे हुए अपन- को ज्यों ही तनिक नोरसे सींचा, स्यों ही पोंकी सारी दामोदरेण सरसोत्कलिताधिवधौ । नरें ठहर गयी ६ । समत यम्-यिक्रमके पन्द्र निप्पेवतुः परमपिकमिसाविषेप भगवान्का तनिक-सा जोर लगते ही पेड़ों के सने, शाम्बरें, छोटी-छोटी गरियो भौर एक-एफ पचे काप उठे वीर में स्कन्धप्रपालविटपोफतघणशम्दो॥२७॥ दोनों वह बोरसे तड़तड़ाते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥२७॥ १ पाचवमा ११ स एममुक्ला देव ।। वसूलम् । ४ बस्तिो । ०१ पार-वरदानसे तपस्या भीम होती है। नमपरममिमीन प्राप देने पमात् नर-नारापा-माधमकी मामा परने या अभिप्राय है कि फिरसे सर मनपर लिया जाय । २ मैने योर हो भनुमा दिया है पर बिना वसा के पूर्व नहीं ऐ राक्या है, इसलिये । ३ माने अराम्यदेव एवं गुरुप नारायपके सम्मुत मम्ना काय मिरन करने के लिये । + मगान् भीष्म मपनी पारप्रिम उनें मुरमाते थे । परनु सा पास गाने मरण पालि बनि नाररने पाया कि नामुषमा सामिप्य माप्त रोगा । के बीनमें बने। भाप मगान् शिमरे मनशमें योग परने । ठमोरीम्नमें जमा मेला भी न रता । मीनर प्रास्ये मिना दोनोम एक साप हार भी रेसे हय । इस मगानो गुन ( माफ बार मा गुल पा रस्मी ) से या हमारे पागल ( पशु-पनी पा रेदी बागाय)री को न दो-दोरा बार मना है। पाने मनुरापमा पाम सिना पयस्सर होता है उना ममे सयमे मते । मानो परी चार मने पीछे-पीछे पसनेमा सत्तारा मन पसार पराया।

१८८ श्रीमागपत [२०१० खर मिया परमया फझमः स्फरन्तो तेन दोनों वृक्षोमसे मम्निके समान तेरखी दो सिस पुरुप निकले । उनके चमचमाते हुए सौन्दर्यसे दिशाएं सिवायुपेत्य इजमोरिष बासयेदाः। दमक उठा। उन्होंने सम्पूर्ण लोंके खामी मगमन् फण प्रणम्प शिरसाखिललोकनार्य श्रीकृष्णके पास भाकर उनके घरों में सिम रसकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर शुख पदयसे वे उनकी इस पदान्जली विरवसामिदम्पतुः स ॥२८॥ प्रकार स्तुति करने लो-॥ २८ ॥ रुग्ण सम्म महायोगिस्समापः पुरुपः पर।। उन्होंने कहा–समिशनम्दफ्तसरूप! सपको अपनी मोर साफर्पित करनेवाले परम योगेधर श्रीकृष्ण । आप म्यताम्यसमिद विश्वरूपं ते प्रामणा विदुः ॥२९॥ प्रकृतिसे अतीत स्वयं पुस्मोत्तम हैं । वेदश सामण यह बात बामसे है कि पहम्पत और सम्यक सम्पूर्ण जगत्वाकाही त्वमेका सम पूतानां देहाखात्मेन्द्रिये परः । रूप है ॥ २९ ॥ भाप हीसमस्त प्राणियोंकि शरीर, प्राण, पत्त करण और इदियोंकि स्वामी है। तप ताप ही स्वमेघ कालो भगवान् विष्णुरम्पय ईपरः ॥३०॥ सर्वशक्तिमान् काठ, सवष्यपक एवं अविनाशी ईश्वर है॥ ३० ॥ आप ही महत्त्व वौर का प्रति है, जो स्व महान् प्ररुतिः सूक्ष्मारमासवतमोमयी। भरफ्त सूक्ष्म एव सत्वगुण, रजोगुण और सगुणरूपा लाप ही समस्त स्पू और सूक्ष्म शरीरों के फर्म, रखमेम पुरुषोऽध्ययः सर्पक्षेत्रविकारविद ॥३१॥ भाव, धर्म और सत्ताको माननेवाले सबके साधी परमश्मा है॥३१॥ इतियोंसे प्रहण किये जाने वाले प्रातिके गृममार्गस्त्वमग्रामो विकारैः प्राकसैर्गुणै । गणों और विकारों के द्वारा आप पारमें नहीं पा सकते। स्पूल और सूक्ष्म शरीरके वारणसे ढका हुआ ऐसा कौन फान्विहाईति विनातुं प्रासिद गुणसातः॥३२॥ सा पुरुष है, जो आपको जान सके । क्योंकि आप तो उन शरीरोंके पहले मी एकरस विधमान पे ॥३२॥ सम्म तुम्पं भगपते वासुदेवाय पपसे । समस्त प्रपत्रके विषता मगवान् वासुदेवको हम ममस्कार परते हैं। प्रमो ! भापके हारा प्रकाशित होनेवाले गुणोंसे आरमया गुणरछममहिम्ने प्रमाण नमः ॥३शा री बापने वपनी महिमा छिपा रही है । परामसरप भीकृष्ण । हम आपको नमस्कार करते है ॥ ३॥ यम्पावतारा मायन्ते परीरप्पशरीरिणः । माप प्रास्त शरीरसे रहित हैं। फिर भी जब आप ऐसे परामाम प्रकर करते हैं, जो साधारण शरीरधारियोंक सम्नतिपातिशपर्वीपमग रिये शस्य नहीं है और जिनसे माफर तो क्या जिनषे ॥३४॥ समान मी काई महीं कर सकता, तब उनके द्वारा उन म भान मवमासम्म भषाप रिभषाप च । शरीराम आपके भतारों पत्त पर जात॥३०॥ प्रभा | आप ही समस्त लोकों के अभ्युप और निये भरतीगा भागन माम्प्रत पतिराविषाम् ॥३५॥ पम रिये इस समय अग्नी सम्पूर्ण "रियोंसे अतीर्ण ।

ब०१०] दशम स्कन्ध १८९ नमस्कार गोका वर्णन नमः परमकल्पाग नमः परममाल । हर है । माप समस्त अमिष्टाषाओंको पूर्ण करनेवाले हैं ॥ ३५ ॥ परम कल्याण ( साप्प) स्वरूप ! आपको वासुदेवाय शान्ताय यदूर्ना पतये नम ॥३६॥ नमस्कार । परम माळ ( सघन ) खरूप आपको है । परम शान्त, सबके हृदय में बिहार करनेवाले मनुबानीहि नौ मर्मस्तवानुपरकिंफरौ। यदुशशिरोमणि भीष्णको नमस्कार है ॥ २६ ॥ दर्शनं नौ मगपत श्वपेरासीदनुग्रहात् ॥३७॥ अनन्त ! हम भापके दासानुदास हैं। आप यह स्वीकार कीजिये । देवर्षि मागन् नारदके परम अनुगइसे ही हम पाणी गुणानुरुधने अवगौ पायां मपरावियोंको आपका दर्शन प्राप्त हुआ है ॥ ३७॥ प्रभो! हमारी वाणी आपके मङ्गलमय इस्तौ च कर्मसु मनस्तष पादयोः । करती रहे। हमारे फान भापकी रसमयी फमामें लगे रहें। हमारे हाप आपकी सेवामै और मन आपके चरण कमलों स्मृरयो शिरस्तष निवासजगत्प्रणाम की स्पतिमें रम जाय । यह सम्पूर्ण जगत् आपका निवास- स्मान है । हमारा मस्तक सबके सामने झुका रहे । संत दृष्टि सतादर्शनेऽस्तु भवचननाम् ॥३८॥ आपके प्रत्यक्ष शरीर है। हम्मरी आँखें उनके दशन करती ॥ ३८॥ मीशुक उवाच भीशुकदेयमी कहते हैं-सौन्दर्य-माघुपनिधि इथं संकीर्तितस्ताम्पा भगवान् गोकलेपर। | गोकुलेभर श्रीकृष्णाने मलमूबर और मणिग्रीवके इस प्रकार स्तुति करनेर रस्सीसे उन्हमें मने घे ही ससे एक दाम्ना चोलखले पदः प्रहसमाह गुसको ॥३९॥ | उनसे पहा॥ ३९ ॥ मीभगवामुवाप भीभगवान्ने कहा-समस्लेग धीमासे अवे हो रहे सावं मम पुरैधैवापिणा करुणारमना । मे । में पहटेसे ही यह बात जानता था कि परम फारुणिक देवर्षि माग्दने दाप देकर तुम्हारा ऐपर्य मष्ट यशीमदान्धयोपोम्मिर्षिभ्रंशाऽनुग्रहः कृतः॥४०॥ पर रिया तण इस प्रकार तुम्हारे ऊपर क्या की ।।१०॥ जिनकी पुदि समदर्शिनी है और प पूर्णम्पसे मेरे सानो समचिधानां मुसरां मतवात्मनाम् । प्रति समर्पित है, उन साधु पुरुषों के दधानसे श्वन होना टीक से ही सम्भय नहीं है, जैसे सूर्पोप होनेपर दर्शनानो भक्त्या पुंसोऽभ्णाः सवितुर्यथा॥४१॥ मनुष्य के नेत्रों के सामने अन्धकारका होना ॥ १॥ इसलिये नबर पोर मणिग्रीव ' तुमग वा गरछसं मस्परमा नलसर सादनम् । हापर अपने-आने घर जाना । मुमग्रेगोंको मसारचप्रमे सुसनेवाले अन्य मक्किमावी, जो तुम्हें अभीर, सातोमपि भावोधामीसितः परमोऽभव ||१२|| प्राप्ति हो गयी है ॥ १२ ॥ परायण १ ममम्ने विमम ।।२ ने भगाममातु। ३ न। •in में मुफ का भौर पर र मरीति परल । मर में और मुझ और मेरी सुन र है। पर दिया रेगन मगधन्धेरीमा गपी।

१९० भीमद्भागवत [.११ श्रीमुक उवाच श्रीशुकदेवजी कहते हैं-अब मतान्ने इस प्रकार कहा, तब उन दोनोंने उनकी परिक्रमा की वीर बार-बार इत्युक्तो वो परिझम्म प्रणम्प च पुनः पुनः । प्रणाम किया । इसके बाद उसमें वे ए सर्वेककी मान प्राप्त करके उन अोंने उत्तर दिशाकी का पदोलसलमामन्य जग्मतुर्दिषपचराम् ॥४३॥' की ॥ १३ ॥ इति श्रीमहागवते म्हापुराणे पारमइस्मा संहितम्या दशमस्कर प्रवर्षि नारदशापो नाम दशमोऽध्याय ॥ १० ॥ अकादशोऽध्याय - गोकुमसे पदापन सामा तम पस्सासुर मौर बकासुरका सवार पीक उमाप भीशुम्वेवमी कहते हैं-परीधित् ! पक्षों के गिरनेसे गोपा नन्दादयः भुला दुमयोः पतसो खम् । चो मपार शम्दाला पा, उसे नन्दपाया थादि गोपोने भी मुना । उनके मनमें यह शादाई कि कहीं निजी ताजग्मः पुरुभेष्ठ निविभमचरिताः ॥१॥ सो नहीं गिरी ! सब के सब मयभीत होकर पक्षों के फ्स मा गये ॥१॥हाँ पहुँचनेस उन भेोंने देख कि भम्पा निपतितो सत्र दर्यमलार्जुनौ । दोनों बर्जुनके वृक्ष गिरे हुए हैं। पपपि पक्ष रिनेका कारण स्पष्ट पा–भी उनके सामने ही रस्सीमें ब पनमस्तदविशाय लक्ष्मं पवनकारणम् ॥२॥ तुम रुक उमा सौच या पा, परस्त रे समा म सके । 'यह किसका काम है, ऐसी आश्चर्यजनक दुना उलूखल विकर्मन्न दाम्ना पाई व पालकम् । कैसे घट गपी र सोचकर ये फार ो गये, | उनकी मुवि म्रमित हो गपी ॥ २३॥ वहाँ कुछ वाक फस्पेद इस भापर्यमुस्पात इति कासराः ॥३॥ खेल रहे थे । न्होंने कहा-भरे, इसी मनेसामा सो काम है। यह दोनों पक्षोंके बीचमेंसे होकर किस पाला ऊचुरनेनेति विर्यग्गवमुलूस्खलम् । रहा था। उस निरम हो जाने दूसरी बोरसे इसने उसे म्बींचा घोर पक्ष र पो। हमने तो इमर्मेसे विकता मम्पगेन पुस्मापप्पचक्ष्महि ॥ ४॥ निकलते हुए दो पुरुष भी देते हैं। ॥ ४ ॥ परन्तु गोर्पोने पायोंकी बात मही ममी । घे करने लगे-एक न ते वदुक्त नगर्न पटेवेति वस्स तत् । मम्हा-सा पया इतने बड़े पक्षोंको उखा सख, पर कभी १।२ यमनमान माम 11 बारापभियान | ४ तिरधीनमुमू 1५ पटेरिति । • पथैने रिपार किया कि वक्तामात गुन (रमी ) में श्च हुए समीता में इनके वर्णन होते हैं। निर्गुमने तो मनमे मामा भी नहीं मना ।इमे मगवान के रहने दी ये पले गये । मस्परा उप मदा भीनयी एस मया । अाप मारा गाम हा तुम गदा भीमपो गुोंमे ही र-ऐसा सनसभाशीर्ग र पर पामि पो गये।

म० ११] दसम स्कध पालसोत्पाटनं तो केचित् संदिग्भवेतसः॥५॥। सम्भव नहीं है । किसी-किसीके वित्तमें श्रीकृष्णकी पाइलेकी लीपोका स्मरण करके सन्देर मी हो पाया ॥५॥ उल्लल विकर्षन्तं दाम्ना पदं स्वमात्ममम् । नन्दवामाने देख, उनका प्राणोंसे प्यारा मचा रस्सीसे मेधा विलोक्य नन्द प्रहसदनो पिसमोघ ह॥६॥ हुआ सरल घसीटता न यहा है। वे हंसने लगे और जस्तीसे चाकर उन्होंने रस्सीकी गाँठ खोल दी ॥६॥ गोपीमिा स्तोमितोऽनृत्पद्मगवान् मालमत् कचित् । सर्वशक्तिमान् मगवान् कभी-कमी गोपियों के पुसगने- से साधारण पाटकों के समान नापने स्गते । कमी भोले- माले धनजान बायसी तरह मने छाते वे उनके उद्गापति कधि मुग्धस्तरष्ठो दास्पन्नषत् ॥७॥ हापकी कठपुतली उनके सर्पपा अधीन हो गये थे ॥७॥ विमति कषिदाशतः पीठफोन्मानपादुकम् । कमी उनकी माहासे पीहा से आते, तो कमी दुसेरी आदि तौलमेके मटसरे ठठा असे । कमी सहा से आते, पाहुक्षेपं च कुरुते स्वानां प प्रीविमामान् ॥ ८॥ तो कभी अपने प्रेमी मर्कोको आनन्दित करनेके लिये पहलवानोंकी मासि ताल क्ने टगते ॥ ८॥ इस प्रकार दर्भयस्तदिदा लोक आत्मनो मृत्यवश्यताम् । सर्वशक्तिमान् मगवान् अपनी वाल-लीमोंसे बमवासियों को थानन्दित करते और संसारमें जो लोग उनके हस्पको प्रजस्योगाह पे हप भगवान् पालटितैः ॥९॥ अननेवाले हैं, उनको यह दिखगसे कि मैं अपने सेवक पश हूँ॥९॥ क्रीणीहि मोः फलानीति भुस्वासस्परमम्मुता। एक दिन कोई फल बेचनेवाली पाकर पुकार उठी- 'फल, मे फल ' यह सुनते ही समस्त कर्म धीर फलार्थी धान्पमादाय ययौ सर्यफलप्रदः ॥१०॥ उपासनाओंके फल देनेवारले भगवान् भव्युत फल मी नेके लिये अपनी बेटी-सी अंगुलीमें अनान सेकर दौड़ फलविक्रपिणी तस्स म्युतधान्य फरश्यम् । परे ॥ १०॥ उनकी मजुनमसे अनाम तो रास्तेमें ही विस गया, पर पप देवनेवाटीने उनके दोनों हाप फारसे फलैरपूरपा रत्नै फलभाण्ठमारि ॥१॥ मर दिये । इधर मावान्ने भी उसकी पर रखनेश्ठी टोकरी रनोंसे मर दी॥ ११ ॥ सरिचीरगत रुप्ण भग्नार्जुनमथाहयत् । तदनन्तर एक दिन पमधुन इसको सामनेवासे श्रीकृष्ण और बधाम यात्रों के साप स्पेटते मेरो पमुना- स्टार पो गये और खेमें ही रम गये, तब रोहिणीदेवीने राम प रोहिणी देवी फ्रीरलकैर्मृशम् ॥१२॥ ने पुकारा जो कृष्ण को बराम! मनी श्राओ' ॥१२॥ परस्तु रोहिणीके पुकारनेपर भी वे भाये नहीं, क्योंकि नोपेयाचा यदाती फ्रीरामनेन पुत्रको । उनका मन सेपमें उग गा पा । जब पुगनेर में ये • मन्दसावा इसलिपे से किया पापा देवर र न पप कि म माने परिपाका लिा नही मन पोरने मगे। मालाने पापा भौर रिवने छोड़ा । मगग्रम् भीरप्पकी सीठ ने पाल सिदई कि उनरे सा में पन भोर मुतती मला पराम भरे होत्यसपमा म मुल। - ।

१९२ श्रीमद्भागवत . यसोदा प्रेपयामास रोहिणी पुत्रवत्सलाम् ॥१३॥ दोनों बाउक नहीं बाये, सय रोहिणीचीने वाहमय स्नेहमयी यशोदानीको मजा ॥ १३ ॥ श्रीकृष्ण और काम कीडन्स सा मुत पालरतिवेलं सहाग्रजम् । | ग्वाबोंके साप यात देरसे ले रहे थे, पशेदारीने जाकर उन्हें पुकारा । स समय पुत्रके प्रति पारसम्पने यशोदामालीन कृष्ण पुत्रस्नेहस्नुतस्तनी ॥१४॥ के कारण उनके स्तनों से दूध पुषुआ रहा पा ॥१२॥ रुप्म हपणारविन्दाय तात एहि स्तन पिप । वे बोर-नोरसे पुकारने लगी-मेरे प्यारे पीया ! को कृष्ण ! मम्नयन । सामसुन्दर । क्य ! आओ, अपनी भलं विहार मुग्धान्ता क्रीसभा तोऽसि पुत्रक।१५। मामा दूध पी थे । खेलते खेलते पक गय हो । व्य । मन्त्र पस बनो । देखो तो सही, तुम मूससे दुकले हो ह रामागच्छ तावाशु सानुबा कुलनन्दन । रहे हो॥१५॥ मेरे प्यारे पेय राम ! सम सो समूचे कुलको प्रातरेष ताहारस्त भपान भाक्तुमाति ।।१६।। बानन्द देनेवाले हो । अपने छोटे भाईको लेकर मादीसे आ नावो तो ! देसो, माई ! आज तुमने मास स्वरे प्रतीक्षते स्वादाशाई भोल्पमाणो धाधिपः। कलेऊ किया पा । या तो समझे कुछ स्पना माहिये ॥१६॥ पेन काम ! बजरान भोमन करने के लिये बैठ गये है। एमापयो। प्रिय धेहि स्वगृहान यात पालकाः॥१०॥ परन्तु वर्मतक मुम्हारी बार देख रहे हैं । माओ, बम हमें आनन्दित करो । माको ! ब तुम लोग भी अपने धूलिघूसरिसागस्य पुत्र ममनमाया। अपने घर बाबा ॥ १७॥ बेटा । देखे तो सही, तुम्हारा एक-एक बा से पपन हो रहा है। अन्मभ्रमप भवसो विप्रेम्पो देहिगा शुधि ॥१८॥ बाभो, चन्दीसे स्नान कर मे । आज तुम्हारा कम नक्षत्र है। पवित्र होकर प्रामणों ने दान करो।।१८॥ पश्य पश्प पयस्यास्ते मारामृष्टान् स्वतस्तान्। देखो-देखो। तुम्हारे सापियों को उनकी मासामोंने नहा- घुमकर, मी जोशकार कैसे पुन्दर-सुन्दर गहने पहना स्वपस्तात कसाहारो विहरस्व स्वछातः॥१९॥ गये हैं। अब तुम भी नहा-धोकर, स्पीकर, पहन भोकर तप लेतना' ॥ १९॥ परीक्षित् ! मना यशोदाका इत्थ पशोदा तमशेपशेवरं सम्पूर्ण मन-माण प्रम मममसे बंधा हुआ था । परापर जगत्के शिरोमगि मगवान्या धरना पुर समानी और मस्या मुत स्लेनिपटभीर्नुप । इस प्रकार कइफर एक हापसे यरराम तया यसरे हापसे भीषणा पायर अपन पर ले आयी । इस पर इम्ते गृहीत्वा सदराममपत्र उन्होंने पुत्र के मालक स्पि जो पुछ करना प, र पा प्रमसे रिम ॥ २०॥ नीवा म्यार वस्यवादयम् ॥२०॥ गोपपता महोपासाननुभूप पारने । जब मम्यान आरिमानोंने सम्मामिहारन में ता या-यो वयात हाने ग्रो हैं, तब 4 सट्टे नन्दादमा ममागम्प ग्रमकापममन्ययन् ॥२॥ 17 अब मनामियोंया क्या पाना मा ि-म म०११] दक्षम स्कन्ध तत्रोपनन्दनामाह गोपो घानवयोऽधिका । विषयपर विचार करने टगे ॥ २१॥ उनसे एक गोपका नाम पा उफ्नन्द । ये बदम्पामें सो वड़ ये ही, पानमें देशकालार्थतत्वाः प्रियक रामकृष्णयोः ॥२२॥ भी मड़े थे। उन्हें इस बातका पता पा कि फिस सम्प किस स्थानपर किस वस्तुसे कैसा व्यवहार करना चाहिये। उत्पातम्पमिसोऽमाभिर्गोइलख दिपिभिः । | साथ ही ये यह भी चाहते थे कि राम और श्याम मुम्बी रहें, उनपर कोई विपत्ति न आवे । उन्होंने कहा-॥२२॥ । भाइयो ! अव यहाँ ऐमे वाड़ उत्पात होने लगे हैं, आयान्त्पत्र महोस्पाता पालानां नाशहेतयः ॥२३॥ | नो बचोंके लिये तो बहुत ही अनिष्टकारी है। इसञ्येि | पदि हमलोग गोकुल और गोकुवासियोंकर मग घाइते मुक्ताफथपिद राषस्सा पालन्याबालफोमसो। हैं, तो हमें यहाँसे अपना रा रा उटाफर कूच कर | देना चाहिये ॥ २३ ॥ दालो, यह सामने कैय हुआ हरेरनुग्रहान्ननमनमोपरि नन्दरापकर यहस्य सबसे पहले तो पोंके पिये फारठ- नापतत् ॥२४॥ | सरपिणी हत्यारी पूतनाक चंगुल से किसी प्रकार छ्टा । | इसके कर भगवान्की मरी का यह हर कि इसके घपातेन नीतोऽप दैस्पेन विपदं वियत् । स्पर उतना बड़ा या गिरते-गिरते यचा ॥२४॥ वारपारी देस्पने तो इसे भामाशमें ले जाकर यही शिलापां पवितस्तत्र परित्रात मुरेमरैः ॥२५॥ भारी विपत्ति ( मृत्युके मुम्ब ) में ही डाउ Pया था, परम्तु यहाँसे सब बह महानपर शि, तप भी हमार कुरुके देवघरोंने ही इस बारपाकी रक्षा की ॥ २५॥ यम प्रियेस तुमयोरन्तरं प्राप्य पालका। यमगगुन वृक्षोंके मिनेके समय उनके बीचमें आयर भी यह या और कोई पाक न मरा । इसमे भी यही असावन्पतमो वापि तदप्यम्युतरक्षणम् ॥२६॥ समझना चाहिय कि भगवान्ने हम्परी रक्षा की ॥२६॥ इसलिये जक्ता फोर यात यड़ा बनिरकारी अरिष्ट हमें पायदोस्पातिकोऽरिष्टो मजं नाभिभपेदिवः । वीर हमारे प्रसको नष्ट म करा तबतक ही हमनेग | अपने बचोंको स्कर अनुचरोंक साप पसे अन्यत्र सावद पालानुपादाप यास्सामोऽन्पत्र सानुगाः॥२७॥ चले चरें ॥ २७॥ 'नापन' नामका एप बन है। उसमें छोटे अटे और भी पहन-से मये-नये हरे-भरे बन पनं पन्दापनं नाम पक्षम्म नपकाननम् । हैं। बहो मड़ा ही पथिय पर्वत, घास और हरी-भरी ताबनस्पतियों है। हमारे पशुओंक रिपे ता बह यात गोपगोपीगयां सेमं पुण्याद्रिवणवीरुधम् ॥२८॥ ही हतकारी है । गोप, गोपी और गार्योर ठिये पह देवा सुविधाका ही नहीं, मेक्न पर नपाग्य म्याम सतत्रापर यास्यामःशकान् यमापिरम् । है॥२८॥ सा य ितुम सय मांगोया या बात पती होता जान ही हमरोग मौक रिय पूत्र फर गापनान्यप्रतो यान्तु भवतां यदि रोषते ॥२९॥ न करें, गड़ी-सका जातजा पर गयोका ना हमारी एफमप्र सम्पति, नभन ॥ २० ॥ तरसंकधिया गापा साधु सापितिमादिन । टानन्दपी मन मुनरा मी गपॉन ण्य म्परमे परा-बान टीर, पाम टार। स रायमें फिीस । 3 मा स स २२५-

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भीमसागवत
[१०११
प्रमान् खान् स्वान् समायुन्य ययू परिग्छदा।।३० मी मतमेद न पा । सब लोगोंने अपनी एंट-कीड
| गये इक्ट्ठी की और कलोपर घरकी सब सामग्री पदष्ट
वान् पालान् लियो राजन् सर्वोपकरणानि च। इन्दावनकी यात्रा की ॥ ३० ॥ पीक्षित ! ग्वाने नों
पचों, सियों और सम साममियोको छाडापर बम Pया
मनस्वारोप्प गोपालायचा याचपरासनाः ॥३१॥ और स्वय उनके पीछे-पीछे धनुष-प्रण लेफर वही साप-
पानीसे पलने छो॥३१॥ ठहोंने गौ और गोको
गोधनानि पुरस्कृत्य प्रशाम्यापूर्य सर्पतः । तो सबसे आगे कर लिया और उनके पीछे-पीछे सींग
और तुरही पोर-मोरसे मनाते हुए चले । ठनक साप
तूर्पघोषेण महता पयः सहपुरोहिताः ॥३२॥ ही-साप पुरोहितग भी घछ रहे थे ॥ ३२ ॥ गोपियाँ
अपने-भपने पक्ष स्पध्पर नयी मेसर लाकर, मुन्दर
गोप्यो रूडरथा नसायामकान्तयः ।
सुन्दर मस पहनकर, गले में सोनेके हार धारण किये गए
रोपर सबार पी और यो मानन्दसे मगमन् श्रीकृष्णकी
कृष्णलीला बगुः प्रीवा निफाप्ठ्य सुवाससः॥३३॥ लीअोंके गीत गाती जाती थीं ॥ ३३ ॥ यशोदारान
नौर रोहिणीजी भी वैसे ही सम-धनकर अपने आप
तथा यशोदारोहिम्पायेक अकरमासिते ।
प्यारे पुत्र श्रीकृष्ण तथा मछरामक साप एफ छाडेर
शोमयमान हो रही पी । ये अपने दोनों चालकॉफी तोवर्क
रेजता प्णरामाम्पा तत्कषाभषगोत्सुके ॥३४॥ योठी पुन-सुनकर भी अघाती न पी, और-और पुनम
पाहसी पी ॥ ३१ ॥ बन्दावन सा ही पुम्दर क्न है
पन्दापन सम्प्रविश्म सर्वकारसुखावहम् ।
चाहे कोई भी ऋतु हो, यहाँ मुख-ही-मुस्ल है। उसमें
प्रवेश करके म्पाोंने अपने छालों को पर्यचन्द्राकार
वत्र चर्घजापासं शकटरर्पचन्द्रवत् ॥३५॥ मण्डल गाँधकर सड़ा कर दिया और अपने गोघनके रहने
योम्य सान स्ना छिया ॥ ३५॥ परीक्षित पदापनका
न्दिावनं गोबर्धनं यमुनापुलिनानि च ।
हरा-भरा बन, अत्यन्त मनोहर गोवर्धन पर्वत और यमुना
नदीके मुन्दर-सुन्दर पुलिनोंको देखकर मगवान्
श्रीकृष्ण
वीक्ष्यासोदुधमा प्रीती राममाधवयोर्नुप ॥३६॥ और मम्यमनी के हत्यमे उत्तम प्रीतिका उदय हुआ॥३६॥
एप प्रजौकसी प्रीति यम्छन्वौ बालचेष्टितैः । राम और स्पाम दोनों ही अपनी तोतली बोली और
अत्यन्त मधुर माश्येषित लीनभोंसे गेयी ही तर
कलवाक्यैः म्बकालेन वस्मपालो बमूवतुः ॥३७॥ इन्दावन में भी प्रमवासियोको मानन्द देते रहे । पोर ही
दिमि समय आनेपर ये बछ चराने गे ॥ ३७॥
बपिडूरे प्रजमुगः सह गोपालदारकैः ।
दूसरे मायके साप खेम्ने ठिये बहुस-सी सामग्री
बार वे परसे निकल पाते और गोप ( गम्पोंके रहने
पारपामासतुर्पस्मान् नानाक्रीडापरिच्छदौ ॥३०॥
स्मन ) के पास ही अपने पछाडाको घराते ॥ २८ ॥
श्याम और राम कही याँसुरी यना रहे हैं, तो कही गुलेर
कपिपादयता घेणुक्षेपमाधिपतः कषित् ।
या टेस्वोससे देले या गोरियाँ पक रोहै । पिसी
समय अपने पैरोंके दुषरूपर तान गा रहे हैं, तो कहीं
पवित् पारे किरिणीभिाचित् कृत्रिमगोपं ॥३९॥ नाटी गाय और यर नकर खेउ रहे ६ ॥ ३९ ॥

म० ११] दशम स्फ , पायमाणां नर्दन्तौ युयुधाते परस्परम् । एष ओर देम्विये तो सौद न बनकर करते हुए आपस में ला रह हैं तो दूसरी ओर मार, कोयड, पर आदि पशु-पक्षियोंकी पारियों निकाल रहे हैं। परीक्षिद ! अनुरुत्य रुपैनन्तश्चेरतुः प्राकृती पथा ॥४०॥ प्रकार सर्वशक्तिमान् भगवान् साधारण या को सम्पन खेटसे झते ॥१०॥ कदाषिद् यमुनातीरे षसांधारयतो स्वमै । एक दिनकी बात है, श्याम और परराम अपने प्रमी सस्ता बालयाके साथ यमुनान पर महा घरा रहे थे। षयस्यै कृष्णवलपोसिंघासुदैत्य आगमत् ॥४१॥ उसी समय उन्हें मारनकी नीयनसे एक देस्य वाया ॥११॥ | भगवान्ने देखा कि यह यनावटी माइका गप धारणकर त पत्सरुपिणं वीक्ष्य वरसय्यगत परिः । यमों के मुटमें गिर गया है। ये ऑम्बोंक इशारेसे यरामजीको दिम्पाते हुए धीरे-धीरे उमक पास पहुँच दर्शयन पलदेवाय शर्मुग्ध इवासदत् ॥४२॥ गये। उस समय ऐसा जान पहता , माना ५ देस्यको तो पहचानते नहीं और उस पर मुन्र पर गृहीस्वापरपादाम्पा सल्लाग़लमन्यतः । मुग्ध हो गये हैं ॥ १२ ॥ भगवान् श्रीषणने पटके साप उसके दोनों पिय पर पदका आकाग घुमाया मामयित्वा कपित्याग्र प्राहिणा गतसावितम् । बार मर नानेस पेयक भर एक रिया । उसका था- सफपित्र्महाकाय पास्यमानः : पपाव ॥४३॥ तगड़ा देत्पशरीर मदत-मे पके पृशोकर रामर म्यप मी गिर पड़ा ॥ १३ ॥ यह दम्पकर या रणक आभय स वीक्ष्य विमिवा गालाः शमः साधु सामिति । । की सीमा न रही । ये प्याह-माइ' करणे प्यारे पदयाकी प्रशंसा करन एगे। दवता मी पर आनम्से फरी देवाप परिमन्तुष्टा पम्प पुप्पपर्पिणः ॥४४॥ बर्वा फरने न्टो ] ११ ॥ सो पत्मपालको भूस्मा सर्पलोकफपालकी । परीक्षित् ! जो मारे टाक एकमात्र भर ६, वे ही श्याम और परराम मग बरसात (मोर सप्रातराणी गोपत्सायारयन्ती विपेरतुः ॥४५॥ घरपाहे ) पने हुए हैं। वे तदर सी उमर पापी सामग्री ए ने वीर दास पगमे पर पप बनमे स्वस्य परसल म पापयिप्पन्त एकदा । मरे वनमें घुम्म फरते ॥ १५ ॥ एक निपत है, सप पारपाउ बरन पर पानी ग्रिने गत्वा मलायाम्पा] पापयिस्या पपुरम् ॥४६॥ कपि जगप्पा माले गर | उन्होंने पल पठोको जागिपा जोर हि मा मनि१६|| वे वम दगुराग मदामपमरम्भिवम् । गमन टेन मिहान्य यातमा नीर यश र एमा मदम ताम, मना हा गे समगुरमनिभिनं गिर ग्रामिण पुतम् ॥४७॥ पापा को दुग टिन २७ ॥ गार ठर्म पर ru| पर म में पका नाम मानगुरा पम्पक। रुपा रस गT R ना १ मा ~ Tननस भीमद्भागवत [२०१२ । वेनैव साकं पृथुकाः सहस्रशः । निकल पड़े॥१॥ श्रीकृष्णके साथ ही उनके प्रेमी साइनों बालबाल सुन्दर छींके, पेन, साँग और पसरी निग्धाः मुशिग्वेत्राषिपाणघेणयः । सेयर तथा अपने सहसों पोंको बागे करके बी प्रसस्तासे आपने अपने घरोंसे पर पड़े ॥२॥ भनि खान् वान् सहस्रोपरिसरूपयान्निसान श्रीकृष्णके अगणित में अपने अपने मला मिल दिये और स्थान-स्थानपर वाचित स्टेल स्ने हर पत्सान पुरस्कृत्प पिनिर्ययुर्सदा ॥ २॥ विचरने मे ॥ ३ ॥ यत्रपि सके सब सामान कृष्णवस्वैरसंस्मातेचीकृस्प सवत्सकान् । काँध, धुषची, मणि और सुवर्णके गहने पहने हुए थे, | फिर भी उन्होंने पन्दाक्नके पळ-पीले हरे फासे, मपी- धारयन्तोऽर्मलीलाभिर्विस खास्तत्र पत्र ह॥३॥ | नयी पोसे, गुसे, रंग-बिरंगे फ बोर मोरपलासे सथा गेह नादि रंगन घासुमोसे अपने स्ना फलप्रपालस्तमसुमनापिन्छपातुभिः लिया ॥ ॥ कोई किसीका मंका पुरा सता, तो कोई किसीकी देत या मामुरी । नमाम्न वस्तुओं के स्वामी- काचगुलामणिस्वर्गभूपिता बप्पभूपयन् ॥ ४॥ को पता चल्ता, तम म्हें लेनेवास्त्र किसी दूसरेके पास दूर फेंक देता, दूसरा सीसरेके और तीसरा मोर मी दूर चौषिके सप्णन्तोऽन्योन्पशिक्यादीन्शातानाराच विषिपुः। पास । फिर वे हंसते हुए उन्हें मैटा देते ॥५॥ यदि श्याम- मुन्दर श्रीकृष्ण क्नकी प्रेमा देख्नेके लिये कुछ बागे पत्रस्याम पुनराइसन्त पुनर्ददुः ॥५॥ म जाते, तो पहले मैं मुग, पहले में मुगा'-- इस प्रकार आपसमें होर माकर सब के सब उनकी यदि दूरं गतः कृणो बनभोमेक्षणाय तम् । भोर दौर परते और उन्हें छ-छकर बानन्दम्म हो माते ॥ ६ ॥ कोई गाँसरी पना रहा है, तो कोई संग ही मा पूर्वमदं पूर्वमिति संस्पृश्य रेमिरे ॥६॥। एक सा है । कोई कोई मरोंके साप गुनगुना हे तो मनुत-से कोपके सारमें स्वर मिलकर कुट-२' केचिद वेणून वादपन्दोमान्ता मणि केचन । कर रहे है ॥ ७ ॥ एक बोर कुछ बाध्यास व्यकासमें ठरते हुए पनियोंकी मपाके साम दौर लग रहे हैं, केपित मृग प्रगायन्तान्तः कोकिल परे॥७॥ दूसरी मोर कुछ हंसोंकी पालकी नकल परसे ए उनके साप मुन्दर गतिसे पा रहे हैं। कोई बगुलेके पस मिछायामिः प्रभावन्तोगसन्त साघुईसके। उसीके समन आँखें मूंदकर बैठ रहे हैं, तो कोई मोरोंको नाचते देस उम्हाँकी तरह नाच रहे हैं ॥ ८ ॥ कोई पकैरुपविक्षन्तम नृत्पन्तम कठापिभिः ॥८॥ कोई बंदरोंकी छ फरकार सींच रहे है, सो दूसरे विकर्पन्तः कोशमासानारोहन्तम वैर्दुमान् । उनके साप इस पेड़से उस पेपर पा रहे हैं। कोई कोई उनके साथ मुंह बना रहे हैं, तो दूसरे उनके साप विन्ति : सावन्तम पलाशि ॥९॥ एक गम्से दूसरी सम्पर छपाँग पर रो।॥९॥ बहुत-से म्यार वो नदीके कमरमें एक सेट हे सार्फ मेकपिलवः सरिस्मतपसम्प्तताः । है और उसमें फुदाते मोंके साप सप भी - म० १२] दशम स्कन्ध विहमन्तःप्रतिच्छायाशपन्तम प्रतिस्वनान् ॥१०॥ पदक रहे हैं। कोई पानीमें अपनी परया दोक्कर इसफी हंसी कर रहे हैं, तो दूसरे अपने की प्रति स्थ सता प्रमसुखानुभूत्या अनिको ही मुरा-मरा कह रहे हैं ॥ १० ।। भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञानी सोक छिये स्वय मझानन्दके मूर्तिमान् दास्प गतानो परदेयतन। अनुभव है । दास्यमावसे युक्त मकों के लिये वे उनके मायामिवानों नरदारकेप झाराप्यदेव, परम ऐचयशाली परमेश्वर हैं। और माया- सहित विस्थाकि छिये वे केवल एफ मनुप्यन्याय पाक बिबाह कसपुष्पपुजाः॥११॥ हैं । उन्हीं भगवान्के साप चे महान् पुष्पारमा पाञ्चाल तरह-तरहके स्लेर ग्नेछ रहे हैं ॥११॥ बहुत मम्मोतय यस्पादपांसुर्षहमन्मकृष्णसो भ्रम, और बा. रा. मिन्होंने अपनी इन्द्रियों और भत्त करणको पशमें कर लिया है, उन योगियों के प्रवास्ममिर्योगिभिरप्पलम्म रिये भी भगवान् श्रीकृष्ण परणकमकी रन अप्राप्प स एव पदग्विषय स्वय स्थितः है । षही भगवान् सय मिन प्रवासी ग्याश्यान्नेकी बॉयक सामने रहकर सा खे सेटते हैं, उनके किंवमे ते दिटमतो प्रसौकसाम् ॥१२॥ सौभाग्यकी महिम्य इससे अधिक क्या कही जाय ॥१२॥ अपापनामाम्यपत महासुर परीक्षित् ! इसी समप ममासुर नामक महान् देस्य स्पा सुम्बफ्रीडनवीक्षणाधमः। या धमका ! उससे थीम और ग्यामागेही सुग्यमपी निस्प यदन्तनिनजीवितेप्मुभि श्रीरा देवी म गयी । उमक ल्यमें जगन होने स्त्री। यह इतना मपार था कि अमृतपान करके अमर हुए पीवामृतरप्यमरै प्रतीक्ष्मते ॥१३॥ देवता भी उससे अपने जीवनकी रक्षा करनेके लिये नार्मकान् फणमुस्तानपासुरः चिन्तित हा करते थे और इस बासकी मार रम्पते रहस मिशिसी प्रकारमे इमकी मृस्पुका अवसर मा कमानुशिष्टः स पकीवकानुनः ।। माय ।। १३ ॥ अवामुर एतना और सम्मुरका टा प्रप तु मे सादरनाशकचयो भाइ तथा मका भेगा वा पा । पद श्रीवण, श्रीगम आगि म्याग्यायो एम्बर मन ही मन साचन प्यामि ईयाममैन सपल हनिप्पे ॥१४॥ | यही मेरे सगे भाइ सौर पहिनको माग्नबाग 1 इस पते पदा मस्तुदोस्तिलाप ये भाज में इन म्याम्याफे साय इसे मार रागा॥१०॥ जब ये सब मकर मेरे उन गानों माइ-पश्निों पर- रुतास्तदा नएममा प्रमौकसः। तर्पणी निगडि पन जायेंगे, सम अनयासी अपने प्राणे गते वर्ममु का नु चिन्ता पाप मरे से हो जायगे । मन्लान ही प्रारियोंक प्राग प्रधामुष प्राणमृता हि ये ते ॥१५॥ है ! जब प्राग ही म रहेंगे, तब शरार बसे रहा। इति परस्पानगरं पृन वपु । इसकी मृत्युमे प्रमयामी माने-आर मा जायेंगे ॥10॥ ऐसा नभय परमे वा दुर देय वजरा गप धारग योजनायाममहाट्रिपीचरम् । पर माम म गया । उममा बा अजग्न-सा एप योजन रंगे मा सार ममन RTI मान पा । पृत्वात म्याचगुहानन तदा पा माती अन पा । टमरी नीपत मर परगो पथि पशेत प्रसनासपा खलः ॥१६॥ नगर बनेरी सिरिय ग्मन गुरुष मन माता स भीमागवत . , मागत्य सासा कर्ण तीक्ष्णतुण्डोऽग्रम पली॥४८॥ हो पाया था । उसकी चोंच वही सीसी पी और बार स्वयं यदा गवान् पा । उसने सफापर श्रीकृष्णको फण महायकग्रस्त रहा रामादयोऽर्मकाः । निगल लिया ॥ १८ ॥ जब माम भार पाठोंने देखा कि यह बड़ा भारी वगुत्र श्रीकृष्णको निगर गया, पपरिन्द्रिमाणीव विना प्राण विवेतसः ॥४९॥ सय उनकी यही गति हुई नो प्राण निकम बनेर सं सालमूल प्रदान्तमग्निषद् इन्द्रियों की होती है। ये अचेत हो गये ॥ १९ ॥ परीक्षित ! श्रीकृष्ण मेयापितामह रमाके मी पिता हैं। गोपालसनु पितर जगद्गुरोः। | ये छीनसे ही गोपाल पाल्य यने हुए है। जब ये पालो चर्च सपोऽसिमाक्षत पक- साके नीचे पहुँचे, ता थे आगके समान उसका तारा नपने लगे। मन उस दैत्यने श्रीहम्गके शरीरपर स्तुम्न हन्तु पुनरम्पपपत ॥५०॥ | बिना किसी प्रकारका घाव किये ही सम्पर उन्हें उगल दिया और फिर बड़े कोषसे अपनी कटोर बोचसे उनपर तमापतन्तं स निगृप सुम्यो घोट करनेके लिये टूट पा ॥ १० ॥ फेसका सस दोम्या पक कसमस्त सतां पतिः । बकासुर सभी मकरसर मावान् श्रीकृष्णपर अपरहीरहापा कि इन्होंने अपने दोनों हापोंसे उसके दोनों ठोर पाल पापस्सु बालेषु ददार लीलया लिये बौर म्वासालोंके देखते-देखते खेछ-मी-पेमें उसे वैसे ही चीर गम, जैसे कोई वीरण ( गाँवर, जिसकी सदाबहो धीरगवयु दिवौकसाम् ॥५१॥ नहका सस होता है ) को चीर गले | इससे देवतामों- तदा पकारि सुरलोकवासिनः को बमा मानन्द हुआ ॥ ५१ ॥ सभी देवता भगवान् श्रीकृष्ण नन्दनबनके पेग, घमेली अदिके इन समाकिरन् नन्दनमरिलनदिभिः । मरसाने लगे तथा नगरे, शश भादि बजाकर एवं समीरिर चानकभासस्तवै स्तोत्रों के द्वारा उनको प्रसन्न करने मो। यह सब देख- पर सप-के सम बाबाल माचर्यचकित हो गये ॥५२॥ स्त वीक्ष्य गोपालसुता विसिमिरे ॥५२॥ अव मनाम आदि मालकाने देस्य कि श्रीकृष्ण पालेके मुंहसे निकलकर हमारे पास खा गये है, सप उन्हें सकं बलस्पाइपलम्प बाला ऐसा वानन्द मुमा मानो प्राणों के समारसे इलियाँ सके। रामादयः प्राणमिन्द्रियो गमः । और मानन्दित हो गयी हो । सबने भावान्को अध्य सानाग परिरम्प निसार मटा गले लाया । इसके बाद अपने-अपने को हॉफसर सब बमें पाये और पहाँ उन्होंने परके प्रणीप पस्सान् मनमेस्प तमगुः ॥५३॥ गोंसे सारी घटना पर पुनायी ॥ ५५ ॥ भुत्ला वा पिमिता गोपा गोप्पचाविप्रियाप्ता । परीक्षित ! सम्मुरक की घमा सुनकर सम- के सब गोपी-गोप भामर्यचकित हो गये। उन्हें ऐसा नान पड़ा, जैसे क्लीया साक्षात् मृत्युके मुखसे दी १ गुगम् । २ गतः।

म०१२] १०७ प्रस्पागतमित्रोस्स्यादेवन्त कृषिवेधणाः ॥५४॥ ौटे हों । वे धी समुक्ता, प्रेम और आदरसे श्रीकणको निहारने ओ। उनके नेत्रों की प्यास बहती ही अहो पतास्स पालस्य परमो मृत्पयोऽमपन् । नाती थी, किसी प्रकार में पति न होती पी ॥५॥ वे भापसमें कहने लगे-पाय ! हाय !! यह कितने अप्पासी विप्रिय पो रुवं पूर्व पता भयम् ॥५५॥ माधर्यकी कत है। इस याथ्यको कई बार मृत्युके मुंहमें नाना पड़ा । परन्तु चिन्होंने इसका अनिष्ट करना अशाप्पभिभषन्स्येनं नैव ते पोरदर्शनाः। चाहा, उन्हीका मनिष्ट प्रभा । स्योंकि उन्होंने पहलेसे दूसरोका अनिष्ट किया पा ॥ ५५ ॥ यह सब होनेपर मी ये भपहर ममुर इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाते। विषांसपेनमासाय नश्यन्त्पग्नौ पसाच ॥५६॥ माते है इसे मार गलनेकी नीयतसे, कित बागयर गिरकर पतिंगोंकी तरह उण्टे स्वर्य स्वाहा से बाते महोममविदा वाचोनासत्याः सन्ति कहिचिद । है॥५६॥ सच है, प्रभवेता महारमाकि बचन कभी छठे नहीं होते । देखो म, महारमा गर्गाचार्यने मर्गो पदाइ भगमानन्वमाषि तथैव सत् ॥५७॥ मितनी बातें कही, पी, सव-की-सव सोयों खाने टीक उतर रही हैं। ५७ ॥ नन्दबाना आदि पगण इसी इति नन्दादयो गोपाः हप्परामको सदा । प्रकार का आनन्दसे अपने श्याम और रामकी बातें विस्या करते । वे उनमें रखने समय राते कि उन्हें संसारके दुस-संकटका कुछ पता ही न चला ॥५८॥ कुर्वन्तो रममामाम नाविन्दन् भवषेदनाम् ॥५८।। इसी प्रकार श्याम और घमाम माछाके साथ मी भासमिधानी हेटते, तो कभी पुछ पावते । कमी पव विहारैः फौमारे। कौमारं महसुजे । संदरोंकी भाँति उछपते-कूदते, सो कमी और कोई विचित्र एक करते। इस प्रकारके पारित खेमेसे उन दोनोंने निठायनैः सेतुबन्धैर्मर्फटोपनादिभिः ||५९॥ | अजमें अपनी बाम्यावस्या म्यतीत की ॥ ५९ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईयो सहितायो दशमस्या पूर्षि रसायो नामैकादशोऽप्पाय ॥११॥ अथ द्वादशोऽध्याय मपामुरका ग्यार थीभुक समाप भीशुकदेवजी करते है-पीधित् ! एर दिन फपिद बनानाय मना पद अमात् नन्दनम्दन श्यामसुन्दर बनमें ही पसेका परनेक विचारसे प्रातः समुत्थाय पयसवरसपान् । म तक ठर गपे और संगकी मधुर मनोहर पनिसे प्रबोधपमट्टारवेण चारुणा जम्ने सापी ग्यासको मनपी मात जनाते हुए उन्हें विनिर्गता परसपुरःसरा हरिः॥१॥। माया भौर पछदार भागे करके २ नमा से यामागवत वेनैव साफ पृथुका सहस्रशः निकल पड़े ॥१॥ श्रीकृष्णके साप ही उनके प्रेमी सहनों ग्वाथ्याछ मुम्दर छीके, संत, साग और बॉमुरी स्निग्धाः सुनिषेत्रविपाणषेणषः । लेकर तथा अपने सहस्रों बछगोंको नागे फरक वह प्रसमानासे अपने-अपने घरोंसे घर पड़े ॥ २॥ उन्होंने म्वान् स्वान् सहस्रोपरिसस्पयान्वितान् श्रीकृष्णके भगणित मछमि अपने अपने मनो मिय दिये और स्मान-स्थानपर बाटोचित स्केल खेम्सेर पत्सान् पुरस्कृस्य विनिर्ययुर्मदा ॥२॥ विचरने लगे ॥ ३ ॥ यद्यपि सब के सब सम्मा कृष्णवत्सरसम्म्पातेथीहत्य म्वत्सकान् । कोप, ऍषची, मणि और मुवर्णके गहने पहने हुए के फिर भी उन्होंने इन्दापनके पम्पीरहरे फासे, मयी- चारपन्तोऽर्मलीलाभिर्षिजस्तत्र तत्र ह ॥ ३ ॥ | नयी कफ्रेंसे, गुठोसे, रंग-बिरंगे में और मोरपसे तपा गेड बार रंगीन पासुओंसे अपनेको सजा फल प्रवालम्तबकसुमनःपिच्छधातुभि ठिया || १ || कोई किसीका का पुरा ना, तो कोई पिसीकी फेत या योमुरी । मम उन वस्तुओं के स्वामी- फाचगुलामणिस्वर्णपिता अप्यम्पयन् ॥ ४ ॥ को पता चलता, तब उन्हें लेनेवाव्य किसी दूसरेके पास दूर फेंक देता, दूसरा तीसरेके और तीसरा चोर मी पूर चौधे मुणन्तोऽन्योन्यशिक्पादीन भावानाराम विक्षिपुः। फस । सिर वे हंसते हुए उन्हें छोटा देते ॥५॥ पदि श्याम- सुन्दर श्रीकृष्ण क्नकी श्येमा देखने के लिये पुरा नगे सप्रत्याय पुनराद्धसन्तम पुनर्ददुः ॥५॥ माते, तो पहरे में छुग, पहले मैं छुऊँगा'- इस प्रकार मापसमें होर लगाकर सम-क-सब उनकी पदि दूरं गतः रुप्मा पनसामेषणाय सम् । और दौड़ पाते और उन्हें हर भान दम्म हो जाते ॥ ६ ॥को माँसुरी मना रहा तो पोरसींगही आई पपई पूर्वमिति सस्पृश्य रमिरे ॥ ६॥ इंक रहा है । पोई-याद मौरोंक साप गुनगुना र ६, तो पहुत-से कोपर्गेष म्परमें पर मिग्रमर पुरन पम्मित पाल पत्पन्समा अगाणिसान। प्प रहे पर भार पुर वारसा सापा ठाते हुए पधिपोंकी सपो साप की यरह है, तो पपिद मृ प्रगापवायूमन्तः काफिले पर ॥७॥ दुमरी और पुर सौरी पाकी मार मम r उमा सापपुर गति पर रहे है । पाई पालो पाम रिप्यापाभि प्रभापतोगान्तामापुरमकै । ठगीर ममान अमर रहे, तो कोई मोरोको माणादा उन्तीकी तरह नाम रदे ॥८॥ पार पगारिमन्तम नपन्तय फलापिभि ॥८॥ पारी र प गद६, मरे বললঃ उना मप इम पेरम टन पेला पा रहे । को राइन्वय सामान । काटना गप मुंबना गरम Tr गिरनम ने मार पनप पनाति ॥रपसर्ग पर गा रे ॥•॥ पानगरमा नगर सागर गार मनि गरिपारमानुनाः । २ टममे पुकार में एप गईमा म० १२] दक्षम स्कन्ध १९९ विहमन्तःप्रतिच्छाया:क्षपन्तम प्रतिस्वनान् ॥१०॥ | फुदक रहे हैं। कोई पानीमें मफ्नी पर देसकर उसकी इसी कर रहे हैं, तो दूसरे अपने शम्की प्रति- इस्थ सां प्रमसुखानुभूस्पा पनिको ही मुरा-मय कह रहे है॥ १०॥ मगवान् मीण हानी संतोंके लिये स्वयं प्रशानन्दके मूर्तिमान् दास्म गवाना परदैवतेन। अनुभव है। दास्यमावसे युक्त मतोंके लिये वे उनके मायामिवानां नरदारकेण आराप्यदेव, परम ऐपर्यशाली परमेपर हैं। और माया मोदित विस्फान्धों के लिये वे केवल एक मनुष्य पालक साक बिना फरपुष्पपुञ्जाः ॥११॥ है। उनहीं मावान्के साथ घे महान् पुप्यामा बालनाल सरह-तरह के स्केर खेल रहे हैं ॥११॥ यदुत जन्मों तक यत्पादपासुर्यदुचन्मरतो प्रम दौर का उठाकर जिन्होंने भफ्नी इन्द्रियों सात्मभिर्योगिभिरप्पलम्मः । और अन्त करणको पशमें भर लिया है, उन योगियोंके छिये भी मगवान् श्रीकृष्णके चरणकाओंकी रब अप्राप्य स एप पदापिएप स्वयं स्थितः है । यही मगश्यन् स्त्रय निन बजबासी म्यायालोंकी माखोंके सामने रहकर सदा खेछ स्नेखते है, उनके कि पर्यते दिएमतो प्रजौकसाम् ॥१२॥ | सौमापकी महिमा इससे अधिक क्या कही माय ॥१२॥ अपापनामाम्पपत महासुर परीक्षित् ! इसी समप अवाप्सुर नामका महान् देस्य स्तेपो सुसमीरनवीक्षणाक्षमः । आ धमका । उससे श्रीकृष्ण और पासपोंकी मुसमयी निस्म यदन्तर्निजीवितेप्सुमिः क्रीसा देसी न गपी । उसक एयमें मग्न होने लगी। पीतामृतेरप्यमरैः मह इतना मयार पा कि अमृतपान करके अमर पए प्रतीत्यसे ॥१३॥ देवता भी उससे अपने नीमनकी रक्षा करनेके लिये धर्मकान् फणमस्तानपासुरः चिन्तित रहा करते थे और इस मातकी माट देखते रहते ये कि किसी प्रकारसे इसकी मृत्युका अवसर वा फैमानुशिष्टः स बसीपयनुजः। जय ॥ १३ ॥ अघासुर प्रतना और बकापुरका छोटा प्रय तु मे सोदरनाशकचयो माई तपा कमका मेगा मा पा । यह भीग, भीमा इमार्ममैन सबलं हनिप्ये ॥१४॥ यही मेरे सगे माई और परिनको मारनेपास्त्र है। इस धादि ग्मालवाणको दस्कर मन ही मन सोचने लगा कि एते यदा मस्सहदोस्तिलाप थिये वाब में इन म्ममवाओंके साप इसे मारागा ॥१॥ मत्र ये सब मरकर मेरे उन दोनों माइ-बहिनोंके मृत- कवास्तदा नटसमा प्रयोकसः। तर्पणकी तिअपलि बन जायगे, तब ममासी अपने प्राणे गते पर्मम का नु चिन्ता भाप मरे-जैसे हो जायगे । सन्साम ही प्राणियों के प्राण प्रभासवः प्राणमृता हिये ते ॥१५॥ है। नव प्राण ही म रहेंगे, तब शरीर कैसे रहेगा । इसकी मृत्युसे अनवासी अपने आप मर नायो ॥ १५॥ इति परस्पानगर पर वपुः ऐसा निश्चय करके वह दुष्ट देस्य वनगरका रुप धारण योजनापाममाद्रिपीवरम् । पर मार्गमें ले गया । उसका पा अमार शरीर एक योमन रथे बड़े पातक समान विशाल एवं मोटा या । पृत्वानुवं म्पाचगुहानन सदर या बहुत ही बहुत था । उसकी नीयत स्त्र यायोफो पपि म्यशेत असनामया खलः ॥१६॥ निगा जानेकी थी, इसरिये उसने गुण सम्पन अपना +4 स २०० भीमसागवत [१०१२ धरापरोष्ठो बलदाचरोष्ठो महुत पड़ा मुँह फार रस्खा वा ॥ १६ ॥ उसका मीचे- का होठ पृषीसे और उपरफा होठ बाद से राहा दर्याननान्तो गिरिभादष्टः। पा। उसके नमः मन्दरायोंके समान थे और दो पवतके शिखर-सी जान पाती पी । मुरके भीतर पोर ध्यान्सान्तरास्मो वितताम्वबिह अम्पकार पा। मीम एक चौपी अस सहक सी दीदी भी। साँस बाँधी के समान पी और आँखें दावानलके समान पक्ष्यानिलभासदवेधगोप्पा ॥१७॥ दाक रही पी ॥ १७ ॥ प्रष्ट्या सास सर्वे मत्वा पन्दावनमियम् । वषासुरकर ऐसा रूप देखकर मार्कोन समझा कि पर भी वृन्दावनकी कोई शोमा है। वे कोसुकाश से. व्याचामगरसुण्डेन पत्प्रेषन्ते स लीलया ॥१८॥ ही सेमें उपेक्षा करने लगे कि यह मानो अमगरका हुआ हो ॥१८॥कोई कहता-मित्रो भय, मतव्यमो महो मित्राणि गदस सत्रकूट पुरः स्थितम् । सो या जो हमारे सामने कोई जीव-स्त्र पैठा है यह हमें निगल्नेके लिये खुले हुए किसी मगरके मुँह-जैसा नहीं है" ॥१९॥ दूसरेने पहा---सचमुच स्यकी किरणे असस्सप्रसनव्यात्तष्यासतुमायते न पा ॥१९॥ | परनेसे ये जो बादल अल-लाल हो गये हैं, वे ऐसे मालूम होते हैं मानो ठीक-ठीक इसका ऊपरी हो ही सरपमर्ककरारतमुचराहनुष पनम् । हो । बौर म्ही वादळकी परम्से यह ये नीचेकी भूमि कुछ खळ-माल दीख रही है, मझी इसका नीचे अपराहनुयात् रोधस्तत्प्रविछायमायणम् ॥२०॥ | होठ बाम पड़ता है ॥ २० ॥ तीसरे ग्वालबालने पा- हाँ, सच तो है। देखे तो सही, क्या ये दापी वीर प्रतिस्पर्धेते सपिम्पा सम्पासष्ये नगोदरे । पायी मोरफी गिरि-पतराएँ अमगरके सोपी हाल नहीं करती ! और ये ऊँची-उधी शिवर-पंकियों तो समसालयोऽप्येवास्ताष्ट्राभिम पम्मत ॥२१॥ | साफ साफ इसकी दाई म्यादम पाती है। ॥ २१ ॥ पौष- ने कहा-भरे माई। पहली पौदी सपको ठीक आस्ठतायाममार्गोऽय रसना प्रतिगर्जति । धनगरकी टीम सरीसी माश्म पस्ती है और इन गिरि योक यीचा अधिकार सो उसके मुंदके भीतरी माग- प्पामन्तर्गत पान्तमेसदप्यन्सराननम् ।।२२॥ को भी मत करता है, ॥ २२ ॥ किमी दूसरे बसान | पहा-देख, दम्ो । ऐसा मान पता है कि नहीं दावाष्णस्तरबातोऽयं पासव भाति पश्सस । । पर मंगामें नाग गी है। इसीसे यह गरम और तीमी हवा पा रही है । परस्त अजगरकी सौमो साप इसका तदरपसायदुर्ग पोऽप्यन्तरामिपग भात् ॥२३॥ | पा ही मेर वैट गया है । और उसी बागसे जमे हुए प्रागिर्योकी दुगन्ध ऐसी नान पहती है, मामो भनगरके में मरे हुए जीवोंप मामी की दुर्गन्ध हा ॥ २३ ॥ अम्मान किमत्र प्रमिता निविध तब उन्हीममे एपन कहा- हमनेगाइसफ मुंहमें भुम अप, ता क्या पर दमै निगा मापन ! भनी ! नय तथा पेसम्म पिनापति । या स्य निगया। ऐसा करनेरिया पीता अ० १२] दशम सन्ध २०१ धणादनेनेति बकार्युषन्मुख एफ क्षणमें यह भी यकामुरके समान न हो जायगा । हमारा यह कनीया इसको रोग पोड़े ही । इस प्रकार वीक्ष्योइसन्सः फरताउनैर्ययुः ॥२४॥ करते हुए वे ग्वालबाछ कासुरको मारनेवाले श्रीकृष्णका मुन्दर मुस देखते और ताठी पीट-पीटकर हंसते हुए इत्व मियोऽतम्यमतज्ज्ञमापित अघासुरके मुंहमें घुस गये ॥ २४ ॥ उन अनजान यायी मापसमें फी हई भ्रमपूर्ण बातें सुनकर भुत्ता विपिन्स्पेत्पमृपा मुपायते । मगवान् श्रीकृष्णने सोचा कि 'अरे, इन्हें तो सच्चा सर्प भी ध्य प्रतीत होता है ।' पीक्षित ! रक्षो विदित्याखिलम्तरत्स्यितः मगवान् श्रीकृष्ण नान गये कि यह राक्षस है । मय, स्वाना निरोधु भगवान् मनो दधे ॥२५॥ | उनसे क्या छिपा रहता ! ये तो समस्त प्राणियोंकि इदयमें ही निवास करते हैं। अब उन्होंने यह नियय किया कि सावत् प्रविष्टास्त्वसुरोदरान्तर अपने सस ग्वार-या को उसके मुंहमें जानेसे बचा में ॥ २५ ॥ मगवान् इस प्रकार सोच ही रहे थे कि सब- परं न गीर्णाः शिवः सपस्साः। के-सब मालबाल छोंके साय उस असुरके पेन्में चले गये । परम्तु अघासुरने अभी उन्हें निगव्य नहीं । इसका प्रतीक्षमाणेन पकारियेशन कारण यह था कि अघासुर अपने भाइ यम्मुर पौर यहिन ननाके वधफी याद करके इस यातकी पाट देख इतखकान्ससरणेन रक्षसा ॥२६॥ रहा पा कि टनको मरनेवाले श्रीकृष्ण मुँहमें या साप, तब सबको एक साप ही निगम जाऊँ ॥ २६ ॥ मगवान् तान् पीरूप रुणः सकलाभपप्रदो श्रीकृष्ण सयका अमय देनेगल हैं। जब उन्होंने देख पनन्पनाथान् स्यारादषच्युतान् । कि ये वारे म्यापार-जिनका एकमात्र रक्षक में ही हूँ मेरे हापसे निकल गये और मैसे कोई तिनफा ठा- दीनांच मृत्योर्जठराग्निघासान् पर आगमें PR परे, वैसे ही अपने आप मृत्युसपनपाप्मुरफी जठराग्निके पास यन गपे, तय देवकी इस विचित्र जीवापर घृमादितो दिएकवेन मिमित ॥२७|| | भगवान्यो यहा विस्मप हुआ वोर उनरा एय दपासे दस्ति हो गया ॥ २७ ॥ स सोपन उगे कि 'अब मुप्ते कस्यं किमत्रास्प वलस्स बीपनं स्पा करना चाहिये । ऐसा कौन-सा उपाप है, जिससे इस दुष्टकी मृत्यु भी हो नाप और इन संनयमाव मार- नपा अमीपां च सतां विस्सिनम् । मासे पामारी हत्या भी न हा। ये दोनों काम में हो सफते। परीक्षित ' भगवान् श्रीरण भूत, मरिष्य, दर्यकर्ष स्पादिति सविपिनपत जान-सया प्रश्पक्ष दाने रहते हैं। उनके रिये मास्वाविशयम परम्परि ॥२८॥। यह उपाय जानना फोड़ पटिन न पा ! अन्ना मान्य निमप फाप म्यप टमुफ मुहम पुम गरे ॥ २८॥ उस सदा पनप्छदा देषा भयादारति पुशु । सम्प पदलोंमें डिनर देवा मपण दाम-दापा पुगर के और अपमुग्फ हिनै सवारिभम वर्ष प्रस्ट आप प फमापा फोणपाम्पमाभवाः ॥२९॥ ' पाने टगे ॥ २९ ॥ मा १ त २२१- २०२ श्रीमद्भागवत [२० १२ । सन्मुला भगवान् कृष्णस्वम्पयः सार्मवस्सकम् । अघासुर कमों वीर मामा के सहित भगवान् पूर्तीचिकीर्पोरारमानं तरसा वषे गले ॥३०॥ श्रीकृष्णमयो अपनी सोंसे घसकर चूर-चूर कर गाना घाइता था। परन्तु उसी समय अश्निाशी श्रीमाणने तवोऽसिकायम निरुदमार्गिणी देवताओंकी पाय-हापा मुनकर उसके गमे, वस्ने मुद्गीर्णरप्टेम्रमतस्त्वितस्तत । शरीरको यही फुर्ससि का लिया ॥ ३०॥ इसके बाद पूर्णोऽन्तरले परनो निरुदो भगवान्ने अपने शरीरको इतना मा कर पिकि उसका गाय ही रुघ गया । बोसें ठर गयी । वह मर्पन विनिपाय विनिर्गवो पहिः ॥३१॥ म्याकुल होफर बहुत ही छटपटाने या । साँस सकर तेने सर्वेषु परिर्गत | सारे शरीरमें मर गयी और मत्तमें उसके प्राण प्रसन्न फोरकर निकल गये ॥ ३१ ॥ उसी मार्गसे प्रा!के प्रामेषु पत्मान् मुरदः परेवान् । साप उसकी सारी इन्द्रियों भी पारीरसे बाहर हो गया । रएया स्वपोत्थाप्य तदन्वितः पुन उसी समय मावान् मुकुन्दने अपनी अमृतमपी एपिसे मरे हुए क्मों और मायाको जिस्म दिया और उन पक्वान्नान्दो भगवान् मिनिर्ययो ॥३२॥ सबको साप लेकर वे अघासुरके मुंहसे बाहर निकल पीनादिभोगास्थिवमनुत मह बाये ॥ १२ ॥ उस पनगरके स्थूस पारीरसे एक बयत बहुत और महान् ज्योति निकी। उस समप उस योनि- ज्योति: सपाम्ना वलपद दियो दया । | के प्रकाशसे दसों निशाएँ प्रगति हो उठी । पर पोपी प्रतीक्ष्य खेजस्थितमीसनिर्गम देरतक तो बाकाशम सित होकर भगवान्के निकालनेकी प्रतीक्षा करती रही । नब वे पाहर निकल जाये, तब विवेश समिन मिपता दिवौकसाम् ।।३।। यह सब देवताओंके देखते-देखते उन्होंमें समा गयी ॥१३॥ ततोऽविरहा स्वकवोऽस्ताई उस समय देवताओंने छ परसाकर, मसरानि नाच कर, गम्वनि पाकर, विषारीने पाजे बनाकर, मामोंने पुप्पैः मुरा अप्सरसप नर्तने । सनि-माटर और पार्षदोंने नय बपकारके नारे गीत मुगा पापपराम पापी एमावर या यानन्दसे मावान् श्रीकृष्णका अमिनन्दन स्तोम विमा बानिस्सनर्गणाः ॥४॥ | किया । क्योंकि भगवान् श्रीमणने बधासुरको मरकर उन सबम बहुत बड़ा पाम किया ॥ ३१॥ उन तहसम्पात्रमुगापगीविका- बहुत स्तुतियों, सुन्दर पात्रों, मामय गीतों, जय-जयकार जपादिने कारसकमाउस्मनान । पौर आनन्दोरमयोंकी मङ्गरम्यान प्रमोक्के पास पहुंच गयी । जय मानीने पर पनि सुनी, साये बहुत ही भुनासपाम्नाऽन्त्यम आगताऽचिरा शीघ्र भरने पाइनपर चार नही जाये र मगायन रष्टा महीशम्प मगाम विम्मयम् ॥३५॥ श्रीकृष्ण यह महिमा दमकर वामपंपक्ति हो गये ॥३५॥ परीजिन् । र वृन्दावन में अजगर बर पाम सुम्स राजन्नामगर धर्म शुष्क इन्दावनतम् । गया, तर पासियों के विमल गिनातक रोम्नेरी मनोहमा बहुतिय पवाफीरगदरम् ॥३६॥ यजल गुप-सी पना रहा ॥ ३६॥ या जो मगयान्न अग्ने पायागेर मुरमुरे मुरसे यबापा पा और पह कौमार कम एसम्मादिमायणम् । नमगरको मोशन किया, वह य मान्ने ।

५० १२] दशम स्कन्ध २०३ - - मुस्पोः पौगाउके बाला रमेधुनिमिता मजे ॥३७॥ | मफ्नी कुमार अवस्थामै वर्षात् पाँच वर्षमें ही की थी म्बामालोंने उसे उसी समय देख भी था, परन्तु पौमाण नैतत् विचित्रं मनुवार्ममापिना असा अर्याद छठे वर्षौ मस्पत मापर्यचकित होकर व्रजमें उसका वर्णन किया ॥३७॥ अमाप्सुर मर्सिम्मन् मघ परावराणां परमस वेधसः । (पाप) ही पा । भगवान्के स्पर्शमात्रसे उसके सारे पाप धुर गये और उसे उस सारूप्प-मुक्तिकी प्राप्ति मपोऽपि यस्पर्शनभोवपातक: जो पापियोंको फभी मिल नहीं सकती। परन्तु यह कोई यावर्यकी बात नहीं क्योंकि मनुष्य पालयली-सी टीम पापात्मसाम्पं त्वसा सुदुर्लभम् ॥३८॥ रचनेवाले ये वेही परमपुरुष परमारमा है, जो व्यक्त-अम्यक और कार्य-कारणरूप समस्त मगरके एकमात्र विभत्स पदाप्रविमान्सराहिता हैं ॥ ३८ ॥ मगवान् श्रीकृष्णके किसी एक बाकी मावनिर्मित प्रतिमा यदि ध्यान के द्वारा एक बार भी हदपमें मनोमयी भागवती ददौ गतिम् । [ वैय ही नय, तो यह साम्य, सामीप्य भादि गतिका दान करती है, जो भगवान्के मारे मतोंको मिस्ती स एष नित्यास्मसुखानुभूस्पमि है। मावान् साम्मानन्द के निस्य साक्षात्कारसरूप हैं माया उनके पास नहीं फटक पाती। ही सर्य म्पदस्तमायोऽन्तर्ग तो हि किं पुन ॥३९॥ अघासुरके शरीरमें प्रवेश कर गये । क्य भव मी उसकी | सद्गतिके विषयमें कोई सम्वोर है। ॥ ३९ ॥ साजी करते है-शौनकादि पियो । पदुपश- शिरोमणि भगवान् मीणने ही राजा परीक्षितको दिवा यादवदेवदतः बीवन-दान दिपा पा! उन्होंने बम अपने रक्षक एवं भूत्वा स्वरातुपरितं विपित्रम् । सीवनससका या विचित्र चरित्र मुना, तब उन्होंन फिर भीशुकदेवजी महारानसे उन्हींकी पवित्र खाके पप्रच्छ भूयोऽपि तदेव पुर्ण सम्बन्धमें प्रश्न किया । इसका कारण र पा कि वैयासकि यभिगदीतपेवा ॥४॥ | भगवान्की अमृतमपी मेयने परीशिवके पितको जपने शमें कर रस्म पा || १० ॥ रागोवाच पजा परीक्षितने पूम-भगवन् ! नापने कहा पा कि बाबोंने मगलान्की कीई पाँच वर्षकी मेय प्रमन् कालान्तररुतं तस्काठीने कपं भवेत् । जनमें छठे बर्षमै नाफर कही। अब इस विषयमें भाप का करके या वतमाये कि एष सम्पकी श्रील दूसरे पद कौमारे हरिकतं जगुः पौगरफेऽर्मका ॥४१॥ समयमें बर्तमानपाडीन कैसे हो सकती है। ॥११॥ महायोगी गुरुदेव ! मुझे इस बापर्पपूर्ण यस्यको माननके किय मदा कम्वास हो रहा है। बाप या करके साहि मे महायोगिन् परं कौतूहल गुरो। पस्याये । श्राश्य ही इसमें मगान् श्रीरणकी विधि परनामोंको घटित करनेवारी मापार पुछ-न-कुछ कम्म मनमेवरेरेप माया भपति नान्पया ॥४२॥ होगा । क्योंकि और किसी प्रकार ऐसा नहीं हो सकी सूत उपाय ।

२०४ भीमद्भागवत [२०१३ ग्रामण सूत उवाच वर्य धन्यवमा लाके गुरोऽपि पप्रपन्ययः । ॥ १२ ॥ गुरुदेव ! यपति क्षत्रियोचित | सेवासे विमुख होने के कारण में नपाधी मामाका क्षत्रिय हूँ, तथापि हमारा महोमम्प है कि हम अापके यत् पिपामो महुस्त्वचा पुण्परुणकथामृतम् ॥४३॥ मुखारबिन्दसे निरन्तर मरते हुए परम पवित्र मधुमप ग्रीकृष्णभिमक्का मार-मार पाम कर रहे है ॥ १३ ॥ सूतजी करते हैं- मगवान्के परम प्रेमी मोम श्रेष्ठ शौनकजी | मन रामा परीक्षितने इस प्रकार प्रम इत्य स पृष्टः स तु बादरायणि किया, सब प्रीशुकदेवजीको भगवान्की पर सीम स्मरण । हो पायी । और उनकी समस्त इन्द्रियाँ सपा पन्त सस्मारितानन्तावासिलेन्द्रियः । करण विवश होकर भगवान्की निस्पतीअमें सिंच गये । फशत् पुनर्लन्धपदिशिः धनः कुछ समयके पाद धीरे-धीरे श्रम और फरसे में पायजान हुआ । तब ये पीक्षित्से मगवान्की सीमका प्रस्याह त भागवतोचमोचम ॥४ा गर्णम करने लगे ॥ ११ ॥ .. इति श्रीमद्भागवत महापुराणे परमाईस्पं संदिसायो दशमस्करघे पूर्व शादशोऽप्याय ॥ १२ ॥ । मथ त्रयोदशोऽध्याय ग्रामीका मोह और उसका माश भीशु उपाय भीशुकदेवत्री कहते है-पीक्षित् । तुम बो माम्यपान् हो। मगलान्के प्रेमी मोम तमारा स्पन साघु पृष्ट महाभाग स्वया भागवतोचम । | श्रेष्ठ है । समी तो सुमने इतना सुन्दर प्रश्न किया है। में तो तुम्हें वार-पार मगवान्की सीम-कारें सुननेको यन्नूतनपसीगस्स मुवमपि को महः॥१॥ मम्नी, फिर भी तुम उनके सम्बन्धमें प्रभ करके उन्हें और मी सरस और मी नूतन यमा देते सतामर्य सारमृता निसर्गों हो॥ १ ॥ रसिभ स्नोंत्री मणी, कान और सप पदर्थवाणीचतिषेवमामपि । भगवान्की सीमाके गान, अबण और चिन्तनके लिय ही हाते है उनका यह स्पमाय ही होता है कि क्षण- प्रतिषण नम्पपदप्युवस्स यद प्रतिक्षण मगवान्की स्वयमोंको वर्ष रसम्पी और निस्य नन्न अनुमत्र करते रहें टीम से ही, मेसे रिया बिगनामिम साघु पार्वा ॥२॥SP पुरुगेंगे वियोंकी घमि नपा-ना रस जान पाना है ॥ २ ॥ पर्गशित् ! तुम एम पिसमे भाग गणुपारडिवो राममपि गुपं पदामि से। को । यपरि भगवान्धी या पग बयान रहस्पमपी | है, फिर भ म तुम्हें सुनाता है। क्योंकि दयाइ बाचार्य- प्रपः स्निापम्प शिप्पस गुरमो गुममप्पत ॥ ३ ॥ गग आने प्रमी शिष्यको गुम रम्य भी मतम दिया -- म. १३] दशम समन्ध २०५ उपाधमदनान्मृत्पो रक्षित्वा पत्सपालफान् । करते हैं ॥ ॥ यह तो मैं तुमसे कह ही चुका हूँ कि भगान् श्रीगने मपने साथी ग्यालझेको मृत्यु सरिस्पुलिनमानीय भगवानिदममवीत् ॥ ४॥ रूप बघामुरके मुंहसे क्या लिया। इसके बाद वे उन्हें यमुनाके पुलिमपर ले आये भोर उनसे कहने टो-॥२॥ महोऽविरम्यं पुलिन पपस्सा। मेरे प्यारे मित्रो ! यमुनाजीका या पुग्नि अस्पन्त रमणीय है। देखो वो सही, यहॉकी माछ किसनी फोमल और स्यकेलिसम्पन्मृदुलाग्छपाठकम् । सोहम लोगोंके लिये उनकी तो यहाँ समी सामग्री विषमाम है। देखो, एफ भोर रंग-बिरंगे कमल स्फुटत्सरोगभरतालिपत्रिक सिले हुए हैं और उनकी सुगन्धसे खिंचकर मार गुंबर कर रहे हैं, तो दूसरी मोर सुन्दर-मुन्दर पक्षी मा की पनिप्रविधानलसद्भुमाकुलम् ॥५॥ मधुर कारव कर रहे हैं, निसकी प्रतिष्पनिसे सुशोभित एल इस स्थानकी शोमा बना रहे हैं ॥५॥ भब अत्र भोक्तम्पममाभिर्दिया रूढ सुधार्दिताः। हमोगेको यहाँ मोबन कर लेना चाहिये । क्योकि दिम पात बा माया है और हमलोग भूखसे पस्सा: समीपेऽपापीम्या परन्तु भनफैस्समम् ॥६॥ पीवित हो रहे हैं। छो फनी पीकर समीप ही धीरे पीरे हरी-हरी घास परते ऐ॥ ६ ॥ तवेसि पापयित्वास पस्सानारम्प शाहले । ग्वाम्याने एक स्करसे कहा ठीक है, ठीक है। होंने ओंको पानी पिलाकर हरी-हरी घासमें छोड़ सस्वा विक्यानि पुसमुः सम भगवता सदा ॥७॥ दिया और अपने अपने छीके लोट-होलकर भगवान्के साप बो भानन्दसे मोक्न करने लगे ॥७॥ सबके फणस वियफ पुरुराधिमणले बीचमें भगवान् श्रीकृष्ण बैठ गये । उनके चारों बोर | प्रख्यामेंने गुस-सी मध्यकार पक्तियाँ पना ही और रम्पाननः फल्सरको प्रमार्ममाः । एफ.से एक स्टमर कैठ गये । सबके मुंह श्रीकृष्णकी बार ये भीर सबकी आँखें मानन्दसे मिल रही पी । सहोपविष्टा विपिने बिरेनु- बन-मोचनके समय ग्रीष्ण साय पेठे हुए ग्वामयक ऐसे शोमायमान हो रहे थे, मानो कमटकी कर्णिकाके पछदा यथाम्मोकाकर्णिकायाः॥८॥ चारों ओर उसकी छोटी-बड़ी पंसुहियों मुशमित हो रही हों ॥ ८॥ कोई पुष्प तो कोई पते बार कोई केषित् पुप्पैर्दले फेषित् पल्लवैरहुरै। फल।। को फ्ल्प, ईकुर, फल, छीके, छाल एवं पवरोंक शिम्भिस्वग्मिपद्रिय पुसःकतमासना॥॥ पान बनाकर भोजन करने लगे ॥९॥ मगवान् श्रीकृष्ण और स्वास्थ्यास सभी परस्पर अपनी अपनी मिन्न-मिन्न सर्वे मिपो दर्शयन्तास्वस्वभोन्परुषि प्रथम् । रुविका प्रदर्शन करते । कोइ किमीको हँसा देता, तो को स्वयं ही सितेसते थे-पोट हा जाता । इस इसन्तो हासयन्तयाम्पवजाः सहेश्वराः ॥१०॥' प्रकार पे सब मेनन करने लगे ॥ १० ॥ ( उस सम्प २०६ भीमसागपत [२०१५ .. पिन वेणु चठरपटयो भूजवे च फक्षे श्रीकृष्णकी छटा सबसे निराठी पी। ) महोंने मुसीको तो कमरकी फेंदमें मागे मोर खोस लिया मा । सींग और देत मालमें दबा लिये थे । बायें हापमें पड़ा ही ममुर पामे पाणौ मसुणकवल सत्फलान्यकुलीपु । घृतमिश्रित दही-मासका प्रस प धौर अंगुलियोम भदरक, नीम् धादिके पवार-मुरम्ये दा रखे थे। ग्वाम्बाछ उनको चारों मोरसे घेरकर बैठेए पे बोरो स्वयें सबके मीच बैठकर अपनी विनोदमरी पोसे शिष्ठन् मम्मेसपरिसदोहासयन् नर्मभिारः अपने साथी ग्बामाको साते गा रे । सम्ख योंके एकमात्र मोका है, घे ही मगवान् कर बालोंके साप देकर इस प्रकार बाल मेल करते सर्गे लोकेमिपति पुराने पहमग पालकेलि॥११॥ ए मोबन कर रहे थे और स्पकि देवता आश्चर्यचकित होकर पर मानुस स्टीसा देस रहे ये ॥ ११ ॥ मारवेष पस्सपेषु मुलानेप्पध्युतात्मसु । मरतवंशशिरोमणे 1 इस प्रकार मोजन करते करते बाम्पा भगवान्फी इस रसमयी खमें तमय हो गये। पत्सास्स्वन्तर्वने दूर विविस्तृणलोभिवाः ॥१२॥ उसी समय उनके को हरी-भरी मासके पाठबसे फोर नंगठमें बड़ी दूर निकल गये ॥ १२ ॥ सम्बालबारों वान् मा भयसंत्रस्तानचे कणोऽस भीमयम् । का पान ठप्त बोर गपा, तब होवे मपमीत हो गये। उस समय अपने भक्तों के मयको मग्न देनेवाले मगान् मित्राण्याशान्मा विरमदेहानेप्पे यसकानाम् ॥१२॥ मीणने कहा-- मेरे प्यारे मित्रो ! तुमग भोग्न करना 4६ मत करो । मे भी पछाको किये बात इत्युक्त्वाद्रिदरीजगहरेप्यास्मवस्सकान् । १॥ १३ ॥ पापा से इस प्रकार कहकर मायान् श्रीकृष्ण हापमें दही-भातका कोर रियेही पाड़ों, गुफागों, विचिन्वन् भगवान् कृष्णासपाणिकवला यमौ॥१४॥ कुनों एवं बम्पन्य भयाहूर मानोंमें अपने तथा सावियोंकि छाड़ोंको इने फल रिये ॥ ११ ॥ परीक्षित् । प्रभावी मम्भोममनिस्तदन्सरगतो मापार्मकस्येशित पामेसे ही बाकाशमै उपस्थित थे । प्रमुके प्रवसे षघामुरका माक्ष देखकर उन्हें पहा आर्य हुमा । द्रष्टुमनु मदिस्पमन्यदपि सदस्सानिधो पत्सपान् । उन्होंने सोचा कि एनसे मनुष्य-बाय बने हुए भगवान् श्रीकृष्णकी कोई और मनोहर महिममपी सीन देखनी नीत्यान्यन रुवान्तरदधात् खेऽवस्थिता यः पुरा चाहिये । ऐसा सोचकर उन्होंने पहले सो बछयोंको, चौर भगवान् श्रीकणके चले जानेम मामाको भी, ट्यापासुरमावर्ण प्रभयता प्राप्तः परं विमपम्॥१५॥ क्या ले माक्र रम पिया धीर सय तर्धान हो गये, अन्तत वे जा सकी ही तो स्तान है॥ १५॥ वतो वस्मानदैत्य पुलिनेऽपि च परसपान् । मान् श्रीग का म मिनेर यमुनानीके पुग्निपर और बाये, परन्तु पहा क्या देखते ही उभावपि पन छप्पो विविकाप समन्ततः ॥१६॥ | पायउ भी नहीं है । सब उन्होंने बनमें घूम-घूमकर अ०१३ ] दशम स्कन्ध काप्यानान्तर्विपिने घम्सान पालाप विश्ववित् । । चारों घोर उन्हें इस ॥ १६ ॥ परन्तु बव म्बावाल और म्छो उमें कहीं न मिले, तब वे तुरंत मान गये सर्ष विधिकृत कृष्णः सरसाव बगाम ॥१७॥ हि या सव प्रमाकी करवत है । ये तो सारे विवके एकमात्र आता है ॥ १७ ॥ अब मगअन् श्रीकृष्णने वों और बाबा की माताओंको तप्प प्रमाजीको वतः कष्णो मुदं कर्तुं तन्मातृमा च फस्स छ । मी आनन्दित करनेके ठिये अपने आपको ही बछड़ों और मायनों दोनोंके रूपमें मना लिया क्योंकि येही उमयायितमास्मानं चक्रे विश्वदीपरः ॥१८॥ तो सम्पूर्ण विश्के कर्ता सर्वशक्तिम्मन् ईश्वर है ॥ १८ ॥ पीक्षित् | ये मालय और बछरे सध्याम मितने थे, पायद पत्सपवत्सफास्पफर पुर्यावत् फराण्यादिकं नितने छोटे-छोटे उनके शरीर थे, उनके हापपैर जैसे- नैसे थे, उनके पास पित्नी पौर नैसी छपियों, सींग, पावन पष्टिरिपामणदलचिग पाषद निम्पाम्बरम् । माँसुरी, फ्ते और छीके थे, जैसे और मितने वयाभूषण थे, उनके शील, स्वभाष, गुण, माम, रूप और अवस्साएँ यावच्छोसगुणाभिधाकविषयो यावर विहारादिर्क मैसी पी, जिस प्रकार ये साते-पीते चार करते थे, ठीक वैसे ही और उतने ही सोम सर्वस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट सर्व विष्णुमप गिरोऽङ्गायदमा सर्वस्वरूपोपभो॥१९॥ हो गये । उस समय या सम्पूर्ण कात् विष्णुरूप है- यह वेदवाणी मानो मतिमती होकर प्रफ्ट हो गयी ॥ १९ ॥ स्वरमात्माऽऽस्मगोवस्सान् प्रतिवारिमवन्सपै।। सस्मिा मगवान् स्वयं ही नछो वन गये और स्वयं ही बाल- माल । अपने मात्मस्वबप क्योंको थपनेमात्मस्वरूप पाल- फ्रीरमात्मनिहारै म सर्वारमा प्राविश्व समम् ॥२०॥ लो हुए उन्होंने सत्र में प्रवेश किया ॥ २० ॥ परीक्षित् । बामेंक द्वारा फेरकर अपने ही साप बनेकों प्रकारके खेल मिस ग्वाम्क नो पछड़े थे, उन्हें उसी गामायके तचदत्सान पर नीस्वावगोष्ठे निवेश्य सः। रूपसे अग्ना-मस्या से जाकर उसकी वासा में घुसा दिया और विमिम पालकोंके रूपमें उनके मिम-मिम परॊमें तवारमाम राबस्त वत्सप प्रविष्टवान् ॥२१॥ चले गये ॥ २१ ॥ तन्मातरो घेशुरषत्वरोरिषता म्याम्पोंकी माताएँ वामरीकी तान सुनते ही मन्दी से दौर आयी । ग्यासबाट बने हुए परम श्रीकृष्णको उत्याप्प दोभि परिरम्प निर्मरम् । माने यम्ये समसकर हापोंसे ठयकर म्होंने जोरसे एयसे म्गा लिया । ये अपने प्रोंसे पारसस्य स्नेहकी स्नेहस्तुतस्तन्यपयासुधास अधिकता के कारण मुबासे मी मधुर धीर वासबसे भी मस्या परं प्रम मुवानपायपन् ॥२२॥ मादक सुनुवाता हुआ दूध उन्हें पिथने थ्गी ॥ २२ ॥ सतो नृपा मर्दनमझलेपना परीक्षित । इसी प्रकम प्रतिदिन मगवान् श्रीरण उन ग्वाम्मागेके रूपमें पनसे और सहाररक्षातिलकापनादिभि । आते और अपनी गसम्म गोंसे माताधाको • भगवान् सर्वसमर्थ ।। वे अपनी पुण्ये हुए पासबाट मौर पराम्प सरते थे। पितु इमसे असामेन मेर दूर न ऐसा मौर में मगयी उस रिम्प मयान एचर्य न देत म मिमने उनके विधर्माधान ममिमाम मारिया । इसीमिये मायाम् उनी गासपास मौर कामपारसकीयसे डीएवं रतने ही माम्पाप मेर रणे पत्र गये। । सन्प्यासमप - २०८ श्रीमद्भागवत [२०१३ । संलालितः स्थाचरितः प्रहर्पयन् मानन्दित करते। वे माताएँ उन्हें उमान गाती, न पन्दमका ख्य फरती गैर भम्छे-अच्छे बसों म सायं गतो यामयमेन माधवः ॥२३॥ गहनोंसे सजातीं । दोनों मौके पीच गठसे अपने छिये कानमा ठिौना लगा देवी ता मोमन का गावम्तमो गोष्ठसपेत्य सस्वर चौर तरह-तबसे वह अब-प्पारसे उनका मन पर करती ॥ २३ ॥ म्यालिनोंके समान गौर भी व अंगों हुकारपोपैः परिहासङ्गवान् । | मैसे परकर मन्दी-जल्दी लोटती और उनकी सुनकर उनके प्यारे के दौरान उनके पास आ रहे स्वकान् स्वकान् यत्सतरानपायपन् वे बार-बार उन्हें अपनी जीमसे चाटती और परम पूध पियती । उस समय स्नेहकी अधिकताके काR महुलिन्त्यः सबदौपस पयः ॥२४॥ उनके पोंसे स्वयं ही धकी धारा पहने लगावी ॥२१॥ इन गायों और ग्यासिनोका मासूमात्र पहले जैसा है गागोपीनां माततामिन् सर्वास्नार्दिको मिना । ऐपर्पज्ञानरहित और पिशुन पा । हो, अपने बस पुत्रोंकी अपेक्षा इस समय उनका स्नेह पश्य वधिय पुरावदास्वपि हरेस्तोफता मामया विना ॥२५॥ या। इसी प्रकार मगवान् भी उनके पहले पुत्रों के समान ही पुत्रमाप दिखा रहे थे, परन्तु सालान्में उन बाम बचौकसा स्वतोकेष स्नेहवालचाम्दमन्वहम् । के जैसा मोहका भाव नहीं था कि मैं इनका पुत्र है ॥२५॥ अपने अपने पारकों के प्रति मासियोंकी स्नेह-छता दिन प्रतिदिन एक वर्षसक धीरे-धीरे सती ही गयी। यातक अनैनि:सीम पाघे यथा सणे स्वपूर्ववत् ॥२६॥ | कि पहले श्रीकृष्णमें उनका मैसा असीम और धर्म प्रे: पा, वैसा ही अपने इन बझोंके प्रति भी हो गया ॥२६॥ इस्वमात्माऽऽत्मनाऽस्मानपस्सपालमिषेण सः। इस प्रकार सरिमा श्रीकृष्ण मे और पापा के महामे गोपाल मनकर अपने बालकरूपसे पसरपका पान करते र एक पर्वतक वन और गोष्ठमें क्रीय पाउमन् वस्सपो पर्ष विकीरे बनगोष्ठयोः ॥२७॥ करते रहे ॥ २७ ॥ एकदा पारयन् वस्सान सरामोपनमाविशत् । पा एक का पूरा होनेमें पाँच- रातें शेष पा, तप एक दिन मगवान् श्रीकृष्ण कटरामनीके साप पकों पञ्चपासु बियामासु ापनापूरणीपमः ॥२८॥ को घराते हुए नमें गये ॥ २८ ॥ उस सम्प गौर गोवर्मनकी चोटीपर घास पर ही बी । यहाँ तो विद्रापरता गापो बस्सानुपद्रवम् । महानि इनके पास ही घास पर पुए बात र गोवर्षनादिभिरसि चरन्स्पो दशस्तमम् ॥२९॥ पपने कम्योंको देखा ॥ २९ ॥ पोको देखते ही गोंका सत्य-स्ने उमा वाया । वे अपने राध तस्स्नोपशोऽस्मतास्मा वापकी मुष-मुम सो बैठी और पाक रोकनेकी कुछ भी परवा म कर निस मर्गसे ये न न सकते थे, उस स गोवमोऽस्पास्मपदुर्गमार्गः । । मार्गस फार करती हुई बड़े से दौर पा । सस अ०१३] दशम समय २०९ विपान करनीष उदासपुच्छो समय उनके पनोंसे दूध कहता जाता पा और उनकी गरदने सिकुकर मे मिल गयी पी। वे छ तथा ऽगावहतगमपमा नयेन ॥३०॥ सिर उठाकर इतने वेगसे दौर रही थी कि माध्यम होता पा मनो उनके दो ही पैर है ॥ ३० ॥ जिन गौओं के समरप गानोऽधा वत्सान् मत्सबत्योऽप्यपाययन् । और भी छो हो चुके थे, घे भी गोषर्बनके नीचे अपने पहले मोके पास दौर आया और उन स्नेहवश गिलन्स्य इव पाङ्गानि लिइन्स्पाखौधस पयः॥३१॥ अपने बाप कहता हुआ दूध विग्रने लगी । उम समय में अपने क्योंका एक-एक आर ऐसे चावसे चाट रही पी, गोपास्तद्रोधनापासमोपलन्जोरुमन्युना । माना उन्हें अपने फेमें रच रेंगी ॥ ३१ ॥ गोपोंने उन्हें रोक्लेश बहुत कुछ प्रयत्न किया, परन्तु उनका साग दुर्गापमतोऽम्पेस्य गोषस्सैर्दशः सुतान्॥३२॥ प्रकन व्यर्थ रहा । उ आफ्नी त्रिफलाफर कुछ ला और गार्योफ्र यदा कोव भाया । जय वे बात कम व्या- सदीषणोस्ममरसाप्ताशया कर उस फठिन मार्गसे ठस स्पानपर पहुंचे, तब उमोंने छोंके साथ अपने यायोको भी टेम्मा ॥ ३२ ॥ मातानुरागा गतमन्पवोऽर्मकान् । अपने क्योंको देखते ही उनका एय प्रेम रससे सराबोर हो गया । बोंक प्रति अनुरागकी यात खा गयी, ददुप दोमि परिरम्य मूर्धनि उनका क्रोष न जाने कहाँ हसा हो गया । उन्होंने अपने अपने मालकको गोरमें उपकर एयसे स्टा लिया घ्राणैरमापुः परमां सद ते ॥३३॥ और उनका मस्तप सूंघकर मापत माननित हुए ॥३३॥ सूरे गोको कपने वालोंके आश्रिनसे परम वानन्द तत प्रवयसो गोपाम्तोकान्लेपमुनिर्माता । प्रास उभा । व निहाल हो गपे । फिर बरे क्ठसे उन्हें मेषकर धीर-धीरे यहाँसे गये । जानेके बद भी वापकों के और टमक कामिनके स्मरणसे उनके नेत्रोंसे प्रमक कम्पाम्छनैरपगतास्तदनुस्मृत्युदभषा ॥३४॥ । बांसू बहते रहे ॥ ३१॥ व्रजस्प राम प्रमवीक्ष्पोकम्पमनुषणम् । वामनीने देस कि प्रवासी गोप, गौर नीर वामिनोंकी न सन्तानोंपर मी, जिन्होंने अपनी माका मुक्तस्तनेष्वपस्पेमप्पहेतुषिदचिन्तयत् ॥३५॥ दूध पीना छोड़ गया है, क्षण-प्रतिक्षण प्रेम सम्पत्ति और म्सके भनुरूप उत्तम्य मनी ही जा रही है। तवरे विचारमें पा गपे, पोयि उन्हें इसका कारण मायम किमेतदनुसमिव बासुदवेऽखिलास्मनि । म पा ॥ ३५ ॥ यह कैसी विचित्र घात ! महिमा | भीगमें प्रजवासियोका और मेरा बसा मर्व स्नेह है, नमस्म सात्मनम्ताकेम्पपूर्व प्रम पर्पते ॥३६॥ 1 वैसा ही इन बाठकों और ओपर भी माना जा रहा ॥ ३६ ॥ यह कौन-सी मया है। कासि आपी है। यह किसी दबाकी है, मनुप्यकी है अपन भमरोंकी फेर्य का कुत मायाता देवी वा नार्यतासुरी । । परन्तु क्या ऐसा मी सम्मत्र है। नहीं-नहीं यह तो मेरे । - -- मा म स २२७- २१० भीमद्भागवत । प्रायो मायास्तु मे भर्नान्या मेऽपि विमोहिनी॥३७॥ प्रमुखी ही मया है । और किसीकी मायामें ऐसी मा. नहीं, जो मुझे भी माहित कर ले ॥ ३७॥ बरामी इति सश्चिन्त्य दाशार्दो पत्सान् समयसानपि । एसा विचार परफे शानदारिसे देख, ता उन्हें पम मा हुया कि इन सब छहों और ग्यासमा कमें न सर्वानापष्ट पैकण्ठं चतुपा पपनेन स ॥३८॥ भीकृष्ण-ही-श्रीकृष्ण हैं ॥३८॥ सब उन्होंने भी कहा---'भगवन् ! ये मायाम और बछड़ न दास नैते सुरेशा भूपयो न चैते और न तो कोई अपि ही । इन मिन्न-मिग्न मा आश्रय लेनेर भी आप अकेले ही इन मर्पोम प्रालि स्वमेव भासीश भिदाभयेऽपि । हो रहे हैं। कृपया स्पष्ट करके थोड़े ही यह म दीजिये कि भार समें पृथक्त्व निगमात् फथ यदे प्रकार कम, बक, सींग, रस मारिके लपमें मश-आण क्यों प्रकाशित हो । त्युकेन व प्रणा मलोऽयेत् ॥३९॥ तव भगवान्ने ब्रह्माकी सारी करत सुनाये में क्यामजीने सस्प बातें जान म ॥ १९ ॥ तावदेत्यात्ममात्ममानेन शुटयनेहसा । परीक्षित् | तमसा मामाची प्राकसे अजमे है आये | उनके कालमानसे जस्तक केवल एक पुरोगदम्ब फ्रीरन्तं दरशे सकल हरिम् ॥४०॥ ( नितनी देरमै तीसी सूइसे काफी सुकी किर समय व्यतीत हुला । उन्होंने देखा कि भार श्रीकृष्ण ग्यासबाल वीर मछकि साप एक सारसे पहले मावन्सो गोकले पालाः सवस्सा: मर्व एषाहि । भक्ति ही क्रीम कर रहे हैं॥१०॥ ये सोचने लगे गोकुलमें मितने भी बालवार वीर थे, मायापये अपाना मे नायापि पुनस्थिताः ॥४१॥ तो मेरी मायामपी शम्फापर सो रहे हैं उनको मने थाम्नी मायासे भो कर Pया था, वेक सक्तक सचेत नहीं हर ॥११॥ सब मेरी मम इस पवेऽष त्रस्मा मन्मापामोहितेतरे । मोहित वाया और मोंके अतिरिक से उसने दूसरे मास्क तथा मा कहसि मा गये, जो एक सार तापन्त एव वधाम्दं फ्रीमन्तो विम्मुनासमम् ॥४२॥ | भगवान्के साप स्केल रो॥ १२ ॥ प्रमानीने दो सानोपर दोनोंको देखा और मात देरसक भ्यान क अपनी शानर शिसे उनका रास्प खोलना चाहा, पर एपमेवेषु मेदेषु पिर मास्वा स आस्म।। इन दोमि कौन से पहले यामाठ हैं और कौन पीछे मना किये गये हैं, इनमेंसे कौन सन्चे है और के सस्पा के कतरे नेति मासु नेप्टे पश्चन ॥४२॥ नास्टी–पर बात ये किसी प्रकार म समा सके ॥४॥ भगवान श्रीकृष्णकी मायमें तो समी मुष हो रहे । एवं सम्मोदयन् विष्णं विमाई विचमाहनम् । परन्त कोई भी मया मोह भगवान्का स्पर्श मही । सकता । मामी उही भगवान् श्रीकृष्णको अपनी माय मोहित करने पले ये | किन्तु उनको मोरिस करना स्वयेष मापयामाऽपि स्वपमेष विमोहित ॥४४॥र रहा, वे भस्म होनेपर भी अपनी ही मायसे रुप म. १३] दशम स्कन्ध २११ . सम्पां तमोवन्नहार खद्योताधिरिषाहनि । माप मोहित हो गये ॥ ११॥ जिस प्रकार रातके घोर अन्धकारमें कुहरेके पक्षकारका और दिनके प्रकाशमें जुगनके प्रकाशका पता नहीं क्सा, वैसे ही जय शुद्र पुरुष महापुरुषोंपर अपनी मायाका प्रयोग करते हैं, तब यह उनका तो कुछ बिगार नहीं सकती, अपना ही मारतीतरमायैश्य निान्त्यात्मनि युञ्जतः ॥४५॥ | प्रमात्र सो बैठती है ॥ १५॥ सापत् सर्वेवस्सपाला पश्यतोऽजस्म तत्क्षणात्। ग्रमाची विचार कर ही रहे थे कि उनके देखते देखते उसी क्षण सभी म्याश्यल और बछ, श्रीकृष्णके परश्यन्त पनश्यामाः पीतकोशेपवाससः ॥४६॥ लपमें दिखायी पड़ने छो। सब के स्व सबल क्वरके समान श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, शहा, क, गा और पर्सजा शुकचक्रगदाराबीयपागय । पपसे युक्त-पतुर्मज । सक्के सिरफर मुकुट, काम कुण्डल और कमि मनोहर हार तपा फ्नमामएँ शोमाफ- किरीटिना मलिनो हारिणो धनमालिनः४७) | मान हो रही पी ॥ १६ १७ ॥ उनके पक्ष स्पलपर मुवर्णकी मुनहली रेस-श्रीपस, वाम पार्क, भीनस्साङ्गददोरत्नकम्मुकणपाणयः फरत्यामि श्याकार रलोंसे पड़ कंगन, घरोंमें नूपुर और कले, कमरमें पानी तथा अगुम्पिोंमें अगरिया नपुरैः फटफर्भावाः कटिसूत्राहुलीयकैः ॥४८॥ जगमगा रही थीं ॥ १८ ॥ वे नछसे शिछनक समस्त में कोमल और नूतन तुलसीकी माअएँ, जो उन्हें आदिमस्तकमापूर्णास्तुलसीनवदामभि मदे माम्पशाण मकोंने पहनायी थी, धारण किये हुए ये ॥ १९ ॥ उनकी मुसकान पौनीके सपन उम्पल फोमले सर्वगात्रप मुरिपुण्पयदर्पितेः ॥४९॥ पी और रतनारे नेत्रोंकी फ्टासपूर्ण विस्यन यदी ही मधुर पी । ऐसा मान पाया था मनो वे इन दोनों के चन्द्रिका विशदस्मेरैः सारुमापानीक्षितः। द्वारा सत्वगुण और रनोगुणको मीकार करके मकननोंक प्रयम मुद अपसाएँ सगाकर उनको पूर्ण कर रहे म्यकाथानामिन रब सवाम्यां स्रष्टपालका ॥५०॥ ॥ ५० ॥ ब्रह्मामीने यह भी देख कि उन्हींक से दूसरे प्रमासे लेकर तृणतक सभी चराचर जीम मूर्तिमान पारमादिस्तम्बपर्यन्तैमूर्तिमझिपराधरैः । होकर माचते-गाते भनेक प्रकारकी पूजासामग्रीसे पण मण मगमानके उन सब सोकी उपासना कर रहे नृत्पगीसाधनेका। पृथक् पृथगुपासिताः ॥५१॥ है ।। ५१ ॥ उन्हें लगभग्रा अणिमा-महिमा श्रादि अधिमाधर्महिमभिरनापाभिरितिमि सिदियों, माया-विषा वार विभूतियों पर महत्तत्त भार पौबीसौं सत्व पारों ओरसे घेरे हुए हैं ॥ ५२ ॥ प्रकृति में - पतुर्विश्चतिमिस्तस्यै परीवा मादादिभिः ॥५२॥ झोम उत्पन्न करनेवाअ कार, उसके परिणामस कारण समात्र वासनाओंको जगानेवाग्य संस्कार, कामनाएँ, । फालस्वभावसस्कारकामकर्मगुणादिभिः । मम, विश्य और पर सभी मर्निमान् होकर मगवान के प्रस्पक रूपकी उपासना कर रहे हैं । मगवान्की सता म्वमहिप्पस्तमतिभिर्मृतिमशिरुपासिवा ॥५३॥ चोर महत्ताक सामने उन समीकी सन्ा भौर महत्ता । - , म २१२ भीमद्भागवत [म. १५ । सस्पचानानन्तान दमात्रैकरसमूर्तयः वफ्ना अस्तित्व खो बैठी पी ॥ ५३॥ मानीने य भी देस्म कि वे समी मन, मक्ष्यित् और वर्तमान कामे वारा सीमित नहीं है, त्रिकामवाधित सस्प है। व स्व- असाटरिमाहात्म्पा अपि मुपनिपशाम् ॥५४॥ के सम सर्यप्रकाश और केवल अनन्त बानन्दस्वरूप है। उनमें जाना अपना चेतनताका भेदभाव नहीं है। सप के सब एकरस हैं। यहाँतक कि उपनिपास तत्वमानियोंकी ठिमी उनकी अनन्त महिमाका स्त्र एव सरुद्ददर्शाम परममास्मनोऽसिलान् । नहीं कर सकती ॥ ५१ ॥ इस प्रकार प्रमाजीने एक साप ही देखा कि वे सब के सब उन परम परमात्म श्रीकृष्णके ही स्वरूप है, किनक प्रकाशसे या सर यस्प भासा सर्पमिदं विभाति सचराचरम् ॥५५॥ घराधर जगत् प्रकाशित हो रहा है ॥ ५५ ॥ ततोऽतिकतुकोदात्य स्तिमिसैकादशेन्द्रियः। य अस्पम्त भाचर्यमय पश्प देखकर नमानी सा चकित रह गये । उनकी म्यारहों इन्द्रियाँ ( पाँच कर्मेन्द्रिय | पाँच बानेन्द्रिय घोर एक मन ) शुभ एवं सम्ब रा तदाम्नामदमस्तूप्पी पूर्देम्पन्तीव पुत्रिका ॥५६॥ गयीं । वे भगवान्के तेनसे निस्केन होकर मौन में गये । उस समय वे एसे स्तम्ब होकर सा रह गये | मामो मनके अभिछात-वक्ताके पास एक पुसली सस हो ॥ ५६ ॥ परीक्षित् । मगवान्का स्वरूप तसे पो इसोरेशेऽवक् निममहिमनि स्वप्रमितिके है। उसकी महिमा असाधारण है । यह साम्प्रकाश, बानम्दसाम्प और मायासे अतीत । फेरत भी सामान पसे उसका वर्णन करनेमें असमर्थ है, इसपिये परप्राजातोऽतमिसनमुखममकमिवो । उससे मिका निषेध करके धनम्दम्बम्प या किसी प्रकार कुछ सहेत करता है। यपि ममानी समस्त पियामेंके अधिपति है, तफनि मायान्के रिव्यमा अनीशेऽपि द्रष्टु किमिदमिति पा समवि मति को ये तनिक भी न समझ सके कि यह पाहै। कहाँ- तक कि ये मगवान्के उन महिममय मपोंको देखने भी असमर्प हो गये। उनकी बात मुंद गर्यो । भगवान् पछादामा मात्वा सपदि परमोऽमाजपनिकाम्५७ श्रीकृष्णाने झाक इस माह और असमर्थताका जानकर दिना किमी प्रयासके तुरंत अपनी माया परा हा दवाऽवाप्रविलम्भाष:क' परेवबदुत्थितः। किया || ५७ ॥ इससे यात्रीको माघशान ला। मानो मरकर फिर जी उठे। सोश होकर उमोंने ज्यों- स्यों करके या मासे अपने नेत्र म्पोले । तब कहीं उन्हें रुपमा मीन्पचे जीरापप्रेद सहारमना ॥५॥ अपना शरीर और यह मगर एमपी पहा ॥ ५८ ॥ | नि अमानी जापागें भोर देग्न पगे, तब पहले मपपाभिवापश्यन् दियाऽपश्यत् पुराम्पितम् । रिसाएँ भौर उसके मार सुरंत ही उनक सामने मापन --

भ० १३]
दक्षम स्कन्ध
२१३
पन्दापनं जना जीपालुमाफीर्ण समाप्रियम् ॥५९॥ | Pखायी पदा । एम्दापन सबके लिये एक सा प्याग है ।
निवर देखिय, उधर ही जीयोंको नीयन देनेवाले फर
यत्र नैसर्गदुराः सहासन् नृमृगादयः । और घरोंसे लदे मुए, हरे-हरे पचोंसे लहलहात हुए
पोंकी पति शोभा पा सी हैं ॥ ५९ ॥ भगवान्
मित्राणीनाधितावासद्वृतरुटसर्पकादिकम् ॥६०॥ श्रीकृष्णकी लीअभूमि हानेके कारण वृन्दापन धाममें प्रोध,
वाणा मादि टोप प्रवेश नही कर सकते और वहाँ
सत्रादहत् पशुपयशशिशुस्वनाट
स्वभावसे ही परस्पर दुस्पज वैर रहनेवाले मनुष्य और
प्रमादय परमनन्तमगाधयोधम् ।
पशु-पक्षी मी प्रेमी मित्रोंके समान हिल-मिस्कार एफ साप
राते हैं ॥ ६०॥ ब्रह्मानीने अन्दावनका दर्शन करने
वत्सान सखीनिय पुरा परितो विचिन्व बाद देखा कि अद्वितीय परम गोयाक बास्थ्यया-सा
नाट्य कर रहा है। एक होनेवर मी उसके सस्पा है,
दक सपाणिकवलं परमेष्ठपषष्ट ॥६१॥ | अनन्त हानेपर मी पइ घर-उवर घूम रहा है और उमा
प्रान अगाध होनेपर भी यह अपने म्याग्वाप और मला
घटना स्वरेण निजघोरणतोऽपवीर्य
को हूँड़ रहा है। प्रमानीने देखा कि जैसे भगवान्
श्रीकण पहले अपने हापमें नहीभातका कौर ये स्न्हें
पृश्यां वपुः फनफदगमियाभिपात्य ।
दूर गे थे, वैसे ही भव मी भोसे ही उनकी म्योजमें
स्पृष्ट्वा चतुष्टिकाटिमिरमियुग्म
स्त्रो हैं ॥ ६१ ॥ भगवान्को वेसने ही प्रमाजी अपने
वाहन हंसफरसे कूद पड़े और सोनेके समान चमक्ते
नत्वा मदभुसजलरकताभिषेकम् ॥६२॥ ए अपने वीरसे पृप्पीपर दणाकी मॉनि गिर पर।
उन्होंने अपने चारों मुझुटोंक अप्रमागमे भगवान्क चरण
उत्थायोत्याय फष्णस्य निरस्य पादयोः पसन् ।
कमरोश स्पर्श करके नमस्कार किया और आनग्य
आँसुओंकी धारासे उन्हें नह्य Pया ॥ ६२ ॥ घ
यास्ते महित्व प्राएर स्मृत्वा स्मृत्वा पुन पुनः॥६॥ भामान् श्रीकृष्ण पहले ली हर महिमामा चार-गार
म्मरण करते उनक चरणोंपर गिरत और टट कर
शनेरथोत्याय विमृन्य लापने मिर-मिर गिर पड़ते।सी प्रकार महुल दग्नकये मामान्य
चरणोंमें ही पा रह ॥ १२ ॥ टि धीरे-धीरे उट और
मुन्दमुदीक्ष्य विनम्नन्धर ।
अपने नेत्राक ओम पॉछ । प्रेम और मुक्किा एकमात्र
कताउलिः प्रप्रयवान् समाहित
उद्गम भगवान्या रेपकर उनपर मिर मुफ गम । न
काँपन म्गे । अनि मारकर बड़ी नम्रता और प्पामतार
मधेपपूर्गद्दयलतेला ॥६४॥ साय गद्ग वार्गमे ये भगवानकी स्तुति करन गा॥
इति श्रीमशागते मापुगणे पारमहम्या महिनायो राममधे
वधि प्रयाशा पाप ॥ १३ ॥

२४ मामाग भसा अथ चतुर्दशोऽध्याय प्रमाजीके मारा भगवानकी स्तुति मसोपाप भीप्रभात्रीने स्तुति की-प्रभो ! एकमात्र वाप स्तुति करने योग्य है। में भापके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ। आपस यह शरीर वर्गकाटीन मेधक सम्म नोमीप सेऽप्रवपुषे सहिदम्पराय त्यमान है, इसपर सिर विमरीके समान मिरमिकभी- मिल करता हुआ पीताम्म शोमा पाता है। वाफ्के गरेम पुंषधीकी मान्य, कार्नामें मकरान पुषण सपा सिएम गुजाववंसपरिपिछलस मुखाप । मोरपाका मुकुट है, इन सबकी पारितसे मापके मुतार मनोम्बी छटा छिटक रही है। पक्ष स्वल्पर लटकती पन्मसजे कसलवेत्रविपामवेणु क्नमाटा भौर नन्ही-सी इपेपर दही-मातका कौर । भगमें से भऔर सींग सपा कमरकी फैटमें वापसी पहचान बतानेवाली माँसुरी श्येभा पा रही है। आपके लक्ष्ममिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय ॥१॥ कम से मुकोमल परम सुकुमार धरण और यह गोपाल, बलकाका पुमधुर येव । ( में धौर कुछ नहीं बानता, में तो इन्हीं चरणोंपर नियार ॥१॥ सर्व- अस्सापि देव पपुपो मदनुग्रहस्य प्रकाश परमाता । बापका या मीनिया भजनोंकी लासा-अमिममा र्ण करनेवाग्य है। यह आपकी स्वेच्छामपस न तु भूतमपम्प कोऽपि । चिन्मपी इसका मर्तिमान् सम्प मुझपर वापका साशास्त हया-प्रसाद है । मुझे वनगडीत करनके छिय ही आपने | इसे प्रकट किया है । कौन कहता है कि यह पचमूतोंकी नेक्षे महि तपसितुंमनसाऽऽन्तरेण रचना है । प्रमो ! यह तो प्राकत शुद्ध सत्सम्य है। मैं या मोर कोई समधि छाकर भी मापके इस सबिदा नाद-विम्की महिमा नदी चान सकता | फिर आत्मा- साक्षात्तवैव किमतात्मसम्भानुमतः ॥ २॥ मनगनुमवसम्प साक्षात् आपकी ही महिमाको तो कोई एकाप्रमनमे भी कैसे जान सकता है।॥ २॥ प्रभो ! भाने प्रयासमुदपास्म नमन्त एष चो प्रेग मानके लिये प्रयन न करके भपने स्थानमै ही स्थित रहकर केक सत्सा करते है और भापके अम्ल सत पुरुषोंके शरा गयी हई भापकी लीम-कथाका वो बीवन्ति सन्मुम्परिको भवदीयवार्ताम् । उन प्रेगोके पास रहनेसे अपने आप मननेको मिती है, शारीर, मणी और मनसे विनयाक्नत होकर सेवन करते है-यहाँ तक कि उसे ही बापना जीवन स्ना लेते हैं, बाने पिसाःभूतिगांतनुवापनोभि उसके पिमा बीही नाही सबसे प्रभो। यपि भापपर फिीमें कोई कमी विस्प नही प्राप्त कर सकता, फिर ये प्रापयोऽमितभितोऽप्यसि खिलोक्पाम् ३ | मी ये बापपर विजय प्राप्त कर देते हैं, बाप उनके प्रेमके { ما

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भ०१४] दशम स्कध २१५ भेमासूति भक्तिपदस्प ते मिमो मधीन हो जाते हैं ॥ ३ ॥ भगवन् ! नापकी भक्ति सस्त्र प्रकारके कम्पाणका मूलस्रोत-उद्गम है। यो ग्लिश्यन्ति ये फेवलपोधलम्भये । छोग उसे मेषकर केवल हानकी प्राशि के लिये प्रम उठाते और तेपाममौ फ्लेशल एष शिप्पत्ते मोगते हैं, उनको यस, देश-ही-केश हाप छगता है, और कुछ नहीं-जैसे पोपी भूसी नान्यव्यथा स्थूलसुपाषषासिनाम्॥ ४॥ | छूटनेवालेयो केवल श्रम ही मिलता है, चावल नहीं॥ ४॥ पुरे भूमन् पाषोऽपि योगिन हेमप्युत ! हे अनन्त ! इस लोकमें पहले भी मनुत- से योगी दो गये हैं। जब उन्हें योगादिके द्वारा बापकी स्त्वदप्तेिहा निमकर्मलम्भया । प्राति म दुई, तब उन्होंने अपने किक धौर पैदिक समस्त फर्म आपके चरणों में समर्पित कर दिये । उन विपुम्म भचयैव योपनीतया समर्पित कोसे तथा आपकी लीराम-कससे उन्हें वाफ्की मक्ति प्राप्त हुई। उस मक्तिसे ही आपके स्वरपका बान प्रपेदिरेऽप्रोऽभ्यत ते गति पराम् ॥५॥ प्राप्त करके उन्होंने पही सुगमतासे वाफ्के परमपदकी प्राप्ति कर ली ॥ ५ ॥ हे अनन्त ! भापके सगुण-निर्गुण स्थापि मूमन् महिमागुपस्स से दोनों स्कमपोंका हान कठिन होनेपर भी निर्गुण स्वरूप- | की महिम इन्द्रियों का प्रत्याहार करके गुवात करणसे वियोवघुमईरयमलान्तरास्ममिः । मानी जा सकती है । (जाननेकी प्रक्रिया । कि) विशेष आकारके परित्यागपूर्वक वात्माकार क्स करणका साक्षात्कार किया जाय । यह मारमाकारता अविकिपात् खानुभवादरूपठो घट-पटादि सपके सम्मन झेय नहीं है, प्रत्युत वापरण- का मजमात्र है। यह साक्षात्कार का प्रम। अनन्ययोभ्यात्मतया न चान्मथा ॥६॥ माको मानता हूँ इस प्रकार नहीं किन्तु स्वयंप्रकाश रूपसे ही होता है|॥६॥ परन्तु भगन् ! मिन समर्थ गुणात्मनस्तऽपि गुगान् विमातु पुरुषोंने पनेक नोतक परिप्रम करके पृषीका एक-एक परमाणु, आकारके हिमकण (बोसकी पूर्व) तपा हितावतीस्प क ईघिरेऽस्म । उसमें पकनेवाले नक्षत्र एवं सातकको गिन राम है उनमें मी मन, ऐसा कौन हो सकता है मो कालेन यै विमिताः मुकम्पै मापके सगुण स्वरूपके मनन्त गुणोंको गिन सके। प्रमोबाप केस संसारके पापाणके लियेहीमाती पासनः से मिहिका धुभासः ॥७॥ इए हैं। सो भगवन् ! यापकी महिमाका हान तो बसा ही कठिन है॥ ७ ॥ इसलिये जो पुरुष क्षण-क्षणपर तचेऽनुकम्पा सुसमीषमामो बड़ी उपुक्तासे पापकी कपाका ही मीमांति अनुमत्र करता रहता है और प्रारम्बके क्नुसार जो कुछ मुश या समान एवारमख्ख विपाकम् । दुख प्राप्त होता है उसे निर्षिकार मनसे माग सेता है, भीमहागवत [अ०११ । खाम्बपुर्मिविदधनमस्ते एवं नो प्रेमपूर्ण रदय, गद्गद गाणी और फुक्ति शरीरसे अपनेको आपके चरणोंमें समर्पित करता राव है-इस प्रकार जीवन व्यतीत करनेवालय पुस ठीक जीवत या शक्तिपदे स दाममाम् ॥ ८॥ वैसे ही अापके परम फरका अधिकारी हो जाता है, बैमे अपने पिताकी सम्पतिका पुत्र । ॥ ८ ॥ पश्य मन्नार्यमनन्त आये प्रमा ! मेरी कुग्लिा तो देखिये । भाप अनन्त भी परात्मनि वरपपि माथिमायिनि । पुरुष परम्परमा हैं और मेरे जैसे बाब मायागी में आपकी मायाक चक्रमें है। रि भी मने आपपर अपनी मायो वितत्मक्षितुमारमयैभर्ष माया फेयर मफ्ना ऐश्वर्य देखना चाहा 1 प्रभो । मैं आपके सामने हूँ ही क्या । क्या आगये सामन चिनगारी- मर किमानच्छमिवाचिरमी ॥९॥ की भी कुछ गिनती है । ॥९॥ मान् ! मैं रागुमसे उपन हुक्षा हूँ। आपके सपने में प्रकटीक नहीं अत धमस्याच्युत मे रजोसको बनता। इसीसे अपनेघो आपसे मा संसारका स्वाम माने वैयपा। मे बत्रमा मगकर्ता हूँ-स मयारल समानसस्स्वरपथगीसमानिनः । मोहये घने अन्धकारसे में बंधा हो रहा था । इसधिये आप यह समानकर कि यह मेरे ही अधीन है.--मेग अजावलेपाधतमोधपशुप मस्य हैइसपर कसा करनी चाहिये, मेरा अपराध क्षम फीप्रिये ॥ १०॥ मेरे स्वामी ! प्रपति, महतात, महार, पपाऽनुकम्प्यो मपि नापयानिति ॥१०॥? मापाश, मापु, लम्नि, जल और पृथ्वीन्य आवरणोंसे विग हुआ यह प्रमाण हो मेग शरीर है। भीर माफ समामहदहम्मथराग्निगर्म पक्ष गमक हिदम ऐसे-ऐसे नगगिम प्रशासन उसी मवेष्टिताण्डपासप्तविवस्तिकाय । प्रकार उजव्याते रहते हैं, जैसे मरोलेकी जायमैसे आनेवाणी सूर्पकी फिरोम रजा घंटे-छोटे परमाणु नाते फेरम्बिधाषिगणिताण्डपराणुचर्या र म्पियी पड़ते है। पदोबाने परिम्पणसे साडेतीन हायर शरीरबाग अभ्यस्त भुन म, और कहाँ जारी पातापरामश्विरम्प प समरितम्॥११॥ अनन्त महिमा ॥ ११ ॥ इत्तियों पर हमें म वानवाल परमारमन् | जय पथा माता फेमें रहता है, तब उधपण गमगतस्प पाइया अमाना अम्ने गप-पैर पीरमा परम्सु क्या माल किं फल्पने मातुग्धामागसे । उमे अगर ममननीय उमय रिये ना पाई जागा ता और नदी नशा से ही जाने विमग्निनाम्निम्पपदेशपिन पर्गमा भी पम्मु एमी है आपकोगा नगग्नि रुप स्पिदप्पनन्त ॥१॥ भीता महा! ॥१२॥ जगनपान्तादपिपपपादे पुतियों का नाम जिग ममर सीनों म रामन बग्मीन. गरमर उस व नित नागपगम्पादग्नाभिनारान धंना माभिाममा स्म । नका क्या, १४] दशम स्कन्ध २१७ विनिर्गतोऽजस्त्विप्ति पार न वै मृपा यह कहना किसी प्रकार अमस्प नहीं हो सकता । तप बाप ही कालाये, प्रमो ! क्या मैं आपका पुत्र नहीं कि स्वीधर त्वम विनिर्गतोऽस्मि ॥१३॥ ॥ १३ ॥ प्रमो ! आप समस्त जीवोंके पारम्प हैं। इसलिये आप नारायण ( नार-जीप और अयन- नारायणस्त्व न हि सर्वदेहिना बाध्य ) हैं। आप समस्त जगत्के भौर जीयोंके अधीमा मात्मास्पधीष्ठासिललोकसाथी । है, इसलिये आप नारायण ( नार-जीव और अयन प्रवर्तक ) है । आप समस्त लोकों के साक्षी है, इसलिय नारायगोन नरम्बसामना भी नारायण (नार--- --जीय और अपन—जाननेवास्य) घचापि सस्प न तर माया ॥१४॥ हैं। नरसे उत्पन्न होनेवाले करमें निवास करना कारण मि नारायण (नार-जल और भयन—निवासस्थान) तबन्जलस्थ तन सन्जगापुर कहा जाता है, ये भी भापक एक अंश ही हैं। यह भशमापसे दीना भी सत्य नहीं है, आपकी माया ही फि मे न एट भगवंस्तदेव । है ॥ १० ।। भगवन् ! यदि आपका वा विगट् सम्प किं वा सुरप्टं हदि मे देर सचमुच उस समप में ही पा तो मैंने उसी समय उसे क्यों नहीं देना, जब कि मैं काटनालके मागस कि नो सुपपेव पुनर्व्यदर्शि ॥१५॥ उसे सौ तक जरमें दूता रहा ! फिर मने नव मौष मायाधमनारवारे तपस्या की, तब उसी समय मेरे श्यमें उसका दशन कैसे हो गया । और फिर कुछ ही क्ष!में मद पुन क्यों अस्प प्रपञ्चस्स पहिः स्फरस । नहाँ दीमा, अन्तर्धान स्पों हो गया ॥ १५॥ मापाका करस्नस्स चान्तर्मठरे नन्या नाश करनेवाले प्रमो ! दूरकी बात कौन करे--अभी इसी कमरमें आपने इस बाहर दीखनेवाल जारका मायात्वमेव प्रकटीकतं ते ॥१६॥ | अपने पेटमें ही दिस्य दिपा, जिसे देखकर माता यशोदा चक्ति हो गयी थी। इससे यही तो सिद होता कि यह यस्य पक्षाविदं सर्व सात्म भाति यया था। सम्पूर्ण विष काल आपकी मपा-ही-मया ॥१६॥ तवग्यपीद सत्सव किमिद मायया विना ॥१७॥, सापके सहित यह सम्पूर्ण विम जैस बाहर पिता अपेव वरतेस किं मम न ते है वैसा ही बापक उदरमें भी दीम्या, तब क्या यह सब आफ्मी माया पिनाही आपमें प्रतीत दुवा अप मापात्वमादर्शित ही आपकी सीम॥१७॥ उस Pनकी मात पान दीजिय, वाजकी ही जिये । क्या आप वाफ्न मेर मेकोऽसि प्रथम सतो प्रजसुइय | सामने अपने बनिरिक सम्पूग विपको अपनी मापामा वस्सा समम्ता अपि । खेर नही गिननया है। पहार आप अकल । सि सम्पूर्ण मारमार, मटर और छपी होष भी आपकी सावन्तोऽमि पतुर्भजाम्तदम्मिली हो गये। उसके बार मैन दम्या कि आपक प सब गए साक मयोपासिता चतुमुरबीर मरेसहित सम्म सब सस्प टनकी सेवा म्नावस्येव नगन्स्पस्तदमित्र कर रहे हैं। मापन भग्ना-अग्रा उतने ही प्रमणोंका RI मी भाग कर दिया था, पम्नु अप अप कसर प्रमादप शिप्यते ॥१८॥ अपरिमित अस्लिीय म्यन्यमेही पर गप है ॥ १८॥ - भा म त २२८- २१८ भीमद्भागवत [२०१७ अवानां त्वत्पदवीमनात्म- जो ख्येग अज्ञानवश आपक खम्बएको नहीं मानदे नहीको आप प्रकृति में स्थित जीवके मापसे प्रतीत होत न्यात्माऽऽरमना मासि वितस्प मायाम् । हैं और उनपर अपनी मायाका परदा मध्यार सटिके सृष्टानिवाई वगतो विधान सम्प मेरे (ममा ) रूपसे, पालनके समय अपने (विष्णु) इस त्वमेयोन्त इस त्रिनेत्रः॥१९॥ मापसे और संहारक समय के रूपमें प्रतीत होते हैं॥१९॥ प्रमो बाप सारे मगरकेन्वामी और विषता है। सुरेप्पपिपीच तपैव नृप्पपि अजन्मा होनेपर मी आप देवता, अषि, मनुष्य, पसुशी चौर मलचर भार योनियोंमें जार माण करते हैं-स- विर्य पादस्वपि सेऽचनस्य । रिये कि इन रूपोंके द्वारा दुध फुलोका धमर तोड़ दे बमासवां दुर्मदनिहाय और सत्पुरुषोंपर क्नुपह करें ॥ २० ॥ भगवत् ! कार अनन्त परमात्मा वीर योगेपर हैं। किस समय गार प्रभो विधातः सदनुग्रहाय च ॥२०॥ अपनी योगमायाका विस्तार करने सस्य करने माते हैं, को वेति भूमन् भगवन् परास्मन् उस समय त्रिलोकीमें ऐसा कौन है, जो या नान सके योगेघरोतीर्मववत्रिलोक्याम् । कि भापकी खस्य कहा, किसलिये, क्र और कितनी होती है ॥ २१ ॥ इसझिये यह सम्पूर्ण जगत् खप्नके कबा कम पा कति वा फदेसि समान असस्य, खानरूप और दुस-पर-दुस देनेवाय विस्तारमन् क्रीरसि योगमायाम् ॥२१॥ है। आप फरमानन्द, परम शानखरूप एम अनन्त हैं। यह प्रयासे उत्पन एष विलीन होनेपर भी आपमें आपकी समादिद बमदशेषमसत्वरूपं सन्चासे सत्यके समान प्रतीत होता है ॥ २२ ॥ प्रमे। स्वप्नाममस्तपिपपपुरुदासदासम् । भाप ही एकमात्र सत्य है। प्योंकि भाप सबके वात्म मोरें। पाप पुराणपुरुष होनेके कारण समस्त जम्मानि त्वमेव नित्पमुखबोपनापनन्ते विकारोंसे रहित है । भाप सर्यप्रकाश है, इसमिप देश, मायास उपदपि यत् सदिपावभाति॥२२॥ काल मोर पस्तु जो परप्रकाश हैं-किसी प्रकार मापको सीमित नहीं कर सकते। माप उनके भी आदि एकस्त्वमारमा पुरुपा प्रकाशक हैं। बाप अविनाशी होने करण निष्प है। सत्या स्वयंन्योतिरनन्त बायः । वाफ्का मानन्द पसमित है। मापदं न तो किसी नित्याऽधरोऽवससुलो निरजन: प्रकारका मठ है और न अमाव । थाप पूर्ण, एक है। समस्त उपाधियोंसे मुज होने के कारण आप जपतसरूप पूर्णोद्धयो सक्त उपापितोऽमृतः॥२३॥ है ॥ २३ ॥ भापका यह ऐसा खम्प समस्त भीवोंका एवंविर्ष स्वा सकतारमनामपि ही वफ्ना खरूप है । जो गुम्हप सूर्यसे तमानरूप म्वास्मानमारमात्मवया विषधसे । हिम्म पटि प्राप्त करके उससे आपको अपने सम्पक | सपने साक्षात्कार कर लेते हैं, इस पूरे संसार-सागर गुर्वफलम्योपनिपस्सु पापा को मनो पार कर माते है । ( संमार-सागरके एटा ये ते सरन्तीव भवान्ताम्मुभिम् ॥२४॥ होने के कारण इसमे पर आना भी विचार दशकी । ।

दशम स्कन्ध पास्मान मेवात्मतयाविजानता दृष्टिसे ही है)॥ २९ ॥ जो पुरुष परमात्माको यात्मके म्पमें नहीं जानते, उन्हें उस अमानके कारण ही इस तेनैव मार्स निखिल प्रपश्चिवम् । नामरूपारमक निसिल प्रपरकी उत्पत्तिका भ्रम हो जाता । किन्तु झान होते ही इसका भास्पन्तिक प्रत्र्य हो पानेन भूयोऽपि च तत् प्रलीयते जाता है। मैसे रस्सीम भ्रमके कारण ही सौंपकी प्रतीति रज्वामहे गभवाभवो यथा ॥२५॥ होती है और भ्रमके निमत्त होते ही उसकी निवृति हो अमानसंको भषधमोधी जाती है ॥२५॥ संसार-सम्बन्धी मन और उससे मोक्ष-ये दोनों ही नाम आहानसे कम्पित हैं। वास्तव दौ नाम नान्यो स्त इतक्षभावात् । में ये भहानके ही दो नाम हैं। ये सत्य और ज्ञानस्वरूप परमात्मासे मिग्न अस्तित्व नहीं रखते । जैसे सूर्यमें दिन अजस्रपित्यास्मनि केवले परे और रातका भेद नहीं है, वैसे ही विचार करनेपर असम चिस्वरूप केवल शुद्ध मापनस्वमें न वचन है विधार्यमाणे सरणाविषाहनी ॥२६॥ और न तो मोक्ष ॥ २६ ॥ मगवन् । कितने काभर्यकी बात है कि आप हैं अपने वास्मा, पर लोग आपको त्यामात्मान परं मस्या परमात्मानमेन च । पराया मानते हैं। और शरीर आदि है पराये, किन्तु उनको धारमा मान बैठते हैं। और इसके बाद भापको कही वात्मा पुनहिमग्य अहोऽनुमनतानसा ॥२७॥ पळा ।इने लाते हैं । मला अहानी जीवोंका यह अन्तर्मवेऽनन्त भवन्तमेव | कितना बड़ा अज्ञान है ॥ २७ ॥ हे अनन्त ! आप तो सक्के अस्त करणमें ही विराजमान हैं। इसलिये संतलोग पवश्यमन्तो मृगयन्ति सन्तः । थापके अतिरिक जो कुछ प्रतीत हो रहा है, उसका परित्याग करते हुए अपने भीतर ही आपको ₹रते हैं । असन्तमप्यनस्पदिमन्तरेण क्योंकि यपपिरस्सीमें साँप नहीं है, फिर भी उस प्रतीयमान साँपको मिप्या निभय किसे दिना , कोई सत्पुरप सगुणं तं फिस यन्ति सन्तः ॥२८॥ सची रस्सीफो कैसे जान सकता है । ॥२८॥ मचापि ते देव पदाम्मुमदय अपने भक्तजनोंके एयमें स्वयं सुरित होनेवाले मावन् । आफ्क बानका सरप और महिम्म ऐसी ही प्रसादलेशानुगृहीत एव हि । है, उससे मानस्पित नगत्का माश हो जाता है | 1 फिर भी जो पुरुष भापक युगर चरणकमका तनिक- बानाति वस्व भगवन् महिम्नो सा भी रूपा असा प्राप्त कर लेता है, उससे अनुगृहीत हो जाता है-बही भापकी सचिदानन्मयी महिमाका नपान्य एकोऽपि पिरविचिन्वन् ॥२९॥ सव मान सकता है। तसग कोई भी पान-वैगम्यान साधनम्प वपने प्रफनमे बहुत पाटकर कितना भी सदस्तु मे नाथ स भूरिभागो अनुसन्धान करता रहे, बहाश्की महिमाश पप शान भषेध पान्यत्र या तिरषाम् । भही प्राप्त कर सकता ॥ २९॥ इसरिय भगवन् ! मुप्त इस पेनाइमेकोऽपि मपन्जनाना जन्म, दूसरे जग्ममें अपना किसी पशु-पक्षीमारिक जन्ममें भी एसा सौम्प्रग्य प्राप्त हो शि में आपक समिमे पार मृता निपेये वर पादपन्लगम् ॥३०॥ र दाम हो गई और स्नि आपके परणामी .

२२० भीमद्भागवत [१०१० । महाऽविधन्पा व्रजगोरमम्पः सेवा कर ॥ ३० ॥ मेरे स्वामी ! जगत्के बा-बड़े या सृष्टिके प्रारम्भसे लेकर भक्तक आपको पूर्णव का न स्कन्पामृतं पीसमतीव ते सदा । कर सके । परन्तु आपने इनकी गायों और म्यानित पछा एवं याख्य कनकर उनके स्तनोंका अमृत-सा दूध यासां निभो वत्सतरात्मप्रात्मना वई उमंगसे पिया है । वास्तवमें उन्हींका चीक्न सफल है, वे ही स्पन्न धम्प है ॥ ३१ ॥ बहो, नन्द की प्रवासी गोपोंके धन्य माम्प है। वास्तवमें उनका बहो- यवृप्तयेऽयापि न घालमज्वरा ॥३१॥ माम्य है। क्योंकि परमानन्दस्वरूप सनातन परिपूर्ण काम भाप उनके अपने सगे-सम्बन्धी और मुम्न् है ॥ ३२॥ अहो भाग्यमहो भाग्यं न गोपनजौकसाम् । हे भव्युत ! इन प्रजवासियोंके सीमाम्पकी महिम तो मलग रही-मन मादि म्यारह इन्द्रियोंके बधिछात् पमित्र परमानन्द पूर्ण प्रम सनातनम् ॥३२॥ | देवता के रूपमें रहनेवारले महादेव धादि हमध्येग वा ही माम्पवान् है । पोंकि इन प्रमसियोंकी मन मार पपातु भाम्पमहिमान्मुख तापदास्ता म्यारह इन्द्रियोंको प्याले मनाकर हम मापके चरणकमों का वमृतसे भी मीठा, मदिरासे भी मादक मपुर मकरन्द मेकादश्चैव हि मयं बत भूरिभागा । रस पान करते रहते हैं। म उसका एक-एक इन्द्रियसे | पान करके हम अन्य-पम्प हो रोहै, तव समस्त इन्द्रियों- से उसमा सेपम करनेवाले प्रवासियोंकी तो बात ही पक्ष्वीकधपकैरसमस पिनाम: क्या है ॥ ३३ ॥ प्रभो ! इस मनममिके किसी पनमें चौर विशेष करके गोकुलमें किसी भी योनिमें चन्म हो शर्वादयोऽयुदबमधमृतास ते॥३३॥ गाय, यही हमारे प्रिपे यई सौभग्यकी पत होगी । स्पोंकि यहाँ जम हो जानेर भापके किसी-न-किसी प्रेमी तव भूरिभाग्यमिह बम किमप्परम्प के चरणों की पुष्टि करने म्पर फाही जायगी। प्रमो मापके प्रेमी सम्मासियोंका सम्पूर्ण जीवन बापका ही जीवन है। यद् गोकुलेऽपि कसमाधिरजोऽभिपेकम् । पापही उनके जीफ्नक एकमात्र सर्वस्व है। इसलिये उनके परणोंकी ति मिन्टना मापके ही चरणों की भूमि पन्नीपितं तु निखिल भगवान् समन्द मिरना है और भाफ्ले चरण की पूलियो तो भुतियों मी मनाहि कसे तक ही सी है ॥२४॥ स्स्पयापि पस्पदरचा श्रुविमृग्यमेप ॥३४॥ | देवताओंके भी आराध्यदेव प्रभो । इन मवासियोको इमकी सेवाके में पाप क्या फर देंगे । सम्पूर्ण पांघोपनियासिनामत भवान् किंदेष रावेतिन- | फीके फलस्वरूप ! अपसे मार और कोई फल तो है ही नहीं, यह सोचकर मेरा चित्त मोहित हो रहा है। माप उनें अपना स्वप भी देकर उऋण नहीं हो घेता वियफगत् फलस्वदपरंत्राप्ययन् मुमति। सकले। क्योंकि भापके कम्पको तो उस पृतनाने भी ..१४] दशम स २२१ सोपादिष पूतनापि सहला त्वामेव देवापिता | अपने सम्बन्धियों- अघासुर, कासुर आदिके साथ प्रात कर छिया, जिसका केवल पेप ही साधी सीका था, पर यामार्थसात्प्रियास्मतनयप्राणाशयास्स्वकते।३५/ जो हृदयसे महान् कर पी । फिर, जिन्होंने अपने घर, धन, खनन, प्रिय, शरीम, पुत्र, प्राण और मन-सन कुछ आपके ही चरणों में समर्पित कर दिया है, जिनका वागदरागादयः स्तेनास्तावत् कारागृहंगृाम् । सब कुछ आपने ही लिये है, उन प्रज्यासियोंको भी यही फल देकर आप कैसे उभण हो सकते हैं ॥३५॥ | सचिदानन्दस्खमप श्यामसुन्दर ! तमीतक रागद्वेप आदि ताप माहोऽधिनिगडो यावत् कृष्ण न से अना (३६|| दास चोगेंक समान सर्वस अपहरण करते रहते हैं तमीतकम और उसके सम्बन्धी की तरह सम्बन्ध- प्रपम्ब निष्प्रपञ्चोऽपि विरमयमि भूवले । के धमि वाघ रखते हैं और तमीतक मोह पैरकी बेदियोंकी तरा जका रखना है-जबतक पीव भाप का नहीं हो जाता ॥ ३६॥ प्रभो ! आप वियर प्रपनमनवानन्दसन्दोई प्रथितुं प्रभो ॥३७॥ योसे सर्वथा रहित है, फिर भी अपने शरणागत मक मनको अनन्त आनन्द वितरण करनेके लिये पृष्त्रीमें क्यतार लेकर विवके समान ही अविसका विस्तार बानन्त एष चानन्तु किपात्यान मे प्रभो । करते हैं ॥३७॥ मेरे स्वामी 1 मात कहनेकी आश्प- पता नही-मो स्पेग मापकी महिमा जानते हैं, वे मनसो पपुपा वाचा मयं सम गोधरः ॥३८॥ | बानते हैं, मेरे मन, पाणी और शरीर तो आपकी महिमा जाननेमें सर्वपा ममर्प है ॥ ३८ ॥ सचितानन्द- | खम्प श्रीकृष्ण ! आप सबके साक्षी हैं। इसलिये आप अनुमानीहि मो रुप्ण सलवेस्सि सर्परम् । सब कुछ जानते हैं । आप समस्त जगत्य स्वामी हैं। मा सम्पूर्ण प्रपन आपमें ही स्थित है। बापसे में और त्वमेव मगतां नापा बगदेवचवार्पितम् ॥३९॥ क्या कई । अब आप मुझे स्वीकार कीजिये । मुझे अपने त्येक मानेकी भादा दीजिये ॥ ३९ ॥ सबके मन-प्राण- को अपनी साप-मपुरीसे आकर्षित करनेवाले श्यामसुन्दर ! भीकृष्ण इप्णिफुलपुप्फरजोपदापिन् वाप यदुवशमप कम्पको विकसित करनेसे सूर्प है। | प्रमो ! पृणी, देवना, प्रामण और पशुरूप समुद्रफी क्ष्मानिर्जरदिवपनदपिदिकारिन । अमिति करनेवाले चन्द्रमा मी आप ही हैं। बाप पम्पणियोंक धर्माप गतिका घोर अन्धकार नए परनेत्र उदमशावरहर शिविराषसच रिये सूर्य और चन्द्रमा दोनों के ही समान ६ । पृथ्वीपर रहनेवाले राक्षसोंक नए करनेवाले आप चम्नमा, सूर्य आरि समस्त देवताओंक भी परम पूजनीय है। भगवन् ! गाफरपमार्फान् मगपन् नमस्ते ॥४०॥ | में अपने जीवनमर, महाकल्यपयन्त आपका नमस्कार ही फरता रहूँ॥ १० ॥ भीशुक उपाय मीशुकदेवजी महत है-परीक्षित् ! स्मारक ग्व इत्पभिष्ट्रय भूमानं तिः परिक्रम्य पाइयो । पिन्य प्रमाजीने इस प्रकार भगवान् श्रीमती म्मुनि - २२२ भीमसागवत [.१० नत्वामी बगदासा स्वधाम प्रत्पपपत ॥४१॥ | की । इसके बाद उन्होंने सीन कर परिक्रमा करके सके घरोंमें प्रणाम किया और फिर अपने गतम्य साल सस्पोको घरले गये ॥ ११॥ नमानीने ओं और ततोऽनुमाप्प भगवान् स्वसष प्रागपसिवान् । ग्वालवालों को पहले ही यथास्पन पाँचा दिया था। मगमान् श्रीकृष्णने प्रमाणीको विदा कर दिया और यमों बत्सान पुलिनमानिन्ये यथापूर्वसस्त स्वकम् ॥४२॥ को लेकर यमुनाजीके पुछिनपर आये, जहाँ पे करने सत्ता म्यालयान्को पहले छोड़ गये थे॥ १२॥ परीक्षित ! एफसिमपि पातेऽम्ने प्राणेश पान्तराऽऽरमनः। अपने चीक्नसर्वस्व -प्राणवस्लम श्रीकृष्णके वियोग यपि एक वर्ष बीत गया मा, तपापि उन मामाको रुप्णमापाहता राजन् क्षणार्ध मेनिरऽर्मकाः॥४३॥ म सम्य जाधे मणके सम्मान बान पका । क्यों न हो, से भगवान्सी सिरिमादिनी योगमायासे मोहित ये हो गये ये ॥ १३॥ नगदके सभी जीव उसी मापसे मोहित कि कि न विस्मरन्सीह मायामोदितयेतसः । होकर शास और भाचायोंकि बार-बार समझानेपर भी अपने बारमको निरन्तर भूले हुए हैं। मास्तवमें उस मन्मोहितं जगत्सर्पमभीक्ष्म पिस्मृवात्मकम् ॥४४॥ | जी हाँ क्या-क्या मही भूत जते हैं। ॥ १४ ॥ मयाकी ऐसी ही शक्ति है। मन, उससे माहित होकर उनुष सुरदः कृष्ण स्वागतं तेऽविरसा । परीक्षित् | भगवान् श्रीकृष्णको देने ही ग्वालमाने बड़ी साक्यसे कहा--'माई | तुम मले भाये । स्वागत है, सागत | बभी सो हमने तुम्हारे बिना एक और भी नैकोऽप्पभाजिकवल एदीवा साधु सन्यताम् ॥४५॥ नहीं साय है । माओ, इधर आयो, आनन्दसे भोजन | करो' ॥ १५ ॥ तव हंसते हुए भगवान्ने ग्वाम्मायक साप मेगन किया और उन्हें नपासुरके शरीरका साधा दवा हमन् पीकेशाऽभ्यवास्प सहामः । दिखते र बनसे मनमें लोर माये ॥ १६ ॥ धीहत्य सिरपर मोरपंसकर मनोइर मुकुर वीर पुराने दर्शयधर्मामगर न्पवर्मत धनाद प्रधम् ॥४६॥ बाम सुन्दर-मुन्दर महें-महे महकते हुए पुष गुंग रहे थे। नयी-मयी रंगीन पातुओंसे श्याम शरीरर चित्रकारी की हुई थी। वे बने समय रास्तेमें उप म्वरसे कभी पर्दप्रपननपपातपिपित्रिवास बाँसुरी, कभी पते और कमी सींग सजाकर पापोत्सबमें मग्न हो रहे हैं। पीछे-पीछ मामाल उनकी साससान प्रामपणुदतगारयोस्सबाप । कीर्तिया गान करने जा रहे हैं। कभी ये नाम मार अपने छोंको पुकारते, तो कभी उमके साप म्या । समाने ख्यते । मार्गके दोनों भोर गापियों सही है। जब परसान् गणमनुगगीतपवित्रकीर्ति | कभी पिछ नेत्रोंसे उनकी नगरमें नम मिय देते है, तम गारियों नामन्द-मुग्ध हो जाती है । इस गोपीरगुमपरतिः प्रविषेश गाष्टम्॥४०॥ प्रगर भगवन् श्रीकृष्णने गाष्टमें प्रवेश किया ||१७|| १०१४] २२३ - - बधानेन महान्यालो यशोदानन्दसनुना । परीक्षित् ! उसी दिन वारकोंने जमें जाकर कहा कि 'आज यशोदा मैयाके व्याले नन्दनम्दनने पनमें एक इतोऽविसापय पासादिति वाला नमे जगुः ॥४८॥ मा भारी वनगर मार सत्य है और उससे हमलोगोंकी रक्षा की है ॥१८॥ राजोवाच रामा पर्पमित्मे कहा-मन् । मनवास्पिोंके लिये श्रीकृष्ण अपने पुत्र नहीं थे, दूसरेके पुत्र थे। प्रपन् परोड़वे कृष्णे इयान् प्रेमा फथ भवेत् । फिर उनका श्रीकृष्ण के प्रति इतना प्रेम कैसे एआ ऐसा प्रेम तो उनका अपने बालकोंपर भी पहले कभी नहीं पाऽभूतपूर्वस्तोकेषु खोवेवपि कथ्यताम् ॥४९॥ हुआ था ! आप कृपा करके बताये, इसका म्या फारण है॥१९॥ श्रीशुक उपाय भीशुकदेवजी कहते है-राजन् ! संसारके मभी प्राणी अपने वापसे ही सबसे बफर प्रेम करते हैं। सर्वेषामपि भूतानां नृप स्वास्मैव वस्लम । पुत्रसे, धनसे या और किसीसे जो प्रेम होता है-वा तो इसलिये कि वे वस्तुएँ अपने आत्माको प्रिय पाती इतरेऽपत्यविचाधास्तरलभतयैन हि ॥५०॥५०॥राजेन्द्र ! यही कारण है कि समी प्राणियोंका अपने मारपके प्रति जैसा प्रेम होता है पैसा अपन सद रामेन्द्र यथा स्नेहा स्वस्तकात्मनि देहिनाम् । कालानेवाले पुत्र, धन और गर वादिमें नहीं होता ॥५॥ न तथा ममतालम्बिपुत्रवितगृहादिषु ॥५१॥ मुफ्भेष्ठ ! जो स्प्रेग देहको ही आत्म्य मानते हैं, वे भी अपने शीरसे जितना प्रेम करते हैं, उतना प्रेम शरीरके देहात्मवादिनां पुसामपि रामन्यसचम । सम्बन्धी पुत्र-मित्र आदिसे नहीं करते ॥ ५२ विधारके द्वारा यह माम हो जाता है कि प्या शरीर पया र प्रियतमस्तपान मनु ये च तम् ॥५२॥ में नहीं है, यह शरीर मेरा । तब इस शरीरसे भी जारमाके सम्पन प्रेम नहीं आता । यही कारण है कि देहोऽपि ममवामार षेधर्मसौनास्मात् प्रियः। इस लेके वीर्ण-शीर्ण हो जानेर मी जीनेकी आश्य प्रका सपसे बनी रहती है॥५३॥ इससे यह यात पजीर्यस्पपि दहेऽसिन् बीविताशा पलीयसी ॥५३॥ सिद्ध होती है कि समी प्राणी अपने आपसे ही स्वमे सफर प्रेम करते है और उसीके लिये इस सारे घराचर तमात् प्रियतमः स्वास्मा सर्वेषामपि देहिनाम् । जगत्से भी प्रेम करते हैं॥५१॥ इन श्रीकृष्णको ही बगदेवचराचरम् ॥५४॥ म सब बात्माओंका आस्मा सम्मो । संसारके कल्याणके रिये ही योगमायाका माधय सेवर के यहाँ देधारीके रुप्णमनमोहि स्वमात्मानमस्सिसास्मनाम् । | समन जान पाते हैं॥५५॥ वो लोग भगवान् श्रीकृष्णक बास्तविक स्वरूपको जानते हैं, उनके रिये तो इस नगदिताय सोऽप्यत्र दहीपाभाति मायया ॥५५॥ जगत्में मो कुछ मी चराचर पदार्प हैं, अयवा इसमे वस्तुतो बानतामत्र कणं सास्नु परिष्णु च। परे परमात्मा, प्रम, मारापण आदि जो भगातारप है समी श्रीकृष्णसस्प ही है। श्रीकृष्णक अतिरिक भगवम्पमसिठ नान्यत् मस्स्विा किसान ॥५६॥ मौर कोई पाल-अप्राक्त बस्तु है ही नहीं ॥५६ ॥ वदर्थमेष सफलं 1 २२४ भीमनागपत [२०१५ सर्वेपामपि वस्तूनां भावार्थो भवति म्पितः । सभी वस्त्रोका अन्तिम म्प सपने कारणमें स्थित होता है। उस कारणके मी परम कारण है भावान् श्रीकृष्ण । तामा वस्थापि भगवान् कृष्णाकिमसतस्तु सप्पताम्।।५७) कामो, किस वस्तुका श्रीकृष्णसे भिम बतलायें ॥ ५७ । समाभिता ये पदपल्लवपुष चिन्हांन पुष्मकीर्ति मुकुन्द मुरारीके परपष्ठ की नौकला आश्रय गिया है, जो कि सत्पुरुषोंका सक्स है मास्पद पुण्पयशोधरारे। उनके लिये यह मम सागर क्छ के खुरके गद्दे समान भवाम्बुधिर्वत्सपद परं पद है। उन्हें परमपदकी प्रालि हा जाती है और उनके को पद पद यद् विपदा न तेषाम् ॥५८॥ | विपत्तियों का निवासस्थान—यह संसार नहीं रहता|५८० सर्वमाख्यात यत् पृष्टोऽहमिह लया। परीक्षिस् । तुमने मुझसे न पा कि भाको पाँच वर्षकी सन्म मालमानेने छटे पर्वम कैसे कही, यत् कौमारे हरिकृत पौगण्ड परिकीर्तितम् ॥५९॥ उसका सारा रहस्य मैने तुम्हें काम दिया ॥ ५९ ॥ प्रवत् सुरहिपरितं परारे | भगवान् श्रीकृष्णकी ग्वालबालेंके साप पनकीका, बक्सर को मारना, हरी-हरी घाससे युक्त मूमिपर बैठकर मोचन रघाईनं बादलोमनं च। करना, याक्तरूपधारी घओं और म्वालवाका प्रकट होना और प्रमाजीक शरा की हा इस महान् स्तुतिको जो प्पक्केवर रूपमजोर्वमिष्टष मनुष्य मुनसा और कहता है-उस-उसको धर्म, वर्ष, काम और मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है॥६० ॥ भूषन् गृपन्नेति नरोऽखिलार्यान् ॥६०॥ परीक्षित् । इस प्रकार श्रीकृष्ण वोर बरामने कुमार एष विहारैः कौमारैः कौमार बहतु । अवस्थाके अनुरूप ऑसमिधौनी, सेतुपन्धन, दरोंकी भौति उसलना-दना वादि अनेकों बाएँ करके अपनी निलापनैः सेतुपन्फर्मर्कटोरलपनादिभिः॥१॥ कुमार-अस्मा जमे ही स्याग दी ॥ ६१ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहस्य संहितायां शमस्कन्धे पूर्वार्धे नमस्तुति म बई शोऽध्याय ॥ ११ ॥ अथ पञ्चदशोऽध्याय पेनुकापुरका उद्धार मौर बासपासोको अठिपनागके पिपत पचामा भीन्सुक उपाच भीगुकदेवजी कहते हैं-परीधित् ! अब बाम सप पौगम्हवयः भिती प्रजे और श्रीकृष्णने पोगप्पा-मस्वामें अर्यात् छठे वर्षमें प्रवेश पम्पतुस्ती पशुपालसम्मवौ। फिया । अब उन्हें गौएँ परानेकी स्वीकृति मिल गयी । गापारयन्तौ सस्तिमिः समं पदै ये अपने सहल म्यामा साथ गौएँ घराते हुए सम्दा- न्दिावनं पुष्पमवीय पळसु ॥१॥ कनमें माते और जाने चरणोंसे इन्दानको कल्पत पारपभिरग्राम।

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कर्मपा गाण नपवन मात ।

दशम स्कन्भ २६५ . स तन्मापो शपदीरयन् तो फापन करते ॥ १॥ मापन गौक किये हरी-हरी घाससे युक्त एवं रंग-भिगे पुष्पॉकी सन हो रहा था। गोपेर्गणमिः सयानो बलान्धितः । आगे-आगे गोरे, उनके पीछे पीछे गौमुरी बनाते हुए श्याम- सुन्दर, तदनन्तर काम और फिर श्रीकृष्णके यशका गन पशन पुरस्कृस्प पशम्पमाविशद करते र बालबाल-पस प्रकार बिहार करने के लिये उन्होंने पितुकामः सुमाफर धनम् ॥ २ ॥ उस नमें प्रवेश किस्म ॥ २ ॥ उस बनमें कहीं सो भौरे यही मधुर गुंजार कर रहे थे, कही हुर-के-सुर हरिन वन्मम्पोपालिमगदिबाइल चौकसी मर रोये और कहीं मुन्दर-सुन्दर पक्षी पहक रहे थे। वह ही सुन्दर-सुन्दर सरोवर पे, बिना मग मान्मनःप्रस्म्पपय सरस्वता महात्माओंके दपके समान स्वच्छ और निर्मल पा । पावेन जुट शतपत्रगन्पिना उनमें सिले हुए कम सौरमसे सुभासित होकर शीतल- निरील्प रन्तुं भगवान् मनो दधे ॥ ३॥ मन्द-सुगन्ध वायु उस बनकी सेवा कर रही थी। इतना | मनोहर पाय न कि उसे देखकर भगवान्ने मन-ही- रात्र सधारणपरलवभिया मन उसमें विहार करनेका संकल्प किया ॥ ३ ॥ पुरग्रेशम फलप्रसनोरुपरेण पाइयो। भगवान्ने देखा कि मा-बड़े बक्ष फल और पोंके मारसे मुफकार अपनी राड़ियों और नूतन कोंपलोंकी अडिमासे सपिछवान् वीक्ष्प वनस्पतीन् सदा | उनके घरोका स्पर्श कर रहे हैं, सब उहनि बढ़ वानन्दसे कुछ मुसकराते हुए से अपने बड़ मई मश्राम- मयभिवाहाग्रजमादिपरुपः ॥ ४॥ जीसे कहा ॥ १ ॥ भीमगवानुवाप भगवान् भीरुप्णने कहा -देवशिरोमणे । यो सो याना देवता भापके चरणकममेकी पूमा करते हैं; अहो ममी देवपरामरार्थित परन्तु देसिये तो, ये एस भी वफ्नी मज्यिोंसे सुन्दर पुष्प और फलेकी सामग्री पर चाक चरणकमलोंमें पादाम्पुर्व ते मुमनाफलाईणम् । मुक रहे हैं, नमस्कार कर रहे हैं। क्यों न हो, इन्होंने नमन्स्युपादाय शिस्वामिरारमन इसी सौम्मम्पके लिये तया अपना दशन एव भरण करने वासों के मानका नाश करने के लिये ही सो प्रदान- स्तमाऽपहत्यै सरुजन्म पस्रुवम् ॥ ५॥ धममें पक्ष-योनि प्राण की। इनका जीवन पम्प है॥५॥ वादिपुरुष ! यपपि आप इस बन्दाफ्नमें पतेऽलिनस्तव पशोऽसिललोकतीर्थ अपने ऐमर्यनको छिपाकर बाकॉकी-सी लीय पर रहे हैं, फिर भी बापके श्रेष्ठ मत मुनिगग अपने इस गायन्त आदिपुरुषानुपद भजन्ते । दक्षको पहचानकर यहाँ मी प्राय मौरोंके सपमें वापके प्रायो अमीमुनिगणा मवदीयमुस्पा मुपन-याक्न पशा निरन्तर गन करते हुए वापक ममनमें सगे रहते हैं। वे एक क्षणके लिये भी बापका गह बनेऽपि न मात्पनपारमदैयम् ॥ ६ ॥ नहीं छोड़ना चाहते ॥ ६ ॥ मानी ! नास्तवमें आप नस्पन्स्पमी शिखिन ईख सदा हरिम्प हो स्तुति करने योग्य हैं । देपिपे, माझ्या अपने घर बाय देख ये मार वाक दशनोंसे मानन्दित होकर हन्ति गोप्य इव ते प्रियमीषणेन । | माघ रहे हैं। हरिनियाँ मृगनयनी गाोिक समान मानी १ प्राचीन प्रतिमें श्रीमावानुवाच ना मंस मही है। २२९- २२६ भीमश्रामवत . सूक्तम कोकिसगणा गृहमागवाय प्रेममरी तिरी चितवनसे बापके प्रति प्रेम प्रकट कर ही है, वापको प्रसन्न कर रही है। ये कोयलें अपनी न्या वनौकस इमान् हिसां निसर्गः ॥७॥ मधुर कुछ-कुछ पानसे पापका कितना सुन्दर स्वागत कर रही हैं ! ये बनमासी होनेपर मी प है। स्पोंकि सत्पुरुषोंका स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे घर वाये धन्यमय परणी सृणवीरुधस्त्वत् अतिपिको अपनी प्रिय से-प्रिय वस्तु मेंट कर देते है।जा बाब यहाँकी भूमि अपनी हरीपरी पासके साप आपके चरणोंका स्पर्श प्राप्त करके पन्य हो रही है। यहाँके रस, पादस्सयो मलवा करनाभिसृष्टा । ताएँ और मारियों आपकी भैगुलियोका स्पर्श पाकर अपना यहोमाम्य मन ही हैं। मापकी दयामी पिसानसे नयोऽद्रयः लगमगा: सदयाषलोके मदी, पर्वत, पा, पक्षी-सब तार्य हो रहे है और की गोपिया वापके क्स स्लका स्पर्श प्राप्त करके, र्गोप्पोऽन्तरेण समोरपि यत्रामी॥८॥| मिसके रिये स्क्प अश्मी मी प्रत्रपित रहती हैं, धन्य- धन्य हो रही हैं।॥८॥ मीणुक उवाच भीशुकरेग्मी करते है-परीक्षिस् ! इस प्रकार परम सुन्दर सदाक्नको देखकर भगवान् श्रीरुण गात एवंन्दावन भीमत् छष्ण प्रीतमनाः पन् । ही आनन्दित हुए। अपने सस लिया के साप गोळनकी तराईम, पमुनातपर गौ को चराते हुए भनेकों रेमे समारयमद्रः सरिखोपस्सु सानुगः ॥ ९॥ | प्रकारकी सीमएँ करने पगे ॥९॥ एक ओर पासवाल भावान् श्रीहष्णके चरित्रोकी मधुर तान म राते है, कपिद मायति गायत्सु मदापालिप्पनुषते।। तो दूसरी बार मध्याममीके साप बनमान पहने हर श्रीकृष्ण मतवाले मौरको पुरीली गुनगुनाइटमै अपना उपगीपमानपरितः स्रग्वी सहर्पणान्वितः ॥१०॥ कर मिप्रकर मपुर सप्रित अअपने गते हैं ॥ १० ॥ कमी-कमी श्रीकृष्ण जनतेर रानसोंके सप स्वयं मी कचिम फलांसानामनु जति पिवम् । ऋचने लगते हैं मोर कभी माचवे ए मोरोके साप स्वयं मी रामक ठुमक नाचने प्राते है और ऐसा नाचते कि मभि नूरपति नृत्यन्त पणिहासयन् कचित् ।।११॥ मपूरको उपहासास्फर बना देते हैं ॥ ११ ॥ कभी मेषके मेषगम्भीरया वाघा नामभिगान् पशून् । सम्मन गम्भीर माणीसे दूर गये हुए पशुओं उनका माम से रोकर बड़े प्रेमसे पुकारते हैं। उनके पाठकी कपिदाहयति प्रीस्या गोगोपासमनोपया ॥१२॥ ममुर पनि पुनकर गर्यो और बाराक पित्त भी अपने पशमें नहीं रहता ॥ १२ ॥ कभी पोर, कीप पकारमाशयमाभारद्वामाय बर्षण । (करापुर), पकवा, भरदूम वीर मोर पारि पशियोंकी- सी बोडी मारते तो कमी पार, सिंह अफिी गमनासे ममुरति मम सम्माना भीवयम्पासिंध्याम॥१३॥ | रे हुए जीवोंके समान स्वप भी मयभीतकी-सी श्रीम १ मापीन प्रनिमें भीगु सदाचा इतना मंण नही। बने या भीमान् प्रीत ।

भ०१५] दशम स्कन्ध २२७ - कचित् क्रीडापरिभान्त गोपोत्सङ्गापवईणम् । करते ॥ १३ ॥ जय क्यामजी खेलते केटो पकसार किसी ग्वाथ्याकी गोदके तकियेपर सिर रखकर लेट जाते, स्वप विषमयस्पार्य पादसंवाहनादिमि ॥१४॥ स्य श्रीकृष्ण उनके पैर दयान उगते, परल मटने लगते और इस प्रकार अपने मड़े माईकी पकावट दूर करते ॥१९॥ नृत्यतोगायतः कापियरगतो युध्मवोमिए । जब ग्वाल-बाल नाचने-गाने टासे भरा ताल ठोकठोंक- कर एक दूसरेसे कुस्ती छाने लाते, तब श्याम और राम गृहीवास्तौ गापालान् इसन्तौ प्रश्शनसतुः ॥१५॥ | दोर्नो माई हापमें हाप राकर खड़े हो जाते और स- इसफर वाह-वाह करते ॥१५॥कमी-कभी स्वयं श्रीकृष्ण कचित् पछयवरपेषु नियुभमकर्षितः। भी वालवालोंके साप कुश्ती छाते छाते पफ नाते तपा किसी मुन्दर सके नीचे कोमल पस्योंकी सेना किसी पषम्लामयः शेते गोपोस्सङ्गोपपईमः ॥१६॥ बालवालकी गोदमें मिर रस्पकर लेट जाते ॥ १६ ॥ पीक्षित् ! उस समय कोर-कोई पुण्यके मर्तिमान् सरूप पादसंपादनं धक्छः केचिचस्स महास्मनः । म्यालाल महात्मा श्रीकृष्णके 'धरण दगाने छाते और दूसरे निष्पाप बालम उन्हें वा-बड़े पत्तों या अगोछियोंसे अपरे इसपाप्मानो व्यग्ने समयीनयन् ॥१०॥ | पंख मने ध्यते ॥ १७॥ किसी-किसीकेएदयमें प्रेमकी पारा उमा आती तो वह धीर-धीरे उदारशिरोमणि अन्ये तदनुरूपामि मनोवानि महात्मनः । | परममनस्वी श्रीकृष्णकी सीयोंके मनुरूप उनके मनको प्रिय लगनेवाले मनोहर गीत गाने याता ॥ १८ ॥ गायन्ति म महाराज स्नेहक्किमधियः शनैः ॥१८॥ मगवान्ने इस प्रकार अपनी योगमापासे अपने ऐयमय सहपको छिपा रम्स या । वे ऐसी छाएँ करते, एवं निगूढारमगति समापया जो ठीक-ठीक गोफ्याटकोंकी-सी ही माझ्म पाती । गोपारमवस्व परिसमिसम्यन् । सय माक्ती हामी बिनके चरणकमकी सेवामें संडम राती हैं, वे ही भगवान् इन ग्रामीण प्रकों के साप रेमे रमालालितपादपरलयो | यो प्रेमसे प्रामीण से खेप करते थे ! पीमिद ! | ऐसा होनेर भी कमी-कमी उनकी ऐपमपी स्पीयरें प्राम्पैः सम प्राम्पवदीनषेटित ॥१९॥ मी प्रकट हो जाया करती ॥ १९ ॥ भीदामा नाम गोपालो रामफेशपयोः सखा । मसामनी और श्रीहाणके सबमि एक प्रधान गोप- बालक श्री मा । प्य Pन उन्होंने नया सुबर और स्त्रोक्ताण (ोटे कृष्ण) ना माने याम और सुबलस्तोककपणापा गोपा प्रम्णेदममुपन् ।॥२०॥ रामसे बढ़ प्रेमके साप कहा-||२०|| 'हमलोगोंको सवा सुम पचानेवाले पामी ! आपके बालश्री ता कोई राम राम महामाहो कप्प दुनिपईग । पाइ ही नहीं है। हमारे मनमोहन भीकृष्ण ! दुको मर कर गना ता तुम्हाग समान ही है।पसे यादीदी इताऽविदरे सुमाद पन मालालिमालम् ॥२१॥ | दूरपर एकबदा मरीन है। म, उसमें पति-कात नाइके २२८ भीमद्भागवत [अ०१५ फलानि तत्र प्रीमि पतन्ति पतितानि च । वृक्ष मरे पर हैं ॥२१॥ हाँ बहुस-से खरके फल पा फककर गिरते रहते हैं और पात-से पहले गिरे ए में सन्ति विस्ववरुदानि पेनुफेन दुरात्मना ।।२२।। है । परन्तु वहाँ धेनुक नामका एक दुष्ट दैत्य रहता है। उसने उन फापर रोक लगा रस्ती ॥२२|| मप्रम- सोऽसिवीर्योऽसुरा राम हे रुप्प सररूपपक् । मी और मैया श्रीकृष्ण ! यह दैत्य गकेके रूपमें रात है। मयं तो यका श्वान् है ही, उसके साथ बोर मात्मतुरखमलैरन्पतिभिडभिसः ॥२३॥ भी बहुत से उसीके समान बलवान् दैत्य उसी सपने रहते हैं ॥ २३ ॥ मेरे शत्रुपाती मैया ! उस दैत्पने वमात् रुपनराहाराद् भीते मिरमित्रान् । सप्तक न जाने कितने मनुष्प वाले हैं। यही कारण है कि उसके रके मारे मनुष्य उसका सेवन नहीं करते न सेम्पवे पञ्चगः पक्षिसनियमितम् ॥२४॥ और पशु-पक्षी मी उस अंगसमें नहीं बसे ॥ २० ॥ उसके फल हैं तो सुगन्धित, परन्तु हमने कमी नहीं वियन्तेऽसक्कपूर्वाणि फलानि पुरभीणि च । खये। देखो म, भारों वोर उन्हीकी मन्द-मन्द गम फैल रही है । तनिक सा प्यान देनेसे उसका रस मिसने एप ने मुरभिर्गन्धी विषषीनोऽमगृभते ॥२५॥ लगाता है ॥ २५ ॥ श्रीकृष्ण ! उनकी मुगन्धसे हमारा मन मोहित हो गया है और उन्हें पाने के लिये मत प्रयच्छ तानि ना रुप्प गन्धलोमिवषेतसाम् । रहा। तुम हमें वे पर वास सिम्पयो । पाठ दादा ! हमें उन फकी पड़ी उत्कट पमिलया। पाम्अस्ति माती राम गम्मा यदि रोचते ॥२६॥ मापको रुचे तो वहाँ पल्प चलिये ॥ २६ ॥ एवं सुहाचा भुवा महस्प्रियचिकीर्पया । अपने ससम्बाब्यारेकी यह बात सुनकर मगबन् प्रास्स बग्मतुर्गोपेतो वासवन प्रम् ॥२७॥ श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों इस वीर फिर करें प्रसन करनेके लिये उनके साप तालबनके लिये पस पो ।२७) पछा प्रविश्य पाहुम्मा वालान् सम्परिकम्पयन् । उस पनमें पाकर परामगीनेवफ्नी पोहसे सम आरके फलानि पातमामास माम लोमसा ॥२८॥ पेयोंको पर शिया वीर मसवाले हाबीके मोके समान में पा मोरसे हिलाकर मत-से फल मीचे गिरा फलाना पवतां अम्ब निन्नम्मासुररासमः । दिये ॥२८॥ मग गपेके मपमें रानेवासे देपने फरक मिलनेका शब्द उना, सब यह पर्वतों के साथ सारी पृथ्वी मम्पपावत् विक्तिल सनगं परिफम्पयन् ॥२९॥ को मतावा उनकी मोर दौसा ॥ २९ ॥ मह बका समेस्य वरसा प्रेस्पदाम्पो पदावलं पली । मध्यान् पा । उसने यह देगसे मामा के सामने बाबर अपने पिछले पैरोंसे उनकी छातीमें दुग्धी मरी र निहस्पोरसि काम समन् पर्पसरत् संशः ॥३०॥ इसके बाद दुष्ट यो जोरसे रेंकता वा हसि हट पुनरासाप सरम्भ उपकोटा पराक् सितः । गय ॥ ३० ॥ राजन् ! गधा कोममें भरकर किर | रेफला एका दूसरी बार प्रामगीके पास पहुँचा और परगावपरौ रामन् बलाप प्राक्षिपद मा ॥३१॥ उमकी वोर पीठ परके फिर या कोषसे अपने किस १ छातीम् ।२ पमा । तरा।

म०१५]] दशम स्कन्ध २२९ सतं गृहीस्वा प्रपदोामयित्पैकपाणिना। पैरोंकी दुलती चलायी ॥ ३१ ॥ क्लामबीने जम्ने एक ही हायसे उसके दोनों पैर पकर लिये और उसे विक्षेप रणरामाने आमणस्पकजीवितम् ॥३२॥ आकाशमें शुभकर एक ताइके पेपर दे मारा । पुमते तेनाइतो महातालो देपमानो पहच्छिरा । समय ही उस गधेके प्राणपखेरू ठप गये ये ॥ ३२ ॥ उसके रिनेकी चोटसे सहमहान् सापका पक्ष-जिसका पार्मस्पं फम्पयन् मयास चान्यं सोऽपि चापरम्।३। ऊपरी भाग बहुत विशाल पा-स्वयं तो तबतकावर गिर ही पस, सटे हुए दूसरे वृक्षको भी उसने तोर ठीलयोस्सृष्टलरदेशासाहता। मम । उसने तीसरेको, तीसरेने चौकोपस प्रकार वालामकम्मिरे सर्षे महापारिता इव ॥३४॥ एक-दूसरेको गिराते हुए बहुत-सेतापक्ष गिर पड़े ॥३२॥ परामनीके लिये तो यह एक खेल पा । परन्तु उनके नैतचित्रं भगपति मनन्ते जगदीघरे । द्वारा फैले हुए गधेके शरीरसे चोट ख-खाकर कहाँ सम- | के सब साप हिल गये । ऐसा मान पहा, मानो सक्को भोतमोतमिद मस्मिस्तन्तुष्पा पया सटः ॥३५॥ भावातने समोर दिया हो ॥ ३१ ॥ भगवान राम सर्य अगदीपर हैं। उनमें यह सारा संसार ठीक से तवा रुग्ण प राम पहातपो घेनुकस्य थे। ही बोतप्रोत है, वैसे सूमि का । तब मश्र, उनके कोधारोऽम्पद्रवन् सबै संरम्पाहसपाभवाः ॥३६॥ लिये यह कौन माश्चर्य की बात है ॥ १५ ॥ उस समय थेनुकासुरके माईमपु अपने माके मारे पानेसे क्रोवके तस्तिानापवतः कणो रामम प लीलया। मरे व्यगपन्य हो गये । सक्के सब गधे क्लरामनी और श्रीकृष्णपर बड़े घेगसे टूट पड़े ॥ २६ ॥ रामन् ! गीतपमापरणान् प्रारिणोगराबसु ॥३७॥ उनमेमे जो-जो पास वाया, उसी-उसीको षामनी और फलप्रकरसहोणे देस्पदेहेर्गतासमिः। श्रीक्षणने स्पेठ सेमें ही पिछले पैर पकाकर साक्षों- पर दे मारा ॥३७॥ उस सम्प बह भूमि ताड़के से रराम म्। सवासानैर्षनैरिव नमस्तलम् ॥३८॥ पट गयी और टूटे हुए एस तपा देस्योंके प्राणहीन शीसे भर गयी । भैसे बदसे नाश क गया पोस्वत् सुमहत् कर्म निशाम्प विषुधादयः । हो, उस भूमिकी वैसी ही शोमा होने समी ॥ १८ ॥ कळामनी जोर श्रीकृष्णकी याद माथ्यपी मीन देखकर मपचु पुष्पवर्षाणि पर्यायानि तुष्टषुः ॥३९॥ देवतागण उनपर छठ मसाने टो और बाजे परा मनाकर स्तुति करने लगे ॥३०॥ मिस Pन पेनुकापुर अपवालफशान्पादन मनुप्पा गतसानसा । मय, उसी Pनसे ग्रेग मिरर होकर उस बनके साचाल पण पशषपातपनुककानने ॥४०॥ माने उगे तपा पन मी म्पछदताय साप घास भरने गे ॥ १० ॥ कृष्णा कमलपनाथः पुण्यभवणकीर्तन।। इसक बाद कमायेपन मगपान् श्रीरल्ग पर माई अग्रामनीके साप बन अपे। उस समय उनके सापी पाउचाउ टनके पीछ-पीछे चरसे हुए उनकी स्तुति स्तूयमानोऽनुगोपः सानजो प्रममायमत् ॥४१॥ व गात ये । क्यों न हो, भगवान्की ग्रोंका | प्रग-पीसन ही सक्से बदका पवित्र को है ॥ ११ ॥ १ वाट परमानो। ।

२३० भीमनागपत [4०१५ गोर धमछरिसकुन्तलाई उस समय श्रीकृष्णकी (पराठी अश्योंपर गौकि पुरोसे उम्-उपकर धूलि पड़ी गई थी, सिरपर मोरपंसका मुकुट पन्यप्रसनरूपिरक्षणचालासम् । या और पामें मुन्दर-सुन्दर मंगरी पुष्प गुपे हुए थे। उनके नेमि मधुर चितवन और मुसपर मनोपर मुस्कान वेषु कान्तमनुगैरनुगीसकीति पी। वे मधुर-मपुर मुरली मना रहे थे और सापी सम्बन गोप्पो रिपितरोऽम्भगमन् समेता ४२ उनकी मन्ति कीर्तिका गान कर रहे थे । वंशीको पनि सुनकर पहुत-सी गोपियों एक साथ ही सबसे महर पीत्वा धान्दावसारपमधि- निक्स भायी | उनकी बॉनि म जाने फरसे श्रीवात्मके दर्शनके लिये तरस सी पी ॥ १२ ।। गोपिने अपने स्वाप बर्षिरावं अयोपितोऽहि । नेत्ररूप भमसि मगमान्फे मुखारविन्दका मकरन्दनस पाम करके दिममरके मिशहकी बलन शस्त की । और सत्सत्तति समधिगम्य विषेश गोठ भगवान्ने भी उनकी मनमरी हसी तथा नियसे मुख प्रेममरी सिरठी पितवनका सकार सीकर करके अबमें समीरहासपिनयं पदपागमोषम् ॥४३॥ प्रवेश किया ॥ १३ ॥ उपर फोदामैया धौर रोशिम- मीका प्य वारसल्पस्नेहसे उमर रहा था । महोंने श्याम तयोर्यशोदारोहिण्यो पुत्रयोः पुत्रपरसले । और रामके घर पहुंचते ही उनकी इसके अनुसार या समयके अनुरूप पहसेसे ही सोच-सजाकर रोई मपाकाम यथाकालं म्पपा परमाधिपः॥४४॥ वस्तुएँ में सियी-पिषी और पाहमायी ॥ ४ ॥ | माताोंने तेस उपटन नादि अाकर स्नान कराया। गतामानभमो नत्र मनोन्मर्दनादिभिः। इससे उनकी दिनमा घूमने-फिरनेकी मर्गकी पकान दूर हो गयी। फिर उन्होंने सुन्दर बस परमाकर दिन्य पुपोकी नीलीपसिस्वारुधिरा दिव्यनग्गन्भमणिती॥४५॥ माला पहनापी तपम चन्दम माया ॥ १५ ॥ तत्पश्चात् | दोनों भाइयोंने मनायोंका परोसा इमा खादित नाम मानन्पुपरस प्राश्य खादभमपलालियौ । मोनम किया । इसके बाद से सरपरसे दुअर-दुलर कर पशोदा और रोहिणीने में सुन्दर शम्यापर सुमा। सविष्य परधरपापा मुर्म मपपजे ॥४६॥ श्याम और राम बो मारामसे सो गये ॥ १६ ॥ एष स भगवान् रुप्पो इन्दावन परकचित् । मावान् श्रीहम इस प्रकार इन्दा नमें अनेकों सीमएँ करते । एक दिन अपने ससबाप के साथ भपौ रामम राखन कालिन्दी ससिभिवतः॥४०॥ यमुनासम्पर गये । रामम् ! उस Pन नाममी मके साप नहीं पे॥१७॥ उस समय जेठ-जामा अप गावक्ष गापाय निदाघातपपीरिताः। पामसे गौर गौर पालमा अत्यन्त पीपित हो रहे थे। प्याससे उनका काठ सूख या क । इसभिप उोंने दुष्ट मर्स पपुस्तस्सास्वपार्वा विपपितम् ॥१८॥ यमुनाभीका विकेश जल पी लिया ॥ १८ ॥ परीक्षिए । होनारके पर उन्हें इस बातका प्यान ही नही रहा विपाम्भस्तदुपस्पृश्य देखोपारचेतसः। हए | उस वियले यमक पीते ही सब गौर और ग्नक- निपेतुर्गासवः सर्वे सलिलान्ते मा॥४९॥ या प्राणहीन होकर यमुनाजीके सटपर गिर पड़े ।। ४९ ॥ १ सौरममति १२ भिवा ।

२०१६] दक्षम स्फत्प २३१ वीक्ष्यवान् पैसाभूतान रुप्पोयोगेश्वरेचरः। उन्हें ऐसी अवस्मामें देखकर योगेपरोंके भी ईवर मावान् भीकृष्णने अपनी अमृत बरसानेवाली पिसे गर्ने नीक्ति पियामतपपिम्पा स्वनाथान् समबीनयत् ॥५०॥ कर दिया । उनके स्वामी और सर्वख तो एकमात्र श्रीकृष्ण ही ये ॥ ५० ॥ परीक्षित ! चोना बानेपर ये तेसम्प्रतीवस्सतया समुस्थाय बलान्तिकात् । सम्म यमुनानीके तटपर छ सखे ए भोर माचर्यचक्ति होकर एक-दूसरेकी ओर देखने यो ॥ ५१ ॥ रामन् ! मासन् सुपिस्मिताः सर्वेपीक्षमाणाः परस्परम् ॥५॥ अन्तमें उन्होंने यही निश्चय किया कि हममेग विधेय वन्वर्मसतसद् राबन् मोविन्दानुग्रहेषिणम् । | जल पी लेने के कारण मर चुके थे, परन्तु हमारे श्रीकृष्णने अपनी मनुहमरी रिसे देकर हमें फिरसे मिम पीस्वा पिप परेसस्प पुनरुत्थानमारमनः ॥५२॥ दिया है ॥ ५२ ।। इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या संहितायां दशमस्कन्धे पूर्व घेनुकसयो नाम पब्दशोऽपय ॥ १५ ॥ अय षोडशोऽध्याय काख्यिपररूपा भी क उवाप भीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित् ! भावान् श्रीकृष्ण पिसोक्प पिता रुणारुणारुणाहिना विसः। ने देस कि महाविपर कालिय नागने यमुनाजीका नाम वित्र कर दिया है।तष पमुनाजीको पुद करनेके वसा विनिमन्धिछन् सर्प सादयासयत् ॥१॥ विचारसे उन्होंने वहाँस उस सर्पको निकाल दिया ॥१॥ राजोपाव पजा परीसित्मे पूम-पान् ! भगवान् भी हम्णने । पमन्तर्मलेगा न्मगृहाद भगवानहिम् । यमुनानीके अगाध नमें किस प्रकार उस सर्प दमन किया। फिर कारिप माग तो नउचर जीव नहीं पा, सपैपपगावास यपाऽऽसीद विप कभ्यताम् ।।२।। ऐसी दशामें वा अनेक युगोतव जयमें क्यों और कैसे रहा ! सो कात्याये ॥२॥ नमसरूप महासमन् ! भगवान् वनन्त है। ये अपनी सीन प्रकट करके स्वच्छन्द अमन् भगवतस्तस मुम्ना स्वच्छन्दवर्तिनः । विहार करते है । गोपालरूपसे उन्होंने भो उदार मीय की है, यह तो अमृतस्वरूप है । भय, उसके गोपाठोदारचरितं कस्कृप्येतामृत जुपन् ॥ ३॥ सेवनसे कौन तृप्त हो सकता है॥३॥ श्रीशुक उपाय भीशुकदेवजीने कहा -परीक्षित् । यमुनाजीमें काम्पि मागमा एक कुमा पा । उसफा ना किसकी काठिन्यो कालियसासीधदः कषिद् विपामिना । गासि स्वैमा रहता था । यह तक कि उसके पर अपमाणपयापमिन् पतन्त्युपरिगाः स्वगाः॥४॥ उपनेवाले पनी भी मुसकर उसमे गिर माया करते थे। १ सपाय १।२ प्रफीडापा परापनिम्मा ४ मप्यमाण पो 1 ।

२३२ श्रीमद्भागमत विषमता विपोदोमिमारुतेनाभिमर्शिताः । उसके विपैले क्सकी उत्ताल तरकका स्पर्श करके का उसकी झेटी भेटी द लेकर चव यु कार माती नियन्ते तीरगा यस्स प्राणिनः स्थिरबङ्गमाः॥५॥ और तटके पास-पात, पब, पर पछी पादिका सर्भ फरती, तब वे उसी समय मम पाते थे ॥५॥ परीधित् ! स परवेगविपषीर्यमषेय सेन मग्लान्का अवतार तो दुर्गका दमन करने के लिये होत ही है। सब उन्होंने देखा कि उस साँपके विषका के दुध नदी पसलसंयमनापवारः । यहा प्रपण ( मपकर) और वा मपानक विष हो उसका महान् की तपा उसके कारण मेरे हिरम रुणः कदम्पमधिरुम तोऽति- स्थान यमुनाची मी वृक्ति से गयी ६ सय मान् मीसम्म पनी कारका फेंटा कसकर एक बहुत ही मास्फोठा गाउरक्षनो न्पपसद् विपोदे॥६॥ कदम्बके पक्षपर कर गये और वहाँसे ताल ठोंकार उस | पिंपळे में कूद पर ॥ ६॥ यमुनानीका बस साँपके सर्पादः पुरुपसारनिपातवेग विषके कारण पहलेसे ही खीळ रहा। उसकी सयों लाल-पीली बोर वयात मपहर ळ ही पी । पुस्खोतम संघोभितारगविपोनासिवामुराशिः। मगकन् श्रीकृष्णके द पानेसे उसका पाठ और मी उछने ज्या । उस समय तो कास्पिदहका बाइकर उपर सरकर चार सौ पतक फैल गया । बपिन्स पर्यवप्लवो विपकपायमिभीपणोर्मि- क्नात पशाली भगवान् श्रीकृष्णके लिये इसमें कोई वार्यिकी पत मही है ॥ ७॥ प्रिय परीक्षित् । मगन् विन् धनु तमनन्तपलस्स किंवत् ।। ७॥ श्रीकृष्ण काठियदा में कूदकर मनुष्य कश्मय मावाले गजराके समान बल ठालने लगे। इस प्रकार नस- तस्स हदे विहरतो सुनदरपूर्ण कीमा परनेर उनकी मुमाओंकी टमारसे क्समें बड़े पोरका शम्द होने ष्णा । बाँससे ही सुननेवारे काम्पि पार्षापमझ वरवारमविक्रमस । नागने बह बापान मुनी और देस कि कोई मेरे निवास- स्थलका रिस्कार कर रहा है। उसे पसइन नए। यह पिडकर भगवान् श्रीकणके सामने वा गपा ॥८॥ मावरप वनस्वसदनामिभवं निरीक्ष्य उसने देख कि सामने एक सॉक्टा-साना बालक है। पर्यास्मन मेधके समान अस्पस्त सुषुम्मर शर, उसमें पशु भवाः समसरचदमप्पमाणः ॥ ८॥ माकर बाँखें हटनेका नाम ही मही खेती । उसके पक्ष सम्पर एक सुनही रेखा-धीक्सया पिद और प्रषणीयसुङमारपनारदा बह पीले रंगका पम्र धारण किये राबड़े मधुर एवं मनोहर मुखपर मन्द-मन्द मुसकान वयात श्येमापान भीवरसपीवपसन मितसुन्दरास्पम् । हो रही है । परण इतने सुषमार बोर सुन्दर है, मानो | पापी गली हो । इतना पाप होनेर भी चय मोरन्दमप्रतिभयं कमठादरास्प्रिं काम्पि भागने देखा कि पाक सनिष भी मरकर (स किसे नमें मौनमे सेट या, तब उसपर क्रोध और सन्दप मममु रुपा सप्रया पछाद ॥५॥ भी पा गया । उसने श्रीरम्णको ममस्थानोंम सकर १ दमन रे।

ब०१६] दशम स्मन्य २३३ नागभागपरिपीतमाएपेष्ट अपने शरीरके बन्धनसे उन्हें जकल रिया ॥९॥ भगवान् श्रीकृष्ण मागपाश मंधकर निश्चेष्ट हो गये । यह देखकर मालोमतरप्रयससा: पशुपा भृशार्ताः । उनके प्यारे सम्म बालवास बहुत ही पीडित हुए और उसी समय दुस, पभात्ताप और मयसे मर्छिन होकर रुणऽपितास्ममुहदर्थकलत्रकामा पृथ्वीपर गिर पड़े। क्योंकि उन्होंने अपने शरीर, मुाद, धन-सम्पत्ति, स्त्री, पुत्र, मोग और कामनाएँ-सम पुछ दुःस्वानुमोकभयमुढापियो निपेतुः ॥१०॥ भगवान् श्रीकृष्णको ही समर्पित कर रवा पा ॥ १० ॥ गाधोपावत्सतर्यःकन्दमानाः सुदुखिता । गाय, बैल, मछिया और पापड़ दुम्से कराने लगे। श्रीकृष्णकी घोर ही उनकी टकरकी अघ रही पी। वे रुप्णे न्यस्तेषमा भीता सदस्प इस सस्सिरे ॥११॥ रकर इस प्रकार स्पा हो गये, माना गे रहे हों । उम समय उनका शरीर हिलना-रोग्यता तक न पा ॥ ११ ॥ अप बजे महास्पाताधिविधा मतिदारुणाः। इधर मजमें पृष्षी, आकाश और शरीरोंमें वड़ भयङ्कर मयाहर तीनों प्रकारके टपात ठ व हुए जो इस उस्पेतुर्सपि दिग्पास्मन्मासमभपर्शसिन ॥१२॥ बातकी सूचना दे रहे थे कि बहुत ही शीघ्र को अनुम घटना पनेवार्थ ॥ १२ ॥ नम्यावा आनि रोपोंने वानालक्ष्म भयोखिमा गोपा नन्दपुरोगमा । पहले तो उन अशकुनों को देखा और पीछेसे यह जाना कि भाज श्रीकृण विना वनामक ही गाय चराने चले गये। वे मपमे व्याकुर हो गये ॥ १३॥ घे मगधनका प्रभाव विनारामेण गारुण शास्त्राचारयितुं गतम्।।१३|| नहीं जानते थे । इसीलिप उन अशकुनों को देखकर उनके मनमें यह बात आयी कि आज तो श्रीकृष्णकी ईनिमिनियन मस्या प्राप्तमतद्विदः । मृत्यु ही हो गयी होगी । ये उसी क्षण दुम्ब, शोक और भयसे आसुर हो गये । क्यों न हो, धीक्ष्ण ही उनके तस्प्राणास्तन्मनस्कास्ते दुःलोकभयातुराः ॥१४॥ प्राण, मन और सबम्स ना थे ॥ १३ ॥ प्रिय परीक्षित् ! जनके बारम, पद और वियोंश म्बमार गों-मा मापालादपनिता सबै पशुचिप । ही मात्सपार्ण पा । मे मनमें ऐसी मान आम ही अम्यरत । दीन हो गये और अपने प्यारे फहयाका दम्पनकी उपर निबमोहला दोना कणदर्शनमालसाः ॥१५।। म्यसासे पवार याकर निार पर॥ १५ ॥ बनाम- नी मर्य भगवान्क साप और मव गतिमान् है । उन्होंने बव प्रवामियोंको सना फातर और इतना वस्तिपा कातरान् पीक्ष्य भमरान् मापयोबलः। भातुर स्पा, तब हमी वा गयी । परन्तु य पुछ बोले नहीं, सुप ही रहे । स्पॉनि माने घटे माइ प्रास शिविमोनाच प्रमाणाऽनुसस्प सः॥१५॥ श्रीरणा प्राव मोति जानने ध ॥ १६ ॥ मज- मामी भने प्यारे धीरणका डन । बार अधिर सेग्नपमाणा दमित फर्ण समितया पर्दै । कठिनाइ म र योरि माग गर्ने मगवानक चरणपिद । मा २1.-- २३४ भीमागपत [4.१६ । भगवरलक्षणैर्जग्मुः पदम्मा यमनातटम् ॥१७॥ | मिस्ते माते पे । बो कास, अनुश्श मादिसे युक्त होने के कारण उन्हें पहचान होती चाती पी । इस प्रकार वे यमुना-स्टमी बोर माने भो ॥ १७ ॥ से तत्र तत्राजयमाशाशनि परीक्षित् ! मार्गमें गौओं वौर दूसरों के परमषिों के बीच-बीच में मगपानके चरणचिए भी दी जाते थे। घमोपपमानि पदानि विश्पतेः । उनमें कमल, जौ, भाइश, पन और घनाक पिछ मात मार्गे गषामन्पपदान्तरान्तरे ही स्पष्ट थे। उन्हें देखते हुए घे मात शीनासे पले ॥ १८ ॥ म्होंने दूरसे ही देख कि काम्पिाने निरीक्षमाणा यपुरङ्ग सत्वराः ॥१८॥ कालिप नागके शरीरसे बघ हुए श्रीकृष्ण केशाहीन हो मन्तईदे सगभोगपरीवमारात् रहे हैं। कुमरके किनारेपर पाया बचेत पुए पड़े हैं और गौर, बैल, मे आदि म भार्तमरसे करा रहे रुणं निरीहमुपलम्प जलाशयान्ते। हैं। यह सम देसकर ये सस्त्र गोप पन्त न्याकु और अन्तमें मूर्छित हो गमे ॥ १९ ॥ गोपियोंका मन अनन्त गोपांच मूढविपणान् परितः पशूप गुणपणनिल्प मामान् श्रीकृष्णके प्रेमके रंगमें रंगा हुक पा। वे सो निस्प-निरन्तर भगवान्के सौहाई, उनकी संक दतः परमकश्मलमापुराताः ॥१९॥ मधुर मुसफन, प्रेममरी चितवन तपा मीठ पामीकर दी गोप्योऽनुरक्तमनसो भगवत्पनन्ते स्मरण करती रहती थी । अब उन्होंने देस कि हमारे प्रियतम श्यामसुन्दरको कारे सौपने जका स्थी, तर तम्सौरदमितषिलोकगिर मरम्स्पः । तो उनके एयमें पका ही दुस और वही ही मन हुई। मपने प्राणकाउम जीवनसर्पसके बिना उन्हें तीनों लोक अस्तेऽहिना प्रिपसमे मृशदु स्ववप्ता सूने दीसने छगे ॥ २० ॥ माता यशान तो अपने शून्यं प्रियम्पतिस्तं दलिसाकम् ॥२०॥ यस स्प्रफके पीछे काम्यिहमें करने ही जा रही थी, परन्तु गोरियोंने उन्हें पका रिम्पा । नके पमें भी बसी ही पीड़ा भी । उनकी वॉयसे भी मामाकी की ताः रुप्ममावरमपरपमनु प्रविष्टां यी र पी । सपसी बाम्ये भीषणके मुखकमान्स सुरपयथासमनुगमनुषःस्रवन्या।। टगी पी । मिनके दारीरमें चेतना पी, पे अनमोहन धीरणफी पूतना-यत्र मादिकी प्यारी-प्पारी ऐच वाम्ना प्रशप्रिपफया फषपन्य आसन् नगर कह कहकर पशोदाजीको धीरज बंधाने । रितु मधिश ता मुकी सग पर ही गयी पी ॥२१॥ कृष्णाननेऽपितरमा मृतकप्रतीकाः ॥२१॥ परीधित् ! नन्दामा आदिके जीवन प्राण मा भीरण दी । श्रीशगय पिये पारियादमें पुमने मगे। कमाणान निषियना नन्दारीन पीप तादम् । या पर श्रीकाका प्रमार जाननेवाले भगवान् पयाम जीने कितीका ममझा-युमर, मिटीका परपूर और प्रापपपन् म भगान रामाकृष्णानुभाव सिम्॥२२॥ पिकाउनान्यॉमें प्राण पाये गा फि॥२२॥ १।

दशम स्कन्ध २३५ । इत्व स्वगोलमनन्पगति निरीक्ष्य परीक्षित् | यह सौपके शरीरसे पर जाना ता धीकृष्णकी मनुष्यों जैसी एफ सील पी । चब उन्होंने सनीमारमतिदुःस्तितमात्मोतोः । देख सिजके सभी लोग भी और चोंके साप मेरे छिये इस प्रकार भरपस्त दुम्मी हो रहे हैं और सचमुच थानाय मर्पपदवीमनुवर्तमान मेरे सिया इनका कोई दूसग सहारा भी नही है, तब ये एक मुस्तफ सर्पके स्वनमें रहकर बाहर निकाल स्थित्या महमदतिष्ठदुरङ्गान्धात् ।।२३।। वाये ॥ २३ ॥ मगवान् श्रीकृष्णने उस समय अपना शरीर फुल्यकर म्यूब मोटा कर दिया । इससे सॉफ्का शरीर टूटने लगा । यह अपना नागपाश छोपकर अलग तत्प्रपमानवपुपा न्यपितात्मभाग सका हो गया और कोषसे आगबबूला हो अपने फण ऊँचा करके फुफकारें मरने लगा । पात मिलते ही स्त्यबस्वोभमय्यकुपितः स्वफणान् समनः। श्रीकृष्णपर चोट करने के लिये यह उनकी ओर टकटकी तस्थौ श्वसममनरन्ध्रषिपाम्बरीप- ध्याकर देखने लगा । उस समय उसके नयुसे विस्फी फुहारें निकाल रही थी । उसकी आँस्य स्थिर थी और स्तम्धेषणारमुकमुसोहरिमीक्षमाण ॥२४॥ हनी लायछ हो रही पी, मानो मट्ठीपर तपाया हुआ सपका हो। उसके मुंहसे बागकी लपटें निकाल रही संजिहया दिष्ठिसया परिलेलिहान पी ॥ २१ ॥ उस समय काठिय नाग अपनी दुहरी जीम छपल्पाकर अपने हार्डोके दोनों किनारोंको घाट देसकिणी प्रतिफरालपिपानिरष्टिम् । रहा था और अपनी कराठ घाँस्योंसे विस्फी भाग्य उग- लता ना हा पा । अपने वाहन के समाम मगवान् फ्रीरमम परिससार पथा खगेन्द्रो श्रीकृष्ण उसके साप तेरते हुए पैतरा पलने लगे। और यह सास भी उनपर पोर फरनेका दोष दवा बमाम साऽप्पवसरं प्रसमीक्षमाणः ॥२५॥ हुआ पैंतरा दख्ने एगा ॥ २५ ॥ इस प्रकार पैंतरा यदलते वास्ते उसका पर क्षीण हो गया । तब मगवान् परिम्रमहौजसमभाम श्रीकृष्णने उसके या-बड़ सिरोंफो तनिक वा रिया और मानम्प तत्पपुशिरःस्पषिस्ट आपः। सकर उनपर सवार हो गये । कारिप नाग मस्तकों पर बहुत-सी व्य-माय मणियाँ दी । उनक स्पर्शसे तन्मरमनिकर स्पातितान- । मगवान्के सुकुमार सलोंकी स्पटिमा और भी बा पादाम्मुजोऽखिलकलादिगुरुनन ॥२६॥ गयी । नस्प-ग्न भारि समस्त क्यों मारिप्रवर्तन मावान् श्रीकृष्ण उसके मिरॉप क्या नृत्य काने सं नर्तुमपतमवेक्ष्य तदा तदीय लगे ॥ २६ ॥ भगवान्के प्यारे मत गन्धष, सिद, गधर्षसिद्धसुरधारणदेवपन्नः । दवा पारम और देवगनाोंने सब दा मि मावान् नृत्य करना पाइते हैं, तब ये बा प्रमम मुरा, डोर, श्रीस्पा मृदङ्गपणवानझमाघगीत नगरे आर बाजे पनाते हुए, सुन्दर-मगर गीत गाते एए पुष्पोंदी वर्ग फट र ओर अग्न निम्नवर पुप्पापहारनुतिभिः मासोपसेदुः ॥२७॥ करते हुए में समर टमी समप मगधन्धे सवा २३६ भीमसागवत । यद्यन्छिरा न नमतेश कधीर्ण पहुँचे ॥ २७ ॥ परीक्षित् ! कानिध्य नागके एक सौ ए सिर पे । वह अपने मिस सिरको नहीं मुकम्ता पा स्तचन् ममर्द स्वरदण्डभरोऽधिपातः । उसीको प्रचण्ड दणधारी मगवान् अपने पैरोंकी चोर धीणायुषो ममत उवषमास्सतोऽसा कुचर सलते । इससे काम्पि नागकी नीयनशक्ति भी हो पठी, वह मुँह और नथुनोंसे म्यून उगम्ने स्या नस्तो वमन् परमकश्मलमाप नागः ॥२८॥ वन्तमें चक्कर मारते-कारते वह बेहोश हो गया ॥२८॥ तस्याक्षिमिर्गरलममता शिरस्सु सनिक मी येत होता तो यह अपनी बाँससे विर उग छन लाना वीर क्रोधके मारे जोर-चोरसे फुफकारें मरं पद् यत् माममति नि घमतो पोम्पैः । लाता । इस प्रकार का अपने सिरोंमसे निस सिक ऊपर उपा, उसीको नाचते गए मगवान् श्रीकृष्ण म नुत्पन् पदानुनमयन् दमयाम्पब चरणोंकी ठोकरसे मुफाफर रौंद सटते । उस सम्म पुप्पैः प्रपूजित हा पुमान् पुराणः ॥२०॥ | पुराण-पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंपर जो सूतमी म पत्ती पी, उनसे ऐसा माम होता, मानो रक तचित्रवाण्यपिरम्पफरमातपत्रो पुोंसे उनकी पूजा की जा रही हो ॥ २९ ॥ परीक्षित रक्त मुस्लैरुरु पमन् नृप भग्नगात्रः । भगवान्के इस अद्भुत तापक-तृस्यसे पारिपके फणसा छत्तमामिल हो गये । उसका एक कपूर स्मृता पराघरगुरुं पुरुष पुराण | घर हो गया और मुंहसे म्यूमकी उनी होने ली । उसे सारे जगत्क वा शिक्षा पुराणपुरुष माकन नारायणं तमरण मनसा बगाम ॥३०॥ मारायणवी स्मृति हुई । मह मन-ही मन भगवान्क रुग्णस गर्ममगतोऽविमराक्सन्न शरणमें गस्पा ॥ ३० ॥ मगमान् श्रीकृष्णके उरमें सम्प विध है। सरिये उनक भरी वामसे कारिप माग पार्णिप्रहारपरिगफगातपत्रम् । शरीरकी एक एक गाँट दीरी पर गयी। उनकी एडियों की चोरसे उसके पत्र के समान पण छिम-मिल हो गय । राष्ट्राहिमायमुषसेदुग्मुप्प पान्य भपने पतिकी यह रशा देकर उसकी पलियाँ भगवान् भाः स्थासनभूपणफेशपन्याः ॥३१॥ की शरणमें आया । पं अयस्त बातुर होसी मयके मरे उनके वस्त्राभूषण अस्स-म्पस्त हा रे थे और साम्त सुविग्नमनमाऽथ पुरम्कताम: मेशकी पारियाँ भी स्थिर रही पी ॥ ३१॥ उम समय उन सानी मागपत्नियोंक वित्तमें बड़ी घाइट पी। काय निर्धाय सवि भूतपति प्रणेमुः । भाने मारयोंगे आगे का प पृषीपर ग्रेट गयीं और हाप जोरफर उन्होंने समस्त प्रागिर्यो एकमात्र म्वामी साम्पाकताअलिपुगः शमलस भर्त भगवान् श्रीकृष्ण प्रणाम किन । भगवान् श्रीक्षण पिप्समा रणद शरणं प्रपमा ॥३२॥ शरणागत पसर मानकर अपने वराभी पतियो मुहाने भीमसे उन्होंने उनकी शरण प्रहण दी।॥ २२ ॥ मागपत्म्य अः भागपस्नियोन सदा-प्रभा ! नापस यह बाजार न्याप्पा रिदमा उछितिपऽमि ही दुयो र दनके पिये है। इसरिये इस म्तमारतार परनिग्रहाय । आगाना सर्वग उचित | भाग सिमें पिच महीन नमायातिलिim - 1-- Sir . " - PO/ arti mees भगवान् धीरप परोपर जो गूनकी पाती थीं। उनसे मालूम होता, मानो रचफुसुमासे उनकी पूजा की जा रही हो। [१३ १४२

२२८
श्रीमद्भावित
[अ०१५
भूतावासाय मताप पराय परमात्मने ॥३९॥ | करणों में विराजमान होने पर भी अनन्त हैं । भाप समत
प्राणियों और पदाकि चाय सया सब पापकि सपने
भी विपमान है। आप प्रतिसे परे स्मं समान
बानविधाननिधये प्रधणेऽनन्तश्शक्तये।
हैं ॥ ३० ॥ आप सब प्रकारक पान और अनुमः
स्मानाने हैं। अापकी महिमा और शकि अनन्त है।
आपका स्वरूप अप्राक्त-दिव्य चिन्मय है, प्राकृतिक
अगुगापासिकाराप नमस्तऽप्राइसाय च ॥४०॥ गुणों एम विकारोंका थाप कभी स्पर्श ही नहीं करते ।
आप ही नाम है, हम आपको नमस्कार कर रही हैं ॥१०॥
पाप प्रकसिमें क्षोम उत्पन करनेवाले काल हैं, कातिके
कालाप कालनामाप कासावयवसाक्षिणे ।
आप हैं। और कालके क्षण-पम्प आदि समस्त क्पको
साक्षी हैं। आप विश्वरूप होते हुए भी उससे अमा
रहकर उसके प्रय है। भाप उसके बनानेवाले निमित
विश्वाय तदुपद्रष्ट्र वकः विपदसवे ॥४१॥ कारण तो है ही, उसके रूपमें धननेवाले उपादासकारण
मी ॥ ११ ॥ प्रभो ! पचभूत, उनकी तन्मात्राएँ,
इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि और इन सबका बनाना
भूतमात्रेन्द्रियप्राणमनोमुद्धघाशयात्मने
चिर—ये सब बाप ही हैं। तीनों गुण और उनके
कामि झनेपाले वमिमानके द्वारा मापने अपने साक्षात्कार
को डिपा रस है ॥ १२ ॥ माप देश, काल और
त्रिगुणनाभिमानेन गूढम्बात्मानुभूसपे ॥४२॥
वस्तुओंधी सीमासे बार-
-अनन्त है । सम्मसे में
सूक्ष्म और कार्य-कारों के समस्त विकारोमि भी एकरस,
विकाररहित और सर्वश हैं । ईश्वर है कि नहीं है, सर्व
नमोऽनन्ताय हमाम फूटसाम पिपभिसे ।
है कि बस्न इत्यादि भनेक मतभेदोंक अनुसार कार
उन-उन मतपदियोंको न्हा उन्हीं में दर्शन देते
हैं। समस्त शम्दकि मक रूपमें सो भाप में ही
नानावादानुरोधाय पायवाचकमकये ॥४३॥ | शोक रूपमें भी हैं तथा उन दोनोंका समन्ध मोगने
मात्री शक्ति मी भाप ही हैं। हम आपको नमस्कार
मरती हैं ॥ १४॥ प्रत्यक्ष अनुमान गरिमितने मी
नम प्रमाणमूलाय काये पासपोनये ।
प्रमाण है, उनको प्रमाणित करनेवाले मूल बाप ही है।
समस्त शास वापसे ही निकले हैं और पापकान
स्वत सिर।बाप ही मनको लानेकी विक रूपमें
प्राचाय निाचाय निगमाय नमो नमः ॥४४॥ और उसको सब कहीसे हटा मेनेशी बजाके सपने
| प्रवृत्तिमर्ग भौर निवृत्तिमाम दोनोंके मूल दे
भी स्वयं भाप ही है। हम आपको बार-बार नमस्कार
नमः कप्णाय रामाम बसुदेवसुवाय च।
करती हैं॥ ११ ॥ श्राप शुक्सत्तमप वसुदेरके पुत्र
बासुदेव, सार्पण एवं प्रपुम्न धौर बनिम्म भी हैं। इस
प्रकार चतुर्ग्रहके रूपमें पाप मलों तथा सपोंके तामी
प्रो am | | 1 धीकरण | हम पापको नमस्कार करती हैं ॥१५॥

म०१६] दशम स्कन्ध २३९ नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मन्छादनाय । आप अन्त करण और उसकी पत्तियोंके प्रकाशक हैं, भौर उन्हीके द्वारा भपने आपको हक रखते हैं। उन वन्स करण और वृमियोंके द्वारा ही मापके स्वम्पका कुछ गुणायुपलक्ष्याय गुगइट्रे स्वमविदे ॥४६॥ कुछ संकेत भी मिलता है । माप उन गुणों और उनकी वृत्तियोंके साझी तपा स्वयप्रकाश है। हम आपको ममस्कार करती हैं ॥ १६ ॥ आप मूलपातिमें नित्य बच्यारुतविहाराम सर्वम्याफवसिबमे। विहार करते रहते हैं। समस्त स्थय और सूक्ष्म नगस्की मिति वापसे ही होती है। लीकेश भाप मननशील आत्माराम है। मौन ही मापका स्वभाव है । बाफ्को हमारा सोफेश नमस्तेऽस्तु मनपे मौनमीलिने ॥४७॥ नमस्कार है ॥ १७ ॥ भाप स्पूट, सूक्म समस्त गनियों के जाननेवाले तपा सबके साक्षी हैं। आप नामसपात्मक विषप्रपत्रके निषधकी अवधि तथा उसके भविष्मान परावरगतिकाय समिधाम से नमः । होनेके कारण विसरूप भी हैं। भाप विमके अभ्यास तपा अपवादके साधी हैं व भज्ञानके द्वारा उसकी सत्पतम्रान्ति पर्व स्वरूपहानके शग उसकी आत्यन्तिक मनियाप प विधाय तद्रष्टेऽस्पच हेतषे ॥४८॥ निभूतिके भी कारण हैं । पापको हमारा नमस्कार है ॥ १८॥ स्व पस्म मन्मस्सितिसपमान् प्रमो प्रो ! यपपि पफ्नि न होने कारण आप कोई गुपैरनीहोऽतकालशक्तिपः । भी कम नहीं करते, निष्क्रिय है-नपानि अनादि कम्पशक्तिको स्वीकार करके प्रा कि गुणों के द्वारा आप वचत्स्यमावान् प्रतिपोधमन सता इस विपकी उत्पति, स्पिति और प्रत्यकी लीन फरते है। क्योंकि भापकी स्याएँ बमोध है। कार सस्प समीधयामोपविहार से ॥४९॥ साहस । इसपिये जीवोंके संस्कारमपसे छिपे एप छस्पैष ऽस्तनपशिसोक्यो स्वमायोंको अपनी दृष्टिसे मामत् कर देते हैं ॥ १० ॥ प्रिोकीमें तीन प्रकारी योनियाँ -सत्वगुणप्रभान शान्ता मशान्ता उत मृडयोनयः । शान्त, रजोगुणप्रधान भशान्त और समागुणप्रधान मूह । बे सम्-की-सा वापकी की समर्तियाँ हैं। फिर भी हम शान्ताः प्रियास्ते पघुनावितुं सता सभप बापको सपगुगप्रवान शान्तजन ही विशेष प्रिय हैं। योपि वापा या वस्तार और ये पीलाएँ साधुगों- धर्मपरोप्सोमा ॥५॥ की रक्षा तया धमकी रक्षा एवं बिस्तारक रिये ही अपराधा सफभर्ना सोढम्पः स्वप्रमाकतः । है ॥ ५० ॥ शास्तारमन् ! स्वामीको एक बार अपनी प्रभाका मार सम सेना चाहिय । यह मूठ है, आपका धन्नुमईसिमान्तास्मन् म्हस्य स्वामजानत ॥५१॥ पचानता मही है, इसलिये इसे क्षमा कर दीचिये ॥५१॥ मगान् ! 8 कीजिये अब यह सर्प मरनेहीबाग है। मनुगृहीप्य भगयन् प्राणास्यजति पभगः। साघु पुरुष सामे ही हम अपग्रओम ग्या करते आये । स्यातुप वे

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म. १६] दशम स्थ २३७ ता प रिपोः सुनानामपि तुस्परप्टे और पुत्रका कोई भेदमा नहीं है । इसरि आप जो किसीको दण्ड देते हैं, वह उसके पापोका प्रायभित र्घत्से दम फलमेवानुशमन् ॥३३॥ कराने और उसका परम कल्याण करने रिपे ही ॥३३॥ आपने हम गोंपर यह बड़ा ही अनुग्रह किया । यह अनुप्रदाय भवता कता हि नो तो भापका फया प्रसाद ही है । क्योंकि आप जो दुर्योको दगाऽसतां । स्मलु फरमपापहः । दण देते हैं, उससे उनके सारे पाप नए हो जाते हैं। इस सपने अपराधी हानेमें तो काइ सम्देह ही नहीं है। पद् दन्दशकम्यममुप्य देहिन या यह मपराधी न होता, सो इसे सर्पकी यानि ही फ्राधाऽपि तेऽनुप्रा एव सम्मवः ॥३४॥ क्यों मिस्सी । इसध्येि हम सम्चे एपसे आपके इस कोक्को भी आपका अनुग्रह ही समझती है ॥ ३४॥ मुतप्त किमनेन पूर्व अवश्य ही पूर्वजन्ममें इसने स्वयं मानरहित होकर और निरस्त मानेन मानदेम । | दूसरोंका सम्मान करते हुए कोई यहन वही सपस्य की धर्मोऽभ पा मर्पजनानुफम्पया है । अपया सब जीवोंपर दया करते हुए इसने कोई बहुम बहा धर्म किया है। तभी तो धार इसके ऊपर पता भषांम्प्यति सर्वीपः ॥३५॥ सन्तुष्ट हुए हैं। स्पोंकि सर्व-नीवस्वम्प आपकी प्रसनताका यही उपाय है ।। ३५॥ भगवन् ! हम नहीं समान पाती कसानुमायोऽस्स न देव विमरे कि या इसकी शिम साधनाका फार है, जा यह आपके सगहिरणस्पर्णाधिकार चरणकम मेंकी घटमा स्पर्श पानेका अधिकारी हुआ है। आपके चरणोंकी रन इतनी दुर्टम है कि उसके लिये पाच्या पोर्टलनाऽऽपासपो आपली माहिनी लामीजीको भी बहुत Pों तक समस्त मागोंश स्पाग फरक निपमाया पान करते हुए विहाय कामान् सुधिर धृतमता ॥३६॥ सपस्या करनी पड़ी थी ।। ३६ ॥ प्रभो । जा आपके न नाकाष्ठं न च मार्वभौम चरणों की धूपिणी शरण लस्त हैं, व मकान स्वर्ग राम्प या पृथ्वी की पाट गाही नहीं चाहते । न प रसातर न पारमेष्ठप न रमाधिपरयम् । काही राय चाहते और न तो प्रभा पर ही सेना न यागमिदीर पुनर्मय चाहते हैं। उन्हें अगिम्पर याग-सिदियोंकी भी पाइ वा नहीं होती। होता कि व नम-मृत्युमे हानेगरे वाम्छन्ति यस्पादरज प्रपन्ना ॥३०॥ वैवस्य-मोक्षकी भी इष्य नहीं करते ॥ ३० ॥ स्यामी ! यह नागर समागुगी योनिमें यमन हुआ है और दुरापमन्यै अयन क्राधी है। स्त्रि भी हमे आपरी पद परम पवित्र नमोजनिः कोषाऽप्पहीशः। परणाम प्राप्त , मा मगेंक सिप शरीरिणो मणा जिसम प्राप्त करने मम्मे ही संगारपमें पर हुए जीपको ममाय मर-मापतिमी पत्रही पदिसतः स्सार विभरः ममक्षः ||३८|| , स्पा- मोभी मी प्रति हो नी है ॥३८॥ प्रभा ! म अपर प्रपर कामी । म अनल संभपिन्स ऐभयो Aपरि । असगमन नापाप मुंमार प्रमा नमस्तुभ्यं भगरते पुरमाय महात्मने ।

२१८ भीमद्भागवत [अ०१५ । मुवावासाय भूताय पराप परमारमने ॥३९|| | करणों में विराममन होनेपर मी अनन्त हैं । भाप समस्त | प्राणियों मोर पदाकि ध्यानय तपा स्व पदापकि रूपमें | मी विद्यमान हैं। पाप प्रकृतिसे परे स्म्प परमाम ज्ञानविज्ञाननिधये ग्रामणेऽनन्तशकये। हैं ॥ ३० ॥ आप सब प्रकारके हान और अनुम्योंकि सम्बाने हैं। मापकी महिम और शक्ति अनन्त है। आपका स्वरूप भप्राकृत-दिन्य चिम्मन्य है, प्राकृतिक अगुणापासिकाराप नमस्तेऽप्रारुताप च ॥४०॥ गुणों एव विकारोंका आप कमी स्पर्श ही नहीं करते । आप ही नाम है, हम आपको नमस्कार कर रही हैं ॥१०॥ माप प्रकृति क्षोम उत्पन्न करनेवाले का है, कासशक्तिके कालाप फालनाभाय काठावयवसाक्षिणे । मात्रय है।और फालके क्षण माप भारि समस्त मापक | साक्षी हैं । बाप विवलप होते हुए भी उससे झग रहकर उसके दध । माप उसके बनानेवाले हमिक- विश्वाप तदुपद्रष्ट्र सरकः विपतिषे ॥४१॥ कारण तो है ही, उसके रूपमें बननेवाले उपादानकारण भी है ॥ ११ ॥ प्रभो ! पचभूत, ठमकी तमात्राएँ, इत्रियों, प्राण, मन, मुद्धि और इम स्पा सचाना भूतमात्रेन्द्रिमाणमनामुयायपारमने चित्त-ये सब वाप ही है। तीनों गुण और उनके कामि हानेवासे कमिमानके द्वारा मापने अपने साक्षात्कार को छिपा रस्य ॥ १२ ॥ आप देश, काल और त्रिगुपनाभिमानेन गूढस्वात्मानुभूतये ॥४२॥ वस्तुओंकी सीमासे भाइर—मनग्स हैं । सूरमसे मी सूक्ष्म और कार्य-कारों के समस्त विकारों में भी एकास, विकाररहित और सर्वक है। ईस है कि मही है, सा नमोऽनन्ताय पक्ष्माय फूटसाप विपमिसे । है कि भन्या इत्यादि वनेक मतभेदोंक अनुसार बाप उन-उन मतवादियोंको नहीं उनी सोम दर्शन देते हैं। समस्त शब्दोंक भपके सपमें तो पाप है ही, नानावादानुरोपाय वाम्मवाचकाये ॥४३॥ | शके रूपमें मी र सपा उन दोनों का सम्मान बोपने- माम शकि मी मापही है। हम भापको नमस्कार करती है ॥ १३ ॥ प्रत्यक्ष अनुमान वादि मितने मी नमः प्रमाणमूलाम रूपये मानयोनये। प्रमण हैं, उनको प्रमाणित करनेवाले मूळ आप ही है। समस्त शाम वाफ्से ही निकले हैं और बापका काम स्वत सिद है। भाप दी मनको लानेकी विधिफे रूपमें प्राप्ताय निवृचाप निगमाय नमो नमः ॥४४॥ और उसका सब कहींसे हटा मेनेकी माड़ाके रूपमें प्रवृत्तिमर्ग और निविमर्ग है। इन दोनेक मूल वेद भी स्पर्प माप ही हैं। हम भापको बार-बार ममस्कार नमः रुप्माय रामाम बसुदेपसुताय च । करती हैं॥ ११॥ बाप शुद्धसत्वम्य मसुदेवके पुत्र पासुदेव, सापण एवं प्रधुम्न और बनिस्ट भी प्रपार चतुके रूपमें भाप मझो तपा पारयों स्वामी प्रपुम्नापानिरुदाम सात्वा पतये नम । ४५॥ है। भीरम ! हम बापको नमस्कार करती है ॥१५॥ - म० १६] दशम स्कन्ध २३९ नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मच्छादनाय च । आप अन्त करण और उसकी वृत्तियोंय प्रकाशक है, और उन्हीं के द्वारा अपने-आप तक रखते हैं। उन अन्त करण वोर शत्तियों के द्वारा ही आपके स्वम्पका कुर गुणात्युपलक्ष्याय गुणद्रष्ट्र स्वमविदे ॥४६॥ कुछ संकेत भी मिटता है । आप उन गुणों और उनकी पूचियोंके साक्षी तया स्वप्रकाश है । हम आपको ममस्कार करती है॥ १६ ॥ आप मप्रकृतिम निस्य अम्पास्तविहाराय सर्वष्याफवसिदये। विहार करते रहते हैं। समस्त स्यूल और मम जगत्की मिद्धि मापसे ही होती है। जीवेश नाप मननशीठ भरमाराम है। मौन ही भापका स्वभाव है। आपको हमारा एपीकेस नमस्तेऽस्तु मनये मौनशीलिने ॥४७॥ नमस्कार है ॥ १७ ॥ आप स्य, सूक्ष्म समस्त गतियों जाननेवाले तया सक्क साझी हैं। आप नामापास्मक विषप्रपरके निपधी अवधि तया उसके अभिप्रान परामरगतिबाय समिक्षाय ते नमः । हानेके कारण विश्वम्प भी हैं । आप विभक अध्याम तथा अपवादये सभी हवं महान दारा उसकी सत्यवभान्ति एव सरपझानक दाग उसकी सास्यन्तिक भविधाप च निधाय तद्रष्ट्रेऽस्य च हेतये ॥४८॥ निवृत्तिके भी धारण हैं । आपका इमाग नमस्कार है।॥ १८॥ समस्प म मस्पितिसपमान् प्रमो प्रभो ! पपरि पिन न हानेने पारण आप फोन गुणरनीदोऽवकालपक्तिपुष । भी कम महीं करते, निस्क्रिय हूँ-नयापि अनार पापालिका सीकर परक प्रर के गुणोंके ग भार तपत्स्यभावान् प्रतिबोधयन् सता इस विपकी उत्पति, स्थिति और प्रउपसरी लीन पग्ने है। क्योंकि भारी मंगः अम्प है। आप मग्य ममीपपामोघ विहार ईहसे ॥४९॥ सान्य है।सरि जीयाक मंकारगरपसे रिपेण समाबोको अपनी दरिमे जामत पर से ॥१०॥ तस्पर तऽमस्वनाखिला विगमें तीन प्रकारकी यानियो --मस्त्यगुणप्रथम शासा प्रशान्ता उस मूडयोनय । शास्त, रजोगुणप्रधाम अशान और समागुगप्रयन मन । वेमा की-मय अपी प्रतियाँ है। रि मीग गान्ता प्रियास्त पनावितु मां ममय थाररस सपगुग्प्रधान पालनन सिप जिप पॉरि आप पता और पर्णय माधुनना स्यातुप ते धर्मपरीप्मयेहता ॥५॥ को मा नया धमी भा में विमान मे ।। है।॥ ५० ॥ माग्मन् । म्यमीरा र मा भनी मपरापा मालभ सारम्पः सप्रमात प्रजारा जगध मरम्मा पाप । परम, असा धन्तुमामिगान्तामन मूडम्प स्वाममानव ॥५१॥ पइमानना नहीं है इसरियामेमा पर विष ॥ १॥ मास्न 'कात्रिय अपप गर भनेर । मनुगृहीप्य भगवन प्राणाम्गनति पमग । मात्र पुरस मामे ही हम भार "प पग्न अरे २४० भीमागवत [अ०१६ " सीमाना साघुशोमानापतिः प्राण प्रदीयताम् । [ हैं । अन बाप हमें हमारे प्राणस्वरूप पनिवेगको दे दीक्यि ॥ ५२ ।। हम बाकी दासी है। हमें वाप रिघहि ते किरीणामनुहम दवाइया । नाशा दीबिपे, आफ्पी क्या सेवा करें पोंकि ये प्रदाय साय आपकी बाधाओं का पालन-~-- -आपकी सेने मन्वयानुतिष्ठन वै मुमसे सस्वामयात् ॥५३॥ करता है, यह सब प्रकारके भयोंसे छुटकारा प का है॥ ५३॥ मासुक उमाच भीशुकदेवजी कहते हैं परीक्षित् ! भगान्के घरणोंकी ठोकरोंसे पाभ्यि नागके फण किन-मिल हो इत्य स नागपनीमिर्मगवान् समभिटुतः । गये थे । मा मेसुध हो या य । जा नागपनियोंने पित भमचिरस विससर्वाधिनैः ॥५४॥ इस प्रकार मगवान्की स्तुति की, सब म्होंने दप करके उसे छाया ॥ ५५ ॥ धीरे-धीर काठिय मागको प्रविलम्पेन्द्रियप्राणः कालिया नफहरिम् । इन्द्रियों और प्राणोंमें कुछ-कुछ घेसना मा गयो । बगी कठिनतासे पास लेने लगा और योगी देरके र मी दीनतासे हाथ नोडकर भावान् भीकृष्णसे इस कन्छ व साम्यसन्दीन कृपणं प्राह रुताप्रति:५५ प्रकार मोला--॥ ५५ ॥ नाय । हम ज-मसे ही दुर पसला सहोस्पापा नाममा दीर्घसम्पपः । तमागुणी और मत रनोंक पाट मी पदमा सेनेपा- महे श्रेषी जीव है। मीयोंके मिये अपना स्थमाव छोड़ स्वभावोद्स्स्पोनाथ लोकानां यदस प्राः ॥५६॥ देना बहुत कठिन है । इसीके कारण संसारके बेग माना प्रकारक दुरापोंमें फंस जाते हैं ॥५६॥ विश्वविधाता ! स्वपा समिई विमं भातुर्गुणविसर्जनम् । जापने ही गुणों के मेट से इस जगत्में नाना प्रकार के स्वाय, पीय, का, योनि, पीम, पित्त और आकृतियोंका नानासमभाववीयोबोपोनिमीमाक्षशकसि ॥५०॥ निर्माण किया है।।७।।भगमन् ! आपकी ही सक्षम हम सर्प मी है। हम नमसे ही बडे कोधी होते हैं। हम पर्य पवन भगवन् सपा बास्युरुमन्यष । इस मापाके पारमें स्वयं मोहित हो रहे है। फिर कपत्पनामस्व मावादुम्त्य प्रमोदिवा स्वयम् ५८ अपने प्रयासे इस दुस्स्पन मायाका त्याग कैसे करें ॥५८॥ आप सी और सम्पूर्ण मगरके स्वामी है। वापही भपान हि कारणं सब सो जगदीपर। हमार समाव और इस मायाके कारण है। का अनुप्रई निग्रह पा मन्यसे तब विपेहि नः॥५९॥ बाप अपनी असे-जैसा ठीक समोकपा कीजिये या दप दीजिये ।। ५९ ॥ पीमुक उपाय भीशुकदासी करते-काठिय मागकी पास इस्पात मचा मा भगवान् कार्यमानुष । सुनकर पत्र मनुष्य भगवान् श्रीक्षणमे कहा-'सर्प ! मब वे यहाँ नहीं रहना चाहिये। अपने पाति- नात्र स्पेय स्वया सर्प सप पाहि माचिरम् । माई, पुत्र और मियोंक साथ शीच ही यासि समुवमें १ बारम्पलिस्थाप। । ।

अ०१७] दशम स्कन्ध २४१ स्वमात्मपरपदारात्यो गोनभिर्मुज्यता नदी ॥६॥ | चला मा । षब गौएँ नौर मनुष्य यमुना प्रसका उपभोग फरें ॥ ६० ॥ जो मनुष्य दानों समय तुमको दी य एतत् सम्मर मर्त्यन्तुम्य मदनुशामनम् । मेरो इस बाधाका स्मरण तया कीतन करे, उसे सागसे कीर्वयन्नुमया सन्म्योर्न युप्मद्भयमाप्नुयात्।।६१॥ कमी भय न हा ॥ ६ ॥ मैन इस कास्टिय हमें कोडा की है। इसलिय नो पुरुप इसमें स्नान करके नगसे योऽम्मिन रसास्वा मदाफोडे देवादीस्तर्पयेजलः । देवता और पितरोंका नपण फरेगा, एवं उपनाम करक उपोप्य मा सरमर्चेत् सर्वपापः प्रमुच्यत ॥६२॥ मेरा स्मरण करता हुआ मेरी पूजा करेगा-म सब पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥ ६२ ॥ मैं मानता है कि स् दीपं रममक हित्वा इदमेसमुपाथित । गहरके मयसे रमणक द्वीप मेदफर इस दहमें आ ससा ययात्स सुपणस्त्वां नाधान्मत्पादलाञ्छितम्।६३पा । वय नेरा शरीर मरे चरणचिहोंमे बस्ति हो गया है । इसलिय ना, अब गहा तुम सायेंगे नहीं ॥६॥ श्रीभुक उपाय भी कवयमी कहत-भगवन् श्रीकृष्णकी एक एफ लीला अद्भुत है । उनको ऐसी भाझा पाकर ऐचमुक्तो भगवा कप्णेनानुसफर्मणा । काठिय नाग बोर उसकी पतियोंने बानम्दसे भाकर त पूजयामास मुदा नागपस्न्यम सादरम् ॥६४||बह नागरसे उनकी पूजा का ॥ ६४ ॥ नोंने रिम्प दिप्याम्बरस्राणिभिः परारपि मपणः । पस, पुषमाग, मणि, परम्म्य भाषण, प्य गन्ध, पदन और अति उत्तम कम की मालासे नगर क दिन्पगन्धानुलेपैष महत्योस्पलमारया ॥६५॥ स्वामी गापा मगवान् श्रीकृष्णका पूमम फरक उन्हें पूजपिस्वा जगनाथ प्रसाद गध्वजम् । प्रसम किया। इसके बाद यह प्रम वीर मानन्दसे उनकी परिक्रमा का, बन्दना की और उनसे अनुमति वता प्रीतोऽम्यनुनावः परिक्रम्पाभिवन्ध तम्।।६६।। तब अमी पनियों, पुत्रों भार बधु-बधों सकलसमुहत्पुत्रो द्वीपमन्धर्जगाम ।। साय रमाय दीपकी, ना ममुरमें सकि रहना एक स्पान है, पात्रा की । छीला मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी वदेव मामृवजला यमुना नियिंपाभवत् । पपासे यमुनानीका मल के चिहान ही मही, बलि अनुग्रहात् भगवत क्रीडामानुपरपिण ॥६७॥ उसी समय अमृतक समान मधुर हो गया ॥६५-६७॥ इति आमदागबत महापुराणे पारमइस्पा सहिनायो नमस्कम्प पूर्षि कारियमोक्षग माम पोशाऽप्पाप ॥१६॥ राजापाप अघ सप्तदशोऽध्याय परिपकालिया भानी कथा तथा भगवानका प्रसपासिपॉरायाममम पपामा रामा परीक्षितन पूजा-भगान् । कारिपनापन मागी निवासस्थान रमाकनीस, दो बोरा ! नागालयं रमगर्य यमापत्यास फालिय । र उम बासन ही रामौका परन-मा अपराध सपा गुपणम्प तेनफनामममम् ।।१।। लिप गा ! ॥ १ ॥ १URI मनपा दसा । रियाय । ३ मुमा ममा गान् नै । म म २१- श्रीमद्भागवत [अ०१७ श्रीक उपाय भीगुफदेयसीने फहा-परीक्षित् ! पूर्वकारमें गरामीको उपहार सहप प्राप्त होनेवाले सपोन या नियम उपहाय सर्पजनर्मासि मासीह यो पलि । कर मिया था कि प्रत्येक मासमें निधि वृक्ष के नीचे वानस्पस्या महामाहो नागाना प्राछ निरूपित ॥२॥ गरुको एक मपत्री मेंट दी बाय ॥ २ ॥ इस नियम के अनुसार प्रत्येस ममावस्याको सारे सर्प अपनी म्बस्व भाग प्रपन्छन्ति नागा पर्वणि पर्वणि । रक्षाके लिये महारमा गसजीको अपना-वपमा मग गोपीयायात्मन मर्ये सुपर्याय महात्मने ।। ३ ॥ देवे रहते थे ॥ ३ ॥ उन सपर्मि करका पुत्र काम्पि माग अपने विप भौर परक घमदसे मतवाला विषवीर्यमदाविष्टः कालवेयस्तु कालियः । हो रहा था । उसने गरका तिरस्कार करके सम फदीकस्य गरुठं म्वय त पुमजे पलिम् ॥ ४॥ देते, ससे मी खा लेता ॥ ४ ॥ परीक्षित ! यह तो बलि देना दूर रहा-दूसरे साँप जो गरुडको गति सन्मुसाइपिता राजन् भगवान् भगवत्प्रिय । मनकर भगवान्के प्यारे पार्षद शक्तिशाली गरुको महा क्रोध वाया । इसलिये उन्होंन काठिय नागको म्पर विजिघांसुहाग कालिय समुपाद्रवत् ॥ ५॥ राख्नेके विचारसे पर वेगमे उसपर माफमण किया ॥५॥ विषधर कापिय नागने नम देखा कि गम्म समापतन्तं तरसा विपायुधः बा वेगसे मुमपर भाक्रमण करने वा रहेत. वपने एक सौ एक फण फैमाकर रसनेक पिये उनपर प्रत्यम्पपादुन्तिनकमस्तकः । टूट पका । उसके पास शव ये केवल दौत, इसलिये उसने दातोसे गरको रस हिया । उस समय का दभिः सुपर्ण व्यवश ददायुध अपनी मयाबनी नीम म्पपा रहा पा, उसकी साँस करालबिहासितोप्रलोचनः ॥६॥ लगी बन्न यी पी वोर बाँखें बदी रापनी मान परसीबी ॥ 6 ॥ सार्श्वनन्दन गरमी विष्णुमगवान् के त साह्मपुत्र स निरस्म मन्युमान मारन है और उनका वेग तथा पराक्रम मी अनुमनीय है। कालिप नागकी यह निठाई देखकर उनका कोभ प्रचप्पषेगा मधुरदनासन । और भी बढ़ गया तपा मनोंने उसे अपने शरीरसे सटककर फेंक दिया एवं अपने मुनहले बायें पंससे पक्षेण सव्येन हिरण्यरोचिपा काहिप मागार पर गोरसे प्रहार किया ॥ ७॥ उनके पसकी चोट से काग्न्यि नाग साफ हो गया । यह जपान कसुतमविक्रमः ॥ ७॥ धमाकर होसे मगा और यमुमाबीके इस पुममें सुपर्णपक्षामिता कालियोऽतीष विठ्ठलः । बना थापा । यमुनानीका यह पुल गरके रिये नाम्य पा । साप को यह इतमा गहरा पा कि उसमें ई विषेश कालिन्यास्तदगम्य दुरासदम् ॥ ८॥ दूसरे लोग भी नहीं जा सकसे घे ॥ ८ ॥ इसी १पारायणिपाय। • गरमपा इस प्रकार है-गगारीश्री माता किमया मौर पौध माय में परस्पर और था। मातम और मारपर गामी से सर्प मिम्ता उम्ी मे पा रहे । इसे पास रोपर स्प मर्प पानी मपमें गपे । सम प्रमाने पर मियम कर दिया कि प्रदेशभमाषामागे प्रत्येक सपरिवार पारीबारीसे गायीने एक सीबहियारे।

अ० १७] दमम स्कन्ध २४३ तकदा जलचर गरुहो भस्यमीप्सितम् । म्यानपर एक दिन सुधातुर गहाने तपस्वी सौरिक मना करनेपर मी अपने अमीट मश्य मस्यको बरपूर्वक निवारितः माभरिणा प्रमश क्षुषिताऽदरत् ॥ ॥ पकर म्ा लिया ॥ ९॥ अपन मुनिया मत्स्यरामक मारे जानेके कारण मालियोंको वा कार वा। मीनान् सुद् खितान दृष्ट्वा दीनान मानपतौहते। भयन्त दीन दौर म्याकुर हो गयी । उनकी यह दशा देखकर महर्षि सौमरिको कमी दया भायी। उसने कृपया सांभरि प्राह तप्रत्यक्षममाघरन ॥१०॥ उस फुश्ममें रहनेवाले सय जीमोंकी भलाई के लिये पाएको यह शाप दरिया ॥ १० ॥ यदि गरूक मित्र अत्र प्रविश्य गस्टो यदि मत्स्थान मम्वादति । कभी इस कुण्डमें घुमकर मछपियों को बायेंगे, तो उसी क्षण प्राणोसे घो बैठेंगे । मैं यह सस्य-साप कहता सपा प्राणवियुज्येत सत्यमसद् प्रवीम्यहम् ॥१९॥ ॥ ११ ॥ परीक्षित ! महर्षि सामरिक इस पदी पात काम्पि मागके सिवा और कार साप नही जानता सकालिया पर वेद नात्य पपन लेलिहः । पा । इसलिये बह गारफे भपसे यहाँ रहने टगा पा और मन भगवान् श्रीकृष्णन उसे निर्मप करके पहासे अवात्सी गरुडा भीत कृष्णन च विवासित ।१२। रमणक दीपमें मेन दिया ॥ १२ ॥ कृष्ण दाद विनिष्क्रान्त दिम्पनग्गन्धवाससम् । परीक्षित् ! इधर भगवान् धोरण दिम्म माला, गन्ध, पब, महामन्य मणि और एणमय बाभूपोंसे महामणिगणाझीण आम्यूनतपरिष्कतम् ॥१३॥ विभूषित हो उस पुण्डसे बाहर निकाल ॥ १३ ॥ उसको देखकर सब-के-सब इनवासी इस प्रकार एट उपलम्पात्थिता मर्वे लब्धप्राणा पासवः । सहाए, जैसे प्राणोंको पार इन्द्रियाँ सचेत हो जाती प्रमादनिता मानो गोपा प्रीत्याभिरभिर ॥१४॥ है। सभी गापोंका सय वानन्दसे भर गया। प्रम और प्रमुमतासे पान क्रयाको ल्यसे गान मगे ॥ १५ ॥ परीक्षित ! योगरानी, रोहिणीनी, योगगदिणी नन्गाप्या गापाप कौरय । मग्दपावा, गोपी और गार-ममी श्रीकृष्णा पाया सचेत हा गय। उनका मनारप सम्म हा गया गणं ममय लघहा आमहन्थमनाग्या ॥१५॥ ॥ १५॥ रामनी तो भगवान्य प्रमाप बरामते ही ये श्रीकृष्णप! एपसे गाकर सने ग| गमवायनमालिहर जहासापानुभावचित् । पति, ध, गार, 43-मब-य-सब बम" मन नगा गाया पपा यत्मा गभिर पग्मा मुदम् ।।१६।। हो गप ॥ १६ ॥ गायोग पु-गुरु मोन करनी पति साप मम्सबाद वापर पदा- नन पिप्रा ममागत्य गुरस मस्तप्रका । नाभी दारे बगा पाप मान पर उगुम्न कालिपप्रम्ना दिण्या मुनम्नवा मज ॥१७॥ गिा ! साएर आ गया पर बदमोमाग्यो बनायोमा मदुक मुपमे मीन हि दान दिजातीनां हानिमुनिहाय । जागो तुम न कानात 41 . NI TIप।

२४४ श्रीमद्भागवत । नन्दा प्रीसमना राबन गा सुवर्ण सदादिशत् ॥१८॥ ग्रामों की बात सुनकर नम्दयावाको बलीप्रसमता हुई। उन्होंने बहुत सा सोमा धौर गौर बामणोंको दाम दी यहादापि महामागा नष्टलन्धप्रजा सती । ॥१८॥ परमसीमाम्यवती देवी यशोदाने भी काम्के गालसे बचे हुए अपन लाटको गदमें लेकर इदयसे चिपका लिया । उनकी बससे मामन्दके सबोंकी परिपज्याइमारोप्प ममोपाचफलां मुह ॥१॥ वूद वार वार टपकी परती थी ॥ १९ ॥ वोरात्रि सत्र गजेन्द्र सुचदम्पो श्रमकर्शिता । राजेन्द्र 'वनवासी और गौएँ मद गहत ही एक गये थे। उपरसे भूस-पास भी थ्ा रही पसलिये मपुर्वजोममो गाव फालिन्या उपलद ॥२०॥ स रात के प्रनमें नही गये, वहीं यमुनाबीके सम्पर सदा शुधिवनो तो दापामि सर्वतो प्रजम् । सो रहे ॥ २०॥ गर्मकि दिन , वरका मन सुस गया था। भाधी रातके समय उसमें बाग लग गयी । सुप्त निशीथ आइस्य प्रदग्घुसपचक्रमे ॥२१॥ उस भागने सोये हुए प्रशसियोंको चारों बोरसे मेर लिया भौर पर इन्हें नहाने हनी ॥ २१॥ बागकी नाँच लगने पर बमबासी मबदाकर वठ समाए वोर तत उत्थाय सम्प्रान्ता दपमाना प्रजोक्स । मीला-मनुष्य भगवान् श्रीकणकी शरणमें गये ॥ २२॥ रुण मस्ते शरणं मायामनुबमीवरम् ॥२२॥ नोंने कहा- प्यारे श्रीकृष्ण ! श्यामसुन्दर । महामाग्पवान् बलयम ! तुम दोर्मोका पर विक्रम बनन्स रुप्प फप्ण महाभाग हे रामामिवयिक्रम । है। देखो, देखो, मयाहर बाग तुम्हारे सगे सम्बन्धी हम नमनाको बगमा ही चाहती ॥२॥ एप पोरसमो पहिस्सापकान असते हि न ॥२३॥ तुममें सव सामर्थ्य है।हम तुमारे साद है, इसलिये इस प्रख्यकी अपार वागसे में बचानो। प्रमोहिम सुस्तरामास्वान पाहि कालामे सुहद प्रमो। मृम्युसे नही परते, परतु सम्बारे नफुतोमय चरणकमम नशानुमस्मधरण संत्यातुमहतोभयम् ॥२४॥ इनमें हम वसमर्थ हैं ॥ २४ ॥ मगवान् बनात है वे अनन्त शकियोंको धारण करते ,धम जारीपर इत्थं म्बनपेतम्यं निरीक्ष्य अगदीपरः। भगवान् श्रीकृष्णन जब देखा कि मेरे समन इस प्रकार म्याकुल हो रहे हैं, तब वे इस मखर बागको पी सममिमपिषचीनमनन्तोऽनन्तमति ॥ ५॥ गये । ॥ २५ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमस्या सहिताय परमरपाधि दापग्निमाचर्म माम समदशोऽध्याय ॥ १७ ॥ 'स्तारा । तरा।। पापीहा राणमिम। भनि पान ..-नाल र नेके लिये ही भारतीय भा है। ये बा पार र रना भी मेय संप है। २ रामार घरमें भारतीय मुरभित रमार भनिने मय टमारयामा उनको भाने मुनमें स्पाणि परमगलराज अ० १८] दशम स्कन्ध २४५ अथाष्टादशोऽध्याय प्रतम्बामुर यार मीशुक उपाच भीशुकदेवजी करते है-परीधित् ! अब मानन्दित सजन सम्बन्धियोंसे घिरे हुए एवं समके मुखसे अपनी अथ कृष्णः परिश्तो मातिभिमुदितात्मभिः । कनिका गान पुनते हुए श्रीकृष्णने गोकुटमरिस गोष्टमें प्रवेश किया ॥१॥ इस प्रकार अपनी योगमापसे बनुगीयमानो न्पविक्षद् प्रनं गोलमण्डितम् ॥१॥ का-सा वेप बनाकर राम और श्याम अनमें श्रीश कर रहे थे। उन दिनों प्रीम प्रतु पी। यह शरीर प्रजे विक्रीस्टोरेव गोपालच्छपमायया । पारियोंको पात प्रिय नहीं है ॥२॥ परम्त पन्दावनके ग्रीप्मो नामर्तुरभवन्नातिप्रेयाछरीरिणाम ॥२॥ | सामाविक गुणोंसे वहाँ बसन्तकी ही छटा छिटक रही पी। इसका कारण पा पम्दामनमें परम मधुर भगवान् श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण और बलरामजी निवास जो करते सच इन्दाषनगुपैर्षसन्त इव लधितः । ये ॥ ३॥ मागुरोको तीसी इंकार भरनोंके मधुर पत्रास्ते भगवान साक्षाद रामेण सह फेशवः॥३॥ | मर-मरमें किय गयी पी । ठम मरोंसे सदा सर्वदा बहुत ठंडी नलकी पुड़ियाँ ठहरा करती थी, जिनसे यत्र | वहकि वोकी हरियामी देखते ही बनती थी ॥१॥ निमरनिदिनिवयस्खनमिश्लिफम् । जिधर देखिये, हरीपरी बसे पृषी हरी हरी हो यी शवसच्छीकरीपममण्डलमण्डितम् है। नदी, सरोवर एवं भरनोंकी मरोंका स्पर्श करके ॥४॥ नो पायु पलती थी उसमें ममह पीले-मीले, धरतक सरित्साप्रसषणोर्मिवायुना लिये हुए, देरके सिले ए--कसार, उत्पम नादि कहारफलोत्पलरेणुहरिणा। बनेकों प्रकार के कमलाका पराग मिग मा होता था। इस शीतम, मन्द और सुगन्ध वायुके कारण पनवासियों न विद्यते पत्र पनौकमा दवा को गर्माका किसी प्रकारका देश नहीं सहना परता निदाघवाहभषोऽविझाउले॥५॥ पा । न दावाग्निका ताप रगता था भौर न तो सूयका माम ही ॥ ५॥ नदियों में अगाध नम भरा हुमाया। अगाधतोपहदिनीठटोमिमि बड़ी-सी छारें ठमके तोको धूम जाया करती थी। ये सनक पुहिनोंमे रक्यता और सरें सप्ठ बना तूबरपुरीप्या पुलिनः समन्ततः ।। माप्ती । ठनक कारण भास-पासकी मूमि नीती पनी खसी मौर सूर्यको अस्पात उम तया सीडी किरणें भी यहाँकी न पत्र पठागुमरा विपोल्पणा पृषी और हरी मरी घासको महा मुसा सफती सगो रस हादलितं च गृपसे ॥६॥ी, चारों बोर हरियाली Bा रही पी ॥ ६ ॥ पार्वन भरनम कप होता है। भगवान मुससे भमि प्रभा--मुताद् मनिरपत । इसलिये मावान्ने उसे मुसमें ही स्थापित किया । ४ मुसहारा मरिन पाच परत मा मात्र मष्ट किया । भव-रामाग्निको पाद परनेमें भगवान के मुत्तस्थानीय माझमी समर्थ है।

२४६
श्रीमद्भागवस
[२०१८
वर्न इममित श्रीमहाचित्रमृगदिनम् । उस वनमें वनोंकी पात-की पौत फलोंसे रद रही थी।
नहाँ देखिये, वहीसे सुन्दरता झटी परती पी। कहाँ रंग-
विरंगे पक्षी चहक रहे हैं, तो करी सरह-तरके हरिन
चौकसी मर रहे है । कहीं मोर कफ रहे हैं, तो कई
गायन्मयूम्रमरं कूवत्कोकिलसारसम् ॥ ७ ॥ मोरे गुबार कर रहे है । कहाँ कोयले कुश्क यी है,
तो कही सारस अलग ही धपमा अगप
क्रीरिप्पमागस्तत् कप्पो भगवान् पलसंयुतः।
॥ ७ ॥ ऐसा घम्दर वन देखकर श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण
पौर गौरसुन्दर वठरामनीने ठसमें विहार करनेकी इस
की। भागे-आगे गौएँ चहा, पीछे-पीस पारबाल और
घेणं पिरणयन् गोपेर्गोधने संक्तोऽविशत् ॥ ८॥ बीच में अपने दो भाईके साप माँसुरी बनाते हुए
श्रीकृष्ण । ॥ ८ ॥
प्रबालास्तवकस्रग्धातुकृतम्षणाः
यम, श्याम वौर ग्वाम्मामैंने नव पठनों, मोरपंसके
गुओं, सुन्दर-सुन्दर पुोंके हारों और गेह वारि
रंगीन घातमोंसे बपनेको मति भौतिसे समा लिया ।
रामकपणादयो गोपा ननृतुर्ययधुर्जगुः ॥ ९ ॥
| फिर कोई धामन्दमें मग्न होकर नाचने त्यगा, तो करें
ताल बैंककर फुस्ती करने मगा और किसी किसीने
राग मापमा शुरु कर दिया ॥९॥ जिस समप श्रीकृष्ण
कप्णस्य नृस्पतः केचिजगुः केषिदवादयन् । नाचम गते, उस समय कुछ म्बासवास गाने गते
और कुछ पौमुरी तपा सींग बसाने लगते । कुलापेमेसे
ही ताट देते, वो कुछ माह-वाह करने लगते ॥१०॥
मुपाणितलो मह प्रवर्भसुरथापरे ॥१०॥
परीक्षित ! उस समप नट जैसे अपने मायककी प्रशंसा
करते है, वैसे ही देवतालोग म्वासबाठोंका तप भारण
करके वो बाते और गोपमातिमें जम कर छिपेपर
गोपमातिप्रतिच्छमी देवा गापालरूपिण । | बस्टरराम और श्रीकृष्णकी स्तुति करने टगते ॥ ११ ॥
घुघराष्टी मलकोवाले श्याम वीर बारराम कमी एक
मरेका हाप पारकर कुहारक पाककी सर पर
इटिर कृष्णरामा च नटा इस नट नृप ॥११॥ काटत-पुमरी-परेता मेटते कभी एक-दूसरेसे अधिक
फौद नानेकी छिासे दत--पी सकते,
भ्रामरीकन क्षेपरास्फोटनविकर्पण ।
का हर गाकर दसे फेंकते, तो कभी ताम येक
टोकार रस्साकसी परसे-एक दस दूसरे दमके
विपीत रस्सी पकाकर सौषता और कभी कहाँ एक-
चिक्रीरतुर्नियुदन काकपक्षधरी कचित् ॥१०॥
दूसरेसे पुरती महते गाते । इस प्रकार तरह-तरह के
ग्वेर केरते ॥ १२ ॥ कही कही म दूसरे ग्यासबास
चिन्न्यत्सु धान्यपु गायकी वादकां म्वयम् | मापन सगते तो श्रीकृष्ण बौर बरामजी गाते या
मापुरी, सींग बापिमासे और महारान ! कमी-कभी ये
सतुर्महाराज माधु माचिति यादिनी ॥१॥ पाद-पाइए परफर समकी प्रशंसा भी करने गते ॥१३॥

अ० १८] दशम स्कन्ध २४७ - कचि मिन्वै फचित् कुम्मै कचामलकमुष्टिमिः । फमी एक-दूसरेपर बेन, नायफल या भोवलेके फळ हायमें लेकर फेंकते । कमी एक-दूसरेकी बॉस बंद करके छिप जाते और वह पीसे हाता- अस्पश्यनेत्रमधायः म. कचिन्मृगखगेहया ॥१४॥ इस प्रकार ऑसमिचौनी खेलते। कभी एक दूसरेको छनेके लिये मात दूर-दूरतक दौड़ते रहसे और कमी कपिल दर्दुरप्पावैर्विविधैरुपहासकैः पशु-पक्षियोंकी घेश्य बोका अनुकरण करते ॥ ११ ॥ कहीं मेटकोंकी तरह फुदक मुदककर पलते, तो कमी फदाधित्स्पन्दोलिफया कहिचिन्नृपचेष्टया ॥१५॥ रस्सियोंसे पोंपर मूडा गलकर मस्ते, तो कमी दो मुँह मना-मनाकर एक दूसरेकी रेसी उबासे । कहाँ माल्कोंको सहा कराकर उनकी बाहोके मलपर ही छटकने एव तो लोकसिद्धाभिः कीराभिधेरतुर्वने। उगते । कमी किसी रानाकी मात करने लगते ॥१५॥ इस प्रकार राम और श्याम दाम्मकी नदी, पर्वत, नषद्रिद्रोमिफुजेषु काननेषु सरस्सु च ॥१६॥ घाटी, कुम, क्न भौर सरोवरोंमें वे समी सेठ सेठे, नो साधारण पन्चे संसारमें खेला करते है ॥ १६ ॥ पभूधारयतो!पैस्तद्वने रामकृष्णयो । एक दिन जब परराम और श्रीकृष्ण म्बामबालोंक गोपरूपी प्रलम्पोऽगादसुरतमिहीर्पया ॥१७॥ साथ उस क्नमें गोएँ चरा रहे थे, तब ग्वाम्के वेपमें प्रसम्म मामका एक बार भाया । उसकी पापी सं विद्वानपि दाशार्हो भगवान् सर्यदर्शन । कि में श्रीकृष्ण और बळामको दरले बाऊँ ॥ १० ॥ । मगवान् श्रीकृष्ण सर्वज्ञ। ये उसे देस्ते ही पहचान वन्वमोदत तस्सख्य षर्घ तस्य विचिन्तयन् ॥१८॥ | गये। फिर मो उन्होंने उसका मित्रताका प्रस्ताव सीकार कर लिया । ये मम-ही-मम पर सोच रे येकि किस सत्रोपाहूम गोपालान् कृष्णा प्रार विहारवित् । युजिसे इसका वध करना चाहिये ॥ १८॥पाया | सबसे पो सिमी, खोके वाचार्य श्रीक्षण ही थे। हे गोपा विहरिम्पामो द्वन्दीमय मथापथम् ॥१९॥ , उन्होंने सब ग्वाम्बालोंको घुस्पकर कहा - मेरे प्यारे मित्रो! मान हमलोग अपनेको उचित रीतिसे दो दीमि तत्र चक्रुः परिषदौ गोपा रामचनादनौ । मेह के । और फिर मानन्दसे खे ॥ १९ ॥ उस स्पेनमें बाउबालोंने राम और श्रीकृष्णको नायक रुष्णसपद्विना फेविदासन् रामस्प चापरे ॥२०॥ बनाया । कुछ भीमणके सापी बन गये और कुछ आरुषिविधाः क्रोरा वामवाइकलक्षणाः । बतरामके ॥ २० ॥ फिर उन लोगोंने महसबसे एसे बहुत-से नेत लेले, मिममें एक दमफे लोग दूसरे दसके यत्रारोहन्ति जेवारो वहन्ति च पराजिता ॥२१॥ भोगोको गफ्नी पीठपर पकाकर एक मिर्दिए स्पानपर ले गाते थे। मीसनेवाण दम परता पा वीर हारनेवाठा पहन्तो पासमानाथ पारयन्सय गोधनम् । दर होता पण ॥ २१ ॥ इस प्रकार एक दूसरेकी पीठपर पासे-वड़ाते श्रीहम्ण बादि पाठबाल गौएँ भारीरक नाम पर जग्मुः रुप्णपुरागमा ॥२२॥ ? घरासे हुए माण्डीर नामक बरके पास पहुँच गये ॥२२॥ , गमानाम।

२४८ भीमनागत [.१८ । रामसहहिनो यहि भीदामापभादय । परीक्षित् ! एक पार बलरामबीके दसपाले भीदाम, क्रीसयां जपिनस्तांस्तानः कप्णाइयो नृप ॥२३॥ पम आदि बालवामान स्लेसमें मामी मार छी।स श्रीकृष्ण बाधिन्हें अपनी पीठपर चढ़ाफर लोन से उवाह कम्णो भगवान् श्रीदामान पराजितः । ॥ २३ ॥ हारे हुए श्रीकृष्णने धीदाम्पको अपनी पीठपर पड़ाया, मद्रसेनने वृषमको बौर प्रकम्पने बरामीको पर्म भद्रसेनस्तु प्रलम्पो रोहिणीसुतम् ॥२४] ॥ २४ ॥ दानवपुङ्गम प्रसम्मने देखा कि श्रीकृष्ण ने अषिपर्व मन्पमानः फर्ण दानवपुङ्गवः । महे मध्यान् है, उन्हें में नहीं हरा सगा । बता उन्हीं के पक्ष में हो गया और यमममीको सेकर पुतलि षान् द्रुततर प्रोगादयरोहणतः परम् ॥२५॥ माग चष्प, बौर पीठपरसे सतारनेके म्येि नो स्थान नियत धा, उसमे आगे निकल गया ॥ २५॥ वसामयी तसदान् परणिधरेन्द्रगौरस बड़े भारी पर्वत के समान मामाले थे। उनको फार महासुरो मिगवरयो निस पपुः । प्रसमासर दूरतक न मा सका, उसकी चाल के गयी। तर उसने अपमा सामाविक देपहप धारण कर स आम्पितः पुरटपरिसदो पभो ळिया । उसके काले शारीरपर सोनेके गहने चमक सरिर मानापतिवारिपामुदः ॥२६॥ पे और गौरमम्मर मध्यमत्रीको धारण करनके कारण उसकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो बिजीसे पुरू निरीक्ष्य तापुरलमम्मरे परत काठा मादस चन्द्रमाको धारण किये हुए हो ॥२६॥ उसकी वो आगको सरा धघफ सी पी और दाएँ प्रदीतग् कटितटोगदष्टकम् । मोहतक पाँची बड़ी मयावनी दी। उसके - ज्वलच्छिल कटकिरीटामात (म्म बाठ इस तरह रिसर रहे थे, मानो वागकाम्पटें | उठ रही हों। उसके बाप मोर पामि कर, सित्पर विषावर हलपर ईपदनसम् ॥२७॥ मुकुर मौर कानोंमें कुण्डल थे । उनफी कान्तिसेवा बदा मन हग रहा पा! इस भयानक दैत्यको वा अधागतस्मृतिरमयो रिपु षठो | पेगसे बाकाश गाते देस पहले से परामची कुछ घबया से गपे ॥ २७ ॥ परन्तु दूसरे ही क्षणमे अपने विहापसा मिन हरतमात्मन । सहपकी पाद वासे ही उनका मय नाता था। पनामजीने देखा कि कैसे चोर किसीका धन उराकार रूपाइनम्छिरसि स्टन मुष्टिना ले गाय, से ही यह शत्रु मुझे चुराकर वाकास-मासे लिये जा रहा है। उस समय असे इम्रने पर्वतोपर सुराधिपो गिरिमिव पबहसा ॥२८॥ मा सत्यया था, वैसे ही उनोंने झोप करके उसके स आदतः सपदि विशीर्णमस्तो सिरपर एक सा कसकर जमाया २८ ॥ धूसा म्याना था कि उसका मिर घर घर से गणमा सम्पादपमन्रुधिरमपस्मृतोऽसुर । मुंहसे म्पून उगमन मगा, चेतना माती सीमार बहा प्रापार 12 मापीन प्रतिम प्स मारता 'इस्पारि पूर्ण पाठ यों है स स पाऽम विणीमार्गा मुवाइमन पिरमरम्पवाहरः। । - अ० १९] दमम स्कन्म २४९ महारव ध्यसरपतत् समीरगन् मयाहर शम्द करता मा इन्द्र के द्वारा बनसे मार मुए पर्वतके समान पर उसी समय प्राणहीन होकर पृष्पीपर गिरिर्यथा मघवत आयुधाइतः ॥२९॥ र पहा ॥ २९ ॥ दृष्टा प्रलम्मे निहस बलेन बलशालिना । बगरामनी परम बसशाली थे। नब बालवाहोंने देखा कि उमानि प्रमम्मामुरको मार राग, सब ठमके माधर्य की सीमा म रही । वे बार बार वाह-वाह करने गोपा सुषिमिता आसन् साधु सावितिषादिनः३० बगे ॥ ३० ॥ बालबालोंकर पित्त प्रेमसे बिहछ हो गया । वे उनके लिये मुम कामनावोंकी वर्षा करने आशिषोऽभिगृणन्तस्त प्रशनसुस्तदईणम् । मगे और मामो मरकार छौट भाये हों, इस मावसे वालिङ्गम करके प्रशंसा करने एगे । पस्तत ववरामगी प्रस्पागवमिवालिङ्गय प्रेममिहलचेतसः ॥३१॥ | इसके योग्य ही पे ॥ ३१ ॥ प्रस्मासुर मर्तिमान् पाप पा । उसको मृत्युसे देवताओं को बना मुस मिला । पापे प्रलम्बे निहते देवाः परमनिर्भताः । वे बलमामनीपर घर परसाने लगे और बाप्त वष्य किया, पात वा किया इस प्रकार काइकर उनकी अभ्यर्पन पलं माल्पः शशंसुःसाधु सान्निति॥३२॥ | प्रशसा करने लगे ॥ ३२ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमाईस्या संहितायां दशमस्करघे पूर्षि प्रलयघो मामायदोऽप्याप ॥१८॥ अथेकोनविंशोऽध्याय गीमो मौर गोपोने दावानरसे बचाना मीझुक उवाच भीशुकदेवमी करते है-परीक्षित ! मम समय सब बालबाल खेल-कूदमें लग गये, तब उनकी गौएँ फ्रीरासक्ता गोपेषु तद्गायो रचारिणीः । बेरोकटोक परती हुई बहुत दूर निकल गयी और हरी स्वैरं परन्त्यो विविस्तृपलोमेन गहरम् ॥१॥ हरी मासके मोमसे एक गहन पममें घुस गयीं ॥ १ ॥ उनकी बकरियों गायें और भसे एक वनसे दूसरे कनमें अजा गावो महिप्पम निर्मिन्स्पो पनापनम् । होती हुई नागे पर गया तथा गर्मीक तापसे म्याकुल हो गयो । बेमुप-सी होकर वस्तमें रक्राती हुई इपीकाटवी निर्विविशुः मन्दन्त्यो दायतपिताः ॥२॥ मुखाटनी ( सरफरोकि वन ) में घुम गपी ॥ २ ॥ सर श्रीकृष्ण, बलराम वादि बामबालोंम दशा कि तेऽपश्यन्तः पशून् गोपाःफणरामादयस्संदा। हमारे पामोंका तो कहीं पता-टिकाना ही नहीं, तब उन्हें अपने प्रेम-करपर बसा परतावा मा बोर जातानुसापान विदुर्मिचिन्वन्तो गांगतिम् ॥ ३॥ वे बहुत कुछ सोम-बीन करनपर भी मपभी गौओंका १ समसाधु साधुस्पिनम् । १ पानीमायामय 11 वादारमिरवाच ।। पापित ।मता। सस २२२- २५० भीमागवत वगैस्तरखुरंदन्छिन्नैर्गोप्पदैरहिर्गपाम् । पता न लगा सके ॥ ३॥ गौर हो तो अनवासियों जीविकाका साधम दी। ठमके म मिसनेसे में बताये मार्गमन्वगमन् सर्वे नष्टाजीच्या विषतसः॥४॥| होगहे थे। पर वे गौओंके सुर और दातासे की ई पास तपा पृषीपर बने हुए खुरोंके बिहोंसे उनका पता लगाते हुए भागे बरे॥१॥जसमें उन्होंने साटम्यां भ्रष्टमार्ग मन्दमान स्वगोधनम् । देशा कि उनकी गौर मुभाटवी में रास्ता भूलकर समय ही है। वम पाकर वे होगमकी वेश करने सगे । मम्प्राप्य पिता श्रान्तास्ततस्ते सं पवर्तयन्॥५॥ उस समय वे एकदम पफ गये थे और उन्हें प्यास मी बड़े मोरसे लगी हुई थी। इससे वे ग्याकुल हो रहे पे॥५॥ उनकी यह दशा देखकर भगवान् श्रीका का आहवा भगवसा मेपगम्भीरपा गिरा । अपनी मेधके समाम गम्भीर वाणीसे माम मेकर गौनोंको पुकारने स्टा । गौर अपन नामकी पनि स्वनाम्नां निनदं भुवा प्रविनेदुः प्रदर्पिता ॥६॥ धनकर बात हर्षित हुई। वे मी उत्तर पुकारने और माने एगी ॥ ६ ॥ तत समन्वाद पनघूमकेतु पीशित् । इस प्रकार भगवान् मन गायोको पुकार ही रहे थे कि उस बनमें सब बोर मकरमाव दावामि परछपाभूव धयक पौफसाम् । मग गपी, मो वनवासी जीसका काम ही होती है। साप ही बडे जोरकी गोधी भी घसकर उस पमिके समीरित: मारपिनोत्तपोन्मुके बहममें सहायता देने मगी। इससे सब बोर फैसी पर प्रथम अम्नि वपमी मपर अपटोसे समस्त परावर पिलेलिहान स्थिरनगमान् महान् ॥७॥मीवोंको भस्मसात् करने लगी ॥ ७ ॥ सब माती वीर गोगोंने देखा किदापामल चारों बोरसे हमारी ही तमापतन्त परितो दवामि बोर बाता पा रहा है, तापे अपन्त मयभीत हो गपे। और मायके मपसे सपए जीव मिस प्रकार गापाप गाव प्रममीक्ष्य भीताः। मगवान्को धारणमें भाते है, से ही रे श्रीकृष्ण और समुप रुपण मरत प्रपना बररामग्रीक शरणाम होकर उप पुकारते हुए बोले-|| ८ || महार भीषण ! प्यार श्रीक्षण! यथा दरि मृत्युभपादिता जना ८॥ परम बगामी पनराम ! हम तुम्हारे शरणागत है। कृष्ण प्ण महावीर ह रामामितविक्रम । देने, हम समय दम तबामसे असमा पाते हैं। मुम दोमों में इससे सपाला ॥०॥ धीरण ! ॥ मिन ही माधु वीर सब कुछ। हें तो मून मनाया गण न मारन्स्पामोदितम् । किमी प्रकारका पानामा पाये। सब धमकि जाना श्यामार मार मार रक्षक एक पर्य हि मममम समाधारपरसरापणाः ॥१०॥ मा हो हमें कप समोसा ॥१॥ .aur.1 मारमा । ममी ।

अ० १९] दशम स्मन्म २५१ मीमुक उपाय श्रीशुकदेवमो करते-अपने समाग्बालबालों के ये दीनतासे मरे बचन पुनकर भगवान् श्रीकृष्णने कहा- षधो निशम्य रूपर्ण पना भगवान् हरिः । परमत,तुमभपमीबा बंद कर लो ॥११॥ मगवान्की निमीलयत मा मैट लोधनानीस्पभापत ॥११॥ मात्रा सुनकर उन ग्बालबालोंने कहा 'बहुत बा' वीर अपनी बाते मद माँ तक योगेश्वर भगवान् श्रीरणने तयेति मीलिताधेषु भगवानग्निमुतणम् । उस मपाहर बागको अपने मुंहसे पी मिया * और इस पीत्वा मुखेन वान् कृष्ण योगाधीशोपमोचयत्१२ प्रकार उन्हें उस पार सहरसे झुका दिया ॥१२॥ इसके बाद गमवाष्मालान वपनी-अपनी बोले खोलकर देखा, उतम तेऽधीम्युन्मीक्य पुनर्भाग्डीरमापिताः । तब मानेको भाण्डीर परके पास पाया। इस प्रकारणफ्मे निशम्प विसिवा मासमात्मान मापमोचिवा चापको और गौमोंको दाबामहसे बचा देशवेपालबाल मात ही विस्मित ए ॥ १३ ॥ श्रीकृष्णकी इस योग फणस योगवीये व योगमापानुभाषितम् । | सिदि तपा योगमायाके प्रभावको एव दामानण्से अपनी रक्षाको देखकर ठमोंमे यही समझा कि मीण कोई दावाम्नेरास्मनःक्षेमवीक्ष्य से मेनिरेऽमरम् ॥१४॥ देवता है ॥ ११ ॥ गाः सभिवर्ल्स सापाहे सहरामो जनार्दनः । परीक्षित् । सापहाल होमपर बलरामगीके साथ मगवान् श्रोहणने गौएँ डौटाया और बंशी बाते घेणु विरगमन् गोठमगाद् गोपैरमिन्दुतः ॥१५॥ र समके पीछे-पीछे अप्रकी यात्रा की । उस समय ग्वाम्बाल ठनको स्तुति करते वा रहे थे ।। १५ ।। इपर अजमे गोपियोंको भीकृष्णके बिना एक एक पण सौ गोपीनां परमानन्द मासी गोविन्ददर्षने । सौ पुगके समाम हो रहा था । जब भगवान् श्रीकृष्ण औटे तब उमका दर्घम करके ये परमामग्दमें मग्न हो धण पुगतवमिव पासां येन पिनाभषत् ॥१६॥ गम् ॥ १६ ॥ इति श्रीममागते महापुराणे पारमईया संहिताप ददामस्काये पूर्षि' दामामिपान नामकोनविंशोऽपाय ॥ १९ ॥ । - २ पासमीगो वामानविमोपममेरे । • भावान् भीकम भकों के मारा भक्ति प्रेममति मुभारम्भ पान पर ममि ममम उमीन स्वारी मम्मा से मारी। इसम्मेि उसने स्वय ही मुसमें प्रवेश किया । २ विपामि मुशामि, मोर यावामि-तीनों पान र मगवान्ने भनी भिवापनापी धिम्मच। १ पसे पत्रिमें अमिपान पिपा पा दूसरी बार दिनमै । मगवान् मपने मकानोन पाप एरनेके लिये सरा स्पर पते । ४ पासी बार सबके खाने मोर दूसरी पारसी मंसद पप भीजपने मनिपान किया। इसम भमिपाव पर मसान् परोप मोर मोहनों कारसे महम्नोन रित करते है। त २५२ श्रीमझामवत [२०२० सूर्य वीर अथ विशोऽध्याय वर्षा भोर शराब वर्णन भीभुक उवाच श्रीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित् ग्यम्बामेनेर पॉचकर वपमी मा, बहिन मादि बियोंसे श्रीकृष्ण बोर तयोस्तदछुत कम दावाग्नेर्माक्षमास्मनः । | पलामने जो कुछ बहुत कर्म किये थे -दापामसे गोपात्रीपासमाचस्पः प्रलम्पपधमेव च ॥१॥ | उनको बधामा, प्रम्बको मारना इस्पादि-सबका वर्णन किया ॥ १ ॥ बोयो रे गोप और गोपियों मी राम गोपादाम गोप्य तदुपाकर्प विस्मिताः । मौर श्यामकी वलौकिकमीलाएँ सुनकर विस्मित हो गयी। मेनिरे देवप्रवरौ कृष्णरामौ प्रमं गतौ ॥ २॥ वेष को बहुत बड़े देवता ही प्रभमें पधारे हैं ॥ २ ॥ वे सब ऐसा मानने लगे कि श्रीकृष्ण और परामके सतः प्रावत प्रावद् सर्पसलसमनवा । इसके बाद प्रितुका मुभागमन एखा। इस अतुम सभी प्रकारके प्रागियोंकीदती होजाती है। इस समय वियोतमानपरिभिफिजिवनभस्तला ॥३॥ चन्द्रमापर बार-बार प्रकाशमय मम मेट्ने हो। बादल, वायु, चमक, करकबादिसे बाकाश मा सा दीखने लगा ॥ ३॥ बाकाशमें नीले वीर ने सान्द्रनीलाम्मदैयोम सविपुत्स्तनपिस्नुभिः। बादत दिर माते, विमठी फाँधने माती, बार-बार गा- | गवाहट ममापी परती, सूर्य, पदमा और सारे अस्पष्टन्योविराग्छन्न प्रयव सगुण भौ ॥४॥ रहते । इससे बाकाशकी ऐसी शोमा होती, जैसे - वरूप हानेपर भी गुभोंसे ढक मानेपर बीकी होती भष्टौ मासान् निपीत पद मम्मामोदमयं पम् । है॥ ॥ सूर्पने रानाकी तरह पृप्पीरूप प्रगासे पाठ महीनेतक नाका र प्रहण किया था, अब सम्प बामे पर ये अपने किरम कोसे फिर ससे बॉटने लगे ॥५॥ स्वगोभिर्मोक्तुमारेमे पर्मन्पा काल भागते ॥५॥ | मैसे दगाठ पुरुष जब देखते है कि प्रमा पात पीवित होगी वेदपापवश होकर अपने जीन प्राण- पटिस्वन्तो महामेपासम्पसनवेपिताः । वक निभवर कर देते हैं-सेही विमरीकी नामको | शोभायमान पनघोर बादण्वेग हमाकी प्रेरणासे प्राणियों प्रीगन बीवन मस्स साधुः करुणा इव ॥ ६॥ काम्यागके लिये अपने नीलमसाप मलको बरसाने मगे ॥ ५ ॥ मेठ-भाषारकी गर्मासे पृषी सूस गयी थी। जब कि गलसे सिंचकर बह फिर हरी-भी हो तपास्या देवमीठा मासीद् वर्षीयसी मही। | गयी-जैसे सकाममापसे तपस्या करते समय पासे तो शरीर दुर्फ हो जाता है, परन्तु सब उसका फल यथैव यम्यसपसस्तनुः सम्प्राप्य तत्कलम् ॥ ७॥ मिमता , तब पुष्ट हो जाता है ॥ ॥ वकि सापाशम्मे बदमोसे पनाबमेरा छा मानेपर मर और निशामुसेपु वयोवाम्तममा भान्ति न ग्रहा। वारों का प्रकाश तो माह मनायी परता, परम्त म् उरमम।

ब.२०] दशम स्पान्य २५३ यथा पापेन पासमा न हि घेदार फलौ युगे ॥ ८॥ गन् चमकने गये है वैसे कछियुगमें पापकी प्रवटता हो मानेसे पासण मोका प्रचार हो जाताहौर वैदिक सम्प्रदाय लुप्त हो जाते हैं॥८॥ मो मदक पहले मुस्वा पर्जन्मनिनद मणका म्पसुजन् गिरः । सुपचाप सो ये थे, अब वे पादों की गरम पुनकर | टर-टर फरने सगे-से निस्प नियमसे निवृत्त होनपर तूष्णींशयानाःप्राग्य मामणा नियमात्मये।।९।। गुरुके वादेशानुसार प्रमचारी ग्रेग वेदपाठ करन गावे ₹ ॥९॥ छोटी-छोटी नदियों, बाजेठ-आषादमें विस्कुळ आसन्नुस्पषवाहिन्या पुद्रनयोऽनुशुप्पती। सुखनेको भा गयी पी, अब समा-घुमड़कर अपने घरेसे पाहर पहने लगी-से अनितेन्द्रिय पुरुषक पुंसो यथास्वतन्त्रस देवपिणसम्पदः ॥१०॥ शरीर और धन-सम्पतियोंका कुमार्गमें उपयोग होने लगता है॥१०॥ पृषीपर कहीं-कही हरीमरी घासफी हर | पाली थी, तो कही-कही वीरबहूटियोंकी लालिमा और हरिता हरिमिः शप्पैरिन्द्रगौपेष लोहिताः । कहीं-कहीं बरसाती छों (सफेट फुसलमों) के कारण पह सफेद मालम देती पी। इस प्रकार ससकी ऐसी उच्छिलीन्धतष्ठापानणाश्रीविभूरभूव ॥१२॥ोमा हो रही थी, म्पमो किसी रामाकी रंग-बिरंगी सेना हो।॥ ११ ॥ सब स्खेत बनामोंसे मरे-पूरे लाया हे क्षेत्राणि सखसम्पतिः फर्पाणां पदं ददुः । थे। उन्हें देखकर किसान तो मारे थामन्दक ने म समावे मे, परना सब कुछ प्रारम्धके अधीन है- धनिनामुफ्ताप देवाधीनममानताम् ॥१२॥ बात न मामनेवाले भनियोंके चित्में बड़ी मसन हो यी पीकि का हम वपने पंजे कैसे रस सकेंगे॥१२॥ जलस्सलोकमः सर्वे नपारिनिपेक्या । नये बरसाप्ती मलके सेवनसे सभी जलपर और पळघर प्राणियोंकी सन्दरतास गपी पी, जैसे भगवान्की सेना करनेसे वार वौर भीतरके दोमों ही रुप सुपर हो अनिनन् रुचिरं रूपं पपा हरिनिपेक्पा ॥१३॥ मारें ॥ १३ ॥ मर्या-अतुमे पाक प्रोफोंसे समुद्र एक तो यों ही उत्ताउ सरोंसे युक्त हो रहा था, जब सरिलिः सात सिधुजुलमेश्वसनोमिमान् । मदिपोंके संयोगसे बह और भी क्षुब्ध हो ठटा--टीफ से ही, जैसे पासनापुल पोगीका वित्त शियोका अपकयोगिनपिचं कामाकं गुणयुग यया ॥१४॥ सम्पर्क होमपर कामना के उभारसे मर गासा ॥१॥ मसमधार गर्याकी चोट से रानपर भी परोको कई गिरयो पर्पधाराभिहन्यमाना न विम्पयुः । म्पपा नही होती पी-जैसे दुमोकी मरमार बामपर भी उन पुरुषों को किसी प्रकारकी प्यपा नहीं होनी, जिन्होंने अपना रिज मगधन्का ही समर्पित कर पा अभिम्यमाना प्यमनैर्यधाधोमपेतसः ॥१५॥ ॥ १५ ॥ जो माग कमी सार नहीं पिय जात ५, देपाससे टक गये और उमक पहचामना कटिम हो मागा पम्युःसन्दिग्पाम्ण छमा प्रसस्तताः। -मैसेजा दिनानियेगेया वम्याम मदी करने, १ मरिता । २ स्मासति ।

२५४ भीमबागपत - नाम्पसमानाः भुवयो दिबैः कोलहवा इस ॥१६॥तब कामसे ये उ मूल मासे है ॥ १६ ॥ यामि बादल बडोकोपकारी है, फिर भी बिनमियो नमें लोफपन्धुपु मेषपु विघुतमलसौहदाः । स्सिर मही रहती-टीक वैसे ही, मे पपा बनुपर- पाठी कामिनी लियौ गुणी पुरुषोंक पास भी स्थिर मारो स्वैर्य न चलः कामिन्यः पुरुपेषु गुणिप्विव ॥१७॥ मही यती ॥ १७॥ वाकाश मेयोंके गर्चन सर्मनसे मर रहा था। उसमें निर्गुण (विमा गेरीके) निधनु धनुर्षियवि माहेन्द्र निर्गुण ष गुणिन्यभात् । की वैसी ही शोमा हा, सी सावरच वादि गुणों के खोमसे होनेवाले विपके बखे में निर्गुण प्रसकी ॥१८० पपपि चन्द्रमाकी सम्म चाँदमीसे बादलीका पता करता व्यक्त गुणम्पतिफरेऽगुणवान पुरुपो यथा ॥१८॥ | पा, फिर मी ठन बादर्शन ही धन्द्रमाको टककर सोमा- हीन मी बना दिया पा--2 -ठीक वैसे ही जैसे पुरपके न रराजोइपन्छामा खन्योत्स्नाराधिन।। बामाससे लाभासित होनेवाला बहार ही ससे ताकर प्रकाशित भाही हाने देता ॥१९॥ वादा के प्रमागमन- मामस्पा भासितया स्वमासा पुरुषो यथा ॥१९॥ से मोरोका रोम-राम सिन्हा था, वे अपनी पुरक और सुस्पक द्वारा बामदास्सब मना रो--ठीक से ही मेपागमोस्सया इशामत्पनन्दम्छिस्पण्डिनः । जैसे गृहस्सीके नेशाममें से ए छोग, मो अधिकतर तीनों तापसे जलसे और भवरा रासे १, मगवान्के गृहेषु वक्षा निर्मिणा सभाम्पवजनागमे ॥२०॥ मौके सुमागमनसे वानन्दम्म हो जाते है ॥ २० ॥ यो पक्ष मेठ-बापाबमें सूब गये थे, वे वावपमी मोंसे पीलापः पादपाः पहिरासमानात्ममूर्तयः । या पीकर पवे, म तमा गठिपोंसे खूब समय गये-जैसे सकाममाक्से तपस्या करनेमाले पारसे तो प्राक्षामास्तपसा भान्ता यथाश्रमानुसेषया ॥२१॥ दुर्म हो जाते हैं, पर कामना पूरी होनेपर मोटे-तगो | हो जाते है ॥ २१ ॥ परीचित् । सामाफि तट कोटे कीचा भौर गम्के पावके कारण प्राय ममातही सरसपान्तरोषस्थ न्यूपरङ्गापि सारसाः । हते थे, परम्त सारस एकभके लिये मी उन्हें नहारते वैसे बमुख दपपामे विषयी पुस्म काम की गृहेप्पशान्तकृत्येषु नाम्पा इव दुराया। ॥२२॥ | पाटसे की मुटकारा नहीं पाते, फिर भी धरोम ही फो राते । २२ ॥ में इन्द्रकी प्रेरणासे मुसब- मलोपैनिरभियन्त सेतो बर्पतीपरे । मार वर्मा होती है, इससे नदियोंकि बाप मोर स्तोंकी में ट-मट गाती है--जैसे कम्भुिगमें पामियोंकि पासमिनामसवादमार्गाः कलौ यथा ॥२३॥ क्या-सहक मिया मतवादोंसे पदिक मार्गको मर्मादा पीली पर जाती है |॥२३॥ बाभुकी प्रेरणासे घने बादल व्यसनापुभिर्नुमा भूतेम्पोऽयामतपनाः । प्रामिोक लिये अमृतमय बाकी वर्षा करने माते- पैसे बाममोकी प्ररणासे अनी भेग समप-समयपर दानके पपाऽऽधिपो पिश्यतयःकासे काले रिजेरिता॥२४॥ द्वारा प्रमाकी बमिगपाएँ जे परत ॥ २१॥ १ अनशस्वः।२ गुणापि ।

अ०२० ] दशम स्कन्ध २५५ । । । एवं धन तद् वर्पिट पाम्बरबम्पुमत् । वर्षा ऋतु पृन्दावन इसी प्रकार शोमायमान बोर पके हुए खजूर तथा मामुनोंसे मर रहा था। उसी वनमें गोगोपालपतो र सपला प्राविहिः ॥२५॥ विहार करने के लिये श्याम कौर बलरामने ग्वालबाल वीर गौनोंके साप प्रवेश किरा ॥ २५॥ गौएँ अपने एनोंक धेनवा मन्दगामिन्य अधोमारेण भूयसा । मारी मारके कारण बहुत ही धीरे-धीरे घाट ही वा। मन मावान् मीकृष्ण उनका नाम लेकर पुकारते, तब ययुमगववाऽऽहता द्वसं प्रोस्या स्नुतम्सेनीः ॥२६॥ चे प्रमपरवश होकर बादी बन्दी दोहन गती । उस समय उनके पनोंसे दूधको घार गिरती राप्ती थी १२६॥ पनौकम प्रमुदिता वनराजीमधुच्युतः। मगवान्ने देखा कि पनवासी मीत और मोलमियो बामम्दमम है। शोकी एछियों मधुधारा देख रही है। पर्यत से जलधारा गिरेर्नादानासाना दरशे गुहाः॥२७॥ हर-भर करते हुए मरने भर हेरे । धमकी भावान पही मुरीमी गान परती है और साथ ही वर्ग हामपर फचित्र बनस्पतिकार गुहायां पाभिवति । हिपनके लिये पात-सी गुफाएँ मी १॥२७॥ मय वर्या होने लगती, तब श्रीकृष्ण कमी किसी की गो में निर्विश्य भगयान् रेमे कन्दमूलफलाशनः ॥२८॥ या सोकर ना छिपते । कभी-कभी किसी गुफामे ही मान्ते और कभी कम्द-मष्ट फल लाकर मालगालोंके दपादन समानीसं शिलापां मलिलान्तिक । साच सेन्ते रहते ॥२८॥ कभी जलक पास ही किसी पानपर बैठ माते मोर रामनी तया ग्याल मा के मम्माननीयपुसजे गोपः सर्पणान्वितः ॥२९॥ साप मिसकर परसे माया हुआ दही-मात टाल शाक मारिके साय म्हात ॥ २०॥ में पेय, बस शाइलोपरि संमिश्य चर्षसो मीलितेक्षणान । और बोके मारी मारसे यकी हई गोरे पोदी ही देर में मापे घाम घर लेती और हरीसी पासपर घटकर ही उमान् पान् वस्सतगन् गाय म्बापोमरपमा॥॥३०॥ नाम पर गुगारी करती रहता । वर्षा ऋतुकी मुन्दरता कपार थी । यह सभी प्राणियों को एम्ब पहुंचा प्राट्भिय च मां वीक्ष्य मर्वभूतमुदावदाम् । रही थी। इसमें सन्देह मही कि वह ऋतु, पय, , बा-सब-क-सम मगवान्की मीराकेही बिलासप भगवान् पूजयाचक्र मात्मशक्त्युपरिताम् ॥३१॥ रि मी उन्हें देखकर भगवान् यहुत प्रसन्न होते वीर बार बार उनकी प्रभामा करते ॥ ३०११ ।। एवं नियमतान्तम्मिन् रामफेशवयोर्यन । इस प्रकार याम और बरगम या मानदसे प्रामें निवास कर रह य । इसी ममय बना पान पर शासन गरत् समभवदम्पमा बडामवपम्पानिला||३२|| ऋतु भा गयी । श्राबाश पास नहीं है ना मिमन हागया बापु बनी वीमी गरिसे परामग्री ॥३॥ मादा नोरजोत्परपा नीराणि प्रकान पपु । শুনুন মন্ত্রী বশিষ্ট সাহাবী নন অালী महा माना प्राम का Bी- टीम मेमे प्रगनाभिर पतामि पुनर्योगनिपवया ॥३३॥ पागधर पुरुषों का वित्त शिरसे या सेवन करनसे 12 निममुग्ती र बेमा भर । मलार २५६ भीमद्भागवत बादल, व्योमोऽब्द भूतमातल्प वापहमपो मलम् । निर्मम हो जाता है॥ ३३ ॥ मद् अतमे बाकसके वर्ध-कारके बड़े ए जीव, पृवीकी कीमा शरलदाराभमिणां कृष्णे भक्तिर्यथानुभम् ॥३४॥ मोर नसके मटमैपनको मार दिया-वैसे माकन की मति प्रमचारी, गास, मानप्रस्थ गौर सम्पासिल सर्वस्व जलदा हित्वा विरेजुः शुनपर्षसः । सब प्रकारके कयें वोर मनुमोका भटपट नाठ कर देती है ॥३॥ बादल बपने सर्पस का दान की तममा कान्सिसे पुशोमिल होने मग ठीक वैसे ही, यपात्यतपणाःचान्तानयोमुक्तकिरिखपा॥३५॥ जैसे मोक-परमोक, गी-पुत्र वोर धन-सम्पषिसम्बन्धी चिन्ता और कामनावोंका परित्याग कर देनपर संसारके गिरयो समुचुम्चोय कचिम समः शिवम् । पन्धनसे छुट हुए परम शान्त सन्यासी सोमायमान होते ॥३५॥ नापतोसे कहीं-कामरने से ये बरकरा- पथा मानामृत काले शानिनो ददसे न पा ॥३६॥ कशी वे वपने कल्याणकारी मस्को नही मी बहाते -जैसे पानी पुरुष समपपर अपने अमृतमय शानका दाम किसी वधिकारीको कर देखें और किसी-किसीको महीं भी नेवाग्दिन् पीयमाणं अल गाधमलेचराः । करते। ३६॥ अटे-छोटे गामि मरे हुए मासके बम्पर पर नहीं जानते कि इस गाटे का ना दिन पर दिन सूखताजा पचासुरन्ना परवनरा महा। कुटुम्मिनः ॥३ा बाहे- पैसे कुटुम्बके मरण-पोपणमे भूमे गए र यामी मानते कि हमारी वायु क्षण-क्षण क्षीण हो रही ||३७p गाधवारिघरास्तापमविन्दम्छरदर्कलम् पोहे में बनेपाले प्राणियोंको शरस्काशन सूपकी प्रसर किरणों से बनी पीका होने मगी-वैसे अपनी पथा दरिद्र रुपण अम्म्यविजितेन्द्रिय ॥३०॥ इन्धियोंके नशमें रहनेवामे पण एवं दरिन पुटुम्मीका तब-तरह के ताप सताते ही राते है ॥२८॥ भी शनै: नै पाई सलान्याम च पीरुष । धीरे-धीरे अपना कौवा बने मगी और घास-पात धीरे धीरे वपनी कचाई छोरन लगे-क से ही, जैसे यभादममता धीरा शरीरादिप्यनारमम् ।।३९॥ विवेकसम्पम साधक धीरे धीरे शरीर नादि बनाम पदापमिसे 'पा में है और यह मेय है। यह बईत्य निपलाम्पुरभूतप्मी समुद्रः शरदागमे । और ममता यो देते हैं ॥३९॥ शाम् श्रतमें सरकार अल स्थिर, गम्भीर और शाम्त त गया जैसे मनके मास्मन्पुपरसे सम्पम निप्परसागमा 11४०11 | नि सकम्प दो मानेपर वारमाराम पुस काण्डमा समेगोदकर शाम्त हो जाता। किसान कदारम्पत्यपाऽगृहन् फपा एसेतुभिः। सेतोकी मेह मायूप्त करके उसका बहना ऐकन मगे- नैसे योगीनन वानी दिपोको पी बोरगानसे यथा माण मरम्मान तमिराधेन यागिन ॥४१॥ सकार, प्रस्याहार करके उनके द्वारा क्षीण होते हए १ नम:।२ परम् ।

१०२०] दशम स्कन्ध २५७ शरदकोशुजांस्तापान भूतानामरूपोऽहरत् । हामकी रक्षा करते है ॥ ११ ॥ शरद् ऋतमें दिमके समय नदी की धूप होती, लोगोंको पास कार होता; देशभिमानज बोधो मुकुन्दो मजयोपिताम् ॥४२॥ परस्तु चन्द्रमा रात्रि के समय लोगोंका सारा सन्ताप पैसे होर लेते-जैसे देहाभिमानसे होनेवाले दुसको शाम मौर भगवतिरहसे होमेवाले गोपियोंक दुसको धीक्ष्ण स्वमशोभत निर्मेधं शरद्विमलसारफम् । नष्ट कर देते हैं।॥ १२ ॥ वैसे वेदोंके वर्षको स्पर कपसे माननेवाम सत्वगुणी चित्त बस्यन्त शोभापम्पन सत्वयुक्तं यथा चित् शन्दममार्थदर्शनम् ॥४३॥ होता है, वैसे ही शरद् ऋतुर्मे रातके समय मेघोंसे रहित निर्मल वाकाश पारोंकी ज्योतिसे मगमगान म्यगा ॥१३॥ अखप्पमण्डलो योनि रराजोगणे शनी । परीक्षित ! जैसे पृषीतलमें यदुवंशियोंके बीच यदुपति भगवान् श्रीकृष्णकी शोमा होती है, वैसे ही आकाशमें यया यदुपसिः कृष्णो प्रष्णिपक्राइतो मुवि ॥४४॥ तारों के बीच पूर्ण चन्द्रमा पुशोभित हाने लगा ॥ १४ ॥ भोसे छद ए एस और लताओंमें होकर बरी ही भागिय समशीतोष्णं प्रसनवनमारसम् । धन्दर वायु पहती, बहन अधिक सी होती और म नधिक गरम | उस वायुके स्पर्शसे सब मेगोंको नमन जनास्ताप नहुर्गोप्यो न छप्पाइसपेतस ॥४५॥ योंकि उनका चित्त उनके हापौ मही पा, श्रीकृष्णने तो मिरबाती, परन्तु गोपियोंको मयन बौर भी पड़ जाती, उस पुरा छिया पा॥१५॥ शरद् अनमें गौर, हरिनियों गावो मृगाःस्वगानार्यः पुप्पिम शरदाभवन् । विदियों वीर नारियों अतुमती-सम्तामोत्पतिकी कामनासे मुक हो गयी तथा साफ, हरिन, पक्षी और पुरुष उनका अन्यीयमानाः स्वापै फलेरीशक्रिया इव ॥४६॥ अनुसरण करने लगे-ठीक वैसे ही, चैसे समर्थ पुरुपके द्वारा की गई क्रियाओंका अनुसरण उनक पल करते उदाप्यन् वारिजानि सूर्योत्थाने कुसद विना । है॥४५॥ परीक्षित् ! जैसे रामाक शुभागमनसे गर बोकि सिषा और सब लोग निर्भय हो जाते६, से गमासु निमया लोफा यंभा दम्पन् विना नृप।।४७॥ तिरित और समी प्रकारक कमल स्किर गये ॥१७॥ ही स्पोत्यके कारण कुमुरिनी (पा को) के इस समय माना शह और गोबॉमे नबामप्राशनर पुरनामेप्यानयगरेन्द्रिय महोत्सव । मसम्बन्धी ठासत्र हाने मगे । मेतो भनाम पफ गपे और पृषी भगवान् श्रोतण सपा बसरामजीकी पभौमा पकसमादया फलाम्या नितरां हरः॥४८॥ उपस्थितिसे मम्पन्त सुशोभित होने एगी ॥ १८ ॥ साधना करके सिदए पुस पैसे समप आनपर अपने पणिमुनिनुपरमासा निगम्यायान् प्रपदिर । देव आदि शरीरीकन प्राप्त होते हैं, बसे होय, सन्यासी, राजा बीर माता-जा पर्गक कारण एक म्पानपर रुके हुए थे हाँसे पाल्पर अपन-नान वभीष्ट काम पर्परुदा पधामिदा म्वपिण्डान् काल आगवे॥४९॥ कामें लग गये ॥ १९ ॥ इति श्रीमागबते महापुराण पारम्स्यां सहितायो दशमस्काप पूर्वाध प्रारद पादर्णन माम विशारप्याय ॥२०॥ १ भान्।

२५८ भीमझागपत अथेकविंशोऽध्याय पेणुणीव मीशुक उवाच भीशुकदेवजी काते है-परीक्षित् ! शरद् पक्षले कारण पावन पहा मुन्दर हो रहा था । बम निर्मा इत्यं शरस्स्वन्छ जल पपारसुगधिना। पा और जलाशयम सिखाए कमलों की सुगन्धसे सनहर पायु मन्द-मन्ट चल रही थी। मगवान् श्रीकृष्णने गौ पौर म्यासबामौके साप उस बनमें प्रवेश किया ॥१॥ न्यविश्वषायुना पास सगोगोपालकोऽच्युतः॥१॥ सन्दर-सुन्दर पुष्पोंसे परिपूर्ण हरी-हरी पक्ष-पक्षिय मतवाले मौरे साम-सामपर गुनगुना रहे थे और व्य सुमिववनराविशुप्मिभृत वरहके पक्षी मुर-के-मुर पग-अलग कारण कर रहे ये, मिससे उस बमफे सरोवर, नदियों और पर्वत-- द्विजालघुपसर सरिन्मूदीधम् । सम-के-सब गूंजते रते थे। मधुपति श्रीकृष्णने मागम- बी वौर ग्वालबालोंके साथ उसके भीतर मुसकर नौका- | को घराते हुए अपनी गाँसुरीपर बनी मधुर तर मधुपविरवगाम घारयन् गा | छेसी ॥ २॥ श्रीकृष्णकी र शीप्पनि मामान्ये | प्रति प्रेममाको, उनके मिमकी बाकाहाको भगानेवार्म सापशुपालबलमुक्ष वेणम् ॥२॥ | पी । (उसे समकर गोपिपोंका दय प्रेमसे परिपूर्ण गया ) वे एकान्तमें अपनी ससियोंसे उनके रूप, गुण और पंशीप्पनिके प्रमाक्का वर्णन करने लगी । सद प्रमनिय आभुत्म वेणुगीस मरोदयम् । मनकी गोपियोन बंशीप्पनिका मामुप वापसमें वर्णन करना चाहा तो ववश्य, परन्तु पशीका स्मरण होते ही काभित् परोध कप्लस स्सस्सीम्पोऽन्वषर्णपन्॥३॥ सन्हें श्रीकृष्णकी मधुर वेश्योंकी, प्रेमपूण कितना मकि इशारे और मधुर मुसकान शादिकी पदो तत्वमितुमारग्धाः सरन्स्पःकृष्णषेष्टितम्। पायी । मनकी मगवान्से मिहनेकी माकासा वार में सगयी। उनका ममहापसे निकल गया। ममनी-मय यहाँ पांच गपी, यहाँ श्रीकृष्ण थे। पर उनकी पापी नाशकन् मरखेगेन विक्षिप्तमनसो नृप ॥ ४॥ बोले कैसे ! वे उसके वर्णनमें असमर्थ हो गया ॥१॥ ( मन-ही-मन देखने लगा कि ) श्रीरुण ग्वाम्मामैक पर्दापीर नटपरवपुः कर्णयोः फर्णिकार साप म्दावन में प्रवेश कर रहे हैं। उनके सिरपर मयूर पिछ हैऔर कानोंपर कनेरके पोले-पीछे पुमा शरीरपर पुनहा पीताम्बर और गोमें पाँच प्रकारक विप्रवासः कनककपिक्षनयन्तींच मालाम् । सुगन्धित पुपोंकी बनी वैयक्ती मात्र है। रंगमनपर अभिनय करते हुए मेष्ठ मटका-सा क्या ही पुन्दर के है ! योमरीके सियों को वे वपन बापरामृतसे मर हे रघान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपान्दै हैं। उनके पीछे पीछे मामा ठमकी मेकपाक्न कीर्तिका गाम कर रहे है। इस प्रकार बैकुण्ठसे मी मेष्ठ पन्दारण्य स्वपदरमपं प्राविस गोवकीतिः ॥५॥ या दापनघाम उनके चरणपिसे गौर मी रमणीय ब०२१] दसमस्कन्ध २५९ गोप्य र इति घेणुरचं राजन् सर्वभूतमनोईरम् बन गया है ॥५॥ परीक्षि ! यह पेशीप्वनि नर, चेतन--समस्त मोका मम चुरा लेती है। गोपिर्योमे. उसे पुना और मुनकर उसका वर्णन करने लगी। वणन भुत्वा प्रजस्त्रियः सर्वाषर्णयन्त्योऽमिरेभिरे॥६॥ | करते-करते ये तन्मय हो गया और श्रीकृष्णको पाकर मामिान करने गी ॥ ६ ॥ गोपियों मापसमें बातचीत करने रगी-भरी सथी। हममे तो मोवाक जीवनकी और उनकी भासोंकी बस, पही-इतनी ही सफरता समझी है। अक्षयता फलमिदं न परं विदाम पौर वो हमें कुछ माछम ही नहीं है। यह कौन-सा माम है। वह यही है कि जब श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण सख्य पश्चननु विषेशयतोर्वयस्पैः। और गौरसुन्दर वाम ग्वालबाळंके साप गार्योको हॉककर मनमें से ना रहे हों या छोटार अनमें बा रहे हों, उन्होंने अपने घरोंपर मुरली धर रम्मी हो पत्र ग्रजेशमुवयोरनुवेणु जुष्ट और प्रेममरी तिराणी चितवमसे हमारी वोर देख रहे हों, उस समय हम सनकी मुख-माधुरीका पान करती ॥ ७ ॥बरी सप्ती ! जब ये बामकी मपी कोपलें, पैर्वा निपीवमनुरकफराषमोक्षम्॥७॥ | मोके पस, झोंके गुप्छे, रंग-बिरंगे कमठ वोर कुमुदकी मामर धारण कर मेते है, भीष्णके सौपरे शररपर पीताम्बर बौर बलरामके ग्रे शारीरपर मीसाम्पर पूर्वप्रवालास्तरकोस्पलाम्म | फहराने भगता है, तब उनका बेपका विचित्र बन माता बाम्बालोंकी गोष्ठीमें ये दोनों मालानुएकपरिधानपिचित्रपौ। बीयोबीच बैठ चाते है और मपुर सहीतकी वाम छा देते। मेरी प्यारी सी 1 उस समय ऐसा नान पाता है मानो दो पतुर नट रगमधपर मिनप मध्ये पिरेजसुरलं पग्नुपालगोष्ठपों कर रहे हों । म क्या बताऊँ कि उस समय उनकी कितनी शोमा होती है बरी गोपिपा ! पर रङ्गे यथा नटवरो कप गायमानो बेगु पुरुषमातिमा होनेपर मी पूर्णमग्ममें न जाने ऐसा कौन-सा साधन-माम कर चुका है कि इस गोपियों की भरनी सम्पति-दामोदरके अपकी सुधा गोप्पा किमाचरदय चल स घेण सये ही इस प्रकार पिये जा रहा कि हम म्ोगों के रिपे पोषा-सा भी रस शेप मही रहेगा। इस बेशुको दमोदरावरमधामपि गोपिकानाम्। मरने रससे सापनेपास्टी दिनियाँ बान कमणेकि मिम रोमारित रो रहीर और वरने में मगरप्रमी मरू वर्य पदवशिष्टरस इदिन्यो सम्तामोका देकर श्रेष्ठ पुरषोंके समान पक्ष भी इसक साप परमा सम्बन्ध गोरफर माँसोंसे धानम्दाशु पहा एप्पसचोऽभु समुचुम्वरमो यथाऽऽया॥९॥ रहा ॥ ९ ॥ १ मोरमम् ।

२६० श्रीमद्भागवत [२०२१ पृन्दावन सखि सषो वितनोति कीर्ति भरी सवी ! यह पृन्दावन मैकुण्ठठोकतक पृष्नीकी कीर्तिका विस्तार कर रहा है। क्योंकि यशोदानन्दन | श्रीकृष्णके चरणकमोंके चिहोंसे यह विडिस हो का मदेवकीमतपदाम्मुबलपलक्ष्मि है।ससि ! जब श्रीकृष्ण अपमी मुनिनममोहिमी मुरम्म | बनाते है, तय मोर मचाले होकर उसको तम्पर | माघने गते है। यह देखकर पर्वतकी बोरियों पर गोविन्दजुमनु मचमपूरनृप विचरनेवाले समी पशु-पक्षी चुपचाप-शाम्त होकर खोर बाते है।वरी सही । बम प्राणपासम प्रेक्ष्याद्रिसान्वपरवान्यसमस्तसत्त्वम् ॥१०॥ भीषण विचित्र वेष धारण करके गौमुरी बनाते है, सव मूह बुदिवाम्म ये हरिनियाँ मी वशीकी ताब उनकर अपने पति कृष्णसार मृगोंके साप मन्दमन्दमके पास पळी वाती है और अपनी प्रेममरी मही-सी धन्माः स मूडमसयोऽपि हरिम्प एता पाँचोंसे ठनें निरसने लगती है। मिरपती क्या है, वफ्मी कमळके समान बही-बी वो श्रीकृपके चरणोंपर निभयर कर देती है और भीकनकी या नन्दनन्दनमुपाचविचित्रवेपम् । प्रेमम्मी चितवनके द्वारा किया वा अपना सत्कार सीकार करती । वास्तवमें ठमका मोक्न पम्प है। माफर्म्य अपुरणितं सहरुप्णसारा: (हम हम्दाबमकी गोपी होनेपर मी इस प्रकार उनपर अपमेको निमबर महीं कर पाती, हमारे परपामे कुछने गते हैं। फिल्मी विरम्पमा है।)॥१०१॥करी सही ! हरिनियों की तो बात ही क्या है-सर्गकी पूना दर्विरपिता प्रणयावलोकैः ॥११॥ | देवियों अब पुपतियों को मानन्दित करनेवाले सौन्दर्य और धीम्के समामे श्रीमणको देखतीहरबाँसरीपर रुणं निरीक्ष्म पनितोस्सपरूपधील समकेहाय गापा वा मधुर संगीत सुमतीता हमके विप्र-विचित्र पाप ममकर में बपने विमानपर ही पध-गुष से बैठती है--मर्शित हो जाती है। भुत्ता च वस्कणिसवेरिचित्रगीतम् । प्प कैसे मारुम मा ससी मनो तो, मग धमके दयमें श्रीकृष्णसे मिळनेकी तीन वाकाहा मग माती है तब वे अपना धीरम सो बैठती , योश हो देम्यो सिमानगवया सरनुमसारा गावी ने इस बातका भी पता नही बम्ता कि उनकी चोरियाम गुपे हुए इस पृप्तीपर गिर रो। | यहाँतक कि उम्मपनी सारीका भी पता महाँ यता, अस्पत्प्रस्नकबरा समर्पिनीम्मा ॥१२॥ यह कमरसे खिसककर ममीनपर गिर गाती है ॥१२॥ विविधम् ।

अ० २१ ] २६१ गायम कृष्णमुखनिर्गतरेणुगीव बरी सम्ही ! तुम देरियोकी गत क्या कह रही हो, इन गौओंको मही दसुनी ! जब हमारे कृष्ण प्यारे परने मुखसे चौमुरीमे स्वर मरते हैं और गौएँ उनका मपुर संगीत सुनती, सब ये अपने दोनों पक्षोंकि पीयपमुचमिवकर्णपुटः पिबन्त्यः। दोने समान लेती हैं-सदेकर मेनी है नौर मानो सनसे मत पीसी, इस प्रकार उस सीतका रस लेने लगती हैं। ऐसा क्यों होता है सही अपने | नौके शारसे श्यामपुरको हदयमें स नाकर ये सगे भाषाः स्नुवस्तनपयाकरला सशस्यु यही विनमान कर देती है और मन-ही-मन उनका मागिन करती हैं। देखती मही हो, उनक नेत्रोसे मानन्दके गोस् हटकने सगते हैं। और उनके बछड़े, बाकी तो दशा ही निराठी हो जाती है। यपि गोविन्दमारमनिशाभुकला सशन्त्य ॥१३॥ गार्यो पनोंसे मपने मात्र दूध मरता यता है, वे जब दूध पीते-पीते बचानक ही वशीष्यामि पुनते हैं, तब मुँहमें लिया हुवा दूधका ट म सगठ पाते हैं और न प्रायो पताम्म विहगा मनयो पनेऽसिन् निगह पाते। उनके पदयमें भी होता है मगवान्का संस्पर्श भौर नेमि छठक होते. मानन्दके वोस् । दे म्या-के-स्यों ठिठके र गावे ॥ १३ ॥ भरी सडी! गौर नर बहो तो हमारी परकी पत। कृष्णेक्षितं वदितं मलयेणगीवम् । | उनकी बात सो नाने ही दो । दापनके पक्षियोंको एम माही देखती हो । उ पसी करना ही है। सप मे तो हमसे मधिकांश बडे-बरे अपि-मुनि १२ कके इस सुन्दर की नयी और मायम ये मसमान रुपिरप्रवालान् मनोहर कोपर्गेवारी मरियोंपर चुपचाप बैठ माते हैं और माँ बद महाँ करते, निर्निमेव मयोंसे भीमस्याकी रूप-मापुरी दया प्यारमरी पितरम देख-देखकर निहास भयन्त्ममीलितप्यो विगवान्मापाते एते हैं, तथा कार्मोसे माप सब प्रकारके शम्दोको होकर केवल उन्हीकी मोहनी गाणी और पेशीका त्रिमुषममोहम सहीत मुमते यवे । मेरी प्यारी सथी। सनका जीवन कितना धन्य है In १॥ नपस्तदा तदुपधार्म महन्दगीत भरी सही 1 देवता, गोषों और पक्षियों की बात यो करती हो ! ये तो घेवन ।सबर नदियोंको महो देवा । इनमें गो मपर दौस रहे, तमसे इनके इसमें श्यामसुन्दरसे मिलने की तीन भाकाहाका मावर्तउधिठमनोमनभग्नबगा पता चता है। उसके बेगसे ही तो इनका प्रबार १ मनमा पिया भीमद्भागवत [२०२१ आलिङ्गनस्पगिठभूमिमीरारे रुक गया है । इम्होंने मी प्रेमस्वरूप श्रीकणकी वशीभनि पुन ली है। देसो, देखो ! ये अपनी चोंके हामी उनके घरण पकाकर कमनके भोंका उपारा दन्ति पादपुगल कमलोपहाराः ॥१५॥ (सीई और उमका माथिन कर रही है, मानो उनके परणोपर अपना एप ही निभयर कर रही बरी सही ! ये मदिया तो हमारी प्रणीकी, हमारे रमाऽवप प्रबपशून् सह रामगोपैः इन्दापनकी वस्तुनिक इन बायको मी थे। नब ये देख्ने । कि अमराजकुमार श्रीकृष्ण और पमापी बालभामौके पाप धूपमें गौर पराये। समारयन्तमनु घेणुदीरयन्तम् । और साफ-माम मौरी मी माते माहेहै, तब हो दय प्रम ठमा बता है। उनके सफर मारले गते है और वे श्यामपन बपने ससा धमस्याको ऊपर अपने शरीरको ही छाता माफर तान देवे ।। प्रेममा उदिता कुसुमावलीमिः इतना ही नहीं, सभी । जब उनपर नन्ही-सी पुहियोंकी बर्श करने गते हैं, ऐसा मान पास सम्पुर्यभाव समपुपाम्पद भातपत्रम्।।१६।। म उमके उपर सुन्दर-मुन्दर श्वेत कुसम पान या है। मही सपी, उनके बहाने दे तो वपना जाल ही निभवर कर देते है ॥ १६॥ पूर्णाः पुलिन्प उरुगामपदाम्जराग भरी मट् हम तो पदापनकी इन मीनियसे पम्प वीर कृतहस्य मानती है । ऐसा क्यों पसी! इसलिये कि हमके हदय परा प्रेम है। जब भीमेन दपिवास्तनमणिठेन । हमारे कण-प्यारेको देती है, तब इनके अपनसे मिकनेकी ती बाकाला बाग उठती । इनके सामने प्रेमकी म्याभिगनाती। उस समय ये क्या हपापाती यह मोहन को हमारे प्रिपतमझी प्रेयसी मोपिय पार्शनमररुजस्हणरुपिवेन अपने पक्ष स्पलोंपर वो केसर मगर, साम एग्दरक परणाम मगी होतीर सदानके पास-पासपर पस्ते तब उनमें मीमा भाती है। ये सीमाग्याठी मीसमिधा नगरे उन निकोपरसे सरार लिम्पन्य माननइपेपुजाम्सदाधिम् ॥१७॥ अपने समों मोर मुसो म तीर और बाम एपकी प्रेम-वीदा शाम्त करती ॥१०॥ वरी गरियो ! यह मिशन वर्दन को भगान्के मोम बात दीपय सफ माग्य! न्यायमदिराना इरिवासपर्यो दासी नही हमारे प्रामीण और सपनासिराम यमके पागम का स्पर्श प्राप्त रके पर निमा मानन्दित पता ! इसके माग्मी पा रामाणपरमसप्रिमोदः । (सणमा कौन कर ! पता उन दोनो-पायो इस अ० २२] दशम स्मन्ध २६३ मान तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यद बौर गौवोका बना ही सत्कार करता है। स्नान-पानके लिये परनोंका चल देता है, गौजोंके लिये सन्दरहरी हरी घास प्रस्तुत करता है । विभाम करने के लिये कन्दराएँ पानीयस्यवसफन्दरकन्दमूलै और सानेके लिये कन्द-मूल फल देता है । यस्तबर्मे या ॥१८॥ धन्य है ! ॥१८॥ परी सी। इन सावरे-गोरे किशोयें की तो गति ही निराली है। नप ये सिरपर नोक्ना (दुहवे समय गायके पैर गोषनेकी रस्सी ) सपेटकर गा गोपकरेनुषन नपतोरदार पौर कोपर फहा ( मागनेवामी गार्योको पकानेकी | रस्सी) रखकर गार्योको एक पनसे दूसरे वनमें हॉकार पेजस्वनैः फलपदस्तनुभृत्सु सररूपः । के माते हैं, सापमें ग्यालयाप भी होते हैं और मधुर मधुर सगीत गाते हुए गोमुरीकी सान छेते , सससम्प मनुष्यों की तो बात ही क्या, कम्य शरीरघारियों में मी पलनेपाले चेतन पशु-पक्षी मोर नर नदी वादि अस्पन्दनं गतिमा पुलकस्तरूणां तो स्थिर हो जाते है तथा अवलमोंको मी रोमाश्च हो बाता है । जादुम्सी मशीका वीर क्या चमत्कार मनाऊँ।॥ १९॥ निर्योगाशकसलक्षमयोविचित्रम् ॥१९॥ परीक्षित् ! वृन्दावनविहारी पीकृष्णकी ऐसी-ऐसी एवं विधा भगवतो या वृन्दावनचारिण । एक नहीं, अनेक ळीत्सएँ र । गोपियाँ प्रतिदिन वापसमें उनका वर्णन करता वीर सम्मपदो नाती । मगधन्की सीमाएँ उनके द्रयमें स्फुरित होने पर्मयन्त्यो मियो गोप्पा मोरास्तन्मयतां ययुगा२०॥ गती ॥ २० ॥ इति श्रीमद्भागाचे महापुराणे पारमहस्यों सहितायो दशमस्काधे पूर्षि पेणुगीतं मामैकमिशोऽध्याय ॥ २१ ॥ अथ द्वाविंशोऽध्याय चीरहरण मीमुक उपाय भीशुकदेवजी करते है-पीक्षित् ! मस हेमन्त हेमन्ते प्रपमे मासि नन्दनमकुमारिका । ऋतु बायो । उसके पहले ही महीने बाद मागशीयमें ईविष्य मुजानाः फास्पायन्पर्चनवतम् ॥१॥और करने लगी । ये केवम हरिप्यान ही साती मनबाबाके अनसी कुमारियों कात्यायनी देवीको पूजा आप्लुत्याम्भसि कालिन्या बलान्चे घोदितेऽरणे । पी ॥ १ ॥ राइन् ! ये कुमारी कन्याएँ विका शितिम मत होतेयोते पमुनामसमें स्नान कर लेती सत्ता प्रतिरुति दवीमान प सफतीम् ॥ २॥ बोर तप्पर ही देवीकी वासकामयी मूर्ति बनाकर १ पदापनाकीगमामेक ।

२६२ भीमद्भागपर [व०२ । आलिझनस्पगितभूमिधरारे रुक गया है। इनोंने मी प्रेमसरूप श्रीष्मकी शीर्ष मन की है। देखो, देशो! ये अपनी सर के हाः उनके चरण पफरफर कमळके स्मेका उपहार गुदन्ति पादयुगलं कमलोपहाराः ॥१५|| रही। वौर उनका बाङ्गिन कर रही है, मानो सौ परोपर अपना दयही निगयर कर रही ॥१५॥ वरी सभी । ये मदियों तो हमारी पृप्पीकी, हम पासपे अपचन् सह रामगोपः वृन्दावन की सासनिक इन बाद को भी देखे सब ये देखते है कि प्रअराजकुमार श्रीकृष्ण पामयी मामासों के साप धूपमें गोएँ भयो समारयन्तमनु वेणुमदीरयन्तम् । चौर साफ-साप बोमुरी भी बनाते जा रहे है, सबलवा यमें प्रेम उमरवाता है। उनके ऊपर मर्य | गते वीर पे स्पामधन अपने सख घनश्याम उपर अपने परको ही अता बनाकर ताम देते। प्रेमप्राव उदिता कुसुमावलीमि इतना ही नहीं, सही 1 मे जब समपर मन्दी-मन फुहियोंकी र्मा करने लगते है, ता ऐसा नाम पर एकि वे उनके उपर सुन्दर-सुन्दर श्वेस कुसम का सम्पमेषात् स्वरपुपाम्मद आवपत्रम्।।१६।।।मही सली, उनके बहाने वे तो अपना भीकन पनिमा कर देते है॥ १६ ॥ पूर्णाः पुलिन्प उरुगापपदाम्जराग- भरी म्ट् हम तो पुम्दापनकी इन भीगनियाको ही धन्य और तफस्य मानती हैं। ऐसा क्यो सका इसधिमे कि हनक हदयमें बड़ा प्रेम है। जब हमारे कृष्ण प्यारेको देखती, तप इनके हरयम मी नो मी मेन दमिशास्तनमणिसेन । मिम्नेकी सीब वाकाहा माग सटती है। इसके में। प्रेमको म्याधिगमतीस समय ये क्या उपायकाती है, पर मी एम मे।हमारे प्रियतमझी प्रेयसी गोपियों सरर्शनसरस्वम्वणपितेन अपने पक्ष सापर नो केसा मातीमा साम- सन्दरके घरों में लगी होती है और ये मम दानके मास-पातपर पम्ते,तम उममें मी मा पाती है। ये सौमाम्पत्ती भीसनियों में उन तिमकोपरसे मकर लिम्पन्त्य थाननाघेप बहुस्तदाधिम् ॥१७॥ अपने समों और मुयोर मन लेती है और इस प्रकार जाने बदयकी प्रेम-पीना शान्त करती है ।।१०।। भरी गोपियो 1 यह गिरियस गोवर्सन तो मगमन्के इन्तापमदिरपठा परिवासयों भदोंमें पास ही प्रेष्ठ है। पम्य इसके माग्य! देसती नहीं रो, हमारे प्राणहम श्रीण और नपनामिराम बामके चरणकमका स्पर्श प्राप्त करके पा किसमा मानन्दित रहता है । इसके मापकी मयू रामरणपरणसर्वप्रमोदा । सण्डमा कोम करे। याने सम दोमोकामागे म. २२] दशम स्कन्ध २६३ मानं नोति सहगोगगयोस्तयोर्यत् और गौओंका बड़ा ही सत्कार करता है। स्नाम-पानके लिये परनोंका चल देता है, गोषोंके लिये सन्दरहरी हरी घास प्रस्तुत करता है। विश्राम करनेके शिये कन्दराएँ और सानेके लिये काद-मूल-कप देता है। वास्तवमें पा पानीयस्पषसफन्दरफन्दमूलैः ॥१८॥ पन्य है।॥१८॥वरी सप्सी ! इन सावरे-गोरे किशोरों की तो गतिही निराली है। वे सिरपर मोक्ना (दुहते समय गायके पैर बाँधनेकी रस्सी) उपेटकर गा गोपकैरनुनन नपतोरदार बौर कंधोंपर फंदा ( भागनेवामी गायों को पकानेकी | रस्सी ) रतकर गायोंको एक बनसे दूसरे मनमें हॉककर घेणुस्खनै फलपदस्तनुभृत्सु सल्पा । से जाते है, साथमें मातमाम भी होते हैं और मधुर मधुर सगीत गाते र योमरीकी तान छेरते है, उस समय | मनुर्योकी तो पात ही क्या, अन्य शरीरधारियों में भी धरनेवाले चेतन पशु-पक्षी और जर नदी वादि अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तस्णां | तो सिर हो जाते हैं तथा अपलमाको भी रोमात्र हो पाता है । जादूमरी वशीका वौर क्या चम्कार सुमाऊँ॥ १९ ॥ निर्योगशिरुतलक्षणपोषिचित्रम् ॥१९॥ परीक्षित् ! बम्दावनविहारी श्रीकृष्णकी ऐसी-ऐसी एवं विधा भगवतो या पृन्दावनधारिण । | एक नाही, अनेक सीस्मएँ । गोपियों प्रतिदिन भापसमें उनका पणन करती और सम्मप हो माती । मगवान्की मीस्मएँ उनके उदय स्फुरित सेन वर्णपन्त्यो मियो गोप्य कोठाम्तन्मयसां ययुमा२०॥ लगाती ॥ २० इति श्रीमद्भागवठे महापुण्णे पारमहस्या सहितार्या दशमस्यापे पूर्षि वेणुगीतं मामैकरिशोऽप्याय ॥२१॥ अथ द्वाविंशोऽध्याय धीदरण श्रीशुक उपाय मी गुरुदेवमी करते--परीक्षित ! जब हेमन्त हेमन्ते प्रथम मासि नन्दप्रजरमारिका । तु नापी । उसके पास ही महीनेमें वर्षात् मागशीमें पेठहविष्य सुनाना कात्यायन्यर्चनयतम् ॥१॥ रन पी 1 केवल हरियान ही स्वाती मनबाबाफ पनकी कुमारियो फास्याफ्नी देवीकी पूजा आप्ठम्याम्भमि फालिन्या जरान्त चोदितेऽम्ण । पी ॥ १ ॥ राजन् ! ये कुमारी कन्या पूर्ण का शितिनमार साटेनासे यमुनामटमें स्नान पर सेनी कस्वा प्रतिमि दगीमाननुप मस्तीम् ॥ 00 और तार टी वीकी बायकामपा मनि बनाकर पन्नीगममेर ।

२६४ भीमद्भागवत [अ० २२ गधैर्मास्यैः सुरभिभिलिभिधूपदीपकैः । सुगन्धित पदम, मौके हार, माति-भौतिके नैवय, धूप-दीप, छोटी-गरी मेंटकी सामग्री, पस्सव, फरवार उपाययोपडा प्रषालफलसण्डलैः॥३॥ पाठ भादिसे उनकी पूजा करती ॥ २३ ॥ साल ही हे कारस्यायनी महामाये है महायोगिनी रेसक्की कास्पामनि महामाये महायोगिन्यधीधरि । एकमात्र स्वामिनी! नाप नन्दनम्दन श्रीकृष्णको हमाव नन्दगोपसुतं देवि पति मे रु ते नम । पति बना दीमिये। रेविहम मापके चरणों में ममस्कार करती है। इस मन्त्रका जप करती ये कुमारिक इति मन्त्र जपन्त्यस्ता पूजां चलकुमारिकाः ॥ ४॥ | देवीको बाराधना करता ॥२॥इस प्रकार उन कुमारिमें- ने, मिनका मन भीकृष्णपर निजागर को पुका था, इस एवं मासं प्रतं घरुः इमायेः रुणवतसः । सहमपके साप एक महीमेतक मदकास्टीकी मनीमाति भद्रकाली समानभुम्यामन्दसुत पति ॥५॥ पूजा को कि मग्दनन्दन श्यामसुन्दर ही हमारे पति ॥५॥ वे प्रतिदिन सपाकाणमें ही नाम में उपस्सूत्थाय गात्रै स्पैरन्पोन्पाववादयः । लेकर एक-यसरी सखीको पुकार लेता वौर परस्पर हा-में-हाम गलकर उघ सरसे भगवान् श्रीकृष्णकी कप्तमुपैर्वगुन्स्पिः फालिन्यो स्मातुमन्यहम्।। ६॥ मीला तया नामोंका गान करती हुई यमुमाबळमे स्नान करने के लिये जाता ॥६॥ ना कदाचिदागत्य तीरे निधिप्प पूर्ववत् । एक दिन सबकुमारियों ने प्रतिदिनकी मन्ति यमुनामी के सटपर जाकर अपने-अपने बल सतार ये बोर पासांसिणगामन्त्यो विजाः सलिले सदा।। ७॥ भगवान श्रीकृष्णके गुणों का गान करती हुई मरवानन्द से गल-कीरा करने गौ ॥ ७॥ परीक्षित् ! मगवान् मोकण सनकादि योगियों और शहर बार योगेश्वरों के भगवान्तदमित्य रुष्णो योगेपरेचरः। मी ईश्वर है। सनसे गोपियों की मभिम्पा हिपी न रही। वे उनका वमिग्राय बानकर अपने सा मामा के वयस्पैराश्वस्तत्र गवस्तत्कमसिद्धये ॥ ८॥ साप उन कुमारियोंकी साधना सफल करनेकेलिपे यमुना तत्पर गये ॥ ८ ॥ उमहोंने वको ही उन गोपियों के वासा पासांस्यपादाय नोपमारुम सस्वरः । | सारे बस सठा ये और बी फुगीसे वे एक कदम्बके पर पा गये । सापी माम्बा ठा-टाकर इसने इसङ्गिः प्रासन याले परिहासमवाय ह ॥९॥ मगे और सय मोकण मी हंसते हुए गोपियोंसे हसीकी बात काने झगे ॥ ९ ॥ परी पुमारियो । म यही बाकर इच्छा होता वपने अपने बस जाबोम अत्रागस्पावठा काम स्वयं वासः प्रगृमताम्। तुमनोगोंसे सच-सब कहता है। हसी माकुर मही करता। लोग करते-करते दुबलीहो गयी गो॥१०॥ सत्म मपाणि नो नम यद्य्य यवफर्शिता ॥१०॥ ये मेरे सशा वालबाल नानते १ कि मैंने कभी कोई । झूठी बात नहीं की है। समरिपो! तुम्हारी या न मपोदितपूष पा अन्स पदिम विदु । ते तो समाबला वाकर अपने-अपम पम छो, या सब एक साप ही बायो। मुझे इसमें को वापति एकैकशः प्रवार सहसाव मुमम्पमा ॥११॥ मह ॥ ११ ॥ ।

म० २२] दशम स्कन्ध । । तस्प पत् श्वेलितं दृशगाप्प प्रमपरिप्लुता । भगवान्की यह हंसी-मसमरी देसार गोपियोंका हृदय प्रेमसे सराबोर हो गया। वे तनिक सञ्चाकर एक- पीठिना प्रक्ष्य पान्योन्य बातमसा ननिर्ययुः॥१२॥ दूसरीकी ओर देखने और मुसकराने की । जम्से बाहर महीं निकरी ।। १२ ।। जय भगवान् ने हंसी-इसीमें या वात कही, तव उनक विमोदसे पुमारियोंका चित एष सुवति गोषि दे नर्मणाक्षिप्तधेसमः । और भी उनकी भोर सिंच गया। ये रे पानी में क्ण्ठ- तक बीई थी और उनका शरीर पर-पर कॉप रहा आफण्ठममा शीतोदे षेपमानास्तममुगन् ॥१३॥ पा । उन्होंने योगसे कहा-||१३|| प्यारे श्रीकृष्ण ! तुम एसी बनीति मत करो। हम जानती है कि तुम मानय भो कथासम्बौ तु नन्दगोपसुत प्रियम् । मम्दवावाके गइले माम हो। हमारे प्यारे हो । सारे प्रजवासीतुमारी सराहना करते रहते है। देखो, हम नाड़े नानीमोऽहमलाव्य देहिवामांसि पिता ॥१४॥ के मारे ठिठरही हैं। तुम हमें हमारे बरख दे दो ॥१॥ प्परे श्यामसुन्दर हम तुम्हारी दासी हैं। तम मो कुछ श्यामसुन्दर ते दास्य करवाम तमोदितम् । कहोगे, उसे हम करने को तैयार है। तुम तो धर्मका मर्म मपीमति जामते हो। हमें कर मत दो। हमारे देहि वासांसि धर्मश ना चेद राक्ष वामहे ।।१५।। बस हमें दे दो मही तो हम जाकर नम्दबाबासे कह देगी' ॥ १५॥ भीभगवानुवार भगवान् भीरुप्णन कहा कुमारियो । तुम्हारी मुसकाम पवित्रता और प्रेमसे मरी । देखो, जर तुम भवत्यो यदि मे दास्पो मोक्तं पा फरिप्पय । मापनेको मेरी दासी साकार करती हो और मेरी बाशा अमागत्य स्ववासामिप्रतीच्छन्तु शुचिसिता । १६॥ का पालन करना चाहती हो, ता यहाँ वाकर अपन अपने पससे लो ॥ १६ ॥ परीभिद ! रे पुमारियों वतो जसागपात सर्वादारिका शीतपिताः। टासे ठिठुर रही पी, कॉप रही थी। मगवान्की एसी वात सुनकर वे अपने दोनों हासे गुप्त नहीका टिपा पाणिम्पा योनिमाछापमोचर छीतकर्शिता ।१७। पर यमुनाजीसे बाहर नि । उस समय रहने बतही सता रही पी ॥10॥ समास शुद मापसे भगवानाहता वास्प शुदभावप्रमादित । मगवान् गात ही प्रसन्न हुए । उनका जान पासमापी देकर उन्होंने गारियों के वस्त्र पसने घर रम पिये रूपे निधाय पामांसिप्रीत प्रोगारममिवम् ।१८। वीरबही प्रसन्नतासे मुसकाते हुए पोरस-~॥ १८॥ गर्य रिपना यदपा पृतमता जिरी गोपियो । तुमन मोन रिया पा, उमेपाली तरह निमाया हैसमें सदर मी परत इस म्पगाइसंतपद देपइतनम् । साम्पा बस्दीन हार मन जरमें स्नाम दिया, इससे सारा अणितदाता परमा तपा यमुनानी- पापानि मद्यपनुत्तर्ये कापस्मा। अरबम मदारकी पति ये तुम भरने साप मारया मिरमे Prata रुपानमाऽभावमर्न प्रश्पताम् ॥१९॥ मुरत प्रगम का मानना भरने वपने सत्य में २६६ भीमद्भागवत [अ० २२ इत्मन्युवेनाभिहितं बजायला आमो ॥ १९ ॥ मगवान् श्रीकृष्णकी बात पुनकर उन बजकुपारियोंने ऐसा ही समझा कि वास्तबमें मस्त्रहीन मत्वा विवस्राप्ठपर्न घतन्यप्तिम् । होकर स्नान करनेसे हमारे में श्रुटि बा गयी । बस उसकी निविण पूर्ति के लिये उन्होंने समस्त कर्मकि साक्षी सम्पतिकामास्त्वपफर्ममा श्रीकृष्णको नमस्कार किया। क्योंकि उन्हें नमस्कार साधारूत नेमुरषयमृग् पतः ॥२०॥ करनेसे ही सारी बुद्धिपों चोर अपरायोंका मार्जन हो नाता है ॥२०॥ब यशोदानन्दन मगवान् श्रीकृष्ण सास्तपावनसा राष्ट्रा भगवान देवकीसुतः । ने देखा कि सब-की-सब कुमारियों मेरी बाबाके बनुसार प्रणाम कर रही तब दे पात ही प्रसाए। उनके पासासि वाम्पाप्रापच्छन् फणस्तेन वोषितः॥२१॥ दपर्मे करणा उमर मापी वीर उन्होंने उनके कर दे दिये ॥ २१॥ प्रिय परीक्षित् ! भीकृष्णमे कुमारियोंसे र प्रलम्भासपमा च हापिताः इसी बात की, उनका न्य-सहोच छलामा, सी की वीर सरें कठपुतलियोंके समाम मचाया पहातक प्रस्तोभिवा क्रीनिषष कारिताः। कि उनके सतक र निये । फिर भी वे उनसे स्ट माहगाई, उनकी इन चेतनाको दोष नहीं माना, बल्कि पमाणि वैवापरसान्पयाप्पम अपने प्रियतम के सामे वे वीर मी प्रसनई ॥ २२ ॥ परीमित् ! गापिपाने वपने-मरने वस्त्र पहम छिये । परन्तु ता नाम्पस्पन प्रियसहनिर्माता ॥२२॥ मोहम्णमे उनके पितको इस प्रकार अपने पशमें कर परिभाय स्पासांसि प्रेसनामसज्विताः। रक्सा वा किये पहसि एक पग मी म बल सका। अपने प्रियतमके समागमके लिये सबकर में महाकी गृहीतपिचानो पलस्तस्मिधन्यायिवेक्षणाः॥२३॥ भोर समीठी चितवमसे मिहारती यहीं ॥ २३॥ वासो विमाय भगवान् स्वपादस्पर्षफाम्पमा। मगगन् श्रीकृष्णने देखा कि उम पुमारियोंने उनके दरणकमलोंके स्पराकी काममासे ही प्रत धारण किया है वोर उनके जीवनका यही एकमात्र साप है। तम प्रतमताना संपल्पमाह दामादरोवरा ॥२४॥ गोपियों के प्रेमक बधीन होकर मतको भगानेवाले मगवान्न उनसे कहा-॥२९॥ मेरी परम प्रपती संकल्पा विदितः सौम्या ममतीना महर्धनम्। कुमारिया ! मैं तुम्हारा पर साहस्य मानता है कि तुम मेरी पूजा करना चाहती हो । मैं तुम्हारी सममिमपा- काबनुमोम करता है तुमारा पा साप साप होगा । मपानुमोदितः साऽसौ मन्या भवितुमहति ॥२५॥ तुम मेरी मा पर सकांगी ॥ २५ ॥ हिमे अपना मन और प्राग मुझे समर्पित कर र सनकी नमय्यावेशितपियां फामः कामाप फ्ल्पत । कामनाएं उन्हें सांसारिक मागोकी भोर सिमानेमें समर्प महाहानी टीमेटी, जैसे मुने या उवासहर पीन भनिनापथिता पाना प्रापापीमाय नेप्पत ||२६|| सिरपरमपमें उगन के योम्प महाग गरी ॥२६॥ १नेपाः।

अ० २२] दशम स्कन्ध २६७ - । यातापला ग्रन सिदा ममेमा रेस्पय क्षपा । सिरिये कुमारियो! बम तुम अपने-अपने घर मोट बानो। | तुम्हारी साधना सिद्ध हो गयी है। तुम बानेवाली शरद प्रतकी रात्रिम मेरे साप विहार करोगी । सतियो । इसी उद्देश्यसे तो तुम गोगोंने यह प्रत बौर कात्यायनी यदिप असमिदं घेरार्थिन सतीः ॥२७॥ | देवीकी पूमा की पी। ॥ २७ ।। * चीरमरणके प्रसंगको लेकर की तरहकी शहाएँ की गाती हैं, मतएम इस सम्बन्धमें कुन विचार करना बावश्यक है । वास्तवमें बात यह है कि सबिदामन्दषन मगवान्की दिम्य मधुर रसमयी स्त्रीगमोंका यस्य गाननेका सौम्पग्य यात पोरे लोगोंको होता है । मिस प्रकार भगवान् चिन्मय है, उसी प्रकार उनकी सीता मी चिन्मयी होती है। सचिदानन्द-रसमय सामाग्यो मिस परमोमव समरमें यह मीठा मा करती, उसकी ऐसी विलक्षणता है कि कई बार तो झाम-विधानसरूप विशुद्ध चेतम परम सममें भी उसका प्राफा मही होता जोर इसीलिये प्रम-साक्षात्कारको प्राप्त महारमा लोग भी इस लीला-रसका समासादम नाही कर पाते । भगवान्की इस परमोगस दिप-रस-लीलाका पदार्प प्रकाश तो भगवान्की सरूपमूता हादिमी शक्ति मित्यनिकुनेवरी श्रीषभानुनन्दिमी श्रीराधाची जोर सदङ्गभूता प्रेममयी गोपियोंके ही दममें होता और वे ही नियवरण होकर भगवान्की इस परम अन्तया रसमयी सीलाका सम्पमादम करती है यो सो भगवान्के मग्म-कर्मकी सभी मीठाएँ दिम्य होती है, परतु इनकी भेग, अनमें निकुमीठा बौर निकुलम भी मेलाल रसमयी गोपियों साप होनेवाळी मधुर ीला तो दिम्यातिदिम्प वौर सर्पगुमयम है। पा मम सर्वसाधारणके सम्मुख प्रकट नहीं है, कन्वरणीमा है और इसमें प्रवेशका अधिकार केवल श्रीगोपी मोकोही है। बस्त, दशम स्कम्पके इकीसमें वप्पापमें ऐसा वर्णन वापा है कि भगवान्की रूप-माधुरी, शीणमि और प्रेममपी लीलाएँ देख-सनकर गोपियों मुग्ध हो गयी । बाईसमें मप्यायमें उसी प्रेमकी पूर्णता प्राप्त करने के लिये में साधनमें लग गयी है । इसी षापायौ माषान्न नाकर उनकी साधना पूर्ण की है। यही चीर-रणका प्रसङ्ग । गोपियों क्या चाहती थी, यह बात उनकी साधमासे स्पष्ट है। ये चाहती थी--मीकृष्णक प्रति पूर्ण मात्मसमर्पण, श्रीकृष्णक साप इस प्रकार पुल-मित्र माना कि उनका रोम-रोम, मम-प्राण, सम्पूर्ण वारमा केवल श्रीलगमप हो नाप । शरत्-काम्में उन्होंने धीमणकी वशीपनिकी पर्वा मापसमें की थी, हेमन्त के पहले ही महीनेमें अर्थात् मगवानके विभूतिसरूप मागशीर्षमें उनकी साधना प्रारम्भ हो गपी । विलम्ब उनके लिये पक्षण पा) मानेके दिनों में प्रात काही यमुमा मानके लिये ब्राप्ती गर्ने शरिकी परवा मी गवसी कुमारी पालिने एक साथ ही मासा, उममें इर्पा-प नहीं पा । ऊँचे सरसे श्रीकृष्णका नामकीर्तन करती हई गाती, ठमें गाँव वीर नातिबामाका भय नही पा । वे ममें भी हरियामका ही मोमन करती, मोरणके लिये इतनी प्याकुल हो गयी पी कि सम्हें माता पितातबका सोच नही था। वे विधिपूषक देवीकी बालकामयी मुर्ति बमाकर पूमा बार मत्र मप करती थी । भाने इस कायम सर्वथा उचित और प्रशस्त मामती थी। एक पास्य-उमोंन बपना कुन, परिवार, धर्म सोच और म्पतिमा भगवाम्के घरों में सर्वपा समपण कर दिया था । यही मपनी रहती पी कि एकमात्र नम्दनम्दम ही हमारे प्राणों के मामी हो । भीषण तो बस्तुत उनके मामी ये हो । परनु लोहाकी रिसे उनके समर्पणमे पोषी कमी पी। वे निरावरणरूपसे श्रीकृष्णक सामने नही मा पीपी, उनमें पोड़ी मिथक पी उनकी यही मिभक दूर करनेक ये-नमकी साधना, उनका समर्पण पूर्ण करमक कि उनका बारग मा कर देने की मावश्यकता थी, सनका यह भावरणहपचार र समा अक्षरी भीमद्भागवत व०२२ पा बोर यही काम मगवान् श्रीक्षणने किया ! इसीके लिये वे पागेश्यों के स्वर भगवान अपने मित्र बामायके साथ यमुनातटपर पधारे थे। साधक अपनी शकिसे, अपने यह वीर साम्पसे केवल अपने निभयसे पूर्ण समर्पण नहीं कर सकता । समर्पण भी एक नया है और उसका करनेवामा समर्पित हो य माता है। ऐसी सिति बन्तयत्माका पूर्ण समर्पण तर होता है, जब मपान सब बाकर वह साइम्प स्वीकार करते हैं मोर सहप करनेवालेको भी स्वीकार करते हैं । यहाँ जाकर समर्पण पूर्ण होता है । साधकका कम्य है-पूर्ण समर्पणकी तैयारी । ससे पूर्ण तो भगवान् ही करते है। भगवान् श्रीकृष्ण यों तो लील्मपुरुषोतम है, फिर मी मब अपनी सी प्रकट करते है तब मर्यादाका समान नहीं करते, स्थापना ही करते हैं। विधिका बतिक्रमण करके कोई साधमाके मामि वासर मही हो समता । पर यकी निष्कपटता, सचाई और सबा प्रेम विधि भतिक्रमणको भी शिमिल कर देता है। गोपियाँ भोकणको प्राप्त करने के लिये जो सामना कर रही थी, उसमें एक श्रुटि पी। वे शाख-मर्यादा और परम्परागत सनातन मर्यादाका उस्लान करके मन माम करती पा । पपि उनकी यह क्रिय बनानपूर्वक ही थी, वापि भगवान्के द्वारा इसका मान होना वावश्पक पा । मगवान्ने गोपियोंसे इसका प्रायश्चित्त भी करबमा । गो लोग भगवान् के प्रेमके मामपर विधिका उम्मान करते है, ठरें या प्रसङ्ग प्यानसे परमा चाहिये और भगवान् शास्त्रविधिका कितना बादर करते हैं, यह देखना चाहिये । धो मस्तिका पर्यवसान रागारिमका मळिमें है और रागारिमका मजि पूर्ण समर्पणके रूपमें परिमत हो नाती है । गोपियोंने पेधी मलिका ममुठान किया, उनका हदय तो रागारिमका मजिसे मरा मा पा ही। का पूर्भ समर्पण होना चाहिये । चीरहरणके शारापही काम सम्पन्न होता है। गोपियोंने जिनके लिये तोक-परलोक, स्वार्थ परमाप, माति कुम, पुरमन-परिजम मोर गुरुपनोंकी पस्प महाँ की, निमकी प्राप्ति के लिये ही उनका यह महाम् अनुष्यम है, निके चरणों में सम्होंने अपना सर्वत निकार कर रहा है, मिनसे निराकरण मिमनकी ही एकमात्र बमिमापा, मिराबरण रसमप भगवान् भीकृपके सामने से मिराबरण मापसे म मा सके-क्या यह उनकी साधमाकी वपूर्णसा नहीं है 11, माश्य है। मोर मा समझकर ही प्रेषियों निरापरणरूपसे उनके सामने गयौं । भीकृष्ण चराचर प्रातिके एकमात्र मधीवर रे समस्त क्रियामोंके कर्ता, मोजा और साक्षी मी ही है। ऐसा एक मी म्पक्त या मध्यक्त पदार्थ नहीं है, जो बिना किसी परदेके समके सामने न हो।पही सर्वव्यापक, बस्तर्यामी है । गोपियोंके, गोर्पोके मोर निसिक विमके यही बारमा । ।समें सामी, गुरु, पिता, मासा, सस, पति बारिक रूपमें मानकर मेग उहाँकी सपासना करते हैं । गोपियाँ सही मगवान्को नाम पूजकर कि पी मगवान् है --पही योगेमरेपर, भराभरातीत पुस्योचम है-पति के रूपमें प्राप्त करमा चाहती थी। भीमसागवत के दशम स्कन्धका प्रसाभावसे पाठ कर नानेपर यह बात बहुत ही स्पट हो माती है कि गोपियों श्रीकृष्णके पास्तविक तरूपको नानती पी, पहचानती पो । मेणुगीत, गोपगीत, युगगीत और श्रीरणके मम्ताम हो मानेपर गोपिनुके पग्वेषणमें यह बात कोई मी देख-मुम-समम सकता है। जो लोग भगवान्को भगवान् मानवे र मनसे सम्बन्ध रहते हैं, स्वामी-सम्मादिके रूपमें सरें मानते, सनके दपमें रोपियों के इस कोचर मापुर्यसम्पल मौर उसकी साबनाके प्रति सा ही कैसे हो सकती है। गोपिये की इस दिम्प मीगका जीवन उप प्रेणीके साधकले पिये भादर्श मीन है। श्रीकृष्ण जीवके एकमात्र प्राप्तम्य साक्षात् परमारमा है। हमारी मुदि, हमारी रएि देहवक ही सीमित है । इसलिये हम श्रीरण म०२२] दशम स्कन्ध २६९ - और गोपियोंकि प्रेमको भी फेवरु देहिक तया कामनाकामवित समझ बैठते है । उस वपार्पित और भप्राक्त डीवा को इस प्रकृतिके राज्य पसीट पाना हमारी स्पून वासनाओंका हानिकर परिणाम है ! नीयका मम मोगाभिमुख बासनावोंसे और तमागुणी प्रतियोंसे भमिमूत राता है। वह विषयोंमे ही घर-से-उधर भटकता यता है और बनेकों प्रकार के रोग-शोकसे वाकान्त रहता है। मन कमी पुण्यककि फल उदय होनेपर मगवान्की अधिप बईतकी क्यासे विषारका उदय होता है, सम भीप दुसम्यालासे त्राण पानेके दिये और अपने प्राणोंको शान्ति- मय घाम पचान के लिये समुक हो उठता है। यह मावान्के लीसाधार्मोकी यात्रा करता है, सत्सा प्राप्त करता है और उसके हृदयकी कपटी उस वाकाहाको लेकर, मो बबतक मुप्त पी, नगकर बरे वेगसे परमात्मा की बोर चल पड़ती है। पिरकाग्से विपयोंका ही मम्पास होनेके कारण बीच-बीचमें विषयोंके सरकार उसे सवाते हैं और बार बार विशेपोंका सामना करना पड़ता है। परतु भगवान्की प्रार्थना, फीर्सन, स्मरण, चितम करते-करते चित्त सरस हराने मगता है और धीरे धीरे उसे मगवान्की सनिधिका अनुमय मी होमे टगता पोषा-सा रसका मनुमव होते ही पित्त यर मेगसे सर्देश प्रवेश कर जाता है और मगवान् मार्गदर्शक के रूपमै संसार-सागरसे पार ले जानेवारी मावपर केकरके रुपमें अपना यों कहें कि साक्षात् वित्सरुप गुरुदेवके रूपमें प्रकट हो जाते हैं। ठीक उसी क्षण अमात्र, अपूर्णता मौर सीमाका बन्धन नष्ट हो जाता है, विशुद्ध मामन्द- विशुद्ध ज्ञानकी अनुभूति होने लगती है। गोपियाँ, मो वमी-अभी साधनसिन रोकर मगधन्की माता लीलामें प्रविष्ट होनेवावी है, घिरकापसे श्रीकृष्णके प्राणों में अपने प्राण मिला देनेके लिये उत्कण्डिस , सिदिशामके समीप पहुंच चुकी है। नवा जो निस्पसिद्धा होनपर भी भगवान्को इचाके अनुसार उनकी दिश्य लोग सहयोग प्रदान कर रही है, उनके उदयके समय मावोंके एकान्त माता श्रीकृष्णकी बाँसुरी बनाकर ठरें भाक्स करते हैं और मो कुछ उनके दपमें बचे-खुचे पुराने संस्कार है, मानो ठने घो टालनके लिये साषनामें लगाते हैं। उनकी कितनी दया है, वे अपने प्रेमियोंसे कितना प्रेम करते है. -यह सोचकर वित मुग्ध हो नाता है, गद्गद हो जाता है श्रीक्षण गोपियोंकि पोंके सपमें उनके समस्त संस्कारोके जागरण वपने हापमें लेकर पास ही कदम्बके इसपर पड़कर बैठ गये । गोपियों जल्में पा, वे नहमें सर्वम्यापक सर्वदर्शी भगवान् श्रीकृष्णसे मानो अपनेको गुप्त समय रखी थी-- मानो इस तत्वको मूम गपी पी कि श्रीकृष्ण बळमें ही नहीं हैसप जस्मरूप भी दी है। उनके पुराने संस्कार श्रीकृष्ण के सम्मुख नानेमें बाधक हो रहे थे, वे प्रीकणके लिये सब कुछ मूल गयी पा परस्त मबतक अपमको नहीं मूली थी। वे चाहती पी केवल पीकृष्णका, पर उनके संस्कार बीचमै एक परदा रना चाहते थे। प्रम प्रेमी और प्रियतम के बीच एक पुप्पका मी परदा नही रमना पासा । प्रेमकी प्राप्ति सपा म्ववानरहित, भवाघ और अन्त मिडन । नहातक वपना सबस-इसका विस्तार वाद नित्ना हो-प्रेमकी भागमें मस्म नही कर दिया माप्ता, महातक प्रेम वौर समर्पण दोनों ही वपूर्ण गते हैं । इसी पर्णताको दूर करते हुए, 'शुम मापसे प्रसन्न हुए' (शुरुमारप्रसारित ) श्रीरणने कहा कि 'मुझसे मनम्य प्रेम करनेवाली गोपियो ! एक बार, केवल एक बार अपने सर्पसको गौर नपनेको भी मूनकर मेरे पास आओ तो सही । तुम्हारे एप जो लम्यक स्याग है, उसे एक क्षण के लिये प्यक तो करो । क्या तुम मेरे लिये इतना भी मही कर सकती हो ।' गोपिपान मानो कहा-मीकृष्ण ! हम अपमको कैसे ! हमारी नमसम्मकी धारणाएं मन दे, तमन हम ससारके नगाध प्राप्लमें माकण्ठ मान है। बारका कर भी है। हम भामा पाहनेपर भी नहीं भा पासी है । श्यामसुन्दर ! प्राणोंके प्राण ! हमारा प तुमारे सामने उगमुक । । इम वहारी दासी हैं। तुम्हारी भाशाचों का पालन करेंगी। परन्तु हमें मिराबरण करके अपने सामने मन दुलालो।" ।

श्रीमदागवत [अ० २२ - सापककी यह दशा-मगवान्को चाहना र साथ ही संसारको मी न मेरना, संस्कारों में ही उठ रामा- मायाके परदेको बनाये रसमा, बबी द्विविधाकी दशा है । भगवान् यही सिखाते हैं कि 'संस्कारशून्म होकर, मिरारण होकर, मायाका परदा हटाकर खायो, मेरे पास आक्षो । बरे, तुम्हारा र मोरका परदा तो मैने ही मेन लिया है, तुम बत्र इस परदेके मोहमें क्यों पड़ी हो । यह परदा ही तो परमारमा बौर भीवके बीच बना म्यावान है। या हट गया, मका कम्पाण एवा । अब तुम मेरे पास बालो, तभी मुम्हारी चिरसधित बाकमाएँ पूरी हो सकेगी।' परमारमा श्रीकृष्णका यह वादाम, बारमाके वारमा परम प्रियतमके मिलमका यह मधुर भामत्रान मगरासे घिसके अन्त में प्रक हो आता है, वह प्रेममें निमम्न होकर सब कुछ गोरकर, मेगना मी भूलकर प्रियतम श्रीकृष्ण के चरणों में दो बाता है। फिर न उसे अपने बमोंकी पुषि रहती है और न म्मेगोंका प्पान ! न वह नगत्को देखता हैन भपनको । यह मगप्रमका रहस्य है। विगुर वौर वमय माकममें ऐसा होता दी है। गोपियों बापा, भीकृष्ण के चरणों के पास मकभाव से खड़ी हो गया। उनका मुसकमावनत पा । यत्किषित संस्कारयोष श्रीकृष्णके पूर्ण लामिमुख्यमें प्रतिबन्ध हो रहा था। श्रीकृष्ण मुसकराये। उन्होंने इशारेसे कहा- 'इतने बड़े स्यागमें यह सोच का है। तुम तो सदा निकम हो में इसका भी त्याग, त्यागके भाषका भी त्याग-स्पागकी स्मृतिका मी त्याग करना होगा। गोपियों की रविधीक्षण के मुसकाळपर पड़ी। दोनों आप अपने बाप जम गये और सूर्यमण्यालमें विराजमान अपने प्रियतम श्रीकृष्णसे ही उन्होंने प्रेमकी मिक्षा मोगी । गोपियोंके इसो सास त्यागने, इसी पूर्ण समर्पणने, इसी उम्पतम वात्मविस्मृतिने ठरें भगवान् श्रीकृष्ण के प्रेमसे मर दिया। वे दिम्य रसके वलौकिक प्राप्त मधुके अनम्स समुद्र में बने-सतराने लगा । वे सब कुछ भूक गया, मनपालेको मी भूल गयी, उनकी रछिमें बब श्यामसुन्दर थे। बस, केरा श्यामसुन्दर पे । मग प्रमी मज नारमविस्मृत हो जाता है, तब उसका दायित्व प्रियतम भगवान्पर होता है। का मर्यादारक्षाके लिये गोपियों को तो मसकी बावश्यकता नहीं थी। क्योंकि सरें बिस बस्तुकी बावश्यक्ता मी, म मिम पुकी पी। परन्तु प्रोकृष्ण अपने प्रेमीको मर्यादाप्युत नहीं होने देते। ये सयं स देते हैं और अपनी नमूनमयी वाणीक द्वारा उमें विस्मृप्तिसे सगावर फिर मगढ़ में छाये है। श्रीकृष्णम करा--. --गोपियो। सामी हो। तुम्हारा प्रम मीर तुम्हारी साधमा मुझसे छिपी महा है । तुम्हारा सम्म सत्य होगा । हारा य सास-तुम्हारी यह कामना तुम उस परपर स्थित परती है, जो निस्सारस्पता कर निकामताका । तशारा उद्श्य पूग, तुमारा समर्पण पूग बार मागे लानेवाली शारदीय रात्रियोंमें हमारा रमण पूर्ण होगा । मगवान्ने साधना समय हानेकी मावि निर्धारित कर दी। इससे भी स्पष्ट है कि भगवान् श्रीरप्णमें किसी भी कामविकारकी कापमा मही दी। कामी पुरुषका चित्त बमहीन सियोंको देसफर एक क्षणके लिये भी कम बशम रह सकता है। एक बात ही पिग है। भगवान्क सम्मुम्प जानेके परम को बम समर्पणकी पूर्णतामें माधक हो 24--क्षिपमा मकर रहप-बड़ी भगवान्दीपा, प्रेम, सामिप्य और बादाम प्राप्त होमके पधार 'प्रसा स्वरूप दो गय । इमस कारण स्पा । इसा फारण १ भगवान्का उम्पन्ध । भगवान्म जपन सापसे हम बोका टटापा पा और फिर उन्हें अपन उत्तम वा पर रस किया था । मीचे शरीरमें पालन की सारिया मावान्ने पार पामर--ननका मस्पर्श पार कितमी भप्राकृत रसारमबागपी, कितनी पवित्र--मया गपी सफा मनुमाम कौन गा सकता है । सन्मे यह ममार तमीतक बाधक और शिमा ८, क पर मगपान्मे मापद बौर भगवानका प्रसा मही हो माता । उन द्वारा प्राप्त होनेपर तुम सती.

अ० २२] - तो यह बन्धन ही मुक्तिखरूप हो जाता है । उनके सम्पको नाकर माया शुद्ध विषा बम मासी है । संसार और उसके समस्त कर्म अमृतम्प मानम्दरससे परिपूर्ण हो जाते हैं । सामवाफा भय माता । कोई मी कारण भगवान्क दर्शनसे पश्चित नहीं रख सकता । मरक नरक नहीं रहता, मगवान्फा दर्शन होते रहने के कारण यह बैकुण्ठ बन नाता है। इसी स्थितिमें पहुँचकर बो-हे साधक प्राक्त पुरुष समान माचरण परसे हुए-से दीसते हैं। भावान् श्रीकृष्णकी अपनी होकर गोपियों पुन वे ही वस्त्र धारण करती है अपना श्री ही बस धारण करते है, परन्तु गोपियोंकी रहिमें अब ये बस नहीं है, वस्तुत मी मही-मब तो ये दूसरी ही वस्तु हो गये हैं। अब तो ये मगवान्क पावन प्रसाद है, पल-पपर मगरान्का स्मरण करानेवाले भास्के परम सुन्दर प्रतीक है। इसीसे उपोंमे सीकार भी किया। उनकी प्रेममयी स्पिति मर्यातक उपर थी फिर भी उन्होंने मगवान्की इसे मर्यादा सीकार की। इस रहिमे विचार करनेपर ऐसा जाम पड़ता है कि भगवान्की पप पीचरण-सीला मी कम्य लीपोंकी माँति ठग्यतम मर्यादासे परिपूर्ण है। मगधन् श्रीकृष्णकी मीणोंके समय केवळ केही प्राचीन बामप प्रमाण है, जिनमें सनकी सीमाका वर्णन हुआ है। उममेंसे एक भी ऐसा अन्य नहीं है, जिसमें श्रीकृष्णकी मगबचाका वर्णन म हो। मीहष्ण 'सयं मगधन् ।, यही मात सर्वत्र मिरती है। मो भीकृष्णको मगवान् महा मानते, यह स्पष्ट है कि वे उन प्रबोंने भी नहीं मानते । और दो सम इन्पो को ही प्रमाण महा मानते, वे मनमें वर्णित मीमायके वाधारपर श्रीकण परित्रकी समीक्षा करने का अधिकार भी नहीं रखते । मगवान्को प्रेमानोंको मानवीय परित्रके समका रसना शास्त्र-रहिसे एक महाम् अपराध है और उसके अनुकरणका तो सर्वथा ही निषेध है । मानवमुनि-यो स्थूलतामोंसे ही परिपेरित है केवल नरके सम्बन्धमें ही सोच सकती है, मगवाम्की दिम्प चिन्मयी तीमके समय कोई फापना हो नहीं कर सकती । पर पुदि मापं ही नपमा ठपहास करती है, मो समस युतियों के प्रेरफ पौर युमियोंसे कयन्त परे रहनेवाले परमारमाकी दिम्य स्पेलगको अपनी कसौटीपर कसठी है। एप और पुद्धिके सर्वया विपरीत होमेपर मी यदि पोड़ी देरके लिये माम में कि श्रीकृष्ण मगवान् नही पा उनकी यह लोग मामी पी, सो मी तक भोर युनिके सामने ऐसी कोई बात नहीं टिक पाप्ती सो श्रीकृष्णके परित्रमें छाछन हो। श्रीमद्भागवतका पारापण करनेवाले नानते कि इनमें श्रीकृष्णन वक्त ग्यारह वर्षकी भस्सातक ही निवास किया पा ! यति रामगेगका ममय सौ वर्ष माने, सो नौ बर्षम ही चीरहरण- पीलम हुई पी। इस यातकी करना भी नहीं हो सकसी कि पाठ-मौ वपके बायकम कामोसजना दो साली है। गाँवकी गंगारिन ग्यासिने, हाँ वर्तमानाकी मागRक मनोवृत्ति मही पाच पापी है, पक नाट-नो पके बाकसे अवैध सम्बन्ध करना चाहें और उसके रिये साधना करें ---पर कापि सम्भव नारी दीमता । सम कुमारी गोपियों के मनमें फलति इति थी, यह बतमाम कषित मनोतिकी टारना । वासकल जैसे गवकी छोरी छोटी छाक्यिा रामा सा कर और 'उमगा सा देपर पाने के लिये देवी टेस्तामोको पूना करती है, वैसे दी उन इमारपीने मी परम मुम्दर परम मथुर श्रीक्षणको पाने के यि देवी-ममम और अन दिय थे। इसमें दोपकी कौन-सी बात है। धामकी वात निरासी । मोगप्रधान दौम सा नानसम्प्राय और नामस्नान भी बन ! उनकी रि इन्द्रिय-मितको मीमित है। मारनीय मनोहति म ठतमग्नि प्यापारवे विर मानस्नान एक 11 मा कि पशुजका मामबाग है । शास्त्रों में इसका निपर , न मग्न स्नापार'-पार शास्त्रकी महा है । घोरण नहीं चाहते थे कि गाविप शस्त्रके किरद नाघरग बरें। देवउ किक बनय ही २७२ भीमद्भागवत [२० २२ -- मोसुक उपाय भीशुकदेवजी काते है-परीक्षित ! मावान्की यह वादा पाकर वे कुमारियों मावान् भीकमके चरण- इत्यादिष्टा भगवतालन्धकामा: फुमारिफाः । कमका प्यान करती ई नानेकी इच्छा न होनेपर मी यो कससे प्रममें गयीं। मब उनकी सारी कामनाएं पूर्ण म्पायन्त्यस्तस्पदाम्भोज कच्छामिर्षिविशुम्रजम्।२८। हो चुकी थी ॥ २८ ॥ नहीं-मारतीप प्रषियोंका र सिमान्त, मो प्रत्येक बस्वमें पृथक्-पृपा देवताओंका वस्तित्व मानता है इस नग्नस्नामको देवताओं के विपरीत बताता है। श्रीपण मानते थे कि इससे बरुण देवताका अपमान होता है। गोपियाँ अपनी बभीह-सिसिके लिये जो तपस्या कर रही पी, उसमें उनका नग्मस्मान बनिए फल देमेवामा पा नौर इस प्रपाक प्रमाव हो यदि इसका विरोष म कर दिया जाय तो बागे पाकर इसका विस्तार हो सकता है, इसलिये श्रीकृष्णाने मर्गकिक रंगसे निफ्ध कर दिया । गोगोंकी म्याक्निोंको इस प्रपाकी पुराई किस प्रकार समभापी माय, इसके लिये भी श्रीकृष्पमे एक मौलिक सपाय साचा । पदिये गोपियोंके पास नाकर ठमें देवताबादकी फिगसफी समतासे, तो ये सरतासे मही समझ सकती पौ । उमें तो इस प्रपाके कारण होने वाली विपत्तिका प्रत्यक्ष अमुम्ब करा देना पा । वीर विपत्तिका बनुमा कराने के पश्चात् उनहोंने देवताओंके अपमानकी बात मी बता दी तपा ममति मंधकर क्षमा-प्रार्थनारूप प्रापषित भी करवाया । महापुरुषों में उनकी बाम्यावसामें भी ऐसी प्रतिमा देसी जाती है मीरुण पाठ-मी वर्षके थे, उनमें कामोरबना मह हो सकती गौर नमनामकी कुप्रपाको मट करनेके रिसे उन्होंने चोरहरण किपा-यह उचर सम्मन होनेपर भी मूसमें वाये हुए 'काम' वौर 'रमण' शब्दोंसे कई लोग भड़क उठते हैं। यह केस शम्दकी पकर, विसपर महात्मालोग प्यान नहीं देते । शुतियोंमें बोर गीतामें भी बनेकों बार 'काम', 'रमजा और प्रति बादि शब्दोंका प्रयोग हा है। परन्तु यहाँ उनका वलीन वय महा होता । गोतामें तो धर्माविरुव कामा को परमरमाका मरूप बताया गया है। महापुरुषोंका बारमरमण, मारममिथुन और पारमरति प्रसिर दी है। ऐसी स्थितिमै केक कुछ सम्दोको देखकर मरकमा विचारशील पुरुषोंका काम नहीं है। वो भीकृष्णको केवल ममुप्प समझते हैं में रमण और रविशन्दका वर्ष केनम कीग अथवा सिल्भर समझना चाहिये, नैसा कि म्याकरणके अनुसार ठीक है-५मु माययाम् । इति मेदसे श्रीकृष्णकी मीष मिम-मिम रूप दीस पाती है। प्यारमबादी मीरणको वात्माके सपमें देखते रमौर गोपियोंको इतियोंके रूपमें । हतियोंका वावरण मध हो बाना ही "पीयरम-सीमा और उनका बारम्पम रम माना ही रास' है । इस रहिसे मी समस्त सीसामोंकी संगति बैठ जाती है । भक्तोंकी रठिसे गोपोकाधिपति पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णका यह सब मिस्यसीमा विम्मस है और मनादिकामसे क्सकासतक यह निस्प चलता रहता है। कभी-कभी भलोपर रुपा करके वे अपने निग्य पाम और लत्प सम-सहरियों के साप होन-धाममें प्रकट होकर टीम करते हैं और मजे के सारण चिन्तम तपा मानम मङ्गको सामग्री प्रकार करके पुन बम्तर्धान हो जाते हैं । साधके लिये किस प्रकार कृपा करके भगवान् मागम और मनादिकाठसे सधिन संस्कारपरको विद कर देते हैं, पर बात मी इस पीरहरण-मीणसे मकर रोती है। मावान् की योग रास्यमपी है, उसका तस के मगवान् की बामते हैं और उनकी सासे उनकी मीमामें प्रति माग्पान् मह कुरामा नामसे हैं । यहाँ तो शाों और संतोंकी पामीके नाधारपर ही कुरा मिनकी एएता की गयी है। हनुमानप्रसाद पोरार । - ।

य०२२] दशम स्कन्ध २७३ . । अप गोपे। परिश्तो भगवान देवकीसुतः । प्रिय परीधित् ! एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण बलराम बी और वासवाणके साथ गौएँ घराते हुए स्थापनसे इन्दालना मतो दूर चारपन् गा सहाज ॥२९॥ मात दूर निकए गये ॥ २९ ॥ प्रीष्म ऋतु पी। सूर्यको किरणें बहुत ही प्रम हो रही पी । परन्तु ममे-धने पक्ष निदापात सिग्मे छायाभिः स्वाभिरास्मनः। मगवान् भीकृष्णके उपर इत्तेका काम कर रहे थे। आतपत्रापितान् वीक्ष्य माना जौकसः ॥३०॥ भगवान् श्रीकृष्णने पक्षों को भया करते देस लोककृष्ण, अनु, श्रीदामा, मम, मर्जुम, विशम, सुषम, वेवसी, हे स्तोककष्ण हे अंशो भीदामन सुबलार्जुन । देवप्रस्म औरपरूपप नादि ग्वाम्माको सम्बोधन करके कहा--॥ ३० ३१ ॥ 'मेरे प्यारे मित्रो ! देशो, ये वृक्ष विशालपम तेजस्विन् देवप्रस पस्यप ॥३१॥ कितने माग्यवान् हैं ! इनका सारा भीवन कवस दूसरों- की मम्मई करनेक छिपे हो है । ये स्क्प तो हवाके पम्पतेवान् माभागान् पराबैंकान्तजीवितान् । ओंके, वर्ग, धूप और पाग-सब कुछ सहते है, परत हमोगोंकी समसे रक्षा करते है॥ ३२ ॥ पासबवपरिमान सान्तो पारयन्ति नः ॥३२॥ | में करता है कि इन्हींका मीन सबसे श्रेष्ठ है। क्योंकि हमके शरा सब प्राणियोंको सारा मिलता है, उनका महो एपो पर मन्म सर्वप्राण्युपजीवनम् । जीवन-निर्वाह होता है। जैसे किसी सनन पुरुषके घरसे कोई याचक मारी हाप नहीं मौरता, से ही इन पोसे सुजनस्पेव मेपी चे विमुखा पान्ति नार्षिन ॥३३॥ भी समीको कुछ-म-कुछ मिल ही आता है ॥ ३३ ॥ पे अपने पचे, फल, फस, छपा, मस, मछ, एकती, गम्ध, पत्रपुष्पफलछायामूलपरकलदारुमिः गोद, रास, कोयला, भार बोर कपसे भी लोगों की गन्धनिर्यासभसास्सिोक्मेकामान् नितन्यते॥३४॥ कामना पूर्ण करते है॥३॥ मेरे प्यारे मित्रा । ससारमें प्राणी तो बहुत है, परन्तु ठमके नीवनकी सफलता एतापसन्मसाफल्म देहिनामिह देहिषु । इसनेमे ही है कि महोतक हो सके अपने घनस, विवेक- निधारसे, वाणीसे वौर प्राणोंसे भी ऐसे ही कम किसे प्रापैरधिमा पाषा श्रेय एवाचरेत् सदा ॥३५॥ जाय, जिनसे दूसरोंको मथाई हो ॥ ३५ ॥ परीक्षित् ! दोनों बोरके पक्ष नयी-नयी कोंपणे, गुम्ने, फल-फूलों इति प्रवालस्वपकफलपुष्पदलोस्करै । और पोसे छद रहे थे । सनकी तापियाँ पुप्पीतक तस्यां नमशास्त्राना मम्मेन यमुनों गतः ॥३६॥ मुकी हुई इस प्रकार माषण करते हुए मगवान् श्रीकृष्ण उन्होके बीचसे यमुना-सटपर निकल जाये॥१६ वत्र गाः पापपिस्वाप सुमधा श्रीवला शिवाः। रामन् 1 यमुनानीका बल बहादी मधुर, शीस और सकपा। उनोगोंने पहले गौमोंको पिजाया और इसके ततो नृप म्वम गोपाः फार्म खाइ पपुर्णतम् ॥३७॥। बाद सर्प मी नी भरकर सादु बनका पान किया ॥३७॥ | परीक्षित् ! मिस समय वे यमुनानोके तटपर हरे-भरे हस्सा उपपने कामं चारयन्त उपवनमें बड़ी सतन्त्रपसे अपनी गौएँ चरा रह थे, उसी पशुन् नप 1 १ सिमागे । २ सामा। भेपमाचरणया - २७४ श्रीमहागवत [२० २३ कृष्णरामायुपागम्य सुधार्मा इदमनुषन् ॥३८॥ समय कुछ मूने वाोंने भगवान् श्रीकृष्ण और बनाम मीके पास भाकर यह बात कही-॥ ३८॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहस्यों संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वाध गोपीपखापहारो माम द्वाविंशोऽध्याय ॥ २२॥ गोपा अः अथ त्रयोविंशोऽध्याय पहपसियोपर रूपा म्याग्बालोंने कहा-मयमाभिराम बलाम ! तुम बड़े पराक्रमी हो। हमारे वित्तमोर श्यामसुन्दर ! तुमने राम राम महावीर्य कृष्ण दुष्टनिवर्षण । बोबडे दुष्का संहार किया है। उन्ही दुरों के समान एपा ने बाधते शुभस्तम्छान्ति फर्तुमर्हयः ॥१॥ भी बुधानेका कोई उपाय को ॥ १ ॥ या मूस मी हमें सता रही। मत तुम दोनों इसे भीत्सुक यात्र भीशुकदेषनीने करा-पीक्षित् ! बब मामबाने देवकीमदन भगवान् भीकृष्णसे इस प्रकार प्रार्थना की, इति विज्ञापितो गोपैमंगवान् देवकीमतः। तब उन्होंने मधुराकी अपनी मळ प्रामगपलिपोपर भक्कापा विप्रभार्यायाः प्रसीदमिदमप्रभीत् ॥ २॥ वाह करने के लिये यह बात कही-॥२॥ मेरे प्यारे मित्रो ! यहाँसे पोपी ही दूरपर पेदादी बामण वर्गको प्रयात देवपजन प्रापमा प्रयवादिनः । काममासे पाशिरस नामका या कर रहे है। तुम धमकी पाशाम जावो ॥३॥ ग्यानबामो ! मेरे मेननेसे सत्रमागिरस नाम मासते स्वर्गकाम्पया ॥३॥हाँ माकर तुम मेग मेरे बर माई भगवान् श्रीबहराम तब गवौदन गापा माधतामविसर्भिता । मीका और मेरा नाम लेकर कुछ पोस-सा भात-- मोजमकी सामग्री माँग छाये ॥ ॥ अब मावान्ने फोर्सयन्तो भगवत मार्यस्य मम पाभिधाम् ॥ ४ ॥ ऐसी थाहा दी, तब म्बामबार उम नामोंकी पासात्म में गये और मनसे मगवान्की माहाके भनुसार ही कम इस्पादिया भगवता गस्वायाचन्त ते तथा । माँगा। पहले उन्होंने पृप्तीपर गिरकर दणापत् प्रणाम कताजलिपुटा विमान दमावत् पतिता सवि ॥ ५॥ किया और फिर हाप नोइकर कहा--|| ५ ॥ पृषीके मर्तिमान् देक्ता मामलो ! वाफ्का कल्याण हो । मापसे हे भूमिदेवाः भूत रुणस्यादेशकारिणः । निवेदन है कि हम प्रस्के पाले है । भगवान् श्रीरण प्राप्तामानीत मद्रवो गोपान्नोरामवोदितान्॥ ६॥ ौर परामकी बाबासे हम वास्के पास बाये है।गप | हमारी बात सुनें ॥ ६ ॥ मगवान् बाराम मीर श्रीकृष्ण गापारयन्तापविदर मोदन गौएँ चराते र यहाँसे पोड़ी ही दूरपर वाये गए। रामापुती पो लपवो डाधिसौ। स, इस समम मम ममी और वे चाहते हैं कि १ मागा पमुनागमम नाम शापिंधविक्मो । २ ले म तिवू ।

अ० २३] दशम स्कन्ध २७५ - बमोदिजा ओदनमर्थिनोर्यदि बापजोग ठरें पोरा-सा मात दे। बामणो! भाप धर्मका मर्म जानते हैं। यदि मापकी प्रथा हो, वो उम भदा च यो यन्छत धर्मविचमाः ॥७॥ मोममाड़ियोंके लिये कुछ मात दे दीनिये ॥७॥ सननो। जिस यादीमा पशुबलि होती है, उसमें और सौत्रामणी दीक्षायाः पशुसंस्थायाः सौत्रामण्यामसचमा । यहमें दीक्षित पुरुपका मन नहीं खाना चाहिये । इनके अतिरिक और किसी भी समय किसी भी यसमें दीक्षित पुरुषका मी बम सानेमें कोई दोष नहीं है।॥८॥ अन्पत्र दीक्षितसापि नाममभन् हि दुम्यति ॥८॥ परीक्षित् ! इस प्रकार मगवानके गम माँगनेकी बात समकर मी ठन बाझोंने उसपर कोई प्याम नहीं दिया। इति ते भगवपासांभृण्वन्तोऽपि न शुभषः । ये चाहते पे सर्गादि तुछ फल और उनके लिये बड़े-बड़े कमि उलझे तुए थे। सच पूछो तो वे ग्रामण झामकी क्षुद्राशा भूरिकर्माणो पालिसा पदमानिनः ॥९॥ सिसे ये बालक ही, परन्तु वपनेको मदा कानहर मामते मे ॥९॥ परीक्षित् । देश, काल, अनेक प्रकारकी देवः कालः पृथगद्रव्य मन्त्रवन्त्रविमोऽययः । सामप्रिपा, मिल-मिन कमि बिनियुक्त मन्त्र, अनुष्ठानकी पद्धति, अतिवनमा वादि या करानेवाले, बग्नि, देवता यबमानय ऋतुर्धर्मध यन्मयः ॥१०॥ देवता, यनमान, यह मौर धर्म-इन सव सोम एक- मात्र भगवान् ही प्रकट होहे॥१०॥ देही प्रम परम साक्षात् भगवन्तमधोषजम् । इन्द्रियातीत परबम भगवान् श्रीकृष्ण वय पाममा के द्वारा भात मांग रहे हैं। परन्तु इन मूलनि, नो वपनेको शरीर ही मनुप्पष्टया दुप्पामा मात्मानो न मेनिरे ॥११॥ माने बैठे हैं, भगवान्को मी एक साधारण मनुष्य ही माना और टमका सम्मान नहीं किया ॥ ११॥ परीक्षित ! न से पदोमिति प्रोनुर्न नेवि प परंतप । मम सन ग्रामोंने हों या मार-कुछ नहीं कहा, तब ग्बामामोंकी वाण टूट गयी, वे मोट भाये वोर गोपा निराशाः प्रस्पेस्प वयोचुः कृष्णरामयो॥१२॥ यहाँकी सब बात उन्होंने मीकृष्ण तया बम्यमसे कर दी ॥१२॥ सनकी बात सुनकर सारे मगरके स्वामी तदुपाकर्ण्य भगवान् प्रहस्स बगदीघाः । । भगवान् श्रीकृष्ण हंसने लगे। उन्होंने मालबालोको | समझाया कि संसारमें असफलता तो बार-बार होती है, प्पामहार पुनर्गोपान दर्शमैंठौकिकी गतिम् ।।१३॥ नफरता मिल ही जाती है । फिर उनसे उससे निराश नहीं होना चाहिये, मार-मार प्रपात करते मां मापयत पत्तीम्पा ससंघर्पणमागवम् । कहा-॥ १३ ॥ मरे प्यारेलालबारो! इस बार तुम रोग उनकी पत्तियों के पास गाओ और उनसे कहो कि राम और 'पाम पो मापे म धितना पाहांगे दास्सन्ति काममन्न पाखिग्धामप्युपितापिया॥१४॥ उतना मोगम ये रेंगी। वे मुससे बसा प्रेम करती उनका मन सा-सर्व मुममें गा रहता ॥१॥ गस्वाप पसीनालायो रमाऊमीनाः म्यतताः । भारी बार मापबार पतीशाय गये पर जाकर | देना तो माफोकी पतियों सुन्दर पर या और ।

भीमद्भागवत [अ० २३ ही दूरपर षयम् ॥१६॥ नत्या द्विजमतीर्गोपाः प्रमिता इदमहवन् ॥१५॥ | गहनोंमे सन-धमकर बठी है। उन्होंने हिमपतियोंको प्रणाम करके पसीनम्रतासे पायात कडी--॥१५॥ पाप नमोवो विप्रपनीम्पो नियोधत पासि नः। बिमपतियोंको हम नमस्कार करते हैं। नाप रूम | करके हमारी बात सुनें । भगवान् श्रीक्षण यहाँसे मोती जाये इतोऽपिवूरे घरवा कृष्णनेहेपिता पए है और समोंने ही हमें मापके पास भेमा है। १६॥ वे मालवाट बौर बलराममीके साप गामारपन् स गोपालः सरापो दूरमागतः । गौर पराते हुए इधर बहुत दूर वा गये है। इस समय हनें और उनके सादियों को भूख लगी है। बाप ठमके लिये कुछ मो मम दे ॥१०॥ परीक्षित् | ये ग्रामपियों पुमक्षितस तस्सान्न सानुगस प्रदीयताम् ॥१०॥ मात दिनों भामान्की मनोहर की धरती थी। उनका मन उनमें लग चुका पा । वे सदा-सदा इस भुत्वाच्युतमुपायातं नित्यं सदर्सनोस्सुकाः । बात के लिये उत्सुक रहता कि किसी प्रकार भीकणके दर्शन हो नाय । श्रीकृष्णकेवानेकी बात सुमते ही वे सताबी हो तत्कपाक्षिप्तमनसो पम्पूर्माससम्ममाः ॥१८॥ गयी।१८। उन्होंने वर्तमि भयन्त सादिक वीर हितकर माप, मोग्य, नवीर चोप्प-पारों प्रकारकी भोजन चतुर्वि पहुगुणमममादाय मापनः । सामग्री से की तपा माई-बन्धु, पति पुओंके रोकते हमेपर मी अपने प्रियतम मगधन् श्रीकृष्णके पास मामेके लिये मभिससः प्रियं सर्वाः समुद्रमिव निमगाः ॥१९॥ घरसे निकल पड़ी-ठीक वैसे ही, पैसे नदियों समुद्र के पि । क्यों न हो न माने कितने दिनोंसे पवित्र निपिम्पमानाः पतिभिर्मादमिर्वन्धुभिः । कीर्ति मगवान् मीकमके गुभ, लीग, सौन्दर्य बोर म्मधुर्य वारिका वर्णन पुन-सुनकर ठोंने उनके भगवत्युचम लोके दीर्पभुतपतालयाः ॥२०॥ परणोफर अपमा दप निछावर कर दिया पा ।१९-२०) प्राममपलियनि माकर देखा कि पमुमाके तटपर मये-नये यमुनोपवनेऽशोकनवपल्लवममिते कोपसे शोम्मपमाम बसोकनमें गामबालोंसे मि विचरन्वं पूर्व गोपैः सायचं दाशुः स्त्रिया ॥२१॥ ए बलरामबीके साप श्रीकृष्ण घर-घर धूम रहे १॥ २१॥ हमके सांबले शरीरपर मनहम्म पीताम्बर | विमिन्म रहा। गले में बनमाण लटक रही है। सामं हिरण्यपरिषि पनमास्पबई मस्त्रकपर मोरपंसका मुकुट । वा-याम रंगीन भातुमोंसे चित्रकारी कर रहै। मये-नये कोपमेक भातुप्रचालनटवेपमनुव्रांसे | गुम्छेपारीरमें गाकर मटका-सा वेष बनारसाएकाप | बानेरुसाग्वालबाल्के कंधेपरसाए और दूसरेहा- पियस्तास्तमितरेण घुनानमचं से कमसा न मचा रहे । कामोमें कमल के कुमार है, कपोकोपर (पराठी बस में स्टक सी वोर मुस- कास्पलालककपोलमुस्वान्यासम् ॥२२॥' मा मन्द-मन्द मुसकानकी रेपासे प्रश्चित हो या म० २३] दशम स्कन्ध २७७ मेग इस प्रायाभुतप्रियतमोदयापूरै है॥२२॥ परीक्षित ! मकसक माने प्रियतम श्यम सुन्दरके गुण बोर लीलाएँ अपने कानोंसे धन-सुनकर चन्होंने अपने ममको ठहकि प्रेमक रंग रंग वाल पा, पसिन् निमममनसम्तमयाधिरन्धः । सीमें सराबोर कर दिया था। अब मेनोंदे मार्गसे हमें भीतर ले जाकर बहुत देरतक वे मन-ही-मम सनका माशिम करती रही और इस प्रकार छनोंने अपने हृदयकी बलन शान्त की-बैक से ही, मैसे मागत् अन्तः प्रवेप सुधिर परिरम्प ताप लौर सप्न साओं की प्रचियों या मैं भाषसे सख्ती रहती है, परत अप्ति अवस्थामें उमके मभिमामी प्राइको पाकर उसीमें मीन हो जातीर और प्रा पाभिमापो विमनरेन्द्र ॥२३॥ इनकी मारी बलम मिट जाती है ॥ २३ ॥ सास्तपात्पकसाशा प्राप्ता प्रात्मदिराक्षया। प्रिप परीक्षित् ! भगवान सबके अपनी बात मानते १, सबको मुद्रियोंके साक्षी है। उन्होंन अम देखा कि से ग्राममपस्मियों अपमे माई-बापु वीर पति-पुत्रोंके रोकन- विझायाखिलाग्द्रष्टा प्राह प्रासिवाननः ॥२४॥ पर भी सब सगे-सम्बन्धियों मोर विषयोंकी बाशा छोर कर कबळ मेरे दर्शनकी हालसासे ही मेरे पास बापी स्वागत यो महाभागा आस्यता फरवाम किम् । है, तबाहोंने ठमसे कहा। उस समय उनके मुखारविन्द परहास्यकी तरङ्गपठसेलिया करही पा॥२॥ मगवान्न कहा-महामाग्यश्वी देवियो ।तुमाग सागस है। जामो, यो दिखया प्राप्ता उपपन्नमिदं दिया ॥२५॥ दर्शनकी इमसे यहाँ प्रयी हो, पह तुम्हारे जैसे प्रम- छोकहो, हम तुम्हारा म्या स्वागत करें। मोगहमारे पूर्ण एयबालोंके योग्य ही है ॥ २५॥ इसमें सादेव नन्यदा मयि कुर्वन्ति समाः स्वार्थदर्शनाः । माही कि संसारमें अपनी सची मनाईको समधनेवाले जितने भी बुद्धिमान् पुरुष,वेभपन निफ्सम समाम ही मुझसे प्रेम करते हैं, और एसा प्रेम करने हैं, मिममें अतक्यम्याहिसा भक्तिमात्मप्रिये यथा ॥२६॥ किसी प्रकारको काममा नहाँ राती-- जिसमें किसी प्रकारका म्यषधान, साहोच, छिपाव, दुविधा या देत नहीं होता ॥ २६ ॥ प्राण मुधि मन, शाम, समन, प्राणहिमनाम्वास्मदारापस्यपनादयः सी, पुत्र मौर धन मारि समुपकी ममी रस्तुएँ सिक गिये और निसकी सग्निधिसे पिप सगतीह-स भारमासे, परमारमासे, मुम भीषणसे गाकर और फोन परसम्परा पिया मासंस्ततः फोन्नपरः प्रिय ॥२७) पारा हो सकता है ॥ २७ ॥ इसठिये तुदाय माना उचित होम गारे प्रमका बमियम्दन परखा। वन यात देवपजनं पदयो बो द्विजातयः। परवा तुमयोगमा दर्शन कर चुकी । पर जामी माडामें बोर पामो । नुमारे पनि मग गास्स । तुम्हारे माप मिकर दी जामा पा पूग पर बम पारपिप्यन्ति पुष्माभिगृपमेधिन ॥२८॥ सकेंगे ॥ ८ ॥ १ मापीन पीने सर्व पम्पादिम्पले भीमगगनुपापा ना भरित पर ११२ पापा २७८ श्रीमद्भागवत [२०२३ परम्प उखु माएपपक्षियों ने कहा-अन्तर्यामी स्पामसुन्दर । मेष विभाजति भमपान मदितुं नृशंस वापकी यह बात मिष्ठरतासे पूर्ण है। आपको ऐसी बात नहीं करनी चाहिये । शुतियों कहती है कि मो सस्पं रुप निगमतप पाइपूलम् । एक बार मगवानको प्राप्त हो जाता है, उसे सिर ससारमें नहाँ छौटना पड़ता । बाप अपनी या वेदवानी प्राता पर्य मुलसिदाम पदावरप्ट सस्य कीनिये। हम अपने समस्त सगे-सम्बन्धियों की बाझाका छान करके वापके घरणाम इसलिये वापी केपनियोद्धमतिलापसमलमधून् ॥२९॥ है कि वापके चरणोंसे गिरी उम्मीकी मात्रा अपने केमि धारण करें ॥ २० ॥ स्वामी। मब हमारे गृहन्ति नो न पसमा पितरी मता पा पति-पुत्र, माता पिता, माई-बन्धु और स्वजन सम्बन्धी हमें स्वीकार नहीं करेंगे। फिर दूसरोंकी तो बात ही न मानन्धुसुदात एक चान्मे। क्या है। वीरशिरोमणे । बम हम भापके परम बा वस्मात् मवस्प्रपदयोः पतिवारमना नो पसी में और किसीका सहारा मही है। इसलिये बम हमें दूसरोकी शरणमें न नाना पड़े। ऐसी म्पपत्ता नान्याभव गतिररिन्दम तदविधेहि॥३०॥ कीषिये ॥१०॥ भीभगवानुवाच भगवान महममे करा-देखियो ! तुम्हारे पति- पुत्र, माता-पिता, माई-बन्यु-कोई भी तुम्हारा तिरस्कार नही करेंगे। उनकी वो बात ही क्या, सारा संसार पतयो नाम्पायेरन् पिवमासमतादयः। उमाय सम्मान करेगा। इसका कारण है। तुम मेरी हो गयी, मासे पुण हो गयी हो । देखो न, लोफाम दो मयोपेता देना अप्पनुमन्यते ॥३१॥ देवता मेरी बातका अनुमोदन कर रो। ॥ ११ ॥ | देक्यिो ! इस संसारमें मेय वा-माही ममुर्पोम मेरी न प्रीतयेऽनुरागाय पङ्गसङ्गो नृणामि । प्रीति पा अनुरागका कारण मही है। इसलिये तुम माधो, बपना मन मुझमें भगा दो । तरें मात शीघ्र उन्मनी मपि युजानामपिरान्मामवाप्सय ॥३२॥ | मेरी प्राप्ति हो बायगी ॥ ३२ ॥ भीशुकदेवजी करते हैं परीक्षित् सब मगवान् में इस प्रकार का, तब वेवासमपनियों पाशाम और गये। सन मार्गाने अपनी नियमिमिक भी इस्पुरका मनिपस्न्यस्ता यमबाट पुनर्गताः । दोषी नही की। समकेसाप मिफापना का मा किया ॥ ३१ ॥ उन खिोमसे एकको माने से पानसूसमा स्वामि:सीमिः सयमपारपन् ॥३३॥ समय से उसके पति ने बरपूर्णक रोक लिया था। इसपर उस गणपनीने मगवान्के से ही वरुपका म्यान किया, जैसा कि गत दिनोंसे पुन रक्सामा । का विश्वा भर्ना भगवन्तं यथाभूतम् । अब उसका पाम नम गया, तब मनपी-मन मगधन्का निमभिमाप । म मम्प । मीमुक उवाच २७९ म० २३] दशम स्कन्ध दोपगुप्त विबही देई फर्मानुषन्धनम् ॥३४॥ बागिन करके उसने फर्मक शारा बने हुए अपने शरीरको ओर दिया-(शुद्धसत्त्वमप दिम्य शरीरसे उसने भावान्की सम्मिपि प्राप्त कर ली ) ॥२४॥ भगवानपि गोपिन्दस्तेनेषान्नेन गोपफान् । | घर मगवान् भीकृष्णने मापणिपोंके साये ए उस चार प्रकारके बमसे पहले ग्यासबागेको मोवन कराया और फिर उन्होंन सय मी मोनन किया ॥१५॥ पतुर्विधनाशयिस्वा स्वयप पुसजे प्रसः ॥३५॥ परीधित् ! इस प्रकार श्रीगमनुष्य भगवान् श्रीकृष्णमे मनुष्यकी-सी हीण की और अपने सौन्दर्य, माधुर्य, लीलानरवपुर्नुलोकमनुशीलयन् । वाणी तपा कोसे गौएँ, पाण्याठ और गोपियोंको भानन्दित किया और सय भी ठमके अमेरिका रेमे गोगोपगोपीनां रमपन् रूपमाफकतैः ॥३६॥ प्रेमका मालादम फरके आनन्दित हुए ॥ १६ ॥ मपानुस्मृत्य विप्रास्ते अम्बतप्मन् वागवः । परीक्षित् । इधर सब बामगोंको यह मालम एषा कि मीहष्ण तो सर्प भगवान् रे, तब उनमें बस परतावा वा। सोचने हो कि जगदीपर मगवान् यद् विश्वेपरयोर्याामहन्म मिरम्पयोः ॥३०॥ श्रीकृष्ण मौर बळ्यमकी माहाका काम करके हमने बड़ा मारी वपराध किया हैतो मनुष्यकी-सी राष्ट्रास्त्रीमा मगपति कृष्ण भक्तिमलौकिकीम् । लीम करते हुए मी परमेपर ही १ ॥ ३० ॥ नग ठगोन देखा कि हमारी पस्निोके एयमें वो मगवान्का अमैकिक प्रेमी और हमसोग उससे बिस्कुल रीते, भास्मान घ तमा हीनमनुतप्ता म्पगईमन् ॥३८॥ तब वे पछता-पताकर अपमी मिन्दा करने लगे ॥ ३८॥ वे काने लगे-'हाय | हम मगवाम् श्रीकृष्णसे बिमुस । यो ऊँचे फुलमें हमारा नग्म धिग् जन्म नक्षिात पियो भिग्यतं भिग पहुमताम् । इमा, गायत्री ग्रहण करके हम मिचि हुए, वेदाप्ययन करके हमने बोबो या फिये, पास्तु पर सब किस कामका शिकार है, धिकार है। हमारी विषा म्यप विकलं पिक क्रियादाप विमुस्खा ये स्वधोधजे ३९ गपी, हमारेत पुरे सिद्ध हुए । हमारी इस बाइवाको धिकार है। ठचे पशमें मग्म सेना, कर्मकाण में निपुण नूनं भगवतो माया योगिनामपि मोदिनी । होना किसी काम न माया । इनें बार-बार भिकार है ॥२९॥ निमयी, मगवान्की मापा बड़े-पा योगियों को मी मोहित कर देती है । वमी तो हम कामाते है यवू पप गुरखो नृमा स्वार्थे समामहे द्विजाः ॥४०॥ मनुष्योक गुरु और ब्रामण, परस्तु वपन सन्चे स्वार्थ पौर परमार्थ के विषय विस्कुम भूले हुए १ ॥१०॥ | कितने माधर्षकी बात ! देखो तो सही-पपपि भोपापस नारीणामपि फणे जगद्गुरौ । ये लिया है, तपापि मगहरु मगवान् श्रीकृष्णमे इनका क्तिमा अगाध प्रेम १, भनुगः अनुराग है! ठसीसे दुरन्तभावं योऽपिम्पम्मृत्युपासान् गाभिधान्॥४१॥ इहोंने गृहस्सीको बह पहुत की फोसी मी करट गरी, ૨૮૦ भीमद्भागवत [अ० २३ नासां विजातिसंस्थारा न निवासी गुरावपि । {मो मृत्युके साप भी नहीं कटती ॥ ११॥ इनके म तो दिवातिके योग्य योपवीत बादि सस्कार हए । नतपोनात्ममीमांसान शौचन क्रिमाः शुभाः॥४२॥ और न तो इन्होंने गुरफुलमें 0 निवास किया है। न नहोंने तपस्या की है और न तो बात्माके समयमें ही कु विवेक-विचार किया है। उनकी बात हो र अथापि अधमलोके कृष्ण पोगेपरेपरे । रही, इनमें न तो पूरी पवित्रता और म तो भुमर्म ही ॥१२॥ फिर भी समस्त पोगेप के घर पुष्प- मक्रिया न पास्माकं संस्कारादिमवामपि ॥४३॥ कीर्ति मगवान् श्रीकणके चरणों में इनका प्रम है। मौर हमने अपने सस्कार किसे , गुरुकुम निवास किया है, वपम्या की है, मामानुसन्धान किया , नेनु स्वार्थविमूदाना प्रमचानां गया । पवित्रताका निर्मद किया है तथा मछे-अपोकर्म किसे , ति मी भगतान्के चरणों में हमारा प्रेम मा। { सदी बात यह है कि मोग गासीके काम मि मतवाले हो गये थे, अपनी ममई बौर महानास्मारयामास गोपपापसागतिः॥४४॥ गुईको निस्कुस मूल गये ये । बहो, मगवान्की मितमी है। मळक्स प्रमुने मामबाडको अन्पया पूर्ण कामस्य खस्मापाक्षिा पतेः। भेगकर समके पवनोंसे हमें चेतावनी दी, अपनी पाद दिमयी ॥ ११ ॥ भगवान् समयं पूर्णकाम वीर सम्पमोक्षपर्यन्त नितनी मी फामनाएँ होती है, उनको इशिवम्यैः किमस्माभिरीशस्वैव विरम्बनम् ॥५५॥ पूर्ण करने से है। यदि हमें सचेत नहीं करना होता तो उनका हम सरी क्षुप बीवोसे प्रपोगन ही क्या हो सकता पा ! भवश्प ही नोंमे इसी ठपसे हिन्वान्पान् भजते यं भोः पादस्सर्शनपास। माँगालेका बहाना बनाया । बम्पपा उन्हें माँगनेकी मला क्पा वावश्यकता पी !॥ १५ n सय कामी बम्प सब देवतामाको छोरकर, गौरवपमी पसरता, गर्म धारमदोपापवर्गेण तपामा जनमोहिनी ॥४६॥ बादि दोषोंका परित्याग कर केस एक बार उनके चरणकमका स्पर्श पाने के लिये मेक करसी रहती । ही प्रमु किसीसे मोमनको याचना करें, या देसा कालापथग्यं मन्त्रवन्तविजोऽप्रयः । मोगों को मोहित करने के लिये नही तो वीर है। ॥ १६ ॥ देश, काड, पक्-पृथक् सामम्पिो, उन-उन देखता पजमानम फतुर्मय यम्मया ॥३७अग्नि, देवता, पनमान, यह और धर्म-सत्र मगगन्फे कमि विनिमुळ मन्त्र, अनुष्ठानकी पति, अभिम, री सरूप ॥२७॥ी योगेपरों के मी पर स एप भगवान् मावाद विष्णयोंगेघरपर । भगवान् विगुप्त मीण के रूपमें यदुवंशियों में भक्तीर्ण • २४] दशम स्कन्ध २८१ सो यप्तिस्मभण्म अपि मूडा न विमहे ॥४८॥ इए, यह बात हमन मुन मसी पी, परन्तु हम इतने मूह है कि उन्हें पहचान म सके ॥ १८ ॥ नहो वयं धन्पवमा येपी नस्ताष्पी सिय । पह सब होनेपर मी हम धम्यामिधन्य हमारे बारे माग्य हैं। तभी तो हमें बैसी पनियों प्राप्त है। नफ्स्पा यासां मवि वा अस्माफ निमलारी॥४९॥ उनको मक्किसे हमारी मुनि मो भगवान् श्रीकृष्णक मविचल प्रेमसे पुक हो गयी है ॥ १९॥ प्रमो ! नमस्तुम् भगषते कृष्णायाङष्ठमेधसे । वाप अधिनस्य चौर बमम्त ऐपयोंके सामी है। श्रीकृष्ण ! भापका कान बबाघ है। बापकी ही मायासे मायामोहितषियो प्रमामः फर्मपर्मसु ॥५०॥ हमारी बुद्धि मोहित हो रही है और हम कि पचा में भटक रहे हैं। हम वापको नमस्कार करते है ॥५०॥ आदि पुरुषोत्तम मावान् श्रीकृष्ण हमारे सबै न आपः पुरुषः स्वमायामोहिवात्मनाम् । इस अपराधको क्षमा करें । क्योंकि इमारी मुनि उनकी अविभावानुभाषानां अन्सुमहस्पतिक्रमम् ॥५१॥ मायासे मोहित हो रही बार हम उनके प्रभावको न माननेवाले बहानी ॥ ५१ ।। इति स्वापमनुस्मृस्प फष्णे ते सहेलनाः। परीक्षित् 1 छन प्राझोंने श्रीकृष्णका तिरस्कार किया पा । बत ठने अपने अपराधकी स्मृतिसे बड़ा पश्चात्ताप हुवा और उनके दपमें भीकृष्ण-बलरामके दिग्क्षयोऽप्यम्युवमोः सा भीतान पायछन्।५२। दशनकी बनी इच्छा भी परम्त कसके रके मारे बे उनका दर्शन करने न मा सके । ५२ ।। इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या सहिताय दशमस्कम्ध पूर्षेि यापम्पुदरण नाम प्रपोशिोऽपाप ॥ २३ ॥ अथ चतुर्विंशोऽध्याय म्दया-निवारण भीमुक उवाच माशुकदेषनी करते है-परीक्षित ! मगवान् मीण बरामबीक साप एम्दावनमें राकर भनेकों भगवानपि सत्रैष बलदेवेन संयुत । प्रकारकी डीपएँ कर रहे थे। समोंने एक दिम देशा कि पकि सब गोप इम्-या करनकी तैयारी कर से अपश्यभिवसन् गोपानिन्द्रयागरुतोचमान् ॥१॥ १॥१॥ मगवान् श्रीकृष्ण सबके अन्तर्यामी गौर उदमिझोऽपि भगवान् सर्वात्मा मर्पदर्शना । सर्पक उनसे कोई बात छिपी नहीं पी, ये सब जानते ये। मिल भी पिनयावमत होकर ठगोंने मम्दबावा वादि प्रभपापनतोऽपृच्छतु पवान् नन्दपुरोगमान् ॥ २॥ बो-बड़े गोपोंसे पूम-॥ २ ॥ पिताजी ! मापठोगोंकि १ मापीन पतिमें मह पर्य से मेकर निमम इसे का पाठ नहीं है। २ मम।। फरपुपर्धन नाम अपेक्षिठितम् ।४ बारापविराय। पास २.- २८२ श्रीमद्भागपत [अ० २५ कम्पसा मे पिता कोऽर्म सम्भ्रमोष उपागत । सामने या कौन सा क्या मारी काम, फोन-सा ससा पा पहुँचा है। इसका फल स्या है। किस तरेश्यसे, कौन होग, किंफलं फस्प पोदेशा केन वा साम्यते मनः॥३॥ किन सावनोंक द्वारा याह याह किया करते पिताजी ! मुझे यह मवश्य बनलाये ॥३॥बाप मेरे पिता रबार में पतन् हिमान् कामो मम शुभपये पित । माफ्का पुत्र । ये पाने मनमके लिये मुस बनी उत्कण्ठा मी है । पितायी । नो संत पुरुष सबको अपनी यात्म न हि गोप्य हि साधनांफत्म सर्वान्मनामिह ॥४॥ मानते हैं, जिनकी रष्टिमें अपने और परायेका भेद नहीं है, मिनका न कोई मित्र है, न शत्रु बौर म उदासीम- अस्त्पस्वपरदष्टीनाममित्रोदाम्तविद्विपाम् । ठमके पास छिपानेकी तो कोई बात होती ही नही। | परन्त पदि ऐसी स्थिति म दो, तो यस्यकी बात शकी भौति उदासीनसे भी नहीं करनी चाहिये । मित्र तो उदासीनोऽरिखद् वर्ण्य आत्मवत् सुइगुष्यते ॥५॥ जपने समान ही कहा गया है, इसठिये उससे कोई बात छिपायी महाँ बाती ॥१५॥ यह ससारी मनुष्य समझे धात्वासात्वा च कर्माणि बनोऽयमनुविष्ठति । बेसमा बनेकों प्रकारके कोका बनुष्ठाम करता । | उनमेंसे समझ-बूमकर करनेवाले पुरुपोंके कर्म से विदुपा फर्मसिद्धिः साचया नाविदुषो भवेत् ॥ ६॥ सफल होते हैं जैसे समझ नहीं ॥ ६ ॥ मत इस समय बापोग मो क्रियापोग करने मा रहेर तत्र तावत् क्रियायोगोभयता किंविचारितः । पाकि साप विचारित-शाखसम्मत है वपना गैक्षिक ही है- यह सब जानना चाहता हूँ, बाप रूपा करके अथवा लौकिकस्तन्मे पृच्छता साधु भग्पताम्॥७॥ एलपसे बतलाये ॥ ७ ॥ मन्दबाबामे कहा-केटा ! मगवान् हम्द वर्षा करने पाले मेकि सामी है। ये मेष उनीके अपन रूप है। पर्न पो भगवानिन्द्रा मेपास्तस्पात्मतय । वे समस्त प्राणियोंको तृप्त करनेवाला एव जीवनदाम सेऽभिवन्ति भूतानां प्रीणन बीपन पयः ॥ ८॥ करनेवाला जल रसाते हैं ॥ ८॥ मेरे प्यारे पुत्र ! हम चौर दूसरे लोग मी ठन्दी मेधपति भावान् इन्द्रकी पोंक वं बात चपमन्ये च पायां पतिमीमरम् । सारा पूना किया करते है। मिम सामपियोंसे या होता है,ये भी उनके बरसाये हुए सक्तिशामी नलसे ही ट्रप्पैस्तद्रतसा सिर्यमन्ते क्रतुभिनराः ।। ९ ।। | उत्पम होती हैं ।। ९ ।। उनका या करनेके बाद भी सम्छपेणोपजीवन्ति विमर्गफलहवः । कुछ बच यता है, उसी बमसे हम सब मनुष्य अर्थ, धर्म और कामरूप त्रिवर्गकी सिदिके लिये अपना भीवन पुंसां पुरुषकाराणां पर्जन्म फलमावन ॥१०॥ | मिह करते हैं । मनुष्योंके रखती वादि प्रपोंके फल देनेवाले इन्द्र ही है।॥ १०॥ यह पर्म हम्पय पुस- य एवं विसजा धम पारम्पयोगत नरः । परम्परासे चन्म भाया है। जो मनुम्य काम, मम, मय भया रेषपस ऐसे परम्परागत धर्मको छाप दवा है, फामाठाभानुभयानपान सपनामानि शाभनम्११ उस कमी माल मही होता ॥1॥ नन्द उपाय १मदार उपाय।

प० २४] उनम स्कन्ध २८३ श्रीगुफ उपाप धानुकदेवमा मदते-परीक्षित् मा, शहर पचोनितम्मनन्दस्य तथान्येपो प्रजाकसाम् । बादिक मी शामन कानबाट शव भगवन्ने नन्दा और दमर नमवासियोंकी बात सुनकर इन्द्रको शोध इन्द्राय मन्य जनयन पितर प्राह पेशव ॥१०॥ दिलाने के लिये अपने पिता नम्बाबासे कहा ॥ १२॥ भीभगपानुवार भीभगयान में कहा-सामी ! प्राणी मपन फर्मक अनुसार ही वदा हाता और कर्मसे ही मर जाता है। उसे कर्मणा नायवे जन्तु फर्मर्णन दिलीपते । उसके फर्मक अनुसार ही मुम्मसुम्य, मय जोर मारके | निमिचों की प्राप्ति होती है॥१३॥ परिौको दी मुम्ब दु र भय क्षेम फर्मणैवाभिपयते ॥१३॥ सब कुछ न मामकर उनसे मिन जीवोंक फमका कट देनेगलाईपर माना भी जाय, सा पर कम कानालाको अम्ति घेदीघर फमित फलरुप्यन्यकर्मणाम् । दी नम कर्मक वनुसार फर द सफा । न करनेवाणेपर उसकी प्रमुमा मही घर सकती ॥१॥ पार भजते सोऽपि नपक्रतुः प्रसहि स ॥१४॥ | जब सभी प्राणी अपने-अपन कर्मोका हो माग रह है, तब हमें इनकी क्या वावश्यक्ता हरिनामी । फिमिन्नणे मताना म्यम्बकमानुपसिनाम् । अब वे पूर्वसंस्कार अनुसार प्रात हानयाले मनुष्योंके कर्म-कसको बदर ही मही मक्ते--तम उमसे अनीशेनान्पधातु स्वभावषिहित नृणाम् ॥१५॥ । प्रपोजन ! ॥१५॥ मनुष्य अपने ममात्र (-सस्कारों ) के मधीन है।बह उसीका अनुसरण करताद। पौतफ म्वभावयत्रो दि जन' म्वभावमनुमन्ते । कि देवता, अमर, मनुष्य नादिका ये हुए यह सारा जगत् समावमें ही पित है ॥१६॥ जीव लपन कर्मों स्वभावम्पमिद मर्व सदेवासुरमानुपम् ॥१६॥ के अनुसार उत्तम गोर बनम शरीरों का ग्रहण करता और छाता रहता है। अपने कर्मोकि भनुसार ही पर देहानुपाश्चाअन्तः प्राप्योत्स्नति कर्मणा । ४६, यह मिर है २९ उमीन-ऐसा पदार करता है । फौता पाएँ, पम दी गुरु और कर्म शामित्रमुदामीन फर्मर गुस्लीमर ॥१७॥ 'बीयर १७) इमलिये पिताजी । मनुष्य काहिये मि यसकारीक बनमार नपने पण सपा नाममके सम्मान मम्जयन फर्म भारम्प बर्मत। धनुरूर पोका पाम्म पाना इमा पममी बार परे । जिमने तारा मनुष्य मौरिका मुगमनाने पत्री अगा पन पत उदयाम्य हि देवतम् ॥१८॥ ६, बदी उमका एप तना ॥ १८ ॥ नमे अपन विवादित पतिका आफर जार पतिया सेवन करनारी आजीप्यता भाय पम्ब पम्पनीपति । प्पमिपारिरीगी कभी निगम नही परमी, पेसेही जामनुप्प पानी पामीरीय पगार मला न तम्मा पिम्दन धम वार नायमना यथा ॥१०॥ एनिमी मायामना परत ३ उममे व पीएम को मिा || १. nrrit पर्नेन प्रलला विमा गजन्या ग्यया सर । सम्पयन मधमेनमे, २५ मार्ग

२८४
भीमनागवत
[अ०२४
वैश्यस्तु पातमा बीवेच्छद्रस्तु दिवसेषया ॥२०॥ इपिसे बौर शुद माझम क्षत्रिय और श्योंकी सेवासे
जपमी नीविकाका निर्वाह करें ॥ २० ॥ बस्यकी
कपिपाणिज्यगोरक्षा इसीद तुर्यमुच्यते । पाधि चार प्रकारकी है-की, पाणिम्प, गोरक्षा
और म्पान लेना। हमलेग उम चानुमसे एक केस
पार्श पतुर्विधा तर मयं गोचमोऽनिम्नम् ॥२१॥ गोपामन ही सदासे करसे बाये हैं ॥ २१ ॥ पिवाची!
इस ससारकी स्थिति, सत्पत्ति वोर बन्तके कारण क्रमास
सत्व रजस्तम इति स्थित्युत्परयन्तहेतवः । सत्गुण, रमोगुण बौर तमोगुण है। यह विविध प्रकार
का सम्पूर्ण जगत् मो-पुरुषके सयोगसे रमोगुणके हारा
रबसोस्पयवे विधमन्पोन्य विविध जगत् ॥२२॥ सत्पन्न होता है ॥ २२ ॥ उसी रगोगुणकी प्रेरनासे
मेघगण सब कही ना परसाते हैं। उसीसे कम और
रब्बसा चोदिता मेघा पर्पन्त्यमग्नि सर्वतः । भमसे ही सब नोयोकी बीविका चमती है। इसमें मान
इन्द्रका क्या लेना-देमा है! बामणस्या कर सकता
प्रजास्सैरेन सिदधन्ति महेन्द्रः किं करिम्पति॥२३॥।॥ २३ ॥
न न पुरो बनयदा न ग्रामा न गृहा वयम् ।
पिताबी 1 म तो हमारे पास किसी देशका सम्म
है और न तो बड़े-बड़े नगर ही हमारे अधीन ।।
नित्यं पनौफसस्तास पनौलनिवासिन' ॥२४॥ हमारे पास गाँव या घर मी नहीं है। हम तो सदाके
तसाद गवां मामणानामद्रमारम्पा मलः।
बमबासी , पन वोर पहारीसम्परे घर ।। २१ ॥
इसझिये हममेग गौवों, मामों और गिरिरामका यमन
य इन्द्रमागसम्भारास्वैर साम्पा मसः ॥२५॥ फरमेकी पारी करें । एन-पाके थिये नो सामप्रिया
इकठो की गयी है, उन्हासे
पाका वनुष्ठान होने
पच्यन्तांविविधा पाका सूपान्तापायसादयः। दे ॥ २५ ॥ भनेकों प्रकारके पकवान -सीर, हल्ला
सयावापूपन्फत्प मर्वदोहन गुमसाम् ॥२६॥ पूषा, पूर्व बादिसे मेकर मंगकी दालतक बनाये गायें ।
भयका सारा दूध एकत्र कर लिया माप ॥ २६ ॥ बेद
इफ्न्ताममयः सम्पम्
मायगैर्ममवादिभिः बादी नामों के द्वारा ममीमातिन करवाया जाय तथा
| उन्हें बनेकों प्रकार बम, गौएँ और दक्षिणाएं दी
अन्न बहुविषं तेम्पो देय पो धेनुदक्षिणाः ॥२७॥ गायें ॥ २० ॥ वौर मी, चाण्डाठ, पतित तथा कुत्तों-
अन्पेम्पयापचाष्ठालपविवेम्पो मपाईसः।
तकको यथायोग्य बस्तुएँ देकर गाय को चारा दिया गाय
और फिर गिरिरानको भोग धगापा नाय ॥ २८ ॥
यबसं च गवां दवा गिरपेदीपत्ता पलिः ॥२८॥ इसके बाद सूत्र प्रसाद सापीकर, सन्दर-मन्दर पर
पानकर, गानोंसे सम-समा छिया माप और बदम
स्पलता मुक्तपन्तः स्वनुलिप्ताः सुपासस ।
भगाकर गौ, मायण, अग्मि तपा गिरिराम गोवर्धनकी
प्रदषिर्ण प रुत गोविमानलपर्वतान् ॥२९॥
प्रदक्षिणा की माय ॥ २९॥ पिवानी ! मेरी तो ऐसी
ही सम्मति है। यदि वाए गोंको उचे, तो ऐसा ही
एतन्मम म सास किया पदि रापते । कीजिये । ऐसा वह गौ, मामण और गिरिपसको तो प्रिय
अपगामायणाद्रीणां मप पदमिती मसा॥३०॥ होगा ही, मुझे मी पास प्रिय है॥.॥

म०२५] दशम स्कन्ध २८५ मीभुक उवाच भीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित् ! कारामा | मालान्की इच्छा थी कि इन्द्रका धमार घूर घूर कर दें। कालास्मना भगषवा शक्रदपं जिघांसता । मन्दबावा बादि गोोने ठमकी बात सुनकर पी प्रसन्नता प्रोक्तं नितम्प नन्दापा साध्यगृहन्त तदषः॥३१॥ से मीकार कर ली ॥ ३१ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने बिस प्रकारका यह करनेको कशा पा, पैसा हो या नोंने तथा च व्यदधुः म यथाऽऽह मधुसूदनः । प्रारम्भ किया। पहले ब्राझोंसे सस्तिवाचन कराकर पापयित्वा वस्त्पपनं सद्रम्पेण गिरिद्विजान्॥३२॥ उसी सामग्रीसे गिरिरान और प्रामोंको सादर भेट दी, तपा गौषोंकोहरी घास सिवायी। इसके बाद मम्दबाया उपरस्य बलीन् सर्वानावा यषस गषाम् । आदि गोपीने गौवोंको बागे करके गिरियनकी प्रदक्षिणा गोधनानि पुरस्कस्य गिरि पठ्ठः प्रदक्षिणम् ॥३३॥ की ॥ ३२ ३३ ।। ग्रामोंका भाशीर्वाद प्राप्त करके वे बोर गोपियों मळीभाँवि श्यार करके गौर देने से पुती अनास्यनयुक्तानि से घारम स्वलकृता । गारियोंपर सवार होकर भगवान् श्रीकृष्णकी सीमाभोंका गान करती हुई गिरिरानकी परिक्रमा करने बगी ॥३४॥ गोप्पम रुष्णवीर्याणि गायन्स्यः सविनाशिषः॥३४॥ मगवान् श्रीकृष्ण गोपोंको विश्वास दिलने के दिये गरि कृष्णस्स्वन्पतम रूपं गोपविमम्मण गतः । रामक ऊपर एक दूसरा विशाण शरीर धारण करके प्रकार हो गये, सपा मैं गिरिरान है। इस प्रकार करते हुए लोऽसीतिप्नुवन् रियलिमादद्रपुः ॥३५॥ | सारी सामग्री बारोगने लगे ॥ ३५ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने आपने उस सरूपको दूसरे मन-मासियोंके साप स्वयं मी तस्मै नमोवनजन सह पो आत्मनात्मने। प्रणाम किया गौर करने लगे-देखो, कैसा बापर्य है। गिरिरामने साक्षात् प्रकट होकर इमपर सपा की आओपश्यत भेलोऽसौ रूपीनोऽनुग्रहं पधात् ॥३६॥ ॥ ३६ ॥ ये चाहे नैसा रूप धारण कर सकते हैं। | नो कमवासी सीव इनका निरादर करते है उन्हें ये मठ एपोऽवनानतो मान् कामरूपी वनोफसः । गते । वाा, मपना वोर गौमोंका कल्याण हन्ति मस्मै नमस्पाम शर्मणे प्रास्मनोगवाम् ॥३७॥ करने के लिये इन गिरिरानको हम नमस्कार करें ॥२७॥ | इस प्रकार मगवान् श्रीकृष्णकी प्रेरणासे मन्दबाबा वादि इस्पद्रिगोदिजमस्वं वासुदेवप्रेणोदिता । पो-यूरे गोपोंने गिरिरान, गौ और मामोंका विधिपूर्वक पूजन किया तपा फिर श्रीकृष्णके साप सब मनमें सोट पथा विधाय से गोपाः सहरुप्णाग्रज ययु ॥३८॥ बाये ॥ २८॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या सहितायो दशमस्कन्ध पूर्षि चतुर्दिशोऽध्याय ॥ २॥ अथ पञ्चविंशोऽध्याय गोवर्धनपारण मी चाल भीशुकदपभी कहते हैं- भत् ! बन्दको इन्स्तदाऽऽरमनः पूषा विज्ञाप विहां मृप । { पता लगा कि मरी पूना पद पर दो गपी , तबरे १ मधे ।२ इन्द्रमतमद्रमतु ।। पायपनिमार। ।

२८६ मीमहागपत [अ० २५ -1॥ २ ॥'मोह, - गोपैम्पाकृष्णनापेम्पो नन्दादिम्पमुक्ोप सः॥१॥ नन्दबाबा मादि गोर्पोपर मनुत ही क्रोधित हुए । परन्तु सनके क्रोध करनेसे होता क्या, उन गोकि रक्षा गणं सापर्वकं नाम मेघानां पान्यकारिणाम् । तो सर्य मावाम् श्रीकृष्ण ये ॥ १ ॥ इन्द्रको करने पदका पसा घमा पा, ये समाते थे कि मी इन्द्रापाचोदयत् छन्दोवास्प चाहेशमान्युत ॥२॥ त्रिलोकीका ईश्वर है। उन्होंने क्रोघसे तिमिसकर प्रथ्य करनेवाले मेकि सावर्तक नामक गणको गया बहो धीमदमाहात्म्य गोपाना काननौमसाम् । पाई करनेकी वाहा दी गौर करा- इन अंगणी ग्वा को श्वना घमण्ण! सचमुच या पनका फर्म मर्पमुपाभिस्प ये' पछर्देषोलनम् ॥३॥ी मशा है। मम देखो तो सही, एक साधारण मनुष्य कृष्णके पळपर उन्होंने मुत्र देवरानका नाम पचाप्टः कर्ममयैः क्रतुभिर्नामनौनिमः। कर गष्य ॥ ३ ॥ वैसे पृप्तीपर बहुत-से मम्दादि पुरुष भवसागरसे पार जाने के सम्पे साधन मानियाको पिपामान्धीक्षिकी दिस्या तिवीर्षन्ति भवार्णवम्॥४॥ तो मेर देते है और माममात्रकी टूटी हुई माक्से- फर्ममय प्योंसे इस घोर संसार-सागरको पार करना वाचालं पालिश स्तम्भमझ पणितमानिनम् । चाहते हैं ॥१॥ फ्ण पकवादी, मादाम, अभिमानी वीर मूर्ख होनेपर भी अपमेको पात का शानी कण मर्पमपाभिस्य गोपा मे चक्करप्रियम् ॥ ५॥ समानता है । यह सब मृत्युका पास है। फिर में उसीका सघरा लेकर इम वाहीने मेरी पहेलना की एप मिपावलिप्तानां रुणेनामासिवात्मनाम् । ॥५॥ एक हो ये यों ही पनके मशेमें हे के दूसरे सपने इमको चौर मावा दे दिया है। धुनुव भीमदसम्म पश्न नपत संषयम् ॥ ६॥ वा तुमम्मेग बाकर इनके इस धमके पास और ऐकलीको पम्में मिम दो सपा उमफे पनुमोका संहार अब पैरायस नागमारुयानुप्रबे प्रमम् । कर गये ॥३॥ मैं मीतुमारे पीछे पीछे ऐरावत हापीपर घड़कर नम्दके प्रमका माश करने के लिये महापराक्रमी मरुदणैर्महाषीपैनन्दगोष्ठविपासमा ॥७॥ महगों के साप जाता ॥७॥ पीसुक उपाय भौशुध्देयजी करते है-परीक्षित् 1 ने इस प्रकार प्रत्यके मेषोंको बाधा दी और उनके बम्पन इत्पं मघवसामप्ता मेषा निर्मक्तयन्मना । सोड दिये। भवने व पासे भन्दवापाके अपर नन्दगोकलमासारै पीरयामासुरोजसा ॥८॥ पद आये और मुसम्पार पामी बरसाकर सारे प्रयको पीमित करने म्गे ॥ ८ ॥ चारों मोर विठियों पियोवमाना विशिस्तनन्त स्तनयिस्लुभि । बमकम म्गा, बाद वापसमें टकराकर करानेगे तीमर्मरुद्गर्नुन्ना वापर्वलयर्फराः ॥ ९॥ बौर प्रथम बौधीकी प्रेरणासे में बोबडे बोले परसाने बगे ॥९॥ इस प्रकार मबद-क-दव बादल पार स्पूणास्थूलावर्पधारा मुच्चस्म्पनेप्वभीक्ष्णमः। मार वा-यावर संमेके समान मोटी-मोटी भाराएँ गिराने १ ममममचीवरम् । २ वगैर्न ।

३० २५] दशम स्फन्ध २८७ बलौघे अन्यमाना मूर्नादृश्यस नतोमतम् ॥१०॥ लगे, तब ब्रमभूमिका कोना-कोना पामीसे मर गया और कहाँ नीचा है, कहाँ उचा-इसका पता घरमा भस्मासाराविवातेन पधषो जातवेपना । कठिन हो गया ॥ १० ॥ इस प्रकार मुसळधार पर्पा तवा मावावके साटेसे मर एक-एक पशु छिरने गोपा गोप्यमशीतार्ता गोविन्दं शरण मयुः ॥११॥ भौर कॉपने लगा, ग्माल मोर पालिने भी ठरके मारे नत्यन्त व्याकुल हो गयी, तप वे सबके सब मगवान् प्रीकृष्णकी शरणमें माये ॥ ११ ॥ मुसष्टघार वर्षास घिरा मुतांध फायेन प्रच्छापासारपीडिताः। | सताये नानेके कारण सबने अपने अपने सिर और बहोंको मिशफार वपने शरीरके नीचे छिपा किया पेपमाना भगवतः पदमलमुपाययुः ॥१२॥ पा और ये कांपते-कॉपसे भगवान्की धरणशरणमें पहुंचे ॥ १२ ॥ और बोले--प्यारे श्रीकृष्ण ! तुम बड़े रुम रुष्ण महाभाग स्वभा गोकले प्रभो । माम्पवान् हो । वव सो कृष्ण ! वेषक सुम्हारे ही माम्पसे हमारी रक्षा होगी। प्रमो ! इस सारे गोकुपके प्रातुमर्हसि देषामः कुपिता भक्तवत्सल ॥१३॥ | एकमात्र सामी, एकमात्र रक्षक तुम्ही हो । मकवरसम ! इम्बके क्रोधसे अब तुम्ही हमारी रक्षा कर सकते ठिलापर्पनिपातेन इन्यमानमधेवनम् । हो ॥ १३ ॥ भगवान्न देश कि वर्षा और वोठोंकी | मारसे पीमित होकर सब बेहोश हो रहे है। वे समय निरीक्ष्य भगवान् मेने पितेन्द्रकस हरिः ॥१४॥ गये कि यह सारी करवत इम्बकी है। ठमोंने ही क्रोधवश ऐसा किया है॥ ११॥ मन-ही-मन अवर्वत्युवर्ण पर्पमतियात सिलामयम् । करने लगे-'हमने इन्द्रका या मा कर दिया है, इसीसे वे ब्रमका नाश करनेके लिये बिना ऋतके ही खयागे विरतेऽसाभिरिन्द्रो नामाय पर्पति ॥१५॥ यह प्रचण्ड वायु और लोक साप पनपार गर्या कर दे॥१५॥ वध, में अपनी योगमायासे इसका वध प्रतिविधि सम्पगास्मयोगेन साधये । भीमति सवाय दूंगा। ये मूर्खतावश अपनेको टोकपास मानते। इनके ऐपय और धनका घमा तपा बदाम लोकेशमानिना मोत्याद्वरिप्ये श्रीमद तमः ॥१६॥ घर घर फर इंगा ॥ १६ ॥ देवतागोग तो सतप्रधान होते हैं। इनमें अपने ऐपप गौर पदका न हि सदापयुक्ताना सुराणामीशविसय । अभिमाम न होना चाहिये । बत यह तपिती कि इन सत्वगुणसे युत दुष्ट देवता भोकर मैं मान मङ्ग मचोऽसतां मानभाः प्रक्षमायोपकल्पते ॥१७॥ रहूँ। इससे अन्तमें उन्हें शाविही मिलेगी ॥ १७॥ पर सारा ना मेरे माषित है, मेरे द्वारा स्वीस्व वीर तसान्मच्छरर्ण गाष्ठं ममाथं मत्परिग्रहम् । एकमात्र में ही इसका रक्षा हूँ। अत ममपनी योगमापासे इसकी रक्षा करूंगा। संतोंका रक्षा करना तो मरा नही गोपाये म्यास्मयोगेन मोऽयं मे प्रत आरितः॥१८॥ रामब उसके पाउनकामासर जा पहुँचा है।॥१८॥ १ निप्पे। • मपपान करते है- समादेव परमाप दाम्मीति व यातममम सर्वभूतेम्पा दराम्पात मम ॥ म एक बार मरी धरण मा यता और मैं तुमारा इन प्रार पारना करमा है, उसे मैं नम्पूर्ण प्राधियोंसे भमय पर पता है यह मेरा है।

२८८ भीमसागपत [अ० २५ इत्युक्त्वैकन हस्तेन कृत्वा गोवर्धनाचलम् । इस प्रकार कहकर भगगन् श्रीकृष्णमे स्टेस से में एक ही हापसे गिरिरान गोयनको उस जिपा और धार लीलया रणछायामिन पालका ॥१९॥ जैसे छोटे-छोटे वाम्क बरसाती छत्तेके पुपको ठसान हापौ रस से, वैसे ही उन्होंने उस पर्वतको अथाह भगवान् गोपान्ममतास वौकसः। | धारण कर मिया ॥ १९ ॥ इसके बाद भगवान्ने गोोसे कहा--'मातामी, पिताजी और ममासिने ! पपोपजोपं पिशत गिरिगर्त सगोधनाः ॥२०॥ तमलोग वपमी गौओं और सब साममियोंके साप इस पर्वतके गढ़े में बाकर धारामसे बैठ जावो ॥ २० न त्रास इह पर कार्यो मदस्ताद्रिनिपातने । देसो, मडोग ऐसी शहा न करना कि मेरे हापसे या पर्वत गिर पड़गा । तमोग तनिक मी मत म्ये । वासवर्षभयेनाले वस्त्राणं विहितं हि वः ॥२१॥ इस गाँधी-पानीके से तमें पानेक रिये ही मने यह युक्ति रची।॥ २१ ॥ मम भगवान् श्रीकृष्णने वमा निर्विविश्वर्ग फष्णापासिवमानसाः । इस प्रकार सबको भाषासन दिपा-पास पाया, तब सब के सब पास अपने-अपने गोधन, फलों, सावकाशं सपनाः सप्रया सोपवीषिन ॥२२॥ बामितों, पुरोहितों मोर मृत्पोंको अपने सपने माग मेकर भीतके अनुसार गोकर्दनके गड्ढे में बा पुचम्मयां सुसापेवा दिलासर्मजपासिभिः। | मुसे ॥२२॥ मगवान् श्रीकृष्णने सम प्रमासियों के देसते- | देखते म्स-पासकी पीड़ा, बाराम-विधामकी बास्यकता वीक्ष्यमाणो दोवद्धिं सप्ताई नाचलत् पदात् ॥२३॥ आदि सब कुछ मुन्मफर सात दिमसक लगातार उस पर्वतको उपये रक्या । वे एक रग मी हाँसे इधर रुपायोगानुभावंसं निझाम्पेन्द्रोऽतिमिमितः । उभर नही पाए ॥ २३ ॥ श्रीकृष्णको योगमापाका प्रभाव देखकर इन्द्रक बाधर्मका ठिकाना न पा । निःस्तम्भो प्रष्टसाहस स्वान् मेघान् सैन्पवारपवर४ | अपमा सझम्प पूरा न होनेके कारण सनकी सारी टेकडी बंद हो गयी, घे भौधरके से ए गये । इसके संध्यमादिवादिस्य पातप च दारुणम् । बाद उनोने मेघोंकने वपने भाप बर्ग करनेसे रोक दिया ॥ २९ ॥ जब गोमधारी भगवान् श्रीकृष्णने निशाम्योपर गोपान् गोवर्मनपरोऽप्रवीत् ॥२५॥ देखा कि वह मपहर गाँधी वौर भनघोर वर्षा कर हो गयी, भाकाशसे बादम टेंट गये पौर सूर्य दीसन गे तब उन्होंने गोपोंसे कहा-॥२५॥ मेरे प्यारे निर्यात स्पजव त्रास गोपाः सखीधनाकाः । | गोपो 17 तुममेग निर हो मागो और वरनी वियों, गोधन तपा पोंके साथ बाहर निकल नामो । उपारसं पासवर्ष युदप्रायाम निम्नगाः ॥२६॥ | देसो, जब बाँधी-पाभी बंद हो गया तथा नदिपोंका पानी मी उतर गया ॥ २६ ॥ मगवान्की ऐसी वाला पवस्वे निर्पपुर्योपाःस्व स्वमादाय गोधनम् । पाकर अपने-अपने गोधन, सियों, मन्नों पोर मको साप से तपा बपनी सामग्री छकोपर मादफर धीरे शक्टोढोपकरण सीपालम्पविराा भनेः ॥२७॥ धीरे सब लोग बाहर मिका वाये ॥२७॥ सर्वशक्तिमान् १ विशु । धारा ।

अ० २६]
दशम स्कन्ध
२८९
भगवानपि त शळं स्वम्याने पूर्ववत् प्रसः । | भगवान् श्रीकृष्णने मी सब प्रागियों के देखते-देखते
म्वेल-स्लेसमें हो शरिरानको पूर्वपत् उसके स्पानपर रम्प
पश्पता मर्मभूतानां म्यापयामाम लीलया ॥२८॥ Pया ॥ २८ ॥
त प्रर्मवेगाभिमृता प्रीमो
बनासियोंका हदय प्रेमके बावेगसे भर रहा पा ।
पर्वतको रखते ही वे भगवान् श्रीकृष्णके पास दोप
यथा समीयु परिरम्भणादिभि ।
नाये । कोई उन्हें उदयसे लगाने और कोई चूममे एगा।
गोप्यच सम्नेहमपूजयन् मृदा | समने उनका सकार किया । बड़ी-मूडी गोपियोंने बड़े
वानन्द बार स्नेहसे दही, पावर, मल मादिसे उनको
दध्ययवादियुमु सदाशिप ॥२९॥ मङ्गल मिल्क क्यिा बोर ठमुकदपसे तुम वाशीर्वाद
दिये ॥ २० ॥ पशोदायमी, रोहिणीमी, भादवामा
यशोदा रोहिणी नन्दो रामय परिना पर ।
नौर मठवानोंम श्रेष्ठ बामनीने स्नेदार रोकर
कृष्णमालिङ्गय युसुजुराशिपः स्नेहमयसरा ॥३०॥ ' श्रीकृष्णका एपसे एगा रिया सपा नाशीर्वाद
रिये॥३०॥ परीक्षित् ! उस समय भाकाशमें स्थित देवता
दिपिटेयगणा माया सिद्गन्धर्वचारणा ।
साप्प, मिद, गन्धर्य बोर धारण बादि प्रमन होकर
तुप्युर्ममुसुम्तुष्टा पुप्पवर्षाणि पाथिय ॥३१॥ मायन्की "तुति करते हुए उनपर योकी वर्षा करने
सगे ॥ ३१॥ गजन् ! सर्गमें देवनारोग शरीर
महन्दुभवों नेदुर्दिवि देवप्रगोदिताः।
नारन बनाने एगे। तुम्युरु आगिराम मगमान्की
जगुगंधर्वपतपस्तुम्पुरुषास्ता नृप ॥३२॥ मधुर होणका गान करन हगे ॥ ३२ ॥ इसके बाद
भगवान् श्रीकृष्णने पत्रको पात्रा की। उनमे वगामे
समाऽनुगत पशुपं परिधितो
बनाममी चल रहे थे और सनके प्रमी गावाम
राजन म गोप्ट सरलोऽनजदरि । उनकी सेवा कर रहे थे। उनफ सापही प्रममयी गोरियों
भी बरन आकर्षित करनेबारेममें प्रम नगान
सपाविधा पस्स फतानि गोपिका
पाले मातादी गोवदनधारण नामका गान
गापन्त्य ईपर्मदिता इदिस्पस ॥३३॥ परती या जनादसे अममें और बापा ॥ ३३ ॥
ही श्रीमद्भागरते महापुण्णे पागमा म्या मंत्पिपा दामा'
पूध पिप ॥२५॥

२९० श्रीममागपत [अ० २६ पालकस्स यदेतानि फर्माण्यत्पनुवानि वै । लगे ॥ १ ॥ इस बाठकके ये कर्म बड़े बौकिक है। इसका हमारे-जैसे गवार प्रामीणों में मम्म लेना तो इसके कथमईत्यसौ जन्म ग्राम्मेवात्ममुगुप्सितम् ॥ २॥ लिये वही निन्दाकी बात है । यह मण, कैसे उचित हो मकता है ॥२॥ नेसे गमरान काई कपल तथा य सप्तदायनो पाला करणेफेन लीलया । कर उसे उपर उठा ले गौर धारण करे, से ही इस नन्हे-से सात वपके पालकमे एक ही वापसे गिरिराम कार्य पिम गिरिवरं पुष्करं गभरारिप ॥३॥ गोवर्द्धनको उखार मिया और मेर-खेल में सात दिमोतक उठाये रस्सा ॥ ३ ॥ यह साधारण मनुष्यफे लिये मना खोकेनामीलिवाक्षेण पूतनाया महौजसः । फैसे सम्ममा प्रम या नना सा बचा था, उस समय बसी मर्पकर राक्षसी पूतना भायी भौर इसने औसकेर पीत! स्तन सद प्रापे कालेने वमम्तनो ॥४॥ किये-किये ही उसका स्वम तो पिया ही, प्राण मी पी टा-ठीक वैसे ही, से काट शरीरकी वायुको दिन्ववोऽपा शयानस्स मास्पस्य चरणावदम् । निगा नाता है ॥ १॥ मिस समय यह हम तीन महीनेका था भौर छकडे नीचे सोकर रो रहा था, अनोऽपसद् विपर्यस्त रुदल प्रपदाहतम् ॥ ५॥ वस समय रोसेरोसे इसने ऐमा पौष मसाला कि उसकी टोकरसे यह बस मा छारा उबम्पर गिर हो एकापन आसीनो हिपमाणो विहायसा । पहा ॥ ५॥ उस समय तो यह एक वर्षका पा, चब देस्प करके रूपमें इसे बेटे-बैठे नाकासमें का दस्पेन यस्तृणावर्तमहन् कण्ठग्रहातरम् ॥ ६॥ के गा पा | तुम सर मानते ही हो कि इसमे उस मृणात दैत्यको गला घोंटकर मार दाग ६ ॥ उस निकी पात तो सभी नाम है कि मासयोरी करने- कचिदयावस्तन्य मात्रा पर उतरवले । पर यशोदारामीमे इमे उम्पसे बाँध किया था। या पुरकि बल बकया खारवेमाचते ठम दोनों पिर मर्युम गच्छमर्जुनयोर्मध्ये पाहुया वापपाश्यत् । ७॥ बोके बीच से निकल गपा और उन्हें उस्तार ही राठा ॥ ७॥ जब या बारबार और परामजी साप पने मंचारयन परसान् मरामो पालतः। पठोको परानेके रिये पनमें गया मा पा उस समय इसने मार गएनके लिये एक देय यगुमेक सपने इन्तुमर्म एक दोम्या मुम्बनाऽरिमपारयन् ॥ ८॥ बाप्पा और इसने देनों धाडैसे उमके दोनों टर पका कर उसे मिना की तरह मीरगना ।। ८॥मिस समय परसेपु परमरपण प्रविमन्त निघामया। इमको मार रामकी प्यासे एक देग बदेके माम गोमुरमें घुस गया था, उम गमय हमने उम सपा मेरीनोम मार रामा भोर ठमे परे एमा पपानपान पिधानि प लालया ॥ ९ ॥ पर पगार उम पेरोकने मीरा पा ॥ ॥ मन बामनीक माप मियर धि गपमें सनेशसे रा गाभन नदम परामित । घनुगपुर मा उमके भावोर मार सरा और पके रसोंगे म तासना यो रिपे उपयोगी पर वानपन धर्म परिपालान्वितम् ॥१०॥, और मालमय बना पा || १. ॥ मीने मानी म०२६ ] दमम स्कन्ध २९१ प्रतम् पातयिस्योगं मलेन पलसालिना। पराममीमे द्वारा फूर प्रमाउरको मरना गला तथा दाबानमसे गौओं गोर बालबालोको उबार रिया ॥११॥ अमोचयत् पजपरुन् गोपांधारण्यवहित ॥११॥ यमुमाननमें रहनेवामा कालिय नाग कितना वियता पा! आशीविपसमाहीन्द्र दमित्वा विमद इदात् । परन्तु इसने उसका मी मान मर्दन कर उसे बलपूर्वक दहसे निकाल दिया और यमुमामीका नल सके लिये प्रसपोदाम्य यमुना पक्रेऽसौ निर्विपोदकाम् ॥१२॥ विपरदिव-अमृतमय बना दिया ॥ १२ ॥ मन्दनी! हम यह भी देखते हैं कि तुम्हारे इस सॉगले वालकपर दुस्स्यजधानुरागोऽमिन् सर्वपां नो बजौकसाम् । हम सभी प्रम दासियोंका ममन्त प्रेम है और इसका भी एमपर स्वाभाविक ही स्ना।क्या भाप पतमा सफर नन्दते तनयेऽस्मासु तस्याप्योत्पचिका कपम्॥१॥ कि (सका क्या कारण है ॥ १३ ॥ मा, को तो यह सात वर का नन्दा-सा मालक वीर कही इतने बड़े क सप्तहामनो पालः क महाद्रिविधारणम् । गिरियनको सात दिनोतफ उठाये रसना । मजयन ! इसीसे ततो नो जायते शहा यजनाध वयात्मजे ॥१४॥ तोतुम्हारे पुत्रके सम्बधर्मे हमें पड़ी शङ्का होरही ॥१॥ मन्द उपाप मम्दपायाने कहा-गोपो तमोग सावधान होकर मेरी बाव पुनो । मरे मालकके विपपमें तुमारी शाश ध्या मेयधो गोपा प्येत सहापयोऽर्मके। दूर से माय । क्योंकि महर्षि गाने इस बारकको एन कुमारमादिश्य गर्गों मे यदुपाच ॥१५॥ देसकर इसके विषय में ऐसा ही कदापा ॥१५॥ तुम्हारा या बारक प्रापेक युग शरिहण करता है। विभिन्न पणाश्रय किलास्यासन् गृहमोऽनुयुग वनः । | युमि इसने वेत, रक मोर पीतये मिम मिम रंग सीकार दिये थे। इस बार या सणार्ग वा ॥१६॥ गुहा रक्तस्तथा पीव इदानी रुप्पा गत ॥१६॥ मन्दनी ! यह तुम्हारा पुत्र पहले कहा मुदेव पर भी पैदा हुमा पा, इसरिये इस रहस्यको मानम मागय पसुदेयस्य कचिमावस्तवास्मज । मासे छोग इसका माम श्रीमान् बासुदेव है-ऐसा पासुदेव इति धीमानभिशाः सम्प्रचक्षते ॥१७॥ करते हैं ॥ १७ ॥ तुम्हारे पुत्रके गुग और कमकि अनुरूप और भी बहुत से माम र तपा बात से रूप। पानि सन्ति नामानि रूपाणि च मुठस्य ते । में तो उन मामको जाना, पर मेसार साधारण रोग महा मानते ॥१८॥ परमरोगो परम सम्पा गुरम्मानुरूपाणि तान्यहं पेद नो जनाः ॥१८॥ करेगा, समस्त गोर और गौयोंको परमातीमादित परेग्य इसकी सतापठासे तुमलागीपीतितियों- एस प प आधास्यद् गोपगोकुलनन्दन । को वही गुगमनासे पार करोगे ॥ १० ॥रार! मनेन सर्वदुर्गागि यूयमनम्तरिप्पथ ॥१९॥ [माने एक बार में काई राना न राय पुरानेन मापन साधषो दरपुपीरिता । पासमाने पायें और एम? मचा रस्ती दी। तब रेसी पुत्रने सम्म पुरी रक्षा की मराजक रपमा विग्युर्दम्पन ममधिता ॥२०॥ इसमे 2 टन मी RER सन् १ मा मप।

२९२ भीमहागवत [म.२६ , - पएतमिन् महाभागाः प्रीति कुर्वन्सि मानवाः। की ॥ २०॥ नम्दयाबा! नो तुम्हारे इस साँप शिवसे प्रेम करते है, ये बड़े भाग्यवान् है । जैसे विष्णुमगवान्के नारयोऽभिभवन्त्येतान् विष्णुपक्षानिषासुराः॥२१॥ करकमलों की प्र-छापामें रहनेवाले देवताबाको वमर मही मीत सकते, वैसे ही इससे प्रेम करनेवाओं को तमामन्द कुमारोऽम नारायणसमो गुणैः। मीतरी या बाहरी-किसी भी प्रकारके शत्रु नही मीत सकसे ॥ २१ ॥ नन्दनी ! चाहे विस मिसे देखें- भिमा कीर्त्यानुमावेन तस्कर्मसु न विमयः ॥२२॥ गुणसे, ऐधर्य और सौन्दर्यसे, कीति वीर प्रमाक्से सम्हारा बाक साय भगवान् मारायणके हो समान है। इस्पदा मी समादिप गर्गे व स्वगृह गते । | बस इस बामकके बमोक्कि कायोको देखकर वार्म मलमा चाहिये ॥२२॥ गोपो ! मुझे सब गर्थचार्यनी मन्ये नारायणस्पर्शि कप्णमकिष्टकारिणम् ।।२३॥ | या वादेश देकर अपने पर चले गये । तबसे में बलौकिक बौर परम मुसब कर्म करनेवाले इस बायको इति नन्दनपा भुत्वा गर्गगीत मौकसः। | भगवान् माययणका ही वंश मानता हूँ ॥२३॥ सब भयबासियोंने मम्दबाबाके मुझसे गर्गजीकी या बात हमी, टिभुतानुभाषास्ते कृष्णसामिववेमसः । तब समका विस्मप याप्ता या क्यों कि पब अमित सेगसी भीषण प्रमाको हिपसे देस और एन सदिता नन्दमानर्मुः रुणं च गवनिमयाः ॥२४॥ के थे। वामम्दमें मरकर उनमे नन्दबाबा वीर श्रीकृष्णकी मूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २४ ॥ देपे पर्पति पवितवस्या निस समय अफ्ना या मा हो जाने के कारण इन्द्र झोषके मारे बाग-बम्म हो गये थे और मूसलधार वर्षा पनामपनिले। करने लगे थे, उस समय वनपात, मोकी कार और प्रथम गाँधीसे सी, पशु तपा बाले वत्यन्त पीरित हो सीदस्पालपति यात्मशरणं गये थे। अपनी शरणमें रामेबाले प्रजवासियों की पर रमानुफम्प्युत्मपन् । दशा देखकर भगपम्का म्दप करणासे मर माया । परम्त फिर एक नयी मेला करनेके विचारसे मे तुरंत उस्पाटपैकफरेण लमबलो की मुसकराने मगे। मैसे कोई नहा-सा निर्मक वाक सेम सेल्में ही बरसाती उठेका पुष्प उभारले, वैसे लीलोमिछलीघ्र यथा पोटदोंन एक हापसे ही गिरिरान गोपीनको तसार विपद् गोष्ठमपान्महेन्द्रमदभित् र पारण कर मिया पर सारे मनकी रक्षा की। इन्द्रका मद पूर करनेवाले दे ही भगवान् गोविन्द हमपर प्रीयान इन्द्रो गवाम् ।।२५॥ प्रसन्न हो ॥२५॥ इति श्रीमगाठे महापुराणे पारमहस्यों सहिताया दशमरफर पूषि ॥ २६॥ पर्दिशोऽध्याप १ मारगरगा।

प० २७] २९३ अथ सप्तविंशोऽध्याय धोरप्डका अभिषेक मीशुक उपाच श्रीशुकदेवनी कहते है-परीक्षित् ! मग भगवान् श्रीकृष्णने गिरिरान गोपर्धनको धारण परके मूसमधार गावर्षने धृते शैल आसारा रक्षिते जे । पर्यास प्रत्रको बचा लिया, सय उनके पास गेलोकसे कामयेन ( बधाई देने के लिये) मोर सर्गसे देषरान गोलाकादाब्रज कणं सुरभि शक एव च ॥१॥ इन्द्र (अपमे अपराधको क्षमा कराने के पिये) बाये ॥१॥ मावान्का तिरस्कार करने के कारण इन्द्र पास हीमन्त्रित विविक्त उपसझम्प पीडित फवहेलन । थे। इसलिये सनोम एकान्त-स्थान में भगवान्के पास जाकर अपने सूर्यके समान सेवसी मुवुटसे ठमके चरणों- पस्पर्श पादयोरेन फिरीटेनार्कवर्चसा ॥२॥ का स्पर्श किया ॥२॥ परमते प्रस्ती मगवान् श्रीकृष्णका प्रभुतानुभाषोऽस्य कृष्णस्यामिसतेजसः। प्रभाव देख-समकर इन्द्रका यह धर्मर नाता रहा कि मैं ही तीनों लोकों का स्वामी हूँ। मब ठनोंने हाप मारकर नष्टत्रिलोफेसमद इन्द्र आह कवाजलिः ॥३॥ | ठमकी स्तुति की ॥ ३ ॥ दमे कहा- -मगवन् ! बापका स्वरूप परम शास्त, विशुदमन सप झानमप, रजोगुण तपा तमोगुणसे रहित एवं मिशुद धाम शान्त मप्राक्त सत्वमय है। यह गुणों के प्रारूपसे प्रतीत सपोमर्य ध्यस्तरजस्तमस्कम् । होनेवाण प्रपत्र केवल मायामय | स्पोंकि भापका सरूप म मामने के कारण ही बापमें इसकी प्रतीत होती मायामयाऽयं गुणसम्प्रवाहो है॥१॥ मन लापका सम्पम्प वान और उसके न विद्यते तेऽग्रहणानुपन्धः॥४॥ कारण प्रतीत हानेवाले देहादिसे है ही मही, रि उन देवादिकी प्राप्तिके कारण तपासनीसे होनेवासे सोम- इवो नु सदतर ईश वक्तवा कोष वादि दोष तो लापमें होती से सस्ते है! लोभादयो मेऽमुपलिङ्गभावा । प्रमो 1 इन दोपत्र होना तो महामका लक्षण है । इस प्रकार पपपि दान और उससे होनेपाले जगत्से भाप प्यापि दणं भगवान् विभर्सि का कोई सम्बन्ध मही, रिमी धर्मको रक्षा और दुर्शका दमन करनेके रपे वाप अपनार ग्रहण करते धर्मस्स गुप्त्यै खलनिग्रहाय ।।५।। १और निप्रह-मनुपद मी करते ॥ ५॥ बाप भगत् पिता गुरुस्त्व जगतामधीसो के पिता, गुरु वीर स्वामी है। माप नगदका निफ्त्रण फरनकरिये दण पारण किये हुए दुसर कामभार दुरस्पयः काल उपापदण्ड । माने मनोकी यसमा पूरा करने के लिये सवासे मीगसार प्रकट करते ३१ लोग हमारी तार दिताय स्वेच्छाउनुभिः समीइसे भरनेशने सिर मान बैटवे है, उना मान मनकाते मान विधुन्नागीयमानिनाम् ॥ ६॥ ए मनाने प्रभारी नगर पग्ने २ ॥ ६॥ प्रभो ! रापमा २९५ भीमद्भागवत [अ० २७ - - ये मदिधाना चगदीशमानिन जो मेरे-वैसे वानी और मानेको बगत्का ईश्म मामने वाले है, वे सब देससे कि बड़े-बड़े भयके बसरोपर स्वावीप कालेऽभयमाशुतन्मदम् । भी बाप मिर्मय रहते हैं, तो वपना धर्मरोग देते हिस्वामार्ग प्रमजन्स्पपस्मया रमौर गर्वरहित होकर संतपुरुषों के द्वारा सेमित मलि | मागका बाय लेकर आपका मनन करते है। प्रभो । हा खलानामपि वेऽनुशासनम् ॥ ७॥ आपकी एक-एक बेटा दुरों के लिये दण्ड विधाम है ॥७॥ स त्व ममैश्चर्यमदप्तुतस्य प्रमो ! मैंने ऐमर्पक मदसे चूर होकर वापका अपराध किया है। क्योंकि मैं बापकी शकि मोर प्रमाके सम्ब कवागसस्तेऽविदुपः प्रभावम् । में बिल्कुल बननान पा | परमेश्वर ! बाप कृपा करके मुम्न मूर्ख अपराधीका यह अपराध क्षमा करें और ऐसी कला धन्तुं प्रभोऽधाईसि मूढचेतसो करें कि मुझे फिर कभी ऐसे दुए मानका शिकार म होना पड़े॥८॥सपप्रकाश, इन्द्रियातीत परमारमन् । मैव पुनर्मुन्मतिरीक्ष मेऽसती ॥८॥ पापका पह बातार इसलिये वाकिनोवार सवावतारोऽयमपोषजे सेनापति केरमपमा पेट पामने ही मार और पृषीके लिये पो मारी मारके कारण बन से उनका सप स्वयम्भराणाहरुभारजन्मनाम् । करके सनें मोक्ष दिया नाप, वीर जो वारके पाकि सेकरबारी मनन २, तमका अम्युट्प चम्पतीनामभवाय देव हो-सनकी रक्षा हो ॥९॥ मारन् ! में लापको नमस्कार करता है। वाप सम्सिर्यामी पुरुषोत्तम तप भवाम युप्मपरमानुनर्विनाम् ॥ ९॥ सरिम्प बासुदेव हैं। पाप पदुर्मशियों के एकमात्र मामी मळमासम एष सबके बिचको नाकर्षित करनेवासे । नमस्सुम्य भगवे पुरुपाय महात्मने । में भापको बार-बार ममस्कार करता हूँ॥१०॥मापन मीयों के समान कर्मश होकर मही, सतम्प्रतासे मपर वासुदेवाय कृष्णाय सास्पा पठय नमः ॥१०॥ भोंकी तथा मपनी इछापे मनुसार शरीर मीका स्वछन्दारापदहाय किया है। मापका या शरीर भी विनामसरूप विशुदमानतये । बाप सब कुछ , सबके कारण और सबके बारम सर्वस्मै सनीनाय सर्वभूतारमने नम ॥११॥ है। में नापको बार-बार ममस्कार करता है ॥ ११ ॥ मग ! मेरे बमिमानका पात महीनोर मे मयेद भगान् गाठनाशायासारयायुभि । प्रोभ भी बात की सीम, मेरे बशक बाहर जा भने दे कि मेरा पा तो मर र Pिया गया, तब में पष्टितं पिरत पम मानिना सीग्रमन्युना ॥१२॥ म्ममभार वर्ग मोर मॉधीक द्वारा सारे प्रमा नष्ट कर देना चाहत॥ १२ ॥ परन्तु प्रयामा स्वपक्षानुरीताऽस्मिघम्तम्तम्मापापमः। मुरगत दी बनुमत किया। मेरी पेयम्पर्प होम मेरे बमेरकी मरमा पीपार मेरे समीप पर गुरुमाग्मानं स्पाम गरणं गतः ॥१शा मोर मरेमा मापी शर॥ १३ ॥ र मनाएमा ।

अ० २७] दशम स्कन्ध २९५ मीशुक उपाय भोशुकदेवजी कहते हैं परीक्षित् ! नब देवयन एवं सहीसित कृष्णो मघोना भगवानसम् । इन्द्रने भगगन् श्रीकृष्णकी इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने सते हुए मेषके समान गम्भीर वाणीमे इन्दको मेषगम्भीरया पाचा प्राममिदमनवीत ॥१४॥ सम्बोधन करके कहा--॥ १४ ॥ श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान् मे कहा-इन् ! तुम ऐर्य और धन सम्पत्तिके मदसे पूरे-पूरे मतवाले हो रहे थे। इसध्येि ममा तेऽकारि मघवन् मस्वमङ्गोऽनुगमता । तुमपर अनुमा करके ही मैंने तुम्हारा यह मा किया है। या इसलिये किया तुम मुझे निस्प निम्तर स्मरण रस मदनुस्मृतये निस्य मत्स्येन्द्रमिया मृभम् ॥१५॥ | सको ॥ १५ ॥ जो ऐभय और धम-सम्पत्तिके मदसे बघा हो माता है, पर यह मही देखता किम कामरूप मामैपर्यभीमदान्धी दमपाणि न पश्यति । परमेपर हापम दण मेकर उसके सिरपर सपार है। में जिसपर अनुमा करना चाहता है, उसे ऐमर्यप्रष्ट कर संशयामि मम्पदयो यस्य थे छाम्पनुग्रहम्॥१६॥ देता ॥ १६ ॥ इन्द्र ! तुम्हारा माल हो । अब तुम अपमी रामधानी बमराक्सी मामो बोर मी भावाका गम्पा शक भद्र यः क्रियता मेऽनुशासनम् । पाउम करो। वप कभी धमा न करना । नियनिस्सर मेरी मभिषिका, मेरे सयोगका अनुमय करते रहना गौर म्पीया बाधिकारेषु गुरुर्म स्तम्भमर्जितः ॥१७॥ अपने अधिकार के अनुसार उचित रीतिसे मर्यादा पान करना ॥ १७॥ अथाह सुरभि कृष्णमभिषेप मनस्विनी। परीभित् ! मगवान इस प्रकार बाबा देही हे ये हिमनसिनी कामधेनुने अपनी सम्सानों के साथ गोपवेष- समन्तानरुपामन गोपरूपिणमीश्वरम् ॥१८॥ भारी परमेश्वर श्रीकणकी वन्दना की और उनको सम्बोधित करके कहा--॥ १८॥ सुरभिरुवाच कामधेनुने कहा-सचिदानन्दम्वरूप श्रीरण ! बाप महायोगी-योगेगा। भाप सर्य विमरे, विपके ऊगकम महायोगिन् विपास्मन् विपसम्भव । परमकारण है, अपुग है। सम्पूर्ण विपके सामी | बापको अपने रसकके रूपमें प्राप्तकर हम समाप हो भवता लोकनायेन मनाया षयमभ्युत ॥१९॥ गयी ॥ १९ ॥ बाप उगके सामी है । परन्तु सं ना परमर्फ देवं सं न इन्द्रो जगत्पते । हमारे तो परम पूममीप नाराप्यदेव दी। प्रमो । इन्द्र त्रिलोकीके इम्म हुमा करें, परन्तु हमारे उम्र तो देखता और माय भव गोविप्रदेवानां ये च साधर २०|| आप ही है। पत्र बाप ही गो, साघुमनों की रक्षाके लिये हमारे इम्य बन माइये ॥२०॥ इन्द्रनस्ताभिपेस्पामो प्रमणानोदिवावयम् । हम गौएँ पानीकी प्ररणसे लापको अपना इस माम- कर भमिस करेंगी। विभारमन् ! आपम पृषीका मार भवतीर्णोऽमि विश्वा मन् मुमभारापनुत्तये ॥१॥' तारमक लिये ही भावना पारण किया है ॥ २१ ॥ : - १पाभाम्प २ मग्प मापन ।

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में० २८] दभम स्कन्ध परुण उवाच तगृहीस्थानपद् मृस्पो वरुणसासुरोऽन्तिकम् । मन्दवाबाको यह माश्म नहीं था कि यह अनुरोंकी वेला है, इसलिये वे रातके समय ही यमुमानलमें घुस गये। उस समय परुणके सेवक एक असुरने उन्हें पकर लिया अमिझायासुरी पेलो प्रविष्टमुदई निशि ॥२॥ और पहभपने हामीके पास से गया ॥२॥ नन्दबाबा के सो जानेसे अमके सारे गोप 'श्रीकृष्ण ! अब तुम्ही सुकवस्तमपश्यन्तः कृष्ण रामेति गोपकाः। वपने पिताको मा सकते हो, पलाम ! अब तुम्हारा ही मरोसा है। इस प्रकार करते हुए रोने-पीटने लगे। भगवास्तदुपभुत्प पितरं परुणारतम् । मावान् श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान हैं एव सदासे ही अपने मोंका मय भगाते भाये है। नव सनोंने अमवासियों- का रोना-पीटना ममा और यह नाना कि पितानीको संदन्तिकं गतो राजन् खानामभयदो विसः ॥ ३॥ वरुणका कोई सेवक ले गया है, तब वे वरुणबीके पास गये॥३॥ नब मोकपाल वरुणने देखा कि समव जगत्के अन्तरिदिपौर पहिरिन्द्रियोंके प्रवर्तक भगवान् श्रीकृष्ण सप प्राप्त पीक्ष्य सीफेशं लोकपालः सपर्ममा । दोहनके पहॉपधारे हैं, तब उन्होंने उनकी मत बनी पूना की। मगवान्के दर्शनसे उनका रोम-पेम बामन्दसे खिल मात्या पूजयित्वाऽज वार्शनमहोत्सवः ॥ ४॥ उठा। इसके बाद उनोंने भगवान्से निवेदन किया ॥२॥ परपजीने कहा-प्रमा! भाग मेय शरीर धारण करना सफल हुआ । भाम मुझे सम्पूर्ण पुरुषार्थ प्राप्त हो मप मे निमृतो देहोऽयैवार्थोऽधिगत प्रभो। सपा | क्योकि जाम मुझे भापक चरणों की सेवाका शुम वासर प्राप्त इला है। भगवन् । मिनें मी भापके स्वत्पादभामो भगवन्नवापुः पारमध्यनः ॥५॥ चरणकमोंकी सेवाका मुअवसर मिला, ये मसागरसे पार हो गये ॥ ५ ॥धाप मोंक भगवान् वेदारियों के नमस्तुम् भगवते प्रमणे परमात्मने। नम और योगियों के परमात्मा है। मापके सम्पमें विभिन्न छोक्पष्टियों की कल्पना करनेवामी माया नहीं है-ऐसा ने पत्र भ्यते माया लोकष्टिविकल्पना ॥ ६ ॥ श्रुति करती है। मैं पापको नमस्कार करता ॥६॥प्रमोमेिय परसेवक पदाहौर मनमानाबामपने कर्तम्पको बमानता मामफेन मूढेनाकार्यवेदिना । मी महाँ बानता । वही वापके पिताजीको से भाया है, बाप मा फरके उसका अपराध क्षमा कीचिये ॥७॥ मानीतोऽयंत पितावद् भवान् धन्तुमर्हति ॥ ७॥ गोविन्द ! मैं जानता हूँ कि माप पाने पिताके प्रति पका प्रेममाव रखते है । पेमापके पिता ने बाप ममाप्पनुपई कृष्ण कर्तुमर्हस्पशेपरम् । मे माइये । परम्त मगन् ! जाप सपके मन्तर्यामी, सबके साक्षी । इसलिये बिमरिमोहन श्रीकृष्ण ! माप गोविन्द नीयतामेप पिता ते पितृवत्सल ॥ ८॥ मुन दास्पर मी कृपा कीजिये ॥ ८ ॥ भीन्नुफ उमाप भीशुकदेममी कहते हैं--परीभित् ! मावान् श्री- एवं प्रसादित रुप्मो भगानीमरेपर । रुण ममा मानिईम के मी ईसर । छोकपाल वक्ष्णन १ मारा ।२ मत्पा । पानलिकेपर। 1.

२९८ भीमद्भागवत [२० २८ आदायागात् स्वपिसरं कन्धनां चापहन्मदम् ॥ ९॥ | इस प्रकार उनकी स्तुति करके उन्हें प्रसम किया । | इसके मा" मगवान् अपने पिता नम्दनीको लेकर सम्में पले वाये और बवासी भाई-चन्मुखोंको धानन्दित नन्दस्त्वतीन्द्रिय राष्ट्रा लोकपालमहोदयम् । किया॥९॥न बाबाने वरुणमेकमें मेकपास्के इन्द्रियातीत | ऐपर्य और मुस-सम्पषिको देसा तथा यह भी वेसा कि कृष्णे प समति वेपी शासिम्यो निमियोऽप्रवीत् ।। यहाँक निवासी उनके पुत्र श्रीकृष्णके परमि मुक-सुफ फर प्रणाम कर रहे हैं। उन पर विस्मय एवा । उनहोंने प्रबमें माकर अपने गति-भाइयोंको सब बाते तेस्त्रौत्सुक्मधियो राजन् मस्या गोपालमीश्वरम् । का मनाया ॥ १० ॥ परीक्षित् ! मगवान्के प्रेमी गोप पा सुनकर ऐसा समझने लगे कि बरे, ये तो सय अपि नः खगति सूक्ष्मामपाधास्सदधीश्वरः ॥११॥ मगवान् हैं । तब उनोंने मन-ही-मन ही उस्मुक्तासे विचार किया कि क्या कमी बगदीधर मगवान श्रीकृष्ण हमलोगोंको भी अपना पह मायाप्तीत क्षघाम, इति स्वाना स भगवान् पिशायाखिलाक्समम्। कक्ल इनके प्रेमी मतहीमा सकसे है,दिसलायेंगे।११। परीक्षित् ! मनमान् श्रीकृष्ण सायं सर्वदशी । मम, साइल्पसिन्भे सेपो रूपयैतदचिन्तयत् ॥१२॥ उनसे या बात कैसे छिपी राती। वे अपने बात्मीय गोपोंकी मा वमिछापा जान गये और उनका साम सिर करनेके लिये पासे भरकर इस प्रकार सोचने ननोलोफ एतसिन्नविधाकामकर्ममि । ललो ॥ १२ ॥ इस संसारमें गीम भवानवश सीरमें मात्ममुखि करके भौति-मतिकी काममा और उनकी उचापपासु गति न घेद स्वां गतिं भ्रमन ॥१॥ पूर्तिक लिये नाना प्रकारक कर्म करता है। फिर उनके फसमरूप देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी भादि ठची-मीची योनियों में भटकता फिरता है, अपमी पसरी गतिको- इति सश्चिन्स्प भगवान् महाकारुणिको हरिः। वारमसहपको नहीं पहचान पावा ॥१॥ परमदयाल मगवाम् श्रीकृष्णने इस प्रकार सोचकर उन गपोको दर्शयामास लोकं म्प गोपानां तमसः परम् ॥१४॥ मायान्धकारसे अतीत अपना परमधाम दिसम्मया ॥१९॥ मापवान्ने पहले हमको उस समय साक्षरकार करवाया निसका सरूप सस्य, शाम, अनन्त, सनातन भीर म्पोति सस्पंधानमनन्त यत् प्रसन्पोति सनातनम् । मरूप है तपा समाभिनिष्ठ गुणातीत पुरुष ही रिसे | देख पाते ॥१५॥ बिस माशयमें नफरको मगवान्ने यदि पश्यन्ति मुनपो गुणापाये समाहिताः ॥१५॥ क्पमा सरूप दिखमया पा, उसी बासरूप महदमें मापन् उन गोपोंको ले गये । यहाँ उन लोगोंन उसमें इसकी लायी । वे प्राइदमें प्रवेश मर गये। तब सेतु ममदनीतामग्नाः रुप्मेन पोदरताः। भगवान्ने उससे उनको निकालकर अपने परमधामका दर्शन कराया ॥१५॥ उस दिम्प भगवत्सरूप मेकको दाशुभमणो लाई पत्राक्रोऽध्यगात् पुरा ॥१६॥ | देखकर नन्द मादि गोप परमानन्दमें मग्न हो गये। वो १ बसिमिययम् । २ बम ।

अ० २९] २९९ नन्दादयस्तु सं दृष्ट्वा परमानन्दनिर्षसाः । उमाने देखा कि सारे वेद मूर्तिमान् होकर भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे हैं। यह देखकर ये सब-के- केणं पसत्रम्छन्दोमिास्तूयमान सुविस्मिता॥१७॥ सब परम विस्मित हो गये ॥ १७ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या सहितायो दशमस्कम् पूर्षियाविंशोऽध्याय ॥ २८ ॥ - अथैकोनत्रिंशोऽध्याय राससीसाका मारम्म भी फ उपाय श्रीशुभदेवजी करते-परीक्षित | शरद् ऋतु थी। उसके कारण बेला, चमेली भादि मुगन्धित पुष्प सिळकर मह-महें महक रहे थे। भगवान्ने वीर मगवानपि हा रात्री शरदोत्फुल्लमल्लिका । दरणके समप गोपियोंक। मिन रात्रियोंका सकेत दिया पा, ये सब-की सब पुखीमूत होकर एक ही गत्रिके रूपमें उठसित हो रही पी। भगवान्ने ठरें देख, बीस रन्त मनधळे योगमायापाभितः ॥१॥ ' देखकर दिम्य बनाया । गोपियों तो चाहती ही थी। बब मगवान्म मीमपमी बचिम्प महाशक्ति योगमायाके सहारे उन्हें निमित्त बनाकर रसमपी यसकोग करनेका दादराज करैर्मुख सहस्प किया । वमना होनेपर मी सन्होंने अपने प्रेमियों- की पूर्ण करनेके लिये मन स्वीकार किया ॥१॥ मावान्के सहस्प करते ही चन्द्रदेवने प्राची दिशाके प्राच्या विलिम्पमरुणेन शन्तमै । मुसमण्डलपर वपन शीतल किरणरूपी फरकमलेसे मरिमाको रोली केशर मादी, जैसे परत मिॉक बाद स पर्पणीनामदगाप्छुचो मान् अपनी प्राणप्रिया पसीके पास जाकर उसके प्रियतम पतिमे उसे जानन्दित कानके लिये ऐसा किया हो! इस प्रकार चन्द्रदेवने उदय होकर म केवल पूनिशाका, प्रत्युत ससारके समस्त चर-अचर प्राणियोका संताप-जो मिप प्रियाया इव दोर्पदर्शनः ॥२॥ दिनमें शरकाशन प्रखर सूर्यदिभोके कारण म गया । या-दूर कर दिया ॥२॥ उस रिम चन्द्रदेवा मणल कमन्न्तमस्वयमण्डल मखण्ड पा । पूर्णिमाकी रात्रि थी। वे नूतन बगरक समान साल साल से ये, कुछ सोमिनित भामिनासे पुक्क नाम परते थे। उनका मुममम मीनीक रमाननाम नारमाराम् । समान मारम हो रहा था। उनकी कोमा रिसे सारा बन गनुरागरे ।ग रंग गपा पा । बनर कोन समभिन्म मागवा पुस्मिन । २ मरिमामय । रामनिसाय | ४ मप्पुत ।

३०० भीमसागवत [२० २९ पन च तस्कामलगोऽभिरजित कोनेमें उन्होंने अपनी चौदमीकेसरा अमृतका सम्म ठरस दिया था। मगवान् श्रीकृष्णने अपने दिम्प हम्मा रसके उदीपनकी पूरी सामग्री उन्हें और उस मको नगो कल याम मनोहरम् ॥ ३॥ मामी कामवीमही की वस्पष्ठ एवं मपुर तान भी ॥५॥ देखकर अपनी माँसुरीपरगनान्दरियोंके मनको हरम करके- भगवान्का वा पशीवादन भगवान्के प्रेमको, उनके मिळनकी स्मळसाको बल्यास उकसानेवाय-बानेवाय निशम्प गीतं तदनापर्धन पा। यों तो श्यामसुन्दरने पहले से ही गोपियों के ममको | अपने पशमें कर रस्सा पा। जब तो ठमक मनकी सारी वस्तुएँ- रमय, सारोग, धैर्य, मर्यादा वादिकी ग्रजलियः कृष्णगृहीतमानसाः। चियाँ मी-जीन में। पंधीपनि उनसे ही उनकी विचित्र गति हो गयी। निनहोंने एक साप साधना की पी भीकृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनके लिये, मे गोपियों आमगारन्योन्पमलक्षियोपमाः भी एक-दूसरेको सूचना न देकर-पातक कि एक पूसरेसे अपनी पेडाको छिपाकर वहाँ वे थे, मकि किसे पाळ पड़ी। पीक्षित । वे इतन वेगसे ममी पीक स मन्त्र कान्तो बालोलामालाः ॥ ४॥ | उनके कानों के कुछ मौके का ये थे ॥ ९ ॥ , दुइन्स्योऽमिया कामिद दोई हित्वा समस्यामा बशीपनि पुनकर जो गोपियों पूरी दुर यी पा, में मत्फ्त सत्सुकतावश दूध दुहला मेयर | पनी । नो धूम्रपर दूध मोटा बी पी, वे सफलता हुमा पयोऽधिभित्म संपापमनुवासापरा ययुः ॥५॥ दूध छोपकर, मोर मो लपसी पका ही वीरे पकी हुई आपसी बिना उतारे ही ज्यों-की-स्यों मेगकर का दी॥ ५॥ वो मोमन परस रही पी वे परसनासोरकर, परिषेपयन्त्पस्तद्वितापायपन्स्पा शिन् पयः । गो भेटे-छोटे बचों को दूध पिला रही थी वे दूध पिल्मना सकर, बो पतियों की सेवा पुसूया कर रही परे सेवा-सुपा छोरकर वर नो खर्य मानन कर ही शुभूपन्स्यापतोन् मामिदन्नन्स्योऽपास्सभोजनम्॥६॥ ने भोमन करना छोपकर अपने कृष्णप्यारेके पास बम परी ॥६॥ कोई-कोई गोपी अपने भीरमें भाग, सिम्पन्त्यः प्रजन्त्योऽन्या मअन्त्यः कामलोचने ।पदा मौर उबटन मगा रही थी और कुछ मोसोम भवन ममा रही पा । ठणे ओपर सपा उमट पछट वप धारणकर श्रीरणके पास पहुँचनेके मिये म्पत्पस्तवस्रामरणा: कामिन् प्णान्विर्क ययुः॥७॥ चल पा ॥७॥ पिता और पत्तियोंने, भई बार माति-माधुषोंने सरोका, उनकी मालमपी प्रेमपात्रा में विन गमा। परन्तु वे इतनी मोहित हो गयी दी ता यापमाणाः पतिभिः पिवभिभावाभि । मि रोकनेपर भी महकी, न एक सकी । सकती म० २९] " - कैसे! विधविमोहन श्रीपप्णने उनके प्राण, मन और गोविन्दापहतात्मानो न न्पयर्सन्त मोहिता ॥ ८॥ वारमा सब कुछका अपहरण मो कर दिया या ॥८॥ परीक्षित ! उस समय कुछ गोपियों घोके भीतर दी। उन्हें बाहर निकलनेका मागहीम मिला। तब सम्होंने अन्तहगताः कामिगोप्याऽलन्धविनिर्गमा । अपने नेत्र मद लिये बौर पदी तन्मयतासे श्रीकणके सौन्दर्य, माधुप और सोलार प्याम करने का ॥९॥ परीक्षित् | अपने परम प्रिपतम श्रीकृष्णक असम विरहकी तीव वेदमासे उनके उदय, इतनी म्यपालतनी जल्न हुई फि उनमें यो पुछ अशुम कणं तनावनायुक्ता दभ्युमीलिवलोचनाः ॥ ९॥ संस्कारोंका मेशमान अवशेष पा, वा मम हो गया। इसके बाद सरस ही प्ान लग गया। प्याममें उनके सामने भगवान् श्रोष्ण प्रकर हुए। उन्होंने मन-ही- मन बड़े प्रेमसे, मड़े भायेगसे उनका वालिङ्गन किया। सहप्रष्ठविरहवीग्रतापधुताशुभाः उस समय उन्हें इतना मुम्ब, इतनी शान्ति मिली कि उन सब-के-सम पुण्यके संस्कार एफ साप ही क्षीण हो गये ॥ १०॥ परीक्षित् ! यपपि उनका उस समप पानप्राप्तान्यताश्लेपनिर्पस्या झीगमाला ॥१०॥ मीकृष्णक प्रति भारमात्र मी पा; तथापि कहा साप वस्तु मी मावकी अपेक्षा रानी है। उन्होंमे जिनका बालिान किया, चाहे किसी भी भावसे किया हो, मे खय परमारमा ही तो थे। इसलिये ठगोम पाप और वमा परमात्मान जारपदयापि मगता । पुण्याप कर्मके परिणाममे बने हुए गुणमर शरीरका परित्याग कर दिया । ( मगवान्की में सम्मिरित होनके योग्प रिम्य बप्रापन शरीर प्राप्त कर रिपा) बागुणमयं दई मयः प्रधीणव धना ॥११॥ इस शरीरसे मोगे जानेवासे कमबन्धन तो प्यानय ममप ही शिम मिन पुक प॥ ११ ॥ गगोपाष गता परीमिदमे पूज-भगवा ! माता मातान् श्रीक्षणको फर? आमा रम प्रियतम ही पनी कणं विर् परं फान्त न तु प्रनतया मुन । उमर उनमें प्रमान महा प्रार वनही रएि प्रान गुम ही मामल मीनी है। गुगप्रवाहापरमम्तासां गुणधिया क्यम् ॥१२॥ ऐसी स्पिनिय उमप पि गुर्गे FROM मंमारकी निति मे मामा "n पीगुरु उग भी गुस्दापनि परामद 'मदुम्मे पाने सेवर पुश ल मािन FATI मामा प्री सभा पनर मन प्रल नरम उन पुग्माइनस पेप मिदि यथा गत । सारीरमे हम्ग मी ट" ३०२ श्रीमद्भागवत [ब० २९ द्विपमपि पीके सिसाघोषजप्रियाः॥१३॥ | स्पितिमें जो समस्त प्रकृति और उसके गुणों से यतीत मगवान् श्रीकृष्णकी प्यारी और उनसे अनन्य प्रम करती है, वे गोपियों उन्हें प्राप्त हो माय-समें | कौन-सी माचर्यकी मात्र है॥१३॥ परीक्षित । नमो निाभेपसार्याय म्पत्तिर्मगपतो नुप । बाखबमें भगवान् प्रतिसम्बन्धी पनि विनाश, प्रमाण- प्रमेप और गुणगुणीमावसे रहित है। वे अक्स्यि वनन्त अप्राक्त परम कल्याणसरूप गुणों के एकमात्र अम्पयसाप्रमेयस्य निर्गुपस गुणात्मनः ॥१४॥ वामप है। उन्होंने या बो अपनेको तथा अपनी कीगको प्रकट किया है, उसका प्रपोजन केवल इतना ही है कि श्रीव उसके सहारे वपमा परम कल्याण सम्पादम करे ॥ ११ ॥ इसडिये मगवान्से केस काम कोर्ष भयं स्नेहमैक्य सौरवमेव च । सम्बन्ध हो माना पारिये।ा सम्बन्ध चाहे पैसा हो-कामका हो, कोषका हो या मपका हो; स्मेव, मावेदारी या सौहार्द का हो । चाहे निस मानसे मापन- निस्प हरौ विदपतो यान्ति तन्मपता हि॥१५॥ में नित्य-निरन्तर अपनी पियों गोर दी मार्य, वे | मगवान्सेही मती है। इसलिये सरिया मगमप हो जाती है, और उस जीवको मगवान्की की प्रानि होती है ॥ १५॥ परीक्षित् | उमारे-जैसे परम न चैव विसपा कार्यों भवता भगवत्पजे । भागवत, मगाम्का यस्य नामनेले भकको भीकमके सम्बन्ध ऐसा सन्देह नहीं करना चाहिये । पोगेपक मी ईघर बनमा मगवान के लिये भी यह कोई व्यर्य- योगेश्वरेश्वरे रुप्मे पत एका विराम्पते ॥१६॥ । की बात ! मरे । उनके सहापमाप्रसे--मकि इशारेसे सारे जगत्का परम कम्पाण हो सकता है । ।। १६ ।। म भगवान् भीरुणने देख कि की भनुपम विभूतियों-गोपियाँ मेरे लिम्बुस पास का गपी वारप्ट्वान्तिकमामाता भगवान् प्रजयोपितः। है, तब उन्होंने अपनी बिनोदमरी गावातरीसे सम्में मोरत करते हुए कहा । क्यों न हो--मूत, भविष्य और क्तमानकारके मितने पका है, हममें बेही ते अमदर पदवी अष्ठो पापापेशेषिमोहमन् ॥१७॥ सर्वश्रेष्ठ है ॥ १७ श्रीभगवामुपार भगपाम् भीछप्पमे कहा- महाम्ग्यती गोपियो! तुम्हारा स्वागत है। बतमाजा, तुः प्रसम करनके म्यागपामाभागाः प्रिय किंकरपामि। लिपे में कौन-सा काम कर। अजमें तो सब कुश मङ्गल है म ! हो, इस समय पही ममसानामपं कपि भूवागमनकारगम् ।।१८॥ मानकी क्या नावश्यकता पर गयी १ ॥ १८ ॥ सम्दरी , भ०२९] दशम स्कन्ध रखन्पेपा घोररूपा पोरसस्वनिपेषिता । गोपियो ! रातफा समय है, यह सर्यतीमा मयाबमा होता।मौर इसमें गो-बड़े मपापने जी-मन्तु इधर प्रतियात घज नेह स्पेयं सीभिः मुमभ्यमाः ॥१९॥ उधर घूमते रहते हैं । मत तुम सब तुरंत अनमें सेट नामो । पतके समय घोर मंगमें सियोंको महारुफना स्वादिये ॥ १० ॥समें न देसकर सम्हारे माँ-बाप, पति- माता पितरा पुत्रा प्रावरः पतयप न । पुत्र और भाई-बम्धु दूर रहे होंगे । वम मपमें न डामे ॥ २०॥ तुमनेोने रंग-बिरंगे पुष्पोंसे लदे गए विचिन्वन्ति अपच्यन्तो मा कृर्व पन्सायसम् ।। इस बमकी शोमाफो देश । पूर्ण पदमाकी कोमल रभियोंसे या रँगा हवा है, मानो उननि बपने रए पनं सुमित राकेशकररजितम् । पो चित्रकारी की हो, और यमुनामीके मटका स्पर्श करके मनेवाले शीतल समीरकी मन्द-मन्द मानानिललीसैमत्तापल्लषशोभितम् । ॥२१॥ गतिसे हिलते हुए ये बमोंके पत्ते तो इस बनकी शोमाको गौर भी बहाये। परन्तु भव तो हमलोगोमे मह सब कुछ देख लिया ॥ २१ ॥ मग देर मत यात माचिरं गोप्टंशपभपतीन् सतीः । कहो, शशिप-से-शीन बममें स्त्रैट नामो । तमोग फुटीन भी हो भौर सय भी सती हो, नामो, अपने अन्नन्ति पस्सा पालाय वान् पापयत दुमत ॥२२॥ पतियोंकी बौर सतियोंकी सेवा पुल्या करो। देखो, तुम्हारे परफे नमो-नो पम्ये चौर गौयोंके मछम रोमा रहे, बनें खूप पिगमो, गौएँ दुरो ॥ २२ ॥ वयमा पदि मेरे वामदमिस्नेहा भवस्पोयन्त्रिताशयाः । | प्रेमसे परवरा होकर मग यहाँ भायी हो तो इसमें कोई मनुचित बात मही, या तो तुमारे योग्य ही बागवा मुपपन्न वा प्रीयन्ते मयि जन्तवः ॥२३॥ है। क्योंकि नगरके पशु-पक्षीतक मुझसे प्रम करते है, मुष्ट देसकर प्रस्म होते है॥ २३ ॥ कम्पाणी गोपियो। मर्सः शुभमण स्त्रीमा परो धर्मो प्रमामया । सियका परम धर्म यही है कि मे पति और ससके माई अन्धुलोंकी निकाटमात्रसे सेवा करें मोर सन्तानका परम्न-पोषण करें ॥ २९ ॥ मिम सियोंको उत्तम होक तमन्सूनां च फल्पापा प्रधानां पानुपोपणम् ॥२४॥ प्राप्त करने की बमियरा हो, ये पातकीको डोरकर और किसी भी प्रकारके पतिका परित्याग न करें। मलेही इपीसो दुर्मगोलो नो रोम्पधनोऽपि वा। रमुरेसमाववाग्म, भाम्पहीन, दर्स, रोगी पानिधन यो म हो ॥२५॥ फुल्पीम पियों के लिये मार पतिः स्त्रीभिर्न हातम्यो लोफेप्सुमिरपातकी ॥२५॥ पुस्पकी सेना सम तयइसे निन्दनीय ही है। इससे उनका परम्येक गिरता है, सर्ग महाँ मिम्वा, इस शोक, अपयश होता है । यह कुर्म स्वयं सो बक्त प फरगु क भयापहम् । राण, भगिक ही इसमें प्रस्पक्ष-वर्तमानमें मी कर दी-कार है । मोक्ष वानिकी तो बात ही कौन करे, यह भूगुप्सित र सर्प मापपस्य इलमिया ॥२६॥ साक्षात् परम मप-नरक बादिका छ । ॥ २६ ॥ - - मसर्ममपश्स्य ३०६ श्रीमद्भागवत [अ० २९ अस्माक्ष्म तत्प्रमृति नान्पसमधमङ्ग प्राप्त वा । मिस दिन यह सौमाम्प हमें मिम और तुमने हमें सीकर करके मानन्दित किया, उसी दिनसे हम वोर किसीके सामने एक क्षणके लिये भी टारनेमें स्मात स्वयाभिरमिता पत पारयाम ॥३६॥ समर्ष हो गयी है-पति-पुत्रादिकोंकी सेना तो दूर ही ॥ २६ ॥ हमारे सामी ! निन अमीचीका भीर्यत्पदाम्बुजरबधकमे सुलस्या पाकटाक्ष प्राप्त करनेके लिये पदे-बड़े देवता तपस्या करते रहते है, पही मीनी तुम्हारे पक्ष सल्में बिना किसीकी प्रतिकित्ता के सान प्राप्त करनेपर मी अपनी लग्यापि वक्षसि पद फिल मृस्पमुष्टम् । सौत तुळसीके साप तुम्हारे चरणोंकी रम पानेकी ममिय किया करती है। बसकके समी मनोने उस घरणरबका सेवन किया है। सन्हींके समान हम भी यस्याः स्ववीक्षणकतेऽन्पमुरप्रयास तुम्हारी ससी परगरमकी शरणमें बायी ॥२७॥ भगवन् ! अबतक जितने भी तुम्हारे चरण की मण स्तन वयंच सवपादरमाप्रपमाः ॥३७॥ ली, ससके सारे कष्ट तुमने मिटा दिये । स तुम हमपर कृपा करो। हमें भी अपने प्रसादका सम्म बनायो । हम तुम्हारी सेवा करमेकी वाशा-मिलासे तमः प्रसीदाजिनार्दन तेऽहिमूल घर, ब, कुटुम्म-सब कुछ मेहकर तुम्हारे मुगल चरणों की शरणमें बायी है। प्रियतम । वहाँ तो तुमारी बारामनाके लिये अवकाश ही मही है। पुसमूषण। प्राप्ता लिसज्य पसतीस्वदुपासनाशाः । पुरुषोत्तम ! तुमारी मधुर मुसकान और चार चितवनने हमारे दयमें प्रेमकी-मिसनकी वाकांक्षाको बाम स्वस्सुन्दरमितनिरीक्षणतीमकाम- पघका दी , हमारा रोम-रोम उससे बह रहा है। तुम हमें अपनी दासीके रूपमें स्वीकार कर मे। हमें अपनी सेवाका बसर दो ॥ ३८ ॥ प्रियतम । तुम्हारा सप्तात्मना पुरुषमपण देहि दासम् ॥३८॥ एम्दर मुसकमस, निसपर घुमाली बसमें प्रमक ही |१, तुम्हारे ये कमनीय कपोल, मिमपर अन्दर-सुन्दर वीपासफावमुख सब इमलभी कुमत वफ्ना बनन्त सौन्दय विखेर रे । हारे ये मधुर वर, दिनकी सुधा प्रधाको मी छमामेमाम्म है। तुम्हारी यह मयनमनोहारी चितवम, नो मद-मन्द गजसलाधरसुप इसिसावठोकम् । | मुसकानसे उम्लसित हो यो मारी ये दोनों मुमाएँ जो परमागर्वोको वमपदाम देनेमें माफ्त दचाभयं च मुजदमायुर्ग पिलोस्प सदार वौर तमारा पह पक्ष सम, मो ममीमीका- | सौन्दर्यकी एकमात्र देवीका निस्प क्रीम, देशर पक्षः भियरमण च भवाम दास्यः ॥३९॥ हम सब महारी दासी रो गपी .n १९ ॥ - म० २९] दशम स्कन्ध ३०७ पक्ष और का रूपङ्ग ते कलपदायतमछिसेन प्यारे श्या समुन्दर ! सीनों लोकमि मी बोर ऐसी कौन-सी भी है, जो मधुर मधुर पद और आरोह अवरोह-कमसे विविध प्रकारकी मूळमायोंसे युफ तुम्हारी शीकी सम्मोहिताचरिताम घलेविलोक्याम तान सुनकर सपा इस त्रिलोकसन्दर मोहिनी मतिको- मो अपने एक मुंद सौम्दपसे प्रित्येकीको सौन्दर्यका प्रैलोक्यसोभगमिदप निरीक्ष्य रूप दान करती है एव जिसे देखकर गो, पक्षी, हरिम मी रोमाधित, पुस्टक्ति दो नाते-अपने यद्गोदिजममृगाःपुलफान्पपिम्रन्।४०१ मेनोसे मिहारकर वार्य मर्यादासे विचलित न हो जाय, कुम-कान और Rोकरमाको त्यागकर तुममें अनुरक न हो माप ॥ १० ॥ हमसे यह वास छिपी मही है म्यक्तं भवान् ग्रजभयातिहरोऽभिजातो कि वैसे मगवान् नारायण देवताओंकी रक्षा करते है, | वैसे ही तम प्रजमणमा मय और दस मिटाने के देवो यथाऽऽदिपुरुप सुरलोकगोप्ता । लिये ही प्रकट हुए हो । वौर पर मी स्पष्ट हो कि | दोन-मुसियोंपर तुम्हारा का प्रम, पपी का है। प्रिपतम ! हम भी बहो दुखिनी है। महारे मिननकी सनो निषेहि फरपजमासंपन्धो वाकांक्षाकी भागसे हमारा वक्ष स्थल मम रहा है तुम अपनी इम दासियोंके वश स्सस भोर मिरपर अपने कोमल करकमल रखकर पहें वपना हो हमें तप्तम्तनेषुष शिरस्सु पकिरीणाम् ।४१। नीनदाम दो ॥ ११ ॥ भीसुक उवाच मीगुकदेवजी कहते हैं-परीक्षित् । मान् श्रीकृष्ण सनकादि योगियों बोर शिवादि योगेमक भी ईसर १ । मब उन्होंने गोपियोंकी म्पया और इवि विकवितं तासां श्रुत्वा मोगेपरेघर । प्याकुस्तासे मरी पाणी पुनी, तब ठमका एय दयासे मर गया और पपपि ये भारमाराम-अपन माप ही रमग करते रहते हैं, उन्हें अपम वनिरिक और प्रदम्प मुदय गोपीरात्मारामोऽप्यरीरमत् ॥४२॥ किसी भी बाह्य बस्तुकी अपेक्षा नहीं मिल मी उननि रसकर नफ साय प्रोडा प्रारम्मकी |॥ १२ ॥ सामिः ममेवामिरुदारपेटिव भगवान् श्रीरप्पन अपनी माव-मनी बार पेश गोपियों के मनुसून कर दी, सिर भी पाने समय म्यो करयो एपरम स्थित पे अप्युत य । जब प्रियेक्षणास्पाटमुम्बीभिरम्पत सुरकर हमने तब उनके उगमत-उम्भर दर कुलमायके समान बन पाने घे । उनकी प्रममरी पितानसे नीर उमा दमके भामरा मे उदारहासदिनन्ददीधिनि । मुम्रममा प्रसि गया । उन्हें पारो वरमे रिक्षा गरी । उम ममय र मी प्यरापणार इवाइमिपूत ॥४३॥ ' शायदा, माना भरनी पना काओंसे सिर एस । ।

३०४ श्रीमद्भागवत [अ०२९ - अषणाद् दर्शनाद् ध्यानान्ममि मापोऽनुकीर्तनात् । । गोपियो ! मेरी लीला और गुणों के अबणसे, रूपके दर्शनसे, उन सबके कीर्तन औरम्यानसे मेरे प्रति जैसे वनम्प प्रेमकी प्राप्ति होती है, मेसे प्रमकी प्राप्ति पास बनेसे माहोटी। न तथा समिण प्रतियात ववो गृहन् ॥२७॥ इसलिये तुमस्यगनमीषपमे-अपने घर मौर बायो॥२०॥ श्रीसुक उपाय भीशुकदेवजी कहते हैं-परीक्षित् ! भगवान् श्री- कृष्णका या वप्रिय माषण सुनकर गोपियों सदास, सिम इति विप्रियमाकर्ण्य गोप्यो गोविन्दभापितम् । हो गयीं । उमकी माश ट्ट गयी। पिताके वया विषण्णा भग्नसहपामिन्सामापुरत्पयाम् ॥२८॥ एव वपार समुदमें इवने उत्तराने स्मनी ॥ २८ ॥ उनके बिम्बाफल (पके हए कुंवरू) के समान मा सार कस्वा मुखान्मय शुचा धसनेन शुप्पद् वर शोकके कारण परम्नेवाली छवी और गरम सॉससे सूस गये । ठगहोंने अपने मुँह नीचेकी बोर स्टकर पिम्बाराणि परगेन मुर्व लिस्वन्स्पः। | लिये, घे परके मोंसे धरती कुरेदने भगा । नेत्रोसे प्ररुपाचमपिभिः इचशमानि दुमके माँसू बह-बहकर काममके साप बक्ष सम्पर पचने वौर वहाँ मगीई केशको धोने मगे । उनका वस्पुर्घअन्त्य उरास्वमराः मतूप्मीम् ॥२९॥ उदय दुःससे इतना भर गया कि ये कुछ बोस म का चुपचाप मीरा गया ॥ २९ ॥ गोपियोंने बपने प्यारे प्रेष्ठ प्रियेसरमिव प्रसिभापमाणे श्यामसुन्दरके किये सारी कामनाएँ, सारे भोग मेर दिये थे। श्रीकृष्णमें उनका मान्य अनुराग, परम प्रेम पा। मम सनोंने अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी प रुण तवर्ष विनिवर्तितसर्पफामा: । निठरतासे मरी मात सुमी, गो वहीनी ममिय-सी माराम हो यी पी, तब उन्हें बसा दुस एला । बाँखें रोते- रोते लाल हो गया, वोमुभोंके मारे रुंध गयी । उमनि नेपिम्प रुदितोपाते स किशित् धीरन धारण करके अपनी बाके वासू पोडे और फिर प्रणयकोपके कारण घे गद्गद वाणीसे करने संरम्ममगदगिरोज्नुपवानुरका ॥३०॥ष्णा ॥३०॥ गोपियोंमे करा-प्यारे श्रीकृष्ण ! तुम मा-बट म्यापी हो । हमारे यकी बात बामते हो । म मै विमोति भवान् गवितुं नृक्षसं इस प्रकार निमतामरे पमन नहीं करने चाहिये । हम सब कुछ कर केस तमारे पराम संस्मन्य सर्पविपस्सन पादमूलम् । ही प्रेम करती है। इसमें संदेह नहीं कि तम सत्त्र वीर हीसे हो । तुमपर हमारा को य महा है। मक्का भयख दुरबमा मा स्पमासान फिर मी तुम अपनी बोरसे, पैसे मादिपुरम मगन् मारायण मा करके मपने मुमुक्ष मोंसे प्रेम करते है, से देवो यथाऽऽदिपुरुसो भजते समधन्॥२१॥ ही हमें सीकार कर मो।हमारा स्याग मत करो ॥३१॥ गोप्य अपुग ।

4० २९] दशम स्कन्ध २०५ यत्पत्पपस्यसुहदामनुसूचिरङ्ग प्यारे श्यामसुन्दर ! तुम सब धोका रहस्य जानते हो। तुम्हाय यह माना कि अपने पति, पुत्र स्त्रीणांखधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम्। मोर माई बन्धुर्मोकी सेवा करमा हरी मियोंका सधर्म '-अक्षरश ठीक है । परन्तु इस उपदेशके भनुसार अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे हमें तुम्हारी ही सेवा करनी चाहिये, क्योंकि तुम सब उपदेशोंके पद (चरम लाप) हो, साक्षात् मगवान् हो । प्रेष्ठो भवांस्तनुमृतां किल पधुरात्मा ॥३२॥ तुम्हा समस्त शरीरपारियोंके सार हो, वारमा हो और वन्ति दि स्वपि रविंशलाःस्व आस्मन् परम प्रियतम हो ॥३२॥ बारमझानमें निपुण महापुरप तुमसे ही प्रेम करत, क्योंकि तुम नित्य प्रिय एक नित्पप्रिये पतिमुवादिभिरासिंदै किम् । अपने ही भारमा हो । बमिस्य एप दुखद पति- पुत्रादिसे क्या प्रपोनन है। परमेघर ! इसलिये हमपर वम प्रसीद परमेघरमा मछिन्या प्रसन्न होको । कपा करो । कमलनयन ! चिरकालसे सुम्हारे प्रति पाप्ती-पोसी पाशा बमिठापाकी टासाती आयो मृतां स्वपि घिरादरविन्दनेत्र॥३३॥ माका छेदन मत करो ॥ ३३ ॥ मनमोहन । अब तक हमारा पिच परके करम-मे लगता था। इसीसे चिचं मुखेन भववापस गृहपु हमारे हाय मी उममें रमे ए थे। परन्तु तुमन हमारे देखते-देखते हमारा मह चित एट लिया। इसमें तुम्हें यभिर्विशत्युत करावपि गृपकत्ये। कोई कठिनाई भी मही उठानी पड़ी, सुम तो मुसम्वरूप हो न ! परन्तु अब तो हमारी गति-मति निराठी ही पादौ पद न चलतस्तव पादमूला हो गयी है। हमारे ये पैर तुम्हारे चरणकमलों का छोड़कर एक पग भी हटनेके ये तैयार नहीं है, मही याम फथं ग्रजमधो करनाम फिंपा ॥३४॥ इट रहे हैं। फिर हम मममें कैसे ना ! और यदि पहा नाय मी तो करें क्या ! ।। ३१ ॥ प्राणवायम! हमारे प्यारे स्था! तुम्हारी मन्द मन्द मपुर मुसकाम, सिचान नस्त्वदधरामसपूरकण प्रेममरी वितन और मनोहर सगीतने हमारे हदयमें तुमारे प्रम और मिसनकी बाग धपका दी। उसे हासावलोककलगीवजान्छयामिम् । तुम भरने मघरोंकी रसधरासे पुछा दो। मही तो ना पेत्यय विरदजाम्पुपयुक्तदहा प्रिपतम ! हम सच कहती २, तुम्हारी रिस्म्यपाको बागसे हम भरन-अपने शरीर मष्टा देंगी और प्यानके ध्यानेन याम पदयो पदवीं सखे ते ॥३५॥ जय तुम्हारे घरणकमरों को प्राप्त करेंगी ॥ ३५ ॥ प्यारे कमरापन 1 तुम बमपसिक्कि प्यारे । पपम्पुजाय तप पादतर्स रमाया पौर वे मी तुमसे मात प्रेम करते हैं । इससे प्राप तुम ठहाक पास रहते हो । यामक कि पार दिन परगकमरों की सेवा वासर सर्प मामीवीको भी दषधणं कृषिदरम्पचनप्रिपस्य । कमी-कभी ही मिया । एदी पर साहमें

श्रीमद्भागवत
[१०२९
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अस्पात्म सस्प्रमृति नान्मसमयमा
प्राप्त प्रभा । मिस दिन यह सौमाम्प हमें मिल कर
| तुमने हमें सीकार करके बामन्दित किया, उसी दिनसे
सातु त्वयामिरमिता पत पारयामः ॥३६॥ असमर्थ हो गयी है-पति-पुत्रादिकोंकी सेवा तो पूर
हम वोर किसीके सामने एक घणके लिये भी ठहरनेमें
रही ॥ ३६ ॥ हमारे सामी । जिन ममीनीका
भीर्यस्पदाम्बुजरजमक्रमे तुलस्खा ख्याकटाक्ष प्राप्त करनेके लिये बड़े बड़े देवता तपस्या
फरते रहते हैं, मी मीत्री उमारे पक्ष स्पस्में दिना
किसीकी प्रनिन्द्रिताके स्थान प्राप्त कर लेनेपर भी अपनी
सम्यापि पक्षसिपदं फिल मृत्पमुष्टम् । सौत तुम्सीके साप तुम्हारे चरणोंकी रन पानेकी ममिणपा
| किया करती है। अबतकके समी मळीने उस
मस्साः स्वबीक्षणकवेन्पमुरप्रयास
चरणरजका सेवन किया है। उन्होंके समान हम भी
कुमारी एसी परणानकी शरण पापी है ॥ ३७॥
भगक्न् ! अबसक जितने भी तुम्हारे घरों की शरण
स्तवद् पयप सबपादरजाप्रपमा ॥३७॥ मी, उसके सारे का तुमने मिटा दिये। अब तुम
हमपर कृपा करो। हमें मी अपने प्रसादका मामम
बनायो । हम तुमारी सेवा करनेकी मासा-अभिमषसे
समः प्रसीद धिनार्दन तेऽस्मूिल
पर, गैर, कुटुम्म-सब कुछ छोरक्त तुम्हारे पुगक
परणोंकी शरणमें बायी है। प्रियतम ! पाँ तो तुमारी
भारापनाके लिये अवकाश ही नही है। पुरसमूषण ।
प्राप्ता विसृज्य पसतीस्वदुपासनाशाः ।
पुस्खोघम ! तुमारी मधुर मुसकाम दौर चारु पितानने
हमारे दयमें प्रेमकी-मिम्मकी बाकांक्षाकी बाग
स्वस्सुन्दरसिवनिरीक्षणतीम्रकाम-
भयका दी है, हमारा रोम-रोम उससे चल रहा है।
जम हमें अपनी दासीके रूपमें सीकार कर मे। हमें
अपनी सेवाका क्सर दो ॥ ३८॥ प्रियतम | तुमारा
तप्तात्मना पुरुपभूषण देहि दास्यम् ॥३८॥
सम्दर मुसकमछ, निसपर पुषरामी मल लक यी
है, तुमारे ये कमनीय कपोल, मिमपर मुन्दर-सम्बर
वीक्ष्पालादतमुख तब इमलभी | कुण्या वपना वमन्त सौन्दर्य बिखेर रहे है। तुम्हारे
ये मधुर गपर, मिनकी पुधा सुधाको भी समाधी
है। तुम्हारी या नयनमनोहारी चितवन, नो मन्द-मन्द
गप्पसलाधरसुर्घ हसिवापलोकम् ।
| मसकामसे सम्मासित हो ही है, हमारी ये दोनों
समाएँ गो शरमागोंको बमपदान देनेम बापत
दत्ताभयं च सनदमयुगं विलोक्प वदार हैं और तुम्हारा यह पक्ष सल,
जो ममीजीका-
सौन्दर्यकी एकमात्र देवीस मित्प कीमसळी, देखकर
पक्षः मियेकरमण च भवाम दासः ॥३९॥ | इम सब वम्हारी दासी हो गयी १॥ ३९ ॥

अ० २९] दशम स्कन्ध ३०७ का स्पा ते कलपदायतमूर्षिछतेन प्यारे श्या मन्दर ! तीनों माकोंमें भी गौर ऐसी कौन-सी स्त्री है, बो मधुर-मधुर पद और भारोह अवरोह क्रमसे विविध प्रकारकी मुनावोंसे पुक तुम्हारी वशीकी सम्मोडिताऽऽर्यचरिताम चलेस्त्रिलोक्पाम ताम सुनकर तपा इस त्रिलोकमन्दर मोहिनी मतिको- गोषपने एक द सौन्दर्यसे निल्नेकीको सौन्दर्यका त्रैलोक्यसीमगभिव पनिरीक्ष्य रूप दान करसी एक लिसे देखकर गो, पक्षी, पप और परिम मी रोमाधित, पुलकित हो जाते ?-अपने यद् गोविनममृगाःपुलकान्पपिम्रन्।४०), मेत्रोंसे निहारकर आर्य-मर्यादासे विचलित म हो नाय, कुरु मान बौर कसनाको स्यागकर तुममें अनुरक न हो माय ॥ १० ॥ हमसे यह बात छिपी नहीं है ध्यकं भवान् मजमयासिंहरोऽभिजातो कि पैसे भगवान् नारायण देवता की रक्षा करते हैं, |वैसे हो तुम प्रनमण्डलका मय बोर दुख मिटाने के दयो यथाऽऽदिपुरुपः सुरलोकगोप्ता । | छियेही प्रकट हुए हो । वौर पर मी स्पष्ट ही है कि दीन-अमियोपर तुम्हारा बना प्रम, नसी कृपा है। प्रियतम ! हम भी पड़ोदु सिनी । तुम्हारे मिरनकी समा निषेहि फरपाजमासंपन्धी वाकांक्षाकी बागसे हमारा वक्ष स्थल गल रहा है। तुम अपनी इम दासियोंके पक्ष सठ और सिरपर अपने कोमल करकमल रसकर इहें अपना न्ये, हमें तमस्तनेषु च शिरस्सु पकिधरीणाम् ।४। जीवनदान दो ॥ ११ ॥ श्रीशुक उपाय मीगुकदवशी कहते हैं-परीक्षित । मायम् श्रीकृष्ण सनकादि योगियों और शिवार योगेपरोके भी ईपर हैं। मब ठम्होंने गोपियोंकी म्पपा और इति विक्लयितं सासां शुस्वा योगेवरेपर । | म्याकुम्पसासे भरी बाणी मनी, तब उनका पदप दमासे भर गया और पपपि वे भारमाराम -अपन-माप ही रमण करते रहते है, हमें अपने परिवार प्रहस्स सदय गोपीरात्मारामोऽप्परीरमत् ॥४२॥ किसी भी नाम स्तुकी अपेक्षा महाँ, सिर मी उन्होंने इसकर उनके साथ कोहरा प्रारम की॥ १२ ॥ सामिः ममेतामिरुदारपेंटित मगवान् श्रीरगने अपनी माव-मट्टी और पेष्टाएँ गोपियोंके जमुम कर दी फिर भी मरने यौ ज्यो केरमों एपरस सित ये सप्त में जब प्रियेशणोत्कृष्ठमुखीभिरन्युत स्तुपकर हममे सब उनके समर ठग्माल दात कुम्दकरके समान बान पहने ५ । उनकी प्रममरी लियनसे बौर उन दर्शनके वानसे गायिका उदारहामद्विजकुन्ददीधिति मुम्पकमल प्रतिसगपा । र उग्हें पारो चारमे घरकर पीच उस समय श्रीगकी मी न्यराचवणार इवोमिस ॥४३॥' शर्मा , माना बरनी पनी ताओंसे घिर पर ३०८ श्रीमभागवत [म. ३. उपगीयमान उद्गापन् पनिताशतयुधप । बम्बमा की हो ॥ १३ ॥ गोपियोंके पत-शत यूपर्पोरे स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण देवयन्ती मान पाने दान माला विनव मैजयन्तीं व्यपरन्मणपन् धनम्।।१४।। गोपियों अपने प्रियतम श्रीकणके गुभ और मीयाममेकर को शोमायमान करते हुए विधरण करने उगे। की गान फासी, तो कभी भीकृष्ण गोषिके प्रेम और नया पुलिनमाविश्य गोपीभिर्दिमवारकम् । सौन्दर्यके गीत गाने गते ॥ ११ ॥ इसके बाद मगवान् श्रीकृष्णने गोपियाँक साप पमुमानी पादन रेमे सत्तरलानन्दमदामोदयापुना ॥४८॥ पुलिमपर, को करके समान धमकीठी बारसे बगम्ममा रहा था, पदार्पण किया। यमुनामीकी वरष तक के ससे बीस और कुमुदिनीकी सहम पुगन्यमे पाहुप्रसारपरिरम्भकरालको समासित वायुके द्वारा सेरित हो पा रानस वानन्दप्रद पुषिमपर भगवान् ने गापियोंक सापकीय नीमीलनालभननमनस्ताप्रपातः 1 की॥ १५॥राप फेमना, मामिन फरमा, गोपियों हाप दबाना, सनकी चोटी, गाँध, मीमी और सन तोरपावलोफहसितैर्मनसुन्दरीणा पादिका स्पर्श करमा, विमोद करमा, मसात करमा, विनोदर्म पितामसे देना और मुसकाना-म क्रियाबोंक दारा गोपियों के दिम्पकामरसको, पामोरमा सतम्भयन रतिपति रमपावकार ॥४६॥ प्रेमभावको सरेरित करते हुए भावान् श्रीकृष्ण ठरें कीराहारा मानन्दित करनेगे ॥१६॥ उदारशिरोमणि एवं भगवत रुप्पासम्धमाना मास्मन । सर्वव्यापक मगवान् श्रीहमने बनास प्रकार गोपियोका सम्मान किया, तब गोपियोंके मनमें ऐसा माष वाया कि संसारकी समक्ष लियो में हम ही सर्वश्रेष्ठ हमारे आत्मानमनिरे स्त्रीणामानिन्पोऽम्पधिसुवि।।४७ समान और कोई मर है। कुछ मामती से गई ।। १७ ॥ नब भगवान्ने देख किया तो अपने तामो पद सौमगमदं पीस माने व केशर । मुपागका फुल गई दो बाया है जब मान मी करन , हम उनका गई बात करमके लिये तपा उनका मान र कर प्रसन्न करने के रिये वही-~- प्रसमाप प्रसादाम तमान्तरधीमत 1४८॥ मनके बीच ही वस्तधाम हो गये ॥ १८ ॥ शनि श्रीमद्भागरते महापुराभे पारमाहत्या सहितायो दशमस्काये बधि मगणतो सोरावर्णन मामैकोमत्रिंशोऽप्यास ॥ २९ ॥ अथ त्रिंशोभ्याय श्रीकप्परपिरहमें पापियोकी दशा मीमुक उपाय मीशुकदेवजी काते है-परीक्षित । मावान् अन्तहित भगवति महसैष प्रजागना । सहमा अन्तर्धान गये। उन देशवर अमयुपतियों १ रासह भावेषानमेन ।

० दशम स्कन्य यवस्तमघाणा फरिप इस यूथपम् ॥ १॥ की वैसी ही दशा हो गयी, जैसे यूपपति गभरामके बिना हपिनियोकी होती है। उनका दय विदकी गस्यानुरागमितषिम्रमेक्षित जायसे मळने लगा ॥ १ ॥ मगवान् श्रीकृष्गकी मदोन्मत्त गजरानकी-सी पाठ, प्रेममरी मुसकाम, मनोरमालापविहारविनमः विलासमरी पितफ्न, मनोरम प्रेमालाप, मिम-मिम याक्षिप्तचिताः | प्रकारको लीम्मों तथा शृक्षार-रसकी माष-मलियोंने 1. प्रमदा रमापते उनके वित्तको पुरा मिया पा! वे प्रमकी मतभामी स्वाम्ता विचेष्टाजगृहस्तदामिफाः ॥२॥ गोपियों श्रीकृष्णमय हो गया और फिर श्रीकृष्णकी विभिन्न चेसामोंका अनुकरण करने लगी ॥२॥ अपने प्रियतम गतिसितप्रेक्षणभापणादिपु श्रीकृष्गकी चाम-दाल, हास-रिलास मोर पिस्वम-योसन मादिमें भीगकी प्यारी गोपियों उनके समान ही वन प्रियाः प्रियस्य प्रतिवमूर्तयः । गया, उनके शरीरमें भी वही गति मति, बही माप-मङ्गी उत्तर बापी। वे अपनेको सर्पया मूम्कर श्रीकृष्णसरूप वसावह स्विस्पक्ठादात्मिका हो गयी और उम्दीके कील-विमासका अनुकरण करती हई में श्रीकाग ही-नस प्रकार करने लगे। न्पवेदिषुः रुप्मविहारविम्रमाः ॥३॥ ॥ ३ ॥ वे सब परस्पर मिटकर उँच बरसे ठम्हीके गायन्स्प उन्धेरसमेष सहसा गुणोंका गान करने मगो पोर मतवाली होकर एक बमसे दूसरे बनये, एक सालीसे दूसरी माडीमें ना-बाफर विधियुन्मचफस पनापनम् । श्रीकृष्णको दने हगा। परीक्षित् । भगवान् श्रीग कही दूर पोरे ही गये थे। वे सो समस्त नर चेतन पप्रपाकाश्वदन्तरं पदामि तपा उनके बाहर भी बाकाशके समान एफरस स्थित ही। वेव ये, माहीम येपरन्तु ठहै म भूतेषु सन्त पुरुष वनस्पतीन् ॥ ४॥ देखकर गोपियाँ बनस्पतियोंसे -पेड-पौधोंसे उनका पता पूछने ष्णा ॥ १॥ प्येका कषिदसरप प्लप न्पप्रोध नो मनः । (गोपियोंने पहल यो-या वृक्षोंसे भाकर पूटा) 'हे पीपम, पाकर और बरगद ! नम्दनम्दम पाममुन्दर नन्दरनुर्गवी हत्या प्रमदासाबलोफनैः ॥५॥ भरनी प्रेममरी मुमकान और चितानसे हमारा मन पुराकर चले गये हैं। क्या तमोगोंने उन्हें देखा है! ॥ ५ ॥ फरवक अशाक, मागकेशर, पुमाग और कचित् इवफाशोकनागपुभागचम्पाः । चम्पा! पराममीके छोटे माई, विमझी मुसकानमानसे पदीदी मानिनियोंका मानमर्दन से नाता है, पर माये ये क्या ! ॥६॥ (अब उगाने श्रीमतिके पोसे रामानुजो मानिनीनोमितो दर्पहरसिवः ॥ ६ ॥ कहा-) पहिम तुलसी ! तुम्हारा एप तो बड़ा कोमस है, तुम वो समी मागोका कायाण धाइती । कषितुलसि फस्पाणि गोपिन्दपरणप्रिये । भगवान्के भरोम तुगारा प्रम तो .0, म भी १ नो गरा ३१० भीमागवत [म.३० भसाक सहस्वालिम्रिद घटस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः ॥७॥ तुमसे बहुत प्यार करते हैं। सभी तो मेरिकि मडराते रहनेपर भी वे मारी मारम नहीं सवारते, सदा मालस्पदर्शिधः कचिन्मल्लिके जाति पिके । पहने रहते हैं। क्या तुमने अपने परम प्रियतम श्याम मुम्दरको देखा है।॥७॥प्पारी मालती ! मरिमे। प्रीति यो चनपन् यातः फरस्पर्सेन मायः ॥ ८॥ बासी और मही ! तुमलोग्नेने काचित् हमारे परे माधवको देखा होगा । क्या वे अपने कोमा कसे स्पर्श सूतप्रियालपनसासनकोविदार करके तुममें पानन्दित करते हुए इधरसे गये हैं। बम्पर्कपित्वपकलाप्रकदम्पनीपाः । प्रिपाल, फटा पीतशाक, कमनार, जामम, वाक, बेग, मौलसिरी, भाम, कदम्ब और येऽन्ये पराभवका यमनोपलाः | मीम तपा भम्पाम्प यमुमाके तटपर विराममान पुस वरुपये। तमारा चम-जीवम केवल परोपकारके किये असन्तुरुप्मपदी रहिवात्मनां नः ॥९॥ |है। भोकणके बिना हमारा भीवन सूना हो रहा है। हम बेहोश हो रही है। तुम हमें वनें पानेका मार्ग किं से कव क्षिति तपो षत केशवाधि बता दो ॥ ॥ मगवान्की प्रेपसी पृष्पीदेवी ! तुमने ऐसी कौन-सी तपस्या की है कि श्रीकणके परणकमों स्पर्शोत्सवोपुलकिवाजम्दैविमासि । का स्पर्श प्राप्त करके राम बानग्यसे मर रही पौर हण-पता नादिके रुपमै बपना रोमात्र प्रकट कर ही अप्पधिसम्भव उरुममविक्रमाद पा हो ! तुम्हारा यह उम्पस-विगस ग्रीकृष्ण परमस्पर्श- के कारण है अपना पामनावतारमै विवरूप भारण आहो पराहवपुपा परिरम्भणेन ॥१०॥ करके उन्होंने तुम्हें जो मापा था, उसके कारण है। अप्पेणपत्न्युपगवः प्रिययह गात्रै कहीं उनसे भी पहले बराहमगवान्के मा-ससके कारण तो तुम्हारी या दा नहीं हो रही है। ॥१०॥ वरी म्सन्वन् रक्षा सलि मुनि विमच्युतोका। ससी ! हरिनियो ! हमारे श्यामसुन्दरके बा-सासे भरमा सौन्दर्यकी धारा बहती पती है, मे कही अपनी प्राणप्रिपाके साप तुम्हारे मपोंको परमानन्दका दान कान्वाइसङ्गाचामरञ्जिवायाः | करते हुए इधरसे ही तो मही गये है। देबो, देसी, यहाँ कुरपनि पोषणकी कुन्दकलीकी मानकी ममोहर गध का रही है, जो उनकी परम प्रेयसीके ना-सासे इन्दसजाइलपवेरिह याति गध ॥११॥ लगे हुए कुच-मसे अनुरधित ग्रती है। ॥ १ ॥ तहसरो! उमको माटाकी सुमीम ऐसी सगाध है कि पाहु प्रिपांम उपधाय गृहीतपमा उसकी गायके सामी मतप से भौरे प्रस्पेक क्षण उसपर मराते रहते है। उनके एक हापौ तीमम होगा रामानुजस्तुलमिकातिलेमदापः। और दूसरा हाप वपमी प्रयसीके झमेरा रस्से होंगे। पीपमान र पम्नरय हमारे प्यारे याममुगरापरसे विधरते हुए वाप गये गे। नाम पाना है, मग हमें प्रगाम करमके रिये ही शुरे । परम् उदोन अपनी मममी पाभिनन्दति परन् प्रणगारगर ॥२॥ नितानसे भी गुहारी , ना बलिदम किया है । प्रणाम .३०] दशम स्कन्ध ३११ -- पृच्छतेमा लता पाइनप्पाश्लिष्टा बनस्पते।। | या नहीं ! ॥ १२ ॥ सरी सम्ही ! इन सतायोंसे पूछो। ये अपने पति प्रोको मुनपाशमें बाँधकर वापिन किये हुए हैं, इससे क्या हुमा । इनके शरीरमें मो पुक्क है, रोमान है, वह सो भगवान्क नाँके स्पर्शसे ही है। वहो । इनका कैसा सौभाम्प ननं तत्करजसष्टा विम्रत्युत्पुलकान्यहो ॥१३॥ है"॥ १३ ॥ इस्पन्मचमचोगोप्यः कृष्णान्धेपणकातराः। परीक्षित ! इस प्रकार मतबाठी गोपियों प्रळाप करती हई मगवान् श्रीक्गको इसे-हते कातर हो यी पी । लीला भगवतस्तास्ता पनुचछस्तदात्मिका ॥१४॥ नौर मी गाड़ आवेश हो मानेके कारण थे भगवम्य होकर भगवान्की विभिन्न नीलामोंका अनुकरण करने कस्वामित्त नायन्त्याः कृष्णायन्त्पपियत् स्तनम् । ळगा ॥ १९ ॥ एक पूतना घन गयी, तो दूसरी श्रीकृष्ण बनकर उसका न पीमे गी। कोई छका बन गयी पोकायित्वा रुदस्पन्या पदाहम्छकटापतीम् ॥१५॥ तो किसीन बार कृष्ण वमकर रोते हुए उसे पैरकी ठोकर मारकर उम्ट दिया॥१५॥को सखी वागण बनकर दैत्यापित्वा महारान्मामेका फप्पामभाषनाम्। बैठ गपी तो को सृणावर्त दैत्यका रूप धारण करके उसे हर ले गयी। कोई गोपी पौष घसीट घसीटकर रिङ्गयामास काप्पधी फर्पन्तीपोपनि स्वने ॥१६॥ घुटनों के बठ बक्यों चढ़ने मी और उस समय उसके पायजेय स्नान-सनमुन बोलने लगे।१६।एक बनी कृष्ण, रुपपरामायिते रे तु गोपायन्स्पम फापन । तोदूसरी बमीबलराम, धौरमात-सी गोपियों ग्वाम्मा के रूपमें हो गयी । एक गोपी बन गयी परसामर, वो मेस्सायसी इन्ति चान्या तत्रैमासु पकायतीम्॥१७॥ दूसरी बनीयकामुर । तव तो ग्नेपियोंने नष्टया-अप्रा श्रीकृष्ण बनकर बरसासर और बकापुर बनी हुई गपियों को मारनेको जीया की ॥१७॥ जैसे श्रीकृष्ण बममें करते थे, सेती माय दूरगा यवत् फणस्तमनुपर्ततीम् । मापी गौमुरी बना-बगाकर दूर गये हुए पशुओंको मुठानेका सेक स्नेक्ने ष्मी | वा दूसरी गोपियों 'पाह पेणुकणन्ती फ्रीरन्तीमन्यासिन्ति साचिसि॥१८॥ बाहर करके उसकी प्रशसा करने ॥ १८ ॥ एक गोपी नपनेचे श्रीकृष्ण समझकर दूसरी सहीके गसमें फसाचित् स्वसर्वन्पस्प पलन्त्याहापराननु । गोह गडकर वस्ती वीर गोपियोंसे करमे रगती- मित्रो ! म यीबाग हूँ। मग मेरी पर ममोहर चार रुप्पोनपश्पत गति ललिवामिति सन्मनाः॥१९॥ देखे ॥ १९ ॥ कोई गोपी श्रीकृष्ण बमकर कहती- बरे मनासियो ! तुम आंधी-पानीसे मत ग्रो। मा मैप्ट वातवर्गाम्यां तत्त्राणं विहितं मया । मैंने उससे बपनेकर उपाय निकाय लिया है। ऐसा कहार ग्वधन-धारणका अनुकरण करती हुई पर इत्युक्त्वैकेन इस्तेन मनन्स्युभिदधेऽम्बरम् ॥२०॥ वपनी मोडमी उठाकर उपर मान ली ॥ २० ॥ १ पत्सापित पीलापा वर्षका तु पापियाम् । । एक ।

श्रीमद्भागवत [अ०३० आपका पदाऽऽक्रम्प शिरस्पाहापरी नृप । । परीक्षित् ! एक गोपी बनी कारिय माग, तेदूसरी मीना बनकर उसके सिरपर पैररखकर चढ़ी चढ़ी बोसने भगी- दुष्टाह गच्छ बातोऽई खलानां ननु दम्पृक्॥२१॥ रे दुष्ठ साप ! त्यहाँसे चला ना। मैं दुशेका दमन करनके लिये ही तत्पन हुमा हूँ ॥२१ ।। इसनेमें ही तकोषाध गोपा दापार्मि पश्यदोलणम् । एक गोपी मोळी--बरे वालो । देश, इनमें बनी मपहर बाग म्गी है। तमसोग जम्दी-से-जल्दी वपनी माँसें मद लो, में बनायास ही तुमलोगोंकी रक्षा कर पक्षम्पायपिदध्ये वो विधास्मे धेममअसा ॥२२॥ लंगा' ॥ २२ ॥ एक गोपी यशोदा बनी बौर पूसरी पदान्पया सजा काषित्तन्वी तत्र उसले । बनी ग्रीकृष्ण । यशोगने लोंकी मागसे श्रीकृष्णको उपलमें बाँध दिया। अब यह श्रीकृष्ण बनी हुई पुग्दरी भीमा सुरक् पिधायास्सं भेजे भीतिविरम्पनम् ।२३। गोपीहापोंसे मुंह टॉपकर मयकी मकस करने लगी ॥२५॥ एवं कणं पन्छमाना पृन्दावनलवास्तरून् । परीक्षित् । इस प्रकार तीम करते-करते गोपियाँ पन्दापमके वृक्ष पोर पसा दिसे फिर मी श्रीकृष्णका न्यचक्षत वनोदेचे पदानि परमात्मनः ॥२४॥ पता पूछने लगी। इसी समप सनोंने एक स्थामपर | मगवान्के चरणचिन देखे ॥ २१ ॥ वे वापसमें करने पदानि भ्पकमेवानि नन्दस्नोमहास्मनः । गी--अवश्य ही ये परणविह तदारशिरोमणि मन्द नन्दन श्यामसुन्दरके हैं। क्योंकि इसमें पना, कमक, लक्ष्यन्ते हि धजाम्भाववाशपयादिभि ॥२५॥ बा, बाश वौर मौ मादिके शि स्पष्ट ही दीख रहे ॥२५॥ठन परणविहोंके हारा प्रमठम मगवान्को सैस्तै पदैस्तत्पदपीमन्विच्छन्त्योऽग्रतोऽपलाः। खती हई गोपियाँ धागे नही, तम ने पीकृष्णके साप किसी प्रनयुक्तीके भी परमपित दीस पड़े। वना पदैःसुपृक्तानि विलोक्या:समनुषन् ॥२६॥ उन्हें देखकर ३ म्याकुल हो गया और मापसमें करने -~-|| २६॥ से हपिनी अपने प्रियतम गनराजके कस्सा पदानि चैतानि यातामा नन्दसनुना। साप गयी हो, वैसे ही मन्दमन्दम श्यामसुन्दरके साप उनके कपेपर हाथ रखकर चम्नेवाली किस पर अंसन्मस्तप्रकोष्ठाया फरयोः फरिणा यथा ॥२७॥ मागिमीके ये चरणचिहरे ! ॥ २७॥ वश्य ही सर्व शकिमान् मगवान् श्रीकृष्णकी पर 'भाराधिका' रोगी। अनपाराधितो नून भगवान् हरिरीपरः । इसीलिये इसपर प्रसन्न होकर हमारे प्राणप्पारे श्याम- यो विहाय गोविन्दःप्रीतो यामनमद रहः ॥२८॥ सन्दरने हमें मेर दिया है और इसे एकान्तमें ले गमे १॥२८॥ प्यारी ससियो! मासान् श्रीकृष्ण अपने चरण धन्याहा ममी आरमो गोविन्दायपम्मरेणयः । कमसे मिस रनका स्पर्श कर देते हैं, धन्य हो जाती है, उसके होमाम्पत्योंकि प्रमा, शहर और मी योन् प्रमशो रमा दवी घुम्न्यधनुषये ॥२९॥ मादिमी अपने भनुम नए करने के लिपे ठसमको अपने १ नाम् । २ पाप समारयोरेवा मुगन्ति व मूतः ।

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भीष्म-चरण
भीरापापरण

ब. ३०] दशम स्कन्ध ३१३ वस्था अनि नायोमकुर्वन्स्युन्चे पदानि यत् । सिरपर धारण करते हैं।॥ २९ ॥ मरी ससी ! चाहे कुछ भी हो-यह मो सही हमारे सर्पस्य श्रीकृष्णको पैकापात्प गोपीनां रहो भऽन्युमाघरम् ॥३०॥ एकान्तमें ले जाकर अकेले ही उनकी बवर सुधाका रस पी रही है, इस गोपीके ठमरे हुए चरणचिह सो न लक्ष्पन्ते पदान्पत्र सस्सा नून मृणाहुरै । | हमारे दयमें वकाही क्षोम उत्पम कर रहे हैं। ॥३०॥ | यहाँ उस गोपीके पैर नहीं दिखत्मयी देते। माटम होता है, यहाँ प्यारे श्यामसुम्दरने देखा होगा कि मेरी प्रयसीके स्लिपत्सुमाताप्रितलासमिन्ये प्रयसी प्रिय ॥३१॥ सकुमार चरणकमलोंमें घासकी नाक गहती होगी,इसलिये उन्होंने उसे अपने कंधेपर पड़ा लिपा होगा ॥ ३१ ॥ इमान्पधिझममानि पदानि पहतो पम् । | सखियो ! यहाँ देखो, प्यारे श्रीकृष्णके चरणसिंह अधिक गहरे बालों से है। इससे सूचित होता है कि यहाँ वे किसी मारी वस्तुको उठाकर चले है, उसीके गोप्यःपश्यत फणस्य माराकान्सस्स फामिनः॥३२॥ बोपसे उनके पैर जमीनमें धस गये । हो-न-हो यहाँ उस कामीने अपनी प्रियतमाको अवश्य पधेपर चढ़ापा प्रवावरोपिता कान्ता पुप्पहेतोर्महात्मना । होगा ।। ३२ ॥ देखो-देखो, यहाँ परमप्रमी प्रमठमने झल सुननेके लिये अपनी प्रयसीको नीचे उतार दिया पत्र प्रश्नावषय प्रियार्थे प्रेयसा रुतः। है और यहाँ परम प्रियतम श्रीकृष्णने भफ्नी प्रपसीके | लिये इस पुने है । उचक-उधकार मल तानेके कारण यही उनके पंजे तो धरतीमें गड़े हुए हैं और प्रपदाफमणे पते पश्यतासफले पदे ॥३॥ | एदीका पता ही महीं है ॥ ३३ ॥ परम प्रमी श्रीकृष्णने | कामी पुरुपके समान पहा अपनी प्रपसी के संपारे हैं। फेन्ठप्रसाधनं स्वत्र कामिन्या कामिना फवम् । देखो, वपने पुने हुए फल्यको प्रेयसीकी चोटीमें पनेके लिये वे यो ममय ही बैठे रहे होंगे। ॥३॥ परीक्षित् ! तानि घूठयता फान्तामुपविष्टमिह ध्रुवम्॥३४॥ और पूर्ण र । ब वे अखप्प है, उनमें दूसरा काई रही भगवान् श्रीक्षण बारमाराम है। पान आपमे दी सन्तुर | नहीं, तब उनमें कामकी कल्पना कैसे हासकतीति रमे सया चात्मरत आरमारामोऽप्यस्खण्डित । | मी उन्होंने कामिपोंकी दीनता-श्रीपरवशता और नियोंकी कुरिनमा रिखाते हुए वहाँ उस गोपीने साप ९फान्त कामिना दर्शयन् देन्य स्रोणां चैव दुरात्मताम्॥३५॥ में फ्रीग की थी-~~एक खेप रपा पा ॥ ३५ ॥ इस्पेष दर्शयन्त्यम्ता येरुर्गोप्यो विघेतसः । इस प्रकार गोपियों मापारी-मी होकर-वामी सुध- मुष सोकर एप मरप! भगवान् श्रीमणके परगपिन यो गापीमनयत् कृष्णो पिहायान्या स्त्रियो पने॥३६॥ मिगती हुई वन वनमें मार रही दी । घर मगवान् ग्रोरण दूसरी गोपियो। पन छोरफर मिम माग्पाती गोरीको काममें से गप थे, उसने ममा शिदी मा प मतदारमान परिप्टमर्पयापिताम्। समन गोरियम अष्ठमारिपे ता मार प्यार भीषण दुमरी गारिश लापत, ना उन्हें ना हित्वा गोपीः कामयाना माममा भनत प्रिय ॥३७॥ पाइती १, गाल मेरा ही मान पर है । मुप्त र १मा मतिम भवान माना समोसमम मा रिवन्ध।

भीमनागपत [.. - न खलु गोपिकानन्दनो भवा तुम केवळ यशोदानन्दनही मही हो, समस्त शरीरघास्यि नखिलदेहिनामन्तरात्मा केयमें रहनेवाले उनके साक्षी हो, क्न्तर्यामी हो विसनसार्थितो विश्वगुप्तये सखे ! प्रमानीकी प्रार्थनासे विश्की रक्षा करनेके किसे सख उदेयिवान् सात्वा फले॥४॥ तुम पदुषशमें जातीर्ण हुए हो ॥ १ ॥ विरचिताभय वृष्णिपुर्य ते अपने प्रेमियोंकी अमिमपा पूर्ण करनेवाले बमाम्प यदुवंशशिरोमणे ! नो लोग जन्म-मत्पुरूप चरणमीयुपा सस्तेर्मयात् । ससारके चारसे उरकर तुमारे चरणोंकी शरण प्राम करते हैं, उन्हें तुम्हारे करकमल वपमी छत्रमबा फरसरोल कान्त लेकर बमय कर देते हैं। हमारे प्रियतम ! सबधी शिरसि घेहि नः श्रीकरग्रहम् ॥ ५॥ अन्सा-अमिषामोंको पूर्ण करनेवात्म यही करकमला, मिससे तुमने मी नीकर हाप पकता है, हमारे सिरफर प्रेयसनातिहन् वीर योपियां रख दो ॥ ५॥ प्रवासियोंक दुसर करनेवासे और शिरोममि श्यामसुन्दर ! तुम्हारी मन्द-मन्द मुसकानकी निषजनसयसनसित एक उपक रेख ही तुम्हारे प्रेमीजनोंके सारे मान- मदको चूर चूर कर देमेके लिये पर्याप्त है। हमारे प्यारे भव ससे भबस्किारी: म नो सथ हमसे सलो मत, प्रेम कये । हम तो तुमारी दासी १, तुम्हारे चरणोंपर मिछाम बमकोको चछरुहानन चार दर्शप ॥६॥ अपना का परम सुन्दर सॉकम-सॉवम्म मुहमा दिखलायो ॥५॥तमारे चरणकमल शरणागत प्रागियोंक प्रणवदेहिनों पापकर्जन सारे पाणको नष्ट कर देते है। समस्त सौन्दर्म, माधुसको सानौर सय बमीनी उनकी सेवा करती उगचरानुर्ग भीनिकेतनम् । राती है। तुम ठम्ही चरणसे हमारे बटोंके पीछे पीछे चम्ते हो और हमारे लिये उन्हें सौपके फोतकर फणिफयापितं ते पदाम्मुर्ब रसनेमें भी तुमने संकोच नहीं किया । हमारा एप तुमारी महम्पपाकी बागसे मम माप फण इथेपु नः कन्धि समम् ॥ ७॥ | मिनकी नाकाहा हमें सता दी। मम अपने में ही परम हमारे पक्ष सम्पर रस्कर हमारे की पागको शान्त कर दो ॥७॥कमम्मपन ! तुमारी मधुरया गिरा वगुवाक्पया पाणी कितनी मधुर है। ससका एक-एक पद, एक-एक शब्द, एक-एक अक्षर मपुराप्तिमपुर है। मोबने पुधमनोहया पुष्फरेषण। विान् उसमें रम जाते है। मसपर अपना सर्वस निमार कर देते हैं। तुम्हारी उसी पाणीका रसासादन विभिकरीरिमा वीर सपती करके तमारी वाहाकारिणी दासी गोपियों मोहित हो रही । दानपीर ! व तम वपमा विम्य अमृतसे मी रपरसीधुनाऽऽप्याययख ना ॥८॥ मपुर भररस फिमकर हमें भीवन-दान दो, एका १०२१] दशम स्मन्य ३१७ तष कथामृत सप्तमीवन दो ॥ ८॥ प्रमो। तुम्हारी लीलाकया मी अमृतसरूप है। विहसे समाये हुए लोगोंके लिये तो वह जीवन कपिभिरीरिस करमपापहम् । सर्वस ही है। पयरे ज्ञानी महात्मामों-मक्त कवियोंने उस गान किया है, यह सारे पाप-साप तो अरणमाल भीमदातर मिटाती ही है, साथ ही प्रवणमाप्रसे परम मगम- परम फम्पाणका दाम भी करती है। वह परम सन्दर, परम मधुर गौर बमुत विस्वत मी है। जो तुम्हारी उस मुवि गुणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥९॥ीमा-कपाका गान करते हैं, वास्तबमें मूढोक वे सबसे बड़े दाता॥ ९॥ प्यारे ! एक दिन मह पा, नम प्रहसित मिय प्रेमषीधेम तुमारी प्रेममरी हसी वौर चितवन तथा तुमारी तरह सरहकी क्रीगोकर प्यान करके हम बानम्दमें मान हो विहरण १ ते ध्यानमालम् । नाया करती पी । उनका प्पान भी परम मायापक है, उसके बाद सुम मिले । तुमने एकापसमें दपस्पशा रहसि संविदो या एदिस्पटः । ठिठोलिया की, प्रमकी बातें कही। हमारे कपटी मित्र ! बब ये सब बातें पाद भाकर हमारे मनको भग्ध किये सडक नो मनः धोभयन्ति हि ॥१०॥ देती १० ॥ चलसि पद ब्रजाचारमन् पश्न् हमारे प्यारे स्वामी ! तुम्हारे परण कमरसे मी सकोमल पोर प्रदर ६ । नम तुम गौवाको चरानके नलिनसुन्दर नाप पदम् ।। लिये अनसे निकलते हो तर पर सोधफर कि तुम्हारे के युगल चरण ककर, तिनके कोर कुश-कोटे गाजानसे चिठरणाः सीदतीति ना 1 कर पाते होंगे, हमारा मन बेचैन हो जाता है। हमें या कलिलतो मनः कान्त गन्छति ॥१॥ दुम होता है ॥ ११॥ मि दळनेर गय तुम बनसे पर मौन्ते हो, तो हम देखती र कि तुम्हारे मुम्पकमक- दिनपरिपये नीलगन्तले पर मीनी-मानी मटमें घटक दी और मौनोंक पुरसे पनहाननं सासकर पनी धून पीरिमारे और प्रियतम! विनदातम् । तुम नपना बद सौन्दय हमें दिसा-दिम्पकर मारेलपमें धनरवस्खलं दर्शयन् सह मिनकी बाकाहा--प्रम उत्पम कासे हो।। १२ । प्रियतम 1 पफमात्र तुम्ही हमारे सारे दुवो मिटाने मनसि नः सरं पीर पन्छसि ॥१२॥ वामे हो । तुम्हारे पर फमल दारगागा मोंकी समस्त प्रगवफामद पपजापित । मभिष्टायमोंको पूर्ण करनेाले ३ । स ममीमीटमकी सेवा करती २ बोर पृषी तो वे मुराग ३ परनिमारने पेयमापदि। भापतिके समय एकमात्र उम्दा चिन्तन करना उरित परमपरजे मन्तम जिससे मार्य सियों पर बाती हैं। पुत्र हे प पिने देम पम्प गधार पर रमण न सनेपर्पयाधिरन् ॥१३॥। हमारे पर समा एपी मया भारत र ति रिटीई । -- ३१४ भीमद्भागवत [५०३. छे सतो गत्ला पनोद्देश मा केशवमग्रवीत् । आदर दे रहे हैं ॥३६ ३७॥मगवान् श्रीकृष्ण प्रभाकर शाररके भी शासक हैं। वह गोपी क्नमें जाकर करने प्रेम और सौभाग्यके मदसे मतवाठी हो गयी और ठना न पारयेऽह चलितु नम मां यत्र ते मन ॥३८॥ | श्रीकृष्णसे काने लगी- प्यारे । मुझसे सब तो और नहीं चला जाता । मेर मकुमार पाँव पक गये हैं। अब तुम वहाँ घरूना चाहो, मुझे अपने वघेपर चढ़ाकर एनमुक्त प्रियामाद स्क घ आरुमतामिति । चन्मे ॥ ३८॥ अपनी प्रियतमाकी या पात एनका | श्यामसुन्दरने कहा- हम प्यारी | तुम बब में कषेपर घर लो ।" यह सुनकर वह गोपी ज्यों ही उनके तसमान्तर्दधे कृष्ण सा पधन्वतप्पस । ३९॥ | कधपर घड़ने घी, स्यों ही श्रीकृष्ण चन्तर्वान हनने वौर वह सौमाम्पाती गोपी रोने-पळताने त्यो ॥१९॥ हा माप हा रमण ! प्रष्ठ । हा महामुन । म हा नाथ रमग प्रष्ठ कामि कासि महासन । कहाँ हो ! कहाँ हो!! मेरे सखा ! में मुम्हारी दीन-हीन दासी हूँ। शीघ्र ही मुम अपने सामिप्यका अनुमा कराओ, मुझे दर्शन दो ॥ १० ॥ परीक्षित । दास्साम्ते कपणाया में मखे दश्चय समिधिम्।।४ ॥ गोपियों भगवान् के घरणचिोक सहार ठमके जाने- का माग बसी बस्ती वहाँ जा पहुँची । की अपिच्छन्त्योभागवता माग गोप्योऽविद्रत । दूरसे ही उमोंने देखा कि उनकी सस्ती अपने प्रियतम के | वियोगसे दुखी होकर बचेत हो गयी है ॥११॥ दशु प्रियविश्लेपमोहितां दुःखितां सस्तीम्।।४१॥ उन्होंने उसे भगाया, तब उसने भगवान् श्रीकृष्णसे उसे जो प्यार मौर सम्मान प्राप्त हुना था, यह एनक्ले पुनाया। तया कधितमाफर्म मानप्राप्ति व माधवात् । उसने यह भी कहा कि मैंने पुष्टिलताश उनका अपमान किया, इसीसे ये मन्तर्धाम हो गये । उसकी अपमानं च दोगत्म्पाद् यिम्मप परम यपु ॥४२॥ बात सुनकर गापियों बाधकी सीमा न ही ॥१२॥ तवाऽविधन वन चन्द्रज्याना यावधिभाम्यते। इसके बाद मनमें नहातक चन्द्रदेवकी नादमी छिटक रही थी वहातक ये ट रती हुई गयी । परम्त जय उहोंन देमा विगे पना अकार है-मोर जंगल है-हम सी जागी तो श्रीकृष्ण और भी उसके मम प्रविष्टमारभ्य सदा निरस्तु विय ॥४३॥ जर घुम भाग नव वे उधरसे तो पापी ॥१३॥ परीभित् । नारियोंका मन श्रीरामपा गया था। उनमी वाणीमे गणपये अतिरिक्त मौर काई बात मही नियमी पी। उमागरीरमे पपाश्रीग्णय रिपalk स मनाहानागपातदिगष्टाम्नमिमा । नपर धीरणकी गागर वासायीकहानप पहूँ उनका . ३१] भब कथामृतं तसजीवन दो ॥ ८॥ प्रमो। तुम्हारी लीलाकया भी समसखरूप है। विरहसे सताये हुए लोगों के लिये तो वह जीपन कपिभिरीडित करमपापहम् । सर्वस्व दी है। वायदे ज्ञानी महारमानों-मळ कवियोंन उसफा गान किया है, पर मारे पाप-ताप सो भवणमाल भीमदातत मिगती ही है, साथ ही अणमाप्रसे परम मङ्गल- परम कल्याणका दान भी करती है। वह परम सुन्दर, परम मपुर और बहुत विस्तृत भी है। जो तुम्हारी उस सवि गृणन्ति ते मूरिदा जना ॥९॥ बीठा कपाका गाम करते हैं, मास्तममें भूलोक में ही सबसे बड़े दासा है ॥९॥ प्यारे ! एफरिन या था, जब प्रहसित प्रिय प्रेमवीष्टणं हमारी प्रमभरी हसी मोर चितवन तपा तुमारी तरह तरहकी कीडनोका प्यान करके हम वानन्दमें माम हो विहरणं च ते ध्यानमालम् । जाया करती पी। उनका पान भी परम मादापक है, उसके बाद तुम मिले । तुमन एकाग्समें हदपस्पशा रहसि मंविदो या रदिश ठिटोरियों की, प्रमकी मासे कदी । हमारे कपटी मित्र ! ये सब बातें याद माफर मारे मनको क्षुम्भ किसे कुहरू नो मनः क्षोभयन्ति हि॥१०॥ । देती हैं ॥१०॥ पलसि यद् प्रवाधारपन् पशून् हमारे प्यारे सामी ! तुम्हारे चरण कमरसे भी एकोमल वौर पुग्दर है । जब तुम गौवोंको पराने के नलिनसुन्दरं नाय ते पदम् । लिये जसे निकलते हो तब यह सोचकर कि मारे शिलणारे सीदतीति ना वे युगल घरण ककर, तिनके कोर कुश-कोटि गर जानसे । कर पाते होंगे, हमाय मम पेन दाबाताराहम बरा फलिलसां मना कान्त गन्छति ॥११॥ दुख होता है ॥ ११ ॥ दिन दसनेकर जब तुम बनसे घर औरते हो, सोहम देखती है कि तुम्हारे मुम्ससमय- दिनपरिषये नीठान्तले पर मीडी-नीमी मरमें स्टक वीर और गौमोंक सुरसे पनवहानने उप-उरकर पनी एस पी हमारे वीर धिपताम! निम्रदातम् । । तुम मरना ए सौन्दप हमें Pिम्प-दिम्यकर हमारे एयमें धनरबखल दर्शयन् सह मिसनकी माफयाहा-प्रेम उपम करते हो ॥ १२॥ प्रियतम ! एकमात्र तुम्ही हमारे सारे दुयोको मिटाने मनमि नः सई पीर पन्छसि ॥१२॥ बाले वगारे घरगकम गरगात मोंकी समस्त प्रगतस्यमद पपार्पित 'मभिगगका पूर्ण करनगर। मप ममीजी नही सेरा करती है और पृषीरे ये भूगरी। धरणिमरने म्पेयमापदि। मापरिके समय एकमात्र उम्ही पिस्तन परमा राषित परमपरवं अन्तम , निमसे मारी बालियों का गगी । उप मिलान वे परम पम्प RAY पररात न सुनेपर्पयाधिहन् ॥१३॥ | हमारे CHEER मकर एपकी पपा सम्त पर १ मिर्षिा धीमद्भागवत न सतु गोपिकानन्दनो भषा तुम केवल यशोदानन्दन ही नहीं हो समस्त शरीरपास्पि- नखिलदेहिनामन्तरात्मा के उदयमें रहनेवाले उनके साक्षी हो, बन्सर्यामी हो । विखनसाथियो पिपगुप्तये ससे प्रमानीकी प्रार्थनासे विपकी रक्षा करनेके किये सस्त्र उदेयिवान् सात्वता फुले ॥४॥ तुम यदुवंधमें अवतीर्ण हुए हो ॥ १ ॥ विरचितामय वृष्मिधुर्य से अपने प्रेमियोंकी बमिम्मपा पूर्ण करनेवास्येम बागम्प यशशिरोमणे | नो लेग बनम मृत्युरूप चरणमीयुपा सस्तेमयात् । संसारके घबरसे ररकर तुम्हारे परणोंकी शरण प्राम | करते है, उन्हें तुम्हारे करकमल पमी पापा फरसरोरुह कान्त कामद | लेकर बमय कर देते हैं। हमारे प्रियतम ! सबकी शिरसि धेहि ना भीकरग्रहम् ॥५॥ खाम्सा-अमिछपाओंको पूर्ण करनेवाला ही मारकमक, मिससे तुमने सफ्मीमीका हाप पता है, हमारे सिपर प्रेबननातिहन् पीर योपिता रख दो ॥ ५॥ मनवासियोंकि दम दूर करनेवाले वीर शिरोमणि श्यामसुन्दर ! तुम्हारी मन्द-मन्द मुसकानकी निजजनसयम्यसनसित एक तम्मा रेशा ही तुम्हारे प्रेमीजनोंके सारे मान मदको घूर घूर कर देनके लिये पर्याप्त है। हमारे प्यारे भब ससे मपत्किएरीः स नो सथ | हमसे स्टो मत, प्रेम करो। हम तुमारी दासी हमारे घरोंपर निबरामवस्मयोंको चलरुवानन चार दर्शय ॥६॥ अपना वह परम सुन्दर सक्मि-सावमा मुख्याल दिमवो ॥३॥तुमारे चरणकमल शरणागत प्रानियों के प्रणवदेहिनां पापफर्धन सारे पाणको मर कर देते हैं। समस्त सौन्दर्य, माधुयको सान है और सय छयामीमी सनकी सेवा करती तृणधरानुगं श्रीनिफेसनम् । | रहती है। तुम ठम्ही चरणोंसे हमारे बछकि पीछे पीछे पते हो और हमारे लिये उनें सॉफ्के फोस्कपर फणिपणार्पित ते पदाम्मुख रसनेमे मी तुमने संकोच मही किया । हमारा एय हमारी विदम्पपाकी भागसे गाल रहा तुम्हारी फण रुषेषु नः कन्धि एन्छपम् ॥०॥ मिनकी बागडा हमें सता दी। तुम अपने में ही परण हमारे बक्ष सनर रस्फर हमारे दपकी मधुरया गिरा परगुणापपया चालाको शाम्त कर दो ॥ ॥ कमठमपम 1 हारी पाणी कितनी मधुर है! ससका एक-एक पद, एक-एक शम, एक-एक वभर मधुरातिमधुर है। बीते सुधमनोनया पुम्फरेषण। विशन् उसमें रम जाते है। उसपर वपना सर्वस निछार कर देते हैं। हारी सी वामीका रसासादम विधिकरीरिमा वीर सपती करके तुम्हारी बाबाकारिणी दासी गोपिया मोहित हो रही है। दानरीर तुम अपना Pम्प अपतसे भी रपरसीपुनाऽऽप्पायपम्य नः॥८॥रामपुर भर-रस पिमफर हमें जीवन-दान दो, एका मापन प्रविम बरना 'चार र प्रदेश महा है।

२०३२] दशम स्कन्ध यते सुजातपरणाम्बुरुह स्तनेषु तुमारे चरण कमलसे मी सफुमार है। नेहम मपने कठोर सोंपर भी स्रते भरते यात धीरेसे रखती हैं कि कहीं उन्हें चोट न म्या बाय। उन्हीं चरणोंसे तुम रात्रिके भीताः शनै मियदधीमहि कर्फशेषु । समय घोर नगममें छिपे छिपे भटक रहे ! क्या ककर, पत्पर मादिकी चोट लगनसे उनमें पीड़ा नहीं होसी हमें तो इसकी सम्भापनामात्रसे ही घर मा हा तेनाटवीमटसि तद व्यथते न किंस्वित् । हम अचेत होती ना ही। श्रीकृष्ण ! श्यामसुन्दर ! प्राणनाय । हमारा मोक्न तुम्हारे लिये है, हम तुम्हारे लिये मी रही है, हम तुम्हारी दिमिर्ममति धीमबदायुपनि ॥१९॥ १ ॥ १९ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या सहितायो दशमस्कन्धे पूर्षि रासक्रीचार्या गोपीगीत नामैकत्रिशोऽप्याय ॥ ३१॥ । अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः भगवान या प्रकट होकर गोपियोंको साम्त्वना देना श्रीशुक उपाच भीगुम्वेवजी कहत है--परीक्षित् | मगमन्की प्यारी गोपियों बिहके माधेशमें इस प्रकार भौति-मानिसे इति गाप्यः प्रगापन्त्य प्रलपन्त्यपपिषधा। गाने और प्रलाप करने ठगी । अपने कण-प्पारेके दशमकी सालसासे वे अपने को रोक न सकी, करणा रुरुतु मुखर राजन् कृष्णदर्शनलालमाः ॥ १॥ मनक मुमपुर स्मरसे फट छकर राने सगी ॥ १ ॥ मोक, तमी ममय ननके. बी.चोलीस, मावान् श्रीकृष्ण सासामाविरमच्छोरि सयमानमुखाम्बुज । प्रकट हो गये । उनका मुखममा मन्द-मन्द मुसकानसे खिम्य हुआ पा, गरमें बनमारा पी, पीताम्बर पारण पीताम्रधर स्रग्बी सावान्मन्मथमन्मथः ॥२॥ किये हुए थे। उनका पाम्प क्या पा, सबके मनको मय रामनेवाले कामदबके मनको मी मधनवारण पा ॥२॥कोरि-काट कार्मोसे भी पुग्दर परम मनोहर प्राण- तमिठास्यागत प्रष्टप्रीत्युत्पछप्याऽयला । बाम श्यामसुन्दरका नाया देस गापियों के मन प्रम और वानन्दसे जिस उठे। वे सब-की-मग एक ही साप इस प्रकार उठ सकी हुई, माना प्रागहीन शरीरमें दिन्य उपस्पपुगपत् साम्तन्त्र प्राणमिवागतम् ॥ ३ ॥ प्राणोका सधार दस गया दो पारीरके एक-एक बहमें नपीन पेतना-नूतन स्फनि वा गयी हा ॥३॥ एक मापीने का प्रम और वानरसे श्रीरप्णके कापिन् कराम्पुर्व शारगृहाअलिना मुद्दा । रकममो अपन दोनों हामि 8 रिया और यह १ पटाययामेव १२ पदरापनिवार।

भीमद्भागवत [अ० १३ । मुरवषर्धन शोकनाशनं दो ॥ १३ ॥ वीरशिरोमणे । तुम्हारा बघरामृत मिलनके मुसको, भाकाहाको बानेवाला है। यह विरहस्य खरितवेणुना सुष्टु चुम्बितम् । समस्त शोक-लापको नष्ट कर देता है। या गानेवाली गोमरी मीमांति उसे घूमती रहती है। विनोंने एक इवररागषिमारणे नृणा भार ससे पी लिया, उन लोगों को फिर दूसरों वीर दूसरोकी आसक्कियोंका स्मरण भी नहीं होता । हमारे पीर । विवर पीर नस्तेऽधरामयम् ॥१४॥ अपना ही अपरामृत हमें वितरण फये, पिणाको अटति यत् भषानहि फानन ॥ ११॥ पारे । दिनके समप नब म बममें बिहार करनके लिये चले जाते हो, तर तुमें देसे बिना हमारे श्रुटिर्पगायवे स्वामपश्यताम् । | लिये एक-एक क्षण युगके समान हो जाता है और नव तुम सम्प्याके समय छौटते हो तपा मुधराम हटिलान्तस भीमुखं च ते मम्मोंसे युक्त तुम्हारा परम पुम्दर मुखारविन्द हम देखती है, सस समय पलकोंका पिरमा हमारे लिये मार बर उदीक्षता पक्ष्मा माम् ॥१५॥ हो जाता है और ऐसा जान पावा है कि इन नोंकी पतिसुवान्वयम्रारुपान्धवा- पष्माको बनानेवाब विधाता मूर्स है ॥ १५॥ प्यारे श्यामसुन्दर । हम अपने पति पुत्र, माई बधु बीर नतिविलक्ष्य सेऽन्त्यच्युतागताः । कुम्-परिवारका त्याग कर, उनकी इच्छा और नालायका गतिमिदस्तयोगीसमोहिसार एलान करके तुम्हारे पास वापी है। हम पम्हारी एफ-एक चाल नामती है, सईत समझती हैं और किसय योपित फस्स्पजेमिति ॥१६॥ मारे मधुर गानकी गति समसफर, उसीसे मोहित | होकर यहाँ वायी है । कपटी । इस प्रकार रात्रि रहसि संविद एछमोदय समय वापी ई युगतियों को मारे सिवा और कौन छोड़ सकता है ॥१६॥ प्यारे ! एकान्तमें तुम मिसनकी प्रहसिवान प्रेमपीधगम् । भाकाहा, प्रेमभावको जगामेवाठी बातें करते थे । छिटोली फरके हमें छेरते थे। म प्रेममरी चितवनसे दुरः पियो वीक्ष्य घाम ते हमारी मोर देखकर मुसकरा रेते थे और हम देखती सहरतिस्पृहा मयत यो तमारा यह विशाम पक्ष सल, जिसपर स्पमीनी मनः ॥१७॥ निस्प मिरस्तर निवास करती है । तबसे पाक निस्वर ग्रमपनीका व्यक्तिरङ्ग ते हमारी लालसा बाती ही जा रही है और हमारा मन अधिकाधिक मुग्ध होता बाया है॥ १०॥ प्पारे । प्रमिनालयलं विश्वमङ्गलम् । | तुमारी यह मभिम्पति मम नगासियों के सम्पूर्ण दुस- तापको मए करनेवाली और विपका पूर्ण मान करने के स्पम मनाइप नस्त्वत्पदात्मना रिपे है।इमारा एप तुम्हारे प्रति भारसासे मर रहा। कुछ पोड़ी-सी ऐसी पोरधि दो, यो हारे निनननों- बमनहदुर्जा पमिदनम् ॥१८॥के एयरोगको सर्मपण निर्मुल कर दे ॥ १८ ॥ और ati म० ३२] दशम स्कन्ध ३२१ विकसकन्दमन्दारमुरम्पनिलपट्पदम् ॥११॥ | लेकर यही ही शीतल और सुगन्धित मन्द-मन वायु पक रही पी और उसकी महकसे मतवाले होकर भौरे इधर-उधर मगरा रहे ये ॥ ११॥ शरपूर्णिमाके चन्द्रमाकी चाँदनी अपनी निराली ही छटा दिखा रही शरचन्द्रां शुसन्दोहणस्तदोपातमः शिवम् । पी। उसके कारण रात्रिके अन्धकारका तो कहीं पता ही न पा, सर्वत्र मानन्द-मालका ही साम्राम्प प्रया कृष्णाया इस्तवरलोचितकोमलवालुकम् ॥१२॥ या । वह पुछिन स्या पा, यमुनाजीन स्वय अपनी लहरोंके हार्पो भगवान्यी लीक लिये मुकोमल मालकाका रंगमन्त्र बना रस्छ पा ॥ १२ ॥ परीक्षित ! तदर्शनाहादविधूवर जो | भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे गोपियोंके दमें इतन भानन्द और इसन रसका सन्टयस मा कि उनक दयकी सारी भाधिव्याधि मिट गयी। जैसे कर्मकाण्डकी मनोरथान्त वसयो यथा ययु । मुनियों उसका मणन करसे करते मन्तमें जानकाणका प्रतिपादन करने ष्टाती और फिर वे समस्त मनोरपोंसे बैठचरीयः फषामादित ऊपर उठ जाती हैं, तपस्प हो जाती है वैसे ही गोपियों मी पूर्णाम हो गयी । अब उन्होंने अपने कम सलपर लगी हुइ रोली कसरसे चिड़ित मोहनीको रचीफ्लपमासनमास्मयन्धये ॥१३॥ अपने परम प्यारे मुखद् श्रीकृष्णक विराननेके लिये विय दिया ॥ १३ ॥ वो-या योगेपर अपने योग- साफ्नसे पवित्र किये हुए इयमें जिनके लिये बासनकी तत्रोपविष्टा भगवान् स ईयरो कल्पना करते रहते हैं, किन्तु फिर भी अपने उदय सिंहासनपर बिठा नहीं पाते, यही सर्वशक्तिमान् मगवान् यमुनाजीकी रेतीमें गोपिोकी मोरनीपर बैठ गये। योगेश्वरान्तईदि कल्पितासनः । सहस-सहस गोपियोंक बीचमें उनसे पूजित होकर मावान् वो ही शोमायमन हो रो थे। परीक्षित् ! तीनों लोकोमसीनों काम नितना भी सौन्दर्य घकास गोपीपरिपनतोऽपित प्रकाशित होता है, वह सब तो मगवान्फ बिन्दुमात्र सौन्दर्यका पामासमर है। वे उसके एकमात्र बारम्प स्त्रैलोक्पलम्पेफपद वपुर्दभत् ॥१४॥ २॥१९॥ भगवान् श्रीहष्ण अपने इस भौतिक सौन्दर्यके द्वारा मफे प्रम धौर वाकाटाको और भी उमाद रहे थे । गपियोंने अपनी मन्द-मन्द मुसकान, समावयिता अमनदीपन मिश्रसपूर्ण पितान और निगी महासे उनका सम्मन विसा । किसीने उनके चरणकमको अपनी गोमें सहासलीलेषणविभ्रममुषा रख लिया तो किसीन उनके काम का 1 से उनक ३२० भीमनागपत [२०३२ काषित दधार समाहुमसे चन्दनरूपितम् ॥ ४ ॥ | धीरे-धीरे उसे सहलाने गी । दूसरी गोपीने उनके पदमचर्षित मुनदण्डको अपने क । रस मिय काचिदअलिनागृहाचवी साम्प्लवचितम् । ॥ ॥ तीसरी सुन्दरीने मावान् का चमा आ पान भपने हामि से लिया । चौथी गोपी, जिसके दो मगवान्के हिसे बड़ी मन हो रही , के गयी एका सदधिकमल सन्तप्ता स्तनपोरधात् ॥ ५॥ और उनके घरणकमळको जाने वक्ष स्वल्पर रम रिम ॥ ५ ॥ पाचवा गणेपी प्रणयकोपसे पिन कर, भोर एका मुटिमावन्य प्रमसरम्भवितुला । चढ़ाकर, दाँतोंसे होठ दबाकर अपने कराक्ष-बाणेसे बापती ई उनकी बोर ताकने मनी ॥ ६ ॥ टी गोपी अपने निर्निमेय मपनोंसे उनके मुख माला प्रतीक्षत् कटावे संदष्टदमनच्छदा ।। ६ ।। | मकरन्द-रस पान करने ठगी। परम्स जैसे संत पुरुष भगवान्के चरणों के दशनसे कभी तृप्त मही तेरे से मपरानिमिपदृष्टग्म्पांजुपाणावन्मुग्वाम्मुजम् । ही वह उनकी मुख-मापुरीका निरन्तर पाम करते रहनेपर मी तृप्त नहीं होती पी॥ ७ ॥ सासी गोपी | मत्रों के मार्गसे भगवान्को वपमे हदयमें ले गया और आपीवमपि नाठप्पत् सन्तस्त घरग यथा ॥७॥ | PR उसने बोलें बद कर मी | पर मन-न-मन मगवाम्का वालिङ्गम करनेसे उसका शरीर पुसमेत रोमरोम सिस उठा और यह सिद योगिकि सफाचिन्नेत्ररन्ध्रेण दिकत्य निमीस्य च । समान परमानन्दमें मस हो गयी ॥ ८ ॥ परीक्षित जैसे मुमशुमम परम ज्ञानी संत पुरुषको प्राप्त कर पुलफागयुपगुमास्ते योगीवानन्दसम्मुठा ॥८॥ संसारकी पोदासे मुळ हो जाते हैं, वैसे ही सम्य गोरियोंको भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे परम वानर और परम सष्ठास प्राप्त दवा । ठमक बिरहके कारण समाम्ता फरवारोफपरमात्मपनिर्माता। गोरियोंको जो हुस हुमा या, उससे ये मुरू हो गया पौर शास्तिके समुदमें बने उतराने मगा ॥०॥ परीक्षित् | यों तो भगवान् श्रीक्षण प्युत बोर पक्रस अम्रिदर्ज वा प्राम प्राप्प यथा जनाः ॥९॥ 1₹, उनका सौम्दय मोर म्मधुप निरतिशयर भी | विरह म्पपासे मुकई गोपियोंकि बीपमें उमपी मा ताभिरिपूत नाकाभिमंगवानस्पुता एन । और भी यह गयी। ठीक वैसे ही, जैसे परमेघर अपने | निरय वाम, पर वार शकियोंसे सेपित दानपर और म्पगमताधिक नात पुरप अतिभियथा ॥१०॥ भी शामायमाम होता ॥१०॥ वाममादाय कारि-या नियिम्य पुलिन विसः । सिय मा भगवान् श्रीकृष्णने हम समुन्दरियोकर माय पर यमुनानीके पुरिममें प्रवेश किया । उस समर मिये पर पुद और मगरले पुनीरनि हो गया,

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३२२
श्रीमद्भागवत
[अ० ३२
गोप्य उपः
संस्पर्शनेनाहरुवाधिहस्तयोः
सम्पर्शका आनन्द लेनी हर कमी-कमी का
ठठमी पी-कितना सुकुमार है, कितना मधुन
है। इसके यार श्रीकृष्णके थिय चानसे मन-ही-
मस्तुत्य पत्कृपिता पभापिरे ॥१५॥ सनिक रूZमा उनके मुंहसे ही उनका दोष स्वीकार
फरानेके लिये ये फटने मीना १५॥
गोपियोंने कहा-नटनागर ! कुछ लोग तो ऐसे
होते हैं, जो प्रेम करनेवासे ही प्रेम करते है वीर
भनतोऽनुभजन्स्पेक एक एतद्विपर्ययम् ।
कुछ लोग प्रेम न करनेवरमेंसे मी प्रम करते हैं। परन्तु
नोमयांप मजन्त्येक एतमा हि साधु भोः ॥१६॥ कोई-कोई दोनोंसे ही प्रेम नहीं करते प्यार ! इन तीनों
सुम्हें फौन-सा भय लगता है! ॥ १६ ॥
श्रीभगवानुपाच
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा--मेरी प्रिय सथियो ! जो
प्रम करनेपर प्रेम करते है, उनका तो सारा उघोग
मियो भमन्ति ये सस्पास्वार्थफान्सोधमाहिते।
स्वार्थको लेयर है । लेन-देनमात्र हैन तो उनमें
स्प्रेहाई है और न तो धर्म । उनका प्रम मेवल स्वाम
लिये ही है। इसके अतिरिक्त उनका और कोई प्रयोजन
नमा सौरदं धर्मः स्वार्थाचं उदि नान्मथा ॥१७॥ नहीं है ॥ १७ ॥ सुन्दरियो । नो अग प्रेम न करने
पासेसे भी प्रेम करते है-जैसे समायसे ही करुणाशीज
मजन्स्पभमतो ये पे फरणाः पितरौ यथा ।
सन्न और माता-पिता उनादय साहादसे, हितपितासे
मरा रहता है और सघ मे, तो उनक म्यवहारमें
निस्सस सस्प एवं पूर्ण धम भी है ॥ १८॥ पुछ लोग
धर्मो निरपपादोऽत्र सौहद च सुमध्यमाः ॥१८॥ से होते हैं, जो प्रम करनेवासे भी प्रम नहीं करने
म प्रेम करनेवासमका वो उनके सामने कोई प्रमही नही
है। ऐसे स्पेग चार प्रकारक होते हैं। एक तो घे, जो
भमतोऽपिन ये फेचित् भजन्स्पभजता कुसः। अपने सपने ही मम्स रहते हैं-निनकी सिमें सभी
ईत मासता ही नहीं। दूसरे थे, जिन्हें देत ता मासना
है, परन्तु नालाप हो जुक है, उनपर क्सिीसे कई
आत्मारामा पाप्तकामा भावना गुरुदुइ ॥१९॥
प्रपोजन ही नहीं है। तीसरे ६, मोजानते ही नहीं
मि हमसे फोन प्रम करता है और पाये थे है, जो
नाई सम्म्पो मजसोऽपि जन्तून
जन-यूमर अपना हित करनेवाले परोपकारी गुरुतस्य
गोंसे भी ग्रह पाते हैं, उनको सताना घाइते
भवाम्पमीपामनुतिवृषये
६॥१९॥ गोरिया ! में तो प्रम करनेवासे भी प्रमा
पैसा प्यार नहीं करता, त्रैमा करना चाहिये। में
| ऐसा पर इसीलिये करना हैं कि उनकी वितति और
यथापना लम्बपने पिनटे
मी मुममें स्टगे, निरन्तर मगी ही रद । जमे निर्धन पुरुषा
कमी महन-सा धन मिर पाप धीर सि को गाय तो
उसराप ग्रेय ए धनी पिन्तास मर जाता है,
नगिन्तपान्पभिभूता न पेद ॥२०॥ मे दी में भी मित्रमियर लिपि माता हूँ ॥२०॥

३२३ दशम स्कन्ध मदर्थोनिमयलोस्वेद गोपिया । इसमें सन्दह नहीं कि तुमटोगोंने मेरे लिये लोक मर्याग, वेमार्ग और अपने सगे सम्बन्धियोंको मी श्रेषया है। पमी स्थिति में मुम्हारी मनापत्ति और म्वानां हि यो मय्यनुराधयेऽधला । कहीं न जाय, अपने सौन्य और सुहागकी चिता न करने लगे, मुम्मम ही शी रहेमीरिये फरोशनपसे तुम सोगामे प्रम करता हुआ ही म छिप गया था। या परोक्षं भनवा विरोहित इसलिये तुमग मरे प्रेममें गोर मन निगे। तुम स्य मेरी प्यारी हा भीर म तुम्हारा प्यारा हूँ॥२१॥ मेरी मामपितु माईथ सत् प्रिय प्रिपाः ॥२१॥ प्यारी गोपियो । तुमने मेरे गये घर-गृहम्पीकी उन घड़ियोंका तोड़ गय है, जिन्हें घा-या योगी पति पारयेऽह निरचयसपुजा नहीं तोड़ पाते । मुझसे तुम्हारा यह मिशन, यह भारिमक संपोग सर्पया निमठ और सपमा निरोपई। स्वसापुरुस्य विधायुपापि यः। यदि म अमर शरीरसे --अमर जीवनसे अनन्त कालय तुम्हारे प्रम, सेवा और त्यागका याय मुकम्ना बाई ता या माजन् दुर्जरगेड्याला मी नहीं चुका सकता । मैं जम्म-अमन लिये तुम्हाग अणी 11 तुम भरने साम्प ममावसे, प्रमसे मुन्ध उमण माप तपः प्रतिपातु साघुना ॥२२॥ कर सकती हो । पन्नु मैं सो सम्भाग प्रणी ही ॥२२॥ न । इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईम्या संहितायां दशमस्कत्य पूर्षि रासक्रीसर्या गापीमान्वन नाम यात्रिशोऽध्याप ॥ ३२ ॥ अथ त्रयनिंगोऽध्याय । । महापम भी उमाप मीयुकईयी काल-गन 1 गापियाँ भगवा की उम प्रकार प्रममग मुमधुर वी पुनका नाम मगरवो गाप्प भुस्वायाधः मुपमला। विद्रम्प नाप प या, याग मी मागी बार मोगमपुपनिपि प्रगयाम्प भाग मा इर्विरजं ताप तदोपचिताहिए ॥१॥ मनारप हा गयी । ॥ मग श्रीमगा नया पारभत गोविन्गे रासक्रीडामनुमतः । श्रीर मेविका प्रपियाँ पदमाणी या avr pm दी थी 1 टन ग्रीगनों माप यमुनानी पनि रस्नरपिता प्रोतरन्पान्पावसाहुभिः ॥२॥ मतानन भनी मुमयी गान प्रारम का || || सास्सवः सम्प्रदाता गापीमण्डलमण्डित।। मग यागों मामी मगान श्री गारिया पीपर्म प्रस्ट गय और ग्नप गर्म पाना दाब अगरण प्णन तामां मध्य दयाईयाः । रिया । इस प्रकार गार्ग और पय श्रीण, १ मर । २ मीरापा मन्तदर्शन र । बारगपत्रिपारा । ।

महारास रसमय भगवान्की अन्तरजालीला अ० ३३] इयम स्कन्ध ३२५ उरुचजगुनस्पमाना रक्तकण्ठयो रसिप्रियाः। पी॥ ८ ॥ गोपियोंका जीवन मगवान्की रति है, प्रेम है। वे श्रीकृष्णसे सकर नाचते-नाचते ठचे सरसे मधुर गान कर रही थी। श्रीगका संस्पर्श पा-पाकर कम्गाभिमर्शमुदिता यगीतेनेदमाशवम् ॥ ९॥ और भी मानन्दमम्न हो रही थी। उनके राग-रागिनियोंसे पूर्ण गानसे यह सारा जगत् भव मी गूंज रहा है ॥९॥ फाषित् समं सकन्देन स्वरबातीरमिथिता।। कोई गोपी भगवान्के साय-उनक स्वरमें मर मिय- कर ग ही थी । ड श्रीकृष्णके सरकी अपेक्षा और उभिन्ये पमिसा तेन प्रीयता साघु साम्पिति । मी ऊँचे सरमे राग अत्यपने लगी । उसके शिक्षण और उसम खरको सुनकर ये बहुत ही प्रसम हुए भौर वाह-वाह करके उसकी प्रशंसा करने सगे। उसी रागको एक तदेव तुषममिन्ये व मानं च पादात् ॥१०॥ दूसरी सटीने धपदमें गाया । उसफर मी भगवान्ने वक्त सम्मान किया ॥ १०॥ एफ गोपी नाप करते करते फाचिरामपरिभान्ता पालम्पस्प गदामृतः। फक गयी । उसकी क्योंसे कान और घोरियोंसे देयके मस सिसकने टो। तब उसने अपने माथ्में अपार पाहुना स्कन्धं सयालयमल्लिका ॥११॥ बोस कसका पका लिया ॥११॥ भगवान् श्रीकृष्णने ही सरे मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरके कपको अपनी अपना एक हाय दूसरी गोपीके पेपर रस रमसा था। सौकांसगतं बाई कृष्णसारपलसौरभम् । वह स्वमानसे तो कमलके सम्मन पुग्धसे पुक या दी, उसपर पहा सुगन्धित चन्दनका सेप भी पा । उसकी चन्दनालिप्तमाघाय इटरोमा घुघुम्म ह ॥१२॥ सुगन्यसे यह गोपी पुरक्षित हो गयी, उसका रोम रोम सि ठा । उसने से उसे चूम टिया ॥१२॥ एफ गोपी न्य पर ही पी । माचनेके कारण उसके कुमार पस्यामिमाट्यविक्षिप्त कुलत्विपमग्मितम् । हिट हे थे, उनकी छटासे उसके पोल और भी चमक हे थे। उसने अपने पागेको भगवान् श्रीमणके गण्डंगण्टे सन्दधत्या अदाचाम्बूलचर्षितम् ॥१३॥ कोउसे सटा रिपा और भगवान्ने उसके मुंहमें माना चमया हुआ पान दे गया ॥ १३ ॥ पाई गोपीनपुर नस्पन्ती गापती काचित् फूजन्तु पुरमखला। और करधनीके मुंघरुओंफो नकारती हुई नाच और गा रही पी। बह जब बहुत पर गयी, तब उसने पाने मगरमें ही सा पामसुन्दर शीना परपमरो जाने पार्चम्याम्पुतहम्नाज भान्ताधात् स्तनयोः शिवम्१४, दोनों मनोपर रम पिया ॥ १४ ॥ गाप्या लम्बाप्पत का थिय एकान्तमछमम् । परीक्षित ! गाधियोस सीमाप छानीनीसे भी बहकर है । छल्मीनी परम प्रियतम पफास्त बारम मगान् श्रीहरुको करने परम प्रिपामो में पारर रिया गान पानी उनके साप रिकार परने Pr मारन् श्रीगने उनके गो माने मुजगाने गृहीसमयम्तदाम्यां गायनपस्त शिजरि ॥१५॥ २ सय पा, उम समय गारियकी बड़ी वर्ग ३२४ श्रीमद्भागवत , प्रविप्टेन गृहीतानां फण्टे मनिकट खियः॥३॥ | कम पा । समी र हमारे परे तो हम सहन गोपियोंसे श यं मन्मेरन नभस्तावद् विमानशतसालम् । रासोत्सव प्रारम्भ हुआ विमानोंकी भीड़ लग पस्नियोंके साप वहाँ दियाफसा मदाराणामौत्सुक्पापदतास्मनाम् ।। ४॥ प्रसासे, टाधुक्तासे पा ॥ ३१ ॥ खगकी उठी । म्वर्गीय पुष्पों ततो दुन्दुभयो नेदुनिपेतुः पुप्पाष्टयः । अपनी-अपनी पत्तियों के फरने सगे ॥ ५॥ रा प्रियतम श्यामसुन्दरफे जगुर्गधर्षपचय सत्रीकास्वयशोऽमलम् ॥५॥ क्यों करान, पैरोंके पायन छोटे धुंधर एक साप बज उठ | इसलिये यह मधुर पनि भी पड़ पलयाना नपुराणां पिहिणीनां योपिताम् । पी ॥ ६ ॥ यमुनानाकी रमणर पीपमें भगवान् श्रीकृष्णकी बड़ी ऐसा जान पाता पा, मानो अगणित सप्रिपागाममून्छन्दस्तुमुलो राममण्डले ॥ ६॥ हो ॥ ७ ॥ मृपके समय गो- हुई सुवर्ग-मगियों के बीचमें ज्योतिर्म, दमक-मुक्सर भपने पार कभी आगे - पीठ हटा सेनी । कमी गतिके अनुसार- तयातितुगुमे साभिर्मगवान् देवकीमुतः । रम्पती, तो कभी पड़ पेगसे, कभी चार जानी, पमी अपने हाप उठा उटाकर मा पसी विमिन प्रभारसे उधमकानी । मध्ये मगीना मानां महामरफला यथा ॥ ७॥ अपूर्ण गमे मुसरानी, सो कभी भाई मापते-नापसे उनकी पतरी पसर ऐसी स- 12, मनो टूट गरी दो। मुम्ले, मरने, पाद पामसंजपिपुतिभिः मम्मितम्रपिताम पउने पुतमि उनर मन हिर रह थे तपा । जा रहे थे। पानॉफ युगल दिलीकर आजत। माना परिश्रममे उना मुंहम मयमपपलामा एमसर्गाहगल । की प्रपन मे थी। येशशी पारियों के पर गपी पी । मीगीरी गोरे मुर्गा प्रा नपा नन्गी परम प्रमी मिप मुम्प फागमनाप्रथया मापी सद -गाम मात्र रही थी। न पहना 7 मानो पालो, गोरेग-मगर उनर। मापनपरिकामा पपगरिनु ॥८॥ri rif गिती 1 ।

ज०३३] दशम स्कन्ध ३२५ उम्पैर्जगुनृत्पमाना रक्तकण्ठ्यो रतिप्रियाः । पी ॥ ८॥ गोपियोंका बीवन भगवान्की रति है, प्रेम है। वे श्रीकृष्णसे सकर नाचते-नाचते ऊँचे सरसे मधुर गान कर रही पी। श्रीकृष्णका संस्पर्श पा पाकर कम्माभिमर्शमदिता यद्गीतेनेदमा सम् ॥ ९॥ और भी मानन्दमान हो रही पी । उनके रामगिनियोंसे पूर्ण गानसे यह सारा नगर अब भी गून रहा है ॥९॥ फाचित् समं सान्देन खरबादीरमिश्रिताः । कोई मेपी भगवान्के सार -उनके स्वरमें स्वर मिल- कर ग रही थी । पर श्रीक्म्णके स्वरकी अपेक्षा और उभिन्ये पबिता सेन श्रीमता साधु सामिति । भी ऊँचे सरसे राग अथपने लगी। उसके शिक्षण बौर उत्तम खरको मुनकर वे बहुत ही प्रस्न ए और पाह-वाह करके उसकी प्रशंसा करने लगे। उसी रागको एक तदेव सुवममिन्ये सस्यै मानं च पादात् ॥१०॥ दूसरी ससीने धपदमें गाय । उसका मी भगवान्ने भात सम्मान किया ॥ १०॥ एफ गोपी नत्य करते करते काचि रासपरिमान्ता पार्श्वम्पस्य गदामृतः। पक गयी । उसकी कलापोंसे कान और चारियोंसे देयके मूल सिसकने लगे। तब उसने अपने मालमें बार पाहुना स्कन्वं सयदलयमलिका ।।११॥ से कसकर पकड़ लिया ॥११॥ भगवान् श्रीकृष्णने ही सरे मुरीमनोहर श्यामसुन्दरके कंधेको अपनी अपना एक हाप इसमी गोपीके पर रस रक्खा पा। सासगर्व घाई कृष्णस्योत्पलसौरभम । या स्वभावसे तो कमलके सम्पन मुगवसे पुक पाही, उसपर पड़ा मुगन्धित 'पादनका लेप भी था । उसकी पन्दनालिप्तमाघाप (एरोमा थुचुम्म ॥१२॥ गन्धसे या गोपी पुषित हो गयी, उसका रोम रोम शिक व्य । उसने घटसे उसे घूम लिया ॥१२॥ एक फस्पाधिमाव्यविधिप्तपालस्विपमण्ठितम् । गोपी नृत्य कर रही पी । नाचनेके कारण उसके पुणणार हिछ , उनकी छटासे उसके मासोर और मी चमक रहे थे। उसने अपने पपोको मावान् श्रीकृष्णके गडंगण्डे सन्दधस्या भराचाम्पूलचर्षितम् ॥१॥ मसोलसे सटा दिया और भगवान्ने उसके मुंहमें जाना भगाया हुमा पान दे दिया ॥ १३ ।। फाई गोपी नपुर नृस्पन्ती गापती काचित् अन्नपुरमस्खला। और फायनीके परओंका मनपाती नई नाच कोर गा यी पी। वह पर बाल पक गपी, तब उसने अपने मगरमें ही सह श्यामसुन्दरफे शीतय परामरको भाने पार्चम्पाप्पुतहलाम्मान्तावाद खानयोः शिवम्१४ दोनों स्तनोपर र त्र्यिा ॥ ११ ॥ गाप्पो सम्पाप्पुतं का स श्रिय एकान्तबहमम् । परीक्षित् 1 पिपॉस सीमाग्प छानीप्रीसे भी मकर । मीनीफे परम प्रियतम एपान्त पम्मम भगवान् श्रीकृष्ण करने परम प्रियतम का पापन गरियो गन परती उनके साप विहार करने हर । मगान् मीरगने उनके गगेंगे माने मुसा में गृहीतकण्ट्यम्तदायों गायनयरवं विहिर ॥१५॥ बाँध रम्य पा, उम सम्य गरिकी ही बाई ३२६ श्रीमागपत [३० ३३ कार्गोत्पलालकविटरपोलधर्म शोमा थी ॥ १५॥ उनके कानों मम्के पुरा शोभायमान थे । घुघराली पर कपोग्गेपर स्टर वाभियो पलयन् पुरपोपवाया। रही यो । पसीनेकी बूदें मटकनेसे उनके मुखको टा निराठी ही हो गयी पी। रासमपलमें भगवान् गोप्पा सम भगवता नन्तः स्वकश श्रीक्षणके साय नृत्य कर रही पी। उनके कंगन और सस्तमजो भ्रमरगायकरासगोष्ठधाम् ॥१६॥ पाययोंक याजे यम रहे थे । भरि उनके समरसे अपना मर मिटाकार गम रह थे। और उनके बड़े एवं परिवाराभिमर्श और चोटियोमे गुप ए मल गिरते जा रहे थे ॥१६॥ परीशिद ! जैसे नन्दा-सा शिशु निर्यिकारमानसे वानी जिग्वेषणोरामविलासहासे। परीके साप सेता है, पैसे ही रमारमण भगवान् श्रीक्षण कभी उन्हें अपने पसे सगा सेते, मी रेमे रमेशा प्रजमुनरोभि हापसे सनया अस्पश करते, की प्रममरी तिराठी चितवनसे उनकी ओर देखते सो कमी लीयसे उन्मुक यथार्मक बप्रतिविम्वविनमः ॥१७॥ Eसने छगते । इस प्रकार उन्होंने मनमुम्दरियों सदामाप्रसादालन्द्रिया साव क्रीडा फी, बिहार किया ॥ १७ ॥ परीभित् । भगवान्के मोका संस्पर्श प्राप्त कर गोरियोंकी फेशान् दुल कुलपट्टिका वा। इन्द्रियाँ प्रेम वीर बानन्दरो मिस हो गयी । उनके केश पिसर गये । के हार टूट गपे वीर गाने भामा प्रतिव्योदमल मजत्रियो जस्त-म्यस्त हो गये। ये मरने केश, वन और संचारीको भी पूर्णतया सम्हाग्ने षसमर्प हो गपी ॥ १८ ॥ विमम्तमालाभरणा इखह॥१८ मगान् श्रीकृष्ण की यइ रासपीडा देसात वर्गमी देवनार मी मिटनी पामनामे मोदित हो गयी और कृष्णविफोरितं यीस्य मसहा पेपरनिय । समन तारों सपा मग माप चन्द्रमा पस्ति, रिमित कामादिताम्मायमगणा विस्मिताऽभयत्॥१०॥ हो गपे ॥ १९ ॥ पीक्षित् ! पी मगवान आमगम है--उन्हें अपन अतिरिक्त श्रीर रिमी भी आपयाला सम्मा भारतमारमानं पावतीगापपापित । मारी-कीर भी उन्होंन जिननी मारियों मी, उनने ही रण किये और 1 में उनो साग इस रमम भगरीमाभिराम्मारामाऽपि रीग्या ॥२०॥ प्र frr रिया ॥ २०॥ बर मा ना न और मृग मागिर पाना पागनों पर नामानिम्तिारण था नाना पदनानि म | " मय पर पर भा भीरने म प्राये मर्द पाने सुगर फसमा भाग सना मुले प्रामनाम्ना नमना पागिना ॥ २१ ॥ पाद ! भगाना बगमा और गाप्प पापगन्ननविर मगरमि मा । उन्होंने जन उन पनि मानापुर गाभिपा गुतिसमनिशान। nि mubi १० ३३] दशम स्कन्ध ३२७ । मानं दधस्प ऋषभस जगुः कसानि तपा उस प्रेममरी चितवनसे, जो सुधासे भी मीठी मुसकानसे उग्र हो रही थी, भगवान् श्रीकृष्णका पुग्यानि सस्करसस्पर्शप्रमोदाः ॥२२॥ सम्मान किया और प्रमुफी परम पवित्र छील्योंका गान करने या ॥ २२ ॥ इसके बाद जैसे पका हुआ गनराज मिनारोंको तोपता मुक्षा हपिनियोंके सप वाभिर्युतः मममपादिसुमनसा जलमें घुसकर मीरा करता है, वैसे ही रोक और केदकी मर्यादाका अतिक्रमण करनेवाले भगवान्ने अपनी पृष्टसजा सहचशमरजिताया। पान दूर करने लिये गोपियोंके साय मलकीमा करनेके उद्देश्यसे यमुनाके मलमें प्रवेश किया । उस गन्धर्वपालिभिरनुकुट आपिशव पा समय मगवान्की पनमाल्न गोपियोंक भाकी रगरसे कुछ कुषा-सी गयी थी और उनके वन स्परूकी केसरसे यह रंग मी गयी दी। उसके चारों बोर भान्तोगजीभिरिभराडिष भिमसेतु ।२३। गुनगुनाते ए मारे उनके पीछे-पीछे इस प्रकार कल र ये, मानो गन्धर्षरान उनकी फीनिका गान करते सोऽम्भसल युवतिमि परिपियमानः ए पीछे-पीछे चल रहे हों ॥ २३ ॥ परीक्षित् । यमुनाजळमें गोपियोंने प्रेममरी पितानसे भावान्की प्रम्णेवितः प्रहसतीमिरितस्ततोऽन। ओर देस-वेस्पर सपा ससकर उनपर इधर-उधरसे बलकी खूब पौनरें साल । बल सटीच-उसलीमकर वैमानिकैः इसमर्षिभिरीकामानो उन्हें सूब नहल्यया । विमानोंपर पड़े हुए देवता पुष्पोंकी वर्षा करके उनकी स्तुति फरने लगे । इस प्रकार यमुनाजन्में मप आत्माराम भावान् श्रीकृष्णाने गमरामके रेमे खप स्वरविरम गनन्द्रलीलः ॥२४॥ समान करविहार किया ॥ २५ ॥ इसके बाद भगवान् श्रीहाण अम्युमतियों और भौरोंकी भीसे घिरे हुए रुप्णोपपने यमुनानके उपरनमें गये । मह बड़ा ही रमगीय था। उसके चारों ओर नल और सलमें यही सुन्दर पुगध- वाले इस जिले हुए थे। उनकी मुवास स्कर मन्द प्रसनगन्धानिलनुष्टदिक्तटे । मन्द वायु घर रही पी । उसमें भगवान् इस प्रकार विचरण करने एगे, नैसे मदमत गजरान हपिनियोंक चचार भृङ्गप्रमदागणावो ईरके साप घूम रहा हो ॥ २५॥ परीक्षित् । घरदी गइ रात्रि विसरे रुममें मनेर रानिपों पुनीमून पया मदद द्विरदः फरेणुमिः ॥२५॥ | हो गयी थी, मदुत ही सुन्दर पी। चारों ओर चन्द्रमाकी की मुम्दर पदिनी छिप रही थी । मार्यो, शरद एर्ष प्रशाशविरामिवा निशा तुकी स्नि रस-सामप्रियामा म मिस्ता है, उन समीसे वह युफ पी। उसमें मावान् श्रीणन भपनी म मन्पकामाऽनुरतापलागण । प्रपसी गोरियोंफ साप पमुनाव पुटिन, यमुनानी और तसम ।

३२८ भीमद्भागवत [म०३३ २७॥ मम । सिपेश आस्मन्पयरुदसौरत | उनके उपनमें विहार किया। यह बात स्मरण रस्ती चाहिये कि मगवान् सस्पसाल्प हैं । यह सत्र उनके चिमप सास्पकी दी चिन्मयी टीम है। और उन्होंने इस लीयमें कामभवको उसकी चेराओंको तप सदा भरत्फाम्पमधारसामयाः ॥२६॥ | उसकी प्रिपाको सर्वथा अपने अधीन कर रसस्वा प, उन्हें अपन-आपमें कैद कर रखा पा ॥२६॥ रामोपाप पशा परीक्षित्मे पूछम-मगान् ! भगवान् श्रीकृष्ण सारे बगस्के एकमात्र खामी है । मोंने अपने का सम्थापनाप धर्मस्प प्रश्नमामवरस च । श्रीवामनीके सहित पूर्णरूपमें अवतार प्रण किस भरतीहि भगवानशेन जगदीपरः ॥२७॥ | पा । उनके पासारका उद्देश्य ही यम या कि धर्मकी स्थापना हो और मधमका नाश स कप धर्मसेतना धक्का फर्माभिरषिता । घे धर्ममर्यादाक बनानेासे, उपदश करनेवाले और रक्षक थे। फिर उन्होंने स्वयं धर्मके विपरीत परसिपका प्रवीपमाचरद् प्रपन् परदाराभिमर्शनम् ॥२८॥ स्पर्श कैसे किया ! ॥ २८ ॥ मैं मानता हूँ कि मालान् श्रीकृष्ण पूर्णश्चम थे, में किसी भी वस्तुकी कामना साप्तामो यदुपति कृतवान् मुगुप्सितम् । नहीं पी, फिर भी उन्होंने किस वमिपायसे व किमभिप्राय एत नः संशयं छिन्धि मुदत ॥२९॥ निन्दभीप कर्म किया । परम ब्रह्मचारी मुनीश्वर ! आप रुपा करके मेरा यह सन्देह मिटाइये ॥ २९ ॥ भीक उपाय भीशुकरेजी काते है-सूर्य, ममि व्या मिर धर्मम्पतिममा रट पिराणां व साहसम् । (समर्ष) कमी कमी धर्मा उल्लहन और इसका काम करते देखे जाते हैं । परम्म उन फार्मोसे म वेत्रवी पुरुषोंको का दोष नहीं होता । दसो, अग्नि सेजाया न दापाय पहा मर्यमजो यथा ॥३०॥ नहीं होता ॥ ३० ॥ जिन लोगोंमें ऐसी सामम्म सप कुछ सा जाता है, परन्तु उन पदार्पोक दोपसे मही है, उन्हें मनसे भी सी बात कभी नहीं सोचनी नंतद् ममापरमात मनसापि पानीपरः । पाहिये, शारीरसे करना तो दूर रहा । यदि मूवादश को ऐसा काम कर रटे तो उसका नाश हो गया है। मगान् पारने इस्लाइस रिपी म्यिा पा, दूसरा विनम्पस्पामरन्मालापपादोऽधिज पिपम्।३१॥ कोई पिये तो बह जम्पर भस्म हो जापग ॥ ३१॥ इसरिप इस प्रकारक वो शहर आमिर, बने अविकारये मनुमार उमफ यचनको ही सत्य मानना स्यगणां पच मस्यं तपापरित फपिन् । और टमीक अनुमार बापरण पाना चाहिये । उनय भाचरणका अनुफाम तो यहां पीरिया माग है । मरिय मुदिम्मन् पुरुषमा पानिय नि ते पत्मामापुन पुदिमाम ममामरद ॥३२|| उनश मा आपरण उनक अशा अनुप हो, - १ पुष्पा पापप पर ।

३२९
१० ३३]
दशम सन्ध
प्रशलाचरितेनपामिह स्वार्थो न विपते । उसीको जीयनमें उतारे ॥ ३२ ॥ परीक्षित् 1 घे
सामप्यत्रान् पुरुष अहङ्कारहीन हाते है, शुमकम करनेमें
विपर्ययेण पानों निरहंकारिणां प्रभो ॥३३॥ उनका कोई सांसारिक खाद नहीं होता और अशुभ
क्स करनमें अनर्थ (नुक्सान ) नहीं होता । वे
किमुताखिलसवाना तिर्यपदिकिसाम् ।
स्वाय और अनसे ऊपर उठे होते हैं ॥ ३३ ।। जब
म्हींके सम्बन्धमें एसी बात है तब जा पञ्च, पञ्ची,
इशिनुमशिसव्यानां मसलाइशलान्यय ॥३४॥ मनुप्प, दक्षता आदि समम्स चराचर नीयोंके परमात्र
प्रमु सर्वेयर भगवान् हैं, उनके साप मानवीय सुम
परपा पहलपरागनिपेवता
और अशुमा सम्बन्ध कैसे जोड़ा जा सकता
है।॥ ३४ ॥ जिनके घरणमाके रसका सेवन करके
योगप्रभावविधुतालिलफर्मवन्धाः ।।
मकान तृप्त हो जाते हैं, मिनके साय योग प्राप्त करके
| उसके प्रभावसे योगीमन अपने सारे कर्मस्पन पाट
राष्टते हैं और विचारशीप दानीबन जिनक तस्मका
स्वर परन्ति मुनयाऽपि न नभमाना विचार फाये तस्याए हो जाते हैं तया समम्न कम-
बन्नासे मुक्त होकर म्पद विपाते हैं, वे ही
स्वस्यम्छयाऽऽचयपुपा मुस एप पन्ध|३५|| मायान् अपने मकोका असे अपना मिमप श्रीविद
प्रस्ट परत है, तय भय, उनमें पमनकी फस्पना
गोपीनां तस्पतीनां च सर्वेपामेय देहिनाम् ।
ही कैसे हो सकती है ॥ ३५ ॥ गारिपॉक, उनके
| पतियोंक और सम्पूरा शरीरधाग्याचे अन्त कारणोंमें जो
आरमारपसे विगजमान है, जो सपके साभी और
योऽन्तपरवि साऽभ्यः क्रोग्नेनेह दहमाक्॥३६॥ परमाति है, यी ता अन्ना Pन्य-पिम्मप श्रीविग्रह
प्रस्ट फरय य” स्टीग फर रहे हैं ।। ३६ ।। मायान्
अनुग्रहाय मवाना मानुप दामाम्पिठ । जीयामरा पानर ग्यि ही अपनर मनुष्यसपमें
प्राट पाते हैं और सी प्यार पाते, बिन्दै
भजते वाशी फ्रीडा या भुस्या उत्परो भवेन् ।३७१, मुना जीव भगवरगपग हा जाय ।। ३७ ॥ प्रगामी
पागने भगा धारण ततिर मी गादि नारी
नामपन् बलु प्याप माहितास्तम्य मायया।
दी। उनी पागमापसे महिला पण समन
ग्दप विमर्ग पलिका हर पम्ही ॥ १८ ॥
मन्यमाना पराम्यान स्वान् बान्दारान्मजाकम
गसिप गरि दीन गं | मुहूर्त
कपा । पपशि गिरी जान मन
मारिन भगान् श्रीमी प्रमअन्न
प्रनगर उपायन पामुदरानुमादिता । आन पर पगबीय अनीर पराम,
F- ममे पार मात्र हा प्रमन्न शना
अनिशुल्या पयुगाय सगान् भगवरिप्रपा ३९ ॥ ॥

भीमनागवत [अ० ३३ विक्रीरित अवष्मिरिदं च विष्णोः पीक्षित् । मो धीर पुरुष अजयुमतियोंकि सप मगवान् श्रीकृष्णके इस चिम्मय रासविस्मसका प्रमाके भदान्नितोऽनुमणुपादय पर्मये यः । साप बार-बार अषण और वर्णन करता है, उसे मत्यन्के चरणोंमें परा भक्तिकी प्राप्ति होती है और भक्ति पर भगवति प्रतिलम्प कामं दत ही शीघ्र अपने दपके रोग-कामविकारसे छुटकारा पा माता है । उसका काममा सदाके दोगमाषपदिनोस्पचिरेण धीरः ॥४०॥ लिये मा हो जाता है* ॥ १० ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या सहितायां दशमस्का घे पूर्षि रासक्रीसमर्णन माम प्रपरिशोऽप्याप ॥२३॥ G १ राजीवात्रममि । * श्रीमद्भागवतमें ये रासनीसके पाँच षष्याय उसके पाँच प्राण माने जाते हैं। मगवान् श्रीकृष्णकी परम अन्तरजालीय, निनस्यत्पभूता गोपिकाओं और शादिनी शक्ति श्रीराधानीक साथ होनेवाली भगवान्की दिव्यातिदिग्य कीग, इन अध्यामि कही गयी है । 'एस' शम्दका मूम रस है और रस रूप भगवान् श्रीकृष्ण ही है--सो स। जिस दिन्य क्रीगमें एक ही रस अनेक रसोंके रूपमें होकर अनन्त-अनन्त रसका समास्नादन करे, एक रस ही रस समझके रूपमै प्रष्ट होकर सर्य ही भासाप-प्रसादक, लय, घम और विमिम भासम्पन एवं उद्दीफ्नके रूपमें क्रीम करे--उसका नाम रास है । भगवान्की यह दिष्य मीन भगवान्के दिग्य भाम, दिम्य रूपसे निरन्तर हुआ करती है । यह मगवान्की विशेष कृपासे प्रेमी सक्कों के हितार्थ कभी-कभी अपने हिम्म धामके साथ ही भूमपालपर भी अवतीर्ण गुम करती है, मिसको देस-सुन एवं गकर तप स्मरण-पिसन करके अधिकारी पुरुष रसस्वरूप भावान्की इस परम रसमयी लीमका बन्द ले सकें और स्वयं भी भगवान्की छीपमें सम्मिलित होकर अपनेको तफल्प कर सकें। इस फशप्यायीमें वंशीधनि, गोपियों के अभिसार, श्रीहष्णके साप उनकी बातचीत, रमण, श्रीरापानीके सप अन्तर्धन, पुन प्राकम्प, गोपियोंके द्वारा रियर मसनासमपर विरामना, गोपियोंके कर प्रश्नका उत्तर, रासनस्य, श्रीग, नस्केलि और नविहारका वर्णन है जो मममी मागमें होनफर भी वस्तुन परम विम्य है। समयके साथ ही मान-मस्तिष्क भी पस्टता रहता है। कमी क्रस्किी प्रधानता हो जाती है और कमी परिटिकी । धानका युग ही ऐसा है मिसमें भगवान्की दिम्प-सीस्मोंकी तो मारत ही क्या, खर्य भगवान्के अस्तिस्वापर ही अविश्वास प्रकट किया जा रहा है। ऐसी स्थितिमें इस दिम्प मीस्यका रहस्य न समझकर प्लेग तरह तरदकी आशादा प्रकट करें, इसमें भापकी को पत नहीं है । पलीय प्रत्तररिसे और मुस्का भगवायासे ही समसमें आती है । मिन मम्यवान् और मगवतप्राप्त महात्माओंने इसका अनुमा किया है, ये पम्य हैं और उनकी चरण-पब्लिके प्रतापसे ही त्रिलोकी पम्प है। उन्हींकी युफियोंका आश्रय लेकर पहॉ राससीसमके सम्बन्धमें यस्किथित् विक्षनेकी पना की जाती है। यह बन पहले ही समम सेनी चाहिये कि मायम्का शरीर बीव-शरीरकी भाँति पर नहीं होता । परकी सचा कार जीवकी रश्मेिं होती है मावान्की रहिमें मही । यह दो वर पह देही है, इस प्रकारका भेद मार कार प्रति के राज्यमें होता है । अमाल लोकमें-हाँकी प्राप्ति भी चिम्मप है सब कुछ चिन्मय ही होम कहाँ बचित्की प्रतीति तो मेस विधिम्मस वका मावान्की पकी सिलिक स्मेि होती है । इसम्मेि - ।

३० ३२] ३३१ - स्यूत्ताम -या यों कहिये कि परराम्यमें रहनेवाय मस्तिष्क जब भगवान्की पाक्त हीराओंके सम्पन्चमें विधार करने मगम है, तब या अपनी पूर्व वासनामों के अनुसार ग्यम्पकी धारणाओं, अपनाओं और किस्मोंगा ही नारोग उस दिम्य राज्यके विषयमें भी करता है, इसलिये दिग्पालीसके रहस्यको समझनेमें असमर्थ हो जाता है। यह रास वस्तुत परम उम्मल रसका एक दिग्य प्रकाश है । बा भास्की यात तो दूर रही, बानरूप या विहानरुप नगदमें भी यह प्रक्ट नहीं होता । अधिक क्या, साक्षात् चिन्मय तस्वमें भी इस परम दिम्य उम्मल रसका समयमास नहीं देखा जाता । इस परम रसकी स्पति तो परम भवमयी श्रीकरणप्रेमसरूपा गोपीजनोंके मधुर एदयमें ही होती है । इस रासपीत्यके यपाखरूप और परम माधुर्यत्रा पाखाद उन्हींको मिलता है, दूसरे लोग तो इसकी मापना भी नहीं कर सकते। मायान्के समान ही गोपियों मी परमरसमयी और सन्चिदानन्दमपी ही हैं। साफ्नाकी टिसे भी नोंने न पेल नर शरीरका ही स्थग कर दिया है, बस्कि सूक्ष्म शरीरसे प्राप्त होनेवाले खग, कन्यसे अनुमा होनवासे मोश और तो क्या, परताकी रसिका ही स्याग कर दिया है। उनकी दृष्टिमें केवल चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण है, उनके हृदयमे श्रीकृष्णको तृप्त करनेवाला प्रेमामृत है। उनकी इस अस्पैविक स्थिति में स्यूशरीर, उसकी स्मृति और उसके सम्पन्धसे होनेवाले मा सड़की कल्पना किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती। ऐसी कल्पना तो केवल देहारममुनिसे जको पुए जीवोंकी ही होती है। मिदोंने गोपियोंको पहचाना है, उन्होंने गोपियोंकी धरणरिया स्पर्श प्राप्त करके अपनी कृतारपता चाही है । झा, शार, उदव और अजुनने गोषियोंकी उपासना करके मायन्के परमि से प्रमका वरदान प्राप्त किया है या प्राप्त करनेकी अभिन्या की है। उन गोपियोंक दिप्प मक्को साधारण स्त्री-पुरुषके भाव जैसा मानना गोपियों के प्रति, मगवान्के प्रति और पास्तवमें सत्यके प्रति महान् जन्याय एवं अपराध है । इस अपराधसे मरनेके लिये मावान्की दिप्य टील्योंपर विचार करते समय उनकी जमात दिग्यताका स्मरण रम्ना परमावश्यक है। मतान्का चिदानन्दपन पारीर दिम्य है। बइ भमरमा बौर अविनाशी है, हानोपादानरक्षित है। वह लिस्प सनातन शुद मावखरूप ही है। इसी प्रकार गोपियों दिम्य जगतकी मातापी सम्पमता बन्ससाखियाँ है। इन दोनोंका सम्बन्ध भी दिम्प ही । पर उबतम मानराम्पफी पीव्य स्पूल शरीर और स्मल मनसे परे है। भावरण-माके भनम्तर वर्षात् पीरहरण करके जब भगवान् सीरुति देते हैं, तब इसमें प्रमेश होता है। माल देहकर निर्माण होता है स्यूठ, म भोर पारग-इन तीन देहोंने संपोगसे । जस्ता धारण- शरीए रहता है, साफ इस प्राक्त दोहसे बीपको एरपारा महा मिरता । पारण-पारीर कहते हैं पूर्ववत मक उन संस्कारों, जो देह-निर्माण कारण होते है। इस कारण-शीए के माध्यरपर जीरो बार-बार स्म-मृत्युके पार पहना होता है और पर पक जीवकी मुहिम हमेतक अप स्पारणा या सरपा अमाप म होनेता पलता ही रहता है । इसी अवयन के कारण पाचमौनिक प्यारीर मिला हैलो रक, मांस, बपि दिसे मरा वीर समसे टस हो । प्रतिक राम्प मितने शरीर दाठे ६, सभी बहन पोनि और बिन्दुके संयोगले ही बनते है, फिर चाहे कोई कामरनित RRY मैथुनसे उत्पन्न ७ या ऊपपीता मापुर सारपसे, सिन्दुर प्रयोगमी होनेपर पर्तयत् श्रेष्ठ मैयुनसे दो, मका दिना दी मैयुनके माभि एप, पाय, बर्ग, नेर, मिर, मनक नरिके ससि, बिना ही सो समाप्रसे बप पिना देने के समरसे ही उम्पन ! ये मैयुनी-अमेधुनी ( अपर कमी-कमी सी व पुरुमदारके निा में टन दानाल) सर्भ और पोनि और पिम्दुफ संयोगनित हो। पेसी ल₹। इसी प्रकार पे फार कति निबन' पनि कामात घर, पन्दसे मी? प्रात दी। विर पा देके प्पि पारम्पनेपले शरीर - ।

भीमबागपत - मी प्राक्त ही हैं। प्राक्त शरीर इन सबमे विलक्षण है, जो महाप्रज्यमें मी नष्ट नहीं होते। और भगवाह सो साक्षात् भगवरूप ही है। देव शरीर प्राय रक्त-मास मेद-अस्थिपाले नहीं होते । अप्राक्त शरीर मी नहीं होते । फिर मगवान् श्रीकृष्णका भाखमय शरीर तो रक्त मोस-वस्तिमय होता ही कैसे। तो सर्वपा चिदानन्दम्प है। उसमें देह-देही, गुण-गुणी, रूप-सपी, नाम-नामी और लील्म तथा लीमपुरुषोतमका में नहीं है । श्रीकरणका एक-एक मा पूर्ण श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्णमा मुखमण्डल जैसे पूर्ण श्रीकृष्ण है, वैसे ही श्रीकृष्णका पदनस मी पूर्ण श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्णकी सभी इन्द्रियोंसे सभी काम हो सकते हैं। उनके कान देख सकते हैं, उनकी आँखें सुन सफ्ती हैं, उनकी नाक स्पश कर सकती है, उनकी रसना सँघ सकती है, उनकी लवा साद ले सकती है। घे हार्थोसे देख सकते हैं, खाँसोंसे चल सकते हैं। श्रीकृष्णका सब कुछ श्रीकृष्ण होने के कारण वह सर्वथा पूर्णतम है। इसीसे उनकी रूपमाधुरी निस्पवईनशील, नित्य नवीन सौन्दर्यमयी है। उसमें ऐसा चमत्कार है कि वह स्वये अपनेको ही बाफर्षित कर लेती है । फिर उनके सौन्दर्य-माधुर्यसे गौमरिम और राक्षबेल पुलवित हो बायें, इसमें सो करना ही क्या है । मगवान्के ऐसे स्वरूपभूत शरीरसे गंदा मैथुनकर्म सम्भव नहीं। मनुष्य जो कुछ खामा है, उससे क्रमश रस, रक, मांस, मेद, मजा और बस्मि बनकर अन्तमें शुक स्नता है, इसी शुक्रके बाघारपर शरीर रहता है और मैथुनक्रियाम इसी शुक्रका क्षरण हुआ करता है । भगवान्फा भीर न तो कर्म- जन्य है, न मैथुनी सष्ठिका है और न देवी ही है । मा सो इन सबसे परे सर्वषा विभुद भगस्वरूप है । उसमें रक, मांस, अस्ति भादि नहीं है, बतएव उसमें शुक्र भी नहीं है । इसलिये उसमें प्राक्त पाश्चमौतिक शरीरोंवाले स्त्री पुरुषों के रमण या मधुनकी कल्पना भी नहीं हो सकती । इसीलिये मगमान्को उपनिषदमें असम प्रमचारी मतव्यया गया है और इसीसे मागपतमें उनके लिये अमन्दसौरता यादि शब्द माये हैं। फिर को शश करे कि उनके यह हजार एक सौ आठ रानियों के इतने पुत्र कैसे हर तो इसका सीन उपर की। कि यह सारी भगक्सी सरि पी, मगवान्के साइम्पसे ईपी। मगमन्के शरीरमें जो रस-मांस वादि दिखत्मयी परते है, पर तो मगलान्की योगमायाका चमकार है। इस विवेचनसे भी यही सिद्ध होता है कि गेपियोंके सप भगवान् श्रीकृष्णका चो रमण हुआ वह सर्वपा दिग्य भगवत्-राम्पकी सीम है, मैक्ति काम-श्रीग माही । x x इन गोक्यिोंकी साफ्ना पूर्ण हो चुकी है । भगवान्ने अगमी राश्रिोम मनके सप विहार करनेका प्रेम- सल्प कर लिया है । इसीके सप उन गोपियोंको मी जो नित्यसिया, जो मेष्ठिम विदिता भी है नी रात्रियोंमें दिम्य-सीत्यमें सम्मिलित करना है । ये वगठी रात्रियों कौन-सी हैं, पर बात भगवान्की पिके सामने है। उन्होंने शारदीय रात्रिपोंको देख्दा । 'भगवन्ने देखा-सका मर्म सामान्य नही, विशेष है । जैसे सरिके प्रारम्ममें स पेक्षत एकोई बहु स्वम् ।'भगवान्के इस ईक्षणसे बगदकी उत्पत्ति होती है, से ही गसके प्रारम्भमें भावान्के प्रमवीक्षणसे शरवालकी Pम्य रात्रिकी सरि होती है । मलिक-पुष्प, चन्द्रिकर वा समस्त टीपनसमप्री मान्के घरा मीक्षित है अर्यत् किक मही, मामेषिक-पात है। गोपियोंने अपना मन श्रीराणके मनमें मिरा दिया। उनके पास सयं मन न पा । भव प्रम दान करनेवाले श्रीकृष्णने शिरके लिये मगीन मनकी, दिम्प मनकी सटि की। पागेश्वरेचर मगान् भीहष्णकी पदी योगमाया है, यो रासातपके लिये रिय पत्र, पिप्प सामग्री एवं Pिम्प मनका निर्माण किया करती है । इतना होनेपर मायान्की माँसुरी बरती है। भगवान्की योमरी पापो चेन्न, चेतन जा, पम्पो नषठ और बचो पार, विधिमक्ने समानिस और समझिम्पस मिक्षित बनाती रहती है। मगमका प्रमान प्राप्त परके गोपियों निस्सहाय, निमित्त हाम्र परके सामने सगी र पीकर गुरुम्नॉफी सेग-शा-धर्मके पाममें खगी थी, कोई गो-रोहन 4.३३] दसम स्कन्ध आदि मर्षके फाममें लगी गई थी, कोई साज-शृङ्गार आदि कामके साफ्नमें व्यस्त थी, पर्दे पूना-पाठ आदि मोझसधनमें स्टमी गई थी। सब गीई या मपने-अपने काममें, परन्तु वास्तवमें वे उनमेंसे एक भी पदार्प चाइती न थी । यही उनकी विशेषता पी और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि वीपनि सुनते ही कर्मकी पूर्णतापर उनका ध्यान नहीं गया, काम पूरा करके चलें, ऐसा उन्होंने नहीं सोचा । ये चल पड़ी उस साधक संन्यासीके समान, मिसका हदय मैराम्पकी प्रदीप्त ज्यालासे परिपूर्ण है। किसीन किसीसे पूछा नहीं, सत्या नहीं फी, बस्त-म्पस्त गतिसे मो से पी, वैसे ही श्रीकृष्णके पास पहुँच गयी । वैरम्पकी पूर्णता और प्रेमकी पूर्णता एक ही बात है, दो नहीं । गोपियाँ बज धौर श्रीकृष्ण बीचमें मर्तिमान् वैराग्य हैं या मूर्तिमान् प्रेम, क्या इसका निर्णय कोई कर सकता है! साधनाके दो भेद है----मर्यादापूर्ण वैघ साधना और २-मर्यादारहित अवैध प्रमसापना । दोनोंके ही अपने अपने खतन्त्र नियम है। वैध साधनामें पैसे निपछि मनका, स्नातन पक्षिा, कर्तव्योंका और विविध पालनीय फोका त्याग सपनासे भ्रष्ट करनेवाथ्य और महान् हानिकर है, वैसे ही अवैध प्रेमसाफ्नामें इनका पाटन कलरूप होता है। बात नहीं कि इन सय पात्मामतिके साफ्नोंको वा अवैध प्रेमसामनाका साधक जान-बूझकर छोर देता है। बात यह है कि यह स्तर ही ऐस है, जहाँ इनकी बावस्यकता नहीं है । ये वहाँ अपने-अप वैसे ही छूट नाते हैं। वैसे नदीके पार पहुंच जानेपर सामाषिक ही नौकाकी सारी छूट नाती है। अमीनपर न तो नौकापर बैठकर पलनेका प्रश्न उठता है और न ऐसा चाहने या करनेवाला मुद्धिम्मन् दी माना चाता है। ये सब साधन वहीतक आते हैं, यहाँतक सारी पत्तियाँ सहन स्वेअसे सदा सर्वदा एकमात्र मगवान्- फी जोर दौड़ने नहीं लग जाती । इसीलिये मगवान्ने ग्नतामें एफ जगह तो अर्जुनसे कहा है- म मे पारित कर्तव्य निपु बोकेषु विचम । नानपातमासप्प पर्व एव र कर्मप्पि । यदि रनब गातु कर्मण्यतन्द्रिवः1 मम पानुवर्तते मनुष्पा पा सश। सस्तीरेयुरिमे मोका न कुपो कर्म घेदहम् । सारस्य च कर्तास्थामुपरम्यामिमाप्रमाः। सला कर्म पपिसो पपा कम्ति भारत । र्यादितपासकामधेपुगेकप्तप्रहम् । (३।२२-२५) वर्गुन ! पपपि तीनों लोकॊमें मुझे कुछ भी करना नहीं है, और न मुसे किसी वस्तुको प्राप्त की करना है, जो मुसे म प्रम्स हो तो भी में कर्म करता ही हूँ। यदि में सावधान होकर कर्म न कहें तो गर्जुन ! मेरी देख-देसी मोग फोको मेरमै भौर यो मेरे कर्म म क्रनसे ये सारे प्याक भय हो मायँ तपा में इन्हें पर्ण- सकर बनामेवाम्य और सरी प्रमाका नाश करनेवाय पर्ने । इसलिये मरे इस भादर्शक अनुसार अनासक हामी पुरुषको भी लोसपा के लिये वैसे ही कर्म करना चाहिये, जैसे फर्ममें वासक नानी मेग करते हैं।' यहाँ भगवान् भादर्श मेमसंपनी ममापुरुषके रूपमें बोलते हैं, मोक्तापक बनकर ससारणको शिक्षा देते हैं। इसीलिये सर्प मफ्ना उदाहरण देकर लोगोको फर्मम प्रपच करमा चाहते हैं । ये ही भगवान् ठसी गीतामें यहाँ अन्तताकी बात करते हा सर कहते हैं- सपमान परिपम्प मामेक शरम (१८) 'सारे धोका स्याग करके केवर एक मेरी शरणमें आ ना ।' यह बात सबक लिये मही है। इसीसे मगवान् १८ । ६१ में इसे सबसे पाकर छिपी हुई गुत पद (नगुपतम ) पदकर इसक बादक ही भोरमें कहते हैं- - -- मामागवत [अ० २५ नाभकाय इद ते मावपस्काय कदाचन। म बाशुभषये पाय म मा पोऽम्पस्पति । ( १८ ।) 'भैया धर्मुन ! इस सर्वगुण्तम मातको चो इन्द्रिय-विजयी तफ्ती म हो, मेरा भक्त न हो, पुनना म पाहता हो और मुसमें दोष यता हो, उसे न कहना !' श्रीगोपीचन साधनाके इसी उस स्वरमें परम धादर्श पी। इसीसे उन्होंने देव-गेह, पति पुत्र, येक परोक, फर्सम्प-धर्म-सस्को श्रेषकर, सबका महान कर, एकमात्र परमाखरूप भगवान् श्रीकृष्णको ही पानेके लिये अमिसर किया पा । उनका यह पति पुत्रोंका स्पाग, यह सर्मका त्याग ही उनके सरके अनुरूप सधर्म है। इस सर्वधर्मस्याग' रुप सर्मका भाचरण प्रेपियों जैसे उच्च सरके समि ही सम्भव है। क्योकि सम धोका पद त्याग कही कर सकते हैं, जो इसका फ्याविधि पूरा पालन कर चुकने के बाद इसके परमास धनाप और अचिन्त्य देवदुर्नभ माध्यमको प्राप्त कर चुकते हैं, वे भी जान-मूसकर स्पाग नहीं करते । सूर्पा प्रस्म प्रकाश हो जानेपर तब्दीपककी माति खत ही ये धर्म उसे त्याग देते हैं। यह त्याग तिरस्कारमूक नहीं, वर क्लिक । माक्प्रेमकी ऊँची स्थितिका यही स्वरूप है। मर्षि नारदवीका एक सूत्र है- बदामपि सम्पति बम्ममिगिनानुपर्ग भते । जो वेदोका (बेदमूम्क समस्त धर्ममादायोंका ) में भीमति स्याग कर देता है, यह असण, सम भावप्रेमको प्राप्त करता है।" जिसको मगवान् अपनी शीपनि मनाकर--नाम के होकर मुगये, वा मन्त्र, किसी दूसरे धर्मकी भोर तामसर कप और कैसे क सकता है। रोक्नेवासेने रोका मी, परन्तु हिमाम्पसे निकालकर स्मरमें गिरनेवाली प्रमपुत्र नदीकी प्रस घरको क्या कोई रोक सकता है। ये न सका, नहीं रोकी जा सकी। जिनके पिल्में कुछ प्राऊन संस्कार मशित पे, वे मरने मनधिकारके कारण शरीर मामेमें समर्थ म हुई । उनका शरीर घरमें पड़ा रह गया, भान्के स्यिोग-ससे उनके सारे कलम धुळ गये, पानमें प्राप्त मान्के प्रेममिलनसे उनके समस्त सौमम्पका परम्मल प्राप्त हो गया और में भगवान्के पास सशरीर गानेवाली गेपियोंके पाक्नेसे पहले ही भगवान्के फस पांच गयी । मगवान्में मिल गया । यह शाखाका प्रसिय सियत है कि पाप-पुण्यके कारण ही मन होता और शुभाशुमका भोग होता है। मासुम कोकि मोगसे जा पाप पुष्प दोनों मर हो जाते है, कम नीकी मुहि हो बाती है। पति गोपियाँ फाप पुष्पसे रहित श्रीमगवान्की प्रम-प्रतिमानरूपा बी, तथापि मयके लिये यह दिखया गया है कि नपने प्रियतम श्रीकृष्णके पास म ना सकनेसे, उनके निशानम्से उमको इतना महान् स्ताप मा कि उससे उनके सम्पूर्ण अनुमका मोग हो गया, उनके समस्त पाप मा हो गये । और प्रियतम मावान्के म्फनसे में इतमा वानन्द मा दिउससे उनके सरे पुष्पोंका फल मिल गया । इस प्रकार पाप-पुण्योंका पूर्णरूपसे वम्ब रोनेसे उनकी मुक्ति हो गयी । चाहे किसी भी मक्से हो- कामसे कोपसे, वोमसे—ो मालान्के माम्प श्रीविग्रहका चिन्तन करता है, उसके मम्मकी बफेक्षा न करके पस्तुशकिसे ही यसका कम्पाण हो जाता है। यह मानानके श्रीविरहकी विशेषता है। मायके द्वारा तो एक प्रस्वरमति मी परम कापाणका दान कर सकती है, बिना मावके ही कल्याणदान मगावहिका साम दान है। । ।

अ० ३३] दशम स्कन्ध " । मगवान् हैं बड़े लीम्बम्प । हो ये भमिल विपके विषता मा-शिव धादिके भी क्दनीय, निशिळ पीयोंके प्रत्यत्मा है, वही ये पानटपर गोपियोंकि इशारेफर नाचनेवाले भी हैं। उन्हींकी इससे, उन्होंके प्रेमाहानसे, उन्होंके वंशी-निमन्त्रणसे प्रेरित होकर गोपियों उनके पास पाया, परन्तु उन्होंने ऐसी मावली प्रकट की, ऐसा स्वाँग बनाया, मानो उन्हें गोपियों के मानेका कुछ पता ही न हो । शायद गोपियोंकि मुंहसे वे नके पदयकी मात, प्रेमकी यात मुनना चाहते हों । सम्भव है, वे विप्रथमके द्वारा उनके मिलन भावको परिपुष्ट करना चाहते हैं। महुत फरफे तो ऐस माश्म होता है कि कहीं लोग इसे साधारण बात न सम्म में, इसम्पेि साधारण स्पेगोंके लिये उपदेश और गोपियों का अधिकार भी उन्होंने सबके सामने रख दिया । उन्होंने सज्जया-माफ्यिो ! में कोई विपत्ति तो नहीं पायी, घोर रानिमें यो मानेका कारण क्या है ? घरवाले दवे होंगे, अब यहाँ ठहरना नहीं चाहिये । इनकी प्रेम देख ली, जब मयों और छोंका भी प्पान करो। धर्मके भनुच्छ मोझके खुले हुए शर अपने सो सम्पषियों की सेवा मेहकर फनमें दर-दर मटफ्ना भिपके लिये अनुचित है। श्रीको अपने पतिको ही सेवा करनी चाहिये, यह कैस मी क्यों न हो । यही सनातन धर्म है । इसीके अनुसार तुम्हें चना चाहिये । मैं जानता हूँ कि तुम सब मुझसे प्रम करती हो । परन्तु प्रेममें शारीरिक सनिधि मायमय नहीं है। प्रवण, स्मरण, दर्शन और प्यानसे सानिध्यकी अपेक्षा अधिक प्रम पाता है । माओ, तुम स्नासन सदाचारका पालन फरो। श्वर-उधर मनको मत भटकने दो।" श्रीकृष्णकी पर शिक्षा गोपियोंक लिये नहीं, सामान्य नारी-बातिके लिये है । गोपियोंका अक्किार विशेष या और उसको प्रकट करनेके लिये ही मान् श्रीकृष्णने ऐसे धन फहे थे। इन्हें मुनकर गोपियोंकी क्या दशा ई और इसके उत्तरमें उन्होंने श्रीकृष्णसे त्या प्रार्थना की; वे श्रीकृष्णको मनुष्य नहीं मानती, उनके पूर्णम सनातन सरूपको भीमति नानसी है और यह जानकर ही नसे प्रेम करती है-इस बातका कितना सुन्दर परिचय दिया, यह सव विषय मूल्में दी पाठ कानेपोम्प है । सचमुच जिनके हृदयमें मावान्फे परमतत्पका पैस्स मनुफ्म ज्ञान और मगवान्के प्रति वैसा महान् मनाप अनुराग है और स्पाईक साप निनकी वाणीमें वैसे उदार है, वे ही विशेष अधिकारवान हैं। गोपियों की प्रार्थनासे यह बात स्पष्ट भीकृष्णको मतामी, योगेरे घर परमतमके रूपमें पहचानती पी और जैसे दूसर स्पेग गुरु, स्व या माता-पिता के रूपमें श्रीकृष्णकी उपासना करते हैं, जैसे ही ये पनिके रूपमें श्रीकृष्णसे प्रेम करती पी बो कि मि मधुर भाक्के उम्प परम रसके नामसे कहा गया है । मा प्रेमके समी माव पूर्ण होते हैं और साधकोंको स्वामि ससदिक रूपमें मगन् मिते हैं, तय गोपियोंने क्या वासाव किया पाकि उनका यह उपतम मास जिसमें शान्त, दास्य, सत्स और बास्सप्प सम् के सम अन्तर्भूत हैं और जो सबसे उन्नत एवं सबका अन्तिम रूप है -न पूर्ण हो । मगधन्ने उनका मान पूर्ण किया और अपनेको संख्य रूपोंमें प्रफ्ट करके गोपियों के सप कीग की। उनकी कीराका स्वरूप मतमवे हर कहा गया है-'रेमे रमेश जनसुन्दरीHियामक स्त्रप्रतिविम्वविधम' । जैसे नन्हा-स शिनु दपण अथवा मम्मे पो ए अपने प्रतिबिमके साथ सेमता है, वैसे ही रमेश मगवान् और प्रसन्दरिपनि रमण किया । अर्यत् सचिदानन्दघन सर्वान्सर्यामी प्रेमरस सरूप, अमरस्लप परमात्मा भगवान् श्रीहम्णन अपनी हारिनी शक्तिरूपा आनन्द-भिन्मपरस-प्रतिमाक्तिा बानी ही प्रतिमूर्तिसे उत्पन्न नानी प्रतिविम्य स्वरूपा गोपियोंसे नात्मीया की । पूर्णरम सनातन रसम्वरूप रसराम रसिक-शेखर रस्परात असिसास्तविपाइ मगवान् धीम्याकी इस चिदानन्-रमपी दिव्य क्रीडाका माम ही रास है । इसमें म फोह या शरीर प, न पाहत अल-सङ्ग पा, और म इसके सबन्धकी प्रारत और स्थड परफ्नाएँ ही थी। यह या चिदानन्दमय मगवान्का रिम्य पि, जो दिम्प टीप्रधाममें स्वदा हासे सनेर मी मी-कमी प्रफ्ट होता है। - ३३६ श्रीमबागवत [२०३३ । स्यिोग ही संयोगका पोषक है, मान और मह ही मगवान्की लीलामें वाक है । मगवान्की दिम्म सीपमें मन और मद मी, मो कि दिव्य है, इसीलिये होते हैं कि उनसे मध्यमें रसकी और भी पुष्टि हो। मसान्की इच्छसे ही गोपियोम बेठानुरूप मान और मदफा सम्बर एला और भगवान् अन्तर्धान हो गये। जिनके हृदयमें लेशमात्र मी मद अवशेष है, नाममात्र मी मानका संस्कार शेष है, वे भगवान् के सम्मुस गर्ने अधिकारी नहीं। अथवा मे मावान्का, पास रहनेपर मी, दर्शन नहीं कर सकते। परन्तु गोपियों गोपियों थी, उनसे बारके किसी प्राणीकी तिलमात्र भी सुना नहीं है। मावान्के वियोगमें गोपियोंकी स्या दशा, इस बातको रास्मीत्रका प्रत्येक पाठक जानता है । गोपियों के शरीर-मन-प्राण, थे जो कुछ भी स्व श्रीकृष्णमें एक्तान हो गये। उनके प्रेमोनमकान गीत, जो उनके प्राणों का प्रत्यक्ष प्रतीक है, धान भी मधुक मदोको मायमान करके भगवान के छीतमलोकमें पहुंचा देता है । एक मार मस हदयसे हृदयहीन होकर नहीं, पाठ करनेमाप्रसे ही यह गपियोंफी महत्ता सम्पूर्ण दयमें मर देता है। गायियों के उस महामावा-उस बौकिक प्रेमोन्मादाको देखकर श्रीहम्ण भी स्तरित म र सके, उनक सामने सामन्याम्प' रूपसे प्रकट हुए और उन्होंने मुळफण्ठसे स्वीकार किम कि पोस्पिो, मैं तुम्हारे प्रेममावका चिर ऋणी है। यदि मैं अनन्त कातर तुम्हारी सेवा करता रहूँ, तो भी तुमसे उमण नहीं हो सकता । मेरे अन्तर्घान होनेका प्रयोजन तुम्हारे चिसको दुसाना मही फ, परिक तुम्हारे प्रेमको और भी उम्पल एवं समर करना पा । इसके बाद रासक्रीया प्रारम्भ हुई। चिन्होंने अप्पामाखफा स्वाध्याय किया है, ये जानते है कि योगसिमिप्राप्त साधारण योगी भी कारके द्वारा एक साप बने शरीगेका निम्ाण कर सकते हैं चोर अनेक स्थानोंपर उपस्थित राकर पृषक पृषक कार्य कर सकते हैं । इन्द्रादि देवगण एक ही समय भनेक स्मानोंपर उपस्थित होकर बने योम पुगार माइति स्वीकार कर सकते हैं। नितिक योगियों और योगेघरोंके ईयर सर्वसमर्थ मावान् श्रीकृष्ण यदि एक ही सप वनेक गोपियोंके साप फ्री करें, तो इसमें बाथर्पकी कौन-सी बात है । जो मेग भावान्को मगवान् मही सीकार करते, की अनेकों प्रफारफी शाशकार करते हैं। भगवान्की निप्र टीममें इन कोका सर्वया प्रवेश नहीं है। गोपियों धीहणकी स्वकीय पी या परकीया, यह प्रश्न मी श्रीकृष्ण के स्वरूपको मुखाकर ही उठाया जाता है । श्रीकृष्ण जीव नहीं है कि आत्की पस्तुओंमें उनका हिस्सेदार दूमा भी पीव हो । को कुछ भी पा, है और मागे होगा—उसके एकमात्र पनि ग्रीकृष्ण ही है। मफ्नी प्रार्पनामें गोपियोंने बौर परीशिवके प्रसके उत्पमें धीशुकदेवजीन यही मात कही है कि गोपी, गोपियोंके पति, उनके पुत्र, सगे-समाधी और नगरके समस्त प्राणियोंके एयमें धात्मरूपसे, परमात्मरूपसे जो प्रमु स्थित है—ही श्रीमम्ण है। कर्म भमसे मानसे भले ही श्रीकृष्णको पगया समसे ये किसीके पराये नहीं है, सपके अपने है, सब उनके हैं। श्रीगकी रिसे, कि पारसक्कि टि है कई परकीया है ही नहीं, सय स्वमीमा है, सब केवल अपना ही गाविधास है, समी स्वत्पभूता अन्तमा गति है । गलियों इस बतको जानती पी और स्थान स्मनपर उन्होंने ऐसा कहा है। ऐसी स्पिनिमें 'जारमा और औपरम्प का फार विक नहीं र पता । हो पाम नहीं है, बा-सा नहीं कहा औरपस्या और मारमावा की पारना ही से हो सकती है। मारियों परकीपा नहीं पी, लकीया पी परन्तु उनमें परकीया-मात्र था। परकीया होनेमे भौर परकीयभाष होनमें आकाश-पस्तामा तर है । परकीपाश्वमें तीन पाने या महत्ती होती है-अपने प्रियतममा निरम्सर पिसन, मिनकी उक्ट उस्फस्ट और दापारिका ससपा अमाप । सर्वव्याभाबमें निरस्तर एफ सत्य यनक मरण य तीनों माते - ।

अ० ३३] दशम स्कन्ध - गौण हो बानी है, परन्तु परकीया मायमें ये तीनों मव बने रहते हैं। कुछ गोपियाँ जारमयमे श्रीकृष्णको घाइती थीं, इतना ही अर्थ है कि ये श्रीकृष्णाका निरम्तर चिन्तन करती पी, मिलने के लिये उठिन रहती पी और भीकृण्मके प्रत्येक म्पबद्धारको प्रेमकी भरोसे ही देखती दी। चौमा मात्र विशेष महत्वका और है-पाया कि स्वकीया अपने घरका, अपना और अपने पुत्र एवं कन्याओंका पालन-पोषण, रक्षणायेक्षण पतिसे चाहती है। वह ममाती है कि इनकी देखरेख करना पतिका कर्तव्य है, क्योंकि ये सब उसीके आश्रित है, और यह पतिसे एसी आशम भी रखनी है । किसनी ही पतिपरायगा क्यों न हो, स्वकीयामें यह सकाममाय छिग रहता ही है। परन्तु परकीया अपने प्रियतमसे कुछ मही चाहती, कुग भी आशा महीं रखती, वह तो केवल अपनेको देकर ही उसे सुम्बी करना चाहती है श्रीग्नेपियोंमें यह माप मी मनमति प्रस्फुटित पा । इसी विशेषताके कारण संस्कृत-साहित्यके कई प्रयोम निरन्तर चिन्तनके उपरणखहए परकीयामायका वर्णन भाता है। गोपियोंके इस मायके पक्ष नहा, मनेर यन्त श्रीमद्भागरतमें मिस्ते हैं, इसलिये गोपियोंपर परकीयफ्नका आरोप उनके मायको न समझने के कारण है। जिसके बीकनमें सकारण घमकी एक हल्की-सी प्रकाशरेस आ बाती है, उसी नीवन परम पवित्र और दूसरोंके ठिये आदर्श-सरूप मन बाता है। फिर वे गोस्पिों, निनका जीवन सामनाकी चरम सीमापर पहुँच चुका है, अश्या नो नित्यसिदा एवं भगवान्की म्वरूपभूता है, या जिहोंने कल्पोंतक साधना करके श्रीपनकी कपासे उनका सेवाविकार प्राप्त कर किया है, साचारका ठम्यान कैसे कर सकती हैं। और समान धर्म-गर्या गोंक संस्थापक श्रीकृष्णपर धर्मोत्ममा स्पन कैसे ल्याया चा सकता है। श्रीकृष्ण और गोपियों के सम्बन्धमें इस प्रकारकी पुसम्पनार उनके दिम्य स्परए धौर दिम्पीयके विपमें अनमिता ही प्रकट करती हैं। श्रीमहागपतपर, दशम स्कवार और रासपश्चाप्यायीपर अक्सफ अनेकानेक माग्य और टीकाएँ किसी ना चुकी है--जिनके स्म्सकोंमें नगद्गुरु श्रीक्छमाचार्य, श्रीश्रीधरत्वामी, श्रीजीयगोस्वामी प्रादि है । उन लोगोंने मह विस्तारसे रासयन्त्रकी महिमा सममापी है । किमीने इसे कामपर विनय पतनपा है, किसीने मगवान्का रिम्य विहार क्या है और किसीने इसका आप्परिमक अर्थ यिा है । भगवान् श्रीकृष्ण आस्मा है, मारमाकार वृद्धि श्रीराधा हैं और शेष आरमामिमुम्ब वृतियों गोपियों हैं | उन धाराप्रवाइसपसे निरन्तर आरमरमग ही रास है । किमी भी दृष्टिसे देखें गसीकी महिमा अधिकाधिक प्रकर होती है परन्तु इससे ऐसा नहीं मानना चाहिये कि श्रीमद्भागवत में वर्णित रास य रमग-प्रसारक या कारना ममन्त्र है । यह सर्वमा सत्य है और जैसा वर्णन है, वैसा ही मिन-विग्रसारिरूप शृङ्गारमा रसाम्बान ही पापा। मेर इतना ही है कि वह किस सी-गुरुपयोंकर मिठन न प । उसक नायक थे सचिदानन्दविग्रह, परापरतल, पूर्णतम स्वाधीन और निराश खेप्यविहारी गोपीनाय भगवान् नम्दनन्दन, और नायिका यी कर्म शादिनीशक्ति श्रीराधनी और उनकी कायम्यानपा, उनकी घनीभूत मूर्तियों श्रीगोपीमन । बतण्य इनकी पइ मीन अप्राकृत थी। तथा मीटी मिश्रीको अत्यन्त महुए इन्द्रायग (स्वे ) जैसी कोई आकृति पना ही जाप, जो दसनेमें टोक दो-चेसी ही माझम हो फन्सु इससे बस में क्या कह मिथ्रीका वा कामा पो ही हो आता है । क्या देवेक आकारकी होनेस ही मिनीके खामविक गुण मधुरताका अमार हो जाता है। नहीं नही, 4 किमी मी आकारमें थे- सर्वत्र सर्वदा और सवपा र मिश्री-ही-मिघ्री है। बल्कि इसमें सीमा वमत्कारपी यात जहर है । स्ग समाते रहुआ तेन्च और होती है यह मपुर मिश्री। इसी प्रकार असिमसामृतसिन्धु सचितानन्दविग्रह भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी अन्तरङ्गा अभिम्नस्समपा गरियोंकी स्मय भी देखने कैसी ही क्यों न हो पस्तुत बह सबितानन्दमयी ही है । उसमें सांसारिक गरे काम का सार है ही नहीं । हो, यह अश्य है कि इस व्ययकी नवल किमीको मही करनी चाहिये, करमा सम्भव मी नहीं है । मापिक पदार्थोके हारा मायातीत मगनका अनुसरण को ३३८ यीमद्भागवत [म.३३ यह समझमें नहीं 1 कैसे कर सकता है। कार को चाई जैसी सुन्दर मिठ्यकी आकृति दे दी चाय, उसका कलुआफ्न कमी मिट नहीं सकता । इसीलिये जिन मोहमस्त मनुष्योन श्रीकृष्णपी रास आदि अन्सरमा-श्रीयऑश अनुकरण करके नायक-नापिकामा रमाखाटन करना चाहा या चाहते हैं, उनका घोर पतन हुआ है और दोग । श्रीहमकी इन ओंका अनुकरण सो फेयर थीम ही कर सकते हैं। इसीलिये शुकदेवजीने रासपचाप्ययीके अन्तमें सबको सावधान करते हुए कह पिया है कि भगवान्क उपदेश तो सय मानने चाहिये, परन्तु उनके सभी आचरणों का अनुकरण नहीं करना चाहिये । जो लोग भगवान् धीकृष्णको पेषल मनुष्य मानते हैं और क्या मानवीय भाव एवं बाशी कसौटीपर उनके चरित्रको पाना चाहते हैं वे पहले ही शससे विमुख हो जाते हैं, उनके घिनमें धमकी को धारणा ही नहीं रहती और घे भगवान्को भी अपना युदिके पीछे चना चाहते हैं । इसलिपे साधोंके समने उनकी उचि-युक्तियोंका कोई महत्व ही नहीं रहता । जो शास्त्रके 'श्रीक्षण स्वयं भगवान् है इस पचनको नहीं मानता, बह उनकी स्वअओंको रिस आवारपर स्य मानकर उनकी वालोचना करता है- आता । जसे मनधर्म, देवर्म और पशुधर्म पृथक्-पृपक होते हैं, पसे ही भगवरम मी पृषक होता है और भगवान् के चरित्रका परीक्षण उसकी ही कमोटोपर होना चाहिये । भगवान्का एकमात्र धर्म है-प्रेम-परवशता, दयापरवशता और भोंकी अभिडापाकी पूर्ति । यशोटाके हायोंसे अम्बुङमें बँध आनेवाले श्रीकृष्ण अपने निजवन ग्यपियों के प्रमके कारण उनके साथ नाचें यह उनका सहज धम है। यदि यह हठ ही हो कि श्रीकृष्ण का चरित्र मानवीय धारणाओं और बादशेक मनुकूल ही होना चाहिये, तो इसमें मी पोर आपतिकी बात नहीं है। श्रीकृष्णकी अपस्मा उस सम्म दस के मग थी, जैसा कि मागवतमें स्पष्ट वर्णन मिलता है । गोषोंमें रहनेवाले बढ़त से दस के पन्चे तो नंगे ही रहते हैं । उन्हें काम- पति और मी-पुरुष सम्बन्धका कुछ भान ही नहीं रहता । लाके की एक साप खेलते हैं, माचते हैं, गाते हैं, स्पोहार मनाते है, गुदुर्ग-गुदुएकी श्मती करते हैं, बारात ले जाते हैं और मापसमें मोन-भात भी करते हैं । गाँके मारे लोग सबोंका यह मनोरमन देसकर प्रसम्म ही होते हैं, उनके मममें किमी प्रकारका दुर्भाव नहीं पाता । ऐसे नोंको युक्ती स्त्रियों मी यो प्रेमसे वस्ती है, बादर करती हैं, नहलाती है, मिलती है । यह सो साधारण गों की बात है । श्रीकृग, जैसे प्रामाधारण की शक्तिमम्पस, गालक मिनके मनर मद्ग, बाम्पकारोंमें ही प्रश्ट हो फुके मिनफी सम्मति, चातुम्य और शक्तिसे पी-यी विपतियोंसे प्रजवासियोंने प्राण पाया था, उनके प्रति म्हॉकी सियों, नालिकाओं और बाउका कितना पावर रहा होगा--सकी कल्पना मही की जा सकती । उमके सौन्दर्य, मधुप और ऐप से भारत होकर गाक्की पाक-माझिाएँ उनके साप ही रहती थी और श्रीकृष्ण मी मानी मौरिक प्रतिमासे राग, ताल आदि नये नये टंगसे उनका मनोरनन करते पे और ठरें शिक्षा देते थे । ऐसे ही मनोरोंसे रासाला मी एफ पी, ऐम समझना चाहिये । नो श्रीकृष्णको केवर मनुष्प सम्मते है, उनकी टिम भी यह टोपकी बात नहीं होनी चाहिये । मे उदारता और पुद्धिमानीके साथ भागरतमें आये ए काम पनि प्राति शम्दोका ठीक वैमा ही अर्थ सममें, जैस्म फि उपनिषद् और गीतामें इन शब्दोंका अर्थ होता है। वास्तवमें गोक्यिोंक निष्काम प्रेमका ही नामान्तर काम है और भगवान् श्रीहनका बामरमग मपया उनकी दिव्य कीया ही रति है । इसीरिये स्वान-म्यानपर उनके प्रिये विमु परमेभर, अमीपति, भगवान्, योगेभरेपर, पारम्भ राम, ममयममा आशिम आये हैं-मिस्से किसीको कोई भ्रम न हो जाय । मच गोपियाँ श्रीकृष्ण की बंशीधनि सुनकर बन जाने स्त्री वी, तम उनके सगे-सम्पम्धिपोंने उन्हें जानेसे रोका पा । रातमें मानी मालिकाओं को भव्य, कौन बाहर जाने देता । फिर भी वे पी गप और इससे घर ।

अ०३४] दशम स्कन्ध ३३९ अथ चतुस्त्रिंशोऽध्याय सुपर्शन मीर शपुरका नसार मी क उपाय भीकापही कहते हैं-परीक्षित ! एक यार नन्दवामा आदि गोपोंने शिवरात्रिके अवसरपर बड़ी पकदा देवयायामां गोपाला जातफौतुका । उत्सुक्ता, कौरहा और मानन्दसे भरकर वेटोंसे मुती हुई गाड़ियोपर सार होकर अम्बिकापनकी यात्रा अनौभिरनायुक्त प्रययुस्तेऽम्पिकावनम् ॥ ॥ की ॥ १ ॥ गजन् ! यहाँ उन अंगोन सरखती मरीमें मान भित्या मोर सर्वान्तर्यामी पसुपनि मगधन् शाहरजीका वत्र सात्वा सरस्वस्मा देवं पशुपति विक्षम् । तपा भगवती भम्पियामीया पड़ी भफिसे अनेक आन रईगैर्मक्त्या देवी पनपतेऽम्बिकाम् ।। २ ॥ प्रकारकी सामग्रियोंक द्वारा पूजन किया ॥ २ ॥ १ बादरावणिरुवाच। मायको किसी प्रकारफी असमता नहीं हुई। और न तो उन्होंने श्रीकृष्णपर पा गायियोंपर किसी प्रकारका म्मश्छन ही लगाया । उनका श्रीकृष्णपर, गोपियोंपर विश्वस पा और वे उनके बचपन और ग्वेलोंसे परिचित थे। में तो ऐसा मालूम हा मानो गोषियों हमारे पास ही हैं । इसको दो प्रकारसे समा सकते हैं। एक तो यह कि श्रीकृष्ण के प्रति उनका इतना विभस था कि श्रीकृष्णके पास गोपियोंका रहना मी अपने ही पास रहना है। यह तो मानवीय रहि है। दूसरी दृष्टि यह वि श्रीकृष्णको योगमायाने एसी म्यास्पा कर रखी थी, गोपोंको वे घरमें ही दीखती पा । किसी भी ठिसे रासीला दक्षित प्रसा नहीं है, बखि अविकारी पुरुषकि पिये तो या सम्पूर्ण मनोमन्थ्यो नष्ट करनेवाध्य है । राम्पसके अन्तम पहा गया है कि जो पुरुष अदा-मस्तिपूर्वक रास- डोल्पका अषण और वर्णन करता है, उसके उपया रोग काम बहुत ही शीम नए हो जाता है और उसे मावान्का प्रेम प्राप्त होता है। मगरतमें अनेक स्पानपर ऐस वर्णन भाता है कि जो भगवान्की मायाका वर्णन करता है, र मयासे पार हो पाता है । जो मावान्के काममयका वर्णन करता है, वह कामपर विजय प्राप्त करता है । राजा परीक्षित्ने अपने प्रोम ची शहाएँ की हैं, उनका उत्तर प्रभोंके अनुरूप ही अम्पाय २९ के लोक १३ से १६ ठक भोर मध्याय ३३ के श्लोक ३० से ३७ तक श्रीशुकदेवनीने लिया है। उस उत्तरसे वे शकाएँ तो ट गयी है, परन्तु भावान्की दिव्याठीका खस्य नहीं सुने पापा सम्भस उस रहस्यको गुप्त रखने के लिये ही ३३ में भप्यायमें रास्टील्मप्रमाा सम्पस कर गया गया । मस्सन इस टीके गूढ रहस्पकी प्राकर-जगत्म व्याख्या की मी नहीं जा सकती । क्योंकि यह इस जगहमी क्रीमा ही नहीं है । यह सो स हिच्य बानन्दमय रसमय सम्मकी चमकारमपी सीम है, मिस्के प्रवण और दर्शनके लिये परमास मुनिगण मी सा उस्कष्ठित रहते हैं। कुछ स्लेग इस स्टीन्यप्रसंगका मागक्तमें फेक मानते हैं, वे वासबमें दुराग्रह करते हैं। क्योकि प्राचीन से प्राचीन प्रतियोंमें भी यह प्रसंग मिलता है और बरा विचार करके देखनेसे यह सर्वथा सुसंगत बौर निर्दोष प्रतीत होता है। भगवान् श्रीकृष्ण क्या करके ऐसी सिमर युधि दें, जिससे हमलेग इसका कुछ रास्प समानमें समर्थ । मतान्के इस दिम्पयम्मके वर्णनका यही प्रयोजन है कि बीत गोपियोंके उस महेशक प्रमका, जो कि भीमणको ही मुख पचान झिम पा, स्मरण करे और उसके शरा मगवान्क रसमय दिम्पभष्टाक्मे भगवान् के अनन्त प्रेमका अनुमत्र फरे । हमें रासष्यका अप्पपन करते समय किसी प्रकारकी मी शक्का न करके इस माको जगाये रखना चाहिये। ननुमानप्रसाद पोदार - ३४० श्रीमहागवत [२०३४ - गायो हिरण्यं पासांमि मधु मचनमाताः । यहाँ उन्होंने आरपूर्वक गोरे, सोना, बस, मघु और मधुर मम माझगोंको दिये तथा उनको लिमया-फियया । मारणेम्पो ददुः सर्वे देखोन प्रीयतामिति ॥ ३॥ वे केवल यही चाहते थे कि इससे देवाधिदेव भगकन् | शहर हमपर प्रसन्न हो ॥ ॥ उस दिन परम ऊपा सरस्वतीतीरे मल प्राश्य धृतमवाः । | माम्पवान् नन्द-मुनन्द आदि गोपोंने उपवास कर रफ्स पा, इसलिये ये ग केवळ बस पीकर रातके रजनी व महाभागा नन्दसुनन्दकादयः॥४॥ समप सरस्वती नदीके नटपर ही पेटके सो गये ॥१॥ फपिमहानहिस्तमिन् विपिनेऽतिपुसधित । उस मम्बिकाक्नमें एक पड़ा भारी अजगर रहता था। | उस दिन यह भूख मी बहुत पा । देश यह तर यच्छमागतो नन्दं प्ठयानपुरगोऽग्रसीत् ॥ ५॥ ही आ निकल और उसने सोये ए नन्दनीको पका लिया ॥५॥ मनगरके पका लेनेफर नन्दराजी बिछाने सचुकोशाहिना प्रस्त कृष्ण कण महानयम् । सपो-बेटा कृष्ण | कृष्ण ! दोबो, दौो । देसो बेटा । सर्पो मां प्रसते तास प्रपन्न परिमोधप ॥६॥ | यह वमगर मुझे निगल रहा है। मैं तुम्हारी शरणमें है। बस्दी मुसे इस साइटसे मचामो ॥६॥ नन्दवाना- सख पाकन्दित भुन्या गापालाः सासोत्थिताः । का पिल्लाना सुनकर सब के सब गोप एकाएक ळ सो पए और उन्हें अबगरके मुंहमें देखकर घमा गये । प्रस्तच या विमान्ताः सर्प पिम्पधुरुरमुफै॥७॥ | अब ये एकाठियों (बबली छापियों ) से उस भनगरको मारने लगे ॥७॥ किन्तु एकाठियोंसे मारे असावैर्दधमानोऽपि नामश्चचमरगमः। | जाने और जख्नेपर भी क्वगरने नन्दवनको छोमा नहीं । इतनेमें ही मतपसछ भगवान् श्रीगने वहाँ तमस्मशत् पदाम्पेस्प भगवान् सास्था पतिः॥ ८॥ | पाँचकर अपने घरोंसे म्स अन्गरको दिया ॥८॥ मायान्के श्रीचरणोंका स्पर्श होते ही बनगरके सारे स वै भगवतः श्रीमत्पादसहिताशुभः । भशुम भस्म हो गये और मह उसी क्षण बजगरका शरीर छोपकार विपाधरास्ति समन्दर रूपवान् मन मेमे सर्पवपुहित्वा रूप विपापरार्षितम् ॥ ९ ॥ गया ॥९॥ स पुपके शरीरसे दिम्य म्पोति निकल रही थी। वह सोनेके हार पइने र पा । जब यह वमएपछटपोफसः प्रण समपस्थितम् । प्रणाम करनेके बाद हार जोड़कर मगवान्के सामने मा हो गया, तब दोंने उससे पूछा-॥१०॥ 'तुम दीप्यमानेन वपुपा पुरुष हेममालिनम् ॥१०॥ कौन हो ! तुम्हारे बा-आसे सुन्दरता फूटी पाती है। तुम देसनमें बड़े महल मान पाते हो । तुम्हें यह का भान् परया लपम्पा रायतेनुसदर्शनः। परफ्न्त निन्दनीय अगा-योनि क्यों प्रासपी ! अस्प ही तुम्हें विवश होकर इसमें बाना पस फगुप्सितामेवो गति वा प्रापितोऽवसः ॥११॥ होगा ॥ ११ ॥ मनगर शरीरसे निकलाप पुरुष बोला- मई विद्याधरः कपित् गुदर्शन इति सुतः। मगवन् ! मैं पहले एक पिपार पा। मेरा नाम पर १।१ एमरमः । १ स्मृतः । सर्प उपाप म. ३४] दसम एकम ३४१ मिया स्वरूपसम्पत्या विमानेनापरं दिशः ॥१२॥ मुदशन । मेरे पास सौन्दय तो था ही, छामी भी बहुत थी। इससे में विमानार सफर यहाँ से यहाँ घूमता रहता सपीन विरूपानविरमा प्राइस रूपदर्पिसः । पा ॥१२॥ एक दिन मैंने अहिरा गोत्रके कुपवरियों को देखा। अपने सौन्दर्यके घमरसे मैंने उनकी इसी सेरिमा प्रापिता योनि प्रलम्भेस्पेन पाप्मना ॥१३॥ उपायी । मेरे इस अपराधसे कुपित होकर उन ध्येने मुझे भनगर-योनिमें जाने दे दिया। यह मेरे पापोंका शापो मेऽनुप्रदायैव कृतस्तैः करुणात्मभि । ही फल या ॥ १३ ॥ उन कयास अपियोंने अनुमहके लिये ही मुन्न राप दिया पा। स्पोकि मह उसीका पदई लोकगुष्णा पदा सटो हसानुभः ॥१४॥ प्रमाण है कि आब घराचरके गुरु स्वयं आपने अपने चरणकमलोंसे मेरा स्पश किया है, इससे मेरे सपरे अचम वं स्पाई भवभीवानां प्रपमानो भयापहम् । नष्ट हो गमे ॥ १०॥ समस्त पापोकर नाश करनेवाले प्रमो। ये लोग जन्म-मृत्युत्प संसारसे मपमीत होकर आपच्छे शापनिर्मका पारस्पसवमीरइन् ॥१५॥ आपके चरणोंकी शरण म्हण करते हैं, उन्हें आप समस्त | मपोंसे मुक्त कर देते हैं । मब में आपके श्रीचरणों के प्रपमोऽमि महापागिन् महापुरुष सत्पते । स्पर्शसे शापसे छूट गया हूँ और वपने स्रेको जानेकी अनु मनुबानीहि मां देव सर्वलोफेबरेपर ॥१६॥ मति चाहता हूँ।१५। मकवासल महायोगेर पुरुषोतम ! में आपकी शरण । इन्द्रादि समस्त मेकेपरों के प्रपदण्या विमुक्तोऽहंसपस्तेऽभ्युत दर्शनात् । परमेम स्वयंप्रकाश परमारमन् ! मुझे सवा दीनिपे ।१६। अपने सरूपमें निस्प-निरन्तर एफरस रहनेवाले अयुत ! यभाम रामभखिलान् योसनात्मानमेष च । माफ्के दर्शनमात्रसे में प्रक्षों के शापसे मुक्त हो गया, पर कोई भामर्पकी सात नहीं है, क्योंदि जो पुरुष सपः पुनाति किं भूयस्तस्य स्पृष्ट पदाहि ते ॥१०॥ बापके नार्मोका उच्चारण करता है, पर अपने-आफ्को और समस्त प्रोताओंको भी तुरंत पवित्र पर देता है। इत्मनुमाप्प दाशाई परिझम्माभिपन्य म । फिर मुझे तो आपने स्वयं बस्ने चरणकम से स्पर्श सुदर्शनो दिषयावः कशानन्दय मोचितः ॥१८॥ ॥ १७ ॥ इस प्रकार सुदर्शनने भगवान् भी- पिसा है । तब माय, मेरी मुक्तिमें क्या सन्देश दो निशाम्म फुप्पस सदात्मवमव कृष्णसे विनती की, परिशमा पी वौर प्रणाम किया। फिर उनसे भागा पर बह अपने मेयो म गया और नोक्सो विस्मितयेतसस्तता। मम्दपाय इस मारी साइटसे छट गये ॥ १८॥ राजन् ! जय प्रजवासियेने भगवान् श्रीकृष्णका यह अनुत प्रमाण समाप्प सिन् नियम एनर्मज देख, सप उन्हें यहा विस्मय हुमा । उन स्थगने उस क्षेत्रमें गो नियम से स्ले थे, उनका पूर्ण करके ये यड़े बादर और प्रेमसे श्रीकृष्णसी टस स्पेयका मन परसे नपाययुम्तन् कपपन्य आरसा ॥१९॥ दुए पुन प्रअ सौ भाये ॥ १९॥ कदाचिदप गोरिन्दा राममातविक्रम । एक नयी पास है, अवित का कानगाले १ पापा ३४२ श्रीमद्भागवत [अ० ३४ कन्या उनका विजातुर्वने राज्यां मध्यगो प्रअयोपिताम् ॥२०॥ मगवान् श्रीकृष्णा और घलरामजी रात्रि के समय स्नमें गोसियोंके सय विहार कर रहे थे ॥ २० ॥ भगवान् श्रीकृष्ग निर्मळ पीताम्यर और बरामजी नीयम्बर पारस उपगीयमानी ललितं खीजनपद्धसौहदै। किये ए थे। दोनोंके गलमें फलोंके सुन्दर-सुनार हार छटर रहे थे तपा शरीरमें बहराग, सुगन्धित खलवानुलिप्ताङ्गो सम्विणौ विरनोऽमरौ ॥२१॥ | पदम ला हुआ पा और सुनर-सुन्दर आभूषण पहने हुए थे । गोपियों बड़े प्रेम और कानन्दसे परित स्वरमें उन्होंके गुणों का गान कर रही या ॥ २१ ॥ अभी भी निशास्त्र मानपन्तादिवोहपतारकम् । सापहार आ था । आकाशमें सारे उग आये थे और चाँदनी छिटक रही पी । अग्रके सुन्दर गन्धसे मतदारसे मरिलफागन्धमचालि मुष्टं उसदयायुना ॥२२॥ | होकर मौरे इर-उधर गुनगुना रहे थे सम्म कशाप पिटी हुई पुमुदिनीयी मुगध सेपर वायु मन्द-मन्द पल रही थी । उस समय उनका सम्मान करते हुए भगवान् जगतः सबवानो मनःभवणमङ्गलम् । श्रीकृष्ण और रामनीने एक ही साय मिस्पर राग बारोह-अवरोहे सौ करपपन्तौ युगपत् स्वरमण्डलमूर्छितम् ५५२३॥ स्यों का उतारसे यात ही सुन्दर स्ग रहा था। पह जगत्वे समान प्राणियों के मन भोर पानशेबानन्द से मर देनेवायपा॥ २२-२३ । उनका यह गन सुनकर गाप्पस्तद्गीवमाकर्पो मूर्छिता नाविदन् नृप । प्रेपियों मादित हो गयी । परीक्षित् | उन्हें अपन शरीर की मी सुधि नहीं रही कि उससे मिसाले ए क्यों भोर मारियोंसे पिमते हुए पुणोंका सम्हार सत्तमामान सस्तकशन सवः ॥२४॥ सः ॥ २५ ॥ एवं विकीडनाः स्वर गापसोः सम्प्रमचयत् । निरा समय काम और श्याम दानों मार इस प्रकार म्पएम्द गिर कर रहे ५ और उमतयी मति गा रहे साहपूरति मपाता धनदानुमराऽम्पगात् ।।२५।। , उसी समय यौदागर मामास पय पक्ष आपा । बह पुपा अनुगर पा ॥ २५॥ पर्गशित् । दानों तपानिरीयता रानिमार्थ प्रमदाजनम् । माइयोंके दाने गायले पाउन गरियाका सर एक उनकी आर भग पग । बिनये पम्य स्वामी माग गरयामाम दि पदीप्यामनहित ॥२६॥ भागा धीरण ही, गरियाँ उस समय गगर पिसन P ॥२६॥ दोनों भायोंन दरसे फ्रान्कन रामनि पिलाप परिप्रदम् । पास एस जाप, पोटी पर पादरी प्रपनि पिडाद और पाण! राम ! पपा गा दम्पना प्रमा भातरापन्यपारनाम् ॥२७॥ पुगम गरी मन भरी जाण ॥२७॥मा मा मप्रसार मा मण्यमपागी मामामीनरपिनी। अhir में रासार पर २०३५) देसम स्फन्ध ३४३ भासेदतुस्त तरमा त्वरित गुपकाधमम् ।।२८॥ वेगसे क्षणभरमें ही उस नीच यक्षके पास पहुंच गये ॥२८॥ यझने देख वि काल और मृत्यु के समान ये दोनों भाई स पीप तामनुप्राप्ती कालमृत्यू इमोटिजन् । मेरे पास आ पाचे । सव बह म्ह घयदा गया । उसने नेपियोंको सो ही शेष दिया, स्वयं प्राग मचाने के लिये विसृज्य स्त्रीमन मूढ पाद्रवसीवितेष्छया । २९॥ मागा |॥ २९॥ सब खिोकी रक्षा करनेके पे काम- तमन्वधावद् गोविन्दो यत्र यत्र स धावति । नी तो वही सब रह गये, परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण नहीं- | नहों का मगकर गफ, उसके पीछे-पीछे दौरते गये। बिहीर्घम्तच्छिरारनं तस्यौ रघन लियोधनः ॥३०॥ वे चाहते थे कि उसके सिरफी चुरामणि निकाल लें ॥३०॥ अपिदर साम्पत्य निरस्तस्य दुरात्मन । | कुछ ही दूर बानपर मावान्ने उसे पकर लिया और उस दुष्टके सिरपर कसकर एक घूसा जमाया और महार मष्टिनैवान सहगमणि विमः ॥३१॥ चूगमणि के सप उसका सिर मी घासे अव्य फर लिया ॥ ३१॥ इस प्रकार मगान् श्रीकृष्ण पूडको सापूर निहन्यैवं मणिमादाय भास्वरम् । मारकर और यह चमकीसी मणि सेयर लौट भाये तय सब प्रेपियोंके सामने ही म्हेनि वह प्रेमसे वा मगि बड़ मग बायाददात् प्रीत्या परुपन्तीनां च यापिताम्।३२ भाई रामबीको दे दी ॥ ३२ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमाईस्यो सेहितायो दशमस्कर पूर्वि शहरायो नाम चतुनिशोऽध्याय ॥ ३९ ॥ अथ पञ्चत्रिंशोऽध्याय युगमगीत मासु उपाय श्रीशुकरेयसी करते है परीक्षित ! भगान् भी- सगके गौओंको चराने के लिये प्रतिदिन क्नमें घर जाने- गोप्यः कृष्ण पन यावे तमनुतपतसः । पर उनके सय गोपियोंपर चित भी पय माता था। उनपर मन श्रीहल्या चिन्तन करता रहता और वे वाणसे कमठीला प्रगापन्त्या नि पद स्पेन वासरान् ॥१॥ उनकी यओंका न काली रहता । इस प्रकार में पड़ी फटिनासे अपना दिन बिताती ॥१॥ गोपिया मापसमें कहीं-अरी सही अन प्रमी ननोंक प्रम वितरण करने और इप करनेशतरमा मोक्ष द देनेग्रा श्यामसुन्दर नग्नाग्म नब अपन बायें पामाकसवामपालो परिगतम्ररपरास्तिवेशम् । कपाको याया मोडकी भार या दसे हैं भार बनी । महिं नपाद हुए मामुर्गस अरोमे प्रगत है सपा बनी मुगुमार अंगुश्यिोका उमा हॉपर मिगत र मधुर धमलाइनिभिगायतमाग गाप्पाग्यति यत्र मुन्द । तान सहते हैं उम समय मिदाहियों आकाशमें मरने १ प्राचीन प्रतिमें "मारे पर पर मही है । २ पाएपरिपाच । गोप :

३४४ भीमदागवत [अ० ३५ म्पोमयानवनिता सह सिदै पति सिद्गगोंके सप विमानोंपर बदकर आ बाती है और उस तानको सुनकर अपन्त ही चक्ति तथा विसिवास्तदुपधार्य विस्मित हो जाती है। पहले सो उन्हें अपने पतियोंके म सलमाः। | रहनेपर मी चिल्ली यह दशा देखकर लाया मम होती है, परन्तु झगमरमें ही उनका चित्त माममाणसे विध वाटप फाममार्गणसमर्पितपिचाः | है, ये विवश और अयेत हो नाती हैं। उन्हें इस बाकी मी मुधि नहीं रहती कि उनकी नीत्री खुल गयी है कम्मल मयुरपस्मृतनीम्पः ॥ ३॥ | और उनके पस मिसक गप हैं॥२३॥ घरी ग्रेपियो ! सुम यह बामर्यकी बात सुनो चित्रमपला। णुतेद | ये नन्नन्दन कितने मुन्दर है। जब में इस्ते हैं तप हास्यरेम्वएँ हारका रूप धारण कर लेती है, उरसि स्थिरवियुत् । मुभ्र मोती-सी धमकने लगती हैं। थरी वीर । उनके पक्ष स्थल पर हराते हुए हारमें हास्यकी किरणें चमकने नन्दसनुरयमार्सजनाना सानी हैं। उनके पक्ष स्वार जो श्रीपसकी मुनही रेस है, वह तो ऐसी जान परती है, मानो श्याम मेघपर बिजली ही स्थिररूपसे बैठ गयी है। बप दुखीपनोंको मुख नर्मदा यहिं विधवेणुः ॥ ४॥ देनेके म्येि, विरहियोंके मृतक शरीरमें प्राणोंका सञ्चार करनेके लिये बाँसुरी बनाते हैं, सब बनके र के मुंग वृन्दको प्रमापा मृगगागो छ, गएँ और हरिन उनके पास ही दौड़ भाते हैं। केल आते ही नहीं, सस । दाँतोंसे चाफ एमा घेणुवापराषेवस घासका पास उनके मुंहमें म्यों-कर-स्यों पड़ा रह सता धारात् । है, ये उसे न निगठ पाते और न तो ठगछ ही पाते हैं। | दोनों कान सा फरक इस प्रकार स्थिरमासे सा हो दन्तदष्टपपला प्रतकर्मा माते हैं, मानो सो गये हैं या केवठ भीतपर रिसेपुर चित्र हैं। उनकी ऐसी दशा होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि यह याँसुरीको तान उनके पितको पुरा निद्रिता लिरिलतचित्रमिवासन् ॥ ५॥ मेती है ॥१५॥ महिमतपस्चापला हे सधि ! अप वे नम्दक प्यारे हार भपने सिर प मारपसा मुफुर याँध सेने दें, पुंषराठी मरकामे पदमालपारिपविरम् फले गुप्छै म्पोंस बने हैं, रंगीन धासुओंसे अफ्ना बार- मा रंग रत है और मपे नये पलोंसे ऐसा र समा लेते हैं, जिसे को पहुत बड़ा फसवान हो और कि करिचिन् माल आति स गाप पगमजी तथा ग्वारपाक सप माँसुरीमें गौओंका नाम पर उन्हें पुग्ने उम समय प्यारी सरियो । मयिोनी गति भी कर जाती है। पानी है कि गा: ममाहपति या मन्द ॥६॥ मायु उमाश हमारे प्रिपतमके पर पष्ठि हमारे • ३५] दशम स्कन्ध ३४५ तहि भागतयः सरितो ये पास पहुंचा दे और उसे पाकर हम निहाल हो नाय, परन्तु सस्पिया । वे भी हमारही जैसी मन्दमागिनी हैं। जैसे नन्दनन्दन श्रीकृष्णाका आलिङ्गन परते समय हमारी तत्पदाम्युबरजोऽनिलनीतम् मुनाएँ कॉप जाती हैं और जहतारूप सम्बारीमक्का उदय हो जानेसे हम अपने हापोंको हित्य भी नहीं स्पृहयतीर्पयमिवापपुण्या: पाती, वैसे ही ये मी प्रमके कारण काँपने लगती हैं। दो चार यार अपनी तरूप मुजाओंका कॉफ्ते काँपते प्रमवेपितमुजा स्तिमितापः ॥ ७॥ छाती सो अवश्य है, परन्तु फिर विवश होकर स्थिर हो जाती है, प्रमावेशसे स्तम्भित हो जाती हैं ।। ६-७॥ अनुचरैः समनुवर्णिधवीर्य भरी वीर ! जैसे देवता अग अनन्त और अचिन्त्य | ऐश्यक सामी भगवान् मारापणकी शक्तियोंका गान आदिपुरुप इवाचलभूतिः । | करते हैं, वैसे ही पाण्याठ अनन्तसुन्दर नटनागर श्रीकृष्णकी बसओंका गन करते रहते है। ये अचिम्स्य- वनपरो गिरिसटेषु चरन्ती ऐपर्य-सम्पन श्रीकृष्ण व वृन्दाफ्नमें विहार करते वेणुनाशयति गाः स यदा हि ॥ ८॥ रहते हैं और याँसुरी बजाकर गिरिराज गोवर्धनकी तराईम घरती हुई गौवोंको नाम ले-लकर पुकारते हैं, उस समय पनवास्तव भास्मनि विष्णु क्नके दक्ष और बताएँ मठ और फरसे छद जाती है, उनके भारसे गलियों मुक्सर धरती छ्ने रगती हैं, म्पजयन्स्य इस पुप्पफलादपाः । । मानो प्रणाम कर रही हॉ, वे दक्ष बार लताएँ अपन भीतर भगवान् विष्णुकी अभिव्यक्ति सचित करती प्रमतभारपिटपा मधुधाराः -सी प्रमसे छल उठती हैं, उनका रोम-रोम सिट जाता है और सक्-की-स्व मधुधराएँ ने टगती प्रमाटवनवः ससमु म ॥९॥ ॥ ८९॥ दर्शनीपतिलको पनमाला भरी सडी ! जितनी भी बस्तुएँ मसारमें य उसक याहर दसनेपोम्य है, उनमें सबसे सुन्दर, सम्पमे मभुर, दिल्पगन्धतुलसीमघुमने सवक शिरोमणि है- - हमारे मनमाहन । उनक साबले पटपर केमापी पीर फितनी पनी है—स, देखनी ही माभा । गल्में फुनोतय सम्पती ईकन भतिडलरलघुगीतमभीए माप्य, उसमें पिरोपी दुइ तुम्सीकी रिप्य ध और मधुर मधुसे मायासे होकर सके. भरिया मनाहर माद्रियन् पईि सन्धिवषणु ॥१०॥ एवं उप खरसे गुनार काठे रहते हैं। हमार नटमागम स्थाममुन्दर भैसी उम गुनगुनाइटपा पार करते है और उन्होंक बरमें म्बर मिग्रा अग्नी यमुर्ग इक्त मरमि सारसईमविहङ्गा सगत है । उम ममय मन । उम मुनिजनमाइन सनको मुन मरोवरमें गनेशाप मारमहंस अनि भारगावरतपेठस एत्य । पक्षियोंश भी दिन उनक हापमे निकर सातानि 1 ३४६ श्रीमहागवत [म. ३५ हरिमपासत पसचिचा नाता है । मे विवश होकर प्यारे श्यामसुन्दरके पास में बैठते हैं तप बॉमें मद, उपचाप, क्ति एकाम करके उनकी आराधना करने माते हैं:-मानो कोई विस-- इन्त मीलिसरसो समौनाः ॥११॥ इत्तिक गसिक पमइस ही हों, मत कहो तो यह फिलन वापर्यकी बात है।॥१० ११॥ सहकला सगपतसपिलासः अरी प्रमदेखियो । हमारे श्यामसुन्दर स्म पुयोंक कुण्पल बनाकर अपने कानों में धरण कर लेते है और कामजीक सप गिरिरानक शिरोपर सड़ होकर सानुषु विविमुतो प्रबदम्पः । सारे बगरको हर्षित करते हुए बाँसुरी बनान गते हैं-पाँसुरी क्या समाते हैं, आनन्दमें भरकर उसकी हर्पयन घेपुरषेण पनिके हारा सरे विश्का मालिन करने कगते हैं- स समय श्याम मेव बाँसुरीकी तानके साप मन्द-मन्द गरजने लगता है। उसके पित्त इस बातकी शारा जातदर्प उपरम्भति विनम् ॥१२॥ बनी रहती है कि कही मै जोरसे गर्मना कर उन् र कहाँ पाँमरीकी तमके विपरीत पर जाप, उसम मादतिक्रमणशरिखता मुरापन से नाय, तो मुमसे महारमा श्रीगका अपराध हो जायगा । सती । इ इतना ही नहीं करता, | जय देखना है कि हमार सय घनश्यामको बाम ग रहा मन्दमन्दमनुगर्वति मेघः नब वह उनक उपर आकर छाया कर सेना है, उनका छत्र बन जाता है। परी पर ! महता प्रसन्न मुरादमभ्यवर्पत सुमनामि होकर वा प्रमसे उनक रूपर आना मन ही नियम | कर दम है-मन्दी-नम्ही पुड़ियों के सपमें एसा परसन नाता है, माना टिम्प पुष्पोपा पर्या कर गा हो । कमी 'छापया च विदधत् प्रठपप्रम् ॥१३॥ पी गाणी ओटमें छिपकर नारोग भी पुणवर्ग कर जाया करते हैं ।। १२ १३ ॥ रिविधगापचरण विदग्धा मतशिरोमगि फारामी ! तुमार सुन्दर कुंभ । माउवाक माप पर मरनेमें वो निपुग है। गनी! येण्याप उम्धा निशिक्षाः । तुम्हार मासे पर सपक पार तो है ही, पर मी पहन है । बाबा, उन्होंन बाँसुरी बमना किसीसे सांग तब सुत मनि यदापरपिम्प महा । अपनी जन प्रकारका गगगिनियों उन्होंने निकारही | जब भरन सिमामास साश स्पस्या इसमशरनपत् घरजाती ॥१२॥ अथर्गेम योगर्ग राफर अपम, निगाभाम्पिगेनक जानिया जान मत, उम ममय म पम म्परिनी माननम्नदपधाप मुरा भार मीनान सुनस प्रया, सर और इट आ'ि बरेखा भी-जा मपत --उसे नही पान समयपरमठिपुरागा । पातलन मोहित । जात म्नका नित - .

५०३५] दषम एकत्य ३४० - काय जानतमन्धरपिता तो उनके किनेम मी उनक हायमे निकलकर मशी मनिमें नहीन हो ही जाता है, सि भी सुष नाता है, पौर वे अपनी सुध-भुन स्पेकर उसीमें तन्मय हो मात यपुरनिषिततया ॥१५॥ है ॥ १११५ ॥ निमपदाम्जटलैर्यअषज- अरी वीर 1 उनके चरणकमयमें यजा, वा, कमर, अडश आदिके विचित्र और सुन्दर-सुन्दर विक है। नीरबालविचित्रललामः जब बभूमि गौओंके खुरसे खुद बराती है, तब वे अपने सूकुमार चरणोंसे उसकी पीस मिटाते हुए गज बजसका समयन् खुरवाद | रानके समान मन्दगतिसे जाते हैं और याँसुरी मी गमाते वर्मधुर्यगतिरीरितवेणुः ॥१६॥राते हैं। उनकी पह पेशीप्वनि, उनकी श्र पाल और उनकी यह सिमरी चितवन हमारे उदयमें प्रेमका, प्रति सेन वर्म सपिलाम मिलकी आकांक्षाका आवेग यहा देती है। हम उस वीक्षणार्पितमनोभववेगा समय इतनी मुग्ध, इतनी मोहित हो जाती है कि हिल दोक नहीं सकता, मानो हम नरम हों । हमें तो इजगति गमिता न विदामः इस पातका मी पता नहीं चलना कि हमारा नया खुल गया है या बंध है, हमारे शरीरपरका मा मर गया है कामलेन फार पसन या ॥१०॥ य॥ १६ १७॥ मगिपरा कचिदागणयन् गा परी वीर ! उनके गमें मगियोंकी माम बहुत ही मी मायम होती है। तुलसीकी मपुर गन्ध वनें गात मालमा दपिवगन्मतुलस्या । प्पारी है। इसीसे तुम्सीकी मानको तो ये फभी पवे ही नहीं, सदा धारण किये रासे है। ना ये श्यामसुन्दर प्रगपिनोऽनुपरस्थ पदांसे उस मणियोंकी मालासे गौलोंकी गिनती करते करते किसी प्रेमी ससके गले में गौह राठ देते है और माप माता- प्रक्षिपन् सममगायत यत्र ॥१८॥ मनाकर मसरी कमाते र गाने लगते हैं, उस सम्प कगितगुरपशिपिचार मस्ती हुई स बाँसुरीके मधुर स्वरसे मोहित होकर कृष्णसार मर्नेकी पनी हरिनियों भी मफ्ना पित्त उनके रुप्णमन्सत रुष्णदिया। चरणोंपा निहावर कर देनी और मैसेएम गोपियों जपने घर-गृहस्थीकी आशा ममिषा श्रेषकर गुणसगर गुणगणार्णमनुगत्य हरिपो मागर मन्दनम्दनका घेरे रहती है, वैसे ही ये भी उनक पास दौर बाती है यहाँ एकटक देखती हा मुषी गोपिका इस विमुग्रहाशाः ॥१९॥ ग माती है, मौटनेका माम भी नहीं होती ॥१८ १९॥ इन्ददामापकौतुफषेपा मदरानी यशोदामी ! मखयमे तुम वही पुण्याती हो । तभी सो तुम्हें ऐसे पुत्र मिले हैं । तुम्हारे वे स्याले पर या प्रमी है मश चित बड़ा कामात गोपगोपनातो बसनामाम् । । म प्रमै सपोंको नामसे हास-परिहासक ३४८ भीमद्भागवत परिवाः ।।२२॥ घेरकर उनकी नन्दरनुरनचे तव वस्मो द्वारा मुख पहुंचाते हैं। कुम्दप का हार पहनकर म वे अपनेको विचित्र पेपमें सजा लेते हैं और बाक नर्मदः प्रणयिनां विजदार ॥२०॥ सप्प गोत्रों के साथ यमुनाजीके लम्पर सेटन गते । मन्दवायुरुपवास्पनुल उस समय मल्पज पन्दनके समान शीतन और सुगन्धित स्पर्शसे मन्द-मन्द अनुज्ञा कर पा मानपन् मलयवस्पन । | तुम्हारे पकी सेवा करती है और गर्म कर पन्दिनस्तमुपदेवगणा ये उपदेवता वीचनोंके समान गधाकर उन्हें सन्तुष्ट करते है तपा अनेकों प्रकारफी मेंटे देते हुए सम बोरसे वापगीवालिभिः करते हैं ।। २०२१॥ पस्सला अवगा मदगध्रो बरी सदी ! श्याम्मुन्दर अप्रकी गौओंसे बम प्रेम करते हैं। इसीलिये तो उन्होंन गोर्चन धरण किया फ) का 4 सब गोषोंको लौटकर आते ही होंगे, पन्यमानघरणः पपि । देखो, सायाहाल हो पा है । सब इतनी देर क्यों होती है, सही। रास्ते बाबा झा आदि क्योहार फरस्नगोपनमुपोप दिनान्ते जौर शहर मादि शानद उनके चरणों की वन्दना चो फरने लगते हैं । अब गौओंक पीछ-पीछे बाँसुरी बाते गीतवेपुरनुगेरितकीर्सि: ॥२२॥ हुए ये आते ही होंगे । प्रवास उनकी कीर्तिका गान का रोग । देमो न, या प्याक रहे। उत्सरं भमहचापि एपीना गोषोंके पुरेसे ठप-उस्कार मान-सी पूछ पनमावापर पर गपी है। घे दिनभर अंगमें घूमते-घूमते फा मुमपन् खुररजमहरितसक्। गये हैं। फिर भी अपनी इस शोमासे हमारी भानों को फिसला सुस, किसना भानन्द देते हैं। देखे, ये हिस्सपैति सरदाक्षिप यशो की कारसे प्रकट हुए समको वाहादित करने एप पाले चन्द्रमा बम प्रमी नोंकी मध्यके लिये हमारी देवकीमठरमूखरामः ॥२३॥ माशा-अमिअधाओंको करनेके लिये ही हमारे पास पूर्ण बरे आ रहे हैं।॥ २२-२३ ॥ मदविर्णितलाचन पिन सभी ! देखो कैस सौन्दर्य ! बमरी बास कुछ पनी ए हैं। कुछ-कुश कई किये र केसी माली बान पनी है । गहमें क्नमात्म लग रही है। मानदः समादो वनमाली । सोनके कुमालाकी कान्तिसे अपने कोमल क्सोको मदरसाण्पदनो वकृत कर रहे है। इसीसे मुंहपर लपके पेरके मदुगई समान कुछ पीअमन जान पाता है। और रोमरोमसे विशेष काक मुसकसमे प्रनता भी पस्ती है। भणयन कन लक्ष्म्पा ॥२४॥ टेम्पो अब वे अपने सवा ग्या म्यागेका सम्मान करने स० ३६) दशम स्कन्ध ३४९ यदुपतिर्दिरदराजविहारो म्हें शिक्षा कर रहे हैं। देखो, देखो सवी ! पत्र विभूषण श्रीक्षण गमराजके समान मदमरी पालसे यामिनीपतिरिक्षेप दिनान्ते। इस सम्या वेश्नमें हमारी ओर आ रहे हैं। अब मदितवमा उपयाति दुरन्त अजमें रहनेवानी गौओंका, हमलोगोंका दिनभरका असा विट्र-ताप मिटानेके लिये उदित होनेवाले मोचपन् ग्रनगवां दिनतापम् ॥२५॥ चन्द्रमाकी माँति य हमारे प्यारे स्यामसुन्दर समीप चले भा रहे हैं ।। २४ २५ ।। मी क सपाच श्रीशुकदेवी कहते है-परीक्षित् । महमागिनी गोपियोंका मन श्रीकृष्णमें ही स्टग बता पा । वे श्रीकृष्णमय हो गयी पा। जब मावान् श्रीकृष्ण दिनमें एवं प्रबसिपोराजन्फालीसानु गायतीः। गलोंको घरानेके लिये उनमें चले जाते, तप वे उनहाका चिन्तन करती राती और अपनी-अपनी ससिपेकि सप पा-क्या उन्हींकी स्पस्यओंका गन करके उसीमें रेमिरेशासु तचिचाम्तन्मनस्कामहोदया: ॥२६॥। रम जाती । इस प्रकार उनके पिन बीत जसे ॥ २६ ॥ इति श्रीमद्भागतसे महापुराणे पारमईस्या संहितायां दशमस्सत् पर्षि इन्दाक्नक्रीगयो गेपिकायुगलपति नाम पत्रिशोऽध्याय ॥ ३५॥ अथ पत्रिंशोऽध्याय मरिणमुरका सवार मोर केसका भीमारजीको मन मेखना भीक मात्र माशुकदेवजी कहते है-परीक्षित् ! बिस समप मगवान् श्रीहाण ग्रनमें प्रवेश कर रहे ये पोर वहाँ अथ सर्मागतो गाष्ठमरिष्ठो दृपमासुर । वानन्दासपकी धूम मची हुई थी, उसी समय वरिष्ठमुर नाममा एक रेस्य देरका रूप धारण करके मही महाककृत्कायः कम्पयन् सुरविषताम् ॥१॥ आया । उसका मुद् (धेर पुट्ठा ) या पुआ और पनौर दोनों ही बहुत वाया थे। वह मरने रम्ममाणः खरतरं पदाच विलिम्बन् महीम् । खुराको हतने जोरसे पर रहा था कि उसमे घपती कप गी॥१॥ का बरे जाग्मे गज गहा पा उपम्प पुच्छं वप्राणि विपाणाग्रण थोढरन् ॥ २ ॥। और पैसे घ्न उग्रता जाता था । पूँइ पी किये हुए पा और सागसे बहारीपारी, सोफी में आरि विभिन् मिनिच्छा मन् मत्रपन्म्तम्भलोचनः । तोइता आता या ॥ २ ॥ बीच पीचर्मे यार-बार मता और गोपर छोक्ता नाना पा | ऑन फायर इधर यस्य निहादिसना निष्ठरण गयो नृणम् ॥ ३॥ | उधम रहा पा । परीक्षित् । उसके पोरसे १ मारीन प्रतिमें भीगुरु उपाय से मेन्ट - महरम " नरा पार मुममें नर्स 21 मापन परार्मा गापितमाम | बारापत्रिकामा ४ मीि ।५ माम् ।

३५० श्रीमद्भागवत [२०३६ पवन्स्पालतो गर्भाः सपन्ति मा भयेन पं । हमवनेसेनिटर गर्जनासे मयनश सियों और गोत्रों के तीन चार महीने के गर्म सक्ति हो जाते थे और पाक निर्षियन्ति पना यस्स फइपलश्या ॥ ४॥छ महीनेके गिर जाप्ते पे । और सा क्या कर सके मसलको पर्वत समझकर बादल उमपर अफ्र घर तीक्ष्णमासशील्प गोप्पोगोपाय तवसुः । जाते थे ॥ ३१॥ परीक्षित् ! उस तीसे संगमाले पषवो देवपीवा रामन् संपन्य गोलम् ॥ ५ ॥ पैसाको दसकर गोपियों और गोप सम भयमीत हो गपे । पशु सो इतने रर गये कि अपने रहनेका साम कम रुप्णेति ते सर्षे माविन्द शरणं ययुः । | मेकर माग ही गये ॥ ५॥ उस समप सभी प्रयासी 'श्रीगण ! श्रीरण ! में इस भयसे बचायो इस भगवानपि तद पीक्ष्य गोहलं भविद्वतम् ॥ ६ ॥ प्रकार पुकारते हुए मावान् श्रीकृष्णकी शरणमें आये। भगवान्ने देखा कि हमारा गेकुन अत्यन्त मपत्र हो मा मैप्टेति गिराऽऽपास्स पासुरमपाहयत् । रहा है ॥ ६ ॥ नम उन्होंने भरनेकी कोई बात नही -या कहकर सबको ठाइस घया और फिर मोपाल: परभिर्मन्द पासितः किमसचम ॥ ७॥ षासुरको ललकारा, 'अरे मूल ! महादुष्ट ! ह इन गौओं और म्वास्मेंको क्यों ररा रहा है। इससे क्या पेलदर्पहाई दृष्टान्य स्वद्विभाना दुरात्मनाम् । होगा ॥ ७॥ देस, तुम-जैसे दुरामा दुर्गाके कमा पर पूर चूर कर देनेवाला यह में है। इस प्रकार इस्पास्कोव्याम्पुतोऽरिष्ट तसतम्देनकोपपत्।। ८॥ ललकारकर भगवान्ने म ठोंकी वौर उसे कोक्ति करने के लिये वे अपने एक ससके गलेमें गोराम्बर सम्पुरंसे मुखामोर्ग प्रसायबिम्भिवो हरि।। मोहो गय । मावान् श्रीकरणकी इस फुनौतीसे - कोषक मरे निलमित्य ठठा मौर अपने सुरोंसे भो सोऽप्येवकोपिताऽरिष्ट सुरेवावनिमुश्चिस्वन् । गोरसे भाती पेदता पुजा श्रीकणकी जोर सफ्टा । उस समय उसकी उठापी गई छके पासे भाकाशके उपत्युग्छममन्मेषः लदा रुप्ममुपाद्रवत् ॥ ९॥ बदल तितर-बितर होने लगे ॥ ८-९ ॥ उसने अपने सीसे मांग मागे कर मिये । स्मल स्पन ऑससे टकटकी अग्रन्पस्तविषाणानः स्तम्घासम्लोपनोऽन्युतम् । भगाकर श्रीकृष्णकी वोर देवी मबरसे देखता एमा, उनपर इतने वेगसे टूटा ममो इन्द्रो हापसे होगा फटाक्षिप्याद्रवतर्ममिन्द्रसकोऽवनिर्वथा ॥१०॥ इला बा हो ॥ १० ॥ भगवान् श्रीगणने अपने दोनों हासे उसके दोनों साँग पकड लिये और जैसे एक गहोस्वा मायोस्तपा मटायश पदानि सः। हापी अपनेसे भिड़नेपाल दूसरे हाचीको पीछे हटा छना है इसे ही उन्होंने उसे अटगह मग पीये टेपका प्रत्पपावाद भगवान गज प्रतिगई यथा ॥११॥ | गिरा दिया ॥ ११ ॥ भगवान्के उम प्रकमा ठेल उनपर मह फिर तुरंत ही ळ महा एषा और कोपसे साऽपविदा भगवता पुनरुत्माय मस्वरः । भरत होकर मनी-मंत्री साँस छोक्ता एजा मिल उनपर अाफ्टा । उस समय उसका सारा शरीर पसीनेसे आपतत् स्विमसबाहर नि असन् कायमूर्छितः॥१२॥ मय हो रहा पा ॥ १२ ॥ मगमान्न जा देख पुष यन् संपम्प निमाकुलम् ।। नम । हम्म्। ५ प्राचीन प्रतिमें पाहा दुरामनाम् या सोपा मारे १मसाममिका गमन ।

अ० ३६] दशम स्कन्ध समापतन्वं म निगृप मृत्योः शिवह अब मुझपर प्रहार करना ही चाहता है, तब उन्होंने उमर सींग पकालिये और उसे सात मारकर ममीनपर पदा ममाक्रम्प निपास्प मूतले । गिग रिया और फिर पैगैसे दबाकर इस प्रकार उसका निप्पीश्यामास यथासम्पर पम् निकाला, जैमे कोर गीय कपड़ा निचोड़ रहा हो। इसक याद उसीका मांग उसाइफर उसका म्यूब कुपानिपाणन जपान साऽपवत् ॥१३॥ पीटा, जिससे यह पता ही रह गया ॥१३॥ परीशित् । असगषमन्त्रशकद समुत्सृमन् इस प्रकार यहस्य मुंइसे म्वून उगता और गम-मत करता हुआ पैर पकने दम 1 उसकी माँ उलट क्षिय पादाननवम्पितेषण । गपी और उसन का परब माय प्राण प्रा। अब खगाम कन्; नितेरथ धय । देशनालोग भगवान्पर १२ यरस्य परसाकर उनका स्तुति करन सग ॥ १९ ॥ चव भगवान् श्रीमायने इस प्रकार पुप्पः किरन्ता हरिमीरिरे सुराः ॥१४॥। एक सपमें बानेवाले अरिणामुरको मार डाला, तब सभी एफकामिनहत्तास्तूयमानः स्व मातिभिः । गोप उनकी प्रशंसा करने लगे। उन्होंने क्यामजीके साय गोममें प्रवेश किया और उन पर ग्रेवियोंक विवेत गा; सबला गोपीना नयनात्सव ॥१५॥ मफ्न-मन आननसे भा गये ॥ १५॥ मरिष्टे निहते देस्ये कृष्णनातकर्मणा । परिक्षित् ! भगवानकी यस्य अपत बद्भुत है । इक जब उन्होंने अग्शिामुग्यो मार मग, नय भावमय कंसापायाह भगवान् नाग्दा दपदर्शनः ॥१६॥ नार जो एस्प्रे गाम मे शीघ्र भगान्का दशन पशोदापामा कन्यादरम्यारुणमय च । परात गहत ६, कमक पास पर्दैन । उन्होंने उससे कहा-॥१६॥ कम ' जा पाया तुम्हारे हायमे एका राम घ रोहिणीपुत्रं वसुदपन बिम्पता ॥१७॥ आशशमें पी गया, यह ता यशोदास पुत्री थी। आर न्यस्ता म्वमित्र नन्द पयाम्पोस पुरुपाहता। अप्रमें जा धीबाग है, ये सीक पुत्र है। को जा बरगमभी हैं प रोगीय पुत्र है। मुरबन तुममे निशम्यम भापति कापात् प्रचलितन्द्रियः।।१८का आन मित्र नन्य पाम उन गनोंका गप पिा है। उन्होंन । तुम्हारे अनुसार स्पॉफा बरिया निसातमसिमादच चमुरपत्रिपामया। । यह यान मुनत ही कमी व्यापर नियाभर निवारिता नारदन वस्मुता मृत्युमारमन ।।१९।। मारे पर उय ॥ १-१८॥ उमन मुबमारा मर गाम्ना पितुरमतीय तर उद्या, परम्म माग्दीन मात्वा तामप पाग पन्ध मा भायेगा । गफ ग्पिा । यसका यह मास गपा निमुटप प्रतियाते तु दरपा फंम प्रामाप्य फधिनम् ॥२०॥ मुवन विमा हपरती आर बीमे दयाकही हर्ग पयुष पाराह तम उमन दी प्ररयामाम इन्यवां भरता गमवावा। मरिमें पग्यिा । जयनार कर फेसन फागमा भर पहा-भुन जमन बता मुटिरमापूरलतालकादिषन् || गमता फोरपाम १ मारी। - ३५२ श्रीमद्भागवस [अ०३६ अमात्यान् हस्तिपांश्चैव समाझ्याह भोजराद् । कसने मुष्टिक, चाणूर, शल, तोशल, आटिं पायानों, भा मा निशम्पतामे वीरचाणूरमष्टिको ॥२२॥ मस्त्रियों और महावतोंको मुल्यकर कहा--'वीरवर घागर | और मुश्कि! तुमनेग प्यानपूर्वक मेरी बात सुनो ।१९-२२॥ नन्दप्रजे किलासाते सुतावानकदुन्दुमेः। समुदेवके दो पुत्र कलाम और सण नन्दके अमौ राते हैं। हाँके हापसे मेरी मृत्यु पाल्पयी जाती है ॥२३॥ रामरुप्पो वतो माई मृत्युः किल निदर्भित ॥२३॥ का ये यहाँ कायें, सब तुमळोग उन कुटी भवम्पामिह सम्प्राप्तौ इन्पेतां मछलीलया । लाने लहानेक व्हान मार गम्ना । अब सुम्स्लेग माँति- मनिके मंघ मनाओ और उन्हें अखाड़के चारों बोर मनाः क्रियन्ता विविधा मल्लरङ्गपरिथिताः । गोलगप्रेम सन दो । उनपर बैठकर नगरबासी और | देशकी दूसरी प्रना इस खच्छन्द दंगण्यो देखें ॥२॥ पौरा बानपदाः सर्वे पश्यन्तु स्वैरसंयुगम् ॥२४॥ महावत । ममा कार हो । देख्य भाई ! तुम दंडके महामात्र स्वया मद्र रहार्यपनीयताम् । घेरेके फाटफपर ही अपने कुवल्पापीर हामीको रसन्म | गौर नब मेरे शत्रु उधरसे निकरें, सब उसीक करा दिपः कुवलयापीरो जहि सेन ममाहिती ॥२५॥ | उन्हें मरवा रालमा ॥ २५ ॥ इसी चराईशीको विकि- पूर्वक धनुषया प्रारम्म कर दो और उसकी समस्तक आरम्पा पनुर्यागधतुर्दश्यां यथाविधि । छिये बरदानी मूसनाप भैरवको बहुत से पवित्र पशुओंकी विवसन्तु पशन मेम्मान भूतराजाय मीपे ॥२६॥ बलि चलायो' ॥ २६ ॥ परीशिव ! स तो केवल स्वार्थ-सफ्नका सिद्धान्त इत्पानाप्याघवन्य आहूप यदुपुमत्वम् । जानता पा । इसलिये उसन मन्त्री, पहछान् और महात- राहीस्वा पाणिना पाणि सवाऽरमवाच ह ॥२७॥ को इस प्रकार याना देकर श्रेष्ठ यदुवंशी अफरको पुश्मया और उनका हाय अपने शयमै सेयर योग-॥२७॥ भो भा दानपते मी क्रियता मंत्रमारत । 'अकरनी ! बाप तो बा उरनी है । सा तरहसे मेरे, बादरणीय है। आरक्षाप. मेा एक मित्रोमियम नान्यस्त्वना दिसतमा पियत भाप्रवृप्णिषु ॥२८॥ कर दीमिय स्पोंकि भाप और अग्निवंशी यादों । में आपसे यहकर मेरी मया करनपान सस्य कोई नहीं अवस्स्वामाभित मौम्प कार्यगौग्यमापनम् । है ॥२८॥ पर काम मन बड़ा है, इसठिये मेरे मित्र ! मन नारंग आप म्यिाटीर मे ही, पपेन्द्रा विष्णुमाभिप म्याधमध्यगमन रिस ॥२०॥ जैसे इन्न समय होनपर भी निशुरा बाप रेफर वना सार्व साधता गा॥२९॥ आप नम्दरापके ममें गन्छ नन्दप सप मुतापरानन्दम । जाप । व मुरजीक दो पुत्र है। उन्हें इसी रपार पहारत पर्ने पाइप । क्स, पप इस पाममें दर मामाने नारिहानन रपनानप मा चिरम् । ३०॥ मही होनी चानिय ॥ ३० ॥ सुनत है, रिशुरु मरोमे जीनगर पतभाने उन गानोरा मी युग पारग निमट नि म सम्पपपसमभयः । निभितरिया है । इमि भार उन गानोको सो मे सभा । ।

अ० ३६] दशम स्कन्ध ३५३ . तावानय सम गोपैनन्दाथै साम्पुपायनैः ॥३१॥ ही आइये, साप ही नन्द आदि गोंको भी यही-यही मेंटों के साथ ले भाइये ॥ ३१॥ यहाँ मानेर में उन्हें पातयिष्य इहानीतो कालमल्पन हस्तिना । अपने पाश्के समान कुलव्यापीर हाथीसे मरषा गग्न । पदि वे यदाचित् टस हापीसे पच गये, तो मैं अपन यदि सक्को वसो मरीतये घेतोपमः । ३२॥ | मनके सम्पन मजमूत और फुर्तीले पहष्टयान मुष्टिक- चाणूर आदिसे उन्हें मरया गटंग ॥ ३२ ॥ उनके सयोनिहतयोस्तप्तान वसुदेवपुरोगमान् । मारे जानेपर वसुदेव आदि गि, भोज और दशाईमरी उनके भाई-बन्धु शोकाकुल हो जायेंगे । फिर उन्हें मैं ववमधून निहनिप्पामि वृष्णिमोपदशाईकान्।॥३३॥ अपने हार्यों मार डागा ॥ ३३ ॥ मेरा पिता उग्रसेन यो तो व्हा हा गया है, परन्तु अभी टसको राम्पकाध्यम स्ना उग्रसेन पिवर स्यविरं राज्यकामकम् । हुआ है। यह सब कर चुकनके पाद में उसको, उसक मा देवकलो और दूसरे भी मो-जो मुझसे ट्रेप करनेवाले ६-उन सक्ने सउषारके घाट उतार दूंगा ॥ ३१ ॥ सद्भातरं देवक च ये चान्ये विदिपो मम ॥३४॥ मेरे मित्र अमूरची 1 फिर तो में होऊँगा और आप होंगे, सपा होगा इस पृष्मी अफस्टम राम्य । नासध वसपा मही मित्र भमित्री नटकष्टका । हमारे योन समर है और पानरराज शिविद मेरे प्यारे सखा है॥३५|| शम्मरम्मुर, नरकासुर और बाणासुर येता जरासधो मम गुरुदिनिदो दयितः सम्बा ॥३५॥ मुझसे मिझता परसे ही है, मेरा मुंह देते रहते हैं; इन सबरी सहायतासे में देवताओंके पक्षपाती नरपतियों- सम्परो नरको पाणो मय्येष स्वसौरदा । को मारकर पृष्षीका अन्य राज्प भोगूग ॥ २६ ॥ यह स्त्र मानी गुम मा मने आफ्नो बना दी। सरह मुरपधीयान् इत्वा भोल्ये महीं नृपान् ॥३६॥ अब बाप जन्नी से-जरी बदाम और कृष्णको पहा ले बाइये। अभी तो ये बच्चे ही हैं। उनए मार एतन्ना पाऽऽनय क्षिप्रं रामकृष्णाविहार्मका । साउनमें क्या स्थगता है। उनसे पेपर इतनी दी मात पहियेग कि य ग धनुश्यनक दान और यदुशियों- धनुर्मखनिरीक्षार्थ द्रष्टुं यदुपुरथियम् ॥३७॥ पर राजशनी मथुगी शोभा दयनके यि या अ जाप ॥ ३७॥ मारजीन रा-महागन ! 7 अन्नी पुस, मस्ता बरिट दूर पाना चाहते हैं, इसरिय आरश ऐस राजन् मनीपित सभ्यस्तव म्पावधमानम् । सोपना रही है। मनुन्यको पाहिप कि पहेसाय ो पा असावा, दानों प्रति मात्र र माना मिदमिया मर्म पुर्याइदै रिफलमापनम्॥३८ मत ॥ ३८ ॥ मनुष्य परे गरे तारपुर मम पाता जप करता प्रमे मदी, देवी से नागपात पान नगसिपने, मनारथान् परात्पुग्नचना देसहतानपि । प्रानि मे रामेही मर पर रीवा १ ।१ मर। मार उपाय ३५४ श्रीमागवत [म. ३७ युत्पते हर्पशोकाम्या वयाप्यानो करामि ते ॥३९॥ है कि फमी प्रारम्धके अनुकूल होने पर प्रयत सम हो जाता है, तो यह हर्षसे का खता है और प्रतिकूल | होनेपर लिस्ट हो जाता है तो शोकमस्त हो जाता है। फिर मी मैं आपकी भाषाका पालन तो कर ही रहा हूँ ॥३९॥ भीभुक उवाच भीशुकदेपसी कहतेकसने मन्त्रियों और एवमादिश्य चार मन्त्रिगम विसृज्य स । अक्रजीको इस प्रकारकी बाहा देकर सबको विदा पर दिया । सदनम्तर षह वपने महलमें पप गया और प्रविषेश गृह सस्तथा। स्वमालयम् ॥४०॥ | भकरची वपने घर लौट छाये॥ १० ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमास्यां संहितायां दशमस्काचे धिक्ररसप्रेषण नाम पट्विंशाऽपाय ॥ ३६॥ अथ सप्तत्रिंशोऽध्याय देशी मार म्पोमासुरका ग्वार तथा नारदजीके पाप भगवान की स्तुति भीमुक उवाच भीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित् 1 पंसने मिस केशी सु माहितः खुरैर्मही केशी नामक दैत्यो भेजा पा, वह यो मरी घोके रूपमें मनके सम्पन पेगसे दोक्ता इमा प्रबम माया । महाहयो निर्जरपन् मनोजय । वह मपनी टापोंसे धामी सोता रहा पा ! उसपी गमदनके हितराये हुए पाके मटकेसे भाषाशके मादल सटावप्ताम्रविमानसकुर और विमानोंकी भी वितर-बितर हो रही पी। उसी कर्मन् नभो हेपितभोपिताखिल ॥१॥ भयानक हिनहिनाइटसे सब के सब झ्यसे फॉप रहे थे। विशालनेत्रा यिकाम्पफोग्रो उसकी बड़ी-बड़ी बौने घी, मुँह क्या पा, मानो किसी इसका म्योपर ही हो । ठसे दापनेसे दी र तापा । पुदगलो नीलमहाम्दापम । बड़ी मोटी गरदन पी। शरीर इसना विनर कि विकीर्प मालूम होता पा पारीयारी बा सभी घटा है। उसी नीपतमें पाप मा पा । यह धीरणको मारपर भपने प्रर्ब म नन्दम्प जगाम फम्पपन् ।॥२॥ | सामी पंसस हित करना पाहता पा । उसके पम्नेसे त ग्रामपन्त भगवान् म्यगाकुल भूषण होने लगता ||१-२॥ मगवान् श्रीरणाने देशा हि उमरी दिनहिनाहरसे उनने वाभित रहनेगान गोकुल मपितनिरिपूर्णिताम्पदम् । भयभीत गावर उमटण मासे मान मिस आम्मानमानां मृगयन्तमप्रणी तिर होगह है, ना पहनापि उन्होंगरी तर पासर उमा सामने आ गये और पाहपन् म म्पनदन्मृगन्द्रपन ॥३॥ उम्हॉन मिग सिन बजार उसे माग ॥ ३ ॥ भाग यापम । दुराशयः सहित ग्दा ३५५ ५० ३७] दशम स्कन्ध धनु मवान्तरे स निमाम्यामिसुखो मुखेन व | मगवान्को समने आया देख यह और भी बिट गया तथा उनकी भोर इस प्रकार मुंह पैसा दौडा, मानो पिपन्निवाम्पद्रवदत्यमर्पण आकासको पी जायगा । परीक्षित् । सचमुच करीका बवान पदम्पामरविन्दलोपन थेग या प्रचण्ड या । उमर विजय पाना तो फरिन या हो, उसे पका लेना में आसान नही या । उसन दुरासदभण्ठवा दुरस्पय ॥४॥ माधान के परम पाँचर झुटती मादी ॥ ४॥ पन्तु सद् पश्यपिस्वा समभोधनो रुपा भगवान्न उससे अपनको यचा उिया । मग, वह इन्द्रिया तीतको से मार पामा ! उन्होंने अपने दोनों हासेि प्रगत दाम्पो परिविष्य पादयोः । उसके दोनों पिछले पर एका लिये भार जैसे गदा साँपको पाकर मय देशहै, उसी प्रकार कोसे सावसत्सन्य उसे भुमाकर मा अपमानके साप चार मी हापकी पूरी पपोरग वार्धसुतो व्यवस्सिवः ॥५॥) पर फेंक दिया और स्वयं अाफ्ट सड़ हो गपे ॥५॥ पोड़ी ही देर बाद फेडी फिर सचेन हो गया और उछ स लम्धसंग पुनरुपितो रूपा खड़ा हुआ। इसके बाद यह मोधसे मिष्टकर और म्पादाय केशी सरसाऽऽपसहरिम् । मुँह फारमन मा वेगसे भगवान्पी आर सफ्टा । उसको दौरते देस भापान मुसकान लगे। उन्होंने अपना सोऽप्यस्य वको मुजसचर सपन् पाया हाप उसके मुंहमें इस प्रकार म दिया, जैसे सर्प बिना किसी आशक्षक अपने दिमें घुस जाता प्रदेशयामास यथोर्ग विले ॥६॥ ॥ ६ ॥ परीक्षित् । मगमन्या अश्यात कापर मन निपेतुर्मगषगुजर- कमठ भी उस समय ऐमो गया, मानो ताया इमा येश हो । टस्का स्पश हावे ही केशीक दोन ट स्ते केशिनम्तप्तमया साप्तो यथा । ट्रक गिर गये और जैसे जगेटर रोग उपेक्षा कर देने पर पहुन या जाता है, से ही श्रीगा मुजणा पाइप वाहगतो महात्मनो उसने मुंहमें गाने || ७ || अपित्याक्ति मगन् यथाऽमय: सपा उपक्षित ॥७॥ श्रीमानका हाप उसक महमें इतना बढ़ गया कि उसकी मामा भी भान-माना माग म रदा । अब प्ता दम समेधमानेन स रुप्णवाहना पुग्ने पद पर पीरन म । टम बम पसीनसे पाय हा गया, भौगोकी पुती उन गी, निरुदवायुवरणाम रिक्षिपन् । पर मरम्पग पग्न गा । पानी में उमरा दार्गम प्रविमगार परिपपलापन निरठ र पृषीम नि पहा ना| उमा प्राय पर उस गय ॥८॥ उमा निग र यि पपान र पिम्पन ठिी य्यम् ॥ ८॥ एआ हाना कारग रिवही पर पानी का पट फरियाफलापमान गया । मामाह भगान् धन मा पर्गरमे अली मुशरम ने इसमे पुर में अभप या गत म्पसारपाहप्प सब महामना। माग आ । निा अपना ही पारा मारा गया । - - भीमागवत [२०३० अपिसिनोऽपरनहसारिसमायैः देवताओंको मसदी इससे पड़ा भासला । प्रस्न होकर भावान्के पर पुस मसाने गौर प्रसनवर्दिविपतिरीविता ॥९॥ उनकी क्षति करने हो ॥९॥ देवर्षिरुपसझम्प भागश्तप्रवरो नृप । पीभित् । देवर्षि नारदनी मचानक परम प्रेमी और समक्ष जीपोंके सधे शितली है। सके यहास सोकर अनायास भरत कृष्णमनिटकर्माण रहस्येतदमाप ॥१०॥ फर्म फरमेघाले मगवान् श्रीहपके फस मामे और एफारतमें उनसे कहने लो-॥१०॥ सचितानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ! आपका स्वरूप मन और कृष्ण रुप्माप्रमेयात्मन् योगेश जगदीपर । माणीका निस्य नहीं है।भार योगेर है। सरे भगत फा नियन्त्रण आप ही करते हैं। आप सबके दपमें निवास करते है और सम्प-के-सा भापके उदयमें निभास पासुदेवारिबलावास सात्वा प्रवर प्रभो ॥११॥ करते हैं। आप भोंके एकमात्र पान्छनीप, यदुषश- शिरोमणि और हमारे खामी है।॥ ११ ॥ जैसे एक ही बमि सभी छपियोंमें घ्याप्त रहती है, वैसे एक ही भाप स्वमारमा सर्यम्वानामेको पोतिरिवधसाम् । समस्त प्राणियों के मारमा है। परमाके रूपमें होनेपर भी आप अपनेको छियाये रसते हैं, क्योंकि आप पर- मूहो गुराया साक्षी महापुरमईपर ॥१२॥ कोशरूप गुफाओं के भीतर रहते हैं। रिमी पुरुषोतम- के गपमें, सपके नियताके रूपमें पोर सबके सभीके सपमै वाफ्का अनुभव होता ही है ॥ १२॥ प्रभो । आत्मनात्माप्रपा पूर्व भायपा ससजे गुणान् । बाप सबके अधिधान और सर्व अभियानरहित हैं। आफ्ने सष्ठिके प्रारम्भमें भग्नी मापासे ही गुणोंधी सहि की और उन गुगों ही स्वीकार करके भाप वगफी तेरिद सस्पसंफस्पः स्वस्परस्परसीधरः ॥१३॥ अगति, स्थिति और प्रम्प पर रहते हैं। पद हर पाने प्रिये आपको अपनेसे अतिरिफ और किसी भी स स्पै भूधरमसानो दरपप्रमघरपसाम् । बस्तुको आयस्पस्ता नहीं है। क्योंकि माप सर्वशकि- मान् वीर सपसाल्य है ॥ १५॥ वही भप देप, । प्रमय पर राशा, निहोंने बाजार गमोर मनसीणां रिनाशाप सेनूना रक्षणाय च ॥१४॥ और धारण पा रखा है, पिनाश परनके पि सम्म मी मर्यादाओको मा पता यि यदुवशमें भरती दिएका त निहलादल्या लयाय पाठि। एए हैं ॥ १५ ॥ म , अनन्दी पत कि आएन सी यादो में ग्दने गरो भी दैस्पर मार इमरी निग्निासेडरपर दाना- पाप पिनमयमाम्पमापनिमिपादियम् ॥१५॥ मग आ रमा घोर भाग नागा पग्ने ५ ||१५|| गात महिई गर महान पापानिनम् । प्रय 'र पगा। आभार, नमो नमन् । मना ।

म. ३७]
दशम स्कन्ध
३५७
कसं च निहतं द्रप्पे परघोऽहनि ते विमो ॥१६॥ | दूसरे पहलवान, पुराव्यापीर हाथी और स्वयं फैमरो
भी मरते देखा ॥ १६ ॥ उसके बाद शसासुर, फार-
संस्थानु रालयवनमुरागां नरफस्य च ।
पवन, मुर और नरसामुग्या वर देवग्न । आप स्वर्गसे
पारिजातापहरणमिन्द्रस्य च पराजपम् ॥१७॥ पत्या उस्सर टायेंगे और इन्द्र के पी पपा करने पर
उनपने टसश मवा पलायेंगे ॥ १७ ॥ आप अपनी
उदाई पीरमन्यानां पीर्यशुरफादिलक्षणम् ।
सया, बीरता, सैदय आणिका शुल्क देकर वीर-यत्पाओं-
नृगस मोक्षणं पापा द्वारकायां जगत्पते ॥१८॥ से विवाह करेंगे, और जगदीश्वर ! बाप धारफरमें रहते
हुए नगको पापसे छुदायगे ।। १८ ॥ आप जाम्बवतीये
समन्वफस्स घ मणेरादानं सह भार्यया ।
साप स्यमन्तक मगिको जाम्बयान्से से आयेंगे और अपने
पामसे माझगक मरे हुए पुयोंको टा देंगे॥ १९ ॥
मूतपुत्रमदानं च प्रामणस्य वधामतः ॥१९॥
इसके पश्चात् माप पौरफ-मिथ्यावासुदेवका १५
पौण्टकस्य पध पभाव काशिपुर्याय दीपनम् । फरेंगे। काशीपुरीमो जला देंगे। युधिगिरके राजसूप-पझमें
चेदिराज शिवरायो और बहाँसे टीसे समय उसक
दन्तषग्रस्य निधन पयस्य च महाक्रती ॥२०॥ | मोमेरे भाइ दम्तवक्त्रको नष्ट करेंगे ॥ २० ॥ प्रम्य !
यानि पा मानिधीर्याणि द्वारकामापसन् भवान् ।
द्वारकामें निवास करते समय आप भोर यदुत-से
पाकम प्रकट परगे, मिन्हें पृथ्वीके यो पहनी और
फर्वाद्रपाम्पर तानि गेपानि कविमिर्मवि ॥२१॥ प्रतिभाशीठ पुरुष आगे चग्या गरेंगे । बहसय
देग ॥ २१॥ इसके मार आर पृण्याचा भार उतारने
अथ ते फालरूपस्स पपिप्णोरमप्य । के लिये कागपमे अर्जुनके सारपि पर्नेगे और अनर
बझीक्षिणी सेनाका संहार करेंगे। यह सब में अपनी
अक्षौहिणीनां निधन द्रक्ष्याम्यर्जुनसारपेः ॥२२॥ ऑग्यसे दम्ग ॥ २२ ॥
पिशुद्धविमानपन स्वसम्पया
प्रमा ! अप मिगुद्र विज्ञानघन हैं। आरय म्यगपमें
और रिमीरा वनित है ही नहीं। आर नित्यनिगम्तर
ममातमवार्थममोपवामिटतम् ।
अग्ने परमनम्म्यमा पित पदते हैं। सरपे मारे
पाप मारमा नित्य प्रामहीमा साहस
म्वतममा निस्पनिाचमाया-
बमोधमकी मिमी शादिर समने मय और
मपमे दोनेरा प गुिग्नर गेमर पर नगतिम
गुणप्रवाई भगवन्तमीमहि ॥२३॥
है-पी हमादी मारी। एमेजर आरा', प्यार
सपिणानरमा नितिगर पाम भगानी
म पाता है॥ २३ ॥ आ गर भत्र
रामाधर स्वाभपमारममापा
दी र निन् ।अने, मित "रम
माया गद और मान किन-
रिनिर्षितापपिशेपफरपनम् । जनमरे भनागरी परगी
मेटी मनी र
मोहरामपागमनुप्परिणा
पटना [२ म्दु गरिमा प्रस्ट !
भनिन
नताऽपिपुर महानिमावताम् ॥२४॥
11'Enा पार॥१॥

३५८ श्रीमद्भागवत [अ०३७ भीमुक उपाप मीशुकदेवी कहते १-परीक्षिस ! भगवान्के परमप्रेमी मक देवर्षि नारदनीने इस प्रयम भगवान्की एवं यदुपति कृष्ण भागवतप्रवरो मुनिः। स्तुति और प्रणाम किया । भगवान् के दर्शनों के अहादसे प्रणिपत्याम्पनुतातो ययौ सदर्शनोत्सव ॥२५॥ नारदजीका रोम-राम मिल उटा । तदनन्तर उनकी अदा प्राप्त करके घे चले गये ॥ २५॥र मगमन् श्रीसम्म भगवानपि गोविन्दो इत्या केशिनमाइये । | क्शीयो बदाईमें मारकर सि अपने प्रेमी एवं प्रसम- पशूनपालयत् पालः प्रीतजसुग्नापरः ॥२६॥ तथा प्रजवासियोंको परमानन्द किरण परन लगे ॥ २६॥ | चिन ग्मार वाले के साय ववत् पशुपालनक काममें उग गप एकदा ते पशून पालापारयन्तोऽद्रिसानु । एक समय ये सब ग्याउयाठ पहापकी चोरियोपर गाय नादि पशुओंको चरा रहे थे ता पुछ चोर और पुछ रक्षक धनिलायनक्रीगयोरपालापदेशत ॥२७॥ मनकर छिपने शियानेयर-मुका-सक्रीका मेलमेर रहे में॥२७॥राजन् ! उन स्पे!मसे कुछ सा चोर घोर पुर वयासन् फसिविधारा पासाय कतिचिन्नृप । रक्षक तया पुछ भा पन गये थे। इस प्रकार में निर्भप हाफर खेलमें रम गये थे ॥२८॥ उसी सम्प ग्यमा भेपापिताम सत्रैक विजपुरकतोभया ॥२८॥ श्रेष धारण फरफ म्याममुर को लाया । षइ म्यपानियों के भाचाय मयामुग्या पुत्र था और स्वयं भी पदा मायामी मपपुत्रा महामाया पामो गोपालयपरक । था। यह ग्रेडमें पहुधा पार दी पनता और भाग्ने मपापितानपायाइ प्रापभोरापिसो पहुन् ॥२९॥ | हमहान् अमुर पार-बार उन्हें से बापर एफ पानी दुए यहुन-से गायोयो पुगकर छिपा आता ॥ २९ ॥ गुम्समें राऊ देता और उसका दरपाना पप पही गिरिदपा सिनिक्षिप्य नीत नीर्व महामुरः । पानसे व दता । इस प्रकार ग्वाल्या पर चार-गाय पाक ही पप गह ॥ २०॥ मतवमा शिलया पिदध दार पतु पनामपिताः ॥३०॥ भगान् उमरी पर परत जान गरे। जिस समय पायामा गिजा रहा प, उसी समय उन्होंन, सम्म सन फम विगापरुणाभरणदःगताम् । जगे मिंद भेडियो दयाम से उसी प्रकार, उसे भर गापान नपन्नं जमार पर दरिरिपोजमा ॥३॥ दाया ॥ २१ ॥ प्यार पड़ा परी प । टान समान अम्ना अमरपर पायom ग निई समाग्याप गिरीन्द्रमाल परी। गानिमा मा । पान्नु भगाने उमारे म प्रसर आन शिरमें काम यिापार मानग्मिानमारमानना प्राणापुर||३२|| in 7 न गए ||३२||र मगान् धान नो राजा उस भूमि। निगपापुतादाम्पा पानापिरामहीम | टिग्मि HTjh trI दामिनोहर पर नमी Farm पसमा दिसान पारममापन ॥३३॥ ru11 || भा गmir गुणा । गुपानिपराननि ग पाए । Irr 1 m anti- - अ.३८] दमम स्कन्ध ३५९ ! स्तूपमानः सुरगोपः प्रविषेश स्वगोकुलम् ॥३४॥ | बड़े-बड़ देवता और ग्पाउयाल उनकी स्तुति करने टगे और मावान् श्रीकृष्ण जनमें चसे पाये ॥ ३४ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्पा संहितायो दशमस्कत्ये वर्धि म्योमासुरवधो नाम स्तत्रिंशोऽध्याय ॥ ३७ ।। अथाटत्रिंशोऽध्याय भरखीकी प्रजयात्रा मीझुक उमाप भीशुकदेयजी कहते हैं-परीक्षित् ! महामति अफ्रजी भी यह रात मयुरापुरीमें बिताकर प्रात काठ अफोऽपि च सो रात्रि मधुपुर्या महामतिः । होते ही रस्पर स्वार हुए और नन्दयाबाके मेकुलकी ओर पल दिये ॥ १॥ फाम माम्फ्यान् अम्रजी उपित्वा रथमास्पाय प्रययौ नन्दगोइलम् ॥१॥ यी पान करते समय मार्गमै फायनयन भगवान् श्रीवम्गकी परम प्रेममयी मक्सेि परिपूर्ण हो गये । धे गन्छन् पथि महाभागो भगवस्यम्मुजेक्षणे । इस प्रकार सोचने छगे-॥ २॥ मैने एसा कान-सा भक्ति परामुपगत एवमेतदपिन्सपत् ॥ २॥ | शुभ कम किया है, ऐसी कौन-सी श्रेण तफ्त्या की है अपवा किसी सत्पात्रको एसा कौन-सा महत्वपूर्ण दान किं मयाऽऽचरित भद्रं किं तप्त परमे तपः । दिया है जिसके फलस्वरूप आज में मगमान् श्रीकृष्णके दर्शन फॉग ॥ ३॥ में पड़ा विषयी हूँ। सी किंपापाप्पईते दर्च यद् द्रक्ष्याम्पप केशवम् ॥ ३॥ तिमें, पदया साखिर पुरुष भी जिन गुणोंका ही गन करते रहते हैं, दर्शन नहीं पर प्रत-न्न ममैतत् दुर्लम मन्य उत्तमश्लोकदर्शनम् । भगवान्के दरान मेरे लिये अत्यन्त दुसम है, टीफ से ही, नमे कुलथे यायके लिये पदोंका पीनन विपयात्मनो यथा मनकीर्तन शूद्रजन्मनः ॥४॥ ॥५॥ परन्तु नहीं मुफ्त अश्मको भी भगवान् श्रीगो मैर ममाधमस्यापि स्पादवान्युतदर्शनम् । दशन होंग ही। क्योंकि जसे नमें बहते हुए तिनके पी-पभी इस पाग्मे उस पार लग जासह, मेटी दियमाणा कालनपा कपित्तरवि फधन ॥ ५॥ समपके प्रयाइमे भी की कार इस ममामाग्रफा पर पट सकता है॥ ५॥ अस्प ही भत्र मरे सारे ममापामगले नट फलपधिप मे भमः। मगुम नष्ट हो गये । आज मग जग्म समा गया । क्योंकि भार में भगवानरे टन घग्णपस में भाव यममम्मे भगवतो यागि पेपाश्मिपश्यम् ॥ ६॥ नमम्पार कर जा मामा पाप-पतियार भी पप' । पानके दी रिप है ॥६॥ मने मा अज कमा पतापात मन्यनुग्रह मरे र यही ही रा पी। ग्मी कमर भवनमे , इम भूतपर आन मा मान्स ठप्पेऽशिप प्रहितोऽमुनाहरः । पापमयों न - 1 मिनर माताकी सिमनाम । 1 । -

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भीमनागपत
[१० ३८
३६०
कान्तिका पन करफे पहले युगेके अपि-मही इस
रुवायवारस्य दुरस्पय सम
अमानरूप बार अन्धकार राशिको पार कर चुके हैं।
पूर्वेऽसरन् यमलमण्डलविपा ॥७॥ सर्प यही भगवान् तो अपनार म्हण करके प्रकट हुए
हैं ॥ ७ ॥ प्रमा, शहर, इन्द्र आदि बड़े-बड़े देवता
जिन परणयमोंकी उपासना करते राते है, स्पर्प
यदर्चित प्रमभवादिभि सुरैः
| मगनी सम्मी एफ क्षणके लिये भी जिनकी सेम नहीं
छोड़ती, प्रेमी मोंके साथ बड़-गो बानी मी जिनकी
मिया च देव्या मुनिभिःससात्वसः।
आराधनामें संम्म रहते है मगवान्के वे ही वरण-
कमल गौओंको घराने के लिये म्पाव्यालले साप बन-
गोधारमायानुचरैपर घने
फ्नमें विचरते हैं। वे ही सुर-मुनि-यन्दित श्रीचरण
यद् गोपिकानां रुषहमादितम् ॥ ८॥ गोपियोंके षष्ठ स्पलपर लगी हई कमसे रंग जाते है
विदित हो पवे ॥८॥ में अवश्य अपय ठमका
द्रस्यामि नून मुकपोलनासिक
दर्शन करूंगा । मरक्तमणिके समान मुनिन्ध कान्ति-
मान् उनके कोमा कपोल है, तोकेकी ठोरके समान
मिसालोकरणकालोपनम्
नुकीली नासिका है, होठोंपर मन्द-मन्द मुसकान,
| प्रेममी फितन, फासे कोमल रतनारे खोपन और
मुर्ख सन्दस्य गुगलकात
कोपर पुषराठी सके स्टक रही हैं। में प्रेम
और मुक्तिके परम दानी श्रीमुकुन्दके उस मुस्कालका
प्रदक्षिण मे प्रचरन्ति पै मृगाः ॥९॥ धान भवश्य दर्शन फसँग । क्योंकि हरिन मेरी
दायाँ मोरसे निकल रहे हैं ॥ ९॥ मगवान् विष्णु
अप्पय विष्णोर्मनुजस्वमीयुपो पृष्पीका मार उतारनेके लिये स्पेयसे मनुष्यकी से
श्रा कर रे । सम्पूर्ण स्मयप्पके कम है।
भाराषताराप मुमो निजेन्छया।
| सैन्दर्यकी मूर्तिम्मन् निषि हैं। मात्र मुझे ठहाँका
दर्शन रोग ! अप हो । बाब मुझे सब ही
लापम्पधाम्नो भपिशाफ्लम्भनं
आँसोका फल मिड यापन ॥ १०॥ मगवान् इस
काय करणरूप बगतके प्रध्यमात्र वोर ऐसा होनेपर
मम न न स्पात् फलमसारमा॥१०॥
वयफ्नका वाहार उन्हें छतक नहीं गम है।
उनकी चिन्मपी शकिसे मानके कारण होनेवाम
म ईविवादरहितोऽप्पसत्सवो
भेदपम पानसहित दूरसे ही निरस्त राता है।
खतेमसापास्ततमोमिदाश्रमः
अपनी योगम्झ्यासे ही मने-चाप, भूमिसम्मानसे
प्राण, इन्द्रिय और मुदि आदिके सहित अपने स्वरूप
स्वमायमाऽऽस्मन् रचिवेस्दीक्षमा
मूत नीयोंकी रचना कर लेते है और उनके सप
इन्दापनकी फुमि तपा गोपियोंकि घरोंमें तरह-सराकी
प्राणायधीभिः मदनेषमीयते ॥१९॥ टीस्मएँ करते हुए प्रतीत होते है ॥ ११ ॥

०३८] दक्षम स्कन्ध यस्यास्सिलामीवदमि सुमाले जब ममस्त पापोंके नाशफ उनके पग्म मान्यमय गुण, कम और जमकी टीयोंसे युक्त होकर पाणी उनका पर्याचो बिमिया गुणकर्मजन्ममि । गान करती है, तब उस गानसे मंसारमें जानकी म्फति होने लगती है, शोमाया सधार हा गाता है, सारी प्रामन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति पै भगद् अपवित्रताएँ धुल्या पवित्रताका साम्राम्य छा जाता है, परन्तु जिस वाणीसे उनक गुण, स्रीय और जम्मकी कपाएँ नहीं गायी जाती, यह तो मुर्देको ही दामित पास्तद्विरता शवनाभना मता ॥१२॥ करनेवाली है, होनेपर भी नहीक समान-म्पर्य है ॥ १२॥ जिनक गुणगनका ही ऐसा माहात्म्प है, य स चापतीर्ण: फिल मास्ववान्वये ही भगवान् स्वयं यदुवंशमै अवतीर्ण हुए हैं। किसरिये । अपनी ही मनापी मर्यादाका पालन करनमाले श्रेष्ठ स्वसेतुपालामरवर्यशर्मक देवताओंका कल्याण करनेफ ये । ये ही परम | ऐचर्यशार्य भगवान् आर अजमें निवास कर रहे है यमा विव वन् ब्रज भास्त इचरो और वहीसे अपन पराका विस्तार कर रहे हैं। उनका यश फितना पवित्र है । बहा, देवताग भी उस गायन्ति देवा यदशेपमालम् ॥१३॥ सम्पूर्ण मङ्गलमय यशका गान करत रहते हैं ॥ १३ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि आज म अपश्स ही उन्हें देनंग । वे वा-यासतों ओर टोकराके भी एकमात्र आयप है। व स्वप नूनं मरतां गतिं गुरु सब परम गुरु हैं। और उनका नाप-सौन्दर्य सीनों लोगोंक मनका मोह नयाय्य है । जा नपाल प्रलापकान रशिम महात्मवम् । है, उनक रिय यह आनन्द और ग्सका घाम सम्मा है। इसीमे म्वर्य लक्ष्मीनी भी, ना सन्दप वर्धापरी रूपं दधान थिय इपितास्पर है, उन्हें पानक उिय परफ्ती रहती है।हाता में उन्हें अवश्य दान । क्योंकि आर मरा मार-प्रभात दृध्ये ममासन्नुपस मुर्शना ॥१४॥ है, आज मुप्त प्रान पारसे ही अप-अउ शगुन दोन अधारस्ट मपदीया स्थान मन में उन्हें दाग तब सर्पभ्रष्ट पुरा ग्राम तपा श्राफ घरमें माम्पार पाने रिय तुरंत ग्यमे प्रधानपुमोधरण मालम्पप। फू परगण । उनफ चरण पका नंगा । आह ! टनक धरण फितन दुग्म है। बसया यात्र-पति अम- पिया पृत यागिभिरप्पर तुम सभात्यारक रिप मन-ही-मन अन्न एपमें उनक परगे। की दरग फात ६ र म पना टम्दें प्रत्यक्ष पा नमस्य आम्पा ममग्नीन मनाकम ||१५|| नाग और या जाग उनपर । ग्न दानाक साथ ही अप्पधिमूल पठितम्य म विव टनरु प्रर्म मन कर पराग माफी भी पमा कांग ॥५॥ मर गसम्म ! नए में टनक मिरम्पधास्तमिजास्तपरवम् परपामि तिर अन्ना परमार - मा एन१९- ३६२ भीमद्भागवत । दचाभय कालसबारसा | मेरे सिरपर रस देंगे। उनके वे काफमत मन मेगको प्राइविताना शरणेपिणी नृणाम् ॥१६॥ मयसे अत्यन्त प्रवाकर उनकी शरण चाहते और एक सदाके लिये अम्पान दे चुके हैं, जो कापी संपले समईण पत्र निभायाक्षिक आ आते हैं ॥ १६ ॥ इन्द्र तथा दैत्यराज बलिने मान्के उन्ही करकममें पूजाझी भेंट समर्पित करके तीनों स्था बलिपाप अगत्त्रमेन्द्रताम् । छोश प्रमुख -इन्द्रपद प्राप्त कर नि । माकान्के [ उन्हीं कारकमोंने, जिनमेंसे दिव्य मममी-सी मुगन्ध यद् वा विहारे ब्रजयापितो भर्म जाया करती है, अपने स्पर्शसे रासीक समय पर स्पर्टेन सागन्धिकगन्स्यपानुवत् ॥१७॥ युवतियोंकी सारी पकान मिटा दी थी ॥ १७ ॥ कसका दूत हूँ । उसी मंत्रनेसे उनके फस जा रहा न मय्युपैम्पस्परिपुद्धिमच्युतः हैं । कहाँ वे मुझे अपना शत्रु तो न समझ बैठेगे । राम फसस्स दूतः प्रहितोऽपि पियाम् । राम ! वे ऐस कदापि नही समझा सकते। क्योकि मे निर्विकार है, मम है, क्युत है, सारे विश्व के साथी याऽन्तर्वहिवास एतदीडित है, साझ है, वे पित्तक बाहर भी है और भीतर भी । व क्षेवारपसे स्मित होकर क्त करणकी एक-एक चेय- क्षेत्र विस्यमलेन पशुपा ॥१८॥ को पानी निर्मठ मानशिक शारा देते रहते हैं ॥१८॥ तब मेरी शहा म्पर्य है। अस्प ही में उनक रोम अप्पधिमूलऽवहित रुवाबलं हाप जोरकर निीतमवसे सड़ा हो जाऊँगा । थे मुसकाते मामीक्षिता समिवमार्द्रमा दया । हुए दयामरी मिग्ध शिसे मेरी ओर देख्ग । उस समय मेरे स्म-जन्मक समस्त वसुम संस्कार उसी क्षण मर सपथपप्चस्तसमस्तकिलिपा हो जायेंगे और मैं नि शहोकर सदा के लिय परमानम्हमें मान हो जाउँग ॥ १९॥ में उनक फुटुम्मका ।। पाढा मुदं पीतविना उर्जिताम् ।।१९।। और उनमा मपन्त हित चाहता हूँ। उनके सिमा और कोह मेरा आराध्यदेव भी नहीं है। एसी मितिम । सुरचम प्रातिमनन्यदेव पानी लंबी-संत्री मोहोंसे पकाकर मुझे भरप अपने |दयसे लगा लेंगे। अहा । उम समय मेरी ता देह पनि दाम्पापुद्र परिरप्सतस्य माम् । होगी ही, पर दूसरोका पवित्र मानपाठी भी कम यानि माम्मा हि तीर्थीक्रियव सव म और उसी सम्प-उनका आगिन प्राप्त होत ही- मेर कममप मन, जिनके कारण में अनादिकापसे मटा पन्धष कमात्मक उन्मसिस्पतः ॥२०॥ या ई, टूट बायगे ॥ २० ॥ अब वे मेग आगिन कर पुगे और महाप जाय, मिर मुकामर अफ सामन सम्भागमाई प्रणतं कसाअलि म्पा हा गाऊँग तब ब मुझ पाया भक्त । इस प्रकार महपर सम्मान करेंगे। क्यों न हो, इसी पवित्र बोर मो पप्यतपूर सतस्पुरुभवाः । मधुर पात्र विस्तार काना यिही सान मंग कर सदा रय जन्ममृता महीयसा गह है । तर मरा जीवन सजायग्न | भगवान् भीषणन मिसा अपनाया नदी निम भार नहीं नमाता या धिगाप्प जन्म तत् ॥२१॥ या—उसा उम मका, जीपनका पितरः ॥२१॥ । ।

शत्रु । उनकी अ० ३८] दशम स्कन्ध ३६३ न तो उन्हें कोर प्रिय है और न तो अप्रिय । न तो न तस्य फभिद दयित मुहसमो उनका कोई आत्मीय सुम्द है और न तो न चाप्रियो प्य उपेक्ष्य एव वा । उफेशाका पात्र मी कोई नहीं है। क्ति मी जैसे कल्पवृक्ष तथापि भकान् भजते यथा तथा अपने निफट पाकर याचना करनेवाग्रेको उनकी मुंह माँगी वस्तु देता है, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण भी, जो सुरनुमो यदुपाभितोऽर्यदः ॥२२॥ उन्हें जिस प्रकार मजना है, उसे उसी रूप मझते है वे अपने प्रमी मतोंसे ही पूर्ण प्रेम करते हैं ॥२२॥ फिश्चाग्रजो मावनतं यदूतमः में उनके समने विनीत मावसे सिर मुकार म्पदा हो सयन् परिप्पन्य गृहीतमम्जलौ । जाऊँगा और कटरामजी मुमकराते हुए मुझे अपने हदयसे लगा लेंगे और फिर मेरे दोनों हाप पकाकर मुसे घरके गृह प्रवेश्याप्तसमतसकर भीतर ले जायेंगे। यहाँ सब प्रकारसे मेरा सत्कार करेंगे। इसके बाद मुझसे पूछेगे कि 'म हमारे घरवालों के साम सप्रल्पते कंसफठ स्ववन्धुषु ।।२।। फैसा व्यहार करता है । ॥ २३ ॥ भीभुक उपाय मीशुकदेवजी करते-पीक्षित् ! सफापनन्दन अकर मार्गमें इसी चिन्तनमें इथेवे रपमे नन्दगाँव पहुंच इति सचिन्तयन् रुणवफलतनयाऽननि । गये और सूर्य अस्ताफम्पर फ्ले गये ॥ २० ॥ जिनके रयेन मोडल प्राप्तः सूर्यास्तगिरि नृप ॥२४॥ घरणकाली रनको सभी लोक्साल अपने किरीटोंके द्वारा सेक्न करते हैं, मकरजीने गोप्टमें उनके घरणघिहोंक पदानि ससाखिललोकपाल- दर्शन किये । कमल, या, इश मादि असाधारण फिीटमुटामलपादरणाः चिहकि द्वारा उनकी पहचान हो सी पी और उनसे पृप्पीकी शोम बद ही पी ॥ २५ ॥ उन घरणपिके ददर्श गोष्ठ वितिकौतुफानि दर्शन करते ही अजीके हदयमें इतना अहाद हुआ पिलधितान्पम्जयवाहुना ॥२५॥ कि ये अफ्नको समाल न सक, विहार हो गये । प्रेमके भावेगसे उनका गेम राम सिट उठा, नेत्रामें आँसू भर पाये तदर्शनाहादविश्वसम्प्रम और टप टपकने लगे । ये रथसे कर उस ष्टिमें स्पेटने लगे और कहने मो-'अहो ! यह हमारे प्रमुफे प्रम्पोरामाभुकलाहलेषणा । घरणोंकी रजह ॥ २६ ॥ परीक्षिस् ! कम संदेशसे रथादपस्कन्ध स तेप्वषेष्टत सेकर यहाँ तक अनजीके चिक्की जैसी अवस्था रही है, यही नीयोंके रेह धारण करनका परम एम है। इसरिये प्रभारमन्पधिरजोस्पा इति ॥२६॥ बमात्रका यही परम कम्य शिम, मय और देईमृतामियानों हिता टम्म भिय शुचम् । शोक स्यागार मगगनकी मति ( प्रतिमा, मक्क आरि) बिह, स्पय स्थान तथा गुणोंक दान-अवग आरिने मंदेशा यो हरेरिसदनभवणादिभिः ॥२७॥ दाग प्मा ही मात्र मापारन करें ॥ २७ ॥ ददर्स कप्ण राम प प्रजे गादान गतौ । अजमें पहुंचकर अपनीन श्रीवाग और बदगम गानों मायाँका प्राय दहनक म्पानमें भिगममान गम्या । श्याम- १ मपटिनगर ।२ प्राचीन पनि में मना भरमारिभिःn या पर मूममें नहीं है। ।

३६४ भीमद्भागवत [२०३८ पीतनीलाम्बरधरौ शरदम्पुरुहेक्षणी ॥२८॥ सुन्दर श्रीकृष्ण पीताम्म मारण किये हुए थे वीर गौर मुन्दर क्याम नीलाम्बर । उनक नेत्र सरकालीन कालके किशारौ श्यामलश्येतो भीनिकेतो पालुजौ । समान हिले हुए ये ॥ २८ ॥ उन्होंने भी किशोर भस्मामें प्रवेश ही किया पा । वे दानों गौर-श्याम नितिन मुमुखी सुन्दरषरौ पालद्विरदविक्रमौ ।।२९॥ सौन्दर्यकी स्मन थे । घुटनोंका स्पर्श करनेवान्टी छी-लंबी भजनजाशाम्भोजैमिहिरमिभिर्मबम् । | मुनाएँ, सुन्दर क्दन, परम मनोहर और गलाके समान लळिन पाछ पी ॥ २९ ॥ उनके घर!म पना, शोभयन्तो महास्मानावनुक्रोशसिनेक्षणौ ॥३०॥ फन, बहुश और कमम्के हिथे। नावे पछते थे, उनसे चिक्ति होफर पृषी शोमायापन हो जाती थी । उदाररुपिरक्रीरो सम्विणो पनमालिनी । उनकी मन्द-मन्द मुसकान बौर चिकन ऐसी पी, मानो दया बरस रही हो । वे मरताकी तो मनो मूर्ति ही पुण्पगन्धानुलिप्ताङ्गो सातौ विरजवाससौ ॥३१॥ | थे ॥ ३० ॥ उनकी एक एक लीला उतारता और सुन्दर कापसे मरी पी। गलेमें वनमान और मगियोंके हार प्रधानपुरुपापापी जगदत् जगत्पती । जगमग हे ये। उन्होंने अभी-अभी स्नान करके निर्म वस पहने थे और शरीरमें पवित्र बाग तथा पन्दनका अवतीर्णा जगस्पर्षे स्वांशेन पलकनवौ ॥३२॥ लेप किया ५ ॥ ३१॥ फीशित् । वरने देस कि | जगत्के मानिकारण, जगत्के परमपति, पुरुषोत्तम ही दियो विविमिरा राजन् वा॑णौ प्रभया स्वया । संसरकी रक्षाके म्येि भरने सम्पूर्ण वंशोंसे सभामग्री और श्रीकृष्णके रूपमें अवतीर्ग होकर अपनी बाकारितसे पथा मारकता मैलो रौप्पर फनकाचिती ॥३॥ | Pाओं का बन्धकार र कर रहे हैं। ये ऐसे मले माझ्म होते थे, वैसे सोनेसे मरे हुए मक्तमगि और रपाचर्णमवप्लुत्य साऽङ्करः स्नेहमिहल । चोरीके पर्वत सगमन रहे हों ॥ ३२ ३३ ॥ म्हें देने ही अक्रजी प्रमावेगसे अधीर होफर रबसे छ पपात परणोपान्त दयद् रामरुप्णयो ॥३९॥ परे और भगवान् श्रीकृष्ण तपा पनामक घरों के पास साया हो गये ॥ ३४ ॥ परीक्षित् ! मगमान्के दर्शनसे भगवानाहादयाप्पपर्याकुलेषणः उन्हें इतना आहाद हुआ कि उमके नेत्र आँसूसे सर्वच मर गये। सारे शरीरमे पुछ गयी । उस्कम्डा- पुलाचिता औस्कण्ठ्यात् स्वाम्म्याने नागफन्नुप३५/ पश गम भर पानेके कारण व अपमा माम भी न बाम सर ॥ ३५॥ शरणागतमरसर भगवान् श्रीमण भगम्निमभिप्रस्य रथानाधिवपाणिना। उमय मनरा मात्र मान गय । उन्होंने बड़ी प्रसन्नतासे पप्राधिन दापार द्वारा उन्हें पीसकर उप्रपा और परिरेमऽम्पुपाकप्प प्रीतः प्रणतवस्सल ॥३६॥ | एपसे या उिया ॥ ३६ ॥ इमो या अपये परम | म्नी श्रीपतरामजीर समन निीत मानसे गरे गपे, मरपणप प्रणनमुपगुम महामना । सब उसेंन उनसो गर एग श्रिी उनश एप दाप श्रीणने पाका तपा इमरा ग्रामबीने हों गृहीमा पाणिना पाणी मनयन मानुजागृहम्।।३०|| | माइ उन्हें घर स गर ॥ ३७ ।। १ नमः।

4.३९] दशम स्कन्भ ३६५ प्रताप स्वागतं वस्मै निषेप च परामनम् । घर ले जाकर भगवान्ने उनका या वागत-सत्कार किया । कुशल-माल कर श्रेष्ठ मासनपर बैठाया धौर प्रषास्प विधिवत् पादौ मधुपर्कारणमाहरम् ॥३८॥ विधिपूर्वक उनके पाँव पलारकर मधुफ्क (शहद मिय [भा रही ) वादि पूनाकी सामग्री मेंट की ॥ ३८ ॥ निवेय गां पाविषये संपाम भान्तमास । इसके बाद मगवान्ने अतिथि अफ्रजीको एक गाय दी और पैर दबकर उनकी फाफ दूर की समा या अन्नं पहुगुणं मे भदयोपाहर विस ॥३९॥ भादर एवं प्रवासे उन्हें पवित्र और अनेक गुणोंसे युक्त भारका मोजन कराया ॥ ३० ॥ जब वे मोचन कर चुके, सस्मै मुक्तवते प्रीत्पा रामः परमधर्मविस् । तब धर्मक परम मर्म मगवान् मलामनीने बहे प्रेमसे मुस्वास (पानरस्त्रयची मादि) और सुगन्धिम ममला बादि देकर मसवासैर्गधमारयै परांप्रीतिं म्पधात पुन ॥४०॥ न्हें अत्यन्त वानन्दित किया ॥ १० ॥ इस प्रकार सत्कार दो मुक्नेपर नन्दरायनीने उनके पास जाकर पप्रन्छ सस्कर्स नन्दः कर्ष स निरनुग्रहे। शा-निफनी ! आफ्ग निर्दयी सके जीतेची | किस प्रकार अपने दिन काटवेवरे। उसके रहते माप से बीवति दाशाई सौनपाला पावयः ॥४१॥ होगोंकी की दशा है,जो फसाईशारा पानी र मेवोंकी होती है॥११॥ मिस इन्द्रियराम पापीने अपनी किस्टहती हई मोऽमधील स्वस्वसस्तोकान् मोशन्स्पाममुहप्स्सलः। इनके नत-नोपयों को मार गम पापल्प्रेग उसकी प्रचा हैं। फिर कप मुसी है, यह मनुमान तोहम कर ही कैसे किं नु सित्तस्प्रमाना पाहन विमक्षामहे ॥४२॥ सकते हैं ॥१२॥ अननीने नन्दपामसे पहले ही कुश- म्भल एरिया पा। जब इस प्रकार इत्पं बनतया पापा नदेन सुसभाजितः। वाणीसे आकरचीसे कुशल माळ पास और उनका सम्मान किया तब अरनीके शरीरमें गवा चलनेकी गो कुछ मकरः परिपप्टेन बापनपरिभमम् ॥४३॥ | पाक थी, यह सब दूर हो गयी ॥ १३ ॥ मावाने मर इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्पा संहितायो दशमस्कर पूर्षि भागमन मामघात्रिंशोऽप्पाप ॥ १८ ॥ अथेकोनचत्वारिंशोऽध्याय श्रीकृष्ण-बसरामका मपुरागमन भोमु उपाय शुकदेवजी कहत है- भगवान् श्रीकृष्ण और सुखोपविष्ट पर्यो रामहप्णोरुमानितः । कररामनीने मकरनीका मीमांति सम्मान किया। वे माराम से फलंगपर बैठ गये । उन्होंन मार्गम नो नो नमित्यपाएँ लेमे मनोरथान् सर्वान् पषि यान्स पावर ह॥१॥ की थी, ये सब पूरी हो गयी ॥१॥ परीक्षित् ! पपीके फिमलम्पं भगति प्रसन्ने भीनिकेतने । आश्पम्मान मगवान् श्रीकृष्णक प्रसन्न होनेपर ऐसी १ मुगान् । २ प्राचीन मतिम पूर्वाधा या पाठ महारे। ।

३६६ श्रीमहागवत [1० ३९ तथापि तत्परा राजमा हि याभ्छन्ति मिशन ॥ २॥ | कौन-मी यस्तु है, जो प्राप्त नहीं हो सकती । फिर भी | भगवान्के परम्प्रमी मकान किसी भी वस्तुकी कामना सार्यतनाशन कृत्या भगवान देवकीसुतः । नहीं करते ॥ २॥ देवकीनन्दन भगवान् श्रीकने सायाालका मोक्न करनेके बाद अमूरजी के पास कार सुस्सु पचे फंसस पप्रच्छान्पविकीर्पितम् ।। ३ ।। अपने खजन-सम्पन्धियों के साम करके म्हार और उसके माले कार्यक्रम के सम्बन्धमे प्रध्य ॥३॥ श्रीभगवानुवाच भगवान् श्रीकृष्णमे कहा-पापा । धापका दप बहा शुद्ध है। आपको यात्रामें कोई कह तो नहीं सात सौम्मागतः कचित् स्वागत मद्रमस्यः। हुया ! स्वागत है। में माफ्की माकामना करता है । मयुराके हमरे वात्मीय पुद, कुटुम्बी तथा बन्य सम्बन्धी सम्म सकुशल और लस म॥२॥ हमरा अपि स्वशासिमन्पूनामनमीवमनामयम् ॥ ४॥ माममात्रका मम स तो हमारे कुलके लिये एक स्पार म्पाधि । जबतक उसकी पती हो रही है, तक्तक किं नु नासलं पन्छे एभमाने लामये । हम अपने वंशवालों और उनके बाल-बयोंका कुशल माह क्या पूर्वे ॥ ५॥ चाचानी हमारे लिये या कसे मासुलनाम्पा स्वाना नम्तरप्रशसु च॥५॥ यो सेदकी बात है कि मेरे ही फारण मेरे निरपराध और सामारी माता-पिताको अनेकों प्रकारकी यातनाएँ मेमनी पड़ा-सरा-सरके का उठाने पड़े। और तो महो अमदद मूरि पित्रोखिनमार्यो । क्या करें, मेरे ही कारण उन्हें इफ्कली डीसे जाकर जेमें गल दिया गया तपा मेरे ही कारण उनके बन्ने यदेतो पुत्रमरणं मदेसोन्धनं तयो ॥६॥ मी मार राले गये ॥ ६ ॥ मैं बहुत गनोंसे चाहता पा कि अपोमिसे किसी-न-किसीका दर्शन हो । विष्टयाम पनि स्थान ममेशा सौम्म काक्षितम् । या सौमम्पकी बात है कि आप मेरी बह अमिमष्य पूरी हो गयी । सौम्यम्वमाम चापाणी ! अब आप क्या करक मजात वर्मता तात तवागमनम्मरणम् ॥७॥ यहाइमे कि वाफ्का मुभागमन विस निमिसे मा ॥७॥ मीमुक उवाच भीशुकदेवसी करते-परीक्षित् ! अव भगवान् श्रीरणने अनजीसे इस प्रकार प्रभ किया, हम उन्होंने पृष्टो भगवता मोबणेयामास माषष । नगया कि कमने तो मी यदुवंशियोंसे पोर और पैरानुबन्ध पदप पसुक्यवधोपमम् ॥ ॥ अम रकम है। मुतनीको मार सम्नेका भी उपम कर चुका है॥८॥ कारजीन क्सका सन्देश पसंदेशा यदर्थ वा दूताः संप्रेपितः स्वयम् । और निस उदेश्यसे उसने सय वरमीको दूत बनाकर | भेजा पा और मारदबीने मिस प्रकार पमुदक्के पर श्रीहरण- यदुर्स नारदेनास्प सम मानकन्दमः ॥९॥ के जन्म लेनेका वृत्तान्त उसको मारिया बा, सो सरकार १३।२ वाप।

देशम स्कन्ध ३६७ भुत्वावरः कृष्णो पलम परवीरहा । मनाया ॥ ९॥ भकनीकी यह पात सुमकर विपक्षी शत्रुओं का दमन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण और माम- प्रास नन्दं पितरं राबाऽऽदिष्ट विजमातुः ॥१०॥ जी हँसने लगे और इसक सद उन्होंने अपने पिता नन्दमीयो क्सकी माझा सुना दी ॥ २० ॥ सम नन्द गोपान समादिश्चत् सोऽपि ऐपता सर्वगोरसः। पायाने सब गोपोंको आजादी कि 'सारा गारस एकत्र करो । मेकी सामग्री ले लो और छको योगो ॥११॥ उपायनानि गुडी पुन्यन्ता छस्टानि च ॥११॥ प्रान का ही हम स्व मथुराकी यात्रा करेंगे और यहाँ पर राना कसको गोरस देगे । वदों एक बहुत यास्थामा यो मधुपुरी दास्सामो नपठे रसान् । बड़ा उत्सव हो रहा है। उसे देखने के लिये दशकी सारी द्रक्ष्यामः मुमहत् पर्ष यान्ति मानपदा छिल । प्रजा इमली हो रही है । हमगग मी उसे देखग ।। नन्दयायाने गाँपके फोतवाल द्वारा यह घोषणा करे अममें एषमापोपयत् सत्ता नन्दगोपः खगोले ॥१२॥ करवा दी ॥ १२ ॥ गोप्यत्तास्तदुपभुत्य पम्यमिता भृशम् । परीक्षित ! जर गोपियोंने सुना कि हमारे मनमोहन श्यामसुन्दर और गौरमुर पराममीको मधुरा से जाने के रामप्णी पुरी नेतुमकूर ग्रनमागतम् ॥१३॥ प्रिये अपनी में कार्य है, तत्र उनके अपने बड़ी ज्यपा दुई। ये पाकुउ हो गयीं ॥ १३ ॥ मगवान् श्री. कणके मथुरा जानेकी बात सुनते ही मौके हृदयमें फाधिमकवावापासम्लानमुखाथिया । एसी नमन र वि गरम साँस चल्ने सगी, मुम्पकमल संसदलबलयमरानन्ध्यम कापन ॥१४॥ कुम्हत्य गया । और बहुतोंकी ऐसा दशा हुई इस प्रकार अयेत हो गयी कि उन्हें मिसकी रोइनी, अन्याय उदनुपाननिस्तापाचपः। शिरत हुए न और ढीस ए नूहोंकका पान रहा ॥१४॥ भगवान्के समापया ध्यान आतेही बत- नाम्पसननिर्म साफमामला गता इस ॥१५॥ सी गोरियोची चित्तातियाँ सश्या निात हा गयौं, मानो समाविम्य-आरमामें तापी हो, और उन्हें मानस्पपापस प्राररनुरागस्मितरिता । मरन शार आर संसरपा पुट प्यान ही न रहा 174|| बातमी परियॉक मामन भगवान् श्राागा प्रम, रदिशाधिपदा गिरा मममह जिप ॥१६}} उमरी मा म मुमान आर ' पपरन मारी विचित्र पसे युक मधुर वाणी भाषन । उसमें तल्लीन हो गी | माहिती गपी ॥१६॥ ग्यपियों गति मुलतिका पेय सिन्धामावलारनम् । मन-ही-मन भगवानही या घ, भाष-मनी, प्रमभी मुममान, पिनयन, सारे मा मिटा नाही शाकाहानि नमाणि प्राराममरितानि ॥१७॥ यिपि तपा प्रमाभी नाश रिमन पाने गा भार टनक मिहन भपये कालाहाग 1 उनस चिन्तपनपा मुइन्दल भीता गिरा। एप, उमा मान्न म मगा प्रति समति १rnमण न भ प म ।

३६८ श्रीमद्भागवत [अ० ३९ गोप्य पु । ममेवा सदश प्राधुरमुरुपोऽम्पुताशयाः ॥१८॥पा। उनकी बॉोसे माँसू बह रहे थे। ये मुरकी अर इकट्ठी होकर इस प्रकार कहने लगी ॥ १७१८॥ गोपियोंने कहा-पन्य हो विधातातुम सब अहो विधावस्तर न फचिद् दया विधान तो करते हो, परन्तु तुम्हारे हदयमें दया देश भी नहीं है । पहल सा तुम सौहार्द और प्रेमसे मादक संयाज्य मश्या प्रणयन देहिनः । प्राणियोंको एक-दूसरेके साप जोर देते हो, उन्हें वापसमें एक कर देते हो, मिरा देते हा, परन्तु अभी उनकी खांमारवायान् विपुनहषपार्थक आशा-अमिश्रषाएँ पूरी मी नहीं हो पाती, वे कृप्त भी नहीं हो पाते कि तुम उन्हें म्पर्प ही अउग-अलग कर विक्रीरितं तेऽभकषेटिस यथा ॥१९॥ देते हो ! सच है, तुम्हारा यह सिम्मा बोंके सेमी सरह म्पर्ष ही है ॥ १९ ॥ यह कितने दुसकी पान यस्त्वं प्रदश्यासिसकुन्तलापूर्त है। विधाता ! तुमने पहले हमें प्रेम वितरण करनेवाले रामसुन्दरफा मुसक्सर दिसत्यया । कितना सुन्दर मुन्टवक्त्र मुकपोलमममम् । बह ! काले काले धुंधराले भाउ पसोडापर मकर हैं। मरफ्तमणि-से चिकने समिध फसोऊ और तोतेकी पोकापनादम्मिलेनमुन्दरं | चाँध-सी सुन्दर मासिका तप अधरोंपर मन्द-मन्द मुसकानकी मुमर रोग, गो सारे दोनोंको समय फगापि पारोक्ष्यममा त कतम् ॥२०॥ भगा देती है । विधना ! तुमन एक पर ता में वर परम पुर मुम्परम3 Pाया और अप उसे ही हमारी पूरस्वममममारम्यया म्म न नागासे ओमन कर रह हो । मचमुम तुम्हारी यह करत बहुत ही अनुचित ॥२०॥ हम जानती पार्टि दस रस पनामयन् । है, इसमें अपूरपास नहीं है। यह तो साफ तुम्हारी पुरता ६। नवमें मुम्ही अरफ नामस को भाये को मार जानी दी तुम हममे मर्गरी मन्ति पनादाविरमगाएर छीन गह हो। नक ग म "पामानक पाएर जाम सम्हारी यग्गिा सम्ग सौम्य निहानी गर्मी बदीयमद्राम पर मदिप ॥२॥गता ! सुम्द ऐमा मही चाहिए ।। २१ ।। न नन्दमनु यसभामाद अह ! मनग्न सम्मानका भी मपनप म्ोने मे ने बानी पर पदगी है। सड़ी- मर्मायन न पानातुग न। नरा मगर, न प्रप प भरमें पहल गया हम आने पासार, सन सम्पनी परिपुर पिमान पवनान मुलान पनी मापिस नही मी मनी Fr पर mt Ji माराममदागमा नप्रियः ॥२॥ ? frrin लोपा मग ॥ २२ ॥ -or I. ५ ।। । । A - म. ३९] दशम स्कन्ध मुखं प्रमाता रखनीयमाशिपः लामकी रातका प्रास काल मयुराकी सियोंके लिये निमय ही बड़ा मालामय होगा। भान उनकी मात दिनोंकी सत्या पवा पुरयोपियां सुषम् । मभिलाषाएँ भास ही पूरी हो जायगी । जब हमारे समान माः संप्रविष्टस्य मुस्ल अपस्पते: श्यामसुन्दर अपनी तिरछी चितवन और मन्द-मन्द मुसकानसे युक्त मुखरबिन्दका मादक मधु मितरण करते पास्सन्स्पपालोस्कलिससिसासपम् ॥२३॥ र मथुरापुरीमें प्रवेश करेंगे, तब वे उसका पान करके वासां मान्दो मधुममुभापित फ्य-धन्य हो आयगी ॥ २३ ॥ यपपि हमारे श्यामसुन्दर धैर्यवान् होनेके साप ही नन्दयाया मान गुरुज की Pीतचिसः परवान् मनस्पपि । आशामें रहते हैं, तपापि मयुराकी पुवतियों अपने मधुके समान मधुर पचोंसे इनका पित परमस फर्य पुनर्न: प्रतियास्यतेऽवला अपनी भोर खीच ऐंगी और ये उनकी सछन मुस्कान ग्राम्पा सलखमिवपिनमर्ममन् ॥२४॥ तया बियसपूर्ण भाव-मैग्निसे यहीं रम जायेंगे । फिर हम गवार म्यारिनोंके पास ये लौटकर क्यों माने एगे बप हर्ष र शो भषिच्यते ॥ २९ ॥ धन्य है मार हमारे श्यामसुन्दरफा दशन करके मयुराके शाई, भोग, बन्धक और दृष्णिवशी दावाईभोजान्धकप्णिसात्वताम् । यादोंके नेत्र अवश्य ही परमानन्दया साक्षात्कार करेंगे। महोत्सवः श्रीरमण गुणास्पद पात्र उनके यहाँ महान् असत होगा । सपही जो लोग यहाँसे मपुरा बाते हुए रम्परमण गुणसागर द्रस्पन्ति ये चायनि देवकीसुतम्॥२५॥ नटनागर देवकीनन्दन श्यामसुन्दरका मागमें दर्शन । करेंगे, वे भी निहास हो जायगे ॥ २५ ॥ मैतविधसाफल्मस्प नाम म देखे सधी ! यह सफर किसना निन, फितना एयहीन है। पर तो हम गोपियों इतनी दुखित हो दर इस्पेसदसीय दारुणः । रही है और यह हमारे परम प्रियतम भन्ददुलारे न्यामसुन्दरफा हमारी आँखोंसे लोनउ फरक महुत दूर से याऽसावनाधास्स सुदुःखित अन जाना घाइता है भौर दो मात फट्या हमे धीरन मी नहीं बध्यमा, आचामन भी नहीं देता । सचमुष ऐसे प्रियास्प्रियं नेप्यति पारमम्बनः ॥२६॥' अपन्स फर पुरुषका '' नाम नहीं होना चाहिये प॥२६॥ सदी । हमारे य श्याममुम्दर मी तो पम अनाभीस समासिता ग्य निठुर नहीं है । दोन-दाडो, वे मी रपर र ग्य । और मलयाले गोपगग एकसारा उनके साथ जानक समन्वमी च स्वरयन्ति दुर्मदा । शिये किती रण मचा रहे है। सपमुच ये मम्म हैं। और हमारे पाह। उन्होंने ता इन व्यगोपी गापा अनामि म्पविरैरुपधिस जानी मा उपेक्षा काही मिना जो मनमें जाये, फो। अब हम क्या परें । आज विराना देवं घ नाऽघ प्रतिदूतमीदते ॥२७॥ मका डम्बरे प्रतिार घटा कर रहा है।॥ २७॥ १ नाथ । । मत १४- ३०० भीमद्भागवत निवारपाम: समपेत्प माघर्ष मे, इम सर्य ही कर पपने प्राणपरे किनोऽकरिप्पन कुलामान्यमाः । श्यामसुन्दरको रोकेंग; कुमके पो-म्हे और खुपन हमारा क्या कर सोधरी सखीम वा एमके सुकन्दसनामिमिषार्षदुस्स्पजाद् लिये भी प्राण्यन्धम नन्दनन्दनका सा अपने कार्य थी। बाज हमारे दुर्भाग्यने हमारे सामने उनका पियोग देवेन विषसिपदीनचेतसाम् ।।२८॥ उपस्थित फरके हमारे चिक्तको विनष्ट एवं पशकुन का यस्पानुरागललिवमितबल्गुमन्त्र दिया है ॥२८॥ ससियो । जिनकी प्रेमभरी मनोहर मुस्कान, रहस्यकी मीठी-मीठी बातें, निम्सपूर्ण क्तिकन लीलाबलोकपरिरम्भणरासपाप्माम् । और प्रेमालिनसे हमने रासलीलकी वे रात्रियों को बहुत विशाल वी-एफ क्षणके समान बिता दी। नीताः स नः धणमिव क्षणदा विना से मम मस्त्र, उनके मिना हम उन्हीकी दीवार विट्रम्पपाका पार कैसे पायेंगी ॥ २९ ॥ एक दिनको गोप्पा कथं न्वतितरेम तमो दुरन्तम् ।।२९॥ नहीं, प्रतिदिनकी बात है, सायकालमें प्रतिदिन के बालासे घिरे हुए मामबीके साप पनसे गोर योगः पये प्रजमनन्तसमा परीतो घराकर अटते है। उनकी काली काली धुपी माझे और गलेके पुष्पहार गौओंके खुरकी रमसे ढके रास्ते गोपैपिंधन खुररनछुरितालफसफ् । है। वे बाँसुरी बनाते हुए अपनी मन्द-मन्द मुसमान घेणु कमन् सितम्टापनिरीक्षणेन पौर तिरछी चितवनसे पेस देखकर हमारे दपको पेव उसे है। उनके पिमा मला, हम कैसे की वित्त विकास्पसमते नु कय भवेम ॥३०॥ ( सकेंशी ' ॥ ३० ॥ भीमुक उपाय भीएकोषमी कावे?-परीक्षित् ! गोषित वाणीसे तो इस प्रकार कर रही पा, परम उमर एवं वाणा विरहावरा मूर्ख एक एक मनोभाव मगवान् श्रीकृष्णका स्पर्श उनक प्रमसिया फणविपक्तमानसाः । वामिन कर रहा था । वे पियकी सम्भावनासे अपन न्याकुल हो गया और अब मेकर हे गोविन्द ।। विसन्म लग्ना रुनु म सुस्वर दामोदर ! हे मामय इस प्रकार उघी वापसे गाषिन्द दामोदर माधवेति ॥३१॥ पुकार-पुकारकर सुमित स्वरसे राने मा॥३१॥ गोपियों इस प्रकार से बीपी ! रो-रोते सारी रार सीगामष रुदन्तीनामुदिते सवितर्यच । पीत गपी, सूर्योदय हुन् । बकरजी सध्या पर मरमोदयामास समेवादिको रथम् ॥३२॥ और उसे हक से चले ॥ ३२ ॥ मन्दमाका अरि । आदि निस्य कर्मोंसे नित्त होफर रबार समार गोपातमन्वसन्धत नन्दापाः शफटैस्ततः । गोपोने भी दूध, दही, मसन, श्री मारिसे मरे मटो पौर मेंटकी मान-सी सामग्रियों से मैं तपा आदायोपायर्न निकुम्भान् गोरससम्भृतान्॥३३॥ | छतोंपर पाकर उनके पीछे-पीछे पले ॥ ३३ १ति समवे। - ३७१ ५० ३९] दशम स्कन्ध गोप्यम दमित रुप्पमनुवयानुरञ्जिता । इसी समय अनुरागके रंग रंगी हुई गोपियाँ अपने प्राणप्यारे श्रीकणके पास गयी और उनकी स्तिक्न, मुसकान मादि निरसकर कुछ-कुछ मुखी । अब वे अपने प्रत्पादेर्श भगपतः कान्स्पायलसिरे ॥३४॥ प्रियाम श्यामसुन्दरसे कुछ सन्देश पानकी माकाहासे नहीं सकी हो गयीं ॥ ३१ ॥ यदुर्वशशिरोमणि मगवान् तास्तथा सप्पशीर्मीत्य स्वप्रमाने यदत्तमः । श्रीकृष्णने देख कि मेरे मथुरा मानेसे गोपियों के दपमें की कान हो ही है, वे सन्तप्त हो रही है, तब नहोंने दूतके द्वारा में बाउँगा' यह प्रेम सन्देश मेमकर सान्तयामास सप्रमैरामास्स इति दौस्यकैः ॥३५॥ छ, पीरन बघाया ॥ ३५ ॥ गोपियोंको सकतक रफकी पम मौर पहियोंसे ठपती पुष्ल दीखती ग्री, पापदालस्यते फेर्याव रेम् रपस्य च । तस्तक उनके शरीर चित्रलिखित-से ही ज्यों-त्यों सदे रे । परन्तु उन्होंने अपना पिच तो मनमोहन प्राणवछम श्रीकृष्ण साप ही मेन दिया था ।। ३६ ॥ अनुप्रस्थापितास्मानो उस्मानीवोपलक्षिता ॥३६॥ ममी उनके मनमें वाशा थी कि शायद श्रीकृष्ण कुछ दूर ज्यकर औट भायें । परन्तु अब नहीं दे, तव वे ता निराशा नियात!पिन्दविनिवर्तने । निराश हो गया और अपने अपने घर पठी भायी । पीशित् 1 वे रात-दिन अपने प्यारे सामसुन्दरफी दीपोंका गान करती रहती और इस प्रकार अपने विनोफा महनी निन्पुर्गाफन्स्पः प्रियटितम्॥३७॥ शोकसन्तापको इन्का करतीं ॥ ३७॥ भगवानपि सम्प्राप्तो रामाधस्तो नृप । परीक्षित् । इपर भगवान् श्रीकृष्ण मी क्लरामजी और बकरीके साप वायुके सम्पन धेगवारले रपपर रमेन पायुवेगेन कालिन्दीमधनामिनीम् ॥३८॥ सवार होकर पापनाशिनी यमुनामीके किनारे जा पाचे ॥ ३८ ॥ यहाँ उन अगोंने हाम-मुँह घोपर पमुनानीका तत्रोपसाश्म पानीय पीस्वा मूट मणिप्रभम् । भरतमणिके समान नी मौर अमृत के समान मीठा क्स पिया । इसके बाद मामयीके साय मगवान् पपमपमज्म सरामो रयमाविशत् ॥३९॥ पक्षोंके मुरमुग्में सो रपपर सवार हो गये ॥ १९ ॥ भरीने दोनों भाइयोंको रमपर बेवकर उनसे आझा मफरस्तावपामन्य निवेश्य च रथोपरि । ये और यमुनाचीके कुण ( अनन्त-तीर्य या प्रसाद ) पर जाकर वे विधिपूर्वक लान करने लगे ॥१०॥ क्यालिन्या इदमागत्य सानं विधिवदाचरद ॥४०॥ उस पुरागमें स्नान करने के बाद से पमें अवधी लाकर गायत्रीका पर फरने यो । उसी समय परके भीतर निमन्पपसिन् सलिले जपन् मम सनातनम्। अक्रूजीने देख नि श्रीकृष्ण और ममाम दोनों पर वाव दरशेफरी रामकृष्णौ समन्विती ॥४१॥ एक साथ ही बैठे इए है।। ११ || अब उनके मनमें यह शाराई, अमदेवगीके पुत्रोको केम रयपर दौ रथसौ रूपमिह सुतावानकन्दमः। मेस पापा, मावे महा नमें से था गये ।

३७२ भीमहामव सहि स्वित् स्पन्दने न स्त इस्युन्मन्न्य व्यपष्ट सः॥४२॥ सब यहाँ हैं तो शम्रपद रपपर नहीं होंगे। ऐस सोचकर नोंने सिर बाहर निकालकर देख ॥१२॥ तत्रापि च यथापूर्णमासीनौ पुनरेव सः । धे उस रषपर भी संवत् बैठे हुए थे। मोने य सोचकर कि मेने उनैनो में देख पदमम न्यमन्मत् दर्धनं यन्मे मृपा किंमलिले तयोः॥४३॥ ही रहा होगा, फिर दुक्की गायी ॥ १३ ॥ परस्तु भूमस्तत्रापि सोऽद्राधीन स्तूसमानमहीपरम् । फिर उनोंने कहा मी देख कि साक्षात् कान्तदेव श्रीशेषची निराचमान है और सिद, कारण, गर्व एवं सिवचारणगन्धरसुरैतकन्धरै ॥४४॥ अमर अपने अपने सिर झुकाकर उनकी स्तुति कर हे हैं ॥ ११॥ शेषनीके चार सिरह धौर प्रत्येक साहसचिरस देवं सहस्रफगमौलिनम् । फगर मुकुट सुशोमित है। कमलनारके समान | उम्पछ शरीरपर नीलाम्बर धारण किये हुए और नीलाम्परं पिसावेत मृगः श्वेतमिव म्बितम् ।।४५॥ उनकी ऐसी शोमा हो ही है, मानो सहन सिमोसे युक्त श्वेतगिरि फैलास शोमायमान हो ॥ १५ ॥ सस्सोस्सरे घनश्याम पीतकोशेपवाससम् । वामीने देख कि शेषनीकी गोद में श्याम मेयो पुरुष पतुर्सन शान्त पपपत्रारुपेक्षगम् ॥४६॥ समान धनश्याम पिराबम्पन हो रहे हैं। रोमी पीताम्बर पहने है। पी ही शाम्त धर्मग मति है और काम्के रसके समाम रतनारे नेत्र पारुप्रसमवदन चालासनिरीषणम् । ॥१६॥ ठनका पदन बड़ा ही मनोहर भोर प्रसमसला सन है । उनका मधुर हास्य और चारु पितान सुप्रमसं चालक मुफपोलास्गाधरम् ॥४७॥ विसको पुरापे लेती है । महि मुन्दर और नासिका तनिक ऊपी तपसी ही मुघा है । इन्दर फार प्रलम्बपीवरसुर्ज तुझांसोरापलभियम् । क्सोल और मलाल अपगेकी छटा निराम ही कम्मुकर्म निम्ननाभि पलिमपल्लवादरम् ॥४८॥ ॐच और का स्मल छम्मीबीका वाभ्यम्बान है ॥ १७ ॥ बहिं पुनातक ठंडी और पुत्र १ शाके समान उनपर पदावधाम पुरोल गत्र, गह पास्कटितटभोणिकरभोरुश्यान्वितम् नामि और विकलीयुक उदर पीपसके पके समार शोमायम्मन है ॥ १८ ॥ स्पूछ फटिप्रदेश और नितम पारमानुयुगे पारुमायुगलसंयुतम् ॥४९॥ हापीकी रके समान नाघ, अन्दर घटने एवं विधि हैं। एपीके व्यरकी गाँटे उमरी ई और मास-म गुरसारणनम्बवावदीधितिविम् नोंसे दिव्य म्योतिर्मय किरणें फैल रही है । परम् नयारपष्टदपिलसस्पादपङ्करम् कसको गुश्यिों और अंगूठे मयी और कोम । पंखुड़ियों के सम्मन मुशोभित है ॥ १९५० ॥ अफ मुमहाईमणिवातकिरीटफटकारदै बहुमून्य मणियोंसे बड़ा आ मुकुट, फरे, गन्दी करिषमाम्यहारनपुरहमाले करधनी, हर मपुर मौर कुमासे सम्म यहोपवीत ॥५१॥ इ दिम्यति मागत हो रही है । एक हाप ८ १ मि मापतिमिरनु । २ सिंप! ३ माईमनियत | । । - H सरोवरमें अकूरजीको भगवदन

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ब०४०] दक्षम स्कन्ध ३७२ . भ्राजमान पपकर प्लपक्रगदाधरम् । शपमा पा रहा है और शेष सीन हामि शख, चक्र और गदा, कम सलपर श्रीक्सका चिस, गोमें कौस्तम भीवस्सवक्षस प्रावत्कौस्तुमं वनमालिनम् ॥५२॥ मणि और वनमात्र लटक रही हैं। ५१५२ ॥ नन्द-मुनन्द यादि पार्पद अपने सामी', सनकादि सुनन्दनन्दप्रमुग्वैः पाप? सनकादिभिः । परमर्यि परप्रमा, ब्रह्मा, महादेव आदि देवता 'सर्वेसर, मरीचि आदि नौ प्रमण प्रध्यपति और प्रहाद-नारद सुरेक्षेप्ररुद्रापर्नर भिष दिसोचमः ॥५३॥ आदि मगवान्के परम प्रमी मक्क तथा आठों पस अपने परम प्रियतम 'मगवान्। सममकर मिन-भिन्न मार्बोके अनुसार निर्दोष वेदपाणीसे न्की स्तुति कर रहे प्राहादनारदषमप्रमुखैर्भागवतोचमः १॥५३-५१ ॥ साप ही व्मी, पुषि, सरस्वती, कान्ति, पीर्ति और पशि (पर्याद ऐधर्म, 45, हान, स्तूयमानं पृथग्भाषचोभिरमलास्मभि ॥५४॥ थी, पर बोर वैराग्य -ये परेपर्यहप शक्तियाँ ), इला ( सन्विनीरूप पृथ्वी-शक्ति), उर्जा ( अाशक्ति), श्रिया पुष्टया गिरा फान्त्या कीस्पा तुष्टयेलयोर्जया । | विषा अविधा ( नीवोंके मोक्ष और बन्धनमें कारणरूपा पहिरक शक्ति ), हादिमी, संविद (वन्तरमा शकि) विषयाविषया वस्या मायया च निषेवितम् ॥५५॥ वीर माया बादि शझियाँ मूर्तिमान् होकर उनकी सेवा फर ग्री॥५५॥ विलोक्प सुमृशं प्रीतो भक्त्या परमया युतः। भगवान्की यह मॉकी निरसकर वरजीका एप परमानन्दसे छलाथ्य मर गया। उन्हें परम भकि प्राप्त हो गयी । सारा शरीर क्शिसे पुलक्ति हो गया । हप्पचनरूहो भारपरिलिमारमलोपन ॥५६॥ | प्रेमावर उत्फ होनेसे उनके नेत्र औमसे मर गये ॥ ५६ ॥ अव अमरजीने अम्ना साहस स्टोरयर गिरा गद्गदयास्तापीत् सम्पमालम्पसात्वतः। मायान्के चरणों में सिर रम्पफर प्रण्यम किया और घे ठसमे पार हाप जोपर पड़ी सावधानीसे धीरे-धीरे गद्गद स्वरसे मामान्यी स्तुति करने प्रणम्प नापहिता वाललिपुटः शनैः ॥५७॥ एगे ॥ ५७ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्पो संहितायो दशमस्यत्यै पूर्विर प्रतियाने एकोनयस्वारिंशोऽम्पप ॥ ३० ॥ अथ चत्वारिंशोऽध्याय मामी हारा भगपान् मीराणसी स्तुति भाजी पास-प्रभो ! पर प्रति मानि समान नवाऽस्म्पद त्वाग्विलहतात पारणोंके परम पागम है । बपदी मविनाशी पुस्पोरन नारायण रुपमापमम्ययम् । नारापग तपा मार ही माभिरसटसे टन हानीम १ पान । २ मविपान मामेकन । मनर उपाय .

३७४ भीमद्भागवत [a.. - पभाभिमासादरविन्दकोशाद अविवि मा है, स्न्हिोंने इस परावर मगल्की सी की है। मैं वाफ्के चरणमि नमस्कार करता है ॥१॥ प्रमाऽऽविरासीत् यस एप लोकः ॥१॥ | पृप्पी, कल, अम्नि, वायु, आकाश, महार, मन, प्राप्ति, पुरुष, मन, इन्द्रिय, सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषय भूस्तोयमग्निः पवनः स्वमादि और उनके भविष्यावदेवता--यही सम बराबर मात् महानचादिर्मन इन्द्रियाणि । | सपा उसके म्यवहारके कारण है और ये सम्म सब आपके ही वासरूप है ॥२॥ प्रहति और प्रतिसे सर्वेन्द्रियार्था विषुधाय सर्वे उत्पन होनेवाले समस्त पदार्य पदहाति के द्वारा प्रन किये जाते हैं, इसलिये ये सम बनाना । वनामा ये हेतवस्ते बगवोजमूताः ॥२॥ होने के कारण पर बौर इसध्येि वापका सस्म नई जाम सकते । क्योंकि माप तो सप वास्मा ही पारे । नैते स्वरूप विदुरात्मनस्ते | राजी वपश्य ही वापके स्वरूप है। परन्तु ये प्रति गुण रस्से युक्त है, इसम्पेि थे मी आपकी प्रकृतिका मप्रादयोऽनास्मवमा गृहीताः। और उसके गुणोंसे परेका सरूप मही जानते ॥ ३॥ साधु योगी सर्य अपने क्त मरणमें सिस जसमीर अमोऽनुपदः स गुमेरमाया के सपने समय भूत-मौतिक पदार्थ म्पाप्त परमात्मा के रूपमें धौर सूर्य, चन्द, अग्नि थादि देवमासाळमें रस गुणात् पर घेद न से स्वरूपम् ॥ ३॥ देवता के रूपमें तप उनके साक्षी महापुरुष एवं स्वां योगिना यनन्स्पदा महापुरुपमीपरम् । नियता ईबरके रूपमें साक्षात् वापकी ही उपासना करते है॥१॥ बहुत से कर्मकाण्डी मामण फर्ममार्गका उपदेश साम्पास्म साभिमूतं च साधिदैवं च साधवः ॥ ४॥ परनेवाली प्रयीविचाके हारा, जो आपके इन्न, मम्नि धादि वनेक देवयाचक नाम तपा बम्हस्त, समर्षि वादि अय्या च विषमा फेषित् स्वां नैवैतानिका विवाः। मप बताती है, पो-बड़े पर करते हैं और पजन्से वितवैर्यझर्नानारूपामराम्म्पया ॥५॥ उनसे वापकी ही उपासना करते है॥५॥ बात से पानी अपने समस्त फोका सम्पास कर देते है और एके स्वाम्बिलकर्माणि संन्यस्योपशम गवाः । शाम्तभाव में स्मित हो जाते है। इस प्रकार कानयाके शरा बानस्वरूप बापकी ही बाराधना करते हैं॥६॥ मानिनो पानपमेन यजन्ति मानविग्रहम् ॥ ६ ॥ और भी बहुत से संस्कारसम्पन्न अपवा शुरवित वैष्णा- अन्ये च संस्तवात्मानो विधिनामिहितेन से । जन आपसी स्तपीहरपाचरात्र मादि धिोंसे समय होकर आपके पर वार बने और मारापकरूप पन्ति स्म मपास्त्वा वै बहुमन्कतिकम् ॥ ७॥ एक स्वतपकी पूजा करते हैं ॥ ७ ॥ मापन् ! इसरे ग्रेग शिानीक धरा काये हुए मार्गसे, विसापर्य स्वामेवान्ये शिवोकन मार्गेण शिपरूपिणम् । भेसे बनेर वास्तर-भेद भी, शिवसमाप आपकी महापापरिमेरेन भगवन् समुपासते ॥ ८॥ ही पूजा करते हैं ॥ ८ ॥ सामिन् ! नो छोग दूसरे देवताओंकी मकि परत बार उन्हें मापसे मिल सई एष पन्ति लो सरदेवमपेबरम् । समानते हैं, ये सप भी मास्तर मापसी मारापना म०४०] ३७५ येऽप्यन्यदेवतामका यद्यप्यन्पषिय प्रभो ॥९॥ करते हैं, क्योंकि आप ही समस्त देवताओं के रूपमें है और सर्वेश्वर भी हैं॥९॥ प्रमो 1 से पर्वतोंसे सब ओर यहुत-सी नदियाँ निकाम्नी है और वाकि नरसे यपाद्रिप्रभवा नय पर्मन्यापरिता प्रभो । भरकर घूमती-धामती समुद्रमें प्रवेश कर नासी है, वैसे ही सभी प्रकारके उपासना-मार्ग घूम-धामकर देर-सो विषन्ति सर्वत सिन्धु सहयोगसमोऽन्ततः॥१०॥ आपके ही पास पहुंच जाते हैं ॥१०॥ सत्त्वं रजस्तम इति भवतः प्रकृतेर्गुणाः । प्रभो ! भापफी प्रतिके सीन गुण है--सत्व, सेपु दि प्राकृताः प्रोक्ता आममस्थावरादयः ॥११॥ रब और तम । ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यम्त सम्पूर्ण घराकर भीव प्रारल है और जैसे पन सूत्रोंसे मोतप्रोत तुम्प नमस्तेऽस्त्वरिपकरटर्य रते है, वैसे ही ये सब प्राप्तिके टन गुणोंसे ही सर्वात्मने सर्वधियां च साधिणे । ओतप्रोत है ॥ ११ ॥ परन्तु आप सर्वशरूप होनेपर भी उनके साप लिया नहीं हैं। आपकी घटि निर्टिस है, गुणप्रवाहोऽयमविद्यया क्योंकि आप समस्त इत्तियोंके साधी है। यह गुणों के मपर्वसे दयनृतिर्यगारमम् ॥१२॥ प्रपाइसे होनेपाली सृष्टि अपानमून्य है और यह देता मनुष्य, पशु-पक्षी आ समस्त योनियोंम म्याप्त है; मग्निर्मुखं सेऽयनिरनिरीक्षण परन्तु आए उससे सर्वया अटग है। इसलिये में आपको सूर्यो नमो नामिरथो दिन श्रुतिः । नमस्कार करता हूँ ॥ १२ ॥ अग्नि नापका मुख है। पोः फ सुरेन्द्राम्तव पाइयोर्णया । पृथ्वी चरण है। सूर्य और चन्द्रम्म नेा है। आश नाभि है शिाएँ कान है। बर्ग सिर। देवेनगग धिर्मरुत् प्राणपलं प्रकल्पितम् ॥१३॥ मुबाएँ हैं। समुद्र कोख है और यह भायु ही आपकी रोमाणि पोपधयः शिरोरुहा | प्राणशालिके रूपमें उपासनाके ठिये करियत हुई है।१३॥ मेपा परस्पाम्यिनसानि सेऽजय । इक्ष और मोरपियों रोम है। मेघ सिमे पा है। परत आपके अम्पिसमूह और नम्र है । रिन और राम निमेपर्ण राम्पानी प्रजापति फ्टकोका बाटना और मीचना । प्रजापति जननन्द्रिय मदन पटिम्तष पीमिप्यते ॥१४॥ हैं और बटि ही आपका यीप है ॥ ११ ॥ अविनाशी स्परपम्पयारमन् पुरुपे प्रकस्मिता मगन् । नेमे जरमें बहुत से जाना मीर और गूर । फागेम नम्हें नरें कर रही है, रमी प्रकार टपामनाम सार सपाठा पाजीरसाला । लिय माम अक मनाप पुराए अनक प्रकारफ यथा जले मजिाते बताफमा जीय-अम्तुओंसे परे र टाफ भोर टनके म्यमय ऽप्युटमार पा मध मनोमये ॥१५॥ परिपत किये गप है ॥ १५॥ प्रभो ! कर पीडा करने के लिये मीर जो-जो माग परतेने पानि पानीह रूपाणि कीडनाध विभपि हि। सब कर दे शोफ माहफा पो-श ने है और सैरामएशुपा लोका हा गापन्ति ते यश ॥१६॥ कि मय माग र अनम्मे अमिमा पारा न किये।

३७६
भीमद्भागवत
[4.१०
नमः कारणमत्साय प्रलयाम्पिचराय च । करते हैं ॥ १६ ॥ प्रमो | मापने वेदों, अरियों,
भोषियों और सत्यात भादिकी रक्षा-दीयाके लिये
मस्परूप धारण किया था और प्रध्पके समुद्र में सछन्द
इयचीर्णे नमस्सुम्यं मधुफैटभमृत्पवे ॥१७॥ विहार किया था । आपके मस्यरूपको मैं नमस्कार करत
है। मापने ही मधु और फैटम नामके कमरोंका संहार
करनेके रिये इयग्रीव क्सार प्राण पिया । म
बझाराप पाते नमो मन्दरधारिणे ।
आपके स सपको भी नमस्कार करता हूँ ॥ १७ ॥
मापने ही यह विशाल क्ष्छपरूप ग्रहण करके मन्दराम-
पिस्पशारविहाराय नमः सूकरमूर्तये ॥१८॥ को धारण किया पा, अपको मैं नमस्कार करता है।
बापने ही पृथ्वीके उद्वारकी लीला करने के लिये बराबरूप
नमस्तेमुवसिंहाय
| स्वीकार किया था, आपको मेरे मार-मार नमस्कार ॥१८॥
साघुलोकभयापह।
प्रहाद-जैसे साधुक्नोंका भेदमय मिटानेवाले प्रमे !
वाफ्के उस पौकिक मृसिंहरूपको मैं नमस्कार करत
वामनाय नमस्तुभ्यं फ्रान्तत्रिसपनाय च ॥१९॥। आपने वामनरूप प्रहण करके अपने फ्गोंसे तीनों
गोष नाप लिये ये, आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥१९॥
धर्मका उल्लान करनेवाले धर्मी क्षत्रियोंक वनका छेदन
नमो मुगणां पतये सपनपनच्छिदे ।
फर देनेके मिये बापने मूगुपनि परशुरामरूप ग्रहण किया
पा । मापके उस रुपको नमस्कार करता हूँ।
नमस्ते रघुपर्याय रामणान्तफराय च ॥२०॥ | रापणा नाश करनेके छिये आपने पुत्रशमै भगान्
रामके रूपसे अबतार प्राण फिपा पा । में लापको
नमस्ते वासुदेवाय नमः सहर्पणाय च ।
। नमस्कार करता हूँ ॥२०॥ मध्यवयनों तप यदुवंशियोंका
पम्न-पोषण करनेके म्येि मापने ही बनेको वामदेव,
सकर्षण, प्रान वोर बनिरुद–स पतुदके लपमें
प्रफ्ट किया है। में आपको मार-मार नमस्कार करता
प्रयुम्नायानिरुदाय सात्वां पतये नमः ॥२१॥
है।। २१ ॥ देय और नवोंको मोहित करने के लिये
काप शुर अहिंसाम्मर्गक प्रमतय मुखका सप प्राम
नमा पुदाय शुदाप दैत्पदानयमादिने । करेंगे। म वाफ्को ममस्कार करता है। और पृथ्वीके
क्षत्रिय सम्लेमाप हा जायगे, तब उनका माश
करने के लिये आप ही परिकके मामें बनीर्ण होंगे।
म्लन्छमायक्षप्रहन्त्रे नमस्ते फरिवरूपिणे ॥२०॥ | में वाफ्यो ममस्कार करता हूँ ॥ २२ ॥
भगवीपलाकोऽयं माहिसस्तर मापया । मगरन् 1 ये सप-ये सब जीव आपपी मापासे मोरित
हो रहे हैं और इस मोहके कारण ही हमें और
अहंममेत्पसद्वादो माम्पते फर्मवरर्मसु ॥२३॥ या मे इस घटे दुगमहमें फंसफर यर्मक मार्गम
मक रहे हैं ॥ २३ ॥ मेरे मामी ! मी प्रकार में भी
पर गामा ममागारदारार्धम्यजनादि । बममें भीसनयारले पनि समान रे दानो, पनी
पुत्र और मन-मन वारिया रस्म समहर उ
प्रमामि म्यप्रफरपेषु म सत्यधिया विभा ||२४|| स ग गा र टप गा ॥ २४ ॥

३०४०] - अनित्यानास्मदाखेषु विपर्ययमविपहम् । मेरी माना तो देखिये, प्रभो ! मैंने भनित्य पस्तुओको नित्य, मनारमको आत्मा और दुस्पकरे मुख समम लिया । मत्य इस उटी युनिफी भी कोई सीम्म है ! इस प्रकार दन्दारामस्तमोविटो नजाने त्वाऽऽस्मनः प्रियम्।२५।। अदानवश सांसारिक मुम्दु ख आदि इन्दाम ही रम गया और यह बात बिल्कुल भूल गया कि बाप ही हमारे पयायुधो जल हिस्वा प्रतिच्छन्न तदुरः। सम्ये प्यारे हैं ॥ २५ ॥ जैसे कोई पनजान मनुष्य जनक रिये तास्मयपर नाय और उसे उसीसे पैा हुए मिवार मारि घासोंसे दया देयकर ऐसा समझ से कि अम्पेसि मृगणां वै संस्थाह पराङ्मुस ॥२६॥ यहाँ बछ नहीं है, तया सूर्यफी फिरणाम घटाछ प्रतीत होनेवाले उसके लिये मुग्नयाकी ओर दौड़ पड़, वैसे नोस्सर कपणपी: कामकर्मइस मन । ही में अपनी ही मायासे छिपे उनके कारण सापको टोफर विषयोंमें मुण्डकी आशसे मक रहा हूँ ॥२६॥ रोवर्प प्रमाधिभिपाधर्दियमाणमिवन्तत ॥२७॥ मैं अधिनानी असर वस्तुक झानसे रहित है । एसीसे मेरे मनमें अनेक मस्तुओंकी याम्ना और टन निग्ये पर्स करनेके साम्प उठते ही रहते हैं। इसके अतिरिक्त सोश वायुपगतोऽस्म्पसा दुराप ये इन्द्रियों भी जो भी प्रवल एक दुमिनीय है, मनको पप-मपर बसूया इधर उवर घसीट से जानी हैं। तचाप्पई भषटनुप्रह ईश मन्ये । इसीरिये इस मनको में राक नहीं पाता ॥ २७॥ इस प्रकार मयता जा में भाप उन परणकमकी स्त्रययाम आ पहुँचा है, जो दुओं के लिये दसम है। पुंपो भवेत् यहि संसरणापपर्ग | मेरे स्वामी ! इसे मी में आपस मयप्रसाद ही मानना क्योंकि पनाम । जम बीपक संसारमे मुकदोने- स्वप्पाजनाभ सदुपामनपा मति स्मात् ॥२८॥ फा समय आता है, तब सत्पुरुषोंकी उपासनासे चिवधि अपमें स्याता है॥२८॥ प्रभा 'उ विज्ञान स्यम्प है निधन है। निसनी मी प्रतीलियों होती विज्ञानमात्राप सर्वप्रत्यपाहतये । है जितनी मी तिपा है, उन सपा अपही कारण र अधिष्टान है । जीपक कप व जागेर मुग्म आरिब निमित पार, पम, म्यमाय तर प्रातिर सपने भी पही हैं। मा रही 'ग्न मुसे रफ्ना भी पुरुषप्रधानाप मानणानन्तशक्तये ॥२९॥ जारी किया परम अपर्य है। मस ननमर परम ॥ २० ॥ प्रम जाही पमुख बादी म्जन र अप नमस्ते पामुदगर सपनपपाप प । (साग) है; ही पुदिक्षार मना रिटर १दि । नमा १४८- ३७८ भीमागवत [२०११ -- पीकेश नमस्तुम्प प्रपन्नं पाहि मां प्रभो ॥३०॥ | देवता हषीकेश ( अपुन और अनिरुद ) है । पारको पार-बार नमस्कार करता है। प्रभो! आप मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये ॥३०॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्यां संदिताया दशमस्कन्धे बर्षिफर स्तुनि म चत्वारिंशोऽध्याय ॥१०॥ अथैकचत्वारिंशोऽध्याय श्रीकृष्णका मयुपडीमें प्रवेश भीनुक उपाप भीशुकदेवजी करते हैं परीक्षित् ! मकरनी इस प्रकार स्तुति कर रहे थे। उन्हें भगवान् श्रीहाणने नमें स्तुगतस्तस भगवान् वर्णपिता चले वपुः । अपने दिव्यसपके दशन कराये और फिर उसे उस लिया, ठीक वैसे ही, जैसे कोई नट अभिनयमें कोई सप भूपा समाहरद रुप्पोनटो नामिवास्मनः ॥१॥ दिखाकर फिर उसे परदेकी मोटमें छया दे ॥१॥ पव करनीने देस कि भगवान्का पद विम्याप क्स- सोऽपि चान्सहित पीय बलादुन्मन्न्य सत्वरः। नि हो गया, तब ये पळसे बाहर निकाल लाये और फिर मन्दी-सदी सारे बावश्यक फर्म समाप्त करके र कस्वा पावश्यक सर्व विस्मितो रथमागमत् ॥ २॥ पर घले माये । उस सम्म्य व घहुत ही विस्मिन हो तमपृच्छपीकेशः किं ते रएमिहम्मुतम् । पे॥२॥ मगवान् श्रीकृष्णने उनसे पूछा-पाचामी भआपने पृथ्वी, भाकाश या जलमें कोई बहुत बस्तु भूमौ वियति वोये वा तथा ला लपयामहे ॥३॥ है क्या ! क्योंकि आपकी वात देख्नेसे ऐसा | नान पस्ता है।॥३॥ भाहरमोम कहा- प्रमो | पृषी, वाफाश । बमें और सारे भाव में जितने भी मत पदार्थ है, असानीह मायन्ति ममौ विपति वा पले। सम भपमें ही हैं। पर्पोकि बाप विसरूप है। त्यमि विमात्मासानि कि मेऽस्ट विपश्यतः॥४॥ पापको ही देख रहा हूँ तब ऐसी कौन-सी भात कर रह जाती है, जो मेने न देखी हो ॥ १॥ मगन् पत्रानुतानि सर्वाणि भूमौ वियसि मा बले । जितनी भी मत वसाएँ है, ये पृप्पीमें हों मा म अपना नाफाशर्म-सब-यी-सब जिनमें हैं, नहीबाप संस्थानुपश्यसोगमन् कि मेरएमिहामृतम् ॥५ को में देख रहा हूँ। फिर भय, मैने पहा वसुत पस रस्युपत्ता योदयामास स्पन्दन गान्दिनीसुतः। कौन-से देसी ॥५॥ गम्दिनीननन वामीने य कहकर रप हॉक Pया और भगवान् श्रीकृष्ण तय मपुरामनयद् राम कृष्ण पैर दिनास्पये ॥६॥ | सामग्रीको मेकर Pन दस्ते से थे मधुरापुरी र १ मनपाने महापुरुषसतिभाला । अफर उवाच L दशम स्कन्ध ३७९ म०४१ मार्गे आमजना राजस्तन सत्रोपसंगताः । पहुंचे ॥ ६ ॥ परीक्षित् ! म सान-स्थानपर गाँवोंके ोग मिल्नेके लिये माते और मावान् श्रीकृष्ण तपा पसुदेवसुतो बीय प्रीता रष्टिं न चादुः ॥ ७॥ नामजीको देखकर आनन्दमम्न हो जाते । घे एक्टक । उनकी ओर देखने छाते, अफ्नो पति इटा न पाते ॥७॥ तावद् प्रमौकसस्तत्र नन्दगोपादयोऽप्रत । नन्दकवा आदि प्रवासी तो पहलेसे ही हाँ पाँच गये पुरोपवनमासाप प्रतीक्षन्तोऽवतसिरे ॥८॥ थे, और मयुरापुरीके वाहरी उपफ्नमें सकार उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे ॥ ८ ॥ उनके पास पांचकर नगदीम तान् समेस्याह भगवानर अगदीचर।। मगवान् श्रीकृष्णने विनीतमावसे सरे अकरनीका एय गृहीत्वा पाणिना पाणि प्रमितं प्रहसभिव ॥ ९॥ अपने हाथमे लेकर मुसकराते हुए कहा---॥ ९ ॥ भवान् प्रविशतामग्रे सहयान पुरी गृहम् । 'चाचामी ! माप रस सेफर पहले मयुरापुरीमें प्रवेश कीनिये और अपने घर जाइये । हमलोग पहले यहाँ बर्य विहानमुपाय तसो द्रमामहे पुरीम् ॥१०॥ उतरकर फिर नगर देखने के लिये धागे ॥ १० ॥ मकरसीने का प्रमो ! भाप दोनोंके बिना में मथुरामें नहीं जा सकता । स्ामी ! मैं वाफ्का मक। नाई भवदम्या रहितः प्रपेक्ष्ये मधुरो प्रमो। मरस प्रो ! थाप मुझे मत छोरिये ॥ ११ ॥ मगन् ! बाइये, फलें । मेरे परम रितपी और सच्चे स्पतुं नाईसि मा नाथ भक्कं ते भक्तवत्सल ॥११॥ मम् माक्न् ! भाप परामनी, माछासों सपा नन्द रायत्री वादि वरीयोंके साप चलकर हमारा पर स्नाय आगन्छ याम गेहान् नः सनापानामघोषन । कीनिये ॥ १२ ॥ हम ग्रास। आप अपने चरणों- सहाग्रजः सगोपाल। सुरहिम महत्तम ॥१२॥ की पिसे हमारा पर पवित्र कीजिये । वापके चरणों की पोक्न ( गयाळ या परणामृत ) से अग्नि, देवता, पुनीहि पादरजसा गृहान् नो गृहमेधिनाम् । पितर--सब के सब तप्त हो जाते हैं ॥ १३ ॥ प्रमो ! भापके युग चरणोंको पसरफर महात्म्य पग्नेि प पश पप्छौधेनानुप्यन्ति पिवरः सामपा सुराः ॥१३॥ प्राप्त किया, निसका गान संत पुरुष करते हैं। केरल यश ही नहीं-उने बानीय ऐर्य क्याप गति भवनिन्पाश्मियुगलमासीप्लोक्यो पलिमहान् । प्राप्त हुई, जो अनम्य प्रमी मोंको प्राप्त होती है ॥१॥ भाफ्के परणोदक-गानीने तीनों येक पवित्र कर ऐश्वर्यमतुलं सेमे गति पैकान्तिनां तु या ॥१४॥ द्धये । सचमुच मे मर्तिम्मन् पवित्रता है । उन्होंके सश- से सगरके पुत्रों को सदति प्राप्त हुई और उसी जम्यो आपस्तेऽध्यपनेजन्पस्त्रीस्लोफाम्चयोऽपुनन् । सय मतान् शहरन अपन सिरपर धारण किया ॥१५॥ शिरसापषमा शव स्वर्याता: सगरास्मजाः ॥१५॥ स्तुशिशिरामग ! भाप दक्ताओंके भी बाराप्यदष नगतके स्वामी है । पापके गुण और स्थाओंफा माग देवदेन अगमाप पुम्पभवणीर्दन । तपा पर्सन बड़ा ही मारी है । उसम पुरुष भापके गुर्गो कीन फरवे गत है। मण्यग ! में पचमोसम स्नेक नारायण नमोऽस्तु ते ॥१६॥ पापको नमस्कार करता है ॥ १९॥ - है 1 भीमद्भागवत भीभगवानुवाच मीभगवानमे करा-चाचानी ! मैं दाउ मैको भायास्मे भषतो गेहमहमार्यसमन्वित । साप बापके घर आऊँग और पहले इस पदुर्मशिक द्रोही कसको मरकर तव अपने सम सात् सन्नोस पहुचमा हस्ता विसरिप्पे सास्प्रियम् ॥१७॥ प्रिय माँग ॥ १७ ॥ भीमुक उपाय मीशुकदेवजी कहते-परीक्षित् ! मानके एवमको भगवता सोऽरो विमना इव । इस प्रकार कहनेपर अकरमी कुछ मनाने से हो गये । ननि पुरीमें प्रवेश करके कससे श्रीकृष्ण और नमामा पुरी प्रविष्टः फंसाप फर्षिय गृहं ययौ ॥१॥ से आनेका समाचार निवेदन किया और फिर अपने म अधापराहे भग रुप्मा सहर्षणान्वितः। गये ॥ १८ ॥ दूसरे दिम तीसरे पार करामजी वीर बाध्या के साप मगवान् श्रीकृष्णने मथुरापुरीको रेसने के मपुरी प्राविशत् गोपैर्दिष्टः परिमारितः ॥१९॥ | ध्येि नगरमें प्रवेश किया ॥ १९ ॥ भगवान्ने देख कि ददर्श सो स्फाटिकतुजगोपुर नगरके परकोटेमें स्फटिकमणि ( सिौर ) के बहुत धे चे गोपुर ( प्रधान दरवाजे ) तवा परोम मी यो-यो द्वारा प्रादेमफपाटतोरणाम् । फटफ बने पुए हैं। उनमें सोनेके बड़े-यो कितावको हैं और सोनेके ही तोरण (सहरी दरपाजे ) मने हुए वस्मारकोठा परिवादुरासदा हैं। नगरके चारों भोर सचिवौर पीतकी पारदीवारी मपानरम्पोपमनोपशोभिताम् ॥२०॥ पनी हुई है। के कारण और कहासे उस नगरमें प्रवेश सौवर्णाटकानिपट करना मत कठिन है। सात स्थानपर मुन्दर-सदर उबान बौर रमणीय उपान (केरळ सियोंके उपयोग, श्रेणीसभामिर्ममनरूपस्कवाम् । आनेवाले कीचे ) शोमायमान है॥२०॥ सुवर्णसे सजे ए चौराहे, पनियोंके महस, उन्हीके सापके पारे, वैवजामलनीलपिडमै फारीगरों के बैठने के स्थान या प्रवर्गक समा-मान काहरिनिर्मलभीषु वेदिषु ॥२१॥ ( टाउनहाल ) और साधारण शेगक नियस मगरकी यमन मा रहे । र्य, हीरे, स्फटिक (सिम्मेर ), वऐपु बालासुसरन्धहिमे भीलम, मुंगे, मोती और फ्ने भारिसे बाए ने, पाविष्टपारावाहिनादिवाम् चबूतरे, रोखे एवं फर्श शादि बामगा हे । उनपर मंसिकरध्यापनमार्गचस्प बैठे हुए कबूतर, मोर नादि पक्षी मति मोतिकी बोये बोल रहे । समक, माबर, गम एवं चौराहोंपर सूब प्रकीर्णमास्पारशलाजवण्डलाम् ॥२२॥ | शिवकाव किया गया है। स्थान-सानपर कमेंके गवरे, भापूर्णहम्मैदेविपन्दनोधिवैः प्रबारे (मौके पार), सीठ और पास सिरेर १॥ २१ २२ ॥ घरोंके दरमानोंपर दही वौर पन्दम प्रमनदीपावसिभि सपालो। वादिसे पर्षित कसे मरे पए कमा सस्ते हैं और ये सान्दरम्भाममुफैः समेतुमिः भल, दीपक, ममी नयी कोपो, फापसहित केसे और सुपारी पस, बेटी-छोटी बारियों पर रेशमी सोसे ॥ मनमति सजायेर॥२१॥ . स्वतावतार सपहि अ०४१] दसम स्य ३८२ सां सम्प्रविष्टौ पसुदेवनन्दनौ परीक्षित् ! यसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और पनामजीने वालबालोंके साप राजपपसे मपुरा नगरी में प्रती वयस्पैनरदेववर्मना। प्रधेत किया । उस समय नगरकी नागियों यही उसकतासे उन्हें देखने छिये मटपट अटरियोपर पा गया ॥२१॥ द्वन्दं समीयुस्त्वरिता पुरझियो किसी-किसीने वदोके कारण अपने वम और गहने हाणि चैवारुरुहुनु पोत्सुमाः ॥२४॥ उसने पहन लिये । किसीने मय्से कुम्ल, कान आदि जोड़से पहने जानेवाले आभूषणों से एक ही पहना और कामिन् विपर्यन्तवनभूपणा चल पड़ी । कोइ एक ही कानमें पत्र नामक आभूषण धारण कर पापी पी, तो किसीने एक ही पायमें पाय विस्मृस्प चैकं युगलेवयापराः । जेत्र पहन रख पा । कोइ एक ही ऑसमें भजन फफपश्यपणेफनपुरा बॉन पायी थी और दूसरीमें बिना औजे ही पल पसी ॥२५१ कर रमणियों सो मोबन कर रहीपों, वे हापका नाभस्वा विसीयत्वपराम लोचनम्॥२५॥ कर समर चल पड़ीं । सबका मन उत्साह और अश्नन्स्य एफास्तदपारस सोस्मपा भानन्दसे म रहा था। को-कोई उमटन सगवा रही पा, वे बिना स्नान किये ही दौर परी । सो रही अभ्यज्ममाना अरुवोपमलना। पी, घे फोव्याल सुनकर छ सही ई और उसी अवस्पा दौर वर्ष । नो मताएँ यचोंको दूध पिला रही स्वपन्स्य उत्पाय निशम्य निस्वन भी, वे उन्हें गोदसे हटाकर भगान् श्रीमणको देखनेके प्रपापयन्स्योऽर्ममपोम मावरः ॥२६॥ उिये धछ पहा ॥ २६ ॥ परम्नपन भगवान् श्रीरण मनवासे गजरानके समान वही मस्तीसे पछ रह थे। मनासि तासामरविन्दलोचन उन्होंन यमीको भी मानन्दित फरनेपासे अपने पाम- सुन्दर चिपठसे नगरमारियोंक नेत्रोंको बड़ा भानन्द दिया प्रगरमलीलाइसितावलोपनः । भौर मानी पियसाश प्रगत्म हंसी सपा प्रममी चितफ्न बहार मपहिरदे द्रविक्रमो से उनके मन पुरा लिये ॥ २७ ॥ मधुरापी नियों मात रिनोसे मावान् शीष्णकी जस गीता सुनती आ शं ददन्टीरममारमनोत्सवम् ॥२७॥ रही थी । उनक पित्त चिरकासे श्रीगणक प्रिये पधर, म्पापुल हो रहे थे। भान उन्होंने उम्दै दम्प । भगवान् रहा मुम्वतमनुवघेतसस्त धाणने भी अम्नी प्रमी पितपन और मन्द मुमरान पी मुभामे सांपफर उनपा सम्मान पिपा । पर्गभित् ! वरपेक्षपोस्मितमुधोषणठम्धमाना । उन मियोंने मेक नाग भगवन्को भान एपमें से अपर टन आनन्दमय सम्पमा आशिन विपा । आनन्दमूर्विष्पगुप माऽऽत्मलम्ब टनश शरीर पुरित हो गया और न Pमोपी एयरपपोजरनन्तमरिन्दमाधिम्॥२८॥ रिगह-प्याधि गत हासी॥२८॥ मयुगी मारियों मान- प्रासादसिम्पराम्दा प्रीस्पषसमग्वाम्युचा । अनिमद रोकी अयारियर पर पनगम भार श्रीराम पुगेकी पर्म पान B 1 टम समय टन त्रिपों- सम्पदर्पन सौमनस्यै प्रमदा परम ॥२९॥ मुक्ता प्रमर असे घिर गई ५ ॥२९॥ १ मित्र । - ३८२ भीमसागवत [.. दमयः सोदपाः सम्गन्पैरम्मुपायनैः । क्षत्रिय और वैश्योने सान सानपर दही, काय सबसे मरे पात्र, पोंके हार, पन्दन और मेंटकी समय वालान ः प्रमदितास्तत्र तत्र दिनातयः ॥३०॥ से मानन्दम्म्न होकर भगवान् श्रीकृष्ण और कामजीवी पूना की ॥ ३० ॥ भयानको देखकर समी पुस्तानी आपसमें कहने मो-भय है। क्या हैरिपोने उनुः पौरा अहोगोप्पस्तपः किमचरन् माइन् । ऐसी कौन-सी महान् तपस्या की है, विस्के कारण ये या प्रतावनुपश्यन्ति नरलोकमहोत्सयौ ॥३१॥ किशोरोंको देखती रहती हैं ॥ ३१ ॥ मनुष्यमात्रको परमानन्द देनेवाले इन दोनों मन्दार रमकं कश्चिदायान्तं रङ्गकारं गदाग्रजः । इसी समय मावान् श्रीकृष्णने देख कि एक क्षेत्र, जो कपड़े रंगनेका भी काम करत या, उनकी बोर व नापास पासांसि धौवान्पत्युचमानि च ॥३२॥ रहा है । मगलान् श्रीकृष्णने उससे धुने हुए उसम-उस काले मागे ॥ ३२ ॥ भगवान्ने कहा-'माई ! म देमारयोः समषितामा पासांसि पाईतोः। हमें ऐसे यत्र दो, जो हमारे शरीरमें पूरे-पूरे का की। यस्तवमें हमलोग उन कोंके अधिकारी है। इसमें मनिप्पति पर भयो दातुस्ते नात्र संशयः॥३३॥ सन्देह नहीं कि यदि म हममेगेंफो पस दोगे के तुम्हारा परम फल्याण होगमा ॥ ३३ ॥ परीक्षित ! भगवान् सर्वत्र परिपूर्ण है। सब कुछ उन्हीका है । सिर में स पापियो भगषता परिर्षेन सर्वतः। उन्होंने इस प्रकार मांगनेकी खीष्य की परन्तर मूर्ख राना कसका सेक्क होनेके कारण मलाल हो साक्षेप रुपितः प्राह मृस्पो रमः सुदुर्मदः ॥३४॥ गा पा । मगमन्की वस्तु भगवान्झो देना तो दूर पE, उसने क्रोधमें भरकर बाध्य करते हुए कहा- ईशान्येव पासासि निस्पं गिरिषनेचराः। उममेग रासे हो सदा पहार और जंगम । क्या यहाँ ऐसे ही कम पामते हो। तुममेग बहुत ठाम हो गये परिधच किसवाचा राजद्रम्माम्पभीप्सथ ॥३५॥ | भी ऐसी कमाकर बातें करते हो। का में राम- का पन घटनेवी मई ॥३५॥ मरे, मूर्छ। यावाशु पालिमा मैवं प्राप्पं पदिक्जिीविषा । जावो, भग भायो । यदि कुछ दिन पीनेकीरण हो तो फिर इस तरह मत मांगना । कर्मचारी हमारे पम्नन्ति प्रन्ति तुम्पन्ति स राजालानि ॥३६॥ जैसे उसको कैद कर देते हैं, मार गम्ते । गोर नो कुछ उनके पास होता है, छीन लेते हैं ॥१९॥ एष विकत्यमानस्य पितो देवकीमुवः। जब र धोबी इस प्रकार यहुत कुछ कर म करन या, तब भगवान् श्रीकृष्णने तनिक कुरीस रबकस्म फरापण शिरः कापादपातयत् ॥३०॥ होकर उसे एक तमाचा बापा और उसका सिर पामसे पड़से नीचे गिरा ॥ ३७॥ यह देखकर सानुजीषिनः सर्षे बासा कोशान् विसन्यथे। उस घोपीके भीम कम करनेपामे समरे सब कपकों के १ इस मामिला ०११] दशम स्कन्ध ३८३ दुवः सर्वसो मार्ग पासांसि वगृहेऽच्युत ॥३८॥ हर यहीं छोड़कर इकर उन माग गये । मगवान्ने उन पोको ले लिया ॥३८॥ मगवान् श्रीकृष्ण और काम- पसिस्वाऽऽस्मप्रिये पने कमा सहर्पणस्तथा । जीने मनम्मने यस पहन लिये तया बचे हुए वमिसे बात से अपने साथी पासवारों को भी दिये । बहुत से क्षेपाम्पादत्त गोपेम्पोक्सिन्य मवि कानिचित् ॥३९॥ काहे तो वहीं ममीनपर ही छोड़ चल दिये ॥३९॥ ततस्तु पायकः प्रीतम्तयोपमकल्पयत् । मगवान् श्रीकृष्ण और वश्राम जब कुछ आगे से, तम उन्हें एक दर्जी मिल्ला । मगवान्का अनुपम सौन्दर्य विचित्रपणेमैलेपैराकल्पैरनुरूपस ॥४०॥ देसफर उसे वही प्रसनता । उसने उन रंग-बिरंगे सुन्दर पोंको उनके शरीरफर ऐसे दगसे सजा दिया कि वे सब ठीक-ठीक पच गये ॥१०॥ अनेक प्रकारके सॉस नानालक्षमपाम्या कृष्णरामा विरेनतु । पिस्ति होकर दोनों माइ और मी अक्कि शोमापमान हुए। ऐसे जान पाते, मानो यसबके समय श्वेत और स्वलकृतौ पालगनौ पर्षणीव सितेतगै ॥४१॥ श्याम गजशावक भीति समा दिये गये हों ॥ ११ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण उस दीपर यहुत प्रसन हुए। उन्होंने उसे इस येक्में भरपूर धन-सम्पति, कर पेपर्य, सफ्नी सस्स प्रसमो भगवान् प्रादात् सारूप्पमात्मनः । स्मृति और दूरसक देखने सुनने आदिकी इन्दियसम्बन्धी शक्तियों दी और मृत्युक यादक लिये अपना समरुप्प मिय घ परमां सोफे पलपर्यस्मृतीन्द्रियम् ॥४२॥ | मोक्ष मी दे दिया ॥ १२ ॥ सत सुदाम्नो भवन मालाकारम्म चम्मतु । इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण सुदामा मातीचे घर गये। दोनों भाइयोंफो देखते ही पुलमा ठम्वका हुआ तो रा स समरपाय ननाम शिरमा सवि ॥४ा और प्रप्पी सिर रखकर उन्हें प्रणाम पित्या ॥ १३ ॥ सयोरासनमानीय पार्प पायाईणादिभिः । फिर उनको सामनपर देकर उनके पाँव पहारे, दाप घुस्यये और तदनन्तर ग्वाम्याग सहित सबकी लोके पूजा सानुगयोमझ सकसाम्प्लानुलेपनै ॥४४॥ हार, पान, पदन गरि समनियोंमे विधिपूर्वक पूजा की ॥ १० ॥ इसके पचात् उसने प्रापना की--प्रो ! प्राह ना सार्थक जन्म पारित पकल प्रभो । भाप दोनोंके शुगमनमे हम्परा जग्म सार हो गया । पिवदेयपंपो मर्प तुष्टा पागमनेन याम् ॥४५॥ देवताओंके सणसे मुक्त हो गपं । ये हमार परममन्तुष्ट हमारा कुरा पवित्र हो गया । आम हम पितर, ऋषि और हैं॥४५॥ माप दोनों समूग जगहफे परम कारण हैं।वर समारने अभ्युग्य-उमति और न अपम्--मोनके रिये अपतीणाविहांशेन घेमाय च भवाय च ॥४६॥ दीमपृष्याम भरने हान, पर आदि अंगोंके साप अक्तीर्ग दूर है॥१६॥ परिमाप प्रम यानेपामे ही प्रम करते नहिवां विपमा रष्टि मुरागदास्मना । हैं, मम्न फानमार ही भवते नि मा आपकी रटिमें रिम्मता नहीं है। क्योंकि आप मार जगत्के समया सर्पम्तषु भवन्त भजतोरपि ॥४७॥ परम माद् और बम है। आप स्मन प्रारियों भोर भवन्ता क्लि विपस्स वगत कारण परम् । .

भीमागवत [4.४२ तापाशापयर्व मुस्प किमाई करबागि वाम् । | पामें समयपसे स्थित है ॥ १७ ॥ में आपका दास है। माप दोनों मुझे बाबा दीजिये कि मैं आफ्मेकी पुंसोऽस्पनमो सेप भवद्भिर्मभियुन्मते ॥४८॥ फ्या सेवा फल। मगवन् ! नीषपर आपका यह मत वड़ा अनुग्रह है, पूर्ण क्या प्रसाद है कि आप उसे पता देकर किसी कामे नियुक्त करते हैं ॥ १८॥ राख्न ! इस्पमिप्रेत्य राजेन्द्र सुदामा प्रीतमानसः। मुटामा मालीने इस प्रकार प्रार्थना करनेके मार माकन का बमिप्राय जानकर पहे प्रेम और आनन्दसे भरकर शस्तः सुगन्धैः इसमाला विरपिता ददौ ॥४९॥ | अफ्त सुन्दर-मुन्दर तथा मुगन्धित पुर्पोसे गूबे र हार उन्हें पहनाये ॥१९॥ व ग्वाम्माल और ममाम- नाभिःस्वलाइती प्रीती कृष्णरामौ सहानुगौ । नीके साप मगवान श्रीकृष्ण उन पुन्दर-सुन्दर अमृत हो चुके, तब उन वरदायक प्रमुने प्रसन होकर प्रगताप प्रपमाप ददसुपरदो परान् ॥५०॥ किनीत धौर शरणागत सुदामको श्रेष्ठ वर दिये॥५०॥म मान्मने उनसे यही वर माँग्न कि प्रभो । आप ही समस्त सोऽपि वप्रेऽपला मकिशमिन्नेवासिलास्मनि । प्राणियों के आम है । सर्वखरूप बापके चरणों में मेरी अश्विन मकि हो। आपके मतोंसे मेरा सौहार्द, मैत्रीका सम्बन्ध हो और समस्त प्राणियों के प्रति बढतक दयाका वक्ता च सौहार्द भूतेषु पदयां पराम् ॥५१॥ | माव बना रहे ॥ ५१ ॥ भावान् श्रीणने मुदामाको उसके मगि ए पर तो गये ही-ऐसी मम्मी मी दी, इति तसे पर दवा भिय चान्वयवभिनीम् । बो शपरम्पराके सप साप मती जाय और साथ ही एल, भायु, कीर्सि तप कान्तिका मी वरदान दिय । इसके बार मगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साप सि बलमापुर्यशः कान्ति निर्मगाम सहायकः ॥५२॥ ] किराए ॥ ५२ ॥ इति भीमसागसते महापुराणे पारम्हस्या सहितायां दशमस्करघे पूर्वि पुरप्रवेशो नाम एकरवारिंशोऽध्याय ॥११॥ अथ द्विचत्वारिंशोऽध्याय कुम्मापर कपा धनुपमा भौर कसकी प्वयाट भी क उवाच भीशुकदेवजी कहते हैं-परीधित् ! इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण जब अपनी मणीके सय राजमार्गस अप प्रजन् रामपयेन माधव: बागे बर, तब उन्होंने एक युवती सीको देस्य । त्रिय गृहीसाइपिसेपभामनाम् । उसका मुंह तो मुभर पा परन्तु वा शरीरसे पुरी थी। सीसे उसका नाम पर गप था धुजा । विलोक्य पुजा पुवती वरानना अपने हापमै चन्दमा पा लिये हुए आ रही थी । मगवान् श्रीहाग प्रमरसान करनेसे है मोंने पामा पान्ती प्रासन रसप्रदः ॥१॥ कुम्जापरस्पा करने के लिये हंसते हुए उससे प्रश्न - १॥ ।२ रिविवो । । प्राचीन विमें 'पूर्षिः पामरी है। ४ वापरावप्पिरवाच । ।

- ४२] दशम स्कन्ध ३८५ फा स्व परोपदु हानुलेपन 'मुन्दरी ! तुम कौन हो। यह चन्दन किसके लिये फस्पाङ्गने या फपयस साधु नः। ले ना रही हो। कल्याणी 1 हमें सब बात सच देमारयोरगविलेपमुचर्म सच पता दो। यह उत्तम चन्दन, यह भराग हमें भी दो। इस दानसे शीघ्र ही तुम्हारा परम कल्याण भयस्ततस्ते नचिरा भविम्पति ॥२॥ होगा ॥२॥ सैरन्मुवाच उबटम मादिगानेवानी सैरानी कुम्माने कहा- "परम सुन्दर 1 में फसकी प्रिय दासी हूँ। महारान दासस्थई सुन्दर कससम्मता मुझे बहुत मानते हैं । मेरा नाम प्रियका (कुम्जा) त्रिपक्रनामा मनुलेपकर्मणि । है। मैं उनके यहाँ चन्दन, मायग लानेका काम करती हूँ। मेरे द्वारा तैयार किये हुए चन्दन और महाविस भोजपतेरतिप्रिय मराग भोजराज कसको बहुत माते हैं। परन्तु आप दोनोंसे बाकर उसका भौर कोई उत्तम पात्र नहीं विना युवा फोऽन्यतमस्तदर्हसि ॥ ३ ॥ ॥ ३ ॥ भगवान् के सौन्दर्य, मुकुमारता, रसिकता, मन्दहास्य, प्रमामप मौर घारु चितयनसे कुम्वाका मन उपपेशलमाधुपासितालापवीक्षितः हापसे निकल गया । उसने मगवान्पर अपना उदय न्योअवर कर दिया। उसने दोनों भाइर्योका यह सुन्दर वर्षिनारमा ददौ सान्द्रसभयोरनुलेपनम् ॥ ४ ॥ धौर गादा माराग ६ दिया ॥ ४ ॥ तम भगवान् सवस्तावकारागेन स्वर्णेवरशोभिना। श्रीकृष्णने अपने साँपले शरीरमर पीले रंगका और फलाम्बीने अपने गेरे शरीरपर मत रंगका बाराग सम्प्राप्तपरभागेन भुञ्जमावेऽनुरजिसौ ॥ ५॥ लगा तपा माभिसे परके भाग; अनुरधित होकर वे अत्यन्त मुशोभित हुए ॥ ५॥ मावान् प्रमभो भगवान् कम्नां त्रिषको रुचिराननाम् । श्रीकृष्ण उस कुपापर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने दर्शनका प्रस्पक्ष फल दिसम्पनेके लिये तीन सन्नी का मनपके दर्शयन् दर्शने फलम् ॥ ६ ॥ मगहसे टेडी किस्तु सुन्दर मुसवाठी कुम्जाको सीधी करनेका विचार किया॥६॥भगवान्ने अपने घरोंसे कुम्जा पनामाकम्प प्रपदे वफास्युत्तानपाणिना | के परके दोनों पंजे दवा लिये और हाप चा फरके दो प्रगप सुपकेडमास्माइनीनमदम्पत ॥ ७ ॥ अगुपियाँ उसकी ठोड़ीमें छायी तमा उसके शरीरको तनिक उचका रिया ॥ ७॥ उपते ही उसके सारे सा पदर्जुसमानाही बृहम्मोमिपयोधरा । भाग सीधे चौर समान हो गपे । प्रम और मुक्तिके दाम मगवान्के स्पर्शसे वह माल विशाल नितम्ब सया मन्दस्पर्शमात् सयो पम्य प्रमदोचमा ॥ ८॥ | पीन पयोमासे युक एक उत्तम युवती पन गयो ॥ ८ ॥ ससो रूपगुणाकार्यसम्पन्ना प्राह फेशवम् । उसी क्षण पुरमा म्प, गुण और उारतासे सम्पन हो गयी । उसक म्नमें मवान्के मिनकी उचरीयान्तमारुप्प सयम्ती चातापछया ॥९॥ कामना बाम उन । उसन उनके दुपरेसा ओर पकाकर मा म २१..

भीमनागपत [५०४२ , एहि वीर गृहं यामो न स्वास्पस्तुमिहोत्सरे । मुस्करासे र कहा.--- ||९॥ वीरशिरोमणे! कारे, घर पसें । भव में पापको यहाँ नहीं सकती। स्वमोन्मपितषिचायाः प्रसीद पुरुपर्पम ॥१०॥ क्योंकि आपने मेरे चितको मप गम है । पुरोम । मुम दासीपर प्रसन होइये ॥ १०॥ जब मामी एवं सिमायापमानाकम्पोरामस्य पश्यत।। समने ही फुरबाने इस प्रकार प्रार्थना की, ता मान श्रीणने अपने साथी बारवालों के मुंहकी बोर देकर सम्बबोल्पानुगानां च प्रसस्तामुगाच ह॥११॥ | हँसते हुए उससे कहा- |॥ ११ ॥ सुन्दरी ! हमारा घर संसारी लगाके लिये अपनी मानसिन म्यति एप्यामि ते गृई सुम्रः पुंसामाधिविकर्जनम् । मिटानका साधन है। में भरना कर्य पूरा करके वास कहाँ पाउँग। हमारे-जैसे बेघरके बटोहियोंको हमारा ही साभिवार्थोऽयहाणां नः पान्यानां स्वं परायणम्॥१२॥ करके भावान् श्रीकृष्णने उसे विदा कर दिय । का तो आसा है ॥ १२ ॥ इस प्रकार मीठी-मीठी मते विसन्य मान्या पाप्पात प्रजन् मागें पणिपः। वे म्यापारियों के मानारमें पहुंचे, सब उन म्यापारियों ने म्नका तपा बल्यामजीका पान, कमेंके हर, पादन जौर तरह-सरहकी भेट–उपहारोंसे नानोपामनताम्मलनग्गन्धःसाप्रबोऽर्चितः ॥१३॥ किया ॥१॥ उनके दर्शनमासे सियोंक एप प्रेममा अकेग, मिझनकी भाकाहा जग उठती थी। याक सदर्भनसरधोभादास्मानं नाविन् विपः । कि उन्हें अपने शरीरकी मी सुध न रहती । उनके पस, मुहु और कान टीले पर जाते मे तब विसस्तवासाकारवलयालेख्यमूर्तमः ॥१४॥ फिलिसिन मुर्तियोंके समान मों-की-स्यों सही ख बासी पी ॥ १ ॥ तत पौरान पुच्छमानोभनुपासानमप्युतः। इसके बाद भगवान् श्रीक्षण पुरवासियोंसे । धनु:- वमिन प्रविष्टो दाशे धनुरेन्द्रमिवासस् ॥१५॥ पाका स्थान पूछते हुए रगशायमें पहुँचे और हा उन्होंने इन्द्रपके समान एक बहुत धन्य पुरुर्षभिर्गसमचित परममित् । देख ॥ १५॥ उस धनुनमें बात-स न माया गम पा, बनेक पामस्य यथासे उसे समाया गया था। पार्यमाणो नृभिः कृष्णः प्रसम धनुराददे ॥१६॥ उसकी म पूजा की गयी थी और मात-से सैनिक करेण वामन सलीलमपरत उसकी रक्षा कर रोपे रोकनेर मी उस धनुषको समारसे उस समेच हत्वा निमिपेण पश्यताम् । शिया ॥१६॥ मन्होंने सबके देखते-देखते उस सुपको गायें आपसे व्यापा, उसर गेरी यामी और एक नमो विरुप प्रपमा मम्पतो क्षणमें सोचकर बीचों बीचसे उसी प्रकार सके दो पपेसुद मदर्यक्रमः ॥१७॥ टुमने कर गले, मैसे बहुत पवान् मतमाम हापी सेमी सेल्में ईको तोर सा ॥ १७ ॥ पनुपो भन्पमानस शम्द सं रोदसी दिशः। धनुय या तम उसके हादसे भामाश, पृमी और निग । मामान् श्रीहष्णने रवि .

म०४२] दशम स्मन्य ३८७ य घरयामास क्षुत्वा कंसनासपागमत् ॥१८॥ दिशाएँ मर गयीं, उसे सुनकर कस मी भयभीत हो गया ॥ १८ ॥ मत्र धनुषके रक्षाफ माततापी असुर अपने सहायकों के साप महत ही मिले। ये भावान् सदाक्षिणा सानुचरा पिसा आततायिनः । श्रीकृष्णको घेरकर सो हो गये और उन्हें पका लेनेकी असे विछाने छनो-पाये, गाँव , जाने न प्रहीतुकामा मावप्रपा पम्यतामिति ॥२९॥ पावे ॥ १९ ॥ उनम्म दुष्ठ अभिप्राय नानकर कायमची पौर श्रीक्षण भी तनिक कोक्ति हो गये और उस अथवान् दुरभिप्रापान विलोक्य पलफेसपो । धनुषके टुमोको ठाकर उन्हीसे उनका काम तमाम कर दिया ॥२०॥ सदी धनुषस्तमोंसे उन्होंने उन दौ धन्वन आदाय सकले ताप बनतुः ॥२०॥ अमुरेकी सहायता के लिये कसकी मनी ए सेनाका भी संहार कर पम । इसके बाद वे यहाअके प्रधान पलं प सहितं इस्था झालप्मुखाचता । हारसे होकर बाहर निकल जाये और मानन्दसे मयुरापीकी शोम देससे हर विधरने सगे ॥ २१ ॥ व नगरनिवासियों ने दोनों मार्योंके इस बहुत निफम्प पेवारी निरीक्ष्य पुरसम्पदः ॥२१॥ परकमकी बात सुनी और उनके तेज, साइस तपा धनुपम रुपको देखा तब उन्होंने यही निभय किया तयोलवतं वीर्य निझाम्प पुरवासिनः । कि होम-हो ये दोनों को श्रेष्ठ देवता ॥ २२ ॥ तेजा प्रागरम्पं रूपं च मेनिरे विमुधोचमौ ॥२२|| सासे मथुरापुरीमें विचरण करने भो । मन इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और क्लरामजी पूरी सूर्यास्त हो गया तब दोनों माई म्याल्बालों से घिरे हुए तयोविचरतो स्वैरमादित्योऽस्तमपेयिवान् । नगरसे बाहर अपने डेरेपर, नहाँ छकड़े थे, छोट रुणरामो वो गोपैः पुराप्छकटमीयतुः ॥२॥ मी इमें मिलें, परम्म उन्होंने सक्का परित्याग आये ॥ २३॥ तीनों मौके पर यो देवता घाइते ये कर दिया और न चाहनेवाले भावान्का वरण किया । गोप्पो सान्दविगमे विरहातरा या महीको सदा के लिये जाना निवासम्पान बना लिपा । मधुरावासी मही पुरुषभूषण मापान् श्रीमणके आग आश्वासनापि यता मधुपुर्यम्बन् । अङ्गका सौन्दर्य देख रहे हैं। उनका कितना सौमाम्य है। प्रबमें मावान्की यात्राके ममय गोपियोने विरहातुर सम्पपता पुरुषपणगावक्ष्मी होकर मपुरावाहिक सम्बन्ध जोआ पा रही थी, वे सब बहो करच सत्प। सधमुष वे परमानन्दमें हित्येतरान् नु मजतमामेऽपन श्री ॥२४॥म्म हो गये ॥ २९ ॥ रि हाथ-पैर धोकर श्रीकृष्ण और परामयीने झसे म्ने हुए पीर वादि पदापोका अपनिकाधिपुगली सस्वाधीरोपसेपनम् । मेन किया और पस बागे क्या करना चाहता इस बातका पता सगकर उस रायो ही मारामसे ऊपता सुर्ख रात्रि धावा कंसचिकीर्पितम् ॥२५॥ से गये ॥ २५ ॥ १61 ३८८ भीमद्भागवत [५.१२ परा फंसस्तु भनुपो भङ्ग रक्षिणां खपलस्प प । जम कसने सुना कि श्रीकृष्ण और स्त्रमने ना तोर राय, रसकों तथा उनकी सहायताके पे मेची पघं निशम्प गोविन्दरामविक्रीरित परम् ॥२६॥ई सेनाका भी संहार कर गय और यह सब उनके लिये केवल एक सिलवार ही पा सके लिये में दीर्मप्रभागरी भीवो दुनिमिचानि दुर्मतिः। कोई अम या कठिनाई नही ठानी पड़ी ॥ २६॥ तब यह बहुत ही सर गया। उस दुईलिको बल देग्तक मीद न भायी। उसे माग्रस्-अक्स्पमें न मान्यचोमयथा मृत्योर्दीस्पफराणि च ॥२७॥ सममें भी बहुत से ऐसे अपशकुन हुए, बो सकी मृत्युके सूचक थे॥२७॥अप्रत्-अमस्सामें उसने देस कि अदर्शनं स्वशिरसा प्रतिरूपे घ सस्पपि । क्ल या दर्पण शरीरकी परमाई तो परती सिर नहीं दिखायी देता, अंगुली आदिकी धार म होनेर असस्पपि द्वितीये पदेस ज्योतिपा तथा ॥२८॥ मी चन्द्रमा, तारे और दीपक आदिकी ज्योतियों उसे दो-दो दिखायी परती है॥२८॥ अयामें छेद दिखती पाता है धौर कमि गुठी गालकर सुननेफ्र में छिटप्रवीतिश्छायायां प्राणभोपानुपश्चतिः । प्राणोंका घू, शम्द नहीं सुनायी पक्ता । 18 मुनाले प्रतीत होते हैं और बाछ या कीपरमें अपने पैरों वर्षप्रतीविषेप सपदानामदर्शनम् ॥२९॥ चि नहीं दीख परते ॥ २९॥ कसने समावस्या देखा कि वह प्रेतोंके गले लग रहा गपेपर सफर स्वप्ने प्रेतपरिप्या सरयान विपादनम् । लता है और विष स रहा है। उसका सारा शरीर तेससे दर, गहमें मयाकुसुम (अबछ) यायामलदमारयेफस्सैलाम्पको दिगम्परः ॥३०॥ और मम्न होकर कही जा रहा है ॥ ३० ॥ सप और मात्-अवस्थामें उसने इसी प्रकारके और में अन्पानि पेस्थम्तानि स्वमजागरितानि च । बहुत-से अपशकुन देते। उनके कारण उसे घड़ी कित हो गयी, वह मृत्युसे पर गया और उसे मीद म पश्पन् मरमसन्त्रम्तो निठा लेमे न चिन्तया ॥३१॥ | झापी ॥ ११ ॥ म्पुटायां निशि कौरम्प सुर्य चाइथ समस्थिते । परीचित् ! जब रात बीत गयी और सूर्यनारायण कारयामास ये फ्सो मल्लकोरामहोत्सवम् ॥३२॥ (दंगछ) का महोरस्त्र प्रारम्म कसम्म १ ३२ ॥ राज पूर्व समुद्रसे उपर उठे, सब राजा कसने महकीय आननुः पुरुषा # सूर्यमेर्यम जनिर । कर्मचारियोंने रंगभूमिको मीमति मनापा । यी, मेरी आवाजे बजने लगे। मेगके बैरनेके मन में मश्रामालवा सम्भिः पनामा पैलवोरणे ॥३३॥ | के गबरों, मंडियों, वस्त्र और पनगरोंसे सजा दिये तेपु पोरा जानपदा प्रसपत्रपुरोगमा । गये ॥ ३३ ॥ उनपर मामण, क्षत्रिय नार नागरिक सया मामवासी-सब यमास्थान बैठ गये। रामाग पथाप जो विवि राजानप झपासना ॥३४॥ भी अपने-अपने निश्चित म्पामपर जा रटे ॥ १५ ॥ १ पपुल्सपि । २ पानिम्म् ।

२०४३] दसम स्म ३८९ --- ।। कंस परित्तोऽभात्यै राजमश्च उपाविशत् । राजा कस सपने मन्त्रियोंके साप मण्डलेश्वरों (छोटे खेटे रामाओं ) के धीचमें सबसे श्रेष्ठ राजसिंहासनपर मरसेपरमध्यसो रदयेन वियता ॥३५॥ आ कैा । इस समय भी अपशकुनोंके कारण उसका विच चवदायम मुभा पा ॥ ३५ ॥ तब पहलवानों के पापमानपु सूर्येषु मल्लवालातरेषु च । ताळ ठोकने साथ ही वास यमने लगे और गरवी मल्ला खलङ्गवा मासोपाध्यायासमाविशन्।॥३६॥ पहमपान खूब सज-धजकर अपने-अपने उस्तादोंके सप असा में मा उतरे ।। ३६ ॥ पार, मुष्टिक, ! घाणूरो मष्टिकः कूटः लम्तोशल एव च । कूट, पाठ और तोशल आदि प्रधान-प्रधान पहलवान बाजोंकी मुमधुर बनिसे उत्साहित होकर अम्याइमें आ न आसेदुरुपस्थानं यस्गुवाघमहर्पिताः ॥३७॥ नाकर बैठ गये ॥ ३७॥ इसी सम्प मोजराज फंसने नन्दगोपादयो गोपा भोजराजसमाहुताः । नन्द आदि गोपोंको पुछवाया । उन ग्रेगोंने आकर उसे तरह-नरहकी में दी और फिर जाकर वे एक मञ्चपर निवेदितोपापनास्ते एफस्मिन् मञ्च माविशन्॥३८॥ बैठ गये ॥ ३८ ॥ - इति श्रीमद्भागवत महापुराणे परमईस्या संहिसायो दशमस्करच पूर्व मछरझोफ्षर्णनं नाम हिचत्वारिंशोऽध्याय १२॥ अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्याय ऊषरूपापीड़का ज्वार भोर मबारेमें प्रवेश भीमुक उवाच भीशुकदेवजी करते हैं- काम-कोरादि शत्रुओंको पराजित करनेवाले परीक्षिस् ! अब श्रीसम्ण और क्पराम अथ रुणध रामय कपचौधौ परन्तप । मी स्नानादि निस्पकर्मसे निपूछ छो दंगम्के अनुरूप मल्लदुन्दुभिनिएँ चम्पा द्रष्टुमपेपतुः॥१॥ नग्नहेकी पनि सुनकर सामूमि देखने के लिये घउ पड़े॥१॥ भगवान् श्रीकृष्णने रंगभूमि दस्खाजेपर पहुंचकर दस रमदारं समासाप तस्मिन् नागमपम्पितम् । कि कहो महायतमी प्रेरणासे उपय्यापीर मामका हामी अपश्यत् छवलयापीकृष्णोऽम्मष्ठप्रचोदितम्॥ २॥ खड़ा है ॥ २ ॥ तव मगवान् श्रीगने अनी कमर कस ली और मुंघराणी अन्य समेगी तया मेवये पद्ध्वा परिकर शौरि समुप कटिरालकान् । समान गम्भीर बागीसे महायनको कारफर कहाशा उवाच इस्तिप वाषा मेघनादगभीरया ॥३॥ महामन औ महाबत हम दोनोंको रारता देट। हमार मार्गसे हट जा ! अरे, सुनना नही । दर मत अम्बष्ठापट मार्ग नौ देवपक्रम माचिरम् । पर । नहीं तो महापीक साय भी उस यमगजक नो पेत् सारं स्वाय नपामि यमसादनम् ॥ ४ ॥ घर पहुंचाता है ॥ १॥ ममायान् श्रीपन महावनको जब इस प्रकार धमकाया, तत्र वह गोषसे निउमिन व्य एवं निर्मसंतोऽम्मष्ठ कुपितःकोपित गजम् । भौर टमने पार, मृत्यु तक यमराजक सम्मन यफ्न १ मतमोरवर्मने दिन । २ पाररामतिरुवाच ।

श्रीमद्भागवत [4. । चोदयामास कृष्णाप कालान्तफयमोपमम् ॥ ५॥ | म्यङ्कर फुलण्यापीडको बाहुशकी मारसे कुछ भी श्रीकृष्णकी भोर बदाया ॥५॥ कुवल्ल्यापीरने माकन फरीन्द्रस्तमभिट्ठस्य फरेष सरसाग्रहीत् । की ओर अपटमार उन्हें बड़ी तेजीसे सूहमें सपेट नि कराव् विगलितः सोऽम निहस्याभिष्पलीयत॥६॥ | परन्तु भगवान् सँगसे बाहर सरफ आये और उसे र घुसा नमाकर उसके पैरों के बीच बा छिपे ॥६॥ सहस्तमपधागो प्राणरटिः स केशवस् । उन्हें अपने सामने न देखकर कुमसम्पापीरको बारे हवा । उसने सँघकर भगवान्को अपनी सबसे टटो परामक्ष पुष्करेण स प्रसम्म विनिर्गतः ॥ ७॥ लिया और पका मी, परन्तु उनोंने मलपूर्वक वा उससे छमा लिया ॥ ७॥ इसके पद मगवान् क पुच्छे प्रगृमातिम्ल धनुपः पञ्चविंधसिम् । स्वान् हामीकी पूंछ पकाकर सेल सेपमें ही से हफ्तक पीछे पसीट आगे जैसे गा मौकोसी विधार्प पथा नागं सुपर्ण इस लीलया ॥८॥ मते है ॥ ८॥ मिस प्रकार घूमते हुए को मा स पर्यावर्तमानेन सम्पदक्षिणतोऽम्पुवः । बालक घूमता है मपया स्वयं मगवान् श्रीकण किस प्रकार समोसे खेलते थे, वैसे ही वे म्सकी पंछ फा पनाम माम्पमाणेन गोवत्सेनेव पालकः ॥९॥ कर उसे घुमाने और खेळने लगे। कर यह दायर घूमकर उनको पकाना चाहता, सब वे बर्य मा मते तवोऽमिमुसमम्मेस्प पाणिनाअस्प पारणम्। बोर नब यह मायकी ओर घूमता, तब ये दायें पुम नाते ॥ ९॥ इसके बाद हावीके सामने पाकर मोने प्राद्रवन् पातयामास स्पश्यमानः पद पदे ॥१०॥ उसे एक सा नमाया वीर ये उसे गिराने के लिये इस प्रकार उसके सामनेसे भागने मी, मानोरकर सधापन् फ्रीसपा भूमौ पतिस्वा सहसोषित। लेना है, तब छ सेता ॥१०॥ भगवान् श्रीकपने दौड़ते दौरते एक मार स्नेल खेल में ही पृथ्वीपर गिरने त मस्सा पवित क्लयो दन्तामा सोमनस्थितिम्॥१२॥ वझ्निय किया बौर म कहाँस उठकर मग सोहए। उस समय हामी प्रोपसे जल-भुन रहा था। उसने स्वविक्रमे प्रविसे इजरेन्द्रोऽत्पमर्पितः । समता कि वे पर पड़े धौर पर बोरसे अपने दोनों दाँत धरतीपर मारे ॥ ११॥ पब फुलापापीका पा थोषमानो महामात्रैः कृष्णमम्पद्रवद् सपा ॥१२॥ आक्रमण न्यर्थ हो गया, सब पद और भी पिड गया। महावतोंकी प्रेरणासे वह कम होकर मगवान् मीना तमापतन्तमासाप भगवान् मघुमदनः। टूट पका ॥ १२ ॥ भगवान् मधुसूनने बन असे अपनी ओर मारते देखा, व उसके पास को गमे निगृप पाणिना इस्सं पातयामास भूसले ॥१२॥ | और अपने एक ही हापसे उसकी र पकाकर उसे धरतीपर पटक दिया ॥ १३ ॥ उसके गिर पानेर पतिवस्स पदाऽऽम्प मृगेन्द्र व लीलया। भगवान्ने सिंहके समान सेपही मोसमें उसे पैसे दव कर उसके दो सा लिये और उन्होंसे हामी जोर दन्तमुपाटप सेनेम इम्तिपांमदनदारिः ||१४|| हातका काम तमाम कर Pया ॥ ११ ॥ - :

१०४३] दशम स्कन्ध ३९१ वतर्क द्विपमुत्सृज्य दन्तपाणि समाविशत् । परीक्षित् ! मरे हुए हापीको छोरकर मायान् ग्री- कृष्णने हापमें उसके दाँत छिपे क्रिय ही रंगभूमिमें प्रवेश सन्यस्तविपापोऽयपदपिन्दुमिरविता । किया। उस समय उनकी शोभा देसने ही योग्य पी। उनके विवस्वेदमणिकावदनाम्मरुहो पभो ॥१५॥ कपेपर हापीका दाँत रखा हुआ था, शरीर रक और मदकी दोंसे सुशोभित पा और मुसकाळपर पसीनेकी नौ गोपैः कतिपफर्मलदेवबनार्दनौ । ब्द मलक रही पी ॥ १५ ॥ परीक्षित् । भगवान् श्रीरण और काम दोनोंके ही हार्पोमें कुक्ल्यापीड़के रविविधतू रामन् गनदन्तपरायुधौ ॥१६॥ महे-यो दात शसके रूपमै मुशोभित हो रहे थे और मल्लानामशनिवृणा नरपर। कुछ म्पावाल उनके साप-साप चल रहे थे । इस प्रकार | उन्होंने रंगभूमिमें प्रवेश किया ॥ १६ ॥ निस समय मीणा मरो मूर्विमान् भगवान् श्रीकृष्ण कामनीके सब रंगभूमिमें पधारे, उस गोपानां खननोभ्समा विविसमा समय वे पहलवानोको पाकटोर-शरीर, साधारण मनुष्योंको नर-रत्न, पियोंको मर्तिमान् कामदेव, गोपोंको पास्ता स्वपित्रो शिशः। खनन, दुष्ट राजाओंको दण देनेमाले शासक, माता-पिताके सम्पन गह-मूहोंको शिशु, कसको मृत्यु, शानियोको मृत्युर्भोजपतेविरामविदुपा विराट, योगियोंको परम तस्व और मक्तशिरोमगि इणि सत्व पर योगिना पशियोंको अपने इरादेव बान पो ( सबने अपने अपने भावानुरूप क्रमश और, बात, थार, हास्य, एणीनां परदेसि विदितो मीर, पारसत्प, भयानक, वीभत्स, शान्त और प्रेममति गत: साप्रमः ॥१७॥ रसा अनुभव किया ) ॥ १७॥ राजन् । वैसे तो हत अवलमापीरं एटा तापपि दुर्बयो । कम पक्ष धीर-वीर प, फिर ना उसने देखा कि इन दोनोंने फुयलपापीयको मार गा, तब उसकी समान कसो मनसम्पपि सदा मृशादिषिचे नुप ॥१८॥ में यह पान वायी कि इनको जीना तो बहुत कटिन है । उस समय यह बहुत पयका पापा ॥ १८ ॥ श्री- सौ रमत् रगती महामशी रुण और यमरामकी यदि यही लंबी-लेनी पा । पुर्णोके विचित्रवेपाभरणनगम्यरी हार, पस और अम्बण आरिसे उनका वेर रिचिम हा हा फऐमा जान पाता था, मानो उसम र धारण यथा नरावृत्तमपधारिणी करके दो नट अभिनय करने के लिये पाये हों। जिनक मना क्षिपन्तौ प्रभया निरीक्षणाम् ॥१९॥ नेत्र एक यार उनपर पा गाते, बस, टग ही नाते । यही नहीं वे अपनी कात्तिसे टसका मन भी पुरा निरीक्ष्य तायुतमपूरपो जना इस प्रकार दोनों रंगभूमिमें मायमान हुए ॥ १९ ॥ पीक्षित् ! मघापर मिनने छोग पेठे थेये मथुराक मस्सिता नागरराष्ट्रका नृप । मागरिष और राष्ट्रले जन-समुनय पुरुगन मगमन् प्रहर्पयेगोत्कस्तिषणाननाः श्रीक्षण और परामर्श देसस्तानने प्रस्न हुए कि उनके नेत्र भीर मु यमर F3 टटे, टम्पयसे मम पपुर्न हसा नयनस्तदाननम् ॥२ ॥ गये । । नेत्रों के द्वारा उनकी मुलधुरीका पान करने - ३९२ भीमद्भागवत [२०१ पिपन्त इव चसुम्यो लिहन्त व जिहया । करते कृप्त ही नहीं होते ये ॥ २०॥ मनो उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों, मिहासे घाट । बिघ्रन्त इस नासाम्पा लिप्पन्स इस पाहुभिः ॥२१॥ नासिकासे सूंघ रहे हों और मुजावोंसे पकार ऊचु परस्पर से पै यथारप्ट यथाश्वतम् । दयसे स्टा रहे हों ॥ २१ ॥ उनके सौन्दर्य, गुर माधुय मौर निर्मपताने मानो दर्शकोंको उनकी छीप्रमा वदूपगुणमाधुर्यप्रागलम्पसारिता इस ॥२२॥ स्मरण करा पा चौर व लोग आपसमें उनके सम्बया एसो भगवतः साक्षादरेन रापणस्य हि । देसी सुनी बाते पहने सुनने लगे ॥ २२ ॥ ये बने अवतीर्णाविहांशेन पसुदयस्स घेश्मनि ॥२३॥ साक्षात् भगवान् नारायणके अश हैं । इस पर मुदेषजीके घरमें भवतीण पुए हैं ॥ २३ ॥ [अंगुर एप वै किल देवक्या बातो नीमध गोकुलम् । Pसफर ये साँले सोने कुमार देवकीके गमे फालमेवं वसन् गूढो ना न दवेश्मनि ॥२४॥ पहुँचा दिया ५ । इतने दिनोंतक ये कहाँ छिकर ये उपम बुए थे। बनमते ही षसुदेवजीने इन्हें गेट पूतनानेन नीतान्तं चक्रवासष दानवः । और नन्दबीके घरमें ही फ्छफर इतने बड़े हुए ॥ २०॥ धर्मुनो गुमफाफेशी धेनुकोऽन्य च तद्विधा ॥२५॥ आदिका तया और मी दुष्ट दैत्य का वध तपा यमअर्जुना इन्होंने ही पूतना, तृणावर्त, शहद, केशी और पेतुः गाव सपाला एवेन दापाग्नेः परिमोषिता । | उहार किया है ॥ २५ ॥ इन्होंने ही गे और माने दागनलकी चालासे मचाया था। कालिय नागका दमन कालियो दमितः सर्प इन्द्रय विमदः कृतः ॥२६।। | और इन्द्रका मन-मर्दन भी इन्होंने ही किया था ॥२५॥ सप्ताहमेकास्तेन पृतोऽद्रिप्रवरोऽमना। इन्होंने सात दिनोंतक एक ही हापार गिरिराज गोवर्धनको ठाये रक्स और उसके द्वारा आंधी-पानी वर्षवाताशनिम्पम परित्रात व मोडलम् ॥२७॥ तया अमपातसे गोकुको क्चा लिया ॥ २७ ॥ गेम्मि गोप्योऽस्य नित्यमदिवासितप्रक्षम मुखम् । इनफी मन्द-मन्द मुसमान, मधुर पिकान और सहा एकरस प्रसन रहनेवाले मुसरविन्दके दर्शनसे जानन्दित पम्पन्त्या विविधास्वापास्तरन्ति स्वाभमं सदा ॥२८॥ रहती पी चौर बनायास ही सब प्रकारके तोसे मुळ हो जाती पा॥ २८॥ पदते है कि ये पदुक्रम वदन्स्पनेन पश्चाऽय यदो सुबहुविभुवः । रक्षा करेंगे । यह मिरूपात वंश इनके द्वारा महान् भिय यशो मा प तप्पत परिरक्षित ॥२९॥ समृद्धि, यश और गौरव प्रान करेगा ।। २९ ।। दूसरे ही श्यामसुन्दरके वह मा कमलनयन श्रीवा- अयं चास्साग्रज भीमान् राम कमललापन । नी है । हमने किसी-किसीके मुँइसे एसा सुना है कि प्रलम्पा निहतो येन बस्सको ये षकादयः ॥३०॥ | इन्होंने ही प्रवासर, रसासुर और क्यम्मुर आपिको मारा है ॥ ३०॥ जनेयं मुबाणपु तूर्येषु निनदस्सु च । जिस सम्य दशकोंमें यह चर्चा हो सी पी और मखरे रही बादि याने का येथे, उस समय कृष्णरामा समाभाप्प चाणूरो पाक्यमयीस् ॥३१॥ चाणूरने भगवान् श्रीकृष्ण और बप्रामको सम्पन्न फरके यह बात कही-||३१॥ मन्दनम्दन माग ॥ नन्दपना हराम भषन्ती बोरसमता । और क्यामजी ! तुम दोनों बीरोंके आदरणीय हो । १ नंगी। ॥

भ.४३] दशम स्कन्ध ३९३ 1 नियुकुमलो भुत्वा राज्ञाऽऽहती दिभुणा ॥३२॥ हमारे महायजने यह सुनकर कि सुमाग कुस्ती लफ्नमें पड़ निपुण हो, तुम्हारा कोश देखने के लिये तुम्हें प्रिपंराया प्रकर्षन्त्य भयो विन्दन्ति व प्रजाः। पहा मुष्वापा है ॥ ३२ ॥ देखो माई! प्रना मन, पचन और फर्मस रानाय प्रिय फाय करती है, उसका मा होता है और जो राजारी इसके विपरीत पम्म मनमा फर्मणा वाचा विपरीतमवोन्यया ॥३३३] करती है, उसे हानि उसनी परती है ॥ ३३ नित्य प्रमदितागोपावत्सपाला यथास्फरम् । यह सभी जानते हैं कि गय और यह घरानमाले ग्वालिये प्रतिदिन मानम्दसे जगामें कुस्ती एपलाकर बनेषु महयुद्धेन फोडन्तमारपन्ति गाः ॥३१॥ खेळते रहते है और गये घराते रहते है ॥ ३१ ॥ इसलिये बाओ, हम और तुम मिश्वर महाराजको प्रसाद राशः प्रियं प्य वय च करवाम है। प्रसम करनेके लिये कुस्ती सरें। ऐसा करनेसे हमपर | समी प्राणी प्रसम होंगे, क्योंकि राना सारी प्रजाया भवानि न प्रसीदन्ति सर्वभूतमयो नृपः ॥३५॥ प्रतीक है। ॥ ३५ ॥ वभिशम्पाप्रमीत्रुप्णो देशकालोचित पचः। परीक्षित् ! भगवान् श्रीक्षण तो बाहते ही कि इनसे दो-दो हाप परें । इसरिय उन्होंने घागरफी मात निपुदमात्मनोऽभीष्ट मन्यमानोऽमिनन्य ॥३६॥ सुनकर उसका अनुमोदन किया और देशपा के अनुसार यह यात पही--॥ ३६ । 'चार ! हम भी प्रजा भाजपतेरम्प धर्म चापि पनेघराः। इन माजरान पंकी यनवासी प्रम। हमें इनको प्रसम करनेका प्रपन अवश्य करना चाहिये । सीमें फरणाम प्रिय नित्य तम परमनुग्रह ॥३७॥ हम्परा पाल्याण ९ ॥३७॥ रितु चार ! हमोग अ पालक हैं । इमयि हम धान समान पराले पारोंके माप ही पुश्ती साना पर करेंगे । पुती पारायं सुरपाल प्रीरिप्पामो यधाघिसम् । समान परागके सही होनी चाहिय, निमसे देखने पाल समासगरी अन्यायके समर्पर हानेया पार म भवेमियुद्ध माधी म्पशेमन्त ममामद ॥३८॥ एगे ॥ ३८ ॥ र उपाय साग्मदा-अनी 'तुम आरपयाम मबारक नाटा नरिमन्य पलपमलिना पर । हो और न तो शिलार । शुम गानों पनाम भट हा, तुमने अमी-अभी हजर हा पोका र रातार सीलपभा सा पन मामदिपमपमृत् ॥३९॥ पुपरपा र झीग मर गय ॥३॥ उमरियम नाशो हम म परानो स्प है। समानुभवायलिभिपादम्प नानपायी। गाना या अपपादन मही। सिनिय श्रीण म मुदा ना जार अE मपि विक्रम पाणेय पलन मा मटिक । १०॥ AIR म मुरम || १०॥ पति मगर मगरमदम्यो मदिनमा पूर्ण पुरराममनिपाइप ||३|| .. 1ि0 THIN | .

३९४ भीमद्भागवत [१० अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय चाग्र मुएिक मादि पहलवामोंका तया फैसका उद्धार भीभुक उपाय श्रीशुभश्रेषजी करते है पीक्षित् ! मार श्रीकृष्णने घाणर मादिके वका निपित सकसक एवं बर्षियसकल्पो भगवान् मधुसूदनः । लिया । जोर पद दिये बानेपर श्रीकृष्ण चाणूरसे के मआमनी मुहिकसे जा मिड़े ॥ १॥ वे स्टेग स आससाइाय चार मएिक रोहिणीसुतः ॥१॥ दूसरेको नीत सेनेकी इष्यसे हायसे हाल मॉकर और इम्ताम्पा हस्तपोर्षमापदम्मामेव च पादयोः। पैरोंमें पैर भगाकर मलमूर्षक पनी-धानी बोर संमे लो॥ २ ॥ वे पोंसे पजे, घुटनोंसे छुटने, मकै विपकर्पतर पान्य असम मिचिगीपया ।। २॥ मापा और प्रतीसे यती मिमाफर एक-दूसरेपर परेर अरस्नी रे अरनिम्प जानुम्पां चैव जानुनी। करने को ।। ३ ।। इस प्रकार दॉप करते करते अपने अपने मोपीदारको पकाकर इमर उस पुमा शिरः शर्णोरसोरम्ताव पोन्पमभिसनतुः ॥३॥ | दूर ढकेल देते, जोरसे जक्त लेते, छिप जाते, उठाकर पटक देते, छूटकर निकल मगाते और कभी छोड़कर परिधामणविधेपपरिरम्भावपातनः पीछे हट जावे थे। इस प्रकार एक-दूसरेको रोकने, प्रहार करते और अपने जोरीपारको पचा दनेकी उत्सर्पणापसर्पणमान्योन्य प्रत्यरुन्धताम् ॥ ४॥ चेय फरते । कमी कोई नीचे गिर जाता, कोसा उमे पुटनों और पेरेमि दवाकर उस सेना । हार्योसे उस्थापनरुपयनेपालने थापनैरपि । पकाकर ऊपर ले जाता । गोमें लिपट बानेर उकेर | देता और वामपक्ता होनेपर हाय-पाल बडे को परस्पर जिगीपन्तावपचक्रतुरात्मनः ॥५॥ गांठ बाँध देता ॥ १५ ॥ तत् पलायलनपुर्व समताः सर्ययोपितः । परीक्षित् । इस दगाको देसनेके म्येि मगर यात-सी महिस्सएँ भी आयी हुई थी । मोने का देखा कि बड़े-बड़ पहलवानों के साथ ये अटे-रोटे ऊमुः परस्परं राजन् मानुकम्पा वरूपन्नः ॥ ६ ॥ हीन पाठप छाये मा रहे हैं, सब में कम-जना टारियों कनावर करुणावश आपसमें अतीत करने महानप यताधर्म एपी राजमभामदाम् । गी-॥ ६ ॥ 'यहाँ रामा कसके समस्या पार और अधर्म कर रहे हैं। कितने साली बात है कि राजाके सामने ही ये बसे पहलनों और निर्भर ये पलामलयपुर्द रामाऽन्विच्छन्ति पम्पतः ॥७॥ गायोंके युद्धका अनुम्पेन करते हैं ॥ ७ ॥ बहन ! | रेया, इन पासवानोंवा एक-एक आग पो सम्मन प पम्र माग्मगदी मला शरन्द्रमविभो । पठार है। ये मनमें वह भारी पर्वत से मान होते है। परन्तु धाम और ममाम अभी जान भी नहीं हुए हैं। इनकी किशोर अवमानरा एरपरा क पानिगामागगी सियाग नाप्तायनी ॥ ८॥ अफ्त सुपुमार है । पर्यो ये और पदों में ॥८॥ ..ण परे।

म० ४४] दशम स्कन्ध ३९५ - " धर्मव्यतिक्रमो मस्स समाजस सुर्व भवेत् । जितने लोग यहाँ इकट्ठे हुए है, देख रहे हैं, उन्हें अवश्य-अवश्य धर्मोल्लवनमा पाप लोग। सखी ! क्य यसाधर्मः समुचिप्ठेम स्मेयं तत्र फहिंचित् ॥ ९॥ हमें भी इस पर देना चाहिये । जहाँ अवर्मकी प्रधानता हो, कहाँ कमी न रहे, यही शास्त्रका नियम है।॥ ९॥ देस्से, शाम कहता है कि बुद्धिमान् पुरुषको न सभा प्रविश्न प्रानःमम्यदोपाननुसरन् । समासदोंके दोषोंको आनते हुए, समग्रमें जाना ठीक नहीं है। क्योंकि वहाँ बाकर उन गुर्गों को पहना, अवन् विष्ठवणो नरः फिलिपमश्नुते ॥१०॥ चुप रह नाना अवा में नहीं जानता ऐसा कह देना- ये तीनों ही बातें मनुष्यको दोषागी वनाती है ॥१०॥ परगवः शत्रुममितः कृष्णस पदनाम्बुखम् । देखो, देखे, श्रीकृष्ण शत्रुके चारों घोर पैंतरा बदम रहे है । उनके मुसार पसीनेकी द ठीक वैसे ही पीक्ष्यतां अमवायुप्स पपकोशमिवाम्मुभिः ॥११॥ श्येमा दे रही हैं, जैसे कमलकोपर जल्की बूदें ॥११॥ सखियो । क्या तुम नहीं देख यी हो कि कटरामनीका कि न पश्यत रामस्य मुम्बमावाप्रलोचनम् । मुस मुटिकके प्रति क्रोधके कारण पुछ-कुछ माल स्प्रेचसे युक्त हो रहा है। फिर भी हास्यका बनिरूद धावेग कितना पुन्दर लग रहा है ॥ १२ ॥ सही ! मुष्टिफ प्रति साम झसमरम्भशोमितम् ॥१२॥ सच मे तो प्रजभूमि ही परम पवित्र और धन्य है। क्योंकि वहाँ ये पुरुषोत्तम मनुष्यके वेपमै निकर रहते पुण्या पत प्रप्रसवो पदर्य नृलिङ्ग हैं। स्वयं भगवान् शहर और सश्मीमी निनके चरणों- की पूजा करती है, वे ही प्रमु हो रंग-बिरंगे अंगती गूढः पुराणपुरुषो वनचित्रमारयः । पुणोंकी माला धारण कर रहे हैं सपा मध्ययममीके साप याँसुरी बजाते, गौर घराते और तरह-तरह के खेत सेन्टो हुए मानन्दसे विधरते हैं ॥१३॥ सती ! गा पालयन् सहरलकणय घेणु पता नहीं, गोपियोंने कौन-सी तपस्या की थी, जो नेत्रों के दोनोंसे नित्य-निरम्तर इनकी रूप-मधुरीका पाम करती विक्रीउमाश्चति गिरिधरमार्थिताधिः॥१३॥ रहती है इनका रूप क्या है, स्पवण्पका सार । संसारमें या उससे परे किसीका मी सूप इनक रूपके गोप्यम्तपाकिमचग्न् यदमुप्प रूप सम्पन नही है, फिर पदकार हानेकी सो मात दी म्या है ! सो मी किसीके सँवारने समानसे नहीं, गहन लापण्पसारमसमोर्चमनन्पसिद्धम् । पसे भी नहीं, पश्चि सयंसिद है । इस सपको देम्पने देम्पते तमि भी नहीं होगी। पॉशि यह प्रति- क्षण नया हाता जाता है, निस्य नूतन है । समम यश, रग्भि पिवन्त्यनुसवाभिन दुराप सौन्दय और ऐपय इसीके आश्रित है । समिया ! मम्मु उसका दर्शन तो गो के ठिये बन ही दुर्लभ मकान्तधाम पनस भिप एपरस्प॥१४॥ है । छ तो गोपियोंके ही ग्यमें या है ॥१९॥ १ मनम् ।

श्रीमद्भागवत 10 [. या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप | सस 1 प्रबकी गोपियाँ क्य है। निर श्रीकृष्णमें ही चिर लगा रहनेके कारण प्रेमभरे दर नार्मरुदितोषणमार्जनादौ । बांमुझोंके कारण गद्गद पाठसे वे हींकी लीयो गन करती रहती है। वे घ दुहते, दही माटे । गायन्ति चैनमनुरतधियोऽध्रुफम्यो ते, पर छीपते, माल्कोंको इल्म मुमते, रोसे बाळकोंको चुप कराते, ठमें नहलते-पुरते, परे धन्मा ब्रजनिय उरुक्रमधियानाः॥१५॥ झारसे मुहारते-कहाँसफ कहें, सारे काम-कार समप श्रीकृष्णके गुणों के गानमें ही मस्त ग हैं ॥ १५॥ ये श्रीकृष्ण नब प्रात काल गौधों प्रातजा प्रमत आविष्ठवष साप रानेके लिये बनसे पनमें आते हैं और सायादार व मार प्रजमें भौटते है, तब बड़े मधुर सरसे में गोभिः समकणपतोऽस्स निशम्प घेणम् । कमाते हैं। उसकी टेर सुनकर गोपियाँ घरका स निर्गम्म सूर्णमबलाः पपि रिपुम्याः | काम-कान छोस्कर सरपट रास्तेमें दौर पाती है। मीकृष्णका मन्द-मन्द मुसकान एवं दयामरी वितान पश्यन्ति समिसमुख सदयावलोफम् ॥१६॥ युज मुसाल निहार-निहारकर निहास होती है सपमुष गोपियों ही परम पुण्यक्ती हैं ॥ १६ ॥ एन प्रभापमाणासु खीषु योगेषरो हरिः। मरतवंशशिरोमणे ! जिस समप पुरवासिनी कि स इन्सं मनमो भगवान् भरतर्षभ ॥१७॥ इस प्रकार घातें कर रही पी, उसी सम्प योगेन | भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन शत्रुको मर गम्ने सभमाः स्त्रीगिरः भुत्वा पुत्रस्नानुघाऽऽतुरौ । निमय किया ॥ १७॥ वियोंकी ये स्पर्म बतें मात फ्तिा देयकी देव भी सुन रहे थे। वे पुरस्नेहए पितरापन्यसप्पेतां पुत्रपोरसुधौ बलम् ॥१८॥ शप्रेकसे मिहल हो गये। उनके इसमें भी पम्न, बा पीड़ा होने लगी । क्योंकि वे अपने पुत्रोंके का वीर्य तेस्तैनिपुद्धविधिभिर्विषिधेरच्यतेतरी नहीं मानते थे ॥ १८ ॥ भगवान् श्रीकग और उन भिड़नेवाय चाणूर दोनों ही भिम-मिन्न प्रकारके दो युपधाते पयान्मान्य सधैष पलमुष्टिको ॥१९॥ का प्रयोग करते हुए परस्पर जिस प्रकार हमसे थे, वैसे ही क्यामजी पौर मुधिफ भी मिड़े गए थे॥१९॥ भगवद्गापनिप्पासर्यचनिप्पेपनिप्रैः भगवान्के बा-प्रस्पा पासे भी कठोर हो रहे थे। अभी रगइसे चागरकी रग-रगतीपर गयी। पार पर उसे एसस चाणो भज्यमानाका मुहुर्लानिमपाप ह ॥२०॥ मन्म हो रहा था मानो उसके शरीरके सारे मन | टूट रहे हैं। उसे वही म्यग्नि, वही म्यय ॥२०॥ स स्पेनवेग उस्पस्य सप्टोकस्य कराषुभी । का यह अत्यत प्राधित होकर पाजकी तरहाटा बोर सोनों हापोंक से पाँधकर उसने भगान् भीष्ण- भगवन्न पामुदपं श्रद्धा पक्षस्यबाधत ॥२१॥ की छातीवर महार किया ॥२१॥ परस्त उमके प्रहारसे •मियों नहीं प्रदीपी गौसे निम्न ही समुदेव-देशीर से भवः । उनी बाते मुन म० ४४] दलम सन्म ३९७ नाचलचस्प्रहारेण मालादत इस दिय । भगवान् तनिक मी विचलित न हए, जैसे भोंके गनरे की पारसे गमराज । उन्होंने चाकी दोनों मुनाएँ पफा बाहोनिगृम पाणूरं पहशो मामयन् हरिः ॥२२॥ ली और उसे मन्तरिक्षम वा वेगसे कई बार घुमाकर धरतीपर दे मारा । परीक्षित ! चाणूरके प्राण तो पुमानेके माठे पोषयामास तरसा क्षीणनीवितम् । सम्पही निकल गये थे। उसकी येषभूषा वस्त्र म्यस्त मिस्रस्ताकस्पफेशस्रगिन्द्रध्यम इपापस ॥२३॥ ऐ गयी, केश और माअ विस्खर गयीं, यह इन्द्रधन ( इन्द्रकी पूमाके लिये एक किये गये बड़े शो) के तथैव सटिका पूष स्वप्प्यामिहतेन थे। सम्पन र पहा ॥ २२ २३ । इसी प्रकार मुटिफने मी पहले यामनीको एफ घूसा मारा । इसपर पत्री पठभद्रेण मलिना उलेनाभिहतो भृशम् ॥२४॥ ममामजीने वसे या मोरसे एक सम्मथा ना दिया ॥२५॥ समाचा पनेसे वह काँप उठा और भाँधीसे उड़ाए प्रपेपित स रुधिरसामन् मुम्वतोऽदितः । | वक्षके समान अत्यन्त म्यपित वीर क्तमें प्राणाहीन म्यसुः पपातोपस्पे वाताहत साधिपः॥२५॥ होकर म्यून उगता हुवा पृप्पीपर गिर पड़ा ॥ २५ ॥ हे राजन् ! इसके बाद योसामि श्रेष्ठ भावान् मम्माम- पता फूटमनुप्राप्त रामः प्रहरता पर । जीने अपने सामने आते ही फूट नामक पइयानको सम्भनेटमें ही वायें आपके घूससे उपेक्षापूर्वक मगर अबधील्लीलया राजन् सापर्म वाममुटिना ॥२६॥ सटा ॥ २६ ॥ उसी समय भगवान् श्रीहप्णने पैरवी वर्षेव हि शुलः कप्णपदापसम्भीर्पकः । ठोकरसे शटका सिर धडसे भाग कर दिया और सोश को तिनकेसी तरह चीरकर दो टुपये कर दिया । इस विधा विदीर्णस्तोलक उभावपि निपेतसुः ॥२७॥ प्रकार दोनों धराशायी हो गये ॥ २७ ॥ जय बापूर, चाणूरे मुरि कूट शले तोशल इते । मुएिफ, भूट, शठ और तोशर ये पाँचों पहलवान र चुके, तब जो बच रहे थे, पे अपने प्राण बचानेके लिये शेपाः प्रधर्मलाः सर्वे प्रामपरीप्सषः ॥२८॥ साप बसि माग साहुए ||२८|| नफे भाग मानेपर गोपान् वयस्यानाकप्य संमृन्य विजहतुः। मगवान् श्रीकृष्ण और पराममी अपने समवयस्क बाट पाठको स्वीच-बचकर उनके साप मिाने वीर माप वाघमानेपु त्र्येषु पलान्ती रतन पुरी ॥२९॥ नापार मेणिनिके साप अपने नपरोकी भनकररको | मियक मउग्री-पुरतीक है परन गगे ॥२०॥ जना प्रमरपुः म फर्ममा रामप्णयो।। मगवान् श्रीस्य और नमी इस अन मीना रम्या सुपी दाबा महा आमट रा । अप श्ते फर्म विप्रमुम्पा साप साधु मामिति॥३०॥ प्रमण और साधु पुरुष 'पन्य है, पन्य है:- फहस्त प्रमा यरन लगे। परम्तु ममा इसमे या इतेषु मरलपर्येषु विद्वत प भामराट् । दुम्म हुआ । इ कौर मी पिर गया ॥ ३० ॥ जय उमत्र प्रधान पहत्यान मार टार गप और पराए सक-मसा भाग गप, न मोजगत सन बान शान. न्पधारयन् म्वनर्याणि पाय घेदमुवाच ॥३१॥ गन - परा Pप मौर आन मेयर यह बात १ मिरता -इस प्रकार - -

भीमागपत
[.४१
"
नि सारयत दुचो पसदेवात्मजो पुरात् । दी-॥ ३१ ॥ धरे, वासुदेवके इन दुश्चरित्र साधे
धनं हरत गोपाना नन्दं पनीत दुर्मतिम् ॥३२॥
नगरसे बाहर निकाल दो। गोपोंका सारा धन धीन में
और दुर्मुदि नन्दको कैद कर ये ॥ ३२ ॥ यमुत
पसुदेवस्तु दुर्मेधा हन्यतामाधसत्तम । मी बड़ा कुबुद्धि और दुष्ट है । उसे शीन मर गये।
उग्रसेना पिता चापि सानुगः परपथगः ॥३३॥
मौर उग्रसेन मेरा पिता होनेपर भी अपने अनुयापियोंकि
साप शत्रुओंसे मिस्त्र मुना है। इसलिये उसे भी कम
एवं विकत्यमाने पे कसे प्रपितोऽध्ययः । मन ओशो ॥ ३३॥ कंस इस प्रकार मह-माकर वापर
लपिम्नोत्पत्य सरसा मममममारहत् ॥३४॥
कर रहा था कि अविनाशी श्रीकृष्ण कुपित होकर पुरस
गपूर उठकर असे ही उसके ऊँचे मध्यम व
समाविशन्तमालोक्य मृत्युमात्मन बासनात् । कहे ॥३९॥ जब मनस्त्री क्सने देखा कि मेरे मृत्युरूप
मनस्वी सहसोत्थाय जगृहे सोऽसिचर्मणी ॥३५॥ | भगवान् श्रीकृष्ण सामने आ गये, तब वह सहसा जाने
सिंहासनसे उठ सका था और हापमें ढाल तपा समर
त खमपाणिं विचरन्तमाशु उटा की ।। ३५॥ हाथमें तलवार पर यह चोर करने
अवसर (दता मा पैतरा बदल्ने एगा । वामाश्में
स्पेन यथा दक्षिणसध्यमम्परे ।
उड़ते हुए वाजके समान यह कमी दायाँ और ना
समगदी दुर्विपहोगवेजा तो कमी पायी घोर । परन्तु भगवान्का प्रचण वेब
मधोरग वार्यसुतः मसम्म ॥३६॥
बत्पत्त दुस्सह
है। जैसे गहा साँपको परत तेर
वैसे दी मायान्न पपूर्वक उसे पका मिपा ॥१६॥
प्रगृम फेशेषु
पलस्किरी
इसी समय कसका मुखर गिर गय वौर भगवान्ने उसके
निपात्य रहापरि तुझमश्चात् ।
केश पकाकर उसे भी उस ऊँचे मनसे रंगभूमि मीरा
Pपा। फिर मम स्वतन्य और सारे विपके वायप मगमन्
तस्योपरिष्टात् म्वपमजनाभ
श्रीकृष्ण उसके उपर स्वयं फर पर ॥३७॥उनके
पपात विमाधम आरमतत्र ॥३७॥ [करते ही कसकी मृत्यु हो गयी । सबके देसते-दोस्त
त सम्परेत बिचकर्म भूमी
| भगवान् श्रीकृष्ण पं.सकी पशो धरतीम उसी प्राम
घसीग्ने स्टगे, जैसे सिंह पापीको पसी । मोर।
हरियम नगता विपश्यतः ।
उस समय सबके मुंहसे हाय ! हाय !, दीदी ऊँगी
अवाज सुनायी पड़ी ॥३८॥ पम निस्य निरन्तर पनी
हाहति शब्द मुमहाम्नदाम्
घया माय धीमगरा दी क्तिन पाना गया
दीरितः
प। कर ति-पीत, साते धरते, योगा और माँ
मेन मुम ममय ओ हमने पक्षमा माग
म निगदादिग्नभिया तमीधर
श्रीाणको ही दमा गता भाग मल मिनो
पिरायदन पारिसनम्बरमन ।
परामप- पाइपभागमे टीम म यि नम
दो-नमे प्रगानगे उनी गरी प्राति पर
ददने नकारामप्रता
गुक्ति ई निगरी प्राणिय.. तापी पागिपर1ि
मारमाए ॥३०॥ भी पनि॥॥
गर्वजनरेद्र ॥३॥

E कम-उद्धार

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ज०४४] दशम स्कन्ध तस्मानुजा प्रावरोऽटौ फन्पग्रोपकादय । कसके कर और यमर भादि पाठ श्रेटे थे। वे अपने को माईका बदला लेनेके लिये कोषसे धाग- सम्पपापमभिदा भानुनिषेशकारिणः ॥४०॥ पले होकर भगवान् श्रीकृष्ण और मलाकी भोर दौड़े || १० || जब मगवान् क्यामजीने दे कि ये वयाविरभसाम्तोस्तु सपचार रोहिणीमुता। बारे मेगसे युद्धके लिये तैयार होकर दौड़े भा रहे हैं, तम मान परिषमपम्य पनिव मृगाधिपः ॥४१॥ महोंने परिए उठाकर इदं वैसे ही मार राय, से मिह पशुओंको मार टाळता है ॥ ११ ॥ उस समय नेदुर्वन्दुभयो ष्योम्नि अयशाया विभूतयः । वाकाशम दुन्दुर्मियों बजने लगी । भगवान्के विभूति- सरूप मा, शकर आदि देवता बड़े भानन्दसे पुपोंकी पुप्पः फिरन्तस्तप्रीताः पश्चसुर्नन्तः त्रियः ॥४२॥ र्षा करते हए उनी स्वति करने हो । अप्सराएँ नाचने का ॥ १२ ॥ महारान ! फेस और उसके क्षेपों खियो महागन मान्मरणाम्विताः । माइयोंकी मियाँ अपने आस्मीय भजनोंकी मृत्युसे वस्यन्त सनाभीयर्विनिप्रन्याधीhण्यभूविलोपनाः ॥४३॥ दुखित हुई। वे अपने सिर पीटती हुई बामि आँसू मरे कहाँ पायी ॥ १३ ॥ वीरयष्यापर सोये हुए अपने श्रयानान् धीरशय्यामा पसीनालियनोचतीः । पतियोंसे लिपटकर ये शोकमस्त हो गया और बार-बार आँसू बहाती हठचे सरसे चित्रप करने लगी ॥१४॥ विलेपु मुस्वरनार्यो विझजन्स्पोमाः सुय ॥४४॥ नाप 1ो प्यार ! हे धर्मा ! हे कारणामय ! हे अनापमा ! श्राफ्फी पस्युसे इम साकी मृत्यु हो हा नाष प्रिय धर्मश करुगानापात्सल । गयी। भाज हमारे घर उजा गये। हमारी सन्तान स्वपा हवेन निहता वर्ष ते सगृहप्रजाः ॥४५॥ अनाय हो गपी ॥ १५ ॥ पुरुस्श्रेष्ठ ! इस पुरके वाप ही सामी मे । मापके विरासे इसके सप समाप्त हो स्वया पिरहिवा फ्स्पा पुरीम पुरुषर्षभ । गये और मानधिक उतर गये । पर हमारी ही भौति विक्या होकर शोमाईन ए गयी ॥ १६॥ सामी ! न शोभते बयमिप निचोत्सवमाला ॥४६॥ मापने निरपराध प्राणियोंके सप घोर द्रोह किया था, अन्याय किया था, इसीसे आपकी यह गति । सच अनागालमूतानां फवपान दासरवणम् । है, या नगरके जी0से बाह करता है, उनका अहित वेनेमा भादां नीतो मूतष्ठककाठमेत सम्॥४॥ ये भगवान् महा जग के समस्त प्राणियोंकी उपति करता है, ऐसा कोन पुरुष शान्ति पा सकता है | ॥१७ सर्वेपामिह भूतानामेप हि प्रभवाप्पपः । और प्रत्यके भावार है। यही रक्षक भी हैं। जो इनका मुरा पाइसा है, इनका निरस्कार करता है, वह गोप्ता पदवम्पायी न कधित् सुम्पमेधते ॥४८॥ कभी सुखी नहीं हो साता ॥ १८ ॥ भीमुक उपाय भाशुष्वेवजी कहते हैं-परीभित् । मावान् श्रीहम्ण ही सारे संघरके नीमनदाता हैं। उन्होंने रायोपित आघास भगर्याछाकभावना। रानियोंको वास कसा, सम्ममा दी, जि मामीतिक समालोकिकी संस्था इताना समकारपत् ॥४९॥ अनुसार मानेवायका नेश त्रिपा-वर्म होता है, प भीमद्भागवत [.. मातरं पितरं च मोषयिस्वाथ बन्धनात् । सव कराया ॥ १९ ॥ तदनन्तर मगान् श्रीमान और पामजीने जेलमें कर अपने माता-ोि कुप्मरामोषयनाते शिरसाऽऽस्पृश्य पादयो॥५०॥ पन्धनसे छुपाया और सिरसे स्पर्श करके को घरमोंकी पन्दना की ॥ ५० ॥ किन्तु अपने पुरी देवको पसुदेवय विनाय जगदीघरौ । प्रणाम करनेपर मी देवकी और पमुदेवने उन्हें बादीम समसकर अपने इससे नहीं लाया । उन्हें शाहरा कतसंवन्दनौ पुत्रौ सखमाते न शहिती ॥५१॥ गयी कि हम नगदीश्वरको पुत्र कैसे समझें ॥ ५१ ॥ हो इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या संहितायो दशमस्कन्धे पूर्वि कसबा नाम चतुवस्वारिंशोऽप्याप ॥ ११ ॥ अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय भीरुम्ब-बसरामका यज्ञोपवीत मौर गुरुकुम्प्रवेश मा क उपाय मीशुकवेषनी कहते हैं-परीधित् ! मा पिठरावुपलम्पायों विदित्वा पुरुषोत्तमः । श्रीकृष्णने देा कि माता-पिताको मेरे ऐश्वर्या, में भगवाक्का झान हो गया है । परन्तु इन्हें ऐस होना ठीक नहीं, (इससे तो ये पुत्र स्नेहका सुरु मा भूदिति निजामाया क्वान जनमोहिनीम् ॥१॥ नहीं पा सकेंगे-) ऐसा सेवफर उन्होंने उनपर भर्न पर योगमाया फैल्म दी, जो उनके सपनों मु उवाच पितरावेस्म सासमा सास्वतर्षभ । रसकर उनकी स्वीममें सहायक होती है ॥१॥ यदुवंशशिरोमगि मगवान् श्रीक्षण बड़े भाई मन्त्रामी प्रभपावनतः प्रीणभम पावेति सादरम् ॥ २॥ सप अपने माँ-पके पास जाकर मालक के विनयसे मुक्सर मेरी अम्म ! मेरे रिताजी न नाममो युषपोस्तात निस्पोरकण्ठिनयोरपि । | शब्दोंसे उन्हें प्रसन फरसे हुए कहने लगे---|| २ ॥ 'पिताजी ! मतात्री ! हम आपके पुत्र है और अप हमारे लिये सवा उकछिन हेहै, फिर भी पर बारपांगशारा पुत्राम्पामभवन् कचित् ।।३॥ हमारे वाल्प, पौगए और किशोर भास्पाका सुट हमसे मही पा सके ॥ ३ ॥ दुर्दैवाश हममगेका न लम्भा देहसयोर्यासो नौ भवदन्तिफे। आपके पास रहना सौम्यग्य ही मही निम । इससे बारको माता-पिताके परमें रहकर वो परम्पारका यो बाला पिसगेहम्पा बिन्दन्ते सालिवामदम्॥४॥ सुम्न मिलता है, वह हमें भी नहीं मिल सका ॥ १ ॥ रिता वोर मता ही इस शरीरको जन्म देते है और इसका पाटन गासन करते है। तप कही नाफर पर ममार्थमम्भवो देहा अनितः पापिता यता शरीर धम, अर्य फाम अपना मोक्ष की प्रासिस सभ्न १ मत कम गरयनिवार।

४०१ दशम स्क अ०४५] न तयोर्याति निर्देश पित्रोर्मर्त्य शतायुपा ॥५॥ मनता है । यदि कोई मनुष्य सौ वपतक जीकर माता और पिताकी सेवा करता रहे, तब भी यह उनके यनपोरात्मज फल्प आत्मना च धनेन च । उपकारसे उमण नहीं हो सकता ॥ ५॥ जो पुत्र सामग्य रहते भी अपने माँ बापको शरीर भीर धनमे पति न दयास प्रत्यम्बमाम मारयन्ति हि ॥ ६॥ सेव नहीं करता, उसके मरनेपर यमदूत उसे ठमके अपने शरीरका मांस स्किराते हैं ॥६॥ मा पुरुष मावरं पितरं पदं भाया साची मुत शिशुम् । साय होकर भी बूढे माता-पिता, सती पही, याप्टक गुरुं विप्रं प्रपन्न प कल्पोऽपिनसमन् मृत ॥७॥ सन्तान, गुरु, ब्राह्मण और शरणागतका भरण-पोषण नहीं करताप जीता हुना भी मुर्देके समान ही मायकल्पयोः फमानिस्पधिप्रघेतमोः। १७॥ पिलानी ! हमारे इसने दिन ध्पर्य ही बीत गये । पोविकसके मयसे सदा तरिममित्त राने के मोपमते घ्यतिकान्ता रिखमा मामनर्थता ॥८॥ कारण हम वापकी सेवा करनेमें बसमर्प रहे ॥ ८ ॥ मेरी मानौर मेरे पिताजी ! बाप दोनों में क्षमा सन् धन्तुमईथनात माता परतन्ययो । परें । दाय ! दुए कंसन अापको इतने इतने फार दिये, परन्तु हम परस्य रहने के कारण आपकी कोई अर्यवात्रा गुश्रूषां प्लिष्टयोदुरा भृशम् ॥ ९॥ ' सेद्य-शुपा न कर सके ॥ ९ ॥ भीगुर उपाप भी शुकदेवजी कहते है-परीक्षित् । अपनी मीगसे मनुष्य बने हुर विधारमा श्रीहरिकी इस पाणीसे इति मायामनुप्पस्स हरविचात्मना गिरा । मोहित हो देवकी समुदेपन उन्हें गो में उठा लिया माडिनावशमागप्य परियज्यापसुर्मुदम् ।।१०॥ और ८ पसे चिपकाकर परमानन्द प्राप्त किया ॥ १० ॥ राजन् ! ये स्नापा से पचार पूर्णत मोहित हो मिमन्नापश्रुधाराभि म्नेहपान पाती। गये और आसुओकी धारासे उनका अमिय करने न रिविदान्गजन् पाप्पाला विमादिता ।।११॥ से कुछ यार भी म मके ॥ ११ ॥ म्नग । यहौतय कि मुओंके कारण गण ध जानेमे ग्यमामाम्य पितग भगान् दयकीमुन । फीमम्म भगवान् श्रीकृष्णन इस प्रकार अपने मातामर नामर्न पनामररान्नृपम् ।।१२।। माता-पितायो मरतनायर भरने माना उममेनसे पदपोंका गजाबमा पिपा || १२॥ और उनसे का- नहागन'म आपसी प्रना । अर भार पापान महाराज प्रमायामप्तमहमि दमोर नामम पानिपे । राजा पय लिया गप यपातिवाद पद्भिनामिनभ्य नपामन ||१३|| (पान्मुनी मी ही मप अपर वर्ग हानफ कारग पदमी गजभिगमन र मी पे माने मपि मृग्य उमीन भरता विधारय । महोत ॥१३॥ असम मेफ यनका पसी मे काग - नरपा भी मिरवर ररियानता मितान्ये नगधिरा || गा मा ना में माना ! किया।.२५। - ४०२ भीमनागपत [२०१५ सर्वान् स्वान्यातिसम्म धान् दिम्म्पः कसमयाद् गठान ही क्या है ॥ ११ ॥ परीक्षित् । भगवान् श्रीकम ही सारे विपके विधामा है । उन्होंने, नो सके भयसे म्याकुल होकर इधर-उधर माग गये थे, उन पर पदुष्ण्य कामघुदासाईरादिकान् ॥१५॥ इणि, अन्धक, मधु, दापई और कुकुर बारिशम उत्पन समम्त समातीप सम्बन्धिोंको संगम समाजिवान् समायाम्प विदेशापासमर्शितान् । युवाया । ठमें धरसे बाहर बनेमें बनाश ठागा पका पा । मगवान्ने उनका सत्कार किम, सालना दी और उन्हें स्वा धन-सम्पत्ति देकर तप्त किया कष न्यवासपत् म्बगहेषु विसः मंस विपकत् ॥१६॥ अपने-अपने घरोंमें बसा दिया ॥ १५ १६ ॥ का सारे के सारे यदुर्वी मगमान् श्रीकृष्ण तथा कम्पनी के सुप्मसंकर्पणमुजैर्गुप्ता लम्ममनोरथाः। बाहुबलसे सुरक्षित पे । उनकी स्पासे उन किसी प्रकारकी म्यपा मही पी, उस महा था । उनके प्ररे मनोरप सफर हो गये थे। वे ना हो गये। गृहेषु रेमिरे सिद्धाः रुप्मरामगतज्वराः ॥१७॥ मन में मपमै भपने घरोम बामन्दसे विहार करने को ॥ १७॥ मगवान् श्रीपणका बदन वानम्मका सदम पीचन्तोजरहः प्रीता महन्दपदनाम्मुखम् । है। गा नित्प प्रफुछित, कमी न कुमपमेयम कम है। उसका सौन्दर्य पार है। सदय स और चितवन उसपर सदा मामती यहती है । परस्य नित्म प्रमदिर्स भीमत् मदमसितषीक्षणम् ।।१८॥ दिन-प्रतिदिन उसका दर्शन करके वानन्दम्म बने ॥ १८॥ मयुराके पर पुस्य भी युवकों के समान तर प्रत्रयसोऽप्यासन् युवानाऽतिबलौजसः । जपत मान् और उत्साही हो गये थे, क्योकि वे अपने मेोके दोनोंसे पारंमार मानके | मुखरपिन्दका अमृतमप पिन वोऽसमन्दस्स मुखाम्पुबसुधा सा ॥१९॥ राते थे।॥ १० ॥ अथ नन्दं ममामाय भगवान् देवकीसुत । प्रिप परीक्षित ! पत्र देवकीनन्दन भगवान् भी और बलरामग्री दोनों ही नम्दबाबाके पास वाये और समर्पणम राजेन्द्र परिप्पन्पेदमूचसु ॥२०॥ | गले लगने के बाद उनसे कहने लगे॥२०॥ पितमी ! आपने और माँ यशोशने महे स्नेह और दुस्मरसे पितवाम्या स्निग्धाम्पा पोषिती लालिसौ मृशम् । हमारा स्मसन-पाम किया है। इसमें कोई सन्देह नही पित्रोरम्पपिका प्रीतिरास्मजप्पास्मनोऽपि दि॥२१॥ | कि माता-पिता सन्तानपर अपने शरीरसे भी अधिक स्नेह करते ॥ २१ ॥ गिनें पालन-पोषण मकर स पिता मा च जननी मौ पुप्णीतां म्यपुत्रवत् । सकमेके कारण समन-समपिर्योने त्याग Pया, उन बानों को नो मेग वपमे पुरके समान मायारसे मिन् पधुभिरुन्मष्टानकन्यै पोपरक्षण ॥२२॥ पामते १, ने ही वास्तवमें उनके माँ बाप १ ॥२२॥ पितामी ! जब आपलोग अममें जाइये । इसमें सदो यात पूर्प मन तात पर्य प म्नाग्वितान् । महा कि हमारे बिना वारमन्यमानो समण बाप मकरन्द-रस पान करते दशम स्कन्ध ४०३ मातीन् यो द्रष्टुमेप्यामो विधाप सुइदा मुखम् ॥२३॥ लोगों को मात दुख होगा । यहाँक साम्-सम्पधियोको सुखी करके हम वापळोगोंसे मिटनके लिये पायेंगे। एवं सान्त्वय्य भगवान् नन्द सम्रममच्युतः । ॥ २३ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने नन्दवाना और दूसरे प्रवासियों को इस प्रकार सममा-पुताकर बड़े भादरके पासोऽलंकाररुप्याधरईयामास सादरम् ॥२४॥ | साप पस, पाभ्पण और भनक धातुओंके यन परतन भादि देकर उनका सत्कार किया ॥ २९॥ भगवान्की इत्युक्तस्तौ परिप्वज्म नन्दः प्रणपविल । बात सुनकर नन्दगाबाने प्रमसे अधीर होकर दोनों भाइयोंको गले ल्या किया और फिर नमि पोस् पूर्याभुभिर्ने सह गोपैम ययौं ॥२५।। भरकर गोपोंके साप प्रस्क लिये प्रस्थान किया ॥ २५॥ मथ शूरमुखो राजन् पुत्रयोः समकारयत् । है राजन् ! इसके बाद वसुदेवनीन अपने पुरोहित गर्गाचार्य तथा दूसरे ब्राह्मणोंसे दोनों पुत्रोका विधिपूर्वक पुरोधसा मामगैम यथावत् दिजसंस्कृतिम् ॥२६॥ हिनाति-समुचित यज्ञोपवीत सस्कार करवाया ॥ २६ ।। उन्होंने विविध प्रकारफ पन और आभूषणोंसे नामकर तेम्पोदा दक्षिणा गावोरुममालाः खलकताः । । सस्कार करके उन्हें बहुत-मी दक्षिणा तथा पाठोपाठी गौएँ दी । समी गौएँ गले में सोनेकी मारा पाने हुए खलंकतेम्म सम्पूज्य सवत्सा धौममालिनीः॥२७॥ पी समा वोर मी बहुत-से बासूपणों एम रेशमी वस्त्रों की मामोंसे विभूषित पी ॥ २७ ॥ महामति सदेवनीने याः फष्परामजन्मः मनोदचा महामतिः । भगवान् श्रीकृष्ण और ममामजीके नम नक्षत्रमें नितनी गौर मन-ही-मन सहस्प करके दी पी, उन्हें पहले कसने जन्मापसे छीन लिया था । अब ठनका स्मरण सामाददादनुस्मृत्य फेसेनाधर्मतो हसाः ॥२८॥ करके न्होंने बामणों को ये रिसे दी ॥ २८ ॥ इस वतम लम्बसस्कारी दिक्त्व प्राप्य सुमतौ । प्रकार यदुवंशके भाचार्य गर्गजीसे संस्कार कराकर मल- | राममी और भगवान् श्रीकृष्ण शिजत्वको प्राप्त पए। उनका प्रहनयान असम तो था ही, पब उनाने मर्गा पदुलाचार्या गापत्र प्रमास्मिता ॥२९॥ गायत्रीपूर्वक पप्पयन करनेके हिपे ठसे नियमत स्वीकार किया ॥ २९ ॥ श्रीकृष्ण पौर पसराम मगरके एकमात्र प्रभो सर्वविषानां समझा मगदीचरौं । सामी । सर्पक्ष । सभी विपाएँ ठम्हीसे निकाटी है उनका निर्मक्ष धान स्वत सिद्ध है। फिर भी उन्होंने नान्मसिद्धामलवानं गूहमानो नरहितः ॥३०॥ मनुष्यकी-सी सीध्य करके उसे छिपा रमहा पा ॥ ३० ॥ यो गुरुकुल पासमिच्छन्तापजग्मतुः । अप दोनों गुरुकुलमें निवास करनेकी इसे काश्पगोत्री सान्दीपनि मुनिके पास गये, जो अपम्तीपुर काश्य सांदीपनि नाम मवन्तीपुरवासिनम् ।।३१।। (उम्मैन ) में रहते थे ॥ ३१॥ दोनों माई विविपूर्वक गुरुमीके पास एने मा। उस समय वे बड़ी सं पत, अपनी पेशाओंको सर्वपा निपमित रस्से पर थे। पथोपसाप वो दान्ती गुरौ प्रतिमनिन्दिताम् । गुरुमी तो उनका भादर करते ही थे, भगवान् श्रीकम्ण ४०४ श्रीमद्भागवत [अ०४५ । ग्राहयन्तापेतो म भक्त्या देवमिवास्तौ ॥३२॥ | और कसराम भी भी गुरुकी उच्चम सेवा कैसे करनी वादिये, इसका मादर्श लोगोंके सामने रमते ए नही तयोईिनवरस्तुष्ट शुदभावानुधिभिः। | भकिसे इष्टदेक्के समान उनकी सेवा करमे लो ॥३२॥ गुरुवर सान्दीपनिजी उनकी पुरमाबसे युक सेवासे प्रोवाच घेदानखिलान् साझोपनिषदो गुरु ॥३३॥ बहुत प्रसन्म हुए । उन्होंने दोनों भाइयोंको छों का और उपनिषद के सहित सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा दी ॥३३॥ इनके मिथा मन्त्र और देवतानोंके जानके साप धनुर्नेद, सरहस्सं धनुर्वेदं धर्मान् न्यायपास्तथा । मनुरमृति मादि धर्मशात्र, मीमांसा पारि, वेदोंका तात्पय क्तत्मनेषाले शास, तर्कविया (म्यापशाम) तथा चान्वीक्षिकी विधा राजनीति च पविधाम् ॥३४॥ माल्फिी भी शिक्षा दी। साथ ही सन्धि, विप्रा, पान, आसन, देव बोर वामय-इन छ मेदोंसे युक राब सव नरवरभेष्ठौ सर्वविधाप्रवर्सको । नीतिया मी पप्पन पत्यया ॥३१॥ पीक्षित ! भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम सी विधाओं के प्रवर्तक हैं। इस समय केवल श्रेष्ठ मनुष्पका-साम्यवाहार करते हुए सकभिगदमात्रेण वो संजगृहप ॥३५।। | सीधे अप्पफ्न कर ये थे । उनहोंने गुरुमीके केस एक बार कहनेमाप्रसे सारी विपाएँ सीसा ॥ ३५ ॥ वयफ चौसठ दिनरातमें ही सफ्मीशिरोमणि दोनों अहोरात्रै असुपटया सयौ तावतीः फलाः । माइयोंने चौसठों को काहान प्राप्त कर लिया । इस प्रकार अध्ययन समाप्त होनेपर उन्होंने सान्दीपनि गुरुदक्षिणयाऽऽचार्य छन्दामासतुर्मपः ॥३६॥ | मुमिसे प्रार्थना की कि वाफ्की चो इमो, गुम् • पीठ कम्गएँ - १ गानरिया २ पाच-माँति-मों तक मे बमना । ५ मिनारी टे बनाना ७ पाप मार पुमारिसे पूनाके उपहारी रपना मना ८ पद सेन बनाना १ दाँत वन मौर मरी रंगना) १ मनिगौ की फो पनाना ११ एप्पा रचना १२ सम्झे गाँध ऐना १५ विपिन सिदियों दिसामना १४ स-सा आदि बनाना १५ कान मौर बाटीके मैके गाने नाना १५ पड़े मौर गाने बनाना १. मेरे मामसि भार करना १८ अनाके पौत्री एकना करना १९ मुगाब पस्तुएँ-त्र है मावि स्नाना २ इन्द्र बाल–बागी २१ चाहे मेल पप धारप कर ऐना २२ हापकी कि काम, २१ सय-वासी पानी पस्तुएँ बनाना २४ क्य-सय पीने पराम बनाना २५ पूकर काम २५ पुष्य बनाना, नपाना २० परेसी २८ प्रतिमा आदि बनाना २१ उनीत ५ प्रन्योरे पाने सदरी ११ नारक, मास्मायिका मारित्री रमना करना २२ समस्यापूर्ति करना १५पी देत बाण भारि बनाना ३४ गीचे रो भावि बनाना, ३५ पत्रकारीगरी ५पा मदिनानी पीगरी २० ने बोरी आदि धातु तपा होस् पम्ने माद रखोकी परमा १८ सोना बौदी मादि ना ना ३९ मनिया रंग पचानना। सानों परपान ४१ पत्री पिरिय ४२ मेड़ा मुर्गा बटेर बादिप्रेमानेत्री रीति ४५ नोवा-मैना भारिन ऐपिसोबोकना उचान विधि ४५ पौकी काम गर । मुसीधीव पा मनी मात क्वारेन सम्म सम्मान समझना ४८ मिन देशोधीमान शान एन-अपशकुन बानना प्रभो उचरमें एमागुमना ५ नाना प्रभरके मापत्रबनाना ५१सोमे नाना प्रकार मापम भरमा ५२ सारेभिभाग बनान्न ५३ मनम स्टारपना करना ५४ नबी नदी वा मिना ५५ हसे प्रम निममना ५५ मत प्रेम सम ५. एम योग गन ५८ बर्बोप्रेशियाने या परतने विधा ५९ पूत्रीडा ६ दूरके मनुमा मखमोल मारप पर सेना १ पासप्रेशन २ मपतिया ( प्राप्त कम्पनेवायरिया १४वमारिने पपम रखने मचा। तत्प ४ नाम्म

दशम स्कन्ध
४०५
१०४५]
दिजस्तयोस्त महिमानमत
दक्षिणा माँग लें ॥ ३६॥ महारान! साम्दीपनि मुनिने
उनकी बहुत महिम्य और अलौकिक मुद्रिका अनुमब
सलक्ष्य राजमतिमानुपी मतिम् ।
कर लिया था। इसलिये उन्होंने अपनी पतीसे सत्मह
सम्मन्थ्य पल्ल्या स महार्णवे मृस
करके वह गुरुदक्षिणा मोगी कि 'प्रभासक्षेत्रमें हमारा
पालं प्रभासे परपाम्पमूष ह ॥३७॥ मालक समुद्र में बकर मर गया था, उसे उमलोग का
दो ॥ ३७॥ बलरामनी और श्रीकृष्णका पराक्रम
तयेस्यधारम महारथी र
अनन्त था । दोनों ही महारथी पे। उन्होंने भात
प्रभासमासाद्य दुरन्सविझमौ । पमा कहकर गुरुजीकी नाडा स्वीकार की और रपपर
वेलामुपग्रन्य निपीदतुः वर्ण
सवार होकर प्रभासक्षेत्रमें गये। वे समुद्रतटपर जाकर
क्षणमर बैठे थे। उस समय यह जामकर कि ये
सिन्पुर्विदित्वाईणमाइस्तपो ॥३८॥
साक्षात् परमेश्वर है, अनेक प्रकारकी पूना-सामग्री
तमाह भगवानाम्दु गुरुपुत्र प्रदीयताम् ।
लेकर समुद्र उनके सामने उपस्किा पुभा ॥ ३८ ॥
भगवान्ने समुद्रसे कहा–'समुद्र । तुम यहाँ अपनी
पोऽमामिह त्वया प्रत्तो पालको महतोर्मिणा ॥३९॥ बी-बड़ी तरकोंसे हमारे विस गुरुपुत्रको पहा ले गये
थे, ठसे लाकर शीघ्र हमें दो' ॥ ३९ ।।
समुद्र उपाय
मनुष्यवेपपारी समुदने कहा- देवाविदेव श्रीकृष्ण!
नैवाहार्पमई देव दैत्य पन्नमना महान् । मन उस पालकर नहीं लिया है। मेरे बमें पद्धजन
अन्तर्बरकर कृष्ण शारूपपरोऽसुरः ॥४०॥ नामका एक पका मारी दैत्य मातिका वसुर के रूप
राता है। अवश्य ही उसीने का कारक चुरा लिया
भास्ते तेनाहतो नूनं समृता सत्वरं प्रमः ।
होगा' ॥ १०॥ समुदकी बात सुनकर भगवान् परत
ही जम्में मा घुसे बौर शहारको मार राग । परन्तु
बलमाविश्य त हत्या नापश्पदुदरेऽर्मकम् ॥४१॥
वा बालक उसके पेल्में नहीं मिला ॥१॥ सम
उसके शरीरका शा लेकर मावान् रपपर चले
उदभप्रभव खमादाय रथमागमत् ।
साये । बसि बनामनीके साप धीकृष्णने या
वत संयमनी नाम यमस्व दयितां पुरीम् ॥४२॥ की प्रिय पुरी संयमनीमें जाकर अपना शह मनाया ।
गत्वा जनार्दन शा प्रदप्मौ सहलायुध ।
इसका शम्द सुनकर सारी प्रनाका शासन करनेवाले
शाहनिहदिमाकर्म्य प्रजासंयमनो यमः ॥४३॥
मगराजने उनका सागत किया भीर महिमावसे
भरकर विधिपूर्वक उनकी बहुत बड़ी पूना की।
सयोः सपो महतीं चके भक्त्युपदेहिताम् । उन्होंमे नम्रतासे झुककर समस्त प्राणियोंके दपमें
उवाचावन्तः कृष्णं सर्वभूताक्षमालयम् ।
विराममान सचिदानन्द-सरूप मगवान् श्रीकणसे कहा-
'टीलासे ही मनुप्प मने हुए सर्वम्यापक परमेघर | मैं
लीलामनुष्य हे विष्णो युषयो करवाम किम् ॥४४॥
भाप दोनोंकी क्या सेवा करूँ ॥ १२-१४॥
भीभगवानुसार
भीभगवान्ने कहा-यमरान ! यहाँ अपने कर्म
गुरुपुत्रमिदानीव निजकर्मनिवन्धनम् ।
बन्धनके अनुसार मेरा गुम्पुन गया गया है। तुम
मेरी भासा सीकार करो और उसके कर्मपर ध्यान
थानयम्य महाराज मच्छासुनपुरस्कर ॥४५॥ न देकर उसे मेरे पास ले माओ ॥ १५ ॥

४०६ भीमसागवत [२०१६ सयेति तेनोपानीवं गुरुपुत्र यद्धमौ । यमाबने जो 'आमा' कहकर मसान्का पादेश सीकर किया धौर उनका गुरुपुत्र का लिया । तब यदुवंशशिपमनि मगवान् श्रीकृष्ण और परामनी उस बालकको लेकर दवा स्वगुरवे भूयो प्रपीप्षेति समचतुः ॥४६॥ ठग्नेन और पाये और उसे अपने गुरुवेकको सौंपकर कहा कि बाप और जो कुछ चाहें, माँग लें ॥१६॥ गुरुत्वाब गुयमीने कहा-बेटा ! तुम दोनोंमे मध्यति गुरुदक्षिणा दी। अब मोर क्या पाहिये । जो तो सम्पर सम्पादितो वत्स भवम्पा गुरुनिष्क्रयः । मैसे पुरुषोधोका गुरु है, उसका कौन-सा मनोस्य को नु युप्मविधगुरोः कामानामवशिष्यते ॥४७॥ थपूर्ण रा सका है।॥ १७॥ बीये ! मन म दोनों अपने घर जाये । तुम्हें मेकको पवित्र करने गच्छत स्वगृह वीरो कीर्तिमस्तु पावनी । पाभी कीर्ति प्राप्त हो । सम्हारी पड़ी विषा स लोक बौर परोकौ सदा नवीन पनी रहे कमी छन्दस्सिमावपामानि भवन्त्विा परत्र च ॥४८॥ विस्मृत म हो ॥ १८ ॥ बेग पीक्षिर ! हि गुरुधीसे गुरुमैवमनुशावी रमेनानिलरासा। पाशा लेकर मायुके समान वेग और मेधके समान शाइबाले रपपर सवार होकर दोनों भाई मधुगम मैट आपाती सपुरं सास पर्मन्पनिनदेन ॥४९॥ वाये ॥ १९ ॥ मपुरकी प्रमा मात दिनों तक श्रीकण | मोर मामको न देखनेसे मत्पन्त दुसी हो दी समनन्दन् प्रमाः सर्वा ष्ट्वा रामजनार्दनी । पी। बम उन्हें जाया गया देख सके सब परमानन्दमें मग्न हो गये, मानो खोया बापन मिल गय अपश्यन्त्यो पहानि नष्टसम्बधना इव ॥५०॥ । हो ॥ ५० ॥ इति श्रीमनागपते महापुराणे पारमईस्पा संहितार्या दशमस्करपे प्रधि गुम्पुत्रानफ्नै नाम पचवारियोऽप्याप ॥१५॥ अथ षट्चत्वारिंशोऽध्याय च्यवनीकी मनपात्रा भीक उसाच मीशुकदेवजी कहते हैं-परीक्षित् । उम्पनी इनिशियों में एक प्रधान पुरस पे । साधार पप्णीनां प्रबरो मत्री रुष्णस्य दयितः सखा । पृहस्पतिमीके शिष्य और परम मुस्मिान् थे । उनकी शिप्पो परस्सवेः साक्षावो पुद्रिसपमः ॥१॥ महिमाके सम्बम्पमें इससे बहकर और कौन-सी बात रही या सकती है कि वे मात्राम् श्रीणके परे धमा भगवान् प्रष्ट भक्कमेकान्तिनं कपिन् । सखा सपा मन्त्री भी पे ॥ १॥ एक रिम शरम्पगों के सारे दुसर सेनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने अपने प्रिय ग्रीस्वा पाणिना पाणि प्रपमातिहरो हरिः ॥ २॥ मळ भार एकान्तप्रमी उदानीका बाप अपने हामें १ गुमति पत्र । पररापभिसाप ।

०४६] दशम स्कन्ध ४०७ . गच्छोदय ब्रज सौम्प पित्रोनों प्रीतिमाह । | लेकर कहा-॥२॥ सौम्पखमाव उदय ! तुम मनमें नाओ। मो मेरे पिता-माता नन्दवादा और यशोदा मैपा हैं, उन्हें वानन्दित करो, चौर गोपियों मेरे पिरहकी गोपीनां मदियोगाधि मसदसैर्विमोघय ॥३॥ व्याधिसे मनुत ही दुसी हो रही है, उमें मेरे सन्देश मुनाकर उस वेदनासे मुक्त करो ॥ ३॥ प्यारे ठम्य ! गोपियोंका मन नित्य-निरन्तर मुममें ही मगा पता वा मन्मनस्का मस्साणा मवर्ये स्पतदैहिकाः । है। उनके प्राण, उनका भीवन, उनका सर्वस्व में ही है। मेरे लिये उन्होंने अपने पति पुत्र मादि समी ( मामेष दमिस प्रेष्ठमात्मानं मनसा गताः।) | सगे सम्बन्धिपोंको छोर दिया है। उन्होंमे मुदिसे भी मुभीको अपना प्यार, अपना प्रियतम-माही, नहीं, थे स्पक्तलोकधर्माम मदर्थे तान् विमर्म्यहम् ।। ४ ।। भपना भास्मा मान रस्सा है। मेरा पण त हैकमो लोग मेरे लिये लौकिक और पारसैविक पोको क्षेत्र देते हैं, उनका भरण-पोषण में सप करता ॥१॥ मपि वा प्रेममा प्रेप्ठे उसे गोलत्रियः । प्रिय उद्धव ! मैं उन गोपियोंका परम प्रियतम । मेरे यहाँ चमे बानेसे वे मुझे रस्म मानती और मेरा स्मरण करके अपत मोहित हो ही है, बार-बार मर्थित सरन्त्यो विमुमन्ति पिरोस्कठपविला ॥५॥ हो जाती है। ये मेरे विराकी म्यपासे बिल हो यी हैं, प्रतिक्षण मेरे लिये उत्कण्ठित रहती मी गोपियो, मेसी प्रेयसियों इस समय मोही कार भारयन्त्यतिरुच्छ्रेण प्रायः प्राणान् कपनन । और यासे अपने प्राणोंको किसी प्रकार रस रही है । मैने उनसे कहा पाकिम पाउँगा । ही उनके जीपनका । उदय ! और तो क्या करें, में ही उनकी प्रस्पागमनसंदेशैलष्यो मे मदात्मिकः ॥ ६॥ आत्मा हूँ । वे निस्प-निरन्तर मुझमे ही ताप रहती ॥६१ भीमुक उमाप श्रीशुकोपजी करते है-परीक्षित् ! जब म्यान् श्रीकृष्णने यह मात कही, सब उनी बड़े आदरसे इस्पुक्त उदवो रामन संदेशं भर्तुरातः । अपने सामीका सदेश लेकर रषपर सवार हुए और भादाय रथमारूम प्रययौ नन्दगोइलम् ॥७॥ मन्दबके लिये बम परे ॥ ७॥ परम सुन्दर उसवनी सूर्यास्तके सम्प नन्दबाबाके प्रब पाँचे । प्राप्तो नन्दव भीमान् निम्लोपति विभावसौ। उस समय नंगळसे गौएँ छोर ही पी। उनके खुरों के बापातसे इतनी पूल ठा दी थी कि उनका रप रक छमयाम प्रविशता पशूना खुररेणुमिः ॥८॥ गया था ॥ ८॥ प्रममिमें अतुम्ती गौमोंके लिये मतवाले सौद वापसमें हारे थे। उनकी गर्जनासे पासिवार्येऽभिपुम्पद्विदित शुप्पिभिः। साप ब्रा ऍन रहा था । यो दिनोंकी प्यायी दुई गौर अपने पनोंफे मारी मारसे दबी होनेपर भी अपने-अपने पावन्तीभिप नासाभिस्योभार स्ववस्सफान् ॥९॥ पयोंकी घोर दौड़ रही पी ॥ ९॥ वाधार --

४०८
भीमद्भागवत
[म० ४६
32
इवस्तवो विलाहिर्गोवत्सर्मण्डित सिवैः । सफेदरंगके वडो वर-उपर उम्म-कदमचाले ए पात ही
भले मालम होते थे । गाय दुहनेकी 'घर-घर घनिसे और
गोदोइनन्दाभिरवं वेणूनां निस्वनेन च ॥१०॥
वॉसरियों की मधुर टेरसे अब मी अनकी मन शोम्म
हो रही पी ॥१०॥ गोपी मोर गोप सुन्दर-सुन्दर
गायन्तीभित्र फर्माणि शुमानि पलकप्मयोः ।
कर तथा गमोंसे सम्पमकर श्रीकृष्ण तथा पररामजीके
मङ्गलमय चरित्रोंका गान कर रहे थे और इस प्रकार
स्खलफवाभिर्गोपीभिर्गोपच सुविरामिवम् ॥११॥
प्रमकी शोभा और भी बह गयी थी ॥ ११ ॥ गोंकि
धम अमि, सर्प, अतिपि, गौ, प्रक्षण और देवा-
अम्न्पर्कातिथिगाविप्रपिवदयार्धनावितैः ।
पितरोंकी पना की हुई थी। पकी सुगन्ध चारों ओर
| फैल गी पी और दीपक जगमगा रहे थे। उन परोंको
धूपदीपेष मात्यप गोपाबासैमनोरमम् ।।१२।।
पुष्योंसे सजाया गया था। ऐसे मनोहर गहोंसे सारा र
और भी मनोरम हो रहा ॥१२॥ पायें बोर
सर्पतः पुप्पितवन विजालिकलनादितम् ।
पन-पक्रियों फलोंसे लद दीपा । पक्षी पाक के
ये वीर मारे गुंगार कर रहे थे। वहाँ जल बोर का
ईसकारप्रवाकीणें पपपणंभ मण्ठिवम् ॥१३॥ दोनों ही कमों के कनसे शोभायमान थे और इस,
पास धादि पक्षी वनमें पिार कर रोये ॥ १३ ॥
समाग समागम्य कृष्णसानुपरं प्रियम् । मग भगवान् भीडम्णके प्यारे अनुचर उसकी
अनमें भाये, सब उनसे मिलकर नन्दबाना बहुत ही
नन्दाप्रीत परिप्वज्य वासुदेषधियाऽऽर्षयत् ॥१४॥ प्रसम हुए । उन्होंने उदानीको गले स्ट्रगाफर उनका
| जैसे ही सम्मान किया, मानो स्लम भगवान् श्रीम
भोमित परमान्नन सविट फशिपी मुखम् । आ गये हों ॥ १ ॥ समपपर उत्तम अनका भाम्न
कराया और जब भारामसे पढ़गपर बैठ गय, सेशन
गतमम पर्यपृच्छत् पादमवाहनादिभिः ॥१५॥ पाँव बाकर, पम्य मकर उनकी पाप र बरी
॥ १५॥ तब नरवाशन उनसे पूछा-परम परम-
फपिदा महाभाग मम्बा न भूरनन्दनः ।
बार उसवनी ! वर हमरे सप बसुदेवत्री यो
छा गये। उनके भारमीप ममन तपा पुर आ
आस्त पान्यप यापयुक्ता मुक्तः गुप्तः॥१६॥ उन माप है । इस समप ने सब कुदामे तार
म! ॥ १६॥ पइयो सोमाय पान जाने
दिष्टया माहम पापः सानुग म्पेन पाप्मना।
पापोंके परम्बाप पापी पता अपने अनुपापियोर मार
माय गपा । स्पोकि समारसे दी धार्मिक परम मार
माना पमनालाना या टि य मदा यदुवंशियोंग ५ मा हो परना था ॥ १७॥my
उसनी ! श्रीरण भी हमरोगों की भी पार को
है! पर उनसरीमा मजन-ममी, गया?
प्रविमानन इमा मातर गुरद गरीन ।
गा,
उभाना भी और गासनो
परम-
सीम Ima
गारन म पामना गागा पगाने गिरिमा कमी न म्॥१८॥

अ०४६] दशम स्कन्ध ४०९ - अप्यायास्पति गोविन्द स्वजनान् मरुदीधितम् । बाप यह तो बताइये कि हमरे गोविद अपने मुद्दान्धोको देखनेके लिये एक बार भी यहाँ आयेंगे क्या । यदि ये यहाँ का बासे सो हम उनकी वहि द्रक्ष्माम सदस्य सुनसं सुमितेक्षणम् ॥१९॥ सुधा नासिका, उनका मधुर हाम्य और मनोहर चितवनसे युक्त मुखकमल देख तो लेते ॥ १९॥ दायाग्नेतिवाच अपमष रक्षिताः। उदयनी । श्रीकृष्णका पदय उदार है, उनकी शक्ति अनन्त है, उन्होंने दापानलसे, आंधी-पानीसे, वृपासुर और अजगर आदि भनेको मृत्पुके निमित्तोंसे-जिन्हें दुरत्ययेम्यो मृस्यम्पः कृष्णन सुमहात्मना ।।२०।। टालनेश कोइ उपाय न पा--एप मार नहीं, अनक वार हमारी रक्षा की है ॥२०॥ उदानी ! हम मरता कृष्णपीर्याणि लीलापानिरीक्षितम् । श्रीकृष्णके विषिष चरित्र, उनकी बिगसपूर्ण तिरही । चितवन, ठमुक हाम्य, मधुर भाषण आदिका स्मरण करते रहते हैं और उसमें इतने समय रहते हैं कि इसित भापित पालमर्याना शिथिला क्रिया ॥२१॥ अब हमसे कोई काम-काज नहीं हो पाता ॥२१॥ नव हम देखते हैं कि यह यही नदी है, जिसमें मरिगल्बनोदेशान् मुकुन्दपदभूषितान् । श्रीकृष्ण जनकीग करते थे, यह वही गिरिराज है, निसे ठहोंने अपने एक हायपर उट रिया पा, ये रही पनके प्रदेश है, जहाँ श्रीकृष्ण गौएँ घराते एर बाँसुरी बनाते आफ्रीडानीयमाणानां मनो याति तदारमताम् ।।२२॥ ये, और ये से ही स्थान है, जहाँ वे अपने समाओं के साप अनेकों प्रकारके मेल खेलते थे, और साप ही मन्ये रुणं घ राम प प्राप्ताविर सुरोत्तमा । यह भी देखने हैं कि उनके चरणचिद अभी मिटे मही है, तब उन्हें दबकर हमारा मन श्रीकृष्णमप हो पाता है ॥ २२ ॥ इसमें सदर मही कि म मुराणां महदाप गर्गस्व वचनं यया ॥२३॥ धीकरण और अग्रामका विशियमगि मानता है और यह भी माना कि ये दवताओंका कोर पाल वश प्रमानन सिद्ध करन लिये यहाँ भाये र न्यप पम नागायुतमार्ण माला गजपति तया । मावान् गगापापनीने मुश्से ण्मा ही पहा या ॥ २॥ जमे सिंह बिना किसी परिश्रमक पशुओंको मार दाना है, मे ही उन्हनि गारमें ही महारापिर्पोमा अअधिष्ण लील्यैव पानिव मृगाधिपः ॥४॥ र रापनात कम उमा गनों अजय पापनों और महान् पयारी गजराज गुपया मर एग ॥२५॥ उन्होंने मीन नाउरे रमन महामार पनुयष्टिमिषभराट् । र धनुपम रेमे हा नार मे कर दी पिसी दी तोर दार । मरे पर भाग्नेपर पभजफन एम्नेन ममाहमदभाइ गिरिम् ॥२५॥ हामे सन्निर गिजका टयर गमगाया ॥ २० ॥ । मानप्रय श्रीमद्भागवत ४१० [अ०४६ प्रलम्पो घेनुफोऽरिष्टम्सपावर्तो पादयः । यही सपने देखते-देखते स्केल-खेळमें उन्होंने प्रखम्प, छेनुक, अरिए, तृणावर्स और बक जादि उन बड़े-बड़े देत्योंको मार मला, जिन्होंने समस्त देका देत्या सुरासुरक्तिो हवा येनेह लोलया ॥२६॥ और असुरोंपर विनय प्राप्त कर ली पीर ॥ २६ ॥ मोसुक उपाय भीशुक्वेरसी करते है-पीक्षित् ! नन्यायका दप पो ही भगवान् श्रीकृष्णके अनुराग-रगमें रंगा हम इति संस्मृस्य संस्मृस्प नन्दः कृष्णानुरक्तपीः । था । जब इस प्रकार ने उनकी स्पस्याओं का एक एक करके स्मरण करने लगे, तब तो उसमें प्रेमकी वाही अस्पुस्कण्ठोऽभषसणी प्रेमप्रसरविलः ॥२७|| आ गयी, वे बिल हो गये और मिम्नेकी अत्यन्त उपाय होने के कारण उनका गम प गया । व जप यशोदा पर्पमानानि पुनस्स परितानि च । हो गये ॥ २७ ॥ पादारानी भी यहाँ बैठकर नन्द बाबाकी मातें सुन रही थी, श्रीकृष्णकी एक-एक स्त्र भण्वन्त्यभूण्मयासाक्षीद स्नेहस्नुतपयोधरा ॥२८॥ सुनकर उनके नेत्रोंसे बाँस हवे जाते थे और पुत्र- स्नेहफी बाइसे उनके खनोंसे दूधकी पारा यहती जा तयोरित्यं भगपति कृष्णे नन्दयशोदयो।। रही थी। २८ ॥ उद्धवजी मन्दवाच और पशोनारानीके इयों श्रीकृष्णके प्रति फैस वगाध अनुराग पीरूपानुरागं परमं नन्वमाहोवो मया ॥२९॥ यह देखकर मानन्दमम्न हो गये और उनसे कहने गे॥ २० ॥ उपप उवाच सवर्ष ने कहा- मानद ! इसमें संदेश महा युषां साम्पतमौ भूनं देहिनामिह मानद । कि आप दोनों समस्त शरीरधारियो बस्यन्त माम्यवान् है, सराहना करने योग्य है। कि जो सारे परावर नारायणेऽस्थिलगुरौ यत् कसा मतिरीप्क्षी ॥३०॥ नगरके बनानेवाले और तसे झान देनेवाले नारायण हैं एतो हि विमस्य च मीमयोनी उनके प्रति बापके दयमें ऐसा पासत्यस्य-पुप्रभाव है॥ ३० ॥ वाम और श्रीकृष्ण पुराणपुरुष है, ये रामो समन्दः पुरुषः प्रधानम् । सारे संसारके उपादानकारण और निमित्तकारण भी है। अन्यीय भूतेषु विलक्षणस्य मगमान् श्रीकृष्ण पुरुष है तो कराममी प्रभाम (प्रकृति)। वानस्प पेशात इमौ पुराणौ ॥३१॥ ये ही दोनों समस्त शरीन प्रपिट होकर उन्हें जीमम दान देते हैं और उनमें उनसे अपस विरक्षण जो मसिजन प्राणविमागकाले हानससप जीव है, उसका नियमन करते हैं ॥३१॥ घर्ण समाधेश्य मनोऽविशुदम् । जो जीव मृत्यु के समय अपने पुद मनको एस धणके नित्य फर्माशयमाशु याति लिये भी उनमें गा देता है पर समस्त कर्मबासनाची का धो यहाता है मौर शीघ्र ही सूर्यके समान तेजसी परां गतिं प्रामपोऽवणः ॥३२॥ तपा समय होफर परम गतिको प्राप्त होता है ॥३२॥ तसिन् भयन्ताव खिलास्महेसा मे भगवान् दी, जो स्वके आम और परम कारण है | मतोंकी अमिस्मषा पूर्ण करने और पृषी मार नारापणे करणमर्त्यमा । सारने लिये मनुष्यास शरीर प्रारण फरक प्रफ्ट स०४६] दशम स्कन्ध भाष विधा नितरां महात्मन् हए हैं। उनके प्रति आप दोनोंका एसा सुध्द पारसल्य- माष है, फिर महात्मायो । आप दोनोंके लिये अब कि यावशिष्ट युगयो सुकन्यम् ।।३३।। कौन-सा शुम फर्म फरना शेष रह जाता है। ३३ ।। मफक्स्सल यदुर्वशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण पोड़ ही आगमिष्यत्पदीर्घेण कालेन प्रबमव्युत । दिनमि प्रजमे भायेंगे और आप दोनोंको-अपने माँ- यापको मानन्दित करेंगे ॥ ३१ ॥ जिस समय उन्होंने प्रिय विधासते पित्रोर्मगवान् सान्यतां पतिः॥३४॥ समस्त यदुषशियोंके द्रोही कसफो रंगमूमिमें मार गला और भापके पास आकर कहा कि 'मैं प्रजमें पाऊँगा', इत्या कंसं रामध्ये प्रसीपं सर्मसात्वताम् । उस फफ्नफा वे सस्प करेंगे ॥३५॥ मन्दवाया और मामा यशोदाजी ! आप दोनों परम माग्यशाली है। पदार व समागस्य कृष्ण सत्यं करोसि तत् ॥३५॥ सेद न करें । आप श्रीकणको अपने पास ही देखेंगे, क्योंकि जैसे काठमें अमि सदा ही मा स्विपस महाभागो द्रपथः कृष्णमन्तिके। व्यापक रूपसे रहती है, वैसे ही वे समस्त प्राणियोंके हृदयमें सर्वदा विराजमान रहते हैं।॥३६॥ एक शरीरके प्रति अन्तदि स मूवानामास्से न्योतिरिवैधति ॥३६॥ अभिमान न होने के कारण न तो को उनका प्रिय है और न तो अप्रिय । ये सबमें और सबके प्रति समान न पस्सास्ति प्रियः कधिमाप्रिमो वास्त्पमानिन । है, इसलिये उनकी दरिमें न तो कोई उत्तम है और न तो मधम । यहाँतक कि विषमताका भाव रखनेवाला नोवमोनाघमो नापि समानखासमोऽपिया ॥३७॥ भी उनके लिये विषम नहीं है ।। ३७ ।। न तो उनकी कोई माता है और न पिता । न पनी है और म तो न माता न पिता सस्स नभार्या न मुसादयः । पुत्र वादि । न अपना है और न तो पराया । न हो और न तो जन्म ही ॥ ३८॥ इस फिमें उनका कोई नात्मीयो न परभापि न देहो बन्म एव च ॥३८॥ कम नहीं है फिर भी ये साधुओं के परित्राणके मिये, लीम करनेके लिये देवादि सरिक्क, मरस्यादि तामस न पारस कर्म पा लोके सदसन्मिभयोनिए । एवं मनुष्य मादि मिन योनियोंमें शरीर भारण करव हैं॥ ३९ ॥ भगवान् मनमा । उनमें प्राकृत सल, रन वादिमेंसे एक भी गुण नहीं है। इस प्रकार इन क्रीडार्य सोऽपि साधूनां परित्राणाप फल्पते ॥३९॥ गुणों से अतीत होनेपर मी सरस्मके लिये लेप सलमे थे सत्व, रम और तम-इन तीनों गुणोंको स्वीकार कर लेसे है और उनके सारा जगत्की रचना, पालन और सहार परते है ॥ १० ॥ मब बन्चे भुमरीपरेवा खेसन माते फ्रीरमतीवोऽत्र गुणैः सूझत्पपति हन्त्यजः ॥४०॥ या मनुष्य वेगसे चपन स्मगाने लगते हैं, तब उने सारी पृष्षी घूमती र नान पड़ती है। वैसे ही पास्तवमें यथा प्रमरिम्ना नाम्पतीव महीयते । सब पुछ करनेवाला पित ही है परन्तु उस वित्तम मादि हो नानेक कारण, भ्रमवश उसे भात्मा- विधे फर्तरि वात्मा फर्तेपाधिया स्मृठ ॥४१॥ अपना के समक्ष अनेक कारण, बी अफ्नको पर्ता सत्त्व रवस्तम इति भवते निर्गुणो गुमान् । ।

४१२ भीमद्भागवत [अ०४६ म एष सर्व पुवमोरेख वायमात्मजो भगवान् परि । समाने लगता है॥१॥ मगवान् श्रीकृष्ण केक आप दोनोंके ही पुत्र नहीं है, ये समस्त प्राणियों के सर्षेपामात्मजो पात्मा पिता माता सईयर ॥४२॥ मामा, पुत्र, पिता माता और स्वास्नी मी हैं ॥४२॥ पष्ट भूत भूतभवद् भविप्पत् बाबा | जो कुछ देखा या सुना जाता है-यह चाहे भूतसे सम्बन्ध रसता हो, तम्मनसे अश्या मरिष्यसे; म्पास्नुश्वरिष्णुर्महदल्पर्फ च। सापर हो या बङ्गम हो, महान् हो माया मरूप हो- ऐसी कोई पस्त हो नहीं है, जो भगवान् श्रीकणसे विनाम्यवाद पस्तु तसं न वार्म प्रक । बाबा | श्रीकृष्णके अतिरिक ऐसी को बस्तु महा है, जिसे वस्तु कर सकें। बास्तबमें सम परमार्थमूतः ॥४३॥ | ये ही है, से ही परमार्थ सत्य हैं ॥ १३ ॥ एमं निष्ठा सा मुक्तोर्यतीता परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्णके एक उदन और नम्दमाया इसी प्रकार वापसमें बात करते रहे वीर पर नन्दस कप्णानुपरस्प राजन् । रात बीत गमी । पुछ गत शेष रहनेपर गोपियों उठी, गोप्यः समुत्थाय निरूप्य दीपान् दीपक जल्पकर उन्होंने घरकी देहलियोंपर वास्तुदेक्का पूजन किया, अपने घरोंको मार-मुहारकर साफ किया पास्तून् ममम्पर्य दधीन्पमन्यन् ॥४४॥ | भोर फिर दही मदने यी ॥ ११॥ गोपियोंकी दीपदीप्तर्मणिभिर्विरेज करमार्यो फगन शोभायमान हो रहे थे, रस्सी सींचते समय से बहुत मी माझ्म हो रही थी। उनके रन्जविकर्षबकारणलजः नितम्ब, स्तन और गलेके हार हिल रहे थे। कानोंके फलमितमम्तनहारगुणाल कुण्डस हिम हिसकर ठनक ममण्डित कामेोंकी स्मरिमा बढ़ा रह पे । उनके बाभूपोंकी मणियाँ विपत्कपालास्पष्माननाः ४५|| श्रीपती म्योतिसे और भी जगमगा रही थी और इस प्रकार मे अपन्त शोमासे सम्पम होकर ही मब रही षी ॥१५॥ उद्गायतीनामरविन्दलापन उस ममन गरियों-कमलनयन मगमान् श्रीकृष्णके मामय परित्राका गगन पर रही थी। उनका प प्रजानानां विषमस्पशन पनि । मीत दही भवनकी पनिसे मिलकर और मी अमन निमयनमन्दमिश्रितो हो गया तप न्यगलोकतक जा पहुँमा, जिसकी सर | म्हारी सत्र मोर पल्पर Pशाओंका मान मिटा देती निरम्यते येन दिमाममालम् ॥४६॥ ॥ १६ ॥ भगरत्युदित सूर्य नन्दरि प्रमाक्सः । 'जब मगमन् मुवनमास्करका उपमा, तब मनागनामोंने देम्म मि नम्बापाकसार एक प्यार सातसम्म पम्पायमिति पापन् ।॥४७॥ माना स महा है। परम्मरेसे पस्ने स्या पर | किसका सा किसी गोपीने कहा-~ -मरा अमर भागठ: या य मस्पार्धमाका! प्रणवन मिद नेवन्य जर ही तो कदा फिर नही मा ता ०४७] दशम स्कन्ध ४१३ गोपीने कहा- न नीतो मधुपुरी कृष्णः कमललोचन ॥४८॥ आ गया है ! जो कमलनयन प्यारे श्यामसुन्दरको पहासे मथुरा ले गया था |॥ १८॥ किसी दूसरी -क्या अब वह में ले जाकर अपने मरे र सामी फसका पिण्डदान करेगा । म यहाँ * साधमिप्पत्यमाभिर्मर्तुः प्रेतस्प निम्फतिम् । उसके धानेका भौर क्या प्रयोजन हो सकता है। ननवासिनी लियों इसी प्रकार वापसमें बातचीत कर दी थी कि ठसी समय निस्कर्मसे निवृत्त होकर ठम्पनी तिखीणां वदन्तीनादयोऽगात् फवाहिकः॥४९॥ | मा पहुँचे ॥ १९ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमास्या संहितायो दशमस्कन्धे पूवर्षि मन्दशोकापनपन नाम पटक्वारिंशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्याय उयब तथा गोपियोंकी पातचीत मौर समरगीत पीक उपाय भीगुप्लेषजी करते है-पीभित् ! गोपियोंने देशा कि श्रीकणके सेवक उपजीकी माति और संघीय कप्णानुपरं प्रशस्त्रियः वेषभूषा श्रीकृष्णसे मिलती-जुलती है । पुग्नर्नोसक की प्रलम्वाई नवकलोचनम् । यी मुनाएँ है, नतन कमलदलके समान कोमल नेत्र, शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए है, गोमें काम्पुप्पोकी पीताम्बरं पुष्करमालिनं उस | माला है, फा!में मणिमटित कुमठ मलय दे और न्मखारविन्द मणिमण्डलम् ॥१॥ मुखारविन्द अत्यन्त प्रफुल्लित है ॥ १॥ पवित्र मुसकान बासी गोपियोंने मापसमें कहा- "यह पुरुप देख्नेमें तो शुधिमिताः कोऽयमपीच्यदर्शनः मात पुन्दर है। परम्स यह है फोन ! कहाँसे भाया एवम फस्याप्यतयेपम्पणः । है। किसका दूत है! इसने श्रीकृष्ण-मैसी मेफ्-म्पा क्यों घरण कर रही है। सब-की-सब गोपियों ठनका इति स सर्वा परिववाल्मुका परिचय प्राप्त करने के लिये माफ्स सक हो गपी और स्तमुचमलोकपदाम्मुखाभयम् ॥ २॥ उनसे बहुत-सी पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीहष्णके घरण- क्सके भाभित तथा उनके सेवक-सवा उपजीको ते प्रभयेणायनवाः सुसस्कर्व पायें वोरसे घेरकर की हो गयीं ॥ २ ॥ जब उरें माम हुआ कि ये तो रमारमग मगवान् श्रीकृष्णा समीरहासेषणसनुवादिभिः । देश सेयर पाये हैं, सम नोने दिनपसे हुक्मर रहस्सपग्छन्नुपरिटमासने सड हास्प, चितवन धौर मपुर वाणी भागिसे उदक- भीका अस्पत सत्कार किया तथा एकान्तमै बासनपर विज्ञाय सन्दशहरे रमापतेः ॥३॥। मैठाकर में उनसे इस प्रकार कइन एगी-1॥३॥ १ ता । २ सयमान । ३ मार ।

श्रीमझागत [२.१० मानीमस्त्यां यदपवेः पार्पदं समुपागतम् । 'ठवनी ! हम मानती है कि भाप पानायके पार्षद ।। उम्दाका संदेश करमहापधारे हैं। मापक स्वामीने जाने भर प्रपित पित्रोर्मवान प्रियचिकीर्पया ॥४॥ माता-पिताको सुख देनेके मियापको यहाँ मेवा है। वन्मया हमें तो पम इस मादाँव-गौयोंकि इनकी अन्यथा गोमजे तस्स सरणी न पल्मो। नगहमें उनके स्मरण करने योग्य कोई भी वस्तु किसी नहाँ परती, माता-पिता आदि सगे-सम्ममियरका ले बन्धम तो बडे-बडे ऋषि-मुनि मी दरी करिमाईस से स्नेहानुभन्धो मधूनां मनेरपि सुदुस्त्यज' ॥ ५॥ पाते हैं ॥ ५ ॥ दूसरों के साथ मो प्रेम सम्बन्धका साँग किया पाता है, पासो किसी-न-किसी वाक किम से अन्येप्वयंच्या मैत्री यावदविरम्बनम् । होता है । मौका पुष्पोंसे नौर पुरुषोंका सियोंसे ऐस ही ससाका प्रम सम्बन्ध होता है |॥ ६॥ बब देस पुम्मि सीपुस्ता महत् समनस्किा पट्पदै ॥ ६॥ समझती है कि अब मेरे पााँ आनेबाळेके पास भन माँ है, तब उसे यह पता बता देती है। प्रना देसी है कि यह रामा हमारी रक्षा नहीं कर सकता, तब निस्स्व स्थजन्ति गणिका अकल्प नृपति प्रजाः। उसका साप छोर देती है। वपन समाप्त । बनेपर किसने शिष्य अपने भाचार्योकी सेना करते । पाकी अभीवरिया बापाविमो ददक्षिणम् ॥ ७॥) दक्षिणा मिली कि अस्विमग पलवे बने ॥ ७ ॥ सपर फल नहाँ राते, तब पक्षीगण से बिना लगा बीतफलं सक्या पातिवमो गाम् । सोफे विचारे उपनावे भाबम कर लेनेरे बाद पतिति योग ही गृहस्पकी छोर पर दसवे। पनमें भाग मी कि पधु माग छरेहए। बाईसी एप गितमा दग्ध मृगास्तधारप चारो भक्त्वाखो त्रियम् ॥८॥ मी मनुराग हो, मार पुस्म मपना काम बमा लेने के बार वस्टकर भी तो महाँ देखता परीक्षित ! गोपियों इविगोप्मा रि गोविन्द गववाकापमानसाः । के मन, माणी और शरीर मीरण हीन थे। जब भगवान् श्रीकृष्णके दूत बनकर उससमी प्रस्में भाये, सबसे उमसे इस प्रकार करने पर यह भूल ही गया) कृष्णदो पर्ज याते उदये त्सकलीफिलाः ॥ ९॥ कि कौन-सी बात किस माह जिसके सामने बानी पाहिये । भगवान् भीहणने बचपनसे सेकर किशोर गायन्त्य' प्रियम्माणि रदत्यम गदिया । बरसातक जितनी भी सीमएँ की उम समकी पाद कर-करके गोपियों उनका गाम बरन भगा। बारमविस्प्त होकर भी-मुलम समाको भी भूल गया वस्प संम्मप मम्मृम्प पानि शारवात्यया ॥१०॥ भोर घटपरकर पेन मम ॥ १०॥ एक गोपीको उस समय स्मरण हो रहा था भगवान् मीरणके मिश्न कापि मधुरे रया ध्यायन्ती ष्णमहमम् । पी लीग । उसी समय उसने देखा कि पास ही एष भय गुनगुना पाई। उसने ऐसा सम्मा मानो मुस गटी से समभरत भीमणने मनाने के लिये इन पिपप्रम्पापित दूर्व कम्पपि पदमप्रवीत् ॥११॥ | मेजा था। वह गोपी मौरेसे इस प्रसर गरम सी-1११॥

०१७] दशम स्कन्ध ४१५ गोप्युपाप गोपीने कहा-रे मधुप ! तू फापटीका सखा है। इसलिये सू मी कपटी है। हमारे पैरोंको मत छ । छठे प्रणाम करके हमसे अनुनय-विनय मन कर । मधुप कितषपन्धो मा स्पशाप्रिं सपत्न्याः हम देख रही है कि श्रीकृष्णकी नो वनमाला हमारी सौतौके पक्ष स्पल्के स्पर्शसे मसठी पद है, उसका पील पीला कुहम तेरी मठोंपर भी लगा हुआ है। र स्वयं रुचविलुलितमालाकुमश्मश्रुभिर्नः । भी तो किसी कुसुमसे प्रम नहीं करता, यहाँ से वहाँ ठडा करता है। जैसे तेरे स्वामी, वैसा ही तू ! मधुपति पातु मधुपतिस्तन्मानिनीनो प्रसाद श्रीकृष्ण मथुराकी मानिनी नापिकाओंको मनाया करें, उनका वह कुमरूप कृमा प्रसाद, जो यदुवशिपोंकी समार्म उपहास करनेयोम्य है, भरने ही पास रखें। पद्सदसि विनम्म्यं यस्य तस्त्वमीह१२ उसे तेरे द्वारा यहाँ मेजने की क्या आवश्यकता है ।। १२ । जैसा तू काला है, वैसे हो ये भी है । तू भी पुप्पोका रस लेकर ठा जाता है, वैसे ही ये भी निकले । उन्होंने सकदधरमुधो स्वो मोहिनी पाययित्वा हमें फेकर एक बार-हॉ, ऐसा ही लगता है केवल एक बार जपनी सनिक-सी मोहिनी और परम पदफ वघरसुधा पिलायी पी और फिर हम मोली-माली प्रेपियों- सुमनस इव सबस्तस्यजेष्मान् भवार। को छोरकर वे यहाँसे चले गये । पता नहीं, सुकुमारी लक्ष्मी उनके चरणकमलों की सेवा कैसे करती रती है। परिचरति फष तत्पादपपं तु पना सक्स्य ही ये बैर-सवीले श्रीकृष्णकी चिकनी-चुपड़ी पातोमें आ गयी होंगी। चितचोरने उनका मी चित्त चुरा लिया होगा ।। १३ ॥ अरे भ्रमर ! हम पनगासिनी मपि बस स्तषेवा उंचम लोकजल्पै ॥१३॥ है। हमारे तो घर-शर भी नहीं है। हमलोगों के सामने पदुषशशिरोमणि श्रीकृष्णका महुत-सा गुणगान | क्यों कर रहा है। यह मब मला हमलागोंको मनानेके किमिह पह परखने गापसिर्व पदना लिये ही तो है परन्तु नहीं-नहीं, वे हमारे पिये फर्मा मये नहीं है। हमारे लिये सो नाने-पहचाने, मिन्दुल्ला पुराने हैं । तेरी चाफ्लसी हमारे पास नहीं चल्गी । मधिपतिमगृहाणामग्रतो न पुराणम् । जा, यहसि बसा बा और जिनके साथ सा विनय यती है, उन तीणकी मधुपुरवासिनी सस्तियों के सामने माकर उनका गुणगान कर । वे मयी है, उनकी दिनपसरलसरतीना गीयता त प्रसह मीमाएँ पम मानती हैं और इस समय ये उनकी प्यारी है, उनके हदयकी पीड़ा उन्होंने मिग दी। में तेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगी तेरी चापटसीसे अपितफचरूजस्ते पाल्पपन्तीएमिष्टा ॥१४॥ | प्रमभ होकर तुझे मुंहमांगी बस्तु गी ॥ ११ ॥ १.मुत्तम ।

४१६ भीमद्भागवत दिवि भषि परसायों का नियस्त दुरापाः मोरे । वे हमारे लिये छम्पटा रहे है, ऐसा तू क्यों है। उनकी फरमरी मनोहर मुसकाम और इशारेसे जो कशमें न हो जाये, उनके पास दौडीन मारें- ऐसी कौन-सी लिया है। बरे बनमान ! समी कपटरुचिरयासप्रविजम्भस्य याः स्युः। पातामें वीर पृटीमें ऐसी एक भी श्री नहीं है। मौकी तो बात ही क्या, मयं ममीनी मी को धरणरबफी से किया करती है। फिर हम श्रीको लिये किम गिनती है। परन्त तू उनके पास म चरणरज उपास्ते यस भूविषय का काना कि तुम्हारा माम तो मका,ब अछे लोग तुम्हारी झीतिका गान करते है, परन्तु इस सार्थकता तो इसी । कि तुम दोनोपर दप करो। नहीं सोहण 1 मारा उत्तमस्मेकर नाम मुटा पा अपि च रुपणपक्षे मुतमसोकशम्दः॥१५॥ | नाता ॥ १५ ॥ बरे मधुकर ! देस, र मेरे पैरत सिर मत टेक । म जानती है कि अनुनय-निमय करनेमें क्षमा याचना करनेमें मका निपुण है। विस्न शिरसि पार्द पेम्पई पादुकारै होता है धीमणसे ही पही सीसकर वाया है. ठे एका ममानेके लिये दूतको सन्देशवाहको | कितनी चाटुकारिता फरमी चाहिये । परन्तु व सम्मा कि यहाँ तेरी दाल नहीं गलनेकी । देख, हमने श्री नुनयविदुपस्तेऽम्पेत्य दौत्यर्सन्दात् । के लिये ही अपने पति, पुत्र और दूसरे लोगों को मेर दिया । परम्त उनमें तनिक भी समता नहीं। ऐसे निर्मोही निकले कि हमें मेषकर चलते बने ! काव ही मता, ऐसे बात साप हम क्या सन्धि करें! स्वकर यह विवष्यपत्पपत्यन्यलोकन स्या र मब भी करता है कि उनपर विश्वास करना चाहिपे । ॥ १६ ॥ ऐ रे मधुप । सबवे राम बन थे, तब उन्होंने कमिशन पारिको म्याध सम्पन पिका बही नियमासे मारा था। पेपारी शूर्पणख काममा म्पसजदस्चपेवाः किं नु संघपमम्मिन् ॥१६॥ उनके पास बायी थी, परम्न उनहोंने अपनी श्रीके कहा होकर उस पारीक माय-काम पाट लिये भोर इस प्रकार उसे कुम्प र न्या। मामण पर बमनके मृगपरिव रूपान्द्र विष्य तुषधर्मा मपमें सन्म सेक्स सन्होंन क्या मास । बरिने तो उनकी पूना पी, उनकी मुंहमान बस्तु दी और उन्होंने उमकी पूजा ग्रहण करके मी उसे बरु प्रशसे बो पर पाता राम या टीम से ही, जैसे गिपमाल पिम्पागोचितः पामयानाम् । कोषा यति पर भी बल देनयर जान जप १०४७] दशम स्कन्ध ४१७ . पलिमपि पलिमवाधेश्यद् घाइचद् य सापियोंके साप मिलकर घेर लेता है और परेशान करता । अच्छा, तो मब माने दे, हमें कृष्णसे स्पा, किसी मी काली वस्तुके साथ मित्रतासे कोई प्रयोजन नहीं स्वदलमसिससख्यैर्दुस्त्यजस्तकधार्थ ॥१७॥ । परन्तु पदि ह या करे कि 'जब ऐसा है तब तुम- रोग उनकी वर्षा क्य करती हो तो भमर ! हम यदनुचरितलीलाकर्णपीयूपविग्रुट् सच कहती हैं, एक बार जिसे उसका चसका लग नाता है, वह उसे छोर नहीं सकता । ऐसी दशामें हम चाहनेपर भी उमकी चर्चा अंक नहीं सकती ॥१७॥ सकददनवितान्दधर्मा विनष्टाः । श्रीकृष्ण की लीलारूप कर्णामृतके एक कणका भी जो रसा- सादन कर लेता उसके राग-देप पुस्त-दु स वादि सारे हद छुट जाते है। यहतिक कि बहुत से लोग सपदि गृहकुटुम्ब दीनमुत्सन्य दीना तो अपनी दु समय-दु ससे सनी हुई घर-गास्सी मेषकर बकिशन हो गते हैं, अपने पास कुछ भी पहप इस विहान भिसुचयो चरन्ति ॥१८॥ संग्रह-परिह नहीं रखते, और पक्षियोंकी सरह चुन पुनफर-मीस माँगकर अपमा फे भरते है, दीन दुनियासे जाते राते हैं। फिर भी श्रीकृष्णकी मीला- कपा छोड़ नहीं पाते । मास्तबमें उसका रस, उसका बममतमिव जिमष्माहत भरधानाः पसका ऐसा ही है। यही दशा हमारी हो रही है।॥१८॥ जैसे कृष्णसार मृगकी पत्नी मोली-मारठी हरिनियाँ व्याधके कुलिकरुतमिवाधा कृष्णवचोहरिप्पः। समधुर गानका विश्वास कर लेती है और उसके बालमें फैसकर मारी जाती है, जैसे ही हम मोम-मामी गोपियों भी उस छरिथ्या कणकी कपटम्मी मीठी-मीठी वामि वाकर दामुरसादेतचमस्वस्पर्शसीघ्र वन्हें सत्यके समान मान बैठी और उनके नस्वस्पर्शसे होने पाली कामम्याधिका मार-बार अनुमय करती रही। इसलिये श्रीकृष्णके दूत भौरे । अव इस बिषयमें तू मौर सररुम उपमन्त्रिन् भण्पतामन्ययाः ॥१९॥ २ मत कह । उसे कहना ही हो तो कोई दूसरी पात फा ॥ १९ ॥ हमारे प्रियतमके प्यारे सच ! नान पड़ता है तुम एक पार उघर नाकर सिर लोट वाये प्रियसख पुनरागा प्रेयसा प्रपित किं से । वाश्य ही हमारे प्रियतमने मनाने के लिये तुम, मेजा हेगा । प्रिय ममर ! तुम सा प्रकारसे हमारे माननीय हो । कहो तुम्हारी स्पा है। हमसे जो परय किमनुरुन्धे माननीयोऽसि मेर। पाहो मो माँग लो। अधा तुम मच वतामो, स्पा हमें वहा बचना पाहते हो ! ममी, उनके पास नपसि फथमिहामान् दुस्त्यचन्द्रपार्म सारर गैरना बहा कठिन है। हम तो उनके पास जा चुकी हैं । परन्तु तुम हमें यहाँ से माकर करोगे । स्या। प्यारे भ्रमर ' उनके साप-उनके बस स्ससपर सततमरसि सौम्प भी साफमास्ते ॥२०॥! तो उनकी प्यारी पही समीनी सदा रहती हैं म । तब ।

४१८ भीमद्भागवत [4.0 उस उपाय अपि मत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनाऽस्ते माँ हमारा निर्वाह कैसे होगा ॥ २० वमा हमारे प्रियवमके प्यारे दूत मधुकर हमें यह बाममो कि सरवि स पिटगेहान् सौम्प पन्ध्पगोपान् । कार्यपुत्र मानान् श्रीकम गुरुकुन्से टकर माने मन मुस्से तो हैम या वे कभी नन्दवावा, पोदा- रानी, यहकि घर सो सम्बन्धी धौर मायामकी में कचिदपिसकान किरीणां गृणीवे पाद करते हैं: वीर क्या हम दासियों को भी कोई बात कभी बावे प्यारे भ्रमर ! हमें यह भी पतामको कि कमी ये पनी मगरके समान दिग्य सुगन्पसे मुळ सजमगुरुसुगमधासत कहानु ॥२१॥ मुगा हमारे सिरोंपर समगे ! क्या हमारे जीबनमें कभी ऐसा म वपसर भी भायेगा। ॥ २१ ।। मीसुक उमाप भीकोपनी करते हैपीक्षित् । गोपियों भगवान् अधोदनो नितम्यैवं कृष्णदर्शनलालसाः। मीरुणके दर्शनके स्पि मापस अमुक-मागपित दो रही थी, उनके लिये सरप दी पी। उनकी पात्रे सुनकर सदमनीने धनें उनके प्रियतमका सन्देश सुनाकर सान्वयन् प्रियर्सदिनोपोरिदमभापस ॥२२॥ सालना देते हुए इस प्रकार कहा ॥ २२ ॥ उरवसीने कहा-यहो गोपिपणे ! तुम ताप अहो सूर्य म पूर्णार्या भवत्यो लोकपजिताः । हो। तुम्हारा मीन स। देवियो ! तुम सारे संसारके छिये पूजनीय हो, क्योंकि तुमलोगोंने इस पामुश्वे भगवति मामामित्यपितं मनः ॥२३॥ प्रकार भगवान् श्रीकृष्णको सपना दप, अफ्ना सर्पस समर्पित कर दिया है ।। २५ ॥ दाम, त, तप, रोम, दानवववपादामजपम्याध्यायसंयमः बप, वेदाप्पफ्न, प्यान, धारणा, सम्पधि बौर कस्याणके अन्य विविध साधनोंक द्वारा भगवान्की महिमा हो, भयाभिविविधमान्य कृष्ण भक्तिहिं साम्पते॥२४॥ यही प्रपन किया जाता है ॥ २१ ॥ ४ को सोमपी बात है कि तुमडोगोंने परिकीर्ति मगान् श्रीकृष्ण के प्रति भगवत्प्सम आफ भपतीभिरनुपमा । पही सवम प्रेममति प्राप्त की और उसी वारी सास्ति विस्य , मोबा-बहे अति-मुनियोंके किये भी भक्ति प्रयनिता दिष्टया मनीनामपि दुरी भा॥॥२५॥ मयस्त दुर्सम है ॥ २५ ॥ सरमुष या किन सौम्मापारी बात है कि तुमने बरने पुर, पक्ष, , रिटया पुत्रान पतीनदान बजनान भवनानि । समन मोर परोंको मोरकर पुरोवम भगवान् भीषण- को, यो मबके परम पति, पतिक मपमें बरण किय हिन्यारीन पूर्व पर सम्माग्य पुग्मं परम् ॥२६॥ ॥ २५ ॥ महाभारपानी गोपिया । भगछन् श्रीरण के पियोगसे तुमने उन इन्दिपारी परमामा के प्रति र गमभाग पिता भपतीनामपायज । मात्र प्राम कर रिया, गभी वस्तुओंके सपने । उनम न मनेगोर ६ मा मेरे गिरण माभागा मान मन्नुमः ॥२७॥' सामने भी प्रपर मा मरे उपर तुम सरिकी

ब०४७]
दलम समन्म
४१९
ध्या प्रियसंदेशो भवतीनां सुखावहः ।
बड़ी ही दया है।॥ २७ ॥ में अपने स्वामीका गुप्त काम
करनेवास्म मूठ है । तुम्हारे प्रियतम मावान् श्रीकृष्णाने
तुमध्येगों को परम पुस देनेके लिये यह प्रिय सम्देश
मेमा है। कायाणियो । ही लेकर में तुमनेगों के पास
समावस्यागतो भद्रा पर मत रास्करः ॥२८॥ | वाया , अब उसे सुनो ॥ २८ ॥
भीमगानुसार
भगवान श्रीरुप्मने कहा है-में समका उपादान
कारण होनेसे सरकाममा ई, सबमें वनुगत ई, इस-
लिये मुमसे कमी मी तुम्हारा वियोग नहीं हो सकता ।
भवतीनां वियोगो मे नहि सस्मिना कधित् ।
जैसे संसारके समी भौतिक पदामि भाकाश, वायु,
बमि, चत और पृषी-ये पाँचों भूत व्याप्त है, इनसे
सब पतएँ बनी है और यही उन वस्तुओंके रूपमें है।
भषा भूतानि मतेषु पायपिलं मही । | जैसे ही में मन, प्राण, पत्रमूत, इन्द्रिय और उनके
विषयोंका वाघ्या मुरमें , म उममें और
सब छोको में ही उनके रूपमें प्रकट हो हा हूँ॥२९||
वयाई - मनाप्राममूतेन्द्रिमगुणामयः ॥२९॥ मी अपनी मायाके द्वारा भूत, इन्द्रिय वौर उनके
विषयोंकि सपमें होकर उनका बाश्रय बन जाता है वष्य
सयं निमित्त भी बनत अपने आपको दी रचता ,
आत्मन्येवात्मनाऽऽस्मान सुजेइम्पनुपालये।
परता हूँ और समेट लेता ॥ ३० ॥ वात्मा माया
पौर मायाके कम्पोस पृषक है। यह विशुद मानमरूप,
मास्ममापानुमावेन मवेन्द्रियगुणात्मना ॥३०॥ र प्रकृति, कोक जीव तथा अपने ही अबाम्तर मेदोंसे
ररित सर्वपा एम है। कोई भी गुण भसका स्पर्श
मही कर पाते। मायाकी तीन पियों सप्ति,
मात्माधानमया मुखोम्पतिरिकोऽगुणान्वयः। समनौर बाम । इनके रा [ी बम, मन्त
बोपसरूप बारम्म कमी प्रात्र, तो कमी वैमस वीर
कमी मियरूप से प्रतीत होता है ॥११॥ मनुष्यको
सुएप्तिसमबाप्रद्धिर्मायाधिभिरीपते ॥२१॥हिये का समरे कि सममें दीसमेवाले पदापोंकि
समान ही नाम बास्मामें इन्द्रियोंके रिस्य मी प्रतीत
पेनेन्निपान ध्यायेत स्पास्यमवरिपतः ।
हो ये, मिप्पा है। इसीरिये उन बिस्पोका
चिकन करमेशले मन और इन्द्रियोंको येक वीर
मानो सोकर सष हो, इस प्रकार जगत्के सानिक
समिरूपादिन्द्रिमागि विनिद्रा प्रस्पपयत ॥२२॥ स प्रकार समी नदियों घूम-फिरकर समुद्रमें ही
यको स्पागकर मेरा साक्षात्कार करे ॥ ३२ ॥
पपिसी है, उसी प्रकार मनसी पुस्पोंका वेदाम्यास,
एवदन्वा समामायो योगा सांस्य मनीषिणाम् ।
पग-सापन, समानामविवेक, स्याग, तपस्पा, इविपरपम
और सत्पबादि समस्त धर्म, मेरी प्राप्सिमें समाप्त
होते है। सबका सब फल है मेरा साक्षात्कार क्योंकि
स्पागलपो दमा सप समान्दा सापगा। ॥२॥ सब मनको निम्म करके मेरे पास पहुंचाते है॥३३॥

४२० भीमसागपत [अ०५० । - यत् त्वा भवतीनां वैरे व प्रियो दशाम् । गोपियो ! इसमें सदेह नहीं कि मैं तुम्हारे नयनों- का मुक्तारा हूँ। तुम्हारा नीफ्न-सर्वस है। किन्तु में मनसः संनिफार्थ मदनुभ्यानकाम्यया ॥३४॥ यो तुमसे इतना दूर यता है, उसका कारण है। यही कि तुम निरन्तर मेरा पान कर सको, शरीरसे दूर रहनेपर भी ममसे तुम मेरी सनिधिका अनुभव करो, यथा दरचरे प्रेष्ठे मन भाविश्य पसते । अपना मन मेरे पास रक्से ॥३१॥ क्योंकि जियें दौर बन्यान्य प्रेमियोंका वित्त अपने परदेशी प्रियतमें स्त्रीणां च न तथा घेत सनिक क्षिगोचरे ॥३५॥ जितना निधक माक्से लगा रहता है, उतना बॉस के | सामने, पस गानेवाले प्रियतममें महो गता ॥३॥ वशेष पत्तियोंसे रहित सम्पूर्ण मन मुझमें भगाकर बन मय्यावेप मनः केत्स्नं विमुक्काशेपइति यत् । सुम लोग मेरा मनुस्मरण करोगी, तब शीघ्र ही सदा के लिये मुझे प्राप्त हो गावोगी ॥ २६ ॥ म्यागियो । निस अनुसरन्स्पो मां नित्यमपिरान्मामुपैप्पथ ॥३६॥ सम्प मैने इन्दावनमें कमरदीय पूर्णिमाकी रात्रिरस- कीय की पी उस समय मो गोपियों सबोंके रोक सेनेसे अममें वीर गपी--मेरे साप यस-शिरमें या मया फोडतारामांचनेऽमिन् प्रम आम्बिसाः । सम्मिलित न हो सका, मेरी हीछावों का स्मरण करने से ही मुले प्राप्त हो गपी पी। (तुममें भी में मिप असम्भरासाः फल्यायो माऽऽधर्मवीर्यपिन्समा।३७। काश्य, निराश होनेकी कोई बात नहीं)॥३७ भीक उवाच भीष्वेवसी पवे परीक्षित् ! अपने प्रियतम श्रीकृष्णकर या सेंदिसा मुनकर गोपियोंको बसा मानन्द एव प्रियतमादिष्टमाकर्म्य प्रायोपितः । हुवा । उनके सम्वेशसे उन्हें श्रीकणके सरूम और ता पुरुर्व प्रीतास्तरसंदेशागतस्मृतीः ॥३८॥ एक-एक सीमको पद बाने म। प्रेमसे मस्कर उन्होंने उदयीसे कहा ॥ २८ ॥ पोपियोंमे करा-उरकणी ।पो सौभाम्पकी और मानन्दकी बात है कि यदुशियों को सताने मन्त्र पापी कंस सपने अनुयायियोंकि साप मारा गया । ब भी कम दिएपाहिसोहवः फंसो यदूनो सानुगाऽषद । भानन्दकी बात नहीं है कि श्रीहष्णके मापुसत्य चौर गुस्मनोंके सारे मनोरम पूर्ण हो गये क्या कर विएयाऽऽर्डग्धसः शस्पास्तेऽच्युतोऽधुना३९ इमारे प्यारे श्यामसुन्दर उनके साथ साम मिलास कर ये है ॥३९॥ किन्तु उसपनी एक बात बाप | हमें बताइये । मिस प्रकार हम अपनी प्रमी पीली कपि गदाग्रमा सौम्प फरोति पुरयोपिताम् । मुसकाम और उमुन्क बितानसे उनकी पूजा करती पा और ये मी हमसे प्यार करते थे, उसी प्रकार प्रीति न लिग्भसवीरहासोदारक्षणार्षिस ॥४०॥ | म्भुरकी सियासे भी ये प्रेम करते हैं या नहीं ! ॥१०॥ १पचापा गोप्य अ . ४२१ ४७] य रतिपिशेपच प्रिया परयोपिताम् । ततक दूसरी गोपी बोल उठी-अरी सही ! हमारे प्यारे श्यामसुन्दर तो प्रेमकी मोहिनी सत्यके विशेपा हैं। समी श्रेष्ठ सियों उमसे अनुपम्येत सदाक्यविनमैघानुभाजित ॥४१॥ प्यार करती हैं, फिर भछा जय नगरकी मियों उनसे मीठी मीठी बातें करेंगी और हाव-मावसे उनकी मोर देखेंगी तम ये उनपर क्यों न रीगे ॥११॥ पि मरति न साधो गोविन्दः प्रस्तुते कषिन् । दूसरी गोपियाँ वोली-'साधो! आप यह तो बताइये कि जय कमी नागरी नारियोंकी ममली में कोई बात चल्तीह और गाष्टिीमध्ये पुरस्त्रीणां ग्राम्याः स्वैरकथान्सरे ॥४२॥ हमारे प्यारे सम्छन्दरूपसे,विना किसी सोच के जब प्रेमकी या परने स्टाते हैं, सय क्या कमी प्रमावश हम गंगार ग्वाटिनोंको भी याद करते हैं" ॥ १२॥ कुछ गोपिर्पोने वा किं निशाः सरति यासुखदा प्रियाभि का-'उदयनी! क्या फभी श्रीकृष्ण तम यत्रियों का स्मरण करते हैं, चय कुमुदिनी तपा कुन्दके पुष्प मिले हुए थे, चायें भोर चाँदनी छिटक रही पी और इन्दाक्न वृन्दापने फमदान्दशमापूरम्ये । अस्पत रमणीय हो रहा था। उन रात्रिोम ही उन्हनि रास-मण्डल बनाकर इमठोगकि साप मृत्य किया था। रमे कणचरणनपुररासगोष्ठया कितनी सुम्दर पी मह गुस-सीमा । उस सम्प हमलोगोंके पैरों के नपुर समान समामुन बन रहे थे। हम सब समिपा उम्हीकी सुन्दर-सुन्दर लीलामोंका गान ममाभिरीस्विमनोझकपः कदाचित् ।।४३॥ कर सी पी बोर के हमारे साप नाना प्रकार के बिहार कर रर थे' ॥ १३॥ कुछ सरी गोपियों बोस ठही-उदयमी । हम सब तो नाके विखको अप्येप्यतीह दाशाईस्तप्ता सस्तया शुचा । आगसे जछपी है। देवराम इन्द्र मैसे अस बरसापर क्नको हरा-भरा कर देते है, उसी प्रकार क्या कभी संवीवयन् नु ना गार्यपेन्द्रो पनमम्पुदं ॥४४॥ श्रीकृष्ण भी अपने कर स्पर्श मादिसे हमें जीवन- दान देनेके लिये पहाँ भागेतबतक एक गोपीने कहा-बरी सम्ही ! अब वो नहोंने शामोंको स्मात् कृष्ण हायाति प्राप्तराज्यो इवादिस । मारकर राम्य पा रिया है। जिसे देखो, ही उनकर मान् बना पिरता है। मदर बोयो नरपतियोंकी पुमारियोंसे सिह करेंगे, उनके साप मानन्दपूर्वक नरसन्या उद्वान प्रीत सर्पसुरवतः ॥४५॥ रहेंगे, पो हम गंगारिनों के पास क्यों मायगे ॥१५॥ दुसरी गोरीने क्या-नदा सडी | महारमा भीरण किममाभिननोकाभिरयाभिर्वा महामन । तो सब एमीपति है। उनकी सारी काम्न पूर्ण ती १ घेतास्प है। हम पनामिनी पाटिनों अपना दूसरी रामपुरपरिपासे उन को प्रपोवन महाराहम श्रीपनामम प्रिपेठाई उम्मन ॥४६॥ करिना किस पौन-सा काम बाप माturn . । ।

नन्दनन्दनको हमारे नेत्रों के सामने मकर रस देवे है। उदयो। हम किसी भी प्रकार--माकर मी उनमूह मघ सर ॥५०॥उनकीपासपी ४२२ श्रीमद्भागवत [8.० पर सौप हि नैराश्य स्वैरियप्पाह पिङ्गला। देखो वेश्या होनेपर मी मिच्यने क्या ही केक कहा है.--'ससारमें किसीकी भाशा न स्मना है सम्से का पुरा है। यह बात हम बात वखानतीनां नः कणे सपाप्पाशा दूरस्पया ॥४७छोरनेमें असमर्प ।। उनके समगमनकी प्रथा ही है हैं, फिल मी दम भगवान् श्रीकृष्णके ऐटनेसी बाल इमारा जीवन है ।।१७। हमारे प्यारे समारो जिनकी कीर्तिका गान कोमा महात्मा करते हो । क उत्सहेस मंत्पमतमलोकसविदस् । हमसे एकान्तमें मो मीठी-मीठी प्रेमको बातें करने बनेका, मुसानेका उत्साह भी दम से कर सकती देखे तो, धनी म न हानेर मी सर्व अनिष्ठयोऽपि यस भीरगानच्या कथित् ॥१८॥ समीची उनके भरोसे छिपटी रदती हैं, एक पर प्रिये भी उनका मा-सा भेकर यहाँ महा मावा ॥ १८ ॥ उनी । यही नदी है, जिसमें ये विहार करते थे। यात्री पर्वत , निसक शिमला सरिलिवनोरेशा गावो बेपुरवा इमे । यापर ये गाँसुरी अमाते थे। ये वे ही न निमें वे रात्रिक समय यस छीला करते थे, और ये घेही गौएँ हैं, जिनको धरनेके लिये रे मुबह-शाम संकर्षणसहामेन कृष्णेनाचरिता प्रभो ॥४९॥ सी ही शीको तान हमारे का नती यही है। इममेगोको देखते हुए वादे-माते थे। और यह बैंक मैसी ये अपने ककि सपोगसे या पाते थे। बरामजी के साथ श्रीमपने हम सभीका सेवन निय पुनः पुनः मारयन्ति मन्दगोपसतं यत । है॥१९॥ यहाँका एक एक प्रदेश एक-एक पनि उनके परम सुन्दर धरणकमसे विदित है। बब-मब हम देख्वी रे, समीरममा पही तो फरती प्रती है-समय मे हम्परे प्यारे श्याम दर भीनिकेवैस्तत्पदफैसित नै क्रमाः ॥५०॥ सी मुन्दर चार, उन्मुक्त हास्य, विलमार्ग विम गस्या ललितपोदारदासलीलारलोकन । पौर मधुमयी बागी बोह। वन सबने हमारा वित पुण किया है। हमारा मन हमारे में नहीं है। इस मन्हें मू वो किस ५१ ॥ हमारे प्यारे माम्म्या गिरा एभिपः कर्य न विसरामो ॥५१॥ पारे । तुम मीना हो तो क्या नाम हमारे भीकृष्ण ! दी दम्परे जीवन के सामने हो, सर्वस पिये तो प्रननाप ही हो।हम गोलियों के एक पत्र जमा सन्चे सामी हो । मादर ने है नाप रमानाप प्रजनामाविनाप्नन । पार पर हमारी म्पपा मिटामी हमारे सार काटे १ मार। तद्वि | म०४७] दशम स्कन्ध ४२३ मममुधर गोविन्द गोहलं पजिनार्णवात् ॥५२॥ है। गोविन्द ! तुम गौधोंसे पात प्रेम करते हो। क्मा हम गएँ नहीं है। तुम्हारा पह सारा गोकुल- जिसमें ग्ालबाल, पिता-माता, गोएँ और हम गोपियों सब कोई है--दु सके अपार सागरमें एम रहा है। तुम इसे बचामो, बायो, हमारी रक्षा करो ॥ ५२ ।। श्रीमुक उपात्र मीशुकोषजी कहते है प्रिय परीक्षित् ! मावान् ततस्त्राः कृष्णदेवपेठविराबर । श्रीकृष्णका प्रिय सन्देश पुनफर गोपियों के विकी न्यथा शान्त हो गयी थी। ये इन्द्रियातीत भगवान् श्रीक्षणको अपने पास्माके रूपमें सर्वत्र सित सम्ब वर्ष पूर्मयाजास्वाऽऽत्मानमघोषवम् ॥५३॥ चुकी थी । ना से यह प्रेम और बादरसे उसवनीका सत्कार करने मगा ॥ ५३ ॥ उपमी गोपियोंकी बास कविचिन्मासान् गोपीनां विनुदाधा। विरह-व्यपा मिटाने के लिये कई महीनोंतक यहीं रहे। वे ममवान् श्रीकी बनों लीलाएँ और पा सुमा मुनाकर नमासिपोंको धानन्दित करते रहते ॥ ५१॥ 5ष्णठीसाकयां गायन रमयामास गोडसम् ॥५४॥ नन्दबावाके अनमें जितने दिनों तक उसवनी हे, उतने दिनोंतक भगवान् श्रीकणकी लीम्पकी चर्चा होते पालन्त्यहानि नन्दस्य प्रजेऽवात्सीत् स व्दवः । रहने के कारण ब्रजवासियों को ऐसा नान पसा, मानो भभी एक ही क्षण इक्षा 0॥ ५५॥ भगवान्के परमप्रेमी भळ ठयवनी नदीतटपर माते, पामी पोरसा धनप्रामाण्यासन् कृष्णस्य वार्तया॥५५॥ और कमी गिरिरामकी घाटियो विचरसे । कमी रंग-बिरंगे से मदे पर मि ही रम नाते और यहाँ मगवान् श्रीकृष्णन कौन-सी लीला की है पर पूछ-म्बर अममासियोंको भगवान् श्रीक्षण और उनकी सीलाके स्मरणमें क्मय कर ऊण समारपन् रेमे हरिदासो प्रजौकसाम् ॥५६॥ | देते ॥ ५६ ॥ सरबजीने अमें राकर गोपियों की इस प्रकारकी प्टवैषमादि गोपीनां कृष्णाषेशात्मविक्लवम् । प्रेम-मिता सपा और भी बहुत सी प्रेम-पेयए देखी। उनकी इस प्रकार श्रीकृष्णमें स्मपता देखकर वे प्रेम मौर भानन्दसे मर गये । भव वे गोपियोंको नमस्कार उदह' परमप्रीतस्ता नमस्समिद गौ ॥७॥ करते हुए इस प्रकार गान करने एगे- ५७॥स पृप्तीपर केवल इन गोपियका ही शरीर धारण करना श्रेष्ठ एवं सम स्पोकि ये सारमा भगवान् श्रीकृष्ण एता पर सनुमको मुवि गापपप्पो परम प्रममप दिभ्य महामाबमें स्थित हो गयी है। प्रेमकी यह ची-सेउची सिसि संसारके मपसे मैन मुमुक्षमनोंके रिपे ही महाँ, मरिश पाना गोविन्द पप निलितास्मनिस्ठमावाः । मुनियों-मुक पुरुण तपा हम मजनक सिपे मी कमी सरिधनगिरिद्रोणीपींधन सुमिष्ठान द्वमान् ।

४२४
भीमद्भागवत
[4.0
पाम्छन्ति यत् भवभियो मनपोषयं ष पाञ्छनीय ही है। हमें इसकी प्राप्ति नहीं हो सकी।
सत्य है, मिन्हें मगवान् श्रीकृष्णकी छठा कारक
रसका चसका लग गया है, उन्हें कुलीनताकी,
किं प्रमजन्मभिरनन्तफापारसस्व ॥५८॥ हिमातिसमुचित सस्कारकी और मोमह या पाप्रेम
दीक्षित होने की क्या भावश्यकता है।पय यी
मगवान्की कसाका रस नहीं मिया, उसमें रुचि नहीं
कमा लियो पनचर्यभिचारदुष्टाः , तो भनेक महाकम्पोतक मार-बार झा होनेसे ही
क्या लाम। ॥५८ ॥ को ये पनचरी पाचार, बार
और जातिसे हीन गाँवकी गवार म्पस्टिने बोर को
कम्पक चैप परमारमनि रूडभावः। सचिदानन्दपन मगवान् श्रीकृस्णमें यह बनन्य परम
प्रेप ! बहो, धन्य है । धन्य है। इससे सिर पडा
है कि कोई मगवान्के स्वरूप वीर यस्यको न
नवीधरोऽनुभबमोऽविदुपोऽपि साधा
मानकर भी उनसे प्रेम करे, उनका मनन करे, ते
| वे सर्प अपनी शक्तिसे, अपनी पासे उसका परम
यस्तनोस्पगदराज इवोपयुक्तः॥५०॥
कल्याण कर देते हैं, ठीक वैसे ही, जैसे कोई बनगन
भी वमृत पी से तो ५ अपनी बस्तु-शकिसे ।
| पीमेवालेको अमर बना देता है॥ ५९ ॥ भगवान्
नार्य मियोऽङ्गठनितान्तरतेःप्रसाद
श्रीकृष्णने रासोरसक्के समप इन जागनाकि गोमें
मोह राख रासकर इनके मनोरप पूर्ण किये । इन
भगवान्ने बिस कृपा प्रसादका वितरण किया, हमें
स्पोपितों नलिनमन्धरुचा तोऽन्या' ।
मैसा प्रेमदान किपा, पैसा मगवान्की परमप्रेमची
मित्यसङ्गिनी पर स्पलपर राममान मममीनीको भी
नहीं प्रप्त इला | कमलकी सी मुगन्ध पर कान्तिसे
रासोत्सवेऽस्स मुबदमागृहीतकण्ठ
युक्त देवाहनाओंको भी नहीं मिम । फिर दूसरी
| सियोंकी तो बात ही क्या करें! ॥३०॥ मेरे को
तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि में इस प्रदान-
सम्धाक्षिा यउदगाव ब्रजबलवीनाम् ॥६ ॥ घाममें कोई कापी, मता पपका वोपधि-- रबी-फूटी
ही बन बाऊँ 1 40 यदि में ऐसा बन जाऊँगा, तो
मुझे इन प्रमाना की परणपूछि निस्तर सेक्न
आसामहो परपरेणुशपामा सो | फरनके लिये मिस्ती रहेगी। इनके चरण-रग मान
परके मैं धन्य हो नाऊँग । मय ये गोपियाँ ।
| देखो तो सही, मिनको छोरना पन्त कठिन है,
इन्दावने किमपि गुरमलचौपधीनाम् ।
ठम सम्म-सम्बन्धियों तथा कलेकी वार्य-मर्यादाका
परित्याग करके इन्होंने मान्की पदवी, उनके साप
तन्मयता, उनका परम प्रेम प्रस र मिपा है-
या दुस्सब स्वपनमार्यप पहिस्सा बोरोंकी तो बात ही स्पा--अगवाणी, उनकी
मि ग्रासरूप समस्त शुतियों, उपनियों मी बसक
भगवान्के परम
प्रेममप सहपको हती ही
मेसर्सइन्दपदमी भुतिभिर्विसम्याम् ।।६१॥ | सती हैं प्राप्त
नहीं कर पाता ॥ ११ ॥

२०४७] दशम स्कन्ध ४२५ या भियाचिंतमजादिभिराप्तकामै- वय मगरती ममी मी मिनकी पूजा करती बसी है, अमा, शहर आदि परम समर्थ देवता, धर्मकाम बारमाराम और बड़े बड़े योगेपर अपने दयमें जिनका चिन्तन योगेधरैरपि यदात्मनि रासगोष्ठधाम् । करते रहते हैं भगवान् श्रीकृष्णके ठम्ही चरणारविन्दों को गस-सीलाके समय गोपियों ने भपने वक्ष सस्पर रुप्णस्म तद् भगवतपरणारविन्द रस्थ और उनका मालिन करके अपने एयफी जलन, न्मस्तं स्तनेषु विजहु परिरम्प यापम् ॥६२॥ | बिह-व्यया शान्त की ॥६२॥ नन्दयागके प्रजमे रहनेवान्टी | गोपागनाओंकी 'चरणको मैं वारंवार प्रणाम करता बन्दे नन्दनमस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णतः । -~-उसे सिरपर घड़ाता है। अहा ! इन गोपिर्पोने भगवान् श्रीकृष्णको ठोठाकपाके समाधमें जो कुछ गान किया है पह तीनों लोकोंको पवित्र कर रहा पासां इरिफयोगीतं पुनाति अपनत्रयम् ॥६३॥ | धौर सदा-सर्वदा पवित्र करता रहेगार ॥ ६ ॥ भीक उपाय भीशुकदेषभी कहते है-परीक्षित् ! इस प्रकार कई महीनोंतक बनमें रहकर उसजीने पर मथुरा जानेके लिये गोपियोंसे, नन्दवाया और यशोदा मैयासेवाडा अब गोपीरनुसाप्प यशोदा नन्दमेव च । प्राप्त की बालवानोंसे मिगलेकर वहसि यात्रा करने के लिये वेषपर सवार हए ॥६॥ जब उनका रप मनसे बाहर गोपानामन्य दाशाहों पास्पमारूहे रथम् ॥६४॥ निकला, ता नन्दनाया जादि गोपगण बहुत-सी मेंफी सामग्री लेकर उनके पास पाये और बाद में बोस् निर्गतं समासाप नानोपायनपाणय । मरकर उन्होंने वा प्रमसे कहा-॥६५॥ 'उदयनी । बम हम यही चाहते हैं कि हमारे मनकी एक-एक नन्दादयोऽनुरागेण प्रायोचममुलोधनाः ॥६५॥ इनि, एफ-एक सङ्कल्प श्रीकृष्णक घरणकमोंके ही बाधित थे। उमींकी सेवाके लिये उठे और उन्हीं में मनसा इसमो न स्युःकृष्णपादाम्मुबाश्रयाः। मागी भी रहे। हमारी वाणी निरप-निरस्तर उन्हीके नामोका उचारण करती रहे और शरीर नहींको प्रणाम पाचोऽभिघापिनी ना फायस्तत्प्रहमादिपु ॥६६॥ करने, ठहाके याज्ञा-पाटन और सेवा में लगा रहे ॥६६|| उपजी ! हम सब कहते हैं, हमें मोक्षकी इच्छा कर्मभिर्माम्यमाणानां यत्र फापीपरेप्छया । बिस्कुल नहीं है। हम भगवान्की इछासे अपने कोकि भनुसार पाहे मिस योनिमें अन्म में-वहाँ शुम भाचरण करें, दान करें और उसका फल मालायरितेदन रतिनी कृष्ण ईश्वरे ॥६७॥ यही पायें कि हमारे अपने ईमर श्रीकृष्ण हमारी प्रीति उपरोचर पाती र ॥ ६७ ॥ प्रिय परीक्षित् एवं समामितो गोपः कृष्णभस्या नराधिप । नन्दबाबा जारि गोपगेन म प्रकार श्रीकृष्ण-मक्केि द्वारा उदयनीका मम्मान किया। कावे मगवान् व्दवः पुनरागन्छन्मपुरी कृष्णपाटिताम् ॥६८॥ श्रीगके पारा सुरक्षित मयुगपुरीमें पेट वाये ॥१८॥ ।

४२६ भीमद्भागवत [०४८ फमाय प्रणिपत्याइ भक्पुद्रेम प्रमौकसाम् । कहाँ पहुँचकर उमोंने भगवान् श्रीकृष्णको प्रश्न किया और उने प्रमवासियोंकी प्रेममयी महिला नेक, जैसा उन्होंने देखा था, कह सुनाया। इसके बाद मन्दयावाने मेंटकी नोजो सामग्री दी पर उमका, सुदेवनी, बलरामजी वीर राग उमसेनक पसुदेषाम रामाय राझे चोपायनान्यदात् ॥६॥ । वे दी ॥ ६९ ॥ इति श्रीमहागवत महापुराणे पारमाईस्या संहिताया दशमस्कन्धे पूर्षेि दरवप्रतियाने सप्तचत्वारिंशोऽध्याय ॥४७॥ अथाष्टचत्वारिंशोऽध्याय भगवानफा कुजा मोर माकूरजीके पर जाना श्रीमुक उवाच श्रीशुस्येवजी कहते है परीक्षित् । तदनन्तर सबके भारमा तप सब कुछ देसनेपाले भगवान् श्रीकृष्ण अथ विझाप भगवान् सर्वारमा सर्वदर्शनः । अपनेसे मिकनकी माता रसकर ध्याफुलाई कुवाका | प्रिय करने—उसे मुख देनेकी इससे उसके म सैरन्ध्याः कामसप्तायाः प्रियमिच्छन् गृहं ययौ ॥ १॥ गये ॥ १॥ कुम्माका घर मामूप सामप्रिपोंसे सम्पस था। उसमें शृङ्गार-रसका उदीपन करनेवासी बहुत-सी महार्होपस्करैरास्य कामोपायोपाईहितम् । साधन-सामग्री भी मी ई पी । मोतीकी भामरें और अकादामपतामभिर्विवानशयनासन: साम-सानफ्र इरियों भी स्गी हई की। दो सन पर थे। सेजें मिमयी हई पालौर नेके म्येि धूपैः सुरभिभिदीपः संग्गन्धरपि मष्ठितम् ॥ २ ॥ बहुत इन्दर-सुन्दर बासन गाये हुए थे। भूपकी मुगन्ध फल रही पो।पकको शिसाएँ जगमगा दी गृ तमायान्तमषेय साऽऽसनात् पौ। सान-स्थानपर लोंके हार और पदम रस ए थे ॥२॥ भगवान्को अपने घर वाते देस कुमा सप समुत्थाय हि वातसम्ममा । | परत पाकर बपने मासनसे उठ ही ई और ससियों के साथ आगे बढ़कर उसने विधिलक भगवान्का पथोपसंगम्य सस्त्रीभिरपुर्व सागत-मत्कार किया। फिर श्रेष्ठ वासम वारि देकर विविध सभाजयामास सदस्सनादिभिः ॥३॥ उपचारोंसे उनकी विधिपूर्वक पूजा की ॥ ३ ॥ एम्पने | भगवान्के परममक उपजीको भी समुचित रीलिसे योदयः साधु वयामिपमिता पृधा की; परन्तु मे उसके सम्मान के लिये उसका पिया हुध मामन छकर भतीपर ही गये । (अपने न्पपीददुमिभिमुश्प घामनम् । सामीके सामने हीन वासनपर पदमा उचित न मेरा वादयपरियामा शुक्र४ि मुमत ।

अ०४८] दशम स्कन्ध ४२७ सा रुष्णोऽपि तूर्ण शयन महाधन समझा । ) भगवान् श्रीकृष्ण सचिनन्दसत्प होनेपर भी लोकाचारका अनुकरण करते हुए तुरंत उसकी विषेश लोकाचरितान्यनुनतः ॥ ४॥ बहुमूल्य सेमपर बा केळे ॥१॥ सप फुमा मान, बाराग, पड, माभूगण, हार, गन्ध (त्र आदि), मखनालेपछलभूपण- | साम्बूल शोर सुधासत्र वादिसे अपनेको खून समाकर समान्धताम्बूलसुघासपादिभि । हीलामपी लमीठी मुस्कान ता हाव-भावके साप भगवान्की मोर देखनी हुई उनके पास पायी ॥५॥ प्रसाधितात्मोपससार माधर्व कुस्मा नगीन मिलनके सक्कोपसे कुछ मिझक दी थी। सबीउलीलोत्सितविनमेधितः ॥५॥ तब श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने उसे अपने पास युम्ग म्यिा और उसकी माणसे मुशोमित करणई पकाकर अपने भाइय कान्ता नवसङ्गमदिया पास मैया लिया और उसके साप क्रीग फरने लगे। परीक्षित ! कुल्याने इस नन्ममें केवल मगवान्को मङ्ग- विशहिता पणभूपिते करे । राग अर्पित किया था, उसी एक शुमकर्मके फलस्वरूप प्रगृप अग्यामधिवेश्य राममा उसे ऐसा अनुपम अवसर मिला ॥ ६॥ कुम्जा भगवान् श्रीकृष्णके घरगोंको अपने काम-तिस एदय, पक्ष स्पस रेमज्नुलेपार्पणपुष्पलेखपा ॥६॥ बोर नेत्रोंपर रखकर उनकी दिम्य मुगन्ध लेने लगी और इस प्रकार उसने अपने पदपकी सारी बाधि सानन्यसाधयोस्रसस्तपाणी- पापि शान्त फर छी । पक्ष सरम्से सटे हुए वानन्द विन्स्पनन्तचरणेन रुखो मृजन्ती । मुर्ति प्रियतम श्यामसुन्दरफा अपनी दोनों मुजाओंसे गाद भाङ्गिन करके कुम्मामे दीर्घकाठसे बड़े हुए विरह दोपो म्हनान्तरगत परिरम्प कान्त तापको शान्त किया ॥७॥ परीक्षित् ! कुणाने के बगग समर्पित किया था। उतनेसे ही उसे मानन्दमूर्तिमबहादतिदीर्घतापम् ॥७॥ उम सर्वशक्तिमान् भगवान्की प्राप्ति हुई, जो कान्य- सैव कैवरपनार्य त प्राप्य दुष्प्रापमीश्वरम् । मोलके बनीवर और मिनकी प्राप्ति मपम्त परिन है। परन्तु उस दुर्भगाने में प्राप्त करके भी ब्रजगोपियोंकी आरागार्पणनाहो दुर्मगेदमयाचव ॥ ८॥ मति सेवा न माँगकर यही माग--८॥ प्रियतम ! आप कुछ दिन यहीं राकर मेरे साथ कीटा कीनिये । आहोप्पतामिह प्रेष्ठ दिनानि विचि मया । क्षेकि हे कमसनपन ! मुमसे भापका साथ नहीं छोश जाता ॥ ९॥ परीक्षित् । भगवान् श्रीकृष्ण सबका मान रमस्त्र नोस्सहे स्यक्त सह तेऽम्पुरुहेक्षण ॥ ९॥ मनपाले भौर सर्वेपर है। उनोंने कभीर बर देकर सस्पै फामवरं दवा मानयित्ता प मानदः । | उसकी पूमा सीकार की बार फिर अपने प्यारे मत उदगीके साप अपने सर्वसम्म्पमित परपर मोट सहावेन सर्वेशः म्यपामागमदिमत् ॥१०॥ माये ॥१०॥ परीक्षित ! मगवान् ममा मादि समस्त मरीके भी ईपर हैं। उनको प्रसम पर सेना मी दुराराध्य समाराम्य विष्णु मघरेपरम् । सीबके लिये बहुत ही कटिम है।नो को उन्हें ४२८ श्रीमहामवठ [अ०४८ यो पूणीत मनोप्रामममस्थाव कमनीप्पसौ ॥११॥ | प्रसन्न करके उनमे विश्य-मुख माँगता है, वह निम्प ही दुर्मुशि है, क्योंकि पास्तबमें विषम सुस्त वापत तुम्छ-नहीके बराम है ॥११॥ अरभवनं रुप्णः सहरामोदर प्रमु । सदमम्तर एक दिन सर्वशक्तिमान् मगवान् श्रीकृम्म बामग्री और उसवमीके साप भकूरजीकी बमिमा किंचित्रिकीर्पपन् प्रागाढतप्रियकाम्पया ॥१२॥ पूर्ण करने वौर उनसे कुछ काम लेने के लिये उनके घर गये ॥ १२ ॥ मकरनीने दूरसे ही देस लिया कि समान नरवरमठानारा वीक्ष्य स्वपान्धवान् । हमारे परम मधु मनुष्यलोकशिरोमणि मगवान् श्रीकृष्ण और क्लयाममी आदि पधार रहे। ये तुरंत स्टकर प्रत्युस्थाय प्रमदित परिपज्पाम्पनन्दत ॥१३॥ जागे गये तपा वामदसे भरकर उनका अमिनदम ननाम फुप्फ राम प स सैरप्यभिवादितः । और वाजिन किया ॥ १३ ॥ भनीने माइन् श्रीकृष्ण और कामको नमस्कार किया तपा उनकी पूजयामास विश्वित् फवासनपरिग्रहान् ॥१४॥ साप सन दोनों भाइयोंने मी उ, नमस्कार किया। जब सब स्पेग मारामसे वासोंपर भै गये, सब बानी पादावनेमनीरापो धारपन्छिरसा नृप । ठन म्मे!की विधिवत् पूजा करने म्गे ॥ १ ॥ पीक्षित् ! उन्होंने पहले भगवान्के चरण धोकर परको अर्हणेनाम्परैदिम्पैर्गन्धनग्मपणोचमैः ॥१५॥ दक सिरपर धारण किया और फिर अनेकों प्रकारकी अचिस्वाचिरसाऽऽनम्प पापगतौ मजन् । पूना-सामग्री, दिम्प क्स, गन्ध, मास्म और प्रष्ठ वामूपमों- से उनका पूजन किया, सिर मुकार में प्रथम प्रभपावनवोऽकर किया और उनके घरों को अपनी गोद में लेकर दाने कृष्णरामावमापत ॥१६॥ मगे। उसी समय उन्होंने स्नियावनत होकर झापा दिएपा पापोहतः कमामानुगोयामिद फूलम् । श्रीकृष्ण और मलयामनीसे कहा--॥१५-१६ ॥ 'मगवन् ! या बड़े ही वानन्द और सीमाम्पकी बात भवदम्पास कन्गदुरन्ताच समोधितम्रा है कि पापी कंस अपने अनुपििक साप मारा गया। उसे मारकर बाप दोनोंने पदवशको पात यो साटसे पुर्वा प्रधान पुरुषी अगषेत् जगन्मयो । बचा लिया है तपा उमा वीर समर किसा॥१७॥ भवम्यान विना किंचित् परमम्ति न पापरम्॥१८॥ आपके वनिरिक और कोई वस्तु महान माप दोनों नगर के कारण भोर मगरम्प, वादिपुरुष आरममएमिदं विषमन्वाविश्य म्पतिभिः। कारण और म तो कार्य ॥१८॥ परमारमन् ! बापने ही अपनी शक्सेि इसकी रचना की है और मापी इयते पहुधा प्रान् श्रुतप्र पपगोगरम् ।।१९।। वपनी काप, माया गरि शाक्तियोंसे इसमें प्रष्टि होकर मितनी भी रसुर दली बार सुनी जाती है, उनके पथा हि भूतेषु पगमरम् रूपमें प्रतीत हो रहे है॥१॥ मे पृषी पारि कारणता से ही उनके कार्य पावर-अजमहीर बनते मप्रादया यानि भान्दि नाना । 12 में उनम मनुसिर से होकर बने मोम प्रतीत पागात मिल -४८] दशम स्कन्ध ४२९ एवं भवान् केवल आत्मयोनि- होते हैं, परन्तु वास्तत्रमें ये कारणस्म दी है। इसी प्रकार हैं तो केवल आप ही, परन्तु अपने कार्यरूप प्यात्माऽऽत्मतन्यो पहुधा विभाति ॥२०॥ नगमें सेष्ठासे अनेक रूपोंमें प्रतीत होते हैं । यह सृजस्पयो लुम्पमि पासि विश्व | मी मापकी एक शीश ही है॥ २० ॥ प्रमो । माप रजोगुण, सत्वगुण वीर समोगुणरूप अपनी शकियोंसे रजस्वम सम्यगुण स्वशक्तिभि । क्रमश जगतकी रचना, पालन और संहार करते है, न पयसे वगुणकर्मभिर्वा किन्तु आप उन गुणोंसे अपवा उनके पारा होनेवाले कोसे पधनमें नहीं पाते, क्योंकि पाप नुम् शान मानास्मनस्ते फघ पन्धहेतुः ॥२२॥ स्वरूप हैं । ऐसी स्थितिमें आपके लिये बन्पनका कारण दहापुपाषेरनिरूपितत्वाद ही क्या हो सकता है।॥ २१ ॥ प्रमो ! सय बारम वस्तुमे स्यूलदेह, सूक्ष्मदेह वादि उपाधियों न होने के भयो न माक्षाभ मिदाऽऽत्मन स्पाद । कारण न तो उममें नन्म-मृत्यु है और न किसी प्रकारका अतो न पन्धस्तष नैन मोक्ष भेदमाव । यही कारण है कि न आपमें बम्पन और म मोक्ष । बापमें अपने-अपने अभिप्रायके अनुसार स्वाता निकामस्त्वयि नोऽविवेक ॥२२॥ यन्धन या मोक्षकी जो कुछ कम्पना होती है, उसका स्वयादिवोऽय जगतो हिताय कारण केवल हमारा अविवेक ही है ॥ २२ ॥ जापने माके कल्याणके लिये यह सनातन वेदमार्ग प्रकट यदा यदा वेदपयः पुराण । किया है । जब-जब इसे पासण-पपसे घनेवाले दुखें- पाम्पेत पास्लण्डपधैरसहि के धरा क्षति पहुँचती है, सब-सब वाप शुद्ध सत्तमय शरीर ग्रहण करते है ॥ २३ ॥ प्रभो । यही थाप इस स्तदा भवान् सत्त्वगुण पिभसि ॥२३॥ समप अपने अंश श्रीबलरामजीके साप पृथ्वीका मार मत्त प्रमाऽध पसुदपगृहऽयतीर्ण दूर करनेके लिये यहाँ समुदेवनीके घर भत्र्ग हुए है। आप भमरोंके अंशसे सत्यम माममात्रके शासकोंकी म्यांशेन भारमपनेतुमिहामि भूमे । सौ-सौ अशीहिणी सेनाका सदार करेंगे वौर पदुशके यादिणीतरना मुरेतरांश पशका विस्तार करेंगे ॥ २१ ॥ इन्द्रियातीत परमात्मन् । सारे देवता, मि, भूतगग और रामा आपकी मूर्ति रामाममुप्प पलस्प पशो वितन्यन् ॥२४॥ वाक घरोंकी धोबन गमानी तीनों स्यारो अपम ना पमतय ग्गल भूरिभागा पवित्र करती है। माप सार जगत्के एकमात्र तिा बौर शिवरात्र भार हमारे पर पधारे । य सर्षदेपपिभूननृदयमूर्ति । इसमें सन्देर नहीं कि वान हमारे पर पम्पत्य हो यन्पादनाचमरितं विजगन् पुनाति गरे । उनले मोमपरी सीमा म रही ॥२५॥ प्रम्। मत्व जगद्गुगधोधन या प्रविष्ट ॥२५॥' बार प्रेमी मों के परम प्रिप्तम, सपाका, भारत दिन और मार-र-सी से भी मान मते पनिम्न्यदपर शरण मर्मापा मा न मुस्मिन् पुरानो वा भन्नप्रिपालगिर मुरद सामान । र रिमी इमरेरी पग्में मामला ६15, ४३२ श्रीमद्भागवत वि०४९ - वेज बोजो पलं पीय प्रश्रयादींप सद्गुणान् । वक्रमीको कुरसी वौर पिदुरने यह स्तस्मया कि स्तराते मके दुर्योधन भादि पाण्डवों के प्रमाब, शासकौशल, का प्रमानुराग पार्थेषु न सहनिमिकीर्पितम् ॥ ५॥ बीरता तपा दिनप आदि सद्गुण देस्य-देखकर उनसे बस्ते रहते हैं। जब वे या देखते हैं कि प्रजा पामसे ही विशेष प्रेम रखती है, तब तो और मी हि बाते कतं च धाराष्ट्रैर्य गरदानायपेशलम् । हैं और पाण्मयोंका भनिए करनेपर उतारू हो पाते हैं। भवतक दुर्योधन आदि पतराष्ट्र के पुत्रोंने पाण्योर कई आचम्पो सर्वमेवास्मै पृथा विदुर एव च ॥६॥ धागे भी बहुत कुछ करना चाहते हैं ।। ५६ ।। बार विपदान आदि पनुत-से अत्याचार किये हैं और पृथा तु ग्रासरं प्राप्तमक्रमपमृत्य तम् । सब बकरमी कुरसीके घर जाये, तब हमने उवाच अन्मनिलयं मरन्स्पश्नुकलेक्षणा ॥७॥ माईक पास जा बेटी । अकबीको देखकर कुन्तीके मन में अपने मायकेकी स्मृति जग गयो भौर नेमि वॉस् मा आये । उनोंने कहा---॥ ७॥ प्यारे माई | क्या कमी अपि मरन्ति नः सौम्प पितरौ मातरम में । मेरे माँ-बाप, माई बहिन, मतीने, कुत्रकी बियों और ससी-सहेलियाँ मेरी याद करती हैं। ॥८॥ मने मुना भगिन्यो प्रासपुत्राय वामयः सरम्प एव च ॥८॥ कि हमारे मतीने भगवान् श्रीकृष्ण और कम्पनयन मम्माम पर ही भक्तमाल वोर शरणागत-रक्षक है। भ्रायो भगवान कृष्णः शरप्पो भक्तवत्सल । क्या ये कमी अपने इम फुफरे भायोंको मी याद करते ११॥९॥ में शत्रुओंके बीच घिरकर शोकाकुल हो यी है। पैतृप्यसेपान् मरति राममाम्पुरषणः ॥९॥ | मेरी यही दशा , वैसे कोई हरिनी मेगियोंके बीमें पर गयी हो । मेरे बच्चे मिना पापके हो गये हैं। क्या सापसमध्ये शान्ती पत्रणो हरिणीमिव । हमारे श्रीकृष्ण कमी यहाँ माकर मुसफो वीर इन कनाम बालकोंको सान्त्वना देंगे " ॥१०॥ (श्रीकृष्णको जपने सान्त्वपिप्पति मां पापैः पिटहीनामबालकान्।१०। | सामने समझाकर कुत्ती करने लगी-) सचिदानन्दसरूप भीकृष्ण ! तुम महायोगी हो, विश्वास हो और तुम सारे फष्ण कण महायोगिन् विपात्मन् विषभावन । | विपके गीवनदाता हो । गोविन्द ! अपने बच्चोंके साथ दस-पर-दुःस मोग ही है। तुम्हारी शरणमें वायी है। प्रपा पाहि गोविन्द शिश्चभिवापसीदसीम् ॥११॥ | मेरी रक्षा करो । मेरे बचोंको यचायो ॥ ११॥ मेरे मीण ! या ससार मृत्युमय है और तुमारे करण नान्पचव पदाम्मोत्यात् पश्यामि भरण नृणाम् । | मोम देनेवाले है। में देखती है कि जो मोग इस संसार से सरे पुए, ठमके लिये तुम्हारे परमकमा के अतिरिक बिम्पा मृत्युसंसारादीपरस्सापपर्गियस् ॥१२॥ जोर कोई मण और कोई सहाय महा है ।। १२ ।। श्रीक्षण ! तुम मापाके देशसे रहित परम पुरा हो । नमः रुप्माप शुदाय प्रमणे परमात्मने । तुम सर्प परम्स परमारमा ।। समस्त सापनों, ।

अ०४९] दशम स्कन्ध ४३३ योगेधराप योगाय त्वामहं शरणं गवा ॥१३॥ योगें गौर उपार्योंके सामी हो तथा स्वय योग भी हो । श्रीकृष्ण ! मैं तुम्हारी शरणमें मापी है। तुम मेरी रक्षा फरो ॥१३॥ मीमुक उपाय भीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित । तुम्हारी पर दादी कुन्ती इस प्रकार अपने सगे-सम्बन्धियों और मन्तमें इत्यनुस्मृस्य स्वपन कण घ अगदीश्वरम् । जगदीघर भगवान् श्रीकृष्णको स्मरण करके अस्पम्त दुखित हो गयी वौर फफक मापककर रोने भी ॥१९॥ पारद दामिता राजन् भवता प्रपितामही ॥१४॥ परमी और विदुरनी दोनों ही मुख और तु सको समान रहिसे देखते थे। दोनों पक्षसी महास्मानाने कुन्तीको उसके पुर्षोके मम्मदाता धर्म, वायु धादि समदुरस्कमुस्खोऽरो विदुरम महायशाः। देवतामोंकी याद दिलायी भौर यह कहकर कि, तुम्हारे पुत्र मधर्मका नाश करनेके लिये ही पैदा हुए है, पात कुछ समझाया-गुमाया और सान्त्वना दी ॥१५|| भरमी सान्स्पयामासान्ती सत्पुत्रोत्पचिहेतुभिः ॥१५॥ बम मथुरा गगने धगे, तव रामा पतराष्ट्रके पास माये । वस्तक यह स्पष्ट हो गया था कि रागा अपने पुत्रोंका यासन् राबानमम्पेस्य विपमं पुत्रलालसम् । पक्षपात करते हैं और मतीनोंक साप वपन पुत्रोंका-सा बाप नहीं करते । भव वनीने कौरवोंकी मरी सभामें भीकृष्ण और बनाममी भाविका हितयितासे मरा सन्देश अपदद सुरा मध्ये पन्धुमिः सौरदोदितम् ॥१६॥1 का सनाया ॥ १६ ॥ र उपाय माजीने कहा-महाराज प्रतयष्टमी ! आप कुरुशियों की उम्बल कीर्तिको और भी बनाइये । भो भो वैचित्रवीर्य स्वं करूणां कीर्तिवर्षन । भापको यह काम विशेहपसे इसलिये भी करना चाहिये किमपने भाई पाक परक सिधार बनेर बम मावर्षपरते पाणाषघुनाऽऽसनमास्सितः ॥१७॥ पाप सम्पसिंहासनक अधिकारी हुए हैं ॥ १७ ॥ आप धर्मसे पपीका पाख्न कीनिये । अपने सापहारसे धर्मेण पालकन्नुपी प्रणा शीलेन रखपन् । प्रनाको प्रसम रखिये मोर वपने खगोंक साप समान बर्ताव कीमिपे । एसा कामेसे ही मापको टोक यश वर्तमान सम म्वेषु अमा कीर्तिमवाप्स्यसि ॥१८॥ और परलोकमें सद्गति प्राप्त होने ॥ १८ ॥ यदि आप इसके विपरीत माचरण करेंगे तो इस त्येस्में भापकी मन्पपा वापरलोके गर्हितो पास्पसे तमः | निम्दा होगी और मरमक या बापको नरकमें जाना पोगा। इसडिपे अपने पुत्रों और पापमयोंकि माय तसाद ममत्वे पर्वख पाण्टवेवात्मजेषु ॥१९॥ समानताका बर्ताव कीनिये ॥ १० ॥ नाप जानते ही है कि इस ममारमें कभी कही को किसीके साप सा नेह पास्यन्तमवासः कर्दिचित् फेनचित् सा। मही रह सकता । प्रिनसे डोए, सनसे एक दिन श्रीमहागवत [.१८ सर्वान् ददाति महदो मवमोऽभिकामा मान करनेाले प्रेमी मजकी समस्त अमिमवार पूर्व कार से है। यतिक कि जिसकी कभी शनि के मात्मानमप्युपषमापचमौ न यस्य ।।२६।। कृमि नहीं होतीनो एकरस है, अपने उस बात मी साप दान कर देते है ॥ २६ ॥ मोके । हिएषा मनाईन भवानितन प्रवीतो मिट्यनेपाले और जन्म-मृत्युके मन्धनसे उसने प्रमो ! यदेबो योगिरान और दमान मी गाने योगेधरैरपि दुरापगतिः सुरेश । स्वरूपको नहीं जान सकते । परम्स हमें आपका साधार दर्शन हो गया, यह कितने सौमाम्पकी बात है। प्रमो' छिन्म्याशु नः सुतकलाधनाप्तह हम की, पुत्र, धन, खजन, गेह और देह धादिक | मोहकी रस्सीसे हुए वश्य ही यह काम मायाका सेन है। नाप स्पा करके इस गाळे मनसे दशादिमोहरमना मवदीपमायाम् ॥२७॥ (शीघ्र काट दीमिये ।। २७ ॥ मोसुक उवाच मीशुकदेवजी कहते हैं-पक्षित । इस प्रकार इत्पर्षित संस्तुवम भकेन भगवान् हरिः । मप्य वारजीने भगवान् श्रीकृष्णको एमा और पर की । इसके बाद भगवान् मीरुमने मुसकराकर बार आरं सस्मिते प्राह गीर्भिी सम्मोहयमिव ॥२८॥ | मधुर वाणीसे उनै मानो मोहित करते हुए कहा ॥२८॥ मीभगवानुवाच भगषाम् भीकम्पने कदा-तात बाप हमा गुरु-शिवोपदेशक और चाचा है। हमारे शर्म अत्पन्न स्पेनो गुरु पिसम्पपलायोमन्ध निस्पदा । प्रसंसनोस तपा हमारे सदाके तीसोबा वक और सदा ही मापकी रखा, पान वीरमा पपसरल्पा पोप्याथ अनुकम्पा माहिए॥२९॥ पार ॥२०॥ अपना परम पाण चाहनेकाले मनुष्य को वाप-जैसे परम पूक्मीय वीर महासम्पपान रखें भवरिया महाभागा लपेष्पा सिचमाः सर्वदा सेना करनी चाहिये । पाप-पैसे संत देसाई भेपस्कामैनूभिनिस्पं देवा स्वार्या नसावा ॥३०}} मी सर स्पोंकि देसामि तो साता। परन्त सतमि मही ॥ ३०॥ के नछके सीप (मई नसम्मयानि शीर्थानि नदेवा मृच्छिलामया । सरोकर लादि)ी सी नहीं है, केस पत्रिका (शिन बारिकी बनी ई मर्निया ही देवता नहीं । वे पुनन्स्पुरुक्मलेन दसनादेश साव ॥३१॥ बाबाजी ! उनकी तो गत दिनातक मासे सेपा। बाप, तब मे पवित्र करते है। परन्तु साप । बाने हशनमात्रसे पवित्र कर देते है ॥३१॥ बापानी स भवान मुरदापना भपापविकीर्पया। आप हमारे दिवेषी पदमि सर्वये । इसलिपे का प्राणोकर हित करने के लिये तथा उनका मुला- शिप्रासापाणयानो गछस्व स्वेगमाइयम् ।।३२॥ जानने के लिये हस्तिनापुर आइपे ॥ ३२ ॥ हमने रे सुना है कि राना पाणके मर जामेपर अपनी मान पिवर्षपरस पाता सा पाया मुद स्लिवार । the माय परिप्रि म पाणाकोसमें व अ०४९] दशम स्कन्ध ४३१ [-समान म्पकार जानीसाः स्वपुरं राजा वसन्त इति शुभ्रम ॥३३॥ गये थे ! वा राना धृतराष्ट्र उन्हें अपनी राभधानी हसिनापुरमें ले आये हैं और वे वहाँ रहते हैं ॥३३॥ वेषु राजाम्बिकापुत्रो भ्रात्पुत्रेषु दीनधीः । आप जानते ही है कि रामा धृतराष्ट्र एक तो अंधे है और दूसरे उनमें मनोबलकी भी कमी है । उमका पुत्र समो न वर्तते नून दुपुत्रवनगोऽन्धरा ॥३४॥ दुर्योधन बहुत दुष्ट है वोर उसके अधीन होने के कारण वे पाणोंके साप अपने पुत्रों जैसा- गच्छ बानीहि तवपतमधुना साधमाधु वा । नहीं कर पाते ॥ ३१ ॥ इसपिये भाप यहाँ जाइये और मालम कीनिये कि उनकी स्थिति नही है या पुरी। विनाप तद् विघास्यामो यथाशं मुददा भवेत् ॥३५॥ आपके शारा उनका समाचार जानकर मैं एसा उपाय काँगा, निससे उन मदोंको मुख मिरल ॥३५॥ सत्रशक्तिमान् इस्मकरं समादिश्म भगवान् हरिरीश्वरः । भगवान् श्रीकृष्ण पकरबीको इस प्रकार आदेश देकर बमामजी और उसममीके साप हाँसे अपने घर सहर्पनोखाम्यां पे ततः स्वभवनं ययौ ॥३६॥ लौट खाये ॥ २६ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहस्यो संहितायो दशमस्कन्धे पूर्वाध भरचवारिंशोऽप्यप ॥ १८ ॥ । अथैकोनपञ्चाशचमोऽध्याय भाद्रजीका हस्तिमापुर सामा भीसेक उवाप । श्रीशुफ्वेषजी कहते हैं—परीक्षित् ! मगवान्के बाहानुसार आकरनी हस्तिनापुर गये । वहाँकी एक-एक स गत्वा हास्तिनपुर पौरपेन्द्रयशोऽङ्गितम् । बसपर पुरणशी नरपनियोंकी अमरकीर्तिकी छप ज्ग रही है। वे वहाँ पहले घराष्ट्र, मीष्म, बिदुर, फुत्ती, ददर्श सत्राम्बिकेयं सभीष्मं विरं प्रधाम् ॥ १॥ बहोक और उनके पुत्र सोमात, गोणाचाय, याचाप, दुर्योधन, द्रोणपुत्र भयरमामा, मुविष्ठिर मादि पागों सापुर्व घ वाहीकं भारद्वाज सगौतमम् । पाण तथा मन्पाम्य इस मित्रोंसे मिले ॥१२॥ जब गान्दिनीनम्दन बहाना सब इप-मित्रों और सम्परिभोसे कम्प मुयाधनं द्राणि पाण्डवान् सुरदोऽपरान् ॥ २॥ मलोमोति मिल चुके, तब उनसे उन रोगोंने अपने मयुरावासी म्बजन-सम्बन्धिोकी युमात्र सम पूष्ठी । उनका पथावदुपसंगम्प पधुभिर्गान्दिनीसुत । उपर देकर मारनीने भी हस्तिनापुरवासियों पुरान- महलके सम्बन्धमें पूछताछ की ॥२॥ परीक्षित् ! बननी सम्पृष्टम् मुरदातो म्वर्य पापच्छदव्ययम् ।। ३ ॥ जाननके लिये कि, पृतराष्ट्र पाण्डयोंके साप पैसा म्पहार करते हैं, कुछ महीनोंतक ही रह । सच पूसो उवास गतिपिमामान् राम्रो प्रविवित्मया । तो धृतराष्ट्रमें अपने दुए पुोंकी इसके विपरीन पुस भी करनेका साहस न पा ' में कुनि आरि दुणे की प्रधम्पासमारम्प स्वरच्छन्दानुवर्तिन ॥ ४॥ मगहके अनुसार ही काम करते 4 ॥ १ ॥ २ म्परप ।२ पारम्परिपाप ।। पीस। - ४३२ श्रीमद्भागवत [२०४९ - वेज बोजो पलं पीय प्रश्रयादींप सद्गुणान् । भक्रनीको कुत्ती जोर विदुरने यह बतलाया कि प्रत्या छपके दुर्योधन भादि पाण्डवोंके प्रभाव, शसकौशल, का, प्रमानुरगं पार्वेषु न सहदिमिकीर्पितम् ॥ ५॥ वीरता तथा क्मिय आदि सद्गुण देख-देखकर उनसे बरते हते हैं। नब ये य देते है कि प्रना पास ही विशेष प्रेम रखती है, सब तो वे और भी मि माते कु च धाराष्ट्रैर्य गरदानायपेशलम् । हैं और पाणयोंका पनिट करनेपर उतारू हो जाते है। घबतक दुर्योक्न बादि घृतराष्ट्र के पुत्रोंने पाण्यास बायस्पो सर्वमेवास्मै प्रपा विदुर एव च ॥६॥ धागे भी बहुत कुछ करना चाहते हैं ॥५६॥ मार विदान बादि मात-से अत्याचार किये है पृषा तु मातरं प्राप्तमधरमपरस्प वम् । जब वक्ररनी कुस्तीके घर वाये, तब क वप उवाच जमनिलयं मरन्त्यनुरुलेषणा ॥७॥ माईके पास जा पेय । मननीको देखकर कुन्तीके मन वपने मायकेकी स्मृति जग गयी और नेमि र म माये । उन्होंने कहा--॥७॥ प्यारे माई ! क्या कम अपि मरन्ति न सौम्प पितरौ मातरम मे । | मेरे मां-बाप, भाई-बहिन, भतीजे, पुरकी सियों को ससी-सहेमियों मेरी याद करती है।॥८॥ मने मना । भगिन्यो भ्रासपुत्राय बामपः सम्म्य एष प ॥८॥ कि हमारे मतीचे भगवान् भीषण और कम्मर वलराम बरे ही मकरसल वीर शरणागत-क्षक है। प्रात्रेयो भगवान् कपणः भरम्पो भक्तवत्सलः। क्या ये कमी वपने इम फुफेरे भाइयोंकी मी याद करते हैं।॥९॥ में शत्रुओंके बीच घिरकर शोकाकुल हो सकी है। पैठपसेपान सरति रामपाम्पुरोक्षण ॥९॥ मेरी श्री है, जैसे कोई हरिनी भेशियों के बीच पर गयी हो । मेरे बच्चे बिना बापके हो गये हैं। क्या सापसमम्मे शोचन्ती पफामा हरिणीमिव । हमारे श्रीकृष्ण कमी यहाँ माकर मुनको और इन कनाप बालकोको सान्त्वना देंगे ॥१०॥ (श्रीकृष्णको अपने सान्त्वयिप्पति मां वाक्पैः पितहीनांथपालकान्।१०। साम्ने समाकर कुत्ती कहने उगी-) सचिनन्दसरूप श्रीकृष्ण ! तुम महापोगी हो, विचारमा हो वौर तुम सारे फण रुग्ण महामोगिन् विपात्मन् विश्वभावन । विषके बीवनाता हो । गोविन्द । वपने बचोंके साप द स्व-पर-दुःस मोग रही हूँ। मुम्हारी हरणमें भारी ।। प्रपा पाहि गोविन्द शिशुभिधावसीदतीम् ॥११॥ मेरी रक्षा करो । मेरे मोंको बचायो ॥ ११ ॥ मेरे श्रीकृष्ण ! या सप्तार मृत्युमय और तुम्हारे बरण नान्पचव पदाम्भोजात् पश्यामि क्षरण नृणाम् । मोक्ष देनेवाले हैं। में देखनी कि गोलोग इस संसार से बरे हुए हैं, उनके लिये तुम्हारे चरणका मतिरिक बिम्पो मृत्युसंसारादीपरस्पापवर्गिकात् ॥१२॥ वोर को शरण और कोई सहाय नहीं है ॥ १२ ॥ श्रीकृष्ण ! तुम मायाके से रहित परम शुद्ध हो। नम रुप्माय शुदाय प्रमण परमात्मने । तुम सर्प परम परमात्म्य हो । समस्त साधनों, १ गित सारमन् विपाथर।

म०४९] दशम स्फन्म ४३३ गोगेपमाप योगाम त्यामई शरणं गता ॥१३॥ योण और सपापोंके स्वामी हो तया सय योग भी हो । श्रीकण ! मैं तुमारी शरणमें मापी है। तुम मेरी रक्षा करो॥ १३ ॥ भीक उपाय भीशुकदेवजी करते हैं परीक्षित ! तुम्हारी पर दादी कुन्ती इस प्रकार वपमे सगे सम्बन्धियों और जन्तम इत्पनुस्मृत्य स्वमन रुष्णं नगदीपरम् । जगदीपर भगवान् श्रीकृष्णको स्मरण करके वक्त दुसित हो गयी और फफक-फफकर रोने लगी ॥१९॥ धारदा हालिवा राजन् ममता प्रपितामही ॥१४॥ ममी वीर बिदुरली दोनों ही पुस और तु सको समान रशिसे देखते थे। दोनों यशसी महास्मानाने कुन्तीको उसके पुत्रोंके जन्मदाता भम, वायु भादि समदुःखमुस्लोफ्रो विदुरम महायशाः । देवतागोंकी याद दिनपी और यह कहकर कि, तुम्हारे पुत्र मधर्मका माश करनेके लिये ही पैदा हुए बात कुछ समझाया-गुमाया और साम्वना दी ॥१५॥ मनमी सान्त्वपामासान्ती तत्पुत्रोत्पधिहेतुभिः ॥१५॥ मम मथुरा जाने भगे, तव रामा पृतराष्ट्रके पास आये। भसक यह स्पष्ट हो गया था कि रामा अपने पुत्रोकर यासन् रामानमम्मेस्य विपर्म पुत्रलालसम् । पक्षपात करते है और मतीकि साप अपन पुत्रोंका-सा बर्ताव नहीं करते। पर वनीने कोरमोंकी मी समामें श्रीकृष्ण और वष्ाममी बादिका हितरित्यसे भरा सन्देश अवद सादा मध्ये पुमिः सौहदोदिसम् ।।१६।। । कर मनापा ॥ १६ ॥ भारजीने कहा-महाराम पृतराष्ट्रमी । बाप पुरुषशिपोंकी सम्पछ कीर्तिको और भी बनाइये । भो भो वैविप्रवीर्य तरुणां कीर्तिवर्धन । पापको यह काम विशेषरूपसे इमलिये मी करना चाहिये कि अपने माई पाणुक महक सिधार मानेर बम पाहापधुनाऽऽमनमाम्पितः ॥१७॥ बाप राम्पसिंहासना अधिकारी हुए हैं ॥ १७ ॥ माप धर्मसे प्रपीका पान कीजिये। अपने सापपदारसे धर्मेम पालपन्नुपी प्रवा शीलेन रजपन् । प्रमाको प्रसम रसिये भार भरने नगोंके साय मान बपि कीजिये । ऐसा मानसेनापको येक पश वर्तमानः सम मेप भयः कीर्तिमवाप्समि ॥१८॥ गौर परोफमें सद्गति प्राप्त मार्ग ॥ १८॥ परिवार इसके विपरीत माचरण करेंगे तो इस लोकमें भापकी मन्मथा स्वापरलोके गहिवा पास्पसे समः । मिन्दा होगी और मरनके 4 आपको मरको जामा पड़गा । मधिये अपने पुत्रों और पायोक माय तसात् समत्वे पर्वम्य पाणवेधारमधेपु प ॥१९॥ सम्पनत्यका बर्ताव कोरिये ॥ १० ॥ बाप मानते ही किस ममार को कहीं को किसीक साप मग नेह पास्यन्तमपास करिचित फेनपिन् मह। महीरा मा । जिनमे हा दर हैं, उनसे पक कम - बकर उवाच प्रावयुपरसे ४३४ भीमसागपत [२०४९ रामन् स्फेनापि देहेन किन चापात्मनादिभिः॥२०॥ विठुरना पड़ेगा ही। ग्रमन् ! या पात भपने शीले 1 लिये मी सोनों भाने सत्प है। फिर सी, पुत्र, पन वादि छोस्कर याना पडेगा, इसके विषयमें तो करना एक: अस्पते अन्सुरेफ एन प्रलीयते । ही क्या है ॥ २०॥ जीव केगी पैदा होता है और मकेला ही मरकर जाता है । वपनी करनी परनी- एकोऽनुसरे मुहतमेक एव च दुष्कृतम् ॥२१॥ का, पाप-पुष्पका फस मी पण ही मुगवता है ॥२१॥ मिन बी-पु!को हम अपना समझते है,वे ते हम अधर्मोपचित विर्स परन्त्यन्मेऽत्पमेधसः। तुम्हारे अपने है, हमारा मरण-पोषण करना हमारा धर्म है-इस प्रकारकी बातें बनाकर मूर्स प्राणीके पर्मस इकट्ठे किये गए धमको बटते है, वैसे यरूमें बने सम्मोमनीयापदेलानीव अलौकसः॥२२॥ पाले मन्तुओंक समस मळको उनके सम्बन्धी बाट | बावे k ॥२२॥ या मूर्स मीब निर्ने अपना समझकर नधर्म करके भी पाळता-पोसा है, वे ही प्राण, पन पुष्णावि पानभर्मेण स्वपुरचा वमपमिसम् । और पुत्र बादि इस जीवको बसम्र श्रेषकर ही पले जाते है ॥ २३ ।। नो अपने धर्मसे विमुख तेवाय प्रहियन्ति प्राणा रायः मुवादयः ॥२२॥ | पम्पेि, तो वह अपना मेकिक स्वार्थ भी नहीं मानता । मिनके लिये वा अधर्म करता है, तो उसे क्षेपही वर्ष किल्विपमादाम वैस्त्मक्को नार्थकोविदः। देंगे, उसे कमी सन्तोषका अनुमब भ होगा और यह अपने पापोंकी गठरी सिरपर मदकर स्स्य धोर मस्कने चापगा ॥ २१ ॥ इसलिये महारान ! या मात समा अमिद्धार्थो विशत्पन्धं स्वधर्मविश्वस्तमः ॥२४॥ मजिये कि या दुनिया चार दिनकी चोदनी है, सपने का सिलवार, नाका तमाशा है और है ममोप- तसालोकमिमं राजन् स्वममायामनारथम् । मात्र ! आप अपने प्रयासे, वपनी शकिसे विको रोकिये ममतामश पक्षपात न कीजिये । प समर्थ 11, समत्वमें स्थित हो माइपे और इस ससारकी बारसे पीस्पायम्यात्मनाऽऽस्मानं समासान्तो भय प्रभा|२५|| उपराम-शान्त हो बाइय ॥ २५ ॥ रामा तराष्ट्र ने कहा- दानपते भरपी ! लाप मेरे कल्पाणकी ममेकी बात कह रहे हैं। वैसे मरने- यथा पदवि कल्याणी वार्य दानपते भवान् । पालेको बमूत मिल नाय तो इसससे तृप्त नहीं हो सफ्ता वैसे ही में मी वापकी इन पातसे दस मही सथानयान हप्यामि मर्त्यः प्राप्प ययामृतम् ॥२६॥ हो रहा है ॥ २६ ॥ फिर मी हमारे रितपी करनी मेरे पास विच यापकी या प्रिय शिक्षा तनिक मी नहीं ठहर रही है, क्योंकि मेरा हदय पुत्री ममताके तपापि एनृता मौम्य रदिन सीपत पले । कारण अत्यन्त विषम हो गया है। नेसे स्फरिक पर्वतके | शिसरपर एक बार निमी कौंधती है और दूसरे ही पुत्रानुरागविपम विपुत् सौदामनी पथा ॥२७॥ क्षण वरतर्धान हो जाती है, वही दमा भापके उपदेशों- प्रप्तराष्ट्र उपाय ।

३. ४९] दशम स्कन्ध ४३५ ईमरस विधि को नु विधुनोत्पन्पया पुमान् । की है।॥ २७ ॥ अकरजी ! सुना है कि सर्पशछिमान् मग्मान् पृथ्वीका मार उतारने के लिये यदुकुलमें अवतीर्ण भूमारवताराय योऽवती! पदो फुले ॥२८॥ हुए हैं। ऐसा कौन पुरुष है, जो उनके विधानमें उलट फेर कर सके । उनकी जैसी होगी, वही होगा।॥२८॥ यो दुर्निमर्शपथया निबमाययेदं भगवान्की मायाका मार्ग भविन्स्प है। उसी मायाके द्वारा इस संसारकी सष्टि करके वे इसमें प्रवेश करते है सन गुपान विभजते सदनुप्रषिष्ट । और कर्म तपा कर्मफसोका विमाजम कर देते हैं। इस तस्मै नमो दुरवषोधविहारतन्त्र संसार पनकी बेरोकटोक वालमें उनकी अधिस्य भीम- शकिके गतिरिक बौर कोई कारण नहीं है। मैं उन्हीं समारचक्रगतये परमे परस्य ॥२९॥ परमैश्चर्यशास्मी प्रमुको ममस्कार करता हूँ ॥ २९ ॥ मीशुक उवाच भीशुकदेषजी कहते हैं-स प्रकार बनी इत्यभिप्रेत्य नृपवेरमिप्रापं स यादन । महाराज भूतराष्ट्रका वमिप्राय नामकर और कुरुवंशी समन- सम्बन्धिोंसे प्रेमपूर्वक अनुमति लेकर मथुरा मोट माद्रि समनुपातः पुनर्यदपूरीमगात् ॥३०॥ घाये ॥ ३० ॥ परीक्षित् ! उन्होंने यहाँ मगवान् श्रीकृष्ण और क्लामजीके सामने पृतराष्ट्रका का सारा म्यवहार शक्षस रामकृष्णाम्यां धृतराष्ट्रविषेष्टितम् । माग, जो वे पाण्डयोंके साप करते थे, कह सुनाया। क्योंकि समको हस्तिनापुर भेजनेका मास्तमें उदेश्य भी पाणवाल प्रति फोरम्प यदर्थ प्रेपितः स्वयम् ॥३१॥ यही पा ॥ ३१ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे यासियामध्यदशसाहस्यां पारमाईस्था संहिताया दशमस्कन्धे पूर्षि एकोनपश्चाशवमोऽध्याय ॥ १९ ॥ ममाप्तमिद दशमस्कन्धस्य पूर्वार्दम् मीरप्णार्पणमस्तु १ एमपणे एपोन ।

by ...19

भीराधाकृष्णम्पो ममा
श्रीमद्भागवतमहापुराणम्
दशमः स्कन्छ
( उत्तरार्द)
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गन्धानाऽग्गिनि पापिहारा दागानी गन ।
रनवागारपुना पान मापनम मनमम ।।
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दोनोमि मसार ग्रहण किया ॥१४॥मर मयदर अनि पुमकर शापक्षकी सेनाकबीरोंकाय कि मार परो उठा। उन देखकर मगभराज स्यसम्म | यदुशी बापको 1 अपना खामी और रक्षक मामले |,गो वापसे ही सनाप उनपर बहुत पी सिदि प्यारे भायुष मूळ मी जा चे॥१३॥ | भार नए कीजिये । भगवान श्रीकृष्ण और रामजी होकर मथुरासे निकले । उस समय दोनों भाजपने | पा दारक । पुरीसे बाहर निकबर सम्हाने बरवा ४४० श्रीमद्भागवत [२०५० अक्षौहिणीमि सम्मान भटाश्वरथाइमरैः। पास आ पहुंचा है। में इसका माश फरगा। पर मागपस्तु नहन्तम्यो भूयः फर्ता फ्लोपमम् ॥८॥ ममी मायब सरासन्धको नहीं मारमा चाहिये। यह बीक्ति रहेगा तो फिरसे कमरोंकी पास से एतदर्थोऽवतारोऽयं भूमारहरमाय मे। इकड़ी कर छायेगा ॥ ७-८॥ मेरे यार की प्रयोजन है कि में पृथ्वीका बोच इस्का कर , मा संरक्षणाम सानो सतोऽन्येषां धाय च ॥ ९॥ मप्रमोंकी रक्षा कह और दुष्ट-दुर्जनों का संहार ॥ ९.. अन्योऽपि धर्मरक्षायै देहः संम्रियते मया । समय-समयपर पर्म-रक्षाके किये और मार रोकनेके लिये में और भी ममेकों शरीर प्राम करत विरामापाप्मधर्मस्प काले प्रभषत कचित् ॥१०॥ ॥१०॥ एवं ध्यायति गोविन्द वापश्चात् धर्मवर्चसौ । परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार विचार हो रहे पे कि आकाशसे सूर्यके समान मनको र रप मा पाँचे । उनमें युद्धकी सारी साममिमा समय रथाएपरिखसौ सयः समतो सपरिच्छदौ ॥११॥ या और दो सारथी में हाँक खे थे ॥ ११ ॥ समप भगवान्के दिम्य और सनातन भामुष मी बर्ष आयुधानि च दिष्पानि पुराणानि परछया । जाप कहाँ पाकर उपस्थित हो गये । मने देखकर मग एन तानि पीफेनः सार्पणमयावधीत् ॥१२॥ माईगी । आप को शक्तिशाली है ! इस समय में श्रीकृष्णने अपने बड़े माई मलामनीसे करा--1॥१२ पक्ष्यार्य व्यसन प्राप्तुं पदनां त्वावतां प्रभो । एप वे रथ आयातो पितान्पायुधानि च ॥१३॥ ना पड़ी है। देखिये, यह आपका रप है और को मानमास्साप असत म्पमनान् म्वान् ममदर । मब बाप इस रमपर सवार होकर शव-सेनाका सार कोनिय और अपने मजमोंको इस विपत्तिस बनाइये । एतदर्भ हि नी जम माधूनामीश धर्मरुत् ॥१४॥ मगन् ! सापुओंका पम्याण करने के लिये ही हर अयोविंशत्पनीकारम भूमे रमपाकुरु । आप पह येस बक्षौहिणी सेना, प्रणीका पार एष सम्मनय दाशार्हा दंशिवी रचिनौ पुरात् ॥१५॥ पा सणह करके कवच धारण किये भोर पर सकर निजामत म्यायुभायौ मलेनापीपसागावो । अपने भापुध लिये ए थे मोर छोटी-सी सेना मो साथ-साथ कर दी थी । भीष्मका रस हाँकन - अ०५०] दशम स्कन्ध ४४१ शावाद मागमो वीक्ष्य ह कृष्ण पुरुषाधम ॥१७॥ ने कहा-पुरुषाधम ग ! सो अभी निरा यया है। ओसे सरे साथ एनेमें मुचे साज लग रही है। न स्त्रया योद्बुमिन्छामि पालेनफेन लसपा । | इतने दिनोंकन बाने कहाँ कहाँ छिपा फिरता था। और मन्द ! तो अपने मामाका हत्याग है । इसग्यि गुमन हि स्त्रया मन्द न पोरस्य याहि पन्युरन् ॥१८॥ में सेरे साप नहीं लड़ मला ना, मेरे समनेसे माग मा ॥ १७-१८॥ बलराम | परि तेरे पित्तमै यह तब राम यदि श्रद्धा युभ्यम्व धैर्यमुद्रा । सदा हो कि युदमें मानेर स्वग मिला है सात आ, हिम्मत गाँधकर मुमसे एप। मेरे यागोंसे छिम-मिल हित्यापा मन्छरश्छिन्न देह स्थर्याहि मां बहि ॥१९॥ हुए शरीरफो यहाँ प्रेकर म्वर्गम जा अथवा यदि तुममें शक्ति हो तो मुझे ही मार डास' ॥ १० ॥ भीभगवानुपाप भगयान् धारणने कहा-पग पगम ! जो नीर होते है, ये तुम्हारी तरह टींग नहीं हायमे, पता अपना नब शूरा विकन्यन्ते दर्शयन्त्येव पौरुपम् । बार पौरूप दी Pखगते हैं। दोन्गे, अब तुम्हारी मृत्यु तुम्हारे मिपर माच रही है। तुम मे ही अबर पर न गृहीमो पो राजमातुरस्य मुमूर्पत ॥२०॥ रहे हो, जैमे मानेके ममय र मनिशानका गगी पर । कालो, में मुम्हारी यातपर प्यान नहीं पता || २०॥ भीमुक उपाय श्रीगुरुवयमी कहत है-पर्गभित ! जमे यायु नरामुतम्तायभिमृत्य माधवी मारमोमे सूया और धूमे भागया - नी है, महापसीपन परोपमाऽऽणोत् । किन्तु बाम्नव य ढमते नहीं, ठगार प्रमश ति पाटाही ६ मे ही मगधराज जगमधन मगयान ममन्ययानवजवानिमारधी श्रीक्षण और पगम स्तमन आकर अपनी यदन यरी पश्यन् और अपर मेनाक दाग ठडे मागे ओग्मे पूनिली मायुरिवाम्ररेणुभि ॥२॥ घेर लिया-पोता पिटना मेना, रस पता, पाने मुपर्णनालवजचिद्धिती और मारपियों का पता भी गया ॥२ शाम पुगपुरी- स्था पारियों भरन मगरी प्रटारियों को भार पागार पलमपन्या हरिरामपामधे। माम युदरा फानुर में । जब ग्नान दाम शिप पुगवान्कादम्पगापूर रिपुदभूमिमें मपन् पाणी गरम्मानि भार पग्रामडीसी मानिटम निरिमा ममाथिता मममह गुपादिता ||२२|| गौ तर य RExam मnि 2 ॥ हरि परानीफपयामुचा मुह जब भगान् श्रीरान दमेना-rh मेर म प्रार पर माना शिलीमापापनापपपीडितम् । मगा पनी अननिरrr में ममन्यमानगप गुरामुगमित हा मेना टगम जपन 3. -R प्परमपन्छारामनानमम् ॥३॥ मदिर न irr103॥

शूरशिरोमपि भीकृष्ण नमो भगवते वामुन्माप श्रीमद्भागवतमहापुराणम् दशमः स्कन्धः (उत्तरार्घः) अथ पञ्चाशत्तमोऽध्याय सगसम्पसे युर भोर मारकापुरीका निमाण श्रीशुक उवाच भीगुकदेयमी पाहत ई-भरतवंशशिरोमणि परीशिस्! अन्ति प्राप्तिम फैमस मदिप्या भरतर्षभ । सफीदा रानियों थी अस्ति और प्राति । पतिकी मृत्युसे उन्हें पड़ा दुम्ब मुभा भार वे अपने पिताकी पनधानीमें मुवे भर्तरि दुःस्वार्वे ईयतु स पितुहान् ॥ १ ॥ चली गयीं ॥१॥ उन दोनोंका पिता या मगधरान पिने मगधराजाय नरामंधाय दुःस्विते । जरासन्ध । उससे उम्होंन बो दुखके साप अपने विधवा हानेके कारणोंपर वर्गन किया ॥२॥ परीचित्! पेदपावतु सर्वमात्मबंधष्पकारणम् ॥२॥ पह अप्रिय समाचार सुनकर पहले तो रासन्धका बड़ा स वदप्रियमाकर्ण्य शोकामर्पयतो नृप । शोक दुखा, परन्तु पीछ बइ कापसे नियमित उठा । अयादी मही फतु पर्ने परमम्पमम् ॥ ३॥ उमने यह निश्चय फरके कि, मैं गृप्तीपर एक भी पर मयौहिणीमिविशत्या तिमृभिप्रापि मपृतः । पशी नहा रहनदूंगा, पुरकी बहुत मदीसपार्य की ॥२॥ और सेमि मधौदिगी सेनाय माप यशिर्पोफी गज- पदराजधानी मयुरी न्यरुण मनतोदिशम् ॥ ४ ॥ घानी मथुराको चारों भारसे पर रिया ॥ ४ ॥ निरीय सदल स्प्ण उपलमिय मागरम् । भगवान् श्रीकृष्णन दम्ग- -राम की मेना क्या द, उमामा पुआ समुद्रदोने पर भी गमा म्पपुरं तन मन्द बजन घ भयाकुलम् ॥ ५॥ उमने पारों आरमे दमारी गमशनी पE ! मार मजन तसा पुग्वामी भपात दार॥५॥ मिन्नयामाम भगयान हरि फारणमानुप । भगान् श्रीीय पपीर भार उतारना यही मनुष्य पा-मा र धारण रिपे पुर। प उग्दोंन पिर किया कि मरे आगरका या प्रयाग्नाम तनगनुगुण पारवारप्रयाजनम् ॥ ६॥ ममप म मानस मुल ग पाना परिय॥६॥ उन्होंने माया पर वापस किन निप्पामि पल पना भवि भारं समादिनम् । समापन भनि मानिय, पुरमार, वीमि पुरा गरी म्मा इन्ही पागपन ममानीत पाना मरमसयाम् ॥ ७॥ Fit IE fire Fign मरे पार ४४० भीमद्भागवत [३०५. अधौहिणीभिः सख्या भटावरपरैः। पास ना पापा। में इसका ना करुंगा। पस्त मागमस्तु न हन्तव्यो भूयः फर्ता पठोपमम् ॥ ८॥ मी मगधराण वरासन्धको नहीं मारमा चाहिये। क्योंकि यह मीवित रहेगा तो फिरसे अमकी बहुत-सी से एकवर्षोऽसतारोऽयं मूभारारमाय मे । इकही कर अयेगा ॥७८॥ मेरे मस्तारका की प्रपोमन है कि में पृथ्वीका मोम इस्कार, सप संरक्षणाम सानो सोऽन्येपो भाय च ॥९॥ सन्नोंकी रक्षा कर्मी और दुर-दुर्जनों का संहार ॥ ९॥ मन्मोऽपि धर्मरक्षायै दहः संम्रियते मया । समय-समपपर रिमाके लिये वीर मते हुए वर्मको रोकने के लिये में भोर भी बनेकों शरीर मग काय विरामापाप्मधर्मस्म काले प्रभवतः कचित् ॥१०॥ ॥१०॥ एवं ध्यायति गोबिन्द आमाशात् मर्यवर्चसौ । परीक्षित ! मगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार विचार कर ही रह ये कि आकाशसे सूर्यके समान चमक र रप था पहुँचे । उनमें युखकी सारी सामग्रियों सम्मिद रमाएपस्मिती सघ सस्तो सपरिन्छदौ ॥१२॥ी और दो सारपी उन्हें होक ये मे ॥ ११ ॥ इस समप भावान्के दिम्य और सनातम वायुध भी कामे मायुधानि च दिम्मानि पुराणानि पहष्छया । वाप वहाँ पाकर अपस्थित हो गये। उन्हें देखकर मग पम् भीरणने अपने बड़े माई बत्माममीसे करा- १२॥ एटा तानि पीकेस: सर्पममयापपीत् ॥१२मामी । बाप बरे जिशाम है ! इस समय को पामार्य मसन प्राप्त मदनी स्वार्ता प्रमो। यदुषशी भापको ही अपना सामी वीर रक्षक मानते ₹, जो मापसे ही समाप हैं, उनपर मत पड़ी पिठि एप ते रथ आयाता दयिसान्यायुधानि च ॥१३॥ मा पपी । देखिये, या पापका रव । और आपके प्पारे बायुष हल माल मी मा पनि ॥१५॥ पानमास्पाय जपत म्पसनात सान् समुदर । बब भाप स रपपर सवार होकर शत्रु-सेनाका सहार कीजिये और अपने सानोको इम विपत्तिसे बचाइये । एतद हि नौ बम साधूनामीष्ठ धर्मकत् ॥१४॥ मग सामुमोका कल्याण करनेके लिये ही हम दोनोंने कतार माण किया है ॥१४॥ कर प्रमोशिस्पनीमासमे ममेर्भारमपा। पाप यह स नक्षौहिणी मेना, पृथ्वीका मनिपुण मार नः कीनिये ।' मावान् श्रीकृष्ण और मामयीने एसम्मन्व्य दाशाही स्तिो रयिनौ पुरात् ॥१५॥ पा समह करके कवच धारण किये और रसपर सहम होकर वे ममुरासे निकले । उस समय दोनों माईपने निमग्मतुः वायुधात्मौ सेनाल्सीपसागाती। अपने मायुध पिये ए थे और छोटी-सी सेना के साप-साप पत पी पी । भीमका सहक रहा पा वाहक । पुरीसे बाहर निकालकर उन्होंने अपना शादमी विनिर्गत्य परिवारकासारधिः ॥१६॥ | पाथणम्य स्प जापा ॥ १५१६॥ उनके पकी मपाएर पनि मुनक्त शत्रुपक्षकी सेमाके बोरोका मय ततोऽमूद परसैन्याना रवि वित्रासषेपपुः । गरके मारे पर्य उठा । उन्हें देखकर मगराज परासन्ध - अ०५०] दशम स्कन्ध ४४१ । । वादाद मागधो वीक्ष्य हे काम पुरुषाधम ॥१७॥ ने कहा-'पुरुषाधम कृष्ण ! तू तो अभी निग या है। अकेले तरे साथ एपनमें मुझे मज लग रही है। नन्यया पादुमिच्छामि पालेनफन लगया। इतने दिनोंतक हम जाने कहाँ कहाँ सिमा रिता था । और मन्द ! तो अपने मामा इस्याग है। मठिये गुमन हि त्वया मन न गोत्म्ये माहिप घुइन् ॥१८॥ में तेरे साथ नहीं पा मयता । जा, मरे सामनेसे माग जा॥१७१८॥ मागम ! यरि तरे चित्तमें या तब राम परि अदा युध्यम्य धर्यमुद्रह । श्रदाहा कि युदमें मरनेर म्ग मिटता है तो भा, हिम्मत यो पर मुझसे एक । मरे धागोंमे छिन-भिम दिन्यामा मग्छंश्छिन्नं दई स्वर्याहि मां बदि॥१९॥ हुए शरीरको यहाँ श्रेदर स्वर्ग ना अपया परि तुममें शक्ति हो तो मुम ही मार ढाल' ।। १० ॥ भीभगवानुवाच भगयान् श्रीकृष्णन कदा-मगधरान ! जा पीर होते है, ये तुम्हारी सगर रोग नहीं होंगन यता अपना नपरा विकत्यन्ते दर्शयन्येव पौरपम् । पट-पौरपदी म्यगत है। देणे, अब तुम्गी मृत्यु तुम्हारे मिरर नाच गी है। तुम मे ही अक्बर पर न गृहीमो पचो गजमातुरस्य ममूर्पसः ॥२०॥ रहे हो, जैसे मग्ने ममय कोई ममिगतका गगी कर । मर, में मुमार्ग वातपर ध्यान नाही "ता ॥२०॥ भी उपाय भीगुरुदयी काल-पर्गभिस् ! जमे पयु सामुतम्नायभिमृत्य मापी मागमे म्परा आर घूम अगरा पर एनी t, महापलीयन पर्गयमाऽऽपणोन् । शिस्त याम्नयमें वक्ते नही, उनाय प्राग सिंह पया ही है। मे हा माधराज जगमाने भगवन मर्मन्पयानवजानिमारथी धीक्षण भार पउगमो मामन आया अपनी पहल परी प्रयन् बार अपर मेनाक दाग उम्मगे भाग्मे सूपानली पापुरिवाम्ररेणुभिः ॥२१॥ घर रिय-पोतर पि उनहरी मेना गप पा पागे मुपगनालयवनिहिना और मुरपियों का नाम भी रहा गया॥१॥मयुगपुगे स्था- करिया जान मन की अगम्पों पर यलसपन्यो हरिरामपामृप । पर पुदाय कारगर उदोन er गिय पुगद्वारकाम्पगा रिपुषभूमिमें मापान् भारीगर मनिस्न र यग्नमामि मिपामत ममाभिता ममुमार गुपादिता ||२०|| A TRE म ॥ २० ॥ र परानीरूपामुनो मुटु जब झन् धीरन द-शि-सेनfreen मे मप्रा र पर ग गिरीमुम्मापनापपीग्निम् । C पनी जननिर व ना मन्पमागाप गुगगुगपिन हर्ग मेना मग न TET कर मन प्रणाम प्पपपपपागगनानमम् ॥२३|| मप्र मा । fr.॥

४४२ भीमशागपत [ज०५० गृछन निपात्य संदधन्छन् इसके बाद ये सरमसमेंसे मण निकाल्ने, उन्हें धनुस्पर विरुप्प मुद्धम्हितमाणगान् । पढ़ाने और धनुपकी टोरी स्वींचकर मुर-के कम | मेने लगे। उमसमय उनका यह अनुप इतनी पुर्नसियूम निमन स्थान अरपाजिपत्तीन् रहा , मानो कोई बडे मासे ममतचक्र (लारी) पुम निरन्तरं यददलातचक्रम् ॥२४॥ रहा हो । इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण बरामधी चतुरङ्गिणी-नापी, घोडे, रप और पेछ सेनाका निर्भिमाम्भाः करिणो निपतु संहार करने लगे ॥ २५॥ इससे यदुस-से हाथियों रनेमसाबार सरसरणकन्धरा । सिर फट गये भौर ये मर-मरपार गिरन सग। मगोरी बोयरसे अनेकों बोके सिर घासे अन्य हो गय । रथा हवायचजमूतनायरन घाद, ममा, सारपि और रपियोंके नए हो जाममे बहुत. पासपछिममुजोरुकन्धरा ॥२५॥ से रख काम हो गये । पदम सेनापी याद, जोष और मंछिधमानदिपदमवाजिना- सिर आPि बापस्या करया कर गिर पा ॥ २ ॥ उस पुदमें अपार सेजम्वी भगवान् यमनीन करने मगरता शतमाऽमगापगा । मुमकी घासे पाहत-से मनाले शत्रुओंफो मार-मारकर मुजाहय उनके बा-प्रत्यासे निकले हुए म्की सम्मा नपियों पूरुपणार्पएछपा हा दी । कही मनुष्य कर रहे हैं तो यही हापी और इतदिपढीपहपग्रहाला ॥२६॥ | पार पा रहे हैं। उन मरियोंमें मनुष्योकी मुनाएँ फगरमीना नरमशगंवला सौपके समन पान पलों बार सिर इस प्रकार माइम धनुम्नरमायुधगुरममाला परसे, मानो पछुओंकी भीड़ लग गयी हो । मरेर | हापी दीप-से मोर पोर कि समान जान पाम । अन्दरिकायतभयानका महा जाप और गौ मयिोंकी सग, मनुयों के श मणिप्रवाभरणा माग ॥२७॥ मेमाके समम, धनुष तरों की मौत और गण-मन प्रतिना भीरभयावहा मृष साप दिनको सम्पन जान परत । दार्ने प्रमी मरस पती, मना भयानर भैर हों। बाम्म्य मनम्पिना इपफग पाम्परम् । मगियों और कारण पपके गझे सपनों के ििनमतागन मुमन दमदान ममन बहा गरे। उन ग्न नापोर पास पुरुष डर से प बार बीगेका आपसमें पूर उगार मपणनापग्मियनजमा ॥२८॥ या रहा पा ॥ २६-२८ ॥ पगचित् नगमा नागदगमग्य - मेना समुद्रक मान दगम मपप' भार की दग्न्तरा मगधडपानितम् । करिमाइसे जीतने पाप ! परंतु माTirm मार पनामीन सपाही ममपमें उमे मत पाए। धपे 1 मार वा मामी उन मेला11 पिनि मनगटामपा परम् ॥२०॥ पाना पारामा || गाना गुग मन्न? nan17 मिपहनान्न भानयम प मान नि। मालिया। TIL परी पत्र 2017xt । प्रशानं यमुदायपा गमानिननगी अ. ५०] ४४३ न तस्स चित्रं परपक्षनिग्रह सेनाका इस प्रकार बान-की-बातमें सस्यानाश कर दें। तथापि नव ये मनुप्यका-सा र धारण करके मनुष्यकी- सी छोटा करते है, तब उसका भी पर्णन किया ही स्तथापि मानुषिधस्स पर्पस ॥३०॥ | जाता है ॥३०॥ वाह विरथ रामो बरासंघ महापलम् । इस प्रकार रासन्धकी सारी सेना मारी गयी। रप भी टूट गया । शरीरमें केवल प्राण माफी रहे । सय भगवान् श्रीक्लामजीने जैसे एक सिंह दूसरे सिंहका एखानीकायशिष्टार्स सिंहः सिंहमिवौजसा ॥३१॥ पा लेता है, वैसे ही करपूषक महावी जरासंघको पफर लिया ।। ३१ ॥ नरासवने पहले बहुतमे विपक्षी नरपतियों पर किया था, परन्तु वान उसे ममामनी बम्पमान तारातिं पाशैरुणमानुपः । रहणकी फाँसी भोर मनुष्योंके से बाँध रहे थे। मगवन् श्रीणने यह सोचकर कि यह छोड़ दिया नायगा तो और भी सेना कही करके लायेगा ता हम पारयामास गोविन्दस्तेन कार्यधिकीर्पया ॥३२॥ सहज पृथ्वीका मार उपर सकेंगे, बलामीको रोग दिया ।। ३२।। महे-या शूरवीर नरासन्धका सम्मान करते थे । इसलिये ठसे इस मानपर पड़ी Bा माश्म स मुक्तोलाकनाधाम्पा नीरितोपीरमम्मतः। कि मुझे श्रीषण और परामने त्या करके दीनकी मौति छोर दिया है। अब उसने तपस्या करनेश निमय नपसे फतसंकल्पो वारितः पथि राजभि ॥३३॥ किया । परत गस्तेमें उसके सापी नरपनियोंन परत समझाया कि राजन् ! पर्मशियोंमें क्या रखा है। मापसे विश्नुत ही परादित नहीं कर सकतये। वापस प्रारम्बवश ही मीचा देवना पाउन गर्गाने वास्या पवित्रार्थपर्दर्नपने प्रारुतरपि । मगधन्की र, ति निमय प्राप्त करनेसी भाशा मारि बतायका तथा शैषिक शन्न एष युक्तियों दे म्वरमपन्धप्राप्तोऽय यदुभिस्ते पराभव ॥३४॥ देकर पर मान समझा दी कि भापको ताम्या नहीं पानी पाहिये ॥ २३३१॥ परीभित् ! उम समय इता मर्यानीका नृपो पाईद्रयस्तदा । माधम रामपकी सारी मेना मर चुरी पी । भगवान् मामीने उपेशा उसे रिपा पा । इसमे उपपिता भगवता मगधान् दर्मना ययौ ॥३५॥ स बात उदास होकर जाने दन मापन गया ॥ ३५॥ सान्दाऽप्यपवरलो निम्तीणारिपताणर । पाशित ! मगरन् श्रीमती मेनाने रिसीमा बल भी गौशन I और उन्होंने जगमन्धी वाम मशीदिनी सेना जा मुमुदने सम्भन दी, मुनही विजय प्रान पर ठम मन्सा र तनार मम्मनके पुन र उनके म दर इसमशिदरनुमादित ॥३६॥ । कार्पग बढ़न । नियमाग ४४४ भीमसागवत [३०५० । ( मापुररूपसङ्गम्प पिचरैदिसास्ममिः । मरासन्धकी सेनाके पराजयसे मथुरावासी मपरहित से गये थे और मावान् श्रीकृष्णकी बिमयमे उनका पदप उपगीयमानविजय सूतमागधवन्दिभिः ॥३७॥ धानन्दसे मर रहा पा । भगवान् श्रीकृण लाकर उनमें मिर गये। सूत, मगध और बन्दीमन उनकी विनयके गीत गाय राजदुन्दुभयो नेदुर्गेरीसूर्याप्यनेकशः। पे॥ २७ ॥ सि समप भगवान् श्रीकृष्णने नगरमें प्रवेश किया, उस समय यहाँ श्य, नगारे, मेरी, सुरही, वीणावेणुमृदङ्गानि पुर प्रविशति प्रभो ॥३८॥ मीणा, माँसुरी वीर मृदा धादि वाओ क्सने मो ये॥ ३८ ॥ मधुराकी एक-एक सबक और गरमें सिक्तमागा रटननां पताकामिरलकताम् । भिकार कर दिया गया था। चारों बोर ईसते मरते नागरिकोंकी चहल-पान पी। स्परा मगर मेटी-मेटी लियों और वही-मदी बिमय पताकायोंमे सजा पिया निर्घा प्रमघोषेण कौतुकातोरणाम् ॥३९॥ गया था । नामोंकी मेदपनि गूंज रही थी और स्त्र निचीयमानो नारीभिर्मास्पदम्पक्षतारै । भोर मानन्दोरसक्के सूचक मंदनमार याँध दिये गये ये॥३९॥निस समय श्रीरुण नगरमें प्रवंच कर ये निरीक्ष्यमाम सस्नेह प्रीस्पुत्कलितलोचनै ॥४०॥ पे, उस समप मगरकी नारियाँ प्रेम और उत्कम्यसे भरे र नेत्रोंसे उन्हें स्नेहपूर्वक निहार रही और ममेके श्रापोधनगर्स विचमनन्त पीरभूपणम् । हार, दरी, लक्षस वोर जी ध्वदिके बर्रोंकी उनके उपर वर्षा कर ही पी ॥ १० ॥ भगवान् श्रीतम रणभूमिसे अपार धन और पीरोंके बाभूपण ले आये यदुराजाय सत् सर्वमाएत प्रादिशरप्रमः ॥४१॥ थे। सब उन्होंने फशियोंके राजा उग्रसेनके पास मेज दिया ॥११॥ एवं सप्तदशकत्वम्तावत्पधौहिणीबलः । पीक्षित् । इस प्रकार सत्र वार तेइस तेस बक्षी रणी सेना इक्ट्ठी करके मगधराज जरासन्मने मगमन् युपुषे मागधा राजा यदुभिः कृष्णपालितः ॥४२॥ भीकणके द्वारा सुरक्षित यदुर्गशिपोंसे पुरा किया ॥१२॥ किन्तु यादने भगवान् श्रीकृष्णकी शकिसे हर बार अक्षिण्वस्तकसं मर्व अप्पय झणतेजसा । उसकी सरी सेना ना कर दी। सब सारी सेना नए इवेषु स्वेप्पनीकेषु त्यक्तोऽयादरिमिपः ॥४३॥ ऐ गाती, तब यदुशियोंके उपेक्षापूर्वक रोग देनेपर मरासप अपनी राबधानीमें लौट जाता ॥ १२ ॥ मिस अष्टादशमसंग्राम आगामिनि तदन्दरा । समय क्यारों संग्राम छिभने ही माम पा, उस समय नारदजीका भेगा एलापीर काम्पान दिसापी पाए॥ नारदप्रपियो पीरा यवनः प्रत्याश्यस ॥४॥ युद्धमें काम्यक्नके सामने सदा होनेपाम बीर संसारमें स्रोध मयुरामेत्य विसभिलॆन्हपाटिभिः । दूसरा कोईमपा । उसने जब पहना कि यी हमरे ही वैसे पवान् है और हमारा सामना कर सकते नृलाफ धाप्रतिद्धन्दा पूष्णीम्त्याऽऽत्मसम्मितान्४५५ र रिया ॥ १५ ॥ है, तब तीन परोष मम्मी सेनास्पात उसने मधुराको १ सीमामा । २ अर्नग ।। प्रेरित ।

ज० ५०] दक्षम स्कन्ध ४४५ कल व दृष्ट्यापिन्तयत् कप्ण संकर्पणसहायवान् । कालयकनकी यह असमय चढ़ाई देखकर मावान् श्रीकृष्णने पटामवीके साप मिस्कार विचार किया- कहो या पजिनं प्राप्त अभयतो महत् ॥४६॥ "अहो ! इस समय तो यदुवंशियोपर चरासन्ध और कालपान-ये दो-दो विधियों एक साथ ही मेरा अपनाऽयं निरुत्वेऽमानय तावन्महायला। ही हैं ॥ १६ ॥ माज इस परम बलशासी यानने हमें भाकर घेर छिया है और जरासन्ध भी आन, मागमोऽप्यप वाघोबा परयो वाऽऽगमिप्यति॥४७॥ या परसौमें आ ही जायेगा ॥ १७॥ यदि हम दोनों माई इसके साप छानेमें लग गये और उसी समय आवयोर्युम्पतोरस्प ययागन्ता बरस्सुत । बरासन्ध मा पहुंचा, तो यह हमारे पधुओंको मार रालेगा या तो कैद करके अपने नगरमें से नायगा । गन् पधिप्पत्यथवा नेष्यते स्वपुर फ्ली ॥४८॥ क्योंकि यह बहुत बयान् है ॥ १८ ॥ इसलिये वान हमलोग एक ऐसा दुर्ग-ऐसा किला बनायेंगे, जिसमें तमात्य विधास्सामो दुर्ग दिपठदुर्गमम् । किसी भी मनुष्यका प्रवेश करना अत्यन्त कठिन होगा । मातीन् समाधाय यवनं घातयामहे ॥४९॥ अपने सबन-समन्धिोको उसी किसमें पहुँचाकर र इस पनका षध फायेंगे' ॥ १९ ॥ रामनीसे इस प्रकार समाह करके मगवान् श्रीकृष्णने समुयके भीतर इति सम्मन्त्र्य भगवान् दुर्ग द्वादशपोजनम् । एक एसा दुर्गम नगर बनवाया, जिसमें सभी वस्तुएँ अमृत था और उस नगरकी ज्या चौपार पाताळीस अन्त समुद्रे नगरं कृत्स्नम्तमचीफरत् ॥५०॥ कोसकी पी ॥ ५० ॥ उस नगरकी एक-एक षस्में विषकर्माका शिान (मास्तुविधान ) और शिल्पकायकी पते यत्र हि त्वाष्ट्र विमान शिल्पनैपुणम् । निपुणता प्रकट ऐती पी । ठसमें वास्तुशासके अनुसार महीमही सब, चौराहों और गलियोंका पपास्पान रम्पावत्वरपीधीभिर्यपावास्तु विनिर्मितम् ॥५१॥ कन्यक विमानन किन गा पा ॥ ५१ ॥ यह नगर एसे मुन्दर-सुन्दर उपानों और विचित्र विचित्र उफानोंसे युक्त था, जिनमें देवताओंके गम और लवाएँ पाती मुरदुमलतोद्यानविचित्रोपषनान्वितम् राती पी | सानेके इतने उचे-ऊँचे शिखर थे, जो मापाशसे मातें करते थे । फरिफमगिकी मटारियों इममादिविस्मृग्भिः स्फाटिकाहालगोपुरैः ।।५२॥ और उके-ऊँचे दरवाजे वह ही सुन्दर स्टाते ॥५२॥ भान रसनेके लिये पोनी और पीतउके बहुत से फाठे ग्रवारी कोष्टमम्मरलस्व। बने हुए थे। वहकि महल सोनेके बने हुए थे और | उनपर कामगर सानेके पा सजे हुए थे। उनके शिम रोंके थे तपा गच पनेकी पनी इ बहुत भाटी महंगृहनिर्मामरकतम्पल ॥५३॥ माम होती थी ॥ ५३ ॥ इमक अनिरिक उम नगरमें पास्तुदेवताके मन्दिर भोर छने भी बहुत सुन्दर-मुन्दर पाम्नाप्पतीनां व गॉर्मलभीभिप निर्मितम् । बने हुए थे। उसमें चारों पगके यग निवास परते ये । +- १४६ भीमसागवत [म.५१ चातुर्वर्ण्यजनाकीणे यदुदेवगृहोल्लसत् ॥५४॥ और सबके बीचमें यदुषशियोंके प्रधान उग्रसेनी, वसुदेवनी, फम्यमनी तण भगवान् श्रीकणके मार सुधर्मा पारिजातं च महेन्द्र प्राहिमोदरः । जगमगा रो थे ॥ ५१ ॥ परीक्षित् ! उस समय देश राम इन्द्रने भगवान् श्रीकृष्ण के लिये पारिजात वृष और सुधर्मा-समाको मेज दिया । पह समा ऐसी Pिष्य पी कि पत्र पावम्भिको मर्यो मर्त्यधमर्न युन्पते ॥५५॥ | उसमें बैठे हुए मनुष्पको भूम-प्यास आदि मर्पयेते धर्म नहीं छ पासे ये॥५५॥ परणनीने ऐसे गार- श्यामैकमार्गान् वरुपोहयामछुट्लान् मनोमवान् । से सेत घोड़े मेन दिये, जिनका एक-एक कान श्या वर्णका पा, और जिनकी चाळ मनके समान तेजी। अष्टौ निधिपतिः कोशान् लोकपालो निजोदयान्॥५६॥ दूसरे लोकमार्कोने भी अपनी-अपनी विभूतियों मगमनुके धनपति कुमेनीने अपनी बाठी निधियों मेन दी कर पस मेज दी ॥ ५६ ॥ पीक्षित ! सभी स्क्यानको यद् यद् भगवता दक्षमापिपफ् स्वसिद्धये । म्मावान् श्रीकृष्णने ही उनके अधिकार के निर्वाइके लिये शजियों और सिद्धियाँ दी है। जब भगवान् श्रीण सर्व प्रत्पर्पयामासुहरी भूमिगते नृप ॥५७॥ पृष्णीपर असीण होकर स्मम करने हो, तप समी सिदियाँ उनहोंने भगवान्के घरमि समर्पि कर दी ॥ ५७ ॥ मगान् श्रीकृष्णने अपने समस्त सत्र योगप्रभावेण नीन्या सर्वजन हरिः। समन-सम्बन्धियोंको बानी भचिन्स्य महाशकि योग मायके शरा धारका पाँचा दिया। शेष प्रजाकी राके प्रजापालेन रामेण रुप्मः समनुमन्त्रित । म्मेि रामजीको मयुरापुरीमें रस दिया और उनसे स्मा लेकर गोमें कामोंकी माय पाने, बिना कोई भर-शस किये म्वयं नगरके बदरपाजेसे बाहर निकल निर्जगाम पुरद्वारा पपमाली निराधः ॥५८॥ वाये ।। ५८ ॥ इति श्रीमहागक्वे महापुराणे पारम्भस्या संहिताप दशमस्कार सत्तराधे दुर्गनिवेशन माम यशसमोऽप्याय ॥ ५० ॥ अथेकपाशचमोऽध्याय पन्यपन मम दोना मुकुन्दकी कया भौगुरु उपाए श्री गुम्नेयसीदते हैप पीक्षित ! निश व विनास्प विनिम्फ्रान्तमजिहानमियोरपम् । समय मावान् श्रीाण मथुरा मगरफे मुख्य परसे निकले, उस समप ऐसा माझम पा, माना पूर्व दिशमसे चन्द्रोग्य । रहा हो। उनपा एममा शरीर अफ्त दानापतम स्याम पीवकोशेपत्रामसम् ॥१॥ दी शनीय था, उसस रे मी पीताम्बरसी एय निराठी . N ०५१] ४४७ भीवस्सवपस प्राजकौस्तुभामुक्तकन्धरम् । ही थी, पस स्स पर सरेस्याके सपने श्रीपास-विह शोभा पा रहा था और गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही प्युदीर्घचतुर्याहु नवफारुणेषणम् ॥२॥ पी ! चार मुजाएँ पाँ, नो लवी-सेवी और कुछ मोटी मोटी पी । हाल के खिले हुए कारके समान कोमल भौर नित्यप्रमुदितं भीमत्सुकपोलं शुचिस्मितम् । रतनारे नेत्र थे। मुसकमालपर राशि-राशि आनन्द लेत रहा था । कपोलोंकी छटा निराठी ही पी । मन्द-मन्द सस्तारविन्दं विम्राण स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥ ३॥ मुस्कान देखनेवालों का मन नुराये सेनी थी । कार्नो मकराकत कुम्फर मिलमिल-मिलमिल शल्य थे। उन्हें देखकर कालयवनने निश्चय किया कि यही पुरुष बासुदेवो अपमिति पुमाग्रीवस्सलाम्छनः । वासुदेव है। क्योंकि नारदजीने जो जा सक्षण यतप्रये पे-कक्ष स्पलपर श्रीवसका चिड, चार मुजाएँ, कमाके पर्सबोरविन्दाक्षो पनमास्पतिसुन्दर ॥ ४॥ से नेत्र, गरमें वनमाल और सुन्दरताकी सीम्स, ये सब । इसमें मिनर हैं। इसलिय यह काई दूसरा नहीं हो उपपेर्नारदप्रोक्तर्नान्यो भवितुमईति । सकता । इस समय या पिना किसी अन-शसके पैदल ही इस ओर चल आ रहा है, इसलिये में भी इसके निरायुधमलन् पनो मोत्स्येऽनेन निरायुधः ॥५॥ साप विना असशस्त्रके ही छगा' ॥ १-५॥ इति निधिय यवना प्राद्यन्तं पसमुस्तम् । एसा निमय करके जब काम्यान मगवान् श्रीकृष्ण की ओर दौथा, तब वे दूसरी ओर मुंह करके रणभूमिमे अन्वभावनिक्षुस्सं दुरापमपि योगिनाम् ॥ ६ ॥ भाग चले और उन यागिदुळम प्रभुको पकानेके रिये कालपत्रन उनके पीछे-पीछाने या ॥ ६ ॥रणोप इस्तप्राप्तमित्रात्मान हरिणा स पदे पदे । भगवान् मीणा करते हुए मा रहे थे, कारपान - पगपर यही समझता था कि अब पका, तम पकमा । नीता दर्शयता दूर पवनेशोऽद्रिकन्दरम् ॥ ७ ॥ इस प्रकार मायान् उसे बहुम् दूरतय एक पाएकी गुरुमें ले गये ॥ ७॥ काळपश्न पीछेसे पार-मार आक्षर करता पसामन मछले जातस्य सव नोषितम् । कि 'अरे माइ ! तुम परम पाम्या यदुवंशमें पैगापुर हो, तुम्हारा इस प्रकार युद्ध छाइकर भागना उचित नही इति विपमनुगतो नन प्रापाहतागुभः ॥ ८ ॥ है। परन्तु ममी उसक अशुभ नि दोष नही हुए प, एवं क्षिप्ताऽपि भगवान् प्राविशद् गिरिकन्दरम् । इसरिये वह भगान्को पानेमें समर्थ न हो सका ॥८॥ | ठमके भाक्षर करते रहनेपर भी भगवान् उस पनकी माऽपि प्रतिष्टम्तमान्यं शयानं दम्झे नरम् ॥ ९॥ वहाँ उसने एक दूसरे ही मनुप्पो स्टेते हुए देम्फा ।।९।। गुफामें घुस गये । उनक पीछे सम्यान मी मुम् । उसे दमार पालपानने सामा 'देखा तो सही, यह नन्दमा दमानीय शेते मामिह माधुवन् । मुझे इस प्रकार इतनी दूर 7 जाया भर भर इस तरह-मानो इसे दुण पता ही न हो-माधुवाधा यनयर इति मन्याप्पत मूढम्म पदा ममतास्मन् ॥१०॥ सो रहा है । पर सोचकर उस म्हने ठमे कमर - ४४८ भीमनागवत स उरथाप चिर सुप्तः शनैरुन्मील्प लोचने । एफ लात मारी ॥ १० ॥का पुरुष वहाँ बहुत दिनोंसे सोया दवा था । पैरफी टोकर लगनेसे छ तठ पर दिशो पिलोकमन् पार्थे तमद्राधीदवस्पितम् ॥११॥ देखनेर पास ही फात्म्पन्न सका हवा दिली और धीरे-धीरे उसने अपनी बाँखें खोली । इयर-उस दिया ॥११॥ परीक्षित वह पुरुष इस प्रकार ठोकर मारकर स तालत्तस्स रुटस घटिपातेन भारत । नगाये जानेसे कुछ कष्ट हो गया प । उसकी सी पाते ही काल्यानके शरीरमें भाग पैदा हो गयी और का देहनामिना दग्धो भससादभवत् धणात् ॥१२॥ क्षणमरमें बम्पर रास्टका ढेर हो गया ॥ १२ ॥ रामोवाच राजा परीसिदमे पूम-भगमन् । निस्के पति- पातमाप्रसे कालपवन चलकर भस्म हो गया, इ पुस को नाम स पुमान् प्रान् फस्स किंवीर्य एष च । कौन या किस बरका पा! उसमें कैसी शक्तिपी और यह किसका पुत्र ! आप क्या करके पह में मतत्याये कि पर्वतकी गुफामें जाफर क्यों सो राह फरसाद गुहांगतः शिश्ये कि जो थषनार्दनः॥१३॥ . । श्रीमुक उवाच मौशुकोयनी कहते है --पीधित् । वे इस्याकु स स्वाइसे जातो मान्धातवनयो महान् । पी महारामा मान्धाताके पुत्र रामा मुचुकुन्द थे। नामों के परम मक्त, सस्पप्रतिझ, संपामविनयी और समुन्द इति सम्पावो अमम्पः सत्पसहरः ॥१४॥ महापुरुष थे ॥ १५ ॥ एक बार इन्द्रादि देवता असुरोंसे बत्फ्त म्पमीत हो गये थे। उन्होंने अपनी रक्षाके स याचिसः सुरगणैरिन्द्रायरत्मरक्षणे । लिये राना मुकुन्दसे प्रापना की और उन्होंने बहुत असुरेम्पा परित्रस्तैस्तद्रवां सोऽकरोपिरम् ॥१५॥ दिनसक उनकी रक्षा की ॥ १५॥ या भात नोंके बद देवताओंफो सेनापतिके लपमें सामिकार्तिकेय मिल लम्बा गुई से म्वापालं मुचुलन्दमयानुषन् । गये, सब उन लोगोंने राजा मुकुन्दसे कहा-'रान् । बापने हम लोगों की रक्षाके लिये बात श्रम और का राजन् विरमा फच्या भवान् नः परिपालनात।१६। उपप है । नाप विधाम कीचिये ॥ १६ ॥ वीर नरलोके परित्पन्य राज्य निदतफण्टकम् । शिरोमणे ! आपने हमारी रक्षाके म्पेि मनुष्यसकता अफ्ना बकाप्टक राज्य और दिया और मीनकी अमान् पालपतो बीर मामाम्ते सर्व उमिताः॥१७॥ मिलपा सपा भोगोंका मी परित्याग कर दिया ॥१७॥ मुवा महिप्यो भवतो भातयोऽमात्समन्त्रिमः। वा अापके पुत्र, रानियाँ, मु-बान्धव और अमात्य- मन्त्री तप आपके सम्पकी प्रनामसे कोई नही रहा। प्रमाप सुस्पकालीमा नाघुना मन्ति कालिसाः॥१८॥ सब के सा फालके गामें चले गये ॥ १८ ॥ कर स्मत काबानोंसे भी यवान् है । वह स्वयं परम समर्म कालो बलीयान् पलिना भगवानीपरोऽम्पयः। भविमाशी मोर म्गरम्मनप है। जैसे बाले पोको प्रजाः फालय कीरन् पनुपालो मया पशून्।।१९|| | अपने नशम रमते है, वैसे ही सेट में सारी १ पवैशिपाच । अव । - १० ५१] दशम स्कन्ध ४४९ परं सनीप्प भद्रं ते ऋसे कैपस्यमय न । प्रमाको अपने अधीन रसता है।॥ १९ ॥ राजन् ! बापका कायाण हो । मापकी नो इन्न हो हमसे मांग लीनिये । हम कैमय-मोक्षके मतिरिफ आपको सब एक एपेघरस्तस्प भगवान् विष्णुरम्पयः ॥२०॥ कुछ दे सकते हैं। क्योंकि फैक्त्यमोक्ष देनेकी सामर्थ्य तो केवल विनाशी भगवान् विष्णुमें ही है॥ २० ॥ एक्मक स देवानभिवन्य महायशाः । फ्रम यशस्रो राना मुचुकुन्दने देवताकि इस प्रकार कानेपर उनकी बन्दना की पौर बात यके होनेके अपयिष्ट गुहाविष्टो निद्रया देवदच्या ॥२१॥ कारण निवाका ही पर माँगा, सपा उनसे पर पाकर ये मीदसे मरकर पर्वतकी गुफाम वा सोये ॥ २१ ॥ उस स्वाप यास यस्तु मध्ये मोधयेवामपेतनः । सम्प देताओंने कर दिया पा कि राजन् ! सोवे समय यदि मापको कोई मूर्ख बीचमें ही नग्न देगा, स स्वया दृष्टमात्रस्तु भसीभवतु तस्षणात् ॥२२॥ | त्ये ह आपकी दो परते ही उसी क्षण भस्म हो गायगा' ॥२२॥ पाने ममसाभीसे भगवान् सात्वतर्पभः । परीक्षित ! जब काम्पम मस्म हो गया, तब आस्मानं दर्शयामास मसुन्दाय धीमते ॥२३॥ यदुवंशशिरोमणि मगवान् श्रीकृष्णने परम बुद्धिमान् रामा मुचुकुन्दको अपना दर्शन दिया । मगवान् श्रीकृष्णका तमालोक्य घनश्याम पीसफौश्चयवाससम् । श्रीविप्रा वर्षाकामीम मेक्के समान साक्ला पा । रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए थे। पक्ष स्पष्पर श्रीफ्स्स भीवस्सपथसं प्रावत्कौस्तुमेन विराजितम् ॥२४॥ और गलेमें कौस्तुभमणि अपनी दिम्प ज्योति बिस्लेर रहे थे। चार मुनाएँ पी । पैजयन्ती माम वग ही घुटनोंतक पर्सन रोपमान वैजयन्त्या च मालया । स्टकरही पी। मुखकमल अस्पत सुन्दर और प्रसमा पास्पसमवदन से सिम माप । कानोंमें मकरास कुण्ड जगमगा स्फरन्मफरहमालम् ॥२५॥ से ये । होठोपर प्रेममरी मुसकराहट थी वोर नेत्रोंकी प्रेषणीय नलोकस्स सानुरागमितेषेणम् । चितान अनुरागकी पर्य कर रही पी। भस्पात दर्शनीय तरुण बस्सा और मतबासे सिंहके समान निकि अपीघ्पवयसं मत्तमृगेन्द्रोदारविक्रमम् ॥२६॥ चाळ ! राना मुचुपद पपपि बड़े पुहिम्मन् गौर धीर पुरुष थे, फिर मी मगवान्की या दिम्प ज्योतिर्मयो मूर्ति पर्यपृच्छन्महामुहिस्सेजसा तस्स धर्पितः । देखकर कुछ चकित हो गये-उनके सेबसे हतप्रतिम हो सकपका गये । भगवान् अपने वेनसे दुर्य जान शशितः शनकै रामा दुर्धर्षमिव तेमसा ॥२७॥ पाते थे राजाने तनिक शरित होकर पूम ॥२३-२७॥ मुकुन्द उवाच राजा मुकुन्दने कहा-माप फौम है। इस को भवानिह सम्प्राप्तो विपिने गिरिगहरे । कोटोसे मरे हर घोर अंगमें आप कमलके समान पदम्पा पचपलाशाम्यां विचरस्पुरुकण्टफे ॥२८॥ कोमल घरोंसे क्यों विघर रहे हैं ! और इस पर्वतकी गुममें ही पधारनका क्या प्रपोजन था: ॥२८॥ क्या किंस्विचेमस्पिना तेजो भगवान् वा विभावसुः । माप समस्त सेप्रलियोंके मूर्तिमान् वेन वपमा भगवान् सूर्य सोमो मोन्द्रोपा लोकपालोऽपरोऽपि वा ॥२९॥ अमिदेव तो नहीं रे ! क्या आप सूय, चन्द्रमा, देवयम १ मान प्रतिमें स्वाप बाव 7 या पूरा भोक में नही रिप्पपीम मित्रा। सार्प यात स्पानमै पर पाठमेर। वेसिवम् । ३ मपीब । साप पद मास भीमद्भागवत . मन्ये त्वा देवदेवानां प्रयाणां पुरुपर्पमम् । इन्द्र या कोई दमरे लोकशा है। ॥ २९॥ में तो ऐसा समझता हूँ कि आप देवताओंके माराध्यदेव प्रमा, विणु पदपाधसे गुहाधान्त प्रदीप प्रभया यथा ॥३०॥ सया शहर-इन तीनॊमसे पुरुषोत्तम मगवान् नारायण ही है। क्योंकि जैसे प्रष्ट दीपकअपरेको दूर कर देता है, भुभूपतामध्पलीकममाफ नरपुङ्गव । ही आप भपनी कान्तिसे इस गुफाफा बंधेरा मगारो म्वमन्म कर्म गोषवाकप्पा यदि रोषते ॥३१॥ है ॥ ३०॥ पुरुषश्रेष्ठ । यदि पापको रुचे सो हम अपनाउम्म, कर्म और गोत्र बताइये, क्योंकि हम सम्ने पर्म तु पुरुपष्माघ ऐस्याका क्षत्रप एष । इससे उसे सुननेके इच्छुक हैं ॥३१॥ और पुरुष तम ! यदि बाप हमारे बारेमें पूछे तो हम इस्माकुशी मुन्द इति प्रोक्तो यौवनाचात्मन प्रभो ॥३२॥ (अप्रिय हैं, मेरा नाम है मुचुकुन्द । और प्रमु ! में युवनामनन्दन महाराज माम्बाप्ताका पुत्र हैं ॥ ३२ ॥ चिरप्रजागरमान्तो निद्रयोपदतेन्द्रिमः । पात दिन तक जागते रहनके कारण में पक गया था। सय मिन विजने काम कनाप्युत्भापिसोऽधुना।।३३॥ काम कर दिया था, इसीसे में इस निम्न स्थानमें निदाने मेसी समस्त इन्द्रियों की शक्ति भनी भी, ठरें साऽपि भसीकता नूनमात्मीमेनैव पाप्मना । मिन्द्र सो रहा पा । अभी-अभी किसीने मुझे गा दिया ॥ ३३ ॥ अग्य उममे पापोंने से उसे अन्यकर मनन्तर भयाशीमान लक्षितोऽमिप्रशासना॥३४॥' भस्म फर Pया है। इसके मा? शत्रुओं के नाश करने कार परम मुन्दर वापने मुझे दशन दिया ।। ३९॥ तेजपा तऽविपण रिद्रप्टुं न शक्नुम । महामाग ! बाप समस्त प्राणियोंके मननीय है। आपके इतौजसा महाभाग माननीयोऽसि देहिनाम् ॥३५॥ परम पिम्प और वसा तेजसे मेरी शक्ति सो गयी है। मैं आपको बहुत तक टेम्म भी नहीं सकता ||२५ एष मम्भापिता राजा भगवान् भवभावनः । जब रामा मुचुपुरदने इस प्रकार करा, तब समस्त प्रयाइ प्रहमन् वाण्या मषनादगभीरया ॥३६॥ मेपनि के समान गम्भीर वाणीसे पहा-- ॥ ३६॥ प्राणियोंके जीवनाता भगवान् श्रीकृष्णने हंसते हुए भीभगवानुपप भगवान श्रीरप्णने कहा-प्रिय मुकुन्द ! मरे बमकमाभिधानानि मन्ति मम मामश । बारों नाम कम और नाम है। ये बान्त है, इसलिये में भी उनकी गिनती करके मही पतग सकरप ॥२७॥ न नापन्त नुमंग्यातुमनन्तन्वान्मयापि हि ॥३७॥ पद सम्म मि को पुरुष माने अनेक जन्म परिजॉमिनिमम पाभिवान्पुरुजन्मभि । पृषीफ घर-र धूप-दो गिमती पर गले, पारत गुणकमाभिधानानि नम जमानि परिचित् ॥३०॥ प्रकार मही गिन मफ्ना ॥ ३८ ॥ राजन् ' सना मरे जम्म, गुरु, कर और मामोंका पोई कभी किसी पालमपापपग्नानि जमार्माणि म नृप । समसम आदि परगण गरे बिसमिल जम्म और मनुस्मन्ता नपान्त गरान्ति परमर्पय ॥३९॥ पास कम पाने मदत परन्तु कभी उनका पार नही पाते ॥ ३० ॥ त्रिप गुपु मा दोनेपर भी तपाप्यवानान्पर र गदवा मम । माने सदन म, पर्म और मात्र गम बारम्प 1 infrrtm I मन।

२०५१] दशम स्कन्ध ४५१ विज्ञापितो विरिपेन पुराह धर्मगुप्तये । | हूँ, मुनो। पहले प्रमानीन मुमसे धर्मकी रक्षा और पृषीके मार बने हुए असुरोका मंहार करने के ख्येि भूमे रायमाणानामसुराणां धयाय च ॥४०॥ प्रापना की थी ॥ १० ॥ उन्हीकी प्रार्थनासे मैंने यदु पशर्मे वसुदेवजीके यहाँ अवतार प्रहण किया है । भय में अरती! यदुकुले गृह आनकदुन्दुमे । समुदेवजीका पुत्र हैं, इसलिये लोग मुप्त बासुदेव कहते वदन्ति वासुदेवेति घसुदेवसुत हि माम् ॥४१॥ है ॥ ११ ॥ अबतक मैं काग्नेमि बारका, जो फैसके रूपमें पैदा हुआ पा तपा प्ररम्ब मादि अनेकों साधु कालनेमिईत कस प्रलम्मापाच सद्धिप । द्रोही मसुरोंका सहार कर चुका है । राजन् ! यह कारपवन पा, मो मेरी ही प्ररणासे तुम्हारी तीक्ष्ण रष्टि षय च मवनो दग्धा रास्ते तिग्मचक्षुपा ॥४२॥ परते ही मस्म हो गया ॥ १२ ॥ बड़ी में तुमपर कृपा करनेके लिये ही इस गुफामें आया हूँ। तुमने पहले साज तपानुग्रहार्थ गुहामेतामुपागत । मेरी बहुत बाराफ्ना की है मौर में हूँ मतपसल ॥१॥ इसलिये राम ! तुम्हारी जो अमिडाषा हो, मुझसे मोग प्राषित प्रधुरं पूर्व स्वयाई भक्तवत्सल ॥४३॥ हो। मैं तुम्हारी सारी त्मलसा, अभियपाएँ पूर्ण कर परान् वृणोप्य राज सर्वान् कामान्ददामि ते। दूंगा । यो पुरुष मेरी शरणमें आ जाता है उसके लिये फिर ऐसी कोई वस्तु नहीं रह जाती, जिसक पिये यह मां प्रपोजन फषिमभूयाऽईति शोचितम् ॥४४॥ शोक करे ॥ ११ ॥ श्रीसुफ उपाय मीशुकदेयमी कहते हैं- जय भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा, तब राना मुचुकुन्दको पद गगका रस्पकस्तं प्रणम्पाह मुचुान्दो मुदान्वित । यह कपन याद आ गया कि यदुर्मशमें भगवान् भातीर्ण होनेवाले हैं। वे बाम गपे किये स्वयं मगवान् नारायण पापा नारायणं देवं गर्गवाक्यमनुसरन् ॥४५॥ है। आनन्दसे भरकर उनहोंने भगवान्क चरणोंम प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की ॥१५॥ मुयुकुम्दने कहा-प्रभो ! नगरके सभी प्राणी आपकी मायासे नस्पन मोहित हो रहावे आपसे विमोहितोऽय जन ईश मापया विमुख होकर अनपमें हीसे रहते हैं और आपका मान स्वदीययास्वा न भजत्पनर । नहीं करते। ये मुम्बके लिये पर-गृहस्पीक उन प्रमगेमें दस जाते हैं, वो मारे दुक र यात है। इस सहस्सी और पुरुष समी टो जा रहे हैं ॥१६॥ मुम्बाय दुखप्रभवेपु समत इस पारगर ससारसे सर्पपा रहित प्रभो ! यह भूमि बम्यन्त पवित्र कर्म भूमि है, इसमें मनुष्यका नम हाना गृहपु योपिन् पुरुपम पधितः ॥४६॥ अम्पन्त दुलम है। मनुन्य-जीपम इतना पूर्ण मि | उसमें भरमके रिपे कोई भी वमुगि महीमान लम्चा जनो दुर्लभमत्र मानु परम सौभाग्य और मान्की महक सपासे उसे रुयमिदम्पङ्गमपसवाऽनप बनापास ती प्राम पर भी जो अस्नी मति, गति मुकुन्द पार ४५२ भीमद्भागवत पादारविन्दं न भजत्यसन्मति भसत् संसारमें ही, छगा देते हैं और तुच्छ विषमुके किये ही सारा प्रमा करते गए घर-गृहसीके वक्षरे हान्धरूपे पतितो यथा पनुः ॥४७॥ ऐम पर यते हैं मगवान्के चरणकमेंकी उपासना | महाकरसे, मनन नहीं करते, ये तो ठीक उस परके समय ममैप कालोऽमित निष्फलो गयो हैं, वो पणके मसे अंधेरे में गिर गया है ॥ १७ ॥ मगन् । मैं रागा था, राम्फममीले राज्पभियोगमदस भूपतेः। मदसे में मतवाल हो या पा । इस मरनेवाले शरीरको ही तो में भास्मा अपना सहप समझ सापाकोर मात्मपुढे सुतदारकोशम् राजकुमार, रामी, अनाना तप पृथ्वीके मेम-मोहमें ही फैसा गा पा । उन बस्तनोंकी चिन्ता दिन-रात मे प्यासनमानस दुरन्तचिन्तया ।।४८|| गले म्गी हती थी। इस प्रकार मेरे जीवनका व भाप समय विकु निष्कर--म्यर्प चल गया ॥२८॥ फलेवरेऽस्मिन् पटाम्पसभिमे यो शरीर प्रत्यक्ष ही पड़े और मीतके समान मिलीक और स्प होने के कारण उनीक समाल करने नियमानो नरदेव इस्यहम् । मध्य भी है, उसीको मन अपना साप मानसि पा और फिर अपनेको मानव पा नरदेवा । इस तो रखेभाषपदास्पनीक प्रकार मैंने मदान्ध होकर लापको तो कुछ समझा हो म । रप, हापी, घोडे और पैदम्झी बहिणी से गो पर्यटैस्स्वागणपन् सुदुर्मदः ।।४।। सपा सेनापतियोंसे भिकर में पनीमें इपर-उपर पून प्रमचमुपैरिविरुत्पचिन्तया यता ॥ १९॥ मुझे ए करना चाहिये और माह मही करना चाहिये, इस प्रकार विविध कर्तव्य वीर मर्समें प्रपदलोम विपयेषु छाउसम् । की पिस्तामें पड़कर मनुष्य अपने एकमात्र - मामालिसे विमुख होकर प्रमच हो माता, बायपाल त्वमप्रमच सासाभिपपसे से नाता है। संसारमें भोप रपनेवासे निपी मिपे ससकीयावा दिन-नी रात-भौगुनी बहती होती सुखलिहानोऽहिरिपाखुमन्तकः॥५०॥ है। परन्तु जैसे मूसके कारण भीम पम्पास एक | सौप असावधाम को दबोच लेता से। पुरा स्वरमपरिपते परन् कामरूपसे सदा सर्वदा सावधान इनेपले नाप एकाएक उस प्रमादप्रस्त मागीपर टूट परते है और उसे है मार्ग नरदेषसमितः। बीतते १॥५०॥ वो पहले सोनेके रोंपर पता बोनो गयरामोंपर पापर धमता पा और मग म एस फालेन दुरत्ययेन ते फरकाना पा, यही शरीर पके बाप कामा मस बनकर पार क देनेगर पक्षियोंकी विद्या, भरतीमें गाः फलेपरा पिटुमिमस शिवः ॥५१॥ देनेपर सारा कीड़ा और बागमें जमा देनेपर राजा म०५१] दशम स्फन्प ४५३ ददत् । निर्मित्य दिक्चक्रमभूतविग्रहो दर बन जाता है ॥ ५१ ॥ प्रमो ! जिसने सारी दिशामोंपर विग्य प्राप्त कर ली है और मिससे माने- परासनस्या समराजवन्दित । मामा संसारमें कोई रह नहीं गया है, जो श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठता है मौर बड़े-बड़े मरपति, जो पहले उसके गृहेषु मैपुन्पमुखेषु योपिता समान थे, अब जिसके घरोंमें सिर मुकाते हैं, वही पुरुष मघ वियप-मुख भोगनेके लिये, जो घर-गृहस्पीकी कीगमगा पूरुप ईश नीयते ॥५२॥ | एक विशेष वस्तु है, स्त्रियोंके पास भाता है, सब उनके हापका सिसौना, उनका पालतू पशु मन जाता है ॥५२॥ मनोति फर्माणि सपस्सुनिष्ठितो महुत से लोग विषय मोग छोरकर पुन राम्यादि मोग निषचभोगस्तदपेक्षया मिलनेकी इअसेही दान-पुण्य करते हैं वोर में फिर सम्म मेकर सबसे बड़ा परम स्वतन्त्र समाट होऊँ।" ऐसी पुनष मयेयमई स्वरारिति काममा रखकर तपस्याम मटीमाति स्पित हो गुमर्म करते हैं। इस प्रकार मिसकी तणा बढी रकदापि प्रादतों न सुखाय फल्पते ॥५३॥ एसी नहीं हो सकता ॥ ५३ ॥ अपने सहपमें एकरस स्थित इनेवाले मगमन् ! भीष अनादिकामसे जगम भवापवर्गो भ्रमतो यदा भवे पस्युरूप संसारके पारमें मटक या है। नब उस पारसे छूटनेका समय आता है, सब उसे सत्संग प्राप्त अनस वर्षन्पुत सत्समागमः । होता है। यह निषय है कि विस क्षण ससंग प्राप्त सत्समो यहि तदेष सकती होता है, उसी क्षण सोंके भाम्प, कार्यकारणरूप नगदके एकमात्र सामी बापमें जीवकी मुनि मस्पत परवरेशे स्वपि मापते मतिः ॥५४॥ ससासे स्म जाती है ॥ ५१ ॥ मगवन् ! म वो ऐसा समानता है कि बापने मेरे उपर परम पनुपाकी र्ग मन्ये ममानुग्रह ईश से हतो की, क्योति बिमा किसी परिभम्के–बनायास ही मेरे रान्यानुषन्धापगमो परम्म्या । राम्पका बम्पन टूट गया । साधु-समाक्के परता राना मी बब वपमा राज्य कर एकान्त ममन यः प्रायते साधुभिरेकचर्पया सापम करनेके उदेस्पसे बनमें जाना चाहते है, तब उसके ममता-सपनसे मुक्त होनेके लिये बरे प्रेमसे मनं विविधगिरस्तरमूमि ॥५५॥ मापसे प्रार्थना किया करते हैं ॥५५॥ क्तर्यामी प्रमो ! मापसे क्या छिया ! म भापके चरणोंकी सेवाके न कामयेऽन्यं तप पादसेवना- भतिरिक और कोई भी पर नहीं चाहता पोषि दफिजनप्रार्थ्यतमा पर पिभो । जिनके पास किसी प्रकारका संग्रह-सरिमा मही. अपना जो उसके भमिमानसे रहित रे ग मी माराध्य फस्त्वां सपपर्गदरे केस उसीके रिये प्रार्थना करते रहते हैं। मगमन् ! मय, मागापे तो सही-मोश देनेवासे यापकी मायभना वणीत आर्यों परमात्मान्धनम् ॥५६॥ करके ऐसा कौन अष्ठ पुर दोग्य, जो मरनेको बाँधने पाले सांसारिक विषयमा पर मंगे॥५६॥ इसलिये तम्लाइ पिसन्याशिप ईन सर्वतो प्रमो ! में समगुग, रजोगुग भोर तमोगुरसे सम्पप रजन्तम समगुणानुबन्धना रसनेगरी समस्त कामनाको पोरस्त मस्त मापदके ४५४ भीमद्भागवत [२०५१ निरखनं निर्गुणमदर्य परें देशमान सम्पन्धसे रहित, गुणातात, एक-अद्वितीय, पिलरूप परमपुरुष आपकी शरण ग्राम करत त्वां सप्तिमात्रं पुरुष प्रजाम्पहम् ॥५७॥ ॥५५॥ मगमन् ! मैं अनादिकाल से अपने कर्ममेको मोगते भोगते भरपन्त स्मार्त हो रहा था, उनकी सद चिरमिह जिनार्वस्तप्यमानोऽनुतापैः पाम रात-दिन मुझे जल्पती रहती थी। मेरे छ अनु (पाँच इन्द्रिय और एक मन ) कमी शान्त न होते थे, रविपपरमित्रोऽलम्धशान्ति कपवित् । उनकी विषयों की प्यास बदसी ही बा बी पी । झमी किसी प्रकार एक क्षण के लिये भी मुझे शान्ति शरपद ससपेतस्त्वत्पदाज परास्म- न मिली । शरणदाता! मा मैं आपके मप, मृत्यु पौर शोकसे रहित परणकमकी शरणम वाय।। अभयमृतमशोर्फ पाहि मा पममीश ॥५८॥ सारे गहने एकमात्र स्वामी ! परमात्मन् ! पाप मुत्र शरणागतकी रक्षा कीनिये ॥ ५८ ॥ भीभगवानुवाप भगवान् श्रीकप्प्णमे कहा-सार्वभौम माराय। आम्हारी मति, तुम्हारा निधय पहा ही पवित्र और उभी सार्वमोम महाराज मतिस्ते विमलोजिता । कोटिका है । यधपि मैंने तुम्हें बार-बार पर देने परै प्रलोमितस्यापि न कामविहता यसः ॥५९॥ बधीन मई ॥५९॥ मैंने तुम्हें मो कर देने का प्रमेमन प्रलोभन दिया, फिर भी तुम्हारी मुद्धि कामनामकि प्रलोभितो वरैर्यत्वमप्रमादाय विद्धि तत् । दिया, इ केक्स तुम्हारी सावधानीकी परीक्षा लिने । मेरे जो अनन्य मक होते हैं, उनकी मुनि कमी न धीर्मय्येकभक्तानामाटीभिर्भिपते कचित् ॥६०॥ कामनावोंसे इधर-उपर नहीं भटकती ।। ६० ॥ जो लोग मेरे मळ महीं होते, वे चाहे प्रामापाम बानिकाय युजानानाममकानो प्राणायामादिमिर्मनः । अपने मनको पशमें करनेका कितना ही प्रयत क्यों न अक्षीणपासनं राजन् रक्ष्यते पुनरुत्यिसम् ॥१॥ करें, उमकी वासनाएँ क्षीण नहीं होता, पौर रामम् । उनका मन फिरसे विषयों के म्ये मचल पदसा ॥१॥ विपरस्त्र महीं फार्म मप्पाषेशितमानसः । प्रम अपने मन और सारे मनोमाको मुसे समर्पित कर दो, मुनमै ख्या दो, और फिर स्वादरूपसे पृथ्वीर अस्त्येव नित्पदा सुम्प भक्तिर्मय्पनपापिनी ॥६२॥ विचरण को । मुममें तुम्हारी विषयवासनाशून्य निर्मक भक्ति सा बनी रहेगी ॥ १२ ॥ तुमने क्षत्रिपक्षका पात्रधर्मम्पितो जन्तून न्यमधीर्मगयादिभि । पाचरण करते समय शिकार बादिके भसरोपा मार से पशुभोंका वध किया है। पर एकामधिसे मेरी समादिवतचपसा वर्ष मदुपामय ॥६॥ उपासना करते हुए तपस्याके द्वारा उस पापको को माछो ॥ ६ ॥ राजन् ! भगसे गम्ममें तुम अमन जन्मन्यनन्तरे राजन् सर्पमतमुदत्तम । मनोगे की समस्त प्राणियोंके सपे हितैषी, परम मार हाआगे तपा नि मुम विमुद विधानपन परम्पराको मन्चा हिजपरम्प ये मामुपैप्पसि यलम् ॥६४॥ प्राम करोगे ॥ ६ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमाईस्या सेहिसायो दशमस्करपे उत्तय मुकुन्दसतिमिफसधारासमोऽप्याप || ५१ ॥ १ ।२ नमाप्तिम् । १ पपा । परनपो मानमा एए ।

२०५२] अथ द्विपञ्चाशचमोऽध्याय शारक्यगमन धीवर रामजी यिषाह तथा धीफप्णके पास रश्मिणीजीका सन्देशा लेकर ब्राह्मणा माना मीसुम उवाच मीगुकवेयजी कहते हैं-प्यारे परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार इस्वाकुनन्दन रावा मुकुन्दपर इत्यं सोऽनुगृहीतो कृप्पोनेस्वाकुनन्दन । अनुग्रह किया । वव उन्होंने भगवान्की परिक्रमा की, स परिक्रम्य संनम्प निभफ्राम गुहामुग्नात् ॥ १॥ उन्हें नमस्कार किया और गुमसे बाहर निकले ॥ १ ॥ उन्होंने पाहर भाकर देखा कि सब-के-सष मनुष्य, म वीक्ष्य शुष्टकान् मान् पगून पीरुवनस्पतीन् । पशु, मना और पक्ष नस्पति पालेकी अपेक्षा महुत छोटे-छोट आकार के हो गये हैं। इससे यह जानकर मन्वा फलियुग प्राप्त जगाम दिशमुत्तराम् ॥ २॥ कि कलियुग मा गया, वे उचर Pशाकी बोर घल दिये ॥ २ ॥ मारान मुचुकुन्द तपम्या, असा, धैय तप भद्रायुता धीरो नि मझो मुक्तसशय । सपा मनासविसे युफ एवं संशय-सग्देहसे मुक्त थे। पे अपना चित्त भगवान् श्रीयम्गमें लगाफर गन्धमादन समाधाय मन कृष्णेप्राविसद् गन्धमारनम् ।। ३ ।। पवत्पर बा पचि ॥ ३ ॥ भगवान् नर-नारायणके पर्याप्रममायाच नरनारायणालयम्। निस्प-निवासस्थान वारिकापममें चार बड़े शाम्तमानसे गर्मा-सर्दी अदि दस महते हुए प तस्याक द्वारा सर्पदन्द्रसह शान्तम्तपसाऽराधयारिम् ॥ ४॥ मावान्की आराधना करन लगे ॥४॥ भगवान् पुनरावज्य पुरी यश्नवेटिताम् । इधर मात्रान् श्रीकृष्ण मयुरापुरीमें पैर भाये । भक काल्यानकी सेनाने ठसे घेर रमवा या । का इन्वा म्लेच्छालं निन्ये तटीयं द्वारकां धनम् ॥ ५॥ उन्होंने म्सेरकी सेनाका संहार किस बार उसका साय घन उनकर शरफाको से चले ॥५॥ निम समय मगधन् नीयमाने धने गाभिनृभिधायुतचोदित । श्रीकृष्णके आज्ञानुसार मनुष्यों और पेपर बह पन से माया गाने टया, उसो समय मगपरा जरासन्ध रि बावगाम बरामधत्रयाविशत्पनीकप ॥६॥ (अपरही बार ) बस अभौहिणी सेना सेफर का धमका ॥ ६ ॥ परीदिए । -सेनाका प्राउ वेग देन- विलाप गरभम रिपुसन्यस्य माधवा । कर भगवान् श्रीकृष्ण और बगाम मनुष्योंकी-सी मेग करते हुए उसके सामनमे पड़ी पुकि साप माग मनुप्पथेष्यमापनी राजन् दुइवतुटु तम् ॥ ७॥ निकास ।। ७ ॥ उनके मनमें सनिक भी मय न पा । रिर मी म्पनो सम्पन्न मयमीत हा गपे दो-इस प्रकार विदाय विर्स प्रचुरमभीती भीम्भाववत् । का नाश्य करते एए, बह सवयर-मब धन बही भापकर बना योजनोंतक वे अपने कमगरके समान मुरुमा पापा पयपानाम्यां परतुपायाधनम् ॥ ८॥ चरणमे ही-47 भागत चल गया ८॥ रस महाबरी मगधराय रामभन दग्ग मिश्रीरा और राम ता मा रहेर सामने स्टा और १ गो। २ मपुरा पम्ने त। पगयमानी ना या मागध महमन परा।

१५६ [२०५२ श्रीमद्भागवत अन्वभावद् रपानीकैरीश्योरप्रमाणवित् ॥९॥ अपनी रम-सेनाके साप उमका पीछा करने । भगवान् श्रीकृष्ण बौर परामनीके ऐपर्य, प्रमात्र पर प्रवत्स दूरं संभान्ती तुङ्गमासतां गिरिम् । काहान म पा ॥ ९ ॥ मात दूरतक दौड़नेके कारण दोनों माई कुछ पक से गये। अब वे याती प्रवर्षमाम्य भगवान् नित्पदा पत्र पर्पति ॥१०॥ अवर्षण पतपर घर गये । उस पर्वतका प्रणा नाम इसलिये पहा पा किया सदा ही-मेष गई गिरी निलीनाषामाय नाधिगम्प पई नृप । किपा करते थे॥१०॥ परीक्षित् ! जब पसन्कने देखा कि वे दोनों पारमें छिप गये और बहुत सनेस ददार गिरिमेपोभिः समन्तादमिमुत्सबन् ॥११॥ भी पता न पक्ष, तब उसने ईधमसे मरे र प्रश्न पर्वतके चारों मोर बाग लगाकर उसे सम्म दिपा ॥११॥ सव उत्पत्य तरसा दपमानतटामौ । चब म्ाबान्ने देखा कि पर्वतके भेर मन्ने मगे हैं दरुयोजनोचङ्गाभिपततुरधो समि तब दोर्मों माई नगम्भकी सेनाके घेरेको पवे ए ॥१२॥ बड़े बेगसे उस म्यारह पोमम ( चौधम्मस कोस) ठो मलक्ष्यमाणो रिपुणा सानुगेन यदूत्तमौ । | पक्तसे एकदम नीये परतीपर द वाये ॥ १२ ॥ राजन् । उन्हें जरासपने वपचा मसके किसी सैनिकने स्तपुरं पुनरापाती समुद्रपरिखां नृप ॥१३॥ देखा मही मोर वे दोनों माई महाँसे घसकर फिर अपनी समुद्रसे बिरी Ti द्वारकापुरी बसे वाये ॥ १३ ॥ सोऽपि हरपापिति मृपा मन्वानोपलकेशवो। सरासम्बने ठाठ ऐसा माम स्पा कि श्रीकृष्ण को पलमारुप्प सुमहन्मगवान् मागधो ययौ ॥१४॥ कमाम दो यम गये, और फिर अपनी बात पर सेना मैटाकर मापदेशको फम गया ॥ १० ॥ बानर्वाधिपतिः भीमान् रेवतो रेवती सुताम् । पह बात में तुमसे पहले ही ( मबम कम्पमें प्रमणा पोतिः प्रागद बलायेति पुरोदितम् ॥१५॥ मनी रेवती मामी कन्या इमानीकी प्रेरणासे पराम का पुका हूँ कि मानदेशके रामा श्रीमान् रैयतीं जीके साप म्याद दी।॥ १५॥ परीक्षित ! मगवान भगवानपि गोविन्द उपपेमे गुरुदा। श्रीरपण मी स्वयंवरमें बाये पर शिशुपाल और उस पक्षपाती शास्त्र मार नरपनियों को पर्वर राम दी भीष्मकमुता थियो मात्रा म्वयंवर ॥१६॥ सबके देखते-देते, असे गहाने सुधाका दरल किए वैसे ही विदर्भदेशकी पत्रकुमारी हरिमणीको । प्रमप्प बरसा राम शावादीमयपक्षगान् । माये और उनसे विवाह कर लिया। इस्मिणीनी हा भीमकमी करपा और ख मागसी मामीजीकाबला पम्पत मालोकानां नास्यपुत्र मुधामिर ॥l | पौ ॥ १६ १७ ॥ गोपाल रामा परीमित्म पूण-भगवन् ! हमने सुना भगपान् भीष्मम्मुना रुक्मिणी रुपिराननाम् । RF मगन् श्रीरणन भीष्मालम्निी परमाद गगन रिधानेन उपपेम इति श्रुतम् ॥१८॥ रुक्मिणीवी बफ हरण करके रामरिधिसे उन साप रिचर किपा पा ॥ १८॥ महाग! का मगरमणमिप्यामि प्लम्पामिततजम । पहनना पायपरम तेरी भगान् पोरन पा, ।

ब० ५२] दशम स्कन्ध ४५७ . मयामागधशावादीन् जित्या कन्यामुपाहरत्॥१९॥ | मरासन्ध, शास्त्र यादि नरपतियोंको जीतकर किस प्रकार रुक्मिणीका हरण किया । ॥१९॥ प्रम मावान् श्रीकृष्णकी लीलाओंके सम्बधर्म म्या करना है। स्वयं तो पवित्र ही, सारे जगत्का मल घो-वहाकर उसे मापन् रुप्मकथा पुम्पा माचीलॊकमलापहाः। भी पवित्र कर देनेवाळी है। उनमें ऐसी लोकोत्तर माधुरी है, जिसे दिन-रात सेवन करते उनपर भी नित्य नया- नया रस मिलता यता है । मन्या ऐसा कौन रसिक, कौन ममन है, नो उन्हें मुनकर तृप्त न हो को नु उप्रेत भृण्वान भुसको नित्यन्त ना ॥२०॥ जाय ॥ २० ॥ श्रीशुक उवाच श्री गुफदेवजी कहते हैं-परीक्षित् । महाराज भीष्मक विदर्मदेशके अधिपत थे। उनके पाँच पुत्र घासीद भीप्मको नाम विदर्भाधिपतिर्महान् । और एक सुन्दरी कन्या थी ॥ २१ ॥ सबसे वह पुत्रका स्य पञ्जाभवन् पुत्रा फन्मका च घरानना ॥२१॥ नाम था रुक्मी वीर चार छोटे थे—निनके नाम से प्रमश रुक्मरप, रुक्मबाहु हमकेश बोर रुममाली । पम्पप्रमो रुममरथो रुपमयारनन्तर । इनकी बहिन पी सनी रुक्मिणी ॥२२॥ नव उसने स्मफेखो रुपममाली रुक्मिण्येां स्वमा सती॥२२॥ मगवान् श्रीकृष्णके सौन्दर्य, पराक्रम, गुण और पेमकी प्रशंसा मुनी-जो उसके महलमें मानपाले अतिथि गोपभुस्प मुकुन्दस्य रूपषीर्यगुणभिय । प्राय गाया ही करते थे तब उसने यही निश्चय किया कि मगवान् कृष्ण ही मेरे अनुरूप पति हैं॥२३॥ बागवेगीपमानास्त मेने सरशं पतिम् ॥२३॥ भगवान् श्रीकृष्ण मी समझते थे कि 'रुक्मिणीमें म मुम्दर-सुन्दर लक्षण है, का परम बुदिम्ती, उदारता, को पुद्धिलमणौदार्यस्पशीलगुणाश्रयाम् । सौन्दय शोटस्वभाव और गुणोंमें भी अदितीय है। इमरिये रुक्मिणी ही मरे भनुम्प पत्नी है। बत हप्णय सम्मी मार्यो समुहो? मनो दधे ॥२४॥ भगवान्ने रुक्मिणी मीसे सिाह करनेका निभय विण ॥२०॥ रुक्मिगीमीये मार-पाच मी चाहते थे कि न्यूनामिच्छता दातुं कृष्णाम भगिनी नृप । हमारी बहिनका सिर श्रीकृष्णसे ही हो । परम्मु रुक्मी श्रीकणसे गा देश रमता पा, टसने उन्हें निगाह मता निवार्य प्णविद् मी अंघममन्पत ॥२५॥ करनेसे राक रिया और शिशुपाल्को ही अपनी बहिनफे याग्य पर समझा ॥२५॥ - कपन्यासिवापानी पदी दुमना मृतम् । जब परममुन्दरी परिमीका पद मास हुआ कि मेरा बा मा. उम्मी लिपारष साप मेग विह करना चाहता है, तब ये बात उगम हा गया । उनाने विविन्स्पाप्त निज कनिन् कृष्णाप प्रारिणो द्रतम् ६ बहुत कुछ माचीचरकर एक विश्वासराव या पायपपिरपाव।२ माने। मान २५८- ४५८ भीमद्भागवत [२०५२ दारका स समम्पेत्य प्रतीहार प्रवेशित । तुरंत प्रीकृष्ण के पास मेना ॥ २६ ॥ नब वे देवता दरकापुरीमें पहुँचे, तब द्वारपाठ उन्हें रानमइस अपश्मदापं पुरुपमासीन फायनासने ॥२७॥ मीतर ले गये। वहाँ जाकर ब्रामणदेक्ताने देखा कि वर्मा पुरुष मगवान् श्रीकृष्ण सोनेके सिंहासनपर विशनम घट्ना प्रमम्पदपस्तमवरुप निजासनात् । हैं॥२७॥ ग्रामों के परममत भगवान् श्रीकृष्ण E ब्राझणदेवताको देखते ही अपने वासनसे नीचे उत्तमम उपवेश्याईयात्रके यथाऽऽत्मानं दिवौकम ॥२८॥ धौर उन्हें अपने भास्नपर बैठाकर वैसी ही पूजा के जैसे देवतालोग उनकी ( मगवान्की ) किया कर तं मुक्तपन्तं विभान्तमुपगम्य सतां गति । हैं ॥ २८ ॥ आदर-सत्कार, कुशम प्रश्नके नन्तर व बामणदेवता सा-पी चुके, माराम विश्राम पाणिनाभिमृनन् पादावष्पग्रस्तमपृच्छत ॥२९॥ सतके परम बाध्य भगवान् श्रीकृष्ण उनके पास ग और अपने कोमल हासे उनके पैर सहमते हुए बड़े शमन कषिद् द्विवरभेष्ठ धर्मस्ते पद्धसम्मतः । भामसे पूछने लगे--॥२९॥ प्रामणशिरोमणे 1 बार पित्त तो सदा-सदा सन्तुष्ट रासा है न । वाफ पर्सते नातिक ण सतुष्टमनम सदा ॥३०॥ मफ्ने पुरुषोद्वारा स्वीकृत धमका पालन परनेमें को कठिनाई तो नहीं होती॥ ३० ॥ प्रामण परि मोड मंतुष्टो महि यतेंत प्रामणो मन केनचित् । मिस नाय, उसी सन्तुष्ट रहे और अपने धर्मका पाल करे, उससे गुत न हो, तो या सम्प्रेष ही सम्म अहीपमान म्वाद्धर्मात् स सस्यास्तिलकामधुक्॥३१॥ | सारी कामनाएँ पूर्ण कर देता है ॥ ३१ ॥ यदि इयर पद पाकर मी किमीको सम्तोष न हो तो उसे मुलं अमतुष्टाऽमरुलोफानाप्नोत्पपि मुरेपर । लिये एक लोकसे दूसरे लोकमें बार-बार मकना पड़ेगा पह की मी पन्तिसे 2 महीं सकेगा । परन्तु जिसने अचिनोऽपि सतुष्टः गत सङ्गिविज्वरः ॥३२॥ पास तनिक भी सपा-परिमाह नहीं है, और नो मर्स अवस्थामें सन्तुष्ट है, यह सब प्रकमसे ससाफ्रकि विधान बलाभमसृष्टान् साधून भूतापमान् । होकर मुम्बकी नौट साता है।॥ १२ ॥ जो सर्य प्रार हुई वस्तुसे सन्तोर कर मेसे हैं, जिनका सम्प निगदकारिण पान्तान् नमम्य शिरसामान ॥३३॥ आधारहित और शन्त र- उन ग्रामोंको में सर रहा से मधुर है और जो समस्त प्राणियोंके परम प्रितपी फपित्यारारं प्रसन राबता यस्स हिप्रना । मिर मुश्यकर नमस्कार करता हूँ ॥२३॥ पक्षमा रामाकी बोरसे at आपसगोंको सब प्रकारकी सुरिर म! मिसके राम्यमें प्रनाफा बसी सह पालम हो मुर्म धमन्ति विपय पान्यमाना मम प्रिय ॥३४॥ और वह मानन्से रहती है, वह रामा मुन्न बाली विप ॥३५॥ मामला ! बाप यहाँसे, पिन पनम्म्ममागना दुग निम्नार्पद परिछपा। हेतुमे और शिम बभिरारामे इतना पटिन भगत कार पहाँ पारे । परि मान विशर मपनीर माना प्रत्यगुण गव विकाय फग्याम त ||३५|| ना तो हममे करिये । हम नारी क्या सेर २०५२] दशम स्कन्ध ४५९ एवं सम्पष्टसम्प्रमो प्रामण परमेष्ठिना । करें । ॥३५॥ परीक्षित् ! लीन्यसे ही मनुष्यरूप धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने जब इस प्रकार प्राझण- देक्तासे पूछा, तब ठनोंने सारी बात कह सुनायी । लीलागृहीतदेहेन तस्मै सर्षमवर्णयन् ॥३६॥ इसके बाद वे भगवान् से रुक्मिणीबीका सन्देश करने छगे॥ ३६॥ रुक्मिभ्युकार रुक्मिणीजीने कहा-त्रिमुगनमुन्दर । मापके गुणोंको मो मुननेवालकि फाकि रास्ते उदयमें प्रवेश करके एक-एक माके ताप, जन्म-जन्मकी बटन युमा मृत्वा गुणान् सबनसुन्दर शृण्वता ते देवेतपा अपने रूप-सौन्दयको नो भेत्रपाले जीवोंक निश्मि कर्णविपरितोऽगसापम् । | मेत्रोंके लिये धम, अर्थ, काम, मोक्ष---चारों पुरुपाक फस एम स्वार्प परमार्थ सब कुछ है, प्रवण करके रूपं व्यां पक्षिमतामलिलार्थलार्म प्पारे अभ्युत ! मेरा चित्त लज्म, शर्म सव कुल मेकर बापमें ही प्रवेश कर रहा है ॥३७॥ प्रेमस्वरूप त्वय्यन्यताविपति चितमपत्र मे।।३७॥ स्यामसुन्दर ! चाहे निस टिसे देखें, कुन, शील, क्षमाय, सौन्दर्य, पिपा, अवस्सा, धन-धाम-समीमें का त्वा मुकुन्द महती कुलष्टीलरूप नाप वद्धितीय है, अपने ही समान है। मनुष्य नोकरें विपाचयोद्रविणधामभिरात्मतुल्सम् । | जितने भी प्राणी है, सबका मन बाफ्को देखकर शान्तिका अनुमान करता है, बामन्दित होता है। अब धीरा पति फुलवती न प्रणीत कन्या पुरुषभूपण ! बाप ही क्तमाइये-ऐसी कौन-सी फुल- पती, महागुणक्ती पौर धैर्यती क्या होगी, मो काले नृसिंह नरसोफमनोऽभिरामम्॥३८॥ वियाह के योग्य समप मानेपर आपको ही पसिके रुपमें बरण न करेगी ! ॥३८॥ इसीठिये प्रियतम ! मन वाफ- उन्मे भवान् सात पतिरा खाया को पतिरूपसे वरण किया है। मैं भापको बारमसमर्पण कर चुकी है। बाप अन्तर्यामी हैं। मेरे दपकी बात मात्माप्तिम भपतोय विमो विधेहि । वापसे छिपी नही है। भाप यहाँ पधारकर मुसे अपनी पसीके रुप नीकर कीजिये। कमलनयन ! प्राणाम ! मा पीरभागममिमर्शतु पैप भारा में नाप सरीसे वीरको समर्पित हो चुकी , भापकी गोमापुवन्भूगपतेर्मलिमम्मुमाक्ष ॥३९॥ भब से सिंहका भाग सियार छु जाय, कैसे कही शिपार निकटसे बाकर मेरा स्पर्श न कर नाय ॥३९॥ पष्टदचनियमववदेवाविप्र- भने पदि सम्म-सम्ममें न (ना, पावठी वादि खुद पमा ), इट ( पहादि करना), दान, नियम, रत गुषर्चनादिभिरल भगवान् परेशः । तथा देवता, प्रामण वोर गुरु वारि की पूनाके शरा भगवान् परमेशरफी ही वायफ्ना की हो और वे मुझपर माराधितो यदि गदाप्रम एत्प पाणि प्रसन्न हों, तो भगवान् श्रीकृष्ण वाकर मेरा पागिप्राण गृहात मे न दमपोपमुतादयोऽन्ये ॥४०॥ कर शिशुपाठ वपना दूसरा कोई मी पुस्प मे स्पर्श ४६० श्रीमद्भागवत प्रसप योभाविनि त्वममितोबाने विदर्भान् न कर सके ॥१०॥ प्रभो ! भाप पनित है । जिस दिन मेरा विवाह होनेवाला हो उसके एक दिन पहले गुप्तः समेत्य पृतनापतिभि परीतः । भाप हमारी राजधानीमें गुप्तरूपसे या चाइये और फिर निर्मप्य चैधमगधेन्द्रपल बड़े-मरे सेनापतियोंके साप शिशुपाम तपा नरामम्पकी सेनाओंको मप गळिये, तहस-नहस कर दीजिये वोर मा राक्षसेन विपिनोवह नीर्यवरकाम्॥४१॥ बलपूर्वक राक्षसविधिसे बीरताका मूल्य देकर मेल पाणि- प्राण कीनिये ॥ ११॥ यदि बाप सोचते हों कि अन्त पुरान्तरचरीमनिहत्य कन्छ- 'तुम तो मत पुरमें भीतरके मनाने महलों में पारेके स्स्वासरहेकथमिति प्रबदाम्पुपायम् । क्षेदर रहती हो, तुम्हारे भाई-बन्धुवोंको मारे बिना में तुम्हें पैसे ले मा सकता है, तो इसका उपाय म वापको पूर्वेपुरस्ति महती लदेवियात्रा बतलाये देती है। हमारे फुलका ऐसा नियम है कि | विवाहके पहले दिन कुलगीका दशन करनेके मिसे यस्यां वहिर्नवनिरिजामुपेयात् ॥४२॥ एक महुत बगी यात्रा होती है, मुख्स निकलता है- मिसमें विवाही मानेयमी कन्याको दुरहिनको नगरके यस्पास्पिइमरजास्नपन महान्यो गाहर गिरिनादेवीके मन्दिरमें जाना परता है ॥ १२ ॥ कमलनयन ! उमापति मगान् शङ्करके सम्पन बो-से पाम्छन्त्यमापतिरिवारमसमोऽपहत्यै । महापुरुष भी बारमयुनिके लिये वापके घरणकाकी पूलसे स्नान करना चाहते हैं। यदि म बापकाप पर्मम्मुजाप न लमेम भवत्प्रसाद प्रसाद, वाफ्की र चरणा नहीं प्राप्त कर सकी है मतदारा शरीरको प्रसाकर प्राण र गी । पारे बमामसन् प्रवरुवा छतमन्मभिःस्सात्॥४३॥ | उसके लिये सैकड़ों बम क्यों न लेने परें, कमी-न-कमी तो भापका प्रसाद माश्य ही मिलेगा ॥ १३ ॥ प्रामणवेषताने कहा-पशशिरोमणे! यही रुक्मिणी के मत्पन्त गोपनीय सम्देश मिमें लेकर मैं बापके इस्पेते गुमदिशा पदुदेव मयाप्रताः। पास भाया । इसके सम्बन्धमें जो कुछ करना हो, विचार कर मनिये और तुरंत ही उसके अनुसार कार्य विमृश्य फलं पचात्र क्रिया तदनन्तरम् ॥४४॥ कीजिये ॥ १९ ॥ पापण उपाय इति भीमनगरसे महापुरमे पारमईस्पा संहितापो दशमस्काउचरार्षे रक्मिणपुशप्रस्तावे दिपञ्चाशचमोऽम्पाय ॥ ५२ ॥ अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय सक्मिणीहरण म०५३] दशम स्कन्ध ४६१ प्रगम पाणिना पागि प्रहसमिदममवीत् ॥ १॥ सुनकर अपने हायसे ग्रामणदेवाका हाय पकर लिया और हंसते हुए में बोले ॥१॥ मीभगवानुमान भगयान् भीरुप्णमे कहा-मणदेवता । जैसे विदर्भराजकुमारी मुझे चाहती है, पैसेही में भी उन्हें चाहता है। मेरा चित्त उन्हीमें गा राता है। कहाँ- तयाहमपि तपिचो निद्रा च न लमे निश्चि । तक कई, मुझे रात के समय नदितक नहीं भाती में नानता हूँ कि ममीने पश मेरा विवाह रोक दिया मदार रुक्मिणा पान्ममोबाहो निवारितः ॥२॥॥२॥ परत ब्राह्मण देवता ! आप देखियेगा, जैसे एफपियोंको मथकरएक-दूसरेसे गरकर मनुष्य सामानयिष्य उन्मध्य राजन्मापसदान् मधे । उनमेंसे बाग निकाल लेता है, वैसे ही पुदमें उम माम- घारी क्षत्रियकुलमायाको तहस-मास करके अपनेसे प्रम करनेवाली परमसुन्दरी राजकुमारीको में निकाल मस्परामनवपालीमेपसोऽग्निशिखामिष ॥३॥ पाऊँगा ॥ ३ ॥ भीभुक उपाप भीषुकोपजी कहते है-परीक्षित् ! मधुसूदन भी- कृष्णने या मानकर कि रुक्मिणीके विवाहकी सम्म परसों उमाप प निकाय रुक्मिप्पा मधुरन्दनः । रात्रिमें ही है, सारपीको बहा दी कि दाहक वनिक रया संयुज्यतामाशु दारुकत्याह सारथिम् ॥ ४ ॥ मी विम्मान करके रप मोत भवो' ॥ १ ॥ दास भगवान्के रपमें शैम्प, सुप्रीम, मेघपुप्प और बसाइक स चा शैम्पसुग्रीनमेपपुप्पालाएको । नामके चार घोड़े नोतकर उसे में पाया और हाय मुक्कं रथमुपानीय तस्सी प्राञ्जलिरग्रवः ॥ ५॥ नोकर भगवान्के सामने समाहोगया ॥ ५॥ शूरमम्दन श्रीकृष्ण प्रामणदेवताको पहले रफ्पर घड़ाकर फिर बाप मारुम स्पन्दनं शौरिदिअमारोप्य सूर्णगे। भी सबार ए वीर उन शीगामी योगोंके वाय एकही पानचदिकराण विदर्भानगमस्यैः ॥ ६ ॥ रातमें नामर्ददेशसे विदर्मदेश मा पहुंचे ॥६॥ राषा स टिनपतिः पुत्रस्नेहमर्श गतः । फुण्डिमनरेश महाराय भीष्मक अपने बड़े मके समीके स्नोपश अपनी पत्मा शिशुपाम्को देने के लिये शिशुपालाप खां कन्पा दास्यन् कर्माप्पफारयत्॥७॥ विवाहोत्सबकी तैयारी कर रहे थे ॥७॥ नगरके गजपप, चौराहे वा गमी-श्चे मार-मुहार दिये गये थे, उनपर पुरं सम्मष्टसंसिक्तमार्गरम्याचतुप्पथम् । छिनकार किया जा चुका था। चित्र-विचित्र, रंग-रिंगी, चित्रमनपाकाभिस्तोरणैः समलङ्कृतम् ॥ ८॥ छोटी-बड़ी परियों और पताकाएँ ष्णा दी गयी थी ! पोरन बाँध दिये गये थे॥८॥ इति श्री-पुरुष पुष्प सम्म धमास्पाभरणपिरजोऽम्बरमूपिते माछा, पर, हप-मुखेन, चन्दन, गहने बोर निर्मल बोसे शुष्ट स्त्रीपुरुपैः श्रीमगृऔरगुरुपिते ॥ ९॥ सजे हुए थे। कि सुन्दर-सुन्दर परेमसे वगरके पकी सुगम फैल रही पी॥९॥ परीक्षित् ! राना मीमकन पिचर पिन् देवान् समम्पर्य विप्राय विपिपन्नृप । और देवतामोंका विपिर्तक पूजन करक प्रायोको भोजयित्वा यथान्मार्ग वापयामास मालम् ॥१०॥ मोनन कराया और नियमानुसार सस्तिवाचन भी ॥१०॥ - ४६२ भीमनागपत .. मुस्नाता मुदती कन्या कसफौतुकमालाम् । मुशोमित दोसोवाळी परमसुन्दरी रामकुमार रुक्मिणीनीको नाम कराया गया, उनक हामि म्मक आतांशुकयुग्मेन भूपियां भूषणोत्तमैः ॥११॥ सूत्र कहण पहनाये गये, कोहबर मनाया गया, दो नो | मये कम तने पहनाये गये और वे उत्तम उत्तम वामपने घल सामर्ममुर्मर्वया रक्षा वियोसमा । से विभूषित की गया ॥ ११ ॥ श्रेष्ठ ग्रामोन सम पुरोहितोऽपविद् वै जुदाय प्रशान्तये ॥१२॥ अफ् और यमुर्वेदके मोसे उनकी रक्षा की और वर्म | वेदके विद्वान् पुरोहितने ग्रहशान्तिके रिये हम्न किया ।१२ हिरण्यरुप्पपासांसि तिलांग गुरमिश्रिवान् । राना मीमक कुरूपरम्परा और शाखीय विधियकि वो प्रादा धेनुप विप्रेम्पो राजा विषिविदां वर॥१॥ तिन और गोर ग्रामों को दी ॥ १५ ॥ नानकार ये । मोंने सोना, चाँदी, क्स, गुड मिसे एवं दिपती रामा दमघोपः सुताय वै । इसी प्रकार चेदिनरेश राना दमघोभने मी वपने शिशुपालके लिये मन्त्र ग्रामोसे अपने पुरके फारयामास मन्त्रमः सर्वमम्पुदमोचितम् ॥१४॥ सम्झवी मङ्गलस्य कपये ॥ ११ ॥ इसके करपे म मदप्पद्विर्गबानीक: स्पन्दनेहेममालिभिः। जुवाते हुए हापियों, सोनेकी मास्मोंसे सजाये रखें पैदमें तपा पुरसबारोंकी चतरङ्गिणी सेमा साप से पत्यबसालैः सैन्य परीतः इष्ठिनं ययौ ॥१५॥ कुष्टिमपुर मा पधि ॥ १५॥ विदराब भीमक भागे धाकर ठमका सागव-सत्कार वीर प्रपाके व तपे विदर्भाधिपति समम्पेत्याभिपूज्य च । बर्षन-पूजन किया । इसके बाद सम लोगोंको पहले निवेशयामास सदा कल्पितान्पनिषेचने ॥१६॥ ही निश्चित किये हुए उनमामि वामन्दपूर्णफ म दिया ॥१६॥ उस बारातमें शाम्प, जरासम्ध, दान सत्र शालो जरासन्धो दन्तवस्त्रो विद्रपः । विवरण बौर पौडक नादि पाम्के सातों मि नरपति माये थे ॥ १०॥ ये सब राजा श्रीकृष्ण आजग्मपैयपक्षीया पौरफापा सहसमः ॥१७॥ | मामनीके विरोधी थे वीर राजकुमारी रुक्मिणी रिक्षापार को ही मिले, इस विचारसे पाये थे। सम्हनि च कृष्णरामदिपो यचा फन्या चैपाय साधितुम्। अपने मनमें प पहलेसे ही निधप कर स्थाप पपागप हरेत् रुप्पो रामापैर्यदुर्मितिः ॥१८॥ यदि श्रीकृष्ण बत्माम बादि यदुपशियोंके साप बाम कत्याको हरनेकी पेय करेगा तो हम सब मिय योत्स्पाम संहतास्तेन इति निषितमानसाः । | उससे लगे। यही कारण था कि उन यनावोंने पर्न अपनी पूर्व सेमा और रप, मो, हामी बादि मी कर भामग्मसमा सर्ने सममलवाहनाः ॥१९॥ साप से छिपे थे ॥ १८ १९ ॥ मुत्यैतत् भगवान् रामो विपक्षीयनपोपमम् । विपक्षी राबानोंकी इस पारीका पता भाषण बराममीको ग गया और जब उनि पइ मुना। भैया भीषण कसे ही यमकुमारीका हरण करने कृष्णं पैक गर्व हत कन्या फलाशिवः ॥२०॥ लिये चले गये हैं, तब उन्हें यहाँ माई-गोकी । १ तिरा ।१ मिान। ।

व० ५३] दशम स्कन्ध ४६३ , - बलेन महता सार्घ भ्रावस्नेहपरिप्लुत । वाशश ई॥२०॥ यपपि वे ग्रीकृष्णका मल-विक्रम जानते थे, फिर मी भ्रातृस्नेइसे उनका इदय मर भाया, मे तुरंत ही हापी, घोड़े, रप और पैदळेकी पदी मार तरित कुण्डिन प्रागाद् गजाधरयपचिभि ।।२१॥ चतुरक्षिणी सेना साप स्कर कुण्डिनपुरके लिये चल पर॥२१॥ भीष्ममन्या परारोहा काहन्त्यागमन हरे । इधर, परमसुन्दरी रुस्मिणीजी मगवान् श्रीकृष्णके शुगमनकी प्रतीक्षा कर रही थी। उन्होंने देख्य श्री- प्रत्पापचिमपश्यन्ती दिबस्पाचिन्तयत्वदा ॥२२॥ कृष्णकी तो कौन कहे, ममी बामणदेवता भी नहीं मोटे ! वे परी चिन्ताम पर गया, सोचने लगीं ॥२२॥ अहो! यहा त्रियामान्तरित उदाहो मेऽपराधम । बम मुझ समागिनीके विवाहमें केवल एक रातकी देरी है। परन्तु मेरे नोक्नसर्वम्य कमलनयन भगवान् बब नागच्छत्यरविन्दायो नाई दम्पत्र फारणम्। भी नही पधारे । इसका क्या कारण हो सकता है, कुछ निभय नहीं माल्म पदसा । यही नहीं, मेरे सन्देश से सोऽपि नापतेऽयापि म देशहरो द्विज ॥२३॥ नानेवाले ब्राह्मणदेवता भी तो नमीतक नहीं बैटे ।२२। इसमें सन्देह नहीं कि भगवान् श्रीकृष्णका समप परम अपिमय्मनवपास्मा दृष्ट्या किनिन्जुगुप्सितम्। शुद्ध है और विशुद्ध पुरुष ही उनसे प्रेम कर सकते हैं। उनोंने मुसमें कुछ-न-कुछ मुर्गा देखी होगी, तभी मत्पाविग्रहणे नन नामाति हि सतोपमः ॥२४॥ तो मेरा हाप पकानेके रिप-मुझे स्वीकार करने के दुर्मगाया न मे घाता नानुक्लो महेश्वरः । लिये उपत होकर ये यहाँ नहीं पधार रहे है॥२॥ ठीक है, मेरे माम्य ही मन्द ! विषाठा और मगवान् देवी पा विमुखा गौरी रुद्राणी गिरिजा सती॥२५॥ शार भी मेरे अनुकूल नहीं जान पड़से । यह भी सम्भव है कि स्वफ्नी गिरिराजकुमारी सती पावतीनी मुमसे एवं चिन्तयती पाला गोविन्दरतमानसा । अप्रसन्न हो ॥ २५ ॥ पीक्षित् ' रुक्मिणीमी इसी उघर-युनमें पड़ी हुई थी। उनका सम्पूर्ण मन और न्यमीलयत कालमा नेत्रे चामुफलाइले ॥२६॥ उनके सारे मनोभाव मळमनघोर भगवान्ने चुरा लिये ये। ठमोंने उम्हाँको सोचते-सोचते 'वमी सम्प है। एवं वमा प्रतीषन्त्या गामिन्दागमन नृप । ऐसा समझकर अपने मॉस्मरे नेत्र बन्द कर लिये ॥२६॥ परीक्षित् ! इस प्रकार रुक्मिणीना मगवाम् श्रीरणके बाम सरसजो नेप्रमस्फरन् प्रियमापिण ॥२७॥ मुभागमनकी प्रतीक्षा पर रही थी। उसी समय उनकी वायी जॉप, मुना और नेन परफने एगे, जो अध रुप्णविनिरिए स एव द्वितममम । प्रियदमके आगमनफा प्रिय संवाद सूचित कर रह ये ॥ २७ ॥ इतनमें ही भगवान् श्रीरणके भेजे हुए प्रामणदेवता आ गये और ठहोंने अन्न पुग्में राम अन्त पुरचरी देवी राप्रपुत्री ददर्श ॥२८॥ कुमारी रुक्मिणीका इस प्रकार टेम्य माना काई प्यान मान देवीहो॥२८॥ मनी रुस्निगमान देगा मामग- सा से प्राटबदनमम्पग्रामगति सती । देवताका मुस प्रश्रिा है। टनक मन और चहरेपर ४६६ श्रीमहागपत [अ०५३ नानोपहारपलिभि प्रदीपापलिभि पृथक् ॥४७॥ } प्रकारके मैवेष, मेंट और आरती आदि सामम्पेिसे अम्बिकादेवीकी पूजा की ॥ १७ ॥ तदनन्म उप विप्रनिय पतिमवीम्तया है समपूजयत् । सामप्रियोसे तथा नमक, प्रश, पान, स्टसूत्र, फर कर लवणापूपतामूलकप्ठसूत्रफलेक्षुभि ईससे मुहागिन बामणियोंकी मी पूना की ॥ १८ ॥ ॥४८॥ तव बामणियोंने उन्हें प्रसाद देकर माशीर्वाद दिये वर तस्पै त्रियम्ता प्रइद् शेषां युपजुराधिप । दुलहिनने प्राणियों और माता अम्बिकाको नमस्कार कर प्रसाद ग्रहण किया ॥ १९॥ पूजा-मकी साम्पा देख्य नमम शेपा प जगृहे गए ॥४९॥ विधि समाप्त हो जानेपर उनमि मोना तो रिया वीर मुनिव्रतमथ त्यक्त्वा नियकामानिफागृहात् । एलनटित अंगठीसे बगमगाते हुए फरकारके एक सहेलीका हाप पकाकर ये गिरिमामन्दिरसे बात प्रगम पाणिना मृत्यां रसमुद्रोपशोभिना ।।५०॥ निकासी ॥ ५० ॥ वां दवमायामिव पीरमोहिनी पीशित् ! रुक्मिणीची मागन्की मायके मम ही पड़े-बरे धीर-पीको मी मोहित कर सेनेवारी या सुमभ्यमा कुण्डलमपिताननाम् । उनका कटिमाग बात ही सुन्दर और पस्य प मुखमण्डसपर कुम्हरस्टों की शोमा जगमा सी ची। श्यामा नितम्बार्पिवरसमेखला किशोर और तरण अास्साफी सुम्निमें स्थित पी नितमापर गड़ाऊ करपनी शोमायमान हो बीपी म्पजस्तनी अन्तलहितेषणाम् ॥५१॥ बक्षस्थल कुछ उमरे हुए थे और उनकी शिस्टक हुई बोके कारण कुछ चाल हो रही थी ॥५१॥ शुचिमिा पिम्मफलाधरपुति उनके हम्टोपर मनाहर मुसकान थी। उनके दोनों पोत पी तो कुत्दपीके सम्पन परम उम्मक, परत फके हर कुंसके समान बार-यम होयेंकी बमकसे शोणाममानद्विज फड्मताम् । उसपर मी मासिमा नागपी थी। उनके पायोंके पदेश फलईसगामिनी चमा एपे और उनमें सगे हुए छोटे-मोरे पुर स्नान-नमुन कर रहे थे। परने सुकुमार परग- विस्कानपुरधामनोमिना कमोंसे पैम ही रावईमकी गरसे चल रही । उनकी यह पर्व ela raR हो बाये ए गायो पिलास्य पीरा समुहः समागता पशमी पर मग मोहित हो गये । बामदेषने ही मगानका काप सिर परनके रिये पान बोंसे उमस यमम्बिनम्न स्वास्छयारिता ॥५॥ एप नर कर दिया ।। ५२ ॥ मम्मिगीनी इस प्रकार यो बास्य त नृपनयनदारदाम इम उपमा पाप्राय दान मद-मन्द गनिमे पाया मान् श्रीगणपर भरना गरिश मौन्दर्य नियम माटानगरलपतम उन्मिताया । पर ही पार र उनकी पूरी मुमरान १THIोभाम् । पदा पलन्ती २०५४] दशम स्कन्ध ६६७ पेतु धितो गबरपाधगता विमूढा तपा लजीली चितकनपर वपना चित एमकर वे बड़े- मड़े नरपति एवं वीर इतने मोहित और बेहोश हो गये यात्रा लेनारयेऽर्पयती स्वशोभाम् ॥५३॥ कि उनके हाथोंसे बस-शस्त्र छुटकर गिर पड़े और घे सैव पनवलपती चलपयकोशी सय भी रप, हापी, तया घासे घरतीपर मा गिरे ॥ ५३ ॥ इस प्रकार रुक्मिणीनी भगवान् श्रीकृष्णके प्राप्ति सदा भगवतः प्रसमीक्षमाणा । शुमागमनकी प्रतीक्षा करती हुई अपन कमटकी कहीके उत्सार्य पामफरमरलकानपाङ्ग समान सुकुमार घरोंको यात ही धीरे-धीरे भागे बड़ा रही थी। उनोंने अपने बायें हापकी अंगुलियोंसे प्राप्तान् प्रियैवत नृपान दाशेऽच्युत सा ॥५४॥ मुसकी ओर मकती हुई अडफे हटाया और वहाँ बाये हुए नरपतियों की बोर मनीसी चितानसे देखा । उसी वो राजकन्या रपमारस्वती समय ठमें श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्णके दशन इए ॥५१॥ रामकुमारी रुक्मिणीनी रपपर पाना महार कप्पो द्विफ्ना समीपताम् । | ही चाहती थी कि मगवान् श्रीकृष्णने समस्त शत्रुओं के र समाराप्प सुपर्णलक्षणे | देखते-देखते उनकी भीरमेंसे रुक्मिणीनीको ठठा लिय्य और उन सैकद रानाओंके सिरफर पौष रप्तकर ठमें राप्रन्पचक्र परिभूम माधवः ॥५५॥ अपने उस रपपर बैठा लिया, जिसकी चमापर गरुडका ससो ययौ रामपुरोगमैः शनै चिरलगा मा पा ॥ ५५ ॥ इसके बाद जैसे सिंह सिपाकि वीचसे अपना माग ले सगालमन्यादिप भागदरिः ॥५६॥ रुक्मिणीभीको लेकर मगवान् श्रीकृष्ण कामनी आदि यदुवंशियोंक साप मासे चल पड़े॥५६ ।। उस समय तं मानिन स्वामिभयं यावर्य मरासन्यके पशवी भमिमानी राजाओंको बफ्ना यह बड़ा भारी मिस्कार और यश-कीर्तिका नाश सहन म परे खरासंधवा सेहिरे। हुआ। वे सबके सा चित्रकार करने लगे-'महो, अहो विगमान् यम आयन्वनां हमें विकार है। भाम हमलोग घनुप धारण करके रखे ही रहे और ये ग्वाले, नेसे सिंहके मागको हरिन ले गोपैति केसरिणा मृगरिष ॥५७।। बायें उसी प्रकार हमारा सारा यश छीम ले गये ॥५७॥ जाय, वैसे ही इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारम्ईस्यां संदिता दामस्करय उता रुक्मिमीकरण माम त्रिपाशत्तमोऽध्याय ॥५३॥ अथ चतु पञ्चाशत्तमोऽध्याय TOपाल के साथी राजामौकी भोर रुपमीकी हार तथा भीरप्प रुक्मिणी-यिपाह भीम उवाच मी तुकयेषजी कहते हैं--पीशिव इस प्रकार कह-सुनकर सब के सब राजा फ्रोषसे बागवला हो इति सर्षे सुमरग्धा पाहानाम दशिता ठठे और काय पहनकर अपने-अपन बाइनोंपर सवार १ पेभिए ।

४६४ भीमद्भागवत [२०५३ आलक्ष्य लक्षणाभिना समपच्छच्छुचिमिता॥२९॥ | किसी प्रकास्की घबबाहर महीं है। ये उनै देखकर धक्षोंसे ही समझ गयी कि मगवान् श्रीकृष्ण न गये । तसा आवेदयत् प्राप्त सशस यदुनन्दनम् । फिर प्रसस्तासे लिखकर उन्होंने ग्राममदेवतासे म ॥ २९ ॥ सब प्रामणदेक्ताने निवेदन किया कि उक्तं च सत्यवचनमात्मोपनपनं प्रति ॥३०॥ मूरि प्रशंसा की । यह मी वतमया कि राजकुम्परीली ! 'भगवान् श्रीरण यहाँ पधार गये है। और उनकी मूरि वाफ्कोले बानेकी उनोंने सस्प प्रतिहा की है॥३०॥ समागतं समानाप पैदर्भी इटमानसा । मगवान्के शुमागमनका समाचार मुमकर रुक्मिणीयीका दय नामम्दातिरेकसे मर गया। महोंने इसके बदले में न पश्यन्ती प्रामणाय प्रियमन्पमनाम सा ॥३१॥ मामणके लिये मगवान्के मतिरिक्त मौर कुछ प्रिपन देखकर उनोंने केवल नमस्कार कर लिया । वह जगतकी समम ममी बामणदेवताको सौंप दी ॥११॥ प्राप्तौ भुत्वा स्वदुहितुरुद्वाहप्रेक्षणोत्सुफो । राणा मीमकने पुना कि भगवान् श्रीकृष्ण और अम्ययार्पघोषेण रामकृष्णौ सापैः ॥३२॥ माटरामदी मेरी पत्यका विवाह देखने के लिये उरसकरा- वश यहाँ पधारे है । सब यही, मेरी वादि माजे बजगावे मधुपर्कमपानीय पासांसि विरबासि सः । ए पूनाकी सामग्री लेकर उन्होंने उनकी अगवानी की ॥ ३२ ॥ पौर मधुपक, मिर्म का तप उत्तम उपायनान्पभीष्टानि विपिवत् समपूजयत् ॥३३॥ | उत्तम मेंट देकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की ॥ ३३ ॥ भीमाची गो मुद्धिमान थे। मगवान् के प्रति उनकी तपोनिषेशन भीमदुपकल्प्य महामतिः । पनी भकिपी । उन्होंने मगवान्को सेना और सापियोंकि सहित समस्त सामग्रियोंसे युङ निवाससानमें बरामा ससैन्पयोः सानुगयोराविध्य विदघे यथा ॥३४॥ | और उनका यपावन वातिप्प-सस्कम किया ॥ ३४ ॥ विदर्मपन मीणालीके यह निमन्त्रण मितने रामा बामे एष राक्षो समेतानो पपावीय पवाषय । थे, उन्होंने उनके पयाम, मस्सा, म र धनके अनुसार सारी इच्छित पस्तुएँ देकर सबका खूब सरकार यथावलं पाविच सर्वेः कामैः समईयत् ।।३५॥ किया ॥ ३५ ॥ विश्भदेशके नागरिकोंने नव मुना कि सम्ममागवमाकर्प विदर्मपुरवासिन । भगवान् श्रीहाण यहाँ पधारे है, तब वे लोग भगवान्के निवासस्थानपर बाये और अपने सपनोंकी धमलिमें भर आगत्य नेपाञ्जलिमिः पपुस्त मुस्लपइयम् ॥३६॥ मरकर उनके बदनारविन्दका मधुर मरम्द-रस पान करने लगे ॥ ३६॥ वे वापसमें इस प्रकार बातचीत अस्मैव मार्या मवितुं रुक्मिण्पईति नापरा । यरते थे---सिम्मी इन्हीकी बहिनी होनेके योग्य है, नौर पे परम पवित्रमर्ति श्याममुन्दर रुक्मिणी के ही भसावप्पनयपारमा मैम्पा समुचित पति ॥३७॥) योग्य पति है। दूसरी को इनकी पनी होनेके पोम्प महा ॥ ३७॥ पदि हमने अपने समम्म या इस किसिमुपरित यमस्तन तटस्त्रिलोकात् । गगममें पुश भी सकर्म किया हो, तो प्रिोक-रिपाता अ०५३] दशम स्मन्म ४६५ अनुगृहातु गृहात पैदाः पाणिमच्युत ॥३८॥, मगवान् हमपर प्रसन हों और ऐसी क्या करें कि श्याम सुन्दर श्रीकृष्ण ही विदर्मराजकुमारी रुक्मिणीनीका पाणिग्रहण करें। ॥२८॥ एर्ष प्रेमकलापद्धा पदन्ति स पुरौकस । परीक्षित् 1 निस समय प्रम परपश होकर पुरवासी | लोग परस्पर इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, उसी कन्या चान्त पुराद् प्रागा भटैगुप्ताम्पिकालयम्।३९ समप रुक्मिणीमी भन्स पुरसे निकलकर देवीनीके | मन्दिरके लिये थी । महुत-से सैनिक तमकी रक्षामें पश्यां विनिर्पनौ द्रष्टुं भवान्याः पादपलाम् । नियुक पे॥ ३९॥ वे प्रेममनि श्रीकृष्णचन्द्र के धरण- सा चानुप्पामती सम्परु सान्दचरणाम्मुन्नम्॥४०॥ कमलोंका चिन्तन करती मुई मगवती मवानीके पाद पछयोंका दर्शन करमेके मिये पैदल ही चरी || १०॥ पक्वाधाभि' सार्घ सस्तीभिः परिवारिता । ये साय मौन पी वौर माताएँ तपा सही-सहेमियों सम बोरसे उनें घेरे हुए पं। शूरवीर राजसैनिक हार्पोमें गुप्ता रावभटैः भूरै समरुपतापुषैः । | बम-शम उठाये, काच पाने उनकी रक्षा कर ये थे। मृदङ्गपणवास्तूयमेर्यम अनिरे ॥४१॥ उस सम्स्य मृदा, शक, दोस, तुरही बौर मेरी वादि माजे मज रहे ये ॥ ११॥ पहुत-सी बामणपत्नियों नानोपहारपलिभिरिसम्पा सासष्ठः। पुण्याला, चन्दन मादि प्रगन्ध दम्प भीर गहने कामोंसे सम-भनकर साफ-साथ चल रही थी और अनेकों सग्गन्धयनाभरणैर्दिवपत्न्प' खलङ्कृताः ॥४२॥ | प्रकारके उपहार तथा पूजन थादिकी सामग्री कर सहस्रों श्रेष्ठ वायगनाएँ भी साप पी ॥ १२ ॥ गये गायन्तम स्तुवन्तम गायका बापवादकाः । मासे माते थे, ज्वाले बाजे बनाते घग्ते पे और सूत, मागम तथा मंदीजन तुमहिनके चारों वोर नप-नयकार परिचार्य वर्ष बम्मः स्तुमागफ्यन्दिन ॥४३॥ | करते-रिद बसानते जा रहे थे||१३||देवीपीके मन्दिर में पहुंचकर रिमणीनीने अपने कमाके सदश सुकोमल बासाथ देवीसदनं धौतपादकराम्मुजा । हाप-पैर धोये, भाचमन किया। इसके बाद बाहर-मीतरसे पवित्र एवं शान्तमावसे युक्त होकर अम्बिकादेवीके उपसभ्य भूपि शान्ता प्रविक्षाम्पिकान्तिकम्।४४। मन्दिरमें प्रवेश किया ।। १५ ।। बहुत-सी विधि-विधान मानमेवाली मसी-मूही मामणियों उनके साप की। वो ये प्रपयसो बाला विधिमा विप्रयोपित । उन्होंने मायन् शाहरकी भगिनी मवानीको और मगवान् शहरमीको भी रुक्मिणीनीसे भवानी पन्दपाश्चकुर्मवपली भवान्विसाम् ॥४५॥ करवाया ॥ १५॥ रुक्मिणीशीने माक्तीसे प्रार्थना की- भम्विका माता ! भापकी गोदमें बैठे पुए आपके प्रिय नमस्ये त्याम्बिकेभीक्ष्णं वसन्तानयुतां शिवाम् । पुत्र गणेशमीको साधापको में बार-बार ममस्कार | करती है। आप ऐसा पाशीर्वाद दीपिये कि मेरी म्याद पविर्मे भगवान् कृप्पस्तदनुमोदताम् ॥४६॥ अमिलापा पूर्ण हो ! भगवान् श्रीकृष्ण मेरे पति हो। ॥ १६ ॥ इसके बाद रुक्मिणीनीने मस, गन्ध, अहिर्गन्धाधतेपवास समास्यम्पणैः । असत, धूप, रस, पुप्पमाला, हम, धामपण, बनेको १ रामविकत्यभि ।२ दोपर्वा । प्रणाम ४६६ श्रीमद्भागवत [म. ५३ नानोपहारपलिमि प्रदीपावलिमि पृथक् ॥४७॥ प्रकारके नैवेद्य, में और आरती मादि सामग्रियों से अम्बिकादेवीकी पूजा की ॥ १७ ॥ तदनन्तर उन विप्रलिम पतिमतीस्तपातः समपूजयत् । सामग्रियोंसे तमा नमक, पू, पान, कण्ठसूत्र, फल कोर लषणापताम्मलकण्ठस्त्रफलेक्षुभिः ईससे सुहागिन बामणियोंकी भी पूना की ॥१८॥ ॥४८॥ तव बामणियोंने उन्हें प्रसाद देकर भाशीर्वाद दिये मे सस्पै स्त्रियस्ताः प्रद शेपी गुपुमुराधिप । दुलहिनने ग्रामणियों और माता बम्पिकाको नमस्कार करके प्रसाद प्रमण किया ॥ १९ ॥ पूमा वकी साम्पो देव्यै नमम शेषां च बगृहे मधुः ॥४९॥ विधि समाप्त हो नानेपर उनहोंने मौन का तोड़ दिया और | रस्नमटित अंगूठीसे नगमगाते हुए फरफमके काय एक मनिग्रसमय पात्वा नियकामाम्बिकागृहात् । सहेलीका हाप पारकर ये गिरिनामन्दिरसे बाहर प्रगृम पाणिना मृत्ा रममद्रोपचोमिना ॥५०॥ निकले ॥ ५० ॥ । तां देवमायामिव बीरमोहिनी परीक्षित ! रुक्मिणीची मगगनकी मापाके सपन ही बडेपो धीर-गीरों को भी मोहित कर देनेवारी की। सुमम्पमा इप्रलमण्डिखाननाम् । उनका कटिभाग बहुत ही सुन्दर और पतला पा मुसममाम्पर कुरकी शोभा नगमन सी की। श्यामा किशोर धौर तरुण अस्माकी सन्धिमे स्थित पी नितम्बार्पिसरममेम्पला नितम्मपर नहाऊ करधनी शोभायमान हो खीर म्पन्नत्स्तनी इन्तलक्षिसेक्षणाम् ॥५१॥ पक्ष पर कुछ उमरे गए थे और उनकी शि मकर ईवरकों के कारण कुछ पत्रल हो रही पी॥ ५१ शुधिसिता रिम्पफलाधरयुति उनके होयेपर मनोहर मुसकान पी। उनके दाने पोत दी तो फुन्दकर्मके समान परम उम्र, परम पो ए कुंदन के समान माह होठोंकी धमक झोणायमानदिबन्दमताम् । उसार मी सानिमा भागपीपी। उनके पारेके पापने धमक रहे थे और उनमें लगे हुए बेटे थे पुन पदा पलन्ती फलाईसगामिनी स्नान स्नान कर रहे थे। में अपने सुकुमार परग शिअत्कलानपुरधाममोमिना कम्पोंसे पैदल ही रासकी गरिसे पा रही थी उमकी वह मर्म एवि सम्र हो भाये पर बड़े- विलोक्य पीस मुल समागवा यशम्बी वीर सर मोहित हो गये । कामदेवने ही भगवानका कार्य सिद्ध करने के लिये मरने वालों से उनका पम्बिनम्नस्तरछयादिता ॥५२॥ एप वर्जर कर पिया || ५२ ॥ रुस्मिगीभी इस प्रकार यो पीस्प से नपतपम्नदारदाम इम उगम पात्राव मान मन्द-मर गलिसे बना मान् श्रीरणपर भरमा राशि-शि मौम्य नियम पाराग्लामतपेनम उन्मिवाया । पर रही थी। उन्हें मार और उनकी शुरी मुगान 'ल | २ गोमिना ।

१० ५४] दशम स्कन्ध ६६७ पेतुः धितो गबरपाचगवा विम्हा सण लजीनी चितवनपर भपना पित स्टाकर ये बड़े बड़े नरपति एवं वीर इसने मोहित बौर बेहोश हो गये यात्राम्हलेन हरयेऽर्पयती स्वशोमाम् ॥५३॥ कि उनके हासे अस-शस छूटकर गिर पड़े और घे मेव अनैपलयती चलपयकोशी सय मी रय, हापी, तया घोसे परतीपर आ गिरे ॥ ५३॥ इस प्रकार रुक्मिणीची भगवान् श्रीकृष्णके प्राप्ति सदा भगवतः प्रसमीक्षमाणा । घुमागमनको प्रतीक्षा करती हुई वपने कमलकी कलीके उत्सार्य घामकररलकानपा समान मकुमार चरणोंको बहुत ही धीरे-धीरे बागे बढ़ा रही थी। उन्होंने अपने बायें हापकी अंगुलिपोसे प्राप्तान् प्रियवत नपान्दाशेऽभ्युत सा ॥५४॥ मुसकी ओर लटकती हुई अझै हटाया और यहाँ आये हुए नरपनियों की ओर लजीली चितफ्नसे देखा। उसी तो रावकन्यां रममावती समय उन्हें श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्णके दशन हुए ।। ५१ ॥ रानकुमारी रुनिमणीजी रयपर पाना बहार कप्णो दिपता समीक्षताम् । ही चाहती पी कि भगवान् श्रीकृष्णन समस्त शोंक रव समाराप्य सुपर्णलक्षणं | देससे देखते उनकी मीरमेंसे रुक्मिणीनीको उठा लिया और उन सैकड़ों राजाओंके सिरपर पाँव रसकर ठम रामन्पचक्रं परिम्प माधव ॥५५॥ अपने उस रयपर वैया लिया, निसकी पजापर गरुका वतो पयो रामपुरोगमै शनैः चिमगा हुआ पा ॥ ५५॥ इसके बाद से सिंह सियारों के बीचमैसे अपना भाग से चाप, वैसे ही सुगालममादिव भागावरि ॥५६॥ | रुक्मिणीजीको लेकर मगमान् श्रीकृष्ण ममामजी वादि यदुशियोंके साप पहाँसे चल पड़े।॥५६॥ उस समय तं मानिनः स्वामिभवं यश क्षय नपसन्धके वशक्ती अभिमानी रागाओंको रूपमा यह मा भारी तिरस्कार और यश कीर्तिका माश सहन न परे खरासंधवशा सेहिरे । हुआ। वे सब-के-सम चिसफर करने लगेबहो, बहो पिगमान् यस आचपन्यनां हमें मिस्कार है। आन हमलोग धनुष धारण करके खा ही रहे और ये माले, नैसे सिंहके मागको हरिन से गोई केसरिणा मृगरिख ॥५७॥ नाय उसी प्रकार हमारा सारा परा छीन ले गये ॥५॥ न इति श्रीमहागवते महापुराणे पारमईस्या संहितार्य दशमस्कर उत्तरार्थे रुक्मिणीहरण नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽप्याप ॥५३॥ --- अथ चतु पञ्चाशत्तमोऽध्याय शिशुपालरे सायी गजामोंकी मीर रुपमीकी हार तपा भीरम रफिमणी-विपाद भीगुरु उबार भीगुषयजी कहते है-परीचित् । इस प्रकार का-मुनकर सब के-मुा राग प्रोधसे भागबमा हो इति सर्वे मुर्मरन्धा पाहानाराम दंशिता ठटे और बास पहनकर भपन-अस्न बाहनोंपर सपर १ चेपिर ।

४७० भीमसागपत [अ० ५४ अपार निशितैर्याप्पैर्गोपालस्प सुदुर्मतेः । धाम में बने तीखे वाोंसे उस सोटी पुखियाके नेप्मे वीर्यमदं येन स्वसा मे प्रसमं रता ॥२२॥ सो उसका साहस, यह हमारी मदिनको कक म्वासके बलबीर्यका धर्मर घूर घूर कर दूंगा । देखे विकरचमानः कुमतिरीसरस्साप्रमाणवित् । हर ले गया है |॥ २२ ॥ परीक्षिस् ! समीकी मुनि बिगर गयी थी । वा मगवान्के सेम-प्रमाक्को विस्कुट रखेनैकेन गोविन्द तिष्ठ लिप्ठेस्पभाइयत् ॥२३॥ नहीं जानता था । इसीसे इस प्रकार यहक पसार बातें करता दया वह एक ही रपसे श्रीकृष्णके पास धनुर्विकम्प सुरजने कणं विभिः शरैः। पहुंचकर मलकारने लगा-सहाय सदायमा२२॥ उसने अपने धनुषको मर्मक सांधकर मानन् आह पारे धर्ण तिष्ठ पदनां कुलपांसन ॥२४॥ श्रीकृष्णको तीन बाण मारे और कहा–रक क्षम मेरे सामने खर! यदुर्मशियोंके फुलकाम से कौवा ज्य यासि स्वतार मे सपिस्वा न्याशयतिः । होमकी सामग्री चुराकर ठर नाप, वैसे ही तु मेरी महिमको चुराकर कही मागा ना हा है। बरे मन्द ! हरिप्पच मद मन्द मामिनः कूटयोधिनः ॥२५॥ तुका मायावी वौर कपट-युरमें कुशाम है । बाब में तेरा सारा गर्न सर्व किये गम्ता ॥२४-२५॥ यापम मे हतो वाणः शमीचा सण दारिफाम् । देख । नबतक मरे बाण से धरतीपर मुम्म महाँ देते उसके पहले ही इस वीको छोड़कर भाग मा ।' सयन् कृष्णो धनुरिछस्थापभिषिव्याध रुक्मिणम्२६ समीकी बात सुनकर भगवन् श्रीकृष्ण मुसकराने को। उन्होंने उसका धनुष काट शाम और ससपर बाण अष्टभिमतुरो वाहान दाम्पा पतंचज त्रिभिः । मेरे ॥ २६ ॥ साथ ही भगवान् श्रीकृष्णने वा बाण उसके चार पोकोपर और दो सारपीपर मेरे और तीन स धान्यद धनुरादाय रुणविष्याध पञ्चभिः।।२७॥ माणोंसे उसके रसकी पमाकोकाट गला । तब रुक्मीने तैस्तारितः शरौपस्तु चिच्छेद धनुरभ्युतः । दूसरा धनुष उठया वीर भगवान् श्रीकृष्णको पात्र बाम म्परे ॥ २७॥ उन बाणों के मानेपर उनोंने उसका पुनरन्पदुपारच तदप्पन्छिनदष्पयः ॥२८॥ इ धनुष भी काट गला । रस्मीने इसके बाद एक और धनुर सिम्पा, परन्तु हापमें तेजी से वपिनाशी परिष परि शुलं पर्मासी शक्तितोमरौ । अभ्युतने ठसे भी काट गथ ॥ २८ ॥ इस प्रकार रुपमीने परिप, परिस, शूल, ढाल, तम्बार, शक्ति मोर यद् यदायुधमावच तत् सर्ष सोऽपिनरि॥२९॥ तोमर---मितमे अन-शम उठाये, उन सभीको मान्ने प्रहार करनेके पहले ही फाट यम ॥ २९॥ वर तो रथादवप्तस्य बङ्गपाणिर्जिपसिया । रुक्मी क्रोधारा हाथमें तलवार लेकर भगवान् श्रीकृष्णको मार गटनेकीयसे रपसे कूद पका और इस प्रकार म्मकी रुप्णमम्पद्रमत् छद पता इस पत्तकम् ॥३०॥ ओर अपा, जैसे पतिंगा बागकी मोर पकता है॥१०॥ चब भगवान्ने देख कि ममी मुझपर चोट करना तस्य पापततः सई विरमपर्म पनि । चाहता है, तब हमने अपने बाणों से उसकी बार- १ लिटेन च । १ दप्तानमामिशक्तिलोमान् । ४ पपातनिरम्मतः ।

तया म० ५४] दशम म्फन्ध छित्त्वामिमादद विग्म रुक्मिण इन्तुमुपद ॥३१॥ तयारको निर-लि फरके पाट दिया और उसको मार गलनके लिये हायमें तीम्बी सलवार निकाल दी ॥३१॥ नब रुक्मिगीनीने देखा कि पे तो हमारे मायने अब एट्या प्रावधोधोग रुक्मिणी भयविहला । मार ही सरना घाइते हैं, तब घे मयसे विहर हो गयीं और माने प्रियतम पति भगवान् श्रीकृष्णक पठित्वा पादयोमर्तुरुवाच करुण मुवी ॥३२॥ चरणोंपर गिरफर करुण-म्यरमें योरी-|| ३२ ॥ 'देवताकि भी आराध्यदेव ! जगत्पते ! आप यागेपर योगेवराप्रमेयात्मन् देवदेव जगत्पते । हैं। आपके स्वरूप और इण्याओंको कोई जान मही सकता । माप परम पम्पान् है। परन्तु काम्पागम्वरूप इन्तु नाईसि कल्याण म्रातर मे महामज ॥३॥ भी सो हैं। प्रभो ! मेरे मैयाको मारना आपके योग्य | काम महीं है ॥३३॥ भी रु उवाच भी गुफदेयजी कहते हैं-हस्मिगीनीका एक-एक १ मा मपके मारे पर-पर कोप या पा । शोककी प्रबलता परित्रासचिमम्पिवाहत्या से मुं। सूख गया था, गा रुंध गपा पा । आतुरता र मानेका हार गसेसे गिर पा पा और इसी अपस्मामें गुचापशुप्य मुखरुद्धकण्ठया ये भगवान्के चरणकमर पर हुए पी । परमपाल स्ववित्रमितममालया मगवान् उन्हें मयभीत देखकर करुणामे दो गृहीसपाद फरुणो न्यवर्वत ॥३४॥ गये। उन्होंने सस्मीको मार टाल्नेय विघार घोर रिया ॥३१॥ फिर भी हमी उनके अनिएपी घबसे चलेन पहा तममाधुकारिण विमुप म पुआ। तब भगवान् श्रीणने उसको उसीके माम फेश प्रवपन् म्पम्पयन् । । दुपासे योघ रिया और उसकी गदीमट तय फेश का नगइसे एकर उसे पुरम्प बना रिया । समता वातन्ममर्द परसैन्यमद्भुत यावशी पीने की अनुन सेनाका तहस-नहस पर टाटा-टीम मे ही जैसे दापी पसरगना - पदप्रयीरा नलिनी यथा गबा ॥३५॥ गरता ॥३॥रिये RET उधरसे सेयर कृष्णान्तिकमुपपन्य दशुम्नर रिमणम् । श्रीाणा पाम वाप, ता विरामी दुपामे या हुआ वधमरी भाम्या पाामा ६। उमे परत सपाभूत सप्राय या मकपणा विम । समानिमान् मगगन् बामनी बड़ी या भपी और उन्होंन उमर धन गोरगर उमेर पाता निमुन्य पदं फग्गा भगवान् हप्तमप्रवीत् ॥३६॥ श्रीप्णमे पहा-॥ ३६॥ T! तुमन प भय अमाचिद न्यया पण छनममन्नगुष्मितम् । नही दिया ! निम्ति काप मगर यस मही है। जन मापीरी नदी पार ठमे पुप सपने मथुफेनाना पेरप्य मुादा पप ॥३७॥ कर दना, पर ता पर FIR ॥३७॥ मा पनीने नमो मारनपा मंरामान माम्पगरया मानुगम्पमिन्नया । पा-मीदवार मता रसायन २६८ धीमबागवत [२०५४ सौर स्वैर्मले परिझान्ता अन्धीयतिकाका १॥ हो गये। अपनी-अपनी सेनाके साप सब पनुष से लेकर मगवान् श्रीकृष्णके पीछे दौरे ॥ १॥ रामन् ! पर चानापवत आलोय यादवानीमयथपाः । पशियोंके सेनापतियोंने देखा कि शहर हमपर जा वस्थुम्तत्समला राजविस्फर्म स्वधति से ॥ २॥ वाया है, तब उन्होंने मी अपने-अपने धनुषका कर किया और पुमकर उनके सामने ग्ट गये ॥२॥ अपपछे गवस्कन्धे रभोपस्से च कोविदाः। परासपकी सेनाके मेग कई पोदेपर, कोई हामीफा तो सपनुः शरवर्षाणि मेषा अद्रिप्वपो यथा ॥३॥ कोई रफ्पर घरे हुए थे। वे सभी धनुदके बड़े मर्मा थे। वे पवेशियोपर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा करते पस्पर्षल परासारष्ठ वीक्ष्य सुमध्यमा । मगे, मानो दम् फेदम बादल पहागेपर मुसल्यार पानी मनोरमेष्ठत्तम भयविहललोचना ॥४॥ मरसा ये हो ॥ ३ ॥ परम्मुन्दरी रुक्मिणी नीमे देस्य कि उनके पति श्रीकृष्णकी सेमा बाण पर्यास कापी मास भगवानाह मा म मामलोचने । है। तब दोंने समाके साम मपमीत नेत्रोंसे मगवान् भी के मुस्की मोर देख [॥21॥ भावाने सिकर विनफ्स्पघुनैवैतत् वाषक शत्रर्ष पलम् ॥५॥ सुन्दरी ! डरो मत । समारी सेना बभी तुम्हारे तेषां वविक्रम वीरा गवसकर्षणादयः । शत्रुओंकी सेनाको नष्ट किये गस्ती ॥५॥ इस गद और सहर्षण भादि यदुवंशी मीर अपने रोका मम्प्पमामा नाराचैमिगमान् रयान् ॥ ६॥ पराक्रम और वधिक न सह सके । वे अपने बाटेसे पेतुः शिरसि रविनाममिना गधिनी भनि । शत्रुभोंके हापी, पोते तवा पोको निमिम करने गे 15) म बाणोंसे रप, पोडेबोरापियोंपर बैठे विपक्षी सभण्डलकिरीटानि सोप्पीपाणिप कोटिशः ॥७॥ वीरों के कुमाल, किरीट जोर पगरियोस एशोमित करो सिर, मग, गदा और धनुस्युज हाय, पहुँचे,चो बार कर इस्लाः सासिगदेपासाः करमाक रसोऽद्यः । कर-करकर पृषीपर गिरने समो। इसी प्रकार बोके सबर, हामी, उँट,ग, और मनुष्यों के सिर मी का कटर अभापतरनागोष्ट्रसरमप॑शिरांसि थ॥८॥रणमिमें बेटने लगे ॥ ७-८ ॥ मन्तम बिनपकी इन्पमानपठानीका प्रिमियकाशिमिः। संबी बाकालाबाले पदुर्मशियेने शभुषोंकी सेमा वास महस कर बामी । जरासम्म वादि सभी ना युरसे रामानो विमला अमुरास भपुरःसराः ॥९॥ पीठ दिशाकर माग सो ॥९॥ शिवपाल समम्पेत्य विदारमिवापुरम् । उघर शिवपास अपनी माबी पनीके मिन मानेके कारण मरणासम-सा हो या पाम तो उसके हप नष्टत्विष गोत्साई चप्पादनमझुवन् ॥१०॥ उत्साह व गमा पा और न तो शरीरपर कान्ति । उसका मुंह सूब या पा । उसके पास माकर पराम्पकाने लगा--॥१०॥ शिशुपाम्बी माप तो एक भेष्ठ पुरुष । भो भोः पुरुपसाल वॉर्मनस्पमिदं स्मज । या उदासी मेप दीमिये । क्योंकि गमम् ! को मीभाव सर्वदा वपने मनके मनुकूम ही हो मा प्रतिक ही हो, न प्रियाप्रिपयो राजन् निष्ठा देहपु श्यते ॥१९॥। इस सम्बन्धी कुछ सिरता किसी भी प्राणीके जीवन पासोमालिया।

य०५४]
दशम स्कन्ध
पथा दारुमयी योपिन्नृत्पते शहफेप्छया । नहीं देखी जाती ॥ ११॥ जैसे कठपुती बीगरकी
भके अनुसार नाचती है, वैसे ही या मीन भी
एवमीपरतन्त्रोऽयमीहते मुखदुःखयो ॥१२॥ भगवदिष्यके वधीन मकर मुस बोर हु सके सम्बन्धमें
औरेः सप्तदमाई चै संयुगानि पराजित ।
पपाशक्ति चेय करता यता है॥ १२ ॥ देखिये,
श्रीकृष्णने मुझे तेईस-ईस वक्षौहिणी सेनाके साप
अयोविंशतिभिः सैन्यैर्बिम्प एकमई परम् ॥१३॥
सत्रा पार हरा दिया, मैने केवल एक मार-अठारहवा
बार उनपर विजय प्राप्त की ॥१३॥ फिर मी इस
तथाप्पईन शोचामिन प्रारम्पामि कर्दिचित् ।
पातको लेकर मैं म तो कभी शोक करता हूँ और म
तो कमी हर्ष, क्योंकि में नामता , कि प्रारम्बके
फासेन दैवयुक्तन बान्न् मिद्रावि जगत् ॥१४॥ अनुसार कामभगवान् ही इस चराचर मगत्को मकनोरते
रहते हैं ॥१९॥ इसमें सन्दो मही कि हमलोग बड़े-
मधुनापि षर्य सर्वे वीस्पृथक्पृथपाः । पोपीर सेनापतियोंके भी मापकरें । फिर भी, इस
समय श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित यदुर्मशियोंकी पोड़ी-सी
पराजिताः फल्गुतन्त्रैर्यदुमि रुप्यपालितः ॥१५॥ सेनाने हमें हरा दिया है ॥१५॥ इस बार हमारे
रिफ्नो बिग्युरघुना काल यात्मानुसारिणी।
शत्रुओंकी ही गीत मुई, क्योंकि काम धनों के अनुकूल
यो । जब काळ हमारे दाहिने होगा, बइम मी उगहें
बदायर्म विजेप्पामो यदा फालः प्रदक्षिमः ॥१६॥ बीत मेंगे ॥ १६ ॥ परीक्षित् । चा मित्रोंने इस प्रकार
समझाया, तब चेदिरान शिल्पा अपने अनुयापियोंके
एवं प्रबोधितो मित्रपोज्गात् सानुग पुरम् ।
साप अपनी राजधानीको भेट गया और उसके मित्र
राना मी, बो मरनेसे बचे थे, अपने अपने मगरको
विशेषाः पुनस्तेऽपि पपुः स्वं स्व पुरं नृपा ॥१७॥ चले गये ॥१७॥
हामी तु राक्षसोदाई कप्पविरसान्स्वनः ।
परिमणीनीका बहामाई ममी मगान् श्रीकृष्णसे
पात देख रस्ता पा । उसको यह बात बिस्कुल सहन
प्रस्तोऽन्यगमत् रुप्मक्षौहिण्या तो पसी ॥१८॥ मई कि मेरी बहिनको श्रीकृष्ण र ले बायें पौर
ग्रक्षीतिसे बकम्पक ससके साप विवाह करें । सामी
सम्पमी मुसरम्धः मृष्यतां सर्वसमाम् ।
बल्ी तो पाही, उसमे एक मझौरिणी सेना साप से
सी और श्रीकृष्णका पीछा किया ॥ १८॥ महावा
मम्मी कोषमारे इस रहा पा । उसने कपच पहनकर
प्रतिम महाबाहुर्दशितः समरसनः ॥१९॥ और धनुष धारण करके समत मरपतियों के सामने या
वास्या समरे कृष्णमप्रत्यूष व रुक्मिणीम् ।
| प्रतिज्ञा की-|| १९ ॥ बाप लोगोंकेगीच या शपष
करता हूँ कि यदि में युरमें श्रीकृष्णको म मार सय वीर
अमिन प्रवेस्पामि सस्ममेव प्रवीमि वः ॥२०॥ अपनी बहिन रुक्मिणीको न लौटा सका तो बानीयनभानी
कुण्डिनपुरमें प्रवेश महाँ कलंगा' ॥२०॥ परीक्षित् ! यह
इस्युक्त्वा रथमारुम सारथि प्राइ सत्वर । काफर हरपर सवार हो गया मोर सारपीसे बोरग-
यहाँ हण हो हाँ शीघ्र से शीघ्र मेरा प से बगे।
पादयाघान् पव कणस्वस्स मे संयुगं भवेत् ॥२१॥ भाग मे उसीके साय
मुर ऐगा ॥२१॥

৪৩০ भीमद्भागवत [२०५४ । अपाह निशितैमर्गोपालस्य सुदुर्मतेः । धान में अपने तीखे बाणोंसे उस मोटी पुविषाले ग्वाके मलवीर्यका धमा पूर पूर कर दूंगा । देखे नेप्पे वीर्यमदं येन स्वसा मे प्रसमै हता ॥२२॥ तो उसका साहस, न हमारी बहिनको बापूर्वक विफरथमानः मतिरीश्वरस्साप्रमाणवित् । हर ले गया है ॥ २२ ॥ परीक्षित् | समीकी मुशि विगर गयी थी। पर भगवान्के तेम-प्रमावको मिक्स स्पेनकेन गोविन्द तिष्ठ तिप्ठेस्पयाडयत् ॥२३॥ नहीं जानता पा ! इसीसे इस प्रकार काफमासार बातें करता एषा वा एफ ही रपसे भीकणके पास धनुर्पिकप्प सुद्ध बन्ने कृष्ण त्रिभिः शरैः। पहुँचकर ललकारने लगा-सदा रह ! समा रह॥२३॥ उसने अपने वनुषको बलपूर्वक सांपकर भगवान् आह चारे धर्म विष्ठ पदनां कुलपसिन ॥२४॥ श्रीकृष्णको तीन बाण मारे और करा-एक अन मेरे सामने बर ! यदुर्मशियोंके कुलकार से कोवा प्र यासि वसा मे समित्या बावतिः । होमकी सामग्री पुराकर ग नाय, वैसे ही तू मेरी (बहिनको चुराकर कहाँ मागा मा यहावरे माद । हरिप्णेऽम मद मन्द मामिना कूटयाधिन ॥२५॥ महा मायावी बौर कपट-पुरमें कुशल है । बाय में तेरा सारा गर्व र्य किये गाता हूँ॥२५-२५॥ पावन मे हवो वापः नयीया सब दारिकाम् । देस ! अबतक मरे बाण तुम्छ धरतीपर मुम्म महाँ देखे उसके पहले ही इस बचीको होरकर भाग मा ।' समन् रुप्योधनुपिछत्यापभिविष्याधरुक्मिणम्२६ रुम्पीकी बात सुनकर भगवान् श्रीकण मुसकराने को। ननि ठसका पनुम काट राग और सफर छ माण अष्टभिपतुरो पाहान् दाम्पा संघर्ष त्रिमिः । छोड़े ॥ २६ ॥ साप ही मगवान् श्रीकृष्णने पाठ माण उसके चार घोसॉपर और दो सारपीफर मेरे और तीन स चान्पप धनुरम्दाप कर्ण विष्पाप पवभिः॥२७॥ माणों से उसके रपकी पनाको कान गा । तब रुक्मीने सैस्तारिता शरौघस्तु चिन्छेन पनुरच्युतः । स्य धनुस उद्यया पौर भगवान् श्रीकृष्णको पाच बाण | मारे ॥ २७ ॥ उन बाणोंके लगनेपर उमाने उसका पुनरन्पदुपादत सदप्पच्छिन्दष्यया ॥२८॥ द धनुय मी फार राग । समीने इसके बाद एक और धनुर मिया, परन्तु हापमें अमी-सेसे परिमाशी परिष परिक्षं भूलं चैमोमी शक्विामरी । जयुतने उसे भी काट गम ॥ २८ ॥ इस प्रकार सम्मीने परिप, परिश, शूल, ढाल, सभार, शक्ति गौर यत् यदायुधमाइचवत् सर्व सोऽछिनहिः॥२९॥ तोमर--मितने अस्त्र-रात उपये, उन सभीको मान्ने प्रहार करनेके पर ही काट मम ॥२९॥ सतो स्वादवप्उत्प सङ्गपाणिजिपासमा । कामी झोपश हापौ तस्यार लेकर मगमान् श्रीकृष्णको मार गटनेकीअसे रपसे रद पवा और इस प्रकार उनकी रुपमम्पद्रवद द पवा इष पावकम् ॥३०॥ बोर अपन, जैसे पतिंगा वागकी पोर सपकता है॥३०॥ सब भगवान्ने देखा कि ममी मुसपर चोट करना सम्प चापतता बाई विलशमर्म पमि । चाहता है, तब हमने अपने पासे उसपी राम- ' fr पहुन् । २ रप्तः । ३ नमामिणनितोमरान् । ४ रपाचवपिनवम्मुता।

अ० ५४] दसम स्कन्ध ४७१ छिचामिमादव तिग्म रुक्मिणं हन्तुमुयत ॥३१॥ तरवारको तिल-तिल करके यार दिया और उमको मार गलनेके रिपे हापमें तीस्थी सवार निफालरी ॥३१॥ जय रुक्मिणीजीने देखा कि ये तो हमारे भाइको अब एटा भाववधायोग रुक्मिणी मपपिहला । मार ही डगरना चाहते हैं, तम ये भपसे पिस हो गा और अपने प्रियतम पति भगवान् श्रीयम्गके पतित्वा पादयोमर्तरुयाच फणं मती ॥३२॥ घरणोंपर गिरकर फरण-स्वरमें चोरी-॥ ३२ ॥ 'देवताओं के भी भारम्पदेश । नगरपसे! आप यागेपर योगेश्वराप्रमेयात्मन देवदेव जगत्पते । है। आपके स्वप पोर इच्छाओं को कोई जान मही सकता | बाप परम यसपान् है। परन्तु कल्याणम्वरम्प इन्तु नाईसि फरपाण प्रातरं मे महामुज ॥३३॥ भी तो हैं । प्रभो ! मेरे भैयाको मारना आपके योग्य काम मही ॥२३॥ पीशुरु उपाप भी शुकदेयजी कहते हैं-हत्मिणीवीका एक-एक जा मयके मारे पर-पर कॉप या या । शोककी प्रबलता तया परित्रासविकम्पिवाहत्या से मुंह सूख गया पा, गला ऊँघ गपा पा । आतुरता- यश सोनका हार गरसे गिर पापा और इसी मास्पामें शुचावाप्पन्मुखरुदकण्ठया वे भगवान्के चरणकमर पकड़ पुए पी । परम याद फातर्यविमिवहममालया भगवान् उन्हें मयभीत देखकर करणासे इति हो गृहीवपाद फरणो न्यवर्तत ॥३४॥ गपे । ठोंने रुक्मीको मार गमनका विमार छोर | दिया ॥३१॥ किर भी रुल्मी उनके अनिकी घाटासे चलेन पद्घा तममापुकारिण | पिमु न हुआ। तब मगवान् श्रीणने उसको उसीफ मम्मसुकर प्रवपन् व्यरूपयत् । दुपासे सोध रिया और उसकी दादी-" सया केस कर जगहसे मदकर उसे पुम्प बना रिया । तपतर सावन्मम परमैन्यमद्भुत यावशी पीरोंने गकी अनुन सेना तहम-नाम पर सग-टीम मेदी जैसे हापी पमरमनपा - यदुवीरा नलिनी यथा गजा ॥३५।। गरता है ॥ ५॥ रि घे PPT परमे पर रुष्णान्तिममुपग्रन्य दरम्ना परिमणम् । श्रीरये पाम माप, तारि सामी दूपासे यथा हुआ अधमरी भाम्पा पारमा । उसे दगार क्याभून इतप्राय ट्रा मपणो विस । समानिमान् भगवन् परामतीकर बदी पा मापी और टोन उमरे पपनगर उमे CEPपातपा रिमुष्प पदं फम्मा भगवान् कम्पमप्रवीत् ॥३६॥ माणमे का-॥३६Tण ! तुमन पद अMTI अमाप्पिद पपा कृष्ण फनमम्मन्नुगुप्मितम् । नहीं दिया। पद नितापमान पेय मदी है।मान गणपती म्: पात्र उमे पुमा अपने मधुएगाना पेरप्प गादा प ३७n पर ला को 10. ॥ ३७॥ इसा गा गमतीने स्मिीको मन नपरा मंगमान मापापेक्षा मानुपस्पमिन्नपा । मना! मार FIR पिता । - पदा.- ४७२ श्रीमझागवत [4. ५१ सुस्वदु स्वदोन पान्योऽस्ति यत स्वकतम पुमान्३८ गया है, यह सोचकर हमलोगोंसे मुरा न मानना क्योंकि नीकको सुख-सुख देनेवाण को दूसप मही है। उसे तो अपने ही कर्मका फल मोगमा परवा ॥३ मधुर्षधाईदोपोऽपि न ममोर्वधमईति । थब श्रीकृष्णसे योसे-पग ! पदिक्पनासगा-सम्बन्धी बप करने योम्प वपराध करे, तो भी अपने ही सम्बन्धियोंके त्याज्य सोनप दोषेण इत किं हन्यते पुन ॥३९॥ द्वारा उसका माय नाना उचित नहीं है। उसे मेर देना चाहिये । या तो अपने अपराषसे ही मर चुका क्षत्रियाणामयं धर्म प्रजापतिविनिर्मितः। है, मरे हुएको फिर क्या मारमा ? ॥ १९ ॥ पित रुक्मिणीगीसे बोले-सापी! मामीने क्षत्रियों का प्रातापि प्रावर इन्पाद येन घोरसरस्वतः ॥४०॥ धर्म ही ऐसा ना दिया है कि सगा माई भी अपने माईको मार गलता है। इसलिये यह क्षात्रधर्म मापन राजस्य भूमे विचस्स स्त्रिमा भानस्य तेजसः । घोर है।॥ १०॥ इसके बाद श्रीकृष्णसे बोले- कृष्ण । यह ठीक है कि वो स्पेग धनके मोमें बचे हो ये है और मभिमानी है, वे राम्प, पृथ्वी, पैसा, सी, मानिनोऽन्यस्प वा हेतो भीमदान्धाःक्षिपन्ति ४ि१ माम, सेत्र अश्या किसी और कारणसे अपने माधुओंका मी तिरस्कार कर दिया करते ॥२१॥बब ये तय विपमा पुद्धिः सर्वभूतेषु दुखदाम् । रुक्मिणीनीसे बोले-'साथी! मारे माई-मधु समस्त्र प्राणियों के प्रति दुर्माण रखते हैं। हमने उनके मनरके लिये ही उनके प्रति दणविधान किया है। उसे तुम पन्मन्पसे सदाभद्र सुददा मद्रमन्नवत् ॥४२॥ शानियोंकी माँति अमा मान रही हो, या तुमारी युनिकी दिवमता ॥१२॥ देवगो मोग मगवानको भात्ममाहो नृणामेप करप्यते देवमायया । मायासे मोहित होकर देहको हो वाम्म मान से है, उहीको एसा वाममोर होता है कि यह मित्र , मुस दुरदासीन इति दहारममानिनाम् ॥४३॥ शघ्र और यह उदासीन है ॥ १३ ॥ समस्त दे। | पारियोंकी मारमा एक ही है और कार्य-कारपसे, मापसे उसका कोई सम्मान नहीं है। और पहा मार पक एप परा पारमा सर्वेपामपि देहिनाम् । उपापियोंके भासे उसे सूर्य, चन्द्रमा बादि प्रकाशपुरु पार्प और बाकाश मिन-भिम पम पाते। परन्तु है नानर गमते म्हैया ज्याविर्यथा नम ॥४४॥ | एक ही, वैसे ही मर्म म्यग शरीरके भे से बाम्पका भेट मानते है।।११॥ पदभारभि जसबाठा है। प्रभू, पक्षपाम, तन्मात्रा त्रिगुगरी इस देर मापन्नानप ट्रम्पप्राणगुणात्मकः। मायामा ठमके पानसे ही इसकी पल्पना हा भोर पर पम्पित शरीरही, जो उमे समता मान्मन्परिपपा मम ममाग्पति देहिनम् । है, उसपर मग्म-मापुर परमेंस जाता ॥५॥ ful . दशम स्कन्ध ४७३ अ० ५४] नात्मनोन्येन मयोगो वियागधामत सति । सापी ! नेत्र और रूप दोनों ही सूर्य के द्वारा प्रकाशित होते हैं। सूर्य ही उनका कारण है। इसटिये सूर्यक साप नेत्र बौर सपा म सो फमी वियोग होता है और नदतत्वावप्रसिद्धपाम्या यथा रवे ॥४६॥ न मपोग । इसी प्रकार समस्त संसारकी सत्ता आत्मसत्ता- के कारण जान पड़ती है, समस्त मंसारफा प्रकाशक आरमा ही है। फिर भारमा साप दूसर असत् पदार्थों जन्मए यस्तु देहस्य विक्रिया नात्मन कचित । पर मयोग या वियोग होही कैसे सकता ॥२६॥ सन्म सेना, रहना, थाना, मदछना, धन्ना और मरना- ये सारे विकार शरीरके ही होते हैं, आस्माके नहीं । फलानामिन नपेन्टोमृतिमस्स कुहरिष ॥४७॥ जैसे कृष्णपक्षमें कानोका ही क्षय होता है, चन्द्रमामा मही, परतु अमावस्याके दिन व्यबहारमें लोग पन्द्रमाका ही क्षय हुआ कहते-सुनते हैं, से ही बम-मायु बागि यथा शयान आन्मानं विपयान् फलमेव च । सारे रिकार शरीरके ही होते हैं, परंतु रोग उसे झम पश अपना-अपन आरमाका मान लते ॥१७॥ जसे मोपा हमा पुरुष किसी पदार्थक न होनेपर अनुभक्तऽप्पमत्पर्धेतधाऽऽमोत्ययुधोभवम्।।४८॥ मी सममें भोक्ता, मोग्य और मोगरूप फोका अनुमा करता है, उसी प्रकार जवानीसाग भूटर संसार पक्रका अनुभव करते हैं ॥ १८ ॥ इसलिये सापी मानक नम्माशान शाकमात्मझापविमाइनम् । कारण होनेवाले इस शोकमरे प्याग दी। यह शाम अग्त करगको मुरब्य देता, है मोहित कर देता है। इसरिये इसे श्रेषकर तुम अपन परपमें स्थित हा नवनानेन निहत्य म्बम्पा भय गुचिम्मित ॥४०॥ जाबो ॥ १० ॥ यीमु उवाप धीशुक्लायमी फाहत ई-क्षिस् ! जब बलयम- बीने इस प्रकार समझाया, तब परम्मुम्री हरिमगीनीने वं भगयता तन्यी रामण प्रतियोधिता। भाने मनमा मे मिलकर विवक-युदिसे उसका समाधान किया ॥५०॥ इसमीकी सेना और उमा तेममा मिनम्मे परिराज्य मना पुदया ममाघ ॥५०॥ नाग हा पुत्र था। पर प्राग एच रह ५ । उमर मिकी मारी आशा भिगार प्पय हा पुकी दा गगायझेप उन्मण ििभयठप्रभ । शार शोने अपमानित पर ग्मे Pा- पिा। म्मान विकण विसयान्ममनाग्थ ॥५॥ उमे धरने विभप दिये जानकी परगपय स्मृति भूम ना पनी ॥ ५१ ॥ मा उमन अन दिने के पर भावक्र नाम नियामाय महन पृग्म् । पि माप्रार नामरी रात बहीनरी बना उमन पहल ही यह प्रतिहा पर भी पारि बुदि मारा मति जिममन्यय यशपमाम । परामर धिना भारानी इटा निरा 'याय विमा में पुचि नपुरमें प्राय माही कोय। मिमिका, मिन न प्रवस्यामान्युस्मानमारमा५॥ पाप ने ||५२ ॥

४७४ भीमद्भागवत [अ० ५५ । भगवान् भीमकसुतामे निजित्य भूमिपान् । परीक्षित् ! मगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सब राजाओंको नीत लिया और विदर्भराजकुमारी रुक्मिणी- पुरमानीय विधिवदुपयेमे फुरदह ॥५३॥ नीको शरफा छाकर उनका विधिपूर्वक पाणिग्रहण सदा महोत्सवो नृणां यदुपुर्या गृहे गृहे । किय ॥ ५३ ॥रे रामन् ! सस समय धारकापुरीमें घर-घर यहाही उत्सव मनाया जाने लगा। मों न हो, वदन्न्पभावानां कृष्णे यदुपतौ नृप ॥५४॥ महाक सभी लोगोंका यदुपति श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम नरा नार्यच मुदिताः प्रमृष्टमणिकुण्डला । जो पा ॥५॥ महकि सभी नर-नारी ममियों के सामीले पारिनुपावापरयोश्चित्रघाससो ॥५५॥ कुमाल धारण किये हुए थे। उन्होंने मानन्दसे मरकर नि विचित्र वस्त्र पहने दना और प्रतिनको कनेकों में की सा प्रणिपुयुत्तमितेन्द्रफेसुभि सामग्रियों उपहारमें दो ॥ ५५ ॥ उस समय द्वारकाझी भर्भ शोमा हो रही थी। कहा बहीबसी पताका विचित्रमाल्पाम्बररमतोरणे बहुत उक्तिक फहरा रही थी। चित्र-विचित्र माहार, वम और रनोंके तोरम मेघे र थे । पार-वारपर दमा बभौ प्रतिद्वापक्तप्तमाल सीठ वादि मालकी वस्तुएँ समायी हुई दी । जलमरे रापूर्णहम्भागुरुष्पदीयकै ॥५६॥ कलश, परगवा बोर घूपकी सुगन्ध तथा दीपाकीसे बड़ी ही निरक्षण शोमा हो ही पी ॥ ५६ ॥ मिश्र सिक्तमार्गा मदम्पद्विराहतप्रेष्ठभूमबाम् । नरपति बामन्त्रित किये गये थे। उनके मतवाले हाधिय- गर्दास्सु परामृष्टरम्भा गोपशोभिता ॥५७॥ के मदसे द्वारकाकी सबफ वीर गठियोका सिकायो गप्पा पा । प्रत्येक दरखानेपर केलोंके स्वमे और सुपारीफे सरूमचपकैकेयविदर्मयदुकन्तपः पेर रोप पर बात ही मो माझम होते थे ॥ ५॥ उस उसकमें कुवालवश इधर-उधर दौर-धूप करते र मिषो समदिरे तमिन् संम्रमात् परिधावताम् ॥५८॥ वर्गम कुरु, समय, कैकेय, विदर्भ यदु और कुन्ति रुक्मिण्या हरणं शुस्वा गीपमान सतस्ततः । बारियों के लोग परस्पर मानन्द मना रहे मे ॥५८॥ हाँसको रुक्मिणीहरणकी ही गाया गायी जाने लगी। राभानो राजकन्याश्य बमवर्मुशलिमिता ॥५९॥ | उसे सुनकर राजा मोर सनकम्पाएँ परत विस्मित हो मारफापाममू रामन् महामोदः पुरौकसाम् । | गपी ॥५९॥ महाराज ! भगक्ती छमीनीको सम्मिणीके रूप साक्षात् समीपति भगवान् श्रीकृष्णके साथ देखकर रुक्मिण्या रमयोपेत घट्दा फष्ण भिया पतिम् ॥६०॥ धारकाबासी नरनारियोंको परम मानन्द हुवा ॥६ ॥ इति श्रीमहागवते महापुराण पारम्स्यो सहितायो दशमस्कर उत्स्यर्षे रश्मियुवाहे चतु पचाशतमोऽध्याय ॥ ५१ ॥ अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय प्रपुमका जम्म मौर शम्बरासुरका प भी उपाय | भीगुकदेवजी कहते है-परीक्षित् ! कामदेव मगवान् फामम्तु वासुदेवांशो दग्धः प्राग रुद्रमन्पुना। | वासुदेवके ही बार में पहले समगवान्को कोमामि- १एनन् । २ ने पक्मिाहोमो नाम ख । बादराबपिण्याला थ० ५५] दशम स्कन्ध । देहोपपचये भूयस्तमेव से भस्म हो गये थे । बा किर शरीर मासिके लिये प्रत्पपद्यत ॥१॥ उन्होंने अपने अंशी मगवान् वासुदेवका ही भाश्रय स एव जातो पैदम्या कृष्णवीर्यससमव । छिया ॥१॥येही काम अबकी बार भगवान् श्रीकणके द्वारा रुक्मिणीजीके गमसे उत्पन्न हुए और प्रद्युम्न नामसे जगत्में प्रघुन इति विस्म्यास सर्वतोऽनवमः पितु ॥२॥ प्रसिय नए । सौन्दय, पीय, सौशील्प आदि सदगुर्नामें भगवान् श्रीकृष्णसे वे किसी प्रकार का न ये॥२॥ त शम्बर कामरूपी इत्ला तोफमनिर्दशम् । याटक प्रधुन ममी दस दिनके भी न हुए पे कि काम- स विदित्वाऽऽत्मन श प्रास्पोदन्वत्यगाव गृहम् ३ ले गया और समुद्र में फेंककर अपने घर और गया । रूपी सम्परामुर येप बदलकर सूतिकागृहसे उन्हें हर त निर्जगार पलवान् मीन सोऽप्पपरै सह । उसे मालूम हो गया था कि यह मेरा मावी शत्रु है ॥ ३ । समुदमें पालक प्रघुमको एक वा भारी वा बालेन महवा गृहीसो मन्पजीषिभिः ॥४॥ मछ निगल गया । तदनन्तर महोंने अपने बहुत का जाल्में फंसाकर दूसरी मटियों के साथ उस मछको मी त शम्बराय कैवतो उपाजहुरुपाषनम् । पका लिया ॥ ॥ मीर उन्होंने उमे ले जाकर शम्परामर को मेंटके रूपमें द दिया । शम्श्रामुरफे रमोइये उम सूदा महानसं नीत्याश्यन् स्वभितिनामृतम् ॥५॥ अछुत मछको उठाकर रसोईघरमें ले आये चोर दृष्ट्या सदुटरे पाल मायापत्य न्यवेदयन् । कुमापियोंसे उसे काटने ग॥ ५॥ रसोइयोंने मरस्यके पेग्में पालक देखकर उसे शम्बरामरकी दासी मायावती- नारदाऽकवयत् सन ससा अद्धिसयेवस । को समर्पित किया । उसके मनमें बड़ी शंकाई। तब नारदने वाकर बालकका कामदेव होना, भीकृष्णकी पसी बालस तस्वमुत्पपि मत्स्स्पोदरनिवेशनम् ॥ ६॥ रुक्मिणीके गर्मसे जन्म लेना, मछके मैटमें जाना सब कुछ कर सुनाया ॥ ६॥ परीक्षित् ! पर मायावती साप कामस वै पसी रवि म यशस्विनी । कामदेवकी यशखिनी पनी रति ही पी । निसन शहर बीके क्रोषसे कामदेवका शीर मस्म हो गया था, पत्यनिर्दम्भदेस्स देहोत्पति प्रवीधती ॥७॥ उसी दिनसे वह उसकी दके पुन उत्पन्न होनेकी निरूपिता सम्परेण सा सुपौदनसाधने । प्रतीक्षा कर रही थी ।। ७ ।। उसी रनिको राम्परामरने अपने यहाँ दाल-भान बनानेके काममें नियुक्त कर रहा फामद शिव पुत्मा पफ स्ने सदार्मफे ॥ ८॥ | पा ! जब उसे मायम हना कि इस शिशुके रूपमें मेर पति कामदेव ही है, तब वह उसके प्रति पात प्रम नातिदीपेण फालन स काणी रुडपौवनः । करने लगी ॥ ८॥ श्रीकृष्णकुमार भगवान् प्रघुन पात पाई दिनोंमें मवान हो गये। नका रूप-लावण्य इतना मनयामास नारीणां वीयन्तीनां च पिममम् ।। ९॥ बहुत पा कि जो सियों उनकी भोर देमी, दमके सा पति पत्रदलायतवर्ण मनमें गृहार-रसका तदीपन हो जाता ॥९कमलदम्के समान कामम एवं विशाल नेत्र, घुटनोंतक पी-बी प्रलम्बाई नरलोकसुन्दरम् । गोह और मनुष्फ्लेको स्पसे सुन्दर शरीर ! रति सरुन १ मत्स्य ।

श्रीमद्भागवत [२०५५ सबीउहासोपभिसम्रवेषसी हास्यके साय भौह मकाकर उनकी वोर दस्ती और प्रेमसे मरफार त्री-पुरुषसम्बन्धी मात्र व्यक करती । प्रीत्मोपतस्थ रविरङ्ग सौरते ॥१०॥ उनकी सेवा-शुपामें गो बती ॥१०॥ श्रीकृष्णननन म्गगवान् प्रानने उसके मामि परिवर्तन देसफर करा- 'देषि ! तुम तो मेरी मौके समान हो । सम्हारी मुधि नामाह भगवान् काणिर्मातस्ते मतिरन्यथा । उष्टी कैसे हो गयी। मैं देखता हूँ कि म मामाका माव छारकर कामिमीके समान हाव-भाष रिस पी मावभावमविक्रम्प पर्वसे कामिनी यथा ॥११॥ हो ॥ ११ ॥ रतिरूवार रतिमे कहा-'प्रमो! भाप स्वयं ममावान् नारायण पुत्र है । शम्बरासुर बाफ्को सूतिकागृहसे जुग व्य भवान् नारायणसुतः सम्परेणारतो गृहात् । या । थाप मेरे पति नपं कामदेव र वौर में यापकी अहं तेऽधिकतापसी रसि कामो भवान् प्रभो।।१२।। सदाकी धर्म-पनी रति हूँ॥१२॥ मेरे सामी ! सब वार दस दिन के भी न थे, तब इस शम्बरामरने वापको हरकर एप त्यानिर्दश सिन्धावक्षिपन्छम्परोऽसुरः । समुदमें टाल दिया था। यहाँ एफ मन्छ आफ्को निगल गया चोर उसीके पेटसे बाप यहाँ मुझे प्राप्त हुए हैं ॥१३॥ मन्स्योऽग्रसीचदुदरादित प्राप्तो भवान् प्रभो ॥१३॥ यह शम्बग्रमर सैकड़ों प्रकारफी माया जानता है। इसको अपने वशमें कर लेना पा जीत लेना बहुत ही घमिम जहि दुर्घप दुर्जय शत्रुमात्मन । फटिन है । आप अपने इस शत्रु मोहन आदि मायाओं म द्वारा नस कर गतिये ॥१४॥ सामिन् ! अपनी सन्तान मायाशवविदं त्व घ मायाभिर्मोहनादिमि ॥१४॥ पापके सो मानेसे भापकी माता पुत्रस्नहसे म्याकुर | हो यो है ये आतुर होकर अत्यन्त दीनतासे तमि पग्निाचति त माता पुररीव गतप्रजा । चिम्सा करती रहती है। ठमकी टीक सी ही दर पुत्रनहाइला दीना विवत्मा गौरिपातुरा ॥१५॥ सा मानेपर पबारी गायकी होती है ॥ १५ ॥ | हो रही है, जैमी पचा सो जानपर पुटरी पक्षीकी वषय प्रभाप्पयं ददी विद्या प्रघुम्नाय महामने । मायावती रतिने इस प्रकार पपर परमशक्तिरमती प्रधुमको महामापा नामकी विपा मिग्ग्रयो । पद रिपा मायावती महामाया मचमायापिनाशिनीम् ॥१६॥ एमी है जो सब प्रकारको पाओंफा ना कर देती है॥ १६ ॥ अब प्रधुम्ननी शबरामरफे पास समर मग नमरमम्प य मयुगाप ममादयन् । उमरा कटु-पतु भाक्षर मरने उगे । म पाइते प मियद रिमी प्रकार मग पर पटे। इतना ही मड़ी अरिपनमामपं भिपन गधनपन परिम् ।।१७। उन्हाने युदो गिये उसे स्पष्टगपसे मयाय ॥ १७ ॥ मापिशिमा दुर्वगाभि पादास इमारग । प्रगुमनाक दामनोंगी चामे मायगर रि 1 उय। माना रिमीन मि सोपरगे येवर मार | उगी आगोमे मार हो गया। निपकाम गदारारिमानामनामन ॥१८॥शपमें गा सेयर पादरम मापा |॥ १८ ॥ । ।

म० ५५] दशम स्कन्ध गटामाविन्य तरसा प्रघुम्नाय महात्मने । उसने अपनी गदा यो जोरसे आकाशमें धुमायी पौर इसके बाद प्रद्युम्नजीपर चन्म दी । गटा चलते समय प्रक्षिप्य उपनदाट वननिप्पेपनिष्टरम् ॥१९॥ इसने इतना कर्मश सिंहनाद किया, मानो बिजली फरक रही हो ॥ १९॥ परीक्षित् ! मगवान् प्रधुम्नने तामापतन्ती भगवान् प्रद्युमो गदया गदाम् । देखा कि उसकी गदा बहे घासे मेरी ओर पा रही है। अपास्प साधे छद्ध प्राहिणोत् खगदा नृप ॥२०॥ सप उनोंने अपनी गदाके प्रहारसे उसकी गदा गिरा दी और कोषमें मरकर अपनी गदा उसपर चलायी ॥२०॥ सच मायां समाभित्य देतेपी मयदर्शिताम् । तब वह दैस्प म्यामुरकी मतपयी हुई मामुरी मायाका आश्रय लेकर माफाशमें चला गया और वहाँसे प्रधुम्ननी समयेऽसमय पर्प फामो पैहायसोऽसुर ॥२१॥ | पर अन-शोंकी वर्षा करने छगा ॥ २१ ॥ महारपी प्रधुम्नजीपर बात-सी क्स-वर्षा करके जम कर उन्हें पाध्यमानोऽसवपण रौफिमगेयो महारथ । पीपित करने लगा, तब उन्होंने समस्त मायामोंको शान्त करनेबाली सखायी महाविपाका प्रयोग किया ॥ २२ ॥ सस्यात्मिन्य महाविद्या सर्षमायोपमर्दिनीम् ॥२२॥ तदनन्तर शम्बरासुरने पक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षसोको संकों मायामोंका प्रयोग किया, परन्तु श्री- सतो गोमगान्धर्वपैशाचौरगराक्षसी । कृष्णकुमार प्रधुम्नसीने अपनी महाविपासे तन समका प्रापुर शतनो दैत्य काफिय॑धमयत्सता ॥२२॥ | नाश कर दिया ॥ २३ ॥ इसके बाद वम्होंने एक तीक्ष्ण तलवार उठापी और शम्दरामुरका किरीट एवं निशातमसिम्यम्प सफिरोट सकुशलम् । पुण्डसम्से सुशोमित सिर, नो छालास दादी, मुझसे बड़ा मयाहर लग थापा, काटकर घासे अलग कर सम्बरस्प शिर फायात् साम्रश्मभ्योजसाहरत् ॥२४॥ दिया ॥ २१॥ देवता लोग पुपोंकी क्या करते हुए बाकीर्यमाणो दिविज स्तुपदि कुमुमोत्कर। स्तुति करने छगे और इसके बाद मायावती रति, जा भाकाशमें चलना जानती थी, अपने पति प्रधुम्ननीको भापयाम्बरधारिण्या पुरै नीता बिहायमा ॥२५।। बाकाशमार्गसे द्वारकापुरीमें ले गयी ॥ २५॥ अव पुरवर गमन् ललनाशतमलम् । पशि ! आकाशमें अपनी गोरी परीके साथ सौरले प्रपुरमीकी एसी शोमा हो रही थी, मानो मिजरी और मेषका मादा हो । इस प्रकार उन्होंने भगवान्के वस विधान पन्या गगनाद् विघुतेर पलाहक ॥२६॥ उत्तम मतपुरमें प्रवेश किया, जिसमें सैकड़ों ग्रष्ठ रमगिपी निवास करती पी ॥ २६ ॥ मम्त पुरकी म इन जलदश्याम पातापवाससम् । मारियोंने गाडा प्रघुमीकर नए पर्गकासीन मक समान श्यामरण है। रंगमी पीतामर धारण किये हुए हैं। पुराना सवी मुनाएँ १ रनलार मप्र प्रसमापाई तामाई मुग्मितं रुचिराननम् ॥२७॥ सुर मुगार मन्द-मन्द मुमकानकी अनी ही स्टा ६ । उनक मुमटिपर पुष्पर्ग और नीली बसें पस्वसम्माभाई नानवालटिभि । इस प्रकार दामापम्पन रही हैं, माना भौरे पर रहे १ मन् । मरम्म स्पिारणम् ।

श्रीमहागवत [२०५५- कृष्ण मत्या स्त्रियो हीवा निलिल्युस्ता तत्र ह॥२८॥ 0। वे सब ठने श्रीकृष्ण समझकर सकुचा गयी चोर घम श्वर-उघर लुक-भिम गी ।। २७-२८ ॥ पिर अवधार्य बनैरीपदलयाम्पेन योपित । धीरे-धीरे सियोको यह मल्म हो गया कि ये श्रीकृष्ण नहीं है। क्योंकि उनकी अपेक्षा इनमें कुछ विलक्षणतर उपजग्मुः प्रमदिताः सनीरत्न सुविसिवा ॥२९॥ | अवश्य है । वम थे अत्यन्त आनन्द वौर विस्मयसे मर कर इस श्रेष्ठ दम्पति के पास आ गया ॥ २९ ।। इसी अप तत्रासितापाली पैदर्भी वल्गुभाषिणी । समय वहाँ रुक्मिणीनी वा पाँची। परीक्षित् ! उनके नेत्र फरारे और बाणी अफ्त मधुर बी । इस नर्कन असरद म्वतं नट स्नोस्नुतपयोधरा ॥३०॥ दम्पतिको देखते ही उन्हें क्यने सोये हुए पुत्रकी याद हो को न्वर्य नरपर्यः कस्य पा कमलेषणः । बायी । पारसम्पस्नेहकी अधिकतासे उनके खोसे दूध परने लगा ॥३०॥रतिमणीमी सोचने मा-- पृत फया वा बठर के लम्धा त्यनेन पा॥३१॥ | नररत कौन है ! पर कमलमयन किसका पुत्र है। किस कम मागिनीने इसे अपमे गर्ममें भारण किसा होगा । इसे यह मम पाप्पात्मजा नष्ट नीतो य पविकागृहात् । कौन सौम्ाग्यानी पनीरूममें प्राप्त है। ॥३१॥ मग मी एक नन्हा-सा शिशु खो गया था। म चाने एतत्तुस्मययोरूपो पदि जीवति मुत्रचित् ॥३२॥ कौन उसे स्तिकागृहसे उठा ले गया । यदि कह कहाँ जीता-जागता होगा तो उसकी बस्सा तपा रूप कार्य त्यनेन संप्राप्त सारूप्प झाधिन्वनः । भी इसीके सम्पम इना होगा ॥ ३२॥ में तो इस बातसे आरत्यावर्गत्या म्बरहापावलोकनः ॥३३॥ हैराम है कि इसे भगवान् श्यामसुन्दरकी-सी रूपरेखा, वोंकी गम्म, पाठमाल, मुसकान-पितक्म बौर बोस- म एव वा भवेन्न्न यो म गर्मे तोऽर्मक । चाळ कहास प्राप्त ॥ २३ ॥ हो-नमो नापी बाक, जिसे मैंने अपने गर्भ धारण किया था। अमुग्मिन् प्रीतिरधिका बाम स्फुरति म सष ॥३४॥ क्योंकि समावसे ही मेरा स्नेह इसके प्रति उमा रहा है और मेरी वा बोह मी फरक रही है।॥३१॥ एच मीमांसमानायां वैदम्पा दमकोसुन । निस सम्प रुक्मिणीमी इस प्रकार सोच-विधर कर दी पा—निमय और सन्देम्के सेमे मुलगी देवस्पानरुदन्दम्पार चमनाक आगमन् ।।३५॥ थी, उसी समय पवित्रकीर्ति मगवान श्रीकृष्ण अपने माता-पिता देवकीपसुदेवनीने साप हो पधारे ॥३५|| विनातार्थाऽपि भगांस्तूप्मीमाम जनादन । मगवान् यीपम्ग सब कुछ जानते थे । परम्तु य कुर म बोले, पुरधाप बढ़ रहे । इतनेमें ही मारदमी पड़ों ना पहुंचे और उन्होंने प्रयुममीको शप्परम्सुरका रस नाग्दोऽभययन मष भम्पराहरणारिफम् ।।३६॥ पाना, समुदर्भ पर देना आदि बितनी भी पटनाएँ घटित हुई पा, रेसम पद सुनायी ॥ २६ ॥ नारदजी- के द्वारा यह महान् थाधर्ममयी घरमा सुनकर भगवान् नपुरया महदाभय इप्णान्तापुरपापितः । धीरणके मन्त-पुरकी यि पकिन हो गया और १ उचा। २ पासवान। ।

अ० ५६ ] दशम स्कन्ध अम्पनन्दन पहनन्दान् नष्ट मृसमियागतम् ॥३७॥ बहुत वर्षातक साये रहनेके वाद लौटे हुए प्रफुलनीका इस प्रकार भमिनन्दन करने मी, मानो कोई मरकर नी देवकी वसुदेवम कृष्णरामौ तथा लिय । उठा हो । ३७॥ देवकीमी, सुदेवमी, मावान् श्री- फुरण, वन्मामजी, रुक्मिणीशी मोर नियों-सब उस नव दम्पती तो परिप्वज्य रुक्मिणी च ययुर्मुदम्॥३८॥ दम्पतिको हदयसे लगाकर मात ही मानन्दित हुए ॥३८॥ जब शरकावासी नर-नारियोंको यह मादम हुवा कि न प्रघुम्नमायातमाकर्ण्य द्वारकौकस । सोये हुए प्रद्युम्नधी और बाये है, तब वे परस्पर काने म्गे-बहो, कसे सौभाग्यकी बात है कि यह पाठक मानो अहो मृत इथापावो पालो दिएचेति हाब्रुवन् ॥३९॥ | मरकर लि मौर माया' ॥३९॥ परीक्षित् ! प्रचुसनीका रूपरंग भगवान् श्रीकृष्णसे इतना मिलता-जुलता था कि य पै मुटु पिस्सरूपनिजेशमाषा- ठने देसकर उनकी माताएं भी उन्हें अपना पतिदेव श्रीकृष्ण समानकर मधुरमाश्में मग्न हो जाती थी और उनके म्तन्मातरो यदभजन रहरूलभाषाः । सामनसे हटकर एकान्तमें चली जाती थी ! श्रीनिकेतम मगधन्के प्रतिविमलरूप कामावतार भगवान् प्रभुनके चित्रं न सत्खलु रमास्पदविम्वविम्ब दील बानेपर ऐसा होना कोई अपर्पकी पात नहीं है। सिर ठरें देखकर दूसरी सियोंकी विचित्र ददशा दो काम सरेऽक्षिविपये किमुतापनार्यः॥४०॥ माती पी, इसमें तो कहना ही क्या है ॥ १० ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारम्हस्यां संहितापा दशमस्कन्य उच्चपर्धे' प्रधुम्मोत्पचिनिरूपण माम पापनाशोऽध्याय ॥ ५५॥ अथ पट्पञ्चाशचमोऽध्याय स्पमम्सकमणिकी च्या आम्पपती मोर सत्यभामा सापभीरप्पच विवाद श्रीशुक उवाप भीगुरुदेयसी कदते ६-परीशित् । सत्राजित्न सत्राजित म्यवनयां रुष्णाय स्ववित्तिप । श्रीकृष्णका झूटा कर मगाया था। स्ति. तस अपराधका मानन करनेके रिये उमने सर्प म्यमन्तकागिसहित अपनी स्थमन्तमन मणिना म्ययमुपम्य दत्तवान ॥१॥कया सस्पमामा मगवान् श्रीहनको सौंप दी ॥१॥ रागोपाप रामा परीभित्ने पूज-मापन् । सप्राजित्ने सपावित फिमकरोत् प्रान् कृष्णस्य कित्तिपम् । भावान् श्रोषणा स्पा बाराधमा । उसे म्पपनामगि पहसि मिठी और उसन वानी पस्या म्पमन्ना तम्तम्प कम्मान दत्ता सुताएर २ ॥ उन्हें क्यों । ॥२॥ भी उगप मागदपीन पदा-परीधित् ! सरमित् भगवान् मासीन् मनावित प्यों भक्तम्प परम मरा। सूपस बात का मक पाने उमकी मधिसे प्रसन ३ ४८० श्रीमद्भागवत [अ०५६ प्रीवस्तमै मणि प्रादात् सूर्यस्तुष्ट स्ममन्तकम् ॥३॥ | होकर उसके बास घड़े मित्र घन गये थे। सूर्य मावन्ने ही प्रसन होकर वो प्रेमसे उसे स्पमन्तममणि दी समषिमन् मणि कण्ठे म्राजमानो यथारपि । पी ॥३॥ सत्राजित् उस मणिको मलेमै धारणकर ऐसा प्रनिशे द्वारकां रास्तेजसा नोपलक्षित ॥४॥ चमकने लगा, मानो स्पर्य स्य ही हो । परीक्षित् । जा सप्रानित शारकामें मापन तब सस्पत तेजसिताके व विलोम बना दूगवेबसा मुष्टष्टय । कारण वेग उसे पहचान न सके॥१॥ दूरसे ही उसे देकर लोगोंकी वो उसके सेबसे चौषिया गया । दिम्पतेऽर्मगवत नर्भसुः सूर्यचश्विाः ॥ ५॥ ध्येगोने सममा कि कदाधिर सम भावान् सूर्य का ते है। उन ला!ने भगवान्के पास जाकर उन्हें इस बातकी नारायण नमस्तेऽस्तु शचक्रगदाधर । सूचना दी। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण चौसर के दामादरारविन्दास गोविन्द यदुनन्दन ॥ ६ ॥ हे पे ॥ ५॥ गोंने कहा---शहादापारी भायपण ! कमलनयन दामोदर ! यदुवंशशिरोमणि एप आपावि सविवा स्वां विभुर्जगत्पते । गोविन्द ! आपको नमस्कार है ॥६|| जगदीवर ! देखिये। अपनी चमकीली किरणोंसे लोगोंके नेत्रों को चौषियते मुम्मन गभस्तिचक्रेण नृपां पई पि तिग्मगु ॥ ७॥ ए प्रस्परस्मि भगवान् सूप वाफ्का दर्शन करने का रहे है॥७॥ प्रभो 1 समी श्रेष्ठ देवता विधी नन्वन्त्रिपन्ति ते मार्गप्रिलोमा चिनुपर्षभाः । सापकी प्रालिका मार्ग से इसे है, किन्तु उसे पावे जास्वाप गूदे या द्रष्टुं स्वां पात्यवः प्रभो ॥ ८॥ नहीं। बाब पापको यदुवंशमें छिपा रावा बानफल बम सूर्यनारायण पापका दर्शन करने जा रहे हैं ॥ ८॥ भीक उस श्रीशुकदेषजी कहते है परीक्षित् । निषम्म पालवधर्म प्रासाम्मुखलोचना । पुरुमौकी यह बात सुनकर कमलमपन मालान भीकृष्ण हसने लगे। उनोंने कहा-'अरे, ये सूर्यदेव महा। प्राइनासो रनिर्देष सत्राधिन्मणिना ज्वलन ॥९॥ यह तो समामिद , यो मणिके कारण उसना चमक सा ॥९॥ इसके बाद सत्राजित् मपन समय में सत्राजिव स्वगृह श्रीमत् रुसकौसकमङ्गलम् । का माया । परफर उसके पुमगमनके उपायों प्रविश्य देवसदने मणि विप्रेन्यवेशयत् ॥ ०|| RAको देवमन्दिरमें भापित करा दिया ।१०। मात्र उत्सव मनाया जा रहा पा । उसने नापति गाय दिने दिने म्पर्णभारानष्टौ स सुजति प्रभा । | पीक्षि ! पर मणि प्रतिदिन बाट भार, सोना या फरती पी । और जहाँ वह पूजित होकर राती भी हो दुर्भिक्षमारिष्टानि सभिष्याधयोऽशुभाः । दुर्पिक्ष, महामारी पीरा सपम्प, मानसिक और ० मारका परिमाण इस प्रकार है- मर्मितिमि गुशान्याच अयो परममधे व वर्षे वार माहुभारं स्पादियनिस्मुथ ॥ भधात् बार मीदि। पान ) श्री एक गुड़ा पाँच गुजान पापा भाउ पाच एक परम भाट परबरा एक पारस पह मो पपनै एक तुपा भोर बीम तुम्न एक मार प्रमा। बममान क्ष पपान्। पस्यम् ।

अ०५६] दमम स्कन्य ४८१ नसन्ति मायिनम्तत्र पत्रास्तेऽम्यर्थितो मणि ॥११॥ शारीरिक व्यया तया मायापियोंका उपद्रव आदि माई मी बसुम नहीं होता था ॥ ११ ॥ एक वार मगधन् श्रीकृष्णने प्रसङ्गमश कहा-'सत्राजित् ! तुम पानी म माचियो मणि कापि यदुराजाय शौरिणा | मणि रामा उग्रसेनका दे दा । पर वह इतमा बर्ष रोलप-स्पेभी था कि भगवान्की भाशाक्य उलहन होगा, इसका कुछ मी विचार न करके उसे अस्वीकार नवार्थकामुक प्रादाद याआभामतर्कयन् ॥१२॥ कर दिया ॥ १२ ॥ तमेकदा मणि कण्ठे प्रतिमुन्य महाप्रभम् । एक दिन सत्राजिल्क माई प्रसेनने उस परम प्रकाश- मयी मणिको अपने गलेमें धारण कर लिया और फिर वह प्रसेनो इयमात्म मृगयां घ्पचरद यने ॥१३॥ मोझेपर सवार होकर शिकार खेम्ने बनमें चला गया॥१॥ यहाँ एक सिंहन घोड़सहित प्रसेनको मार डाला और उस प्रसेनं सायं दत्वा मणिमाच्छिप कसरी । मणिको छन रिमा । वह अभी पर्वतकी गुफामें प्रवेश करीया पा कि मणिके ये अक्षराम नामवान्न गिरि विशाम्ता निहसो मणिमिच्छता ॥१४॥ उसे मार राग ॥ ११॥ ठहोंने यह मभि अपनी गुरमें सोऽपि चके कुमारस्य मणिं क्रीडन विले । से माकर वोको स्पनेके पिये दे दी । अपने माई प्रसेनक न भरनेसे उसक माई सत्रामित्या महा दु अपश्पन मातरं माता सत्राजित् पर्यतप्पत ॥१५॥ हुआ ॥ १५ ॥ यह कान ख्या, बहुत सम्मत्र है श्री पणने ही मेरे माइपो मार गया हो । पोंकि पर मायः कप्पन निासो मणिग्रीवो पर्न गतः। मगि गलमै मसकर मनमें गया पा ।' सत्यजितकी पर बात सुनकर लोग आपसमें काना-पी करने लग ॥१६॥ मावा ममेति वन्छुत्वा कर्णे कर्णेऽजपजना ॥१६॥ ना भगवान् श्रीकृष्णने सुना कि यह क्राफा टीका मेरे ही मिर मगाया गया है, तब ये उसे धा-बहाने के मगस्तिदुपभुन्य दुर्यो रिप्तमात्मनि । उत्पम नगर कुछ समय पुरुगेका साप सकर प्रसेन का इनके लिये गनमें गये ॥ १७॥ बहो सोसते. माई प्रसेनपठमीमन्यपद्यत नागर ॥१७॥ | खामने टोगोंने दम्या कि पार गरमें मिहन प्रसेन और उमरे पापा मार भाटा। जब में प्यग मिदक इस प्रसेनमार्य चपीस्य कमरिणा पने । परो नि देते हुए आगे बस, सर उन मन पर भी दखशि पर्वतर पर रिने निश्को भी मार राग है चादिष्ट निहसमृधण दरराजना ॥१८॥ ॥१८॥ पासराजपिल भीमम धन सममाऽऽतम् । भगान् भान मा गगेका पादर ही गिन | Pपा भर अवर ही बार अमरसे मग प्रफा विषा भगानवम्पाप्य परिः प्रजा ॥१९॥ गी मपार गुम प्रा यि | १० || मावन्ने तय ना मगिभष्ट पारकारन मतम् । पन बार दमिर मनि म्पन्नस्या पाया तु स्ठमनिममिमातस्पध्मशान्तिक ॥२०॥ विना ना दिया । टस र सनकी इसे ८ ४८२ भीमद्भागवत [१०५६ खमपूर्व नर हा धात्री चुक्रोश भीतषत् । बन्केके पास जा सके पए ॥ २० ॥ उस गुरुमे एक जपरिषित मनुष्यको देखकर मम्चेकी पाय भयभीती वच्छत्वाम्पद्रपद दो माम्बवान् बलिनां वरः॥२१॥ माँति चिस्य उठी । उसकी किमहट सुनकर फरम कली अक्षरान बाम्बवान् क्रोषित होकर यहाँ दौर समें भगषता वेन युपपे स्वामिनाऽऽस्मनः । वाये ॥ २१ ॥ परीक्षित् वाम्पत्रान् उस समय कुफ्ति हो ये थे । उनै मगवान्की महिमा, उनके प्रमाका पता म चला। उन्होंने उन्हें एक साधारण मनुष्य पुरुप प्रारु मस्या छपियो नानुभाववित् ॥२२॥ समझ लिया और वे अपने स्वामी मगमान् श्रीकृष्णसे पुर करने लगे ॥ २२ ॥ जिस प्रकार मासके लिये दो बाम इन्दयुद सुखमुलमभयोबिबिगीपतो । मापसमें करते हैं, वैसे ही किमयामितापी मायान् श्री- पण और नाम्यवान् श्राफ्समें धमासान युद्ध करने को। आयुधाश्मदुमैर्दोभिः फष्पार्वे श्येनपोरिष ॥२३॥ पहले तो उन्होंने अब-शोकर प्रसार किया, फिर शिष्मनोका । सत्पश्चात् वे पक्ष उसारकर फ सरेपर आसीचदष्टार्षिशामितरतरष्टिभिः | फेंकने को। अन्तमें माइमुख होने ध्या ॥ २३ ॥ परीक्षिय ! वन-प्रहारके समान को घोसे आपसमें वचनिप्पेपपरुपैरविषममानिशम् | ये अट्ठाईस दिनतक बिना किमाम किये पत-दिन मरते ॥२४॥ हे ॥ २४ ॥ तमें भगवान् श्रीकृष्णके घूसोंकी पोटसे कृष्णमष्टिविनिप्यातनिप्पिष्टाकोरुपन्धनः । नाम्यान्के शरीरकी एक-एक गाँठ टूट-मर गयी । उत्साह जाता रहा । शरीर पसीमेसे पपपप हो गया। तब उनोंने माफ्त विस्मित-पक्ति होकर भागन् धीगसवः खिमगात्रस्तमाहातीच विपितः ॥२५}} मीहष्णसे कहा ॥ २५॥ प्रमो | म मान गया ! बाप बाने त्वां सर्वभूतानां प्राण योजा सहो बलम् । ही समस्त प्राणियों के सामी, रक्षक, पुरणपुरस मान् विष्णु हैं। बाप ही सबके प्राण, इन्त्रिपबया, मनोका चौर शरीरक्ल ॥२६॥ वाप सिके रचयिता मग विष्णु पुराणपुरुष प्रभविष्णुमधीपरम् ॥२६॥ | आदिको मी मनानेवाले है । बनाये र पदार्पोम में सत्तारूपसे बाप ही विराजमान हैं। कालके मितने भी सं हि विश्वसुर्धा सटा समानामपि यच सत् । भम्पा , उनक नियामक परम का बाप ही हर शरीर-भेदसे भिन्न-भिम प्रतीपमान अन्तरालमयोंकि परम फालाफालयतामोशः पर बात्मा तथाऽऽमनाम् ।२७|| वामा भी बाप ही है ॥ २७ ॥ प्रभो ! मुझे मन है, बापने अपने नेत्रोंमें तनिक-सा कोषका मात्र मेकर पस्मैपदुस्कलितरोपकाक्षमोक्ष निम्ती रिसे समुद्रकी जोर दसा पा । उस समय समुदके अंदर रनेवाले बड़े-बड़े नाक (परिपत) परमदिसत् क्षुभितनप्रतिमिशिलाऽम्धिः । और मगरमच्छ मुम्ब हो गये ये बौर समझने आपको मार्ग दे दिया था। तब मापने उसपर सेतु बोपकार सेतुः मत स्वमश उन्नम्विा च लश। मुन्दर यशकी स्थापना की सपा का विवस विपा । मापके बाणोंसे कर-करकर पक्षसकि सिर पप्पीपर कोट रपाशिरसि भवि परिपक्षवानि ॥२॥ येथे ! (बारसही बाप मेरे ३ ही शम्मी भीकृष्णके ब०५६] दशम स्फध ४८३ इति विधातविज्ञानमृक्षराबानमय्युतः । रूपमें आये हैं)॥ २८ ॥ परीक्षित् ! बम अक्षयन बाम्बान्ने झापानको पहचान लिया, तब कमळनयन व्याजहार महाराज भगवान् देवकीसुतः ॥२९॥ श्रीकृष्णने अपने परमकल्याणकारी शीसाठ करकमलको अभिमुश्पारविन्दासः पाणिना शंकरण तम् । उनके शरीरफर फेर दिया और फिर महंतकी पपासे रुपया परया भक्त प्रेमगम्भीरया गिरा ॥३०॥ मरकर प्रेमगम्भीरयाणीसे अपने मफ जाम्बवान् नीसे कहा-॥२९३०॥ अक्षयन ! हम मणिके रिये मणिदेसोरिह प्राप्ता वयमृक्षपते फ्लिम् । ही तुम्हारी इस गुफामे पाये हैं। इस मणिके द्वारा में मिष्यामिशापं प्रमृजमात्मनो मणिनामना ॥३१॥ | अपनेपर लगे झूठे कलाको मिटाना चाहता हूँ ॥३१॥ इस्युक्त स्वां दुहितर कन्या पदी सुदा । भगवान्के ऐसा करनेपर नाम्यवान्ने यो बानन्दसे उनकी पूना करने के लिये अपनी कन्याकुमारी जाम्यवती अर्पणार्थ स ममिना प्मायोपजहार ह ॥३२॥ को मणिके साथ उनके घरणेमिं समर्पित कर दिया||३२॥ अदा निर्गम ौरेः प्रविष्टस्य पिले बनाः । मावान् श्रीकृष्ण निन लोगोंको गुफाके बाहर छोर गये थे, उन्होंने बारह दिनतक उनकी प्रतीक्षा की। प्रदीप बादशाहानि दुःखिताः स्वपुरं ययु ॥३३॥ | परन्तु जब उन्होंने देखा कि अयतक वे गुफार्मेसे नदी निकले, तय घे अत्यन्त दुस्सी होकर धारकाको बोट निगम्य देवकी देषी रुक्मिपानकदुन्दुभि । गये ॥ ३३ ॥ यहाँ नव माता देवकी, रुक्मिणी, | वसुदेषत्री तपा अन्य सम्बन्धियों और फुटुम्बियोको या मादोषस्तयोऽनोयन क्लिात् कृष्णमनिर्मातम् ॥३४॥ मालम इजा कि श्रीकृष्ण गुफार्मेसे नहीं निकले, कम उन्हें का शोक हुआ ॥ ३९ ॥ सभी द्वारकापासी सत्राजितं शपन्तस्ते दु:सिता द्वारकौकसः । पस्यन्त दु सित होकर सत्रानिको मला-पुरा पहने मगे और मगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिये महामाया दुर्गादेवीकी शरणमे गये, उनकी उपासना करमे उपतस्थुर्महामापां दुर्गा कृष्णोपलम्धये ॥३५॥ ठगे ॥ ३५॥ उनकी उपासनासे दुर्गादेवी प्रसम हुई भऔर उन्होंने आशीर्वाद दिया । उसी समय उनके बीचमें तेपो तु बन्युपस्मानाव प्रत्यादिष्टाशिपास च । मगि और पानी मवत्र नाम्पतीके साप समरममनोरष होकर भीक्ष्ण सवको प्रसन करते हुए प्रकट हो प्रादुर्बभूव सिद्धार्थः सदारो हर्पयन् हरिः ॥३६॥ गये ॥ ३६॥ सभी द्वारकावासी भगवान् श्रीकृष्णको पहीके साप और गरमें मगि धारण किये हुए देकर उपलम्प पीकेशं मृत पुनरियागतम् । परमानन्दमें मन हो गये, मानो कार मरकर स्पैर भाया सह परन्मा मणिग्रीषं सर्वे बावमहात्सया ॥३७॥ हो ॥ २७ ॥ समामित समात्य समायां राजसनिधी । सानन्तर मगवान्ने सवानिको रामसमामें महाराव उपसेन के पास पुरवाया भोर निम प्रकार मगि प्राप्त ईपी, वह सव कपा मुनाफर उन्होने पर मगि प्राप्ति धाम्म्याय भगवान् मणिं तसन्यवेदयन् ॥३८॥ साजिदको सौंप दी ॥ ३८॥ सारित् वापत समित हो गया । मगि तो उसने ले ली, परन्तु उसका सपातिप्रीडितो रस्न गृहीत्वापामस्वस्ततः । मुंह मीचे की ओर ष्टक गया । अपने अपराधपर उसे भीमद्भागवत [.५० अनुतप्पमानो भवनमगमत् स्वेन पाप्मना १३९।१ यहा पश्चाताप हो रहा था, किसी प्रकार वह अपने म पाँचा ॥ ३९ ॥ उसके मनकी मारक सामने सोऽनुप्यास्तदेवाघ बलवद्विग्रहालः। निरन्सर भपना भपराध माचता रहता । बरमान्क साम विशेष करने के कारण समयमीत भी हो गया था। कथं मृधाम्मात्मरचा प्रसीदेषाम्पुतः रूपम्॥४०॥ कम का यही सोचता हता कि मैं अपने अपराधका मानम फैसे करूँ। मुझपर मगमान् श्रीकृष्ण को प्रसन हो ॥ १०॥ में ऐसा कौन-सा काम करें, जिससे मेरा किं त्वासाघु मर्म स्याम सपेक्षा जनो यथा । कल्याण हो और मेग मुझे कोसे नहीं । समुप में मदूरदशी, भर है" धमके लोमसे में ही पताका अदीर्घदर्शनं पुढे मूह द्रविफ्लोलपम् ॥४१॥ काम कर पैर ) ११ पब में रमणिमें स्नके समान अपनी काम्या सत्पमाम्म धौर यह स्पमसकर्मान दास्से दुहिवरं राम सीरन्न रखमेव च । दोनों ही श्रीकृष्णको देहूँ। यह उपाय बात व है। सीसे मेरे अपराधका मानन हो सकता है कर उपामोऽयं समीचीनम्तस शान्दिन पापथा ॥४२॥ ) को उपाप नहीं है ॥ १२॥ सत्रानिने पानी निक मधिसे ऐसा निश्चय करके नये ही इसके किये उधोन एवंध्यवसितो षड्या सत्राजित् स्वमुता शुभाम् । किमा पौर अपनी कम्पा तपा स्यमन्तकमणि दोनों ही के माक्त प्रीकृष्णको मर्माण का दा॥१३॥ सम्पमाम्म मणि च स्वपापम्य रुष्णायोपजहार है॥४३॥ शीर-सम्प, सुन्दरता, उदारता, अादि सद्गुणैसे सम्पन वा । एत-से लोग चाहते थे कि सत्पमाम्य हमें मिले और उन लोगोंने उनें मोगा भी पा । पराका सां सत्यभामा भगवानुपयेम यथाविधि । मगयन् श्रीकृष्णने विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहम बहुभिर्याचितां श्रीलरूपौदर्यगुणान्विताम् ॥४४॥ से कहा- हम स्यमन्त्यमणि नमो । जाप सूर्य- कि ॥ ११ ॥ परीक्षित् ! मालान् श्रीकप्प्पने सानिए माधान के मह इसलिये या एकेही पास से) भगमाना न मणि प्रतीन्छामो पर्य नृप । हम तो केवल उसके फरहाके, अर्थात् उससे निकले र सोनके अधिकारी है। बही बाप में दे दिया तबाम्नां देवभत्स पयं च फलभागिनः॥४५॥ करें। ॥ १५ ॥ इति श्रीमागवते महापुराणे पारमहस्यां संहितायां दशमस्कारधे उवा) स्पान्तकोपाल्याने पक्षाशोऽध्याय ॥५६॥ अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय म्यमस्तक हरण तपायाध उशर मोर भाजीच्ये फिर मारण पुम्मना भीमर पाप मीएकोपजी कहते है-परीक्षित ! यपि मापन पिसावार्थोऽपि गाविन्दायभानावर्ण्य पाणमान् । श्रीगो इस मामका पवा पा कि यक्षागाफी बागसे पामा बाम भी मौका नहीं हुमा तपापि सस १ ममाप्यमाना। देरमा ।। ।। मातराममारे समनार पाडा.

म० ५७] दशम समन्ध ४८५ जन्ती च छत्रपकरणे सहरामो ययो कुरुन् ॥१॥ धोमे मुना कि कुन्ती और पाण्डव जछ मरे, तब उस एमपका फुल-परम्परोधित म्यवहार करने कहिये वे म राम- जीके साय हस्तिनापुर गये ॥ १॥ यहाँ जाकर भीष्म- भीष्म कप समिदुरं गान्धारी द्रोणमेम छ । पिसामा, रूपाचार्य, विदुर, गान्धारी और मोणाचार्यसे मिलकर उनके साथ समवेदना सहानुभूति प्रकट की और उन कोसे कहने लगे.-'हाय-हाय ! यह तो तत्पदालौ च साम्य हा कष्टमिति होचतुः॥२॥ बो ही दुखको मात हुई ॥ २ ॥ लाध्यैक्दन्तरं रामन शतधन्वानमुक्तः । भगवान् श्रीकृष्णके हस्तिनापुर चले चानेसे द्वारकामे भकर और तबर्माको अवसर मिल गया । उन लोगोंमे अकरमतर यो मणि काम गृपते ॥३॥ (शतभन्यासे पाकर कहा -'तम सत्राजित्से मणि क्यों नहीं छीन लेते। ॥३॥ सप्रावित्ने अपनी श्रेष्ठ योऽसम्प संपतिवत्य कन्पारन विगर्ष नः । काया सस्यमामाका विवाह हमसे करनेका वपन दिया था और अब ठसने हमलोगोंका तिरस्कार करके उसे श्रीकणक साप म्याह दिया है। मा सत्रामित् भी रुप्णायादाम सत्राजित् फरसाद भ्रावरमन्वियात॥४अपने माई प्रसेनकी पार्योन यमपुरीमें नाय १ ॥ ९ ॥ शतपन्या पापी पा मौर मब तो उसकी मृत्यु मी एवं मिममसिस्ताम्या सत्राजितमसत्तमः। उसके सिरपर माघ दी थी। बार और कतवमकि इस प्रकार याकामेपर शतधन्वा उनकी वामि मा गया समानमवभील्लोभात् स पापः धीणबीषित ॥५॥ और उस मातुष्टभे लामका सोये हुए सत्राजित्को मार सगला ॥ ५॥ इस समय सियाँ वनायके समान रोने- स्त्रीणां विक्रोशमानानां मन्दन्तीनामनाथपत् । पिस्ने गापरन्तु शतपन्याने उनकी नोर तनिक भी प्यान न दिया, जैसे कसाई पशुओंकी हत्या कर दान्ता हत्ता पशून सौनिचन्मणिमादाप जग्मिवान् ॥ ६॥ है, जैसे ही वह सत्राजिदको मरकर और मणि लेकर महाँसे धपत हो गया ॥ ६ ॥ सुस्पभामा च पितर हवं वीक्ष्म शुधार्पिता । सुत्पमामामीको यह देखा कि मेरे पिता पर समे गये १, बहरा शोक हुआ और मे हाय पितानी ! आप पितामी ! मारी गपी'---इस प्रकार पुकार पलपघाव दातेति हा हसासीवि मुमती ॥७॥ पुकारकर बिलाप करने सगी । यीस्थी बमें ये पहोश हो जाती और होश आनेपर ति मगर फरन वैलदाम्पो मृत प्रास्स जगाम गबसाइयम् । सात ॥ ७॥ इसके बाद उन्होंने अपन पिसाफे शास तेरके कमाहमें रखवा पिा और अप हस्तिनापुरको गया । उन्होंने वह दुम्पसे मगवान् श्रीगा अपन सप्णाय विदितायाय वप्ताऽचम्प्यो पितुर्वधम्।। ८॥ पिता की हत्याका पन्त सुमाषा-~यपपि इन बातोंका मगवान् श्रीकृष्ण पालसे ही जाना थे ॥ ८॥ पीधित् ! सर्वशक्तिमान् मगचन् श्रीरण और बलरामजीने सब सदाभरी राममनुस्त्य नृलोस्साम् । मनात मनुष्यों सी सीग करते हुए नानी बसामि ४८६ श्रीमद्भागवत [ २.५७ अहो नः परम कष्टमित्पस्रायो विलेपतुः ॥९॥ भोस् भर लिये पोर मिलाप करने को कि हो! हम लोगोंपर सो यह बात बड़ी विपति या पकी ९॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण सत्पमामानी और काम आगत्य भगवस्तिमात् सभामा साप्रमः पुरम् । जीके साप हस्तिनापुरसे मका मैट बाये पोर - पन्धाको मारन तपा उससे मणि छीननेका उपोग करने शवधन्यानमारेमे इन्सु हाँ मणिं तत ॥१०॥ स्त्रो ॥१०॥ सोऽपिरुणोयम धात्वा भीतः प्रापपरीप्सया। जब शतकबाको या मारम हुमा कि भगान् श्रीकृष्ण मुझे मारनेका ठपोग कर रहे हैं, तब यह बहुत साहाय्ये कृतवर्मागमयाघत स पामयीत् ॥११॥ उर गया और अपने प्राण बचानके लिये उसने कृतवर्मासे सहायता मोगी । तव सममि कहा- ११॥ नाहमीधरया: प्रों हेलनं रामकृष्णायो। 'भगवान् श्रीकृष्ण और बग्यमनी सर्वशक्तिमान ईर में उमका सामना नहीं कर सकता । भब्य, ऐसा को नु माय कल्पेव तपोजिनमाचरन् ॥१२॥ | कौन है, जो उनके साप और बाँधकर इस खेक और परोको सकुशल र सके ! ॥ १२ ॥ तुम फंस सहानुगोऽपीतो यदेपास्यानित भिया । मानते हो कि कस मन्हासे रेप करनेके कारण राम- लामीको सोटा वोर अपने अनुपमिके साप मा जरासंध सप्तदश संयुगान विरयो गतः ॥१३॥ गया। जरासन्म-वैसे शूरवीरको मी ठमझ सामने सपा पार मेशनमें हारकर विना रपके दीवानी रामधामीमें सो माग प्रत्याग्प्यातः स चाकर पार्णिप्राइमपाचत । पका पा ॥ १३॥ नव तिमनि उसे इस प्रकार - सा मवाब दे दिया, सव सम्याने महापाके मि सोऽप्याह को विरुध्येत विद्वानीपरयोलम् ॥१४॥ नरभीसे प्रार्थना की। उन्होंने कहा-'माई ! ऐसा कोन है, जो सर्वशक्तिमान् मगामा कमीप जाम- याद लीलपा विर्ष सुजत्पयति इन्ति च । कर भी उनसे पर-विशेष यमे । यो भगवान् केम्प्रे ही इस सिकी रचना, रक्षा और सहार करते है तप पेष्टां विपसना पस्प न विदुमारिताजया ॥१५॥ | जो कर क्या करना चाहते हैं-इस बातको मायासे मोदित प्रक्षा बादि विय-विधाता मी महा सम्म पाके, या मप्तहायना पेलमुत्पाठपकेन पाणिना। मिदोंने सात वर्षकी बासा ---जन वे निरे बामक थे, एर हापसे ही गिरिराज गोपीनको खा लिय धार लीलया पाल उमिछली मिरामक ॥१६॥और जैसे माहे मने पम्मे बरसाती पेको उन नमनम हाथमें रस से है, से ही सेर क्षेत्र में सात दिनोंक भगरत कृष्णापातकर्मण । उसे सटाये रम्य, में ता वन मगमन् गणारे ममस्कम करता है। उनके कर्म कात अनन्तापादिमूताय गम्यायान्मने नम ॥१७॥ बना', एनस और मामयसप हैं । में उन्हें नमस्कार करता है ॥ १४ १७ ॥ मय इस प्रकार मरजीने प्रयाम्पात: म वेनापि शतधन्वा महामपिम् । भी ससे कोरा नपापा, म्याने स्पसा म० ५७] दशम स्कन्ध तमिन् न्यस्साघमारम तयोजनर्ग ययौ ॥१८॥ मणि उन्होंके पास रख दी बौर भाप चार सौ कोस लगातार चळनेवाले घोरेपर सवार होकर पहसि पसी फुतीस मागा ॥ १८॥ गस्टचजमारुम रथ रामजनार्दनौ । परीशित् ! भगवान् श्रीकृष्ण और मलयम दोमों माई अपने उस रपपर सवार पुए, निसपर गचिासे अन्वयावां महावेगैरश्च रामन् गुरुवहम् ॥१९॥ चिहित घमा फहरा दी थी और बड़े बेगपाले घोरे जुते हुए ये । अव उन्होंने अपने चार सत्राजितको मिथिलायामपषने विसृज्य पतितं हयम् । मारनेवाले शतपन्धाका पीछा किया ॥ १९॥ मिपिळा पझपामधावत् सत्रस्त कणोऽप्यन्यद्रवद रुपा।२०। पुरीके निकट एक उपवनमें शतघन्वाका घोडा गिर पड़ा, जब वह ठसे होकर पैदल ही भागा । यह नस्पति पदातेगांस्वस्स पदातिस्तिग्मनेमिना । भयभीत हो गया पा । मगवान् श्रीकृष्ण मी क्रोध करके उसके पीछे दौड़े ।। २० ॥ शतपन्या पैदल ही माग चरण भिर उत्तस्प पाससोळविनोन्मणिम् ॥२१॥ रहा पा, इसलिये भगवान्ने भी पैदल दोरकर अपने तीषण पारवाले चक्रसे उसका सिर उतार लिया अलम्धमणिरामत्य कृष्ण आहाप्रजान्तिफम् । धौर उसके पनि स्पान्तकमणिको रा ॥ २१ ॥ ध्या इतः सवधनुर्मणिस्तत्र न विद्यते ॥२२॥ परन्तु जब मणि मिली नहीं, सय मगषान् श्रीकृष्णने बड़े माई वनामजीके पास माकर कहा हमने शत- वत आह पलो न स मणि समन्वना । घन्वाको म्पर्य ही मारा | क्योंकि उसके पास स्यमस्तक- मणि तोही नहीं ॥ २२॥ वाममीने कहा- कस्मिमित् पुरुपे न्मस्तस्तमन्धेप पुरं ग्रज ॥२३॥ इसमें सन्देह नहीं कि शतधन्वाने स्यमन्तकमणिको किसी-न-किसीके पास रस गियाहै। अब तुम द्वारका अई पिदेहमिच्छामि द्रष्टुं प्रियतम मम । गाओ और उसफा पता लगाना ॥ २३॥ में विदेह इत्यात्वा मिथिला रामन् विवेश यदुनन्दन ॥२४॥ यमसे मिलना चाहता हूँ, स्योंकि ये मेरे यहुत ही प्रिय मित्र है। परीधित् ! यह कहकर पदुवशशिरोमणि संरना सहसोत्याय मैथिल: प्रीतमानस । पळरामनी मिपिग्ण नगरीमें चले गये ॥ २१ ॥ अब मिपिन्यनरेशन देखा कि पूजनीय मसराममी महाराज अर्हयामास विधिवदईणीयं समर्पणः ॥२५॥ पधारे हैं, तब उनका "प आनन्दसे भर गया। उन्होंने सफ अपने आसनसे उठकर अनेर साममियोंसे सनकी उवाम वस्सा कतिचिमिथिलायां समाविमुः। पूजा की ।। २५ ॥ इसक वार मगयन् पञ्चमनी कई पोतक मिमिरापुरीमें ही रहे। महात्मा जनकन पड़े मानितः प्रीतियुक्तन बनकेन महात्मना । प्रेम चोर सम्मानसे ने रस्ता । इसके बाद समपार ततोऽधिषद् गदा काले भातराष्ट्र सुयोधनः ॥२६॥ धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधनने बरामजीसे गदायुद्धफी शिक्षा प्राइण की॥२६ ॥ पानी प्रिया सत्यमामा प्रिय कार्य फसवो द्वारकामेत्य निधनं शवधन्वनः । करके भागन् भीषण शारका र आये और उनको पह सम्पचार सुना रिपारि यन्वायन मार दाध्य अप्राप्तिघमणे प्राह प्रियायाःप्रियकर विस ॥२७॥ या, परस्तु म्यमनकमगि उमक पास म मिनी ॥२७॥ १ ने । १ पार्वतमानः ।

४८८ श्रीमद्भागवत [२०५७ ततः स कारयामास क्रिया मधोईतस्प। | इसके बाद उन्होंने भाई-मधुओंके साथ अपने ससुर साकं मुद्भिर्मगवान् या मा स्युः साम्परायिका॥२८॥ सत्रामिल्की वे सब षौदेहिक क्रियाएँ करवायाँ, जिनसे मृतक प्राणीका परलोक मुधरता है ॥२८॥ अफरः कृतवर्मा च भूत्वा शतधनोर्वधम् । अकर और कृतवर्माने शतधन्याको सत्रामिल्के पके लिये उचेजित किया था । इसलिये वष उनहोंने एना व्यूफ्तर्मपवित्रस्ता द्वारकाया प्रयोजको ॥२९॥ कि मावान् श्रीकृष्णने शतधम्याको मार गम है, तब देस्यन्त मपमीत होकर धारकासे भाग खोए ॥२९॥ अरे प्रोपितेऽरिष्टान्यासन् वै द्वारकौकसाम् । परीक्षित् ! कुछ मेग ऐसा मानते हैं कि बकरके। से चले जानेपर शारका वासियों को बहुत प्रकारके पनि शारीरा मानमास्तापा मुहुर्दै विभौखिकाः ॥३०॥ पौर अरिष्टोंका सामना करमा पड़ा । दैविक और भौतिक निमियोंसे बार-बार यहाँके नागरिकों को शारीरिक | मानसिक कर सहना पा । परन्तु जो लोग ऐसा कावे इत्पनोपदिसन्स्पेक विस्मृत्य प्रागुवाहतम् । हैं, वे पहले की हुई मातोंको मूल बाते हैं । मम, मुनिवासनिवासे किं पटसारिष्टदर्शनम् ॥३१॥ मी कमी सम्भव है कि मिन भगवान् श्रीकृष्ण समस्त अपि-मुनि निवास करते हैं, उनके निवासस्थान प्रमका- दषऽवर्षति कासीमः अफल्कापागताप पै । में उनके रहते कोई उपद्रव सदा हो जाय ॥३० ३१॥ उस समय नगरके बड़े-बड़े रोगोंने कहा- 'एक बार काशी नरेशक राम्पमें वर्ण नहीं हो पीपी, सूख पर स्वसुर्वा गान्दिनी प्रादात् तताध्यपत् म काशिपु ३२। गपा पा । तब उन्होंने वपने राम्पमें बाये हुए के तस्सुतस्तस्प्रभावोऽसावरो यत्र मत्र ह । पिता श्वफरकको अपनी पुत्री गाम्दिनी म्याह दी । तम उस प्रदेशमें पर्वा हुई । बकर भी सामने की पुत्र दवाभिवर्पते तब नोपतापा न मारिकाः ॥३३॥ हैं और इनका प्रमाव भी वैसा ही है। इसलिये गाँ रहते हैं, वहाँ यहाँ सूत्र होती है या किसी प्रकारका मन्ट और महामारी थादि उपद्रव महाँ इति अपच भुत्वा नंतापनि कारणम् । होते । परीक्षित् ! उन लोगोंकी बात सुनकर मावान् मे सोचा कि मस उपदफा यही कारण नहीं है या इति मम्मा समानाग्य प्राहाम् जनानः ॥३४॥ मानकर भी भगवान्ने कुरा भैसकर वमीको तुंरचय और नानपर उमसे बातचीत की ॥२२-२१॥ मान्ने पूजपित्याभिभा पैन कथपिम्बा प्रिया फयाः । उनका मम सागत-सत्कार किया और मीठी-मीठी प्रमकी बातें कहकर उनसे सम्भाषण किया । पशिद ! मगवान विमानालिलपिसत मपमान उवाच ॥३५॥ ये उपोनि मुसकराते हुए अरसे कहा-॥ ३५॥ समके पिता एक-एक सारस देखते रस्ते हैं । इस चामानी । बाप दाल-धर्मक पाला है । हमें ननु दानरते न्यम्नस्त्वय्याम्न सपन्यना । पह बात पहलसे ही मारम मि सपना 'नटः।

दशम स्कन्ध अ० ५७] स्थमन्तको मणिा श्रीमान् विदित पूर्वमेव न ॥३६॥ | वापके पास वइ स्यमन्तकमणि छोड़ गया है, जो वही ही प्रकाशमान और धन देनेवाली है।। ३६ ॥ श्राप मानते ही हैं कि साजिवके को पुत्र नहीं है। सत्राजिवोऽनपत्यत्वाद् गृहीयुरित सुता । इसलिये उनकी ताकीके मके- उनके नाती ही उन्हें तिमनति और बिगान करेंगे, उनका ऋण जुफायेंगे दार्य निनीयाप पिण्यान् विमुपणे च शेपितम्।।३७|| और जो कुछ वष रहेगा, उसके उत्तराधिकारी होंगे ॥३७॥ इस प्रकार शास्त्रीय दृष्टि से यपपि स्यमन्तकमणि हमारे तथापि दुर्घरस्त्वन्पैस्वयमास्तां सुनवे मणि । पुत्रों को ही मिनी चाहिये, तपापि पर मणि आपके ही पास रहे। स्पोंकि आप मड़ प्रनित और पवित्रामा है तथा इसके लिये उस मणिको रसमा अरफ्स कटिन मी किंतु माभग्रज सम्यख्न प्रत्येति मणि प्रति ॥३८॥ है। परन्तु हमारे सामने एक बहुत बड़ी कठिमाई यह वा गपी है कि हमारे बारे माई कसरामनी मणिके दर्शयस महाभाग बन्धूना शान्सिमावह । सम्बन्ध मेरी वातका पूरा प्रयास नहीं करते ॥३८॥ इसलिये महाम्यम्पवान् धनी ! आप वह मणि दिसा- कर हम्परे पत्रि-बलरामजी, सत्यमाम बीर अव्युच्छिन्नामलास्तऽध पर्तन्ते रुममपेदय ॥३९॥ जाम्बस्तीका सन्देह दूर कर दीजिये और उनके पदयमें शान्तिका सभार कीजिये । हमें पता है कि उसी एवं सामभिरालब्धा बफरकसनयो मणिम् । मणिके प्रतापसे जानकर आप हंगासार ही ऐसे या करते रहते हैं, जिनमें सोनेकी वेदियो बनती है ॥३९॥ आदाय वाससाछन्नं ददो सूर्यसमप्रभम् ॥४०॥ परीक्षित् ! बत्र मगान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सान्त्वना देकर उन्हें सममामा युनाया, तब धरनीने वहमें लपेटी स्पमन्त दर्शपित्वा मातिम्पो रज आत्मन । हुई सूर्यो समान प्रकाशमान यह मगि निर्य भौर भगवान् श्रीकृष्णको दे दी ॥ १० ॥ मावान् विमृन्य मणिमा भूपस्तस्मै प्रत्यर्पयत् प्रभु ॥४१॥ श्रीरणने यह स्पमतकमणि अपन नानि माइयोंको दिसाकर अपना काम दूर किया और उसे अपने पस्त्वद् भगपत ईयरस पिप्णो पास रखने में समप होनेर मी पुन अरबीको मोटा रिया ॥११॥ सशकिमान् सकपापक मगधन् श्रीगणके पर- पीपाल्य वृजिनहर सुमङ्गल च । | फोंसे परिपूर्ण यह भारुयान समस्त पापों, रणवीर कोकर मार्चन करनेवाला तया परम महरमय है । आरम्यानपठति भगोस्पनुमरे या जो इसे पहत्य, सुनता अपत्रा स्मरण परता है, पर सब प्रकारकी अपकीति और पापोंसे छकर शान्तिपर दुप्फीति दुरितमपोन यावि शान्तिम् ।।४२|| अनुभव करता है ॥ २ ॥ इति श्रीनमागवते महापुरामें पारम्एस्यो सहितायो दशनाच उतरा म्पमतकोपराम्याने सप्तरवाशवमोऽस्पाय || ५७ ॥

४९० भीमद्भागवत [२०५८ अथाप्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय भगवान् श्रीकप्पके मम्पाम्प विवाहोंकी कथा मीकि उवाच भीशुकदेषजी करते है-परीक्षित् ! अब पामयों का पता चल गया था कि वे साक्षामबनमें से नहीं है। एकदा पामषान् द्रष्टुं प्रतीतान् पुरुषोत्तम । एक बार मगध प्रीक्षण उनसे मिथ्नेके लिये इन्द्रप्रस | पधारे । उनके साप सात्यकि नादि बहुत से पहुशी मी इन्द्रप्रस्थ गतः भामान् पुयुधानादिमितः ॥ १॥ ॥१॥ जब वीर पाणने देखा कि सर्वेभर मगवान् म समागतं पार्षा मुभन्दमसिलेवरम् । भीतष्ण पधारे है तो असे प्राणका सधार होनेपर समी इनियों सचेत हो जाती है, वैसे ही वे सापे-सब एक सप उत्स्युर्पगपत् वीरा प्राणा मुस्पमिषागतम् ॥ २॥ र सो ए ॥ २ ॥ बीर पाण्डवोंने मगवान् श्रीकृष्णका नागिन किया, उनके बा-सङ्गसे इनके सारे पाप-प परिप्पज्याच्युतं वीरा मासमारीनस । घुल गये । मगवान्की प्रेममरी मुसकराहटसे मुशोभित मुस-सुषमा वेसकर वेवानन्दमें मान हो गये ॥ ३ ॥ सानुरागमित पत्र पीक्ष्य सस्प मदं ययुः ॥३॥ भगवान् श्रीरणने युधिष्ठिर और भीमसेनके घरों में प्रणाम किया और बर्जुनको एप्से लगाया । नकुल और युधिष्ठिरस्य भीमस्स रुस्वा पादामिवन्दनम् । सहदेवने मगवान के चरणोंकी वन्दना की ॥ १ ॥ मा फाल्गुन परिरम्पाप यमाभ्यां धाभिषन्दित ॥ ४॥ परमसुन्दरी झ्यामवर्णा प्रौपदी, मो नवविवाहिता होने के | भगवान् श्रीकृष्ण श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हो गये, तब परमासने आसीनं कृष्णा कृष्णमनिन्दिता । कारण तनिक मा यो थी, धीरे-धीरे भगवान् की- कणके पास पापी और ठमें प्रणाम किया ॥ ५॥ नघोरा मोठिता किषिष्रेत्पाम्पपन्दत ॥ ५॥ पाणयोंने मगवान् श्रीकृष्ण के समान ही पीर सात्यक्किा मी सागत-सत्कार वीर अमिमन्दम-पादन किया । तथैव सास्यकिः पापैः पवितमाभिवन्दित । एक वासनपर बैठ गये। दूसरे पडुशियोंपर भी सपा पोम्प सत्कार किया गया तपा ये मी माणके बायें निपसादासनेऽन्ये च पिता पर्युपासत ॥ ६ ॥ / बोर वासनोंपर बैठ गये ॥ ६ ॥ इसके बार भगवान् श्रीरण अपनी मा फुस्तीके पास गये और ठमके पूर्ण समागत्य कवाभिवादन- घरमि प्रणाम किया । कुत्ती जीने अत्यन्त स्नेस में मपने हदयसे लगा लिया । उस समय उनके नाम स्तयाविहार्द्रप्यामिरम्भिवः प्रेमके गाँस छाक माये । कुस्तीमीने श्रीकृष्णसे अपने आपएपस्तिो इसलं सहस्नुपा भाई-मधुनोंकी फुशार-क्षेम छी बौर मगवान्ने भी उनका पपोषित सर देकर उनसे ठमकी पुत्र पिप्पसार परिपष्टवाधयः ॥ ७॥ द्रौपती मोर स्वयं उनका कुशस माल पहा ॥ ७॥ उस समय प्रमकी दिम्तासे कुत्तीनीका गम म गपा का, प्रमहम्पदफण्ठाभुलापना । नोंसे वास् पा रहे थे। मावान्क एलनेफर उन्हें १ पारपनिरपर मादिता।। ममाव । नमिता में रमे । बोहिता-सा तमार

[० ५८]
दशम स्कन्ध
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परन्ती तान् पहन क्लेशान् लेखापापात्मदर्शनम्॥८॥ अपने पहले के क्लेश-पर-क्लेश याद थाने मो और वे
अपनेको मात समाएकर, बिनका दर्शन समस्तक्लेशोंका
अन्त करनेके लिये ही मा करता है, उन भगवान्
श्रीकृष्णसे पाने लगी- ८॥ श्रीकृष्ण ।
दैव इशलनोऽभूत् सनाथास्ते कृता वयम् ।
निस समय तुमने हमलोगोको अपना कुटुम्बी,
सम्बन्धी समसकर स्मरण किया और हमारा कुशल माल
माननेके लिये माई अक्रको भेगा, उसी समय हमारा
शातीन्न मरतारुण भासा मे प्रेपिसस्त्वया॥९॥ कल्पण हो गया, हम अनापेको तुमने सनाप कर
| दिया ॥ ९ ॥ में जामती हूँ कि तुम सम्पूर्ण जगत्के
फ्रम हितैषी मुम् चौर भास्मा हो। या क्समा है और
न तेऽस्ति स्वपरम्रासिर्विपस्स सादात्मनः ।
या पराया, इस प्रकारफी भान्ति तुम्हारे मदर मही
है। ऐसा होनेपर मी, श्रीकृष्ण ! जो सदा तुम्हें स्मरण
करते है, ठमके दपमें बाकर तुम बैठ भासे हो और
तथापि सरतांनभत् क्लेशान् हसि रवि स्थितः॥१०॥ उनकी क्लेश-परम्पराको सदाके सिमे मिटा देते हो ॥१०॥
युपिष्ठिर उवाच
युधिष्ठिरजीने कहासभर श्रीकृष्ण । हमें इस
बगतका पता नही है कि हमने अपने पूर्वमन्मि या इस
किं न आपरित भेयो न वेदामधीपर । | मनममें कौन-सा कम्याण-साधन किया है। वापका दर्शन
बोमड़े योगेबर मी बड़ी कठिनतासे प्राप्त कर पाते हैं
योगेपराणां दुर्दों पन्नो प्याकमेपसाम् ॥११॥ और हम कुमुद्धियोंको पर बैठे ही भापके दशन हो रहे
हैं॥११॥ रामा गुषिष्ठिरने इस प्रकार मगधन्का
इति वैवार्षिकान् मासान् रामा सोऽम्पर्थितामुखम् । खूब सम्मान किया और कुछ दिन नहीं बनेकी प्रार्थना
की। इसपर मावान् श्रीकृष्ण इन्द्रप्रसके नर-नारियोंको
बनयन् नपनानन्दमिन्द्रप्रसौमसा पिसः ॥१२॥ अपनी रूपमाधुरीसे नयनानन्दका दान करते हुए बरसास-
के चार महीनोंतक मुखपूर्वक पहाँ रहे ॥ १२ ॥
एकदा रपमारुम विजमो भानरवजम् ।
परीक्षित् ! एक बार वीरशिरोमणि बर्जुनने गाण्डीव
धनुष बोर वक्षप मागवाले दो तरकस लिये तपा मगवान्
गाणीव धनुरादाप तूणी पाइपसापकौ ॥१३॥ यहाणके साथ कवच पहनकर अपने उस रपर सवार
हुए, निसपर बामर-चिहसे चिहित प्पया स्माई दी।
सा रुणेन सेनको विर विपिन पनम् ।
इसके बाद विपक्षी वीरों का नाश करनेवाले पुन उस
गहन मनमें शिफार लेने गये, नो मात-से सिंह नाम
परम्पारामृगाकीर्ण प्राविपत् परवीरहा ॥१४॥ मादि भपहर बानवरोंसे मा पुमा पा ॥ १३१॥
यहाँ ठोंने बहुत से बाप, सूमर, मैसे, कसे हरिन,
वाविन्यप्राधान् सकरान् महिपान करून् ।
शरम, गवय (नीलापन लिए भूरे रंगका एक यदा
हिरम ) गैरे, हरिन, सरगोश और शत्सक (साही)
शरमान् गमयान् सान्दरिणाम्छमासाठकान्॥१५॥ वादि पशुओंपर अपने बालों का निशानात्याया ॥१५॥

४९२ भीमद्भागवत [म०५८ तान् निन्युः किंकररा राज मेष्मान् पर्षम्युपागते । उनमेंसे जो याके योग्य थे, उन्हें सेवागमपर्वका समय मानकर राजा युधिष्ठिरके पास ले गये । अर्जुन शिकार हदपरीतः परिभान्तो बीभत्सुर्यमुनामगात् ॥१६॥ खेलने पळते पक गये थे। अब ये प्यास मानेपर यमुनाजीके किनारे गये ॥१६ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण वोर सत्रोपराश्य विक्षदं पीत्वा पारि महारयो । अर्जुन दोनों महारपियोंने यमुनानीमें हाप-पैर धोकर कणीदरमतुः फन्यां चरन्ती चारुदर्भनाम् ॥१७॥ त्या को तपस्या कर दी है ॥ १७ ॥ उस मे उमका निमल नम पीया वीर देस कि पफ परमसुन्दरी तामासाद्य परारोहां सुविधा रुचिराननाम् । मुन्दरीकी जघा, दौत और मुस अत्यन्त सुन्दर मे । अपने प्रिय मित्र श्रीकृष्णके मेमनेपर मुनने उसके पप्रच्छ प्रेपितः सख्या फारगुन प्रमदोचमाम्॥१८॥ पास जाकर म-॥ १८ ॥ "मुन्दरी ! तुम कौन हो। किसकी पुत्री हो । कहाँसे थायी हो । स्पा करना काव कस्पासि सुभोणि तोऽसि किं चिकीर्षसि । चाहती हो। मैं ऐसा समझता हूँ कि तुम अपने योम्प पति चाह सी हो। कम्पाणि । तुम जपनी सारी मन्ये स्वां पतिमि छन्ती सर्व कथय शोभने ॥१९॥ बात बतलामो ॥ १९ ॥ कासिनमुवाच कालिन्दीने कहा-में भगवान् सूर्यवेकी पुत्री हूँ। में सर्वश्रेष्ठ वरदानी मगवान् विष्णुको पतिके सपने मा देवस्य सचितुर्दहिता पतिमिन्छवी । प्राप्त करना चाहती है और इसीलिये या कठोर तपस्या विष्णुं परेयं परदं तपः परममालिवा ॥२०॥ कर ही है ॥ २० ॥ पीर दर्शन ! में नीके परम भाभय मगवानको रेकर बोर किसीका अपना पति नान्यं पति प्रणे पीर वमृते भीनिकेतनम् । महाँ मना सकती । बमापोंके एकमात्र सहारे, प्रेम तुम्पको मे स भगवान् सान्दोऽनापसंभयः ॥२१॥ वितरण करनेवाले मगमान् श्रीकृष्ण मुसपर प्रसन्न ॥२१॥ मेरा नाम है कालिन्दी। यमुनानल्में मेरे पिता कालिन्दीवि समाख्याता पसामि यमुनाजले । सूर्यने मेरे लिये एक मान मी वनमा दिया। उसीने निर्मिते भवने पित्रा पापदच्युतदर्शनम् ॥२२॥ यही रति ॥ २२ ॥ अर्जुनने गाकर मगवान् में राती हूँ । नमतक भगवान्का दशन न होगा, म तथाषद गुडाकेदो मासुदेमाय सोऽपिताम् । | सारी बातें कही। वे तो पहलेसे ही सबक मानते थे, या उनाने कामिन्दीको अपने रफ्पर रथमारोप्य सद् विद्वान् धर्मराजमुपागमत् ॥२३॥ मिया और भगन पुधिष्ठिरके पास के वाये ॥ २३ ॥ येदेष कृष्णः सदिष्टः पार्थानां परमानुसम् । इसके बाद पाणपोंकी प्रार्षमासे मगलान् पाम रखनके लिये एक अत्यन्त कम और विचित्र फारयामास नगरं विचित्रं विपकर्मणा ॥२२॥ | मगर निकाकि बारा बनवा पा ॥ २४ ॥ मगवान् भगपस्तिथ निपसन् स्थानां प्रियपिझीपया। इस बार पापोंको वानन्द देने और उनका हित फरमके किये हो वात दिनोंक्क रहे । इसी बीच मनिदेको ममये साप दातुमर्जुनस्यास सारथिः ॥२५॥ मण्डप-क्न दिलानके लिये रे ननके सारथी भी १ पारि रमवे पुरुषमीसारम् । ३ वषेर । । श्रीकणसे भीष्णने अ०५८] दशम स्कन्ध ४९३ सोऽग्निस्तुएो घनुरदादयामयेतान् रथ नृप । बने ॥ २५ ॥ माण्डव-पनका भोजन मिस नानेसे अग्निदेव महुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अङ्गुनको गाण्डीव अर्जुनायाक्षयो सूणो धर्म चामेपमखिभिः ॥२६॥ धनुष, चार श्वेत घोरे, एक रप, दो अटूट वाोंवाले शरकस और एक ऐसा मसब दिया, जिसे कोई भम- शमधारी मेद न सके ॥ २६ ॥ सण-दाहके समय ममम मोचितो व सभा सम्ल्प उपाहरत् । अर्जुनने मप दानक्को नम्नेसे बचा लिया था। इसलिये उसने अर्जुनसे मित्रता करके उनके लिये एक परम पसिन् दुर्योधनस्खासीमलस्सलरशिम्रमः ॥२७॥ महत सम्ा बना दी। उसी समामें दुर्योधनको नममें समबीर स्पलमें नलका भ्रम हो गया पा॥ २७॥ स तेन समनुमात मुरद्रिमानुमोदित । कुछ दिनोंके पाद मगवान् श्रीकृष्ण भनकी अनुमति एवं अन्य सम्बन्धियोंका अनुमोदन प्राप्त करके सास्यकि आपयो दारफी भूयः सात्यकिप्रमोर्पत ॥२८॥ | अदिके साप द्वारका रोट माये ॥ २८ ॥ कहाँ भाकर वनोंने विवाह के योग्य ऋतु मोर म्यौतिपश्पसके अनुसार मयोपयेमे फालिन्दी सुपुण्पतय ऊर्जिते । | प्रशसित पवित्र कानमें कालिन्दीजीका पाणिग्रहण किया। इससे उनके खनन सम्बन्धियोपो परम मङ्गल चौर विवन्वन् परमानन्द स्वानां परममालम् ॥२९॥ | परमानन्दकी प्राप्ति हुई ॥ २९ ॥ मपन्ती ( उम्मैन ) देशके राबा ये पिद चौर विन्दानुविन्दावाषन्त्यो दुर्योधनमशानुगौ। अनुविन्द । वे दुर्योक्नके पशवी सपा अनुयायी थे। उनकी बहिन मित्रविन्दाने स्वयंवर मावान् श्रीगणको स्वयंवरे स्वभगिनी फणे सक्तो न्यपेधताम् ॥३०॥ी अपनापति बनाना चाहा। परन्तु किन्द और अनुविन्दने अपनी बहिनको रोक दिया ॥३०॥ परीक्षिस् ! मित्रविन्दा राजाधिदेम्पास्तनयां मित्रविन्दा पितृप्तसु।। श्रीरणकी झा राजाधिदेवीकी त्या पी । भगवान् श्रीक्ण रानाओंकी मरी समामें उसे बटपूर्णफ दर से गये, सब ोग भपना-सा मुँह रिये देखते ही प प्रसमा रक्यान् कृष्णो राजन् राज्ञां प्रपश्यताम् ॥३२॥ गये ॥ ३१ ॥ नम्नजिमाम फीसस्य आसीद राजाविधार्मिकः। पीक्षित ! कोसउदेशके यमा पे मम्ननित् । अस्पत धार्मिक थे। उनकी परमगुन्दरी पल्पाका नाम तस्य सत्याभवत् कन्या देवी नाग्नजिवी नृप ॥३२॥ सपा मम्ननित्फी पुरी होलसे पर माग्ननिती भी कामाती पी । परीक्षित् ! राजाकी प्रतिसके नवा शेजस्ट्रेपा बोनुममित्या मप्त गोपान् । अनुसार साम दुर्दान्त बगेपर त्रिप प्राम न मर सकनेके कारण कोई रामा ठम् कपासे विवाह तीक्ष्णयमान मुदुर्घर्पान् पोरगधामहान् सलान्।३३ कर सके । क्योंकि उनफ सींग का तीये जोर से और किमी वीर पुरुरकी गाय भी मही सर सस्ते दोश्रुवापजिलम्या भगवान् सान्या पति । ॥३२ शानब पगशियमगि मावान् श्रीगने पाह सम्बधार मुना फिनो पुरुष उन पैगेका नीत स्मा, वगाम सरसपुरं मन्यन महता पृत ॥३४॥ | इसे ही सत्या प्राम होगी, तब पहुन बड़ी सेना स्कार १ पिये। हरी - ४९४ श्रीमद्भागवत [अ०५४ " सफासलपतिः प्रीवः प्रत्युत्पानासनादिभिः । कोसलपुरी (अयोप्या) पाचे ॥३॥कोसममरेश महाराज नानबित्ने बड़ी प्रसनतासे उनकी अगवानी की बोर वासन आणेनापि गुरुणा पूमपन् प्रतिनन्दितः ॥३५॥ आदि देकर बहुत बड़ी पूना-सामग्रीसे उनका सकार किपा । मावान् श्रीकृष्णने मी समका बास मन पर विलोपामिम 'समागत ममिमदन रिया ॥ १५॥ राजा नम्नमिन्की कन्या | सत्याने देखा कि मेरे चिर-अमिछपित रमारमम मावान् नरेन्द्रफन्या पकमे रमापतिम् । श्रीकृष्ण यहाँ पधारे। तब उसने मन-ही-मन पर भूपादर्य में पविराशिपोऽमला: अमिमरा की कि यदि मैने अत-नियम वादिका पाम करके इन्हींका पिन्तम किसा है तो ये ही मेरे पति ने करोतु सस्पा यदि मे वो ॥३६॥ और मेसी विशुर बालसाको पूर्ण करें। ॥ ३६॥ नम्न- बिती सस्या मन-ही-मन सोचने ली-भक्ती कमी, यत्पादपाश्मरणः शिरसा विमति प्रया, शहर और बड़े-बड़े मेकपाल निनके पापारमा भीरम्जनासगिरिशासासोकपाल परग अपने सिरपर धारण करते है और मिन प्रमने अपनी बनायी दई मर्यादाका पालन करनेके म्येि ही लीलातमः खमतरोतुपरीप्सपेशः समय-समयपर बनेको कतार प्राण किये है प्रमु मेरे किस धर्म, मत वपमा निमासे प्रसन्न हो। कासे दपत् स भगवान् मम केन सुम्पेत्।३७ चे स्प्रे केवल अपनी रूपासे ही प्रसम हो सकते हैं ॥३॥ परीक्षित् ! रामा नम्ननित्ने मगवान् श्रीकृष्णकी विधि- अर्षित पुनरिस्पाह नारायण बमस्पते । पूर्णक वर्षा-सूना करके प्रार्थना की-बारके एकमात्र सामी मारापण | बाप अपन मरूपभूत वात्मानन्देन पूर्पस करपाणि किमपकः ॥३८॥ बानादसे ही परिपूर्ण । बौर में एक मनुए! मबापकी क्या सेवा करा ॥ २८ ॥ भीशुकदेवजी कहते है-पीक्षित् ! यमा नभनिए- समाह भगवान रेट: वासनपरिग्रहः । का दिया पुमा बासन, पूमा धादि मीनार करके मावान् भीकृष्ण पाव स्तर (ए । वनोंमे मुसकराते मेपगम्भीरया वाचा सस्मिर्स रुनन्दन ॥३९॥ ए मेषके सम्पन गम्भीर मामीसे कहा ॥ ३९ ॥ भीभगवानुपाप भगषाम् भोकलमे कहा-गमन् ! बो अप्रिय नरेन्द्र याा कविभिषिगर्दिता अपने धर्मम पित है, उसका कुछ मी माँगना पित नहीं । धर्म किसानोंने उसके इस कर्मकी निन्दा की रामन्मन्मोनियधर्मवर्तिना है। फिर भी में वापसे सौहार्द का प्रेमका समय स्थापित करने के लिये भापकी क्त्या पाहता हूँ। हमरे समापि पाये सब सौदेच्छया यहाँ इसके बदले में कुछ एक देनेकी प्रपा मही कन्या स्वदीयोन हिचकदावयम्॥४॥॥ १० ॥ १ वा । २ मायेन प्रतिम पापम मारि पूरा मोड भक्ति पुनरिस्माह । इस पूरे मोजके बाद ब० ५८]] दशम स्कन्ध ४९५ - राजोपाप पमा नग्नजित्ने कहा-प्रमो! बाप समस्त गुणों के धाम है, एक्सान भाय है। आपके पक्ष सम्पर फोऽन्यस्तेऽम्यधिको नाय कन्यावर हेप्सितः। झगश्ती लक्ष्मी निस्प-निरन्तर निवास करती हैं। मापसे गुमधाम्नो यस्याने श्रीर्वसत्पनपायिनी ॥४१॥ | पाकर फयाके लिये अभीष्ट वर मटा और कौन हो सकता है। ॥ ११ ॥ परन्तु यदुर्वशशिरोमणे । हमने कित्यमामि फतः पूर्व समयः सात्वसर्पम । पहले ही इस विस्यमें एफ प्रण कर लिया है। फापाके लिये फौन-सा पर उपयुक्त है, उसका बल पीरुप पुंसां पीर्यपरीक्षार्थ फन्याचरपरीप्सया ॥४२॥ कैसा है-स्पादि बातें जाननेके लिये ही ऐसा किया सप्ते गोपा वीर दुर्दान्ता दुरखग्रहाः। गप्पा है ॥ १२ ॥ पीरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ! हमारे ये सातों कैल किसीके वशन बानेवाले और बिना समाये हुए पतैर्भग्ना सुभहयो भिमगावा नृपात्मजा ॥४३॥ है। इन्होंने मदुत-से राजकुमारों के बड़ोंको सम्मित करके उनका उम्साह तोग दिया है।॥ १३॥ श्रीकृष्ण ! पदिमे निगृहीवा स्युस्त्वयंच यदुनन्दन । यदि आप ही माप में, अपने पशमें कर से, तो परो भवानभिमतो दुहितु, श्रिया पते ॥४४॥ लक्ष्मीपवे ! आप ही हमारी कत्याके लिये अमीर पर दरेंग ॥ ११ ॥ मगवान् श्रीणने राना नग्नजितका । एवं समयमाफर्म्य पद्या परिकर प्रमः। | ऐसा प्रण पुनकर कमरमें फेंट कस ली और | अपने सात रूप स्नाकर लेट सेमे ही उन पेडोंको आत्मानसप्तधारुत्वा न्यगृहालीलपैयवान् ।।४५॥ माय ख्यिा ॥ १५॥ इससे पैठणेश घमंड चूर हो गया और उनका क-पोरर भी नाता खा । म मगवान् । परनासान् दामभिः शौरिर्ममदान् हवीमसः। श्रीक्ष्ण उन्हें रस्सी बांधकर इस प्रकार चने लगे, पकल्लीलया पद्धान् पालोदारुमयान् यथा॥४६॥ जैसे स्केरते समय नन्हा-सा याय काठके चंगुको घसीरता ||१६|| राजा नम्नपित्यो पका विस्म्प एमा। क्त प्रीत सुता राजा ददौ कृष्णाय पिमित । उन्होंने प्रसन्न होकर मगवान् श्रीकृष्णको अपनी कस्याका तप्रित्पशृवात् भगवान् विधिवत् माझी प्रमः॥४७दान कर दिया और समाधिमान् मावान् श्रीकृष्णाने भी अपने अनुरूप पनी सस्याका विधिपूर्वक पाणिग्रहण राजपत्न्यम दुहितः कर्ण लम्चा प्रिय पतिम्। रिसा ॥ १७ ॥ रानियोंने देखा कि हमारी पायको । उसके अस्पत्त प्यारे भगवान् श्रीरण ही पति मपमें सेमिरे परमानन्द जातप परमोत्सम ॥१८॥ प्राप्त हो गये हैं। उन्हें बहा आमन्द हुआ और पारों सहमेयानच नेदुर्गीवापद्विजाशिप । ओर पहा मारी टासर मनाया जाने या ८॥ राम, ढोल, मगरे पनने स्टगे। सब ओर गाना-समाना नरा नार्यः प्रमदिवा मुपाम संगठकवा ॥४९॥ ने गा । माग पाशीरि दने स्ग। मुम्दर बस, पुणेक हार और गदनोंसे सज-धजकर मतक नर-नारी दम्पनुसामाणि पारिबई महान विभुः । बनम मनाने सगे ॥ १९॥ गना नम्नबित्ने दस हमार और और सीन हवा प्रेमी नापुरती जामियों, पुठीनां विमार्य निसीपमुघाममाम् ॥५०॥ ना सुन का सप में महार पइने र १प्रिय पदा।

४९६ भीमहागवत [२०५८ । नवनागसहस्राणि नागाछवगुणान् रथान् । दहेनमें दी । इनके साप ही नीरनार हावी, नौका रप, नौ करोष घोड़े और मौ भय सेवक मी दोन स्थाच्छवगुणानधानधाच्छतगुणान् नरान् ॥५१॥ दिये ॥ ५०५१॥ कोसनरेश यमा नमवित्ने मन दम्पती रपमारोप्य महत्या सेनया इतौ । और दामादको रपपर पढ़ाकर एक बड़ी सेनाके सा विदा किया । उस समय उनका दय वारसम्प-स्नेह स्नेहप्रविमरदयो पापयामास कोसल ॥५२॥ उद्रेकसे द्रवित हो रहा था ॥ ५२ ।। श्रुत्वैतत् लघुप्पा नपन्त पथि कन्यकाम् । परीक्षित ! यदुशियोंने बोर रामा मावित बलोंने पहले बात से राजाओंका वर-पौठय धूलमै मि भम्नवीर्याः सुदुर्मर्षा यदुभिर्गो पैः पुरा ॥५३॥ दिया था। अब उन रानावोंने यह समाचार सुना, | उनसे भगवान् श्रीकृष्ण की यह समय सान नई तानस्यता परवावान् बन्धुप्रियदर्जुन । उन लोगोंने माग्ननिती सत्याको लेकर नाते समय मन मगवान् श्रीकृष्णको घेर म्यिा ॥५३॥ वौर मे को को मनपर बाणोंकीर्या करने लगे। उस समय पामम गागीवी कालयामास सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥५४॥ अर्जुनने अपने मित्र भगवान् श्रीकृष्णका प्रिय करने किये गाणीव धनुप धारण करके वैसे हि भेटे-म पभोंको सदेर दे, जैसे ही उन मरपतियों को म पारिपाईमुपागप दारफामेत्य सत्यया । पीटकर मगा दिया ॥५१॥ तदमन्तर यदुर्मशभिर्म | देवकीनन्दम भगवान् श्रीकृष्ण उस दोन और सप रेमे पदनामृपभो भगवान् देवकीमुतः ॥५५॥ साप द्वारकामे माये और वहाँ सकर गृहस्पोक्ति दि करने लगे ५५ ॥ भुक्कीः सुवा भद्रामपयेमे पितृप्यमः। परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्णकी ममा वकी केमय देश म्याही गयी दी। उनकी पन्यका मा कैकेयी भाभिर्दचा फणः संवदनादिभिः ॥५६॥ | पाना । उसके भाई सन्तर्दन वादिने उसे समं । मान् श्रीकृष्णको देनिया और उननि उसका पानि मुखों च मद्राधिपर्लक्ष्मणां लपगैर्युताम् । प्रहण किया ॥ ५६ ॥ महादेशके रामाकी एक कर स्वयंवरे महारैका स सुपणैः सुधामिन ॥५७॥ सर्गसे ममृतका हरण किया था, जैसे ही मायन् पी लक्ष्मणा । पर वस्यन्त मुझणा पी। जैसे गम माणने स्वयंवरमें अकेले ही उसे हर मिया ॥ ५७ मन्पाविषा भार्याः फमस्यासन् सहस्रशः। परीक्षित् ! इसी प्रकार मगवान् श्रीकृष्णकी सहसो त्रियों पी। उन परम सुन्दरियों को ये भीमामुरा भौम इस्वा समिरोधादातापानदर्शना ॥५८॥ मारकर उसके दीगृहसे छुमा माये पे ॥ ५८ ॥ इति श्रीम्नागमते महापुरामे पारमईस्या संहितापा दशमस्करचे त्राः मठमदिप्युवाहो मामा पचाशतमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ १ मालम्पु । २ प्राचीन प्रतिम उदा पाठ नहीं है।

म० ५९] दशम स्कन्ध ४९७ | -- अथेकोनपष्टितमोऽध्याय भौमासुरका उदार मौर सोलह हजार एक सौ राजकम्पाभोके साथ भगवान्फा विषाह रागोवा रामा परीसिने पूछा-मगन् ! भगवान् श्रीकृष्णा- ने मौमामुरको, निसने सन सियोको बीगृहमें डाल पमा हत्तो भगवता भौमो मेन घ वासिय । रस्सा था, क्यों और कसे मारा ! भाप कृपा करके वाई-धनुषधारी भगवान् श्रीकृष्णका पह चित्र परित्र निरुदा एतवाचन विक्रम शाधन्वन ॥१॥ सुनाइये ॥१॥ भीमुक उपाच श्रीशुकयेषजनि फहा--परीक्षित भौमारने बरुण- फा छत्र, माता मदितिके कुण्टर और मेह पर्वतपर रतन्छपण हवकुण्डलबन्धुना । स्थित देवतामोंका मणिपर्वत नामक स्थान छीन मिया था । इसपर सक्के रामा इन्द्र द्वारकामें आये और इतामराट्रिम्मानेन मापितो भौमवेष्टिवम् । उसकी एक-एक करवा ननि भगवान् श्रीकृष्णको मुनायी । अब मगवान् श्रीण अपनी प्रिय पी सत्य- मामाके साथ गह पर सवार हुए मौर भीमाप्मुरकी राम समार्यो गाहाल प्राज्योतिपपुरं ययौ ॥२॥ पानी प्राणज्योतियपुरमें गये॥२॥ प्राग्ज्योतिपपुरमें प्रवेश करना बहुत कठिन पा । पहले तो उसके चारों भोर गिरिदुर्गा प्रसादुगर्बलाग्न्यनिलदुर्गमम् । पहायोंकी किरनी थी, उसके या शोंका घरा लगाया आ था। फिर जनसे मरी साई वी, उपके बाद नाग या बिजलीकी चहारदीवारी पी और उमके मुरपाशापुर: सर्वत आवृतम् ॥३॥ भीतर वायु (गै ) यंर करके रम्भा गया था । इससे भी भीतर मुर स्पिन नगरके चारों ओर अपन 'स गदया निर्षिताद्रीन् शनदुर्गाणि मापकः । हनार पोर एवं मुर करे ( नाल) विमा रकम थे ॥२॥ मगधन् घीणने अपनी गाकी बोरसे पझाको तोडफोड गला भौर ओंकी मारचरीका मागोसे चक्रणामि बलं पा मुरपाशन्तियामिना ॥ ४॥ हिममिम वह रिया । चकके भारा अमि, मर जा बायुकी पहारीवारियोको तहस-नहस कर Pिया और शहनादेन पन्त्राणि हृदयानि मनम्मिनाम् । मुर अस्पके पंटोंका तयारसे काट कर अगरप {Pया ॥ ॥ ना गार पत्र-मशान व स्नगी हुई थी उनका, सपा वीरपुरगों पर पदना से प्रारं गदपा गुर्पा निर्षिमेद गदाधर ॥५॥ विर्ग का Pिपा र नगरक परवाया गराधर मावान्न जानी मारी गगमे पंस का ग ..! पाचमन्पयनि श्रुत्वा पुगान्तानिभीषणम् । भगवान्द पाधवम्य पर्व पनि प्रयागन विमानकी पाक ममाम म भपहरा । तमे सुमार १ मे ।

श्रीमहागवत मर गयान उत्तम्या दैत्यः पञ्चगिरा बलात् ॥ ६॥ मुर दैत्यकी नींद टूटी और वा बाहर निकल काम । निगलमुग्रम्प मुर्निरीक्षणो उसके पाँच सिर ये मोर भवता या परके भीतर स्ने युगान्तनिलराचिरुल्वणः | रहा प॥ ६ ॥ यह देस्य प्रयकालीन सूर्य और अग्निके समान प्रचण सेनखी पा । इतना भपार प्रमविरोफीमिव पञ्चभिर्मुग्व था कि उसकी बोर आँख उठाकर देखना भी सामान रम्पद्रवचार्यमुख यथारगः ॥७॥ फम्म नहीं था। उसने त्रिशूल उठाया और इस प्रकार आरिम गूर तरसा गरुन्मते भगवान्की ओर दौडा, जैसे सौंप गाजीपर टू पा। उस समय ऐसा मागम होता पा मनो मह अपन पत्र निरस्य यस्वर्ण्यनदद स पश्मभिः । मुम्मोसे मिगेकीको निगल बाप ॥ ७॥ उसने बन म गदमी सर्वरिशाऽन्तरं महा विम्यो मह वेगसे धुमाकर गहाजीपर पत्य फिर वपन पाँचों मुसोंसे घोर सिंहनार करने । नापूग्यमण्डकाइमाणोत् ॥८॥ उसके सिंहनादया महान् गद पृणी, बारा, पालन वदापत में त्रिशिर्म गरुत्मते और दसों शिमि पर सारे प्रमाण्ड में मर गयाnel हरि पराम्पामभिनत्तिधाममा । भगवान् श्रीगने देग्ग कि मुर स्पिका वि गरी मोर मा पेगसे आ रहा है । तब अपना रस्ता मगेषु न पापि गंगनारपन् Pिाकर पुसि उन्होंने गेग मारे, जिनसे र सम्म गो माऽपि पाम्पमुभव ॥९॥ पिन काकर मीन टूक हो गया । इसके माप दी मुर खामापतन्ती गापा गदा मृघ देयक मुमि भी भगवान्ने परत से याग मारे । इसमें । पद रिप अरयन पुल से घट भर उसन भगानगर गराग्रजा निर्मिभिर महमपा । | अपनी गा पायी ॥ ॥ परम्नु मगगन् श्रीन उपम्प वानभिपाताऽनित पानी गाफ प्रहारमे मुर पी रे भन्न पम परमनसे पदस ही मर पर पर पिया। अप पद निगगि पमाण जहार रानपा १०॥ दीनदा नानक कारण पानी मुबार पे गार की प्पगुः पानाम्भमि नमनीषा भार गैरा और उन्होंन गटाती पर उमरे पार्ने FIR उमार रिप ॥ १०॥ गिर पटते ही निरागमा रिग्विलनमा पर गरज पर ही तम्या मना गम विभाग सन र परा, 'म नाम ar प्रतिक्रिपामाता गनर का गम में Franti गमपना ॥२॥ पो गपुर प.प. Pr नामाग्मि परिभाग पा मम्मत जर- । Hि पगुनमगना-प ITET HTTrtun भार - nar द गाय गमगी ग Thifarn भंगा निग्गन पणापा || ममम, ।

व०५९] दशम स्कन्ध ४९९ - प्रायुञ्जवासाय भरानसीन् गदा | वे वहाँ जाकर बड़े मापसे भगवान् श्रीकृष्णपर बाण, अस्पृष्टिशलान्यजिते रुपोषणाः । सद्ग, गदा, शक्ति, अधि और त्रिशूल आदि प्रषण शसोंकी वर्षा करने लगे। परीक्षित ! मगवान्की शकि तच्छनी भगवान् स्त्रमाणे यमोप और अनन्त है। उन्होंन अपने वाणोंसे उनके रमोपवीर्यस्तिलशपर्स ह॥१३॥ | कोरि-कोटि शसान तिक-तिन करके काट गिराये ॥१३॥ वान् पीठास्पाननपद् यमधर्म भगवान्क शवप्रहारसे सेनापनि पीठ और उसके सापी दैत्योंके सिर, बाँध, मुमा, पैर और करच कर गये और निकत्तशीरपाधिधर्मण ठन समीक्ने भगवान्न यमराजक पर पहुँचा दिया । खानीकपानच्युतपरसायकै नब पृथ्वीके पुत्र नरकासुर ( मोमासर) ने देखा कि स्तपा निरस्तान् नरको परासुतः ॥१४॥ भगवान् श्रीकृष्णके चक्र मौर मार्गों से हमारी सेमा चौर निरीक्ष्य दुर्मर्पण आम्रवन्मदै सेनापतियोंका संहार हो गया, सब उसे बसम क्रोष गैजेट पयोधिप्रमनिराफमत् । एला । मह समुद्रतटपर पैदा हुए यमुत-से मायाले हापियोंकी सेना सेकर मगरसे बाहर निकम । उसन हा सभाप गस्नोपरि स्थित | देश भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पहीक साप आकाशमै सूर्योपरिष्टात् सवरिपन यथा । गरपर स्थित है, जैसे सूर्यके उपर विपसीके साप फणं स सस्मै व्यसबग्छतमी पर्णकालीन श्याममेव शोभायमान हो । मीमासुरने स्वय योधाय सर्ने युगपत् म विम्यधुः ॥१५॥ | मगनान्के उपर शतमी नामकी शालि चलायी वार उसके सब सैनिकोंने मी एक ही साथ उनपर अपने मौममैन्य अपने पस-शम ह ॥ १११५॥ व मगवान् विचित्रपाबंनिशिवः शिलीमुखैः। श्रीपण भी चित्र विचित्र पसवाले सीले तीरले पाण निरुत्पाहरुधिरोधनिग्रह पम्पने लगे। इससे उसी समय मौमासुरके सैनिकापी मुमाएँ, अमि, गर्दन और पा कर-कटकर गिरने को, चकार तव हवामकुक्षरम् ॥१६|| हायी भोर घोरे मी मरने लगे ॥ १६ ॥ योनि योधी प्रयुक्तानि भवालागि हवा । परीक्षित् । भौभानुरके सैनि:ने भगवान्पर नो-जो बन-शम चमये थे, वनमें से प्रत्येकको मगमान्ने तीन हरिस्तान्पन्छिनवीक्ष्णैः शरैरेकैमसनिभिः ॥१७॥ तीन तीते मार्गोसे कार गिराया ॥ १७ ॥ उस समय । मगवान् श्रीकृष्ण गरमीपर सवार थे और गहानी उपमान सुपर्णेन पक्षाम्यां निमवा गजान् । अपने पसे शपियोंको मार रहे थे। उनकी चोंच, पंस और पोंकी मारसे पापियोंका बनी पीगा और ये गरुत्मवा इन्यमानास्तुप्पपक्षनम्बर्गमाः ॥१८॥ सव-के-सब मात होकर युद्धमिसे भागकर मगरमे घुस { गये । पापही जोग मौमासर ही काता या । जब पुरमेवाविशमार्ग नरको युम्पयुम्पत । इसन देस कि गाग्रीकी मारसे पीड़ित हाकर मेरी सेना माग यी है, तब उसने उनपर पर शाकि पत्नी, एट्य विद्रावि सैन्य गरुडेनादितं स्वकम् ।।१९।। | निसने गाको मी निकल कर Pिया पा । परन्तु उसकी १ प्राचीन प्रविमें पानि यो मामिमि हर दसोपड़ी मार ऐना पाठहै-मुदानि पराकानि मना हान्पम्निचरमपरेकिमिचिमिः । भगवान् गदाग्रजो । .. - ५०० भीमसागवत [1.५९ त भीमः प्राहरच्छप्पा पम्रा प्रतितो पतः । चोटसे पक्षियम गर तनिक भी विचलित न हुए, मानो किसीने मतवाले गजरानपर यकी मामसे प्रहार नाकम्पन वया विशो मालाहत इव दिपा ॥२०॥ किया हो ॥ १८-२० ॥ अत्र भौमामुरने देखा कि मेरी मूल भौमोऽष्युस हन्तुमाददे वितथोपमः । एक मी 'चाठ नहीं चश्ती, सारे उपोग विफल होते ना रहे हैं, तप वस्ने श्रीकृष्णको मार डालने के लिये एक तद्विसर्गात् पूर्वमेव नरकस शिरो हरिः । त्रिशूळ उटण्या । परन्तु उसे धमी या छोर भी न पाया अपाहर गजम्पस पकेग सुरनेमिना ॥२१॥ प कि मगवान् श्रीकृष्णने हरेके सम्पन तीसी धारकले चारुफिरीटम्पर्ण सकसे हाथीपर बैठे हुए मौमासुरका सिर कार गम्म ॥२१॥ उसका जगमगाता पुमा सिर कुमाल वीर मुन्दर किरीटके पभो प्रथिम्यां पतितं समुज्वलत् । सहित पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसे देकर मौमासुरक हादति साचित्पृपया सुरेश्वरा सगे-सम्बधी हाय-हाय पुकार उठे, अषिलोग 'साघ साधु' कहने लगे और वेक्ताल्भेग भगवान्पर पुर्पोकी माल्यैछिन्द विफिरन्त ईतिर ॥२२॥ य करते हुए स्तुति करने उगे ॥ २२ ॥ ततम भूः कृष्णमुपेत्य कुम्हले अब पृप्पी भगवान्के पास आपी । उसने मगवान् श्रीकृष्णके गलेमें वेनयन्सीके साथ काममा पहना दी प्रतप्तजाम्यूनदरममास्वरे और अदिति माताके बगम्गाते हुए कुणाल, चा तयाये सर्वबयन्त्या बनमालपार्पयत् इर सोनेके गण सामटित थे, मगवान्को दे ये तथा परुणका छा और साप ही एक महामणि मी उनको प्राचेतसं छत्रमयो महामणिम् ।।२३।। | दी ॥ २३ ॥ रानन् ! इसके बार पृथ्वीदेवो पाया अस्तीपीदय विश्वेनं देवी दववराचिंतम् । | देवताओंके धारा पूजित किसेवर भगवान् श्रीकृष्णको प्रालि' प्रगता राबन् भक्तिप्रवणपा धिया ॥२४॥ | स्तुन्नि करने छगी ॥ २५ ॥ प्रणाम करक हार मोबकर भकिमावभरे हदयसे उनकी मुमिरुषाच पप्पीदेवीमे कहा-शवगाघारी देवदेवेवर । में भापको नमस्कार करती है। परमात्मन् । आप नमस्ते देवदेवेष्ठ सचक्रगदापर। | अपने मोंकी हम पूर्ण करनेके लिये उसीके अनुसार रूप प्रकट किया करते है।माको में नमस्कार करती मक्तच्छोपावरूपाय परमात्मन् नमोऽस्तु ते ॥२५॥ ॥२५॥ प्रभा! लापकी माभिसे कमल प्रकट हुवा है। अप कमकी मात्र पामते हैं। आपके नेत्र कम से नमः परमनाभाय नमः परजमालिने । सिगर और शान्तिापा है। आपके घरण कमाके समान मकुमार और मोंकायको शीतल करनेयमे नमः पश्चनेत्राप नमस्ते पहजाय ॥२६॥ बाप समय एभर्य, धर्म, पा, सम्पत्ति, कान और है। वापको में बार-बार नमस्कार करती है ॥ २६ ॥ राम्पक आभप है। बाप सर्वम्पापक होनेर मी नमा भगरते सम्म पामुदनाय विष्णधे । सय बसुदेवनन्दमके सपनें प्रकट हैं। मैं अपको नमस्कार १ माहाविर । भूपाय।। चत्रिण ५० ५९] दशम स्फम ५०१ पुरुषायादिषीबाय पूर्णपोषाय ते नमः ॥२७॥ । करती हूँ। आप ही पुरुष है और समस्त कारों के भी परम कारण हैं। बाप सर्प पूर्ण ज्ञानस्यमाप है। में बजाय मनायिनेऽस्स प्रमणेऽनन्तशक्तये । आफ्को नमस्कार करती है॥ २७॥ भाप स्क्य तो है मन्मरक्षित, परम्त इस नगत्के जन्मदाता आप ही है। परापरात्मन् मृतात्मन् परमात्मन् नमोऽस्तु ते॥२८॥ याप ही कनन्त शक्यिोंके पात्रय बम हैं । जगत्का जो कुछ मी कार्य-कारणमप सप है, जितने भी प्राणी स्व वे सिमक्ष रज उत्कट प्रमो या वप्राणी है-सब वापके ही सरूप है । परमासान् । थापके चरणमि मेरे बार-बार नमस्कार ॥ २८॥ प्रमो। तमो निरोधाय विभपसंतः। जब बाप मगही रचना करना चाहते है, तम उत्कट रनोगुणको, बोर नब इसका प्रलाप करना चाहसे है स्मानाय सत्व भगवो जगत्पते तब तमोगुणको, तपा अब इसका पालन करमा चाइवे हैं तब सत्वगुणको सीकार करते हैं । परन्तु यह सब कालः प्रधान पुरुपो भवान् परः ॥२९॥ करनेपर मी बाप इन गुर्गोसे ढकते नहीं, ठित नहीं होते । जगत्पते 1 बाप स्त्रय ही प्रकृति, पुरुष और यह पयो न्योविरथानिलो नभो दोनोंके स्योग-वियोगके हेतु काल, सपा उन तीमोस परे भी हैं ॥ २९ ॥ मगवन् ! म (पृथ्वी), मम, वमि, मात्राणि देवा मन इन्द्रियाणि । पायु, श्राकाश, पश्चतन्मात्राएँ, मन, इस्त्रिय और इनके कर्ता महानिस्पलिल चराचर वषिष्ठत-देवता, माहार और महतल-कहाँतक काई, यह सम्पूर्ण घराबर नगर आपके वद्वितीय स्वरूपमें स्वम्पद्वितीये भगवमयं भ्रमः ॥३०॥ भम्के कारण ही पृपा प्रतीत हो रहा है ॥ ३० ।। वस्पास्मयोऽयं तव पादपर शरणागत-मप-भवन प्रभो ! मेरे पुत्र भौमासुरका या भीतः प्रपमाविहरोपसादितः । पुत्र मगदच मस्पन्त भवमीत हो याहै। मैं रसे बाफके रकमकी शरणमें से बायी है। प्रभो ! भाप इसकी वत् पालपनं कुरु हस्तपहले रक्षा कीजिये और इसके सिरपर मफ्ना र करकमल तिरस्पाम्पासिलफरमपापाम् ॥३१॥ रहिये जो सारे मगल्के समस्त पाप-तापोंको नष्ट करने पाम॥ २१॥ भीक मात्र भीशुक्वेपजी कहते है-परीमित् | जय पृथ्वीने इति सम्पार्पितोषाग्भिर्ममषान् भक्तिनम्रया । मकिमाक्से विनम्र होकर इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति-प्रार्थना की, 6 ठनोंने मगदत्तको वमपदान दखामयं मौमगृह प्राविश्चद् सकलर्दिमन् ॥३२॥ दिया और मौम्पमुरके समस्त सम्पचिपसे सम्पन्न महलमें प्रवेश किया ।। ३२ ॥ यहाँ माकर भगवान्ने देखा कि तत्र रामन्यकन्पाना पट्सहस्राधिकायुतम् । मौमारने मापूर्वक रानाभोंसे सोख चार राजकुम्पारियों भौमाहताना विक्रम्प राजम्यो दम्शे हरि ॥३३॥ नकर वपने यहाँ रस होती थीं ॥ ३३ ॥ न उन राजकुमारिने क्तपुरमें पपारे र मरश्रेष्ठ मगधान् प्रविष्ट सियो वीप नरवीरं विमोहिताः । श्रीक्षणको देश, सबवेम्प्रेरित होगयी मोर ठननि उनकी २ परामराम भूतन् । २ पर।

५०२ भीमद्भागवत [.५९ मनसा बनिरेऽभीष्टं पति सोपसादिसम् ॥३४॥ नोवकी कृपा सया वफ्ना सौमाम्प सम्माकर मन ही मन भगवान्को अपने परम प्रियतम पतिके रूपमे मरण भूयात् पसिरप मम धामा सदनुमादताम् । सिया ॥ ३१ ॥ उम रानकुमारियोमसे प्रत्येकने का मग अपने मनमें यही निमय किया किये गीत इति सर्मा पर हप्णे भावेन हेदयं दधुः ॥३५॥ ही मेरे पति हों और विधाता मी इस वनिमयको करें ।। इस प्रकम सन्होंने प्रेम भाबसे बताय साप्राहिमोद शारवीं मुसृष्टविरजोऽम्पराः । मगवान्के प्रति निभवर कर दिया ||२५|| म मगन् श्रीकृष्णने उन राजकुमारियोंको सुन्दर-सुन्दर निर्म नरपानैर्महाकोशान रथावान् द्रविषं महत् ॥३६॥ साम्भण पानाफर पालकियोंसे भरका मैन दिया वोर उनके साथ ही पत-ये समाने, प, घोड़े तपा बन एराबवलेमांम चतुर्दन्तांन्तरस्थिनः। सम्पत्ति में मेजी ॥ १६ ॥ एरापतके पैशमें उत्पनर करपात वेगवान् चार पार हाँसोमा सफेद रंग बोस पतारांब चतुःपर्टि प्रपयामास फेश्यः ॥३७॥ पापी भी भगवान्ने पाँसे घरका मेजे ॥ १७ ॥ गत्वा सुरेन्द्र भवनं दत्खादित्यै गइरसे। इसके बाद मागन् श्रीकृष्ण अमरावती स्किन देशाब इनके मम गमे । हो देवान इन्धने वाली पूजितसिदशेन्द्रेण सोन्द्राण्या ध सप्रिया ॥३८॥ पनी इन्द्राणीके साथ सत्यमापनी बौर मगवान् श्रीकृष्ण- पोरितो भार्ययोस्पाव्य पारिमा गरूस्मति । की पूजा की, तम मावान्ने मदितिके कुपा हमें दिये ॥३८॥ोसे मोरवे समय सापभामामीकी प्रेरणासे भगवान् श्रीकृष्णने कम्पास तासकर गरम रस किया आरोप्प सेन्द्रान् विमुभान् निर्जित्योपानयत् पुरम३९ और देवयव इन्च तथा समस्त वेक्तात्रों को बीतकर उसे द्वारकामें ले वाये ॥ १९ ॥ मगजान्ने उसे सत्पभामाके मापितः सरपभामाया गृहोपानोपशोभना । मालके बगीचे छगा दिया । इससे उस नीचेकी लेम भयन्त यस गयी । पम्पाक्षके साप उसके गन्ध और अन्यगुम्रमराः स्वर्गात् वद्गन्धासवलम्पटाः ॥४०॥ मारके छोमी मारे मर्गसे पारकाये बसे गाये ये ॥ १० ॥ परीक्षित ! देखो तो सही अब इन्द्रको पयाप आनम्य किरीटकोटिभि जना काम बनामा पा, तब तो नोंने अपना सिर BREर मुकुटकी मोकसे मगवान् श्रीमणके रोका पादौ सशमन्युतमर्थसाधनम् । स्पर्श करके उनसे सहायताकी भिक्षा मांगी थी, पस्त सब काम बन गया, तब नोंने उनी मगवान् मी- सिद्धार्थ एतेन विगमवे महा माणसे माई मन ही । सचमुच ये देवा भी को तमोगुणी? मौर सबसे पहा दो। तो उनमें पनामला नहीं सुराणा पवमो धिगाभवाम् ॥ ३१॥ का है। विकार है ऐसी पनावताको ॥ ११ अयो सहर्त एकमिन् नानागारेप वा लिया। त मन्तर भगवान् श्रीकृष्णने एक ही मुइसमें का माया मामोम बहा रूप धारण करके एकरी सफेवता।

१० ५९] ५०३ - पथोपयेमे भगवास्तापदपघरोऽध्ययः ॥४२॥ | साथ सब राजकुमारियोंका शास्त्रोछ विधिसे पाणिग्रहण किया । सर्वशक्तिमान् बक्निाशी भगवान्के लिये इसमें बाभर्यकी कौम-सी बात है ॥१२॥ परीक्षित् ! भगवान् गोपु तासामनपाय्यतर्पक की पक्यिोंके ममग-अलग मार्लोमें ऐसी दिम्य सामग्रियों मरी हुई पा, मिनके बराबर जगत्में कही मी और कोई भी सामग्री नहीं है, फिर बषिककी तो यात ही पप भिरस्तसाम्पाविशयेप्यवस्थित । है । वन महमें सकर मति-गलिके परेकी स्पस्टा करनेवाले अविनाशी भगवान् श्रीकृष्ण मपने आत्मानन्दमें रेमे रमामिनिषकामसम्प्लुतो मन्न रहते पुए सक्ष्मीनीकी भशखरूपा उन पलियाँके साप टीक वैसे ही विहार करते थे, जैसे कोई साधारण मनुष्य घर-गृहस्तीमें एकर गृहस्प-धर्मके अनुसार माचरण यपेतरो गाईकमेपिकांपरन् ॥४३॥ करता हो ॥ १३ ॥ परीक्षित ! ममा भादि बड़े-बड़े देवता मी मगवान्फे पास्तविक सरूपको और उनकी इत्वं रमापतिमवाप्प पति सिमस्ता प्रासिके मार्गको नहाँ नामते । तनही रमारमण भगवान् श्रीकृष्णको उम लियोने पति के रूपमें प्राप्त किया था। प्रमादयोऽपि न विदुः पदी यदीयाम् । अब निस्प निरन्तर उनक प्रम मोर वानन्दकी समिति होती यती पी और वे प्रेमभरी मुसकराइट, मधुर मेहुर्सदाविरवमेधितयानुराग | चितवन, नवसमागम, प्रेमाराप तया मात्र बडानेवारी | लम्रासे युक्त होकर सब प्रकारसे मगवान्की सेवा करती राती की ॥ १९ ॥ उनमेंसे सभी परियों के साप सेवा हासावलोकनवसंगमनल्पलमा ॥४४॥ करमके लिये सैको दासियाँ राती, फिर भी जा सनके महलमें मगवान् पधारते तर सर्व धागे माकर प्रस्पदमासनवराईणपावशोष- बादरक उन्हें सिवा माती, श्रेष्ठ वासनपर बैयता, उत्तम सामग्रियोंसे पूजा करसा, घरणकमल पसारती, साम्प्लविभमणवीजनगन्धमास्यः । पान लगाकर सिमता, पाँच दबाकर पकावट दूर करती, | पंस मस्ती, इन-फुलेख, पन्दन आदि गती, फक कशप्रसारशयनसपनोपरा हार पहनाती, केश संवारती, मुखाती, मान कराती और जनक प्रकारके मोजन कराकर अपने ही हार्यों भगवान् दामीप्यता अपि विभाविदषु सदास्पम् ॥४५॥ | को सेवा करता ॥ १५ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहतो संहिया दशमस्का' उच्राधे पारिबाताहरणमरकामा नाम एकोमपरितमा- ऽप्याय ॥ ५९॥ १ ग्धे पारिपार नरपत एकोन ५०४ भीमद्भागवत [.. अथ षष्टितमोऽध्याय -- भीरुप्प-रुक्मिणी-सपाद मीभुक उवाच मीशुकदेक्सी करते हैं परीक्षित् ! एक दिन समस्त जगत्के परमपिता और अनदाता मगवान् श्रीम फार्दिचित् सुलमासीनं स्वतस्पस्थं जगद्गुरुम् । सम्मिणीजीके पगपर मारामसे बैठे र पे। मीमा पति पर्यचर मैग्मी म्पबनेन सस्तीअनैः॥१॥ सेवा कर ही पी, उन्हें पंखा झम बी पी ॥ १ ॥ नन्दिनी श्रीरुक्मिणीजी सखियोंके साप अपने पतिरेकी यस्त्वेवल्लीलया विश्व सुनस्पत्यवतीधर । परीक्षित् ! जो सर्वशळिमान् मगवान् सेट से में ही इस जगत्की रफ्ना, रक्षा और प्रध्य करते हैं-ही मम्म स हि मातः स्वसेतूनां गोपीधाप याम्वनः ॥२॥ लिये यदुवंशियोन अनीर्ण हुए हैं ॥ २ ॥ मिलीमीफा प्रमु अफ्नी बनायी हुई धर्म-मर्यादामौकी रक्षा करने तमिमन्तगृह प्रामपक्कादामविलम्बिना । महल पड़ाही मन्दर पा। उसमें ऐसे-ऐसे वेदोरे तनाए थे, जिनमें मोतियों की लगियों की माम, स्टक बी पी। विराजिते वितानेन दीपैर्मणिमयैरपि ॥३॥ मणियोंके दीपक जगमगा रहे थे ॥ ३॥ मा चमेनीके मल्लिकादाममिः पुप्पैदिरेफालनादितः। मल और हार मह-मह महक रहे थे। मम्मे पर मुस्- के मुर मारे गुबार कर हे थे। उन्दर-सुन्दर गरोस्- जालर ध्रप्रविष्टम गोभिचन्द्रमसोऽमलैः॥४॥ की मामिम्मसे चन्द्रमाकी शुभ्र किरणे महसके मतिर छिटक रही पी ॥१॥ उपानमें पारिमातके उपनको पारिजातवनामोदवायुनोपानशालिना पगन्ध कर मन्द-मन्द तिल वायु पम ही थी। पैरगुरुजै राजन् बालर ध्रविनिर्गतः ॥५॥ प्रयेसोंकी आलियोमसे आगरके धूपका तो बाहर निकत या पा ॥ ५॥ ऐसे म्हसमें धके फेनके समान कोमर पय फेननिमे शुभ्र पर्यछे फशिप्तमे । और उम्मत विभोंसे युक्त सुन्दर फापर मगान् श्रीकृष्ण बरे नाममसे विराजमान थे और इस्मिगीरी उपतस्यै मुस्खासीन बगवामीश्वरं पतिम् ॥ ६॥ त्रिलोकीके स्वामीका पतिरूपमें प्राप्त करके उनकी सेवा पालय्यजनमादाय रसदई सम्वीफरात् । कर रही थी ॥ ६ ॥ इक्मिणीनीने अपनी ससी हापसे या पैर से लिया, पिसमें रोंकी मी मी छन योजयती देवी उपासाचक ईश्वरम् ॥ ७॥ उसे दुग्न दुमकर भगवान्की सेन करने सगी ॥४॥ पी बौर परमरूपवती रक्ष्मीयापिणो देवी रुक्मिणीची मापापुत फणयती मणिन्पुराम्पा उनके करकममें जमाउ ठियो, कंगन और अगर शोभा पा रहे थे। परमि मणिबंटित पापनेव नमुन रजालीयपलपम्यजनाप्रदम्ता । हममुन कर रहे थे । बचपके नीचे छिपे हुए नोंकी | केशरसी सासिमामे हार मास-मास जान पाता at पवानगूपमझोणहार पमा मा पा । नितममागमें ममम्प मापनीयी सदियों स्टफ रद्दी दी। इस प्रकार के भगवान्ने भामा नितम्पत्यापपराकाम्या ॥८॥ | पास ही पर उनकी सेधमें मरन यी ॥ ८ ॥ १ पारपणाम । भिरि ।। ।। पप्पुतं ।

अ० ६०] दसम स्कन्ध तां रूपिणी नियमनन्पगति निरीक्ष्य रुक्मिणीजीकी धुंधरास्मी अल्के, कानों के कुमाल भौर गलेके स्वगहार क्स्यन्त विलक्षण थे । उनके मुवचन्द्रसे मुसक्राहकी अमृतवर्या हो रही थी। ये रुक्मिणीनी या लीलया धृततनोरनुरूपरूपा। भलौकिक नपठावण्यवती छमीनी ही सोहै। उनोंन बम देखा कि भगवान्ने लालपके लिये मनुष्पका-सा शरीर ग्रहण किया है, तब उन्होंने भी उनके अनुरूप रूप प्रकर प्रीतः म्मयालयकृण्टलनिककण्ठ कर Pया । भगवान् श्रीकृष्ण यह टेमकर प्रात प्रसम हुए कि रुक्मिणीजी मेरे पापण है, मेरी अनन्य प्रयसी हैं। तब उन्होंने मा प्रेमसे मुसकराते हुए उनसे वस्त्रोलमम्मिवसुधां हरिराषभापे ॥९॥ ॥९॥ श्रीभगवानुषाप भगवान् भीरुभ्यमे कहा-राजकुमारी ! बड़े यो नरपति, जिनके पास लोकपालों के समान एपर्य पौर रामपुत्रीप्सिता भोकपालविभूतिभि । सम्पत्ति है, जो वह महानुभाव और श्रीमान् है तथा सुन्दरता, उदारता और पळमें भी यास मागे हुए महानुभाव भीमट्टी रूपादार्ययलार्जितै ॥१०॥ है, तुमसे विवाह करना चाहते थे ॥ १०॥ तुम्हारे पिता और भा. मी तुम्ही साप तुम्हारा विवाह करना चाहते थे, यहाँनक कि उन्होंने वाम्गन भी कर दिया तान् प्राप्तानपिनो हित्वाचैयादीन् स्मरदुर्मदान् । पा । शिशुपाल वादि वह यह वीरोको, जो कामो मत होकर तुम्हारे याचफ क्न हे थे, तुमने छोड़ दिया दत्ता म्रात्रास्वपित्राय फम्मानो वरपेऽसमान।।११॥ न वपना पनि स्वीकार किया । एसा सुमन क्यों और मेरे-से म्पत्तिको, जो किसी प्रकार तुम्हारे समान किया । ॥ ११॥ सुन्दरी ! देखो, हम जरामध आदि रावम्पा पिम्पत मुम् समुद्रं शरण गतान् । राजाओंसे ररकर समुद्रकी शरणमें भा बसे हैं । मा-या मख्यानोंसे हमने पर बाँध रम्या है और प्राप लवनि फसपान् प्रायस्त्यक्तनृपासनान् ॥१२॥ सिंहासनफे अधिकारसे भी हम बशित ही हैं ॥१२॥ मुन्दरी 1 हम किस मागके अनुयायी है, हमारा कौन सा मार्ग है यह मी लोगोंको अच्छी तर मालूम नहीं अम्पटवरमना पुंसामलोकपथमीपुपाम् । है। हमस्येग ठोक्कि म्यवहारफा भी ठीक-ठीक पालन महीं करते, अनुनय-विनयके बारा सियों को रिमाते मी आस्थिताः पदवीं सु। प्रायः सीदन्ति योपितः॥१शा नहीं । जो सियाँ हमारे-वैसे पुरुषोंका अनुसरण करती है, सर्ने प्राय केश- दीश मोगता पाता है ॥ १३ ॥ मुन्दरी ! हम तो माके अकिशन है। न तो हमारे निष्किमना पर्य शवभिफिसनसनप्रिया । पाम कभी कुछ या भोग्न रहेगा। ऐसे हो अकिचन लोगोंसे हम प्रम भी करता है और वे ग भी हमसे प्रम फरत है। यही कारण है कि अपनो धनी समझनेवाले तम्मान प्रायेण नमायामो भजन्ति मुमध्यमे ॥१४॥ या प्राप हमसे प्रम नहीं करत हमारी मेया नहीं श्रीमनागपत [३.६० । पगारात्मसम विच अन्मधर्याकतिर्मयः । करते ॥ १५ ॥ जिमका धन, कुछ, एचय, सौन्दय और आप अपने समान होती है-महासे विसर पर समोविवाहो मैत्री व नाधमाधमयो कचित् ॥१५|| मित्रताका सम्बन्ध करना चाहिये । जो अपनेसे श्रेष्ठ या बंदर्येतदविताय तपादीपसमीपया। अपम हों, उनसे नहीं करना चाहिये ॥१५॥र्मिक कुमारी ! तुमने मफ्नी दूरदर्शिता के कारण इन बोका पता वयं गुणहीना भिक्षुमि साधिका सपा ॥१६॥ विचार नहीं किया और बिना आने मूझे मिशुम मेरो पछी प्रशंसा बनकर मुझ गुणहीनको परम कर अथात्मनोऽनुरूप वै भनस्म अत्रियर्पमम् । लिय ॥ १६ ॥ अव भी कुछ विगवा नहीं है। तुम अपने अनुरूप किसी श्रेष्ठ क्षतिपको परण कर थे। भेन स्वमाविष सम्पा मात्र च लप्स्पसे ॥१७॥ निसके रा सुमारी समेक और परलोककी सारी माशा-बमित्मपाएँ पूरी हो सके ॥ १७ ॥ सुन्दरी । वैपायवरासंभवन्तवस्त्रायो नपा । तुम जानती ही हो कि शिशुपाल, शास्य, मसन्म, दायका मादि मपति और तुम्हारा पहा माई हामी- मम द्विपन्ति वामोरु रुपमी चापि क्याग्रजः ॥१॥ सभी मुझसे द्वेष करते थे ॥ १८ ॥ कल्याणी ! वे सध स-पौषके मइसे अषे हो रहे थे, अपने सामने किसीको सेपो नीयमहापाना साना मयनुत्तये । कुछ नहीं गिनते थे । उन दुका मान मर्दन करनेके रिये ही मैंने हारा हरण किया । और कोई आनीतासि मया भद्र तेजोऽपारतामताम् ॥१९॥ कारण नाहीं पा ॥ १९॥ निमय मिठासीन है। इस बी, सवान और धनके छोट्य नहीं है। उदासीना गर्म नन न स्पपत्याकामका । निष्क्रिय और वेगइसे सम्बन्परहित सीपशिसके आत्मसम्माऽऽमहे पूर्णा गेहयोोविरक्रियाः।२० ही पूर्णकाम है, कास्य हैं ॥ २० ॥ समान साक्षीमात्र है। हम अपने बारम्पके साक्षात्कार मीशुक उवाच भीशुषसी मतेपीक्षित् । मगवान् एवापदुक्त्वा भगवानात्मानं वल्लभामिव । श्रीकृष्णके क्षणमरके किये मी मान होनेके कारण मन्यमानामविश्लपात सदपेन उपारमन् ॥२१॥ रस्मिनीगीको यह अमिमाम हो गया पा कि में इनकी सबसे अधिक प्यारी । इसी की शान्ति के लिये इति त्रिलोफेशपतेस्तदात्मना इतमा करकर मगवान् चुप हो गये ॥ २१ ॥ पीक्षित प्रियस्स देष्यभुतपूर्वमप्रियम्। जा रुस्मिणीमीने अपने परम प्रिपाम पनि सिकेपर मगवान्की यह अप्रिय पाणी मुनी-चो पहले कमी आभुस्प भीता इदि बावनेपषु नहीं मुनी थी, तब पेत्यन्त मपमीत हो गया, उनका मिन्स दुरन्दा रुदती मगाम ६ ॥२२।। दय घाफने लगा, रोते-रोते चिन्ताके भगाध समुद्र में पदा मुनातेन नस्वारुणपिया बने-उतराने सगी ॥ २२ ॥ मन कसके समान कोमर मौर नसोंकी परिममे पुछ-कुछ यस प्रतीत सुप लिस्मन्पभुमिरजनासित । रानेवाले चरणोंसे पाती कुरेदने मगा। बानसे मिले १ पाराविसपार।

म०६.] दशम समय ५०७ आसिकती झुमरूपितौ स्तनो हुए काले कारसे गाम केशरसे रंगे हुए बक्ष स्थलको धोने लो। मुंह मीचेको छटफ गया । पन्त दुखके कारण तस्थावधोमुरम्पतिदु सरुदवाक् ॥२३॥ उनकी वाणी रूक गयी और वे ठिमी-सी र गयी १२३॥ अत्यन्त म्पया, भय और शोक के कारण विचारशक्ति हम तसा सुदालभपशोकविनष्टपदे हो गयी, वियोगकी सम्मापनासे थे लक्षण इतनी दुल्टी हो गयो कि उमकी कल्पका कंगनतक सिसक गया। हस्ताछठयालयसो म्यजनं पपात । हायका क्षेत्रर गिर पड़ा, मुखिकी विकलवाके कारण वे देष विलयधियः सहसप समन् एकाएक श्वेत हो गयीं, कश बिखर गये बोर वे धायु येगसे उखा हुए फेलेके समेकी तरह धरती पर रम्मेष पायविहता प्रविझीर्य केशान् ॥२४॥ पड़ीं ॥ २१ ॥ मगवान् श्रीकृष्णने दस्सा कि मेरी प्रयसी | रुक्मिणीनी हाम्प-विनोदकी गम्भीरता नही सम्पा यही सद राष्ट्रा भगवान् कम प्रियाया प्रेमपन्धनम् । हैं और प्रेम पाशकी पताके कारण उनकी यह दशा हो रही है। समावसे हो परम कारुणिक भगवान् हासमौरिमजानन्त्याः कारणः सोऽन्यफम्पत ।।२५।। श्रीकृष्णका हदय उनके प्रति करणासे मर गया ॥२५॥ चार मुमागोवाल से भगमान् उसी समय परगसे उतर पर्मकादवलमाशु तामुत्थाप्य चतुर्मजः । पड़ और रुक्मिणीनीको उठा लिया तथा उनके खुरे हुए केशपारों को गाँधकर अपन शीप करकमलोंसे फेशान् सम्म तपत्र प्रामृजत् पपपाणिना ॥२६॥ उनका मुंर पंछ दिपा ॥ २६ ॥ भावान्ने उनके | नेत्रोंक भासू वीर शोकके ऑलर्मोसे मागे हुए खनको प्रसन्याधुफले नेत्रे स्तनौ चोपहतो शुचा । पेंटकर अपने प्रति अनन्य प्रेममात्र रसनेपाली उन सती रुक्मिणीनीको गोहोंमें मरकर यतीसे ब्गा रिया ॥२७॥ थालिप्य पाहुना राजभनन्पविपयां सतीम् ॥२७॥ मायान् श्रीकृष्ण सम्झाने मुनाने में ना कुशल और अपने प्रमी मोंके एकमात्र माधय हैं। जब उनोंने देखा सान्त्ययामास सान्त्वनः कुपया रुपांप्रस । कि हास्यकी गम्भीरताके कारण रुक्मिणीनीकी युद्धि पार, पर गयी है और ये वत्पन्त दीन हो यी है, हासपौष्ठिम्रमपित्तामतदहां सां गतिः ॥२८॥ | तब उन्होंने इस अवस्थाके अयोग्य नपनी प्रपसी रुक्मिणी- नीको सम्माया ॥२८॥ भीभगवानुवार भगवान् श्रीकृष्णमे कहा-विदभनन्दिनी ! तुम मुझसे भुरा मन मानना । मुझसे रूठना नहीं। मैं मानता मा मा पैदम्परमया याने स्पो मन्परायणाम् । हूँ कि तुम एकमात्र मेरे ही पापगहो। मेरी प्रिय साचरी! तुम्हारी प्रममरी पत सुननेके लिये ही मने स्वाष भोतकामेन प्लेल्याऽऽचरितमाने॥२९॥ सी-ईसीमें यह एम्ना की थी ॥ २९ ॥ में रहना चाहता था कि मेरे यों कहनपर तुम्हारे पटरान हाट धनं च प्रममरम्भस्फरिताधरमीषितम् । प्रणय कोपसे किस प्रकार पाने लाते हैं। तुम्हारे १ एस्पैः मोठे ।

५०८ श्रीमद्भागवत [१०६. फराक्षेपारुणापा सुन्दरकुटीतटम् ॥३०॥ कटाक्षप्षक देखनेसे नेत्रों में कैसी साम्य छ बाली भैर महिं का मानेके कारण तुम्हारा मुंह कैसा मुम म्भता है ॥ ३० ॥ मेरी परमप्रिये । सुन्दरी ! म अयं हि परमो लामो गृहेषु गृहमेधिनाम् । काम-धम रात-दिन उगे रहनेवाले गृहस्पोंके न्येि । गृहस्पीमें इतमा ही सो परम स्मम है कि अपनी पि वलिनीके साप हाम-परिवास करते हुए कुछ पनि ममम मते याम प्रियया भीरु भामिनि ॥३१।। सुखसे विमा स्त्री माती हैं ॥ ३१ ॥ भीभुक उवाच श्रीशुक्लेषनी कहते है-राजन् । जब मगमा श्रीकृष्णने वपनी प्राणप्रियको इस प्रकार समाप्त मयं भगवता राजन् वैदर्भी परिमान्स्विता । मुमाय, तब उन्हें इस मामा विपास हो गया कि में लात्वा तत्परिहामोक्तिं प्रिपत्यागमय हो ॥३२॥ नदयसे यह मय जाता रहा कि प्यारे हमें थे। प्रियवाने केवल परिहासमें ही ऐसा कहा पाक पभाष भुपम पुा वीक्षन्ती भगषन्मुलम् । देंगे ॥ ३२ ॥ पीक्षित् | मम घे समान शस्य और प्रेमपूण मधुर चितानसे पुरुषपण भगवान् श्रीकृष्णकर सपीठहामरुचिरसिम्पापागन भारत ॥३३॥ | मुसरमिन्द निरसती हुई उनसे कहने लगी-॥३३॥ रुक्मिप्युपान रुक्मिणीसीने कहा-काटनयन ! भापका य कहना ठीक है कि ऐपर्य मादि समस्त गुणों से युद्ध, नन्षमेतदरविन्दविलोपनाह समस्त मगवान्के अनुम्प में नहीं। आपकी समानता मै किसी प्रकार नहीं कर सकती । कहाँ तो अपनी नसा महिमामें स्थित, तीनों गुणों के स्वामी यद् भवान् भगवतोऽमराठी विभूम । तपा ब्रह्मा आदि देवतासि सेक्ति बाप भगवान्। वोर कहाँ तीनों गुणोंक अनुसार समाव रखनेवाली गुणमयी कम्प महिम्न्पभिरतो भगवास्थ्यधीश प्रकृति में, मिसकी सेवा कामना के पीछ भकनेवाले पानी येग ही करते हैं ॥ ३९ ॥ भय, मै आपक समान पर हो सकती है। सामिन् ! वापर या फाई गुणप्रतिरागृहीवपादा ॥३४॥ | कहना भी टीप ही पाप गानोंक भपसे सम्मुझमें या छिपे हैं। परन्तु गजा शक अप पृषीके मप भयान्वि गुणम्म उम्ममान्त राजा नहीं तीनों गुणम्प रागा है। मानो पर | उही भपसे अतःकरणम्प ममुद्र में पैक्यम्न मन शेत ममुह उपलम्भनमात्र आत्मा । मनिम्बम्प भात्मा गपमें विराजमान रते हैं। इसमें सन्ता नहीं कि आप राजामोसे पर रमते है परन्तु ये राजा फान हैं । यही अग्नी दुष्ट इन्द्रिप । इनसे तो निम्प पदिद्रियगण मवरिप्रहम्स आप रही। और प्रभआप गासिंहामनसे ति' पर भी यफ दी पोंकि अपर मरणों।। मेश यानेबाने भी गमाव परपर घोर अहाना पर नम्सनुपपद विघुनं नमान्यम् ॥३५॥ ममन्या नगमे । दुत्कार रसग है । हि आपक अ० ६०] दशम स्कल्प ५०० , - । स्वत्पादपममकरन्दजुपां मुनीनां लिये तो कहना ही क्या है ॥ ३५॥ भाप कहते हैं कि हमारा मर्म स्पष्ट माही है और हम लौकिक पुरुषों- जैसा बाकरण भी नहीं करते, यह बात भी निस्सन्देह पास्फुट नृपशुभिर्ननु दुर्षिभाम्यम् । सत्य है । क्योंकि बो भूपि मुनि आपके पादों का मकरन्द-रस सेवन करते हैं, उनका माग भी अस्पष्ट हता है और विषयोम माझे हुए नरपशु उसका यमादलौफिकमिवेहितमीश्वरस्य अनुमान भी नहीं लगा सकते । और हे अनन्त ! आपके मार्गपर चलनेवाले आपके भक्तोंकी भी पाएँ जब प्राय अरगकिक ही होती है, तब समस्न शक्तियों ममस्तहितमयो अनु ये भवन्तम् ॥३६॥ और ऐपयोंके आश्य आपकी चराएँ अल्गैकिए हों इसमे तो कहना ही स्पा है। ।। ३६ ॥ आपने अपने निफिटनो ननु भवान् न यतोऽस्ति फिंचम् अकिमन बालाया है, परन्तु आपकी अकिसनता दरिद्रता नहीं है। उसका मप यह है कि आपके अतिरिक और कोई पस्त न होनेके कारण आप ही पम्मै पलिपतिमुजोऽपि हरन्स्यबाचा । सब कुछ हैं । आपके पास रखने के लिये कुछ नहीं है। परन्तु जिन ब्रमा आदि देवताओंकी पूना मत्र दोग करते हैं, मेंट देते हैं, वे ही स्प्रेग आपकी पूजा फरसे नस्वा विदन्त्यमुठपोऽन्सफमापवान्धा रहते हैं। आप उनके प्यारे हैं और वे पापके प्यारे हैं। ( आपका यह कहना भी सुईया उचित है कि धनाम लोग मेरा मन नहीं करते, ) जो लोग अपनी प्रष्ठो मवान् पलिसनामपि सेऽपि तुम्यम् ॥३७॥ धनाअताके अभिमानसे अधे हो ये हैं बार इन्दियोको तृप्त करनेमें ही स्टगे है, न तो आपका मनन सेवन ही करते और न तो यह जानते हैं कि भाप मूरघुफ त्यं वै ममम्तपुरुपार्थमय फलात्मा रूपम उनके मिरपर मार ॥ ३७॥ जगत्में जोयके ये जितने भी पाश्नीय पाप हैं-धम, अप, काम, मोक्ष-उन सबके सपने आप ही प्रा है। यदाछया मुमतया विसृजन्ति कत्लम् । आसमस्त प्रति प्रतियों, सापनों, मिदियों और माप्योंके परम्परप है | विचारतील पुरुष अपको प्रा6 परने के लिये मत्र पुछ छोर देते है । भगवन् तेपी विभा ममषिताभवन समाज उही विवकी पुरुषों आपने मप ममप हाना चाहिये । जोरपा प्री-पुरुषके सहसासमे प्राम हानेपाम पुम सिपाप रसया मुम्बद निनोन||३८॥ सुख या दुसा पनि है, रेवादि आप मपथ प्राप्त करने याग्य नही ६॥ ८ ॥ यह करि । भिक्षुकाने आपकी प्रामा पाई । परम्नु किन पिझुगेन । स्वंन्यस्तदण्टमुनिमिर्गरिसानुभाव ठन परमात मन्पामी महामानोंम आप महिमा और प्रमावर पगम दिया है जिन अगसे- अगरी म्यकिय भी 70 मका निभय का पि आम्माऽऽत्माम जगनामिवि मनाऽमि है। न्ने भानसे नमें इम बता मन हुए १ मिहरि मरम्प ५१० श्रीमद्भागवत [२०६० हिस्था भवभ्रुव उदीरितकालवेग अपको वरण किया है कि पाप सारे जगत्के कर हैं और पने प्रेमियोंको मारमदान करते हैं । मैने चार | बूझकार उन मा बीर देवराज इन्द्र मदिका भी इसमें परित्याग कर दिया है कि आपकी महके सरेसे होनेवाम काल अपने देशसे उनकी भाश-बभिन्मपाय यस्ताशिपोजभवनाकपप्तीन्छतोऽन्ये ३९ पर पानी फेर देता है। फिर दूसरोंकी-शिशुफार दन्तबस्त्र या जरासन्धकी तो बात ही क्या है।॥३० बाम पचस्त्य गदाग्रज येस्तु भूपान सर्वेघर धार्यपुत्र ! आपको यह बात किस प्रका | युक्ति-सात नहीं मालम होती कि अप राबाओंसे मम विद्राव्य मानिनदेन मार्यमा त्वम् । | मीत होकर समुदमें पा से है । पोंकि मापने के। अपने शावनुषके टकारसे मेरे विवाह के समय अपे। मिहो यथा स्वपलिमीश पशून स्वभाग समत रानालोंको भगाकर अपने परम समर्पित मु | दासीको ठसी प्रकार हरण कर लिया, मैसे सिंह वन कर्कश पनिसे वन-पशुओंको भगाकर अपना भाग है तेम्पो भयाद् यदुदषि शरणं प्रपमः॥४०॥ वे ॥ १० ॥ कानपन ! आप कैसे करते हैं कि चं मेरा अनुसरण करता है, उसे प्राप कर ही उठन पदाम्छया नृपशिखामणयोऽजन्म परता है। प्राचीनकालके वन, पूष, मरत, फ्यति की गय आPि बोबड़े-बड़े रामराजेपर अपना अपना एक जायन्तनाहुपगमादय ऐकपत्यम् । साम्राम्य मेसकर भापको पानेकी अमिम्मपासे एफ्स्य करने पनमें चले गये थे, वे आपके मार्गका अनुमन करनेके कारण क्या किसी प्रकारका पर उठा रो राज्य विसन्य विविशुर्वनमम्पुजाक्ष २॥ ११ ॥ आप कहते हैं कि तुम और किसी राम कुमारका परण कर स्मे । मगवन् ! माप समस्त गुोके सोदन्ति तेऽनुपदवी ताम्मिता किम्॥४१॥ एकमन आभप हैं । बाबह संत आपके घरणामस्येकी सुगम्धका क्वान करते हते हैं। उसका माथ्य केने फान्यं अयेत तब पाइसरोजगन्ध ममत्रसे मोग ससारके पाप-सापसे मुक्त हो जाते है। एमी सवा उन्हीं में निवास करती रिजा माघाप मन्मुम्बरि मनतापवगम् । मनग्गइये कि अपने सार्य और पमार्थको ममीमति समझनेवारी एसी कौन-सी खी है, जिसे एक बार उन चरणकमों की सुगन्ध सूचनेसे मिप साप और किरा लाम्पालयं स्वविगणग्य गुणालपम्प उनका तिरस्कार करके ऐसे गोंको परण परे जो सग मरपु राग मम्म, जरा बादि मासे युक्त है। कोई मयो मदाम्भयमविविक्तरष्टिः ॥४२॥ भी मुहिमती भी एसा नहीं कर सकती ॥ ४२ ॥ १५भा प्र०६० दशम स्कन्ध व स्वानुरूपमभई जगतामधीश | प्रमो ! आप सारे जगत्के एकमात्र स्वामी है। आप ही इस येफ और परोकने समस्त आशाओंको पूण करनेवाले एष आरमा हैं। मैने आपको अपने अनुरूप मात्मानमत्र च परत्र च कामपूरम् । समझकर ही वरण किया है। मुझे अपने फोकि अनुसार विमिम योनियो मटकना पर, इसकी मुनको स्पान्मे सवाहिरणं सतिभिर्भमन्त्या परवा नहीं है। मेरी एकमत्र भभित्रमा यही है कि में सदा अपना मजन करनेवाल्यका मिथ्या संसारभ्रम निवृत्त यो पं भवन्तमुपपात्पनृतापवर्ग ॥४३॥ करनेवाले तपा उन्हें अपना सहफ्तक दे सलनेवाले आप परमेपरके चरणोंकी शरणमें रहूँ ॥ १३ ॥ तसा: स्पुरच्युत नृपा भवतोपदिशाः अभ्युत ! शत्रुसूदन ! गोंके समान घरका योमा ढोने- वाले, कैक समान गुस्सीके व्यापामि जुते रहकर स्त्रीमा गृहेषु सरगोपपिरालमृत्मा । कर ठानेवासे, कुचोंके समान तिरस्कार सहनग्रले, क्लिायके समान रूपण और हिंसक तया क्रीत दासोंकि समान बीकी सेवा करनेवाले शिशुपाल आदि रानारोग, यत्कर्णमूलमरिकर्मन नोपपाया मिन्हें वरण करनेके लिये आपने मुझे सकेत किया है- युप्मत्कथा मृविरिचममासु गीता ॥४४॥ उसी अम्मगिनी मीके पति हों, जिनके फा में भगवान् शार, मा आदि देवेबरोंकी समामें गायी जानेवारी स्वकामधुरोमनस्वफेशपिनमन्स- आपकी मीठाकपाने प्रवेश नहीं किया है॥ ११ ॥ पर मनुष्पका शरीर नीति होनेपर भी मुर्दा ही है। मर्मासास्थिरक्तकमिषिट्कफपिचयातम् । उपरसे चमड़ी, दामछ, रोएँ, मस और केशसे ढका एम, परम्तु इसके मीतर मांस, सी, सून, की, बीपच्छर्य भनति फान्तमतिविमूला मल-मूत्र, का, पिस और वायु मरे पड़े हैं। इसे नही माझी अपना निम पनि समापार सेवन करती है, बिसे कमी भापके चरणारविन्दके मरम्दकी सुगन्ध या से पदाम्जमकरन्दमजिप्रती स्त्री ॥४५॥ (पनेको नहीं मिली है ॥ १५॥ कमलनयन ! माप आस्मराम है। मैं मुनरी अपवा गुणरती हैं, इन बातों अस्त्वम्मुजाय मम से परणानुराग पर भापकी ष्टि नहीं जाती । अ आपका पसीन एमा सामाविक है, फिर भी आपके घरणसमय मा माग्मन् रतस्य मपि पानतिरिकाटे । मुन अनुराग दो, पड़ी मेरी अभिमपा है। जा आप पर्मस्य पदम उपाचरमोऽतिमात्रा इस संसारकी अभिदिके पिप उत्कट रमोगुण बीकार काके मेरी ओर देते हैं, तप का भी आप परम मामीक्षसे सहन परमानुफम्पा॥४६॥ अनुपा ही है ॥ १६ ॥ मधुमून ' आपन रहा कि किसी अनुम्प परफो परण पर सा! मैं आरसीएम नयालीममदं मन्ये पचम्ते मधुमूरन । चातको भी मूर मही माननी । क्योंकि भीमभी एफ पुरुषके दाग जीती जानेपर भी का निरेगी प्रप अमायाव हिमाय फन्पापाः स्यादति फमिन्४७ अमाप सन मिसी-किसी मर पुष्पमें भी प्रीति श्रीमद्भागवत घ्यदायाचापि पुंपल्या मनोऽम्पेति नय नवम् । | रहती है ॥ १७ ।। कुल्टा सीकर मन तो किया से जानेपर मी नये-नये पुरुषोंकी ओर खिंचता मत है। युसिमान् पुरुषको चाहिये कि वह एसी कुश्य गीचे | अपने पास न रखे । उसे अपनानेाव्य पुरुष मक मुधोऽसती न पिमपाव वां पिम्रदुमयम्युतः ॥४८॥ और परोक गनों सो मैना है, उम्पनर हो जप है॥ १८ ॥ , श्रीभगवानुवाच भगवान भीरप्पने कहा-साप्पी ! राजकुमारी । यही बातें सुननेके लिये तो मैंने तुमसे ईसीसीमें माम्पेसच्योतामेस्स्व राजपुधि प्रलम्भिवा । तुम्हारी याचना की पी, तुम्हें कम्पा था । सुम्ने मेरे मचनोंकी जैसी म्याख्या की है, वह वक्षरश सव मयोदित यदन्वात्य सर्व वत् मत्यमेव हि ॥४९॥ है ॥ १० ॥ सुम्दरी ! तुम मेरी अनन्य प्रयसी हो । | मेर प्रति तुम्हारा मनम्य प्रेम है। मम मुझसे गो-बो मान् पान फामयसे कामान् मय्यकामाय भामिनि । अमिम्प्रपाएँ करती हो, वे सो सुम्हें सदा-संग प्रास ही हैं। और यह बात भी है कि मुझसे की हर ममिन्मपाएँ सन्ति मकान्तभक्तायास्तव करपामि निस्पदा ॥५०॥ सांसारिक कामनाओं के समान बन्धनमें सामने नहीं होतीं, बल्कि ये समस्त कामनाओंसे मुफ कर देती उपसम्बं पतिप्रेम पातिव्रत्यं च तेऽनष । १॥५०॥ पुण्यमपी प्रिये ! मैंने तुम्हारा पतिप्रेम और पातिकस्य भी भलीमाँति देत या । मैंने उपटी सीधी पवाक्पमारपमानाया न धीर्मय्यपफर्पिता ॥५१॥ | बात कर-करफर तुम्हें विचलित करना चाहा का परन्स तुम्हारी मुदि मुझसे तनिक भी इधर-उर न ये मां भजन्ति दाम्पत्ये तपमा प्रतधर्मया । वर्ग ॥५१॥ प्रिये ! मैं मोक्षका खामी है । मोगोंको ससार-सागरमे पार करता हूँ। जो सकाम पुष बनेक कामात्मानोऽपवर्गेलं मोहिसा मम मायया ॥५२॥ प्रकार के रत और तपस्या करके दाम्पम-जीनके विषय-मुसुकी अमिगपासे मेरा मनन करते है, ये मेरी मां प्राप्य मानिन्पपवर्गमम्पद मायसे मोहित है ॥ ५२ ॥ मानिनी प्रिये ! में मोक्ष | तपा सम्पूर्ण सम्पदालोंका आमय , अधीबर।। पान्छन्ति ये सम्पद एष तत्पविम् । मुझ परमात्म्पको प्राप्त करके भी जो लोग केला विषय- मुसके साधन सम्पत्तिकी ही मभिव्यपा करते. से मन्दमाग्या निरयेऽपि ये नृणा | मेरी परामक्ति नहीं चाहते, वे पो मन्दगी है, कि वियपास तो नरकम और नरफके ही समान स्कर कर भादि योनियम मी प्राप्त हो सकते हैं। पन्त मात्रामास्वाभिरया सुसंगमः ॥५३।। उन लोगों का मन तो विपयोंमें ही गा रहता है, इस दिये उने नरक चाना मीषअमान पदा॥५॥ दिण्या गृहपर्यसकन्मपि त्वया गहेपरी प्राणप्रिये । यह मा भानन्दकी बात है कि तुमने बक्तक निरन्तर मसार पन्धनसे मुक्त करनेवाली कवानुवचिर्मवमोपनी स्वलः । मेरी सेवा की है। दुए पुप ऐमा कमी नहीं कर पसमयसे प्रम म १२ मामा हिमे ।

अ. ६०] दशम स्कन्ध - मुदुप्फरामो मुतरी दुराष्ठिपो सक्ते । मिन नियोंका चित्त दूषित कामनाोंसे भय हुधा है धीर जो अपनी इन्द्रियोंकी तृप्तिमें ही रागी मसुम्भरामा निरुर्तिजुप लिया ॥५४॥ ) रनेके कारण बनेकों प्रकारके छल-छन्द रचती यती है, उनके लिये तो ऐसा करना और भी कठिन है ॥५४॥ न त्याणी प्रणयिनी गृहिणी गृहेषु मामिनि ! मुझे अपने समरमें तुम्हारे ममान प्रेम करने वारी मार्या और कोई दिखायी नहीं देती । क्योंकि पश्यामि मानिनि यया स्वविषारकाले। निस समय सुमने मुझे देश न पा, केपष्ट मेरी प्रसा सुनी थी, उस समय भी अपने विवाहमें भाये हुए प्राप्तान नपानवगणयप रहोहरो मे रानाओंकी उपेक्षा करके ग्रामणक शारा मेरे पास गुम प्रम्पापियो दिख उपपतसस्कयरस ॥५५॥ सन्देश भेजा था ॥ ५५ ॥ तुम्हारा हरण करत समय मने तुम्हारे माइको युद्धमें बीतकर उसे पिसप कर भ्रातुर्विरूपकरणे युधि निजितस्य दिया था और अनिरुद्धके विवाहोत्सबमें चौमर बलते गोदाहपर्वणि च तद्धमपगोष्ठधाम् । समय बळामनीने तो उसे मार हा सम्म । किन्तु हमसे वियोग हो जाने की आशङ्कासे तुमने चुपचाप यह सारा दुखसमुत्थमसहोऽसदयोगभीत्या दुस सह छिया । मुमसे एक यात भी नहीं की। नवाप्रमी किमपि वेन वर्य मितास्ते ॥५६॥ । तुम्हारे इस गुणसे में तुम्हारे कश हा गया है ॥ ६ ॥ तुम्ने मेरी प्राप्तिक लिये दूतके द्वारा अपना गुप्त मन्देश दतस्त्वयाऽऽत्मलभने सुविविक्तमन्त्र मेवा पा, परन्तु अब तुमने मेरे पधनमें कुछ किस | होता दस्य, तव तुम्हें यह सारा संमार मुना दीखने अम्पापितो मयि पिरापति शून्यमेतत् । ल्या । उम समप तुमने अपना यह सनसन्दर गरीर किसी दूसरेके योम्प न सम्मकर इसे छोड़नका साल्प मत्वामिहास मगमनन्ययोम्प कर पिया या । तुम्हारा या प्रेममात्र तुम्हारे ही अंदर विष्ठेत तस्वमि वर्ष प्रविनन्दयाम ॥५७॥ मोद प्रेम-भानका केवल अमिनम्दन करते हैं ।। ७७ ॥ रहे । हम इसका बदस्य नहीं चुका सकते । तुम्हारे इस मीसुक उपाप श्री गुरुदेव कहत ई-परीक्षित् ! बगीपर भगवान् धीरण आरम्पराम है । ये अब मनुप्योकी मी मौरसमलापैगवाजगदीचर । टीय कर रहा है, तब उसमें दाम्पत्य प्रमका बहानेपासे विनोग्मरे वाष्टिाप मी परते हैं और इस प्रकार गमी- परवा रमया रम नरलार्क रिम्पयन् ॥५८॥ । पिगी सम्मिगीनी साप विहार करता है ॥ ४ ॥ | मगन् श्रीप्य ममस्त जगत्का क्षिा दनरमे पोर 'पान्पासामपि पिमुहेपु गृहसानिव । मर्पयापक है । ये इसी प्रकार दूसरी पलिपीय मदनाम भी गम्पोंके समान यत और गृहस्पोषित धर्मा पास्थितो गृहमधीयान् धमालोकगुम्हरि ॥१९|| 'पाटन करते थे ॥ ७० ॥ । प इति श्रीमद्भागते महापाणे पारमस्या संहितार्य दशमलपे उत्तराधे मृणस्निगीमा नान परिनमाऽप्यप ॥६०॥ जान पी पते पुनरा इलामा।

५१२ भीमद्भागवत ست न्यूढायाचापि पुंधरया मनोऽभ्येति नव नवम् । रहती है ॥ १७ ॥ कुलटा तीका मन तो श्मि हो मानपर भी नये नये पुरुषोंकी ओर सिम्ता रहत है। मुखिमान् पुरुपको चाहिये कि यह एसी कुख्य अपने पास न रस्खे । उसे अपनानेवाला पुष मक वृधोऽसती न विमृमात् नां विम्रदुभयप्युत ॥४८॥ और परलोक दोनों से बना है, उभ्यभ्रष्ट हो जाता है॥१८॥ मीभगवानुवार भगवान् श्रीकृष्णमे कहा-साधी । राजकुमारी ! यही बातें सुननके लिये तो मैने तुमसे सी-सीमें साम्पेतच्योतुकामैस्त्वं राजपुत्रि प्ररम्भिता । तुमारी पन्ना की थी, तुम्हें छकाया पा । तुनने मेरे | क्वनोंकी जैसी म्पापल्या की है, वह अक्षरश सम्म मयोदितं यदन्वात्य मर्व सत् सत्पमेव हि ॥४९॥ ॥ १९ । मुन्दरी ! तुम मेरी अनन्य प्रपसी हो। मेर प्रति तुम्हारा अनन्य प्रेम है। तुम मुझसे बो-जो यान् यान् कामपसे कामान् मय्यकामाप भामिनि । भमिल्लपाएँ करती हो, वे तो हमें सदा सर्व प्राप्त है है। और यह यात भी कि मुझसे की हुई वमिनपर सन्ति मकान्तभक्तापास्तव कल्याणि नित्यदा ।।५०॥ सांसारिक कामनाओं के समाम बन्धनमें राळनेवाली नवी होती, बल्कि वे समस्त कामनायोंसे मुझ कर केवी उपलम्ब पतिप्रेम पातिव्रत्यं प सेऽनघ । १॥५०॥ पुष्पमयी प्रिये 1 मैंने हमारा पतिप्रेम और पातिव्रत्य भी मीमाति देस लिया । मने उल्टी-सौमी पदापैमापमानाया न धीर्मग्यपकर्पिता ॥५१॥ अत का कहकर में विवक्ति करना बहा र परम्स तुम्हारी बुद्धि मुझसे तनिक भी इधर-उभर म ये मो भजन्ति दाम्पत्ये तपसा प्रतधर्मया । ई ॥ ५१ ॥ मिये ! मै मोक्षस म्यामी । । मोर्गोको संसार-सागरसे पर करता हूँ। नो सकाम पुरुष अनेक कामात्मानोऽपवर्गेर्स मोहिसा मम मायया ॥५२॥ प्रकार के त और तपस्या करके दाम्पप-जीन के विषय-मुखकी अमिप्रपासे मेरा भवन करते हैं, ये मेरी मां प्राप्य मानिन्पपवर्गसम्पद मापासे मोहित है ॥ ५२ ॥ मानिनी रिये ! में मेष तथा सम्पूर्ण सम्भोंका आप्रय , वधीपर है। पान्छन्ति ये मम्पट एव तत्पतिम् । मुन्न परमात्माशे प्राप्त करके भी चो मग केवा विषय- मुसके साधन सम्पत्तिकी ही अमिमग्र करते हैं ते मन्दमाग्या निरयेऽपि ये नृणां | मेरी पराभक्ति नहीं चाहते थे मदभागी है, क्योंकि विषयमुस तो नरकों और नरफके ही समान सूकर मात्रात्मकत्वाभिरयः सुसंगम ॥५३॥ न लोगोंका मन तो विषम ही या यता है, इस कर आदि यानिमि भी प्राप्त हो सकते। पन्त लिये उन्हें मरकमें जाना भीवधनान पाता॥५॥ दिएपा गृहमयमकन्मयि स्वया | गोपरी प्राणप्रिये । यह मा भानन्दकी पात र | तुमने बता निरन्तर ममार-पानसे मुक्त करनेापी कतानुपतिमनमापनी मेरी सेवा की है। दुए पुर ऐमा कभी मही कर खलः। समपर्म पाम म 12 माश्या रिम।

अ. ६.] दगम स्कन्ध मुटुप्फरामौ सुतरां दुरानिपो सकते । जिन सियोंका चित्त दूषित कामनाजोंसे भरा हुआ है और जो अपनी इन्द्रियोंकी तृतिमें ही लगी मसुम्मराया निकतिजुप लिया ॥५४॥ रनेके कारण अनेकों प्रकारके छम छन्द रचनी यती है, उनके लिये तो ऐसा करना और भी कठिन है ॥५१॥ न स्वामी प्रणयिनी गृहिणी गृहेषु मानिनि ! मुझे अपने घरमरमें तुम्हारे मम्मन प्रेम करन | यारी मार्या और कोई दिसायी नहीं देती । क्योंकि पश्यामि मानिनि यया स्वषिवाहफाले। निस समय तुमने मुझे देखा न पा, केकर मेरी प्रशंसा प्राप्तान् नृपानवगणरप रहोहरो मे मुनी पी, उस समय भी अपने विवाहमें आये हुए राजाकी उपेक्षा करके प्रमणके द्वारा मरे पास गुम प्रसापितोद्रिय उपचतसस्मयस्य ॥५५॥ | सन्देश भेजा था ॥ ५५ ॥ तुम्रा हरण करत मम्स्य मासुषिरूपफरणं युधि निर्जितस्प मैंने तुम्हारे माको युद्धमें जीतकर उसे लिप कर दिया था और अनिरुदके विवाहोत्सबमें चौसर म्यते प्रोद्वाहपर्वणि पतधमक्षगोष्ठयाम् । समय वरामनीने तो उसे मार हा नाला । किन्तु एमसे पियोग हो जानेकी आशवासे तुमने सुपचाप वह सारा दुरूसमुस्थमसदोऽसदयोगभीस्पा दुस सह लिया । मुप्तसे एक बात भी नहीं फही। नामवी: किमपि न षर्य जिवास्ते ॥५६॥ तुम्हारे इस गुणसे में सम्हारे वश हा गया है । - ६ ॥ तुमने मेरी प्रासिके लिये दूतके द्वारा अपना गुप्त सन्देश दतस्त्वयाऽऽत्मसभने सुविषिक्तमन्त्रः भेना पा, परन्तु जब तुमने मेरे पाँधनमें कुछ किम्य होता देखा, नच तुम्हें यह सारा संसार मूमा दीपने प्रम्यापितो मयि धिरापति शून्यमेतत् । स्टगा । उस समय तुमने अपना या सामन्दर नारीर किसी दूसरेके योग्य न सम्माकर इसे अपनेका माल्प मत्वामिहाम इदमङ्गमनन्ययोग्य पर लिया था । तुम्हारा यह प्रमभाव तुम्हारे ही और विष्यत सवयिषय प्रतिनन्दयाम ॥४७॥ मर्योच प्रम-मावफा फेवल अभिनन्दन करते हैं ।। .७॥ रहे । इम इसका पन्छा नहीं घुस्न सफते । तुम्हारे हम श्रीगुर उबाप भीगुफाप हम ई-परीक्षित ! अगरीपर भगवान् श्रीकृष्ण आस्माराम है। वे जय मनुष्योको-मी मारतमंतरापर्मगवाजगदीश्वर । लीग कर रह है, तय उममें दाम्पत्य-प्रमका बानगाने विनोन्मरे बाप भी करते हैं और इस प्रकार गम- बरवा रमया रम नारा रिम्पयन् ॥५८ । पिगी रुस्मिगीनीफ साय विहार फरत है ॥ ॥ | भगवान् श्रीग ममत नगवफा शिक्षा दनासे और सपाल्पामामपि विमगृहेषु गृहयानिष । मरम्पारक हैं। ये इसी प्रकार दूसरी पक्षियोंके महामे भी गइम्पोंके समान रहसे और गहम्पोधित भमरा भास्थितो गृहमधीयान् भमोलाकगुरुहरि ॥९॥ पान परत ये ॥ ७ ॥ पस इति श्रीमद्भागावे महापुराणे पारमद स्पा संहितापा मस्कन्ध उवर्षे प्रणरस्निीमचा मान परिसमाऽप्याप ॥६०॥ मापन प्रीम पहना मामा ५१४ भीमागपत [२०६१ अथैकषष्टितमोऽध्याय भगवान्की सततिका वर्णन तथा मनिस्य विषाहमें रुक्मोका मारा जान्न मीसुक उवाच भीशुक्येपजी कहते है-परीक्षित् ! श्रीकृष्ण की प्रस्पेक पलीके गर्मसे दस-दस पुत्र उत्पन एककस्ता कृष्णस्य पुत्रान् दश दशापलाः । हए। वे रूप, मल आदि गुर्नामें अपने पिता भगवान् अजीजनभनक्मान्पितुः सीस्मसम्पदा ॥१॥ श्रीकृष्णसे किसी वासमें कम न थे ॥ १ ॥ रामफुपरिष गृहादनपर्ग वीक्ष्य राजपुश्योऽच्युत सितम् । | देखता कि भगवान् श्रीकृष्ण हमारे महलसे कमी पहर नहीं चाते । सदा हमारे ही पास बने यते। इससे ने प्रष्ठ न्यमंसते व स्वन सचत्त्वविद त्रिय ॥२॥ यही सम्हती कि श्रीकृष्णको में ही सबसे प्यारी है। परीक्षित् ! सच पूझे तो वे अपने पति भावान् श्रीका- चार्षन्जकोठषदनायतबाहुनेत्र का तत्व-उनकी महिमा नहीं समझती पो ॥२॥ मुन्दरियों अपने वास्मानन्दमें एकरस सित मायन् सप्रमहासरसबीक्षितपस्गुबत्दै प्रीमणके कमा कल्पके समान मुन्दर मुस, विशाल सम्मोहिता भगवतो न मनो विजेत वाह, कणस्पर्श नेत्र, प्रेममरी मुसकान, रसम्पी पितान वीर मधुर वाणीसे सय ही मोहित यती पी। सपने स्वैषिम्रम समशफन् पनिसा विमम्मः॥३॥ शृङ्गारसम्बन्धी हावमोंसे उनके मन को अपनी ओर मायावलोफलषदर्शितभावहारि सौपने समय म हो सकी ॥३॥ ये सोम हमारसे अधिक पी। अपनी मन्द-मन्द मुसकान और लिखी भ्रमण्डलप्रदिवसौरतमन्त्रीप्टः । चितानसे युक मनोहर मोहोंके इशारेसे ऐसे प्रेमके वाण घाती थी जो काम-कलाके मामोंसे परिपूर्ण होते । पल्पस्तु पोरनसहस्रमनवाणे- परन्तु किसी भी प्रकारसे, किन्हींसाधनों हारा वेमगपान्के यस्पेन्द्रिम विमपित करणैर्न शेः॥४॥ परीक्षित् ! प्रमा बादि बार-बड़े देवता भी मावान्के मन एवं इन्द्रियोंमें समस्ता मही सत्पन कर सका।।४॥ इस्थ रमापतिमबाप्प पति वियस्ता वास्तविक सस्पको या उनकी प्रासिक मागको भारी जानते । उन्हीं रमारमण भगवन् श्रीकृष्णको उन लियोने प्रमादयोऽपि न विदुः पदवी योयाम् । पतिक मपमें प्राप्त किया था। नव नित्य निरन्तर उनके मेमुर्पदाविरतमेधितयानुराग- प्रेम और मामन्दकी अभिवति होती यती पी और ये प्रमभरी मुमत्राट, मधुर चितपन, नवसमागमकी मासा हासाबलोकनवसङ्गमलालसापम् ॥५॥ वारिसे मान्पी से करसी एती पा ॥५॥ उनमेमे सभी पक्षियों के साप सेवा करनेक पिये सेकड़ों दासि प्रस्पदमासनषणिपादनाच- सती । पिर भी जब उनके मइसमें भगवान् पारस तप प सप भागे जाकर आरसूता उन्हें उिना साता, वाम्प्लविधमणवीजनगन्धमात्यै । श्रेष्ठ वामनपर बेटाती, उत्तम सामपियोंसे उनकी पूजा वाम्मान मदारित।

अ०६१] दशम स्कन्ध ५१५ - केशप्रसारशमननपनोपहा- फरसी, घरणकमल पखारती, पान लगाकर सिगती, पाँव दयाकर बकाष्ट दूर करतीं, पंखा झलती, स्त्र फुलेर, चन्दन अदि पाती, लोंके हार पहनाता, फेश सेवारती, मुख्यती, स्नान कराती और अनेक प्रकार के मोजन फराकर अपने हापों भगवान्की सेक्य दासीशता अपि विभोविंदधुः स टास्सम् ॥६॥ करता ॥ ६ ॥ साा मा दशपुत्राणां कृष्णलीपा पुरोदिता । परीक्षित 1 में कर चुका हूँ कि मगवान् श्रीकृष्णकी अष्टौ महिप्पस्तत्पुत्रान् प्रघुम्नादीन् गृणामिते॥७॥ प्रत्येक परीके दस-दस पुत्र थे । उन रानिमें आठ फ्टरानियों पी, जिनके विवाहका वर्णन में पहल कर चारदेष्ण सुटेप्णय पारनेरम वीर्यवान् । शुफा हूँ। वय उनके प्रफुन आदि पुत्रों का वर्णन करता सुचारुयारगुप्तम भद्रचारस्तथापर ॥८॥ | हूँ॥ ७ ॥ रुक्मिणीके गर्भसे दस पुत्र हुए--प्रभुन, पारुषन्द्रो पिचारुम पारुम दसमो परे । चारुदेण, सुदेष्ण, पराक्रमी चारुदेह, सुचारु, चारगुप्त, प्रघुम्नप्रमुखा बाता रुक्मियां नावमाः पितु ॥१॥ मद्रघारू, चारुचन्द्र, विचार और दसवाँ चारु । ये सपन पिता भानु मुभानुः स्वर्भानुः प्रभानुर्भानुमस्तिथा । मगवान् श्रीकृष्णसे किसी बातमें कम न ये ॥ ८९ ॥ सस्पमामाके भी दस पुत्र थे—भानु, सुभानु, स्वर्मान, चन्नभानुहलानुरविमानुस्तधाष्टम ॥१०॥ प्रमानु, भानुमान् , चन्द्रमानु, वृहदान, बतिमानु, श्रीम्पनु भीभानुः प्रतिभानुष सत्यभामात्ममा दश । और प्रतिमानु । जाम्पातीके मी साम्म आ दम पुत्र साम्प सुमित्रः पुरुजिच्छतजिच सहसमित् ॥११॥ ये-साम्य, ममित्र, फुनित शतमित् सहस्रमिद, विमपवित्रफेतुप पसुमान् द्रनिरः क्रतुः । विम्प, चित्रकेव, मुमान्, प्रविर और कतु । ये सब श्रीकृष्मको बहुत प्यारे पे ॥१०-१२ ॥ नाग्नमिती जाम्बवत्याः सुवा मते सामापाःपिसमवा ॥१२॥ सत्पाके मी यस पुत्र हुए-त्रीर, चन्द्र, भमसेन, विश्शु, चीरॅमन्द्रोऽयसेनम चित्रगुडेंगपान् प । कावान्, प, मम, शङ, सु वीर परम सेमसी आमा समुाभीमान्छन्ति मजिते: मुता ॥१३॥ पुन्ति ॥ १३ ॥ कालिम्दीके दस पुत्र ये पे-स्त, भुत फविर्षपो पीर सुपाडुमद्र एफलः । काय, पृष, बीर, मुगार, भ, शान्ति, दर्श, पूर्णमास भीर सबसे छोटा सोमक ॥ ११ ॥ म्यदेशकी राम शान्तिः पूर्णमास कालिन्या सोमकोऽवरः॥१४॥ कुमारी लक्ष्मणाके गर्मसे प्रपोप, गात्रवान्, सिंह, बल, प्रपोपो गात्रमान्सिंदो पल प्रबल ऊर्चग । | प्रकल, उर्षग, महाशक्ति, सह, मोन और अपयनित माया पुत्रा महाशकिः सहमोजोऽपरामित ।१५। का जन्म हुमा ॥ १५ ॥ मिप्रक्दिा के पुत्र थे-बक, को हर्पोऽनिलो गृध्रो वर्षनोऽमाद एव च । इप, अनिल, गघ, पवन जमाद महाश पावन, बदि महाशः पावना पक्षिमित्रविन्दात्ममा सुधि ॥१६॥ और क्षुधि ॥ १५ ॥ म्याके पुत्र थे---समामनित, संग्रामचिद् दृहत्सेन शूर प्रारणोऽरिदित् । पृहस्सेन शुर, प्रहरण, परिमित, सप, सुमन, याम, भायु धौर सस्पक ।। १७ ॥ इन पररानियों के अतिरिक जय सुभद्रा भद्राया पाम आयुष सत्यक ११७॥ भगवान्की रोहिणी धादि सोलह हजार एक सौ पौर दीप्तिमांस्ताम्रप्ताया राहिल्यास्तनया हरे।। भी पतियों दी। उसके दीसिमान् धौर तामत्प्स आदि प्रामापानियोऽमृदुम्मवत्पां महाल ॥१८॥ दस-दस पुत्र हुए । रुक्मिणीनन्दन प्रभुका मायावती १ आना २ दमिश्री शिवस्मय ४ पासषन्ट्रोमसेनमा पापा।

५१६ भीमबागपत [अ०६१ पुश्यां तु रूक्मिणो राजन् नाना भोजकटे पुर। रसिके अतिरिक्त मोरक्ट-नगरनिवासी समीकी पुत्री रुसमक्तीसे भी विवाद हुआ था । उसीके गर्भसे परम एवेपो पुत्रपौत्राम बभूवः कोटिशो नृप । वशाली बनिरुका नमइया । पीधित् ! श्रीशाके पुत्रोंकी माताएँ ही सोय हजारसे अधिक पी । इस मातर कृष्णजावानां सहस्राणि च पोडप ॥१९॥ गयी ॥ १८ १९ ॥ छिये उनके पुत्र-पौत्रोफी सत्या करोर्योतक पहुँच रामोवाप राजा परीभित्ने पूण- परम ज्ञानी मुनीचर ! भगवान् श्रीकृष्णने रणमिमें सम्मीका घड़ा तिरस्कार फथ रूमम्परिपत्राप प्रादाद दुरिसरं युधि । किया था । इसलिय यह सदा इस मास्की घातमें पता पा कि अवसर मिते ही पीकृष्णसे उसकामदनगर उनका काम सम्पम कर गई। ऐसी स्थिति में उसने अपनी रुष्णेन परिम्सस्सं हन्तुं रध्र प्रतीक्षते । क्या सम्मवती अपने शत्रुके पुत्र प्रद्युम्नजीको कैसे प्यार दी ! कृपा करके वताइये । दो शत्रुमिकीकृष्ण एतदास्पाहि मे सिदन दिपोवारिक मिय ॥२०॥ और उम्मी, फिरसे परस्पर वैमाहिक सम्बन्ध से वा ॥२०॥ मापसे काई पात टिपी मही है। स्योंकि योगीजन मूत, भविष्य पौर वर्तमानकी सभी अनागवमतीत प वर्तमानमतीन्द्रियम् । माते मीमाति मानते हैं। उनसे ऐसी बाते भी किसी नहीं रासी, जो इन्द्रिसे परे है, मात दूर है मक्या विप्ररुई व्यवहित सम्पत् पश्यन्ति योगिनः ॥२॥ पीपमै किसी वस्तुकी वार होने के कारण मही दीकी ॥२१॥ मीशुक उपाय भीमुकदेयजी कहते हैं-पीक्षित् ! प्रधुमनीमूर्ति मान् कामदेव थे। वमके सौन्दर्य और गुणोंपर शङ्गमार म्यपपर सापादनलगायतस्तया । नमपतीने स्वयंवरमें उन्होका बरमाला पहना दी। | प्रधुमनीने युद्धमें बसे ही हो कर नस्पतिको राध समतान निजित्य बहारैफरथो पुधि ॥२॥ जीत रिया मोर रुमानीकोहरलाये॥२२॥ परि मान् धीरम्णसे अपमानित होने के कारण सामीके एपी पचप्पनुमरन पर रुम्मी कप्णापमानित । कोयामि शस्त मही हुई थी बहन भी उनसे और मेटेर पा, रि मी बानी पहिन सस्मिीको प्रसन प्पतर मागिनेयाय मुसो इन्म्पिमु प्रियम्॥२३॥ परनके लिये उसने अपने मानज प्रथुमको अपनी बेटी प्याह दी । २५ ॥ पीसिन् दम पुओंके वनिरिक हरिमण्याम्तनयां राजन् कवयर्मगुतो पली । | मिर्गमीफे एक परम मुन्नी बाबर नोवामपन्या पी। समर माम पा पारसी। एनसकि पुरीन उपपेम विशालगधी कन्या पास्मती रिल॥२४॥ उमके माप रिगइ किपा ॥ २४ ॥ १।१ मापान मसिमें • राणा गुधि पद मा पप यमुम्मान , इस मेमो व गरी १० ६१] दशम स्कन्ध ५१७ दौहित्रायानिरुद्धाय पौत्री स्वम्यढादरेः। परीक्षित् ! स्तमीका मगवान् श्रीकृष्णके सप पुराना र था। फिर भी अपनी बहिन रुक्मिणीको प्रसन्न रोचना परोऽपि म्क्सुः प्रियचिकीर्षया । करनेके लिये उसने अपनी पौत्री रोचनाका विवाह रुक्मिणीके पौत्र, अपने नाती (दौहित्र ) भनिस्तक बानमधर्म तद् मौन स्नेहपानानुबन्धन ॥२५॥ साप कर दिया । यपपि रुक्मीको इस यातका पता पा कि इस प्रकारका विवाह-सम्बन्ध धर्मफ मनुकूछ नहीं तमिलम्पुदये राजन् रुक्मिणी रामकेशयो । है, फिर मी स्नेहबन्धनमें बंधकर उसने ऐसा कर दिया ।। २५॥ परीक्षित् ! अनिरुरके विवाहोत्सवमें पुरं भोजफर नग्म माम्मप्रघुम्नकादयः ॥२६॥ सम्मिलित होनेके लिये भगवान् भीषण, बमयममी, रुक्मिणीमी, प्रान, साम्य आदि शारकावासी मोनकट तमिन् निच उद्वाह फालिङ्गप्रमुस्सा नृपा । नगरमें पधारे ॥ २६ ॥ नव विवाहोत्सव मिर्विन समाप्त हो गया, तव कलिजनरेश भादि घमरी नरपतियोंने सास्ते रुक्मिण प्रोलमधेविनिर्भय ॥२७॥ रुमीसे कहा कि 'सुम बाममीको पारौके सेल्में नीत लो ॥ २७ ॥ राजन् ! परामजीको पासे गम्ने अनसनो मयं राजमपि सम्यसनं महत् । तो भावे नहीं, परन्तु उन्हें मनेका बहुत बड़ा म्पन्न है।" उन अंगोंके महकामेसे समीने पम्पमनीको गुरु- इत्युक्तो पलमाहूय तेनार्थ रुकम्पटीष्पत ॥२८॥ पापा और वह उनके साप चौसर मेग्ने गा ॥२८॥ घसममीने पहले सौ, फिर इनार और इसके बाद दस हमार सहस्रमयुत रामस्वत्राददे पणम् । मुडरोंका दोष गाया। उन्हें रूस्मीने जीत लिया । रुस्मीकी व तु रकम्पजयत्तत्र फालिल प्राइस पलम् । नीत होनपर फत्मिानरेश दाँत दिखा-दिखाकर, हाका मार फर मलामनीफी सी उड़ाने लगा। बलगमनीसे वासी दन्तान् संदर्भयन्नुच्थैर्नामृप्पचलायुधः ।।२९॥ सहन म । कुछ चिड़ गये ॥२०॥ इसके बाद रुम्मीने एफ लाम्म मुहरोंका दोष गाया । उसे यमामीने वो लक्ष रुकम्पग्रहाद् ग्लहं वाजपद पलः । नीत लिया । परन्तु रुक्मी पूर्ततासे यह करने मगा कि बिनवानामिस्पाह रुम्मी फैतषमाभित ॥३०॥ धसे तिलमि ठे। उनके हृदयमें इतना क्षोमामा, मैन भीसा है। ॥३०॥ इसपर श्रीमान् गम्यमनी | मानो पूर्णिमाके दिन समुनमें मार खा गया हो । ठमके मन्पुना शुभित भीमान् समुद्र इस पणि । नेत्र एक ता स्वभावसे हो छाम्पळ पे, दूसरे वक्त कोपके म्परे वे और मी दहक ठठे। मब उनमे दस मात्पारुणाधोऽसिरपा न्यर्पद म्लामाददे ॥२१॥ करोग मुहरोका दाँव रस्सा ॥ ३१ ॥ इस बार भी तपापि मितवान् रामो धर्मेपछलमाभित । पतनियमके अनुसार बत्रयममीकी ही जीत गई । परन्तु समीन एम करके कहा- मेरी बीत है। इस विषयके हामी जितं मयात्रमे वदन्तु प्रामिका इति ॥३२॥ विशेषज्ञ कसिङ्गनरेश आदि सभासद् इसका निर्णय कर दें ॥ ३२ ॥ उस समय वाकाशमाणीने कहा- पदि दाप्रवीमभोषाणी बलेनेव नितो म्लहः । धर्मपूर्णक या बाय, सो बस्यामनीने ही यह मीता । .

श्रीमागपत [२०५२ धर्मसो पचनेनैव सममी पदति वै मृपा ॥३३॥ है। सम्पका का कहना सरसर हट है कि उसने बीता है॥३३॥ एक तो समीके सिपर र सकार तामनात्य वैदर्भो दुष्टगमन्यवोदित। 12ी दौर दूमरे उसके साली दुष्ट समावोंने भी उसे मसंग पहिसन् मापे कालचोदितः ॥३४॥ । उम्मद सलाम । इससे उसने अाकाशमानका मेयर नदिया और सामग्रीकी इसी उपासेप कर~~३॥ वायकोविदा यूपं गोपाला पनगोषणः । प्रशमनी पारि जाफ्लोग -मन भटकने से गाले हीरे ! आप पासा खेछना फ्या गर्ने । अधैर्दीष्पन्ति राजानो बायम नभवामाः ॥३५॥ पार्टी और बाणसे तो केवल रामभोग ही सेवा करने रूसिपमधिधितो राबमिमापशासित । है पाप नैसे नहाँ ३३५ मम्मी के इस प्रकार काक्षेप और राजाओंके उपहास करनेपर मनामनी कोमसे कर परिपधपम्प अध्ने है नृम्णाससदि ॥३६॥ भागबबूला हो उठे । उन्होंने एक मुद्गर सठाम और उस मालिक सभा ही समयको मार गम्य ॥२६॥ कातिहरा तरमा गृहीत्वा इभमे परे । पहले कालिनरेश दात दिला दिसावर रसमा सामा रंगमें भंग देखकर पहमि माग्य, परन्तु मामीने दस दन्दानपातयत् छदो योजसद् वितैर्दिवै ॥३७॥ ही कदमपर उसे पा लिया और मोपसे उसके दाँत अन्ने निर्मिभपानविरसा रुपिोषिताः । नोर मे ॥३७॥ यमनीने अपने मुमकी बोरसे दूसरे प्रवासीको भी कहा जाँध और मिर आदि लोग रामाना सुद्धा ता पलेन परिपार्दिता ॥३८॥ । फोर ग । सूमो मयप और भयमीत खोकर निदते समिममियाले नानीत् सावमाएका! सि गते बने ॥ ३८ ॥ परीक्षित् । भावान् हमने म्ह सोचकर कि यमनीका समर्पन भनेमे रुक्मिणीवरूपो रामन स्नेहमजामवारि ॥३९॥ इलिममी बासम होगी और सामी के बलको पुरा समनेसे वामनी होंगे, बने मान सनीली ततोऽनिरुदै मह सूर्यमा पर सत्पुपर मम्म-युग कुछ न कहा---]] ३० । इसके बाद बनियानीका विवाह और शाम दोनों रथ ममारोप्य पपुः शमसीम् । प्रयम्न सिम हो बानर भगवान्क मारित पाणी रामाद मोमन्यद् दमाई बादि बहुधी नवविवाहिता दुसादल रोजाना के मन अमिरपनीका श्रेष्ठ रपमपाका प्रबट कारसे मिवास्तिलार्या मधुसदनाभपा ६०॥ भारकापुरीको धले भाप ।। २० ॥ इति योमागवठे महापुण्णे पारमईस्प्रे महिनायो दशमस्कायम अनिरुदतिबाहे रुक्मिरको नामैकनिमोण्याप ॥२१॥ अथ द्विपष्टितमोऽध्याय मा मनिम्न- मिल रामायण राया परीक्षितन पूर्ण महायागसम्पम मुनीर। पनपामपामुपपेमे पदसमः । मन ना ६ रि यशशिरोमणि अनिलनीने यामाम १२ साप । पापत २०६२] दशम स्कन्ध तत्र युद्धमभूद पोरं हरियकरमोर्मदत् । की पुत्री उपासे विशा किया था और इस प्रसा भगवान् श्रीकृष्ण और शाहरनीका बहुत बड़ा घमासान युर मा पा । भाप कपा करके यह वृत्तान्त विस्तारसे एतत सन महायोगिन् समारपातु त्वमईसि ॥१॥ मुनाइये ॥ १॥ मीशुष उपाप भीशुकदेवजीन १०-परीक्षित् ! महास्मा बारिकी क्या तो तुम सुन ही चुके हो । उन्होंन बामनरूपधारी पाण पुत्रसज्येठो पसेरासीन्महात्मन । | भगवान्को सारी पृषीका दान कर दिया था। उनके सौ सपके थे। उनमें सबसे बड़ा पा बागापुर ॥२॥ दैत्यान येन वामनरूपाय हरयेदायि मेदिनी ॥२॥ बलिका औरस पुत्र चाणासुर मायान् शिषकी मतिमें सदा रत रहता पा। समाजमें उसका या बादर पा। तस्यौरस सुतो पण शिवभक्तिरस सदा। उसकी उदारता और युविमता प्रशंसनीय पी। ठसकी प्रतिज्ञा अटल होती पी और सचमुष यह बातका धनी मान्यो पदान्मो धीमांय सस्पसंधो मतः ॥३॥) पा ॥ ३ ॥ उन गिनों का परम रमगीय शोगितपुरमें राम्प करता था । भगवान् शहरकी प्यासे दमदार सोगिताम्मे पुरे रम्ये स राज्यमकरोत् पुरा । देना नौकर-पाकरकी तब उसकी सेवा करते थे। उसो इनार मुमाएँ थी । एक दिन जब मगवान् शाहर वस सम्भो प्रसादेन फिकरा व सेऽमराः । चाण्डरनुस्प कर रहे थे, तब उसने अपने इनार हासे बनेकों प्रकारके पाजे पनाकर उन्हें प्रसन्न कर लिया 121 सहसपाहुयेन वाण्टषेऽतोपयन्मृतम् ॥ ४॥ सचमुच भगवान् शाइर बड़े ही मफसल वोर शरणा- गतरक्षक हैं। समस्त भूतोंके एकमात्र स्वामी प्रमुने भगवान मुर्पमतेश शरम्पो भक्तवत्सल । बाणासुरसे कहा-'सुम्हारी नो अहो, मुझसे माँग त्ये। बागाधरन कश-मान् ! बाप मा मगरकी परेणयनयामास स स पग्रे पुराधिपम् ॥५॥ रक्षा करते हुए यही गा करें। ॥ ५ " स एकदाऽऽह गिरिश पार्थस्य वीर्यदुर्मद । एफ न बस-पौरपफ पमा पूर बाणासुरन अपने समीप ही सित मावान् परके घरणकमसोको सूपक विगैग्नार्मवर्णन सस्पन्नम्नत्पदाम्पुवम् ॥ ६॥ समान चमकीये मुफुटसे छार प्रणाम किया और करा-६॥ देवाधिदर ! जाप ममम्त चयपर जम्दप नमस्ये त्या महाट्य लाकानां गुरुमीघरम् । गुरु और पर हैं। आपकने ममम्पार करता है। गिन लोगोंके मनोरप बरसक पूरे मही हुए हैं, उनका पुमामणकामाना फामपूगमराइछिपम् ।। ७॥ ग करनेक रिये अपपपास ॥७॥ मान्! मापन दोम्माम स्वया दम पर माराम मऽमपन् । मुम एक नर मुगी है, परन्तु व मेरे पिये पर भारम्प होनीपोंकि विमान को पिसास्यां प्रतिपादार नएमेतप्त समम् ॥ ८॥ मुम मानी पगरीय फार धीर-बारी माही मिता, श्रीमागपत [अ०१२ फरत्या निमृर्दोभिर्युयुत्सुदिग्गजानहम् । चो मुमसे मम सके ॥ ८॥ आदिदेव ! एक बार मेरी यामि मनेके लिये इतनी खुमत्महट हुई कि मैं आपायां चूर्गयभद्रीन भीवास्तेऽपि प्रदूषु ॥९॥ दिग्गर्मोकी बोर का । परन्तु वे मी उरके परे माग खड़े हुए। उस समय मार्गमें अपनी बहकी बाटसे सन्मृत्वा भगवान् छन्द केतुस्ते मन्यते यदा । मैने बहुत से पहारको सोरफोर गम पा' ॥२॥ वाणामुरकी यह प्रार्थना सुनकर भगवान् शाहरने वनिक क्रोषसे कहा---पे म्ह! निस समप तेरी पना टूटकार त्वदर्पन भवेन्मूठ मंयुग मत्समेन ते ॥१०॥ | गिर मायणी, उस समय मेरे ही समान योद्धासे तेरा युद्ध | होगा और वह मुद स धर्मर चूर चूर कर देगा।१० इत्युक' कुमतिईष्ट स्वगृह प्राविशन्तृप । परीक्षिए ! पाण्णमुरकी युति इतनी बिगर गमी मी कि भगवान् शहस्की बात सुनकर उसे पका हर्प हवा और पर अपने घर लौट गया। मय का मूल मगवान् शाहरक प्रतीक्षन गिरिमादेश स्ववीर्यनशनं कधी ॥११॥ उसके बल-पीर्यका नाश होनेवाला पा ॥ ११॥ आदेशानुसार उस युरकी प्रतीक्षा करने सगा, सिमें सस्सोपा नाम दुहिता स्वमे प्राप्नुम्निना रतिम् । पीक्षित् ! वाणासुरकी एक कन्या थी, उसका मामपा ऊपा । बभी वह कुमारी ही थी कि एक दिन स्वप्नमें फन्पालभत कान्तेन प्रागदएभूतेन सा ॥१२॥ उसने देखा कि 'परम सुन्दर बनिसरनीफे साप मेग समागम हो रहा है। आधर्यकी बात तो यह भी कि मातम समपश्यन्ती कासि कान्वेतिपादिनी। | उसने पनिरुदजीको न तो कभी देख पा और न मना ही पा ॥ १२॥ स्वप्नमें ही उन्हें न देखकर माबोर सन्नीना मभ्प उचसो बिहला ग्रीटिवामृशम्॥१३।। उठी—प्राणप्पारे ! सुम कहाँ हो और उसकी मार टूट गयी । या वयात विहस्ताके साथ उठ बैठी और नाणस्य मत्रीकुम्माण्डभित्रलेखा चवस्थता । यह देखकर कि में सम्सिपोंके वीपमें हैं, बहुत ही नित हुई ॥ १३ ॥ परीक्षित ! वाणासुरक मन्त्रीकर माम पा मम्म्मपृच्छन् मस्खीमपा कौतूहलसमन्विता ॥१४॥ पुरमाय । उसकी एक फम्पा पी, मिसपर नाम प चित्रसेम्प । उपा और विप्रलेसा एक-दमरेकी सदस्यिों दी। चित्ररोमाने असे फसलबश प्रसा-॥१५॥ त्वं मृगयस मुम् कीरसस्त मनारथ । 'इन्दरी ! राजकुमारी ! में दम्पती शि अमीन । रिसीन मुम्हारा पाणिग्रहण भी मात किया है। रिम हम्तमाई न नऽपापि राजपुर और तुनार ममारपर स्पा पाप ॥१५॥ उसोगप ++ रए फपिमर म्बम सापन मीर सम्पी । मैंने मममें एष महतबी देमा । उम 11ने वममा तीनसम्पर परग योस पित पीवगामा 11 ५२१ अ० ६२] दशम स्मन्ध समई मृगये फान्तं पायमित्वाधरं मधु । उसने फहरे तो अपने अवरोंपा मधुर मधु मुझे पियया परन्तु मैं उसे अवाकर पी ही न पायी ॥ | कि वह मुझे दुक्के मागरमें सम्प्पर न जाने कहाँ कापियात स्पृहयती क्षिप्त्वा मां प्रजिनार्णव ॥१७॥ 'घय गया । म नरमती ही रह गयी । सस्त्री ! मैं अपने उसी प्राणफरमका दूट रही हूँ ॥ १७॥ पित्रललोयान चित्ररेसान कदा-सा ! पनि तुम्हारा चित्तचार नियोकीमें कही भी होगा, और उसे तुम परम्यान सगी, व्यसनं तेऽपकपोमि त्रिलोस्पा यदि भाष्यते । तो मैं तुम्हारी विरह-व्यथा अस्य शान्न पर दूंगी। मैं चित्र बनाती है, तुम अपने पितघार प्राणकालमा समानेप्पे नरं यस्ते मनोहर्वा तमादिश ||१८|| पहचानकर याला दा । फिर वह चाह कहीं भी होगा, में उसे तुम्हारे पाम ले आऊँगी ॥ १८ ॥ यों कहकर इत्युक्त्या दयगधव मिदवारणपनगान् । चिपाने घाम की-बानमें यहत मे व्यता गया, मिस, त्पविद्याधरान यधान मनुजांच पयालिखत् ।।१९।। चारण, पमा, प, विद्याधर, यन और मनुष्योंक चित्र यना किये ॥ १९ ॥ मनुष्यामें उसने गिाशी वमुल्य मनुजेषु च सा पुष्णीन् शूरमानकदुन्दुभिम् । जीके पिता र, म्वयं यमुत्पनी, वयामजी आर भगवान् श्रीकृष्ण आकि नित्र बनाय । प्रगुमा चिन पायत की व्यलिरसद रामपणां च प्रपुम्न पीपलजिता ।।२०॥ ऊपा भिम हा गयी ॥ २० ॥ पर्गक्षित् । अब उमन अनिरुदका चित्र देण्या, न ता एजाके मार ठमका अनिरुदं विलिखितं पीप्योपापाप्मुखी हिया । मिर नीमा दा गया । रि मत-मत मुमपात हुए उसने कहा- मा. प्रागणमाभ प ६, वर्ग मोऽसावमारिति प्राह म्मपमाना महीपत ॥२२॥ १ ॥२१॥ चिग्रस्ग्वा नमानाय पान कष्णम्य यागिनी । परीभित् । मित्ररममा पागिनी थी। यह मान गयी कि ये झ्गशन् धीपक पाय है । अर - अफा- यो विदायमा राजन् द्वारको रुप्णपालिनाम् ।।२२।। मार्गमे रानिमें दी भाषा श्री गसग मुति तारकापुर्गमें पहुँची ॥ २०॥ यही ननिरुदनी बन ही मुन मसाग मिरा पामिदिक तय मुर्म मुपपरे प्रापुम्न यागमाम्पिता । प्रभावम दहें उयका नातिर म नापी आर जानी मापी उगाउमा प्रितमकान परम पि ॥२३॥ गृहान्या गाणितपुर मप्प प्रियमदमयन् ॥२३॥ अपन परम मुल प्रागमा १ नम्की मपिताम उमा मुमरमर निदा TRE माग नं गुनवा पिलास्य मुरितानना ! अनिरुदनी म रन मामे बिहारी । भीभित गम्मा न पर हन' गुभिज nir समयमगृह पृम्भी रम प्रापुम्निना ममम् ।।४|| उगम भर पार पुरतर नही माना . -- ५२२ भीमद्भागवत गये ॥ २५-२६ ॥ परापयासासम्गन्धधूपदीपासनादिमिः । ऊपाका प्रेम दिन दूना रात चौगुना सता नाका पा । यह बहुमान्य क्स, पुपोंके हार, इत्र मुखेड, एफ- दीप, भासन नादि सामग्रियोंसे, सुम्पुर पेय (पीनेयोग्य पानभोजनमत्यम वाफ्यैः अपमार्चितः ॥२५॥ पदार्प--धूप, शरबत वादि । भोम्प ( 'पवाकर सने पोम्प ) और मस्य ( निगल जानेयोग्य ) पास सग मनोहर वाणी एवं सेवा-शुश्रूपासे बनिम्पनीका बका गूर: कन्यापुरे शयत् प्रावस्नेहया सया । सत्कार करती। ऊपाने अपने प्रेमसे उनके मनको भरने पशमें कर लिया । अनिरुपमी उस कन्याके क्स.पुस्से छिपे रहकर अपने आपको मूल गये । नें इस कामा नादर्गणान् स बुमधे ऊपयापहतेन्द्रियः ॥२६॥ | भी पता न कब कि मुझे यहाँ भाये दिन बीत सां तथा पदुवीरेण मन्पमानां इतव्रताम् । पीक्षित् ! यदुकुमार मनिस्यबीके सहबारसे उपाय कुखारफ्न मष्ठ हो चुका पा। उसके शरीरपर ऐसे घि हेतुभिर्लधांचाराप्रीवा तुरवप्छदै ॥२७॥ प्रकट हो गये, जो स्पष्ट इस वातकी सूचना दे रहे । और चिन्हें किसी प्रकार छिपाया नहीं या सारा था । मटा आवेदपांच राजेस्ते दुहितुर्भयम् । | उमा पात प्रसम भी राने त्यगी । पहरेदाने समय लिया कि इसका किसी-न-किसी पुरुषसे सम्बन्ध वारस हो गया है। उन्होंने गाकर याणासुरसे निकेन किया- विघटित लषयामः फन्पामाः एलपणम् ॥२८॥ पाइन् ! हमनरेग यापकी अविवाहिता रामकुमरीका नेता रग-रंग देख रहे हैंषा अपके कुम्पर वा अनपापिभिरमाभिर्गुप्तायाम गृहे प्रभो । ष्णानेवास्त्र है ॥२७-२८ ॥ प्रभो ! इसमें मान्य नाही कि हममेग बिना प्रम टूटे, रात-दिन माका पारा देते रहते है । आपकी कापाको माइरके मनुष्य देख मै कन्पापा दूपर्ण पुम्भिर्दष्प्रेक्षाया न विहे ॥२९॥ नहीं सकते । फिर भी मा कससि कैसे हो गयी। इसका कारण हमारी समझ माही वा ग्रा॥२९॥ वतः प्रम्पषितो पायो दुहितु भूतपणः । परीक्षित् ! पहरेदारोंसे र समाचार मानकर कि कल्पामा चरित्र क्षित हो गया है, पाणासुरके हम वरिता मन्पकागार प्राप्ताऽद्राधीव पदाम् ॥३०॥ और अनियमी यहाँ बैठे हुए हैं ॥१०॥ बड़ी पीड़ाई 14 मरपट ज्याके महमें जा पाता प्रिय परीक्षित् ! अनिरुदनी स्वयं कामावतार प्रधुमीके फामात्मन है सपनकमुन्दर पुत्र थे । प्रिमुखनमें उनके जैसा सुन्दर बौर कोहन पा । साँबरा-सलोना शरीर और ससपर पीताम्बर करता पार्म पिशतम्परमम्मुजषणम् । हुमा कामदमक ममान बड़ी-बड़ी कोमा अब १ नाति । २ भयम् । - अ०६३] दशम स्कन्ध ५२३ पायुज कुण्डलकुन्तलविपा | लंबी-लंबी मुनाएँ, क्योल्मेंपर (पाल्ये भव्य और कुण्डलों की मिलमिलाती हुई ज्योति, होटोंपर मन्द-मन्द सितावलोकेन घ मम्मिताननम् ॥३१॥ मुसमान और प्रममरी चितफ्नसे मुस्की शोभा बन्ट्री दीष्यन्तमयः प्रिपयामि नृम्णया हो सी पी॥३१॥ बनिरूमची उस समय अपनी सब बोरसे सब-बजकर बैठी पु प्रियतमा स्याफे साप तदङ्गसजस्तनमस्रजम् । पासे खेल रहे थे । उनके गलेमें पसंती देयके बहुत पाहोर्दधानं मधुमल्लिकाभिता सुन्दर पुप्पोका हार सुशोभित हो रहा था और उस हारमें मयाके भाका सम्पर्क होनेसे उसके वक्ष स्पटकी सस्पान आसीनमवेक्ष्य विस्मितः ।। ३२ ।। केदार लगी हुई थी। उन्हें ज्याक सामने ही पैटय स तं प्रविष्ट तमासवापिभि | देखकर वाणामुर विस्मित-चकित हो गया ॥३२॥ जब अनिरुखजीने देखा कि बाणासुर गत से भाक्रमण मटेरनीफरवलोम माधवः। कारी शबामसे सुसजित पीर सैनिकोंके साप महमें उपम्य मौर्ष परिषं व्यवस्थितो मुस आया है, तब ये उन्हें धराशायी कर देनेके लिये लोहेका एक मयङ्कर परिघ सेयर र गये, मानो सर्य पथान्तको दारो जिषांसया ॥३३॥ कालदण लेकर मृत्यु ( यम ) सका हो ॥ ३३ ॥ जिघृक्षया तान् परितः प्रसर्पतः बाणासुरके साप पाये हुए सैनिक उनको पकानके लिये म्यों में उनकी ओर अपरते त्यों स्यों वे उन्हें मार-मारकर शुनो यथा एफरयूपपोजन । गिराते माते-ठीक वैसे ही, वैसे सूझोंके दरका ते इन्पमाना भवनादू विनिर्गवा मायक पुत्तोको मार गले ! भनिरूदजीकी चोटसे उन सैनिकों के सिर, मुना, बघा आदि बा टूट-फट गये निर्भिसमोरुपमाः प्रदुन्हषः ॥३४॥ और से महस्से निकल मागे ॥ ३१ ॥ जव की & नागपालिनन्दनो बली माणासुरने देखा कि या तो मेरी सारी सेनाका सहार कर रहा है, तप का क्रांघते निलमिला उठा और उसने मन्तं स्वसैन्य पितो बपन्ध । मागपाशसे उन्हें बाँध लिया । म्पाने नब मुना कि उसके प्रियतमको बाँध लिया गया है, तर पर अस्पत रूपा भृर्श झोफविपादापिहला शोक भौर विरादसे घिर गयी। उसके नोसे पद निशम्पासुकला यसैदिपीत् ॥३५॥ आँसूकी धारा इने लगी, वह रोने सगी ॥ ३५ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमाईस्या संहितायो दयामस्कन्छ' उत्तरार्षे निस्कन्धो माम विषष्टितमोऽध्याय ॥ ६२ ।। अथ त्रिपष्टितमोऽध्याय भगपान् श्रीकृष्णके साप पाणामुरका पुर मागुष्पपनी कहते हैं-परीक्षित् ! बरसातक पार अपश्यसो पानिरुदं वद पूना पभारद । महीन बीत गये । परत अनिरुदीकर कही पता न १ भितुस्पा । २ दिए । भीगुरु उपाय ५२४ श्रीमद्भागवत [२०६५ । -- चत्वारो पार्पिका मामा मतीयुरनुनोचताम् ॥१॥ चन्छ । उनके घरके लोग, इस मनासे बहुत ही शोकाकुल । हो रहे थे॥१॥ एक गिन नारदजीने आकर अनिरुवा नारदातदुपाकर्ण्य पासा पद्धस्य फर्म च । शोणितपुर नाना, यहाँ वाणाप्नुरके सैनिकोंको इरान्य प्रपय शोणितपुरं वृष्णयः कृष्णदेवता ॥२॥ और फिर नागपाशमें बाँधा बाना-सारा समाचार प्रपुनो युयुधानब गद माम्पोऽय सारणः । मनाया । तब श्रीकृष्णको ही अपना आराप्यदेव माननेवाले यदुवंशियोंने शोणितपुरपर रवाई कर दी ॥२॥ नन्दोपनन्दभद्राया रामकृष्णानुवर्तिन ॥३॥ भय श्रीकृष्ण और घनामनीके साथ उनके अनुयायी अक्षौहिणी भिरभि समेता सर्वतोदिशम्। समी यदुवंशी प्रद्युम्न, सास्यकि, गर, सम्ब, सारम, नन्द, उपमन्द मीर मद वादिने बारह अक्षौहिणी सेनाके साप लघुर्वाणनगरं समन्ताद सात्वतर्षभाः ॥४॥ न्यूह बनाकर चारों ओरसे पाणापुरकी राजधानीको धे भज्यमानपुराधानमाकारालालगोपुरम् | रिया ॥३४॥ जब बाणासुरन देस्सा कि पदुषशियों प्रक्षमाणो समाविष्टस्तुल्पमैन्योऽभिनिर्ययौ ॥ ५॥ तोडफोर रही है, तब उसे पड़ा क्रोध आया और यह | सेना नगरके उपान, परकाटों, पुर्ना और सिंहाको पामाचे भगवान् रुद्रः समुतैः प्रमथैर्वतः । मी बारह अनौहिणी सेना लेकर नगरसे निकल पड़ा ॥५॥ यागामुरकी बोरसे सक्षात् भगवान् शकर पूधमराज नमी आरुम नन्दिपमं युपुषे रामकृष्णयो ॥६॥ सवार होकर अपने पुत्र कार्तिकेय और गगोंके सब स्प भूमिमें पधारेवर उदोन भगवान् श्रीकृष्ण तया बनाम जी थामीत् सुतमलं युद्धमतं रोमहर्पणम् । युद्ध किया ॥ ६ ॥ परीक्षित् ! बर युद्ध इतना मा कृष्णशङ्करयो राजन् प्रद्युमगुरुयोरपि ॥७॥ मौर घमासान हुआ कि उसे देखकर रोंगटे भाई जाते थे । मगवान् श्रीकृष्णसे शहरजीका और प्रपुरे कुम्भाण्डपकर्णाम्ां पलेन सह संयुगः । स्वाम्किार्तिकका पुर हुमा ॥ ७ ॥ क्यामजीसे कुम्म साम्बस्स यामपुरण पाणन सह मात्मके ॥ ८॥ और पकर्णका युर पुआ । वाणासुरके पुत्र सम्प साम और स्त्रय वाणासुरके साय सात्यकि मिल गये ॥८॥ ममादयः सुराधीशा मुनय मिदचारपाः । ममा आदि बह-यो देवता ऋषि-मुनि, सिद्ध 'चारफ, गन्धवाप्मरसो यक्षा विमानैर्द्रष्टुमागमन ॥ ९॥ गवर्ष जप्मराएँ और यक्ष विमोंपर चड़ भाकर पुत्र शङ्करानुचराठौरितप्रमथगुमकान् देखनके लिये या पहुँचे ॥ ९ ॥ भगवान् श्रीकृष्णाने अपने श्वपिनुयके तीसी मोक्ताले माणसे शारमीके हाकिनीर्यासुधानाम वेतालान् सविनायकान ॥१०॥ बनुचरों-भूत, प्रत, प्रमप गुणक, गफिनी, पातुम्न प्रेवमात पिसाचाप माडान् प्रसाराधमान् । कनाल, विनायक, प्रेतगण, मातृगण, पिशाच, पण और अमरक्षाको मार-मारकर स्वदेश दिया ॥ १० ११॥ द्रावयामास तीक्ष्णा पर शाङ्गधनुश्मन ॥११॥ पिनाकपाणि शाहरजीने मगवान् श्रीकृष्णपर माँति-भौतिक पृषम्विधानि प्राप पिनास्पस्त्राणि शार्षिण । अगणित अन-शों का प्रयोग किया परतु मगमान् भीषणने प्रत्पत्र समयामास शाहुपाणिरविमितः॥१२॥ बिना किमी प्रकारक किस्म्पके उन्हें रोिधी शमायासे शस्त कर Pया ॥ १२ ॥ मगवान् श्रीाणने अपसकी प्रदातस्य प प्रभासं पायम्यस्प प पार्वतम् । सत्तिके रिये यासका नायम्यानक म्येि पर्वतावर, १ पुषः । २ भूतमात् ।। जामियम् ।

६३] दशम स्कन्ध ५२५ । - आमेयस्य व पार्जन्यं नै पाशुपवस्य च ॥१३॥ आग्नेपानके लिये पर्जन्यामका बोर पाशुपतासके लिये नागपणासका प्रयोग किया ॥ १३ ॥ इसके बाद भगवान् श्रीगने बम्मणामसे ( जिससे मनुष्यको जमाई पर माइयित्वा तु गिरिशं सम्भणारेण वृम्भिवम् । माई आने लगती है ) महादेवजीको मोहित कर दिया। ये युस्से वित होकर जमाई लेने लगे, व भगधन् पाणस्य पूतना शारिर्जघानासिगदेपुभिः ॥१४॥ श्रीकृष्ण शङ्करनीसे खुशी पायर सलवार, गदा और याणोंसे बाणासुरकी सेनाका संहार करने लगे ॥१४॥ स्कन्दः प्रयनवाणोपरर्यमानः समन्तत । घर प्रफुनने घाणोंकी बौछारसे स्वामिकार्तिकसो घायल कर दिया, उनके बा-अगसे रक्तकी धारा बह चारी, असा विश्वन गात्रम्यः शिखिनापाक्रमवरणात्१५ वे रणभूमि असकर भपने पाइन मयूरदाय माग | निकले ॥ १५॥ वाममीन अपने मसलकी भोरसे कुम्भाण्ड पकर्षश्च पेवसर्मसलादिसौ । पुम्माण और कपकर्णको धायक कर दिया, वे रणमिमें गिर पड़े। इस प्रकार अपने सेनापतिको हताहत दुदुमुस्तदनीकानि इसनाधानि सर्वतः ॥१६॥ देसकर वाणासुरफी सारी सेना तितर-बितर हो गयी ॥१६॥ विश्नीयमाणं स्वपलं या वाणोऽत्पमर्पणः । मम रपपर सबार वाणामरने देखा कि श्रीकृष्ण पादिके प्रहारसे हमारी सेना तितर फिसर और तास रुपणमभ्यद्रवत् संख्ये रथी हिस्वैप सास्पकिम्॥१७॥ नहस ो रही , तब उसे महा क्रोध बाया । उसने धन्प्याप्प युगपद् पाणः पञ्चतानि वै । चिदपर सास्पतिको छोर दिया और वह भगवान् धीषणपर माक्रमण करनक लिये दौर पा ॥ १७ ॥ एकैमियरो दो दौ संदधे रणदुर्मदः ॥१८॥ परीधित् ! रणोन्मत बाणासुरन अपने एक दनार हापोंसे एक साय ही पोष सौ धनुर सीपकर एक-एकपर दो- सानि चिच्छेद भगवान् धनपि युगपदरित। दा बाण पड़ाये ॥ १८॥ परम्तु भगवान् श्रीकृष्णमे एक साथ ही उसक सारे धनुर कार डाठे और सारपी, मारथि रथमांध इस्था सहमपूरयत् ॥१९॥ रप तपा घोको मी घराशायी कर Pा पशन पनि की।॥ १० ॥ कोरा मामकी एफ देवी थाणामुरकी समाता काटरा नाम नपा मुशिराहा । धर्ममाता थी, वह भपने उपासर पुषके प्राणों की रक्षाके पुरोऽयतस्ये कृष्णस्य पुत्रप्राणरिरक्षया ॥२०॥ रिपे बाल विषेरकर नंग-धरंग भगवान् श्रीकृष्ण के सामने भाकर खड़ी हो गपी ॥ २० ॥ मगपान् श्रीाणन, तवम्नियंग्यो नपामनिरीधन् गदाग्रमः । इसरिये कि कही उसपर टि न पा जाय, भरना मुंद पर रिण और वे दूसरी बोर देने लगे। तमनक पाण सायद विरथरियनपवारिसत् पुरम् ॥२१॥ वागापुर धनुर कर बान और पदीन दा नाना कारण जरने मगरमें पग गया ॥२१॥ विद्राविसे भूतगण बरस्तु निशिराधिपाद । पर जब भगवान् गहरवे मतगगाधर पर मगगपे, ता उनमा पदमा मीन मिर और मम सरग पर R. dy| २ पन पर ।।।

५२६ भीमनागपत मर उपाय अभ्यधामत दासाई दहभिव दिशो दस ॥२०॥दसों दिशाओका नमसा हुआ-सा भगवान् श्रीली बोर दौरा ।। २२ ।। भगवान् श्रीकृष्णने उसे सो अप नारायणा देवस्त ट्राम्पसुजन्ज्वरम् । बोर लाते देसकर उसका मुकाबला करने के लिये माहेश्वरी वैष्मयम युयुधासे बरामौ ॥२३॥ अपना सर मेरा । वन पेशाव और माहेभर देनी पर वापसमें हमने मो॥ २३ ॥ अन्तमें बेचारे माहेश्वरः समानन्दन वैष्णवन मलादितः । वेनसे मारेर मर पीमित होकर विशने या मपन्त मपमीत हो गया । जब उसे अम्पा की प्राण अलन्ध्यामममन्पत्र भीवो माहेभरो पर। न मिला, सब का नया नम्रतासे हाव भोपर शरणार्थी पीकेश सुष्टाष प्रयताञ्जलिः ॥२४॥ शरणमे होनेके लिय भगवान् भीकृष्णसे प्रार्थना करने गा।॥ २१॥ परमे कहा-प्रमो । चापकी जित। नमामि स्वानन्तशक्ति परेछ बाप ममादि बिरों के मी परम मोचर।बाप सबके मामा और सर्वसरूप है। भाप अदितीय कौर कहा सर्वात्मानं केवल एप्तिमात्रम् । हामवरूप हैं। ससास्फी उत्पत्ति, सिवि वीर संहारके विश्चात्पत्तिम्मानसरोधदेत कारण बाप ही है। कृतियोंके हारा भापका ही कान और अनुमान किया जाता है। माप समस्त विकास ममम प्रमालिङ्ग प्रशान्तम् ॥२५॥ रहित स्त्रय कम है। में वापको प्रणाम करता ॥२५॥ कालो देव कर्म जीना समावो काल, देव (ब), कम, जीप, म्यमान, ससम्म द्रव्यध प्राण मारमा विकार शरीर, सूत्रामा प्राण, बाहार, एकाच इन्दिय के पचमूत-पन सबका संघात शिशीर वीरबी स्पर- सत्सधाता पीजरोमषाह के अनुसार उससे कर्म और कमसे फिर की म्पन्मापेपा हग्निपथ प्रपये ॥२६॥ (उत्पति-- सब भापकी मप है। ए मजाके नानामापीलपदोपपन्न निपकी परम वापि । म आपकी शरण प्राममा देयान मालाकसेतून विमपि । है।॥ २६ ।। प्रमो ! माप अपनी बीमासे ही मप सारण पर मेसे और देवा, मधु तपमा हस्य मार्गान सिया धर्समानान् मर्यादाओं का पालन-पोषण करते हैं। साथ ही उम्- मन्मवत्त भारदाराप ममः ॥२७॥ गामी मोर हिंसक कमरोंका संशर मी करसे हैं । वाका माई त वेभसा दुस्सहन पर ममतार पृप्तीफा मार उतारन के लिये है ॥ २७ ॥ प्रमो / भापक शान्त उम और सत्पन्न मान्तोप्रमारपुरपणन मरण। भयानम दुस्सद देव बरसे में वापस सुन्ता हे का सारनापा दहिना ताधिमूल है। मगवन् ! देहधारी नीपोंको तमीतक पप-मता हता है, जबतक वे वाशाकम से बने कान ना सवरन् पापपरामानुपहा ॥२८॥ पापके परणयमयी शरण नही पण करते ॥ २८ ॥ भीभगगनुगप भगयान् भीष्णन करा -शि में तुम मिमिरम्मे प्रगमाऽपिम्पतु समन्यरा भयम् । प्रगम है। तुम मरे मासे मर्मया। , अ०६३] दशम स्कन्ध ५२७ यो नौ मरति मवादं वस्य त्वम्भ भवेद् भयम् ॥२९॥ संसारमें जो कोई हम दोनोंके संवादका स्मरण फरेगा, | उसे तुमसे कोई मय न रहेगा' ॥२९॥ भगवान् श्रीकृष्णके इत्युक्तोऽच्युतमानम्य गतो माहेश्वरो ज्वर । इस प्रकार करनेपर माहेश्वर जर उन्हें प्रणाम करके चला गया । तबतक बाणासुर रयपर सवार होकर पाणस्तु रथमास्ट प्रागायोत्स्पञ्जनाईनम् ॥३०॥ भगवान् श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके लिये फिर मा पचा॥३०॥ ततो पाहुसहस्रेण नानायुधधरोऽसुरः । परीक्षित् ! बाणासुरने अपने हनार हाम तरह-तरह के इपियार ले रक्खे ये। अव पर भस्फ्न्त कोषमें भरकर समोघ परमलदो पामांमफ्रायुधे नृप ॥३१॥ । चक्रपाणि माषान्पर बा)की वर्षा करने लगा ॥ ३१ ॥ तस्यास्पतोऽखाम्पसकधरण भुरनेमिना । बम मगवान् श्रीकृष्णने देखा कि याणासुरने तो माणोंकी पदी लगा दी है, तब वे छुरेकी समान तीसी पारवाले पिछेद भगवान पाहून शास्लाइव वनस्पते ॥३२॥ | चक्रसे उसकी मुजाएँ कारने लगो, मामो कोई किसी पसकी छोटी बेटी सालियों काट रहा हो ॥३२॥ पाहुपन्छियमानेषु पाणस भगवान् भवः । नब मक्तवत्सल भगवान् शाहरने देखा कि बाणामुरकी भक्कानुकम्प्युपत्रज्य चकायुघमभापत ॥३३॥ मुनाएँ कर रही हैं, तब घे चक्रधारी मगवान् श्रीकृष्णके पास आये और स्तुति करने लगे ॥३३॥ मीरुद्र उपच भगवान् शने कहा-प्रमो ! आप वेदममि तात्पयरूपसे छिपे हुए परमन्यामि स्वरूप परराम है। स्वं हि प्रम पर ज्योति प्रमणि पापये। य पश्यन्स्पमलान्मान आकाशमिष फेवलम् ॥३४॥ गुबहदय महात्मागण आपके बाफाशके समान स म्यापक और निर्विकार (मिप) स्वरूपका साक्षात्कार नाभिर्नभोऽमिर्मुखमम्म रतो करते है ॥३१॥ आकाश वापकी नामि है, अमि पौः शीर्षमाष्ठा भुविरब्धिी । मुख है और अप्र वीर्य । वर्ग सिर, शाएँ कान और चन्द्रो मनो मस्स गर्फ आरमा पृथ्वी परण है। द्रमा मन, सूर्य नेत्र और में शिव वापका माहार । समुद्र वाफमा पेट है और इन्द्र यह समुद्रो जठर सजेन्द्रः ॥३५॥ मुना ॥ ३५ ॥ धान्याबोपधियों रोम है, मेव केश, रोमाणि मस्यौपधयोऽनुवाहाः और ब्रमा पुसि । प्रमापति मिझ और धर्म एय। फेशा विरियो विपणा विसर्ग । इस प्रकार समस्त लोक भौर लोकान्तरों के साथ निसके प्रमापतिदयं शरीरकी तुत्स्ना की जाती है, वे परमपुरुष आप ही यस्य धर्म हैं॥३६॥ मसर पोति स्वरूप परम्परम्न् ! बाफ्का म वै भवान् पुरुषो लोककल्पः ॥३६॥ द अवतार धर्मकी रक्षा और संसारके अभ्यु'4- सपापधारोऽयमवण्ठधामन अमिद्धिक सिये हुआ है। हम सब भी आप प्रम्बसे धमेस्स गुप्स्पै जगतो भवाय । ही प्रमाषान्वित होकर सातों मुबोंका पाटन करते वर्य च सर्वे भवतानुभाषिता है॥३॥ माप सबातीय, विजातीप और लगतभेदसे रहित है-एक बोर मदितीय मादिपुरुष है । मापास्त विभाषयामा अपनानि सप्त ॥३७॥ नाप्रद साम वीर सुपुप्ति म तीन अवम्पामि त्वमेक आप पुरुषोऽदितीय जनुगत और उनसे मतीत तुरीस्तत्व भी आप ही हैं। म्स म्यम्पेतुरहसुरीश । बाप किसी दूसरी वस्तुके प्रकाशित नहीं हासे, मुळा ५२८ श्रीमद्भागवत [२०६३ प्रदीयोऽधापि यभाविकारं स्वयं प्रकाश है। भाप सबके कारण १, परमा मापका म तो कोई कारण है और न सो वापकारणपना ही स्वमायया सर्वगुणप्रसिधै ॥३८॥ है। भगवन् ! ऐसा होनपर भी आप हीमो गुण विमिम विषमतामाको प्रकाशित करने के लिये पानी मपैव सूर्य पिहितश्छापया म्बया मायासे देवता, पशु-पक्षी, मनुप्य भारि शरीरों के अनुसार छायो प रूपाणि च सश्चमस्ति । मिा भिन्न स्मोमें प्रतीत होते हैं॥३८॥ प्रो! जैसे सूर्य अपनी छाया मादलोसे ही डक बाता है और एवं गुणेनापिहितो गुणांस्त्व उन मादलों तवा विभिन्न रूपोको प्रकाशित करता उसी प्रकार माप तो सप्तकाश है, पस्तु गुणोंके र मानो ठकसे जाते है और समस्त गुणों क्या गुण- मात्मप्रटीपो गुपिनम भूमन् ॥३९॥ | सिमपानी बीवोक्ने प्रकाशित करते हैं। वास्त्रवमें अप अनन्त ॥ १९ ॥ पमापामाहितधियः पुत्रदारगृहादिपु । भगवन् ! आपकी मायासे मोहित होकर मग मी मुध, उन्मनन्ति निममन्ति प्रसक्ता जिनाये ॥४०॥ दोहोइ बादिमें भासक हो माते है और किस तु सके वार देवदत्तमिर्म लम्या नृलोकमसितेन्द्रियः । सागरमें बन-उतपने गते ।।१०॥ संसारके मान- को यह मनुष्य शरीर बापने मस्पन्स क्या करके किया है। मो नाद्रियेत त्वत्पादोस शोच्यो मात्मवश्यकः॥४१॥ जो पुरुष इसे पाकर भी पानी इन्द्रियोंको पक्षमे मी मस्स्पो विसमते मर्प जात्मानं प्रिपमीभरम् । करता और वापके चरणकमका पश्पि नहीं मेला- उनका सेक्ननहाकरता, उसका जीवन अत्यन्त शोचनीय विपर्ययेन्द्रिया विपमस्यमृतं त्यजन् ॥४२॥ है और न हय अपने-चापको धोखा दे रहा है। मई प्रमाथ विमुधा मनयमामलाशयाः । प्रमो नाप समस्त प्राणियोंके मामा, प्रियतम * सर्वात्मना प्रपन्नास्त्वामारमान श्रेष्ठमीघरम् ॥४३॥ | और मनास्म, दुसरूप एव तु विपर्यो र ईपर हैं। मो मृरपुका प्रास मनुष्य भापको दोष देता से ता जगत्सित्पुदमान्तहेतु धुद्धि करके उनके पीछे मटकता है, याना मूर्स ! कि अमृतको छोरा विष पी हा॥१२॥ समं प्रशान्त मुादात्मदेषम् । प्रमा, सारे देका पौर विश्व यवाले ऋषि-मुनि सा प्रकारसे गौर समिमासे मापके शरणागत कि माप ही हमलोगों के मामा, निमा और सिर अनन्पमेक जगवारमकेस हैं।॥ १३ ॥ बाप जगत्की उत्पति, स्पिति वीर प्रम्पले कारण हैं। वाप सबमें सम, परम शान्त, सबके म भषापवर्गाय भनाम देवम् ॥४४॥ वात्मा और हरदेव बाप एक, पतितीय वीर गतके माघार तपा अधिम्यम है। प्रमो ! हम सब संसारसे वर्य ममा दयियोऽनुपर्ती मुक्त होने के लिये भापका मजन करते हैं| ॥१॥ देव । यह बाणासर मा परमप्रिय, पापात्र और सेवक मयाभयं चममुप्प देव । है। मैने इसे समान दिया है। प्रमो ! जिस प्रकार ५२९ प०६३] दशम स्कन्ध सम्पाद्या सद् भवतः प्रसादो इसके परदा देस्परान महादपर भापका फयाप्रसाद है, यथा हि ते देस्यपती प्रसाद ॥४५॥ सा ही कृपाप्रसाद भाप इसपर भी करें ॥ १५ ॥ मीभगवानुवाच भगपान् श्रीकृष्णने कहा-भगवन् ! आपकी मात मानकर-जैसा वाप चाहते हैं, मैं इसे निर्भय किये यदात्य भगवस्त्वन करवाम प्रिय तव । | देता । आपने पहले इसके सम्बन्धमें जैसा निश्चय भवतो यद् व्यवसितं तन्मे सावनुमोदितम् ॥४६॥ किया था- मैंने इसकी मुबाएँ फाटफर उसीका धनु मोदन किया है ॥ १६ ॥ में बानता हूँ कि बाणासुर अपम्पोऽय ममाप्येप वैरोचनिसुतोऽसुरः। | दैत्यराज बलिका पुत्र है । इसलिये में भी इसका बध नहीं कर सकता, क्योंकि मैने प्रहादको र दे दिया प्रहादाय वरो दयो न सम्यो मे तवान्वयः ॥४७॥ है कि मैं तुमारे वंशमें पैदा होनेवाले किसी भी दैत्यका पत्र नहीं करेंगा ॥ १७॥ इसका धर्मर घर करनके दर्पोपसमनायास्स प्रेरणा पायो मया । लिये ही मैंने इसकी मुमाएँ काट दी है। इसकी बात सदितं च पल भूरि यच भागयित भवः ॥४८॥सी सेमा पृप्पीके लिये मार हो रही थी, इसीलिये | मैंने उसका संहार कर दिया है।॥ १८ ॥ अब इसकी पन्यारोऽस्य सजा शिष्टा भविपन्स्पमरामराम चार मुमार बच यही हैं । ये अमर, अमर बनी येंगी। या बाणासुर आपके पार्षदोंमें मुख्य होगा। अब इसको पार्पदम्पो भवतो नतबिनयोऽसुरः ॥४९॥ | किसीसे किसी प्रकारका मय नहीं है ।। १९ ॥ इति लग्वाभयं कृष्ण प्रणम्य शिरसासुरः । श्रीकृष्णसे इस प्रकार अमयदान प्राप्त करके बाणापुरने उनके पास भाकर घरतीमें मापा टका, प्राघुम्निं रथमारोप्य स पन्ना समुपानयत् ॥५०॥ प्रणाम किया बोर अनिरूपनीको अपनी पुत्री उयाके साप स्पपर बैठाकर मगवान्के पास ले आया ॥ ५० ॥ इसके बाद मामलान् श्रीकणने महादेषनीकी मम्मलिसे अधोहिण्या परिपत सुवासासमलवृतम् । बनामदारविम्वित ऊपरा और अनिरुदनीको एक पक्षी हिणी सेनाके साथ आगे करके द्वारकाक लिये प्रस्थान सपनीर्फ पुरस्कस्प ययौ रुद्रानुमोदिसः ॥५१॥ किप्प ॥५१॥ इधर द्वारकामें भगवान श्रीरुण बारिके शुमागमनका समाचार सुनकर मंडियों और तोरोसे मगरका कोमा-कोना मुगा दिया गया । बी सी सरकों स्वराजधानी समलतां मनः और चौराहोंको चन्दन-मिश्रित नम्से सांच रिया गया । सेतोरणैरुषिवमार्गपततराम् मगरके मागरिकों, बन्धुबान्धों और प्रामगोन मागे बाकर म्यूब धूमधामसे मगवानका स्वागत किया । उस विवश शानफनुभिस्वनै- समय शत, नगारों और दामोंकी मुमुल पनि हो रही थी । इस प्रकार मावान् श्रीगने अपनी राजधानी में रम्युयत पारसहहियाविमि ॥५२॥' प्रवेश किया ॥ ५२ ॥ १ प्रकच । २ उतम ।। मनोरमै क्तिमार्ग ।

-३० श्रीमद्भागवत [२०६५ म एष रुप्मविजय शररेण च संयुगम् । परीक्षित् | जो पुरुष भीशहरमी के साथ भगवान् श्रीकृष्णका युद्ध और उनकी विजयकी कपाफा प्राप्त काल उठकर स्मरण करता है, उसकी पनप नही संसरेत् प्रातरूपाय न तस्य सात पराजयः॥५३॥ | होती ॥ ५५ ॥ इति धीमद्भागवते महापुराण पारम्हस्यो सहितायां दशमस्कन्ध अत्तरार्धे ऽनिस्मानन नाम त्रिपधितमोऽध्याय ॥ ६३ ॥ अथ चतु पष्टितमोऽध्याय नग रानाकी कथा भी वाच भीशुकदेवजी कहते हैं-त्रिय परीक्षित् । एक एकदोपपन राजन् जग्मुर्गदुरुमारका । दिन साम्य, प्रधुन, पाहमान और गद बादि सभी मिहतु राजकुमार धूमनक ठिये उपकनमें गये ॥१॥ साम्बप्रघुम्नचारमानुगदादयः ॥ १॥ मात देसक खेल सेखते आए में प्यास मग जायी । क्रीडित्वा मुधिरं तब विचिन्वन्त पिपासिता । जब वे इधर-उधर जलकी सोन करने लगे। रेपक एं के पास गये, उसमें जल्ल पो या माही, एक बड़ा बल निरुलके कूप दशु सत्यमबुवम् ॥ २ ॥ विचित्र भीष दीख पड़ा ॥ २ ॥ व जीप फ्रक कमला गिरिनिम वीक्ष्म विमितमानमा समान बाकारका एक गिरगिट था । उसे देखकर उनके बासयकी सीमा न खी। उनका दय कागासे मर तस्प चादरण पस्न घसस्ते कृपयान्विता ॥३॥ आया वोर व उसे पार निकरणनेका प्रयास करने धमनम्तान्तयः पासष्पा पतिसमर्माः । एगे ॥ ३ ॥ परन्तु या वे राजकुमार उस गरे र गिरपिका पमा लौर सूतकी रस्सिोंसे योधका कार नाशरबन ममदतु कपणापापमयुरुस्सुका ॥ ४॥ म निकर सक, तव कुइटारा उन्होंने यह अर्थ समागत्यागनियो भगवान पिचमापन । मय बचान्त मगवान् श्रीकणके पास जाकर निवेन किया ॥ १ ॥ अगदके जीवनरासा कसम्मपन मगवान् वीस्याहार वामन तं करण म लीलया ॥ ५ ॥ श्रीकृष्ण उस पर भाये । उमे दसपर उमौन बार्ये हापसे बरसलों-अनामाम ही रसका बार निकाल उत्समम्मामागभिमृष्टा रिया ॥ ५ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण काफममोफा सा विद्याप मपः सरगमम्पम् । दाते ही उस मिनिट-सप माता रमाबोर हा एक म्वगीय स्याम गपमें परिणत हो गया। मा उमा मनममामाकरमारपण शरीरमा रग नपाप मोनेर समान अमर साया । घग्यमुना करणापरयर ॥६॥ और उमर धारपर अपुन मन, आमूग र पुगों पारगाव।। पेम ।। तानात पा परित : - मरामुरगाय Ein 1 नसभा परम ।

अ०६४] दशम स्कध सुभद्र। विद्वानपि तमिदान हर शोमा पा रहे थे ॥ ६ ॥ यपपि भगवान् श्रीकृष्ण जानते थे कि इस दिश्य पुरुपको गिरगिट-योनि क्यों ननेपु विल्यापयितुं मान्दः । मिली थी, फिर मी पा कारण सर्वसाधारणको मालम फस्त्वं महाभाग परेम्परूपो हो माप, इसलिये उन्होंने उस दिश्य पुरुषसे पछा- देवोपम त्वां गणयामि ननम् ।। ७ ।। महाभाग ! सुम्हारा रूप तो बहुत ही सुन्दर है। तुम हो कौन ! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि तुम वापी दशामिमा वा कतमेन कर्मणा कोई श्रेष्ठ देवता हो ॥ ७॥ फल्याणमर्ते ! किस कम के सम्प्रापितोऽस्यतः फलसे तुम्हें इस योनिमें थाना पड़ा था। वास्तवमें तुम आस्मानमाख्याहि विवित्सतां नो इसके योग्य नहीं हो। हमलोग तुम्हारा इत्तान्त नानना चाहते हैं। यदि तुम हमलोगोंको वह बतल्पना उचित यन्मन्पसे न धममत्र पक्कुम् ॥ ८॥ समझो तो अपना परिचय अवश्य दो' ॥ ८ ॥ मीझुक उवाच श्रीशुकदेवसी करते है-परीक्षित् ! नव अनन्स- मनि मगवान् श्रीकृष्णने राजा नासे [क्योंकि वे ही इवि स रामा सम्पष्ट रुप्पेनानन्तमूर्सिना । इस रूपमें प्रकट हुए थे ] इस प्रकार झ, तब उन्होंने वफ्ना सूर्यके समान नाकपमान मुकुर मुकम्मर | भगवान्को प्रणाम किया और ये इस प्रकार करने माधवं प्रणिपत्पाद फिरीटेनार्कवर्धमा ॥९॥ लगे॥९॥ राजा मृगने कहा-प्रमो ! में महाराज इक्वाकुमा नृग उवाच नृगो नाम नरेन्द्रोऽहमिक्ष्याइसनम प्रभो । पुत्र राना नग है। जब कमो किसीने वापके सामने दानिपाठपायमानेषु यदि ते कर्णमस्पश्चम् ॥१०॥ दानियोंकी गिनती की होगी, तब उसमें मेरा नाम भी भाश्य ही कपके काम परा होगा ॥ १० ॥ प्रमो! किं नु सेऽविदित नाथ सर्वभूतात्मसाधिमः । भाप समस्त प्राणियोंकी एक-एक सिके साधी है। कालेनाम्पाइसम्मो वक्ष्पेऽथापि समाश्या ॥११॥ | भूत और मविष्यका म्पवधान भी बापक मा जान मावत्यः सिकसा भूमेर्यावत्यो दिवि वारका । किसी प्रकारकी बाधा माही रास सकता । मत मापसे किया ही क्या है। फिर भी में आपकी वाहका पान मामत्यो पधाराम तावतीरददा म गाः ॥१२॥ करनेके किये करता हूँ ॥ ११ ॥ भगवन् ! पृषीमें पमसिनीस्तरुणी शीलरूप मितने भूरियाण है, वाकाशमें मिसन तारे है मौर बपमि गुणोपपमाः कपिला हेमभूतिः । जितनी मम्की धाराएँ गिरती है, ममे उतनी ही गौर दान की पी ॥ १२ ॥ वे समी गौएँ तुमार, नौनबाग, न्यायार्जिता रूप्पखरा सपस्सा सीची, सुन्दर, सुत्क्षणा और कपिला थी । मैने दुशलमालाभरणा ददावहम् ॥१॥ | म्यायके घनसे प्रास किया था। सबके साप बने थे। खठकतेम्या गुणशीलपम्प सनके मांगेम सोना मा दिया गया पा वीर सुमि चाँदी । मर्ने बस, हार और गहनोंसे सगा दिया जाता सीदवटुम्नेम्य वतव्रतेम्प। पा । ऐसी गौएँ मैने दी थी ॥ १३ ॥ मगन् ! में तपःभुवममवदान्पसम्प युवावम्पासे सम्पम श्रेष्ठ प्रामणकुमारोंको-जो सद् प्रादा युवम्पो दिमपुङ्गवेम्पः ॥१४॥ गुणी, शीसम्पन, कठौ पः हुए कुटुम्बासे, दम्भरक्षित १पारम्पपिसाच । २ मानवे परमारमय।

५३२
श्रीमहामवत
[३.६०
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गाभूहिरण्पायवनाचहस्तिन
तमसी, वेदपाठी, शियोंको विचारान करन वल तप
सबरित्र होते--वस्त्राभूषणसे बात करता और उन
कन्या मदासीस्तिलरूप्पशपया। गौत्रोंका दान करता ॥ ११ ॥ इस प्रकार मने मान-
सी गौएँ, पृथ्वी, सोना, घर, मोर, हायी, दामियों
पासासि रमानि परिच्छदान स्था
सहित क्त्याएँ, मके पर्वत, चोदी, शय्या, पप, र
गृह-सामग्री भौर रप भादि दान किये। बनेकों या
निष्ट च यमपरितं च पूर्तम् ॥१५॥ किये बोर बहुत-से एँ, वात्री नादि वनवाये ॥१५॥
फसचिद् दिजमुस्पस्प मष्टा गौर्मम गोषने । एक दिन किसी अप्रतिमही (दान न सेनबसे ।
तपसी प्रामणकी एक गाय मिरकर मेरी गोमि वा
सम्पृक्ताविदुपा मा च ममा दचा दिखातये ॥१६॥ मिली। मुझे इस भातका बिल्कुल पत्ा म फय
| इसलिये मन मनमानमें उसे किसी दूसरे मामणको हार
सां नीयमाना तत्म्वामी नोनाच ममेतितम् ।
कर दिया ॥ १६ ॥ सब उस गायको वे ग्रामग हे
चले, सब उस गायके असली मामीने कहा-
ममति प्रतिप्रामाइ नृगो मे दसवानिवि ॥१७॥ मी दान ले जाने वाले ब्रामणन कहा-'हटे
मेरी है, क्योंकि राजा मृगन मुम इसका दान किया
विपी विपदमानो मामूचतु म्वार्थमाधको ।
६॥ १७ ॥ मे दानों मामण वापसमें मगइसे तुर
अपनी-अपनी बात कायम करने के लिये मेरे पास जाये।
भवान् दातापहतेति तन्मृत्वा मऽभवद्भ्रम।।१८॥ एकन कहा-यह गाय अभी-अभी वापने मुझ दी है। और
इमरेन कहा कि यदि ऐसी मात है तो तुमन मेरी गाय
अनुनीवायुभी पिना धर्मरागतन ।
पुरा मी " भगन् । उन दोनों मामयोंकी बत
गा लय प्रमष्टानां दाम्याम्पेपा प्रदीयताम् ||१९|| माटो पाकर उन लोसे यही भनुनपनिय की
पुनकर मेरा पित्त भ्रमित हो गया ॥१८॥ मन धन-
और कहा कि में बदले में जब उत्तम परग।
भपन्वायनुगृहीता किंकरम्यारिमानव ।
वाम्ग्रेग मुझे यह गाप दीजिये ॥१०॥ में मार
मागोवा सेफ मुमसे बनमानमें पर भसार
समुदरत मां करना पतन्तं निग्येऽशुचौ॥२०॥ बन गया है। मुभपर नापमंग पपा कीनिय और
मुप्त इम घोर परमे तथा घोर मारमें मिनेमे
नाई प्रतापराममि यस्याम्याम्पपाकमन् । बमा प्रिये ॥ २० ॥ मन् ! में इस बात पर
मही अंगा।" पद पवार गाय मामी पा गर।
नान्पर गरामप्पपुतमियामीग्यपरा पपी ॥7॥ महमा पसेमें एक साग ही मही, दराचार
मेरा भी मन महीमप्रार पार
पनाममन्ना पाम्पदनीता पमधयम् ।
मग प्रमग भीगा ||200 गि
'मा आगु ममाम नर पान
पमन परमार
अप और मुम म म गमागमानने मुने
।। antevergrainy || लम्सना।
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जगपन ॥२०॥

५३२ श्रीमद्रामवत [.६१ गोमूहिरण्मायतनावहस्तिनः परस्त्री, केदपाठी, शिपोंको विचारान करनेवाले का सवरित्र होसे—वनाभूपणसे बात करता और उन कन्याः सदासोम्तिलरूप्पय्याः । गौमौका दान करता ॥ ११ ॥ इस प्रकार मैंने मत- सी गौएँ, पृष्पी, सोना, घर, परि, हापी, दासिपी पासांसि रखानि परिम्छदान् स्था सहित फम्याएँ, सलोंके पर्षत, चाँदी, शप्पा, सस गृह-सामग्री बोर रए यादि दान किये। बनेकों या निष्टं च योमरित च पूर्वम् ॥१५॥ किये और बात-से कुएँ, बावली वादि घनाये ॥१५॥ फस्यचिद् दिजमुस्म्पस भ्रष्य गौर्मम गोषने । एक दिन किसी वप्रतिग्रही (दान न सेनेवाले, तपसी बामणकी एक गाय बिछुरकर मेरी गौओं व सम्पकाविदुपा सा च मया दत्ता विजातये ॥१६॥ | मिमे । मुझे इस बातका बिल्कुल फता न क्य। इसलिये मैने मनमानमें उसे किसी दूसरे प्रसगको रान सोनीयमानां तत्स्वामी रोपाष ममेति तम् । कर दिया ॥ १६ ॥ जब उस गायको वे एनसे पले, तब उस गायके बसमै स्मामीने फाा-या ने ममेति प्रतिग्रामाह नृगो मे दयानिति ॥१७॥ मी ।। दान ले बानेशाले बामणने कहा-पाते | मेरी है, पर्योंकि गना नगने मुझे इसका दान किया विप्रो विषदमानो माम्धसु स्वार्थसाफ्को । है॥ १७॥ दोनों प्रामण लापसमें शास्र अपनी-अपनी बात कायम करने के लिये मेरे पास से। भवान् दास्तापर्तेति समस्या मेऽभवत् भ्रम ॥१८॥ एकने का-यह गाप अभी-अभी वापने मुझे दी है के दूसरेने कहा कि यदि ऐसी बात है सो तुम्ने मेरी गगन अनुनीतापुभौ विप्रो धर्मकममातेन । पुरा मी है ।' मगन् ! उन दोनों बाक्षणों की का गो लध प्रकृष्टानां दास्याम्पपा प्रदीयताम् ॥१९॥ सट पर उन दोनोंसे धकी अनुनय-विनमः । मुनकर मेरा चित्त भमित हो गया ॥ १८ ॥ मैंने धर्म- और कहा कि मैं बदर में एक स्यस्त सचम गोर रंग। भवन्तावनुगृहीत किंकरस्याविधानत । वापत्येग मुझे यह गाय दे दीचिये ॥ १९॥ में आप लोका सेक । मुमसे अनजानमें पा पाच समुदरत मां कस्मात् पन्तं निरपेऽशुचौ॥२०॥ मन गया है। मुमपर नापोग कृपा कीमिये और मुझे इस भोर करसे तपा मोर नरकमें मरने नारंप्रतीच्छ पैराबन्मित्पुफ्त्वास्वाम्पपाक्रमत् । पमा यरिये ॥ २० ॥ राजन् ! में इसके परमे कुछ नहीं रंगा ।। यह कहकर गायका सामी पम्म गया । नान्पद् गवामप्यपुतमिच्छामीत्यपरा ययौ ॥२१॥ तुम इसके बद में एक मास ही नहीं, दस हजार गई और दो तो मी में सेनका मही। इस प्रकार कार पसम्मिमन्तर याम्पसीता यमधयम् । दूसरा ब्रमण मी पाय गण ॥ २१॥ देवषिदेव मा दीपर ! इसके बा- आयु समाप्त हानेपर पमाकत जगत्सव ॥२२॥ माये और मुन्त यमपुरी से गये । हो यामने मुझसे १ हो। २. नाम्पा प्रवीण परद इस्युमा साम्मुष ।। ग्राभेना । यमेन परम्तमाह ब०६४] दमम स्मन्ध ५३३ पूर्व त्वमशुम मा ताहो नृपते शुभम् । ह्म-॥ २२॥ राजन् । तुम पहल अपने पापका फल | मोगना चाहते हो या पुष्पका ! तुम्हारे ान और धर्मक नान्स दानस्य धर्मस्स पश्ये लोकस्स भाम्बत ॥२३॥ फलस्वरूप तुम्हें ऐसा केवस्ती लोक प्राप्त होनेवाला है, मिसकी कोई सीमा ही नहीं है ॥ २३ ॥ मगन् ! पूर्व देवानुम सञ्ज इति प्राह पटेति सः। तब नि यमराजसे कहा-देष ! पहले मैं अपने पापका फल भोगना चाहता हूँ।" और उसी क्षण यमरामने वापदद्राक्षमास्मानं ककलासं पतन् प्रभो ॥२४॥ महा-'तुम गिर जामो ।' उनके ऐसा करते ही में यहाँसे गिरा और गिरते ही समय मन देस कि मैं गिर सेक्क प्रझम्पस्प वदान्यस्प तवदासस्य कालव । गिट हो गया है॥ २१ ॥ प्रमो । मैं प्रामा उदार दानी बौर आपका मक पा । मुझे इस यातकी स्मृति यापि विन्यस्ता भवत्संदर्शनार्थिन ॥२५॥ उत्कट भमिटापा भी कि किसी प्रकार भापके दशन हो जा । इस प्रकार पाएकी कपासे मेरे सब मोंकी स्मृति नष्ट न हुई ॥ २५ ॥ मगन् ! माप परमात्मा हैं। स त्व कथ मम विभोऽक्षिपया परात्मा वावा गुद-साय योगीभर उपनिषद की दृष्ठिसे (अमेद रिसे) अपने एयमें आपका पान करते रहते हैं।इन्द्रिया- गोगेधरै श्रुतिप्यामलददिभान्मः । तीत परमान् ! साक्षात् पाप मेरे नोंके सामन कैसे आ गये। क्योंकि मैं तो अनेक प्रकारके म्पसनों, दुखद साधादधायज ठहम्पसनान्धार फममि फंसकर अंधा हो रहा था । आपका दर्शन तो नव होता है, जब संसारके पहरसे छुटकारा मिल्नेका स्यान्मेऽनुरम इह यस भवापवर्गः॥२६॥ समय वाता है ॥ २६ ॥ देवताओंक भी आग्रप्यदेव ! पुरुषोत्तम गोविन्द ! पाप ही पक और अन्यक्क जगत् देवदेव जगमाथ गोविन्द पुरुपाचम । तपा नीके स्वामी हैं। भविनाशी अग्युत ! आपकी फीनि पमित्र है।मन्तर्यामी नागपग ! आप ही समस्त्र नारायण रपीका पुण्यश्लोकायुताष्पय ॥२७॥ पजियों और इन्द्रियों के स्वामी हैं ॥ २७॥ प्रभो ! श्रीक्षण । मैं यम देवता के लोकमें जा रहा है। आप अनुजानीहि मां कप्ण यान्तं देवगति प्रभा। मुझे आहा दीजिये। बाप एसी कृपा फीजिये कि मैं चाहे कहीं भी क्यों न रहे, मे पिठ सदा आपके पत्र कापि सदश्वेतो भूपान्मे त्वत्पदास्पदम् ।।२८॥ चरणकमलों में ही ज्या हे ॥ २८॥ श्राप समस्त कार्यों पौर कारणोंक रूपमें रिपमान है। बाकी शक्ति अनन्त नमस्त सर्वभावाय मदाणेऽनन्तशक्तये । है और भास्प सय प्रम है। आपको में नमस्कार करता हूँ। सविनम्दसाम्प समातमी वासुदन श्रीकृष्ण ! रुप्माय वासुदेवाय यागानां पतये नम ॥२९॥ बाप समस्त पागोंक सामी, योगेधा | आपको मार-बार नमस्कार करता हूँ ।। २९ ॥ । स्युक्त्वासपरिक्रम्य पादी सश्याम्बमालिना। राना तगन इस प्रकार काफर मगान्धी परिक्रमा 1 और भपने मुमुटसे उनके घरोका स्पर्ण करके ५३२ श्रीमहामवत [२०६४ गाहिरण्यायतनापहस्तिन वासी, वेदपाठी, शिप्पेको रियादान करनेवाले प सचरित्र होते—यमाभूषणसे मत फटा और उन मन्या सदासोम्तिलरूप्यमय्याः । गौशेका दान करता ॥ ११ ॥ इस प्रकार मैंने गार- सी गौएँ, पृथ्वी, सोना, घर, घोड, पापी, दासियो पासासि सानि परिन्छदान् स्था- सहित फत्पाएँ, तिम्के पर्वत, चाँदी, शय्या, फा, , गा-सामग्री और रप भादि दान किये। बनेको सा निष्टं च पोपरित च पूर्तम् ॥१५॥ किये और बहुत से ऐं, मामी आदि मनश्चये ॥१५॥ कस्यचिद् दिजमुस्पस्स भ्रष्टा गौर्मम गोधने । एक दिन किसी अप्रतिग्रही (दान न लेने । तपसी बामणकी एफ गाय बिमुरकर मेरी गोम व सम्पकाविदुपा सा च मया दत्ता विजातये ॥१६॥ मिली। मुझे इस बाप्तका बिल्कुल फ्ता न पत्य } इसलिये मने मनमानमें उसे किसी दूसरे प्रमणको गन तो नीयमानां सत्स्वामी राष्ट्रोवाघ ममेति तम् । कर दिया ॥ १६ ॥ नम उस गायको वे मान के फ्ले, तब उस गापके वसठी खामीने कराया ममति प्रतिग्राघाह नृगो मे दयानिति ॥१७॥ | मदान ले जानेवाले ग्रामणन कराते | मेरी है, क्योंकि राना नगने मुझे इसका दान किया विप्रो विवदमानो मामूचतु खार्थसाधको । है॥१७॥ दोनों प्रामण अपसमें प्रगरते र अपनी-अपनी बात कायम करने के लिये मेरे पास बसे। भवान् दातापहर्तेति तच्छुस्वा मेऽभवत् भ्रम ॥१८॥ एफने का यह गाय अभी-अभी धापने मुझे दी है और दूसरेने कहा कि यदि ऐसी माती तो सुमन मेरी न अनुनीतावुभौ विप्रो धर्मकपणतेन । चुरा ली है।" मगन् ! उन दोनों माक्षणों की छ गा लध प्रकप्टानां दास्याम्पपा प्रदीयताम् ॥१९॥ सट पाकर उन दोनोंसे थमी अनुनय-विनय मनफर मेरा पित्त भ्रमित हो गया ॥ १८ ॥ मैंने धम- और कहा कि मैं वदले में एक त्यस वचम गौर रंग। भवन्तावनुगृहीत किंकरस्याविजाना। वाफ्लेग मुझे यह गाय दे दीजिये ॥ १९ ॥ में लोगोंका सेवक हूँ । मुपसे मनवानमें यह अपर समुद्धरत मां कशा पतन्त निरपेऽशुष।२०॥ न गया है। मुमपर वापळोग कृपा फीबिये है मुस इस घोर करसे सपा पोर नरकमें गिरने नाईप्रवाच्छये राबग्नित्युक्त्वा स्वाम्यपाफमत् । बचा स्पनिये ॥ २० ॥ राजन् ! में इसक मरम्ने मही गा ।। यह फरकर गापका सामी पत्य गया। नान्यत् गवामप्यपुतमिच्छामीत्पपरा ययौ ॥२१॥ म इसके मद में एक मास ही नहीं, सहबार गोर वार दो सो भी में सनफर नहीं। इस प्रसर र पतमिमन्तर याम्पइतनीता यमधयम् । सरा प्रमम भी चना गम ॥ २१ ॥ दापिदव स्म दीघर ! इसकेमा आयु समास हानेपर यमरान एत जगत्सत ॥२२॥ आये और मुस यमपुरी स गये । पने पमानने मुझसे २ नागिन इमुस्य साम्पुर । वेगमेनीता। पमन पूएनयार ।

अ० ६५] दशम स्कन्ध ५३५ न मप्रयधन भूमा यद् गृयाल्पायुपो नैरा । इसलिये में तो यही चाहता है कि मानणणेका धन कमी भूलसे मी मरे कोपमें न आये, पराजिताश्च्युना राज्याभवन्स्परजिनोजयः॥४०॥ क्योंकि जो स्पेग ब्राह्मणों के धनकी इम्म भी करते हैं- उसे छीननकी बात तो अग रही-ये इस जन्ममें विन मागसमपि नव दुमत मामा । धत्पायु, शत्रुओंसे पराजित और राज्यभर हो जाते है और मृत्युके माद भी ये दूसरेको कर दनेशले सौप ही होते हैं॥१०॥इसलिये मेरे आरमीयो ! यदि माझण मन्स पाहु शपन्तं वा नमस्कुरुत निस्पक्ष ॥४१॥ अपराध करे, तो भी उससे रेप मत करो। यह मार ही क्यों न बैठे या बहुत-सी गालियों या शाप ही क्यों न मचाई प्रणम विप्राननुफाल समाहितः । दे, ठसे तुमलोग सदा नमस्कार ही करो ॥११॥ जिस प्रकार में बड़ी सावधानीसे तीनों समय प्रामणोंको वधा नमत यूयं च योऽन्यथा में स दण्डपाक् ॥४२॥ प्रणाम करता हूँ, पसे ही तुमम्प्रेग भी किया करो । नो | मेरी इस आलाकर उन्लान करेगा,उसे मैं क्षमा नहीं करूंगा, प्रासयाथों अपरता हर्तारं पातयस्पषः । दण्ड दूंगा ।। १२॥ यदि प्राधणके धनका अपहरण हो जाय तो यह अपम धन उस अपारण करनेवाले मजानन्समपि पनं नृग प्रामणगौरिव ॥४३॥ को-अनजानमें उसके शरा यह अपराध हुना हो तो मी-अप पतनक गरे पास देता है । नसे बामणका गायने बनजानमै उसे लनेवाले राजा मगका नरकमें राल पर विधाष्य भगवान् सान्दो दारफोकस । दिया था ॥ १३ ॥ परीक्षित् ! समम्न उपकका परित्र करनेवाले भावान् श्रीकृष्ण शरकावासियोका इस प्रकार पावनः सरलाकानां विषेश निममन्दिरम् ॥४४॥ उपदेश देकर अपने मालमे चले गये। ॥ ३ ॥ पनि श्रीमानको महापुराण पारमइस्या सहितम्या दशमस्काप उतरा नगोपाम्यन नाम तु पपितमाऽप्पाप ॥ ६ ॥ अथ पञ्चपष्टितमोऽध्याय प्रायनरामग्रीका यमगमन श्रीमुक आप भीगुण्यपजी कहत ई-परीक्षित् ' ममापन पर रामवीके मन में प्राक नम्बा आदि मनन-मुम्बन्धियों- परभद्रा कुम्मष्ठ भगान् रथमास्थित । से मिग्नेकी बड़ी इण और उमण्य भी। अब मुद्दरिनुस्त्वष्ठः प्रयया नन्गारलम् ॥१॥ रघपर सवार होकर हारकास नलागय प्रमे माये ॥१॥ पर उनक लिये प्रवामी गार और गारिया भी बहुत परिप्यताधिगत्कण्ठ गोपोपी भिरस दिनोंसे उत्पप्ति । उ प्राने निमें 'म सबन सरममा प्रापान मरिमें उग मा 47 ना. पारगत सपना।

भीमद्भागवत [२०६५ अपनी बाप, रामोऽभिषाय पितरावानीभिरभिनन्दित ॥ २॥ यो प्रेमसे गले स्माया । कामनीन ममता पशोदा के नम्दावाको प्रणाम किया। उन लोगोने मी वाशी चिरं नः पाहि दाशाई सानुबो जगदीपरः। देकर ठमका ममिनन्दन किस्य ॥२॥ काम इत्यारोप्पाइमालिङ्गय नेत्रैः सिपिचतुर्जलैः॥३॥ कि बलरामजी ! तुम जगदीचर हो, अपने बेटे या मीवाणके साप सर्वदा हमारी रक्षा करते हो, उनको गोपवाय विधियद् यविष्टैरंभिषन्दित । गोदमें ले लिया और अपने प्रेमपशुओंसे उनें मिले दिया ॥ ३ ।। इसके बाद यह-बड़े गोपोंको वम्मामनीने यथाषयो यमासरूपं यथासम्बन्धमारमनः॥४॥ और छोटे-छोटे गोर्पोने बलरामनीको नमस्कार किया । ये मेल-मोड पौर सम्बन्धके अनुसार सबसे समपेत्याप गोपालान् हास्सहस्तग्रहादिभिः । मिले मुले ॥१॥ ग्ालयाम्के पास जाकर किसीसे हाप मिळण्या, किसीसे मीठी-मीठी बाते की, किसीको सूम हंस-सफर गले लगाया । इसके बाद बन कायम विश्रान्त सुस्लमासीनं पप्रच्छुः पर्युपागताः ॥ ५॥ नीकी पकाष्ट दूर हो गयी, वे आयमसे बैठ गये, तर स्थ ग्यास उनके पास भाये। इन म्याने कमसमपन पृष्टायानामयं स्वेपु प्रमगद्गदया गिरा। मगधन् श्रीकृष्णके रम्ये समस्त मोग, स्वग और मोक्ष- तक त्याग रम्य पा । वलरामनीने जब उनके और उनके फमे कमलपत्राचे संन्यस्ताखिलराधसः ॥ ६॥ परवा के सम्बन्धमें कुशलप्रश्न किसा, तब उन्होंने प्रम- गद्गद वाणीसे उनसे प्रश्न किया ॥५६॥ मलयमजी! सुदेषजी आदि हमारे सब भाई-बन्धु सकुशल हैं न ! फधिमो पान्धवा राम सर्वे मुसलमासते । भब थापयोग सी-पुत्र वादिके साथ यते १, बार- बन्चेदार हो गये, क्या कमी पापल्प्रेगों को हमारी कश्चित् सरथ नो राम सूर्य दारसुवान्विसा ॥७॥ याद मी वाती है। ॥ ७ ॥ यह का सौमाम्पकी मात है कि पापी सको वापलोगोंने मार गरम पर भपने दिष्टया फंसा इतः पापो दिष्टया मुक्ता सामनाः। म आनन्दकी बात नहीं है कि आपनो!ने और में पद-सम्बन्धिको पर कठसे वधा लिया । यह में मातसे शत्रुवोंको मार गम या जीत मिपा और मा निहस्य निर्जित्य रिपन दिष्टया दुर्ग समाभिसाः॥८॥ अपत पुरक्षित दुर्ग ( किले ) में वापोग मिस करते हैं।॥८॥ गाप्यो बसन्स्पः परन्छ गमसन्दर्शनाताः । परीक्षित् ! भगवान् मारामजीके दर्शनसे, उनकी प्रेमी पितानसे गोपियों निहाल हो गयी। मनि फपिदास्ते मुर्ख कृष्णः पुरस्रीजनवल्लभः ॥९॥ | सिकर म-~-'क्यों कामची ! मगर-नारियोंके प्राम- फश्चित् सरविषाकधून पितरं मातरं पसः । मन्तम ग्रीकृष्ण भन सकुशाल तो न! ॥९॥ पा कमी ठने अपने माई-पन्धु और पिता-मसाकी मी यार अप्पसौ मातरं द्रष्टुं सकटप्यागमिष्यति । भाती है। क्या वे अपनी माताक दर्शनके लिये एक बार भी यहाँ वा सकेंगे। क्या महाया भीकृष्ण कभी अपि रा स्मरतेऽमाफमनुसेवा महामुजः ॥१०॥ हमलोगेंकी सेवाका मी कुछ स्मरण करते हैं ॥ १० ॥ १ भाभिरिन । २ से ३ ।। प्रारीन प्रतिमें भपसो 'मिम्पति या कम नहीं है।

अ०६५] दशम स्कन्ध मातरं पितरं भातॄन् पतीन् पुत्रान् खसृरपि । आप जानते है कि सबन सम्बन्धिपोंको छोड़ना बहुत ही कठिन है। फिर भी हमने उनक लिये माँ बाप, मार- यदर्थे बहिम दाशाई दुस्त्यजान् स्वजनान् प्रभो॥११॥ मधु, पति-पुत्र और महिन-यटियोंको भी घोर दिया। परन्तु प्रमो। वे बात की वासमें हमारे सौहार्द वीर प्रम. का पपन काटकर, हमसे नाता तोषकर परदेश पले तान सय परित्पन्न गतः संछिमसौहदः । गये, हमलोगोंको किकुछ ही मेड दिया | हम पाहता तो उन्हें रोक सेतो, परन्तु बम में करते कि हम तुमार श्रणी है—मारे उपफारफा बदम्म कमी नही फपं नु तार स्त्रीभिर्न महीयेत भापितम् ॥१२॥ शुका सफ्ट, तम एसी कौन-सीसी, जो उनकी मी मीठी बातोंपर विशाम न कर लेती ॥११ १२॥ एक कनु गृन्त्पनवस्मितास्मनो गापीने कहा-बटरामनी!हम तो गौरकी गवार ग्यलिने ठारी, उनकी बायोमे गयीपरन्तु मारपीलिया तोबदी चतुर होती हैं । मा, वे पल पौर तिन श्रीकृष्णकी षष सतपस्प भुधा पुरखियः । मामि स्परें फंसने लगी, उमें तो वे नहीं एका पाठे होंगे। दूसरी गोपीने कहा -'नहीं सी, श्रीकृष्ण गृहन्ति पे चित्रकथस्य सुन्दर- या मनानमें तो एक ही । ऐसी रंग बिरंगी मोटी- मीठी बातें गहते है कि मा काना ! उनकी पुन्दर मुसकराहट और प्रममरी चितवनसे मार नारियों भी सिवावलोकोपासितसरातुराः ॥१३॥ प्रेमानेशसे न्याकुल हो जाती होंगी और वे अवश्य उनकी मामें आकर अपनेको निछार कर देती ही ॥१३॥ किं नस्तत्कथया गोप्य कथा कथयतापरा । तीसरी गोपीने करा--40 गोपियो ! हमागोको उसकी बातसे क्या मतलब यदि समय ही काटना है तो कोई दूसरी मात करो । यदि उस निष्ठुरफा समय पास्यमाभिविना काला यदि तस्य तय न ॥१४॥ हमारे बिना मीत बाता है तो हमाय भी उसीकी तरह, भले ही दुस्से में न हो, फट ही नापणा ॥१२॥ इति प्रहसिन शोरेसित पार पीषितम् । भब गारियों के भार नेत्रों के सामने भगवान् श्रीकृष्णकी देसी, प्रममी पावे, पारु नितान, बन्टी पाठ और प्रमानिधन आदि मुर्विमान् रोकर नाचने लगे। घेउन गति प्रमपरिप सरन्त्या रुरुद लिय ॥१५॥ माताकी मधुर सनिमें म्पप होकर रोने लगा ॥ १५ ॥ संकरणस्ना: हप्णस्य सदस्दयामः। परहिट मावान् स्परामनी नाना प्रकारसे भनुनय- विनय करने में या निपुग थे। उनोंने भगवान् श्रीहाणके सान्त्वयामास भगवान् नानानुनपस्यविदः ॥१६॥ एपप र एमाल्ने सन्देश मुना-मुनाकर गापिपोका शे मासो वा पावासोन्मघु माश्वमव च । सासमादी॥१६॥ मोर समुन्नक दो महीने-चैत्र बोर पैशाखमा बिताए । रातिक सम्प गारियोन का राम धपामु भगवान् गापीनो विमायान् ||१७|| ' उनके प्रमकी अभिद्धि का । क्यों न हो, भगवान् ।

५३८ भीमसागपत पूर्णचन्द्रकलामटे सौग्दीगन्धवायुना। राम ही जो परे ! ॥ १७॥ उस समय उमरिनी पुगन्ध लेकर भीनी-भीनी बायु पती पती पानोपवने रेमे सेविते श्रीगणेतः ॥१८॥ चन्द्रमाकी बाँदनी छिटककर यमुनामीके तटमा उपकर- को उम्पल कर क्ती बौर भगवान् बाम गोपियों परमपिता देषी वारुपी अषकोटराव । साप ही विहार करते ॥ १८ ॥ मागवेक्ने वानी पुत्री बारणीदेषीको वर्षों मेग दिया था। पतन्ती व वनं सर्व स्पगन्नाम्यासपत् ॥१९॥ के बरसे पर निकली । उसने अपनी मन्यो सारे वनको मुगन्धित कर दिया ।१९।मसुधाराकी पागल से गन् मधुधाराया पायुनोपरत ग्लः । पायुने कलरामनीके पास पहुँचापी, मानो उसने में उपहार दिया हो ! उसकी मईफसे पार ऐमर भाषायोपगसस्तत्र ललनामि सम पपौ ॥२०॥ बज्यमनी गोपियोंको मेकर वहाँ पहुँच गये और उनके साप ठसका पान किया ॥२०॥ उस समय गोपिय उपगीपमानचरितो पनिताभिईलायुषः । नरामजीके चारों बोर उनके परित्रका गान कर सी वी, और वे मतवार से होकर बनमें पिकर रहे थे। वनेषु भ्यचरत् पीचो मदविहल्लोपन ॥२१॥ उनके नेत्र वानन्दमदसे विहल हो रहे थे ॥ २१ ॥ गलेमें पुष्पोंका पार शोमा पा या प । वैजयन्तीकी सम्मेकण्ठलो मचो वैजयन्स्पा च मालया। मात्न पहने र बामन्दोन्मत हो रहे थे। उसके एक कानमें कुम्भल मलक रहा था । मुखारविन्दपर मुस- पिन मितमुखाम्भोज स्पेदप्रालेपपिसम् ॥२२॥ काहन्फी शोमा निराम्ी ही पी । उसपर पसीने द हिमकणके समान जान परती ॥२२॥ स माजाव यमुना जलझीगमीपरा। शफिमपन् बरामनीने अमाकीय करने के लिये यमुना- बीको पुकारा । परन्तु यमुनानीमे या समाकर किने नि पायमनाहत्प मच इत्पापा बलः । हो मसवार हो रहे हैं, उनकी भावामा छन र दिपा के मही वापी । तब मामयीने भोक अनागता हलग इपिदो विपकर्ष । ॥२३॥ आपने हकी नोक्से उन्हें सींचा ॥ २३ ॥ और T-~-पापिनी यमुने । मेरे मुम्मनेपर भी तू पापे त्वं मामवद्याप यमायासि मयाऽऽहता। बाबाका उपदान करके या नहीं पा रही है, मेय तिरस्कार कर रही है। देश, अब मैं तुझे मेरे सम्प्रचलन नेप्ये त्वा लागलाण अवधाफामपचारिणीम् ॥२४॥ फल पसाता है । अभी-अभी तुसे इसकी नोकसे है एपे निर्मत्सिता भीता यमुना यदुनन्दनम् । सौ टुका किये देता है।॥ २५ ॥ मा ममामयने यमुनानीको इस प्रकार पेंट-फटकारा, तब पति उपाच पश्चिा वार्च पतिता पादयोप ॥२५॥ वोर मयमीत हायर बायमनीके चरणोपर पर पर्म और गिडगिडामर प्रार्थना करन मी--||२५४ मेस राम राम महाराहा न जाने तब विक्रमम् । भिराम बरामजी ! महापाहो ! में आपका पराक्रम भून १ परेम्यम् । ३ नेमि।

म०६६] दशम स्कन्ध ५३९ यस्पैकांशेन पिता जगवी जगतः पते ॥२६॥ ( गयी थी। नगत्पते 1 44 में मान गयी कि थापके अंशमान शेषनी इस सारे जगतको धारण करते हैं।२६॥ भगवन् ! माप परम ऐमर्यशाली हैं। धापके पास विक परं भाष भगषसो भगवन् मामजानतीम् । सरूपको म बाननेके कारण ही मुझसे पहभपराध मन गया है। सर्वसहप मजलस्सल ! में पापकी शरणमें हूँ । भाप मेरी भूल-मूक क्षमा कीनिये, मुझे छोर मोक्कुमईसि विधात्मन् प्रपमा भक्वन्सल ||२७|| दीजिये। ॥ २७ ॥ सतोष्पत्र पहना याफ्तिो भगवान वल । अब यमुनाजीकी प्रार्थना स्वीकार करके भावान् फळामने उनें क्षमा कर दिया और फिर बैसे गमरा विवगाह बलं मीमिः फरणभिरिभराट् ॥२८॥ हपिनियों के साथ कीरा करता है, वैसे ही वे गायियों के साप नव्योग करने लगे ॥ २८ ॥ चबवे सफेवा नम पिरस्य सलिलादुचीणापासिताम्बरे । | मर-विहार काफे यमुनामीसे बाहर निकले, तप मामी मीने ठनें नीयम्बर, मामम्प याभूपण और सोनेका भूपणानि महाहाणि ददौ कान्तिः शुर्भास्रजम् ।२९। सुन्दर हार दिया ॥ २९ ॥ रामनीने नीले बस पहन मिमे बोर सोनेफी माय गमें गल छी । भाग पसित्वापाससी नीले मालामामुच्य काम्वनीम्। मगार, मुन्दर मूपोंसे विभूषित होफर इस प्रकार शोभायमान हुए मानो इन्द्रका श्वेतपर्ण ऐयक्त भी रेजे स्मृतो लिमो माहन्द्र इव वारमः ॥३०॥ हो ॥ ३० ॥ परीक्षित् ! यमुनाबी क्व भी यमरामभीके स्थचे ए मार्गसे बहती है और वे ऐसी बान परती अपापि रयते राजन् यमुनाऽऽकटवर्त्मना । है, मानो अनन्तशकि मगवान् यमरामनीका का गान बलसानन्सधीर्यस्म वीर्य सूचयतीव हि ॥३१॥ गोपियों के माधुर्यसे इस प्रकार मुग्ध हो गया कि धने कर रही हों ॥ ३१ ॥ क्लामबीका पित्त प्रमासिनी एवं सर्वा निष्ठा यावा एक्व रमतो प्रज। समपर कुछ पान ही न सा, बहुत-सी रात्रियों एक स्तके समान म्पतीस्त हो गयी । इस प्रकार बमरामजी रामसाक्षिप्तचिचस्प मापुजयोपिताम् ॥३२॥ अजमें विहार करते रहे ॥ १२ ॥ इति श्रीमबागवे महापुराणे पारमा हिसायाँ दशमक उत्तयः मम्वेवपिनये पमुनाकर्षण नाम परिसमोऽम्पाप ॥६५॥ अथ पट्पष्टितमोऽध्याय पीपक भौर काशियन उवार मी उपप भीषजी करते हैं परीक्षित् । बम भगवान् नन्दप्रमे गते रामे फरमाधिपविनृप । मामजी नन्दवायाके ग्रनमें गये सुए थे, तब पीछेसे करूप १.मुबमबान पापितो बमन गण । २ मे समुन्धर्मपं पर बरपतिमाप।

५४० भीमदामपत [अ०१ । पामुदेवोऽहमित्पनो दूत कृष्णाय प्रारिणोत् ॥१॥ देशके कहानी राजा पौण्ड्रफ्ने भावान् श्रीकृष्मके पास एफ दूत मेनकर या कामया कि 'मगधन् पसुरेख त्वं षासुदेवो भगवानपतीर्मों जगत्पतिः । में हूँ॥१॥ मूर्सम्प्रेग उसे यहफाया करते थे कि भाप ही मगधन् वासुदेव हैं और नगरकी रक्षा के मि इति प्रस्तोभितो बालमन आत्मानमच्युतम् ॥२॥ पृथ्वीपर मक्तीर्ण हुए हैं। इसका फा या पति पह मूर्स क्पनेको ही मगवान् मान बैठा ॥ २ ॥ असे दूत च प्राविणोन्मन्दः कृप्पागम्यक्तवर्त्मने । पन्चे बापसमें स्लेमते सम्प किसी बायकको दी रामा मान लेते है और वह रानाकी तरह उनके साथ पहार मारफामां मया पालो नृपो बालस्तोऽषुषः ॥ ३ ॥ करने ब्णता है, वैसे ही मन्दमति कामी पोकने वपिम्पगति मावान् भीकृष्णकी छीम्म धौर पस्य न खस्तु द्वारकामेत्य सभायामासित प्रसम् । मानकर धारकामें उनके पास इत मेन दिया ॥ ३ ॥ फर्ण कमलपत्रार्थ पौण्यमका पूत झारफा पाया वोर रानसभामें बैठे र राजसंदेशमप्रवीत् ॥ ४॥ कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको उसने अपने राजका वासुदेयोऽयतीर्णोप्रमेक एव न चापरः । पर सम्देश कर मनापा-॥ १॥ एकमात्र में ही मासुदेव है। दूसरा कोई नहीं है। प्राणियोंपर हम भूतानामनुकम्पार्थ त्वं तु मिप्याभिधा स्पज ॥५॥ करमेके लिये मैंने ही षकतार प्राण किया है । तुमने मुठ-अपना माम बासुदेव रस किया है, उसे मानि त्वममविवानि मौन्या विमर्षि सात्वत। मेष दो ॥ ५ ॥ यदुवंशी ! तुमने मूर्खतास मेरे पिह धारण कर रस्से है।म मेकर मेरी घरममें त्यास्पैहि मा त्वं शरणनो घेद दहिममाइषम् ॥ ६॥ बाभो वौर यदि मेरी बात में स्वीकार न हो, ते मुम्से पुर करो ॥ ६॥ भीमुक उपाच भीशुकदेवजी कहते है परीक्षित् ! मदमति पोपक्की या मक सुनकर उनसेन बादि समस कत्वनं तदुपाकर्म्य पौण्डकखालपमेघसः । बोर-मोरसे सने छो॥७॥ उन मेगोंकी हसी समाप्त होनेके बाद भगवान् श्रीकृष्णने तसे काम उग्रसेनादया सम्मा उचफैहिमुस्तदा ॥७॥ आकर अपने रामासे कर देना कि रेम ! में अपने का भादि पिहयों नहीं छोगा । इरें में तुमपर अगर उवाच दूत भगवान् परिहासफवामनु । बौर के तुझपर ही नहीं, वेरे उन सब स्पषियपर मी, बिनके एकामेसे तू इस प्रकार मा याहै। उत्सप्पे मर धितानि रस्त्वमेष विफत्यसे ॥ ८॥ स सम्प मूर्स ! तपमा मुंह मकर-आँधे । रिफर चील, गीप, स्टेर मादि मांसभोगी पक्षियोंसे मुस तदपिधायाम फराघ्रपटैतिः । भिरकर सो बापणा, और मेरा शरणदासा नहीं, उन कुपोंकी शरण होगा, जो देश मांस चॉप-बापकर पपिप्पसे सस्ता भविता धरणं शुनाम् ॥ ९॥ मागे ॥८-२॥ परीक्षित् ! मगधन्का यह तिरस्कार सपद मेकर पण्डिफमा दूत अपने स्वामी के पास गया इवि तस्तदाएं खामिने सर्ममारित् । चोर उसे का मनाप्य । इधर भगवान् श्रीकृष्मने भी ६६] दशम स्कन्ध ५४१ मोऽपि रथमास्साय फाशीमुपजगाम ह||१|| रपपर सवार होकर काशीपर पढ़ाई कर दी। (क्योकि यह कहपका राना उन दिनों यही अपने मित्र काशि राजके पास रहता पा) ॥१०॥ एकोऽपि सदुपोगमपलम्प महारथः । मगवान् श्रीकृष्णके भाक्रमणका समाचार पाकर महारपी पौण्ड्रक भी दो पक्षौहिणी सेनाके साप शीघ्र पौहिणीम्पा संयुक्तो नियकाम पुरात द्वतम्।।११।। ही मगरसे बाहर निकल भाया ॥११॥ काशीका रामा सफाधिपतिमित्र पार्णिग्राहोऽन्ययान्नप । पौण्डकमा मित्र या । अत या मी उसकी सहायता फरनेके छिपे तीन पक्षौहिणी सेनाक साप उसके पीछे धोहिणीभिस्तिसभिरपश्यत् पौष्यक हरिः ॥१२॥ पीछे भाया । परीक्षित् ! मन भगवान् श्रीकृष्णने कार्यसिगदावाधीवस्साघुपलक्षितम् । पौण्ड्रफको देसा ॥ १२ ॥ पौड्कने भी शश, चक्र, तमपर, गदा, शाधिनुप बोर श्रीयासपिए भादि पारण प्रणं कौस्तुभमणि पनमालाविभूषितम् ।।१३।। फर रस्स्ले ये। उसके पल पलपर यमाषटी कौस्तुम- शेयवाससी पीते वसानं गावचबम् । मणि धौर स्नम्पमा मी लटक ही थी॥ १५॥ उसने रेशमी पीले क्स पाम रक्ले ये और रपकी मनापर मूल्पमौल्पाभरणं स्फरन्मकरहप्पलम् ॥१४॥ गरका चिह भी भग रख पा । उसके सिल्वर म तमात्मनस्तुल्यवेपं कृत्रिममास्थितम् । वम्म्प मुकुट पा और कानों में मायक्त कुणाल मगमगा ये ये॥१४॥ उसका म सारा-का-सारा पा नट रगत विहास भृश हरिः ॥१५॥ वनाटी पा, मामो काई अमिनेता रंगमचपर लैर्गदाभिः परिधै शक्पृष्टिपासतोमरैः । अभिनय करनेके छिये वापा हो। उसकी देप-भूप्य अपने समान वेस्मर भगवान् श्रीकृष्ण सिलसिपकर प्रसिमि पहिशेर्पाले प्राहरभरपो हरिम् ।।१६।। इसने मो॥ १५ ॥धव शत्रुओंने भगवान् श्रीकृष्णपर कृष्णस्तु तत्पौण्ड्रफमाचिराचयो त्रिशूल, गदा, मुहर, शाळि, ऋष्ठि, प्रास, नोमर, समपर, पशि बोर वाण धादि अस-शोंसे प्रहार किया ॥१६॥ पलं गजस्पन्दनवाधिपचिमत् । प्रमापके समप जिस प्रकार माग समी प्रकार के प्राणि गदासिचक्रे भिरार्दया को जगा देती है, जैसे ही भगवान् श्रीकृष्णने भी गया, सम्भार, चक्र वीर बाण वादि शाखा से पौण्डक तथा पया युगान्ते तमपृषक प्रश ||१७|| काशिरामक हामी रख, घोर पोर पैदएको धतुरङ्गिणी मायोपन चवथवाजिहार सेमाको तहस-महस कर दिया ॥ १७ ॥ पा रणभूमि विपस्वरोदररिणावस्लपि मावान्के चक्रसे सण-हण इए रप, घोरे, हाथी, मनुष्य, गधे दौर उँटोंसे पट गयी। उस समय ऐसा पभो चितं मोदपाई मनस्विना माश्म हो या पा, मानो या भूतनाप शाहरफी भयार कीयसली हो । उसे देस-देखकर वीरों का उत्साह और मामीग्नं भूतपतेखिोल्पणम् ||१८|| मी मर रहा था ॥ १८ ॥ यथाह पौर्फ छोरि भोः पौण्डक पत् भवान् । मा मगवान् श्रीकृष्णने पकिसे कहा-ऐ पोण्डक! दने सूतके करस्पपा पा कि मेरे चिद अन्न-समादि दूतवास्पेन मामार तान्यखाण्युत्समामि ते ॥१९॥ | मेर दो । सो कब में उन्हें सुझपर शोरगा ॥१९॥ मृक्ष ।

जाकर अपने राधासे कर देना किरे मूड में अपने पत्र और के तुमपरी नाही, तेरे उन सब सामिपर ५४० श्रीमनागपत [ । पासुदेयोऽामिस्पशो दूत कृप्माप प्राहिणोत् ॥ १॥ देशके कमानी राजा पौण्डूकने मावान् श्रीकृय एक दूस मेनकर यह कामया कि मिगछन् त्वं पासुदषो भगवानपतीर्णो बगस्पतिः । में हूँ ॥ १॥ मूमेग उसे कम्पा करते बाप ही मगधन् वासुदेव धौर जगतकी रक्षा इति प्रस्तोभितो पालमन आस्मानमच्युतम् ।। २ ।। पृथ्वीपर अक्तीर्ण हुए हैं। इसका फल यह । यह मूर्स अपनेको ही मगवान् मान मैत्र ॥ २ दूत प प्राहिमोन्मन्द कृप्यायाव्यकममने । बच्चे वापसमें स्लेम्ते समय किसी बालकको । मान लेते हैं और वह राजाकी तरह उनके साथ। दारकायां यथा पालो नृपो पालकतोऽमुष ॥३॥ करने गता है, वैसे ही मन्दमति मानी पो तस्सु द्वारकामेस्य सभामामासित प्रसम् । पविस्फाति मगवान् श्रीकृष्णकी कीम्म और स जानकर परफामें उनके पास दूत भेज दिया। कृष्ण कमलपयाक्षं रासदेशमप्रवीत् ॥ ४॥ मानपन भगवान् श्रीकृष्णको उसने अपने ए पौडकमा व्रत धारफा पाया धौर यमसमामें मैं यासुदेवोऽवतीर्णाप्रमेफ एष न घापर । पद सम्देश कर मनाया-॥ १ ॥ एकमात्र बासुदेव है। दूसरा कोई मही है। प्राणियोपर भूतानामनुकम्पार्थ त्यं तु मिप्याभिधा त्यज ॥ ५॥ करनेके लिये मैंने ही अवतार ग्रहण किया है। छठ मछ भपना माम अमदेव रस म्यिा का यानि त्वमसविधानि मोठ्या विभर्पिसात्वत। मेष दो ॥ ५॥ यदुवंशी ! तुमने मुर्सतारय विड धारण कर रमने है। मरें प्रेकर मेरी स्पक्वहि मांत्वं शरणनो पे दहिममाएषम् ॥ ६ ॥ पाओ और यदि मेरी बात में स्वीकार न हो, मुझसे युर को' ॥ ६ ॥ भीमुक उवाच भीगुष्यजी कहते है-परीक्षित । मम्म कत्यनं तदुपाकर्ण्य पौण्डकस्पारसमघसः । पौषककी यह पहफ सुनकर उनसेन वारि समय जोर-मोरसे सने मो॥७॥ उन मेग्रेंकी हसी सम होनेफ याद मगवान् श्रीकृष्णने दूतसे का उग्रसेनादयः सम्या उपकंजरसुस्तदा ॥ ७॥ श्रादि मिद यों नहीं होगा। इन्हें मैं तुम्पर छोईन उवाच दूर्त भगवान् परिहासकथामनु । उत्साये मूढ घिद्वानि यस्त्वमयं विकमसे ॥ ८॥ उस समय मर्मभाना मुंह ककर-औचे में भी, जिनके बहकानसे व इस प्रकार बहक या।। गिरकर पील, गीभ, बटेर आमसभोजी पभिसे मुम्न सदपिधायाम कररावटक्वः। पिरकर सो जायगा, और मेय शरणता नही, उन कुतोंकी शरम होगा, जो मामास पापपापस्न म पपिप्पस इसम्तय भविता भरण शुनाम् ॥ ९॥ अाप || पशिस् ! भगवान का यह सिरस्कार इति तुम्नदाधर्ष म्यामिन मुरमादरन् । सबा भर पोपमा दूत अपने सामी पास मम और उसे यह पुनाया । पर भगान् श्रीकृष्णने भी ६६] दशम स्कन्ध ५४१ ऽपि रथमास्याय काशीमुपजगाम ह॥१॥ | रफ्पर सवार होकर फाशीपर चढ़ाई कर दी। (क्योंकि मा फरक्का रामा उन दिनों वही अपने मित्र काशि- राजके पास रहता पा) ॥१०॥ कोऽपि तदुयोगमुपलभ्य महारथ । भगवान् श्रीकृष्णके थाक्रमणका समाचार पाकर महारथी पौनक भी दो बक्षौहिणी सेमाके साप शीघ्र दिवीम्पा संयुक्तो निमकाम पुरा तम्॥११॥ ही मगरसे बाहर निकल भाया ॥११॥ काशीका रामा । काशिपतिमि पाणिग्राहोऽन्वयान्नुप । पौण्कका मित्र पा । षत वह भी उसकी सहायता करनेके हिये तीन पक्षौहिणी सेना साप उसके पीछे रिणीमिस्तिसमिरपश्यत् पौण्डूकं हरिः ॥१२॥ पीछे वाया । परीक्षिस् ! मन भगवान् श्रीकृष्णने हासिगदाणाधीनस्सापुपलषितम् । पौण्डकको देश ॥ १२ ॥ पौण्कने मी शाह, पक, तलवार, गदा, शाधिनुप पौर श्रीपसचिड वादि धारण नावं कौस्तुभमणि बनमालाविभूषितम् ॥१३॥ फर रस्ले ये । उसके वक्ष सम्पर वमाक्टी कौस्तुम शेपवाससी पीते वसानं गरुडध्वजम् । मणि धौर क्नमाम भी छटक यी पी ॥ १२ ॥ उसने रेशमी पीछे स पहन रखे ये और रपफी बवापर इल्पमाल्याभरणं स्फुरन्मारकण्डलम् ॥१४॥ गतका चिा मी ब्ग रम्य पा । उसके सिरफर तमात्मनस्तुत्यषेपं कृत्रिममास्थितम् । ममम्प मुकुट पा और कानोंमें मकरात कुण्याळ जगमगा छे पे॥११॥ ठसका यह सारा-का-सारा ॥ नट रकम विबहास भृक्ष हरिः ॥१५॥ वेष बनावटी पा, मामो कोई अभिनेता रंगमचपर दाभिः परिपः शत्पृष्टिपासतोमरैः । अभिनय करनेके मिये आया हो। उसकी नेप-भूषा पने समान देखकर मगवान् श्रीकृष्ण सिलसिळपकर सिमि पहिर्याणैः प्राहरभरयो हरिम् ।।१६।। हंसने लगे ॥ १५ ॥ श्रम शोंने भगवान् श्रीकृष्णपर कृष्णस्तु उत्पौफनाशिराजयो त्रिशूल, गदा, मुसार, शक्ति, अति, प्रास, योमर, प्यार, पतिश वर माग भादि मन-शोंसे प्रहार पिया ॥१६॥ पले गज्स्पन्दनवाषिपचिमत् । प्रख्यके समय जिस प्रकार माग समी प्रकारके प्राणियों गदासिचापुभिरार्दप मुश को जन्म देती है, वैसे ही भगमान् श्रीकृष्णने भी गदा, कम्पार, वा मोर बाण थादि शखामोंसे पौप्यूक वा पथा युगान्त हुतमुक्पृथक् प्रजाः ।।१७। काशिरामके घी, रप, भोर पोर पैदरकी चतुरङ्गिणी आयोधन तद्वयवाजिर सेनाको तहस-मास कर दिया ॥ १७ ॥ रणभूमि विपस्लरोष्ट्रररिणापसमिती भगवान्के चक्रसे सपा-का पुए रप, घोरे, हामी, मनुष्य, गधं और ठटोंसे पट गयी । उस समय ऐसा पभो चितं मोदपई मनस्सिना- माम होया पा, मानो पर भूतनाप शाहरकी भपादर क्रीमसही हो। उसे देस-वेसकर शूरवीका प्रसार भौर माळीनं भूतपतेरिपोषणम् ॥१८॥ भी बह रहा ॥ १८॥ अथाह पौर्फ शौरिर्भो भो पौड़क पद भवान् । का मगवान् श्रीगने पौण्डकसे कहा-रे पौण्डक! ने दूतके आरा कहल्यया या कि मेरे पिड अन-शमादि इस्यास्पेन मामाह तान्यनाम्यस्सृजामि ते ॥१९॥ | छोड़ दो। सो वब में उन्हें तुमपर और हाई ॥१९॥ । - हमारा सो सर्पमाश हो गया' ॥ २६ ॥ काशिनरेएम सग । निदान हभपने कुलपुरोहित और बाचापक ५४२ भीमद्भागवत त्यापयिम्मेऽमिधानं मे यत्वयान मृपाधृवम् । प्ने झूठमूठ मेरा नाम रख लिया है। मूस वम में तुमसे उन नामेंको मी कुनाकर एंगः ।। ब्रजामि शरणं तेऽपयदि नेच्छामि संयुगम् ॥२०॥ तेरे शरणमें वानकी बात, सो यदि मैं सबसे कम कर सकूँगा तो देव शरण प्राण फहगा ॥२. इति विप्वा स्तिगिरिधीकस्य पौण्डूकम् । भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार पौमफका रिस्कर अपने तीसे वाणोंसे उसके रखको तोर-मोर सत्र। मिराऽनमद रपान वजगेन्द्रो यथा गिरे ॥२१॥ पक्रसे उसका सिर पैसे ही उतार लिया, जैसे इन अपने वनसे पहारकी चोटियोको टका दिया व ॥२१ तथा काशिपतेः कामाग्छिर उत्कृत्य पत्रिभिः। इसी प्रकार भगवान्ने अपने वाणेसे काशिनरोन सिर मी घरसे उपर उकार काशीपुरी में गिरा RIA न्पपातयत् फाधिपुर्या पपकोशमिवामिल ॥२२॥ वायु कम्म्का पुष्प गय देती है ॥ २२ ॥ इस प्रमा वफ्ने साप मा रम्नवाले पीएफको और उसके सा एवं मत्सरिण हत्या पौगएर्फ ससस्त्र हरिः। काशिनरेशको म्परफर भगवान् भीकम्म पनी तब द्वारकामें छोट वाये । उस समय सिदगम भापक द्वारकामाविशत् सिद्धैर्गीयमानकथामृतः ॥२॥ अमृतमपी कपाका गान कर दे ये ॥ २३ ॥ पीमित। पौडूक भगवान्के रुपका, चाहे वह किसी ममसे है, स नित्यं भगवधानप्रभ्यस्ताखिलपन्धनः । सदा घिन्तम करता राता पा। इससे उसके सारे पवन कट गये । पा मगवान्फा वनाष्टी देव पाल विम्रामम हरे रावन स्वरूप सन्मयोऽभवत् ॥२४॥ इससे बार-बार उसीका स्मरण हो कारण पप भगवान्के सारूप्यको ही प्राप्त एप ॥२१॥ शिरः पवितमालोक्य रामदार सण्ठसम् । इधर फाशीमें राममहमके दरबार एक कुक मप्रित मुष्प गिरा देसका मोग तय-सराफा सो किमिद फस्प षा पत्रमिति सशिश्मिरजनाः॥२५॥ करने को बोर सोचने लगे कि याम है या किसका सिर ॥२५॥ नम या मालम की राम काशिपतेर्मास्वा महिप्प पुत्रमान्धपाः । पर तो काशिनरेशका ही सिम निर्मा, राम- पाराम हा हवा रायन् नाप नाथेति प्रारुदन् ॥२६॥ अपर, राजपरिवारके लोग तमा मागरिक रो-रोर विलाप फरने मो 1-0 माप ! हा राजन् ! हाय ! सुदक्षिणस्तस्व सुतः रुत्वा संसानिषि पितुः । निहाय विहान्तारं यास्पाम्पपपिति पितुः ॥२७॥ स्कर र मन-ही-मन या निसय किया कि अपने पुत्र पा मुदक्षिण । उसने वपने पिता कि इत्पात्मनाभिसंधाप सापाप्पापा महपरम् । पितृघातीको मारकर ही में पिताके अणसे अमते मुदक्षिणार्पयामास परमेण समाधिना ॥२८॥ | साप भयम्त एकामतासे मगवान् शहरकी वारा प्रीवाऽविमुक्त भगम्तिस्मै वरमदाद् भव । फरन एप ॥ २०२८॥ काशी नगरीमें उसकी बार- धनासे प्रसन्न होकर भगवान् शहरने पर दनको कारा। पिवान्दवभापाप स पर परमीप्सिनम् ।।२९॥ | सदक्षिणने या वर्मी कम माँगा कि मुछ मेरे पितृपती- किये यता पा, प्र०५६] दशम स्वन्ध ५४३ - "षिमामि परिचर प्रापणे सममूत्विजम् । के धका उपाय पतमाये ॥ २९॥ भावान् शङ्करने कहा-सुम प्रामगोंके साप मिळकर यक्के देवता अभिधारविधानेन स चामिः प्रमथैर्वसः ॥३०॥ शुभिभूत दक्षिणामिकी अभिचारविधिसे वाराधना करो। इसप्ते वह अग्नि प्रमपगमोंक साप प्रकट होकर यदि प्राणों के धमकपर प्रयोग करोगे तो या तुम्हारा कम्प साभपिप्पति संकल्पमत्रमण्ये प्रयोजित । सिद करेगा ।' भगान् शारकी ऐसी माझा प्राप्त करके सदक्षिणने अनुष्यनके उपयुक नियम प्राण किये धोर इस्पादिष्टस्तथा चक्रे कृष्णायाभिचरन् प्रती ॥३१॥ घर मावान् श्रीकृष्णके लिये अमिधार ( मारणका पुरधरण ) करने ज्या ॥ ३० ३१ ॥ अमिधार पूर्ण पतोऽपित्थितः कृष्णान्मूर्तिमानविभीषण । होते ही याकुमसे अति मीपण पनि मूर्तिमान होकर प्रकट हुमा। उसके केश और दादी-मग तपे हुए तौबेके वस्वाप्रशिलाम्मचरङ्गरोद्गारिलोचन ॥३२॥ समान बाल-लाख पे । बोसोंसे भगारे वरस रहे थे ॥३२॥ उप दा बोर टेदी मुकुटियों के कारण उसके मुतसे सोप्रभाटीदनकठोरास्प स्वजिया। फरता टपक रही पी। एमफ्नी जीमसे मुंहफ दोनों कोने चाट या । शरीर मेग-धरंग था। हापर्म त्रिशूम प्रिये पुर पा, जिसे वह बार-घर धुमात्य जाता बालिइन् सकिणी नमोविघुन्वनिसिखंचलन् ।३३। पा और उप्तमेसे अफ्रिकी लपटें निफसीपी ॥११॥ तारके पेएक समान नदी-बड़ी टोग थी। पर अपन पद्रपा तालप्रमाणाम्यां कम्पयनवनीवलम् । से परतीको कपाता जमा और बालाओंसे दसौं दिशाओं को दग्ध करता दुखा दशरकाकी बोर दौस धौर सोऽम्पधावत् पृता मूद्वारको प्रदान दिश ॥३४॥ यात-की-बातमें द्वारकाके पास जा पहुँचा । उसके साथ गत से भूत भी पे ॥ ३४ ॥ उम ममिपारफी मागको उमाभिचारदानमायान्तं द्वारकांकमः। बिल्कुस पास वायी हुई देस धारकावामी से हो र गये जैसे जंगलमें बाग स्टानेर हरिन डर जाते विलोक्य तत्रम् सर्वे पनदाह मेगा यथा ॥३५॥ १॥ ३५ ॥ वे लोग भयभीत होकर मावान्के पास दोर हुए आये, भगवान् उस सम्प समामें चौसर खेल राये। उन लोगने मगमान्से प्रापना की- तीनों मधेः सभायां कीरन्त भगवन्त भयातुरा । सोकोंक एकमात्र सामी ! शारका नगरी इस मागसे । भस्म होना माहती है। आप हमारी रक्षा कीजिय । पाहि पाहि मिलाफर वह प्रदहत पुरम् ।।३६॥ आपफ सिवा इसकी रक्षा और कार नही पर सकल्प ॥ ३६॥ शरणागतबरसत मानने देग्य कि हम्परे सजन भयभान गय और पुण्यर पुरसरफर सुन्वा सजनवम्बरमा म्वानांचमान्चसम् । जिताभरे बरसे हमारी प्राप्ता पर ।।२, तर उम्होनसमा में तुम काका ग्या परण्य मम्प्रहस्याहमा मैप्ट परितासम्पदम्॥३७॥ बरंगा ॥३७॥ १ का । २ ते १३.३ ।। पपा ममः। दो मत, . | TRकामें मैट भाये । उस समय सिदगण मसान | सदा चिन्तन करता राता था। इससे उसके | किसका सिर tr॥२५॥ जय या मलमा रम्परा तो सर्वनाश हो गया' ।। २२ ॥ काशिनरेशक सगा। निदान ए अपने पुरपुरोहित और वापर ५४२ श्रीमद्भागवत [. त्याजयियेऽभिधानं मे यत्तया मृपाघृतम् । दने झूठमझ मेरा नाम रस ख्यिा है। क्ष्य में तुझसे उन नार्मोको भी मुलाकर । व्रजामि शरण तेऽप यदि नेच्छामि सयुगम् ।।२०।। | रे शरणमें खानेकी वात, सो यदि मैं तुमसे कर सङगा तो देरी शरण ग्रहण कींग ॥ २. इति क्षिप्त्वा शितैर्यामिविरभीकस्य पौण्डूकम् । मगवान् श्रीकृष्णन इस प्रकार पोरका अपने तीखे वाोंसे उसके रफ्फो तार-मोगमा शिराप्रपद् रथान पनमेन्द्रो यथा गिरेः ॥२१॥ फसे उसका सिर वैसे ही उतार किया, वैसे वफ्न कमसे पहारकी चोटियोंको नया दिया तथा काशिपते कायाच्छिर उस्कृत्य पत्रिभिः। इसी प्रकार मगवान्ने अपने बाणेसे पारिनता सिर मी घरसे उपर ठगाकर काशीपुरी, मिरा रिपी न्यपातयत् फासिपुर्या पपकोशमिवानिल ॥२२॥ वायु कालका पुष्प गिरा देती है ॥ २२ ॥ इस प्रकार अपने साथ गह रखनेवाले पौण्डफसो वौर उसके मा एवं मत्सरिण हत्या पौष्ट्रकं ससखं हरि । काशिनरेशको मारकर भगवान् श्रीकृष्ण पनी एक द्वारफामायित् सिदीयमानकथामृत ॥२३॥ अमृतमयी कपाका गान कर रहे थे ॥ २३ ॥ पीजिए। पौम्यक भगवान्के रुपका, चाहे या किसी भने है, स नित्य भगवदपानप्रचस्ताखिलपन्धनः । पन्धन कट गये । या मगन्फा बनाष्टी पकार विभ्राणध हर राजन् स्वरूपं समयोऽभवत् ॥२४॥ किये यता बा, इससे बार-बार उसीका स्मरण हो करण मा मगवान्फे सामप्यको ही प्रत हुआ। २१ ॥ श्वर काशीमें यजमहलके दरवाजपर एक पुर ममित मुग गिय देसकर मोग तय-सरहका ने किमिद फस्य या वपत्रमिति सशिश्मिरजना॥२५॥ करने लगे और सोचने लगे कि पर क्या है। राश काशिपतत्विा महिप्पः पुयपान्भवा । छ तो काशिनरेशर ही सिर , तब निर्य, हर पाराय हा हता राजन् नाप नाति प्राख्दन् ।॥२६॥ कुम्पर, राजपरिवारक मोग तण नागरिक येोठर किया फरन सगे-'हा माप | रामन् ! एपदास मुदधिणस्तस्य मुस कृत्वा ससाविधिं पितुः । निहस्प विस्तार यास्पाम्पपपिति पितु ॥२ का मन मप किया कि मान्ने पुन पासुशिम । उसने अपने पिताबा भारत इत्यात्मनाभिसधाप सापायाया महबरम् । पितृपातीको मारफर ही में रिताक अणसे उन मुदयिमाञ्चपामास परमण समाधिना ॥२८॥ साप आपत एकामतारे भाषा शासकी ना रिमन्त भगम्निस्म परमात भर । करन ॥ २०२८॥ पाशी नगी उसी धनासे प्रसन बोरन भगा गस्न पर दनये या। वदन्तरापार म पम परमीप्सितम् ॥२९॥ पदग्नि यह अभी पर मोगा कि मुप्स मर रिटी शिरः पवितमालाक्प राबहार सकुण्डलम् । 4 ०६७] दसम स्कन्ध अनन्तस्साप्रमेयस्य पदन्यत् रुवषान् प्रस ॥१॥ वाणीक विषय नहीं है। उनकी एक-एक कला प्रेक मर्यादासे विरक्षण है, गरिकी। उन्होंने और बो कुछ बहुत कम किये हों, उन्हें में फिर सुनना चाहता । भीभुक उपाप श्रीगुरुदेयसीने कहा-परीक्षित् । हिनिद नाममा एफ वानर था । वह मीमामुरका सहा, सुमीवका मन्त्री नरकस्य ससा फपि विषिदो नाम वानर । और मैन्दका शपिशाप्टी माइ पा ॥२॥ जव टसने सुना सुग्रीवसचिव सोऽध नासा मैन्दस्य वीर्यवान् ।।२॥ मित्रकी मित्रताके अणसे ठऋण होनेक ठिये राष्ट्र-विष्छा कि श्रीकृष्णने भौमासुरको मार राठा, तब यह अपने सम्पासोऽपचिसि कुर्मन् वानरो राष्ट्रविष्टवम् । परनेपर उतारू हो गया । वह पानर बड़-पढ़ नगरों, गोरों, वनों और अहीरोंफी बस्तियोंमें भाग लगाफर पुरग्रामाकरान् घापानदहद् पहिमत्सुजन् ॥ ३॥ उन्हें क्मने व्या ॥ ३ ॥ कभी यह मा-बड़ पहाडको उपफर उनसे प्रान्त के प्रान्त यतापूर पर प्ता कचित् सालानुस्पाठय वैर्देशान् समचूर्णयत् । और विशेष फरक ऐसा काम यह आनर्त (फाठियाया) दशमें ही करता था । क्योंकि उसफ मिश्रको मारनेवासे आनर्वान् सुतरामेव यत्रास्ते मित्रहा हरि ॥४॥ | भगवान् श्रीकण ठसा दशमें निवास करते ५॥॥ कचित् सप्तमभ्यम्यो दाहित्यिप्प बलम् । शिविद थानरमें दस हजार हापियोंका यछ पा । भी कभी बह दुष्ट समुद्रमें सड़ा हो जाता और हापोंसे देशान् नागायुप्तप्राणो वेलाफूलानमअपत् ॥ ५॥ इतना अउ टयता कि समुद्रतटक दश इय जाते 141 यह दुए घड़बड़ श्रषि-मुनियोंके आश्रमोकी सुन्दर-मुन्दर माप्रमानृपिसम्पानां कृत्वा भग्नवनस्पतीन् । ना-यनस्पतियोंको तार-मादकर पौफ्ट पर दता और उनक प्यसम्बन्धी अमि-कुण्डोंमें मनराकर अमिपाको अपपन्छा घरग्नीन् वैतानिकान् स्वला ॥६॥ इस्ति कर देता ॥ ६ ॥ जैसे स्त्री नामश पीड़ा दूसरे फीफो से जाफर धान वि + फर दता, वैसे पुरुषान् योपिठोमामा द्रोणीगुरासुस । ही मह मान्मठ मानर खिों धौर पुरुषोंका स जाकर पहाड़ोसी घाटियों नप गुफाओंमें गड रता । रि निक्षिप्य पाप्यधाम्छैठपठस्कारीम कीटकम्॥७॥ बाहरसे बड़ी पड़ी बहाने रसकर उना मुंह पं पर ना ॥ ७॥ इस प्रकार यह देशवासियों का निस्तार एव दमान् विप्रवन् दूपर्पय लत्रिय । परता ही युटीन नियोका नीस्ति पर दना पा । एक Pन यह दुए मुनि संगीत सुनकर पता भुत्ता गुउलित गीत गिरि रेवतर्फ पयाँ ॥ ८॥ "AR गम ॥ ८ ॥ समापम्पद् यदुपति राम पुप्फरमालिनम् । पहो टसन दाब कि पदुर्मगरियमगि चयामनी सुग्ण-सुन्दर गुरतियोंक गिम्मान है। उनरा पयाक अग स्पन्न पुगर नाप और मुदयनीयसबाट उठनाधम पगम् ॥ २॥ सकर पोंकी समय पर ही ॥०॥ ना भएम् ।। मनिमुनान्य। - ५४४ भीमबागपत [ । सर्वस्पान्तर्षदि साधी कृत्यां माहेश्वरी विसः। पवैक्षित ! मगवान् सबके शहर-भीतरी विधाय तद्विपातार्थ पार्धस्थापक्रमादिशत् ॥३८|| पाले है। वे मान गये कि यह काशीसे माइमरी ल्या है। उन्होंने उसके प्रतिर वत् सूर्पोटिप्रतिम सुदर्शनं अपने पास दो वियनमान पधनको जाज्वरममान प्रलयानलप्रभम् । दी ॥ ३८ ॥ भगवान् मुक्दका प्याय बार स्वतेजसा ख काभोऽथ रोदसी पर कोटि-कोटि सूर्यकि समान नसी और प्रड अमिके समाम जाम्मपमान | उसके से चक्र मन्दाखमधामिमार्दयत् ॥३९॥ दिशाएँ और वन्तरिक्ष चमक उठ चोर का उ कत्यानल प्रविहतः स रथापाले थमियार प्रतिको कुषल गम ॥ ३९ ॥ श्रीकृष्णके समुदशनचक्रकी शकिसे करपारूप रसोजसास नृप भममुस्लो निवृतः । मुँह ट्ट-झट गया, उसका सेन मा हो गए पाराणसी परिसमेत्य सुदक्षिम में कुण्ठित हो गयी और वह पााँसे मेटकर का गयी तथा ठसने अस्थिय बावापोंकि साप मन सचिम्जन समदात्म्यावाऽभिधारः।४। यसकर मम्म कर दिया । इस प्रकार उसार च विष्णोस्तनुप्रविष्ट उसके विमाशका कारण मुबा ॥ १०॥ रूप पीछे प्रदर्शनका मी काशी पहुंचा । म वाराणसी साहसभाल्पापणाम् । विशाल नगरी पी। बहनहीको कटारिप, मा सपोपुराशालककोष्ठसंकुला पानार, नगरदार, परोके शिमर, पहादी समाने, हापी, मोरे, रप और धर्मोके । सोशास्स्पपरयामशालाम् ॥४१॥ सजित की । भगवान् भीकणके सदशनका पग्चा पाराबसी सर्वो बिष्णोपळ सुदर्शनम् । काशीको बताकर मस्म कर दिया और परमानन्दम्पी लीग करनेमामे मान् श्रीम भूमः पार्थमुपातिष्ठन् कृष्णस्याक्लिष्टफर्ममः ॥४२॥ मेट कापा ॥ १२ ॥ म एक्झामनेन्मर्त्य उचमसाकतिक्रमम् । जो मनुष्य पुम्यकीर्ति भावान् श्रीकणके इस को एकामपके साप ममता या एनाता हैया समाहिता मा भूमपान सर्वपापैः प्राम्पते ॥४३॥ | पापोसे छूट जाता है ॥१३॥ इति श्रीमदागवते महापुराणे पारमईस्पा सहिताय दशमस्कर उत्तराः पौष्कादिवभो नाम बट्पतिमाऽध्याय ॥ १६ ॥ अथ सप्तपटितमोऽध्याय लिपिषभ उवार पमा परीसितमे पूर्ण मावान् बामनी सकिमान् एए सजिपकी सीमासे परे, बन्न 1 मोतुमिच्छामि रामसानुतकर्मणः । उनका सहप, गुण मेम बादि मन मुनि १ समसिम्मेठमा । २ विष्णुका पोपूत्रपिएसप पर । रागावाप २०६७] दशम स्कन्ध ५४५ । अनन्तस्साप्रमेयस्य यदन्यत् कृतवान् प्रसः ॥ १॥ | पाणीके विषय नहीं हैं। उनकी एक-एफ ठीय लोक- मर्यादासे विक्षण है, पौकिक है। उन्होंने और वो कुछ मत कम किये हों, उन्हें में फिर सुनना चाहता F -- -- - भीभुक उपाच भीशुकदेयजीने कहा-परीधित् । निषिद नाम्या एक पानर था । वह भीमाप्सुरका सस्त, सुमीयका मन्त्री 'नरकस्य सस्ता कपिद् द्विषिदो नाम पानर । और मैन्दका शक्तिशाली माई पा ॥२॥ अब उसने मुना कि श्रीकृष्णने भीमामुरको मार राठा, तब यह अपने सुग्रीवसचिव सोऽधमासा मैन्दस्स वीर्यवान् ॥ २॥ त्रिकी मित्रताके अणसे उम्रण होनेके क्रिये राष्ट्र-विप्लव सम्पासोऽपचितिं कुर्वन् पानरोराष्ट्रविष्ठपम् । फरनेपर उतार हो गया। वह पानर यो-वर नगरों, गायों, सनों और अहीरोंफी बस्तियोंमें आग लगाकर पुरयामाफरान् घोपानदहद् पधिमुत्सजन् ॥ ३॥ उन्हें जाने लगा |३ ॥ भी यह बड़ा महादोंका उस्मारकर उनसे प्रान्त-के-प्रान्त पक्ताचूर कर देता कचित् स लानुपाठ्य वैर्देशान् समचूर्णयत् । और विशेष करके ऐसा काम वह आनर्त (काटिपावाद) दशमें ही करता था। क्योंकि उसक मियको मारनेवाल मानान् सुतरामेव यत्रास्ते मित्रहा हरिः ॥ ४॥ भग्यान् श्रीकृष्ण उसा दशमें निवास करते थे ॥१॥ दिविद पानरमें दस हजार हापियोंका या । भी- कचित् समुद्रमापस्यो दोर्पास्थिप्य राखलम् । | कमी यह दुए समुद्र खदा हो जाता और हापोंसे दशन् नागायुतप्राणो वेलालानमजपत् ॥ ५॥ इतना ज3 उपयता कि समुद्रतटक देश म जाते ।५। यह दुए वा-बड़ अपि-मुनियोंके आश्रमोयी सुन्दर-सुन्दर खना-वनस्पतियोंको तार-मारकर पोस्ट कर देता और भाभमानृपिठस्पाना कस्या भग्नवनस्पतीन् । उनक पक्षसम्पन्धी अमि कुण्डोंमें मठ-मूत्र अय्यर अप्रियाको अपयन्छक रग्नीन् पैतानिकान् स्वला ॥६॥ पिन पर दता ॥ ६ ॥ जैसे घी नामया की दूसरे श्रीदोंको से जाफर अपने विमें यद फर दता से । पुरुपान् योपितो त माझ्द्रोणीगुहासुसः। ही मगमत्त मानर बिपों और पुरोक ल चार पादोंकी घाटियों ना गुफाओमें गा दता । फिर निक्षिप्य पाप्पधान्छेले पेनस्कारीव कीटकम्॥७॥ भाइरसे बड़ी-बड़ी पानें रहकर उना मुंह में फर पता ॥ ७ ॥ इस प्रयशर यह दरवामिपोरा तिरसार एव देशान् विप्रर्वन् दूपर्पय कुलस्त्रियः । पाता ही पुर्यन सिपाया भी दूषित पर ना पा । पर रिन सइ दुर मुरनित संगत मुनकर रफ्तक भुता मुललिस गीत गिरि रैवतक यया ॥८॥ तर मया ॥ ८ ॥ वपापम्पद् यदुपति राम पुप्फरमाठिनम् । यहाँ टमन दार फि पशिशिरोमगि वामनी सुन्दर मुम्दा मुरतिक मुंग्न विगान है। उनरा परक अल स्पन्न मुम्र और गिनीय और । गुरखनीयसपाल उठनायुधमम्पगम् ॥९॥ मगर ममी न टर ही॥1॥ ना पम् । मुनिमुना। - प.4१६९- - . रामा पक्षियने पूम-भगवन् मामी भीमनागवत I ससान्तहिःसाथी कस्पा माइभरी विद्यः । पक्षित ! भगवान् सबके बाहर-मीन विवाय सहिपाता पावस्थापक्रमादिश्चत् ॥३८॥ पाले हैं। वे नान गये कि परामसे माहेनरी फस्या है। उन्होंमे उसके प्रतिमा तात् पूर्वषोटिप्रतिम मुबीन अपने पास हो विपनमाम मुदमनसे बाज्वल्पमार्न प्रलयानलप्रभम् । दी ॥ ३८ ॥ भावान् मुकादका प्रार सतेजसा सं कहभोऽथ रोदसी का कोटि-कोटि सूर्योकि समान तेजसी और अग्निके समाम नामापमान । उसके पसे च; मन्दाखमधामिमादयत् ॥३९॥ दिशाएँ मौर मन्तरिक्ष कमक उठे और कब उसने रुत्यानल प्रविहतः स रथाजपाणे अमिधार-अमिको कुक्त गस्म ॥ १९ ॥ श्रीकृष्ण का मुदशनचाकी शक्षिसे सत्याप रसौजसाम नृप भप्रमुस्लो निसः । मुँह ठ-झट गया, उसका सेन महो रवा, पाराणसी परिसमेत्य मुदधिर्म कुण्ठित हो गयी और का हाँसे मेटफर पर्व नपी तपा उसने अस्पिन बापायोंकि साप सटिंग्जन समदात्म्पकतोऽभिधारः।४०। नगर मस्म कर दिया । इस प्रकार का चक्रं च विष्णोन्सदनुप्रविष्ट सीके विनाशका कारण मा. आपके पीछे पदर्शनपक मी काही पहुँचा । पसी वाराणसी साहसभालयापणाम् । विशाल मगरी थी । हमरो बरिय, सदर सगोपुरातालकोष्ठकला पाबार, मारधार, परोके शिबर, चादीकी समोशरस्त्यपरथामशालाम् समाने, पी, पोडे, सबौरवों मेए ॥४१॥ पसम्बित की। मावान् भीतनके दर्शन करने र दग्या बाराणसी स्वो विप्योधक मुदर्शनम् । काशीका महाकर मस्म कर दिया और नि भूमा पार्भमुपातिछन कणसाछिटफर्मम ॥४२॥ मेट वाया ॥ ११ १२ ॥ परमानन्दम्मी लीग करनेवाले भावान् श्रीके य एवम्यावयेन्मर्त्य उच्चमसोकविक्रमम् । जो ममुष्य पुस्पकीर्ति भावान् श्रीकणके रस को एकामवाके साप धमता या समासा4 समाहिती वा भूपात सर्वपापैः प्रपथ्यते ॥४३॥ । पापोसे छूट माता ॥११॥ इति श्रीमायवे महापुराणे पारमाईस्था संहितायो दशमचे उत्तर पीपमादिषयो नाम ष्टपहितमाऽपाय ॥ १६ ॥ अथ सक्षपष्टितमोऽध्याय विविवका म्बार रापासष धतिमान् एवं सदियकी सीमासे परे, बान्त ममा भातुमिच्छामि रामसागुतर्मणः । ! उनका सरूप, गुम, मेगा मादि मन, बुद्धि । . मुस्वियमेटम । २ विष्णुपा । ३ मे पोपप्रपिरायपः पर ।

पसका पन मुम्रप्रनयर उतनाथमध्यगम् ।।९॥ भसार पत" मया ॥०॥ ०६७] दशम स्कन्ध ५४५ बनन्तस्याप्रमेयस्य यदन्पत् कषान् प्रसः ॥ १॥ | याणीके विषय नहीं है । उनकी एक-एक लीय क- मदासे विरक्षण है, अधिक है। उम्होंने और जो कुछ बहुत कम पिये हों, उन्हें में सिर पुनना चाहता हूँ ॥ १॥ भीमुक उपाय श्रीगुरुदेवजीने कहा-परीभित् । दिमिद नामका एफ वानर पा । या भोमासुरका सख, मुपीचका मन्त्री रकस सला कमिद दिनिदो नाम पानर । और मैन्दा शक्तिशाली माइ पा ॥ २ ॥ जब उसने सुना कि श्रीकृष्णने मौम्ममुरको मार राय, तव सह अपने सुग्रीवसतिष सोऽयभ्राता मैन्दस्य धीर्यवान् ॥ २॥ | मिकी मित्रताके अणसे उमण होनेक ठिये राष्ट्र-पिष्टय सरयासोऽपचिति फुर्वन् वानरो राष्ट्रविष्टषम् । फरनेपर उतारू हो गया । वह पानर बड़े-या नगरों, गाँषों, स्थानों और अहीरोंकी वस्तिर्पोम बाग थ्यापर पुरपामाफरान् पोपानदरम् यहिमत्सृजन् ॥ ३॥ उन्हें जमने ख्या ॥ ३ ॥ कभी वह बड़-पड़ पहाड़ों उसपर उनसे प्राप्त- प्रान्त पफ्नाचूर कर देता कचित् सनलानुत्पाव्यतैर्देशान् समचूर्णयत् । और विशेष करके एसा काम या आनत (काटियामाक) दशमें ही करता या । स्पोंकि टसक मित्रको मरनेपाल बानर्वान् सुतरामेव यत्रास्ते मित्रहा हरिः ॥ ४ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण उसी दशमें निवास करते ५ ॥2॥ कचित् समुद्रमध्यस्यो दााषिप्प वञ्जलम् । दिपिद वानरमें दस हार हापियोंका वडा । भी कभी यह दुए समुद्र, सहा हा ग्रता और दापोंसे दशान नागायुप्तप्राणो घेठाल्लानमञ्जयत् ॥ ५॥ इसना नउ टपता कि समुदतटक देश व चाते ।। मह दुए बाबा अषि-मुनियोंक आश्रमाफी सुन्दर मुन्नर प्रत्ययनरातियोंका तार-मरावकर पोस्ट कर दता और प्राधमानपिम्स्यानां कस्वा भग्नयनस्पतीन् । उनके पषसम्बन्धी अपि-पुण्डा मात्र रारत अमियोंकर सम्म नील नमिल्सल..६५ क्ति कर देता ।। ६. ॥ जैसे मी नामा काग, पीबोका ते जाकर अपने पिटमें घेर मन तान, पेस पुरुषान् गोपितोस मामृद्रोणीगुहामु स । ही यह महामत्त पानर सियों और पुगेका 7 अमर पदाशेमी पार्टियों ना गुमनाम रार दता । रि निक्षिप्य पाप्पधाप्ठेले परास्तरीय कीटकम्॥७॥ बाइरसे वायदा पाने कर उन मह व पर दना ॥ ७ ॥ इस प्रकार पर दावासियों का निसार एर दशान् विप्रकुर्वन् दप्यम मुलनिय । पाना ही पुर्यन पिंगा में मिल पा "टापा । पर रिन यह दुर मुति मन मुनरा रस्ता शुना मुठित गीत गिरि मतकं ययौ ।। ८ र ॥ ८ ॥ पापम्पद् यदुपति रामं पुष्करमातिनम् । यहाँ उसन दर मि पनि यमालकी मुम्ग-मुन्दर दुनियर रन गिन्न । सरा मुदसनीपसरात । ... मी ५४६ भीमझामपत मापन्तं पारणी पीत्वा मदविललोचनम् । वे मथुपान करके मधुर संगीत गा रहे थे और उनको बानन्दोमादसे मिल हो रहे थे। उनका शरीर विमाप्रमान वपुषा प्रेमिममिव वारणम् ॥१०॥ प्रकार प्रेमायमान हो रहा था, मन्नो कोई मदम दुष्टः शाखामगः भाखामास्टः कम्पपन् हुमान् । गबराच हो ॥ १० ॥ यह दुए वानर बोकी स्कोप चढ़ जाता और उन्हें कमार देता । ममी लियो धम किलकिलाशम्दमारमान सम्प्रदर्शयन् ॥११॥ सामने माफर किमारी भी मरने मता ॥ ११ ॥ युक्ती मियाँ स्वमाषसे ही फास और हास-परिहारसी सस पाष्टर्थ फपीक्ष्य तरुम्पा जातिचापलाः। | रखनेवाली होती है । क्लरामजीकी सियों उस पर | डिलाई देखकर हंसने लगा ॥ १२ ॥ का पा कर हास्सप्रिया विनासर्पलदेवपरिग्रहाः ॥१२॥ मग मनामनीके सामने ही उन स्त्रियोंकी कार करने लगा। वह उन्हें कभी अपनी गुदा दिखता ते ता हेलपामास कपिर्भ क्षपै सम्मस्वादिभिः । कमी भौहे म्टकाता, फिर भी कमी गरम-रजत्रा दशयन् स्वगुद तासां रामस्स च निरीक्षसः ॥१३॥ मुंह मनाता, घुसकता ॥ १३ ॥ वीरशिरोमणि कमाली उसकी यह चेष्ट्य देखकर कोषित हो गये । उसोने त ग्राम्णा पाइर दो पल प्रारवां वरः । उसपर फ्ल्परका एक टुकमा फेंका । परन्तु हिलिग्ने उससे | अपनेको बचा लिया और सफफर मधुका सय लिया स वापिस्वा प्रामाण मदिराफलक्षं कपि ॥१४॥ | तया कामजीकी अवहेलना करने लगा । उस पूर्वने गृहीस्वा हेलयामास धूर्तस्त कोपयन् हसन् । मधुकशको तो फोन ही राल, सियोंके पर मी का गले दौर थव वह दुष्ट हसमसफर मामजीको मोक्ति निर्भिय कलशं दुष्टो पासास्सास्फालयद् बलम्॥१५॥ करने लगा ॥ १९१५ ॥ परीक्षित् ! म इस प्रकार फदर्थीकस्प पलषान् विप्रय मदोदतः । क्यान् धौर मदोन्मच दिदि लाममीसे नीचा दिखने तथा उनका घोर तिरस्कार करने म्या, तब ठनोंने म्सी सं तस्माविनय एन देशांम तदुपट्ठतान् ॥१६॥ बिइ देखकर धौर उसके द्वारा सताये हुए देशेको सदो मुसलमादच हल चारिबिसिया। दुर्दशापर विचार फरक उस शत्रुको मार गलने की इनसे मोधर्वक अपना हम-मसा व्यया । शिविर में गम विषिदोऽपि महावीर्य शाठमुयम्प पाणिना॥१७॥ कलवान् था। उसने अपने एक ही हापसे शम्मा पे उसर लिया और बड़े मासे दौमकर रामजीके सिर मम्पेत्य तरसा तेन पलं मूर्धन्पधारपद । पर उसे दे मारा । भावान् कटराम पर्वतकी तरह परिका सह हे। उन्होंने अपने हाबसे उस पक्षको सिमपर सेतु मकर्षमो मूभि पतन्तमधलो यथा ॥१८॥ | गिरते-गिरते पका लिया और अपने सुनन्द नामक मुसम्से उसपर प्रहार किया। माउ लगनेसे शिक्षिका मतक प्रतिजग्राह पलमान सुनन्देनाहनम सम् । फट गया और उससे खूनकी धारा बहने लगी । उस मुसलाइतमस्तिष्फो पिरन रक्तधारया ॥१०॥ समय उसकी एसी शोमा हुइ, मना किसी पर्वतसे गेहरा सोता बह रहा हो। परन्तु रिदिने वपने सिर फटनेकी गिरिपपा गरिरूपा प्रहारं नानुचिन्तयन् । कोई परवा नहीं की। उसने कुपित होकर एक सरा । १ प्रमचनिर।२ पापा ।

- ६७] बम स्कन्ध ५४७ पुनरन्य समविष्य कृत्वा निप्पत्रमोजसा ॥२०॥ वृक्ष उसड़ा, उसे मार-कार विना पचेका कर दिया और फिर उससे कामनीपर पड़ जोरका प्रहार किस्म । सेनाहन सुसंलदस्त घलः अवधाच्छिनन् । वामनीने उस पक्षके सैकडों टुकड़े कर दिये । इसके पाद विमिदने यड़े कोषसे दूसरा पक्ष पाया, परन्तु ततोऽन्येन रूपामध्ने त चापि प्रवधान्छिनत् ॥२१॥ भगवान् समामीने उसे मी शतधा छिम-मिल कर दिया ॥ १६-२१ । इस प्रकार यह टनसे युट फरता एवं युम्पन् भगषता भग्ने मग्ने पुनः पुनः। हा । एफ वृक्षके टूट जानेपर दूसरा वृक्ष तस्वस्ता और उससे प्रहार करनेकी चेष्य करता । इस तरह सय माऊप्प सर्पतो प्रधान् निपक्षमफरोन पनम् ॥२२॥ बोरसे वृक्ष उदार-उससफर करते समते उसने सारे पनको ही पक्षहीन कर दिया ॥ २२ ॥ म न रहे वसोऽमुत्रच्छिलाष पलस्सोपर्यमर्पितः। स्व विविदका क्रोध धौर भी पड़ गया तपा यह मत वत् सर्व पूर्णपामास लीलया मुसलायुधः ॥२३॥ | विकर करामबीके ऊपर क्ही-सी पानोंकी वर्षा करने लगा। परन्तु भगवान् कळरामजीने अपने मुसटसे स माह सालसकामो मुष्टीफस्प पीचरः । म्न सभी पानोंको सेल सेटमें ही चकनाचूर कर दिय ॥ २३ ॥ षन्तमें कपिराच विविद अपनी तारके मासाप रोहिनीपुत्र साम्पा वयस्पस्स्मत् ॥२४॥ समान लमी बाहोंसे घुसा गाँधकर कळरामबीकी बोर अपय भौर पास जाकर उसने उनकी छातीपर प्रहार माइवेन्द्रोऽपि दोम्या त्यक्त्वा मुसलला ले। किया ॥ २९ ॥ धन यदुवंशशिरोमणि वष्ठाम्नीने एक और मुझल अलग रख दिये सा कुछ होफर दोनों मनापम्पद महादः सोऽपसद उपिर घमन् ॥२५॥ हासे उसके जस्पान ( हैसी ) पर प्रहार किया । इससे पा पामर तून उगता मा परतीपर गिर पफम्पे तेन पवता सटर सपनस्पतिः । पड़ा ॥ २५॥ परीक्षित | बोधी मानेपर जैसे जमें रोगी उगमगाने माती है, वैसे ही उसके गिरनेसे पर- पर्वतः इरुचाईल पायुना नौरिखाम्भसि ॥२६॥ या रक्षों और चोटियों के साप सारा पर्वत रिछ | गपा ॥ २९ ॥ भाकाशमें देस्ताव्येग स्प-क्या, सिब खपपन्दो नमाम्दः साधु साचिसि धाम्मर । | भेग निम्मे नम । धौर का बड़े गरि मुनि साघु-साधुके | नारे लगाने और पनामनीपर झेकी पर्षा करने सुरसिनसनीन्द्राणामासीत् इसमर्पिणाम् ॥२७॥ भो ॥ २७ ॥ परीक्षित् ! रिषिदने जगत्में पमा उपद्रम मषा रख पा, पत मगवान् कटरामनीने उसे इस एवं निहत्प दिपिदं जगदम्पविकरावाम् । प्रकार मर सय बोर फिर वे शारफापुरीमें छौट आये। उस समय सभी पुरजम-परिजन भगवान् बलरामकी संस्तूममानो भगपाउनेः सपुरमाविश्चत् ॥२८॥ प्रशंसा कर रहे थे ॥ २८ ॥ इति श्रीमागमते महापुरामे परम्हस्या सदिचापा दशमस्कन्धे तस्य रिक्दियो नाम सम्पतिमोऽध्यायः ।। ६७ ॥ १मगार म्मे रिमिरापास्त्र ५४६ भीमद्भागवत [१०० गायन्तं वारुपी पीस्वा मवविहललोचनम् । वे मधुपान करके मधुर संगीत गा रहे थे और उनके ने धानमदोन्मादसे विहल हो रहे थे। उनका शरीर एस विम्राजमान षपुपा प्रमिममिव धारणम् ॥१०॥ प्रकार शोमायमान हो रहा था, मानो कोई मदम्त दुष्टा शाखामगाशाखामास्टः कम्पयन् मुमान् । गनराब हो ॥ १० ॥ इदुए वानर पोंकी तोपर चन नाता और उन्हें मकर देता । कमी मिकी चक्रे किलकिलाशम्दमात्मान सम्प्रदर्भमन् ॥११॥ सामने थाकर किटकारी मी मारने ध्याता ॥ ११॥ युक्ती सियाँ स्वमाषसे ही चमर और हास-पशिामें संधि वस्य धाट कपेक्ष्यि सरुग्यो जातिचापलाः। | रस्नेवाली होती हैं । मलरामजीकी सियों उस पानी मिठाई देखकर हँसने लग ॥ १२ ॥ बब पर कार हास्पप्रिया विबहसुलदेवपरिग्रहाः ॥१२॥ भगवान् मलामनीके सामने ही उन स्त्रियोंकी बोल्न करने छ । या ठने कभी अपनी गुग दिखता ते वा हेलपामास फपिर्म अपै सम्मुखादिभि । कमी महिं मटकाता, फिर कमी कमी गरज-सरकार दशयन् खगुदं तास रामस्स प निरीक्षत ॥१३॥ मुँह नाता, पुरषता ॥ १३ ॥ वीरशिरोमणि कामजी | उसकी यह वेश्या देसकर झोक्ति हो गये । उनाने त प्राव्या प्राहर दो पल प्रारसां पर । | उसपर पपरका एक टुकम फेंका । परन्तु विधिने उससे अपनेको यचा लिया और सफ्टकर मधुफाश ठा लिन स वामित्वा प्रावाण मदिराफलक्षं रूपि ॥१४॥ तय मामबोकी अपहेलना करने लगा । उस मूमने गृहीस्वा हेलमामास धूर्तस्तं फोपपन् हसन् । | मषुकशको तो फोर ही राय, सियोंके वस भी पर निर्भिपकलन दुष्टो वासस्पिास्फालय पलम्॥१५॥ फरने लगा ॥ १४ १५ ॥ परीक्षित ! जब इस प्रश्वर गले धौर का वह दुए इससकर बरामजीको कथित कदहित्य पलवान् विप्रपळे मदोदतः । कलयात् धौर मदोन्मत्त विविद क्लामनीको नीचा दिखने तप ठनफा घोर तिरस्कार करने गा, तब उन्होंने उसकी तं तस्याविनर्म रष्ट्या दाम तदुपट्टवान् ॥१६॥ छठाई देखकर और उसके द्वारा सताये हुए देशोभी दो मुसलमादच हल चारिबिपोसया । दुर्दशपर विचार करके उस शत्रुको मार सने की असे कोषपूर्वक अपना हछ मसज उपा। विवि में बसा शिषिदोऽपि महावीर्य शालमपम्प पाणिना॥१७॥ | वान् प । उसने अपने एक ही हायसे शका पेर उसार लिया वीर यो क्षेासे दौड़कर बलरामबीके सिर मम्मेत्य तरसा तेन पल मूर्धन्पताग्मत् । पर उसे दे मारा । मगवान् बाम पर्वतकी तरह वरियत महे। उन्होंने अपने हापसे इस पक्षको सिरफर तंतु संकर्षणो मूभि पसन्तमचलो यथा ॥१८॥ गिरते-गिरते का लिया और अपने मुनन्द नामक महासे उसपर प्रहार किस्म । मान लानेसे विविका महाक प्रतिमाह मलमान् सुनन्देनाइनन तम् । फट गप्पा और उससे सूमकी धारा वाने व्गी । उस सससारतमस्तिष्फो पिरजे रक्तधारया ॥१०॥ समप उसकी ऐसी शोमई, मानो किसी पर्वतसे गेहका गिरिपपा गरिरूया प्रहारं नानुचिन्तयन् । सोता म्ह रहा हो । परन्तु रिलिइने वपने सिर फटनेकी कोई परचमही की । उसने कुपित होकर एक दूसरा १ प्रमामिल।२ परषा।

भ० ६८] दशम स्कन्ध ५४९ पतुर्भिपतरो बाहानेकैफेन च सारथीन् । प्रहार किया ॥ ९ ॥ उनमेंसे चार चार घाण उनके चार-चार घोऊपर, एफ एफ उनके सारपियोफ्र और एक- रपिनम मोनासविस्म ससेऽम्पपूजयन् ॥१०॥ एक उन महान् धनुषधारी रयी वीरोंपर होगा । साम्बक इस अछुत हवअधक्को देखकर विपक्षी वीर भी मुफ- वंतु ते पिरथं पछपवारमतुरो हगान् । काठसे उनकी प्रशसा करने ओ॥ १० ॥ इसक बाद उन छहों धीरोंने एक साथ मिलकर साम्को रपहीन कर एफस्तु सारपिंजप्ने चिम्छेदान्यामरासनम् ॥११॥ दिया । घार वीरोंने एक-एक बाणसे उनके घार घोगोंको मारा, एकने सारथीको और एफने साम्बका धनुष काट से पवना निरथीकत्य कुच्रेण फरसो युधि । राय ॥ ११ । इस प्रकार कोरयोंने युबमें यही कटिनाई और ममसे साम्यको रपपीन करके बोध लिया । इसके इमार खस्स फन्या पखपुरं बपिनोऽविशन् ॥१२॥ याद वे उन्हें क्या अपनी पत्या लक्ष्मणाको लेकर जय मनाते हुए हस्तिनापुर लोट पाये ॥१२॥ तकृत्वा नारदोकन राजन् संबातमन्पमः। परीधित् ! नारदबीसे यह समाचार सुनफर यदु पशियोंको बया क्रोध आया । वे महाराज उमसेनकी परुन् प्रत्युपर्म भरुग्रसेनप्रचोदिसाः ॥१३॥ बापासे फौरोपर चढ़ाई करनेकी तैयारी करने लगे ॥१॥ कटरामनी क्याप्रधान कलियुगके सारे सप ताफ्को मिटाने- सान्स्पयित्वा तवान् रामासंनद्वान् पृप्णिपुङ्गमान् । | पाते हैं। उन्होंने कुसंशियों और यदुपशियोंके माइग:- को ठीक न समझा । यपपि यदुपी अपनी तैयारी भी कर नैच्छत् छरुणांवृष्णीनां फलिंकसिमलापहः ॥१४॥ युके थे, फिर भी उन्होंने ठने शपत कर दिया और स्वर्य सूर्यके समान तेजस्सी रपपर समार होकर हस्तिनापुर बगाम हास्तिनपुर रयेनादित्यवर्चसा। गये। उनके साथ कुछ प्रामण धौर यदुर्मशके मो-नदे भी गये । उनके बीच मामीकी ऐसी शोमा हो मायः लाम समन्द्र इस प्रो ॥१५॥ रही पी, मानो बन्धन होंसे घिरे हुए हमें ॥११ १५॥ हस्तिनापुर पाँचकर परामनी मगरके बाहर एक उप- गस्या गवाह रामो पायोपपनमासितः। पनमें घर गये भौर फोरमलेग स्पा करना चाहते हैं, इस बातका पता ष्णानेके किये उन्होंने उदमनीको प्रस्त वर्ष प्रपयामास प्रवराष्ट्र पुसत्सया ॥१६॥ राष्ट्रके पास मेना ॥ १६ ॥ सोऽभिपन्याम्पिकापुत्र भीष्म द्रोण पाहिकम् । उबदीने कौरवोंकी समम गाफर धृतराष्ट्र, मीप्म- पितामह, द्रोणाचार्य, महीक और दुर्योपनकी विधिर्वक दुर्योपनं च पिपिपद् राममागवमनमीत् ॥१७॥ अभ्यर्पना-मदना की पौर निवेदन किया कि मामजी पधारे हैं।॥ १७ ॥ अपने परम हितैषी और विपतम तेऽतिप्रीसाखमाकर्ण्य प्राप्त रामं सचमम् । यमरामनीका मागान सुनकर कौरवोंकी प्रस्मताकी सीमा न रही। उसजीया विविश्लक स्कार करके समर्पयिस्वाभिययुः सर्वे मालपाणय ॥१८॥ अपने हार्योम मालिक समग्री रोकर कमामनीयी १ पटेभु ।

ही पातकसे ही हमारे दिये हुए राजमिसे पाहिये । जैसे साँपको दूध पियना पिमनेवालेने से ५५० भीमद्भागवत [.६८ संगम्म मथान्माचं गाममे च न्यवेदयन् । धावानी करने च ॥ १८॥ रि पनी-वनी वस्था और सम्बन्धके अनुसार स्व स्येग कामसे शेपा ये तस्प्रभाषा प्रणेमः शिरसा बलम् ॥१९॥ मिले तथा उनके सत्कारके लिये उन्हें गौ वर्षम की एवं पप्प प्रदान किया | उनमें जो लोग भगवान् का रामभीमा प्रभाव मानते थे, उनोंने सिर मुस्कर में पपून शालिनः भुत्या पृष्ट्वा विषमनामयम् । प्रणाम किया ॥ १९॥ तदनन्तर उन प्रेगोनि परसर एफ-यूसरेका कुशल-माल ठा और या सुनकर परस्परमथो रामो पमापेऽपिक्लव पधः॥२०॥ स्व माई-भु सकुशल है, घरामीने घड़ी पीरता बर गम्भीरताके साप यह मात कही॥ २०॥ सभा उग्रसेनःषितीशेठो यक्ष आझापयत् प्रसः । राजाधिरान महाराज उग्रसेनने तुममेगोंको एक बार दी है। उसे तुमपंग एकामता और समधानीकेसर मुनो और अविलम्ब उसका पालन करो ॥ २१ ॥ उप- तदम्पप्रभियः भुस्वाधान माविलम्बितम् ॥२१॥ स्नबीने का है-हम जानते हैं कि तुमने पर्योने मिळकर वधर्मसे अकेले धर्मामा साम्बको हरा यव उप पावस्त्येक जित्वाधर्मेण धार्मिकम् । दिया पौर बंदी कर लिया है। यह स्म हम इसरिने सह लेते हैं कि हम सम्बन्धियोंमें परस्पर घट न पके अवनीताथ तन्मृप्पे पन्धूनामैक्सफाम्पया ॥२२॥ साम्को उसकी नम्वके सप हमारे पास भब दो)॥२२॥ एकता नी रहे। (मत अब पगडा मत मागे, वीर्यशौर्यपलोभमात्मशक्तिसम परीक्षित् ! क्यामबीफी माणी मीरता, शूरता और हरयो मलदेवस निझम्पोचा प्रशोपिताः ॥२३॥ | अनुरूप पी। यह बात सुनकर कुरुवंशी कोपसेर का पौरपके उत्कर्षसे परिपूर्ण और उनकी शकि मिय उठे । २ करने मो ॥ २३॥ श्रो, ते अहो महभित्रमिद फालगस्पा दुरस्परा । मड़े अपर्यकी बात है ! सचमुच काकी काको भारुरुषस्यपानद् बै शिरो मुझटसेवितम् ॥२४॥ कोई टाछ महीं स्फ्ता । तमी तो पार पैरोंकी की उस सिरपर पाना चाहती है, वो श्रेष्ठ मुटसे मुले एते यौनेन सम्पदाः सहसम्पासनाशनाः । मित है ॥ २१ ॥ इन यदुवंशियोंफे सप मिती प्रभार हमनेोंने मिपारसम्बन्ध कर लिया । ये हमरेस पुप्पयस्तुस्पा नीवा मस्मरचनृपासनाः ॥२५॥ सोने-बैठने वीर एक पंकिर्म सने हो। हममेनि हमें रामसिंहासन देकर राणा बनाया और अपने मा- पामरम्पजने मावपत्र च पाणरम् । र ना म्यिा ॥ २५ ॥ ये यदुवंशी र, पंख, सेताम्य, मुकुट, राजसिंहासन और राजोषित प्रया फिरीटमासनं सप्पा भुनन्स्पमदुपेधया ॥२६॥ स विषयमें उपेक्षा कर रही है ॥ २५ ॥ उपपोग-उपभोग इसलिये कर रहे है कि हमने आना मई या नरदेपलान्छनै- स, बव हो जुका । यदुर्मशियोंके पास बन गयपि यनेकी बावश्यक्ता नहाँ, उनें उनसे जान से दाता प्रदीपः फणिनामिपामृतम् ।

२०६८] दशम ससन्ध ५५१ येऽसत्प्रसादोपचिवा हि यादमा लेकर ये यदुवंशी हमसे ही विपरीत हो रहे हैं। देखो तो मला हमारे ही क्या-प्रसादसे तो इन्फी पाती हुई आनापयत्यय गवत्रपा पत ॥२७॥ धौर पर ये निर्लन होकर हमीपर कुम चलने चले है। शोक है ! शोक है !॥ २७ ॥ जैसे सिंहका प्रास | कमी मेहा नहीं मन सकता, वैसे ही यदि मीम, द्रोण, कवमिन्द्रोऽपि कुरुमिभीष्मद्रोणार्जुनादिभिः । वर्घन भादि करववीर बान-बूझकर न ओर दें, न दे बचमनरुन्धीत दें तो स्वयं देवराज इन्द्र भी किसी स्तुका उपभोग सिंहग्रस्तमिवोरणः ॥२८॥ कैसे कर सकते हैं। ॥ २८॥ भी क काप भीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित् । फुसंधी सपनी कुलीनता, मान्धयों-परिमारषाने (भीष्मादि ) के कमवन्धुभियोममदास्ते भरतर्षभ। क्छ वौर पनसम्पतिके धर्मर चूर हो रहे थे। उन्होंने साधारण शिश्चचारकी भी परवा नहीं की धौर वे भगवान् मामान्म रामं दुर्वान्पमसमाः पुरमाविशन् ॥२९॥ बलरामजीको इस प्रकार दुर्घघन कहकर हस्तिनापुर और गये ॥ २९ ॥ कामरामनीने फरमोंकी दुष्टता-अशिष्टता रष्ट्राफरणांदोशील्प भुत्वाखान्यानि चान्यतः । देखी धौर उनके दुर्वचन भी मने । अव उनका चारा कोषसे सम्तमा उठा । उस समय उनकी ओर देखतक अवोधन कोपसम्भोदुम्प्रेक्ष्य प्रासन सहः ॥३०॥ नहीं जाता था। वे सर-बार जोर-बारसे हंसफर करने को-॥३०॥ सच है, मिन दुको वानी कुलीनता, नन नानामदोमदाः शान्ति नेच्छन्त्यसाक्ष्य । सपौरप और धनका धर्मर हो जाता है, ये शान्ति मही चाहते । उनको दमन करनेस, रास्तेपर स्पनेका उपप तेषां हि प्रक्षमा दमाः पशूनां लगुरो यथा ॥३१॥ समभाना-बुझाना नहीं, बल्कि दण्ड देना है-ठीक पैसे ही, जैसे पसुमोको ठीक करनेक लिये उरेका प्रयोग महोपरन् सुसंरग्धान् कृष्ण पकुपितं शनैः । धावश्यक होता है॥ ३१ ॥ मत्य, देखो तो सही- सारे यदुपेशी धौर श्रीकृष्ण भी प्राधसे मरकर व्याईके सान्स्वपित्यारमेतेपी सममिच्छभिहागतः ॥२२॥ लिये तैयार हो रहे थे। मैं उन्हें शनै -शनै समभा- घुमाकर इन लोगोंको शन्त फरने लिये, मुष्ट करने के प्रिये यहाँ बापा ॥ ३२ ॥ फिर भी ये मूर्ख ऐसी स इमे मन्दमतपः कलाभिरताः स्खलाः । दुपता कर रहे हैं । शान्ति प्यारी नही, काप प्यारी है। ये इतने घमंडी रो रह है कि मार-पार मेरा मामपाय मगदुर्भापान् मानिनाऽवन् ॥३३॥ तिरस्कार फरक गलियाँ कक गये हैं ॥ ३३ ॥ येफ है, भाई टीक है। पृषीके रायोंकी तो यात ही नोग्रसेन किठ विमु जम्पन्धकेयरः । स्या, क्रिस्मेकीके स्वामी इन्द्र वादि पाठ जिनकी प्रया पठन करते हैं, वे उपसेन राजाधिराज नही सकादयो लाफपाला पस्सादेशानुपसिना ॥३४॥ है, ये तो केवळ मान, वृष्णि योर बन्धसंगी पादयोंकि ही सामी हैं। ॥ ३१ ॥ स्पों । बा मुर्मासभाको सुधमाऽऽकम्पत येन पारिजाताऽमराधिपः। अधिकारमें फरक टसमें विरानते हैं और जो दाताओं १पररापविराम। :

५५४ भीमनागवत [२०६९ ततः प्रविष्टः स्वपुर इलायुधा का रामबी द्वारकापुरीमें पहुंचे और अपने प्रमी त समेत्य कधूननुरक्तपेतसः। सम्पचार माननेके लिये उपक पन्धु-बयोंसे मिले उनोंने यदुवशियोंकी मरी समामें वफ्ना पस यसंस सर्व यदुपुङ्गवानो चरित्र कह मनाया, नो हस्तिनापुरमें उनोने की। मध्ये सभागां कुरुपु स्वषेष्टितम् ॥५३॥ साप किपा पा ॥ ५३ ॥ परीक्षित् ! यह हस्तिनमा वपापि च पुर मेतत् सघय रामविक्रमम् । वान भी दक्षिणकी वोर ऊँचा और माबीकी । कुछ मुका हुआ है और इस प्रकार या मगमन् वा ससमत दक्षिमता महापामनुरश्यते ॥५४॥ जीके पराक्रमकी सूचना दे रहा है ।। ५१ ।। इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या संहितायो दशमस्फोघे उतरावे हास्तिनपुरकर्मणरूपसणषिचयो नामापतिमोऽप्याय ॥ १८ ॥ अथैकोनसप्ततितमोऽध्याय देवर्षि नारपजीका भगानकी गावर्या बन्न भीभुक उपाय मीशुकदेवमी करते है-परीक्षित् 1 चम दे मारदने मना कि भगवान् श्रीकृष्णने नरकसमर (भौम्य नरक निहत श्रुत्वा सोदाई प योपिताम् । को मरकर अकेले ही इजरों राजकुमारियति । विवाह कर य्यिा है, तब उनके मनमें भगवान्भी रा रुणेनेफेन पाहीना तद दिनुः म नारद ॥१॥| सहन देखनेकी वषी अभिप्रपा हुई ॥ १ ॥ में से ला-हो, यह कितने आश्चर्य की बात है कि मा चिन पवैतदेकेन वपुपा युगपत् पृथक् । भीकृष्णने एक ही शरीरसे एक ही समय सोया महमें बलग-अलग सोव्ह हजार राजकुमारिय गृहेषु वधष्टसारस सिय एक उदायात् ॥ २॥ पाणिण किया ॥ २ ॥ देवर्षि नारद इस म्पका इस्पस्सुका दारवती देवपिप्टुमागमत् । प्ररित होकर भगवान्की सीख्य देखने के जिये द्वारका पहुँचे । वहाँक उपवन और उपान किन ए रंग: पुप्पिवापयनारामद्विजालिङलनादिताम् ॥३॥ पुपोंसे लदे मासे परिपूर्ण भे, उनपर वरा-सा पक्षी चहक रहे थे और मौरे गुनार कर रहे थे ।' उत्पुलेन्दीषराम्भाजकाहारकमदास्पती । निमा बटस भरे सराबरों में नीले, खन और 2 रंगक भाति-मानिक मार सिले हुए थे । मुमु (क छरितेगु सरस्पै जित इसमासः ॥ ४ ॥ और नवजात समगकी माना भीक ही सी उप ईम और सारस पररव भर रहे थे। प्रासादर नवभिनुग सारिकराजते । द्वारकापुरीमें समिमगि और चौक मी "मरा । पाव पा श्रमि जी व महारतमाग (' महामरमनप्राण मणरत्नपरिच्छदः॥५॥ की प्रभासे माममा रह और उनमें सान तप ही १ कर रवानप 1२ पाइपिसाप ।। उपाय।

म० ६९] दसम स्कए विभकरण्यापथपत्वरापणेः बहुत-सी साममियों शोभायमान में ॥ ॥ उसक राज पप ( वड़ी-बड़ी सरळ ), गर्योि, चौराह और याबार बालासभाभी रुचिरा मुरालयः । वहुत ही सुन्दर-सुन्दर ये । चुरसार आदि पशुओंके राहनक सान, समा-मपन और दर-मन्दिरोंक कारण टसका सान्दर्य और भी चमक उठा था । उसकी ससिक्तमागाणगवीधिदाली सड़कों, चौक, मी थोर दरखानोंपर छिपकार किया गया प । घटी-छोटी मंडियों बार वड़-वड़ पर जगह पवस्पताफायनवारितापपाम् ॥ ६॥ जगह फहरा रह थ, जिनक कारण रास्तोंपर धूप नहीं या पती पी ॥ ६॥ तस्पामन्तःपुरं भीमदचितं सर्व विष्णयपैः । उसी द्वारका नगरीमें भगवान् श्रीकृष्णका बहुत ही सुन्दर क्त पुर पा । वर-बड़ सोकमाउ उसकी पूजा हरेःस्वफौशलं यत्र त्वष्ट्रा कात्स्न्न दशितम् ॥ ७॥ प्रशंसा किया करते थ । उसका निर्माण करनमें विषमनि अपना सारा पत्य कोशल, सारी कारीगरी आप पारमिः सबसहस्त्रै समलकवम् । ष्टगा दी पी॥ ७ ॥ उस पन्त पुर ( रनियास ) में भगवान्की रानियोंके सोया हजारसे पविक महा वियशेकतम प्रौरेः पत्नीनां भवनं महत् ।। ८॥ शाभापमान थे, टन से एक यह भवनमें दर्यि नारद विष्टम्म विद्रुमन्तम्मै फलफोचमै । जीने प्रमश किया ॥ ८ ॥ स महलमै मगेक सभे, वेर्यक उत्तम उत्तम छाने तथा इन्द्रनीट मणिकी दीयारें नीलमयेः पुरचर्जगस्पा पाहतविपा ॥ ९॥ बन रही पी कोर पहाडी ग भी एसी इन्द्रनील मगियासे यनी दुइपी, जिनकी चमक किसी प्रकार विताननिर्मितस्त्वष्ट्रा मुक्तादामविलम्निभिः । कम नहीं होती ॥ ९ ॥ पिचान बनुन-से पसे बॅगवे यना रम्ब थे, जिनमें मातीकी उपियापी पादरें दान्तरासनपमहमण्युचमपरिमः ॥१०॥ एटक ही पी। हापीतिक बन हुए वासन और फलंग थे, जिनम श्रेष्ठ-श्रेष्ठ मणि पीपी॥१०॥ दासी भिनिफकाठीभिः मुवासोभिरलरुवम् । बहुत-सी गसिपा गमें सानेका हार पहन और मुन्र पम्भि सकमुकाणापमुखमणिकमलैः ॥११॥ पोंसे मुसति हाफर तया पहुत से सेवक भी जामा पगी भोर सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहने तपा बाऊ पुण्डर रस्नप्रदीपनिफरपुतिभिनिरस्त- धारण मिसे अपने-अपने काममें न्यन्न ५ बार महलपी नामा मा रहधे ॥ ११ ॥ मने रन-प्रसार अपनी चान्त विचित्रवलभीए भिग्वण्ठिनोऽ । बामगाइटसे उसका अन्धकार दूर कर रह य । अगरफी नृत्यन्ति पन विहिवागुठभूपमय- धूम रनक फारण भराम्स पूी निकर रहा । उसे सम्मान रंग-रिंग मरिमप छनोर र एर मार नियान्तमीक्ष्य धनपुदय उभदन्तः ॥१२॥ मागेक भ्रमसे सन्दरकर नाचन ग्रान ॥ १२ ॥ १ पिणी । २ मा प्रतिमें परिणावगम् ॥ इम भार यार उत्रनारयम्भवम्हरामपर । पुरिता सम्मम्मी मा मदरसे. ॥ पुष्मितारनापमासिस्नागिन् । सP #रम पर इमाम नागरिमा पसता सम्पन्न निम्पिम् ।। बाउ मेरठाचमे ।५ ५ मुमानि । - ५५२ भीमहामवत भानीय सन्पते सोऽसौ न किसायासनाईणः॥३५॥ | वृक्ष पारिशमो उसारकर ले वाते और इसका उप- भोग करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण भी राम-सिंहासन के यस पादयुगं साक्षात् भीरुपास्तेऽखिलेवरी । अधिकारी नहीं है ! वाठी वात है। ॥ ३५॥ सरे अगलकी सामिनी भगवती व्यमी सर्प बिनके परम स नाईति किल पोशो नरदेवपरिच्छदान् ॥३६॥ कमकी उपासना करती है, थे लम्पपति मायन् श्रीकृष्णापत्र छत्र, चम्म थादि राबोक्ति साममिलेको यस्पानिपश्वरनोऽखिललोकपाल नही रस सपसे ॥ १६ ॥ येक है । जिनके धरणकममी धूल संत पुरुपोंके द्वारा सेवित गम बादि मौस्युत्तमैतमुपासिततीर्थतीर्थम् । तीपको भी तीर्य बनानेवाली है, सारे काउ बने अपने श्रेष्ठ मुकुटपर जिनके चरणकमों की धून करम प्रज्ञा भवोऽहमपि यस्स कशा फलाया: करते हैं, ब्रह्मा, शाहर, में और लक्ष्मीची निनकी कला की मी कल्य है वौर मिनके चरणों की पूछ सदा सर्वदा श्रीश्चोदोम चिरमस नृपासनं क ॥३७॥ धारण करते हैं, उन मगवान् श्रीकृष्णके लिये मत्र, राजसिंहासन का रहा है। ३७॥चारे पदुमरी मुलते रुभिर्द भूखण्ड वृष्णयः किल । तो कौरवोंका रिया दुवा पृषीका एक टुमा भोगते हैं। क्या सूख ! हम्डोग गती है और ये कुसरी उपानाः किल पर स्वय तु भरमा चिरः ॥३८॥ सय सिर है ॥ ३८ ॥ ये प्रेग ऐबर्यसे म्मत, धमी अहो ऐचर्यमसानो मचानामिष मानिनाम् । कौरव पागल सरीखे हो रहे हैं। इनकी एक एक बात कटुसासे मरी बौर बेसिर-पैरकी है। मेरे जैसस पुस- असम्पदा गिरोस्याः कासदेवानुशासिता ॥३९॥ इनका शासन कर सकता है, इन दण देकर इनके होश ठिकाने छ सकता —मय, इनकी कोको भय निफोरवी पृथ्वी करिप्पामीस्पर्षितः। कैसे सहन कर सकता है ! ॥ ३९॥ मन में सरी | पृष्पीको कारवाहीन कर गदगा, इस प्रकार का मस्ते गृहीत्वा इलमधस्थौ दामिव अगस्त्रयम् ॥४०॥ रामनी कोषसे ऐसे मर गये, मनो त्रिकीको मस्म कर देंगे । वे अपना हल कर मरे हो गये ॥१०॥ लालाग्रम नगरसविदार्य गबाहरम् । | उनोंने उसकी नोक्से बार-बार चोट करके हसिनापुर- विचकर्ष स गङ्गामा प्रहरिप्पनमर्पितः ॥४१॥ गङ्गानीको श्रोर सींचने गे ॥ ११ ॥ को उखा छिया वोर ठसे डुबानेके म्येि बो कोसे जलपानमिषापूर्ण गङ्गायां नगर पवत् । इसे खींचनेसर हस्तिनापुर इस प्रकार काँपने का आकृप्पमाणमालोक्य कौरवा मावसम्प्रमाः ॥४२॥ दे कि हमारा नगर तो गलानी में गिर रहा है, जो मनो कलमें कोई नाय उगम्गा रही ह। घाम उठे ॥ १२ ॥ फिर न !ने मायके समेष धरम सम्म सादुम्मा बिबीविपक्षः। साप साम्पको नागे किया और वपने प्राणेकी रक्षाके ळिये फुटुम्के साप सलमर्ग पुरस्तात्म सामं प्रामा प्रसम् ॥४॥ नही भगवन् मामनीकी शरण, गपे ॥ ११ ॥ जम करने हाप जोड़कर सराफिमान् म. ६८] दशम स्कन्ध ५५३ राम रामाखिलाधार प्रभाष न विदाम ते । और काने लगे-याभिराम क्लराममी थाप सारे जगत् के आधार शेषजी हैं। हम भापया प्रमाव नहीं जानते। मूढानां नः पुदीनां धन्तुर्मास्यतिक्रमम् ॥४४॥ प्रभो ! हमलेग मूड हो रह हैं, हमारी बुद्धि मिगर गयी है, इसपिशप हमयेगोका अपराध क्षमा कर दीजिये।। १५॥ स्सिस्युत्पत्यप्ययाना त्वमेको देतुनिराथय । बाप बगरकी स्थिति, उत्पत्ति चोर प्रलयके एकमात्र कान् प्रोटनकानीश फ्रीरतस्ते वदन्ति हि ॥४५॥ ) कारण हैं और वयं निराधार स्थित हैं । सर्वशक्तिमान् प्रभो ! बाबा अषि-मुनि कहते हैं कि वाप ख्यिकी समे मुनीदमनन्त लीलया है और य सब के सब टोक आपके सिस्टोने हैं ॥१५॥ बनन्त ! आपके सहस्र-सास सिर में चोर आप खेल- भूमप्पल विभपिं सहस्रमूर्धन् ।। खेटमें ही इस मूमण्डको अपने सिरपर रस्बे रहते हैं। अन्तेष या स्वात्मनि रुवनिमः | अव प्रलपका सम्प बाता है, तब वाप सारे जगतको अपने भीतर हीन कर लेते है और केवल आप ही यचे रहकर श्रेपेऽद्वितीय परिशिम्पमाणः ॥४६॥ अदितीपरपसे शयन करते हैं ॥ १६ ॥ भगक्न् । बाप | जगल्फी स्थिति और पाटनके लिये विमुद्र सत्वमय कोपस्तेऽम्मिलशिक्षार्थ न पाम व मत्सरान् । शरीर ग्रहण किये हुए हैं। आपका यह प्राधप पा मसरके कारण नहीं है। यह तो समस्त प्राणियोंको निम्रतो भगवन् सव सिविपालनतत्पर ॥४७॥ शिक्षा देनेके Pये है ॥ १७ ॥ समस्त शक्तियोंको धारण करनवा सपप्राणिसरुप अपिनाशी भगवन् ! नमस्ते सर्वभूतारमन् सपश्चक्तिपराम्पय । भआपको हम नमस्कार करत है। समस्त विपके रचपिता दव ! हम आपको मार-यार नमस्कार करते है। हम वियफमन् नमस्तेऽस्तु स्वाक्य शरण गताः ॥४८॥ बाकी शरणमें हैं। आप कृय करके हमारी रक्षा कीजिया ॥२८॥ भीभुक उवाच श्रीशुकश्यमी बदत हैपीभित् ! फरगोश नगर समगा रहा प और वे अाफ्त परामें पा पष प्रपन्नः संविग्नर्वपमानायनेवल । ए थे। नप सकसः कुलपणी "स प्रकार भगवान् प्रसादितः मुप्रसनो मा मैप्टेस्पभय ददौ ॥४९॥ ययामजीपी "रणमें आये और उनका स्तुति-प्राथना की नव चे प्रमन्न हो गये और मत' सा फरफर दुर्योधनः पारिपर फुजरान् पटिहापनान् । । उनमें अभपान रिया ॥ १० ॥ पर्गक्षित । दुर्योधन ददी चे शरमनवान्पयुतानि तुरङ्गमान् ॥५०॥ । अनी पुत्री टक्ष्मण्यसे या प्रम करता था। उसने हेजमें साठ-साठ के बारह AT ERN रथाना पट्महस्राणि रोक्माणो सूपवर्चसाम् । वाई मूर्पक समान समस्त हुए मानक छ रप भार सानक हार "इनी र एक हजार गसियों सीनां निष्ककाठीनां सरसं दुहिम्पत्सलः ||५|| दी !॥ ५०५१ ॥ पाशिमामा भगवान् क्याम प्रतिगृप तु तत् सर्व भगवान् सात्वताभ । जीन यह मर "ज सीझर रिया और नारमति उमग्र नस माम्पय माप गयो। भिनम्न सगुत सस्नुपःप्रागात् मुरनिरभिनदित ॥५२॥ सीस काकामी पाया 41 ॥ ५२ ॥ . स्व गडशिया । परापनेपाच दिवमाग रानाम्पुनानि । भाले २७-- समर्थ पुरतस्य साम्मे प्राअठपा परम् ॥१३॥ तम्ही भगवान् बामनीकी शरणमें गर॥१॥ पृधीको कौरवहीन कर राष्ट्रगा, इस प्रकार परमाते को ठस्सा टिया धोर ठसे मानेके मिपे बस कोसे हस्से सोचनेपर दस्तिनापुर इस प्रकार पॉपने म मानो कर्म फाइनावगम्य रही। सरने | घबड़ा ठठे ॥ १२॥ पिर उन लोगोंने उपयो सप साम्पोमागे किपा और वपने प्रणेरी हो ५५२ भीमहामस्त मानीय मुज्यते सोऽसौ न किलाम्पासनाईयः॥३५॥ / वृक्ष पारिजातको उसारकर ले बाते बौर उसका न भोग करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण मी राशि यस पादयुग साक्षात् भीरुपास्तेऽखिलेपरी । अधिकारी नहीं है । सी बात है! ॥ ३५ ॥ से नगदकी स्वामिनी मावती मी स्वयं निके पर- स नाईति फिल श्रीशो नरदेषपरिच्छदान् ॥३६॥ कमओंकी उपासना करती हैं, वे छम्मपति मा श्रीकृष्णचन्द्र या, पर बादि राबोषित सामयिक यस्साधिपहजरवोऽखिललोकपाल नहीं रख सकते ॥ ३६ ॥ ठीक है मई | मिसे चरणकमलों की धूछ संत पुरुषों के द्वारा सेक्ति गङ्गा की मौस्तमैतमपासिततीर्थतीर्थम् । | तीपोंको भी तीर्प बनानेवाली है, सारे काम का वपने श्रेष्ठ मुकुटपर जिनके चरणकमकी धूप कम प्रमा भवोहमपि यस्य कलाकलाया: करते हैं, मामा, शार, में वीर लक्ष्मीची निनकी की भी कय हैं और जिनके चरणों की घूछ भीश्योरोम घिरमस्य नृपासनं क ॥३७॥ धारण करते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्ण के लिये मत्र राजसिंहासन कहाँ रक्स है।॥ ३७॥ चरे मगर मुनवे रुभिदत भूखण्ड वृष्णया फिल । तो कौरवोंका दिया हुवा पृष्पीका एक टुकमा उपानहः किल मयं वय तु करपा शिरः ॥३८॥ सपंसिर है ॥ ३८ ॥ ये बेग ऐपसे उम्मच, मा हैं। स्या स्लूब ! हमलोग जाती है और ये अहो एभर्यमताना मचानामिष मानिनाम् । फौरव पागल सरीखे हो रहे हैं । इनकी एक-एक कटुमासे भरी बौर सिर-पैरकी है। मेरे बैसा पुर- मसम्बदा गिरोस्पा कासदेतानुवासिता ॥३९॥ इनका श्वसन कर सकता है, ने दण देकर सो होश ठकाने अ सकता है मय, इनझी बने अध निकौरवी पृथ्षों फरिप्पामीत्यमर्पितः। कैसे सहन कर सकता है । ॥ ३९॥ अर में सन्न गृहीत्वा इलमुत्तस्थौ दाभिव जगस्त्रयम् ॥४०॥ रामजी बोधसे ऐसे मर गये, मानो क्रिोशीने मल कर देंगे। वे वपना इस लेकर सो गये l लागलायम नगरसद्विदार्य गजास्यम् । मोंने उसकी नोक्से बार-बार बोर करके हसिमा सवा सदा विपर्म स गहापां प्रारिप्पन्नमर्पितः ॥४१॥ गङ्गाजीकी बोर सींचने गे ॥ ११ ॥ जलयानमिवाघूम गङ्गायां नगरं पतत् । आठप्पमाणमालाक्य कौरमा बाघसम्भ्रमाः ॥४२॥ दल कि हमारा नगर तो गङ्गाजी में गिर ग्रा तमेव शरणं जग्मु सकटुम्बा जिजीविपय । छिये कुलमके सप आप जोर साबित १० ६९ ] दशम स्य विभकरध्यापधचखरापणः बात-सी साममियो शोमायमान यो ॥५॥ उसक रान पप ( पड़ी-बड़ी सबमें), गलियों, चौराह और धानार सालासभाभी रुचिरी मुरालपैः। बहुत ही सुन्दर-सुन्दर थे । वासाउ आदि पशुओंके सुनेक स्थान, समा-मवन घोर दक् मन्दिरोक कारण ठसका सौन्दर्य और भी चमक उठा पा ! उसकी संसिक्तमागाझ्यावधिवाली ससकों, चौक, गर्म भार दरवाजोंपर छिड़काव किया गया था। टी-छोटी परियों और पाबड़ कर नगर पवल्पताकाचवारितामपाम् ॥ ६॥ जगह परा रहे थे, जिनक कारण रास्तोंपर म्प नहीं वा पाती पी ।। ६॥ तस्पामन्तापुर भीमदतिं सर्वधिपम्पपैः । उसी द्वारका नगरी में भगवान् श्रीकृष्णका यहुत ही सदर मत्त पुर था | वा-या कपाल उसकी पूजा- हस्पिकौशलं मत्र त्यष्ट्रा कासन्न दर्शितम् ॥ ७॥ प्रशंसा किम परत में । उसका निर्माण करनमै विवर्माने अपना सारा काय-कोराड, सारी कारीगरी र पोटाभिः सपसास्त्रः समलंकतम् । लगा दी पी ॥ ७ ॥ उस क्त पुर ( रनिमास ) में भगवान्की रानियोंक सोला इनारसे अधिक माइल विवोकतम शौर। पत्नीनां भवन मात् ॥ ८॥ मायमन ये, उनमेसे एक बड़ा भवनमें देवर्षि नारद विटम्म विवमन्तम्मैवर्यफलकोचमः। बीने प्रवेश किया ॥ ८॥ उस महलमें मूक म्भे, सूर्यके उत्तम ठरूम छज्ज तम वनार-मणिकी तीवारें इन्ननीलमयेः रुपैर्मगत्या चाहतविपा ॥ ९॥ | गमगा ही पी आर वहाकी गर्भे मी एसी इन्द्रनील मगियोंसे कनीर पी, किनकी चमक किसी प्रकार बितानेनिर्मितस्स्वमा मुक्कादामविलम्मिमिः । कम नहीं होती ॥ ९ ॥ विशफमने बहुत से पसे चोधे बना रम्ने थे, जिनमें मातीकी सरियोंकी मारे दान्तैरासनपर्यईमप्युसमपरिष्कृतः ॥१०॥ स्टक रखी पी । बापीतिक वन हुए आसन और पग थे, जिनमे भेष्ठ-श्रष्ठ मणि जड़ी हुइ पी ॥ १० ॥ दासीभिनिएफसष्ठीभिः मुषासोभिरठरुतम् । बहुत-सी मियाँ गरमें साने हर पहन बार सुन्दर शम्भ सममुकाणीपमुवसमणिकुष्पलैः ॥११॥ वोंसे मुसप्रित होकर तपा बहुत-से सेवक भी नामा- माड़ी बोर मुन्दर-सुगर बन्न पान तपा जड़ाऊ युमा रस्नमदीपनिफरपुतिभिनिरस- धारण मिस अपने-अपन कामर्म म्पन्त बर महलपी शामा का रहधे ॥ ११ ॥बनम ग्ल प्रीप अपनी मान्त यिपिपलभीप सिम्वणिनाऽन। जगमगाहटसे उसम्म अधार दूर कर रह य । अगरफी नृत्यन्ति यत्र विहितागुरुध्पमध एप दनक कारण गेम्पोंसे धूमा नार रहा था। उसे एमर रंग-सिगे मरिभ्य छत्रॉपर बैठहए मार नियान्तमीत्य पनपदप उमदन्त ॥१२॥ पागक भ्रमम मन्कार नाचन यात ॥ १२ ॥ १ पिम ।२ मा प्रतिमें इम पर मायझरममदापर। पुरिना मम्मका मा मनारसे. ॥ भिनासनायाममनारिताम् । नत। भगोमा पमा मान्यन लिमितम् । र उमेरम्यासमः । ५ प. मुनी । - इस ए प ट मह पते | पाणिग्रहण किया ॥ २ ॥ देवान नारद इस उत्सुकतासे पहुंचे। महाके उपपन धीर उपान मिले हुए रंग-मिने ५५४ भीमद्भागवत [२०६१ वतः प्रविष्टः स्वपुरं इलायुधा थप बलराममी द्वारकापुरीमें पहुँचे धौर धपने प्रेमी उस समेस्प पन्धूननुरफवसः। समाचार नाननेफ लिये उपमुफ कपु-यान्धर्षोसे । उन्होंने यदुवंशियोंकी मरी सम्पमें पना हमरा शसस सर्व यदुपुत्वानो चरित्र कह सुनाया, ओ हस्तिनापुरमें नहाने करयों के मध्ये सभायां कुरुप स्वधेष्टितम् ॥५३॥ साप क्यिा ५ ॥५३ ॥ परीक्षित ! यह हस्तिनापुर अयापि च पर प्रेतत् सूचपद रामविक्रमम् । भान भी दक्षिणकी घोर ऊँचा और गायीकी कोर फुछ मुका था है और इस प्रकार या भगवान् काम- सममा दक्षिणता गङ्गापामनुपश्यते ॥५४॥ जीके पराक्रमकी सूचना दे रहा है ।। ५४ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहस्यो संहितायां शमस्कर वे उतरावे हास्सिनपुरकरणम्पसार्यगविक्यो नामाष्टपरितमोऽध्याय ॥ १८ ॥ अथैकोनसप्ततितमोऽध्याय देवर्षि नारदजीका भगवान्की गृहसर्या देवन्म पीक उपाय मीशुकदेवजी करते हैं परीक्षित् ! जब देवी नारदने सुना कि मायान् श्रीकृष्णने नरकासुर (भीमसर) नरक निरव श्रुत्वा सथाबाई च यापिताम् । को मरकर अकेले ही हजारों राजकुमारियों का विवाह कर लिया है, तब उनके मनमें मगमन्की राम- कृष्णनफेन बहीनां तद् दिनुः स नारदः॥१॥ सइन देखनेकी यी अमिप्रपा हुई ॥ १ ॥ वे सेमे स्त्रो-अहा, यह कितने समयकी बात है कि मानन् श्रीकृष्णने एक ही शरीरसे एक ही सम्प सोमार गृहेषु दपएसास त्रिय एफ उदावात् ।। २ म्झौम वग का सोष्ठ हजार राजकुम्परियोग इत्पुस्मुसा वाग्वती देवपिटुमागमत् । प्ररित होकर भगतान्की लीथ्य देखने के लिये द्वारका पुप्पितोपवनारामनिमालिकृतनादिताम् ॥ ३॥ पुष्पोंसे लदे रक्षोंसे परिपूर्ण थे, उनपर ता-सराके पक्षी चहक रहे थे और मौरे गुनार कर रहे उत्फुल्लेदोषराम्भावफहारमदात्पलः । निमठ मउसे भरे सरोवरोंमें नी, मठ और सफा रंगके भोनि-मातिक फमर सिसे हुए छरितेगु सरस्मूच इजिता इसमासे ॥४॥ और नयजान फमी मना भीड़ ही श्री । उन हम और सारस पारव कर रहे घे ॥१॥ प्रासादतधनवभिनुग मारिफराबते । द्वारपासुगम सम्मिामगि और चौफनो यस मार ध । व पाश मामि जबी न महामसतमगि (एन) महामरमनप्रम् म्यणर नपरिच्छदं ॥५॥ की प्रभास गम्गा रहे थे और उनमें सान ता हीरक १ बसवमनप ।२ पादरापनिष्पाप ।। उपरयन् । चित्र पतेतदेफेन पपुपा युगपत् पृथक् । 4॥ . थे । युमर (4) प० ६९] दशम स्कन्ध विभकरभ्यापश्चत्वरापणे धन-सी सामप्रिया शोम्पयम्मन ॥ ॥ टसक राम- | पथ ( मनी-बड़ी साफै ), गलियों, घोगह और भाजार बालासभाभी रुचिरा मुरालयः। बहुत ही सुन्दर-सुन्दर श्रे । धुमसाल आदि पमुभोंके यन्त्र स्थान, समा-ममन और दर-मस्रोि कारण उसा साम्दर्य और भी चमः ठर था । उसकी ससिकमागास्पषीधिवाली सरकों, चाक, गली बार दरवाजोंपर छिन्कार किया गया प। अटी-छोटी नाडियों और वह मर जगह पतत्पताकापचधारिसातपाम् ॥६॥ जगा पहरा रह थे, जिनक कारण रास्तोंपर धूप नहीं वा पाती पी ॥६॥ वस्थामन्तःपुरं श्रीमदचित सधिष्म्यः। उसी द्वारका नगरीमें भगवान् श्रीकृष्णका बहुत ही सुन्दर अन्त पुर पा । वा-या लोकपाल उसकी पूजा हरेः स्वकोशठ पत्र त्यष्ट्रा कात्स्न्न दर्शितम् ॥ ७॥ प्रशंसा किया मरस । उसका निर्माण परनमें विश्यमनि अपना सारा प्रकाशल, सारी कारीगरी पत्र पारशभिः सबसहस्त्रः समठऊतम् । लगा दी पी॥७॥ उस अन्त पुर ( रनियास) में भग्यान्की रानियोक सोव्ह हजारसे अधिक महल विवेमतम शौरे। पत्नीनां भवन मात् ॥ ८॥ समायमान थे, टनमेंसे एफ वा भवनमें दर्षि नारद विएटर विद्रुमम्तम्मै फलफोपमः। जीन प्रवेश किया ॥ ८॥ उस महरम मेंगोंक मे, वैसूर्पक उत्तम उत्तम धम्म तप इन्वनर-मणिकी दीवारें इन्द्रनीलमयैः कुरचर्जगत्या चाहतविपा ॥ ९॥ जामगा रही थी बार कहाँकी गर्चे भी एसी इन्टनीठ मगिर्योसे बनी हर पी, किनकी चमक फिसी प्रकार वित्ताननिमितवमा मुक्तादामविलम्पिभिः । कम नहीं होती ॥ ९॥ विमर्माने बहुत-से एसे चगवे बना रमव थे, जिनमें मातीकी एड़ियोंकी मारें दान्तरामनपर्य ईमपुत्चमपरितः लटक रही थी । हापरितिक बन हुए आसन और पलंग थे, जिनम भ्रष्ट-अष्ट मणि बी हुई पी ॥ १० ॥ दासीभिनिकालीभिः सुमासाभिरलकतम् । बहुत-सी रासियाँ गरमें साना हार पहन बार सुन्दर पुम्भि सकभुकाप्मापमुखमणिकुमलैः ॥११॥ बयोंसे मुससि हावर तया बहुत-से सेवक भी जामा- पगड़ी बार मुन्दर-मुदर पम्न पहन तपा जहा पुमार रत्नप्रदीपनिफरपुतिभिनिरन्त- धारण मिप अपन-अपन पाममें न्यन्त धबार महलकी शामा खा रह धे || ११॥ बनेकों रन-प्रदीप अन्नी मान्त विधिवठभी विखणिनाऽन्न । जगमगाइटसे उसस्य अन्धकार र कर रहय। नगरपी नृत्यन्ति यत्र विहितागुरुपमध धूप रनक पारग मगम्ोंसे पूर्ण निकर रहा था। उसे दमा रंग-बिरंगे मरिम्प एनोर मेट हुए मार निपान्तमीक्ष्य पनरठप उमदन्तः ॥१२॥ पायक श्रमस सरत नाचन मान ॥ १२ ॥ १ पियामी ।२ मा निर्म पारिनारयम् ॥ इम झार पर उमदी गम्भनरामगनपत । पुरसम्मका मार ॥ पुष्मितारम्नायसिस्तारिताम् । ५ मा पर मार नई सीमार पसाद न निमितम् ।। मारने १५ प मुसम्मन ।

५५६ श्रीमद्भागवत .. तस्मिन् ममानगुणरूपण्यस्मुषेप देवर्षि नारदनीने देख कि भगवान् श्रीकृष्म उस मा- की स्वामिनी रुक्मिणीनीक साथ बैठे हुए हैं और रे दासीसहसयतयानुसर्व गृहिण्या। अपने हापों मवान्को सोनेकी नदीले बरसे इस विप्रो ददर्श चमरष्यजनेन रुक्म- कर रही है। यबपि उस मइसमें रुक्मिणीचीक समान ही गुण, रूप, अमस्थ पौर वेष-भूषाची सर्वे दण्डेन सास्वतपति परिवीजयन्त्या॥१३॥ दासियों भी हर सम्म्प लिवमान रहती पी ॥ १३ ॥ सनिरीक्ष्प भगवान् सहसास्थितः श्री नारदजीको देखते ही समस्त पार्पिोंके मुकुटमणि | भगवान् श्रीकृष्ण कनिमणीजीके पगसे सासा छ से पर्यहत सफलधर्ममृतां वरिष्ठः । हुए। वनोने देवर्षि नारदक युगम्पराम मुदत आनम्पपादयुगळं शिरसा किरीट सिरसे प्रणाम किया और हाप नागफर उसे पाने पासनपर बैठाया ॥ ११ ॥ परीक्षित | इसमें सन्य जुम्टेन सालिरवीषिशदासनेस्थे॥१४॥ नहीं कि भगवान् श्रीकृष्ण घराचर जगत्क परम गुरु वस्मापनिन्य परणौ तदपः स्वमर्मा- हैं और उनक 'चरणोंका धोक्न गलाबछ सारे स्मदको पवित्र करने या है। फिर भी व परमममसर और पिम्रसगद्गुरुसरोऽपि सतां पतिहि । संतोंके परम आदर्श, उनके सामी है। उनका एक यसाधारण नाम प्रमप्पदव भी है। वे सोको । प्राम्यदेव इति पद्गुणनाम मुकं वफ्ना आराप्यदेव मनते हैं। उनका यह नाम अके तस्पैव पचरणौषमक्षेपतीर्थम् ॥१५॥ गुणके अनुरूप एवं उचित ही ।। तभी टो भाछन् श्रीकृष्णने म्पप ही मारदजीके पाँव पखारे और उनका घरणामृत अपने सिरपर धारण किया ॥ १५ ॥ मर- सम्पूज्य देवऋपिवर्यमृपिः पुराणो शरोमणि नरके सस्ता सर्वदर्शी पुराणपुरुष मात्र नारायणा नरसस्तो विपिनोदिन्न । | नारायणने शाछोफ विधिसे देवर्षिशिरोमणि मगन् | नारदकी पूना की । इसके बाद अमृतसे भी मी वाम्पाभिभाष्य मिसयामृतमिष्टया किश्त पर शम्दोंने उनका स्वागत-सत्कार किया और फिर पदा-प्रभा 1बाप तो सर्य सममान, प्राह प्रभा भगववे करयाम हे किम् ॥१६॥ धर्म, यश, या पोर एचसे पूर्ण है। आपकी हम स्या सेवा करें" ॥ १६ ॥ नारद उमाप देवर्षि परदन कहा-मगन् । बाप मत नेवासं त्मपि विमाऽखिललाफनाये ख्यकों के एकमात्र सामी है। आपके ये हममें मपी बात नहीं है कि आप अपने मझोसे प्रम मंत्री बनेपुसकलपुदम स्खलानाम् । करते हैं और दुयको दण्ड देते हैं। परम्पशस्त्री प्रमो! निःभयसाय हिजगत्स्सिविरक्षमाम्पा आपने जगत्की स्थिति और रक्षाके आरा समव जीम कम्यण करने के लिये स्वेपसे भतार हम फिस स्वैरास्तार उरुगाय विदाम मुमु ॥१७॥ है। भगान् ! या बात हम भीमति गनते - म०६९] ५५७ रए तवाधिपुगल जनतापवर्ग है॥ १७ ॥ या व सौभाग्यकी बात है कि बाब मुझे अपके चरणकमलोंके दशन हुए हैं । आपके ये चरणकमल सम्पूर्ण जगस्पो परम साम्प, मोक्ष दनमें प्रमादिभिदि विचिन्त्यमगाधयाघः । समर्प है। जिनके द्वानकी कोई सीमा ही नहीं प्रमा, शहर आदि सदा-सषदा अफ्न हृदयमें उनका चिन्तन करते रहते हैं। वास्तवमें ये श्रीचरण की ससारकपपवियोमरणापलम्ब ससाररूप में गिरे हुए लोगोंक मार निषारनेके लिये अक्टम्बन हैं। आप ऐसी फुया कीजिये कि धायक उन परणयमकी स्मृति सर्वदा बनी रहे मार्पमराम्यनुगृहाण यथा स्मृति स्यात्॥१८॥ और में चाहे ज्ॉ वैसे रहे, उनके ध्यान में ताप रई ॥१८॥ तताऽन्यदाविशद् गेइ कप्णपत्न्या:स नारदः। परीक्षित । इसके बाद देवर्षि नारदजी योगेश्यक मी ईश्वर भगवान् श्रीकृष्णकी योगमायाका रहस्य जाननके गोगेपरप्रास्यान योगमायानिषित्सया ॥१९॥ उिये उनकी दूसरी पत्नी के महमें गये ॥ १९ ॥ वहाँ उमोंने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्राणपिया धौर वदवजीक साप चौसर बउ रह है । वहा भी दीन्यन्तमस्तित्रापि प्रिग्या चोधेन च । भगवान्ने सा होकर उनका स्वागत रिया, श्रासनपर बैठाया और विविध साममियोंशरा यही भकिसे उनकी पूजित परया भत्तया प्रत्युत्थानासनादिभि ॥२०॥ मी पूजा की ॥ २० ॥ इसक पाद भगवान्न नारद जीसे वनजानी सरह एम-आप यहाँ कल पचारे । पृष्ट पाविषेषासौ कदामयाना भवानिति । अप तो परिपूर्ण भारम्पराप-आतमाम धौर मग १ भागे । ऐसी अवस्पाम मय हम आपकी मम सा क्रिया किं नु पूणानामपूर्णरमदादिभि ॥२१॥ कर सकते १ ॥ २१॥ मिर भी सम्पर नारी ! भाप पुर-न-कुछ आग अनस्य पीनिये और हमें पापि हि ना ग्रान् जमवन्टाभन कुरु । सेयर असर र हमारा जम सात पीबिय ।" नारसे यह सब दस मुनकर चरित और पिस्स्ति पतु रिमित उत्थाय तप्पीमन्यदगाद् गृहम् ॥२२॥ ॥ रह थे। व यहाँ से उपर जुराचार दूसरे म्हम पर गये ॥२२॥ उस महटमे भी दापि नार'ने दकि भाग भीरम्ग जान नन्दन ह पलामो घर पद हैं। वाप्पचष्ट गारिन्दलालयन्तं मुतान्छिगन् । महोसे कि दूसरे मन गा ता स्या गमत हि भगवान् भारस्य स्नानी नैयारी पर रह ॥ २३ ॥ नवाऽन्यप्तिन् गाऽपय मनानाय कायमम् ॥२३॥ (इस प्रकार देव नारन विभिन्न भाना पिन-भिन्न काप परत दर 1) रक्षा नाम जुदन्त परिमानातान यमन पथभिम। सन पर सरना नदी पास ला बाशि भारग्ना घर ६१ । पदी मा भन्न संग भावपन्न हिवान् कापि राजानमररापिदम् ॥२४॥ ६ र त्यही पारा म बन्न र १ यिनमा ५५८ भीमद्भागवत पापि सम्यामुपासीनं जपन्तं प्रम वाग्मतम् । हैं॥ २१ ॥ कही सन्ध्या कर रहे हैं, तो कही मैन एकप पासिधर्मम्पा चरन्तमसिवम॑सु ॥२५॥ होकर गायत्रीका जप कर रहे हैं। कही हामि यत- तलवार लेकर उनको चस्यनेके पैतरे बदल हे ॥२५॥ अश्वेगज रथः कापि विचरन्तं गदाग्रजम् । की घोरे, हाथी वका रसपर सपार होकर भी विचरण कर रहे हैं। कहीं पल्लंगपर सो रहेको कत्री कचिच्छयानं पर्य( स्तूपमान च वन्दिभिः॥२६॥ । वदीमन उनकी स्तुति कर रह है ॥ २६ ॥ किसी मन्त्रयन्त च कमिधि मन्त्रिभियोट्यादिभि । मइसमें उदय वादि मन्त्रियों के साप किसी गम्भीर विषयपर परामर्श कर रहे हैं, तो कही उमेज्म जलक्रीरारत कापि वारसस्स्यापलावतम् ॥२७॥ वाराङ्गनाओंसे घिरफर जष्क्रीय कर रहे हैं ॥ २७ ॥ कहीं भेष्ठ नामोंको पखापणसे पुसभित गौओंग चिद् द्विजमुस्पेम्या ददत गाः खलताः। दान कर रहे हैं, तो कही मामय इतिहास पुराणोंग भ्रषण कर रहे है॥ २८॥ फही किसी पत्नीक महमें इतिदासपुराणानि गुम्वन्त मङ्गलानि च ॥२८॥ अफ्नी प्राणप्रियके साथ हास्य विनो की बातें करके इस रहे हैं, तो कही धर्मका सेवन कर रहे है। की हसन्त हास्स कथया कदाचित् प्रियया गृहे । मर्थका सेवन कर रहे हैं-धन-संग्रह धौर नारिक फापि धर्म सेवमानमर्धकामौ च अषित् ॥२९॥ कार्यमें उगे हुए हैं, तो कहीं धर्मानुकूल गृहस्थानि विका उपयोग कर रहे है॥ २९ ॥ कहीं एकस्त म्पायन्तमकमासीन पुरुष प्रकृतेः परम् । बैठकर प्रतिसे अतीत पुराण-मुरुपका पान पर र शुथूपन्तं गुरुन् फापि कॉमर्मोगः सपयया ॥३०॥ हैं, तो कहीं गुम्ननोंका इस्टिस मोग-सामी समर्पि करके उनकी सेवा-शुपा कर रहे हैं ॥ ३० ॥ दे धन्त पिनई फैथित् सधि चान्यत्र केशवम् । नारदने देस्य कि मगवान् श्रीक्षण किसीके साप पुरी बात कर रहे हैं, तो किसीफ साप सन्धिकी । कुमापि सर रामेण चिन्तयन्त सतां शियम् ।।३१।। भगवान् काममीफे साथ बैठकर सत्पुरुषोक कल्पक बारेम विचार कर रहे हैं ॥३१॥ कहीं उचित सम्पर पुत्राणां दुहितॄणां च फाल विम्युपयापनम् । पुत्र घोर फत्यानोका उनके साश स्नी पर रोक दारवरम्ततारीः 1: कल्पयन् विभूतिभि ॥३२॥ साथ पड़ी धूमधामसे विधिवत् विषाइ कर रहे ॥३२॥ यही घरस पन्याबारे विदा कर रहे हैं, तो कही प्रम्यापनापानयनैरपत्यानां महात्सवान् । मुअनेकी तयारीमें लगे हुए है। यागेभर मगम्न पीप पागधरशस या ताका पिसिमिर ॥३३॥ भीगणक इन विराट उसको देखकर सभी काम पिस्मित-पक्ति हो जाते ये ॥ ३३ ॥ की यात्रा यजन सम्लान् दवान् कापि क्रतुभिर्जितं । पकिनारा अपनी परम्प देवताओंका यम्न म और पुनपन्त पचिद् धर्म रूपाराममटादिभि ॥३४॥ यही वर्षे पाच तपा मठ यानि मनपाकर इसाई धर्मय मर मगगो कापि रसमाप मभयम् । वाचरण पर रद है ॥ ३२॥ को नए पापोंसे गिरे हुए शिशुद यि घाइपर घमर गया कर १५३, और गन्न मन पान् मध्यान् परान यह ॥३५॥ उसमें पाणि मेष्य पीका पार १ प्रपना २ मापनासामन।। मागे । - ।

अ०६९] दशम स्कन्ध ५५९ अम्पक्तलिन प्रकृतिमन्तःपुरगृहादिषु । १॥ ३५॥ धौर कही प्रजामें तया अन्त पुरके महमि | क्षेय बदलकर छिपेसएसे सघन अभिप्राय जाननेक लिये विचरण कर रहे हैं। क्यों न हो, भगमान् यागेर जा फपिचरन्तं योगेम तपदावमुसत्सया ॥३६॥ हैं ॥ ३६ ॥ अभोवाच रपीफेश नारदः प्रामभिव । परीक्षित् । इस प्रकार मनुप्ययी-सी लीग करते हुए पाकेश भावान् श्रीकृष्णकी योगापाका वमत्र देखकर योगमायादय वीक्ष्य मानुपीमीयुपो गतिम् ॥३७॥ देवर्षि नारदजीन मुस्कराते हुए उनसे कहा-॥ ३७ ॥ प्यागेवर ! भास्मदव ! आपकी योगमाया महाजी आदि पिदाम मागमायास्ते दर्द अपि मायिनाम् । व मह मायाबियोंके लिये भी बगम्य है । परन्तु म भापकी योगम्बयाका रहस्य जानते हैं, क्योंकि आपके योगधरास्मन् निर्भाता भवरपादनिपेवया ॥३८॥ रणकमकी सेम करनसे या सर्व ही हमारे सामने प्रफर हो गयी है ॥ ३८ ॥ देवताओंके भी भाराप्यदेव अनुजानीहि मां देव लोकांस्ते यवसाऽऽप्छतान् । मायन् ! चोरों मुझन वापक सुपशसे परिपूण हा रहे हैं। पर मुसे बाधा दीजिये कि मैं बारफी प्रिमुगन- पर्यटामि तयाद्गायन् लीला भवनपापनीम् ॥३९॥ पावनी लीयका गान करता हुआ उन योको विचरण करा ॥ ३९ ॥ भीभगवानुमान भगवान श्रीरप्पन हास्यर्षि नारदजी मही धमका उपदेशक, पान परनवान और उसका अनुष्ठान प्रसन् धर्मम्य यक्ताह मना तदनुमादिता । करनेवान्दोका अनुमोदनफा भी है। इसलिये संसारको धमकी शिक्षा दनक उदेश्यसेही मास प्रकार धर्मका तच्छिवटामिममाम्पितः पुत्र मा विदः ॥४०॥ आचरण करता हूँ। मरे प्यार पुत्र ! तुम मी या योगमाण देकर माहित मत होना ॥ १० ॥ श्रीनुक उवाच भी पुकायसी फहम है-इस प्रकार मावान् इस्पाचरन् मद्धमान् पावनान गामेधिनाम् । श्रीकृष्ण गृहस्पोको पवित्र करनेगार श्रेष्ठ धमाका आचरण तमेष मवगहपु मन्तमेफ ददर्म ॥३१॥ कर रहा ये । मयि वे एक ही है, फिर भी ठा रुप्मस्थानन्तवीर्यस्प योगमायामहादयम् । मार मीन उनमा उनी प्रश्र पीके मइट मा अरग रम्य || ११ || भगान् श्रीकी शक्ति अनन्त मुहूरन पिरम् विमिता वातकोतुफ ॥४२॥ है। उनकी योगमायाफा परम पचय बार-बार बस्त इत्यर्पकामधमपु कृष्णन अदिवास्मना। दपि नार विस्मय और पोतडकी सीमा नही ।।१२॥ मम्पम् ममाजिन प्रीतम्तमयानुम्मरन यया ॥४३॥ दारफरमें भगवान् श्रीकृष्ण गृहम्पी भौति एसा आचरण माना धम वर्ष और फाममए पुस्गोम मनुप्यपदवीमनुवनमाना उनकी चहा घदा हो। उन्दोंन टेपि नारया वात नागपणाऽपि लभवापगृहीत गतिः। सम्मान किया । वे अपत प्रमन हार भयानमा - | कत्मय करने लगते ॥ २ ॥ रुक्मिणीजीपने प्रियतमा ५६० भीमनागवत [१०. रमेश पोरसासवराजनाना स्मरण करते हुए वहाँसे चले गये ॥ १३ ॥ रामन् । मावान् मारायण सारे जगत्के कम्पाणके लिये वन्त सवीरसौरदनिरीक्षणहासजुष्टः ॥४४॥ अपित्य महाशक्ति योगमायाको सीकार करते हैं कर इस प्रकार मनुष्योंकी-सी लीला करते हैं। धारकापुरीमें सोष्ट नारसे भी अधिक पत्तियों वपमी समान व पानीह विधविलयोद्भवपचिहेतुः | प्रेमी चितपन सपा मन्द-मन्द मुसकानसे उनकी सेवा फरती थी और वे उनके साथ विहार करते थे ॥११॥ फर्माम्यनन्पविपमामि हरिषफार । मगवान् श्रीकृष्णने नो टीनएँ की है, उनें दूसरा कार्य नहीं कर सकता । पीक्षित् ! वे विपकी अपति, रिति पौर प्रध्यके परम कारण है। जो उनको चोंका यस्त्वा गायति मृणोत्पनुमोदतेमा गन, अषण वौर ग्गन-प्रवण करनेवाका अनुमान करता है, उसे मोजके मार्गस्नरूप मगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमयेद् भगवति प्रपषर्गमार्गे ॥४५॥ चरम परम प्रममयी भति प्राप्त हो जाती है ॥ ५॥ इति श्रीमद्भागक्ते महापुराणे पारस्पा सहितायो दशमस्करघे' उत्तरार्धे कृष्णगाईस्प्पदर्शन मामैकोनसप्ततितमोऽध्याय ॥ ६९ ॥ अथ सप्ततितमोऽध्याय भगवान् भीफप्णकी नित्यचर्पा मोर सनके पास सरासम्मके कैदी राजाभोंके दूतका माना भी क उबाप मीशुक्वेषी कहत है-परीक्षित् ! सा समेत अापस्युपश्चार्या कुटान् नतोऽशपन् । होने लगता, अकुट ( मुरगे ) बोल्ने समाते, व ने श्रीकृष्ण-पतियों, जिनके काठमें श्रीकृष्णने अपनी मुब गृहीतकण्ठः पतिभिर्मापव्यो पिरतासुराः ॥ १॥ जाती और उन मुरको कोसने लगतीं ॥ १ ॥ गल रखी है, उनके मोहकी माशाहासे माफ पास्परूरुवन् कृष्म पोधपतीष पन्दिनः। सम्प पारिजातकी पुगन्धसे मुवस्मित भीनी-मीनी स बने लगती । भौर ताम्सरसे अपने सगीफी तान ने गायत्स्यलिपनिद्राणि मन्दारवनवापुभि ॥ २॥ देते । पचियोंकी नींद उपट जाती और वे महीनों में मोति मगवान् श्रीकृष्णको जगाने के लिये मधुर ससे महत तं तु वैदर्भी नामृप्पद वियोभनम् । मुसाशसे घेवी रानेपर भी शामिन छुट परिरम्भणविन्लेपात् प्रिमपान्तरं गता ॥३॥ वाशनासे अत्यन्त महामने और पवित्र मामलों में यसाध सम्झने लगती पी ॥ ३॥ भगमान् भीषण माय महूर्त उत्थाय वायुपस्पृश्य माधपः । प्रतिदिन प्राममामि दी ळ नाते धौर हा मुंह भोकर धरने मापात आममतपमा प्यान करने लगते । उस दप्यो प्रमझकरण आत्मान समस परम् ॥ ४ ॥ | समय उनका रोम-रोम आनन्दसे लिक उठता U 11 १ एन ।२ बारम्पपिम् । अनेकी अ०७०] दशम स्कन्ध एक स्तमज्योतिरनन्यमष्यय परीक्षिस् ! मगवान्का वा यात्मस्वरूप सजातीय, विद्वतीय और स्वगतमे से रहित एक, अब है। क्योंकि उसमें किसी प्रकारफी उपाधि या उपाधिके कारण स्वसस्थया नित्पनिरस्तफल्मपम् । होनेवाय अन्य वस्तुका वसिव नहीं है। और यही | कारण है कि वह अविनाशी सस्प है जैसे चन्द्रमा प्रशासपमस्यायनामहेतुभिः सूर्य आदि नेमन्द्रियके शरा और नत्र-त्रिय पत्रमा स्य बादिके द्वारा प्रकाशित होती है, वैरो मा आम- स्वरूप दूसरेके द्वारा प्रकाशित नहीं, स्वयंप्रकाश है। स्वशक्तिभिर्लक्षिषभावनि तिम् ॥५॥इसका कारण यह है कि अपने स्वरूपमें ही सदा-सबदा और फालकी सीमाके परे भी एकरस मिस खनेके कारण भक्पिा उसका स्पर्श भी नहीं कर सकती। अपाप्लुतोऽम्भस्पमते यभाविधि इसीसे प्रकाश्य-प्रकाशकमाव उसमें नहीं है। जगत्की स्पति, स्थिति और नाशकी पारणभूता प्रमशक्ति, क्रियाकलाप परिधाय वाससी । विष्णुशक्ति धौर शक्तियोंके द्वारा के इस वातका अनुमान हो सफता है कि यह स्वरूप एकरस सवारूप चकार संध्योपगमादि सचमा और आनन्दस्वरूप है। उसीको समझानके ध्येि प्रक्षा नामसे कहा जाता है। भाान् श्रीकृष्ण अपने उसी भारमस्वरूपमा प्रतिदिन ध्यान करते ॥ ५॥ इसक याद दुतानलो ब्रम बजाप पाम्पतः ॥ ६॥ थे विधिपूर्वक निर्मल और पनित्र जळमें स्नान करते। फिर गुद धोती पहनकर, दुपा धोदकर यपविधि उपस्थायामुपन्त सर्पयित्वाऽऽस्मनःकलाः। निस्पकम सन्ध्या-यंदन आदि परछे । इसके बाद हमन फरते और मोन होकर गयत्रीका जप करते । क्यों न हो, देषानुपीन् पितॄन् शान् विपानम्पर्म पात्मवान्।७। वे सत्पुरुषों के पात्र आदर्श दो हैं ॥ ६॥ इसफ कद सूर्योग्य हानके समप सूर्योपस्पान करते और अपने यस्वरूप देवता, ऋषि तपा पितरों पण परत । घेन्ना उमममनोमा साथीनो मौक्तिकसमाम् । फिर कुछ यात्रों और प्रामगों विधिक पूजा फरते। इसक र म मनसी श्रीकृष्ण दुधार, पहल- पपस्विनीना गृष्टीनां सपत्साना सुवाससाम् ॥८॥ पहन ग्यापी हर डोपाठी सीपी-शान्त गौओंर गन फरते । उस समय उन्हें मुन्दर मन और मनिपारी माग्य पहना दी जानी । सौगमें साना और मुश्मे ददी सप्पनुराग्राणां धीमाभिनतिलं सा। चारी मानी जाती । व ग्रामगोका बाभूषणोंसे मुसति करके रेशमी क्स, मृगचर्म और मिटके माय भटकतेम्पा विषम्यो रद पई दिन दिने ।।९॥ प्रतिदिन तेरह हजार चारासी गौएँ इस प्रकार गन करते ॥ ७-९ ॥ तानन्तर धानी विभूतियप गो, गापिपदयमापदगुरुन् भूतानि सपा । दमता युउफ यान, गुरुनन और समस्त सम 1२ सान् गुरुन् । प्राग २७१- ५६२ भीमद्भागवत [.. नमस्तस्पात्मसम्भूतीमगलानि समस्पृश्यत् ॥१०॥ प्राणियोंको प्रणाम करके मालिक वस्तुओका स्म करते ॥ १० ॥ पीक्षित् । यति मगवान्के शरीरमा मात्मान भूपयामास नरलोकविम्पणम् । साज सौंदर्य ही मनुष्य-अक्का कलर है, फिर वासोभिपणैः स्वीयैदिव्यनगनुलेपनै ॥११॥ भी वे अपने पीताम्मादि दम्प पश, कौस्तुमदि भाभूषण, पुर्योके हार और चन्दनानि दिम्य रणसे यवेक्ष्पान्य सवाऽऽदर्श गोपनिबदेषताः। अपनेको बामूपित करते ॥ ११ ॥ इसके बद वे भी धौर दपणमें नफ्ना मुखारविन्द देस्ते, प, केक, कामाम सवर्णानां पौरान्तःपुरचारिणाम् । प्रामण बौर देवप्रतिम नोंका दशन करते । फिर पुरपासी पौर पन्त पुरमें रहनेवाले चारों वर्गों मेगोंकी प्रदाप्प प्रकृतीः कामः प्रचोप्य प्रत्पनन्दत ॥१२॥ बमिळाषाएँ पूर्ण करते और फिर अपनी क्स (प्राम प्रसी) प्रनाकी कामनापूर्ति करके उसे सेवा सविभज्यातो पिप्रान्सकतामूलानुलेपनै । करते और इन सबको प्रसन देखकर स्प बात ही धानन्दित होते ॥ १२ ॥ ये पुरमात्र, सम्मू, सरदः प्रकृतीर्दारानुपायुत तत स्वयम् ॥१३॥ पन्दन और भाग भादि वस्तुएँ पहले बामम, ससम्म सम्बन्धी, मश्री और रानियोंको घाट से और उनसे वापत् सप्त उपानीय स्पन्दनं परमानुतम् । बची हुए स्वयं अपने काम मते ॥ १३ ॥ भगवान् यह सब करते होते, तक्तफ दाहक नाममा सारी सुग्रोवायैर्युक प्रणम्पावस्थितोऽग्रस ॥१४॥ | सुग्रीय भादि घोपोंसे जुता हा अपम्त अहन व ने बाता और प्रणाम करके भगवान के सामने एम गृहीत्वा पाणिना पाणी सारपस्तमधारात् । हो जाता ॥ १५ ॥ इसके बाद भगवान् श्रीम सस्पति और उसमीके साप अपने हापसे मरीका सात्यक्पश्मसंयुक्तः पूद्रिमिव भास्कर ॥१५॥ हाथ पकाकर रपपर सवार होते-टीक बसे ही मैं मुमनभास्कर मगवान् सूर्य उदयाचलपर असा होते इक्षिसोऽन्मापुरस्रीणां समीरप्रमवीक्षितः । ६॥ १५॥ उस समय रनिवासकी मिया म्न एवं प्रमसे भरी पितानसे उन्हें निहारने लगती और को कन्छा विसृष्टो निरगाआतहासोहरन् मन ॥१६॥ करसे उन्हें क्दिा परती । भगवान् मुस्कराकर मरे पित्तको घुगते हुए म्हटसे निफरते ॥ १६ ॥ सुधर्मास्यां सभा सबैप्मिभिः परिवारित । पपीक्षित् । तानम्तर भावान् भीकन समस्त यदुपशि के साथ सुधर्मा नामकी सभमे प्रवेश करते। प्राविसद्यनिषिष्टानां न सन्त्यम पहर्मयः॥१७॥ उम सभाकी ऐसी महिम्न है कि जो सोग उस सम्प्रमे जा से २, उन्हें मम्म-पास, शोक-मोह और जरा- सत्रापषिष्टः परमासने विस मृत्यु- ये उर्मियों नहीं सताती ॥ १७ ॥ (स प्रशर भगवान् श्रीराग सब गनियोंसे अगसम वित होकर पफ ही मप सुधर्म-सभामें प्रवेश करते भी स्वभासा पहुभाऽपभासयन् । और यह अफर श्रेष्ठ सिंहासनार सिन गाते । ममी १ रमनो भूगने १२ श्रीधर 11 मे थिम्मन् ।

ब०७०] दशम स्कन्ध ५६३ पतो नृसिहर्यदुभिर्यचमो अकान्तिसे Pशाएँ प्रकाशित होती रहती । उस पपोडराजो दिवि सारफागण ॥१८॥ समय यदुवंशी धीरोंके बीचमे यदुवंशशिरोमणि भगवान् तत्रोपमन्धिणो राजन् नानादास्परसर्षिभुम् । धोगकी एसी शोम्म होती, नैसे आकाशमै तारामे घिरे हुए चन्द्रव्य शोमायमान होते हैं ॥ १८ ॥ उपतस्धुनटाघापो नर्तस्पस्ताणः पृथक् ॥१९॥ | परीचित् ! समामें विपक्रोग विभिन्न प्रकारक हास्य विनोदसे, नटाचाय थमिनयसे और नर्तकिया पयार्ण मृदत्वोणामुरखवेणुतालदरस्वनै नृत्योंसे बा-अछग अपनी टाटियोंके साथ मगधन्यी सेवा करती ॥ १९ ॥ उस समय मम, वीणा, नन्तुर्जगुस्तप्पुष मतमागधवन्दिन ॥२०॥ | पखवन, बासरी, मान और शा वान टगते बार स्त, मागत्र तया पदीयन नाचत-गत और भगवान्की सत्रामामणाः कषिदासीना प्रम वादिनः। स्तुति करते ॥ २० ॥ कोरको म्यम्याकुशाल प्राण याँ ठकर वेदमत्रोंकी ज्याम्पण करत और कार पूर्वेपा पुम्पयशसा रामा पारुपयन् कयाः ॥२१॥ पालीन पवित्रकीर्ति नरपतियोंके चरित्र का कहकर सुनाते ॥ २१ ॥ सप्रेक पुरुषो राजनागतोऽपूर्यदर्शन । एक दिनकी बात है, सरकापुरीमं राजसभाक द्वारपर एक नया मनुप्प वाया । द्वारपार्थेने मगवान्का विनापितो भगवते प्रवीदार। प्रवेशितः ॥२२॥ उसक बानकी सूचना देक्न उसे समाझ्यनमें उपस्थित स नमस्तत्म हप्णाय परेशाप तालि। किया |॥ २२ ॥ उस मनुप्यने परमेघर भगवान् श्रीकृष्णको हाप जोपर नमस्कार किया और उन राजाओंश, स्निहोंने जरासन्धक बिपक समप टसक गमामावेदयद् तु म्प जरासं धनिरोधबम् ।।२३।। सामन सिर नहीं झुकाया ए बार क्यफ फेर कर लिये गम्य प, जिनकी सन्या बीस दनार भी, ये व दिमिजपे सस्य सनतिं न युपाः । जरासन्धक बंदी बननका दस धीकृष्णक सामने प्रसप रुदास्तेनासम्मपुते 5 गिरिनते ॥२४॥ निब न क्यिा-॥ २३-२१ ॥ सचिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ' अप मन और गणीके अगोचर है । बा आपकी कारणमें वाता है, उसक सारे भप आप नर उप्प रुपणाप्रमयारमन् प्रपमभयमलन । हमारी भर-युदि मिटी नहीं है। ये त्वां शरण यामो भयभीताः पृथग्पिप ॥२५॥ हम स्म-मायुरूप संप्तारके घमसे भयभीत होकर मापकी शरणमें भाय है ॥ २५ ॥ मापन् ' अनियति तात्र विक्रमनिरत कुसल प्रमत्त जीव ऐसे मराम भार निविद कमि मेि हुए हम ये आपके लयये हुए अपने परम पयागरी कम कमप्पयं स्वदिते भवदर्षने स्व । आपकी उसनासे रिमुख हो गप और अपने जीन एवं जीबनसम्पधी आशा-अमिदाआम यम्तावदम्य यलवानिा जीविवाश रह है। पन्तु वाप बर यान् है । आप सामे सा-सबा सार न रहया उनकी जाशाग्यमा तरत मदग्छिन पनिमिपाय नमोऽस्तु तस्मै २६ ससून उष्ण पर म | हम अस्क उम पर दम है। प्रमो बम-मरक १म्परा 1२ परि।

५६४ भीमनागपत [२०७० लोके भषाजगदिनः फलयावतीर्णः फाउझपको नमस्कार करते है॥ २६ ॥र समै मादीपर है और आपने अगढमें अपने बान, कर बादि कम्पोंके साथ इसध्येि बक्तार प्रण किया सद्रक्षणाय खलनिग्राणाय पान्यः। है कि संतोंकी रक्षा करें और दोंको दणदें। ऐसी अवस्थामें प्रमो ! परासन्ध मादि कोई दूसरे राग आपकी इच्छा चौर आरके विपरीत हमें कैसे करे कमित् स्वदीपमविपाति निदेशमीश रहे हैं, यह बात हमारी सम्झमें नहीं आती। यदि व कहा जाप कि जरासन्ध हमें का नहीं देत, उसके किंवा मनः स्वकसमुच्छति सम विष॥२७॥ ने दुख पहुँचा हे हैं, तो यह मी येक नया । रूपमें-उसे निमित्त मनाकर हमारे बाम कर्मी | क्योंकि जब हमलोग आपके पपने है, तब हमरे समापितं नृपमुस्ख परतन्त्रमीश दुर्म में फल देनेमें कैसे समर्प हो सकते है। इसलिये बप क्या करके वास ही हमें इस मसे मुछ कीनिये ॥ २७ ॥ प्रभये । हम जानते है कि स्पायेन मृसकेन धुर वहाम । रामापनेका मुख प्रारम्धके अधीन एवं विपसप्प है। और सघ करें तो सम-मुम्के समान मयत हिस्सा सदास्मनि मुख स्वदनीहसम्म और असत् है । साथ ही उस मुम्मो वेगनेवाला व शरीर भी एक प्रकारसे मुर्दा ही है और इसके के सदा सर्वदा सैकड़ों प्रकारके भप लगे हते हैं । पर किश्यामहेऽतिकपणास्तव मापयेह ॥२८॥ इम तो इसीके द्वारा माल्के अनेकों मार डो रहे । और यही कारण है कि हमने क्न्त करमके निष्काम मा वौर निस्सारस्प स्पितिसे प्राप्त होने पने काम सभी भवान् प्रणवठोकाराविपुग्मो मुखका परित्याग कर दिया है। सचमुच हम वापत बहानी है और आपकी मायाके फदेमें फंसकर - पर देश भोगते जा रहे हैं ॥ २८ ॥ मगन् ! कार पदान् विपुत्व मगपाइपफर्मपापात् । चरणकमल शरणागत पुरुषों के समस्त शोक और माहोंको मह कर देनेवाले हैं। इसध्येि वाप या मुमजोऽयुतमतङ्गाजवीर्यमेका भास्वरूप कमेकि मधमसे हमें कुलपये । प्रमो । या मोल ही दस हजार हापियोंकी शकि रसा। चौर हमलोग्नेको उसी प्रकार दी मनाये दुर मैसे विन सोधमवने मृगारियावी॥२९॥ सिंह मैदोको घेर रस्से ॥ २९ ॥ चक्रपाणे ! बाने भयारह पर जरासम्बसे पुर किया और साम यो वे स्वया दिनबस्व उदरामचक्र उसका मान-मईन करके उसे मेष दिया । परन्तु एक कर उसने वाएको जीत मिया । हम जानते है , सापकी शक्ति, पापका का पीस बनन्त है। सिर भन्नोमपेसाछु भवन्तमनन्तपीर्यम्। मी मनुष्योंका-सा कारण करते ए वाफ्ने हारने २०७०] ५६५ दूत उवाच जित्वा नूलोकनिरत सकढदो अमिनय किया । परन्तु इसीसे उसका धर्मडम गया है। हे अजित । अव पर यह बानकर हमलोगोको और मी सताता है कि हम बाफ्के भक है, पापकी प्रचा है । म वापकी वैसी इष्य हो, रेसा युप्मत्प्रजा अति नोऽत्रित तद् मिहि ॥३०॥ कीबिये ॥ ३०॥ दूतमे कहा- भगवन् ! जरासन्धके मंदी नरपतियोंने इस प्रकार वापसे प्रार्थना की है। ये आपके इति मागपसलमा भवदर्शनाङ्गिण । चरणकमकी शरणमें हैं वोर मापका दर्शन घाइते हैं । थाप पा करके उन दीनोंका पल्याण अपमा पादमूल ते दीनानां शं विधीयताम् ॥३१॥ कीनिये ॥ ३१ ॥ मीसुफ उवाप भीशुकदेवजी ते ?--परीक्षित् ! राजाओंका दूत इस प्रकार कही या था कि परमतेक्खी राजते ध्रुवत्पेव देवर्षिः परमपुतिः । देवर्षि नारदजी यहाँ का पहुँचे । उनकी मुनहरी | बटाएँ चमक रही यो। उ देखकर ऐसा मादम हो पिन पिङ्गापटयभार प्रादुरातीद पपारविः ॥३२॥ रहा पा, मनो साक्षात् भगवान् सूर्य ही उदप से गये हों ॥ १२ ॥ ममा धादि समत येकपाक तपन भगवान् रुग्ण सर्वलोकापरेपरः । एफम्पत्र स्वामी म्मावान् श्रीकृष्ण में देससे री समासदों और सेवक साप हर्पित होकर ठळ सो पुए और बन्द उत्थित शीर्णा ससम्पासानुगोसदा॥३३॥ | सिर मुकाकर उनकी बन्दना करने लगे ॥ ३३ ॥ जय देवर्षि नारद बास्न खीकार करके बैठ गये, तब भगवान् सभापपिता विधिवत् कृतासनपरिग्रहम् । ने उनकी विविश्वक पूज्य की और अफ्नी घनासे पभापे सूनुर्वाम्यैः पदमा सर्पयन् मुनिम् ॥३४॥ ठनको सम्तुए करते हुए वे मधुर वाणीसे बोले-॥३४॥ 'देव ! इस समय तीनों में कुश मा सोई अपि विदच लोकानां प्रयाणामताभयम् । न ! आप तीनों में विचरण करचे रावेर, इससे हमें पद बद्त पा ख्यम कि घर बैठे समका समाचार ननु भूयान् भगवता लोकान् पयटतो गुण ॥३५॥ मिल जाता है॥ ३५ ॥ इपरके द्वारा रचे हुए तीनों कोम ऐसी कोई बात नहीं है, जिसे बाप न जानवे न हि तेऽविदिसं मिचिल्लाकैप्पीभरका । हो। या हम बारसे पर जनना बाइसे हैक युधिष्टिर आदि पाणर इस सम्म क्या करना पाइते अध पन्हामहे युप्मान् पाण्डमानांचिकोपितम्॥३६॥ ॥ ३६॥ श्रीनारद उमात्र दपि मारपसीना-सवल्यारक अनन्त ! सार विचफ निर्माता है और इतने पड़ मापारी है कि यह स्य मया ते यशा दुरस्यपा मा मायावी प्रची पारि भी आपकी मपारा पर नहीं प्रसस्त प्रमा धार सबक घर ममें भरनी माया विभो निमजय मायिनः । मरिस्य शकिसे म्पस यत है. टीम से ही, जैसे भीममामयत [.. । मतेम्मपरत स्पशक्तिमि अम्नि कापियोंमें अपनेको हिमाये रहता है। व्यग्मी दहि सव वादि गुणोंपर ही अटक चाटी है, इससे नहरिषच्छभरुषो न मेछुतम् ॥३७|| आपको ये नहीं देख पाते । मैने एक बार नहीं, को वार आपकी माया देखी है। इसध्येि आप जो में तवेहित कोऽर्हति साधु वेदित अनजान बनकर पाणयोंका समाचार झते हैं, इम्से मुझे फो कौवाइल नही हो साग ३७ ॥ मान् ! स्वमाययेदं सुजतो नियन्छ । आप अपनी मायासे ही इस जगत्की रचना और संहार करते हैं, और भापकी म्याके कारण ही पासप पद् षियमानात्मतयापभासते होनेपर भी सस्पके समान प्रतीत होता है । अप कर क्या करना चाइते हैं, यह बात मलीमति कौन सना तस्मै नमस्ते स्वपिलषणात्मने ॥३८॥ सकता है। पाएका स्वरूप सर्व अचिन्तनीय है। में तो केवल बार-बार मापको नमस्कार करता हूँ ॥३८॥ वीनस या ससरतो विमोक्षणं शरीर और इससे सम्बन्ध रखनेवाय वास्नामि फस्कर जीव ममा मृत्युके चकरमें मटका राता है त पर बानतोऽनर्यवहाच्छरीरतः। नहीं जानता कि मैं इस शीरसे फैसे मुज हो सकता हूँ। वासपमें उसीके हितके लिये बाप नाना प्रकार के लीसावधा सपन:प्रदीपक लीपवतार ग्राण करके वपने पवित्र पशका दीपक ना देते हैं, बिसके सहारे कब इस अनर्थकारी शरीरसे प्राज्यालयत्त्वा तमहं प्रपथ ॥३९॥ मुक्त हो सके । इसध्येि में आपकी शरणमें हूँ ॥३९॥ प्रभो ! आप स्वयं परमम है तपामि मनुष्योंकी सी अवाप्याथावये प्रम नरलोकपिरम्पनम् । स्पश्चाका नाटप करते हुए मुझसे पक रहे हैं । इसलिये वाफ्के फुफेरे मई धौर प्रेमी मल राना युधिष्ठिर प करना चाहते हैं, यह बात में वापको सुनाता हूँ ॥१०॥ राठ पैप्पसेपख भक्तस्य च विकीर्पितम् ॥४०॥ इसमें सदा नहीं है बालेको किमीको जो भोग प्राप्त हो सकता है, वह राम युधिषिको यही प्राप्त यत्पति स्वां मखेन्द्रेम रावस्येन पापः। है। उन्हें किसी वस्तुकी कामना नहीं है। फिर भी मे पारमेष्ठपकामो नृपतिस्तद् भवाननुमोदताम् ॥४१॥ श्रेष्ठ या राजसूपके द्वारा यापकी प्रासिक येि आपकी वाराधना करना चाहते है। आप कम करके उनकी वमिन् देव ऋतुवर भवन्त नै सुरादयः । इस अभियपाका मनुमोदन कीजिये ॥ ११॥ मगान् ! उस श्रेष्ठ यहमें आपका दशन करनेक किपे बाबा दिप्सवः समेप्पन्ति राजानम पशस्विनः ॥४२॥ देना और यशस्त्री नरपतिगण एकत्र होंगे ।। १२ ॥ प्रमो ! आप स्वयं विज्ञानानन्दफ्न प्रच है। आपके भषमा कीर्तनाद ध्यानात् पूपन्वेऽन्सेषसारिन । मण, कीर्तन और प्यान करनेमात्रसे अस्पन भी पवित्र हो बाते हैं। फिर जो आपका दर्शन और स्पस प्राप्त वम प्रममपस्येश विश्लेषाभिमर्शिनः ॥४॥ करते हैं, उनके सम्बन्धमे तो कहना ही प|४ म. ७१] दशम स्कन्ध ५६७ यस्सामल दिवि यश प्रपित रसायां रिमुवनमाल ! आपकी निर्मठ कीति समस्त दिशाओन या रही है तथा वर्ग, पृष्पी और पातसमें म्पासा भूमी पवै सपनमङ्गल दिग्विवानम्। रही है, टीक वैसे ही, जैसे थापफी चरणामृतधारा मन्दाकिनीति दिवि भोगवतीसिधाधो क्षम मदापिती, पातालमे मोगपती धौर मस्यख्येपर्म गाविषेह चरणाम्प पुनावि विधम् ॥४४॥ गाक नामसे प्रवाहित होकर सारे विभको पवित्र कर रही है ॥ ११॥ भीनुक उपाय श्रीगुकायसी कहत है-परीक्षित् ! सम्पमें जितन पदपशी बटे थे, वे सव इस यतके दिय अस्पत समुफ हो रहे थे कि पहले जरामधपर पार करक सत्र तप्यास्मपक्षप्वगृहस्सु पिनिगीपया। उसे जीत लिया जाय । मत उन्हें नारदनीकी क्त पसंद न आपी । तब प्रक्षा आरके असक मायन् श्रीकृष्णने तनिक मुसकराकर ममी मीटी पाणीमें उदय- पाप परी मयन् मृत्पादय प्राइ फेडप ॥४॥ जीसे यदा-॥१५॥ श्रीभगवानुपाय भगवान् भीष्प्णन कहा-'उदा ! मुम मर हितैषी मुर हो। तुम सम्मति दनेपासे और कार्यक तत्सकोमटी- त्व दिन परम चनु सुरन्मन्यातम्वचित् । मति समझनवाने हो, इसीपि हम तुम्हें अपना उसम नत्र मानते हैं। श्वनुमोक्ताओ कि इस नियमें हमें क्या अधार मनुष्य भाम फरपाम वद ॥४६॥ करना चाहिये । तुमारी पातर हमारी बा । इसत्रिय इम मुम्हारी सयरक अनुसार ही काम करेंगे ॥२॥ रस्पुपामन्यिता भयो सवमनापि मुग्धवत् । वर उदयनीने देखा कि भगवन् श्रीनाम सपा हानेर | भी अन मानसी तरह सहक रह, तर ये उनकी निदेश शिरमाऽभाप स्वब प्रत्पभापत ||४७) आजा शिधाप फरफ जल || २७॥ रते श्रीमद्भागवत महापुराणे परमाईत्यो सहितापा मस्त्य उपगधे भावपानवियर सप्ततितमाऽप्याप ।।७० ।। अर्थकसप्ततितमाऽध्याय भीरप्पभगवानसम्मम्य पधार भी यसरी पत-शत् । मापन पी उराप श्री यमन मुनर म्हात जान , इत्पुर्दारितमामप दारूदवाऽयवान् । नार" म मान् भी मार पिचर सम्पाना ममायाप रुष्णस्य ५ महामति ॥१॥'#िरि पदन ग॥ 1 पान ने मचर ममनन भोर भन्न भ -3 da। - ५६८ श्रीमद्भागवत [4. उष उपाय ग्राषजीने कहा-भगवन् ! देवर्षि नारदबीने का को यह सभह दी है कि फुफरे माई पागोंके रामसूप यदुक्तमपिणा देव साचिन यात्मतस्स्वया । यामें सम्मिलित होफर उनकी सहायता करनी चाहिये । उनका यह कपन टीक ही है और साथ ही या में काप पैतृप्यसेयस रक्षा च धरणेपिणाम् ॥२ ।। टीक है कि शरणागतों की रक्षा अवश्यातव्य है ॥२॥ प्रमे ! जब हम इस दृलिसे विचार करते हैं कि राजसूप मटम्म राघस्येन विश्वक्रवपिना विभो । या ही कर सकता है, वो दसों दिशाओंफ्र विम्स प्राप्त कर ले, तब हम इस निर्णयपर बिना किसी दुनिथके पांच पाते हैं कि पाणयोंकि यह और शरणपोली अवो जरासुखमय उभयार्थो मतो मम ॥३॥ रक्षा दोनों कामों के रिये जरासन्धको जीवना अम्पक है॥३॥ प्रभो ! केल जरासन्धको जीत लेनेसे ही असा च महानों तेनैष भपिम्पति । हमरा महान् उमेश्य सफल हो बाया, सब दी राजयोंकी मुलि वीर उसके कारण अफो पक्षध तय गोविन्द रामो पदान् पिसन्नतः॥४॥ एपशकी भी प्रामि हो जायगी ॥ १ ॥ राम बरामद का-पड़ ग्रेगोंके मी दाँत सो कर देता है, क्योंकि स पै दुषिमहो राजा नागापुतसमो पले । दस हजार पापियोंका का उसे प्राप्त है। उसे यदि हरा | सकते है सो केपउ भीमसेन, क्योंकि वे भी वैसे ही बलिनामपि चान्येपां भीम समबलं बिना ॥५॥ कल ॥ ५ ॥ उसे माम्ने-सामनेके युरमें एक भी जीत से, यही सबसे पण। सौ अक्षौरिणी सेना टैरये स तु जसम्मो मा पवाषौरिमीयुतः । कर जब वह युके म्येि सहा होगा, उस समय से बीवना अासान न होग्न निरासन्ध बहुत बड़ा प्रमगमक अपप्पोऽम्पर्धितो विप्रैर्न प्रत्यास्पाति माहिचित् ।। कमी रामान नहीं देता ॥ ६ ॥ इसलिये है। यदि ग्रामण उससे किसी पातकी याचना करते हैं, भीमसेन मामणके वेपमें जाय और उससे मुस्की भिक्षा अमवेषपरो गस्वा स भिधेत कोदर । मागे । भगवन् ! इसमें सन्देदे नहीं कि यदि वापकी परिति भीमसेन और मान्धका इन्स्युर हो, सो इनिप्पति न संदेहो प्रेरये सव सनिधी ॥७॥भमसेन से मार रंगे ॥ ७॥ प्रभो ! आप सर्व शक्तिमान् रुपादित फालखरूप है। किसकी सः निमिर्च परमीशस विषसर्गनिरोधयोः । | बौर प्रम्य अपनी ही शकिसे होता है। प्रथा और शाहर तो उसमें निमितमात्र हैं। (इसी प्रकार जरासम्म हिरण्यगर्मः सर्वम फालसारूपिणस्तष ॥ ८ ॥ का वध तो होगा वाली शळिसे, भीमसेन के उसमें निमितमात्र नेगे) ॥ ८ ॥ कम इस प्रकार का गापन्ति ते विश्वकर्म गृप देन्यो | जरास्यका वध कर रारेंगे, तब कैदमें पाए राजाभ- की रानियों अपने हमें बपकी इस निमुद का गान करेंगी कि आपने उनके शत्रु नाश फरश्य और रामा सम्वधमारमनिमोधनं च । उनके प्राणपसियों को छुड़ा दिया । येक पैसे ही, से ।

म० ७१] गोप्यम कुमारपतेर्जनकात्मजायाः गोपियों कबसे छुपानेकी लीका, पापके शरणागत मुनिगण गजेन्द्र और बानकीजीके उदारकी टीस्यका तपा हमस्योग थापके माता-पिताको फंसके कारागारसे पिम्रोम लन्धरणा मुनयोवयं च ॥ ९॥ मानेकी ठीअफा गान करते हैं ॥ ९॥ इसध्येि प्रभो । जगन्धका षध स्वय ही बहुत-से प्रयोक्न सिद्ध कर देगा। बंदी नरपतियोंके पुष्प-परिणामसे अषमा चरासम्बके बरासधवधा कप्प भर्ययोयापकल्पते । पाप परिणामसे सबिनम्दस्वरूप श्रीकृष्ण ! आप भी तो इस सम्प रानस्य याका होना ही पसंद करते हैं प्रापा पाकषिपाकन तय घाभिमतः ऋतु ॥१०॥ ( इसठिये पहले आप वहीं पधारिये )॥ १० ॥ मीमुफ उपाच मीशुकदेयभी करते हैं परीक्षित् ! उदक्जीकी यह सत्यह सब प्रकारसे हितकर और निर थी। इस्पषषचा राबन् सर्वताभद्रमन्युप्तम् । देषषि नारद, पदुषशके वो-बूद धीर स्वयं भगवान् वपतिवाय कृष्ण प्रस्यपूजयन् ।।११॥ श्रीकृष्णने भी उनकी बातका समर्थन किया ॥ ११ ॥ मपादिशत् प्राणाय भगवान् दपकीसुत । कब अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने मसुदेव आदि गुरु- मृत्पान्दायकवादीननुझाप्प गुरून विध ॥१२॥ नोंसे अनुमति सेपर दारूक, जैन आदि सेयकको एम्बप्रस्म जानेकी तैयारी करनके ठिये भाव दी॥१२॥ निर्गमय्यारोषान् स्वान् सप्तान सपरिच्छतान् । इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने यदुराव उपसेन और संकर्पणमनुक्षाप्य पदुरावं घ शपुरन् । कलरामजीसे बचा कर मल-रयोंके साए रानियों और यसापनीतं स्वरथमाला गरमञम् ।।१३।। | उनके सब सामानरसे आगे क्या दिया और फिर दायके ततो स्थद्विपभटसादिनायकै लाये हुए गायन रयपर स्वयं सपर हुए ॥ १३ ॥ इसके बार रयों, हापियों, घुइसवारों और पैदोषी फरालया परिपत आत्मसेनया। वही मारी सेनाके साय उन्होंने प्रस्थान किया । उस मृदङ्गमेयानमगोम समय मृग नगारे, डॉल, शव बोर नरसिंगकी ऊँची प्रषापपापितककुभा निराक्रमत् ॥१४॥ पनिसे सों श्मि गूंन की ।। १५ ।। सतीशिरामगि समिमगीजी आPि सहस्रों धीरज पहिर्या अपनी ससानों- नुवाजिनाञ्चनशिरिकाभिरभ्युम के साप मुन्दर-सुन्दर वसामूपण, पदन, अगराग और सहात्मजाः पतिमनु सुग्रता ययुः। पुष्पोंके हार वारिसे सम्यनरत गठियों, रों और सानेकी बनी हुरपालकियोंम परपर अपने पतिदय मगधन् पराम्पराभरण विलपनस्रजः श्रीकृष्णक पीछ-पीछे पी। पदय सिपी हायाम गर सुमपता नृभिरसिपर्मपाणिभिः ॥१५॥ तपार लेयर उनकी रक्षा करते हुए पर रह ॥१५॥ नराष्ट्रगामदिपग्धरास्ववयन - इसी प्रकार अनुचरोपी शिया वर बागलाना मन्यमति फरणुभि परिजनमाग्योपित । झार फाफ म वाग्मिी भोपड़ियों, मानि-मानिक नयुओं, नामों को और पाइने निधन आगिकी पलाना करिकम्पलाम्परा साममियों ने मो, गधा और पगेंस परफर घुपम्फग यपुरपिपन्य सवन ॥१६॥ नम वर्ग मी यहा मोर विनियोपर उ7 मम २.७२- ५७० भीमद्भागवत [. वलं शापमपटछपधामरै सवार होकर पी ॥ १२ ॥ जैसे मगरमों और व्हरोंकी उछादसे मुन्ध समुद्रकी शोभा वी । परापुधाभरणकिरीटधर्मभिः ठीक वैसे ही अपन्त फोव्याह से परियम, फास्ट ई बड़ी बड़ी फ्ताफाबों, छचों, चबरों, मेट कामों दिवांशुभिस्तुसलर पमो रखे पमाभूषणों, मुकुटा, फापों पौर दिन के समय अपर यथार्थवावमिततिमिकिलोमिभिः॥१७॥ पम्ती हुई सूर्यको किरणेसे मगवान् श्रीकृष्णकी सेन अत्यन्त शोमयमान हुई ॥ १७ ॥ देवर्षि नारदजी अथो मुनिर्यदुपतिना सभाजितः भगवान् श्रीकृष्णसे सम्मानित होकर सौर उनके नियम मुनकर यनुत प्रसम पुए। मगान्के दर्शनसे उनका प्रणम्म त हदि विदपद विहायसा। दय और समस्त इन्द्रियाँ परमानन्दमें मन्न हो गया। विदा होनेके समप ममान् श्रीकम्पने उनका माना निशम्प तदम्पपसितमाहवाईयो प्रकारफी सममियोंसे वन किया । अब देवर्षि नारदने ठने मन्दी-मन प्रणाम किया और उनकी हिम्म सकुन्दसंदर्भननितेन्द्रियः ॥१८॥ | मर्विको एपमें धारण करके भामाशमसे प्रस्थान राजदूतम्बावेद भगवान् प्रीणयन् गिरा। | किया ॥ १८ ॥ इसके बाद भगवान् भीष्मने मरासपके बंदी नरपतियोंके दूतको वपनी मधुर वाणीसे कायसन मा मष्ट दूत भद्रं षो पातयिम्पामि मागधम् ॥१९॥ नारो मत । म लोगोंका फम्याण हो । में | देते हुए कहा—'दूत 1 तम वपने रानामोंसे सत्र इत्युक्तः प्रस्सितो तो पथावदषदन्नृपान् । मासन्धको मरवा गग्गा ॥ १९ ॥ मगवान्की ऐसी वाका पाकर पा दूत गिरिम्न पत्र गमावीर नरपतियोंको भगवान् श्रीकृष्णका सम्देश ग्यों-का-त्यों मना दिया । तेऽपि संदर्शन शौरे प्रस्पैयन् प समक्षपः ॥२०॥ ने राना भी फारागारसे छूटने के लिये सी-से-पणि भगवान्के शुभ दर्शनकी पाट चोड़ने को ॥ २० ॥ पानसौवीरमरून्ती विनशन हरि। परीक्षित् | अब भगवान् श्रीकृष्ण बात, सौवीर, मह, कुरुक्षेत्र और उनके बीच में पानेकाले पति, मदी, गिरीन् नदीरतीयाप पुरग्रामव्याकरान् ॥२१॥ | नगर, गाँव बहीरोंकी पस्तिपा सपा सानों को पार करते र आगे बने मो ॥ २१॥ भगपन् सवा परती तीवो मान्दोऽध सरस्वतीम् । मुकुन्द मार्गम रक्ती एम सरमती मदी पार करके पाशास और मास्प देशाम होते र एमास मा पश्चासानप मस्स्पांच शमप्रस्थमयागमत् ॥२२॥ पहुँचे ॥ २२ ॥ परीक्षित् ! मावान् श्रीकृष्णका दर्शन अस्पन्स दुर्गम है। गाबमास महाराज युधिष्ठिरको यह वमुपागवमाफर्म्य प्रीतो दुर्दर्शन नुपाम् । समाचार मिल कि मगलान् श्रीकृष्ण पार गरेन उनका रोम रोम वानन्दसे - व्य । अपने वाचार्यों बौर सन-सम्बन्धित साम भगवान्की अजातशत्रुर्निरगात् मापाम्मायः सुतः ॥२३॥ वगवानी करनेके मिये नगरसे मार वाये ॥२१॥ मा गीत गये जाने लगे, पजे ने मो, मापसे गीववादिषपापण मामण मिरकर ऊचे स्वरसे मेमोश उमरण करने प्रधषापेण भूपसा।

भ०७१] दक्षम स्कन्भ ५७१ अभ्ययात् स स्पीच प्राणाः प्रागमिषासः ॥२४॥ (लगे। इस प्रकार से बह आदरसे पीकेश मगवान्का स्वागत करनेके म्मेि चले, वैसे इन्द्रियों मुख्य प्राणसे घट्ना विलिमादयः कुर्ण स्नेहन पान्हा। मिने ना सी हो ॥२०॥ मगवान् श्रीकृष्णको देस- कर राजा युधिष्ठिरका र स्नेहातिरेकसे गद्गद हो चिरा रटं प्रियतम सखजेऽभ पुनः पुनः ॥२५॥ गया । उन्हें बहुत Pोपर अपने प्रियतम मावान् भीषणको देखनेका सौभाग्य प्राप्त नुषा पा । अत वे दोम्पो परिपन्य रमामलाउम भहें बार-बार अपने दपसे उगने भो ॥ २५ ॥ सान्दगात्र नृपतिईसाहमः। भगवान् श्रीकृष्णका श्रीनिमा माक्ती कमीनीका पवित्र बोर एकमात्र निभासमान है। रामा युधिष्ठिर अपनी ठेमे परी नितिमलोचनो दोनों मुनामोंसे उसका मालिन फरक समस्त पाप- प्रोसे छुटकारा पा गये । वे सर्वतोमावेन परमानन्दक हम्पचनर्षि स्मृतलोकषिभ्रम ॥२६॥ समुद्र में मान हो गय । नेत्रमि ोस् छल्म काये, मा वा पुक्ति हो गया, उनें इस विष-प्रपरके भमका वं मातुलेय परिरम्प निर्वतो तनिक भी स्मरण न राह ॥ २६ ॥ तदनन्तर मीमसेनने मुस्कराकर वपने म्मरे माई श्रीकृष्णका मालिान किया । भीमा सपन् प्रेमपाइलेन्द्रियः । इससे उमें बहा वानन्द मिल्य । उस समय उनके दयमै इतना प्रम उममा मि ने नाप विस्मृति-सी यमौ किरीटी च सुरचमं सदा हो गयी । नकुड, सादव पर वर्गुनने भी अपने परम प्रियतम वौर हितैषी मायान् श्रीकृष्णका बड़े आनन्दसे प्राडगाप्पाः परिरेभिरेऽन्यतम् ॥२७॥ आलिङ्गन प्राप्त किस । उस समय उनके नमि माँसुओंकी बार-सी वा गयी पी ॥ २७ ॥ बनने पुन अनेन परिपको यमाम्पामभिवादितः । भगवान् श्रीकृष्णफा बालिङ्गन किया, मकुछ और सादेवने अभिप्रदन मा और सप मगान् श्रीकृष्णने प्रामणेम्पो नमस्कृत्य पढेम्पम पपाईतः ॥२८॥ मामलों और कुरुवशी पोको पायोम्प नमस्कार फिया ॥ २८ ॥ कुक, धाप बार येक्य देशफ नर मानिता मानयामास स्वचयकैकपान् । (पतियोंने भगवान् श्रीक्षणका सम्मान शिप बार भगन् श्रीकृष्णने मी म्नश योचित कर किया । स्त, एखमागपगन्धा पन्दिनयापमन्त्रिणः ॥२९॥ मगध, कहीजन पर प्रापम मगाभी स्तुति करने | यो त ध, नट, विपकवादि मदन , नगरे, मायापटहवीणापणवंगोगग्वैः (बीणा, डोउ और मरसिंग मारवाकर पमनयन भगवान् श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेफ प्रिये नाचने-गन मागाधारविन्दाक्षे तपयनन्तमगुः ॥३०॥ हो । २९३.३ इस प्रकार पम्प लो भगान् धीष्णन अपने सार-सजनोंक साप सम प्रारसे एवं मुनि पर्यस्व पुम्पश्याकशिस्लामभिः । मुसरित बनास नगर प्रत किया। उस समय यंग असमें भगवान् श्रीलकी प्रासा परत पर संस्तूपमाना भगवान् विवेशातात पुरम् ॥३१॥ राये ॥ ११ ॥ १ मा । मानिनो ।। योगुपिः ।

५७२ श्रीमद्भागवत [4. ससिकवर्ल्स फरिणो मगधवायै इप्रस नगरकी सबके वीर गलियों मतपत हाथियों के मदसे तपा मुगन्धित बससे सींच दी गर्म मित्रप्पः फनकतारणपूर्पकुम्मै । पी। जगह-जगह रंग सिंगी मारियों स्गा दी गयी थी। मृष्टात्मभिर्नपदुकठविम्पमस्र सुनहले तोरन चौधे सुए ये धौर सोनेक चलमरे मला स्थान-स्थानपर श्येमा पा रहे थे। नगरके नर-नारी नहा- ग्ग धैर्नृभिर्युषसिभिध विराजमानम्॥३२॥ धोकर तप्त नये वस्त्र, वामपण, पुष्पोंके हार, इ-मुला धादिसे सन-धजकर घूम रहे थे ॥ ३२ ॥ म-घरमै उद्दीप्तदीपपलिभिः प्रतिसपजाल ठौर-ठौरपर दीपक संख्यये गप ये, जिनसे दीमावीमी- सी छटा हो रही थी । प्रत्येक घरफे मरोसे धूपका निर्यातपरुचिरं विलसत्पवाकम् । धूओं निकलता हुया बहुत ही मध्य मदम हो पा । मूर्धन्यमिकल रजतोस् - | सभी घरोंके उपर पताकाएँ फरारा ही पी तपा सानेक फाश धौर चाँदीके शिखर जगमगा रहे थे । भगझन् र्जुष्टं ददर्श भवनैः फरमानधाम ॥३३॥ श्रीकृष्ण इस प्रकारके महयेसे परिपूर्ण पाण्डों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ नगरको देखते हुए भागे यारा प्राप्त निशम्प नरलाचनपानपात्र थे ॥ ३३ ॥ जन युवतियोंने सुना कि मानव नेत्रों के मात्सुक्यविसधितफेसवुकूलपन्धाः । पानपात्र वर्षात् अत्यन्त दशनीय मगान् श्रीक्षण रावफ्यपर था रहे है, तव उनके दर्शनकी मुस्ताके सपो विसृज्य गृहकर्म पीयवस्पे आवेगसे उनकी चोटियों और सादियोंकी गोटें मेरी पर गयी । उनोंने घरका काम काज तो मेरही रिया, द्रष्टु पयुर्पवतय स नरेन्द्रमार्गे ॥३४॥ | सेनार साये हुए अपने पतियोंको भी छोड़ दिया और भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिय रामपर दौड़ तस्मिन् सुसंडल इभाधरधद्विपशिः थायी ॥ ३५ ॥ सम्पर हायी, पार, रब और पाठ कणं सभार्यमुपलम्प गृयाधिस्दाः । | सेना भी टग सी थी। उन वियोंने अयारिपोपर पाकर रानियोंक सहित भगवान् श्रीफम्मका दान नागे विकीर्य कुमुमैर्मनसापगुम किया, उनफ ऊपर पुगेकी पर्ग फीवर मन-ही-मन आडिट्न नि सा प्रमरी मुसकान एन पितकनसे मुम्वागत विदधुरुत्स्मपपीधितन ॥३५॥ ' उनका मुखागत किया ॥ ३५ ॥ मगरकी स्त्रियाँ राम- उनु नियः पधि निरीक्ष्य मुन्दपसी पर चन्दमाफ साय विराजमान ताराओंक समान श्रीकृष्ण- पी पत्नियोंका दम्पकर आपसमें पहन लगा--'सर्य! म्नारायवारपमहा किममार्यमभिः । "न पदागिनी रानिपोंने न जाने पर कौन-सा पुष्प फिम , विसा पारण पुशशिराममि मान् यमनुपां पुरुपमालिरुदारदाम भीरपण अग्न उमुक हास्य और पियसर्ग पटा से लीलारठालयान्सवमासनाति ॥३६॥ उनी और दम्त उनकनमा परम भानमन परत है ॥ ३९ ॥ इसी प्रसर भागन् धीरण गर सत्र वापसमम्प पीरा मगठपागयः । । पपस घ3 स ५ । सान-सानपर पल-से निम्मा ५. ७१ ] दशम स्कन्ध ५७३ चल: सपयों कप्णाय श्रेणीमुस्पा इनस ॥३७॥ । धनी मनी और शिल्पबीवी नागरिकों ने भनेको मालिक यस्तुएँ ख्य-ठाकर उनकी पूजा-अर्घा चौर स्वागत-सत्कार किस्सा ॥ ३७॥ वन्तःपुरजनै प्रीत्या मुकन्दाफुल्ललाचनैः। पन्त पुरफी मियाँ भगवान् श्रीकृष्णको दरस्कर प्रम और आनन्दसे भर गयी । म्न्होंने अपने प्रमविकट और ससम्ममैरम्युपत प्राविभव राममन्दिरम् ॥३८॥ श्रानन्दसे सिसे नेत्रोंके द्वारा भगवान्फा स्वागत किया धौर श्रीकृष्ण उनका स्वागत-सत्कार स्वीकार करते हुए पृथा विलाश्य भ्राय कप्ण त्रिभुवनेश्वरम् । राजमहळमें पधारे ॥ ३८ ॥ सब कुन्तीने अपने विमुक्न पति भतीजे श्रीकृष्णको देख, तब उनका एय प्रमसे श्रीवास्मात्थाय पर्याव समुपा परिपस्वज ॥३९॥ | भर पाया । व पोंगसे उठकर अपनी पुत्रवधू द्रौपदीक साप पागे गपी मौर भगवान् श्रीकृष्णको एयसे लग गोविन्द गृहमानीय दवदवशमाप्तः। लिया ॥ ३९ ॥ देवदेवघर मगवान् श्रीकृष्णको रान । | महसके और लाकर राना युधिष्टिर आदरभाव धार पूजायां नाविदत् कृत्य प्रमादापातो नृपः ॥४०॥ अनन्दक उद्रकसे आत्मविस्मृत हो गये, उन्हें इस पिहप्वमुर्गुरुस्त्रीणां कृष्णपक्राभिवादनम् । | यातकी भी सुवि न रही कि किस ग्रामसे भग्यापी पूमा करनी चाहिये ॥ ४० ॥ भगमन् श्रीकृष्णने अपनी स्वयं पकृष्णया राजन् भगिन्याचाभिवन्दिता मा फुरती और गुरुजनोंकी पत्नियोका अभिवादन किया। उनकी बहन सुभदा बार द्रौपतीने भगवान्को पमा संचादितारुप्मा कप्प्यपत्तीय सर्वशः। नमस्कार किया ।। ११॥ अपनी सास कुत्तीकी प्ररणासे दौरान पस, आभूषण, माय धारिक हारा रक्मिणी, यानरुक्मिणी सस्पीभद्रा जाम्बवती तथा॥४२॥ सत्यभामा जाम्बवती, काशिदी, मिविदा समगा और परम साप्पा सत्या-भगवान श्रीरण की कालिन्दी मित्रविन्दा च सैन्या नाग्नपिती संतीम् । इन परानियाका तया पहा पायी ६ भीषयी क्याम्य रानियोका भी पपापाम्य साकार फिया ॥२२१२ अन्याधाम्पागतापास्तुवासम्खपणनादिभि १४३ माज युधिमिग्न भगवान् श्रीकृष्ण! उनकी सेना, सेवष मन्त्री और पहियाँक साप एस स्थानम टरगया ज्दा मुस निवासयामास धर्मराजा जनार्दनम् । उन्हें निस्प नयी-नया मुम्की सामग्रिपा प्राप्त हों। ससन्य सानुगामात्यं सभा च न नषम् ॥४४॥ अजुनक म्मथ रहमा भगवान् श्रीन गुण व पनका दर परवापर धनिका नम पिया पर मपमुरका तर्पयित्वा माणयन पहिं फारगुनसंपत । उससे पचापा प्र । पर्गशित ! उस मममुरन ही मार युधिमिक ठिय भागमी पानसे र गिप्प मारयित्वा मप यन राष्ट्र दिन्या सभा मता ॥४५॥ सभा नपार का है। ॥ १५॥ भगवान् श्रीराम गगा गुधिप्रियफा आनाम्दत पानक यि या मदीनातर आस कातिचिमासान रायः प्रियचिनीपया। इन्द्रप्रस्में ही ग| मनप-समपार अनुनय साप 1 भदा १ था।

५७१ भीमद्भागवत [..२ - विदरन् स्पमालम फाल्गुनेन भटैसः ॥४६॥ रपपर सवार होकर विहार करने के लिये इयर-उपर कसे | जाया करते थे। उस समय यो-यो गीर सैनिक मी उनकी सेवा के लिये साप साप माते ॥१६॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्पा संहिताय दशमस्कत्ये उत्तरार्ध कृष्णस्पेन्द्रप्रस्पगमन नामकसप्ततितमोऽध्याय ॥ १ ॥ . अथ द्विसप्ततितमोऽध्याय पारके रायस्पपाका मायोजन मीर जपसम्धका सवार भी के उपाय भीशुष्मेवजी करते है-परीक्षित् ! एक इन • एकदा तु सभामध्ये भास्पियो मनिर्भाितः । महाराज युधिष्ठिर माल से मुनि, प्राम, पनियों, बेश्यों, भीमसेन यादि माइपों, पाचा, कुरुके को मायणः क्षत्रिवश्यै(भिभ युधिष्ठिरः ॥ १॥ हों, अति-मधुनों, सम्बन्धियों एष फुनिक सा माचायः इलाममाविसम्मभिवान्पयैः। रामसममें बैठे हुए थे। छनोंने सबके सामने ही मगवान् श्रीकृष्णको सम्बोषित करके पर पृष्षतामेष पैतेपामाभाम्पेदसपाप ह॥२॥ कही ॥ १२॥ युधिष्ठिर पाच धर्मयज पुधिष्ठिरने मा-गोविन्द 1 में सर्व ऋतुगजेन गोविन्द रावस्येन पानीः । रानसूप पाके द्वारा पापका और पापके फरम पर | लिमृतिस्वरूप देवताओंका यमन करमा चाहत। प्रम्ये पक्ष्ये विभूतिर्मनतस्तद् सम्पादय नः प्रभो ॥३॥ थाप क्या करके मेरा या साम्प पूरा कीजिये ॥ ३ ॥ त्वत्पादुके भविरतं परि मे परन्ति कमनाम 1 वापके चरणकमकी पादुकरें समस्त बमामेको मा करनेमाी ।। बोग निम्न प्पापन्स्पमद्रनयने गुचयो गणन्ति । उनकी सेवा करते है, पान और स्तुति करते हैं, वास्तव में वे ही पवित्रामा । मम ममुके पिन्दन्ति ते फमसनाभभमापवर्ग | पारसे छुटकारा पा बाते है । भोर पदिये सांसारिक मायासते यदि समाधिप ईष नान्ये ॥४॥ निपयोंकी भत्पिपा करें, तो उन्हें उनकी म प्राप्ति हे | जावी है। परन्तु जो वायके चरणमस की शरण प्रारम तद् देवदेम भवतपरणारविन्द | नहीं करते, उन मुलियो मिती ही नहीं, सांसारिक सेवानुभाषमिह पम्पतु साफ एपः । मोग भी माही मि॥१॥ देवतके मी गप्पदेश ! में पाहता है कि संसारी समग कपके परणामकी ये त्वां भवन्ति नभमन्स्पुत पाभयपी सेवाका प्रभान देखें। प्रभो ! कुरुवंशी और यद्यपी नरपनिने जोग भापकर भजन करते है और जो निष्ठो प्रदर्भय विभो उम्मजयानाम् ॥ ५॥ मही करते, उनका स्तर बाप जनताको विजय १ एक ।२ पाएपमिलाप । - म.७२] दशम स्कन्ध ५७५ वावे ॥६॥ नागा स्वपरमेदमविस्तष सात् दीमिये ॥ ५ ॥ प्रमो! आप सबके पास्मा, समर्थ और सप यात्मानम्दझे साक्षात्कार , लय हैं। आपमें यह म है और यह दूसरा, यह अपना है और सात्मनः समणः स्वसुखानुभूतेः । या पराया-इस प्रकारका भेदभाव नहीं है। फिर भी जो आपकी सेवा करते हैं, उनें उनकी मायनाके अनुसार फल मिलता ही है टीक से ही, जैसे कायमसकी संसेषता सुरवरोरिष ते प्रसाद सेवा करनेवालेको । उस पाठमें जो यूनाधिकता होती है, ह तो न्यूनाधिक सेवा के अनुरूप ही होती है। | इससे आपमें विपम्ता या निर्दयता बादि दोष नहीं सेषानुरूपमदयो न निपर्ययोऽत्र ॥ ६ ॥ भगवान् भीरुप्मने कहा शत्रु विजयी धमरान ! श्रीभगवानुपाप बापका निपय बहुत ही उत्तम है। रानस्य या करनेसे सम्पग म्पपसित राजन् भपता शत्रुझर्शन । समस्त लोकोंमें फ्फी ममपी कीर्तिमा विस्तार | होगा ॥ ७ ॥ राजन् ! आफ्का यह महायन ऋषियों, फल्याणी येन ते कीर्तिलोकाननु मरिम्पति ॥ ७॥ सिरों, देवताओं, सगे-सम्बन्धिपों, हमें और फहातक पीगो पिटदेवानां सुहृदामपि नः प्रभो । | फरें, समस्त प्राणियोंको अभीष्ठ है॥८॥ महाराज ! पृप्पीके समस्त नरपतियों को बीतकर, सारी पृष्पीयो सर्वेपामपि मूसानामीप्सितः क्रतुराज्यम् ॥ ८॥ अपने वश करक और योषित सम्पूर्ण सामग्री एकत्रित करके फिर इस महायाका अनुष्यन कीनिये ॥ ९॥ पिजिस्प नपतीन् सवान् कृत्या प बगीबशे। महाराज ! बापके चारों भाइ गाय, इन्द्र पादि यक- सम्मृत्य सर्वसम्भारानाहरस्व महामन्तम् ॥९॥ पाठोंके अंशसे पैदा हुए हैं। ये सब-के-सम या पर हैं। आप तो परम मनस्त्री और संपनी ही । बापटोगोंने एते वे मातरा राजन् लाकपालाशसम्भवाः । अपने सद्गुणोंसे मुश अपन पशम फर मिया है। जिन लोगोंने अपनी इन्द्रियों और मनका नाम नहीं किया है, जितोऽस्म्पात्मवता तेजंदर्जया पाऽकतारमभि ।१० ने मुप्त अपन पशमें नहीं कर सकते ॥ १० ॥ सारमें कारबा-से-बम दस्ता मी ठेन, पश, छामी, सौन्दय न फमिन्मस्परं लाफे तबसा यनसा भिया । वीर ऐश्वर्य अगिक करा मरे भकका तिरस्कार महा पर नितिभिमाभिभप दनाऽपि किमु पार्थिव ॥११॥ | समता । मिल पाइ राजा ठसा तिरस्कार कर दे, इसी ता सम्माफ्ना ही क्या ॥११॥ भीमुक उपाय भीगुपयनी कपाते है-परीभित् । मगरमी प्रत सुनकर महाराज युधिष्ठिरफा एप आनन्दसे मर निसम्प भगपद्गीत प्रीतः पृष्ठमुखाम्बुष । गप । टनमा मुकमउ प्रान्ति हो गया । अब नोंने अपने माइपोमा रिलिम्प करना आदापामगवान् मान दिम्मिजयेऽयर विष्णुतापदिनान् ॥१२॥ श्रीगन माण्डोन अन्नी इकिपा सदर फरक टनका १ पार परिपी।

भीमद्भागवत [२०७२ अनमोमातुलेयं मा कृष्ण बानीहि ते रिपुम् ॥२९॥ | इन दोनोंका ममेरा भाइ तथा आफ्ना पुरामा इन्तु म एषमावेदियो रामा बहासोच्चैःम मागधः । हूँ ॥ २९ ॥ जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार वाला परिचय दिया, तब रामा जरासन्ध ठठाकर सिने ज्या । आह चामपितो महा युद्ध सहि ददामियः ॥३०॥ और चिकर माय--'अरे मूर्यो ! परि तु, युद्धी ही इस्लो मैं तुम्हारी प्रार्थना स्त्रीकर मत न त्वया भीरुमा योत्स्ये युधि विक्षवचेतसा । हैं ॥ ३० ॥ परन्तु कृष्ण ! तुम तो नो ग्रपोक हो। युद्ध में तुम पवरा ना हो। यातिक कि मेरे मसे मपुरा स्वपुरी त्यस्त्वा समुद्र शरणं गतः ॥३१॥ तुमने अपनी नगरी म्युरा भी छोड़ दी तथा समुश्की अयं तु पयसा तुरखो नातिसक्यो न मे समः। शरण ली है। इसठिये में तुम्हारे साथ नहीं गा ॥२१॥ यह पुन भी कोई योसा नहीं है। एक स्ने पालो अर्जुनो न भवेदू योद्धा भीमस्तुल्पपलो मम ॥३२॥ मासे ग्रेटा, दूसरे कोई विशेष ध्यान भी नहीं है। इसलिये यह भी मेरे बोड़ा वीर नही है। में इसके इस्युक्स्या भीमसेनाप प्रादाय महतीं गदाम् । साथ भी नही लगा । रहे भीमसेन, ये वास ही मेरे समान मध्यान् और मेरे बोरके ॥ ३२ ॥ मरासन्धने द्वितीयां खपमाराप निर्वगाम पुराद पतिः ॥३३॥ म फहकर भीमसेनको एक मत पड़ी गदा देरी भौर सयं दूसरी गदा लेकर मगरसे बार निका तता समे वले वीरौ सयुक्तावितरेतरौ । बाया ॥१॥ दोनों रणोम्मत बीर बमेमें बनतुजफल्पाम्पा गदाम्पा रणदुर्मदौ ॥३४॥ कोर गदालोंसे एक दूसरेपर चोट करने लगे ॥ ३४ ॥ पाकर एक दूसरेसे मिह गये वो अपनी काके समान मगलानि विषित्राणि सम्र्प दक्षिणमेव च । वे दायें कयें तन-तबके पतरे दस्ते हुए ऐसे शेमा मन हो रहे ये-मतो दो श्रेष्ठ नट रगमंचपर सुरक्षा परतो अचमे युद्ध नटयोरिव रशियोः ॥३५॥ अभिनय कर रहे हों ।। ३५ ॥ परीक्षिस् ! कम एकनी सतपटपटाशम्दो वनिप्पेपसंनिभः। गदा सरेकी गहासे टकराती, ता ऐसा मम होत मनो युद्ध करनेवाले दो साथियोंकि दात मापसमें मिलाकर गदयोः पितयो राजन् इन्तपोरिन दन्तिनोः ॥३६॥ घटकटय रहे हों, या पड़े बोरसे विवी तक यी हो॥ ३॥ जब दो हापी कोषमें भरकर मने गाते ते गद मुबजवेन निपास्त्रमाने गौर वायकी मयिों तो-तोगकर एक-दूसरेफर प्रकार मम्पोन्पोऽसकटिपादकरोरुमकून् । करते हैं, उस समय एक्सरेकी चोटसे वे सम्मिा घूर घूर हो जाती है, वैसे ही नब मरासन्ध वार भीमसेन पूीपम्मतरुपेस्य पथापाले को कासे ग्या पश्च चमकर एक-दूसरेके कंधों, का संयुम्पवोर्डिरवयोरिख दीप्तमन्य्योः ॥३७॥ व उनकी गदाएँ समके व्योंसे टकरा-टकराकर पानापुर पैरों, हापों, मोषों और इसलियोंपर चोट करने को, इस वयो। प्रातयोगदयोनॅपीरी | होने गी ॥ ३७॥ इस प्रकार वा गराएँ चूर पूर से गयीं, तब दोनों मीर में मरकर बपने घोंसे एक छदौ ममधिभिरयास्पचरपिंधम् । इसरेको कुछ गलनेकी पेय करने को । उस । २ निप्प ।। रपम्ताये। ।

१० ७२]
दसम सध
५७९
मन्दसयोमारतोरिभयोरिवासी
ऐसी पोट करते, मनो मेहेका पन गिर रहा हो।
एक-दूसरेपर खुलकर घोट करते हुए दो हाथियोंकी तर
भिधाववनपरुपस्खलसाउनोत्पः ॥३८॥ उनके पप्पो वौर सोका कोर शब्द विवधीकी
फरकसपटके समान मान परता था ॥ ३८॥ परीक्षित् ।
तमोरनं प्रारतो
समशिक्षावलौजसो।
जरासन्ध और भीमसेन दोनोंकी गदा-युदमें कुशम्सा, बल
भौर उत्साह समान थे। दोनोंकी शक्ति तनिक भी क्षीण
निर्विशेपमभूद युटमधीणअययाप ॥३९॥
नही रही पी। इस प्रकार उगातार प्रहार करते
एवं वयोमहराज युध्यतो सप्तविंशतिः ।
बनेपर भी दोमिसे किसीकी चीत या घर न १३९/
दोनों मीर रात के समय मित्रके समान राते वौर दिनमें
दिनानि निरगस्तत्र सुद्धमिशि सिष्ठतो ॥४०॥ छूटफर एक दूसरेपर प्रहार करते वौर छा । महाराज !
इस प्रकार उनकपते ठावेसचाइस दिन पीठ गये।१०।
एकदा मातुलेयं वै प्राह राजन् वृकोदरा। प्रिय परीक्षित् | महाइसवें दिन भीमसेनने अपने
ममेरे भाइ श्रीकृष्णसे कहा - धीहष्ण ! म युरमें बरा-
नसको सरासंघ नितुं युधि माधव ॥४१॥ सन्धको जीत नहीं सकता ॥ ११ ॥ भगवान् श्रीहष्ण
नरासन्धके नम्म बौर मृत्युका यस्म जानवे पे बौर
सत्रोर्षन्ममूवी विद्वान् जीवितं च बराकम् । मामी चानते थे कि जरा राक्षसीने नरासन्धक शरीरके
दो टुकारो मोरकर इसे जीवन-दान दिया है । इस-
पार्थमाप्पापपन् स्पेन तेप्रमापिन्सपरि ॥४२॥ ये नोंने भीमसेनके शरीरमें अपनी शक्तिका सवार
किया और बसम्भके वा उपाय सोचा ॥ १२ ॥
संचिन्स्पारिषभोपार्य भीमस्सामोपदर्शन।।
परीसिद ! मगमान्का वान श्धी। अब महोंने
दर्शयामास रिटर्प पाटपनिन संशया ॥४३॥ उसकी मृत्युमा उपाय जानकर एक पक्षी गठीको
बीचोबीचसे धीर दिया और इशारसे भीमसेनको
व विज्ञाप मासस्या भीमः भारत पर ।
दिखा ॥ १३ ॥ वीरशिरोममि एव परम शक्तिशाली
भीमसेनने भगवान् श्रीकृष्णका अभियाप स्मा किया और
गृहीत्वा पादयाः शष्टु पातयामास मूतले ॥४४॥ जरासन्धके पैर पकाएर उसे धरनीपर दे मारा ॥४॥
सिर सके एक पेरको अपने पैरके नीचे दण्य वोर
एकंपाद पदाऽऽकम्य दाम्पामन्म प्रगम सः। दूसरेको भन्ने दोनों हासे पका पिा । इसक बद
| भीमसेनने उसे गुशकी मोरसे इस प्रकार पार गय, से
गुदतः पाटयामास शास्लामिव महागज ॥४५॥ गजान की गय धीर गले ॥ ५ ॥ यग्ने
दस कि रास्धके घरीरके दा दुफा हो गये हैं,
एकादालापपटिश्यस्तनांसक
और इस प्रकार उनक एक-एक पैर, जौव, माश,
एकबाइषिभूकणे सकले दशु प्रशा ||४६|| मार, पीठ, वन, संय, भुना नत्र मोह और कान
मा-अम हो गये हैं। १६ ॥ मगराज जरासन्धकी
साकारा मानासीमित मगधर ।
मुस्पु नार बाँकी प्रज्जब बारसे "दामा
पुकारने गी । मापन् बान्य और अनुनने भीमसेन
पूजयामामतुर्भीम परिरम्प जयाप्युतौ ॥४७॥ | पा वाठिान करक टना म्यार किया ॥ १७ ॥

५७६ भीमसागपत [.. । -- सहवं दधिणसामादिष्यत् सह सखये । अत्यन्त प्रभावशाली बना दिया था ॥ १२ ॥ तिन युधिष्ठिरने सुखपवशी वीकि सात्य सहदेवको दक्षिण दिशि प्रतीच्या नकुलपदीयां सम्यसाचिनम् । दिशामें दिविस्य करनके लिये मेवा । नकुलको मान देशीय वीरोंके साथ पश्चिममें, झुनको परसदेशी प्राध्यापकोदरं मत्स्यैः केकय सह मद्रकः ॥१३॥ धीरोंके साथ उत्तरमें और भीमसेनको मत्रदेशीय बीरेवि साप पूर्व दिशामें दिम्पिवय करनेका मादेश दिया ॥१॥ ते विशित्प नृपान् मीरा आजादिग्म्प मोबसा । परीक्षित् ! ठन भीमसेन अादि पीरोंने अपने बापौरसर स्व मोरके नरपसियोफो जीत लिया और या करने लिये तफ्त महाराज युधिमिरको बहुत-सा घन मक अबातशत्रपे भूरि द्रषिण नृप यक्ष्यते ॥१४॥ रिया ॥ ११ ॥ जय महाराज युधिष्ठिरने या सुना कि भक्तक जरासन्धपर विजय नहीं प्राप्त की जा सकी, तर श्रुत्वाधित अरासंधं नृपतेर्णायतो हरिः । थे चिन्ता पर गये । उस समय भावान् भीगने में वही उपाय कह सुनाया, जो स्वनीने क्तवया प}१५ आहोपाय समेवाप उद्धवो यमुनाप ॥१॥ | परीक्षित् ! इसके बाद भीमसेन, अर्जुन और मगलान श्रीकृष्ण-ये तीनों ही कामणमा वेपधरण करके गिरिमय भीमसेनाऽर्जुन! रुप्पो प्रमलिङ्गधरानमः। गये। वही बरासन्धकी राजधानी पी ॥ १६ ॥ रच घरासन्ध ग्रामोंक्षा मक भौर गायोक्ति पोका पाम्न जग्मुगिरिग्रज ताठ पृहद्रथसुतो पतः ॥१६॥ करनेवाय पा । उपर्युक तीनों क्षत्रिय बामपका के वारण करके अतिपि-अम्यागोंके सत्कारके समय जरासन्धके पास गये और उससे इस प्रकार पपना ते गत्वाऽऽविध्यवेलायां गृापु गृहमधिनम् । की-॥ १७ ॥ राजन् ! बापका फरमण से। हम ब्रह्मम्य समयाघेरन् राजन्या प्रालिङ्गिनः । १७॥ न ही हम यहाँ किसी विशेष प्रयोजनसे ही कसे तीनों आपके अतिथि है और बहुत दूरसे पा रहे हैं। रामन् विपतिथीन् प्राप्तानपिनोदमागसान् । हैं। इसलिये हम मापसे जो कुछ चाहते हैं, कर हमें अवश्य दीचिये ॥ १८ ॥ तितिक्षु पुरुष क्य ना समः प्रयप्ठ भद्रं ते यद् वयं कामयामहे ॥१८॥ सह सकते । दुष्ट पुरुप मुरा-से-मुरा क्या नहीं कर सकते । उदार पुरुष क्या नहीं दे सकते और समाकि कि दुमर्प वितिक्षणा किमकार्यमसाधुभिः। मिये पराया कौन है ! ॥ १९ ॥ जो पुरुष स्वयं समर्म होकर भी इस नाशवान् शरीरसे ऐसे बचिनारी काका किं न देय वदान्यानो कः परः समदर्शिनाम् ॥१९॥ संपर नहीं करता, जिसका बड़े-बड़े सत्पुरूष भी गान फरें, सच पूछिये तो उसकी कितनी निन्दा की राप, योऽनित्येन शरीरेण सवा गर्य यशो ध्रुवम् । पदी है। उसका जीवन शोक करनेयोग्य ॥२०॥ रामन् ! आप तो जानते ही होंगे-राजा हरिपत्र, नाधिनाम्बिय फल्पास याच्यासोच्य एप स १२० रन्तिदेव, केवल भमके दाने बीन चुनकर निर्वाह करने यारे महात्मा मुद्रा, शिवि, पति, ग्यान और फास परिषद्रा सिदप उठवधि शिविलिः । आदि बहुत से व्यक्ति पतिपिको अपना संख पर १ चीनम्नधिमो।

। अ०७२] दशम स्कन्ध म्पाधः कपोतो पावो मधुषेण धुर्व गता ॥२१॥ इस नाशवान् शरीरके शरा पक्निाशी पदको प्राप्त हो जुक हैं । इसलिये आप भी हममगोपा निराश मत कीजिये ॥ २१॥ भीशुक उपाय भीशुकदेवजी कहते है-परीभित् ! जरासन्धने ठन येोंकी अवाज, सूरत-शफल और कार्योपर परे स्वरैराकृतिभिस्लोस्त प्रकोष्ठेयाविरपि । हुए धनुपकी प्रत्याकी गइके पिझेको देखकर पहचान किया कि ये तो ग्रामण नहीं, क्षत्रिय हैं। अब का सोचने ला कि मैने कहीं-न-कहीं इन्हें देख मी पाय राजन्पम धुन् विनाप एपूषानचिन्तयत् ॥२२॥ है ॥ २२ ॥ फिर उसने मन-ही-मन यह विचार किया कि प्ये क्षत्रिय होनेपर भी मेरे मपसे प्रामणका बेप राबन्पपन्धयो पते प्रमलिङ्गानि विमति । बनाकर पाये हैं।नय ये मिक्षा माग्नेपर ही उताम्य हो गये हैं, तब चाहे वो कुछ माँग ले, में इन्हें दंगा । ददामिभिर्सि सेम्प आत्मानमपि दुस्स्यजम् ॥२३॥ याचना करनपर अपना पन्त प्यारा और दुस्स्पन शरीर देने में मी मुछ हिचकिचाहट न होगी || २३ ॥ लेर्नु भूपवे फीतिवितवा दिवझरमपा । विष्णुमायानने ममणका य धारण फरक पलिका भन, ऐमर्य-सब कुछ छीन लिया, फिर भी वत्रियी पवित्र थपाव प्रक्षिवस्यापि विप्रम्याधन निप्पुना ॥२५॥ फीर्ति स्व और फैटी दुइ और अब भी लोग पर बादरसे उसका गान करते है॥ २० ॥ इसमें सन्दर नहीं कि विष्णुगान्ने दाराज इन्द्रकी राग्यलक्ष्मी यलिसे भय जिहीवन्द्रस विप्मधे शिवरूपिण। छीनकर उडे स्टानेक ठिये ही प्रामणरूप धारण फित्पा पा । दैस्पराव पछिको यह बात माझम हो गयी थी और नानम्नतिमही प्रादाद याममाणोऽपि दैत्यराट।।२५।। भाचाने में रोका भी; परन्तु उन्होंने पृीका दान कर ही दिया ॥ २५ ॥ मेरा तय यह पका निभयर बीवसा प्रामणाधाय मो न्वा पधन्धुना। फि या शीर नाशवान् है । इस शरीरसे चा विपुल यश नहीं कमाता और जो क्षत्रिय अझगफे उिये ही वेदन पतमानेन नेहशा पिपुलं पत्र ॥२६॥ बीपन महाँ धारण करता, टसका जीना म्यर्थ है।।२६॥ पक्षिन् ! सचमुच जयस्वी पुदिनी उदार पी। उपर्पक विचार करक ठसन प्रमग-प्रभारी धीरण, इत्यदारमति प्राद कृष्णार्जुनकोदरान् । मान और भीमसेनसे कहा-पामगे । आफ्लोग मन- चाही बस्तु मांग से, बाप चाहें तो में आपको हेविप्रा यियवासामा इदाम्पास्मशिरोऽपिप ॥२७॥ धना सिर भी दे सकता है ।। २७ ॥ पीभगवानुग भमयान्भीरुप्यन करा-पान्दमाग वमक युदं ना दहि राजन्द्र ददशा मदि मन्यसे । इम्युफ मामग नरवरिप है, हम भारत स पुरके ठिप प्रपेर। पर आपसे पदापिनार्य प्राप्ता राज पानामाशिमः ॥२८॥री मिशीत्रिय ॥ २८ ॥ दास, यमपुत्र मसी कादर पास भ्रातार्जुनामयम् । भीनसेनकोर र इनर महबान और में ५७८ भीमद्भागवत [१०४२ अनयोर्मातुलेग मां कप्ण जानीहि वे रिपुम् ॥२९॥ | इन दोनोंका ममेरा माई तपा पापका पुरस्ना - एषमावेदितो राजा महासोन्कस मामध । हूँ ॥ २९ ॥ नन मावान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सम्म परिचय दिया, तन राबा जरासन्ध ठठाकर स्ने ध्या। माह चामर्पिता मा युई सहि ददामियः ॥३०॥ घोर विर बोय-'घरे मूझे ! यदि तुम युद्धी ही इगो मे मैं तुमारी प्रार्थना स्वीकार करत न सपा भीरुमा योत्स्से यषि विज्ञापतसा । हैं ॥ ३० ॥ परन्तु कृष्ण ! सुम तो बड़े ग्रपोक हो । युद्धमें तुम घबरा नावे हो । यहाँतफ कि मेरे मसे मपुरी स्वपुरीं त्यक्त्वा समुद्र शरणं गतः ॥३१॥ सुमने अपनी नगरी मथुरा मी र दी तपा समुदकी शरण ली है। इसलिये मैं तुम्हारे साप नहीं लगा ।३१॥ अय तु पयसा तुल्यो नातिसत्त्वो न मे समः । पार्जुन भी कोई येदा नहीं है । एक तो काम अर्जुनो न भवेर योदा भीमस्तुरयमलो मम ॥३२॥ मुझसे छोट्या, दूसरे कोई विशेष ध्यान भी नहीं है। | इसम्पेि य भी मेरे मोरका वीर नहीं है। मैं इसके इस्युक्ला भीमसेनाय प्रादाय महसीं गदाम् । साप भी मही मंगा । रहे भीमसेन, ये जाश्य ही मेरे समान कमान् वौर मेरे बोडके है॥३२ ।। बरासपने द्वितीया सपमादाय निर्षगाम पुरा पहिः ॥३३॥ यह कहकर भीमसेनको एक बहुत पपी गदा रेरी और सप दूसरी गदा सेवन नगरसे मार निका वत समे खसे वीरो संयुकागिसरेतरौ । मापन ॥ ३३ ॥ वब दोनों रणोन्मत वीर क्या अामतुर्षभ्रकल्पाम्पा गदाम्यां रमदुर्मदौ ॥३४॥ कठोर गदा से एक दूसरेपर चोट करने मे ॥ ३४ ॥ अाकर एक दूसरेसे मिह गये और अपनी करके समान मपलानि विचित्राणि सम्यं दक्षिणमेष च । वे दा-बायें क्या-तरके पैतरे वदते हुए ऐसे शोमा मन हो रहे ये मनो दो श्रेष्ठ नट रगमयपर पुरका चरसा शुशुमे युद्ध नटयोरिख रङ्गिणोः ॥३५॥ अभिनय कर रहे हो ॥ ३५ ॥ परीक्षित ! जस एकही तवमटपटासम्दो पनिप्पेपसंनिभः। गदा दूसरेकी पदासे टकराती, तब ऐसा मल्म होता मनो युद्ध करनेवाले दो हापियोंकि दाँत मापसमें मित्र गदयोः धिप्पयो राजन् इन्नयोरिव दन्तिनाः ॥३६॥ पटकटय रहे हों, य बड़े जोरसे विजली ताफ राम ॥ ३३ ॥ जव दो हाथी कोधमें भरकर भने मते त पे गद सबजन निपास्पमाने हैं और मामी गरियो तो सोकर एक सरेपर प्रहार भन्योन्पोऽसकटिपादकरोरुपन् । करते हैं, उस समय एक-दूसरेकी घोटसे में सम्मि प्र-चूर हो जाती है, वैसे ही जब जरासन्धवीर भीमसेन चूर्णीचभूवतुरुपत्य यथार्कशासे या गसे गदा पय-धमकर एक दूसरेके कंधों, कारों, सपुध्यताद्विरदयोरिव दीप्तमन्य्याः ॥३७॥| उनकी गदाएँ उनके बड़ोंसे टकरा-टकराकर पानापूर पैरों, हा, चोरों और इसठियोपर पोट करने मे इर तया: प्रस्तपादया वीरा राने गी ॥ ३७॥ इस प्रकार मगाएँ मूर-मूर से गपी, तब दोनों वीर क्रोधमें भरकर वाने घूससे दी बमुटिभिरपारिपिष्टाम् । दूसरेको कुरा गनेकी पेय करने लगे। उनके पूस निरनिर ।। रपसारे । ।

म०७२]
दष्टम स्वन्ध
५०९
शम्दस्तपो प्रारतोरिभयोरिषासी
ऐसी चोट करके, मानो औका धन गिर रहा हो।
एक-दूसरेपर खुलकर चोट करते हुए दो हापियों की तर
मिघोषनपरुपस्तलसाउनोत्थ ॥३८॥ उनके पपयों धौर सोश कठोर शब्द विमीकी
कसलमटके समान चाल पाता या ॥३८॥ परीक्षित् ।
पोखं प्रारको समविधापलौबसो।।
जरासन्ध मोर मोमसेन दोनोंकी गदा-पुदमै कुशलता, मल
और टासह समान थे। दोनों की शकिं तनिक भी क्षीण
निविशेषममूद यमक्षीणसवयोर्नुप ॥३९॥
नाही हो रही पी। इस प्रकार ब्गातार प्रहार करते
हनेपर भी दोनमिसे किसीकी जीस य हार म९)
एवं तयोमहाराज युभतोः सप्तविंशतिः ।
दोनों वीर रतके समप मित्रके समन रावे और दिनमें
विनानि निरगस्ता सुनिधि विष्टसो ॥४०॥ छ्टकर एक दूसरेपर प्रहार करते वीर सपते । महारान!
इस प्रकार उनकेम-साते सचाईस दिन बीत गये। १०।
एकदा मातुलेय पे प्रार राजन् वृकोदरः । प्रिय परीक्षित् ! बहाईस दिन भीमसेमने अपने
ममेरे भाई श्रीकृष्णसे कहा श्रीकृष्ण ! में युबमें चरा-
नमको परासंघ निर्जेतुं यषि माधव ॥४१॥ सन्धको गीत नहीं सकता ॥ ११ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण
पासपके न्म और मृत्युका यस्प बनते पे बोर
नोर्जन्ममृती पिशान् बीवित प राऊतम् । यह भी जानते थे कि जय राक्षसीने बरासन्धके शरीरके
दो दुकोको नोएकर इसे जीवन-दान दिया है । इस-
पार्यमाप्पापयन् स्वेन वैबसाचिन्तपथरि ॥३२॥ ये उनहोंने भीमसेनके शरीरमें पानी शक्तिका सवार
किस्सा और मासन्धके पापा उपाप सोपा ॥ १२ ॥
संपिन्स्पारिवभोपार्य भीमसामोपदर्शनः।
परीक्षित् ! मगवान्का मान वषी। पर उनाने
दर्शयामास विटपं पाटपभिव संमया ॥४३॥
उसकी मृत्युका उपाप नानकर एक पक्षकी राठीको
बीचोबीपसे पर दिया और इशारेसे भीमसेमको
वर विद्याप महासया भीमः प्रारसा वर ।
दिग्णय ।। १३ । वीरशिरोममि परम शक्तिशाम
भीमसेनने भावान् श्रीपम्गकर पम्प्रिाम समाप रिया धीर
गोस्वा पादमा शव पातयामास मतले ॥३४॥ मासचके पैर पकाकर उसे परतीपर दे मारा ॥४॥
रिश उसके एक परको वाने देरके नीचे दपाप धोर
एकंपाद पदाऽऽक्रम्पदाम्पामन्य प्रगप सः। दूसरेको अपने दोनों आपसे पका रिया । इसके पार
भीमसेनने उसे गुराकी मोरसे इस प्रकार चीर गम, जैसे
गुदतः पाटपामास शाखामिष महागवः ॥४५॥ गमगर इसकी गये चीर यमे ॥ १५ ॥ मने
दरा म जरासन्धक शरीरके दो टुफा हो गये है,
एकपादारपणकटिपठस्तनांसके
और इस प्रकार उनके एक-एफ पैर, जोध, पाश,
एकवाधिकणे सरुले दशु प्रश ॥६॥ कम, पीठ, न, कंधा, मुना, नत्र, मौद और फान
आमा-गर।। १६ ॥ मगराज बरास्वकी
हाहाकारा महानासीभिावे मगधर ।
मृत्यु हो अनपर वहाकी प्रामा जारसे हाय-हाय "
पुरारने लगी। मागन् भीरम धीर अगुमने भीमसेन
पूजपामासतुर्भीम परिरम्प जपायुतौ ॥४७॥ [मा मालिन करके उनका स्थान किय ॥ १७ ॥

५८० भीमसागपत [4.७३ सहदेवं सपनयं भगवान् भूतभावन । सर्वशक्तिमान् भावान् श्रीकृष्णके सरूप और विचारों से कोई समा नहीं सकता । पास्तपमें वे ही समस्त प्राणियोंके जीवनदाता है। उन्होंने जरासपके रचसिक- अभ्यविश्नदमेयात्मा मगभाना पनि प्रमुः। सनपर ठसके पुत्र सहदेवका अमिक कर दिया और बरसन्धने मिन रागावोंको कैदी मना रस्त बा, में मोधयामास राजन्यान् संख्दा मागधेन ये ॥४८॥ कारागारसे मुक्त कर दिया ॥ १८ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या संहितायां दशमस्काचे उचराधे जरासन्पो' नाम विसप्ततितमोऽध्याय ॥७२॥ अथ त्रिसप्ततितमोऽध्याय जयसम्पर जेससे जूठे हुए पसामोंकी विदाई और भगवान्या इम्बमा सौट भाग मीमुक उवाच भीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित् । मान्य मनापास ही बीस हजार बाठ सौ रामाभोंको गीतकार अयुसे देशवान्पष्टौ लीलया मुधि निर्विवाः । पहाडोंकी घाटीमें एक किसके भीतर कैद कर रस्स पा । भगवान् श्रीकृष्णके छोर देनेपर सवे पसि से निर्गता गिरिदोग्यो मलिना मलपासस ॥१॥ निकले, तब उनके शरीर कौर क्स मेले हो रहे थे ॥१॥ वे भूमसे दुर्मस हो रहे थे और उनके मुंह सूस गये थे। सुस्थामा शुप्फवदनाः संरोधपरिकर्शिता । जेसमें वंद रानेके कारण उनके शरीरका एकाएका पिम पर गया पा । इसे निकम्तेही न मरपतियों- दशस्वे घनश्याम पीतकोशेपवाससम् ॥२॥ ने देख कि सामने भगवान् श्रीकृष्ण सा । गई काठीन मेवके समान उनपर साक्य-सत्येना शरीर भीरत्साद चतुर्माहु पपगभारुगेक्षणम् । पौर उसपर पीसे रंगका रेशमी बता फडरा रहा है॥२॥ चार भुजाएँ हैं-मिनमें गदा, शर, चक और कमर चारुप्रसमयदन स्फरन्मफरकमलम् ॥३॥ प्रशोमित है। वक्ष स्पर नाम रेख- श्रीवासय पिहोर फालके भीतरी भागके सम्पन फोनम, पपरस्त गदाशङ्करपारुपलक्षितम् । रतनारे नेत्र है । सुन्दर बदन प्रसन्नताका सदन है। कानों में माराकति कुल मिलमिय रहे हैं । पर किरीटवारकटकाटियनामदाधिवम् मोतिपोंरा हर, का, परधनी और पाजून अपने-अपने स्थानपर शोभा पा रहे हैं ॥३१॥ गले भ्रामरमणिग्रीवं निवीव पनमालया । पोस्तुभमगि जगमगा रही है और नमाम एटक पी है । भगवान् श्रीाणको दसकर उन गगळी ऐसी पिपन्त इव पशुम्पा लिइन्त इस जिदया ॥५॥ सिति हा गयो, मानो ये नेत्रोंसे उन्हें पी रहे हैं । बीमसे जिमन्न व नासाम्पो रम्भावसपाहुभिः । पार रह है, नासिक्ससे संभ रहे है और गर्भसे आगिन कर रहे है। उनके सारे पाप मा भगवानो ॥४॥ मुकु, म०७३ ] दशम स्कन्ध ५८१ -- प्रणेमुतपाप्मानो मूभि पादयोहरेः ॥६॥ | दर्शनसे ही धुल चुके थे । उोंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंपर अपना सिर रखकर प्रणाम किया ॥ ५६ ॥ कृष्णसंदर्भनाहादचनसंरोधनमा मावान् श्रीकृष्णके दर्शनसे उन राजाओंको इतना अधिक मानन्द दुवा कि कैदमें रानेका रमेश बिल्कुल प्रसनपीकेश गीर्भिः प्राञ्जलयो नृपा ॥७॥ अवा रहा । थे हाप जोड़कर विनम्र बाणीसे मगवान् श्रीकृष्णकी स्मृति करने लगे ॥७॥ रामान व राजामे मारणागतॊके सारे दुःस और मय हर लेनेवाले देवदेवेसर ! समिदानन्दसरूप भविमाशी नमस्ते देवदेवेश अपमातिहराम्यय । श्रीकृष्ण | हम अपको नमस्कार करते हैं। आपने मायके कारागारसे तो हमें माही दिया, भय प्रपन्नान् पाहिनःरुण निर्विष्णान् घोरसस्ते ॥८॥ इस मन्म-मृत्युरुप घोर संसार-पक्रसे मी छुपा दीजिये, स्पोकि हम संसारमें दु का कटु अनुमव करके उससे नैनं नाधान्वसामो मागघ मधुपदन । उप गये और वापकी शरणमें माये हैं। प्रमो। कम बाप हमारी रक्षा कीचिये ॥ ८ ॥ मधुसूदन ! मनुग्रहो यद् भवसो राधा रान्पथ्यसिर्षिभो ॥९॥ हमारे सामी ! हम मगधराम बरासन्धका फोई दोष मही देखते। मगमन् ! या तो एका बहुत या रापर्पमदोन्नदो न भेयो विन्दते नृप । मनुहए कि हम रान कहलानेवाले मेग राम्फलस्मीसे भ्युत कर दिये गये ॥९॥ क्योंकि जो राजा भफ्ने खन्मायामोरिसोऽनिस्पा मन्पते सम्पदोऽचला।।१०। राम ऐप मइसे उम्मच हो जाता है, मसको सम्चे सरकी-कल्याणकी प्राति कभी नहीं हो सकती । मृगतम्यांचा पाला मन्पन्त उदकासपम् । पर आपकी मायासे मोहित होकर बनिस्य सम्पतियोंको हो पळ मन बैठता है॥१०॥ जैसे मूर्सोग एम वफारिकी मायामयुक्ता वस्तु चपते ॥११॥ मृगतृष्णाके जथ्यो ही नव्यशप मान लेते है, वैसे ही इनियमेश्य और भवानी पुरुष भी इस परिवर्तनशील पर्य पुरा भीमदनएएएयो मायाको सत्य वस्तु मन लेते हैं ॥ ११ ॥ माक्न् । पाले हमध्येग धन-सम्पत्रिके नशेमें चूर होकर अंधे विगीपयास्या इतरेतरस्एप । रहे थे। इस पृथ्वीको बीत लेनेके लिये एक दूसरेफी होष करते थे और अपनी ही प्रजाफा माश करते रहते मन्ता प्रमा स्वा प्रतिनिर्षगा:प्रमो ये। सचमुच इम्परा जीवन बापत क्रूरतासे भरा पश पा, मोर हमग इतने अधिक मतवाले से हम मृत्यु पुरस्स्वाविगणय्य दुर्मदाः ॥१२॥ बाप मयुरपसे हमारे सामन सा है, इस पातकी भी इम तनिक परषा नहीं करते थे ।। १२॥ सचिदानन्द स एष रुप्माय गभीररहसा सरूप श्रीकृष्ण ! फाकी गति मडी गहन है। इतना मध्यान् है कि किसीके टासे टल्य नहीं। क्यों दुरन्तवीर्येण विचालिता: भियः । महोप पर शरीर ही दोहाव उसने हम मरपुरपो।

५८२ भीमद्भागवत [. । झालेन सन्वा भगतोऽनुकम्पया ग्रेगोको श्रीहीन, निर्धन कर दिया है। बाकी बोतुक विनष्टदापरणो स्मराम से ॥१२॥ अपके चरणकमयका स्मरण करते हैं ॥ १३ ॥ विम! धनुकम्पासे हमारा धर्मर चूर चूर हो गया । बम हम अथो न राम्यं मृगणिरूपित या शरीर दिन-दिन क्षीण होता जा रहा है। रोगी तो यह सम्ममूमि ही है। अब हमें इस शरीरसे में दोन शमत् पतता रुजां मुषा । जानेवाले राज्यकी ममियषा नहीं है। क्योंकि हम समा | गये है कि यह मृगतृष्णाके छके समान सर्वच मिथ्य उपासितम्य सहयामहे विभो है। यही नहीं, हमें फर्मक फल सर्गादि कोंकी मी, क्रियाफल प्रत्य प कर्णरोपनम् ॥१४॥ मो मरनेके बाद मिळते है, इख नहीं है । स्पेकि हम जानते हैं कि ये निस्सार है, के एनमें 10 स नः समादिशोपाय येन ते चरणाम्जयोः । मार्गफ जान परवे हैं ॥ ११ ॥ क्य हमें कम करक वाप पा उपाय बतलाये, जिससे बापके चरणकमकी स्मृतिमा न विरमेदपि संसरसामिह ॥१५॥ विस्मृति कभी न हो, सदा स्मृति बनी रहे । चाहे हमें | संसारकी किसी भी योनिमें जन्म स्पो म सेना परे १५० रुप्माय मासुदेवाय हरये परमात्मने । प्रणाम करनेवाक स्तमाका नाश करनेवाले शीश वामदेष, हरि, परमात्मा एवं गोविन्दके प्रति हमारा पर प्रणवशेषनाधाय गोविन्दाय नमो नमः ॥१६॥ पार नमस्कार है ॥ १५ ॥ भीमुक तमाम भीशुकदेवमी पते है-परीक्षित ! कासगरसे मुक रानाोंने जम इस प्रकार करणावरुणाम्य ममपन् संस्तूयमानो भगवान् राममितिवन्धनः । | श्रीकृष्णकी स्तुति की, तम शरणगतरमक प्रभुने कभी वाना करुनस्वात शरण्या सक्ष्ममा गिरा ॥१७॥ मधुर वापसे उनसे कहा ॥ १७ ॥ मीभगवानुमाप भगवान् श्रीकम्पमे कहा-नरपतियो ! तुमलोगोंने बैसी इश्या प्रक्ट की है, उसके अनुसार कामसे मुकामे अपप्रभृति वा भूपा मय्यात्मन्पखिलेपरे । तुम लोगोंकी निभय ही हम भक्ति होगी । याकन ये कि म सबका मामा और सबका स्वामी ॥१८॥ मुद्धा आपते भकिपाटमानसिव तथा ॥१८॥ | मरपतियो ! तुम लोगोंने जो निधय किया है दिएथाम्यबसिस भूपा भवन्त भापिणः । सचमुच तुम्हारे उिये बड़े सौमाम्प और बानादकी बात है। तुम्गोंने मुझसे को कुछ कहा थियधर्ममदान्नाई पश्प उन्मादक नृणाम् ॥१९॥ और ऐश्वर्यके मदसे घर होकर बहुत से लोग उमा' मिल्कुछ टीक है। क्योंकि म देखता , धन-सम्पति दरया नपा बना रावणा नरकाऽपरे । और मतबासे हो गते ॥ १९ ॥ प माप, देन, रावण, नरफाहर वादि वने देता, देप भीमदादू भ्रमितास्मानाद् दसदत्त्पनरमरा ॥२०॥! नरपति भीमदक कारण अपने स्थानसे, पइसे भ्युत । । १ नमामा थ०७३] दशम स्कन्ध भरन्त एतद् विज्ञाय देहापुत्पापमन्तपत् । गये ॥ २० ॥ तुमलेग या समझ ये कि शरीर चोर इसके सम्बन्धी पैदा होते है, इसठिये उनका नाश भी मक्यम्भावी है। पत उनमें धासक्ति मत करो । मां ममन्नोऽभ्यरैयुक्ताः प्रजा धर्मेण रक्षय ॥२१॥ मी सावधानीसे मन और इन्द्रियोंको पशमै रस्कार यों के द्वारा मेरा पचन करो बौर धर्मपूर्वक प्रचाकी रक्षा कये ॥ २१ ॥ तुम्डोग अपनी वंश-परम्पराफी संवन्यन्तः प्रबावन्तून सुख दुःख भवाभनौ। रक्षा के लिये, भोगके लिये नहीं, सन्तान रूपन्न करो पौर प्रारम्बके अनुसार जन्म-मृत्यु, मुष्प-दुख, अम- हानि-बो कुछ भी प्राप्त हों, उनें समानमवसे मेरा प्राप्त प्राप्प सेवन्तो मषिचा विचरिप्पप॥२२॥ प्रसाद समाकर सेवन करो भौर अपना मत मुमें उगाकर भीकन विसवो ॥ २२ ॥ देह और देहके उदासीनाय देहादावारमारामा पृतव्रता । सम्बन्धियोंसे किसी प्रकारकी धासकि न रखकर उदासीन खो, अपने बापमें, वात्मामे ही रमण पत्रो और मन्न तपा पात्रमके योग्य तोंका पालन करते रहो । अपना मय्याश्य मनः सम्पङ्मामन्ते भ्रम यास्सथा॥२३॥ मन मलीमति मुभर्मे छगाकर अन्तर्मे तुमध्येग मुन्न प्रमशरूपको ही प्राप्त हो नायोगे ॥ २३ ॥ भीमुक उवाच भीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित् । मुबनेपर इस्पादिश्य नृपान् कम्मा भगवान् सपनेवरः । झायान् श्रीकृष्णने राजाको पा पादेश देकर उन्हें स्नान यदि पाने के लिये मुत-से सी-पुरुप नियुक्त वेपी न्पयत पुरुपान् सियो मन्मनफर्ममि ॥२४॥ कर दिये ॥ २१ ॥ परीक्षित् । क्रासन्धके पुत्र सहदेवसे उनको राबोधित क्स-याभूपण, माध्य-पन्दन सपयों कारयामास सहदेवन भारत । धादि दिल्याकर उनका स्व सम्मान करबापा ॥२५॥ जब वे स्नान करके सा-भूषणसे मुसम्भित हो चुके, नरदेसोषितर्पस्नपन सम्पिलपनैः ॥२५॥ तब मरमान्ने में हम उत्तम पदाया मोक्न भोजयित्वा परान्नेन मुलावान् समलहतान् । करवाया बोर फन आदि विविध प्रकारके रामोचित मोग दिव्याये ।। २६ ॥ ममवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार भोगैम विवियुकास्ताम्यूलाधैर्नृपोधितैः॥२६॥ उन बंदी राज्यों को सम्मानित किया । वद वे समस्त क्लेशोंसे छुटकारा पाकर तप फानोम मिलमिलते हुए ते पमिता मुन्देन राजाना मृष्टकृष्णला।। सन्दर-मुन्दर फुड इनकर ऐसे शोमायसन इर, विरोधितालेयात्प्राउन्ने यथा ग्रहा ॥२७॥ जैसे वर्णऋतुका मस्त हो जानेपर तारे ॥ २७ ॥ फिर भगवान् श्रीकृष्णने उन मुषण पोर मणिपोंसे स्थान समानारोप्य मणिकाचनमपिवान् । भूपित एवं श्रेष्ठ घोपोंसे युक रयर चनया, मधुर प्रीमप्प नृतवास्पैः स्वदेशान् प्रत्ययापयत् ।।२८॥ दिया ॥ २८ ॥ इस प्रकार उशिरोमणि भगवान् पाणीसे तृप्त किया और फिर उसके दोसे मेन व एम माचिता कन्माद रुप्पन सुमहात्मना। श्रीकृष्णने ठन राजाओंको महान् कससे मुक रिसा । अब वे जगरपति भगवान् श्रीकृष्णके म्प, गुण और पपुस्तमेव ध्यायन्तः कवानि च अगत्सत ॥२९॥ ययोंश चिम्सन करते हुए अपनी-अपनी रायपनीको १ पाममुरत।

५८६ श्रीमद्भागवत [.. ततस्ते दवयवन ग्रामपाः स्वर्णलागले। इसके बाद अविन पाहोने सोनेके से प्पभूमिका उतषाफर पना युधिष्ठिरको छावानुसार कशा तय पधाम्नाय दीवयाश्चक्रिर नृपम् ॥१२॥ यज्ञको दीक्षा दी ॥ १२ ॥ प्राचीन कामे कैसे ईमाः मिलापकरमा घरुणस यथा पुरा । बरुणदेवके यममें सर-के-सब यापान सोनेके बने र थे, वैसे ही युधिष्टिरके पहमें भी ये । पाण्डुनन्दन इन्द्रादयो लाम्पाला विरिभवसयुता ॥१३॥ मनायव युधिष्टिरफ यहमें निमन्त्रण पाकर मारी, सगगा सिद्धगधवा विद्याधरमहोरगा । शहरबी, इन्वादि लोकपाल, अपने गणेके साप तिर और गन्धर्व, विपाधर, माग, मुनि, पश, राभस, पी मनपा पपरयांसि खगकिलरचारणा ॥१४॥ किमर, चारण, वरना या वोर रानियों-ये सो रामानय समाहता राजपरन्पथ सर्वश । उपस्थित हुए ॥ १३ १५॥ सबने बिना किसी प्रकारके कौवालम यह पात मान से कि बसूप रावस्यं समीयुः स रा पासुनस्य वै ॥१५॥ या फरना युधिष्टिरफे योग्य ही है । पोंकि भगवन मनिर कृष्णभकस्स म्पपममविमिताः । श्रीाम्गक भळके लिये ऐसा फरमा फोई नात बकी यात नहीं है । उस समय देवताओं के समान सेवसी अपाचपन् महाराज यात्रका दरवचस । पानकोन धमाज युधिष्ठिरसे विधिपूर्वक गबसूप पर राजापन विधिवत् प्रापेतममिवामराः ॥१६॥णसे करपाया था ॥ १६ ॥ सोमलतासे रस निकाउनके कराया, टीक से ही, जैसे पूर्वकाठमें देखने सास्यान्यवनीपाठो यावान् सदससतीन् । दिन महायज युरिष्टिरने अपने परम भापगन् पार पौर परम्मको भूठ का निधम कानेपने अरबपन् महाभागान् यथावत् मुसमारित ॥१७॥ ससस्पतियों का बही सावधानीसे विषम पूम किया ॥ १७॥ मदम्पारयादगाद रिमसन्तः सभामदः। अब सभासद् मंग इस रिपार विचार करने लगे कि सदस्पोम सबसे पहर हिसको पूजा-अप्राय नाम्पगन्छमनमान्स्पात् सहदरम्तदाप्रवीत् ॥१८॥ दोनी पारिप । बितनी मति, उतन मा । सा सम्मम्मति से पार निगप न । समा । ऐसी स्मि सइदान पहा-॥ १८ ॥ पराम्रिोमणि महा माति पम्पन भाप भगवान मात्रा पति । मापन श्रीगोपस्यो र अप्राद पार पोकि दही सरदाची एस ने सना मरा दशमठधनासः ॥१९॥ श्रा, नम-नाई? उन गरी ॥१५॥ fiv यादीसमयभीम पताममिद किरम पदारमन । मामी की बोनशमन- निगIEL माम्म पागम पस्परः ॥२०॥ TEHETAN तो NRNA17॥२०॥ म ९umtart पर SITaनिरन् । NEHATI.n ५ २०७४] इपम स्कन्ध उस समय धात्मनाऽऽस्माश्रयःसम्पासवस्याविहन्त्यबा२१। यह सम्पूर्ण नगर उन्हींका स्वरूप है। वे अपने आपमें ही स्थित धौर मन्म, बस्तिस्य, दि धादिछ माक- विविधानीह कोणि अनयन् यदवेषया । विकारोंसे रहित हैं। वे अपने प्रामस्वरूप साम्पसे ही जगहकी सखि, पाटन धौर संहार करते है ॥२१॥ हते पदय सर्वः यो धर्मादिलक्षणम् ॥२२॥ सारा जगत् श्रीकृष्णके ही अनुप्रइसे अनेकों प्रकारके फर्मका अनुष्यान करता हुआ धम, अर्थ, काम और मोक्षरूप फुरुपयोका सम्पादन करता है ॥ २२ ॥ वसात् कम्माप महते दीपता परमाईणम् । इसलिये सबसे महान् मगवान् श्रीकणकी ही बापूजा | होनी चाहिये । इनकी पूजा करनेसे समस्त प्राणियोंकी एवं चेत् सर्पभूतानामारमनमामि भवेत् ॥२३॥ तथा अपनी भी पूय हो जाती है ॥ २३ ॥ चे अपने दान-धर्मको अनन्त भावसे युक करना चाहता सर्वमवारममताय कप्णायानन्यदर्शिने । हो, उसे चाहिये कि समस्त प्राणियों और पदापकि अन्तमा, मेवम्यवरहिस, परम शत और परिपूर्ण देय शान्ताय पूर्णाय दपसानन्त्यमिझता ॥२४॥ भगवान् श्रीकृष्णको ही दान फरे २१ ॥ परीक्षित् । | सहदेव भगवान्की महिमा और उनके प्रभावको बानते इत्युक्त्वा सहदेवोऽभूत् तूणीकृष्णानुभावपित् । थे। इसना कहकर वे चुप हो गये धर्मराज युधिष्टिरकी पपसभामें निसन सत्पुरुष उपस्थित थे, सबने एक स्वरसे बहुत ठीक, बहुत टीकर परफर सश्त्वा तुष्टुनः सर्वे साधु साविति सघमाः ॥२५॥ | सहदेवकी वातफा समर्पन किया ॥२५॥ धर्मराज युधिष्टिर धुत्वादिजेरितं राजा ज्ञात्वाहा सभासदाम् । ने मामोंकी या बादा सुनकर तपासमासदोमा अभिप्राप जानफर कर धानन्दसे प्रेमोफसे हिट होकर भगवान् समईयद्धपीकेश प्रीतः प्रणयविहलः ॥२६॥ की ॥ २२॥ अफ्नी पमी, धौर फुटुम्चियों के साथ धर्मराज युधिष्टिरने व प्रम और पत्तादाववनिच्यापः शिरसा लाकपावनी। यानन्दसे मगान्के पाँव पखरे तपा उनके परणकमरें. फा प्येवन जउ अपने सिरपर धारण रिया ॥ २७ ॥ सभाप सानुजामात्य सकुटुम्बोमा सदा ॥२७॥ दने मायनको पीले पीले रेशमी पर और मरम्म्प आभूपग समर्पित किये। उस समय उनक नेत्र प्रम पासाभि पीतकौशपभूध महाधनः । पौर थानके आमुसे इस प्रकार भर गप किम मगधन्को मौति देख भी नहीं सकते ५ ॥ २८ ॥ अपित्वाधुपूगाधा नागरुन् समवेवितम् ॥२८॥ पासमामे ठपस्स्ति सभी यंग मगवान् श्रीरण इस प्रसर मित, मात देखर हाप नार र नमो त्य सभावित वीक्ष्य सर्वे प्राञ्जलयोजना । नम ! स्वप इस प्रसारक नारे ग्रामर उन्हें नमस्टर पान मगे । उस समय वामसमे प्रयो नमा उपेति नमुम्न निपतुः पुप्पाटय ॥२९॥ पुकी रहने स ॥ २० ॥ मीमणकी पूजा माइमन्त्री ५८४ भीमबागवत [.. जगदुः प्रकृतिम्पस्से महापुरुपयेटिवम् | चले गये ॥ २९ ॥ पहाँ बाफर उन स्मोंमें नमी अपनी प्रनासे परमपुरुस भगवान् श्रीकृष्णकी जान कपा और छीम का मुनायी पौर फिर बड़ी सामथानीसे पघान्वष्ठासद् भगांस्तथा चरवन्द्रिताः ॥३०॥ मगवान्के भाजानुसार वे अपना जीवन व्यतीत करने ळगे ॥१०॥ . जरासंघं पातयिस्था भीमसेनेन केशवः। फीधित् ! इस प्रकार मावान् श्रीकृम भीमसेनके पारा नराम्धका वध करवाकर भीमसेन चौर पुनके पार्थाम्पा संयुसः प्रायात् सहदेवेन पूषित ॥३१॥ साय जरासम्धनम्दन सहदेमसे सम्मानित होकर इस प्रस्सके लिये पळे । उन विज्पी पीरोंने इम्बनसके पास गत्या ते खापवास्थ महान् दार्जितारय । | पचफर अपने-अपने क्ष यजाये, जिससे उनके दर्पयन्तः स्वसुरदो दुईदो घासुखामहाः ॥३२॥ इमित्रोको मुस्त और शवोंको बस इस इव ॥ ३१ १२ ॥ इन्द्रप्रस्पनिवासियोंका मन उस श्य समुत्वा प्रीतमनस इन्द्रप्रस्खनिवासिनः। पनिको सुनकर सिळ ठठा । ठनोंने समम किप कि नराध मर गया और बव रामा युधिष्ठिरका राबसूप मेनिरे मागधं शान्त राबा पाप्तमनोरथः ॥३३॥ | यहा फरनेका सक्स्प एक प्रकारसे पूरा हो गया ॥ २३ ॥ भीमसेन, अर्जुन और भगान् भीमाने अभिषन्याय राजान भीमार्जुनबनार्दनाः । राच्य युधिष्ठिरकी पदना की भौर पर सब स्प का मनाया, जो उन्हें मरासन्धके बक्के लिये करना पम सर्वमाभाषयांधारात्मना यदनुष्टितम् ॥३४॥ प ॥ ३१ ॥ धर्मराज युधिष्टिर मगवान् श्रीशाके निशम्प धर्मराजस्तत् केशवेनानुकम्पितम् । इस परम अनुमाफी यात सुनकर प्रेमसे भर गमे, | उनके नेत्रोंसे धनादके बाहयोंकी भूदें टपकने आनन्दानुफलां मनन् ग्रेम्णा नोवाध किचन॥३५॥ | मनी धौर में उनसे कुछ भी कर न सके ॥ ३५ ॥ इति श्रीमदमागबसे महाएपणे पारमहस्व संहितापा दशमस्कन्धे उतरार्षे कृणापागमने त्रिसप्ततितमोऽध्याय ॥ ७ ॥ मी क उपाप और अथ चतु सप्ततितमोऽध्याय भगपानकी भाप्रपूज्य और शिशुपाला उयार भीमेपली मते है-परीक्षित् 1 पन्ज एवं युधिष्ठिरो राजा जरासंघवघ रिभो। | युधिष्ठिर जराधा पध और सशहिमन् मानन् श्रीसम्पफी पख महिमा उनपर बहुत प्रसन्न र ठप्पस पानुभाष भुस्या प्रीवस्तमममी ॥१॥ | उनसे बोले ॥ १ ॥ युधिष्ठिर उपाप धमराज युधिष्ठिरन कहा-सचिदानन्दसरूप श्रीराम ! क्रिोकीके सामी प्रमा, शार अभिऔर य स्सस्त्रलास्पगुरवः सर्वे ठोरुमहराः । इम्बानि अपास--सब भापकी आग पन: Rये १ ।१ परम्परिमिस्पोसित ।। पारम्परिमाप ।४ प्रमे।५ ५।

प०७४] दशम स्कन्ध ५८५ वहन्ति दुर्लमें लन्धा निरसवानुशासनम् ॥२॥ | तरसते रहते है और यदि या मिल जाती है तो पही प्रससे उसको शिरोधार्य करते हैं ॥ २॥ वनन्त ! हमलोग है तो अत्यन्त दीन, परन्तु मानते है बानेको स भवानरविन्दायो दीनानामीचमानिनाम् । भूपति धौर मरपति । ऐसी स्थितिमें है तो हम दण्डके पात्र, परस्त आप हमारी बाड़ा स्वीकार करते रबर उसका पालन करते हैं । सशफिमान् कमन्पन पचऽनुशासन भूमंस्तदस्पन्सविडम्पनम् ॥३॥ माअन्के लिये यह मनुष्य-बोटाका अभिनयमान है॥३॥जैसे उदय अपच असके कारण सूर्यके क्षेत्रमै घटती या पाती नहीं होती, असे किसी भी न पसाद्वितीयस प्रथम परमात्मनः । | प्रकारके फोसे म वो अपका उत्स्यस होता है और न तो हास। क्योंकि भाप सज्यसीय, विजातीय धौर सगतभेदसे रहित स्वयं परसय परमारमा हैं ॥१॥ कर्मभिर्वते तेजो इस च यथा रखेः ॥ ४॥ किसीसे पराजित न होनेधले माधव ! पर में है और या मेरा है तथा या त् है और यह वेग-इस प्रकारकी विकारयुक भबुदि तो पशुओंकी होती है। नये तेजित भक्कानां ममाहमिति माधव । नो वापके धनम्प भा है, उनके पितमें एसे पागम्पनके विचार कमी नहीं पाते । रि आपमें सा होंगे ही कहाँसे । ( इसठिये पाप ना कुछ कर रह त्वं प्रवेति च नानाधीः पशूनामिय यैकता ॥५॥, वह सीसा-री भीम है ) ॥ ५॥ भीमुक उपाप भीशुध्येयजी करत है-पशि ! इस प्रकार इस्युफ्स्वा यमियेकाले वने युक्तान् स न्यविज्ञान पमयन युधिष्टिरने भगवान् श्रीसम्मकी कृष्णानुमोदितः पार्पोमानणान् प्रमचादिन ॥६॥ निपुण बेदादी प्रमको प्रतिज, वाघाय अरिके बनुमतिसे पाके पाग्य समय पानेपर पाके फोम दैपायना भरदामा सुमन्सुगौतमाऽसिवः । रूपमें परण किया ॥६॥ ठनक नाम ये हैं- वसिष्ठपवन कप्पो मैत्रयः कपलितः॥७॥ श्रीरामदैपायन म्यासदेव, भयान, सुमन्तु, गौतम, विमामिया पामदवः सुमति मिनिः क्तु । बस्ति, बसिष्ठ, प्यान, कम्प, मैप, कार, स्ति, पंत परामरा गर्गों वैशम्पायन एव च ॥८॥ विवामित्र, बामदय, एमति, मिनि, नु, पैस, पराशर, गग, वैशम्पाफ्न, अपर्ण, फरसर, धौम्य, अपका पदपपाधीम्पारामा भाग सामुरि । परशुराम, शुधपा, भामुरि, तिहार, मधुरा, परसेन और बाताग ॥७९॥ इनके अतिरिक पोतिहायो मधुन्छन्दा मोरसेनाऽतिमनः ॥९॥ भीष्मपितान्दा सापाय, भूवराष्ट्र उपावासपा चान्ये द्रामभीष्मरुपादय । चोर उनक दुपैन अदि पुरों धोर म्लामति दिदुर रातः सासुता सिरप महामतिः ॥१०॥ बादिका भी पुउपप्प ॥१॥ पन्न् । परम्प पायदान मानक टिप दराफ सर बा, उनके मापा परियामा सदा यदिग्धरः। मन्त्री तप्प तपारी, प्रम, पि, पस घर- समयः सरावाना राजा प्रकल्पा नृप ॥११॥ ससर हो माये ॥ ११ ॥ पिरन म ।२रि। फरफर पमानने द्रोगाचप, ५८८ भीमहामपत इत्थं निशम्ब दमघोपमुसा खपीठा परीक्षित् ! अपने आसनपर बैठा हुदा सिम यह सब देस-मन रहा पा । मगवान् मीचमके दुस्थाय रुग्णगुणवर्णनवावमन्यः। सुनकर उसे क्रोध हो थापा वौर र उठकर म गया । वह भी समय हाय उठाकर बनी बसहि उरिषप्य पाहुमिदमाह सदस्खमी फित निर्मफ्ताके साथ भगवान्को पुना मुनाकर क कठोर वाते कहने ध्या-२०॥ समासन सभाषमन् भगषते पल्मायभीतः॥३०॥ श्रुतियोंका पर कहना सर्वपा सस्य है कि कार ईवर है। बस चेय फरनेस मी अपना काम यो दुरपयः काल इति सत्पाती भुतिः। ही मेता है-सका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने देख लिया होचों धौर मूसोंकी यातसे बड़े-को बयोवर । बवानामपि यत् पुगिर्यालयायैषिमियते ॥३१॥ माना की मुद्धि भी चकरा गयी है ॥ ३१ ॥ पर मानता है कि वाफ्छोग अपनाके योम्प पकान यूर्य पात्रविदां मेष्ठा मा मर्म पालभापितम् । करनेमें सर्वपण समर्थ है। इसज्येि सदसत्पतियो ! मग पळक सहदेवकी या बस ठीक म माने कि र सदसस्पतयः सर्वे कप्पो यत् सम्मवो ॥३२॥ ही धमाके योग्य है ॥ ३२ ॥ यहाँ बड़े यो तपस्ल किशान, तधरी, मानके जरा अपने समस्त पापों सपोषिपानवधरान् ज्ञानविष्यस्तफरमपान् । शस्त करनेवाले, परम पानी परमर्षि, अनिष्ठ व उपस्थित है—जिनकी पूना मोम का भी करते। परमपीन् प्रमनिष्ठान् लोकपालैप पक्विान् ॥३॥ ॥५॥ याकी मम्म्क साबनेपले उन सदसस्पतिम को प्रेकर यह कुकाम मात्र भन्म, माया का अधिकारी कैसे हो सकता है।स्य फोग सदस्पतीनतिकम्प गोपाल: कुलपसिना । कमी पाके पुरोग्रशका अविकारी होस्पता॥१५ न इसका कोई पर्ण है और म तो लाम्म । कु यथा काका पुरोग सपर्या कपमहति ॥३४॥ इसका मानही है। बरे धमेसे यह पार है । वेद कौन कमर्यादाओंका मन करके मनमाना परम वर्णाभमइसापेतः सर्वधर्मपहिष्कृतः। करता है। इसमें कोई गुण भी नहीं है। ऐसी स्थिति यह अमम्बाका पात्र कैसे हो सकता है।॥ ३५॥ भैरवती गुनिः सपर्या मधति ॥३५॥ पापम्मेग मानते हैं कि रामा ययातिने इसके बसको शाप दे रखा है। इसध्येि सपुरोंने इस बंशका ही पयाविनेपा हि फुलं शप्न सद्विहिप्वम् । बहिफार कर दिया है। ये सब सर्वदा म्पर्ष मधुनमें पास राते हैं। फिर ये बम्पमाके योम्प कैसे हो स्थापानरवं ग्वत् सपना फर्माति ॥३६॥ | सकते हैं। ॥ ३६॥ इन सपने समर्पियोंके परा सेक्सि म्भुरा जादि देशोंका परित्याग कर दिया और प्रमर्पिसेषितान् देशान् हिस्तेऽप्रयवर्चसम् । वर्षसफ विरोधी ( येदवरहित ) समुद्र में बिल कन- म । १ मम।

म.७४] सरद्र दुर्गमाथिस्य पापन्ते दसया प्रमाः ॥३७॥ कर एने छ । वासे का ये हर निकलते है, तो गोंकी तय सारी प्रमाको सताते है ॥ १७ ॥ एषमादीपभद्राणि पभापे नएमङ्गलः। पीधित् ! सब वो शिशुपाया सारा सुम नष्ट हो चुका था । इसीसे उसने और भी यात-सी फली- नोवाच किंचिद् भगवान् पभा सिंहविषारतम्।३८की तस्करको 'पुरे हुओं पर पान नहीं देता, कही बातें माषान् श्रीकृष्णको मुनायीं । परम्त नैसे भगवभिन्दनं मुस्वा दासह व सभासदः । | वैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण उप रहे नोंने उसकी बातों- का एक भी उपर न दिया ।। ३८ ।। परम्त सभासदोंके कर्णी पिपाय निमग्मा पन्तयेदिप रूपा ॥३९॥ लिये मगवान्की निन्दा मुनमा वसा प । उनमेसे की अपने-अपने कान बंद करके कोषसे शिशुपाको गाली देते हुए बाहर चले गये ।। ३९ ॥ परीक्षिस् ! निन्दा भयपतः भृर्वस्वस्परस्म मनस वा। यो मायान्की या मगररायण मोंकी निन्दा सुनकर वो नापति यः सोऽपि यात्पपा मकसाम्प्युतः॥४०॥ वहसि हट नहीं जाता, वह अपने झुमकोस म्पुत हो चाता है और उसकी अवोगति होती है ॥१०॥ सका पाण्डसवाः कुदा मत्सयसञ्जयाः । परीक्षित् ! अव शिशुपालको मर मळनेके लिये | पाय, मास्य, मेकप और समर्वी मरपति क्रोषित उदाप्पाः समवस्था शिपालविषांसवः ॥४१॥ होकर हामि हस्पिर ले छ सरे ए ॥ ११ ॥ परन्तु शिपको इससे कोई पहाट म हुई। उसने बिना ववश्वेपस्त्वसम्मान्यो भगृह खगपर्मणी । किसी प्रकारका बागा-पीय सोचे अपनी गलतष्पार भर्सयन् रुष्णपधीयान् राधः सदसि भारत ॥४२॥ | व्या की और ह मरी सम्बमें श्रीकणके पक्षपाती रानामोंका कारने या ॥१२॥ठन गोंको मते तापदुस्थाप भयपान स्वान् निनार्य खप रूपा । मारवे देख भगवान् श्रीकृष्ण उठ सा र । उन्होंने अपने पक्षपाटी राज्योंको शान्त मिपा वीर सयं क्रोष शिरः पुरान्तपत्रेण बारापसतो रिपोः ॥४३॥ परके क्सने पर सफ्टते हुए शिशुपाख्या सिर फुरेके समान तीही पारवाले से काट डिया ॥१३॥ शम्दः कोलाहलोऽप्पासीत् शिशुपाले इस महान् | शिशुपालके मारे जानेर हाँ वहा कोयाहल मच गया । वस्मानुयापिनो भूपा दुखी विसैपियः ॥४४॥ | उसके अनुपापी नरपति अपने अपने प्राण बचाने के लिये गोसे मग माइए ॥ १५॥ जैसे खायाधसे पदेहोस्थित मोतिर्यासुदेवपाविशत् । गि दुध धरती सम्म जाता है, वेसे । स्म प्राणियों के देस्ते-देखते शिपुराउक शरीरसे एक मोति पश्मता सर्वभूतानामुन्केष सवि साम्यता ॥४५॥ निकम्मर मान् श्रीकृष्गमे सम्प गयी ॥ १५॥परीक्षित् ! शिराळके व करणमे लगातार तीन जग्मसे बरमाक्की मन्मयानुगणिववरसरम्भया ममिति हो यी पी। वौर इस प्रकार, परमबसे ही समी, म्यान परते-करते का समय हो गया—-पास हो ध्यास्तन्ममा पातो भाषो हि भवमारणम् ॥४६॥ गया । सप है-मस्युक बार होनेाठी गतिमें पर दिया।

यमन्त-स्नान- | मुक्ति पार ययानुप्रानका पतन करेग, समर ५९० श्रीमद्भागवत [. श्वविग्म्पाससदस्पेम्पो दक्षिणा विपुलामवाद । ही कारण है ॥ १६ शिशुपालकी स्वगति । बाद चक्रवर्ती धर्मराज युधिष्ठिरने सदस्य वीर प्रति सर्वान् सम्पूज्य विभिषधकऽयमृधमेकराट् ॥४७॥ पुफल दक्षिण टी तथा सबका सत्कार करके विधि -यवस्प-स्नान किया ॥ १७ ॥ साधयित्वा क्रतुं रामः कृष्णो योगेवरेचरः । परीभित् । इस प्रकार योगेपरेवर भगवान् श्री | धरान युधिष्ठिरफा राजस्य वर्ण का वोर । उषास विधि मासान् मुहनिरभियाचितः॥४८॥ सगे-सम्बन्धी और सदोंकी प्रनासे कुछ महीने सतोऽनुवाप्प रापानमनिम्छन्तमपीचरः । बहीं रहे ॥ १८॥ इसके बाद राजा युधिश्रिती । म होनेर भी सर्वशक्तिमान् मान् श्रीणने ६ पपो सभार्यः सामात्मः स्वपुरं देवकीसुतः ॥४९॥ अनुमति ले ली और अपनी रानियों तय मन्त्रियों के इन्द्रप्रससे शरकापुरीकी यात्रा की ॥ १९॥ पीधि वर्णितं तदुपास्पानं मया ते पहुनिस्वरम् । मैं यह उपायान तुम्हें बहुत विस्तारसे (सात कर वैकुण्ठवासिनोर्बन्म षिप्रश्नापाव पुनः पुनः ॥५०॥ सनकादि ऋषियों के शापसे यार-बार जन्म लेना। मना शुफा कि बैकुण्ठवासी जप और विका राजपावसम्येन सातो रामा मुधिष्ठिरः । पा ॥ ५० ॥ महाराज युधिष्ठिर राम्पका कार करके समम और क्षत्रियों की समामें देवराज न असपत्रसभाममे शुशुमे मुररारिव ॥५१॥ समान शोभायमान होने लगे ॥ ५१ ॥ राज युमिष्टि देमता, मनुष्य वौर वाकाशचारियोंका पपायोम्प सम राशा सभाषिताः सर्वे सुरमानवसेचराः । किय तया वे मगवान् श्रीकृष्ण एवं राजस्य का प्रशंसा करते हुए वा वानन्दसे अपने वपने मोर कणं क्रतुं च शंसन्तः स्वघामानि पर्यादा ॥५२॥ पले गपे ॥ ५२ ॥ परीक्षित् ! सब तो मुभी हुए, पर दुर्योधनसे पाणपोंकी पा का राज्यमीका र दुर्योधनमवे पापं कलिं हमाछामपम् । सहम म पुवा । स्योंकि स्वमाबसे ही पी, 4 योन सेहेमियंस्फीतारनपाणसुतस ताम् ॥५३॥ प्रेमी मौर फुलकुका माश करनेके पि एक महान् य इद कीर्तयेद् विष्णोः फर्म वैषवधादिकम् । परीसित् । नो पुख्य मगमान् श्रीम्णकी ध्यम्मक्र—शिनुपाम्प, बरासयम, मंदी राजाकों रो बा ॥ ५॥ राममोर्ष वितानं च सर्वपापैः प्रमुम्पते ॥५४॥ पार्योसे छूट नायगा ॥ ५१ ।। .. इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारम्बस्व संहितापा दशमस्कन्धे ठरावे शिवरायो माम चतु समतितमे- ऽध्यायः ॥ ७ ॥ १ राम्रपमिस ।

4०७५] दशम स्कन्ध अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः पमस्प याकी पूर्ति सौर दुर्योधन मपमान रायोवाच पखा परीक्षितने पून-मावन् । बजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिरके राजस्य यजमहोत्सवको देशकर, अजातशत्रोस्त रा राजसपमहोदयम् । निसने मनुष्य, नरपति, अपि, मुनि धौर देवता बादि सचे समदिरे प्रमन् नवेषा मे समागताः॥१॥ आये थे, वे सब वानन्दित हुए । परन्तु दुर्योवनको दुर्योधनं वर्जयित्वा राधानः सर्पपः सुराः । महा दुन, वी पीना हुई, यवात मैंने पापके मुससे सुनी है। मापन् ! बाप क्या करके इसका कारण इति श्रुतं नो भगवस्तत्र कारणमुच्यताम् ॥२॥ क्तमाये ॥ १२॥ माविस्ताप भीशुपयेपनी महापामे कहा-परीक्षित् ! तुम्हारे पितामास ते यझे रामरसे महास्मनः । दादा युधिष्ठिर परे महात्मा थे। उनके प्रेममधनसे कर समी पधु-गन्धोंने राजस्य पामें विभिन्न मान्भवाः परिचर्यायां वसासन् प्रेममन्भनाः॥ ३॥ सेमाकार्य सीकार किया पा ॥ ३ ॥ भीमसेन मोजना भीमो महानसाम्पको धनाध्यक्ष सुभोधनः । ख्यकी देखरेख करते थे। दुर्योधन कोषाध्यक्ष पे । सहदेव अभ्योंकि सागत-सत्कारमें नियुक्त थे और सहदेवस्तु पूजायां नहलो द्रम्पसाधने ॥४॥ | नकुछ विविध प्रकारकी सामग्री एकत्र करनेका काम गुरुधभूपणे विष्णुः कृष्णः पादापनेबने । | देसते वे ॥ ॥ अर्जुन गुरुचों की सेवा-सुधूपा करते थे और सय झामन् श्रीकृष्ण धाये हुए पतिपियोंकि पोष परिषेपणे ठपदमा कर्णो दाने महामनाः ॥५॥ पखारनेका काम करते थे । देमी प्रौपदी भोजन परसनेका युयुधानो विकर्णध हार्दिक्यो विदुरादयः । काम करती और उदारशिपमणि कर्ण खुले हापों दाम पाडीफपुत्रा भूर्यापा ये ष सन्तर्दनादमः ॥ ६॥ विका, हार्दिक्य, विदुर, भूरिया आदि भीक्के पुत्र दिया करते थे ॥५॥ परीक्षित ! इसी प्रकार सम्स्पकिन निरूपिता महापचे नानाकर्मसु वे वदा। और सतर्दन वादि रामसूप कामे विमिन फोम नियुक्त थे। वे सब के सप पैसा ही काम करते थे, प्रवर्तन्ते म राजेन्द्र रामप्रियचिकीपकः ॥७॥ बिससे महाराज युधिष्ठिरका प्रिय और हित हो ॥६-७॥ अस्विसदस्सपहुविरस सुरचमेषु परीक्षिट् ! म अस्मिन, सदस्य धौर यात पुरुषों विप्टेषु बनवसमाणदक्षिणाभिः । का तथा अपने इए-मित्र एवं मधु-यान्धर्वोका एमधुर वामी विविध प्रकारकी पूना-सामग्री और दक्षिणा वादि ये च सात्वतपसेपरणं प्रविष्टे से मीमति सत्कार हो खुश ता शिक्षा मछ- पकृततस्तापमृपस्नपर्न पुनपाम् ॥ ८॥ काम भगवान्के परोम समा गया, तव धान मृदयापमपघुन्यानकगोमुखाः युधिष्ठिम गङ्गानीमें यान्त-स्नान करने गये ॥ ८॥ उस पादिनामि विचित्राणि नेदुरापमृपासवे ॥९॥ समय आ वे अपनप-प्लान करने लगे, तब मृदा, श, टोग, मौत, नगरे चौर नरसिंगे वार तय नर्सक्यो ननईश गायका यूपठो बगुः । तरारू पाजे मरने यो ॥९॥ नर्तकिया थानन्दसे १ बारम्पपिम्प । १ । " - , महत्-सी राममहिषएँ मी प्रदर-मन्दर परिग ५९२ भीमद्भागवत पीणाषेशतलोन्नादस्तेषां स दिवमसशत् ॥१०॥ झूम-घूमकर नाचने ष्णीं । मुर के सुर गये गने से और वीणा, माँमुरी तया मॉम मजीरे करने मोइसकी चित्रचबपवाफारिमे प्रस्सन्दनार्षभि | तुमुल पनि सारे धाकाशमें गूंज गयी ॥ १० ॥ स्खलङ्कमटै पा निर्यप् रुक्ममालिन ॥११॥ और कोमल देशके नरपति रंग-बिरंगी वना-कासको के हार पहने हुए पद, समय, कोन, फुक, कर यसञ्जयकारोबारफेक्यकोसलाः युठ धीर खूब सजे-धजे गजराज्ों, र, घमें न कम्पपन्तो अवं सैन्यैर्यवमानपुरस्सराः ॥१२॥ करके पृथ्वीको कपाते हुए कह रहे थे ॥ ११ १२ ॥ मुसति पीर सैनिकों के साथ महाराज युधिष्ठिरको को सदस्सविग्रिनभष्ठा प्रयषोपेण भूपसा । याके सदस्प, ऋत्विज और बहुत से श्रेष्ठ प्रण के मनोका ऊचे सरसे उपरण करते हुए फो। देव देवर्षिपितगन्धर्षास्तुष्टुपः पुप्पवर्षियः॥१३॥ ऋषि, पितर, गन्धर्व यायससे पुोंकी वर्षा करते । स्वलंता नरा नार्यो गन्धसम्मपणाम्मरैः। उनकी स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥ इन्द्रप्रसके मर-म | इन पुलेल, पुपोंके हार, रंगरिंगेस और सम्म विसिम्पन्स्पोऽभिपिश्चन्स्पो षिबहुविविधैरसैः।१४। मभूपर्णोसे सन-धनकर एक-दूसरेफर का, तेस, मरून मादि रस अफर मिगे देते, एक-दूसरे तैलमोरसगघोदारिद्रासान्द्रमैः शरीरमें लगा देते पोर इस प्रकार कीग करते हुए पुम्मिलिताः प्रलिम्पन्स्पो पिजदुर्वारयोषितः॥१५॥ TRAI, दी और गली केसर मछ देता है लगे ॥ १९ ॥ वाराङ्गनाएँ पुस्यों को तेज, गरा पुरम भीन्न्हें ठम्ही वस्तुओंसे सराबोर कर देते ॥ १५ गुप्ता नभिनिरगमन्नुपम्म्युमेत उस समय इस उसपको देखने के लिये से उक उखम लिम्पोंपर समर आकाशमें बहुत सी रेकि पायी पी, वैसे ही सैनिक मारा सुरक्षित हनप्रस्ता रेम्पो यथा दिवि विमानवरेन्देम्पः । सवार होकर पायी दी । पारकि ममेरे भाई श्री पौर ठमके समा उन रानियों के सर सरा-तबके । ता मातुसेपससिमिः परिपिम्पमानाः पादि गा रहे थे। इससे रानियों के मुख मी मुस्कराहटसे सिल छते थे और उनकी वाकी छोम सबीहासपिफसरना बिरेनुः ॥१६॥ होती की ॥ १६ ॥ उन कि रंग पारि राम्मे रानियोंके समीग गये थे । इससे उनके शरीरके बमा धौर कटिभाग कुम्पु ता देवरानुत सखीन सिपिपुरतीमिः। हेरे । ये भी पिककारी और पामि रंग मर-मरममा अपने देवरों और मके ससमोर ठदेख यी । छिन्नाम्परा पितगावापोस्मन्या। प्रेमभरी उसकता के कारण उनकी चोटियों और शो । प्रत्य-सड १ पारिमिः ।

५९३ ५०७५ दशम स्मन्म - औत्सुम्पनुककारान्स्पषमानमाक्या। मन्धन दाले पर गये ये ता उनमें गुंथे हुए इस मारते ना रहे थे । परीक्षित् ! उनका यह रुधिर वौर पवित्र विहार देखकर मशिन अन्त करणाले पुरुषोंका चित्त पर हो उठता था, काम-मोहित हो साता धोमं वर्मलभियां रुचिरैविहारः ॥१७॥) पा ॥ १७ ॥ स सम्राट थमाइटः सम्व रुक्ममालिनम् । चक्रवर्ती राजा युधिष्ठिर दोपदी बदि रानियों के साप मन्दर घोड़ोंसे युक्त एव सोनेके हासे सुसन्नित रवपर म्पराचत स्वपमोमि क्रियाभिः क्रतुरारिख ॥१८॥ सवार होकर ऐसे शोभायमान हो रहे पे, मनो स्वयं राजस्य यत्र प्रणाम प्रादि क्रियाओंके साप मूर्तिम्पन् पसोसंगापासपपरित्या वे समुत्विना । होकर प्रकट गया हो।॥ १८॥ प्रषिोंने पानी संयाब (एक प्रकारका यार्म ) तथा यान्त-स्नान बापान्य सापांचगहायां सारुप्मया ॥१९॥ सम्बन्धी फर्म फरकफर मोदी के साथ सम्राट् युधिष्ठिर देव दुभयो नेदुर्नरदुन्दुभिभिः समम् । को वाचमन करवाया धौर इसके बाद गामस्लान ॥१९॥ उस समय मनुर्योकी दुन्दुभिपोंके साथ ही देवताओंकी सम्पनु पुप्पपीमि देवपिपितृमानषा ॥२०॥ दुन्दुमिया भी करने लणी । पा-बा देवा, अषि मुनि, पितर योर मनुप्प पुमोकी र्श करने लगे ॥ २० ॥ सस्नुस्तत्र ततः स वर्णाभमपुवा नराः। महाराज युविष्टिरके स्लान कर लेने के बाद सभी वर्गों महापातस्यपि यतः सपो मुच्येत किषिपात।।२१॥ एवं अधोके ग्रेगोने गङ्गाजी स्नान किय, क्योंकि इस स्नानसे यो-से-पदा महापापी मी अपनी पारमाशिसे तमाल मप रामाइते योम परिभाय स्खलकता। मुक्त हो गया है।॥२१॥ तदनन्तर धमराम युधिष्ठिरने नयी रेशमी धोती और दुपाचा धारण किया तथा विविध शस्तिपुरसविप्रादीनानभरपाम्परैः ॥२२॥ | प्रकारके याभूपोंसे अपने सजा लिया। रि अमिन, सदस्य, प्रामण वादिको बसाभूपण दै-देकर उनकी पन्धुझातिनपान मित्र सरदाऽन्याय सर्वशः। पूना की ॥२२॥ महारान युधिष्ठिर भावत्परायण थे, उन्हें समें भगवान्के ही दर्शन होते । इसलिये वे माई-मधु, अभीक्ष्यं मयामास नारायणपरो नृपः ।।२३॥ लुम्बी, नरपति, इट-मित्र, रिती और सभी प्रेोकी सर्वे बनाः सुररुपो मणिभलस चार-पर पूजा करते ॥ २३ ॥ उस समय समी ग चहाऊ कुरण, पुओंके हार, पगा, सी आरसी, गुप्णीपकम्मुकदुचलमहापारा । | दुपा क्षण मणिपोंके बहुम्म्प हार पानकर देवाओंके समान प्रेमायमान हो । वियोंके मुखोंकी भी दानों नाप कुण्ठपुपालका यजुष्ट कोंक कर्मठ और पुँपराठी भोसे वही श्येम परममिया कनकमेखलया पिरेजुः ॥२४॥ से ही पी सपा उनके परिमागमें सोनेकी फरपनियों वो बहुत ही मश्र माश्म शेरही ६ ॥ २॥ अपसिंजो महाशील सदस्याप्रयवादिन । परीक्षित् ! राजस्य पामे नितने वेग आये में- मसपनियपिटाद्रा राजानो ये समागताः ॥२५॥ मम शीमान् श्रतिव, मयादी सदस्य, प्रग, क्षत्रिय, देवर्षि पिदम्यानि लोकपालाः सानुगाः । वस्य, न राजा देवता, ऋषि, मुनि, पितर तपा प - मा २.७१- ५९४ श्रीमद्भागवत [म. रे पजिवास्तमनुप्लाप्प खपामानि पर्नुप ॥२६॥ | प्राणी और अपने अनुयायियों के साप कोकरासस स्वमी पूजा महाराज युधिष्ठिरने की । इनके बाद हरिदासस्प राजर्षे राजसूयमहोदयम् । ग्रेग धर्मरानसे अनुमति लेकर अपने अपने निवासस्थान- को चले गये ॥२५-२६॥ परीक्षित! जैसे मनुष्य ममत- नपाएप्पन् प्रसन्त पियन् मस्र्पोऽमृत पथा।॥२७॥ पान करसे करते कभी तृप्त नहीं हो सकता, सब लोग भगवळ राजर्षि युधिष्ठिरके राजसूय महाया- सप्तो युधिष्ठिरो राजा सुरस्सम्पधिवान्धवान् । की प्रशंसा करते करते तान न होते थे ॥ २७ ॥ इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिरने वा प्रमसे अपने ही प्रेम्णा निवासयामास कणं पत्यागकावर॥२८॥ सन्द-सम्बन्धियों, माइलघुओं बौर मगमन् श्रीको मी रोक लिया, स्पोकि उममें उनके पिसकी मासे भगवानपि तवाङ्ग न्यवास्सीचरिप्रयकरः। ही बड़ा दुख होता प॥ २८ ॥ परीक्षित् ! मान् श्रीगने यदुशी बीर साम्म धादिको द्वारकापुरी मेन प्रसाप्प यदुवीरोम साम्मा पशस्थलीम् ॥२९॥ दिया और स्वयं राजा युधिष्ठिरकी वभिनषा धर्म करने के छिपे, ममें आनन्द देनेके लिये वहीं रह गये॥२९॥ इस्त्वं राजा धर्मसुतो मनोरथमहार्णवम् । इस प्रकार धर्मनन्दन महाराज युधिष्ठिर मनोरके महान् समुद्रको, जिसे पार करना सरफ्न्त कठिन ।। भगपन् सुस्वर समचीर्य कम्मेनासीत् गमनरा ॥३०॥ श्रीकृष्णकी करासे अनायास हो पार कर गये और उनकी सारी पिता मिट गपी ॥३०॥ एकदान्तःपुरे तस वीक्ष्म दुर्योधनः भियम् । एक दिनकी बात है, मावान्के परमप्रमी महाराज | युधिष्ठिरके पन्त पुरकी सौन्दर्य सम्पत्ति पर राशन मतप्यदराबस्यस्स महित्य धाम्पुतात्मन ॥३१॥ | पारा प्राप्त महत्वको दसकर दुर्योवनका मन मसे अम्ने लगा ॥ ३१ ॥ परीशिस् ! पायोंके सि मम पसिन् नरेन्द्रदिविजेन्द्रसुर द्रलक्ष्मी | दानबने बो छ पना गये थे, उनमें नरपति, दैत्य- | पति और मुरपक्यिोंकी विविध विभूतिया कम नाना विभान्ति फिल विपरजोपपलमा । सौन्दर्य स्पान-स्पानपर शोभायमान या । उनके परा राजरानी द्रौपदो अपने पतिौकी सेन करती पी । उस वाभि पतीन् तुपदरामसुतोपतस्पे राजमानमें उन दिनों भगवान् श्रीकृष्णकी हो रानियाँ निवास करती पी। नितम्पके मरी भारके मारण या मे उस राजभक्नमें धीरे-धीरे पम्ने गाधी थी, तब उनके यसां रिपक्कादया सारतप्पत् ॥३२॥ | पापबाकी भनकर चारों बोर पैठ जाती थी। मग मटिमाग बहुत ही सुन्दर १ सय उनके उस पभिनदा मधुपवमहिपोसास एगी इफेसरफी प्रस्मिसे मोतियों के सुन्दर त हार | भी साफ-टाउ जान पड़ते हैं। कुडकी और धूपरानी मामीभरम अनः पम्मदविवाभम् । वसकी पञ्चासे उनके मुम्बकी शोभा और भी

अ० ७५]
दशम स्कन्ध
५०५
मध्ये सुचार पामशेणहारं म जाती थी । यह सब देखकर दुर्योधनके दयमें
यही जलन होती । परीक्षित् । संघ तो दुर्योधन-
भीम मुखं प्रपलकुण्डलान्सलाट्यम् ॥३३॥ का चित्त प्रौपदी, खासक प और यही उसकी जन
का मुख्य कारण भी पा ॥ ३२ ३३ ॥
सभायां ममलमायां कापि धर्मसुमोऽधिराट् । एक दिन राजाधिराम महारान युधिष्टिरबपने मायों,
सम्बन्धियों एवं अपने नयनोंके तारे परम हिती भगमन्
वृक्षोऽनुज धुभिम कृप्णेनापि खचक्षुषा ।।३४॥ श्रीकृष्णके साप मपदानक्की बनायी समामें स्वर्णसिंहा
सनपर देषराव इन्द्र के समान विराजमान थे। उनकी
बासीन फाशने साधादासने मघवानिव ।
भोग-सामग्री, उनकी राज्यव्यमी ब्रह्माजीके ऐपर्य के
पारमेठपभिया जुष्ट स्तूयमानय पन्दिभिः ॥३५॥ सम्पन थी । वंदीचन उनकी स्तुति कर रहे थे। ३१ ३५।।
उसी समय अभिमानी दुर्योधन भरने दु शास्न नदि
सत्र दुर्योधनो मानी परीतो मादमिर्नुप ।
ममयोंके साम यहाँ आया । उसक सिरपर मुकुट,
समें मय और आपमें सलवार पी । परीसित् ! वह
किरीरमाली मविपदसिहस्तः विपन् रुपा ॥३६॥ कोश वारपालों और सेवकों को शिक्षक रहा पा ॥२६॥
उस समझमें मयदानवने ऐसी माया फैल री पी कि
सलेऽम्पगृहा पखान्त बल मत्वा सलेऽपवत् । दुर्योधनने उससे मोहित हो स्पको जछ समझकर अपने
बम समेट म्येि वीर मठको स्मल सम्बाकर या उसमें
खले व मलय मान्स्पामयमापानिमोहितः ॥३७॥ र पहा ॥ १७ ॥ उसको गिरते देखकर भीमसेन,
अहास भीमस्तं न लियो नृपवयोऽपरे ।
रानरानियों सपा दूसरे नरपति हसने छ । यपपि
युधिष्ठिर उन्हें ऐसा करनेसे रोक रहे थे, परन्तु पारे
निषायमाणा मप्पारामा कृष्णानुमोदिवा ॥३८॥ पीक्षित् ! उन्हें इशारेसे श्रीकृष्णका अनुमोदन प्राप्त हो
जुका पा ॥ ३८ ॥ इससे दुर्योधन एजित हो गया,
स बोरिसोऽवाम्पदनो रुपा ज्वलन्
उसका रोम-रोम कोषसे सने एटा । अब मह अपमा
मुंह स्टाफर जुपचाप समाभमनसे निकालकर हस्तिना-
निलम्य तूष्णी प्रययौ गवाहसम् । पुर घाम गा । इस घटनाफो देशकर स्पोम पहा-
कार मच गया और धर्मश्च युधिमिका मन भी कुछ
हाइति शम्दः सुमहानमुद सप्ता-
सिमसा हो गया । परीक्षित् ! या सम होनेर भी
मजातशर्षि मना
वामपन् । भगवान् श्रीकृष्ण चुप पे । उनकी इच्छा पी कि किसी
पभूव सूप्नी भगवान् सपो भर प्रफल पृषीका मार उत्तम मापा और सप प्रो, सो
उनीकी शिसे दुर्योधनफा यह भ्रम दुवा प॥२९॥
सममिहीपुमति स यदाणा ॥३९॥
परीक्षित् ! तुमने मुझसे पा न पा फि उस महान्
एतघऽभिहित राजन् यत् पृष्टोऽहमिह स्वया । राजसूप-यहमें दुर्योक्न मा क्यों हुआ। वन क्यों
सुपापनस्स दौराम्प रामम्ये महामती ॥४०॥ ए ! सो यह सब मैंने तुम्हें पता यि ॥१०॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे परमाईस्पा संहितापां दशमस्कत्ये'
उत्तरार्धे दर्षेनपनभलो माम पञ्चस्ततितमोऽप्याप ॥ ७॥

५९६ भीमनागपत [.. अथ षट्सप्ततितमोऽध्याय शास्वके साथ पादवोंच युर भीभुक उपाप भीशुकदेवजी कहते हैं परीभित् । अब मनु की-सी ला करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णका एक और अथान्यदपि कृष्णस्स भृणु फर्मामुतं नृप । भी पद्मृत चरित्र सुनो। इसमें यह बताया पर कि सौमनामय विमानका अधिपति शास्त्र किस प्रकार श्रीगनरपरीरस्स यया सौभपतितिः॥१॥ मगवान्के हापसे मारा गया ॥ १॥ श्मस्य शिनुमा सस पा और रुक्मिणीके विवाह के बमपर बरात शिनुपातसस्साशाखो रुक्मिम्पशाह मागतः । शिशुपारकी बोरसे लाया गया था । उस समय म पशिपोंने युद्धमै नासन्ध अदिके साथ-साप शाको पशुभिर्निर्जित सरूपे अरास धादयस्तथा ॥ २ ॥ भी जीत ठ्यिा पा ॥ २ ॥ उस दिन सब रान सामने शास्त्रने या प्रतिक्षा की पी कि मैं पृषीसे शान्वः प्रतिक्षामफरोव सृष्मता सर्वभूमचाम् । फ्टुशियोको मिटाकर मग, सब मेग मेरा क- पौरुप देखना' ॥ ३ ॥ परीक्षित् । म्ह शास्वने इस मयादवी मा फरिप्पे पौरूप मम पश्यत ॥ ३॥ प्रकार प्रतिज्ञा करके देवाधिदेव मगान् परतिको वाराफ्ना प्रारम्भ की । वह उन इनों निमें केस इति । प्रविनाय देष पशुपति प्रभम् । एक पर मुट्ठीमर रास फॉक म्यिा करता था ॥५॥ यों तो फर्वतीपति भगवान् शहर पशुप , और- आराधयामास नृप पांसमर्टि सरुद् प्रसन् ॥ ४॥, दानी है, फिर भी वे शास्त्रका घोर सान्य जानकर एक यर्षक बद प्रसन्न हुए । उन्होंने अपने परमात सवत्सरान्ते भगवानाशुतोष उमापतिः । शस्त्रसे पर माँगनेके लिये कहा ॥५॥ उस समय शात्वने या वर माँगा कि 'मुप्त आप एक ऐसा सिक्न घरेणच्छन्दयामास शाल चरणमागतम् ॥ ५॥ दीमिये जे देवता, असुर, मनुष्प, गत्यप, नाग और राक्षसोंसे तोड़ा न ना सके, या इनो की देवासुरमनुम्पाणी गर्वोरंगरधसाम् । प्रम जाय और पशियोंके रिये अपम्त मपहर ममेष कामगं षय स यानं पृप्णिभीपनम् ॥ ६॥ के बाद उनकी बागसे विपक्षियों के नगर जीतनेको हो ॥ ६ ॥ भगवान् शाहरने का सिस तपति गिरिशादियो मपः परपुरखया । मप दानवने योका सोभनामक पिन मनाया और शासो दे Pप ॥ ७॥ पर घिमन प प एक परं निमाप शान्ताय प्रादात्सौभमपमयम् ॥ ७॥ नगर ही छ । यह इतना अवसरम्य प कि उसे सपना या पकाना अस्पस्त पटिन प । पम्नेग्रम स उम्पा कामर्ग यानं समापाम दुरासदम् । उसे बह 7 जाना चाहता, पनी पर उसोसम १।२ मोमरम् ।

अ०७६] ययो शारखती शालो पर पुणिरुतं सरन् ॥८॥ | करते ही चल जाता था । सपने पह विमान प्राप्त करके द्वारकापर चढ़ाई कर दी, स्पोंकि य वृष्णिवशी पादोद्वारा किये हुए पैरको सदा स्मरण रस्ता पा ॥ ८॥ निरुध सेनया शाखो महस्या भरतर्पम । परीक्षित् ! पल्लने अपनी बात वही सेनासे द्वारकाको घारों धोरसे घेर लिया और फिर उसके पुी पमझोपपनान्युयानानि च सर्वशः ॥ ९॥ फर इसे लदे हुए उपक्न और उपानोंको उबारने और नगरवारों, फाटकों, राबमाइये, अटारियों, दीयारों सगोपुरागि शाराणि प्रासाराहालवोलिकाः । और नागरिकों के मनोविनोदके स्थानोंको नर-भ्रष्ट करने विहारान् स विमानारयामिपेतुःशस्त्राष्टप ॥१०॥ लगा । उस श्रेष्ठ विमानसे शोकी मदीप गयी॥९१०॥ बड़ी-बड़ी चहानें, म, मम, सप और बोसे परसने शिला मामाशनमा सर्ग आसारशर्कराः । टगे । वह जोरका वरर उठ खड़ा हुआ। चारों बोर प्रथममक्रवासाऽभू रजमाऽऽच्छादिता दिशः॥१२॥ कामे जैसे त्रिपुरासुरने सारी पृथ्वीको पीषित कर पूज-ही-धून ७ गयी ॥ ११ ॥ परीक्षित् 1 प्राधीन इत्पर्य माना सौमेन फणस नगरी मृशम् । रख पा, मेसे ही श्यपके विमानने द्वारकापुरीको अस्पात पीमित कर दिया । पहोके नर-नारियोको कही नाम्पपयत श राबसिपुरेग यथा मही ॥१२॥ | एफ क्षणके लिये भी शान्ति न मिती पी ॥ १२ ॥ परम्पशास्त्री पीर भगवान् प्रधुम्नने देखा- हमारी प्रयाको प्रपुम्नो भगवान् वीरूप पाध्यमाना निजा प्रजाः। वड़ा कर हो रहा है, तब उन्होंने रपपर सवार होकर मा मैप्टम्पम्पपाद वीरो रथारो महामंशा ॥१३॥ | सको तहस बंधाया और कहा कि 'एरो मत' ॥१॥ उनके पीछे-पीछे सास्यकि, चारदेष्ण, साम्ब, भ्यायोंके सास्परिपारुदेष्णपमानाका सहानुज । साप अफर, पनघमा, भानुक्न्दि, गद, शुक, सारण भारि बहुत से वीर बाबा धनुष धारण करके निकले। हार्दिकपो भानुविन्दप गदय शुकसारणौ ॥१४॥ ये सब के सब मारपी थे। सबने फवध पान रस्से अपरे प मोपासा रथयथपथपा । पे धौर समयी रक्षाके लिये बहुत-से रस, हामी, घोड़े तय पैदल सेना साप-साप चल सी पी॥ १.१५॥ निर्ययुदशिता गुप्ता रपेभाषपदातिभि ॥१५॥ इसके बाद प्राचीन फामें जैसे देवदार्थोके साप सतः प्रयवृते पुर्व शासाना यदुभिः सह । वसुरोंका घम्पसान युद्ध हुमा पा, वैसे ही शतके | सैनिकों और यदुवशिपोंका युर हाने लगा। उसे देख- पपासुराणां विषैस्तुमुल लोमापणम् ॥१६॥ कर लोग्नेक रोग? हा हो जाते ५ ॥ १६ ॥ प्रद्युम्न नीने अपने दिम्य बनोसे क्षणभरमें ही सोमपति प्रम- वाप सौभपतेमाया दिम्पाने रुक्मिणीमुतः । की सारी माया पाट गस्पा टीक से ही, जैसे सूर्य अपनी प्रस्र त्रिोंसे रात्रिका अन्धकार मिटा देते अपन नाप्नयामास नेश दम इपोप्मगु ॥१७॥ १॥ १७ ॥ प्रद्युम्नीके प्रणाम सानफ पंस एवं बिम्पाध पचविंशत्या स्वर्षपूवरयोमुसः । । याक फर छगे हुए । उनकी बैटे जान नहीं पाती १ रङ्गप्पमनुस्मरन् । २ प्रामण्यम ! ३ रप । ।

भीमशागस [. - तो मी -मनो धावस बजिनीपालं शरैः सनतपर्वभिः ॥१८॥ पी। होंने ऐसे ही पचीस मोंसे शो - पतिको घायल कर दिया ॥ १८ ॥ परममनसी प्रक- घवेनावारपण्छासमेकनास्स सैनिकान् । जीने सेनापति के साथ ही शवको मी सौग मरे फिर प्रत्येक सैनिकको एक-एक पौर समयको दशभिर्दशभिर्नेकून् पाइनानि त्रिभित्रिमिः ॥१९॥ दसदस तथा वाइर्नोको तीन-तीन वर्णोसे का फिल्म ॥ १९ ॥ महामना प्रमुम्नबीके इस बात और तदनुतं मात् फर्म प्रयम्नस्य महात्मनः । महान् फर्मको देखकर अपने एमं पाये सभी सनिक उनकी प्रशसा करने लगे ॥ २० ॥ परीक्षिस् ! म म पूर्वमामासुः सर्वे स्त्रपरसैनिकाः ॥२०॥ दानवका बनाया हुआ शास्त्रका प बिमान वापस मायामप पा । बातना विचित्र था कि मामी बने पारस्पैकरूपं तद रम्पसे न प रमते । रूमि दीखता तो कभी एक रूपमें, कमी दीसत के कमी न भी दीसा । यदुर्यशियोको इस पार पा मापामर्म मपातं दुर्विभाष्य परैरम् ॥२१॥ ही न चलता कि वह इस समप फो । ॥ २१ ॥ र कमी पृषीपर आ जाता तो कमी वाफाराम ठाने कचिद् ममौ कपिम्पोनि गिरिमन्निं जले कपित्। माता । कमी पहारकी घोटीपर था बाता, समें तैरने मता । बाबत-चमके समान--- बलातपय माम्मत् सौम सद् दुखस्सितम्॥२२॥ | कोई तुमही एकारियोंकी बनेठी मांग रहा हो-पूमा राता पा, एक क्षणके म्येि भी कही घरत र पत्र यत्रोपलक्ष्येत ससौभः सहसैनिकः । पा ॥ २२ ॥ शाल अपने पिमान और सैनिक सस माँ-हाँ दिसायी पड़ता, पही-सही यदुवंशी सेनापति धारसस्ततस्तवोऽसनन् वरान् सास्वतधपा।||२३॥ वाणोंकी की लगा देते थे ॥ २६ ॥ उनके मम सर्व पौर वम्निके समान असे हुए सपा पिले सोपी शरैरम्पर्कसंसराधीपिपरासदै। तर क्रय होते थे। उनसे शास्त्रका मगार विमान पीपमानपुरानीमा शाखोऽसपत् परेरितै ॥२४॥ वंशियोंके बोसे शास्त्र सय मूर्छित हो गया ॥ २१॥ और सेना पन्त पीमित हो गयो, यहाँ तक कि या शाखानीकपपत्रीपस्थिवीरा भूशार्दिताः। परीक्षित् ! श्लके सेनापतियों ने भी यदुशियों म्यूब शोंकी वर्षा कर मसी पी, इससे ये बापत न वस्पन रणं स्वं स्व लोमसपजिगीपवः ॥२५॥ न सोचने कमरेगे तो परव्येक पना और पीषित पे मस्तु म्होंने अपना-अपना मोर्चा प्रेम बीरेंगे तो विजयी प्राप्ति होगी ॥ २५ ॥ परीशिव ! शाखामात्यो पुमान् नाम प्रपुम्न प्राप्रपोरितः। शल्बके मन्त्रीस मामय एमान्, निसे पहले प्रपुन जीने पचीस याण मरे । महत फनी प । उसने मकर प्रानजीर अनी फौमी गासे या चोरसे मासापगदपा मोम्पा म्याहस्प म्पनदव पली॥२६॥ ) प्रहार किया और मर रिया, मर म्पिार सस का २ गुर्मा। - ब०७७] दशम स्कन्ष ५९९ प्रमुम्न गदया शीर्णनय सलमरिन्दमम् । गरचने थ्गा ॥ २६ ॥ परीक्षित् ! गदाकी चोटसे शुदमन प्रद्युम्नचीका व स्म फट-सा गया । दासका अपोवाहरणात् सशोधर्मविदारुकात्मनः ॥२७॥ पुत्र उनका रप हॉक रहा प । इ सारविवर्मक अनुसार न्हें रणभूमिसे हटा ले गया ।। २७ ॥ दो उम्भसपो सहतेन पाणिं सारधिमाधीन् । घदीमें प्रपुम्ननीकी मुझे टूटी । म उनोंने सारपीसे कहा—'सारये। सूने या बहुत बुरा किया । हाय, अहो मसायिद सूत या रणा मेऽपसर्पणम् ।।२८॥ | हाप! मुग्ने रणभिसे हटा पा ! ॥ २८ ॥ सूत ! हमने ऐसा कभी नहीं सुना कि हमारे पेशका कोई भी न पदनां झले जाता यूपते रणविन्युतः । वीर कभी रणभूमि श्रेषकर अळग हट गया हो। य कमका टीका सो केक मेरे ही सिर लगा। सचमुच विना मन् वीषियन सूतेन प्राप्त किलिपात्॥२९॥ सूत ! र कायर है, नपुंसक है ॥ २९ ॥ पताम तो सही, अब में अपने ताऊ क्लामनी और रिता किनु वस्पेऽमिसगम्य पितरौ रामफलयो । श्रीकृष्णके सामने जाकर क्या कहूँगा ! क्य तो सब लोग यही करेंगे न, कि में युद्धसे मग गया ! उनके युदात् सम्पमपक्रान्तः पृष्टस्त्यात्मना धमम्॥३०॥ छनेपर में अपने अनुरूप क्या उत्तर दे सझंग ॥३०॥ मेरी मामियों हस्ती हुई मुपसे साफ-साफ पूछेगी कि म्पर्क मेकपपिप्पन्तिासन्त्यो माहबामपः। कहो, योर ! तुम नपुंसक कैसे हो गये ! सरोंने युद्धमें सुम नीधा कैसे दिस दिया । सत ! यस ही तुमने फ्लैम्प कय कपपीर तनान्यः कथ्यवां मृघे ॥३१॥ मुझे रणमूमिसे भगफर अक्षम्प वपराध किया है। ॥ ३१॥ सारमिरुपाप सारथीमे कहा-आयुष्मन् ! मेने जो कुछ किप्प है सारीका धर्म समझकर ही किया है। मेरे समर्प धर्मनिषानताऽऽयुष्मन् समवन्मया विमो। लामी ! युवका ऐसा धर्म है कि साइट पानेर मारपी रपीकी रक्षा कर ले और रपी सरपीकी ॥ ३२ ॥ पूतः रगत रक्षेद रचिन सारपिं रथी ॥३२॥ धर्मको समाते हुए ही मैंने मापको रणभूमिसे पतन पिदित्वा तु भवान् मपापोपादिसोरणात् । हटाया है। शाने आपपर गदाका प्रहार किया पा, जिससे माप मठित हो गये थे, बा साहटमें , उपसृष्ट परेमवि मूर्छितो गदया हतः ॥३३॥ | इसीसे मुझे ऐसा करना पड़ा || ३३ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुरामे पारमईप संहितापा दशमस्का उतार्षे शास्त्वयुद्दे पट्सप्ततितमोऽपाप ॥ ७६ ॥ अथ सप्तसप्ततितमोऽध्याय मीमुक उपाय मीशुक्नेबाजी करते--परीसिद! बर प्रामदीने स तूपसाप सलिलं दंभितो प्रकार्मकः। परपोकर, कसब पान पर धारण किया और सरपी नयमा पुमतः पार्ध षीरस्पेस्याइ सारथिम् ॥१॥ से कहा कि मुझे वीर गुमनके पास फिरसे से कम्पेगा। १ सम्मयात् । २ सन पाच । ३ सोमा।। दम्पनिमाप। शाय-बार ६०० भीमद्भागवत [३०० विधमन्त स्वसैन्यानि पुमन्त रुक्मिणीसुतः । उस सम्प शुमान् यादवसेनाफो ठहस-नहस कर छ प्रतिात्य प्रत्यविभ्यनाराचैरएभि समन् ॥ २ ॥ पा। प्रद्युम्नबीने उसके पास पहुँचकर उसे ऐसा करने रोक दिया और मुसकराकर आठ वाण मरे ॥२॥ पतुर्भिपतुरो पाहान् सूतमकन चाइनन् । वाणोंसे उसके चार घोरे और एक एक वणसे मत दाम्यो धनुष केतुं च शरेमान्पेन वैक्षिरः ॥ ३॥ धनुष, पञ्च और उसका सिर काट यत्र ॥३॥ श्वर गद, सात्यकि, साम्ब आPि यदुनशी वीर मी शत- गदसास्यफिसाम्बाथा जघ्नु सौभपतेर्षलम् । की सेनाका संहार करने लगे। सौम सिमाना के पेतुः समुद्रे सौमेयाः सर्षे संछिन्नकन्धराः ॥ ४॥ पड़ते ॥ १॥ इस प्रकार यदुवंशी और शास्को सैनिक मुए सैनिकों की गरदने क्ट नाती और वे समुझमें मिल एष यदना शाक्याना निघ्नवामितरतरम् । एक-दूसरेपर प्रहार करते रहे। वहाही परसन और पुर्द त्रिपवरात्र तदमृतमुलमुत्पणम् ॥ ५॥ मपार युद्द मुआ और पप गातार सच्चस Pनोंक पळता रहा ॥ ५ ॥ इन्द्रप्रस्थ गतः कण माता धर्मग्नुना । उन दिनों भगवान् श्रीकृष्ण राव युविनिके रामरयेऽध निचे शिशुपाले च सस्सिते ॥ ६ ॥ चुलनेसे इन्द्रप्रस्थ गये मुए पे । रानस्य या हो र पा और शिवपाकी मी मृत्यु हो गयी पी ॥६॥ कुरूपवाननुसाप्प मनीष ससुतां पृषाम् | भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि पड़े मयार पाकुन है रहे हैं। हम उन्होंने कुमशके कामों, शनि-मुनियों, निमिचान्यसिपोराणि पश्यन् दारपती यमौ ।। ७॥ कुत्ती भर पापयोंसे अनुमति लेकर धारमा किने भार पाहमिहायात पार्यमिभाभिसंगतः । प्रस्थान किया ॥ ७ ॥ वे मन-ही-मन काने हो कि 'मे पूभ्य मई यामचीके साथ यहाँ कम आया । मा रामन्यायपक्षीया नून युः पुरीं मम ।। ८ ॥ शिशुपाम्के पक्षपाती क्षत्रिय कदम ही दारफापर अपना कर रहे होगे ॥ ८॥ मगवान् श्रीकृप्मने द्वारका पीक्ष्म सत् कदनं स्वानां निरूप्प पुररक्षणम् । पपकर देश कि सचमुच यादयोंर की लिपतिको है । तब उन्होंने मामनीको नगरकी रक्षा मे सौम प शाल्वराजं च दारुफ प्राह फेशयः ॥ ९॥ नियुक्त कर दिया और सौभपति शारकको देखकर करने | सारथी दाहकसे पहा ॥९॥ दारक ! तुम धीम से रथ प्रापम मे सूत शावसान्सिकमाशु पे। शीघ्र मेरा रम शाम्पके पास ले गये। देखे, या हम सम्प्रमस्ते न कर्तमा मायावी सौभराउयम् ॥१०॥ भगवानकी ऐसी लाला पाकर दारूक रपर भा गया को सा मायावी. तो मी तुम तनिक भी मप न करना ॥१०॥ इत्युकयोदयामास रपमासाप दारुकः । उसे शक्की मोर ले पम । मगवान्के रएकी पना गर घिस्से चिड़ित पी। उसे देकर यदुशियों का भी विपन्न दाशुः सर्वे स्व परे घारमानुनम् ॥१५॥ सेनाके प्ोगोंने युद्धभूमिमें प्रवेश करते ही मानको पहचान म्यि ॥ ११ ॥ परीधित् | सक शासकी पासप फुप्पमालोक्य विपापपलेपरा। सारी सेना प्राय ना हो की भी । भगवान् श्रीकम्पो दक्षम कध -- ०७७] प्राहरद कृष्णसमाप शक्ति भीमरवां मधे ॥१२॥ , देखते ही उसने उनके सारपीपर एक बहुत बड़ी शकि पायी । शक्ति पमा मपार शद करती घामापतन्ती नभसि महोत्सामिष रंहसा । हुई भाकाशमें घड़े मेगसे चल रही पी और बहुत वा एमके समान जान पाती थी । उसके प्रकाशसे दिशाएँ भासपती विशामौरिसायकै अवधान्छिनना १३॥ चमक उठी थी। उसे सारपीको घोर बाते देस भाषान् श्रीकृष्णने अपने बाणों से उसके सैफ्नो टुक्ने कर पोरसमिर्विदृष्या पायैः सौम पस्ने भ्रमत् । ट्रिये ॥१२ १२॥ इसके बाद म्होंने शाल्वको सोह भविष्पन्छरसन्दोहः स सूर्य व रश्मिभिः ॥१४॥ वाण मरे और उसके विमानको मी, जो पायाशमें घूम रहा था, अख्सि बोसे चलनी कर दिय--ठीक शायाधौरस्तुदोः सन्यं सशाशास्यन्दनः। से ही, जैसे सूर्य अपनी किरणों से आकाशको भर देता है ॥ १५ ॥ शात्यने भगवान् श्रीकृष्णकी बापी मुनामें, पिमेद न्यपनदस्ता प्रामासीचदम् ॥१५॥ जिसमें शनिनुप शोभायमान पा, बाण मरा, इससे शचिनुर मगवान्के हापसे छूटकर गिर पड़ा । पर हाहाकारो महानासीद भूतानां तत्र पसताम् । एक अद्भुत घटना घट गयी ॥ १५॥ जो लोग आकाश बिनप सौमराइम्पैरिदमा जनार्दनम् ॥१६॥ या पृथ्वीसे यह युद्ध देख रहे थे, ने बड़े जोरसे 'इफ- हाया पुकार उठे। तब शावने गमनकर भगवान् श्री. यत्वया मूतनः सम्पुर्घातर्भार्या हवेक्षताम् । कृष्णसे यों कहा- १६ ॥ मुड़। सूने हमोगोंके देखते ही हमारे माई मोर सत्य शिशुपालकी फनीको प्रमचास सभामध्ये त्वया व्यापादिताससा॥१७॥ हर ख्यिा तपा मी समामें, जन कि हमरा मित्र से स्वाप निशिवपापैरपरामितमानिनम् । शिशुपाल असावधान पा, दले उसे मार राय ॥१७॥ में बानता कि पपनेको अजेय मानी। यदि नयाम्पपूनराति यदि विष्ठेममाग्रतः ॥१८॥ मेरे सामने बार ग सो में बाम से अपने तीखे अमोसे वहाँ पौधा ,गा, महोसे फिर कोई छोटकर मही भावा ॥१८॥ भीभगवानुसार भगमाम् धीम्पने मा-रे मन्द ! पही पावं स्पसे मन्द न पश्पतन्तिकेऽविकम् । पाक रहा है। हमे पता नही कि सेरे सिरफर मौत सपर है। शूरवीर व्यर्षकी पसाद नहीं करते, धे पौस दर्जयन्ति म भूरा न पहुमापिकः ॥१९॥पनी पीरता ही दिलाया करते है ॥ १९ ॥ इस प्रकार कर भगपान् श्रीगने क्रोषित हो भनी दुपस्था भयमाछाप गदमा भीमवेमया। बापत गाती और मपार गरसे शत्यके जास्थान तसार नौ संस्था सबकम्पे वमन्नसा ॥२०॥ या कॉफ्ने ध्या ॥ २० ॥ इधर म गदा भगवान के (ईसी) पर प्रहार किया । इससे या खून उगलता गदामो सन्निाधायां शारवस्वन्तरधीयत । पास मेट भाणी, तर शाल मस्तान हो गया। इसके मह दोसी बीमत-पीते एक मनुष्यने मान्के पास वयोमा आगत्य पुरसः शिरसाम्यतम् । पक्सिर उनको सिर मुकाकर प्रणाम किया और द्र मिनिधि चैौ । २ मा ।

भीमबागपत देवस्या पहियोऽमीति नत्वाप्राह पप्पो रुदन॥२१॥ , रोता हुआ वोल-'मुझे माफी माता देवकीरीचे मेजा है ॥ २१ ॥ उन्होंने कहा है कि अपने कण कण महाबाहो पिता से पिसुपत्सल । फ्तिाके प्रति अस्पत प्रेम रस्नेवाले महापा पदचापनीवाशाखेन सौनिकेन यथा पनुः ॥२२॥ श्रीकृष्ण ! शास्त्र तुम्हारे पिताको उसी प्रश्न बांधकर ले गया है, जैसे कोई फसाई पाको कर निशम्प विप्रियं रुष्णो मानुपी प्रकसि गतः । ले जाय ! ॥२२॥ यह अप्रिय समाचार सुनकर भावान् की- विमनस्को घृणी स्नेहा सभाप प्राकतो यथा ॥२३॥ गयी। ये साधारण पुरूषके समान पत अन्न कृष्ण मनुष्य से बन गये । उनके मुंहपर कुछ खासी कप राममसम्मान्तं जित्वाजेयं सुरासुरैः। भौर स्नेहसे करने लगे—॥ २३ ॥ हो ! मेरे मर्मा परामजीको तो देपता अफ्षा बार कोई नही बरीच शारपेनारपीपसा नीता पिता मे पलवान् विधि।२४॥ सकता । वे सदा-सदा सावधान राते हैं । शम्मका कम्पौरस तो भरपात रूप है। फिर भी इसने में इति मुराणे गोवि सौमराट् प्रत्पुपस्सितः। कैसे जीत लिया और कैसे मेरे पितानीको बाँधकर में पसुदेवमिवानीय कृष्ण दम्बाप ॥२५॥ गया ! सचमुच, प्रारम्ब बहुत बड़ा है ॥ २१ ॥ मावान् श्रीरुण इस प्रकार कर ही रहे थे कि पास एप से बनिता साता पदर्पमिह बीबसि । मुदेवी के समान एक मापारषित मनुष्य लेकर कई मा पहुँषा और श्रीकृष्णसे पहनेगा ॥२५॥ । पधिप्पे पीक्षतस्तेऽसमीक्षश्वेत् पाहि पालिश ॥२६॥ देस, पी तुझे पैदा करनेवाल सेरा बाप है, जिसमें एवं निर्मर्प मापावी सनेनानफसुन्दुमे। किये जी रहा है। सेरे देस देस्ते में इसका काम तमाम करता है। कुछ क्ल पोरस हो, तो इसे उस्कृत्य पिरमादाप स्वस्थ सौम समाविषम् ।।२७॥ का ॥२६॥ मायावी शाल्मने इस प्रकार मापनको ततो मात्र प्रतापप्लव फटकारकर मापारपिस मुदेवका सिर मारसे काट मि धौर उसे लेकर अपने घाफाशप मिनपर स सपोप आस्ते खबनानुपावा। बैा ।। २७ ॥ परीक्षित् ! मान्छन् भीकृष्ण सपंसिस शामखहप बोर महानुभ्यम है। वे यह घटना देशमार महानुभावस्परपदासुरी दो घीके लिये अपने सम्न सदेवनी के प्रति अपन प्रेम ऐनेके कारण साधारण पुरकि सम्पन शोक म माांस शासप्रस्वां ममोदिताम् ॥२८॥ गये । परम्स फिर वे मान गये कि यह मे शत्की फैमयी गई बासुरी मय ही है, वो उसे मस दानाने न तत्र त न पितुः फलेवर तश्पी बी ॥ २८ ॥ मगान् श्रीकृष्णने पुसभूमिन प्रपद माजी समपश्पदम्युतः । सचेत होकर देखा न यहाँ दूत है और म पिसमा शरीर, जैसे सप्नमें एफ रस्य दीमर कस हो गया स्वाप्नं यथा पाम्परचारिक रिपुं हो । उधर देख वो शास्त्व विमानपर सामर नाकासमै लिघर रहा है। तव उसका पप करने के लिये उक्त सौमसमालोक्य निहन्तमपतः ॥२९॥ हो गये ॥ २९ ॥ १२सर्म। " ब०७७] दशम स्कन्ध ६०३ एवं पदन्ति राजर्षे मपम के च नान्विता । प्रिय परीक्षित ! इस प्रकारको पात पूपिरफा विचार न करनेवाले कोई-कोई शपि करते हैं । अपश्य ही ये यत् खवायो मिरुम्मेत नूनं ते न सरन्स्युत ॥३०॥ इस वातको भूल जाते हैं कि श्रीकृष्ण के सम्मन्धमें ऐसा कहना नहींके वचक विपरीत है।॥ २०॥ मयों कशोम्मोही स्नेहोवा भयंवायेजसम्भवाः । अनानिमि सनेवाले शोक, मोह, स्ने और भप, तथा को ये परिधर्म मावान् श्रीक्षण-दिनका धन, विधान कपालणितविधानाने धर्मस्त्वसनिकः ॥३१॥ और ऐी प्रस्तरित है, एफरस है । (मध्य, उनमें वैसे भाषाकी सम्भावना ही हों)॥ ३१ ॥ मड़े मत्पादसेषोतियाऽऽस्मविषया बड़े ऋषि-मुनि मगवान् श्रीकृष्णके चरणकमकी सेवा हिन्नन्त्यनापास्मविपर्ययग्रहम् । करके नमविपाका भीमाति सम्पादन करते हैं और उसके द्वारा शरीर धादिमें वात्ममुदिरूप धनादि बहान उभन्त मारमीयमनन्तमैपरं को मिटा राम्ते है तपा बामसम्बन्धी बनत ऐपर्य प्राप्त करते हैं । म्न सप्तकि परम गतिस्वरूप भगवान् कुतो नु मोहः परमस सद्गः ॥३२॥ श्रीकृष्णमें मध्य, मोर कैसे हो सकता है।॥ ३२ ॥ वं वसपूर्ण प्रदरतमोजसा क्व शास्त्र भगवान् श्रीकृष्णपर या ठसाह धोर | वेगसे शमोंकी वर्ष करने लगा । बम्पेघशक्ति भगवान् पास्य शरैः शौरिरमोपविक्रमा1 भीष्मने मी अपने बोसे शशस्वको घायल कर दिया विमाग्छिन वर्म धनुः शिरोमणि पौर उसके फाच, धमुप तप्पा सिरकी मणिको छिम मिम सौमं च श्रोदया सोष ह ॥३३॥ कर दिया । साथ ही गदामी चोटसे उसके विमानको भी बजेर कर दिया ॥ १३ ॥ परीक्षित् 1 भावान् वत् रुप्पास्वेरिवया विपूर्णित श्रीकृष्णके असे पथ्ययी ई गदासे वा विमान पपात तोये गदया सहसपा। चूर-चूर होकर सममें गिर पस पिसम्प त मतलमास्थितो गदा- पहले ॥ शल्य हायमें गदा सेम्पर, धरती पर सूद सपम्प शान्योऽन्यतमम्मगावद्वतम्॥३४॥ पड़ा और सावधान होकर बड़े मेगसे मगमात् श्रीकृष्णकी बोर भएटा ॥ ३१ ॥ शास्त्रको वाममण करत देश माधावत: सगर्द सस पाहु उनॉन मालेसे गदा सम्म उस्का हाप काट गिराया । मछन छिचाप स्थानमतम् । फिर उसे मार सम्मक छिपे होंने प्रध्यापन वधाय गालस लपासनिर्म सूर्यके समान सेबस्ती पोर वस्यन्त पदमस सदरान का धारण कर दिया । उस समय टनकी ऐसी पोम निप्रद पभी साई इमोदयापता ॥३५॥ रही थी, मानो सूर्यके सप उदयावर शेमसम्मन जहार तेनैव घिर। सहलं हो ॥ ३५ ॥ मगवान् मीहमने उस पसे परम किरीटयुक्त पुरुमायिनो हरि । म्यावी अस्क्या कुमर-किरीटसहित सिर पासे अग कर रिप, टीक वैसे ही, जैसे इन्दने मासे प्रामुरका पप्रेम इप्रस यथा पुरन्दरो सिर काट राय पर उस समय शावके सैनिक पब हाइति पचखदा नपाम् ॥३६॥ कपात दुमसे 'एमापा चिन्य उठे ३६ ॥ १ प्मनतम्भवम् । । रिनेके प्रति अस्पत | बक्त्रायी पी ॥ २८ ॥ मगवान् श्रीकम्मने मुखममिमें भीमनागवत [.. देवस्या पहिवोऽसीति नत्वा प्राहयचा रुदन्।।२१॥ , रोता हुआ नोटा- मुझे आफ्नी 'माता देफीने मेय है ॥ २१॥ उन्होंने कहा है कि बस्ने कप्प रुपण महापाहो पिता ते पिल्पसल । पिताके प्रम रखनेवाले माम पत्यापनीता धारपेन सौनिफेन यथा पशुः ॥२२॥ श्रीकृष्ण 1 शाल्ल उमारे पिताको उसी प्रकार | बाँधकर ले गया है, जैसे पोर पसाई पशुको देकर निश्चम्प विप्रियं रुप्पो मानुपी प्रकृतिं गतः । ले जाय! २२। यह अप्रिय समाचार सुनकर मासान् श्री विमनस्कोणी स्नेहरादपभाप प्राकचोयथा ॥२३॥ कृष्ण मनुष्य-से बन गये । उनके मुंहपर कुछ उपासी न गयी। ये साधारण पुरुपके सम्मान प्राप्त करना कप राममसम्मान्त जिस्वायं सुरासुरैः। और स्नेहसे कहने लगे-॥ २३ ॥ बहो । मेरे मां क्लामबीको तो देवता वयषा असुर कोई नहीं बीत शारनामीपसा नीतः पिता मे पलवान् विधि।२४॥ सकता । थे सदा-सर्वदा सावधान रहते हैं। आपका कल-पौरुय तो परपन्त अप है। फिर भी इसने में इति वामे गोपि दे सौभराट प्रत्युपस्थितः। कैसे मीत रिम्पा धौर कैसे मेरे पिताजीको मोपकर ने पसुदेवमिवानीय रुग्णं दसवाच स ॥२५॥ गया । सचमुच, प्रारम्ध बहुत कम है ॥ २० ॥ मगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार कर रहे थे कि घर एप ते बनिता तातो यदर्पमिह भीषसि । वसुदेवजीके सम्पन एक म्यारचित मनुष्य लेकर कहा पपिप्पे वीक्षतस्तेऽसमीशश्वेत् पाहि पालिश्च ॥२६॥ देव, यो उसे पैदा करनेयास्त्र टेश बप है, जिसके था परचा धीर श्रीकृष्णसे कहनेणा-॥२५॥ पूर्म! एव निर्मम मापावी सझेनानफन्तुमे । लिये जी या है। मेरे देसते-देखते में इसका उत्कस्प पिर बादाय स्वस्पं सौम समाविक्षत् ॥२७॥ पार ॥२६॥ मायावी शास्वने इस प्रकार भगवान्को पतो महसे प्रतापप्छता फटकारकर म्यारचित पमुदेक्का मिथ्यारसे काट लिया और उसे लेकर अपने बाकाशस विमानपर ग खपोध बास्ते खननानुषगाया। | बेठ ॥ २७ ॥ परीधित् ! भगवान् श्रीकृष्ण सर्मसिस हानसमाप वीर महानुभाव है। वे पर घटना देशकर महानुभावस्तश्पवासुरी | दो घडीके लिये अपने सक्न वसुदेवकी के प्रति अपत प्रेम शेनेके कारण साधारण पुरस्मों के समान होममें मायां सपासप्रसता मयोदिताम् ॥२८॥ गये । परन्तु फिर से जान गये कि या तो शम्की | फैलपी गई मामरी मया ही है, जो उसे मप हानाने न पत्र दर्त न पितुः फलेपर प्रपुर माधौ समपम्पदम्पतः । सचेत होकर देस न पहात है धौर न पिसा का शरीर बैसे सप्नमें एक एस दीसार सो गप स्वाप्नं यथा चाम्मरचारिणं रिप से ! उपर देख वो शाम्य विमानपर पाकर बकासमें पिपर साहै। तम उसका वर करके शिये उपर सौमसमालोक्य निहन्तमपतः ॥२९॥ हो गये ॥ २९॥ कस्म तमाम फरम । कुछ का पौरुष हो, तो इसे अ.७८] दसम स्कन्ध मधुरूपमरिं इस्वा म्याषि दहचर यथा ॥६॥ अपने मित्रोंसे बड़ा प्रम करता है, उनका मुझपर ऋण है। अव तुम्हें मारकर ही में उनके अणसे उमण एष रुपैस्तदन् पाप कम तोरिव दिपम् । सकता है ॥ ६ ॥ जसे महावत असे हायीको धापर करता है, वैसे ही दन्तस्त्रने पानी फापी गदयावास्य मनि सिंहवद न्यनदश्च स ॥७॥ बातोंसे श्रीकृष्णको चोट पहुंचानेकी चेष्टा की और फिर यह उनके सिरपर बड़ नेगसे गदा परफर सिंहक गदयाभिरतोऽप्याजौ न चचाल यद्वा । समन गरज व्य ॥ ७॥ रणभूमिमें गदाकी घाट खकर भी भगान् श्रीकृष्ण टस से मस न दए । कृष्णोऽपि वमान् गुम्यो कोमादफ्यासनान्तरे।।८। उन्होंने अपनी पत यही फौमोरपी गदा सम्हाकर उससे दन्तबारके पक्ष सटपर प्रहार किया ॥ ८॥ गदानिभिंगरदय उदमन् रुधिरं मुखात् । गदाफी चोटसे दन्तस्त्रा फलेजा फट गया । पह मुंहसे सून उगटने टा। उसके पाउ पिर गो, प्रसार्प कशाहनोन्धरण्यान्यपरम्पम् ॥९॥ भुजाएँ और पैर फैठ गये। निदान निप्पाग झोन वह परतीपर गिर पड़ा ॥ ९॥ परीक्षित् ! जैसा कि सतः मूक्ष्मतरं ज्योति कृष्णमाविशदद्भुतम् । शिशुराकी मृत्युके समय हुआ पा, सब प्रागियों के सामने ही ग्न्यस्यके मृत शरीरसे एफ अत्यन्त सूक्ष्म पश्पता सर्वभूतानां यथा चैपवघे नृप ॥१०॥ याति निरठी और वह यही विचित्र सतिसे भगानन् धीक्ष्ण सम्म गयी ॥१०॥ विदूरपस्तु तद्भावा भात्याकपरिप्लुतः । दन्तवस्यके भरा नाम प रिप। एह पन्ने भाइकी मृत्युसे अत्यन्त प्रेगयुल हो गया । पर यह मागसदसिचमभ्यामुनसंस्तअिपांसया ॥११॥ धके मरे टी-श्री साँस स्ता हुआ हा पर तसर पर भगवान् श्रीमणको मर डालनेरी वस पापवत हप्णश्चकप पुरनेमिना। इससे आप ॥११॥ रामद ! जप भगमन् श्रीाम्गने दस कियर पर प्रहार करना चाहता है, सब चिरा प्रहार राजद सकिरीटं सकतम् ॥१२॥ उदोंने अपने हररु सम्पन तीपी भरमा परे रिटी और पुरा साप टना र पासे या एर धौम पशातपदन्तवस्त्र सानुजम् । पर यि ॥ १२॥ इस प्रार भान् श्रायने न्न, उसकरिन सीम, न्ताय और निगम दता पिपहानन्परीरितः मुरमान ॥१३॥ निन्द भरना दरों 5 ओि अगम्य , Eरमा परमी प्रमा पिप । उम सम्प "नार मुनिभि मिदगम्पिावरमहारगः। मनुस उनसे सुति कर रहे पर शीमुनि, निर-, पिन और परि हिना, अप्मानि पिगमप सिन्नरपार ||१|| घसा, निग, ३ चिर तर पारन उन मन मन र उन सा र उसगापमानरिव: समुपाभिपिता । मप्र सरन १ र मन " - दी कमिसर सम विपरिपेाहना पुरीम् ॥१५॥ ना ५६ ॥ १३-१५ ॥

६०४ भीमद्रामवत [२०७४ तमिन् निपतिते पापे सौमे घ गदवा हो । परीक्षित् | नब पापी शास्त्र मर गया और उस विमान मी गदाके प्रहारसे चूर चूर हो गया, तब नेदुन्दुभयो रामन् दिवि देवगणेरिताः । देवतास्प्रेग आकाश दुन्दुमिया बजाने लगे । के इसी समय दनसमात्र अपने मित्र शिशुपाल बादिक पदय होनेके लिये अल्फ्त कोषित कर . ससीनामपचितिकर्मन् दन्तपात्रोमाम्पगा।३७।। पचा ॥ ३७ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमईस्या संहितायो दशमस्कत्ये' उत्तरार्षे सोमवधो नाम समसप्ततितमोऽध्याय ॥ ७॥ अथाष्टसप्ततितमोऽध्याय पतवमा मौर विदूरयन बार या तीर्थयात्रा बरामजीके हापसे सजीम पप भीक उपाय भीशुष्वेवजी पते-परीक्षित | शिवपाल शव बौर पौण्फके मरे जानेपर मकी मित्रताका शिशपालम शाखस्स पौणाकस्यापि दुर्मतिः। प्रण घुमाने के लिये मूर्स दन्तपत्र बकेन ही पैरत परलोकगताना पर्यन् पारोक्ष्यसहिदम् ॥ १॥ोलमा । शसके माम्पर उसके हाधमें एकत्र युबमूमिमें वा धमका । पर क्रोके मरे बाग असून गदा की । परन्तु पीक्षित् । मेोने देख, या ना एका पदातिः संक्रुदो गदापाणिप्रकम्पमन् । शक्तिशाली है कि उसके पैरोमी धाकसे पृमी हर पदम्यामिमा महाराम महासत्यो म्मरमस ।। २ ॥ खीरे ॥ १२ ॥ भगमन् श्रीकृष्णने या उसे इस प्रकार भावे देश, सव टपट रामे गदा स्कर में तथाऽऽमान्समालोक्प गदामादाय सस्परः । रपसे झूद पर । फिर से समुद्र तटमी भूमि उसके भार-माटेको आगे मनेसे ऐफ देती है, वैसे ही अवन्तुस्प रथात् कृष्णः सिधु पेलेव प्रस्पभात्॥३॥ उन्होंने उसे रोफ दिया ॥३॥ पमरके नोर्मे बूर फलफ्नरेश दन्तपाने गदा तानकर भगवान् श्रीकृष्णसे गदामुपम्प फारूपा महन्द प्राह दुर्मदः । -पड़े सौमाम्प और बामन्दकी पत कि धान हुम मेरी बाँकेके सामने पस गये ॥ १॥ दिटया विरया भवानप मम प्टिपथं गतः॥४॥प ! तुम मेरे ममा छाके हो, इसलिये तुम् मारना तो मही चाहियो परन्तु एक तो तुमने मेरे स्वमातुलेयोन फष्ण मित्रनुमोबिपांससि । मित्रों को मार गम है और दूसरे मुझे भी मरना पाते । इसध्येि मतिमाद ! वाज में तुम्हें अपनी कर अतस्त्वा गदया मन्द इनिप्पे वनकरपया ॥५॥ कर्कश गासे पूर-पूर कर अशा ॥ ५ ॥ मूर्स ! | वैसे तो तुम मेरे सम्बधी हो, फिर भी हो शत्रु तपानृपमुपैम्पम मित्राणां मिप्रमत्सल ! जैसे माने ही शरीर बनवाय को रोग हो । में १ प्रेमासारखा। -- म. ७८] ६०७ , शर्मगमतो भूतानिप्पोऽभीस्प पहनि च । मान् व्यासदेवका शिष्प होकर इसमे इतिहास, पुराण, धर्मशार अादि बात से शारोंका अप्पयन सेमिहासपुराणानि धर्मशास्राणि सर्वशः ॥२५॥ भी किया है, परन्तु श्रमी इसका अपने मन- पर संपम नहीं है। यह बिनयी नहीं, पण है। पदान्तसापिनीतस प्रथा पणितमानिनः । इस बनितामने टमङ बानेको यहुत का पमित मान रस्था है। जैसे नटकी सारी चेयाएँ अमिनयमत्र न गुमाय भपन्तिम नटस्पेवामितास्मनः ॥२६॥ होती है, वैसे ही इसका सरा अप्पयन सागके पिये एतदर्थो हि लोकेऽसिमसारो मया कपः। है। उससे न इसका यमी बौर म किसी दूसरेका ॥ २५-२६ ॥जो मेग धर्मका निद धारण करते हैं, पम्मामे धर्मपधिनस्ते दिपातफिनोऽषिकाः॥२७॥) परन्तु धर्मका पालन नहीं करते, वे भक्कि पापी है मोर ये मेरे लिये वध करनेपोम्म है । इस अगत्में एवाबदुक्त्वा भगवान् निचोऽसापादपि । इसीलिये मैंने भक्तार धारण किया है। ॥ २७ ॥ भागान् कमाम यपरि तीर्थयायके कारण दुष्टोंके पसे भाषिताच इमामण फरस्पेनाहन प्रमः ॥२८॥ भी कम हो गये थे, फिर भी इतना कहकर ठोंने अपने में सित कुशकी नोक्से उनपर प्रहार हाडेतिपादिनः सर्वे धनप: लिन्नमानसाः। कर दिया और वे तुरंत मर गये। होनहार ही एसी वी ॥ २८ ॥ सूतबीके मरते ही सब एपि-मुनि एफ- उनुः संकब देषमधर्मस्ते का प्रभो ॥२९॥ एण्य करने लगो, समके वित्त दिन हो गये। गोने देवाधि- देव भगान् ममामनीसे कहा -प्रमो ! मापने यह बहुत अस्स प्रयासन दचममाभिर्यदुनन्दन । बड़ा धर्म किया ॥ २९॥ यदुवंशशिरोमणे ! सूतनीको हमी व्यगने बामग्रेषित बास्नपर भेटण्या पा धीर भापपास्माकम वापद माय सर्व समाप्यते ॥३०॥ यतक हम यह सत्र समाप्त न हो, तटसके लिये में शारीरिक कासे रहित वायु भी दे दी थी॥३०॥ अजानवाचरितस्त्रया प्रपवभो यथा । बाफ्ने बनवानमें यह ऐसा काम कर दिया, यो प्रम- हस्या के समान है। हमलेग र मनते१कि भाप यागेश्मरस भवतो नानापाऽपि नियामकः ॥३१॥ फिर भी वापसे पा प्रार्थना है कि आपका अबतार योगेपर १ वेद मी वापर शासन महाँ कर सफ्ता । छोगीको पवित्र करनेके ध्येि वाद, पति बार किसीकी यपत प्रयास्पायाः पावन लोफपापन । प्ररणाके बिना सर्व बानी इसे ही इस समस्याका परिप्पवि भाँडोफसंग्रोऽनन्पपोदितः ॥३२॥ मिलेगी ।। ३१३२ ।। | प्रायश्चित्त कर गे वो इससे ध्येोको घडत शिक्षा मीभगवानुवार भगवान् पम्पमने कहा-में गोपो शिक्षा देनेके फरिप्पे पनिवेशे लोकानुग्रहकाम्पया । मिपे, गोंपर अनुपा करनेके लिये इस माहत्याका प्रापपिच भास काँगा, क्त इसके लिये प्रथम नियमा प्रधमे पल्पे यावान् स तु विधीयताम्॥३३॥ | भेमीका नो प्रापबित्त हो, आफ्ोग उसीका विवान

श्रीमद्भागवत
[.७८
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एव योगेश्वरः रुप्पो भगवाअगदीश्वरः । योगेघर एवं जगदीवर मगवान् श्रीकृष्ण इसी प्रकार वनकों
देड सेन्ते रहते हैं। जो पशुवोंके समान अविवेकी है, मे
ईयते पशुष्टीनां निर्मितो अपवीति सः॥१६॥
उन्हें कमी हारते भी देखते हैं। परन्तु पास्तवमें तो ये
सदा सर्वदा पिनयी ही है ॥ १६ ॥
भुत्या युद्धोधर्म रामः पुरूणां सह पामः।
एफ पर कळरामजीने मना कि दुदैवनादि कौरव
पाण्मयों के साथ युद्ध करनेकी तैयारी कर रहे हैं।
सीभिषेकम्माजेन मम्ममा प्रपयौ किल ॥१७॥
मप्पस ये, उन्हें किसीका पक्ष लेकर मना पसंद
स्वास्था प्रभासे संतH देष पिपिवमानपान् ।
नहीं पा। इसध्येि वे तीपमि स्नान करनेके पहाने
द्वारकासे क्ले गये ॥ १७ ॥ से ककर नोंने
सरखती प्रतिस्रोतं पयो मामणसंशतः ॥१८॥ प्रमसक्षेत्रमें स्नान किया और तर्पण तपा मग
मोनमके द्वारा देक्सा, ऋषि, पितर दौर मनु पोंको
प्रपदक विन्दुसरनितवर्ष सुवर्धनम् । वप्त किया । इसके बाद वे कुछ प्रापणोंके सम्म
सिपरसे सरसती मदी वा ही पी, ठघर ही ,
विशालं प्रभतीर्थ व धर्म प्राची सरस्वतीम् ॥१९॥ | फो ॥ १८ ॥ वे काम पृथदक, फिनुसर, शिल्प,
सुदर्शनतीर्ष, विशाम्तीर्प, तीर्ष, माती और
यमुनामनु यान्येव गङ्गाममु प भारत ।
पूर्वनाहिनी सरसती बादि तीमि गये ॥ १९ ॥
मगाम नैमिपं पत्र ऋषमा सत्रमासते ॥२०॥
परीधित् । सदनम्वर यमुनातट बौर गातटके प्रधान-
प्रधान तीपमि होते हए ये नैमिवारप्प क्षेत्रमे गये ।
उन दिनों नैमिवारण्य क्षेत्रमें को-को भी सहारूप
तमामतमभिप्रेम सनयो दीसत्रिणः ।
महान् स्त्र कर रोपे ॥२०॥ दीपककक सप्ता
सका नियम लेकर बैठे हुए अपियोंने रामयीको
अभिनन्य समान्पायं प्रणम्पोस्वाम पार्वयन्॥२१॥ वाया देख अपने अपने आसनोंसे उठकर उनका सागत-
सफार किसा वीर पयायोम्प प्रणाम-वाशीवार करके
सोऽपितः सपरीवार! कतासनपरिग्रहः । उनकी पूवा की ॥ २१ ॥ वे अपने सादियोंके सा
वासन प्रण करके बैठ गये और उनकी माला
रोमार्पणमासीनं मः शिप्पमैषत ॥२२॥णे चुकी, व ठोंने देखा कि मगान् म्यासके
शिष्य रोमार्पण म्पसगदीपर बैठे हुए हैं ॥ २२ ॥
अप्रत्युस्थापिन स्तमकतप्रहलाअसिम् ।
स्त्यामबीने देस कि रोमहर्षणवी स्त-पाधिमें उफ्न
होनेपर भी उन श्रेष्ठ प्रमोंसे थे बासनपर बैठेर
और उनके बानेर म तो ठळकर सागत करते
अभ्यासीनंपतान् विप्रासुकोपोदीक्ष्म मामा२३ | १ वौर न जोरकार प्रम्हम ही । इसपर
परामीको कोष वा गया ॥ २३ ॥ घेरने मगे
फसादसाविमान पिप्रानपास्ते प्रपिलोममः। कि पा रोमहर्षण प्रतिस्प्रेम मासिका होनेपर भी इन
भेष्ठ कोसे ता पर्मक रक्षक हमलोगोंसे ऊपर मेटा
धर्मपालस्नियमास्मान् पपईति दुर्मतिः ॥२४॥ | हुआ है, इसलिये पर दूधि मृत्युदण्डका पात्र है ॥ २४ ॥

म० ७] दन्नम स्कन्ध ६०९ भीमो वायुरम राबन् पूर्वगन्धस्तु सर्पशः॥१॥ होने लंगी और चारों भोरसे पीक्की दुर्गन्ध थाने ग॥१॥ इसके बद याशायमै यस्बल दानवने सतोऽमध्यमयं वर्षे घवलेन विनिर्मितम् । मन्-मन्त्र यादि अपवित्र वस्तुओंकी वर्षा की । तनन्सर हाथमें त्रिशूछ छिपे पा सय दिखायी पड़ा ॥ २ ॥ अभवद्याशालायां साऽन्वरश्मत शूलधृक् ।।२।। उसका रीसमोर बहुस यहा था, ऐसा आन पड़ता मानो देर-का-नेर फाटिख सहा कर दिया गया हो। विलोक्य पात्कार्य भिमाअनघयापमम् । उसकी चोटी और दादी-ग्छ तपे हुए तोक्क समान अल- खळ पी। बड़ी-बड़ी दादों और मौहोंके कारण उसका तप्ततामशिनाश्मधु दंट्रोगमुकटीमुम्बम् ॥ ३ ॥ मुँइ वडा भावना माता पा । उसे देखकर भगवान् ससार मुसलं रामः परसैन्यपिदारणम् । क्यामजीने शा सेनाको फुरी करनेवाले मसल और देस्योंको चीर-फार गलनेवाले हल्का स्मरण किया । इल व देत्पदमनं त तूर्णमुपतस्मतुः ।। ४ । उनके स्मरण करते ही वे दोनों शम तुरंत यहाँ मा पहुँचे ॥ ३१॥ यामजीने बाकाशमें विचरनेवाले तमाम इलाग्रेण पपल गगनेघरम् । माल दैपको अपने हलके अगले मागसे खींचकर उस मसलेनाहनव दो मर्नि प्रमह बलः ॥ ५॥ अमरोहीके सिरपर बड़े क्रोधसे एक मुसल फसकर बमाया, जिससे उसका लपट फट गया वोर का खून साऽपतद् सवि निर्मिन्नललाटोऽस्फसमरसम्मन् । उगता ता पातलारसे चिस्यता एषा धरतीपर गिर पहा, ठीक वैसे ही जैसे पाकी चोट सफर गेम मादिसे मुशन्नासम्बर शैलो यथा पासोऽरुणः॥ ६ ॥ अल हुवा कोई पहार गिर पा हो ॥ ५६ ॥ नैमियरण्पवासी महाभाग्यवान् मुनियोंने कामनीकी संस्तुस्प मुनयो रामं प्रयुन्यापित्याधिपः । स्तुति की, म्हें कभी, न म्पर्प हानाले बार्वािद दिये, मम्मपिझन् महाभागा सम्न विधायपा॥ ७॥ वैसे ही उनका अमिफ किया ॥ ७ ॥ इसके बाद और जैसे देवतालेग देवराज इनका धमिपक करते हैं पैमयन्तीं ददुर्मालो भीधामाम्लानपहजाम् । पियोंन करामबीको दिम्य यस और दिग्ग बामपण निये क्या एक ऐसी जयन्ती माय भी दी, जो सौन्दर्यका रामाप वाससी दिष्पे दिम्पान्याभरणानि च ॥ ८॥ वामय एवं कमी न मुसानेवाले कमलके पुोंसे युक्त है॥ ८॥ अप तैरम्पनुशातः कौशिकीमेस्प मामः। तदनन्तर नैमियामवासी अपियोंसे विदा होकर स्नास्वा सरावरमगाए यतः सरपुरासवत् ॥९॥ उनके भाजानुसार बाममी प्रमों के साप कशिकी नीके सम्पर भाय । बहो मसान करक ने उस सरोकार मनुस्रोवेन सरस् प्रयागमुपगम्प सः । गये, होस सरयू मदी निकी ॥ ९॥ महसे सरयूके किनारे किनारे पसने स्मो फिर उसे अफर प्रयाग आये और औ मान तण टेक्ना, अपि एर्ष स्नास्वा संसर्प देवादीन् अगाम पुलायमम्।।१०॥ निरोश तर्पण करके गौसे पुनाश्रम गरे ॥ १० ॥ १।२ एमपन् । 11T ६०८ भीमद्भागवत [.. दीर्घमापूर्वतस सत्यमिन्द्रियमेव च। कीषिये ॥ ३३ ॥ पापोग इस सूतको लंबी बार क्छ, इन्द्रिय-शक्ति धादि जो कुछ भी देना चाहते हों, मुझे इतन्य दीचिये, में अपने योगासे सब कुछ माशासित पचद् मूत सापये योगमायया ॥३४॥ सम्पन्न किये देता ई॥ ३ ॥ कृपय उपुर अपिनि कहा-पलरामजी! बाप ऐस कोई बनस तप वीर्यस मृस्पोरमाकमेव च । उपाय कीजिये जिससे आपका शस, पराक्रम और इनकी पथा भवेद पचासत्पं तथा राम विधीयताम् ॥३५॥ दिया था, यह भी सस्य हो बाय ॥ ३५ ॥ मृत्यु भी म्पर्प न हो और हममेगेंने इमें जो मदान भीभगवानुवाच भगवाम् पर कहा-अपियो । वेदोका ऐस फहना कि यात्म्य ही पुत्रके सूप स्पन्न होता है। आत्मा पे पुत्र उत्पम इति वेदानुशासनम् । इसलिये रोमहर्षणके स्पानपर उनका पुत्र धागेको पुराणोंकी कथा सुनायेगा । उसे मै अपनी शक्सेि तमादस भवेत् पका आयुरिन्द्रिपसम्वषान् ॥३६॥ दीर्घायु, इन्द्रियशक्ति और बल दिये देता है ॥ १६ ॥ ऋषियो । इसके मतिरिक माफमेग बौर जो कुछ मी किं. फामो मनिभेष्ठा धूताई फरषाम्पथ । घाइते हों, मुझसे कहिये । मैं वाफ्योंकी इस कहँगा । मनमानमें मुझसे नो वपराध हो गया है अवानवस्स्वपचिति पथा मे चिन्स्पताधा ॥३७॥ उसका प्रायश्चित्त भी वापरमेग सोच-विचारकर मतव्यये । क्योंकि भाफ्लेग इस लिफ्यफे विद्वान् ॥ ३७॥ रुपम उपुर अपियोम कहा-परप्रामबी ! इसका इपलस्स मुवो घोरो पखला नाम दानवः । पम्पल मामका एक मपहर दानव है। प्रत्येक पर्क | पर यहाँ था पहुँचता और हमारे इस सस्को इपित स दूपपति नः सत्रमेत्य पर्षणि पर्पणि ॥३८॥ कर देता ॥ २८ ॥ यदुनन्दन । या यहाँ पर त पापं अहिदामाई हन्नः शुभूपण परम् । पीव, सून, विख, मन, शव वौर मासकी बर्य करने पता है। पाप उस पापीको मर गम्पिमहकी पूपयोणितविण्मूत्रसुरामांसाभिवर्पिणम् ॥३९॥ यह बहुत वकी सेव होगी ॥ १९ ॥ इसके सर पर नवम भारत वर्ष परीस्प सुसमाहितः । एकामधिपसे तीपोमें स्नान करते हए पण महीनों सफ भारतपर्पकी परिक्रमा करते हुए विचरम कीजिये। परित्या वादश मासांस्वीनापी वियपसे ॥४०॥। इससे आपकी शुद्धि हो जायगी ॥ १० ॥ इति श्रीपदागते म्हापुराणे परमाईत्या संहितपो दशमस्का' उमा बदवपरिने पाधोपक्रमो नामम्मसितमोऽध्याय ॥ ७८ ॥ अथैकोनाशीतितमोऽध्याय पत्यम्घ ग्यार मीर पम्पमसीही तीर्थयात्रा भीशुक उपाय भीशुपदयनी कहते है-परीक्षित् । पर्यन सतः पर्वण्यपावर प्रषण्या पांसुषर्पण । आमपर यहा मपाएर भघर माने या । पूरमी पर समस्तीपथावापा पम ।

मी॥ म०७९] दशम स्कन्ध भीमो वायुरमद् राजन् पूयग वस्तु सर्पशः ॥१॥ | होने लगी और चारों ओरसे पीयको दुर्गन्ध भने इसके बाद याशालामें कल्पछ दानवने खतोऽमध्यमर्म वर्ष परवलेन निनिर्मितम् । मल-मूत्र आदि अपवित्र पस्तुओंफी वर्षा की। तदनन्तर हाप, त्रिशूल लिये पखये Pखपी पहा ॥२॥ अभयषु यत्रशालार्यासाऽन्वाश्यत शूलपा ।। २ ।। ! उसका सीमोल वहुत बड़ा पा, ऐसा आन पाता मानो देर-का-रे कालिस कट्ठा कर Pया गया हो। त विलाप यहत्कार्य भिमाखनषयापमम् । उसकी घाटी और दादी छ तपे हुए तोक्क समान लाल- याल दी। बड़ी-बड़ी दाहों धौर मौहों के कारण उसका सप्तताम्रशिवाश्म दंष्ट्राप्रभुइटोमुखम् ॥ ३ ॥ मुंह पड़ा भयावना छाता पा । उसे देखकर भगवान् समार मुसलं रामः परसैन्पविदारणम् । मामजीने शव सेनाको पुरी करनेवाले मसल भोर | देस्पोंको चीर-फार गलनेवाले हया स्मरण किया । इलं व दैत्पदमन से तूर्णमुपवस्वतः ॥४ । उनके स्मरण करते ही वे दोनों शम तुरंत वहाँ श्रा पहुँचे ॥ ३१ ॥ कमामनीने भाकाशमें विचरनेवाले समाकम्प इलागेण पखल गगनेचरम् । कस्बल दैस्पको अपने हलके अगले मागसे स्वींचकर उस असलेनाइन दो मर्नि ममनुरं पला ॥५॥ मम्मोहीके सिरफ्र बो फोक्से एक महल फसकर जमाया, जिससे उसका उपट फट गया धोर का सून सोऽपत मवि निर्मिन्नलठाटोऽस्फसमुत्स्यन् । उगता तण आतस्वरसे पिरमता हुआ धरतीपर गिर पका, ठीक वैसे ही जैसे पाकी चोट खाकर गेरू वादिसे मुन्नार्तम्बर जैला यथा बनतोऽरुणः॥ ६ ॥ पल तुआ कोई पहाड़ गिर पड़ा हो ॥ ५-६ ॥ नैमिवारण्यवासी महाभाम्यवान् मुनियोंने क्यामनीकी सस्तुत्य मुनयो रामं प्रयुन्माविस्थाशिप । स्तुति की, उन्हें कभी, न म्पर्व होनेवाले आशीर्वाद लिये और नसे देवनाग देवराज इन्द्रका अमिषक करते हैं मम्पपिञ्चन् महाभागा न पिघुपायथा ॥ ७॥ वैसे ही उनका अभिषक किया ।। ७ ।। इसके घर समयन्ती ददुमारी श्रीधामाम्हानपजाम् । अपियोंन परामजीको दिन्य का और दिग्ग वामपण रिये स्पा एक एसी पैनयन्ती मान्य भीती जो सौन्यश रामाप नाससी दिम्मे दिम्यान्याभरणानि च ॥ ८॥ अभय एवं कभी न मुमझानेवारले यमके पुष्पोंसे युक ॥ ८॥ मथ रम्यनुपात: कोशिकीमेत्य प्रापणः । तदनन्तर मेमिप्रापयासी अफ्पिोंस किशोर स्नात्वा सरापरमगायत सरयुराप्रवत् ॥९॥ उनक आशानुसार बामनी अमणोंक साप फशिकी । नीक पार आये । बहो म्पन करक में उस सरावरपर गये, जसे सम् नदी निकाय है ॥ ९॥ यहसे मनुसावेन सरयं प्रयागमुपगम्य मः। सरयूक किनार किनारे पस्न म्यग रि उसे असर प्रयाग आप मोर ना मान ता "पना अघि ot स्नाना मती इवादीन् प्रगाम पुलायमम्॥१०॥ लिरोग तपण करक प्रोसे पुरहाधम गो॥ १० ॥ . १२ रमपन् ।

D भीमनागबस [म०७० . गामी गण्डकी स्नास्वा विपाशा झोण वाप्लुतः। पहसि गणकी, गोमती सप बिपाशा नदियों में मान करके वे सोननदक तटपर गये और यहाँ स्नान किया । गयां गत्वा पितृनिट्ना गङ्गासागरसङ्गमे ॥११॥ इसके बाद गप्पामें जाकर पितरोंका मसुदेवजीके बार- उपसश्य महेन्द्राद्री राम रामभिवाय च । नुसार वन-यमन किपा । फिर गला-सगर-संगमर गये, यहाँ भी खान आदि तीर्य-पस्योंसे निडर होकर सप्तगोदावरी वेा पा भीमरथी ततः ॥१२॥ महेन्द्र पक्तपर गये । यहाँ परारामचीका दर्शन बोर अभिवादन किया । तदनन्तर सप्त गोदावरी, घेणा, पया स्कन्दरमा ययौ रामः श्रीझेल गिरिधालपम्। और मीमरपी आरिमें मान फरवे पर स्वामि- कार्तिकमा दर्शन करने गये तपापहोंसे महादेवजी के निवास द्रविरेषु महापुम्प पहाद्रि घाट प्रसः ॥१३॥ स्थान श्रीशैछपर पहुँचे। इसके बाद मगवान् कलरामने प्रविण कामकोणी पुरी कामी झावेरी च सरिभराम् । देशक परम पुष्पम्य सान बेटाचल (बामापी)काशन किण और गहसि थे कामाझी-शिवाची, विष्णुकाशी श्रीरशास्यं महापुण्यं यत्र सनिरितो हरिः ॥१४॥ होवे हुए तपा श्रेष्ठ नदी कावेरीम मान करते इए पुप्पम्प श्रीरंगक्षेत्रमें पहुंचे । श्रीरंगक्षेत्रमें मगलान् सिमु ऋपभाद्रि हरे क्षेत्रं दक्षिणा मधुरो तथा । सदा विराममान रहते है ।। ११-१९॥ प्रॉसे उन्होंने सामुद्र सेतुमगमन्मापासझनाशनम् ॥१५॥ मिष्णुमगवान्के क्षेत्र अपम पर्वत, दक्षिण म्युरा तथा बड़-या महापापोंको नष्ट करनेवाले सेतुपपकी पाच तत्रायुतमदाद घेनामणभ्या इलायुधः । की ॥ १५॥ वहाँ क्लरामनीने प्रमों को दस हजार गौएँ दान की। फिर होसे क्तमय वीर तापी नरियोंमें कसमालो ताम्रपर्णी मलयं च कुलाचलम् ॥१६॥ स्नान करते हुए ये मलपपर्वतपर गये । यह पर्वत सात कुठपर्वतों से एक है॥१६॥ महाँपर विराममन मनागस्त्य समासीनं नमस्करपाभिवाय च । मास्प मुनिको उन्होंने नमस्कार और अभिवादन किया । यामितस्तेन चाशीभिरनुमाता गवाऽर्षणम् । मास्स्यबीसे वाशीवि और अनुमति प्राप्त करके कररामबीने दक्षिण समुदकी पाच की। माँ उनोंने दक्षिण तय कन्पासपी दगा दवीं ददर्श स ॥१७॥ । दुर्गादेवीका पत्याकुमारी के रूपमें दर्शन किया ॥ १७ ॥ इसके बार वे फागुन तीर्द-प्रनम्तशयन क्षेत्रमें को मत फारगुनमामाच पक्षाप्सरसमुपमम् । भार बहोके सर्वश्रेष्ठ पक्षप्सम पाम किया। विष्णुः मनिहिता पत्र स्नास्वास्पर्श गायुतम्१८ हा यामीन दस हजार गार दाम का ॥ १८ ॥ उस तीर्मम सर्वदा विष्णुभगवान्मा सामिप्य रहता है। दवाऽभिनय भगवान फरलास्तु निगमान् । आ भगवान राम बहाँसे पथर फेरर और गि दमे हार भगवान् शरफ क्षेत्र वर्गीय गाणाम्पं विषधर मानिध्य पर पूजटे ॥१०॥ आये । पर्दा स-साना भगान् शर सिवान रहत ₹॥१. ॥ से जम्म नि में निग्रस गन आयादेपायनी रमा पारकमगार चला। मी आर्य नपान गप और शिर उसrt पमा गरिरमा यारा की, सफ मा , नापापपाना निहिपामुपसमापदायकम्।२०। पानी और मिनिम्न मा पोंमें भान पर I भ०७२] दशम स्कष प्रविश्य खामगमन् पत्र माहिम्मती पुरी। रण्यम बाये ॥ २० ॥ वझे हाकर वे नमदानीक स्पर गय । परीशिव 1 इस पवित्र नदीक सम्पर ही मनुतीर्थमुपस्पृश्य प्रभामं पुनरागमन् ॥२१॥ | माहिपतीपुरी है । यहाँ मनुतीयमें स्नान करक ये फिर प्रभासक्षेत्रमै चले आये ॥२१॥ यही उन्होंन प्रामगोसे भुत्ता द्विज भ्यमानं कुरुपाण्डवस युगे । मुना कि कौरव और पाण्डोंक युदमे अधिकांश भत्रियों- सर्वराजन्यनिधन भार मन रख सूचः ॥२२॥) का संहार हो गया । उन्होंने एसा अनुभष किया कि अव पृथ्वीका बहुत-सा भार उतर गया ॥ २२ ॥ जिस स भीमदुर्याधनपागदाम्पो युध्यतामघ । Pन रण-भूमिमें भीमसेन धौर दुर्योधन गायुद कर रहे ये, उसी Pन फारामजी उन्हें राफनेक ठिप पुरुक्षय पारमिप्यन् विनान अगाम यदुनन्दनः ॥२३॥ का पहुँच ॥२३॥ युधिष्ठिरस्तुत रता यमौ रुप्मार्जुनावपि । महाराज युविष्ठिर, नकुर, सहदय, भगवान् श्रीकृष्ण और अनुनन मामी दकर प्रणाम फिया तय अमिनायाभवस्तूष्मी सिंविषारितगतः ॥२४॥ सुप हो रह । व रते हुए मन-ही-मन सोचने लगे कि । ये न जाने क्या कहनेक ठिये यहाँ पगारे? ||२१ ॥ उस समप भीमसेन और दुर्यो ग्न दोनों ही हापमें गा गदापाणी उभी रमा सरुधी विजयपिणी । मर एम-सरको जीतने लिय प्रबंधसे भरकर भी भतिफ रे बारह थे। उन्हें दबकर बामनीने मणलानि विपित्राणि चान्ताविदमग्रवीत् ।।२५।। | कहा-~|| २५ ॥ राजा दुर्योपन और भीमरन ! तुम मानों धीर हा । तुम दानाम पर-पासप भी सपन। पुर्वा तुस्परलो वीरौ । राजन र सादर । में एसा समझता है कि भामसेनम बउ अकि और एक प्राणापिकं मन्य उतक विधयाधिकम् ॥२६॥ । दुर्योधनन गापुदर्भ शिक्षा अधिक पारी ६ ॥२६॥ इसनिक नुमय-वैसे समान परशाम्पिोम मिसा एपफी जप या तसादेकतरस्पर पुरया ममवीर्ययाः । पाजप नहो हानी भीती । म तुम अग म्पय युद मत फते, अब से क पारा ॥ २७ ॥ परीक्षित ! पयामजी पन दानोंक यि हतार थी। नतमयत उपाऽन्यावाविरमस्वातारण ॥२७॥ परन्तु उन गानोंक परमात्र इतना दमाहा गया प कि उन्होंन मनामनीकी मन न माना । मरेकी न साम्प गृहसरदरा पावन् । पदपानी और दर्पवारोंग स्मरग पाम टमत में अनुसान्तारन्पान्य रुक्तं दुष्कतानि च ॥२८॥ दाह ॥२८॥ भगयन् र मानतीन भिप निग्य कि इन प्रारम्य पदका उमझ सम्मान शिम आमनकाशारा देर । घरसमें दिए तदनुमन्याना समाचारपती यो। उप्रान जारि गुरुग्नों तप कप मधियान पर मममे जग और उनम परत यि ॥२० उपमनादिभि प्रावधानिभिः ममुपागत ॥२९॥ म बमलनी ति नतम शर्म गर । ॥ पिन गि-युजन्मि Fa व पुनर्नमिपं प्राप्तमपयाध्यापन मुदा । -प्राम नया प्रभम प्रारणा ॥

श्रीमनागवत [1० ८० क्रस्वङ्ग प्रतुभिः सपैनिश्चासिलषिग्रहम् ॥३०॥ परीक्षित् ! सच पूछो तो मितने मी यह है, वे बलराम- सीके अग ही हैं। इसलिये उन या यानुप्रन स्मेक सेममा विश्वमित्रानं भगवान् म्पतर विसः। संग्रहक लिये ही घा ॥३०॥ सर्वसमर्थ भगवान् वामने | उन ऋषियोंका विशुद्ध तत्वज्ञानका उपदेश किया, जिससे येनेवारमन्पदो विश्वमास्मान विसर्ग चितुः ॥३१॥ वे लोग इस सम्पूर्ण विषको अपने-अपमें और अपने आपको सारे विधमें अनुभव करने सगे ॥ ३१॥ इसके वाद सामनीने भनी मनी रेक्तीक साध यान्त-स्नान स्वपल्ल्यावस्थस्नासो शातिपन्धुसादासः। मिस्या और सुन्दर-मन्दर वन तप्प भामूपण पानकर अपने मई मन्धु तथा समन-सम्बन्क्यिोंक साप इस प्रकार रेले स्वज्योस्रयेवेन्दुः सुवासाः सुष्टपल स्वः॥३२॥ शोभायमन ए, बैसे अपनी चन्द्रिका एवं नक्षत्रों के साप चन्द्रदेव होत ॥ ३२ ॥ परीक्षित ! मगवान् ईरम्विधान्पसंख्पानि पलस्स पलपालिनः । माम लय अनन्त है। उनका खम्प मन और वामी के परे है। उनोंने लीके लिय ही यह मनुष्योंक- मनन्तस्याप्रमेयस्य मायामस्पेख सन्ति हि॥३३॥ सा शरीर प्राण किया है। उन सशाम यमाम बीके ऐसे-ऐसे चरित्रों की गिनती मी मही की जा सकती।३३। योऽनुमरेत् रामस्स फर्माम्यनुतकर्मणः । जो पुरुष अनन्त, सर्वव्यापफ, अमृतर्प मगवान् पामजीक चरित्रोंश साय प्रात स्मरण करता है, या सायं प्रातरनन्तम्प विष्णोः सदपिता भवेत् ॥३४॥ भामान्का बस्यन्त प्रिय हो जाता है।॥ ३५॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराण पारमईत्यो सहितायां दशमस्कन्धे परदेश- सीर्षयात्रेनिसपर्ण नामकोनाशीतितमोऽध्याय ॥ ७९ ॥ -- अथाशीतितमोऽध्याय भीष्मके द्वारा सुदामाजीका सागत पजा परीक्षितन पूम-भगवन् ! प्रम मोर मुक्तिके दाता समक्ष परमामा भगवान् श्रीकृष्णकी शफि नन्त भगवन यानि पान्यानि मन्दस महात्मनः है। इसठिये उनकी मधुर्य और ऐपर्यसे मरी की मी अनन्त है। पर हम उनकी दूसरी सीमाएँ, निश वर्णन मापने अक्सक नही किया है सुनना वीर्याम्पनन्तगीर्यस्य श्रोतुमिठामा प्रभो ॥१॥ चाहते हैं ॥ १ ॥ प्रान् ! ए बीत विषय मुष्को खेमते-खोबसे अत्यन्त दुखी हो गया है। ये अगकी नुभूस्वासरुममन्नुचमसफसस्फथा। तरह इसके निधौ पुम्से रहते हैं। ऐसी मितिमें ऐसा कौन-सा रसिक-सश शेया पुश्त रोग, जो मार पर पत्रिकीर्ति भगवान् श्रीकणकी मालमपी टीमों समस विशेषता पिपमा ममार्गः ॥२॥ पा प्रवण करक मी उनसे विमुख हाना हेगा ॥२॥ तापमतिमा । २ मा । ।

ब० ८०] दशम स्कन्ध ६१३ मूत उपाय सा वाग यया तस्स गुणान् गणीते जो पाणी भगवान्के गुणोंका गान करती है, वही सी वाणी है। वही हाय सम्चे हाय है, जो भगवान्धी करो घ सत्कर्मकरी मनम् । सेवाके लिये काम करते हैं। यही मन सधा मन है, मरेद् वसन्त स्थिरजामपु जो चराचर प्राणियोंमें नियास करनेवाल भगवान्फा स्मरण करता है, और वे ही कान पास्तपम कान कहने योग्य भूमाति तत्पुण्यफया स कर्म ॥ ३ ॥ है,जो भगवान्टी पुण्यमयी कसोश श्रवण करते हैं।३ । शिरस्तु सस्पोमपलिशमानम- यही सिर सिर है, जो पराचर जगत्का भगवान्पी चक- अचल प्रतिमा समझकर नमस्कार करता है और जो घदव यत् पश्यति सदि चक्षु । सवत्र भगवद्विग्रहका दर्शन करते हैं, वही नत्र वास्तवमै अनानि विष्णोरथ सजनाना नेत्र है। शरीरक जो अङ्ग भगान् और उनके भक्तोंक चरणादफा सेवन करते है, पे ही बन पाखयमें था पादोदकं यानि भजन्ति नित्यम् ॥ ४॥ १, सच पूछिये तो उन्हीका हाना सरल है ॥ १॥ समजी फा-दौनकादि भरियो । व राना विष्णुरातन सम्पृष्टा भगवान् पादरापणिः । परीक्षितने इस प्रकार प्रश्न रित्या, तप भगवान् श्रीगुफदेव जीका हदय भगवान् धीरणम ही तहान हा गया । पासुइव भगवति निमग्रहदयोऽब्रवीत् ॥ ५॥ नोंने पीक्षित्से इस प्रकार यहा ।। ५ ॥ भीक आप भीगुरुदयजीने कहा-परीक्षित् ! एफ माग मगवान् श्रीकृष्णक परम मित्र 4 | 4 पद प्रमानी, रुप्मस्वासोत् सम्बाकषिद् प्राक्षणा ब्रह्मवित्तम । विषयोंसे विरक, शास्तधित और नितन्द्रिय घे ॥ ६ ॥ रिक इन्द्रिपार्येषु प्रशान्तास्मा जितन्द्रिय ॥६॥ | वे गृहस्थ पनेसर पिसी प्रवरका संग्रह गरिमन रखकर प्रारम्पक अनुसार जो युछ मिर जाता, उसीम परग्छपापपमन पर्तमाना गृहाममी । सम्तुर रहत थ । उनक पन ता फट-गुगने पही, टनी स्लीक भी से ही य । बह भी आने पतिक वस्स भापो कुचलम्य शुवामा न वधाविधा ॥७॥ सम्पन हा भूमसे दुबध हो रही भी ॥ ७ ॥ एक नि पतियता पति प्राद मायवा वदनन सा । ररिद्रतामी प्रतिम्ति दुनिी पतिता भूमी मार पांती दर आने पनित्यक पास गया और मुशाय दरिद्रा साद माना सा घपमानाभिगम्य च ॥ ८॥ पुर मुंइस पाय-- ८॥ भगान् ! साभार गति मगन् श्रीण अपक सर । वभक समानता, ननुप्रान्भगवत मुम्बा मायान्छिय पति । पर तम्ता और गेंकन नक₹10॥ प्रमण्यम शरम्पथ भगवान् मात्वतपभः ॥ ॥ पपला अध्रप। आर नाम साप । म 'गम भम्पान् अपर ! साधु-सनाम, महक तमुपदि महाभाग माधूनां च परापणम् । बनेंग हि भर युदम्भी कम्निा दूध हा दर ना 1 अराकमा नग॥१०॥ दाम्पति द्रविन भरि मादन ने कम्निन ॥१०॥ बार 1 मान सिर पर माम्नम्भुना मार पी भावापरफयर । मी मनेसनम कर रद । वर ११।२५ ।

६१४ श्रीमद्भागवत [.०८ मरत पादकमलमात्मानमपि यच्छति । इतने उदार है कि भो उनके चरणकमल का स्मरण में है, उन प्रेमी मोंको वे अपने-आपतमा दान किंमर्थकामान् भमतो नात्पभीष्टाजगद्गुरुः॥११॥ गते हैं। ऐसी स्थिति में जगद्गुरु भगवान् भी। अपने भक्तोंको यदि धन और विस्प-मुख, जो अस स एव भार्यया विषो पहुस। प्राधिसो मा। वाहनीय नहीं है, देदें, तो इसमें बार्यकी कौन मत है " ॥११॥ इस प्रकार क्य ठन प्रमगदेवत भय हि परमो लाभ उत्समश्लोकदर्शनम् ॥१२॥ पनीने अपने पतिदवसे कई बार यही नम्रतासे प्रार की, तप होने सोचा कि धनकी तो कोई मात । इति सचिन्त्य मनसा गमनाय मतिं दधे । है, परन्तु मगवान् श्रीकृष्णका दर्शन हो जाएगा, तो जीवनका बात मा यम है॥ १२॥ यही लि मप्पस्त्युपायर्न किभिव गरेफरपागि दीयताम् ।१३। फरक ठम्होंने जानेका निमय किया और अपनी फस मापित्या धतुरो मुष्टीन् विप्रान् पृपुकसगुलान् । बोले-'यस्याणी । परमें कुछ भेंट देनेपोम्प वस्तु है क्या । यदि हो तो दे दो' ।। १३ ॥ तब चलखण्डन दान् यचा भर्ने प्रादानुपायनम् ॥१४॥ मासणीने पास पदोस्के प्रमोंके घरसे चार : विउ मागकर एफ कसदमें गाँध दिये धीर भागार स वानादाय विप्राय: प्रपयो द्वारका फिल । | भेट देनेके लिये अपने पतिदेवको दे दिये ॥ ११ इसके बाद वे ब्राह्मणदेवता उन घिउको लेकर ER सप्तमन्दर्शन मम कथ सादिति चिन्तयन् ॥१५॥ के लिये चल पड़े। वे मार्गमे यह सोचते जाते थे। 'मुझे भगवान् श्रीपणके दर्शन कैसे प्राप्त होंगे। श्रीणिगुल्मान्पतीपापविना कथाम सद्विजः। परीसित् ! शरकामें पहुँचनेपर ये पाणदेवता । प्रमणे के साप सैनिकों की तीन समनियों और विप्राऽगम्पाधाप्णीना गृहप्यन्युतधर्मिणाम् ॥१६॥ व्योतियों पार करके मागदर्भया पाटन करने पक और मणिशी पादोंके महलम, वहाँ पर मपन्त कठिन है जा पाचे ॥ १६ ॥ उनके । गई पासहस्राणां महिपीणो परेदिजः। मावान् श्रीकृष्णकी सह हजार रानियों के महास उनसे एकम उन प्रममदेवताने प्रवेश किया । विषेश्फनम धीमद् प्रमानन्दं गठा पधा ॥१७॥ म्हण पूल सजा-सजापा-अस्पन्त समगुफ ५ उसमें प्रवेश परते समय उन्हें ऐसा माम पुत्र तविलारपान्पुसोदा प्रियापपरमास्सिवः । प्रयन के समुद्रम स-उतरा रोते । ॥ १५ वस समप भगवान् श्रीमम्ण भफ्नी प्राणप्रिया मम मामाधाय नाम्पस्प दाम्पापपग्रही मुदा ॥१८॥ लीक परंगरर गिरे पुर । प्रामण दातास दीदार व सहसा उठा दुए वीर उनफ प्रसव भानमसे उन्हें अपने मुबपाशम पाँच पि॥१ सम्पुः प्रिपस रिप्ररजसतातिनिपत । धित् ! परमानसमा भगगन् मान प्यारे । मोजगदमाक मास से आपत आनन्दित प्राना म्यमुपरिन्दन नवाया पाकरयमा, । उनकपमा सम्मन मा नोंसे प्रमा - । -

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मुगनाममा
RE
भगमन्नाप गमनमामी लाकर मुदामाजीकी पूजा की।

१०८.] दशम स्कन्ध ६१५ योपवेश्म पर्यह स्वयं सम्पुः समर्पणम् । यो ॥ १९ ॥ परीक्षित् ! कुछ समय के बाद भगवान् बोकृष्णने उन्हें ले जाकर अपने पलंगपर बैठा दिया और उपरस्पानिन्याय पादौ पादापनेजनीः ॥२०॥ सर्व पूजनमी सामग्री रखकर उनकी पूजा की । प्रिय वग्रहीम्छिरसा रामन् भगालोकपावना । परीक्षित् ! मायान् श्रीकृष्ण समीको पवित्र करनेवाले है, फिर भी उन्होंने अपने हापों ब्राह्मणदेवताके पौष परिम्प दिम्पग धेन चन्दनागुरुशामः ॥२१॥ पम्बरकर उनका घरणोदक अपने सिरफर धारण किया और उनके शरीरमें पन्दन, अरगजा, केसर आदि दिव्य धूपै सुरभिभिमित्र प्रदीपावलिभिदा । | गन्धोंका लेपन किया ॥ २०२१ ॥ फिर उन्होंने यह अनिस्वाऽऽवधताम्बूलंगपिस्वागतमप्रवीत् ॥२२॥ भानन्दसे सुगन्धित धूप और दीपावसे अपने मित्रकी पारसी सारी । इस प्रकार मा करके पान एव गाय कुचल मलिन धार्म द्विख पमनिसतवम् । देकर मधुर वचनोंसे भले पधारे ऐसा कहकर उनका स्वागत किया ॥ २२ ॥ प्रमणदेता फळे-पुराने वस देवी पर्यचरत् सापाचामरव्यबनेन वै ॥२३॥ | पहने हुए थे । शरीर अस्पत मछिन धौर दुर्वल था । दहकी सारी नसें दिसायी पाती पी । सर्य भगक्ती अन्तापुरषनो इष्टा कुप्मेनामसफीतिना । रुक्मिणीभी पर लपकार उनकी सेवा करने लगी । २३ । मत्त पुरकी सियों पर घेसकर अस्पस विस्मित हो विमिवोऽभूदतिप्रीस्मा अबधूत सभाषितम् ॥२४॥ गयी कि पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्ण अतिशप प्रमसे इस मैले कुचैठे अवधूत ग्रहणकी पूजा कर रहे किमनेन कर पुण्यमयतेन भिक्षुणा । हैं ॥ २१ ॥ वे आपसमें करने मी-पस नगनबंग भिपा हीनेन लोकेऽमिन् गाईवेनाधमेन च ॥२५॥ । निर्धन, निन्दनीय और निकल मिसमंगेने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है, जिससे निषेकी-गुरु श्रीनिवास श्रीकृष्ण मोऽसौ बिलोहगुरुणा भीनिवासेन सम्मत । सप इसका सादर-सत्कार कर रहे है । देखो तो सही, इन्होंने अपने फ्ल्यापर सेवा करती १ सय सामी पर्यहस्सा धिपं हिस्वा परिषकोऽग्रजो पपा ॥२६॥ मरिणी सम्मिणीजीको मेहकर इस प्रमणको अपने | चः माइ वामनीके समान दयसेनाया है ।२५२६। कथयात्रफतुर्गाषापूर्वा गुरुहले सतो।। प्रिंय परीक्षित् 1 भगवान् श्रीकृष्ण बौर में प्रामण दानों एक-दूसरेका हाथ पकाकर अपने पूर्वत्रीकनकी उन भात्मनो ललितारामन् की गुम परस्परम् ॥२७॥ वानन्ददायक घटनामा सरण और पर्णम करने लगे, जो गुरुकुल रहते समय घटित ए पी ॥ २७॥ भीभगवानुवाच भगवान् भीकम्पमे कहा-धर्मक मर्म वामण- अपि प्रमन् गुरुकुलाव भषता लम्बदक्षिणात् । देव । गुरुदक्षिणा देकर जब आप गुरुकुमसे छोट आये, तब आपने अपने अनुरूप श्रीसे विवाह किया या समाचन धर्मच भार्पोरा साक्षी न पा ॥२८॥ नहीं ! ॥ २८ ॥ मैं मानता है कि वापका वित प्रायो गुरपु ते चित्तमकामपित व्या। | गृहस्पीमें सनेम मी प्राप १ भनित तदा । भिपय मार्गोमें भासत । और स्प बोरसे परत हो जाना-स सन्यासीके | धर्मसे मी उतमा सम्पुष्ट नहीं होता, मितना गुरुदक्की | जब हम दोनोंको एक दिन हमारी गुरुपत्नीने हम | अनेके लिये जंगम भेगा पा ॥ ३५ ॥ उस समय मीमद्भागवत [अ० ८० नेपातिप्रीपसे विछन् धनेषु विदितं हि मे ॥२९॥ | नहीं है । विछन् । यह भी मुसे माइम है कि धन मादिमें भी भापकी कोई प्रीति नहीं है ॥ २९ ॥ फेषिन् कुर्वन्ति कर्माणि कामैरहतषेतस । जगत्में बिरले ही लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान्की मापासे निर्मित विषयसम्बन्धी वासनाओंका त्याग कर देते हैं और वित्तमें विषयोंकी तनिक भी वास्ना न स्पजन्ता प्रकृतीदेवीर्यथाई लोकसंग्रहम् ॥३०॥ रहनपर मी मेरे समान केल लोकशिक्षाके लिये कर्म करते रहते है ॥ ३० ॥मामणशिरोमणे | क्या बायको कपि गुरुखले पास प्रमन् सरसि नौ पतः । उस समयकी बात याद है, जब हम दोनों एक सप गुरुकुलमें निवास करते थे । सचमुच गुरुकुलमें ही विनातियोंको अपने प्राप्तम्प पस्तुमा हान होता है नियो विज्ञाय विक्षय तमसः पारमभुते ॥३१॥ जिसके द्वारा वे मानान्धकारसे पार हो जाते हैं ।। ३१ ।। मिप्र ! इस संसारमें शरीरका कारण जन्मदाता पिता सवै सत्कर्मणां साधाद दिबासि सम्भवः । प्रपम गुरु है। इसके बाद उफ्नयन-सस्कार करके सस्कोकी शिक्षा देनेवाला दूसरा गुरु है। यह मेरे ही समान पूश्य है। तदनन्तर ज्ञानोपदेश करके परमात्माको प्राम आपोन पत्राभमिणां पयाई शानदो गुरुः ॥३२॥ | करानेवास्त्र गुरु तो मेरा स्वरूप ही है । यममियोंके ये तीन गुरु होते हैं॥ ३२ ॥ मेरे प्यारे मित्र ! गुरुके नन्वर्षकाविदा प्रपन् वर्गाममयतामिह । स्मरूपमें सर्य में है। इस जगहमें वर्णाश्रमियम जो लोग अपने गुरुदेवके उपदेशानुसार बनायास ही मा सागर पार कर लेते हैं, वे अपने सार्प धौर परमार्थक ये मया गुरुणा पाचा परन्स्पञ्जा भषार्णवम् ॥३३॥ सचे जानकार हैं ॥ ३३ ॥ प्रिय मित्र ! में सक्का धारमा , सक्के हदयमें अन्तर्यामीमपसे बिराममान ! में गृहस्सके पम पमहापच मदिसे, समरीके धर्म नाहमिन्याप्रमातिम्मा तपसोपसमेन वा । उपनयन-दाप्पयन आदिसे, पानप्रस्थीके धम तपस्यसे तुम्मेय सर्वभूतारमा गुरुशुभूपया पधा ॥३४॥ सेमा-शुध्वासे संतुए होता हूँ ॥ २१ ॥ अपि ना मर्पते प्रयन् त निवसता गुरौ । अमन् ! जिस समय हममेग गुरुकुम निवास कर गुरुवार पादिवानामि धनानमने फषित् ॥३५॥ रह पे, उस समपकी पर बात माफ्को पारोक प्रनिटाना महारम्पमपी सुमावू दिम । हमाग एक घोर जंगामें गये हुए थे और मिना भरे वातवपमम्चीम निष्ठराः स्तनयिमनः ॥३६॥ ही बा भ्यतर आँधी-मानी आ गया ५ । आश वित्री महमने छी यी ॥ १६ ॥ अम सूर्यास्त हो पर्पयात गतम्मावत् तममा पारवा दिया। गया; चारों ओर अंधेरा ही अउ गया । भरतीत ५०८०] दशम स्कन्ध निम्न मूलं बलमय न प्राक्षायत किंचन ॥३७॥ | इस प्रकार पानी-ही-पानी हो गया कि यहाँ गहा है, कहाँ फिनारा, इसका पता ही न पलसा पा ॥ ३७॥ पय भृश तत्र महानिलाम्मुभि वह वर्ष क्या पी, एफ ग्रेटा-मोटा प्रथ्य ही पा । माधीके मटकों और वर्षाकी यौनरोंसे हमलोगोंको पड़ी नियमाना मुहुरम्मुसम्मुवे । पीडा हुर, दिशाकाहान न रहा । हमोग अस्पत | बाहर हो गय और एक-दूसरेका राय परामर गठ- दिशोऽविदन्तोऽथ परस्पर घने में इधर उधर भटकते रहे ॥ ३८॥ अब हमारे गुरुदर गृहीतहस्ताः परिसम्रिमातुराः ॥३८॥ सान्दीपनि मुनिका इस यातका फ्ता भय, तम वे सूर्योदय होनेपर अपने शिप्प हमग्रेगोंको इसे इए एतद् विदित्वा उदिते खो सान्दीपनिर्गुरु । जंगमें पहुंचे थोर उन्होंने देस्य कि हम अत्यन्त वातुर हो रहे हैं ॥ ३९ ॥ दे बने सगे-अधर्य, यदेपमाणोना सिम्यानाचार्योऽपश्यदातरान्॥३९॥ आश्चर्य है ! पुरो ! मुम लोने हमारे प्रिये अत्यन्त फस ठम्या । सभी प्रागियों को अपना शरीर सबसे अधिक बहो हे पुषका यूपममदर्धेऽतिदाखिता । प्रिय होता है। परन्तु सुम दोनों उसकी भा परवा न करके हमारी सेवाम ही संलग्न रहे ॥१०॥ गुरुक सणसे मुक्त होने आत्मा पे प्राणिनां प्रष्ठम्तमनात्य मत्परा ॥४०॥ के येि सत्-शिष्योंका इतना ही कम्प है कि मे विशुद भाषसे अपना सब कुछ और शरीर भी गुरुदयकी सेगमें एमदव हि सच्छिप्यै सतम्पं गुरुनिकतम् । समर्पित कर दें।॥११॥हिनशिरोमगियो ! म तुम योगोंसे अफ्त प्रसन्न हूँ। मुम्हारे सारे मनोरप, सारी अभि- पद व मिगुभाषन सर्वार्धात्मार्पण गुरौ ॥४१॥ यायएँ पूर्ण हों और तुम यग्ने हमसे जो वेगप्पयन किया है, यह तुम्हें सरत पस्टस रहे सप्प स क एवं सुप्टा भादिजभष्ठा सस्पा सन्तु मनोरथाः। परटोरी पदी भी निकाउ नहा ॥१२॥ प्रिय छन्दस्सिपातयामानि भवन्त्विा परम प ॥४२॥ मित्र ! बिस समय हमोग गुरुजुर्म निमास पर रद य, हमारे जीवनम ऐसी-रसी अनेरों घग्ना घटित इत्यविधान्यन घनि वसा गुरुम्ममु । । इसमें सन्दा नदी कि गुरुवार पचमे ही मनुष्य लिगा अधिकारी द्वारा और एता प्राप्त गुरारनुप्रणव पुमान् पूर्णः प्रान्त ॥४३॥ परता॥३॥ पामग उराप पानमा पितान पाकि आगप्पा गुरु धाम यह माना की। मिमाभिरनि ददर उगगुरा। पोरि - EC, यसपास र भाठा सत्यकामन मा राजा गुरारम् 100 पुरुष इनरा सौम्प प्रम च ॥ १॥ .. मा नप पसन्दामय प्रत्र दर मापन विभा। | STREEFERIA श्रीमहागपत [१०८१ भपसां तस्स गुरुपु षासोऽस्यन्तपिरम्पनम् ॥४५॥ | आप केदाप्पयनके लिये गुरुकुळमें निवास करें, व मनुष्य-स्टीयका अमिनय नहीं तो और स्या है। इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारम्हस्या संहितायां दशमस्पत्ये उतरार्षे श्रीदामचरितेशीतितमोऽध्याय ।। ८० ॥ अर्थकाशीतितमोऽध्याय सुवामाजीको ऐश्वर्यकी प्राप्ति मीशुक उवाच भौशुफदेवजी कहते हैं-प्रिय परीक्षित् ! मगम् श्रीकृष्ण सबके मनकी बात मानते हैं । ये मारी सदस्थ विजमुरुपेन सह सकथमन् हरि । परम मक, उनके क्लेशोंके नाशक तप संतों के एक सर्पमतमनोऽभिः । सपमान उषाप तम् ॥१॥ मात्र भाम्य है । वे पूर्वोळ प्रकारसे उन लगाके साप बहुत देरतक बातचीत करते हैं । यो अपने प्रमण्यो प्रामकृष्णो ममवान् प्रहसप्रियम्। प्यारे सम्वा उन प्रामणसे तनिफ मुस्मारकर बिनोद प्रेम्णा निरीक्षणेनैव प्रथन् खलु सतां गतिः॥२॥ प्रामणदेवताकी घोर प्रेमभरी ठिसे देख रहे थे ।।१२। करते हुए ग्रेले । उस समय मगवान् श्रीकृष्ण न भीभगवानुवाच भगषाम् भीहप्णमे कहा-'प्रपन् ! कप पाने परसे मेरे लिये क्या उपहार है। मेरे प्रेमी मक किमुपायनमानीतं प्रपन् मे भवता गृहात् । सा प्रेमसे पोपी-सी वस्तु मी मुझे अर्पण करते यह मेरे छिपे पात हो जाती है। परन्तु मेरे अमक अन्वप्युपारतं भकैः प्रेम्णा मूव मे भवेत् । पदि बहुत-सी सामग्री मी मुझे भेंट करते है, तो उससे मैं सूर्यप्पभशापरत न मे तापाप फल्पते ॥ ३॥ मल-अपया पता-पानीमेंसे कोई भी वस्तु मुझे म्सुह नहीं होता ॥ ३ ॥ जो पुम्स प्रेम भकिसे समर्पित करता है, तो में शुमपित भकका र पत्र पुष्प फल तोयं यो मे भक्त्या प्रयग्छति। प्रेमोपहर के स्वीकार ही नहीं करता, बस्कि सुरंत तदहं भव्य परसमभामि प्रपतात्मनः ॥ ४ ॥ भोग मा लेता ॥ १ ॥ परीक्षित् ! भगवान् का के ऐसा कानेपर भी उन ब्रमण देक्वाने प्रासस इस्युकाऽपि द्विजस्तस्मै व्रीरितः पतये मियः। उन प्रमीपतिको वे चार मुट्ठी पि नही हो । उन्होंने स्कोबसे अफ्ना मुँह नीचे कर किया था। परीक्षित ! प्रभुकप्रसूति राजन् न प्रापच्छदपाश्मनः ॥५॥ मगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके ट्रयका एक-एक सहरस और मका बमान भी जानते हैं। मोने सर्वम्वारमा साक्षात् वसागमनकारणम् । प्राममके वानका कारण, हमके दपकी बात मान सी। बचे विचार करने को क एक तो पा मेरा विधापाचिन्तपन्नाय भीकामो माभवत् पुरा॥ ६ ॥ | प्यारा समय है, दूसरे इसने पहले कभी समीकी कामना- १बाविसमोरबी म ।

म०८.] दक्षम कन्ध पल्मा: पतिमतापास्तु ससा प्रियचिकीर्पया। | से मेरा मजन नहीं किया है। इस समय या अपनी पतिता पस्नीको प्रसन्न करने के लिये उसीके मामहसे याँ प्राप्तोमामस्स दास्यामि सम्पदोऽमर्पदुर्लभाः॥७॥ आया है । अव में इसे एसी सम्पत्ति ऍगा, जो देवताओं के छिये मी अत्यन्त दुर्सम है ।। ५-७ ॥ भगवान् श्रीकृष्णाने इस्थं विषिस्य वसनापीरपवान्दिनन्मन । ऐसा विचार करके उनके वससे विपकी एक पोटी- में षा हुषा चिठमा मह क्या है ऐसा कहकर स्त्रयं बहार किमिदमिति प्रपुकसण्डलाम् ॥ ८॥ | खयं ही छीन लिया [॥ ८ ॥ मोर कड़े आरसे कहने लग-प्यारे मित्र ! यह तो तुम मेरे लिये छपन्त भन्येतापनीतं मे परमप्रीमनं सखे । प्रिय मेंट से भागे हो । मे पिउन केमळ मुसे, पकि सारे संसारको तृप्त करनेके लिये पास है ॥९॥ सर्पमन्त्पङ्ग मा विश्वमेते प्रथमतण्डलाः ॥९॥ ऐसा कहकर वे उसमेंसे एक मुट्ठी चिउपास गये और दूसरी मुट्ठी यों ही भरी, स्यों ही रुक्मिणीके रूपमें लय इति सटि सफअग्धा द्वितीयां जग्घुमाददे। भगवती लामीजीने भगवान् श्रीकृष्णकर राय पान गिया । क्योंकि ये तो एकमात्र भगधन्के परम्पण है, में सफर धीर फहीं जा नहीं सक्ती ॥ १० ॥ तापनीर्जगृहे इस्तं तत्परा परमेष्ठिनः ॥१०॥ समिणीजीने कहा-~-चित्मन् ! वस-बस । मनुष्यको इस ध्येको तया मरनेके बाद परको भी समस्त एतापवाले विश्यात्मन् सर्वसम्पसमृद्धये । सम्पत्तियों की समृदि प्राप्त करनेके लिये यह एक मुट्ठी पिठका की बात है। क्योंकि आपके लिये इतना ही बस्मिलोकेऽथनामुस्मिन् ए॒सस्स्वचोपकारणम्॥११॥ प्रसन्नता हेतु बन जाता है।॥ ११ ॥ प्रायमस्तां तु रमनीमुपित्वाभ्युतमन्दिरे । परीक्षित् माझणदेवता उस रातको मगवान् श्रीकृष्ण- के महसमे ही रहे। उन्होंने यह बारामसे म्हो साया- सक्ता पीतामुर्ख मने आस्मानस्वर्गत यथा।।१२।। | पिया और ऐसा अनुमव किया, मानो में प्रयुम्टमें ही पहुँच गया है॥१२॥ परीक्षित् श्रीकुम्मसे प्रमण मोमते विश्वभावेन वसुखेनाभिवन्दित । को प्रत्यक्षरूपमें कुछ भी न मिय । दिर भी उन्होंने उनसे पुस मेंगा नदी ! वे अपने पितफी परतपर कुछ जगाम स्वालय सातपयनुयज्य नन्दितः ॥१॥ त्रित होकर भगवान् भीफणक दर्शनमनित कानन्द स बालग्धाभन कृष्णामतु माचितवान् स्वयम् । में यते-उतरावे अपने घरकी घोर घठ पा ।। १३११।। वे मन-ही-मन साधन लग-अहा, पिसने बानन्द म्वयान ग्रोडितोऽगन्छ महदर्शननिर्णतः ॥१४॥ और पावर्यकी बात है। मामणोंको भनाइएदप माननेग्रस्त भगवान् श्रीम्गमी मायणमकि दाज मैने यहो प्राण्यदेवस रस मदम्यता मया । अपनी आंदों दखयान्य है। जिनके यक्ष सम्पर पर्य एकीजी सा पिरान रहती हैं, उन्होंने मुए पर दरिद्रतमो लक्ष्मीमासिष्टो विम्रवारमि ॥१५॥ | अल्पस्त दरिद्रये अपने एपसे या मिया ॥ १५॥ १ ति पक्सि ममता चौर । २ परिष्यति । मुनै ।

६२० भीमश्रामपत [4.८१ परम- काईदखिः पापीयान् कम्प्णा भीनिकेसनः। | कहाँ तो में पन्त पापी वीर दरिन, धौर को भी के एकमात्र बाश्रय मावान् श्रीकृष्ण ! परन्तु मोने प्रम घुरिति माहं पाहुम्पा परिरम्भिवः ॥१६॥ | पा प्रमण है।--ऐसा सम्झकर मुझे अपनी मुलायम भरकर इदयसे ला लिया ॥ १६ ॥ इतना ही नही, निवासितः प्रियाजुष्टे पर्यवे म्रातरो यथा । | उन्होंने मुझे उस पगार मुल्त्रया, जिसपर उनकी प्राणप्रिया रुक्मिणीमी शयन करती हैं। मानो में उनका महिप्पाबीजिवाभान्तो वालम्पबनहस्तया॥१७॥ स्गा माई हूँ ! कहाँतक करें। में पका हृष्ण का रस- ठिये खयं उनकी पटरानी सम्मिणीनीने अपने हा अभपया परमया पादसमानादिभिः । पर जुल्मफर मेरी सेवा की ॥ १७ ॥ धोर, देवताओं पमितो देवदेवेन विप्रदेवेन देववत् ॥१८॥ के धाराप्पदेष होकर भी प्रमोंको मफ्ना प्रदेश मननेवाले प्रमुने पाँव दयाकर, अपने हाथों सिम-मि- स्वर्गापवर्गमोः पुसा रसायर्या सवि सम्पदाम् । कर मेरी पत सेवा-पुथ्या की और देवता के समान मेरी पूना की ॥ १८ ॥ वर्ग, मोक्ष, पृथ्वी और रसा- सर्यासामपि सिद्धीनां मूल वचरणार्चनम् ॥१९॥ तहकी सम्पति तथा समस्त योगसिदियोंकी प्राप्तिका मा उनके घरों की पूना ही है ॥ १९॥ फिर मपनोऽयं धनं प्राप्प मापन्नधैर्न मां मरेत् । दयाल श्रीमने या सोचकर मुझे पोगा-सा भी मन नही इति कारुमिको नून पनं मेऽभूरि नाददात् ॥२०॥ दिया कि कहीं पर दखि धन पाफर बिस्कुल मालामा म हो जाय मोर मुझे न भून मैठे ॥ २० ॥ इति वचिन्तयन्नन्ता प्राप्तौ निमगृहान्तिकम् । इस प्रकार मन-ही-मन विचार करते-करते प्राण देवता अपने परके पास पहुँच गये । यहाँ क्स सूर्यानसेन्दुसंझार्षिमानैः सर्वतो ससम् ॥२१॥ | देखते हैं कि सम्मा-सव स्पान सूर्य, वनि और कामो सम्पन तेवनी रत्ननिर्मित महसे भिरा हम है। खैर विपित्रोपवनोपानः इजद्विमाला।। और चित्र विचित्र उपक्न बोर उपान बने हुए तब उनमें मुस्के र रंग-बिरंगे फनी कसरत कर रहे है। प्रोत्फुल्लमपदाम्भोजकहारोस्पलपारिभिः ॥२२॥ | सरोवरोम कुमुदिनी तपा श्वेत, मीठ और सौगन्धिक भंति भौतिके काल शिसे हुए है, मुन्दर-सुन्दर की शुष्ट स्वलकसैः पुम्भिः सोभिमहरिणाधिमिः। पुस्य वन-टनकर इधर उधर विचर रहै। उस को देखकर प्रामणदेक्ता सोचने मो-मैं यस्य लिमिदं कख वा सानं फथं सदिदमिस्पभूत् ।।२३॥ | देख रहा है ! यह किसका स्थान है । यदि या कही स्वान है, माँ में राता पा, तो यह ऐसा कैसे हो एप मीमांसमान सं नरा नार्योऽमरप्रमाः । 1-२३ । इस प्रकार से सोपही येथे कि देखत्मयों के समान सन्दर-सुन्दर सी-पुरुष सम्मक प्रस्यगहन् महाभागं गीतमाघेन भूयसा ॥२४॥ साप मङ्गगीत गातेर उस महामापमान् प्रासकी कावानी करने के लिये प्रये ॥ २९ ॥ पतिदेवा शुभ पतिमागसमाकर्ण्य पस्न्युपातिसम्भ्रमा । गम्न मुनकर मामणीको बार आनन्द दुआ बोर १ विमानित। । गया ॥

म० ८१] दशम स्कन्ध ६२१ । । । निमकाम गृहाचूर्ण रूपिणी भीरिपालयात् ॥२५॥ | हावाकर बल्दी-जल्दी घरसे निकल मायी, मह ऐसी माटम होती पी मानो मूर्तिम्ती यमीनी ही कमळनसे पधारी ह ॥ २५ ॥ पतिदेवको देखते ही पतिता पतिव्रता पति राष्ट्र प्रमोत्कण्ठासुलोचना । परीके नेत्रों में प्रेम धौर टाकायके भावेगसे आँसू छलक भाये । उसने अपने नेत्र बंद कर झिये । माझणीने वो प्रेममावसे में नमस्कार किया और मन-ही-मन मीलितास्यनमद् पदमा मनसा परिपखजे ॥२६॥ | माचिन भी ॥ २६ ॥ प्रिय परीक्षित 1 प्रमणपसी सोनेका हार पानी पत्ती वीक्ष्य विस्फरन्ती देवी पैमानिकीमिव । ई दासियों के बीचमें विमानसित देवानाक समान दासीना निष्ककप्ठीनां मध्ये भान्तीस विसिवः॥२७॥ अस्पत्त शोमायमान एवं देदीप्यमान हो रही थी। उसे इस रूपमें देखकर वे विस्मित हो गये ॥ २७ ॥ नोंने प्रीतः स्वयं सया युक्ता प्रविष्टा निप्रमन्दिरम् । अपनी पलीके साप वा प्रेमसे अपने महमें प्रवेश मणिस्तम्भयतापत महन्द्रभवनं यथा ॥२८॥ किया । उनका मास क्या पा, मनो देवरान इन्द्रका निवाससान । इसमें मणियोंके सैकमों समे खड़े पयाफेननिभा। इस्पा दान्ता रुपमपरिग्छदाः । ये ॥ २८ ॥ हासीके दाँतके बने हुए और सोनेके पड़ा हमदण्डानि चामरम्पबनानि च ॥२९॥ पातसे मैदे हुए फलंगोंपर धके फेनकी तरा श्वेत और | फोमल छिौने किस रहे थे। पात-से चमर यहाँ स्ने बासनानि च ईमानि मदपस्तरणानि च। हुए थे, मिनमें सोनेकी रेरिया लगी हुई पी ॥ २९ ॥ सोनेके सिंहासन शोमपमान हो र थे, जिनपर ही मुक्कादाममिउम्बीनि विवानानि घुमन्ति च ॥३०॥ कोमल मोमय गदियों णी हुइ पी ! ऐसे पदोये भी स्तन्छस्फटिककम्पपु महामारफतेषु च । सिमिम रहे थे, जिनमें मतियोफी उपियाँ खटक रही पी ॥३०॥ कटिकमणिकी सच भीतोपर फ्नेकी रमदीपा भ्राजमाना उसनारतसंयुताः ॥३१॥ पीकारी की दुइ थी । रजनिर्मित श्रीमूर्तियों के हापों विलोम प्रामणस्तत्र समृदी। सर्वसम्पदाम् । मैं रोंके दीपक जगमगा रहे थे॥ ३१॥ इस प्रकार समस्त सम्पम्पिोंकी समृद्धि दसकर वीर उस्म का सर्कयामास निर्म्यग्रः स्वसमृद्धिमहतुकीम् ॥३२॥ प्रत्यक्ष कारण न पायर, बड़ी गम्भीरतासे मगदमता विचार करने लगे कि मेरे पास इतनी सम्मति फासि नन पतवन्मम दुर्भगस था गयी॥ ३२ ॥ ये मन-ही-मन कहने लगे--14 स्मसे ही भाग्यहीन और दरिद हूँ। फिर मेरी इस समदरिद्रस समृदिहत । सम्पत्ति-समृद्धिका कारण क्या है। अश्य ही परमेश्वर्य महाविमूतरवठाम्वाऽन्या शाठी यदुवंशशिरोमगि भगवान् भीषणक रूपकटाक्षक अतिरिक और फाई कारण नहीं हा स्मता ॥ ३३ ॥ नैवापपयत पद्घमस ॥३३॥ यह सब कुछ उनकी फरणाकी ही दन है । म्यय नन्ननुपामा दिगत समक्ष भगवान श्रीकृष्ण पूर्णकम और समीपति हानक पारण अनन्त भागसम्मप्रिपासे युक्त है। इसपिये व यापक याचिष्णव भूपपि मरिभान । भकर उसक मनका भा जानकर बहुत पुछ दे देते ६२२ भीमद्भागवत [.८१ पर्जन्यवच्चत् स्वयमीक्षमागो है, परन्तु उसे समझते हैं वात पोवा, इसछिपे सम्ने कुछ कहते नहीं । मरे यदुषशशिरोमणि समस्या- दाशाईकापामपभः सखा मे ॥३४॥ | सुन्दर सचमुच उस मेघसे भी बहकर उदार हैं, ने समुद्रको मम देनेकी शक्ति रसनेपर मी किसान के सामने किंचित्करोस्पुर्वपि यत् स्वदर्च न परस्फर उसके सो जानेपर रातमें परसस्ता है और मुहस्कृतं फल्बपि रिकारी । बात परसनेपर भी पोगा ही समझता है॥ ११ ॥ मेरे प्यारे सख श्रीकृष्ण देते हैं घमुत, पर उसे मानते मयोपनीता प्रपसमष्टिं हैं महुत पेशा धौर उनका प्रेमी भक यदि उसके प्रस्पग्रहीत् प्रीतियुतो महारमा ॥३५॥ देखे तो सही ! मैंने को केवळ एक मी उिका रिये कुछ भी कर दे, तो वे उसको मत मान लेते तस्पैव मे सौरदसस्स्पमैत्री मेंट किया प, र उदार शिरोमणि श्रीकृष्णने उसे कितने | प्रेमसे स्वीकार किया ॥ ३५ ॥ मुझे मन्म-जन्म उनीमा दास्पं पुनर्जन्मनि मन्मनि स्यात् । प्रेम महकी हितैषिता, उन्हीकी मित्रता वोर उदीकी सेवा प्राप्त हो । मुझे सम्पतिकी आवश्यकता नही, सदा- महानुभावेन गुणालयेन सदा म्ही गुणों के एकमात्र निवासस्पन महानुभाव विषमतस्तत्पुरुपप्रसङ्गः मावान् श्रीकृष्णके परोंमें मेरा अनुराग पाता बाप ॥३६॥ और नहीके प्रेमी भोंका सत्सा प्राप्त हो ॥ २६ ॥ भकाय पित्रा भगवान् हिसम्पदो | अजन्म भगवान् श्रीकृष्ण सम्पनि धादिके दोष मानते हैं। वे देखते हैं कि बड़े-बड़े पनियोंका धन वोर रान्य विम्सीन समर्थपस्पज । | ऐमर्यके मदसे पतन से नाता है। इसलिये थे वस्ने अदूरदर्य भत्तयो उसके माँगते रहनेपर भी सरा-सय अदीर्घयोभाय विचक्षण स्वय की सम्पति, राम्प और ऐर्म वादि नहीं देते। यह उनकी मही क्या है ॥ २७ ॥ पीक्षिस् ! अन्न पश्यन् निपातं धनिना महोद्भवम् ।।३७॥ युदिसे इस प्रकार निश्श्य करफे घे ग्रामणदेवता त्याग इत्यम्पवसितो पया भक्ताऽतीव जनाईने । पूर्वक मनासकमावसे बनी परिके साप भाप्रसा स्वप विस्र्पोको ग्रहण करने लगे धीर दिनोंदिन उनी विपयाआपयास्पक्ष्यन् समज नातिलम्पटः ॥३८॥ प्रेम-भक्ति भने यी ॥ ३८ ॥ तस्स ये दमदमस्स हरयमपतः प्रभाः। प्रिय परीशिव । देवताओंके भी बाराप्यदेव मक भपहारी यापति सवशक्तिमान् भावान सय प्रमोघे माधणाः प्रभवोदे न तेम्यो विद्यते परम् ॥३९॥ आफ्ना प्रभु, अपना इसदेप मानते हैं। इसलिये अर्णो- से बार बार कोई भ प्राणी जगत्में नहीं है ॥ ३९॥ एव स विप्रा भगपरमुपदा इस प्रयम मगमन् श्रीकणके प्यारे सा उस प्रमरने देम्स कि प्यपी भगवान् अक्ति है, किसी के अधीन नहीं? रि भी वे अपने सेनगोंके जमीन हो गते या सभृत्परजित पराजिवम् । हैं, उनसे परामिन हो जाते २, अब ये उसके प्यानमें - ३०८२] दशम स्कन्ध ६२३ तयानगोग्रथितास्मस्थन तन्मय हो गये । थानक वागासे उनकी पमिपाकी गाँठ पट गयी और उन्होंने पोड़ ही समयमै मगमानका सदाम लेमेऽपिरता सतां गतिम् ॥४०॥ धाम, जो कि संतोंका एकमात्र प्राध्य है, प्राप्त किया ॥१०॥ परीधिव! प्राझोंको जनाइएदेव मानने- एसद् प्रसग्यदेवस्स भुला ब्रमप्पा नरः। पाने भगवान् श्रीकृष्णको इस मामणमतिको बो मनता है, उसे मावान्के चरणों में प्रेममय प्राप्त हो जाता है लम्धभावो भगवति फर्मवधा विमुल्पत ॥४१॥ | और यह फर्मवन्धनसे मुफ हो जाता है।॥ ११॥ इति श्रीमनागवते महापुरामे पारमहस्पा संहितायो दशमकाये उत्तरार्धे पृथुकोमध्यान नामैकाशीतितमोऽध्याय ॥ ८१ ॥ अथ द्वपशीतितमोऽध्याय भगवान् श्रीकृष्ण-बलरामसे गोप-गोपियों की भेंट भीमुक उपाय भीषजी कात है-परीक्षित् | इसी प्रकार मगवान् श्रीकृष्ण और वामनी घरकामें निवास कर अमदा द्वारपत्यो यस्तो रामफप्णयोः । रहे थे। एक बार सर्वग्यस सूर्यग्रहण आग, जैसा कि सोपरागः सुमहानासीत् उत्पधये यथा ॥१॥ प्रयक समप टग करता है ॥ १ ॥ पीभित् ! मनुप्पोको ग्यातिथियोंक द्वारा टठ प्राणका पता शत्त्वा मनुमा राजन् पुरस्तादेव सर्वतः । पहले से ही चा गया था, इसध्येि सब व्यग धान अपने फल्याणके ठीश्पसे पुष्प शादि उपार्जन करने के सुमन्तपम धेष ययुः मोविधिसया ॥२॥ रिये समतपय तीर्य कुलमत्रमें आये ॥ २ ॥ निधधिया महान् रामा शसस्तो पर। समन्वपश्वक क्षेत्र मा है, वहाँ प्रधारिमें श्रेष्ठ परसरामनीने सारी प्रवीको क्षत्रियहीन करके रागाओंकी नृपाणां रुपिरोषण पत्र पर महाहदान् ।। ३ ।। सघिरघारासे पाप बाबई कुण्ड बना दिये में ॥ ३ ॥ जैसे कार साधारण मनुष्य बरने पाणी लिपिक इज पभगवान् रामो पयाराऽपि कर्मणा। लिये प्रायधित परता है, वैसे ही सपशक्तिमान् मावान् परशुरामने अपने साप पर्मया कुछ सम्बन्ध न धनपर बाकस्स ग्राहपनीशा पभान्याऽधापनुपये ।। ४५ मी कापफी रक्षक उिये महीपर पर किप्प - मापा तीर्थयात्रापतियागन्भारती प्रथा परीशिद 1 इस महान् तीफ्यानाके परस्पर मरताक सभी प्रान्तोकी जनता कुरुक्षेत्र आयी थी। उनमें कृष्णयम तयारपसुदपाइपदप ॥५॥ अर, वमुप, उपसेन आ रह- तप गद, प्रद्युम्न, साम गरि अन्य यदु मी मरने भने पापोर नाश करनफ उिये पुरुक्षेत्र बाये थे। मपुभारत उन्धर्ष समपं धपविष्णव । प्रजनन्दन बतिस्य और पदुर्भश सेनापति ऋतपर्मा- १ सम्रगम्यानेजतिनमा ।२ अपिम्या मता।

६२४ श्रीमद्भागवत [०८२ : गदप्रयुम्नसाम्पापाः मुच द्रशुफसारणैः ॥ ६॥ ये दोनों सुचन्द्र, मुक, सारण बाकि सब नगरी रक्षा के लिये दारकामें रह गये थे। यदुवंशी एक ते आस्तेऽनिरुदो रक्षायां कवषर्मा च यूथपः । स्वभाषसे ही परम तेजस्वी ये, दूसरे गलेमें सोनेत्री माम, दिम्य पुपोंके हार, बहुमूल्य पस और कासे ते रथैर्देषधिष्ण्यामैईयैष तरसप्पै ॥७॥ मुसमित होनेके कारण उनकी शोमा और भी न गपी पी। वे तीर्थयात्राके पपमें देवम्भोंक मिानके गर्नदग्निरम्रामैभिषिधाधरपुभिः समान रषों, समुद्रकी तरङ्गके समाम चलनेवाले घोरों, बादरोंके सम्मन विशालकाय एव गर्जना करते है म्परोप तमहातेवाः पथि काश्नमालिनः ॥८॥ हालियो तपा विषधरोंके समान मनुष्र्पोके द्वारा टोपी जानेपली पालकियोंपर अपनी पत्नियोंके सर इस दिम्पसम्बस्रसमाहाः फलौः खेचरा इस । प्रकार श्येमायमान हो रहे थे, नो साके देवता ही यात्रा कर रहे हों। महामाम्पयान् यदुवंशियोंने कुन क्षेत्रमें परचकर एकाप्रचितसे संपमालक स्नान किया वत्र स्नात्वा महाभागा उपोप्प सुसमारिवा॥९॥ और प्रक्षणके उपलक्ष्यमें निश्चित कातक उपक्स | किया ॥ ५-९ ॥ उन्होंने प्रमोंको गोान किया । प्रामणेम्पो ददुबैनर्वासःस्रास्ममासिनीः । | ऐसी गौओंका दान किया जिन्हें पोंकी सदर-सर से, पुष्पाअएँ एवं सोनेरी बीरें पहना दी गयी रामादेषु विधिवत् पुनराप्लुस्प गप्णयः ॥१०॥ पी । इसके बाद प्रहणका मोश हो बनेर | पारामजीके पनाये हुए फुण्डोंमें पदुवंशियोंने कि- पूर्वक स्नान किया और सत्पात्र प्रामोंको एन्दर-मर ददुः स्वन्न दिजायेम्या कृष्ण नो भक्तिरस्त्विति । फ्यमानोंका भोजन कराया। उदोंने अपने मनमें व सङ्कल्प क्यिा पा कि भावान् श्रीकृष्ण के परप्रेम म्बरं घ तदनुवावा यूप्णयः कप्मदवताः ॥११॥ हम्मरी प्रमभकि मनी रहे । भगवान् श्रीकम्पो हो अपमा आदर्श और इएदय माननेवासे यदुपशिपोंने अस्त्वापविविशुः काम निग्धन्छायाधिपाधि | यी मायामास पयों के नीचे अनी- ग्रह्मोसे अनुमति सेपर तम स्वयं भेग्न किस्म र अपनी इसके अनुसार ग्रा रामर ठहर गरे । समागतास्तदातुः मुरसम्पत्थिना नृपान्॥१२॥ | पीधित् ! विश्राम पर मना या पयशियोंने भन्ने | मुरम् और सम्वी रानाभोंसे मिनाभग्ना गुम मस्स्सागानरकामस्यरिदमकुरुसअपान् रिया ॥ १०-१२॥ यहाँ मस्य, उपनिर, पोस्, निर्भ, पुल, सम्प, पाम्बन, फैरप, मह, पुन्ति, फापाव कपान् मद्रान् कुन्तीनानफरतान्।।१३॥ पाक तथ्य शनुमा-सरों नरपति आपे धानत परम एवं पूसर अनमें अने । भित् ! इनके अतिरिक परशियों के परम मन्पन्मिगारमपीपान् परीप वा नृप । ६नेरी पशु नभ आरिता भागाकानः .५२ माम्न।

दशम स्कन्ध वे अपत ६२५ ०८२] इन्दादीन् सुददोगोपान् गोपीयोस्कण्ठितामिरम्१४ ] लिये चिरकालसे उकटित गोपियों मी म्हों यायी हर पी । यदोंने इन सवको देख ॥ १३ ११ ॥ अन्योन्यसदर्शनापरासा परीक्षित् ! एक-दूसरेके दर्शन, मिटन और काव्यपसे समीको वम मानन्द इया । सभीके दय-काल एर्ष प्रोकल्लापत्रसरोकाभियः । मुख-कमा सिल उठे । सय एक-दूसरेको मुमाम मरफर दयसे लगाते, उनके नेत्रोंसे धोमु की सही छा जाती, आसिप्प गाठ नयनः सपछला राम-रोम सिल उठता, प्रमके थावेगसे धोठी बंद वाती और सब-के-सय आनन्द-समरमें सूक्ने उसराने रम्पत्त्वचो रुगिरो ययर्सदम् ॥१५॥ गते ॥ १५॥ पुरुषोंकी भाँति लियो मी एक-दूसरेको देख्भार प्रेम पौर थानन्दसे भर गपी नियम संवील्य मिथोऽतिसौहद- सौहार्द, मन्द-मन्द मुसकान, परम पषित्र तिरछी मिवामलापाप्योऽभिरेभिरे । चितवनसे देस देकर परस्पर मेंट-कतार मरने लगी। घे अपनी मुजोंमें मरकर केसर लगे हुए पक्ष स्वनः खनान् शमपररूपितान् स्पोको दूसरी मियोंक पक्ष सलोंसे दवाती और | सत्यत यानन्दका अनुभव करती । उस समय उनके नित्प दोमिः प्रणयालोचनाः ॥१६॥ | नेत्रोंसे प्रेम्के खोस् छगने म्यते ॥ १६ ॥ अवस्था पादिमें छोटोंने पार होंको प्रणाम किया और उन्होंने तताऽभिवाप ते पदान् पविष्ठरभिवादिता । अपनेसे अटोंकर प्रणाम स्वीकार किया । ये एक-दूसरेका सागत करके तपम कुशल-मल थादि कर स्वागत कुशलं पद्म पछु। फणम्या मियः ॥१७॥ | फिर श्रीकृष्णकी मधुर लीव्यएँ वापसमें कहने-सुनने या॥१७॥ पृथा भ्रामन् स्वसूर्वीक्ष्य तप्पुषान् पितरापपि । परीक्षित् । पुरती वसुदेव अदि अपने भाइयों, वहिनों, उनके पु!, माता-पिता, मामियों और भगवान् भावपनीर्मन्द च जो संकथया शुचः ॥१८॥ | श्रीकृष्णको देखकर तथा उनसे बातचीत करके अपना सारा दुल मूड गयीं ॥ १८॥ फुम्तीने यमुपजीसे कहा-भैया ! म सधमुष । बड़ी धमागिन हूँ । मेरी एक भी साथ पूरी न हुए। आर्य भ्रातरा मप प्रात्मानमरुताशिपम् । | बाप-बैसे साधु-सभार सजन मा आपविक समय यद् वा आपत्सु मदाता नानुसर सपमा 1१९॥' मी मुवि भी न लें, इससे पाकर दुष्की घात क्या | होगी । ॥ १९ ॥ भैया ! निवाता निस्क मा। मुरदो भातप पुत्रा भ्रातर पिठरावपि । नाता है, उसे सबन-सम्धी, पुष और माता-पिता भी भूल जाते हैं। इसमें आपयोंका फाई दोप नानुसरन्ति सजन यस्स देसमदक्षिणम् ॥२०॥ नहीं ॥ २० ॥ यमुपपीने कहा-बहिन ! उग्रना मत दो। अम्न मामानम्पादनक्रीनिवान् नरान् । हमसे निडग न मानो । सभी मनुष्य देव विडीने मुदर उदास ६२६ श्रीमनागवत ईशस हिप लोकः कुरुते कार्यतेऽथवा ॥२१॥ है। यह सम्पूर्ण टोक ईश्वरके वशमें रहकर कर्म करत है, धौर ठसका फल भोगता है ॥२१॥ पनि । फंसप्रतापिता सर्षे वय पाता विश विष्टम् । | कससे स्ताये जाकर हमभेग इधर-उधर पके विश्वमोंमें भगे गए थे । ममी कुछ ही दिन र एतमेव पुनः स्वानं देवेनासादिताः स्वसः ॥२२॥ ईश्वरकृपासे हम सब पुन अपना स्थान प्राप्त कर सके हैं॥ २२ ॥ भीन्सुक उवाच भीशुकदेवसी कहते हैं-परीधित् । यहाँ किसने भी नरपति लाये थे—पमुदव, उमसेन बार वसुदेवोग्रसेनाधैर्यदुभिस्तेऽर्षिता नृपा । यदुवंशियोंने उनका प्लूव सम्मान-सस्कार किया । थे सव मगलान् भीमणका दर्शन पाकर परमन्द र बासन्नम्युतसंदर्भपरमानन्दनिताः ॥२३॥ | शन्तिका अनुमष फरने गे ॥ २३ ॥ पीधित् । भीष्मो द्रोणाऽम्बिकापुत्रो गाधारी समुता तथा । | भीष्मपितामह, प्रोणाचार्य, पृतराष्ट्र, दुर्योक्नादि पुक साप गधारी, पनियोंके सहित युधिष्ठिर वादि पाया, सदाराः पाणया इन्ती सञ्जयो विदुर कपः ॥२४॥ कुन्ती, सक्षप, विदुर, कृपाचार्य, फुन्तिम्प्रेच, विराट, भीष्णक, महारान नग्ननिव, पुनित, दुपद, शल्प, अन्तिमोमो विराटप भीमफोनममिन्महान् । धकेत, काशीनरेश, दमघोष, विशालय, मिलिमनरेश, | मदनरेश, केकफ्नरेश, पुधामन्यु, शर्मा, कपने पुरुजिद्द्वपदा सस्योष्टकेतुः सकाचिराट् ॥२५॥ पुत्रोंक साप बासीक धौर दूसरे भी युधिष्ठिरके अनुयायी दमघापो विशालाको मैपिलो मद्रकेकयो । मृपत्ति मगवान् श्रीकृष्णका परम सुन्दर श्रीनिकेतन विमा और उनकी रानियों को देखकर पन्त विस्मित युधामन्पुः सुशर्मा च संमुवा वाहिकादयः ॥२६॥ से गये ॥२१–२७॥ अब वे परामभी तथा माछन् रापानो ये च राजेन्द्र युधिष्ठिरमनुव्रता । श्रीकृष्णसे मीमति सम्मान प्राप्त करके मेवानन्दसे श्रीकृष्णके स्मनों—यदुपशियोंकी प्रशंसा करने को श्रीनिफेतं वपुः शौरः सनीक वीक्ष्य विस्मिताः॥२७॥ ॥२८॥ उन लोगोंने मुख्यत्या उपसेमन्त्रीको सम्बोभित अथ ते रामकृष्णाम्यां सम्यक्प्राप्तसमर्हणाः । कर कहा- भोजराच उपसेनमी ! सच पूछिये तो इस नगरके मनुष्योंमें वापभेगका सीमन ही सफर प्रशनर्मदा युक्ता प्णीन् फष्मपरिबहान् ॥२८॥, प है ! धन्य! प्योंकि मिन श्रीका आओ भोजपत यूम बन्मभाषो नृमामिद । दशन पह-बड़े यागियोंके लिये मी हुर्लभ , नीको वापध्येग निस्प निरन्तर देखते रहते है ॥ २९ ॥ यत् पम्मधासक कृष्णं दुर्दर्भमपि योगिनाम्॥२९॥ वेदोंने वह बादरके साथ मायान् श्रीधमकी कीर्विका पदिश्वतिः वतिनुवेदमठ पुनाति गगन किया है। उनके चरणोक्न बम गायक उनकी वाणी-शस और उमझी की इस जगतको पादापनेजनपपय पक्ष शास्रम् । भक्त पवित्र कर ही है। अभी हममेगों के जीवनकी १ एवरे । २. ऐम्मे परफेम पशि 11 पद्मावविपरपा ।

1०८२] दशम स्कन्ध ६२७ म् कालभचिंतभगापि यदधिपन ही बात है, समपके फेरसे पृथ्वीका सारा सौभाग्य नष्ट हो जुका था, परन्तु उनक चरणकमलॉक स्पर्शसे पृथ्वीमें फिर समस्त शकियों का सम्भार हो गया और अब वह स्पर्धोत्पशक्तिरभिवति नोऽखिलान्॥३०॥ फिर हमारी समस्त अभियपाओं—मनोरोको पूर्ण करने गी ॥ ३० ॥ उग्रसेनची ! अपव्येका सदर्शनस्सर्वनानुपथप्रशल्प भीकरणके साप वैवाहिक एवं गोत्रसम्पप है। यही | नहीं, आप हर समय उनका दशन थोर स्पर्श प्राप्त भय्यासनाननसयौनसपिष्ठवधा। करते रहते हैं। उनके साप चरते हैं, बोझते हैं, सोते हैं, बैठते हैं और खाते-पीते हैं । यो तो भाफ- ग गुरस्मीकी प्रमोम से रहते हैं जो नरकमा येपो गृहे निरयपद्मनि वा व मर्ग है, परन्तु बाफ्लोके घर में सर्वव्यापक विष्णु भान् मर्तिमान् रूपसे निवास करते हैं, जिनके स्वगोपवर्गविरमः स्वयमास विष्णु ॥३१॥ दशनमयसे स्वर्ग और माझसकसी अभिटापा मिट ती है ॥ ३१ ॥ मीझुक उपाप भीगुरुदयनी त है-परीक्षित् | चव नन्दपाय- | यो या पात माटम दुइ कि श्रीकृष्ण यदि पदुमशी फुरुक्षेत्रमें थाये हुए हैं, तब वे गापोंक साग अपनी नन्दम्तन यदून प्राप्तान्धात्वारुणपुरोगमान् । सारी सामग्री गापियोंपर व्यदकर अपने प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण काम अनिका देखनके लिये यहाँ आये वागमद् तो गोपैरन म्पादि स्वया ॥३२॥ ॥ ३२ ॥ नन्द आदि गोको दस्बर सय के सय यदुवंशी वानन्दसे भर गय । वे इस प्रकार उठ स रनारप्णया रास्तन्व प्राणमिवोत्थिता । हुए, मानो मृत शरीरमें प्राणों सघार हो गया हो। वे लोग एक-दूसरेसे मिटा यि गुरत दिनोंमे भार परिपस्तजिरे गाढे चिरदर्शनकावराः ॥३३॥ हो रहे थे। इसम्ये एक-दूसरेको बहुत देरफ अफ्न्त गइमारसे आनि फरते रहे ॥ ३३ ॥ पसुटेबबीने अस्पस प्रम और जान से विदा होकर पमुदत परिप्वजप सम्प्रीत प्रमविहल । नन्नीस एपस ला रिया । उन्हें एक-एफ करके | सारी पर्ने पाद हा धापी-47 किस प्रकार उन्हें मान् कसतान प्रधान पुषन्यास च गाइल||३०साना पा और किस प्रकार उन्होंने सने पुरको गाफुमे स जामा नदीफ घर र रिया ॥ ३१ ॥ भगवन् श्रीमत्य और बयामनीने माता कृष्णरामी परिप्वज्य पितरापभियाय च । पश्वा और तिा नम्म्माके हुग्यसे स्मार परगाने प्रगम रिया रीधित् ! उस समय प्रमक खासे गनों माइया गाध ग्या, वे पुर भी नभिनामतु अम्गा साधुषप्टी सदा ॥३५॥ | परन सा ॥ ३५॥ महामापानी पारी और ६२८ भीमद्भागवत [.८९ । वावास्मासनमारोप्य पाहुम्पो परिरम्य च । नन्दपायाने दोनों पुत्रों को अपनी गोद में बैठा लिया और मुजाओंसे उनका गार वाभिन किया । उमके दो यशोदा च महाभागा सुतौ पिजातु शुचः॥३६॥ चिरफास्तक न मिलनेमा जो दु सपा, बसबमिट गप्पा ॥ ३६ ।। रोहिणी पौर देयकीजीने परी यशोदाने अपनी अक्सारमें मर लिया। यशोदाजीने उन बगेकसा रोहिणी देवकी पाप परिप्पन्य ब्रजेश्वरीम् । मित्रताका बोम्पयाहार किया पा, उसका स्मरण करके दोनों का गय भर पाया। व यशोदाबीसे करने सी-३७ सरन्स्पो तत्तता मैत्री पाप्पफमौसमूचतुः॥३७॥ प्यशोदारानी ! आपने और मजेपर नन्दबीने हमारे साथ यो मित्रताका म्यवहार किया है मा कमी मिटने याय नहीं है, उसका पदम इन्द्रका ऐवर्य पाकर मी का विमरेत वां मैत्रीमनिपा प्रजेश्वरि । हम किसी प्रकार नहीं कर सकती । नन्दरानीची । मय ऐसा फोन कृतन है, वो वाफ्के उस उफारको यवाप्पाप्पैन्द्रमैवर्य पस्या नेह प्रतिक्रिया ॥३॥ भूल सके । ॥ ३८॥ देवि ! जिस समय मागम पौर श्रीकृष्णने अपने मध्यपको देसक्कन पाएनके पितानेधरोहरके रूपमें इन्हें वाप दोनोंके पास स्म होम एतावराष्टपितरौ पुषयोः स पित्रोः पा, उस समय बापने इन दोनोंकी इस प्रकार रक्षा की, जैसे फळं पुतयिोंकी रक्षा करती है। तम वाफमेने सम्प्रीमनाम्युश्यपोपणपालनानि । ही हमें सिध्या पिलया, दुबार किया और रिवाया, इनके मझम्के छिये अनेकों प्रकारके स्तप मनाये । सघ पूछिये, तो इनकेम-आप यही प्रेग। वापोगेकी देस-रेस्में प्राप्योपतुर्मवति पक्ष्म ह यदामो इनें किसीकी भापक्कन मी, ये सर्पमा तिर्मय रहे ऐसा करना आफ्नकि धनुरूप ही प्र । क्योंकि सम्मोकी रहिमें अपने परायेका मेद-माल नहीं रहता । मन्दरानीची ! मस्तावयषभयो न सता पर सः ॥३९॥ सचमुच माफ्लोग परम संत है ॥ १९॥ भीक ग्वार भीशुकदेवजी करते हैं-परीक्षित् ! में काम हूँ कि रोपियों के परम प्रिपाम, जीवनसख श्रीमा ही थे। जब उनके दर्शनके सम्म्प नेत्रों की परम निगम गोप्यम प्णमुपरम्प चिरादभीष्टं पपती, स्व पोंको बनानेमासको ही कोसने छाती । उम्हीं प्रेमकी मूर्ति गोपियों को बार बार प्रक्षमे रशिपु पक्ष्मकृतं पन्ति । दिनोंके पद मगमान् श्रीकृष्णका दर्शन का। उनके मनमे इसके लिये कितनी असा पी, इसका अनुमान भी नहीं किया जा सकता । उन्होंने नोंके रास्खे अपने भिदीकतमल परिरम्प सर्वा प्रियतम श्रीकृष्णको दयमें ले जाकर गावामिन किया और मन-दी-मन बाभिन करते करते समय हो गयी । परीक्षित् | महातक कमे उस भवको प्रश्न सदाबमापुरपि निस्पयुजर्जा दुरापम् ॥४॥| हो गयी, जो निस्प-निरमार वम्पस करनेवाले योगियों १. ८२] दशम स्कन्ध ६२९ भगवांस्तान्तधामा विषिक उपसंगत । लिये भी अत्यन्त दुग्म है ॥ १० ॥ क्य भगवान् श्री कृष्णने देख फि गोपियाँ मुरासे तादाम्पको प्राप्त | एफ दो रही है, तब वे एकान्तमें उनके पास गये, आफ्लिप्पानामय पृष्ट्य प्रहसन्निदमप्रवीत् ॥४१॥ उनको इससे गया, कुशल मल पा और हँसते हुए यो योले ॥११॥ सख्यिो ! हमलोग अपने स्पन्न अपि मरथ नःसण्य म्बानामविकीर्पया । सम्बन्धियोका काम करनेके लिये प्रजसे बाहर चले आये और इस प्रकार तुम्हारी जैसी प्रेयसियोको छोरफर हम शत्रुओं का विनाश करनेमें टटम गये । महुत दिन भीत गाविसयिसाम्छत्रुपक्षमपणषेवस ॥४२॥ गये, क्या कभी तुमलोग हमारा स्मरण भी करती हो! ॥ १२ ॥ मेरी प्यारी गोरियो । कहीं तुम लोगों के अप्पषभ्यायथामान् विदरुयाविनइया । मनमें यह प्रशदा सो नहीं हो गयी है कि में बता और ऐसा समातफर तुमलोग हमसे पुरा तो नहीं मानने यी हो । निस्सन्देह मगन ही प्राणियोंके संयोग नून मवानि भगवान् युनकि पियनक्ति च ॥४३॥ और वियोगक कारण हैं।॥ १३ ॥ जैसे पायु पादय, तिनको, हड धौर धूटके कोको एक-दूसरेसे मिय वायुपथा घनानीक तण तूलं रजासि च । देती है, और फिर स्वच्छन्दरूपसे उन्हें पग-अउग कर देती है, वैसे ही समस्त पार्योंके निर्माता भगवान् भी सयोन्याधिपते भूयस्तथा भूतानि भूतकद ॥४४॥ सबका योग-पियोग अपने इअनुसार करते राते है॥ ११॥ ससिपो ! यह वह सौभाम्पकी बात है कि तुम सब लोगेको मेरा यह प्रम प्राप्त हो चुका है, जो मपि भक्तिहि भूसानाममृसत्वाय कल्पते । मरी ही प्राप्ति करानमाथ्यो । स्योंकि मरे प्रति पी हुर प्रम-भकि प्राणियोंका अमृतत्व ( परमानन्द-धाम ) प्रदान दिष्टया पदामी मस्स्नेहा भवदीना मदापन ॥४५॥ करनेमें समर्थ है ॥ १५ ॥ प्यारी गरियो ! जसे घट, फ्ट पारि जितने भी भौतिय पाप है, उनक आरि,क्त अहरि सपम्तानामादिरन्ताऽन्तर परिः । और मप्यमे बाहर और भीतर, उनके मूल कारण पृप्ती, जर, वायु, अग्नि तप आया ही जातपात हो रहा है, वैसे ही जिनन भी पाय है, उनका पहले, पीर, वीपमें, भौखिकाना ययाम्म वाम्बायुज्यातिरानाः ॥४६॥ बाहर और भीतर पर मदी-म हैं॥ १६ ॥ इसी प्रकार सभी प्रारियोंक भीमें यही पौगनत फारणम्पसे स्मित एवं प्रवानि भूतानि भूतप्पात्माऽऽत्मना वत । है, और आम माफ मासेजाचा नीयफम्पसे स्मिता परन्तु म इन नोंसे पर अग्निा सस्प ई। मानों मरे मप्पथ पर पश्यताभावमघर ॥४७॥ टोबर प्रतीत हारर दुम अंग सा अनुभ्त करा ७॥ श्रीगुरु उराप धीमुम्दयमा का परीशिव धीरमन हम प्रकार प्रक्यिोंकर अण्णम्दानकी शिक्षास मप्पास्मसिधपागाप्य एवं उप्पन विधिता । पिशित मिटर । टमी टपरक पर-पार मागसे , पार उभय ६३० श्रीमद्भागपत [4०८३ सदनुसरणध्वस्तजीवकोशास्तमम्पगन् ॥४८॥ | गोपियोंका चीयकोश-शिरीर मष्ट हो गया करने भगवान्से एक हो गयी, मगवान्को ही सदा-सदाक लिये प्राप्त हो गयी ॥१८॥उन्होंने कहा- कम- याश्च ते नलिननाम पदारविन्द नाम ! अगायोषसम्पल मो-यो योगेपर अपने दूप पाळमें छापके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं। योगेपदि विचिन्त्यमगाधपोधे। जो स्प्रेग संसारके पुरम गरे हुए है, उने उससे निकालनेके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र का सम्बन हैं। प्रमो । पाप ऐसी क्या कीजिये किलापका संसारकपपतितोचरणावलम्ब मह घरणकमल, घर-गृहस्सके काम करते रहनेस भी | सदा-सदा हमारे दयमें सिरानम्पन रहे, हम एक गहनुपामपि मनस्यदियात् सदानः॥४९॥ क्षणके लिये मी उसे न भूलें ॥ १९ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्यो संहिताय दशमस्कत्धे' उत्तराधे कृष्णिगोपसामो नाम दपशीतितमोऽध्याय ॥ ८२ ।। अथ ध्यशीतितमोऽध्याय भगवान् की पटरानियों के साथ प्रीपदीकी पावधीत भीशुक उपाप भीशुच्चेपली कहते है-परीशिस् ! मान् श्रीकृष्ण ही गोपियोंको शिक्षा देनेवाले है और ही उस तथानुगृप भगवान् गापीना स गुरुर्गतिः । शिक्षा परा प्राप्त होनेवठी वस्तुहै। इसके पाले चैसम कि वर्णन किया गया है, मामान् श्रीसम्पने युधिष्ठिरमधापृच्छत् सपाप सुहदोऽन्ययम् ॥ १॥ उनपर महान् अनुप्रा किया । पम नोंने धर्मराज युधिपिर सपा न्य समस्त्र सम्बन्धियोंसे पुरा मन स एव लाकनाचन परिपृष्टाः सुसत्कवा । ल्या १॥ भगवान् श्रीकृष्णके परणकमोश दयाल परनेसे ही उनके सारे षाम मष्ट हो पुके थे । बम प्रस्टमनसतपादयाहादसः ॥२॥ जब भगवान् श्रीकृष्मने उनका सफार किया, पुरा:- मार पना, तब वे अफ्त आनन्दित होकर उनसे फवाऽभियं त्वचरणाम्मुजासय । कहने स्टो-॥२॥ मगन ! पर पो मापुर मन ही-मन आपके चरणारविन्दमा माननरस पन पावे मते महमनस्तो मुखनि सर्व फपिन् । पभी भी उनक मुरम्मरसे सीन-यापक मपमें रस छय पाता है। प्रम्प यह इतना अधुत रिम्प रस पिरन्ति ये फगरलं प्रभा है कि फाइभ प्राणी उसको पीसे तो महम-मधुक चार सम्मेवारी रिस्पति अपम अरिपो नर पर देना है। उसी रमु जो ग्रेग अपने पन्नों गेनामें दरम्भूनां दरसदस्मृतिपिछदम् ॥३॥ भर भरसर जीभर 'गते हैं, उन अमदगी भरा मानपताम्।

दशम स्कन्ध ६३१ म० ८३] हित्वाऽऽत्मधामविधुतात्मरुवत्र्यवस- ही क्या है ॥ ३ ॥ गन् । बाप एकरस मानसरूप भोर भत्रण आनन्दक समुद्र है। मुखि-मृतियों के कारण होनेवाये जागत्, खप्न, मुपुति- ये तीनों स्पार मानन्दसम्पुरमखण्ठमकुण्ठयोधम् । धापके सर्यप्रकाश खरूपतफ पाँच ही नहीं पाती, दूरसे ही नष्ट हो जाती हैं। थाप परमाईसोंकी एकमात्र झालापसृष्टनिगमापन आयोग गति है। समयके फेरसे वदोंका सास होते देख्फर उनकी रक्षाके सिम्ये बापने अफ्नी बचिन्त्य योगमापाके मायाकृति परमहसगति नवाः स ॥४॥ धरा मनुप्पका-सा शरीर प्राण किया है। हम अापके घरों में बार-बार नमस्कार करते है ॥१॥ पिस्ताप भीगुकदेवजी कहते है-पीक्षित् !निस समय इत्युसमशकशिखामणि जने दूसरे व्येग इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे थे, उसी समय पादप और कोरम-युल्मी सियों वभिप्नुवत्स्वन्धककौरवनिय एकत्र होकर वापसमें भगवान्यी त्रिभुवन-विख्यास समेस्य गाविन्दकथा मियोऽगृणं लील्यों का पमन कर रही पी। अब मैं तुम्हें म्दीकी खिलाफगीता भूणु पर्पयामि त ॥५॥ यासे सुनाती हूँ ॥ ५ ॥ द्रौपपुवाच प्रौपदीन कहा-हे सस्मिणी, भद, हे जाम्रपती, है पैदर्पयता भद्रह वाम्बववि कौसले । सस्ये, हे सत्यभामे, कान्दिी, शेये, छमगे, रोहिणी हे सत्यभामे कालिन्दिशन् रोदिणि लक्ष्मण।। ६॥ | और न्यान्य थीमणपनियो ! तुमडोग हमें यह तो हे रुग्णपरम्प एतन्ना मृत वा भगवान् स्वयम् । फ्तायो कि स्पै भगवान् श्रीकृष्णने अपनी माणसे गोकर मनुकरण करते हुए सुमयोमा रिस प्रकार उपपमे यथा लोकमनुवन् स्वमायया ॥७॥ पागिम्हण किया ॥ ५-७ ॥ सीमापाप कश्मिणोजीन कदा-द्रीपीजी ! सन्ध धादि सभी राजा पाते पे कि मेरा विग्रह Aणुगउ साप चपाप मापयितुमयतमामुफपु हो इसक यि सभी साखसे सुसन्त्रित रापर युदक उिसे तैपार पे। परन्तु भगवान् मुन्न पैसे की हर स्पये, राजस्वजपभटशेखरिवाधिरणः । जसे सिंह परी बोर नहाक ड्रमसे अपना भाग न से आप । स्पों न हो—जगदमें जितने भी अम्प पीर है, उनक मुस्लपर इन्हींकी चरणभूमि शोभपम्पन निन्य मृगन्द्र व भागमजाविश्वात् होती है। मोदीनी ! मी सोपही अभियाकि भगवान्क पदी समस्त सम्पति बार सान्दकि भाभप तन्मानिकचरणोऽस्तु पमानाप॥ ८॥ घरगरमा बम-न्म मुन्छ बाराधना करना पि प्राप्त दात र म ठन्धी सेवन टी एं॥ ८॥ औरजी मरे तिा कान पामे सनाभिवपतमस्दा ततेन भा प्रसेनी उसे बहन दुहारह प, बत टन्होंन उन परा पर भगमन र मापा । सिमाभिमापमरमाप्तमुपावार । उस फरस दूर करन सिगमन्ने श्भराज सत्यभामराप सप्पभामानदा- ६३२ श्रीमद्भागवत वन जिस्मधराबमध रस्नमदात् स तेन जाम्यवान्पर विक्प प्राप्त की और यह रन अकर मरे पिताको दे दिया । अव तो मेरे पिताजी मिप्या कम लगनेके कारण दर गये । अत यपपि वे दूसरेको मे पादान कर चुके थे, फिर भी उन्होंने मुझे स्यात भीमा पिसादिश्चत माप्रभवऽपि दचाम् ।९१ मणिके साप भगवान्के परमिं ही समर्पित कर दिय ॥ ९॥ वाम्मरसुवाम 2 जाम्बवतीने कहा -प्रौपदीजी ! मेरे पिता प्रम- प्राज्ञाय देवरुदस निजनाथदेव राज नाम्यवान्को इस मासका पत्य न पा कि यी मेरे स्मामी मगवान् सीतापति हैं । इसलिये वे इनसे सवास सीवापति त्रिणपहान्ममुनाम्पयुम्मत् । दिनप्तक लासे रहे। परन्तु जव परीक्षा भी हुई, मोने पात्वा परीक्षित उपाहरदम मा नन लिया कि ये मगवान् राम ही है, तब इनके 'चरणकमल पकाकर स्पाचफमणिके साथ उपहारके पादौ प्रगृम मगिनाइमाप्प दासी ॥१०॥ रूपमें मुझे समम्ति कर दिया । मैं पी चाठी ! कि चन्म-जन्म इन्हीकी दासी पनी रहूँ ॥१०॥ कालिन्धुपाप * गिम्दीने कहा- -प्रौपदीनी ! जय भगवान्को य मछम हया कि में उनके चरणका स्पश करने तपपरन्तीमावाय स्वपादस्पर्धनाया। आश्म-जमिश्नपासे तपस्या कर दी है, तब वे अपने सस पर्छनके साप यमुना तटपर वाये और मुझे सहमोपेरपाग्रहीत् पाणि पोतद्ग्रहमार्यनी॥११॥ स्वीकार कर ठ्यिा । मै उनका घर घुगरनेवाली उनकी मित्रपिन्दोपाप दासी हूँ ॥ ११ ॥ 'मित्रविदामे मा-प्रौपदीची ! मेरा स्वयंवर हो यो मा स्वरवर उपेस्प पिमित्य भूपान् रहा प । यहाँ जाकर भगवान्ने सय राज्यायो गीत मिपा और वैसे सिंच मुम्के मुंर कुत्ता से बफ्ना माग निन्पे भयूक्षगमिपात्मपलि दिपारिः। मैसे ही मुझे अपनी शोमामपी द्वारकापुरी मे आये । मेरे मार्योने मी मुझे मावान्से सुनकर मेग भ्रातृ समेऽपकुरुतः स्वपुरं थियो अपकार करना चाहा, परन्तु उदोंने उन्हें भी मीषा खसास्तु मऽनुभवमश्पपनेजनत्वम् ।।१।। Pसा दिया । मैं एसा चाइसी कि मुझे कम मन्म उनके पाय पसारनेमा सौमाम्प प्राप्त होता रहे ॥ १२ ॥ सरपोपाप मोदीकी । मेरे पिताजीने मे सप्लोधयाऽविपलपीर्यसुतीक्ष्यभन् स्वपवरने वाये हुए राजाओंके मम्-पौरमयी परीक्षा पित्रा सान् पिति-पवीर्यपरायणाय । पेि या पछ्यान् और पराक्रमी, सीसे सांगवाले सात मेठ रस या पे । उन मैगेने वाम मोरों पर तान् पीरदुमदानस्वरसा निगप घर-जूर कर दिया पा । उन्हें भगवान्न पेसमें ही पाटकर पा लिया, नाप म्पिा और पाच दिप कीडन् पापस्या सिराजवामान्॥१३|| टीक वैसे ही, जैसे पटे-छोटे पन्चे बकरी के मोंको जाप, - सस्याने फा- म० ८३] दशम स्कन्ध ६३३ 't , पइस् वीर्यशुरक्षा मा दासीभिधतुरङ्गिनीम् । पका लेते हैं ॥ १३ ॥ इस प्रकार भगवान् का पाठपके शय मुझे प्रात कर चतुरङ्गिणी सेना बोर दासियों के साप द्वारका ले भाये । मार्गमे जिन क्षप्रियाने पिन गव्य, उन्हें जीत भी लिया । मेरी यही अभिप्रपा है कि मुझे इनकी सेवाका अपसर सदा सर्वदा प्राप्त होता पपि निजिप राजन्पान् निन्येवदास्पमस्तु मा॥१४॥ रहे ॥११॥ 'भद्रामे मा-प्रौपटीनी । मायान् मेरे मामाके पुत्र हैं। मेरा पित्त इन्हींक चरोम अनुरक्त हो गया पिता में मातुलेयाम खपमाइम दत्तवान् । पा । अब मेरे पिताजीको यह बात मालम छ, तब ईष्ण कृष्णाप तविचामधीक्षिण्या सलीअनै।।१५॥ और मरत-सी दासियोंके साप मुझे इन्हींक घरों में उन्होंन स्वयं ही भगवान्को घुप्रकर भोहिणी सेना समर्पित कर दिया अस्म मे पादसस्पर्श भधेस मनि जन्मनि । १५॥ में अपना परम कल्याण इसीमें समाप्रती कि फर्मके अनुसार मुझे वहाँ-कहाँ फर्मभिर्माम्पमाणापा येन तस्ड्रप भात्मनः ॥१६॥ मन्म लेना पड़, सर्वत्र इन्हीं के चरणकमाघेका संस्पर्श प्राप्त होता हे ॥ ११॥ लममणोबार लक्ष्मणाने कहानीजी दवर्षि नारद पर ममापि राश्यम्पुतजन्मकर्म वार मगमान्के अवतार और अव्योंका गन करते रहते थे। उसे सुनकर पौर या साधकर कि छामी भूत्वा मुहुर्नारदगीतमास । जीने समस्त जोकपाका स्याग करके मगवान्का ही करण किप, मेरा चित्त मगवान्के चरणों में बासक्त हो चि मुकन्दे किल पपइस्तया गप्पा ॥ १७ ॥ साची ! मेरे पिता मृहत्सेन मुसपर मात प्रम रखते थे। जब उन्हें मरा अभियाप माइम पता सुसमम्म विहाय लोकपान् ॥१७॥ पुषा, तब उन्होंने मेरी इसकी पूर्तिक लिये यह उपाय किरण ।। १८ ॥ महारानी । मिस प्रकार पाडणवीर जाता मम मत साचि पिता दुहिमत्सलः । वमुनकी प्राप्तिक छिये भापके पितान स्पेबरमें मस्प- वेषका भायोजन विस्य पा, उसी प्रकार मर मिताने भी पहस्सेन इति रूपावस्तत्रोपापमपीकरत् ॥१८॥ किया । वाफ्फ स्वरकी अपेक्षा हमारे यहाँ या यथा स्लपपरे रावि मस्स्स पार्थेप्सया रुतः । विशेषता थे कि मध्य बाहरसे ढका हुआ प, फेक समें ही उसकी परछा दीख पड़ती थी॥ १९ ॥ भय तु पहिराच्छभो रयते स मले परम् ॥१९॥ बम यह समाचार राज्योंकर मिश्र, स्व सब बोरसे धुस्वैठत् सर्चता भूपा आपयुर्मपितुः पुरम् । समन्त मन्त्र-शसोंक तक हजारों राजा अपने-अपने गुरुभोंक साम मरे शितानीकी राजधानीमें थाने सर्यान्वयनसवमाः सापाम्यायाः सासमः ॥२०॥ लगे ॥ २० ॥ मरे पिताजीने आये हुए सभी राबाओं- पित्रा सम्पूजिताः सर्षे पयापीर्य यभाषयः । का पत्र-पौरस और अवस्पाके अनुसार मठीभौति म्यागत सत्कार किया । उन मने मुश प्राप्त करने की इचसे आदतुः समरं चाप बर्दु पर्पदि मद्विगः ॥२१॥ स्वयमसम्पर्मे रस्न हुए धनुष और ग्राम उयपे ॥२१॥ १ प्रेम्स ६३४ भीमागवत [1. ८३ आदाय म्यसृजन् फेषित् सन्यं कर्तुमनीधरा।। उनमेंसे कितने ही राजा तो धनुषपर वात मी न मा | सके। उन्होंने मनुफ्को ज्यों-का-त्यों रस दिया । कार्की थाफोटि पा समुस्कृप्य पेतुरेकऽमुना हता॥२२॥ पनुक्की डोरीको एफ सिरेसे बाँधकर दूसरे सिस्तक वीच तो लिया, परन्तु मे उसे दूसरे सिरेसे पाँध म सके, उसका मटका लगनेसे गिर पो॥ २२ ॥ सज्यं कृत्वा परे धीरा मागधाम्बष्ठवेदिपाः । रानीजी ! बड़े-वर प्रसिद्ध पीर--बैसे जरासन्ध, मा नरेश, शिशुपाल, भीमसेन, तुर्योधन और कर्म-इन भीमा दुर्योधनः कर्णो नाविन्दस्वदपस्थितिम् ॥२३॥ स्टेगोंने धनुषपर गेरी तो घसा छी । परन्तु म्हें मी स्मितिका पता न पस्य ॥ २६॥ पासवीर बनन मरस्साभास जले वीक्ष्म शास्त्राच वदयसितिम् । जल्में उस म्छकी परछाई देख या मोर या मी जान लिया कि यह कहाँ है । पदी साबधानीसे ठनोंने याण मे मी, परन्तु उससे ज्यवेध म दुआ, उनमें पार्थो यत्तोऽस्मद्धार्ण नाच्छिनत् पस्सशे परम्॥२४॥ पाणने केवल उसका स्पर्शमात्र किया ॥ २१ ।। राज येषु निश्च! भग्नमानेषु मानिए। रानीवी ! इस प्रकार या वो अमिमानियों का मन मर्दन हो गया । अधिकांश नरपतिपर्पोने मुझे पनेरी भगवान् धनुरादाय सज्य कलाथ लीलया ॥२५॥ खलसा एवं साप-ही-साय छापयेक्फी सेना भी का दी । सब मायान्ने धनुर उठकर खे-लेम्मे- वमिन् सभाय विशिसं मस्स्पं वीक्ष्य सफाले। बनायास ही उसपर मेरी मादी । याण सन और बार्ने छित्त्वेपुमापातयत्त सूर्ये घाभिजिवि म्पिते ॥२६॥ तपा उसे नीचे गिरा दिया। उस समय वैक दायर केला एक वार मयी पम्म देसफर माण मग दिरि गुन्दभया नदुर्जयाम्दयमा मवि । हो रहा प्र, सपिसाधफ मिनिस्' नामक मुदत थीत रहा पा ॥ २५-२६ ॥ देवीजी ! उस सग दवाभ हुसुमामारान् मुमुनु पविईला ॥२७॥ यजमाप दस्ता अनन्दकीर हार पृधीमें जय-जयरगर होने लगा और आकाशमै बुन्नुनिष्य सा रनमाविसमई कनन् पुराम्पो पुणोंरी पर्वा करने छगे ॥ २७॥ रानीजी ! उस सम्म मने रंगार्म प्रवेश किया । मरे परॉक राय पगुम्या प्रदा कनकाज्यतरसमालाम्। स्नान-सनमुन बर रहे थे। मने नये-नय उत्तम रश- पर धारण पर सम्म थे। मी चाग्यिाम माय गुर नुन नियाय परिधाय प फौनिकाय २९ पी और मुंगर समिभिन मुमहराउट पी। माने दाम रनोस तर पर भी, जो यकीनने ममादामवदना करीश्वसम् ॥२८॥ 'ग दुप सान पारण और भागमा हाच । गनानी । म समय मग मुरमा भनी " उसाप चस्पान्ततापपलवि 'पर सुशामिला मनापा तथम गुम और भीमा उया मन का गटशिक्षामगधमा । राना मुग। उटमा स्वीfrFM । - - ३०८३] दशम साप ६३५ रालो निरीक्ष्म परितः शनकर्मरारे सुशीतठ हास्यरेस्य और तिरी तिनसे चारों ओर बैठे तुर रानायोंकी ओर देखा, फिर धीरेसे अपनी रसेऽनुरकरदया निदघे स्वमालाम्॥२९॥ वामान्य भयानके गलेमै गछ दी । यह तो कर ही चुकी हूँ कि मरा एय पहलेसे ही भगवान्के प्रति सावन्मदपटहार रामेनिझादयः। अनुरक पा ॥ २८ २९ ।। मैंने पो ही वरमालय पइनापी स्पों ही मृग, पापज, X, टोल, नगरे श्रादि बजे वजने छगे । मट और नतथियों नाचने लगी। निनेदुर्नटनक्सा ननृतुर्गायका बगुः ॥३०॥ ग्वेमे गाने लगे ।। ३०॥ द्रौपटीजी । नव मने इस प्रकार अपने स्वामी प्रिय- एवं प्ते भगवधि मयेथे नृपयूथपाः । तम मगधन्फा परमान्य पहना दी, उन्हें वरण कर मिया, तब कामातुर रानामोंको वा बाइआ । व न सेहिरे यामसेनि स्पर्धन्ता रम्छयातुराः ॥३१॥ बहुत ही चित्र गये ॥ ३१ ॥ चतुर्मज भगवान्ने अपने मां तावा रथमारोप्य इयरवचतुष्टमम् । श्रेष्ठ चार घोरोभले रपपर मुझे पा लिया और हापमें गापिनुप सेकर तम्मा क्यच पानकर युट करने के लिये शाधिपम्प सनस्तस्पापाजी पतुर्ममः ॥३२॥ वे रपफर सा हो गये ॥ ३२ ॥ पर रानीजी ! दाहकत सानक साम्-सामनसे लदे हुए रफ्को सव राजावोंके दाकपादयामास काशनापस्करं रथम् । सामने ही द्वारकाके उिये हॉक Pया, जैसे फोर सिंह हरिनोंके बीचसे अपना भग के जाप || ३३ ।। उनमेसे मिपता भूसा रामि मृगाणां मृगरारिख ॥३३॥ फुर राजावाने धनुर रेकर युद्धक छिये सब- धर इस उद्देश्यसे रास्में पीय किया कि हम भगवान्का तेऽवसअन्त राजन्या निषेधु पथि कपन । रोक, परन्तु रानीजी ! उनकी चय टीक वैसी ही यी, नसे युत्ते सिंहको रोकना बा ॥ ३१ ॥ शा- संपमा अश्वेवासा ग्रामसिंज्ञा यथा हरिम् ॥३४॥ धनुपके छठे हुए तीरोंसे किसीकी बांह यट गयी तो ते शान्यतपाणीप कृपाइटिकन्धरा । किसीक पैर कटे और किसीकी न ही उतर गयी। यहुत से लोग तो उस रणमिमें ही साके स्पेि सो निपतुः प्रपन फघिदक सत्यज्य सुवुः ॥३५॥ गये भोर यत से युयभूमि छोड़कर भाग सा सन पुरी पनुपविरत्पलंकवा सनन्तर यदुवंशशिरामणि मगमानने सुपी भौति अपने निभासमान मग और पृष्पीम सर्व प्रमित रविन्दपजपटचिप्रतारणाम् । शारफा-नगरीमें प्रवेश रिया । उस निइ पिम्पसे सनापी गमी दी। इतनी मरियों, फासा और तारण नसम्पली दिवि रवि चाभिस स्तुत स्पाये गये कि उनक कारण मुएस प्रमाण परनी- समानिसत्तरणिरिख स्वम्तनम् ॥३६॥ मा नहीं आ पागप ॥ २६ ॥ मी अभियग पूरा हा बानेसे तिानीको बहुत प्रस्मता । टन्होंन बन पिया मे पनरामाम मुरसम्पधिराभवान् । हिती मागे, सुग-सुम्पन्धिर्षों और मार-मोग १ मा २ मिन् समाना।

६३६ भीमनागवत [.८० महिप्प का महाईवासोलंकारैः पासनपरिच्छदैः ॥३७॥ | वनुमन्य वन, बाभूषण, शम्पा, शासन और सिक्ति प्रकारफी साममियों देकर सम्मानित किया ॥ ३७॥ दामीभिः सर्वसम्पद्भिर्भटेभरथवाधिभि । माषान् परिपूर्ण है—तयारि मेरे पितानने प्रेम उन बहुत-सी दासिया, सब प्रकारको सम्पनि, आयुपानि महाहामि ददौ पूर्णस भक्तियः ॥३८॥ सनिक, हापी, रप, पाड़ एवं बहुत-से वहुम्म्य वा सा आरमारामस्स तस्येमा वप चै गृहवासिका । | समर्पित किये ॥ ३८॥ रानीची ! हमने पूर्वजन्ममें साली आसकि मेकर कोई बहुत बड़ी तपस्पा की होगी। सर्पसझनियादा तपसा च पषिम ॥३९॥ दासियों हुई हैं ॥ ३९ ॥ तभी तो हम इस जन्मम आरमाराम भगवन्की न सोन्ह हजार पस्मिोकी भोरस रोहिणीस भोमं निरत्य सगण युधि वेन रुदा -भीमाचरने दिमियके सम्य पतुत-से रागको जीतकर उनकी कन्या हमलोगोंको अपने मम्मे बंदी शास्वाप ना घिविजये जिवराषकन्या।। ना सस्स्य पा । भगवान्ने यह जानकर युद्धमें भौम मर और उसकी सेनाका सहार कर राम और सर्प निर्मुच्य समृतिविमाधमनुस्मरन्ती पूर्णकाम होनेपर भी जम्होंने हमोगों को यहाँसे हसाय तपा पाणिग्रहण करके अपनी दासी बना रिय । पादाम्मुल परिगिनाय यमाप्तकामः॥४०॥ पनीबी 1 हम सदा-सपना उनक उनी चरणकमग पित्तन करती रहती पी जो जन्म-मृत्युम्प संसारसे नवयंसाचि सामान्य स्वारान्य भौन्पमप्युत । मुक्त करनेवाले है॥ १० ॥ साप्पी द्रौपदी ! म सामान्य, इबर अपवा इन दोनोंक माग, अमिमा परान्य पारमेष्ठ पत्रानन्त्यं वारापदम् ॥४१॥ अदि ऐश्वर्य, प्रमाश पर, माक्ष अक्षा मन्स, साहप्प आ मुहिपौ--कुश भी नहीं चाहती । हम काउ इतना ही चाहती है कि अपने प्रियतम प्रभु कामयामा पतस्य धीमस्पादरजा भिय । सुकामस परमकाओंकी यह भीरब सदा अपने सिम पन किया करें, जो लक्ष्मी नीक पक्ष स्पडम कुपामगन्धादयं मूभा पातुं गाभृतः ॥४२॥ की गवसे युक है॥ ४१४२ ॥ उशिरा मणि मान्फ जिन परमयमगेस स उनके गौ प्रमस्त्रियो यत्नाम्छन्ति पुलिन्यस्वणवीरुधः। घराते समय प्रेर, गरिया, मग्नि, किनक और पास- लतातक परमा पाइती थी, उदीपी हम भी पार गावपारयता गापाः पादस्पर्श महारमनः ॥४३॥६॥३॥ इति श्रीमद्भागात महापुगगे गरमईस्पा सदिता समय प्रशीतितमाऽप्य ॥ ८३ ॥ PAGE१ मा || ना समापन।

म. ८४] दक्षम स्कन्ध - अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः पारेषसीका पपोत्सव भीसुक उपाय श्रीशुकदेपनी कहते हैं-परीधित् ! सस्मिा भन्छ- भुला पृथा सुमलपुभ्पथ यायसेनी भयारी मावान् श्रीकृष्णके प्रति उनकी पतियोंफा कितना प्रेम है—यह बात कुत्ती, गान्धारी, द्रौपदी, माधष्पथ विविपपल्प उत स्वगोप्यः। एभवा, दूसरी राजपरियों और भगवान्की प्रियतमा फुप्णेऽखिलास्मनि हरौ प्रणयानुषन्ध गोपियोंने भी सुनी । सब-की-सम उनका यह स्पैविक सर्वा पिसिस्म्पुरलमभुषलाकुसारयः ॥१॥ प्रम देकर अपन्त मुग्ध, मयन्स विस्मित हो गयी । इति सम्माषमाणास सीभिः स्त्री नभिर्नुपु । सबके नोमि प्रेमक घाँस् छल्प आये ॥ १ ॥ इस प्रकार जिस समय त्रिोंसे सियों और पुरुयोंसे पुरुप पाप पूर्पनमस्तत्र कृष्णरामविरक्षया ॥२॥ बातचीत कर रहे थे, उसी समय बहुत-से ऋषि-मुनि द्वैपापना नारदम पवनो देवलोऽसिवः । भाषान् श्रीकृष्ण दौर छाममीका दर्शन करनेके स्पेि निवामित्रः सानन्दो भरमानोऽभगौसमः ॥३॥ याँ आये ॥२॥ म्नमें प्रधान ये ये श्रीकृष्णद्वैपायन म्पास, देपनि नारद, प्पयन, देमल, असित, विवामित्र, रामः सक्षिप्पो भगवान् वसिष्ठो गालवो मृगुः । शतानन्द, भराज, गौतम, अपने शोके सहित भाषान् पुलस्याफस्सपोऽत्रिम मार्कण्डेयोपास्पति॥४॥ | परशुराम, पशिष्ठ, गाम्य, मुगु, पुम्ल्य, कश्यप, अत्रि, द्वितशिवाय प्रयपुत्रास्तपाङ्गिराः। मर्कण्डेय, परस्पति, हित, पित, एक्स, स्नफ, सनन्दन स्नाक्न, सनत्कुम्मर, अहिरा, स्प, यापास्य वीर मगस्त्यो मापपरूपम पामदेषादयोऽपरे ॥५॥ वामदेव इत्यादि ॥३-५॥ शक्यिोंका देस्वकर पहरूम्से बैठे हुए मरपतिगण, युधिष्टिर श्रादि पाणय, भगवान वान् घट्ना सहसास्थान प्रागासीना नपादयः । धीरण और कामजी सहसा उठकर रहे हो गये पाण्डवा कप्मरामौ च प्रमाविवन्दितान् ॥६॥ और सुनने उन लिम्वन्तित भूस्पिगेको प्रणाम किया, १६। इसके बाद स्वागत, थाम्न, पाप, वर्ष, पुष्पमय, धूप वानानघुपैथा सर्वे सहरामोऽन्युमोऽर्षयत् । और चन्दन कादिसे सम रानाओंने तय मामजीके स्वागतासनपापायेमारपधूपानुरूपनेः साप स्वयं ममान् श्रीकमने उन सब प्रपियों की ॥७॥ विधिर्मक पूर्व की ॥७॥ सब सम अवि-मुनि मारामसे उपाच सुसमासीनान् भगवान् धर्मगुप्तनुः । ॐ गये, तब धर्मरक्षाके स्पेि अपतीण भगान् श्रीकृष्णने उनसे कहा । उस समय वा बहुत बड़ी समा चुपचाप सदसस्तव महतो पतषाचाऽनुभवतः ॥ ८॥ भगवान्का म्यपण सुन सी पी ॥ ८ ॥ भीभगवानुमान भगवान भीहणने कहा-पम्प हमोगोंका महापय मन्मभूतो छम्छमात्स्न्न सकळम् । जीवन सफल हो गपा, बार जन्म लेने में पूरा-पूरा फन मिउ गपा, क्योंकि जिन योगेपरोक दर्शन कर देरानामपि तुप्पापं यद् यागेपरदर्शनम् ॥ ९॥ या देवताओंके म्येि भी अस्पन्त दुर्लभ है, उनका १ भि।२ पाप।

६३८ श्रीमहागवत [4.0 . नाग्निर्न पर्या न प चन्द्रवारका किं खल्पतपसां नृणामर्चायां देवचक्षुपाम् । दर्शन में प्राप्त है॥९॥ मिनि सुतो तपस्या की है और जो वेग अपने इरादेको समस्त दर्शनस्पर्धनप्रश्नप्राइपादानादिकम् प्राणियोंके दयमें म देखकर केवल मूर्तिनिश्शेषम होत ॥१०॥ दर्शन करते हैं, न्हें वापोगों के दर्शन, स्पर्श, कुशास्त प्रणाम और पादपूजन आदिका मुभपर मन का नसम्मयानि वीथानि न देवा मच्छिलाममा। मिल सकता है।॥१०॥ कार बमय तीर्ष ही ती नहीं कहत्यते धौर केल मिकी या पपरकी प्रतिमा से पुनन्त्युरुकालेन दर्शनावेव साधवः ॥११॥ ही देवता नहीं होती, संत पुरुष ही वास्वधर्मे वर्ष और देवता है, क्योकि उनका वसुत सम्पतक सेवन किया जाय, तब वे पवित्र करते हैं, परन्तु स्त फुर तो दर्शनमाप्रसे ही कृतार्थ कर देते हैं ॥ ११ ॥ न भूल स धसनोऽथ वाचनः। सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी, बछ, माकाश, वायु, पाणी और मनके अधिष्ठातृ-देवता उपासना करनेपर भी पापका उपासिता मेदकतो हरन्स्पर्ष एरा-पूरा नाश नहीं कर सकते, क्योंकि उनकी उपासना- से मेद-मुद्धिका नाश नहीं होता, यह और भी माती मिपमितो मन्ति मर्ससेषया ॥१२॥ है। परन्तु यदि धनी दो-पकी भी मानी महापुरुषों की सेषा की य तो वे सारे पाप-ताप मिटा देते हैं। पसास्मघुद्धिः इमपे विधातुके क्योंकि ये मेद-मुरिफे बिनाशक ? ॥ १२ ॥ मामाको और सभासदो । जो मनुष्य वात, पित्त और काम न स्वधीः फलप्रादिपु भौम इन्यपीः। तीन धातुओंसे मने ए शस्य शरीरको ही बाग- भपना मैं, मी-मुत्र बादिको ही अपना बौर की, यत्तीर्घमुद्धिः सरिसे न करिधि- पत्पर, काठ बादि पाति विकारों को ही परदेव मानत है तथा जो केवल ऋष्यो ही तीर्थ समझता है-पानी भनेप्पमिक्षपु एव गोस्वरः ॥१३॥ महापुरुषोंको नहीं, प मनुष्य होनेर मी पशुवों में नीच गप ही॥१५॥ मीमुक उपाप भीशुकदेवजी मते । परीधित् ! भावन् की- कम पसण मानसम्पम है। उनका पा गूढ मपण निशम्पत्यं भगवतः कृष्णसाकण्ठमेधसः । समकर सर के सम प्रषि-मुनि चुप र गये। उनकी मुदि चमरमें पड़ गयी, ये समझ म सके कि भगवान् पषो दुरन्वर्य विप्रास्तूप्पीमासन् समद्रियः ॥१४॥ निभार करने के बाद यह निश्चय किया कि भार यह क्या कर रहे हैं ॥१५॥ नोंने बहुत देरवक सपर होनेपर भी को इस प्रकार सामाम्प, फर्म-परतण घिरं विमृश्प मनप परस्पेशितष्यताम् । जीकी मॉनि या संपके लिये है। ऐसा समसकर ये मुसकावेर जनसंपर इस्यूचुः स्मपन्तस्त मगद्गुरुम् ॥१५॥ जगद्गम मायन् श्रीकृष्णसे करने मे ॥ १५॥ । !

०८४] दशम न्य ६३९ - - मुन्य वपुः मुमियोमे कहा-मावन् । थापयी मायासे प्रजा पनियों के अधीमर मरीचि आतिमा पापड तत्ववानी पन्मायया पविदुचमा पय हमग माहित हो रहे हैं। धाप लप इम एते हुए मी मनु-पकी-सी चेद्यओंसे अपनेयो छियाये रसपर विमाहिता विषबामधीधराः । चीवकी भाति वचरण करते हैं। मगवन् ! सुचमुच पदीरितम्यामति गूढ ईदया पापी टीय अफ्त विचित्र है। परम भापर्यमयी है॥ १६ ॥ जैसे पृष्मी अपने विकारों-पक्ष, पस्पर, अहो विचित्रं भगवरिषेष्टितम् ॥१६॥ श्रादिके द्वारा बहुत-से नाम और सप पहण फर ती है, वास्तवमें वह एक ही है, वैसे ही आप एक अनीह एतद् पहुधैक आरमना बार चेयहीन होनेपर भी अनेक मूप धारण कर लेते है और अपने-आपसे ही इस जगत्की रचना, रक्षा कार सजत्यवत्पचि न पम्यते यथा । संहार करते हैं। पर यह सब करते हुए भी इन कसे भीमहि भूमिर्यहनामरूपिणी रिस नहीं होते । जो समातीप, पिजातीप और स्वगत भदशून्य एकरस अनन्त है, उसका यह परित्र ीय धो विमनपरित विरम्मनम् ॥१७॥ मात्र नहीं तो और भ्य है । धन्य है आपकी पह टीय । ॥ १७ ॥ भगवन् ! यपरि आप प्रातिसे परे, प्रथापि काल स्वत्रनाभिगुप्तये ममयं परम परमारम्स है। तथापि सम्प-समपपर मक्क- जनोंकी रक्षा और दुयश दमन करनेक लिय विशुद विभर्पि माप ग्वठनिग्रहाय प। मरवमय श्रीशिमा प्रपर फरतेई बार अपनी टीम स्वतीला पदपथ सनातन हारा मनातन दिय मगकी रक्षा करते हैं, क्योंकि समी वर्गों और धाश्रमोंक म्प थाप स्वयं ही प्रकट गाभमामा पुरुषः परा भवान् ॥१८॥ ॥ १८ ॥ भगान् { 4 अपक्ष विमुद हाप है, नास्पा, माप्याय, पारणा, प्यान थोर समाधिकारा मा तेहएय गुस्ल तुप स्वाप्पायमपमः । उसी में भापक साकार-निराकार ए और नोंक अविष्टाननाए परप्रप परमारमा साझामर दाता पापलब्धं मन प्यक्तमन्यक्तचना परम् ॥१९॥ ६॥ १ ॥ परमामम् ' मा मग ही भेगक अधारभूत सम्मान प्रसाने महान् ययानम्बमा मन । आफ स्वमएकी रधिक स्थन ईसीसे आप प्रामगोंका मम्मान करता है और इमीस अप मामग- सभाजपमि सदाम त प्रमापासणीमान् ॥२०॥ भकोम नामान्य भी ८ ॥२०॥ पाप सविध ययण मापनोंगी घाम सीन्द और मन पुरुषों पर अपनो ममारव पिपायान्तपमा रशः। गनिहारमे निया आज हमपर जम सिमाधीर त्वया मंगम्य महापा यदन्तः प्रगमो पर ॥२॥ THEmmगरपषम मम पाम पर कर दीई || प्रमापारमा मन निम्त। नमम्मुरन भगरन कमायाप्टमधम् । मार्ग मशिनमा म मन्द। भार १ याममाप्रम।

६४० भीमद्भागवत स्वयोगमाषयाम्छममहिम्ने परमात्मने ॥२२॥ आपने अपनी फिस्य शक्ति योगमायाके राज महिमा मिया रस्त है, हम पापको नमस्कार कसे न में विदन्यमी भूपा एकारामाषाणयः । हैं॥ २२ ॥ ये सभामें बैठे हुए राजाभेग वौर दूसरे से मात ही क्या, सयं आपके साप आहार-बार करने बाले यदुपेशी लोग मी भापको वास्तक्में नहीं बनते मायाधवनिकाण्डममारमान कालमीघरम् ॥२॥ स्पोंकि बापने अपने सहपको–यो सबका बाम जगत्का वादिकारण और निफ्न्ता है-मयके परदे पया धयाना पुरुष वास्मानं गुणवतरफ् । एक रस्सा है ॥ २३ ॥ चम मनुष्य स्वप्न देखने मात है, उस समय स्वप्नके मिथ्या पदापोंको ही सस्प समा लेता है और नामाप्रकी इन्द्रियोंसे प्रतीत होने से नाममात्रेन्द्रिपाभाव न वेद रहितं परम् ॥२४॥ अपने स्वप्नशरीरको ही वास्तविक शरीर मन बैठता है। उसे उतनी देर के लिये इस मात्या किकुछ ही पतामह एवं स्वा नाममात्रेषु विपमेपिन्द्रिमाया। रहा कि स्वप्नशरीरफे अतिरिक एक नाम-कारकका शरीर मी है ॥२१॥ ठीक इसी प्रकार बामस्वकारताने मी इन्द्रियों की प्राप्तिकप मापासे पित्त मोहित होकर मायया विनमचिचो न पेद स्मस्पष्ठवात् ॥२५॥ नाममात्रके विषयोंमें भटकने लगता है। इस समय में विस्फे पारसे विवेकशक्ति रक चाप्ती है और जीव या तस्वाप ते रधिमानिमघौधर्म नहीं जान पातम कि वाप इस मामत् संसारसे परे १॥ २५ ॥ प्रमे । को-को पनि मुनि कपात परिपत्र योग-साधमाके द्वारा आपके उन परणकमलको र तीर्थासदादि सुविपकयोगैः। धारण करते हैं, जो समस्त पारितो ना करने से रमाचम्के मी मात्रयस्थान है। यह बा सौभाम्पकी बात उस्सिकभक्पुपावाशयमीवकोशा है कि कार हमें नहींका दर्शन हुआ है। प्रभो ! हम वापके मत है, आप हमार अनुम्न कीनिये। स्पोकि मापके परम पदकी प्राप्ति उन्हीं अगोंको होती है, बिना मापुर्मवद्गविमधोऽनुग्रहाण भक्कान् ॥२६॥ भिशरीररूप जी कोश अपकी कर भक्रिके धारा मठ हो जाता है॥ २६ ॥ श्रीसुक उपाय भीशुकदेवजीते-राज । भान्की इस इस्पनुशाप्प राबाई पृतराष्ट्र युधिष्ठिरम् । प्रकार स्तुति करके और उनसे, रामा प्रत्यम्से तक राज स्वाममान् गन्तुं मनयो दघिरे मनः ॥२७॥ अपने मामार जानेका विचार किया ॥ २७ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरजीसे अनुमति लेकर उन लोग्नेंने अपने पद् पीप तानुपग्रन्य पसुदेवो महायशाः । पशस्वी यमदेवजी उमका जानेका विचार देमफर उनके पास भाये और उन्हें प्रणाम मिया वीर उनके परम प्रणम्प घोपसगम पभाषेद मयन्यितः ॥२८॥ पकाकर नदी ममतासे सफेदन करने लगे ॥ २८ ॥ मना दष्ठम सम्म ६४१ अ० ८४] मसुदेष सपार मरेपीछे कहा-अपियो । आफ्रोग सर्वदेस- खरूप हैं। मापयोगोको नमस्कार करता है। आप नमो व सर्वदेवम्म सुपपः भोतमईय । लोग क्या करके मेरी एक प्रार्थना मन यजिये । यह यफि जिन कोक अनुशनसे कर्मों और कर्मवासनामों- का आस्यन्तिफ नाश-मोध हो जाय, उनका श्राप फर्मणाकर्मनियो यथा सामखदुस्पताम् ।।२९।। मुष्ठ उपदेश कीजिये ।। २९ ।। मारा मारपजीने का अरियो । यह कोई मायर्पकी बात नहीं है कि समुदवजी श्रीकृष्णको माना पाख्य नासिधित्रमिद विप्रा पसुदेवो मुसस्सया । समसफर शुर निवासक भावसे धपन कल्याणका गणं मत्वाम पमा पठति श्रेप मास्मनः॥३०॥ | साफ्न हम्भेगेंसे पूछ रहे हैं ॥ ३० ॥ संसारमें बात पास राना मसुम्पोंके बनादरका कारण हुआ करता संनिर्मो हि मानामनावरमारणम् । है। देखते है, गातटपर रानमा पुरुष हानल मेकर अपनी सुविके लिये दूसरे तीर्यमें बाता गारहित्वा यथान्याम्भस्तबस्यो याति शुद्धये॥३१॥ ॥ ३१ ॥ भीमणकी अनुमति समयके फरसे होने यात्री बगकी सूति, स्पिति और प्रम्यसे मिटनेवाली मसानुभूतिः कालेन लयास्पयादिनास वै । नही है। मह सत किसी दूसरे निमित्से, गुगोसे सवोऽन्पमाच गुणतो न तपन रिप्पति ॥३२॥ और किसीसे मी धीम नहीं होती ॥ ३२ ॥ उनका जनमय खरूप अविषा, राग-रेप बादि सेश, सं क्लेशकर्मपरिपामगुमप्रमा पुण्य-पापमप कर्म, मुख सदि म तपा सत्र | बादि गुणोंक प्रभासे मति नहीं है। वे स्वयं बधितीप रम्पाहतानुभवमीपरमद्वितीयम् । ममरमा है। जब वे अनेको अपनी ही शक्तियों प्राम बाहिसे ढक लेते है, सब मर्मव्येग एसा सम्पाते हैं प्राणादिमिः सलिभपैरूपगूढमन्यो कि वे एक गये, असे याल, कुबरा या पाणके द्वारा मन्मेत समिष मेघहिमोपरागः ॥३३॥ ॥१३॥ भाने नोंके टक जानेपर सूपको दका हुआ मान सेते अयोधर्मनया राजभाभाप्पानफदुन्दुभिम् । परीक्षित ! इसके बार ऋषियोंने भावान् श्रीकृष्ण, बामनी बार अम्पान्य राजाओंके सामने ही वसुदेव सपो ममती राधा स्यैवाम्पतरामयोः ॥३४॥ जीको सम्बोधित करके कहा-॥ ३१ ॥ फर्मक सारा फर्ममा फर्मनिर एप साधु निरूपितः । फर्मासनाओं वोर कमफका पास्पन्तिक नाश करन- का सबसे वय उपाय यह है कि सादिकेसरा माया पजे विष्णु सर्पमझेपर मसः ॥३५॥ समस्त योंक अधिपति माछन् विष्णु शर्मक पिसमापशमोऽयं पेषिभिः शामपापा । बाराधना करे ॥ ३५॥ त्रिकालदर्शी अनियान शास रिसे यही पिकरी शान्तिका उपाय, मुगम मामसाधन दश्विा सुगमा योगा धर्ममारममुदापहः ॥३६॥ और वित्तमें कानम्दमा उन्यास करनयाय धम कायम : १मापि पि ।

६४२ भीमद्भागवत अयं स्वस्स्पयनः पन्था विधातेइमेधिनः । है ॥३६ ॥ अपने न्यायार्जित नसे प्रमाक पुरोल मगवान्की आराधना करना ही छिनाति–अम, पति पन्छ्याऽऽसपिचेन शुक्लेनेन्येत पूरुषः ॥३७॥ और वैश्य गृहस्वके लिये परम कल्यागा मम है॥३७॥ वसुदेवजी विचारवान् फुरुषको चहिय किया विचैपा यपदानाईरसुतेपणाम् । दान मादिके द्वारा धनकी इछको, गरमोचित भोगात स्त्री-पुश्की इछको धौर कायमसे सर भाग में मात्मलोकगनां देव कालेन विस्जेद् पुषः । नष्ठ हो नते हैं इस विचारसे कैसमाको स्याम वे । इस प्रकार धीर पुरुस घरमें रहते हुए ही तीनों प्रशासकी प्रामे त्पकैपणाः सर्वे पपु रास्तपोवनम् ।।३८॥ एषणाओंछोंका परिस्पा करके तपोक्नक लिया करते थे ॥ ३८ ॥ समर्ष समुदेक्यी ! मैसिभिदिजो मावो देवपिपिवर्मा प्रभो । क्षत्रिय वौर वैश्य ये तीनों देवता, अपि और पिर का प्रण लेकर ही पैदा होते हैं । इनके प्रोसे पदाम्पपनपुत्रैस्तान्पनिस्तीर्म स्पमन् पतेत् ॥३९॥ | कारा मिलता है या, वप्पयन और सन्तानोत्पलिसे | इनसे उमण हुए बिना ही जो संसारमा मग कर व स्वप एको दाम्पा वै अपिपित्रोमहामते । है, उसका पतन हो माता है ॥ ३९ ॥ परम मुहिम यसुदेवनी ! बाप बाक प्रति चौर पितरों के प्रम यौर्देसर्गमन्मन्य नियोऽश्चरणो भव ॥४०॥ तो मुक्त हो चुके है। नोंके सारा देवतावोंका अण पुका दीबिये, और इस प्रकार सबसे उप्रग होकर गहत्याग कीजिये, मगवानकी शरण हो बाइय ॥१०॥ पसुदेव भवान् नून भरपा परमया हरिम् । सुदेवनी ! वाफ्ने अक्स ही परम भकिसे काम नगवामीपर प्रायः स यद् पो पुत्रां गतः ॥४१॥ भगवान्की नाराफ्ना की है, तभी तो वे आप दानोंके पुत्र हुए हैं ॥ ११॥ भीक उपाय भीशुष्येवमी कहते -परीक्षिस् । परम मनम्ती इति साचन मुस्वा पसुदेवो महामनाः । समुदेवजीने ऋषियोंकी यह बात सुनकर, मके पर | में सिर रहकर प्रणाम किया, उने प्रसन्न किया और तानुपीनृस्विशा षने मूर्नाऽऽनम्प प्रसाप च ॥४२॥ या ४२ ॥ राजन् ! बब इस प्रकार ऋदेवजीने याके छिपे अविनोंक रूपमें उनका रण कर त एनम्पपो रामन् सा धर्मेण धार्मिकम् । धर्मभक प्रवियोंको वरण कर मिया, तब उन्होंने पुष्प क्षेत्र कुरक्षेत्रमें परम धार्मिक मुक्जीके द्वारा उचमोत्तम ससिमपाजयन् क्षेत्र मरुचमफल्पक ॥४३॥ | सामग्रीसे युक्त पा करमाये ॥ १३ ॥ फीभित् ! जा परीक्षा प्राचायां गुप्मयः पुपरसमः। मुदेपनीने यापी दीक्षा ले मी ता पदुमशियोंने स्नान करफ मुन्दर मस और फार्मेकी मपर धारण कर माता सुवाससो राजन् राजानः सुप्पलमृताः।४। राजाले ग माभूषणोंसे सूत्र मुसभित हो गये॥४१॥ समुदेवगीकी परियोने सुन्दर बस बाग बौर सोनके महिप्पप दिसा निष्कामा सुवाससः। हारोंसे अपनेको सजा रिया और फिर ये सब बड़े १ पिचे। २ मण्पपिम्पब । ३ नम्पोरनी प|४ मिन् महिम्मो मुरि ।

१० ८४] ६४३ दीक्षासालासुपाजग्मुरालिता वस्तुपाणयः ॥४५॥ | आनन्दसे धपने-अपने हाणे, माङ्गकि सामग्री कार याशयम अयी ॥ १५ । टस समय मुदा नेदर्मदापटदशामेपानकादयः फ्लावन, AF, बोल और नगारे भारियाज वस्न पगे। नट और नर्तकियों नाचने लगीं । सूत और मगध स्तुति- गन करने लगे। गन्धर्षोक माय मुरीले गलेगत्ये गन्धर नन्तुर्नटनर्तस्यस्तुमुमः सतमागधा। पहियों गन करने यी !! ४६ ॥ वसुदेवनीने पहले जगु सुकण्ठपो गन्धर्य संगीवंसहमठकाः ॥४६॥ | नेत्रोंमें अंजन और शरीरमें मसन लगा दिया किर टनकी पकी आदि अधरह पनियों के साथ उन्हें दमम्पपिधन् विधिवदक्तमम्पकमृत्तिज । अविनोंने महाभिषाकी विधिसे जैसे ही अमिक पाया, निस प्रफार प्राचीन कालमें नोंके रूप चन्द्रमाया पनीभिरटादशभिः सोमराजमिवोइभिः ॥४७॥ अमिश हुआ था ॥ १७॥ उस समय यह दीक्षित होने के कारण महदवनी तो मृगचर्म धारण किये मुए थे, परन्तु टनकी परियो सुन्दर-सुन्दर साफी, कंगन, ताभिईटबलपैरिन पुररुपले हार, पाय और कर्मल धादि आभूपोंसे मन सी हुई पी । घे अग्नी परियों के साप मीमति खलंकनाभिरिंभी दीक्षितोऽजिनसंपतः ॥४८॥ शोभयान ए ! १८॥ महाराज ! पदेवीक असिन और सदस्य रसवष्टित अभूपम तपा रेशमी तस्पर्विजो महाराब रसफाशेयवाससः। या धारण करके वैसे ही मुश्येमित हुए, बसे पाले इनक पामें हुए ये ॥ १९ ॥ उस समप भावान् ससदस्या विरेजुस्ते यथा पाहणोऽबरे ॥४९॥ श्रीक्षण और स्लरामजी अपन-अपन भा-और खी-पुत्रोंके सप इस प्रकार शोभायमान हुए, जसे अपनी वदा रामय प्णपः स्वैरन्मुभिरभितौ । शक्तियों के साथ समस्त जीपक स्वर स्वयं भगवान् रजतु स्वसदारजीवी स्वविभूतिभिः ॥५०॥ समष्टि नीयक अम्मिानी भीसर्पम तप्त अपन विमुद्र नारायणस्वरूपमें शोभायमान होते है॥५०॥ जिऽनुपर्ष विधिना अपिहोवादिलक्षणेः । सुदरजीने प्रत्येक पामें यातिप्टेम, दय, मम्पस आमाहल यहों, सौरसादि मत पडों और अमि प्रारुवनंदन्यवानक्रियेपरम् दोन बादि अन्यान्य पहाफ रारा प्य, किंण और उनक ॥५१॥ मानक-मन्यॉक स्वामी विगुभगमनकी आराधना की॥५१॥ इमा पर उन्होंन उपित समपस अपत्सिम्पाऽदान् श्चात यथानात स दधिमा । असिओंग पाशगसे मुमति विसा और पासक अनुमार रतुनी दक्षिग नए मज सठातम्याग्रुत्य गाम्कन्या महाधनाः ॥५२॥ धनक साप आरन गाई, मुग पपी॥ पनामयाजारभूप्पैथरिता वे मार्पप । -संपावन नामा यदा भार मारपस्नान अपद । ।३ उपपरे । ५३ ॥ सक

५९६
भीमाागत
धषु प्रतियातेपु पृष्मया कृष्णदेवताः । मन स्व मधु-सन्धय झोसे विदा हो कुकका
भगवान् श्रीकृष्णको ही एकमात्र हादेव मानने से
पीक्ष्य प्रापमासमा ययुरिषती पुनः ॥७०॥ यदुषशियोंने यह दस्कर कि आप सब
पहुंची है, द्वारकाके लिये प्रस्थान मिल ॥ ७० ॥
अनेम्या
फचयांचपदुदेष महात्सबम् । यहाँ जाकर ठोंने सब गेसे वसुदेवबीके क
महोत्सव, स्क्वन-सम्पन्क्यिोंके दर्शन मिन पनि
पदासीचीर्थयात्रापां मुहस्सदर्शनादिकम् ।।७१।। | तीर्थयात्रा के प्रसझेको का सुनाया ।। ७१ ॥
इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमास्यों सहितायां दशमस्कन्धे' उत्तरार्धे
तीर्पयात्रानुवर्णनं नाम फतुरशीतितमोऽम्पाय ॥ ८१ ॥
अथ पञ्चाशीतितमोऽध्याय
मीभगवान के द्वारा पसदवसीधे प्रक्षवानका उपपश तथा देवीडोरेम पुरोको बोरा नगमा
भीवादरावणिस्पाच
भीशुकदेवजी का परीधित् । इसकेक
एक दिन मवान् श्रीकृष्ण और सामग्री प्रात काम
अर्थकदाऽऽत्मबी प्राप्ती कमपादाभिवन्दनौ ।
प्रणाम करनेक छिये माता-पिताके पास गपे । प्रमान
फर होनेपर असुदेवजी में प्रेमसे दोनों भाका
अमिनन्दन करके काने मो॥१॥ मनुदेवजीने पर
वसुदेवोऽभिनन्याह प्रीम्या सहर्पणाम्पुतौ ॥ १॥ यह अपियोंके मुंहसे भगवान्की महिमा सुनी भी तन
उनके ऐपपूर्ण चरित्र भी देखे । इससे में
मनोना स पघा भूत्वा पुधयोर्धामसूचकम् ।
इस यतका सविणास हो गया था कि ये समरन
पुरस नहीं, स्र्य भगवान् । । इसध्येि उन्होंने माने
पुत्रको प्रेमलक सम्बोधित करके यों कहा-॥ २ ॥
तही सवियम्भः परिभाप्पाम्पभापत ॥ २॥ | सचिदानन्दस्वरूप श्रीष्म 1 महायोगीपर सर्पम !
तुम दोनों स्नातन हो । में जानता है
कि तुम दोनों सारे जगदके साक्षात् करणारूप
फप्ण रुप्प महायोगिन् सर्पण सनातन ।
प्रधान धीर फुटपके भी नियामक परमेघर ॥३॥
इस जगतके आधार, कर्मत्त पौर निर्मममममी भी
जाने पामस्य येत् साक्षात् प्रधानपुरमा परा ॥ ३॥ तुमी हो । इस सरे जगत्क स्वा- तुम दानों हो
वीर तुम्हारी ही कीमके ये इसपा निर्यण
पन मेन यतो यस पस्मै यद् यत् पपा यदा ।
है । यह मिस सम्प, निस सएमें जो कुछ रहता है
होता है सब तुम्हा हो। इस जगत्म प्रानि-
सपसे भोग्य और पुस्परूपसे भाछ तप दोनोंसे परे
स्पादिदं भगवान् साधाव प्रधानपुरुषपरः ॥४॥ोंके निपामा सभात् मगवान् भी मुम्ही हो ॥ ॥

६४७ अ० ८५] दशम स्कन्ध एवमानाविधं विश्वमारमसृष्टमधोक्षज । इन्द्रियातीत । जन्म, अस्तित्व आदि भाविकारोंसे रहित परमात्मन् ! इस चित्र विचित्र जगदपा तुम्होंने आत्मनानुप्रविश्यात्मन्प्राणो जीवोषिभर्पजः ||५|| निर्माण किया है और इसमें स्वयं तुमने ही आग्रहपसे प्रवेश भी किया है । तुम प्राण (क्रियाशक्ति ) सौर जीप (मनशक्ति) क सपमें इसका पालन-पोषण कर रहे प्राणादीनां विषमजा शक्तयो याः परस्य ताः । हो ॥ ५ ॥ क्रिपाशतिप्रधान प्राण आदिमें जा बगत्की यस्तुओंकी सहि करनेकी सामर्थ्य, पारतन्मात् पैसारमा अयोधप्टवषेप्टताम्।।६। उनकी अपनी सामप्य नहीं, तुम्हारी ही है । क्योंकि ने तुमारे समान चेतन नहीं, अचेतन हैं, स्वतन्त्र कान्तिस्तेषः प्रभा तथा चन्द्राग्न्यकरियुताम् । माही, परस्त्र हैं। अत उन चेयशील प्राण आदिमें | केष्ठ चेयमात्र होती है, शक्ति नहीं । शक्ति तो तुमारी ही है ॥ ६ ॥ प्रभो ! चन्द्रमाकी कान्ति, यत् स्पैर्यमा मेपिर्गन्धोऽर्धतोमवान् ॥ ७॥ अग्निका वेज, सूर्यकी प्रमा, नक्षत्र और मिपुत् अदिती स्फुरणरूपसे सख, पर्वतोंकी स्थिरता, पृष्पीकी सधारण- सर्पर्ष प्रागनमपी देवस्व शाम तसः। शकिरप इति और गपसप गुण-ये स्व बसपमें धही हो ॥ ७॥ परमेघर । अमें तप करने, चीक्न देने और गर करनेकी जो शक्रिया है, ये तुमारा ओन सहा पल पेष्टा गतिर्गयोस्तवेयर ॥ ८॥ ही सरूप । मल और उसका रस भी तुम्ही हो । प्रमो ! इन्द्रियशकि, अन्तकरणकी शक्ति, शरीरकी दिशा त्वमवकासोऽसि दिष्ठ संस्कोट आभयः । शक्ति, उसका हिमना-गलना, सपना-फिरना-- सब वायुकी शकियों तुम्हारी ही हैं॥ ८॥ दिशाएँ और उनके प्रकाश मी तुम्ही हो । अफास और नादो पर्णस्त्वमाकार आकवीनां पतिः। ९॥ उसका भाम्पमूत स्कोर-कादतन्मात्रा पाणी, नाद-पश्यन्ती, ओंकार--मध्यमा सय वर्ण इन्द्रिय त्विन्द्रियाणां त्वं देवाध तदनुग्रहः । ( अक्षर ) एवं पदापोका मा भाग निर्देश करनाले समय बसरी वाणी भी तुम्ही हो ॥ ९ ॥ इन्द्रियों, उनकी पिपप्रकाशिनी शकि और अपिछत अवबोधो भवान् पुरीवस्खानुस्मतिः सती ॥१॥ दक्षता तुम्ही हो ! मुनिकी निश्चयामिका शक्ति और बीपकी विशुद्ध स्पति मी तुम्ही ॥ १० ॥ भूमि भूतानामसि भूतादिरिन्द्रिपामा १ वंजस । उनका कारण ठामस पार, इन्द्रियोंमें उनका कारण तेजस कार और इन्द्रियों के अधिष्ठासू-देवताम पकारिफा विझत्पानो प्रधानमनुशापिनाम् ॥१९॥ गनफा कारण माण में तुमी हो ॥ ११ ॥ मगन् । उनका कारण सस्तिक बासर तपा सीमोंक आषा- पैसे मि अदि पस्तुओंके विकार घा, इस अदिमें नगरपिा भाषेषु तदसि त्वमनपरम् । मिती निरन्तर पमान है और वास्तवमें ये कारण १ सम्पर। २ इन्द्रियान्त्रिणमा परेका वर । या परा - भीमद्भागवत [.० सस्न् रामारे मिग्रा यजमानपुरस्मराः ॥५३॥ | यसाम्त-स्नानसम्बन्धी अवशेष फर्म कराकर मुखको धागे फरके परशुरामजीके पनाये दमें -रामाने स्नातोऽसहारषासांसि बन्दिम्योदात्तथा नियः। स्नान किया ॥ ५३ ।। स्नान करनेके बसवेशन और उनकी पतियोंने पदीदनोंको अपने सारे सनमून सवः खलंकतो मर्मानापम्पोऽन्नेन पूजयत् ॥५४॥ दे दिये तपा स्वयं नये वनामूपणसे मुसम्ति होकर न्होंने ग्रामोंसे लेकर कुचोंतकको भोजन कराम ॥५१॥ कपून् सदारान् ससुतान् पारिपम भूयसा । तदनन्तर अपने भी-कभों, उनके बी- फुला विदर्म, फोसल, कुरु, काशी, केकस बौर सम्म सरि मिदमस्येसलहरून् कातिकेफपसूक्षयान् ॥५५॥ देशों के राजाओं, सदस्यों, ऋषिलों, देवताओं, मन में भूतों, पितरों और चारों को विदाकि रूपमें बार-स सदसत्तिकसुरगणान् नमूतपिच्चारणान् । मेंट देकर सम्मानित किया। वे भेग हामीपति ममान् श्रीपकी अनुमति लेकर पाकी प्रशंसा करते : भोनिकेतमनुवाप्प शंसतः प्रपयुः ऋतुम् ॥५६॥ अपने अपने घर चले गये ॥ ५५ ५६ ॥ परीभित् । भवराष्ट्रोऽनुबा पार्षा भीमो द्रोपाप्रथा ममौ । उस समय राजा धृतराष्ट्र, विदुर, युधिमि, भीम, अर्जुन, भीष्मपितामह, प्रोणाचार्य, कुन्ती, मकुम, सहदेव, नारा नारदो भगवान्प्पासासासम्पन्धिवान्धवाः॥५७॥ माधव अपने पी मनु यादवको कार बम | मान्छन् म्पसदेव तप दूसरे स्पचन, सम्बन्धी र पन्न परिपन्य यन् सौरदान किपचेवसः। करपन्त विरा-म्यपाका अनुभव करने गे । मोने भापत स्नेहाई लिचसे यदुर्मशियोंका पनि दिन वोर पड़ी कठिनाईसे किसी प्रकार अपने अपने को पपुर्षियरुण सदेशामापरे जना॥५८॥ गये। दूसरे लोग भी इनके साथ ही पास रखना हो नन्दम्तु सह गोपालहत्या पूजयापितः। गपे ।। ५७५८ ॥ परीभित ! भगवान् श्रीक रामनी क्या उनसेन वादिने मन्दाना एवं कम सन | गोपोंकी बहुत पीपी समप्रिपोंसे वर्ग-पूजा की, छप्परामोनसेनापवास्सी पन्धुपत्सलः ॥५९॥ उनका सत्कार किया, और वे प्रेम-परश होकर जा बसुदेवोऽ सोचार्य मनोरथमहार्णवम् । | दिनोंतक वही रे ॥ ५९ ॥ देखनी बनाकस है वपने बहुत यो मनोरमका मासागर पार कर गये थे। उनके वानन्दकी सीमा न पी। समी बीय सम्म सुरवातः प्रीवमना नन्दमाहरे पठन् ॥१०॥ उनके साप ये । नहोंने मन्दमयका एक कार कहा॥ ६०॥ बसुदेव उपार पसरवीन कपा-मा -माईनी ! मान्ने मनुके मातरीसरुवा पायो नृमा यः स्नेहसंपितः। लिये एक बहुत बाम्पन बना दिया है। उसका का नाम है ले, प्रेमपाश । मैं तो ऐसा सात ते दुस्स्पबमई मन्पे शूरामामपि यामिनाम् ॥११॥ कि बड़े मो शूरवीर और योगी-प्रति भी उसे तोड़ने में १ नम्मा मनपरे। मम।

अ. ८४] ६४५ । असास्त्रप्रतिकल्पेय यत् कतारेषु सचमै । असमर्थ है ॥६१ ॥ आपने हम बातोंके प्रति अनुपम मित्रताश व्यहार किया है । क्यों न हो, भार- सरीसे संत-शिरोमगियोका ता ऐसा स्वमान ही होता मैम्पर्पिताफला पापि न निवर्वेस फाहिचित् ॥६२॥ है। हम इसका कभी बदला नहीं चुका सफत, आपको इसका कोई फल नहीं दे सकते । फिर भी हमरा या मैत्री सम्बन्ध कमी टूटनेवाला नहीं है। आप इसको प्रागकल्पाप मचल भातों नापराम हि। सवा निमाते रहेंगे ॥ १२ ॥ माईमी ! पाले सो बदी गृहम दोनेके कारण हम आपका कुछ भी प्रिय और हित न कर सके । अब हमारी यह दशा हो रही है अधुना भीमदान्धाधान पश्यामा पुरःसवः ॥३३॥ कि हम पन-सम्पतिके नशेसे-श्रीमदसे अधे होरो है। थाप हमारे सामने हैं तो भी हम आपकी घोर माराज्यभीरमद पुंसा पस्कामस मानद । नहीं देख पाते ॥ ६३ ॥ दूसरों को सम्मान देकर स्वयं ससम्मान न चाहनेको माईजी 1 वो काल्पणकामी उसे रामश्मी न मिले-नसीमें उसका मन है। क्योंकि नबनानुव पन्धन पान पश्यति ययान्धरक् ॥६४॥ मनुष्प रापश्मीसे अंधा हो जाता है और अपने भाई पघु, सबोंतकको नहीं देख पाता ॥ १४ ॥ मीशुक उपाप भीशुकदेवजी पवे - परीक्षित् ! इस प्रकार एवं सौरदमिस्पचिच आनकदुन्दुभिः । कह-करते मुदेवनीका इय प्रेमसे गदगद हो गया । ठो नम्दवासाकी मित्रता घोर उपफार स्मरण हो मोद सत्कयो मैत्री सरमपितोचनः ॥६५॥ बाये । उनके नेत्रोंमें प्रेमाश्व उमा अये, वे रोने को ।। ६५ ॥ नन्दजी अपने ससा कसुदेमनीको प्रसम नन्दस्तु सम्पुः प्रियकर प्रेम्मा गोविन्दरामयोः। करने के लिये एम मगान् श्रीराम और बरामबीके प्रेमराशमें धार आम्फार फरक-फरते तीन महीनेक अपच वि मासांस्त्रीन् पदभिर्मानितोऽमसदा॥६६॥ स रा गये । वशिपोंने जीमर उनका सम्मान किया ॥ १६ ॥ इसके मार मामन्य अभूपण, रेशमी सवा कामे पूर्यमाणः समजा सामान्भन । क्स, नाना प्रकारची उत्तमोत्तम सामग्रियों और मोगेसे नन्दस्यको उनके प्रवासी स्पपियोंको और भु परार्माभरणधीमनानानग्रंपरिग्छ। मान्धयोंको सूर पर किया ॥ ६७ ॥ पावडी, उपसेन, धीरण, काम, उस आर पदुमंशिर्पोने पसुदेवोपसेनाम्पो हप्पोपलादिमि । मया-अा उनें अनेरों प्रचारका भेदी । उनके विदा परनम उन समसामग्रियों को स्कर नम्याय दामादाय पारिम पापिता पभिर्मयों ॥६८॥ वएन प्रक उिये रगना हुए ॥ ६८ ॥ नम्बाला, गा और गोरियाश चित भगान् धायक पण- नन्दा गापाप गाप्पा गाविनपरपाम्मुज । पसमि इस प्रसार मग या किमरि प्रश्न परनार भी उसे वहसि मैच न सफ । एतरां बिना मनके मना विप्न पुनहर्तमनीमा मधुर्ग ययुः ॥६९॥ 'मोन मधुमी याय की ॥१०॥ । १ मा साभमान मा भीमाागपत [.. पधप प्रतियातेपु पृष्मयः कृष्णदेवताः । म स्त्र क्न्धुबान्मा होसे विदा हो के म भगवान् श्रीकृष्णको ही एकमात्र सदेव मनने वीक्ष्य प्रापमासमा मयुरिवतीं पुनः ॥७०॥ यदुवंशियोंने यह देखकर कि अब वर्ग मत पाँची है, द्वारकाके लिये प्रस्थान मिस ॥ ७० ॥ जनेम्पा कथांचकुर्यदेव महोत्सवम् । | वहाँ जाकर उन्होंने स्व अगेसे वसुदेवजीके महोत्सव, स्पनन सम्बन्धियोंके दर्शन-मिशन पादि पदासीचीर्थयात्रामा सुत्संदर्शनादिकम् ॥७१॥ | तीर्थयात्रा के प्रसझेको कह सुनाया ॥ १ ॥ इति श्रीमदागवते महापुराणे पारमईस्या संहितायो दशमस्काघे' उत्तरार्धे तीर्थयात्रानुवर्णनं माम चतुरशीतितमोऽध्याय ॥ ८१ ॥ अथ पञ्चाशीतितमोऽध्याय भीभगवान के द्वारा वसुदेवजीको प्रमशानका उपदेच वया देवकीमोम पुमोरे गोरा माता भीमादरायमिरमान भीशुकदेवजी पते परीक्षित् । इसके सर एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण और कामनी प्रात कालीन अथकदाऽत्मजौ प्राप्तो कवपादाभिनन्दनौ । प्रणाम करनेके लिये माता-पिता के पास गपे । प्रमास पर लेनेसर मुदेवबी मा प्रेमसे दोनों मवयोंका अमिनन्दन करके करने लगे ॥१॥ बसुदेवीने या वसुदषोऽभिनन्या प्रीम्या सर्पणाम्पुतौ ॥ १॥ यो प्रक्यिोंके मुंहसे भगवन्की महिम मुनी भी तन उनके ऐर्मपूर्ण चरित्र भी देने ये । इससे में मुनीना स वचः भुत्वा पुत्रयार्धामस्थकम् । इस यातका व विक्षस हो गया था कि ये सचरण पुस मही, स्वयं भगवान् हैं। इसध्येि उन्होंने अपने पुको प्रमीक सम्बोधित करके यों कहा-॥ २ ॥ वीजावविभम्भः परिभाम्पाम्पभापत ॥ २॥ सधियानादस्वरूप श्रीकृष्ण | महायोनिम सार्पण ! तुम दोनों स्नातन हो । में अन्ता । कि तुम दोनों समरे के साक्षाव परणारूप कृष्ण कप्ण महायागिन् सर्पण सनावन । प्रधान और पुरुषक भी नियामक परमेर ॥३॥ इस जगतक आधार, माता और निमाणसमन भी पाने पामस्य यत् साक्षात् प्रधानपुरुषी परा ॥ ३॥ तुम्हा हो। इस सर जगदक साम्भ मुम गानों हा और तुम्हारी / फ्रीडाके लिये इमपा निर्माण हुन पय यन यता यस पस्म यत् यत् पया यरा। है । यह जिस समय, जिम मपमें अकुछ रहा है, - म मुमा हा। इस जगदमें प्राति- सपसे भोग्य और पुरुषपसे भाता तश "नासे परे सादिदै भगगन साधात् प्रधानपुरुषभर ||४|| दोनोक निप्पमर सात् भगवान् भी सुनी हो ॥ ॥ पर गं! ।। भान पान ।

ब० ८५] ६४७ एवमानाविषं विममारमसष्टमधोक्षज। | इन्द्रियातीत ! अन्म, अस्विस्थ आदि मयविकारोंसे रहित परमस्मन् ! इस चित्र विचित्र जगत्मा तुमीने आत्मनानुप्रविश्यात्मन्प्रामो बीवोलिभर्पजः॥५॥ निर्माण किया है और इसमें स्वयं तुमने ही आमरूपसे प्रवेश भी किया है। तुम प्राण (क्रियाशकि) और जीव (पानशक्ति ) के रूपमें इसका पाउन-पोषण कर रहे प्राणादीनां विश्वसजाशकयोमाः परसपा । हो ॥ ५ ॥ झिपाशक्तिप्रधान प्राम आदिमें जा जगत्पी वस्तुओं की सृष्टि करनेकी सामर्थ्य है, यह पारवनमाद पैसामा अयोधप्टव पेटताम्।। ६ ।। उनकी अपनी ममर्थ्य नहीं, तुम्हारी ही है । क्योंकि घे तुम्हारे समान चेतन नहों, अचेतन हैं, स्वतन्त्र कान्तिस्तेजः प्रभा सचा चन्द्राग्न्यर्फःविघुताम् । मही, परतन्त्र हैं। अत उन फेयाशील प्राण आदिमें के चेष्टामात्र होती है, शक्ति नहीं। शक्ति तो तुम्हारी ही है ॥ ६ ॥ प्रभो ! क्वमकी शान्ति, यत् स्यम्मा मेचिर्गन्धोऽर्धतोभवान् ॥ ७॥ अप्रिय तेज, सूर्यको प्रभा, नक्षत्र और त्रिपुत् आदिमी स्मरणरूपसे सवा, पर्वतों की स्थिरता, पप्पीकी साधारण- शफिरुप पति और गवरूप गुण ये सब सबमें तर्पणं प्रागनमा देवत्वं वाथ तद्रसः। तुम्ही हो ॥ ७॥ परमेपर 1 अमें तृप्त करने, चीन देने और शुरु करनेकी जो शक्तियों है, ये ओजः सहो पल घेष्टा गतिर्यायोस्तषभर ॥८॥ सरूप है । स और उसका रस भी तुमी हो । प्रमो ! इन्द्रियशक्ति, अतकरणकी शक्ति, शरीरकी दिशोत्तमयमाशोऽसि दिशः स्वस्फोट आया। शक्ति, उसका हिण्ना-आसना, पटना-फिरना-ये सब वायुकी शक्तियों तुम्हारी ही है॥८॥ विशाएँ और उनके अकाश भी तुम्ही हो । अकारा और नादोर्णस्वमोंकार आकृतीनां पृपतिः। ९॥ उसका अभ्यमूत स्फोट-शदतन्मात्रा पाणी, नाद. परपन्ती, ओंकार—मप्या तपा पर्ण ( अझर ) एवं पदार्थों का अभ्ग निर्देश करनेवाले इन्द्रिय स्विन्द्रियामा स्व देवाय तदनुग्राः । पदरूप बसी पाणी मी तुम्ही हो ॥ ९ ॥ इन्द्रियों, उनकी लिफ्पप्रकाशिनी कि और अविष्यात अषयोधो भवान् पुर्जीक्मानुस्मृतिः सती ॥१०॥ देवता तुम्ही हो । मुद्धिकी निपयामिमा शक्ति और | जीरकी निशुर स्मृति मी तुम्ही हो ॥ १० ॥ भूतॊमें भूतानामसि मूवादिरिन्द्रियाणा पजस । म्नका कारण वामस माहार, इन्द्रियोंमें उनका कारण तेचस कहार और इन्दियेके अधिष्ठाय-येवटामि उनका कारण सस्तिक भार तप पीयोंके भाषा- पंकारिको विकल्पानों प्रधानमनुशापिनाम् ॥१९॥ गपना कारण माया में तुम्ही हो ॥ ११ ॥ भगान् ! असे मिती अस्तुिक विकार पड़ा, अादिमें नवरबिा भावेषु तदसि समनश्वरम् । मिटी निरन्तर तपन ह और वास्वपमें वे फारम १ सयेश्वर । २ इनिसनीत्रिपामा प देवाम सर । , या परा ६४८ भीमागवत [२०० यया द्रम्पनिकारेषु द्रम्ममात्र निरूपितम् ॥१२॥ ( मृतिका ) प ही है-सी प्रकार किसने : विनाशवान् पदार्थ हैं, उनमें तुम कारणपसे की। सर्व रसस्तम इति गुणास्ताचपम याः। तत्प हो। प्रस्तावमें वे सब तुम्हारे ही ला ।। १२ ।। प्रभो ! सत्व, रज, तम-से तीन स्वयपदा प्रमणि परे फरिपता योगमायया ॥१३॥ बौर उनकी पत्तियों ( परिणाम )-माजवादि पर | परमात्ममें, तुममें योगमायके पारा करियस ॥१॥ तमाम सन्स्पमी भावा स्विमि विकस्पिताः । इसलिये ये मितने भी चम्म, अति, ति, परिव धादि माप-विकार है, वे तुममें सर्वमा महान त धामीण विकारेण मन्पदाम्यावहारिका ॥१४॥ तुममें इनकी कम्पना कर ली जाती है, सम तुम । निकारों में अनुगत मान पाते हो । कम्पनाकी न गुणप्रवाइ एससिन्नमुधास्वस्लिलात्मनः । हो नानेपर तो निर्विकम्य परमार्पतरूप तुम्ही तुम । | नाते हो ॥ १५ ॥ यह जगत् सत्व, रबका- सीनों गु!का प्रगा। दो, इन्द्रिय, कतर गति सूक्ष्मामपोधेन संसरन्तीह कर्ममिः ॥१५॥ मुख, दुस और राग-प्रेमदि उनहाँके कार्य। | इनमें जो यानी तुम्हारा, सस्मिामा सहमतरूप । पाप्ठया नृतां प्राप्प मुफल्पामिह दुर्लभाम् । जानते, वे अपने देहाभिमानरूप मानके कारन । काँक फंदेमें फंसफर बार-बार कम पपके - खार्षे प्रमसम्म पयो गर्व स्वन्मापसेयर ॥१६॥ मटकते रहे हैं ॥ १५॥ परमेर । मुने । प्रारम्बके अनुसार इन्द्रियरिकी सामध्यसे युद्ध कर असागर ममैवैते दर पास्मान्ययादिषु । दुम मनुष्य शरीर प्राप्त था, किन्तु सुमारी ॥ पश होकर मैं अपने सम्बे स्वार्थ परमार्मसे ही साल स्पानिपभाति भवान् सर्वमिदं जगत् ॥१७॥ हो गया और मेरी सारी बायु यों ही बीत गयी ॥ १५ प्रभो ! ५ शरीर में और इस शरीरके सर युपा न न सुवौ साधाव प्रधानपुरपेपरौ । मेरे बने हैं, इस बहता एवं ममतारूप सीसे तुमने इस सारे नगदको बाँध सस ॥ १७ ॥ म मानता है कि तुम दोनों मेरे पुत्र भूभारधप्रथपण अवतीर्णा तपाऽऽत्य ॥१८॥ हो, सम्म प्रति और बीयोंके स्वामी है। तप्पेगाऽस्म्परणमय पदारमिन्द मरभूत राजाओंके माशक मयेही तुमने माण किया है। यह बात सुमने मुझसे कही में ॥ १८ ॥ इसलिये दीनजोंके हितो, शरमागा मापभसंसदि इमातेपमा । में अब तुम्हारे परणकमकी शरण ने ही कारणागोंके संसरपको मिटानाले हैं। एतापवासमठमिन्द्रियतासन इदियोंकी मालपतासे भर पाया ! इसीके मन पस्युफ प्रास इस पारीरमें आत्ममुखि कर मापारमापि परे पदपस्पपछि॥१९॥ और तुममें, जो कि परम्मम्म, पुप्रमुनि ॥ १५ ..परवाया३मि पर !

दशम स्कन्ध ६४९ सनीय ननु बगाद भवानमो नौ प्रभो! तुमने प्रसव हमें ही हमसे कहा था कि प्यपपि में भजन्म ई, फिर मी में अपनी ही बनायी गई र्म- मर्यादाकी रक्षा करने के लिये प्रत्येक युग तुम दोनेवि द्वारा संजय इस्पनयर्ग निजधर्मगुप्स्यै। अवतार ग्रहण करता रहा है। माकन् ! तुम आकाशके समान भनेको शरीर प्रक्षण करते और छोदते रहते नानावनगंगनम पिदपमहासि हो । पास्तममें तुम अनन्त, एकरस स्ता हो । तुम्हारी वाभमपी शक्ति योगमायाका रास्य मत्र, फोन जान को पेद मुम्न उलाय निलिमायाम्॥२०॥ सकता है । सब लोग सुम्हारी कीर्तिका ही गान करते राते॥२०॥ भाऊ उपाय श्रीशुकरेजी - पीचित् । षसुदेवचीके भाकमेव पितुबास्थ भगवान् सात्वतर्पभः । ये वपन सुनकर यदुवंशशिरोमणि मकर भगवान् श्रीण मुस्कराने लगे। उन्होंने विनयसे मुफकार मधुर प्रत्याइ प्रभयानमः प्रासम्भस्यया गिरा ॥२१॥ वाणीसे कहा ॥ २१ ॥ भीभगवानुमान भगवान् भीकम्यमे करा-पिताजी । हम तो भापके पुत्र ही हैं। हमें छक्ष्य करके आपने यह प्रमझानका उपवेश किया है। हम आपकी एक-एक वघो ष समवेतार्थ तातपमन्मा। वात युक्तियुक्त मानते हैं ॥ २२ ॥ पितानी | पाप- लोग, मै, मैया ठरामजी सरे रफमाप्ती, सम्पूर्ण पमा पुत्रान् समुदिप खग्राम उदातः ॥२२॥ घराचर जगत्सब से सब बापने जैसा कहा, से ही है, स्पको प्रारूप ही समझना चाहिये ॥ २३ ॥ पिताजी ! आमा सो एक ही है। परन्तु वह अपने में आं यमसालार्य इमे ५ वारकौकसः । ही गुणकी सरि कर लेता है और गुणों के द्वारा बनाये हुए पञ्चभूमि एक होनेपर भी अनेफ, सय सऽप्पेप सभष्ठ विमृश्याः सघराघरम् ॥२३॥ | प्रकाश होनेपर भी दृश्य, अपना खरूप होनार मी अपनेसे मिन, नित्य होनेपर भी अनित्य और निर्गुण मात्मा पक स्वपंन्योतिनिस्पाऽन्यो निर्गुमा गुण। HTRAIL अग्नि, म और पृथ्वी ये होनेर मी सगुणके रूपमें प्रतीत होता है ॥ २५ ॥ पहाम्त अपने कार्य घट कुण्डल आनिमें प्रकट आत्मसप्टै सरकतेषु भूतेषु बहुधेरते ॥२४॥ अक्ट, वा-सोटे, अधिक पोरे, एक और बनक-से प्रतीत होते है पस्तु वास्तममें सवारूपसे वे एक संपायुन्मोंदिरापो मस्तस्कतेषु पचाक्षयम् । राते है वैसे ही अस्मामें मी उपापियोंक मेदसे 0 नानात्वकी प्रतीति होती है। इसलिये जो मैं वही सब है-इस रिसे वापस करना क प्रावितिरोपमूर्यको नानासं यास्पसाबपि ॥२५॥ की है ॥ २५ ॥ १ प्रतिश्याच । २ मिले ममाचार्य। -- ६५० भीमद्भागवत [4.6 मीभुक उपाप श्रीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित ! मा श्रीकृष्णके इन क्पोंको सुनकर वसुदेवजीने नाना एवं भगवता राजन् पसुदव उदाहतम् । बुद्धि योग दी, वे मानन्दमें मम होकर वर्णसे में भुत्वा विनष्टनानाधीस्तूणी प्रीतमना अभूत् ।।२६।। और मनसे निस्ताप हो गये ॥ २६ ॥ कुमार उस समय महों सर्वदेवमयी देवकीजी मी बेठी अध नत्र छठयष्ठ देवका सर्वदेवता । ये बहुत पहलेसे ही यह सुनकर अत्यन्त विस्मित । कि पीकरण और क्यामजीने अपने मरे हुए गुमको श्रुत्वाऽऽनीतगुरोःपुत्रमारमजाम्यां सुविमिता॥२७॥ यमध्येकसे वापस म दिया ॥ २७ ॥ अव उन्हें बने उन पुत्रोंकी याद आ गयी, जिनें कसने मारा कृष्णरामौ समाभाष्य पुत्रान्सविहिसिस्तान्। था। उनके स्मरणसे देवकीजीका उदय भातुर हे गफ नेत्रोंसे आँसू बहने मो। उन्होंने वा ही कर सरन्ती कृपण पाए वैलष्पादधुलोचना ॥२८॥ खरसे श्रीकृष्ण और क्लरामबीको सम्बोक्ति करके कहा ॥ २८॥ देवायुमार देवकीजीने कहा-ध्येकाभिराम राम ! सुपारी शक्ति मन धौर वाणीके पर है । श्रीमण ! तुम यागेवरों से राम रामाप्रमेयात्मन् कृष्ण योगेधरेश्वर । भी ईमम हो । में नानती है कि तुम दोनों प्रमपतिकी भी इयर, आदि पुरुष नारायण हो ॥ २९॥ह में मुझे पेदार पो विपस्सामीपरापादिपुरुपौ ॥२९॥ लिखित रूपसे माझ्म है कि जिन लोगोंने कायमसे जमा धैर्य, संयम धौर सत्त्वगुण से दिया है तथा कालविच्चस्तसस्वाना रहामुम्छानपर्विनाम् । बागायोंका उठान करक जो स्वेप्रचारपरायम हो से है, भूमिके मारभूत उन राजाओंका नाश करने से मूमेभारायमाणानामवतीमों किलाप मे ॥३०॥ ही तुम दोनों मेरे गर्मसे भक्तीर्ण हुए हो ॥ ३० ॥ विश्वमन् ! सम्हारे पुस्करूप मासे उत्पन हई मनसे मस्साशांशभागेन वियोस्पचिलयादयाः । गुणों की उत्पति होती है और उनके सामाप्रसे अगदी उत्पत्ति, विकास तथा प्रम्य होता है। आज में सर्वत भवन्ति किल विश्वात्मस्त त्वापाई गतिं गता॥३१॥ करणसे तमारी शरण हो रही हैं ॥ ३१ ॥ सुना है कि सुम्हारे गुरु सन्दीपनिजीके पुत्रको मरे पिरान्मृतसुतादान गुम्मा कालचोदिती । वात दिन हो गये थे । उनको गुरु क्षित देनके से उनकी वाम तप फाकी प्रेरण्वसे तुम दोनोंने उनके मानिन्यधु पितृम्पाना गुरव गुरुदक्षिणाम्।।३२॥ पुत्रको यमपुरीसे घाफ्स व दिया ॥ ३२ ॥ सुम दोनों योगीरोंके भी इसर हो । इसध्येि मात्र मेरी में सधा म दुरुप काम युगां पागेपरपरी । अभिमषा पूर्ण करा । मैं चाहती है कि तुम दोनों मेरे उन पुत्रोंको, निन्हें कंसन मार सम्म मा, म्प दो और भाजराजावान् पुमान् कामय द्रष्टुमाइवान् ॥३३॥। उन्हें मै म आँस देस ॥ ३३ ।।

३.८५] दपम स्कन्ध पिस्तान प्रीशुकदेषजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित् ! माता देवकीनीकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण और वं समोदिती मात्रा रामः रुप्मय भारत । कराम दोनोंने योगमायाका भाम्य कर मुक्तरोफमें उतल संविषिशपांगमापाठपाभिवी ॥३४॥ प्रवेश किया ॥ ३१ ॥ जव देस्पराज वछिने देस कि वमिन् प्रविष्टाघुपलम्प दैत्यराद बगत्के आत्मा और इष्टदेव तया मेरे परम स्वामी विश्वात्मदर्ष सुसर तपाऽऽत्मन । भगवान् श्रीकृष्ण और पटरामजी मुक्तयेक पधारे वर्मनाहादपरिप्सुनामयः हैं, तन उनका इदय उनके दशनके आनन्दमें निमम्न हो गया ! उन्होंने पटपट अपने फुटुम्बके साथ बास्नसे सपः समुस्थाप ननाम सान्मयः ॥३५॥ छकर भगवान्के चर!में प्रणाम किया ॥ ३५ ॥ तयोः समानीय वरासनं मृदा आत्मन्त मानन्दसे भरकर दैत्यराज यरिने भगवान निषिष्टयोस्तत्र महात्मनोस्तयोः । श्रीकृष्ण और क्यामजीको श्रेष्ठ भासन दिया और चव दभार पादापनिज्य तन्जलं वे दोनों महापुरुष उसपर विराज गपे, तब उनोंने उनके पाप पखारफर उनका घरणोदक परिवारसहित सन्द आग्रम पुन पदम् ॥३६॥ अपने सिरपर धारण विश्व । परीक्षित् ! भगवान के सईयामास स तो विमतिभि- घरोंका छ प्रमापपन्त सरे जगत्को पवित्र कर देता महाईवसामरणानुलेपन है॥ ३६ ॥ इसके बाद देस्पान वउिने बहुमुम्प षस, थाभूपण, पन्दन, तामूळ, दीपक, अमृतक समान साम्लदीपामतभक्षणादिभिः भोजन एव अन्य विविध समप्रियासे उनकी पूजा की खगोत्रविचात्मसमर्पणेन घ ॥३७॥ और अपने समस्त परिवार, पन तया शरीर आदिको उनके चरम समर्पित कर दिया || ३७ ॥ परीक्षित ! स इन्द्रसेनो भगवत्पदाम्पुर्व | दैस्पराज बलि बार-बार भगवान्क चरणफाडौंफो अपने विन्मुहुः प्रमविमिमया पिया। कक्ष स्पड चौर सिरपर रसने लगे, उनका हदय प्रमसे विहए हो गया । नत्रोंसे आनन्दके आँसू छाने लगे। उवाच हानन्दजलालवणः रोम-ग्रम सिउ व्य । अव ये गनद स्तरसे मवान्की प्ररटरोमा नृप गद्गदाधरम् ॥३८॥ स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥ पलिस्पाप देस्यपज पटिने कहा-क्यामजी ! आप अनन्त १। आप इतने महान् ? कि शेष आदि सभी विमा नमोऽनन्ताय पर्हते नमः कप्णाय पेपसे । भापके भन्तर्भूत है । सचिदानन्दस्यमय भीग ! बाप नगन्के निर्माता है । बानयोग और भक्ति- योग दोनोंके प्रसर आप है। आप स्पर्य ही परम्स सांम्पयोगवितानाप प्राण परमात्मने ॥३९॥ परम्समा है । हम अप दानाका घार-पपर नमस्कार करते हैं ॥ ३९ ॥ भान् ! आप दानोंका दशन पर्यनं वो हिमवाना दुष्प्रापं चाप्पार्लभम् । प्रागियोंके लिय अत्यन्त दुर्लभ है। सिर भी भापकी मासे मुम्भ हो जाता है। स्पोंकि आज आफ्न रजस्वमालभाषानां यमः प्राप्ती परछया ॥४॥ETA करक हम रगुणी एवं सम्पगुणी समायान्य १० सपा ।२ भूपा । भCI४ मा० । ५ पारिन् ।

६५२ भीमद्भागवत [.. दैत्पदानवगन्धर्वा सिमियाघ्रचारणाः । देस्याको भी दर्शन दिया है।॥ १० ॥ प्रभो ! हम के हमारे ही सम्पन दूसरे दैत्य, दानप, गन्धर्य, सिद, निक यघरपापिष्ठाचाय मूतप्रमथनायम्नः ॥४॥ धर, चारण, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत और प्रानाक धादि आफ्का प्रमसे भजन करना तो दूर या, बारसे विशुद्धसत्वधाम्न्यदा त्वपि शाखमरीरिणि । सर्पदा रद पैरभाष रखते हैं, परन्तु अाफ्का श्रीविद्या साभार नित्यं निवपैरास्ते पर चान्ये च सामाः ॥४२॥ | वेदमय और विमुद्र सपस्वरूप है। इसलिये हमसे बहुतोंने पैरभावसे, पुच्ने भकिसे चौर फुङले फेचनोबदरेण भस्स्पा फेघन कामत ! कामनासे आपका स्मरण करके उस पदको प्राप्त किया है, रिसे अापके समीप रहनेवाले सस्पप्रधान देवता पनि नतया सवसंरन्मा: सनिकष्टाः सुरादयः ॥४३॥ | भी नहीं प्राप्त कर सकते ॥ ११-१३ ॥ योगेबाक अधीपर 1 बड़े-बड़े योगेपर मी प्राय पर इदमिरथमिति प्रायस्तव योगेपरेचर नहीं जानते कि आपकी योगमाया या और एसी है। फिर हमारी तो बात ही क्या है।॥ ११ ॥ इसमे नविदन्त्यपि योगेशा योगमायां छतोषयम् ॥४४॥ स्मी ! मुझपर ऐसे कया कीजिये कि मेरी विभाग धापके ज परणया में छा जाय, जिसे किसीकी पेश तम प्रसीद निरपेषविमृग्ययुप्मत् म रखनेवाले परमहंसोग रंग करते है, और मन धाश्रय लेकर मैं उससे मिल इस घर-गृहस्पीके जो पादारविन्दधिपप्पान्यगृहन्मापात् से निकल चाऊँ । प्रमे । इस प्रकार भपके । चरणकमलेकी, बो सरे जगत्के एकम्पन काप निष्कम्प लियशरणारयुपलम्भाचिः शरण लेकर शस्त हो गऊँ और बोस की विमा कह । यदि कभी किसीका सङ्ग करना । पो धान्तो यपैफ उत सर्पसलैपरामि ॥४५॥ सबके परम हितैपी संतोंका॥ १५॥ प्रमे।। समस्त घराबर माके निपता गौर स्वामी है। शापमानी षिवम्मेख निप्पापान इरु नाप्रभो। हमें माना देकर निष्पाप बनाइये, हमरे पापोका ना कर दीमिये, स्पोंकि नो पुस्स भसके साथ बारा पुमान् पदमाऽऽतिष्ठयोदनाया पिमुम्पते॥४६॥ मात्रामा पान करता है विधि-निमेषके मन मुक गावा ॥१६॥ भीभगवानुवाच भगवान् मोडणा-देव्यपरान! लपम मपन्तरमें प्रगपति मरीचिकी फनी ठणफि गर्मसे. मासन् मरीषा पट् पुत्रा ऊपोप्रपमेऽन्तरे । | पुत्र स्पन पुर। सभी देवता येय देन देवाः ६ महसुपीस्प मुर्ता पभितमपतम् ॥४७॥ कि प्राली अपनी पुषसे समगम करनेके छिपे उप सिने मे ॥ १७॥ इस पहिासरूम वफ्रा वेनासुरीमगन् मोनिमधुनावपफर्मना। कारण में प्रणवने शाप दे दिया और वे बार-योनि हिरम्पचिपोर्खाता नीवास्ते पोगमापपा ॥४८॥ हिरकाशिसके पुत्ररूपसे उत्पन्न हर । मब योगमाया में बसि मकर देवकीके गर्म रख दिया है देशप्पा बरे बावा रामन् कसविरिसिताः । मको उपस होते ही कसने मार राम । दैस्यान म. ८५] दशम स्कन्ध ६५३ साक्षान्छोपत्पात्मजान् स्वस्ति इमेऽन्यासतेऽन्तिके४९ ममता देषकीजी अपने उन पुत्रों के लिये अपन्त शोमासुर हो रही है और वे तुम्हारे पास हैं ॥ १८१९ ॥ षत इत एतान् प्रणेप्यामो मावशोकापनुचये । हम अपनी माताका दोष दूर करनके लिये इन्हें पास के नायेंगे। इसके बाद ये शापसे मुक्त हो नायगे पौर शापा विनिर्मका लोर्फ पास्यन्ति विन्धरा ।५० आनन्दपूर्वक अपने लोक्में चले जायेंगे ॥ ५० ॥ इनके छ नाम है-स्मर, उनीम, परिप्या, पता, मरोगीय परिप्पङ्गा पतझा मुद्रमृद् घृणी । क्षुद्रमत् और घृणि । इन्हें मेरी कपासे पुन सद्गति प्राप्त होगी ॥ ५१ ॥ परीधित् ! इतना कहकर मावान् रिमे मत्प्रसादेन पुनर्यास्पन्ति सद्गतिम् ॥५१॥ श्रमण जुस हो गये । देस्यरान वलिने उनकी पूजा पी, इसके बाद श्रीकृष्ण और कलरामजी यारकोको त्युपस्वा वान् समादाय इन्द्रसेनेन पूजितौ । | यार फिर तारका लौट आये तया माता देवकीको टनके पुत्र सौंप दिये ॥ ५२ ॥ उन वाटकोको दलकर देवी नरिववीमेत्य मातुः पुत्रानयग्छताम् ॥५२॥ | देवकीक एयमें पारसत्य स्नेहकी याद आ गयी । उनके स्तनोंसे दूध मन छग । बार-बार उन्हें गोद में लेकर न् पट्न बालकान् देवी पुत्रस्नेहस्नुवस्वनी । छातीसे लगाती और उनका सिर सूघती ॥ ५ ॥ पुक स्पर्शक मानन्दसे सराबोर एवं आनन्दित देवकीने रिप्वन्पाइमारोप्प मूअिघदभीक्ष्णतः ॥५३॥ | उनको स्तन-पान कराया । ने विष्णुमगवान्की उस मायासे मोहित हो ही पी, रिससे या सहिम्मक अपापयत् स्तन प्रोता सुवस्पर्शपरिप्लुता । पछता है ॥ ५१ ॥ परीक्षित् । देवपीक वनों का मोदिता मायया विष्णोर्पया सटिः प्रपते ॥५४॥ जो उसे पी चुके थे ! उन वालोंने यही अमृतम्प दूध सक्षात् अमृत पा, क्यों न हो, मगत्यन् श्रीकृष्ण पीत्वामृत पयस्तस्सा पीतक्षेपं गदामृतः । दूध पिया । उस दूषके पीनेसे और माान् श्रीकृष्णके बोका संस्पर्श होनेसे में बामसाक्षात्कार हो नारायणासंसर्वप्रसिलन्धात्मदर्शनाः ॥५५॥ गया ॥ ५५ ॥ इसके बाद उन व्ोने मतान् श्रीकृष्ण, माता देवकीपिता मसुदेव और मामजीफो नमस्कार ते नमस्तस्य गोविन्दं देवळी पिवर बलम् । | किया । तदनन्तर सबके समने ही मे देवमेर बसे मिपा सर्वभूतानां ययुर्धाम दिवौकसाम् ॥५६॥ गये ॥ ५५ ॥ परीधित् ! देवी देवकी या देसकर भरफ्त मिस्मित होगी कि मरे हुए पच्य और आये सं रन देवी देवी मृतागमननिर्गमम् । और फिर पसे भी गप । उन्होंने ऐस निथप मिपा कि पा मीरगया ही फोरमय कोश।। ५७॥ मेन मुविस्मितामायां रुप्मस रपिता नृप ।।५७॥ पीशित् । मगान् श्रीकृष्ण स्वयं परमात्मा है, उनकी 'एवविधान्यजुतानि कृष्णस परमारमनः । | शनि अन्त है। उनके ऐसे ऐसे अद्भुत चरित्र इतने है कि किसी प्रकार उसरा पर नहीं पाया जा पीयाम्पनन्तवीर्यस्य सन्त्पनन्तानि भारत ॥५८॥ | सस्ता ॥ ५८॥ १ मुटरने उचव ।

६५४
भीमद्भागवत
सूत उपाय
सक्षमी कहते हैं-शौनकादि रियो | माम्
श्रीकृष्णकी कीर्ति भार है, अमृतमयी है। उनका परित
य इदमनुमणोति भाषयेद् वा मुरारे
जगत्के समस्त पाप-तापोको मिटानेवाल तथा मकरमें
के फर्णकुहरे में मानन्दमुवा प्रवाहित करनेवान है।
परितममृतकीपतिं व्यासपुत्रैः।
इसका र्णन स्मय म्यासनन्दन भगवान् श्रीमुकदेशी
किया है। वो इसका भ्रमण करता है अब इसको
जगदपभिदलं पतसस्कार
मनाता है, उसकी सम्पूर्ण पिमति मायान्में कम
चाती है और न उन्होंके परम फम्याणस्वरूप मामले
भगवति कतथिचो याति तस्थेमधाम ॥५९॥ प्राप्त होता है ।। ५९ ।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमाइस्या सहितायां दशमस्काय' उचराचे
मृतापवानपन नाम पनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५॥
अथ पडशीतितमोऽध्याय
शुभवारण मौर भगवान मिपिठापुरी पना बनक मौर पुतदेव प्रामण पर एकरी साप मम
रायोषाप
रामा परीसिवने पन-मालन् ! मेरे बारा
प्रमन् वेदितमिच्छामः स्वसारं रामफप्पयोः।
झुनने मगमान् श्रीष्म और ममाम्बीकी रिस
मुभवाजीसे, यो मेरी दादी पी, किस प्रकार लिया
यथोपपेमे लिमयो या ममासीत् पितामही ॥१॥ किया । मैं यह जाननेके लिये बतुत उमुफ ३ ॥ १ ॥
भीक उपाप
भीशुकदेवसीमे कहा-पीक्षिस् ! एक बार मापन
शक्तिशाली पर्जुन वीर्पयाप्राफे छिये पृथ्वीपर पिल
अर्सनस्तीर्थयात्रायो पर्यटस्वनी प्रमः।
करते हुए प्रभसक्षेत्र पहुँचे । यहाँ नोने या न
कि सामनी मेरे मामाफी पुत्री मुम्बामा सिका
गतः प्रभासमपोन्मातुलेमी स आस्मनः ॥२॥ दुर्योधन के साप फरना चाहते हैं और पसुवेम, श्री
दुर्योधनाप रामस्तां दास्मतीति न चापरे ।
आदि उनसे इस विक्पमें सहमत नहीं है। वह
के मनम मुमताको पानेकी मम्स नग पायी ।
तशिप्मुस पतिर्मूला त्रिदण्मी शारफामगात्॥३॥ त्रिदप्पी वैष्णक्का वेष धारण करके द्वारका पाँधे ।२३॥
मुन मुम्बाको प्राप्त करनेके सि कहाँ वर्षाका कर
क्षेत्र वै पार्पिफान् मासानपास्सीत् स्वार्थसाधकः । महीनेतक रे। पाँ पुरवासियों और कामनीने
पौसभाजिताऽभीक्ष्ण रामेणाजानता पसः॥
उनका स्व सम्मान किया । में पता मा
एकदा गामानीय थातिप्पेन निमम तम् ।
एक दिन मध्यामबीने क्षतिष्पके पिये निमन्त्रित
किया और उनको पे अपने पर पाये । विदणी-
मग ।२ मि।। मामी ४ मानिन्।
॥ कि ये पर्जुन k॥१॥

प्र० ८६ ] दसम स्कन्ध प्रन्योपहत मैक्ष्य पलेन पुमुजे फिल ॥ ५॥ वेषधारी अर्जुनको बलरामजीने अत्यन्त अदाके साप भोजन-सामग्री निवेदित की और उन्होंने बह प्रेमसे मोजन किया ॥ ५॥ वर्जुनने भोजनक समय यहाँ सोऽपश्यचत्र महती कन्यां पीरमनोहराम् । विवाहयोम्य परम सुन्दरी मुम्दाको दया । उसका सौदय यो व वीरेंका मन हरनेवाध्य प । अर्जुनके नेत्र प्रमसे प्रफुछित हो गये । उनका मन उसे पानेकी आकासे प्रीस्पुकल्लेक्षणस्तस्यां मावाग्ध मनो दधे ॥६॥ भुग्ध हो गया और उन्होंने उसे पली बनानेका छ निमय कर छिया ॥ ६ ॥ परीक्षित् ! तुम्हारे दादा सापि त चकमे वीक्ष्य नारीणां रदयंगमम् । अजुन भी वो ही मुन्दर थे। उनक शरीरकी गटन, माय-मड़ी सिर्योका दय स्पश कर सेती पी। उन्हें देखकर मुम्दाने भी मनमें उन्हींको पति बनानेका इसन्ती प्रीरिखापानी सन्न्यस्तादयेधणा ॥७॥ निधय किया 1 पर तनिक मुसफराकर जीटी चितवनसे उनकी और दखने लगी । उसन अपना दय उन्हें समर्पित कर दिया ॥ ७॥ अव अजुन फक्छ उसीका खां परं समनुम्यायानन्तरं प्रप्सुरजुनः। चिन्तन करने लगे और इस यातका असमाने लगे कि इसे का हर ले जाउँ ! मुम्दाका प्राप्त करनकी टस्फट फामनासे उनका पित चपर यटन लगा, उने न लेमे शंभ्रमविचः कामनातिपलीयसा ॥८॥ तनिक भी शन्ति नहीं मिलती थी ॥ ८ ॥ महस्पो दरयावायां रथा दुगनिर्गसाम् । एक बार सुम्दानी देव-दानक लिपे रपपर समार हाफर शरफा-दुर्गसे बाहर निफी। उसी समय महारपी अनुनने वकी-सुदव और धीम्गकी अनुमतिस मुमदा- वहारानुमत पित्रा कृष्णस्य च महारथ ॥९॥ का हरण कर लिया ॥ ९ ॥रयार सगर हाकर पीर भनन धनुष उठा लिया और जो सैनिक रद राकतक स्थस्सा धनुरादाय शूरांशरुन्धता भटान् । लिये आय, उन्हें मार-नफर भग दिया । मुम्बाफ निज-जन गते-चिहात रह गय और अजुन जिस प्रकार विद्राम्प का खाना खभाग मृगरास्यि ॥१०॥ सिंह अन्ना मग स्मर पल दता है, बसे ही सुभद्रा- फो स्कर घर पर ॥१०॥ यह मन्त्राचार मुनफर सगुता क्षुभितो राम पर्वणीव महार्णव । पग्रामजी परत मिगई । व से ही भुन्न हा उट, जसे पूर्णिमा Pिन ममु । रन्तु नगवान् धीरग सपा गृहीवपादः कृप्णन मुरद्रियान्वशाम्पत् ॥११॥ श्प मुइ-मम्बन्धिान उन पर पासपर उन्हें बात पुर सममाया पुनपा, सत्र ५ गन्त र ॥ ११ ॥ प्रारिपोच पारिपहाशि पायपामुदा बलः । इस पर ग्रामीन प्रसन्न हारर पर ग्धूक म्पि रिल-सा धन, सनी दार्थ, रप, पारगर दासी- महापनारस्करभरपामनरयापित ॥१२॥ स दजन नन ॥ १२॥ स ।२ नुमानित भीमद्भागवत [.4 1 मीभुक उमाप भीशुकदेवजी करते है-परीशित् । निदेन राजधानी मिफ्लिमें एक गृहस प्रामण थे। उनमक रुपास्यासीद द्विजश्रेष्ठा भुतदेव इति भुतः । पा मृतदेव । वे भावान् श्रीकणके परम भक्त थे। एकमात्र मगवतिसे ही पूर्णमनोरस, परम शस्त, हप्पैकभक्पापूर्णाः शान्त कपिरलम्पटः ॥१३॥ और विरक थे ॥ ११ ॥ वे गृहस्साश्रममें रहते हुए में किसी प्रकारका उपोग नहीं करते थे, वो कुछ कि स उवास विदेहेपु मिथिलायो ग्रहाभमी । वाता, उसीसे धमना निर्वाह कर देते थे ॥१९॥ जनीहयाऽऽगताहार्पनिर्वतितनिअफ्रिम ॥१४॥ | प्रारम्पयश प्रतिदिन उन्हें बीकन-निर्वाहमके लिये सम्म मिल जाया करती थी, अविक नहीं। वे उसनेसे है यात्रामा स्यहरयापनमस्युत । सन्तुष्ट भी थे, और अपने वर्णाश्रमके अनुसार फारम नापिकतारतातुष्ट क्रियामके यथोषिताः ॥१५॥ में तत्पर रहते ॥ १५॥ प्रिय परीक्षित ! उस दशक रामा भी, प्रमणके सम्मन ही भकिम्पन से । मैतिक तथा सद्राष्ट्रपालोऽङ्ग महुलाच इति भुत । बशके उन प्रतिष्ठित नरपतिका नाम प बना। उनमें माहारका रश भी न पा । मृतदेव और बना मैथिलो निराम्मान उभामप्यम्युतप्रियौ ॥१६॥ दोनों ही मगवान् श्रीकृष्ण के प्यारे भक्त थे ॥ १६ ॥ तयो। प्रसभो भगवान् दारफेणाहत रथम् । एक बार भगवान् श्रीमणने उन दोनोंपर प्रम्प होकर दारकसे रप ममपापा और उसपर मार देकर पालम सार्फ मनिनिविदान् प्रययौ प्रम ॥१७॥ द्वारकासे विदेश देशकी ओर प्रस्थान किया ॥ १७ ॥ भगवान्के सब नारद, वामदेव, अत्रि, वेदम्पास, परसराम, नारदो वामदेवोऽपि कप्पो रामोऽसितोऽणि । षसित, वारणि, में (अफवेग ), वृहस्पति, | मैक्य, प्पयम अदि ऋषि मी ॥ १८॥ परीमिद । अईसापतिः फायो मैत्रेयश्म्पसनादयः ॥१८॥ ये का जहाँ पहुँचठे वहाँ-हाकी नागरिक और कम- तत्र तत्र मापान्त पौरा बानपदा नृप । पासी प्रवा पूजाकी सममी लेकर उपस्थित होती। पूना करनेवाको मगवान् ऐसे जान पर, मनो यही उपतस्यु सार्महस्सा आहे परमिवोदितम् ॥१९॥ सप साक्षात् सूर्यनारायण उदय हो रहे हों ॥ १९ ॥ परीधित् ! उस यात्रा में वानर्त, धन्न, कुनांगल, का आनर्तपन्न हजाङ्गलकामरस मरस्प फसाउ कुन्ति मधु, केन्य, कोसल, वर्ण धादि वनेक देशकि नर-नास्पिोंने अपने नेत्ररूपी दोनोंसे मगबन् पाबालकुन्तिमधुरम्पकोसला । श्रीकृष्णके म्मुक हास्य और प्रेमी पितानसे युग अन्ये च सन्मुससरोजम्दारणास- मुखमविदके मकरन्दनसका पान किया ॥ २० ॥ सिग्क्षण नृप पपुरतिमिन्नार्यः ॥२०॥ | विग्रेकगुरु भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे मन मेगेकी मानटि नष्ट हो गयी। प्रभु दर्शन करनेवाले नर- वेम्पः स्वपीपमपिनष्टसमिसम्पा मारियों को भरनी रठिसे परम कल्याण और तत्त्वानका दान धर्म त्रिलोकगुरुर च यम्छन् । करते चल रहे थे। स्थान-स्थानपर मनुष्य और देवता व.८५] दशम स्कन्ध ६५७ शृण्वन् दिगन्सपलं स्वयशोऽशुभघ्न भगवानकी उस कीर्तिका गान फरके मुनाते, जो समस्त्र दिशाओंको उम्पर बनानेयास्ट एवं समस्त भानुभोंका विनाश करनेपाली है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण गीव सुरै भिरगाछनफर्षिदेहान् ।।२१।। धीरे-धीरे विदेह देशमें पहुँचे ।। २१ ॥ तेऽच्युत प्राप्तमाकर्ण्य पौरा जानपदा नेप। परीक्षित ! मानान् श्रीकृष्णके मुभगनका समाधार सुनकर नागरिफ और प्रामवासियोंक आनन्दकी सीमा अभीयर्सदिसास्तम गृहीताईणपाणयः ॥२२॥ न ही । वे अपने हाथों में पूजाफी विविध सममियों कर उनकी अगवानी करने आये ॥ २२ ॥ मगवान् रण व उत्तमश्लोक प्रीत्युत्फलाननामयाः । श्रीपस्यका दर्शन करक दनक दय और मुखएमठ प्रम और आनन से दिल उठे । उनोंने भगवान्को कताञ्जलिभिमु शुतपूर्यास्तथा मुनीन् ॥२३॥ तण अ मुनियोंको, जिनका नाम कमठ मन रमवा भा, देखा न पा–हाय जोर मस्तक मुकायर प्रणाम म्यानुग्रहाय सम्प्राप्तं मन्वानी ते जगद्गुरुम् । किस ॥ २३ ॥ मिचिगनरेश बहुव्यय भार सुतदषने, मैधिल धृतदयाय पादयाः पततः प्रभा ॥२४॥ यह समसका फि जगद्गुरु मायान् श्रीकृष्ण हमयेगमें पर अनुपम करनेके लिये ही पधारे ई, उनके चरणोपर न्ममन्यसेतो दागाईमातिध्येन सह डिली। भिकर प्रणाम किया ॥ २२॥ बहुम्यच धीर सुतदेव दोनोंने ही एफ साप हाय जोड़कर मुनि-मण्डलीके सहित मैथिलः भुतदेवम युगपद् सहताञ्जली ।।२५।। । मगवान् श्रीकृष्णको आतिथ्य ग्रहण करनेक रिये निमन्त्रित किया ॥ २५ ॥ भगवान् श्रीपण टानोंकी भगन्तिदभिप्रस्य दया प्रियविकीर्पया । प्रार्थना स्वीकार फरक दोनों ही प्रसन्न करनक छिय | एफ ही सम्प पृथक्-पृफ्फम्पसे दानोंक पर पसरे वार उभयाराविशद गहमभाम्या तदलवितः ॥२६॥ यह पत एफ-मरेका माश्म न हु कि भावान् श्री- कृष्ण मरे घरफ अतिरिक और माँ भी जा रह धातुमप्यसतां दगन जनक म्यगृहागनान् । है ॥२६॥ हिराज बहलाय यह मनबी थ, उन्होंन फा दफा कि दृष्ट-गधारी पुरप जिनका नाम भी आनीतप्वामनायपु सुग्वासीनान् महामनाः ॥२७॥ नहीं सुन सकते, व ही भगवान् श्रीकृष्ण और श्री मुनि मर पर पधार है, पुटर मुन्न भासन मॅग्मय भार प्रारभत्त्या उपदयामापिलधण । भगवान् श्रीका सय षि-मुनि आराममे उनपर । गत्य । उस समय रहस्यपी पिपिरशा प्रम- नत्वा तदधीन् प्रयास्य तदपालापावना ॥२०॥ भगिक उदफमे उनका एप भर अपा । नयॉर्म म् उमा रह ५ । उन्होंने अन्न पूस्तम अतिरियर मामा पान मृप्ना पचयोनक मगन । मरनेमें ममदार फरक नर और माने युक्पा सप टनक परगेश म्यापन जउ मिरर परग रित्य गधमारयाम्परामपापीपाव्यगाप ॥२०॥ और गिर भवन व भगन्माण र धाग पण अशर धूप पर आप सन्ति 'पारा मपुरया ग्रीमिदमारामनपितान । का ग्नरी पूजा ॥२७२.जब मर ग १ २ ४ २ दरम् LT . 3 .

६५८ भीमद्भागवत [4.4 पादापगतौ विष्णोः संस्पृशम्छनकर्मदा ॥३०॥ | मेजन करके तृप्त हो गये, तम राजा बलुम्मा मान श्रीकृष्णके चरणोंको पपने गोदमें मेर के गमे ।* पड़ मानन्दसे धीरे-धीरे उमें सहलाते हुए की मधुर | वाणीसे मवान्की स्तुति करने लगे ॥ ३० ॥ रागोवाप रामा बाछावने कहा-'प्रभो ! भार समस प्राणियोंके भरमा, साक्षी एम सर्यप्रकाश हैं । भवान् हि सर्वभूतानामात्मा साधी म्वरग विभो । सदा सर्वदा आपके चरणकमलोंका स्मरण करते वे हैं। इसीसे आपने हम्प्रेगोंको दर्शन देकर l अथ नस्स्वत्पदाम्भोज मरतां दर्शनं गतः ॥३१॥ किया है ॥ ३१ ॥ माक्न् । थापके पवन है वषचस्तत फर्तुममग्गोचरो भवान् । मेरा अनन्यप्रेमी भक्त मुझे पपन स्वरूप मनरामक भङ्गिनी लक्ष्मी और पुत्र से भी सकर क्रिम है। अपने उन पचनोंको सत्य करनेके किये । पदास्पैकान्तभक्तान्मे नानन्तः धीरजः प्रिय ॥३२॥ आपने हमलोगोंको दर्शन दिया है ॥ ३२ ॥ मग | ऐसा फोन पुरम है, जो भाएकी इस परम दफ्त फोनु त्वापरणाम्भोजमेपंषिद् विसृजेत् पुमान् । और प्रेम-परवशताको जानकर मी आपके चरणकम परित्याग कर सके ! प्रभो । जिन्होंने माफी समय निकिंचनानां शान्तानां मुनीनां पस्स्वमात्मदः३३ वस्तुओं का एष शरीर धादिका भी मनसे परित्याग र दिया है, उन परम शास्स मुनियोंको बाप मरने योऽवतीर्य यदोवंशे नृणां संसरतामिह । तकको भी दे रामते है ॥ ३३ ॥ मापने यमन मकार लेकर कम मूस्युके पारमें पर हुए मनपसे यो विवेने तच्छान्स्पै त्रैलोक्याविनापहम् ॥३४॥ | विस्तार किया है, जो प्रिलोकीके पाप-तापको त उससे मुक्त करनेके रम्ये जगत्में ऐसे मिस फस करनेवाम है ॥ ३१ ॥ प्रभो । भाप भक्ति नमस्तुपं भाषते रुप्यापाडण्ठमेपसे। अनन्त एर्य और माधुर्यकी निधि है, सबके रिलो अपनी मोर वाकर्षित करने के लिये आप सचिदान नारायमाप अपये सुशान तप ईयुपे ॥३५॥ रूप श्यमान है । वाफ्का ज्ञान कान्त है। परम शन्तिका विसार करने के लिये बाप ही माया दिनानि कतिचित् भूमन् गृहान् नो निवस दिसः। प्रषिक रूपमै तपस्या कर रहे हैं। मैं माफ्को ममत्कार करता ॥ ३५॥ एकरस अनन्त । भाप । समेतः पादरजसा पुनीहीद निमे कुलम् ॥३६॥ दिनों तक मुनिमीके साथ हमारे याँ निक फीरिये और अपने घरों की धूम्से इस मिमिक्ष इत्युपामन्धितो राना भगवाल्लोफभावनः । पवित्र कीनिये ॥ ३३ ॥ पीक्षित् ! सबके बीना भगवान् श्रीकृष्ण रामा यात्मरकी यह प्रार्थना सीमा करके मिपियपास नर-मारियोंका कम्पाण करते : उपास पर्चन् कल्याण मिपिलानरयोपिताम् ॥३७॥ कुछ नमोसफ यहाँ रहे ॥ २७ ॥ १ लामा ।२ बदिखा पिव । ।

अ० ८६] दशम स्कन्य ६५९ मृतदेवोऽन्युत प्राप्त स्वगृहाजनको यथा । प्रिय परीक्षित् ! जैसे राजा बहुपथ मतान् श्रीक्षण और मुनि-मण्डलीक पधारनेर मानन्दमम्न हो नत्वा मुनीन् सुसंदृष्टो धुन्वन् वासो नन ह॥३८॥ गये थे, वैसे ही भुतदेव ब्राह्मण भी भगवान् श्रीकृष्ण वणपीठपसीप्वेवानानीतेपपवेश्य और मुनियोंको अपने घर आया देखकर आनन्दविउ हो गये, वे उन्हें नमस्कार करके अपने पम उठाल- स्वागतेनाभिनन्याधीन सभार्याऽवनिजे सदा॥३९॥ उछस्टकर नाचने लगे ॥ ३८ ॥ श्रुतदेक्ने चटार, पीके और कुशासन विद्यकर उनपर मायान् श्रीकृष्ण पौर वदम्मसा महाभाग आस्मान सग्रहान्ययम् । मुनियोंको बैठया, सागत मापण धादिकारा उनका सापांचा उदो उम्धसर्वमनोरथा ॥४०॥ मभिनन्दन किया तया अपनी फनीके साथ बड़े मानन्दसे सबक पाँच पसारे ॥ ३९ ॥ परीक्षित् ! फलाईणोशीरशिवामृताम्बुभि म्हान् सौभाम्पशाली श्रुतदेवने भाप और ऋषियोंक । घरणादपसे अपने घर भोर फुम्पियोंका सींच दिया । मंदा सुरम्पा तुलसीरामुखः। इस समय उनके सरे मनोरथ पूर्ण हो गये थे। वे हतिरेफसे मताले हो रहे थे ॥१० ।। तदनन्तर आराधयामास यथोपएमया होंने फस, गन्ध, उससे मुबासित निमम एष मधुर जख, मुगन्धित पिी, सी, पुश, कमउ आदि सपर्पया सुचविवर्धनान्धसा ॥४॥ अनाफाम-मात पूजा-सामग्री और सत्रगुण कानेवाल स तर्फयामास कुता ममान्य अनसे सकी आगफ्ना की ॥ ११ ॥ उस समप सुतदमी मन-ही-मन समना करने लगे कि मसा गृहप पवितस्स सगमः। घर-गृहीक अपर म गिग हुनाई, अमगाई, मुस भगवान् श्रीरण बार उनफ निवासस्थान अरि- सर्ववीधारसदपादरभि मुनियापा, जिनक घरोफी छ ही समस तीपाको तीध बनानवार्य है, सारन यसे प्राप्त हो गया । कप्णन पास्सारमनिकतम्मुर ॥४२॥ ॥ १२ ॥ जब सत्र ग्नग आविष्य म्वीकार काफ आगमसे थेट गय तब मृतपय अरन खी गुन तप एपवियन सातिच्या मृतदव उपस्थितः । अन्य सम्बन्धिोंक साप उनकी सेगमें उपस्थित हुए । व मावान् श्रीकृष्णक घरणकमया सर्श करते हुए सभार्यम्बनापत्य उवाचायभिमान ॥४३॥ पहने लगे || ४३ ॥ धुनदर उप भुतधना-प्रभा धरना-अन्यकरण पाति और पीस पर पुरासम है । मु भाग्न अन नाप नादान प्राप्तः पर परमपरूपा । दी दरीन पिया हा एसी यात नदी करता यहाँदे शक्तिभि सप्ना प्रविष्टा पात्ममया ॥४॥ ममम मम मम मि म सान बनी । शानियों का इस बार्बी रचना परफ अनसनक यथा पपानः पुरुमा मनसबारममायया । पसे इस प्रकाश रिसा ॥ ॥ स साया पपर।२ एम् । - ६६० भीमद्भागवत [.4 साना लोक पर स्वाममनुविश्याषभासते ॥४५॥ | हुआ पुरुष स्त्रमावस्थामें अविधावश मनदी-मन र जगत्की सृष्टि कर लेता है और उसमें सायं उपस्थित होकर भनेक रूपमि अनेक कम करम हुवा प्रकिन मृष्यतां गदा नववर्चचा त्याभिषन्दताम् । होता है, वैसे ही मापने अपने ही अपनी मापसे जातकी रचना कर ली है और अब इसमें प्रश्न नृणां संवदसामन्तईदि भाखमलात्मनाम् ॥४६॥ करके भनेकों रूपोंसे प्रकाशित हो रहे हैं ।। १५ जो लोग सर्पदा आपकी छीलमकसका अपण-कीतन तपा पापकी प्रतिमानोंका पर्चन-पन्दन करते है इदिस्सोऽप्पतिदस्यः कर्मविषिसयेससाम् । | श्राफ्समें आपकी ही चर्चा करते है, उनका इस सर हो नाता है और आप उसमें प्रकाशित हो उठे १॥ १६ ॥ निन अगोंका चित्त मिस वैरिक आस्मषक्तिभिरपासोऽप्यन्स्युपेतगुणात्मनाम् ॥४७॥ वादि फोकी वास्नासे महिर्मुख हो रहा है, मके नयमें रानेपर भी आप उनसे बहुत दूर है। किन्तु नमोऽस्तु तेऽम्पारमविदो परास्मने लिन भेोंने पापके गुणगनसे पने मत करो सगुणसम्पन्न बना लिया है, उनके लिये पिमतिमेसे अमाप होनेपर मी माप अत्यन्त निकट है ॥१७॥ अनात्मने स्वास्मविभक्कमस्पधे । प्रमो! जो अग असत्यको जननेवाले सो भात्माक रूपमें ही थाप स्थित है और ना शरीर मारिको ही अपना बाम मान बैठे हैं, उनके मो सकारणाकारणलिझमीयुपे आप अनारमाको प्राप्त होनेवाली मृत्युक रूपमें है। आप महपल आदि कार्यदन्य धौर प्रतिरूप मारमा नियामक है-शासक है। आपकी माया पापकी म्पमापयासंविदाप्टये ॥४८॥ अपनी दधिपर पा महाँ मक सकती, किन असने दूसरोंकी दृष्टिको डफ रखा है। आपको में नमस्कार करता ॥ १८॥ स्वयंप्रकाश प्रभो । हम आपक सत्यं शाधि स्वभृस्पान् नारि देव करवामहे । सेक्क है। हमें बाबा दीजिये कि हम आपकी स्य | सेव करें। नेत्रोंके द्वारा आफ्या दर्शन होने की जीयोंके पलेश यते।। मास्के दर्शन की समस्त प्रवदन्तो नृणांफ्लेशा यद् भवानविगाधर ॥४९॥ शोकी परिसमाप्त है ॥ १९ ॥ भीभुक उपाप भीशुकरपनी करते है पीधित् ! शरणमत- वदुक्तमित्युपाकर्म भगवान् प्रमवातिहा । मपहारी भगवान् भीषणने भुतदपकी प्राश्ना सुनकर अपने हायसे उनका हास पफर मिपा और मुसकाव गृहीत्वा पाणिना पामि प्रहमखमपाप ह ॥५०॥ हुए कहा ।। ५० ॥ भीभगयामुषाप भगपान भीहष्णन कहा-प्रिय शुनदम ये या प्रस्तऽनुग्रापार सम्प्राप्तान् विदयमन मुनीन् । या भूमिमुनि सम्पर अनुमा फरनक उिसे ही पान पनि ११।

म०८६ ] दशम स्कन्ध पहम् ॥५४॥ संचरन्ति मया लाकान् पुनसः पादरेणुभिः ॥५१॥ पधारे हैं। ये अपने चरणकमलोंकी से रोग और लोकोंको पवित्र करते हुए मेरे साप विचरण कर रहे देवाः क्षेत्राणि तीर्थानि दर्शनसर्शनार्चनैः । १॥ ५१ ॥ देवता, पुष्पक्षेत्र और तीर्घ आदि तो दर्शन, स्पर्श, मधन आदिके द्वारा धीरे-धीरे बहुत रिम पवित्र करते हैं, परन्तु सत पुस्य अपनी रटिसे शनैः पुनन्ति कालेन सदप्यसमक्षया ॥५२॥ ही सरको पवित्र कर देते हैं। यही नहीं, देवता भादिमें नो पषिन करनेकी शक्ति है, न भी उन्हें बामणो न मना भेयान सर्वेषां प्राणिनामिद । सतोकी रटिसे ही प्राप्त होती है ।। ५२ ॥ तदेव । जगत्में मामण मसे ही सम प्रागियोंसे येष्ठ है। तपसा विधया तुप्या किमु मत्कलया युतः ॥५३॥ पनि या तपस्या, विषा, संतोप और मेरी उपासना--- मेरी भक्तिसे मुक्त हो तब तो पहना ही क्या है ॥५३॥ न ब्राह्मणाम दमित रूपमेतचतुर्भुजम् । मुवे अपना था परमजरूप भी प्राणों की अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं है। स्योंकि प्रक्षण सबवेदम्य है सर्ववेदममो विप्रः सर्वदेवमया और में सदिपाय ई ॥ ५० ॥ दुर्बुदि मनुष्य इस भतको म जानकर काउ मर्ति धादिमें ही पूययुद्धि अविदित्वैवमयजानन्त्पस्पषः । रहते हैं और गुणोंमें दोष निकालकर मेरे स्वरूप जगद्गुरु प्रामणका, जो कि उनका बारमाही सिरस्कार करते है॥५५ ।। माझग मेरा सभाकार गुरुं मा विप्रमारमानमादापिज्याप्टयः ।।५५।। फरक अपने चित्त यह निधय कर स्ता है कि यह घगचर जगत, उमरु सम्बन्धी मारी मानना और घराचरमिद विश्र भाषा ये चाम्य इतव । इसके कारण प्रानि महत्तस्लानि स-पसर आत्मस्वरूप भगवान्व ही गप है ।। ५६ ॥ पिय श्रुतदय ! तुम नदपाणाति पेवस्याधस विना मदीधया ।।५६|| | इन ममप्रियान मा ही स्वप स्मनयर पूरी श्रदास इनकी पूजा करा । या तुम ऐमा करोगे, तब तो तुमन वसा मापानेवान प्रक्षन मच्छदयार्चय। साक्षात् बनायाम ही मेा पूजन कर पिया, नहीं ता भी मही परम्प स्ममियोंसे भी मीना नही हा एप पेदविताऽम्म्पद्धा नान्यथा भूरिभूतिभिः॥५७॥ सस्ती ॥ ७ ॥ भी उपाय भीकमपमी कहत-वर्गमित ! भगगन् धारणका पर जारण प्राप्त शाक धुनहरने भगान् सत्य प्रणाऽऽदिष्ट महरुप्मान दिजानमान् । धारण और उन मयिकी एकलापम अगाधना की तपा उनकी जम गरवारा प्राम दो गर । आराध्यतामभावन मधिलधाप सद्गतिम् ॥५८॥ गजा पागधन भा या गति प्राप की ॥ ५ ॥ प्रिय गित से नक भागी नभ पान, यम्भकया राजन भगरान् भक्तभक्तिमान् । सही भागन्नकी परत है। अन्न ory ६६२ श्रीमागवत [4.0 उपित्वाऽऽदिश्य सन्मार्ग पुनारपतीमगाव।।५९॥ दोनों मोंको प्रस्न करनेके मिये कुछ दिनोल मिफ्लिपुरीमें रहे और उन्हें सा पुलेक मात्र उपदेश करके वे द्वारका लौट पाये ॥ ५९॥ इति श्रीमहागपते मापुराणे पारमास्या संहिताया दशमस्कर उतरार्षे मृतदेषानुराहो माम परशीतितमोऽध्याय ॥ ८६ ॥ भीशुक उपाप अथ सप्ताशीतितमोऽध्याय घेदस्तुति परीक्षिगाव यजा परीसिवने पूछा-भगवन् ! म कर्म के कारणसे सर्वप परे । सस्त, रन और सम--- तीनों गुण उसमें ही नहीं । मन और पानी | साकेतस्पमें भी उसका निर्देश नहीं किया मा सक्त मापन् प्रमम्पनिर्देश्ये निर्गुणे गुणवतय । दूसरी वोर समस्त वक्यिोंका विषय गुम हो। (जिस विषयका वर्णन करती है उसके गुम, जाति फिया अपपा सद्विका ही निर्देश करती है) ऐ | मितिमें शुतियों निर्गुण प्रमका प्रतिपारन किस प्रकार कथं परन्ति भुवयः साक्षात् सदसत परे ॥१॥ करती हैं। क्योंकि निर्गुण वस्तुका स्वरूप हो उनी | पाँचके परे है ॥ १॥ भीगुण्येयमी कहत है-परीक्षित् 1 ( माकन | सर्वशक्तिमान् और गुणों के निधन हैं । श्रुतिपाँ : स्गुणया ही निमपण करती है, परन्तु विचार करनेत उनका तात्पर्य निर्गुम ही निकरता है। विकार सुदान्द्रियमनाप्राणान् जनानामहजत् प्रसः । परनक छिपे ही ) भगवान्ने नीनों के रिसे मुक्ति इन्द्रिय, मन और प्रागोंकी मुष्टि की है। इनका व स्पेनसे वर्ष, धम, फाम अस्पा मोक्षमा बम पर सस्ते । (प्राणों के शरा जीवन-भारण, अमी इन्दियों के द्वारा महागम्प अरिका प्रस्ग, मनाय माया प भवार्थ म आरमनेऽकल्पनाय ॥२॥ मनन और पुरिक राग निधय फरनेर पुतिक ताप निगुग स्वरूपरा सभापार सस्ता है। इसमि भुतिया सगुग्मा प्रतिबदन पानार भी वस्तुतः निर्गुर- परक है) ॥ २ ॥ ERT प्रतिवन पानेर उपनिषद्ग पही समय है। इसे पूगजों भी व सपा पनिपर मामी पपा पूर्वजाता। स्मारियोंने बामनियम धरम शिवो। पि।

, ८७] दशम स्कन्भ दुपलम्वमेतदषपन्त्यपशेपसमा पारा इन्द्र, यरुण आदि दवताओंका भी वगन फिया जाता है, परन्तु हम्मरे ( शुतियोंक ) सारे मन्त्र अपश्च सभी मन्त्रय ऋषि प्रतीत होनेवाले इस सम्पूर्ण जगत् को प्रसवप ही अनुभव करत है। क्योंकि जिस समय यह सारा जगत् नहीं रहता, उस समय मी बाप बच रहते हैं। जैसे घट, शराव (मिटीका प्याला- उदयास्तममौ विरुतेर्मुदि याविरुवात् । फसोरा) आदि सभी विकार मिदीसे ही उत्पा और उसमें यन हाते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण कास्की उत्पति और प्रस्य आपमें ही होती है। तब स्पा आप पृणीके समान सिकारी हैं। नहीं नहीं, आप तो एकरस- निर्विकार हैं । इसीसे तो यह जगत् आपमें उत्पन नहीं, प्रतीत है। इसलिये बसे घट, शराव आदिका वर्णन भी फिीका ही वर्णन है, वैसे दी इन्द्र, वण आदि देवताओंका वर्णन भी आपका ही यणन है। यही अपयो दधुस्त्वयि मनोषचनापरिश कारण है कि विचारशील ऋषि, मनसे जो फुल साधा जाता है और वाणीसे जो कुछ कहा जाता है, उसे भापमें ही स्ति, पापका ही स्वम्प दासते हैं। मनुष्य अपना पैर घाई कहीं भी रस्स-ट, स्पर या काळपर-होग्ग यह पृथ्वीपर ही, स्यापि ये सब अपभा भयन्ति सुवि दक्षपदानि नमाम् ॥१५॥ पृष्मीस्करप ही हैं । इसलिये हम चाह जिस नाम या मिस नका पणन करें, वह आपका ही नाम, आपका पह॥१५॥ तब सरयस्मभिपतस्विरलोकमल झगफ्न् । अग सत्य, रज, तम-स्त तीन गुणोंकी मापासे स्न हुए अभा-बुर भावों या अप्य मुरी क्रियाओं में रम जाया करते है, परन्तु आए तो उस माया नीक सामी, उसको नपानपाले हैं। इसीरिय विचार शीय पुरुष आपकी व्ययकपक जमृतसागरमें गाते गाव रहतर इस प्रकार अपने सार प्रापस्या धान्याहा किपामवान्धिमवगाम पासि बहु । दत है। स्पों न हो, आप संग-कप सभी जीवोंक निये । भारसे ना रेबारे जीप इस नी मार सोनही प्रती। इस हम गम्न मन यते। मस सपोर सम॥१॥ • दुनिादिरममुखाम्य भोरा गुन्थिन् । बामसेसी मन्त्रगोत्सतमुम्मति चिनिगप ॥२॥ ममा भम मूर्य हम भरि रेसा पा र सम्म मात् वपत रानस भी भारम पर नाम रेवाभान मसिगन मनमा परचम रेवतो नमम पम्पा भन मिनिम मिॉन नन रसुवा भार मम्मी नरिमें भारम मम नही दवा ५२॥ मा.स १४- . न ६६४ भीमागवत [4.0 मपि चक्कु प्रषचनमेकं मुभावोऽपरे ॥११॥ सनत्कुमार---ये चारों माई शानीय ज्ञान, तपस्या कर शीळ-स्वभावमे समान हैं। उन लोगेकी मे मित्र और उदासीन एक-से है। फिर भी उन्होंने अपने मेसे सनन्दनको तो पक्का मना लिया और क्षेत्रमा पुननेके इम्पक मनपर बैठ गये ॥ ११ ॥ सनन्दन उवा सनम्दनीने फरा-जिस प्रकार प्राप्त फाल होने स्वसृष्टमिदमापीय श्यान सा शक्तिभिः । पर सोते हुए सम्राटको जगाने के लिये मनुजीवी बंदीजन उसके पास आते हैं और सम्राटके पराक्रम तप सुपर- दन्ते मोधयांचाप्लुस्तलिस भूतयः परम् ॥१२॥ का गगन करके उसे जगाते हैं, वैसे ही जब परममा अपने क्नाये हुए सम्पूर्ण नगरको अपनमें कीन करके यथा अपार्न सम्रार्च पन्दिनस्तस्पराक्रमः। मफ्नी शकियों के सहित सोये रहते हैं, तम प्रम्प प्रत्यूपे म्पेत्य सुसोकैर्षोधयन्त्पनुलीषिनः ॥१३॥ हें इस प्रकार जगाती हैं ॥ १२ १३ ॥ पत्त वृतियाँ उनका प्रतिपादन करनेमारले बनासे मुत्य व प्रतियों कहती है पबित | बाप ही सर्वश्रेष्ठ । आपपर कोई विचय नहीं प्राप्त कर सकता। काकी जय हो, जय हो । प्रमो | आप स्वमवसे ही समस्त ऐपोंसे पूर्ण है, इसलिये घराचर प्रानियोंको फंसाने जय जप अपबामबित दोपगृभीतगुणां पाली मायाका नाश कर लिये । प्रभो । इस गुमापी मायाने दोषके लिये-जीयक भानन्दारिम्प साब स्वरूपमा मानदन करके उन्हें मनमें गने रिम्ये ही सत्यादि गुणोंको ग्रहण किस ।। गमे मितनी भी सामना, पान, क्रिया आदि शक्तियों । म त्वमसि पदात्मना समषरुदसमस्तभगः । सकको जगानेवाले आप ही है। इसश्येि आपके मिटाने बिना या मया मिट नहीं सक्ती । ( इस शिपमें यदि प्रमाण पृष्ठम नाय, तो आपकी वासभूता सुतियों ही- हम ही प्रमाण है। ) यपि हम भापका स्वरूपात वर्णन अगजगदोफसामखिलवस्त्पवयोधन ते | करनेमें असमर्थ है, परन्तु जब कभी भाप मापक मारा जगत्की सष्टि करके सगुण हो जाते हैं य उसका | निपेध करके स्वरूपस्थितिफी लील्म करते हैं पना यफ्ना सचिदानन्दसरूप श्रीविग्रह प्रकट फरक काम करते हैं, सभी हम यत्किचित् भापका वर्णन करन फचिदजयाऽऽस्मना प परतोऽनुपरेभिगमः॥१४॥ समर्थ होती है ॥ ११॥ ॥ इसमें सदा नहीं कि हमारे • हम प्रेम भीभीपरमामीने गुत मुन्र भारहिसे भय हरित यो रिसे बाते - अपनपानि मायामाखमबामुफ्मीतमगुणाम् । म मतमते अमवनपमी निगमगीसगुणार्थता ॥ १ ॥ भनि । भाभीमर पारागुन पारण र पावरमारिस परमेपाली इस मावाको ना न अ० ८७] दशम स्कन्ध । वृलपलब्धमेतदवयन्त्पबशेषतया द्वारा इन्द्र, या आदि दयताओका भी वणन शिपा जाता है, परन्तु हमारे ( सुमियोंके ) सार मत्र अपया सभी मन्त्रदृष्ट्य अपि प्रतीत हा वाल इस सम्पूर्ण जगत् को बमलरूप ही अनुमच करत है। स्पोंकि जिस समय यह सारा नगत् नहीं रहता, उस समय भी आप बम राते है। जैसे घट, शराव (बीका प्याल- कसारा) आदि समी पिकार मिहीसे ही उपन पत उदयाम्तमयौ विकतेर्मुदि पापिकवात् । और उसीमें लीन होते है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगतकी उपत्ति और प्रत्य आस्म ही होती है। सब क्या आप प्रमीके सान विकारी है। नहीं-नहीं, आप तो एकरस- निर्विकार है। इसीसे तो यह जगत् धापमें उत्पन्न नाही, प्रतीत है। इसलिये जैसे घठ, शराम अदिका वणन भी मिडीफा ही वर्णन है, वैसे ही इन्द, परुण आदि देवताआका वर्णन मी आपका ही वर्णन है। यही अत ऋपपो घुस्स्वपि मनोरचनापरिन करण है कि विचारशीत ऋषि, मनसे जो कुछ साधा ज्जता है और पाणीसे जो कुछ कहा जाता है, उसे बापमें ही स्मित, धापया ही समय दरसे हैं। मनुष्य अपना पर थाह यही भी स्तपट, पर या फाळपर-होग यह पृथ्वीपर ही, क्योंकि ये सब रुपमयया भवन्ति मवि दक्षपदानि नमाम् ॥१५॥ पृथ्वीस्वरूप ही हैं । इसयि हम चाह जिस नाम या जिस मापका वणन करें, यह आपया ही नाम, आपका ही मप ह॥१५॥ इति तप सूरयस्पधिपतासिललाफमल मगन् ! ख्यग सस्व, रज, तम इन तीन गुणोंकी मायासे वन हुए अम्म-पुर मग या अच्छी-पुरी क्रियाओं- में उड जाया करता है परन्तु आप तो उस माया- नटीक खामी, उसका नामप्रल है। इसीलिय विचार शीष पुस आरफी अट्यमयाक अमृतसागरमें ग्व सात यत है और इस प्रकार अपन सार पातापको धानका धपणकथामृतान्धिमवगाम वासि बहु । दत है। स्पों न हो, आपकी छीन्य करपा सभी जीवॉक र रोधि । भाले निा परे पर इस नदी मार सोनही पारी 1 पर इस पावन न कर परे भार मठ मोर हमारे॥१॥ •मुश्विपरिकममुसामा पारिद भरपन्धवम् । गुमरोमी मनगरस्त्यमुम्मम्वरका निगपस ॥२॥ समा भपि मग इम भरि रमा दया या सम्म मात् प्राव पानस भी भारम पर नतासमपे भनक रामप्र प्रतिगइन रनर परमर म सो नम्से एम्प भाभरिनि मूर्तिया रस मते । एका भार भम्म म तिम्रा में भी भारम पम ना हा ॥२॥ न

६६६
भीमद्भागवत
[4.८०
किमुत पुन म्वधामविधुताशयकालगुणाः मम्पमळको नष्ट करनेवाली जो है । पुरुयोम ' नि
| महापुरुषोंने अत्मनानक करा अन्त करमक गगोष
आदि धौर शरीरक कामत मा-मरण आदि गोस
मिटा दिये हैं और निरन्तर पापक उस म्पस्की का
भूतिमें म्म रहस है, जो असा आनन्दसमप 6
म्होंने अपने पाप-तापाको सदाक मिये शान्त, भस्म
परम भजति ये पदमजससुसानुभवम् ॥१६॥ कर दिया है इसके विषयमें तो फहना ही म
है * ॥ १६ ॥ भगवन् ! प्राणधरियोंके बीकाकी
सफलता इसमें है कि वे आफ्भा भवन सेक्न करें,
वापी आषाका पालन करें, यदि ये एस नही
फरते तो उनका जीपन म्पर्य है और उनके शरीरम
रतम इव वसन्त्मसुमृतो पदि वेऽनुविधा
| स्वास्का धरना ठीक वैसा ही है, जैसलमाकी
पौफनीमें हवाका थाना-जना । महत्तत्त्व, कार पारिन
आफ्फ अनुम्हसे आपके उनमें प्रवेश करनेपर ही इस
प्रमाण्डफी सुमि की है। ममप, प्राणमय, मनोमय,
| विधानम्य और आनन्दमय-इन पाभों कोशमि पुस-
| सपसे रहनेवाले, उनमें 4 की स्मृति करनेपाल में
महदहमादयाऽपमसूजन् यदनुपात
भाप ही हैं । आपके ही अस्तित्वसे अ कोश
अस्तित्वका बनुमन्य होता है और उनके न रानेर में
अन्तिम क्वक्रूिपसे माप विराजमान हवे । । इस
प्रकार सपमें वन्धित और सबकी अववि छानेर में
भाप असमग ही है। क्योंकि वास्तवमें जो कुछ गतियों के
शरा अस्ति अपया नास्तिके रूपमें अनुभव होता है,
पुरुपविधाज्वयाऽत्र चरमाऽपमयादिषु यः
उन सात काय कारणेसे वाप पर । नेति नेति क
शरा इन सक्का निपध हो भनेर भी बार ही सेर
राते हैं क्योंकि आप टस निपेके भी साझी है और
वास्तम भाप ही एकमात्र सप। ( इसलिमे वारक
भजनक बिना जीपमा चीक्न म्पर्क ही है, क्योंकि
सदसतः परं त्वमष पदप्पषोपमतम् ॥१७॥ । इस महान् सत्यसे पशि है ) ॥ १७ ॥
•परगनेरिक्सनुपस्वमिति सर्वमनौपिम्मा
पनि
मुमद्गुणमयपारिमिसर परमरमन
मारे वेद भाषा सटुमान न है । इसलिये मारो ममी विज्ञान् भाप माममा मनावपरी
गुपारे भरम, सरप भारिक एरा माम्से ही प्रेम प्र । भोर भाषक परपान मरण म त मासे मुठ ।
-
गलपम्मा ॥३॥
मरखपुर
प्रविश्व परि समि भवमवर्गमम्मरणारिभिः ।
मपा ! न मन्ति रणमिदं सिबगुषमासिन लिम् ॥ ४ ॥

अ० ८७] दशम स्कन्ध ६६७ उदरमपासत य ऋपिपत्मसु कूपन अपियोंने आपकी प्रामिक लिये अनको माग मान हैं। उनमें वो स्थल दृशिवाले हैं, में मणिपूरक चक्रमें अग्निमपसे आपकी उपासना करते हैं। अरणशक परिसरपति हदयमारुणयो ददरम् । श्री समस्त नादियोंय निकाटनेके स्पान दयमें आपक परम श्मस्थम्प दहर माकी उपासना करते है। प्रमो। एपसे ही आपको प्राप्त करनका श्रेष्ठ माग वव उदगादनन्त पर भाम चिर! परम सुपुम्ना नाड़ी अमरन्धतक गयी हुइ है। बा पुरुष उस मोतिमय मागको प्राप्त कर लेता है और उससे ऊपरकी | ओर दाता है, वह फिर स्म-मृत्युक चकरमें नहीं पस्ता ॥ १८ ॥ भगवन् ! अपने ही दक्षता, मनुष्य पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति रुवान्तमुम्खे ॥१८॥ और पशु-पक्षी आदि पोनियों मनायी है । सासवत्र सब सपोमें भाप हैं ही, इसलिय फरणरूपसे प्रवेश न फरनेर भी आप पसे जान पातर, मानो उसमें स्वस्वविधित्रयानिपु विशमिव देततया प्रविष्ट हुए हों । साथ ही विमिन आतियारा अनुकरण फरक कहीं उसम, तो कहीं अधमापसे प्रतात होते हैं, जैसे भाग छोटी-बड़ी एफपियों बार फक वरतमतमकास्स्सनलषद म्पकवानुकति । अनुसार प्रचुर अपवा अल्प परिमाणमें या उत्तम-अधम- रूपमें प्रतीत होती है । इसरिये संत पुरुष स्पैविक- परयैविक फोफी दूकानदारीसे, उनक पर्यो पिरक अथ विधाम्पमूप्पपिवयं तव धाम सम बाते है और अपनी तिमन युनिसे स्प-असस्प, वारमा अनास्माका पहचानफर जगतके ठे रूम नहीं विरजधियाऽवपन्त्यभिविपम्पय एकरसम् ॥१९।। । फस्ते, आपक स्वत्र एकरस, सममारसे स्फित सत्य- सम्परा साक्षात्कार करते हैं । ॥ १९ ॥ म्बकतपुरप्पमीपहिरन्तरसबरण प्रमा । जीव नि शरीराम गा है, उसके पसके द्वारा निर्मित होत हैं बार पास्तवम टन शरीरोंक पाप-कारणहप आवरगोस बह रहित , स्पोंकि बस्तर उन थावरणोंगरी सत्ता ही नहीं है। तवानी पुरुष ऐस्य करते?रि स्मन मकियोंगा रण पानेार तम पुरुष बदन्त्यखिठमतितोऽमकतम् । अपरही का स्वरूप है। पम्प हाना कारण अंश नरहरे ! मनुन पर प्रसार भारतात मन और मम्मत आदिसाग भारम भन्न ना प्रोन मना पानी समान होनसपा मम॥ ॥ • ठर्ण दुध निमि मुनिमामि । प. मनुष्य अपनाए यी दुई निरमे ठहर भर माना मिघ्र निधन भार वन प्ररम्रिनन मृत्यु मम नाम नरसाप शिरमन प्रमुग्रेस मारते ॥ ५ ॥ बारसमर्दिनन् । मगंदमालमत्र मग भरमा॥॥ मनु ६६८ भीमसागक्त [4.00 इति नगति विविच्य कवयो निगमाषपने न होनेपर भी उसे अश करते है और निर्मित न हाने पर भी निर्मित करते हैं । इसीसे मुद्धिमान् फुप चीजे वास्तविक स्वम्पपर विचार करके परम विस्के सत्र भरत उपासतेऽधिमभवं सवि विश्वसिता ॥२०॥ आपके चरण ही समस्त वैदिक कोंके समर्माणकर आपके चरणकाकी उपासना करते हैं। परि पौर मोक्षस्वरूप है ॥ २०॥ माान् ! परमात्म तस्कका बान प्राप्त करना वापत कठिन है। सभा दुरषयमारमतरपनिगमाय सपाचतनो पान कराने के लिये आप विविध प्रकारके बतार प्राण करते है और उनके द्वारा ऐसी सन्म करते है। ने अमृतके महासागरसे भी मधुर और मदक होती है । परितमहामृताधिपरिवर्तपरिभमगाः बो लोग उसका सेवन करते हैं, उनकी सरी फास्ट दूर हो जाती है, वे परमानन्दमें मम्न हो जाते हैं। कुछ प्रेमी मज तो ऐसे होते हैं, जो बाकी बी- न परिलपन्ति फेचिदपपर्गमपीपर ते फपयोंको मेसकर मोक्षकी मी अमिन्यमा नहीं करते- स्वर्ण अादिकी तो बात ही क्या है। वे आपके परम- कमःके प्रेमी परमहंसेंके ससंगमें, यहाँ वापकी का होती है, इतना पुस मानते है कि उसके सिस चरणसरोबईसकुलसकषिसएएमाः ॥२१॥ जीनमें प्राप्त अपनी घर-गृहस्तीका भी परित्याग कर देते हैं। ॥ २१ ॥ सदनुपर्ष लापमिदमात्ममाप्रियप प्रभे । यह शरीर बापकी सेवाका सक्न होकर व वाफ्के पपका बनुरागी हो जाता है, तब बारमा, हितैषी, साम् और प्रिय व्यक्तिके समान बाधरण करत है। आप बीक्के सम्चे शितषी, प्रियतम और बरमा ही हैं और सदा सर्वदा जोक्को अपनाने के लिये तफर भी रते हैं। इतनी मुगमता होनपर तक वन | मानव-शरीरको पाकर भी भेग सम्पमान अदिके हारा परति सपो मुखे त्वयि हिते प्रिय यात्मनि च । मापकी आसना नहीं करते, आपमें नहीं रम्ने, पस्कि अनेरा निर्मित सम्पूर्ण अपेमे में न्यूनाधिक मेह-कनिक मनसे रहित एवं सबमें भरपूर भनुमसमें मानेवाम निर्दिप सारे रूपमे सिवम भावानब हम मान रहे हैं । ॥ . सरपस ममेशाम सन्मायाकम्पनम् । तर पिसामाविश्य निसंग ॥ ७॥ मेरे परमानमस्कम स्वामी ! मैं माफ्न भं है। मम्ने री सेवाम आदेश देकर भनी मावा प निर्मित मरे कपन निार" ॥७॥ + स्मात्यायो मिरम् फुर्वन्ति अचिनुबंग पापमम् ॥ ८ ॥ भी भी पिरम गुगवान महापुरप भापके भमरम्प सपा-समुद्रमें हार करते हुए परमानन्द मम पर । भीर पर्म भर्म भम, मो-न पार्य पुरा तपा समान गुरु पना देखे ॥ ८ ॥ ममें फ्रानन्द मामुदः ।

अ०८७] दसम स्कन्ध न पत रमन्त्यही प्रस्तुपासनयाऽत्महनो इस मिनाशी और असत् शरीर तया टसक सम्पन्धिोंमें ही रम आते हीपी उपासना करने लगते हैं और इस प्रकार अपने पात्माका हनन करत है, टसे अगतिमें पहुंचाते हैं। मय, यह कितने फरकी वात है । इसका फल यह होता है कि उनकी सारी रखियाँ, पदनुशया प्रमन्स्युरुमये सारीरमृत ॥२२॥ सारी पामनाएँ शरीर आदिमें ही लग जाती है और फिर उनके अनुसार टनका पशु-पक्षी वादिक न जाने कितने पुरे-पुरे शरीर ग्रहण करने परते हैं और इस प्रकार अत्यन्त भयावह स्म-मुस्युरुप सेसरमें भटकना पाता है* ॥ २२ ॥ प्रभो ! बह-बड़ विधारशीठ निमृतमहन्मनोऽधनयोगपुजो इदि य- | योग पति अपने प्राण, मन और इन्द्रियोंको वध करके सयागम्यासक द्वारा दयमें अापकी उपासना करते है। परन्तु आपकी बात तो यह है कि उन्हें जिस पकी प्राप्ति होती है, लसीकी प्राप्ति टन शत्रुऑको भी हो जाती है, जो आपसे मैर-माष रखने हैं। क्योंकि न्मनय ठपासवे वदरयोऽपि ययु मरणात् । स्मरण तो व मी करत ही हैं। कहतक करें, मान् ! ये सियाँ, जो कानवश आपका परिछिन मानती हैं और अपफी क्षेस्मागक समान मोटी, लंबी तपासुकुमार मुनावोंक प्रति फामभवसे भासत रहती हैं, जिछ परम द्रिय उरगन्द्रभागमजदमविपक्कधियो परफो प्राप्त करती है, यही पर हम सुतियों को भी प्राप्त होता है पपी इम आपको सासरा एकरस अनुभव करती है और प्रापक चरणारमिन्दका मकरन्द रस पान करती रहती है। क्यों न हो, आप समदर्स जो है । आपकी रिमें उसमका परिछिन या पयमपि न ममा समयोऽपिसराजमुधाः ॥२॥ अपरिच्छिन भावमें फार अन्तर नहीं हो ॥ २३ ॥ सहनु पद पतापरजन्मलयाऽग्रमरं मान् ! आप अनाति और मनात है। जिसका { उम्म धौर मृत्यु फारसे सन्ति है, 4 भन्य, आपका कैसे जान सकता है। मपं प्रमाजी, नितिपरापग समकार तपा प्रानिगपा मीधि आ भी बढ़त पीठ आपसे ही अपन एए है। जिम समय आप सबरा समटर मा यत है, उसमय पण फार यत उदगारपियमनु वगणा उभप । । सान नहीं रह जाता, जिमसे उनक सपही साया रममद। ममेज म्पनुप मम्मी ॥९॥ भारो भै भन्नी भारतात मग मन भारमें रम गय | मरममा ! नपरेख मेमर R मुस सप्रमरम मनुस्मभ्य प्रसा! + परम्पर मासनम् । पपसिनारे पर्मियम् ॥१॥ का

६७०
श्रीमद्भागवत
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तहिं न सन्न घासभर्यन च कालजयः आ जी अपरा अन सके। क्योंकि उस पर
सो आपाशादि स्यूत भगत् रहता है और न व
महत्यादि सूक्ष्म जगन् । इन गानोंसे यन हुए शारीर
उनक निमित धग-मुहत आदि कारक का भी नो
किमपि न उप्र शास्त्रमवकप शयीत यदा ॥२४॥ हित । उस समप पुल भी नहीं रहता।
रमय में आपमें की सम गत (सी प्रार
आपस जाननेकी चयम करक आमा मजन कम
बनिमसत सता मृविमुतात्मनि ये च भिदा
ही सक्तम मग है।)-॥२॥ प्रभो ! कुछ कम
मनत है कि असद जगदकी उत्पत्ति होती है की कुछ
म्योग पह है कि सत्-म्पद का नाश होनेर मुझे
मिती है। दूसरे माग अरमाका अनेक मनस है, त
विपणमृतं सरन्त्युपदिश्वन्ति । आरुपिते । का ग्रेग फमके पारा प्राप्त होनपाल यफ और पग्रेस
रूप म्यपहारका रूप मानते है। इसमें स्वनी
कि ये सभी बातें भ्रममाएक हैं और न याराप करके ।
त्रिगुणमय पुमानिति भिदा यदबोधकता | ऐसा उपदेश करते हैं। पुरुष शिशुभम्पस
प्रकारका भेदमय काल अानसे ही होता है और बार
अज्ञानसे सर्वया परे है। इसलिये मानवरूप अपने
स्वयि न दतः परत्र स भवेदवनोधरसे ॥२५॥ किसी प्रकारका भेदमाप नहीं है। ॥ २५ ॥
सदिय मनसिपम विभात्पसदामनुजाद
या त्रिगुणात्मक जगत् मनकी कल्पनामात्र है।
यही नहीं, परम्परमा और बगलसे पुक्क प्रतीत होनेपाल
पुख्य भी करानामात्र ही है। इस प्रकार पाखामे
असद होनेयर भी अपने सस्प अधिछन अपकी सलाके
कारण या सपस प्रतीत हो रहा है। इसलिम मोछ,
सदभिमभन्स्पशेपमिदमात्मतयाऽप्रमविदः । मोम्प र दोनों के सम्बन्धको सिद करनेवास्नी इन्द्रिय
देव ! भापके चरमोच प्रेमपूर्वक स्मरण भरपच दुर्गम है चाहे मैसे कैसे मारे रमि। मुते को मारने
परम सरण दिन-रात बना ये।
गुरभाविसम्म
दोमबन्यो गासिन्यो
मे वारे विध ॥२१॥
मनन्छ । प्रालि मारि परि मषिसे मिस हुआ और माँ माप मन पानी आदि ममेकर
स्थम्म ! (मापन मन तो बहुत ही कठिम) इसभि गाना, स्पासि | नपरि रेग | मुझे ने मानी मति से
म
माधि
+ मिपावमुमरिकममदापमान्तर
भाम्पम्पन्नमवेरमदमहिमसनमानमाफिटम् ।
भीमम्मान
मीवर
मीपते
गोबिन्वेति मुदा परन् मधुपसे मुच
मनात महिमाशाम प्रमेये मन्दमति पुरुष के वारा प्रेरित अत्यन्त कद-विवार फेर मात्र
भरमें माय मापा माना ATTARA मेरे धनमें ऐच वैमा
हो म मा में
मन भीणारमोपत्रे गोविन्द, पते पर भापको मागदर्भ
भरस्म पुमाख मा सडोबा ।
स्मम्मम् ॥१२॥

१० ८७] दशम स्कन्ध ६७१ नहि विकति स्पजन्ति कनकस्य तदास्मतया आदि जितना मी जगत् है, सबको धारमानी पुरुष मात्मरूपसे सत्य ही मानते हैं। सोनेसे बने हुए कड़, कुण्डल आदि सर्णरूप ही तो है, इसलिये उनको इस वकतमनुप्रविष्टमिदमात्मतयाषसितम् ॥२६॥ | रूपमें चाननेवाध्य पुरस उन्हें पता नहीं, यह स्माता है कि में सोना है। इसी प्रकार या आत् मात्मामें ही कनिस्त, बामसे ही व्याप्त है, इसलिये आत्मज्ञानी पुरुष इसे अमाप ही मानते हैं ॥ २६ ॥ तव परि २ चरन्स्यस्विलसत्वनिक्तप्तया भगवन् । जो स्लेग यह समझते हैं कि आप समस्त प्राणियों और पदापोंके अविछन , सक्के आधर है और सर्वात्ममवसे अफमा भन्न-सेवन करते हैं, त उत पदाऽऽफमन्त्पविगणय्य गिरी निश्चते मस्पुको तुच्छ सम्पर उसके सिरपर यत मारते र अदि उसपर विजय प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग पसे विमुख है, वे चाहे स्तिन बड़ विवान हों, में आप काका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंसे पशुओंके समान परिपबसे पनिष गिरा विधानपि तां बोध सेते हैं। इसके विपरीत जिन्होंने आपके साप प्रेममा सम्बन्ध बाड़ रहा है, ये न कर पानेको | बल्कि दूसरोंको भी पवित्र कर देते हैं-जगस्के कमनसे छा दते हैं। एसा सौमाम्य मग, धापसे विमुख स्त्वयि कतसौरदा ग्राउ पुनन्ति न ये निमुखाः।।२७॥ ग्रेगको कैसे प्राप्त हो सकता ॥ २७ ॥ स्वमकरणः म्बरारस्बिलकारस्यक्तिधर प्रभो ! अप मन, बुद्धि और इन्द्रिय अदि फरणों से--चिन्तन, कर्म आरिक सफ्नोंसे सर्परा रहित है। फिर भी आप समस्त अन्त-परण धार पण मरणाको शक्तियोंसे सर्वदा सम्पन्न है। अप स्पन सिखान वान्, स्पपप्रकाश है अत का काम करनक ठिय आपो इन्द्रियाची आवश्यकता नहीं है। जैसे घाटे स्यटे गजा अपनी अपनी प्रजासे कर यर स्पे अपन स्तव पलिमुबहन्ति समदन्त्य चयानिमिपाः । सम्राट्या कर देते हैं, बसे ही मनुष्योंक पूज्य दाता स्वभाति भादेवर सदाभभमाश्यसि भमानन्द पर आत् भान पर नाम भोर मा मनत्रभसि भपिधान-मय सम्पास पाप पन पाखरेता इस मम्प प्ररमने सस्पर प्रधामान रावा ? उम मावान्याम भन्न है। वम् पर प्रचन्नु पम्हाररन्तु बापान पटनु पागम्। पा किमु पो निा नैर मति नरति ॥१४॥ स्या यानि मारिनारम पम FOR अमान में पोध पस्न रम पर पम पम पम मिलिन स्वग्रदा 0 भ्रम्समें रिचर रनु मामा दिना इम मत्सुम्प मगरगरम पर नीर। मयम विमिमता वापसे ही उत्पन्न गराइसकिम का ઉ૭૨ भीमद्भागवत [ra पर्पसजोऽसिलपिसिपदेखि विश्वयजा और देवताओंक पूण्य प्रा अति भी बने पति | प्राणियोंसे पूजा स्वीकार करते है और मापा की होकर वाफ्की पूजा करते यते हैं। ये इस प्रकार थापकी पूजा करते हैं कि भापने गाँवो कर्म ने विदधति यत्र ये त्यधिकवाभपतमफिताः ॥२८॥ | रिये उन्हें नियुक्त कर दिया है, वे अपसे मीन रहकर वहीं यह काम करते रहते हैं ॥२८॥ नित्यमुख। बाप मायातीत है, फिर भी बय अपने सामनसे- सल्पमाप्रसे मयाके साथ प्रांग करते है, व स्सिरचरबासमः स्परजमोस्थनिमिचयुजो साहत पाते ही जीयोंक रस्म शरीर और मोक कर्म-सस्कार का जाते है और घराबर प्रानिकी उत्पत्ति होती है। प्रो! आप परम दयाल सकता विहर उदीक्षया यदि परस्स विमुक ततः। समान सबमें सम होनेके कारण न तो कोई कार अपना है और न तो परपा । वास्तवमें तो बाजे स्मरूपमें मन धौर वाणीकी गति ही नहीं है। काले काय-कारणरूप प्रफमा अम्ब होनेसे में न हि परमस फपिदपरो न परम भवेद आप शून्यके समान ही जान पाते है, परन्न म ररिके भी वषिष्ठान होनेके कारण आप परम स वियत वापदस्स स्म शून्पतुला दक्षतः ॥२९॥ ॥२९॥ अपरिमिता भूषास्तनुभृता यदि सर्पगता मादन् । थाप निस्य एकरस हैं। यदि बीप संच हों और सब के सब नित्य एव सम्म्यापक हो, तम | वे आपके समान ही हो जायेंगे, उस हातमें ये ग्रसि हैं और भाप शासक-पह बात नही नदी सकस धौर तव थाप उनका नियन्त्रण कर ही नहीं सकते। उनका निम्त्रण बाप तभी कर सकते हैं, ये वाले उफ्न एमे अापकी अफेन न्यून हो । इसमें स्पे नही कि ये सव के सब जीव तण इनकी एकता स्तहि न पामतेति नियमा सुष नेतरवा । । - •ममिनिमोऽपि यो परफसविसर। मंशः वर्मा सर्व नमामि मे प्रमु हनिमपीत होनेपर मी समन राम और भातरिक इन्द्रियमी शशि पारण है भीर र एवं मा । उस के सेक्नीय प्रमुखे मैं ममस्पर रखा है। +तरीयमोममाबायोपितकर्ममिा सरत: सिमाम्नारे पिता॥ १६॥ नि ! भाफ्ले समि-तास्मो मुम्म एम मावाने माने यामा महिमा है। जीके परम स्म मेगौम कम दुमा मौर मा भावगमनके चरम मार हम दुखी होते हैं। पिशाबमाप म्प प्याक्सि। मा अ०८७] दशम स्कन्ध ६७३ अवनि च पन्मयं वदषिमुन्य नियन्द भषेद उनमें कारणरूपसे रहते हुए भी उनके नियामक है। पास्तवमें बाप उनमें समरूपसे स्थित है। परन्तु या जाना नहीं जा सकता कि आपका या स्वरूप फैस। क्योंकि ये वेग ऐसा समझते हैं कि हमने न छिया, उन्होंने पास्तपमें आपको नहीं जाना, उन्होंने तो फेसल अपनी बुद्धिके विषयको जाना है, सिसे आप परे है। सममनुबानतो पदम मवदुष्टतया ॥३०॥ और साप ही मतिके द्वारा जितनी वस्तुएँ जानी जाती है, वे मतियोंकी मिसताके कारण भिन्न-भिन्न होती है, इसलिये उनकी दुला, एक मतके साथ दूसरे मतका विरोष प्रत्यक्ष ही है। अतएव भापका सरूप समस्त मतोंके परे है॥ ३० ॥ सामिन् ! जीव वापसे स्पन न घटत उगः प्रतिपूरुपयोरक्या- होता है, पर करनेका ऐसा नहीं है कि काप परिणामके द्वारा जीव बनते हैं। सिदान्त तो यारोकि प्रकृति और मुख्य दोनों ही जम्मा है । वर्षात् उनका वास्तविक सरूप-को भाप ₹-कभी वृत्तियों के दर | टतरता नहीं, बन्म नहीं लेता । म प्राणियोंका जन्म कैसे होता है । अज्ञानके कारण प्रातिको पुरुष और पुरुषको समययुजा भयरमसुमृतो बलबुइइदयत् । प्रकृति समझ लेनेसे, एकका सरेके साथ संयोग हो पानेसे जैसे धुरयुष्म' नामकी कोई स्तन्य बस्तु नहीं है, परम्स उपादान-कारण जळ पौर निर्मित कारण मायुक संपोगसे उसकी सपि हो जाती है। प्रकृति में पुरुष और पुश्ममें प्रकृतिका अभ्यास ( एक दूसरफी काफ्ना) हो जाने के कारण ही बीबकि विविध नाम वीर गुण स्वयि त इमे ततो विविधनामगुणः परमे रस लिये जाते है । पन्तमें जैसे समुद्र नदियों और मधुमें समस्त पुपोंके रस सम नते हैं, पैसे ही ये सबके सब उपाधिरहित धापमें समा जाते हैं। (इसछिपे जीनोंकी मिन्नता पर उनका पृषक अस्तित्व वाफ्के शारा निपत्रित है। उनकी पृपक स्वतन्त्रता चौर सर्व- ध्यापकता आदि वास्तविक सम्पको म आननेके कारण सरित इमाणवे मधुनि लिल्युरशेपरमाः ॥३१॥ ही मानी जाती है ) ॥ ३१ ॥ ० अपम्ब सस गम्विा भुया बुवा म्मेवारसेवः । म्वनिखि d नेपालसमे ॥१७॥ मुरिने समता स्पप्रपत्रके मोमीक स्ममें बिननगन किया और किसे मी वैसनिमय एक है। र सजि और वृद्धि-गुरुपतिम है। स्त्री सतीदर्भ-मापुर्वमिपि प्रमुन में मननी-मम मामय प्रस्व वात्। + सिग्नुप पिम्पमति मागे नीयोपेत गुरम्पमा सगरमार। निमुसियुमम्मे मपि मिनुस्मगुर्द माल्ये नृमि ॥१८॥ । । पा यस्पवान्व है

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भीमद्भागवत
.
नूपु सव मापया अमममीप्यवगस्प मुर्श मान् ! सभी जीव भापकी मापसे भममें मटा-
रहे हैं, अपनेको मापसे पृषक मानकर स्म पता
चाकर काट रहे है । परन्तु बुद्धिमान् पुरुष सभाको
स्वमि मुधियोऽभवे दक्षति भाषमनुप्रभषम् ।
समझ लेते हैं और सम्पूर्ण महिमाक्से वापसी कप
ग्रहण करते हैं। क्योंकि बाप स्म-मृत्युके से
छुरानेवाले हैं। पथपि शीत, प्रीम और वर्गस
कथमनुषता भवभय तब यत् त्रुटि
तीन भागोंषात्म काल्पक अपका भूमिसमा ।
यह सभीको मपमीत करता है, परन्तु ममीले
पार-वर मयमीत करता है, जो आपकी भरमन्नई
सूपति मनिगेमिरभवच्छरणेषु भयम् ॥३२॥
| लेते । जो पापके शरणागत मक्क हैं, उनें मम मम
मृत्युरूप संसारका मप कैसे हो सकता है। ॥३२॥
अवन्मा प्रभो ! बिन योगियोंने बानी इन्द्रिय और
विजितरपीकवायुभिरदान्तमनस्तुरग
प्राणों को वशमें कर म्पिा है, वे भी, स
घरणोंकी शरण न लेकर उमार एवं अत्यन्त का
मन-तुराको अपने पशमें करनेका मा करते हैं, म
यह पतन्ति पन्तुमतिलोलमपापसिदः ।
अपने साधम सफल नहीं होते । में बरबर से
और सैकलों बिपतियोंका सामना करना पाता
| केरळ श्रम और दु सही उनके हाप स्माता है । जी
म्पसनषतान्त्रिता समवहाय गुरोपरग
ठीक यही दशा होती र, जैसी समसमें बिना कसरी
नावपर यात्रा करनेवाले म्यापारियोंकी होती है।
( तात्पर्य यह कि जो मनको बशमें झरना छते है,
पणिज इवाघ सन्स्पकर्णधरा जलधौ ॥३३॥
उनक लिये फर्णधार-गुस्मी अनिमार्य बासात
है)। ॥ ३३ ॥
म्वजनसुतारमदारपनधामभरासुर
भान् ! श्राप धरण धनन्दसरूप और शर
गोंके आत्मा है। आपके राते समन, पुन, दे,
घन, महल, पृथ्वी, प्राण और रप मदिसे म्प प्रयोग
है । जो स्येा इस सत्य सिद्धान्तको न बनकर भी
स्स्वपि मति किं नृणां भयत आमनि सर्वरसे
फुपक सम्झन्धसे होनेवाले मम ही रम हे में
पीक सहित मा सम्पूष मिन मिमें उदय होता है और सुपुति भारि अामामामें विपन्ने प्राप्त है।
प्पा भान होता है, गुभवी करमा प्राप्त होनेरा भारमान नवा व समुद्र में नरके समान पक्ष
किनमें आपतिक प्रपत्र प्राप्त हो पाता। छही त्रिभुवनगुरु ददि भगवान्को में मफ्ने हरपमें माथना करता है।
• ससारकाम्पैविकीमुदीनानामहापठसम्
कपधिवास्यमिद
भीगहरे
पछि ! या चीन सघर को मारेसे सकोसोहपा मोर नाना प्रकार के सांसारिक पापोली पपाठी हुई मा
एक कप भापति ती भापकामे आप में मात्र भाप इन्म पार ोि ।
बरामनरगुणे मापरे पर मनो में मामेव ।
निरणाविसमापनभम अपेम गेम भक्त
प्रफ्न
नमकम् ॥११॥
+ पदा
पावा ॥२ ॥

अ० ८७] दषम स्मन्ध ६७५ इति सदबाना मिथुनतो रवये चरतों ससारमें मय, एसी कौन-सी वस्तु है, जो मुसरी कर सक। स्पोंकि ससारकी सभी वस्तुएँ खभावसे दी बिनाशी है, एफन-एक दिन मठियमेट हो जानी है। और तो क्या, वे स्वरूपसे ही सारहीन धौर मुखयवि को न्विर स्वषिहवे स्वनिरस्तमगे ॥३४|| सत्ताहीन है, व मरा, स्पा मुख द सक्ती ? ॥ ३१ ॥ मगन् ! जो एपर्य, अमी, विषा, ति, तपस्या आदिक घमासे रहित है, व सत्पुस्प इस पृथ्वीतउपर परम सुषि पुरुपुण्पतीर्थसदनात्यूपयो विमदा पवित्र धौर सको पवित्र करनेवाले पुष्पमप सम्चे तीय स्थान है। क्योंकि उनके हदय भापक चरणारपिन सर्वदा विराजमान रहते हैं और यही कारण है कि उन म्त ठत भवत्पदाम्बुजहदोऽपभिदधिक्ला । संत पुरुषोका चरणामृत समस्त पापों और तार्पोका सदा के लिये नष्ट कर देनेवाव्य है । भगवन् ! आप नित्यानन्दस्वरूप आत्मा ही हैं। जो एक यार भी यापका अपना मन समर्पित कर देते हैं. आपमें न्न दति सन्मनस्स्वपि य आस्मनि नित्पमुसे लगा दते हैं वे उन दे-होमें कभी नहीं फंसते र जीयके विवक, राम्य, धैर्य, क्षमा और शान्ति बाद गुणोफा नाश करनेवाले हैं। व तो पस, आपमें ही पुनरुपासते पुरुपसारहरावसधान् ॥३५॥ रम जाते हैं। ॥ ३५ ॥ मुत इदमपित भगवन् जसे मिपीसे क्ना हुआ पड़ा मिटीरूप ही होता है, से ही सत्से बना हुआ जगद् भी सत् दी हैयह वात युळिसाव नहीं है। क्योंकि कारण और काका निर्देश ही उनके भेदका घोतक है। यदि केल भेदका निषध करने के लिये ही एसा कहा जा रहा मदिति मनु वडत हो तो पिता और पुत्रमें, एड और घटनाशमै काय- भारण-मात्र होनेम भी व एक दूसरसे मिम हैं । इस प्रचार काय-कारणकी एकता सवत्र एकसी नहा दम्री जाती । यहि कारण- पसे निमित-पारण न व्यत म्पभिपरति च केवल उपन-कारण लिया जाप-जसे कुण्डलाय सोना-नो मी फ्ही-पही कापफी असपता प्रमरित होती है जैसे रस्सीम साँप । यहाँ उपासन-कारक स्य होनेर मी टसका काप सर्प स्था अस्प है । क च मृपा न वयाभययुक् । । परि यह पहा बाय कि प्रतीत हानेवाले सपका उसन परमानन्दम्प गुस्स! मगन् । बब नरा मन भापक परणोंमें म्मान प्राप्त कर सेगा तब मैं मार पास समन मानोंक परिमममे पुरभरा पाकर परम्पनन्द पास कम्य । •ममा दि स्पधारममानचिपन । जामिन मुशरनादिमिः ॥२१॥ सभारम्र मन मठे, उनर रिये भार कम नामत् परमानन्दरिम्न अात्मा है। इसलिये उने तुन्छ स्वी पुप भन भादिमे क्या प्राम। नुसावदाममनि सचिन्तयन् मन्धि गतमासानाभमानापन् । भवान् मन्च पा पवा ६७६ भीमद्भागवत . त व्यवइवये कारण केवळ रस्ती नहीं है, मसके साथ वरिया-- भ्रमका मेल भी है, तो यह समाना चाहिये किमीच चौर सत् वस्तुके संपोगसे ही इस नगकी पत्ति है। इसलिये जैसे रस्सीम प्रतीत होनेवन से निप इपिवोन्भपरम्परया है, वैसे ही सत् यस्तमें अविधाके स्योगसे प्रतीत होने वास्प नाम-सपारमक जगत् भी मिप्या है। यति के म्यवहारकी सिदिके लिये ही बगएकी सन्त नमी हो, तो उसमें कोई वापति नहीं, क्योंकि पार सस्य न होकर केस म्पावहारिक सस्प है। प्रमपति भारती म्यावहारिक जाल्में मने र काळकी हरिसे काहि है, और चानीजन विना विचार किये पूर्व-पूर्वक मनसे प्रेरित होकर क्यपरम्परासे इसे मानते चले कार।। ऐसी स्पिन्तिमें कर्मफळको सत्य सामनेपाली प्रतिया मेल उसाचिमिसायनान् ॥३६॥ ) उन्हीं लोगोंको झममै राम्ती हैं, जो कर्ममें नर हो रहे हैं और यह नहीं समझते कि इनका तात्पर्य कमलको निस्पता बतानेमें नहीं, बल्कि उनकी प्रशसा करके म कमि म्यानेमें है* ॥ ३६॥ भायन् । वास्तविक का न यदिदमग्र मास न भषिप्पदयो निफ्ना- तो यह है कि यह जात् उपक्केि पले नहीं कर प्रख्यक पाद नहीं रहेगा, इससे सिद्ध होत्म है कि यह बीचमें मी एफरस परमात्मामें मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है। इसीसे हम मुर्तियाँ इस जगत्का वर्णन ऐसे बनु मिवमन्तरा त्वमि विभाति मकरसे | उपमा देकर करती है कि जैसे मी घाअसे सम्मुखपासाहिमितस्वस्पुष्पगाथामृत सातासम्मको मदरे मामद दोस्त् ॥२२॥ मैं शरीर और उसके सम्मावि मासति छोड़कर तीन मापन मिला। मौर कोई भरमिमान त निवास करने । उनीही भाममें रहूँगा। अपुरुषांक मुरम मसत माफी मागे पा-मुपासी नरिपाची पायमै प्रतिदिन स्नान का मौर रसिद मि में भी ये मन मी पगा। भक्तः सभी मुक्न म्ने सपः कुत् कार्यमपी नेपर। त परमानन्द पर मुग पदे मुन्दरमिदिरानुद मामानवम् ॥२॥ माम प्रतीयमान सपर समान स्पसम मापसे म्हय एनेपर में या विभुन पनी ।।दा पना पायरमें पा पानेपर मी मप नगे च यता । रोम वापर भी कार्य सफ्वामें नहीं है। इसलिम भापमा काम अप परमानन्दसान भरेव मुन्दर पर इन्दिरावनित भीदरे ! मैं सीधी ममा मताई। मुस Rो मारिष , न सपर थ.८७] दशम साप मा उपमीयते द्रविपातिषिमसपथै शा और मानेमें कुमाल धादि नाममात्र है, पास्तपमें मिली, सोहा और सोना ही हैं। से ही परमात्मामें विवथमनोबिलासमूठमित्प्पयन्स्पषुधा ॥३०॥ वर्णित जग नाममात्र है, सभा मिप्या और उनकी कल्पना है। इसे नासमा मूर्स ही सत्य मानते हैं.३७) स यदबया स्वशामनुष्यीत गुपिशुपन् भगवन् ! जब जीव मायासे मोहित होकर अविधा- को भएना लेा है, उस समय उसके तरूपमूत आनन्दादि गुण इक जाते है। गुणवम्प पियों, इनित्रयों और देईमि फंस जातपा नहीको धफ्ना बापा मनकर उनकी सेवा करने है। अव उनकी भजति सरूपा ददनु मृत्युमपेतभगः । जन्म-मृत्युमें अपनी जन्म-पत्यु मानकर मके पारमें पर जाता है। परन्तु प्रमो ! जैसे सौप अपने धर्म कोई सम्क्य नहीं रहा, उसे छोड़ देता है-से ही थाप माया अविपासे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, स्वत जहाति बामपिरिष स्वपमाघभगो उसे सदा सर्वदा भेड़ यते हैं । इसीसे मापके सम्पूर्ण एर्य, सदा-सर्वदा आपके साप रते हैं। अमिमा धादि भरसिदियोंसे युक्त परमेम धापकी स्थिति है। इसीसे आपका ऐW, धर्म, यश, श्री, हान वीर राम्प मासि महीमसेऽरगुणितेऽपरिमेयमगः ॥३८॥ भपरिमित है, अनन्त है, ह देश, काल और वस्तुओं- की सीमासे आश्य नहीं 11॥३८॥ भगवन् ! पदि मनुष्य योगी यति होकर मी अपने स्वयकी विस्फ वास्ताओंको ठहर नहीं फेंकते वो न असापकों के लिये आप में रहनेपर भी से ही दुर्लभ हैं, जैसे पदि न ससदरन्ति यतयो रविसमजटा शेरते रहो, मग पहने हुए हो, परसा उसकी याद न रहनेपर उसे पता करे इधर-उधर । जो सधक अपनी इन्द्रियोंको तस करने हो छोराते, विस्यसे दुरभिगमोऽसारदिगवोऽस्मतकण्ठमपिः। विरत नहीं होते, उन्हें जीवनमर और जीवनक माद • मुझपमा विपरित मदनतिसप्रमुख वा नगरे है पर परमात ॥ २४ ॥ ना मुकुट Tu, पा मोर श्रिीमी रुपमै परिस्त मेस मी वखत सोना ही प्रभार नलि। सचम महार मोर मामय मामु मादिरे रूममें पास होनेग्रम मा सम्पूर्ण भापत् पस्न मापसे मिल नहीं है। नियन्ती श्रीधणाममन समसमापारिमि मावान् सारस्तमोगुनापानुम्मीमाटी मामाकम्प शिरमतिर समाईक्रमातुर गहोरिम पारे वाम बारम ॥ २५ ॥ मा! मापी समय माफी मांगनने मात्र नाप यी प्रेरक समय भरि यसलामी एपशुध मोर. हमोगी मने अनेक मान प्रदान कर दी है। साथ ही म मेरे सिर पर होर मामावर गरेरणहै। रवि में मामलो मात्रा मारकरी धमे एक वरियो। माया ६७८ श्रीमद्भागवत [.. असुठपयोगिनामुभपतोऽप्पसुख भगव मी दुःख-ही-दु ख भेगना पड़ता है। क्योंकि व सक नहीं, दम्भी है, एक तो अभी उन्हें मृत्युसे छुटकाम नहीं मिय है, लोगोंको रिमाने धन कमाने परिक मनपगवान्तकादनविरुडपदाइ भरत ॥३९॥ क्ल्श उपने पड़ रहे हैं, और दूसरे आपा सरूपन जाननेके कारण अपने धर्म धर्मका उमान करने परष्येको नरक अदि प्राप्त होनेका भय मी ना ही रहता है। ॥ ३९॥ स्वदवगमी न येचि भवदुत्पश्चभाशुभयो भगवन् ! आपके वास्तविक स्वरूपको जानना पुरुष श्रापके दिये नए पुष्प और पके फल एव दुखेको नहीं जानता, नहीं भोगता, इमेज और मोकापनके भाषसे उपर उठ जाता है। उस समय गुणविगुणान्यांवहि देहमृतां च गिरः। विधिनिषेक्के प्रतिपादक शाब भी उससे तिट में बाते हैं, क्योंकि वे देहामिमानियों के लिये हैं। उनकी मोर तो उसफा प्यान ही नहीं पाता । जिसे जाके स्वरूपका धान नहीं हुआ है, यह भी यदि प्रतिदिन अनुयुगमन्ना सगुण गीतपरम्परया आफ्की प्रत्येक युगमें की हुई लीओं, गुणोंका गाना सुनकर उनके शरा अपको अपने स्वयमें व्य लेत। तो अनन्त, अचिन्त्य, दिम्पगुणगों के निषासम्पन्न प्रमो आफ्का यह प्रेमी भक्त भी पाप-पुर्योके फल सुमसे भवपमृतो मतस्त्वमफ्नर्गगतिर्मनुजैः और विधिनिषोंसे अतीत हो जाता है। क्योंकि कार ॥४०॥ ही उनकी मोक्षस्वरूप गति है। ( पर न पी और प्रेमियोंको छोरकर और सभी शासक्फनमें १ मा वे उसका उछान करनेपर दुर्गतिको प्रा होते पुपतय एष ते न यपुरन्तमनन्तवमा है) ॥१०॥ मावन् ! स्वादि कोंके अधिपति च पमा प्रति मी वाफ्की थाह-आपका पर न प सके, और आपकी बात तो यह है कि बस में उसे नहीं जानते । क्योंकि जव अन्त है ही नहीं, म कोई जानेग से प्रम 1 जैसे बाकाशमै बसे एक स्ममपि यदन्तरानिधया ननु सावरणाः। नन्हे-नन्हे कण उपते रहते , वैसे ही आप काम केसे दम्मन्पायमिन बक्विकन मामचिन्तावर सम्मुमन्तमानि निरपियोगसम्मेणकुम्म् । भाममनिमम्मशम्नवसम्माननाम्मद दीनानाप दमानिधान परमानन्द प्रमो पानि माम् ॥ २९॥ प्रमो में सम्मान संन्यास के बहाने मे गया। एम्मान मेगा पितासे ही भावर तथा रात-रिन नाना प्रभार उपेगी रस्ता यमसे पापा से मुमहो रामभापमान करता हूँ भानी भरमा मोके बारा प्राप्त धम्मसे में सन्छ है। ऐसा पठा। मानाय, सानिमान परम्पमन्द ! मेरी रक्षा मैमि। +ममाम वर मे विधि मास कति पप सुसामुसाम । भरमसनममममापि या नमामि यण विविधिः ॥ २० ॥ 1

६७९
२०७]
।
स इव रजांसि बान्ति पयसा सह यमुत-
अपनेसे उतरोत्तर सगुने सत बावरणों के सहित
अरोम्न्य प्रमाण एक सपही घूमते रहते हैं। क्य
मन्म, भापकी सीमा कैसे मिले । हम सुतियों भी पापक
स्पसपका साक्षात् वर्णन महीं कर सकती, बाफ्के
अतिरिक वस्तुओंका निषेध करते-करते अन्तमें अपना
भी निश्च कर देती है और अपमें ही मफ्नी सता
स्स्वपि हिफलन्त्पतमिरसनेन भवनिधनाः ॥४२॥ खाकर सफल हो जाती है |॥ ११ ॥
मीभगवानुषाप
भगवान मारायणमे कहा-दे । इस प्रकार
सनकादि अपियोंने मात्मा और प्रसकी एकता बतानेवास्त्र
उपदेश सुनकर अात्मस्वरूपको जाना और निस्य सिद
इत्येतदू माणः पुवायाभुत्पास्मानुशासनम् ।
| हानेपर भी इस उपदेशसे समय से होकर टन
यमुग्ने सनन्दनझी पूजा की ॥१२॥ नारद ! सनकारि
सनननमधान ः सिद्धा शास्वाऽऽस्मनो गतिम्॥४२॥ अपि सृष्टिक आरम्ममें उफ्न हुए थे, अतएव वे सबके
पूर्वव हैं। उन ग्राफाशगमी महामाधोंने इस प्रकार
समस्त्र के, पुराण और उपनिषदोंका रस निचोड़ लिया
इत्पशेयसमाम्नायपुरामोपनिषद्रसः
है, यह सका सार-सर्वस है ॥ १५॥ देवर्षे ! तुम
मी उन्हींक समन के मनस-पुत्र दो-उमकी
समत पूर्वजानोमपानैर्महास्मभि ॥४३॥ मन-सम्पतिक उत्तराधिकारी हो । तुम भी पदाके साप
इस प्रसारमविपाको धारण करो और सदभाषसे
स्वतन् प्रमदापाद भदयाऽऽत्मानुशासनम् ।
पृथ्वीमें रिचरण करो। यह विपा मनुप्पोंकी साख
धारपर गां फाम फामानां मर्जन नपाम् ॥४४॥ वासनाओंको भस्म कर देनेपाली है ॥ १४ ॥
भीमुक उपाप
भीशुकदेवी कात है-परीक्षित् ! देवर्षि नारद मह
संपमी, पानी, पूर्णकाम और नैष्ठिक प्रमधारी है। 4
एपंस पिणाऽऽदिष्टं गोत्याभयाऽऽरमवान् ।
जो कुछ सुनते हैं, उन्हें उसकी भारणा हो जाती है।
मगवान् नारायणन न्हें अब इस प्रकार उपदेश किया
तब उन्होंने वही प्रवासे उसे प्रण किया और उनसे
पूर्ण भूतधरो राममा वीरमतो सनि ॥४५॥ यह करा ॥ १५ ॥
माषय | माप मुझे अपने सस्मा भनुमामा बिससे फिर मुस दुसरंपग पर्ति नहीं होती। ममा
मुम भम्ने गुणों के भरम भौर बनध प्रेम दीपि मिसेल में विधि-निषेपम बिगर न रोऊँ।
. पुण्ठ
मिपुरन्दमनन्
वे
गि भविमीसम्पः ।
स्वपि
अपेति भये
मनम्न ! ब्रमा मारि देवता भाप मत नहीं बनत न भाप सनत और न वा मग मममणि
उपनिर देखनठी परिभाप भनन्दानिपः 'नम् नम । बप दो स्प' यह प्रम भापमें परिवाय
देवी हैइसपिये में भी नमो नमः पहा सहा पदी पर भापर करव-प्रमाणी उपसना या है।
म
प
भराम
नम
सम्॥ २८॥

६८०
भीमबागवत
नारद उवाच
..
सभास्तिो भगपता
देवर्षि नारद ने कहा-मान् । आप समिशन
स्वाप श्रीकृष्ण हैं। आपकी कीर्ति परम पनि।
नमस्तस्मै भगवते कृष्णापामलकीये । आप समस्त प्राणियोंक परम कल्याण मोक्षक लिने
फानीय कलाक्तार क्षरण किया करते हैं। में वो
यो धचे सर्वभूतानामभवायोपवीः कलाः ॥४६॥ नमस्कार करता हैं ॥ १६ ॥
इस्पापमुषिमानम्प तच्छिम्पाय महात्मनः।
परीक्षित् । इस प्रकार महात्मा देवर्षि मारद की
अपि मगमन् नारायणको और उनके शिष्योंको नमस्कार
ततोऽमादाभम साधाव पितुर्वैपायनस मे ॥४७॥ गये ॥ १७ ॥ भागान् धेन्यासने उनका पनि
करके स्वयं मेरे पिता श्रीकृष्णदेपाफ्नके बारमार
सकार किया । वे पासन स्वीकार करके के गये, इसके
कवासनपरिग्रहः। वाद देवर्षि नारदने जो कुछ भाछन् नारापमके मुरसे
सुना प,
पर सब कुछ मेरे पिलाडीका न
तस्मै सद पर्णपामास नारायममुखामुखम् ॥४८॥
दिया
॥ १८ ॥ राजन् ! इस प्रकार मैंने तुम्हें काम
कि मन-वाणीसे भोघर और समस्त प्राप्त गुमसे
रहित पराम परमारमाका वर्णन श्रुतियाँ किस प्रकार
इस्पेव पर्षितराजन् यमाप्रभारुतस्वया ।
करती हैं और उसमें मनका कैसे प्रक्श होता है। यही से
तुम्हारा प्रश्न वा ॥ १९ ॥ परीक्षित् ! भगवान् ।
यथा प्रयम्पनिर्देश्ये निर्गुणेऽपि मनमरेत् ॥४९॥ में स्तियते है। वे प्रति और जीव दान
विषका सकल्प करते हैं तथा उसके पनि, मप्पा
स्वामी हैं। उन्होंने ही इसकी सृष्टि करके जीक्के स
पाऽस्सोस्प्रेषक बादिमध्मनिभने योऽव्यसबीयरो इसमें प्रवेश किया है और शरीरोंका निर्मम करक में
ही उनका नियन्त्रण करते हैं। जैसे गा निदा---
या सपदमनुप्रविश्य ऋषिमा चक्रे पुर। शास्ति ताः। , से ही भगवान्को पक्र म जीप ममासे मुन
मसिमें मम्न पुरस अपने शरीरका अनुसन्धान का देत
हो कता है । मावान् ऐसे विशुख, केन विमा ताल
य संपप जहात्पजामनुश्यी सुप्तः छला यथा
है कि उनमें जगत्के कारण मापा अपवा प्रतिभा
रतीमर भी अस्तित्व नहीं है। वे ही वास्तबमें अमन-
स्थान है । उनका पिन्तन निरम्सर करते रहना
संकैवल्पनिरस्सयोनिमभयम्यामेदजन हरिम् ॥५०॥ पाहिये ।। ५० ॥
इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहंस्पा सहितापा दशमस्करवे उत्तरार्धे
नारदनारपगसंबादे बेवस्तुति म माशीतितमोऽप्याप ॥ ८७ ॥

म० ८८] ६८१ अथाष्टाशीतितमोऽध्याय शिपमीन सइटमोचन रागापार रामापरीसिवन पूज-भगवन् ! भावान् शहरन समस्त भागोंका परित्याग कर रस्सी परन्तु ठसा यह जाता ह कि जो दक्ता, अमर अपना मनुष्य उनकी दवासुरमनुम्येषु य भजन्त्यशिव शिवम् । उपासना करते हैं, व प्राय धनी और मागसमान हा जाता है । और भावान् विष्णु समीपति हैं, परन्तु प्रागस्ते धनिना भाजान तु लक्ष्म्या पनि हरिम्॥॥ जकी उपासना करनाले प्राप धनी और भ्गसम्पन्न | नहीं होत ॥ १ ॥ दानों प्रमु त्याग और भाग ठिसे एतत् वेदितुमिच्छाम मदेहान महान् हि न । एक-दूसरेसे विरुद्ध स्वभाषवाउ है, परन्तु उनके उपासकों को उनके सम्पफे विपरीत फार मिला है । मुत इस पिययम बड़ा मह ह कि त्यागीयी उपासनासे विरुदशीलया प्रमोविरुद्धा भजनां गति ॥२॥ माग और लक्ष्मीपतिकी उपासनासे स्याग से मिलता हम आपसे यह जानना चाहता हूँ ॥ २ ॥ भीझुक उपाच भीशुकदेवजी करते हैं परीक्षित ! शिवजी सा अपनी शक्तिसे युक्त रहता है। वे सल आदि गुणोंसे युक्त सिव शक्तियुत श्थत रिलिजा गुणमयतः । नपा अदाकारके अधिग्रता है। महारक तीन मर हैं. वैमारिय नेजस और नामस ॥३॥ विविध वैकारिफस्वैजसथ ताममभत्या विधा ॥ ३॥ अशरसे सात्यह विकार हुए-~स इन्द्रियों पाँच महाभून और एफ मन । आ इन सपक अधिमत वता विकारा अभवन् पारशामाप कश्चन । स्वामिसे किसी एफकी उपासना करनगर समस्त उपधारन् विभूतीनां सासामम्नुत गतिम् ॥ ४॥ प्रयोकी प्राप्ति हो जाती ॥१॥ परम्मु परीक्षित् ! भगवान् श्रीहरि ता प्रातिसे पर पप फुरुपातम एष प्रात हरिहिं निगुणः साधात् पुरुप प्रकत पर । गुणरहित ह । व मा नया सबके अभ करणों साक्षी है। जो उनका भन्न मरता है पासप भा गुणातीत स सवेरगुपद्रष्टा त भजन् निर्गुणा भवत् ॥ ५॥ हो जाना ४ ॥ ५॥ परीभित् ' जय सुम्हारे पाप धर्मराज युधिष्ठिर अश्वमेव पत्र फर जुक, मय भगवान्मे नित्तप्वश्चमेधा गजा युप्मपितामहः । विविध प्रकारक धर्मेका वर्णन मुनत समय म्होंन भी मृण्वन् भगवता धमानएग्छदिदमच्युतम् ॥ ६ ॥ यही प्रश्न क्पिा पा ॥ ५ ॥ परीशिद ' भगवान् भागम माशक्तिमान् परमपर है। मनुष्यों के कल्याणक लिय ही स आर भगान्तम्म प्रीत शुभपव प्रभु । मॉन यदुर्षगमें अतार पारण स्त्यिा या । गना युधिप्रिय नृणां नि अपसाधाप गाजवीर्णो यदा मुल ॥७॥ उन्होंन प्रसन्नतापूनर ”स प्रभार उत्तर Pिया था ||७|| राप्रभ मुनकर और उनकी सुननकी इच्छा कर भीभगवानुवार भगवान् भीरुप्मने मा-ग्रजन जिसमम यस्वाइमनुगृहामि हरिप्प वहन गर्न । हरा काला सा मम मन परभीर धन स्ना . भा म4 २-८६- श्रीमद्भागपत [.८ ववोऽधन स्पचन्त्यस्य स्खजना दुःखदुःस्थितम् ।।८।। है । अय यह निर्वन हो जाता है, तब उसके मुझे सम्बन्धी उसके दु साकुछ चिक्ती पर न करके के श्रेय दते ॥ ८॥ रिकह धनक लिये उपाय करने स पदा विवथाघोगो निर्विष्मः स्याद् धनेदया । ष्याता है, तय में उसका यह प्रपन भी निकर देता है। इस प्रकार धार पर असफल हानेक कारव मस्पर फतमप्रस फरिप्ये मदनुग्रहम् ॥ ९ ॥ नव धन कमानेसे उसमय मन विरफ हो जाता है, उसे दुख समझकर वह उधरसे अपना मुँह माह तो और मेरे प्रमी भक्तोश माथय लेकर उनसे मेरे वनम परम सूक्ष्म चिन्मान सदनन्तकम् । फरता है, तब म उसपर अपनी अहेतुक कपारी वर्ष फरता ॥ ९ ॥ मेरी कृपसे उसे परम सूक्ष्म पान अतो मां सुदराराध्य रित्वान्पान् भजसे जनः ॥१०॥ प्रकार मेरी प्रसन्नता, मी वाराधना यात कठिन है। सचिदानन्दस्वरूप परमकी प्राप्ति हो बती है। इस इसीसे साधारण लोग मुक्त छोडकर मेरे ही दूसरे बाप क्यान्य देषताओंफी थाराधना करते हैं ॥ १०॥ ससस्त आनुतोषेभ्यो लन्धराज्यभियोधाः । दूसरे देवता आनुताप है। ये पटपट रिवन पाते। और अपने मकोको सानाम्य लक्ष्मी दे देते हैं। उसे मचा प्रमत्ता घरदान् विस्मरन्त्यषबानते ॥११॥ और अपने घरदाता मताओंको भी भूल जाते है । पाकर ये उनाल, प्रमानी और उन्मत हो उठते । उनका तिरस्कार कर बैठते हैं ॥ ११ ॥ श्रीशुक उपाप भी मुकदेवजी कहत है-परीक्षित् ! प्रमा, नर और महादेव—ये तीनों शाप चौर बरदान पने समर्म सापप्रसादयोरीक्षा प्रमविष्णुक्षिपादयः। है, परन्तु इनमें महादव और ममा शीम ही प्रस्न में स्म होकर परदान सपा शाप दे देते हैं। परन्तु पिड सपाशापप्रसादोऽग शिषानमा न पाप्युतः॥१२॥ | भगवान् वैसे नहीं है ॥ १२ ॥ इस विश्यमें मा मत्र चोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । लोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। मगमन् शहर एक बार वृकापुरको वर देकर साइटमें पा कामुराम गिरिशो पर दवाऽऽप सङ्कटम् ॥१३॥ सा दियत भिगी हुई थी। एक दिन का मे ॥ १३ ॥ परीक्षित् ! वासुर शकुनिका पुत्र । प्रको नामासुरः पुत्रः वनेः पथि नारवम् । माते सम्म्प उसने देवर्षि नारटको देख लिया और मसे छ कि तीनों देवताओंमें टफ प्रस्न होनेवास्य मौन रमाऽऽशुतोपं पप्रच्छ देवेपु त्रिपु दुर्मतिः ॥१४॥ ॥ ११ ॥ परीक्षित् ! देवर्षि नारद ने कहा- 'तुम भगवान् शहरफी माराधना करो । इससे तुमारा मनोरण स आह देवं गिरिशमपाधावानु सिद्यसि । बहुत जल्दी पूरा हो जायगा । ये पोर ही गुर्मोसे शीघ्र-से-शीघ्र प्रसम्न और पोर ही अपराधसे पुरस कोष योऽपाम्मा गुणदोपाम्यामानुतुप्पति कुप्पति॥१५॥ कर बैठते है ॥ १५ ॥ राक्ग वीर वणासुरने का वंदीनोंके समान शहरमीकी कुछ स्तुतियों की थी। पासपाणयोस्तुष्टः स्वतोपन्दिनोरिव । इसीसे वे उनपर प्रसन्न हो गये और उन्हें कानीय " प्र.11] दशम स्कन्व ६८३ -- पपयमतुल दवा तत आप मुमा टम् ॥१६॥ एमय दे प्य । ऋग्ने गवगक के ग्रस उद्यने और बणामुरके नगरी रमाश भार लनसे वे उनक रिय सहमें भी पड़ गय था ॥ १६ ॥ नारदजीका उपदश भर सामुर कदारभरमें गया इत्यादिष्टस्तममुर उपाधावत् म्बगावत । और अनि मामान परसा मुन्ध मानकर अपन केदार प्रान्मव्यण जुहानोऽग्निमुच हरम् ॥१७॥ । शरीर नोस कार का पर उसने हक्न करन लग्न ॥ १७ ॥ । इस प्रकार , दिनतर उपासना करनपर भी व उसे सापलब्धिमप्राप्य निदात् सप्तमनि । भगवान् शदरक "शन न हुए, तब उसे वा दुख निगमभन् म्वधितिना तनाथपिनम्र्पवम् ॥१८॥ य । सातवें दिन कारतीने स्नान करक उसन अपन भंग यायाल मन्तकमा कुल्हाइसे पाटकर वदा महाकारुणिक स धूटि हक्न करना चाहा ॥ १८॥ तक्षित् । उसे जगत् में यधापय चामिरियास्थिताऽनरान् । काइ दुम्बवश अनमहस्य याने गाता है ना हसयंग करणाश उस यचा त्रत है, पसे ही परम या भगपन् निगृम दाम्पा भुवयान्यनारपद गरने बानुरक अत्मपातक पर ही निपुगरसे नम्नदवस सम्न्न प्रकट हायर पन गनों हासे उसक वनस्पसनामय उपस्तताकृति ॥१९॥ गनों हा पर ग्यि और गत्य पानसे राम दिया। समाह चालालमणीय म उनका पण दाते ही सासुरक अायों-क-स्पों पूम हो गय ।। १० ।। भगवान् गरन परामुरसे कहा- पधाभिम रितरामि त वरम् । पर नृपासुर ! बस फरा, यस करा यहता या । में तुम्हें पर टना चाहता है। तुम मुंहमांगा र मांग प्रोयय वायेन नृणां प्रपद्यता । पर भर 'म ता आन रणागत मकॉपर सर महातपाऽमा भृनमर्थन यथा ॥२०॥ अर महानसे ही सन्तुष्ट हो जाया करता है। भग, नुम छ्टनर मनगर क्यों पीना टर॥२०॥ दर्व म बच पापीयान् वर भूतभयापहम् । पवित् अग्न गरी मुग्न समस्त प्रामियोप भयभीत ग्नान्य पद पर मन मि मजिसक सिगर पस्स पस कर गामि धाम्प म प्रियवामिनि॥२१॥ हार म, ही मर जाय ॥ २०॥ परित् । उस! पर ग्यचना मुनकर भगवान् र द ना अननन- तन्वा भगवान् महा दमना इस भारन । से हा गर हिसार यि-अपनदी ग्रामिति परमम्नस्म ददऽहम्मत यथा ॥ २२ ॥ सा फार फाउन मन्नो सा को अमन यि गिप॥ २२ ॥ इस्युक्त माऽमुरा नून गौरादरपलाग्म । मगन् किस प्रकार यद नर मुर न्नने पद न्ययन नाग्य रि मनीसदीदर म तरपरीवाय गम्भानि किटामुरः । । र असुर "रना सि पन्दौर पिएला उपग पग्न गाता महम्न धातुमारन मारिम्पमानाच्छिा ॥२३|| "रा न वि र मनमा ६८४ भीमद्भागवत तेनापसृष्ट सबम्तः पराधावन् मवेपथ । गये ॥ २३ ॥ यद उनश नाम करने पग करने | उससे उरकर कापत उर भगन लगे । वे पृष्टी, सी यावदन्त दिवा भूमेः काष्ठानामुदगादक् ॥२४॥ और दिशोंक अन्ततप गौड़ते गये परन्तु धि में ठसे पीस करते दम्कर उतरकी ओर से ॥२१॥ अजानन्तः प्रविविधि तूप्मीमासन् मुरथरा । पा-बा दपता इस सइटको टासनका कर उसय र तता वैष्ठमगमद् भास्यरं तमस परम् ॥२५॥ परे परम प्रकाशमय धेकुण्टन्यकर्मे गय ॥ २५ ॥म्मे दबकर चुप रह गय । अन्तमें प्राकृतिक प्रस्से यत्र नारायणमाक्षान्न्यामिनां परमागति । म्वयं भगवान् नारायण निग्रस करते हैं। एकमात्र ही उन मन्यासियोंकी परम गति है, जो सरे आदमे शान्ताना न्यन्त ण्डानां यता नावलंत गत ॥२६॥ नाकर जीको शिर होना नहीं पड़ता ॥ २६ ॥ वमपदान करके शान्तभावमें स्थित हो गये हैं। कुम्टने मकमयहारी भगवान्ने दस कि शाहरनी तो मा साटमें त तपाप्पमन दृश्य भगवान् पजिनार्दन । पर हुए हैं। तब वे अपनी योगमायासे प्रमघरी नर दूरसे ही धीरे-धीरे सकामुरकी पोर आने लगे ॥ २७ ॥ द्गत् प्रत्यूदिया भूत्वा षटुको मागमायया॥२७॥ | मान्न मूमफी मेमन, कन्य मृगधर्म, रज और रुद्राक्षकी माय धारण कर रक्सी पी। उनके एक-एक मेम्बलाजिनदण्डास्तेजमामिरिख ललन् । बासे ऐसी ज्योति निकल ही थी, मानो आग भय रही हो । वे हायमें कुश लिये हुए थे। परमरको अभिवादयामाम च तं उपामिर्जिनीतात् ।।२०।। देखकर उन्होंने वही नमतासे झुककर प्रणाम किया ॥२८॥ श्रीभगवानुवाम प्रभसारी पेपभारी भगवानने पा-शनि- ननन फामुरजी ! आप सा ही बहुत से सन गाइनेय भयान् म्पन श्रान्त कि द्रमागत । पड़ते हैं। आज आप बहुत दूरसे पा रही या तनिक विश्राम तो कर लीजिये । देखिये, यह शरीर ही सारे मुन्नों की बारी । इसीसे सारी कामना पूरी होती वण विधम्यतां पुम आरमाय सर्वकामयुक् ।।२०।। है । इसे अधिक रन ऐना चाहिये ॥ २० ॥ तो सब प्रकारसे समर्थ हैं। इस समय माप क्या करना पदि नायरमापाल युप्मन्पपमित विभो । चाहते है। पदि मेरे सुनने योग्य कोई मत हो तो पतत्पश्य । स्योंकि संसारमें मा नाता है कि येग सहायकों के द्वारा बहुत से काम ना मिमा करते भम्पा प्रापमा पुम्भित स्वाधान समीदवे॥३॥ ॥ ३ ॥ श्रीभुम उवाच भीशुकोजी कात है-परीधित् ! मगलाके एक-एक शादसे अमृत बरस रहा था। उनक इस पर्व भगरता पृष्टा वचमामवरपिणा । प्रकार पूछने पर पहले तो उसने तनिक यरमर बनी काट दूर की टसक मा प्रमश वस्नी तारस, बरदाम-प्राप्ति सपा मगमान् शङ्करके पी पी प्रत गतमोऽमवीचस्मै यधापूर्वमनुष्ठितम् ॥३१॥ गुरसे या सनापी ॥ ३१ ॥ .

अ० ८८] दशम स्कन्ध ६८५ भाप श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान्मे कहा-अध, सी बात है । तर एप षेचाहि सदास्प न धर्य श्रापीमहि । तो भाइ ! हम उसी पानपर विश्वास नहीं कात । आप नहीं जानत है क्पा । वह ता दक्ष प्रजापतिक शासे यो दधशापात् पैशायं प्राप्त प्रतपिशाचराट् ॥३२॥ रिशाचभायपर प्राप्त हो गया है। आजकल यही प्रता यदि पन्तत्र विषम्भा दानवेन्द्र जगद्गुरौ । और पिशा!का सम्राट ह ॥ ३२ ॥ नवराज इतने मह होफर एमी छोटी-बारी बातोंपर विपास पर तमाशु स्वशिरसि हस्त “पस्य प्रतीयताम् ॥३३॥ स्ते है । आप यPि पत्र भी उसे अहरू मानत हा | और उसी बातपर विकास करते हों, तो मटर अपने मयसत्य वचः शम्भोः कश्चिद् दानपर्पभ । सिरपर हाथ रखकर परीक्षा का अनिये ॥ ३३ ॥ उदैन जमसवाच न यद् पकान पुन ॥३४॥ | दानवशिरोमणे । यति किमी प्रकार शक्की वात असाय निकले तो टस असम्पवाका भार गरिय, जिसमे इस्थ भगवतभिर्वचोभिः स सुपेशले । सिर पर्भ यह सूर न ल सर्व ॥ ५९॥ परीक्षित् ' मगमान्न एसी माहित करनेवारी अजुन और मार्य यत भिनधीपिस्मृतःशीर्ण स्वास्त कुमतिपात् ।३५। कही कि उसकी विवक-युदि जानी रही । स युदिन अधापत भिमशिरा वजाहत इव धणात् । भूटकर अपन ही सिम्पर हाथ रख रिया ३५॥ बस, टसी क्षण उमा सिर पर गया और वा पदी जयशन्दोनम बन्दासाघुरन्दोऽभवद् दिवि॥३६॥ मनपर गिर पड़ा, मपना उमार त्रिी गिर पड़ी ।। उस समप आयागर्म स्वतानांग जय-जप, नमा नम मुमुचुः पुप्परपाणि ते पापे एकासुर । साधु-साधु' के नारे उगन लो३६ || पापी कारकी विपिपिद गधा माचित सक्राष्टियः ॥३७॥ | मृत्युसे ठम्ना, ऋषि, पिना और गन्धव अम्पन्न प्रमन हाफर पुष्पोंकी पर्या परन सगे और भगवान् शाइर उस मुक्त गिरिसमम्पाह भगवान् पुरुपाचम । विकर मएसे मुक्त गय ।। ३७ ॥ अब मान पुरुयतमन भयमुक गहरीसे कहा कि दयापिटप ! हा देव महादेव पापाऽय स्वेन पाप्मना ॥३८॥ | बाइप वान है कि इस दएको रसक पापोंने ही ना का रिया । परमधर भय, एमा कान प्राणी है हत को नु महत्स्वीस जन्तु कतकिल्पिप । जो महापुरुषोंका अमाघ करके कुशनसे रह मक । फिर सय जगद्गुरु सिमा ' आपका अपगध का ता धमी स्पा किम् विधेशे कतागस्फो जगद्गुरी॥३९॥ पर सशस गही कसे ममता ॥ ३८ ३० ॥ य पवमन्पाउत्तमक्त्युदन्मतः भगवान् अनम्न शक्यिोंक समुद्र है । उनी एक- एक शकि मन और प्राकर सीमा पर है। व प्रासमे परस साक्षात् परमात्मना हरे । प्रतीत सय परमात्मा है। उनकी शरीफा सहरसे गिरिप्रमाध धमेनमृणाति या लुहानकी पर गम वा फार करता या सुनम्म मा समरक पधनों और शाओक झ्यसे मुकदा विमुच्यते समृतिभिस्तथारिभिः ॥४०॥ नाना ॥ २० ॥ ति श्रीमद्रागात महापुगणे पारमास्पा सहिताया दशमस्काय उत्तराय रुत्रमार्ण नामारातिमाऽपाप ! ८८ ॥

। अपना सिर रखकर सेटे पुए थे। भूगजीने वापर ६८६ श्रीमद्भागवत [१०८९ अथैकोननवतितमोऽध्याय भृगुजोक मारा विश्वाकी परीक्षा तथा भगवानका मरे हुए ब्राह्मण-याउकोको पापस मना श्रीमुक उवाच श्रीशुकदयशी मदत ई-परीक्षित् । एक कर सरस्वत्मास्तटे राजन्नपय सरस्वती नदीके पायन तर या प्रारम्भ करनेक म्येि गई सत्रमासस । वह ऋषि-मुनि एकत्र होकर बैठे। उन छोमेिं इस विषयपर वितर्कः समभूत्पां त्रिवधीशेपु को महान् ॥ १॥ वा--विषाद क्य कि रझा, शिष और विष्णुमें सबसे बड़ा | कौन है ! ॥१॥ परीक्षित् ! उन लोगों ने यह बात जाननेके तस्स जिवामया ते वै भृगु प्रमसुत नृप । लिये ममा, विष्णु और शिक्की परीक्षा लेनेके उमेश्यसे प्रमाके पुत्र भृगुजीको उनक पास मेवा । महर्षि गु वनाप्य प्रपयामासु साऽम्पगाव् ब्रह्मणः सभाम्।२। सबसे पहले प्रमाजीफी समर्म गये ॥२॥ उन्होंने माजीक | धैर्य आदिपी परीक्षा करनके लिये न उन्हें नमस्कार किया न तस्म प्रहण स्तोत्रं चक्रे सत्त्वपरीक्षया । और न तो उनकी स्तुति ही की। इसपर ऐस मम्म हुआ कि नमाजी अपन तेजसे दहक रहे हैं। में वस्मै चुक्रोध भगवान् प्रज्वलन् स्पेन तेजसा ॥३॥ मा आ गया ॥ ३ ॥ परन्तु जब समर्प यानीने दस कि यह तो मा पुत्र ही है, तब अपने मनमें ठठे ए सघात्मन्युस्थिसं मन्युमात्मजायारमना प्रमः। क्रोधको भीतर-ही-भीतर विवेकमुनिसे दवा लिम्पा, मक अधीक्षम यथा वहि खपान्या वारिगाऽऽत्मभ् ।४। से ही, जैसे कोई भरणिमनसे उत्पम अम्निको बरसे मुभा दे ॥४॥ दवा फैलासमगमत् स तं दपा मावर । महसि महा भूगु केल्यसमें गये । देवाधिदेष मसान् शाहरने जब देश कि मेरे भी माजी आये हैं, तप परिरग्धु समारम उत्थाय प्रावर मुदा ॥५॥ | मोंने बड़े आनन्दसे सड़े होकर मम भन्मिन करने के लिये मुनाएँ पैन दा ॥ ५ ॥ परन्तु महर्षि नैन्छस्वमस्युत्पथग इति दयश्चुप ह । मृगुने उनसे आशिन करना स्वीकार न किस और सुम रोक और केकी मारा उस्मान करते हो, इसलिम्प मे तुमसे नहीं मिलना ।' गुजरीकी शूलमपम्प तं इन्तुमारेमे तिग्मलोचनः ॥ ६॥ यह बात सुनकर भगवान् शहर धर्म मरे तिरमिन्म ठठे। उनकी मास चा गयी । उन्होंने त्रिशूल व्यापार पविस्वा पादमादेवी सान्त्वयामास व गिरा। महर्षि भृगुको म्परना पाहा ॥ ६ ॥ परसु उसी समय भापती सतीने उनके चरणोंपर गिरकर बहुत अनुनय- फिनय की और किसी प्रकार उनका मोष यन्त किया। मधा बगाम पैकुण्ठं यत्र देवो धनार्दनः ॥७॥ अहा मगजी भगवान् विष्णुके निवासस्थन प्रमुख गये ॥ ७ ॥ उस समय भगवान् विष्णु ममीकी गो में समान भिय उत्सङ्ग पदा वक्षसवारपत् । कहा- अ०८९] ६८७ सत उत्थाय भगवान् सहलक्ष्म्या सांगतिः॥८॥। उनके मक्ष स्मयपर एक मत कसकर जमा दी। भक्त- NEर भगवान् विष्णु सभीजीके साप वैठे और पटापट स्वल्पादवरूपाभ ननाम शिरसा मुनिम् । अपनी शप्यासे नीचे उतरकर मुनिका सिर झुकाया, प्रणाम किया । मान्ने कहा- | आपका आइये स्वागत मन् निपीदानासने क्षणम् । स्वागत है, भाप मले पयारे । इस आसनपर बैठकर कुछ क्षण विधाम कीजिये । प्रभा ! मुस भापक पुमागमनका अमानतामागतान् पा वन्तुमरंप न प्रभो ॥९॥ पता न पा । इसीसे म आपकी अगवानी न कर सका । अतीव फोमलो तात चरणों ते महामने । मेरा अपराध क्षमा कीजिये ॥८९॥ महामुने ! आपके चरणकमल अत्यन्त कामत है।' यों कहकर भूगुजीके इत्युक्त्वा विप्रचरणौ मईयन् स्वेन पाणिना ॥१०॥ चरणोंको मगधन् अपने हापोंसे सहत्मने लगे ॥ १० ॥ और ओले–माह ! आपके चरणका जा सीयोंका भी पुनीहि सहलाफ मां लोफपालांध मद्तान् । तीर्य बनानवाल्य है । आप उससे बैकुण्ठ श्रेक, मुष्ठे और मेरे अंदर रहनेशने लोक्यारोंको पवित्र कीनिये ॥११॥ पादादकन भरवस्तीर्थानां तीर्थकारिणा ॥११॥ मान् ! आपके चरणकममोंक स्पर्शसे मेरे सारे पाप धुल अचाई भगवरलक्ष्म्या आस मेफान्तभावनम् । गये। मात्र में लक्ष्मीका एकमात्र वाध्य हो गया । मन आपके चरणोंसे चिदिन मेरे व समर लक्ष्मी पत्स्सस्पुरसि मे तिर्मवत्पादहताहसः ॥१२॥ सदा-सपा निवास करेंग ॥ १२ ॥ श्रीमुक उपाय भीमुकदपजी कहत है-स भगवान्न घरफ्त गम्भीर पाणीसे इस प्रकार कहा, ता भूगुनी परम पुस्ली एक हवाण पाठ भृगुस्तन्मद्रमा गिरा । और तृप्त हो गये । भफ्रिके उसकसे ठनका गन्य मर निप्रसस्तपितस्मणी भचयुत्कण्ठाऽनुलाचनः॥१३॥ माया, मौर्यो, घाँस छम आये बार वे पुर। पुनध सनमायन्य मुनीनां प्रह्मवादिनाम् । गये ॥१३॥ परीक्षित् ! मृगुजी कहांसे सटकर ग्रामपदी | मुनियोंक सत्सङ्गमें आये और उन्हें प्रमा, शिव बार खानुभूतमझेपेण रामन् मगुरवर्णयत् ॥१४॥ विष्णुभगवानक पाई जो युछ अनुमत्र हुआ था, यह सब वनिशम्पाय मुनपो पिसिसा मुक्तसंशयाः । | पर सुनाया ॥ १९ ॥ भूगुनीका अनुभव सुनकर समी ऋषि-मुनियोका बड़ा विस्मय हुआ, उनका सम्का दूर भूपाम श्रदधुर्विष्णु यतः शान्तिर्यसाऽभयम् ॥१५॥ होगा । तयसे वे भगवान् विष्णुको ही सर्वश्रेष्ठ मानन धमा साधान् यता मानपैराम्यं तदन्वितम् । गे, क्योंकि वे ही शन्ति और अमपक उद्गमस्थान हैं ॥ १५॥ भगवान् विष्णुसे ही साक्षात् धम, शान, एव चारधा यमाद् यशपात्ममलापहम् ॥१६॥ गग्प, अाठ प्रभारप एचर्य और पितको शुद्ध करन मुनीनां न्यस्तदण्डानां शान्तानां समपेठसाम् । पास्य यश प्राप्त होता है ॥ १६ ॥ शन्त, समचित, आहेचनाना साधूनां यमाहु परा गतिम् ॥१७|| अकिशन और सवरा अमय दनवाने साधु-मुनियोंकी वे ही एकमात्र परम गति है। एसा सार शाख पाते सत्त्व यस्स प्रिया मूर्तिमायणास्पिष्टदेवता । है ॥ १७ ॥ टन प्रिय मनिह सत्र आर इरादा , भरा।२ मागमन ण । गुस्न मद्रया।

૧૮૮ भीमसागवड सूत उपाए भजन्यनासिप शान्ता या निपुणमुड्यः ॥१८॥ प्राह्मण । निष्काम, शान्त और निपुणभुति ( NिE सम्पन ) पुरुष उनफा भजन करते हैं ॥१८॥ भगवान विविधाकृतयम्तस्स राक्षसा असुरा सुराः । की गुणमपी मायाने राक्षस, असुर और दक्पा ये तीन मनियों ना दी हैं। इनमें सत्तमपी मूल ही उनकी प्रातिका साधन है । ये स्वयं ही समर गुगिन्या मायया सृष्टा मस्य तत्तीर्थमाधनम् ॥१९॥ पुरुपायसरूप हैं ॥ १९ ॥ भीक उपाप मीशुकदेवजी कहत है-परीक्षित् । समस्तीप्टर ऋषियोंन अपन लिय नहीं, मनुष्योंका सशप मिटान एग मारम्वना रिमा नगो समयनुचये । लिय ही एसी युक्ति रची थी। पुरुषातम भागना चरणकमलोंकी सेवा करक उन्होंन अपा परमार पार पुरुपय पदाम्म साया तहतिं गता ॥२०॥ किया ॥२०॥ स्वमी कहत है-शानकादि ममियो । भान पुरुपोचमपी यह कमनीय कीर्ति वसा जन्म-मृत्युमपस्सर इपत मुनितनयास्पपनगम के भपरे मिग्रनवारी है। यह प्यासननन भगान् धीमुकदवनीक मुस्थरचिन से निकारी । मुभिनय पीयूपं भवभयभित् परम पुस । मधुमपी सुनधारा है। इस समारकर पा जा टाही मुश्ताक श्रवणपुरै पिरत्यभीक्ष्ण अपन कानोंके गेनोंसे इस निरन्तर पान याता रहा। | उसकी सारी पाक्द, जा जगत्मे पर उभर भटरनमे पाऽप्यभ्रमणपरिश्रम जहाति ॥२१॥ हानी है, दूर हो जाती है ॥२१॥ भीनुरु उबाप भी गुरुपयजी करत-पाभित् । एक नि परदा शरवस्यां तु विप्रपल्या! मारक । बात है, शरफपुरीम किसी ममणीय गर्भसे एक पु पैग हा, 'मम्नु भइ उसी समय भी स जातमाया सुम्पन ममार किन भारत ||२२|| हम गया ॥२॥ मग भान यारमा मनपर त्रि गोवा मृत राजदार्पपधाय म । गजम्हनक गारपर गम और वह उसे र १६ मायाग वितपमातग दोनमानसः ॥२३॥ आतुरता और दुम्म मनसे विमा काम रहन रंग-॥२३॥ मम सन्दर नरि प्रअरिस माधिपा नुन्धस्य विपयात्मना। पून I am सिपी गजा र यमरस sit धपर पा समदापात् परं मगताऽमा ||२| रार अजिना यदा-14 उमे गय मना | कामी पागुर ॥१॥गा गया रिसर दिमागिदार नृपति इमानमजितन्द्रियम् । मेरा सनमर्ग 41 PRIF गगनी र उमा मामन मएम प्रवाभमन्य मीदन्ति दरिद्रा निम्पद मिना ॥२५॥ अनन पनिीय रिप्रपिन्नीर्य परमर ९ | मा भारती नीमरत 1 श र सिप पारिनो गापा ममगापन ॥२६॥' या it in ॥२६॥ रा || नात् 'प्रसर बने कंग म० ८९] ६८९ । मामण उपार सामर्जुन उपचस्प करिचित् केन्नवान्तिक । नर्वे याय्यके मरनेपर जब वह यहाँ पाया, तप उस समय भगवान् श्रीकृष्णक पास अर्जुन भी बैठे लुए थे। उन्होंने परेते नरमे माले प्रापणं समभापत ॥२७॥ | ग्रामगी वात सुनकर उससे कहा--- ॥ २७ ॥ "प्रान् ! आपक निवासस्थान द्वारकामें कोई धनुषधारी क्षत्रिय किखित् नमस्स्वभिवासे इह नास्ति धनुर्धरः। नहीं है क्या । मालूम होता है कि ये यदुवंशी प्रक्षण हैं और प्रजापानका परित्याग करक किसी यमें बैठे राजन्परघुरते में मारणा सत्र आसते॥२८॥ हुए ॥ २८ ॥ स्निफ राज्यमें धन, सी अपवा धनदारात्मप्रापक्ता पन शोषन्ति प्रामणाः । पुोंसे मियुक्त होकर बामण दुखी होते हैं, वे क्षत्रिय नहीं है, क्षत्रियके चपमै पेट पालनेवाले नट है। उनका से वे राजन्यवपेण नटा जीफन्स्यसुम्भराः ॥२९॥ जीवन व्यर्थ है ॥ २९ ॥ भगवन् ! म समझता हूँ कि आप स्री-पुरुष अपने पुत्रों की मृत्युसे दीन हो रहे हैं। अब प्रजा वो भगवन् रक्षिप्ये दीनपारिह। मैं भापकी सन्तानकी रक्षा करूंगा। यदि में अपनी प्रतिश पूरी न कर सका, तो अगमें कूदकर ना मलंगा अनिस्तीर्णप्रतिज्ञोऽग्नि प्रपेक्ष्य हवफल्मपः ॥३०॥ धौर इस प्रकार मरे पापका प्रायथित हो जायगा ।३०॥ ग्राह्मणन कहा-अर्चन । यहाँ कामरामनी, भगवान् ध्रीकृष्ण, धनुधरशिरोमणि प्रधुम्न, अद्वितीप याना अनिरुद संकपणा वासुदेव प्रघुम्नो धन्विना परः। भी जम मेरे बायॉमी रक्षा करने में समर्थ नहीं है, इन अनिरुयोऽप्रतिस्थो न पातु शयन्ति यत् ॥३१॥ | जगरीबरोंके गिय भी यह काम कठिन हो रहा है, तब वत् कथं नु भवान् फर्म दुष्कर नगदीमरै । तुम इसे पासे करना चाहते हो! सचमुच यह तुम्हारी मूना है । हम तुम्हारी इस बातपर सिकुछ विश्वास चिकीर्षसि स्त्र वालिस्यात् तमामहे वयम्॥३२॥ नहीं करते ॥ ३१ ३२ ॥ मधुन उमाप मजुनन कारा-प्रान् ! मे कराम, श्रीकृष्ण भयया प्रद्युम्न नहीं हूँ। म है अर्जुन, बिसफा गडीष नामय नाई सफणा प्रदान न कृष्णः काफ़िरव च । धनुष विचविस्मात ॥ ३३ ॥ प्राह्मणदस्ता आप अदमा अर्जुना नाम गाण्डीव यस्य प धनु ॥३३॥ मर वटपौरुपया तिरस्कार मत कीजिय । अप जानत नही, म अपन पराक्रमसे भगवान् शहरका सन्तुष्ठ पर मायमम्पा मम ब्रह्मन् वीर्य समकतापणम् । गुम ई । झामन् ! मैं आपसे अधिक स्पा पई, में मृत्यु विजिस्म प्रधने आनेप्य ते प्रजा प्रभा ॥३४॥ ॥ ३ ॥ युद्धमें साक्षात् मृत्युका भी जीतकर पापरी सम्तान टा व विधम्भिता विप्रः फाल्गुनेन परंतप । परीधित् ' बन अनुनन उस प्रमणको इस प्रकार विपास त्रिम तब यह सागोस उनक र गौरपका जगाम म्वगुरप्रीत पार्थपीय निनामयन् ॥३५॥ मगन काना हुआ गरी प्रसालनामे अपने घर छोर प्रगतिनल भामन्न भायाया द्विवमनमः । गया ॥ ३ ॥ प्रमरमा समप निफ्ट आनपर प्राण आनुर हारर पनय "पस आया और कहा - पाहि पाहि प्रजा मृत्याग्न्यिाराजुनमातुर ॥३६॥ 'इस बार नुम मर युग्मा मृत्युम चरा ग || ३६ ॥

प्रवेश करनेवा विचार किप । परत भगवान् श्रीहमने भीमद्भागवत स उपस्पृश्य मुख्यम्मो नमस्तस्य महेभरम् । यह एनकर ह्युनने शुरु मासे मापान निसा का दिव्यान्पखाणि संस्मृत्प सन्नं गामीवमाददे॥३७॥ भगवान् शहरको नमस्कार किया । फिर दिम्म को स्मरण फिसा चौर गणीव धनुषपर मेरीकामा न्यरूपत् सतिषागारं रैर्नानानयोजित । हाप के छिय ॥ ३७॥ र्जुनने पाणको कने प्रकारके पस से वमिमन्धित करके प्रसपनाको विर्मगर्थमधः पार्थभकार भरपञ्जरम् ॥३८॥ चारों बोरसे घेर दिया। इस प्रकार नोंने सक्तिको ततः कुमार सखातो विप्रयत्न्या रुदन मुहुः । ऊपर-नीचे, अगल-अाठ बाणोंका एक विशा-सा बन्न दिया ॥ ३८ ॥ इसके बाद प्राशमीके गर्भसे एक शिश सयोऽदर्जनमापदे सप्तरीरी पिहायसा ॥३९॥ देते व सशरीर भाफाशमें क्न्तर्धान हो गया ॥३९॥ पैदा मुखा, जो मार-बार रो रहा प । परम्म देखते भी वदाऽऽा विप्रो विजयं विनिन्दन् कृष्णसंनिधौ । क्य र प्रमण भगवान् श्रीक्षणके सामने ही बनी निन्दा फरने लगा। पर मोम्य-मेरी मूर्खता के देखो, मौयं पश्यत मे योऽहं था लीपकथनम् ॥४०॥ मने इस नपुस्की संगमरी मार्तोमर विश्वास कर लिया ॥ १० ॥ मय निसे प्रगुम्न, वनिम्स यांत न प्रयुम्ना नानिरुदो न रामोन प फश्वः । कि माम पौर भगवान् श्रीकृष्ण मी न वा सो उसकी रक्षा करनमें धौर कौन सी ॥११॥ पस्स शेखः परित्रातुं फोऽन्यस्तदवितेवर ॥४१॥ मिथ्यावादी भर्जुनको धिकार ! आपने मुँह बनी घिगर्जुनं मृपावाद धिगात्मसापिनो धनुः । क्लाई करनेवाले मनके धनुषको विकार है। दुईद्धि तो देखो ! ५ इतावश उस पास्को मेय देवोपसाट यो मौदमादानिनीपति दुर्मतिः ॥४२|| छाना चाहता है, जिसे प्रारम्चने हमसे कम कर रिप ॥१२॥ एवं शपति विप्रो विधामास्याप फाल्गुनः । का यह प्रमाण इस प्रकार में मम पुरा कहने यमौ सयमनीमाच पत्रास्ते भगपान् यमः ॥४३॥ महा मायान् यमराज निवास करते हैं ॥ १२॥ गाँ प, तब अर्जुन योगकम्से तक संपानीपुरीमें गमे विनापत्पमपक्षाणस्तत एन्द्रोमगात् पुरीम् । में प्रमणका बारस्क नहीं मिल । मिरा लेकर क्रमश द, मम्नि, मिति, सोम, क्यु बोर काम आग्नेमी नाती सौम्पो पापम्पो पारणीमध। आदिकी पुरिपोमें, प्रतापदि नीके प्रोम, ससे उपरक महकादिमें एक अन्याय स्मामि गये ॥११॥ रसातल नाकपृष्ठं धिप्पान्पन्मान्यदायुधः॥४४॥ परन्तु कहीं भी उनका मम न मित्र ! तताऽलन्धप्रियता पनिस्सीणेप्रविश्वत । उनकी प्रतिज्ञा पूरी न हो सकी। वा मोंने मम्निमें अग्नि पिपिशु कृष्णन प्रत्युक्त प्रतिपेयता ॥४५॥ उन्हें ऐस फरनेसे रोकते हुए 8-1 १५ ॥ भर्ना अधुन ! तुम अपने बाप अपना तिरस्कार मत करो। दये दिसमस्त मावशात्मानमारमना । में तुम्हें प्रमणके र बाफ ममी दिनये देता है। . १ गमागमभम् । फिर १०८९] दशम स्कन्ध ६९१ सेना कीर्ति विमलां मनुष्याः सापयिप्पन्ति॥४६॥| आज जो स्येग तुम्हारी निन्दा कर रहे हैं, वे ही फिर हम मेगांकी निर्मल कीर्तिकी स्थापना करेंगे ॥१६॥ इति संभाप्प भगवानर्जुनेन सोचरः। सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार सममा- सुधाकर घजुनक साय अपने दिम्प रपपर सत्र गए दिर्मा स्वरभमासाय प्रतीची दिशमाविशत् ॥७॥ और पश्चिम शिाको प्रस्थान किया ॥ १७ ॥ टन्होंने सप्त दीपान सप्त सिन्धन् सप्तसप्तगिरीनध । सात-सात पवतोमारले सात शीप, सात समुद्र और लोका- मोफर्मतको उपफर मार मन्धकारमें प्रवेश किया ॥१८॥ लोकाठोकं तयातीत्य मिपश सुमहचमः ॥४८॥ परीभिस् ! वह अन्धकार इतना मार कि उसमें तत्रापाः म्यमुग्रोपमेषपुप्परलाहकार । शैन्य, मुनीष, मेघपुष्प भीर माहक मामक चारों घोरे अफ्ना मागे भूलकर इधर उपर मफल टगे । ठने कुछ समसि भ्रष्टगठयो पम्पर्मरतर्षभ ॥४९॥ समता ही न या ॥ १९॥ योगेनोंक भी परमेपर तान् रन भगवान् कृष्णो महायोगेम्परेपरः । मावान् श्रीकृष्णने घागेकी या दश दासकर पपन साहस-सहस्र सूर्योकि समान तेजसी पन्यो आगे चलनेकी सहस्रादित्यसमाशं सपर्क प्रारिमोद पुराः ॥५०॥ बना दी ॥ ५० ॥ मुदशन घझ अपने म्योतिर्मप समः सुपोरं गहन स्व मा वेनसे स्वयं मावान्के वारा अपम उस घने एवं महान् बन्धकारका चीरता तुला मनके समन तीज गतिसे धागे पिदारय मुरिवरेण राषिपा । । आगे चस्म । उस समय यह ऐसा जान पता पा, मानो मनोजवं निर्विनिशे सुदर्शनं झापान् रामका वाण धनुपसे छूटकर राक्षसोंकी सेनाम प्रवेश कर रहा हा ॥ ५१ । इस प्रकार प्रदशन चक्रक गुमम्मको रामनगे यथा घम् ॥५१॥ हरा पाल्पये हुए मार्गसे क रय अन्धकारकी द्वारण धनानुपपेन तवमा अन्तिम सीमापर पहुँचा । उस अवारके पार स्वयष्ठ पारावाररहित न्यापक परम ज्योति मगन रही पी। पर पर न्पातिरनन्तपारम् । उसे देखकर असुनही घोसे पीक्मिा गपी पौर उम्होंने समश्नुवान प्रसमीक्ष्य फारगुना विवश होकर अपने नेत्र बंद कर लिये ॥ ५२ ।। इसके वार भगवान्के रयने दिम्प चरम्यधिर्म प्रवेश प्रताडितायोऽपि ऽषिणी उम ॥५२॥ किया। वही तेन मोधी पछनेक कारण उस बसमें ततः प्रविष्टः सरिल नभस्मता बड़ी-बड़ी सळ ही पी, पो बहुत ही भये माश्म होती थी। यहाँ एफ का मुन्दर महत पा । टसमें पलीपसैनधार्मिम्पमम् ममियोंके सहसास सेम चमक-धममसर उसकी तत्रानुर्व पै भवन पुमधर्म छोम मा रहे थे और ठसक पारों भार भनी उम्पक म्राजन्मजिस्तम्भसहस्रशाभितम् ॥५३॥ ज्योति फैल रही थी॥ ५३॥ उसी म्हमें मगवान् शेषनी विराजमान थे। उनका शरीर अत्यन्त भयानक तमिन् महाभीममनन्तमत और बदमत प । उनक सवरिये और प्रत्येक सासमभन्यममामणिमिः फागपर मुन्दर-सुन्दर मगिों अगमगन रही पी । प्रत्येक १ पमपर । मपर्व ।। पुति ।

। । जब भावान् भूमा पुस्मन श्रीकृष्ण और अनुनको | करके उन नमस्कार किया और चा आनन्दका ६९२ श्रीमद्भागवत [२.५ विम्राजमानं दिगुणोपमेषर्ण | सिरमें दो-दो नेत्र थे और ये वो ही भपार थे। सितापलाम शितिकण्ठबिहम् ॥५४॥ उनका सम्पूर्ण शरीर कैससके समान श्वेतवर्णा प और गम तथा जीम नीले रंगकी पी ॥ ५१ ॥ ददर्श तद्भोगसुखासन विस परीक्षित् ! अर्जुनने देख कि शेयभाबन्फी मुखमली महानुभाष पुरुषाचमोसमम् । शय्याफ्र सर्वम्यापक महान् प्रभवशाली परम पुज्यम सान्द्राम्मुदाम सुपिशवासस भगवान् विराजमान हैं। उनके शरीरकी शान्ति पर्व प्रसस्वयं रुचिरायतेषणम् ॥५५॥ कालीन मेघके सम्पन श्यामल है । अफ्त सुन्दर प्रज महामगिवातकिरीटकमाल वस्त्र धारण किये हुए हैं। मुखर प्रसमता सेन यी है धौर महे-या नम्र बहुत ही सुहावने उनसे ॥५५५ प्रभापरिधिप्तसहस्रकुन्तलम् वाम्म्य मणियोंसे नटित मुकुट और कुम्ममेकी पत्तिसे प्रलम्पचाष्टमर्ज सकौस्तुम सासों घुघराठी वलकै घमक रही है। नी-मी भीवस्सलक्ष्म वनमालया वृतम् ॥५६॥ | सुन्दर बाठ मुमाएँ ।, गहमें कौस्तुभ मणि है, क- सुनन्दनन्दप्रमुलै स्वपार्पदे सम्पर श्रीक्सका पिछ है और पुग्नोंतक काममा | खटक सी है ॥ ५६ ॥ अर्जुनने देख कि उनके नम् ममादिभिर्मूविधरैनिंजायुधैः । मुनन्द आदि अपने पार्षद, घर-सुदर्शन अPि भरने पुष्टया प्रिया कीर्पजयाखिलदिभि मूर्तिमान् आयुध तथा पुष्टि, श्री, कीर्ति और वा- निषेप्यमाण परमष्ठिना पतिम् ।।५७।। ये चारों शफिया एष सम्पूर्ण भूदियों नामादि मेकानाक अधीर भगवान्की सेवा कर रही हैं ॥ ५७॥ परीचित् । ववन्द आस्मानमर्नन्तमच्युता भगवान् श्रीकृष्णन अपन ही सरूप भीअनन्त भगवानको जिष्णुष सदनिजातसाचसः। प्रणाम किया । अर्जुन उनके दर्शनसे कुछ भयभीत हो सावाह भूमा परमेष्ठिनां प्रस गये थे, श्रीकृष्णके यार उन्होंने भी उनको प्रमाम किया पदान्जली समितर्बया गिरा ॥५८॥ वालों के स्वामी भूमा पुरुस्न मुसकराते एम और वे दोनों हाय बोरकर सह हो गये । यस प्रति विजात्मजा मे युषयोर्दिामा एवं गम्भीर नाणीसे कहा-५८॥ भीम ! कोर मयोपनीता भुवि धर्मगुप्तये । अर्शन ! मैने तुम दोनोंको देखने के लिये ही पर याक अपन पास मग्न किये थे। तुम दोनोंने धर्मी कलावतीणाववनमेरासुरान् रक्षाके छिये मेरी कस्यों के साप पृषीपर कतार मान इस्पेर भूपस्स्वरयेतमन्ति म ॥५९॥ सेशी मुममेग फिर मेरे पास मोट बाओ ॥ ५९ ॥ स्सिा है, पृप्पीके भरम्प देत्योंका सहार फरक धीम पूर्णकामावपि पुर्वा नरनारापमापी । सुम दोनों अस्विर नर और नारायण हो । यपरि कम पूर्णकाम और सर्वश्रेष्ठ हो, फिर भी जगकी सिप्ति धममाचरवां स्थित्यं अपभी लाकसग्रहम् ॥६ ॥ और डायसंप्राक पि धर्मका आचरण परो' ॥ ६० इत्यादिष्टी भगमता वी कृष्णौ परमष्ठिनी । इस प्रकार आदेश Pपा, तब उन मंगोन उसे सीकर आमिस्यानम्प ममानमादाय द्विवदारकान् ॥६॥ मामण पायोको मार निस यस्तसे जिस प्रकार अप भूप वमम्पुर्व । । स बार भूना पर I४ मो।

अ० ९०] दशम स्कन्ध ६९३ न्मपर्वतां सर्क थाम सम्प्रटी पथागतम् । थे, उसीसे वैसे ही द्वारका यैट थाये । प्रक्षगके वारक अपनी आयुके अनुसार यह वा हो गये थे। उनका विप्राय ददतुः पुत्रान् यथारूपं यभावया ॥२॥ मप और आकति पैसी ही थी, चैसी उनके मक समय पी । म्हें भाषान् श्रीकृष्ण धौर पनने उनके निशाम्प यमन धाम पार्थ परमविस्मित । पिताको सौंप दिया ६ ६१६२ { भगवान् विष्णुके उस परमधामका सकर अजुनक साधर्यकी सीमा न रही। उनोंने एसा अनुभव किया कि बीमेिं जो कुछ कछ- यत्किषित पौसा पुंसो मेने रुप्मानुफम्पितम्।।६३|| पोप है, यह स्व भाषान् श्रीकृष्णकी ही कृयाका फळ है॥ ६३ ॥ पीमित ! मगधन्ने और भी ऐसी भने इदीग्धान्पनेकानि पीयाणीह प्रदर्शयन् । एपर्य धीर वीरतासे परिपूर्ण स्ल्यएँ की । लोकाटिमें सधरण येगोंक समान सांसारिफ विषयों का मोग किया पुसजे विषयान् ग्राम्पानीज चात्यूजिमखैः ॥६॥ और या-बड़ महाराजाओंके सम्पन श्रेष्ठ श्रेष्ठ पर किसे ॥ ६ ॥ भगवान् श्रीगने सादर्श महापुरुषोंका- प्रववपाखिलान् कामान् प्रमासु प्रामणादिपु । समाचरण करते हुए प्रक्षण यादि समस्त प्रनाकोक सरे मनोरथ पूर्ण किये, टीक वैसे ही, वैसे इन्द्र प्रजाके यथाकाले यथेषन्द्रा भगराष्ठधमाम्पित ॥६५॥ लिये सम्पानुसार वर्षा करते हैं ॥ ५॥ उन्होंने यहुत-से अधर्मी राजावोंको स्वप मर ान्य घऔर यातों को अर्जुन आदिके द्वारा मरवा राज्य । इस प्रकार इवा नृपानधर्मिष्ठान् पातयित्वासेनादिभिः । धर्मराज युधिष्ठिर जारि धार्मिक राजोंसे उनझेने मनापास ही सरी पृथ्वीमें धममर्यादाकी स्थापना करा अअसा वर्तयामास धर्म धर्मसुधादिभि ॥६६॥ दी॥६६॥ इति भीमागवत महापुराणे पारम्स्या संहितापां रामफत् उत्चरावे निमकुमागनयन नाम एकोननवतितमोऽध्याय ॥ ८९ ॥ अथ नवतितमोऽध्याय भगवाम् रुमके श्रीमपिहार बम भीमुक उवाच श्रीगुरुपोकापरीक्षित ! शरफानगरीकी ध्या सौकिक पी। उसफी साफ मा चूते हुए मत- मुम्न स्वपूयो निवसन् धारकायां श्रियापतिः । वास हारियों, मुसन्नित यादाओं, घोड़ा और खणमय सबसपत्समृदार्मा जुष्टापां मिपुङ्गाय ॥१॥ रयोंकी भीइसे सा-सा भी रहती थीं । विधर दक्षिय, उपर ही हरे-भर उपवन और उपान म्हग रह खीभिमाचमषपाभिषयौवनम्नन्तिभिः है। पात-क-यौन स स एद हुए है। उनपर फन्दुकादिभिम्पुि फ्रीरन्तामिस्तरिखपुभि ॥ २॥ | भेटकार भीर गुनगुना रहे हैं और तरह-तरहक पक्षी १०पा पम् । २ हिमपगारप।

६९४ श्रीमद्भागवत [.. । निस्पं संग्छमार्गायां मदम्युद्धिमतगजैः । फत्व कर रहे हैं। इनगरी सम प्रकारको सम्पतियोंसे मएर पी। नगरके श्रेष्ठ वीर यदुवंशी उसका सेकस स्वलकमेटेरचे स्पैम फनफाज्यलेः ॥३॥ करनेमें अपना सौमाम्म मानते थे । यहाँको किया सदर वेष-भूषासे विभूषित पी और उनके वापसे उपानोपवनापायां पुष्पितQमराजिषु । पानीकी छटा छिटकती राती पी। वे सामने महम गेंद पादिके सेस खेलती और उनका पर्ने का निर्विषवसाविहगर्नादिताया समन्ततः॥४॥ कमी दीस जाता वो ऐम बन पाता, मनो विमी पनक ही है । समीपति मगवान्फी यही बफ्नी मगरी धारका रेमे पोरथसाहसपसीनामेस्वरलभा। पी। इसीमें वे निवास करते थे। मगवान् सय | सेवा हमारसे अधिक पत्नियोंके एकमात्र प्रागसम्म सापदिपिवरूपोऽसौ तवशेष मार्दिषु ॥५॥ थे। उन पनियोंके याचा महल मी परम ऐमस सम्पन्न थे। जितनी पत्नियों पी, उसने ही का रूप धारण करके वे उनके साथ हिार करते थे ॥ १५ ॥ प्रोफलोत्पलमहारदाम्भोबरेणुभिः । सभी पत्नियों के मामें दर-सुन्दर सरोदर थे । उनका निर्म जल मिले हुए नीले, पीले, श्वेष, कर वासिवामलचोयेषु जद्विजासेषु च ॥६॥ यादि मति भौतिके कमलोंके परागसे महकता रहता पा। उनमें ई-केर हंस, सारस बादि मुन्दर-सन्दर विवहार विगामाम्भो इदिनी मादयः । पक्षी चहफते रहते थे। भगवान् श्रीकृष्ण उन राश तपा कभी-कमी नदियोंके में भी प्रवेश कर अपनी पत्निय के साप विहार करते थे। मगान्के चशमलिप्तामा परिरग्धप योपिताम् ॥७॥ साप निहार करनेवाम पनियाँ जब में अपने मुम् पाशमै बाँध लेती, बाझिन करता, तब मान्के उपगीयमाना गर्मृदङ्गपणानकान् । धीमें उनके पक्ष स्पष्मी केसर जाती पी॥ ६-७ ।। उस समय गन्धर्व उनके पास गन करने वादपबिर्सदा वीणां मतमागधमन्दिभिः ॥८॥ गवे वौर स्त, मागध एवं दीमन को वानन्दसे पफ टोल, नगरे वीर वीणा वादि वाजे बजाने गवे ॥ ८॥ सिष्यमानोऽच्युतस्ताभिसन्तीभिःस रचः । भावान्की पत्नियाँ कभी-कभी सस्ते शिप कारियोंसे उम्में भिगो देती ।ये मी उनको र मर प्रतिपिधन् विचिकीर यधीभिर्यधरारिष ॥९॥ । इस प्रकार मगवान् वानी पनियों सार श्रीम फरते मनो फराज कुमेर यक्षिणियोंके साप विहार कर | रेशे ॥ ९ ॥ उस समप भावान्सी पनियों वा: फिभवननिश्वानुषपदशा स्मत और नंगा यादि भीग जाने माग उनमेंसे भम्पने उगते । उनी पड़ीगी पार्टियों और सियम्य उपहस्कारप्रमना । मिसे गुपे हुए मिने मते, वे उ भिरते- परिमि ३.९० दसम स्मात्य ६९५ फान्त स रेचरभिहीरपयोपगुम मिगोते पिचकारी छीन लेनेके लिये उनके पास पहुँच जाती और इसी बहाने अपने प्रियतमका मागिन मर बावसरोत्सपलसमदना विरेजः ॥१०॥ लेती । उनकं स्पर्शसे पत्नियों के इसमें प्रम-भरकी अमिादि हो जाती, जिससे उनका मुस्कमा सिल कृष्णस्तु सत्स्तनषिपजिवामना उठता । ऐसे अवसरों पर उनकी शोभा सौर मीना जाया करती ॥१०॥ उस समय मावान् श्रीकृष्णकी बन मात्र उन रानियों के पक्ष सम्पर स्पीई केसरके रंगसे क्रीडाभिपतइन्तलपन्दषन्धा । रंग नाती । विहार में बापत मान होजानके कारण पुंषराठी अमेठमुक मावसे हराने लगतीं । वे अपनी सिधन्सर्यतिभिः प्रविपिम्पमानो | रानियों को बार-बार मिगो दते और रानियों भी उन्हें सरन्योर कर देती । भगवान श्रीकृष्ण उनके साप इस प्रकार हिल करते, मानो पार गनराज इपिनियोंसे रेमे फरणुभिरिवेभपतिः परीतः ॥११॥ धिरफर उनके साप फीग कर रहा हो ॥ ११ ॥ भगवान श्रीकृष्ण और उनकी पलियाँ क्रीया करनेके बाद नगना नीनां च गीतमाधोपबीविनाम् । अपने-अपने मनामूपण उतारकर उन नटों और नर्तकिमों- को दे दे, जिनकी जीविका केश्ठ गना-बजाना ही क्रीरालंकारवासांसि रुप्मोदाचस्स च सिप ॥१२॥ है॥ १२ ॥ पीभित् ! मानान् इसी प्रकार उनके साप विहार करते रहते । उनकी चाटदाय, बातचीत, चितफ्न-मुसकान, हास- विस और वाजिन भादिसे कृष्णस्पेन विहरतो गत्पालापवितमिते । | रानियोंकी विभूचि नहीकी ओर सिंची रहती । उमें और किसी यातका स्मरण ही मत।॥ १३ ॥ नमस्येतिपरिप्पड़े खीणा किल सा दियः ॥१२॥ परीक्षित् । रानियोंके जीवन-सर्वस्त, उनके एकमात्र हृदयेपर भगवान् भीरम्णी येवे कानयन स्पाम- उनुभमन्दकधियोऽगिर उमघवसरम् । मुन्दरके चिन्तनमें ही इतनी मम्न हो जाती कि कई दरतक सो सुप ही राती और फिर उन्मत्तके समान असम्बद यतें कहने व्यवी । कभी-कभी तो मामान् चिन्तयन्स्पाऽरपिन्दा तानि म गदतः शृण॥१४॥ श्रीकृष्णकी उपस्थितिमें ही प्रमोन्मा के कारण उनके मिहका अनुमव करन याती। और न आने क्या-क्पा पहने टाती । म उनकी बात तुम मुनाता हूँ ॥१२॥ कररि मिलपसि व पीतनिद्रा न शेषे रामियां पली-भी पुरी ! भर वो सी रस्त हो गयी है । ससारमें सब भार सपाट व गया। खपिविजगति राम्पामीपरो गुप्तमाधा। देस, इस समय म्पर्य मगवान् अपना अखण बोध शियाफर सा रह और तुम नारी महीं आती। ह इस तरा रात-रातभर जगकार मित्यप क्यों कर सी पसमिव सम्बि ऋषि गादनिर्भिमपेता है। सही । कही कमलनयन भगवान्क मधुर हास्प | और प्रिमरी उगर ( मी निस्पक) चितपनसे से नलिननयनरासादारलालेधितन ॥१५॥ एप भी हमारी ही सह धि तय नहीं गया है | ॥१५॥ १ मि १२ त्रिप महिप्प उपुः

नेत्र निमीलयसि नकमष्टपन्धु
।
| प्रियतम जैसा ही। काश्प ही तुम स्थनिम्न
६९६
श्रीमद्भागवत
[.
भी चकली । तूने रातके समय अपने नत्र क्यों
बंद कर किये हैं। क्या तेरे पतिदेव कही विदेश को
स्त्वं रोखीपि फर्मपत चक्रवाकि । गये है कि इस प्रकार काम स्वरसे पुकार रही है।
हापसाय | तब वो न पड़ी दुखिनी । परन्तु हो-न
दास्पं गता पयमिवाच्युतपादयुष्य
हो तेरे दयमें मी हमरे ही समान भगवान्की दास
होनेका मान जग गया है। क्या अब उनके चरमोपर
किं वा सर्व स्थायसे फपरेग पोढम्॥१६॥ | चायी हुई पुष्पोंकी मश्र अपनी घोटियोंमें धारण करना
चाहती है।॥१६॥
मा भोः सदा निम्नसे उदन्व
अहो समुद्र ! तुम निरन्तर गरजते ही राते हो।
सुम्हें नीद नहीं आती या बान परता है तुम सदा
मलग्धनिद्रोऽधिगतप्रजागरः जागते एनेका रोग ला गया है। परन्तु ना नाही,
हम सम्म गपी, हमारे प्यारे श्यामसुन्दरने तुम्हारे बैंक,
किंवा मुझन्दापहवात्मलाम्छनः गम्भीर्य आदि स्वामात्रिक गुण मन छिये हैं । या इससे
सुम हमारे ही समान ऐसी व्याधिक शिकार हो गये हो,
प्राप्त दक्षा त्वं च गवो दुरस्पयाम् ॥१७॥ जिसकी कोई दया नहीं है ! ॥ १७ ॥
स्व पक्ष्मणा बलपसासि गृहीत इन्दो चन्द्रदेव ! तुमें बहुत बड़ा रोग राजयक्ष्मा हो गया
है। इसीसे तुम इतने क्षीण हो रहे हो। अरे राम राम,
पीपस्तमो न निजदीधितिभिःक्षिणोपि। अय तुम अपनी किरणोसे अधेरा भी नहीं हटा सकते !
क्या हमारी ही मति हमारे प्यारे श्यामसुन्दरसी मी-
फधि समन्दगदिवानि यथा वयं त्वं
| मीठी रहस्पकी बातें भूल जानेके फारम भुमारी गोली
बंद हो गयी है। क्या उसकी पितासे तुम मौन हो
विस्मृत्पभोः सगितगीरुपलक्ष्यसेनः॥१८॥ रहे हो ॥ १८ ॥
किन्साचरितममामिर्मलयानिल तेऽप्रियम् ।
ममयानिस ! हमने से क्या मित्र
हमारे एयमें कामया सम्बर कर साहै। अरे नही
गोविन्दापागनिभिन्ने दीरयसि ना मरम् ॥१९॥ जानता क्या ! भगवान्की तिरछी चितम्नसे (परा
इय तो पलेसे ही घायल हो गया है॥ १९ ॥
मघ श्रीमंस्त्वमसि दयिता यादवन्द्रस्य नून
श्रीमन् मेव । तुम्हारे शरीरमा सैन्दर्य दो हमारे
भीवत्साईपमिव भषान् ध्यायति प्रमः ।
भगवान्क परम प्यारे हो । तमी तो सुम हमारी ही
मति प्रेमपाशमें घर उनका पान कर रहे थे।
देखो-देसो । मारा दय चिन्तासे मर रहा है, म
अत्पुस्कण्टःशपलरदयाऽमद्विधापाप्पधारा
उनके रिपे अस्पस्त उमटित हो रहे हो ! तभी तो
नगर-पार उनकी यह फरक हमागही भरि आँसूफी
प्रग मा रहदा । श्याममन ! सपमुच नस्सामसे
स्थामा मृत्याविसबमि मुहद बदम्त प्रमग्न ॥२०॥ नाता जो ना पर रे पग्न माउ नना ॥२०॥

दशम स्कन्ध • ९०] प्रियरावपदानि भापसे मृत री कोफ्ट ! केरा गय वा ही मुरील्य है, मीठी बोरी बोलनेवाले हमारे प्राणप्यारेके समान ही मधुर संजीविकमानया गिरा। सरमे सू बोलती है। सचमुष तेरी बोल्ममें सुध घोल्म करवाणि किमय ते प्रिप हुई है, वे प्यारेके हिसे मरे हुए प्रमियोंको पियन पाटी है। तू ही पता, इस समय हम तेरा क्या विप षद म परिगतफण्ठ कोक्ति ॥२१॥ ॥ २१ ॥ न चलसि न पदस्पदारमुढे प्रिय पर्वत ! तुम तो घई उदार विचारके हो। तुमने ही पृथीको भी धारण कर स्पस्य है । न तुम विविधर चिन्तपसे महान्तमर्थम् । हिलो हो और न कुछ कहते-सुनते हो । जान पाता है कि किसी बड़ी पायी चिन्तामें मन हो रहे अपि पत वमुवनन्दनाधि हो । ठीक है, टीक है, हम समा गयीं। तुम हमारी माँति चाहते थे कि अपने स्तनोंक समान बहुत-से घयमित्र कामपसे स्तनर्विधर्तुम् ॥२२॥ शिसोंपर में भी भाषान् श्यामसुन्दरके चरणकमउ धारण फः ॥ २२ ॥ शुप्पधदा कर्शितामत मि धुपल्या स्मनफ्टी नदियो । यह भीष्म ऋतु है । मुम्हारे कुण्ड सूस्स गये हैं। अब तुम्हारे अंदर रिले हुए कामों सम्प्रस्पपास्कमलभिप इष्टभर्तु । का सौन्दर्य नहीं दीखता । तुम बहुत दुबळी पती हो गयी हो। जान पस्ता है, जैसे हम अपने प्रियतम | श्यामसुन्दरकी प्रमभरी फितवन न फफर अपना रूप पदद पर्य मधुपतेः प्रणयावलोम खो बैठी हैं और मत्यन्त दुक्ली पतली हो गपी है, वैसे ही हम म मेन के शारा अपने प्रियतम समरफा जउ न मप्राप्प सरदयापुरुकर्शिता: मम ||२३|| पाकर ऐसी दीन-हीन हो गयी हो ॥ २३॥ इस स्वागतमासवां पिय पयो पारेको इस 1 ad, आ ! मल आये, लागत है। भास्नपर बेटा, थ, दूध रियो । शिप हंस ! त्याम- सुन्दरको कार बात तो सुनाओ। हम समनती है कि सुम उनके दूत हो । पिसीक पशमें न होनाले श्याम | सुन्दर सयुसर तो है न ! अरे भाइ ! उनी ममता वो पड़ी अस्मिरणभर है। एफ यत तो पत- म्यो, उन्होंने हमसे कहा कि तुम्हाँ हपरी परम मांनु विदाम कपिदजिवः स्वस्स्पास्त उक्त पुरा। प्रिफरमहा । स्या अप उन्हें यह बात याद । सभा, जाओ हम तुम्हारी अनुनय-विनप नहीं सुनती। जब वे हमारी परया नहीं करते, तो हम उनक पीर स्पों । सुकत ! हम उनक पास नहीं जाती । क्य का! वे हमारी इस पूग परनक पि बाना भारत है, अप्य ! तब उन्हें तो यहाँ अन्य साना, पानपतमाहदा नरवि फसार भत्रामा पर्व हमसे दर्ते काना) परन्तु पी की सपम में मा....८- ६९८ भीमद्भागवत धौद्रालापय कामद थिममृते मनिष्टा त्रिपाम् ॥ | सतत । य स वे उच कर यहाँ नही कम पाते। फेरी बात है। मिनि व्यन एक पत्र हैं, बिना नगन्ते अनन्य प्रन है। स हमसे कम एक मी पैरी नहीं है। ॥ २१ ॥ इतीरसेन भाषेन कृष्णे पागधरमर । परभित्! मीण परियो यारोपरेर मान्य में एक ही नम्प प्रन मात्र रहती है। इससे नाले क्रियमाणन माधन्यो लेभिर परमां गतिम् ।।२५॥ पलाद प्रत किय ॥ २५ ॥ मान् श्रीकृषी बार मनाने प्रभारसे नेफ गातारा म्न की गई ध्रुवमानोऽपि य सीमा प्रसपाकर्पत मनः। हैं। वे इवनी मधुर, इतनी मनोहर है कि उनके सपने | मनसे रियोंका मन क्सत् उनकी बोर लिस है। फिर जो मियो उमें मरने नेसे दस्तीप, अरे उरुगायादगातो वा पश्यन्तीनां गत पुनः ॥२६॥ सम्बन्ध तो कहना ही पाहे ॥ २६ ॥ बिना मागिनी लियोने जागुरु मगवान् श्रीमानको मस याः सम्पर्य चरन् प्रम्णा पाइसंवारनादिभिः । | पति मनफर परम प्रेमसे उनके परणामयको सहलाय, उन्हें नहाया भुम्मा, विनया-पियया, मय-ससे उनकी सेन की, उनकी तफ्स्पामा मर्गम वो भव, सि जगद्गुरुं भर्समुश्या तासां किंधाने सपः ॥२७॥ ही कैसे जा सकता है ॥ २७ ॥ एवं वेदोदित धर्ममनुतिष्ठन् सतां गति । पीचित् ! भगवान् श्रीकृष्ण सपुस्योंकि एमा गृह धर्मार्थकामाना महमादर्शयत् पदम् ॥२८॥ धान्य है। उन्होंने वेदोक धर्मका बार-बार बम करके लेगको पर बात विख्य दी कि पर ही आस्सिसस्स पर धर्म कृप्मस्व गृहमधिनाम् । धर्म और काम–साधनका सान |॥ २८ ॥ स. आसन् पोटशसाहस्र महिप्पम शताधिकम् ॥२९॥ हिम्ये वे गृहस्पोषित श्रेष्ठ धर्मा प्रनय कर पर वासा वीरमभूतानामष्टो या प्रागुदारसा । कर रहे थे। पीशिस् ! मैं तुमसे कह ही जुस ! कि उनकी रानियों की संख्या भी सोम हमार एक रुक्मिणीप्रमुखा राजस्तस्पुत्राधानुपूर्वशः ॥३॥ आठ ॥ २९ ॥ उन श्रेष्ठ नियों से मिगी आदिक एफैकस्सा दश दश कप्णोऽजीजन्दारमजान् । पटरानियों और उनके पुका तो में पहले ही असे यावत्य आरमना भार्या अमोघगतिरीधरः ॥३१॥ PO और कितनी पलिया था, उनसे भी प्रत्येको कर्णन कर पुका हूँ॥ ३० ॥ उनके मतिरिठ मन तेपामरामवीर्यायामप्टादश महारथाः दस-दस पुत्र उत्पन्न किये। या कोई आधी बन आम नुदारयशसस्तपां नामानि म शृणु ॥३२॥ नहीं है । पोंकि भायन् स्वशक्तिमान् और सपसान प्रपुम्नमानिरूप दीप्तिमान् भानुरेय च । १॥ २१ ॥ मगवान्के परम पराक्रमी पुम क्यारा | तो महारपी थे, जिनका पश स्मरे जगहमें फायर साम्बा मधुरहानुधियभानुपरणः ॥३३॥ प । उनक नाम मुमसे सुनो ॥ २२ ॥ प्रपुम्न, भनि- सद, दीप्तिमान् मानु, सम्म, मधु, पत्रानु, पिप्रमनु, पुष्करा पदराडप भूतरपा गुनन्दनः। पुरु, यस्ग, पुपा, दमा नरेव, सुनमन, वि- पिपार्विरूपम फरिर्पग्राम एप प॥३॥ | माहु, विरूप, पनि और म्यग्रोध ॥३३ १४ ॥ राम! ।

१० ९०] एतेषामपि राजेन्द्र तनुजानां मधुदिप । भगवान् श्रीकृष्णके इन पुमि मी सबसे श्रेष्ठ रुक्मिणी भन्दन प्रद्युम्नजीथे । वे सभी गुणोंमें अपने पिता के समान प्रघुम्न आसीत् प्रथम पितृवद् सक्मिणीसुतः ॥३५॥ ही थे ॥ ३५ ॥ म्हारी प्रद्युम्नने समीकी स रुक्मिणो दुहिसरमपयेमे मारथः । त्यासे धना विवाह किया था । उसीके गर्भसे तस्मात् सुतोऽनिरुवोऽम्मागायुतपलान्वितः॥३६॥ अनिरुदीका नन्म हुआ । उनमें दस हवार हास्पिोफा क्छ पा ॥ ३६ ॥ रुक्मीके दौडिन अनिरुपजीने अपने समापिरुक्मिणः पौत्री दौडिनो जगृह वसः। नानाकी पोतीसे विवाह किया । उसके गर्भसे पाका पजस्तस्साभवद् पस्तु मौसलादवशेषितः ॥३७॥ चन्म मुन्न । श्रमके शापसे पैदा हुए मुझफे शरा पर्वशका नाश हो जानेपर एकमात्र वे ही वच रहे प्रतिमाहुरमचमात् सुमाइस्तस्य चात्मजः । पे॥ ३७॥ परके पुत्र १ प्रतिभा, प्रतिशाहुके सुमाहोर सान्तसेनोऽच्छतसेनस्तुमत्सुवः ॥३८॥ सुयाह, सुबाहुके शान्तसेन और शान्तसेनके पातसेन ॥३८॥ न तसिन् फुले बाधा अपना भरहुप्रजाः । परीधित् ! इस वंशमें कोई भी पुरण ऐसा न हुआ जो अन्पायुषोऽस्पषीर्याभ श्रमसम्पाम बहिरे ॥३९॥ बहुत-सी संतानवात्म न रा तया जो निर्धन, वसायु और वापशक्ति हो। ये सभी प्रमों के मफ ये॥३९॥ मानेशप्रस्तानां पुंसा विरूपातकर्मयाम् । परीभित् ! यदुवसमें एसे-ऐसे पशखी और पराक्रमी संम्मान समयते कर्तुमपि पर्यायुतैर्नुप ॥४०॥ पुरुष मुए हैं, जिनकी गिनती भी हजारों में पूरी विसः फोठया सहसाणामष्टाशीविश्वानि च। नहीं हो सकती ॥३०॥ मैंने एसा मना है कि पदुपशके घालोको शिक्षा देने के लिये सीन करोग घटसी त्यस्त आसन् यदुलापार्या सुमारामामिवि भुवम्॥४१॥ वाचार्य घे ॥४१॥ ऐसी सितिमें महात्मा यदुवंशियोंकी संस्पान यादवानाका फरिप्पति महात्मनाम्। संख्या तो बतायी ही कैसे जा सकती है। स्वर्य महाराज | उग्रसेनके रुप एक नीठ ( १०००००००००००००) पत्रास्तानामयुतसक्षेणास्ते स बाहुः ॥४२॥ के गमग सैनिक रहसे ये ॥ १२ ॥ देवासुराहपाता देवया ये मुदाया। फीशिव ! प्रधीन काम्मे देसासुरसम्रामके समय माहुत-से मयर बसुर मारे गये थे। ये ही मनुप्पोमें ते चोत्तमा मनुष्येषु प्रभा मा पराधिरे ॥४॥ उपम एए और बड़े धर्मजसे जनताको सान मगे । तमिग्राम हरिणा प्राक्का देवा यदो इसे । उनका दमन करनेके रपे मामान्फी बापासे देफ्तानोन ही पदुशमे क्यवार रिया का । परीक्षित् 1 उनके अपतीणाः अलग पामेश्यधिकं नप ॥४४॥ कुलकी सख्या एक एफपी ॥१२॥ ये सब भगवान् श्रीकृष्णको ही अपना सामी परे आश मानते थे। वेपो प्रमाणं भगवान् प्रभुत्वेनामपरिः । जो पदुनशी अके अनुयायी थे, उनील प्रकारसे में पानुवर्तिनमस्स पापः सर्वयादना ॥४५॥ म्नति ॥ १५ ॥ यस्मियोका विच इस प्रकार भावान् श्रीहरगम श्रम बता पा कि ममें साने बटन, पप्पासनाटनालापकीयस्नानादिकमा । घुम्ने पिरने, अमन सनने और नहाने याने आदि कोम . - ७०० भीमद्भागरत [.. नविदुः सन्तमात्मान पृष्मयः कृष्णचेतसः॥४६॥ अपने शरीरकी भी सुधि न रहती थी। वे बानते ही पे कि हमारा शरीर क्या कर रहा है। उनकी समस्त | शारीरिक क्रियाएँ पत्रके मांति अपने-चाप होती रहती भा॥१६॥ सोर्थ चक्रे नृपोर्न मदजनि यदुपु परीक्षित् ! मावान्का परणपोक्न गाबी बस ही समस्त तीमि महान् एवं पवित्र है । परन्तु मा स्वयं परमतीर्षसम्प मगचन्ने ही यदुधमे पार ख सरित्पादशौच प्राण किया, तब तो गणानकी महिमा काने सापही उनके सुक्रतीर्पकी अपेक्षा कम हो गयी । मान्के विद्विस्निग्धाः स्वरूपं यपुरमितपरा सहपकी यह कितनी बसी महिमा है कि नसे प्रेम करनेवाले भक और ष करनेवाले शत्रु दोनों ही उनके श्रीसंदर्येऽन्ययनः। खरूपको प्राप्त नए । जिस ध्यमीको प्राप्त करने को बड़े-बड़े देक्ता यन करते रहते हैं, वे ही भगवान्की यनामामालनं श्रुतमष गदितं | सेवामें निस्य निरन्तर मी राती है । मगमा म एफ कर सुनने अपना उचारण करनेसे ही सरे बमाको मा कर देता है। परियों के वंशम तिने मर्म यत्कनो गोत्रधर्मः प्रचलित है, सके संस्थापक भगवान् श्रीकम ही है। वे अपने हाथमें काम्वरूप चक्र म्पेि खाते । परीक्षित । रुप्मस्यैतम चित्रं क्षितिभरहरण | ऐसी स्थिति में वे पुनीमा भर उतार देते हैं, यकै पड़ी यात है ॥ १७ ॥ मगमन् श्रीकण ही कालचळायुधस ॥४७॥ | जीवोंके वायपस्थान है। यदि ये सहा-सर्वदश सभा उपस्थित ही रहते है, फिर भी पानेके लिये मोरे जपति जननिवासो देवीजमवादो | देसीजीके गर्भसे जन्म दिया है। पी वीर परिक रूपमें उनकी सेवा करते रहते है। उमने बने पवरपपस्स्यैीर्भिरस्यमधर्मम् । मुनकम्से ममका बन्च फर Pया है। परभिन । मात्मन् समापसे ही परामर जगतका दुस मियते सिरपरपजिननः मुसिवयीमुखेन राते हैं। उनका मन्द-मन्द मुसकानसे पुट दर मुखरक्दि प्रति और पुरखिफे एप प्रम-सा सबर फरा रात है। पास्तबमें सरे जगदम ही प्रजपुरलनिवाना पर्धपन् समदेवम् ॥१८॥ विपी है । उहाँकी प हो । प हो ॥ ॥ ३८॥ स्थ परस निवपत्मरिरथपान पीधित् ! प्रातिसे अतीत परमामने जाना स्सास्ति धम मदारी के लिये न्यि टीम-परीर प्रश्ण फिल्म और उसके अनुम् अन मन ठीठातनाम्वदनुपरिरमनानि पिरियन अभिनय रिस्य । उनमा मापस फम स्मन • ९०] पसम स्कन्ध ७० कर्माणि कर्मकामानि पर्वमस करनेपालके कर्मश्चनोंको काट गलनेवास्य है। वो | यदुषशशिरोमणि मालान् श्रीकृष्णके घरणामकी सेपाका अधिकार प्राप्त करना चाहे, उसे उनकी प्रत्ययों- भूपायमप्य पदगोरखाचिमिच्छन् ॥१९॥ का ही श्रवण करना चाहिये ॥ १९ ॥ परीक्षित ! मय मनुष्य प्रतिक्षण मगअन् मीणामी मनोशारिणी लीय मीस्तपानुसरमेषितया समाद कसाभोस अधिकाधिक मपण, कीर्तन और चिन्तन करने काय, तब उसकी यही महि उसे भगवान्के परम्घाममें पहुँचा देती है। पपि कारकी गतिक परे श्रीमत्यामवपकीनचिन्तयति । पप गाना बहुत ही कठिन है परन्तु मगवान्के धाममें काफी दाल नहीं गळती । मह वहाँतक पानी नहीं दुस्तररुवान्तमपापवर्ग पाता । उसी धमकी प्रासिके पिये वनेक स्घाटोंने सफ्ना राजपाट छोपकर तपस्या करनेके उदेश्पसे जंगकी यान की है। इसध्येि मनुष्पको उनकी सीध्य कम्पका प्रामापन वितिसमोऽपि यपुर्यदर्थाः ॥५०॥ ही प्रण करना चाहिये ॥ ५० ॥ । इति श्रीमद्भागवते महापण्णे ग्रासिम्यामध्यदरासाइयो परमास्पा संहितापा रसास्करवे म्हाचे पीकृष्णपरितानु पर्मन माम नपतितमोऽध्याय ॥ ९० ॥ पवि दशमस्कन्धोचराषः सम्पूर्ण भीकृष्णार्पणमस्तु

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श्रीरापासम्मो ममा श्रीमद्भागवतमहापुराणम् एकादशः स्कन्धः निरस्तनिखिठामान मानाज्ञानविस्पणम् । पूर्णानन्द किमपि वमोलरतमई भजे ॥ ---

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maa परमधामगमनक पूषझी मामी ॐनमा मगरने शनुसाय श्रीमद्भागवतमहापुराणम् एकादशः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्याय । पवुयशच भूपियाँ शाप मीपादरायणिस्ताव म्यामनन्दन भगवान् श्रीगुरुदयमा बहत- 1 परीक्षित् ! भगवान् श्रीगने रामनी तथा स्य छवा ईत्यपधं कृष्ण सरामो यदुभिदेव । याशिक साप मिटर बहुन-से "त्योंका कार पिया तपा पारस और पाण्डयोम भी पीघ्र मार काट अप्रमतारपद भार चविष्टं जनयन् कलिम् !! ? || मघानेवाय स्पन्त प्रपत्र पर उत्पन्न करप माय मार उतार दिया ॥ १॥ कारखान पप्पूण राम, यापिता मुबहु पाण्डमुता सपन नरहनराइके अपम्पनोंसे तमा परीफ नया गचने पानि त्याचारोंसे पाण्डयोमा आफ्न्त प्राधित काया दपतहलनकचग्रहणादिभिस्तान् । पाउदी पाण्डरो निमित चनावर भावन यापन त्या निमित्तमितरतरत समतान् गोनों पक्ष में एकत्र हुए गवाओंर मा य पर इस प्रकार रवीश भर दमा कर पि ॥ ॥ दन्या नृपान् निगर क्षितिभारमोन ॥२॥ पन पाइपमे मुरभिन पधिो गरा यक भराजा और उनकी मनास रिना परम प्रमों मृभाग्गवासना यदुभिनिरस क नाग मनक विश्प न दानगर मारन श्रीगन गुर्ने समाहुभिरचिन्तय प्रमय' । विचार रिय शि गारिम पारा भार र बानर मा पस्तुन मग मि मीना दूर नगरमा न्वारनननु गनाऽप्यगत हि भारं मी निर पार सिरन Fष र न यह पालमहा विषयमान ॥ ३॥ पाप-विपन्न ॥ Tमर रतिर दादी नपान्यत परिभरास भयत कवि शिमा पगार मन्मभपय विभगनानम्म निन्यम् । किससे भी रिहर पर नही दामा। मान र मरमान अन्न म यहस्प रिचार पगु अनिम्न म पनि सर पर मागस परिमिर शान्तिपनि धान || राम फानन मोर सन T न

[१०१
श्रीकृष्ण ही थे, फिर उनमें घट कसे इसी रिसे
७०६
भीमागवत
एवं व्यवसितो रामन् सत्यसकस ईश्वरः । धाममें जाऊँगा ॥ ४ ॥ राजन् ! भगवान् सशक्तिमा
और सत्यसाकल्प हैं। उन्होंने इस प्रकार अपने मम्म
निश्चय करके नामों के शापक पाने अपने ही काम
शापण्याजेन विप्राणां मजो स्वालं विभु ॥५॥ संहार कर लाछा, सक्को समेटकर अपने घामम से
गये ॥ ५ ॥ परीक्षित् ! भागन्की म्ह मूर्ति त्रिकी
सौन्दयका तिरस्कार करनेवाली पी । उन्होंने अभी
सौन्दय माधुरीसे सबक नेन अपनी घोर अस्ति ।
बमृत्या लोकलावण्यनिर्मक्त्यारोचन नृणाम्। लिये थे। उनकी वाणी, उनके उपदेश परम मभुर,
दिव्यातिदिग्य थे। उनके द्वारा उन्हें स्मरण करनायक
चित्त उन्होंने छीन लिये थे। उनके चरणकमल निभा
गीभिस्ता सस्ता चित पदेस्तानीधता फ्रिमा ॥६॥ कन्या, उसकी वहिर्मुस्ता दूर माग गये, वह भी
मुन्दर थे। निसने उनके एक चरणचिका भी गठन
| प्रपश्चसे उपर उठकर उनीकी सेवामें गा गय।
उनहोंने अनायास ही पृथीमें अपनी कीर्तिका विवर
आच्छिय कीर्ति मुस्लोग्र विकल्प पञ्जसानु को।
कर दिया, जिसका बरे सुकविणेंने वही ही सुन्दर
| भापामें वर्णन किया है। यह इसलिये कि मेरे को
वानेके वाद येग मेरी इस कीर्तिका गान, भयण और स्मरण
करके इस अमानरुपअन्धकारसे सुगम्तय फरहा जायेगे।
तमोऽनया तरिप्पन्तीत्पगात् स्व पदमीमरः॥ ७ ॥ इसके बाद परमैश्र्पशाठी मगान् श्रीकृपने आने
घामको प्रयाण किया || ६-७॥
राजोपान
राजा परीसित्ने पूज-भान् ! पदुमशी
प्रमण्यानां वदान्याना नित्यं पदोपसेविनाम् ।
प्रामणभक थे। उनमें यही उदारता भी की और ये
अपने कुलमोफी निस्प-निरन्तर सेव करनाले थे।
सबसे बड़ी बात तो यह पी र उनका पित
मगवान् श्रीकृष्णमें रुणा रहता या फिर उनसे बोका
विप्रशाप कथममदाप्णीनां कृष्णषेस्साम् ॥ ८॥ अपराध कैसे वन गया ! थोर क्यों नामोंने में शप
दिया | भगवान्के परम प्रेमी विप्रवर! उस पर
| कारण क्या पता क्या सरूप प ! समय र
शिपोंक वास्मा, स्वामी गौर प्रियतम एकमात्र मगमन्
यन्निमिचःसवै शापो यारशोदिजसचम ।
देखें तो वे स्य श्रपि तदर्शी पे, फिर उनको पेस
फायमेकात्मनो मेद एतत् सघ वदस्ख मे ।।९॥
भेददति कैसे हुई। यह स्प बाप कृपा करके मुठ
मीशुक उपाय
श्रीशुक्लयजीमे कहा-भगवान् श्रीगने
शरीर धारण करके मिसमै समय हमर पायोम
पिन पपु सकलसुन्दरसभिवेर्स सन्निवा पा ( नोमि मगनपन, पन्धोंमें सिंहस्य,
पामें करि-कर, परम कम बादिमा पिपास था।)
कमोमरन मुवि मुमालमाप्तमाम ।
| पृषी मगष्टम्प यस्याणकारी फोका आपरग किया।
सतपाये ॥९॥

१०.] एकादश स्कन्ध ७०७ आस्साय धाम रममाण उदारफीति वे काम प्रभु द्वारकाधाममें रहकर श्रीरा करते रहे और उन्दनि अपनी उदार कीर्तिकी स्थापना की। सहर्तुमच्छत मुलं स्थितकुत्पशप ॥१०॥ (जो कीर्ति स्वय अपने आध्य तक्मा लान कर सके यह उदार है।)अन्वमें श्रीहरिन अपन फुलक संहार- कमागि पुम्पनिवहानि सुमङ्गलानि उपसंहारकी इझ की, क्योंकि अब पृष्षीका भार उतरनमें इतना ही कार्य शेष रह गया या ॥ १० ॥ मगवान् गापजगत्कलिमलापहराणि कत्या । श्रीकृष्णन एसे परम मङ्गलमय और पुष्प प्रापय यम किये, जिनका गान करनेवाले अर्गो सरे फलिमल कालात्मना निवमता यदुवगह नष्ट हो जाते हैं। अव भगवान् श्रीकृष्ण महाराज उपसेनफी राजधानी द्वारकापुरीमें वसुदेवबीके घर यारों पिण्डारकं समगमन्मनयो निसृष्टा ॥११॥का संहार करनके ख्यि कालमापसे ही निग्रस कर रहे थे। उस समप उनके विदा कर देनेपर-विश्वामित्र, विवामित्रोऽसितः कम्मो दुर्वासा मृगुरकिरा । बस्ति, काय, दुर्गसा, भृग, अधिरा, कश्यप, बामदव, अत्रि, पसिष्ठ वीर नार बार वड़-यई ऋषि दशरफाक कम्पपो षामदषोऽविर्वमिष्टो नारदादप ॥१२॥ | पास ही पिण्डारकक्षेत्रमं जाकर निवास करने लगे भे॥ १११२॥ क्रोउन्तस्तानुपप्रज्म कुमारा यदुनन्दना । एक दिन यदुशम कुछ उपप कुमार स्कळसे सलत उनके पास जा निफरक । उन्होंने धनावी नम्रतासे उपसंगृल पाग्मुरविनीता विनीतवत् ।।१३।। | उनके चरणों में प्रणाम करके प्रश्न क्रिया ॥ १३ ॥ में जाम्बश्वीनन्दन साम्बको मीक वेपमें सजाकर ले गय ते पयित्वा सीप माम्म जाम्बवतीसुतम् । । और कहने लगे, प्रामणो ! यह कनरारी आँखेंबाही पपा पृच्छति वो विप्रा अन्तर्वल्पसिवेषणा ॥१४॥ ! सुन्दरी गर्भवती है । यह वापसे एक वात ना चाहती है । परन्तु मयं एएनेमें सकुचाती है। वाफ्यगामा शान प्रई विलमती मायात् प्रतामोपदसनाः । प्रमोद अग्रव है, आप हमें। इसे पुत्रकी धी अलसा है और अब प्रसवमा समय निकट जा प्रसोप्यन्ती पुत्रकामा किंम्बित् सजनपिप्पति ॥१५|| गया है। अपलंग बसाइये, यह क्त्या अन्ना या पुत्र " ॥ १११५ ॥ पीक्षित् । जब उन कुमारोंने इस एवं प्रलम्घा मुनपस्तानपुः इपिता नृप । प्रकार टन अपि-मुनियोको धोया दना पाहा, ता व भगवत्प्ररणासे कोधित हा ठर | उन्होंने कहा- जनयिप्पति या मन्दा मुमलं कुलनाशनम् ॥१६॥ यह एक एसा मसल पैदा करा, जा मुम्हारे मुल्या तन्वा तेऽतिसन्यन्ता विमुख्य महमादग्म् । नाश करनान्य होगा ॥१६॥ मुनियोंकी या त सुनकर से बलम बहुत ही तर गये। उन्होंने तुरंत सम्बया साम्बस्य दशुम्तम्मिन् मुसलं स्वत्वपम्मयम् ॥१७॥ पेर खाकर दस वा सचमुच उसमें एक ग्रहका माल मिल्य ॥ १७॥ पब तो वे फछनान ओ और कि मन्दभाग्पनः किं वदिप्पन्ति नो जना । पहन छोहम घर अभागे हैं। सो हमलागान मझे। गम्पपोमपम ।

७०८ उन्होंने एसा करना उचित न समय । कामपरी भीमद्भागवत इति विलिता गेहानादाय मुसलं ययुः ॥१८॥ यह क्या नर्थ कर राम का ग हमें क्य को इस प्रकार वे बहुत ही परा गये तथा मसल लेकर वघोपनीय सदसि परिम्लानमुखभिय । अपने निवासस्मानमें गये ॥१८॥ उस समय उनक चेहरे फीके पर गये थे । मुख फुहस्य गये थे । उनाने आपदयामल सयादवसमिधौ ॥१९॥ मरी समप्रमे स्व यादवोंके सामने ले जाकर बममा रख दिया और रान उमसेनसे सारी घटना का मृत्वामोघं विप्रशापं दया च मुसल नृप । मुनाया ॥ १९ ॥ राजन् ! जब सब व्यगोन ब्राहक शपकी बात सुनी बौर अपनी बायसे उस मसाया विस्मिता भयसन्यस्ता पदारकोकस ॥२०॥ देवा, तव सब के सब द्वारकावासी विस्मित और भयमच हो गये, क्योंकि वे जानते थे कि प्रमोंका पर वचूर्णयित्वा मुसल यदुराज स आफ । | कभी मुय नहीं होता ॥ २०॥ यदुरान उपसेमन उस मसको पूरा-पूरा करा गय वोर उस सूरे सप यो बचे हुए छोटे टुफाको समुद्रमै फेकला गया। समुद्रसलिले प्रास्पल्लोई पास्सायोपितम् ॥२१॥ (इसके सम्बन्धमें उन्होंने मावान् श्रीकृष्णसे कोइ सपाइ न ली, एसी ही उनकी प्रेरणा पी ) ॥२१॥ कमिन्मत्स्योऽप्रसीलोई चूर्णानि तरलैवत । परीक्षित् ! उस परेके टुफाको एक मळी निगउ गयी और भूरा तयोंके साप पाकर समुद्रके वितार उममानानि बेलायां लग्नान्यासन् फिलैरकाः ॥२२॥ | पा लगा । यह पारे दिम एक ( स्निा गाँठी एक घास ) क रूपमें वग क्या ॥ २२ ॥ मम्मी मरक मत्स्पो गृहीतो मत्स्पघ्नलिनान्य सहाये। पाल महोंने समुश्में दूसरी महरियों के साथ म ममयो भी पका डिया। उसके पेमें जो आहेस सम्पोरगत लाई स शत्य लुम्बकोऽकरोत् ॥२३॥ दुमका पा, उसको जरा नामक म्यापने अपने बमा नोर्म खग यि ॥ २३ ॥ ममतान् सर कुछ मनत भगवायातमवार्थ इमराऽपि तदन्पया । थे। इस शापको उष्ट भी सकते थे। निमें कतु नन्छन् विप्रशार्प मालरुप्यन्वमोदव ॥२४॥ प्रभुन ग्रामोफे "मपमा अनुमोदन ही रित्या ।। २४ ।। इति श्रीमद्भागवत महापुराग पारमहस्यो संहितापामा शस्पत्ये प्रमोऽध्यायः ॥१ अय द्वितीयोऽध्याय पसुपत्री पास भीनमरवर्गम भानन भोर उन्हें राजा जनक तथा मो यागीभराम संपार गुनाना भीनुर उप भीगुणपसी करन-गुस्नग्न | नारद : म्नमें मगन् श्रीगणी सनिमिम बनी पापिन्दरगुमायो द्वारसत्यां गुरुवार । वी या । इसपि । धाम १ नीर । २ मा ।

अ०२] अयान्मीनारदाऽभाधा कप्यापासनलालया॥१॥ मुरक्षित घरफाळ-वहाँ दक्ष अदिफे शापयर कार भप नहीं पा, विदा पर देनेपर भी पुन -गुन आकर प्राय रहा ही करते थे ॥ १॥ रामन् । सा फोन का नु राजमिन्द्रियगान मुन्दचरणाम्भुजम् । प्राणी है, जिसे इन्द्रियाँ ता प्राप्त हों ओर यह भागक मला आणि वाया दवताओंकी उपास्य चरण्मयों पी निन्य गथ, मधुर नगरन्द-स, अतिर सामाधुरी, मयुम्पर सश और मन मय पनिश सेन फरना न न भनत् मर्पतामृत्युपास्यममराचम ॥२॥ चाहे । कि यह यचारा प्राणी सब बारसे मृत्युसे ही | घिरा हुआ है॥०॥ एक दिनको यत ६, दरि नारद पमुखजीक पहो पधार । ममुग्यान उना तमकदा तु दर्प मुद्वा गृहागवम् । अभिग्रन रिय तपा आरामसे पट जानपर पिरिक्षा उनी पूजा की और इस पर पुन प्रगाम परक अघिनं मुम्पमासीनमभिवादममनीत् ॥३॥ उनसे पह सात पही १३ मुदप उपर भगान् भवता पाया पनपे सर्वदेहिनाम् । रुपणानां यथा पियारुसमशकरत्मनाम् ॥ ४॥ मनानां सपरित दराप प मुसाप प। गुणाप हिमापूनावावामन्यतात्मनाम् ॥५॥ भनि पपपादपाना भरि नयर वान् । पास ममभिरा मारा सनरत्मग ॥६॥ प्रममारियानाननगरवाना। पारामदासानमन मरनासन।। ७॥ 4 ७१० श्रीमद्भागवत --- अहं किल पुरानन्तं प्रजावा मुवि मुक्तिदम् । संसारसे मुक्त हो जाय ॥ ७॥ पहले जन्ममें मेने मुति देनेवाले भगवान्की आराधना तो की पी, परन्तु इसन्नेि अपूर्वप न माक्षाय मोरिता देवमायया ॥ ८॥ कि वे मुझ पुत्रलपमें प्राप्त हों । उस सम्प में मान्य नहीं कि मुस मुक्ति मिले। मेरो आराधनाफा उदेश्यप लीयसे मुग्ध हो रहा पा ॥ ८ ॥ सुस्त! क्य कर यधा विचित्रष्यसनाद् भवद्भिषिपतोभयात् । मुझे ऐसा उपदेश जिये, जिससे में इस जन्म मृत्युरूर भयावह सस्परसे—जिसमें दुख भी सुरका विभत्र मुपम मनसंवादा क्या न शाधि सुयत ॥ ९ ॥ और मोहर रूप धारण फरक सामने जाते है-अना- पास ही पार हो जाउँ॥ २ ॥ सीभुक उपाच भी गुकदेषनी करते है--राजन् ! बुद्धिम्मन् - देवबीने भगफन्के स्वरूप और गुण अदिक भयो गजन्ने कुतप्रभो वसुदेषन धीमता । पभिप्रायसे ही यह प्रश्न क्रिय पा । देवर्षि नारद या प्रभ सुनकर भगवान्के अचिन्स्य अनन्त कात्यायन्स प्रीवस्तमाह दवपिहरे संसारिसो गुणे ॥१०॥ | गुर्गों के स्मरणमें तन्मय हो गये और प्रेम एव बान में भरकर वसुदेवजीसे वोरे ॥ १० ॥ नारद उवाच नारदसीने कहा-यदुवंशशिराममे ! मुमार न मुम्पर्गव व्यवसितं भवसा सात्ववर्षभ । निष्प बात ही सुन्दर है, स्पेंकि यह भागत के सम्बन्धमें है, जो सरे विसको जीन-दान देनेगम है यत् पच्छसे भागवतान् धर्मास्त्वं विश्वभाषनान्॥११॥ पवित्र करनेषाम्य ॥११॥ ममुदखनी ' भागका भुतोऽनुपठितो पात आसो बानुमोदितः । घम एक एसी वस्तु है, जिसे पानोंसे सुनने, से उधारण करने, चिचसे स्मरण करने, एपसे म्बीकार मप' पुनाति सद्धर्मो देषविधाऽपि हि ॥१२॥ TO अनुमोदन करनेसे ही मनुष्प उसी क्षण पनि फरने या कोर पसका पालन करने जा या हो खे न्वया परमकल्याण पुण्यभवणकीर्सन । ऐजाता है-पाहे इ मगवान्का एक सरे संसारका कोही हरी क्यो न हो ॥१२॥ जिनक गुण, स्यमा और नाम मारितो भगवानप दयो नारायणो मम ॥१३॥ आदिका श्रवण तया कीर्तन पक्तिों को भी पान करनान्य है, ठम्ही परम कल्याणस्वरूप मेरे आगप्यदेव भान अवाप्युदाहरन्तीममिविहान पुरावनम् । नाराफ्गका तुमने आज मुमे स्मरण कराया है ॥१३॥ यासुदेवजी ' सुमने मुझसे जो प्रश्न किया है, "सक आर्षभागां घ मपाई विदरस्य महान्मन ॥१२॥ मम्बन्ध सत पुरुष एक प्राचीन इतिहास या करता है। यह "तिहास है- प्रियव्रतो नाम मुता मना स्वायम्भुवस्स य । महारमा निदाका मुभ सवाद ॥ १४ ॥ तुम जानती हा दि वापम्भुव मनुके एय प्रसिर पुरधे प्रिया । नस्पापीघ्रम्मता नाभिपभम्तत्मत स्मृत ॥५॥ प्रियानक आग्नी, आम्नीक नाभि और नाभिक पुर एए ऋषभ ॥ १५ ॥ शयोंन उन्हें भगवान् अमुदेव तमाचामुदान मावषमविवक्ष्या । | अंश का है । मोक्षधर्मका उपदेश करना तिये उम्मान 1-अपम: पुत्र नौ यागीपरों और

एकादा स्कन्ध
७११
अ०२]
अपवीण मुक्त वस्सासीद् प्रक्षपारगम् ॥१६॥ भक्तार ग्रहण किया था। उनकै सौ पुत्र थे और सब-
मा-स्व वदोंके पारदर्शी विशन् धे ॥ १६ ।। टनमें
तेपा व भरता ज्येष्टये नारायणपगयण । । सवसे या थे राबपि मरत । वे मायान् नारायणक
विन्यातं वपमसन यन्नाम्ना भारतमकृतम् ॥१७॥ | परम प्रमा मत घे। उन्हींक नामसे यह भूमिगड, वो
सहल 'प्रचनामप' फरव्यता मा, मारतवर' कामया।
स मुक्तभागा त्यक्त्वमा निर्गतस्तपसा हरिम् ।
मह भारतवर मी एक अत्यधिक स्थान ६॥ १७॥
उपासीनम्तत्पदवीं लेमे वै जन्मभिनिभि ॥१८॥ राजर्षि भरतने स्वरी पृथ्वीका राम-भोग किया, परन्तु
अन्तमें से महकर वनमें चल गय । यहाँ उन्होंने
तो नव नषद्वीपपतयोऽस्य समन्सस । उपत्याक द्वारा माषाफी उपासना की और तीन मन
कतन्त्रप्रणतार एकाशीतिरिवावय ॥१९॥
म भगवानको प्रम दुए, ॥ १८॥ मगवान् अपमा
बीय शप निन्यानव पुत्रोंमें नौ पुत्र को इस मारतपरक
नवाभवन् महाभागा मुनयो मसिन ।
स्व आर पित नौ शपोंके अक्पिति हुए और इस्पासी
पुत्र फममाण्डफ रपिता ब्रमण हो गये ॥ १९ ॥
भ्रममा वातरमना आत्मविधाविश्चार। ॥२०॥नो सन्यासी हो गय । वे व ही भाम्पत्रान् थे।
उन्होंने पारमविपाके सम्पादनमें वा परियम किया था
फविहरिरन्तरिक्ष
प्रबुद्ध पिप्पलायन'।
और वास्वपमें थे उसमें बड़े निपुण थे। वे प्राय
आविहाँवोऽभ मिलश्रमम करभाजन ॥२१॥ | दिगम्यर हा रहते और अधिकारियोंका परमाफ् यस्तुका
उपदश क्यिा करते थे। उनके नाम थे—कषि, हरि,
7 एत भगवसं विभ सदसदामकम् । अन्तरिक्ष प्रयुग, पिफ्यपन, आवि.प्र, निप, चमस
मोर करमाउन ॥२०२१॥ इस काय कारण भीर
आत्मनोऽम्पतिरकग पश्यन्तो व्यचरन् महीम्।।२२॥
न्मक भयक भगदमर जगत्का बसने आपसे अमिन
अष्पाहतेष्टगतम नरसिदसाय
अनुमत्र करते हुए यूपीपर स्वछन्द विचरण करत
मे ॥ २२॥ उनक लिये कही भी रोक-टोक न थी।
गन्धषयधनरसिमरनागलोकान् ।
वे जहाँ चाहते, पल चावे । दक्ता सिद, साम्य,
। गन्स यक्ष, मनुष्य, किनर और नागोंके व्याफामे तपा
मुक्तामरन्ति मुनिचारणभूतनाम मुनि, चारण मनाप, रिपार, प्रमग बोर गौओंक
| म्यानार्म देसम विचरते थे। मुदखी ।
विधाघरनिवगो सपनानि रामम्।।२३।। | के.सब चीमुक ध ॥ २३ ॥
। एकदा निम मत्रमुपसमुपर ध्या।
एक बारखी सात है, इस अवनाम ( भारत ) पर्वमें
| बिहराम म्हारमा निमि वा-या ऋषियों के द्वारा एक
। महान् यज्ञ का हे ये । सोळ ना यागीभर सएट
वेतापमानमृपिभिरजनाम महामन ॥२४|| विचरण करते हुए उनक पामें जा पहुंचे ॥२३॥
यमुत्थी व यागीपर भगवान्क परन प्रभा भक्त और
मान् दृष्ट्वान्यसामान महाभागस्तान नृप । म्या ममान तबस्सी थ । उन्हें समन राजा निमि
आइपनीय आरि निमान् अनि और पवित्र मानि
पसमानास्नया विप्रा सब एवापतस्थिर ॥२५॥ समग सप-य-स्य उनक खागस्में हार गये ॥२॥

७१२ भीमझामबत [.२ विदास्तानभिप्रत्य नारायणपरापणान्। निदेहराच निमिने उन्हें भगान्के परम प्रमी मल धानकर पयायोम्य आसनोपर देवया और प्रेम तथा मानन से प्रीतः सम्बयामळे आसनम्वान् यथाहतः।।२६॥ | मरकर विधिपूषक उनकी पूजा की ॥ २६ ॥ वे नों योगीर धपने अंगोंकी कान्तिसे इस प्रकार का ये सान् रोचमानान् स्वरुषा अमपुत्रोपमान् नव। ये, मानो साक्षात् प्रमाजीक पुत्र सन्मादि मुनीर से पप्रच्छ परमप्रीत प्रभपावनतो नुपः ॥२७॥ उनसे प्रश्न किया ॥ २७ ॥ हो ! राजा निमिने विनयसे मुममा परम प्रेमके मार विदेह उपाय विदहपज निमिने करा-भगमन् ! में ऐसा स्माता हूँ कि अपलोग मधुसूदन मान्क पार्षद हो । मन्ये भगवत' साम्यात् पादान यो मधुदिपः। क्योंकि भगतान्के पार्षद संसारी प्राणियोंको पवित्र करने के स्पेि विचरम किया करते हैं ॥ २८ ॥ चीजों के लिये विष्णोर्भूतानि लोकानां पावनाम रन्ति हि॥२८॥ मनुष्य-शरीरका प्राप्त होना दुम्म है। यदि यह प्राप्त भी हो पात है तो प्रतिक्षण मृत्युका भय सिरफर स्वार दुर्लभो मानुपो दहो देहिनां क्षणभङ्गुर । यता है। क्योंकि यह क्षणमार है। इसध्येि अनिश्चित म्नुष्प चीकनमें भगवान के प्परे और उनको प्यार करने सत्रापि दुर्लमें मन्ये पाठप्रियदधनम् ॥२९॥ ॥ २९ ॥ इसलिये निस्मेक्साफ्न महामो ] इम कले मकवनोंका, स्तोका दर्शन तो और भी दर्ज आफ्न्ोगोंसे यह प्रश्न करते है कि परम कल्पना अत वास्पन्सिक क्षेम पन्छामो भवसोनपा । रूपस्यो। और उसका साधन पाहै। इस स्सस्मै वापे क्षणका ससा मी मनुके लिये पम निधि मंसारेऽसिन्धगार्थोऽपि सत्सङ्ग शेषभिर्नृणाम्३० है ॥ ३०॥ यांगीरो ! यदि हम सुनने के अधिकारी हो तो बाप कया करके पगात धोका उपदेश कीविय, धर्मान् भागवतान् त यहि न भुतये धमम्। | क्योंकि उनसे जन्मादि विकारसे रहित, एकस गन् मीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और उन कि पान भने मै प्रमम प्रपमाप दासत्यात्मानमध्यबः ॥३१॥ वाले शरमागत मकोको अपने आप सक्ला दान कर श्रीनारद उवाच देवर्षि नारयजीने का मुदेवजी ! जब राम निमिने उन मायप्रेमी संतोसे यह प्रश्न किसा, तब उन एवं ते निमिना पृष्टा वसुदेव महसमा । लोगोने पर प्रेमसे उनका वोर उनके प्रभा नमन प्रतिज्यावन् प्रीस्या ससदस्खबिंब नृपम् ।।३२॥ निमसे वोले ॥ ३२ ॥ किया और सस्प तपा अस्विजोंके साप बैठे मुर गा कपिल्याच पहसे उन मी पांगी परोसे विजयम कहा- मन्येऽतपिनयमध्यतरस रामन् ! भष्ठबनोंके एपसे कमी दूर न हानवाले वगुप्त मगवान्के चरमोंकी निस्य निरन्तर उपासना ही पादाम्मुजोपासनमत्र नित्यम् । इस संसारमें परम कन्फम--- राते॥ ३१ ॥ -आत्पतिक क्षेन है और १ पुष्य।२ प्रपत्राव मावान् ।

प्र०२] एकादश स्मन्ध ७१३ उद्विग्रसुद्धरमदात्मभाना सर्वथा मय शून्य है, ऐसा मेरा निथित मत है। देह, गेह वादि तुच्छ एवं असत् पदामि आईता एव ममता हो विपात्मना पत्र निषतते भी ॥३॥ नानेके कारण जिन लोगोंकी वितति उहिम्न हो ही है, उनका भय भी इस उपासनाका अनुष्यन करनेपर येथे भगवता मोक्ता उपाया पात्मलम्धये । पूणत्या निवृत हो बाय है ।। ३३ ।। मगवान्न मास- माले महानी पुरुषोंको भी मुगमतासे साक्षात् अपनी अञ्जःपुसामविदुपा विदिभागवतान् हितान्।।३४॥ प्राप्तिके लिये बो उपाय भर्य श्रीमुजसे पस्ताये हैं, वर्ने ही 'मागत-धर्म समभो ॥ ३१ ॥ राजन् ! इन पानासाम नरो राजन् न प्रमायत कहिचित् । मागवतवमाकर अक्समन करके मनुष्य कमी दिनोंसे पीमित नहीं होता और नेत्र पद करके दौरनेपर मी धावन् निमील्य या नेत्रे नस्सलेन पवेदिर ॥३५॥ अर्थात् विधि-विधानमें शुष्टि हो जानपर भी न मार्गसे स्वहित ही होता है मौर न तो पसित-ससे यचिन कायेन वाचा मनसेन्द्रियैया ही होता है ॥ ३५॥ (मागवतधमका पालन करनेवालेके लिये या नियम नहीं है कि वह एक विशेष प्रकारका कम ही करे।) यह शरीरसे, पाभीसे, मनसे, इन्द्रियोंसे, पुरुषाऽऽस्मना वानुसतस्वभावात् । | मुदिसे, मशरसे, अनेफ जन्मों अपया एक चम्मकी बादतोसे समापश को जो फरे, यह सब परमपुरुष करोति यद् यत् सकलं परमै मगवान् नारायणके लिए ही है-इस मावसे उन्हें समपम फर द । (यही सरस से सरल, सीधा-मा नारायणायेति समर्पयेचत् ॥३६॥ मागपतनम ) ॥३६॥ ईभरसे विमुख पुरस्का उनकी | मायासे अपने स्वरूपकी किस्मृति हो जाती है और इस भय द्वितीयाभिनिवेशव स्पा- विस्मृतिसे ही में देखा है, में मनुष्य है। इस प्रकारफर भ्रम-विपपय हो जाता है। इस देह वादि अन्य दीवादपतम विपर्ययोऽस्मृति । पस्नु, मभिनिवेश, तमना होनेके कारण ही युरापा, मृत्यु, ग्रेग अनि भनेने मप होते हैं। इसरिम्प अपने वन्मापपातो पुध आभनेस गुरुको ही आगप्पदेव परम पिपतम मानकर बनन्य भफिक शरा ठस इसका मजन करना चाहिये ॥३७॥ भस्स्यस्पे गुरुदेषसात्मा ॥३७॥ | गवन् ! सब पूलो तो मगमान्के अतिरिक, अामाक भतिरिक भार कम वस्तु मही। परन्त न होनपर अरियमानोऽप्यवभाति दिया मी इससी प्रतीति इसका चिन्तन करनगरमा उसक चिन्तनके कारण, उधर मन स्नक कारण ही हाती -जैसे स्वप्न ममप मनद्रगकी फल्पना अपा प्यातुर्षिया म्बममनोरथी यथा । जाग्रत् अाम्पा नाना प्रकारके मनापोंगे एक शिक्षा ही इरिटीगने त्यानी । । इसरिये रिचारवान् पुग्पको वन् कममस्सविकल्पक मनो पारिय नि सामारिफ पकि ममम सम्प-यस्य परनेमा मनमा रोक दमे मन | पस, एमा पुधा निम्म्पादभयं तत सात् ॥३८॥ | करत ही उमे अभय पकी, परमामाकी प्रामि ।

७१४ भीमद्भागवत गवन् सुभद्राणि स्थाझ्याणे नायगी ॥३८॥ संसारमें भगवान के सम्मकी कोर कीमती बहुत-सी मामयी कपाएँ प्रमिछ। उमको सुनते जन्मानि कर्माणि च यानि लोफे। रहना चाहिये । उन गुणों और हीमों का स्मरण दिलानेवाले भगवान्के यात से नाम मी प्रसिद्ध है। गीतानि नामानि तदर्घकानि लाम-संकोच कर उनका गान करते सना पहिये। इस प्रकार किसी मी म्यक्ति, यस्तु चौर सानमें बासति न करके विचरण करते ग्रमा चाहिये ॥ ३९ ॥ वे गायन् विलो विघरेवसङ्गः ॥३९॥ इस प्रकार विशुद त-नियम से लेता है, उसके एवंवतः दप अपने परम प्रियतम प्रमुके नाम कीर्तनसे कनुरगार स्वप्रियनामका प्रेमका भार उग पाता है। उसका चित्त द्रक्ति जाता है। भा या साधारण लोगों की स्थितिसे ऊपर वातानुरागो सचित उौः। नाता है। लोगोंकी मान्यताओं, धारमा से परे हो जाता है। धौर दम्मसे नहीं, सभाक्से ही मसल-सा इसत्पथो रोदिति रौति गाय होकर कमी सिससिलाकर हँसने स्माता है तो कमी घर-मटकर रोने लगता है । कम्ये ऊँचे सरसे भगवान्को त्युन्मादवन्नृत्यति लोकमाप ॥४०॥ | पुकारने लगता है तो कभी मधुर स्वरसे उनके गुणों गान करने स्मगता है। कभी-कभी जब पर अपने स वायुममि सलिल महीं च प्रियतमको अपने नोकि सामने अनुभव करता उन्हें रिमनेफे लिये नृत्य मी करने मगता ॥ १० ॥ ज्योतीपि सवानि दिशो नुमादीन् । राजन्! यहवाकाश, वायु, अमि, जग, पृणी, प्रा-नक्ष, प्रामी, दिशाएँ, पक्ष-वनस्पति नदी, समुद्र-सम्के सत्र सरित्समद्रांप हरे शरीर भगवान्के शरीर हैं। सभी स्मोम सार्य मगमन् प्रार है। ऐसा समझकर पह, जो कोई भी उसके सामने यत् किंघ मूर्त प्रममेदनन्पः ॥४१॥ आ जाता है-पाहे वह प्राणी हो या प्राणी--उसे अनन्यभावसे—मावदारसे प्रणाम करता है ॥ १॥ भक्ति परेशानुभवो विरक्ति जैसे भोजन करनेमाको प्रत्येक मासफे साप ही तुति (तसि पया पुर), पुरि ( बीनशविका सबर) रन्पत्र चप सिक एककालः । और क्षुधा-निष्ठि-ये तीनों एफ साप होते गाते हैं | वैसे ही जो मनुप्प भगवान्की शरण लेकर उनका भजन यथाभव स्यु करने माता है, उसे मजनक प्रत्येक क्षममें भगवन् के प्रति प्रम, अपने प्रेमास्पद प्रमुके स्वरूपका मनुभव और म्तुष्टिः पुष्टि क्षुदपायाऽनुपामम् ॥४२॥ उनके बतिरत अन्य वस्तुमाम सम्प-इन तीनोंकी एकसाप दीप्राति होती जाती ह ॥१२॥ राजन्! इस प्रश्न इस्पच्युताधि भजताऽनुप्रया जो प्रतिभण एक-एप इत्तिक द्वारा मावान् परम पन्यका ही भवन मरता है, उसे झामन्के प्रति भक्तिविरक्तिमगवस्मयोपा प्रेममयी भळि, संसारक प्रति गम्प और अपने प्रियतम प्रपवमानस्प एकादश स्कन्ध ७१५ भवन्ति 4 भागवतस्स राजं भगवान्के नहाकी स्मृति- ये सब कस्य ही प्राप्त होते हैं, पर मागपत हो जाता है और जब ये सब प्राप्त हो जाते, तब बखय परम शान्तिका अनुभव स्वतः परां शान्तिमपति साक्षात् ।।४३॥ परने लगता है।॥ १३ ॥ रायोपात पमा निमिने पूज्य-योगीमर । पर बार कपन करके भगवानएका लक्षण वर्णन कीजिये । उसके स्पा धर्म है। और कैसा समाव होता है। वा मनुष्योंके अथ भागवतं त् यद्धर्मो याम्यो नृणाम् । साप म्यवहार करते समय फेसा वाघरण करता है! यथा घरति यद मते यसिझर्मगवत्प्रियः ॥४४॥ क्या वोल्स्ता है। और किन लक्षणों के कारण मायान्का प्पारा होता॥११॥ हरिमाप मपमो योगीश्वरोमसे दूसरे हरिजी पोम्मानन्! वात्मस्वरूप मगवान् समस्त प्राणिोंमें वापरूपसे- निफ्तारूपसे सितारें। जो कहीं भी न्यूनाधिकता न सर्वभूतेषु य पश्येद् भगवनसमारमन । देखकर सर्वत्र परिपूर्ण मगरसचाको ही देखता है और साप ही समस्त प्राणी धीर समस्त पदाप यात्मस्वरूप भूतानि भगवत्यात्मन्येप भागवतोसम ॥४५॥ मगवान् में ही वापरूपसे अपवा अध्यस्तम्पसे सित है, वर्णद यास्तपमें मगपम्वरूप ही है-इस प्रकारका श्वर तदधीनेषु पालिश्शेषु द्विपत्सु च । निसका अनुमत्र है, ऐसी मिसकी सिद शि है, उसे मगवान्का परमप्रमी उपम म्यगत सम्मना पाहिये॥१५॥ जो मान्से प्रम, उनके मोसे मित्रता, दुखी और प्रममधीकपापक्षा य फरोति स मन्यम ॥४६॥ | शानियोंपर पपा तथा भगवान् से रेप करनवायकी उपेक्षा करता है, यह मप्पम फोटिक्न मागपत ॥९॥ मायामेव हरये पूजा या अव्याहते । पौर को भगवान्क अर्मा-विमर-मूर्ति बादिकी पूना तो भदासे करता है, परन्तु भगवान्फ मों या दूसरे नतमका चान्येपुसभक प्रारच स्मृत ॥४७॥ त्यगोंकी विशेष से शुश्रूषा नहीं करता, वह साधारण अंगीका भगवान॥१७॥ जो पात्र-नन आदि इन्द्रियों के द्वारा श-रूप भागि वियों प्रग तो गृहीत्वापान्द्रियरधान या न महिनापति । कन्न । परम्नु मपनी इएनफ प्रतिम्ल पियोंसे र नहीं करता पोर नुन विषयोंक मिउनेर हरित नहीं विप्मामायामिद पश्यन् स प भागवतात्तमः ॥१८॥ होता उसकी यह परि पनी हनी कि यह सब हमारे मगनपी माया -पर पुर उतम भागन है॥८॥ संसारक पमपम मत, गप्पास, दान्द्रियमाणमनाधिप | यम-पर, मप योर सप्णा । प प्रममा शरीर, प्राग, इन्दिप, मन और पुलिस प्राप्त होते हैं। जा बन्माप्पपपपक पुष भागन्दी सनिय छना नप या कि या + ७१६ भीमद्भागवत [. ससारधर्मरविश्यमान इनके बार-बार होते-नाते यनेपर मी उनसे मेक्षित नहीं | होता, पराम्त नहीं होता, या उत्तम म्यगत है ॥१९॥ स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥४९॥ निस्के मनमें विषय मोगकी इन्स, कर्म प्राति को उनके बीच बासनाभोंका उदय नहीं होता धीर गो एक न फामकर्ममीजानां यस येतसि सम्भव । मात्र मगवान् वामदेवमें ही निवास करता है, म उत्तम मादल है॥ ५० ॥ जिनका इस सरीरमें नवे वासुदेवैकनिलय स वै भागवतोचमः ॥५०॥ सत्कुलमें बन्म, तपस्या आदि कर्मसे सपा न वर्ण, अमन एष नातिसे ही बईमाव होता है, न निश्पनी न यस जन्मकर्मम्यां न वर्गाश्रमजातिमिः । मावान्का प्यारा ॥ ५१ ॥ चो न-सम्पतिवार सखतेऽसिमहंभावो देहे पै स हरेः प्रियः ॥५१॥ प्रकारका भेद-माप नहीं रखता, समस्त पदामि समतरूप घरीर भादिमें यह वपना है और यह पाया- इस न यस्य सः पर इति विचेयात्मनि वा भिदा । परमात्माको देखता रहता है, सममाष रहता है तब किसी भी घटना अपणा साइल्पसे विक्षिस न होकर प्रान्त सर्पमतसमा शान्तः सबै भागवतोचम ॥५२॥ यता है, पर भगवान्झा उत्तम मत है ॥ ५२ ॥ त्रिभुवनविभवहेतऽप्पकृष्ठ यमन् ! यो-यो देवा और प्रषि मुनि भी अपने क्त करणको भावमय बनाते हुए दिने र यते स्मृतिरविवात्ममुरादिभिषिसम्पात् । ₹–माग्रन्के ऐसे परमफोसे बाघे धण, को पके लिये भी वो नहीं हटता, निम्सर उन परोसी न फलति भगवस्पदारविन्दा संनिधि बौर सेगमें ही सम्म यता यक्षिक लवनिमिपार्थमपि यःसबैष्णवायः॥५३॥ मातार नहीं तोवता, उस राज्यकारीको वारे को स्वयं उसे विमुक्मकी सम्परमी दे तो मी भगवत उरुविक्रमाश्मिशाखा- प्यान ही नहीं देता। यही पुस्प पाखामें मगर | वेष्णमि मप्रगम्य है, सबसे श्रेष्ठ है ।। ५३ ॥ राम- नस्लमणिचन्द्रिफया निरस्तवापे । यमके सरपर नृत्य-गविसे मॉति मौतिके पाद-वियर इदि कपसपसीदवां पुन: स करनेचसे निषि सौन्दर्य माधुर्य निधि भगवान् के कारण बहुटि-नस्की मणि-पत्रिकासे जिम शरणागत प्रभवति चन्द्र इवोदितर्कतापः ॥५४॥ उदयका मिहनन्य सताप एक बार दूर हो यो उनके दयमै पारि कसे का समय से विसजति दर्य न यस्य साक्षा- चन्द्रोदय होनेपर सूर्यका सप नहीं ग सफा ॥५॥ दरिरवशाभिहितोऽप्पपीपनाशः । विवशतासे नाम्गेधारण करनेपर भी सम्पूर्ण बम रामिरे नए पर देनेाले सर्प मगमन् मीहार मिसके प्रपाले प्रणयरसनया भूतामिपण क्षणभरके लिये मी महाँ तेस्पोकि उसने प्रेमी रस्सीसे उनके परण कम भ रस्त मात्र स भयति भागरतप्रधान उक्तः ॥५५॥ एसा पुरुष ही भावन्फे मोम प्रधान है ॥ ५५ ॥ इति श्रीमहागरसे महापुराणे पारमामा संहिताप्यमेकादशस्फत् रितीयोऽपय ॥२॥ ta अ०३] एकादश स्कन्ध ७१७ अथ तृतीयोऽध्याय माया मापासे पार होनेके उपाय तथा प्रम मोर कमयोगध निरूपण राजोपाप राजा निमिने पूछ-मगन् ! सर्वशक्तिम्मन् परम- कारण विष्णुभगवान्की माया बड़े-बड़े मायायियों को भी मोहित कर देती है, उसे कोई पहचान नहीं पाता। परस्य विष्णोरीशस मायिनामपि मोहिनीम् । पौर बाप कहते हैं कि भक उसे देख करता है।) मत बब में उस मायाका स्वरूप जानना चाहता है, मायां वितुमिच्छामो भगवन्तो वन्तु न ॥१॥ पापम्येग क्या करके धम्लाइये ॥ १ ॥ योगीचरो ! मैं एक मृत्युका शिकार मनुप्प हूँ । संसारके वह-तयके सापोंने मुझे बहुत दिनोंसे सपा रक्खा है। वापरयेग बो नानुसृप्ये झुपन् युप्मदचो हरिकथामृतम् । मगरकपारूप अमृतका पान करा हे उन तापोंको मिटानेकी एकमात्र योपधि है, इसलिये में संसारसापनिस्तप्तो मर्त्यस्तचापमेपनम् ॥ २॥ आफ्यगकी इस वाणीका सेक्न करते करते तृप्त नहीं होता । बार कृपया वोर करिये ॥२॥ अन्तरिक्ष उमा भय तीसरे योगीभर मन्तरिसजीने करा- राजन् ! ( भगत्यन्की मम्पा सरूपत वनिष्पनीय है, पभिवानि भूतात्मा महाभूतैर्महायज । इसलिये उसके कार्याक शायही उसका निरूपण होता है।) बादिपुरुष परम्परमा जिस शकिसे सम्पूर्ण भूतोंके कारण बनते हैं और उनके विषय-मोग तपा सस@षारचान्यापः स्वमात्रात्मप्रसिद्धये ॥३॥ | मोक्षकी सिद्धिक लिये अपना अपने उपासकों की उत्तर सिदिके प्रिये सनिर्मित पत्रमूर्तीके रा नाना प्रकारफे देम, मनुप्प आदि शरीकी सरि करते हैं, उसीको एवं स्टानि भूतानि प्रविष्टा पसधातुभिः । 'म करते १४ ३ । इस प्रकार पकानों के रारा बने हुए प्राणि-शीम उन्होंने अन्तर्यामी रुमसे एकपा दशधाऽऽरमान विभजपते गुमान् ॥ ४॥ प्रवेश किया और अपने को ही पहले एफ मनके रूसमें और इसके बाद पोप हानेन्दिप तपा पाँच फर्मेन्द्रिप-इन गुपैर्गुमान् स भूतान आस्मप्रपोतित प्रसः। दस रूमि विमट कर दिया तप्प तन्हा रारा बिपोका मोग कराने खगे॥ ॥बदेवाभिमानी जीवजन्तर्यामीके धारा प्रकाशित इन्द्रियों के द्वारा नियोका भोग करता है मन्पमान इदं सृष्टमात्मानमिा सखते ॥५॥ वऔर इस पचभूतोंके शय निर्मित शरीरको वामा- अपना सरूप मानकर उसीमें वासक रोजाटा। कमाणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमिघानि दामृन् । (पा मगवान्की म्ाण्ा है)॥५अममा कमेन्द्रियोंसे सकाम कर्म करता है और टनक अनुसार गुम कमका फा मुख चौर मशुमकमा फस दुम भोग करने सवत् कमफळं गृहन् प्रमशीद मुसेवरम् ॥ ६॥ | गवा धोर शरीरधारी एकत्र इस संसार म्यान ७१८ भीमद्भागवत इत्यं फर्मगवीर्गम्छन् पहभद्रषहाः पुमान् । माता है । यह मगवान्की माया है।॥६॥ इस प्रकार यह जीव ऐसी बनेफ समझम्म्य कर्मतियों को, मो आमतसम्ठषात् सर्गप्रलयावश्नुतेऽवनः ॥ ७॥ फलोको प्राप्त होता है और महामूर्तीके प्रकपर्वत | विषश होकर जन्मके बाद मृत्यु पोर मूस्युके बाद स्मो भातूपाठव आसन्ने व्यकं द्रष्पगुणास्मकम् । प्राप्त होता रहता है-या मगमान्की माय ॥७॥ मष परमूक प्रक्ष्यका समप पाता है, यति अनादिनिधन कालो अध्यक्तायापफर्षति ॥ ८॥ और अनन्त काल स्थूण तया सूक्ष्म इम्प एवं गुरास | इस समत यह सष्टिको पम्पककी बोर, उसके वर्षा मनाइष्टिर्मविप्यत्युत्पणा मुवि । कारणकी बोर खापता है-पाभगवान्की माया है। उस समय पृष्पीपर गातार सौ वर्फतक मपार सूट तत्कालोपधितोष्णार्को लोफांसीन् प्रतपिप्यति॥९॥ | पाता है, वर्ष पिकुछ महीं होती, प्रम्पका की शकिसे सूर्यफी उष्णता वीर मी बह माती पटीने पातालतलमारम्प संघर्षणमुस्तानलः। गोकोको सपाने लगते हैं यह मायन्की मापात | उस समप शेभनाग-सबर्षणके मुंइसे भागकी प्रकार दहन्नपशिलो विम्यग् वर्धते षायुनेरितः ॥१०॥ मपटें निफरती हैं और षायुफी प्रेरणासे वे स्पट फार ठोकसे जाना बारम्भ करती है तब और भी ठो सार्वको मेघगणो पर्पति स शर्त समा । | ऊँची होकर चारों बोर फैल भाती है-या मानसी माया है ॥१०॥ इसके बाद प्रम्पकालीन सय धाराभिहस्तिहस्वाभिलीयते सलिले विराट् ॥११॥ मेघगण एपीकी रके सम्पन मोटी मोटी पारावासे में पर्पतक बरसता रहता है। उससे या स्विट् गम वतो विराजमुत्सृन्य पैराजः पुरुपो नृप । बळमें ब बात है—यह भगवान्की माया है ॥११॥ रामन् ! उस समय से विना ईभमके प्रग ना बाई अव्यक्तं विशवे एक्ष्म निरिधन इयानलः ॥१२॥ कर सूक्ष्मतरूप कायसमें मीन हो जाते है। है, वैसे ही विराट् पुरुष तथा वने प्रमाण-शरीरको मगवान्की माया है।॥ १२ ॥ यु पीकी गयी पायुना रवगन्धा मा सठित्वाय फस्पते । लेती है, जिससे वह सबके रूपमें से गठी है और जन नही वायु के रसकोच मेती है, तब सलिलं तरसरस न्योतिष्टायोपफल्पत ॥१३॥ वह वफ्ना कारण बप्ति पन पाता है- माया है ॥ १३॥ अब बचकर निका रूपम लेता है, तब वह अमि बायुमें मीन हो जाती है और स्वरूप तु वमसा पायो ज्योति प्रलीयते । मा बाकाशरूप वाकाश यापुकी पस-शक्ति छीन स्तर तब महाकाशमें मेन हो पाता है-या गान्धी हवस्पर्शोऽवकाशेन वायुनभसि ठीपत ॥१४॥ शद गुणको हरण कर देता है जिससे कई माप्य है॥१७॥ यगन् ! तदनन्तर कामरूप हम स्पमस बार यन हो जाता है। इनियाँ और काठात्मना रतगुण नभ आत्मनि ठीपते । मुधि रावस बार बीन होती है। मन मासिक . रावपापनाशि। २ सरितः। या मगामी ब०३] इन्द्रियाणि मनो बुद्धि साकारिकदृप । अहारसे उत्पम देवताओं के साप सारिखफ बार प्रवेश कर जाता है तथा अपने तीन प्रकारके काफि साप पाझार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है। मपत्र प्रविशन्ति पहारं स्वगुणैरदमात्मनि ॥१५॥ प्रकृति में और प्रकृति प्रम लीन होती है। फिर इसीके उम्टे कमसे सुष्टि होती है। यह भगवानको माया है॥ १५॥ यह सुधि, स्थिति और संहार करनेवाली एपा मापा भगवत सर्गम्मित्पन्तकारिणी । त्रिगुणमयी माया है। इसका हमने आपसे वर्णन किया। पत्र पाए बोर स्पण मनना चाहते है ! ॥१३॥ त्रिषणापर्णितामाभिः किंभूयःमोतुमिच्छसि।१६। गजामिमिने पूज-महर्षिजी इस भगवान्फी माया- को पार करना उन मेर्गके लिये तो मनुत ही कठिन है, जो वपने मनको पशमें नहीं कर पाये हैं। वा बाप रापोवान क्या करके यह पताइये कि नो स्लेग शरीर आदिमें बारम्मति रसते ? तपा जिनकी समत्र मोटी है, पतामैघरी मायाँ दुस्तरामस्वात्मभि । भी बनायाप्त ही इसे फेसे पार कर सकते हैं । ॥१७॥ भय बीय योगीश्यर प्रबुवजी पोले-राजन् ! परन्त्यज स्थूलपियो माप इदमुभवाम् ॥१७॥ मी-पुरुष सम्बन्ध कादि बन्ध!में बंधे हुए मसारी मनुष्य | मुरकी प्राप्ति वोर हुसको निटिके लिये बया कर्म करते रहते हैं। जो पुरुर मायाके पार जाना चाहता [९, उसको विचार करना चाहिये कि उनक कोका फा किस प्रकार विपरीत होता जाता है। सबके पदले कमाण्यारभमाणानां दुःखात्यै मुग्याप प। दुःख पाते हैं वोर तु सनिधिक स्पानपर दिनों-दिन दुःस माता ही जाता है ॥ १८ ॥ एक धनको दी ये। इससे दिन-पर-न दुध बदत्य ही है, इसको पम्मेत् पाझविपर्यास मिपुनीचारिणां नृणाम् ।।१८।। पाना भी कठिन है वीर पदि किसी प्रकार मिग मी जाप तो वात्माके किये तो यइ मृत्युमाए ही है। जो इसकी उसनोंमें पड़ जाता है, यह बाने-मापफो मूड जाता है। इसी प्रकार पर, पुत्र मरन-सम्मपी, - नित्यातिदन पित्तन दुर्लमेनात्ममृत्पना । भन बार भी बनिस्प बोर नाशवान् ही , पदि कोई १ जुटा भी स तो इनसे क्या मुम्प-शान्ति मिस सक्ती १॥ १९॥ इसी प्रकार ना मनुष्य मापासे पार ग्रापस्पासपमुभि का प्रीति माधिवमल ॥१९॥ प्राना चाहता है, उसे यह भी माना पाहिये कि | मरनके गार प्राप्त हानाले सार-रलाक भी पसेही नाशमन् है । म्योंकि इस बाकी पस्तुओंक समान ३ भी कुछ मिन काफि मीति कला ? यो भी एवं ठाई परं विधानपरं समनिर्मितम् । पीक असर पवाओं मन्यन पासवासे अपुर उपआप मोनके शय पमीका और पानाहीनताक म्यासे अपने धर्मका अनुष्ठान, सहमशक्ति, मैग, साप्पाय | सर्वत्र वर्षात् समस्त देश, कास औरषस्य नरूप से "पही मेरा घर है।-ऐसा भाष न रहना, गासा पवित्र थियो, जो कुछ प्रारम्भ बनुसार मिस विविक्तपीरपसन संवोएं येन फेनचित् ।।२५|| उसी सन्तोष करमा सीसे ॥२५॥ भावान्की मारि मार्ग बलम्पनेबाने शासोमें भदा और दूसरे किसी | शासकी मिन्दा न करना, प्रामाणमकेबारा मनम ७२० भीमद्भागवत सतुरयाविश्यमसं यथा मम्ररवर्तिनाम् ॥२०॥ अपवा लाग-बाँट रहती है, वधिक ऐसार्य और मुलगी प्रति छियान्वेषण तपाईW-रेका मात्र रहता है, म पुस और ऐपर्यवाःके प्रति घृणा रहती है एवं कोष तमा गुरुं प्रपयेत विज्ञासु श्रेय उच्चमम् । फल पूरा हो मानेपर यहाँसे पान तो होता ही है। सत्र नाश लिधित है। नाशका मप वहाँ मीनार पाता ॥ २०॥ इसरिये जो परम कात्यानका शिल घान्दे परे च निष्णात प्रमभ्युपश्चमाभयम् ॥२१॥ हो, उसे गुरुदेवकी शरण लेनी चाहिये । गुरुदेव से | हो, बो शम्दा-वेर्दोके पारदर्शी विद्वान् हो, किससे ये ठीक-ठीक समझा सके, वौर साप ही पराममें परिनिति सत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेप गुर्यात्मदैवत । तत्वज्ञानी भी हों, ताकि आपमे बनुमबके वाय प्रार! यस्यकी बातों को बता सके । उनका विच शान्त से, म्यवहारके प्रपञ्चमें विशेष प्रास न हो ॥ २१ ॥ ममायमानुसत्या स्तुम्येदात्माऽऽत्मदोहरि ॥२२॥ | जिज्ञासुको चाहिये कि गुरुको ही अपना परम प्रिपाम भारमा वौर इरादेम माने । उनकी मिफापम्पसे सेव फरे वीर ठमकेपास सफर मागवतधर्मकी भगवान्थे सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु । प्राप्त करनेवाले भकिमारके साधनोंकी क्रियाक शिष प्रहण करे । इन्हीं साधनोंसे सस्मिा एवं मळको करने भास्माका दान करनेवाले भगवान् प्रतम होते हैं ।।२२० दया मैत्री प्रभयं च भूतेप्वदा ययोचितम् ॥२३॥ फिर भगवान्झे भक्तोंसे प्रेम मसा करना चाहिये पहले शरीर, सन्तान वादिमें मनकी बनासकि सीसे । | सीखे । इसके पश्चात् प्राणियों के प्रति पायोम्पदक | मैत्री और विनयकी निकपट मासे शिक्षामा शौर्ष पस्तितिधां च मौन स्वाभायमार्जवम् । करे ॥ २३ ॥ मिट्टी, बल वारिसे बास शरीर । पवित्रता, सम-कपट वादिके त्यागसे भीतरकी परिश्ता प्रमचर्यमहिसां च समर्प इन्दनियो ॥२४॥ सता, प्रापर्य, महिंसा तथा शीत-उप्प, सम्दु वादि दम्म हर्ष लिदसे रहित होना सीसे ॥ २१ ॥ सर्वप्रात्मेघराचीधा कैपस्पमनिकेतताम् । मारमा और निफ्तारूपसे ईश्वरको देखना, एकम्त सेना तो पवित्र स पहनमा और त्यागी होतोटे-पुराने मनोभागपवेशात्रऽनिन्दामन्यन पापि हि ।

अ०३] एकादश स्मन्ध ७२१ घवण, मनोवाफर्मदणे घ सस्य शमदमावपि ॥२६॥ | फोश्च सपम करना, साय योटना, इन्द्रियोंको अपने- थपने गोछको स्थिर रखना वोर मनको कहीं बाहर न जाने देना सीखे ॥ २६ ॥ राजन् ! सामान्की मेमएँ श्रवणं कोनं पान हरेरनुसफर्मगः । बहुत हैं। उनके जन्म-धर्म और गुण दिन्य है। ठनीका कीर्तन और प्यान करना तपा शरीरसे अन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलघेष्टितम् ।।२७। सीसे ॥ २७ ॥ यह, दान, तप अपय जप, सदाचारका जितनी भी चेध्यएँ हों, सब मगवान्के लिये करना पाउन धौर श्री, पुत्र, घर, मपना जीवन, प्राण तपा नो पष्ट दचं तपो बप्त पूचं यश्चात्मन प्रियम् । कुछ अपनेको प्रिय गता हो-सक्-का-सब भगवान्क परणोंमें निवेदन करना, उन्हें सौंप देना सीस्ते ॥२८॥ जिन संत पुरुषोंने सचिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका वारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत् परस्मै निषेदनम्२८ अपने आत्मा और स्वामी के रूपमें साक्षात्कार कर मिया हो, उनसे प्रम दौर स्थावर, जाम दोनों प्रकारके प्रागियोंकी सेवा, विशेष करके मनुष्पोंकी, मनुर्पोमें भी एष फणात्मनाघेप मनुप्येषु च सौरदम् । पोपकारी सम्भोंकी बौर उनमें भी भगव्यमी संतों की करना सीखे ॥ २९ ॥ भगवान्के परम पावन यशके सम्बन्धमें ही एक दूसरेसे वातचीत करना और इस परिषमा चोभपत्र मात्सु नप साधुः ॥२९॥ | प्रकारके साधकोंकर फटे होकर पापस्में प्रेम करना, वापसमें स्तुए बना और प्रपनसे निवृत्त होकर बापसमें ही बाप्पारिक शान्तिका अनुमा करना परसरानुरूथने भगवनः। सीखे ॥ ३० ॥ रामन् ! श्रीकण राशि-राशि पापोंको एक क्षणमे मस्म कर देते हैं। सब उनहींकर स्मरण करें मियो रतिनिधस्तप्टिनिधिर्मिय आस्मनः ॥३०॥ चौर एफ सरेको स्मरण का । इस प्रकार साधन मक्किमा अनुष्टान फरफरते प्रम भफिका उदय से नाता है और वे प्रमादेशसे पुरुक्ति र धारण करते सरन्त सारपन्तम मियाऽपापहरं हरिम् । है।३१। उनकायकी पदी विरक्षण सिति होती है। फभी-कभी वे इस प्रकार चिता परन स्माफि अबतक भगवान् नहीं मिल, स्पा करू, कहा बाउँ, भक्त्या सजावया भक्त्या पिप्रत्युत्पुलक सनुम्३१ किससे पूर्छ, कौन मुस उनकी प्राप्ति परावे ! इस तय सोपते-सोपत ये रोने गतसा कमी मगगनकी टीमारी हर्ति हा बामसे एसा दस्कर कि परमेश्य- कपिा वन्स्प-युवचिन्तया कषि शारीमान् गारियोंक रस टिप दुर, बिरजियार इंसन गते पिभी-कभी इनफ प्रम और दानकी सन्ति नन्दन्ति वदन्त्पठाकिया। धनुभूतिस आमन्दमन हो बात है ता पनी मामानीव पाचन १ र रमप।

| कठिन है॥ ३३ ॥ रहित है, जो सन, चामत् और मपति-भास्थयों |विसकी सच्चसे ही सम्मान होकर शरीर, इन्द्रिय, प्रा सञ्जीवितानि तदरोहि परं नरेन्द्र ॥३५॥ वात्मस्वरूपमें न तो मनकी गति और न पाणी या -स सपने ससका वर्णन मही करदे बालि ७२२ श्रीमद्भागवत नृत्यन्ति गायन्स्पनुस्टीलयन्त्य | माबमें स्थित होकर मगधन्के साप बातचीत करने लगते हैं। कभी मानो उन्हें मुना ये हों, इस प्रकार उनसे गुमोका गान छेर देते है और कमी नापनापन में भवन्ति तूष्णी परमेस्य निर्वताः ॥३२॥ पिने लगते हैं। कमी-कमी गर्ने वरने पास श्वर-उधर दूदने त्याते हैं कमी की उनसे एक होकर, उनकी समिधिम सित होकर परम पत्रिका इति भागषतान्धर्मान् शिक्षन् भक्त्या वदुत्थया। अनुभव करते और चुप हो जावे ॥३२॥ गन् । जो इस प्रकार भागवतधमकी शिक्षा प्राण करता है। ठसे उनके सरा प्रेम-मच्छिकी प्राप्ति हो जाती है और | भगवान् नारायणके परपण होकर उस मप्रको वापस नारायणपरो मायामञ्जस्तरति दुखराम् ॥३३॥ ही पार कर जाता है, जिसके पंजेसे निशाना बात। ही राजोवाच पमा निमिमे पूजा-मार्पिये वाफमेग परमात्म- का वास्तविक खसप माननेवाम समभेष्ठ है । इसभि नारायमाभिधानस प्रमः परमात्मनः । मुसे यह पताइये कि जिस परम परमात्मा का पाराम' | मामसे वर्णन किया वाता है, उनका सहम क्य निष्ठामईष नो वस्तुं सूर्य हि प्रमविसमाः ॥३४॥ है।॥ ३१ ॥ भव पाचर्षे योगीबर पिप्पलापणीने पा- रानन् ! जो इस संसारकी उत्पत्ति, सिति और प्रया निमिक कारण बौर उपादान-करण दोनों ही है, स्सित्यश्वप्रलयहेतुरहेसुरस्य पाम भी और बनानेवाम मी-परस्त रूप कारन उनके साथी के रूपमें निपमान हतारमा यत् स्वप्नजागरसपप्तिपु सद् पहिय। अतिरिक्त समाधिम मी यो-का-यो एकरसता है पौर वन्त करण अपना-अपना काम करनेमें समर्थ हो देहेन्द्रियासुरदयानि घरन्ति पेन हैं, उसी परम सत्य वस्तुको वाप नापमा समकियो।" जैसे विनगारियो म तो अग्निको प्रकाशित कर सकर है और न बन ही सकती है, वैसे ही स परमाने ने उसे देख नहीं सकते और बुद्धि सोच नहीं सकती प्राम बौर इन्द्रियों तो उसके पासतक नहीं ष्टा पाती । नेति नेति-स्पादि पतिपके शाप भी । माणेन्द्रियामिप यथासमर्थिपासा। पिप्पलायन उवाच नैतन्मनो विशति पागुत पसुरात्मा भ०३] ७२३ है पन्दोऽपि बोधकनिषेधतयाऽऽस्ममूल उसको मोष करनेवाले जितने भी सामन है, उनका निषेप करके तारपर्यरूपसे अपना मूलनिका मूल लसा देते हैं। क्योंकि यदि निपेषके अधारकी, मामाकी मर्थोकमाह पम्तेन निपेपसिदिः ॥३६॥ सत्ता न हो तो निपत्र कौन कर रहा है, निक्की वि किसमें हैन प्रमोका कोई उपर ही नये, निपेधकी ही सिदि न हो ॥ २६ ॥ अब सहि मही पी, तप केवल एक बड़ी पा । सूहिका निरूपण करने के लिये सर्व रजस्तम इति विदेफमादौ उसीको त्रिगुण (सत्सम तम ) मपी प्रकृति फरफर मर्णन किया गया। फिर ठसीको बानप्रधान होनेसे महत्त्व, क्रियाप्रपान होनेसे सूत्रात्मा और चीकी उपाधि धर्म महानामिति प्रपदन्ति बीपम् । होनेसे बहारके रूपमें वर्णन किया गया । पासबमें जितनी भी शधियों-पादियोंकि बषियक- देस्तावोंके रूपमें , चाहे इन्द्रियोंके, उनके विषयों मानकियार्थफलरूपवयोस्यक्ति अपच वियोंके प्रकाशके रूपमें हों-सब-का-सपना सही। मोफि प्रमकी शहि अनन्ती । कहाँतक फहूँ ! जो कुछ स्प-प्राश्य, कार्प-कारण, सत्य वीर प्रमेव भावि सदसपतयो पर यत्।॥३७॥ वसस्य है-सब कुछ बम है । इमसे पर को पद मी प्रमही॥ ३७॥ पहायस्वरूप मारमा न तो कमी जम्म सेवा और न मरताहै।इन तो नात्मा जबान न मरिम्पति नैवतेऽसौ माता वीरन घटता ही है। बितने भी पस्तिनशील पदार्प पाहे वे किया, साइप और उनके बावके हमें ही क्यों न हों- सरकी भूत, भविष्यत् वीर नक्षीयवे सेवनविष्यभिचारिणांह। वर्तमान सचाका साक्षी है। सवमें है। देश-काल और पशुसे परिचिल, अविनाशी है। उपसम्धि कानाम अपा उपाधिका विस्य मही। सर्व प्रधदनपाय्युपठम्धिमार्च उपन्धिखरूप मानसरुम है। जैसे प्राण तो एक ही यता है, परन्तु सान से उसके पनेक नाम हो चावे वैसे ही बन एक ऐनेपर भी इन्द्रिय के प्राणो यपेन्द्रियमन रिपरिप सन्॥३८॥ सागसे उसमें अनेकताको कम्पना हो जाती है ॥३८|| जगत्मे चार प्रकारक जीव होते हैं-अा फोरकर पैदा होनेवाले पक्षी-सॉप वादि, नाच पैदा होनबामे अग्रेषु पेशिपु ताम्वविनिवितेप पशु-म्नुप्य, धरती फोड़कर निकालनमाले इस नस्पति और पसीनेसे उत्पम होनेवाले समन आदि । इन सबै नी-शरीरोम प्राणशक्ति जीवके पीछ मी यती है। प्राणो हिजोषमुपधावति तत्र तत्र । भी के भिम-मिल होनेपर भी प्राण एक ही बार। निपनदि ममिवारपा।

७२४ भीमहागवत सन्ने यदिन्द्रिपगणेशमि व प्रसुप्ने समि-त्रास्में जब इन्द्रियों निश्क हो जाती है पाहार भी सो जाता है-ीन हो जाता है, वर्षद स्टम्प आशयमृते सदनुस्मतिनः ॥३९॥ निङ्गशरीर नहीं रहता, उस समय यदि फरस हमारी न हो तो इस वातकी पीछेसे स्मृति ही कैसे होम पर्यजनाभचरणपणयारुभक्त्या मुस्खसे सोया पा 1 पीछे होनेशी या सति ही उस समय वास्माके वसिमको प्रमाणित करती है ॥३९॥ चेतामलानि विधमेन गुणकर्मधानि । चब मगवान् कामनामके चरणकमलों को प्राप्त करने की इन्चासे तीन मछि की जाती देवमकि ही अग्निकी सस्मिन् विशुद्ध उपलम्पत आस्मसार्व भौति गुण और फोसे उत्पन्न हुए वितके सारे मारे जम गस्ती है। मा चिप्स शुद्ध हो जाता है, तब सातत्यका साक्षात्कार हो जाता है जैसे मो साक्षात् ययामलथ्यो सवितमकासमा४०॥ निर्विकार हो भानेपर सूर्यके प्रकाशकी प्रत्यक्ष अनुमति होने लगती है ॥१०॥ यजा मिमिने पूम-योगीपये। सभापोग कर्मयोगका उपदेश कीधिमे, पिसके शय मुख कर्मयोग वदत न पुरुषो येन संस्कृतः । मनुष्य शीघ्रातिशीघ्र परम मेकर्प वर्षद कर्ज कर्म और कर्मफल्यो निति करनेवाय हान प्राप्त कर विभूपेदाच कर्माणि नैष्कम्पं पिन्वते परम् ॥४१॥ है ॥ ११ ॥ एक पार यही प्रश्न मने अपने र महारान इसाकुके सामने प्रभाबीके मानस पुष मर्स पपं प्रश्नमृपीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके । भरियोंसे झ्यपा, परन्तु उन्होंने साथ होनेपर भी में प्रश्नका उतर न दिया। इसका क्या कारण प! नामुवन् प्रमग पुरातन कारणमुन्यताम्॥४२॥ करके मुझे क्तलाइये ॥ १२॥ आपिहोंच उपाप अप छठ पोगीश्यर भाविदोषजीने का यदन् ! कम ( प्रसविहित ), वर्म (निधि) विकर्म (विहितमा मलयन ) -ये तीनों एकमात्र शरा बाने जाते हैं, इनकी गवस्था स्यक मा समासमविफमति पैदवादा न लौकिकः । नहीं होती । वेद अनीय हैनपरकप , की उनके तात्पपर निधय करना बहुत पनि है। इस यहमा विशन् भी उनके अभिप्रायस निगम पदम्य पमरात्मत्वात् सप्र मुमन्ति मूर्यः ॥४३॥ नाकारी समनकर समयी अति भून कर घेरते हैं। सीसे तुम्हारे अपनरी। तुम्हारे प्रत्नमा उधर नहीं निक)" पायसमर है । पर फर्जी मितिले नि पराधरादा पदान् शनानामनुनामनम् । लिन परता से पारस्पने मिटा नगर १ भाय। यो मायरे भोरपि पुरा- शयद एन ।

एकादश स्कन्ध ७२५ अ०३] फर्ममोपाप कर्माणि विधचे अगदं पथा ॥४४॥ | देकर लोपध मिलाते हैं, वैसे ही यह वनम्धिोंको वर्ग बादिका प्रमोमन देकर श्रेष्ठ कर्ममें प्रात फरता है।॥ ११ ॥ जिसका महान निवृत्त नहीं हुला है, नापरे यस्तु वेदोक्कं स्वपमझोऽजितेन्द्रियः । जिसकी इन्द्रियों पशमें नहीं है, यदि मनमाने ढगसे वेदोक कोका परियाग कर देता है, तो यह विहित कमोका भाचरण न करनेके कारण विकर्मरूप अधर्म विकर्मणा अधर्मेण मुस्पोर्मत्युसपैति सः ॥४५॥ | 0 करता है। इसलिये यह मुख्युके बाद फिर मृत्युको प्राप्त होता है ॥ १५॥ इसज्येि फलकी बमिलापा छोरफर वोर विचारमा भगवान्को समर्पित कर नो वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीपरे । वेदोळ कर्मका ही धनुष्ठान करता है, उसे कांकी निधिसे प्राप्त होनेठी शानरूप सिद्धि मिल जाती है। नैष्कम्पो लमते सिद्धिं रोचना फलश्रुति ॥४६॥ जो वेदमि स्वर्गादिस्स फमका वर्णन है, उसका तात्पर्य फालकी म्यतामें नहीं है, यह वो कमर्मि रुचि उत्पन्न करानेके म्येि ॥१६॥ य आनु हदयग्रन्धि निर्जिहीर्षः परात्मनः । राजन् ! बो पुरुष चाहता है कि शीघ्र से शीघ्र मेरे असलरूप बारमाकी एय-पम्पि–में और मेरेकी कल्पित गोठ खुल चाय, उसे चाहिये कि वह वैदिक और निधिनोपयरे देष मन्त्रोक्तेन च फेश्वम् ॥४७॥ तान्त्रिक दोनों ही पद्धतियोंसे भगवान्की थाराधना करे ॥१७॥ पहले सेवा वादिके द्वारा गुरुदेषकी दीक्षा प्राप्त करे, फिर उनके परा अनुप्रानकी विधि लम्भानुप्रा आचार्याच वेन संदर्शिवागम । सीखे अपनेको भावान्की जो मूर्ति प्रिय लगे, बीट | जाम पड़े, उसीके 10 पुरुषोसम भगवान्की पूजा महापुरुषमभ्यर्षेन्माभिमवयाऽऽस्मनः ॥४८॥ परे ॥ १८ ॥ पहले स्लामारिसे शरीर और सन्तोष अादिसे अन्त फरणको शुद्ध करे, इसके बाद भाषान्की शुधि सम्मुखमासीनः प्राणसंयमनादिमिः । मूर्तिके सामने बैठकर प्राणायाम आदिके शरा भूत- मुदि-नाप-शोवन करे, तत्पथात् विधिपूर्वक मत्र, देवता आ िके न्याससे बरक्षा करके भगवान्की पूजा पिण्ड विशोभ्य सन्न्पासातरक्षोऽपेरिम् ।।४९॥ परे ॥ १९ ॥ पहल पुप्प भादि पापों का जन्तु आदि निकानकर, पृधीको सम्मान अदिसे, वरनेका अपम होकर वोर भगवान्की मूर्ति को पाल्हीसी पूजाक मगे वर्षादौ दये चापि यथासम्धापचारकः । हुए पाकि शासन धादिसे पूनाक पोम्प पनाकर मासनपर मनोधारणायक बम छिपकर पाप, अर्घा । अदि पात्रोंको म्यक्ति फरे। नन्तर एकामपित द्रम्पवित्पास्मतिमानि निप्पाप प्रात्य चासनम्।५० होकर दय, मगवान्का प्यान करके पित्र उसे सामनेकी समितिम चिम्तन परे । तदनन्तर एय, सिर, पायादीनुपरप्याध सनिधाप्प समाहिस । शिख (एपाप नम , शिरसे साहा) इत्यादि मोसे

७२६
भीमझामपन
,
।
पादिभिः कृतन्पासो मूलमन्त्रेण पायेत् ॥५१॥ | म्यास करे और अपने देषके मूल मन्त्र के इरा येत
काल बादिके धनुछ प्राप्त पूषा सामग्रीसे प्रतिमा
साझोपाझा सपार्पदो तो वो मूर्ति स्वमन्त्रतः । वादिमें वक्या स्वपमे मगमन्की पूजा करे ॥५०-५१॥
अपने चपने उपास्पदेक्के विद्याकी यदि
पायाचिमनीपायः स्नानपासोषिभूषणः ॥५२॥ वायुधादि उपाग गौर पार्षदोसहित उसके ममा
पाय, पर्य, वाचमन, मधुपर्क, मान, समान,
गन्धमायावतसम्भिपदीपोपहारको
गच, पुप, दधि-वक्षतके तिलक, माम, धूप, दोर
और मैप भादिसे विधिवत् पूजा करे तवा मिर स्तोत्र
साझ सम्पूज्य विधिवत् स्वैः स्तुत्वा नमेरिम्॥५३॥ बारा स्तुति करके सपरिवार भगवान् श्रीपारिको ममत्कार
करे ॥ ५२ ५३॥ अपने भापको माकम्प पर
वात्मानं सन्मय म्यापन् मूर्ति सम्पूजयेदरे ।
करते हुए ही भगवान की मूर्तिका पूमम करना चाहिये।
क्षेपामापाप खिरसि खधाम्न्युदास्स सस्कृतम्॥५४॥
मिर्माम्पको अपने सिरपर रस्से और बादरके साथ
भगपक्षिाको पद्मस्थान स्थापित कर पा समस करनी
एवमम्न्पर्फतोपादावतियो दये च यः।
पानिये ॥ ५५ ॥ इस प्रकार गो पुल बनि, सूर्य
मग, पतिषि और अपने दप बामस्म श्रीहरिकी स्मा
पजतीघरमास्मानमपिरान्मम्पते हि सः ॥५५॥ करता है, या शीघ्र ही मुफ हो गाय है ॥ ५५ ॥
इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहस्यों सहितायामेकादशस्कन्धे तृतीयोऽपाय ॥३॥
अथ चतुर्थोऽध्याय
भगवान्के मषवारोंघ पर्णन
रागोपाल
पजा निमिने पूछा-योगीमये ! भगवान् माता-
से अपने मोंकी भकिके वश होकर बनेकों प्रकारके
यानि पानीड कर्माणि ये स्वप्छन्दजन्मभिः ।
पातार प्रारण करते है और बने तीमएँ ।
अफगग रुपा करके मगमन् की उन सीमाओं का वर्णन
पके फराति फर्ता या हरितानि वन्सु नः ॥१॥ कीजिये, मोरे वनक कर पुके है, फर हेरेप
तुमित उपा
मप सात पोगीश्वर मिळणीने पार
राजन ! मगवान् मनन्त हैं। उमक गुण भी धनन्त
यो वा अनन्तस्स गुणाननन्वार
है। गा या सोसता है कि में उनके गुणों को गिन
ननुक्रमिप्यन् स तु पासबुदिः । गा, र मूर्स गामाया तो सम्भव है कि
१ या नावासोतिभूपयो । २ पोशी । ३ बुतिः ।
• मिष्णुभगान्धी पूरा भयोम प्रयोग का विम्म परमै हो भन्न पाहि गम
ननावरा
रन पेतम्या मरेपरम् ।
करेंगे ॥१॥

4.४] एकादश स्कन्ध ७२७ । रजांसि भूमेर्गणयेत् कवित् कोई किसी प्रकार पृष्पीके पुष्टि कर्गोको गिन ले, परन्तु समस्त शक्तियों के आभय मगवान्के धनन्त गुणका फालेन नवासिलसक्तिधामः ॥२॥ कोई कभी किसी प्रकार पार नहीं पा सकता ॥२॥ | मावान्मे ही पृष्पी, ख, यति, यु, एकरश—दन मृतर्पदा पथभिरात्मसृष्टः । पौष मूतोकी अपने-वापसे अपने बाप, सठि की है। पुर विराज पिरचय्य समिन् । जब वे उनके राग विराट शरीर, प्रसाण्डका निर्माण करके उसमें डीलासे बपने अंश अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश खांशेन विए: पुरुपाभिधान करते हैं। ( मोच्यरूपसे नहीं, क्योंकि मोका तो अपने पुर्योके पसरूप जीप ही होता है तब ठन आदि मवाप नारायण आदिदेवः ॥३॥ देव नारायणको पुरुष' नामसे करते है, यही उनका यत्कार एप सवनत्रयसनिवेशो पहम वक्तार ॥ ३ ॥ उन्होंके इस वियट प्रसार शरीरमें तीनों मेक स्थित है । सभाकी इन्द्रियोंसे समस्त्र पस्पेन्द्रियैतनुभूतासभपेन्द्रियाणि । दोधारियोंकी पानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रिपा बनी है। उनके सरूपसे ही स्वत सिद शानका सबार होता है। मानं स्वतः सनतो पलमोज हा उनके पास प्रयाससे सब शीम वह वाता है तपा इन्द्रियोंम घोन (इन्द्रियोंकी शणि) और कर्म करनेकी सस्वादिभिासिसिलयोनय आदिकर्ता॥४॥ शक्ति प्राप्त होती है। उन्होंके सत्त्व वादि गुणोंसे संसारकी स्थिति, उत्पति और प्रष्य होते हैं । इस बादापम्पमतपती रजसास सर्गे विराट् शरीरके नो शरीरी, वे ही वादिकर्ता नायफ्म १॥ १॥ पहले पान माल्की सत्पचिके लिये उनके विष्णुः स्थितो मतपविजिधर्मसेतुः। रगोगुमके वंशसे प्रमा हुए, फिर ये दिपुरुष ॥ ससारकी सितिके लिये अपने सत्पांशसे पर्म तपा रुद्रोऽप्पयाय तमसा पुरुपः साप | ग्रामों के रक्षक फापति विष्णु बम गये । फिर चे ही तमोगुणफे प्रशसे भगतके संहारके लिये स्व बने। इस प्रकार निरन्तर उनी परिवर्तनशील प्रवाकी सत्पति, इत्यवस्थितिलयाः सतत प्रजासु ॥ ५॥ स्थिति वीर सहार होवे रहते हैं ॥५॥ धर्मस्य दक्षाहितर्पजनिष्ट मृत्यो दक्ष प्रजापतिकी एक कम्पाका माम प मूर्ति । या धर्मको पातो पी । उसके गर्भस भगवान्ने विधेष्ठ । शान्तरमा भर' और 'नारायण' के रूपमें वतार लिया। नारायणो नरपिप्रपरः प्रशान्तः । उनोन यात्मताका साक्षात्कार करनेवाले उस मगाराधनसप फर्मका उपदेश किपा, ना वास्तवमें कमवनसे छानबाम और नैष्कम्प स्थितिको प्राप्त नैपर्पतषणमुबाष चचार कर्म कानेात्या नोन स्लप भी से ही कर्मका अनु छान किया । बोया ऋषि-मुनि ठनक चरणकमों की से करते यते है । वे आज भी परिकाप्रममें उसी योऽपापि धास्त पिपर्यनिपतितापि ॥ ६॥ कर्मका आवरत करते हुए पिराजमान है ॥६॥ १ सतनः । २ मिनिटः । । मूखा । ।

७२८ | केवल कर्मकाण्यमें मोराकर यादके द्वारा देखायो | पीके रूपमें उनका माग देठे यते, उनमेगक १ नो मूस पास, गर्मी-सर्दी एवं आंधी-पानी को श्रीमद्भागवत इन्द्रो विश्वयममघाम जिघृक्षतीति ये अपनी घोर तपस्याके द्वारा मेरा धाम मनना पाते- इम्झने ऐसी बार्शका करके श्री, पसन्त अति दम्पले फार्म न्पयुक्त सगण स क्वर्युपाम्पम् । सय कामदेषको उनकी तपस्याम बिन राग्नेके मि भेगा । कामदेवको मगवान्की महिमाका मन न था, इसन्नेि गत्वाप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातः वह अप्सरगण, वसन्त तथा मन्द-मुगम्ध पके साथ बदरिकाश्रममें जाकर नियों के कटाक्ष-पागोंसे ठनें पाया खीप्रधणपुभिरविध्यदतन्मदिनः करनेकी चेय करने गा ।। ७॥ वादिदेव नर-मापने ॥७॥ यह जानकर कि यहइन्द्रका कुपक है, मपसे कोफ्तेर काम वादिकोंसे सफर कहा-उस समय उनके मनमें विनाय शकतमक्रममादिदेवः किसी प्रकारका बमिमान पा वासर्य नही। 'कामदेव, मझ्यास्त और देवानाबो ! तुम डोस मो प्राह पास गसविसप एवमानान् । मत, हमारा मातिप्य सीकार कये । वमी यहाँ बरो, हमारा वामम सूना मत करो ॥ ८॥ यस् ! म मा मैट भो मदन मारूव देववचो नर-नारायण ऋभिने उने भमपदाम देते हुए इस प्रकार कहा, तब कामदेव भादिके सिर कपासे मुफ गते । गृहीत नो पलिमशून्यमिर्मरुवम् ॥ ८॥ नहोंने दया भगवान् मर-नागफ्णसे करा--'भयो । वापके लिये या कोई बाधकी बात नहीं है। क्योकि इत्थं हवस्यभयद नरदेष दवा बाप मायासे परे धौर निर्षिकार । योगाबमयम और धीर पुरुष निरन्तर मापके परणकम में प्रभास करते रहते हैं ॥९॥ आफ्के भक वापकी महिले प्रमावसे देवताओंकी रामधानी अमरावतीका बास नैतव विभो त्वपि परेऽपिरवे विचित्रं करके वाफ्के परमपदको प्राप्त होते हैं। इसनि म वे भवन करने उगते है, सब देवता मेग तया-सहसे खारामधीरनिफरानतपादपमे ॥९॥ | उनको साधनामें निम्न गते हैं। किस से स्वा सेवा सुररुवा पदवोऽन्तराया। स्वाँको पिलाय परम प्रमापदंत। मार्गमें से किसी प्रकारका णि महा रासते । परन्तु प्रमो ! आपके मकान उनके पास उपस्थित की नान्यस्य पहिपि पसीन् ददत स्वभागान् विष्ण-बाधाओंसे गिरसे महा। यत्कि आपके . कमयेकी छत्रछाया में यते पुर में मोंके सिरफर धच पद त्यमविता यदि विभनि॥१०॥| पैर रसकर धागे का जाते हैं, अपने उसे पुन नहीं होते ॥ १० ॥ बहुत से लोग तो ऐसे होते धुवृत्रिकालगुगमारसचहन्या तपा रसनेन्द्रिय और जननेन्त्रिपके देगोको, जो मार नमानपारवलधीनसितीर्य फचित् । समुदोंक समान है, सा लेते हैं--पार कर आते है। १ मा भषिमी। सवीरनम्रशिरस सपुर्ण तमूषु ब०४] एकादश स्कन्ध ७२९ मोम्स यान्ति विफलस्स पर पदे गो परन्तु फिर भी वे उस क्रोधके कशमै हो वाते है, बो गायके खुरसे यने गरेके समान है और जिससे मंझन्ति दुभरतपश्यापोत्सवन्ति ॥११॥ कोई मम नहीं है.आमनाशक है। और प्रमो । वे इस प्रकार अपनी कठिन तपस्याको खो बैठते है।॥ ११ ॥ जब कामदेव, यस्त आदि देवताओंने इति प्रगृपतो तेषां सियोऽस्पद्भुतदर्शना । इस प्रकार स्तुति की तब सर्वशक्तिमान् मायान्ने अपने योगक्से उनके सामने बात-सी ऐसी रमणियों दर्शयामास शुभूपा खर्षिता कुर्वतीविसः ॥१२॥ ) प्रकट करके दिखायी, जो महत रूप गप्पसे सम्पम वोर विचित्र वाचारोंसे सुसज्जित भी तपा भगवान्फी सेश कर रही पी ॥ १२॥ नव देवराज इन्दके ते दयानुधरा रन खियः भीरिख रूपिणी । अनुघरोंने उन लक्ष्मीबीके समान रूपयती नियोको देखा, तर उनके महान् सौन्दर्यके सामने उनका चरा गन्धेन समुहस्तासां रूपौदार्यदलभियः ॥१॥ फीका पड़ गया, वे श्रीहीन होकर उनके शरीरसे निकलनेवारी दिम्य सुगन्धसे मोहित हो गये ॥ १३ ॥ तानाह देवदेवेन्ठ प्रपतान् प्रासभिव । बम उनका सिर मुफ गया । देवदेवेश मावान् नारायण हँसते हुए-से उनसे बोले—'तुमस्प्रेग इनसे किसी पासामेक्समो पर सपर्णा स्वर्गमपणाम् ॥१४॥ एक सीको, जो तुम्हारे अनुरूप हो, प्राण कर लो। कह तुम्हार सर्गप्रेक्सी शोमा सानेमाल होगी ॥१४॥ देमराज इन्द्रफे अनुचरोंने 'नो बाहा' कहकर भगधन्के भोमित्यादेशमादाय नत्वा तं सुरवन्दिनः । थादेशको सीकार किस्प तथा उने नमस्कार किया । फिर उनके द्वारा नापी र सिमिसे श्रेष्ठ अप्सरा उर्वशीमप्सरम्भेष्ठां पुरस्कृस्प दिवं ययुः ॥१५॥ ठाशीमो मागे करके वे वगयेकमें गये ॥ १५ ॥ वहाँ पहुँचकर नहोंने इन्द्रको नमस्कार किया तया भरी इन्द्रायानम्प सदसि मृण्वता त्रिदिवौकसाम् । सभामें देशप्रमोंके समने भगवान् नर-नारायणक का और प्रभावका पणन किया । उसे सुनकर देवरान उसु रम्पणवलं समस्तत्रास विस्मित ॥१६॥ इन्न भयन्त मपभीस और भक्ति हो गये ॥ १६ ॥ मगान् विष्णुने अपने सरूपमें एफरस स्पिस खते सखरूप्पपददम्युत आरमयोग ए भी सम्श नगएक फ्ल्याणके लिये बहुत-से फमकतार माण किये हैं। विदराब बत, दयप, दचःकुमार पभो भगवान पिता नः। सनक सनन्दम-सनातन-सनस्कुमार बार हमरे पिता अपमके रूपमें अपतीम ऐफर उन्होंने बाभकार पिप्णुः शिवाय अगवां कलयावतीर्ण के साधनोंका उपदेश दिया है। उनान ही हयग्रीक- अतार लेकर मपु-कैटम नामक अनुरोका संहार करके स्तेनाता मधुभिदा भुवयो हसास्वे ॥१७॥ उन स्पोनेके आरा कुराये हुए पेदोंक उपार किया स १-२२- मा | मप पचने गा, तब उनको निर्मप करके याआच्छलेन समदाददिते सुतेम्पा२०॥ मन्यन्तरोम अपनी शजिसे बनेको कल्माटार पर ७३० श्रीमहागवत [.. गुप्तोऽप्पये मनुरिलौपधयम मात्स्ये है।॥ १७ ॥ प्रलपके समय मत्स्यावतार लेकर उनसे भावी मनु सत्पात, पृथ्वी और भापधियोंकी-चापाई क्रोडेतो दिविज उदरताम्भसामाम्। की रक्षा को पोर पाहावतार प्रहण करके पृमीर | रसातससे उद्धार करते समय हिरण्याक्षका सहमनिस) फौमें धृतोऽदिरमृतोन्मधने स्वपप्ठे क्विार प्रहण करके उन्हीं मगधान्ने वस्तममा काय सम्पम करनेके मिये अपनी पीठपर मदरास ग्राहात् प्रपन्नमिभराजममुश्चदार्वम् ॥१८॥ | धारण किया और उनी भगवान् विपुन अपने शरमा एवं बात मळ गजेन्द्रका प्राइसे छाया ॥ १८॥ संस्तुन्यसोऽधिपतिवाम्मणानुपीय एक मार वालसिय अपि तपस्या करते-करते वापत दुल हो गये थे। वे नव कश्यप ऋषिक मि मकं च पत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । समिधा छा रहे थे, तो पककर गायके सुरसे बने गड्ढे में गिर पड़े, मानो समुद्र पर गये हों। उन्होंने देवत्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जब स्तुति की, तव मायान्ने वस्तार कर उनस उदार किया । त्रामरको मारनेके कारण यस माने जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतो नृसिंहे॥१९॥ अमहत्या मी वौर वे उसके मपसे भागकर छिप गरे, तब मगवान्ने उस हस्पासे इन्द्रकी रक्षा की, और देवासुरे युधि च दैत्यपवीन सुरार्थे जव बसने नाप देपानामाको बन्दी बना लिया स्व मी भावानने ही उन्हें बमुकि गुमसे माया । इत्वान्तरेप सपनान्पदधात् कलाभिः । सब हिरण्यकशिपुके कारण प्रहाद बादि स्त पुरुषों से भगवान्ने नृसिंहावतार म्हण किया वर हिरण्यकशिपुरे मृत्वाथ वामन इमामहर बसेमा म्पर ममा ॥ १९॥ उनोंने देवताओंकी रखाके मि देवासुरसमाममें देस्यपतियोंका वध किया और विभिन्न सोऽम्बि पसन्ध दशपत्रमान् सलाई | करके त्रिभुवनकी रक्षा की। फिर बामन-बक्सार प्रमा निषत्रियामरुत गां च त्रि सप्तकत्वो करके नहोंने याचनाके बहाने इस पृप्पीको रस गरिसे छीन लिया और अदितिनन्दन देवताओंको रामस्तु हेरपालाप्ययभार्गवापिः। | दिया ॥ २० ॥ परऽयम-वक्तार प्राण करके उन ही पृष्पीको इकीस पार अप्रिपदीन किया । परशुरामी हर्षशका प्रव्य करने के लिये मानो स्णुशमें 4 रूपसे ही भवतीर्ण हुए थे। उन्हीं मानान्ने रामात स्मुदपर पुछ पाँच एवं रावण और उसकी राजन सीतापविजयति लोफमलमकीति॥२१॥ माको मटिममेट कर दिया। उनकी कीर्ति कम लोकोंके मसको नए करनेवाल। सीतापति भाग भूमर्मरावतरणाय राम सदा-सदा, सर्वत्र विक्पी-बी-बिजयी ॥२१ यदुष्वनन्मा रामन् ! भन्म होनेपर भी पृथ्वीमा मार उदार लिये वे ही मावान् यदुवंशमें जन्म केगे और ऐसे कर्म करेंगे, निमें नाम देवता मी नही कर सक बाता परिप्पति मुरैरपि दुप्फरामि।

एकादश स्कन्ध ७३१ वादविमोहपति यन्त्रकसोऽतदहान् फिर बागे चलकर मगवान् ही बुद्धके रूपमें प्रकट होंगे और पाके मनधिकारियोको पन करते देखकर अनेक शद्वान् कलौ बितिसको न्यानिष्पदन्त॥२२॥ प्रकार के तर्क-क्तिकोसे मोहित कर लेंगे और कलियुगके घन्तमें फरिस अवतार लेकर वे ही न राबाओंका मम करेंगे ॥ २२ ॥ महाबाहु विदेहराज | भावान्की एपविधानि कर्माणि बन्मानि च जगत्पते । | कीर्ति नन्त है । महात्माोंने बगपति भगवान्के ऐसे-ऐसे बनेकों अनम और कमाझा प्रचुरतासे गन भी भूरीणि भूरियशसो पर्णिवानि महाराज ॥२३॥ | किन है ॥ २३ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईया संहितायामेकादशस्कन्धे चतुर्पोऽप्याप ॥ १ ॥ समस उपाय अथ पञ्चमोऽध्याय भकिहीम पुरुपोंकी गति भौर भगवान की पूजाविधिका वर्णन रायोवान पमा निमिने पूम योमरो । थापत्येग तो श्रेष्ठ घामपानी और मगान्के परमभक्त हैं। मा करके या तटाइये कि विनफी कामनाएँ शान्त नहीं भगवन्तं हरि प्रामो न भवन्स्पात्मषिचमाः । ई है, किरू पारलौकिक भोगेकी मासा मिटी नहीं और मन एवं इन्द्रिय भी बसमें नहीं हैं तपा जो प्राय भगधन्फा भवन भी नहीं करते, ऐसे ध्येकी सेपामभान्तकामाना का निष्ठाविजितारमनाम्॥१॥ क्या गति होती है ॥ १ ॥ मप म्पठये योगीभ्यर घमसजीमे करा-रामन् ! मुसाहरूपादेम्पः पुरुषसाभमैः सह । विराट् पुरके मुझसे सषप्रधान प्रामण, मुद्राओंसे सलमत्रप्रधान क्षत्रिय, जाँघोंसे रन-समप्रधान पैश्य बोर चरणोंसे तम प्रधान की उत्पति गई है। उन्हीकी जोधोंसे गृहम्पाश्रम, एपसे प्रमचर्य, पक्ष सलसे पान- चस्वारो जपिरे मर्णा गुर्विप्रारय पृथक् ॥२॥ प्रस्म और मस्तकसे स्पास---ये चार आश्रम प्रकट हुए है। इन चारों वर्गों और अथर्मोके ममदाता स्वपं पायन् ही है। वही इनफ साम्प, निपत्ता और प एपो पुरुप सायादात्मप्रभवमीघरम् । आमा भी है। इसलिये इन गर्ग और आश्रममें सने- सा जो मनुष्य मगवान् भवन नहीं करता, यसि उथ्टा उनका अनादर करता है, वह अपने सान, नभनन्त्यवजानन्ति म्याना म्रय पतन्त्यधः॥ यग माधम और मनुष्य पनिसे भी गुत हो जाता ६ उसका अभपतन हा जाता है ॥ २३ ॥ बहत- प्रिो और ए शशि भगवान्दी पध दररिस्थाः फेचिद् दूरमाच्युतकीतनाः । और उनक मामालन गरिसे पुछ दूर पर गये -- ७३४ श्रीमद्भागवत - । प्रैवर्गिका पक्षणिका आत्मानं घावयन्ति ते ॥१६॥ | उधरके । वे भष, धर्म, काम-इन तीनों पुराने फैसे यते हैं, एक क्षणके लिये भी में शान्ति र मिलती । वे अपने हों अपने पैरेम कुमारी मारने एस आत्मानोऽशान्ता बनाने धानमानिनः । है। ऐसे हीमोगोंको वारमघाती करवे ॥१५॥ बहानको ही शान माननेवाले इन बास्मघातियों को शान्ति माही मिमती, इनके कमौकी परम्परा कमीत सीदन्त्यकतफत्या पे कालध्वस्तमनोरथा ॥१७॥ महीं होती । काठमगवान सदा सर्वदा इमके मनोवार पानी फेरते ग्रते हैं । इनकेादयकी जान, विद कर मिटनेका नहीं ॥ १७ ॥ यमन् ! जो लोग सी भगवान् श्रीकृष्णसे विमुस , वे वक्त परिश्रम कले हित्वात्पापासरचिता गृहापत्पसुरक्रियः । गृह, पुत्र, मित्र पौर घन-सम्पत्ति इकट्ठी करते है। परन्तु उन्हें बन्समें सब कुछ छोड़ देना परता है* | न चाहनेपर मी विवश होकर घोर मरफ पाना पस समोविशन्स्पनिच्छन्तो वासुदेवपरामलाः ॥१८॥ है। ( मावान्का मचम न करनेवाले विषयी पुरानी यही गति होती है)॥१८॥ रागोयाम पजा निमिने पूम-योगीश्वरो ! अपमेग र फस्मिन् काले स भगवान् किंवर्णः फीप्सो नभिः । करके यह बताइये कि मगवान् किस सम्म किस रंगा फौन-सा वाकार सीकार करते है और मनुष्य किस नाना पाकेन पिस्निा पून्पते वदिशोपवाम् ॥१९॥ नामों और विधिय से उनकी उपासना करते हैं ॥ १९॥ भवमयोगीश्वर हरभावनधीनेहा- कव वा वापरं च फलिरिस्पेषु केशवा । पार पुग है-सस्य, त्रेता, द्वापर धीर करान | भावान्के बनेकों रंग, नाम मौर बातियों होमी का नानापर्णाभिभाकारो नानैव विभिनेज्यते ॥२०॥ विमिम विधियों से उनकी पूना की जाती है ॥२०॥ | सत्ययुगमें मायान्के मीनियाका रंग होता है। कते शामतुर्माहुटिलो पल्लालाम्परः । उनके चार मुचाएँ और सिरपर ना होती है, तो कृष्णानिनोपपीतावान् विप्र दमकमाल ॥२५॥ फोपबीत, माक्षकी माल्म, दस वौर काम कर पाकलका ही पहनते हैं। काले मृगमा मनुप्पास्सु तदा शान्ता निराः सवः समाः। करते है ॥ २१ ॥ सत्ययुगके मनुम्प परेशान्त, पास परहित, सबफे रिवैषी मोर समदी हो । यस पन्ति तपसा देवं मेन घ दमन च ॥२२॥ इन्द्रियों और मनको वशमें रसकर प्यानरूप सपको दाय सबके प्रकाशक परमात्म्पकी आराधना से ईस सुपर्णा पऊष्ठा धर्मो मागधरोऽमलः । ₹॥ २२॥ ये स्मेग इस सुपण, वैकुण्ठ, धर्म, योगेश्य ब, ईपर पुरुष, अम्यक मौर परमात्मा आदि मामी ईश्वरः पुरुषोऽम्पकः परमारमेति गीयते ॥२३॥ पारा मगचन्के गुम, मोम बादिका गान करते हैं ।।२।। करभावन उवाच एकादा स्कन्ध ७३५ प्रेताया रक्तवर्णोऽसौ चतुवा खिमेखल । यजन् ! प्रेतायुगमें मगवान्के श्रीविका रंग होता है माउ | घार मुजाएँ होती हैं धौर फटिमागमें हिरण्यकेशवय्यात्मा सम्सचायुपलक्षणः ॥२४॥ वे तीन मेछन्ग धारण करते हैं। उनके केश पुनहले होते है और वे वेदप्रतिपादित माके रूपमें एकर शुक्र वं तदा मनुना देवं सर्वदेवमयं हरिम् । खुप थादि या-पात्रों को धारण किया करते हैं ॥२॥ उस युगके मनुष्य अपने धर्ममें बही निष्य स्सनेवाळे यजन्ति विधया त्रय्या धर्मिष्ठा प्रापयादिनः ॥२५॥ और वेर्दोके अध्ययन-वयापनमें बड़े प्रवीण होते है । ये मेग सम्वेद, यजुर्वेद और सामवेदरूप वेदत्रयीके विष्णुर्यन प्रभिगर्म सर्वदेव उरुकम । गरा सर्षदवसरूप देषाधिदेव भगवान् श्रीहरिकी वारापना करते हैं ॥ २५॥ प्रेतायुगमें अधिकांश लोग विष्णु, पाकपिर्जयन्तम उरुगाय इतीयते ॥२६॥ या, पृप्निगर्भ, सर्वदेव, उसकाम, वृषाकपि, वक्त और उहाय यादि मासे उनके गुण और मीम बादिका वापरे भगवाध्याम पीसवासा निजायुधः । कीर्तन करते हैं ॥ २६ ॥ रामन् ! सपरयुगमें भगवान्के श्रीविग्रहका रंग होता है साम्य । ये पीताम्बर तपा भीषस्सादिभिरदेष लक्षणरुपलक्षितः ॥२७॥ या, चक्र, गदा बादि षपने बायुध धारण करते हैं। | पक्ष सम्पर श्रीपासका पित, भूगुख्ता, कौस्तम्मगि बादि क्षोंसे पहचाने जाते हैं ॥ २७ ॥ राजन् ! तं संदा पुरुप मा महाराजोपलधणम् । उस समय विद्यम मनुष्य महाराजोंक चिड छय, चम पबन्ति षेदतन्त्राम्पा परं जिवासपो नृप ॥२८॥ वादिसे मुफ परमपुरुष भगवान्की दिक और तान्त्रिक विधिसे वाराधना करते है ॥२८॥ पे संग इस नमस्ते वासुदेवाय नमः सहर्षणाय च । प्रकार मान्की स्तुति करसे ₹-2 अनतरूप मगवान् वासुदेव एवं क्रियाशकिरूप सहर्पण 1 हम प्रघुम्नायानिरुद्धाय सुम्मं भगवते नम ॥२९॥ बाफ्को वार-पार नमस्कार करते हैं । माद्यन् प्रपुन धौर अनिरूपके रूपमें हम वापको नमस्कार करते है। नारायमाम अपये पुरुपाय महात्मने । अपि नारायण, महारमा नर, विश्वेश्वर, विश्वरूप और विश्वधराम विवाय सर्वभूतात्मने नम ॥३०॥ सवमूनारमा भगवान्को हम नमस्कार करते हैं ॥२९ ३०॥ राजन् ! आपरयुगमें इस प्रकार लोग बगदीर भगवान् इति द्वापर टर्वीच स्तुवन्ति जगदीश्वरम् । की स्तुति करते हैं । बम फलियुगमें क्नक स्योंके नानावन्यविधानेन कलायपि पभा मृणु ॥३१॥ विधि-विधानसे भगवान्की नैसी पूजा की जाती है, उसका वर्णन सुनो-॥३१॥ रुप्णवर्ण विपाहणं सोङ्गापालपापदम् । फठियुगमें मायानका श्रीविद्या होता है कृष्णवर्ण- काले रंगका । जैसे नीलम मणिमेसे उम्मत कान्तिधारा निकलती यती है, वैसे ही उनके पाकी स्टा मी उम्कत होती ।दप धादिया कौस्तुम वादि १ ण । २ गोरा सरस् । - । होत करते हैं॥७॥ वे मूर्स यो-यूरोकी नहा कि देते । वे कर्मका रहस्प न जाननेवाले मूस पेश | अपनी जीभको सन्तुष्ट करने और फेकी मूस मिटाने-- करते है॥८॥ धन-4मय, पुमीनता, रिप, दाच | सौन्दर्य, यर और फम भारिके धमेरसे अपना पाते भी अम्मान करते रहते है॥९॥ गन् ! ने | इस पतको घर-यार दुहराया है कि भगन् अरसो ७३२ भीमसागवत [.. स्त्रियः शूद्रादयमेव तेऽनुकम्प्या भवानाम् ॥ ४॥हैं। ये बाप-जैसे भगवनकोंकी दपके पात्र है। भापळोग उन्हें कपा-कीतनकी सुविधा देकर मास विप्रोराजन्यपैश्यौ चहरे। प्राप्ताः पदान्तिकम्। उदार करें॥ १॥ नमण, क्षत्रिय और रेस कमसे वेदाप्ययनसे तपा झोपवीत वादि सस्कारों से भागने श्रौतेन जमनापापि समन्त्याम्नायवादिनः ॥५॥ चरणों के निकटतम पहुँच चुके है । फिर मेरे वेदोंका असली तापर्य न समानकर पवार में मार कर्मम्पकोविदाः स्तम्धा मूर्खाः पण्डितमानिन । मोहित हो जाते है॥ ५ ॥ गर्ने फर्मक दल माश्म नहीं है। मूर्ख होनेपर भी वे अपनेको पनि पदन्ति चाटुकान् मूढायया माम्पा गिरोत्सुक्यः॥६॥| मनते हैं और अभिमानमें पकड़े हते हैं। वे मी- | मीठी बाहॊमें भूल जाते हैं और केक क्तु शुभ रबसा पोरसल्पा कामका अहिमन्पय । शब्द-माधुरीके मोहमें परफर पटकीली भबकीम को फहा करते हैं ॥ ६॥ रनोगुणकी अधिकता के काल दाम्भिका मानिनः पापा विहसन्त्यच्युतप्रियान्।।७॥ उनके सक्सस वड़े धोर होते हैं । कामनाओंगे । सीमा ही नहीं रहती, उनका कोष भी ऐसा है। पदन्ति तेऽन्पोन्यमुपासितलियो है जैसे सॉफ्का, मनास्ट और धर्मसे उन्हें है । वे पापीलग भगवान्के प्फरे मळकी सी उमर गृहेषु मैपुन्पपरेषु चाक्षिपः । पासना करते हैं । यही नहीं, वे परस्पर इकट्ठे होकर पबन्स्पस्टापविधानदक्षिम उस घर-गृहस्पीके सम्बन्धमें ही बड़े मा मनवे से १, जहाँका सबसे बड़ा मुख्य मी-सहनासमें ही सीमित है। वृत्त्यै परं भन्ति पशूनतदिद ॥८॥ यदि कभी पाम करते हैं तो अन्न-दान न्या करते, विधिका रुलान करते और दक्षिणतक न धिया विभूत्पाभिजनेन विषया त्यागेन रूपण बलेन फर्मणा । शरीरको पुए करनेके लिये पेचारे पशुओंकी स्प जातसयेनान्धधियः सहयरान् सताऽयमन्पन्ति हरिप्रिमान् स्वला ॥ ९॥ येष्ट उन भगाप्रम्य सतो सच ईमा सर्वे शवत्तनुमृत्स्यवस्थित यथा समात्मानमभीएमीपरम् । सम्पन नित्य-निरन्तर समस्त शारीरभारिपामें सितारें। पदापगीतं च न भवतऽधा 1 दी अम्न भारम्म और धपाम है। परन्तु इस गेपणीको तो सुनते ही नदी और का योग मनारथाना प्रादन्ति पातया ॥१०॥ मारशकी मात आपसमें कहा मुनत रहत है ॥१०॥ ।

२०५] एकादश स्कन्ध ७३३ लोके म्पवायामिपमपसेवा (वेद विधिके रूपमें ऐसे ही कर्मोके करनेकी लामा देता है, कि निनमें मनुष्यकी स्वामाषिक प्रवृत्ति नहीं होती । ) ससारमें देखा जाता है कि मैथुन, नित्यास्तु अन्तर्निहि तत्र चोदना । मांस और मपकी घोर प्राणीकी सामाविक प्राति हो जाती है। तप उसे उसमें प्रवच करनेके व्यवसिविस्तेषु विवाइयन लिये विधान तो हो ही नहीं सकता । ऐसी स्थिति में विवाह, या वीर सौत्रामणी या वारा ही जो उनके सुराग्रौरासु निशुचिरिष्टा ॥११॥ सेपनकी म्यवस्सा दी गयी है, उसका वप लोकी उमा प्रवृत्तिका नियन्त्रण, उनका मर्यादामें स्थापन । धनं च धर्मेकफल यतो वे पास्तवमें उनकी धोरसे भेरेंको हटाना ही मृतिको अभी है।॥ ११ ॥ घनफा एफपात्र फल है धर्म, झान सविधानमनुप्रशान्ति । क्योंकि धर्मसे ही परमतत्वका धान और उसकी निष्टा- अपरोक्ष अनुभूति सिद्ध होती है, और निष्टामें ही गोपु युवन्ति फलेवरस्य परम शान्ति है। परन्तु यह कितने खेतकी पात है कि लोग उस धनका उपयोग घर गृहस्पीके साम या मृत्यं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम् ॥१२॥ काममोगमें ही करते हैं और यह नहीं देखते हमारा पर शरीर मृत्युका शिकार है वोर मा मृत्यु किसी प्रकार मी टास्म नहीं चा सक्ती ।। १२ ।। सौत्रामणी यामें पद प्रामभक्षो विहित सुराया- भी सुराको सूबनेको ही विधान है, पीनेका मही। पामें स्वपा पशोरालभन न हिंसा । पनुका आम्मम (स्पशमात्र) ही विहित है, हिंसा नहीं । इसी प्रकार अपनी धर्मपमीफे साप मैथुनफी बामा भी प्रियभोगके लिये नहीं, धार्मिक परम्पराकी रक्षाफ एवं पवाय प्रजमा न रत्मा निमित सन्तान उत्पन करनेके लिये ही दी गपी। परन्तु नो भोग वर्षवादफे मचम पसे है, विषयी हैं, व इम विशुद्धं न विदु स्वधर्मम् ॥१३॥ वने इस निशुद्ध धर्मको नाम ही नहीं ॥ १३ ॥ जो इस विशुद्ध धमको नहीं जानते, ये धमरी पस्तममें येलने विदाऽसन्त सम्भा सदभिमानिन । तो दुध है, परन्तु समानते हैं अपनको श्रेष्ठ । वे धोसमें पर हर छांग पोंकी हिंसा करते हैं और मरनक माद पशून् पन्ति विनम्मा प्रस्प म्पादन्ति ते घतान् १४ | वे पशु ही उन मारनबालोको स्याते हैं ॥ ११ ॥ या शरीर मृतक शरीर है। इसक सम्पन्धी भी इसफ साप दिपन्त परकायेषु स्वात्मानं हरिमीमरम् । ही छ बाते हैं । जो लोग इस शरीरसे ता प्रमकी गाँट चौंध सेते हैं और दूसरे शारी में एनारे अपनही थाम्प मृतक सानुयन्वेऽसिन् यदस्नेहा पसन्त्यध ॥१५॥ अथ पान निधित ॥ १५॥ जिन लोगोंन बारमझान एवं सशक्तिमान मावानसे वेप करते हैं, उन मौका मुम्पारन करके पे पाय-माध नहीं प्राम किया है थोर मो एकपल्यमसम्प्राप्ता ये चावीताप मूटताम् । पूरे-पूरे मा भी नहीं है, वे अपूरे न धरके ? बार न - ७३४ भीमद्भागवत वगिका पक्षणिका आत्मानं घातपन्ति ते ॥१६॥। उधरके । वे अय, धर्म, काम-इन तीनों अपने फसे यते हैं, एक क्षण के लिये भी में ग्रन्ति । मिलती । घे अपने हाथों अपने पमि कुमारी मारने एत आत्महनोऽस्मान्ता अदाने झानमानिनः । है। ऐसे ही न्ोगोंको यात्मघाती करते हैं ॥१५॥ बयानको ही बान माननेवाले इन बामपतियों को सर्व शान्ति नहीं मिटती, इनके कमाकी परम्पत कमी सन्त सीदन्स्पकृतकृत्या वे कालवस्तमनोरथाः ॥१७॥ नहीं होती । कालभगवान् सदा सर्वदा इनके मनोरकर पानी फेरते रहते है। इनके यकी मख्न, लिया कमी मिटनेका नहीं ॥ १७ ॥ राजन् ! यो मेग कमी हित्वात्यायासरचिता गृहापत्यसुद्दपिः । भगवान् श्रीकृष्णसे विमुस , वेबपन्न परिबन करके गृह, पुत्र, मित्र और धन-सम्पति इकट्ठी भरते . परन्तु उन्हें अन्तमें सब कुछ छोर देना पश्य है न चाहनेपर भी विवश होकर पोर मरफमे जाना पाव तमो विशन्त्पनिप्छन्तो षासुदेवपराङ्मुलाः ॥१८॥ है । ( ममावान्का मगन म करनेवाळे विक्सी पुरी यही गति होती है)॥ १८ ॥ रागोवाच राजा निमिने पूज-योगीको अपोग से कस्मिन् काले स भगवान् किंवर्णः कीमो नृभिः । फरके पह क्तमइये कि भगवन् किस सम्प किस रंगम कौन-सा वाकार मीकार करते है और मनुप दिन नामाषा फेन विधिना पूज्यते सदिहोच्यताम् ॥१९॥ नार्मों और विधियों से उनकी उपासना करते है ॥ १९॥ मपम योगीबरपरभाजनजीवेमा-गन् । फत प्रेता शापरं च फलिरिस्पेषु फेश्वषः । चार युग है सत्य, त्रेता, पर वीर की। इन मगवान्के बनेकों रंग, नाम वीर बातियां होती है तथा नानापर्णाभिषाकारो नानैव विभिनेन्पते ॥२०॥ विभिम विधिये से उनकी पूजा की जाती है ॥ २० ॥ कते शुक्रपतुर्मार्बटिलो फरकलाम्परः । सम्यपुगमें भगवान्के मीनियाका रंग होता है । उनके चार मुनाएँ धौर सिरपर मटा दोषी पतपणे कृष्णाजिनोपवीताधान् विप्रन् दण्डफममाय ॥२१॥ योपवीत, माझकी माम्म, दण्ड और मामा भारत पाकका ही पल पहनते हैं। काले मृगका धर्म मनुप्मास्तु सदा शान्ता निराः सादः समाः। करते ॥ २१ ॥ सत्यपुगके मनुष्य से श्यन्त, परस्म कारक्षित, सबके हितेषी वौर समदर्स होते हैं। वेव्स जन्ति तपसा देवं शमेन च दमेन च ॥२२॥ इन्द्रियों और मनको वशमै रसकर नरूप तपस्याके द्वारा सबके प्रकाशक परमापकी वाराधना करते ईस: सुपों पैको धर्मो यागेपरोऽमलः । ॥ २२ मेग इस मुफ्ण, वैकुट, धर्म, योगेर, समझ, ईसर, पुरुष, मम्पक वीर परमात्म्य भादि नामक स्था पुरुषोऽम्पका परमात्मेति गीयते ॥२॥ रामगन्के गुण, गेम माविका गान करते हैं ॥२२॥ करभाजन उपाय अ.५ प्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुहुस्लिमेखल । यमन् ! प्रेतायुगने भगवान्के श्रीषिका रंग होता है पल । चार मुबाएँ होती है और कटिमागमें हिरण्यकेशवय्यात्मा सपनुवापुपलक्षमाः ॥२४॥ ये तीन मेखला धारण करते हैं । उनके केश सुनहले हाते हैं और वे वेदप्रतिपादित याके रूपमें सफर सफर तं वदा मनुजा देई सर्वदेवमयं हरिम् । घुपा श्रादि या-पात्रोंको धारण किया करते हैं ॥२१॥ उस युगके मनुष्य अपने धर्ममें बी निष्य रतनवाने पबन्ति विधमा प्रय्या धर्मिष्ठा प्रामवादिनः ॥२५॥ | और वेदोंके अप्पयन-यप्यापनमें बड़े प्रवीण होते हैं । से ग्रेग अम्मेद, पद और सामवेदरूप वेदप्रयीके विष्णुर्यशः पृभिगर्म सर्वदेव उरुक्रमः । शरा सर्पदपसरूप देषाधिदेव मगवान् श्रीहरिकी धाराधना करते है ।। २५ ॥ प्रेतायुगमें अधिकांश लोग सिष्णु, पुपाकपिर्जयन्तम उगाप पा, पृष्निगर्भ, सर्वदेव, उल्मम, वृषाकपि, नक्त मोर इवीप ॥२६॥ उम्पय धादि नामोंसे टनके गुण और नीय बादिका दापरे भगवाम्छथामा पीतवासा निजायुधः । | कीर्तन करते हैं ॥ २६ ॥ राजन् ! शापरयुगमें भगवान्के श्रीविनाका रंग होता है किस्म । पीताम्बर सपा श्रीवत्सादिभिरम लक्षणरुपलक्षितः ॥२७॥ श, चक्र, गदा आदि अपने वायुध धारण करते हैं। यक्ष सम्पर श्रीससका चिह, मुगुस्ता, कौस्तुभमणि भादि रक्षोंसे ये पहचाने जाते हैं ॥२७॥ रानन् । तं वेदा पुरुष मा महाराजोपलधणम् । उस समय विस मनुष्य महारानोंके पित्र, पॅकर मादिसे पबन्ति दतन्त्रा पर निभासवो नृप ॥२८] युक परम्पुस भगान्फी पैदिक धौर त्यन्त्रिक विधिसे वाराधना करते हैं ॥२८॥ ये लोग इस नमस्ते वासुदेवाय नम सहपणाय च । प्रकार भगवान्की स्तुति करते 8-10 शामस्वरूप भगवान् वासुदेव एवं क्रियाशकिरूप सहर्षण ! हम प्राभायानिकवाय तुम्प भारवे नमः ॥२९॥ , आपका वार-पार नमस्कार करते हैं । भावान् प्रान्त और अनिम्छरू रूपमें हम बापका नमस्कार करते है। नारायणाय भूपये पुरुपाप महामने । ऋषि मारायण, महामा नर, विशेश्वर, विश्वरूप और विश्वधराप विधाप सर्वमतान्मने नम ॥३०॥ सवभूतात्मा भगवान्को हम नमस्कार करते हैं ।।२९३०॥ । राजन् । सपरयुगमे इस प्रकार लोग नगदीवर भगश्चन् इति द्वापर उर्वोश स्तुवन्दि जगदीश्वरम् । की स्तुति करते हैं । अब कलियुगमें अनक सम्योंके नानावन्यविधानेन फलावपि यथा भूशु ॥३१॥ विधि-विधान से भागनकी जैसी पूजा की जाती है, ठमका यगन मुनो-|| ३१ ॥ रुप्मवर्ण विपाकर्म सानापानासपापदम् । कप्रियुगमें मापानका प्राविण्ह होता गणग-- काले रंगका । से नीनाम ममि उम्पत कान्तिपाय निफरती यती से ही उनके भाकी स्टय भी उम्मन हाती एप रि बम फोस्नुम भादि । १ तण । २ स्पायः समास्।

७३६ श्रीमद्भागवत - मझे सहर्सनप्रायजन्ति हि सुमेषस ॥३२॥ | उपाङ्ग, सुदशन थादि स और सुनन्द प्रति पीसे संयुक्त रते हैं। फलियुगमें श्रेष्ठ पुषिसम्पन पुस ऐसे पोंके द्वारा उनकी भाराधना करते हैं, जिनमें नाम, प्पेयं सदा परिभवन्तमभीएदोहे गुण, लीछा धादिके कीर्तनकी प्रधानता है ॥३२॥ वे लेग भागन्की स्तुति इस प्रकार करते है-प्रये ! वाप शरणागरक्षक है। मापके घरगति तीपास्पदं शिवपिरिशिनुतं शरम्पम् । सदा सर्वदा ध्यान करनेयोम्य, माया-मोहके काल होनेवाले सांसारिफ परानोका क्त कर देनेगले तप मकोंकी समस्त सभीए वस्तुओका दान करने कळे मृत्माति प्रणतपाल भवाब्धिपोत | कामधेनुखरूप है। ये तीयोको भी तीर्य बनानेवाले सप परम तीर्यस्वरूप, शिव, प्रमा यादि काम देवता उणे नमस्कार करते हैं और पाहे वो करें पन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम् ॥३३॥ उनकी शरणमें बा नाय, उसे पीकार कर हते है। | सेवोंकी समस्त बार्ति चौर विपचिके नारक का संसार-सागरसे पार माने लिये महार है। महापुरप! त्पफ्स्वा सुगुस्त्पबमुरेप्सिसराज्यलक्ष्मी मैं आपके उन्हीं घरणारमिन्दोंकी क्दमा करना । ॥३३॥ मान् ! बापके चरणकमकी महिमा कर धर्मिष्ठ मार्यषषसा यदगादरम्यम् । का ! रामावतारमें अपने पिता दशरपीके पोसे | देवताओंके लिये भी वाञ्छनीय वीर दुस्स्पन यमस्मीको प्यार वापके चरणकमल बन-बन घूमते फिरे ! मापामगं दमितपेप्सितमन्वधावत् सचमुघ वाप धमनिष्ठताकी सीमा है। और महापुस। अपनी प्रेयसी सीतापीके चाहनेपर बान-पूजकर कारो चरणफमस मायामृगके पीछे दौरते थे। सचमुच भाप प्रेमफी सीमा है। प्रमे । मापक उनी परमारक्यिोंकी पन्दे मदापुरुप ते चरणारविन्दम् ॥३४॥ बन्दना कराई ॥ ३१ ॥ एवं युगानुरूपाम्पा भगवान् युगवतिभिः । रामन् ! इस प्रकार अमिन युगोंके लोग अपन- भपने युगके अनुरूप नाम-होशय विमिम प्रभारसे मनुबैरिन्यते राजन् श्रेयसामीश्वरा हरि ॥३५॥ भगवान्की आराधना करते हैं । इसमें सम्देव महाँ कि धर्म, वर्ष, काम, मोक्ष-सभी पुस्पापकि एकत्र फालि सभाजयन्त्यार्या गुणवा सारभागिन । सामो भगवान् श्रीहरि ही है॥ ३५॥ फम्मुिगमे के सहीसनसे हो सारे साप और परमार्थ बम आते हैं। मत्र सहीर्तनेनैव सर्व स्वार्धाऽमिलम्पते ॥३६॥ कलियुगको यही प्रशंसा करते हैं, इससे बड़ा प्रम करते इसम्पेि इस युगका गुण बाननेवास साराही भ्रष्ट पुरुष हैं ॥ ११ ॥ देहाभिमानी जीर ससारपमें बना नपद परमा लाभा दाहिना प्राम्पवामिह । कारसे मटक रहे हैं। उनक ये भगमनकी स्पस १ सम्ममीम् । २ जी मभ्पते । ।

अ०५] एकादश स्कन्ध नतो पिन्देत परमांशान्ति नभ्यति सहति ॥३७॥ गुण और नामके कीर्तनसे कहकर और कोई परम अम नहीं है, क्योंकि इससे संसारमें मटकता मिट जाता कतादिपु प्रजा राजन् फलामिच्छन्ति सम्भवम्। है और परम शन्तिा अनुमान होता है ॥३७॥ रापन् ! सत्ययुग, त्रेता और परकी प्रजा चाहती है फलो स्वल भविष्यन्ति नारायणपरायणाः ॥३८|| कि हमारा जन्म कछियुगमे हो, स्पैकि कलियुगमे कहीं-कही भगवान् नारायण के शरणPात-उन्हींके माध्यम कचित् कचिन्महाराज द्रविडेषु च भूरिश । रहनेवाले बहुत-से भक्त उत्पन्न होंगे । महाराज विदछ । कलियुगमें द्रविमदेशमें अधिक मठ फये जावे यहाँ ताम्रपणी नदी या तमाला पपस्विनी ॥३॥ ताम्रपणी, तमाय, पयस्निी परम पवित्र कावेरी, महानदी और प्रतीची नामकी नायिों महती है। कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी । रावन् ! जो मनुष्य इन नगियों का बध पीते है, प्राय ये पिवन्ति बलं तासा मनुजा मनुजेपर । उनका अन्स करण शुर हो जाता है और ये भगवान् वासुदेवके मऊ हो बात ॥ ३८-१० ॥ राजन् ! प्राया भक्का भगपति वासुदेवेऽमलाशयाः ॥४०॥ | जो मनुष्य या करना बाकी है, मह करना आवश्यक ए-इत्यादि पर्म वासनाओंका भपमा मेग्मुनिया देवर्षिभूताप्तनृपा पितृणां परिस्पाग करके सस्मिभावसे शरणागतकसम, प्रेमके परदानी भावान मुकुन्दकी शरणमें वा गया है, वह न किरो नापमृणी घ राजन् । | देवताओं, ऋषियों, पितरों प्राणियों, कुटुम्धियों और सर्वात्मना या शरण उरण्ये अतिपियों के अणसे पण हो चाता है, फिसीके | अधीन, फिसीका सेक्क, किसीके धनमें नहीं रहता गता मुन्दं परिहत्म पतम् ॥४१॥ ॥ २१ ॥ जो प्रमी भक्त अपने प्रियतम भगपान्के चरणकास्मेका वनन्यभावसे दूसरी प्रिपस्स भाषनाओं, खपादमूल भजन आस्माओं, पत्तियों और प्रवृतियोंको रेडकर- त्यक्तान्यभावस्य हरिः परश | फरता है, उससे पती आत तो यह है कि फ्पकम होते ही नहीं परन्तु य िकभी किसी प्रकार हो भी विकर्म पयोत्पठितं कथमिव जाम तो परमपुरुष मगमान् श्रीहरि उसके में बैठकर प सब घो-बहा रेत बार उसके यो मुय घुनाति सब रदि समिषिष्टः ॥४२॥ कर देते हैं ॥ १२ ॥ नारदगी कहत-बमुदपी ! मिपिलानरेश राना निमि नी योगीपरोंसे इस प्रकार मागस्तमा पर्णन धमान् भागवतानित्य शुस्माध मिधिल पर । मुनफर बहुत ही अनन्ति हुए । उमोंने अस्न अमिन जापन्तेयान मुनीन् प्रीत सापाभ्याया मत्रपत्।४३। और अचाके साप भापभनन्दन नौ यानेश्वरोकी पून ववाऽन्तदधिर मिदाः सर्वतारस पश्यत । की ॥ १३ ॥ इसक पर सत्र टोगोंके सामने ने सिद्ध अन्तर्धान हो गय । पिटराव निमिन उनसे मुन राजा धमानुपातिष्ठानमाप परमां गतिम् ॥४॥र भगत अधरम किया और परमगति प्राप्त -मन मार, उपाप | राबवेषधारी अमुर्गेा नाश और संतोषी रक्षा करनेम्मेि | तया जीको परम शान्ति और मुलि देने की | भक्तीण हुए हैं और इसीके जिसे जगहमें उनकी कति ७३८ श्रीमद्भागवत त्वमप्येतान् महाभाग धर्मान् भागवताम्मुतान्। की ॥ १४ ॥ महाभाम्पवान् पसुदेवनी ! मैने तुमारे | अगे जिन मागवतधोका पर्मन किया है, ठम मी यदि भाम्पित भया युको नि सझे यास्यसे परम्॥४५॥ अदाके साप इनफा आचरण करोगे तने स्वम सूत्र धासलियोंसे छूटकर भगवान्का परमपद प्राप्त पुवयो वतु दम्पत्पोर्यभसा परिस अगत् । छागे ||१५|| वसुदेवजी ! तुमारे वीर देवी के पक्षसे तो सारा जगत् भरपूर हो रहा है क्योंकि सर्वशति पुषवामगमद् यद् यो भगवानीबरो हरिः ॥४६॥ मान् भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे पुत्र के सपने वाली पुए है॥ १६ ॥ तुमलोगोंने भगवान् के दशन, वागिन दर्शनालिङ्गानालापैः श्रेयनासनभोजन । तपा बातचीत करने एय उन्हें सुधने, वने, किसने पादिके द्वारा पारसस्य स्नेह करके अपना नय पुरकर आत्मा वा पावित कृष्ण पुत्रस्नेह प्रीतोः ॥४७॥ लिया है, तुम परम पवित्र हो गये हो ॥४७॥ वसुदेखी शिशुपाल, पौफ और शास्त्र भाग राजाओंने तो परेण य नृपतप शिशुपालपाण्डू पैरभावसे श्रीकृष्णकी चाल-ढाल, छीला-विमस, स्तिम- अोलन आदिका स्मरण किया पर भी नियमानुसार शासादया गविविलासखिलाफनाये। नहीं, सोते, बैठते, पम्ते, किरते -साविकरूपसे ही। फिर भी उनकी चिमचि कप्पाकार हो गर्मी भ्याफ्न्त औरतधियः शयनासनादौ मौर वे सारूप्य मुक्तिके अधिकारी हुए । फिर वो मोग प्रेमभाव और अनुरागसे श्रीकृष्णका चिन्तन करते हैं वत्साम्पमापुरनुरक्तधियां पुनः किम्॥४८॥ न्हें श्रीकृष्णकी प्राप्ति होने में कोई संदेह हैम्प !॥४८॥ वासुदेवनी ! तुम श्रीक्षणको केस वपना पुत्र ही मन मापत्यपदिमकवाः कृष्ण सेवात्मनीपर । समाप । वे सरिमा, सर्वेयर, कारणातीत और अविनाशी मायामनुप्पभाषन गूदैपर्ये परेऽन्यये ॥४९॥ एश्वर्य छिपा रख९ ॥ वे पीके भरमा हैं। उन्होंने लोख्यके रिसे मनुष्परूप प्रकट करके अमन म्भारासुरराजन्यदन्तवे गुप्तये सताम् । । । आताणस्य निर्वात्यै पन्ना लोक वितन्यते ॥५०॥ भी गायी जाती है ॥ ५० ॥ श्रीगुरु उपप भीशुकदेपली कहत है-प्रिय परभित् ! नारदीय एतन्मृत्वा महाभागा यमुश्वाऽतिविमित । मुम्से यह सब सुनकर परम भाम्पगन् सुषजी और परम सम्पपती देवकीनीको हाही रिप आ । उम्मे दवकी च महाभागा बहतुहिमात्मन ॥५१॥ जो कुछ माया-मोई अशर पा, उसे उनोंने क्षम मेा Pया ॥५१॥ रामन् ! यह इस परम परित इतिहासमिमं पुण्यं धारयेत् य समाहितः । है। जो एम्पमपित्तसे इसे शरण मात्र है, पर अना १ मा स्नान । २ गिगुगप्प्याम्मयोग्दादम। । । भारतिधिपः । । अपनाशन। । ५ को गुरो ।। प्राचीन प्रतिमें नरी ।।

म०६] एकादश स्कन्ध ७३९ स विधूयह शमले प्रमभूयाय कल्पत ॥५२॥ | सारा शोक-माह दूर करफ प्रापको प्राप्त होता है॥५२॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईया संहितायामेका शस्कर पबमोऽध्याय ॥५॥ अथ पष्ठोऽध्याय देपपभोंकी भगवान्से मधाम सिधारमेफे लिये प्राधना तथा यावर्षाको प्रभासक्षत्र जाने की तैयारी करत देककर उसपका भगपान के पास माना भीक मार भीशुष्पयशी कहते है-परीक्षित् ! जब देवर्षि नारद पसदेवजापन उपदेश फरक चले गये, तब अपने अथ मयाऽऽत्मबदेष प्रजेचराइतोऽम्यगात् । पुत्र सनकादिका, देवताओं और प्रजापतियोंके साप प्रमानी, भूतगर्गोंके साथ सर्वेपर महादेवनी धोर भवम मतभम्पेशा पयाँ मूतगतिः ॥ १ ॥ | मरुद्गणों के साथ देवराज इन्द करकानगरीमें आये । साप | ही सभी आश्रियगण, आठों बसु, अधिनीकुमार, श्रम, इन्द्रा मरुनिमगवानादित्या पसषोऽभिनौ । पक्षियके मंशन प्रषि, ग्यारहों स्व, विश्वदेव, साप्पगग, | गन्धर्ष, मसरा, माग, सिर, चारण, गुपक, रि, स्तिर, शुभयोऽङ्गिरसो रुद्रा विश्व सामान दषताः ॥२॥) विपाधर और विमर भी भी पहुंचे। इन ग्रेगोंके आगमनका उदेश्य यह पाकि मनुप्पका-सा मनोहर पेप धारण करनेवाले गप्सिरसा नागाः सिद्धचारणगुधका । और अपने स्यामसुन्दर विमासे सभी योगा मन अपनी पार सफर रमा लेनमारले भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन अपय पितरश्चैव सविधाधरकिम्मराः ॥३॥ करें; स्पोंकि इस समय म्होंने अपना श्रीषिमा प्रस्ट करके उसके द्वारा तीनों व्योंमें एसी पवित्र फातिमा धारकासुपसजग्मु सर्वे कृष्णदिधरः । | मिस्तपर किया है, जो समस्त अफक अप-तापको साक ठिये मिग्र देती है ॥ ११॥ सरकापुरी सब प्रकारकी पप्पा येन भगवान् नरलाममनोरमः । सम्पत्ति और एपोंसे समर तप भौविक दीसिसे देदीप्यमान हो रही थी। बाकर उन गनि अन्ट्री पन्ना वितने लाफा सक्लाफमलापहम् ॥ ४॥ सविसे युक्त मायान् श्रीकृष्णक दर्शन दिये । भगवान् की लप-माधुरीका निनिमेर मपनोंसे ग्रन करनार भी तस्यां विभ्राजमानायां समुदायां मादभि । उनके नेत्र तुम न हात थे। ये एक्टक परत दरतक म्य पधवाविदप्ताधा रुप्ममतदशनम् ॥५॥ उन्हें दस ही र ॥ ५॥ उन व्यग्ने सके उपान मन्न-पन भयरप आPक रिम्प पुष्पोंसे जगदीपर म्वर्गापानापगमापरवाइयन्ता पचमम् । | भगवान् श्रीगका इक Pिपा और विम-विचित्र पर्ने तय अर्पोसे युक्त पाणीक घरा उनकी स्तुति कान गाभिषिप्रपदायाभिस्तुष्टयुबगदादरम् ॥६॥ठगे ॥ ६ ॥ १ भोवरणपसिरप । २ लिनुवमा।

७४० भीमहागवत देवा उपुर देवतामोंने प्रार्थना की-सामी ! फोकि मिट फंदोंसे छूटनेकी इच्छवाले मुमुक्षुजन महि मासे बरले नवा म ते नाथ पदारविन्द हृदयमें जिसका चिन्तन करते राते , वसे में पुदीन्द्रियप्राणमनोवघोभि चरणकमलो हमयेगेंने अपनी युषि, इन्द्रिय, प्रात, मन और याणीसे साक्षात् नमस्कार किया है।को। यधिन्यतेऽन्तईदि भावयुक्त भापर्य है। अजित ! आप मयिक रसादि गु में स्पित होकर इस मचिन्स्य नाम-रूपमा प्रपत्रकी मसभुमि कर्ममयोरुपाशात् ॥ ७॥ त्रिगुणमपी मापके द्वारा अपन-आमें ही रचना करते है, पाछन करते और संहार करते हैं। यह सब करते त्वं मापया त्रिगुणयाऽऽस्मनि दुर्विभार्प हुर मी इन फर्मेसे वाप लिस नहीं होते है, यदि व्यक्त सनस्पपसि लुम्पसि तवगुणसः। आप राग-षादि दोघोंसे सर्वमा मुफ है और वसे निरावरण पण सरूपमूत परमानन्दमें मन राते नेतर्मवानभित फर्मभिरत्पते वे है ॥८॥ स्तुति करनेयोम्प परम्परमन् ! दिन मनुष्यों में यत् स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवयः॥८॥ पन, दान, तपस्य और पा आदि कर्म झले ही में चित्ताति राग-पादिसे क्सपित है वे उपासना, मेरा- शुदिप न तुमपेय दुराशयानां परन्तु उनकी वैसी शुचि नहीं हो सफ्सी, जैसी श्रायो द्वारा संपृष्ठ शुसास्त करण सज्जन पुरुषोंकी कार विधाताध्ययनदानवप फियाभिः । छीकसा, फीतिक विभपमें दिनोदिन मकर परि होनेवाली प्रवासे होती है॥९॥ मननशील मुमसुम सत्त्वात्मनाम्पम ते यति प्राद मोक्ष-प्रासिके लिये अपने प्रेमसे सिक्ले हुए एक 0 सत्यया भवणसम्भृतया पपा स्यात्।।९।। मरनाले भक्तमन सम्पन ऐश्वर्यको प्राषिके प्रिपे मारे, मिन्हें लपे-लिये फिरते हैं, पात्र विषिसे उपासना स्पान्नस्तबाधिरशुभाशयधूमकेतुः सर्षण, प्रफुन्न और भनिरुयस चतुके सन धेमाप यो मुनिभिरारदोममान । बिनका पूजन फरसे हैं और मितेन्द्रिय धीरपुर में मेमा अतिक्रमण करके भगवामी प्रासिक मि प सात्व समविम्तय आत्मादि । तीनों समय जिनकी पूजा किया करते हैं, पदिक मेव तीनों शेके द्वारा यतत्पपी र विपिसे याने संत हर्चित सवनमः स्वरविक्रमाय ॥१०॥ हायोंमें हविष्य दर पावर भातुति दते और मोम स्त्तिन फरसे है ! आपकी आरनसहरिणी मो पपिन्त्यत प्रयतपाणिमिरचराग्नी विहान योगीजन हदय अन्तर्देशी दाहरिपा परिक शरा आपके चरणम में ही प्यान करते? प्रग्या निरुत्तविधिनशविगृहीत्या। अपक वा-या प्रेमी मफजन मन्दीक जना परम । १ भामरिना। • पबिध्या प्रपामस तारी रामा प्रधम्पो समुम्पनु पिरता यामम्प पम पेति प्रमोश RE ! पोन परलोम पुलोम शासन, शिरसे मामे, मन मोर मासे-दन भार भासे पिन गरा बागपत। - ७४१ अ०६] एचदश स्कन्य अध्यात्मयोग उत योगिभिरात्ममा माराध्यदेव मानते हैं। प्रमो ! आपके ही चरणकमल हमारी समत अगुम चरनामों-विस्वास्नानोंको विमासुभिः परमभागपते परीष्टः ॥११॥ | मस्म करनके लिये अग्निवस्म हो । वे अग्निके समन हम्परे पाप-सापोको मस्म कर दें॥१०११ ॥ प्रभो ! पर्यटया व विभो बनमालयेयं पद मामती सामी बापके पक्ष मउपर मुरमयी पुर बासी मनमाध्यसे भी सौतफी वय स्पर्म रखती है। सिर सस्पर्धिनी भगवसी प्रविपतिवन्द्री: मी भाप उनकी परवा न कर भोंके द्वारा इस सी | मापसे की हुई पूना भी प्रमसे स्वीकार करते है। ऐसे य सुप्रणीतममुपाहणमाददमो मकरासन प्रमुके घरणमल सा हमारी विषय- वासनाओंको बध्यनेपाल अमिस्वरूप हों ।। १२॥ पनन्त! म्याद सदाधिरशुभाशयमस्तु ॥१२॥ वामनावतारमें दस्पराम वरिश्री दी तुइ पृप्पीको नापनेले ज्येि जम बापने अपना का उट्पणा प्रधौर पर सत्यक कसिविक्रमयुवतिपतस्पवाको में पहुँच गया प, देवया एस्प जान पड़ता पा, मानो कोई बहुत बड़ा विजपचन हो। प्रभावीके पखारनेके पस्ते भयाभपकरोऽसुरदयधम्योः । बाद उससे गिरती मानीके की तीन धाराएँ एसी चान पाती , मानो उसमें छगी दुइ तीन पताकाएँ स्वर्गाप साधुपु सलेपितराप भूमन् फहरा दी हों। उसे देखकर अमरों की सेना मपभीत हो गयी पी धीर देवसेना निर्भय । पापा र धरण- पादः पुनातु भगवन् भक्तामर्ष नः ॥१॥ फमा साधुस्लमाष पुरुषों के म्पेि बापके भाम कुम्टोफ- की प्रातिश और दुक लिये अधोगतिका कारण है। नस्सोवगाव इस पस्स वश्च भवन्ति भान् । अापका ही पादपप हम ममन करनेपाके सारे पाप-ताप धो-यहा दे ॥ १३ ॥ ममा अदि जितने प्रासादयम्तनुभृतो मिपुरर्यमानाः । भी शरीरधारी, ये सल, रन, सम-इन तीनों गुणे के परस्पर हिराची विविध मागोंकी टारसे जीत मरते पवे हैं। ने मुखदु सके पड़ोंसे पर नहीं है और टीफ कालस्य ते प्रतिपूरुपयो परस्य से ही भापके पशम है, जैसे नये घर भैस अपने सामीक पशमें हवे । माप उनके म्येि मी बरसाए ॐ नम्तनातु परण पुरुषोचमस्म ॥१४॥ १। उनके जीनका अदि, मध्य और बम्व अपके हो धीन है। इतना ही नहीं, भाप प्राति और पुरुषसे भी अस्पासि सुरुदपम्पितिसंपमाना- परे सपं पुरुससम रें। आपक परणकमा मनोका पत्याग करें ॥११॥प्रमे । खप इस बगकी मम्परुजीयमानामपि कालमाहु । अपति, स्पिति और प्रज्यक परम फारण पोकि पायोंने एमा कहा है कि आर प्रालि, पुरुष और माय प्रिणाभिरपितापपप प्रात महसता भी नियन्त्रग परनेत्र का है। ग्रीत, ग्रीन भीर पर्यशालाए तीन नामिपोंपर समसके मरने सरको उपकी आर म सनबर पाउ पार काठा गभीररय उचमपूरपस्तम् ॥१५॥हा है। आपकी गति अमर और गम्भीर है। माप । |वधीपर है। यही कारण है कि मायाकी गुणी भी आप उनमें रिस मही होते । परमा ही वास है । मापके अतिरिक दूसरे में उनका स्वग करके भी उन विवसे रस्से | साप रहती है। ये सब अपनी मन्द-मन्द मन और तिरछी चितवनसे युक्त मनोहर मोर और मरताव्यफसे प्रौर सम्मोहक कामवाल- | परिपुष्ट कामबाणोसे वापका मन तनिक भी न मिक में असफल ही सी ॥१८॥ आपने कि नदियों महा रस्सी हैं-एक तो व्यापकी या लीनसे भरी कम्पनदी और दूसरी आपके पास जलसे भी गलजी । षत समासेवी गित | कानोंके हारा आपकी कप-नदीम और शरीरमा गमावीमें गोता व्याकर दोनों ही तीयोका सेन से प्रमाग्रीमे कहा-सपरिमन् प्रभो । पले हमने ७४२ श्रीमद्भागवत सप पुमान् समधिगम्पपया वषीर्य स्वयं पुरुषोत्तम हैं॥ १५॥ य फस प्राप्त करके अमोपवीर्य हो जाता है और फिर पच महान्तमिव गर्मममोघवीर्य । संपुफ होकर विपके महत्तत्तरूप गमका सा सोऽय वयानुगत आस्मन आप्रको है। इसके बाद यह महत्तव विगुलामी का अनुसरण करके पृप्पी, गड, तेज, पर का हैम ससर्व पहिरावरणैरुपेतम् ॥१६॥ आहार योर मनरूप सात अक्रमों ( फो) । तस्थुपम जगतम भवानधीशो इस मुश्णवर्ण प्राणफी रचना करता है। इसलिये इपीकेश ! धाप स्मन परामर पन्मायपात्वगुणविधिपयोपनीतान् । अर्थाशुपमपि पीफपते न लिप्तो कारण यननेवाले विभिन्न पदापोका अमोग । येऽन्ये स्वतः परिदतादपि विम्पतिमा॥१७॥ मायावलोफलपदर्शितभावहारि २॥ १७ ॥ सोह हजारसे अधिक रानिय ब्रमण्डलप्रतिसौरतमन्त्रन्नौदैः । परन्पस्तु पोरशसासमनामाणे हैं और कामकाफी विविध रीषियोंसे कम मस्पेन्द्रिय विमषित करपैर्नपिम्पः॥१८॥ वार्षित करना चाहती है, परन्तु फिर में से को विम्म्यस्त्वामृक्कयोदय हासिलोक्याः पाप-राशिको धो हानेके लिये दो प्रकारको पनि पादावनेश्सरितः धमलानिहन्तम् । आनुभवं भूतिभिरभिधमङ्गसङ्ग स्तीर्थदर्य शुचिपदस्त उपस्सशन्ति ॥१९॥ है और अपने पाप-ताप मिटा देते है ॥ १९॥ बादरायणिपाप भीशुकोपनी कहते हैं पीधित् ! समस्त इस्पमिय पिपुधैः सेशः भवतिहरिम् । और भगवान् शाहरके साथ मानीने इस प्रका मगवान्की स्तुति की। इसके बाद अम्यभापत गोविन्द प्रणम्याम्मरमाथितः ॥२०॥ | मावान्से इस प्रकार कहने लगे ॥ २० ॥ अपने धाममें जाने के लिये असाशमें सितम प्रमोप मुमभारावसाराप पुरा विभापित प्रभो । मापसे अक्तार कर पीका भार उतारनेके । १ ममपिहप । २ राम निामम् ।। मरे । पे प्रणाम भयत अ.६] एकादश स्कन्ध G स्वमसामिरक्षेपात्मन्तववोपपादितम् ॥२१॥ प्रार्थना की थी। सो यह काम अपने हमारी प्रार्थनाके अनुसार ही पोचितरूपसे पूरा कर Pया ॥२१॥ धर्मप स्थापित सत्सु सत्यसंधेषु त्वया । मापने सत्यपरापग साधुपुरुषोंकि पल्याणाप धमकी कीविध विसु विधिप्ता सर्वलाकमलापदा ॥२२॥ साफ्ना मी कर दी और दसों दिशाओंमें एसी कति फैला दी, जिसे सुन-सुनाकर सब लोग अपने भवतीर्य यदाय विघ्न् रूपमनुत्तमम् । मनका मळ मिटा देते है ॥ २२ ॥ आपने या सर्वोत्तन रूप धारण करक यदुवंशमें अवतार लिया फर्माण्पदामपत्तानि रिताप जगतोऽकया ||२३|| और जगदफे हितक लिये उभारता और पराक्रमसे मरी मानि ते चरिवानी भनुम्याः सामा कलौ । अनेकों हमएँ की ॥ २३ ॥ प्रभो ! कलियुगमें जो माधुसभाष मनुष्य आपकी इन लीअोंका भरण- मन्तः कोनयन्नध वरिप्यन्त्पञ्जसा वम ॥२५॥ कीर्तन करेंगे, वे सुगमतासे ही इस मानरूप अभयारसे पार हो जायेंग ॥ २४ ॥ पुरुषाचम सपशकिमान यदुवंशेऽवतीर्णस्स पुरुसोत्तम। प्रभो ! आफ्को यदुवशमें अवतार प्राण किप एक से फ्चीस वर्ष भीत गये है।॥२५॥ सर्वाधार बार वरच्छत म्पतीयाय पश्चश्चिाधिकं प्रभो ॥२५।। हमस्प्रेगोंका ऐसा कोई काम वाली नहीं है, जिसे पून नाधुना तेऽखिलाधार दवायोवशेफ्विम् । भरने के लिये आपके यो यनेकी भागस्पकता हो। प्राणों के शाप करण थापा यह कुन भी एक च विप्रनापेन नष्टप्रायमभूदिदम् ॥२६॥ प्रारसे नष्ट हो चुका है २५॥ इसलिये देएम्टनाव ! यदि अप उमित समझें तो अपने परम- वत खधाम परमै विश्व यदि मन्यसे । धाममें पधारिये और अपने सेवक हम क्यारों का सठोकॉहोकालान् न पाहि वैकुण्ठ किंकरान्।।२७॥ तया हमरे सोश पालन-पापण कीजिये ॥ २७ ॥ भीभगवानुमान भगवान् भीरप्पन कहा-माजी | आप जसा अवधारितमतन्म यदास्थ विषपर। कहते हैं, में पहलसे ही बसा निधय फर पुर। मन आपग्रेगोका सब काम पूरा फरक पपीका भार मत वः कायमम्बिल भूमभाराजतारित ॥२८॥ | उतार Pपा ॥ २८ ॥ परन्तु अभी एक पाम भी ६इ यह मि पापी मयिकम, वीरता-शूरता तदिदं यादवले बापीयश्पिादनम् । और धन-सम्पत्तिसे उन्मच हो रहा है। ये सारी बीको लाके विषय मै म बलपर महार्मर ॥२९॥ स सेनेपर सुपे हुए हैं। इन्हें मन अंक मेसे ही एक रस्सजैसे समुद्रको उन तया भूमि ||२९|| पपसरल्य मानां पहना विपुलं कुठम् । पनि में मने और उपाय यदुपनियों पर मिS 7 नए रिसे लिा दी बन्न जान तय रूप गन्तासम्पनन ठाऽपघलन निलपति ॥३०॥ मा उत्तान परक सार मा महार पर मो ॥ ३०॥ पार पत्री' प्रक दानी नासपारध लम्प दिनणापत । से इस बराय नाश प्रम मुराद। इसस यास्यामि भवन प्रम नवदन्त बानय ॥३९॥ भवानन में आपका भाग्ने छकर जागा ॥३१॥ - श्रीशुकदेवजी कहते है-पीधित् ! समन्वदेशों ब्रह्माजीने कहा-समन् प्रभो! पलेहमध्यमाने मापसे मार कर पृप्तीका भर आरनेकेको ७४२ भीमनागवत सच पुमान् संमधिगम्प यया स्ववीर्य स्वयं पुरुरोत्तम ॥ १५ ॥ यह पुरस जारसे की प्राप्त करके अमापदीय हो जाता है और फिर मग म धचे महान्तमिव गर्मममोघषीर्यः । संयुफ होकर विपके महतस्वरूप गर्भका स्थापना सोऽयं वयानुगत आत्मन आण्टकोश है। इसके बाद यह महत्तल त्रिगुणाय मा अनुसरण करके पृषी, जग, तेब, वायु, म हैमं ससर्व बहिरावरजैरुपेवम् ॥१६॥ आहार और मनरूप सात आवरणों ( परतों ) के इस सुवर्णवर्ण प्रामाण्डकी रचना करता है ॥१६॥ तपस्युपण जगतम भवानधीसो इसलिये स्पीकेया | भाप समस्त बराबर मारे पन्माययात्वगुणविक्रिययोपनीतान् । षधीपर है। यही कारण है कि मायाकी गुण-विसमा कारण बननेवाले विभिन्न पदापोंका उपभोग करते है अर्थाम्नुपमपि पीकपते न लिप्तो भी आप उनमें सि नहीं होते । यह केस कासी येपे स्वता परिवादपि विम्पति मा॥१७॥ ही यात है। मापके अतिरिक्त दूसरे टोक उनका त्याग करके भी उन विपयोंसे रखे करे सायावलोकलयदर्शितभावहारि है।। १७ ॥ सोम हबारसे अधिक रानियों से साप राती है। ये सब अपनी मन्द-मन्द मुसान भ्रमणलप्रहितसौरवमन्त्रभौमः । और तिरी पिपनसे युक्त मनोहर मोहक पल्पस्तु पोरशसहसमनवाणे वीर पुरता असे प्रौर सम्मोहक कामबाण पत्र हैं वौर कामकसकी विविध रीतियोंसे वापसमा स्पेन्द्रिय विमयितुं फरगेर्न विम्म्मः॥१८॥ पाकर्पित करना चाहती है, परन्तु फिर भी ये की परिपुष्ट कामबाणोंसे आपका मन तनिक भी न गिा सक विम्म्मस्तषामुक्कयोदवहाखिलोक्याः से असफल ही हो ॥ १८ ॥ मारने निकली पाप-राशिको धो हानेके रिये दो प्रकारकी परित पादावनेप्रसरितः श्रमलानिहन्तम् । नदियाँ महा रस्सी हैएक तो आपकी बसम्म मनसे भरी फमानदी भौर दूसरी बापके पाव-प्रभासन आनुभषं भूतिभिरधिजमजसने बम्से मी गङ्गाजी । मत समासेमी निमकीन फस्नोंके द्वारा अपकी कपा-नदीमें और शरीरके इस स्तीर्घदर्य शुधिपदस्त उपस्पृशन्ति ॥१९॥ अपने पाप-ताप मिटा देते हैं ।। १९ ॥ गङ्गाजीमें गोता माफर दोनों ही ती का सेक्न करते पादरामणिरुमान इस्पभिष्ट्रय विमुटु सेशः शततिहरिम् । और भाषान् शहरके साप पनीने इस प्रसार मावान्की स्तुति की। इसके भाव मे प्रमाम करने अम्पभापत गोविन्द प्रणम्पाम्परमाश्रितः ॥२०॥ भगवान् से इस प्रकार कहने को ॥ २० ॥ अपने घाममें बानेके लिये प्रकाश लित ऐस अमोगा मुम राषवाराम पुरा मिशापितः प्रभो । १ नमविप । २ एम निहगुम् । । । %3D अ०६] एकादश स्कन्ध ७४५ उशव उपाय तनिरीक्ष्यादवो राजन् श्रुत्वा भगवतोदितम् । परीक्षित् ! उसजी मगधन्धीकृष्णके बड़े प्रमी वीर सेवक थे। उन्होंने नव यदुवंशियोको यात्राझी तैपारी करते दसा, रवारिटानि घोराणि नित्य कृष्णमनुमत ॥४०॥ मगवान्की आशा मुनी और अत्यन्त घोर अपशकुन दम्पे, तब वे जगत्फे एकमात्र अधिपति भगवान् श्रीकृष्णके विविक्त उपसगम्य जगतामीबरेपरम् । पास एकान्तमे गये, उनके परमापर अपना सिर रस्फर प्रगाम किया और हाप जोइकर उनसे प्रार्थना प्रमम्य शिरसा पादा ग्रामलिस्तमभापत ॥४१॥ करने लगे ॥ १०११॥ उपजीने कहा- -योगेमर । आप देवाधिदकि भी अधीर है। वापकी लीलाओंके भवण-कीर्वनसे बीब पवित्र हो जाता है। बाए सर्वशक्तिमान् परमेश्वर देवढेषेश योगेश पुष्पभपणकीवन ! हैं। आप चाइले तो पक्षों के शापको मिटा सकते ये | परस्त आपने जैसा किया नहीं। इससे में यह महत्यैतद अल नन लाकं संस्पक्ष्यते भवान् । समझ गया कि बर आप यदुवंशका सहार करफ, इसे | समेकर वश्य ही इस लोकमा परित्याग कर देंगे ॥ १२॥ परन्त पुंपराली मालकोवाले श्यामसुन्दर ! विप्रशाप समर्थोऽपि प्रत्यहम यदीश्वर ॥४२॥ में आधे क्षणके लिये भी भापके चरणकमलोंके स्पागफी मात सोच भी नहीं सकता । मरे जीवनसपस, मरे स्वामी ! थाप मुझे मी अपने धाममें ल चलिये ॥ १३ ॥ नाई तपाधिकमल क्षणार्धमपि केशव । । प्यारेण ! आपकी एक-एक नीम मनुयॊके लिये परम मम्मपी और कानों के रिये अमृतस्वरूप है। जिसे त्यक्तं समुत्सा नाय स्खधाम नय मामपि ।।४३॥ एक बार उस रसका चस्मा लग जाता है, उसके मनमें रिकिसी दूसरी पस्तुके लिये लालसा नहीं तव विक्रीरित कृष्ण नृणा परममङ्गलम् । रह जाती । प्रभो ! हम तो ठम्हे चैय्त, सोते नागत, घूमते-फिरते आपके साथ रह है, हमने आपक साप म्मान किया, स्पेठ ससे, भोवन किप्प, फळातक गिनाये, समपीयपमाम्वाप त्यमत्यन्यस्पृहा जन ॥४४॥ हमारी एक-एक चा वापके साथ होती थी। आप हमारे प्रियतम है, और सा स्या, आप हमार आत्मा है। एसी स्थिति हम वापके प्रमा मफ आपर मुग्यामनारनम्यानम्मानक्रीराशनादिषु से छोर मरते हैं। ।।११५॥ मन आपकी धारण ही माता पहनो बापके लगाय हुए मन्दन स्थ त्वां प्रियमात्मान वय भक्तास्त्यज्ञमहि ॥४५॥ माये, बापक उतारे हुए का पहन और आपके गानोंसे अपन-माको हम आपकी नदन सानग्रल सेवक हैं। चयापसुसमम्गन्धरामाऽलकारनचिता माए म पपरी मायार अक्सरी त्रिय प्रार पर लेंग। अत प्रभा'ने जापकी मयामा उछिटभाजिना दामाम्तव मापां अपमहि ॥४६॥ स नहीं ६, र त फारापक गिर ) ॥२६॥ १मान-ने नही २ समन्यमाना। - धारण रिपे मनात ७४४ भीमहागवत . भीमुक उपाप भीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित् ! जा बलि इत्युक्तो लोकनायेन स्वयम्भूः प्रणिपस्य तम् । लोकाधिपति भगवान् श्रीकृष्णन इस प्रकार का वा प्रयाधीने उन्हें प्रगाम किया और देवता के सबसे सह देवगणैर्देषः स्वधाम थपने घामको चले गये ॥ ३२ ॥ उनक बसे हो समपयत ॥३२॥ वारकापुरीमें बड़े-ब अपशकुन, बह-यो प्रपात क भयतस्पा महोत्पातान् दारवत्पांसमस्थितान्। खड़े हुए । उन्हें देखकर यदुषशके वाम माकन श्रीकृष्णके पास आये । भगवान् श्रीकृष्णने उनसे व विलोम भगवानाइ यदुश्वान् समागतान् ॥३३॥ मात फ्ही ॥ ३३ ॥ श्रीभगवानुवाच भगवान् श्रीकृष्णन कहा-गुम्ननो ! बका एते वै सुमहोस्पाता म्युधिष्ठन्तीह सर्वतः। वारफामें विवर देखिये, उर ही महया कुन और उपात हो रहे हैं। पापमेग जानते ही है शापयनः फलस्सासी मामणम्पा दुरस्पयः॥३४॥ नामोंने हमारे पंशको ऐसा शाप दे दिया है, रिसे टाल सकना बहुत ही कठिन है। मेरा ऐस्न सिपर है कि यदि हममेग भाने प्राणों की रम पाहते हों न पस्तम्पमिहासाभिजिजीविपुभिरापकाः । तो हमें यहाँ नहीं रहना चाहिये । अब किस करनकी प्रभासं सुमहत्पुम्प यास्सामोऽयैव मा घिरम् ॥३५॥ पवित्र प्रभासक्षेत्रके लिये निकल पर्षे ॥ ३४-३५ ॥ यावश्यकता नहीं है। हमशग याब । परम पत्र सात्वा दषशापा गृहीतो यक्ष्मणाहराट् । | प्रभासक्षेत्रकी महिमा गत प्रसिद्ध है। जिस समय दर प्रजापतिके शापसे चन्द्रमाको राजमारमा रोगने प्रस हिम विमुक्त किस्विपात् सपा मेजेभ्यः फलोदयम्।।३६॥ और ये ताण उस पापमन्य रोगसे छूट गये । समान पा, उस समय नहोंने प्रभासक्षेत्रमें नामर मन किया ही उनें कालओं की अभिवृद्धि भी प्राप्त हो गयी ॥३६॥ वय च तस्सिमाप्सुस्प तर्पषित्वा पितॄन् सुरान् । हमग मी प्रमासक्षेपमें फलमर मान करेंगे, देव भोजयित्वोशिजो पिप्रान् नानागुफ्वतान्धसा ॥३७॥ गुवाले पान तयार करके श्रेष्ठ लोको एष पितरों का तर्पण करेंगे और साप हो भनेको मोचन करायेंगे । हाँ हमग उन सत्पात्र ग्राहको वेप दानानि पापु भयोप्सा महान्ति वै । पूरी प्रयासे पपी-बड़ी दान-दक्षिणा देंगे और इस प्रकार उनके द्वारा अपने बड़े-या साइटोको से से जिनानि तरिप्पामा दानोंभिरिवारम् ॥३८॥ पार कर जायगे, जैसे कोई याबफे गाय समान पर कार बाय ।। ३७-२८ ॥ मीभुक उपाय मीशुक्वेषजी करते है-कुम्नन्दन गप मगवान् एवं भगषताऽऽविश यादवाः कुलनन्दन । भीगने इस प्रकार भाडा दी, ता मतसे प्रभास जाने नियय कर लिया और सस मन्तु कवधिपस्तीर्थ सन्दनान् समययुजन् ।।३९॥ अपने-अपने ख सबाने बोतने गे ॥ ३९॥ १ प्राचीन प्रतिमें नहीं है। २ सय । १ महापुषम् । ४ नम्म । । 1 1 मधियों ने एक अ०६] एकादश स्कन्ध ७४५ उदय उपाप तभिरीक्ष्यावा राजन् वस्वा भगवतोदितम् । परीक्षिद् ! उस्वनी मगवन्धीकृष्णके बड़े प्रेमी कौर सेफ मे। उन्होंने नय यदुवंशियोंको यात्राको तयारी करते देखा, मानन्की आमा सुनी और अत्यन्त घोर अपशकुन हारिष्टानि घोराणि नित्य कम्ममनुप्रत ॥४०॥ दम्प, तब वे जगदके एकमात्र वधिपति भगवान् श्रीकृष्मके विषिक्त उपसगम्य जगतामीश्वरचरम् । पास एकान्तमें गये, उनके चरणोपर अपना सिर रहकर प्रणाम किया और हाप जोपकर उनसे प्रार्थना प्रणम्य शिरसा पादौ प्रालिस्तमभापत ॥४१॥ करने लगे ॥ १० ११ ॥ उपजीने कहा-योगेपर । आप देवाधिदोंक भी अधीपर हैं। थापकी लीलायोंके प्रमण कीर्सनसे जीव पवित्र हो जाता है। बाप सर्पशकिमान् परमेपर देवदेवेश पोष्ठ पुम्पयवाएकीसन । हैं। वाप चाहते, तो प्रमों के शापको मिटा सकते थे । परम्तु धापने येसा किया नहीं। इससे में यह सरत्यैतत् मुलं ननं ला; संत्पक्ष्यते भवान् । समझ गया कि या भाप यदुवंशका संहार करके, इसे समेफर अपश्य ही इस लोफका परित्याग कर देंगे ॥१२॥ परन्तु घुपराली पलकोंगाले स्पामसुन्दर ! विप्रतापं समर्थोऽपि प्रत्यहम यदीश्वर ॥४२॥ में माधे क्षण लिये भी भापके चरणकमलों के त्यागकी बात सोच भी नहीं सकता । मेरे जीवनसक्ल, मेरे स्वामी ! भाप मुझे भी अपने धाममें से चलिये ।। १३ ।। नाई बाधिकमल थषार्धमपि केन । । प्यार कृष्ण ! आपकी एक-एफ भिम मनुप्पोंके लिये परम । महम्मपी और कानोंक रिये अमृतसरूप है। निसे त्यक्त समुस्सह नाथ स्वधाम नप मामपि ॥४३॥ एफ पर उस रसका चस्का लग जाता है। उसके मनमें फिर किसी दूसरी पस्तुके लिये लारा नहीं छ जाती । प्रभो ! हम तो ठम्ते-घटस, सोते वागत, तव विक्रीडित कृष्ण नृणा परममङ्गलम् । उम्ते-फिरते पापक साप रहे हैं, हमने आपक साप स्नान किया, मेठ सेके, भोजन क्रिया कहातक गिना, झरमपीयपमाम्वाप त्पमत्यन्यस्मृदां जनः ॥४४॥ हमारी एक-एक घग्य व्यपके साप होती रही। अप पम्परे प्रियतम है और at स्पा, आप हमारे आत्मा है। एसी स्थिति एम वापके प्रमा मक आपर मुग्यामनारनम्पाननानफ्रीराशनादिपु फसे बन सकते १र१५॥ दमन आएकी धारण की माला पहनो, मापके गाय हुए मन्दन ज्यस्यां प्रियमात्मान वयं भक्तास्त्पनमहि ॥४५॥ मापे बापक उत्तरे हुए वा पान और आपके धारण किये गए गहनोंसे अपन-आपका हम जापकी नट्न मन गले सेवक। वयापभननम्गन्धवामाऽलंकारनचिताः । मग्यि हम आपकी मापार अश्य स पिजप प्रात कर लेंगे । ( अत प्रभो 'हमें आपकी पारा उरिछरभाविना दामावर मार्या जयेमहि ॥३६॥ ना ६, दात पापक प्रियागमा) naan १ पान पनि हो । २ जनाना | मनात ७४६ भीमागपत [२०७ वासरशना य भूपयः श्रमणा ऊर्यमन्दिनः । हम जानते है कि मायाको पार कर लेना बात ही पनि है।बर- पोषि-मुनि दिगम्बर यकर बोर मानीस नैष्ठिक मापर्यका पान करके अभ्यामविपाके लिये प्रमापधाम यान्ति शान्ता सन्यासिनोऽमला४७ वस्यन्त परिश्रम करते हैं। इस प्रकारकी कठिन साना- से उन संन्यासियों के उदय निर्मम हो पाते हैं और म कहाँ वे समस्त पत्तियोंकी शान्तिरूप पर्प-चस्प पप त्विा महायोगिन् म्रमन्तः कर्मवर्मसु । स्थित होकर आपकेगानामफ धामको प्राप्त होते हैं। महायोगेश्वर ! हम लोग तो कर्म मागम ही भ्रम मटकहे ₹ ! परन्तु इतना निश्चित है कि हम वापके मानों के त्वज्ञापा तरिप्पामस्तावफैर्दुस्तर समः ॥४८॥ साप आपके गुणों और लीलाओंकी चर्चा करेंगे तक मनुप्पकी-सी चीख्य परते हुए आपने मो अन किया या कहा है, उसका स्मरण-कीर्तन करते संगे । साप सरन्तः कीर्तपन्तम्त रूतानि गदितानि च । ही आपकी चाळ-पास, मुसकान-चितवन पौर हास- परिहासको स्मृतिम तम्लोन हो जायेगे । केवल इससे हम दुस्तर मायाको पार कर जेंगे । (इसलिये हमें मन्यसे मस्यत्मिवेषणस्येलि यन्नुलोकषिरम्मनम् ॥४९॥ पार पानेकी नहीं, आपके स्थिकी चिन्ता है। आप हमें मेरिये नहीं, साप मे पछिपे ) ॥ १८१९॥ भीमुक उवाच मीशुकदेवजी करते है पीक्षित् ! जब उदारीने एक विज्ञापितो राजन् भगवान् देवकीसुतः । देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब उन्होंने अपने वनम्पप्रेमी सख एवं सेवक उपा- एकान्तिनं प्रिय मृत्पमुदर्ष समभाफ्त ॥५०॥ मीसे कहा ॥ ५०॥ इति श्रीमहागवते महापुराणे पारमईस्या संहितापामेकादशस्कर पोऽम्पाप ॥५॥ अथ सप्तमोऽध्याय मपधूतोपाम्पान-गप्पीस मेकर कप्तरता म्ठ गुरमौकी कपा भीभगवानुवार भगवान् भीरुप्मने कहा-हामफ्यन् उदय ! यदात्य मां महाभाग दधिकोपितमव म । तुमने मुझसे जो कुछ कहा है, ममीकामा गत नया भयो लोकपाला म्वर्वास मऽभिकासिम ॥१॥ बात है कि में उनके मोम होकर अपने भामो है। मम्म शहर और हमादि मोबसाक भी अब पड़ी मपा निप्पादित सत्र देवकार्यमशेपतः । चला नाउँ॥१॥ प्रमोपर देवताओं निना काम गर्थमयनीयॊजमशेन करना था, उसे में पूरा कर पुका । इसी कामम प्रिये प्रामार्धित ॥२॥ मानीमा प्रार्थनासे में बसानी सती प्रापान प्रतिम न।

अ०७] ७४७ एकादश स्फन्ध मुलं वैशापनिदग्ध नङ्ग्यत्मन्पोन्पषिग्रहात् । था ॥२॥ अब यह यदुवंश, जो मौके पापसे मस्म हो चुका है, पारस्परिक झ्ट और युदसे ना हो जायगा । आपके सात दिन समुद्र इस पुरी-गरकाको समुद्र सप्तमेशातां पुरी च प्राथमिप्यति ।।३।। दुबो देगा ॥ ३ ॥ प्यारे उप ! जिस क्षण में मार्य- लोकमा परित्याग कर दूंगा, उसी क्षण इसके सारे मङ्गल यवाय मया त्यको लोकोऽयं नएमाल । ना हो जायेंगे और पोर ही दिनों पृषीपर कलियुग- का वोल्पामो बायण ॥१॥ जव में इस पृषीका भविप्पत्पचिरात् साधा कलिनापि निराकृतः।। ४ ।। ) स्पाग कर दें, तम तुम इसपर मत रहना, क्योंकि साधु उदय ! फलियुगमें अधिकांश लोगोंकी रुचि अधर्मम ही न रस्तम्य त्वयैवेह ममा त्पले महीतले । होगी ॥ ५॥ अब तुम मफ्न आरमीप सजन और क्धु घान्धर्षोंका स्नेह-सम्बन्ध और दो और नन्पामसे | मुझमें अपना मन लगाकर समाप्टिसे पृथ्वीमें खच्छन्द बनाऽधमरुचिमर भविप्पति फलौ युगे ॥५॥ विचरण करो ॥ ६॥ इस बगदमें नो कुळ मनसे सांघा जाता है, पाणी से कहा नाता, नेत्रोंसे देखा जाता है त्य तु सर्व परित्यज्य स्नेई स्वजनबन्धुपु । पौर श्रवण यादि इन्द्रियोंसे अनुभव किया जाता है, यह स्थ नाशयन् है । सपनेकी तरह मनका विअस । मायावेश्य मन सम्यक् समग पिचरस गाम्॥६॥ | इसज्यि मायामात्र है, मिथ्या -ऐसा समालो॥७॥ जिस पुरुषका मन वशान्त है, अस्पत ६, उसीको यदिद मनमा वाधा पशुा भवणादिभि । पागलकी तरह अनेकों वस्तुएँ माराम पड़ती है, वास्तवमें या चिवका भम ही है। नामापका भ्रम हो जानपर ही यह गुण है और यह दाप' इस प्रकारकी कल्पना नभर गृममा च विद्धि मापा मनोमयम् ॥ ७॥ करनी पाती है। जिसकी बुनिमें गुण भौर दोपका मे बैठ गया है, बज हो गया है, उसीके लिय कम पुमाऽयुक्तस्स नानार्थों भ्रम स गुणदोपभाक् । अर्मी मौर विहिप मेदका प्रतिपादम दुवा ॥८॥ इमठिये ठदम ! सुम पहले अपनी समस्त इन्द्रियोंको जाने वश कर ग्रे, उनकी बागडोर भाने आपमें 8 कमाकर्मक्किमति गुणदोपषियो भिदा ।। ८ ॥ । ये और काठ इदियों को ही नहीं, चिएकी समस्त वृत्तियोंको भी रोक छो और लि ऐसा अनुभव करो तसाद युकन्द्रियग्रामा युक्तचिव इद जगत् । कि यह सारा जगत् वपन परमार्म ही फैल आई धौर पर मुा सर्चमा इन्द्रियातीत अमसे एक है, आस्मनीधम्ब वितवमात्मानं मप्पधीपर ।। ९॥ , अभिम ॥९॥ जव वेदोंके मुम्स नात्पर्य-निमय मप शान और अनुमाम्प मचानसे भीमौक्ति सम्मम मानविज्ञानमयुक आत्मभूत शरीरिणाम् । पर तुम अपने पारमाके अनुममें ही आनम्मन्न रहोगे और समर्ण देवता आदिारीमचारियोंके अभा हो आभागे । इसठिय किसी भी बिनसे तुम पीदिन नहीं आत्मानुभवतुष्टरमा नान्तराहिन्यसे ॥१०॥ो सयोगे, क्योंकि उन दिनों और विप्न करनेागकी म्नरपनम् । विपिदिन मन थर । निपिर म्म।

७४८ कामनाओंका त्याग अस्पस कठिन ।समार! | अबाधित, एफरस सस्य एंजापनमरेका प्रकासित भीमद्भागवत [२०० दोपषुदयोभयातीता निषेधाम निवर्तते । मारमा भी तुम्ही होगे ॥ १० ॥ जो पुरुष गुण और दोष-दिसे अतीत हो जाता है, यह बासकके समान निषिद्ध कर्मसे निच होता है, परन्तु दोष-मुद्धिसे नहीं। गुणबुड्या च विदितं न करोति यथार्मक ॥११॥ व विहित कर्मका अनुष्टयन मी करता है, परन्तु गुप- बुदिसे नहीं ॥ ११ बिसने भुतिपोके तात्परका यपाप ग्रन हो नहीं प्राप्त कर लिया मस्कि उनम साक्षात्कार मी कर लिया है और इस प्रकार को कटन सर्वमूतमरच्छान्सो पानविमाननिधय । निम्म्पसे सम्पन्न हो गया है, यह समस्त प्रामियोका शितली मुद् होता है और उसकी पत्तियाँ सर्वपा छन्त राती है। यह समस्त प्रतीयमान विकको मेरा की पश्यन् मदात्मक विश्वं न विपफ्त वै पुनः ॥१२॥ नन्म-मृत्पुके बारमें नहीं पाना पाता ।। १२ ।। सरूप-आत्मस्वरूप देखता है, इसलिये उसे फिर धर्म भीसुफ उवाच भीशुकदेषजी करते है-परीक्षित् ! यम मान् इत्यादिप्टो भगन्ता महाभागवतो नृप । श्रीकृष्णने इस प्रकार पादेश दिया, तब भावान्के परम प्रेमी उद्भवधीमे उन्हें प्रणाम करके तत्यानकी प्रासिकी उदषः प्रणिपस्पार सवजिषासुरच्युसम् ॥१३॥ | इअसे यह प्रश्न किया ॥ ११ ॥ उपजीमे कहा-भगवन् ! आप ही समन पोगियोंकी गुप्त पूनी, योगों के कारण वीर योगेवर सप मोगस योगविन्यास योगास्मन् योगसम्भव । ही समस्त योर्गोके आधार, उनके कारण और योगकरम मी है । पापने मेरे परम्कापामके लिये उस सम्परामप निःश्रेयसाय मे प्रोक्तरस्यागः स पासलक्षणः॥१४॥ मकान और सेक्नमें पुम मिल गये, त्पागका उपदेश किया है ॥११॥ परम्स आनन्त ! से त्पागोऽय दुप्फरोभूमन् कामानां विपयात्मभिः । क्रियात्म्य हो गये हैं, उनके लिये विस्य मोगे और सुतरां त्यपि सर्वात्मन्नभक्तरिति मे मतिः ॥१५|| HARE या सर्मला बसम्मम ही है-ऐसा मेरा उनमें भी वो लोग आपसे विमुख हैं, उनके मि ते सोऽह ममादमिति मूढमतिर्षिगाढ निथप है॥ १५॥ प्रभो ! में भी ऐसा ही। मति इतनी हो गयी है कि पर में 1,4 मेग है इस भारसे में आपकी मायाके केत, और दार स्त्वन्माययाविरचितारमनि सानुराधे। सम्मश्री स्त्री, पुत्र, धन आनिमें व हा । तत्त्वजसा निगदित भवता यधाई मगन् । आपने जिस सम्पासा उपदेश किन ? उसका तरस मुप्त सेवक इस प्रकार समजाये कि में सुसाधयामि भगवन्ननुशाधि मृत्यम् ॥१६॥ मापत, भाष्य, पतम्मन इन तीनों भायो सुगमताकि उसका साधम कर सर ॥ १६॥ उप उपाप मी सस्यस्प तस्वस्ट आत्मन आत्मनात्य नहीं, सपप्रफाश आरमसमप प्रभो! में समय ई कि मर ये बारमतत्सा उपदश पानाला आर अतिरिक दामि भी कामही है। पकारमीश विपुषप्वपि नानुषध ।

] एकादश स्कष ७४९ सवें विमोहितधियलव मापसेमे निसने वो पर देवता हैं, वे सब शरियमिमानी होनेके कारण आफ्फी मापासे भावित हो रहे है। उनकी पुष्टि प्रमादयस्तनुमृतो पहिरर्थमाषा ॥१७॥ मायाके पशमें हो गयी है। यही कारण है कि ये इन्द्रियोंसे अनुभव किये जानेवाले बाध सिक्योंको साप तसाद भवन्तमम्पयमनन्दपार मानते हैं। इसीलिपे मुझे तो पाप ही उपदेश कीचिये ॥१७॥ मगन् । इसीसे चारों बोरसे दु सोफी दावाग्निसे नल- सर्वत्रमीश्वरमकुण्ठविण्ठपिम्पम् । पर और विरक होकर मापकी शरणमें आया है। निर्विज्णधीरदस ह जिनामिवप्तो भाप निरोप देश काळसे अपरिधिन, सर्पा, सर्वशक्ति- मान् धार पविनाशी वैकुण्ठोक्के निवासी एक नरके निस्य सस्य नारायण हैं। (मत आप ही मुझे उपदेश नारायण नरससं शरण प्रपये ॥१८॥ कीजिये, ॥ १८ ॥ भीभगवानुमान भगवान् भीरुप्मने कहा उसव। संसारमें जो मनुष्य याबगत क्या है। इसमें क्या हो रहा है। स्यादि प्रायेण मनुजा लोफे लोकवचविषक्षणाः । बासका विचार करने में निपुण है, व पितमें भी धाम वासनाओंसे अपने-माफ्को सम अपमी विक- समुद्रन्ति प्रात्मानमात्मनमाशुभाशयात् ।।१९।। शफिसे ही प्राय वषा मेवे ॥ १९ ॥ समस्त प्रागियोंकर विशेषफर मनुष्यका वारमा अपने हित धीर आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विश्पक्ष । | अहितका उपदेशक गुरुहै। पोंकि म्हप्य अपने प्रत्फा अनुमन और अनुमानके द्वारा अपने हित-वदित- यत् प्रत्पभानुमानाम्या भयोऽसामनुविन्दते ॥२०॥ मा निर्णय करनेमें पूर्णत समर्प है ॥ २० ॥ सास- योगविशारद पीर पुरुष इस मनुष्पपोनिमें इन्दिपशक्ति, एम्पप प मो धीराः सांख्ययोगविशारदा । मम शकि बारिके आभपभूत मुझ मास्तत्वको प्रणत मामिस्तरां प्रपश्मन्ति सशक्त्यपडितम् ॥२१॥ प्रकररूपसे साक्षाकार हैं । २१ । भने एक पैसाल, दो पैराल, तीन पैरवाले, भार परषासे, पारसे अधिक पैसाले और बिना परक-इस्पादि अनेक प्रकार पदित्रिचतुप्पादो यहुपादस्तचापदा के "मीराका निर्माण किया है। उनमें मुघे सबसे वधिक प्रिय मनुप्पका ही शरीर है ॥ २२ ॥ इस पदमा मन्ति पुर सृष्टान्तायां मे पौरुपी प्रिया॥२२॥ मनु में एकाविच तीक्ष्णमुनि पुष भुद्धि बादि पत्र मां मार्मरन्त्यदा युक्त्ता हतुभिराघरम् । प्रहण किये जानेपले तुओंसे जिनसे कि अनुमान भी होता है, अनुमानसे समाप अर्थात् भाशर वादि [प्रमाणैर्गुणलिखाधमनुमानत ॥२३॥ सम्पासे भिन्न मुश सर्वप्रवक रिसको साक्षात अनुमा फरते १५ ॥२३ ।। इस रिस्पमें महारम्पलोग एक प्राप्युदाहरन्तीममिविदास पुरवनम् । प्राचीन मिसा करते है। पर इतिहास परम १R मुः। भनुम्बाम पर -१)एक स्पप्रय तायडे मिना पुदि मारिया पाच प्रमपन सम्वा । सत्रमा मापसी पय और ( २)से बसीडा मादि भौगार ka 0 प्रमुछ हो भरमा - ७५० श्रीमद्भागवत [३०० अवधूतस्य संवाद यदोरमिततेजस ॥२॥ तेनसी अधूत दचात्रेय और गगा यहुके सहारे अवधूत दिन फंविधरन्तमझ्वोभयम् । रूपमें है ॥ २१ ॥ एक बार धर्मके मर्मज मा याने देख कि एक त्रिकामदर्शी तरुग वात ग्राम निर्मय फर्वि निरीक्ष्य संख्मं यदुः पप्रच्छ धर्मपित् ॥२५॥ विचर रहे हैं। तब उन्होंने उनसे यह प्रश्न किया ॥२५॥ मदुलार राज्य पदुमे पूज-मान् ! आप फर्म तो सस्ते इसो बुदिरिय प्रमभकर्तः सुषिशारदा । नहीं, सिर आपको यह वपस्त निपुण बुद्धि कांसे प्राप्त हुई। मिसका आश्रय लेकर आप परम शान् हारेर पामासाय भयाँलोकं विधिरति बालवत् ।।२६।। देखनाता है कि मनुष्य वायु, पश अषमा सौन्दर्य, भी मास्कके समान ससारमें विचरते रसे है।। २६ ॥ ऐस प्रायो धर्मार्थकामेषु विवित्सायां च मानवा । सम्पत्ति याविकी अभिव्यपा स्मात ही पम, अर्थ, काम पपया तत्व-निवासामे प्राव होते हैं, जकारण का किसीकी प्रचि नही देखी जाती ॥ २७ ॥ हेतुनेष समीहन्ते आयुपो मठसा भियः ॥२७॥ रहा है कि आप कर्म करने में समय, विशन् बोर निपुगई। बापका माम्य धौर सौन्दर्य भी प्रशसनीय है। सं तु कल्प कपिर्वष सुभगाऽमृतभाषणः । थापकी वाणीसे तो मामो अमृत टपक या मिर मो शाप जग, उन्मत अश्या पिशामके सम्म्न दवे न पता नेहसे किंचिखोन्मसपिशाचवत् ॥२८॥ है, न तो फुल करते है और न घाइते ही रे ॥ २८५ संसास्के अधिकांश मोग काम और सोमफे दालान से समये । परन्तु अाफ्को देसफर ऐसा मालम ऐव जने दयमानेषु कामलोभदवापिना । है कि साप मुक्त है, नापतक उसकी बोध में नहीं पहुँच पासी, ठीक वैसे ही जैसे कोई हामी कनमें दामि न तप्पसेऽपिना एकोमगाम्भासव दिप ॥२९॥ लगनेपर उससे छुटकर गाजमम्मे मा हो ॥ २९॥ प्रसन्! व्याप पुत्र,खी, धन धादि संसारके स्पर्शसे भी रहित त्वं हिनःपष्छतोमान्नात्मन्पानन्दकारणम् । है। बाप सश-सदा अपने केस मलपमें ही स्ति हते हैं। हम वापसे या पूछमा चाहते है कि अपने मूहि सर्शविहीनस्स भवतः केवलात्मनः ॥३०॥ | अपने आत्मामें ही ऐसे वनिवर्धनीप बामन्दका अनुमत्र कैसे होता है। आप रूपा करके मपश्य परामाये ॥३॥ श्रीभगवानुपाप भगवान् श्रीकृष्णमेघा-उद्धा ! हमारे पूर्वन महारान यदुकी बुधि शुद पी और उनके सम्म यदुनै महाभागो प्रयम्पेन नापणमलि पी। उन्होंने परममाम्पवान् दनापीका सुमेघसा । भापत सत्कार करके यह प्रश्न पूम और मे निम भाक्से सिर झुकाकर ने उनके सामने सा हो गये । पृष्ट समाश्विः प्राह प्रभयापन दिमः ॥३१॥प दपत्रेपनीने कहा ॥३१॥ परपम् । २ माचीन प्रदिम नहीं है। बुदि मादि मोगर किती दि पण ही मबुद्ध हो ये है। परन्तु इसा या भय नहीं है कि भारमा आनुमानित है। परोपाते विमान मंपदा गोपनी अफिम्पत्र अ०७] एकादश स्कन्ध ७५१ प्रवेशाचायजीन कहा- मामण उसप -रामन् ! म पनी सन्ति म गुरखा राजन् वहयो युद्धघपाभिता । युनिसे यहुत-से गुरुओका आयप लिया है, उनसे शिक्षा ग्रहण करके में इस जगत्में मुसमावसे खप्छन्द विषरता यतो पदिमुपादाय धक्कोटामीह ठाम ॥३२॥ है। तुम उन गुरुभोंके नाम और उनसे प्रण की हुई प्रथिषी वायुराकाशमापौऽपिमन्द्रमा रवि । शिक्षा सुनो ॥ ३२ ॥ मेरे गुरुओंके नाम है--पृषी, कपोतोऽजगर मिन्यु पतङ्गो मधुकद् गज ॥३३॥ } वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूप, फ्यूवर, थनगर, समुद, पतंग, माँग या मधुमक्खी, हापी, शहद मधुहा हरिणा मान पिङ्गला फररोऽमक । निकालनवाल, हरिन, मछली, पिङ्गम वेश्या, कुर पक्षी, कुमारी सरक सर्प ऊर्गनाभि सुपशकत् ॥३४॥ वारक, कुंआरी कन्या, वाण बनानेवान्य, सप, मामी पौर नी काट ॥ ३३ ३१ ॥ रामन् ! मैंने इन एवे मे गुरबा रामतुर्विशतिराषिता । चौक्षत गुमाका बाप साह और इन्तीके वाचरणसे शिया चिभिरसेपामन्यशिक्षमिदात्मन ॥३५॥ | इस धोक्में अपन लिये शिक्षा ग्रहण की है ॥ ३५॥ पदो पदनुशिक्षामि यथा वा नाइपात्मज । वीरवर यातिनन्दन ! मैने जिससे जिस प्रकार जो कुछ सीखा है, वह सब खों-का-त्यों तुमसे काम, तथा पुरुषम्पाघ्र निरोध कथयामि ते ॥३६॥ सनो |॥ १६ ॥ मूतैराक्रम्यमाणोऽपि धीरो दैववशानुगे । मन पृषीसे उसके भैपकी, क्षमाफी शिक्षा की। स्प्रेग पृषीपर कितना बापात और क्या-क्या उत्पात नही परते; परन्तु मन को किसीसे बदल लेती है और न रोती-मिठाती है। संसारक समी प्राणी अपने-अपने | प्रारब्धके अनुसार घेरा कर रहे है, ये समप-समपपर तद् विद्वान्न चलन्मागादविक्षि पितत्रतम् ॥३७॥ मिल-भिन्न प्रकारसे जान या अनजानमें आक्रमम कर मैटते। धीर पुरुषको चाहिये कि उनकी मिशता समठ, न सर अपना पीर सोने और न पाप को। मापन मागपर म्यों-का-स्पों बता रम् ॥ ३७॥ पूप्पी- केही विकार पनि बौर पक्षसे मने ए शिवा प्राण उपत्परायसवह परार्यकान्तसम्भव । की कि जैसे उनकी सारी चेष्टर सा-सर्वदा इसरों- के द्वितक रिप ही हातीर, मनिक करना चाहिये कि उनका कम हो एकमात्र इम हित मानक रिये ही हुआ, साधु पुरका पहिय पि उनी शिष्यता मीकार फाफ उनसे पधारकरी शिक्षण मा शिवत मूभृता नगमिष्य परामताम्॥३८॥ पर॥ ३८॥ प्राय मतुप्पन्मुनिनवन्द्रियप्रिय । मन नगरके भीतर गनवाल वायु-प्रारमयुमे पर मिा प्रहग की कि जैसे इमारी एस एप और उपुरी प्राभिसे ही कर दो यता से अधिर कि तिनेसे | सूतके मनियमि न्याप्त सूतके समान भास्माको वक्षण | चाहे चम हो या बचठ, उनके कारण नियमित ७५२ श्रीमद्भागवत [१०७ मान यथा न नश्येत नावकीर्येत वामन ॥३९॥ । जीवन निर्गह हो जाप, उतना भोजन कर ले । इन्द्रियों- को तृप्त करनेके लिये यहुत-से श्यिय न चाहे । संयमें उसने ही विषयों का उपयोग करना चाहिय, निसे बुद्धि विक्त न हो, मन चयन न हो और वागी न्या विपयेप्चाविशन् यागी नानाधर्मपु मर्पत । को बामि न लग जाय ॥ ३९ ॥ शरीरके भर यनेवाले वायुसे मैंने यह सीसा है कि जैसे गायुको बनक स्थानोंमें जाना पाता है, परन्तु का कहीं भी यासक नाही हासा, किसीका भी गुण-दोष नहीं बर- नाता, वैसे ही साधक पुरुष भी वावसकता होनार विभिन्न प्रकारले धम और समाववाले पियोंमें चार, गुणदोपध्यपतात्मा न विफ्जेस घायुवत् ॥४०॥ परन्तु अपने सम्पपर स्थिर रहे । किसीके गुण प दो- की ओर सुक न जाय, किसीसे बासक्ति या इप न कर घेठे ॥ १० ॥ गन्ध फ्युफा गुण नहीं, पृष्षीका गुण है। पस्तु वायुको गन्धका बन करमा पस्ता है। ऐसा करनेपर भी वायु शुर ही रहता है, गन्धसे उसका पार्थिवेचिर देहपु प्रविष्टस्तवगुणाभय । सम्पर्क नहीं होता। वैसे ही साधकका बक्तक इस पावि शरीरसे सम्बन्ध , तफ्तक उसे इसको पनि पीड़ा और भूख-प्यास बादिका भी बन करना पाता है । परन्तु अपनेको शरीर नहीं, बारम्प के रूपमें देको गुपैर्न युपते योगी गन्धर्वायुरिषात्मा ॥४१॥ भी उनसे सर्मपा निर्मिस यता है ॥ ११ ॥ पाता सापक शरीर और उसके गुणों का अध्य होनेपर अन्तस्तिम पिरजामेपु यमन् ! मितने भी पट-मठ बादि पदार्थ है, । प्रमात्मभान समन्वयेन । प्रतीत होनेपर मी बास्तवमें आकाश एफ और अपरिधिम ( पक्षण ) ही है। वैसे ही चर-अवर मिसले मी सम्म-त्यूम शरीर हैं, उनमें यात्मारूपसे सपा स्ति होनेके कारण ग्राम सीमें है। साधकको चाहिये कि म्याप्स्याम्पपछेदममङ्गमात्मनो और क्सारूपसे देखे । यह इतना विस्तृत है कि उसकी तुम्ना कुछ-कुछ वाकाशसे ही की य समती । इसलिये साधकको बास्माकी आपसा माना करनी चाहिये ॥ १२ मरसता है, श्रम वादि पैदा हासे और ना होते हैं वायुकी प्रेरणासे बदछ बादि बाते वीर भने जाते है। यह सब होनेर मी बाकाय असा राता है। बकाशकी वाग म्पती, पानी मुनिर्नभस्त्वं पिततस्प भाषयेत् ॥४२॥ वनाऽकन्नमविपाषापुनेरित ।

एकादश स्कन्ध ७५३ अ०७] न दृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टगुणे पुमान् ।।४३॥ रशिसे यह सव कुर है ही नहीं । इसी प्रकार मूत, क्तमान और मविष्यके चमरमें न बान किन-किन नामरूपोकी सरि और प्रव्य होते हैं, परन्तु आस्माके साप उनका को सस्पर्श नहीं है ॥ १३॥ खच्छ प्रतित स्निग्धामाधुर्यस्तीर्थमर्नृणाम् । जिस प्रकार जन समावसे ही बछ, चिकना, मधुर और पवित्र फरनेवास्य होता है तथा गङ्गा वारि तीयांक दशन, स्पश और नामाचारणसे भी प्रेग पवित्र हो जाते हैं-मैसे ही साधकका भी स्वभावसे ही शुद, लिम्ब, मधुरमापी और स्थापन होना चाहिये । अछ- मनि पुनात्पपा मित्रमीक्षोपस्पर्शकीर्तन ॥४४॥ से शिक्षा ग्रहण करनेवास्य अपने दर्शन, स्पर्श और | सामोचारणसे गोको पवित्र कर देता है॥१४॥ तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्घर्पोदरभाजन । राजन् ! मने बनिसे यह शिक्षा ही है कि वैसे मह तेनती और भ्यातिमय होती है, जैसे उसे फाइ अपने तेजसे दवा नहीं सकता, जैसे उसके पास सम्इ परिपके लिये काइ पात्र नहीं सब कुछ अपने पेटमें रस्य देती है, वीर जैसे सब कुछ स्मा-पी लेनेपर भी सर्वभक्षोऽपि युतात्मा नाइ मलममिवत् ।।४५।। | विभिन्न वस्तुओंके दोपोंसे पह मिस नहीं होती, मेसे | ही साधक मी परम तेजस्नी, तपस्पासे दीप्यमान, इन्द्रियोंसे अपराभूत, भोजनमात्रका सम्सी और ययायोम्य सभी विषयोंका उपभोग करता हुआ भी अपने मन और इन्द्रियको वशमें रक्ख, किसीफा दोष अपनमें न भाने कचिच्छम कषित् स्पष्ट उपास्य श्रेपइन्छताम् । ६॥ ५॥ जैसे ऋमि कही (सकी आदिमें ) अर कट रहती है और यही प्रश्ट, से ही साधक भी कहीं गुप्त रहे और कही प्रकट हो जाय । बह यही- कही ऐसे रूपमें भी प्रकार हो जाता है, जिसस कल्याण- भक्ते सपत्र दातॄणां दरन् प्रागुचराशुभम् ॥४६॥ कामी पुरुष उसकी उपासना कर सकें । यह अमिक समान हा भिक्षाम्प बन करनेशोंक अतीत और मागी अमुमको भस्म कर दा है स समय अम प्राण फरता है ॥ १६ ॥ सार पुपका रसफा विचार करना चाहिये कि बैस अधि छबा पीडा, टवी-सीधी स्वमायपा सष्टमिद सदमलक्षणं विभुः। ख्याड़ियोंन रहकर उनफ समान ही सीधी-नेही या पी. चादी दिायी पता है-वास्तवमै बह वैसी नहीं, पेस सभ्यपफ आरम्ा भी अपनी मापास रचे दुए काय-करमाप जगत्में म्पान हानक कारग उन-उन पसुक नामसपस कोई ध न घनपर मी उनक प्रविष्ट यत तत्तस्वरूपाऽपिपिसि ॥४७॥ रुपमै प्रतीत हाने टगता ॥ १७ ॥ भा पिपुवति। | किसी भी समप उसे इन्द्रियके किसी भी सिम्पमें | आसक्कि नहीं होती ॥५०॥ स्मूलबुद्धि पुणे किसी जंगठमें एक जूतर रहता था, उसने एक पेपर ७५४ श्रीमद्भागवत [अ०७ विसर्गायाः श्मशानान्ता भावा देशस्य नात्मनः। मैंने चन्द्रमासे यह शिक्षा ग्रहण की है कि यमि जिसकी गति नहीं जानी जा सकती, उस काम प्रम्पक्से चन्द्रमाकी फायएँ कटती-माती खती है तपापि चन्द्रमा तो चन्द्रमा ही है इन पता है और फलानामित्र चन्द्रस्य कालेनाध्यक्तवर्मना ॥४८॥ न बढ़ता ही है, वैसे ही जन्मसे लेकर पलुफ्फ्त जितनी भी अवस्पाएँ हैं, सब शरीरकी है, बालासे उनका कोई भी सम्बन्ध नहीं है ॥ १८ ॥ वैसे अगकी पर अपवा दीपकली लौ क्षण-क्षणमें उम्पन और ना कालेन घोषवगेन भूतानां प्रभवाप्पयो । होती रहती है। -उनका यह क्रम निरन्तर बता रात है, परन्तु दीस नहीं पड़ता-वैसे ही जलप्रपाके समान वेगवान् काम्क दारा क्षण-क्षणमें प्राणियों के नित्यावपि न रश्यते आत्मनोऽग्नेर्ययार्चिपाम् ॥४९॥ शरीरकी उत्पत्ति और विनाश होता राता है, परन्तु अडानक्श वा दिसायी नहीं पात॥ १९॥ गुपैगुणानुपारचे यथाकालं राजन् । मैंने सूर्यसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि से वे अपनी किरणोंसे पृधीका जल सींचते और सम्पपर उसे परसा देते हैं, वैसे ही योगी पुरुष इन्त्रिक धारा समपपर पिपोका प्रण करता है और सस्प न तेषु युज्यते योगी गोभिगा इस गोपतिः ॥५०॥ बानेपर उनका स्याग-उनका दान भी कर देता है। बस्के विभिन्न फमि प्रतिसिम्मित हुवा सूर्य उनी प्रषिर-सा होकर भिम भिम दिखायी पता है । पन्त मुध्यते स्पेन मेदन म्पक्तिस इव तद्गत । इससे सरूफत सूर्य अनेक नहीं हो जाता, वैसे ही चर-अघठ उपाधियोंके मेरसे ऐसा जान पता है कि प्रत्येक व्यक्मेिं अत्म्य अम्ग-अज्मा है । परन्तु पिनो ऐसा मन्त्म होता है, उनकी मुनि माटी है । बस लभ्यते स्थूलमतिभिरात्मा चावम्बितोऽवत् ।।५१॥ AM उसमें पाई मेद नहीं है ॥ ५ ॥ बात तो यह है कि आमा भूयक सम्बन एक ही है । नातिस्नेहा प्रसङ्गत या फर्तम्पः कापि फेनचित् । रानन् । यही किसीये सब अपन्त स्ट अप आसक्कि न करनी चाहिये, भपया उसकी मुनि अन्य मुवन् विन्दत संताएं फपाव इव दीनधीः ॥५२॥ सातव्य र दीन हो अपगी और उसे कलूतरकी | तरह अपस्त क्लेश उठाना पड़ेगा ॥ ५२ ॥ राम्न् । कथनारम्य कतनीरो पनस्पती । अपना बॉस्म बना रस्स्य पा । अग्नी माग तरीक फपात्या भापपा माधयाम कतिचिन् ममा ॥५३॥ साप पर फर पतिक उसी भारत में रहा ॥ ५३॥ १ मम्मचनिना । २ पणमस । फपति अ०७]] एकाइम स्कन्ध ७५५ फपोता स्नेहगुणितरदयौ गृहधर्मिणी । उस फ्लूतरके नोरे हृदयम निरन्तर एक-दूसरेके प्रति स्नेही वृद्धि होती जाती पी । वे गहस्थधर्ममें इतन रष्टिं दृष्टयागमन दि सुया कन्यतु ॥५४॥ वासक हो गये थे कि उन्होंने एक दूसरेको दृष्टि-से-पि, असे भा और बुद्धि से युदिको चौध रम्या या ॥५॥ शय्यासनाटनम्मानवाक्रिीराशनादिकम् उनका एक-दूसरेपर इतना विपास हो गया था कि वे नि शाई होपर बझाँकी प्रभावीमें एक सप सोते, मिथुनीभूप विसन्धी रसुर्पनराजिषु ॥५५॥ बैठते, चूमते फिरते, हरते, यातचीत करते, खेलवे और खाते-पीते थे ॥ ५५॥ राजन् । क्लूतरीपर फनूतरका पं यं वाग्छति सा राजस्लपमन्त्यनुकम्पिता । इतना प्रेम प कि वह जो कुछ चाहती, कनूतर यरे से बड़ा का उसका उसकी कामना पूर्ण फरता, मह ततं समानयत् काम कन्गाप्यजितेन्द्रिय ॥५६॥ नूतरी भी अपने कामुक पतिकी कामनाएं पूर्ण कस्ती ।। ५६ ।। समप अनेफर कबूतरीको पहला गम कपोती प्रथमं गर्म गृहती काल भागते । रखा । उसने अपने पतिक पास ही घोसमें अंरे Pये ॥५॥ मगवान्की सचिस्प शळिसे समप बानेस अण्डानि सुपुवे नीटे खपत्यः सनिघौ सती ॥५७॥ ने भव घट गये और उनमें से हाफ पैरवाले बच निकल आये । उनफर एक-एक था और रोएँ अत्यन्त कोमल देषु फाले म्पदापन्त रचिवालयका हरेः । घे॥ ५८ ॥ धन उन कसूतर-मन्तरीकी बोने अपने मायापर ला गयीं, वे यो प्रम और आनन्दसे अपने प्रतिभिर्दबिभाप्पाभि कोमलागवनहाः ॥५८|| पोंका छान-पालन, छाम्पार करते और उनकी मीटी ग्रेटी, उनकी गुटर- मन-मुनफर अनदान प्रजा पुपुपतः प्रीती दम्पती पुत्रवत्सलो। हो जाते ॥ ५९॥ बच्चे तो सदा-सर्वदा प्रस्न रहते मृण्वन्तो फूजितं वासो निती फळभापितः ॥५९॥ ही है, ये अब अपने सूफुमार पोसे मा-आपका स्परा करते, कूबते, माली-भाठी चेयाएँ करने धीर पुइफ- सासों पतत्र मुस्पर्श कृजितर्मुग्धस्ति । पुदपाकर अपने मा बापक पास दीड आत सब कतर कबूतरी अनन्दमा हो जाते ॥ ६०॥ राजन् ! सच प्रत्युद्गमरदीनानां पितरी मुदमापतुः ॥६०॥ न तो । फन्नर-फतरी भगवान्की मायासे माहित हो रहे थे । उनका एय एक-दूसरेफ स्नइक्पनसे स्नेहानुपदरदयानन्पान्यं विष्णुमायया । धरा परे अपने नन्दनदेयक पाउन-पारगर्म विमादिता दीनधियो शिन पुपुपतु प्रवाः ॥६॥ इतन म्पन रात कि उन्हें तीन-दुनिया, अम परमेसी । याद ही न आती ॥ ६१॥ एफ निनों नर-मादा एकदा जग्मतुस्तासाममाप सो उद्धम्बिनी । अपने इमोंक सिर धारा स्त्रने गउ गप र थे। स्पोरि अब उनम पुदमा बरत कर गया था। + गत फानन तम्मि मर्धिनी पेरतथिरम् ।।६२॥ घि मिरकामा जंगने चारों भार रिचरते ये ॥६२ ॥ इधर एक महम्पिा घूमना-यूमता संयाग न्या. कधिन परछाता पनेनर । पश उनके घोमली मार आनियम । उसन प्रलपमनु । पारक ७५६ भीमद्रामवत [.. जगृहे जालमातत्य घरत स्सालयान्तिके ॥६३॥ कि घोंसलेके पास-पास फन्तरक बन्चे फुदक रहे । उसने जाल फैलाकर उन्हें एका मिया ॥६॥ कपोतम कपोसी च प्रजापोषे सदोत्सुको । कबूतर-कबूतरी वोको सिखाने-पिलाने के लिये हर समा उत्सुफ रहा करते थे। अब वे चारा लेकर कसे गती पोषणमादाय स्वनीटमुपजग्मतुः ॥६४॥ घोंसलेके पस आये ॥ ६४ ॥ फतीने देस है उसके नने-नन्हे बच्चे, उनके एपके टुका नाम कपोती स्वात्मजान् वीक्ष्य पालफामालसंघवान् । फसे हुए हैं और दुम्मसे चें-में कर रहे है। उनें एसी स्थितिमें देखकर कबूतरीके दुसकी सीमा न की ! तानम्पधावत् क्रोशन्ती फ्रोशतो मृशास्तिता॥६५॥ | वह रोती-विष्ठाती उनके पास दौर गयी ॥ ६५! भगवान्की मायासे उसका पित अपत दीन-दुखी हो सासकृत्स्नेहगुणिसा दीनचिचाजमायया । रहा पा । यह उमरते हुए स्नेहकी रस्सीसे बकरी ई थी, अपने बर्षाको जालमें फंसा देकर उसे अपने स्वयं चायध्यत शिक्षा पदान् पश्यन्त्यपस्मृतिः ॥६६॥ शरीरकी भी सुध-बुध न रही । वौर वह मर्म । बाकर बामें फंस गयी ॥ १६ ॥ स ममूतरने देखा कपातमात्मजान पानात्मनोऽप्यधिकान् प्रियान् । | कि मेरे प्राणोंसे भी प्यारे नवे गाल्में फंस गये और मेनी प्राणप्रिया पत्नी मी उसी दशमें पप गयी, का भार्या चात्मसमा दीनो विललापासिदाखितः॥६७॥ न वत्पन्त दु छित होकर विलाप करने गा । सम्भुष उस समप उसकी दश अफ्त दयनीय पी॥ ६॥ मो मे पश्यतापायमल्पपुम्पस्य दुर्मतेः । मैं बभागा हूँ, दुर्मति हूँ। हाय, हाय ! मेरा सो सक नाश हो गया । देस, देखो म मुझे अभी वृति ई और अप्साकतास्स गृहस्वर्गिको गृहस्रैवर्गिको हतः ॥६८॥ रकममा मूल या गृहस्थाश्रम ही न न मेरी आशाएँ ही पूरी । तस्तक मेरा धर्म, वर्ष गय॥ ६८ ॥ हाय ! मेरी प्रामप्यारी मुझे ही आप अनुरूपानुल्ला च यस्य मे पतिदेवता। इसदेव समझती थी मेरी एक-एक बात मानती थी, के इशारेपर नाचती पी, सम तसे मरे योम्प की ।क शून्य गोमां संस्पज्य पुत्रैःस्वाति साधुभिः ॥६९॥ क मुझे सूने घरमें भेगकर हमारे सी सारे निरस पचोंके साप सग सिघार रही है ॥ ६९ ॥ मेरे व सोशूमे गरे दीनो मृतदारो मृतप्रन । मर गये । मेरी पनी माती रही । मेय आ संसार क्या काम है । मुहदीनका यह विधुरमीचन-बिना हिण जिजीविषे किम या विधुरो दुःखजीषितः ॥७०॥ इस सूने में किसके लिये बीउँ ! ॥ ७० ॥ राजन का जीवन जम्नका-म्पपाका जीन है।मा तांस्तावतामिछग्भिमृत्युग्रस्वान् विषेष्टत । | फत्तरके वम्चे चामें फंसकर तफस ये । स दीस हा प को मौत के पंजे में है, परन्तु बम भालूतर पा सम देखते हुए मी हल्ला दीन हो या सर्य च कपमा शिधु पश्यमप्यपुषोऽपतत् ॥७॥ | कि सपं मानसूमकर बारने व पहा ॥y प्र०८] एकादश स्कन्ध ७५७ त लम्भ्या लुब्धक कर कपोतं गृहमेधिनम् । राजन् ! इ बहेटिया वम फर या । गृहस्थाश्रमी कबूतर कबूतरी और उनक क्योंक मिट जानेसे ठसे बड़ी प्रसनता कपोतकान् कपोती च मिदार्थ प्रथयो गृहम् ।।७२॥ इ, उसन समझा रा काम बन गया और मह उन्हें लेकर चलता बना ॥ ७२ ॥ जा कुटुम्बी है, नियय और छागोंके सा-साप्में ही जिसे सुख मिवा है एप अपने एवं फुटुम्न्पशान्ता मा इन्दाराम पतत्रियत् । कुटुम्यक भरण-पोषणमै ही जो सारी सुध-बुध खे व्य है, उसे कमी शान्ति नहीं मिल सकती । यह उसी पुष्णन् कुटुम्न कपण सानुमन्धोवसीदति ॥७३॥ | पलूतरक सम्मन अपने कुटुम्बक साथ कर पाता है।। ७३ ॥ यह मनुष्प-शीर मुक्तिशा मुष्य हुय द्वार है। इसे पाकर भी जा वनूतरफी तरह अपनी पर य प्राप्प मानुपं लोकं मुक्तिवारमपावृतम् । गृहस्सीगें । फैसा मुआ है, या मात उतर पाकर गिर रहा है । शासकी भाषा वा 'आसाम्पुत' गरपु खगवत् मचम्तमारजन्य विदुः ॥७॥1॥ ७ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमइस्पा संहिताममेकादशस्कर सप्तमोऽध्याय ॥७॥ अथाष्टमोऽध्याय मपोपास्यान-मजगरसे सेकर पिसावक मी गुरुपोंकी कया भासण उपाप मपध्त पचायजी प्रतेk-राजन् ! प्रागियों- को जैसे पिना बयक, मिना किसी प्रपाके, रोपनेकी चेय करनपर भी पृषकम्पनुसार दस प्राप्त हते हैं, मुसमन्द्रियर्क रामन् म्यर्गे नरम एव च। वैसे ही बगमे या नरकम-कही भी हैं, उन्हें इन्द्रिय- सम्बन्धी सुस्स भी प्राप्त होते ही हैं । इसरिये सुन बोर दहिना यत् यथा एवं तम्मान्नेन्छत सद्बुधः ॥१॥ दुसरा पम्प जाननाल पुदिमान् पुरुषको पारिसे कि इनक ठिये इस्य अपण फिी प्रग्या प्रश्न न ग्राम मुमृप्ट विर्स महान्त स्तोकमव था। फर ॥१॥ विना मोगे, स्निा इय स्पि मय ही । अनापास जा कुल मिउ नाप- पारस-सम्म हो, पर बल मधुर और सारिण, अधिक होया पाय- परम्ध्यवापतित ग्रसदानगराऽक्रिय ॥२॥ युदिमन पुरुष अमारक स्मन उसे ही मर गान निर्गह पर स और उदासीन ह॥२॥ िभावन शपीनादानि मीगि निरादाराऽनुपक्रम । न मिलता उसे भी प्रारम्भाग सन्सारर फिी प्रभारी चरा न कर यहुल रिनोंतक भूम पदारह । उसे पाहिय कि अगररु सम्पन का प्रारम्क अनुमर पदि नापनमा मामा महादिरिख दिएभुक् ॥ ३॥ प्राप्त पुर भवन ही मन्तर ग॥ ३ ॥ - भीमद्भागवत है॥४॥ आजःसहोवलयुत चिन्न देहमकर्मकम् । ठसके शरीरमें मनोक्छ, इन्द्रियवर और देहकर तीनों । तव मी यह निश्चेष्ट ही रहे । निद्रारहित होनस भी सस | पृषा-सारे और कर्मेन्द्रियों के होनेपर भी उनसे कोई न फरे । राजन् ! मैंने बजगरसे यही शिक्षा प्रण शयानो वीतनिद्रप नेहेतन्द्रियवानपि ॥ ४ ॥ मुनि प्रसम्भगम्भीरो दुर्विगामो दुरत्ययः । समझसे मैंने या सीख है कि साधकको सांप प्रसन और गम्भीर खाना चाहिये, उसका भाग म अपर और असीम होना चाहिये तया किसी भी मिमिक अनन्तपारो पक्षोम्य स्तिमितोद वार्मवः ॥५॥ से उसे क्षोभ न होना चाहिये । उसे ठीक से है। रहना चाहिये, जैसे ज्वार-भाटे और त्योंसे रहित सात समृद्धकामो हीना वा नारायणपरो मुनि । समुद्र ॥५॥ देखो, समुद्र पारमें नदियेश मारे कारण पता नहीं और न प्रीष्म-पुतमे घटता ही है, से मगरफ्यपण सधपको भी सांसारिक पदापैकी प्रातले नोत्सत न शुप्येत सरिद्विरिख सागरः ॥ ६ ॥ प्रफुल्लित न होना चाहिये और म उनके एनसे उपस ही होना चाहिये ॥ ६॥ हना नियं दवमायां तदारजितेन्द्रियः । राजन् ! मैने पतिगेसे यह शिक्षा हमी वैसे इ स्पर मोहित होकर भाग व पायो प्रलाभित पतत्य घे तमस्पनी पतनत् ।। ७ ॥ और बऊ मरता है, बसे ही अपनी इन्द्रियों ने ग रखनेपथ्य पुरुष जन बीको देता है तो उसके हा यापिदिग्पाभरणाम्बरादि ए हो जाता है और घर बधारम, माघ गरकर अपना सत्यानाश कर लेता है। समुप द्रम्पपु मापारचितेषु मूढः । देयताओंकी यह माया है, जिससे जीव मायन् या मर- फी प्रालिसे पकित रह जाता है॥७॥जमा कामिनी-कसन, गहने पसा आदि नागमन पिक पापनि फंस हुआ है और जिसी सम विवाति पतनयमम्पति नटरष्टि ॥८॥ उनके उपभागफ रिये ही सायक्ति है, यह अनी fitt बुद्धि पर पतिगे। समान न हो जा॥८॥ म्ना नार्क प्रसत् प्राम दहा पर्वेव यारता । राजन् । संन्यासीको चाहिय किसी रिस प्रारक पर न दार भारती सब अHI 4. गृहानस्मिमानिप्टन प्रति मापुरी मनि ॥९॥ निर्गह परे । परान कपि उनी । दुपा पद पगेस मग ..॥ रिसर । भौग शिभिन्न पुगों-र । पोहोंग- । भगम्पस मालपथ गागम्प सना नर । उन र सम करना नहीन पुती dRNATAKitan com ORATIRAush Rukt माना। मारपर प्रलाभिवात्मा मपभागबुड्या ०८] एकादश स्कन्ध ७५९ - सर्वत सारमादधात् पुप्पेभ्य इव पट्पदः ॥१०॥ चाहिये कि मेटे-बो सभी शगेसे उनका सार- वनका रस निचोर ले ॥ १० ॥ राजन् ! मन मधु सायवनं श्वस्तनं या न संगृहीत मिक्षितम् । मक्खीसे या शिक्षा प्रण की है कि संन्यासीको सायहाड भयवा दूसरे दिनके लिये भिक्षाफा सग्रह न करना पाहिये । उसके पास मिक्षा लेनेको कोई पात्र हो तो पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकेच न संग्रही ॥११॥छ एप और रसके लिये कोई वर्तन हो तो पेट एकही संग्रह न कर पेठे, नहीं तो मधुमक्सिपके समान उसका जीवन ही दूभर हो चायगा ।। ११ ।। सातनं प्रस्तनं पा न संगृहीव भिक्षुक । यह बात सूव सम्स प्लेनी चाहिये कि सन्यासी सबेरे शामके लिये किसी प्रकारका समा न करे, यदि संग्रह मक्षिका व संगृहन् सर तेन विनश्यति ॥१२॥ | परेगा, तो मधुमक्सियोंके समान अपने संग्रहके साप ही जीवन भी गंवा बैठेगा ॥ १२ ॥ परापि युवती भिक्षुर्न सशे दावीमपि । राजन् ! मैंने हापीसे यह सीव कि संन्यासीको कमी पैरसे भी काठकी पनी इसीफा भी स्पश न सासन फरीव पम्पेत फरिम्पा अगसशसः ॥१३॥ करना चाहिये । यदि यह ऐस करेगा तो वैसे हपिनी- के फ-सासे हापी बंध गाता है, पैसे की यह भी बघ बापगा* ॥ १२ ॥ विवेकी पुरुष किसी भी मीको कभी भिगच्छेन नियंप्रामः कहिचिन्मृत्युमात्मनः। भी भोपहपसे स्वीकार न करे, क्योकि यह उसकी मर्ति- ती मृत्यु । पदि वह भीफार फरेगा तो साथियोंसे लाधिक स इन्पेत गरन्पर्गजो यथा ॥१४॥ राषीकी तरा पक्कि परन् भन्प पुरयोंके डारा मारा पायगा ॥ ११ ॥ | देयं नापभोग्य घ लुन्धैर्यव दु ससंक्तिम् । मेने मधु निकाउनेमाले पुरुषसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि संसारके प्रेमी पुश्य यही कठिनाइसे धनका सम्प तो करते यते हैं, किन्तु प सम्धित धन न किसीको दान करते हैं और न मयं उसका उपमोग मुक्त तदपि तवाल्यो मधुहेवार्थविन्मधु ॥१५॥ ही करते हैं । स, जैसे मधु निकाम्नेवाष्म मधु परिमोशारा सभित रसको निकाउ ले जाता है, वैसे ही उनके ससित पनको भी उसकी टोह रसवात्म कोई दूसरा पुरसी भेगता है ॥ १५ ॥ तुम देखते हो न कि मधुहारी मधुमक्सियोंका जोपा हुआ मधु उनके प्लनेसे पासे ही साफ कर बाता है सेही मुद्दालापानितपितरावामाना गृहाशिप । गृहस्पोंके मत कठिनाईसे सहित किये पदायाँको, जिनसे १ ना। • राधी पमनेपासे निम्मे हुए गाईपर प्रगम दथिनी खड़ी कर देव है । उसे देमार रार्थ यहाँ भाताई भर गडदे में रिपस मत है।

७६० श्रीमद्भागवत [.८ मधुहेवाप्रवो मुक्त यतिवें गृहमेधिनाम् ॥ १६॥। वे मुखभोगकी अभिप्रपा रखते हैं, उनसे में पाने सन्पासी मीर ममचारी भोगते हैं। कि गास ते पहले मतिपि-अम्पागोको भोग्न कराकर ही सर्व भोजन करेगा ॥ १६ ॥ ग्राम्पगीतं न शृणुयाद् यतिषनचर कचित् । मैने हरिनसे या सीख है कि बनवासी त्यसको कभी विषय सम्बन्धी गीत नहीं सुनने चाहिये । बस शिक्षेत परिणाद् धनान्मृगयोगीतमोदितात् ॥१७॥ वातको शिक्षा उस हरिनसे प्रहम करे, जो मान्ने गीतसे मोहित होकर व बाता है॥१७॥ इस नृत्पयादिवगीतानि जुपन् ग्राम्माणि योपिताम् । चातका पता है कि हरिनीके गमसे पैटा र अपमा मुनि सियोंका विषय सम्बधी गाना पचाना, नाचना गरि थासां क्रीरनको वश्य प्यभूने मृगीमत ॥१८॥ देख-सुनकर उनके वशम हो गये थे और उनके हाकी फरपुतली बन गये थे ॥ १८ ॥ मिहमातिप्रमापिन्या बनो रसविमोहित । अब मैं तुम्हें मौकी सीख सुनाता है। जैसे मछली फोटेमें लगे हुए मासके टुकड़े के लोमसे वाने मृत्युमृच्छत्यसपदिसनस्तु पनिर्यया ॥१९॥ | प्राण गँवा देती है, वैसे ही साइका अभी तुमुद्धि मनुष्य की अपनी मनको मकर म्याकुल कर देनेवाली विपके हमें इन्द्रियाणि बयन्त्याच निराहारा मनीषिण । हो माता है और मारा जाता है ॥१९॥ विवेकी पुरुष भोजन यद करके दूसरी इन्द्रियपर तो बहुत शीघ्र विजन वजयित्वा तु रसनं तम्भिरमस वर्धते ॥२०॥ वशमें नहीं होती । यह ता मोबन बंद कर देनसे और भी प्राप्त कर लेते हैं, परन्तु इससे उनकी रसनाननिय प्रम हो माती है ॥ २० ॥ मनुष्प और स्त्र इन्द्रिय तावनितन्द्रिया न स्यात् विजितान्यन्द्रियः पुमान् । पर विजय प्राप्त कर स्नेपर भी तक्तक बितेत्रिय न हो सकता, नपतक रसनेन्द्रिय पपने वशमें ही कर न जयेद् रसन यावसितं सर्वे जित रसे ॥२१॥ लेता । और यदि रसनेन्द्रियको वयम कर लिया तो मानो सभी इन्द्रियों वशम हो गये ॥ २१ ॥ पिङ्गला नाम वेश्याऽऽसीद् विदेशनगर पुरा । नृफ्नन्दन ! प्राचीन कामकी बात है कि विदेशनगरी मिपिनमें एक वेश्या राती थी । उसका नाम प्र तस्पा में शिक्षित फिनिमिवोध नृपनन्दन ॥२२॥ | पिङ्गल । मैने उससे जो कुछ शिधा महम की, या में तुम्हें सुनाता , सावधान होकर नो ॥ २२॥ सा स्वरिपकदा फान्तं संफेत उपनेप्पती । स्पेनचारिणी तो पी ही, रूपवती भी थी । एक दिन रात्रिके समय किसी पुरुषो अपने रमणस्थानमें अनेके अभूत् काल पहिरि विमती रूपमुत्तमम् ॥२३॥ लिपे सूर बननार - उत्तम माभूपोसे सकार पात देरतफ अपने परके यारी दरपाजेपर सी मार्ग आगच्छतो पीप पुरुपान् पुरुपपभ । रही ॥ २३ ॥ नरसा ! उमे फरकी मही पनकी कामना पी और उसके मन में या कामना इक्नी समूह म०८] एकादश्च स्कन्ध ७६१ वाम्मुकदान वित्तवतःकान्तान् मेनेऽर्थकामुका२४९ , हा गयी थी कि वह किसी भी पुरुपको उधरसे आते- नाते देखकर यही सोचती थी कि या यो धनी है और आगवेषपयावपु सा मंफेवोपजीविनी । मुस धन देकर उपभोग करनेक लिये ही आ रहा है ॥ २९ ॥ जब वाने-मानेवाले भागे म नाते, तब लिबा संकतनीक्निी वेश्या यही सोचती कि अवश्य अप्पन्मा विचवान् कोऽपि मामुपैप्पवि मूरिद ॥२५॥ी अभी पर मरर ऐसा धनी मेरे पास आग को मुझे यात-सा न देगा ॥ २५ ॥ उसके चित्तफी या एवं दुराशया ध्यतनिदा दार्यपलेम्वती । दुराश मती ही माती पी। यह दरवाजपर बहुत देशमा टंगी रही। उसकी नीट भी जाती रही। कमी बार आती, तो कभी भीतर जाती । इस प्रकार निगम्छन्ती प्रविनती निधी समपपत ॥२६॥ आधी रात हो गयीं ॥ २६ ॥ राजन् ! सचमुच आश्प और सा मी नकी-बहुत पुरी है। धनीकी बाट तस्या विचाराया गुम्पवस्त्राया तीनपेतसः । जोहते-बोइसे उसय मुंह सूख्य गया, चित्त न्याकुल हा गया । अा उसे इस अतिसे यमा राम्प मुआ। उसमें निर्वदा परमो बझे चिन्ताहत: मुम्बापहः ॥२७॥ तुम बुदि हा गये । इसमें सम्दा नही कि इस पराम्प का कारण मिन्ना दी थी। परन्तु एसा पराम्प भी तेम्पा निमिणचिधाया गीव भणु पथा मम । | तो मुलका ही हत ।। २७॥ जब रिङ्गन्मक विचमें इस प्रशर राम्पी माना जामद हुई तब उसने एक गीत गया । ह म तुममें नान्य है । गजन् ! मनुष्य निर्वेद आशापाशानां पुरुषस्य यथा धसि ॥२८॥ आश्मकी फासीपर क रहा है । इस तडकारकी तरह पाटनेवाली परि फार बस्तु है ता पर काम न मनाजातनिर्वेदा देहन्म बिहामति । राम्प है ॥ 2 || प्रिय राजन् । निमे गग्य नहीं दुआ है जान यमोंस कय नदी है. पह शरीर धीर इसक बन्धनसे उसी प्रकार मुक्त नही दाना पधा विज्ञानरहिता मनुबा ममयां नृप ॥२९।। चाहता से अमानी पुरुष ममा नाय भी नहीं माना ॥२९॥ पिमस्कार पिलान यह गीत गापा पापाप त्रियोंफ अलीन हा गपी । भय मरे माया विस्तार पदा म माहरिवति पश्यतापिवितात्मन । मा म्य, में इन दुर पुरुषोंम बिना कादम्तिता ही या सन्तादमत काम कामय येन पारिश ॥३०॥ रमा स्न । ममनून मम ॥ ३. || mal मही मरी गारमा सती । क्तिने मासी मर रोनिकर स्पर्म म मग्न मामा मन्नं ममोप रम रनिप्रद भगवन् भिावमन है । म सम्मान प्रनपुर र सपस मा न भी करत है। जगत् पर शिल्पद नित्पमिर्म रिमाप । अनिम्प भारनिय?।दाप १ मनो। प्रिया पामे नही । बाय 14 मन उनी .

भीमद्भागवत । । ७६२ [२.८ अकामद दुःखभयाधिश्चोक- तो छोड़ दिया और उन तु मनु पोका सेमसि मोहप्रद तुच्छमई भजेया ॥३१॥ दु सभ्य, अधिन्याधि, शोक और न ही देते हैं। जो मेरी एफ भी कामना पूरी नहीं कर सकते असे अहो मयाऽऽत्मा परिवापितो प्रथा या मेरी मूलताकी दी कि में उनका सेक्न करती हूँ॥ ३१ ॥बरे खेदकी बात है, मैने वक्त निन्दनीय सास्पिप्रत्यातिविगर्मवाया यानीविका वेश्यावृत्तिका आम्प थ्यिा और मी अपने शरीर और मनको स्टेश Pप, पीया परचमी । प्रेणानराव यार्थदपाऽनुचोच्यात् मेरा या शरीर कि गय है। मपट, ओमी और निम्दनीय मनुष्योंने इसे खरीद लिया है और में हनी क्रीवेन विवं रतिमात्मनेम्छती ॥३२॥ मर्म कि इसी शरीरसे धन बोर रति-मुख गाती है। मुझे विकार है। ॥ ३२ ॥ शरीर एक पर है। मदस्सिभिनिर्मितवंशवश्य- इसमें हड्डियोंके टेरे-तिरछे वास और संमें सोए। चाम, रोएँ और नासूनोंसे यह अया गया है। स्थूर्ण त्वचा रामनवै पिनद्वम् । नौ दरवाजे हैं, जिनसे मछ निकलते ही राते हैं। धरनषद्वारमगारमेतद् इसमें सथित सम्पक्केि नामपर के मस और मत्र है। मेरे पतिरिक ऐसी कौन सी जो इस लूवारिका विम्मत्रपूर्ण मदुपैति कान्पा ॥३३॥ यफ्ना प्रिय समझकर सेक्न करेगी ॥३१ व विदेशोंफी—जीवन्मुक्तोंकी नगरी है, परन्तु इसमें विदहानो पुरे पसिमामेव मूरधीः । मैं ही सबसे मूर्स और दुष्ट , क्योंकि बकेटी में सो वामदामी, पविनाश एवं परमप्रियतम फरमानको बकर दूसरे पुरुषकी धमित्रपा करती है ॥ ३१ ॥ यान्यमिच्छन्त्यसस्पमादात्मवान् काममम्युतम्।३४। मेरे हदय विरानमन प्रमु, समस्त प्राणियोंके प्रति सम, प्रियतम, स्वामी और आत्मा है। मात् प्रष्ठतमो नाप मात्मा पाय धरीरिनाम् । आपको देकर इन्हें स्मीद लंगी और इनके साथ रे तं विकीपारमनवाह रमेऽनेन यथा रमा ॥३५॥ वित्त ! तम तो सही, आगरके विषय ही बिहार काँगी, नैसे स्मामीची करती ॥३५ । मोर्गाने और उनको देनेवाले पुर्पोन तो किसना पुर फियत् प्रिय ते म्पभनन् कामा नेफामदा नराः। दिया है। रे ! तो मय ही पैदा होते वो मरते खते है। मैं केछ भनी ही सात मही काठी आफ्न्तवन्तो भाषांपा देवा वा कालविद्वता ॥३६॥ मल मनुष्योंकी भी नहीं, क्या ऐकतोने से मोगों द्वारा अपनी पनियोंको सत किया है। ये बारे सो सर मूने मे भगवान् प्रीतो विष्णः केनापि फर्मया । फालक गारलमें परे-पडे कराह रो॥३६॥वासही मेरे किसी गुमकासे विष्णुमगन्मान् मुझपर प्रसन्न हैं, त निर्देदाध्य दुराशाया यन्मे वातः सुखावहः ॥३७॥ तो दुराशयसे मुझे इस प्रकार बैराम्य हुआ है। जय । ।

अ०९] एकादश स्कन्ध ७६३ मैस्पर्मन्दभाम्पायाः फ्लेशा निदरवः । | मेरा पद राम्प मुख देनयात्य होगा ॥ ३७॥ यदि में मन्दभागिनी होती तो मुभ एसे दु सहीन उदयने परते, पेनानुपन्ध निहत्य पुरुषः शममच्छति ॥३८॥ मिनसे वैराग्य पता है। मनुष्य राम्पक गण ही पर पादिक स्व न्धनोंका काटकर शान्तिप्यम करता मेनोपकतमादाय शिरसा ग्राम्पसङ्गताः । है॥ ३८ ॥ अव में भगवान्का यह उपकार आदरस्यक सिर मुस्कर सीकार करती है और पिम्पमोगोंकी स्पत्ता दुराशा धरण प्रजामि समधीघरम् ॥३९॥ दुराश मेहमान उन्ही जगदीपरकी शरण प्राण करती हूँ॥ ३९ ॥ अब मुझे पारन्धके अनुसार जो कुछ मिल संतुष्टश भापत्पवयपालामेन जीवती । जागा, उसीसे निर्वाह कर देंगी और पड़ सन्तोष तथा अदाफे सय रखेंगी । म अब किसी दूसरे पुरुपक्षी मोर विसम्ममनेवादमात्मना रमणेन वै ॥४०॥ न ताकर अपने दयेश्वर, बारम्वरूप प्रमुक साय ही विर फलंगी ॥ २०॥ या जीव संसारक में गिरा संसारकूपे पवित विपर्सपितेवयम् । हुआ है । विपने इसे अवा स्ना दिया, फारूपी अमगरने इसे अपने मुँहमें दया रस्सा है। अब मगधन्फो प्रस्तं कालाहिनाऽस्मान कोऽन्मलातुमधीवर॥४॥ कफर इसकी रक्षा करने में दूसरा फोन समर्प है ॥४१॥ आस्मैय पात्मनो गोवा निर्वि पेठ पदाखिलान् । जिस समय जीव समस्त पियोंसे पिरक हो माता है, उस साम वा स्वयं ही अपनी रक्षा कर सार। मप्रमच पद पश्येद् प्रस्त कालाहिना जगत् ॥४२॥ इसलिये भी सामधानीके साप यह देस्त रहना चाहिये कि सारा जगत् मासपी मनगरसे प्रस्ती ॥२॥ मवधूत इसापनी कहत है राजन् ! पिझ्य एवं भ्यवसितमवित्रामा फान्तवपाम् । पाने ऐसा निथप करके अपने प्रिय धनियोंफी दुराशा, उनसे मिमी पटसाकर परित्याग पर दिया और छिचोपशममास्याप शय्याएपविवेश सा ॥४शा शान्तभावसे जाकर ए मपनी सेजपर सा ही ॥२३ सचमुच माश्य ही स्पसे गा दुसद और निराशा ही पाशा हि परमं दुख नैराश्यं परमं मुसम् । सप वा मुसस्पोकि रिय स्याने जब पुरपरी पधासन्छिय कान्तार्शसुख सुप्पाप पिङ्गला॥४४॥ आश्म स्याग दी, सभी प्रमुखसे सा सरी ॥११॥ आपण उप पति भीमप्रगत मापुण्ण शरमइस्यो महिनाममारकाप्रमोऽध्याय ॥८॥ अथ नवमोऽध्याय मपनोपम्पान-भररस सम्र भूगीता सान गुपमाफीपा मपभूत बतायीन या-राजन् ! मनुष्य अपम्नु भयन प्रिय कानी है, टन्रद्धा माना परिग्रा दिमाप या पत्प्रियतमें नमाम् । हो उनक मग कागजा दिमत् पुष सन नता प्रजाप - 1 | घरके मेग कहीं बाहर गये हुए थे। इसलिये उसने | माश्म ई. धौर उसने एक-एक करके सब पूर्मियों ७६४ भीमन्नामवत अनन्त सुखमाप्नोति तत् पिवान् यस्स्वकिंचनः॥१॥ | बात सम्भायर अकिशन भावसे हता है-शरीरकी से बात ही अलग, मनसे भी किसी परूमा समान करता-नसे मनन्त सुखस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति होती सामिपं हरर जघ्नुर्मलिनो ये निरामिषाः । है॥ १ ॥ एक कुवर पी अफ्नी चोंच मसका टुकाम लिये हुए था । उस समय दूसरे बल्यान् पक्षी, दिनक पस मांस नही पा, उससे छीनने के लिये उसे मेरठ बदामिपं परिस्पज्य स मुखं समविन्दत ॥ २ ॥ मांसफा टुकमा फेंक दिया, तभी उसे सुख मित्र ॥२॥ चोंच मारने लगे। मा कुरर पसीने बफ्नी चौपसे न मे मानापमानौ स्तो न चिन्ता गेहपुत्रिगाम् । मुझे मन या अपमानका कोई प्यान नहीं है और घर एष परिवारमा को जो चिन्ता होती है, मुझ नहीं है । में अपने भारमा में ही रमता । धौर जाने आत्मकीर आरमरतिविंचरामीह पालवत् ॥ ३ ॥ | साथ ही कोरा करता है । यह शिक्षा मैंने कमसे की है । अत उसीक समान में भी मौजसे राता ॥३॥ वाम चिन्तया मुक्तो परमानन्द माप्छप्तौ । इस जगत्म दो ही प्रकारके न्यक्ति निश्चिन्त और परमानन्में म्म राते हैं एक तो भागनाथ ये नना-सा वामक और दूसरा मा पुरुष भो गुणातीत हो गया यो विमुग्यो जरा वालो योगुणेभ्यः परंगतः॥४॥ | हो ॥ ४ ॥ कचित्छमारी त्वात्मानं प्रणानान् गृामागवान् । एक बार किसी कुमारी कन्याके स उसे करा करनेके लिये कई अंग आये हुए थे। उस दिन उसके खप वान यामास कापि यातेपु पन्धुपु ॥ ५ ॥ ही मका जातिष्पसत्कार पिस ॥ ५ ॥ वेपामम्पपहारा शालीन् रहसि पार्थिव । रामन् ! उनका मानन कराने के लिये यह परक भतर एकान्तम धान कटने लगी । उस समय उसकी कमर अपघ्नन्त्याःप्रकोष्ठस्साभकुवा स्वनं महद ॥६॥ में पड़ी शस्तकी धूड़ियाँ जोर जोरसे अब यीभौ ॥ ६ ॥ इस शम्दको निन्दित समसफर कुमारी के मी सध्या सा वेन्नुगुप्सितं मत्वा माती वीरिता दतः । ताब पी और दोनों हामें केस दो-दो पहिर्य पभोकैकशः शान् द्रौ दो पाप्योरक्षेपपत् ।। ७ ॥ हनदा ॥ ७॥ अथ ह नि मन छूटने ली। उभयोरप्पन पोरोपवान्स्पाःसपायो । परन्तु ये दो-दो चूड़ियाँ भी बजने गा, तब उसने एफ एफ सी और तोगदी। जब दोनों काम कर तथाप्येक निरभिदरमामाभवद् चनिः ॥ ८॥ एक-एक पूनी रह गयी, तब किसी प्रकारको अपार नहीं हुई ॥ ८ ॥ रमन ! उस सम्प गणेग अन्वसिषमिम तस्पा उपदशमरिन्दम । आधार-विचार निरसन परसनेक भिमेश्वर-उस घूमता- १ मानापमानौ । २ भाम्मरतो पिरामि । ३ वम् । • कि उसे उतनस दान स्ना पति वा था, यो कि उन दखिया पोका अ०९] ७६५ लोकाननुपरन्नेवान् लाफ्तस्वविवित्सया ॥९॥। घामता में भी यहाँ पहुँच गया था। मैंने उससे पह शिक्षा ग्रहण की कि जम बहुत लोग एक साप यते यासे वहूनां फलहो भवेद् वातो इयोरपि । हैं, तप कलह होता है और दो आदमी साप यते है तब भी बातचीत तो होती ही है, इसलिये कुमारी कन्याकी एक एव चरचसा कमायो इव करण ॥१०॥ मूहीक समान अकेले ही विचरना चाहिये ॥९१०॥ मन एका सयुज्याझिसमासो जिवासनः । राजन् ! मैंने वाण बनानेवालेसे यह सीमा है कि असन और पासको जीतकर पेराम्प और सम्यासके राम्याम्यासयोगेन ध्रियमाणमतन्द्रित ॥११॥ द्वारा अपने मनको वशमें कर ले और फिर वही पसिन् मनो लन्धपदं यदेत सावधामीके साप उसे एफ एम्पमें लगा दे ॥ ११ ॥ जब परमानन्दस्वर परमात्मामें मन स्थिर हो जाता छनै शनमुश्चति कर्मरेणून् । है, तब वह धीरे-धीरे कम्पासनावोंकी धूतको धो सस्पेन वृदन रजस्तमम बहाता है । सत्गुणकी पदिसे रजोगुणी और तमोगुणी पत्तिका त्याग करके मन वैसे ही शान्त हो माता विषय नियोणमुप॑त्यनिन्धनम् ।।१२।। है, जैसे ईधनफे विना वग्नि ॥ १२ ॥ इस प्रकार वदेवमात्मन्यवरुदपियो निसका विच अपन धम्मामें दो स्पिर-निरुद हो जाता है, उसे पादर-भीतर काही किसी पदापका मान न वेद किंचिद् वहिरन्तर वा। । नहीं आता । मैंने देखा पा कि एक बाण बनानेवाला पपुकारो नृपति प्रजन्त कामगर बाग बनाने में इतना तन्मय हो रहा था कि उसके मिपा गवात्मा न ददरसे पार्वे ॥१३।। पाससेही दलबल के साप रामाकी सवारी निफरस गयी और उसे पता तफ न चला ॥ १३ ॥ एकचार्यनिकत स्पादप्रमचा गुहारायः । राजन् ! मैंने सोपसे यह शिभा ग्रहण की है कि संन्यासीको सर्पकी मालि अफले ही विचरण करना चाहिये,, उसे मरी नाही योधनी पारिपे., म. मी. पलक्ष्यमाण आचारमनिराऽसभापण ॥१४॥ बनाना ही नहीं चाहिये । पह एक म्यानमें न रहे, प्रमा' न करे, गुहा माग्मेिं पा रह, बाहरी भाषा- गृहारम्भाऽतिदासाय विफलयापारमन । से पहचाना न नाप । मिमीसे सहायता न ले और बल कम माल ॥ ११ ॥ इम बनिस्प शरीरक लिये समान बदमें पाना म्पर और दूसरी बर मपः परस्तं यम्म प्रविश्य मुम्बमधत ॥१५॥ ६ । माप नमक बनाये घरमें पुमकर र आयमसे भाना समय कारता ॥ १५॥ पर नारायणो दव पर ममापया । अब मार्शसे शिक्षा सुना। सबक प्रयास और अन्सयासी सासक्तिमान् मागन्ने निगमें दिना मिमा ५-य महापमा भनी ही मासे । दुए मरत्य मठम्रपा सान्त समाधरः ||१६॥ मा पन्या भनमें (प्र-पार अस्पिन ७६६ श्रीमसागवत [.९ एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधाराऽस्विलाश्रयः । होनेपर ) कामशक्तिके दारा ना कर दिय-ओ वपनेमें स्पन कर लिया और सनातीय, वित कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीता शक्तिप । तया सगतभेदसे शूम्य अकेले ही शेष य गये । सबके अधिष्ठान है, सस्के वाम्य । पल्त में सवादिप्पादिपुरुपः प्रधानपुरुपेश्वरः ॥१७॥ अपने पाप-अपने ही वापारसे मते हैं, उस कोई दूसरा बाधार नहीं है। ये प्रकृति और पुन दोनोंके नियामक, कर्म और समग्रमा साने परम्पराणां परम आस्ते कैवरपसंहितः । मादिकारण परमारमा वफ्नी शकि करके प्रमाक्से सक्रम वादि समस्त शक्यिोंको साम्पसा डंग कवलानुभवा सन्दोहो निरुपाधिकः ॥१८॥ देते हैं और सयं फैकल्यहपसे एक बोर बहितियार विराजमान इसे है। वे के अनुमक्सप पर केवलास्मानुभाषन स्वमायां त्रिगुणास्मिकाम् । वानन्दधनमात्र हैं। किसी मी प्रकास्की उपरिका उनसे सम्बन्ध मही है। वे ही प्रभु केस बानी पति कालके द्वारा अपनी त्रिगुममपी मापको स्म करते संघोभमन् सुजत्पादो तया सूत्रमरिंदम ॥१९॥र और उससे पहले क्रियाशक्षिप्रधान सूत्र (माल) की रचना करते हैं। या सूत्ररूप मापन ही मनो तामाहुखिगुगष्यक्ति सजन्ती विश्वतोमुखम् । गुणों की पहली वमिम्यति है, यही सब प्रकारको सरि का म्म कारण है। उसमें या साया, सूतमे पसिन् प्रोवमिदं विश्वं येन संसरते पुमान् ॥२०॥ ताने-मानेकी तरह वोतप्रोत है और इसीके कारण बीको जन्म-मृत्युके पारमें पड़ना पाता ।।१६-२०॥ पयोर्भनाभिदयार्णा संस्त्प पत्रतः । से मकड़ी अपने पसे मुंडके धारा वाम्म कमली है, उसीमें बिहार करती है और फिर उसे निगम सी है, वैसे ही परमेवर मी इस गल्को मफ्नमसे उपचा वया विरस्प भूयस्ता प्रसस्पेव महेश्वरः ॥२१॥ करते हैं, उसमें बीकापसे भार करते है और किर उसे क्पनेमें स्मन फर सेते॥२१॥ यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं घिया । राजन् ! मैंने ही ( विनी) कीोसे व शिक्ष प्राण की है कि यदि प्राणी स्नोसे, हेसे पल्प सहा पाव भयावापि याति तफ्त्सस्पताम् ।२२। मपसे भी जान-मकर एकामापसे जाना मन किसीमें हमगा दे तो उसे उसी बस्तफा सरूप प्राप्त हो गवा है॥ २२ ॥ रामन् । से भी एक कोरेको कीट पेशस्त भ्यायन् उन्य सेन प्रवेशितः। | नाकर दीवारपर अपने बनेकी गाद कर देता है पौर पर कीका मयसे उसीका तिन करते करते याति तस्सात्मता राजन् पूर्वरूपमसत्पमन् ॥२३॥ तद्प हो जाता है ॥ २३ ॥ अपने पहले पारीरका स्याग किये बिना ही उसी शरीरसे १ मयना पुस्सेश्वरः । २ गुणा म्पकिम् ।। मपि सन् । •पारसी शरीरसे चिन्तन मिश्र प्राप्ति हो तो दूसरे परीरसे वो अपना ही क्या है। इसम्मेि मनुभो भम्मरमपिचन न के फेव परमात्म्मदी चिन्तन करना चाहिये ।

अ०९] ७६७ एव गुरुम्प एतेम्प एपा मे शिक्षितामतिः। राजन् ! इस प्रकार मेंन इतने गुरुभोसे ये शिक्षाएँ प्रमाण की । अब मैंने अपने शरीरसे बो कुछ सील खात्मोपविधिसो मुद्धि मन मे वदतः प्रभो॥२४॥६, यह तमें बताता है, सारवान होकर एनो ॥ २१॥ यह शरीर मी मेरा गुरु ही है, स्पोकि या मुस वियफ और पराम्पकी शिक्षा देता है । मरना और नीना तो देशो गुरुर्मम पिरतिविवेकहतु इसके साथ लगा ही रहता है। इस शरीरको पका रखनेका फल यह है कि दुस-पर-तुम भोगते बायो। बिभ्रत् म सच्चनिधनं सत्तार्पुदम् । यपि इस मीरसे तत्वविचार करनेमें सहायता मिलती, तपापि में इसे अपना कभी नहीं सम्प्रता, सर्वदा यही तवान्पनेन विमशामि यथा तथापि निमय रसता हूँ कि एक दिन इसे सियार-कुचे रूप जायेंगे । इसीरिये में इससे बसा होकर मिथरता पारस्पमित्यपसितो विपराम्पसगा।२५॥ ॥ २५ ॥ नीव मिस शरीरका प्रिय फरनक लिये दी अनेकों प्रकारकी कामनाएँ और कम करता है तण सी बापात्मजार्थपशुमत्पग्राप्तवर्गान् पुत्र, धन-दौरत, प्री-घोड़, नौकर-चाकर, घर-द्वार और मारमाधुओंका विस्तार करते हुए उनके पालन-पोपगमें स्गा रहता है। बड़ी-बड़ी कठिनाइौ सहफर धनसचय पुष्णाति यत्प्रियविकीपया वितन्यन् । करता है। वायुष्य पूरी होनपर ही शरीर साये तो स्वान्ते सकमबरुधनः म देहा नए होता ही है, इस सम्मम दूसरे शरीरके लिये बीज बोकर उसके लिये भी की म्पमस्पा कर बाता सशस्य बीजम्बमीदति अधमा ॥२६॥ ॥ २६ ॥ जैसे बहुत-सी ने अपने एक पतिका अपनी अपनी बार मचती ? से ही जीरका जीभ एक जोरसाहिए पापाकी वोर साँचती है त्य जिक्तोऽमुमपफर्पति कहिं तो प्पास दूसरी ओर---अस्मी बार बननन्द्रिय एक फोर-श्रीसंभोगकी कार से जाना चाहती है तो विभाऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवण कुतपित् । सया, पर और कान दूसरी भार - सर्श, पोजन और मधुर शम्की और स्चने छगते हैं। घागाऽन्यतमपलरक्क परमशकि नाक कहीं पुम्दर गन्ध मपनेके लिये से जाना चाहती है तो पघल ना की दूसरी और अन्दर रूप देखनक लिये । इस प्रकार पर्मेनिया और बदामपल्पर गहमति तुनन्ति ॥२७॥ शनम्तिो गनों ही इसे सनाती रहता है ॥ २७ ॥ से ता भगवन्न अपनी अधिस्य शकि मापासे पक्ष, सशा पुराणि विविधान्यवयाऽऽरमवस्त्या समर (रेगनगाठ मनु) प], पक्षी, डोम और मरठी अविन प्रकारको पनिपो यो, रन्तु श्यान मर्गमुपपन मगमन्सान । उनमे उन्हें सम्बरि ना । तर उन्होंने मनुष्य १ मगमरमन ।

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अ०१०] एकादश स्कन्ध ७६९ अथ दशमोऽध्याय लौकिक या पारलौकिक भोगीकी मसारवान निरूपण भीभगमानुवाप भगवान् भीहप्प कहत है-प्यारे उष! साधक को चाहिये कि सब तबसे मेरी शरणमें रहकर मयोदिवेप्ववहितः 1. स्वधर्मेपु मदाश्रयः । (गीता, पाबराव वादिमें ) मेरे शरा उपदिष्ट वपने अमर साबधानीसे पान करे । साथ ही वहाँतक इनसे विरोध न हो वहानक निष्काममापसे भपने पर्ण, यभ्रम और कुम्के अनुसार सदाचारका भी अनुष्ठान पर्यायमालाचारमामास्मा समाचरत् ॥१॥ करे ॥ १॥ निष्काम होने का उपाय यह है कि | अधोका परसन फरनेसे शुरु हुए अपने पित्त यह विचार करे कि नगदके पिपी प्राणी शम्द, स्पर्श, अन्वीधत विश्वदात्मा देहिनां विपयारमनाम् । रूप वादि विषयों को सत्य समसफर उनकी प्राप्तिके लिये नो प्रयास करते हैं, उसमें उनका तरेस्प हो या होता है कि मुख मिछ, परन्तु मिटता है दुस ॥२॥ इसके सम्बन्धमें ऐसा विचार करना चाहिये कि सम गुणेषु तस्वध्यानेन सर्वारम्भविपर्ययम् ॥२॥ भास्मा और मनोरप करते समय जाप्रत्-अवस्थामें भी मनुप्य मन-ही-मन भनेकों प्रकारफे वियोका अनुभव करता है, परन्तु उसकी यह सारी कल्पना बस्तुशून्य सुप्तस्स विपमालाका पायतो पा मनोरथः । होनके कारण म्पर्य है। से ही इन्द्रियोंके दाय होनेवाली भेबुटि भी म्पर्य है, क्योंकि यह भी इन्द्रियम्य और नाना बस्तुविश्यक हानेके फारम नानात्मकत्वाद् विफलस्तया मेदात्मधार्गुणै ॥३॥ सत् असाप ही है ॥ ३ ॥ जो पुरुष मेरी शरणमें है, उसे भतर्मुख करनेवास निफाम वपना निस्पफर्म ही करने चाहिये । उन फर्मका बिस्कुल परिपाग कर निर्म कर्म सेवत प्रहरी मत्परस्त्यजत् । देना चाहिय जो बहिर्मुस मनाना अपच सकाम गे। जब आत्मदानकी टस्कट इन नग उटे, तब तो कमसम्बन्धी विधि-विधानोंका भी आर नहीं करना बियामाया सप्राचा नाद्रियत् फर्भपादनाम् ॥ ४॥ पारिये ॥ ? || अहिंसा मारि यमोंका त्य वार्षक सेवन करना चाहिय, मन्तु शाब (पश्यिता) आदि निपोका पानन शक्तिक अनुसार और आरममानफ पमानभीम सवत नियमान मन्पर फनिन् । विराधी न होनेपर ही करना चाहिये । निजाम पुस्पक नये पर और नियोक पानसे भी बाकावारपक बात यह कि अमन गुरुमी, जामर सम्प मदभियं गुरु शान्तमुपासात मदामकम् ॥ ५॥ गननन और शान्त हो मग ही सम्प्प समभक्त । म

७७०
युछ जान पस्ता ॥९॥ इयरकेरा नियमित
| प्यासके कारण प्राप्त होता। भापक सपा
भीमद्भागवत
[...
अमान्यमस्सरो दक्षो निर्ममा जसौहदः । | सेवा करे ॥५॥ शिम्पको अमिमान म कास्ना चाहिये।
हा कमी किसीसे यह म करे-किसीका युग न
सोचे । छ प्रत्येक फीमें कुशल हो-उसे वामन
असस्परोऽर्थजिज्ञासुरनपुरमोषवार
छ न जाय । उसे कहा मी ममता न हो, गुने
॥६॥ चरणोंमें अनुराग हो । को काम सरकार न
करे---उसे सावधानीसे पूरा करे । सा परमात
सम्बन्धमें मान प्राप्त करनकी इज्म माये से।
किसीके गुर्नामें दोप न निकामे और पर्पकी बात न
जापापस्पगृहक्षेत्रस्वजनद्रषिमाविष
करे ॥ ६ ॥ विवासका परम धन है आत्मा, इसम्मि
पर मी-पुत्र, घर-त, सबन और धन बदि सम्पूर्ण
पदामि एफ सम वामाको देने और किसी एक
विशेषताका मायेप करके उससे ममता म करे
उदासीनः समं पश्यन् सर्वेष्वर्थमिवात्मनः ॥७॥ उदासीन ये ॥७॥ उदव ! जैसे जम्नेवी कारसे
उसे जलाने और प्रकाशित करनेगी आग सध
भन्। ठीक वैसे ही विचार करनेपर बान पर
है कि पचमूतोंका ना स्पूबशीर और मन मुनि
विलक्षणा स्थूलसूक्ष्माद् देहादात्मक्षितावाद ।
वादि सम्रा तोफा बना सूक्ष्मशरीर दोनों ही रस
मौर जर है। तपा उनको जानने और प्रकाशित
करनेवाष्य वात्म साक्षी एव सर्वप्रकाश है । रि
पनिस्प, मनक एव पर है।वामा निस्प, एक एवं
मथाग्निदारुमा दाया दाहकोऽन्य प्रशासकः॥८॥
कान है। इस प्रकार देहकी अपेक्षा आपमें मान्
विलक्षणता है। बतएर दोसे वस्मय मिन है ॥ ८ ॥
जब बाग स्कीमें प्रगति होती है, तब स्मारक
उत्पत्ति-बिनाश, वाई-कोटाई बोर बनेका बरि
निरोधात्तपणाहमानात्य वस्कसान गुणान् ।
समी गुण का मयं प्राण कर दी है। पस्तु सप
प्रमे, तो कमीके ठम गुणोंसे बागका करें सम्पन्न
नहीं है। वैसे ही बन वास्मा अनेभर मान
मेवा है, तब दोके जरता, अनिस्मता, स्यूमता,
अन्तः प्रविष्ट आधस एवं दहगुणान् पर ॥९॥ बनेकता आदि गुणोंसे सर्वच रहित होनेपर मी उमसे
मायाफे गुर्गोन ही सूक्ष्म और स्यूम समिका निर्माण
किया है। जीयको शरीर और शरीरको बीच स्वा
योऽसौ गुणविरचितो दहोऽय पुरुषस्य हि ।
| लेनके कारण ही स्थशरीरके जम्म-मरण और सूक्ष्म
शरीरके धागमनका आरमापर आयेप किया जाता
है। जीको जन्म-मृत्युत्प संसार इसी भम sma
संसारस्वभिमन्भोऽप पुंमा विद्याच्छिदात्मनः ॥१०॥ बान हानेपर उसकी स कर जाती है ॥ १० ॥

०१.] एकादश स्कन्य " तमासिनास पाकरमानमात्मस्र्थ केवलं परम् । प्यारे उदय ! इस जन्म-मृत्युस्थप संसारफा कोई दूसरा कारण नहीं, केवल मान ही मूल कारण है । इसलिये अपने वास्तविक मरूपको, आग्माको जाननेकी इच्छा साम्प निरसेदेववस्तुपदि पपाक्रमम् ॥११॥ करनी चाहिये । अपना यह वास्तविक स्वरुप समस्त प्रकृति और प्राकृत जगत्से अतीत, दैतकी गन्धसे | रहित एवं बपने वापमें ही स्थित है। उसफा और आचार्योऽरपिराधः स्पाइन्तपास्युचरारणि । कोई आधार नहीं है। उसे जानकर धीरे-धीरे स्पूल- शरीर, सूक्ष्म शरीर आदिमें वो सस्पत्त्युद्धि हो यो, | उसे क्रमश मिटा देना चाहिये ॥ ११ ॥ ( यामें स्व अणिमापन करके अग्नि उत्पन करते है, तो उसमें सरसंधान प्रवचन विधासन्धि सुखावहः ॥१२॥ नीचे उपर दो छकरियों रहती हैं और वीचमें मन्थन- काष्ठ राता है, वैसे ही) मिपासप पमिकी उत्परिक लिये भाचार्य वौर शिष्य तो नीधे-अपरकी धरणिय शारदी सातिविश्वपुद्धि हैं तपा उपदेश मन्थनफाष्ठ है। इनसे जो जानामि प्रवाहित होती है, यह मित्क्षण सुख देनवासी है। इस कामे घुविमान् शिष्य सहरुक हाय नो अस्पत धुनोति मापां गुमसम्प्रस्ताम् । विशुद्ध ज्ञान प्राम करता है या गुर्गोंसे पनी दुई सियोंकी मापाको मस्म कर देता है। तत्पधाद ने गुण भी भस्म हो जाते हैं, जिनसे कि या संसार पना गुणांय सन्दप यहात्ममेतत् दुमा है। इस प्रकार सपके भस्म 0 जानेर यस बामाके अतिरित बौर कोई वस्तु शेष नहीं य नाती, तब यह बानाम्नि मी टीक वैसे ही अपन पास्तविक स्वयं च शाम्पस्पसमिद् यथापिः ॥१३॥ सरूपमें शान्त हो जाती है, जैसे समिधा न रहनेपर वाग मुख जाती है. ॥ १२ १३ ।। अपां फर्मका मां भोक्तृष्य सुखा लयाः । प्पारे उप यदि तुम काषित् फौफ कर्ता और एल्टु खो माछा गीर्वोको पनेक तया जगद, काल, ये मेरे बास्मानोंको निष्प मानवे साप ही समस्त पाको स्थिति प्रयासे नित्य और याप नानात्वमध नित्पत्व लामालागमात्मनाम् ॥१४॥ सीकार करते हो नपा यह समाते । कि परफर पारि वाम वासियोंकि भसे उनके अनुसार भान हरी उत्पन्न होता और पदळता यता । एसे मतके मन्पस सयभाषानां संम्पा पोत्पतिमी यथा । माननेसे बगा पनप हो मामा (स्योंकि इस प्रकार ० पासा पाठ स्पर से गर्म पिप्रमश नम्बम्म मिस्प एक ही भारमा | PR, मेतरस मारि पर्म सोपरयौ । भाम्पर भनितिक कुछ ना निस्प भोर मायामयो इमिप भारमन्न दान हो ममत मितियोंसे मुकिमिस है।

। अत | मोकन भी कभी दुमसे पाम नहीं पाता।समि | स्वीकार कर लिया गाप कि वे पेग मुस्मी प्राधिकर ७७२ श्रीमद्भागवत तपदारुतिमेदेन जायत भियत च धीः ॥१५॥ जगत्के कर्ता वात्माकी निस्प मचा और स्म-पाते चफरसे मुक्ति भी सिद न हो सकेगी। ) यदि कादि ऐसा सीकार भी कर लिया जाय वो देर सक्सी एषमप्पा सर्वेषां देहिना देहयोगत । मायक्योंके समवसे होनेवासी जीवों की बात मादि अवस्थाएँ भी नित्य होनेके कारन रन हे सकेगी, क्योंकि तुम शादि पदार्प और कामी मित्पर कालावपयस सन्ति भाषा जन्मादयोऽसकत॥१६॥ सीकार करते हो। इसके सिवा, यहाँ भी मात्र कर्व सपा मुम्दु का मोका जीव परतन्त्र ही रखी देता है, यदि यह सतन्त्र हो तो दुस्मा को अत्रापि कर्मणां फर्तुरखातल प लक्ष्पते । भोगमा चाहेगा । इस प्रकार मुक मोगकी समस्या एका जानेपर मी दुस-मोगकी समस्या तो उन्मी ही होगी। इस मतके अनुसार नीयको कमी मुखिया भोक्तमतुःस्लमुस्त्रयो को न्यों विषशं भजेत्॥१७॥ परतन्त्र , विवश है तब तो स्वाप या परम्पर्य में खम्त्रता प्राप्त न हो सकेगी। जब जीव सप्तः भी उसफा सेवन न करेगा । बर्ष और परमार्प दोनोंसेही बपिन र गापा ॥१५-१७॥ न देहिनां सुख किंचित् वियते विदुपामपि । ( यदि यह कहा जाय कि जो ममिति कर्म करना चानते हैं, वे सुसी राठे है, और को नहीं समले उन्हें दुस भोगना परत तोहाना मी कि मही, स्पैकि ) ऐसा देखा मान्य है कि बरे-मर्म तथा च दुल मूगनां स्थाईकरवं परम् ॥१८॥ | कुम विशनों को भी कुछ पुस मही cिt अग पनी बुद्धि या कर्मसे मस पनेका घमंड करते पदि प्राप्ति विषाद प जानन्ति मुखदुसयोः । ६ उनका वा भिमाम पर्प ॥ १८॥ मी या दुम्के नाशका कटीक उपाय जानते को मी प तो मामना ही पड़ेगा कि ठने मी ऐसे उपयर पा नहीं है, जिससे सस्प उनके ऊपर कोई प्रभाव नमा तेऽप्पा न विदुर्योग मस्पन प्रभमेव मया ॥१९॥ सकेबारी में ही महीं ॥ १९ ॥ यस सम्पु कनो सिरपर नाच दी है, तब ऐसी कौन-सी मोग-सामी प मोग-कामना है गो ठमें मुभी कर सके ! मम मिस मनुष्यको फाँसीपर स्टकानेके म्येि स्थानपर कोन: मुसपस्पेनं फामा पा मस्परन्तिके । नापा ना या, उसे क्या समदनगी मार पदार्प सन्मए कर सकते कदापि महा । ( पूर्भेक मत माननेवास्की पिसे न मुसही सिर रोग भाषा नापमानम वापस्पेव न तुष्टिदः ॥२०॥| और न भीका कुरा पुस्याई ही रहेगा ) ॥ २० ॥ १ मिली। ।

प.१०] ७७३ - जाय, भुतं प रष्टवत् दुष्ट सधास्यास्पयम्पयैः । प्यारे उदय | मौक्कि मुस्के समान फरलौकिक मुख मी दोपयुक्त ही है, क्योंकि यहाँ भी पराधीपासे होर पलती है, अधिक सुख भोगनेवाल्के प्रति धस्य पान्तरायफ्यमत्वात् कपिवच्चापि निष्फलम् ॥२१॥ होती -उनके गुर्गोंमें दोष निकाय नाता है और छोटसे घृणा होती है। प्रतिदिन पुण्य क्षीण होनेके साप ही याकि सुप्त भी आपके निकट पहुंचते राते अन्तरापरविडतो यदि धर्मः स्वनुष्ठितः। है और एक दिन नष्ट हो जाते हैं। मौकी कामना पूर्ण होनेमें भी यजम्बन, शखिम और कर्म आर्दिकी श्रुटियोंके करण यो वा विनोंकी सम्भावना राती है। सेनापि निर्जित स्पानं यथा गच्छति सच्यणु ॥२२॥ जैसे हरी-मरी सेती मी पतिष्टि-अनादि अदिके कारण नए हो जाती है, वैसे ही स्वर्ग भी प्राप्त होते-होते शिमोके कारण नहीं मिल पाता ॥ २१ ॥ पदि या पर देवता यझै स्वर्लोकं मावि याशिफः । पगादि धर्म बिना किसी विश्नके पूण तो उसके शरा जो सर्गादि ठोक मिस्ते है, वनकी प्रसिका प्रकार में क्तता , मुनो ॥ २२ ॥ या फरनेवास पुरुष सजीव देणवत्र भोगान् दिव्या निवार्जितान्।२३। योंके शरा देवताओंकी धाराधना फरक स्वर्गमें बाता है और जो भरने पुष्पकमोकि हारा स्पार्मित दिम्य मोगोंको देपतालोंके समान मोगता है ॥ २३ ॥ उसे खपुग्योपषिते शुने विमान उपगीयते । उसके पुर्पोके अनुसार एक चमकीम समन मिलता है और वह उसपर सम्पर होकर मर-मुन्दरियाँक साप | विहार करता है। गन्धर्षगण उसके गुणोंका गान करते गन्धविदरन् मध्ये दवीनां पवेपनम् ॥२४॥ । भौर उसके म्प-अवप्पको देखकर पूसरोका मन सुमा नाव ॥ २१ ॥ ठसा विमान या नहीं ले जाना चाहता है, ही घय बाता है और उसकी परियों स्वीमिा कामगपानेन किरिणीजालमालिना । फ्नघनाकर दिशाओंको गुमारित करती हैं। वह भप्सराओंके साप नन्दनम्न आर देवताओंकी बिहार सम्मिमि फ्रीदाएँ पर करवे इतना सुध हो जाता है फ्रीग्न् न बदामपात सुरागीरप निर्वतः ॥२५॥ कि उसे इस बातका पता ही नहीं घम्ता शिपब मेरे पुष्प सम्बप्त हा बायंगे और म पसि बकेट दिया आगा ॥ २५॥ स्क्तक उसके पुष्प शेर राते है, सावत् प्रमादत खर्गे यावत् पुष्प समाप्यते । तबतक का संगमें चैनकी वंशी बनाता रहता है। पन्त पुष्प क्षीण ते ही इन न रहनेर भी उसे नीचे गिरना पता है, क्योंकि कायी पाली एसी धीपपुष्प पतस्पपागनिम्छन् काउचालितः ॥२६॥ ९ ॥ २६ ॥ १ रेवानाम् ।

७४
श्रीमद्भागवत
यद्यधर्मरत महादसतां पाजितेन्द्रियः । यदि कोई मनुष्य दुष्ठोंकी सगतिमें पार कम
परापण हो जाय, अग्नी इन्द्रियों के वशमें होकर मनमानी
कामात्मा कपणो लुन्या गो मूतविहिंसक ॥२७॥
करने लगे, लेमवश दाने-दानेमें पता करने मो,
लम्पट हो जाय अपवा प्राणियोंको सताने गे और
पशूनविधिनाऽऽलम्म प्रवभूतगणान् यजन् ।
विधि-विस्व पशुओंकी बलि देकर मूत बौर प्रेटी
उपासनामें मग चाप, सब तो यह पशुओंसे मी गप-पत
हो जाता है धौर मपश्य ही नरकमें बाय है। उसे
नरफानपठो जन्तुर्गत्वा यास्युल्पर्ण तमः ॥२८॥ तमें घार बन्धकार, स्वार्थ और परमसे रहित
मानमें ही मटकना पड़ता है।॥ २७२८ ॥ सिने
फर्माणि दु:खोदकाणि कुर्वन् देहेन । पुनः ।
मी सकाम और वहिर्मुस करनेवाले कर्म है, उनका
फल दु सही है। जो नीव शरीरमें माता-ममन को
उन्हीं में ज्या बाता है, उसे घर-पार कम पर-जन्म और
वेहमाभजते तत्र किं सुस्मै मर्त्यधर्मिणः ॥२९॥ मृत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती रहती है। ऐसी स्थिति में मन्यु
धर्मा जीवको क्या पुर हो सकता है।॥ २९ ॥
लोकानां लोकपालानां मद् भर्य कल्पजीषिनाम् ।
मेक और प्रेकपागेकी आयु मी केवळ एक माप
इसलिये मुझसे मयभीत रहते है। औरोकी तो बस से
प्रपणोऽपि भय मतो विपरार्मपरायुप ॥३०॥ उनकी प्रयु भी काम्से सीमित—के दो पर्म
स्पा, सय प्रमा मी मुझसे मपमीत रहते हैं, कि
है ॥ ३० ॥ सत्त्व, स्न बौर तम ये नों गुन
गुणाः सबन्ति फर्माणि गुणोऽनुसृजते गुणान् ।
इन्द्रियों को उनके को प्रेरित करते है और इन्द्रिय
कर्म करती है । जीव अशानस्श सत्त्व, रज आदि गुर्भ
और इन्द्रियोंको अपना सरूप मान बैठता है और उनके
बीपस्सु गुणसंयुको सन्त फर्मफलान्पसौ ॥३१॥ किये हुए फोका फल मुख-दु स भोगने मात्र
है ॥ ३१ ॥ नक्तक गुर्णोकी विमा है त
पावतु स्पा गुणषेपम्प तावन्नानात्वमात्मन ।
शरीरादिमें में बौर मेरेएनका अभिमान , धर्मक
धमाके एकाकी अनुमति नहीं होती के
जान पड़ता है, और मक्तक मापकी अमला है।
नानात्वमात्मनो यावत् पारतन्य तदैव हि ॥३२॥ ARE तो उन काळ अमा कर्म किसके बीन
खमा ही पड़ेगा ।। ३२ ॥ जस्तक परता है,
यापदस्सास्वतन्त्रत्यं तावदीधरता भयम् ।
तक ईपरसे मप ना ही रहता है। ये में और
मेरेपनके माबसे प्रस्त रहकर आत्माकी अनेसा, पर
तता आनि मानते हैं और राम्य न परम करके
य एतत् समुपामीरस्ते मुपन्ति शुधार्पिशाः ॥३३॥ वहिर्मुस करनेवाले मोका ही सेसन करते हते हैं।
उन्हें शाफ और मोहकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥
काल आत्माऽऽगमा लोक स्वभावो धर्म एम च |
प्यारे उदय ! बय मापाके गुमि मोभ होना है, सब
मुङ्ग आपको ही कार जीव केद, मेक, म्बमान और धर्म
का अनक नामोसे निरूपण करने गते हैं। (
पति मो पहुधा प्रागुणम्पतिकर मति ॥३४॥ | सब मायाम्पत् । वास्तविक रूप में आप ही 1 ) ॥३४॥

अ० ११] एकादश स्कन्ध उयव उपाप उयपधीन पूछा-भाषन् । यह नीव देह आदि रूप गुणोंमें ही रह रहा है। फिर दइसे हानवाट को गुभेषु वर्तमानोऽपि दरजेप्यनपाइतः । या सुम्दुस आग लप फ में क्यों नहीं पता। या यह आत्मा गुणोंसे निमि है, देव आदिके सम्पर्कसे सषया रहित है, रि इसे क्धनकी प्राप्ति गुणैर्न मन्यत दही पद्धत या कथ विभो ॥३५॥ कैसे होती है । ॥ ३५ ॥ क्र अभय मुक्त पुरुष कसा पाव करता है, वह कसे विहार करता है, या यह फार्थ धर्तत निहस्त् का शापत लक्षणे । किन वक्षोंसे पहचाना जाता ह कैसे भोजन करता है। और मस्याग आदि से करता है फैमे साता है, से वैठता है और कैसे चलता है । ॥ ३३ ॥ किं सुधीतात विसृजेच्छपीतासीत याति वा ॥३६॥ पयुक्त प्रश्नका मम सननेतालामें आप श्रेष्ठ हैं। इसरिम्पे आप मेरे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये एक हो एवदभ्युत मे हि प्रश्न प्रश्नविदां पर । मामा अनादि गुणों के संसर्गसे नियवद्ध भी मदम पड़ता है और मसान होने के कारण नित्यमुक्त भी। इस अतको निस्पमुक्तो नित्यषद् एक एपेवि में भ्रम ॥३७॥ लेकर मुझे भ्रम हो रहा है || ३ || इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारम्स्या संहितापामेकादशस्कन्ध भगवदुरवस्वाद दशमोऽन्याय ॥ १० ॥ आरमा . अकादशोऽध्याय. बय मुक मोर भवनमा सक्षण भीभगयानुवाप भगयाम् भीरुप्णने कहा-~प्यार उदय पदो मुक्तइति ध्याम्पा गुणतो मे न वस्तुव । यद । या मुळ है, इस प्रकारकी पाम्या या स्परहार मेरे अधीन रहनेवाले सत्यादि गुणोंकी उपारिसे ही होता है। पस्त पाठिसे नही । सभी गुण गुणस मायामूलस्यान्न म मोक्षो न पन्धनम् ।। १ ॥ । मायामूलक हैं-दबाउ है- जाप से समान हैं । इसलिये न मेरा मान है, न तो मेय वचन हो वैसे सम पुदिका वितह-~-उसमें बिना रही पोकमाही मुख दल देशपविध मायया । भारतामिथ्या है से ही पय मोर, सुख-दुख, गरीरकी उत्पति और मृत्यु- यह सब संसारका बमक्ष मात्यय ( अत्रिपा) के फारम प्रतीत हानर भी पास्तविक स्वप्नो यथाऽऽस्मना स्पाति मंसृतिर्न तयातनी।।२।। नहीं है ॥ २ ॥ उदप ' गरीरधारियोंश मुक्तिका अनुभव पानेापी भरमपिपा और पनका अनुभव कानमा विद्यापिय मम तन् विदयुर्व शरीरिणाम् । अपिणा यांना ही मी नारि शकिया है। मी मले।

दाम्पाऽपिनदाम्पा निधान्मप्नात् पयात्थिस ।उनसे मिमी प्रसारण सम्कनहर परमात्र न अपने वास्तविक रूपया जानता है और न जनसे निस्पमुक है॥७॥ प्यार उस मनम्पमा ७७६ श्रीमद्भागवत मोक्षगन्धरी आये मापया मे विनिर्मिते ॥३॥, मायसे ही इनकी रचना हुई है। इनका कोई पास्यक्ति अस्तित्व नहीं है ॥ ३॥ माई | तुम को सपने मुद्धिमान् हो, विचार करो—जीव तो एक है। एकस्पैव माशस्थ जीवस्यैव महामते । मह व्यहारफे लिये ही मरे वशके रूपमे कल्पित व है, पस्तुत मेरा सरूप ही है। आमानसे सम्म बन्धोऽस्याविषपानादिर्षिचया च तमेवरः ॥ ४॥ होनेसे बा । और यह कहान पनादि हानेसे कम होनेपर उसे मुक करते हैं धौर बामाका छन । मी अनादि कालता है॥ ॥ इस प्रकार मात्र अथ पदस्स मकस पैलममं वदामि ते । ही धर्ममि रनेपर भी जो शोक वीर अनन्दरूप मिस धर्माले जान पाते हैं, उन पर धीर मुफ जीता मेद में बताया ॥५॥ (ब मेद दो प्रकारच- विरुवधर्मिणास्तात स्मितयोरेकधर्मिणि ॥५॥ एक तो निस्पमुक्त इयरसे जीक्का मेद, और इस मुफ बद्ध चीक्का मेद । पाम सुनो)-जीव और ईका सुपर्णाक्ती सम्मो सनायौ मद और मुळके भेदसे मिम-मित्र बनेपर भी एक शरीरमें निफ्ता धीर नियन्त्रितके रूपसे स्मित है। ऐस समझो कि शरीर एक पक्ष है, इसमें दफा सन यम्पती कतनीरौ च पक्षे । यनाफर नीव और ईयर नामके दो भी खते ।। के दोनों चेतन होने के कारण समन ! और कमीन क्रिनके फारम सख है। इनके निवास करने एकस्तयाः खादति पिप्पलान्न कारण केसा मीप है। इनी समानत होनेर भी बीव तो शरीररूप रक्षके फल सुन्नुस अदि मोना है, परन्तु इश्वर उनैम मोगकर कर्समन मुरमुरा आदि मन्यो निरनोऽपि भलेन भूपान् ॥ ६ ॥ोनस भी ईश्वरकी यह किश्मणता है कि से क्सन और उनका सीमात्र राता है। भल ऐर्य, आनन्द और समर्प आदिमें भोला जीसे न पर है॥ आत्मानमन्य च स पद विद्रा- कि अमोय इथर तो अपने ग्रस्तनिकलाप और (सक अतिरिछ जगत्को भी जानता है, परन्तु माय बीर नपिप्पलादा न तु पिप्पलादः । अतिरिका । इन दोनोंमें जीप तो पिपासे पुक हाक याऽपिपया पुरसतु निस्परद्धो कारण निस्पबद है और इसर विपन्नहप हाना मारव साप की एक या भी विधा। रियामया यः स तु नित्यमुक्त ॥७॥ HARAN समय नहीं रजा, से भी मुक हो से स्वप्न टूट गनम जगास ही बानी पुष सूक्ष्म और रचून पर रहकर म०११] एकादश स्कन्ध अदरसोऽपि दहस्सा कमप्तिः स्वमाग यथा ॥ ८॥ पुरुष वास्तवमै शरीरसे कोई सम्बन्ध न रखने पर भी मानके कारण शरीरमें ही स्थित रहता है, जैसे सप्न देसनेवाला पुरुष स्वप्न देखते समय स्वामिक शरीरमें बैंध इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुपैरपि गुणेषु च । जाता है ॥ ८ ॥ म्यपहारमें इन्द्रियों शम्द-स्पर्शादि विषयों को ग्राण करती है, क्योंकि यह तो नियम ही है कि गुण ही गुणको ग्रहण करते हैं, भारमा नहीं । इसलिये निस्ने अपने निर्विकार बामस्मरूपको समय गममाणेषकर्याम विद्वान् यस्त्वविक्रियः ॥९॥ लिया है, उन विपर्योंके प्राण-रयागमें किसी प्रकार का अभिमान नहीं करता ॥९॥ या शरीर प्रारम्बके देवाघीने घरीरऽस्मिन् गुणभाष्येन कर्मणा । अधीन है। इससे शारीरिफ धौर मानसिक जितने मी कर्म होते है, सब गुणों की प्रेरणासे ही होते हैं। मानी पुख्य भूठमझ अपनेको उन प्राण-स्याग आदि मौका फर्ता मान बैठता है और इसी अमिमानके कारण वह पर्वमानोऽपुषस्तत्र फर्तास्मीति नियते ॥१०॥ वैध जात्त है॥ १० ॥ एवं विरका अपने आसनाटनमयने । फ्फरे उप ! पूर्वोतपरतिसे विचार करके विकी पुरुष समस्त निफ्योंसे पिरस राता है और सोने-ठने, वर्शनस्पनिमायभोजनभषणादिपु ॥११॥ घूमने-नीरने, महाने, देखने, छ्ने, घने, साने और | सुनने वादि क्रिपाळमें अपनेको फर्ता नही मानता, न तथा पदपते विदस्तित्र तत्रादयन् गुणान् । बल्कि गुणोंको ही कर्ता मानता है। गुण 0 समी ककि कर्ष-मोचा है—ऐसा बानकर विशन् पुस्य प्रतिसोऽप्मसंसको यथा स्व सषितानिल ॥१२॥ फर्ममासना और फासे नहीं वेंधवे । ये प्रतिमें राकर मी से ही पसाराते हैं, जैसे स्पर्श दिसे श्राफाश, पेशारक्षयासहक्षितया छिमसंशयः। चरकी बाईसा मदिसे सूर्य और गन्ध भदिसे मायु । उनकी विमा युद्धिकी तख्वार असा माक्नाकी सानसे प्रतियुद्ध स स्वमान्नानात्वात् विनिवर्तते ॥१३॥ मौर मी तीली हो जाती है, और उससे अपने सारे सशप-सम्देशीयो पाट-कूट कर फेंक देते हैं। जैसे काई पस्स स्युतिसंकल्पाः प्राणन्द्रियमनोपियाम् । खप्नसे नाग उठा हो, उसी प्रकार वे इस मे युरिके भ्रम्से मुक हा जाते हैं ॥१११३ ॥ जिनके प्राण, वृत्तयः स विनिमुका देहस्योऽपि हितगुणैः ॥१४॥ होती है वे देश में स्थित एकर भी उसके गुणों से मुछ इन्द्रिय, मन बौर युरिकी समस्त चेप्ट्याएँ बिना सारस्पके हैं।॥११॥ उन तत्वा मुळ पुरमोंके शरीरको चाहे पस्पास्मा हिस्पतेहिंस्तैपेन किंचियरप्छया। हिंसक रोग पीडा पचाये और पाहे कमी को दे योगसे पूय करने मो- म तो किसीक समानेसे अमते या कपिचन न म्मतिक्रिपत पुभः ॥१५॥ दुस्से होते हैं और न पूजा करनेसे मुखी ॥ १५ ॥ १४ मकोरे । ।

७७८ भीमद्भागवत [२.११ न स्तुपीत न निन्देत कुर्वतः साचसाधु पा। | जो समदर्शी महारमा गुण और दोषकी मेदारिसे मार उठ गये हैं, वे न तो पप काम करने की स्तुति वदतो गुणदोपाम्पा पर्जितः समन मुनिः ॥१६॥ करते हैं और न पुरे काम करनेवालेकी निन्दा, मो किसीकी अच्छी बात सुनकर उसकी सराहना करते। और न मुरीत सुनकर किसीको बिकते ॥१५॥ नर्यान वदेत् किंचिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा । | बीकमुक पुरुष न तो कुछ मन य मुरा काम करते हैं, न कुछ मग या मुरा कहते है पोर न सेवे । | हैं। वे म्पसहरमें पफ्नी समान गति रकार का आत्मारामोऽनया वस्या विघरेलरवन्मुनिः ॥१७॥ मन्दमें ही मन यते है और नरके समान मानो को मूर्त हो इस प्रकार विचरण करते ते ॥१७॥ सन्दमपणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि । प्परे उदम ! जो पुरुप वेदोंका तो पारगामी सिन अमस्तस्स भमफलो मधेनुमिव रक्षतः ॥१८॥ हो, परन्तु परामके पानसे शम्प हो, उसके परिवार को फल महाहै ह तो सा ही जैसे कि गो दुग्क्दोहामसठी च भार्या दूधकी गायका पाटनेनन ॥ १८ ॥ ध म देनेवाली दे पराधीनमसत्प्रजा गाय, म्यभिचारिणी मी, पराधीन छपर, रापुर | सत्पात्रफे प्राप्त होनेपर मी दान म किस ब धन और विच त्वती(रुवमा वा मेरे गुणोंसे रहित वाणी पर्य है। इन वस्तुकों की हीना ममा रक्षति दुःस्वदुःस्सी ॥१९॥ ॥१९॥ इसलिये सब । बिस बर्ष रखवाली करनेवाग दुस-पर-युस ही मोगत हता यस्सा न मे पापनमङ्ग फर्म नगरकी उत्पति, स्थिति और प्रापरूप स्नेकपाक्न छीलाका वर्णन न हो और ममताम खित्युनवप्राणनिराधमस । भी मेरे मेकप्रिय राम काणादि कातारोंका मिसमें पो लीलावतारेप्सितजन्म पा साद गान न हो, इपाणी पन्या है। मुनिमन् पुर चाहिये कि ऐसी वाणीका उच्चारण एवं कलम पम्मा गिरं तो पिमृगाम धीरः ॥२०॥ | करे ॥२०॥ एवं विज्ञासपापोप नानास्वभ्रममात्मनि । प्रिय उदव ! जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया। उपारमत विरज मना मय्पर्य सर्वगे ॥२१॥ म उसे दूर कर दे और मुझ सर्वम्पापी परमान धारमनिवासा पौर विचार के द्वारा आरममें नो बनेका पपनीशो धारयितुं मना प्रमणि निपलम् । | में अपना निर्मळ मन लगा दे तप संसारके म्पबारे उफ्यम हो जाय ॥२१॥ यदि तुम अपना मन पर मपि सर्वाणि फर्माणि निरपक्षः समाचर ॥२२॥ सिर न कर सको तो सारे कर्म निरपेक्ष छकर मेरे कि ती को ॥ २२ ॥ मेरी कपार समक्ष को पनि भवाउमें फंपा भण्वन् सुभद्रा लोकायनी।। करनेवाली एवं कन्याणसरुपिणी ।। माके साप में मनना चाहिये । बार-बार मेरे भतार कर लिया गापमनुस्मरन् फर्म कम पाभिनपन् मुहुः ॥२३॥ | गान, स्मरण और भनिय करना चाशिये ॥ २५ ॥ १ परा। ९ वाम् । मुहाम् । ४ पानीम् ०११] एकादश स्कन्ध ७७९ उपवार मदर्थे धर्मकामानाचरन् मदपाभय । | मेरे बाधित राकर मेरे ही लिये धर्म, काम धौर वर्षका सेवन करना चाहिये। प्रिय ठरव! जो ऐसा करता है, उसे मुफ्त अविनाशी पुरुषके प्रति अनन्य प्रेममयी लभते निपलो भक्ति मय्युप सनातने ॥२४॥ मक्ति प्राप्त हो जाती है ॥२०॥ मलिकी प्रासि सासासे होती है, जिसे भक्ति प्राप्त हो जाती है, या मेरी उपासना करता है, मेरे सानिम्पका अनुभव करता है। इस सत्संगलम्धया भक्त्या मयि मोस उपासिता । प्रकार नव उसका पति करण शुद्ध हो जाता है, तप म संकि उपदेशोंके अनुसार उनके धरा मताये गए मेरे परमपदको बास्तविक सरूपको सानहीमें प्राप्त स पे मे दर्भित सदिरञ्जसा पिन्दते पदम् ॥२५॥ हो बाता है ॥ २५ ॥ सपनीमे पूस-भगवन् ! बड़े को संत आपकी कीर्तिका गान करते हैं। आप हफ्या पप्तमाये कि साघुस्तपोधमश्लोक मतः कीरम्विधः प्रभो । मापके विबारसे संत पुरुपका क्या लक्षण है। वाफ्के प्रति कैसी भक्ति करनी चाहिये, जिसका संतसोग बावर करते हैं । ॥ २६ ॥ मगफन् ! बाप ही नामा भक्तिस्त्वय्युपयुपेत फीटी सदिरास्ता ॥२६॥ वादि श्रेष्ठ देक्सा, सस्पादि लोक और पराचर जगत्के | स्वामी है। में बापका विनीत, प्रेमी और शरणागत ऐत मे पुरूपाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्पभो । मऊ हूँ। आप मुझे मक्ति मौर मक्तका यस्य मतम्माये।२७ | भगवन् ! में बानता कि आप प्रविसे परे पुरुषोत्तम प्रणतामानुरक्ताय प्रपमाम च कप्यताम् ॥२७॥ | एव चिदाकाशस्वरूप प्रक्ष हैं। मापसे मिम कुछ भी नहीं है, फिर मी बापने प्रेम के लिये लेष्टमसे ही यह व प्रम परम व्योम पुरुपः प्रफतेः पर। भग शरीर धारण करके भतार दिया है। इसलिये वास्तापमें पापही भक्ति और भक्तमा यस्य वतन्म सकते मषवीर्णोऽसि भगवन् स्वच्छोपाचपधन्वपुः ॥२८॥ ॥ २८ ॥ भीभगवानुवाच भगवान् धीरुप्यने कहा--प्यारे उखब! मेरा भळ रुपाकी मूर्ति होता है । या किसी भी प्राणीसे रमाव नहीं रस्ता वौर घोर-से-घोर दु स भी प्रसमतापूर्वक कृपालुरफतवोहस्तितिः सर्पदेहिनाम् । सहता है। उसके जीवनका सार है सत्य, और उसके मनमें किसी प्रकारकी पापपासना कभी नहीं पाती। सस्मसारोऽनवपात्मा सम सर्वोपफारफ ॥२९॥ श समदर्य और सबका मटा करमेवाय हाता है ।२९। उसकी पुद्धि कामनाओंसे मलक्ति नहीं होती । वह | संयमी, मधुरस्नमाव धौर पवित्र होता है ।समा परिपसे कामेहतधीर्दान्तो मृदुः शुधिरफिंचनः । सर्पण र यता है। किसी मी वस्तु के लिये कोई १ विभे । २ वपि प्रयुम्पेव । ३ प्राचीन मतिमें मा मोम इस प्रपर है-एनम्मे पुम्मेणाप प्रपणाम पप्पाम् । ४ पा स्पेभ प्राचीन प्रतिमें नहीं है।

७८२ भीमद्भागवत [२०१५ नोपायो विपवे सध्य प्रापर्ण हि ससामाम् ॥४८॥ चाहिये । प्राय इन दोनों के अतिरिक सारस्गरसे कर होनेका भौर कोई उपाय नहीं है, क्योंकि सतपाल | मुसे अपना आश्य मानते हैं और मैं सासर्वदा ठमके अपैतद् परमं गुर्य मुख्यतो यदुनन्दन । पास बना रहता हूँ ॥ १८॥ प्यारे उदय ! या मैं सम्हें एफ अपत गोपनीय परम रहस्यकी पत मामग क्योंकि तुम मेरे प्रिय सेवक, हितैषी, और प्रेमी मुगोप्पमपि षल्मामित्व मे भृस्पा सुरद सस्ता॥४९॥ सस्ता हो, साथ ही सुननेके मी इमुक हो ॥ १९ ॥ इति भीमद्भागवते महापुराणे पारमईयो सहितायामेकादशस्फत् एकादशोऽध्याय ॥ ११॥ " अथ द्वादशोऽध्याय सत्संगकी महिमा मोर कमेच्या कर्मस्यागकी विधि भीभगवानुवाच भगवान भीकृष्ण करते है-प्रिय ठार । नरोधयति मां योगो न सांस्य धर्म एव च । मात्में जितनी भासजियाँ, म सा ना कर देता है। यही कारण है कि मसङ्ग रिस प्रकार मुने न स्वाम्मामस्तपस्स्पागो नेष्टापूर्व न दक्षिणा॥१॥ वशमें कर लेता है वैस साधन न योग है न सल्यान प्रवानिश्छन्दांसि तीर्थानि निपमा यमा । धर्मपालन पोर न स्वाध्याय ! स्पस्या, त्याग, त और दक्षिण्णसे भी मैं वैसा प्रसन्म नहीं होता । कातिक पथावरन्ये सत्सङ्गः सर्वसङ्गापहो हि माम् ॥ २॥k-त, का, केद, तीर्य वीर या नियम भी सामने सत्सङ्गेन हि देतेया यातुधाना मगाः स्वगाः। समान मुझे क्शमें करनेमें समर्प नार॥१२॥ निपाप उपची ! यह एक युगकी नहीं, समी जुर्गोत्री गपर्याप्सरसो नागाः सिदामारणगुणकाः ॥ ३॥ एकसी मात ।। ससके बारा ही दैव्य-राक्षस, पर विद्याधरा मनुम्मेपुपैश्याः भद्राः स्त्रियोऽन्स्पजाः । पक्षी, गन्धर्व-अप्सरा, नाग-सिब, पारण-गक र विधाघरोंको मेरी प्राप्ति है। मनुम क्स, पण रजस्तमप्रकतयस्तस्मिंस्तमिन् युगेऽनष ॥ ४॥ न वाद रमोगुनी-मोगुणी प्रालिके पहयो मत्पदं प्राप्तास्त्वाष्ट्रकायावषादयः । माल से बीर्वोने मेरा परमपद प्राप्त किया है। पपर्वा पतिर्माणो मयमाय विभीषणः ॥ ५॥ सुग्रीव, हनुमान, जाम्पवान्, गन्ध, बटायु, तुला प्रशाद, वर्ण, बलि, माणासुर, मपदानय, विभीषम, सुग्रीवो हनुमानृपो गजो गृधो वणिक्सथा। स, धर्मपाल, कुम्मा, मनकी गोरिया, पापनियों और इसरे मेग मी साके प्रमावसे ही मुझे प्राप्त कर सके म्पापा मम्जा प्रसंगोप्यो यचपस्न्पस्तथापरे॥६॥ ॥ ३-६॥उन मेगोन न तो कमा सापय किस ते नाधीवभुतिगगा नोपासितमहतमाः । प और न विषिर्शक महापुरमोंकी उपसना की थी। इसी प्रकार उहोंने कमचान्नापण मादिगा और कोई अम्रतावप्ततपस: सत्सङ्गान्मामुपागताः ॥ ७॥ तपस्य भी नहीं की थी। सरसके प्रभासे ही १ बना।२ युगे युगे। , ७८३ ०१२] एकादश स्कन्ध केवलेन हि भावेन गोप्योगायो नगा मृगा। वे मुझे प्राप्त हो गये ॥७॥ गोपियों, गायें, यमुन व्यादि पक्ष, मनके हरिन बादि पश, कालिप येऽन्ये मधियो नागाः सिदामामीयुरस्नसा ॥ ८॥ आदि नाग–ये तो साधन-साप्यके सम्बन्धमें सर्वच ही बुद्धि थे। इतने ही नहीं, ऐसे-ऐसे और भी यं न योगेन सांस्पेन दानवततपोऽयरे। पत हो गये हैं, जिन्होंने केवल प्रेमपूर्णमावके द्वारा ही बनायास मेरी प्रासि कर की धौर कवास्प हो गपे व्यास्पास्वाध्यायसन्यासः : प्राप्नुयायमधानपि।९। ॥ ८॥ उदय ! ब-यो प्रफ्नशील साधक योग, सांस्य, दान, त, तपस्या, यम, वतियों की प्यास्या, साप्याय रामेण सार्घ मपुरी प्रणीते धौर संन्यास आदि सापोंके द्वारा मुझे नहीं प्राप्त कर थारुरिकना मय्पनुरकषिचाः । सकते, परन्तु ससक्के दराने में अस्पन्त सुखम हो आता ॥९॥ उस ! निस समय अफरनी भैया विगाढभावेन न मे वियोग | बलरामनीके साप मुसे बसे मयुरा से वाये, उस सम्प गोपियोंका पय गाद प्रेमके कारण मेरे अनुरागके तीसाधयोऽन्य दरशुः सुखाय ॥१०॥ रगमें रंगा हुआ पा । मेरे वियोगफी ती म्याधिसे घे म्पाकुछ हो ही यो वौर मेरे अतिरिक्त कोई भी दूसरी वास्ता धपाः प्रष्ठतमेन नीता वस्तु उन्हें सुस्कारफ नहीं जान पाती पी ॥१०॥ मपैष मन्दावनगोधरेण । तुम जानते थे कि में ही उनका एकमात्र प्रियतम । नव में पन्दाक्नमें पा, क्व ठनोंने बहुस-सी रात्रियों- क्षणार्धपचाः पुनरा तासा ने रासकी रात्रियों मेरे साप पाच क्षणके समान विता दी पी, परन्तु प्यारे उदय 1 मेरे पिना ने ही रात्रियों होना मया कल्पसमा पछुः ॥११॥ | उनके लिये एक एक फम्पके समान हो गयीं ॥ ११ ॥ वैसे यो-या ऋषि-मुनि समाधिमें सित होकर क्या ता नाविदन् मय्पनुपङ्गवद्ध गात बादि बड़ी-बड़ी नदियों समप्रमें मिकर अपने घियः नाम-रूप वो देती है, वैसे ही वे गोपियों परम प्रेमके स्वमारमानमदतघदम् । द्वारा मुममें इतनी तन्मय हो गयी पी कि उन्हें रोक यथा समापी मुनयाऽम्धिवाय परछोफ, शरीर और अपने पहलानेवाले पति-पुपदिकी । भी सुध-बुध नहीं ए गपी पी ॥ १२ ॥ उदप ! उन प्रविष्टा व नामरूप ॥१२॥ गोम्योम पहन-सी का एसी पी जा मरे नास्तविक सरूपको नही जानती थी। वे मुस भगवान् न नानपर मत्कामा रमण जारमस्वरूपविदामठा । पाठ प्रियकम ही सम्पानी पी और जगामारसे मुमसे मिलनेकी आरक्षिा लिया परनी पी। उन साधनहीन प्रस मां परम प्रापुः समान्छससरसा ॥१३॥ सैको, बारों अबल ओने के मङ्गके प्रभामसे ही मुन्न परम्स परमारमा प्राप्त कर दिया ॥ १३ ॥ समाधमुदवात्सुन्य घादनों प्रतिपादनाम् । इसञ्पेि उदा ! तुम श्रुति-स्मृति, विधि-निपेय, प्रवृत्ति नित्ति और मुननेयाम्प तप मनेए निरपश्चमी परियाग प्रपचे प निपूर्व प भावन्म भुतमेव च ॥१४॥ करके सत्र मे ही मारना करते हुए समस्त प्रामियों- नय उमप उबाप | विशुद्ध नामक चक्र वादे और बों मम्मान कर ते॥१७॥ अतिन बाम उमा वरण तष मे म्पकिरिये हि वाणी ॥१८॥ पहले अत्यन्त सूक्ष्म चिनगारीके रूपमें प्रकट होती है और फिर धातुति देनेवर प्रथम सर धारण कर मेती ॥१८॥ इसी प्रकार वोलना, हापोंसे काम करना, विकास करना, मुद्रिसे सम्माना, रायबभिमान ७८४ यामागपत [१०१२ मामेकमेष शरणमात्मान सर्षदेहिनाम् । के आमसरूप मुल एफकी ही शरण सपूर्ण सफ्ले ग्रहण कये, स्पोंकि मेरी शरणमें जानेसे तुम साप याहि सस्मिभाषेन मया स्मा पातोभयः ॥१५|| निर्भप हो जामोगे ॥ १५१५ ॥ स्यक्लीमे कहा-सनकादि योगेसाके में परमेश्वर प्रभो ! यो तो वाफ्का उपदेश एन राम संशयः भृण्वतो पाच सव योगेधरेवर । हैं, परन्तु इससे मेरे मनक्य सम्देह मिट नहीं रहा है। मुझे खधर्मका पालन करना चाहिये या सब कुन मेर थापकी शरण प्राण करनी चाहिये, मेरा मन ही न निवर्तत आत्मसा येन भ्राम्पति मे मनः ॥१६॥ दुविधामें खटक रहा है । पाप क्या करके मुझे ममी- मोति समझाइये ॥ १६॥ मीभगगनुपात भगवान् भीकम्यनेमा प्रिय उदय ! बिस स एप जीपो विवरप्रपतिः परमरम का परोक्षरूपसे वर्णन किया जाता। ये सम्भार पपरोभ-प्रत्यक्ष ही, स्पोकि वेही निशिक रोकने प्राणेन पोपेग गुहां प्रविष्टः। सत्ता स्कर्ति-जीवन-दान करनेवाले, ही पासे मनोमय ममुपेस्य पनाहत नारसहप पा पाणी नामक प्रापके साम रूप मुगघारचक्रमें प्रवेश करते हैं। उसके बाद मषिपूरक मात्रा स्वरो वर्ण इति स्पविष्ठः ॥१७॥ | समरूप धारण करते हैं। तदनन्तर कण्ठदेसमें स्थित पा (मामिस्साम ) में पाकर पश्यन्ती बणीका मनोमय यपानल: सेऽनिलपन्धुरुप्मा रूपमें म्पक होते है। फिर क्रमश मुझे बाहर इस-दीर्घादि मात्रा, उदात्त अनुशात्त आदि सर तप बठेन दारम्पधिमप्यमानः। ककारादि षणरूप स्यूम-~-खरी बापीका रूप प्राम ममः प्रजातो हविपा समिभ्यत विपुलक कासे कम्पकरूपमें स्थित है। सबक काष्ठमबन किया माता है, तब आयुकी सापसेर एवं गदि फर्म गविविसर्गों है, वैसे ही मैं भी शादामनरूपसे प्रमश पश्पती, मध्यमा और पैखरी बाणीके रूपमें प्रकट होता घाणो रसो र सर्भः श्रुतिध । | परोसे कम्ना मन्दिय तपा गुदासे मात्र स्थापना, सूपमा, पसना, देखना, छना, समना, मनसे - संकल्प विज्ञानमभाभिमाना करना, महत्त्तके रूपमें सबका ताना-याना बमना तप मर्य रमसत्त्वतमोविकार ॥१९॥ समस्त कर्ता, कारण वार कर्म मेरी । सरवगुण, रबोगुण बौर तम्गुणक सारे विकार, पाँ- १ १०१२] . अय हि जीपतिपदम्बयोनि- वमिन्पक्रियों हैं॥ १९ ॥ यह सबको नीक्ति करने पाला परमेपर ही इस त्रिगुणम्प प्रमाण-कमनका कारण है। यह वादि-पुरुष पहले एक और क्पक पा। रम्पक एको पयसा स भाप । से उपबाट सेतमें वोया हुवा बीन शाखा-पत्र-पुप्पादि अनेक रुप धारण कर लेता है, वैसे ही कागतिसे पिसिष्टशक्तिहुषेष माति मायाका बाप लेकर शकि-विमानके द्वारा परमेपर ही बनेक समोंमें प्रतीत होने लगा है।॥ २०॥ जैसे पीजानि योनिं प्रतिपय मइन् ॥२०॥ोके ताने-बाने में बस बोतप्रोत पय है, से ही यह सारा विश्व परमात्म्पमै ही मोमोत है। वैसे सतके पमिमिद प्रोतमशेपमोस मिमा पसका अस्तित्व नहीं है, किन्तु सत परके पिमा भी य सफ्ता है, वैसे ही इस जगतके न बनेपर भी पटो यथा तन्तुषितानससः । परमात्मा यता है, किन्तु या बगर परमात्मसरूपी -परमात्माके बिना इसका कोई मस्तित्व मही है य एप ससारवर पुराण: यह संसारवृक्ष अनादि और प्रयारूपसे निस्प है। इसका सरूपी-कर्मकी परम्परा तया इस एसके फर्मात्मक पुष्पफले प्रसूते ॥२१॥ फर मत है-मोक्ष दौर मेग ॥ २१ ॥ इस समार इसके दो बीन है-पास वोर पुण्य । असंख्य वासनाएँ मारे और तीन गुण तने है । पाँच मूत इसकी अस पीजे शवमूलनिनाला मोटी-मोटी प्रधान शाखाएँ और शम्दादि पोष विश्परस हैं, म्याय दिया शसा है सपा जीव वौर पर दो पजस्कन्ध पसरसप्रमति । पक्षी इसमें घोसल्प बनाकर निग्रस करते हैं। इस मधमे वात, पिस और कफलप तीन तहको पाठ है। इसमें दो सबके फल खाते हैं सुख और दसकशास्त्रा दिमुपणनीट १ यिस स स्यातक (स खिपरस्लो दिफलाऽ प्रविष्ट ॥२२॥ सूर्यमण्डका मम कर बानपले मुक पुरुष मित संसार-चक्रमें नहीं पाते)॥ २२॥ जो गृहस्य याद रुपरस आदि विषयों में फंसे हुए है। ये कामनासे मरे मन्ति धैक फलमस्स गधा हुए एनेक कारण गीफ समान १ इस पर दुसरूप फल भोगन्ते २, पोंकि ये जनक प्रकारके प्रामपरा एकमरम्पवासात फकि बन्धनमें से पते है। जो परम्पवासी परम्स विम्यासे विरह है, ने इस वृक्ष एसक सम्पम हैं और वे इस मुखमप फल भोगते । पि उन । सा प एक पहरूपमिन्य- पासबमें में एक ही हूँ। पर मेरा जो अनेमें प्रकारका मुपये कमा मामप। राइस बातको मापामपे पद म पद वदम् ।।२३।। गुरुओं का सम्म स्तापही पखपमें समन वे | वृमियोको मी पन्त कर देना चाहिये। | निस धर्मके पालनसे सस्पगुणकी दिएपी सबसे | धष्ठ है। धर्म रजोगुण और तमोगुणमा मार ७८६ भीमद्भागवत एर्ष गुरूपासनकभास्पा वेदोंका रहस्प जामता है।॥ २३ ॥ त उमर तुम इस प्रकार गुरुदेवकी उपासनारूप बनम्य भलिने पिपाठारेण शिवेन धीरः । पारा कपने शानकी कुमारीको तीस कर मेर उसके पारा धैर्य एवं सावधानीसे जीवमानको र विवश्ष्य बीनाशपमप्रमचः मधे । फिर परमात्मस्वरूप होकर उस प्रतिरुप मो- को भी छोड़ दो और अपने ममम सरूपमें ही सिक सम्पप चारमानमथ स्पवासम् ॥२४॥ हो यो ॥ २१ ॥* इति भीमयागपते महापुराणे परमईस्या संहिसायामेकादशस्काये आदशोऽध्याय ॥ १२ ॥ अथ त्रयोदशोऽध्याय हसरूपसे समकाविको दिये हुए उपदेशका वर्णन भीभगपामुपाच भगवान् श्रीकृष्ण कहते है-प्रिय उस्य ! सर, रन और तम-ये तीनों मुनि (माति ) के गुण सत्व रजन्तम इति गुणा पुढे चारमन । हैं, मात्माके नहीं। सत्त्वके द्वारा रन और तम-व दो गुर्गोपर मवय प्राप्त कर लेनी चाहिये । मनन्त्र सत्वेनान्यतमो इन्पात् सत्वं सत्वेन चैव हि ॥१॥ सत्त्वगुणकी शान्तरिके शग उसकी दया पहि सत्त्वादधर्मोभषद् पदात् पुसा मनकिलक्षण । | सत्गुणकी प्रति होती है, तभी बीको मरे भविरूप मधर्मकी प्राति होती है। निस्तर सारिक वस्तुओं साविकापामया सच तता धर्मः प्रवर्तते सेवन करनसे ही सत्वगुणफी इमि होती है और न ॥२॥ मेरे मफिरूप सधर्ममें प्रवृत्ति होने लगी ॥२॥ धर्मा रजम्तमा हन्मात् सवतिरनुप्तम । कर देता है। ये दोनों नए हो जाते आशु नस्पति सन्मूला अधर्म उभय इत ॥ ३॥ उनीक कारण होन्याय अधम भी सीन हो किन मन ॥ ३ ॥ पास, म, प्रयजन, देश, समय, आगमाऽपाप्रबादसा: काल मचजन्मघ । जग्म, प्यान, मत्र वोर संस्कार-ये दस पस्तर पर • र भनी मापाठ ग अपवलपमे प्रतीत हो पाते। इस पर भम्पा अरप ही मंगने भार भारिप्यस माम भरि भान्ति ही माम मर मिनारम भरिमर भन्न रणर्म पनि म परम भाप गुनमा १HARE TT मिने: AMAR यो भारमा परम पनि भम । नजान रो बनेर न म । समसामनिमारे। ता ७८७ अ० १३] एकादश स्कन्ध म्यानं मन्योऽध संस्कारो दौते गुणहेतवः ॥ ४॥ सात्तिक हों तो सत्वगुणकी, गनसिक हों तो रजोगुणकी और वामसिक हों तो तमोगुणकी वृद्धि करती हैं॥१॥ इनमेंसे शासक महारमा जिनकी प्रशसा करते हैं वे सारिक वचत् साविकमवैषो यद् यद् सदा प्रचक्षते । हैं, जिनकी निन्दा करते हैं, तामसिक हैं और जिनकी उपेक्षा करते हैं, वे पस्तुएँ राजसिक १॥५॥ मम्- निन्दन्ति तामस वच राजर्स सदुपेक्षितम् ॥ ५॥ | तक अपने वारम्पका साक्षात्कार तथा स्थूल-सूक्ष्म शरीर और उनके कारण तीनों गुणोफी निति म हो, तप्तक मनुम्पको चाहिये कि सत्वगुणकी सात्त्विकान्पेष सेवत पुमान् सत्त्वषिष्ये । पदिके लिये सात्तिक शास वादिका ही सेक्न करे, क्योंकि उससे धर्मकी वृद्धि होती है और भमकी वतो धर्मस्ततो मान यावत् स्मृतिरपोईनम् ।। ६ ।। प्रिसे अन्त करण शुद्ध होकर आत्मतत्तका हान होता है॥६॥ बाँसौकी गासे बाग पैदा होती है और का उनके सारे यनको जमकर शान्त हो जाती है। पैसे येणुसंघर्पजो पहिग्या शाम्पति तदनम् । ही या शरीर गुर्गोके पेपम्पसे उत्पम हुया है। विचारधारा मन्पन करनेपर इससे अनामि प्रममित होती है और समस्त शरीरों एवं गुणोंको भस्म एवं गुणव्यस्पयो देह शाम्पति सक्रियः ॥७॥ करके सय भी शान्त हो जाती है॥७॥ म्यषजीम पू-भगवन् । प्राप सभी मनुष्य विदन्ति माः प्रायेण विषपान् पदमापदाम् । इस बातको बामते हैं कि लिपप विपत्तिमोके घर है, फिर भी वे कुचे, गधे वीर मकरेके समान दुस सान करके भी उनीको ही मोगते यते है । इसका क्पा तथापि सजवे कृष्ण धत् फर्थ मस्तराम्पत् ॥ ८॥ ॥ ८॥ मीमगधनुष भगवान् भीकम्णने कहा-पिप सप । नीय जब मामवश वपने सहपको मूसकर वयसे सम्म अहमिस्पन्पधादिः प्रमथस्स पभा हदि । स्यूयदि शरीमि माधुदि कर बैठता है-चो कि सर्पपा भ्रम ही सब ठसका सस्पप्रधान मन घार उस्सपति रजो पोरं ततो पैकारिक मनः ॥९॥ | रबागुणकी मोर मुफ जाता है, उससे प्याप्त हो जाता है॥९॥ बस, वहाँ मनमें रजोगुणकी प्रधानताई कि उसमें संकल्प विकल्पोका तोता बघ मासा है। रजायुक्तस्य मनमः संकल्पः मविफल्पफ । बब बह विषयोंका तिन करने लगता है और अपनी तसा मामा गुणम्पानाइ दुस्सहः स्पाद्धि दुर्मतः।।१०॥ छुटकारा होना बहुत ही कठिन है ॥ १० ॥ दुबुद्रिक कारण कामके फैदमें फंस बाता , जिससे फराति कामशग फर्माण्यविजितन्द्रिय । अब या पानी कामबन भनेकों प्रकार कर्म करने स्माता और इन्द्रियों के वश होकर यह जानकर भी | कि इन कमात्र मन्तिम फस दु सही है, उन्हींको दुःखादकाणि सम्मश्यन् रावगषिमोहित ॥१॥ करता है, उस समय कब रमागुणके तीन घेगसे पन्त १ पनी । उयब उपर कारण - ७८८ श्रीमद्भागवत रजस्तमोम्मा यदपि विद्वान् विक्षिप्तधी पुनः। | मोहित राता है॥११॥ यथापि विवेकी पुरका विव भी कमी-कमी रजोगुण और तमोगुणके वेगसे विधि अतन्द्रितो मना युञ्जन् दोपष्टिर्न सअसे ॥१२॥ (, इसलिये व बसी साक्वामीसे अपने चित्तको एकल होता है, तपासि उसकी विषयों में दोपति बनी व करनेकी चेय करता राता है, जिससे उसकी लिवी अप्रमचाऽनुपुचीत मनो मय्यर्पयञ्चनैः। भासकि नहीं होती ॥ १२॥ साधकको चाहिये । वासन और प्राणपयुफ्र विजय प्राप्त कर अपनी पति जनिविष्णो मेथाका जितपासो निसासनः ॥१३॥ अपना मन मावे बौर इस प्रकार बम्पास करते समय पौर समय के अनुसार पसी सावधानीसे भीरे-धीरे मासे अपनी असफलता देखकर तनिक मी ठणे नाही, पति एतापान योग आदिटो मच्छिप्पैःसनकादिभिः । पौर भी सासाइसे ठसीमें बाय ॥ १३ ॥ भित्र उदय ! मेरे शिष्य सनकादि परमपिने मेगा बड़ी खरूप बताया कि साधक अपने मनको सार- सर्वतो मन आकृप्य मय्यदाऽवेश्यते यथा ॥१४॥ से खींचकर विराट् आदिमें महाँ, साभार मा । पूर्णरूपसे भगा दें ॥ ११ ॥ ग्यक्तीने करा-श्रीकण ! कापने जिस समय पदा त्वं सनकादिम्पो येन रूपेण फेशप । मिस सफ्से, समकादि परमर्षियोंको योगा बक योगमादिष्टवानेत रूपमिच्छामि वेदितुम् ॥१५॥ दिया था, उस रूपको में जानना चाहता है ॥ १५.३ भीभगवानुसार भगवान् मोहम्णने या प्रिय उदन | समकार पुत्रा हिरण्यगर्मस्म मानसाः सनकादयः । परमर्षि प्रमाणीके मानस पुत्र।। उनोंने एक पप्रच्छा पितर यामा पागस्पैदान्तिकी गतिम् ।१६। इस प्रकार प्रश्न किया पा ॥ १५ ॥ अपने पितासे योगकी सूक्ष्म अन्तिम सीमाके समय सनदय व समयदि परमर्पियोंने पम-पिताजी ! गुणों मर्पस् विपमि घुसा ही या है और गुण चित्तकी एक-एक निमें प्रविष यते । वर्षात गुणप्वाविशत घेतो गुणाभवसि च प्रभो । चित्त और गुण वापसमें मिले-जुले ही यते हैं । ऐसी स्थिति में जो पुरुष इस संसारसागरसे पार होकर मुधि- कथमन्पान्पसस्पागो समधारवितिवीर्पोः ॥१७॥ पद प्राप्त करना चाहता है, इन दोनोंको एक दूसरेसे वळण कैसे कर सकता है। ॥१०॥ श्रीभगवानुपाच भगवान् श्रीप्यमहत-प्रिय उदय । पारि पवाजी सब दबतायोंके शिरोमगि, सपा और एष पृय महादव वर्षभूभूतभावनः । प्राशियोक जन्मदाता है । फिर भी सनकादि परम्परा ध्यायमानः प्रश्नगार्ज नाम्पपया फमधीः ॥१८ रन HD , पोंकि उनकी मुदि वर्म- इस प्रफम स्पनर पान करक भी ये इस प्रस्ता भी १ पपापम । १ निरिण।

अ०१३]
एकादश स्फन्म
स मामचिन्तपद् देव प्रभपारतितीर्पया । प्रवण पी ॥ १८॥ उदय ! उस सम्प ब्रह्माजीने इस
प्रश्नका उचर देनेके लिये मणिमावसे मेरा चिन्तन
तस्पाई सरूपेण सफाशमगर्म तदा ॥१९॥ | किपा । तव में इसका रूप धारण करके उनके सामने
प्रका पुमा ॥ १९ ॥ मुझे देखकर सनकादि प्रमाबी-
रप्ट्वा मांस उपग्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम् । को थागे करके मेरे पास भाये और उन्होंने मेरे
चरणोंकी बन्दना करके मुझसे पूछा कि 'आप फोन
प्रमागमग्रतः कृत्वा पप्रच्छु। को भवानिति ॥२०॥॥२०॥ प्रिय उश्व ! सनकादि परमार्पतषके
जिल्हास थे, इसरिये उनके कानेपर उस समय मैंने नो
इस्पा मुनिभि पृष्टस्तत्वजिज्ञासुभिस्तदा । कुछ कहा हम मुघसे मुमो-॥ २१ ॥ 'बामणो !
यदि परमार्परूप मस्तु नानात्वसे सर्वपा रहित है, तम
पदवीचमई तेम्पस्तदुक्ष निबोध मे ॥२१॥ | यासके सम्बन्ध बाप रे!का ऐसा प्रश्न कैसे युक्ति
संगत हो सकता है। अपना में यदि उस देनेके
रिये बोई भी तो किस माति, गुण, क्रिया और सम्बन्ध
बस्सुनो यपनानात्वमात्मनः प्रश्न ईशषः।
पादिका वाश्य लेकर उत्तर हूँ। ॥ २२ ॥ देवता,
कर्ष घटेत मो विप्रा पर्वा मे क आमया ॥२२॥ मनुष्प, पशु, पक्षी, बादि समी शरीर पनमूतात्मक
होनेके कारण थमिान ही है और परमार्थरूपसे भी
पञ्चास्मकेप भूसेप समानेषु च पस्तुतः ।
अमिन है। ऐसी स्थितिमें भाप कौन है, वाप स्मेका
या प्रश्न | केक वाणीका म्यवहार है । विचारपूर्वक
को भवानितिमः प्रभो पाचारम्भो धनः॥२३॥ महा है, क्त निरर्पक है ॥ २३ ॥ मनसे, पामीसे,
रिसे तपा वय इन्द्रियोंसे मी बो कुछ प्रहण किया
मनसा पयसा प्ठ्या गृपयेऽन्पैरसीन्द्रियैः। | जाता है, सब में ही मुमसे मिम धौर कुछ
महा है। सिवान्स बाप मेग तत्वविचाराग
आमेष न मनोऽन्पदिति पुम्पयमञ्जसा ॥२४॥ मरते-करते वियाफार हो जाता है और विषय वित्तमें
समय सीनिये ॥२१॥ पुत्रो ! या पित्त चिन्तन
प्रविष्ट हो जाते हैं, यह यात सत्य, तथापि विनय
गुणेप्पाविशते तो गुणापतसि च प्रजाः । और पिच ये दोनों ही मेरे सहपभूत नीबफे
देह-उपाधि हैं। पद बास्माका पित धौर
बीपस देह उभयं गुणाश्तो मदात्मनः ॥२५॥ | विपके साप को सम्बन्ध ही नहीं है ॥२५॥
इसलिये बार-बार विस्पोंका सेक्स करते रहनेसे गो चित
गुणेषु पाविशचित्तमभीक्ष्णं गुणसषया । विसर्पोम वासक हो गणवीर लिपप भी पित्त्में
प्रविर हो गये है, इम दोनों को अपने वास्तविकसे
गुणाम विचप्रभा मम्प उभयं त्पमत् ॥२६॥ अमिम मुम परमामाका साक्षात्कार करके त्याग देमा
चाहिये ॥ २६ ॥ बाप्रत, स्वप्न और मुपसि-ये तीनों
चमत् स्वप्ना सुपुप्तं च गुणता पुदिश्य ।
अबस्याएँ सत्यादि गुर्गों के मनुसार होती हैं और मुद्रिकी
ठिया है, सचिदानन्दका समाप महा। इन हचियों
का साक्षी होनेके कारण जीव उनसे विष्क्षण है। यह
तासां विलक्षणाजीव सावित्वेन विनिमिवः।।२७॥ | सिम्त शुति, युति और अनुभूविसे युक्त है ॥ २७ ॥

| वीर उनके कारणभूत कर्म-ये सब के सब इस मामले दीसनेप्रले सम्पूर्ण क्षणमार पदापोको बनुमा पार और सप्नापसा वयमें ही नामदमें देर शादी ७९० श्रीमहागवत यहि संसृतिबन्धोऽयमात्मना गुणवसिदः । क्योंकि युधि-तियों के द्वाय दोनेवाय एम वारमा त्रिगुणमयी वृतियों का दान करता है। मनि सीनों मस्सायोंसे विक्षण और उनमें वनगत, मयि तुर्मे स्थितो बमात् त्यागस्तद् गुणवेतसाम्।।२८॥ Fरीय ततमें स्थित होकर इस मुद्रिके मका | परिस्पाग कर दे । तन विषय वीर वि दोनोगाम यहकारफत पन्धमात्मनोऽर्थ विपर्ययम् । स्याग हो बासा है॥ २८ ॥ पा धन कारी ही रचना है और यही अस्माके परिपूर्णतम सम विद्वान् निर्विध संसारचिन्ता तु स्थितस्स्पजेत्।२९। बाको नानकर रिक्त हो नाय । और काले कि पखण्मान घोर परमन्दसरूपको मिपा देय है। स वनस्सा वनुगत तरीपसरूपमें रोकर संसारी मापमानार्थधीः पुसो न निवर्तेत युक्तिभिः । चिन्ताको छोर वे ॥ २९ ॥ बसक पुस्की मिन-भिन्न पदामि सम्पयनुवि, बामुनि, योर मममुखि मुखियों प्राय नित्त नहीं हो जाती, तबतक वह कानी यसरी जागर्मपि स्वपमशः स्वप्ने मागरण यथा ॥३०॥ बागता है सपि सोता हुआ-सा गता है जैसे सप्नावस्वामें मान पाता है कि मै भाग व असावादास्मनोऽन्येपो भावानां सकता भिदा । हैं ॥ ३० ॥ कारमासे अन्य देर बाहि प्रतीयमाम माम- रूपात्मक प्रपञ्चका कुछ भी पस्तित नहीं है। इसकिने उनके कारण होनेवाले वर्णमारिभेद, सारिक मतमो हेतपयास्स मृपा खप्नथ्यो यथा ॥३१॥ ये से ही मिया है, जैसे सन्दर्ज पुमो 50 देखे हुए सबके सब पदार्थ ।। २१॥ यो बागरे पहिरनुक्षणधर्मिणोऽर्थात् नो नामत् क्लामें समस्त नियोंकि जरा ग्रा यो समस्करणईदि सत्सप्पान् सम्पन ही वासनाम्य विस्यका नुमन कसा है और मासि-पासामें उन सब पियों को समेटकर उनके स्वप्ने सुपुप्त उपसंहरते स एफ: पको मी वनुमव करता है, एक ही है। मामत अस्माके इन्द्रिय, सप्नावसाके मम और प्रतिभी संस्कारबती मुविका मी ही सामी है। स्पेकिन स्मृत्पन्वयात्रिगुणात्तिगिन्द्रियेषा॥३२॥ त्रिगुणमयी तीनों मायोका साक्षी है। किस मैने स्वप्न देस्य, बो में सोप्या, पी में जाग या बस एवं विमृश्य गुणतो मनसस्स्यपस्था स्मृतिके सम्पर एक ही बारमाका समज अस्थम | होना सिद हो माता ॥ ३२ ॥ ऐसा विवास्कर मा | की ये तीनों स्वस्थाएँ गुणोंक द्वारा मेरी माणसे मेरे म मायया मपि कता इति निश्चितार्थाः। शतरूप नीबमें कीमत की गयी है और वास्मा में १ योनि। खप्नपुट ।। किंस्य | ४ साम् । ५ भिवाप। .

१३] एकादश स्कन्ध ७९१ संछिप हार्वमनुमानसदुक्तितीक्ष्ण नितान्त असत्य है, एसा निमय करके तुमलोग मनुमान, सत्पुरुयारा किये गये । उपनिषदोंके प्राण मौर तीक्ष्म शान वाफे एग सकन संशयोंके माधार बहकाला छेदन करके इयमें स्थित मुम परमात्मामा घानासिना भजत माखिलसंशयाविम्॥३३॥ | मनन करो ॥ ३३ ॥ ठि पिप्रममिदं मनसो षिलार्स या भगत् मनका विव्यस है, दीहनेपर मी नए प्राय है, बलातधक (कारियों की बनेटी) के समान रष्ट विनष्टमतिलोलमलासपक्रम् । बापत पल है धौर भ्रममात्र है-ऐसा समझे। प्राता धीर शेयके मेदसे रहित एक मानवरूप बारम विज्ञानमेमारुचेय विभाति माया ही बनेक-सा प्रतीत हो रहा है। यह स्थूळ सीर इन्द्रिय और त करणरूप तीन प्रकारका विकल्प म्वप्ननिधा गुणविसर्गकतो विकल्पः ॥३४॥ गुमोके परिणामकी रचना है और सप्न के समान माया- का सेस है, वहानसे कस्पिती॥ ११॥ इसध्येि हिं सता प्रतिनिवर्स निक्षिण- उस वादिरूप पश्यसे राशि हटाकर तृण्मारहित इन्द्रियों के म्यापारसे बीन और निरीह होकर मानन्द के बनुभयो स्तूष्णीं भवेमिसुखानुभवो निरीहः । मान हो चाय । पपपि कभी-कभी बाहर वादिके संरस्यवेक च यदीदमवस्तुमुद्धा समय मा शातिक प्रपत्र देख्नमें बाता, तपापि यह पहले ही बारम्बस्तुसे अतिरिक्त और मिथ्या त्पर्क प्रमाप न भषे स्मृतिरानिपासात्।।३५।। समसकर छोड़ा जा चुका है । इसस्टिये का पुन भान्तिममफ मोह उत्पन्न करने में समर्थ नहीं हो सकता। देई धनधरमपसितमस्थित पा दोपातपर्पन्त केरम सस्कारमात्र उसकी प्रतीत होती ॥३५॥ जैसे मदिरा पीकर ठम्मत पुरुष या सिदो न पश्यति यतोऽभ्यगमन् म्वरूपम् । नहीं देखता कि मेरे द्वारा पहना मा पम शरीरपर है दैवादपेसमुख देचषमापन या गिर गया से ही सिर पुरम त्रिस शरीरसे उसने अपने स्पवयका साक्षात्कार किया प्रारम्धबा यासो यथा परिका मदिरामदापः ॥३६॥ या देय है या दैवषश कही गया या भाया है- | मघर धरीरसमापीइन बातोपर पशि नहीं गस्ता ॥३६॥ दहोऽपि देवगः पल धर्म यावत् प्राण और इन्द्रियों के साप या शरीर मी प्रारम्पक वर्णन है। इसलिये अपने भारम्भक (बमानेमसे) स्वारम्भक प्रतिसमीक्षत एव सासुः । कर्म रहता है, तबतक उनकी प्रतीक्षा करतो गता है। परत वास्मवस्तुका साक्षात्कार करने म सप्रपत्रमषितसमाधियाग तप समाधिपर्पत योगमे बाहर पुम्प, मी, पुत्र, पन बादि प्रपत्रके समित उस शरीरको फिर कमी स्वीकार म्वाप्नं पुनन भजन प्रतिरवस्तुः॥३७॥ ! मही करवा, बपना नहीं मानता, जैसे जगा था मित्मे ।२ मम्।

७९२ श्रीमद्भागवत मयैतदुक्तंषो विप्रा गुमेपत् सांस्पयोगयो । पुरुष सप्नापस्य के शरीर बादिको ॥३७॥ सभी भूमियो ! मैंने तुमसे जो कुछ कहा , मानीत मागतं यनं पुप्पदमविक्षया ॥३८॥ धौर योग दोनोंका गोपनीय यस्य ।। म सप काम है, तुमलोगों को तमसानका उपदेश करने । यहाँ थापा , ऐसा समझो ॥ ३८॥ विप्रो ! । आयोगस्य सांस्पस्य सत्पस्पर्वस्प तेजसः । योग, सांख्य, सल्य, ऋत ( मधुरमाफ्म ), नई कीर्ति और दम (इन्द्रियनिग्रा) इन सकी पर परामं निजभेष्ठाः भियः कीर्तेर्दमस्य च ॥३९॥ रात है और किसीकी अपेक्षा नयाँ स्वता । वि. गति–परम अधिष्ठान है ॥ ३९ ॥ में समस्त गुणी साम्प, षसाग धादि सभी गुण मेरा ही सेवन करते है मां भवन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपक्षकम् । मुझमे हो प्रतिष्ठित है, क्योंकि में सका रिती प्रियतम बौर मात्मा । स्व प्रमे, जे उमें गुन सादं प्रियमात्मान साम्पासादयोऽगुणाः ॥४०॥ काना मी ठीक नहीं है, क्योंकि वे सत्वरि गुणी परिणाम नहीं है और निस्प है॥१०॥ इति मे छिमसन्देहा मुनयः सनकादयः । प्रिप उदा ! इस प्रकार मैंने सनकारि मुनिकी सभापयिस्वा परया भक्त्यागपत संस्तषैः ॥४१॥ संशय मिटय दिये। उन्होंने परम मजिसे मेरी माय धौर स्तुतियोंशारा मेसी महिम्पका गान किया। ११॥ वैरह पूजित सम्प संस्तुतः परमपिभिः । जब उम परमपियोंने भीमाँति मेरी एक बोर खति प्रेस्येयाप खर्फ धाम पश्पस परमेष्ठिनः ॥४२॥ कर सी, तब में प्रमाबीके सामने ही वास्प होकर अपने धाममें छोट माया ॥ १२ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारम्हस्पा संहितायमेकारशस्पत्य प्रयोदशोऽध्याय ॥ १३ ॥ उच उपाप अय चतुर्दशोऽध्याय भक्तियोगकी महिमा तथा म्याम पिधिन पर्णन उखवजीम पूण-भीम । बसपदी महान भारमकन्यागके बनेको साधन बताते हैं। उनमें बन पदन्ति रुपण भेगासि यहनि प्रमवादिनः । अपनी रएिक अनुसार समी भेष्ठ है मप किसी एका तपा विकल्पप्राधान्यमुताहा एफमुस्पता ॥ १ ॥ प्रधानता है ! ॥१॥ मेरे सामने ! मापने तो बनी-मः भवनोदाहतःस्वामिन् भक्तिपागाऽनपक्षितः । महियोगको ही निरक्षेप एष सत्य साधन बता निरस्प सर्वतः सईयन स्वय्पाविशेन्मनः ॥२॥ | बापमें ही समय हो जाता है ॥ २ ॥ है क्योंकि इसीसे सब भासे वासभि मेजकर 4 १पसीवाय।

, अ०१४] एकादष्ठ स्कन्ध ७१३ भीभगवानुभाष भगवान् भीठप्प करा -प्रिय उम । याद पाणी समपके फरसे प्रलपके पसरपर सुप्त हो गयी कासन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंबिवा । थी; फिर जब सुटिका समय बाया, तब मैंने अपने सहम्पसे ही इसे प्रमाको उपदेश किया, इसमें मेरे मपाको प्रक्षणेप्रोका धर्मो यस्यां सदात्मकः॥ ३३॥ | मागवतधर्मका ही पणन है ॥३॥ माने आपने य्येष्ठ वेन प्रोक्ता च पुत्राय मनष पूर्वजाय सा। पुन स्वायम्मुप मनुको उपदेश किया और उनसे मुगु, पक्षिय, मीधि, पुण्य, भत्रि, पुलस्त्य और कल-न उतो मुम्पादयोऽगृहन् सप्त श्रममहर्षयः ॥ ४ ॥ सात प्रजापति मार्षिोंने प्राण किया ॥ ४ ॥ तदमन्तर इन सपियोंकी सन्तान देवता, दानक, गुपक, मनुष्य, वेम्पा पिलम्पस्तमपुत्रा देवदानषगुपका । सिय, गधर्ष, विचाधर, चारण, किन्देव, शिमर, मनुयाः सिद्धगन्धयोः सपियाधरचारणाः ॥५॥ल, अस और किम्युटर आदिनेइसे अपने खनाली नामपिसे प्राप्त किया । सभी नानियों और पछियोंके किंदेवा किनरा नागा रखाफिम्पुरुपादयः । स्वभाष-उनकी बसनाएँ सत्व, रज और तमोगुणके कारण मिम मिन है, इसछिये उनमें और उनकी बुद्धि पापस्तेपी प्रकृत्तपो रख सत्यवमोचषः ॥ ६॥रियोंमें भी अनेफों भेद है । इसलिये वे सभी अपनी-अपनी प्रातिके अनुसार उस वेदवाणीका मिम माभिर्मवानि भियन्ते भूतानां मवयस्तथा । मिल भर्प ग्रहण करते है। पावाणी ही ऐसी अस्मैक्षिक है कि उससे मिन बप निकलना स्वाभाविक ही सभाप्रकृति सर्वेषां चिना वाच स्रपति हि ॥ ८ ॥ ६॥ ५-७ । इसी प्रकार स्वायद तपा परम्परागत उपदेशक मेइसे मनुर्योकी पुरिमें मिमय बनाती है एष प्रकृतिचिमा भियन्तै मतयो नृणाम् । | वीर कुछ मोग तो बिना किसी विचारक वेदविस्य पारम्पग फेयाचित् पालणामतयोऽपर ॥ ८॥ पाहणमतावलम्बी ए बात ॥ ८ ॥ प्रिय ठरण 1 सभीकी युदि मेरी मापसे मोशित हो रही है इसीसे मन्मायामोशिवधिय पुरुषाः पुरुपर्पम । वे अपने-अपने कम-संस्कार और अपनी-अपनी पिके अनुसार बारमकन्पापक साधन भी एक नी बनेको श्रेया पदन्त्पनेकान्त पथार्म यधारुपि ॥९॥ यतराते हैं ॥९॥ पूर्वमीमांसक धर्मको, साहित्याचार्य पशको, कामशासी कामलो, पांगवेज सप और कम- धर्ममक पञ्चपान्ये काम सत्य दर्म इमम् । दमाशिफो, दणनीतिकार एमर्पको, स्यागी स्यागको और कम्पतिक भोगको ही मनुष्प-चीवनका स्थाई परम भन्म वदन्ति स्वार्थपाएमर्म स्यागमाजनम् ॥१०॥ मम मतम ॥१०॥ कम्पोगी रोग यातप, दान, त तपा यम-नियम बादिको पुरुषार्थ तस्मते रुपियवतपादानम्रतानि नियमान् यमान् । है। परन्तु ये सभी कर्म द इनके फम्सहप ना छोग १ खामि । २। • श्रम मोर सेरादि गुर्गमसे रविव नाप निविसम मे रेक्या है पा मनुप्प' ऐब मनोहारीयकर निवासी मनुप। मितव्य शरीरको मातिसे कुरु-कुछ मनुष्पा समान प्राणी । कुछ पुम्पा ममान प्रवीत रामेमा नपरि । - - भा | उसके लिये वाकाशमा एक-एक कोना बनम्दसे । है, वह मुझे हमेशकर न तोक्साका पर पारा। न देशाब इन्द्रका, उसके मनमें मसला बमनेकी इभ्य होती और न मासे मी किसीकी अपेक्षा नही, जो याद पिचनसे सा ७९४ भीमसागवत आयन्तपन्त एवैपां लोग्नः कर्मविनिर्मिताः । मिझते है, वे उत्पति और नाशपाले । । को समाप्त हो मानेपर उनसे दुश्नही मिरत । सप मे, तो उनकी अन्तिम गति और भान है। उनसे वो मुख मिलता है। दुःस्वोदकस्तिमोनिष्ठा मुद्रानन्दाः धार्पिता ॥११॥ है और वे मोक भोगके समय मी बस्या बदिये कारण शोकसे परिपूर्ण ।। (सम्मेि इन । साधनोंक फेरमें न परमा पारिसे) ॥११॥ मय्पर्पितास्मनः सम्म निरपेक्षस सर्वतः । प्रिय उदय ! वो सब बोर मिरपेको हो गया है, किसी मी कर्म या फरमादिकी मान मपाऽऽस्मना सुखं पचत्त साव विषयात्मनाम्१२ नहीं रखता और अपने क्तकरणको सब मुझे ही समर्पित कर चुका है, परमानन्दसरमर पामाके रूपमें स्फुरित होने व्गता है। इससे या अकिंचनस्स दान्तस्स शोन्सस्स समचेतसः। मुखका अनुभव करवा लियास प्रालि किसी प्रकार मिल नहीं सकता ॥ १२ ॥ मया संतुष्टमनसः सर्वाः सुखमया दिशः ॥१३॥ प्रकारके संग्रह-परिमासे गीत-पाकिस्म है। वपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करके शान्त वौर सम्म न पारमेष्ठप न महेन्द्रधिमे हो गया है, जो मेरी प्रासिसे ही मेरे सानिध्यापक करके ही सदा-सदा पूर्ण सन्तोषका अनुमान करता न सार्वभौम न रसाधिपत्यम् । हुवा ॥ १३ ॥ जिसने अपनेको मुहे सौप र न योगसिदीरपुनर्मवं मय्पपिंवारमेन्छति मद् विनान्यत् ॥१४॥ रसावकारी मामी होना चाहता है। मेगा बीसी सिदियों और मोती अभियान न तपा में प्रिपतम आरमयोनिने शंकर । करता ॥ १५ ॥ उदय ! मुझे तुम्हारे-से प्री में मितने प्रियतम 1, उप्तने प्रिय मेरे पुत्र या शहर, सगे भाई यमामजी, स्प बांगिनी नघ संरूपमा न भोर्नवारमा च पथा भवान् ॥१५॥ और मेरा अपना काम्य भी नहीं है ॥ १५॥ hि निरपर्ध मुनि शान्त निर्वर समदर्शनम् । उपरत होकर मेरे ही मनन मिानमें तीन बात भोर यग-प न रस्पर सब प्रति सम्पन की , उस महारम्पक पी-पीछे म निरन्तर ५ मा अनुयजाम्पा नित्य पूययस्यपिरेणुमि ॥१६॥ / पुन्य करता है उसके परी भूत उगम १ एरिव र परस । । समधिनम् । मा ७९५ एकादश स्कन्ध -१४] निष्क्रियना मय्पनुरक्तपेस उपर पर नाय वौर में पवित्र हो जाऊँ॥ १६॥ नो सब प्रकारके सपा-परिपासे रहित है यहाँतक कि शरीर मादिमें भी आईता-मम्ता नहीं रखते, बिनका भान्सामहान्तोऽसिलवीयपत्सला।। वित मेरे ही प्रेमके रगमें रंग गया है, जो संसारकी वासनायोंसे शान्त–उपरत हो चुके हैं और वो अपनी माता उदारताके कारण समावसे ही समस्त कामैरनालम्पधियो उपन्ति यत् प्राणियों के प्रति दय और प्रेमका माप रखते हैं, किसी प्रकारफी कामना दिनकी युरिका स्पर्श नहीं कर पाती, तन्नरपेक्ष्य न विदुः सुसं मम ॥१०॥ उन्हें मेरे जिस परमानन्दस्वरूपका अनुमय होता है, उसे और कोई नहीं जान सकता, क्योंकि वह परमानन्द तो केसम निरपेक्षतासे ही प्राप्त होता है ॥ १७॥ बापमानोऽपि मरतो विपरबिवेन्द्रियः । उबजी ! मेरा जो मक ममी प्रिन्त्रिप नहीं हो सकारी और स्मारके विस्य वार-बार उसे सपा पचासे प्रायः प्रारभया भक्स्पा विपर्यनामिम्यते ॥१८॥ खते-अपनी भोर च लिया करते हैं, पर मी स्थापित सुसमृदार्षिः परोस्पांसि भमसात् । क्षण-क्षणमे ममेपली मेरी प्रात्म भक्ति के प्रमायसे प्राय सियों से परामिवम्बी होता॥१४॥ ग्वष ! जैसेघधक्ती तपा महिपया भकिनासि शस्त्रयः ॥१९॥ई बाग मकरियों के बड़े टरको मी बहकर सक कर देती से ही मेरी मछि भी समस्त पाप-राशिको न साधपति मो योगो न सांस्मधर्म उदव । स्या मध्म सस्ती ॥ १९ ॥ उप ! योग- सपम, धन-शिान, धर्मानुष्ान, चप-पाठ और तपस्याग नवम्पामस्वपस्स्पागो यथा भक्तिर्ममोचिंता ॥२०॥ मुझे प्राप्त करानेमें उतने समर्थ महाँ है, निम्नी दिनों- दिन मानेप्री बनम्य प्रेममपी मरी मति ॥ २०॥ भक्त्यारमेकमा प्रामाभयाजमा प्रिया सताम् । म मतोंका प्रिपतम धाम में पनप भया और धनम्प मकिसे ही परम आता है। मुझे प्राप्त करनेका “किर पुनाति ममिठा मकानपि सम्भषात् ॥२१॥ यह एक ही उपाय है। मेरी ममम मछि ठन स्योको मी पवित्र मातिामसे मुज कर देती है यो स्म ही ॥२१॥इसके विपरीत को मेरी मिः सत्पदयापेठो विषा वा तपसान्यिता । मजिसे वश्रित है, उनके विषको सप और दयासे युद्ध पर्म और तपस्यासे युक्त लिपा भी पटीनॊति पवित्र मित्यापवमात्मान न सम्पर प्रपुनावि हि॥२२॥ फरने में असमर्थ ।। २२ । चबतकसारा शरीर पुलकित महा हो माता, रित पिभाकर गदगद माह हो चाप, क लिना रोमहर्षे द्रषता घेवसा विना । मामदके वासू असे माने नहीं खाते तपा मन्त- ग और बदिया मलिकी बाइमें चित बने उतराम विनाऽऽनन्दानुष्ठया शुम्मेवभक्त्पाविनाऽऽक्षयः नहीं पाता, तबतक इसके दुख होनेकी कोई सम्माना १ पौ ।९ पोम ।

" | जैसे सण अपवा मनोरका राम्य । सम्मेि मेरे | चिन्तनसे तुम अपना पिच पर कर ममेर से पूर्व | मेकर, पवित्र एकान्त स्थानमें बैठकर ही सामीसे मेय ही चिन्तन करे ।। २९ ॥ प्यारे उखरा विक यापिस्सन्यथा पुसा यथा तत्समिसनतः ॥३०॥ जैसे देशभर बन्धनमें पाना पावसाची | च्या करके या क्तवाये कि मुमुक्ष पुषमापस मिल ७९६ भीमनगरव वाग् गद्गदा द्रवते यस्स चित्त नहीं है ॥ २३ ॥ गिसकी वाणी प्रेमसे गदगद होती है, वित्त पिकाकर एक बोर बहता रहता है, एक रुदस्पभीणं हसति कषिच । म्येि मी रोनेका ताँता नहीं टूटता, परन्तु बो की से पिलख उद्गापति नृत्पते प शिसिफर सिने भी लगता है, कहाँ मन कोमा मनधियुक्तो भवन पुनाति ॥२४॥ भया ! मेरा यह मत न का अपने पति उचे सरसे गाने गाता है तो कहां माक्ने गाता है यथामिना हेम मलं बहाति सारे संसारको पवित्र कर देता है ॥२०॥ जैसे करे मा पुनः स्वं भजते घ रूपम् । सपनेपर सोना मैडमेर देता है-निल तो आत्मा च फर्मानुष्ठय विध्य पौर वपने बसमी मुख रूपमें स्थित हो जाता , ही मेरे मकियोगके करा धारमा कर्मबासमासे मुर मशक्तियोगेन भनस्पयो माम् ॥२५॥ होकर मुझको ही प्राप्त हो जाता है, कि म. उसका वासविक स्वरूप ॥ २५ ॥ उसकी 1 मेो यथा यथाऽऽत्मा परिमृज्यतेऽसौ परमपावन स्मया-कलाके प्रवण कीर्वमसे ज्यमिक मत्पुण्यगाथाभवगाभिधानः मैल पुस्ता माता है, स्पों में उसे मस्सो तथा सथा पश्पत्ति पेस्तु पक्ष्म पक्कि तपके दर्शन होने लगते हैं जैसे वाले द्वारा नेत्रोंका दोष मिटनेपर उममें सूक्ष्म चक्षुर्यवेवाअनसम्प्रयुक्तम् ॥२६॥ | देखनेकी शक्ति माने लगती है ॥ २६ ॥ विषयान् म्यायतमिर्च विपयेषु विपक्षते । जो पुरस निरन्तर विस्य-चिन्तन किया करता मामनुसरतमिर्च मय्मेष प्रनिलीयते ॥२७॥ करता है, उसका ति मुझमें जमीन हो । उसका पित्त वियोम फैस माता है और में मेव मात्र तसादसदभिमान यथा स्वप्नमनोरथम् । है ॥२७॥समिये तुम दूसरे साधनों और फोक्ति मेर दो। घरे माई । मेरे अतिरिक और कुछ हिस्वा मपि समाधत्स्य मनो महावभावितम् ॥२८॥ महीं, जो कुछ भान पड़ता है, यह ठीक पैसा ।। खीमा सीसङ्गिनां सहस्पफ्त्वा व्रत आत्मवान् । तबसे-एकामपसे मुझमें ही हो ॥ २८॥ घेम विविक्त आसीनपिन्तफेन्मामतन्द्रित ॥२९॥ सपी पुरुष स्त्रियों वौर उनके प्रमियका सा दूरसे ही न तपास भवेत पमेनो वन्यमान्यप्रसङ्गवः । सासे कोर सीसलियों के छम्पटीके मासे पुसको फैसावट भौर किसीक भी सासे नहीं हाती ॥.. ग्यपजीन पूण-फमलनपन श्यामादर पर यथा त्यामर विन्दास यानं वा यदात्मकम् । ध्यायन्समधुरत म पान त्वं यतमर्हसि ॥३१॥ मपसे, किसी प्रकार वार किस बसे प्यान करे ! ॥११॥ १ धम्म्मम् । । । उदर उपाप ७९७ भ०१४ श्रीभगवानुमाघ भगवान् भीकम्णने कहा-प्रिय उदय 1 गोन तो पात उँचा हो और न बहुत नीचा ही-ऐसे बासनपर शरीरको सीधा स्वकर बारामसे बैठ जाय, सम आसन आसीन समझायो यथासुस्वम् । हापोंको अपनी गोद में रस से बौर रमि अपनी मासिकाके अग्रभागपर नमाये ॥ ३२ ।। इसके बाद पूरक, कुमक हस्तायुस्सा आधाय स्वनासाग्रहवेक्षणः ॥३२॥ और रेचक, तप रेचक, , कुम्मक वीर पूरक-न प्राणायामों- के द्वारा नापियों का शोषम फरे । प्राणायामका भम्यास प्रागस्य शोषयेन्मार्ग पूरकुम्भकरेपर। धीरे-धीरे साना चाहिये और उसके साप साप इन्द्रियों को बीतमेका मीभम्पास करना चाहिये ॥३॥दयमें कमल- विपर्ययेणापि शनैरम्पसेभिर्जितेन्द्रियः ॥३३॥ नात्मात पतले ससके समान प्रकारका निम्तन करे, प्राणके द्वारा उसे उपर ले जाय और उसमें पटानादके उपविच्छिममोहारं घम्टानादं विसोर्णपत् । सम्पम सर स्थिर करे। उस सरका तॉम टूटने न प्रागनोदीर्य सत्राथ पुनः संघसमेत् स्वरम् ॥३४॥ पावे ॥ ३१ ॥ इस प्रकार प्रतिदिन तीन समय दस-दस वार ॐकारसहित प्राणायामका पम्यास करे । ऐसा | करनेसे एक महीनेके अंदर ही प्राणवायु पशमें हो जाता एवं प्रणवसंयुकं प्रागमेव समम्पसेत् । है ॥३५॥ इसके बाद ऐसा चिन्तम करे कि इस एक फमक है, वह शरीरके भीतर इस प्रकार स्मित है मानो दशातलिपपर्ष मासादर्घाग जिसानिलः ॥३५॥ उसकी री वो ठपरकी बोर है और मुंह मीनेकी बोर। पर प्याम करमा चाहिये कि उसका मुस्त उपरकी बोर हत्युमरीझमन्तःसMनालमधोमुस्वम् । होकर मिल गया है, उसके पाठ दम ( पसलियों) भौर उनके बोबीच पीली-पीबी पन्त कुमार कर्णिका ध्यात्वोlमुखमुभिद्रमष्टपत्र सफर्णिकम् ॥३६॥ (गी) ॥ ३६॥ कर्णिकापर क्रमश सूर्य, चन्द्रमा फर्णिकापर त्रसेन सूर्यमामाग्रीनुत्तरोतरम् । मौर अपिका म्यास करना चाहिये । तदनन्तर बमिके मेरे इस रूपका स्मरण करना चाहिये। मेरा यह सरूप म्यामके लिये पता ही माममय है॥३७॥ पहिमप्ये मरेतु रूपं ममैतद मानमङ्गलम् ॥३७॥ मेरे मक्योंकी गठम पनी ही पुरोग है। रोम-रोम्से शान्ति टपक्ती । मुरुमाल अस्पत प्रफुम्वित और समं प्रशान्त मुसलं दीपचारुपतुर्सअम् । मन्दर है। धुनोंतक श्री मनोहर पार मुमाएँ । पड़ी ही पुम्दर पीर ममोदर गरदन है। मरकतमणिके सुषारसुन्दरग्रीवं सुकमालं शुचिस्मितम् ॥३८॥ सन सक्रिय कपोल हैं । मुलपर मन्द मन्द मुसका की घनोनी ही छया है। दोनों ओरके कान वराबरी और समानकर्मविन्यस्तस्फरन्मकरकुपलम् उनमें मकफ्त कुमार मिममिस-मिममिस कर रहे हैं। र्या- काठीन मेपके समान स्पामळ शरीरपर पीतामर फहरा हा। भीमस एवं उस्मीमीका पिड वक्ष सम्पर दा हेमाम्परं पनश्याम श्रीवत्सथीनिक्तनम् ॥३९॥ मायें विराजमान है । हामि क्रमश शह पक्र, गदा १ दीवार भीमसागवत [.१५ चक्रगदापयवनमालाविभूपिवम् एवं पप धारण किये हुए हैं। गलेमें वनमान्य स्टक दी है। परमि नपुर शोभा दे रहे हैं, गोमें कौस्तुमी नपुरविलसत्पादं फौस्तुभप्रभया पुतम् ॥४०॥ जगमगा रही है। अपने अपने स्थानपर चमचमाते र पुमस्किरीटकटफटिम्वाङ्गदायुतम् किरीट, कंगन, काधनी और बाद मायान से रहे हैं। मेय एक-एक बा अाफ्त मन्दर एक इमान सर्षाजसुन्दरं दर्य प्रसादसमुखेषणम् । है । मुम्दर मुख वीर प्यारमरी तिन पा-प्रसारकी वर्षा कर रही है। उदय ! मेरे इस समार सा मुजमारमभिम्पायेत् सर्वाङ्गेषु मनो दधत् ॥४१॥ गाना चाहिये ॥ ३८-११॥ ध्यान करना चाहिये और अपने मनको एक-एक पाने इन्द्रिमाणीन्द्रियार्थेभ्यो मनसाऽऽप्प सन्मन । मुविमान् पुस्सफो चाहिये कि मनके गलियो पुड्या सारपिना धीरः प्रणयेन्मपि सर्वतः ॥४२॥ साप्तासे मुझमें ही ध्यादें चाहे मेरे किसी भी उनके विपर्योसे सांच के बोर मनको युनिरूप सारणी तत् सर्वम्पापर्क चिचमाकप्पैत्र धारयेत् । | स्पो न मे ॥ १२ ॥ मब मरे मरीरका प्यान से भो, तब अपने क्लिको पार एक सालमें रिसर नान्मानि चिन्तयेत् भूयः सुमित भालमेन्मस्लम् ।४३। करे और बम्प बोका चिनसन म करके देकर मन्द मद मुसकानकी म्यासे युक्त मेरे मुखका की या वत्र लम्भपदं चित्तमारुप्प व्योम्नि धारयेत् । | करे ॥ १५ ॥ नव वित्त मुखारविन्दमें यर अप, तर उसे बसे हटाकर बाकाशमें स्थिर करे । तदमन्ता तब त्यस्ता मदारोहो न किंचिदपि चिन्तयेत्॥४४॥ बाकाशका विरून मी त्याग कर मेरे सरूपमें पास हो गाय और मेरे सिवा किसी भी पस्तुका भिन्तन न एवं समाहितमतिर्मामेवास्मानमात्मनि । करे ॥ ११ ॥ जब इस प्रकार वित्त समति हो मात , तब मैसे एक म्योति दूसरी ज्योतिसे मर एक विचष्टे मपि सर्वात्मन् पोतिन्मोतिपि संयुतम् ॥४५॥ को नमन करने ॥ ५ ॥ यो क्षेत्री | हो जाती है, वैसे ही अपनेमें मुझे और मुख सम्म इस प्रकार तीन प्यानयोगके गाय मुबमें ही काले मानेनेस्वं मुवीण पुसतो योगिनो मनः । | पिक्का संपम करता है, उसके पितसे वास्तुकी नेत, | तत्सम्बन्धी शान और उमकी प्रासिके लिये होनेवाले संयास्मत्याशु निर्वाण द्रव्यशानक्रियामम ॥४६॥ | कोका भ्रम शीघ्र ही निसहा जाता है ॥ १६ ॥ ॥ इति श्रीमद्भागवते म्हापुराणे पारमईस्य सहितायामेादशवाय चतुर्दशोऽप्याप ॥ ११ ॥ अथ पञ्चदशोऽध्याय भिम-मित्र सिरपोके नाम मोर पसण भीभगवानुवार मिलेन्द्रिमस युकस विवपासस्य योगिनः । भगवान् श्रीकृष्ण का प्रिय उदय ! मम सातान्त्रिय, प्राम वीर मनको अपने काम करके अ०१५] एकादश समन्ध ७९९ उनव उपार -- मयि धारयतमेत उपविष्ठन्ति सिद्धय ॥१॥ अपना विच मुसमें मगाने गता है, मरी धारणा करने ख्याता तब उसके सामने यात-सी सिद्रियाँ उपस्थित होती है ॥ १॥ उसषधीने कशा पप्पुत। कौन-सी धारणा करनेसे कया धारणया कास्थित कवि सिदिरम्पुस । किस प्रकार कौन-सी सिद्धि प्राप्त होती है और उनकी समय कितनी है, बाप ही योगियोंको सिनियाँ देते है, पति या सिद्धयो मूहि योगिनां सिद्धिदोभषान् ॥२॥ अत वाप इनका मर्णन कीनिये ॥ २ ॥ श्रीभगवानुपा भगवान श्रीकृष्णने कहा-प्रिय उस्मधारणायोग के पारगामी योगियोंने अठस्य प्रकारकी सिरियो पत्यापी सिदयोऽसदिश प्राथा धारणा योगपारगैः। हैं। उनमें पाठ सिडियो तो प्रधानसपसे मुझमें ही राती और दूसरोमि म्यून । घोर दस सत्वगुणके विकाससे भी मिल जाती ॥ ३ ॥ उनमें तीन सिद्धियों सासामठी मत्प्रधाना दसैव गुणदेवः ॥३॥ तो शरीरकी -अणिमा', 'महिमा चौर एधिमा । इन्द्रियों की एक सिदि है-प्राप्ति' । लौकिक और पर अगिमा महिमा मूलपिमा प्राप्तिरिन्द्रियः । गौकिक पदार्योंका इप्लानुसार अनुभव करनेवारी सिदि प्राकाम्पा है । माया और उसके फार्पोको इयानमार प्राकाम्म सुतरप्ट शक्तिपरणमीशिठा ॥४॥ सग्नि करना शिता' नामकी मिति ॥2॥ विस्मि राकर भी उनमें आसक न होना पशिता' और जिस-निस मुख्की कामना करे, उसकी सीमा- गुणवतमा पशिवा यत्कामतदवसति । तक पाच जाना 'समापस्पिता नामकी बारी सिदि है। ये अर्यो सिदिय मुहमें समापसे ही सती है और एता मे सिद्धय सौम्प प्रष्टीचीत्पत्तिका मया ॥५॥ जिहें में देता है, उमीको शत प्राप्त होती हैं ॥५॥ इनके अतिरिक और मी पर सिदियाँ है। शरीरमें अमिमच दहऽस्मिन् द्रभवणदर्शनम् । भूष, प्यास मा बर्गका न हाना, बहुत दूरफी पस्त दख सना और मन की बात सुन स्ना, मनके साम्प ही शरीरमा उस स्थनपर पहुंच जाना, जो इस मनाजर' कामरूपं परमपप्रवेशनम् ॥ ६ ॥ बड़ी रुप पना ना, दूसरे शरीर प्रयश काना, जब म त तभी सरीर अदना, असाओ साप हानाय खम्छन्दमृत्पर्देवानां महकीडानुदसनम् । दमास इरान, सरसरी सिद्धि, स्व जगद सपक Tरा बिना ननु नच आगाऊन-प इस सिदियों पचासकसमंसिदिरामाप्रतिहमा गति ॥ ७॥ सस्तगुगक पिशर किससे ही ॥ ६-७ ॥ भून, भविष्य और पानी मात्र बान सना शान-उण, सम्म दुख और - अकि न आना, सरक विमलमलमा परविधायभिवता। मल आकिबाल न सना अति. मा .

८०० दाकार बनाकर उसमें ो माता॥ १२ ॥ बो साविक बास्को मेत | प्राप्त कर मेसा॥१६॥नो पुस्म मुमचलमिनी श्रीमद्भागवत अन्याम्मविपादीनां प्रविष्टम्भोऽपराजयः ॥ ८॥ बादिकी शक्तियो स्वग्मित कर देना और मिल में पराजित न होना ये पाँच सिदियों भी मेनिको एतायोदशतः प्रोक्का योगधारणसिद्धयः । प्राप्त हाती है ॥ ८॥ प्रिय उदय योग-धारणा करतो | जो सिद्धियाँ प्राप्त होती है, उनका मने नाम निसले प्रय वर्णन कर दिन । अब किसी भारमासे पैसे पयाधारणया या साद यधा पा स्याभिवोध म।।९॥ | सिदि फैसे प्राप्त होती है, यह क्तयता, स्नो मूससूक्ष्मात्मनि मपि तन्मात्र धारपेन्मनः । प्रिय उदव ! पश्चभूतोंकी सूक्ष्मतम मात्राएँ मेत ही शरीर है। साधक केवट मरे ठसी शरीरकी उपसमा फरता है और अपने मनको अणिमानमवामोति तन्मानोपासको मम ॥१०॥ मा देदेन है अर्थत् मेरे पत्रमा शरीरके मतिरिक और किसी भी वस्तुका चिन्तन नहीं करता, उसे पनि मात्पारमन्मपि परे यथासंस्थं मनो दधत् । नामकी सिदि वर्ष पवनी शान मादिमें भी प्रोत | करनेकी शक्ति अणुता प्राप्त ऐ वाटी ॥१०॥ इचवके रूपमें मी में ही प्रकाशित हो वा ।* महिमानम्यामोवि भूतानां च पृथक् पृथक् ॥११॥ उस रूममें समस्त म्यायवारिक धानोंका केछ । ।ने मेरे उस रूपमें अपने मनको मसलकार करके हमारा परमाणुमये चित्त भूतानां मयि रजपन् । कर देता है, उसे महिमा' नामकी सिद्धि प्राप्त होती है और इसी प्रकार बाकाशादि पचमूमो मेरे है शरी है-पग-मग मन लगानेसे उम उसकी मात फालसूक्ष्मार्थता यागी लपिमानम्याप्नुयात् ॥१२॥ ॥ो योगी आदि चार मूलोंके परमभुको प्राप्त हो जाती है, यह मी महिमा सिद्रिके ही वर्ग मेरा ही रूप समर सिफो याकार कर धारयन् मय्यांतरपे मनो पैकारिकेऽसितम् । उसे उधिमा सिद्धि प्राप्त हो जाती है-उसे परमाणुस काका स्मन सूक्ष्म मस्त बनेका समर्म प्रभ सर्वेन्द्रिमाणामात्मत्वं प्राप्ति प्राप्नोतिमिन्मनाः ॥१३॥ योमा अभिनय हो भन्न है। मेरा सहप समप्रकर मेरे उसी रूपमें रिकी परण करत चिन्तन करने म भन्छ इस प्रकार अमि' नामकी सिनि महस्पास्मनि यः पत्र पारपेन्मपि मानसम् । स्त्रात्मामें मफ्ना पित स्थिर करता है, उसे मुखममा प्राकाम्यं पारमष्ठयम विन्दतेऽम्पतजन्मनः॥१४॥ी से शिमुसार सम्य भाग प्राप्त हो जाते मन्मा (सूपस्मा) की प्राकाम्पा नामकी सिमि प्रस १ बारमन् । • एप्पी भाषिके परम्पगुोम गुरुब विषामन या है । इसीसे उसना मी मिपेप करने के किले परमानुक समानवा कमी।

प०१५] एकादा मान्म विष्णौ प्रधीघरे चित्रं भारयेत् फालविग्रो । है॥ ११ ॥ जो त्रिगुणमपी मायके स्वामी मेरे काम- रारूप विश्वरूपफी धारणा करता है, इसीरों और जीवों को अपने अनुसार प्ररित करनेकी समर्ण्य प्राप्त स इतित्वमवाप्नोति क्षेत्रक्षेत्राचोदनाम् ।।१५॥ कर लेता है । इस सिविका नाम शि॥१५॥ जो योग मेरे नारायण सरूपमें मिसे तुरीप बोर नारायणे तुरीयारस्पे भगषच्छन्दशम्पिते । भगवान् भी कहते हैं-मनको छा देता है, मेरे सामाविक गुम उसमें प्रकट होने लगते हैं और उसे मनोमय्पादधद योगी मदर्मा वशितामियात्॥१६॥ मशित्त' नामकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ १६ ॥ निर्गुण प्रम मी में ही हूँ। वो अपना निमठ मन मेरे इस असमरूपमे स्मित कर लेता है उसे परमानन्द निगुण प्रमणि मयि धारयन् विशद मन । स्मरूपिणी यामावसायिसा' नामकी सिद्धि प्राप्त होती ।। इसक मिनेपर उसकी सरी कामनाएं पूर्ण हो परमानन्दमाप्नोति मत्र कामोऽवसीयते ॥१७॥ आती है, समाप्त हो जाती हैं ॥ १७ ॥ प्रिय उद्धन ! मेरा मह रूप, नो श्वेतीपका खामी है, भस्पत शुद्ध शवदीपपती चित्त धर्ममपे मपि । और धर्मम्प है। बो उसकी धारणा करता है, पर भूक- व्यास, जन्म-मृत्यु और शोक मोहन छ मिपोंसे धारयम्यतां याति पार्मिरहितो नरः ॥१०॥ मुक हो जाता है और उसे शुद स्वरूपकी प्राप्ति होती है॥ १८ ॥ में ही समष्टि-प्राणरूप अाफ्शारमा । बो मेरे इस सरूपमें मनके द्वारा अनाहत नादका चिन्तन मय्याफाशात्मनि प्राण मनसा पापमुद्राइन् । करता है, वह पूरभवणा नामकी सिदिसे सम्पम 0 बसा है और बाफाशमें उपदम्ब होनेस्टी विविध तम्रोपलन्धा भूसाना ईमा पाय मृणात्यमौ ॥१९॥ प्राणियोंकी योठी धन-समझ सकता है ।॥ १९ ॥ जो योगी नेत्रों को सूर्यमें मोर सूर्पको नेमि संयुक्त कर देता चक्षुस्त्वष्टरि संपाज्य सधारमपि चपि । है धौर दोनोंके संयोगमें मन-ही-मन मेरा प्यान करता है, उसकी रशि सूक्ष्म हो जाती है, उसे 'दूरदर्शना मां तत्र मनसा म्यायन् विश्व पश्यति सस्मरम्॥२०॥ नामफी सिद्धि प्राप्त होती है और वह सारे संसारको । देख सकता है ॥ २० ॥ मन और शरीरको प्राणवायुक मनो मयि सुसमान्य दई नदनु वायुना । | सहित मरे साथ संयुक्त कर दे और मेरी धारणा करे तो । इससे मनोबा मामकी सिदि प्राप्त हो जाती है । इसक प्रभरसे पर योगी नहीं भी बनेका संपत्य करता है, मदारमानुभाषेन तास्मा यत्र वै मन ॥२१॥ जो उसका पारीर उसी क्षण पहुँच जाता है ॥ २१ ॥ मिस समय योग मनको उपादान कारण बनाएर किसी पदा मन उपादाप यत् मद् रूप पुभूपति । देवता वादिका रूप धारण करना चाहता है तो यह अपने मनके बनु पैस ही रूप धारण कर देता है। सचत् भवमनारूप मपोगपठमाभय ॥२२॥ इसका कारण यी कि उसने वस्ने शिवको मरे सप जो Pय है ॥ २२ ॥ जो योग दूसरे शरीरम प्रदेश परकार्य पिशन मिद आस्मान तत्र भावयेत् । करना चाहे, ए ऐसे माफ्ना करे कि म उसी शरीरमें १ धेश्मत्रपारनात् । नुप्स । म.स २०९- ८०२ भीमागपत . पिमं हित्वा विशेत् प्राणो षायुस्तः पउधिवत् २३। । । ऐसा करनेसे उसका प्राण वायुरूप करण कर मेरा है । बौर पह एक पलसे पूसरे पर जानेको मत पापाऽऽपीव्य गुर्द प्राणं तुरःफण्ठम्र्पसु | समान अपना शरीर छोरकर दूसरे शरीरमें प्रवेश कर का ॥ २३ ॥ योगीका यदि शरीरका परिपाग करना मारोप्य प्रशरन्ध्रण मम नीत्योस्सृजेत्तनुम् ।।२४॥ दय, यक्ष मल, फल वीर मस्तक ले बाप । दिन | तो एबीसे गुदाद्वारको दबकर प्रामवायुको मन अमरन्ध्रके शरा उसे नममें मन करके शरीरका परिपस विहरिप्पन् सुराकीरे मस्स्थ सत्व विभावयेत् । कर दे ॥ २१॥ यदि उसे देवताओंके बिरसो में कीदा करनेकी इच्छा हो, तो मेरे मुख सत्ताप सहपकी विमानेनोपविष्ठन्ति सत्वाची सुरमियः ॥२५॥ भक्ना फरे । ऐसा करनेसे सत्वगुणकी संशतरूप पुर-मुन्दरियाँ विमानपर पाकर उसके पास पहुँच कठी यथासंकस्पये पुरुषा यंदाषा मस्परः पुमान् । ॥ २५ ॥ मिस पुरुषने मेरे सस्पसससहपमें वफ्ना विच स्थिर कर दिया है, उसीके न्यनमें सका द, मह अपने मनसे मिस समय जैसा सास कस्टा मपि सत्ये मनो युजस्वथा सत् समुपाश्नुते ॥२६॥, उसी समय उसका पा सास सिम हो त है ॥ २६ ॥ में शिया बोर वसिप'न दोनों यो वे मनावमापमो ईशितुर्मतितुः पुमान् । सिदियोंका स्वामी हैं, इसछिये कमी को मेरी का टाछ नहीं सकता । जो मेरे उस रूपका चिन्तन करके अंतभिम विहन्येत तस्स घाशा यथा मम ॥२७॥ भी कोई नहीं सकता ॥ २७ ॥ मिस पेशी उसी मनसे युक्त हो जाता है मेरे समाम उसकी को पित मेरी पारणा करते-करते मेरी मति के प्रमासे पुर मात्मा शुद्धसत्वस्व योगिनो धारणाविदः । हो गया है, उसकी मुनि जन्म मृत्यु बादि बरा नियोको मी जन सी है। और तो क्या-भूत, मविप और सस कालिकी मुदिच ममृत्यूपारिता ॥२८॥ पर्तमानकी सभी बनें उसे माश्म हो जाती है ॥२८॥ जैसे कटके द्वारा मछमें रानाले प्राणियों मास नहीं अग्न्पादिभिर्न इन्येत मनेर्योगमप वपुः । होता, वैसे ही निस योगने सपना पित मु मार शिपिट कर दिया है उसके योगमप शरीरको अग्नि, मेपागभान्तषिचस्व पावसामुदः पवा ॥२९॥ जस वादि कोई मी पदार्थ मा मही कर सकते ॥२९॥ नो पुरण श्रीक्स बाहि हि और शा-गदा-पापा मविभूतीरभिध्यापन् भीमरसासपिभूपिताः । आदि आयुभोंसे विभूषित तथा प्रमा- पर अरिसे सम्पन्न मेरे अक्सरोका फन मरतो, मम हो पातपप्रम्पजनैः स भषदपराजितः ॥३०॥ जाता है ॥ ३० ॥ उपासफस माम मोगधारणया मनः। इस प्रकार यो विचारशीठ पुर मेरी उपासना करता है और योगधारणाक द्वारा मेरा पिसन करता, १ मम । २ वार । ३ न फुवचित् । । गुस्वतम । ५ मप्येव भा । वम् ।

एकादश सन्म सेल्पः पूर्वफपिता उपतिष्ठन्स्पशेषतः ॥३१॥ | असे वे सभी सिदियों पूर्णत प्राप्त हो जाती है, जिनका मर्गेन मेने किया है॥३१॥ प्यारे उदम निसने अपने प्राण, मन और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली जितेन्द्रिमस्य दान्तस्स जितवासात्मना मुनेः। है, जो संपमी है और मेरे ही सरूपकी धारणा कर या है, उसके लिये ऐसी कोई भी सिदि मही, नो दुर्लभ मदारणां पारयतः कासा सिद्धि सुदुर्लभा ॥३२॥ हो । उसे तो सभी सिनियाँ प्राप्त ही है ॥ ३२ ॥ परन्तु श्रेष्ठ पुरुष करते हैं कि जो लोग महियोग प्या बन्वरायान् वदन्त्येवा पञ्जतो योगमुघमम् । शामयोगदि उत्तम योगोंका अम्पास कर रहे है, जो मुसे एक हो रहे हैं उनके लिये इम सिद्रियोपत्र प्राप्त होना मया सम्पपमानस्प कालपणाहेतवः ॥३३॥ एक दिन ही है, स्योंकि इनके कारण म्यर्थ ही उनके स्मपका दुरुपयोग होता है॥ ३३ ॥ वगतमै बम्म, जन्मौपतिपोमन्त्रैर्मापतीरिह सिद्धप । मोपवि, समस्या और अदिके द्वारा नितनी सिदियों प्राप्त होती है, वे सभी योग के द्वारा मिल जाती हैं, परन्तु योगकी अन्तिम सीमा-मेरे सारूप्य, साडोस्प बादिकी योगेनाप्नोति शासबो नान्र्योगगति प्रजेत्॥३४॥ प्राप्ति निा मुझमें चित्त गाये किसी में सामनसे नहीं प्राप्त हो सकती ॥ ३९ ॥ समादियोंने बात से समन समोसामपि सिमीना देता पतिस प्रक्षा। बतलाये ?पोग, साक्ष्य और मम वादि । उनका एव समस्त सिद्धिपोका एकमात्र में ही देत, सामी धोर आयोगस्य सांसपस्य धर्मस्प प्रयवादिनाम्।।३५।। ( मम ॥ ॥ ३५ ॥ जैसे स्थूल पञ्चभमें बार, भीतर-- सर्वत्र मूम पप-महाभूत ही है, सूक्ष्म भूतोंके अतिरिक्त हमात्माऽऽन्तरो पापोऽनावा सर्वहिनाम्। स्मूल भूतोकी कोई सत्य ही नहीं है, वैसे ही में समस्त प्राणियों के भीतर प्रद्यमापसे और बाहर रस्परूपसे स्मित है। मुझमें यादर-मीतरका भेद भी नहीं है, स्योंकि में मया भूतानि भूत पहिरन्तः स्वय तथा ॥३६॥ | निरावरण, एफ.-- -अनितीय नाम ॥ ३६॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमाईस्पा संहितापमेकाशक पदशोऽध्याय ॥१५॥ अथ पोडशोऽध्याय भगवान विभूतिपोधपम ग्दशीम मा~भगवन् ! आप सय सम्म है। म आपका आदि है और न त । आप अपरणरहित खं मम परम साक्षापनापन्तमपासम् । अद्वितीय तत्त है। समस्त प्रागिणे और पदार्पोकी सपामपि भावान वाणसित्पाययोगवः ॥ १ ॥ । स्पति, स्पिति, रक्षा और प्रध्यके कारण भी धाप ही है । भार उर-नीच सभी प्राणियों में स्थित है, परन्तु उभाषषषु भूतेषु दुर्भयमस्वात्मभि । जिन मेग्रेने माने मन और इन्द्रियोंका में नहीं किया ८०४ जो तुम कर रहे हो॥८॥ उयपनी 1 में समस्त प्राणिका आत्मा, विपी, मम् और सर-नियामक । में ही इन समस्त प्राणियों और फापति रूपमें! मे काम1 गुणमि में उनकी मूलस्वरूप सम्मान भीमागपन उपासते स्वो भगवन् पायामध्येन नाममाः ॥२॥ है, वे आपको नहीं जान सकते । आपकी पोषित येषु येषु च भाषेषु भपस्पा स्वो परमर्पयः । उपासना तो मसक्ता पुरुष ही करते हैं॥१२॥ यो-यो भूषि-महर्षि आपके जिन रूपों वोर विभूतिया उपासीनाः प्रपद्यन्ते संसिद्धिं तद वदव मे ।। ३ ।। परम भक्तिके सप उनसना करके सिद्धि प्राप्त करते । मह थाप मुझसे करिये ॥३॥ समस्त प्राणियों के गूठपरसि भूतास्मा भूतानां मखभाषन । चीक्नदाता प्रमो ! प समस्त प्राणियोंके पतराम हैं। बाप उनमें अपनेको गुप्त रखकर सीम करते सते नसा पश्यन्ति भूतानि पश्यन्तं मोरिवानि ॥ ४॥ है। भाप तो सबको देखते हैं, परन्तु नगल्के पानी या:काम भूमौ दिवि चे रसापा छापकी मापसे ऐसे मोहित हो रहे हैं कि ये करने नहीं देख पाते ॥ ॥ अक्स्पि एचर्यसम्पन्न प्रमो । विभूतयो विशु महाविमते । | पृथी, हर्ग, पाताल तप दिश-विदिशाओंमें बाले प्रामसे युक्त चो-बो म विभूतियाँ , बाप ना करके सा मामास्पात्यनुभाषितास्ते मुझसे उनका वर्णन फीनिये । प्रभो ! म अक उन नमामि वे तीर्थपदाधिपमम्॥ ५॥ तीर्प मनानेवाले हैं ॥ ५ ॥ 'चरणकमलोंकी पदना करता हूँ,समस्त लगेको में भीभगवानुपाप भगवाए भीकम्पमे करा- -प्रिय मा म प्रश्नका मर्म समझनेवा में शिरोमणि हो । सि समस एवमेवदर पृष्टः प्रश्न प्रश्नविदा पर । कुरुक्षेत्रमें कौरव-पापोंका युर सिमा म प, उस युपस्सुना विनशने सपस्नरच्नेन वै॥ ६॥ प्रय॥ अर्जुनके मनमें ऐसी | सम्य शत्रु से युद्ध के लिये तत्पर अर्जुनने मुझसे यही भास्वा शासिमध मर्ममधर्म रान्पोतुझम् । धारणा हुई कि कुटुम्बिोको मारना और से में राज्यके लिये मात ही निन्दनीय अधर्म है। स्मरम पुस्मों के सामन मह या सोच रहा कि मैं मरनेसम्म ससो निहत्तो हन्ताई रसोऽयमिसि लौकिकः ॥७॥ और ये सब मरनवाले हैं। यह सेक्कर । युद्धसे उपरत हो गया ॥ ७॥ मैने रणभूमिमें स तदापुरमम्मानो युस्स्पा मे प्रतियोपित । पात-सी युक्तियाँ देकर वीर-शिरोमणिर्मनको स्थाय अम्पभापस मामेषं पथा स्वं रणमूनि ॥ ८॥ प। उस समय मर्जुनने मी मुझसे यही प्रश्न किया बामास्मोदवामीपा भूतानो सुररीभरः । आ सवाणि भूतानि तपा स्थिस्युबाप्पयः ॥ ९॥ | और इन उत्पत्ति, स्मन एव प्राज्यका कारण भ ॥२॥ आ गतिर्गतिमा कालः फळयतामाम् । गतिशीठ फायमि में गति ।। अपने अधीन करनेवान्मेमें गुपाना चाप्पईसाम्पंगुणिम्पोत्पत्तिको गुण॥१०॥ और जितने भी गुणवान् पार्ष है उनमें उनका अ० १६ } एकादश स्कन्ध ८०५ गुणिनामप्पा सूत्रं महां च महानइम् । साभाषिक गुण , ॥ १० ॥ गुणयुक्त वस्तुओंमें मैं सूक्ष्माणामप्यहं जीवा दुर्भयानामई मनः ॥११॥ क्रियाशफिप्रधान प्रयम कार्य सूत्रामा ई और महानोंमें बानशक्तिप्रधान प्रपम कार्य महत्तस्म । सूक्ष्म वस्तुओंमें हिरण्यगों वदानो मन्त्राणां प्रणयविपत् । में जीव और कठिनाईसे पशमें होनेवालोंमें मन अपराणामकाराऽमि पदानिच्छन्दसामहम् ॥१२॥ ॥ ११ ॥ में केदोंका अमिम्पकिस्पान हिरण्यगम है रोज सर्वदेवान पमनाममि हम्पवाट । और मन्त्रोंमें तीन मात्राओं (#3+म) बाल ओंकार है। मादिस्पानामह विष्णू रुद्रामा नीललोहित ॥१३|| में अवमें अकार, छन्दोमें त्रिपदा गायत्री ॥ १२ ॥ अमीर्णा भृगुरद राजीणामर मनुः । समस्त देवताम हम्द, आठ बमुमि अग्नि, पादश देवर्षीणां नारदोज मिर्धान्पमि पेनुष ॥१४॥ धादियोंमें विष्णु भौर एका श योम नीरहित नामका सिदेवराणां कपिल सुपर्णोई पतत्त्रिणाम् । व ॥ १३ ॥ में बार्षियोंमें मग, राजर्पियोंमें मनु, प्रजापतीनां दक्षाज पितगामहमर्यमा ॥१५॥ देवर्षियमि नार' और गौोम कामधेनु हैं ॥ ११ ॥ मां विदुधदन दैत्यानां प्रहादमसुस्परम् । में सिद्धेबरों में कपिस, पश्पिोंमें गार, प्रजापतिपोंमें साम नक्षत्रौपधीनो धनेश पधरपसाम् ॥१६॥ दक्ष, प्रजापति और पितरोंमें अर्यमा ३ ॥ १५ ॥ प्रिय उदय परयोंमें देस्पराज प्रहाद, नक्षत्रोंमें पन्द्रमा, ऐरावत गजेन्द्राणां यादसां वरुण प्रसम् । उपसा पुमता सूर्य मनुष्याणां च भूपतिम् ।।१७॥ योपियोंमें सामरस एवं यश्च-राक्ष फुकेर -ऐसा उन्ःमवास्तुरङ्गामा धातूनाममि कामनम्। सम्को ॥ १६ ॥ में गजरानोंमें ऐरावत, सनिपासियोंमें यमा संयमता पार सर्पाणामसि पासुकि ॥१४॥ मनोम राजा है ॥ १७ ॥ में घोमि उम्चे प्रया, उनका प्रसु काम, तपने और चमकनेर्लोमें सूर्य तथा नागेन्द्राणामनन्ताऽई मगेन्द्र गिदरिणाम् । धातुओंमें सोना, दणाधारियोंमें यम और सामि बाकि आश्रमाणामई तुर्या वणोनों प्रथमाऽनष ॥१९॥ ॥ १८॥ निष्पाप उवनी ! मैं नागानों में गेम्नाग, सींग और दाउबाल प्राणियोंमें उनका राजा सिंह, वीर्धानां सातसां गता समद्रः सरसामहम् । । आयमोंमें मन्यास और मामि प्रमग ई॥ १० ॥ मैं नीर्थ और नगियाम गङ्गा, जप गर्मि समुर अप-दानों में आयुधानां धनुरई त्रिपुरना भनुप्मनाम् ॥२०॥ धनुष नया अनुशम त्रिपुरारि दार ई ॥ २० ॥ पिप्पानामस्म्पई मरुगहनानां हिमालयः । म निवासम्पनोंमें सुम्स, दुगम स्थानों दिमाप, वनस्पतियोंमें पीपल और धान्यों में जो ३ ॥२१॥ म पनस्पतीनामपर) मोपधीनामहं यवः ॥२१॥ पुरोहितोंमें यसिष्ट पचताओंमें मृहस्पति, समस्त सेना- पराधसा पसिष्ठा ममिष्ठान पुरसति । पतियोंमें मामिकार्तिक और पगप्रयतम भापत् भन्दा ससनान्यामग्रयो भगवानज ॥१२॥ पाई ॥ २२ ॥ परमहायमें मनाया ( महाप्याप- एस) प्रामे अदिसास और मुर करने पर पार्मि यशानां प्रमयज्ञाश ग्रहानामपिटिसनम् । निमगुरु पयु अग्नि मूप, , प्री पर अन्य पापम्पत्यम्पुवागारमाशुपीनामप्या शुमिः।२३। है ॥ २३ ॥ अठ प्रकारक पाग्ने म म्नानिग माप पागानामारमसरापा मन्त्राऽनि शिविगीपताम् । मान है । विजयक पोंमें (हन गय में मन ( नीत ) पई, पौग अन्य और अनरसरा आनीधिळी घलानो रिम्साम्पातिवादिनाम् २४ सिरप कौरतका समातियारियोम विपर है ॥२४॥ १ मी। “पमा रम् ।। मन परामरमेवनानप्रग ।

) | में म्यापारियों में रानेपाली छामी, छपरट करनेवाने | सास्पिक पुरुषोंमें रहनेवाला सस्पगुण ई॥३१॥ बलवानमि उत्साह और पराक्रम तय भगपरे सास्वा नवीनामादिविरह परा ॥३२॥ भक्तियुक निष्काम कर्म । गकी पूप देर, सारंग, प्रयुम्न, अनिम्ब, नारायम, फीस, या सिर | पर्वतोम स्थिरता और पृथ्वीम उद अरिमरी पक्ष उसका एयरपत्र गुण शरई॥३४॥ उमावीमें १ देताम् । १ मनीन पन पर हम धर-पामा मिचिम्पानामापर । मानगभकामें वरिपराम अधुन और प्रामिपमें उनसरी ८०६ भीमद्भागवत सीणां तु शतरूपाह पुंसां स्वायम्मुयो मनुः मैं नियोंमें मनुफ्स्नी शतरूपा, पुस्योंमें सामना मुनीरोम नारायण और ब्रह्मचारियमि सनत्कुमार R1 नारायणो मुनीनां प कुमारो प्रपधारिणाम् ॥२५॥ में धर्मोम कर्मसंन्यास अपवा एपणाश्यक त्या सा धर्मामाममि सन्पासा खेमामामवहिर्मतिः । प्राणियोंको भम्पदानरूप सथा संन्यास । यो सानोंमें मामलबका अनुसन्धान है, धम्प्रिायो गुमानो ऐनृतं मौन मिघुनानामजस्त्वहम् ॥२६॥ सनम मधुर मधन एवं मौन र जाते संवस्तरोऽस्म्पनिमिषामृतूनां मधुमाधपौ। जोम में प्रमपति हूँ-जिनके शरीर के दो मोसे पूरा और मीका पात्र बोस पैदा इस ॥ २३ ॥ सा मासानां मार्गशीर्पोजनक्षत्रापा वधाभिजित्।।२७॥ सावधान रहकर बागनेवा में संक्सरबप का में , अर युगानां प फ धीरणा देवलोऽसितः । | असुर्कमे वसन्त, महीनोंम मार्गशीर्य और ना वमिजित् है ॥ २७ ॥ में पुग्में सल्फ्युग, लिपसिन सायनोऽसिम्पासाना कवीनां सम्म प्रात्मवान्२८ महर्यि देवछ और अस्ति, व्यामि श्रीमपान नास तथा कक्यिोंमें मनखी सुखाचार्य । ॥ २८ ॥ सम्मिी पासुदेषो भगषा व तु भागवतेप्वाम् । उत्पत्ति और ज्य, प्राणियोंके स्म और पस्म का कि फिम्पुरुपामा हनुमान् विपाधागा सुदर्शनः ॥२९॥ प्रोम) में बासुदेव । । मेरे प्रम्य मम तुम (मा और वरिपाके जाननेवाले मावानोंम (मिशिश मा रत्नानां पपरागोऽसि पपकोटा सुपेभसाम् । किम्पुरुषोंमें हनुमान, बिपाशेम पुदशन ( किने बमारके रूपमें नन्दमामाफो प्रस मिया ५ । और नि कशाऽसि दर्मजातीनां गम्यमान्य हमिःम्यहम्॥३०॥ भगवान्क पदस्पर्शसे मुक्त हो गया था ) में {ARH "यवसापिनामई लक्ष्मीः कितयानां छलग्रहः । | रनोंम पमराग (मठ), सुन्दर वस्तुमि कसको कर तोम कुश और इपियोंमें गया पी ॥३०॥ तिविधाम्मि तितिषणां सर्च सम्बवतामहम् ।।३१॥ | पूतक्रीया, तितिक्षुझोंकी तितिश्न (करसहित) मान सरापलया कमाहं विद्धि सात्वताम् । विनावमु पूर्वचिनिर्गन्धर्वाप्सरसामहम् । और मान नौ मतिम में पानी एवं श्रेष्ठ मूर्ति भूघरापामह स्य गन्य मात्रमई भुः ॥३३॥ प्रदरगारकी अन्य पूर्वचिति ।। वासुदेव ॥ ३२ ॥ में मि विश्वास और अपो रसप परमस्तजिष्ठानां विभाषमु । ॥ ॥ २३ ॥ में जाने सजलियम परम वेन्य प्रभा सूर्येन्दुनाराणा भन्दाश नभम परः ॥३५॥ अग्निः सूप, पत्र और तारोंमें प्रम तय मा प्राण्यानो पलिरहे वीराणामामनुन । मम | ४ मापन प्रतिमें पाल मा। ।

प्र.१६] एकाश स्मन्ध ८०७ मवानां सिविनस्पचिरई के प्रविसंत्रमः ॥३५॥ । उत्पति, स्थिति और प्रध्य हूँ ॥ १५ ॥ में 0 पैरेमि चलनकी शक्ति, पाणीमें बोल्नेकी शक्ति, पायुमें मल. गत्युस्त्युत्सर्गोपादानमानन्दस्पर्शलक्षणम् । स्थगकी शक्ति, हामि पकानकी शकि और बनन- |न्द्रियमें आमम्पमोगकी शकि। सपा स्पर्शी, मास्वादभुपमघाणमई सर्वेन्द्रियेन्द्रियम् ॥३६॥ | नेत्रों में दर्शनकी रसनामें माद लेनेकी, कानों में प्रवणकी और नासिकामे उघनकी शझि भ) में ही है। समस्त पूधियी पापुराकाश आपो ज्यातिरहे महान् । इन्द्रियोंकी इन्द्रियशफि में ही ॥३६।। पृषी, वायु, वाफाश, जल, तेज, भकार, मइयत्त, पबम्हामूत, विकार पुरुषोऽध्यक्त रज सब तम परम् ।।३७१ जीप, मम्पक, प्राप्ति, सत्व, रज, तम और उनसे परे | रानेग्म ये सब में ही॥३७॥ इन अहमेवत्प्रसस्पानं भान समिनिश्रयः । | तत्वोधी गणना, मनोरा उनका भान तथा तल- सनरूप उसका फल मी में ही हूँ। मैं भी ईपर ई, मरमरण जीधेन गुणेन गुणिना विना । में ही नीव ई में ही गुण हूँ बौर में ही गुणी है। में ही सबका मात्मा हूँ और में ही सर हूँ। मेरे मतिरिक और काई भी पदार्प कही भी नही है ॥३८॥ सपास्मनापि मरेण न भागो विपते कचित् ॥३८॥ | यदि में गिनने म्" तो किसी समय परमाणुओंकी गणना तोमर सफताई, परन्तु अपनी विभूतियोंकी गणना नहीं पर सम्पानं परमाणूनी कालन फ्रियते मया । सकता | क्योंकि जा मेरे रचे हुए कोटि-कोटि प्रमाफी न तथा मेवितीनो समताऽमानि फोटिशः ॥३९॥ तो हो ही से सकती है ॥ ३९ ॥ ऐसा समझो कि | मी गाना नहीं हो सकती, तब मेरी मभूतियोंकी गणना वेजा भी कीतिरधर्महीस्पागा सौभगभगा। निसमें भी तेब, श्री, फीति, एमप, सम्या, स्पाग, सौन्दर्य, सौभाग्य, पराक्रम तितिक्षा और विज्ञान आदि वीर्य वितिक्षा रिझान पत्र पत्र स मेशकः ॥४०॥ श्रेष्ठ गुणा हो, का मेस ही start एतास्ते कीर्तिताः सपा संघपण विभूतयः । उदाजी ! मैंन तुम्हारे प्रस्तक अनुमार संझयसे विभूतियों का वर्णन मित्य । ये सब परमार्य-वस्तु नहीं हैं, मनाधिकारमात्र है क्योकि मनमे सोचा और पाणीसे मनोविकारा एकवे यथा पाचाभिभीमसे ॥४१॥ ही कोई भी वस्तु परम्पर्य (पास्तविक ) नहीं हती। उसपी एफ कसना ही होनी है।॥११॥ बामन्छ मना या प्राणान् पश्यन्द्रियाणि प । । सठिये मुम पाणीको स्वयम्दमरणसे रोको, मनक साहर निकम्मर मो । इसके किये प्राणोंको पशमें आरमानमारमना पपछन भ्या सामने॥४२॥ करो और इन्द्रियों का दमन करो । सतिक बुद्रिके क्षारा प्रपत्राभिमुस सुदिको शामत करो। र तुम्हें संसारके मम मायुदय बीहा मागमें मटकना नहीं पाण!१२॥ या पाठमनसी सम्यगसपच्छन् भिपा यति । गो साधक बुद्धिक शरा पगी और मनको पूगमया ज्यो। २ प्रकम् । . , सेही अपन म्मकी रक्षा निरसयमा ८०८ " mo- अपने परमवर्मका उपदेश किपप | ॥३॥ रिपसम्म। बहुत समप बीत जानेके कारण इस सम्पपई | उपदेश दिये बहुत दिन होगपे॥४॥ अपुत! न प्रापा भविता मस्पलोफ प्रागनुशासितः॥४॥ मूर्तिमन् होकर मिराजमान रहते हैं, माके अतिरिक | ऐसा का भी नहीं है जो आपकसपमा प्रान, प्रवचन असा सरक्षण कर सफ॥५॥समा भीमद्भागवत वस्म प्रतं तपो दान समस्यामपटाम्मुवत् ।।४३॥ | कशमें नहीं कर देता, उसके त, का और दम में प्रकार क्षीण हो जाते हैं, वैसे कम्चे परमें मा तसान्मनोपचाप्राणान् नियन्छेन्मस्परायणः । मल ॥ १३॥ इसपिये मेरे प्रमी मतको चाहिये मेरे परायण होकर मलियुक मुरिसे की, मा प्राणोंका संपम करे । ऐसा कर लेनेपर फिर से , मद्रकियुक्तमा पुरया वतः परिसमाप्यते ॥४४॥ करना शेप नहीं खत्म ! वाह कसकस्म हो जाता है ।। ११॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमास्यां संहितायामेकादशस्कर पोशोऽध्याय ॥ १६ ॥ अथ सप्तदशोऽध्याय पर्णाश्रम-धर्म-निरूपप्प रायवजीने कहा-कमळनयन भीसम्म | बसे यस्त्वयाभिहित। पूर्व धर्मस्वद्भक्तिलक्षण।। पहले वर्णाश्रम धर्मका पान करनेबके किसे में सामाम्पत मनुष्यमात्रके हिपे उस धर्मा उपदेश दिया वर्णाश्रमापारवतां सर्वेपी द्विपदामपि ॥१॥ पा, निससे अापकी मलि प्राप्त होती है। खबर कसा करके या स्तष्ाये कि मनुष्य किस प्रकारसे बसने यथानुठीयमानेन स्वपि भफिर्तृणां भवेत् । धर्मका अनुष्ठान फरे, निस्से बापक परममि उसे भी स्वधर्मेणारविन्दाय तत् समास्यातुमर्हसि ॥ २ ॥ आपने पसे अवतार प्रण करके मायने प्राप्त हो जाय ॥ १२ ॥ प्रभा पुरा फिल महापाहा धर्म परमकं प्रभो । पचन हंसरूपण ब्रह्मणेऽम्पारध मार ॥ ३॥ अक्ने प्राय नहीं समा रह गया है, क्योंकि बाक्लो उसय स दानी सुमहता फालनामिप्रफर्मन । पृषीमें तप प्रमाकी उस सभामें भी, या सग पर उस बाप मामला प्रस्ता, रथक और उपदशक बार ही है। पका पताविता नान्यापमस्याम्पुस ते सपि । सभायामपिपरिया या मूर्तिधरा फलाः ॥ ५॥ मधु देपा मारकर बगेकी रस ग्याषिया प्रपत्रा प भवटा मधुमदन । म्यक महीनस रस पिनष्ट र अमक्ष्यति ॥ ६ ॥1 का मंगे, तब इस पर 11 ही बा अपन से -- समारमन् ! जप अप पृषीनसे अभी सस १०१७] एकादश स्कन्ध । नव ना सर्वधर्मच धर्मस्वशक्तिलक्षणः। फिर उसे कौन बतायेगा।॥ ६॥ आप समस्त धोक मर्म है, इसलिये प्रभो ! भाप उस धर्मका वर्णन कीजिये, जो आपकी मति प्राप्त करानेवाला है। और या मी स्ताये कि किसके लिये ठसका कैसा विधान यथा यस विधीयेत तथा वर्मय मे प्रभो ॥७॥ है॥७॥ मीत्सुक उपाय भीशुकदेषनी कहते है-परीक्षित् ! बव इस प्रकार भक्तशिरोमणि उदयनीने प्रश्न किया, तव भगवान् इत्यं समृस्थमुस्पेन पृष्टः स भगवान् हरिः । श्रीणने अत्यत प्रसन्न होकर प्राणियों के कल्याण के लिये प्रीतः क्षेमाय मानाधर्मानाह सनातनान् ॥ ८॥ न्हें सनातन धोका उपदेश दिया ॥ ८ ॥ भीभगवानुवाप भगवान् भीमप्यमे कदापिय ठद्रव ! तुम्हारा प्रश्न धममय है, स्पोकि इससे पर्णाश्रमी मनुयोको धर्म एप वष प्रश्नो नामेपसफरो नृणाम् । परमवल्याणस्वरूप मोक्षकी प्राति होती है। अत में तुझे उन धोका उपदेश करता है, सापवान होकर वर्णाभमाचारवां मप निमोध मे ॥९॥ सुनो ॥ ९॥ जिस समय इस कम्पका प्रारम्भ हुआ पा और पहल सत्ययुग पछ रहा था, उस समय सभी आदौ कतयुगे वर्णो नृणां इस इति स्मृतः । मनुष्योका स' नामक एक ही षण था । उस युगमें स्म ग्रेग नमसे ही तकल्प होवे थे, इसीलिये उसका उत्कृत्या प्रभावात्पातसात् कृतयुग विदुः॥१०॥ एफ नाम कृतयुग मी है ॥ १० ॥ उस समय केपछ प्रणम ही भेद भा और तपस्या, शौच, दया एप सस्परूप वेदः प्रणव एवाने धर्मोऽहं परूपरक । चार चरणोंसे युक में ही उपमहापधारी धर्म प । उस उपासवे सपोनिष्ठा इस मामुक्तफिलिपाः ॥११॥ समयके निष्पाप एवं परमतस्त्री मकनन मुम इससहए शुद्ध परमारमाकी उपासना करते ये ॥ ११॥ परम शेताम, महाभाग प्राणान्मे दयाापी । भाम्पवान् उद्भव ! सत्ययुगके बाद प्रेतायुगका ध्यरम्भ होनेपर मेरे रूपसे यास-प्रभासके द्वारा ऋग्वेद, सामरे विधा प्रादुरभूर्चस्मा आमासं प्रिवृन्मसः ॥१२॥ | और यजुर्वेदरूप प्रयविपा प्रफ्ट हुई और उस प्रयी- पिपासे होता, अन्ययु और उद्गाताके कमरूप तीन विप्रथपियविद्गद्रा मुखवाहरूपादनाः । भेदोंवाले याके रूपसे में प्रकट हुआ ॥ १२ ॥ विराट पुरुषके मुझसे क्षण, मुबासे क्षत्रिप, घासे वैश्य और पैरामात् पुरुषाशाता य प्रास्माघारलक्षणाः ॥१३॥ घरोसे 'द्रोंकी म्पत्ति हुइ । उनकी पहचान उनके समयानुसार मौवापरणसे होती है |॥१३॥ उदयनी! गृहाभमा नपनधो प्रमभयं दो मम । विराट् पुरुष मी में ही हैं, इसठिये मेरे ही मसलसे गृहस्थाश्म एयसेम्वचपायम, मध स्पस्टसे मानप्रस्थाश्रम वैधास्थानापनेवासोन्पासामोर्पणि संस्सितः।१४। और मस्तफसे संन्यास प्रमी उत्पति हरी ॥ १४ ॥ १ दसव । २ पसात् ।। प्रेतायुगे ।। एन । ५ र समाने पाठः संन्यासः शिरसि स्य महीवरूदेव मिनटंक प्रपश्यति ॥६॥ कर संगे, तब वो इस धमफा मेपही दास्पा उन बाप प्रास हो जाय ॥ १-२ ।। प्रभ । मायामला | उपदेश किसे बहुत दिन हो गये।।४॥ वत। | प्रसका रक्षक बौर उपदेशक बार ही अत बैसे ही अपने धर्मकी भी रन कीजिये। सरकार श्रीमद्भागवत वस्स प्रा तपो दानं सपस्यामपटाम्मुवत् ॥४३॥ में नहीं कर लेता, उसके स्त, तप और दर प्रकार क्षीण हो जाते हैं, जैसे कान पामें मा वमान्मनोवचःप्राणान् नियम्छेन्मत्परायणः । बल ॥ १३ ॥ इसलिये मेरे प्रेमी मतमो भनि। मेरे पराफा होकर भनियुक्त बुद्धिसे कमी, मन में प्राणोंका संयम करे । ऐसा कर सेनेपर फिर से , मप्रतियुकया पुदपा वसा परिसमाप्यते ॥४४॥| करना शेष नहीं रहता। सप्तकरप हो जाता है॥ १७॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमारिया संहितायमेकादशस्कम् पोशोऽध्याय ॥ १६ ॥ अथ सप्तदशोऽध्यायः पभम-धर्म-निरूपण ग्दवजीमे कहा-ममनयन भीरप ! गाने पस्त्वयाभिहिता पूर्व धर्मस्वाक्तिलक्षण।। पाले वर्णाश्रम धर्मका पान करनेमा के लिये और सामान्यत मनुष्यमात्रके शिये उस धर्मय उपदेश नि वर्षापमाचारषवां सपा द्विपदामपि ॥१॥ पा, चिससे वापसी मक्ति प्राप्त होती है। पर कया करके या स्तष्पये कि मनुष्य किस प्रकारसे बरने यथानुष्ठीयमानेन स्वमि भकिणां भवेत् । धर्मका अनुष्ठान करे, जिससे आपके चरम उसे मी स्वधर्मेणारविन्दाथ तत् समास्पातुमईसि ॥ २ ॥ पसे असतार महम करके भी पुरा किल महापाहो धर्म परमकं प्रभो । बपने परमवर्मका उपदेश किया पा ॥३॥ दिन ! पास समय धीत जाने के कारण इस सम्म मप- यत्तन हंसरूपेण प्रमणेऽम्पास्थ माधव ॥ ३॥ | लोकमें प्राय नहीं रह गया है, क्योंकि आपको उसका स दानी सुमहसा कालेनामित्रकर्शन । पृथ्वीमें तप प्रमाकी उस समामें में, माँ सम्म मेर न प्रापा भविता मर्त्यलोक प्रागनुशासितः॥४॥ मूर्तिमन् होकर मिराजमान राते है आपके बनिरित ऐस कोई भी महा। जो बापक इस मा प्राम, पका पाविता नान्पो धर्मस्साम्पत वे समि । प्रमचम अपा संरक्षण कर सक ॥ ५ ॥ इस पर सभायामपिपरिऽध्यां यत्रमूर्तिधराः फला! ॥५॥म मारकर पेशेको रस की का पापित्रा प्रपत्रा च भपता मधुसूदन । परम्यानन् । बर आर पृथ्वीतसे अनी मेरा सरम २ चमनमान्। २ कलम ।

अ० १७] एकादश स्कन्ध चच नः सर्वधर्म धर्मस्वदतिलपणः । फिर उसे कौन बतावेगा। ॥ ६ ॥ श्राप समस्त धोक म है, इसलिये प्रभो ! बार उस धर्मका वर्णन कीनिये, जो आपकी भकि प्राप्त करानेवाला है। और यह भी बताइये कि किसके लिये उसका कैसा विधान यथा यस्य विधीयेव तथा वर्णय मे प्रभो ॥७॥ भीशुक उवार भीशुकदेषमी कहते है-परीभित् ! बवाइस प्रकार भक्तशिरोमणि उपदीने प्रश्न किया, तव भगवान् इत्य समृस्परम्पेन पृष्ट स भगवान् हरिः। श्रीकृष्णने मत्फ्त प्रसन होकर प्राणियों के कल्याण के लिये प्रीतः माय मानां धर्मानाह सनातनान् ॥ ८॥ उन्हें सनातन धर्मोका उपदेश किया ॥ ८ ॥ भीभगवानुवाच भगवान् भीकप्यमे का—प्रिय उदव ! तुम्हारा प्रश्न धर्ममय है, क्योंकि इससे वर्णाश्रमधर्म मनुर्योको पम्प एप तम प्रश्नो नैश्रेियसफरो नृणाम् । परम्पत्याणस्वरूप मोक्षकी प्रासि होती है। अत में तुम्हें न धोका उपदेश करता ई, सावधान होकर पर्याभमाचारलता समय निबोध मे ॥९॥ सुनो ॥ ९ ॥ जिस समय इस कम्पका प्रारम्भ हुआ था वीर पहला सत्ययुग पल रहा पा, उस सम्म सभी भादौ कवयुग वर्णो नृणां इस इति स्मृतः । मनुष्योंका इस मामक एक ही पण पा । उस युगमें स्व ग्रेग चम्मसे ही तकल्प होते थे, इसीलिये उसका कृतकस्पाः प्रचा आस्यासमात् कवयुग विदुःशा१०॥ एक नाम तयुग भी है ॥१०॥ उस समय केक्छ प्रणव ही वेद प और तपस्या, शौय, दया एम सत्पम्प वेदः प्रणव एषाग्रे धर्मो परूपपक् । धार घरोसे युक में ही अपमरूपधारी धर्म प । उस उपासते सपोनिष्ठा इस मां मुफकिसिपाः ॥११॥ सम्यके निष्पाप एवं परमतपस्वी भक्तजन मुह ईसखाप शुर परमात्मायी उपासना करते थे ॥ ११॥ परम लाले मामा प्रायमे पासपी । म्यम्यान तय ! मुफ्युगके. बाद, प्रेतायुगमा आरम्भ, होनेपर मेरे एयसे भास प्रयासक द्वारा अग्रे, सामो विधा प्रादुरभूतस्या अहमास शिव मस्सः ॥१२॥ और यजुर्वेदाप पपीविपा प्रष्ट हुए और टस प्रपी- विपासे होता, पच्यु और उद्गताके फमरूप तीन विपक्षत्रियपिटादा मुलपाइरुपाबा। भेदोंपाले याके रूपसे में प्रकट हुआ ॥ १२ ॥ विराट | पुरुषके मुससे मामम, मुनासे धनिप, घासे वैश्य और पैरामात् पुरुयाजावा य प्रारमाधारलक्षणाः ॥१३॥ घरोंसे सूत्रोंकी उत्पत्ति हुई । उनकी पहचान उनके समानानुसार बार अपरणसे होती है ॥१॥ उदपत्री ! ग्राममो अपनतो प्रवचप रदो मम । विराट् पुरुष भी मैं ही। इसउिये मेरे ही उम्मटसे गृहस्थाश्रम, एयसेममधपायम, प स्परसे वानप्रस्थयम पैप सानाद मने मासोन्यासाशापणि सस्सितः।१४। और मसफसे सम्पासश्रमी उपपि हर है ॥ ११ ॥ १ वता सर्व । २ यस्मात् । ३ वायुगे । घर । ५ धसमाने पाहा न्यास मिनि सिवः।

. । | उसीसे नो कुल मिल बाप, उसमें सायना- | सस्पपर छर, चोरी न करें, फम्म,कोप पोमसे पचे और बिन कामोंके करनेसे समस्त प्राधिकारी वर्षका भी विचार करे ॥ २२ ॥ मलय, मृगधर्म, | वर्णके अनुसार दण, स्वाक्षकी माय, पापपीत वर | रिये दर और बत न धोबे, रंगीन धास्नपर न ८१० श्रीमद्भागवत वर्णानामाश्रमाणां च अन्मभुम्पनुसारिणीः । इन वर्ण और वाश्रमोंके पुरुषोंके समर में से मासन् प्रकृतयो नणां नीचैर्नीचोचमोत्तमाः ॥१५॥ गये । अर्थात् उत्तम स्पोंसे उपम हानेवाले वर्ष को बम्मस्थानोंके अनुसार उसम, मध्यम बौर परम प्रमो दमस्तपः शौच सतापः शान्तिरार्जवम् । वाकिस्लमा उतम और अपम स्थानोंसेतापन होनेको मशक्तिम दया सत्य प्रमप्रकृतयस्त्विमाः ॥१६॥ क्षमाशरता, सीधाफ्न, मेरी भक्ति, दया वोर समर केवपम नुए॥१५|| शम, दम, तपस्या, पवित्रता, स्वे, तेजो पल पतिः शौर्य सिविक्षौदार्यपधमः । ये ब्राह्मण वर्णक स्वभाव है ॥ १६॥ तेब, , , सर्व प्रमभ्यसैवर्य पत्रप्रकृतपस्त्विमाः॥१७॥ प्रामणमकि और ऐपये क्षत्रिय वर्णक समय पीरवा, सहनशीलता, उदारता, उयोगसीम्त, सिरक, पास्तिफ्य दाननिष्ठा प अदम्भो प्रेपसेपनम् । हैं॥ १७॥ वास्तिकता, दानशीदा, दम्भहीत, नामोंकी सेवा करना और पनसम्पसे , अतुष्टिरपिघपैश्यप्राप्तयस्त्विमा ॥१८॥ होना-ये पैश्य वर्णके सभव ॥ १८ ॥ अधूपर्ण द्विजगवां देवानां पाप्यमायया । ने और देवताओं की निष्कपटभरसे सेवा करना कर तत्र लम्धेन संतोपः शतप्रकृतयस्त्विमाः॥१९॥ शव वर्णक समय है ॥ १९ ॥ अपवित्रता, हरु बोम्स, मशौचमनृव स्तेयं नास्तिक्य शुष्कविग्रहः । चोरी करना, ईपर भौर परमेककी परम करमा छठ प्रगाना और काम, कोष एवं वप्पाके कमें मनमा क्रोधम र्पणखभाषोऽन्तेवेसापिनाम्॥२०॥ पारों को और चारों बाधके लिये सभरण या यना-ये मस्पोंकि समय है ॥ २० ॥ उसपी | अहिंसा है कि मन, पाणी धौर शरीरसे किसीकी सि न करें। सस्पमस्तयमकाममोपलोभवा। भूतप्रियहिता प धर्माऽयं सार्षपर्णिकः ॥२१॥ प्रसन्नता वोर उनका मन हो, दी करें ॥ २१ ॥ द्वितीय प्राप्पानुपासन्मापनयन विजः । कमसे यज्ञोपवीत संस्काररूप रिसीप म्म प्राप्त करके षसन् गुरुङले दान्तो नमापीयीव चाहुतः ॥२२॥ गुरुकुम रहे और अपनी इन्द्रियोको पचभै रस्से । भाचार्यक भुम्यनफर केदका मप्पयन करे और उसके मेललामिनदण्डाधामसत्रफममवन् जटिलोऽपौतददासाऽरक्तपीठः शान् दधत्।।२३॥ या धारण कर । सिपर ज्य रक्ले, नीले स्नानभोजनहोमा बैंपोपार घ पाग्यतः । और कुश धरण करे ॥ २३ ॥ स्नान, मोजन, हम, | बप बौर मम्मूत्र स्पागके समय मौन हैं और कब नच्छिन्यामम्वरोमाणि कशापम्पगतान्यपि ॥२४॥ तपा गुशेन्द्रियके मार और नाम्पूनोंको कभीन पटे ॥२१॥ १ परिौः । २ मान्य गतपो नर्ना । । सिप्रवनम् । ४ वर्षभ । ५ मवावपिनान् । । प्राग, क्षत्रिय वन पैश्य गर्भाधान बाहि संस्कारों । . - मयोपारे।

एकादा स्कन्ध १७] जो नावफिरेवातु प्रयतधरः स्वपम् । पूर्ण प्रमचर्यका पालन करे । स्वयं वो कभी वीर्यपात फरे ही नहीं । यदि स्वप्न आदिमें वीर्य स्खलित हो वकीर्गेऽवगामाप्सु मतासुखिपदीं जपेत् ॥२५॥ चाप, तो जलमें स्नान करकं प्राणायम करे एव गयत्रीका प करे ॥ २५ ॥ ममचारीको पवित्रताके बम्पर्काचार्यगोविप्रगुरुसुराम्छुचिः सम एकाग्रचित्त होकर अग्नि, सूर्य, वाचार्य, गौ, | प्रामण, गुरु पदजन और देवताओंकी उपासना करनी माहित उपासीव संध्ये च यववाग बपन् ।॥२६॥ चाहिये तय सम्यकाळ और प्रात काल मौन होकर सम्योपासन एवं गपत्रीका जप करना चाहिये ॥२६॥ प्राचार्य मा विजानीयाभावमन्पेत कारचित् । आचार्यको मेरा ही स्वरूप समझे, कमी उनका तिरस्कार न परे । उन्हें साधारण मनुष्य समझकर दोपदष्टि न न मर्पयुद्धपासमेत सर्वदेवमयो गुरु ॥२७॥ | करो स्मोकि गुरु सर्वदेवमय होता है ॥२७॥ सापकाळ पौर प्रात काल दोनों समय वो कुछ मिक्षामें मिले वह सायं प्रातरूपानीय मैक्ष्य तस्मै निवेदयेत् । व्यकर गुरुदेवके आगे रख दे । केवउ भोजन ही नही, यो कुछ हो सब । तदनन्तर उनके पाशानुसार वा सपमसे मिक्षा आदिका पोक्ति उपयोग करे ॥ २८ ॥ पश्चान्पदप्यनुहावपुपयुशीन समतः ॥२८॥ थाचार्य यति चाते हों तो उनके पीछे-पीछे चले, उनके सो जाने के बद वही सापवानीसे उनसे पोपी दूरपर सोधे । शुधूपमाण आचार्य सदोपासीव नीपपत् । पके हों, तो पास बैठकर चरण दवावे धीर बैठे हों तो उनके वादेशकी प्रतीचा हाप पोरफर पासमें ही सपा पानशम्पासनसाने सिरे वालिः ॥२९॥ रहे । इस प्रकार अस्पत्त भेटे म्पतिकी माँति सेवा शुण्यके द्वारा सदा-सर्कश आचार्यकी बागमें तत्पर रहे ॥ २९ ।। एपश्चो गुरुङले बसे भोगविवर्षित। जपाक पिचाप्यपन समास न होजाय, तक्तकस्व प्रकार के मोगोंसे दूर रहकर इसी प्रकार गुरुकुलमें निवास करे और विपासमाप्पसे पाव विप्र व्रसमसणितम्॥३०॥ | कभी अपना सवयत समित म हाने दे॥ ३०॥ पपसौ छन्दसा लोकमारोक्ष्पन् प्रसारिएपम् । पदि प्रचारीका विधार हो कि में मूर्तिमान् वेदोंके निवासस्थान प्राओको नाउ, तो उसे बाजीमन नैष्ठिक समर्पमान ग्रहण पर सेना चाहिये । और येदोंके गुरवे विन्यसेव देह साम्मापाचे पानस ॥३१॥ स्थाप्यायके लिये अपना सारा नीषन वाचार्यकी सेवमें • समर्पित कर देना चाहिये ॥ ३१ ॥ एसा प्रमचारी अग्नी गुरावात्मनि प समतेषु मो परम् । सचमुच प्रमतेमसे सम्पन्न हो जाता है और उसके सारे पाप नए जाते हैं। उसे चाहिये कि अग्नि, गुरु, अपने शरीर और समस्त प्राणियोंमें मेरी ही उपसना फरे और पपग्धीरुपासीत प्रभवसम्मफरमपः ॥३२।। यह भव रखे कि मरे तथा सबके हृदयमें एक ही १ न विनिए । २ सान् मुरानपि । ३ पन्नम् ।

स्नान, - , | मेरा भामारी भफ बिना वाममके रासर धारा अनुमप एवं शााफ सभोंसे सम्मन कुटन मन्दसे पत्यमे और राफानाहा, तायमा नानम परायमीतु पयगा वा मरणामनु क्रमान् ।।३९॥ निम्न मी पपासे सिर पर साता॥२॥ ८१२ भीमशागवत स्त्रीणां निरीक्षणस्पर्शसलापत्वेलनादिकम् । परमात्मा विराजमान है ॥ ३२ ॥ मापारी, सास पौर संन्यासियोको चाहिये कि ये बियोको देखा, सं प्राणिना मिथुनीमूसानगृहस्सोऽग्रतस्स्पबेत् ॥३३॥ करना, उनसे बातचीत प हंसी मममी पदि पस शौचमाचमन स्नान संध्योपासनमार्जवम् । दूरसे ही त्याग दें, मैथुन करते हुए प्राणियोंपर तो है पाततक न करें॥ ३३ ॥ प्रिय स्दव ! शोध, अपमान, स्थ्योपासन, सरछता, तीर्यसेवन, बप, समर तीर्घसेवा जपोऽस्सश्याभल्पासंभाप्पवर्जनम् ॥३४॥ प्राणिमि मुझे ही देखना, मन, वाणी वौर शरीरमा सर्वाभिमप्रयुक्तोऽम नियमा लनन्दन । संयम-या ग्रामघारी, गृहस्प, पानप्रस्थ और संपनी- सभीके म्येि एक सा नियम है। वसयोंको न मम मनावः सर्वभूतेपु मनोषाकापसयमः ॥३५॥ चाहिये उनसे न बोम्ना—ये नियम मी सक्से मि अमाप क्योंको न साना और मिनसे बोलना ना एव पद्धतधरो ग्रामगोऽग्निरिष ज्वलन् । १॥ ३॥ ३५ ॥ नैष्ठिक माचारी प्रामम इन लिया फलन करनेसे अनिके समान सेजसती हो जाता है। मनकस्तीव्रतपसा दग्धर्माशमोऽमलः ॥३६॥ तीन सपस्याके कारण उसके कर्म संस्कार भस्म हो को हैं क्त करण शुद्ध हो माता वोर ह मे मत अथानन्तरमावेपन् यथा जिशासितागमः। | होकर मुझे प्राप्त कर लेता है॥३६॥ प्यारे उदव ! यदि नैफिक प्रापर्य प्रान करने इल न हो-गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहता हो, गुरपे दक्षिणा दया स्नापाद् गुवेनुमोदितः ॥३७॥ देकर और उनको अनुमति लेकर सम्मानिसका तो विधिपूर्वक वेदाध्ययन समाप्त करके वाचार्यको पनि फरा- स्नातक क्नफर प्राप्भम योर दे ॥३७॥ मचारीको चाहिये कि अपचर्य-भमके बर गास गृह वन वोपवित् प्रवजेन् वा दिजोचमः । अश्या वानप्रस्थाश्रममें प्रवेश करे । परि मानते तो संन्यास भी ले सकता है। अपना उसे परिये कि फमश एफ माश्रमसे दूसरे वाभममें प्रवेश करे । किन्तु आश्रमादाश्रमं गन्छमान्यथा मत्परमरत् ॥३८|| विपरीत शमसे आश्रम परिवतन पर सेयरमें न प्रार हो ॥ ३८॥ गृहार्थी सरसी भाषामुरहदजुगुप्सिताम् । प्रिय उस ! यदि प्रमपर्याश्रम के पद गुस्न सीपार करना हो तबझपारीसे पाहिये जित । विपाइ परे। पर मामा भानरोटी और भन्ने ही यसरी दानी गरिये। परियामा म्प पी रितमानम्।

भ० १७] एकादश स्कन्ध ८१३ याजनम् ॥४०॥ इज्याध्ययनदानानि सर्वेषां च द्विजन्मनाम् । पा-यागादि, पप्पयन और दान करनेका अधिकार ग्रामण, क्षत्रिय एवं वैश्योंको समानरूपसे है। परन्तु दान सेने, पदाने बौर या करानेका अधिकार केपल प्रामोंको प्रतिग्रहोऽध्यापन घ प्रामणस्पैष ही है ॥ १० ॥ प्राभणको चाहिये कि इन तीनों चिोंमें प्रतिपाइ धर्मात् दान लेनेकी पतिको तपस्या, प्रतिग्रह म पमानस्तपस्वेजोयशोनुदम् । तेव बौर यशका नाश करनेवाष्म समभकर फहाने और या करानेके शरा ही अपना जीवन निर्वाह करे और अन्माम्पामेव जीत शिंठो दोपासपोः ॥४१॥ } यदि इन दोनों पतियोंमें भी दोपरि हो—परामउम्पन, दीनता वादि दोष दीमते हैं तो अन फटनेके बाद प्रायमस्य हि देहोऽय क्षुद्रफामाय नेप्पते । स्खेतमि पड़े हुए दाने बीनकर ही अपने जीफ्नका निर्वाह कर ले ॥ ११॥ उष 1 ऋक्षणका शरीर अस्पत्त कृष्णाय सपसे घेह प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥४२॥ तुलम है । यह इसलिये नहीं है कि इसके द्वारा तुम्छ विषय भोग ही भोगे नायें । यह तो जोक्न-पर्पन्त फार पिलोम्छापा परितुष्टचिचो | मोगने, तपस्म करने और अन्तमें अनन्त मानन्दक्षरूप | मोधकी प्राप्ति करनेके छिये है ॥ ४२ ॥ जो प्राण धर्म महान्त विरज पुपाणः । धरमें रहकर अपने महान् धर्मका निष्काममानसे पालन करता है वौर सेमि ता यायमि गिरे-पर दाने मय्यर्पितास्मा गृह एव सिष्ट- सुनकर सन्तोषपूरक अपने जीवनका निर्वाह करता है, स्मय ही अपना शरीर, प्राण, अस करण और भात्मा मातिप्रसक्ता समुपैति शान्तिम् ॥४३॥ मुझे समर्पित कर देता है और कही भी अपन्त असति नहीं करता, या विना संन्यास लिये ही परमशान्ति- समुदरन्ति ये विप्र सीदन्तं मत्परायणम् । सम्प परमपद प्राप्त कर लेता है॥ १३॥ यो पंग श्यितिमें यह कम पाहे मेरे मरू ब्राह्मणको विपत्तियोंसे वानुभुरिग्मे नघिरादापनयो नौरिवार्णवात् ॥४४॥ | वा लेते हैं, उन्हें में शीघ्र ही समस्त आपत्तियोंसे उसी | प्रकार पचा लेता है, जैसे समुद्र यते हुए प्राणीको सवा ससदरेदुरावा पितेषन्पसनात्प्रजाः। नौकर मरा लेती है ॥१५॥ राजा पिताके समान सारी प्रचाका फरसे उदार फरे---उन्हें बचावे, जैसे बास्मानमात्मना पीरो यथा गणपविगवान् ॥४५॥ गनरान दूसरे गोंकी रक्षा करता है और धीर होकर सर्य वपन धापसे अपना उदार फरे ॥ १५॥ एवं विधो नरपतिर्षिमानेनार्फवर्धसा। राजा इस प्रकार प्रचाकी रक्षा करता है, पर सारे पापोंसे मुक्त होकर क्त समयमें सर्पक समान सेवसी विध्येहाशर्म फत्ममिन्द्रेण सह मोदसे ॥४६॥ स भोगता है |॥ १६ ॥ यदि प्रमग अध्यापन अथवा विमानपर पावर सगरेको बाता है और इन्द्र के साप पन-यागादिसे बफ्नी विश न पय स्के, तो वैश्य- सीदन् विमा वणिवत्या पप्परेवापद तरेत् । विका माभ्य से से, और जकाक विपति दूर न १ निस्पे।

| देवया, काकबलि आदि भूत्पा और मदानरूप प्रतिदिन पूना परवा हे॥ ५० ॥ गृहसमा ८२४ भीमामा खानपाऽऽपदाक्रान्तो नश्वास्या कथंचन ॥४७॥ | अय सतक करे । यदि बात की परिभा सा करना तो समपार उठाकर पत्रियों की लिसे में अपना काम चला ले, परन्तु किसी भी मामा की वैश्यवल्या तुराबन्पो बीवेन्मृगपयापदि । सेवा-निसे पानति परते न करे || 101 इसी प्रकार यदि क्षत्रिय भी प्रजापख्न बादिवे पर अपने जीफ्नका निर्वाह न कर सके तो पावि पर घरे वा विप्ररूपेण न त्या कथचन ॥४८॥ द्वारा अपवा विपार्टियोंको पहाफर अपनी आपत्तिके दिन बादि कर ले । बहुत घनी आपत्ति हो तो सिरके काट दे, परन्तु मीचोंकी सेवा, पानतिया का कमी न ले ॥१८॥ वैश्य भी अपत्तिके समप यों शूद्रवृत्ति भजे वैश्यः शूद्राकारुफटक्रियाम् । इति सेवासे अपना जीवन निर्वाह कर ले और पर चटाई मुनने बादि कामतिका आभय ले ले, परत कन्यामको नगम पर्षि लिप्सेत कर्मणा ॥४९॥ उदय ! ये सारी बातें धापत्तिकालके लिये ही हैं। वापिका समय बीत जानेपर निम्नमणोंकी इचिसे जीविशेगम वेदाभ्यापखधास्वाहारत्पमाधैर्ययोदयम् । करनेका छोम न करे ॥ १९ ॥ गृहस पुरको पहिये कि षेदाप्ययनरूप प्रमा, तर्पणरूप दिया, निरूप देवपिपिदभूतानि मद्रपाम्पन्वई पबत् ॥५०॥ अतिपियन पादिके शरा मेरे सरूपमूत ऋषि, देश, स्तिर, मनुस्य एवं अन्य समस्त प्राणियोंकी पति परन्छयोपपन्नेन शुक्लेनोपार्जितेन पा। बनायास प्राप्त अपच शाखोकरीविसे अम्ति बने शुर पनसे अपने मृत्य, अमित प्रजम विस धनेनापीठयन्भृस्पान् न्यायेनैवाहरेत् क्रतून् ॥५१॥ प्रकारका कर न पहुँचाते हुए पाय और विधिक सा ही पन फरे ॥ ५१ ।। दुम्वेषु न सज्जत न प्रमापत् कुटुम्पपि । पिप उम्प 1 गृहस्थ पुरुष कुटुममें असफ न हो। वा पुलुम भनेर मी भजनमें प्रन्यर न करे । | युद्धिमान् पुसको पह रात भी सम्म लेनी पहिये कि विपधिनपरं पश्येदरप्टमपि रप्टवत् ॥५२॥ जैसे इस अरकी सभी वस्सर नाशमन् है बसे । सादि परप्रयके भोग भी नारामन् दी 21 ५२ ॥ यह जो खी-पुत्र, भाई-मधु बोर गुरुजनों प्रा. पुषदारावर धना सगमः पान्यसंगम । जु-ना है यह सा से रिस पास पोही मळे । गो हो । सभा -प्रार जाना है। वैसे सनना टूटनेना ही रहता है, वैसे ही इन मिस्न जुम्नेग्रमें सम्मासि समय अनुदई रिपनपते ममा निदानुगा यथा ॥५३॥ तादी बता दे रिसा फोन मिरा 121५१॥ . पाना।२ प्राधा।

अ. १८]
एकादश स्कन्ध
इत्प परिमसन्मको गृहेम्पतिथिवा पसन् । गृहसको चाहिये कि इस प्रकार विचार करके घर-गृहस्सीमें
फसे नहीं, उसमें इस प्रकार अनासलमाक्से हेमानो कोई
न गृहरनुवमेत निर्ममो निरुतः ॥५४॥ अतिपि निवास कर रहा हो। जे शरीर आदिमें बहसार
पौर घर यादिमें ममता नहीं करता, उसे घर-गृहस्पीके
फैदे पाँध नहीं सकते ॥ ५. ॥ भकिमान् पुरुष
कर्मभिहमेषीवैरिष्ट्रा मामेष भक्तिमान् ।
गृहस्सोषित शासोक कोकि पारा मेरी बाराधना करता
तिप्ठे वनं पोपषिशेत् प्रजावान् वा परिमबेत्।।५५॥ हुआ घरमें ही रहे, अपवा पदि पुत्रवान् हो तो वानप्रस्थ
वाग्रामें पग माय या संम्पासाश्रम स्वीकार कर ले ॥५५॥
प्रिय ठरूष । चो लोग इस प्रकारका गास्मनीलन न
यस्त्वासक्तमविगैह पुत्रविचैपणातुरः।
स्तिपकर घर-गृहस्सीम ही भासको आते हैं, जी, पुत्र
मौर धनकी कामनामें फंसकर हम्पमाप करते रहते
नेणा रुपमधीHदो ममाइमिति मध्यते ॥५६॥ और मूढत्वपश बीट और कृपण होकर में मेरेके
| फेरमें पड़ जाये हैं, वे च जाते हैं ॥ ५६ ॥ वे सोचते
बहो मे पितरी प्रदीभार्या पालात्मजात्मजाः।
-हाय । हस्य ! मेरे माँ बाप मूरे हो गये।
पस्नीके माम्बई बमी छोटे-छोटे है, मेरे न रानेर ये
बनाया मामते दीनाःफर्य जीवन्ति दु:खिता॥५७) दीन, नाप और दुखी हो चाय फिर इनका जीवन
कैसे रोग" ॥ ५७ ॥ इस प्रकार घर-गासीकी
मासनासे बिसका चित्त विक्षिप्त हो रहा है, भू-
पर्व गृहाशयाक्षिप्तहदयो मृढपीरयम् ।
पुदि पुरुष बिक्पभोगोंसे कभी तृप्त नहीं होता, उन्हीं में
उमाकर वपना जीवन खो बैठता है और मरकर पोर
बवसत्याननुभ्यायन् मतोऽन्ध विशते तमः ॥५८॥ तमोमय नरकमें जाता है ।। ५८ ॥
इति श्रीमहागवते म्हापुराणे पारमाईस्यो सहितायमेकादशस्यत्वे उतरार्षे
समदोऽप्याप ॥ १७॥
अथायादशोऽध्याय
वानप्रस्थ और सम्यासीके पम
भीभगवानुमान
भगवान् भीरुप्प करते है-प्रिय ठन । यदि
गृहस्स मनुष्य वानप्रस आश्रममें नाना चाहे तो अपनी
पनं विविशुः पुत्रपु भायो न्मस सहप का ।
फरनीको पुत्रोंक हाय सौंप दे अपय अपने आप ही के
पन एन पसेप्छान्तस्तृतीय भागमायुपः ॥१॥
ले और फिर शान्त घिचसे अपनी वायुका तीसरा भाग
क्नमें ही रहकर व्यतीत करे ॥ १॥ उसे कनके पवित्र
कन्दमूलफलँन्पर्मेभ्येति प्रकल्पयेत् । कन्द-म और जैसे ही शरीर निर्वाह करना चाहिये,
पसकी जगह ओंकी उ परिने अथवा घास-स्त
पसीत रकळ वासस्वणपर्णाजिनानि च ॥२॥ और पायअसे ही कम निकास से ॥ २ ॥

८१६ भीमद्भागवत [२०१८ कचरामनवश्मनुमलानि विमृया दसः । केश, रोएँ, नस्य और मूंछ-दादीसप भीरके माको हटाने | नहीं । दातुन न फरे । जसमें घुसकर किस नाव न धाषेदप्मु मज्वेत त्रिकाल स्पनिलेशयः ॥३॥ | करे और धरतीपर ही पर रो ॥ ३ ॥ मीम अहमें पचाम्नि तपे, वर्षा ऋतुमें खुले मैदानमें राकर पर्सकी ग्रीमे वप्येत पञ्चामीन् मस्खिासारपार जले। वयोमर सहे । जाइके दिनोंमें गलेता जन्में न रहे। | इस प्रकार घोर तपस्यमय बीपन व्यतीत करे ॥१॥ आकण्ठमनः शिशिरे एवषचस्तपमरेत् ॥ ४॥ कन्द-मूलझेको के बागमे मूनकर स्व ले का सम्पनुसर पके हुए फल यादिके द्वारा ही काम पर अग्निपर्क समभीयात् फालपक्षमथापि वा। ने । उने फटनेफी पावश्यकता हो तो बोलप य सिम्पर कूट ले, अन्यथा दोर्वोसे ही बना पाकर सा उलूखलाम्मट्टो पा दन्तोस्खल एव पा॥५॥ छे ॥ ५॥ मानप्रस्यमीको चाहिये कि कौन-सा पाई कहाँसे अना चाहिये, किस सम्म्प गाना चाहिये, कौन- वयं संचिनुपात सर्वमात्मनो चिकारणम् । कौन पदार्प अपने अनुकूल है-इन मतोंको बानकर | अपने जीवन-निहिके लिये नयी सब प्रकारके फन्द देशकालवलामिझो नाददीवान्पदाजातम् ॥६॥ | मूल फल आदि ले यावे। देश काछ वादिसे श्नम्धि | लोगोंसे अये हुए अपवा दूसरे समपके सचित पार्योको पन्पैवरुपुरोगनिपेत् कालचोदिवान् । सपने काम म ले ।। ६ ॥ नीमार यादि नंगी ममसे ही घर पुरोगश बादि तैयार करे और नीसे समयोचित मामयण आदि कि कर्म करे । वानप्रस हो न तु श्रीवेन पशुना मा यस पनाश्रमी ॥७॥ नानेपर वेदविहित पशुओंगरा मेरा यजन न करे॥७॥ | वेदनेताओंने वानप्रस्थीक लिये अग्निहोत्र, दर्श, पौर्णमास अग्निहोत्रं च दर्शच पूर्णमासम पूर्वपत् । चौर चातुर्मास्य धादिमा पेस ही विधान किया है। चैस गृहस्सों के लिये है ॥ ८ ॥ इस प्रकार पोर तपस्या चातुमास्यानि च मनेराम्नावानि च नैगमैः॥८॥ करते-करते मांस सूस नानेके फारम पानप्रस्थकी एक एक नस दीमने लगती है। मह इस स्याहारा एवं पीपेन वपसा मनिधमनिसवतः । मेरी याराधना करके पहले तो ऋषिके प्लेसमें जाता है और हासे किर मेरे पास था जाता है, क्योंकि तप मां सपामपमाराप पिलोकादुपैति माम् ।। ९॥ | मेरा ही सरूप है ॥ ९॥ थप उद्धा ! को पुरण फरसे किये हुए और मोक्ष देनेवाले इस महान् तपस्पाने यस्त्येतत् कम्तधीर्ण सपा निाश्रयसंमाद । सर्ग, प्राठोक आनि पोर-माटे फकी प्राप्तिक उिये करता है उससे महकर मूर्स और कौन होगा ! इसक्रिमे फामापासीयसे मुम्ज्या पालिकोऽपरस्वतः॥१०॥ तस्यका अनुनन निष्कामापसे ही करना चाहिये ।।१०।। १ साम ।२ मत पारिवम् ।। पौर्णमामः । • भात् मुनि इस बात अनारभिमुह पराप प्रोम माना पाहिसे सितमप मना पारिप भोर मे नप भने भनुम । सारो नन-नीन र मूस-पस भारिप बस । रेग-प्रयरिसे मननिय मन मोक पाये हुए भषा पामगारमें मर सि हुए परापोर सेनमे पाभि भारिश परप तस्य जिनमें भाराम।

अ०१८ ] एकादश स्कन्ध ८१७ पदासो नियमेऽकल्पो जरया जातवेपथुः । प्यारे उद्धय | वानप्रस्पी जब अपने आप्रमोचित नियोका पाटन करनेमें असमर्थ हो जाय, युअपेक कारण टसका शरीर कारने लगे, तब यज्ञाग्नियोको आत्मन्पमीन् समाराप्य मचित्तोऽपिं समाविशेन्।११।। मानाके गारा अपने क्त्त करण, आरोपित कर ले और अपना मन मुझमें लगाफर अम्निमें प्रवश कर जाय । यदा कर्मविपाका लाफपु निरयात्मसु । (यह विधान काल उनके लिये है, जो विरक नहीं है) ॥ ११ ॥ यदि उसकी स्मधमें यह बात आ जाय कि काम्य फर्मासे उनके फलस्वनए जो येक प्राप्त होते पिरागो जायते सम्पन्यस्तामि प्रभजवतः॥१२॥ हैं, वे नग्कों के समान ही दसपूर्ण हैं और मनमें लोक परत्येकसे पूरा पेराग्य हो जाय तो विक्षिक याम्निोफा परित्याग फरक सन्यास ले ले॥१२॥जो वानप्रस्सी स्न्यासी होना चाई, यह पहले केदविधिके अनुसर आठ प्रकारके या यथोपदेश मां दसा सर्वसमृपिजे । श्राद और प्राजापत्य यजसे मेरा यमन करे । इसके बार अपना सवस्म विस्को देर । यज्ञाम्नियोंको अमीन् खप्राण आपेश्य निरपक्षः परिप्रजेत् ॥१३॥ अपन प्रार्पोमें लीन कर ले और फिर किसी में स्थान, यस्तु और व्यक्तियों की अपेक्षा न रखपत स्वछन्द विवरण परे ॥ १३ ॥ उदयनी ! जय श्रमण संन्यास लेने विप्रस नै मन्पसतो देखा दारादिरूपिणः । लगता है, तब देवनान्यंग सी-पुत्राष्टि सगे-सम्बन्धियोंकर मप घरण करके उसक सुन्पास-पाहणमें किन रास्ते है। वे सेचते हैं कि 'अरे यह तो हमध्यगामी विप्नान् इन्स्पिर्य प्रमानाझम्प समियात् परम्।१४। स्याहटना कर, हमनगोंको डाँधकर परमात्म्पको प्राप्त हाने बसा ह ॥ १० ॥ रिमृपाप निर्मासः फोपीनाच्छादन परम् । यदि सन्यासी यस धरण फरे तो कट लगोटी लग और भक्यिन्से-अधिफ उसके ऊपर एक ऐसा छोटा सा टुफला एप ल कि जिसमें लंगोटी उफ जाय । स्मत नरम्हपात्राभ्यामन्मत् किंपिदनापदि॥१५॥ | तपा आभ्रमधित दण्ड और कमालक अनिरिक धोर कोई मी यस्तु अपने पास न रम्ज। यह नियम आपति- फालयो कर सके लिये है ॥ १५॥ नत्रोंसे टिपूत न्यसेत् पाद बसपूतं पिपजलम् । धरती देसकर पैर रस, कपसे अनबन क्स प्रिये, मुंहसे प्रत्येक वात सयक्त-सत्यसे पवित्र हुडही निकाले सस्पपूता बदल पाच मनापूत समाधरद ॥१६॥ विचार कर ही कर ॥ १६ ॥ माणीके छिय मोन, और शरीरसे क्तिने भी काम कर, मुदिक-सोक शरीरके लिये निदथेष्ट सिति और मनके रिये प्राणयाम दण्ण मौनानोहानिलायामा दप्पा पाग्दापेतसाम् । है। जिसके पास ये तीनों दण्ड नहीं है, केवल १ धमविपाच्यु । २ मस्स। ३ विप्नम् । ४ मित् । मा ११०- ८१८ भीमद्भागवत [अ०१ नमेवे यस्य मन्स्पायेणुभिर्न भवेद् यति ॥१७|| शरीरपर बाँसके दण धरण कानसे दण्डी साम नहीं हो जाता ॥ १७ ॥ स्न्यासीका चाहिये । भिधां चतुर्पु वर्षेपु विगमान् वर्जयमरेत् । जातिभ्युत और गोघाती आदि पतितोंको श्रेष्मर चार पोकी मिझा ले । कवल अनिश्चित सात घरोंसे जितन सप्तागारान् सफ्लप्तांस्तुप्यल्ल पन तावता ॥१८॥ मिट जाय, उतनसे ही स्तोप कर ले || १८ || प्रकार भिक्षा कर वस्तीक वाहर क्यशपपर जाप, वहिर्जलाशय गस्वा तत्रापस्पृश्य वाग्यत । यहाँ हाफ पैर धोकर जलम दारा मिक्षा पवित्र कर ले फिर शास्त्रोक्त पद्धनिसे जिन्हें मिधाका भाग देना चाहिये, विभज्य पावित श्रेप जीताशेपमारतम् ॥१९॥ | टन्हें टकर जो कुछ क्चे ठसे मौन होकर स्म दूसरे समयके लिये यघाफर न रस्से और न अधिक एकभर महीमेतां निस्सन मयतेद्रिय । माँगकर ही ल्यये ॥ १९ ॥ सन्यासीका पृापर अकले ही विचरना चाहिये । उसकी कही भी आसक्तिन आत्मक्रीड आत्मरत आग्मवान् समदछनः ॥२०॥ आपमे ही मस्त रहे, आम-प्रमर्म ही तन्मय र हो, स्व इन्द्रियों अपन पशम हों । यह अपने- विविधमशरणा मदाबविमलाठमः। | प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियोंमें भी ये रक्स और सर्वत्र समानम्पसे स्थित परम्हमारा अनुभम करमा रह ॥ २० ॥ सन्यासीफो निर्जन और निर्भय आत्मान चिन्तयेदेकममदन मया मुनिः ॥२१॥ | ण्यन्त स्थानमें रहना चाहिय । उसका एय निरन्तर मेरी माझ्नासे विशुन यना रहे । यह अपन-अपका अन्वीक्षेतात्मना पघं मोक्ष च शाननिष्ठया । मुझसे अमित और अदितीप, अडके मपमें चिन्तन करे ॥ २१ ॥ यह अपनी माननिष्ठासे पिसके कम बन्ध इन्द्रियविक्षया माध एपी च सयम ॥२२॥ और मोक्षपर विचार करे क्या निश्चय करे कि इन्दियोका विपयोंक किये विशित होना--पास होना पनी सम्माधिपम्प पलंग मनापेन चरे मनि । और उनको सयमम रस्ता ही मोधी॥ २२ ॥ इस लिये सन्यासीको पाहिये कि मन एष पाँचों मानेन्द्रियों- विरक्त पुछकामेम्पोलम्चाऽऽरमनि सुर्ख महत्२३ मधा मुंह मोड़ ले और अपने-आप ही परम आनन्द को जीत के, मागोंकी क्षुद्रत्न समझकर उनकी ओरसे का अनुभव परे । इस प्रकार यह मेरी भाक्नासे भरपर पुरपामग्रजान् साधान् भिसाथ प्रविसंधरत् । पृथ्वीमें विचरता गदे ॥ २३ ॥ के भिक्षके लिये ही नगर, गाय, अझीरोपी यस्ती य यात्रियोंकी टाम्पमें जय । पुष्पदशमरिच्छलानाभमवती महीम् ॥२४॥ पवित्र ठा, नदी, पमत, मन भर अभमासे धर्म में स्निा कहीं मा नोई घूमना-फिरता रहे ।। २१ ।। भिक्षा भी अधिकतर मानसियाम भाप्रमसे ही हम पानप्रम्याश्रमपदप्वभीष्मं मध्यमाररत् । करे । स्यापि पटे हुए नॉक नसे पनी हुइ मिश प्रम ही रिफा भुर फर पनीर उससे पण मंसिम्परपाधर्ममार शुद्धसाप शिठापसा||२५॥ मुचा माह दूर हार सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ २५ ॥ 'गा। ।

. १८] एकादष्प स्कन्ध वववस्तुतया पश्येद् श्यमानं विनश्यति । विचारवान् संन्यासी सस्यमान जगत्को सत्य वस्तु कमी न समस, क्योंकि यह तो प्रत्यक्ष ही नाशवान् सक्तपित्तो विरमेदिहामुत्र चिकीर्पिवात् ॥२६॥ है । इस जगत्में कहीं में अपने चित्रको प्राये नहीं । इस बेक और परलोकमें जो कुछ करने अनेकी इच्छा हा, उससे विरक हो नाय ॥ २६ ॥ सन्यासी विचार देख्दात्मनि जग मनोवामाणसातम् । करे कि भारमामें जो मन, वाणी और प्राणा सबात- रूप यह जगत् है, यह सारा-का-सारा माया ही है। पर्व मायेति सर्केण स्वस्यस्त्यक्त्वा न वत् सरे॥२७॥ इस विचारफे मारा इसका वाध करके आने स्वपमें भित हो जाय और फिर कभी टसा स्मरण भी न ज्ञाननिष्ठा पिरको वा महको वानपेक्षका । परे ॥ २७ ॥ माननिष्ठ, विरक मुमुक्षु और मोक्षकी भी अपना न रम्नवात्य मेरा भक आश्रमोकी मर्पदामें बन नहीं है। चाहे तो बाश्रमों और उनके चिहको सलिलानाथमास्त्पत्त्या घरदविधिगाचरः ॥२८॥ प छोपकर, वद-शास्त्रक विधि निपेघोंसे परे होकर खन्छन्द विचरे ॥ २८॥ वह युद्धिमान् होकर भी मुधो पालफनत् क्रीठत् सतला अउपयरत् । चालकों के समान खेले । निपुण होकर भी नस्यत् रहे, विशन् होकर भी पागली तरह बातचीत परे और समस्त बद-विधियोंका जानकार हायर भी पशुचिसे चदेदुन्मन विद्वान् गोचर्या नैगमधरेत् ।।२९।। ( अनियत आधारयान् ) रहे ॥ २० ॥ उसे चाहिये शिॉक फमकाण्ड-भागी व्याख्याम न लगे, पाखण्ड वेदचादरतो न स्थान पायष्टी न इंतुफः । म करे, त्य-क्तिकसे बचे और वहाँ फोग वाद-चित्राट हो रहा हा, यहाँ का पक्ष न ठ॥ ३० ॥ यह इतना शुकवादविवाद न कंचित् पक्ष समाभयेत् ॥३०॥ क्वान् हो कि उसक मनमें किसी भी प्राणीसे उद्वेग न हो रह स्वयं भी किसी प्राणीको उद्विग्न न करे। उसकी पोइ निन्ग करे, ता अमनतासे सह ले, किसीकर नादिजेस जनाद धीरा जर्न चाइजयम तु । अपमान न करे। प्रिय उप ! सन्यासी इस शरीरक रिय किसीसे भी पर न करे । एस र ता पशु करते अविपादांम्तिविधेत नापमन्पत कचन। हैं।॥ ३१ ॥ जैसे एक ही चन्द्रमा उपसे भरे हुए विभिन्न पात्रोंमें अया अश्या रिस्पी रता है, वैसे ही एक ही परमात्मा समस्त प्राणियामें और अपनमें भी देसरिश्य पशुपद पर फुयाम कनचित् ॥३१॥ किन है। सबकी भरमा तो एफ है ही, पञ्चभूतोंसे क्ने हुए शरीर भी सबक एक ही है, क्योंकि सय पाय- भातिक ही तो है। (सी अपस्थामें किसी से भी वैर एक एव परा प्रारमा भूप्यात्मन्पपम्भित । विगध करना अपना ही घर-पिराध है)॥ ३२ ॥ पपेन्दुरुदपात्र भूतान्येकारमानि च ॥३२॥ प्रिय उदय ! सन्यासीको किसी दिन पदि सम्पपर अलावान विपीदेत माउ काल मनकचिन् । भोजन न मिल, तो उसे दुखी नहीं हाना चाहिय और - - -- ८२० भीमद्भागमत [म.१८ लम्बानाप्ये कृतिमानुभय देवतान्त्रितम् ॥३३।। , यदि बराबर मिलता रहे, तो हर्पित न होना चाहिये। उसे चाहिये कि यह कैर्य रक्ले । मनमें हर्म और सिर दोनों प्रकारक विकार न आने द, क्योंकि भोक्न मिलना आहागर्म समीहत युक्त वत्माणधारगम् । और न मिलना दोनों ही प्रारबके अधीन है॥ ३३ ॥ मिक्षा अवश्य माँगनी चाहिये, ऐसा करना उक्ति ही तत्त्व विमृश्यते तेन वद विशाम विमुच्यते ॥३॥ है, क्योंकि भिक्षासे ही प्राणोकी रक्षा होती है। फ्रण रहनेसे ही तत्त्वका विधार होता है और तत्वविचारसे परमछयोपपनाममपाठमवापरम् तत्त्वज्ञान होकर मुक्ति मिलती है ॥ ३४ ॥ संन्यासीको प्रारम्के अनुसार अच्छी या पुरीजैसी भी मिश्रा मिल वाय, उसीसे पेट भर ले । यम और बिछौने भी तधामासस्तथा शय्यां प्राप्तंप्राप्त भजेन्सनिः॥३५॥ से मिल जाय, उम्हीसे काम का ले। उनमें बलेन या मुरेपनकी कल्पना न करे ॥३५॥ जैसे में परमार शांचमाचमनं स्नान न तु चोदनया परे । होनेस भी अपनी स्टीलमसे ही शौच क्षार शामोळ नियमों का पालन करता है, वैसे ही ज्ञाननिष्ठ पुर भी अन्पांम नियमाधानी यथाई लीलयेकर ॥३६॥ शौच, आचमन, स्नान और दूसरे नियमका सीम्पसे ही थाचरण कर । क शासविधिक अधीन होकर विधि किएर होकर न करे ॥ ३६ ॥ क्योंकि माननिष्ठ पुरु- को भेदकी प्रतीति ही नहीं होती। जो पाले पी, पर न दिवसमा मिकल्पासपा या घमदीक्षया दवा। भी मुन्न सारमा सभात्यारसे नए हो गयी। परि | कभी-कभी मरणपन्त बाधित की प्रतीनि मी होनी श्रादहान्तान् कचित् रूपाविस्तत सम्पद्यते मपा।३७॥ है, तब भी देइपात हो जानपर षद मुजसे एक हो जाता है॥ ३७॥ द सादपु कामपु बातनिर्वेद भारमवान् । उनी । (यह तो हुदमानवान्यी यात, अत्र कायत पराम्पवानकी मात मुना)। जितन्द्रिय पुरुष, जब यह निमप हो जाय कि संसारक वियोंफ भागका अजितामितमर्मा गुरु मुनिमुपाय बेत् ॥३॥ महीनस तव वह सिरक हा जाय और पति पर मरी प्रासिक साधनोंका न मानता होता भगतचिन्तनमें तमप रहनेवास प्रमनिष्ठ सदुभी शरम पारन् परिघरद भक्ता अदापाननम्पक । प्रहण कर ॥ ३८ ॥ गुरुकी भक्ति को प्रता रस्स आम उनमें लार कभी न निकाला जपतफ प्राका यार मम विघानीया मामप गुरुमात ॥३९॥ पान छ, तपता या आगरसे मझ ही गुरुक रुपमै समाना रआ उनकी सेवा कर ॥ ३०॥ पित्त सिन पाच इन्द्रियों मार मन, इन दाम पिम्प मा प्रास परपसंपतपवग प्रचणन्द्रियसारधि । पी सिपमा घा, अ युलिन सर

०१८]
एकादय स्कन्ध
८२१
ज्ञानवैराग्यरहितखिदणामुपजीवति ॥४०॥ विगा हुए हैं और जिसके बदयों न ज्ञान है और न
सो वैराग्य, यह यPि त्रिदण्डी सन्यासीका पप धारणपर
सुरानात्मानमास्मस्थं निहनुते मां च धर्मदा ।
पेट पासता है तो यह संन्यासधमका सत्तानाश ही कर
रहा है और अपने पूप दफनाओंका, अपने-आपकरे
अषिपापापोऽमादप्मा बिहीयते ॥४॥
और अपने हदयमें स्थित मुनको ठगनेकी चेटा करता है।
अभी उस वेषमात्रक सम्यासीकी वासनाएँ क्षीण नहीं
मियोधर्मः शमोऽहिंसा सप ईक्षा वनौकस । हर है, इसलिये इस त्येक और परमेक दोनोंसे
हाय धो बैठता है ||१०-११॥ संन्यासीका मुख्य
धर्म है-गन्ति और अहिंसा । वानप्रस्थीका मुल्य धर्म
गृहिणो भूतरक्षेच्या विजयाचार्यसेवनम् ॥४२॥ हे तपस्य और भगाय । गृहस्थका मुख्य धर्म है-
| प्राणियोंकी रक्षा भार यय-त्याग तथ प्रभचारीमा मुख्य
प्रश्नचर्य तपः शेष सन्तोपो भूतसौपदम् । धम है-आचार्यकी सेवा ।। १२ । गृहम्प मी कमल
तयारमें ही अपनी मीका सहसास करे । उसक
लिये भी स्मपर्य, तपस्य, शौच, सन्तोर और समस्त
ग्रामसाप्पृष्ठो गन्तुः सर्वेपो मदुपासनम् ॥४३॥ प्राणियोंक प्राप्त प्रमभाव- ये मुम्य धम है । मेरी
उपासना तो सभी करनी चाहिये ॥ १३ ॥ जो पुरुष
इति मायः स्वधर्मेण भजेभित्पमनन्यभाक् । इस प्रकार अनन्यमापसे अपने वर्णाश्रमम के द्वारा मेरी
सेवाम गा रहता है और समस्त प्राणियोंमें मेरी भायना
सर्वमतेपु मनावो मक्ति विन्दते पदाम् ॥४२॥ करता रहता है, उसे भी अपिधर मक्कि प्राप्त हो जाती
||११|| उदयनी ! म सम्पूण टोकोका एकमात्र
भकपादवानपापिन्मा सबलोकमहपरम् ।
स्वामी, सपकी उत्पत्ति और प्रयकर परम फारम प्रम ।
सर्वोत्पत्पप्पप प्रम कारणं मापयाति स ॥४५॥ | निस्प-निरन्तर कनेवाली पण भडिके शरा वह मुन्ध
प्राप्त कर लेता है॥१५॥ इस प्रकार कर गृहस्स
इति स्वधर्मनिणितसला निनावमहविः ।
अपने धर्मपालन करा अन्त करणको मुद करके मेरे
एमयको-मरे स्वरूपको जान हता है और हमन-विहानसे
पानविज्ञानसम्पन्ना नधिराद समुपैति माम् ॥४६॥ सम्पन्न होकर शीघ्र ही मुझ प्राप्त कर लेता है ॥१६॥
मने तुम्हें यह सवासाररूप षणाश्रमिपोंका धम यतव्यया
वर्गाश्रममा धर्म एप आधाररक्षण । है । यदि इस मानुक्रनमें मेरी भतिका पुट मग अप,
स्व तो इससे बनायास ही परम कल्याणस्तरूप मोझकी
स एम मडक्तियुसा नि:भपसकरः परः ॥४७||
प्राप्ति हो जय ॥ १७॥ सापुखमाम उदय ! तुमने
पदाभिहित साधो भवान् पन्छति पय माम्।
मुझसे बे प्रश्न किया था, उसका उत्तर मेने दे दिया
पर यह बताया कि अपने धमका पालन करनवाय
पधास्वपमसंपुका भक्ता मा समियात् परम् ।।४८॥ | मत मुम परासरूपका किस प्रकार प्राप्त होसार ॥२८॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमईस्पो संहितापानेकादशकाये मधदशोऽध्याय ॥ १८॥

२२ भीमद्भागवत . अथैकोनविंशोऽध्याय भफि पान मौर यम-निपमादि सापोन वर्णन श्रीभगवानुपाप भगवान् श्रीकम करते है.--उबजी 1 बिराने उपनिषदादि शाखोंक प्रवण, मनन और निरियसनके या वियाभुतसम्पन्न आत्मवान् नानुभानिकः। शारा भस्मसाक्षात्कार कर लिया है, जो श्रोत्रिय एक मनिष्ट है, विसफा निश्चय केल युक्तियों और भनुम्मनों- मायामाप्रमिदं सात्वामान च मपि सन्यसेत् ॥ १॥ पर ही निर्भर नहीं करता, दूसरे शन्दमि–जो केक परोक्षशानी नहीं पाए जानफर कि सम्म इत- पानिनस्त्वामवेए खाद्घ हेतम संमतः । प्रपत्र और इसकी निवृत्तिका साधन वृतिमान मापामात्र है, उन्हें मुममें स्वन कर दे, वे दोनों ही मुा कत्मामें म्वर्गभेषापवर्गव नान्मार्थो मते प्रियः ॥२॥ अयम्स हैं, एसा जान ले ॥ १ ॥ बानी पुरुषका अभीष्ट कार्य में ही उसके साधन-साप्य, स्वर्ग बौर झाननिशानसमिक्षाः पदं श्रेष्ठ लिदुर्मम । अश्वग भी में ही हूँ, मेरे अतिरिक्त और किसी मी पदार्पसे र प्रम नहीं करता ॥ २ ॥ जोबन और नानी प्रियतमोऽनो मेघाननामा विभर्ति माम्।। ३॥ स्वरूपको जानते हैं। इसीलिये ज्ञानी पुरुष मुस सक्से विमानसे सम्पन्न सिद्धपुरुप है, वे ही मरे वास्तविक प्रिय है । उदयनी । मानी फुप अपने एनके द्वारा तपस्वी नपा दान पवित्राणीतराणि च । निरन्तर मुप्त अपने अन्त करणमें क्षरण परत है ॥३॥ तत्त्वज्ञानके मात्रका उदय होनेसे जो सिद्धि प्राप्त नालं कुर्वन्ति तां सिदिमा धानालया रुता ॥४॥ होती है, यह तपस्या, तीष, अप, दान अथवा अन्त करणशुद्धिके और किसी भी साधनसे पूर्णतया नहीं हो तमामानेन सहित मास्वा स्वास्मानसम । सक्ती ॥१॥इसपिये मेरे प्यारे उद्भव ! तुम धानके सहित अपने अरमसहएको जान स्पे धौर फिर बान शानविधानसम्पन्नो भन्न मां भक्तिभावितः ॥ ५॥ पाप मुनियोंने शान-विधानरूप पाक द्वारा अपने विधानसे सम्पन होकर भकिमाषसे मेरा मन करो ॥५॥ पन्त फरणमें मुझ सब यो मधिपति धामाका पनन शानविधानपान मामिष्ट्याऽऽत्मानमात्मनि । करके परम सिन्दि प्राप्त की ॥ ६ ॥ उसब ! आप्यास्मिक, वापिदैविक और माधिभौतिक-इन तीन मर्चयापति मा वै ससिदि मनपाऽगमन् ॥ ६॥ क्यिारों की समष्टि ही शरीर । और पर्सन मारे आभित है। यह पहले नहीं पा पौर वन्तमें नहीं स्वय्यदपाधयति पत्रिविधी विकारो हेग, कका वीचमे ही मीरा रहा है। इसलिये इसे जादूके रसके समान माया ही समझनी चाहिये । इसके मापान्तराऽऽपतति नायपमर्गयोर्यत् । जो स्मना, राना, काना, कमा, पटना र मर १ नमगा। २ एरिम् ।

म०१९] एकादश स्कन्ध आप ही । जमादयोऽस्य यदमी तव तस्य किं स्यु | होना ये भावविकार है, इनसे तुमारा कोई सम्पय नहीं है। यही नहीं, य विशर उसके भी नहीं है, स्योंकि यह वय असर ह । धसत् वस्तु ते पहल राय तपादमताऽन्ति तदप मम ॥ ७॥ नहीं थी, बदमें भी नहीं रहेगी, इसलिये वीचमें मी उसका कोई अस्तित्व नहीं होता ॥ ७॥ उपव उपाय उपजीने करा-विषम्प परमार झान विशुद्ध विपुलं पर्यंत विपके स्वामी है। आपका या पराग्य और विहानसे युक्त सनातन एवं विशुद्ध शान जिप्त प्रकार मद हो दैराग्यविज्ञानयुतं पुराणम् । जाय, उसी प्रकार मुझे स्पष्ट मारय समझाइये और उस आरूपादि विषधर विश्चम अपने भकियोगमा भी क्णन कीजिय, जिसे प्रक्षा आदि त्वद्भक्तियोग च महरिमृग्यम् ॥ ८॥ महापुरुष भी ढूंदा करते हैं ॥ ८ ॥ मेरे साम्य ! जो तापत्रयेणाभिहतस्स पारे पुस्य इस संसारक विकट मार्गमे तीनों तापोंक धपेड़ सतप्यमानस्य भवाम्पनीश। | स्वा और भीतर-बाहर जट-मुन रहे हैं, उनक लिये आफ्क अमृत युगउ चरणारक्दिोंकी छत्रछायाक पश्यामि नान्यन्छरम समाधि अतिरिक्त और कोई भी आश्रय नहीं दीखता ॥ १ ॥ इन्दासपवादमवाभिवपात् ॥९॥ माहानुभाव ! आफ्ा या अफ्ना सेक्क अवर कुरम दष्ट जन संपवित विलेऽमिन् पड़ा हुनाह, फारसपी सपने इसे रस रफ्त है, कालाहिना क्षुद्रसुन्बोलतर्पम् । फिर मी त्रिपोक क्षुद्र पुरु-भागोंकी तीन सृष्णन मिटती समुदरन रुपमाऽऽपन- | नहीं, कसी ही जा रही है । आप क्या फरक इसका उदार कीजिये और इससे मुक्त करनेवाठी वाणीकी सुधा पंचोभिरासित्र महानुभाव ॥१०॥ | घरासे इसे मगार कर दाचिये ॥ १० ॥ धौभगषानुपाष भगवान् भीष्णमे कहा-उदयनी ! जो प्रश्न इस्थमेतत् पुरा राजा भीष्म धर्मभृतां परम् । | तुमने मुझसे किया है, यही प्रश्न वमगज युधिमिने धार्मिकशिरामणि भीष्मपितामइसे किया या । उस समय अजातशत्रु पप्रच्छ सर्वेपी नोऽनुमण्यताम् ॥११॥ हम सभी अंग यहाँ विपम्मन थे ॥ ११ ॥ सब भारतीय निच भारते पुरे मुहभियनपिहरू । महायुद समाप्त हो चुका था और रर्मराज युधिभि अपन | सबन-सम्पन्धियोंक संहारसे शोक-बिर हो रहे थे, श्रुत्वाधर्मान् पान् पभान्मोषधमानपच्छत ॥१२॥ स्म उन्हॉन मीप्मपितामहसे अस्त-से धर्मोका विवरण मुननक पश्चात् मोक्षक साधनोंक सम्यन्धमें प्रश्न किया वाना तेऽभिधासामि देवव्रतमुवान्तान् । प॥ १२ ॥ उस समय भीष्मपितामहक मुससे सुने हुए मोक्ष धर्म में तुम्हें सुनाऊँग । क्योंकि वे मान, पैगम्प, विधान, पानपैराग्यविज्ञानभवामक्त्युपररितान् ॥१३॥ श्रया और मकिके भावोंसे परिपूर्ण है ॥ १३॥ उद्वनी निस हानसे प्रात पुस, मइल हार और नवैकादश पत्र प्रीन् भावान् मतेषु येन थे । पप्रामाश्रय ना, पाप शननिय, पांच फर्मेन्दिय धीर १ पापोन प्रदिम सडर वापरफे से ११३ पोको पूरा भमम्तां परम् । सनपाट नहै। २ पनरिमनगम ।

८२४
श्रीमद्भागवत
[.१९
"
श्वेताकमप्येषु वनमाने मम निधिवम् ॥१४॥ | एफ मन ये म्पारह, पाँच म्हामून और तीन गुण
अात् इन अट्ठाईस तत्वोको ममासे पर तुगता
सम्पूर्ण कार्योंमें देखा जाता है और इनमें भी एक परमाण
एतदेव हि विज्ञान न तयेफेन येन यत् ।
तत्वको अनुगत मापसे देखा जाता है-मह परोक्षान्न
है, ऐसा मेरा निभय ह ॥ १९॥ स्व विस एक तस्मसे
अनुग्न एफल्मक तस्वोंको पहले देख्ता पा, उनको पत्रे
सित्पुस्पत्यप्पयान् पश्येत् भाषानां त्रिगुणात्मनाम्॥ देने, तव यही निश्चित विज्ञान ( अपरोक्षधान ) का
समान न देस्से, फितु एक परमारण प्रमको ही
जाता है। (इस मान और विमानको प्राप्त करनेकी
आदायन्ते पमन्य च सन्यावसृन्य मदन्वियात् ।
युति यह है कि) यह शरीर कादि तिने भी भिगुमात्मक
सवस्य पदार्प है, उनकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रम्पका
विचार करे ।। १५॥ बो तलवस्तु सुपिके प्ररम्मम
और मन्तमें कारणरूपसे ति रहती है, पी मपमें
पुनस्तस्प्रतिसफामे पच्छिम्येत सदेव सत् ॥१६॥ भी रहती है और यही प्रतीयमान कार्यसे प्रतीयमग्न
कार्यान्सरमै अनुगत मी होती है। फिर न कार्योका
प्रध्य अयमा पाप होने पर उसके सभी एष वनिधन
वति प्रस्पधमतिममनुमान चतुष्टयम् ।
रूपसे शेष र आती है। यही सत्य परमार्थ वस्तु है, एस
समन् ॥ १६ ॥ श्रुति, प्रत्यक्ष, ऐतिथ (महारोंमें
प्रसिदि ) और अनुमान-प्रमाणों में यह चार मुख्स हैं।
प्रमाणप्पनरम्पाना रिकस्पात् स विरन्पते ॥१७॥ | इनकी कसौटी पर कसनेसे सस प्रपञ्च मलिर, नर एन
विकारी एनेके कारण सत्य सिद्ध नहीं होता, इसलिये
विस्की पुरस इस विविध कल्पनारूप अपना शम्दमात्र
कर्मणां परिणामिस्वादापिरिबादमङ्गलम् ।
प्रपसे पिरक हो बाता है॥ १७ ॥ विवेकी पुरुषको
चाहिये कि वा स्वर्गादि फल देनेवाले यानि फकि
परिणामी-नभर होनेके कारण प्रकपर्यन्त लादि
विपथिभर पश्येदरष्टमपि स्टवत् ॥१८॥ | मुस–भएको भी इस प्रपञ्च चित्रप-मुलके समान ही
यमय, दुखदायी एव नाशवान् समझे ॥ १८॥
भफियागः पुरैपोका प्रीयमाणाय तेऽनप ।
निग्याप ठप्पची ! मक्तियोगका नमन में हमें पते
ही मुना का परस्तु उसमें मुम्हारी मात प्रीति ,
पुनध थपिम्पामि महाक मारण परम् ॥१९॥ इसम्मेि में तुम्हें फिरसे भक्ति प्राप्त होनमा श्रेष्ठ सफ्न
कामता हूँ ॥ १९ ॥ जो मेरी भक्ति प्राप्त करना चाहता
भदामृतम्यायो मे एपन्मदनुकीर्तनम् ।
हो, म मेरी अमृतमयी फल्पामें प्रदा रमसे, निरम मरे
गुण, पीय और नामका साहीत करे; मेरी पूजा में अापत
परिनिष्ठा प पूजायो स्तुविमिः सरनं मम ॥२०॥ निष्ठा रस्से और स्त्रोत्रोंक शरा मे स्तुति करे ॥ २ ॥

अ० १९] एकादश स्कम ८२५ आदर: परिचर्यायो सारैरभिवन्दनम् । | मेरी सेन-पूजामें प्रेम रस्ते और सामने साध्याम | छोटकर प्रणाम करे, मेरे भोंकी पूजा मेरी मनकाम्पधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः ॥२१॥ | पूनासे सफर करे और समस्त प्राणियोंमें मुझे ही देखे ॥ २१ ॥ अपने एक-एक महकी चेष्ट्य के मेरे मदर्थेनान्वेष्टा च पवसा मदगुणेरणम् । ही लिये फरे, पाणीसे मेरे ही गुणोंका गान करे और मप्यर्पर्ण मनसः सर्वकामविषर्जनम् ॥२२॥ वरना मन भी मुझे ही पित कर तपा सारी कामनाएँ छोड़ दे ॥ २२ ॥ मेरे लिये धन, भोग और मदर्थेऽर्थपरित्यागा भोगस्य च सुखस्य च । प्राप्त मुहका भी परिपग कर दे और जो कुछ यन, दान, हसन, जप, रस और तप किया माम, वा सय पष्टं दच हवं जप्स मदर्भ यद् वः तप ॥२३॥ | मेरे लिये ही करे ॥ २३ ॥ उदयनी ! जो मनुष्य इन धोका पाटन करते वीर मेरे प्रति प्रात्म-निवेदन पर देव हैं, उनके दपमें मेरी प्रमयी मक्तिका उदय धर्मर्मनुप्पाणावात्मनिषेदिनाम् । होता है और जिसे मेरी मति प्राप्त हो गयी, उसके मपि सजायते भकि कोऽयो ऽस्यावशिष्यते॥२४॥ उिये और किस दूसरी मस्तुका प्राप्त होना शेष रह जाता है।॥२५॥ यदात्मन्यर्पित पित्तशान्त सम्योपवितम् । इस प्रकारक धोका पाउन करनेसे पिच व सस गुणकी हदि होती है बोर कर शस्त होकर बारमा भौ पान सवैराग्यमैपप चीभिपपत ॥२५॥ लग मता है। उस समय साधक्सो धर्म, पान, राम्प और एपर्य रूप ही प्राप्त हो ज्यते॥२५॥ पर संसार विविध कम्पनाओंसे भरपूर है। सच पूछा तो पदर्पित वा विकल्प इन्द्रियै परिभावति । इस्पा नाम तो है, मित्त कोई वस्तु नहीं है। जब वित इसमें छान Pपा जाता है, तब इन्दियोंके साप धर-उधर मापने लगता। इस प्रकार पित्त रजागुग रजम्बलं धासभिष्ट पिनं विद्धि विपर्ययम् ॥२६॥ ) को बाइ वा जाती है, यह असत् वस्तुम या पता है और उसके धर्म, हान भागितामाही आते है अधम, अदान और माफा भी पर न जाय॥२६॥ धर्मा मनिकन प्राकामानयनरम्पदमनम्। उदर 1 जिससे ममी भक्ति हो, वही गम है, जिससे मन और भारमा एकतारा साकार हा, ही मान गुणधमला परम्पमध्य पाणिमादय ॥२७॥ पिपासे असह-नि रहना ही परम्पर और अनिमावि सिदियों एभप ॥ २७ ॥ उसवीन बा-मिएमएन ! पम और निपम यम विधि प्रामा निपमा शारिम्सन । कितने प्रारक है। श्रीाम ! सम स्म! म गम कादम रुप्मतितिक्षापनि प्रभा२८) क्या ! प्रभा । निEि भार २८॥ दिनतिर मोय कि मस्पमृतमूल्यन । और मुशान तम्या गुना, मप और 'प्लस भी १ पाते। उपर उतार काप ८२६ श्रीमहायपत [.१९ . फस्त्यागः किं धनंषेप्टको यज्ञः पाचदक्षिणा॥२९॥ स्वरूप स्तमइये । त्यग क्या है ! नमीष्ठ धन कौन-स है। या किसे कहते हैं। और दक्षिण मा का पुसः किंस्विर पलं श्रीमन् भगो लाभव केशव । है ॥२९॥ भीमान् केशव ! पुरुषका सभामा म्या फा वियाही पराका श्रीः किं सुख दुस्वमेव च।३० है। मग किसे कहते हैं। और समस्या रस्त है। उसम विषा, छत्रा, श्री तप पुस और दुम क्स का पम्मितः कम मूर्ख का पन्धा उत्पपय क । है॥३०॥ पणित और मुसके आम प्या हैं ! और कुमार्गका क्या लवण है । पर्ण और नरक क्या है। का स्वर्गा नरफा का स्थित को पन्धुरुत किं गृहम्।३१। भाई-मधु किसे मानना चाहिये और घर स्पा है। ॥३१॥ कमाया को दरिद्रामा कपणा का कईश्वरः । पनान् वीर निर्धन किसे करवे ! पण फोन है। और ईसर किसे करते । भक्तपसा प्रभो! बाप एसान् प्रश्नान मम हि विपरीतांम सत्पते ॥३२॥ | बिरोधी भावोंकी भी म्पाख्या मीचिये ॥ ३२ ॥ मेरे इन प्रश्नों का उत्तर दीनिये और साप ही इनके भीभगवानुमान भगवान् श्रीरुप्यने काममा बारी-अहिंसा, अहिंसा सत्पमस्तेयमसको सरप, वस्सेय ( चोरी न करना ), असहता, मन, हीरसचयः। सप्तम्य (भावश्यकतासे बधिक धन आदि म जोमना), आस्तिस्य प्रमचय च मौन स्थैर्य धमाभयम् ॥३३॥ अस्तिकता, अमर्य, मौन, स्पिरता, क्षमा वीर अस्प । नियमों की संख्या भी यारा ही है। शौच (बाहरी पवित्रत शौचं वपस्तपो होमः श्रदाऽऽतिष्पं मदर्चनम् । भौर भीतरी पवित्रता ), जप, तप, हफ्न, भ, अतिपिसेवा, मेमी पूज, तीर्थयात्रा, परोपकारकी चस, तीधारन परार्धेहा तुष्टिराचार्यसेवनम् ॥३४॥ सन्तोष और गुरुसेवा-इस प्रकार यम और नियम दानों- की संख्या सह-मार हैं। ये सकाम और निकम्म एते यमाः मनियमा उभयोदश स्मृताः । दोनों प्रकारके साधकोंके लिये उपयोगी है। उसी ! पुमामुपामिवास्तास पयाकाम दुइन्ति हि ॥३५॥ ठमके यानुसर उ, भोग और मोक्ष दोनों प्रान जो पुरुष इनसा पालन करते हैं, ये यम और नियम समा मभिष्ठता पुदर्दम इन्द्रियसंयम । करते हैं ॥३३-३५॥ युविका मुझमें छा जन्म ही शम' है। इन्द्रियों के सपमा नाम दमाम्पापसे प्राम दमक तिनिधा दाममो जिहोपस्यजया शतिः ॥३६॥ साइने नाम नितिक्षा है। विदा और जननेन्द्रियर निस्य प्राप्त करना धैर्य है। किसीसे राह न करना सबको दरयाम परं दानं फामत्यागम्तपः स्मृतम् । अभय दना "नामनामा त्याग करना ही है। अग्नी यासनाओंपर पिस्य प्रप्स मारनाही तर सत्र बभावरिअप गाय सस्य च ममदर्शनम् ॥३७॥ समबरप, सम्पनरूप परमाम्मका न ही सपा ३७ प्रानं ममन्ता वाणा परिभि परिशीनिना। से प्रकार सर और मधुर पर कोही मामाभोंने समा पहा है। कामि मासक नहाना हो । ममममम अपग्गाग मन्याम उन्मत ॥३॥ कामनाऔर एग ही मu urge १ ॥ ३८ ॥ -- म०१९] एकादश स्कन्ध ८२७ धर्म इष्ट धनं नृणां यशोऽहं भगवचमः । धर्म ही मनुष्योंका अमीष्ठ पन' है। मैं परमेपर ही या है। इनका उपदेश देना ही दक्षिणा प्राणायामहीमेटम्पक दक्षिणा ज्ञानसंदेशः प्राणायामः परं परम् ।।३९।।।।३९। मेरा ऐपर्य ही म, मेरी भेष्ठ भकिही उत्तम भयमा है, सची विचाबी है जिससे प्रम और भारमाका भगो में ऐश्वरो भाषो लाभो मनक्तिरुपमः । भेद मिट जाता है। पाप करनेसे पूणा होनेका नाम ही का है॥१०॥ निरपेक्षता वादि गुण ही शरीरका सबा विद्याऽऽत्मनि भिदायापो सुगुप्सा हीरफर्मस॥४०॥ सौन्दर्य भी है, दुसौर मुख दोमोंकी मारनाफा सदाके किये नए हो जाना ही मुसा है । विषयभोगों की भीगंगा नरपेक्ष्यापाः मुख दासमुखास्पयः। काम्ना ही है। जो पन्धन और मोक्षका तत्व बानता है, वही पण्डिता है॥ ११॥ शरीर भादिमें दुखेकामसुलापेक्षा पण्ठियो कन्धमोपषिद् ॥४१॥ जिसका मैपन है, यही मूर्छ । नो संसारकी मोरसे मात करके मुझे प्राप्त करा देता है, यही सपा मुम्न है। मुझे देशापतिः पन्या मभिगमः स्मृतः । चितकी बहिर्मुस्ता ही कुम । सत्त्वगुणकी दि ही सर्ग और सस्ते । तमोगुणकी दिही 'नरका उत्पथपिचविक्षेपः स्वर्गः सुवगुणादयः ॥४२॥ है। गुरु ही सपा माई मन्भु' है और वा गुरु में ई । यह मनुष्य-शरीर ही सभा 'घर' है मरकस्तमउन्नाहा पन्धुर्णकर बन्धुर्मुस ससे। तग सचा 'धनी पह, नो गुणोंसे सम्पन है, जिसक पास गुणोंका बजाना ॥ ४२१३॥ जिसके पितमे असतोप, अभामका बोध है, ही परिखा है। जो गृह शरीरं मानुप्म गुणात्या पाय उच्यते ॥४३॥ नितेन्द्रिय नही है, सही पाया है। समर्थ, स्वतन्त्र दरिद्रा यस्त्वसंतुष्टपणो योऽपितेन्द्रियः । वीर 'इवर पर, जिसकी चिमति विषयोंमें आसक नहीं है। इसके विपरीत विपमि असक्त है, बी गुपप्पसकधारीचा गुणसी विपर्ययः ॥४४॥ मग मस१५ परे रश्मन चिरले प्रश्न पूछ थे, उनका उच्च मन दे दिया, इनको स्मा सेना मोक्षमार्गक लिये सहायक है। में उन्हें गुम एत उग्य ते प्रश्नाः सर्षे साधु निरूपिता । और दागेका छAण अमग अग कतिक ताऊँ। सवमा सारांश इतने ही समय लो कि गुणों भीर किं वणिवेन पाहुना लक्षण गुणदापया । दोषणेपर रि जाना ही सबसे बड़ा दोर भर गुण- दायॉपर शिन जाफर अपने शस्त नि सरन्स म्ममपम गुणदापचिपा गुणस्तूभमवर्जितः ॥४५॥ मित रह वही सबसे मका गुण है॥५॥ इति श्रीमागरते पापुराण पारमइस्पा सहितापामपा शसत्य एकानशिपाप ॥१९॥ । मोरा ८२८ भीमद्रामवत [२०२० तमा उचाप . , अथ विंशोऽध्याय पामयोग, कर्मयोग मोर भक्तियोग उदयमीमे करा-फाटनपन श्रीकृष्ण वाप सर्वशक्तिमान् है । आपकी भाशा ही वेद है, उसमें कुछ विषिष प्रतिपेधष निगमो परम ते । कोको करनेकी विधि है और कुम्के करनेका निषेध है। यह विधि निषेध फोक गुण और दोपकी परीक्षा अवेक्षतेऽरनिन्दाप गुणं दोपं च कर्मणाम् ॥ १॥ करके ही तो होता है ॥ १ ॥ वर्णभम मेव, प्रसिओम वर्णाभमविकस च प्रविसोमानुलोमत्रम् । वोर मनुलोमरूप पर्णसकर, कोंक उपमुछ और ब्नुपयुज म्य, देश, वायु वीर कालमा बर्ग और मरकके मेदोंका ग्रेप भी वेदोंसे ही होता है ॥ २ ॥ द्रम्पदेषषयाकालान् स्वर्ग नरफमेष घ ॥२॥| इसमें सम्देह नहीं कि आपकी षणी ही वेद , परस्तु उसमें विधि-निषेध ही तो मग पहा है। यदि समें गुणदोपभिदाष्टिमन्तरेण गुण और दोषमें मेद करने की रनि म हो, होर वचन। | प्राणियोंका फम्याण करनेमें समर्थ ही कैसे हो।॥३॥ निःश्रेयस फर्थ नृणां निषेधविधिलपणम् ॥ ३ ॥ देता और मनुष्यों के लिये भेष्ठ मर्ग-दर्शकमा काम सर्वशक्तिमान् परमेश्वर | सापकी वाणी वेद ही विसर, करता है, क्योंकि उसीके द्वारा सर्ग मोक्ष आदिमा पितृदेवमनुप्पाणा वेदमस्तमेश्वर । पस्तुओंका मोघ होता है और इस मेकमें भी किसका कौन-सा साप्प है और स्पा सन-पसमा निर्णय श्रेयस्स्वनुपलग्नेऽर्थे साध्यसाधनयारपि ॥ ४ ॥ भी उसीसे होता है॥॥ प्रमो। इसमें सदा नहीं कि गुण और दोमि भेददृष्टि वापकी माणी के ही गुणदोपभिदायटिनिंगमाप्ते नहि स्क्तः । अनुसर है, किसीकी अपनी कल्पना नही, परन्तु प्रश्न तो यह है कि आपकी वाणी ही भेदमा निषेध निगमेनापवादम भिदामा इति । प्रम ॥ ५॥ है। आप क्या करके मेरा र भ्रम मिटाये ॥ ५ ॥ भी करती है। यह शिरोध देखकर मुझे भ्रम हो रहा श्रीभगवानुवाच भगवान् भीडम्पने कहा-प्रिय उद्धप। मैने ही | केमि एवं पत्र भी मनु पोका कायाम करने लिये यागात्रयो मया प्रोका नमां भेयाविधिस्सया। | अधिकारिमेदसे तीन प्रकारके योगका उपयश मिया है। वे कान, कर्म और भक्ति । मनुप्पो परम मानकर्म घभकिप नापामाऽन्याऽस्ति चित्॥६॥ फम्याणक रिये इनके अतिरिक और कोई उपाय की | नहीं है ॥ ६ ॥ उदयनी ! ग्रे ग मो तम उनक फारमेंसे सिल हो गये हैं और मात्र स्पाग फर युके निर्षिणानां धानयागान्यासिनामिहर्मस । ये बानयोगके अधिकारी है। इसके विपरीत निक १ नियमात् । २ निम्मेमा ।

१०२०] तेपनिम्पिषिचानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्॥७॥। विसमें को धौर उनके फसे पेराम्य नहीं हुआ है, उनमें दु मुद्धि नहीं है, वे सकाम न्यछि फर्म- योग के अधिकारी हैं ।। ७॥ नो पुरुष न तो अत्यन्त पहच्या मत्कयादी बातमवस्तु यः पुमान् । विरक है और न पन्त मासळीतप किसी पूर्वजन्मके भुमकर्मसे सौभाम्पवश मेरी मम-कमा ननिर्षियो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्प सिदिः॥८॥ बादिमें उसकी श्रद्धा हो गयी है, यह भक्तियोगका अधिकारी है। उसे महिपांग परा ही सिद्धि मिश सकती है।॥ ८॥ कर्मक सम्बन्धमें जितने भी विधि- वापत् मणिनीस न निविपत यावता । निपेष , उनके अनुसार तभीतक धर्म करना चाहिये, अबतक कममप मगर बार उससे प्राप्त होनेवाले सर्गादि पुखोंसे पेराम्य न हो जाय- अपवा रक्तक मस्फयाभरणादौ या महा पापम जायते ॥९॥ मेरी पीय कमाके श्रवण-कीर्तन मादिमें प्रदा नरो बाप || ९॥ उदय | इस प्रकार अपने पूर्ण धीर स्वधर्मसो पवन् पोरनापी काम अब । साम्रमके अन् धर्म स्पिस राफर पोंक द्वारा मिना किसी माशा और कामनाके मेरी आराधना करता ये और निपिन कोसे पर यकर केवस विहित कमेका न पाति वर्गनरफो पपन्पन्न समाचरेत् ॥१०॥ आचरण करे तो उसे बर्ग या नरफमें नहीं जाना पाता ॥ १०॥ अपने धर्म, मिष्ट्य रस्नेवाम पुरुष इस शरीरमें राते-राते ही निविद कर्मका परित्याग कर यस्मिलोके वर्तमान स्वधर्मसोनमः शुचिः। देता है और रागादि ममेंसे मी मुक-पवित्र हो जाता है। इसीसे मनायास ही उसे मामसाक्षात्काररूप विशुद्ध तत्वाान अपपा बुत-विष्ट होनेपर मेरी भक्ति शान विश्वमाप्नोति मझक्ति वा परम्छया ॥११॥ प्रप्त होती है ॥ ११ ॥ यह विपिनिपघलप फर्मका अधिकारी मनुष्य शरीर बहुत ही दुर्छम है । वर्ग और नरक दोनों ही लोकों में रहनेवाले जीम इसकी अमिन्यापा सर्गिमोऽप्येतमिग्छन्ति लोक निरपिणस्तथा । करते रहते है, स्पोकि इसी शरीरमें अन्त करणकी शुदि हानेपर पान सपा मतिकी प्रालि हो सकती स्वर्ग अपया नरकमा मोगप्रधान शरीर किसी भी साथ शानभक्तिम्पासुभपं सदसाधकम् ॥१२॥ साफ्नके उपयुक्त नहीं है । मुद्धिमान् पुरुषका न तो स्वर्गकी अभिनय करनी चाहिये भौर न नरककी दी। न नरः सर्गति काामारी पा विषषणः । और सो स्य, इस मनुष्य-शरीरकी भी फामना न करनी चाहिये, क्योंकि किसी भी शरीरम गुणधुदि और वमिसन हो भनेसे अपने व्यस्त षिक वसापकी नेमं लोक पकाक्षत रहावेशा प्रमापति॥१३॥ प्राप्तिके साधनमें प्रपद होने माना है ॥ १२ १३ ॥ यपि यह मनुप्प-शरीर है तो मुस्थमस्त्र ही पस्तु इसके पूरा परमार्थकी-सप बस्तुकी प्रासि हो सकती एतद विद्वान् पुरा मुस्पारमवाय पटेस सः । । मुरिमान् पुरुषको चाहिये क्लिप बात जानकर मृत्यु भीमसागवत [१०२. । अप्रमच इदं शास्वा मर्पमप्यर्थसिदिदम् ॥१४॥। होनेके पूर्व ही सावधान होकर ऐसी साफ्ना कर में चिससे षा जन्म-मृत्युके चारसे सदाके किसे छूट माय-मुक हो जाय ॥ ११॥ या शरीर एक छियमार्न यमैरेतेः कतनी पनस्पतिम् । है। इसमें घोस्य बनाकर जीवरूप पक्षी निवस करता है । इसे यमराजके दूत प्रतिक्षण काट रहे हैं। जैसे पक्षी करते हुए वृक्षको छोस्कर उप तसे ॥ खगः खफेतमस्सध्य क्षेमं याति पलम्पटः ।।१५।। | नासक नीव भी इस शरीरको छोरकर मोक्षका ममी मन माता है । परन्तु असफ बीप दुम ही मोगता बहोरात्रैछिपमानं पुयायुमपपेपधुः । रहा है ॥ १५॥ प्रिय उदय ! ये दिन और रात क्षण-क्षणमें शरीरफी वायुको क्षीण कर रहे हैं। या मुक्तसङ्गः परं मुतया निरीह उपशाम्पति ॥१६॥ आसक्ति छोगफर परमतत्पमा बान प्राप्त कर देता है बानकर जो मपसे कोप ठरता है, या म्मणि इसमें | और फिर इसके भीवन-मरणसे निरपेक्ष होकर अपने नरेशमाप सुसम सुदुर्सम भास्मामें ही शान्त हो जाता है ॥ १६ ॥ यम्म शरीर समस्त झुम फोकी प्रासिका है और भरपन्त दुर्गम होनेपर भी अनायास सुम्म हो गया है। पुष मुकर्म गुरुकर्णधारम् । इस संसर-सागरसे पार जानेके लिये या एक मा | नौका है। शरण-हणमाप्रसे ही गुरुदेव इसके कोट मनकर पतवारका सम्पासन्न करने लगते हैं और स्मरण- मयानुकलेन नमस्त्रतरित मनसे ही मै अनुच्छ वायुफे रूपमें इसे छापकी बोर काने लगता है। इतनी सुविधा होनेपर भी ओ इस शरीरके द्वारा संसार-सागरसे पार न हो कतार पुमान् भवाम्मिं न वरेत् स प्रारमहा ॥१७॥ तो अपने हार्पो अपने मामाका हनन--अब पचन कर रहा है॥१७॥ मदारम्मेप निर्पियो विरक्तासंपतेन्द्रियः। प्रिय उसय ! स पुरुष दोषदर्शनके कारण कमोस उद्विग्न मोर विरफ हो जाय, तब बिठन्द्रिय होकर व अम्यासेनास्मनो योगी धारयेदपलं मनः ॥१८॥ योगमें स्थित हो माप और धम्पप्रस-भस्मनुसत्यमके रा अपना मन मुख परम्मामें नियमापसे घरम धार्यमा मनो यहि माम्पदाधनपम्बितम् । फरे ॥ १८ ॥ स सिर करते समय मन पाल होकर इधर-उधर भटकने मो, तब पटपट बड़ी सापनीसे मतन्द्रितोऽनुरोधेन मार्गेपास्मवर्क नयेत् ॥१९॥ कर ले ॥ १९ ॥ इन्द्रियों और प्रानोंको अपने काम उसे मनाक्र, समश्या मुनाकर, फसलकर अपने वशमै | रक्खे और मनको एक घणके थिये मी मतवन मनोगति न विसपेशितप्राप्यो मितेन्द्रियः। मेड़े । उसकी एक-एक बाप, एक-एक हरकको देखता है। इस प्रकार सत्त्वसम्पम दुरिक गरा औरे समसम्पन्नपा सपा मन भास्ममा नपेत् ॥२०॥ | रे मनको भपने पशम कर लेना चाहिये ॥ २०॥ ।

भ०२०] एकादश स्कन्ध मनाकर मश एप वै परमो योगो मनसा संग्रहः स्मृत । बैसे सवार भोरको अपने वश करते समय उसे अपने मनामाषकी पहचान कराना चाहता है-अपनी अफ अनुसार उसे पाना चाहता है और बार-बार पुसमयर उसे अपने वश कर लेता है, जैसे ही रदयात्वमविशन् दम्पस्पेनासो सङ्गः ॥२१॥ मनको फुसकर उसे मीठी-मीठी बातें कर सेना भी परम योग है॥ २१ ॥ साम्पसमें प्रकृतिसे लेकर शरीरर्पन्त सटिफर जो कम समया सांस्पेन सर्वभाषाना प्रतिलामानुलामतः । गया है, उसक भनुसार सटि चिन्तन करना चाहिये और विस क्रमसे शरीर वादिका प्रतिमें लय बताया गया है, उस प्रकार उपचिन्तन करना चाहिये । या भवाप्पयावनुयायेन्मनो यारत् प्रसीदति ॥२२॥ कम तस्तक जारी रम्झना चाहिये, जक्तक मन शन्त-स्थिर न हो जाय ॥ २२ ॥ जो पुरुष समरसे विरत हो गया है और जिसे संसारके पामि दुस- निर्षि गम्म विरक्तम्प पुरुपस्सोक्तपदिन । बुद्धि हो गयी है, पर अपने गुरुपोंके उपदंशको मत्यौति सम्माकर बार-बार धान खरूपक की चिन्तनमें संग्रश्न रहता है। इस अभ्याससे बहुत मनस्स्यजति दारात्म्पं चिन्तितस्सानुचिन्तया||२३॥ ) शीघ्र ही उसका मन अपनी वा चना, बो अनात्मा शरीर धादिमें आत्मबुदि करनेसे ईद, ग्रेड दता ॥२॥ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रपाइर, यमादिमिर्यागपपरान्धीधिपया च विषया । धारणा, पान, समाधि आदि योगमार्गासे, पस्तुतत्तरा निरीक्षण परीक्षण परनेमा अस्मविपासे तस मेसी | प्रतिमाकी उपासनासे--अर्थत् कमपोग, मानयोग और भक्रियागसे मन परमात्माका चिन्तन पटन सगना ममाचापासनाभिया नान्योम्म सरन्मनः ॥२४॥ धार पाइ उपाय नही ॥ २५ ॥ यदि रुपात प्रमादन पापी फर्म विगस्तिम् । उवय । पमेत या फभी मार निति कम फरता ही नहीं परम्नु पनि कभी उमसे प्रमाग्यश फार अगर बनवाय ता यागकागही ग्म पापमा जअ पागनर दहा नान्यवर पदाचन ॥२५॥ द्वार, उपचान्द्रायग अडिसर प्रायधित कभी न पर ॥ २५ ॥ अन्न-अमन अधिकार अनिष्ठ मही सस्वाधिकार या निष्टा स गुमा परिकीर्तित । गुग यहा गया है। इस गुण-गर और रिसिनिक विनसे पड़ी तस्म्पनिया कि किमी प्रकर फमणा वास्पसुदानामनन नियमः च । रियासळिया परिस्पाग हा आप: स्यामि या तो जम्मसे हा अशुरई, अनक है। पर तारस्य बना गुणदापविधानन मनाना त्याग्न या ॥२६॥ नित्यग नियमी तय सरु प्रहनिया रोमाया।

८३२ भीमहागवत [. बातडो मस्कथामु निर्विष्णः सर्पकर्मसु । संकोच ही करना चाहिये ॥ २६ ॥ ये सभक समय फोसे विरफ हो गया हो, उनमें दुशुदि रस्ता के पेद दुःखात्मकान् कामान् परिस्पागेऽप्पनीधरः।२७ मेरी लीलाकसके प्रति माल हो और यह भी करता हो कि सभी मोग और मागवासनाएँ दुसरूप है, किंतु ततो भजेत मां प्रीत भवानिमयः । इक्ना सब जानकर भी जो उनके परिस्पागमें समर्थ न छे, वृषमाणमसान् कामान् दुःखोदकाम गईयन् ॥२८॥ उसे चाहिये फि ठन भागेको तो मोग ले, पस्तु में सन्चे हदयसे दु सननफ समझे और मन-ही-मन उसकी प्राक्तन भक्तियागेन भबसो मासचन्मने । निन्दा करे तप उसे अपना दुर्भाम्प ही समझे । सपही इस दुविधाकी भितिसे छुटकारा पानके लिये प्रयास फामा दय्या नश्यन्ति सर्प ममिरदि म्बिसे ॥२९॥ | निश्चय और प्रमसे मेरा भजन करे ॥ २५-२८ । इस प्रकार मेरे पाये हुए भक्तियोगके ारा निरन्तर मेरा भिपते हृदयग्रन्विश्छिपन्ते सर्वसंशयाः । भजन करनेसे में उस साधकके दयमें जाकर बैठ माता हूँ और मेरे विराजमान होते ही उसके दपकी सरी घीयन्ते पास्स फर्मागि मपि दप्टेऽखिलात्मनि।।३०॥ वासनाएँ अपने संस्कारों के साप नष्ट हो जाती हैं ॥२९॥ समान्म किमुक्तस्य योगिनो पे मैदास्मनः । इस तरह सब उसे मुझ सरिमाका सभास्कर हो जाता है, तम तो उसके हृदयकी गाँठ टूट जाती है, उसके सारे नशानं न च वैराग्य प्रायः भेयो भषेदिर ॥३१॥ संशय लिम भिम हो जाते हैं और कर्मवासनाएँ सत्र क्षीण हो नाती है ॥३०॥ इसीसे वो योगी मेरी मजिसे यत् कर्मभिर्मचपसा जानवैराम्पतय यत् । युक और मेरे चिसनमें मान रहता है, उसके लिये मन अपना वैरायकी माश्यकता नहीं होती। उसका कम्पण योगेन दानधर्मेण भयोभिरितरैरपि ॥३२॥ तो प्राप मेरी मकिके वारा ही हो जाता है ॥ ३१॥ फर्म, तपस्पा, शान, राम्य, योगम्पस, दान, धर्म और सर्व मशक्तियोगेन मनको लभतेऽजसा । दूसरे कम्याणसाधनोंसे वो कुछ स्वर्ग, नपा, मेरा परम स्वर्गापवर्ग मदाम पयचिद् पदि पाम्छसि ॥३३॥ | भक्त मेरे भकियोग के प्रमावसे ही, परि चाहे तो, कामास पाम सपा कोई भी वस्तु प्राप्त होती है, सब मेरा न किंचित् साधयो धीरा भक्ता प्रकान्तिनो मम । प्राप्त कर लेता है ॥ ३२ ३३ ॥ मेरे मनम्फोमी एम धैर्यवान् साधु मक्त सर्व तो कुछ पाहते ही नहीं, यहि पाम्मन्स्पपि मया दर्च कैवस्थमपुनर्मनम् ॥३४॥ वस्तु की तो बात ही क्या-2 केन्य-मोच भी नहीं में में बना पाता है और देता भी । ले में दूसरी सेमा घरते ॥ २१॥ पवनी ! सम्से मेष्ठ एवं महान् नरपेक्ष्म परं प्राहुनि मेयसमैनासकम् । नि मेपस ( परम कम्पान ) तो निरपेक्षताका ही दूसरा माम है। इसध्येि मोनिकाम बौर निरपेक्ष होता है तमाभिराषिपा भकिनिरपेषस मे भवेत् ॥३५॥ उसीको मेरी मति प्राप्त होती है ॥ ३५ ॥ मेरे कान्य प्रमी मोंका और उन समदर्श महामोका, यो बुद्धिसे न मम्पेकान्तभक्ताना गुणदोपोझमा गुणाः । अतीत परमतत्वको प्राप्त हो मुफ है, इन विधि और निपेपसे १ मिपिना मम ममो मो मममसे । २ महारममः । ३ मकसकम् ।

अ०२१] एकादश स्फन्ध साधूनां समचितानां पुद्ध परमुपयुपाम् ॥३६॥ | होनेगले पुण्य ओर पपसे कोई सम्बन्ध ही नहीं होता ॥३६ । इस प्रकार जा लोग मेरे यायमे तुर इन एवमेवान् मयाऽऽविष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः। मान, मकि और कर्ममागोका अश्य लेते हैं, वे मेर परम मस्याणस्वरूप घामको प्राप्त होते हैं, क्योंकि वे पला- धम विन्दन्ति मत्स्सान पद प्रस परम नितु ॥३७॥ तलको बान लत हैं ॥ ३७ । - इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमाईस्या सहितायामेकादशस्कन्धे विशोऽध्याय ॥२०॥ -- - अथैकविंशोऽध्याय गुण-चोप-व्यपस्थाका स्थरूप मौर रहस्य श्रीभगवानुमान भगयान् भीरुप्म कहते है-प्रिय उद्भव ! मेरी प्रासिके तीन मार्ग है. भक्तियोग, मानयोग और कमयोग । जो इन्हें पका चाइन्द्रियों के द्वारा क्षुद मोग मोगते य एतान् मस्पयो हित्वा भकिमानक्रियात्मकान । रहते हैं, वे बार-बार जम्म-मृत्युरूम संसारके पारमें भटकते ॥१॥अपन अपने अधिकारके अनुसार धममें छ निष्ठ्य रहना ही गुण कहा गया है और इसके क्षुद्रान् कामांमः प्रागर्नुपन्तः ससरन्ति ते ॥ १ ॥ । विपरीत अनधिकार चेष्टा करना दोष है । तात्पय यह । कि गुण और दाप दानॉफी न्यषस्था अधिकारक अनुसार की जाती है, किसी मस्तुके अनुसार नहीं ॥२॥पस्तुओंके स्व स्पऽधिकारे या निष्ठा स गुण परिकीर्वित । समान होनपर मी शुद्धि-अशुदि, गुण-दाप और शुभ- काम,आदिका जो विधान किया जाता है, उसका अभिप्राय पिपर्यपस्तु दोपः स्माद्भपोरस निमयः ॥ २॥ यह है कि पापका ठीक-यक निरीक्षण-परीक्षण हो सके और उनमें सन्देह उपम करके ही यह योम्प है कि अयोग्य, स्वामयिक प्रतित निपन्धित - संकुपित किया जा सके ॥ ३॥ उनक शरा नुघशुद्धी विधीयते समानप्वपि पस्तुप। धम सम्पादन कर स्फ, समाजका न्यबहार टीक-यफ पा सके और अपने पहिधात बीवनके निर्वाहमें दम्पस विचिकित्सा गुणदोपा शुभाशुभौ ॥ ३॥ ' भी सुविधा हो । इससे यह अम भी है कि मनुष्य अपनी पसनाम्य मन प्रतियांक शरा इनफ आसमें म फंसकर मानुसार अपने जीनको नियन्त्रित और धमार्थ व्यवहाराध मात्राथमिति चानप। मनको वशीभूत कर लेसा है । निष्पाप उदय ! पर आचार मने ही मनु आदिका रूप धारण करके दर्शितोऽय मयाऽऽपारा धर्ममतावा धुरम् ।। ४ ।। धर्मफा मर ग्रेनेशल फसबके लिये उपदेश म. २१०१- । - ८३४ भीमद्भागवत [२०२१ भूम्यम्म्यम्पनिलाकामा भूतानो पञ्चधातव । किया है ॥ ५॥ पृथ्वी, जल, तेज, पायु, आमा-- ये पचभूत ही नझासे लेकर पवेतमक्षफ्यन्त समी प्राणियों के शरीरोंके मूलकारण हैं । इस तरह वे सब शरीरफी ररिसे आमपसावरादीनां शारीरा आत्मसंयुता ॥५॥ तो सम्मन है ही, सका आत्म्म मी एक ही है॥ ५ ॥ प्रिय उद्भव ! पपपि सक्के शरीरोंके पचमूत समान । फिर भी वेदोंने इनक वर्णाश्रम यदि अमा-अलग नाम वेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेप्पपि । और सय इसलिये बना दिये हैं कि ये अपनी पसना- मूलक प्रवृत्तियों को संकुचित करके नियमित फरक धर्म, नर्थ, काम, मोक्ष-इन चारों पुरुभापोंको सिद्ध कर घातपय कल्प्यन्ते एतेषां स्वार्थसिदयं ॥ ६॥ स ॥ ६ ॥ साधुश्रेष्ठ ! देश, काल, फल, निमित्त, अधिकारी और धान्य आदि वस्तुओंके गुण-दोषरोंका मिषान भी मेरेद्वारा इसीलिये किया गया है कि कमि सोगोंकी देशकालादिभाषाना वस्तूनां मम सचम । उष्माल प्रवृत्ति न हो, मर्यादाका मा न होने पावे ॥ ७॥ देशमि यह देश अपवित्र है, जिसमें माणसार संग न हो और विस्के निवासी बामणमक न हों । फणसार माके गुणदोषौ विधीयेते नियमायं हि फर्मणाम् ॥ ७॥ होनेपर भी, केवळ ठन प्रदेशोंको मेषकर सिंत पुरुष रहते हैं, फीकट दश अपवित्र ही है। संस्काररहित और अकृष्णसारो देवानामभयोऽशुचिर्मवेत् । उमर भादि स्थान भी अपवित्र ही होते हैं।॥ ८॥ सम्प नही पवित्र है, जिसमें कर्म करने याम्प सामग्री मिल सके तपा कर्म भी हो सके। जिसमें कर्म करनेकी सामग्री न कृष्णसाराऽप्यसोषीरफीफ्टामस्करिणम् मिल, आगन्तुक दापोंसे अपवा साभाविक दोपक कारण ८॥ निरामें फर्म ही न हो सके, यह समय अनुद है ॥२॥ पदार्थोकी शुद्धि और अशुदिदम्य, पचन, सरकार, कार, कर्मण्या गुणवान् कालो द्रन्यतः स्वत एव वा । महत्त्व अवका यत्पपसे भी होती है। ( पैसे को पात्र जलसे शुद्ध और म्यादिसे पशु हो माता है। किसी वस्तुकी शुद्धि अपचा भबुद्धिमें शफा हानेर प्रमौके पचनसे बाह शुर हो जाती है या अनुर रहती है। यतो निपर्वते फर्म स दोपाऽफमकः स्मृतः ॥९॥ पुप्पादि अउ छिरकनसे शुद्ध और संम्नेसे असुन म | जाते हैं । तत्कालका पम्पा हुआ अन पुख और बस दम्पस्स भुयशुद्धी व न्येण पपनेन च । वाद माना जाता है । वो सरोपर और नी आदिका मनपुर और छोटे गहोंका अशुद्ध माना जाता है। इस प्रकार प्रमसे समझ सेना चाहिये।)॥१०॥ शक्ति, मस्मरणाध झालन महत्वात्सतपाधवा ॥१०॥ अशकि, मुनि भार वैभव के अनुसार मी पवित्रता और अपविताकी म्पत्रस्य हाती है। उसमें भी स्थान और शक्तयारकपाधवा पदपा समृद्धया प पदात्मन।। उपयोग करनात्मी भायुफा विचार करते हुए ही बार १ भम्पम्पम्ममि । - अ० २१ ] एकादश स्कन्ध अर्घ कर्षन्ति हि यथा दग्नावस्थानुसारतः ॥ ११ ॥ | वस्तुओंके व्यहारका शेष अंक तरहसे ओंका जाता है। ( जैसे धनी-दरिद्र,सम्यान-निक, बुद्धिमान्-माड, उपश्य- पूर्ण और सुखद देश तया तरुण एक वृद्धावस्था मेसे शुद्धि और पशुदिकी मासाम पत्तर पर जाता धान्पदाम्थितन्तूनां रसतैमसचर्मणाम् । है)॥ ११॥ अनाच, लकवी, ापीदात बादि जी, सूत, मधु, नमक, तेल, घी जादि रस, सोना-पारा आदि तेजस पदार्प, चाम और पका बादि मिडीके बने पदाप कालमाय्यमिमृतोये पार्थिवाना युतायतैः ।। १२ ।। समपार आने-अप या लगनेसे, बागमें बध्यनेसे, मिली व्यानेसे अपमा बलमें धोनेसे शुद्ध हो जाते है। देश, काल छोर अवस्थाके अनुसार काही जल-मिट्टी भादि शोषक अमपलिप्स यत् येन गन्म लेप व्यपोहति । सामग्री के सपोगसे शुदि करनी पाती है तो कहीं-कही एफ एक्से भी शुदि हो जाती है ॥१२॥ यदि किसी पस्तमें काइ सक्षुद पदार्प लग गया हो तो टनेसे पा भजते प्रकृति सस सप्छौचं तावदिप्यते ॥ १३॥ मिती आदि मनेसे जब उस पदार्थकी गन्ध बोर लेप न रहे भौर पद वस्तु अपने पूर्ववपमें आ जाय, तप उसको शुर समझना चाहिये ॥ १३ ॥ मान, दान, तफ्स्पा, खानदानक्षपोऽषस्थापीयसंस्कारकर्मभि' क्प, सामर्थ्य, सस्कार, कर्म और मेरे स्मरणसे पित्तकी सुविहोती है। इनकेश शुद्ध होकर मम, क्षत्रिय और देसको विहित कोका आचरण करना चाहिये ॥१॥ मस्स्मृस्पा पात्मनः शौच शुदाफापर दिनः।१४ | गुरुमुखसे मुनफर ममाति दयाम कर लेने से मन्त्रकी पौर मुझे समर्पित कर देनेसे फर्मझी भूमि होती है। स्वपजी । इस प्रकार देश, काल, पदार्थ, फर्म, मत्र मन्त्रस्य व परिणानं कर्मशुद्धिर्मदर्पणम् । और पर्सन छहोंके सुर होनेसे धर्म और अशुद्ध होनेसे वर्म होता है।॥१५॥ कहीं-कही शासविधि- धर्म सम्मपते पभिरधर्मस्तु विपर्ययः ॥ १५ ॥ से गुण दोष हो पाता है और दोष गुण । (बसे प्रक्षा- के किये सत्य पदन, गायत्री जप आदि गुण हैं, परन्तु पदके लिये दोप है। बीर दूध आदिका व्यापार वैसके कषिद् गुणोऽपि दोपः स्याद दोपोऽपि विधिना गुण । लिये विहित, परम्नु अलगके लिये भरपत सिद है।) एफ ही पक्षफे विषयमें किसी के लिये गुण भीर किसीके शिये दोपका विधान गुण और दोयोंकी बस विकताका सपन कर देता है और इससे यह निश्चय गुणदोपायनियमस्तहिदामेव होता है कि गुण-दोषका व भेद फरिफ है ॥१६॥ जो येग पवित, वे पतिौका-सा आचरण करते है तो उनै पाप नहीं याता, जब कि श्रेष्ठ पुरुषों के लिये समानकर्माचरम पविवानां न पातकम् । सह सर्वस स्याम्य होता है। जैसे ग्राम्पोंके लिये पाधते ॥१६॥ १ तपा।

८३६ भीमद्भागवन [अ०२ औत्पविका गुणः सोन शमान पतत्पध ॥१७॥। स्वामयिक हानेके कारण अपनी पत्नीका सा पाप नहीं है, परन्तु स्न्यासीक पिये घोर पाप है । उसनी! तो यह है कि चो नीचे सोपामाईयह गिरेगा कहाँ यता यता निवतेत विमुच्येत सतस्ततः । वैसे ही जो पहलेसे ही पतित हैं, उन पर धौर फल क्या होग! ॥१७ ॥ जिन-जिन दोषों और गुर्मोसे मनुष्यका पिठ उपरत हो जाता है, उन्ही वस्तुक वन्धनसे वह मुच्छ हो जाता है। मनुष्यों के लिये व एप धर्मो नृणां क्षेम शाकमोहमयापहः ॥ १८॥ निवृत्तिवप धम ही परम कल्याणका साधन है। क्योंकि यही शोक, मोह वौर मपको मिटानेपाम है।॥ १८ ॥ विपपेपु गुमामामात् पुंमः समस्ततो भवत् । उद्धवजी ! वियोंमें कहीं भी गुणों धारोप करनेसे उस मस्तुके प्रति आसक्ति हो पाती है। वासहि होनेसे समाचत्र भवेत् काम कामादय फलिनृणाम् ॥१९॥ उसे अपने पास रस्सनेकी कामना हो जाती है और इस | काम्नाकी प्रतिमें किसी प्रकारकी बाधा पानेपर लोगों फल?विपा कापस्तमस्तमनुवर्तते । परस्पर माह होने लगता है ॥ १९ ॥ कापसे असम क्रोधकी उत्पत्ति होती है और प्रोवमे समय अपने रित- अहितका योघ मही रहता, वान छा जाता है । इस तमसा प्रस्पते पुंसमवना पापिनी द्रुतम् ॥२०॥ अनानसे शीघ्र ही मनुष्पकी कार्यकाका निणय करने- पाठी व्यापक चेतना शक्कि लुस पे जाती है ॥२०॥ | साधो ! घेतलाशति अर्थात् स्मृतिके उस हो जानेपर तया विरहित साधो जन्तुः शून्याय कल्पते। मनुप्पमें मनुष्यता नहीं रह जाती, पशुखा वा बाती है ततोऽस्य स्वार्थविनशो मूर्छिनस मृतस्य च ॥२१॥ | अब उसकी मस्पा मैसी ही हो जाती है, जैसे कोई और यह शूम्पके समान अतिवहीन हो जाता है। मधित या मुर्दा हो। एसी स्पितिमें न तो उसका विपयाभिनिवशेन नात्मानं पद नापरम् । स्पर्य बनता है और न तो परमाय ॥ २१ ॥ विरका चिन्तन करते करते बह लिपपम्म हो जाता है। उसका अधजीविया जीवन् न्यध भनव य प्रमन् ॥२२॥ बीकन पक्षोंक समान जर हो जाता है । उसके शरीर उसी प्रकार म्पर्य श्वास घसा रहता है, से हारी धक्नीरी हवा । उसे न अपना शान यस्ता है और न किसी फलश्रुतिरिय नृणां न आया राचन परम् । दूसरेका । यह सर्वमा सामाबित हो जाता है ॥२२॥ उदवजी! परस्परिम्प फरकापमान परनेसली भुति मनुप्योंके रिये उन-उन गोरो परम पुरुमा नहींमती, परन्तु पन्मुिस पुलोंके लिये मत फरणभुदिक आरा अपानिधपा प्राक्तं यथा मपन्यरापनम् ॥ २३॥ परम कन्यगम्य मी सिमासे ही फार्मि पनि उत्पन्न करना ग्यि सा गगन करती है। जैसे पासे आरिम इपि उन्फन करनेक सिरोनक पास्य को जात है। (न ! प्रममे शयपत्र पादापी हो तो । भया ब० २१] एकादश स्मन्म तुम्हारी चोटी का जायगी ) ॥ २३ ॥ इसमें म्न्देह उस्पत्यैव हि कामपु प्राणपु स्वजनेषु च । नहीं कि संसारके सियभोगाम, प्राणमि और सगे- सम्बन्धिोम समी मनुष्य जमसे ही आसक्त है और यासक्तमनसो मा आत्मनाऽनहतुपु ॥२४॥ | उन प्रस्तुओंकी वासफि उनकी वास्मोचतिमें वाधक एवं अनयका कारण है ॥ २१ ॥ ये अपने परम पुस्ताको नहीं मानते, इसलिये स्वादिका जो पगन नतानविदुप स्वार्थ भ्राम्यतो पूजिनाचनि । मिता है, मयों कारयों सस्य-एसा विचास करके देवादि-योनियोंमें मटकते रहते हैं और फिर बस अदि काय युज्या पुनस्केप वास्तमो विशवो घुध ॥२५॥ योनियोंके घोर अन्धकारमें आ पड़ते हैं। ऐसी अवस्था | कोई मी विशन् अपवा वेद फिरसे उन्हें उन्हीं श्यियामें यों प्रात्त करेगा ॥ २५ ॥ बुदिलोग (कर्मवादी) एवं व्यवसित कचिदविझाप पदय । | वेदोंका यह अम्बिाय न समझाकर फर्मासतिवश पुपोंके समान स्वदि स्कोका पणन देखते हैं और उन्हींको फलश्रुति सुमित्रा न वेदना पदन्ति हि ॥२६॥ | परम फल मानफर माफ जाते हैं । परन्तु वेदवेत्ता लोग | कृतियोंका ऐसा तात्पप नहीं जायते ॥ २६ ॥ विषय वासनामें फंसे हुए दीन-हीन, सेमी पुरस रग-बिरगे कामिन कपमा लुन्या पुष्पेषु फलपुर्य । पुर्पोके समान स्वर्गादि लोकोंको ही सब कुछ सम्मा पेटते हैं, अग्निके परा सिर होनेवाले पा-यागादि कममि ही मुग्ध हो जाते हैं। उनें अन्समें देवक, अपिमुग्धा घूमतान्ताः स्य लोमन विदन्ति ते २७ पितृदोष आदिकी ही प्राप्ति होती है। दूसरी धोर मटक नामेके कारण उन्हें अपने निजधाम आत्मपदका न ते मामा जानन्ति हदिस्य य इदं यत । पता नहीं मावा ॥ २७॥ प्परे उदय साधना है तो काठ फर्मकी और उसका कोई फल है तो इन्द्रियोंकी सृति । उनकी ऑखें धुंधर्य हो गयी है, उपयशला पसुलपा यथा नीहारचसुप ॥२८॥ सीसे ने यह बात नहीं जानते कि जिससे इस जगत्की उत्पत्ति हुई है, जो स्वप इस जगत्के रूपमें है, परमात्मा में उनके हद ही ई॥ २८॥ यदि हिंसा ते मे मतमविवाय पराध विपयारमका । और उसके फल मांस-ममणमें रग ही हो, उसफा स्याग न किया जा सकता हो, तो यामें ही करे—यह हिंसापां यदि राग साद् य एष न चोदना ॥॥२९॥ । परिसत्या विधि है, स्वामाविक प्रवृत्तिका सदोष है, सन्यापन्दनादिके समान अर्धा विधि नहीं है। इस प्रकार मेरे परोश अमिप्रापको न जानकर विश्पटप हिंसाविहारा पालम्बः पमुभि स्वमुखेन्छया। पुरुप हिंसाका लिम्बार खेलते हैं और दुग्नाश पानी इन्द्रिपाकी तृसिक रिपे यव दिये हुए पमुओंके मांससे पन करके देवता, तिर तय भूतपसियाके यजना यजन्ते दवता यझे पिवमतपतीन् म्बलाः ॥३०॥ अंग करते हैं ।। २९३० ॥ १ सिन् भूत । . उनके पास ८३८ श्रीमद्भागवत [ब०२१ खमोपममा लोफमसन्तं भवणप्रियम् । उदयनी । स्वर्गादि परोक सप्नके के समय है, वास्यमें वे बसत है, केस उनकी यातें सुनने आशिपो इदि संकल्प्प स्पजन्त्यर्थान् यथा वणिक्३१ वहुत मीठी लगती हैं । सक्झम पुम्म यहाँके मोगोंकि किने मन-ही-मन बनेकों प्रकारके स्कल्प कर से है वैसे म्यापरी अधिक समझी भाशासे मूलधनको भी से स्वासत्त्वतमोनिष्ठा रजासत्चतमोजुपः । | नैठता है, वैसे ही वे सकाम कोदारा अपने क्नका नाश करते हैं ॥ ३१॥ वे स्वयं रजोगुण, सखगुण पा उपासत इन्द्रपुरम्पान् देवादीन् न वषैव माम्॥३२॥ तमोगुणम सित रहते हैं और रजोगुणी, सत्वगुणी काल | तमोगुणी इन्द्रादि देवताओंकी उपमना करते हैं। रखेव देवता पनेर्गत्वा रस्सामहे हिषि । ठन्हीं सामग्रियोंसे उतने ही परिभमसे मेरी पूज नहीं करते ॥ ३२ ॥ ने नय इस प्रकारकी पुषित पानी- वस्पान्य इस भूयात्म महाशाला महाइलाः ॥३३॥ रंग बिरंगी मीठी-मीठी बातें सुनते हैं कि पम्पेग इस कमें पोंके द्वारा देवताओंका बन करके स्वामि बायेंगे और वहाँ दिव्य भानन्द भोगेंगे, उस्फे पादा एवं पुष्पितया पाचा पाक्षिप्तमनसा नृभाम् । फिर हमारा जन्म होगा, सब हम पड़े कुलीन परिवारमें पैदा होंगे, हमारे बड़े-बड़े महल होंगे और हमारा कुटुम्ब मानिना चौतिस्तम्धानां मदापि न रोषते ३४ बहुत मुसी और बात या होगा, तब मका दिए | क्षुम्ब हो जाता है और उन हेकडी जतानेवाले धमनियों से मेरे सम्बन्धकी वतचीत भी षछी नींगती॥२३ ३०॥ वेदा अमात्मविपयास्त्रिकाण्डविपया इमे । उसम्जी । वे तीन काम-कर्म, उपासना और धन । इन तीनों कामकि पारा प्रतिपादित विषय है और वारमकी एकता, समी मन्त्र और मकान परोधषादा ऋषयः परोक्ष मम च प्रियम् ॥३५॥ अपि इस विषयको सोछकर नहीं, गुप्तम्यनसे करते हैं और मुझे भी इस वकको गुप्तस्मसे करना ही बमीर है॥ ३५ ॥ वेदोका नाम है शम्दाम । ये मेरी मर्सि सम्दप्रय मुदुर्योघं प्राणन्द्रियमनोमपम् । है, इसीसे उनका रास्य सम्झाना अत्यन्त कठिन है। यह शम्दाम फ्य, परमती वीर मणमा पानीके रूपमें अनन्तपारं गम्भीर दुर्विगाय ममुद्रवत् ॥३६॥ और गहरा है। उसकी याद गाना स्फ्त पनि प्राण, मन और इन्द्रियाम्प है। समुद्र के समान सोमारहित है। (इसीसे वैमिनि अनिवाबो मिशन भी उसके तरफ्पका फिन्टोक निर्णय नहीं कर पाते) ॥ ३६॥ मयोपपरित भूमा प्रहमानन्तशक्तिना। उदय ! म बनन्तशक्तिसम्पम एव स्स्य अनन्त प्रम है। मने ही वाणीमा स्तार किया है। जैसे फमा | नालम पतरा-सा सूत होता है, से ही या वेग्मी मृत' घोपरूपम पिसपूर्णेन लप्पते ॥३७॥ प्रामियोंक अन्त करणमें अनाहरूमा के मपमें प्रपट होती १ माया।२ चारिसमाना।।मममि । • पनि समयमा भरिमरी नही है भाव मरण पर एनेस दो या त ममहमें भाती है।

ब. २१] एकादश स्मन्य ८३९ पोर्चना िदयार्णामदमते मुखात् । है ॥ ३७ ॥ भगवान् शिरप्पार्म स्वयं वेदमूर्ति एष अमृतमय है। उनकी उपाधि है प्राण और सय भनाइत | शब्दके द्वारा ही उनकी धमिव्यकिरहै। जैसे मयती माकासाद पोपवान् प्राणो मनसा स्पर्शरूपिमा ३८ पन दरसे मुख्शारा जाला उगरती और फिर निगल लेती है, वैसे ही व स्पर्श अदि पोंका संकल्प करने | वाले मनरूप निमित्तकारणके राग दयाफाशसे अनन्त छन्दामयोऽमृतमय सरसपदवी प्रस। अपार भनेकों मागोपाठी सरीरूप वेदवाणीको सय ही प्रकट करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते पाहाराव म्पञ्जितस्पर्शम्यरोप्मान्त समूपिताम् ।३९|| हैं । यह वाणी प्रत सूक्ष्म ओंकार के द्वारा अमिम्पक | स्पर्श (कर से लेकर 'म तक. २. ), खर ('या से की तफ-२), ठप्मा (श, प, स, ए) और विचित्रभापापितां छन्दाभिभतुरुवर । पन्त स ( य, र, ल, व )-न पसि विम्पित है। | उसमें ऐसे छन्द हैं, जिनमें उत्तरोतर चार-पार पर्ण अनन्तपारो शृहती सृजत्पाधिपत स्वयम् ॥ ४०॥ मत जाते हैं और उनक द्वारा विचित्र भाषाक रुपमें पार विस्तृत हुए है ॥ ३८-१०॥ (चार-चार अधिक वोयाल छन्दोमसे कुछ ये हैं-गायत्री, उष्णिक, अनुप गायम्युणिमनुष्टुप् च पृहती पक्तिरेव च। वृहती, पक्कि, त्रिष्टुप, गती, तिचन्द, अस्पष्टि, वतिगती और विराट् ॥ ११॥ केवाणी कम- त्रिष्टुम्जगत्पतिच्छन्दा भत्यष्टपतिजगविराट्।४१। काठमें क्या विधान करती है, उपासनाकाण्डमें किन दक्ताओंफा पणन करती है और धानकाणमें फिन प्रतीतियोंका अनुवाद करके उनमें अनकों प्रकारक किं विधत्त म्मिाचष्ट किमन्य विकल्पयेत् । झिम्प करती है-इन बातोंका इस सम्बन्धमें धुतिके । रहस्यको मर अतिरिक और कोई नहीं जानता ।। १२॥ मैं तुम्हें स्पए बवख्य आता है, सभी श्रुतियों फर्मकाण्डमें इत्यस्या दयं लोक नान्या मद्धेद फवन ॥ २॥ मा ही विधान करती है। उपासनााडमें उपास्प दयनाओक रूपम वे मरा ही फ्णन करती है और मान- मां विधचऽभिधचमा विकल्प्यापामते स्वाम् । याणमें पाकादिरूपसे मुमर्म ही अन्य बस्तुओंका आराप कर उनका निपध पर दती है । सग नियोका यस, इतमा ही तात्पप है कि ये मग आम्रप एतावान् सववार्ध शम्द आम्याप मां भिगम्। समान मुझमें मेरा भाराप करता है, मायाम्म कहफट उसपर अनुपद फरती हैं और अन्तमें सा निष करक मुनमें ही शन्त हा माती है और काल वशिष्ठान मायामात्रमनधान्त प्रविपिथ्य प्रमीदति ॥४३॥ मपसे में ही शेष रह जाता है।॥ १३ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराण पारमाइरया संहितापपमेयशस्लप एपर्षिाऽप्पाप ॥ २१ ।।

८४० श्रीममागवत [ज.२२ उदप उपाप अथ द्वाविंशोऽध्याय तत्त्वोंकी सस्था भौर पुरुष-प्रति- थिक उपजीने का प्रमो! विश्वेयर ! अमिलने | तोंकी सध्या कितनी यतस्ययी है ! आपने तो कभी कति तस्यानि विवश संख्यातान्पृपिभिःप्रमो। (उम्मीसबै अप्यायमै ) नौ, म्पाय, पाँच और तीन नवैकादश्च पश्न वाम्पात्य त्वमिद अवम ॥१॥ अर्पत् कुन महाईस तस्व गिनाये हैं । यह तो हम मुन कचित् पविशति प्राहुरपर पञ्चविंशतिम् । चुके हैं ॥१॥ किन्तु कुछ ग म्चीस तत्व समते है तो कुछ पचीस; कोई सात, नौ अपवा छ सीमार सप्के नव पट् कवियत्वार्येादशापरे ॥२॥ करते हैं, को चार बतलाते हैं तय कोई मारा ॥ २॥ केचित् सप्तदश प्राहुः पोहक प्रयोदश । इसी प्रकार किन्ही किन्हीं ऋषि-मुनियोंके मतमें उनकी संख्या सत्रह है, कोई सोग भौर को देवा तमवे एतावस्वं हि संख्यानामृपयो यविषक्षमा । हैं। स्नातन ग्रीकृष्ण ! ऋषि-मुनि इतनी मिल सस्याएँ किस अभिमापसे क्तमते हैं। पाप कृपा करके हमें गायन्ति पृथगायुप्ममिद नो पातुर्मासि ॥३॥ भगवान् भीमप्यने कहा ठरकजी | वेदा प्रहम युक च सन्ति सर्वत्र भापन्ते प्राममा यथा । इस विषयमें जो कुछ काते है, इसमी बैंक, क्योंकि सभी तत्ष सममें अन्तर्भूत हैं । मेरी मयको स्वीकार करके क्या करना असम्भव॥१पैसा माया मदीपामुद्गृम पदां किं नु दुर्घटम् ॥ ४ ॥ तुम कहते हो, वह ठीक नहीं है, जो मैं कहता है, वही नैवदे यथाऽऽत्य त्वं यदई पन्मि तत्तथा । स्पाय - -इस प्रकार जगत्के कारणके सक्यों मिवाद इसलिये होता है कि मेरी शक्तियों सल, रज अादि गुणों और उनकी प्रवियोंका रहस्म बेग समा एवं विवदतां हतुं शक्कयो मे दुरत्ययाः ॥ ५॥ नहीं पाते, इसलिये ये वपनी-अपनी मनोवृतिपर ही कामा कर बैठते हैं ॥५॥ सल थादि गुणेके क्षोमसे ही यासांम्पविफरादासी विकल्पोषदां पदम् । ५ विविध फापनारूप प्रपत्र-जो क्तु नही कर नाम है-सठ सभा मा है। यही काद-विवाद मरने- | वायके विवादका विश्य है। च इन्द्रियाँ अपने कमें प्रासे समदमऽप्पेति पादस्तमनु साम्मति ॥ ६॥ हो नाती है तथा पित शन्त जाता , तब पा प्रपत्र मी निबच हो जाता है और उसकी नितिक साप ही सारे वाद-विवाद मी मिट नाव ॥६॥ परस्परानुप्रवेशात् तत्वानां पुरुषर्षभ । पुरुषशिरोमणे! तत्तका एक दूसरेमें अनुप्रयेश है इसलिये पा तत्वोंकी तिनी संस्था मारना चाहता है, उसके अनुसारफारणको कार्यमें पयवा कापका कारणमे मिपाकर पीपापर्यप्रसंस्मानं मघा पतुषिवक्षितम् ।।७॥ भफ्नी स्थित संख्या सिय कर मेला है ॥ ७ ॥ १ वे २ लमिति ।। पम् । ४ मम प्राचीन प्रतिमें नहीं है।

य० २२] एकादश स्मन्म ८४१ - एकसिमपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीवराणि च । ऐस्य देखा जाता है कि एक ही तत्तमें बहुत से दूसरे तत्वों- का अन्तर्भाव हो गया है। इसका कोई पन्धन नहीं है कि किसका किसमें अतीव हो। कभी कट-पर बादि कार्य पूर्वमिन् वापरमिन् या तरखे तस्यानि सर्वश ॥ ८ ॥ मस्तुओं का उनके कारण मिटी-स्त आदिमें, सा कमी म्धिी-सूत आदिका घर-पट मादि कामि अन्तमपि हो बाता है ॥ ८ ॥ इसपिये वादी-प्रतिवादिमिसे जिसकी याणीने जिस कार्यको जिस कारणमें अया जिस कारणको पार्षापर्यमतोऽमीषां प्रसस्यानममीप्सताम् । जिस कार्यमें मसर्मूत करके तत्वोंकी नितनी संख्या स्वीकार की है, यह हम निभय ही सीकार करते हैं, स्पषि उनका यह उपपादन युफिसात ही है ॥९॥ यथा विविक्त यन्त्र गतीमो युक्तिसम्भषात्॥ ९ ॥ उद्धवजी ! जिन ग्रेगनि एम्बीस सम्या स्वीकार की अनाधविषायुक्तस्स पुरुपस्पात्मवेदनम् । है, ये ऐसा करते हैं कि जीव पनादि फाटसे अविपासे प्रत हो रहा है। वह स्वयं अपन-आफो नहीं जान खतो न सम्भवादन्यस्तवमो घान्दो भवेत्॥१०॥ सफा । उसे बारममान कयनक लिये किसी अन्य सर्पाकी आवश्यकता है । ( इसठिये प्रतिके काय कारणरूप चौग्रस तस्व, पीसका पुरुष और उम्मीसको पुरुपेश्वरयारत्र न पलक्षम्पमम्बपि। पर इस प्रश्वर कुल एबीस तत्व स्वीकार करने चाहिये ) ॥ १० ॥ फीस तव माननेवाले पहते है कि इस शरीरमें बीव और इरफा अणुमात्र भी क्दन्पकल्पनापार्था धान च प्रमतेर्गुण ॥११॥ अन्तर या मेट नहीं है, इसलिये उनमें भेदकी कम्पना न्यप है । यही भनकी बात, सा सो सवारिमका प्रकृतिका कविगुणसाम्यं वै प्रवेनात्मनो गुणाः । गुण है ।। ११ ॥ तीनों गुणोफी साम्यावस्या ही प्रकृति है, इसलिये सत्त्व, रज आPि गुण वास्माके नहीं, प्रातिक ही हैं। इनके शरा जगत्की स्थिति, उत्पत्ति भार प्रत्य सर्व रवस्तम इति सिरपुत्पत्पन्तहेतप ॥१२॥ नुवा करते हैं। इसलिये ज्ञान आरनाका गुण नही, प्रातिका ही गुण सिद्ध होता॥ १२॥ इस प्रसा सत्त्वगुण ही शान है, रजोगुण ही कम है और तमोगुण सच मान रब फर्म तमोऽधानमिहोम्पते । ही भान कहा गया है। वीर गुमि धाम उत्पम करनेवाध्य इनर ही सान है और सूत्र अर्पात् महतस्व गुमम्पतिकरः काल स्वभार स्त्रमेव च ॥१३।। दोनों ही संख्या युक्तिसंगत है ) ॥ १३ ॥ ही समान है। (सरिये पचीस मोर सन्चीस तोफी- पुरुषः प्रकृतिपूकमारो नभोऽनिल' । उवा ' (यरितीनों गुणोंका प्रकृति से प्रभा मान जैसा कि उनकी उत्पत्ति और प्रटपका देखते हुए मानना चाहिये ता नलाकी सभ्या मर्य । १ अन्वेगुम । २ तलमेर वा। भा २ १०६- ८४२ भीमद्भागवत [२०२२ ज्योतिरापः क्षिसिरिति तच्चान्युकानि मे नय।।१४॥ श्वास हो जाती है। उन तीनोंके अतिरिक्त पबीस ये है--) पुस्य, प्रकृति, माचल, धार, पाकार, भोर्ष त्वम्दशन घ्राणो जिहति मानशकपः। वायु केब, बल और पृथी—ये नौ तत्व में पलेही गिना जुका ई॥१५॥ श्रोत्र, स्वधा, चक्षु, नासिका और रसना-ये पाँच वानेन्द्रियों, धाका पाणि, पा, पायु और उपस्स-ये पाच कर्मेन्द्रियों तप मन जो पापाप्युपम्पपावधिकाण्यतोभयं मनः ||१५|| कर्मेन्द्रिय और मानेन्द्रिय दोनों ही है। इस प्रकार फुल ग्यार इन्द्रियाँ तपा शम्द, स्पर्श, रूप, रस वौर गन्ध- ये मानेन्द्रियक पाँच सिप । इस प्रकार तीन, नौ, शुन्दा स्पर्शे रसो गन्धो रूपं चेस्पर्धजातयः । म्यारह और पाँच [सब मिलकर अटाईस तव होते हैं। कर्मेन्द्रिय के द्वारा होनेवाले पाँच कम-घटना, गत्युफ्त्युत्सर्गशिल्पानि फर्मायतनसिद्धयः ॥१६॥ इनके शरा तत्त्वोंकी संख्या नहीं रहती। इन्हें कर्मेन्द्रि छोळना, मल स्पागना, पेशाब करना पौर काम करना--- सतप ही मानना चाहिये ॥१५ १६॥ सृष्टिके वारम्भमें मगारी प्रकृतिपस्स फायकारमरूपिणी । कार्य ( म्पाय इन्द्रिय वौर पचभूत ) और कारण (महस्व अधि) के रूपमें प्रकृति हीराती है। पी सत्यादिभिगुणवत्त पुरुषोऽन्यक्त ईक्षवे ॥१७॥ ति, उत्पत्ति और संहारसम्मन्धी अपस्मार धारण सत्त्वगुण, रजोगुण और तम्प्रेगुणकी सहायतासे अगली करती है । भन्यक पुस्प त्ने प्राति बार उसकी ध्यक्तादयो पिर्खाणा घातय' पुरुषधया । मास्याओंषा केवल साक्षीमान बना यता है ॥ १७ ॥ यस्त यादि कारण धातुएँ विकारको प्राप्त हुने र पुरसके क्षणसे शक्ति प्राप्त करके परस्पर मिल जाते हैं और प्रकृतिका आधय सेकर उसी क्ससे प्रमाण लम्पयायो सूजन्रपट सहता प्रकलात् ॥१८॥ सहि करते हैं ॥ १८॥ उदाजी ! जो स्यंग तभी सत्स प्रत मीर सप्तर पातव इसि तत्राथा पक्ष म्वादय । फरसे हैं, उन विपारसे आश, प्रयु, सेब, ना और | पृषी-पे पाच भूताच्य जीव वार साता परम्झना--- जो साक्षी जीव और माझ्य जगत् दोनों अधिष्टान शानमात्माभयापारम्तता दहन्द्रियामय ॥१९॥ पनि तो पचभूनासे हो र है । इसरिये थे ह. है-ये ही सत्य है । दे दिय और प्रामापी अम्ग नही गिनत ] 11 || जाग गए तन म्पीकर करत है, ने पहन हरि पाप भूत है। ध्य परमाण परमास । पद परमान जान पनर परिम्पयापि भूनानि पथ पर पर पुमान । एर पचभूतोंसे युक्त हार आदि सर करा प० २२ ] एकादश स्कन्ध ८४३ वयुक्त आत्ममम्मूर्त सन्दं समुपाविशत् ।।२०।। ३ बार उनसे जीवरुपसे प्रवेश करता है । ( इस मतके अनुसार नीयमा परमारमार्म और शरीर धादिषा पत्र मूमि समावेश हो जाता ह) ॥ २० ॥ जा त्यग कारणक चत्वार्येषेति तत्रापि तेज आपाऽममात्मन । रूपमें चार ही तल साकार करत है, वे कहत है कि आत्मासे तेन, जल और पृथ्पाकी उत्पत्ति हुई और जातानि तरिदै जात जन्माषपविन खलु ॥२१॥ जगत्में जितने पदार्थ है, सब इनहाँसे उत्फ्भ हाते हैं । मे समी कम्पोका इनाम सम्पवेश कर लेते है ॥२१॥ जो येग तत्पॉफी समन्या सत्रह मतष्टाते हैं, में इस प्रकार सख्याने सप्तदशक भूतमात्रन्द्रियाणि च । गगना करत है-पाँच भूत, पाँच तस्मात्राएँ, पाँच धानन्द्रियों, एक मन और एक आरम् ॥२२॥ जा अंग पक्ष पञ्चकमनसा आत्मा सप्तदश स्मृत ॥२२॥ | सस्योंकी समस्या सोयह मवयत है, उनकी गणमा भी | इसी प्रकार है। अतर फेमठ इतना ही है कि वे अश्वमें मनका भी समावेश कर लेते हैं और इस तब पोरसंस्म्याने आत्मष मन उच्यते । प्रकार उनकी सस्वसंम्या सास रह जाती है। जो येग तेर तत्व मानते है, कहते कि आशादि पाँच म्वन्द्रियाणि पबंध मन प्रात्मा प्रयोदश ।।२३।।। भूत, भाप्रापि पाँच मानन्द्रियां, एक मन, एफ बीमारना और परमात्रय तरह वसई॥२३॥ ग्यारह सम्या माननेवायने पाँच भूत, पांच ज्ञानन्द्रियाँ भार इनक ऐकादशत्व आत्मासी महामतेन्द्रियाणि च । अतिरिक एक आपका अस्तिल स्वीकार रिया है। जो म्ग नौ साल मानत है, ये आकाशादि पाँच भूत अटी प्रकतयच पुरुपय मन, मुदि, अहहार—ये आर प्रति और ना नवस्पथ ॥२४॥ पुस--इन्हीका तत्व माना है ॥२४॥ उदात्री ! इस प्रकार प्रीि मुनिग्न भिन्न-भिन्न प्रमान तत्वोपी इति नानाप्रसम्म्यानं तवानामपिभि स्वम् । गणना की। सवा पदमा उचित, क्योंकि सबमी मम्स्या युक्तियुक्त है। जो मांग तबानी, सय न्याप्पंयुक्तिमसा विदूपां सिमसामनम्।।२५ सब कुछ येर ही है ॥ २५ ॥ । उन्हें किसी भी मतमें बुराई नही दीपनी । उनफ किये स्वपीन हास्यममुटर ! पपरि मापन प्राति पुरुषमामी पपप्पात्मविलधों। प्रान और पुरुष गो एसयूमरस माप पिन दें, तपरिये आपममें इतने पुलि गहै कि शरत ग्नर मे नहीं जान पाता । प्रतिमें पुरप और नन्यान्यापाथपा कृप्प रमत न मिदा तया ।।२६।। पुरुष प्रालि अनेन मे प्रतीत हान है। इन भिमन्य पहा॥६॥कानन भाग मर एपर्न प्राचारपत पान्माप्रातिषम्यामनि । इनरी स्मिता भार अनिलागल्या बनवत मदद। और उपर उग्रप १ रन --...

८४२ भीमद्भागवत [अ० २२ ज्योतिरापः क्षितिरिति तत्वान्पुक्तानि मे नव॥१४॥ | मट्वास हो जाती है। उन तीनोंके अतिरिक्त पचीस ये है--) पुरुष, प्रकृति, इचप, बहार, माकाश, भोत्रं स्वम्दर्शन प्राणो बिहेति शानक्षतपः । पायु, तेज, नल भोर पृथ्वीये नौ तत्व में पहले ही मीना कुका ॥ १५ ॥ श्रोत्र, स्वचा, पशु, मासिक और रसना- ये पाँच बानेन्द्रियों, बाक पाणि, पद, पायु और उपस-ये पाँच कर्मेन्द्रियों तथा मन जो पापाण्युपस्सपावधिकर्माण्पोभयं मनः ॥१५॥ फर्मेन्द्रिय और मानेत्रिय दोनों ही है । इस प्रकार कुल म्पर इन्द्रियाँ तपा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध- ये बानेन्द्रियोंक पाँच विस्प । इस प्रकार तीन, नो, सम्यः स्प: रसो गन्मो रूप घेस्पर्भजातयः । बारह पोर पाच-सब मिलकर बटवाईस तत्व हाते हैं। कर्मेन्द्रियों के द्वारा होनेवाले पाँच कम-चना, गत्युपस्पुत्सर्गशिल्पानि कर्मायसनसिन्य ॥१६॥ इनके द्वारा तत्वोंकी संख्या नहीं मती। इन कर्मेन्द्रिय मोम्ना, मठ स्यागना, पेशाव करना और काम करना-- सहए ही मनना चाहिये ॥१५ १६॥ सृष्टिके बारम्भमें सर्गादो प्रकतिर्यस्य कार्यकारणरूपिणी । कार्य ( म्यारह इन्द्रिय और पञ्चभूत ) और कारण (माचस्व आदि) के रूपमें प्रकृति ही रहती है। वही सत्यादिभिगुणैर्धचे पुरुषोऽव्यक्त ईधते ॥१७॥ मिति, उत्पति वीर सहारसम्बन्धी मनस्वाएँ धारण सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी सहायतासे नगल्की | करती है । मन्पक पुरुष तो प्रकृति वोर उसकी ध्यक्कादयो विश्र्वाणा घावयः पुरुपेक्षया । स्पसावाका केवळ साक्षीमान बना यता है।॥ १७ ॥ महत्चत्त यादि कारण धातुएँ विकारको प्राप्त होते हुए फुपके रक्षणसे शक्ति प्राप्त करके परस्पर मिल जाते हैं बौर प्रकृतिका मामय लेकर उसीक मासे की लम्वीर्याः सूजन्स्पर सहसा प्रकवेपसात् ॥१८॥ सृष्टि करते हैं ॥ १८ ॥ उदयनी। सप्तय पातव इति तंत्रार्थाः पत्र म्वादयः । करते हैं, उनके विचारसे प्रामाश, मयु, तेज, अर और पृथ्वी-ये पाच भूत, छ्य जीव और सावर्षों परम्पत्य- जो साक्षी जीव और साक्ष्य जगत् दानोंका भविष्यन ज्ञानमात्माभयाधारस्तता दहन्द्रियामय ॥१९॥ उत्पति तो पाभूतोंसे ही हुई है [ इसमे से इन है-ये ही तत्व है। देह, इन्द्रिय और अमारिकी धमा नहीं गिनते ] ॥ १० ॥ नो मग पारस स्वीकार करत है, रे पाहत है कि पाच भूत ₹र एय है परमपुर परम्परमा । पर परमारमा अपने नाप परिपत्रापि भूतानि पञ्च पष्ठ पर पुमान् । हुए पत्र भूतोंसे युक्त हात दर आदिकी सरि बना प्लेग तत्वों की समसा सात सीकर प्र०२२ ] एकादश स्कन्ध तर्युक्त आत्ममम्मूत सरदं समुपाविशत् ॥२०॥ १ धार उनसे जीवनपसे अयश करता है । ( इस मतके अनुसार बीमा परम्परम्पमें और शरीर आदिका पक्ष- भूताम समावेश हा बाताह) ॥ २० ॥ जा मग कारणफ चत्वार्येवति वनापि तेज बापाऽममात्मन । रूपम पार ही वत्स स्वीकार करत हैं, व महत है कि बारम्पसे सेन, जप और पृपाकी उत्पत्ति हुई है और जातानि तरिद जात जन्माषयविन खलु ॥२२॥ जगदमें स्तिन पदाप है, सर न्हाँसे उत्पन्न हात। ने सभी करपाका न्हाम समावेश कर स्त है ॥२१॥ जो दाग तलामा सरूपा सरह सगत है, में इस प्रकार मस्म्याने सप्तदशक भूतमात्रन्द्रियाणि च । गगना करत है-पौध भूत, पाँच तया, पाँच ज्ञानन्द्रियों, एक मन और एक अत्म्य ॥२२॥ बामग पञ्च पञ्चगमनसा आत्मा सप्तदस स्मृत ॥२२॥ तत्त्यापी समय सान सत्रत हैं, उनी गाना भी इसी प्रकार है। अन्तर केरठ इतना ही किय आस्मामें मनच मी समावेश पर लते हैं और इस वदत् पाटशर्मम्म्याने आत्मैव मन उच्यत । प्रशा उनकी तत्पसंख्या सादर जाती है। मायग सेरह तस्त्र मानते हैं, वे कहते हैं कि आदि पाँच मन्द्रियाणि पव मन आत्मा त्रपादश ॥२३॥ भूत, यात्रादि पाँच शनेन्द्रियों, एर मन, एक नीपरम्प { और परम्परा--य साह तस्प है ॥२३।। म्यारह सम्या माननेवाने पोच नून, पाप शनन्दिया और इनक एकादसत्व आत्मासी महाभूतन्द्रियाणि च । अतिरिक एस पात्माका अस्तिम्प साकार दिया है। जा नाग नौ तस्स मानत है, वे आकार पाप भूत ची प्रकृतपर्धव पुरुपय नक्त्यध ॥२४॥ | मन, बुद्धि, शरय र प्राति और नई पुरुष-न्हाया ताप मानन ॥२॥ उदरी । इस प्रकार ऋषि-मुनिपान भिन्न-भिन्न प्ररारसे सस्ती इति नानाप्रमुग्न्यान उचानामृपिभि स्तम् । गग्ना की। मस पक्षमा उचित हो कि सभी मन्या सुळियुफ है। जो डग समपानी १, उसे रिमी भी मन युगा न गनी । उनर रिय मुप न्याम्पयुक्तिमन्चात् विदुपा किमशोभनम्।।२५।। जस्व युजयर दी६॥ २५॥ उदाउमा ज्यपटीन हा साम्मुर! पपरि म्परपन पति पुरुषधामी पयप्यान्मविठवगी। प्राम और पुरुष गो एकमन्स मप मिन, न सममें इतन मुकिर गर है कि मारत सा मही जान पाना । प्रति पुरप कर न्यान्यापाभवान् कप्न रयत न भिटानएर १२६५ पुरुपर्ने प्रति मिनीत हार न मिलता उपमतमोरारतरनान प्रान'मररने पालासचन पान्माप्रातियताऽऽमनि । इनमेनिमय अनिलता मानतामा 'न स इन्द्रासनाने नdi ८४४ भीमागवत [२०२२ पुरुष, । एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हदि । बाप तो सर्पह है, अपनी युक्तियुक्त पाणीसे मेरे सन्दका निवारण कर दीजिये ॥ २७ ॥ मगवन् ! आपकी ही छत्तुमईसि सर्पज बचोभिर्नयनपुणैः ॥२७॥ पासे जीपोंको ज्ञान होता है और आपकी मायाशक्तिसे ही त्वचो शान हिजीवानां प्रमोपस्तत्र शक्तित । उनके बानका नाश होता है। अपनी भात्मस्वरूपिमी मायाकी विचित्र गति आप ही जानते हैं, और कोई नहीं त्वमेव पास्ममापाया गर्ति फेथ न घापरः ॥२८॥ | आनता । अतएव आप ही मेरा सन्देव मिटानेमें समर्पहैं।२८। मीभगवानुवार भगवान् भीहप्णने कहा--उपजी ! प्रकृति वीर शरीर और बारमा- इन दोनोंमें अस्पन्त भेद है। प्रकृतिः पुरुपश्चति निरूपः पुरुपर्षभ । इस प्राकृत जगत्में जन्म मरण एष विनास पादि क्किर लगे ही रहते हैं। इसका कारण है कि एप वैकारिकः सर्गो गुणम्पतिफरात्मकः ।।२९॥ यह गुणों के क्षोमसे ही बना है॥ २९ ॥ प्रिय मित्र ! ममाज माया गुणमय्यनेकपा मेरी माया त्रिगुणामिका है। पही अपने साम, रम मादि गुणोंसे अनेकों प्रकारकी भेटवत्तियों पैदा कर देती विकल्पपुदीप गुणैर्विधये । है । यपपि इसका विस्तार असीम है, फिर भी इस शिकारस्मक सप्टिको तीन मार्गोमें बाँट सकते हैं। वैकारिकसिविधोऽध्यात्ममेक तीन भाग है---अध्यात्म, अघिदव और अविभूत।३०। उदाहरणाईनेन्द्रिय अप्पारम है, उसका सिप रूप मैपाधिदेवमविभूतमन्पत् ॥३०॥ अधिभूत है भौर नेत्रगोलपमें स्थित सूर्यदक्ताका अंश ग् रूपमार्फ षपुरत्र रः | बस्दैिव है । ये तीनों परस्पर एक दूसरेक अश्यसे सिद्ध होते हैं। और इसलिये अव्यस्म, अविर्दन और परस्पर सिम्पति म स्वतः खे। अधिमूत-ये वीनों ही परस्पर सापेक्ष है। परन्तु आकाशमें स्थित सूर्यमण्डल इन तीनोंकी अफेमासे मुज आत्मा पदेपामपरो म आपः है, क्योंकि वह सत सिद है। इसी प्रकार धारमा भी स्वयानुभूत्पाखिलमिद्धसिद्धिः । उर्युक्त तीनों भोक मूकारण, म्नका साक्षी और उनसे परे है। वही अपने स्वयसिम प्रकाशसे समझ सिम पवं स्वगादि भवणादि चक्षु पदापक मनसिवि है । उसीके समका प्रकाश होता जिहादि नासादि च चिचयुक्तम्।।३१॥ है। जिस प्रकार चक्षुके तीन भेद बताये गये, उसी प्रकार त्वचा, भोत्र, निहा, नासिका और विच आरके भी तीम योऽसौ गुणपोभकतो विकारः तीन भेद है ॥३२॥ प्रकृतिसे महत्वलनता है और महसक्से भागर । इस प्रकार या मार गुपोंक प्रधानमूलान्महसः प्रपतः। धोमसे उत्पम गुमा प्रातिका ही एक कार है। १ रेपेछ । २ माम्नो योगगति । । मषाषिभूतमपिरेवापत् । ४ मोऽसो । • सालचा हा भोर वायु' भत्रम पम भैर दिशा मिाल मोर पण नासिम गी भोर भश्मिी- मारा रिच दिनमा पिप भोर मामुरेशा मन म्नन विषय भौर चन्द्रमा भार, भारत विरास भोर या उदि, समानेन रिपप भौर नमा-दन सभी निविष तपासे भाज्यम्रो सम्पाप मी।

प० २२] एमादय स्कन्ध प्रई विमोइविकल्पोत MERके तीन मैद है--साषिक, सामस और राजस। यह आहार ही भवान और सष्ठिकी विविक्ताका मूल- बैंकारिकस्तामस ऐन्द्रियम् ॥३२॥ कारण है ॥ ३२ ॥ अस्मा बानखस्प है, उसका इन पदासि न तो कोई सम्बन्ध हे भोर न उसमे कोई धारमापरिज्ञानमयो बिरहो विमादकी ही यात है ! अस्ति-नास्ति (हनहीं), सगुण निर्गुण, माव-अमाव, सस्प मिथ्या भादि रूपसे जितने भी पस्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठः। वाद-विवाद है, सबका मूळफारण मेदरष्टि की है। इसमें एम्देह नहीं कि इस विवादका काई प्रयोजन नहीं है, व्यर्थोऽपि नेषोपरमेत पुसा या सर्पप्प म्पर्य है, तथापि भो रोग मुझसे-अपने वास्तविक खरूपसे विमुख है, वे इस विवादसे मुक नहीं मच परावधियां स्खलाकात् ॥३॥हो सकसे ॥ ३३ ॥ उष उपार रराषधीने पूछा-मगवन् मापसे पिमुश सीय खपन किये हुए पुष्प-पापोंके फलसम्प ॐधी-नीची स्थत परापतषिय वकः कर्मभि प्रभो । योनियों नाते-आते रहते है। अव प्रश्न यह है कि म्यपक आमाका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें रामा, अफर्ता- उपाष पान् यथा दशान गृहन्ति विस्जन्ति च ॥३४॥ का कम करना पौर नित्य-वस्तुमा बन्म-मरण कैसे सम्भव है। ३. ) गाबिन्द ! जो मेग वारमझानसे रहित है, चे हो इस वियपको ठीक-ठीक सोच भी नहीं सकते । और इस विषयक विद्वान् संसारमें प्राप मिलते नहीं, वाममारपारि गोविन्द एविभाध्यमनात्मभिः । स्पोंकि सभी येग आपकी मायाकी भूलभुलैया में पड़े हुए है। इसलिये पाप ही रूपा फरके मुझे इसका रास्य न घेतद प्रायचो लाफ विशंसः सन्ति पनिता॥३५॥ समझाइये ॥ ३५॥ भीभगवानुवाच भगवान श्रीकृष्णने सा-प्रिय उदय ! मनुष्योंया मन फर्म संस्कारोंका पुत्र है। उन सस्कारों के अनुसार मनः फर्ममयं नृणामिन्द्रियः पनभिवम् । भोग प्राप्त करने के लिये उसके सप पाँच इन्द्रियों भी पीई हैं। इसी माम है शरीर।बी कमकि अनुसार एक शरीरसे दूसरे शरीरमें, एक ध्येकसे दूसरे ठोक आता-जाता रहता है। आम्म इस णिशरीरसे लामालाक प्रयात्पन्य मारमा तदनुवर्तते ॥३६॥ समग्र पृषक है। उसका आना-बाना नहीं होता, परन्तु नब वह अपने रिशमीर ही समम बेटता है, उसी में म कर लेता है, तब उसे भी अपना भाना-आमा प्रतीत होने ध्यता है॥ ३६॥ मन कफि मधीन है। ध्यापनमनाऽनु विपयान प्यान् गानुथुतानप! यह देने एर पा सुने हुए सिरोपा चिन्तन करने व्यता है और क्षणभरने ही उनमें साकार हो आता है तथा १ मम ।। गाय माता ८४४ भीमनागवत [अ० २२ एवं मे पुण्डरीका महान्तं संशयं रदि । आप तो सब है, अपनी युक्तियुक्त पाणीसे मरे म्दोका निवारण कर दीनिये ॥ २७ ॥ भगवन् ! आपकी ही छत्तुमईसि संवन वचाभिर्नयनैपुणे ॥२७॥ कपासे जीवोंको ज्ञान होता है और आपकी मायाशकिसे ही त्वनोमानं हिजीवानां प्रमोपस्तेऽनशक्तित । उनके मानका नाश होता है। अपनी आत्मसरूपिणी मायाकी विचित्र गति आप ही जानते हैं, और काई नहीं समय पात्ममायाया गति पेत्य न वापरः ॥२८॥ नानता। अतएव भाप ही मेरा सन्देह मिटानेमें समर्थ हैं।२८। भीभगवानुवाच भगवान् श्रीकृष्णने कहा- उबजी । प्रकृति और पुस, शरीर और अरमान दोनोंमें अस्पत्त मेद है। प्रकृतिः पुस्पश्चेति विकल्पः पुरुपर्पभ । इस प्राकृत जगत्में जन्म मरण एव बि-हास यादि एप वैकारिकः सर्गा गुणपतिकारात्मकः ॥२९॥ विकार को ही रहते हैं । इसका कारण हो कि र गुणों के क्षोमसे ही बना है ॥ २९॥ प्रिय मित्र | ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा मेरी माया त्रिगुणामिका है। बही अपने सत्व, रज आदि गुणोंसे अनेकों प्रकारकी भेदहतियों पैदा कर देती विकल्पपुदीम गुणैविधचे । है । यपपि इसका विस्तार असीम है, फिर भी इस विकारात्मक सरिको तीन भार्गोम बोट सकते हैं। ये बैंकारिकखिविधाऽध्यात्ममेक- तीन भाग है- -अध्यात्म, अक्दिव और अविभूत।३०। माहरणानप्रेन्द्रिय अप्पारम है, उसका सिप रूप मेथापिदैवमधिमूतमन्पत् ॥३०॥ अधिमूत है भौर नेत्रगोलकमें स्थित सूर्यदेवताकर अश अधिदेव है । ये तीनों परस्पर एक दूसरके आपसे सिद्ध होते हैं। और इसलिये अन्याम, अषि और परस्पर सिध्यति यः स्वत से। अधिभूत-ये वीनों ही परस्पर सापेक्ष हैं। परन्तु बाशमें स्थित सुपमण्डल इन तीनों की अपेक्षासे मुक आस्मा यदपामपरी य आप हे स्पोंकि यह स्वत सिद है। इसी प्रकार भारमा मी वयानुभूत्याखिलसिद्धमिद्धि । उम्युज तीनों भोंस मूमकरण, उनका सर्भ और उनसे परे है। वही अपने मायसिय प्रकाशसे समस्त सिम एवं स्वगादि भषमादि चक्षु पदापाकी मूससिदि है । उसीके द्वारा सम्मा प्रकाश पास जिहादिनासादि पनियुचम्॥३१॥ है। बिस प्रकार च के तीन भेद बताये गय, उसी प्रकार त्वचा, पात्र, निहा, नासिका और रिच आदिके भी तीन- याऽसी गुणक्षाभकतो विकार तीन भदौ ॥३१॥ प्रतिसे महत्तस्त्र बनता है और महत्यससे अाशर । इस प्रकार यह आधार गुणों के प्रधानम्ठान्मतः प्रस्तः। धोमसे उपम हुआ प्रातिका ही एक विकार है। रम् रूपमा पुरन रधे । १ रण। २ पारम्ना समाति । । मपिन्नमश्रिमत्यत् ।। स्रोमो । • पप गाय स और वाया भान पर और दिशा गित स भोर यम्प नासिम प और भन्निी प्रमार, चिन चिम्मनपरि भोर मनुस' मा म्नप्रोपर भोर पारमा भार, भाशरसि भोर ५० fx समप्रस और नमन मभी पिरिध कस भामाभम्पप नत है।

म. २३ ] एकादष्ट स्कन्ध ८४९ शते स्वर्मनिरवान् शान्तास्ते चरणालयान्॥६०॥ | मी दुष्क द्वारा किया हुआ निरस्कार सह लेना अत्यन्त फठिन है। स्पोंकि प्राति अत्यन्त कती है ॥६०॥ इति श्रीमद्भागयते महापुराणे पारमाईस्या सहितायामेकादशस्यत्वे शार्षिशाऽध्याय ॥ २२॥ अथ त्रयोविंशोऽध्याय एक विशिष्ट बामणका इतिहास बादरामभिरुवाप मीशुकदेवजी करते है-पीक्षित् । वास्तवमें मगवान्की स्पस्यकपा ही अषण करने है। वेदी स एपमार्शसित उदक्षेन प्रेम और मुक्तिके दाता है । जय उनके परमप्रेमी मक्त भागवतमुस्पेन दापाईसंस्म्पः। व्यवजीने इस प्रकार प्रार्थना की, सव यदुवंशविभूषण सभाजयन् मृत्यवचो मान्द भीमगषान्ने उनके प्रश्नकी प्रशसा करके उनसे इस स्खमाषभापे भरणीपवीर्यः ॥१॥ | प्रकार कहा- ॥ १॥ मीभगवानुवाच भगवान् भीरुण ने कहा -देवगुरु वृहस्पसिके पाईस्पत्य सवै नात्र साधु दुर्बनेरि।। शिष्य उदयनी ! इस संसार में प्राय ऐसे संत पुरुष नहीं मिल्से, नो दुर्जनोंकी कटुपाणीसे बिंधे हुए अपने स्वयको दुरुक्कैभिममास्मान यः समाधासुमीधरः ॥२॥ सम्पल सकें ॥ २ ॥ मनुष्पका हृदय मर्मभेदी वा!से विक्नेपर भी उतनी पीसका अनुभव नहीं करता, जितनी न तथा सप्प सिद्धः पुमान् पाणैः सुमर्मगैः । पीग ठसे दुष्ठोंके मन्तिफ एवं कठोर वाम्बाण यपा संदन्ति मर्मस्सा संसता परुपेपवः ॥३॥ पहुंचाते हैं ॥ ३ ॥ उदयनी । इस विषयमें महात्मालोग कथयन्ति महत्पुम्पमितिहासमिहोदव । एक बड़ा पवित्र प्राचीन इतिहास कसा करते हैं, में ही तुम सुनाउँग, तुम मन लगाकर उसे सुनो ॥ ॥ वमई वर्षमिप्यामि निनाथ सुसमाहितः ॥ ४॥ | एक मिभुक्को दुयेने बहुत सताया प्ा । उस समप भी केनषिद् भिशुमा गीत परिमूवेन दुर्जनः । उसने अपना धैर्य न छोहा और उसे अपने पूर्वजन्मके फोका फल समाफर कुछ सपने मानसिक बार प्रकट मरसा धनियुक्तन विपाक निर्मणाम् ॥ ५॥ किये थे । उहाफा इस इतिहास में वर्गन है ॥ ५॥ अवन्ति दिवा कमिदासीदाम्पसमा भिया । प्राचीन समयकी यात है, उनमें एक मामण रहता पा। उसने स्सेती-म्यापार आदि करके पटुत-सी धन वाताति: कदर्यस्तु नमी लम्भाऽतिकमपनः॥६॥ सम्पति इद्धी कर ली थी। यह बहुत ही रूपण, कामी और यभी पा । कोष सो ठसे बात-पातमें आ जाया करता पा।॥ ६॥ उसने अपने जाति-मन्धु और अतिपिको घावयोऽतिथपस्तख पाल्माणापि नाचिंताः। कभी मीटी चातसे भी प्रसन नहीं किया, यिनेमियनेसी नो पात ही क्या है । यह पम पमसे रीत घरमें रखता १ गुफ उबार । २ वर्षः।। सन्ति । ४ मा ५ निमम्म। पश्यि । . म स ८४८ भीमद्भागवत [अ० २२ . यधाम्भसा प्रचलता सरवोऽपि चला इव । वैसे नदी-तामय बादिके जलके हिलने या चाहोनेर उसमें प्रतिविम्बित ताके वृक्ष भी उसके साप हिस- पशुपा भ्राम्पमाणेन दृश्यते प्रमतीय मूः ॥५३॥ खेलते से जान पड़ते हैं, जैसे घुमाये जानेवाल ने यथा मनोरथपियो पिपयानुभवो मृपा । साप साप पृषी मी घूमती हुई-सी दिखायी देती है, जैसे मनके द्वारा सोचे गये तपासप्नमें दसे गये मोगपदार्य सम्प बलीक ही होते है, वैसे ही हे दाशाह ! वात्माका समष्टाम दाशाई तथा संसार आत्मनः ॥५४॥ विषयानुमवरूप ससार भी सर्वघा सस्प है । आमा ते अर्थे सविधमानेऽपि संमृतिर्न निवर्तते । निस्प शुर-मुर-मुकलमाव ही है॥५३५॥ विपकी सत्य न होनेपर भी जो जीव विषयों का ही चिन्तन करता पायतो विपयानस्स स्वप्नेनागमो यथा ॥५५॥ रहता है, उसका या जन्म-मृत्युरूप ससार या कमी निच नहीं होता, जैसे सप्नमें प्राप्त धन-परम्परा मागे विना निवत नहीं होती ॥ ५५ ॥ तमाद्व मा सक्ष्च विपपानसदिन्द्रियैः। प्रिय उदय । इसलिये इन दुष्ट (फमी तृप्त न होनेपथ) इन्द्रियोंसे विपयोंको मत भोग्ने। यास्माके बहानसे प्रती आत्माग्रहणनिर्भातं पश्य वैकल्पिक भ्रमम् ॥५६॥ होनेवाल सांसारिप मेदभाव भामुखक ही है, ऐसे समझो ॥५६॥ भसाधु पुरुष गर्दन पाकर माह निकाल दें, पाणीवारा अपमान करें, उपहास करें, निन्द धितोऽवमानिताऽसद्भिः प्रलम्धोऽयथितोऽथवा। करें, मारे-पीने, माधे, माजीविका छीन में, ऊपर एक दें मूतदें पया तरह-तरहसे विचलित करें, निष्ठासे रिगाने तारिता सम्निषदो पात्या वा परिरापितः ॥५७॥ की घेध करें, उनके किसी भी उपद्रपसे क्षुम्भ न होना चाहिये। क्योंकि वेता बेचारे मानी गर्ने परमार्पका तो पता ही नहीं है। अत जो अपने कल्याणका इफ निष्ठितो मूत्रितो याचपहुधैवं प्रेमम्पितः । है, उसे सभी कठिनाइयोंसे वफ्नी विवेकमुखिारा ही-किसी वाप साधनसे नहीं-अपने वा स्ना श्रयस्फामा कन्गत आत्मनाऽन्मानमुदरत।५८) चाहिये । वस्तुत धारमररिही समस तिपपियोंसे बचने का एकमात्र साधन ॥ ५७५८ ।। उषजीने कहा-मावन् । थप समस्त बच्यों के शिरोमगि है । मैं इस दुनिसे किये गये निरस्कारको पधैयमनुपुप्पेयं वद नो वदतां पर । अपने मनमें वत्यन्त बसघ समस्ता मा. वैसे मैं इसको समय सर, आप उपदेश जीवनमें धरण फर मुगुस्सहमिमं मन्ये आरमन्यसदतिक्रमम् ॥५९।। साई, मैसे हमें कामाय ॥ ५९॥ विश्वस्मन् ! ओ आफ्फे मागतचर्मक आवरणमें प्रमपूर्वक संसम्न ? मिन्होंने आपके रण-यमय ही आप से लिया है विदुपामपि विश्वात्मन् प्रकविहिं पलीयसी। उन शान्त पुरुषोंके अतिरिक माना मिशन के रिसे १ भरममपनियम पायन प्रसाधमम् । २ बराबर मिसा। भय । ५ प्रकि। मे। उयव उपाय २०२३] एकादस स्कन्ध प्रोयेणार्धा फदर्याणां न सुखाय कदाचन । न मेरे मुम्सभोगके ही काम आया ॥ १५ ॥ प्राय देखा जाता है कि रुपण पुरुषोंया धनसे कभी मुख नहीं इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च ॥१५॥ मिस्ता । इस लोक्में तो वे धन कमाने धौर स्नाकी चिन्तासे जलते रहते है और मरनेपर धर्म न करनेके पोयशस्विनां गुदाम्या ये गुणिनां गुणा । कारण नरक जाते हैं ॥ १५॥ वैसे योगा-सा मी लोभ स्वल्पोऽपिवान् हन्ति मित्रोरूपमिषेप्सितम्१६ को सपाङ्गसुन्दर म्वरूपको बिना देता है, वैसे ही तनिक-सा मी स्येम यशस्सियोंके शुद पश और अर्धस्स साधने सिद्ध उस्क- रक्षणे म्पये। गुगियोंकि प्रशसनीय गुणोंपर पानी फर देता | है ॥ १६ ॥ धन कमानमें, फमा सेनपर उसको नायोपभोग आयाससासमिन्ता नमो नृणाम् ॥१७॥ याने, रसन एवं सर्च करनेमें तया उसक नाश और उपभोगमें-वहाँ देखो वहीं निरन्तर परिग्रम, मप, स्तेप हिंसानृतं दम्भःकामा क्रोध सयो मदः चिन्ता और भ्रममा ही सामना करना पत्म है ॥१७॥ मेदो परमविमासः संस्पर्धा व्यसनानि च ॥१८॥ चोरी, हिंसा, झूठ बोलना, दम्भ, काम, फ्राध, गर्व, अहार भेदयुधि, वेर, अविनास, स्पर्श, सम्पटता, आ धोर एते पञ्चदशान भर्थमूला मता नृणाम् । शराम-ये पंधन मनुष्योंमें घनके कारण ही मन गये । इसलिये कम्त्याणकामी पुरुषको चाहिये कि तमादनर्धमधास्य श्रेयोऽर्थी दूरवस्त्यजत् ॥१९॥ सार्य एव परमार्यके विरोधी अपनामवारी अनर्मको दूरसे ही ोड़ दे ॥१८१९॥ मधु, सी-पुर, माता-पिता, भियन्ते भ्रातरो दाराः पितर सुरदस्तथा । सगे-सम्बन्धी जो स्नेहपन्धनसे नवकर विज्युल एक हुए रावे?-राम-के-सब कोरीके कारण इतने फट एकास्निग्धाः काफिणिना सपा सर्वेऽरया फताः।२० गाते हैं कि सुरत एक-दूसरेक पातु वन आते हैं ॥२०॥ ये रोग पाइ-से धनक ठिये भी भुध और फुद हो जाते उधैनात्पीयसा पते सरम्धा दीप्तमन्यवः । हैं। यातकी-वातमें सौदा -सम्पन्ध अादते हैं, अग- त्पनन्त्या स्पधो नन्ति सहमोत्सृज्य मोहदम् २१ उरि रम्न स्टाते हैं और एकाएक प्राग मन-देनार उतार हा माते हैं। पहातक कि एफ-मरका सबनाश फर लम्बावन्मामरप्राध्य मानुप्पं तत निजाउयताम्। गरत हैं ॥ २१ ॥ दक्ताओंके में प्रार्थनीय मनुप्प सम्ममा अर टसमें भी थष्ठ प्राझगशरीर प्रास पाक वदनात्त्य पे स्वाप मन्ति पान्त्यशुभा गतिम्॥२२॥ | जा टमा उनार परत है और अपन सम्च न्याय परमाया ना करते २, अगुम पनि प्रातदान पगापरगयावार प्राप्य ठाऋमिम पुमान् । २॥ २२ ॥ इ मनुष्पसर्गर मानवार बराबर है, द्रविण ऽनुपन्त मस्र्योऽनप धामनि ॥२३॥ इसर पर मा एमा न बुद्धिमन् मनुन्य हरा बनाफ पार क्नक चरने रसग्दे ॥ २३॥ देररिपिवभूतानि मातीन्नध्य भापिनः । मनुष्य दया ऋषि, लिा, प्रगी, नि-मार, पुदमी और नक दमर भागगे। ग्ना माग पर मनुष्य नही र दा नयादी रमा उपभाग करना, अमभिन्न पारमान पपविनः पतन्यप ॥२॥ यद शुरु ममान न गमय पानाय ग ता १। २. परम ।। पन । नाय । ।

८५० श्रीमद्भागवत [२०२३ शुन्यावसथ आस्मापि काले फामेरनर्चितः ॥७॥ौर सय भी अपनी पन-सम्पत्तिके द्वारा समपर | अपने शरीरको मी सुखी नहीं करता पा ॥ ७॥ उसकी दुश्शीलस्य कदर्यस्य तुमन्ते पुत्रवान्याः । कृपणता और पुरे समावके कारण उसके बेटे-बेटी, भी मधु, नौकर चाकर और फनी आदि सभी दुख गते दारा दुहितरो मृत्या विपप्या नाचरन् प्रियम्॥८॥ कोई भी उसके मनको प्रिय मानेयाय व्यार नहीं और मन-ही-मन उसका अनिष्ठपिन्चन किया करते थे। वस्पैवं यक्षविचस्प म्युवस्सोभपलोकतः । फरता पा॥ ८॥ वह छोक-परक दोनोंसे ही मर गया पा। बस, यक्षेकि समान पनकी रस्खाली करवा राता था। उस नसे छह न तो धर्म कमाता पा और न मंग धर्मकामविहीनस्य चुलधुः पञ्चभागिनः॥९॥ ही मोगता पा । बहुत दिनों तक इस प्रकार चीयन तिने- से उसपर पचमहापाके माग्ी देवता विगर उठे ॥९॥ तेदवमानषिस्रस्तपुम्पस्कन्धस्व भूरिद । उदार उसमी ! पक्षमझायाके मागियोंक तिरस्कारसे उसके पूर्व पुष्पोका सहारा—विसके से पकाक न टिका या पा–बाता रहा और जिसे उसने पर उपोग अर्थोऽप्पगच्छभिधन षहापासपरिश्रमः ॥१०॥ थोर परिश्रमसे कहा किया था, वह कर उसकी बाँके सामने ही नए-भर हो गया ॥१०॥ उस नीच ब्रामणका शातयो जगृहः किंचित् किंचिद् दस्सव उप । कुछ न तो उसके कुटुम्बिपोंने ही छीन पिा, कुछ चोर चुरा ले गये । कुछ आग सा आने वादि देषी देवताकालत किंचिद् मापन्धोर्नुपार्थिवान्॥११॥ कोपसे नष्ट हो गया, कुछ समपके फेरसे मारा गया | कुछ साधारण मनुष्योंने ले रिया और पा सुचा र धौर दणके रूपमें शासकोंने पहिया ॥११॥ उदकी | स एष द्रविणे नरे धर्मकामविवर्जितः । इस प्रश्र उसकी सारी सम्पत्ति जाती रही ।म तो उसने धर्म ही कमाया पौर म भोग ही भोगे । इम उसके उपेक्षितम स्वजनचिन्तामाप दुरत्पयाम् ॥१२॥ सगे सम्बन्धियोंने मी उसपी बोरसे मुंह मोग यि । वय उसे पड़ी म्यानक चिन्ताने मे रिया ॥ १२ ॥ धनके नाशसे उसक उदयमें बड़ी चम्न हुई । उसस तस्स भ्यायता दीप नटरायम्तपस्विनः । म्न से से भर गया। आँसुओंके फारम गया गया । परन्तु इस सरह चिन्ता करते करते ही उसके मनमें नियता पाप्पकण्ठस्य निर्वेदः मुमदानभूत् ।।१३॥ संसारके प्रति महान् दु समुशि और उत्घट रेराम्पर | उदय हो गया ॥ १३ ॥ स चाहदमा कर्ट प्रधाऽऽत्मा मऽनुतापितः। अब र प्रमग मन-ही-मन पाइने मा-माप ! हाय !! बह सेग्मी बत है, मैंने इतने गिनतफ असे भ्यपदी इस प्रकार मापा । जिस पर रिये मेने न पाप न कामाय यस्सापापास इस ॥१४॥ सरन्धर परिश्रम पिरम, पर न तो मरम्ने एग और १ तरिम्न ।

व०२३] ८५१ प्रायेणार्धाः कदम न सुखाय कदाचन । न मेरे सुस्वमोगके ही काम माया ॥ १९ ॥ प्राय देख जाता है कि कृपण पुयोको पनसे कभी मुव नही इह पास्मोपतापाय मृतस्य नरफाय च ॥१५॥ मिस्ता । इस लोकमें तो ये धन कमाने और रक्षाकी चिन्तासे चलते रहते हैं और मरनेपर धर्म न करने के पसोयाविना शुद्ध साध्या ये गुणिनां गुणाः। कारण नरकमें जाते हैं ॥ १५॥ जैसे प्रेरा सा मी लोमः स्वल्पोऽपि तान् हन्ति चित्रोरूपमिवेप्सितम्१६/ को सर्वाङ्गसुन्दर स्वरूपको बिगाड़ देता है, वैसे ही | तनिक सा भी लोभ यशखियोंके शुद् यश और अर्थस साधने सिद्ध उत्कएँ रपणे व्यये । गुणियोंके प्रशमनीय गुणोंपर पानी फेर देता है॥ १६ ॥ धन कमानेमें, कमा सेनेपर उसको नायोपभोग आपासमासमिन्ताम्रमोनृणाम् ॥१७॥ हाने, रखने एवं सर्च करनेमें तपा उसके नाश कौर उपमोगमें-जहाँ देखो वही निरन्तर परिश्रम, मप, स्तेय हिंसानृतं दम्भा कामा क्रोधः सयो मद। चिन्ता और भ्रमका ही सामना करना पड़ता है ॥१७॥ मेदो पैरमवियासः संस्पर्धा व्यसनानि च ॥१८॥ चोरी, हिंसा, झूठ योन्सना, दम्म, काम, क्रोध, गर्व, वादार मदमुद्धि, वैर, अधिवास, स्पर्श, लम्पटना, गया और एते पनदशान अर्थमूला मता नृणाम् । शराब-ये पंद्रह पनी मनुोंमें पनके कारण ही माने गये हैं। इममिये कल्याणकामी पुरुपको चाहिये कि समावनमधारम्प भेमोऽर्थी द्रवस्त्यजेत् ॥१९॥ स्वार्थ एवं परमार्थ के विरोधी अपनामधारी अनर्यको दूरसे ही पदे ॥१८ १९॥ पश्-घु, सी-पुत्र, माता-पिता, भियन्ते मातरो दारा पिव। सुरदस्तथा । सगे-सम्बन्धी यो स्नेहबन्धनसे बंधकर निस्कुल एफ हुए रहते हैं-सक्के सव कौपीके कारण इतने फट एकास्निग्धार काकिणिना सपा सर्वेऽरमा कवा।।२०। गाते हैं कि तुरंत एक-दूसरेके धनु यम बाते हैं ॥२०॥ ये त्येग पोर से धनके लिये भी सुध थोर फुद हो जाते अनास्पीयसा मते संरन्धा दीसमन्पषः । हैं। यात-की-यतमें सौहार्द-सम्पन्ध छोड़ देते हैं, ख्यग- स्यमन्त्पाशे स्मधोघ्नन्सि सहसास्कृन्य सौरदम् २१ सेंट रखने लगते हैं और एकाएक प्राण सेन-दोपर उतारू हो जाते है । यहातक कि एक-दूसरेका सवनाश फर लम्चा जन्मामरप्राय मानुप्य सद् दिजाउयताम्। गरसे हैं।॥ २१॥ देवताओंके मी प्रार्थनीय मनुष्य- जन्मयो और उसमें भी श्रेष्ठ प्रमगशरीर प्राप्त करके वदनात्य ये स्वार्थमन्ति यान्स्पभुभां गतिम्।।२२।। | जो उसफा बनादर करते हैं और अपने सप्चे म्पाय- परम्पपका नाश करते हैं, वे बशुभ गतिस प्राप्त होते स्नगापपर्णयाद्वारं प्राप्य लोकमिम पुमान् । ६॥ २२ ॥ यह मनुष्यशरीर मोक्ष और स्वगका सार है, दक्षिण कोऽनुपज्पेस मोऽनर्धस्य धामनि ॥२३॥ अनोक धाम धनके घरमें फंसा रहे ॥ २३ | इसको पाफर भी एसा कौन युदिम्पन् मनुष्य है जो जो देपपिपिवभूतानि मासीन् मध्य भागिनः । मनुष्य देशमा, ऋषि पितर, प्राणी, जाति-माई, कुटुम्बी और धनके दूसरे गीगरोंको टनका भाग सान स्तुर असंविभन्प चात्मानं यक्षवित्त पतस्पध ॥२४॥ यह पक्षके समान धनकी रसवारी फरनवान्य परम तो नहीं रहता और न न्यप ही उमा उपभोग करता है, १ पा. २. प्राषिभः ।३ गुपयन ।। मीनन्या ।

८५२ भीमामपत [ब. २३ मर्थयारमा वि प्रमचस्स पयो पलम् । माश्य ही अधोगतिको प्राप्त होती ॥२९॥ में बने फर्तम्पसे युक्त हो गया है। मैंने प्रमाइमें अपनी बा, इश्चला पेन सिम्पम्ति अरठः किं नु साधये ॥२५॥ धन और मल पौरुष स्वो दिये । विकीन्ग किन सोसे मोझतक प्राप्त कर लेते। उनीको मैने एन एक्स फरनेकी म्पर्य धमें खे दिया । बब मुडामें में कौन- कस्मात् सक्तिश्पते विद्वान् ष्पर्धयाहयासछत् । स साधन कसँग ॥ २५ ॥ मुझे माझम नहीं होगा कि सो विशन् मी धनकी व्यर्प तृष्णासे निरन्तर में कस्सपिन्मापया नून लोकोऽयं मुषिमोरिवः ॥२६॥ दुखी रहते हैं 'हो-न-हो, अवश्य ही यह ससार किसी भी मायासे पस्यन्त मोहित हो रहा ॥२६ ॥ यह मनु किं भननदेर्वा कि फामैर्वा कामदैत । शरीर काळके विकराल गाम्में फ्म मा। एसको धनसे, धन देनेवाले देवताधों धौर मेगसे, भोगवसनाओं और उनको पूर्ण करनेवासे तथा पुन पुन मना मृत्युना असमानस्स फर्मभिर्योत बन्मदः ॥२७॥ मृत्युके पारमें गठनेमाले स्काम कर्मोस अम ही स्य है।॥ २७॥ नूनं मे भगवास्तुष्टः सर्वदेवमयो हरिः । इसमें सन्देह नहीं कि सदिक्सरूप मगवान् मुापर प्रसम है। तभी तो उन्होंने मुझे इस दशा में पहुंचाया येन नीतो दशामेता निर्देदमास्मनः पुनः ॥२८॥ पौर मुझे बगदके प्रति यह दुस्मुधि वीर भैरम्प दिया है। क्तुत वैराग्य ही इस संसार-सागरसे पर होनेके छिये नौकाके समान है ॥ २८ ॥ में अब ऐसी सोज कालापशेपेण खोपपिप्पेजमारमनः । परस्सामें पांच गया है। यदि मेरी आयु क्षेप छ । में पाममममें ही सर राकर अपने परमाक यप्रमघोऽखिलस्वार्षे यदि स्मात् सिद्ध बारमनि॥२९॥ सम्झन्धमें सबफन हो जाच्या और बघ जो समय पर या है, उसमें अपने शरीरको तपस्यके रा पुस सत्र मामनुमादेरन् देखालिसपनेश्वराः । गॉग ॥ २९॥ तीनों लोकोंके स्वामी देवगण मेरे इस सरसका अनुमोदन करें। अभी निराश होनेकी कोई सहतेन प्रमलोकं स्वट्वाङ्गः समसाधयत् ॥३०॥ | भगवनामकी प्राप्ति कर श्री पी ॥ ३० ॥ बत नहीं है, क्योंकि राजा खट्वाङ्गने तो दो घी की श्रीभगपानुभाष भगवान भीरुप्य बात-उदयनी । उस उम्पैननिवासी ब्राह्मणने मन-ही-मम इस मका निभा करके मैं और मेरे पनकी गोठ सोड दी। इसके इस्पभिप्रस्प मनसा पापन्स्पा दिजसत्तम । बाद म शान्त होकर मौनी संन्यासी हो गया ॥३१॥ उन्मुन्य दयन धीन्मान्ता भिक्षुरमन्सनिः।।३१॥ प्रात मासकिनी। उसने अपने मन, इन्द्रिय वीर अब उसके पिच किसी भी स्माम, बस्तु या पलिके स पचार महीमेवा सपतास्मेन्द्रियानिल । प्राणोंको पशमें कर लिया । यह पृणीपर समरसे विचरन ज्या । या मिशा के लिये नगर और गोम भिवार्थ नगरप्रामानसशोऽलक्षिसोऽविशत् ॥३२॥ / जाता अवश्य पा, परन्तु इस प्रकार जाता पा सिस परि।

म०२३] एकादश स्वन्ध ८५३ तं वै प्रपयर्स भिक्षुमवघ्तमसज्जनाः । उसे पहचान न पाता प॥ ३२ ॥ उदयनी ! र मिझुफ अवधूत यात हा ऐ गया था। दुए उसे या पर्यभवन् भद्र बहीमिः परिभूतिभिः ॥३३॥ देखते ही टूट पाते और तरह-तरहसे उसका तिरस्कार करके उसे वग करते ॥ ३३ ॥ कोई उसका दम केषिस्त्रिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम् । छीन लेता, तो कोई मिक्षापात्र ही टक ले जाय । कोई कमण्डल उठा ले जाता तो कोई आसन, स्वाक्ष- पीठ पैकऽक्षयत्रं च कन्यां धीराणि फेचन ॥३४॥ ) माल और फंया ही लेकर मग जता। कोई तो उसकी गोटी चौर सको ही श्वर-उधर गल प्रदाय प पुनस्तानि दर्शिसान्यादर्सने । देते ॥ ३४ ॥ कोकोई ये पस्तुएँ देकर और कोई अन्न प मैश्यसम्पन्न मुजानस सरिचटे ॥३५॥ दिसम-दिस्यकर फिर मेन लेते । म यह अमधूत मधुकरी मगकर पाता और बाहर नदी-ठटपर मोचन करने मनयन्ति च पापिष्ठाः टीमन्स्यस्य पनि । बैठता, तो पापी छोग कभी उसके सिरपर मूत देते, वो कभी यूफ देते । वे लोग उस मौनी अषष्तको तरा यवपापं पापयन्ति वारयन्ति न मति चेत् ॥३६॥ | तरइसे योनेके लिये विवश करते थोर का यह इसपर भी न बोरस्ता तो उसे पीठते ॥ ३५१६ ॥ सर्वमन्त्पपरेशाभि स्तेनोऽयमिविवादिनः। को उसे चोर कहकर रॉटनेनपटने लगता। कोई | कहता से यौष ल्ये, घोध थे और सिर उसे रस्सीसे पघ्नन्ति रज्ज्यातं फेचिद् सम्पतांबभ्यतामिति॥३७॥ | बाँधने ष्यते ॥ २७ ॥ फो उसका तिरस्कार करके इस प्रकार ताना फसवे कि देखो देखे, वन इस विपन्स्पेकेऽवजानन्त एप.धर्मध्वजा शठ । रुपणने घमका ढोंग रचा है। धन-सम्पति जाती रही, सी-पुत्राने घरसे निकाल दिया तब इसने मीस माँगनेका षोपविच इमा प्रतिमग्रहीद नबनोन्मितः ।।३८॥ रोजगार मिया है ॥ ३८ ॥ बोहो । देखो तो सही, या मोटा-तगड़ा मितरी धैर्य, चड़ भारी परतके स्मन अहो एप महासारो सिमान् गिरिरारिख । है। यह मौन रहकर अपना काम मनाना चाहता है। सचमुच यह गुलेसे भी मनायर होगी धौर बनिययी मौनेन साधयत्पर्य यमपद हनिमयः ॥३९॥ 2 ॥ ३९ ॥ कोई उस अनन्तकी रंसी उमाता, वो कोई उसपर अयोवायु अता । जैसे स्लेग तोता-मैना इत्येक विहसन्त्यनमेक दुवातयन्ति च । श्रादि पार पक्षियोंको यौव रेते य पिबड़में मद कर खते हैं, पसे ही उसे भी वे लोग गाँव दते और घरों में पद कर दते ॥ १०॥ किन्तु यह सब कुछ मुपचाप सं घरधुनिरुरुधुर्यथा फ्रीउनके विजम् ।।४०॥ र लगा । उसे कभी घर बादिक फारण देहिक पीड़ा सहनी पड़ती, की परमी-सर्दी धादिसे देवी कर ठाना पड़ता और भी दुर्जन । अपमान अदिके एव स भाविक दुःख देषिक देदिकं च यत् । मा उसे भौतिक पीड़ा पहुँचाते, परन्तु भिक्षुक्क मनमें इससे कार पियार न होना । बइ सम्प्रता किया भाक्तम्पमात्मना दिष्ट प्राप्त प्राप्तमयुध्यत ॥४१॥ म मरे पक्मक यौका पर है और इसे पासव।२ पाप्रमग ।। दुबारसन्ति । ४ ५ प । ।

भीमद्भागवत - प्रोग्रहस्पैव बदन्ति पीडा महाकी पीड़ा तो उनका प्रभाव ग्रहण करनेपले शरीरका ही होती है और आम उन महों और झीरोंसे मत कुम्पत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥५४॥ | परे है। तब मन, मह किसपर क्रोध करे । ॥५॥ कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्षेत् पदि कोको ही मुम्दु स्का करण माने तो मसे अरमका क्या प्रयोमन ! क्योंकि ये से एक पदार्थक किमात्मनस्तति बराजस्थे। पर और चेतन-उमपरूप होनेपर ही हो सकते हैं। (ो वस्तु विकारयुफ और वफ्ना हितहित माननेकी दास्पषिर पुरुषोऽय सुपर्णः ऐती है, उसीसे कर्म हो सकते है क्तः या विकारयुक्त होनेके कारण पर होनी चाहिये और रितरितका धान लभ्येत् कस्मै नहि फर्ममूलम् ॥५५॥ रखनेके कारण चेतन । ) किन्तु ये तो क्केतन है और उसमें पक्षीरूपसे एनेपाल वामा सम्प निर्विकार पालस्तु हतुः सुखदुःखयोश्चत् और साक्षीमत्र है। इस प्रकार कोका तो करें फिमारमनस्तत्र सदास्मोऽसौ । भाधर ही सिद्ध नहीं होता । फिर कोष जिसपर करें ॥५५॥ यदि ऐसा मानें कि फार ही सम्मान नाम्नेरिमापोन हिमस्स तत् स्यात् कारण है, तो आत्मपर उसका क्या प्रमा। र्पो काल सो बारमखरूप ही है। वैसे भाग को नहीं कुम्पेत कस्मै न परस्य इन्दम् ॥५६॥ क्स सक्ती, और 6 को नहीं गम मा न फेनचित् कापि कचनास्स | वैसे ही यात्मस्वरूप का पस्ने भारमाको ही मुस- दुग नहीं पाँचा सकता । फिर किसपर कोष निया इन्द्रापरगः परवः परस्स। धारमा शीत-उष्ण, मुम्दुस बादि नोंसे | सर्वपा वसीत है ॥ २६ ॥ यात्मा प्रासिके सरूप, पथाहमः ससृतिरूपिणः स्या धर्म, कार्य, लेश, सम्बन्ध और गन्धसे भी रहित है। उसे कभी कही किसीक द्वारा किसी भी प्रकारसे इनका देवं प्रपुदो न विमेति मृतः ॥५७॥ स्पर्श ही नहीं होता । वह तो जम गुस्सुके पकने एतां स आसाय परास्मनिष्ठा- झटकनेवाले शाहारको ही होता है । जो इस कतको जान लेता , या फिर किसी भी मपके निमितसे मम्पासितां पूर्वतममापिभि । मयमीत नहीं होता ॥ ५७ ॥ पाना प्राचीन शरि- मुनियोंने इस परमात्मनिष्टामा पाप ग्रहण किया। अहं वरिप्यामि दुरन्तपार म भी इसीका भाश्य ग्रहण करूंग और मुळि वा मुकुन्दाधिनिपेक्यैव ॥५८॥ प्रमके दाता भावान्क घरणकरपी सेमाके द्वारा ही इस दुरन्त वानसागरफो बनायास ही पार कर देगा ||५८॥ भीभगपानुवार भगपान् भीरुप्प व-उदाजी । उठ प्रझमा धन स्या मरा हुआ, उसका सारा से ही दूर हा त्या | अब वह ससारस विरत हा गावकर प्रमन्य गो पफरमान स्थम् । सम्पास स्कर पप्पीमें लछद चर रहा 41 परि बाय तमा निविंच नएद्रविणा गवतम ० २४] एकादश स्कन्ध ८५७ निराकतोऽसतिरपि स्वधर्मा दुर्येने उसे बहुत सताया, फिर भी पा अपने धर्ममें घटठ रहा, तनिक भी विचति न तुला । उस समय वह मौनी दकम्पिवोऽम मनिराह गाथाम् ॥५९॥ मत्रत मन-ही-मन इस प्रकारका गीत गाया करता पा ॥ ५९ ॥ उदवजी 1 इस संसारमें मनुष्यको कोई सुम्बाम्बपदो नान्यः पुरुपस्पास्मषिप्रम । दूसरा सुस या दुच नहीं देता, यह तो उसके पिता भ्रममात्र है। यह सारा समार और इसके भीतर मित्र, उदासीन धौर शाके मद महानफल्पित हैं ॥ १० ॥ मित्रादासीनरिपत्र संसारस्तमसः कृत ॥६०॥ | इसलिये प्यारे ठसव ! अपनी वृत्तियोंको मुममें तम्य कर दो और इस प्रकार अपनी सरी शक्ति लगाकर तमात् सर्वात्मना वास निगृहाग मनो धिया । मनको पशमें कर स्टो और किर मुनमें ही निस्पयुक्त होकर स्मित हो जायो । वस, सार योगसाधनका मय्पावेशितया युक्त एसापान् योगसंग्रहः ॥११॥ | इतना ही सार-संग्रह है ॥ ११ ॥ मह मिझुक्का गीत क्या है, मुर्तिमान् म्यान-निष्ट्य ही है। नो पुरुष एकाग्रचित्तसे इसे सुनता, सुनाता और धरण करत य एतां भिसुणा गीचा प्रमनिष्ठां समाहित । है वह कभी मुस-तु खदि इन्दोंके यशमें नहीं होना। उनके बीच भी यह सिंहके समान दहारता रहता धारयशषपम्वन् पवामिभूयते ॥६२॥ है ॥ १२ ॥ -- पति श्रीमहागवते महापुराणे पारमईस्या संहितायामशादशस्कन्वे प्रयोविंशोऽध्याय ॥ २३ ।। अथ चतुर्विशोऽध्याय साम्पयोग भीभगमानुपान भगवान् भीरण कावे है-प्यारे उयम ! अब में में सल्पिशासका निर्णय सुनाता है। प्राचीन काम्के अथ ते संप्रपक्ष्यामि सारूप पूर्वविनिषितम् । योमा ऋषि-मुनियोने इसका निश्चय किया है । जब जीव इसे मीर्मोवि सम्म लेता है, तो इ मेदयुधि मद् विझाय पुमान् सपो जमाद मैकरिसर्फ भ्रमम् ।। | मुस्क मुस-सु खदिरूप भमा तकार त्याग कर देता है॥१॥ युगोंसे पूर्व प्रध्यमाम्में बादिसत्ययुगम और मा कमी मनुष्य विषेकनिपुण होते है-म सभी भासीमानमथा पर्म एफमेवाविफरिपतम् । मवस्यामि या सम्पूर्ण दृस्य वोर प्रय, मगर और जीव विकासन्य किसी प्रकारके भेदमावसे रहित फेक या विषेशनिपुणा पादौ कृतयुगऽयुगे ॥२॥ ही होते हैं ॥ २ ॥ इसमें सन्देह महीं कि अनमें किसी प्रकारका निकटर नहीं है, यह केवल अद्वितीय समापाफलम्पण फेवलं निर्विरिपतम् । स्त्य है। मन और पाणीकी उसमें गति नहीं है। म प.११.८- भीमद्भागवत [.१ पाचनोऽगोधर सस्य विधा समभवन् पुरत् ॥ ३॥ मम ही माया और उसमें प्रतिबिम्बिन जीके सपने- तयारकतरो मार्थः प्रकृतिः साभयात्मिका । पश्य पौर प्रध्यके स्पर्म—दो मम लिमकस हे गया ।। ३ ।। उनमसे एक वस्तुको प्रकृति करते है। घान स्वन्मतमो भाषः पुरुषः सोऽभिधीयते ॥ ४॥ उप्सीन जगतमै काय और कारणका रूप धरण निस है। दूसरी वस्तुको, नो मानवम्बए है, पर माते तमा रज सत्वमिति प्रकसेरभवन् गुणाः । है ॥ ॥ उद्धवजी ! मैने ही बीके शुम मम | कोके अनुसार प्रकृतिको क्षुम्ब किया । सा उससे मया प्रक्षोम्पमाषायाः पुरुपानुमतेन च ॥ ५॥ सव, रज और तम-ये तीन गुण प्रकट हुए ॥ ५ ॥ तेम्म समभवत् पूर्व महान् सत्रण संयुतः । उनसे क्रिया-शक्तिप्रधान सूत्रधीर पानशतिप्रधान महसस प्रफ्ट हुए । वे दोनों परसर मिले हुए ही हैं। महत्तत्तमें ततो विहर्षता जाताभकारो यो विमोहनः ॥ ६ ॥ | विकार होनेपर बाहार म्पक । क वाकार की बीयोंको मोहमें गलनेवल है ॥६॥ तीन प्रकारका कारिकस्तजसष पामसपत्मह निषत् । है—सात्विक, रानस और तामस । हार पतामात्रा, समाप्रन्द्रियमनमा कारण चिदचिन्मयः ॥७॥ इन्दिप बोर मनका करण है, इसरिये यह स-वन- ठमपारमा है॥ ७ ॥ त्यम्स वादारसे पनामा अर्थस्तन्मात्रिकामा तामसादिन्द्रियामि च | | और उनसे पाँच भूतोकी पत्ति हई । सम राइस सैजसा देनमा आमन्नेफावश च पैकवात् ॥ ८॥ म्पारण देवता : प्रकट हुए ॥ ८ ॥ ये सम्म वाटारसे इन्द्रियों और सात्विक महारसे इत्रियों के मया संघोदिसा भाषाः सर्प संहस्य कारिणः । पदार्थ मेरी प्रेरणासे एकत्र होकर परस्पर मिज गये और अरमुत्पादयामासुर्ममायतनमुभमम् इन्होंने यह मण्डप मा म किया । यह वण ॥९॥ मेरा उत्तम निवासस्थान है॥१॥ पदम घमिम्मई समभषमणे सलिलसस्मिती। वम् स्पित हो गय, तप में मारायमरूपसे इसमें मिराजमान हो गया। मेरी नामिसे विचमकी पति मम नाम्यामसूद पर विश्वास्यं वय पारमः ॥१०॥ हुई । उसीपर कमाका आविर्भाव हुमा ॥ १० ॥ विक- समरिके अन्त करण प्रमाने पसे बहुत सी तपस्य सासजसपसा युको रमसा मदनुग्रहात् । की। उसके बाद मेरा रुपा प्रसाद प्राप्त करके रजोगुणके धारा म् , मुभ , स धर्मात् पृथ्वी, क्तरिक्ष कौर लोमान्सपालान् विपास्मासषः स्वरिति विधा११ | सगम तीन अर्कोनी बौर इनके कामों की स्कता की ॥ ११॥ देवताभोंके निवासके लिये सर्वेक, भूत- देवानामोझ आगीत स्वप्तानो घ वा पदम् । प्रेतादिके लिये मुबक (अन्तरिक्ष ) और मनुष्य | माविके लिये भर्नेक ( पृरिमेक ) मा निभय किया मत्पादीनां च भूर्लोक सिद्धानां पितयात् परम्।१२। गा । इन तीनों रमेसे कर मोक, तरमेक थरि १ विधमपस्मिना । २ ।। योजना ।४ प ५ समिसिते । • पाप भनेत्रिय पाँच फर्मेनिप भोर एक मन-दस प्रकार म्पाय इलियाके मभिपता म्पय रेखा है। - . -- ८५९ १०२४] एकादश स्कन्ध - मधोऽसुराणा नागानां मूमेरोकोऽसृजत् प्रा । सिदोंके निवासस्थान हुए ॥ १२ ॥ सष्टिकार्यमें समर्प प्रमाबीने असुर और नार्गों के लिये पृथ्षीके नीचे अतल, त्रिलोक्पां गवया सर्वाः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम्।१३। क्तिल, सुनउ नदि सात पाताळ स्नाये । इन्हीं तीनों | लोमि त्रिगुणात्मक कमकि अनुसार विविध गतियाँ योगस्य तपसव न्पासस्स गतयोऽमलाः । प्राप्त होती है ॥ १३ ॥ योग, तपस्या और स्म्यासके द्वारा मइक, जनमेक, तपश्रेक और सस्परप महर्मननपा सरयं भक्तियोगस मद्गतिः ॥१४॥ उत्तम गति प्राप्त होती है तपा भक्तियोगसे मेरा परम धाम मिळता है ॥ ११ ॥ यह सारा जगत् कर्म और उनके संस्कारों से युक्त है। में ही कालरूपसे फर्मोके अनुसार मया कालास्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् । उनके फल्का विधान करता हूँ । स गुणप्रवाहमें परफर चीव कमी व चाता है और कभी उपर वा गुणप्रवाह एतमिन्नुन्मसति निमअति ॥१५॥ जाता है. कभी उसकी अधोगति होती है और कभी उसे पुष्पगति-उपगति प्राप्त हो जाती है ॥ १५॥ वर्षात्कशाम्लो यो यो भाषा प्रसिध्यति । जगत्मे छोटे-बड़े, मोटे पतले.त्रितने भी पदार्प क्नते हैं, सव प्रकृति और पुरुष दोनोंके सपोगसे ही सिद सोऽप्युभयसयुक्तः प्रकस्या पुरुपेण च ॥१६॥ होते ॥ १६ ॥ निस्के वादि और अन्तमें मो है, वही बीचमें भी है और वही सत्य है । विकार तो केसक यस्तु यस्सादिरसमस वै मध्यं च वस्प सन् । म्पवहारके लिये की कल्पनामात्र है। जैसे फगन कुणाल आदि सोनेके विकार, और पह-सकोरे आदि विकारो व्यपारार्थों यथा सैजसपार्थिवाः॥१७॥ | पीके विकार पहले सेना या मिही ही थे, बदमें भी सेना या मिट्टी ही रहेंगे। पत वीचमें मी ये सोना या यदुपादाय पूर्वस्तु भाषो विकासेऽपरम् । मिती ही है। वही कारण ( महल वादि ) भी मिस परम कारणको उपादान बनाकर वर (महंकार मादिरन्तो यदा यस तव सत्पमभिधीयते ॥१८॥ आदि ) कार्य की सृष्टि करते हैं, वही उनकी अपेक्षा मी परम सत्य है । वारपर्य या कि मा जो निस किसी मी कार्यक अदि और न्तमें विपमान रहता है, वही प्रकतिर्यस्योपादानमाधार! पुरुषः पर। स्प है॥१७१८॥ इस प्रश्नका उपादान कारण प्रति है, परमात्म अपिछन है और इसको प्रकट करमेवाला सवोऽभिम्पका फासोनम वत्रिवयं स्वहम्॥१९॥ है । व्यवहार-कालकी या त्रिविक्ता पस्तुत - स्वरूप है और में वही पुर प्रम ॥ १९ ॥ नक्तक परम्पकी ईक्षणशक्ति अपना काम करती राती है, सर्गः प्रवर्वते तापत् पौर्यापर्येण निस्पक्षः । अबतक उनकी पालन-प्रवृति बनी राती है, तबस्फ बीबकि फर्ममोगके लिये कारण-कार्यरूपसे पच पिता- महान् गुणविसर्गाः सिस्यन्तो यावदीक्षणम् ।२०। पुपादिके रूपसे यह सुशिचक निरन्तर परता यता है॥२०॥ विरामपासापमानो लोकमपविफल्पका यस विराट् ही विविध ख्यकों की सृष्टि, स्थिति और महारफी ख्यममि है। जब म काठमपसे इसमें म्पास ८६. भीमागवत [1० २१ पनस्वाय विशेषाय कल्पते अपनी सह ॥२१॥ | होता , प्रलयका सकल्प करता है, तब यह मुन्नों साप विनाशम्प विभागके योम्प हो नासा है ॥ २१॥ अन्ने प्रलीयते मर्त्यमन्नं धानासु लीयते । उसके लीन होने की प्रक्रिया यह है कि प्राणियों के शरीर धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गघे प्रलीयते ॥२२॥ धर्मे, मन वीजमें, वीच भूमिमें वौर भूमि गन्ध- तन्मधमें लीन हो जाती है।॥ २२ ॥ गन्ध जर्मे, बा अप्सु प्रलीयते गन्ध आपण स्वगुणे रसे । अपने गुण रसमें, रस तेममें मोर तेष रूपमै स्बन हो | माता है ॥ २३ ॥ रूप वायुमें, वायु स्पर्शम, पर्स लीयते ज्योतिपि रसो न्योती स्पे प्रलीयते ॥२३॥ | अफाश, तण बाकाश शन्नतन्मात्रामें स्मन हो मात है। इन्द्रियों पपने कारण देववामि और सतत रास रूप पामो स च स्पर्शे लीयते सोऽपि चाम्परे। अहहारमें समा नासी ॥२॥हे सौम्य ! राजसणार अपने नियत्न सात्तिक भाररूप मनमें, शम्दतमात्र अम्मरं शम्दतन्मात्र इन्द्रियाणि खयोनिषु ॥२४॥ पञ्चभूतोंके फारण तामस महाद्वारमें वीर सारे जगत्को पोनिकारिके सौम्प लीयते मनसीपरे । मोहित करनेमें सर्व विविध कार महत्त्व सीन हो जाता है॥ २५ ॥ मानशक्ति और निमशक्ति- अम्दो भूतादिमप्पेति भूतादिमहति प्रमः॥२५॥ प्रधान म्हपाप अपने कारण गुमि सीन हो जाता है। गुण वश्यक प्रातिमें धौर प्रति भपने प्रेरक वक्निाशी कामे न हो जाती है ॥२६॥ कस मायाम्प जीवमें सलीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवचमः । वौर पीन मुख थममा भारम्पमें लीन हो जाता है। धारमा किसीमें लीन नहीं होता, व उपाधिरहित बपने तेऽम्पक्त संप्रलीयन्ते तत् काले लीयतऽव्यये ॥२६॥ सहपमें ही स्थित राहत्व है। वह गल्की सुशि और प्पका अधिष्ठान एवं मधि ॥ २७ ॥ उदयनी । फालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मयपजे । वो इस प्रकार विवेकहपिसे देखा है, उसके निध आरमा करल आत्मस्पो विकल्पापायलक्षणः ॥२७॥ उसकी स्मृति हो भी जाय, तो या अधिक कारक यह प्रपश्चका भ्रम हो ही नहीं सकता । यदि कदाचित एवमन्धीक्षमाणस कथं वैकल्पिक प्रम । दियों पर कैसे सकता है। क्या सूर्योदय होनेपर में प्रकाशमें बन्धकार पर समता ॥ २८ ॥ उदपनी! मनसो इदि तिप्ठेस म्पोनीवादिये नमः ॥२८॥ में कार्य वीर कारण दोनोंका ही साधी हूँ । मेने तुम्हें एप सांस्पपिपिा प्रोक्ता संशयग्रन्धिमेईनः । सरिसे प्रम्प और प्रस्थ्यसे सुमितकमी संत्यविधि पतस्य दी। इससे सन्देकी गाँठ कट जाती है और प्रतिगामानुलोमाम्पा परावरच्या मया ॥२९॥ पुरुष अपने सरूपमें सिमत हो जाता है ॥ २९॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारम्झस्पा संशिवापामेवारशस्कर पशिशेऽयय ॥ २५ ॥ १ मत्पॉन । २. भेषमा

८६१
०२५]
एकादश कन्य
अथ पञ्चविंशोऽध्याय
तीनों गुपोंकी पत्तियों का निरूपण
भीभगवानुवाच
भगवान भीरुप्म काते है-पुरुम्पपर उद्धनही ।
प्रत्येक व्यक्तिमें अलग-अलग गुर्गोका प्रकाश होता है।
गुणानामममिभाणां पुमान् येन यथा भवेत् । उनके कारण प्रागियोंके सभापमें भी भेद हो जाता है
अव में क्तयता , कि मिस गुणसे फैसा फैसा स्वभाव
दमे पुरुपयर्येदसपभारय ससप्तः॥१॥
बनता है। तुम सावधानीसे मुनो ॥ १ ॥ सत्वगुणकी
चिया है :-शम ( मन संपम ), दम (इन्द्रियनिग्रह),
शमोदमन्तिविक्षेक्षा तपासयं दया स्मतिः ।
तितिक्षा ( सहिष्णुता ), विवेक, तप, सत्प, दया, स्मृति,
तुष्टिस्स्पागोऽस्थाश्रद्धाहीर्दयादिःखनितिः॥२॥ सन्तोष, स्पाग, विपके प्रति अनिष्य, ग्रहा, लज्जा
(पाप करनेमें स्वामाविक सोच ), आत्मरति, दान,
फाईदा मदस्तुणा स्तम्भ आशीभिंदा सुस्वम् । विनय और सरप्ता भादि ॥२॥ रजोगुणकी रचियों
है यि, प्रयत्न, धमेह, तृष्णा ( पसन्सोप), ऐंठ
मदोत्सावा याप्रीतिस्य धीमें पलोधमः ॥३॥ या अकर, देवताओंसे धन प्राविकी पचना, भेदयुधि,
विषयमोग, युवादिके पिये मदमनित रसह, अपने
क्रोधो लाभाऽनृतं हिंसा याआदम्भा पलमः कलिग मशमें प्रेम, हास्य, पराक्रम और छलक उपोग करना
अदि ॥३|| तमोगुणकी वृत्तियो?--मोष (मसहिष्णुता),
शोकमोदौविपादार्ती निद्राऽऽसा भीरनुपमः॥ ४॥ छोम, मिथ्यामध्यण, हिंसा, याचना, पापड, धम, फल
शोक, माह, विवाद, दीनता, निवा, आशा, भय और
सत्त्वस्य रजसश्चतास्तमसमानुपूर्वशः।
परमम्पता भादि ॥ ५ ॥ इस प्रकार कमसे सत्त्वगुण,
पृथयो पर्णितप्रायाः सनिपातमधो मृणु ॥५॥
रजोगुण और तमोगुणकी अधिकांश पत्तियोंका पृपक
पूरक वर्णन किया गया। अब उनके मेट से हरानेवारी
संनिपावस्वामिति ममेस्पक्ष या मतिः ।
वृतियोंका वर्णन सुनो ॥ ५॥ उदयमी 1 में और
यह मेरा है। इस प्रकारको धुदिमें तीनों गुणेश मिश्रण
म्यवहारः संनिपावा मनोमान्द्रियासुभिः॥ ६॥ है। दिन मन, धम्दादि विप, इन्द्रिय और प्राणों के
कारण पूर्वोछ क्यिोंका उदय होता है, ये सबके सा
धर्मे पार्थे च काम च यदासौ परिनिष्ठितः । सात्विक, राजस ओर तामस हैं ॥ ६ ॥ जर मनुष्य
गुणानां संनिफर्पोऽयं प्रदारसिधनायह ॥७॥
धर्म, वर्ष और काममें स्न्यन रहता है, तब उसे सत्य
गुगसे श्रदा, रबागुण से रनि धीर तमोगुगसे धनकी
प्राचिलधण निष्ठा प्रमान् पर्हि ग्रहाभम ।
प्राति होती है । यह भी गुणोंका निभग ही ॥७॥
निस समय मनुष्य सपाम फम, गृहसाभम ओर
सर्मापरणमें अधिक प्रीति रस्ता है, उस समय भी
पुरुष सबसपुक्तमनुमीयाच्छमादिभि ।
मानसिक शान्ति और बितेन्द्रियता आदि गुर्गोसे
सत्सगुगी पुसकी, कामना आपिसे रजोगुणी पुरुपी
स्वधर्म चानुतिष्ठत गुणानो समिति सा ॥ ८॥ उसमें तीनों गुर्गोका मा ही समझना चाहिये ॥ ८ ॥

८६२ भीमबागवत कामादिभी रजोयुक्तं क्रोधायैस्तमसा युतम् ॥ ९॥ । और क्रोध-हिंत आदिसे तमोगुणी पुस्पकी पर यदा भजति मा भवस्या निरपेक्षः स्वफर्मभिः । फरे ॥ ९॥ पुरुष हो, चाहे सी-जान निकाम होकर अपने निस्प-नैमितिक कोरा मेरी वारापन व सतप्रकविं विपात् पुरुप लिपमेन पा॥१०॥ फरे, तब उसे सत्त्वगुणी बानना चाहिये ॥ १० ॥ सकाममाषसे सपने कोक शारा मेरा भवन-पूजन करनेच्या पदा माशिप आशाम मां मंजत स्वकर्मभिः । रमोगुणी है और वो अपने शत्रुको मृत्यु पारिने लिये मेरा भवन-पुक्न करे, उसे मोगुणी समन्य तरमाप्रति विषाद्विसामानास्य तामसम् ॥११॥ चाहिये॥११॥ सत्व, रज और तमन तीनों गुणोक कारण बीवका चित्त है। उनसे मेरा कोई सम्बन्ध मही सम्र्य रजस्तम इति गुणा जीपस्स नैष मे । है। इन्हीं गुणोंके गारा सीव शरीर वपन धन लादिमें थासक होकर मनमें पर जाता ॥ १२ ॥ सम विघजा यैस्तु भूताना सलमानो निमम्मसे ॥१२॥ गुण प्रकाशक, निर्मठ और शान्त है । बिस स्मप पतरो जयेत् सत्त्वं भाखरं विश्नद शिवम् । रमोगुण धीर तमोगुणको दमाकर पढ़ता है, उस समय पुरुष मुस, धर्म वीर शान आदिका भान ये बता वदा सुखेन युज्मेत धर्मशानादिभिः पुमान् ॥१३॥ समाव है यासति और प्रति । मिस समय वमोगुण है ॥ १३ ॥ रचोगुण मैदमुदिका कारण है। उसका धौर समगुणको दमकर रजोगुण काता है, उस समय यदा अचमः सत्त्वं रजा सह भिदा चलम् । मनुष्य दुस, कर्म, यश पौर मीसे सम्पन्न होता है ॥ १५ ॥ स्मोगुणका स्वरूप है जान | उसका यदा दुखेन पुज्येत फर्मणा यशसा दिया ॥१४॥ स्तमात्र है बाळस्प और बुद्धिकी मूरता । नमकर | सत्वगुण और रमोगुण को दय मेता है, तब प्राणी तरह- यदा जयेव रजा सत्त्वं समोमू लर्य जरम् । तरहफी भाशाएँ करता है, शोक मोहमें पाबा, पुज्येत सामोशाम्पा निद्रयासियाऽऽशया॥१५ करता है ॥ १५ ॥ जब वित प्रस्न , विंस करने लगता है अपय निरा-आम्स्यके वशीभूत सदा पिन प्रसीदत इन्द्रियाणा प निर्वतिः । इन्द्रियों शान्त हो, यो निर्मप हो और मनमें व्यस्त म हो, तब सत्त्वगुणकी इदि समानी चाहिये । दहभयं मनोऽसह सत् सच विद्धि मत्पदम् ॥१६॥ करते-करते जीवकी मुनि घाम, मानेन्द्रियाँ , | सत्वगुण मेरी प्राप्तिका सामनरे॥१५यस सम्म पिन क्रिपया चाधीरनिषिध पेवसाम् । | फर्मेन्दियों विकारयुक, मन भाव और शरीर असा ऐप, तब सम्पाना चाहिये कि रजोगुण जोर पका गावाम्वास्थ्य मनो मान्त रज एतर्निशामय ॥१७॥ रहा है ॥ १७ ॥ जब रित नेन्द्रियोंक शरा पारि विरयोंको टीस्टफ समानम वस्त हो गाय और सीदपिन रितीयेव चतसो प्ररणेऽधमम् । छिन्न होकर दीन भने ख्यो, मन सूना-सा होकर तप मान वोर ग्रिदयी पनि हो, तर माना मना नटं तमा म्लानिम्तमस्तदुपधारय ॥१८॥ | चाहिये कि तोगुग दिएर ६ ॥ १८ ॥ २ पगा।

म० २५] ८६३ एधमाने गुणे समय देवानां पलमेधते । उद्वपची सत्वगुणके यानेस देवताओंका, रजोगुणके कानेपर अनुरोंका और तमोगुणके कानपर राक्षसोका असुरागां च रजसि तमस्पदव रक्षसाम् ॥१९॥ स का जाता है (तिमि भी क्रमश सत्यादि गुर्गोकी अधिकता हानेपर देवस्व, असुरस्व और राक्षसस्प्रधान निवृत्ति, प्रति अपच मोहकी प्रधानता हो जाती समायागरण विद्याद रजसा स्वममादिशेत् । है) ॥ १९॥ सत्वगुणसे जाग्रत्-मक्स्था, रजोगुणसे समावस्था और तमोगुणसे सुपुति-अवस्था होती है। प्रस्थाप तमसा वन्तोस्सुरीप त्रिपु सन्ततम् ॥२०॥ सुरीप इन तीनोंमें एक सा व्याप्त रहता है । वही शुद्ध और एकरस ग्राम है।॥२०॥ वेदोंके भम्यासमें तत्पर प्रमण सत्यगुणके द्वारा उपरोदर उपरके लोकोम नावे उपर्युपरि गम्छन्ति सम्वेन प्रामणा जनाः । है। तमोगुणसे जीर्षाका सादिपफ्त अधोगति प्राप्त | होती है और रजोगुणसे मनुष्यशरीर मिलता है ।। २१ ।। तमसाधोऽधआमुस्पाद रजसान्तरचारिग ॥२१॥ सको प्रालि होती है। जिसकी रजोगुणकी इदिके निस्की मृत्यु सत्वगुणों की दिके समय होती है, उसे समय होती है, उसे मनुष्यग्रेक मिटता है और को सत्वे प्रलीनाःस्त्रयन्ति नरलोक रजोलया । | तमोगुणकी दिके समय मरता है, उसे नरकसी प्राप्ति होती है। परन्तु जो पुरुष त्रिगुणातीत-जीवन्मुक ए गये समालयास्तु निरय यान्ति मामेष निर्गुगा ॥२२॥ |उनमें मेरी प्राप्ति होती है ॥ २२ ॥ जन अपने धर्मका आचरण मुझे समर्पित करके अपषा निष्काममामसे मदपर्ण निष्फलं वा साविक निजकर्म तत् । किया जाता है, तब वह साषिक होता है। जिस फमके मनुष्ठानमें किसी फलकी फामना राती है, वा राजस फलसंफरसं हिंसाप्रायादि तामसम् ॥२३॥ राजसिक रोता है और जिस फर्ममें फिसीको सताने अपवा दिखने आदिका मार रहता है, वह तामसिक पिस्वकालिशानरको कल्पिकं च यत् । होता है॥ २३ ॥ गुद अस्माका मान सस्तिक है। | उसो पा-मोका समाना राजस मान है और उसे प्राक वामन शान ममिष्ठं निर्गुणं स्मृतम् ॥२४॥ शरीर समसन्म तो सर्वया तामसिक है। इन तानोंसे मिश्रण मेरे स्पस्पा मास्तधिक मन निगुम पान पनंतु माथिको पासो ग्रामा रामम उम्पवे । ६॥२९॥नमें राना साविस निवास, गोपमें रहना रागस है और घरमै राना तामसिक इन समसे बाकर मेरे मन्दिरम राना निगुग निवास तामस पतसदनं ममिकेत तु निगुणम् ॥२५॥ * ॥ २५॥ मनासकभवसे फम फरनपरा प्रतिक है, रागान्ध हाफर मम फरनेश्ना रानसिक पौर साविक कारमाऽसही रागा राजसः स्मृत । वापरविचारसे रहित होकर परनेशन तामसिक है। इनक भनिरिक ना पुस का मरी गर्म रहकर सामम स्मृतिविम्रष्टा निगुमा मदसाभयः ॥२६॥ ! मिना वापरक फम करता है, यह निगुग कता १नर।

८६४ श्रीमद्भागवत साधिक्याम्यात्मिकी भदा फर्ममधातु राजसी। है ॥ २६ ॥ आत्मज्ञानविषयक ध्रमा सलिक श्रम कमविषयक धया राजस है और जो प्रदा वर्मी तामस्मधर्मे या भदा मरसेवायां तु निर्गुणा ॥२७॥ | होती है, यह तामस है तथा मेरी सेवामें नो म है, वह निगुण श्रद्धा है ॥ २७ ॥ भारोम्पायक पध्य पूतमनायस्तमाहार्य साथिर्फ रमृतम । पवित्र और अनायास प्राप्त भोजन सालिक है। रसनेन्द्रियको रुचिकर और स्वादफी दरिसे युक कार राजस पेद्रियप्रष्ठं तामस पार्तिदापि ॥२८॥ राजस है तमा दुखदायी और अपवित्र वापर यमन है ॥ २८॥ अन्तर्मुखतासे—आत्मचिन्तनसे प्राप्त सास्सिक सुखमात्मात्यं पिपयो थे तु राबसम्। होनेवाल मुस्ल साविक है। बहिर्मुस्तासे-त्रिपोंसे प्राप्त होनेवाय राजस है ता कान और दीनतासे तामसं माहदैन्योत्थं निर्गुण मदपाश्रयम् ॥२९॥ | प्राप्त होनेवात्य सुख ताम्स है और नो मुल मुझसे मिलता है, यह तो गुणातीत और अप्राक्त है ॥ २९॥ द्रव्य दशा फल कालो शान कर्म च कारफ । उदफ्नी ! दम्प (वस्तु), देश ( स्थान ), फा काल, पान, कर्म, कर्ता, श्रद्धा, सा, देप मनुष्य- भवावसाऽऽकृतिनिठा गुग्पः सर्प एपहि॥३०॥ तिर्यग्ननि शरीर और निष्ठ-समी त्रिगुणात्मक हैं ॥३०॥ नररत ! पुरुष और प्रकृतिके आश्रित तिने सर्षे गुणमया भावाः पुरुसाव्यतविष्टिताः । मी माप है, सभी गुणमय है—चाहे त्रापि इन्द्रियोंसे अनुमष किये गए हों, श्योंके द्वारा लोक-कान्तरेकि र सुसमनुष्यास पुदधा वा पुरुपर्षभ ।। ३१॥ धमें मने गये हों अथवा बुद्रिके द्वारा सेचे विन्तरे गये हों ॥ ३१॥ जयको जितनी भी योनियों अना एताः संसृत्य पुंसो गुणकर्मनिषन्धना । गम्तियाँ प्राप्त होती है, ये सब उनके गुणों और कर्मक धनुसार ही होती हैं। हे सौम्य । सय के स्व गुम मेनेमे निर्जिताः सौम्प गुणाजीपेन धिचजाः। वित्तसे ही सम्पच रस्ते है ( समिये जीव में बनायास ही बीत सकता है)। जो जीव उनपर निश्प भक्तियोगेन मनिष्ठो मदापाय प्रपपते ॥३२॥ पारनिष्ठित हो जाता है और बासत मेरा माविक प्राप्त कर देता है, यह मकियोगके द्वारा मुझमें से स्वरूप, जिसे मोक्ष भी कहते हैं, प्राप्त कर लेता तसाद देहमिमलम्बा शानविधानसम्भवम् । है ॥ ३२ ॥ यह मनुष्णशरीर बहुत ही दुर्लम है । इसी शरीरमें सत्थान और उसम निष्ठारूप विनफी प्राप्ति गुणसङ्ग विनिम मा भजन्तु पिचषणाः ॥३३॥ गोषी मासफि हटाकर रामनन फरना कहिये ॥३२॥ सम्भव है, इसलिये इसे पाकर युद्धिमान् पुरुषों निस्सगोमाभक्षेद् विज्ञानप्रमचा जितेन्द्रियः। रिचारशील पुरुपयो चाहिये कि मी सानीसे सत्त्वगुणके सेक्नसे रजोगुण वीर तमोगुणको जीव से, इन्दियोको पशमें कर से और मेरे स्यम्पको समभकर मेरे रजस्तमधाभिजयेत् सघससेषया मुनिः ॥३४॥ भरनमें छा जाय। आसकिका लेशमात्र भी न रखनेद।३।। १ निमिवार।

अ० २६ ] एकादश स्कन्ध ८६५ सचं चाभिजयेद् युत्को नरपेक्ष्यण शान्त धीः ! योगयुक्तिसे चित्तवृत्तियों को शान्त फरके निरपक्षताके द्वारा सत्वगुणपर भी विजय प्राप्त कर ले । इस प्रकार गुणोंसे मुक्त होकर जीव अपने जीवमाको सम्पपते गुणर्मुक्ता जीवा जीव विहाय माम् ॥३५॥ छोड़ देता है और मुझसे एक हो जाता है ॥ ३५ ॥ जीव गिशरीररूप अपनी उपाधि जीपस्वसे तपा वीवा जीवविनिर्मको गुणैधाशयसम्भवः । अन्त करणमें उदय होनेवाली सत्यादि गुणोंकी चियोंसे मुक्त होकर मुस प्रसकी अनुभूतिसे एक्स्पदर्शनसे पूण हो जाता है और या फिर घाण अपया अन्तरिक मपैष प्रमणा पूर्णो न पहिर्नान्तरपरेत् ॥३६॥ किसी भी विषयमें नहीं बता ३६॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमाईस्या सहितायामेबादशस्कन्धे पञ्चविंशोऽप्याय ॥ २५ ॥ अथ पड्विंशोऽध्याय पुरषाकी पराम्पोति भीभगवानुवाच भगवाम् श्रीकृष्ण करते है-उदयजी या मनुष्य शरीर मेरे स्वमत्रानकी प्राशिका—मेरी प्राप्तिका मुख्य साधन है। इसे पाकर चे मनुष्य सच्चे प्रमसे मेरी मझक्षणमिम काम लठम्या मर्म आस्मितः । मक्ति करता है, क्त करणमे स्थित मुसा भान दसरूप आनन्द परमात्मानमारमस्स समुपैति माम् ॥१॥ परमात्म्मको प्राप्त हो जाता है ॥ १ ॥ जीयोकी समी योनियों, समी गतियों त्रिगुणमयी है। जीप गुममग्पा जावयान्मा विमुक्का ज्ञाननिष्ठया । जाननिष्छके द्वारा उनसे साके लिये मुफ हो जाता है। समरन आदि गुण जो दीख रहे हैं ये वास्तविक गुणपु मायामात्रेषु दृश्यमानेषषस्तुतः । नहीं है, मायामात्र हैं। ग्रान हो जानेके वर पुरुष उनके बीपमें रहनेपर भी उनके द्वारा न्यवहार करनेपर पवमानाऽपि न पुमान् यन्यतेप्यस्तुभिर्गुण ॥ २॥ | मी उनसे वैधता नहीं । इसका कारण यह है कि उन गुण की वस्तविक सच ही नी ॥२॥ साधारण सझन कुर्यादसतां शिमोदरता कपित् । स्पेगों को इस बातका ध्यान रखना चाहिये किया ध्येग वियोंके सेवन और उदरपोषणमे ही लगे गए हैं, उन तसानुगस्तमसन्धे पतत्पन्धानुगान्धरत् ॥३॥ पसत् पुरुषों का साकमी न करें, स्पोकि उनका अनुगमन करनेवाले फुरुपकी देसी ही दुर्दश होती है, जैसे अके एला सम्रारिमा गाधामगायत शपयाः । | सहारे बस्नेवाले अपेकी । उसे तो घोर फ्धकारमें ही मला पाता है॥३॥ उपनी हो तो परम उर्वशापियामपन् निषिणः शोकसयम ॥ ४॥ | यशस्वी सम्राट इम्यनन्दन पुनरमा उर्मशीके विरहसे अत्यन्त जस्सिा । २. धर्मगर । 1 श्रीमद्भागवत [ब. २६ त्पमत्वाऽऽरमान वजन्तीं ना नम उन्मत्पन्नृपः । येसुध हो गया था। पीछे शोकट मानेपर उसे बम | वैराग्य एमा और तन उसने यह गाण गायी ॥ १ ॥ विलपनवगामाये घोरे तिष्ठेवि विलयः ॥५॥ राज पुरुरवा नग्न होकर पागळकी मति अपनेको छोरकर भागती हुई उर्वशीके पीछे अत्यन्त विहस होकर दौरने लग और कहने लगा-- कामानहप्ताऽनुमुपन् समन् वर्पयामिनीः । 'देवि ! निष्ठुरादये ! योगी देर ठहर जा, माग मता ॥ ५॥ उर्वशीने उनका पित बार कर लिया पा । उन्हें तृप्ति नहीं गई थी। न घेद यान्ती पान्तीरुश्याकृष्टषेचनः ॥६॥ क्षुद्र विषयोंके सेवनमें इतने डूब गये थे कि उने पोकी रात्रियों न जाती मालम परी और न तो बाती ॥ ६ ॥ ऐल उपाय पुमरवाने कहा-हाय हाय ! मा, मेरी महता तो देखो, कामवासनाने मेरे पिको कितना फलषित कर अहो मे मोडविस्तार कामफरमलचेतसा । दिया ! उर्वशीने अपनी माघोंसे मेरा ऐसा गम पास कि मैने यायुके न जाने कितने व खो दिये । वोह । ग्या गृहीतकण्ठस्स नायुस्लिमाइमे स्मृताः ॥७॥ विस्मृतिकी भी एक सीमा होती है ॥ ७ ॥ हाय-बाय | इसने मुझे छ लिया । सूर्य वख हो गप या उदित नाइ वेदाभिनिर्मकः सूर्यो वाम्युदितोऽमया । मुखा-या भी मैं न चन स्का । बढ़ खेरकी बात मपितो घर्षपूगाना भताहानि गवान्युत ॥ ८॥ मुझे मालमतक न पड़ा ॥ ८ ॥ भो ! अाश्चर्य है। है कि बात से वर्षोक दिन-पर-दिन बीतते गपे और हो मे आत्मसम्मोहो येनान्मा योपिता कतः । मेरे मनमें इतना मोह का गपा, जिसने नरदेव शिवममि चक्रवर्ती क्रोगमृगधकवी सबाट मुप्त पुनरमाको मी लियोका झीगमग नरदेवशिखामणिः ।। ९॥ लिगना ) मना दिया ॥९॥ देखो, मैं प्रनामे सपरिच्छदमारमानं हिस्सा राममिपेपरम् । मर्यादामें रखनेगम सम्राट है। मुझे और मेरे रास्याटको तिनकेकी तरह कर जाने गी और में पान्ती खिम घान्वगर्म नम उन्मत्तपत् रुदन्॥१०॥ पागल होकर नेग-धरंग रोता-निम्ता उस श्रीके पीछ दौर पहा । हाय ! हाय ! यह भी को भीवन है।१०। मुतस्तस्यानुभाष सात् वेज ईसत्यमेव था। में गधेकी तरह दुलसियों सहमर मी भीके पीछे-पीछ दौड़ता रहा, फिर मुममें प्रमात्र, वेव पीर सामिल झम, याऽन्वगन्छ त्रिय यान्ती खरखत् पादतारितः।।११॥ कैसे रह सकता है ॥ ११ ॥ श्रीने लिसका मन कुरा मिया, उसकी विधा म्पर्प है। उसे तपस्या, त्याग और किं विपया किंतपसा कि त्यागेन वसनषा। शसापाससे भी कोई स्यम नहीं । भोर इसमें स्न्ये विविक्तन मौनन स्त्रीभिर्यस्य मनो एवम् ॥१२|| नहीं कि उसका एकान्तसेवन और मौन भी निपल है॥ १२ ॥ मुष्ट अपने ही हानि-सभस पता महाँ, म्यास्पायविद धिमा पूर्व पण्डिसमानिनम् । फिर भी अपने मात पमा पन्ति मनता। मुग | मर्म विकार है । हाप ! हाय ! म पानी सपत् यामाचरतो प्राप्य त्रीभिगोखरपजिवः ॥१३॥ होकर भी गघ और सी का सीफ फरमें फंस १ पर।

अ० २६ ] एकादश स्कन्ध ८६७ सेषतो वर्षगान मे उर्वश्या अधरासपम् । गया ॥१३॥ में योतक ठर्वशीके होठोंकी मादक मदिरा पीता रहा, पर मेरी कामवासना तृप्त न हुई । सच न कृप्यस्पास्मभूः कामो पहिराहुतिभिर्यथा ॥१४॥ है, कही आवृतियोंसे अम्निकी तृप्ति हुई है ॥ ११ ॥ उस फुटटाने मेरा वित्त चुरा लिया । भामाराम पुसण्यापात घिच फो न्वन्पो मोषितुं प्रमः। पीवमुक्तों के स्वामी इन्द्रियातीत भगवान्को छोड़कर और ऐसा कौन है, जो मुझे उसके पदेसे निकाल सके ।१५। आस्मारामेधरमते भगवन्तमधोक्षजम् ॥१५॥ उर्वशीने तो मुझे पैदिक सूळके पन्नोंगरा यपार्थ चात कहकर सम्माया मी प, परन्तु मेरी चुदि ऐसी मारी गयी कि मेरे मनका यह भयाकर मोह तब भी मिय पोधितस्यापि देश्या मे सक्तवाक्येन दुर्मतः । नहीं । जय मेरी इन्द्रियों ही मेरे हापके बाहर हो गपी, तय में सम्मासा मी कैसे ॥ १६ ॥ जो रस्सीके स्वरूपको मनोगतो महामोहो नापयास्पर्जितात्मनः ॥१६॥ न जानकर उसमें सर्पकी कल्पना कर रहा है और दुखी हो रहा है, रस्सीने उसका क्या बिगाड़ा है। इसी प्रकार फिमेतमा नोऽपरुत रज्ज्या या सर्पपेतसः । इस मेशीने भी हमारा क्या विगग । स्योंकि स्वप में | ही अजितेन्द्रिय होनेके कारण अपराधी हूँ॥ १७ ॥ रन्नुम्बरूपापितुपो योग पदमितेन्द्रियः ॥१७॥ | कहाँ तो यह मैय फुय, दुगन्धसे मरा अपवित्र शरीर और कहाँ सुकुमारता, पवित्रता, सुगन्ध बादि पुष्योक्ति कार्य मलीमसः कायो दौर्गभ्यापारमकोऽनुचिः। गुण ! परन्तु मैने मानवश वसभरमें सुन्दरका भरोप कर लिया ॥ १८॥ यह शरीर माता-पिता का सर्वस्त्र कगुणाः सौमनम्माया अभ्यासोऽनिधया कृतः॥१८॥ है अपन फनीकी सम्पत्ति । यह स्वामीकी मोल ली गई वस्तु है, भगका ईधन है अपवा कुत्ते और धोका पित्रोः किं स्वं नु भार्यायाः स्वामिनोऽग्नेः मगधयोः। भोजन ! इसे अपना कहें अपना मुद्-सम्बन्धियोंका । गत सोधने विचारनेपर भी कोई निश्चय नहीं बता ॥१९॥ फिमात्मनः किं सुरदामिति यो नापसीपते ॥१९॥ | यह शरीर मल-मूलसे मरा हुआ अत्यन्त अपवित्र है। इसका भत्त यही है कि पक्षी सफर विष्ट कर दें, इसके सब जानेपर इसमें कीड़ पर जय अपवा जय समिन् कलवरऽमप्य सुच्छनिष्ठे विफलते। देनेपर यह राडका ढेर हो जाय । ऐसे शरीरपर स्प्रेग ष्टू हो जाते हैं और कहने ष्यते हैं-~-'अहा ! इस मो सुभद्र सुनस सुमित चे भुस्य सियाः ॥२०॥ | मीका मुसमा कितना सुन्दर है। नाक किवनी मुषा है और मन्द-मन्द मुस्कान कितनी ममोहर है।॥२०॥ तमामरुधिरस्नापुमदोममास्विसंहतौ । या शरीर स्वचा, मांस, रुधिर, स्नायु मेग, मन और हहियोंका देर और मठ-मूत्र तय पीक्से मरा तुमा है पनि मनुष्य इसमें रमता है, तो मर-माके कीमि और विण्मयप्ये रमता कमीणां फिपदन्तरम् ॥२१॥ | उसमें अन्तर ही क्या है ॥ २१ ॥ इसठिये अपनी मई सम्झनेवारले विवेकी मनुप्पको चाहिये कि सिपों अयापि नापसज्मेस खापु स्त्रमपु पार्षषित् । और सीडम्पर पुरुषोंका सङ्ग न करे । विस्य और १ मुमुन् । २ विमूत्रपूर्व । - ८६८ भीमद्भागवत [५०० विपयेद्रियमयोगा मनः सुम्पति नान्यथा ॥२२॥ इन्द्रियोंके संयोगसे ही मनमें विकार होता है, क्या विकारफा कोई पसर ही नहीं है ।॥ २२ ॥ जो पल अध्यादभुताद् भारान भाव उपजायते । कभी देखी या सुनी नहीं गयी है, उसके रिये मनमें जसम्प्रयुअतः प्राणान् शाम्पति स्तिमितं मन ।२३। स्किार नहीं होता । जो छोग विषयोंके साप इन्द्रियोका संपोग नहीं होने देते, उनका मन अपने अप निक तस्मात् समान फर्तव्या स्त्रीपु सेणेपुचेन्द्रियै । होकर शन्त हो जाता है।॥ २३ ॥ मत सणी, कान और मन आदि इन्द्रियोंसे सियों और सीमपोका सा विदुपां चाप्पविधम्ध पवर्ग किमु माशाम्॥२४॥ ही क्या, यह बह विशनोंके उिपे भी अपनी इन्द्रियाँ और कभी नहीं करना चाहिये। मेरे बैसे व्येगोंकी तो बत मन विश्शानीप नहीं हैं।॥ २१ ॥ भीभगवानुवाप भगवान् मीण कहा है-उद्धवजी | राजराजेपर एवं प्रगायन् नृपदेवदेवः पुम्मरवाके मनमें मब इस सबक उद्गार ठने लगे, तब उसने उर्वशीरोक्का परित्याग कर दिया। अब धानोदय स उपशीलाफमयो विहाय । होनक कारण उसका मोह जाता या बौर उसने अपने एपमें ही मारमस्वरूपसे मेा साक्षारकार पर लिया और गइ बारमानमात्म यवगम्प मां वै शान्तमावमें स्थित हो गया ॥ २५॥ इसम्पेि मुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि पुरुराकी भाँति कुसा छोमर उपारमझान विधूत माद सत्पुरुषोंका सा फरे। संत पुरुष अपने समुपदेशेसे ॥२५॥ उसके मनकी आसकि नष्ट कर देंगे ॥ २६ ॥ संत वता दुस्मनमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत मदिमान् । पुरुषों का लक्षण यह है कि उन्हें कभी किसी मस्तुकी अफेशा नहीं होती । उनका पित मुसमें त्गा रहता सन्त एतस्प छिन्दन्ति मनाम्यामङ्गमुक्तिभिः।२६। । सदा-सदा-सर्वन सदमे सब रूपसे भिम है। उनके दयमें शान्तिका अगाध समुद्र महराता रासा मन्ताऽनपधा मपिता प्रशाता समदर्शिनः। भगवान्या ही दर्शन करते हैं। उनमें भतारका या | भी नहीं होता, फिर मामाकी ता सम्बना ही पहा निममा निरहकारा निश निप्परिग्रहरा ॥२॥ रहते हैं तप बोरिक, म्पनसिक, शारीरिक और पग- है। मे सर्ग-गरमी, सुम्प-दुम्म आइमामे एकरस सम्स्पी किसी प्रकारका भी परिमर नहीं मुझे ॥२७॥ नए निरय महाभाग महाभागा मकथा | परमभम्पान् उदावी | मनोक सौभाग्परी महिमा पिन कह ' उनम पास सगसाग भी मम्भान्नि दिता नृगां नुपता प्रपुन त्यपम् ॥२८॥ आ पाती है । मरी यस मनुष्यों के विप परम लिएर है। उनका मेग्न पाउना सार पान मासमान्ति गापन्ति पनुमादन्ति गाना। गशाभी॥८॥दर और बदाम म्भीडीयोग धग गान पार अनुबन को म पगाभानामभनिन्दिनित मयि॥२०॥ ई 447 जान भार मा म 1 प्रन - - अ० २७] एकादश कध ८६९ मक्ति लब्धपता साधोः किमन्पदवशिष्यते। मक्ति प्राप्त कर लेते हैं।॥ २९ ॥ उदवही में अनन्त अधिन्त्य कल्याणमय गुणगोंका याप्रय हूँ । मेरा स्वरूप मयपनन्तगुणे प्रदाण्यानन्दानुभषात्मनि ॥३०॥ है सोय आनन्द, केवल अनुभव, विशुद आरमा । में साक्षात् परम है। जिसे मी मकि मिठ गयी, वह तो संत हो गया । अव उसे कुछ भी पाना गेर नहीं पधोपश्रयमाणस्य भगवत विभाष सुम् । है॥३०॥ उनकी तो यात ही स्पा- -मिसन उन संत पुरुषों की शरण ग्रहण कर ली, उसकी भी कमजब्ता, श्रीत भसं समोऽप्पेवि साधून संसेवतस्तथा ॥३१॥ | संसारभय और अनान आदि सत्रमा निवृच हो जाते हैं । झ्य, जिसने अग्निभयन्का आश्रय ले छिया उसे निमन्ज्योन्मखता पारे भषाम्धी परमायनम् । शीत, मय अयका अधकारका दुख हो सकता है।१३१॥ जो इस घोर ससरसागरमें व टतग रहे हैं, उनके लिये समवेता धौर शन्त स्त ही एकमात्र आप्रय हैं, सन्तो समषिद शान्ता नौरयाप्सुममताम्॥३२॥ जैसे जम्मै स्व रहे लोग्नेक ठिये दर नौफा ॥ ३२ ॥ जैसे धनसे प्राणियोंके प्राणकी रक्षा होती है, जैसे म अर्घ दिप्राणिनां प्राण याताना शरण त्यहम् । ही दीन-दुखियोंका परम रक्षक , जैसे मनुष्पके रिये | परोकने धम ही एकमात्र पूंजी है--से ही जो नंग | संसारसे भयभीत हैं, उनक लिये संतान ही परम धर्मा विष नृणां प्रत्प सन्ताऽगि विभ्यताऽरणम्।३३|| आश्रय हैं ॥ ३३ ॥ जैसे सूर्य वाकाशम उग्य होकर लोगोंको जगत् ता अपनेको दस्सनेक पिये नप्रदान सन्ता दिसन्ति चक्षूपि पहिरर्क समस्थित । करता है, वसे ही संत पुरुष अपनेको तया मावान्या देखनेके उिये अन्तरि दते है। संत अनुपाशील देपा है। संत अपने हितपी सुखद् है । दखतापाधवा सन्त मन्त प्रात्माइमव च ॥३४॥ संत अपने प्रिफ्तम अस्य हैं। और अक्कि स्या याई, म्बय में ही संतक मपमें पिपमान ई॥ ३॥ प्रिय पंतसेनस्तताऽप्पवमुपा लाकनि स्पृहः । उदर ! आम्मसाभात्कार हाते ही ल्यनम्न पुमरको उवशीक "यककी स्पृहा न रहो। उसकी सारी आसकियाँ मिर गयी बार यह वापराम दोफर साष्टापसे इस मुकमना मदोमतामात्मारामपचार ॥३५॥ 1 श्रीपर विचरण करने लगा ॥ ३५ ॥ इति धीमहागात महापुराणे पारमहा सहिनायामामध पdिsmय ॥२६॥ अथ मप्तविंशोऽध्याय रियायोगना पणन ग्यपान पूज-भमरमरधामण'मिम मिया क्रियायाग ममानत्व भषदारापन प्रभा । पारा माश्य एकाग्र भवन निम प्रमाग्य जिस उस उगम ८७२ श्रीमद्भागवत [.२० कुश, शुचि सम्भृतसम्भार प्राग्दमै कल्पितासन । उपासक पहल पूजारी सामग्री मट्ठा कर । फिर इस प्रकार कुना विगये कि उनके बाल भर सफी ओर रहें । तदनन्तर पूर्व या उसरकी वार मुंह आसीन प्रागुदग्पार्चेदर्षायामय सम्मुख ॥१९॥ फरके पविस्तासे उन कुदयोंके आसनपर के जय । यदि प्रतिमा अघउ हो तो उसके सामने ही पटना चाहिये । इसक बाद पूजाकम्प प्रारम्भ करे ॥ १९॥ पहले विधिपूर्वक न्यास और फल्यास कर ले । कत पास कसन्यासां मदर्चा पाणिनाऽऽमृजत् । इसके बाद मनि म्यन्यास करे और हापसे प्रतिमापरसे समर्पित सामग्री हटाफर उसे पोंछ दें। इसके बाद जम्से भरे हुए फटश और प्रोक्षणपात्र अPकी पूजा कलम प्रोक्षणीय घ पधादुपसाधयेत् ॥२०॥ गन्ध-पुण धादिसे परे ॥ २० ॥ प्रोक्षणपात्रके कसे | पूजासामग्री और अपने शरीरका प्रोक्षण कर ले | तदनन्तर पाप, अर्प और आचमनके लिये तीन प्रम सदाशिवपजन द्रम्पाम्पास्मानमेव च । फलशमेंसे मा भरकर रस्ठ ले और उनमें पूजा पदति के अनुसार सामग्री राले। (पापपाश्रम श्यामाक- प्रोक्ष्य पात्राणि प्रीपशिस्तैस्तैष्पेन साधयेत्॥२१॥ आदि, अर्धपात्रमें गन्ध, पुष्प, अक्षत, चौ, दाने, ब, कमा, विष्णुमता और पदन, तुत्सी व सरसों और दूब तथा पाचमनामे जायफल, पायाचिमनीयार्थ प्रीमि पात्राणि दैशिक । आदि गले । ) इसके बद य करनेमाको घाहिये कि तीनों पात्रों को क्रमश दयमन्त्र, शिरोमन्त्र कार शिक्षामन्त्रसे अभिमन्त्रित करके तमें गायत्रीमन्प्रसे तीनों रदाशीप्णोथ सिम्ममा गायध्या चाभिमन्वयेत्।।२२।। को अभिमन्त्रित करे ॥ २१ २२ ॥ इसके पर प्राणायामके द्वारा प्राणवायु और भावनावोदारा शरीरस अमिक एव ।। जानेर प्रयकाल में फ्रम सूस्म और पिण वाय्वमिसभुख इत्पपसा परां मम । श्रेष्ठ दीपकशियाके सम्मन मेरी पीपमा प्पान करे । बानो सिम मि मुनि करके अकार, भार, मकार, रिदु और नाद-दम पाँच फमयों के अवीं जीपकलांच्यापेमादान्तेसिसुभाषिताम् ।२३। अन्तमें उसी जीकामा प्यान करते है ॥ २३ ॥ छ जीसम्म आत्मस्वरूपिणी है। जब उसके टेक्से सारा पत करण और शरीर मर चाय, सम मानसिक तपाऽप्रमभूतया पिरम्पाप्ससम्पून्य तन्मयः । उपचारोंसे मन-ही-मन उसकी पूजा करनी चाहिये । तदनन्तर क्म्प होकर मेरा अवाहन करे और प्रसिम्य आदिमें स्थापना करे । फिर मन्त्रों के द्वारा वापस पावापा_दिपु स्याप्प न्पस्तामा प्रपूजयेत् ॥२२॥ करके उसमें मेरी पूजा करे ॥ २४ ॥ उसबजी ! मेरे भासनमै धम आदि गुणों और बिमग नादि शक्तियों की मावमा परे । अर्थत् आमनके चारों कोनोंमें धम, प्रान, पायोपस्पशाईपादीनुपचारान् प्रमसमेत् । राम्प घऔर ऐश्वकप चार पाये है; अधर्म, मान, ।

अ०२७] एकादश स्कन्ध धर्मादिभिप नवमि कल्पयित्वाऽऽसन मम ॥२५॥ । अवैराम्य और धनैमर्य-ये चारों दिशाम हरे है, सत्त-रज-तमस्य तीन पटरियोंकी बनी हुइ पीठ है, उसपर विमय, उर्पिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रही, पचमष्टदल तत्र कणिकाक्सरोज्ज्वलम् । सम्या, इशाना और अनुपहा-ये नौ शकियाँ विराजमान् है। उस आसनपर एफ अष्टदल कमल है, उसकी उभाम्प वेद पाम्पो मर्म भयसिद्धये ॥२६॥ ) कर्णिका पत्पन्न प्रकाशमन है और पीली-पीली कसोंकी छय निराली ही है। आसन सम्बधमे ऐसी भावना करके पाप, आचमनीय और अH आदि उपचार प्रस्तुत सुशन पामजन्य गदासीपुधईलान् । करे । तदनन्म भोग और मोझकी सिद्रिक पि वैदिक और तान्त्रिक विधिसे मेरी पूजा करे ॥ २२२६ ॥ मुसलं कौस्तुम माला श्रीवस्स चानुपूजयेत् ।।२७११ । सुदर्शनचक्र, पनवम्य श्या, कौमोदकी गदा, सुङग, वाण, धनुष, हल, मूसर इन आठ आयुषोंकी पूजा नन्दं मुनन्द गरुड प्रचण्टे चममेष च । आठ दिशाओंमें करे धौर कौस्तुममणि, वैजयन्तीमाष्य तथा श्रीवत्सचिहकी पक्ष स्पस्पर यपास्थान पूजा महानल पल चैव समदं ससदेषणम् ॥२८॥ रे ॥२७॥ नन्द, सुनन्द, प्रचण्ड, चण्ड, महाल, क्छ, कुमुद और कुमुदभण-न पाठ पापर्दोफी आठ दिशाओंमे, दुर्गा विनायकं व्यासं विपक्सेनं गुस्न सुरान् । गराफी, सामने, दुर्गा, विनापक, न्यास और विष्वक्सेनकी चारों कोनोंमें स्थापना फरफ पूजन फरे । पापी धार स्वेस्वे स्त्राने स्वभिमुम्बान् पूजयेत् प्रावणादिभिः।२९, गुस्ती और पपाश्म पूर्व दिशाम इन्द्रादि साठ स्पेकपाोकी स्पाफ्ना करके प्रोक्षण, सम्पान आPि क्रमसे टनकी पूजा करनी चाहिये ॥ २८२९ ।। चन्दनोचीरकरामागुरुवासितैः प्रिंय उद्व ! यPि सामन्य हो तो प्रतिदिन चन्दन, स, कपूर, केसर और अगवा बार सुगन्धित सलिल स्नापपन्मन्त्रनिश्पदा विमवे सति ॥३०॥ वस्तुओंवारा सुपास्ति जष्टसे मुष्ट स्नान कराये और सर्षपमानुषाफन महापुरुपविधया। उस समय 'सुवर्ग धर्म' इत्यादि वर्णधर्मानुवाक, मिलते पौरुपेगापि सूक्तन साममी रामनादिभिः ॥३१॥ पुसरीकाच' इस्मादि महापुरुषविधा, साहसी पुरुष । इत्यादि पुस्पसूक और इन्द्र नरो नेमपिता हफ्ता पसापनीताभरणपत्रममा धलपन । इत्यादि मन्त्रक राजनादि सामगापनका पाठ भी करता रहे ॥ ३०१॥ मेरा मळ वन, यसोपर्यत, पाभूषण, मलीव सप्रम मद्रको मा यथोषिधम् ॥३२॥ पत्र, माय, गप और पदनारिसे प्रमवक यपावत् पापमाघमनीयं च गन्मे सुमनसोऽवतान् । म्मा शृतर परे ।॥ ३२ ॥ उपासक भवान साम मुस धूपदीपापहापाणि दपान्मे अदपार्षका ॥३॥ पाप, आचमन, चन्दन पुष्प, अमन धूप, दीप आर गुरुपायसमीपि सप्पस्पापूपमादनन् । माममियों समर्पित पर ॥ ३३ ॥ पदि हा सक नो गुरु संपावदधिपाय नवय ससि कम्पपत् ॥३४॥ । खीर, घृत, पूी, पर, इला, दही और दाल

भी छपने वनुन बान पड़े, उसी विषिसे मेरी बारापन
करनी चाहिये ॥७॥ पहले करने बस्किारानुसार
संसत होफर द्विचत्व प्राप्त करे, फिर भदा और मणिके
| रिता एवं गुरूप मुझ परमात्माका भाकी समापियाके
अषया प्रक्षण-पाहे किसी में भी भारापना करे।९।
उपासकको चाहिये कि ग्रात काल दतुक्न करके पसे
श्रीमद्भागवत
समात्यां ये यधार्चन्ति सात्वता सात्वतर्पभ ॥१॥ उदेस्यसे आपकी अर्मापूज्य करते हैं, आप वाले
अराधनस्य क्रियापोगमा वर्णन कीजिये ॥१॥
एतद् वदन्ति मुनयो सहुनि यस नृणाम् ।
नार, भगवान् म्पासदेव भोर आचार्य वृहस्पति अनि
वा भरि-मुनि यह यात बार-बार कहते हैं कि क्रिय
नारदोभगवान् ध्यास आचार्योऽङ्गिरसः सुतः।।२॥ सारा माफ्फी आराधना ही मनुष्य के परम पन्न
निस्सृत ते मुम्वाम्भोजाइ यदाह भगवानजः ।
साधना है ॥२॥ यह क्रियायोग पहले गत व
मुखरविमसे ही निकाल पा । आपसे ही परम ।
पुत्रेभ्यो मृगुमरूपेम्पो देव्यैचभगवान् भव ॥ ३ ॥
इसे मम्मजीने अपने पुत्र मुगु अदि म्हर्पियोको
भावान् शङ्करने अपनी भङ्गिनी भगवी पनी
एतद् वै सर्पवर्मानामाप्रमाणां च सम्मतम् ।
उपदेश किया था |॥ ३ ॥ पादारक्षक प्रमे ।
मियायोग प्रामण-मत्रिय मादि वर्गो धौर प्राचारी-ग
श्रेयसामुत्तमं मन्य स्त्रीभद्रामा घ मानद ॥ ४ ॥ त एसा समानता हूँ कि मी-शूद्रादिके प्रिपे में
यदि आधर्मोके लिये भी परम कल्याणकारी है।
सबसे श्रेष्ठ साना-परति है॥४॥ कमलनयन इस
एतत् फमलपत्राक्ष फर्मपन्धविमोधनम् ।
मुन्दर ! आप शहर आदि जगदीपरोंके भी ईर
और मैं आपके चरणोंका प्रम्य मक हैं। बाप !
भक्काम षानुरकाप हि विश्वेश्वरधर ॥ ५॥ करके मुझे यह फर्ममधनसे मुछ करनेगली नि
श्रीभगवानुवाच
भगवान् भीरुप्यने -उदवजी 1 फर्मरमर
न पन्ताऽनन्तपारस फर्मकामस घोर ।
इतना विस्तार है कि उसकी कोई सीमा नहीं है, इसरि
संधिप्त वर्णपिप्पामि यथावदनुपूषशः ॥६॥
मैं उसे पोड़ेमें ही पूर्वापर कमसे विधिपूर्वक वर्णन कर
| ३ ॥ ६ ॥ मेरी माकी तीन विधियों है-रिक
वैदिकस्तान्त्रिको मिम इति मे त्रिविधो मस्त ।
तन्त्रिक और मिश्रित । इन तीमिंसे मेरे मतको
प्रयाणामीप्सितेनैव विधिना मा समचयेत् ॥७
यदा स्वनिगमेनोक्तं द्विजत्वं प्राप्प पूरुपा |
शास्रोष्ठ विक्सेि सम्पपर योपवीत संस्कारके जरा
यथा यजत मा भत्तपा भन्या वभिबोध मे ॥ ८॥ साप वह किस प्रकार मेरी पूजा करे, इसकी विधि -
अर्घायो म्पपिसेऽमौवासूर्ये वाप्सुहदि रिजे।
मुमसे सुनो ॥ ८ ॥ भक्तिक निष्कास्ट मासे बने
द्रम्पन भक्तियुक्तोऽर्घत् स्वगुरुं माममायया ॥९॥
सारा मूर्तिम, सीमें, अम्निमें, सूर्यम, जङमें, हमें
पूर्व सान प्रकर्षीत पौतदन्तोऽनसुव्य ।
उभपैरपि घ स्नानं मन्त्रग्रहणादिना ॥१०॥ यान्त्रिक दोनों प्रकारके मन्त्रोंसे मिट्टी और मम आदिका
शरीरशुद्धिक लिये मान करे और फिर मैरिक और
। मेवमि ! २ सूमि हरि वा दिया।
बतलाये ॥ ५॥

१० २७] एकादश स्थन्ध लेप करके फुन स्नान करे ॥ १० ॥ इसके पभाव संमोपारस्पादिकर्माणिवेदनाचोदितानि मे । वेदोक्त सन्प्या-पन्दनादि निस्पकर्म करने चाहिये । उसके बाद मेरी आराधनाश ही मन सहस्प करके जात कल्पयेत् सम्पसंकल्पः कर्मपावनीम् ।११। वैदिक धौर तान्त्रिक विधियोंसे फर्मफ्धनोंसे छुकानेवाली मेरी पूजा करे ॥ ११॥ मेरी मूर्ति पाठ प्रकारकी होती शैली दारुमयी लोही सेप्यालेस्पा च सैकसी। है-परपरकी, एकनीकी, धातुकी, मिट्टी धोर क्दन यादि की चित्रमयी, याकामयी, मनोमपी और मणिमयी ।।१२।। मनोमयी मणिमयी प्रतिमाएविधा स्मृता ॥१२॥ | 3 और अचछ मेदसे दो प्रकारको प्रतिमा ही मुख मगधन्का मन्दिर है। उदवजी ! अचल प्रतिमाके पलापलेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमन्दिरम् । पूमनमें प्रतिदिन आमाइन और रिसर्जन नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥ फल प्रतिमाके सम्बन्धमें विषम्य उदासापाहने न स्तः स्थिरायामुपार्घने ॥१३॥ है। चाहे करे और चाहे न करे । परन्तु वालुकामयी प्रतिमममें तो भावाइन धौर विसर्जन प्रतिदिन करना ही चाहिये। मिट्टी और चन्दनकी तपा पिसमयी प्रतिमाओं- अस्मिरायो पिकल्प: स्यात् सण्डिले तु भषे वयम् । को स्नान न करावे, केछ मान कर दे, परन्तु और सबको स्नान कराना चाहिये ॥ १९ ॥ प्रसिद्ध प्रसिद्ध सपनं स्वपिलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम् ॥१४॥ पायोंसे प्रतिमा मादिमें मेरी पूज्य की जाती है, परन्तु ओ निष्काम मक है, वह अनायास प्राप्त पायसे और उम्प प्रसिदैर्मपागः प्रतिमादिप्यमापिनः । भाषनामाप्रसे की हदयम मेरी पूजा कर ले ॥ १५ ॥ ठदवजी | स्लान, मम, बाभूपण आ7 तो पायण भत्तस च यथालग्धैईदि भाषेन पैम हि ॥१५॥ अपना धातुकी प्रतिम्यक पूजनमें ही उपयोगी है बालकामपी मूर्ति बपमा मिकीकी यदीर्म पूजा करनी हो, तो उसमें मन्त्रोंके द्वारा अंग और उसक प्रधान खानालंफरण प्रष्ठमधापामय | देवताओंकी यथास्थान पूजा करनी चाहिये । सप्प बनिमें पूजा करनी हो, तो पृतमिधित हवन साममियोंसे आहुति सगिले सस्पपिन्पासा वहापाज्यप्ततहषि ॥१६॥ देनी चाहिये ॥ १६ ॥ सूर्यको प्रतीक म्मनपर की जानेपाली उपासनाम मुख्यत अपान एष उपस्सान सू चाम्पई प्रष्ट सलिले सलिलादिभिः । ही प्रिय है और उसमें सर्पण आदिसें मेरी उपासना करनी चाहिये । जब मुझे कोई मत हार्दिक श्रद्धासे का भी पड़ाता है, तब म उसे गो प्रेमसे सीमार भन्योपात प्रष्टं भकन मम वार्यपि ॥१७॥ करत ॥ १७ ॥ यदि कार बभक मुठ यहुत-सी सामग्री निवेदन परे, तो भी मै उससे संतुष्ट नहीं प्यभकोपरत न म तापाप पल्पत । होता । अम में भकि-पदापूर्वक समर्पित कासे ही प्रस्म हो जाता। सन गध, पुष्प, धूप, टीर और नैप भादि पस्तुभोंके समर्पणसे तो कहना ही क्पा गन्धो धूप सुमनसा दीपाऽभापं च किं पुनः॥१८॥ २॥ १८ ॥ पदमचारिवानि । २ मेडनुस । । याममा प्राचीन मतिमें नहीं है। द्धप।

८७२ श्रीमद्भागवत शुधि सम्भृतसम्भारा प्रारदमै कल्पितासन | उपासफ पहले पूजाकी सामग्री इकट्ठा कर से । फिर इस प्रकार कुश म्झिये कि उनके गले मास पक्की ओर रहें । तदनन्तर पूर्व या उसरी ओर मुंह आसीन प्रागुदग्वादर्घायामय सम्मुखः ॥१९॥ फरक पवित्रतासे उन फुशों के आसनपर के जप । यदि प्रतिमा अच्छ हो तो उसके सामने ही बैठना चाहिये । इसके बाद पूजाकार्य प्रारम्भ करे ॥ १९ ॥ पहले विधिपूर्वक आन्यास और करन्यास फर से। कतन्यास कसन्यामा मदर्चा पाणिनाऽऽमृजत् । | इस्के याद मनिमें मप्रन्यास करे और हापसे प्रतिमापरसे पूर्वसमर्पित सामी हटाकर उसे पोज दे। इसके बाद | कसे मरे हुए काश भोर प्रोक्षणपान आदिकी पूजा कलम प्रोक्षणीय घ यथादुपसाधयेत् ॥२०॥ गन्ध-गुण्य अदिसे परे ॥ २० ॥ प्रोक्षणपात्रके कसे पूनासामग्री और अपने शरीरका प्रोक्षण कर ले | तदनन्तर पाप, मर्प और भाचमनके ये तीन पार्कम पदहिर्देवयजन द्रभ्याम्पास्मानमेष च। | फलशमेंसे जल भरकर रस के और उनमै पूज-परतिके प्षनुसार सामग्री डाले। (पापपाप्रमें श्यामाक- -सत्येक प्राक्ष्य पात्राणि प्रोपनिस्तैस्तैम्पेन साधयेत्॥२२॥ धादि, अर्धपानमें गन्ध, पुष्प, अक्षत, जौ, कुश, तिल, दाने, दूब, कमल, विष्णुकाम्स्य मौर चन्दन, तुलसीदास सरसों और दूम तपा बाचमनपा बायफल, सग पापाऱ्यांचमनीमाथ प्रीणि पात्राणि दैटिक । अदि गले । ) इसके अइ वा करनेपालेको चाहिये कि तीनों फोंको क्रमश दयमन्त्र, शिरोमन्त्र बोर शिखमप्रसे अभिमन्त्रित करके अन्तमें गायत्रीमप्रसे तीनों रदाश्चीमाय सिम्बया गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत्।।२२। को अभिमन्त्रित करे ॥ २१ २२ ॥ इसके बार प्राणायामके द्वारा प्राणवायु और भावनाओवारा शरीरस बपिके सुद हो जानेर एयकमछम फ्रम सूक्ष्म और पिणे वाव मिसशुख रत्पमस्सा परां मम । श्रेष्ठ टीपकशिसाके समान मेरी चीनकमा प्यान फरे । बा-डे सिद्ध ऋषि मुनि कारके प्रकार, कार, मकार, विन्दु और नाइन पाँच कमों के भनी बीवकलामापेमादान्त सिद्भाविताम् ।२३। अन्तमें उसी नीयासका पान करते हैं ॥ २३ ॥ ष्ण जीवकाम मात्मस्वसरिणी है। पर उसफे सेजसे सारा क्स करण और शरीर मर वाय, तम मानसिक सयाऽस्मभूवया पिम व्याप्त सम्पून्य तन्मया । उपचारोंसे मन-ही-मन सकी ना करनी चाहिये । तदनन्तर ताप होकर मेरा वामान करे और प्रतिमा आदिमें स्थापना करे । फिर मोंके द्वारा वापस मायामादिपु स्पाप्प न्यस्ताई मा प्रपूजयेत् ।।२४॥ करके उसमै मेरी पूना करे ॥ २४ ॥ उदपजी ! मेरे भासनमें धम बादि गुणों और मिग बादि शकियोंकी मायना करे । अर्पाद आसनके चारों फोनम रम, धान, पायोपस्पाणिादीनुपचारान् प्रकल्पयेत् । राग्य भार ऐश्वर्यप चार पाये है, पवर्म बान, 1 ८७३ . ७] एफारश स्कन्ध धमादिभिम नवमि फल्पगित्वाऽऽसन मम ॥२५॥ अवैगग्य और अनमर्य-ये चारों ओंमें रे है, सत्र रज-तम-अप तीन पटरियोंकी बनी हुई पीठ है, उमपर विम्य, अर्पिणी, भाना, क्रिया, योगा, प्रही, पयमष्टदल तत्र कणिकाफसरोज्ज्वलम् । सम्या, इशाना और अनुपहा-य नौ शकियों विराजमान् है। उस आसनपर एक अष्टदल कमल है, उसकी उभाम्या वेदत पाम्पो मर्म तूभयसिद्धये ॥२६॥ | कर्णिका अत्यन्त प्रकाशमान है और पाठी-पीनी कसरोंकी घटा निराठी ही है । आसनक सम्बन्धम ऐसी भफ्ना करके पाप, आचमनीय और अन्य आदि उपचार प्रस्तुत सुदर्शन पाचजन्प गदासीपुधनुहलान् । फरे । तदनन्तर भोग बार मोक्षकी सिद्धिक ये वैदिक और तान्त्रिक विधिसे मेरी पूजा करे ॥ २५-२६ ॥ मसल कौस्तुम माला भीवत्स चानुपूजयेत् ॥२७॥ सुदर्शनचक्र, पञ्चजन्य शश, फौमोदकी गदा, सग, याण, धनुष, हल, मसलन आठ आयुधोंकी पूज्य नन्द सुनन्दं गर प्रचण्ड पममेष । आठ Pोंमं करे और फौस्तुभमणि, पेजफ्तीमालय तपा श्रीवत्सचिहफी वक्ष स्पलपर पणास्थान पूजा महावल पल बैर मर्द कुमदेषणम् ॥२८॥ परे ॥२७|| नन्द, मुनन्द, प्राण, चण्ण, महाक्स, स, कुमुर और कुमुदभुण-न आठ पादोंकी आठ यात्रोंमें, दुर्गा विनापर्क व्यासं विप्पासेन गुरुन् सुरान् । गहरकी, सामने, दुर्गा, बिनायक, व्यास और विष्वक्सेनकी चारों कोनोंमें स्थापना करके पूजन करे । गायी मोर स्वे स्वे स्थाने स्वभिमुम्वान् पूजयेत् प्रावणादिभि ।२९|| गुरुकी और यपाक्रम पूर्वादि दिशामें इन्द्राटि गाठ लोकपा की स्थापना करक प्रोक्षण, पम्पदान आदि प्रससे उनकी पूजा करनी चाहिये ।। २८ २९ ।। चन्दनौमीरकपुरकामागुरुवासिनः प्रिय उदम ! यPि सामध्ये हो तो प्रतिदिन चन्दन, म्स, कार, कसर और अरगजा आदि सुगन्धित सलिले स्नापपेन्मन्बनिरपदा विभवे सति ॥३०॥ | वस्तुओंवारा मुषासित असे मुघ स्नान कराये और वर्णपर्मानुषाफन महापुरुपवियया। उस समय 'सुवर्ण धर्म इस्पादि वर्णधर्मानुषाक, मिते पारुपेणापि यतन सामभी राजनादिभिः ॥३१॥ पुण्डरीकाक्ष' स्यादि महापुरुपनिषा, सहसा पुरुष इस्यादि पुरुषसूत वीर 'इन्द्र मरो नेमपिता हन्ता पसोपपीताभरणपत्रसमान्धलपनैः स्पादि माछ राजनादि साम्गायनका पाठ भी करता मटीत सप्रम महको मा यथोचिवम् ॥३२॥ र ।। ३० ३१॥ मेरा मफ मन, मनोपवीत, बाभूपण, पत्र, माम, गप और पन्दनादिसे प्रमखक यवायत् पाधमाधमनीयं च गन्धं सुमनसोऽयवान् । मा झार करे ॥ ३२ ॥ उपासफ अमाके साप मुझे धूपदीपापहार्याणि दपान्मे अद्वयार्चकः ॥३३॥ पाच वाचमन, मदन पुष्प मनव, धूप, दीप पारि गुरपायससपीपि शपत्यापूपमोदकान् । माममियों समर्पित करे ॥ ३३ ॥ यति हो सक तो गुरु, संपाषदपिम्पांम नयद्य सति उत्पयेत् ॥३४॥ स्त्रीर, पृत, पूर्ण, पर, आ, इलभ, दही और दाउ - , ८७४ भीमद्भागवत [अ० २० - अम्पान्मर्दनादर्शदन्तधावाभिवेचनम् । थादि विविध पोंका नैवेप गावे ॥ ३९ ॥ मान्के विग्रहको दतुधन कराये, उक्टन लगाये, फसमूत बदिसे स्लान फाये, मुगन्धित पदापोंका सेम करे, दर्पन अमापगीतनृत्यादि पर्वणि स्युस्तान्वाम् ॥३५॥ पोंके अवसरपर नाचने गाने वादिका मी प्रक्ष दिखये, मोग लगाये और शक्ति हो तो प्रतिदिन का करे ॥३५॥ विधिना विहिते अप्ठे मेखलागवेदिभिः । उद्दषबी ! तदनन्तर पूमाके बाद प्रसाफ मिक्सेि मने हुए कुछमें अमिकी स्थापना करे | या कुमा मेस्त्र, गर्न वऔर वेदीसे शोभायमान हो । उसमें हापकी अमिमाधाय परितः सम्हेत् पाणिनोदितम् ॥३६॥ वासे अग्नि प्रज्वलित करके उसका परिस्मान करे, भर्पत उसे एका कर दे ॥ १६ ॥ दीके चारों वार परिस्तीर्याय पर्युक्षेदन्याधाय यथाविधि । कुशमिका करके अर्थात् चारों बार बीस-बीस कुरा विनफर मन्त्र पाता गुमा उनपर बल सिके । इसके प्रोक्षण्याऽऽसाय द्रम्पाणि प्रोल्पापो भावयेत माम् । करके अनिके उत्तर मग रोमाफ्ोगी सामग्री रस्से बद विधिर्वक समिवाओंका आधानरूप मचाधाम फर्म और प्रोक्षणीपापके सम्से प्रोक्षण करे । तदनन्तर बनिमें वातजाम्मनदप्रप शुकचक्रगदाम्पुजैः। | मे। इस प्रकार प्यान करे ॥३७॥ मेरी मूर्ति तपाये ए सोनेके स्मान दम दम दमक रही है। रोम रोमसे शान्तिकी वर्षा हो रही है। बी और विशार पर लसचतुर्मख शान्तं पपफिअस्फवाससम् ॥३८॥ मुबाएँ श्मायमान हैं। उनमें खा, 'का, गदा, पप विराबम्मन है। कमलकी केसरके समान पीन पीस स्फरस्फितीटकटफझटिपघबराजदम् मज फहरा रहा है।॥ २८ ॥ सिपर मुकुट, कामों में करान, कमरमें करपनी धौर गोहोंमें अनद विसीय हे हैं। पक्ष सम्पर श्रीवासका कि । गोमें भीपस्सवधर्स भापत्कौस्तुमं पनमालिनम् ॥३९।। कौस्तुममणि जगमा यी है। छुटनोंतक पनम्म्म ष्टक खी। ॥ ३९ ॥ अनिमें मेरी इस मूर्तिमा प्पन करके पूजा करनी चाहिये । इसके बाद सूमी समियों- ध्यापमम्पर्म्य दारूमि विपाभिषतानि च । को पृतम पोकर याति दे और धाम्पमाग और बाघार नामक दो-दो हतियोंसे और मी हक्म करे । तदनन्तर पीसे मिगोकर हफ्त साममियोंसे माति प्रास्पाच्यभागावापारौ दवा चोन्यप्कृत हविः॥४०॥ ६॥ १० ॥सके बाद अपने इमाप्रसे अश्या नमो नारायणाया इस मायक्षर मनसे तप पुस्मसूझके जुहुयाम्मूलमन्त्रण पोरशविदानतः। | सोह मत्रोंसे हवन करे । पुद्धिमान् पुसको अहिये कि धर्मादि देवताओंक किये भी विभिक मोंसे धर्मादिम्पा यधान्पार्य मन्त्री विष्टकतं पुष | हबम करे और सिमर माइति भी दे॥११॥ १ ममारि गीवनरपद मपनि पपाता । २ प्रोस्पलियाम्पानि मोस्यामाप्रपरेत माम् ।। मुकर । ४ रिम्पानिप्रवानि ।५ पाम्पान । । । मन्प एकादश स्कन्ध ८७५ अ० २७] अम्पाय नमस्कृत्य पार्षदेम्पो पलिहरेत् । इस प्रकार अम्निमें अन्तर्यामीरूपसे सित भावान्की पूर्व फरके ने नमस्कार करे बौर नन्द-मनन्द यादि पार्पदोंको बाठों विद्यामि वनकगि बलि दे । मूलमन्त्र जपेद् प्रम स्मरमारापणात्मकम् ॥४२॥ तदनन्तर प्रतिमाके सम्मुख बैठकर परसमस्वरूप मतान् नारायणका स्मरण करे मोर मावस्वरूप मूलमन्त्र ॐ दवाऽऽचमन मुच्छेप षिष्वक्सेनाय कल्पयेत् । नमो नारायणाया का अप करे ॥ १२ ॥ इसके याद मावान्को बाचन करावे और उनका प्रसाद वियरसेन मुखपासं सुरभिमत् ताम्बूलापमाईयेत् ॥४३॥ | को निवेदन करे । इसके पमात् अपने इष्टदेवकी सेवामें सुगन्धित ताम्बूल वादि मुश्वास उपस्थित करे तया उपगायन् गृणन् नृत्यन् फर्मामभिनयन् मम । पुष्पालि समर्पित करे ॥ १३ ॥ मेरी बीवोंको गाये, उनका वर्णन करे और मेरी ही ग्रओंका अमिनप करे । यह सब करते सम्प प्रेमोम्मच होकर मत्कपा भाषपश्यन् महत क्षणिको भवेत् ॥४४॥ माचने लगे । मे छीला-कपाएँ स्र्प ने पौर दूसरोको पनावे । कुछ समयतक संसर और उसके रगड़ों स्तपैरूपावचः स्तोत्र पौरामः प्रारपि । गयोंको मूबर मुझमें ही रूपय रो बास्य ॥ ११ ॥ प्राचीन ऋषियोंके आरा असा प्रास्त भोंके द्वारा बनाये पुए अटे-बड़े स्तव और स्तोत्रोंसे मी सति करके स्तुस्वा प्रसीद भगवमिति वन्देव दरषत् ॥४५॥ प्रार्थना करे-भगान् ! आप मुभपर प्रतम हों। मुझे अपने पाप्रसादसे सराबोर कर दें।' तदनन्तर दमवत्-प्रणाम करे ॥ १५॥ अपना सिर मेरे चरणों- विरो मस्पादयोःरुत्या पाहुम्पा च परस्परम् । पर रख दे और अपने दोनों हासे दायेसे दाहिना और वापसे चायाँ चरण पकइयर करे-भगवन् ! प्रपन्न पाहि मामीश भीवं मृस्पग्रहाणयात् ॥४६॥ इस संसर-सागरमें में स्व रहा है । मृत्युत्प मार मेरा पीछा कर रहा है। में ररकर आफ्पी शरणमें नया हूँ। प्रमो! आप मेरी रक्षा कीनिये ॥ १६ ॥ इति शेपो मया दो शिरस्साधाप सादरम् । इस प्रकार स्तुति करके मुझे समर्पण की हर माध्य भादरके साप मरने सिरपर रस्से और उसे मेरा दिया हुम प्रस्थर समम । यो मिसनन फाना तापसी उवामपेपेक्षास्यज्याविन्योविपि सत्पुनः ॥१७॥ भरना परनी चाहिये कि प्रतिमासे एफ रिम्प ज्योति नियम है और वह मेरी यम्भ रणनिमें ठीन हा अचादिगु यदा या श्रद्धा मात्र चार्चयन् । गपी है। बस, यही सिर्मन ॥10॥ उदात्री । प्रतिमा आनिमें ख वहाँ भदा तब, तहाँ मरी सपनेयात्मनि च सबारमाइमास्थितः ॥१८प्रागिर्याम सा आने इसमें भी स्थित ॥ ॥ ॥ पूग करनी चाहिये, क्योंकि म मामा ई बार समस्तु उदयी बामनुप्प इस प्रसर बरिफ तान्त्रिक पर फियापागप पुमान् पदिकतान्त्रिक । प्रिपापोगकाग ही पूरा पाला, १६ रस अंक श्रीमद्भागवत [अ० २८ अर्धन्नुभयतः सिद्धिं मचो पिन्दस्पभीप्सिताम्॥४९॥ और परलोकने मुझसे मभ्येष्ठ सिद्धि प्राप्त करत है॥ १९ ॥ यदि शक्ति हो, तो उपासक सुन्दर मदर्चा सम्प्रतिष्ठाप्य मन्दिर कारयेद् प्ठम् । और सुदृद्ध मन्दिर मनवाये और उसमें मेरी प्रतिम पुप्पाघानानि रम्पाणि पूजायात्रोत्सवामितान् ॥५०॥ निस्पकी पूजा, पर्षकी यात्रा वोर बड़े-बो उसयोंकी सारित करे । सुन्दर-सुन्दर फूलों के मरीचे लगवा दे, पूजादीना प्रवाहार्य महापर्षस्वधावाम् । | व्यवस्था कर दे ॥ ५० ॥ जो मनुष्य पोंके उपसा और प्रतिदिनकी पूजा लगातार फ्लनेके म्येि म्मत, क्षेत्रापपपुरग्रामान् दत्ता मरसार्टितामियात् ॥५१॥ बजार, नगर पक्ष्या गाँव मेरे नामपर समर्पित कर देते है, उन्हें मेरे समान एपर्पकी प्रानि होती है ॥५१॥ प्रतिष्ठया सार्वभौम सपना अवनत्रयम् । | मेरी मूर्तिकी प्रतिष्ठा करनेसे पृषीका एफम्य राय, मन्दिर निर्माणसे क्रियेकीका राप, पूना जारकी पूजादिना ब्रह्मलोक त्रिभिर्मत्साम्पतामियात् ॥५२॥ व्यवस्था करनेसे प्रत्यक और तीनों के द्वारा मेरी मामेव नरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति । समानता प्राप्त होती है ।। ५२ ॥ ज्ये निष्काममासे | मेरी पूजा करता है, उसे मरा मक्कियोग प्राप्त हो जाता भक्तिमार्ग स लभते एव प पूजयेत माम् ॥५३॥ है और उस निरपेक्ष भफियोगके द्वारा कह स्वयं मुझे प्राप्त कर | लेना है॥५३॥ जो वफ्नी दी हुई या दूसरोंकी दी ई देवता यः म्बदा परेर्दा हरेत सुरविप्रयोः । और प्रमणकी जीविका हरण कर लेता है, वह कोको | मयोतक विष्टका कीया होता है ॥ ५५ ॥ जो मेग पति स जायते विग् वाणामयुतायुतम् ॥५४॥ | ऐसे कामोंमें साप्ता, प्रेरणा अश्या अनुमोदन करते मनुध सारघतारनुमोदितुरेख है, वे मी मरनेके बाद प्राप्त करनेवाले के समान ही फरके च। भागार होते है । पर उनका हाम अधिक या फर्मणां भागिनः प्रत्य भूयो भूपसि तत् फलम् ॥५५॥ तो फल भी में अधिक ही मिलता है ।। ५५ ॥ इति श्रीमशागवते महापुराणे परम्हस्पो संहितापामेशदशक धे सप्तविंशोऽप्पाप ॥ २७ ॥ अथाष्टाविशोऽध्याय परमाप-निरूपग भीभगानुगम भगवान् श्रीकृष्ण पनर-उदरजी ! पपी म्पबहार्म पुस और प्राति-प्यार-भासे । प्रसारमा गत जान पता नगी परम परमारमाणि न पत्रमन गदयन् । “गिस नर या प अरिएनम्मद, 1147न।

अ० २८] एकादश स्कन्ध ८७७ विचमेकास्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुपेण च ॥१॥ इसलिये किसीके शास्त, घोर और मइ लभ्व तया उनके अनुसार फोकी न स्तुति करनी चाहिये और न निन्दा । सर्वदा अदेत-दष्टि रनी चाहिये ॥१॥ जो पुरुर दूसरोंन सम्पब और उनके फोकी प्रशसा अश्या परस्त्रभातकर्माणि य प्रशासति निन्दति । निग करते है, ये शीघ्र ही अपन यमार्य परमाथ-साधनमे । प्युत हो जाते हैं, क्योंकि साधन सो इनक अभिनिवश- फा-उसके प्रति सपाय-युद्धिका निपय करता है और प्रशसा तथा निन्दा ठसकी सस्पताके भ्रमका स याशु प्रश्यते स्वार्थादसत्पभिनिवेशतः ॥२॥ जार भी न करती हैं ॥२॥ उदक्षजी सभी इत्रियाँ राजस बाइक पाय है । अन व निवित हो जाती है, तब शरीरका अभिमानी जीव तनागम्य हा देवसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्यस्था नष्टयतन । जाता है अर्थात् उसे माहरी शरीरकी स्मृति नहीं रहती । उस समप यदि मन पच रहा, व तो वा सफ्नक झठे रस्योम भटकने स्पाता है और यह भी मन हो ग्य, त्य तो जीव मृत्युक समान गा निटा-----मुसिम माया प्रामोति मस्र्युषावरमानार्थक पुमान् ॥३॥ लीन हो जाता है । बसे ही जन जीव अपन अग्निीप आग्मा सम्पया भूटकर नाना पस्तुओं का टशन फान लगता है, तब यह रूप्नक समान इट रस्योंमें स जाता है अप्य मृत्युक समान अमानमें छान हो जाता ह ॥३॥ किं भद्र फिमभद्र पावसायातुन फियत् । उदयनी ! जब रेत नाम पर वस्तु ही नहीं है, तर उसम अमुक वस्तु मरी है और समय बुरी, अपक्षा इतनी भटी और इतनी पुरी ह-पह प्रभ हा नहीं समता । विपकी सभ्भ बस्तुएँ पारीसे यही जा सम्पादित सदर मममा मातमेव ॥४॥ सस्ती है अपरा मनमे सोपी जा सकती है। इसठिन स्प एवं अनिस्प होनक कारग उना मध्यात तो सटही ॥१॥ई प्रतिपनि और मारी आदिमें चारी आफि अपम पपी माप छायाप्रत्यायामामापमन्ताऽप्पकारिण । मिथ्या परन्तु उन परा मनुष्पक हपयन भर-पाप आमि सदर पा जाता। पंस हीरदार सभी पम्पुरंद त मरानिध्या ही स्नु उनादानक साग इनामपटक पर नही हा जमा, नरी यंदादया भारा परन्त्याम् पुना भयम् ॥५॥ अन्तिा मति न 1 जी, "साय अनिमा भप-धन यानी गाती ॥ ॥ दानी। शपु म पास अगदी। सीमा-निरन् 161 पुषि-गरन आमा मदिरापन मुवनि प्रन । सग निमारत नाही ८८० श्रीमद्भागवत [३.४ । थापन्तपोरस्य यदव कपल अयमानुछ युक्तियां, महापुरुषोंके उपदेश बीस दोनोंसे अविश्व स्वानुभूति भी प्रमाण है । समान फालय हतुप तदेव मध्ये ॥१८॥ यही निकालता है कि इस संसारके आदिमें जो पाता अन्तमें जो रहगा, जो इसका मूल कारण बार प्रकाशक यथा हिरम स्वफत पुरस्तात् है, वही अदितीय, उपाधिशून्य परमारमा बीच भी है। उसके अतिरिक और कोई यस्तु नहीं है ॥ १८॥ पभाम सर्वस्प हिरण्मयस्स। उदक्ची ! सोनेसे फरान, पुण्डल अादि बहुत-से बनस्ल तदेव मध्ये व्यवहार्यमाण बनते हैं, परस्तु चन ये गइने नहीं वन थे, तब भी सेना पा और जन नहीं रहेंगे, तब मी सोना रहेगा । इसलिये नानापदेश्वैरहमास | चव वीचमें उसके फंगन-कुण्डत बादि वनेको नाम तात् ॥१९॥ | रस्कर म्यवहार करते हैं, स्व भी कह सोना ही। विज्ञानमेवत्रियवस्थमा ठीक ऐसे ही जगत्का वादि,अन्त और मध्य में है। वास्तयों में ही सत्प तत्व हूँ ॥ १९ ॥ भाई उदय ! मनकी तीन अवस्पाएँ होती हैं—बामद, सप्न वोर गुणत्रय कारणफार्यकर्ड सुपसि, इन अमस्थाओंके कारण तीन ही गुम है- समन्वयेन म्पतिरेफरम सत्त्व, रज और तम । धौर जगत्के तीन मेद /- पप्यात्म (इन्द्रियाँ ), अधिमूत ( पृषिम्यादि ) वीर येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥२०॥ अधिदैत्र (फर्ता ) । ये सभी विविधताएँ जिसकी सबसे सत्यके सम्मान प्रतीत होती है और समाधि धादिम पर न यत् पुरस्तादुत पमा त्रिविधता न रहनेपर में जिसकी सत्ता बनी रहती है न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । पर तुरीयतत्त्व-न तीनोंसे परे और इनमें अनुपात चौथा प्रातस्य ही सत्प है ॥२०॥ जो उत्पत्तिसे पहले भूत प्रसिद्धं च परेण यद् यत् नहीं पा चौर प्रम्पके पश्चात् में नहीं रहेन, ऐस समझना चाहिये कि बीचमें भी होशी--- तदेव तत् सादिति में मनीपा ॥२१॥ कल्पनामात्र, माम्मात्र ही है। यह निश्चित रूप है कि जो पदार्थ निससे बनता है और जिसके द्वारा प्रकाशित मविचमानोऽप्यषभापते या | होता है, यही उसका मास्तविक स्वरूप है, वही उसकी वैकारिको राजससर्ग ऐपः । परमार्प सत्ता है यह मेरा खनिश्चप है॥२१॥ य जो विकारमपी रामस सष्टि है, यह न होनेपर भी दीस मम स्वफ्न्योविरतो विभाति रही है। यह स्वयंप्रकाश प्रमही है। इसलिये इन्द्रिय, मन्द्रिमार्यात्मविफारधिप्रम् ॥२२॥ विप्प, मन और पनस्तादि तिने मित्र-विचित्र नाम- रूप में उनके रूपमें ही प्रतीत हो रहा । ॥२२॥ एवं स्फट प्रमविवेकहेतुभिः प्रमविचारके साधन हैं-भत्रण, मनन निदिध्यासन और स्वानुभूति । उनमें सहायक -आस्मानी गुरुदेव ! (नो परापपारेन विशारदेन । परा विचार करफ स्परपसे बहादि मनरम पाध ५० २८ एकादश स्कन्ध हवामा हिसाऽऽस्मर्सवहमपारमेत निषेध कर देना चाहिये । इस प्रभार नपेधके द्वारा भारमविषमक सन्देहीको हिल-मिल करके खाने बानन्द स्वानन्दतुष्टोऽखिलकारफेम्पा ॥२३॥ स्वरूप प्रात्ममें ही मसो जाय और सब प्रकारको पिपासनाओंसे रहित हो जाय ॥ २३ ॥ निपध करनेकी नरमा वपुः पार्थिव मिन्द्रियाणि प्रक्रिया यह है कि पृम्भीर विकार होनके कारण पारीर घरमा नहीं है। इन्दिय, उनके अधिष्ठातृ-देवता, प्राण, देवा मसुर्षायुजलं वायु, छ, अमि एष मन भी आमा नहीं है, क्योंकि इनका धारण-पोषण शरीरके सम्बन ही बनके द्वारा होता मनोऽभमा धिपणा व सत्य- है । पुदि, चित, नारार भाफाश, पृषी, शम्दादि मारुति सं घितिरसाम्पम् ॥२४४ ( विषय और गुणोंकी साम्यावस्था प्रकृति भी घरमा नहीं है, क्योंकि ये सर के सथ सय एम जा ॥२१॥ समाहितः कः करणैर्गुणास्ममि उदजी | मिसे मेरे सहपका मीमोति शान हो गया मसकी वृत्तियों और इन्द्रियो यदि समाहित यती? गुणो भवेन्मस्सुषिवितधाम्नः । तो उसे उनसे छाम क्या है और यदि वे विक्षिप्त | रहती हैं, तो उनसे हानि मी क्या है? पोंकि मस्त विक्षिप्यमाणैस्त किं नु दूपर्ण करण और यापकरणसभी गुणमय हैं और बारम्पसे इनका काइ सम्बन्ध नहीं है। मध्य, वाकाशमै बादमेके पनेलपेसेपिंगते रखे किम् ।।२५।। या चाने क्या तितर-बितर हो जानेसे सूर्यका क्या बनता निगमता है॥२५॥ से मायु वाफाशको मुख यथा नभो पावनलाम्पु गुम नही सक्ती भाग जय नहीं सकती, स्ल मिगो नहीं गतागर्सगुणैर्न सकते। सकता, पूल-धुएँ मटमैन्य नहीं कर सकते भौर प्रोंके गुण गरमी-सी बादि उसे प्रभावित नहीं कर समतो- वापर सम्परसस्तमोमले स्पोंकि ये सब थाने चानेले क्षणिक माष है भीर धाकमा इन सबपर एक्रस पविष्टान है-बेसेडी रहेमतेरे संशतिहतभिः परम् ।।२६।। | सत्त्वगुण, रोगुम धौर तमोगुणकी हरियों तथा कर्म अविनाप मास्माका स्पर्श नहीं कर पाते, वह तो इनसे तथापि सङ्ग परिवर्मनीया सर्वश परे ।नके द्वारा तो कल ही ससारमें गुणेषु मापारमितेषु वापत् । मटकता है, जो इनम बहाकर कर बैठता है॥२६॥ उदयनी । ऐसा होनेपर भी तक इन मापानिर्मित मनक्तियोगेन टेन गाव गुणों और उनके कार्याका सह सर्वशत्याग देना चाहिये, रक्तक मेरे सर मजियगके साए मना रनोगुणरूप रनो निरस्मस मनःपासः ॥२७॥ म एकरम निकल न जाय ॥२७॥ उदयजी ! जैसे मयमोति विकिस्सा न करनेपर पधाऽऽमयोऽसाधुचिकिस्सितो नमा रोगमा समूल नाश नहीं होता, मह बार-बार ठमरकर पुन पुना संतुदति प्ररोहन् । मनुस्यको सतया मरता है, वैसे ही निस मनफी मास्नाएँ १ भोग प्रतिर २२११- ८७८ भीमद्भागवट । प्रायते प्राति विश्वात्मा दिसते परतीधरः ॥६॥ उपादान कारण भी है । अर्पात् ही विद करता है धौर ही बनाता भी है। वही रक्षाकरे और रहित मी कही है । सामा भावान् ही इसका सार मरते तमाममात्मनोऽन्यमादन्योभावो निरूपितः । हैं और विसका संहार होता है, वह भी ये ही हैं ॥६॥ पवश्य ही ष्पहारष्ठिसे देखनेपर आस्म इस लिसे मिन है, परम्सु वामाशिसे उसके अतिरिक और कोई निरूपितेप विविधा निर्मूला मोतिरात्मनि । वस्तु ही नहीं है । उसके अतिरिक्त चो कुछ प्रतीत हो रहा है, उसका किसी भी प्रकार निर्वधन नहीं किया जा सकता और अनिर्वचनीय तो केछ माता- इदं गुष्पमयं विदि विविघं मायया कृतम् ॥७॥ सरूप ही है, इसध्येि यात्ममें सृष्टि-स्पिति-संगर अपवा अध्यात्म, वक्दैिव और अधिभूत-ये तीन-तीन एतद् विद्वान् मदुदित मानषिकाननै पुनम् । प्रकारकी प्रतीतियों सर्वपा निर्मुल ही है । न होनेपर भी यों ही प्रतीत हो रही है। यह सत्त, रब वीर तमके कारण प्रतीत होनेवाध्य दय-वशनपश्य बारिकी न निन्दति न च स्वाति लोके घरति सूर्यनत् ॥ ८॥ मान और निको उतम स्थितिका वर्णन किया त्रिविक्ता मायाफा खेउ है ॥७॥ उदघी । तुमसे है। वे पुरुष मेरे इन पचनोंका रास्य बान लेता है प्रत्पधेगानुमानेन या न तो किसीकी प्रशसा करता है और म निन्दा । निगमनारमसषिदा। वह अगसमें सूर्यके समान सममाक्से स्थिरता ग्रता ॥ ८ ॥ अस्पन, अनुमान, शाल और बारमानुभूति आपन्तवदसन्मात्वा निस्संगो विचरदिह ॥ ९॥ उपाति-विनाशशील होने के कारण मनिस्य एवं बसप आदि सभी प्रमाणेसे यह सिख है कि या जगत् है । यह बात बानफर जगत्में असहमामसे विचरना ग्यपभीम पथ्य-मगन् ! करमय वीर देह है स । मामा स्वयंप्रकाशी और देह है बस। नवात्मना न देहस्स ससृतिदृश्यया । ऐसी सिनिमें कम-मृत्युरुप संसर न शरीरको हो सकता है और न आत्माको । परन्तु इसका हाना में उपसम्म होता है । तब यह होता किसे ॥ १० ॥ अनात्मम्बामारीश फस्स पादुपलम्पते ॥१०॥ भारून स्प्रे अविनाशी, प्राक्त-अप्राकृत गुणेंसे रहित, गुद, स्वयंप्रकाश और सभी प्रकारके आचरणोंसे रहित आत्माम्पयोऽगुणामुन म्यपंज्याविरनाश्तः । . तया शरीर स्निाशी, सगुण, बार, प्रकाश्य और आहत ह । अममम भग्निके समान प्रकाशम्मन है, तो शरीर कम्ठकी तरह अचेतम । फिर या जन्म-मरपुर अभियावदनिरः फस्या महति ॥११॥ मस्नर है रिसे ! ॥ ११ ॥ १ मतिरा । २ भामदायरस पस्य प ण्यतिः । चाहिये ॥९॥ उरव उपाप म०२८] एकादश स्कन्ध . भीभगवानुवाप भगयान भीक्षप्णने कहा-पस्तुत प्रिय ठदव ! संसारका अस्तित्व नहीं है तयारि जबतक देश, इन्द्रिय बोर पान देहन्द्रियागरात्मनः सनिफर्पणम् । प्राणों के साथ भास्माकी सम्बन्ध भ्रान्ति है, तस्तक अविवेकी पुरुषको वा सत्प-स स्फुरित होता है ॥१२॥ ससार फलयास्तावदपार्थोऽप्यविषफिन ॥१२॥ जैसे खप्नमें अनेकों विपत्तियों खाती हैं पर पास्तवमें वे वर्षे प्रषियमानेऽपि संमृतिर्न निमर्तते । हैं नहीं, फिर भी स्वप्न ट्टनेतक उनका अस्तित्व नहीं मिटता, से ही संसारके न होनेपर भी जो उसमें प्रतीत पायतो विपयानस म्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥१३॥ होनवाले शिश्योका चिन्तन करते रहते हैं, उनके सम्म- मुस्कुरूप संसारकी नियुक्ति नहीं होती ॥ १३ ॥ अव पपा प्रप्रतिपदस्स प्रस्वापा पहनर्धमृत् । मनुष्य खप्न देखता रहता है, तब नींद टूटनेके पारले उसे बड़ी-बड़ी विपत्तियोका सामना करना पस्ता है, स एष प्रतिनुवस्स न पे माहाय गत्पते ॥१४॥ परन्तु जब उसकी नींद ट्ट नाती है, यह वग परता है, तब न तो सप्नकी विपक्यिों राती है मौर म उनके कारण होनेवाले मोह वादि विकार ॥१५॥ उदयची ! प्रोकार्पभयग्रोधलोभमोहमहादयः धार ही शोफ,हर्ष,म्प, क्रोष, प्रेम, मोह, स्पा और जन्म-मृत्युका शिकार बनता है। आमासे तो इनका कोई मईकारस्प रश्यन्ते जन्म मृत्युष नात्मनः ॥१५॥ सम्पन्च ही मो॥ १५॥ उदषमी 1ो, इम्ब्रिय, प्राण और मनमें स्थित भायी म उनका पमिमान देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो कर बैठता है में सपना सरूप मन लेता है- तब उसका नाम 'जीवा जाता है । उस सूक्ष्मतिसूक्ष्म बीयाऽन्तरास्मा गुणफर्ममूर्तिः। छात्माकी मूर्ति है—गुण और फोका बना हुआ छिमशर । उसे ही का स्मरम्म कहा जाता है स्त्र महानित्पुरुषेष गीत: और कहीं महत्त्व । उसके और भी बहुत से नाम है। यही काररूप परमेारक अधीन होकर नन्म- संसार माधापति कालतन्य ॥१६॥ मृत्पुरुप सप्तारमै श्वर-उधर भटकता यता॥१६॥ वास्तषमें मन, वाणी, प्राण और शरीर आरके ही अमूलमतत् पहुरूपरूपिवं कार्य है। यह तो निर्मल, परन्त देवता, मनुष्य धादि अनेक मि इसकी प्रतीति होती है । मननशील पुरुष मनोवचामाणशरीरफर्म उपासनाकी शानपर पाकर पानकी तम्बारको भरफ्त तीसी बना लेता है और उसके अय देहाभिमान- जानासिनोपासनया शिवेन- का—आहारका मूमेद करके पृष्मीमें निईना होकर विचरता है। फिर उसमें किसी प्रकारकी पिछवा मुनिर्गा विचरत्पदणः ॥१७॥ | पाश्म-तृप्मा नहीं सती ॥ १७ ॥ नामा भौर मनामाके सरूपको पृथक् पृपा भीभाँति समाना वियेको निगमस्तपथ ही धान , स्पोंकि विवेक होते ही रेतका अस्तिल मिट जाता है। उसका साधन हैसपस्पाक शरायको र अस्पदविधमयानुमानम् करके स्वादि पापा भक्ण करना । इनके अतिरिक १ संसारपस्मान् । २ विषयासस ।। मृत्युनं वात्मनः । ।

श्रीमद्भागवत [३.२८ । आफ्न्तपोरस्य पदव केवल प्रषणानुकुल युक्तियाँ, महापुरुषों के उपदेश और म दोनोंसे अविरुण सानुभूति में प्रमाण हैं । सबका म कालम तुम तदष मम्मे ॥१८॥ यही निकलता है कि इस संसारके आदिमें जा पा ता पन्समें चो रहेगा, जो इसका मूल कारण और प्रकाश पथा हिरप स्वकत पुरस्तात् है, वही अद्वितीय, उपाधिशुन्य परमात्म बीचमें भी है। उसके अतिरिक और कोई वस्तु नहीं है ॥ १८॥ सर्वस हिरण्मयस्स । उदयची ! सोनेसे फगन, कुखळ श्रादि बहुत-से बामपन क्नते हैं, परन्तु बम के गाने नदी मने थे, तब मी सेना तदेप मम्मे उपरहार्यमाण प और जब नही रहेंगे, तब भी सोना रहेगा । इसम्मेि नानापदेहमस्स जब बीचमें उसके कंगन कुमत वादि बनेको नाम तात् ॥१९॥ रखकर म्यवहार करते हैं, तामी पर सेना है। विज्ञानमेतस्त्रियवसमझ क ऐसे ही बगतका वाति,अन्त बौर मप्प में ही। वास्तव में ही सत्य तत्व हूँ ॥ १९ ॥ मई उन । मनकी तीन अवस्पाएँ होती है-जामद, खप्न और गुणत्रय कारणकार्यफई पुति इन अयस्भाओं के कारण तीन ही गुण -- समन्वयेन पतिरेफसम सत्व, रम वौर तम । और जगत्के तीन में है बप्पारम (इन्द्रियाँ), अधिमूत ( पृपिन्यादि ) और येनैव तुर्मेण सदेव सत्पम् ॥२०॥ षधिदेव ( कर्ता )। ये सभी त्रिविधताएँ बिसकी सबसे स्पके समान प्रतीत होती हैं और सम्पवि भाग्मेिं यह न यत् पुरस्तादुत यम पमा त्रिविधता न रहनेपर भी जिसकी सचा बनी बसी है, पर तुरीयतत्त----न तीनोंसे परे और इनमें अगत न्मभ्यं च सम्म व्यपदेशमात्रम् । चौबा ममतत्व ही सत्य है ॥२०॥ जो उत्पविसे पहले भूत प्रसिद च परण पत् यत् नहीं पा वौर प्रम्पके पश्चात् में मही रहेगा, ऐसा सम्झना चाहिये कि मीचमै भी नहीं-केवार तदेप सत् स्यादिति मे मनीपा ॥२१॥ कल्पनामात्र, नाममात्र ही है। या निमित सम्पहै कि जो पदार्प जिससे इनता है और निसके द्वारा प्रकाशित अविधमानाऽप्पसभापते या होता है, वही उसका वास्तविक स्वरूप है, यही उसकी पैफारिको राजससर्ग एपः। परमार्थ सच है- -पह मेरा स निधप है ॥२१॥ जो विकारमपी रानस सहिद, यह न होनेपर मी दास प्रम स्वपन्याविरवा विभाति ही है। यह स्वयंप्रकाश प्रमही । इसलिये इन्द्रिय, प्रमन्द्रियार्थास्मविकारचित्रम् ॥२२॥पर उनक रूपमै सही प्रतीत हो रहा है ॥२२॥ विस्प, मन वौर पचभूतादि तिने पित्र-विचित्र नाम- एवं पर प्रवियेफातभि प्रतिधारके सावन है-यण, मनन, निम्प्यिासन और खानुभूति । उनमें सहायकमामानी गुरुपाना परापवादन विशारदन। शारा विचार करफ स्पएमपसे दहा मनाम पाय ८८१ २० २८] एकादश स्कन्ध - छिच्चाऽऽत्मसदहमपारमेस निपेष कर देना चाहिये । इस प्रकार निपेवके शरा भामविषयक सन्दयोंको छिम-मिन करके अपने बानन्द खानन्दतुष्टोऽखिलकामसम्म ॥२३॥ स्वरूप सामने ही मम हो जाय और रूप प्रकारको विषयग्रसनाओंसे रहित हो जाय ॥ २३ ॥ निपेव करनेकी नारमा वपुः पार्थिन मिन्द्रिमाणि प्रक्रिया या कि पृष्मीका विकार होनेके कारण शरीर वात्म्य नहीं है। इन्द्रिय, उनके अधिष्ठातृ-देवता, प्राण, देवा पसुषायुजले वामः। वायु, जल, अमि एव मन मी भाम नहीं है, क्योंकि इनका धारण-पोपण शरीरके समान ही मनके द्वारा होता मनोरुममात्र धिषणा च सत्य- है। बुद्धि, पित, महार, अाकाश, पृथ्वी, शन्दादि मारुतिः सं लिविरर्धसाम्पम् ॥२४॥ विस्प और गुणोंकी साम्यावस्था प्रति भी आत्मा नहीं है, स्पोंकि ये सब के सब इश्य एष जर १॥२॥ समाहिस का फरणैर्गुणास्ममि उपजी | जिसे मेरे स्वरूपमा मध्यमोति पान हो पापा है, उसकी ठियों और इन्द्रियों यदि समाहित यती? गुणो भन्मस्मुषिषिक्तभाम्नः। तो उसे उनसे छाम क्या है और यदि ये विक्षिप्त । राती हैं, तो उनसे हानि मी क्या है। स्पोंकि अस्त निक्षिप्यमाणैरुत किं नु पर्म करण मोर वायकरणसभी गुणमय है और मामासे इनका कोई सम्बन्ध नहीं है। म, धाकाशमें वादक पनेरुपेतैर्षिगते रखे किम् ॥२५॥ या जाने का तितर-बितर चानेसे सूर्यका स्य जनता-दिगम्त्य है।॥२५॥ जैसे वायु नाकाशको मुख्य पपा नभो पावनलाम्युमगुपै नहीं सपती आग जय नहीं सकती, जल मिगे नहीं र्गतागतगुणैर्न समते । स्कता, धूम-धुएँ मटमैन नहीं कर सकते मोर ऋतुओंके गुण गरमी-सी आदि उसे प्रभावित नहीं कर सकते- तथापर सुस्वरवस्तमोमले क्योंकि ये सब पाने चानेवाले क्षणिक भाव है बीर बाकाय इन सबका एकरस अधिष्ठान है-वैसे ही संमते संसविहेतुभिः परम् ॥२६॥ सत्गुण, रजोगुण और समोगुणकी गियों वा धर्म बबिनाशी धारमाका स्पर्श नहीं कर पावे या तो इनसे सपापि सही परिवर्सनीयो सत्र परे है। इनके तो फेमल भी संसारमें गुणेषु मायारबिसेषु सावत् । मटकता है, जो इनम महायर फर पेठसा है॥२६ ॥ उदयनी । ऐसा होनेपर भी तबतक इन मायनिर्मित महतियोगेन टेन पाषद् गुणों और उनके कार्योफा सा सक्पा त्याग देना चाहिये, अक्तफ मेरे सुप मक्तियागके शरा मना रबोगुणरूप रजो निरस्पेस मनापाय: ॥२७॥ मड एपदम निकल न जाप ॥२७॥ उदयनी 1 जैसे मध्यमौति विकिस्त म करना पपाझमयोऽयाधुचिकिरिसतो ना रोगा सा नाश नही होय, या बार-बार उभरकर पुन पुनः संतुदति प्रान् । मनुष्पको साया करता है। सेही मिस मनझी वासनाएँ भोभमविवि ।

श्रीमद्भागवत सन्दिप अपिणर्य पहले आन पारम कमसे -८२ [२०२८ एवं मनोऽपकापापकर्म और फर्मोके संस्कार मिट नहीं गये। ग्रे की पुत्र यागिर्न विम्मति सर्वसङ्गम् ॥२८॥ रहता है और उसे कई बार योगच मी कर देता है।।२८॥ बादिमें वासक है, वह बार बार अधूरे योगीको बेक्ता देवताभोंके द्वारा प्रेरित शिप्य-पुत्र धादिके मा किसे योगिनो ये विहतान्तरायै- हुए बिन्नोंसे यदि कदाचित् अपूरा योगी मवर्गप्युव हो मनुप्पमृतसिदशोपसृष्टः बाय तो भी प अपने पूर्वाभ्यासके कारण पुन योगा- म्यासमें ही लग जाता है। कर्म बदिमें उसकी प्रति से प्राक्तनाम्पासपलेन भूयो नहीं होती ॥ २९ ॥ उदयनी ! जीव संस्कार बसे प्रेरित होकर जम्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त फर्ममें ही का युद्धन्ति योगं न तु कर्मतन्त्रम् ॥२९॥ गता है और उनमें इष्ट बनिए-युद्धि करके हर्ष-विपार मादि विकारोंको प्राप्त होता यता है। परन्तु जो फराति फर्म क्रियते घ बन्तु: तत्वका साक्षात्कार कर लेता है, न प्रतिमें रिक्त फनाप्यसौ चादित आनिपातात् । रानेपर भी, संस्कारानुसार कर्म होते रानेर मी उनमें इए-भनिष्ठ-मुद्धि करके हर्ष-विपद बार रिकारोंसे युद्ध न तत्र विद्वान् प्रकृती सितोऽपि नहीं होता, क्योंकि भानन्दस्वरूप धारमा के साधारकारसे | उसकी संसारसम्बन्धी सभी बाशा तृष्णाएँ पहले ही नर निपतृष्ण स्यसुखानुभूस्या ॥३०॥ हो चुकी होती है ॥३०॥ बो अपने सरूप मित विष्टन्तमासीनमत प्रबन्त हो गया है, उसे इस बातका भी फ्त नहीं रात शरीर सा है या बैठा, पड रहा है या हो रहा है मापानमुमन्व मदन्तममम् मल-मूत्र त्याग रहा है, मोज्न कर हाय वौर | कोई सामालिक पर्म कर रहा है, क्योंकि उसकी पति स्वभावमन्पत् किमपीहमान- तो वात्मस्वरूपमें सित--प्रसाफार राठी ॥१॥ यदि मानी पुरुपकी टिम इन्द्रियों के विविध काम लिस्य, मात्मानमात्मस्तमतिर्न वेद ॥३२॥ जो कि असत्, पाते भी है तो उन्हें बम्ने वारमासे मिन्न नहीं मानता, स्पेशिने युतियों, प्रमाणों यदि स पश्यस्पसदिद्रियार्ध और स्वानुभूतिसे सिद्ध नहीं होते। जैसे नींद टूट नानानुमानेन पिरुमन्यत् । मानेपर खममें देते हुए और बागमेपर तिरोहित हर पायोंको काई सस्प नहीं मानता, वैसे ही कानी पुल न म पते वस्तुतया मनीपी भी अपनेसे मिम प्रतीयम्पन पगाको सस्प महा म्पनते ॥ २२ ॥ उदवजी ! ( इसका यह अर्थ महो। म्वाप्न योत्थाय तिरादधानम् ॥३२॥ कि अशानीन आत्म्सका स्याग कर दिया है और पानी गृहीत गुणामपिय उसको माइण मरता है। इस वार्य फार तना ही है कि ) अनमें प्रकारक गुण भौर कसे युवा ममानमात्मन्पविक्तिमा .

[२८] ८८३ सन् पुनरीक्ष्य निवर्तते थमिम मान लिये गय थे, उनमा विवेफ नाना थप घामाटि हानेर मान और उसक काकी नियति हो जाती है। इसलिये मानकी निचिही न गपते नापि वियप आस्मा ॥३३॥ भर है। ज्यिों के भय न ता मामाका ग्रहण हो सकता है और न स्याग ॥ ३३ || बसे सूर्य उदय होत पपा हि भानोरुदयो नृचक्षुषां मनुष्यों के नेशक रूमनसे अन्धकारका पूरा स्टा दते है, किसी नयी वस्तुका निर्वग नहीं करत, पैसे ही मरे समरूपका अपरोभवान पुरुषक मुहिगत बहानका तमो निन्पामतु सद विधत्ते। धावरण नष्ट कर उता है। वह इदम्पसे मिली महाका नुभव नहीं करावा ।। ३१ ।। उदाजी ! आप नित्य एवं समीक्षा निपुणा सदी में परोश है, उसकी प्रामि नहीं करनी पड़ी । बह | सर्यप्रकाश है। टसमें साल भादि किसी प्रकार के विकार नहीं है। वह नारक्षित है र्यात् की किसी हत्यापमिर्स पुरुषस पुद ॥३४॥ प्रकार में वृत्ति बाम्त नहीं होता । इसलिये अप्रमेय है। मन भादेके भरा टस्का संस्कार भी नहीं किया स्वपज्योतिरोऽप्रमेयो ख सकता । आमा दश, पा और बस्तात परिष्छद न होने के कारण अस्तित्व, दति, परिवान, दास बोर विनाश उसका स्पर्श मी न कर सकते । सपकी और महानुभूतिः सकलानुभूतिः। स्व प्रकारकी अनुभूतियों भरमस्थलप ही हैं। का मन और गणी मात्माका थाना अविषप स्माकर नित हो जाते हैं, सब वही सबादीय, विजातीय और स्पात एकोऽदितीयो पचा विरामे भइसे शूभ्य एक अद्वितीय र जाता है । म्यवहारपिसे टसकेसन्सापानी और प्राग शदिके प्राय सपमें येनेपिता पागसमपरन्ति ||३५|| निरूपण किया जाता ॥३५॥ एवावानास्मसमाहरा या विकत्यस्तु काले । उदानी ! बस्तिय कामासमें अपाहीन नाईके सरा विविध मान स्ना मनका भमबहान है। सचमुष या त बड़ा मोह कि धरने वात्मक अतिरिक उस भ्रमका भी और कार अविधान नहीं है। बपियन सबमें अन्पत सचाई ही नहीं। इसध्येि भारमन्न्त स्वमात्मानममतमोन यस्व हि ॥३६॥ स्व कुछ अत्मा ही ह॥३६॥ माट-से परिवाम्बिनी येग एसा परत कि यह पानभौतिक व विभिन्न माम और सोश सपने इन्द्रियोंके शरा प्राण किया पमामारुविभिप्रार्य पापमवाधितम् । सा इसउिप स्पी। परन्नु वय वाईन बागीश वारम्बरमात्र है क्योंकि तस्त सव इन्द्रियसी म्पनार्यादा र म पगितमानिनाम् ॥३७॥ प्रमानित कस करेंगी ॥ ३७॥ पप सब ही शिद नहीं हावी, फिर वे किसी १ विमाप । २.विश्वेमिराया।

८८४ श्रीमद्भागवत यागिनाऽपसयागस्य यजतः काय उत्यिसैः। उदवजी ! यदि योगसाधना पूर्ण होने के पहले है पिसी समथरमा शरीर रोगदि उपद्रोंसे पीति हो, उपसर्गविहन्यत तमायं विहिता विधि ॥३८॥ उसे इन उपार्योका आश्रय सेना चाहिये ॥ ३८॥ गरमी ठंडक आदिको चन्द्रमा-सूर्य अदिकी धरपके 4 पागधारमया कांधिदासननधारमान्वितैः । पात आदि रोगको वायुधारणयुक आपनोंक द्वारा र प्रह-सपादिश्त विनोयो तपस्पा, मात्र एक बापधिकारा तपामग्रीपः कोधिपसगान् विनिर्दहत् ॥३९॥ नष्ट कर डालना चाहिये ॥ ३९ ॥ फाम कोध बादि पिनोंको मेरे चिन्तन और नाम-सपरितन आदि द्वारा ग्रंथि ममानुष्यानन नामसशीर्तनादिभि । मए करना चाहिये । तरा पतनपी ओर से जाने से पागधरानुपाया या हन्यादशुभदाम्मनः ॥४॥ दग्भ मद आPि विनोंको धीरे-धीरे महापुरी सेपने शारा दूर कर देना चाहिये ॥ २०॥यनोइ मस्तीयाली कनिन पामिर्मधारा मुम्ब पयसि स्थिरम् । विविध उग्रयोंफ दारा इस शरीरमो मुर और युधपस्यमें सिर पर मिल अगिमा दि सिरियों विधाय विविधापापैरथ पुअन्ति सिद्धय ॥४॥ छिप योगसन करते हैं, परम्त मुस्मिान् पुर ऐसे शिपारफा समर्थन नहीं करते, स्पोंकि यह तो एक नदि तन् नसलाप्यं वदापासा पपार्थ । प्पर प्रयास है। धर्म यो पर पके स्मन इस शरीरका नाश तो भारसम्भनी है ॥ ४१४२ ॥ परि अन्तसापाच्छरीरस्य फलस्पर वनस्सनः ॥२२॥ कारिन् दुत प्निातक निरन्तर और अपरक यागरगना पररा रहनार शरीर मा भी हो आप, ता पानिपता निस्य मापथन् फलनामिपात् । में मुविम्यन् पुरुष अनी रखना र उसमें दी FIR नहीं पर सेना पाहिये । उसे 11 समारप्पासमतिमान् पागमरमन्य मत्सरः ॥४३॥ मरी प्रातिको ही रहना ॥३॥ यसमा पायय र भरेदी- पागपामिमा पागा रिमान् महपाप । गाना संप्रन , उसेवामान-fte नही मा। उRETECal और मा अननी जना मातar मानरापीयन निमगुग्गनुभूः ॥५५॥ 4 ॥ ४ ॥ Errorant AN OF 1:51 | 3 | अयशनिंगाध्याय भागनिचोरम परि २३ गाना। aum Hrut 11. Putar म० २९] एकादय स्कन्प ८८५ - संथालसा पुमान् सिद्धपेत् तन्मे मजासान्गुन॥१॥ (क्त जब आप कोई ऐसा सरल और मुगम साधन कात्याये, जिससे मनुष्य अनायास ॥ परमपद प्रास कर सके ॥ १॥ कमलनयन ! बाप जानते ही है कि प्रायशः पुण्डरीष युजन्तो योगिनो मनः । अधिकांश योगी जब अपने मनको एकाग्र करने लगत तब वे बार-बार घेय करनेपर भी समसम होने के कारण पिपीदन्स्यसमाधानान्मनोनिग्राफर्शिताः ॥२॥ हार मान देते हैं मोर उसे काम न कर पानेके कारण दृष्टी हो जाते हैं ॥ २ ॥ परम्मेवन ! पाप विखेमर अथाव बानन्दछुप पदाम्पूर्व है। आपके द्वारा सरे संसारका नियमन होता है। इसीसे सारासार-विचारमें चतुर मनुष्य आपके भानन्दवी इंसा भरभरविन्दलोचन । चरणकमकी शरण लेते पोर बनायास ही सिसि प्राप्त कर लेते हैं। आपकी माय उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती, क्योंकि उन्हें योगसाधन और कर्मानु- मुख नु विश्वधर योगकर्मभि धमका गमिमान नहीं होता । परन्तु नो भापके स्स्सन्मापयामी विडतान मानिनः॥३॥ चरणोंका बामय नहीं देते, वे योगी और कर्मी माने समनके घरसे मस नाते हैं, अस्प ही वाफ्की मापाने उनकी मति हर है॥३॥ प्रमो! बाप किं चित्रमप्पत सवैतदशेपमधो सक्के हितपी साम् । आप अपने मनन्य शरणागत महिनादि सेवफि मधीन थे आप, पर भापके लिये दासेपानन्मभरणेषु पदात्मसान्नम्। कोई वार्यकी साव नहीं है। क्योंकि काफ्ने रामावतार ग्राम करके प्रेमपश बामसे भी मित्रताका निर्वाह योरोपय सामगैः स्वयमीपराणां किया। पपपि प्राण वादि अकेगण मी अपने दिम्य किरीटोंको आपके चरणकमत रसनेकी चौकीपर रगावे भीमकिरीटतटपीरितपादपीठः ।। ४॥रते ॥ ॥ प्रभो ! मार सबके प्रियतम, हामी पौर धारमा है। आप अपने मनन्य शरणागोको सब वस्वाखिलारमदयितेपरमाभिवानो कुछ दे देते हैं। मापने पछिमाहाद पादिवाने मोंको नो कुछ दिया है, उसे नामकर एस कौन पुष होग सर्वाई खतविपिसजत कोनु । जो मापको छोड़ देग। यह बात किसी प्रकार मुदिमें ही मही बाती कि मम, फोसपारवान् मिस्मृतिके फोमा भजे किमपि मिस्मृतयेऽनु भूत्यै गर्त सम्नेवासे तुष्य तिमि ही फंस रखनेपले मागको क्यों चाहेगा। हमलोग वापके परणकमकी किंगामधेनवर पादरजोनिः॥ ५॥ रखके उपासक हैं।हमरे रिये दुर्घमी पाहै ! ||५|| मान् ! बार समम्त प्राणियोंके गत परममें स्त- नवापयन्स्पपपिति फवपस्ववेश | मीहरसे बौर पर गुसपसे सित हाकर मक सरेपासप मिय देते रमौर अपने मास्त्राषिक सम्पको प्रयायुपापि कवडसदा सरन्दः । उनके प्रति प्रष्ट कर देते हैं। गाया मानी १ मा ।२ न्यपिरविं।

८८६ भीमशागक्त [.. २९ योऽन्तर्षदिस्वनुभृतामधर्मविधुन्व मामाचीके सम्पन यी आयु पाकर भी आपके उपकरेंस क्दन मही चुका सकते। इसीसे वे आपके उपकारोंका स्मरण करके क्षण-क्षण अधिकाधिक वानन्दका अनुमा माचार्यचस्पवपुषा स्वगति ध्यनक्ति ॥६॥ करते राते हैं ।। ६॥ भीन्नुक उपाप भीशुकदेवजीते-परीक्षित् ! मान् भी- इत्युपेनात्पनुरक्तचेतसा ग प्रादि ईयरोंके भी ईवर हैं। वे ही सत्सव आदि गुर्गों के द्वारा प्रमा, विष्णु पौर स्वका रूप धरण पृटो जगत्क्रीसनक स्वशक्तिभिः। करके मादकी लपवि-सिति दिके सेट सेम करते है। बव उपनीने गभरे चिचसे उनसे या प्रश्न गृहीतमृतिप्रय ईश्वरपरो किया, तब नोंने मन्द-मन्द मुसकराकर नई प्रमसे बगाद सप्रेममनोहरमितः॥ ७॥ कहना प्रारम्भ किया ॥ ७ ॥ भीभगवानुवाच मीभगवाम्मे कहा-प्रिय उन । बर में हमें इन्त से कथयिष्यामि ममधर्मान् मुमालान् । अरने उन मममप मागपतधोका उपदेश करता क्निका प्रदार्वक अपरण करके मनुष्प संसाररूप पाट्याचरन् मो मृत्यु सपति दुर्जपम्॥ ८॥ दुर्जप मृत्युको बनायास ही बीत लेता है ॥ ८ ॥ उदमी ! मेरे भक्तको चाहिये कि वान सरे फर्म मेरे कुयात् सपोणि फर्माणि मदर्थ धनको सरन् । लिये ही करे और धीरे-धीरे उनको करते समय मेरे मप्पार्पितमनधिचा मर्मात्ममनोरविः ॥९॥ | स्मरणका अभ्यास कमाये । कुछ ही दिनॊम उसके मन पौर पित्त मुरमें समर्पित हो जायगे । उसके मन और दशान्पुम्पानाभयेत मकै साघुभिः भिवान् । मारमा मेरे ही धोम रम नायगे ॥ ९॥ मेरे भक देवामुरमनुप्येषु मनकापरितानि च ॥१०॥ साधुमन जिन पवित्र सार्मोमें निवास करते हों, उन्होंने रहे और देखता, अमर अपना मनु|में जो मरे बाप प्रधा मधण या मर्ष पर्षयात्रामहोत्सवान् । मक हों, उनके वाचरणोंका वनुस्मण करे ॥१०॥ फारयद् गीतनृत्यामहाराजविभूतिभिः ॥११॥ पर्षके असर सबके सब मियार भएन अमेय ही नृस्प, गान, आप भारि महाराजाचित याट-बाटसे मेसी मामप सर्पभूता पहिरन्तरपावतम् । यश आदिके महोरसा परे ॥ ११ ॥ पुदान्त करम स्वतारमनि घारमान यथा सममलाशयः ॥१२॥ एवं आवरण पून्य मुभ परमात्मा ही समय प्राणियों और पुरुष माकाशक सम्पन पर और भीतर परिर्स इति सर्याणि भूतानि मापन महापुते । अपने एयौ ति दये ॥१२॥ निर्मनुदि उपाय ! सभाजपन् म पमानामान काठमाभितः॥१३॥ प्रारियों और पदापनि मान करना है और उन्ने जो सथम गया इस शामररिफा आप्रय र मर्म प्रामण पुत्रसस्तन ममप म्फतिक । मा ही सप नर मार परताहै नपान और पारा, पार और प्रमगभा, मूर्य और स्निगी भर रफ पर समरम् पगिता मतः ॥१४॥ त 3 और मरमें सम्पनी राय, उमे । माम्पसमाप । NARARI ब०२९ एकादश स्कन्ध ८८७ 1 नरेप्पभीक्ष्ण मदाव पुंसो भावयतोऽचिरात् । सच हानी समाना चाहिये ।। १३ १४ ॥ जब निरन्तर सभी नर-नारियों में मेरी ही माक्ना की जाती है, तब स्पर्धास्यातिरस्कारा सारा रियन्ति हि ॥१५॥ ) पोई ही दिनों साक्फके पित्तसे स्पर्श (होई), प्या, चिरस्कार और ब्रार थादि दोष दूर हो जाते है मिरज्य स्मयमानान् वान् शंपीगंधदैहिकीम् । ॥ १५ ॥ अपने ही ग यदि हँसी करें तो करने दे, उनकी परफा न करे, 'म अभ्य है, यह दुरा है। प्रजमे दण्डव मावायचामागोखरम् ॥१६॥ ऐसी छटिको और ओक सञ्जको छोड़ दे और कुचे, चाण्डाल, गो एव गरेको भी पृथ्वीपर गिरफर साध्या | दणपत् प्रणाम करे ॥ १६ ॥ बक्तक समस्त प्राणियोमें यावत् सर्वेषु भूतेषु मझायो नोपजायते । मी मापना--मा-भावना न होने छो, तफ्तक इस प्रकारसे मन, अणी पौर परीरके सभी संकल्यों और तावदवस गसीत पाङ्मनः कामचिमिः ॥१७॥ | फोदारा मेरी उपासना करता रहे ॥ १७॥ उदननी म इस प्रकार सर्वत्र यात्मभुद्धि-मधुदिका अभ्यास सचे प्रयात्मक तस्स विययाऽऽत्ममनीपया। वित्या बाता पोरी दिनमि उसे मान होकर सब कुछ प्रामस्वरूप दीसने बगता है। ऐसी टि हो परिपश्मन्नुपरमेत् सर्वतो सकसः ॥१८॥ जानेपर सरे सराप सन्द पने श्राप निवृत्त हो जाते अयं हि सर्पकल्पाना सघीधीनो मतो मम । और यह स्व कहीं मेरा साक्षात्कार करके सेसारदरिसे उपरम हो जाता है॥१८॥ मेरी प्रासिके जितने मद्रायः सर्वभूतेषु मनोबाकायत तिमि ॥१९॥ साधन है, उनमें में तो सबसे भेष्ठ साफ्न यही समझता ई कि समस्त प्राणियों और पदार्पोमें मन, वाणी और | शरीरकी समसारियोंसे मेनी ही भावना की जाय ॥१९॥ न पोपक्रम सो मर्मस्पोट्याम्नपि । उदात्री ! यही मेरा अपना भागवतधर्म है। इसको एक पार पारम्म फर देनेके याद किस किसी प्रकारकी विन- मया म्पचसितः सम्पनिर्गुणत्वादनाधिप ॥२०॥ पासे इसम रतीमर भी अन्तर नहीं पाता, क्योंकि पा धर्म निष्काम है और सर्प मन ही इसे निर्गुम यो यो मपि परधर्म करप्यते निप्फलापचत् । होनेके फारम सोहम निभय किया है।॥ २०॥ भगवतधर्म में किसी प्रकारकी श्रुटि पानी सा दूर रही- सदायामो निरः स्यात् भयादेखि सत्तम ॥२२॥ पनि स धर्मका सफ्फ मय-शांक आदिके अवसरपर निकासी भाबना और रोने-पीटने, भगन-सा निरसक फर्म भी निष्कामवसे मुह समर्पित कर दे ता ने भी एपा पुद्धिमतां पुहिर्मनीपा च मनीषिणाम् | परी प्रस्नताक कारण धम बन जावे ॥२१॥ विवेशियों के विरेक और चतुरोपी चतुराकी पराकाष्टा यत् सस्पमन्वेनेह मरानाप्नोति मामतम् ।।२२॥ इसी में है कि वे इस स्निाशी बार अम्प शरीरके पारा मुम वस्निाशी एवं रूप तस्वयो प्राप्त फर में ॥ २२ ॥ एप सेऽभिहिवः करमा प्रमरावस्प संग्रह । उम्वनी ! यह सम्श प्रनपिपाश यस्य मने संक्षेप और विस्तारसे तुरे मुना रिया । इस रास्पको १ मंमिः । २ मा बासति ।

८८८ भीमशागत [4.२९ समासम्पासविधिना देवानामपि दुर्गमः ॥२३॥ सम्बना मनुष्येकी तो फोन कहे, देवताओं के लिये भी अभीक्ष्णमस्ते मदितं धनं विस्पष्टयुक्तिमत् । वत्यात फठिन ॥ २३ ॥ मैंने जिस मुस्पर और युक्तियुकबानका वर्णन मर-बार किया है, उसकेको एतद विझाय मुच्येत पुरुषो नष्टसंशयः ॥२४॥ जो समझ लेता है, उसके दयकी साप-प्रन्थियाँ B+- मिम हो जाती हैं और यह मुल हो जाता है ॥ २१ ॥ सुविविक्तं तब प्रभ मयैतदपि पारयेत् । मैंने तुम्हारे प्रश्नका मश्रोति खुपसा कर दिया, जो सनातनं प्रमगुम परं प्रमाधिगच्छति ॥५॥ वेदोंके मी परम यस्य सनातन पर को प्राप्त कर पुम हमारे प्रश्नोवरको विचारपूर्वक धारण करेग, , म एव मम भकेषु सम्प्रदधात् सुपुष्पलम् । हेगा ॥ २५ ॥ जो पुरुष मेरे मवोंको इसे मीमति स्पष्ट करके समजायेगा, उस हानदाताको में प्रसन्न मनसे उस्माई मबदामस्म ददाम्पारमानमारमना ॥२६॥ भफ्ना ससफतक दे दारंग, उसे वारम्बान कर य एतत् समधीपीस पवित्रं परम शुधि । ग्य ॥ २६ ॥ उपबी ! या सहारा और मेरा संवाद स्वयं तो परम पवित्र है ही, मौको भी पवित्र करने स पूसाहरहमा पानदीपेन दर्शयन् ॥२७॥ वान है । जो प्रतिदिन इसका पाठ करेग और दूसरों को | सनायेगा, इ इस शानदीपके द्वारा दूसरोंको मेरा दर्शन य एतच्छूदया नित्पमध्यनः भूपुपापरः । करानेके कारण पवित्र हो जायग् ॥ २७ ॥ नो को मपि भक्ति पर कुर्मन् कर्मभिर्न स पम्पते ॥२८॥ एकाम पित्तसे इसे प्रयापूर्वक नित्य मुनगा, उसे मेरी परामक्ति प्राप्त होगी और पा कर्मनसे मुल हो मप्युद्धप स्वया प्रम सखे संमवधारितम् । नायगा ॥ २८ ॥ प्रिय सखे । तुमने भलीभाँति मामा अपि ते विगतो मोहा लोकमासौ मनोभषः ॥२९॥ एक तो दूर हो गय न १ ॥ २९ ॥ तुम इसे स्वरूप समान लिया म ! और मुम्हारे विकार नैतस्वया दाम्भिाय नास्तिमाय शठाय च । | दाम्मिक, नास्तिक, शठ, वमशाल, मफितीन वीर उरत अशुथ्पोरभक्काय दुर्मिनीताय दीयताम् ॥३०॥ ममणमा हो, प्रेमी हो, साधुस्वमात्र हो और | पुरुषको कमी मत देना ॥ ३० ॥ो इन दोपोंसे रहित एतेदपिषिदीनाप प्रपम्पाप प्रियाय च । निसका चरित्र पवित्र हो, उसीयो या प्रसार मनाना चाहिये । यदि शर और सी भी मेरे प्रति प्रम-भक्ति साधये शुचये प्रपा मक्किास्पान्द्रयोपिताम्।।३१॥ रसते हों, तो उन्हें भी इसका उपदेश करना चाहिये ॥३१॥ नैव विशाप जिवासोतिम्पमवशिष्यते । से दिम्प अमृतपान कर लेनेर कुछ भी पीना शेर मी यता, वैसे ही यह जान मेनेपर निवास लिये और पीसा पीयूपममृत पावसं नावशिप्पचे ॥३२॥ कुछ भी जानना शेष नहीं रहता ॥ ३२ ॥ प्यारे उन । पान कर्मणि याग घ वातार्या दण्डधारण । मनुप्पो मान, गर्म, योग, माणिम्प बोर राजदण्डादिसे प्रमश मध, धम, काम और अपम्प पर प्राप्त होते यापान नृणां वात नास्ति चतुर्विधः ॥३३॥ है, परन्तु तुम्हारे जैसे अनम्प मालोंके दिये पद पाउँ १ समुरभारितम् ।

• २९] ८८९ एकादश स्कन्ध - । स मर्यो यदा त्यकसमत्वकर्मा प्रभारका फल केवल में ही हूँ ॥ ३३ ॥ जिस समय मनुष्य समस्त फोका परित्याग करके मुझे आत्मसमर्पण निवदितारमा विधिकीपिंटो मे । कर देता है, उस समय वह मेरा विशेष माननीय हो तदामृतत्व प्रतिपयमानो । जाता है और में उसे उसके जीवसे छुपाकर अमृसखरूप मोक्षकी प्राप्ति करा देता और कर मुझसे मिलकर मेगा मयाऽऽस्मयाय च फल्पते वै ॥३४॥ मरूप हो जाता है ॥ ३ ॥ मीशुक उवाप श्रीगुष्यपजी कहत है-पशित् । अव उदपी योगमार्णका एषमादर्शितयोगमार्ग- परा-सा उपदश प्राप्त कर चुके थे । मायान् | श्रीशणकी यात पुनफर उनकी आँसमें ऑस् उमद स्वदोचमसोफवचो निश्चम्प। आपे । प्रेमकी वादसे गा च गया, सुपचाप हाप जोरे पदाञ्जलिः प्रीत्युपरूवकण्ठो रह गये और वाणीसे कुछ वोटा न गया ॥ ३५ ॥ न किंपिपेऽनुपरिप्लुतायः ॥३५॥ उनका विच प्रमावेशसे विहल हो रहा था, उन्होंने विष्टम्य पिच प्रमयाषपूर्ण धैर्यपूर्वफ उसे रोका और अपनेको भयन्त सौम्मम्पशाय धैर्येण राजन् हु मन्यमान । मनुमा करते हुए सिरसे यदुसंशशिरोमणि भगवान् रुवानलि प्राह यदुवीरं भीके चरणों को स्पर्श किया तपा हाप मारफर शीर्णा स्पर्शस्त धरणारविन्दम् ॥३६॥ उनसे यह प्रार्थना की ॥ ३६ ॥ उप उष उपजीमे कहा-प्रभो ! भाप मन्या और प्रमा विद्रावितो मोहम पिस्रो आदिक भी मूल कारण है। मैं मोहके महान् अन्धकारमे मटका रहा था। वाफ्क रस्तासे यह सदाक छिये माग गया। य आस्तिो म तय संनिषानात् । मत्य, ओ अधिक पास पहुँच गया उसके सामने क्या विभाषसोः किं नु समीपगस्प शीत, अषकार और उसके कारण होनेषाध्य भय टहर शीर्द तमा भी प्रभवन्त्यवाय ॥३७॥ सकते हैं । ॥ ३७ ।। भगवन् ! आफ्फी महिनी मायान मेरा मानदीपक डीन म्यिा पा, परन्तु आपने रुपा करके प्रस्पपितो म भवतानुकम्पिना या फिर अपन सेवकको लोन दिया। आपने मेर उपर भृत्याय विज्ञानमय प्रदीपः। महान् अनुमाफी नपा की है। ऐसा कौन होगा, जो हित्वा स्वक्षस्तव पादमूलं थापके इस कृपा-प्रसादका अनुभव करके मी आपके परणकमकी शरण मेरदे और किसी दूसरेका सहारा काऽन्यत् समीपाष्ठरणं त्वदीयम् ॥३८॥ ल!॥ ३८॥ आपने अपनी मायासे सबिटिके लिये शरणम म मुटः स्नेहपायो दाशाई, वृष्णि, वफ और सारपतवंशी यादोंके साप दासारसम्पन्धकमात्वत्पु मुठ मर स्लपम्पसे बोव Pया पा । आज आपने प्रसारितः सृष्टिमिदये स्वया अषकी तीर्स तयारसे उस धनको भनापास स्वमायया पात्ममुवोषरविना ॥३९॥ ही काट मध्य ॥ ३९॥ महायागेपर ! मेय थापा । जब आप पा करक मुग शरणागतका नमोऽस्तु ते महापागिन् प्रपयमनुशाधि माम् । एसी आधा दीपिय, जिससे पापफ परणामध्यमें मी यथा त्वचरणाम्भात्र रवि स्पादनपायिनी ॥४०||| अनन्य मछि पनी रह ॥ २० ॥ , मेरमपम । २ स्तम्मन् । - -- ममस्कार मा म २२१२- ८९० श्रीमद्भागवत [अ० २९ श्रीभगवानुवाच भगवान् भीमप्यने कहा-उम्पनी ! तुम मेरी महासे मदरीवनमें चले जाओ । न मेरा ही वामम गच्छोट्य मयादिष्टोक्दयोख्य ममाथमम् । है। यहाँ मरे चरणकमोंके धोक्न गङ्गारका सान सत्र मत्पादतीर्थोदे नानोपसर्शनः नुचि ॥४१॥ पानके द्वारा सेवन करके तुम पवित्र हो बाबागे ॥११॥ अलकनन्दाके दर्शनमाप्रसे तुम्हारे सारे पाप-ताप नष्ट हो पियालकनन्दामा विधूताशेषकरमप । नायगे । प्रिय उदय ! तुम यहाँ पक्षोंकी मन पनना, क्नके कन्द-मू पाल साना और फिसी मोगकी अपेक्षा वसाना वल्कलान्पङ्ग पन्यमुक् सुखनिास्पदः ॥४२॥ | न रजकर नि स्पृहसतिसे अपने आपमें मस्त रहना ॥१२॥ सदी गरमी, मुम-तु सबो कुछ था परे, उसे सम तिसिचन्दमात्राणां सुशील संपतेन्द्रियः । रहकर सहना । समाव सौम्प रहना, इन्द्रियोंको पशमें रहना । चित्त शान्त रहे । मुद्धि समानित हे और तुम शान्त समाहिसधिया मानविज्ञानसंयुत ॥४३॥ खय मेरे खरूपके हान और अनुभवमें बने रहना ॥१२॥ मैने तुम्हें जो कुछ शिक्षा दी है, उसका एकान्तमें विचार- मचाऽनुशिक्षित पच विविक्तमनुभावयन् । पूर्वफ अनुभव करते रहना । अपनी वाणी चौर पित मम्माषेशितवाञ्चित्तो मर्मनिरसो भव । मुझमें ही लगाये रहना और मेरे यताये हुए भागक्तवर्ममें प्रेमसे रम बाना । अन्तमें तुम त्रिगुण और उनसे सम्बन्ध अतिम्रज्य गतीस्तिस्रो मामेप्पसि सत परम् ॥४४॥ | मै मिल जावागे ॥ १४ ॥ रसनेकली गतियों को पार करके उनसे परे मेरे परमायस्वरूप श्रीभुक उपाच श्रीशुकदेवजी कहते है-परीक्षित् ! मामान् श्रीकृष्ण- के म्वरूपका झान ससारके भेदभ्रमको छिम-भिम कर स एवमुको हरिमधसोप देता है । जब उन्होंने स्वय उद्धवजीको ऐसा उपदेश किया तो उन्होंने उनकी परिक्रमा की और उनके परगने- प्रदक्षिणं व परिसुत्प पादयोः । पर सिर रख दिया । इसमें म्देह नहीं कि उसपी शिरो निधायाधुकलाभिराधी संयोग नियोगसे हानेवाले मुख-दु सके बोरसे परे ५, क्योंकि वे मावान के निईन घरों की शरम से पुके थे। पिनदइन्दूपराऽप्यपक्रम ॥४५॥ फिर मी महोसे चस्ते समप उनका पिच प्रेमामेशसे भर गया। उन्होंने अपने नेत्रों की परतीमापारासे मनाया- सुखस्त्पजस्नेहवियोगातरो के घरणकमको मिगो या ॥ १५॥ परीधित् । भगवान्क प्रति प्रेम फरके उसका स्पाग फरना सम्मम न सक्नुपस्त परिहातुमातुरः । नही है । उन्हींक वियोगकी कल्पनासे उपजी फातर हो गये, उनका त्याग करनेमें समर्प नए । पर यर की ययौ मृघनि भवपादुफ मिल होकर मष्पित होने लगे। कुछ सम्पक पाद | उन्होंने भगान् धीमणके चरणोंी पादुफाएँ अन्न सिर निमममसत्य ययौ पुन पुन ॥३६॥ | पर रख में और बार-बार भगवान्य चरणों में प्रभाम करफ ८९१ एकदम स्कन्ध . ३० ] प ततस्तमन्तईदि संनिवश्य पहासे प्रस्थान किया ॥ १६॥ मगधन्के परमप्रमी मक्त उबजी इदयमें टनकी दिन्य वि धारण किये कारिखम्- गतो महाभागवतो निशालाम् । ग्रम पहुँचे और यहां उन्होंने तपामय जीवन न्यतीत फरक यथोपदिष्टये जगदकान्घुना जगत्के एकमात्र हितैपी मावान् श्रीकृष्णक उपशानुसार उनकी पत्मभूत परमगति प्राप्त की ॥ १७ ॥ भगवान् तप समास्याय हररगाव गतिम् ।।४७॥ शहर - योगेश्वर भी सदिानन्दस्सलप भगवान् ग्रीकृष्णक चरणोंकी सेवा किया करते है। उन्होंने सय एतदानन्दसमुद्रसम्मृत श्रीमुखसे अपने परमप्रमी भक उदषक लिये इस शानामृत- का वितरण किया । यह शनामृत धानन्दमहासागरका मानामृत भागवताप भापितम् । सार है । जो अदाके साप इसका सेवन करता है, वह कप्पन योगेधरसेषिताधिणा | तो मुक्त हो ही जाना है, उसक समसे सारा जगत् मुफ ऐ जाता है।॥ १८ ॥ परीक्षित् ! से भीरा मिल सन्दयाऽऽसेन्य जगद घिसभ्यत ॥४८॥ पुष्पोंसे उनका मार-सार मधु संग्रह कर लेता है, मसे ही स्वप वदोको प्रकाशित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णन भवभयमपरन्तु ज्ञानविमानसार मक्कोको संसारसे मुक्त करने के लिये यह धान और शिान निगमकदपजरे मृावद् वेदसारम् । का सार निकन्या है। उन्होंने जरा-गादि मपकी निति- क किसे धीरसमुद्रसे अमृत मी निशम्य पातमा इनें अमृतमदघितभापापयद् भृत्पवगान् ममश अपन निधिमार्गी और प्रकृचिमर्गी भक्तोंको । फिव्यपा । वे ही पुरुषाचम मगवान् श्रीहम्ण सारे जगत्के पुरुपमृपभमा कप्पसन नतोऽसि ॥४९॥ । मूल कारण है । मैं उनके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ ॥१९॥ इति धीमागपते महापुराणे परमात्मा संहितापामेकादशस्फरव एफोनत्रिंशोऽम्पाप ॥२९॥ । अथ त्रिंशोऽध्यायः यफसधसहार गजोदाप पा परीभिदन पूप्रभार ! जय महाभागक्स अपनी पारीवनका घर गये, तर भूतभाक्न मावान् तता महाभागया उवर निर्गदे बनम् । धीमणने शरकामें पप स्टीय रची। ॥ १॥ प्रभो ! पदुम्माशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णन अपने के प्रमाणप- द्वारवयां किमहराष्ट्र भगवान भूतभावन ॥१॥। पक्ष होनपर सपक नेयदि इन्द्रियोंक परम प्रिय अपन प्रधानापापमसृष्ट यादयपभ । रिम्प धीविनइकी स्यनका समरण कैसे किया । ॥२॥ भगवन् । जब नियोक नप ठनक श्रीविग्हमें थ्ा जात प्रयसी सबनेप्राणां तर्नु म कमान्यजन् ।। २ ॥ थे, तब वे उन परोसे हटानमें असमय हो जाती थी। बस्त पुष उनी रूपमाभुरी वमन मनते है, तब प्रत्याए नयनमरठा यत्र लग्न न शेक: विश्यमानाक रास्त प्रश करके उनक चिठमें कगाविष्ट न मरति तता यन् मुतामात्मतमम् । गा-सा जाता है, कॉटना नहीं जानता । उसकी १ नमादि।

श्रीमद्भागवत [अ० --- यन्धीर्याचा जनयति रति किनुमान कवीनां | शोमा करियों को काव्यरचनामें अनुरग रग भर देत और उनका सम्मान बढ़ा देती है, इसके सम्बन्ध करना ही क्या है। महाभारत युरके समय जन थे। दादा अर्घनफ रपपर बैठे हुए थे, उस समय । योद्धाओंने उसे दस-देस्ते शरीर-स्याग किया, दृष्ट्या जिप्णापधि स्थगत पच तत्साम्यमीय ॥३॥ सासप्य मुक्ति मिल गपी। उन्होंने अपना ऐसाज 1 श्रीविग्रह किस प्रकार अन्तर्धान किया। ॥३॥ ऋपित्याप श्रीगुरुरपणी करते है-परीक्षित् । जब भग दिवि सम्पन्तरिक्ष च महात्पातान् समस्थितान् । श्रीकृष्णने देखा कि आकाश, पृथ्वी और अन्तरि | वा-या टपात---अशकुन हो रहे हैं तब न एमाऽऽसीनान् मुधर्माया कृष्ण प्राइ पनिदम् ॥४॥ सुधर्य सम्पमें उपस्थित सभी यदुपशिसे छ। कही-शा श्रेष्ठ यदुवंशियो ! यह देखो, घरकामे या पत पारा महोत्पाता धावत्या यमकेतवः । भपहर उत्पात होन हमले हैं। ये साक्षात् यमराव मुहमपि न स्यमय नो यदपुगवाः ॥५॥ पजाके समान हमारे महान् अनिएके सूचक है अब हमें यहाँ घड़ीदो-घड़ी भी नहीं या लिया पालाध पूद्धाप यहादारं प्रजन्त्वितः । चाहिये ॥ ५॥ मिपो, मन्चे और पूरे पडोसे स्त्रिय पर्य प्रभामं यास्यामो पत्र प्रत्यक् सरस्वती ॥६॥ क्षेत्रमै पसे जायें और हमस्योग प्रभासक्षेत्रमें करें । सब जानत है कि वहां सस्ती पधिमकी बरस. तग्राभिपिच्य गुचप उपोप्प मुसमाहिता । | समुद्रम ना मिली है ॥ ६ ॥ माँ हम मान पत्र दलता पूजयिप्याम सपनालपनाईम ॥७॥ मन आदि मममियोंसे देवताओंकी 5 परित्र होंगे, उपास करेंगे और एकापरिससे - प्रामणांस्तु महाभागान् कृतम्बस्त्ययनाषयम्। फरेंगे ।। ७॥ यहाँ स्वस्तिवापनके पद हसनगर गाभूदिरम्यवामाभिर्गवायरथव मभि भूमि, साना, यक्ष, हाथी, भर, ख और पर गि ॥८॥ वाय महारमा म सकार करेंगे॥८॥विस रिधिरप परिटमा मगलापनमुत्तमम् । प्रारक अमारा नाश करने गये और परम म |जननी ६ । प्रष्ट पाश देयता, सम और गो दयदिवगा पूजा मनप परमा भर ॥ ९॥ यी पूजा ही प्राणियों के जन्म परम पम ॥ इति मरें ममासम्म परदा मधुदिपः । पगडित् ! सभी पर यमशिन भाग्न भी कर मपति नाभिरूमाप प्रभामं प्रयग् ग्य ||०॥ पहचान सुनकर तपस्त दस गारा अनुचे कि भारतरत नाओमे ममुर पर पर 6 रोग प्रद नचिन भगरता दिट पदसन यादया ! सीम पी॥१०॥ गि मावन् पारमा सीमा पा पाममा माया गायपादितम् ॥१॥ और मे Fr x 1 Adutam ।

५० ३०] एकादश स्कन्ध ८९३ ततस्वमिन् महापानं पपुमरियकं मधु । मायस्प किये ॥ ११ ॥ यह स्व तो उनीने किया। विष्टषिम्रशितधियो यद्वैश्यते मति ॥१२॥। परन्तु देषन उनकी युरिहर ली और ने उस मरेपक नामक मदिराका पान करने मो, जिसके नशेसे युधि भ्रा हो महापानाभिमचाना चौरामा सचेतसाम् । जाती है। यह पीनेमें तो अवश्य मीठी ख्याती है, परन्तु कृष्णमायाविमूढानां संघर्पः सुमहानभूत् ॥१३॥ परिणाममें सर्वनाश करनेवाली है ॥ १२ ॥ उस तीन युयुधु काधसंरम्धा वेलायामासवापिनः । मदिराफ पानसे सब के सब उन्मत्त हो गये और वे धमरी धनुर्भिरसिभिर्मक्लैर्गदाभिस्तोमरष्टिभिः ॥१४॥ वीर एक-दूसरेसे जाने प्रगाने को । सच ने तो श्रीकृष्णकी मापासे वे मूद्र हो रे मे॥ १३ ॥ उस सम्प पसस्पता स्थलराटिभि वे क्रोषसे मस्कर एक-दूसरेपर वाक्रमण करने लगे और सरोष्ट्रगाभिर्मनिरैरपि धनुष-बाण, तयार, माले, गदा, सोमर और ऋठि आदि मिथ समेस्पाश्चवरैः सुदुर्मदा का शर्मासे हो समुद्रतटपर ही एक-दूसरेसे भिक गये ॥ ११ ॥ मतपाले यदुर्मशी रयो, हापियों, घोड़ों, न्यहम्छरैर्दशिरिष दिपा वने ॥१५॥ गों, टये, सायरों, क्ये, भैसों और मनुष्योंपर भी सपार अपुग्नसाम्बी युषि स्वमत्सरा- होकर एक-दूसरेको वार्णोसे पाठ करने लगे—मनो बफरभोजापनिरुद्धसात्यकी बगी हामी एक-दूसरेफ्र दौतोंसे चोट पर । सुभद्रसख्यायजिती सुदारूगो सम्की सषारियोंपर घमाएँ फहरा यी पी, पैदल सैनिक भी वापसमें उष्या रहे ये ॥ १५॥ प्रपुम साबसे, गदा सुमित्रासुरभी समीयतुः ॥१६॥ बार मोबसे, अनिम्म सात्यकिसे, सुभव संपामजिसे, अन्ये च ये ये निशटोलमुकादयः मगमान् श्रीकृष्णके भाइ गद उसी नामक उनके पुत्रसे सहस्रजिच्छजिदानुमुरपाः और ममित्र मुरपसे युद्ध करने भो। ये सभी मरे मपटर यो पे और क्रोध मरकर एक मरेका नाश करनेपर तुछ अन्योन्यमासाप मदाधकारिता गये थे ।। १६ ॥ इनके पनिरिक निशठ, उस्मुक, बन्नुभन्देन विमोरिसा मुशम् ।।१७॥ सासनित, शतनित् और मानु धादि पदव मी एक- दाहाहाप्पन्धमभोवसात्वता | इसरेसे गुंप गये । भगवान् श्रीरुगाफी माने तो इन अरपन्स मोरिस पर ही रपटा पा, पर मदिराके मशेने मध्यपुंदा मापुरधरसेनाः। भी इन्हें भय बना दिया था ॥ १७॥ दाशाह, वृष्णि, विसर्घनाः फाराः इन्तमम अषक, मोब, साकत, मनु, अबुट, माधुर, शूरसेन, मिथस्वतस्तेऽय पिसन्म सौरम् ॥१८॥ विसर्जन, कुकुर और पुन्ति बादि वंशोंके लांग सौहार्द और प्रमको मुअकर व्यपसमें मार-मार करने को ॥१८॥ पुत्रा अयुध्यन् पिभिर्माभिम । मन्तावश पुत्र पिताका, माइ माईका, मान मामाका, स्वतीपदौवित्रपिवृष्यमातुः । नाती नानामा, मित्र निश, सुखद् सदा, पापा मतीने मित्राणि मित्रः सुरदा माथि का तथा एक गोश्वाले आपसमें एक-दूसरेका खून करने सगे। १९ । अन्तमें जब उनक सब गण सम्पत थे चोदीस्वहस्तातर एम मूद्या ॥१९॥ , गये, मनुस टूट गये और शबाब नए-भर हो गये तब यस पायमायेषु मन्यमानेषु भन्यम् । होंने अपने से समुद्रतटपर यी हुई एफा नामकी घास स्वास्नी गुरु की । महही धस पी, जा ऋषियों- शस्त्रप धीममाण सटिभिजाररका |॥२०॥ के आपके काय उत्पम दुर साइम्प सके रेसे पैदा : - !

८९४ श्रीमद्भागवत [अ०३० तावप्रकल्पा सभषन् परिषा मुटिना मृताः । हुई पी ॥ २० ॥ हे राजन् ! उनके हायोंमें आते है या पास करके समान फटोर मुनरोंके रूपमें परिक्त हो बम्नुदिपस्तै कप्णेन पार्यमाणास्तु तं च ते ॥२१॥ गयी। मब धे रोपमें मरफर उसी घासके द्वारा अपने विपक्षियोंपर प्रहार करने मो। मावान् श्रीकप्मने में प्रत्पनीकं मन्पमाना घलभद्रं च माहिता । मना किया, तो उन्होंने उनको धौर फलामनीको मी अपना शत्रु समा स्पिा । उन बाततापियकी युति ऐसी इन्तुं कृत्तषियो राप्रमापना आततायिन ॥२२॥ मह हो रही थी कि वे उन्हें मारनेके लिये उनकी ओर दौड़ पड़े ॥ २१२२ ॥ पुन्नन्दन ! अन मगन् अथ तापपि सदापपम्म कुरुनन्दन । श्रीकृष्ण और एलरामजी मी झोपमें मरकर पुखमूनिमें एरफामष्टिपरिषौ परन्तो चमतुर्यघि ॥२३॥ इपर-उधर विचरने और मुद्रीकी मुट्ठी एरफा घस उतार सरकर उन्हें मरने को। एरका घसकी मुही। प्रमशापोपसृष्टानां कृष्णमाया तास्मनाम् । मुखरके समान चोट करती पी ॥ २३ ॥ जैसे बाँसोंकी रगरसे उत्पन होकर दावामळ बाँसको ही मस्म कर देता स्सधाक्रोधाधम निन्ये वैणवोऽमिर्ययापनम् ॥२४॥ मयसे माहित यदुवंशियोंके स्पम्पिक कोधने उनका है, से ही मापसे प्रख और मगवान् श्रीकृष्मकी एवं नप्रेषु सर्वेषु कुलेपु स्वेपु फेसवः । अस कर दिय ॥ २१ ॥ व मगवान् श्रीकृमने देस कि समक्ष यदुषशियोंका संहार हो जुका, तन मोंने अवतारिसो सवा भार इति मेनेऽवश्शेषितः ॥२५॥ यह सोचकर सन्तोषकी साँस ली कि पृथ्वीका बम पुत्र भार भी उतर गया ॥ २५ ॥ रामः समुद्रवेलायां योगमास्साय पौरुपम् । परीक्षित् ! मध्यमजीने समुद्रतटपर बैठकर एका वत्पाज लोक मानुप्पं संगोल्यात्मानमात्मनि॥२६॥ सही र कर यि और मनुष्यशरीर मेर पितसे परमात्मचिन्तन करते पर अपने नामाको पारम रामनिर्यागमालाक्प भगवान् देवकीसुतः । दिया ॥२६॥ जब मगवान् मीणने देसा कि मेरे को माई कलरामनी परमपदमें छीन हो गये, दबने एक पीपके निपसाद धरोपस्थे तूष्णीमासाय पिप्पलम् ॥२७॥ पेड़के तळे जाकर चुपचाप घरदीपर ही मैठ गये ॥ २० ॥ मगवान् श्रीकृष्णमे उस समय अपनी आकान्टिसे पिभ्रचतुर्स रूपं प्राजिष्णु प्रभया म्यया । देदीप्यमान चतुर्मज रूप धारण कर रक्ख भ और धूम- से रहित अग्निके समान Pशायको भारहित- दियो वितिमिराः कुवन् विधूम इव पावकः ॥२८॥ न ना रहे थे ॥ २८ ॥ विशन मेरो समान साँवरले शरीरसे तपे हुए सानेके समान म्योति निका श्रीयत्साई घनश्यामं वप्तहाटकवर्षसम् । रही थी । पक्ष स्टपर श्रीमसका विहशमापमान था। वे रेशमी पीताम्मरकी भाती धीर स ही दुपारी पारम मोशेपाम्परयुग्मेन परिसीचे मुमङ्गलम् ॥२९॥ | किये हुए थे। बड़ा ही मामय रूपा ॥ २९ ॥ मुख । काम्पर सुन्दर मुससम्म और कपर नीम-मीठी मुन्दरम्मितरपार्ज नीलकुन्तलमण्डिसम् । यस बड़ी ही महायनी नगती थी । फाउक समन १ वास्तव्यदामिनः३म्परिम्स) अ०३०] एकादश स्कन्ध ८९५ पुण्डरीमाभिरामाई स्फरन्मकरणलम् ॥३०॥ मुन्दर-सुन्दर एष सकुमार नेत्र थे। फामि मकान्त कुम्मळ सिमित्य रहे थे॥३०॥ कमरमें करधनी, कंपेपर फाटिस्त्रनमस्त्रफिरीटकटकाल्दै योपवीत, माथेपर मुफुट, मार्योंमें कंगन, वाइमि वान्द, वक्ष सय्पर हार, चरोम नपुर, गुलियोमें हारन् पुरमद्राभिः कौस्तुमेन विराजितम् ॥३१॥ अंख्यिा और गलेमें कौस्तुभमणि प्रेमायमन हो रही थी ॥३१॥ घुटनोंतक क्नमाम लटकी इइ पी । य, चक्र, गदा धादि आयुध मूर्तिमान् होकर प्रमुकी सेवा धनमालापरीवा मृर्तिमद्विनिजापुर्घः। कर रहे थे। उस समय भगवान् आफ्नी दाहिनी बॉक्पर वायाँ चरण रटकर बैठे हुए थे । यस अन सम्या रक्त सत्वोरी दक्षिण पादमासीन पजारुणम् ॥३२॥ कमलके सम्पन चमक रहा पा ॥ ३२ ॥ पीक्षित् ! जरा नामका एफ यहेलिया था। उसने मसलावशेषाय:खण्डकतेपलम्धको जरा। मुझम्के क्चे हुए टुक्रोसे अपन याणकी गाँसी बना ली थी। उसे दूरसे भगवान्का लाम-पल तलमा हरिनक मृगास्याकारं तचरण विष्पाप मृगशया ॥३३।। मुसके समान जान पड़ा । उसने उसे सचमुघ हरिन चतुर्म से पुरुप बन स कतकिल्पिप । सम्बनकर अपने उसी गणसे वींध दिया ॥ ३३ ॥ जब एड पास आया, तब उसने देखा कि 'अरे! ये तो चतुर्मन भीत पपात शिरसा पादयोरसुरदिपः ॥३०॥ पुरुष हैं। अब तो यह अपराध कर चुका पा, इसध्येि उरक मारे कांपने लगा और देल्पदलन भामान् श्रीकृष्णके अबानता कतमिट पापन मघुसदन । घरणेपर सिर रसकर घरतीपर गिर पड़ा ।।३० ॥ उसने धन्तुमईसि पापस उत्सम साफ मेनप ॥३५॥ कहा- मधुसूदन ! मने अनजानमें यह पाप किया है। सचमुच में यहुत बड़ा पापी है, परन्तु पाप परमपशवी यस्मानुस्मरण नगामपानवान्तनाशनम् । और निर्विकार है । आप कृपा करक मेरा अपराध क्षमा फीजिये॥३५॥ सर्वव्यापफ सर्वशक्तिमान् प्रमा! महामा- पदन्ति सस्प त विष्णो मयासाधु कृत प्रभा ॥३६॥ मग कहा करते हैं कि आपके स्मरणमाप्रसे मनुष्योंका वन्माऽऽशुबहिष्ठ पाप्मानं मृगलुम्धकम् । अनानान्धकार नर हा जाता है। वा खेदकी बात है फि मैन स्पर्य थापा ही अनिष्ट कर दिया || ३६ ।। पदा पुनरह स्व न जुया मदतिक्रमम् ॥३७॥ गुम्टनाय । म निरापराध हरिणों को मारनमात्म महापापी यस्पात्मपागरचित न विदुषिरिता है। आप मुस अभी-अमी मार डाठिये, क्योंकि मर जानेर म फिर मी याप-से महापुरुषोंका एसा अपराध न करूंगा रुद्रादयाऽस्य तनया पतयोगिराया ।। ३७ ॥ मगरन् ! समग विपाके पारी ब्रह्मा और उनके पुत्र म आ भी आपकी पागमायाका बियस वन्मायया पिरिवरटय एतदजः नहीं स्न पाव, स्पोंकि उनकी शि भी थापी मायासे किं वस्य व वपममद्गतया गृणीम ॥३८॥ महत है । एसी अस्सामें हमारे से पापयानि अंग उसके विश्यमें मह ही स्ण सरते ! ॥ ३८ ॥ पीभगयानुपाच भगयान् भीमप्णन या- जर स् र मत, मा भवरे त्यमुत्तिष्ठ काम एप मा हिम। टर-टर! पता तून मर मनका काम मिस्या जा,

८९६
भीमद्भागवत
याहि व मदनुवासः स्वर्ग सुरुतिनां पदम् ॥३९॥ मेरी आमासे तू उस स्वर्गम निवास कर, बिसकी प्रती
सेगा पुष्पयनोंको होती है ॥ ३९ ॥
इस्पादिष्टो भगवता कप्णेनेच्छाशरीरिणा । श्रीशुकदेवजी कहत है—पीक्षित् ! मावान् है
कृष्ण तो अपनी इससे शरीर वारण करते है।
नोंने बरा म्यापको यह वादेश दिया, क्व उसने उसकी
तीन धार परिक्रमा फी, नमस्कार किया और मिनर
त्रिः परिप्रम्प स नत्वा विमानेन दिवं ययौ ॥४०॥ | सवार होकर स्वर्गको चस्य गया ॥ १० ॥
दारूका कुप्मपदवीमन्विच्छमधिगम्य वाम् । मावान् श्रीकृष्णका सारपि दास्क उनके साना
पायुं तुलसिकामोदमाघ्रायाभिमुख गयौ ॥४१॥
पता लगाय सुधा उनके द्वारा धारण फी र तुलसीकी गन्ध-
से
युक्त वायु सँधकर और उससे उनके होनेके स्मनका
तं न तिम्माभिरायुवैत
वनुमान व्याकर सामनेकी भोर गप्पा ॥ ११॥ दामने
मपत्थम्ले कवफेवनं पविम् ।
वहाँ जाकर देखा कि मगान् श्रीकृष्ण पीके अपके
नीचे आसन गाये बैठे हैं। बसप तेनमारले असुन
स्नेप्लुतात्मा निपपात पादयो
मुर्तिमान् होकर उनकी सेवा में संग्न है। उनै देकर
रथावप्लुत्य समाप्पलोचनः ॥४२॥
| दाहकके दयमें प्रेमकी मार आ गपी। नेत्रोंसे बांसुओंकी
धारा बहने ली। वह रपसे दमर मगवान्के परोकर
अपश्यतस्त्वपरणाम्मुर्ज प्रभो
गिर पड़ा ॥ १२॥ उसने भगवान् से प्रार्थना की- 'प्रभो ।
रटिः प्रणा तमसि प्रविष्टा । रात्रिके सम्प पम्मके पन्त हो जानेपर राह पम्ने बाकी
दिशो न जाने न लमेघ शान्ति
नैसी दश्य हो जाती है। आपके परणफममेका दर्शन म
पाफर मेरी भी वैसी ही दशा हो गयी है। मेरी विनर
यथा निशायामापे प्रणप्टे ॥४३॥ हो गयी है, चारों खोर अंधेरा छा गया है। भय न तो मुझे
इति प्रपति सूते वै रथो गहरलाञ्छनः।
| दिशाबोंफा पान है और न मेरे एपमें शक्ति की
है। ॥ १३ ॥ परीक्षित् ! धमी दास्क इस प्रकार का ही
खमुत्पपात राजेन्द्र सम्पन्चज उदीयतः ॥४४ा रहा था कि उसके सामने ही भावान्फा गम्भव र
वमन्वगन्छन् दिम्पानि विष्णुप्रहरणानि च ।
फरका और घोपोंके साप प्रकाशमें उस गया ॥१॥
उसके पीछे-पीछ मामान्फे दिम्प आयुध भी फन गये।
वेनाविषिमितात्मानं सतमा जनार्दनः ॥४५॥ यह सम देखकर दारफे अधपकी सीम्म न गी । तर
गग्छ द्वारपती सव मादीनां निधनं मिधः । भगवान्ने उससे कहा-॥१५॥ तुम घरका
सकपणस्म नियाण बन्धुभ्यो हि मायाम् ।।४६॥ ममीको परम गति भोर मेरे मध्यमामाकी मार
परले बाभी और कहा यदुर्मशियोंके परस्परिक समार, भैया
भारकायां प न स्धेप भवनिय स्ववन्धुभि ।
कहो ॥ १६॥ उनसे कहना कि जब तुमनगोंको अपने
मया स्पको यदुपुरी समुद्र प्रावपिप्पति ॥४७॥
परिवारवाके सप वारसा नहीं बना पाहिये । मेरे न
स्व व परिग्रह म आदाय पितरी घनः ।
गनपर समद उस नगरी कुला दगा ||१७|| सर मग
अपनीमानी धन-सम्पनि, युटुम्ब बार मर मता-रितारा
अर्जुनेनापिता सन इन्द्रप्रस्थ गमिप्पथ ॥१८॥ सेक्स अनुनके सरगमें इन्दप्रस पल आपै ॥ २८ ॥

८९७ २० ३१ एकादश स्पन्ध पतु महर्ममास्साय माननिष्ट उपेषकः दाहक ! तुम मेरे शरा उपदिष्ट भागातधर्मका आप ये और माननिष्ठ होकर सबकी उपेक्षा कर दो नन्मापारधनामेठी विज्ञापापशर्म प्रच॥४९॥ त्या इस एपको मेरी मायाकी रचना समसार शान्त हो जाओ ||२९|| भावान्का यह आदेश पाकर दामने इत्युक्तम्त परिग्रम्प नमस्कस्प पुनः पुन । उनकी परिक्रमा की और उनके चरणकमत अपने सिरपर रहकर बारबार प्रणाम किया । तदनन्तर पा उदास उत्पादोधीप्यपाधाप दुर्मनाः प्रपया पुरीम् ॥५०॥ मनसे शरफाफ प्रिय चल पा ॥ ५० ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईयो सहिताया कादशकाधे विशोऽध्याय ॥३०॥ अथैकाविंशोऽध्याय धीभगवानस्पधामगमम श्रीगुरू उवाच भीमाजी करते हैं परीक्षित् ! दास्यक पसे अनेपर प्रभाजी, शिव यायती, इन्दादि ययसार, मरीचि बध मागम घटा भवान्या च सर्म भर । आPि प्रजापति, वा-बड़ श्रषि-मुनि, पितर-सिद, गन्धर महन्द्रप्रमुसा दवा मनप समजेश्वरा ॥१॥ विपास, नाग-धारण, य-राक्षस, किलर-अप्सरा सण पितरः मिमन्धवा विद्याधरमहारगाः । गायक पिभिम पक्षी या मंत्रपथानिसमग भगान् पारणा पयाधामि फिभराप्मरमा दिवा ॥२॥ श्रीगक परम सम-सम्मानका सनक ठिय की उसमुयनसे वो पारे। वे सभी भावान् श्रीफगक जम वामा भगवता नियाणे परमास्मुस । और मनरुपा गन अपयश पगन कर रहे थे। उनक गायन्तधगृणन्तम बार समाणिजन्म च ।। ३ ।। भिनासे सारा आकाश भर-पा गपापा । वही भक्ति में सप पुष्परपाणि विमानावलि भिनभ । भगग्रन्पर पुगोधी पग पर रहम ॥१-३॥मायापय भगवान् श्रीगष्णन प्रभाजी और मान रिभूतिनाए पन्त सळराजन् भक्त्या परमया युवा ॥४॥ दस्पोका दमपर जाने अपार सम्पम भिन विरा भगमन पिनामहैशम्प पिस्तारात्मना विमः। भार फरक समान ने बंद कर पि ॥५॥गगना भीरिद सकप्पन और धरणमा मदनप अधर पापारमनिवारमान पचनयन्पमालयन् ।। और सरस प्योंक ति परम समाप अध्रय ६, नामाभिरामो बार्नु धारगाप्पानमगलम् । इसकि उन्होंन (पानिपाक समान ) अग्निनामम्मी पासपारगयाऽऽपप्पागमापामाविशयम्।।६।। पगारमग उमय उना महा समीर भान रमें गा॥६॥ ग समय स्म नतर धान दिति नभया ना पतु गुपनमयदान् । या रेशम पुरी दानादि ! मधमा निम्म अनि धायानु न यह ॥ ७॥ भगा साइम अस्मे स्प, में, 24, ॥

८९८ भीमद्भागवत [३. ३१ देषादयो प्रधमुस्मा ने विशन्तं स्वधामनि । कीर्ति और श्रीदेवी भी चली गया ॥ ७॥ मतान् श्रीकणकी गति मन और वाणीके परे है, तभी तो बस मान् अविशावगर्सि रुर्ण दप्पुमातिविमिताः ॥८॥ अपने घाममें प्रवेश करने लगे, तम प्रमादि देवत मे सौदीमन्या पधाऽऽकाशे मान्स्या हित्वाम्रममलम् । ॥ ८ ॥ असे बिजली मेषमाप्रमो मेकर का |उने न देख सके । इस घटनासे ठने नया ही क्लिप गतिर्न लावते मस्पैस्तथा फणस दैववै ॥९॥ पात,से ही बड़े-बड़े देवता भी भीकृष्णकी गति के सम्बन्ध थाफाशमें प्रवेश करती है,तब मनुष्य उसकी चाल नहीं देख अबरुद्रादयस्ते हुए मोगविं हरे। कुछ न जान सके॥९॥ नमानी वीर भगवान् शार मादि देवता भगवान्फी यह परमयोगम्पी गति देशभर में विस्मितास्त प्रसन्ता वसं लोक पपुस्तदा ॥१०॥ विस्मपके साथ उसकी प्रशंसा करते अपने-अपने कमें चले गये ॥ १०॥ राजन् परस्त्र वनुमूमननाप्पयेहा पीक्षित् ! जैसे मट भनेकों प्रकारक स्वॉग बनाता है, परम्तु यता उन सबसे निप, वैसे ही मगधन्का मायाविरम्मनमोहि पथा मटस्य । मनुष्यों के समान जम्म लेना, सीन्स करना और फिर उसे सारमनेदमनुविश्प विरस्प पान्ते संघरण कर लेना उनकी मायाका निम्मसम्पत्र है-अमिनय- मात्र है। ये स्वप ही इस जगत्की सुधि करके इसमें प्रवेश संहत्य चास्ममहिनोपरतः स पास्ते ॥११॥ परके विहार करते है और मस्तमें संहार-श्रय करके अपने अनन्त महिमामय स्वरूपमें ही स्मित हो जाते हैं ॥ ११ ॥ मस्पेन यो गुरुमुखं यमलोकनीत सान्दीपनि गुरुका पुत्र यमपुरी कम गया पा, परन्तु उसे रे मनुष्य शरीरके साय खोटा खये ! सुम्हारा ही शरीर सबसे त्वाचानपच्छरणदा परमासदग्धम् । का पुत्र प, परन्तु उन्होंने हमें बीवित कर गया। वास्तवमें उनकी शरणागतमरखता ऐसी ही है । और सो जिग्येऽन्समान्तकमपीशमसावनीश क्या करें, उनोंने कानों के महापाउ भगवान् शारको | भी गुदमें जीत रिया और अपत अपराधी अपने किम्बापने वरनयन्भृगपुंसदेहम् ॥१२॥ शरीरपर ही प्रहार करनेवाले भ्याधमने भी सदेव मा तथाप्यपम्पितिसम्भवाप्पय | भेज रिया । प्रिय परीक्षित् ! ऐसी सिप्तिम क्या ये अपने शरीरको सदाफ मिये यहाँ नहीं रख सम्पअपरप प्पनन्पहेतुर्पदशपतिएक ही रस सरते थे ॥१२॥पपरि भगमान् श्रीमण सम्पूर्ण जानकी स्थिति, उत्पत्ति और संहारक निरपे कारण है और सम्पूर्ण शक्तियों के परण करनाले १ सयापि उमोंने अपने नन्छत् प्रणतुं वपुरण शापित शरीरपोइस संसरम मचा रखनवीनही इससे उनाने यह विस्त्या विस मनुस्प-शारीरसे मुसक्या प्रयोजन है। मस्पेन किं म्यस्यगति प्रामयन् ॥१३॥ अम्मनिष्ठ पुरक लिये यही आकि वे शरीर रउनेसरी चयन करें ॥१३॥ जो पुरुष प्रात काम उमर भगयन् पएका प्रावधाप रुप्मस पदवी पराम् । भीमफपरमभामग्मान की इस परास एकामना और भकिन २ मोहानी। पति।

एकाइश स्कन्ध ८९९ अ०३१] प्रपत कीर्तयेद् भक्तपातामयामोत्पनुचमाम्॥१४॥ सत्य कीर्तन करेग, उसे भगधनका पही सर्वश्रेष्ठ परमपद प्राप्त होग्न ॥ १०॥ दारुका धारकामेस्प वसुदेवोग्रसेनयोः । श्वर दास्त भगान्धीकृष्णके पिरहसे भ्याकुर होकर द्वारका आया और यमुदेवजी तया उमसेनके घरणोपर पवित्वा चरणावस्न्यपिश्चात् कृष्णषिभ्युतः ॥१५॥ नर-मारकर उन्हें यामुषोंसे भिगोने लाठ ॥ १५ ॥ कृपयामास निधन वृष्णीना कत्लयो नृप । परीशित् ! उसने अपनेको समलकर यदुमशियोक क्लिाश- का पूरा-पूरा विमरण का मुनापा । उसे सुनकर छोग बहुत तमत्वोदिपडदया जना शोफविर्छिता ॥१६॥ ही दुखी हुए और मरे कके मष्ठित हो गपे ॥१६॥ सत्र म स्वरिता जग्मुः कम्माविश्लपविला। मगवान् श्रीकृष्णक वियोगसे बिल होकर वे लोग सिर | पीटसे हुए वहाँ तुरंत पहुँचे, जहाँ उनके भाई-बभु न्यसवा शेरते या घातयो मन्त आननम् ॥१७॥ | निप्प्राण होकर पर हुए पे ॥ १७ ॥ देवकी, रोहिणी देवकी राहिणी व वसुदेवस्तथा सुतौ । और यमुदेवजी अपने प्यारे पुत्र श्रीकृष्ण और क्यामको न ( देखकर शोककी पीरासे बेहोश हो गये ॥ १८॥ उन्होंने कृष्णरामावपश्पन्तः शोकार्मा विषाः स्मृतिम्॥१८॥ मावनिरासे न्याकुल होकर भी थाने प्राण छोड़ दिये। प्राणाय विजस्ता भगवद्विरहातुरा । सियोंने अपने अपने पसिके शव पहचानफर हेंयसे ख्ण लिया और उनके साप चिसापर बैठकर भस्म हो उपगुप पतींस्ताव पितामाहरुह लिया ६१९।। गीं ॥ १९ ॥ वरामजीकी पत्तियों उनके शरीरको, रामपस्न्पष वरसपगुपाधिमाविछन् । बसदेवनीकी पत्तियों टनक शवकर और भावान्की पुमधुएँ अपने पत्तियोंकी यशोंको लेकर अग्निमें प्रवेश पसुदवपल्यस्तद्गार्व प्रधुम्नादीनहरे स्तुपा । कर गयी । भगवान् श्रीकृष्णकी सस्मिणी धादि क्रानियाँ कृष्णपल्पोऽविशममि रुक्मिण्यापास्तदारिमका।२०) ठनक प्यानमें मम होकर अनिमें प्रविर हो गयीं ॥२०॥ अर्जुन: प्रयसः सख्युः कृष्णस्य निरातरः । परीभित ! अर्जुन अपने प्रिफ्तम और सवा मगमन श्रीकृष्णक थिइसे पहले तो अस्पन्त म्याकुल हो गये। सि आत्मानसान्त्वयामाम कामगोवैः सदुक्तिभि ॥२१॥ सोने मोके तोर मुटुपदेशोंका स्मरण करके अपने ना नएगाप्राणामर्जुन: माम्परायिकम् । मनको समय ॥२१॥ परंशक मृत व्यक्तियोंमें जिनका फोर रिण दनाय न पा, उनका श्राद अभुनने क्रमश हताना कारयामाम पधापदनुपूर्वर ॥२२॥ विधिक करमापा ॥ २२ ॥ महारान ! भगान्क न शारदरिणात्यको समुद्राऽप्ठारपधणान् । रानर समुद्रन एसम्पन भगवान् श्रीगरा नियस म्मान प्राकर कही भगमें सारी शरया एलादी॥२३॥ पजयित्वा मागत धामद्भगवदाम्पम् ।।२।। भगवान् भीमग यहा अब में सम-सा नियास करत निस्य सनिहितम्तय भगवान् ममदनः । है। समन म्ममात्र दीसार नाोग नाश पानग्य और सन्ननगैका भी मन बनाना स्मृत्या पाशुभारं सर्वमलमलम् ॥२॥ ॥२२॥ धियानाशिद 'सिगनफ अनन्तर मी मुची गोगनपदनादाय पान पनजय । Pणे, परों श्रीदोग स्मर अनुन इन्दप्रस्प भाप । मा। २ तारे | मत | भीमद्रामवत इन्द्रप्रस्थ समाधेश्य पर्ज साम्पपेपयत् ॥२५॥ | वहाँ समको यपम्पोम्य क्साकर बनिसबके पुत्र काका राज्याभिषेक कर दिया ॥ २५ ॥ राजन् ! तुम्हारे दारा शुस्या सुरसघं राजमर्जुनाचे पितामः । युधिमिर आदि पाण्डमोंको अर्जुनसे ही यह बात मामाई कि यदुवंशियोका संहार हो गया है। सब सोने करने स्वा तु पंधरं कस्वा मग्मुः सर्वे महापधम् ॥२६॥ | वंशधर तुम्हें राज्यपदपर अमिषित करके हिमाळपकी पएसद् देवदेवस विष्णोः फर्माणि अन्म च । वीरयात्रा की॥२६॥ मैने तुम्हें देवताओंके भी पाराणा मवान् श्रीकृष्णकी बनाछीमा पार कर्मी मनापी । कीर्तयेन्ठ्या मत्यः सर्वपापैः प्रायवे ॥२७ यो मनुष्य प्रमाके साथ इसका कीर्तन करता है, समस्त पापोंसे मुक हो जाता है।॥ २७ ॥ परीक्षिस् ! जो मनुत्प इत्थं परमंगवतो रुचिरावतार इस प्रकार भक्कमपहारी निशिक सौन्दर्यमाधुर्यनिधि श्रीकण चन्द्र के अबतार-सम्बन्धी रुचिर पराक्रम वीर इस वीर्यामिपालचरिवानि च सतमानि। श्रीमबागवत महापुराणमें तथा दूसरे पुतोंमें गर्मित अन्यत्र चेह घ भुसानि गुमन् मनुप्पो परम्पनन्दमपी कालीख, कैशोरलीय बादिका संकीर्तन करता है, परमहस मुनीत्रोंके अन्तिम प्राप्सम्य भीमपके भक्ति पर परमासगतो समेत ॥२८॥ भरोमें परामक्ति प्राप्त करता है ॥२८॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पैपसिश्यामदासासपो परमाहस्या संहितापामेकादशस्कृत्ये एकत्रिंशोऽध्याय ॥३१॥ ॥ इस्पेकादशः स्कन्धा समाप्तः ॥ हरितसत् ।।

पीरापामाम्यो ममा श्रीमद्भागवतमहापुराणम् सगुणो निर्गुणो भावः भून्पान्यात्मकस्तथा । लीलाविलासो यस्मैव त चन्द भालपत्सपम् ।।

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मार्कण्मयपर शारजीकी कृपा भगवान गदर भीपापतीनी नपा भपत गणोंक माप पधार । [T ५ ॐनमो मायवे मामदेवाय श्रीमद्भागवतमहापुराणम् बादशः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्याय कलियुग राजवर्णका वर्णन राजा परीसितमे पूण-मगवन् ! यदुवंशशिरोमणि स्वधामानुगते रुप्मे बर्षपविभूपमे । मगवान् श्रीकृष्ण अब अपने परमपम पधार गये, तम पृथ्वीपर किस वंशका राम्प मा ! तप कब किसका फस शोऽभषव प्रख्यामेवदापाव मे मने ॥ १॥ राज्य होगा ! वापस्या करके मुसे यह मतमाये ॥ १ ॥ मीझुक उपाय भीशुकदेवीने कहा-प्रिय परीक्षित् ! मैने में योऽन्स्पापुरञ्जयोनाम भाष्योपाईद्रयो नृपः । नर्वे स्फपमें यह बात स्तापी थी कि परासंपके पिता यूहरपके वशमें मन्तिम राना होगा पुरमय भपषा वस्लामात्मस्तु भनफोहतास्वामिनमास्मबम् ॥२॥ रिपुचय । उसके मन्त्रीका नाम होग पुनक । कह पपने प्रयोवसन राजाने का यत् पालकः सुतः । स्वामीको मार गलेगा धौर अपने पुत्र प्रयोतको राज- सिंहासनपर अमिपिक करेग्न । प्रपोसफा पुत्र रोग मिशासपस्वस्पुत्रो भविता राजकस्ततः ॥३॥ पाठकपाकका विशास्यूप, विशस्यपका रानक पौर नन्दिवर्धनस्तापुत्रः पत्र प्रपोतना इमे । राक्कका पुत्र होगा नन्दिवन । प्रपोसवंश यही पाँच मरपति होंगे । इनकी सा होगी 'प्रपोतना ये एफ मएत्रिशोचरत भाल्पन्ति प्रथिनी नूपा ॥ ४ ॥ सौ बातीस वर्षतक पृथीका उपभोग करेंगे ।। २-१ ॥ शिशुनागस्ततो भाल्पा काकवर्णस्तु वत्सुतः । इसके पचत् शिशुनाग नामका रामा होग। शिशुनागका करकवर्ण, उसका समधर्मा पौर क्षेमधर्माका क्षेमधमा सरस सुत क्षेत्रमा क्षेमधर्ममः ॥ ५॥ पुत्र होगा क्षेत्र॥ ५॥ धेश्यामा मिधिस्तर, उसावनात विधिमाः सुतम्तयाजातशत्रुर्मषिष्यति । श, फिर दर्भक धौर दर्भकका पुत्र अनय होगा ||६|| दमकलस्सुनो मायी वर्मकस्पायः स्मृतः॥ ६॥ मनपसे नन्दिवईन और उससे महामन्दिका बम्म होगा । नन्दिवर्धन पायो महानन्दि सुवस्वतः । शिशुनाग-वंशमें ये दस राज होंगे। ये सब मिलकर शिशुनागा दशैवते पटथुपरमतत्रयम् ॥ ७॥ जिंप परीक्षित् । महामन्दिकी शूझा पनीके गर्भसे मन्द कलियुगमे तीन सौ साठ पर्वतक पृथ्वीपर राज्य करेंगे। समा भोल्पन्ति पृथिवीं गयेष्ठ कलौ नृपाः । नामका पुत्र शेन । बा स्वान् होगा । म्हानन्दि महानन्दिसुतो राजन् दीगोंदवो पली ॥ ८॥ पापमा नामक निधिका अधिपति होगा । इसीलिये बेग महापापतिः फरिमन्दः अविनाशत् । उसे महापप भी रहेगे। वह क्षत्रिय रायोंके विनाश- १.२ भाम्पो।। समस्त । ४ दिसतातु:1५ मोम । वागमे ।

भीमग्रामवत [.१ ९०४ । ततो नृपा भविष्यन्ति शूद्रप्रामास्त्वधार्मिका ॥९॥ | का कारण बनेन । तमीसे राजादोग प्राय शूद्र और अधार्मिक हो जायेंगे ॥ ७-९॥ स एकछत्र थिवीमनुलहितासनः । महाफम पृथ्वीका एकल शासक होगा । उसके पासिम्पवि महापमा द्वितीय इव भार्गवः ॥१०॥ शासनका उल्लान कोई भी नहीं कर सकेगा । क्षत्रियों के तस्प चाप्टौ भविप्पन्ति सुमारपप्रमुखाः सुताः। विनाशमें हेतु होनेकी छिसे तो उसे दूसरा परशुराम ही य इमां भोक्ष्यन्ति मही राजानःम शतंसमाः॥११॥ समझना चाहिये ॥ १० ॥ उसके पुमान्य अदि बाल पुत्र होंगे। वे सभी राचा होंगे और सौ तक इस नष नन्दान् विना कषित् प्रपमा दरिम्पति । पृथ्वीका उपभोग करेंगे ॥ ११ ॥ कौटम्प, बरस्पायन वेपामभाषे जगतीं मौर्या माल्पन्ति पै फलौ ॥१२॥ । तपा चाणक्यके नामसे प्रसिद्ध एक सण विवक्रिमात स एष चन्द्रगुप्त वे दिजो रान्येऽभिपेक्ष्यति । नन्द धौर उनके समाल्य बादि पाठ पुत्रों का नाश कर वत्सुता पारिसारस्तु ततभाशोवर्धनः ॥१३॥ नरपति पृथ्वीका राज्य करेंगे ॥ १२ ॥ यही प्रमण पहले | रामा । उनका नाश हो सानेपर कटियुगमें मौर्यवी सुयशा भविता तस्स सङ्ग : सुपशः सुतः । पहल चन्द्रगुप्त मौर्यको रानाके पदपर अभिवित करेगा । शालिमस्ततस्तस्य सोमधर्मा भविष्यति ॥१४॥ | वर्धन ॥ १३ ॥ अशोकनका पुत्र होगा सुयश । उपर- पन्द्रगुप्तका पुत्र होगा वारिसार और मारिसारका शोक शसधन्वा सेवस्तस्स भषिता व पाद्रथः । का सहत, सातका शारिशूफ धौर शमिशक्का मौर्या मेते दन नृपाः सप्तत्रिंचष्लमोचरम् ॥१५॥ पुत्र वृहप होगा । कुश्वंशत्रिमूषण परीक्षित् । सोम्शर्मा ॥ ११॥ सोमशर्माका शतपन्या और शतना- समा भोल्पन्ति प्रथिवीं कलौ फुरुकलोवह । मार्यवंशके ये दस, नरपति कलियुगमें एक सौ सैतीस हत्या पाद्रथ मौर्य तस सेनापतिः कालो। पतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। वृहद्रपका सेनापति होगा पुष्पमित्र शुज । वह अपने स्वामीको मारकर सर्प पुप्पमित्रस्तु शहाहा स्वयं राज्यं करिम्पति । राजा बन बैठेगा । पुष्पमित्रका अमिमित्र और अग्नि- अप्रिमियस्ततम्तसात् सुज्येष्ठोऽध भविष्यति ॥१६॥ मित्रका सुज्येप होगा ।। १५ १६ ॥ मज्येष्ठका मुमित्र, वसुमित्रा भद्रफप पुलिन्दा भविता तत । यमुमिप्रका मचक और भद्रका पुझिद, पुलिएका ततो पाप तुतस्तमा वनमित्रो भविप्पति ॥१७॥ भाग और भागवतका पुत्र होन्म घेन मूति । घोप और घोषका पुत्र होग वामित्र ॥ १७॥ पर सता भागवतम्तमात् देवमूर्तिरिति ध्रुनः । शके ये दस मरपति एक सौ पाहतक पृष्पीका शुभा दरात भापन्ति भूमि वर्पशवाधिकम् ॥१८॥ पान करेंगे ॥ १८ ॥ तत कपानिय भूमिर्यास्त स्पल्पगुणान् नृप । परीभित् ! श्री मरपतियोंका राज्यमा समस हानेपर या पृथ्वी कम्यवंशी नरपतियों के हापमें भी गुम हस्खा दवभूति कण्वाऽमास्यस्तु फामिनम्।।१९॥ भाकमा गुणवाले होंगे। पुनशा वन्तिम नरपति | जायगी । काशी नरपति अपने पूर्वी राजाओंकी स्वयं फरिप्पते राज्यं वमुदेवा महामतिः । देवभूमि यहा ही सम्म होगा । उसे उसर श्री पालवंशी बमुदव र गरगा और अपने मुदिबउसे वस्य पुषस्तु भूमित्रस्तरस नारायणः सुतः । म्पये राज्य करेग्न । मसुदेवका पुत्र होगा भूमित्र, भूमिका १ समापि यमुना । २ मुतु ।। उप मस्तिा वा INA मुमा ।५ महीपतिः । ६ बताना । मोपी सफा पान्द्रगुम मिभर मोदी हानी है। विष्णुपुरापारिमें गुससे पोर पारस नामक एक भीर मोपेरंगी पमप्र मनत मिस्वार मन पहा दम सम्मा समहनी पासि । .

द्वादश स्कन्ध ९०५ बारायणम भविता मुशमो नाम विश्वतः ॥२०॥ | नारायण और नाययणका शर्मा । सशर्मा का यशस्सी रेग्य || १९२० ॥काशके ये धार नरपति कामायना इमे भूमि चत्वारिंशष पाच । कामायन कार्यगे और कलिमुगमें तीन सौ पैंतालीस अतानि प्रीणि भोपन्तिवाणा पकलीयुगे।।२१॥ वर्षतफ पृषीका उपभोग करेंगे ॥ २१ ॥ प्रिय परीक्षित् ! पर्वशी शर्माका एक शूद्र सेवक होग-पड़ी। दवा काण्व सुन्नर्माण मृत्यो पलो पली। पन्ध्रनाप्तिका एक पहा दुष्प होगा । बसुशर्माको म्बर गांभोमत्पध्रजातीय संचित् कालमसचम ।२२।। कर कुछ समयसक स्मय पृष्पीका राज्य करेगा ॥ २२ ॥ रुप्मनामाप समाता मविता प्रथिवीपतिः । इसके बाद उसका माइ पण राना होगा । हम्णका पुत्र श्रीशान्तकरण और उसका पोणम्पस गा ॥२३॥ भीमान्सफर्मस्तत्पुत्रा पौर्णमासस्तु तत्सुवः ॥२३॥ पौर्णमासका लम्बोदर घोर लम्बादरका पुत्र वितिलक लम्बोदरस्तु वस्पुत्रस्तस्मादिमिलका नृपः । होगा । विविठयमा मेघस्माति, मेस्त्रासिका क्टमान, मेपस्वातिमिपिलकावटमानस्तु तस्य च ॥२४॥ षटम्पमी बनिष्टकर्मा, बनिष्फर्माका हालेय, हाळ्या सम्म, तमसा पुरीपभीर धौर पुरीपभीरमा पुत्र होगा भनिष्टफमा हालेपस्तलकस्तर पात्मजः। यना मनन्दम ॥ २१२५ ॥ पीक्षित् । सुनन्दनकर पुरीपमीहस्तस्पुत्रस्ततो राजा सुनन्दनः ॥२५॥ | पुत्र होगा चकोर, चकोरके पाठ पुत्र होंगे, जो सभी कारो पालो पत्र शिवस्वातिररिंदमः । एकात्मगे। इनमें सबसे अटेका नाम होगा शिवखाति। यह वा बीर होगा और शत्रुओंका दमन करेग शिवखाति- तस्मापि गोमवीपुत्रा पुरीमान् भविता ततः ॥२६॥ या गोमटीपुत्र सौर उसका पुत्र होगा पुरीमान् ॥ २६ ॥ मेदःशिरा शिवस्कन्दो यशश्रीस्वस्सुवस्ततः । पुरीमान्का मेहरा, मेद शिराफा शिस्करद, nि- विजयस्वस्सुखो भाष्यचन्द्रधिः सलोमभिः ॥२७॥ पदका यहथी, याश्री विनय वौर विजपके दो पुत्र हो-पन्द्रधि मोर येमधि ॥ २७ ॥ परीक्षित ! य एते त्रिभन्नुपतयमस्वार्पदशवानि च। तीस राना पार सौ छप्पन सक पृथीका राज्य पट्पशासप प्रथिवी भोक्ष्यन्ति मनन्दन ।।२८॥ मग ॥ २८ ॥ सप्ताभीरा आवमृस्पा दस गर्दभिनो नपाः । पीभित । इसके पचात् सामूति-नगरीके सात कायापार भूपाला भषिप्यन्त्यतिलोलुपा ॥२९॥ बाभीर, दस गर्दभी धार सोया का पुपमा गम्य तवाऽष्टौ यवना भाम्पामतर्दश तुरुप्ककाः । फरेंगे। ये सब-क सब का येमी होंगे ॥ २९ ॥ इनक भूया दस गुरुणाय मौना एकादशंष तु ॥३०॥ बाद बाळ यान और चौदा सर्फ राम्य करेंगे । इसके एत भाश्यन्ति पृथिवी दसवर्षशतानि च । याद दस गुरुग्ण और म्यारह मौन नरपति होंगे ॥३०॥ मानोंक अतिरिक्त ये रूप एक हमार मिम्पानमे बतफ नवाधिका पनमति मौना एकादश घितिम् ॥३१॥ पृप्वीका उपभाग करेंगे । तया ग्यारह मान नरपति तीन भाक्ष्यन्त्यम्दवान्पात्रीणिते सम्पिदे सक। सौ बपतक पूतीया रासन करेंगे । बन ठनफा राम्प किलिकिलायो नपत पा भूतनन्दाध्ययनिरि ॥३२॥ ) का समाप्त हो जायगा, ता किनिविष्य नामकी नग्नी में शिशुर्नन्दिय वधाता यशोनन्दिा प्रबीररु । भूतनन्द नाममा रामा हग । भूतनन्दका कहिरि, इत्येत रे पपशत भपिम्पन्त्यषिकानि पट ॥३॥ पहिरिफा भाई शिभुनन्दि नया पशानन्दि और प्रवीरम- १ भविष्यस्पस्नीवति ।२ दिसा ।। य मन्५ प्रवक। 1 ९०६ भीमकामात तेपी प्रयोदश मुसा भषिवारष पाहिकाः । | ये एक सौ छ पर्पतक सम्म करेंगे ॥३१-३॥ इनके तेर पुत्र होंगे वीर वे सबके सब बहिक मामयेगे । पुप्पमित्रोऽय राजन्यो दुर्मियोऽस्स सथैव च ॥३४॥ उनके पश्चात् फुपमित्र नामक पत्रिप और उसके पुत्र दुर्मिका राज्य होगा ॥ ३५ ॥ परीक्षित ! माधिकारी एककाला इमे भूपाः समान्ध्राः सप्तकोससा।। नरपति एक साप विभिन्न प्रदेशमि राज्य करेंगे। उनमें सात क्न्ध्र देशके तप सात 0 कोसम्देशक विदूरपतयो भाम्पा निपपास्तत एव हि ॥३५॥ | निषध देशके स्वामी होंगे ॥ ३५ ॥ वधिपति होंगे, कु बिदर भूमिके शसक और कुछ मागपाना सु भपिता विपस्मृतिः पुरजया। इनके गद माघ देशका राजा होगा विसर्वि। परेक मुलपके वतिरिक वित्तीय पुरवयालयेगा। फरिप्पस्पपरो धर्मान् पुलिन्दपदुमद्रमान् ॥३६॥ हामणादि ठन्न वर्गों को पुहिद, यद् और मन बादि प्रयामामयभूपिठा। स्थापयिप्पति दुर्मतिः । म्झेन्छयाप जातियों के सपने परिणत कर देगा ॥ ३५ ॥ इसकी मुनि इतनी दुध होगी कि यह मामल, अत्रिय पीर्यवान् पत्रमुत्साप पपमस्या सबै परि । और कश्यों का नाश करके शवपाप जनताकी रक्षा करेगा। पने मम्मीसे सत्रियों को उमर देग कोर परासी मनुमङ्गामाप्रयागं गुप्तां मोल्पति मेदिनीम् ॥३०॥ पुगेका राजधानी बनाकर हरिद्वार से लेकर प्रयागपर्यन्त मुरक्षिस पृमीका राम्य करेग ॥ ३७॥ पीधित् । सौराष्ट्रापन्स्पामीराम पूरा अर्बुदमासवाः । पों पों धार फरियुग माता जायगा स्पों में सौगा, प्रात्या विजाभविप्पन्ति शूद्रप्राया धनाधिपा॥३८॥ वती, मामीर, शूर, हुंद और माम्य देशके पासण- गण मस्कारणम्य हो जाएँगे तपा राबाग मी शूकम्प सिन्धोस्तट चन्द्रमामा फौन्तीकाश्मीरमप्पलम् । हो नायगे ॥ ३८॥ सिमुतट, कबभागका टप प्रदेश, कोन्तीपुरी धौर कामीरमार प्राय होकर, भोत्पन्ति शुद्रा बास्पापाम्लेच्छापामपपर्चस ॥३९संस्कार एवं प्रमोबसे हीन नाममात्र के विका और म्मेका राप होग॥ ३९ ॥ सुल्पकालाइमे राजन् म्लेच्छपायाम ममृतः। परीक्षित ये सबके सब रामा वाधार-विचारमें म्से उपाय होंगे। ये सब एक ही समय मिल-मित्र प्रातमें राज्य करेंगे । ये समसब परले सिरेके एठे पसेऽधर्मानुतपरा फरगुदास्तीवमन्यवः ॥४०॥ मार्मिक और साप दान करनेवाले होंगे । कोटी कोटी मातोंको लेकर ही ये प्रेके मरे पगमसूम जाया सीवालगादिवसाप करेंगे॥१०॥ ये हुए मेग बी, पों, ओं, मापनको परदारधनारताः। मारनेमें मी नहीं दी । सरेपी भी और पन हपिया लेने के लिये ये सर्पदा ठसक रहेंगे । म तो इनमें उरितास्वमितप्राया अससत्ताल्पामः ॥४१॥ देर योगी वौर म तो पटते ।क्षणमे तो आपमे इनकी शकिबोर बायु पोतरी होगी॥११॥इनमें परम्परम भसंरुवा क्रियाहीनारपसारमसावा संस्कार नहीं होंगे । पेमपने कर्तव्य कर्मका पान १ पुष्पनिले । २ नेप ।। विसर्भिवपु ।

द्वादश स्कन्ध ९०७ समास्ते भवयिप्पन्ति म्लेप्छाराज परूपिण ॥४२॥ नहीं करेंगे । रजोगुण और तमोगुणसे अघे बने रहेंगे। राजाके वेपमें म्लेश ही होंगे। वे ट्र-पसाटकर अपनी प्रजाका खून चूसेंगे ॥१२॥ जब ऐसे लोगोंगा तुमाधास्ते जनपदालच्छीलाचारवादिनः । शान होग, तो देशकी प्रनाम भी पैसे ही समान आचरण और मापणकी वृद्धि हो जायगी । राजारोग तो उनका शोषण करेंगे ही, वे आपसमें भी एक दूसरेको उत्पीरित करेंगे और अन्तत सर-के-सब नर हो अन्पोन्पतोराजभिय क्षययास्यन्ति पीरिता॥४३॥ जायेंगे ॥ १३ ॥ इति श्रीमदम्पगस्त महापुराणे पारमात्वं सहितायां वादशस्काधे प्रपमोऽप्याय ॥१॥ अथ द्वितीयोऽध्याय ग्युिगके धर्म भी गुम्देयमी कहते है-परीधित् ! समय बड़ा भीमुक उपाय कान् है, मों ज्यों घोर करियुग माता जागा, पोपों उधरोवर धर्म, सम्प, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, पर समानुदिन पम सत्यं शीर्ष धमा दया । और स्मरणशक्तिया यप होता जागा ॥१॥ फकि | युगमें निस्के प्रस धन इंग, उसीकर लोग पुटीन, शासन मतिना रामन् नहपत्यापुठं स्मृति ॥ सदाचारी बोर सद्गुणी म्पर्नेगे । जिसके बाप शक्ति होगी मही पम और न्यापपरी परस्मा अपने अनुउ करा सकता ॥ २॥ विग्रह-सम्पफ स्पेि फुल-क- विचमस की नूगा उन्मापारगुणादयः । पोम्पता आरिकी पर-निरस्त नही रहेगी, पुरस्टयुम्नीकी पारस्परिक हरिसे ही समय हो जायगा। न्याहारी निपुग्ता सपाई और इम्पनगरीमें नहीं गगी जा धमेन्यापम्पवम्यापो कारण पतमद रि॥|| जितना भ्याट कर सघा, पइ उतना ही न्याहार पुराउ माना गायन । श्री और पुरुषरी अम्परा अधर उनाशी संपम न हार पर गाय दाम्मापऽभिपिातमोयर म्याहारिफ । ही रहा। ममी समान उस गुग-मभासे नहीं पहानसे अपरेसी ॥ ३ ॥श, "-मानव गौरव पुम्द परिप्ररय समरहि॥३॥ आग्मिती समयारी, संन्यासी बा आश्रतिशत पान और परमरेस शिदिर पर ना हो म मर आम नामसार हागा तिङ्गामाम्यातान्पिा पापनि घरपम् । म न च न कम गर्म भमुना ग, पे ९०८ भीमद्रामात प्रामान्यापदोस्प पापित्ये चापलं वचः॥४॥ मदानोंसे ठीय ठीक न्याय न मिल सकेटा । जो चालमें नितना घाट्यक होग, उसे उतना ही बम बनायतैवासाघुरपे साधुत्य दम्भ एव तु । पमित मना जायग ॥१॥ असाघुताफी-गोरी होनेकी एफ ही पहचान रहेगी--गरीब होना । जो चितना अधिक दम्भ-पासप कर सकेगा, उसे उतन्य स्वीकार एव घोराहे स्नानमव प्रसाधनम् ॥ ५॥ ही वा साघु समझा जायगा । विवाह के म्येि एक-दूसरेकी स्वीकृति ही पर्याप्त होगी, शास्त्रीय विधि-विधानकी- रे वार्ययन तीर्थ लापम्प केलधारणम् । संस्कार दिकी कोई बावश्यकता न समझी नापगी । बाल वादि संभारकर कर-सत्तेसे लैस हो जाना ही स्नान समझा जायगा ॥५॥ अग दूरके तालको वीर्य उदरम्भरता स्वार्थः सस्पस्थे पार्टपमेष हि॥६॥ मानेंगे और निकटके ती गामाप्रेती, माता पिता धादिकी उपेक्षा करेंगे। सिरपर बड़-यो मास---काकुल रखना ही शारीरिक सौन्दर्यका चिह समझा गया राय कुटुम्पभरण यशोऽर्थे धर्मसेवनम् । पौर मीनका सबसे या पुरुष्यप होगा--अपना फेट भर लेना । जो स्तिनी मिठाईसे बात कर सकेगा, उसे एवं प्रमाभिटामिराकीले बितिमरले ॥ ७॥ उतना ही सच्चा सममा नायगा ॥१॥ योन्पता-अतुराईका सबसे बड़ा क्षण यह होगा कि मनुष्य अपने कुटुम्पका पसन कर । धर्मका सेक्म यशक हिये किया बापण। प्रमविदकत्रवद्रामा यो पली भविता नृपः। इस प्रकार यव सारी पृथ्वीपर दुका बोम्माम हो | बापग, तब रागा होनेका कोई नियम न रोग, मामा, प्रवा हि लुम्मै रामन्पैनिनैर्दस्पधर्मभिः ॥८॥ | त्रिय, वैश्य वपना शूमि बो की होग, ही राज्य यम बैठेग्न। उस समपके नीच राव नपस्त निर्दप एवं न गे, प्रेमी तो इतने होंगे कि उनमें और आच्छिमदारद्रविणायास्यन्ति गिरिफाननम् । छटेरोम कोई मन्तर न किपा न सकेगा । वे प्रमाकी पूनी एवं पत्नियोतक्तो मेन गे । नसे गरकर प्रय | पहाड़ों और अंगों में भाग मापी । उस समय प्रया शाफम्लामिपक्षौद्रफलपुष्पाटिभोजनाः ॥९॥ ता-सरहके शाक, कादम्प, मांस, मधु, फल-मन और नीम गुठळी बादि स-साकर पानाफे मरेगी ॥७-२॥ अनाचा पिनयन्ति दुर्मिधारपीरिसा। कमी का न होगी-सूख पर जायगा तो कभी कर | पर-फर स्माये जायेंगे । कभी काफेकी सर्दी पड़ेगी तो फमी पाच्य पड़ा, कभी भाँधी घरगी, कमी गरमी शीववावातपमामैिरन्पोन्मतः प्रवाः ॥१०॥ पड़गी, तो कभी वाद या चापगी । इन उपसे तपा वापसके संपर्व से प्रना अत्यन्त पीपित होगी, मय हो पणी ॥ १० ॥ स्प्रेग मुस-प्यास तम नाना प्रकाफी सुम्पा म्पाधिभिव संसप्स्यन्ते च चिन्तया | चिन्तासि टुम्पी रहेंगे। रोगोंसे तो उन्हें छुटमास की ।

द्वादश्च कध २०२] विसर्विशतिवर्षाणि परमायुः फलौ नृणाम् ॥११॥ | न मिला । फरियुगमें मनुष्योंकी परमायु कम्ल वीस या तीस वर्षकी रागी ।। ११ ॥ धीपमाप्पेषु दोष दहिना कलिदोपतः । परीशित् । कतिलक दोपसे प्राणियों के शरीर होटे-टे, क्षीग और रोगप्रस्त होने व्यगे । पर्ण और बाधम धर्म क्तस्यनेवाथ्य वेदमाग नध्याय हो वभिमवतां धर्म नष्टे वेदपये नृणाम् ॥१२॥ जापान ॥१२॥ धर्ममें पापडकी प्रधानता हो जायगी । राज महाराजे गम्-लुटेरोंके समान हो जायेंगे । मनुष्य पाखण्डपत्रे धर्मे दस्युप्रायेपु राजसु । चोरी, छठ तपा निरपराध हिंसा अदि माना प्रकारक कुमोसे जीविका चयने लोगे ॥१३॥ चारों वर्गोके घौपानृतपयाहिंसानानाधिपु रे नृषु ॥१३॥ लोग शदोंके समान हो जायेंगे। गाएँ मकरियोंकी तरह छोटी-बेटी और कम दूध देनेवारी हो जायगी । पानप्रस्थी और संन्यासी पारिरिक धाश्रमवाल भी घर-गृहस्पी शुद्धप्रायेषु वर्णेपुन्छागमायास पेनुप । सुटकर गृहोपा-सा व्यापार करने योगे। जिनसे वैग्रहिक सम्बन्ध है, उहीको अपना सम्बधी माना गामापे प्वाश्रमेषु यौनप्रायेषु पघुपु ॥१४॥ | नायगा ॥ १४ ॥ धान, जौ, गर्दै यदि धायोंके पादे टे-टे हाने होंगे। म अधिफोश शमीक समान भेटे और फैटीले वृष ही रह गयगे । बादमें विनध्ये अणुप्रापास्त्रोपपीपु शमीप्रायेपु सास्लुपु । तो बहुत धमकगी, परन्तु वर्षा फम होगी । गृहस्पोंके घर पतिपि-सकार या वेदप्पनिसे रहित हानके कारण विपस्पायेषु मेषेषु उपप्रायेषु सम्म ॥१५॥ अपवा बनसल्या घट जानक कारण सूने सून हो जायेंगे ।। १५॥ परीशिव ! अधिक स्या करें--कछि पुगर भत हात-सासे मनुपर्पोया स्वभाव ग| जैसा इत्थ कली गतप्राये बने तु सरपर्मिणि । द सह यन जायगा, लोग प्राय गृहसीरा मार लानेवाल और विषयी हा अपंगे। एसी सिनिमें धर्मफी रक्षा पर्मत्राणाय मावेन भगवानवतरिम्पति ॥१६॥ करनेक ठिये सत्त्वगुण स्वीर परफ स्वर्प भगान् अनार प्राण करेंगे ॥ १६ ॥ परापरगुरापिणारीपरस्सासितारमनः प्रिप परीक्षित् ' सम्पर भगवान् विष्णु सत्र सकिनन् ? 14 सपसमा हानर ना पगघर जग्दक धमपामाय माना वम रूमापनुनय ॥२७॥ मी शामि, उना स्तमा प्रयन कारमा रहें मुम्न गिफ-सद्गुरु । य माधु--मम पुरुषों जन्म-मृत्युक पम्मे साना र अपार प्रदा रत उम्मनग्राममुम्पस नामपरामदारमनः। है ॥10॥ उन रिनों शम्मरमाने यि नमः पर घमाग । उनरा एप या या भरन विष्णुपमा रत्ति प्रादुमरिणति ॥१८॥ भागविगतका । उन्दी पर पानामगर ९१२ भीमद्भागवत देवापिः तनोता मरुश्षेत्वाकर्षशन । भीमपितामहके पिता राजा शमनुके भाई देवपि और सस्थाकुशी मा इस समय फलपमें लित है। कलापग्राम आसाते महायोगपलान्विती ॥३७॥ बहुत बड़े योगलसे युक्त है।। ३७ ।। कलियुगके वात- में कत्किमगवान्झी बाबासे वे फिर यहाँ बायेंगे और गाविौत्य कलेरन्ते वासुदेवानुधिक्षिती। पहलेकी भौति ही वर्णाश्रमर्मका विस्तार करेंगे ॥ ३८ ॥ वर्णाममयुतं धर्म पूर्षवत् प्रपयिप्पतः ॥३८॥ है, ये पूर्वोक्त क्रमके अनुसार अपने अपने समपर्मे पुष्पीके सस्फ्युग, त्रेता, वापर धीर फरिपुग-ये ही चार मुम | प्राणियोंपर वफ्ना प्रभाव दिखते राते॥ ३९ ॥ प्रेता शापरं च फलिश्चेति चतुर्युगम् । पीक्षित् ! मैने तुमसे जिन राबावोंका वर्मन किया है, अनेन फ्रमयोगेन सवि प्राणिपु वर्तते ॥३९॥ | मी मी करते रहे, परन्तु यसमें मरकर घुम्ने कि वे सब और उनके अतिरिक्त दूसरे राजा भी इस पृषीको राजन्नेत मया प्रोक्का नरदयास्तथापरे। गये ।। १० ॥ इस शरीरको मसे ही कोई राजा का परन्तु मतमें यह कीमा, रिघ अपवा रास्के रूपमें ही भूमौ ममस्वं कस्वान्ते हित्येमा निधनं गताः॥४०॥ परिणत होगा, रास ही रोकर रहेगा। इसी शरीरके य इसके सम्बन्चिोक म्येि जो किसी भी प्राणीको सतात समिनिर्भमसंधान्ते राजनाम्नोऽपि यस प। है, इन तो अपना साईनाना है और न हो पर मार्च । क्योकि प्राणियोंको सताना तो नरफका र मुसहर तत्कवे स्वार्थ किं घेद निरयो यतः ॥४१॥ ॥ ११॥ ये ख्येग यही सोचा करते हैं कि मेरे दावा परदादा इस असम मका शासन करते थे। क सेयमलगा : पूर्व में पुरुपैता। मय या मेरे अधीन किस प्रकार रह धौर मेरे बाद मेरे बेटे-पोते, मेरे पशम किस प्रकार इसका उपभेग मत्पुत्रस्य व पात्रस मत्सूवा पंजस्य वा ॥४२॥ करें ॥ १२ ॥ वे मूल इस आग, पानी और मिशीके शरीरको अपना नापा मान बह और न अभिमान वेवानन्नमय काप गृहीस्वाऽऽस्मतयानुधा । के साप गंग हॉकते है कि यह पृषी मेरी है । क्त्तमें मही ममतया चाभी हित्वा तेऽदर्शनं गता ॥४३॥ हो जाता है॥३॥ प्रिय पशिद ! ओज नरपनि में शरीर बार पप्पी दोनोंको पार सपही भाश्य व उत्साह और मम्मीदपसे इस पीक अभाग ५ य भूपतयाराधन सअन्ति सुवमाजसा । स्टगे रहे, उन सबको काम्ने अम्ने विमाउ पग्में पर गण । वप यात्राउ इतिहासमें उनकी कहानी हीर उनवे कवाः सर्वे कथामात्राः फथामु च ॥५४॥ रह गपी है ॥ ११ ॥ पति धीमद्भागरते महागगे पारम्हस्व सहिताया गया रितीपाऽप्याप ॥२॥ ११मामि ।

म०३] बादश स्कन्ध पम्पा अथ तृतीयोऽध्याय युगधर्म मौर कनियुगके दोपोंक्षे वयमेका उपाय-बामणीर्वन मीफ सपात्र भीशुकदेवजी कहते-पीक्षित् 1 जन पुप्पी देखती है कि रामाोग मुमपर विजय प्राप्त करने के लिये उत्प्रकले हो रहे है, तव यहांसने लगती है और कहती प्रष्ट्राऽऽत्मनि चये'ध्यमान् नृपान्हसति मरियम्। तिने आश्चर्षकी बात है कि ये सुनायेग, जो म्बय मौतके सिलीने है, मुझे जीतना चाहते हैं॥१॥ होमा पिबिगीपन्ति मृत्योः फ्रीग्नका नृपा।। १।। राजाओंसे यह बात छिपी नहीं है कि वे एक-न-एक दिन मर जायेंगे, फिर भी ये व्यर्धमें ही मुसे जीतनेवी कामना करते हैं । सचमुच इस कामनासे अंधे होने के काम एप नरेन्द्राणी माघः स्याद् विदुपामपि । कारण ही वे पानीके सुल्झुलेके समान क्षणभर शरीरपर विचास कर बैठते है और धोख सतत् ॥२॥ पेन फेनापमे पिग येऽतिविभम्मिवा नृपा ॥२॥ सांघते हैं कि 'इम फहरले मनके सहित अपनी पौधों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करेंगे-अपने भीतरी शत्रुओंको पशमें करेंगे, क्योंकि इनको जीते विना बाहरी शत्रुओं- पूर्व निर्मिस्प पनर्ग बेप्पामो राजमन्त्रिणः । को जीतना कठिन है। उसके बाद अपने शत्रुके मन्त्रियों, अमात्यों, नागरिकों, नेताओं और समस्त सेनाको भी वतः सचिवपौराप्तकरीन्द्रानस्य कष्टकान् ॥ ३ ॥ परामें कर लगे । वो भी हमारे विषय मामि कोटे बोयेगा, उसे हम अवश्य जीत लेंगे ॥ ३ ॥ इस प्रकार धीरे-धीरे कमसे स्सरी पृथी हमारे क्वीन हो जापगी धौर फिर एम क्रमण अप्पामः पृची सागरमेखलाम् । तो समुद्र ही हमारे राम्पफी सका काम करेगा। इस प्रकार वे अपने मनमें अनेकों भाशाएँ गोल लेते हैं और इस्पाठापदण्या न पश्यनस्पन्तिफन्तकम् ॥ ४॥ म्हें यह बात बिल्कुल नहीं सूझती कि उनक सिरपर काछ सबरी॥४॥ यईतक नहीं, जब एक दीप उनके पशम हो जाता है, तब ये दूसरे द्वीपर समद्रापरमा मिसा मां पिशन्स्पम्धिमोबसा। विजय करने लिय की शक्ति और टरसाहक साप समुद्रयान करते हैं। अपने मनको, इन्द्रियोंको पशमें किपदात्मजयस्यैव शक्तिरास्यमये फलम् ॥ ५॥ वश करक मी ग्रेवा-सा भूभाग ही प्राप्त करते है। | करके व्येग मुक्ति प्राप्त करते है, परन्तु ये छोग उनको इतने परिम्म धौर अरमस्फममा मह किसना तुछ फर यो पिसन्पैष मनपस्तस्मताम इथा। है" ॥५॥ परीक्षित् 1 पृणी कहती है कि वा बा मनु और उनक मार पुत्र मुझ यों-की-पों पर जहाँसे आये थे, वही टी एस ट गय, मुष्ठ अपने गता यधागतं युद्धोमो अप्पन्स्यपद्धय ॥६॥' माग न ले जा सक । अब य मूल गजा मुम्स युदमे । १ यमाय ।

भीमसागवत [.२ अपमानुगमारप देवदचं अयस्पति । | अवतार प्राण करेंगे ॥१८॥ श्रीमगवान् ही मासिद्रिय के और समस्त सद्गुणों के एकपत्र सभ्य है। असिनासाधुदमनमप्रैश्चर्यगुणान्वितः ॥१९॥ समस्त चराचर जगत्केरे ही रक्षक बार स्वामी हैं। वे देवदच नामक शीगामी घोरपर सवार होकर को स्पारके घाट उतारकर ठीक करेंगे ॥ १९॥ उनके विपरन्ना ना थोपा हमेनाप्रतिमपुतिः । रोम-रोमसे भाछनीय सेस्की किरणें छिटकती होगी। अपने शीनामी मोड़से पृषीपर सर्वत्र विचरम करेंगे नपलिङ्गन्दो दस्यून कोटिशो निहनिम्मति॥२०॥ और राजाके पेपमें छिपकर रानेवाले कोटि कोटि मो- का संहार करेंगे ॥ २० ॥ अप तेपो भविष्पन्ति मनासि विनदानि । प्रिय परीभिद 1 पब सब गोकर संहार से वासुदेवाङ्गरागातिपुष्पगन्धानिलस्पशाम् । मुकेगा, तब मगरकी और देशकी सारी प्रजाका प्रय | पवित्रतासे भर पापा, क्योकि भगवान् कस्किो शरीरम पौरजानपदानां पे इतेपखिलवस्थप ॥२१॥ स्मोहुए बहरागका पर्स पाकर कत्यन्त पवित्राईबायु उनका स्पर्श करेगी पोर इस प्रकार में भगवान के तेपो प्रमाविसर्यध म्पविष्ठः सम्भविम्मति । श्रीनिमाकी दिम्प गप प्राप्त कर सकेंगे ॥ २१ ॥ उनके पवित्र हदोंमें सलमूर्ति मगवाम् बामुदेष विरामान वासुदेवे भपति सचमूती हदि पिते ॥२२॥ होंगे और फिर उनकी सन्तान पहलेली माँति प-पुर और फम्यान् होने मे ॥ २२ ॥ प्रनाके नपन-मनो- पदापतीर्णो भमपान् कत्किर्मपतिहरिः। | हारी हरि ही धर्मके रक्षक भौर स्वामी है।ये ही भगवान् अब फरिकके रूपमें सार माम मरेंगे, सी रुत भपिप्पति तदा प्रजारासिय माविकी ॥२३॥ | समय सत्ययुगमा प्रारम्भ हो गापगा वोर प्रसकी स्प ही सलगुणसे युक हो पदा पद्रप म तपा विम्यास्पती। चायनी ॥ २३ ॥ निस समय बनामा, सूर्य और पर | स्पति एक ही समप एक ही साथ पुष्य नक्षत्रके प्रथम एफराशौ समेप्पन्ति वदा भवति यत् रुतम् ॥२४॥ कामें प्रवेश करते हैं, एक राशिपर आते हैं, उसी समय सत्फ्युगका प्रारम्म होता ॥२१॥ येऽतीतावर्तमानाये भविप्पन्ति च पापिंवाः। परीक्षित् ! चन्द्रवंशम बोर सूर्यवंशम लिने गय तेसठरेशमा प्रोनावशीयाः मोमपूर्पयोः ॥२५॥ो गये हैं या होंगे उन सबका मने मंझसे वर्णन कर या ॥ २५॥ तुम्हारे म्पसे समर राज मदके आरम्प भवतो बम पावभन्दामिपंधनम् । अमियकता एक इन्चर, एक सौ पंद का समय एस नर्पसहस्रं तु मन पञ्चदशो घरम् ॥२५॥ ओग ॥ २६ ॥ जिस समय आकाशमें मरिया सपीगी तु माँ पूर्णस्यसे उदिसौ दिपि । उदय होता है, उस समय पामे उनसे दोहोरे Pसपी पाते है। उसके पीपमें भिग्रेटर रेसर सयोस्तु मम्पे नक्षत्र पन यत् समं निशि ॥२७॥ | समभागमें मसिनी आदि नवर्षोमसे एक न रिस । म्ममा । २ मयि ।। नमोः । ४ पूर्ण है। सन्तानसम्म म०२] ९११ तनेत अपयो युक्तास्तिष्ठत्पश्चत नृणाम् । पावा है ॥ २७ ॥ उस नक्षत्रके साथ सप्तर्षिगण मनुष्यों की गणनासे सो र्यतक रहते हैं। वे तुम्हारे सदीये विजा काले अधुना चामिता मपा॥२८॥ नमके समय धौर इस समय भी मघा नक्षत्रपर स्थित है ॥ २८॥ विष्णोर्मगवतो भानुः कृष्णास्पोऽसौ दिवंगत । सयं सकन्यापक सर्वशक्तिमान् भावान् की शुद्ध सवमय बिमाके साप श्रीकृष्णाके रूपमें प्रकट हुए थे। महाविछन् फलिर्लो पाप पद रमते बनः ॥२९॥ वे जिस समय बफ्नी लीय संघरण करके परमधामको पधार गये, उसी समय फलियुगने संसारमें प्रवेश यावत् स पादपपाम्पा सपन्नास्ते रमापतिः। किया । उसीके कारण मनुष्योंकी मतिभाति पापकी बोर | दुरुक गयी ॥ २९॥ तक सामीपति भगान् श्रीकृष्ण वापत् सलिच पृथिमी पराकान्तुं न पाश्चकन् ।॥३०॥ अपने चरणकमसे पृथ्वीका सर्श करते रहे, तबतक फरियुग पृथ्वीपर अपना फैर न जम्न सफा ॥३०॥ पदा देवर्षपः सप्त मघासु विचरन्ति हि। | परीक्षित् 1 निस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्रपर विचरण | करते रते हैं, उसी समय करिपुरका प्रारम्भ होता है। वदा प्रावस्तु कतिदिशामतास्मकः ॥३२॥ कम्युिगकी आयु देवताओंकी वर्षगणनासे बारा सौ याँधी वर्षात् मनुष्योंकी गणना के अनुसार चार मस्त, पदा मपाम्पो यास्यन्ति पूर्वापार महर्षयः । क्तीस हजार वर्षकी है।॥ ३१ ॥ जिस समय सप्तर्षि मघासे पकार पूर्वापाड़ा-नक्षत्र, या उके होंगे, उस सदा नन्दात् प्रमृन्येप कलिविंगमिप्पति॥३२॥ | सम्प राना नन्दका राम्प रहगा । तमीसे कलियुगकी वृद्धि शुरू होगी ॥ ३२ ॥ पुरावस्ववेता ऐतिहासिक विशनोंका पसिन् रुप्मा दिव मावस्खमिन्नेव सदाहनि । कहना है कि जिस दिन भगवान् श्रीकृष्मने वस्ने परम- घामको प्रपाण किया, उसी दिन, उसी समप फलिपुरका प्रतिपनं कलियुगमिति प्राहुः पुरामिदः ॥३३॥ परम्म हो गया ॥ ३३ ॥ परीक्षित् ! जब देवताओंकी गणलाक अनुसार एक हजार वर्ष भीत युगे, तब दिम्पादानां सासान्ते चतुर्पतु पुनः कवम् । कलियुगके अन्तिम दिनोंमें फिरसे पक्किमगमन्की कपासे मनुप्पोंके मनमें सस्मिकताका सञ्चार होगा, मेग भविप्पति यदा नपा मन भास्मप्रमाञ्चकम् ।।३४॥ अपने वास्तविक स्वरूपको जान सकेंगे और तभीसे सत्ययुगमा प्रारम्भ भी होगा ॥ ३१॥ इस्पेप मानपो पशा यथा संस्पायवे समि । पीक्षित् ! मेने तो तुमसे का मनुका, सा भी संघरसे यमन किया है। जैसे मनुवंशकी गणना होती वया विश्वविमाया तास्ता शेया पुगे पुगे॥३५॥, बेस ही प्रत्येक युगमे प्रक्षण, वैश्य जार होकी भी शपरम्परा समानी चाहिये ॥ ३५॥ राजन् । जिन एतेषां नामसिहाना पुरुमाणा महारमनाम् । पुरुषों मोर महामामोश वणन मैने तुमसे रिसा भव का मामसे ही उनकी इमान ती|अब वे नहीं १ मा उनी कसा य गपी है। उनकी कीर्ति फपामाप्रारशिष्टानां कीतिरेव सिता मवि ॥३६॥ ' ही पूर्णपर गौ तदा सुनना मिली है ॥ ३६॥ -- भीमबागपत मकते पिपुत्रागा मातृणां चापि विग्रहः । जीतकर पशमें करना चाहते हैं ! ॥ ६ ॥ जिनके पिले आयते असतां राज्ये ममतापदधेतसाम् ॥ ७॥ यह बात समुळ हो गयी है कि या पृष्पी मेरी है, म ममैवेर्य मही त्स्ना न ते मुद्रेति वादिनः । दुष्य के राज्यमें मेरे लिये पिता-पुत्र वीर भाई-मई में आपसमें म बैठते हैं।॥७॥ ये परस्पर इस प्रकर स्पर्धमाना मिथोघ्नन्ति प्रिय ते मत्कने नृपाः॥ ८॥ कहते हैं कि 'यो मुड़ ! यह सारी पृमी के प्रभुः पुरुग्ना गार्निपो भरतोऽर्द्धनः । ही है, तेरी नहीं, इस प्रकार राबाग एक मान्धाता सगरो रामः स्वक्षाङ्गो घुन्पुरा रघु ॥९॥ मर ख्येि एक-दूसरेको मरते हैं और स्वयं मम सरेको कहते सुनते हैं, एक-दूसरेसे स्पर्श करते तृलपिन्दर्यपातिय अतिः अननुर्गयः । मिटते हैं ॥ ८॥ पृथु, पुरुरवा, गावि, नान, भरत, सहस्रबाहु, घुन, मान्धाता, सार, राम, स्ट्या मगीरथालयाचा मत्स्सो नैपधो नृगः ॥१०॥ | धुन्धुमार, रघु, तृणबिन्दु, ययाति, शति, शन्तन, गप, हिरण्यकशिपुत्री रावमो लाकरावणः । मगीरप, कुपथ्याध, कारस्प, नस, मृग, हिरण्यकशिपु वृत्रासुर, छोकद्रोही रायण, नमुचि, शम्बर, मौमसुर, नमुचिः सम्यरो मोमो हिरण्याक्षोऽथ तारकः ॥११॥ शक्तिशास्त्र नरपति हो गये। ये सब ग्रेग समान हिरण्याक्ष भोर तारकासुर तथा बौर नगुत-से देस्य एवं अन्ये च बहवो देत्या रामानो ये महेश्वराः । समझते थे, शूर पे, समीने विपमें दूसरोंको हरा सर्वे सर्वविदः शूराः सर्वे सर्ववितोऽविताः ॥१२॥ सब मृत्युक ग्रास बन गये । राजन् ! उन्होंने अपने दिया किन्तु दूसरे लोग इमें न जीत सके, पर सा ममता मय्यरर्सन्त कस्तोमर्यधर्मिणः । पूरे अस करणसे मुमसे ममता की और समझा कि पर पृथ्वी मेरी है। परन्तु विकराल कासने उनकी पस पूरी न होने दी। अब उनके पल-पौरप और शरीर कथावशेषाः फालेन पकृतार्थाः कता विभो ॥१३॥ बादिका कुछ पता ही नहीं है । केपल उनमी मानी- मात्र शेष रह गपी है ॥९१३ ॥ कथा इमास्ते कथिता महीयसा परीक्षित् ! संसारमै महुत-से महान् पुरुष हो गये हैं, विताप लाकेपु पशः परेयुपाम् । जो सम्र्ण लोर्कोमें अपने या विस्तार करक फोसे विज्ञानवैराग्यविषधया विमो कल पसे । उनकी ये पत्याएँ तुम्हें पान बार राम्या उपदेश करनेके म्पेि यही गपी है। हमें बाणीमा वयाविभूतीनं तु पारमाम् ॥१४॥ वैभवमात्र म सम्मा, इनमें परमार्थ-सस्त्र भरा आहे ॥१४॥ पस्तूनमशेरगुणानुवाद भगान् श्रीकृष्णका गुमनुबाद समस्त भमङ्गका नाश मंगीयतेऽमीक्ष्यमममतन परनेग्रम है, मामा महरमा उसीका गान करते रहते है। जो भगवान् श्रीकणके चरणोंमें अनन्य प्रममयी नित्यं गणयादमीण भकिकी अपसा रखता हो, उसे निस्प-निरन्तर भगान्क रुप्मऽमला मन्तिममीप्समान ॥१५॥ हिम्प गुणनुदपर ही पावे गना पाहिप |॥ १५ ॥ गमा परीक्षित्म पूण-भालन् । मुशता पाठियुग फनापायन मगरन पसपिान कसा बनाः । में गशिगशिगदी पियपी गर। उम समा । यमय प्राण रागोराप अ० ३] द्वादश स्कष ९१५ मान सम विधमिप्यन्युपचितांस्तन्म हि यथा मुने ॥१६॥ | प्रेग किस उपायसे उन दोपोंका नाश करेंगे । इसके अतिरिक युगका स्वरूप, उनके वर्म, पत्यकी स्थिति युगानि युगधर्माय मान प्रलयफल्पयो । भौर प्रम्पकालके एवं सषम्यापक शक्तिमान् मावान्फ कालापका भी पपायद वर्णन फालस्पे पररूपस्स गति विष्णोर्महात्मनः ॥१७॥ | कीजिये ॥ १६ १७ ॥ भीलवनी कहते है-पीभित् ! सत्ययुगमे धम श्रीशुक सपाप के चार चरण होते हैं। वे चरण?-सत्प, दया, सप और दान | उस समयके येग पूरी निष्टाके साप अपने- ते प्रवर्तते धर्मपतुप्याचअनर्धत । अपने धर्मयत पाउन करते हैं। धर्म स्वप भगवान्का खाप है ।। १८ ॥ सस्पयुगक व्यंग नड़ सन्तोपी और सस्पं दया सपा दानमिति पादा विभोर्नुप ॥१८॥ दयाल होते है। वे सबसे मित्रताका म्यवहार करते और शशस्त रहते हैं। इन्द्रियों और मन उनके वशमें संतुष्टः करुणा मंत्रा शाता दान्तास्तितिक्षव । राते हैं और मुम्ब-दुख आदि पोंको वे मानभावसे सहम करते हैं। अधिकांश लोग तो समदर्शी और पात्मारामा: समस्या प्रापश भ्रमणा जनाः।।१९।। आराम होते है और बाफी लोग समपस्थितिक रिये अम्पासमें तत्पर रहते हैं ॥ १९ ॥ परीक्षित् ! धर्मक घेतायो धर्मपादाना तुपांचो हीपते शनैः । समान अधर्मक भी घार घरण 2-असत्य, हिंसा, असम्तार और फस्छ । प्रेतायुगम इनके प्रमायसे धीरे मधर्मपादैरनृतहिंसासवोपविग्रह ॥२०॥ | धीरे धर्मक सत्य आदि परणोंका चतुरांश क्षीण हो जाता है ॥ २० ॥ राजन् ! उस समय यमि माझगों तदा क्रियासपानिष्टा नाविहिसान लम्पटाः । पीप्रधानता भुण्य रहती है। योंमें अयन्त हिंसा और एम्पटताश धमाय रहता है। सभी व्येग फममार निकासपीवदा यणा प्रयाघरा नप ॥२१॥ | और तपस्या निम्र रखने हैं और अर्प, धम एव काम- मपत्रिका सेक्न करते हैं। अधिकांश टोग पमप्रति तपस्मत्यदपादानप्वष इसति द्वापर। माफ मोंक पारदर्शी पिशन होते हैं ॥ २१ ॥ पर युग हिंसा, असन्ताप, छ वार देप-अधर्मके इन हिंसातुष्टपन्नापंधर्मस्याधर्मरक्षणः ॥२२॥ चरणोंफी दिये गती एक इनफ पारण धमके पारों परण-वास्पा, सस्प, ग्या मीर दान आपे-आध भीगह जावई॥ २२ ॥ उस समयक म्यग पर यसम्चिना महामाला स्वाध्यायाध्ययनरता । पशम्बी कमाण्डी और वर्गक अप्पयन-अप्पापनमें का नयर हात ₹। यग्ग्रेक कुदम्ब पावर हात है, प्राप आत्या कुटुम्मिनारायणा धदिनाघरा ॥२३॥ इत्रिप और माग नव प्रयाना गती ६ ॥२३॥ मग नाना मुनी दामे है। उस समय पर्मि परियुगौ सो अपना गारों परग अपत पा गात का तु पमहनना तुयायाऽभमोहतमि । है। उनक कारण धर्मक पार्टी परण भीम हान याते १ ।२मापनाबमा।

९१२ भीमद्भागवत [..२ देवापि तनोवा मरपेक्ष्याइनमः । भीष्मपिताम्बके पिता राजा शम्तनुके भाई देशापि और स्वाकुर्मशी मर इस समय फल्पम्ममें लित है। फलापमाम आसाते महायोगवलान्वितो ॥३७॥ बहुत मे योगक्लसे मुक्त है ॥ ३७॥ कलियुगके पास- में फस्किभगवान्की भावासे वे फिर यहाँ वायेंगे और वाविदत्य फलेरन्ते नासुदेशानुधिषितो। पहलेकी मति ही वर्गामधर्मका विस्तार करेंगे ॥३८॥ | सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कमिग-येही पर मुग वर्णाममयुतं धर्म पूर्वपत् प्रथयिम्पतः ॥३८॥ | ये पूर्वोक कमके अनुसार माने अपने समयमै पृष्पीके प्राणियोंपर अपना प्रमाव विखते राते है॥१९॥ तं त्रेता शपरं च फलिश्षेति चतुर्युगम् । | परीक्षित् ! मैने तुमसे जिन रामायोका पर्णन किया है, अनेन कममोगेन सषि प्रागिषु वर्तते ॥३९॥ मीमी करते रहे, परन्तु वन्तमें मरकर पूष्म कि वे सब और उनके पतिरिक दूसरे राज्य भी इस पृष्मीको राजन्नेते मया प्रोका नरदेषास्तपापरे। गये ॥ १० ॥ इस शरीरको मझे ही कोई राना कर परन्तु पन्तमें यह कमा, विधवपया रासके रूपमें ही मूमौ ममत्व हस्तान्ते हित्वमा निधनं गता॥४०॥ परिणत होगा, रास ही होकर रहेगा । इसी शरीरके य | इसके सम्बन्धियोंके म्पेि जो किसी भी प्राणीको सतात समिविभमसंबान्ते रोमनाम्नोऽपि यस् च। न तो अपना सार्प मानता है और न तो पर- मार्प । पौषि प्राणियोंको सताना तो नरकता हार मूवर तत्कृते स्वार्षकि वेद निरयो पतः ॥४१॥ है ॥ ११ ॥ वे लोग यही सोचा करते हैं कि मेरे दावा-परदादा इस पसण ममपामा शासन करते थे, कई सेपमस्वपमा । पूर्व में पुरुता । का पर मेरे वधीन किस प्रकार रहे बौर मेरे का मेरे | बेटे-पोते, मेरे रान किस प्रकार इसका उपभोग मत्पुत्रस्य च पौत्रस्त मसूर्या पंचवस पा ॥४२॥ करें ॥ १२ ॥ वे मूर्स इस बाग, पानी और निजीके | शरीरको अपना वापा मान बैठते हैं और बोवमिमान तेजोऽजन्नमय कायं गृहीत्वाऽमतयापुधाः। के साप जग हाँकते है कि यह पृषी मेरी है। म मही ममतया चोभौ हिस्वान्तेऽदर्शन गताः ॥४३॥ हो जाते है॥१३॥ प्रिय पशिस् ! बो-को नरपति वे शरीर और पृथ्वी दोनों को अपार स्पीक्षाश्य यः साह और कळ-पोरससे इस पृषीके उपभोग ये ये भूपतगोरापन् मनन्ति वमोमसा । मो रहे, उन सपको पालने वपने विकराल गाम्मे पर दक्पा । कब के इतिहासमें उनकी कानी ही क्षेत्र कालेन ते कवाः सर्वे कथामात्राः कथासु च ॥४४॥ र गपी है ॥९॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमईस्या संहिताय पदशकाचे हितीयोऽम्माप ॥ २ ॥ १ मिने। २ रायम्पाम्पषिपस ।

म०३] द्वादश स्कन्ध राम्या अथ तृतीयोऽध्याय युगधर्म मोर करियुगके बोपोसे पानेका उपाय-मामसहर्तन भीक उपाय भीशुकदेवजी करते है-परीक्षिद ! पृष्णी देखती है कि राजाभेग मुझपर बिनय प्रास करनेके लिये उतावले हो रहे है, तबसने व्गती है और करती राष्ट्रात्मनि अपे'ष्पग्रान्नृपान्हससि भूरियम् । है-कितने सापकी बात है कि ये रानाध्येग, जो स्वयं मौत के खिलौने हैं, मुझे जीतना चाहते हैं।॥ १ ॥ भोमा विजिगीपन्ति मृत्योः क्रीउनका नृपा । १॥ राजाओंसे यह बात छिपी नहीं है कि वे एक-न-एफ दिन मर जायेंगे, फिर भी ये म्पर्य में ही मुझे जीतनेकी । कामना करते हैं। सचमुच इस काम्नासे बंधे होनेक काम एप नरेद्राणां माप स्वाद विदुपामपि । कारण ही वे पानीके मुलभुलेके समान क्षणमार शरमरपर विचास कर बैठते हैं और धोखा खाते हैं ॥ २ ॥ पेन फेनोपमे पिणे येऽतिविभम्मिता नृपाः॥२॥ साचते हैं कि हम पहले मनके सहित अपनी पाँचों इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करेंगे-अपने भीतरी शत्रुओंको यछमें करेंगे, क्योंकि इनको जीते बिना बाहरी शत्रुओं- पूर्व निर्विरप पदबर्ग बेप्पामा राजमन्त्रिणः । यो जीतना कठिन है । उस याद अपने शत्रुके मन्त्रियों, अमात्यों, नागरिकों, नेताओं और समस्त सेनाफो भी ततः सचिषपौराप्तकरीन्द्रानस फाटकान् ॥ ३॥ ॐगे। जो भी हमारे विनय मार्ग कोठे ग्रेयेगा, उसे हम अपड्य जीत लेगे ॥२॥ इस प्रकार धीरे-धीरे क्रासे सारी पृष्पी हमारे पवीन हो जापगी वीर फिर एवं फ्रमेण अप्पामा पृथ्वी सागरमेखलाम् । तो स्मुन ही हमारे राम्पकी का काम करेगा। इस प्रकार ये अपने मनमें अनेकों आशमाएँ वौध लेते हैं और इस्पाशापदादया न पश्यन्स्पन्तिफेन्तकम् ॥ ४॥ उनें यह बात पिकुछ नहीं सूमती कि उनके सिरपर काल सवार है।॥ १॥ यहीतक नहीं, जब एक दीप उनके कशमें हो जाता है, ता वे दूसरे छीपर समुद्रावरणां जिससामा पिशन्स्पम्धिमोबस।। विन्य फरनेके लिये बड़ी शक्ति धौर टत्साहक साय समुद्रयात्रा करते हैं। अपने मनका, इन्द्रियोको पशमें कियदास्मअपस्पैतन्मुक्तिरास्मबये फलम् ॥ ५॥ हामें करम मा मोबा-सा ममाग ही प्रश्न करते हैं। करके नग मुक्ति प्राप्त करते हैं, परन्तु पेग टनको इतने परिमम और भारमसंपाता ह कितना तुछ फल या पिसन्यैव मनवस्सस्सुवाम रूपा। है" ॥५॥ परीक्षित् । पृथ्वी कहती है कि - वह मनु और उनके बीर पुप्र मुझे ज्यों-की-स्पों पर जहाँसे पाये थे, यही सम हाप ग्रेट गय, मुम अपने गता यथागर्व युदामा अप्पन्स्पमुद्धयः ॥ ६॥ | माप न ले ना सक । अत्र ये मूल राना मु युरमें पशमें कर १ यम्पमा ।

९१४ भीमद्भागवत , " । मस्कृते पिपुत्राणां मासूमो चापि विग्रहः । जीतकर पश्में करना चाहते हैं। ॥६॥ मिनके पितम जामसे मसती राज्ये ममवापदधेतसाम् ॥ ७॥ या यात बाछ हो गयी है कि यह पृष्षी मेरी है, म ममैवेयं मही कुत्स्ना न ते मटेति षादिनः । दुधैके राज्यमें मेरे लिये पिता-पुत्र और माईमाई मी अपसमें ब्य बैठते हैं ॥ ७॥ वे परस्पर इस प्रकार स्पर्धमाना मियोध्नन्ति प्रिय ते मस्कृते नृपाः॥ ८ ॥ महसे हैं कि 'भो मा ! यह सारी पृथ्वी मी पुषुः पुरुया माधिपो भरतोऽर्जुनः। ही है, सेरी नहीं, इस प्रकार रामालग एक मान्धाता सगरो रामा खट्वाङ्गो पुन्हा रघु।।। ९॥ /, मेरे लिये एक-दूसरेफने मारते हैं और स्वयं कर दूसरेको करते मुनते हैं, एक-दूसरेसे स्पर्श करते तृणपिन्दुर्ययातिष शाति: तनुर्गय । मिटसे है ॥ ८॥ पृथ, पुरुरवा, गधि, नहुप, भरत, सहसमा, अर्जुन, मान्धाता, सगर, राम, स्ट्या मगीरथावलयाचा फत्स्सो नैपधो नगः ॥१०॥ धुन्धुमार, रघु, तृणबिन्दु, स्पति, शान्ति, रत्तनु, गप हिरण्यकशिपुत्रो रापमो लाकरावणः । मगीरप, फुलल्याय, फारस्थ, नछ, नग, हिरण्यकशिपु, पत्रामर, क्योही रावण, नमुचि, शम्बर, भौमासुर, नमुचिः शम्परा मौमा हिरण्याक्षोऽथ तारकः ॥११॥ शक्तिशाम नरपति हो गये। ये सब थेग सब पर हिरण्याक्ष धीर तारकासुर तपा बौर पहुत-से दैत्य एवं अन्ये च पायो देस्मा राप्रानो ये महेपराः । सम्मते थे, शूर पे, समीने दिलिम्पमें दूसरोंको हरा दिया किन्तु दूसरे लोग इन न जीत सके, परन्तु सम- सर्वे सर्पषिदः शूराः सर्वे सर्वजितोऽमिताः ॥१२॥ के सव मृत्युक यस म्न गये ! राजन् ! मोने पम्ने ममतां मय्यवर्तन्त कस्बोच्चैर्मप॑धर्मिणः । पूरे अन्त करणसे मुमसे ममता की और समसा किया पृथ्वी मेरी है। परन्तु विकराल काटने उनकी अस्सा फभाषशेपाः कालेन मकवार्या कसा पिभो ॥१३॥ आदिका कुछ पता ही नहीं है । फास उनकी कहानी पूरी न होने दी। अब उनके बा-पौरप और शरीर मात्र शेष रह गपी ॥९१३ ॥ कथा इमास्ते कथिता महीयसा परीक्षित् ! संसारमें याहुत-से महान् पुरुप हो गये हैं, विवाय लोप पच परेयुपाम् । जा सम्पूर्ण लोकोंमें मरने यशका विस्तार करके यहाँसे विधानपैराम्पविषया विमो क्ल पसे । उनकी ये कमाएँ सुम्हें पान और परम्परा | उपदेश करनेके मिये कही गपी है। इन्हें बमीना पयोविभूतीन तु पारमाम् ॥१४॥ वैभवमात्र न सो इनमें परमार्थ-तत्व भरा ॥११॥ पस्तूतमसोकगुणानुवादः भगवान् श्रीकृष्णका गुणानुपाद समत अजोबा नाश मंगीयतेऽमीक्ष्णममालन फरनगव्य है, पामा हाम उसीका गान फरसे राते १! जो भगवान् श्रीमानके परमोंमें अनन्य प्रमापी यमर निस्यं भृणुयादमीण भफिकी यात्रा रना हो, उसे निस्प-निरन्तर मगधक कृष्णऽमला भक्तिममाप्समानः ॥१५॥ रिम्प गुणानुवादषा ही परते राम धादिय ॥ १५ ॥ रामा परीसिक्न पूण-भाग्न! मुस तो उयुग- कनापायन भगरन मलर्दोपान्ताजना । म गशिशि द्वार दी दिसायी ? ह। उस सा १ ना।२ मत भ्रमण मान ९१५ स०३] द्वादश स्कन्ध विधमिप्यन्त्युपचितांस्तन्म हि यथा धने ॥१६॥ येग फिस उपायसे उन दोषोंका नाश करेंगे । इसके अतिरिक युमे॒का सबए, उनके घमे, कल्पकी सिति युगानि पुगधर्माय मान प्रयत्पयोः। और प्रलयकालके एवं सर्वम्यापक सर्व शक्तिमान् मगवान्क काफ्का भी ययावत् क्णन कालस्पेपररूपस्स गति विष्णोर्महात्मन ॥१७॥ | कीमिये ॥ १६ १७ ॥ श्रीशुधवसी कहते है-परीक्षित् ! सत्ययुगमें धम मीशुक उपाय के चार परण होते हैं, वे घरण है--सस्प, दप्प, तप और दान । ठस समपके मेग पूरी निछके साथ अपने रुत प्रमर्तते धर्मवतुष्पाचजनेत । अपने धर्मा पालन करते हैं। धर्म सय भगान्फा साम्प ॥ १८ ॥ सत्ययुगक ध्येग मा सन्तोषी वीर सस्पं दया तपो दानमिति पादा विभोर्नुप ॥२८॥ दयाल राते हैं। वे सबसे मित्रताका म्यवहार मरते और शन्त रहते है। इन्द्रियों और मन उन शमें सतुष्टा करुणा मैत्राः शान्ता दान्तास्तितिक्षयः । यते हैं और मुम्बस बादि को वे समानभावसे सहम फरते हैं। अधिकांश लोग तो समदर्स और पारमारामा समरस प्रायशा भ्रमणाजनाः।।१९।। बायराम होते हैं और वाफी लोग स्वरूपस्थिति के लिये अम्यासमें तत्पर रहते हैं॥ १९ ॥ परीक्षित् ! धर्मके त्रेतायां धर्मपादाना तुयाशा हीयते शनैः । समान अधर्मक भी चार चरण -सरप, हिंसा, असन्तार और पाय । प्रेतायुगर्म इनक प्रमापसे धीरे अधर्मपादेरनृपरिसासवोपविग्रह ॥२०॥ धीरे धक सस्य आदि परणोंका चतुांश क्षीण हो जाता ॥ २०॥ राजन् ! उस सम्प वर्मि प्रामगों सदाक्रियावपानिष्ठा नातिहिंसा न लम्पटा । की प्रधानता अक्षुण्ण रहती है। पोंमे अत्यन्त हिंसा और सम्मटताफा अमात्र रहता है। सभी लोग समकाण्ड वैयर्गिमात्रयीवदा वणो प्रमाचरा नृप ॥२२॥ और तपस्यामें निष्य रस्ते है और अर्प, घम एवं परम- सूप प्रिवर्गमा सेवन करते हैं। अधिकांश ग्रेग कमप्रति सपस्सस्पदपादानवध इसति द्वापर । फदफ बोंक परशी विधान होते हैं ॥ २१ ॥ शाम युगमें हिंसा, असन्ताप, छ र देगवधर्मके इन हिंसातुष्ट पन्त इपंधर्मस्याधर्मठपण परणोंकी वृद्धि हो जाती है एक इनफ कारण धमके ॥२२॥ पारों चरण-तस्पा, सत्प, दया बार दान आधे-आधे भीण हो जाते हैं ॥ २२ ॥ उम समयक अंग बड़ पम्बिनी महाशाला पाण्यायाध्यपन रता । पशनी मममी और भोक अप्पपन अध्यापनमें या सहपर हास है। गोंक पुदम्म वारा हाल प्राप मात्मा कुटुम्निनारा रमा धादिनाचरा ॥२३॥ अप्रिय भोर मागास प्रमानना गती ६ ॥२३॥ ग पनाम मुम्बी हात ३। उस समप यामि पम्भुिगने तो अन्ना चारों परग अफ्त पर अत कजा तु पमानना तपासाऽधमोतमि । है। उनक मारग पफ पारों परण शग हाने यात । मावेजारमन्बनायामाः।

श्रीमद्भागवत एभमानैः पीयमाणो भन्ने सोऽपिपिनरस्पति॥२४ धौर उनका चतुर्थाश ही बच रहता है । कसमें उस चतुशिका भी ख्येप हो जाता है ॥ २९॥ कति. तस्मिन्नुम्भादुराचारा निर्दमाः सुप्कपैरिमः। युगमें छोग लोभी, दुराचारी बोर कठोराश्य होते हैं। वे मुटम एक-दूसरेसे पैर मोर ले लेते हैं, एव खस- दुर्मगा मूरिताप दाशोधराः प्रजाः ॥२५॥ तृष्णाकी वो बाते रहते हैं। उस समयके धमागे में शर, केवट धादिकी ही प्रधानता यती है ॥२५॥ सत्वं रवस्तम इति राम्यन्ते पुरुपे गुणाः । सभी प्रामियोंमें तीन गुण होते हैं-सत्व, रय और सम । फाळकी प्रेरणासे समय-समपर शरीर, प्राम कालसं पोदिवास्ते में परिवर्सन्त वास्मनि ॥२६॥ मौर मनमें उनका हास वोर विकास भी पुक करत है ॥ २६ ॥ निस सम्य मन, बुद्धि और इनियों प्रभवन्ति यदा सखे मनोगुलीन्द्रियाणि च । । सत्त्वगुणमें स्थित होकर वपना अपना काम करने लगती हैं, उस समय सस्पयुग सम्बना चाहिये । सत्वगुणकी सदा रुवयुगंविधानाने तपसि पद रुचिः॥२७॥ प्रधानताके समय मनुष्य पान और तपस्पासे वधिक प्रेम फरने पता है ॥२७॥निस समप मनुष्यों की प्रापि और पदा धर्मार्थकामे भक्तिर्मपति देहिनाम् । सचिधर्म, वर्ष वौर मेकिक-पार मैकित पुस मोगली कोर होती है तपा शरीर, मन एस इन्द्रियाँ रोगुणमे लित होकर काम करने लगती हैं-युद्धिमान् पीक्षित् ! समझना चाहिये वदा प्रेतारमोचिरितिषानीहि पुद्धिमन् ॥२८॥ | कि उस समय त्रेतायुग आफ्ना काम कर रहा है ॥२८॥ निस सम्प प्रेम, बस्तोप, अमिमान, दम्म बौर मासर पदा लोभस्मसंतोपो मानो दम्भोऽधमत्सरः। बादि दोषोंका सवाल हो चौर मनुम्प पर मा तपा पिके साप सफाम फमि माना चाहे, उस साप कमणां चापि काम्पाना वापर वव बस्तमः ॥२९॥ द्वापरयुग सम्ममा चाहिये । अवश्य ही रबोगुण और तमोगुणकी मिश्रित प्रधानताका नाम ही वापरयुग है।२९॥ जिस समय झूठ-कपट, तन्द्रा निना, हिंसा-भिम', शोक या मापानृव मन्द्रा निद्रा हिंसा विषादनम् । मोह भय धौर तीनवाकी प्रधानता हो उसे तमोगुण प्रधान कमियुग समझना चाहिये ॥२०॥ स्व करिमका पाको मोहाभय दैन्न सफलिस्तामसः स्मृतः ॥३०॥ यम्य होता है, ता मेगोंकी न हो जाती है, अधिकांश लोग होते तो अफ्त निर्धन, परस्त सते पमा मुद्रश्यामा सुद्रभाग्या महामनाः। त्यात अधिक । उनका माम्प तो होता है महुत ही माद और पिच्ने कामनाएँ होती है मत पपी-बगी । | निम दुता वोर कुटापनकी मावि हो जाती है।३१॥ फामिना रिचरीनापस्वैरिण्य मसियासतीमा३२॥ सरे देशम, गांव-गोवमें लूटेरों की प्रधानता एवं प्रमुरता हो जाती है। पासण्डीग अपने नये-नये मन पसार मनमाने ढंगसे वेदोश तार्य निकाम्न प्रा? और दस्ता वनपदादा पासपपिठा।। इस प्रकार उन्हें कसरित करते है। राना कम्मनेते १ नम्पति । १ ।। योधि ।४ पराज प्रमेषु महिमपति रेहिमाम् । र मी दुरिमार ।

५०३] रामानम प्रमाभवाः शिभोदरंपरा दिवा ॥३२॥ खग प्रत्यकी सारी कमाइ गफ्फर उन्हें चूसने स्यान्ते है। बामणनामधारी जीव फेट भरने और जननन्द्रियको कृप्त परनेमें ही लग जाते हैं ॥३२॥ प्रमचारी रोग प्रमापर्य तसे रहित और अपवित्र राने छाते हैं । गृहम दूसरोंको अग्रता नटयोऽसौधा भिक्षषम कुटुम्पिन । मिक्षा देनेके बदल वय भीख माँगन टगते, वानप्रस्थी | गोगामें बसने लगते है और स्पासी घनक अफ्त व्यभी- वर्यविशाच हो अत हैं ॥ ३३ ॥ मियोंका माफार सो तपस्विनो ग्रामनासा न्यासिनाऽस्पर्थलोलुपाः ॥३३॥ोटा हा जाता है, पर भूसमा जाती है । उन्हें सन्सान बहुत अधिक होती है और ये अपनी कुल- मर्यादाका उठान करके यसपा-बो उनका भूषण इस्त्रकाया महाहारा भूर्यपत्या गहियः । है- बेटती है। वे सदा-सदा काषी बात कहती नती हैं और चोरी तया का में पड़ी निपुण हो जाती हैं। उनमें साहस भी बहुत बड़ जाता है।॥ ३१॥ समककभाषिप्यचौर्यमायोरुसाइसा ॥३४॥ | प्यापारियोंके दप अत्यन्त क्षुद्र हो जाते हैं। ये कोही- | कोहीसे निपटे राते और शाम-छामक लिय धोखधड़ी करने लगते है । घार तो क्या अपटिकाम म हानेर पमपिम्पन्ति पैदा किराया कुटकारिणः । तपा धनी होनेपर मी वे निमणीक म्यापारोंका, बिनयी समपुरुष निन्दा फरत है, ठीक समझने और अपनाने स्मात है ॥३५॥ स्वामी चाह सर्वश्रेष्ठ दी म्यों न हो- अनापपपि मंस्पन्त बाता साधुजुगुप्मिनाम् ॥३५।। | इस सेवकलोग देखते हैं कि इसक पास धन-गेल नहीं | रही, तप उसे घायर भाग जाते हैं। सबक पार कितना ही पुराना स्पों न हा परम्तु जब यह किसी पतिस्पक्षपन्ति निर्दम्य मृस्याअप्पलिताचमम्। पिपचिम पर जाता, मम म्मामी उसे ददत है। और तो स्पा प्रय गीर पकन हो जाती है - दूध मृत्य विपनपत्याल गामापयस्विनी ॥३६॥ | दना व कर दती है, तब अग उनका भी परित्याग कर दत॥ ३६॥ पिम्रादमुन्यातीन् हित्वा सारतमौरदा । थिय पर्गमित् । पडियाक मनुष्य बाही भो ग्रतीब बन्नी कामयसनाका तत फानक रियही रिमामे प्रम यात । विपासनाकीत हार ननारपाठमंरादादीना मंगा लीनरा ॥३७॥ नितीन हा राव है कि माता-पिता, भाइरभु और मिनोग भी ग्राम पर मानी सार्थ और साप्रमा द्रा प्रतिग्रहीप्यन्ति तपासपापनापिन । मा लन प्रात है ॥ ३७॥ स ताचियोगा पर न जना पर मग्न र गन स्नानामिन्द प्रमरा सीभर समान नहीं है, नमिसन पम पल्पस्यपनया अधिस्साघमासनम् ॥३८॥ मित्रम्न हाम्र पनरा उरदा यान आत॥३८॥ पप्पर । २ प पनि भवन ।

९१८ भीमहागपत निस्पमदिग्नमन्सो दुर्भिधारकर्षिताः। घय परीक्षित् ! कलियुगकी प्रजासूस पबनेके कारण वापत मयभीत और भातुर हो जाती है। एक तो दुर्मिक्ष और दूसरे शासकोंकी कर-पदि । प्रजाके शरीरमे पास निरन्ने मृतले राममनाइष्टिमयासुराः ॥३९॥ अस्थिपञ्जर और मनमें केवळ उद्वेग शेष र बाता है। प्राण रक्षाके लिये रोटीका टुक्का मिना भी कठिन हो पासाऽभपानश्यनम्मवायनानभूपीः । जाता है।॥ ३९ ॥ कलियुगमें प्रजा शरीर बोले किये स और पेटकी मात्र शन्त करने के लिये रोटी, पीने लिये पामी वीर सोनेके लिये दो हाप बीनसे मी गति हीनाः पिशाचसंदर्या भविपरित फलोप्रमाणा४ ॥ हो जाती है। उसे दाम्पस्प-जीवन, मन और अमूम पहननेतककी मुविधा नहीं यती । लेगेकी काति, प्रकृति वीर चेयाएँ पिॉफी-सी हो गती ॥१०॥ फलोपपिपिकेऽप्प विगृम पक्कसौहदाः। कठिपुगमें कोग, अधिक धनकी सो मत ही स्या, पुस फौपियोंके लिय मापसमें वैर-विरोध करने गते और त्यल्पन्ति पंप्रियान् प्रामान हनिप्पन्ति स्वकानपिटर बहुत दिनों के समान तथा मित्रताको तिबलि दे देते है । इतना ही नहीं, वे दममी-दमदी के लिये अपने सगे- सम्बन्धिपोतककी हत्या कर बैठते और अपने प्रिय प्रार्मोसे न रहिप्पन्ति मनुशाः सविरौ पितरापपि । भी हाथ धो बैठते हैं ॥ ११॥ परीक्षित् ! कलियुगके क्षुध प्राणी केळ कामवासनाझी पूर्ति और पेट भरनेकी पुत्रान् सोसलान् क्षुद्राः शिश्नोदरम्भराः ॥४२॥ धुनमें ही लगे रहते हैं । पुत्र अपने बूढ़े मा-मापकी में रक्षा-पालन-पोषण नहीं करते, उनकी उपेक्षा कर देते हैं और पिता अपने निपुण-से निपुण, सब मे फलो न रामप्रमा परं गुरु योम्प पुत्रोंफी मी परवा नहीं करते, ठमें मग कर देते हैं ॥१२॥ परीक्षित् । श्रीमगवान् ही बावर मात के परम पिता और परम गुरु है । इन्द्र मावि प्रिोग विपति उनके चरणकमों में अपना सिर मुकाकर सर्वस समर्पण करते आते है। उनका ऐप मनन्त है चोर प्रापेग मा भगवन्तमम्पुर्व वे एफरस अपने सरूपमें स्थित है । परन्तु फरियुग गोमें इतनी महत्व फैल जाती है, पारमियोंके करम मपन्ति पासमाविभिभषेतसः ॥४३॥ गोगोंका विच इतना भटक जाता है कि प्राय मग अपने कर्म और मम्बनाओं के द्वारा भगवान्मी पूबासे भी पिशुस यभामषेयं ग्रिममाण हो जाते हैं ॥ १३ ॥ मनुप्प मरन के समय बातरवावी आतुर स्थितिम मच गिरते या मिसटते समय सा होत्र भी पदि भगवान्के किसी एक नामका उचारण कर से, पवन् स्वतन् वा पियशो गुणन् पुमान् । तो उसके सारे कर्मवचन मिमिल हो जाते है १।१ मा म भुमा । घिल्लोफनाथानसपादपजम् म०३] कादश भन्म ९१९ । विमुक्तमार्गल उत्तमा गति उसे उत्तम से उत्तम गति प्राप्त होती है । परन्तु हाय रे कलियुग ! कटियुगसे प्रभावित होकर लोग उन भामान्की प्राप्नोति यक्ष्यन्ति न त कलोचनाः॥४४॥ आराधनासे भी विमुख हो अते हैं ।। ११ ॥ पुंसा कलिकतान दोपान दम्पदेशा मसम्भवान् । सभित् ! करियुगक अनेकों दोष हैं। कुछ वस्तुएँ पित हो जाती हैं, स्थानों में भी दोषकी प्रधानता हो सर्वान् हरवि चिचम्योभगवान् पुरुपोधमः ॥४५॥ जाती है । सब टापोंका मूल स्रोत तो अन्त फरण है ही, मन्त जन पुरुषसत्तम भगवान् एयमें आ विराजते हैं, थुतासकोवियोध्याता पूजितधारतोऽपिना। स्व उनकी सनिधिमापसे ही सब-के-सब दोप नर हा नते हैं ॥ १५॥ मगमन्क गप, गुण, लीसा, धाम और नृणाधुनाति भगवान हत्म्या जन्मायुताशुभम्॥४६॥ नामक अषण, सकीर्तन, प्यान, पूजन और आदरसे ये मनुप्पके एयौ आफर पिराजम्मन हो जाते है। और पधा देम्नि स्थिता वहिर्वर्ण दन्ति भातुजम् । एक-दो जन्मक पापोंकी तो बात ही स्पा, हजारों बाँके पापके देर-क-टेर भी क्षणभरमें भस्म कर देते हैं।॥१६॥ पषमारमगता विष्णुर्यागिनामशुमाशयम् ॥४७॥ जसे सानके साथ संयुफ होकर अग्नि ठसक धातुसम्बन्धी मलिनता आदि गोपाको मए कर देती है, वसे ही साधकोंक विद्यासपःप्राणनिराधमैत्री हायमें सिक्न होकर भगवान् विष्णु उनके अशुभ सस्कारों- यो सदाक किय मिटा देत है।॥ १७॥ परीक्षित् । तीथाभिपेयतदानबप्यः । विपा, तपस्प, प्राणायाम, समता प्राणिोक प्रति मिय भाष, ती स्निान, क्त, न धौर जप - किसी भी नात्यन्तशुदि लभतऽन्तरात्मा साधनसे मनुप्यके पत्त फरणकी पेसी बाम्तविक शुद्धि नहीं होती, जैसी गदि मगवान् पुरुषोत्तमके दप यथा रदिस्थ भगमत्पनन्त ॥४८॥ विराजमान हो जानेर होती है ॥ १८ ॥ शिव । मुम्हारी मृत्यु समय निकट आ तमा मरारमनाराजन रिस्थ कुरु कशवम् । गया है। अब सापमान हो जामा कमी गतिसे पार अस यागी मारी वृत्तियोंसे भगयान् श्रीकृष्ण का अग्न निपमामा अवस्तिम्तता यासि पर गतिम् ॥४९॥ एपसिंहासन पर बैन । एसा करनसे अश्य ही नुग्द परमातिमी प्रामि हानी ॥५२॥ जायाग मृत्युफ निपट पच ह , उ मुर प्रसारसे परम - निपमापाभिम्यया भगवान परमपर । झापा ही पान करना चाहिए । प्यारे पउित् । मरा परम आप अं सर्वम्य भगान् भरना प्यन फान गत्या जान वामन फर स्तर, उसना मारममा नयापन गरामा मामभपः॥५०॥ समाना स्त है ॥ ५० ॥ीभित् । यो ता परियुग गोरा गुनाना ६, रतु इसम पर बदत्त महा गुम लपिनिध गरमम्ति प्रामान गुण । द गाय कि गिरामे गाउन नग ।२ ।। पी। मा ९२० बीमामषत [... कीर्तनादेष कृष्णस मुक्तसङ्गः परं प्रजेत् ॥५१॥ | श्रीकृष्णका सहीर्तन करनेमाप्रसे ही सारी बासधिमा छूट जाती है और परमारमकी प्राप्ति हो जाती है।५१० सत्ययुगमें मगवान्का प्पान करनेसे, तामें बार रुते यदूम्यामतो विष्णुं प्रेतायां यजतो मले। योंके गारा उनकी वाराधना करनेसे वीर तार विधि- पूर्वक उनकी पूना सेपासे जो फा मिलता है, हकमिमुग केछ मगानामका कीर्सन करनेसे ही प्राप्त होत बापरे परिचयायां फलौ तदरिकीर्तनात् ॥५२॥ ६ ॥ ५२ ।। इति भीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहिताया दशस्कन्धे' तृतीयोऽध्याय ॥३॥ अथ चतुर्थोऽध्याय चार प्रकारकेप्रग्य मीभुक उपाय भीगुकदेवजी कहते है-पीक्षित् ! (तीसरे काम- में ) परमाणुसे लेकर विपराधपर्यन्त फाल्का सरूप और फालस्ते परमाप्यादिविंपराविधिप। एक-एक युग कितने-क्तिने लोंका होता है, यह मै हमें कषितो गुममानं प पूर्ण फल्पलयावपि ॥ १ ।। बता चुका हूँ। थव तुम कल्पकी स्थिति और उसके प्रठपका वर्णन भी एनो ॥ १ ॥ राजन् ! एक हजार चतुर्युगसार्स चे प्रथमो दिनमुम्पते । चतुर्युगका प्रमाका एक दिन होता है। साफ इस दिनको स फल्पो पत्र मनपबतुर्दश पिपिते ॥ २ ॥2॥२॥ कश्यक पन्तमें उतने ही समस्तक प्रज्य ही कल्प भी करते है। एक कल्पमें चौदा मनु ऐसे तदन्ते प्रलयस्तावान् मामी रात्रिदाता । मी आता है। प्रम्पको ही प्राकी रात भी करते हैं। उस सम्प ये तीनों लोक न हो जाते है, उनका प्रया लोका इमे तत्र फरमन्ते प्रलसाय हि॥३॥ प्रय हो नाता है ॥ ॥ इसका नाम नैमितिक प्रय है । इस प्रठपके असरपर सारे विषको अपने मन एप नैमितिका प्रोक्ता प्रलयो यत्र विश्पसम्। समेटकरीन कर ब्रमा और उपचार शेपर्य भगवान् नारम्पण भी शयन कर जाते हैं। इस शेतेऽनन्तासनो मिचमात्मसास्कृत्प पास्ममः ॥२॥ प्रकार रातके बद दिन धौर दिन के बाद रत होते-हारे जब प्रमाणीकी अपने मामसे सौ वर्षकी और मनुष्की विपराचे स्वतिक्रान्ते प्रपणा परमेष्ठिनः । रहिमें दो पराईकी बापुसमा होसती तल माल बाहार और पसारमात्रा ये सप्तो प्रतियों बपने तदा प्ररुतया सप्त फल्पन्ते प्रसपाय ॥५॥ कारण मूल प्रतिमें सीन हो जाती ॥ ५॥ रामन् इसीका नाम प्राकृतिक प्रज्य है। इस प्रम्पमें प्रम्पक एप प्राकृतिका राजन प्रलयो पत्र लीयसे । कारण उपस्थित होनेपर पचभूतोंक मिश्रणसे बना हुम १ युगानुन ती १२ | विचम्।।

९२१ द्वादन स्कन्ध १०४] प्रापफोस्तु संघातो पिघात उपसादिसे ॥६॥ प्रमाण अपना स्यूसप छगकर कारणरूपमें स्थित हो जाता है, घुस-मिग बाता है॥ ६॥ परीक्षित् । पर्जन्यः शतष'गि भूमौ राजन् न वर्षति । प्रम्पका समय खानेपर सौ पर्पतफ मेघ पृथ्वीपर वर्षा नहीं करते। किसीको भन्न नही मिळता । उस समय सदा निरमे पन्योन्यभक्षमाणाः सुधादिताः ॥७॥ प्रजा मूख-प्याससे व्याकुल होकर एक-दूसरेको खने लगती है॥ ७॥ इस प्रकार कालके ठरवसे पीरित होकर धर्म पाखन्ति धनके कालेनोपद्वता प्रमाः । धीरे-धीरे सारी प्रजा क्षीण हो जाती है। प्रल्पकालीन सांपक्षक सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणों से समर, प्राणियों के सासद दैहिक मौम रसं सापतको रविः ॥८॥ शरीर और पृष्मीफा सारा रस खाच-खीचकर सो जाते रश्मिभिः पिपते पोरै। सर्व नैव पिमुञ्चति । है और फिर उन्हें सदाकी मति पृथ्वीपर बरसाते नहीं । उस समय सर्मणभगवान्के मुख्से प्रम्पकालीन संपर्तक सवः सवर्वको पहिः संकपमुलोत्थितः ॥९॥ अग्नि प्रकट होती है ॥ ८९॥ वायुके वेगसे यह और भी न जाती है और तल-मता वादि सातों नीचेके दात्मनिलवेगोस्थः शून्पान् भूविपरानय । कोको मस्म कर देती है। वडकि प्राणी तो पहले ही उपर्यधः समन्ताप शिखाभिर्षशिसूर्ययोः ॥१०॥ मर चुके होते हैं। नीचेसे पागकी करारी लपटें और उपरसे सूपकी प्रचण्ड गरमी ! उस समय अपर-नीचे, दपमान विभास्पद दग्धगोमयपिमपत् । बारों शोर यह बाण जख्ने लगता है और ऐसा मान पात, माना गोयरका उपस्त्र बलकर अंगरेके रूपमें तवा प्रषणपवनो पापामधिक शतम् ॥११॥ दहफया। इसके बाद अल्पकालीन भायात प्रचण परःसापर्तको पावि धूम्र व रजसाऽऽशवम् । सार्वक वायु सैकड़ों योतक पलती राती है। उस सममका साकाश ध और धूसे तो भरा ही रहता है, ततो मेपलान्पर भित्रवर्णान्यनेकश ॥१२॥ | उसके याद पसंख्यों रंग-बिरंगे यादछ अाफाशमें माराने गते हैं और बड़ी मयहरताके साप गरारजकर सैकड़ों शत पपाणि वन्ति नदन्ति रभसखनैः । बर्पतक वर्षा करते रहते हैं। उस समय प्रमाणके वव एकादक विशे प्रमाण्डविपरान्तरम् ॥१३॥ | भीतरका सारा संसार एक समुद्र हो जाता है, सब कुछ जरमान हो जाता है॥१०१३॥ उदा ममेर्गन्धगुण असन्त्पाप उदष्ठवे । इस प्रकार जब नष्प्रय हो जाता है, तामपपीके विशेष गुण गन्धको प्रस रेता है-अपन, डीन कर अस्वगन्धा तु पृथिवी प्रलपत्लाय कल्पते ॥४॥ लेता है। गन्ध गुणक जउमें लीन हो जानपर पृप्तीका प्रथ्य हो जाता है, पर जम धुन मिरपार जाप मन यती ॥१५॥ राजन् । इसके बाद चम्क गुण रसको अपो रसमथो वेजला लीयन्तेऽध नीरसाः। वेनखत प्रस सेता है और न नीरस होकर उनमें सम जाता है । तदनन्तर प्रयु वेनके गुण रुपको प्रस असते तेवसा रूपं वापुस्तद्रहित तदा ॥१५॥ स्वाहे वार क्षेत्र रूपरहित होकर वायुमें टीन हा बाता है। राम्श यायुके गुग सरी अनम मिय ठीयते पानिले बोपाया संग्रसते गुणम् । ल्वा है और वायु स्पहीन होकर भामाश पन्त हो

९२२
भीमद्भागवत
वि०५
।
सबै विशति खं राजस्तवम नभसो गुणम् ॥१६॥ | जाता है । इसके बाद ताम्स पाहार अाकाशके गुण
शब्दको प्रस लेता है और पाच शम्दहीन होकर
पदं असति भूतादिनभस्तमनु लीयते । तामस प्रहारमें छीन ऐ माता है। इसी प्रकार वैम्स
जैवसन्द्रिमाणपत्र देषान् पैकारिको गुमैः ॥१७॥ महार इन्द्रियोको धौर वैकारिक ( सालिक ) बाहर
इन्द्रियाधिष्ठातृ-देवता और इस्त्रियत्तियों को अपनेमे बन
महान् ग्रसत्पांकार गुणाः सत्यादयम तम् ।
कर देता है॥१५१७॥ तत्पपात् महसत बारको
और सत्त वादि गुण म्हचत्तको प्रस है। पीमित !
असतेऽव्याकृतं रामन् गुमान् फाप्लेन घोदितम् ।१८। इसम काफी महिमा है। उसीकी प्रेरणासे कपाळ
न तस्स कालावषैः परिणामादयो गुणाः ।
| प्रकृति गुणों को प्रस होती है और तप के प्रकृतिमी
प्रकृति शेष रह चाती है ॥१८॥भी घराबर जगतका
मनापनन्तमध्यकं निस्प कारगमम्पयम् ॥१९॥ | मूल कारण है। यह भव्यक, मनादि, अनन्त, नित्य
धौर अविनाशी है। नगर अपने पार्योंको जीन
न पत्र पापो न मनो न सत्वं
फरके प्रत्यके समप साम्यावस्थाको प्राप्त हो जाती है
समो रबो पा महदादयोऽमी ।
तब काके अवयव कर्म, मास, दिन-रात, अम वादिके
कारण उसमें परिणाम, प, पनि यदि किसी प्रकरके
न प्राणपुदीन्द्रियदेषता पा
विकार नहीं घेते ॥ १९॥ स समय प्राति स्पूछ
न संनिवेशः सल लोफकल्पः ॥२०॥ तमोगुण, इस अदि किफार, प्राण, पुषि, त्रिय
अपया सूक्ष्मरूपसे वाणी, मन, सत्गुण, रमोगुण,
न खप्नवागन्न च तत् सुषप्त
धौर उनके देवता बादि कुछ नहीं रहते । सत्रिक सम्प
| रानेवाले लोकोंकी कापना और उनकी स्पिति भी मही
न खं बलं भूनिलोऽपिरः ।
रहती ॥ २० ॥ उस समय स्वप्न, चामत् पौर सपति-
संसप्तरन्छन्परदप्रतक्ये
ये तीन अवस्थाएँ नहीं रहती। वामश, जा, भी,
अप, बनि बौर सूर्य भी नहीं यते । स्व कुछ सोये
समूलभूत पदमामनन्ति ॥२१॥
| हुएफे सम्पन शूम्य सा यता है । उस कास्पाका तक
शरा अनुम्मन करना भी असम्भव है। उस अन्यळकोरी
लपः प्राकतिको पेप पुरुयाम्पक्तमोर्यदा ।
नगदफा गभूत तत करते हैं ॥२१॥ इसी वास्थाका
नाम प्राप्त प्रध्या है। उस समय पुरुष और प्रकृति
भक्तपः सम्प्रलीयन्ते विवशाः फालविद्वताः॥२२॥ दोनोंकी शक्तियों का प्रभाक्से क्षीण हो जाती है वोर
विवश होकर अपने मूलस्वरूपमें स्मन हो जाती हैं ।२२।
पुदीन्द्रियारपण माने भावि तदाभयम् ।
परीश्चित् ! (बन अत्यन्तिक प्रम्प वर्षत् मोक्षण
स्वरूप कामपा नाता है।) मुदि, इनिध्य भोर उनके
विषयों के रूपमें उनका वषिष्ठान, मानस्वरूप बसी
भासित हो ही है। उन सपका तो माधि भी है और
अन्त मी । सम्मेि वे सब समय महास्य है
और अपने अधिष्ठनसे भिन्न उनकी सच भी नहीं।
श्यसाम्पविरकाम्यामापन्तवदयस्तु यन् ॥२३॥ इसउिये सपा मिष्पा-मायामाप्र है ॥ २३ ॥

म.४] ९२३ दीपमानुपपन्योतिषो न पृथग्भवेत् । जैसे दीपक, नेत्र और रूप-ये तीनों सेबसे भिन्न नहीं है, वैसे ही बुद्धि, इन्द्रिय और इनके विषय सम्पत्राएँ भी अपने वषिशनसरूप अझसे मिन नहीं -पपपि वा | इनसे सर्वया मिन है, ( जैसे रज्जुरूप अधिष्ठानमें एवंपी। खानि मात्राथन स्परन्पतमानात॥२४॥ षपस्न सर्प आपने अधिष्ठनसे पृफ्र नहीं है, परस्त अप्पस्त सर्पसे अधिधानका कोई सम्बन्ध नहीं है।)।२१। परीक्षित् ! जामत, स्वप्न धौर सुपसि-ये तीनों अस्थाएँ पुवामरण स्वप्नः सुपसिरिति चोपसे । सुद्धिकी ही हैं। प्रत इनके कारण अन्तररमामें जो विच, तैस वौर प्रारूप मानावकी प्रतीति होती है मह केवल मापात्र है। मुनिग्स नानापका एकमात्र मायामात्रमिदं राजन् नानात्वं प्रस्यगात्मनि ॥२५॥ सत्य मात्मासे कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ २५ ॥ यह निय अपचि और प्रल्पसे प्रस्त है, इसम्ध्येि अनेक यक्योंकर समा पानी है। अत यह कमी प्रममें होता है वीर कमी नहीं होता, टीक वैसे ही जैसे भाकाशमें मेषमाध्य पथो बलधरा ध्योम्नि भवन्सिन भवन्ति । की होती है और कभी नहीं होती ॥ २६ ॥ परीक्षित ! जगत्के म्पबहार में कितने भी धक्यत्री पदार्म होते हैं, उनके न होने पर भी उनके मिन-मिन श्वपत्र मनमीद तथा विश्वमषयष्यदयाप्पयात् ॥२६॥ स्स्य म्मने बाते है। क्योंकि ये उनके कारण है। वैसे पसहप अवयवीके न होनेपर भी उसके कारणरूपसूत्या अस्तित्व माना ही जाता है, उसी प्रकार कार्यरूप जगत्के षमपमें भी इस जगत्के कारणरूप बक्पबकी स्पिति सत्ये प्रवरसः प्रोका सर्वावपिनामिन । सकती है।। २७ । परन्तु में यह पार्य-कारणमात्र भी वास्तविक नहीं है। क्योंकि देखो, कारण तो सामान्य वस्तु है और कार्य विशेष वस्तु । इस प्रकारका जो मेद विनार्थेन प्रवीयेरन् पटस्पेषा सतवः ॥२७॥ रिखपी देता है, यह केवल भ्रम ही है । इसका हेतु यह है कि सामाम्य और विशेष मात्र मापेक्षिक है, पम्पोन्याधित हैं। विशेषके विना सामान्य और सामग्रम्पके यद सामान्य विशेषाम्यामुपलम्येव स भ्रमः । पिना विशेषी स्थिति नहीं हो सकती । काय श्रीर पारणभार थादि और अन्त दोनों ही मिरखे है, इसलिये भी वह स्वाप्निर भद-भपके सम्पन सपा वास्तु है ॥२८॥ इसमें सन्देह नहीं कि यह प्रपशप भन्पान्यापाश्रया सर्पमाघन्तपदवम्त यत् ॥२८॥ विकार स्वाप्निक विकारक सम्पन ही प्रतीत हो रहा है, तो भी या पपने अधिग्राम प्रसास्थरए आरम्पसे मिल नहीं है। कई यो भी ता आमासे मिलमपर्म अणुमाय विकार:सम्पायमानाऽपि प्रत्यगात्मानमन्तरा। भी इसका निरुपम नही पर सफ्ता । पर मारमासे १सरूमपरपुरया ।

९२४ भीमद्भागवत [.. न निरूप्पोऽस्स्पणुरपि स्याच्षेधित्सम आत्मव९ पृपा इसकी सवा म्पनी मी गाय तो यह मी चिस्प बालके | समान स्वप्रकाश होग, वौर ऐसी स्थिति में बरकमकी भौति ही एकरूप सिद्ध होगा ॥ २९ ॥ परन्तु एकना नहि सस्पस्स नानात्वमषिदान् यदि मन्पते । तो सर्वषा निश्चित है कि परमार्प-सस्य वस्तुमें नानाल नहीं है। यदि कोई कानी परमार्प-सस्य पस्तौ नानाल स्वीकार करता है, तो उसका यह मानना वैसा ही है, नैसा महाफाश धौर घटाकाशमा, पाकाशस्थित सूर्य नानास्त्र छिद्रयोर्यदन्योतिपोतियोरिव ॥३०॥ और नमें प्रतिविम्बित सूर्यका तथा मा वायु वीर पथा हिरमं बहुधा सेमीयते धान्तर पयुका मेद मानना ॥ ३०॥ नभित कियाभिर्मवहारपमम् । जैसे व्यवहारमें मनुष्य एक ही सोनेको क्नों होम गह-गमकर तैयार कर लेते है और कंगन, पन पपोमिर्मगवानभोधयो | कुणाल, करा वादि अनेक सोमें मिलता है। इसी म्यास्म्यायवे लौफिकवैदिकने। ॥३१॥ प्रकार व्यवहारमें निपुण विद्वान् मेकिक दौर मेदिक | वाणीके द्वारा इनित्रयातीत वामस्वरूप भगवान्का भी पथा घनोऽप्रभवोऽर्फदर्भिसो | अनेकों रूमि वर्णन करते हैं ॥३१॥देखे न, बादल सूपसे पोष्ठभूतम्म प धुपस्तमः । उपम होता है और सूर्यसे ही प्रकाशित । सिर में एवं त्वई प्रसगुणस्तदीक्षितो सूर्यकेही वंश नेत्रकि छिये सूर्यका दर्शन होनेमें बनक क्न बैठता है। इसी प्रकार भार भी हमसे ही प्रयांशकस्मात्मन भास्मपन्धनः ॥३२॥ तत्पन होत्य, प्रमसे ही प्रकाशित होता वोर के घनो पदार्फप्रभवो विदीर्यते वंश जीवके लिये सस्वरूपके साक्षात्कारमें बपक म पाः स्वरूपं रविमीयते वदा। | बैठता है ॥ ३२ ॥ जब सूर्यसे प्रकट होनेकाम पादर तितर-बितर हो माता ने पपने सहप सूर्यका पदा पहंकार उपाधिरास्मनो दर्शन करनेमें समर्थ होते है। ठीक वैसे ही, जब बीवके जिलासमा नश्पति तर्मनुस्मरेत् ॥३३॥ दयमें निकासा भाती है, क्ता कामी उपानि बाहार मदेवमेतेन विषेकहेविना नष्ट हो जाता है और उसे अपने ससमा समयम हो जाता है ॥३३॥ प्रिय परीक्षित जन जीव विवेक मायामयाईफरणात्मम धनम् मासे मायम्य पाहारमा पचन फट देखा है, ता छिवाम्पुतात्मानुभषोऽवतिष्ठते यह वपने एकरस जस्मस्मरूपके साक्षात्कार में स्मित हो तमाहुरात्यन्विफमा सम्प्ठयम् ॥३४॥ आरपन्तिक प्रश्य पढ़ी जाती है ॥ ३ ॥ | जाता है। मामाकी परमपामुक्त पास्तविक स्थिति ही नित्यदा सर्वभूतानां समादीनां परंतप । हे शरमन ! तत्वदर्य मेग कहते है किसे मेवर तिनकेतक जितने प्राणी या पदार्थ है, सभी र समय पेटा होते और मरसे ग्रते हैं। वर्षद निस्पहपसे उस्पचिप्रतयाफ एममाः सम्प्रचक्षत ॥३५॥ । टपति और प्रप होता ही रहता है ॥ ३५॥ १ भास्मान् ।२ पोरपि। प्रतीयते।४ पाव चमः । ।

म०४] मादश स्मन्म ९२५ फालसोसोजयेनानु हिपमाणस्य निस्पदा । संसारके परिणामी पदार्प नदी-प्रवाह और दीप-शिख मादि क्षण-क्षण पदलते रहते हैं। उनकी बदलती हा वपस्सायो को देखकर यह निध्य होता है कि देह आदि भी पासप परिणामिनामनस्वास्ता जन्मप्रलयोतषः ॥३६॥ सोकेके वेगमें कहते कदमते जा रहे हैं । इसलिये क्षण- अणमें उनकी उपति और प्रल्प हो रहा है।॥ ३६ ॥ अनापन्तवमानेन कालेनेघरमूर्तिना। बैसे आकाशमै गरे हर समय चल्ते ही राते है, परन्तु उनकी गति स्पष्टरुपसे नही दिसपी पस्ती, ऐसे ही मगवान्के सरूपभूत अनादि-मनन्त फाळके कारण अवस्सा नैर रमपन्ते विपति ज्योतिपामिव ॥३७॥ प्राणियोंकी प्रतिक्षण होनेवाली उत्पत्ति और प्रलपका भी पता नहीं पता ॥ ३७॥ परीक्षित ! मैंने तुमसे घार निस्पो नैमितिकाचैष तथा प्राकतिको लया। प्रकारके प्रल्पका वर्णन किया, उनके नाम हैं-निस्य प्रख्य, नैमितिक प्रलय, प्राकृतिक प्रख्य वौर बास्पन्तिक प्रख्य । प्रस्वपमें कालकी सूक्ष्म गति ऐसी ही है ॥३८॥ मात्पन्तिकप फपितः कालस्प गतिरीरशी॥३८॥ है फुरुश्रेष्ठ । विध-विधाता भाषान् नारायण ही समस्त्र प्राणियों और शक्तियों के बामप है। वो कुछ एता: इरुभष्ठ खगद्विधातु मैन संक्षेपसे कहा है, वह सब नहींफी अलग-कपा है। नारायणस्पाखिलसवधाम्नः भगवान्की लीम्प्रोमा पूर्ण पणन तो स्वयं महाबी भी लीलापथास्ते फपिताः समासप्तः नहीं कर सकते ॥ ३९ ॥ जो मेग भक्त दुस्तर कासन्न नाजोऽप्पभिभातमीयः॥३९॥ संसार-सागरसे पार जाना चाहते हैं अपवा को ध्येग अनेकों प्रकारके तु दावानमसे दम्ब हो रहे हैं, उनके संसारसिन्धुमविदुस्तरमुचितीर्पो- लिये पुरुषोतम भगवान्फी टीम-कायारूप रसके सेपन के न्यः यो भगवतः पुरुपोचमस्य । अतिरिक और कोई साक्न, कोइ नौका नहीं है। ये के ठीला रसापनका सेवन करके ही अपना ममोरप लीलाधारसनिपेषणमन्तरेण सिद्ध कर सकते हैं॥१०॥नो कुछ मैंने महें पुंसो भवेद् पिविषावदनादितस्म॥४०॥ | सुनाफा है, यही श्रीमद्भागवतपुराण है । इसे सनातन पुराणसंदितामेतामूपि रायणोऽम्यय अपि नर-नारायणने पाल देवर्षि नाररको सुनाया पा और उन्होंने मेरे पिता महर्षि कृष्ण पापनको ॥ ११ ॥ नारदाय पुरा पार कष्णदेपापनाप ॥४१॥ महारान ! उन्हों यरीबनविहारी भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनने सये मई महाराज भगवान् पादरायण । प्रसन्न हाफर मुझे इस दम्प ग्रीभागयतसंहिताका उपदेश इमा भागपती प्रीस संहिसां पदसम्मिताम् ॥४२॥ | रिया ॥ १२॥ पुरुश्रेष्ठ ! आगे चयर स्य शौनकादि एवो यक्ष्पत्यसो छत सपिभ्यो नैमिपालये। ऋषि नमिगरण्य क्षेत्रमें बहुत या सत्र करेंगे, तब उनक प्रस्न करनेपर पौराणिक वस्छ श्रीमती उन दीर्घसने फुरुमष्ठ सम्पृष्टः यौनकादिभिः ॥४३॥ | प्रेगका इस संहितामा भ्रमण मागे ॥ १३ ॥ इति श्रीमद्भागयते महापुराणे पारमहस्य संहितार्या सारस्वत्ये चतुर्पोऽध्याय ॥।॥ १N परमार्थविनिमय माम |

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५०५] शदश स्कन्ध ९२७ स्नेहाधिष्ठानवर्यपिसंयोगो याषदीयठे। है।"६|| बक्ताक के,तेउ रस्सना पात्र, सीबोर भागका संयोगरता है, तभीतक दीपमें दीपकराना है। वैसे ही उनके (ही समान जक्सफ आरमाका फर्म, मन, शरीर और इनमें रहन्वा पेस्पाप्यासफ साय सम्बन्ध रहता है तभीतक वो दीपस्प दीपत्वमे देहरुवो भवः। उसे जन्म-मृत्यु के चक्र संसारमें मटकना परता है और रनोगुण, सत्वगुण तथा तमोगुणधी वृत्तियोंसे उसे उत्पन, स्पित एवं विनष्ट होना पाता है॥७॥ परन्त रजस्सचवमोया जायतेऽय विनश्यति ॥ ७॥ जैसे दीपपके घुम्न मानेसे तस्वरूप वेजका विनाश नहीं होता, जैसे ही संसारका नाश होनेपर मी स्वयंप्रकाश धामका नाश नही होता । स्पोकि यह कार्य और नसबारमा स्वयज्योतियोम्यकाम्यक्तयोम्परः। कारण, यक और धन्यक सबसे परे है, यह व्यकाशके समान स्यका आधार है, नित्य और निधन, वा आकाश इस पाधारो ध्रुवोऽनन्तोपमस्ततः ॥ ८॥ अनन्त है। सचमुच पारम्पकी उपम्य वात्मा ही है।॥ ८॥ एपमारमानमात्मस्तमात्मनैयामुश प्रभो। है. रानन् । तुम अपनी विशुर एवं विकाती बुद्धिको परमारमाके फिन्तनसे भरपूर कर से और स्वयं ही अपने अन्तरमें स्थित परमारमाया साक्षात्कार पुपानुमानगर्भिण्या पासुदेवानुचिन्तया ॥९॥ | करो ॥ ९॥ देखो, तुम मृत्युओंकी भी मृत्यु हो। तुम स्वयं ईश्वर । मामणके पसे परित तक्षफ तुम्हें घोदितो विप्रवाफ्पेन नत्यांभक्ष्यविवपकः । मस्म न कर सकेन । षषी, तक्षपकी तो बात ही स्पा, स्वयं मृत्यु और मूओंका सम्र भी सुमारे पासतक न मस्ययो नोपपल्यन्ति मृत्यूनो मृत्युमीघरम् ॥१०॥ फटक सगे ॥ १० ॥ मुम इस प्रकार अनुसन्धान- चिन्तन करो कि में ही सर्वाधिष्ठान परामई। अहं प्रध पर धाम प्रदाह परमं पदम् । सविधन य में ही है। इस प्रकार तुम क्यने अपने अपन वास्तविक पफरस अनन्त वा स्वरूपमें एवं समोघमात्मानमारमन्पाधाय निष्कले ॥११॥ स्थित मर ॥ ११॥ उस समय बरनी विरेटी जीभ पगाता दुआ, अपने होटयेक पाने घाटा हुआ दशन्त वधर्फ पादे ललितानं विपानने।। सक्षम आय और अपने विराम मुछेसे मुम्हारे पैरोंमें रस या परमा नहीं। तुम बरने पारमनपर्म नपसि शरीरं ष विश्व प पृथगारमनः ॥१२॥ स्मित हार इस भारका--और तो क्य, सारे रिको भी पानेसे पक्न दबगे ॥ १२ ॥ आरमसमर स्य पतस कथित सात यथाऽऽरमा पृष्टवान् नप। पशिव ! मुमने निशान भगवान् की बीयके सम्मधर्म या प्रश्न शिप, उसरा उतर मने द दिया, अर रेस्पिास्मनपष्ट किया थातुमिच्छसि ॥१३॥ पर क्या मुनना चाहते हा ॥ १३ ॥ - इति श्रीमदगम्ने मागगे पारम्हस्व संदिवापामा मापद नामनेऽयाप ॥५॥ १बार ।९ पास ९२८ श्रीमद्भागवत [अ०१ सूत उपाय अथ पष्ठोऽध्याय परीमित्की परमगति जममेझयम सर्पसत्र मौर घेदोंके शामामेव भीमनामी कहते हैं-शौनकादि अपियो ! म्पस मदन श्रीशुकदेव मुनि समस्त घराचर जगत्को वानी एतानिशम्प मुनिनाभिहित परीषि वामइके रूपमें अनुभव करते हैं और म्पहार सके म्पासात्मजेन निखिलारममा समेन | | प्रति समष्टि रखते हैं । भगवान्के शरणागस एवं उनके द्वारा सुरक्षित राजर्षि परीक्षित ने उनका सम्पूर्ण उपदेश सस्पावमूलमुपसृस्प नवेन मूर्भा बड़े प्यानसे प्रवण किया । बम से सिर मुसाकर उनके चरणों के सनिक और पास सिसक माये व वाडि पदाअलिखमिदमा स विष्णुरातः ॥१॥ बाँधकर उनसे यह प्रार्थना करने लगे ॥१॥ राजोवाच पमा परीसितमे कहा-भगवन् । पाप करपाके मूर्तिम्पन् सम्प हैं। अपने मुझपर परम का करके सिदोऽस्म्पनुगृहीतोऽसि भगवाकरमारमना । धनादि-अनन्त, एकरस, सख्य भगवान् श्रीहरिके सरूप और प्रमोंका पर्मन किया। में बारकी प्रासे भागितो पप मे साधादनादिनिधना हरिः ॥२॥ परम अनुगमीत धौर क्तकस्य पे गप हूँ॥२॥ संसारके प्राणी अपने सार्प वौर परमापक मानसे शून्य १और विमिम प्रकारके चोंके दानम्से दम्भ हो नास्पतमई मन्ये महसामपुतारमनाम् । हे। उनके ऊपर भारम्य महामोंका मनपा होना कोई नयी, घटना भपता थार्यकी मत ना है। अधेषु तापतप्तेषु भूतेषु यदनुग्रहः ॥३॥ | या तो उनके लिये सामामिक ही है ॥ ३ ॥ मैंने मौर मेरे सप धौर मात से मेने वाफ्के मुखरक्दिसे पुरामसंहितामेवाममोप्म भपतो वयम् । इस भीमद्भागवत महापुराणमा प्रषण किया है। इस पुराणमें पद-पदपर भगवान् श्रीहरिके उस स्वरूप और उनकीकों- पसा सस्वमक्षाको भगवाननुपर्पते ॥४॥ का वर्णन इषा , सिक गानमें यो-या वापराम पुस्प रमते राते हैं ॥ १॥ मगन् । धापने मुझे भगवस्तषकादिम्पा मस्पुम्पान विमम्पाम् । धमपपदफा, मम वौर भारमाकी एकताका समस्कार कर दिया है। पब में परम शान्तिस्वरूप में मित है। पव मुस सभक अदि किसी भी सूयुके निमितसे प्रवियो प्रम निर्वाभमभय दर्शितं स्वया ॥५॥ अपना दम मदर मुस्युओंसे भी भय नहीं है। मैं बम्प ऐ गप ॥५॥ प्रान् । अप मुनो नाम मनुबानीहि मा प्रयन् वार्ष यच्छाम्पपोषले । दीमिये कि मैं अपनी वणी कर, मौन हो गई और साथ ही कामनाक संस्कारसे मी रहित पिको मुतकामाचर्य घेतः प्रपश्य विसबाम्पन् ॥६॥ इन्द्रियातीत परमारमाके स्वरूप, विभीन करके गाने J पामा 1 . माहित समाशि।

९२९ सूत उपाय । महानं प निरस्तं मे मानविज्ञाननिष्ठया । प्राणोंका त्याग कर दूं ॥ ६ ॥ बापके ारा उपदेश किये हुए जान धौर विज्ञानमें परिनिष्ठित हो जानेसे मेरा कान सर्पदाके लिये नष्ट हो गया । बापने मगवान्के भवता दर्षित क्षेम पर भगवतः पदम ॥७॥ परम कल्याणमप सहपका मुझे साक्षात्कार कर दिया है॥७॥ श्रीसखजी करते हैं-शौनकादि ऋषियो । राजा स्पुकम्तमनुप्राप्य भगवान् पादरापणिः । परीक्षितने मावान् श्रीशुकदेक्नीसे इस प्रकार कहकर वाई प्रेमसे उनकी पूजा की । अब वे परीझिस्से विदा मगाम भिक्षुभिः सार्फ नरदेवेन पजित ॥८॥ लेकर समात त्यागी म्यामाधों, भिक्षुओंके साप हाँसे चले गमे ॥ ८॥ राजर्षि पीक्षितने भी बिना किसी वाध सहायता के स्वयं ही अपने अन्तरमाको परमात्माके परीषिदपि राजपिरात्मन्यात्मानमारमना । चिन्तममें समाहित किया और पानम्मन हो गये। उस समप उनका पास-प्रयास भी नहीं पता था, ऐसा समाधाय पांदण्याषस्पन्दासुर्यथा तरुः ॥ ९ ॥ चान पाता था मानो कोई सफा हूँठ हो ॥ ९॥ मोले गासनीके तटपर कुश्यको इस प्रकार पिछय रस्सा प्राक्कले परिप्यासीनो गाल उदसलः। पा, विसमें उनका अपम्पग फिी ओर हो और उनपर स्वयं उप मुंह होकर बैठे पुए थे। उनकी मासक्ति प्रममूता महायोगी निस्सङ्गश्छिन्नममयः । १०॥ घोर संशय तो पहले ही मिट मुके थे। अब वे ब्रह्म बौर मामाकी एकसाम्प महापागमें स्थित होकर प्रम- तक्षकः प्ररितो विप्राः हदन विजनुना । सरूप हो गये ॥१०॥ शौनकार अपियो । मुनिकुमार श्रीने मोषित इन्तुकामो नृप गन्छन् दार्श पथि फश्यपम् ॥११॥| होकर परीक्षितको शाप दे दिया था । अब उनका मेजा रामा तयाक सर्प रामा परीक्षित्को उसनेके लिये उनके तं तर्पयित्वा निर्गनियम पिपहारिणम् । पाठ छा । यस्तेमें उसने कश्यप नामके एक प्रक्षणको | देवा ॥ ११॥ कस्पप प्रमाण सर्पविपकी चिकित्सा | करनेमें बह निपुण थे। तभकने यात सा धन देकर विमप्पप्रतिच्छन्ना कामरूपोऽवयन्नृपम् ॥१२॥ कश्यपको वहीसे मैटा दिया, ठनें सबके पास न पाने दिया । और सप ब्रमणके रूपमें छिपकर, क्योंकि प्रपमुवस राबर्दाऽगिरलाग्निना। वह अनुसार रूप धारण कर सकता था, राजा पीक्षितके पास गया और उममें उस लिया ॥ १२ ॥ पभूम भमसात् तपः पश्यसो सर्वदेहिनाम् ।।१३।। रानपि परीभित् तक्षकके उसनेके पास ही प्रममें स्थित हो चुके थे । बम तक्षको विषकी बागसे उमा हाहाकारो महानासीद् सवि से दिमु सर्वतः । शरीर सबके सामने ही जम्मर भस्म हो गया ॥ १३ ॥ पृषी, मामा और सब दिम बढ़ जोरसे हाय-हाय की पनि हाने लगी। दकता, कर, मनुष्य पिस्मिता पभवन् मर्षे दयासुरनरादय ॥११॥ वादि समक-सब परीक्षितको यह परम गति देम्पकर मा सहं २ ११७- ९३० भीमामक्व फरा- देवदन्नुभयो नेदुर्ग प्सिरसो जगुः । विस्मित हो गये ॥ ११ ॥ देवतामोंकी मियाँ अपने- पपुर पुष्पवर्षानि विषुधाः साधुवादिन ॥१५॥ देवतागोग साधु-साधु' के मारे गाकर पुष्पोंकी वर्ष आप मन ळी । गर्म और अप्सराएँ गान करने मगा। बनमेजयः स्वपिवरं भुत्वा वक्षकभधिवम् । करने मो॥ १५॥ मन जनमेजयने पुना कि तक्षकने मेरे पिताजीको पथावहाष सहदो नागान् सत्रे सह द्विजैः ॥१६॥ रस म्यिा है, तो उसे पड़ा क्रोध हुन्छ । कामह ग्रामों के साप विधिपूर्वक सोका अग्निकुम्पडमें हक्न करने सर्पसत्रे समिदाग्नी दसमानान् महोरगान् । मग ॥ १६ ॥ तक्षकने देखा कि जनमेजरके सर्पसत्र- की प्रचलित अमिमें पड़े-पड़े महासर्प मस्म होते ना रष्ट्रेन्द्र भयसंविग्नस्तक्षकः मरण पयो ॥१७॥ हे हैं, तब वह अत्यन्त भयभीत होकर देवयन लाकी शारणमें गया ॥ १७॥ बहुत सपोंके मस्म होनेपर में मपश्यनक्षतं तत्र राजा पारीक्षितो द्विजान् । तक्षक न वाया, यह देखकर परीक्षितनन्दन रामा चन | मेजयने नामोसे कहा कि प्रामणो । भक्तक सपधिम उवाघ वक्षः फसान्न दमनोरगाममः ॥१८॥ तक्षक क्यों नहीं भस्म हो रहा है। ॥१८॥ मने -राजेन्द्र ! तक्षक इस समय इन्द्रकी शपमें सं गापापति राजेन्द्र शक्रः शरणमागतम् । पला गापा है और में उसकी रक्षा कर रहे ।। तेन संस्तम्भितः सर्पस्तमा नाम्नौ पतस्पसौ॥१९॥ कुममें गिरफर भस्म नहीं हो रहा है ॥ १९॥ परीक्षित ही तशकको स्खम्मित कर दिया है, इसीसे र अग्नि- पारीक्षित इसि भुस्वा प्राइविंज उदारधीः । मन्दन बनमेनप से ही मुद्धिमान् गौर पीर थे। उन्होंने प्रमों की बात सुनकर प्रलिनोंसे फा कि प्राम। सोन्द्रस्तषको विप्रा नाग्नौ किमिसि पात्यते ॥२ ॥ आफ्लेग इन्द्र के साथ फको क्यों नहीं बम्निमें करा देते ॥ २० ॥ जनमेजयकी बात सुनकर प्रमोंने तमुवाऽऽपुर्विप्राः सोन्द्र तथक मखे। उस यहमें इसके साथ तक्षकका बम्निकुण्ण बागान सपफासु पतस्पेह सोन्द्रण मरुस्थता ॥२१॥ किया । उनोंमे कहा-रे तक्षक मात्रमके सर पर इन्द्र के साप इस अग्निकुममें शीघ्र वा पड़ा ॥२१॥ इति प्रमादिसाक्षपैः सानादि द्रः प्रचारितः जन ब्राह्मणों ने इस प्रकार बानमन्त्रमा पाठ किया, तम स्प्रे इन अपने स्थान-भार्गकसे लिपरित हो पम्प सम्भ्रान्तमतिः सविमान सतषः ॥२२॥ | गये । विमनपर बैठे हुए इम्य सक्षम साप ही मत हे पतन्तं विमानन सहधकमम्परात् । पाया गये और उनका बिमान मी चार काटने ख्या ॥ २२ ॥ वशिरानम्दन पात्पतिमीने देख कि पिलोमाङ्गिरसाप्राहराबान त पास्पतिः॥२३॥ माकपासे देवराम इस विमान और के साथ ही वम्निकुममें गिर गई, तम मोंने रामा ममेम्पसे नैप तया मनुप्मेन्द्र षधमईति सर्पराट् । कहा-॥ २३॥ नरेन्द्र साव तक्षामो मर मम्मा भापके पोम्प काम महीं है। यह अमृत पी पुका है। अनन पीपममृतमय वा ममरामरः ॥२४॥ इसलिये यह जम और धमर है ॥ २५ ॥ १ तपमान १२ फागः।। रोऽमरा! .

सूत उपाय म.६] दादा स्कन्ध जीवितं मरण जन्तोर्गसि स्वेनेष कर्मणा । राजन् ! जगत के प्राणी सपन-अपने कर्म के अनुसार ही जीवन, मरण और मरणोर गति प्राप्त करते है। कर्मक पति- राजन्ततोऽन्यानान्पस्स प्रदाता सुखदाम्बयोः ॥२५॥ रिक और कोई भी किसीको मुख दुख नही दे सकता ॥ २५ ॥ जनमेजय ! यों तो वमुत-से लोगनेकी मृत्यु साँप, चोर, बाग, निकी दिसे सपा भूस, प्यास, सर्पयोराग्निषिघुम्यः क्षुदृयाभ्यादिभिर्नुप । रोग यादि निमितोंसे होती है, परंतु या तो कहनकी पञ्चत्वमृच्छते अन्तर्मय आरम्पर्म वेत् ।।२६॥ बात है । वास्वपमें तो समी प्राणी अपने प्रारम्भ कर्मका ही उपभोग करते ॥ २६ ॥ राजन् ! तुमने बहुत से निरपराध सोको जय दिया है । इस षभिचार-याका तमात् सत्रमिदं राजन् संस्पीयेवाभिचारिकम् । फल केवल प्राणियोंकी हिंसा ही है । इसरिये इसे मैद सपा अनागसो दरभा जनैर्दिष्ट हि मुम्पते ॥२७॥ कर देना चाहिये । स्पेकि नगदके सभी प्राणी अपने- अपने प्रारम्पकर्मका ही मोग कर रहे हैं ॥ २७॥ भीमाची फरते है-शौनकादि अपियो । महर्षि दास्पतिबीकी मातका सम्मान करके जनमेजपने कहा कि पापकी वास ARरोधार्य है। उन्होंने सर्प-सत्र पद इत्युक्तः स तत्पाह महर्षेनियन् वचः । पर दिपा और देवगुरु पृास्पतिनीकी विधिषक पूना की ॥ २८ ॥ श्रमिगण ! (निससे विद्वान् प्रमणको भी कोष वाया, राजाका शप एक्षा, मृत्यु हुई, फिर नन- सधातुपरत पूजयामास पाक्पतिम् ।।२८॥ | मेन्यको काध वापर, सर्प मारे गय ) यापी भगवान विष्णुकी महामाया है । यह अनिर्वचनीप है, इसीसे मायनके सम्पभूत चीप काधदि गुण-पतियों के विप्मार्मामायापाप्ययालक्षणा यया । जारा शरीरेमि मोहित हो जाते हैं, एक सरेका र स्व दते और भागते हैं और अपने प्रफनसे इसको नित नहीं कर सकते ॥ २९ ॥ ( विष्णुमगवान्फे स्वरूपका निश्चय करके उनका भजन करनेसे ही मामासे निति परपस्यैमात्ममता मूतेषु गुणपिभिः ॥२९॥ होती है, इसलिये उनक समापका निरूपण सुनो-) यह दम्भी है, पाटी हास्याफारक बुदिमें बार-यार को न यत्र दम्भीस्यभया पिरास्सिा दम्भ फारफा सनम होता है, वही माया है। मन अल्म- वारी पुरुष भामचर्चा करने लगते है, ताबा परमाफ खरूपमें निर्भय रूपसे प्रक्षित नहीं हाती, विस्तु मय- मापाऽऽरमवावासादास्वादिभिः । मत होकर यमा मह वा पार्य न करती नाही किसी प्रकार रहती है। इस सपर्म उसका प्रतिपादन किया गया है। मापाक भित नाना प्रकारक न यहिखादा विविधस्तदाभयो लिवर मनबाद में परमारमाफ सम्पर्म नहीं है, क्योंकि से शेविश्पक है और परमरमा र है। म बाद-विवादी ता पत ही स्पा, व्यक्त्परत्यक्ष मनप संम्पनिमसाति यत् ॥३०॥ | दिपयोंक सम्पप सहन्य-पिकल्प करने मन ९३२ भीमसागवत न यत्र सज्प समतोभयोः परं शान्य हो जाता है ॥ ३०॥ कर्म, उसके सम्पादकी सामग्री धौर उनके पारा साप्यकर्म-इन तीनोंसे मन्किा यम बीवखिमिरन्वितस्वदम् । भारात्मक जीष-या सम जिसमें महीम सरूप परमात्मा न तो कमी किसीफ दारा अषित होता देवनुत्सादिवपापपार्क है और न तो किसी विरोधी ही है। जो पुरुष उस परमपदके सहपका विचार करता , हमनकी माया- मपी लहरों, बाहार आदिका वाध करके सप वस्ने निपिज्य चोमीन् विरमेत् स्वयं मुनिः।।३१॥ वामशरूममें विहार करने अगता है ॥ ११ ॥ जो मुमुक्षु एव विचारशीठ पुरस परमपदके अतिरिक्त यसका परं पद जपमामनन्ति तव परिम्याग करते हुए नेति नेति के आरा उसका निषेध करके ऐसी वस्तु प्राप्त करत, जिसका कमी सिर यमेति नेतीत्पतन्सिसक्षवः । नहीं हो सकता और न तो कमी त्याग ही, वही तय भगवान्का परम पद है, यह बात सभी महान बोर बिसय दौरारम्पमनन्यसौदा शुतियों एक मतसे सीकार करती हैं। अपने पिस्को एकाप करनेामे पुर परत करमकी मुशियको, दोपगुपालसित भनाम-भावनामोको सदा-सदाके लिये मिटाकर माम्प समाहितः ॥३२॥ प्रेममासे परिपूर्ण प्रयके मारा उसी परम पदमा कमिशन करते और उसीमें समा जाते हैं ॥ ३२ ॥ विण- व एतदधिमप्यन्ति विधार्यत् परमं पदम् । भगवान्का यही वास्तविक स्वरूप है, यही उनका परम पद है । इसकी प्राति मी अगोंको होती है, जिनके आई ममेति दीर्घन्य न पा देगेहजम् ।।३३।। क्त करण; शरीरक प्रति महमान नहीं है और न तो इसके सम्बधी गा धादि शामि ममता ही । सचमुम अतिवादोस्तितिक्षेत नावम पेत कपन । भगवकी वस्तुओं मेंगन और मेरेपनपा आरोप सुत ही दुनता है ॥ ३३ ॥ शैनकनी ! जिसे इस परम- फ्रकी प्राप्ति भीम है, उसे चाहिये कि प सरोकी न घेर्म देहमाधिस्य बरं कुर्वात मनधित् ॥३४॥ । कटु मणी सहन कर से और बरमें किसीका अम्पन्न न करे । इस क्षणभर शरीरमें महत्तम मामा करके रिसी नमो भगवे तस्मै फणायाकुण्ठमेधसे । भी प्राण्ग्रेस कभी पैर न करे ॥२॥ भगवान् श्रीकृष्णा द्वान अनन्त है। महीके चरणकमक पानसे मैने इस श्रीमद्भागात महापुरामा अप्पपन मिस यत्पादाम्पुलरध्यानात् सहिवामपगामिमाम्॥३५॥ वम उनसे नमस्कार करके या पुराण समास करता में मोमा उपराष शीमकलीम पूण-साधुशिमोमगि सूतजी" पंतादिभिम्पामसिप्पैर्वेदाचार्महात्मभिः । म्यासनीक शिम्प पेउ भनि माया मामा और साम्पपम् । भेरिमेत सम्मतिः स्पषु ।

सूत उपाय ९३३ म०६] पेदाप कतिधाम्पस्ता एतत् सौम्याभिषेहि नः॥३६॥॥ वेदोंके प्राचार्य थे। उन लोगोने कितने प्रकारसे वेदोंका विभाजन किया, यह मात बाय या करके हमें सुनाइये ॥ ३६ ॥ साजीने कहा-मन् ! जिस समय परमेष्टी प्रमानी पूर्वसरिका जान सम्पादन करनेके मिसे एकाम- पित हुए, उस समय उनके दयाकासे काठ तास समापिसास्मनो नमन् प्रमणः परमेहिनः । भादि सानोंके सपसे रहित एक अफ्त बिरक्षण अनाहत नाद प्रकट गया । मय जीव अपनी मनोहत्यि- को रोक देता है, उसे मी ठस भनाइत नादफा स्पाकासादभूभादो प्रतिरोधात् पिभाम्पते ॥३७॥ अनुभव होता है ॥ ३७॥ शौनकली ! बोबा योगी उसी अनाहत नादकी उपासना करते हैं और उसके प्रमासे मात करणके दम्य (अधिमूस ), निया यदुपासनया प्रमन् योगिनो मलमारमनः । ( पप्पाम ) और फारक ( अधिदैव ) रूप मलको नष्ट | करके वह परमगतिरूप मोक्ष प्राप्त करते हैं, जिसमें नम्म-मृत्युस्म ससारमक नहीं है ॥३८॥ उसी बना- द्रम्पक्रियाकारकास्य पूस्वा मान्स्पपुनर्मषम्।।३८।। हत मादसे साकार, कार और मकाररूप तीन | मानोंसे युक्त अयार प्रकट हुका । इस ॐफारकी शकिसे ही प्रकृति कपकसे म्पफरूपमें परिणत हो जाती ततोऽभूत्रिदोशरो योऽध्यकप्रभवः स्वराट् । है। ॐकार सय भी भम्यक एवं अनादि है और परमात्मसाप हानके कारण स्वयंप्रकाश भी है। जिस पचल्लि भगवतो प्राणः परमात्मनः ॥३९॥ परम वस्तुको भावान् मय वपया परमापके नामसे कहा जता है, उसके सरपका योध भी फारक हाराही होता ॥ ३९ ॥ जव नमेन्द्रिमी शहि सुमारे भूपाति य इम स्फोटं मुप्पथोत्रे पशून्परम् । जाती है, तब भी इस अपारफो—समस्त अपेको प्रकाशित करनेवाले स्फोट तत्पको जो सुनता है और मेन पाग म्पन्पते परसम्पकिराकाश पारमनः॥४०॥ मुक्षि एवं समाधि-अवस्थाओं में सबक गमावको मी नानता है, वही परमामाका विभुद स्वरूप है। वही ॐकार परमपम्पसे दयाक्मशमें प्रष्ट होकर पेदरूपा खधाम्नोप्रपण साधावू पापका परमात्मनः। प्राणीको अमिन्मक करता है॥१०॥ ॐकार अपने माप परमम्प परणामका साक्षात् पच्क है। और ॐकार ही सम्पूर्ण मत्र, उपनिषद् और वेदोका स्ना- स सर्वमन्त्रोपनिषदलीप सनातनम् ॥४१॥ | तन यीब है ॥ ११ ॥ सस पासंखयो वर्षा बारापा भृगया। शौनफनी ! कारके तीन मण-बा, '' बार म् । य ही तीनों पर्ण सत्व, रज, तम-न तीन गुणों, अफ, पा, साम-न तीन नार्मो म् , मालनि रिकि रूपमें तीन-तीनकी संत भीमामा तीन अर्पो और जामत, रून, न यत्र स- १२४ भRT TRI IIRIT मोरामायण सोमबारसलीपिनामम् ॥५॥ रोमासो रो रोममिरिनधि। सम्माविमान सोधारामातुर्योधविपक्षमा ४४॥ पुत्रानापापपचीख ममीन मसकनषिदान् । । से परम्परपा प्राप्तास्वपिठौतियः । मयोंको धारण करते हैं ॥ १२ ॥ इसके कर सञ्चितिमान् माजीने अकारसे ही क्त्त स ( प. ७ ब), उम (श, ष, स, ह), स्वर ( से बीतक), स्पर्श ( कसे मादक ) तप हल और दीर्घ धादि धोंसे मुफ अक्षर-समामय वर्षात् गर्न मालकी रफ्ना की ॥ ३ ॥ उसी वर्णमाम्मारा माने अपने पार मुखोंसे होता, बर्ष, उद्गाता और - इन चार सिकि कर्म बतअनेके लिये ॐकार और प्यातियोंके सहित चार वेद प्रकट किसे और अपने पुत्र समर्पि मीधि आदिको घेदाम्यफ्नमें कुश देखकर में वेदोफी शिक्षा दी । ये सभी जब धर्मका उपदेश ते तु धर्मोपदेशारः पुप्रभ्यः समाविछन् ।।४५१ करनेमें निपुण हो गये, तब उन्होंने वपने पुत्रोंको उनका अप्पयन कराय॥१११५॥ तदनम्तर, उन्हीं लोगों के नैष्ठिक प्रमापारी शिष्प मधियों के द्वारा चारों में सम्प्रदायके रुपमें दोफी रक्षा होती रही । प्रापरके चतुर्युगेषध म्पस्ता द्वापरावौ महर्षिभिः ॥४६॥ पन्त मार्पियोंने उनका विभाजन भी किय ॥ ४६॥ जब बामवेदा अपियोंने देखा कि सम्पक फरसे रोगों- धीणापुपक्षीयसवान् दुर्मेधान् वीक्ष्य कालव । की आयु, शकि और पुदि क्षीण हो गयी है, सप उन्होंने पपने हदय-देशमें विरानान परमामाकी प्ररमासे मौके घेदान् प्रापयाम्पस्सन्हदिम्माष्युतचादिता॥४७॥ बनेको विमग कर दिये ॥ १७ ॥ ममिभप्यन्तर प्रयन् भगोहा भावनः । शौनकनी ! इस वैवस्वत मनन्सरम भी प्रमा-गर प्रमशायर्लोकपालैयारिवा बालोरपाकी प्रार्पनासे पसिउ विषक जीनता धर्मगुप्तये ॥४८॥ भगवान्न धर्म रक्षा म्यि मार्ग परामARI सत्पतीक पराचरात् सत्पपरयामशिकलया विक्षः। | गर्भसे अपने अयश-मयसम्प म्पसके सूपमें बस्तर प्रवीर्णो माभाग वेदं पके पतुर्विधम् ॥४९॥ प्रहण किस्म है । परम भाम्पवान् नाजी । मोने ही पर्तमान युगमें पेदफ चार विभाग किस ॥१८॥९॥ समय यजुम्सानी गधीनुदस्य पर्गश । जसे मणिक समूहमेंसे विभिन्न समिकी ममिया टकर पतमः संदितामझ मैन्युर्मणिगणा इस ॥५०सदाने मन्यसमायमेंसे भिम भिन्न प्रकरणों के अनुसार अग्रा-अमा पर भी जाती है, पसे ही महामन्ति मान् तागोस पतुरा सिम्पानुपाहस महामतिः। मोग समह पर उनसे मग, पशु, गम और एक सरिता प्रसन्नकास्म ददो विभः ||५१॥ पुअर प्रत्यायो एक महिनाको सिद॥५.५ पार-गे पार मंदिता नापों और जाने पर माया नोन भाष' नामी पक्ष असता पो २ मा मरे।। | पैठार महिनामापा मारामपामाप ९३५ का अध्यापन वैशम्पायनसंज्ञाप निगदौख्यं यजुर्गणम् ॥५२॥ ] 'निगद' नामकी दूसरी पजु संहिता बैशम्पायनको, साम- शुतियोंकी 'छन्दोगसंहिता' जैमिनिको और अपने शिष्य सोम्नां वैमिनये प्राह तथाछन्दोगसहिताम् । सुमसुश्चे वयर्वाङ्गिरस-संहिता' अपर्वाङ्गिरसी नाम म्वशिम्पाय सुमन्सपे ॥५३॥ कराया ॥ ५२ ५३ ॥ शौनकजी ! पैन मुनिने अफ्नी पैलः स्वसंहितामृचे इन्द्रप्रमितये पनिः । संहिताके हो विमाग करके एकमा बयफ्न इन्द्रप्रमितिको और दूसरेका मकको कराया । या फलने भी अपनी पाप्फलाप च सोऽप्पाह शिष्येम्प सरिता म्वकाम्५४ शायके चार विभाग करके उन्हें अलग-अलग अपने चतुर्था म्पस बोभाय पानवल्लमाय भार्गव । शिष्य वोप्य, यापल्स्य, पराशर और अग्निमित्रकोपढ़ाया। परामरायामिमित्रे बद्रप्रमिविगत्मवान् । ५५॥ परमसंयमी इन्द्रप्रमितिने प्रतिमाशाली मास्कस ऋषिको अपनी संहिताका अध्ययन कराया । माकपक शिष्य अध्यापपत् सरिता स्वां मायायमूर्षि कविम् । ये-दममित्र । उन्होंने सोमरि आदि प्रक्यिोंको वेदोका तस पिप्पो दवमित्र सौभर्यादिम्प ऊमिमान्॥५६॥ अप्पयन कराया ॥ ५१ ५६ ॥ माङ्केपके पुप्रमा नाम शाकरयस्तरसुत स्वां तु पनपाम्पस सरिताम् । घा शाफ्स्य। उन्होंने अपनी संहिताकपाँच विभाग करके ठमें पारस्प, मझल, शीप, गोम्प और शिशिर नामक पारस्पमेन्द्रलपालीपगोखल्पशिक्षिरेष्वधात् ॥५७) शिष्योको पराया ।। ५७ ॥ शाकस्पक एक और शिष्य जातकार्पम सच्छिम्पः सनिरुको स्वसंहिताम् । थे—बातूफर्ण्य मुनि । ठनोंने अपनी सरिताके तीन विमाग करके तासम्बन्धी निरळके साप अपने शिष्य फ्लाफपैजपतालविरजेम्पो ददौ मुनिः ॥५८॥ बलक, पैज, पैताङ बोर रिक्को फमया ॥ ५८ ॥ पाझलिः प्रतिशास्लाम्पोपालसिल्पारम्पसंहिताम् । याकसके पुत्र याकलिने सव शास्त्रोंसे एक बासिन्य' चामालापनिर्मम्यः कासारश्वैष तादधुः ।।५९|| नामकी शाख रची । उसे मात्यपनि, भव्य एष कासारने प्रहम फिया ॥ ५९ ।। इन प्रमर्पियोंने पूर्षेक सम्प्रदायके वारणाः संहिता घेता एभिर्ममपिभिसा।। अनुसार अम्वेवसम्बन्धी माप शास्त्रों को धारण किया । भुत्वैतन्छन्दसा म्यासं सर्वपापै प्रमुष्पत ॥६ ।। नो मनुष्य यह केके विमजनका इतिहास प्रवण करता | है, वह सब पापोंसे छूट नाता है ॥ ६० ॥ पैशम्पायनसिप्पा वै परफाचर्ययोऽभपन । शौनकली । वैशम्पायनक कुछ शिपोका नाम था चरकाम्ययु । इन ग्रेगोन अपने गुरुदेषक प्रमाइत्या जमित अपका प्रायपित्त करनेके लिये एफ का अनुष्ठान पच्यात्यांहाचपण सगुरोर्वतम् ॥६१॥ किया । इसीरिये इनका नाम 'परफाफ्यु' पका ॥६॥ | शम्पायनके एफ शिष्य यावलय मुनि मी ये। उन्होंने पापस्पैम वच्छिम्प माहाहा भगवन कियत । अपने गुरुदेवसे कहा--हो मगमन् ! ये घरफामा आपण तो बहुत ही की शक्ति रखते हैं। इनके न- पानसे बम ही कितना । म बाफ्के प्रायधिसके परिवेनास्पसारामा परिप्पेज सुपरम् ॥६२॥ दिये बहुत ही कठिन तपस्या कींगा ॥ १२ ॥ १ माम्म। र सामानि मिना । प्रम । ५ मोहममाम्मेप गाभिने सिधिरेऽम्पपात् । .. 1४ प्रमति ९३६ भीमसागपत इस्पको गुरप्या इपितो मायर्स स्वया । याइकलप मुनिकी यह बात सुनकर वैशम्पायन मुनिकास या गया । उन्होंने कहा- 'यस-वस, जर यो । तुमसरे विप्रावमन्त्रा शिप्मेण मदधी त्पजामिति ॥६३॥ जैसे नामोंस अपमान करनेवाले शिष्यकी मुझे को आवश्यकता नहीं है । देखे, भयक तुमने मुसे ये फुल अप्पन किया है, उसका शी सेशीम त्या कर देवरावसुतः सोऽपिच्छर्दित्वा मजुषां गंगम् । दो और योसे चले जाओ ॥ ६३॥ यामास्यवीरे- रातके पुत्र थे। नोंने गुरुजीकी बाझ पाते ही अके वतो गंतोऽभ मुनयो दाशुस्वान् यमुर्गणान् ॥६४॥ गये। जब मुनियोंने देखा कि यात्रामपने तो पाये गए यजुदका बमन कर यि और के हसि वमन कर दिया, तब उनके विसमें इस काक पपि विचिरा मूत्वा तल्लोलुपतयाऽऽददुः। लिये बना अउच पुआ कि हमोग किसी प्रकार इसको मरण कर । परन्तु प्रामण होकर उगले हुए मनोको तैत्तिरीमा इति पाशाखा मासन् सुपेशला॥६५॥ और उस संहिताको युग श्या । इसीसे यादकी ग्रहण करना मनुचित है, ऐसा सोचकर वे सीतर कन मह परम रमणीय शारख सचिरीपा के नामसे प्रसिप पाइपरस्पस्ततो प्रयन् पन्दस्सिपियवेपयन् । हुई ॥ ६४ ६५ ॥ शौनकली ! अब पासपने सोचा कि में ऐसी नुतियाँ प्राप्त कर, जो मेरे गुरुतरीके पास गुरोरविधमानानि पतस्वेऽर्कमी-परम् ।।६६।। भी न हों । इसके थिये ये सूर्यमगवान्का उपस्थान करने यावरस्यजी इस प्रकार उपरान परते-म ॐनमो भगमते मादित्यापाखिलगतामारम- सम्पूर्ण मगल्के पासा और फास्वरूप है । ॐकारस्वरूप मगवान् सूर्यको ममस्कार करता है । माप सरूपेष कालस्वरूपेण चर्षिघमूतनिकामानां लेकर तृणपर्यन्त क्तिने भी बरायुज, अप्पन, स्वेदन और उद्विज -बार प्रकार के प्राणी है उन सबके हदयदेशी प्रमादिस्खम्बपर्यन्वानामन्तदयेषु पहिरपि पाकाप, और हर आकाशके समन व्याप्त रहकर में वाप सोपापिनाम्पषधीयमानो भवानेक एष धमलम उपाधिके धोसे वसा रहनेवाले वदितीय भगवान् ही हैं। वाप ही क्षण, ज्य, निमेष दिवालोंसे सहटिव निमेपालपषोपचितसंवत्सरगनापामादानविसर्मा | सफसरोंक द्वारा एवं करके धार्मण-विकर्मण-वादान म्पामिमा गोकयात्रामनुपहति ॥१७॥ समस्त लोकभी बीवनयात्रा कम यदुर पाप विधुर्मम सवितरवस्तपस्पनुसव | बोग प्रतिदिन तीनों समय वेद-विधिसे भापकी उपासन है॥ ६७ ॥ प्रमो ! बाप समस देवताओं मेष्ठ है। नमसराम्नायविपिनोपतिष्ठमानानामखिलारित करते हैं, उनके सारे पाप और दुःों के बीचोंको वा मिनपीमाषमर्षन भगवतः समभिधीमहि वपन मस्म कर देते हैं। सूर्यदेव । अप सारी सरिक मा कारण एवं समस्त ऐम्पके स्वामी हैं। इसलिये । मपसम् ॥६॥ पापके इस गोम्प मसाल्मा एकापताके सार १ गपान् । २ गत्प्रय। ३ पोप ।४ व । ५ गाल। लो॥६६॥ याक्सिम बाप प्रदानका १३७ अ.६] मादश स्कन्ध पापाव सिरपरनिकराणां निजनिकवनानां । ध्यान करते हैं ।। ६८ ॥ आप सबके आस्मा धौर अन्तर्यामी है । जगत्में मितने चराचर प्राणी है, सब मनइन्द्रियासुगणाननास्मनः स्वयमास्मा पर्यामी थापके ही बाधित है। बाप ही उनके अचेतन मन, प्रचोदयति ॥ ६९॥ इन्द्रिय और प्राणों के प्रेरक है ॥ ६९ ॥ यह खेक य एवेमं लोकमतिकरालवदना धफारसंज्ञा प्रतिदिन बन्धकाररूप बजगरक विकराल मुंहमें परफर क्वेत धौर मुर्दा-सा हो जाता है। बाप परम करणा- अपराहगिविस मुसामिष विचेतनमयलोस्पानु स्क्स्प है, इसध्येि क्या करके अपनी मित्रसे ही सम्पमा परमकामिक ईश्वमेवोत्थाप्पाहरहरनुसपन इसे सचेत कर लेते हैं और परम कम्पाणके साक्ष्न समय- समपके धर्मनुष्टयानों में मगाफर भारमाभिमुख करते हैं। मैसे भेयसि स्वधर्मास्पात्मानमाने प्रपर्वपत्मपनिपति राजा दुष्यको म्पभीत करता या अपने राज्यमें विचरण रिषासापूना भयमुदीरपन्नटप्ति ।। ७० ॥ करता है, वैसे ही वाप चोर-जार कादि दुष्यको मयमीत करते दुए विचरते रहते है।।७०॥ चारों बोर समी दिक्पाल स्थन- परिवाशापालेतत्र तत्र कमलकामामलिमि स्थानपर अपनी मममी पालीके समान बानियोंसे रूपरसाईमः ॥ ७१ ॥ थापको उपहार समर्पित करते हैं ॥ ७९ ॥ भगवन् ! अथ ह भगषनव चरपनलिनपुगलं त्रिभुवन वापके दोनों चरणकमल तीनों मेयोंके गुरु सारा महा- नुभाषसे भी वन्दिव हैं। मने आपके युगछ परणफमकी गुरुमिर्वन्दितमहमयातयामयजुःकाम उपसरा इसयि शरण ली है कि मुझ ऐसे पदकी प्राप्ति हो, मीति ।। ७२ ॥ जो पतफ किसीफो न मिलाये ॥ ७२ ।। पासी कहते है-शौनकादि ऋपियो । बम पास्य मुनिने मगमन् सूर्पकी इस प्रकार स्तुति की, एवं स्तुत स मगवान् वाजिरूपपरो हरिः । प्रसम होपर उनके सामने वसलपसे प्रफ्ट हुए और टम् पदक टन मन्योंका उपदेश किया, जा पप्पयातयामानि मुनयेऽदात् प्रसादितः ॥७३॥ भक्तक किसीया प्राप्त न हुए थे ॥ ७३ ॥ इसक वार पाइवत्स्य मुनिने पमुर्पदफ असस्य मयोंसे उसकी मजमिरफरोन्छास्ता दशपथ सेविंशः। पंदह शाखाकी रचना की । महो वानसनम शाखके मामसे प्रसिद्ध है। उम्म्य, माध्यन्दिन बादि प्ररियोंने अपामसन्यस्ताः काम्नमाध्यदिनादयः॥४४॥ प्राण किया ॥ ७ ॥ जैमिना सामगस्खासीत् मुमन्तुम्तनयो मुनि । यह बात में पहले ही चुका है कि मि श्री फूण पायनने जैमिनि मुनिको सामसंहितामा सम्पयन परराय । उनके पुत्र में मुमन्तु मुनि और पौत्र ये सुग्मान् । मुन्यांस्तु वरमुतस्ताम्यामकैको प्रारसहिताम्।।७५॥ जैमिनि मुनिने अपने पुत्र और पौत्र एक-एक सरिता पाय ॥ ७५ ॥ जमिनि मुनिक एक सिम्पस नाम या मुरुमा पापि तम्हिप्पा सामवेदतगमहान् । पुरुस । वह एक महान् पुरुष पा । जैसे एफ धर्म १ प२ मिभिर ।३। .१७ १८६९-न तो माहारा ममा गायत्रीमा तत्सरिनुरियम्', "मा. देवस पीरि। मोर पिका पाना परमात् -नवीन पर म्यम्पा परते हुए भावान् सूर्यप्रस गयी है। सूत उवाच तव वे ९३८ भीमामबत [4.0 सहससंहितामेदं पके साम्नां तसो दिनः॥७॥ मनुत-सी गलियों होती है, वैसे ही मुकर्माने सामोरी हिरम्मनाम: कौसरमा पौप्पलिम सुकर्मणः । एक हजार संहिताएँ बना दी ॥७६ ॥ मुककि शिप कोसन्देशनिमासी शिरण्यनाम, पौष्यनिधौर अप्रमेयाम शिम्मी बगृहतमान्य आवन्स्पो प्रभाविचमः ॥७॥ श्रेष्ठ वाक्यने उन सर्वोको प्राण किया ।। ७७ !! पौष्पनि और भावपके पाँच सौ शिष्य थे। ये उस उदीमाःसाममा शिप्पा मासन् पञ्चशतानि पे । दिशा निवासी होने के कारण मोदीप्य सामवेदी करने पोप्पममातन्त्पयोपापितांमप्राप्मान् प्रपषते।७८) ये। उमीको प्राप्य सामवेदी भी करते हैं। नोंने एक-एक संहिताका अध्ययन किया ॥ ७८ पौप्यधिक डोगाधिर्मालकि प्रत्यासीदः धिरेव च। और भी शिम्प पे अगाधि, मालि, कुम्प, कुसीद पौम्पत्रिविम्या बगाः संहितास्ते शसं शवम्॥७९॥ धौर कुक्षि । इसमेंसे प्रत्येकने सौ-सौ संहिताबोंका पप्पयन किया ७९ ॥ हिरण्पनामका शिष्प --- कतो हिरण्मनाभस्म चतुर्षिपतिसहिताः । कृत । उसने अपने शिष्योंको चौबीस संहिताएँ पसार्य। शेव संहिताएँ परम स्पर्मी बाक्स्पने अपने शिओं को सिप्प उपेस्पष्टिम्पेम्पा शेपा भावन्स्प मात्मवान् ८०ा दी। इस प्रकार सामन्दका विसार हया ॥ ८० ॥ - इति श्रीमद्भागवते महापुरण परमहस्व संहिताया वादशस्फावे घेदशास- प्रणपने नाम षष्ठोऽध्याय ॥६॥ अथ सप्तमोऽध्याय' मपर्षदेवकी शाखाएं मोर पुपनोंके समय सूत उवाच भीसाजी करते है-शनकादिषियो ! में कर मथर्वपित् सुमन्तुम चिम्पमध्यापयत् स्वकाम् । मुका कि पाक्दिके माता मुमन्तु मुनि पे । महोने पानी संहिता अपने प्रिय शिष्य कामको पायी। सहित सोऽपि पध्याय वेददर्शप चोक्तवान् ॥१॥ काधने उस संहिताके दो माग करके पथ्य और मे धौशायनिर्मचलिर्मोदोपः पिप्पलापनिः । दर्शको उसका बम्पपम कराया ॥ १॥ ददर्शक पार शिष्य हुए-शौम्पनि, प्रमगलि, मोदोष वौर पिण्यध्यपनि । धेददर्शस विप्पास्ते पम्पनिम्मानयो शृणु ॥२॥ पम्पके शिष्यों के नाम सुनो ॥ २ ॥ शौनकली ! छावः शुनको प्रमन् नाजलियाप्पपर्वपित् । पप्पके तीन शिष्य पे--कुमुद अनक और अपविता मामछि । वकिरा-गोत्रोत्पन शुनकके दो शिपये- पम्रा विप्पोऽधाङ्गिरसः सैभवायन एप च । वधु और सैन्यमापन । उन अगोने दो संहितायोका अभीयेतो संहिते है सापांपास्वपापरे ॥३॥ पापनादिके शिप्प समर्प वादि तमा नक्षत्रात्य पप्पयन किया । भवपिदके वाचायोम इनके बतिरिक नपत्रकल्पः शान्तिम पश्यपाङ्गिरसादयः । शान्ति, कासप वारिस मादि कई भान् और भी एते बापर्वाचाया: मृणु पौराणिफान मने ॥४॥ ॥ ३१ ॥ गए। बा मैं तुम्हें पौराणिक सम्पन्नमें मनाया नाम नम् अ०७] ९३९ प्रय्यारुणि कश्यपम सावणिरकतमणः । शीनकली ! पुराणोंके । आचार्य प्रसिद्ध है- प्रयाणि, पश्पर, सामणि, ताण, पैशम्पायन मोर वैश्चमापनहारीको पर पौराणिका इमे ॥५॥ हरीत १५॥ एन लोग्ने मेरे स्तिानीसे एक-एक पुराण- संहिता पी भी और मेरे पितानीने सय भगवान् म्याससे बधीयन्त म्पासशिम्यात् संहिता मस्सितर्वस्तात् । ठन सहिताबोंका अप्पयन किया था। मैंने उन छछों भाषा सभी सहितका अपयन मिपा पा ||६|| एकैसामामेवेपा शिप्प सः समभ्यगाम् ॥ ६॥ वन संहिताबोंके अतिरिक पौर मी चार मूल सहिताएँ भी । ठनें भी कश्पप, साणि, परशुरामजीके शिष्य कम्पपोईच सापी रामहिप्पोऽमतप्रणः । अकुतमण और उन सबके साप मैंने व्यासजीके शिष्य अधीमहि म्यासशिम्याचवतो मलसहिता ॥७॥ मीरोमार्पगनीसे, ओ मेरे पिता थे, पम्पयन किया पुराणलवणं प्रमन् मरिभिर्निरूपितम् । निकली ! महपियोंने वेद और शोक अनुसार पुराणों के क्षण काव्यये ?। बम हम सस्प होकर सावधानीसे उनका वर्णन सुनो ॥ ८॥ शौनकली। भशप्प पुदिमाप्रिम वेदशासानुसारतः ॥८॥ पुराणों के पारदर्श विशन् बताते है कि पुराणों के दस लक्षण हैं-तीख-वर्ग, रिसर्ग, पति, रक्षा, सर्गोऽसाथ विसगेय पची रक्षान्तराणि प । मचन्तर, यश, अनुपरित, संस्था (प्रथ्य), तु (सी) और मामय फोस्कोर पापाय पुराणों- पो पंशानुपरित संस्मा हेतुरपाययः ॥९॥) के पाँच ही क्षण मानधे है। दोनों ही मार्वे टीक है, पोफि मापुराणोंमें दस क्षण होते है पर छोटे दशभिर्वधर्णर्युक्तं पुराणं वदिदो पितु । पुरामि पचि । विस्तार करके दस मतगते हैं और संक्षेप परके पौष ९१०॥ (पर इनके एमग मनो) मेषित् पचविष प्रदान मादलपन्यवस्सया॥१०॥जाम्ब प्रपति सीन गुण क्षम्म हावे है, तब माइतात- की उपति होती है। मालससे तामह, राज्स और सारिक ( सास्तिक ) तीन प्रकारक बदशा मते अपात गाभा मातखियोशमः हैं। विविध आरसे ही पमा मात्रा, ट्रिप और रिपोरी टारति होती है। इसी सपरि-यमश नाम भूवमाप्रन्द्रियाधाना सम्भवः सर्ग उम्पते ॥११॥ है ॥ ११ ॥ परमेश्वरक अनुमइसे हरा मानथ्य प्राफिक प्रतेस अभिक अनुमार पुरुषानुगृहीतानामनां वामनामपा। थी और युरी वासनाओरी प्रधानतासे बसपा परा- पर गरमा जारी गपि मृरि परत एक विगोऽयं ममाहाराजा पीई परामरम् ॥१२॥ से दूसरे का सम्बन, सर रिसण यह १२॥ १२ ॥ पर प्रागिनी अपरमापति अर्षद मिमदानि मठाना परामपरामि । जीन- निसा मी । म रिपोक पनि ९४० भीमद्भागवत [३०० कता स्वेन नृणा पत्र कामाचोदनयापि वा ॥१३॥ मी । इनमेंसे मनुष्योंने कुछ तो समानश काम्नाके धनुसार निश्चित कर ली है और फुल्ने शामके आपण रखाम्पुतावतारेहा विवस्वानु युगे युगे । नुसार ॥ १३ ॥ ममान् पुग-युगमें पशु-पक्षी, मनु प, अषि, देवता बादिके रूपमें अवतार प्रण करके बनेकों विश्वपिदेवेषु इन्पन्ते पैनपीद्विपः ॥१४॥ का संहार भी करते हैं। उनकी व अकार-सीम छीन करते हैं। इनी कतारेमि वे वेदधमके विरोधियों- | विपकी रक्षाके किये ही होती है, इसीलिये उसका माम मन्नन्सर मनुर्देषा मनुपुत्राः सुरेबर।। रक्षा' है ॥ १२ ॥ मनु, देवता, मनुपुत्र, स्य, सप्तर्षि मोर मावान्के वशफ्तार–ही . बातोंकी विशेषता- से युक्त सम्पको मक्त्तर कावे ॥ १५ ॥ पानी- अपयोंऽसावतारम हरे पविधाान्यते ॥१५॥ से तिने रागवोंफी मुशिशुई है, उनकी भूत, भविष्य गौर पतमानकालीन सन्तानपरम्पराको वंश काते। म राशा मयप्रसूतानां पशस्त्रैकालिफोऽन्मयः । रानाथोंके तपा उनके पएपरोके चरित्रका नाम 'वान परित है॥ १६ ॥ इस विकासासमा समससे ही वंशानुचरितं पां पूचं वंशधराम ये ॥१६॥ | प्रारतिक, नित्य बोरे बास्यन्तिक । तल्क मिने प्रश्य हो माता है। उसके पार भेद-नैमितिक, शहीको संसा' का है॥ १७ ॥ पुरा के सामने नैमितिका प्राकतिको नित्य बास्यन्तिको लयः। हेतु नामसे विसका म्पहार होता है बीवी स्पोंकि बाखमें पी सर्ग-निसर्ग वादिका है और वरिपावश बनेकों प्रकार के कर्मकममें समा गया है। संस्पेति समिभिः प्रोक्ता पतुर्षास्स स्वभाषतः ॥१०॥ जो मेग उसे चैतन्यप्रधानकी रिसे देखते हैं, वे उसे अनुशपी वर्षात् प्रतिमें शयन करनेपथ का । हेतु जीवोऽस सादरविणार्मकारकः । और जो उपाक्किी रहिसे करते है, वे उसे भम्पात पद प्रतिरूप करते हैं ॥ १८ ॥ जीवकी वृदियोंके सीन विभाग है बाम्त, सम और सपनि । ये इन पं चानुशयिन प्राहुरव्याहवमतापरे ॥१८॥ सामे इनक अभिमानी विव, तेजस और प्रादक मायाम्प रूपोम प्रतीत होता है और इन वास्याओंसे परे सुस्पतालके रूपमें भी उशित होता है, पीस म्पनिरस्मन्वया पस्प नाप्रत्म्वमसुषुप्तिए । उसीको यहाँ 'अयम्पा शपसे कहा गया ॥१९॥ | नामविशेष और मशिरसे युक्त पदापोपर विचार करें, ता व सचामात्र बस्सुक मपम सिव होते हैं। उनकी मापामयपु ना मन बीवमिषपाय ॥१९॥ रिशमाएं सुप्त हो जाती है। बस में बह सत्ता ही उन विशेस्ताओंफ मामे प्रतीत भी होगी और उनसे पर भी। टीम इसी म्पापसे शरीर और विषाण पदापु यथा दम्यं ममायं रूपनामगु । की उत्पत्ति से मागु भार माप मार्यन्त स्तिनी ०८] द्वादश स्कन्ध ९४१ पीजादिगमतान्तासु घरम्पासु युतायुतम् ॥२ ॥ 1 भी विशेष अवस्थाएँ है, उनक पर्ने परम सत्यस्वरूप मझ ही प्रतीत हो रहा है और उनसे समया पृपफ् भी है। यही पाश्य-भेसे अधिष्टान और साभीक मपमें प्रम ही पुगणोळ आध्रक्तस्त्र है॥ २०॥ नव चित स्वय प्रारमविषार अपना योगाभ्यासक द्वारा सुस्मगुण विसमेत यदा चिच हित्वा पुसिम्रर्य स्वयम् । रबागुण-तम्प्रगुणसम्बन्धी प्यावहारिक वृत्तियों और जामत् स्वप्न आदि स्वाभाविक वृत्तियोंका त्याग फरक उपराम हा जाता है, तम शान्तवृत्ति तत्वमसि' वादि महावास्यों- के शरा आरम्हानएर उदय होना है। उस समय आत्म वेत्ता पुरुष अविपाजनित फर्म-पासना और फमप्रतिसे पोगन वा तदाऽऽरमान घेदेहाया निवर्तते ॥२१॥ निवृत्त हो जाता है ॥ २१ ॥ नकादि ऋगियो ! पुरातत्तवेत्ता ऐतिहासिक एवंउधमलक्ष्याणि पुराणानि पुराषिदः । विद्वानोंने इन्ही लोक शरा पुराणोंकी यह पहचान बत मायी है। ऐसे लक्षणोंसे युक्त अटे-या घटारह पुराण मनपाऽटादस प्राहु तुछ कानि महान्ति च ॥२२॥ १ ॥ २२ ॥ उनके नाम य ई-प्रमाण, पपुराण, माय पार्य वैष्णव च शैवं ला सगारठम् । विष्णुपुराण, शिषपुराण, विराग, गरुडपुराम, नारद नारदीय भागवतमाग्नेयं समान्दसमितम् ॥२३॥ | पुराण, गवतपुराण, मम्निपुराण, स्कन्दपुराण, मविष्य- पुराण, ममवैवर्तपुराण, माकपपुराण, पामनपुराण, भविष्य प्रदान मार्कडेय सवामनम् । बराहपुराण, मत्स्यपुराण, मपुराण और महापुराण वाराहमाप कौम च ब्रह्माण्डासपमिति त्रिपद।।२४॥ परम्पराने जिस प्रकार मेदसहिता और पुराण- पर अटार है॥२३२२ ॥ शौनरनी । म्पासनीकी अपमिद समास्या नावाप्रणयनं मुनेः । सहिताओंका अप्पपन-अप्पापन, विमानन किया मह मैंने तुम्हें सुना यि । यह प्रसासनन और पानायक विष्यमिप्यपपिप्पापा प्रतवाविवर्धनम् ।।२५।। प्रनतनी अभिवृद्धि करता है ॥ २५ ॥ इति मागपत महापुगगे परमाईस्पा महिनाया गावाप सत्माऽप्पाप ॥७॥ अथाष्टमोभ्याय माया तामा र प्रति गानामीन -Fधुनिगमग मर्या प्रामुमत दो। मम्मुम 7 PM गूलर पि मापा २६ ना पता । ITTETTTTT पर मुरगद २, 141-5114141 .

९४२ भीमागवत [.८ समसपारे प्रमतां नृणां स्व पारदर्शनः ॥ १॥। उन्हें आप पहसि निकास्पर प्रकाशखरूप परमात्मा साक्षात्कार करा देते हैं। बाप क्या करके हमारे एक माहुमिरायुपमूर्षि मुकणतनयं बनाः। प्रश्नका म्वर दीजिये ॥१॥ मेग कहते है कि मृका-अश्केि पुत्र मार्कण्डेय अनि चिरायु हैं और या फल्पान्ते उपरितो येन प्रस्तमिदं जगत् ॥ २॥ मिस समय प्रलपने सारे गाएको निगल मिस था, उस सम्प भी वे पचे रहे ॥ २ ॥ परन्तु सूतकी ! ये ते | इसी कम्पमें हमारे ही पशमें उत्पन्न हुए एक श्रेष्ठ सगु- सषाअसफलोत्पमा कल्पेऽसिन्भार्गवर्षम।। घंशी हैं और दाँतक हमें मालूम है, इस काप नैवाघुनापि भूतानां सम्पः कोऽपि मायते।। ३ ।। ऐसी स्थिति में यह मत कैसे सत्य हो सकती है कि भक्तक प्रागिर्योका कोई प्रथ्य नहीं ॥३॥ एक एवार्णवे माम्मन् ददर्भ पुरुष फिल । चिस सम्म्य सारी पृष्पी प्रल्पकालीन समयमें सनम पी, उस समय मर्कण्डेयसी उसमें रूप-उतरा रहे। वटपरपुटे वार्फ शमान स्वेकममुतम् ॥ ४ ॥ कर सोये हुए बमुकुन्दका दर्शन किया ॥ १. और उन्होंने अक्षयषटके पत्तेके दोनेमें वपस्त काम एप नः संचयो म्यान् त कौतूहलं पतः । स्तनी । हमरे मनमें क्या सन्यवर इस क्तको जाननेकीयदी उकास्य है। पाप से योगी है, पौराणियों | में सम्मानित है । काप क्या करके हमारा यह सके नश्चिभि महायोगिन् पुराणेप्यपि सम्मतः ॥५॥ | मिटा दीचिये ॥ ५ ॥ भीसाखीने करा नकली। बाफ्ने क्स वर प्रश्न किया । इससे ग्रेगोंका भ्रम मिट जायगा । और प्रश्नस्त्वया महर्षेऽयं कतो लोकम्रमापहः । सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस फलामें मगन नारायणकी महिमा ।। जो इसका गन करता है उसके सारे कछिमछ नष्ट हो जाते हैं ॥ ६ ॥ शौनक नारायणफया यत्र गीता फलिमलापहा ॥६॥ी ! मुकाम पिने अपने पुत्र मर्करके सभी सरकार सम्प-सम्पयर किये। मरेपनी विधिक योग प्राप्तदिनाविसंस्कारो मार्कमेया पितुःप्रमात् । अध्ययम करके तपस्या और साप्यापसे सम्पन्न हो गये ये ॥७॥ म्होंने बानीकन गर्यका व से रक्स छन्दसिधीत्य धर्मेण तपस्वाध्यायसंयुतः ॥ ७॥ । शत्तमावसे रहते थे। सिरफर अटाएँ कम रस्सी पी । पक्षोंकी छाया ही बन पानते थे। वे अपने पखसधर शान्तो बटिलो परफलाम् । हामि कमर वीर दणा धारण करते, शरीरपर को पपीत बौर मेसन शोमयमान रहती ॥ ८॥ काले सिप्रद कमलं दम्पपीत समेखलम् ।। ८॥ पूजी पी । यह स्प मोने अपने जीवन प्रार्थ- मृगका चर्म, स्वाक्षमाम और कुश यही उनकी | प्रतकी पूर्तिके म्येि ही प्राण किया प। फामाजिनं सापपत्र दाध नियमईये । वोर प्रात कामग्निहोत्र, सूर्पोपस्थाम, गमदन, मा सूत उपाय । १ष्मा। J URTI -- म०८] द्वादश स्कन्ध ९४३ इस्पं बन्यर्फगुरुषिप्रारमवर्धयन् संम्पयोई रिम् ।। ९ ।। | सत्कार, मानस-पूना और में परमात्माका स्वरूप ही हूँ इस प्रकारकी भावना अदिके द्वारा भगवान्की अाराधना सायं प्रात: स गुरवे मैल्पमाहत्प पाग्यसः । करते ॥ ९ ॥ सर्य-प्रात मिना बकर गुरुदेवके चरमि निवेदन कर देते और मौन हो जाते । गुरुनी- प्रमजे गुनुप्रातः सफलो घेदुपोपितः ॥१०॥ की आशा होती तो एफ कर स लेते, अन्यय उप- पास कर जाते ॥१०॥ मार्कोपजीने इस प्रकार एवं तपस्वाभ्यापपरो वर्षाणामयुतापुतम् । तपस्या और स्माभ्यायमें तत्पर रहकर करोगों पपोतक भाराधयन् पीक विग्ये मृत्यु सुर्खयम् ॥११॥ भगवान्की आराधना की और इस प्रकार उस मृत्युपर मी विजय प्राप्त कर दी, मिसको जीतना वाम्बई योगियों के लिये मी कठिन है॥ ११ ॥ मापजीकी मया मुंगुर्मयो दक्षो प्रमपुत्राय येऽपरे । मुख्यु-विज्पको देखकर प्रय, मुगु, शाहर, दक्ष प्रमापति, प्राभानीके अन्यान्य पुत्र तया मनुष्य, देस्ता, पितर एवं नदेवपितृमूतानि तेनासमविषिसिताः॥१२॥ अन्य सभी प्राणी अत्यन्त विस्मित हो गये ॥ १२ ॥ पदवघरस्तपस्वाध्यायसंयमैः । पानीम्न मर्पतवारी एवं योगी मार्कण्डेयजी इस प्रकार तपस्या, स्वाध्याय और संयम भादिके डारा भविषा दयापभोक्षजं योगीमस्तक्लेषान्तरात्मना॥१३॥ | श्रादि सारे स्लेशोंको मिटाकर शुद्ध पन्त करणसे इन्द्रिया- तीत परम्पराका प्यान करने लगे ॥ १३ ॥ योगी तस्मै पुम्जसपिच महायोगेन योगिनः । मार्कण्डेयनी महायोगके द्वारा धफ्ना चित्त भगवान्के | स्परूपमें जोरते रहे । इस प्रकार साधम करते करते म्पदीयाय महान कालो मन्वन्तरपास्मफः॥१४॥ वात समप--3 मान्तर म्पतीत हो गये ॥ ११ ॥ प्रामन् ! इस सातमें मपन्तरमें बव इन्द्रको इस सत्या एवत् पुरंदरो शास्वा सप्तमेऽसिन् किलान्तरे । फ्ता पल्ल, सब तो ये उनकी तपस्यसे शक्ति और मपत्ति हो गये। सम्यिो महोंने उनकी तपस्या तपोषिधितो अपमारेमे सनिघातनम् ॥१५॥ विन डाछना आरम्म फर दिया ॥ १५ ॥ गन्धर्वाप्सरस: फार्म वसन्तमलयानिलो। शौनकजी । इब्ने मापनीकी तपस्पामें लिप्त गलनेके रिये उनके आश्रमर गभर्ष, असार, काम, मुनये प्रपयामास रबस्त्रोकमदी तथा ॥१६॥ पात, मस्पानिय, प्रेम धौर मदको मेजा ॥ १६ ॥ ते वै तदाश्रमं जन्महिमाद्री पान उचर। भगवन् ! वे सम उनकी भावाक यनुसार उनके वाममार | गये । सकारेपनीका भाप्रम हिमाश्यके उत्तरकी पुप्पभद्रा नदी या चित्राख्या पक्षिला विभो॥१७॥ ओर है । कहाँ पुणभद्रा नामकी नदी महती है और उसके पास ही चित्र नामकी एक शिव्य है ॥ १७॥ सदाममपद पुण्यं पुष्पगुमलसाभिवम् । शौनफनी ! मकरम्पनीका माधम बड़ा ही पवित्र है। चारों बोर हरे-भरे पवित्र वृक्षाकी पंक्तियों १ ठनपर पुण्यविचालाकीण पुम्पामठजलाशयम् ॥१८॥ सताएँ अहाती गती हैं। योंके मुरमुट में स्थान- १ मोमगुः । २ रम्।३ ता।

९४४ भीमद्भागवत [.. मनम्रमरगीत मनमामिला विम्। { मनर पुरसम शगम निसन्तर और म दीपसमा प्राय र नुन पर दी गहन ॥१८॥ की साले भीर मत्तनिटाग मानदिनालालम् ॥ पानी सबीन गुराग गोमxर्मन का हात पदो मास काहि परम पर पा पुस्ते हस मसाले मार गनदी रेम करत नाप परत रहवर समय पापु प्रविष्ट प्रादाय दिमनिसरासरान। मा पिर पता इत्यो । १९. बाप मुनिः मती मेकर मागुनमाश पिता उसनलीना रनोरी नना-नई पुरा समद की । सामन्ति मुमनामि परिपक्ता वयागुचम्मपन् मरम् ॥२०॥ पुणे दिन शिव और रि कामको उत्तरित परते हुए धीर-धार इन व्या ॥ २०॥ पामय प्यार सार रसस्तने भी पानी पायी। उपचन्द्रनिगारमा प्रचारत हासिभि । प्यारा समय प। मम्दमा उति अली मनार फिरणोंश विस्तार पर से थे। इस सश्य गरि गल व उताओंस अनि प्रकार गापद्रुमलतामालम्सनासीत् शुमार ॥२२॥ परी तु दुर ५ । नयी-नयी गये, फळे भार छोंक गुप्प अा हा अभापमान हो रहे ५॥ २१ ॥ मस्तरा सामान्य दम्मार कामदेग्ने अन्वीयमाना गीतवादियधम् । | भी यहाँ प्रवेश किया । उसके साथ गते नयनाले गधा हुरकर पर । उसके चारों ओर बहुत-सी म्वगीय अप्सराएँ घउ रही थी और मफेय आयसाच पाप म्लीयधपति मर ॥ ॥ काम ही सरमा नापक या । उसके हापमै फुरेश धनुर बार उसपर सम्माइन आदि प्रम परे हर ॥ २२ ॥ हुताग्नि समुपामीन दप्मुः शमकिंकराः। उस सम्प मापण्डय मुनि अग्निहोत्र करके भगछन्- पी उपासना पर रहे थे। उनके नेत्र बंद थे। इतने | सेमस्त्री , मनो सये अग्निदेव ही मूर्तिमपन् होकर मीसिताध दुराधर्ष मूर्तिमन्नमिवानलम् ।।२३॥ बरे हों ! उनपो देसनेसे ही प्रश्न हो जाता पाकि इनको पराजित कर सकता बहुत ही कठिम है।लके नन्तस्तस्य पुरतः खियाऽयो गायका जगुः। बाह्यकारी सेक्ोंने ममय मुनिको इसी वारसा देख ॥ २३ ॥ अब क्सराएँ उनके सामने नागने ग। कुछ गन्धर्ष मधुर गान करने को तो कुछ मुबमा मदमीणापणाचं धर्मनारमम् ।।२४॥ प्रणा, ढोल आदि ने बड़े मनोहर सरमें क्मने रसुष्मा ।२ मुपा ।

अ०८] द्वादश स्कन्ध ९४५ संदघेऽलं स्वधनुपि फाम पञ्चमुख तदा । लगे ॥ २५ ॥ शौनफजी ! अव कामधेवने अपने पुष्प- निर्मित घनुपपर पाचमुस वाण घड़ाया । उसके वाणके पाँच मुस्त है—शोषण, दीफ्न, सम्मोहन, तापन और मधुर्मनो रजम्तोक इन्द्रमृत्या व्यकम्पयन् ॥२५।। उन्मादन । जिस समय यह निशाना लगाने की ताकमें था, उस समय इन्द्र के सेक्क पसन्त और स्यम क्रीरन्त्या पुञ्जिकस्सस्याः कन्दुकै स्तनगौरवात् । माय मुनिका मन विचलित करनेके स्पेि प्रयमशील ये ॥ २५॥ उनके स्त्रमने ही पुत्रिकस्सली नामकी सुन्दरी अप्सरा गेंद सेस रही पी। स्तनोंके मारसे वार भृशमदिनमम्पाया फेशविससितलज ॥२६॥ बार उसकी कमर उचक जापा करती पी। साप ही उसकी चोटियोंमें गुंथे हुए सुन्दर-सुन्दर पुप और इतस्ततोम्रमवाप्टेमलन्त्या अनुफन्दुकम् । माख्यएँ विसरफर धरतीपर गिरती जा रही पी ॥२६॥ कभी कमी वा तिरी चितवनसे इधर-उधर देख लिया फरती पी। उसके नेत्र कमी गेंदके साप माफाशकी मायुर्जहार तद्वासः सूक्ष्म श्रुटितमेस्खलम् ॥२७॥ ओर जाते, कमी धरतीकी आर और कमी हयेत्रियों की बोर । वह वो हाव-भाक्के साप गेंदकी ओर दोस्ती पी उसी सम्प उसकी फरघनी टूट गयी और वायुने विससर्ज तदा पाण मत्वा तं स्खजिस मरः । उसकी झीनी-सी सासीको शरीरसे अष्टग कर दिया ॥२७॥ कामदेवने अपना उपयुक्त अक्सर देखकर और यह सर्व दाभवन्मोषमनीवस्य पयोयमः ॥२८॥ समझकर कि क्य मण्डेय मुनिको मैने जीत लिया, उनके उपर अपना याण मेगा । परन्तु उसकी एफ न यी । म्पका रेय मुनिपर उस्स्फा सारा उपोग निफल व इत्थमपर्वन्तो मनेस्तचजसा मुने । हो गया—ठीक वैसे ही, वैसे असमर्प और अमागे पुस्योंकि प्रपा फिल हो जाते हैं ॥२८॥ शौनफनी ! मार्कण्डेय मुनि अपरिमित तेजस्सी ये । काम, वसन्त दघमाना निवपतुः प्रयोम्पादिमिवार्मकाः ॥२॥ आदि आये तो ये इसलिये कि उन्हें तपस्यासे भर पर दें, परतु अब उनके तेजसे सने लगे और टीक उसी प्रकार माग गये, जैसे भेटे-छोटे बच्चे सोते ए सापको इतीन्द्रानुचरैर्ममन् धम्तिोऽपि महाप्मनिः । अगाकर भाग जाते हैं ॥ २९ ॥ शौनकली ! इन्द्रके | सेमोंने इस प्रकार मार्कोपनीको पराबित करना पा, परंतु वे स्वीमर भी विचटित न हुए । इतना ही नहीं उनके मनमें इस बातको लेपार तनिक मी यभागादामो भावं न तपित्रं मात्सु हि ॥३०॥ शहरका भाव हुआ । स्च है, महापुरसोंके लिये यह फौन-सी बामर्पकी बात है ॥ ३०॥ जय देसराज एन निस्तेघर्स फार्म सगणं भगवान् स्वराट् । | इम्मने देखा कि कामदेव अपनी सेनाके साप निस्तेब- हतप्रम होकर पैट हैपौर सुना किंगम माकण्डेयजी परम प्रभाशाली हैं, तब उनै वा आर्य श्रुत्वानुभावं प्रमविसर्प समगात् परम् ॥३१॥ | हुआ ॥ ३१ ॥ भा.स. १९९- २४६ भीमद्भागवत [1०८ पर्व युजतमि तपस्वाध्यापसंयम । शौनकजी ! माकणेय मुनि तपस्या, स्वाप्पाय धारणा, प्पन और समाधिके द्वारा मगमनमें पित नुग्रहापाविरासीभरनारायणो हरिः ॥३२॥ लगाने प्रपा करते रहते थे। पर उनपर रूप- | प्रसादकी पर्वा करनेके लिये मुनिचन-नयन-मनोहारी तो शुषहप्णी नवफसलोचनौ | नरोन्म मर और मगवान् नारायण प्रकट र ॥ ३२ ॥ उन दोनोंम एकका शरीर गौरवर्ण पा और दूसरेका चतुर्भजी रोपवल्फलाम्बरौ। श्याम । दोनोंके ही नेत्र तुरंतके खिसे पुए कमाके समान कोमल और विशाल पे। चार चार मुनाएँ पी । एक पवित्रपामी उपवीतर्फ विवत् | मुगधर्म पहने पर थे, तो दूसरे इसकी छल । होम कुश छिये गए पे धौर गोमें तीन-तीन सूतके सोपीत फमण्डर्ड दण्डमूर्जु घ अंगवम् ॥३३॥ शोभायमान थे । वे कमपाल और वासका सीय दम प्राण किये हर पे॥ २३ ॥ फाळगवेकी माता वीर अन्तुमाजन चीयों को हटानेके लिये पसकी ची मी रस्से हुए थे। पाक्षमालामत अमा, इन्द्र वादिके भी एप मानन् मर-नाम्पम कुछ येदं च साक्षाचप एष रूपिणी । उप कदफे ये पौर बेद धारण किये हुए थे। उनके शरीरसे चमकती हुई बिजलीके सम्पन पी पीसे रंगकी सपरिवर्मपिषनरोचिपा कान्ति निकल रही पी। वे ऐसे मालूम होवे थे, मनो सर्य तप ही मूर्तिमन् हो गया हो ॥३१॥ जत्र मार्कडेय मुनिने देखा कि भाकन्के साक्षात् स्वरूप प्रांश दधानी विपुर्पभाषितौ ॥३४॥ नर-नारायण भूपि पधारे हैं, तब ये बड़े वादरमापसे 4 भगवतो रूप नरनारस्पमापी । उठकर मे हो गये और परतीपर दणरत् छोटकर साध्या प्रणाम किपा ॥ ३५॥ भगवान्के दिम्य दर्शनसे भायादरणोच्चननामाङ्गन दण्ठवत् ।।३५।। उन्हें इतना अनन्द हुआ कि उनका रोम-रोम, उनकी सारी इन्द्रियाँ ख अतकरण शान्तिके समुदमें गोवा वत्संदर्शनानन्दनियतात्मेन्द्रियाशयः । स्खने छयो । शरीर पुनक्ति हो गया । नेत्रामें अस्ि | उमड़ पाये, जिनके कारण वे उन्हें मर गाँव देख रामाचपणाभा न सेह साबुदीक्षितम् ।।३६॥ सस्ते ॥ २६ ॥ तदनन्तर से हाप जाकर ळ सा हुए । उनफा आ-भा भगवान्के सामने एका जा रहा धाप प्राञ्जलि प्रह औत्सुक्पादासिपमिव । पा। उनके एयमें उत्सुकता तो इतनी थी, मनो वे ॥ नम इतीशानी पभाप गद्गदापरः ॥३७॥ यमन गप, गदर अपीसे फेरठ इलना ही फहा- | भगवान्या वाजिशान कर उगे। उनसे और फुश तो रासनमादाय पादयारवनिज्य च । नमस्कार ! नमस्सा ॥ २७ ॥ इसके मा- ठहोंने दानों आमनपर यया, या प्रमसे अके परम पसारे णनानुलेपन धूपमात्परपूजयत् ॥३८॥ और अर्प, पदन, धूप और माग दिसे उनकी पून पीपणे 1२ मा

अ०८]
द्वादश स्कन्ध
९४७
मुसमासनमासीनी प्रसादाभिमुसौ सुनी। फ्रने लगे ॥ ३८॥ मगधन् नर-नारायण मुर्वक
मासनपर विराजमान थे और मार्कयनीपर स्पा
प्रसादकी पर्ण कर रहे थे। पूनाके भनन्तर मार्कण्डेय
पुनरानम्प पादाम्यां गरिष्ठाषिदमप्रवीत् ॥३९॥ मानने न सर्वश्रेष्ठ मुनिरधारी नर-नारायणके चरम
प्रणाम किया और यह स्तुति की ॥ ३९ ॥
मामय उपाच
मागेप मुनिने कहा-मापन ! मैं अल्फा जीव
किं वर्गये तव विभो यदुदीरितोऽसु: मस, आपकी अनन्त महिमाका फैसे वर्णन करे।
मापकी प्रेरणासे ही सम्पूर्ण प्राणियों -म, शहर
संसन्दते वमनु पापनान्द्रियाणि ।
तथा मेरे शरीरमें भी प्राणशक्तिका सञ्चार होता है और
फिर उसीके कारण वाणी, मन तपाइन्द्रियोंमें भी बोलने,
स्पन्दन्ति पै तनुभृतामजसर्वयोष
सोचने-पिधारने और करने बाननेकी शकि थाती है।
इस प्रकार सबके प्ररफ और परम स्वतन्त्र होनेपर भी
स्वस्पाप्पयापि भजतामसि भावन्घुः॥४०॥
आप बफ्ना मजन करनेयले भक्तोंके प्रम-वन्धनमें बंधे
हुए है॥ १० ॥ प्रभो! आपने क विपकी रक्षाके
मृती इमे भगवतो भगवत्रिलोक्पा
लिये ही जैसे मास्य-म आदि अनेकों प्रमतार प्राण
किये हैं, पैसे ही भास्ने ये दोनों गप भी प्रित्येकीके
घेमाय तापविरमाय च मृत्यूजित्दै ।
कल्याण, उसकी दुस-निवृत्ति और विपके प्राणियोंको
मृत्युपर विनय प्राप्त करानके लिय ग्रहण किया है।
नाना विमर्पषितुमन्मतन्यपेई
। छाप रक्षा सो करते ही हैं, मकसीके समान अपनेसे
ही इस विषको प्रकट करते हैं और फिर स्वयं अपनेमें
सन पुनर्पससि सर्वमियोर्णनाभि ॥४१॥
ही टीन भी कर लेते है ॥ ११ ॥ आप चराचरका
। पाछन और नियमन करनेवाले है।म भापके चरण-
सस्यापितु स्पिरचरेशितुरहिमूल
फममें प्रणाम करता है। वो आपके चरणकमकी
कारण म्हण कर लेते हैं, उन्हें फर्म, गुण और फालजनित
मत्स्थ न कर्मगुणकालरून स्पृशन्ति ।
स्टेशा स्पश भी नहीं कर सकते । वेदक ममा अषि-मुनि
आपकी प्रासिक लिये निरन्तर आपत्र स्खक्न, पदन,
या स्तुवन्ति निनमन्ति यजन्त्यभीक्ष्ण
पूजन और प्यान किया करते हैं ॥१२॥ प्रभो !
जीवनक चारों भोर भय-ही-भपका पोख्वाप्य है। आरोपी
ध्यायन्ति दया मुनयस्तदाप्यै ॥४२॥
तो यत ही स्पा, अपके करमापसे स्वप प्रभा भी
नान्यं तपायपनयादपवर्गम
अत्यन्त मपभीत रहते हैं, क्योंकि उनकी अयु भी
सीमित का दो परार्धकी है। स्टि उनके बनाये
क्षम बनस्य परिवाभिम इस वियः।
हुए मौतिक शरीरयासे प्राणियोंके सम्बन्ध ता कहना
ही क्या है। एसी अस्पमे आपक चरणमायकी
प्रदा पिम पलमता विपराधधिप्प्य शारण प्रहम करनेक अतिरिक और कार भी परम
कल्याण तपा मुस-पान्तिपा उपाय हमारी स्माम नहीं
पाठस्य त किमुत तन्कृतभौतिक्मनाम्।४३॥ आता क्योंकि आप स्वयं ही मोक्षम्यम्प है ॥ १३ ॥

९९८ श्रीमद्भागवत [०८ ॥ वद पे भजाम्पृतधियस्तष पादमूलं मगमन् ! आप स्स्मत बीयोंके परम गुरु, सक्से श्रेष्ठ धौर सस्य मानसरूप है। इसध्येि आत्मरूपसे रस हित्वदमात्मन्छदि चात्मगुरोः परस्प। देनेवाले देइ-गोर आदि निष्फल, असत्य, नाशपन् गौर प्रतीतिमात्र पदाको त्याग कर में आपके चरमसत्येकी रदापपार्थममदन्त्यमभित्रमात्र ही शरण ग्रहण करता हूँ। कोई भी प्राणी यदि आपकी विन्देत त तहिं सर्वमनीपितार्धम् ।।४४॥ अभीष्ट पदार्थ प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥ ीवोंक परम शरण प्रहण कर लेता है, तो यह उससे अपने सरे सत्वं रजस्तम इतीश तपात्मनन्धो मम् प्रभो ! यपपि सत्व, रज और तम-ये तीनों गुण आपकी ही मूर्ति हैनन्हींके वारा अप जगत्की मायामया म्यितिलयोदयहसयोऽस्म । उपचि, स्पिति, उप वादि अनेको मायाम्पी सीयरें लीलाता पदपि सचमयी प्रशान्त्यै करते हैं फिर भी अपकी सत्त्वगुणमपी मूर्ति ही बीको | शान्ति प्रदान करती है । रजोगुणी और तमोगुणी मूर्तियसे नान्पे नृणां न्यसनमोहभियम याम्याम्।।४५॥ मदि ही होती है ॥ ४५ ॥ भगमन् ! इसरिये बीबो शान्ति नहीं मिल सकती। उनसे तो दुस, मह और तम्मानवह भगवन्नर्थ तावकाना मुदिम्मन् पुरुष अपकी और आपके मोंकी परम प्रिय एष गुद मूर्ति नर-नारपणकी ही उपसना करते हैं। गुहां तनुं म्बदपिता पुशला भजन्ति । पाभराप्र-सिदाम्सके अनुपापी गुद सलाही अपा भीविग्रह मानते हैं। उसीकी उपासनासे आपके नित्य- यन् सात्यता पुरुषरूपमुसन्ति सर्च धाम येकुरसी प्राप्ति होती है। उस धामारी पर स्थिरता है कि वह टोक हानेर भी सप्पा भपरदिन और लाम्य पताऽभयमुतात्ममुम्बन नान्यत्।।४६।। भोगयुक होनेपर भी आरमानन्दसे परिपूर्ण है । ये रजोगुन और तमोगुगक आपकी मति स्वीकार नहीं करते ॥२६॥ तम्म नमा भगवते पुरुषाय भूम्ने मगन् ! आप अतयामी, सर्वव्यापक, समय, विधाप विधगुरव परदवतायै । जगहरू, परमागृप्य और गुस्सा है। समस्त यति र कि पाणी आप अधीन है। भार नागपणाप प्रापय म नरात्तमाप ही न'मागके प्राता हूँ।म आ स गुग पम्प नराचम नर आर पीर नागपणा मनसार ईमाप मंपनगिर निगमधराय ॥४७॥ फरता । ॥ १७॥ आर पार प्रत्यक जीरो के तब उन: रिपा, प्राग्गेमें तण उपमें भी पान ना रितपाइपयंभ्रमदा है ता भी अपार मायासे पुतिननी मदिन बनता हसता हमारी मन्न मापा स्पपि तस्या। इदियों ना मात्र गे ful अनि मार नगद गुस्ता| नमापपा पनि मउमाधा- पहनाना हानी HOUT HIRE Institute दापमानितगुगरपमाप यहम् II मन .

भ० ९] ९४९ पार्शनं निगम आत्मरहा प्रकाओं प्रभो ! वेदमें अपना साक्षात्कार करानेवास्य साह हान पूर्णरूपसे विधमान है जो आपके स्वरूपका रहस्य प्रकट मरता है। प्रझा आदिबह-बड़े प्रतिमावली मनीपी उसे प्राप्त सुपन्ति यत्र करयोऽजपरा पतन्त । करनेका या करते रानपर भी मोहमें पर जावे। आप भी एसे स्त्रीयाहारी है कि विमिन मतवाले आपके सम्बन्ध जैसा साचते विचारते हैं, वैसा ही शीठ समाव सवादविषयप्रतिरूपशील और सूप पण करके आप उनके सामने प्रकट हो माते हैं। पास्तवमें आप देश धादि समस्त उपाधिमें छिपे हुए विद मिसानपन ही है। पुरुपातम ! म पन्त महापुरुपमात्मनिगूढयोभम् ।।१९।। आपकी क्दना करता है ।। ४९ ॥ त इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहस्यों सहितायां सादशस्कन्धे मोऽध्याय ॥ ८॥ सूत उपाप अथ नवमोऽध्याय माकपजीका माया-पशन भीमामी कहते हैं-स्य शानसम्पम माकपडय संस्तुतो भगवानिय मारयेन धीमता । मुनिने इस प्रकार स्तुति की, तब मगवान् नर-नारापगने नारायणो नरसख प्रीत आइ मृगाहम् ॥ १॥ प्रसन्न होकर माकण्डेयजीसे कहा 11 १ ) मीभगानुपाप भगवान नारायणमे कहा-सम्मान्य प्रार्षिशिरो- मणि 1 तुम चिरकी एकाता, तपस्पा, स्वाध्याय, स्यम भो भो प्रारर्पियमासि सि आत्मसमाधिना । और भी मनन्य भकिसे सिर गये हो॥२॥ तुम्हारे मपि भचपानपायिन्या तप स्वाध्यायसयमैः॥२॥| इस अनीन प्रमचयतकी निष्टा देखकर हम तुम्पर बहुत ही प्रसन्न हुए हैं। तुम्हारा कल्याण हो । म समस्त षय के परितुष्टा स त्वरतपयेया। पर देनेशप्रेयर स्वाम्य है। इसपिये तुम अपना अभीर घर प्रतीप्छ भद्रं ते घरदहावभीप्सितम् ॥ ३ ॥ | पर मुझसे माँग मे ॥ ३ ॥ ऋपिरुषार माकणेय मुगिन कहा दावेश ! शरणागत भयहारी अधुत ! आपकी जय हो ! जप हा 'हमार वित तु दवदवश प्रपमातिरायुत । सिपे बस इतना ही पर पर्याप्त है कि आरन परा फरक परेगतावताले ना यद् भवान समान्यव ॥ ४॥ अन मनोहर स्वरूपमा दशन कराया ॥ १॥ प्रश्न शार अति देवाण योग-साधनाके शरा एकाग्र हुए गृहीत्वावादयो यम्य श्रीमत्पा रामदशनम् । मनसे ही अपक परम सुन्दर श्रीमरणपत्यका शन प्राप्त करफक्ताप हा गये है। आज उन्ही आरन मरे मनमा योगपंकन स भवान् मधगोचर ॥५॥ नेत्रोंक सम्न प्रस्ट हार मुझे धन्य नाप ॥५॥ १स १२ सम्म सहीस्थितम् । ३ मुख्न ।

९५० भीमद्भागवत [अ०९ सूत उपाय अधाप्पम्पुजपत्राष पुण्यसोकशिखामणे । पवित्रकीर्ति म्हानुमावोंके शिरोममि कमलनयन ! फिर मी वाफ्की भााके अनुसार में भाफ्से वर माँगता है। | में आपकी वह मया देखना चाहता , निस्से मोहित होकर सभी ध्येफ धौर कपाळ धरितीप वस्तु प्रथम वरुप मापां पया लोका सपालो वेद सम्झिदाम्।। ६ ॥ अनेक प्रकारके मेद-विमेद देसने उगते हैं ॥ ६ ॥ साजी कहते हैं-शौनकली ! जब इस प्रकार माय मुनिने भगवान् नर-नारायमकी इमनुसार इतीटितोऽर्चित फाममपिमा भगवान् मुने । स्तुति-पूना कर मी एव परदाम माँग म्यिा, तव उनाने मुस्कराते हुए कहा-'छक है, ऐसा ही होगा ।' समेति स मपन् प्रागावू पदर्यामममीधरः ॥ ७॥ | इसके बाद में अपने प्रश्रम पदरीफ्नफो घले गये ।।७।। मार्कण्डेय मुनि अपने आश्रमपर ही यकर निगम इस समव चिन्तयमर्धमृपि स्वामम एप सः । बाता चिन्तन करते रहते कि मुझे मापाके दर्शन कर होंगे। वे वमि, सूर्य, चन्द्रमा, सम, पृथ्वी, वायु, माकाश एवं पसमन्पर्कसोमाम्मवायुषियदात्मम क्तकरणमें और तो स्पा, सर्वत्र भगवान्का ही ॥८॥ | दर्शन करते हुए मानसिक वस्तुओंसे उनका पूजन करते यते । कमी-कमी तो उनके इसमें प्रेमकी ऐसी बार म्यायन् सर्वत्र च हरि भावपैरपूजयत् । वा नाती कि वे उसके प्रबाहमें बने उतराने गवे, | उन्हें इस पतकी मी याद न राती कि कल का किस कचित् पूजा विसमार प्रेमप्रसरसम्प्ठत ॥९॥ प्रकार भगवान्फी पूना करनी चाहिये । ॥ ८९ ॥ तस्पैदा भृगुंभेष्ठ पुप्पभद्राक्टे मुनेः । शौनकमी ! एक दिनकी बात है, सन्ध्याके सम्म पुपमा नदीके तटपर माफमेय मुनि भगवान्की उपासीनख संम्मापा प्रपन् षापुरमन्महान् ॥१०॥ उपासमा, तन्म्प हो रहे थे। ममन् ! उसी समय तं पण्ठमन्द समदीरपन्त एकरएक बड़े नोरफी आँधी घग्ने प्णी ॥१०॥ उस समप आँधीके कारण पी मयार वापर हाने रंगी पलाइका अन्वभवन् फराला । मौर गा विकराल बादछ धाकाशमें मैडराने मगे। विजी चमक-धमक कर काकने छगी और रपके पुरेफे अक्षस्थविष्ठा समचुम्तरितिः सम्पन बलकी मोटी-माटी धाराएँ पृषीपर गिरने स्वमन्त उच्चरभिवर्पधाराः ॥११॥ छगों ॥११॥ पही नहीं, माकम्य मुनिको एसा दिसपी पड़ा कि चारों ओरसे चारों समुद्र समूची पुप्पीको ततो परश्पन्त चतुस्समद्राः निगलते हुए उमड़े आ रहे हैं। मधीके देशसे समुद्र में बड़ी-बड़ी रे ठठखी है, या भयाहर भैनर पर समन्ततः क्ष्मावलमाग्रसन्यः। रहे हैं और मपर भनि फान फारे गस्ती है। समीरवगार्मिभिरुपनक स्थान-सानपर यो-यह मगर उस रहे हैं॥ १२ ॥ महाभयावतंगभीरपापा ॥१२॥। उस समय बाहर-भीतर चारों मोर मम्मी-वस अन्तवादियाधिरतियुभिः सरै दीप पा । ऐसा जान पड़ता पा कि उस समाशिम पृषी ही नहीं, सग भी खा जा या है। ऊपरसे यो सतहदाभारुपतापिवं जगत् । येगसे आँधी चल सी है और विवी चमक सी १ भफि ।२ मुनि ।। रपि ।

९५१ प्र०९] द्वादश स्कन्ध चतुर्विघं वीक्ष्य सहात्मना मुनि मिससे सम्पूर्ण जगत् संतप्त हो रहा है। स्व माकण्डेय मुनिने देखा कि इस नए प्रष्टयसे सारी पृष्पी इव गयी जे लाप्लुता क्षमा विमना समरसत् ॥१३॥ |, उदिब, स्वेदज, वणन और नरायुज- चारों तस्पैवमुद्रीपत ऊर्मिभीपण प्रकारके प्राणी तया स्वप ने भी अत्यन म्याकुल हो रहे हैं, तब वे व्यास हो गये और साप ही अत्यन्त प्रभसनापूर्णितवार्महायः भयभीत भी ॥ १३ ॥ उनके सामने ही प्रख्यसमुद्र यापूर्यमाणो वर्षदिरम्मुद मपहर व्हरें उठ रही पी, घाँधीके वेगसे वाशि उम्मळ रही पी और प्रल्पकालीन वादल मस-ससफर मामप्पधादशीपवर्षाद्रिभि समम् ॥१४॥ स्मनको और भी भरते जा रहे थे। उन्होंने देख कि समुवने दीप, पर्प और पर्षोंके साप सारी पृष्पीको सामान्दरिथं सदिषं सभागणं युवा दिया ॥१॥ पृथ्वी, अन्तरिक्ष, नग, ज्यातिमण्डल प्रैलोक्पमासीत् सह दिग्भिराप्लुसम् । (ग्रा, नक्षत्र एवं तारोंका सम्झ) और दिशाके साय तीनों लोक असमें स गये । वस, उस समय एकमात्र स एक एषोर्षरितो महामुनि- महामुनि मार्कण्डेय ही स्व रोये । उस समय के पागल घोर धके समान न्य फैलाफर यहाँसे पों म्राम विक्षिप्म स्टा जगन्धवत् ॥१५॥ और पासि यहाँ भाग-भागकर अपने प्राण वचानेकी चेय कर हे पे ॥ १५ ॥ ये मूलप्पाससे पाकुसो रहे सुवृद्पीसो मारैस्तिमिशिल- थे। किसी भोर बड़े-बो मार तो किसी ओर बह-यो | तिमिलिल मस उनपर ट्ट पाते । किसी बोरसे हवाफा रुपनुसो पीधिनभस्वता इतः। का पाता तो किसी बोरसे लबरेंके पपेड़े उन्हें घायल कर देते । इस प्रकार इधर उधर मटफते-मटकते तमस्पपारे पवितो अमन् दिशो वे अपार मानान्धकारमें पर गये-होश हो गये न वेद स गां च परिभमेपित ॥१६॥ और इतने पक गये कि उन्हें पृथ्वी वीर आकाशका भी मन न रहा ॥१६॥ कमी को मारी मकरमें पड़ जाते, कंचिद् गतो महापर्ने वरलैस्ताडित फधित् । कभी तरह कोफी चोटसे चल हो उठते । मग कभी मम्जन्तु आपसमें एक दूसरेपर आक्रमण करते, यादोभिर्मस्पत कापि स्वयमन्पोन्यपातिभि ||१७|| | सर ये भयानक ही उनके शिकार बन जाते ॥ १७॥ कहीं शोकमत हो नाते, तो कहीं मोहप्रस्त्र । कभी कषिच्छार्क कधिन्मोई कचित् दास सुखभयम्। दुसरी-दु के निमित पाते, तो कभी तनिक मुस्त मी मिल जाता । कभी मपभीत होते, कभी मर जाते, कचिन्मृत्युमत्राप्नाति पाप्मादिभिरतादित ॥१८॥ तो कमी तरह-तरह के रोग में सताने ध्यते ॥ १८ ॥ इस प्रकार मार्कडेय मुनि विष्णुम्गमान्फी मापाक अयुतायुवर्पाणां सहस्राणि शतानि च । घरमें मोहित हो रहे थे। उस प्रध्यायके समुद्रमें भटकते-भटकते में सेक्रबारों की मही, अखें. पंतीयुर्ममतस्तस्मिन् विष्णुमाया तात्मनः ॥१९॥ करोगों वर्ष बीत गये ॥ १९ ॥ १ण । २ वर्षति ।। मोर ।४ परितो । ५ पिम्मायामाप । ६ रासः । ७ भटीपु ।

९५४ भीमग्रामपत अन्सद अपेः सपो यहानीवनिर्मिता ॥३३॥ । तुरंत अन्तर्धान हो गये ठीक वैसे ही, असे बम्मो और पसमर्ष पुरुषों के परिप्रमका पता नहीं पता किरन दिय बिना ही क्या हो गया ॥३३॥शौनकी । उस तमन्वध पटो प्रमन् सलिल लोकसम्मृषः । शिशुके अन्तर्धान होते ही बब मगदका सदर प्रळ्यकालीन एस एव नल भी तकाल बन हो गप और मय मुनिने देख कि मैं तो पालेके सम विरोधायि क्षमादस स्वाभमे पूर्वपत् स्मितः॥३४॥ ही अपने पाश्रममें बैठा हुआ है ॥ ३१ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमास्यां संहितायो द्वादशस्फराधे माया- दर्शनं नाम नमोऽस्फपः ॥ ९ ॥ अथ दशमोऽध्याय मायाको भगवम् पारका वरदान सूत उवाच भीमनमी करते है-शौनकादि प्रपियो ! मममेय मुनिने इस प्रकार नारायण निर्मित योगमाफीमार स एवमनुम्मेद नारायणपिनिर्मितम् । अनुभव किया । अब पनिषय फरके कि इस मापसे पेमव योगमायायास्तमेष शरण यमौ ॥१॥ मुक्त होनेके लिये मयापति भावान्की कारण ही एकमात्र सपाय है, भीकी शरणमे स्पित हो गये ॥१॥ मार्करोयबीने मन-ही-मन कहा-प्रमो । वाफी झापा बासपमें प्रतीतिमात्र होनेपर भी साप शानके समान प्रपमोऽस्पध्रिमूलं ते प्रपन्नाभयद हरे। प्रकाशित होती है और बाबा विद्वान् भी उसके से मोहित हो जाते हैं। आपके श्रीचरणकम ही शरणागों को सब प्रकारसे वादाम पर है। इसमे मामय उवाच पन्मायपापि विपुषा मुमन्ति मानफाशया ॥ २॥ ने उनकी शरण प्राण की है ॥ २ ॥ सूत उपाय सामी करते--मण्डेयजी इस प्रकार शरणागी की मास्नामें समय हो रो थे। उसी समय मान् मेवं निभृतारमानं पेण दिवि पर्यटन् । शहर मगक्ती पावतीजीफे साप नन्दीपर समार होकर प्रकाशमासे विचरण करते हए उधर या निकले और स्टाम्पा भगवान् रुद्रा ददर्श स्थगणतः ॥३॥ मर्कारयजीसे उसी अपस्में देख। उनक साप मात से गग भी ५ ॥ ३ ॥ जय भगवती पार्वतीने मरणय अथामा समर्पि पीय गिरि ममभाषत । मुनिको पानी अपस्था तेस, ता उन दप सासम्प-स्नेहसे उमड़ पाया । उनाने शहरजीसे पहा--भगवन् । ततिरस प्रामणको बोर तो दरिसे। पश्पर्म भगवन् विप्र निमूना मन्द्रियापम् ॥ ३॥ से दमन शाम्त हो जानेर समुदयी नरें और मईयो १५५पामो ६५ । र भागप्याने ना सिमग ।५ मिरयम् ।

म.१०] द्वादश जन्म सूत उपाप निमृतोदमपात वातापाये मार्गषम् । शान्त हो जाती हैं और समुद्र धीर-गम्भीर हो जाता है, से ही इस ग्रामणका शरीर, इन्द्रिय और अन्त करण शान्त हो रही। समस्त सिदियोंके दाता यापही इसलिये रुपा करके बाप इस बामणकी तफ्स्पाका प्रस्पक्ष फीस तपसा साक्षात् ससिदि सिदिदो भवान्।। ५॥ फल दीजिये ॥१५॥ भीभगवानुषाम भगवान् शारने कहा-देवि । ये प्रामानि लोक अषवा परपफकी कोई भी वस्तु नहीं चाहते। और तो नैवेस्पाधिपः कापि प्रयोिधमप्यत । स्या, इनके मनमें कमी मोक्षफी मी भाकाहा नहीं होती। इसका कारण यह है कि घट-घटवासी अमिनाशी भगवान्के मक्किं परां भगवति लम्भवान् पुरुपेऽम्पये ॥६॥ चरण्यामों में इन्हें परम भक्ति प्राप्त हो की है ॥ ६ ॥ प्रिये । यधपि इन्हें हमरी कोई बावश्यकता नहीं है, भयापि संपदिप्मामो भपान्तेन साधुना । फिर भी में इनके साथ कतचीत करूँगा, क्योंकि ये महात्मा पुरुष है । जीवमात्रके लिये सबसे लम्की जय हि परमो लाभो नुमा साधुसमागमः ॥७॥ वात यही है कि संत पुरुषोंफा समागम प्राप्त हो ॥ ७॥ सूतवी करते हैं-शौनकनी ! मावान् शहर समस्त विचाओंके प्रपतक और सारे प्राणियोंके दयौ विराजमान पामी प्रमुहै। नगदक नितने भी संत इत्युक्त्वा तमपेयाप भगवान् स सतां गति । हैं, उनके एकमात्र छात्रय पौर धादर्श मी पही है। मगपती पार्वतीसे इस प्रकार काकर भगवान् शहर श्वाना सर्व विधानामीश्वरः सर्पदेहिनाम् ॥ ८॥ मकोय मुनिके पास गये ॥ ८ ॥ उस समय मार्कण्य मुनिकी समस्त मनोतियाँ भावदायमें समय पी। उन्हें अपने शरीर मौर जातका बिल्कुल फ्ता न प । इसलिये सयारागमन साधादीषयोगदात्मनः उस समय ये गा मी न जप्न सके कि मेरे सामने सारे विपके लामा सर्य मावान् गौरी-गाहर पधारे गए न बेद रुदधीचिरास्मान विषमय प॥९॥१॥९॥ शौनकली 1 सर्वशकिमान् भगवान् कैखस- पतिसे यह बात म्मिी न रही कि मार्कण्डेय मुनि इस भगवास्तदभिवाप गिरीशो योगमायया । समय किस धास्वामें है। इसशिये पैसे वायु वाकाशके स्थानमें मनापास ही प्रवेश कर गाती है, वैसे ही अपनी पोगमापासे मार्कण्डेय मुनिके उदयाकाशमें प्रवेश आविशगुहाकाशं पायश्किद्रमिवेश्वरः ॥१०॥ कर गये ॥ १० ॥ मारेय मुनिने देखा कि उनके दयमें सो भगवान् शहरक दर्शन होय।। शहरची यास्मन्पपि शिवं प्राप्त तरिस्पिङ्गमटाधरम् । के रिस्पर विचमके समन धमकी पीटी-पीठी स्टाएँ प्रेमयमान हो सी हैं । तीन नेत्र र धौर पक्ष दयपुर्व प्रशिमपन्वमिष भास्करम् ॥११॥ दस भुमाएँ । टप-पाका शरीर उदयान सूर्पके । । १ मधम्मुरम्।

९५२ भीमहागवत [.५ - स कदाचिद् भ्रमस्तमिन् पृषिष्याः वकृति विजः। शौनकनी ! मार्कण्डेय मुमि इसी प्रकार प्रत्यपके कथ्य बहुत समपाक मापते रहे । एक बार उनोंने पृपके एक न्यग्रोधपोतं दरशे फलपल्लवशोभितम् ॥२०॥ टीलेफर एक बेटा-सा घरगदमा पेड़ देस्य । उसमें हरे-हरे पत्ते और बाल-पल फल शोभायमान हो रहये ॥२०॥ प्रागुपरस्पो शालापां तस्यापि दरले शिशम् । क्रगदके पेपमें ईशानकोणपर एक ग्रह पी, उसमें एक पोका दोना-सा का गया था। उसीपर एक वमी अन्दर नन्हा स शिशु ले सा पा। उसके शीरसे शयाने पणेपुटके प्रसन्तं प्रभपा तम ॥२१॥ ऐसी उम्मक छय छिटक रही पी, मिससे पास-पासका धेरा दूर हो रहा बा ॥२१॥ वह शिशु मरमतमगि महामरक्सश्याम भीमववनपहजम् । के समन सौक्ला-साँवष्य पा । मुखकमलपर सारा | सौन्दय स्टा पाता था। गरदन के सम्मान खर- दाववाली थी। प्रती चौरी थी । तोकेकी पोको कम्मुग्रीवं महारस्क पुनासं सुन्दरम्रवम् ॥२२॥ समान सुन्दर नासिका और भौहें बड़ी मनोहर पी ॥२२॥ | काली काली घुषम्य कळ कमोझेपर लटक रही। पासजदलकामात कम्युभोफादारिमम् । और पास मानेसे कभी-कभी दिल भी जाती पी । शा के समान धुमकदार काम अनारके ख्यस बात पर विठ्ठमाधरभासेपच्छोणायितसुधामितम् ॥२३॥ शोभायमान हो ये थे । मंगेके समान अल-लाल होटो की कान्तिसे उनकी सुष्यमयी श्वेत मुसकान कुछ महिमा मिमित हो गयी पी ॥ २३ ॥ नोक कोने कमाये पपगभारणापा पहासाबलोकनम् । भीतरी मागके समान सनिक लाल-पल पे । मुसकान और चितवन सास दयको पा सेती पी। बी गम्भीर नामि पी । भेटी-सी तोंद पीपम्के पचेक समान स्वामजालिमविनिम्ननाभिदलादरम् ॥२४॥ अन पस्ती धौर भास लेनेक समप उसपर पीए पो तथा नामि भी हिल जाया करती पी ॥ २१॥ चावलिम्पा पाणिम्पादनीय चरणाम्पुषम् । | नन्हें-महें हार्योम मी पुन्दर-सुन्दर अंगुलियाँ भी। पर शिशु अपने दानों परफमसे एक चरणमाको मुमें ग्रपर घूस या प । माकण्स्य मुनि या दिग्य रस मुख निधाय विप्रन्द्राधय तं वाक्ष्य विसिवः॥२५॥ देखकर अस्पत विस्मित हो गपे ॥ २५ ॥ तपशनाद् पीवपरिभमा मुदा शनिफजी । उस दिम्य शिनुको देख्वे ही मार्करमेय मुनिकी सारी पट जाती रही। धानम्दसे उनके प्रान्फरतरत्पतिलाचनाम्पुज दप-कमर और मप्ररमा जिस गये । शपिर पुस्ति हो गया । उस नमें से शिफ इस अस्त भी प्ररएरामातभारशस्ति दसम्र उनम मनमें सह-तयती शहा-पर फोन है। इस्पादि-आने मनी और 1 उस शिशुसे ये पते प्र पुरने प्रममार पारम्म् ।।२६॥ मनक ठिये उसक सम्पन सरफ गपे ॥ २६ ॥ Pal२ स्थिप पुनभम्।

द्वादस मिन्म पापण्डियोष असिवेन भार्गव वमी मार्कण्डेपनी पाच मी न पाये थे कि उस शिशुके स्वासके साप उसके शरीरके भीतर उसी प्रकार मुस सोऽन्तपनीरं मष्ठको यपाविशत् । गये, जैसे कोई मर किसीक पेटमें पम गाय । उस शिशुके पेटमै चाकर आने सम्-की-सव भी सहि सत्राप्पदोन्पस्तमपए कत्लझा देखी, जैसी प्रश्पके पहले उनोंने देखी पी । वे यह पथा पुरामुमदतीव षिमिता ॥२७॥ सप विपिन दश्य देखकर वाचर्यचकित हो गये । ये व रोदसी भगणानद्रिसागरान् मोहवश कुछ सोच-विचार मी न सके ॥ २७ ॥ हनि उस शसके उदरमें पाकाश, पन्तरिक्ष, म्पोसिर्मपाल, श्रीपान सपर्षान फमा मुरासुरान् । पर्षत, समुह, दीप, पर्प, दिशएँ, देवता, देस्य, बम, पनानि देषान् सरितः पुराफरान् देश, मरिपा, नगर, साने, किसानोंक गोल, बहीरोकी पक्षियों, मात्रम, पर्ण, उनके वाचार-न्यमहार, पत्रमा खेटान् प्रवानाममवर्षाचयः ॥२८॥ भूत, मूतोसे बने हुए प्राणियोंकि शरीर तपा पदार्प, महान्ति भवान्पथ भौखिकान्पसौ बनेक युग बौर शोक मेदसे युक का बादि सब कुछ देख । केस इतना ही नही, पिम देशों, बस्यों कालं नानायुगकल्पफत्पनम् । और काणेक शरा अगदका व्यवहार सम्पन्न होता है, पद किंपियन्यद् म्यवहारकारणं यह सब कुछ हो विचम्पन पा फहातक को, पा सम्पूर्ण विश्न म होनेपर भी हो सायके समन प्रतीत ददर्ष विश्वं सदिपाषभासितम् ।।२९॥ घेसे देखा ॥ २८ २९ ॥ हिमाम्य पर्वत, बही पुण्यम्मा हिमालय पुष्पनहां च तां नदी नदी, उसके हटपर अपना भामम वीर यहाँ रानेवाले ऋषियोको मी मोयबीने प्रस्पक्ष दी देख । इस निजामम वेत्र ऋषीनपश्यत् । प्रकार सम्पूर्ण विश्वको देखते-देखते ही वे उस दिष्य विश विपश्यम्मसितारिखमा शिशुके शासके द्वारा ही बार आ गये और फिर प्रलय- | कालीन समयमें रिप ॥ ३० ॥ पत्र फिर उन्होंने सवल्लभाम्भौ ॥३०॥ देना कि समुद्रके वीचमें पृष्पीके टीलेपर की दरगदफा तसिन् पिया कहदि प्रहर पेड़ ज्यों-का-त्यों विधान है और उसके पचेके दोनेमें पर्ट १ तत्पर्णपुटे शयानम् । ही शिशु सोया हुआ है। उसके बापर प्रेमामूतसे परिपूर्ण मन्द-मन्द मुस्कान है और पानी प्रेमपूर्ण वोकं प वस्प्रेमसुभामिन मितपनसे मायनीकी मोर देश हा॥१॥ निरीधितोऽपाङ्गनिरीषणेन अब ममेय मुनि इन्द्रियातीत भगान्को यो शिशुके ॥३१॥ रूपमें कीग का रो ये और नौके मार्गसे पहले ही पतं पाठ वीक्ष्म नेपाम्यां पिष्ठितं हारि। एपमें विराजमान हो चुके थे, अमिन करनेके प्रिये बडे श्रम और कठिनाईसे बागेकडे ॥१२॥रस्तुशौनक प्रभ्मयादतिसहिएः परिप्वक्त मपोषजम् ॥३२॥ नी । भगवान् केप योगियोंके ही मही, स्वप ग्रेगके मी स्वामी और सपके हदय ये गनेकले हैं। अभी पावन स भगवान् सायाद योगाधीशो गुहाया। मार्कणेय मुनि उनक पास पहुँच मी म पाये ये कि १ अनि मम् । १ पत्र । ३ नमाम्यौ। ४ र पिभिवम् । , 1 ९५४ भीमद्भागवत [२.१. मन्त ऋषः सपो योहानीशनिर्मिता ॥३३॥ । तुरंत बत्तर्धान हो गये ठीक वैसे ही, वैसे वमगे और वसमर्थ पुरुषों के परिभमका पता नहीं पता किफ दिये बिना ही क्या हो गया ! ॥३३॥शौनकली। उस समन्वय वटो अझन् सलिलं लोकसम्मषः । शिशुफे अत्तर्धान होते ही बरगदका पतष प्रठ्यकालीन दृश्य एष पठ भी तकाल लीन हो गस और मार्कण्डेय मुनिने देखा कि मैं तो पहलेके सपन विरोधायि धगादस्स म्वाधम पूर्वपत् लिसः॥३४॥ी वपने धाश्रममें बैठा हुया है ॥ ११ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे पारमहस्य संहिताय द्वादशस्करचे माया- दर्शनं नाम नबमोऽभ्याप ॥९॥ मार्गप्पेय उवाच अथ दशमोऽध्याय मार्कणेयसीचे भपवाम् शहरका वरदान सूत उवाच भीतमी कहते है--शौनकादि प्रपियो ! मन्मेप स एबमनुस्येद नारायणपिनिर्मितम् । मुनिने इस प्रकार नारायण निर्मित योगाय का अनुमान किया । क्य या निरप करके कि इस मापसे वैभम योगमामायास्तमेव शरणं ययौ ॥१॥ मुळ होनेके लिये मायापति भगवान्की शरण ही एकमात्र उपाय रे, ममीकी शरणमें स्थित हो गये ॥१॥ मापोयडीने मन-ही-मनमा-प्रमो । मापकी माया पास्तवमें प्रतीसिम्पत्र होने पर भी सस्प प्रानके समान प्रपभोऽस्म्पनिमूर्ख ते प्रपन्नाभयद हर । प्रकाशित होती है धौर को-या विवान् मी उसके स्केने मोहित हो जाते है। आपके श्रीचरणकमल ही शरणग मन्माययापि विपुषा समन्ति मानकाशया ॥२॥ को स्थ प्रफारसे बमपदान करते हैं। इसलिये मैने ठमीफी शरण प्राण की ॥२॥ सूत उवाप सानी कहते-परेपनी इस प्रकार शरणागति- की भानामें समाप हो र ये । उसी समय मान् बेमे निमृतारमान उपेण दिवि पर्यटन् । शहर भगवती पार्वतीजीके साप मन्दीपर सवार होकर साशनासे विचरण करते हुए उप निकले और रुद्राम्या भगवान् रुद्रो ददर्भ स्वगणेतः ॥३॥ मगरेयत्रीको उसी वास्यमें देश । उनके साथ मात से गग भी थे ॥ ३॥ जय भगवती पार्वतीने मागम मुनिको प्यानकी अबस्थाम तब माइप अधोमा समर्षि वीक्ष्य गिरिश समभापत । बारसम्प-स्नेइसे नम क्या । उमॉने शहरजीसे पहा-मावन् । सनिकासक्षमी वोर तो दखिये। पश्पर्म भमनन् नि निमृता मन्द्रियाश्यम् ॥ ४॥ जैसे मान शान्त हो जानेपर समुद्रकी छहरे और मऽम्पिो १प पामो पर । २ पापपागफ्पाने ना ।। शिम्पाय। पाश ।५ तमिरयम् ।

म.१०] द्वादश जन्म ९५५ सूत उवाच निमृतोदनपत्रात पातापाये यथार्णवम् । शान्त ऐनाती हैं और समुद्र धीर-गम्भीर हो जाता है, वैसे ही इस बामणा शरीर, इन्द्रिय और अन्त करण शाम्त होगा। समस्त सिद्धियोंके दाता श्राप ही है। इसलिये क्या करके बाप इस बामणकी तपस्यका प्रत्यक्ष पूर्वस सपसः साक्षात् ससिदि सिद्धिदो भवान्॥ ५॥ फल दीजिये ॥ १-५॥ मीभगपानुवाच भगवान् शारमे कहा-देवि ! ये प्रमर्यि लोक पवा परोककी कोई भी वस्तु नहीं चाहते। और तो नेपेपत्याधिपा कापि प्रमर्पिोषमप्यत । क्या, इनके मनमें कमी मोभकी भी पाकासा नहीं होती। इसका कारण यह है कि घट-घटवासी अविनाशी मगवान्के भक्तिं परां भगवति लम्भवान् पुरुषेऽव्यये ॥६॥ चरणकममि इन्हें परम मति प्राप्त हो चुकी है।॥ ६ ॥ प्रिये । यपपि इन्हें हमरी कोई बावश्यकता नहीं है, अथापि संचदिप्पामो भवान्येसेन साधुना । फिर भी मैं इनके साप बातचीत करेगा, स्पोंकि ये महात्मा पुरुष है । जीषमात्रक लिये सबसे बड़े बाकी मय हि परमो लाभो नृणां साधुसमागमः ॥ ७ ॥ बात यही है कि संत पुरुषोंफा समागम प्राप्त हो॥७॥ सतजी इते है शौनफनी । भगवान् शङ्कर | समत विपाओंके प्रतिक और सारे प्राणियोंके हदयमें विराममान पन्तर्यामी प्रमु है । जगत्के जितने भी संत इस्युक्त्वा ससपेयाय भगवान् स सर्वा गतिः । हैं, उनके एकमात्र साप थोर आदर्श मी वही है। मामती पार्वतीसे इस प्रकार काकर भगवान् शार ईखाना सप विधानामीश्वरः सर्वदेहिनाम् ॥ ८॥ | मार्मण्डेय मुनिके पास गये ॥ ८॥ उस समय मण्डेय | मुनिकी समस्त मनोवृत्तियों भगवदाप स्मय थी । ठने अपने शरीर धौर माल्फा विस्कुछ पता न पा । इसलिये तयारागमन साधादीनयोर्जगदात्मनोः। उस समय वे यह मी म जान सके कि मेरे सामने सारे विपके वारा सर्य मावान् गौरी-शर पधारे हुए न वेद रुदधीचिरास्मानं विश्वमेव च ॥९॥॥९॥ शौनकली ! सर्वशक्तिमान् मगवान् फैस- पतिसे यह बात छिपी नही कि मार्फपटेय मुनि इस समय किस अस्सामें है। इसशिय जैसे वायु अवसाशके भगांस्तदभिशाप गिरीशो मागमायया । स्थानमें बनायास ही प्रवेश कर जाती है, से ही अपनी योगमापासे मार्पगडेप मुनिके एकाशमें प्रमा आविशचद्गुरामाशं पायुश्छिद्रमियेश्वरः ॥१०॥ पर गये ॥ १०॥ माकपडेय मुनिने दहा कि उनके हत्यमें तो भगवान् शाहरके दर्शन हो रहे हैं। शाररनी- आत्मन्पपि शिव प्राप्त गरित्पिङ्गजटाधरम् । के शिरपर विजक समान घमणी पीटी-पीय चटाएँ समयमान ही है । तीन नेत्र है और यध दशभुज प्रांशुमपन्तमिव भास्करम् ॥१९॥ दस मुजाएँ । संग-माका गरीर उदफालीन सूर्यके १ पधम्मभुम्मा भीमहामवत माघधर्माम्बरधरं मूलस्वट्वाङ्गवर्मभिः । सम्बन वेजस्सी है ॥ ११ ॥ धीरपर समम्म परम किये हुए हैं और हामि शूल, मग, स, मार- वषमालासमरुककपालासिधनु सह ॥१२॥ मन्य, उमरू, सप्पर, तलवार मौर धनुर लिये हैं ।। १२ ॥ माय मुनि अपने हृदयमें अकस्मत् मगमन् शाका विग्राम सहसा भात पिपल्प एदि पिसिना । या रूप देखकर विस्मित हो गये । परस्य! किमिदं कृत एवेति समाधेरिवो मुनिः ॥१३॥ बानेसे नोंने अपनी समाधि सोत दी ॥ १३ ॥ कहाँसे वाया। इस प्रकरणी पियोंका मप से ने उन्मीस्म दम्झे सगण सोमयाऽऽगतम् । गन्होंने बौखें खोली, तव देखा कि तीनों स्मेकोंकि एक मात्र गुरु भगवान् शहर भीपार्वतीनी तप वपने गई रूद्र बिलोकैकगुरुं ननाम सिरसा मुनिः ॥१४॥ स्मथ पधारे हुए हैं। सनाने ठमके घरोंम मा टेवर प्रणाम किया ॥ १५ ॥ तदमर मरम्प मुनिने तेस्मै सपो म्पदपात् सगणाप सहोमया । सागत, घासन, प्रच, वर्ण, गन्ध, पुष्पमात्र, प्प और स्वागतासनपाचार्यगन्धस्रग्धूपदीपक दीप वाशि उपचारोंसे भगवान् शहर भगवती पार्षी ॥१५॥ और उनके गर्णोकी पूना फी ॥ १५ ॥ इसके पश्चात् मार्कण्डेय मुनि उनसे करने मो- सम्पाफ * या पात्मानुभावेन पूर्णकामस ते विमौ । सर्वशक्तिमान् प्रमो 1 पाप अपनी वारमानुभूति और करणाम किमीशान मेनेदं नितिं जगत् ॥१६॥| 0 मरे में उस शन्तिका निस्तार हो रहा है महिमासे ही पूर्णकाम है। बापकी शान्ति और मुस्से ऐसी अवस्था में आपकी क्या सेवा कह।।। १६॥ में नमः शिवाय शान्ताय सत्वाय प्रमृराय च । पापफे त्रिगुणातीव सदाशिव मस्फको और सलगुगसे युक्त शान्तनरूपको नमस्कार करता हूँ। में अपने रबोपेऽप्यपोगम नमस्तुम्म तमोजो ॥१७॥ रजोगुणयुक्त सर्वप्रवर्तक सरूप एक तमोगुणमुक वधोर सरूपको नमस्कार करता ॥ १७ ॥ मीस्तमीपते है-शौनकमी । न मम एवं स्तुतः स भगवानादिदेवः सतां गतिः । मुनिने संतोंके परम वामप देवाधिदेव मगमान् शारकी परितुष्टः प्रसमात्मा प्रहसंस्खमभाषत |॥१८॥ इस प्रकार स्तुति की, हलवे उनपर भापत सर मौर को प्रसम चितसे सते एकाने को॥ १८॥ मीभगवानुमान भगवान् बरमेबा-मोपदी प्रमाणुि तवा में-म तीनों ही बरदासामोंके सामी हम बरं मीप नः काम परदेषा पर्म प्रया। मेनुका दम कमी म्यप नही बता । हमसे ही मरणशपिक मनुष्य मी बसूकमकी प्रामि कर देता है। अमोपं वर्णन येगा माँ पद पिन्दोऽमृतम् ॥१९॥ इसलिये मारी बोइयो, पीवर मासे मांग मे । १९॥ १ तोमरः । २ मिस ।। माचीन मतिमें प्तस्मै सोमन इस पर लानमें विमुपारमसमापन सन निकोपमा ऐता फो। इसके सिमा पर्तमान प्रविमें थे २५ मामाभाचारमा कित सम्मापारिभिा' मामलोसनेमा न परकर माँ ही ( विमुष्या नमः इसके बार) पहा गया है। इसके मात् पगास्न हस्पादि प्रमेय पाठ है।४ रेणाप नित्याच प्रम् ।५ मेप पो । बामदेवा। प्राचीन प्रतिम परिक्षा "भारत र पाकिसान माप परपोरेवरेको महेयर। । ऐख पाठहै। भीमभाव उग्रप । सूत उपाय :

२०१० ९५७ मायणा साधमः शान्ता निस्सा भूतपस्सला।। ग्रामण समावसे ही परोपकारी, शान्तचित्त एवं मनासक होते। वे किसीके सायबरभाष नही रस्ते धीर एकान्तभक्का मसासु निराः समदर्शिनः ॥२०॥ समदर्शी होनेपर भी प्राणियोंका - देखकर उसके निवारण के लिये पूरे दयसे जुट जाते हैं। उनकी सम्से पसी विशेषता तो या होती है कि वे हमारे घनम्य प्रेमी सलोन लोकपालास्तान् वन्दन्स्पर्धन्स्पुपासते। एवं मत होते ॥२०॥ सारे ग्रेप और कयास ऐसे प्रमों की वन्दना, पूजा और उपासना किया करते मा प भगवान प्रमा स्वय घ हरिरीपरः ॥२१॥ । फेवक वे ही क्यों, में, भावान् प्रमा तपा सय साक्षात् पर मिणु भी उनकी सेवा संसान राते न ते मय्यन्यतेऽब च मिदाममपि षधते। हैं ॥ २१ ॥ ऐसे शमन्त महापुर मुघौ, विष्णुमगमान्में, आमा, श्यनेमें और सम वीमें अणुमाय भी मेद मही नास्मनम बनस्सापि सद् युष्मान् पयमीमहि ॥२२॥ देखते । सदा सर्वदा, सर्वत्र थोर सर्वपा एकरस पारम्बका ही दर्शन करते हैं। इसलिये हम तुम्हारे-जैसे महात्मानों- न पम्मपानि तीर्थानि न देसाश्वेतनोमिता। की स्तुति और सेवा करते हैं।॥ २२ ॥ मार्कण्डेयमी! | केवल मलमय तीर्प ही तीर्प नहीं होते तपा केवर ना से पुनन्त्यरुपलेन यूयं दर्शनमात्रतः ॥२३॥ मूर्तियाँ ही देवता नहीं होती । सबसे बड़े तोप और देवता तो तुम्हारे-वैसे संत १, स्पोंकि ये तीर्थ बौर | देवता बहुत दिनों पवित्र करते हैं, परन्तु तुमरोग मामणेम्पो नमस्सामो येऽसम्पं प्रयीमयम् । दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देते हो ।॥ २३ ॥ हमलोग तो प्रमोंको ही नमस्कार करते हैं, पोंकि ये चिक्की निमस्पारमसमाधानतपरखान्यायसंयमै ॥२४॥ एकामता, तपस्या, स्पध्याय, धारणा, प्पान और सम्माविक पारा हमारे बेदम्य शरीरको धारण करते ॥२१॥ मायनी बाई महापापी और अनपत्र मी मुम्हारे अषणा दर्शना पापि महापातफिनोऽपि वा। जैसे महापुरुषों के परिप्रश्रवण वौर दशनसे ही शुर हो जाते हैं, फिर ये सुमोक सम्भापण और सहवास शुम्पेरभन्स्पजामापि किमु सम्भाषणादिमिः।।२५।। मादिसे शुद्ध हो जायें, इसमें सो पानाहीश्या है ॥२५॥ श्रीमतजी करते हैं-शौनका अस्यिो । चन्द्र पण मगमन् शहरी एक-एक क्त धर्मक गुरुतम इति चन्द्रललामस्प धर्मगुयोपहितम् । रास्यसे परिपूर्ण थी। उसके एक-एक अक्षर अपक्का समुन्न भय मुख्श एमक्यस्य मुनि सपने पानोंकारा पपोऽमृतापनमूपिनावप्यत् कर्णयोः पिरन् ॥२६॥ तन्नि न ( २६ ॥ वे बिरालक विशुभगान्धी भी तमपटाके साप उसका पान फरसे रहे, परम्तु उने म्यासे पटक सुक ये और बहुत पके पुए भी थे। सपिर माययादिप्योग्रामित मस्तिोमाम् । मापन् शिवकी कल्याणी ग्रगीमा अमृतान करनेसे १ साधन माफ्टिन्युमिनुम् । २ हयिो। सूत उपाय - मा २७॥ m/marra गये।महान मावान् सारसे बम भी प्राणियोंकी समझके परे।।मत्र, mamuhमाविस्वामिग्माधिमा।|२/रते ॥ २८ ॥ धर्मके प्रमपनकार प्राय प्राणियोंको मातरमपमुमोपन्त मिसमा स्तुपन्ति ॥२९॥ माचरण करता, तो उसकी प्रशसा भी करते हैं॥२९॥ नम्मेवानुमावस्वैर्मामिना पार्क मया ॥३०॥ | किसीकी पदना-स्तुति यादि करते हैं तो केवल इस गुफाभिरामावि कव स्वप्नाग यथा॥३१॥ / सी की है और इसमें स्पर्य प्रवेश करके फर्ता न होने ९५६ श्रीमद्भागवत म्पाघ्रचर्माम्बरधरं शूलस्वट्मागर्मभिः । मधमालारमरुककपालासिधनुः नेपा-सचमुच सर्वशधिमान् मगलान् पिमार्ण सहसा भा जो सही ये सारे जगत्के स्वामी होकर मी वाने फिमिदं मीन रानेवाले मेरे-जैसे बीवोंकी पदना मोर स्तुति नेत्रे पर रास्य और स्वरूप सम्मानेके लिये उसका धारण धौर अनुमोदन करते है तथा कोई धर्मका जैसे नागर अनेकों से दिखता है और उन खोसे उसके प्रमाषमें कोई मन्तर नहीं पात्य, वैसे ही बाप अपनी स्वजनमोहिनी मयाकी पूरियोंको स्वीकार करके फामकेशरा काफ्की महिम्बमें कोई त्रुटि नहीं आती ॥३०॥ वापने स्वप्नद्रायके समान अपने मनसे ही सम्पूर्ण विकी . wwar मा कर पिनाम् । नाता ममता स्वमायाममातिभिः। पाय मनसा विश्वमात्मनानुप्रविम्म यः। तस्मै नमो भमरते त्रिगुभाष गुपारमने। पर मी कर्म करनेवाले गुपों के धरा क्लकि समान प्रतीत होते हैं ॥ २१॥ मगछन् । श्राप त्रिगुणस्वरूप | नेपर भी उनके परे उनकी क्षमाके रूपमें स्थित है। साप ही समस्त जानके मूल, केसर, अद्वितीय स्वरुप पायामितीमाय गुरवे असमर्वये ॥३२॥ में काफ्को नमस्कार करता ॥ ३२ ॥ अनन्त । कंपनु पर भूमन् परं स्वव परदर्शनात् । ध्यापके श्रेष्ठ दर्शनसे पाकर एसी और कौन-सी बस है, मिसे में वरदानके रुपमै माँ ! मनुष्य कारके पार्शनाव पूर्णफामः सस्पकामः पुमान् भवेत्॥३३॥ दर्शनसे ही पूर्णकाम और सत्यसाइम्प हो जाता है ॥३३॥ माप स्वयं तो पूर्ण हैं ही, अपने भनेकी भी समस्त वरमेक मऽपापि पूर्णात् कामाभिषपणात् । कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। इसरिये में आपका दर्शन प्राप्त कर सेनार भी एक पर और मैगता है। भगपत्यम्पुता भक्ति वस्परपु वमा स्वपि ॥३४॥ और वापमें मरी वविधा मति सदा-सदा बनी पा यह कि भावान्में, उनके शरभागात मळमें रो॥३१॥ सूत उपाय भीमाजीहते है-शीनमनी । अब ममाप इस्पचिताऽभिप्तम मनिना मक्कया गिरा। | मुनिने सुमधुर गाणीसे इस प्रकार मापन शारकी स्तुति तमा भगवामयः धपा पाभिनन्दितः ॥३५॥ बार पून्य पी, तब उन्होंन भगपती प्रपतीफी प्रसाद पपरा ३ मा ।

ब०१०] बादश स्कन्भ ९५९ सूत उपाय कामो मा सर्वोऽयं भकिमास्वमधोक्षजे । प्रेरणासे यह बात कही ।। ३५ ।। मा! तुम्हारी सारी फामनाएं पूर्ण हो । इन्द्रिपाठीत परमात्ममें सुमारी मनम्प मामल्पान्ता यमः पुण्यमजरामरता तथा ॥३६॥ भक्ति सदा-सदा बनी रहे । कम्पपर्यन्त तुम्हारा पवित्र पश फैले और तुम मम एव अमर होगायो ॥ ३६॥ मझन् ! तुमारा प्रयतेम तो सौदा प्रमुण्ण रहेगा ही। धानं कालिकं प्रमन विज्ञानं च विरक्तिमत् । तुम्हें मूत, मषिष्य और वर्तमानके समस्त विशेष मानोंका एक भविष्टनरूप पान और वैराम्प्युक्त स्वरूपस्थितिकी मधषखिनो भूयात् पुराणाचार्यतास्तु से ॥३७॥ प्रामि हो बाप । में पुराणका आचार्यष मी प्राप्त हो ॥ ३७॥ भीमाजी करते हैं-शौनकली 1 इस प्रभार त्रिवन मगवान् शाहर मार्फगरेय मुनिको पर देकर मगमती एष परान् स मुनये दापागात पपईमरः । पार्वतीसे मण्डेय मुनिकी तपस्या और उनके प्रलय- | सम्पधी अनुमत्रों का वर्णन करते हुए होसे चले देव्यै तत्कर्म कथयभनुभूत पुरामुना ॥३८॥ गये ॥ ३८ ॥ गवंशशिरोमगि मार्कण्डेय मुनिको उनके महापोगा परम फल प्राप्त हो गया । व म्पयन्फे सोऽप्पवातमहायोगमहिमा भार्गवोत्तम । पनन्यप्रेमी हो गये । अव भी वे भकिमारमरित हयसे पृथ्वीपर विधरण किया करते हैं ।। ३९ ॥ परम अन- विचरत्पघुनाप्पद्धा इराधकान्समा गत ॥३९॥ सम्पन माकण्डेय मुनिने मगवान्की योगमापासे निस भडत स्त्रीमका अनुभव किसा पा, प्रमैने व्यापागोको अनुवर्णितमेतच मार्कण्डेयस धीमतः । सुना दिया ॥ १० ॥ शीनफनी । यह नो मार्कण्डपमीने बनेकपल्पोंका-सपिपलपॉका भनुभव किया, वह मगमान्- मनुस्त भगवतो मापाषैभषमनुसम् ॥४०॥ की मायाका ही पैमा पा, ताकाठिय प और उनीक एतत् फेचिदषिसो मायासंयतिमात्मन । लिये पा, सर्वसाधारणके लिये मही । फोसार इस मायाकी रचनाको न जानकर बनादिकालसे मार मार अनापावर्सित नृणां कादाचित्कं प्रचक्षते ॥४१॥ हरानेगाले सुपि-प्रलय ही इसको भी बताते हैं । ( इसलिये भापको यह शाम नहीं करनी चाहिये कि इसी कम्पके य एषमेतद् मृगुवर्य वर्णित हमरे पूर्वज माफण्डेपनीकी वायु इतनी सैफी कैसे हो गयी. ) ॥ ११॥ गुपशशिरोमण । भाएको स्थागपाणरनुभाषभावितम् । पर बोम्मकारयचरित्र मुनाग्य है, मह भगवान् घामगिक प्रभाष बोर महिमसे भरपूर है । जो इसका प्रवण एवं सभावयेत् समृणुयाद् सावुभौ कीर्तन परते , ये दोनों ही कम-वासनामोंक कारण प्राप्त होनेवाले आवागमनके परसे स्वाक पेिश सयान कमाशयमतिर्मवेत् ॥४२॥ आते हैं ॥ ४२ ॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराण पारमाइम्य संहिताप शादशस्त्रत्ये दयाऽम्पाप ॥१०॥ १ पि ।२ यातय | ति ।। ५ मा ।

श्रीमद्रामवत . सूत उवाच अथैकादशोऽध्याय भगवान्के मह उपा मोर मयुन रहम सपा विभिन पंपोंकर पर्षण शौनक उपाप शौनकसीने कहा- सूतनी ! बाप मानके पम भऊ और बोंमें शिरोममि है। हममेग समन अधेममर्थ पन्छामो भषन्त पहुवित्तमम् । शाओंके सिद्धान्तके सम्श्वमे वापसे एक विशेष प्रल छना चाहते हैं, क्योंकि पाप उसके मर्म ॥१॥ समस्तता राक्षान्ते भवान् भागषत सम्पचिद ॥१॥ मग नियोगका पसरत् ग्राम प्राप्त करना चाहते है। वान्विचा परिचर्यामा केबसस भिया पते। क्योंकि उसका पुस्ताक ठरपाठीक आचरण करनेसे मरणधर्म पुस्प अमरत्व प्राप्त कर लेता है। क्त वापहमें अपाङ्गायुधाकल्प कल्पपन्ति थाप यः ॥२॥ या मतमाये कि पारादि तत्रोंकी विधि जानने के मेग केवल श्रीमीपति मगवान्की वाराधना करते सम्म उमो पर्णम भद्रं ते प्रियापोर्म पुसत्सवाम् । पित किम वलोंसे उनके परमादि का गरुमविठा मेन क्रियानैपुणन मो मायादमप॑वाम् ॥ ३॥ करते हैं। मगलान् आपका कम्याण करें ॥ २३॥ मदर्शनादि वायुष वीर फोस्तुमादि वाभूमोंकी करना भीस्वामी कसा शोमकली प्रमादि वाचायनि, नमस्तस्प गुरुन् वक्ष्ये विमतीय प्णवीरपि । दोंने बौर पराप्रादि तन्त्र-मन्पोने विष्णुमगमन्की मि मितियों का वर्णन किया है, मैं श्रीगुरुदेव के परम यो प्रोका परतन्त्राम्पामाचा परमादिभिः॥ नमस्कार करके बाप मेगको ही मनाता ॥ १ ॥ मायायैवभिस्तस्यैः स विकारमयो विराट् । भगवान्के निस चेतनारिछिन विराट रूपमें किसकी दिखायी देती वह प्रकृति, सूत्रामा, महत्तल, भार | और पामा-इन मौतोकि सहित पार थिय निर्मिता श्यत पत्र मचित्के सवनत्रयम् । ५॥ तपा पञ्चभूत-इन सोव्य विकारों से बना हुआ है ॥ ५॥ एस वै गोरु रूपम् पादौ पौः शिरो नमः। यह भगवान्का ही पुरुररूप है । भी इसके भरण है न मखक , अन्तरिक्ष नाभि , सूर्प नेत्र, सु नाभिः सूर्योऽधिपी नासे पापु की दिशाप्रभो ॥६॥ मासिका है और दिशा फान १॥ ६ ॥ प्रश्पति BिE प्रमापतिः प्रमननमपाना मृत्पुरीथितः । है, मुस्पु गुदा है, स्करराष्ाण मुबर १, पन्द्रमा मन नावा लाकपाला मनभन्द्रा ध्रुवौ यमः ॥ ७॥ मनीपेश होठ है, स्न्द्रम्पकी भाभी दस्ताव है और पारान मरि ॥७॥ मम उरस होठ लआचगेऽपरा लामादन्ताग्याला मायाप्रमः। ८ भ्रम मुसमान है इस रोम और बदउ । मिराठ रामामि भूदा मूसा मपा पुरुषर्षभाः ॥ ८॥, पुस्पक सिरफर उगे हुए माउ ॥ ८ ॥ ौन सनी किस पारानप प'पुरुपा यावन्या सम्पया मितः । प्रसार यह म्पटि पुस अपन परिमामसे सात यश उसी प्रसार र समरि पुरुर भी इस येफसमितिक साथ सारानमारपि महापुरुपा ठारसम्पया ॥९॥ अग्ने सत पसेका ।। ९ ।। १२ पारेकामा प्रेम भापा । 1 4.] द्वादश स्कन्ध कौस्तुभम्पपदेशेन वास्मज्योतिर्षिभर्पयः । स्वयं मयन् अजन्मा है। वे कौस्तुममणिक बहाने जीव चैतम्परूप आरमज्योतिको ही धारण करते हैं और सत्प्रमान्यापिनी साक्षात् धीवत्सरसा विसः॥१०॥ उसकी सक्यापिनी प्रमाको ही पक्ष स्यपर भीवास रूपसे ॥१०॥ वे अपनी सत्व, रज थादि गुणोंगाम खमा वनमालास्यां नानागुणमयी दधत् । मायाको बनमालक रूपसे, एन्फा पीताम्बरके रुपसे सण उम्-न तीन मानाबाले प्रणवने योपवीतके पासच्छन्दोमय पीतं ब्रास्त्र विषत् स्वरम् ॥१॥ रूपमें धारण करते हैं ॥ ११ ॥ देवाधिदय भगवान् विभर्ति सांस्प योग घ देयो मकराणाले । मान्य और योगमप ममरात कुमास तय सब कोको अभय करनपाले प्रयकर ही मुकुटके रुपमै धारण मौलि पदं पारमेप्ठ्यं सर्वलाकारापकरम् ।।१२।। करते हैं ॥ १२ ॥ प्रति ही उनकी शेपशम्प्य है, निसपर से विराममान यते हैं और धर्म-धानादियुक भम्पारुतमनन्तास्यमासन याधिष्टितः । सतगुण ही उनके नामिकमटके रूपमें वर्णित मुआ धर्मशानादिभिर्युक सम पयमिहोम्मत ॥१३॥1॥१॥ वे मन, इन्द्रिय और शरीरसम्बन्धी शक्कियोंसे शुभ प्राणततरूप कौमोदकी गदा, बस्तखरूप पाचन्य मोबस्सहोमलयुतं मुस्पतस्य गदा दधन । राश और तेम्सस्सलप मुदशन-चक्रको धारण करते यो सस्व दरवर जस्ता सुदर्शनम् ॥१४॥२॥ १ ॥ भामाशके समान निर्मउ आफाशस्वकप सम्म, तमोमय पधानरूप सड, काप शाधिनुष और नभानिमं नमस्तस्यमसि धर्म समोमयम् । फर्मका ही तरफ धारण किये हुए है| इन्द्रियों कालरूपं धनुः सा तथा कर्ममयपधिम् ॥१५॥ | काही मगवान्के बों के रूपमें कहा गया है । क्रिया- शळियुक मन ही रातमाएँ रश्क बाहरी भाग इन्द्रियाणि शरानाहुरासीरस्य स्पन्दनम् । है और पर अम्प यादिक मुदामोंसे उनकी वरदान, सन्मात्राम्पस्माभिन्यक्ति मुद्रयाक्रियास्मताम् ।१६॥ अम्पान वादि उपमें कियागीता प्रकट हाती है ॥१६॥ स्पमा यया अग्निगाठ ही भगवान्की मण्टस देवय मनं दीया संस्कार आरमनः । पूजा स्थान है, मत करणका शुनि ही मन्त्रदीक्षा धौर अपने सस्त पापोंका नए कर देना ही मायन्की परिषयो भगवस आस्मनो दुरिवषयः ॥१७॥ पून ॥ १७॥ भगवान् भगन्दा लीलाममलमदान् । बामगा ! सुमन एस्य, धर्म, पश, मी, शन पोर बेराग्य-नए पदापाका नाम ही सीय-फमा है, धम यसप भगवाधामरम्पपनेऽभवत् ॥१८॥ विसे मायान् अपने परकममें पारण करत है । धम भार पशको मारा चैंबर एवं न्यन (पले)क आवपत्र तु पैडण्ठं विधा पामास्ताभयम् । सपसे तप अपने निर्भप धाम फुण्ठया स्यम्पसे धारण किये हर है। तीनों वेदोका ही नाम गहा। ही निवेदः मुपणाल्पा याति पूरुपम् ॥१९॥ तामी परम्पराका वहन करत ह ॥ १८ १९ ॥ अमसमय भगवानफी उनमें कमी न मिठुरनेवाठी अनपायिनीभगरती भी:सावादात्मनार । यस्माधिका ही नाम पम । भगवान्क पापक रिम् । २ नमस्तम् । ३ र्म ताये। । भासं २,१२१-

श्रीमद्भागवत
विमसेनस्तन्त्रमूर्तिर्षि दिनः पार्पदाधिपः ।
| मायक विश्वविश्वत विष्वक्सेन पाश्चरात्रादि वागमरूप
है। मगवान्क स्वाभाविक गुण वणिम्स, महिमा काम
मासिद्रियों को ही मन्द-मनन्दादि पाठ द्वारपाउ करते
नन्दादयोऽष्टौ शास्वामतेऽणिमाया हरेर्गुणा।।२०। । ॥ २० ॥ शौनकची ! स्वयं भगवान् ही बसदेव,
संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिम्ब -न पर मूर्तियों के
वासुदेवा संकर्षणः प्रयुम्नः पुरुषः खयम् ।
रूपमें अवस्थित है। इसलिये उनको चतुके रूप
कहा जाता है ॥२१॥ वे ही अमत् क्वत्यके वभिमानी
'विसा बनकर शब्द
पर्श धादि बाघ विस्पोको पान
अनिरुद्ध इति प्रमन् मूर्विम्यूहोऽभिधीयते ॥२१॥ करते और वे ही स्वप्नावस्थाके अभिमानी सैक्स' बनकर
वाप विपोंके बिना ही मन-ही-मन अनेक विषयों को
स विश्वस्तै जसः प्राबस्सुरीय इति प्रधिभिः ।
। देखते धौर ग्रहण करते हैं। वे ही मसि-यपत्यके
वमिमानी 'प्रास नकर विषय धौर मनके संस्कारोंसे
मुक मानसे टक माते है और वही सपके साची
वर्षेन्द्रियाशमवानर्ममषान् परिभाम्पते ॥२२॥ परीया रहकर समस्त प्राोंके अधिष्ठम रहते हैं ॥२२॥
इस प्रकार का, उपमा, बायुध मोर वाभूपोंसे युछ
धापाकापुपाकरपैभगवास्तचतुष्टयम्
तपा कामदेव, संकर्षण, प्रगुम्न एवं अनिरुद-इन चार
मर्सियोंके रूपमें प्रकट सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीपरि ।
विभर्ति म चतुर्मतिर्मगवान् हरिरीपरः ॥२३॥ क्रमश विश्व, तेजस, प्राय एवं तुरीयरूपमे प्रकाशित
हाते॥२३॥
विजऋपम स एप प्रमयोनिः स्वयंरक् शौनकली ! यही सर्वस्वरूप भगवान् मेक मून
कारण है, वे स्वयंप्रकाश एर्म पानी महिमासे परिर्ण
स्वमहिमपरिपूर्णो मायया चे स्वयैवत् ।
१। अपनी मापासे ब्रह्मा धादि सपों एवं नामोंसे
इस विषकी सटि, स्पिति और संहार सम्पन्न करते हैं।
समवि परति पातीस्यास्पयानास्वाक्षा इन सब फर्मों और नामोसे उनका मन कभी भारत
नही होता । यपि शासनि भिन्नके समान उनका
वित्त इस निरुक्तस्तस्परैरारमसम्पः ॥२४॥ वर्णन हुआ है अपश्य, परन्तु ये परमे मर्कोको मारम-
स्वापसे ही प्राप्त होते हैं ॥ २१ ॥ सचिदानावकर
श्रीकृष्ण रुप्मसस्त पुष्पभापनिट श्रीकृष्ण ! आप अर्जुन के सहा है। आपने पदुवंशशिरो-
मणिके रूपमें मातार प्रहम करके भीके बाहरी भूपामेंको
ग्राजन्यवादहनानपवर्गवीर्य
भस्म कर दिया है। आप पामस सहा एकरस राता
है। जकी पयायएँ और आपके नारदार प्रमी
निरन्तर आपके पत्रि पशा गान करते गते है ।
गाविन्द गापवनिवाग्रजभूस्यगीत
गोविन्द ! आपक माम, गुण और सीप्रदिपाभाय करनेसे
ही जीवा माहो जाता है। हम सप सापक सेवक
सीधभषा भवणमाल पारिभृत्पान् ॥२५॥ है। आप न करके हमारी रक्ष पीरिये ॥ २५ ॥

अ०११] द्वादश स्कन्ध ९६३ सून उपाय य इद भय उत्याय महापुरुपलक्षणम् । पुरुषोम भायान्के बिहभूत , उगा और आयुध आदिके इस वर्णनका जो मनुष्य भगवान्से ही चित छाकर पवित्र होकर प्रात का पाठ करेगा, उसे सपके इयमें रानाले प्राम्बाप परम्पमा ज्ञान हो सचिचः प्रयतो जप्या मम वेद गुमाशयम् ॥२६॥ आयग्न ॥ २६ ॥ शौनकलीने कहा- शौनक उपाय -स्तजी! मगषान् श्रीमुकदेवीने भीम्दागक्त-कपा नावे समप या परीक्षितसे (पाश्चम शुको यदा भगवान् विष्णुराताय श्रमते । स्कत्व ) कहा कि अपि, गत्यप, नाग, अप्सरा, यक्ष, समस और देवताओंकर एफ सौरगय होता है और सौरोगणो मासि मासि नाना पसति सप्तकः॥२७॥ | ये सातों प्रत्येक महीनेमें बदलते राते है। ये बारह गण अपने सामी शदश भादिपोंके साथ रहकर म्या वेपो नामानि फर्माणि 'संयुतानामधीयौः । काम करते हैं और उनके मन्तगत व्यक्कियों के नाम स्पा है । सूर्पक रूपमें भी स्वयं मापान ही है। इसउिये उनके विभागको हम ही धमाके साथ मनना पाते दिन भाधानानो व्यूह सूर्यास्मनो हरे॥२८॥ २, आप क्या करके कहिये ।। २०२८॥ भीमतीने कदा-समस्त प्राणियोंकि भारम्प भगवान् विष्णु ही है। मनादि बविपासे बाद उनके वास्तविक अनापविषया विष्णोरात्मनः सर्वदेहिनाम् । सरूपके मानसे हो समस्त बोंक म्पहार-पातक प्राकृत सूर्यमण्डका निर्माण हुमा है । वही टोकॉम निर्मितो लोकतन्त्रोऽर्य ठोका परिपर्सते ।।२९॥ भ्रमण किया करता है ॥२९॥ अमटमें समस्त छोंके एक एप हिलोकाना गर्म पारमाऽऽदिनदरिः। बारमा एष अादिकचे एकम्पन श्रीहरि ही अन्तर्यामीरपसे र्य यने हुए हैं। ये पपरि एफ ही हैं, तथापि श्रमियनि सर्पपेरक्रियामलमूपिभिधोदित ॥३०॥ | उनका बहुत रूपोम पणन किया है। ये ही समस्त रिक प्रियायोंके मूह १॥ ३० ॥ दशौनकली ! एक मला दाः क्रिया को करण कार्यमागमः। भगवान् ही मायके परा काउ, देश, यज्ञादि किया, फर्ता, पुन धारि करण, यागादि धर्म, समय, श्याम्य उन्म फलमिति प्रसन्नवपाकाऽअसा हरि॥३१॥ | पानिप्प और पम्पसे नौ प्रशारके को जाते १॥२१॥ फाउपधारी भगवान सूर्य टगोर याहार पादिपु शासमु मगवान कालम्पपा। टीकटीर घयनेक यि क्षेत्रा मह महीना भान । भिजमिन बार पक साप पर उगाया म्वन्याय परति पृथग्दभिगमै ॥३२॥ ₹॥ ३२॥ वाता उतम्पला इतिभामुखी स्थहमने। लाजी धना नामक मूप, लिस्पी बसग, पनि राक्षस, गरि रूप साव पश, पुरस्य भी तम्त्यस्तम्परुरिति मधुमास नपन्स्पमा ॥३३॥ तुम्सुरु ग-५२३ सम वना-अना काप तपु ।

९५४ भीमद्भागवत अर्यमा पुलहोऽधौजा। प्रतिः पुचिमसली। सम्पन्न करते हैं ॥ ३३ ॥ अर्यम स्प, पुख परि, नारदः फल्छनीरम नयनयेते स माधवम् ॥३४॥ गौर फछनीर सर्प-ये वेशसम्पास्के कार्पनिक धपोजा यक्ष, प्रहेति राक्षस, पुझिकस्मळी वसरा, नारद मियोऽनि:पौरुषेयोऽध तक्षको मेनका महा।। हैं ॥ ३५ ॥ मिप्र सूर्य, अत्रि ऋषि, पौस्पेय रायम, तक्षक सर्प, मेनका अप्सरा, हमहा गम्धर्व और रक्सन रवखन इति मेते शुममास नयेन्स्पमी ॥३५॥ पर ये ज्येष्ठ मास्के कार्यनिर्वाहक हैं ॥३५॥ बाप पसिष्ठो परणो रम्मा सहभन्मस्तथा हुए। मरण नामक सूर्यके साप वसिष्ठ ऋषि,रम्मा अप्सरा साम्म शुकभित्रखनश्चैव शुचिमार्स नपन्स्पमी ॥३६॥ अपने कार्यका निर्वाह करते हैं ॥३६॥ भवण मास एक यक्ष, गन्धप, राफ नाग और चित्रसन राक्षस अपने इन्द्रो विद्यापसुः भोला पलापत्रस्तधाङ्गिराः । नामक सूर्यका कार्यकाठ है । उनके साथ विश्व प्रम्लोपा राक्षसो पर्यो नभोमास नयन्त्पमी ॥३७|| गन्धर्व, भोता पक्ष, एलापत्र माग, अङ्गिरा पि, प्रम्बोध वसरा एष पर्य नामक राक्षप्त अपने कार्यका सम्पादन विवस्वानुग्रसेनम भ्याघ आसारणो भृगुः । करते है॥ ३७॥ मारपदके सूर्पका नाम है निस्कन् । उनके साप उप्रसेन गन्धर्म, म्याग्र, राक्षस, बासारण या, अनुम्लोचा शल्पालो नभसाम्प नमन्त्पमी।। ॥३८॥ मुगु अषि, अनुम्लोचा अप्सरा और वापस नाग राते पूषा धनञ्जयो पात सुपेणः मुरुधिस्तथा । हैं॥ ३८ ॥ शोमकली ! माघ मास या नामके सूर्य घृताची गौतमश्वेति तपोमार्स नपन्त्यमी ॥३९॥ ग, मपि या कृताधी पसरा वोर गौतम ऋति राते हैं। उनके साथ पनप नाग, पात राक्षस, पुन ऋतुपर्चा भरवाजः पर्जन्यः सेनविचथा। रहते ॥ ३९॥ फागुन मासका कार्यकस पप निम ऐरावतश्चैव तपस्यास्पं नपन्त्यमी ॥४०॥ भरवाज अषि, सेनमित् पसरा, विश्व गन्धर्व और ऐरावत | नामक सूर्यका है। उनके साप कसु पक्ष, वर्षा राधस, मोहः कश्यपस्ताप चतसे नस्तयोर्वशी । सर्प रासे १ ॥ १० ॥ मर्गशर्म मसमें सूर्यका नाम होता है। उनके साथ कश्यप प्रति, सार्प यक्ष, विपुष्पयुमहाशाह सहोमास नयनस्पमी ॥४१॥ | अतरेन गन्धर्व, ठमंशी मप्सरा, निपुन रमत और मगः स्फोऽरिष्टनेमिरून यामुम पशमः । महाशा नाग यवे हैं॥१॥ पौत मासमें भग मामक | सूर्यके साथ स्मन राक्षस, बरिनेमि गर्ग, पक्ष, कर्कोटकः पूर्णविधिः पुप्पमास नयनस्पमी॥४२॥ आयु अषि, पूर्वचित्ति पसरा वोर फर्कोटक नाग गते हैं॥ १२ ॥ वाचिन मासमें लय सूर्प, कादम्नि प्रति, स्पा सुपीकतनया फम्पलप सिलोचमा। कम्प माग, तिलोत्तमा अप्सरा, मसफेत राक्षस, सवस्ति प्रेमापेतोऽप अवजित् प्रवराष्ट्र इपम्भराः ॥४३॥ फार्तिकने विष्णु नामक सूर्यके साथ अस्तर नागरम्म पक्ष मीर पृतराष्ट्र गन्धर्षका कार्यकाल ॥१३॥ स्प विष्णुरमतरा रम्भा संपर्याय सत्यजित् । बप्सरा, सूर्यवर्चा गन्धर्ष, सस्पविद पक्ष, विश्वामित्र अपि और मसपेत राक्षस स्पना-अपना कर्प सम्पन विमामित्रो मस्सापत ऊर्यमास नपन्स्पमी ॥४४॥ करते है ॥ १४॥ १ यन्ति ते । २ रिपर प्रमपोतो।

4. १२] द्वादश सन्ध ९६५ एता भगवतो विष्णोरादित्यस विभूतयः । शौनकनी ! वे स्त्र सूर्यरूप मगायन्की विनियों हैं। जो लोग इनका प्रतिदिन प्रात काल और सायराल मरवा सभ्ययोनृपां हरन्त्यहो दिने दिने ॥४५॥ स्मरण करते हैं, उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥१५|| बादशस्वपि मासेषु देवोऽसौ पनिरस्य थे। | ये सूर्यदेव अपने छ गोंके साप बारहों महीने सर्वत्र विचरते राते हैं और इस ओक तण परम्गेको विवेक परन् समन्ताचनुते परह ष सन्मतिम् ।।४६॥ युविका विस्तार करते हैं ॥१६॥ सूर्यमगवान्के गोम सामय॑जुमिस्खल्लिोषयः संस्तुपन्स्यमम् । ऋषिलोग तो सूर्यसम्बन्धी अम्वेद, यमुफेद और सामवेदके गन्धर्यास्त प्रमापन्ति नृत्पन्त्यप्सरसोऽप्रतः॥४७॥ मनोहारा उनकी स्तुति करते हैं और गन्धर्ष उनके सपशका गान करते रहते हैं। अप्सराएँ मागे-आगे उभयन्ति रथ नागा प्रामप्यो रथयोषकाः। नत्य करती चलती है ॥१७॥ नागगण रस्सीकी तय उनके रफको फसे गते हैं। पक्षगण रपका साज सबाते पोदयन्ति रय प्रठे नम्रता पलसालिनः ॥४८॥ १मोर क्वान् राक्षस उसे पीछेसे ढकेलते है ॥१८॥ पालखिश्याः सहस्राणि पटिर्मपर्पयोऽमला। | इनके सिवा बासिन्य नामके साठ हजार निर्मलामान पुरतोऽभिमुख यान्ति स्तुषन्ति स्तुतिभिर्विसम्॥४९॥ प्रमा सूर्यकी बोर मुंह करके उनके बागे-आगे सुति- पाठ करते पश्ते हैं ॥१९॥ इस प्रकार बनादि, अनन्त, एवं पनादिनिधनो भगवान् हरिरीश्वरः । मम मगवान् श्रीहरि ही करप कम्पमें अपने सरूपका कल्पे कल्पेसमास्मानध्यप सोफानषत्पबा ॥५०॥ सिमग करके घेोका फन-पोषण करते रहते हैं ॥५०॥ इति श्रीमहागाव महापुरामे पारमईस्यो सेवितायो दशस्करावे मादित्पम्यूपिमरण नामैकादशोऽप्याय ॥ ११ ॥ अथ द्वादशोऽध्याय भीमद्रागवतकी सक्षित विषय-सूची सूत उपाय भीसनजी करते है-माफिरूप महान् धर्मको नमस्कार है । विविधाता भगवन् मीरम्पको नमस्कार नमो धर्माय मासे नमा कृष्णाय वेधसे । है। अब में उसोको नमस्कार करके श्रीमद्भागवतोछ अपगम्पो नमस्तस्य धर्मान् वक्ष्ये सनावनान्॥१॥ स्नानघका संधिस सिक्षण मुनाता ॥१॥ अनादि अपियो बाफोर्गेने मुझसे जो प्रान विमा पा, एतद्वा फधित विप्रा विप्मोपरितमदसतम् । उसके अनुसार मैने मगवान् विष्णुका यह बहुत चरित्र भवद्भिर्यदा पृष्टो नरामा पुरुपोचितम् ॥ २॥ | नापा । र सभी मनुष्योंके भाग करने योग्य है ॥२॥ अत्र सकीर्तितः साक्षात् सर्वपापहरो हरिः। इस श्रीमद्भागस्तपुराणमें सापापापहारी स्वयं भावान् श्रीहर माही संकीर्तन इमा।ही सबके इयमें विरानमान, नारायणो हपोकेशो भगवान् सात्वा पतिः ॥ ३॥ सकी इन्द्रियोंके स्वामी और प्रेमी मोंक भीपनपन १।२ पापीन प्रतिमें मत उपाय यह भैस 'नमो बमाप नाचनान् इस स्मेक पार। ३ सदीरयते।

भीमद्भागवत [२०१२ -- मत्र प्रम परं गु जगतः प्रभवाप्यमम् । है॥ ३ ॥ इस श्रीमद्भागक्तपुराणमै परम रहस्यमय- भक्त गोपनीय प्रपतत्वका वर्णन हुआ है । टस में ही इस मात्फी रूपति, स्थिति और प्रळयकी प्रतीसि होती है । इस पुराणमें उसी परमतत्वका धनुमकामक पानं च सर्पास्मानं प्रोक्तं विज्ञानसंयुतम् ॥४॥ शान और उसकी प्राप्तिके साधनों का स्पष्ट निर्देश है॥१॥ भक्तिमोगः समारपातो पैराग्यं चवदाभयम् । शौनकनी ! इस महापुराणके प्रथम स्कम्पमें मजि- योगका माँति निरूपण हुमा है और साप ही भकि- पारीषितमुपारुपान नारदास्मानमेप च ॥५॥ योगसे उत्पन एष उससे स्पिर रखनेवाले वेराम्यका मी वर्णन किया गया है। पीक्षिस्की कसा और न्यास नारद संपादके प्रसासे नारदपरित्र मी कहा गया है ॥५॥ प्रायोपवेशो राजवि प्रशापात् परीधिसः । राबर्षि परीक्षित् प्रामणका थप हो जानेपर किस प्रकार | गमतटपर धनशन-पत्र लेकर बैठ गये और पिप्रकार शुफस्स पर्पभस संपादय परीक्षितः॥६॥ श्रीशुकदेक्जीके साप किस प्रकार उमा सवाद प्रारम्म एवा, यह फा मी प्रपम स्फत्पमें ही है ॥६॥ योगधारणयोत्क्रान्तिः संपादो नारदासयोः । योगधारणाके द्वारा शारीरस्यागकी विधि, प्रमा और नारदका संपाद, क्वतारोंकी संक्षिप्त पर्चा तथा मापाप अवतारानुगीतं च सर्गः प्रापानिकोऽग्रतः ॥७॥ वादिके क्रमसे प्राकृतिक सूटिकी उत्पत्ति आदि वियोंका वर्णन द्वितीय स्फर है॥७॥ पिरोदवसंवादः धमैत्रेययोस्ततः । तीसरे स्वधर्म पहले-पहल विदुरी और अदाबीके पुराणसंहिताप्रभो महापुरुपसमितिः ॥८॥ और सदनन्तर बिदुर तप मोपनीके समागम और संवादका प्रसङ्ग है। इसके पश्चात् पुराणसहिताके विक्पमें सतः प्राकृतिक सर्गः सप्त वैकतिन्नम ये । प्रश्न है और फिर प्रल्यकालमें परमात्मा किस प्रकार स्ति वता प्रमाम्पसम्मतिरामा पुरुषो यतः ॥ ९॥ प्राकृतिक मष्टि और मत्तत्व बादि सात प्रकृति-पिातियों- रासे हैं, इसका निरूपण है॥ ८॥ गुणों के भीमसे फालस स्थूलसूक्ष्मस्स गतिः पपसमयः । के द्वारा कार्य सष्ठिका वर्णन है। इसके बाद मायकी पति और उसमें विराट् पुरुषकी स्थितिया स्वरूप सम उदरणऽम्भाधेरिम्पाषषभो यथा ॥१०॥ समन्माया गया है ॥ ९ ॥ तदनन्तर स्पून बार सूक्ष्म फाट्या सरूप, मेकम्पकी उत्पति, प्रम्प-समासे ऊर्चतिर्यगवा मर्गो रुद्रसर्गस्तथैव च। पृषीका उदार करते समय पराइभगवान्क द्वारा हिरण्याक्षका अर्धनारीनरस्साय यतः स्वायम्भवो मनुः ॥१॥ वध देना, पशु पक्षी और मनुष्यों की समि एवं रुदोंकी उपस्किा प्रसङ्ग है । इसके पश्चात् उस बर्ष शतरूपा च या स्त्रीणामाषा प्राविरुचमा । मारी-नरके स्वरूपका विवेचन है, जिससे सापम्मुव मनु धार नियोंकी अस्पात उत्तम वापा परी शतरूपा संवानो' पमपसीनां फदमस्स प्रजापतेः ॥१२॥ म मा । फईम प्रजापति परिन, उनसे मुनि १ ग म्ममा । २ पमसम्मानमर।३ प्रमासा पापानिरी गति + + ।

म० १२] द्वादश कप ९६७ अपवारो भगपत: कपिलस महात्मन । पत्तियों का सम्म, पासप मगवान् कमिका ममतार और फिर कपिपदेस तण उनकी माता देवहूतिके संवादका देवइस्पाम संवाद फपिलेन च भीमक्षा ||१३|| प्रसा आता है ॥ १०-१३॥ नवापसमुरपचिर्दधयाविनाशनम् चौये स्वत्यौ मरीचि मादि नौ प्रजापतियोंकी उत्पत्ति, नुषस चरितं पभास्पषोः प्राचीनपरियः ॥१४॥ दक्षपाका विष्वंस, रामपि भुव एम पृथुका परित्र तपा नारदस्त व संवादस्वत प्रेयग्रस दिया। प्राधीनवाई और नारदजीके सेवादका पर्णन है। पाँचो नामेस्ततोऽनुचरितमृपभस्य भरतस्य च ॥१५॥ स्कल्पमें प्रिपातका उपासान, नामि, अपभ और ममतके दीपवर्पसमुदाणा गिरिनघुपवर्णनम् । चरित्र, दीप, पर, समुद्र, पर्वत और नदियोफा वर्णन, ज्योवियस संस्थान पातालनरकसितिः॥१६॥ ज्योतिश्चमके विस्तार एवं पाताउ तथा नरकाकी भितिका निवपण दुधा॥१५-१६॥ दखनम प्रस्ताम्पस्तत्पुत्रीमो ष सततिः। शौनकादि अथियो । छठे स्वधर्म ये विश्य थाये -प्रचेताओंसे दक्षकी उत्पति, दक्ष-पुत्रियोंकी सम्मान देवता, असुर, मनुष्य, पशु, पर्वत और पक्षियोंका चन्म- मसो देवासुरनरास्तिश्नगम्बमादयः ॥१७॥ कर्म, प्रामरकी उपचि और उसकी परम गति । (वय सातवें स्कायके विषय मतस्याये जाये है-इस स्कन्धमें स्वाष्ट्रस्य सन्म निधनं पुत्रयोष दिवे दिया। मुख्यत दैस्पराव हिरण्यकशिपु और हिरण्यक्ष सन्म- कर्म एम दैत्यशिरोमणि महारम्म प्रहारके समय चरित्रका दस्पचरस्य परिस प्रहादस्य महात्मनः ॥१८॥ निरूपण है ॥ १७१८ ॥ मन्वन्तरानुधन गन्द्रस्य पिमोक्षणम् । पाठ स्कन्ध मन्वन्तरोंकी कया, गजेन्द्रपेक्ष, विमिम मन्वन्दरावताराथ विष्णोईयपिरादप ॥१९॥ मक्तोंमें होनेवासे जागीर भगवान् विष्णुके भतार---- कौम भाव तर मात्स्य वामनंच जगत्पते । कूर्म, मस्य, पान, सन्तरि, इसमीप आग, अमृत-प्राशि- थोरादमधन मदमसाः दिवौकसाम् ॥२०॥ के लिये दमत्रों बार दस्पोका समुन्द्र मन्यन और दयापुर वामुरमहापर्ट गजवशानुकीर्तनम् । सम्म अनि विपर्पोवर वर्णन है । न स्वमै मुस्पत इस्वाजन्म व सुपुग्नस्स महात्मनः ॥२१॥ राजयोफा वर्णन है। इअकुके जम फर्म, भविखार, महापमा सुपुत्र, इल्य एवं ताराफ उपाख्यान-~-इन सबका इसापास्यानमग्राक्त वारापास्मानमेव च। पगन किया गया है। भूपयशस तान्त, शशद और मृग म्यवशानुपन मादापा नूगादयः ॥२२॥ भादि गबो पमन, पम्पा परित्र पर्याप्ति, सौगन्य चायशपात: कास्सस्य धीमतः । स्टवाल, माता, सौमर, सगर, बुरिमान् क्युरस्म खट्मागस पमा भातुः सौभर सगरम च ॥२३॥ और पोसलद भगवान् रामक सपापारी परित्रका रामस कासलन्द्र परितं रिसिपापदम् । पगन भी इसी सत्यमे । तदनन्तर मिमिका इस्पाग निमरजपरित्यागा उनन्चना र सम्भव ॥२५॥ और उनकी उत्पत्तिका वर्णन है ॥ १९-२० ॥ रामस्प भागवन्द्रम्प नि यारण भूव । भूगुवशिरोमगि परशुरामजी त्रिष-मवार, पदवशी एतस मामयसम्म ययातनपस प॥२५|| नरपति पुत्पता, पति, नाप, उपन्तनम्न भरत, दाम्पन्तमावस्यापि संतनालापनस ५। तनु और उनक पुत्र भीव आरिपी संक्षिप्त पसाएँ - र ।

९७० श्रीमद्भागवत [अ०१७ लीलावतारकर्मामि कीर्तितानीह सर्वशः॥४५॥ | सन्द नहीं कि इस यसरफर मैने हर तरहसे मगलानी स्लीम धौर उनके अवतार-चरित्रोकारी कीर्तन कित है॥ १५॥ पतितः स्वलितपत सुस्वा वा पिवशोषन् । बो मनुष्य गिरते-पक्के, फिरते, तुम भोगते हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्षपातफात् ॥४६॥ अषा छीकते समय विवशतासे भी ऊँचे स्वरसे के छसा है—'हरये नम ', यह सब पापोंसे मुळ हो सास संकीर्पमानो भगवाननन्ता है ॥ १६ ॥ यदि देश, कार एवं प्रस्तुसे परिछिम भगवान् श्रीकृष्णके नाम, ठीक, गुण थादिका मदीन भुतानुभाषो व्यसन हि पुंसाम् । रिप जाय अपन उनके प्रभाव, महिमा वरिका प्रयण किया जाय तो ये स्वयं ही दयमें था विराजते हैं प्रविश्य पिचं विघुनोत्पशेप पौर प्रषण तथा कीर्तन करनेवाले पुरुषके सारे दुस मिय यथा समाऽर्कोऽभ्रमिवातिषातः॥४७॥ देते हैं ठीक वैसे ही, बैसे सूर्य अन्धकारको और बोधी मदलोंको तिसर-बितर कर देती है ॥४७निस मृता गिरस्ता मसतीरसस्कथा माणीके शरा घट-घटकसी अधिनाशी भगवान्के नाम लीम, गुण बादिका उचारण नहीं होता, वा पानी न कप्यते यद् भगवानपोक्षवः । मवपूर्ण होनेपर मी निरर्पक है—साग्रीन है, मुन्दर होनेपर में अमुन्री और उत्तमोत्तम विषयों का प्रति- पदेव सत्यं सदुद्देष मालं पादन करनेवाली होनेपर भी असममा है। नो बानी और षचन भगवान्फे गुर्गोसे परिपूर्ण रते हैं, वे ही तदेव पुण्यं भगवद्गुमोदयम् ॥४८॥ | परम पाक्न है, वे ही मामय हैं और वे ही परम सम सदेव रम्यं रुचिरं नव नर्ष ॥ १८ ॥ निस वचनके द्वारा भगवान्के परम पवित्र यसका गान होता , ही परम रमणीय, विकर एवं खदेव श्रम मनसो महोत्सवम् । प्रतिक्षण नया-नय जान परसा है। उससे बनन्त कातक मनको परमानन्दकी अनुभूति होती रही है। तदेव लोकार्णवनापर्ण नृणा मनुष्योंका सारा शोक, चाहेर समुहके समान में | और गहरा प्यों न हो, उस पचनके प्रभावसे सबके यदुचमोफयशोऽनुगीपत ॥४९॥ म्पेि सूख जाता है ॥ १९॥ विस पाणीसे-सोय रस, भाष, अणार अदिसे युक्त ही क्यों न हो- न वद् वषिषपदं पर्यशो अगत्यो पवित्र करनेगले मतान् श्रीकृष्ण के पशका कमी गान नहीं होता, यह स्प्रे कौओंके थिये उशि मझे बगस्पविन प्रगृणीत फाईषित् । स्थनक समान अपत वपवित्र मनसम्परनिवासी व चाहतीध न तु इससेवित ईस भपका प्रसधाममें विहार करनेवाले भाबरणार पिदाधित परमईस भळ उसका भी सेवन नहीं करते। पत्रान्युतस्तय हि साधयोऽमलाः॥५०॥ निमउ दरबामे साधुनन तो मही मिस करते हैं १ रपेस्नु नमान्ने । , म. १२] स वाग्विसों जनतापसंयो हों मगवान् राते हैं ॥ ५० ॥ इसके विपरीत जिसमें सुन्दर रचना मी महादे और नोव्याकरण बारिकी दरिसे यखिन्प्रविश्लोकमपनत्यपि । दूचित शब्दोंसे युक्त भी है, परन्तु जिसके प्रत्येक श्मेको नामान्यनन्तस्प योऽपितानिय भगवान्के सुपशसूचक नाम अरे हुए हैं, या बागी गोंकि सारे पापोंका नाश कर दी है, क्योंकि सत्पुरुप पृमन्ति गायन्ति गुणन्ति साधवः ॥५१॥ ऐसी ही पाणीका षण, गान और कीर्तन लिया करते नैकमप्यमयुतभापनर्मित हैं ॥५१॥ वह निमल मान भी, जो मोक्षाकी प्रालिका साझाए साथम है, यदि मायानकी मधिसे रक्षित हो न पामते मानमल निरञ्जनम् । तो उसकी टखनी शोमा नहीं होती। सिर जो कम इता पुनः प्रपदभद्रमीयरे मगवानको अर्पण नहीं किया गया है- चाहे कितना ही था क्यों न हो सर्वदा आमाररूप, दुस न पर्पिस फर्म परप्यनुचमम् ।।५२॥ देनेवाय ही है, तो शोमन–परणीय हो ही कैसे पशामियामव परिममा परो सका ५२॥ वर्णाश्रमके वनुकूल वापरण, तपस्या और थप्पयन धादिके लिये जो गा या परिश्रम बाप्रमापारसप मुतादिषु किया जाता है उसका फल है-48 या अपमा ममिस्मृति श्रीपरसादयपयो छमी की प्राप्ति । परन्तु भगवान्के गुण, दम, नाम गुणानुवादभषणादिभिरिः बारिका प्रवण, कीर्तन पर तो उनके प्रीपरणामों की अमिठ स्पति प्रदान करता है॥५३ ॥ मगवान् मविस्मृति। कप्नपदारविन्दयोः श्रीकृष्णक चरणकमकी पवित स्मृति सारे पाप-ताप क्षिणोत्पभद्राणि सम तनाति च । और धमालों को नष्ट कर देती और परम शान्तिा विस्तार करती है। उसीके द्वारा वास करण पुरा हो सस्पस्प शुदि परमात्मभक्ति अत्य है, मगवान्यी मति प्राप्त होती है एवं परराम्पसे पार्न ष विज्ञानपिरागयुक्तम् ॥५४॥ ॥५॥ शौनकादि ऋषियो ! माफ्याग को भाग्यवान् युज भाजनके स्वरूपका ल तपा अनुभव मास होल्प यूस दिवाइया पर भूरिभागा हैं। पम्प, कय हैं। स्पोंकि आपलोग या प्रेमसे निरन्तर अपने एयमें सन्तिर्यामी, सम्प, सर्वशक्ति मच्छपदात्मन्पखिछात्मभूतम् मन् धादिदेव सबके बायप्रदेश एर्ष सय दूसरे नाराय बमदेसमीय अराध्यदेवसे रहित नारायण भगवान्को सापित करके मजन करते रहते ॥५५॥ रिस सम्म्प राबरि मनसभाषा भावाविवेश्य ॥५५॥ पीमित् अनशन करके वाबो रियोंकी भरी समामें माघ संसारित भात्मवश्व सबके सामने श्रीगुरुदयनी महाराजसे श्रीमशागवतकी (कप सुन रहे थे, उस समप ही कमर मने भी ठही मुर्त पुरा मे परमर्पिवस्त्रात् । परमपिके मुख्से इस मामता प्रण किया प। प्रायोपषश्चे नृपतेः परीक्षित वापने रसका स्मरण कराकर मुहरर का अनुग्रह किया । मैं इसके लिये वापगोंका वा मणी सदस्यपीणां माहा समताम् ॥५६॥ ३ ॥ ५६ ।। १ हि ।२ मम्मी ।

९६८ भीमनागपत [म.१२ मपातेपेष्ठपत्रस पदोशोऽनुकीर्तितः ॥२६॥ भी नक्म स्कन्धमें ही है। सबके असमें स्पतिके में ठपके यदुफा पेशविस्तार कहा गया है ॥ २५२६ ॥ यत्रावती! भगवान्कप्यास्पो सगदीपर। शौनकादि प्रपियो ! इसी पदुपशमें बगस्पति मगन् भीकृष्णने वतार प्राण किया पर ठहोंने बनेक पसुदेवगो बम सेतो पदिय गोङले ॥२७॥ | असुरोंका सहार किया । उनकी पाएँ इतनी है कि सस्स फर्माम्पपारामि कीर्विवान्पसुरधिपः । | कोई पार नहीं पा सकत । फिर भी दशम स्करपमें उनका कुछ फीर्तन किया गया है। पमुक्की परदेशीय पूतनासुपयःपानं शफ्टोमाटनं पिठोः ॥२८॥ गर्भसे उनका जन्म मुखा । गोकुछमें मम्दवाये र नाकर पड़े । पूवनाके प्राोंको दूषके साथ पी लिया । सुणावर्तस निप्पेपस्तष पकवत्सयोः। बयफ्नमें ही छकाको सट दिया ॥ २७-२८॥ तमा धेनुफस्स साम्रातुः प्रलम्पस च संधया ॥२९॥ पत, पकामुर एवं सामरको पीस गन्य । सपरिवार घेनुकासुर बौर प्रळम्मामुरको मार राम ॥ २९ ॥ गोपानां च परित्राप दाबाम्ने परिसर्पतः। दाबानम्से घिरे गोपोंकी रक्षा की। कास्पिनागका दमन किया । कगरसे मन्दमायाको धपाय ॥ ३० ॥ इसके दमन फालिमसाहेमहाहेर्नन्दमोक्षणम् ॥३०॥ माद गेमियोंने मगझन्को पतिरूपसे प्राप्त करने के किसे प्रवषयों तु फयानां पत्र तुष्टोऽच्युतो व्रतैः । मत किया और भगपान् श्रीकृष्णने प्रसन्न होकर में पमिमत पर दिया । मानने पापल्पिोपर स्या की। प्रसादो यमपनीम्पो विप्राणां धानुतापनम् ॥३१॥ उनके पतियों—ामोको पड़ा पचाताप हुन ॥३१॥ गोवर्धनभारणकी खाम करनेपर इम्म और कामनुने गोवर्धनोशारण च सक्रम सुरमेरम। वाकर मगमका पहाभिषेक किसा । शरद् ऋतुकी पत्राभिषेक रुग्णस्प सीमिक्रीरापराविपु॥३२॥ रात्रिोम नमुन्दरियों के साथ रासक्रीय की ॥ ३२ ॥ दुए पर, मतिर भोर केशीके वक्की जगई। पारस दुर्घर्षधोऽरिष्टस्म कशिनः । सदनन्तर वकरची मथुरासे उम्दाफ्न आये और उनके अक्रूराममनं पथात् प्रेसानं रामरुप्णयोः ॥३३॥ प्रस्धन किस ॥ ३३ ॥ उस प्रसगार मप्र-मुन्दरियोंने साथ भगवान् भीकृष्ण तथा मरामजीने मधुराके लिये मप्रसीमा विलापम मपुरालोकन सतः । जो विष्णय किया था, उसका मन है। राम और श्यामने मधुरामें जाकर गाँकी समाष्ट देसी बोर गजमुष्टिकचाणूरकसादीनां च यो वधः ॥३४॥ कुपथ्यापी हापी, मुटिक, चाण एवं फेस मादिका संहार किया ॥३१॥ सान्दीपनि गुरुक पा लिय. मृतस्पानयन मनाः पुनः सादीपनेगुराः । प्प्पन करके उनके पत पुत्रो मेटा छाये । शीनदि शपियो 1 निस सम्प भगवान् श्रीकग मभुराम निस मपुराया नियसता यदुषस्य यस्प्रियम् । कर रहे थे, उस समय उन्ोंने उदर और मयामीक करामदयरामाम्पा पवेन हरिणा दिशाः ॥३५॥ ५ ॥ जस पर बार बही-सी सेनाएँ साप यमशियोका सम प्रफारसे प्रिय और हित परामंधममानीतसन्यस्य पाना था। सेपर पापा और भगवान्न उनका सर करके पप्पीय १२।२ मधमम् । प्रसिद।

भ०१२] । घातनं पपने द्रस्प सस्पस्या निषेधनम् ॥३६॥ | मार हल्का किया । काव्यपनको मुचुकुन्दसे भस्म का दिप । द्वारकापुरी बसाकर रातों-रात सक्को यहाँ पहुँचा आदान पारिजातस्य सुधर्माया सुरालयात् । दिया ॥ ३६ || स्वासे पल्पवृक्ष एवं सुधर्मा समा ले श्रये । भगवान्ने दल के दछ शत्रुओंको युद्ध में पराजित रुक्मिापा रण पढे प्रमाव्य द्विपतो हरे। ॥३७॥ करके इमिणीका हरण किसा ॥ ३७ ॥ वाणासुरके परस्म जम्भणं युद्धे याणस्प सजगन्तनम् । | साप युरके प्रसङ्गम महादेवजीयर ऐसा बाण छोदा कि | थे भाई लेने लगे और घर काणाहरफी मुबाएँ फाट प्राग्ज्योतिपपति हत्वा फन्पाना हरण च यत् ॥३८॥ गठी । प्रागप्योतिषपुरके स्वामी मौमासुरको मारकर चैवपीटकशासाना दन्तवक्त्रस्य दुर्मतेः । सोलह हजार कन्याएँ प्रहण की ॥ ३८ ॥ शिपाल, पौण्ड्रफ, शाम्ब, दुए दन्तवस्त्र, शम्बरासुर, विविद, ठ, सम्परो दिविदः पीठो मुर पगबनादयः ॥३९॥ मुर, पभजन श्रादि दैत्योंके पर योरुरका वर्णन करके या पात तापी गरी कि भावान्ने उन्हें कैसे कैसे माहात्म्यं च वभस्तेषां वाराणस्पाप दाहनम् । माय ! भगवान्के चक्रने काशीको जन्म दिया और फिर उन्होंने भारतीय मुरमें पाणयोंको निमित्त बनाकर पृष्पी- भारावतरण भूमेनिमिधीकृत्य पामवान् ॥४०॥ का बहुत बड़ा भार उतार दिया ॥ ३९५० ॥ विप्रशापापदेशेन संहारः स्वकलस्प च । शौनकादि ऋषिपो ! म्यारहवें स्कायमें इस यतका पर्णन हुआ है कि भगवान्ने प्रामणों के शपके पहाने उदयस्य च संयादो वासुदयस्य चाहत ॥४॥ | किस प्रकार यदुवंशका संहार किया । इस स्कीमें मगवान् श्रीकृष्ण और उसका संवाद वा ही महत यत्रास्मविया पखिला प्रास्ताधर्मविनिर्णयः। है।॥ ११ ॥ उसमें सम्पूर्ण भस्मधान और धम निर्णयका निरूपण हुआ है और अम्तमे या पत बतायी गयी तवा मत्यपरित्याग मारमयोगानुभाषसः ॥४२॥ किस प्रकार मर्पयोपना परिस्मा पिया ||४२॥ पारा है कि भगवान् श्रीकृमने अपने साम्मयोगके प्रभावसे स्वस्थमें विभिन्न युगोंके रक्षण और उनमें रानाले पुगतधणचिप कठी नृणामुपष्ठरः । एोगों पधारका पणन किया गया है ता यह भी मतव्यया गया है कि फठियुगमें मनुष्योंकी गति मिमीत चतुर्विधध प्रलय उत्पचिसिविधा सपा ॥४३॥ होती है। चार प्रकारक प्रव्य और सीन प्रकारकी टाविस पगन भी इसी स्वधर्म है ॥ १३॥ इसके देहत्याग राजबिष्णुरातस्य धीमतः। बाद परम भानी राना परशिदक शरीरस्यागको पात कही गी। तदनन्तर वदोंक प्रस्-सिमानर प्रसा पाखाप्रणयनमूपाण्टयस्य सत्रया। भाया है। मार्कर उपजीकी सुदर फ्ध, भगानक अर उगनेंस स्पसा करन भोर सबक अन्तमें विधामा महापुरुसविन्यासः सर्पस अगदास्मनः ॥४४भगवान् सूपके गर्गेश वगन र || ११॥ शाना अरिया 1 आरयनि इस सनक बन्सरपर मुपसे जा इति चाक हिमश्रष्टा यत्पृटाऽहमिहानिए । । युरल , उप्सरा पगन मने पर रिया । इसमें - ।२ स्वस्त मा मुक २ १२२- ९७० श्रीमहागवत [२०१९ लीलावतारकर्माणि कीतिवानीह सर्वशः ॥४५॥ सन्देह नहीं कि इस अवसरपर मने हर तरहसे भगान्धी पेय और उनके भतार-पत्रिका ही कान लि है॥१५॥ पसितास्वरिसमा धुवा वा पिवशोषन् । जो मनुष्य गिरते-पडसे, फिसलते, दुस भोगते हरये नम इस्युच्चैर्मुम्यते सर्पपातमात् ॥१६॥ अपवा ठीकसे समय विवशतासे भी ऊँचे स्वरसे के उठता है-प्रये नम ', यह सब पापोंसे मुक्त हो जता संसर्पमानो भगवाननन्स: है।॥ १६ ॥ यदि देश, काळ एवं प्रस्तुसे परिचित भगवान् श्रीकृष्ण के नाम, पा, गुम धादिमा सहीन भुतानुभावो मसनं हि पुंसाम् । किया जाप अपया उनके प्रभम, महिम बारिष प्रविश्य पि पिधुनोत्पशेष अषण किया जाय तो वे स्वयं ही दयमे मा विराब है पौर प्रवण तप कीर्तन करनेवाले पुरुयके सरे तुम मित्र पधा समाऽर्कोऽम्रमिवातिषातः॥४७॥ देसे है-ठीक वैसे ही, वैसे सूर्य प्रकारको र बॉधी वादोंको तितर-बितर कर देती है ॥१जा बिस मा गिरस्ता मसतीरसस्कथा पाणीके द्वारा घट-घटषासी अविनाशी मगधन्के नाम, कीय, गुण याविका उचारण नहीं होता, यह कामी न सभ्यते यत् भगवानधोधन । मपर्ण होमेपर भी निरर्षक है-सारहीन है सुन्दर होनेपर मी मसुन्दर है और उत्तमोत्तम शिषर्पोका प्रति- तदेष सत्यं तदुदेव मङ्गल पादन करनेवाली होनेपर भी पसलमा है। जो कमी और पकन मगवान्के गुणों से परिपूर्ण रते है तदेव पुग्मं भगवद्गुणोदयम् ॥४८॥ | परम पाक्न हैं, वे ही जलमय है और वे ही परम सन सदेव रम्पं रुधिरं नवं नई ॥ १८ ॥ सि क्क्नके द्वारा मायान्के फ्रम परित्र यशका गान होता है, वही परम रमणीय, रविकर एष सदेव राम मनसो महोत्सवम् । प्रतिक्षण नया नया पान पत्नी । ससे पनन्त फास्तक मनको परमानन्दकी अनुभूति होती राती है। तदेव शोफार्णवधापणे नृणां मनुष्योंका सारा शोक, चाहे यह समुद्रके समान और गहरा क्यों न हो, उस वचनके प्रभासे साके यदुसमसाकपसोऽनुगीमसे मिये सूम बात है ॥ १९॥ जिस पाणीसे-पाहेब ॥४९॥ रस, माव, धमार आदिसे युकदी में न हो- न त पपमित्रपदं हरेर्यशो बगतको पवित्र करनेवाले मगवान् श्रीकृष्णके यशका कभी खगस्पवित्र प्रगृणीत फर्दिचित् । गान नहीं होता, पर तो कौमोंके लिये उति कोके स्थानके सम्पन अस्पात अपवित्र है । मानससरोमनिवासी सन् चामतीर्थ न तु इससेषित इस मपमा असक्षममें हिार करनेवाले मगाबरणार विन्दामित परमस मक उसका कभी सेक्न नहीं करते। पत्राभ्युतस्तत्र हि साफ्योऽमलाः ॥५०॥ निर्मळ रक्ताले सधुक्म तो भी निप्रस करते १ परमेऽस्त नमम्रो ।

९७१ स वाग्विसर्गो जनतापमान न्हों मगवान् रहते हैं ॥ ५० ॥ इसके विपरीत जिसमें मुन्दर रचना भी नहीं है धौर जोव्याकरण वादिकी पिसे यमिप्रविश्लोकमपपस्पपि । दूषित शम्ोसे युक्त भी है, परन्तु जिसके प्रत्येक श्याकमें नामान्यनन्तस्य यशोऽश्विानिय मगमान्के सुयशस्वक नाम बड़े हर पाणी छोगोंकि सारे पापों का नाश कर देती है, क्योंकि सपुरम सम्पन्ति गायन्ति गुणन्ति साधवः ॥५१॥ ऐसी ही वाणीका श्रवण, गान धौर कीर्तन किया करके नष्कमप्यच्युतभाववर्जित हैं॥५१॥ इनिमल मान भी, जो मक्षिकी प्रातिका साक्षात् साधन है, यदि मान्की मकिसे रहित थे न शोभते ज्ञानमल निरञ्जनम् । तो उसकी ठानी रोमा नहीं होती। फिर यो फर्म स्तः पुन: अपदभद्रमीपरे मामानको अर्पण नहीं किया गया है-वह चाहे कितना ही उँचा क्यों न हो-सर्वदा आमालाप, दुस न पर्पित कर्म यदप्यनुत्तमम् ।।५२।। देनेामही, ए तो शोभन परणीय हो ही फैसे पशाभिमामव परिचमा परो सकता है॥५२॥ वर्णाश्रमकेचनुकूल वाघरण, तपस्या और अप्पयन बादिके किये को मात वा परिश्रम वर्षापमाघारपाभूतादिप लिया जाता है उसका फा-केवा यश पवा मविस्मृति भीपरपादपपयो मी की प्राप्ति । परन्तु मावान्के गुण, छीत्र, नाम गुणानुवादभवणादिभिः ॥५३॥ बारिश मण, कीर्तन शादि तो उनके श्रीचरणकमों- की वपि स्मृति प्रदान करता है ॥ ५३ ॥ भगवान् अविस्मृतिः कृष्णपदारबिन्दसौः श्रीकृष्णके चरणकमकी अविचळ स्मृति सरे पपताप सिणोत्पभद्राणि शर्म तनाति । और ममालेको नष्ट कर देती और परम शान्तिका विस्तार करती है। उसीफे गारा पन्त करण पर सस्वस्थ सुदि परमात्मभक्ति गता है, भातानकी मक्ति प्राप्त होती है एव परवैराम्यसे पुस मसान्के ससूपर धान तत्व अनुमक्ष प्राप्त होता पानं च विज्ञानविरागयुक्तम् ॥५४॥ ॥५॥ शौनकादि ऋषियो ! आफ्स्येग बड़े मम्पवान् यूपं विवाऽपा पर भरिमागा है। क्य, पन्य ।। स्योंकि सफ्टवेग वा प्रमसे निरन्तर अपने हायमें सन्तिर्यामी, साम्प, सर्वशकि- एकहपदारमन्यखिलारमपूनम् मन् पारिदव सबके बाराष्पदेण एवं सर्प दूसरे नारापर्ण दरमदेवमीप आराध्यदेवसे रहित नारायण मामान्को स्थापित फरक मनन करवे रावे ॥५५॥ विस समय राय मनसभावा भवताविवश्य ॥५५॥ परीक्षित् मनपान करके वहा अपियोंफी भी समामे मह प समारित मारमतव सबके सामने भीशुकदेवमी महाराबसे श्रीमनागपत्की का मन ये थे, उस समय ही येकर मने मी उनी एव पुरा मे परमपित्रात। परमर्षिके मुसमे इस धामनका प्रण किया था। प्रायोपपछे नृपतेः परीधितः वाफ्यगोने उस स्रण कराफर मुम्पर या धनगद किया । में इसके लिये बापोगोंका यड़ा भणी सदस्पपीणा माता च भृण्यसाम् ॥५६॥ ३ ॥ ५६ ॥ २धि ।२ मनन्यमी ।

९७२ भीमद्भागवत [4.१२ पसमा फपित विप्राः पनीयोसफर्मपः । शौनकादिस्यिो ! मावान् मासुदेवकी एक एकमेव सर्वदा मवण-कीर्तन करने योग्य है। मैने इस प्रस माहाम्म्य पासुदेवस्य सर्वाशुभषिनाशनम् ॥५७॥ नहीकी महिमाका पर्णन किया है, मो सरे मकुम संस्कारों को धो मातीहै॥ ५७ ॥बो मनुष्य एकार- म एवं भावयेभित्पं यामक्षयमनन्पधीः । पितसे एक पदर अपना एक क्षण ही प्रतिदिन सब कीर्तन करता है और वो घमाके साथ इसका भाग भवावान् योऽनुभूमुपाद पुनास्पास्मानमेव सः॥५८ फरता है, वह मक्स ही शरीरसहित अपने बन्द भरम पवित्र पना लेता है॥५८॥ो फुस्स द्वादशी वसा शादश्यामेकादश्यां या मण्यमायुम्पपान् भवेत् । एकादशीके दिन इसका श्रवण करता है, दीर्घ पठत्पनश्नन् प्रयतस्तमो भवत्पपातकी ॥५९॥ हो जाता है और वो संपर्मक निराहार रहकर पड़ करता है, उसके पहले के पाप तो नष्ठ हो ही पाते हैं, पुप्फरे मधुरामा च द्वारपत्पां यवारमषान् । पापकी प्रति मी मर हो जाती है ॥ ५९॥ो मनुन | इग्नियों वीर बात करणको पपने पशमें करके पार उपोप्प संहितामेसा पठित्वा पुष्पते भयात् ॥६०॥ पूर्वक पुष्कर, मथुरा वपत्रा शारकामे इस पुरामसंहिता पाठ करता है, मह सारे मोसे मुक्त हो जाता है । ६० ॥ देवता मुनयः सिद्धाः पितरा मनमो नृपाः । जो मनुष्य इसका प्रवण पा उच्चारण करता है, उसके कीर्तनसे देवता, मुनि, सिद, फितर, मनु गौर मरपति यच्छन्ति कामान् गृणत शृण्वतो यस्प कीर्वनात्।६१॥ सन्तुष्ट होते है और उसकी षभिमपाएँ पूर्म करते प्रचो पपि सामानि दिजोऽधीत्यानु विन्दते। हैं ॥ ११ ॥ अग्वेद, यजुर्वेद और समवेद के पाठसे मामगको मधुकुन्या, घृतकुल्या पौर पर कुल्पा (मम्। मधुकरपाः घृतकुन्याः पय अल्पायवफलम्॥६२) की प्राशि होती है। बी फ भीमद्भागवतके पासे में घी एवं दूषकी नदिया वर्षात् सम प्रकमकी मुख-समृद्धि) पुरामसंहितामतामधीत्य प्रयता दिखा। मिना है ॥ १२ ॥ जो दिन संपमपूर्वक इस पुराण- 'संहिताका सम्पपन करता है, उसे उसी परमरकी प्रोकं भगाता यत्तु सस्पदं परमं प्रमेत् ॥१३॥ प्राप्ति होती है, मिस वर्णन मयं भागन्ने किमा है॥६३ ॥ इसके बप्पपनसे ब्राह्मणको प्रनामरा प्रशा वित्राऽधीस्याप्नुयात् प्रा रामन्यादधिमस्खलाम् । (तत्यानको प्राप्त कराने अनी मुदि ) की प्राप्ति होती है और क्षत्रियको समुदपर्यन्त भूमामा राम्य प्रास होता है। वैश्यानिषिपतिस्प च द शुद्धत पाएकात्॥६४॥ पैश्य कुवेरका पद प्राप्त करता है और शुम सरे पापोंसे पुरपारा पा जाता है । ६० ।। करिमसमंद निकालनाऽखिलमा भगवान् ही सपक स्वामी ६ भोर समझ के समय हरिरिताय न गीयत अभीष्मम् । पलिमको बस फरनेवासे यों तो उनका रमन करने के लिये मत से पुराण है, परन्तु उनमें सत्र वोर इस तु पुनमगराननपति निगार भगमन्ना नगन नहीं मिलता । श्रीमद्भागात परिपटिनाऽनुपदं कथाप्रसनै ॥६५|| ' महापुराणमें ता प्रापेक फार प्रसाइम पर-पाएर समसका । १नामबा।

म० १३] बादश स्कन्ध ९७३ मन्म-मृत्यु तमहमवमनन्तमारमतवं भगवान्का ही वर्णन हुआ है ॥६५॥ वे मादि विकारों से रहित, देश-कास्यदिक्ट परिप्छेदोसे मुक अगदुदयस्थितिसयमारमशक्तिम् ।। एवं स्वयं भामतत्व ही है। नगरकी उत्पत्ति-स्थिति मुपतिभिरमशककराये | प्रलय करनेवाली शक्तियों भी उनकी स्वरूपभूत ही है, मिन नहीं। प्रमा, शहर, इन्द्र आदि खपाल भी उनकी दुखसिखरमम्पत नतोऽसि ॥६६॥ स्तुति फरना लेशम्पन्न भी नहीं बानसे । उनी एकरस उपचितनवशक्तिभिः स्त्र आत्म सभिदानन्दस्वरूप परम्पस्माको मैं नमस्कार करता हूँ॥६६॥ बिनोने अपने स्मरूपमे ही प्रकृति पादि नौ शकियोंका न्युपरचितस्विरजङ्गमाठयाय साइप करके इस चराचर जगदकी सति की है और नो इसके अधिष्ठानरूपसे स्थित हैं तमा मिनका परम भगवत उपलब्धिमाप्रधाम्ने पद केवठ अनुभूतिस्वरूप है, ठन्ही देवताओंके आराप्य- सुरवपभाय नमः सनासनाय ॥६७] | दक्ष सनातन मान्के चरणों में नमस्कार करता हूँ।६७ स्वसुखनिमृतचेतास्तम्पदस्तायभायो श्रीशुपदेवजी महाराज अपने भारमानन्दमें ही निमम्न ये। इस बाबत स्थितिसे उनकी भेदरएि सर्वमा ऽप्यमितरुचिरठीलारुष्टसारस्तदीयम् । नित हो चुकी थी । फिर भी मुरलीमनोहर पाममुन्दर की मधुमयी, माठमपी, मनोहारिणी टीमोंने उनकी दृचियों को अपनी मोर आकर्षित कर लिया और उन्होंने म्पसनुव रुपया यस्तपदीप पुराण जगत्के प्राणियोंपर कृन फरके भारतलको प्रकाशित करनेाले इस महापुराणका विस्तार किया । म मही सर्वपापहारी न्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेषनीफे परम समस्सिलपविनम्न म्यासपनु नवोऽमि ॥६८॥ ममस्कार करता हूँ ॥१८॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमइस्पा संदिता दशस्यत्वे सादर- बधार्यनिरुपणं नाम परशोऽपाय ॥ १२ ।। मूत उपाय अथ त्रयोदशोऽध्याय विभिन्न पुराणांची मोक-सम्पा मीर भीमद्भागपनकी महिमा धीस्तमी फदत है-मा, वरुण, इग्द, स्व और माद्रण दिम्प रसुतियों द्वारा जिनक गुण-गनमें म.न य प्रथा वरुणन्द्ररुद्रमता स्तुन्वन्ति दिम्य स्तन रहते हैं। साम-सहीतक ममा चमि-मुनि अग, ए, मस एवं उपनिषदोंक सहित पेशारा मिना गान पाते घदै मापदनमापनिषदैर्गायन्ति र सामगा। वह, योपयोग प्यानके निधन एवं तटीन मनसे मुममि भिर । २ प्रपीन प्रति हमा भिम्पति से (न भोर २)पा नत गए।पमान मतिय उपीमरों सार उमा पार । भयात् भी॥ ||पर) उन दोनों म उम्र - ९७४ भीमद्भागवत ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो | जिनका भाषम्य दर्शन प्राप्त करते रहते हैं, किन्तु म सब करते रहनेस भी देवता, दैत्प, मनुष्य-कई में यस्मान्त न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः।।१।। मप्रकाश परमामाको नमस्कार है॥ १ ॥ मिस समय जिनके वास्तविक सरूपको पूर्मस्य न जान सका म भगवान्ने कछासप धारण किया था और उनकी ब्राम्पदमन्दमन्दरगिरिग्रावायकभ्यना- पीठपर या मारी मन्दरापन मपनीकी तय घूम पा, उस समय मन्दराचलकी बानोंके नोकसे सुबमने कारण भावान्को तनिफ मुम्न मिम । वे सो गये और भिद्रालोः फमठयकतेर्मगवतः चासानिलाः पान्तुषः बासकी गति सनिफ ब गयी। उस समय उस बस- बायुसे नो समुद्रके जको धमा व्या पा, उमका संस्कार बाब भी उसमें शेष है।मान भी समुद्र उसी चासनयुके पत्संस्कारकलानुपर्तनवशाद बेलानिमेनाम्भसा | पोंके फलस्वरूप मार-मटोंके सपने दिन रात पता- उतरता राता है, उसे क्वतक दिखाम न मिम । मावान्की पही परम्प्रभागसाठी पासमायु बारमेगोंकी यातायातमतन्द्रितंजलनिघे पापि पियाम्पति ।२। रक्षा करे ॥ २ ॥ पुरामसंस्थासम्भूतिमम पापप्रयोजने । नकली ! मब पुराणोंकी ग-ध्या को दान दानस माहात्म्प पाठादेष नियोपत ॥३॥ संन्या, उनका बोस, श्रीमद्भागकाका प्रतिपाप रिफ्य और उसका प्रयोजन मी पुमिये । इसके दानकी फाति तपा प्रामं दक्ष सहस्राणि पाचं पोनपष्टि च । [ दान धीर पाठ वादिकी महिमा मी वापळेग माप कीनिये ॥३॥ सरपुरासमें दस हजर शेक, फापुरागर्ने भीवैष्णवं प्रयोपिशचतुर्विशति क्षेत्रकम् ॥ ४॥ पपन हबार, श्रीविष्णुपुराणमें सेईस हजार और शित दधारी भीभागवत नारदं पञ्चविंशतिः । | पुराणकी सोकसंख्या वीस हजार है॥ ॥ मी- मागक्तमें पयानार, नारदपुराणमें पचीस हजार, मार्कण नप वाई च दशपच पाशतम् ॥ ५॥ मर्कण्डेयपुराणमें मौ हबार स्पा बग्निपुराणमें पर हजार, चार सौ श्लोक ॥५॥ भविष्यपुराणकी छोक चतुर्दश भविम्पं सात्तथा पश्चतानि च । | संस्पा चौदह हजार, पाँच सौ है और मेकर्सपुरानकी दशाटो प्रमषेष लिङ्गमेकादश्चैव तु ॥ ६ ॥ १॥ ६॥ यापुराणमें चौबीस हजार, स्कन्दपुराणी बयरर हमार और मिपुराणमें ग्यार पर ओक चतुर्विधति वाराहमेकाचीतिसारकम् । सोक रच्या इक्पासी बजार, एक सौमौर कामन- स्कान्दं शतं वया पैक वामन दपकोर्तितम्।। ७ ।। सोकोका और मरस्यपुराण चौदह मार सोकोंका है। | पुराणकी दस इन्गर ॥ ७॥ धर्मपुराण सत्रा पर सप्तदशाममा मास्स्मं वसु चतुर्दछ । गमपुराणमें उम्मीस हसर सोको प्रयणपुराणमें एकोनविंशस्सौपर्ण ममा शवथैव तु ॥ ८॥ वह हमर ॥ ८ ॥ इस प्रकार सम पुराणोंकी रोक समया कुछ मिसकर चार अस होती है। उनमें श्री- पर्ष पुराणसंदाहसपुर्तष उदाहतः। मद्भागक्त, जैसा कि पहले कहा पुका, बारा सत्रायदषसाइर्स भीभागपतमिप्यते॥९॥' हबर मेकका ॥९॥ ।

क. १३] दादष्ठ स्कन्ध इई भगवता पूर्व प्रमणे नाभिपहजे । शौनकनी ! पहले-पहल भगवान् विष्णुने अपने नामि- कालपर स्पित एवं संसारसे भयभीत प्रमापर परम करुणा सिताय भक्मीताय कारुण्यात् सम्प्रकाशिवम्॥१०॥ करके इस पुराणको प्रकाशित किया पा।१०। इसके आदि, मप्प और पत्तमें पैराम्य उत्पन्न करनेवाटी पास-सी आदिममापसानेषु वैराग्याख्यानसमुतम् । कमाएँ हैं । इस महापुराणमें जो भगवान् श्रीहरिकी या पसाएँ है, वे तो अमृतस्वरूप ही, उनके सेपनसे हरिलोलाकपाघ्रावामतानन्दितसत्सुरम् ॥१२॥ सत्पुरुस और देवताबोको बना ही थानन्द मिलता सर्ववेदान्तमारं यद अमास्मैकस्वलक्षणम् । है॥ ११॥ माफ्येग जानते हैं कि समस्त उपनिपदोका सार प्रम और ध्यानाकर एकम्पम्प पतिीय सक्स। वस्त्ववितीयं तमिष्ठ कैपल्यैरुप्रयोजनम् ॥१२॥ श्री श्रीमद्भागवतका प्रतिपाप विषय है । इसके निर्माणका प्रयोजन है एकमात्र कैसत्य मोक्ष ॥ १२ ॥ प्रौष्ठपयां पौर्णमास्यां हेमसिंहसमन्वितम् । जो पुरुप भाद्रपद मासकी पूर्णिमाक दिन श्रीमद्भागवतको सोनेके सिंहास्नपर रखकर उसका दान करता है, उसे ददासि यो भागवतं स यासि परमां गतिम् ॥१३॥ परम्माति प्राप्त होती है॥ १३ ॥ संतोंकी सभामै तभीतफ राजन्ते तावदन्यानि पुराणानि सतां गमे । दूसरे पुराणों की शोभा होती है, जक्सक सबभ्रष्ठ स्वयं यापम श्यते साधाश्रीमद्भागवतं परम् ॥१४॥ श्रीमद्भागवत महापुराणके दर्शन नहीं होते ॥ १ ॥ पर श्रीमद्भागपत समस्त उपनिषदोंका सार है। इस सर्षदान्तसारं हि भीभागपसमिप्यते । रस-मधाका पान करके एक चुप है, पा किसी और तद्रसामतत्प्तस्य नान्यत्र साद्रविः कषित् ॥१५॥ पुराण-शस्नमें रम नही सकता ॥ २५ ॥ जैसे नदियों में निम्नगाना यथा गङ्गा देवानामम्युतो यथा । गत, देवताओंमें विष्णु और वैष्णवोंमें श्रीशाहरनी सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही पुराणों में श्रीमद्भागवत है ॥ १६ ॥ शीनकादि वैष्णवानां यथा सम्म पुराणानामिदं तथा ॥१६॥ अपियो ! जैसे सम्पूर्ण क्षमि काशी सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही क्षेत्राणां वसईपी पक्ष काशी अनुचमा । | पुराणों में श्रीमद्भागवतका स्थान सबसे ऊँचाई ॥१७॥ या श्रीमद्भागवतपुराण सर्वपा निर्दोष है । भगवान्के तथा पुरामवातानां श्रीमद्भागवत निजाः ॥१७॥ प्यरे मल वैष्णव इससे या प्रम परवेस पुराणमें जीमुफ परमहंसोंके सर्वश्रेष्ट, पश्तिीय एवं मायाके सेशसे श्रीमहागवत पुराणममलं यदैप्णपानां प्रियं रहित बानका गान किया गया है। इस प्रकी सबसे यमिन् पारमहसमकममल पानं परं गीयते । मी विपक्षणता पो कि इसमा नेप्प वर्षात् फोकी अस्पस्तिक निति भी शान-वैराम्प एम मळिसे युक्त है। तत्र पानविरागमतिसहित नफर्ममाविष्फत जो इसका भ्रषम, पठन और मनम फरने लगता है, उसे । भगवान्की मति प्राप्त हो जाती है बोर का मुछ हो सन्मृण्वन् पिपठन् विचारणपरो मत्पाविद्यम्पेमा बा है ॥ १८ ॥ फस्मै येन विभासितोऽयमतुलोमानप्रदीप: पुरा यह भीमप्रागवत भगतवानका एफ श्रेष्ठ प्रकाशक है। इसपी सुलनामें और कार भी पुराण नहीं है। इसे पसे पाल स्वयं भगवन् मारापमने प्रसीके लिये प्रक्ट किया था। फिर नोंने ही प्रमाजीके रूपसे देवर्षि वरपेण प नारदाय गुनयेरुणाय तरपिगा। मारदको उपदेश फिस्य और मारदजीके रूपमें भगवान् ९७६ ग्रीमद्भागवत . यागीन्द्राय सदात्मनाथ भगमद्रासाय कारुण्पत श्रीकृष्णद्वैपायन प्यास्फो । तदनन्तर उगोंने ही म्पास- रुपसे योगेन्द्र शुकदेवजीको गौर श्रीशुकदेवगीके सपसे स्वच्छ विमलं निशाकममतसत्पपर धीमहि॥१९॥ अत्यात फरणावश रामर्षि परीक्षितको उपदेश किस । वे भगवान् परम शुद्ध एवं मायाम से रहित हैं। शोक नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय साक्षिमे । और मृत्यु उनके पासतक नहीं पटक सकते। हम सुर उनी परम सस्पस्वरूप परमेप्रका ध्यान करते हैं ॥१९॥ य इद रुपया कस्मै ज्यापधर्व समपर्व ।।२०॥ करते हैं, मिन्होंने क्या करके मोक्षामियपी समाजीको हम उन सर्वसाक्षी भगवान् वासुदेशको नमस्कार इस श्रीमद्भागवत महापुराणका उपदेश किया ॥ २०॥ योगीन्द्राय नमस्तस्मै शुकाय प्रमरूपिणे । साप ही हम उन योगिराज प्रमस्वरूप श्रीमुकदेवनीको मी नमस्कार करते हैं, क्दिोंने श्रीमद्वागत महापुराण ससारसर्पदट यो विष्णुरावमम्मघत् ॥२१॥ नाकर संसार-सर्पसे उसे हुए समर्षि परीधिको मुठ किया ।। २१ ॥ देवतावोंके याराप्यदेव सर्वेश्वर ! भाप भव भये पथा भक्तिः पादयास्तव बायते । ही हमारे एकमात्र स्वामी एव सर्वस्व है। अब बाप ऐसी रुपा कीचिये कि बार बार जन्म मरण करते रहनेपर भी दधा कुरुम्ब देवश नापस्त्व नो यतः प्रभो ॥२२॥ भापके घरणयसमें हमारी अनिमठ मक्किमनी रहे ॥२२॥ बिन भगवान्के मामोंका सहीनि सारे पापोंको सर्व नामसकीर्तन यस सर्वपापप्रणाशनम् । मष्ट कर देता है और निन मायान्फे घरमिवारमसमर्पण, | उनके चरणोम प्रणति सर्वदाके रिये सब प्रकारके छेको श्त कर देती है, उन्हीं परमतत्त्वस्वरूप श्रीवारिको में प्रगामा दालयमनस्त नमामि हरिं परम् ।।२३॥ | नमस्कार करता है ॥ २३ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे यासिस्पामयदशसाहल्या सरमाईस्या संहिता वारशस्पत्य प्रयोदशोऽस्पाप ॥ १३॥ इति द्वादश स्कन्या समाप्त मम्पूर्णोऽय ग्रन्या रपतीय पस्तु गोपिर तुभ्समा समर्पण । तन सरमिस्मत रति म प मापतीम् ॥ 'पारमा भर तरम् ।। १ भोरस) मी।

ॐनमो भगवते वासुदेवाय श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् अथ प्रथमोऽध्याय पास तवाप परीसित् मोर वमनाभाव समागम, शाणिस्पमुनि मुख भगमान्की सीलाके रहस्य मौर प्रमभूमि महस्वका वर्णन महर्षि व्यास पते है जिनका सारूप सबिदा नम्मघन, जो अपने सौन्दर्य और माधुर्यादि गुणोंसे सबका भीसचिदानन्दपनस्वरूपिणे मन अपनी ओर आकर्षित कर लेते है और सदा-सदा कृष्णाय धानन्तसुखाभिवपिणे । अनन्त मुस्की वर्षा करते यते है, जिनकी ही शलिसे वियोवस्माननिरोधदेतो इस मिथकी उत्पचि, सिदि वौर प्रणम्य होते -उन भगवान् श्रीकृणको हम मतिरसफा पास्वादन करनेके नुमो वर्य भफिरसाप्तयेऽनिशम् ॥ १ ॥ लिये निस्य निरन्तर प्रणाम करते हैं ॥१॥ नैमिषे सूतमासीनमभिवाय महामतिम् । नैमिषारण्पक्षेत्रमें श्रीस्तमी स्वस्प-विचसे अपने वासन- पर मैठे हुए थे । उस सम्प मालान्की अमृतम्पी मोबाष्पके रसिक, उसके रसास्वादनमें वस्य कुशव कपामृतरसास्वादशमला अपयोऽनुपन् ॥ २॥ शौनकादि अषियोंने सूतनीको प्रणाम करके उनसे यह प्रश्न किया ॥२॥ अपय व ऋफ्पिोंने पूम--सूमनी ! धर्मराज युधिष्टिर यम श्रीमयुरामण्डलमें मनिम्वनन्दन काका वीर हसिनापुरमें बजे भीमाधुरे दशे स्वपौत्रं हस्तिनापुरे । अपने पौत्र परीक्षितका राज्याभिषेक करके हिमालपर चले गये सब राजा पा और परीक्षितने से कैसे कौन अभिपिच्य गते राशिसो कार्य किं च पक्रतुः ॥ ३॥ कौन-सा कार्य किया ॥३॥ भीस्तमीने हा-मावान् नारायम, नरोपम नर, देवी सरस्वती और महर्षि म्यासका नमस्कार करक मुद नारायण नमस्कृत्य नरं चैव नराधमम् । वित होकर मातस्त्रको प्रकाशित करनवाले इतिहास- पुराणम्प 'नयाका बारण करना चाहिये ।।१।। देवी सरस्वती म्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।। ४ ।। | शौनकादि प्रमर्पियो ! म धमयम युधिष्टिर भादि पाण्म- महापर्क गत राति परीधित प्रथिवीपतिः । गण सारोहणक म्मेि हिमाव्य फले गये, तर सम्राट पिशित एक नि मथुरा गये । उनकी इस यात्राका मगाम मधुरां विप्रा वचनाभदिरक्षया ।। ५॥ ठरेश्य इतना ही था कि यहाँ धष्कर बनामसे मिल सूत उपाय माह २१२३- श्रीमहागवत । पिम्पमापर्स झात्वा वनः प्रेमपरिप्स्तः । शुल बा ॥ ५॥ या पानामको यह समाचार माम पुमा कि मेरे पितातुस्य परीधित मुझसे मिलने मे अभिगम्पाभिवाचाय निनाय नियमन्दिरम् ॥६॥ मगरसे वागे मकर ठमकी मालानी की, परम्म प्रक्रम पा रहे, तब उनका मय प्रेमसे भर गया । उमान किया वौर बड़े प्रेमसे हमें वपने महममें से बाये ॥६॥ परिपन्य स ते पीरा रुप्पफमतमानसः । वीर परीक्षित मगवान् भीडपके फ्रम प्रेमी मठ । उनका मन लिस्प-निस्तर मानन्दपन श्रीमान में । रोहिम्पाया हरेः पत्तीर्वषन्दापतनागत ॥७॥ रमत्महता था। नोंने मगवान् श्रीकणके प्रपौत्रकानाम- का को प्रेमसे वाभिान किया । इसके बाद क्स पुरमें वाभिसम्मानितोऽस्पर्ष परीक्षित् पृथिवीपतिः । माकन मगधन् श्रीकणकी रोहिणी नादि पत्नियों को नमस्कम किया ॥ ७॥रोहिणी वादिमीण परियोने मी सबाट परीक्षिका मत्पन्त सम्मान किया । तमाम करके निभान्तः सुसमासीनो क्मनाममवाच ॥८॥ जब बारामसे बैठ गये, तब उन्होंने पानामसे परत कही॥ ८॥ पीविनुमान पम परीमिदने मातात ! तुमारे पिता और पितामहोंने मेरे पिता-पितामहको मो-यो सार्यसे स्वस्पिवृभिन्नममस्पिवृपितामहाः। वाव बचाया है। मेरी रक्षा भी उन्होंने ही की है॥९॥ उद्धृता भूरिदःसौपादई प परिरक्षितः ॥ ९ ॥ प्रिय कानाम ! यदि में उनके उपकारोका बदन जुमामा चाहूँ तय किसी प्रकार नहीं चुका सकता । इसलिये में न पारयाम्प तात साधु कृत्योपामतः । तुमसे प्रार्थमा करता हूँ कि तुम मुखर्मक याने राम- काबमें प्रो रहो ॥ १० ॥ तुम्हें अपने समानेकी, त्वामत प्रार्थयाम्पङ्ग मुस राज्येऽनुयुज्यताम्॥१०॥ सेनाकी तथा शत्रुषोंको दबने वादिकी तनिक भी चिन्ता न करनी चाहिये । हमारे लिये कोई मतम्यतो केला कोशसैन्यादिवा चिन्ता तपारिदमनादिजा । एक ही, पर कि तुम अपनी इन माताओंकी सूम प्रमसे मम्ममाति सेवा करते राना चाहिये ॥ ११ ॥ मनामपि न फार्या ते सुसेम्पा किन्तु मातरः ॥११॥ यदि कमी तमारे उपर कोई भारचिनविरति अपे वस्त्र किसी कारणवश तुम्हारे पदय बधिक कोशका वनुमत निषेय ममि फतन्यं सर्वाधिपरिवर्जनम् । हो, सो मुघसे बताकर पिन्त हो मामा; मैं तुम्हारी भुत्यैतत् परमप्रीतो यग्रस्त प्रत्युषाच ॥१२॥ बात सुनकर कानाको कमी प्रसमता हुई । उहोने सारी फिताएँ र कर दूंगा ।" सम्राट परीधिवकी या राजा परीस्विसे कार-॥ १२ ॥ यमनामने हा-महान आप मुसे जो कुछ राजन्नुचितमेतले पदमासु प्रभापते। कर रहे हैं या सगा वापके अनुरूप है। आपके स्वस्पित्रोपकसाई धनुर्वियाप्रदानवः ॥१३|| फितान भी मुसे धनुर्वेदकी शिक्षा देकर मेरा महान् उपकार किय॥ १३ ॥ इसलिये मुझे किसी बातमी तमामासापि म चिन्ता धात्रं मुपपुप । तनिफ भी पिस्ता नही है। क्योंकि उनकी पासे में पद्मनाभ उपाय प०१] माहात्म्प ९७९ किन्स्पेका परमा चिन्ता स्त्र किनिश्चिार्यताम् १४, क्षत्रियोचित शूरवीरतासे मीमाति सम्पम हूँ । मुझे कमल एक मातकी बात पड़ी चिन्ता है, श्राप उसके माधुरे त्वभिषिक्तोऽपि पितोहं निर्धन बने । सम्बन्ध कुछ विचार कीनिये ॥१४॥ यपपि में म्युर- ममलके राज्यार पमिषिक , तथापि में या निवन क गवा पे प्रपात्रत्या पत्र राज्य प्ररोषते ॥१५॥ नमें ही रहता है । इस बातका मुझे कुछ भी पता नहीं है कि यहाँकी प्रजा कहाँ चली गयी, क्योकि राज्यका इस्युको पिम्णुरावस्तु नन्दादीनां पुरोहितम् । मुसतो सभी है, जब प्रना ॥१५॥ मब मनामने साणिस्पमाहावा पसंदेनुचये ॥१६॥ परीक्षितसे यह बात कही, तर ठमोंमे कम्नाममा सन्देह मिटाने के लिये महर्षि शाजिम्पको धुष्याया । ये अथोट विहाया शारिस्पः समुपागतः । ही महर्षि शाणिस्य पाले नन्द बादि गोपोंके पुरोहित ये॥१६॥ परीचिका सन्देश पावे ही महर्षि श्यापिम्प पबिवो पानामेन निपसादासनोचमे ॥१७॥ अपनी कुटी झेडकर कहा था पहुँचे । नाभने विकि पूर्षक उनका सागत-सकार किया और वे एक ऊँचे उपोषात विम्मुरासपकाराशु ततस्त्वसौ । शासनपर विराजमान पुए ॥ १७ ॥ राजा परीक्षित्ने कानामकी बात उन का मुनापी । इसके बाद महर्षि उमाप परमप्रीसस्तापभी परिसान्त्ययन् ॥१८॥ शानिय बदी प्रसन्नतासे उनको सानयना देवे हुए कामे मो॥१८॥ साकिस्म उपाय शायिस्पजीने कहा-प्रिय परीक्षित् सौर बनाम! भूतं दधिची मे राम ब्रजभूमिजम् । में हमलोगोंसे प्रमभूमिका रास्प क्तमता । हम दवित्त होकर मुनो । 'प्रया शम्दका भर्ष है म्याति । इस पर- प्रजनंम्पाप्तिरित्पुस्पा मापना प्रा उम्पते॥१९॥ यमके अनुसार न्यफकहोने के कारण ही इस मूनिका नाम प्रया पहा॥१९॥ सत्तारब,सम-म तीन गुणोंसे गुणातीतं प्रा म्याप प्रज्ञ उम्मले। वहीत नो फ्रम है, यही म्पापक है। इसलिये उसे प्रज' करते हैं। मह सदानन्दसरूप, परम पतिर्मय सदानन्दं परं ज्योतिर्मकानां पदमष्पयम् ॥२०॥ और अफ्निाशी है । बीपमुछ पुरुष उसीमें स्थित हो है॥२०॥ इस परमप्रखरूप प्रधाममें नन्दनम्दन समिन् नन्दात्मजः रुग्णः सदानन्दाविग्रहः । मान् श्रीकृष्णका निमसो । उनका एकएक बम सचिदानन्दसरूप मे वामराम और भातफाम हैं। आरमाराममाप्तकामा प्रेमातरनुभूयते ॥२१॥ प्रेमरसमें डूबे हुए रसिकचन ही उनका अनुभव करते हैं ॥ २१ ॥ मगचन् प्रीकृष्णकी आत्मा है-राधिका, मात्मा तु राधिका वस्स तपैष रमणादसौ । उनसे रमण करनेके कारण ही रास्य-रसके मर्म बानी | पुरुष उन बारमाराम' फाते । ॥ २२ ॥ 'काम' आरमारामतया प्राह प्रोन्यवे गूडपेदिभिः ॥२२॥ शम्दका यो कामना-अमित्मपा । मनमें मगधन् फामास्तुवान्छिसास्त्रस्त गावो गापामगोपिनः । भीकम बारित पार्व-गौएँ, बालबाल, गोपियों और उनके साय सीत्य-विहार पादि, चे सक्-के-सब यहाँ निस्पा पर्ने विहारापा आप्तममम्नतस्त्वपम् ॥२३॥ निस्प प्राप्त है । इसीसे श्रीकृष्णको 'माप्तकामा कारा गया ९८२ भीमद्भागवत वष कृष्णसलान्यत्र स्फरन्तु मदनुग्रहात् ॥४०॥ | भगवान्की लीगके जितने भी स्पछ है, सक्की में ठीक-ठीक पहचान हो जायेगी॥१०॥ पानाम ! स वन संसेवनारस उपस्त्वां मिलिप्यति । श्वभूमिका सेक्त करते यमेसे तुम किसी दिन दबा मिल जापी । फिर तो मानी माताओं सहित तुम उहाये ततो रहस्समेतमा प्राप्ससि त्वं समाफः ॥४१॥ इस भूमिका ता मान्छी श्रीषका रहस्य भी बान स्पेगे ॥ ११ ॥ एवमुक्तातु शाण्डिस्पो गतः कृष्णमनुसरन् । मुनिर शायिनी उन दोनोंको इस प्रकार सा- पुमाकर मग्पान् श्रीकृष्णका सारण फरसे पर अपने धाश्रमपर चले गये । उनकी बातें सुनकर रामा परीक्षित विष्मरातोऽथ पञम परां प्रीतिमापतुः ॥४२॥ ौर बानाभ दोनों ही बहुत प्रसन्म ए ॥ १२ ॥ इति श्रीस्कान्वे महापुराण एकाशीतिसाहसपा संहितापां द्वितीये रेणापणे श्रीमशागतमाहाम्ये शालिम्पोपदिनभूमिमाहारम्पवर्णनं नाम प्रपम्पेऽम्पाय ॥१॥ रुपम उ सूत उपाए अथ द्वितीयोऽध्याय पमुना भौर भीकनपचियोका सवाद वनोत्सव दवा प्रकट होमा अपिर्योम पूण जी ! यात्रापे कि शाण्डित्येवोसमादिश्य परायचे खमाभमम् । पीक्षित् और कनामको इस प्रकार भादेश देकर कर साहित्य मुनि जाने मामको छोट गपे, र उन दोनों किंकर पक्रतुस्तौ तु राजानौ स्त तद् पद ॥ १॥ रामायन कैसे-कैसे और कौन-कौन-सा काम किया ॥१॥ सतनी करने यो सपनन्तर महाराज परीक्षितने इन्दप्रस (दिल्ली) से हजारों बड़े-रे से प्रेको मुलवाकर ववस्तु विष्णरावेन भणीमस्या सहस्रशः। म्युराम खनेकी साह दी॥२॥ इनके अतिरिक सम्राट पीक्षितने मधुरामसम्के मामणे तपा प्राचीन नामको, इन्द्रप्रस्यात् समानाप्प मपुरापानमापिताः॥२॥ जो भगवान् के बड़े ही प्रेमी थे, पुरश्मा और उन्हें आदरके मापुरान् मापणांस्तथ वानरांम पुरावनान् । योम्य सम्माकर मपुर-नगरीमें साम्या ॥१॥स प्रकार पना परीक्षितकी सहायता और महर्षि समिकी निमाप माननीयस्य तेषु म्मापितवान् खराट् ॥ ३ ॥ | प्यासे बनाभने कम उन समी स्थानों की बेन की, वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण पने प्रेमी गोप-गोरियों के साप मजस्त सत्सहायेन माणिस्पस्याप्यनुप्रयत् । नाना प्रकारकी धीमाएँ करते थे। ध्यस्थानों क गाविन्दगापगोपीनां लीलासानान्यनुक्मात् ॥४॥ टीक निथप ऐ गानेपर उनोंने माँ-बाकी छीनाके अनुसार उस-उस सानका नामकरण किया, मगधन्के बीमाविमाकी साना की तपाउन-जन स्थानोपर बनेगे विज्ञायाभिषयाऽऽस्याप्य सामानावासपद महन् । गाँव रसाये । सान-स्थानपर माता के मामले पुग मोर उपपादिपून मिनादिम्पापनन प॥ ५ ॥' सागरे । उन्ध और सीधे , वादि म० २] माहात्म्म ९८३ गोविन्दारिदेवादिस्वरूपारोपमेन देवताओंकी साफ्ना की ॥१५॥ गोविन्ददेव, हर्दिष भादि मामोंसे मावरिया सारित किये । इन सम शुम कुप्पोकमकि स्वे राज्ये वसान प समोद ॥६॥ कमोकि द्वारा कानामने अपने राम्पमें सब कोर एकमात्र श्रीकृष्णमतिका प्रचार किया और बड़े ही धानन्दित प्रजास्तु मदिवास्तस्स रुष्णकीर्तनतस्पराः। हुए ॥ ६ ॥ उनके प्रनानोको भी पड़ा पानन्द पा, वे सदा भगवान्के मधुर माम तमा सीपयोंके कीर्वनमें परमानन्दसम्पन्ना राज्य सस्पैव तुष्यः॥७॥ संख्म हो परमानन्दके समुझमें ये यते ये और सदा ही वमनामके राज्यकी प्रशंसा किया करते थे॥७॥ एकदा कृष्णपरन्पस्तु श्रीकृष्णविरहातुराः । एक दिन भगवान् श्रीकृष्णकी मिरा-फेदनासे म्पाकुत्र सोमह हमार यनिणे अपने प्रियतम पविदेवकी पतुर्प पटरानी कामिन्दी ( यमुनामी) को खानन्दित देखकर फालिन्दी मुदितां वीक्ष्य पछर्गतमस्सराः ॥ ८॥ | सरटमाबसे उनसे भने ज्या । ठमके मनमें सौतिपा- गहका लेशमात्र भी नही पा ॥ ८॥ भीक्षणपन्य उप भीमप्यकी पनियोंमे कहा-पहिम कालिन्दी । से हम सब श्रीकृष्णकी धर्मपी, मेसे ही सम भी पपा वयं कप्पपल्पस्तथा त्वमपि शोभने । तो हो। हम तो उनकी विरहामिमें जली जा रही है, उनके योग-दु ससे हमारा हदय म्पपित हो रहा है, पर्य विरद्ध स्वास्त्विं नकालिन्दि व वद ॥९॥ | किन्तु तुम्हारी यह स्थिति नहीं है, तुम प्रसम हो । इसका क्या कारण है। कल्याणी ! कुछ पताओ तो तपुत्वा सममानासाफालिन्दीवास्यममवीत् । उनका प्रश्न सुनकर यमुनानी रेंस पम् । सापही पर सोचकर कि मेरे प्रियतमकी पही होनेके कारण ये सापत्न्यं वीक्ष्य तपासा फरुणापरमानसा ॥१०॥ | भी मेरी ही बहिने हैं, पिपस गपी, उनका दय दयासे | अपित हो उघ । क्त वे इस प्रकार करने लगा ॥१०॥ कातिन्युवाप पमुनामी ने कहा-अपनी बारमा वीरमग करनेके कारण मगमन्त्रीकरण मारमायम है। उनकी वारमा आरमारामस्स हप्णस तुषमात्मास्ति रापिका । र-श्रीराधाबी 1 में दासीकी मॉति गधानीकी सेवा करती यती । उनकी सेवाका ही या प्रमाण है कि विय वस्या दास्पप्रभाषेण पिहोऽसान् न संस्पृशेत् ॥११॥ इम्प्रय पर्श नहीं कर सकता ॥ ११ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी जितनी भी गनियों है, स-की-सब श्री. तस्सा एशिविस्तारा सपाः भीकप्णनापिकाः । राधाके ही अंशका विस्तार हैं। भगवान् श्रीरण और रारा सा एक दूसरेके सम्मुम्न है, उनका परस्पर निस्प- संयोग, इसलिये गधा सम्पर्म शत रिपमान जो नित्पसम्भाग पवास्ति तस्सा साम्मुरूपयागत ॥१२॥ श्रीकृष्णकी क्य रानियों है, उनको भी भगवान्या निस्प स्योग प्राप्त है।॥ १२॥ भीषण ही गधा है और स एप सा स मवास्ति यंशी सत्यमरूपिका । राधा ही श्रीम। ठन दामो प्रम ही शी।

९८० श्रीमद्भागवत [101 रास्पं विदमेतस्स प्रकतेः परमुच्यते । है ।। २३ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी व ग्रस्पीच प्रकृति से परे है। वे विस सम्य प्रकृति के साप सेमे प्रकृत्या खेलतस्तस्स लीलान्पैरनुभूयते ॥२४ गते हैं, उस समय दूसरे लोग भी उनकी सर्गसित्पप्पया पत्र रजासत्त्वतमोगुणैः । अनुभव करते है॥२९॥ प्रकृति के साप हमे कीलाम ही रबोगण, सत्त्वगुण वीर तमोगुणके प्राय समि, लीलेषं द्विविधा तस्स वास्तवी व्यावहारिकी ॥२५॥ स्थिति और प्रत्यकी प्रतीति होती है । इस प्रकार प निश्चय होता है कि मगवान्की मील दो प्रकारको है- वास्तवी तत्वसंवेपा जीवानां म्पावहारिकी । एफ वास्तवी और दूसरी व्यावहारिकी ॥ २५ ॥ पाली लीला स्वसंवेष है उसे स्वय भगवान् और उनके रसिक आपो विना दिसीया न द्वितीया नायगा कचित् ।।२६/ भक्तनन ही जानते हैं । जीवोंक सामने जो मन होती है, या म्यापारिकी मेळा है। वास्तही तीत्मके बिना युषयोर्गोपरयं तु तल्लीला व्यापारिकी । म्यावहारिकी सलीम नहीं हो सकती, परन्तु व्यापारिकी लीगका वास्तविक लीमके राज्य की प्रवेश नहीं हो पत्र भूरादयो लोफा मुषि मापुरमण्डलम् ॥२७॥ सकता ॥ २६ ॥ तुम दोमो भगवान्की किस मेमो अत्रैव प्रजभूमिः सा पत्र तत्व मुगापितम् । देख रहे हो, या व्यवहारिकी टीम।। ५ पुची पौर स्वर्ग आदि स्मेक इसी बीठपके अन्तर्गत है। इसी भासते प्रमपूर्णानां कदाचिदपि सर्मतः ॥२८॥ , जिसमें भावान्की वह वास्तवी शस्य-मन गुमरूपसे पृम्धीपर या मयुगमण्डन है॥ २७॥ यही महाभूमि होती रहती है। वह कमी-कमी प्रेमपूर्ण ब्दयवाले रसिक कदाचिद् द्वापरस्सान्ते गोलीलाधिकारिणः । मतोंको सम्म छोर दीपने गती है॥ २८ ॥ कमी भईसमें शपरफे वन्तमें बब भावान्को रहस्य मेनके समता यदान पुर्यवेदानी तदा हरिः ॥२९॥ अधिकारी भवन यहाँ एकत्र होते है, जैसा कि इस समप भी कुछ काठ पहले हुए थे, उस समप ममानन् करने आता सिके साथ रात केले। दो स्वैः सहावतरेत् स्पेषु समावेशार्थमीप्सिताः । यस्तारका य प्रयोजन होता है कि रास्य-सीमके मधिकारी मानन मी क्व परिका के साथ सम्मिलित होकर पला-रसका बावादन कर सकें। इस प्रकार वदा देवादयोऽप्पन्पऽवसरन्ति समन्ततः ॥३०॥ भगवान् मातार प्राण करते है, उस समय भगवान के अभिमत प्रेमी देवता और अपि आदि भी सब ओर थतार लेसे ॥ २९३०॥ सर्वेषां वामिगत रुत्वा हरिरन्सहिंतोऽभवत् । अभी-अभी जो बफ्तार पापा, उसमें भगवान् अपने सभी प्रेमियोंकी अमिप्रसाएँ पूर्ण करके वास्तमि हो चुके हैं। इससे या निमय हुवा कि यहाँ पाले तीन तेनात्र विविधा लोकाः सिताः पूर्व न संशयः॥३१॥ प्रकारके मम्बन उपस्थित थे, इसमें संदेश का ॥ ३१॥ उन तीनों प्रथम तो उनकी श्रेणी , मो मगमन्के नित्प माता पार्षद -बिनका नित्पास्वरिलप्सपश्चैव दवायाश्वेति मेदतः। मगमन्से की वियोग होता ही नहो । दूसरे को अ०१] माहात्म्य दयापास्तेप कप्णेन द्वारिका प्राप्तिाः पुरा ॥३२॥ | एकमात्र मायनको पानकी इच्छा रखते हैं-उनकी अन्तरण-मीरममें अपना प्रवेश चाहते हैं। तीसरी श्रेणीम | देवता भादि हैं। इनमें से जो देयता आदिके प्रशसे पुनमासलमार्गेण स्वाधिकारपु चापिताः । अवतीर्ण हुए थे, उन्हें भगवान्न प्रजभूमिसे हटाकर पहले ही गरका पहुँचा दिया । ॥ ३२ ॥ फिर भगवान्ने सलिम सदा कप्णः प्रेमानन्दैकरूपिणः ॥३३॥ ब्राह्मणक शापसे उत्पन्न मुसको निमित्त यनाफर पदकुलमें भक्तीर्ण देवताओंको स्वर्ग मेज दिया और पुन अपने विधाय स्वीयनित्येषु समावेशितवांस्तदा । अपने अधिकारपर सारित कर दिया । तथा बिनें एकपत्र भगवान्को ही पानेकी इच्छा थी, ठ, प्रेमानन्द खरूप बनाकर श्रीकृष्णन सदाके लिये अपने नित्य निस्पाः मर्वेऽप्पयोग्येषु दर्शनाभावां गताः ॥३४॥ अन्तर पार्षद सम्मिलित कर लिया । जो निस्प पाषद ने यपपि यहाँ गुप्तापसे हानेवाय नित्यष्टीयमें सा ही राते है, परन्तु जो उनके दर्शनक अधिकारी नहीं म्पावहारिकलीरास्थास्तत्र यभाधिकारिण । है, ऐसे पुरुषोंफ लिये वे भी अस्प होगये हैं॥३३ ३४॥ जो लोग न्यावहारिफ भेगमें स्पित है, वे नित्यतरीका दशन पान के अधिकारी नहीं है, इसलिये यहां पानशासको पश्यन्त्यत्रागनास्तम्माभिर्मनत्वं समन्तत ॥३५॥ सब बार निनन वन--सूना-री-सूना दिखायी देता है, क्पेकिन मास्तविक गमें रिपत मकननोको दस नहीं सकते ॥ ३५॥ तम्माघिन्ता न ते काया वज्रनाभ मदानया । इसलिये पम्नाम ! तुम्हें तनिक भी चिन्ता न करनी पाहिये । तुम मेरी बासासे यहाँ परत-से गाँव बसायो, वामयाय बहन ग्रामान् समिदिम्न भविष्यति ॥३६॥ इससे निथप ही तुमार मनोरोंकी सिदि होगी ॥३६॥ भगवान् श्रीकरणने वहाँ सी लीला की है, उसके अनुसार कमलीलानुमारण कत्वा नामानि मरत । उस स्पानका नाम रमन तुम जनों गौर यसाओ और | इस प्रकार दिम्य अनभूमिका भनाभौति सेवन परस त्वया पाम्रपता ग्रामान् संसेच्या भूरिय परा ॥३७॥ रहो ॥ ३७॥ गावधन, "गपुर ( उंग ) म.पुरा, महावन (गोयुर), नपाम ( नन्गाप) और हरसानु गार्टन दीपपुर मधुरायां महारने । (परसाना ) वादिमें तुम्हें पाने रिये सनी मनमानी नन्टिग्राम पत्मानी काया राज्यन्यितिम्यया॥३०॥ रीयक मानी, पान, मारी, सगर और पुत्र या पाहिये ॥ ३८॥ उन-उन स्थानों का मानान्की नपतिद्राणिमण्डारिकमान् मसरतमा । युम्रयन आपिया सेग्न फरत राना पाहिय । एमा पानसे नुम्भार रायम प्रजा बात ही सम्पन्न होगी और रान्य प्रजा मुमम्ममाम्त्वं च प्राना भविप्पसि ॥३९॥ तुम मा मन प्रसन्न रहोगे ॥ ३० ॥ पर मभूमि मीनपीस मुम्हें प्रपतनम इस मिश मगिदानन्दभरपा त्वया मन्चा प्रपनन । सेग्न करना चाहिये। म अशी इमरी से ९८२ मीमहागवत वन रुप्णखलान्यत्र स्फरन्तु मदनुग्रहात् ॥४०॥ मावान्की कीमके जितने भी सछ, सस्की में ठीक-ठीक पापान हो जायेगी॥१०॥ पानाम इस पज संसेवनाइस वस्त्यां मिलिप्पति । जिभूमिका सेक्स करते रहने से तुम किसी दिन ठगुमची मिस मागे । फिर तो अनी माताओं सहित हम मासे वतो रहस्यमेवमात् प्राप्यसि त्वं समाक ॥४१॥ स भूमिका तपा मगवान्फी लीलाका रहस्य भी जान एवमुक्त्वा तु शारिरयोगता कृष्णमनुसरन् । मुनिवर शामित्यमी उन दोनोंको इस प्रकार समय- मुमाकर मगवान् श्रीकृष्णका स्मरण फरर अपने भानपर बले गये । उनकी बातें सुनकर राय पीमित विष्णरासोऽप पमय परां प्रीतिमषापतः ॥४२॥ | और बनाम दोनों ही बहुत प्रसन्न हुए ॥ १२ खेगे॥ ११ ॥ इति भीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहनपा संहितामा दितीये राणे भीमद्भागवतमाहात्म्मे शामिम्योपदिशानभूमिमाहात्म्पवर्णनं नाम प्रपमोऽध्याय ॥१॥ अपय पुर सूत उपाय अथ द्वित्तीयोऽध्याय यमुना भौर भीकम्मपक्षियों का स्वाद कीर्वनोत्सपमें सवीन प्रकट गेला अपिमि पूम पानी ! अब यह पताइये कि शामिस्पेनीसमादिश्य पराये स्वमाभमम्। पीक्षित् और कानाको इस प्रकार बादश देकर बम छापित्य मुनि पाने कामको लौट गये, बब उन दोनों किमार्थ धक्तुस्तौ तु राजानौ स्त तद पद ॥१॥ रागाने कैसे कैसे और कौन-कौन-सा काम किया !॥१॥ सतजी करने समेतदनन्तर महायम परीक्षितने इन्द्रप्रस (दिसली ) सेहमा बाना सेको जुमाकर सवस्तु विष्णुरातेन भेणीमण्या सहस्रशः। मयुगमें बनेकी मगादी॥ २॥ इनके बतिरिक सबाट पीक्षितने ममुरामयम्के मामलों तथा प्राचीन बानको, इन्द्रप्रम्पात् समानाप्प मधुराम्यानमापिताः ॥ २॥ जो भगवान् के बड़े ही प्रेमी थे, पुरनपा और उसे अदरक माधुरान् प्रामणांस्तत्र वानरांष पुरायनान् । पाग्य समसफर म्पुय नगरीमें बसाया ॥ ३ ॥ इस प्रकर राजा पपेक्षितकी महायता और महर्षि रित्यकी निझाम माननीयत्वं तेपु म्यापितवान् खराट् ॥३॥ क्या बनामने मश उन सभी स्थानोंकी खेर की, नही मालान् श्रीकृष्ण अपने प्रेमी गोप-गोगियों के साथ पवस्तु सत्सहायेन भागिल्पस्याप्पनुमान् । नाना प्रकारकी रीमएँ रखे थे। मीमस्थानोंका पैक गारिन्दगापगापीना लीलाम्पानान्यनुनमात् ॥४॥ टीक निधप हो गगनेस उन्होंन की लीयो अनुसार उम्-उस स्पनका नामकरण किया, भान्के रिमापाभिधपाऽऽम्पाप्य प्रामानारासयमान् । गविहाको सापना पीपा उन-उन स्थानोपर भने गौर साये । सान सानपर माता नामसे पुशोर गणपादिपर्नेन सिपादिम्यापनन ॥ ५ ॥' सुगा । पुस और पसीने नगपये, शिप पर -- ५०२] माहात्म्य ९८३ गोविन्दहरिदेवादिस्वरूपारोपणेन देवताओंकी सापना की ॥ १-५॥ गोविन्ददेव, हरिदेव वादि नार्मोसे मावदिया सापित किये । इन सम पुम रुष्णफमति स्वै राज्ये सवान प समोद ह॥६॥ कनेकि दारा पानामने अपने राज्यमें सब थोर एकम्पन श्रीकृष्णमतिका प्रचार किया और बड़े । अामन्दित हुए ॥ ६ ॥ उनके प्रधामनोंको भी बया बानन्द पा, प्रवास्तु मदितास्तस्स रुपणकीर्सनवत्सराः। ये सदा मगधन्के मधुर नाम तप्प लीयोंकि कीर्तनमें परमानन्दसम्पन्ना रान्य वस्पैव तुम्दषुः ॥७॥ सम्म हो परमानन्दके समुद्र में इसे रहते थे और सदा ही पानामके एपकी प्रशंसा किया करते थे।॥७॥ एफदा कप्पपल्पस्सु श्रीकृष्णविरहातुराः । एक रिम मावान् श्रीकृष्णकी विरा-वेदनासे म्पाकुछ स्प्रेयमार यनियों अपने प्रियतम पतिदेवकी पतुर्प पटरानी कामिन्दी ( यमुनापी)को भानन्दित देखकर कालिन्दी मुदिता चीत्य पातमत्सराः ॥ ८॥ सरदमावसे उमसे छाने लगा । उनके मनमें सौतिपा- गहका लेशमात्र भी नहीं पा ॥८॥ मीणपल्प वपुः मीरुप्यकी पनियोन कहादिन फालिन्दी । बैसे हम सब श्रीकृष्णकी धर्मपती है, जैसे ही तुम भी पथा पय रुप्मपत्ल्पस्तथा स्वमपि शोभने । तो हो। हम तो उनकी निहामिम नगी ना ही । उनके वियोग-दु ससे हमाय हदय म्पपित हो या रे, वर्य चिरहदासातास्वं नम्नलिन्दि सद् पद ।। ९॥ | किन्तु तुमारी यह स्थिति नहीं है, तुम प्रसन हो । इसका क्या कारण ! कम्पाणी ! कुछ बताभो तो साही ॥९॥ तपुत्वा सयमानासा कालिन्दी वाक्यमप्रवीत् । उनका प्रश्न सुनकर यमुमाची रेंस परी। प्रपती या सोचकर कि मेरे प्रियतम्की पनी होनेके कारण ये सापस्न्यं वीक्ष्य तथासां फल्पापरमानसा ॥१०॥ भी मेरी ही महिने हैं, पिरस गयी, उनका दप दप्पासे दमित हो उय । पत मे इस प्रकार करने मगा ॥१०॥ कालिन्युगात यमुनामीने का -अपनी मारमा तीरमण फरमके करण मगवान् श्रीसम्ण मारमाराम है। उनकी मारमा आत्मारामस रुप्पस मुवमात्मास्ति रापिका। ₹--श्रीपानी में दासीकी मतियधानीकी सेवा करती राती हैं। उनकी सेवाका ही या प्रभाव है कि मिया सस्सा दास्यप्रभावप विरहोऽमान् न ससभेत् ॥११॥ दम्पय स्पश नहा कर सकता ॥ ११ ॥ मगवान् श्रीकणकी बितनी भी गनियों , स-पी-सब थी राधाके ही देशका विस्तार । मानान् श्रीरण और वस्था एबोसविस्ताराः सदा भीकृष्णनायिका । रापा सा एफ मरके सम्मुम्ड है, उनका परस्पर निस्प संयोग है, इसलिये गधाक स्त्रहरम बशत विषमान ना नित्यसम्भाग एवास्ति वस्सा साम्मुम्पयोगत !|१२|| श्रीकृष्णकी प गनियों है, उनको भी भगवान्का निस्प संयोग प्राप्त है।॥ १२॥ भीमरणही रामा है और स एव सा समवास्ति पेशी तत्पमहापिस्त्र । राधा ही धीरप हैं। उन दोनोंका प्रम कमी है।

श्रीमसागवत -- भीकृष्णनखचन्द्रालिसमाचन्द्रावली स्मृता॥१३॥ | तपा राधाकी प्यारी सस्ती चन्द्राशी भी श्रीकम्म-चरणोंकि नसरुपी चन्द्रमामोंकी सेपमें ध्यसक रहने के कारण ही रूपान्तरमगृहाना तयोः सेवातिलालसा । 'चन्द्रापली नामसे कही माती है ॥ १३ ॥ मगध और भीगकी सेवामें उसकी बड़ी लालसा, बड़ी मगन रुक्मिण्यादिसमावेशो मयात्रैव विलोकितः ॥१४॥ है, इसीमिध्ये या कोई दूसरा स्वरूप धारण नहीं करती। | मने यही श्रीराधा ही रुक्मिणी पादिका समावेश देसा युप्माकमपि रुष्णन पिरहो नैव सर्वतः है॥११॥ तुमलोगोंका मी सर्गशमें श्रीकृष्णके साप वियोग नहीं हुआ है, किन्तु तुम इस तस्यको इस सपने किन्तुए नजानीय तमा ध्याफलवामिवाः॥१५॥ जानती नहीं हो, इसीमिये इतनी म्याकुम हो रही हो ॥१५॥ इसी प्रकार पाले भी जब मकर प्रीमणको नन्दगाँसे एवमेवात्र गोपीनामकरावसरे पुरा । मयुराम भाये थे, उस पसरपर गो गोपियोंको भीमसे वियकी प्रतीति थी, मह भी वास्तविक क्यि नाही, विरहाभास एषासीदुवेन समाहितः ॥ १६॥ केवल बिहका बामास था। इस बातको यस्तक नहीं जानती पा, सपतक ने ममा काम पा, फिर बम तेनैव भक्तीना पेद् भवेदत्र समागमः । उसमीने धाकर उनका समाधान किया, तब वे इस चातको समझ सकी ॥१६॥ यदि तुम्हें भी उनकीका वई निस्पं स्वकान्तेन विहारमपि लप्सष ॥१७॥ स्वसंग प्राप्त हो जाय, तो तुम सब मी अपने प्रियतम श्रीकृष्णके साप नित्यविहारका मुस्स प्राप्त कर लेगी॥१जा सूत उवाच साजी करते-अधिगण ! मन मनोंने इस प्रकार सममाया, तब श्रीकृष्णकी पत्नियाँ सदा प्रसन एवमुकास्तु ताःपत्न्पः प्रसन्ना पुनरमपन् । रहनेवारी यमुनाभीसे पुन बोली । उस सम्म उनके एयमें इस बातकी बी मसा पी कि किसी उपापसे ठरवजीका दर्शन हो, बिससे हमें अपने प्रियतमके नित्य- उवालोकनेनात्मग्रेष्ठसङ्गमलालसा ॥१८॥ स्योगका सौभाग्य प्राप्त हो सके ॥ १८ ॥ भीडम्पपविमोने या ससी | मारा ही भन्पासि सलिकान्तेन पस्सा नैयास्ति विध्युति । बीकन य है, क्योंकि पम्हें कभी भी अपने प्राणनायके वियोगका दु सनहाँ मोगना परता। मिग श्रीराधिकामीकी यसस्ते स्वार्थससिद्धिस्तस्या दास्पो पबिम ॥१९॥ कपासे तुमारे अमीभ की सिद्धि हुई है, उनकी अब हम- ठोग भी दासी ई १९॥ कि तुम मभी कर चुकी परन्तवलामे सादयात्सर्वार्थसाधनम् । हो कि उसमीके मिसमेफ्र जो हमारे सभी मनोरथ पूर्ण वषा पदख कालिन्दि सल्लाभोऽपि पवाभवेत्॥२०॥ बिससे उबबी भी शीघ्र ही मिल बा ॥ २० ॥ होंगे इसम्पेि कारिन्दी । बब ऐमा फोो उपाय बताओ, सूतजीहत है-श्रीकृष्णकी रानिपोने पर यमुमा- एवमुक्ता तु कालिन्दी प्रत्युषाधाम तास्तथा । जीसे इस प्रकार का तप वे भगवान् भीरप्णचन्द्रकी सरन्ती प्णचन्द्रस्य फला! पारशरूपिणी॥२१॥ सोम कम्पोंका पिन्सम करती ही उमसे काने श्रीकृष्णपल्म अ स्त उप १०२]] माहात्म्य ९८५ साधनमिर्बदरी प्रजवा कप्णन मन्त्रिणे प्रोक्ता। मगी ॥ २१ ॥ जय भगवान् श्रीकृष्ण अपने परमधामको पवारन लगे, तब उनोने अपने मन्त्री उपसे कहा- 'उद्धव | साधना करनकी भूमि है बदरिकाश्रम, षत वास्ते स तु साधावपुर्न पाइयल्लोफान् ॥२२॥ अपनी साधना पूर्ण करनेके लिये तुम यही आयो ।' मगवान्की इस थानाके नुसार उषत्री इस समय अपने साक्षात् सम्पसे यदरिकाश्रममें विरानमान है और फलभूमिर्मभूमिईचा तौ परंप सरहस्यम् । यही मानेवाले विधामुत्योकी मगवान्क बताये हुए छानका उपदेश करते यते हैं ॥ २२ ॥ साधनकी फलमिह तिरोहित सचदिहेदानी सउदयोऽलक्ष्पा२३ फररूपा भूमि है कानमि, इसे भी इसके खस्योसहित | मगवान्ने पहले ही उदमको द Pया था। किन्तु बा फालभूमि यहाँसे भगवान्क तर्धान होनेक साप ही गोवईनगिरिनिकटे सस्तीसले नद्रनाकामः । स्यूस पिसे परे ना चुकी है, इसीलिये इस समप यहाँ उदय प्रत्यक्ष दिखायी नहीं पावे ॥ २३ । फिर भी एक स्थान ह, जहाँ उदपनीका दशन हो सस्ता सत्रस्पारसल्लीरूपणास्ते स उदवो ननम् ॥२४॥ है। गोर्वन फ्षतके निकट भगवान्की मसहचरी गोपियोंकी बिरसठी है, हॉकी लता, वार और मेक सपमें पश्य ही उद्धवजी हो निवास करठे पास्मात्सषरूपत्वं हरिणा तस्मै समर्पित नियतम् । है। ताकि रूपमें उनके बनेका पही ठोप है कि मगमन्की प्रियतमा गोपियोंकी घरमरज उनपर पस्ती रहे ॥ २१ ॥ उसपत्रीके सम्बन्धमें एक निषित बात वसाचत्र स्मित्वा छसमसर परिसर सववाभिमा२५॥ पदमी कि उनें मापन्ने अपमा उरस्व-सहप प्रदान किया है। मगधन्फा ठसा उवचाका गई, वे उससे भरा नहीं रह सकते, इसलिये भय मुमध्यग घोणाणमद कीर्तनकाम्पादिसरससङ्गीते । पद्मनाभकोसाप मेकर महाँनाधीवर कुममसरामके पास यहरो ॥२५॥ भगतकोंकी मारली एकत्र करके गीणा, उत्सप आरम्भम्पा हरिरवलाकान् समानाप्या।२६।। केशु और मृदंग धादि मार्बोफे साए मगधन्फ नाम और स्टीयोंके कीर्तन, भगवासम्धी काम्य फयामों के प्रयम तपा मातहणगानसे युक्त सरस सगीताशय महान् यसव सत्रावायला भविता नियत महात्सवे निवते । वारम्म करो।२६।। इस प्रकार नव उस महान् उत्साका विखार होगा, तब नियम है कि हों उपजीका दर्शन मिलेगा । ये ही मतीमाति तुम सब छो! मनोरम पूण पाप्माकीणामभिमसिदि सरिता स एष सवितानाम् करेंगे " ॥२७॥ स्तगी काटी- यमुनानीकी वायो दुइ बातें इविभुत्या प्रसमास्ताः कालिन्दीमभिपन्य ठत् । | समर प्रीकृष्णकी रानियाँ बहुत प्रसन। ठनोंने यमुनाबीचे प्रमाम किया और हाँसे छीनकर पानाम कथयामासुरागस्प रज प्रति पराक्षितम् ।।२८॥ वप परीभित्से वे सारी बातें कर सुनायी ॥२८॥ मा २१२४- सूत साप ९८६ श्रीमद्भागवत [०३ विष्णुरावस्तु तन्मृत्वा प्रसम्भस्तयुतस्तदा सब बातें सुनकर परीक्षित्को वनी प्रसन्य एई और ठनोंने यमनाम तया श्रीकृष्णपहियोंको उसी समय साप वधागत्य तत् सर्व कारयामास सत्वरम् ॥२९॥ से उस स्थानपर पाँधकर सकाउ ह सब कार्य प्रारम्भ फरषा दिया, जो कि यमुनानीने बताया प॥२९॥ गापनाइवरण वृन्दारण्ये सखीसले । गोवर्धनके निकट बन्दानके भीतर फुसुमसरोसपर वो सखियोंकी विकारस्थली है, वहां ही श्रीकृष्णकीर्तनका प्रवृत्त मुमाम्भोधी कृष्णसीर्तनोत्सवः ॥३०॥ उसय मारम्भ हुल्य ॥ ३० ॥ वृषभानुनन्दिनी श्रीयाजी तपा उनके प्रियतम धीरणकी पहलीगभूमि ना साधाद प्पभानुमुताकान्तविहारे कीर्तनथिया । साहीतनकी शोमासे सम्पन्न हो गपी, उस समय को रहनेपाले सभी मकनन एकास हो गये। उनकी पि, सायादिव समारत्ते सर्वेऽनन्परमाऽभयन् ॥३॥ उनके मनकी वृत्ति को अन्यत्र न नाती थी ॥ ३१॥ तदमम्तर सरके देखते-देखते पहा फेल हुए तृण, गुम्म बोर ततः पश्पत्सु सर्वेषु वणगुल्मलताचयात् । स्ताओं के सम्हसे प्रकट होकर धीउसानी सबके सामने पाये । उनका शरीर पामवर्ग पा, उसपर पीतामार शोभा थाचगामादव सपी श्याम पीताम्बराएतः॥३२॥ | पा हा पा । वे गलेमें वनमाय और गुंगाकी मान धारण फिपे हुए थे तब मुखसे पारंपार गपीछम गुआमालाधरो गापन् यन्लयीरत्लम मुहुः । | श्रीकृष्णकी मधुर स्वराओंका गान करते थे। उसीक | आगमनसे उस सीतनारसबकी शोमा कर गुनी या सदागमनता र भृशं सहीर्तनात्सर ॥३३॥ गयी । बसे स्फटिफमगिकी बनी पुई वाज्यिाकी उसपर चौग्नी टिफनसे उसकी शेम बहुत बह जाती है। पन्दिमागमतामात् स्मारिकाहारभूमणि । उस समप सभी त्यग आनन्दक समुदमें निम्न हो जाना सब कुछ भूउ गये, मुम-युध उ पठे ॥ ३२-३४॥ नथ सब मुगाम्भाधी मया सर विमम्मरु ॥३॥ पादार पद वा उनकी पेतना Pिय स्येपसे नारे आपी, अर्घद पर उन्हें नेश हा तर उसात्रीको धणनागरिमाना या श्रीकृष्णास्वीयम् । भगर धीमामय उपम्मित दव, ना मोरप र्ग हा नानक पारम प्रान हारे उनी पूगा परन उदा पक्षपामर प्रतिवन्धमनारथाः ||३५|| Rगे ॥ ३ ॥ गरमाग10mins सानपानियामा श्रीमगामाहाम्रे FELMERA fifa नामुपगना नाम दिनीमाश्याप ॥२॥ अब तृतीयाऽध्याय भीमागापागभार मादारम्प भागाभपणभातामो भगालाममापी गाय पानर-3-14 MIOरसर भभानुना मानधननारगन् । IHAR TI HURNIRL मरम्पाप पर पशिसार रिदमे १॥ मा म०३] माहात्म्प ९८७ उसय उवाच सपनीने फहा-रामन् ! तुम धन्य हो, एकमात्र भन्योऽसि राजन् कणकभक्या पूर्णोऽसि नित्पदा । श्रीकृष्ण की भकिसे ही पूर्ण हो ! क्योंकि श्रीकृष्ण-सीतन के महोत्सबमें तुम्हारा एय इस प्रकार निमम्न हो रहा पस्वं निमग्नचित्तोऽसि कप्मसाईनोत्सवे ॥२॥ है ॥२॥ बड़े सौमाग्यकी बात है कि श्रीकृष्णकी पनियों के प्रति तुम्हारी मकि धौर पनामपर तुमहाग प्रेम है। रुष्णपत्नीपुषजे च दिएघा प्रीतिः प्रवर्तिता! तात ! तुम जो कुछ कर रहे हो सब तुम्हारे अनुरूप है। क्यों न हो, श्रीकृष्णने ही तुम्हें शरीर और मम तयोचितमिदं तात कप्पदचाङ्गवैभव ॥ ३ ॥ प्रदान किया है, मत तुम्हारा उनके प्रपौत्रपर प्रेम होना सामाविक ही है ॥ ३ ॥ इसमें तनिक भी सुन्दा नहीं शारफास्पेषु सर्वेषु पन्या एते न संशयः । कि समस्त शरकावासियोंमें ये लोग सबसे बकर न्य पा मनिवासाप पार्थमाविष्टवान् प्रमः ॥ ४॥ अर्जुनको धाज्ञा की थी ॥ १ ॥ श्रीकृष्णका मनरूपी हैं जिन्हें इनमें निवास करने के लिये मामान् श्रीकृष्णने भीकृष्णस्य मनयन्द्रो राधास्पप्रभयान्वित । चन्द्रमा राधाके मुखकी प्रभारूप चाँदनीसे युक्त हो उनकी लीलाममि बन्दाफ्नको अपनी किरोसे मुशोमित तविहारवनं गोभिर्मण्डपन् रोचते सदा ॥५॥ करता हुआ यहाँ सदा प्रकाशमान राता॥५॥ श्रीकृष्णचन्द्र नित्य परिपूर्ण है, पाहत पन्द्रमाकी भाँति कृष्णचन्द्र सदा पूर्णस्तस्स पोरन याः फलाः । ठममें वृद्धि और धपम्प विकार नहीं होते। उनकी जो सोलह कराएँ हैं, उनसे सहसों पिम्प किरणे निकलती पित्सहस्रप्रभाभिन्ना अत्रास्ते सत्वरूपमा ॥ ६ ॥ हती हैं, इससे उनके सहयों मेद हो जाते हैं। इन समी फोंसे मुफ, नित्य परिपूर्ण श्रीकृष्ण इस प्रमभूमिमें एवं पजस्तु राजेन्द्र प्रपन्नभयभखकः। सदा ही पिम्पन यते हैं, इस भूमिमें और उनके खरूपमें कुछ मन्तर नहीं है ॥ ६॥ राजेन्द्र परीधित् ! भीकृष्णदक्षिणे पादे स्थानमेतस्स पर्वते ॥७॥ इस प्रकार विचार करनेपर समी प्रवासी भगवान्के वाल्में स्थित है । शरणागतोंका भय दूर करनेपाल जो अषतारेऽष कप्पन योगमायातिभाविताः । ये पत्र हैं, इनका स्थान श्रीकृष्णके दाहिने चरणमें है॥७॥ इस अस्तारमें भगवान् श्रीकृष्णने इन सबको तबलेनास्मविस्मस्या सीदन्स्पेते न समयः ॥८॥ अपनी योगमायासे वभिभूत कर लिया है, उसीफे प्रभावसे ये अपने सम्पको भूल गये हैं और इसी कारण सदा ऋते रुष्णप्राशं तु म्यात्मबोधोन फस्सचित् । दुखी रहते हैं। यह बात निस्सन्देह ऐसी ही है ॥८॥ श्रीगका प्रकाश प्राप्त पुए बिना किसीको भी अपने वत्प्रकासस्तुजीयानां मायया पिरितः सदा ॥९॥ सरूपा बोध नहीं हो सफता । जीवोंके बात करगमें जो श्रीगतलका प्रकाश है, उसपर सदा मायाका अष्टाविंशे द्वापरान्ते स्वयमेव यदा हरिः । | पर्दा पड़ा यता है।॥९॥ षट्ठाइसवे परके क्न्समें जब भगवान् श्रीराम मय ही सामने प्रकट होकर अपनी उत्सारयेग्निजां मायां वत्प्रकाशा भवनदा ॥१०॥ मायामा पर्ग छटा स्ने है, उम सम्य जीवोंपर उनका ९८८ भीमसागपत [.३ - स तु फालो व्यविक्रान्सस्तेनेदमपर शृणु । प्रकाश प्राप्त होता है॥१०॥ किन्तु बाब समस तो बीत गया, इसलिये उनके प्रकाशकी प्रासिके मि अन्पदा तत्प्रफासस्तु श्रीमद्भागमताद् भवेत्॥११॥ पब दूसरा उपाय पसत्यपा मा या है, मनो। काम श्रीमद्भागवत शास्त्र यत्र भागवतैर्यदा । सापरके अतिरिक्त सम्पमें यदि कोई भीकृष्णतत्वमा प्राण पाना चाहे, तो उसे पा श्रीमद्भागवतसे ही प्राप्त हो मीयते भूपते चापि भीकप्मस्तत्र निमितम् ॥१२॥ सकता है ॥ ११ ॥ मगधन्के मत बाँस कमी श्रीमद्भागात शासका कीर्तन घोर घाण करते,हाँ श्रीमद्भागवत यत्र श्लोकं श्लोकार्द्धमेव च । उस समय भगवान् श्रीकृष्ण साक्षातरूपसे विराजमान वत्रापि भगवान् कृष्णापल्लवीमिर्विराजते ॥१३॥ गते हैं ॥ १२ ॥ मो भीमद्भागवतके एक य वाघे ठोककर ही पाठ होता है,पों भी श्रीकृष्ण अपनी भारते मानव जन्म प्राप्य भागवत न ये । प्रियतमा गोपियोंके साप विषमाम रहते हैं। इस श्रुतं पापपराधीनैरात्मघातस्तु तैः कृतः ॥१४॥ | पवित्र मारत में मनुष्यका कम पाकर भी गिन मेगोने पापके अधीन होकर श्रीमद्भागवत नहीं सुना, मोने भीमद्भागवत शास्त्रं नित्यं यै परिसेवितम् । मानो अपने ही हाणें अपनी हत्या कर ली ॥ १४ ॥ मिन यबमागियोंने प्रतिदिन श्रीमागपत श्मसका सेक्न पितुर्मातुप भायायाः कुलपति सुवारिता ॥१५॥ किया है, उन्होंने अपने पिता, माता और पत्नी-तीनों के विधापकासो विप्राप्पा रानां शत्रुजयो विनाम् । ही फुपका मनीभाँति उसार कर दिया ॥ १५॥ मागस्तके साप्पायर अवमसे प्रमोंको विमा धन म्वास्थ्य च शूद्राणां श्रीमशागवता भवेत्॥१६॥ प्रकाश (योध) प्राप्त होता है क्षत्रिय म्ोग शत्रुओं पर विजप पाते हैं, वैश्योको धन मिसाईबोर थम सस-- यापितामपरपां च मवाञ्छितपूरणम् । नीरोग वने आते हैं ॥१६॥ तिर्यो तपामस्या भाविकप लोगों की भी इच्छा श्रीमद्भागवतसे पूर्ण होती है। यत कोन अतो भागवत नित्यकान सेवेत भाग्यवान् ॥१७॥ | ऐसा भाग्यवान् पुरुष है, जो भीमद्भागवतका निस्य ही सेग्न न फरेगा ॥ १७ ॥ ॥ अनेकों जगत रु सामना करते अनजन्ममंसिद्ध श्रीमहागपत लमेत् । फरते जब मनुष्प पूग सिद्ध हो जाता है, तब उसे श्रीमद्भागवतकी प्राति होती है। भगससे मापनमा प्रकाश भगपदक्तरुवन्तत्र जायते ॥१८॥ प्रश मिश्रा है, जिससे भगक उत्पन होती माम्यापनप्रसादात भामहागरत पुरा। ॥८॥ यकालमें समियापनकी पपासे श्रीमद्भागात पृहस्पतिजीको मिरा और गृहस्पतिजीने मुझ या यहम्पतिदनरान् म वनाई कप्णयलभः ॥१९॥ इसीसे में धीम्या प्रियप्तम सख्य हा सम्म ॥१९॥ परीधित् ! गृहस्पतिवीन मुन एक म्यापिका भी आग्यापिांग तनाको पिष्णुराव निराध ताम् । | सुनायो थी, उसे तुम मुना। इस भाग्यापिकासे श्री मसागरतधायक सम्प्रदायका मम भी जाना जा सस्ता पायत सम्प्रदायास पर भागातभुत ॥२०॥४॥२०॥ पास्वीकार पहसातिमीन पहा था-मानी मापासे पुषसए याध पदा प्णा मायापुरपम्पम् । धारग फरनगर भागन् धीहमने जर गरि रिये ममा प्रिभारि ग्न मापनमागुणः ॥२१॥ सय मिग्य, सर उन परिप्र मे तान गुरु प्रार

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९९० भीमसागवत [.३ मोधार्षिम्पो विरक्कम्पो मुक्ति पञ्चवि तथा॥३१॥ ससारबन्धनसे मुछ होना चाहते है, विरक, उने मेऽपि मोधन वाम्छन्ति सान् कप पालपाम्पदम् । उनके इच्छानुसार पाँच प्रकारकी मुक्ति भी देश रहूँगा ॥ ३१ ॥ परम्तु जो मेग मोक्ष मी नहीं चाहते, आत्मानं च भियं चापि पाठमामि कथं वद ॥३२॥ उनका पाम्म में कैसे करूँगा 1- यह बात सम्ममें नहीं वाती । इसके अतिरिक्ष में अपनी तथा ममीनीकी मी तमा अपि पुम नापा श्रीभागवतमादिशत् । रक्षा कैसे कर सांगा इसका उपाय भी बनाइये ॥ ३२ ॥ उषाघ घ पठस्वैनचव सर्भिसिद्धये ॥३३॥ उन्हें भी श्रीमद्भागपतका उपदेश किया और कहा–'तुम विणुकी यह प्रार्थना सुनकर आदिपुरुप मापने भपने मनोरपकी सिद्रिके लिये इस श्रीमद्भागवत-शारका सतो विष्ण प्रसभात्मा परमार्थकपालने । सदा पाठ किया करो ॥ ३३ ठस उपदेशसे विष्णु मगवान्का पित प्रसम हो गया और वे स्वामीजी के साथ समर्थोऽभूफ्यिा मासि मासि भागवतं मरन् ॥३४॥ प्रत्येक मासमें श्रीमद्भागवतका चिन्तन करने लगे । इससे वे परमार्थका पाख्न और यपाझपसे संसारकी क्षम पदा विष्णुः स्वयं पत्ता लक्ष्मीय भवसे रता । करनेमें समर्थ र ॥ ३४ ॥ नग मावान् विष्णु रूम पक्का होते हैं और मम्मीची प्रेमसे माण करती, उस तदा भागवतभाषो मासेनैप पुनः पुनः ॥३५॥ समय प्रत्येक पार भगक्सकश्यका माण एक म्पसमै । यदा लक्ष्मीः स्वप पस्त्री विष्णुमभवणे रतः। समाप्त होता है॥ ३५॥ किन्तु अव यमीनी सर्व पक्षा होती है वोर विष्णु प्रोता बनकर सुनते हैं, तब मागवत- मासदयं रसास्वादस्तदातीव सुशोभते ॥३६॥ कभाषा रसास्वादन दो मास तक होता रहता है, म्स समय का बनी पुन्दर, बहुत ही रुचिकर ही अधिकारे स्थितो विष्मुर्लक्ष्मीनिश्चिन्तमानसा । है ॥३६॥ इसका कारण एक स्णुि तो अधिकारास्तो, उन्हें नगत्के पानकी चिन्ता फरमी वेन भागवतास्वावस्तस्या भूरि प्रकाशते ॥३७॥ पाती है। पर मीमी इन असे का है, पता भय द्रोऽपि तं देवं संहाराधिकता पुरा । उनका पय निपिन्त । इसीसे यामीनीके मुस्से मागकपाका रसासादन वधिक प्रकाशित होता है। पुमांस प्रार्थयामास स्क्सामर्थ्यविनाये ॥३८॥ काम माया पा, चपनी साममेकी पनिक लिये उम इसके पश्चात् मने भी, निमें मगन्ने पाने सहार परम्पुरुप मगवान् श्रीकृष्णसे प्रार्थना की।३७२८॥ नित्ये नैमिधिके चैव संहारे प्राकते तथा । योमा--मेरे प्रम देवदेव मुझमें निस्प, नैमितिक पतयो मम पियन्ते देवदेव मम प्रभो ॥३९॥ सहारको शाकि बिस्कुल नहीं है। पा मेरे लिये को र प्राप्त संहारकी शधियों तो है, पर व्यत्यत्तिक मात्पन्तिके सु संहारे मम तिर्न वियते । मह व ममैवतु वेन स्वां प्रार्थयाम्पहम् ॥४०॥ प्रार्थना करता हूँ ॥ ३९१० ॥ दु की बात है । इसी फीकी पूर्तिके लिये में वापसे पासतिरुपान पहसावित्री कहते है-सकी प्रार्थना पुनकर श्रीमद्भागवत तमा अपि नारायणो ददौ । मारापणने उनें भी श्रीमद्भागवतका ही उपदेश किया । स तु ससेवनादस्य जिग्ये पापि वमोगुणम् ॥४१॥ सदाशित स्मने एक बम एक पारायण के प्रामसे मागतका ।

०३] माहात्म्य ९९१ उस उपाप कथा भागवती तेन सेविता पर्पमात्रतः । का सेकन किया। इसके सेवनसे उन्होंने तमोगुणपर विजय पापी और आस्यन्तिक संहार (मोक्ष) की शक्ति भी प्राप्त लये स्वास्पन्तिके तेनावाप शक्ति सदाशिव ॥४२॥ कर सी ॥ ११ १२ ॥ उषजी करते-श्रीमदागवतके माहात्म्पके सामान्य में यह बाल्पपिका मैने अपने गुरु श्रीवृहस्पतिमीसे श्रीभागवतमाहात्म्यमामाख्यायिका गुरोः। सुनी और उनसे भागक्तका उपदेश प्राप्त कर उनके चरणेमि प्रणाम करझे मैं बहुत ही मानन्दित मुभा ॥१२॥ तत्पपाद शुखा भागयत लम्मा समुदेन प्रणम्प तम् ॥४३॥ | मगवान् विष्णुकीरीति स्वीकार करके मैंने भी एक मास्तक श्रीमद्भागसकपाका मलीमौविरसास्वादन किया ॥१४॥ तसस्तु वैष्णवी रीतिं गृहीत्या मासमाप्रतः । उतनेसे ही में भगवान् श्रीकृष्णका प्रियतम सब हो श्रीमद्भागवतासादो मया सम्यनिपेषित ॥४४॥ गया । इसके पचात् मगवान्ने मुझे अजमें अपनी प्रियतमा गोपियोंकी सेवामें नियुक्त किया ॥१५॥ वावर्तष पवाई कृष्णस दयितः सखा । यपपि मावान् अपने स्लीयपरिका केसाप निस्प विहार करते फणेनाप नियुक्तोऽई जे स्वप्रेयसीगणे ॥४॥ रहते हैं, इसस्मिये गोपिका श्रीकुमसे कभी मी वियोग नहीं होता, तपापि त्रो भ्रमसे विरह वेदनाका अनुभव बिरहा सु गोपीपु स्वयं नित्पविहारिणा । पर रही थी, उन गोपियों के प्रति मगन्न मरे मुससे मागयतका सन्देश मायया ॥ १६ ॥ उस सन्देशको भीभागपतसन्दयो मन्मुखन प्रयोधित ॥४६॥ अपनी बुद्धिके अनुसार ग्रहण कर गापियो तुरत ही विरह तपधामति लन्या सा आसन् विरहवर्जिताः । बेदनासे मुक्त हो गया। में भाग तक इस बस्यको तो नहीं समन सफा, किन्तु मैंने उसका चमत्कार प्रस्पन नाबासिप रहस्यं तचमत्कारस्तु लोकितः ॥४७॥ देवा ॥ १७ ॥ इसके बहुत सम्यक याद जब प्रमादि स्ववास प्रार्घ्य कणं प ब्रह्मायेषु गते' मे। देता थापर मायन्मे अपन परमधाममें पधारनेकी प्रार्पना करके चले गये, उस समय पीपलक प्रसकी नाक श्रीमद्भागवत कृष्णस्तरहस्य खप ददौ ॥४८॥ पास भान सामने सहए मुष्टे भगवान्न श्रीमद्भागवत- पुरवोऽश्वत्ममूलस्स चम्पर मयि तद् इदम् । रिस्पर उस रहस्यका म्वयं ही उपश मिपा और ममी मुदिमें उसका निधय का Pिया । उसीक प्रभावसे तेनात्र प्रवन्लीपु पसामि पदरीं गतः ॥४९॥ में पदरिकाधम गहमर मी यहाँ प्रकी समाओं और स्में निवास करताई ॥ १४ १० ॥सीक परसे यहाँ सम्मानारदमुण्डम तिष्ठामि स्वच्छया सा। नारदपुणपर सा स्टेप्सनुसार वियत्रमान रहता है। कृष्णप्रकाशोभक्तानां भीमद्भागवतार भवन्॥५०॥ भगवान्क मकोका भीमद्भागातक अनसे धारण-तस्वका प्रकाश प्राप्त सकता ॥ ५० ॥ इस कारण यहाँ वदपामपि कायार्थ भामदाग त्वम् । उपसित र इन सभी भक्कननोक कापको सिदिफ नये में श्रीमद्भागरता पाट भगया, किन्तु इस कार्यमें तुम्हें प्रवभ्यामि सहरायाऽध त्ववानुप्ठिता भवन् ।।५१॥ ही सहायता करनी पड़गी ॥ ५१ ॥ सुननी करत है -यह सुनकररावा पवित् उदा । विष्णरावस्त ध्रुत्वा ठदुवं प्रगतोऽत्रवीत् । जीको प्रगाम फरफ उनसे भारत - सूत उपाय ९९२ श्रीमद्भागवत [अ०३ सूत उमाम उपव उवाच परीविद्याप परीसिने कहा-हरिदास उदयदी आप निश्चिन्द्र हरिदास स्पया कार्य श्रीभागवतकीर्तनम् ॥५२॥ | होकर श्रीमद्भागवत-कपाका कीर्तन करें ॥५२॥ इस आशाप्योऽहं यथाकाः सहायोऽत्र मया तथा । कार्यमें मुस बिस प्रकारफी सहायता करनी बाक्सक हो उसके लिये बाबा दें। स्क्षजी करते है-परीधित्का यह वपन सूनका श्रुत्वैताद्धषा वाक्यमुवाच प्रीतमानसः ॥५३॥ उपची मन-हो मन बहुत प्रसन्न हुए और बोले ॥५३॥ उपमीन कहा-रामन् ! मगवान् वीकृष्णने यो इस पृषीतलका परिस्पाग कर दिया है, तबसे यहाँ भीफणेन परित्पके मूतले पलवान् फलिः । अपन्त वक्षयान् कलियुगका प्रमुख हो गया है। जिस समय यह शुभ अनुशाम यहाँ भारम्भ हो जाया, स- करिप्पति परं विघ्न सत्कार्य समपसिते ॥५४॥ अन् कलियुग अवश्य ही इसमें मात का दिन गलेगा ॥ ५५ ।। इसलिये तुम दिम्पिबपके लिये पायो समाव दिग्विजय याहि कलिनिग्रहमाघर । वोर कमियुगको मीतकर अपने मशमें करो । इयर में अहं तुमासमाषण वैष्णवी रीतिमास्थितः ॥५५॥ तुमारी सहायतासे वैष्णवी रीतिका सहारा कार एक महीनेतक यहाँ घामदागपकवाका रसास्वादन कराऊँगा भीमागवतास्वाद प्रचार्य त्वत्सहायत । और इस प्रकार भागम्तफापाके रसका प्रसार करके इन सभी भाताओंको भगवान् मधुसूनके निस्य गोमोकथाम पवान् सम्प्रापपिप्पामि नित्यपाम्नि मधुदिपः॥५६॥ पहुँचाउँगा ॥ ५५-१६॥ साधी कहते है-उस्वनीकी पात सुनकर राज्य परीक्षित् पहले तो फलियुगपर विस्य पानेके विपरसे भुस्वयं सचा राजा मुदितश्चिन्तयाऽऽतुरः । बड़े ही प्रसन हुए; परन्तु पीछे यह सोचकर कि मुझे मागपत फ्याक भवमसे मधित सना ही पड़ेगा, चिन्तासे वदा विज्ञापयामास म्याभिप्रार्य समुद्भवम्॥५७॥ म्याकुल हो उठे । उस समय उन्होंने उदबीसे अपना अभिप्राय इस प्रस्र प्रस्ट किया ॥५७ ॥ परीधिदुपाप राज्य परीक्षितन कदा-तात! वाफ्षी आयक फाठिं तु निग्रहाप्यामिवात त पचसि स्थित । अनुसार तस्पर होफर मैं फलियुगको सो सही अपने थीभागववसम्प्राप्ति फर मम भविष्यति ॥५४॥ वश करूँगा, मार धीमशागमती प्रासि मुप्त कसे आई तु समनुग्रामस्वय पादवले भिवा । होगी ॥५८ ॥ में भी आपके चरणोंकी शरणमें आया मत मुमपर भी प्रापको अनुमर फरना चाहिये । मनी फहस है-उनफ इस वपनको पुनरर थुत्यैतत् पचन भूमाऽप्युदयस्तमुवाच ॥५९॥ उदक्षत्री पुन मे ॥ ५० ॥ उयपसीन कहा-राजन् ! तुम्हें किसी भी राबभिन्ना तुन कापि नय काया फवचन | पाता यि किमी प्रसारमा चिन्ता नहीं करनी चाहिये। नरंप भगरप्ठास्य पता मुरपाधिमारिता ॥६॥ पोजिम भारपा-माम प्रधान अधिकारी तो तुम् सूत उपाय सूत उ ९९३ सूत उपाय अ०३] माहात्म्प एवापत्कालपर्यन्त प्रायो भागववभुतेः । हो ।। ६०॥ ससारके मनुष्य नाना प्रकारके फोम रचे-पचे एए, ये लोग वाजतक प्राय मागपत-प्रवणकी वार्तामपि न मानन्ति मनुप्मा कर्मतत्पराः ॥६१॥ बात भी नहीं बानते ॥६१॥ तुम्हारे ही प्रसादसे स्वत्प्रसादेन पाषो मनुप्या भारताजिर । इस मारतप्पम रहनेवाले अधिकांश मनुष्य श्रीमद्भागवत- कयाकी प्राप्ति होनेपर मरत मुस प्राप्त करेंगे ॥ ३२ ॥ श्रीमहागवतप्राप्तौ सुख प्राप्स्यन्ति शाश्वतम्।।६२।। महर्षि भगवान् श्रीमुक्दवमी साक्षात् नन्दनन्दन श्रीकृष्णके नन्दनन्दनरूपस्तु श्रीशुको भगवानृषिः । सहप हैं, वे ही तुम्हें श्रीमद्भागवतकी का सुनायेंगे, भीमद्भागवतं तुम्यं पातयिष्यस्पसंशयम् ॥६३।। इसमें तनिक भी सन्देही कत नहीं है ॥६३|| राजन् ! उस फयाके श्रवणसे सुम प्रजेवर श्रीकृष्णक निस्यधामका तेन प्राप्स्यमि गर्जस्वं नित्य धाम प्रजेशितुः। प्राप्त करागे । इसके पचात् इस पृप्पीपर श्रीमद्भागवतफसा- भीभागवतसपारस्तमा भपि भविष्यति ॥६४॥ का प्रचार होगा ॥ ६ ॥ अत राख्छ परीसिद ! तस्मात्री गच्छ राजेन्द्र फलिनिग्रहमाचर । तुम जाबो और कलियुगको जीतकर अपने वशमें करो । सुनजी कहते है-उबजीक इस प्रकार पहनेपर राजा परीभित्न उनकी परिक्रमा करक उन्हें प्रणाम किया स्युक्तस्तं परिक्रम्य गता राजा दियां अये ॥६५॥ और रिविजयके लिये पल गये ॥ ६५ ॥ इवर पाने वनस्तु निजरान्येश प्रतिबाई विधाय प। | भी अपने पुत्र प्रतिमाहुको अपनी राजधानी मधुराका राजा बना गया और माताको साथ कर ठमी स्थानपर, सव मामिः सार्फ तम्यो भागवताशया ॥६६॥ जहाँ उपजी प्रकट हुर ध, जाकर श्रीमद्भागवत मुननेकी अध वृन्दावने मास गापर्धनममीपतः। इप्रसे रहने गे॥६६॥तनम्तर उदयनीने गन्दाफ्नर्म गोवर्षनपर्वतक निकट एक महीनेनफ श्रीमद्भागवतफपके भीमद्भागवतावादस्तखवेन प्रतिवः ॥६७॥ रमुफी धारा महायी ॥ ६७ ॥ उस रसमा आखा न तसिमास्वाधमाने तु सचिदानन्दरूपिणी । करते समय प्रमी यातामोंकी दृष्टिम सब आर भगान्की सचिदानम्मपी स्पीय प्रकाशित हो गयी और सत्र प्रकाशे हरेलीला सर्पत कृष्ण एव च ॥६८॥ श्रीकृष्णचन्द्रका साक्षाकार हाने ज्या ॥ ६८ ॥ उस आन्मान वदन्त स्थं सर्वेऽपि दरशुस्तदा । समप सभी श्रोताओंने अपनेया झगमान्ने पमे स्थित पमस्तु दक्षिण राम कृष्णपादमरोगह ॥६९॥ देख । पमनामने श्रीक्षणके गहिने परणमसर्म अपने स्थित देन और श्रीकृष्णक रिहायसे मुळ हायर उस खात्मानं कृष्णपघुपा मुक्तस्तम्मनाभत । सानपर अस्पन्त मुशामित होने लगे । पानामी ये साथ तमातरः कृष्णे रामरात्रिप्रकाशिनि ।।७०॥ पाले मनपा पम्दमाफ विग्रहमें अनेका पम और रोहिणी अमिता भी रासी रजनीम प्रकाशित हाने- चन्द्र कलाप्रभारुपमान्मानं वीप्प विस्मिता । प्रभाक सपमें स्थित दस बात ही मिम्मित तपा अम्ने प्रगप्पारेकी सि-वेदनासे छुटकाग पाकर उनक म्वप्रष्ठविरहम्पापिचिमुक्ताः ग्यपद यपु ॥७॥ परमभाममें प्रविर हा गय॥ ६९-७१ ॥ इनके अतिरिक यम्प प नमत सर्वे नित्पलीतान्तरं गता । भी ग्रे श्रोतागण हो उपम्पित फे, २ भी मामयी निस्य अन्तरग सम्मिलित होकर इस स्पून प्यार प्यापहारिम्लासम्पः सघाऽदर्शनमागताः ॥७२॥ हारिक जगत्से तस्मात अन्तर्धान हो गये ॥ ७२ ॥ तं २ १५१- --- ९९४ भीमद्भागवत [.. गोवर्धननिकोप गोपु वृन्दावनादिषु । वे समी सदा ही गोवर्धन पर्वतके कुछ और आलिम, इन्दापन-काम्पकन वादि !में तय हॉकी दिप्य गीत बीचमें श्रीकृष्णके साथ विचरते हुए मनन्त बानन्दम अनुभव करते राते हैं। वो खेग श्रीकणके प्रेममें मान नित्यं रुप्णेन मोदन्ते रमन्ते प्रेमप्तस्परैः ॥७३॥ है, उन मावुक मक्तोंको उनके दर्शन भी होते हैं ॥७३॥ सूतमी कहते-बोलोग इस मगपातिकी काम- म एतां भगवत्प्राप्तिं शृणुयाचापि कीर्वमेत् । को सुनेंगे धौर करेंगे, में मगवान् मिस मागे पौर तस्स वै भगवस्त्राप्तिःसहानिम जायते ॥७४॥ उनके तु सोका सदा के लिये बन्त हो नायगा ।। ७४ ।। इति श्रीस्काम्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्रपा सहितायां द्वितीये वैष्णक्सरे परीक्षिरसमावे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये तृतीयोऽपाय ॥३॥ तपय उचुः अथ चतुर्थोऽध्याय श्रीमद्भागवता साप प्रमाण माता-पताके रक्षण प्रवणविधि मोर माहात्म्प शौनकादि अपिोने मासूतनी ! वाफ्ने हम मेगोको पात बच्ची बात बतायी । वापफी गायु मे, साधु यस पिरै जीव घिरमेष प्रश्चाधि नः । बाप चिरजीपी 0 धीर चिरकाम्सक हमें इसी प्रकार उपदेश करते हैं। धान हमध्येगोंने मारके मुझसे भीभागवतमाहात्म्पमपूर्व स्वन्मुसाभूतम् ॥१॥ श्रीमद्भागवतका बर्व माहात्म्य ममा ॥१॥ सूतनी ! का इस समय भाप हमें यह बताये कि श्रीमद्भागमा वत्स्वरूप प्रमापं च विषि च भवणे वद । सरूप क्या है। उसका प्रमाण--उसकी सोकसन्या कितनी मिस विधिसे उसमा मग करना चाहिये। तन वरफ्तुर्लक्षमं सूत श्रोतुभापि पदाधुना ॥२॥ श्रीमद्भागवत के पक्का और मोक्ता क्या अक्षण हैं। अभिप्राप या कि उसके वह दौर श्रोमा कैसे होने दिये ॥२॥ सूतजी करते अपिगण ! श्रीमद्भागवत और श्रीमद्भागवतस्साथ भीमद्भगवतः सदा । भगवान्का सहप सदा एक ही है और का सचिदानन्दम्प ॥३॥ भगवान् श्रीकममें जिनकी स्वरूपमझमषाम्ति सन्पिदानन्दलक्षणम् ॥३॥ | मान भी है, उन भावुक भोंके दपमें जो मगवान्के श्रीकृष्णासाभकाना तन्माधुर्यप्रकाशकम् । मधुर्य भावको अमिम्पत करनेवास, उनके दिम्प मापुर्य- समुन्म्मति पदाम्प पिद्धि भागवत हि सत् ॥ ४॥ श्रीमद्भागवत सममा ॥ ४ ॥ नो बस्य ज्ञान, विमान, | रसका मास्सादन करानेग्रय सभोत्तर पचन है, उसे भानविधानभक्तपानतुष्टपपर भक्ति एव इनके जगभूत साफ्नमत्रपको प्रकाशित करनेवायद तपा ना मापका मदन करने में समर्म, मायामदनदध च विदि भागवत प सत् ॥ ५॥ उसे भी तुम श्रीमद्भागवत समझो ॥ ५ ॥ भीमशागत प्रमाणे तस्स का मेद पनन्तस्साधरात्मनः । अनन्त, अक्षरमरूप है। इसका निपत प्रमाण भय, सूत उवाच वन ।

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९९४ भीमद्भागवत [.. गोवर्धननिकालेषु गोषु वृन्दावनाविषु । वे सभी सदा ही गोवर्धन पर्वतके कुज और परिव इन्दाक्न-काम्पक्न वादि फोर्म तथा वहाँकी दिन्म गौर बीचमें श्रीकृष्णके साप विचरते हुए बनन्त धनन्दका अनुभव करते रहते हैं। जो लेग श्रीकणके प्रेममें मन निस्पं कृष्णेन मोदन्ते रमन्ते प्रेमवत्सरैः ॥७३॥ है, उन मावुक मोको उनके दर्शन भी होते है ॥७३॥ सानी कहते है-योग इस भगक्यासिकी कम य एतां भगवस्त्राप्तिं भूमपाश्चापि कीर्तयेत् । को सुनेंगे और करेंगे, ठने भगवान् मिल नायगे पोर तस्प थे भगवत्प्राप्तिई स्वहानिय जायते ॥७४||| इनके दु खोपा सदाके लिये क्त हो जायगा ।। ७५ ॥ सूत उवाच इति श्रीस्काम्दे महापुराण एकाशीतिसाहसपा सहितायां वितीये देणवसाने पीक्षिसंपदे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये तृतीयोऽध्याय ॥३॥ अनुपम उपुर अथ चतुर्थोऽध्याय भीमद्भागवतन साप प्रमाण भोता-पकाके छमण भवपविधि मौर माहारम्प शौनकादि ऋषिोंने कहा-पानी 1 बापने हर मेगों को बहुत अच्छी बात बतायी । काकी असु बने साधु त चिरं जीव घिरमवं प्रशाधि नः। माप पिरजीवी हों और चिरकालतम हमें इसी प्रकार उपदेश करते रहें । भान हमलोगोंने वापो मुखसे भीभागवतमाहात्म्पमपूर्ष स्पन्मुलामतम् ॥१॥ श्रीमद्भागवतका पूर्व माहात्म्य सुना है॥१॥ सूती ! था इस समय आप हमें यह पताइये कि श्रीमद्भागवाया तत्स्वरूप प्रमाणं च विधि च भवणे पद । सबप क्या है। उसका प्रमाण--उसकी मोकसम्या स्तिनी किस विधिसे उसफामनग करना चाहिये। तब तदफ्तर्लक्षण सून भोतुभापि पदाधुना ॥ २ ॥ श्रीमद्भागयतके वसा और प्रोष्य के क्या अक्षम है। अभिप्राप यह कि उसके बहा और प्रोन कैसे होने चाहिये ॥२॥ सवजी कहते है-अमिण ! श्रीमद्भागवत और श्रीमद्भागवतस्साथ भीमनगवतः सदा । मावान्फा सहप सदा एफ ही है और बह । सचिदानन्दम्य ॥३॥ मगमान् श्रीक-जिनको स्वरूपमझमयाम्ति सच्चिदानन्दलक्षणम् ।। ३ ॥ गन मी , उन भानुक भोंके हश्यमें जो भावान्के भीकपणासत्तभक्ताना सन्माधुर्यप्रकाष्ठकम् । मधुप भारत अभिन्यक करनेवाप्य, उनके दिम्य माधु- समुन्वृम्भति यदाक्प पिद्धि भागवतं हि तत् ॥ ४॥ भीमनगम समन्मा ॥ १ ॥ जा पाप मन, विमान, रसमा मास्नादन करानेयाग सनिय बन , उसे मानविज्ञानभक्तपणामतुष्टपपर बर । मक्ति ए. इनके आभूत साधनचतुरपो प्रमाशित मापामदनधन विदि भागपर्व प वत् ॥ ५॥ उसे भी तुम श्रीमद्भागवत समना ॥ ५ ॥ श्रीमान फरनेवाय ई ताजा मापामा मदन परनमें समाई, प्रमाणे उम्प य पद पनन्तस्पायरात्मनः । अनन्त, रस्सम्पाइसरा नियत प्रमाण भन्या, सूत उपाप

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९९६ श्रीमद्भागवत [ब०१ भोतास्निग्धाभवे मीनो मीनाक्षीरनिधी यथा।।१५।। निर्निमेय नयनोंसे घेता दुबा मुंइसे कभी एक शहर भी नहीं निकालता धीर निरन्तर कसारसका ही आसान यस्तुवन् रसिकायोतून् विरौत्मनो को हिसः। करता रहता है, वह प्रेमी श्रोता 'मीन' कहा गया मुख्नरसासवान् कोऽरम्पे मृगान् यथा ॥१६॥ १ ॥१५॥ ( ये प्रयर अर्थात् उसम प्रोताओंक मेद बताये गये हैं, अब अवर यानी अधम श्रोता बताये माते मूडः शिषपदन्याम्मुक्त्वा न स्वपमाघरन् । हैं।) पक' कहते हैं मंदियको। जैसे मेडिया बन यथा दिमवतः गले भूरुण्याल्पो विहङ्गमः ॥१७॥रानेवाली पामक गवना करता है, मैसे ही बो मूस मीतर येणुकी मीरी भामाब सुननेमें लगे र मृगको सर्व भुसमुपादत सारासाराषधीपः । पपाश्चमके समय रसिक स्रोताओंको उरिम्न का मा बीच-बीचमें जोर-बोरसे बोस उठसा देशका कात्म्य स्वादुद्राधा स्खलिं चापि निर्विशेष यथा पः ॥१८॥ ॥१६॥ हिम्पलपके शिवरपर एक भूल जातिका पक्षी स उष्ट्रा मधुरं मचन् विपरीते रमेत यः। होता है। यह किसीके शिश्नपद वाक्य सुनकर पैसा ही बोना करता है, किन्तु खय उससे न्यम नहीं उठाता । पमा निम्म चरत्युदाहित्वानमपि सद्युतम् ॥१९॥ इसी प्रकार जो उपदेशकी बात सुनकर उसे दूसरोंको तो सिवये पर स्वय आरणमें न छाये, ऐसे प्रोताको अन्येऽपि पाषो मेदा प्रयोस्वरादयः । 'भूहमा कहते हैं ॥ १७ ॥ तृप' फइते हैं लो। पिशेपास्तपदाचारस्तचरप्रकसिसम्भषैः ॥२०॥ उसके सामने मीठे मीठे अगर हो या कामी सी, दोनोंको वह एक-सा ही मानकर स्ाता है। उसी प्रकार जो मास्सित्वाभिमस्त प्रणम्प विधिष सनी नई सभी बातें प्राण करता है, पर सार और पसार वस्तुका विचार करनेमें उसकी मुदि ची---असमर्थ अपक्कापवादो हरे होती है, ऐसा श्रोता थप कहलाता है॥ १८ ॥ बिस प्रकार उँट माधुर्यगुणसे युक्त श्रमको भी गेवार के नीमकी दी पत्ती चबाना , उसी प्रकार जो भगवान्की लीला: भातुमभीप्सतेऽतिनिपुणो मधुर कयाको मेसकर उसके मरीत संसारी मामि रमता रहता है, उसे ॐ करते ॥१९॥ ये कुछ पोये- से मेर यहाँ नाये गये । इनके अतिरिक मी प्रपर-बार नमोऽध क्तमालिः। | दोनों प्रकारके भोता!के भ्रमर और गदहा' आदि पात | से मद में इन सब मेदोको उन-उन श्रोताओं के साम्प्रतिक सिप्पो विधसिवोऽनुपिन्दनपर! भाचार-व्यहारोंसे परम्ना चाहिये ॥२०॥यो पके स्त्रमने उने विविवत् प्रणाम करके बैठे और क्प संसारी प्रस्नेऽनुरका बोको छोरकर केवल भीमालान्की मेम-कानोंको शुधि- ही मुनने की इच्छा रस्से सम्मानेमें अत्पन्त कुशल हो, नम्र हो, हाप बोड़ रहे, शिष्यावसे उपदेश प्राण करे और निस्म रुष्णजनप्रिया निगदिता भीतर भदा तपा विघास रसले, इसके सिता, मो कुछ मने उसका राम पिन्सन करता रहे, मो बात सम्मानेमें न वाये ऐ और पवित्र माक्से रहे तथा श्रीकृष्णके मोखा पञ्चभिः ॥२१॥ मत्पर सदा ही प्रेम रखा हो—ऐसे ही भोताको बच्चा स १०४] माहात्म्य ९९७ - भगवन्मतिरनपेक्षा सुइदो दीनेषु सानुकम्पो यः। लोग उत्तम श्रोता कहते हैं ॥२१॥ भय बकाके क्षण क्तमते हैं। निसका मन सदा भगवान्में गा रहे, मिसे किसी भी वस्तुकी अपेक्षा न हो, जो सक्का सुब्द और दीनोंपर दया करनेवास्म हो तपा बनेको युजियोंसे पहुधागोपनचतुरो वक्ता संमानितो मुनिभिः ।।२२।। तत्वका योष करा देनमें चतुर हो, उसी पकाका मुनिलेग मी सम्मान करते हैं ॥२२॥ अथ भारतमस्थाने श्रीभागवतसेवने । विप्रगण ! अब मैं मारतपर्पकी भूमिपर श्रीमद्भागवत कपाका सेक्न करने के लिये जो भावश्यक विधि है, उसे विधि प्रमुत भो विप्रा येन स्पाद सुखसंतति ॥२३॥ वतष्मता हूँ, आप मुनें । इस विधिके पाउनसे श्रोताकी राजस सात्विक चापि तामसं निर्गुणं तथा । मुख परम्पराका विस्तार होता है ॥ २३ ॥ श्रीमद्भागवतका सेक्न चार प्रकारका-सास्त्रिक, राजस, तामस और चतुर्विघं तु विझे भीभागषससेवनम् ॥२४॥ ' निर्गुण ॥२४॥ निसर्म याकी ति तैयारी पी गयी हो, पतुत-सी-पूना-सामग्रियों के कारण जो मस्यन्त शांभासम्पन्न सप्ताई यदवद् पत्तु सभम सत्यरं सदा । दिसपी रहा हो और वह ही परिश्रमसे बहुत ताकीके साप सेविसं राजस तधु पहुप्यादिशोभनम् ॥२५॥ सात दिनोंमें ही जिसकी समाप्ति की बाय, वह प्रसमतापूर्वक किया सुधा श्रीमद्भागवत्का सेक्न 'रानस' ॥२५॥ मासेन ऋतुना पापि भवणं स्वादसंयुतम् । एक या दो महीनमें धीरे-धीरे कराके रसका आस्वादन साखिर्फ पदनापास समन्तानन्दवर्धनम् ।।२६॥ ' करते हुए मिना परिश्रमके जो प्रत्रण होता है, यह पूर्ण भानन्दको बढ़ानेवाला 'सात्विक सेवन कहल्यताहे॥२६॥ तामसं यत्तु पर्पण सालसं अदया युतम् । वामस सेवन बह है जो कभी भूनसे छोय रिया बाय और पाद भानपर फिर बारम्भ कर दिया जाय, इस विस्मृतिस्मविसंयुक्त सेवनं तच सौम्पदम् ॥२७॥ प्रकार एक मपतक पाठश्य और वाके सप घलाया माय । यह तामस सेगन भी न करनेकी अपेक्षा अप्न वर्षमासदिनानां तु विमुप नियमाग्रहम् । और सुष्ट ही देनेवाला है ॥ २७ ॥ जब वप, महीना और दि के नियमका आग्रह ोगकर सदा ही प्रम और भकिके साप भ्रषण किया नाय, तप यह सेवन निर्गुग' सर्वदा प्रेमभक्त्यैव सेवनं निर्गुणं मतम् ॥२८॥ माना गया है ॥२८ ॥ रामा पीक्षित् और शुकदेवके सम्पादमें दो मागपतफा सेवन हुभा पा, यह निर्गुण ही पारीधितेऽपि संचादे निर्गुणं तत् प्रकीर्तितम् । बताया गया है। उसमें जो सात रनोंफी मात वाती है, यह रामाफी मायुक बचे हुए Pिोफी संख्या अनुसार स्त्र सप्तदिनारम्यान तदायदिनसंस्म्यया ॥२९॥ है, सप्ताह-पत्यका निपम करनेक लिये नहीं ॥२९॥ भारतीक अतिरिफ अन्य स्थानों में भी त्रिगुण अन्यत्र त्रिगुण चापि निर्गुणं च यथेच्छया । (सात्विक, राजस और प्रमस ) अपना निर्गुण सेपन अपनी चिके अनुसार करना चाहिये । तात्पर्य यह कि यथा फयचित् कतन्यं सेवनं भगवन्तः ॥३०॥ जिस किसी प्रकार भी हो सके श्रीपनागक्तका सेक्न,उसका ९९८ भीमद्भागवत - । - ये भीकम विहारैफभजनास्वादलोलुपाः । प्रवण करना ही चाहिये ॥३०॥ जो केस श्रीमती जीव्यवोंके ही अपग, कीर्तन एवं रसासादनके कि मुक्तावपि निराकाहास्तेपो भागवतं धनम् ॥३१॥ साम्ययित रहते मोर मोसकी मी इथ नहीं रहे, उनका येऽपि संसारसंतापनिर्विष्णा मोधकाङ्गिणः । हो श्रीमद्भागवत ही धन है॥३१॥ क्या जो सबसे दुःखोंसे पसराकर अपनी मुक्ति चाहते हैं, उनके किने तेषां भषोपर्ष चैतत् कलो सेष्यं प्रपनतः ॥३२॥ | मी यी इस मक्रोगकी वोपभि । अत इस फरिमाने इसका प्रयापक सेवन करना चाहिये ॥ ३२ ॥ इसके ये चापि विषयारामाः सांसारिकसुखसताः । अतिरिक गो अंग विपमि ही रमण करनेवाले है नेपा तु फर्ममार्गेण या सिद्धिः साधुना कलौ ॥३३॥ सांसारिफ मुस्खोंकी ही पिने सदा घाइ याती है, उनके सामधनविज्ञानाभावादत्पन्तदुर्लभा लिये मी भव इस कलियुगमें समl, धन और विधि- विधामका ज्ञान न होने के कारण कर्ममर्ग (पादि) से तमासैरपि संसेम्पा भीमद्भागवती कथा ॥३४॥ मिरम्नेवाली सिदि अस्पन्न दुर्बम हो गयी है। ऐसी दशग्ने उन्हें भी स्त्र प्रकारसे का इस मगायतकपका ही सेक्न धनं पुत्रांस्तथा दारान् गानादि योगृहान् । करना चाहिये ॥३३३१॥ भीमागक्तकी का धन, पुत्र, बी, हावी-मोड़े भदि पाहन, यश, मकान असापत्न्यं च रान्यं च दयाव भागवती फया॥३५॥ और निफाटक राप मी दे सकती है ॥३५॥ सम्म मावसे मागवतका सहारा लेनेवले मनुष्य इस संसारमें इह लोके वरान् सक्त्वा भोगान्वै मन्सेप्सितान् । मनोति म गोंको भोगकर अन्तमें श्रीमशागत के श्रीभागववसान यात्पन्ते भीहरेः पदम् ॥३६॥ ही सासे श्रीहरिके परमधामको प्राप्त हो जाते है॥३६॥ जिनके यहाँ श्रीमद्भागवतकी का पात्र होती से पत्र भागषती वार्ता ये च तपमणे रवाः । तथा नो मेग उस करके मणमें मोसते हैं, उनकी | सेना और सहायता अपने शरीर और उनसे कस्मी पां संसेवन हवि देहेन च धनेन च ॥३७॥ चाहिये ॥ ३० ॥ उनकि अनुप्रासे सहायता करनेवाले पुरुषको मी मागक्तसेनका पुण्य प्राप्त होता है। सामना तदनुग्रहवोऽसापि श्रीभागवससेवनम् । दो वस्तुओं की होती है-श्रीहनकी और पनकी । भीकृष्णम्पतिरिक्त यत्चत् सर्ष धनसंक्षितम् ॥३८॥ Fol , सीन है ॥ ३८॥ भेटा बोर श्रीकृष्णके सिवा मो कुछ भी चाह बम्प, याम बनके रुष्णार्थीति पनार्थीति भोता वका विधा मनः । पळा मी दो प्रकारके मने गये है, एफ भीशनको काने वामे और दूसरे पनको । न पळा, न ही भेता यथा पक्ता तथा श्रोता तत्र सौस्पं विवर्धते ॥३९॥ ९॥ पर दोनों विपरीत मिकरके हो तो मी हो तो दो कप में रस मिलता है, न ममी उभमा परीस्मे तु रसाभासे फलप्पुतिः । रसामास हो जाता है,क्त फहमी हानि होती है। कितु गो भीमको पानेवाले वका और मोत फिना रुपाधिना सिद्धिर्षिसम्बनापि यायते॥४०॥ | उन्हें निम्न होनेपर भी सिधि मनस्य मिती है ||४०॥ रमाको तो तमी सिदि मिलती है, मग झाके पनाधिनस्त संसितिनिधिसम्पूर्णसापश्चात् । बनुनका विधि-विधाम पूरा उत्तर माप । भीकम्पकी भ० ४] माहात्म्य ९९९ कप्पार्टिनोऽगुणस्यापि प्रेमेष विधिरुचमः ॥४१|| चाह रखनेपाला सवमा गुणहीन हो और उसकी विधिमें कुछ कमी र नाय तो मी, यदि उसके दायमें प्रेम है भासमाप्ति सकामेन फर्तन्यो हिविधिःस्वपम् । तो, वही उसके रिये सर्वोत्तम विधि है ॥ ११॥ सकाम पुरुषको फपाफी समासिके Pनतक सर्य सम्पानीके साथ नातोनित्यक्रिया कलाप्राश्म पादोदफहरे ॥४२॥ सम्ी विधियों का पालन करना चाहिये । ( मागस्तफापाके श्रोता और पका दोनों ही पालन करने योम्प विवि यह पुस्तकं च गुरु चैव पूजयित्वोपचारसः । है-प्रतिदिन प्रात फारस मान करके अपना नित्यकर्म पादपा भूमपाव पापि भीमद्भागवत सदा ॥४३॥ रा कर ले । फिर भगवान्फा चरणामृत पीकर पूजाके | साम्पमसे श्रीमद्भागवतकी पुस्तफ और गुरुदेव (म्पस) पयसा ना इविप्येग मौन भोजनमाचरेत् । का पूजन करे। इसके पश्चात् कस्यन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रमपर्यमपासुप्ति झोपलोभादिवर्जनम् ॥४४॥ प्रेमद्भागवतकी कया सप को अपम सुने ॥ १२ १३ ॥ दूध या सीरफा मौन भोजन करे। निरय समचर्यका पालन मचान्से कीर्तनं नित्यं समाप्सो बागरं चरेत् । और भूमिगर म्यन करे, क्रोध और प्रेम आदिको स्याग दे॥११॥ प्रतिदिन कमाके अन्समें कीर्तन करे और प्रामणान् भोवपित्वा तु दक्षिणाभिः प्रतापयेत्॥४५॥ यामप्तिके दिन रात्रिमें नागरण करे। समाप्ति होनेपर गुरपे पलभूषादि दवा गां च समर्पयेत् । प्रामणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणसे सन्तुष्ट करे ॥ १५ ॥ कपवाचक गुरुको पस, बाभूपण आदि एवं फसे विधाने तु लभते पाछित फलम् ॥४६॥ देकर गौ भी अर्पण करे । इस प्रकार विधि-विधान पूर्ण फरनेपर मनुष्यको बी, घर, पुत्र, राज्य बीर धन आदि दारामारसुवान राज्ये धनादिप यदीप्सितम् । जो-जो उसे अभीए होता है, पर सब मनोमाञ्छित फळ परं तु शोभते नात्र सकामत्वं विटम्पनम् ॥४७॥ प्राप्त होता है । परम्म सकामभ्यव बहुत सी विडम्बना है, पह श्रीमद्भागवतकी कपामें शोभा नहीं देता ।। १६ १७॥ कृष्णप्राप्तिकर अश्वत् प्रमानन्दफलप्रदम् । श्रीशुकदेवजीफे मुतसे पहा शुभा यह श्रीमद्भागवतशास तो कछियुगमें साक्षात् श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाम मोर भीमहागव शास्त्र कालो झीरेण भापितम् ॥३८॥ निष्प प्रमानम्दरूप फल प्रदान करनेवाला है।॥ १८ ॥ इति श्रीरकाम्दे महापुराण एकाशीनिसाहमा संहितापो दितीये देणारे श्रीमागतमाहात्म्ये भागवतधोतवस्तुमक्षणभक्तपिरिनिरुपण नाम बताऽप्पाप ॥ १ ॥ ॥ समाप्तमिद भीमागवतमाहात्म्मम् ।। विस्सत् ।

४ Y ४ १ श्रीमद्भागवत-पाठके विभिन्न प्रयोग' भागवत-महिमा दिन विभामस- अमाप पोप मनस स्कोका कपाई वा निम भाग पर्छन् । । का पुमान् सोऽपि पसाराम्मुमते किमुतातिमत् । ४८ भाषा मोरया चौपाई प्रेम मी निस्य ये ममुम्म १ १२ पाठ र उसकी भी मसारस मुक्ति हो जाती है। फिर ८२ सम्पूर्ण पाट करनेपाळेकी दो बात मा है। पपा पुरिमा पुरिषर मागक्तमावरात् । (२) सप्ताहपारापण (सत रिनका) निस्म पठेर पारि बता सात् संपतितपा। निश्चमणमम मममस्त्रीय बुद्धिमानी रिमचा नही। संसारमननायक विन विभमसम् सम्प अम्पाय योग मम्मान भीमनागवला आदरपूर्वक पपायति पाठ करे । १ ३ २ ममो नित्यपउने मासे पपि मैकमा । २ पासमा मिचमान् भाला श्रीमनागवः पठेत् । ३ यदि नित्य पाठ न र समय से वो ममीने मा बम YC एक बार नियमपूर्वक भफितरत भागातच पाठ भवस्म ५ करना चाहिये। ४८ एभरे व पन्त पोगाव पोन पा। पाभिरिंसी परमिा समभिषों पम्त् पुमान् । (३) सप्ताह पायपण (जस दिन) पसाईनाय पण ममतेम बतुपापि वा। मोनाशि निक दिन पम् भागवं पस्त मुक्षि मुर्ति सचिमते । चिमामलम् समन्म भभाव योग मप्र को एक दिनमै पाठ न प्रसस्ता हो या दोन १ १८ ८ स्थत इस पह, तीस या मठ दिनमें भीममायका पाठ करे । इससे मोग एवं मोस दोनोंत्री प्राप्ति होती है। २ एपोम्पापुमा पा सहमहो गुसम्मत।। १ प्रीयाहरवीरवर्ष सो पमा मन्ति गुम्पा विमेपो सिमान। १२ बिसेपोलि समाना ममासमेता। (४) मरम्म प बने विमान बहुत-से शपियोंने सप्ताहपारायण मी उत्तम पस माना पाठमा प्रामण ९ पापपण संख्या १५. है। भागनकी प्रीति के लिये सम्पूर्व पच बराबर है। निव निबम-प्रतिदिन पार्य सम्पर उनी मभाव धे न्यूनारिक नही। पानेवायो रिये मम्मे ( (युरिय) पाठ पाठये मरम्म पर समसिमें पारायणब मा गया है। पाना परिये। (१) निप्पाम पाराबम ममरतीय विधामल - भम्पाव बोय मम्म पाठोप्रापण या ५पारायण-संख्या १..या १०८ २ विशेष नियम पनाममहारयादविणमांकन रे। २ दिन विभामसम्म मम्माय योग मण्याप ३ १ ३ १४. ४९+ - . १ ९ ७ दिन ४८ १ ४ २ ५ १ अपातामै प्रमदित प्रमाणाममुकाम मिति परिसर । में मम्मति और पाकिस्मत्या पूर्ण मात्रिभो।

भीमागवत-पाठके विभिन्न प्रयोग १००१ विभामसम-रूप भवास येग मम्माम विभामस्प-सम्म दिन १ दिन ४ मन्याय २४. योग अमाप ४८ १ १२ (५) सप्ताहपाययण ( सात दिन) मिमा लिने विमामलम्साम्प भम्पाव दिन योग मात्र Y २ ५ १२ (१) शत्रुपयम्साहित पामा प्रामण, पाययप-संख्या १९४ विशेष नियम-प्रतिदिम पाठके प्रारम्म एम समासि मरम सबके मध यापुम्स' (म १० रमे ८) बादि मोका पाठ करे! दिन विभामा सम्प मम्माम १ १ ९ ४९ ४१ योग मम्माय ४८ १ १२ R ३ ७ १ ८४ (१) सप्तापायपण (सात दिन) बमप्रावि ने दिन विभामस-ससम्म भाम योग मध्याव २ १ ६ २ ५२ १ ५ . १२ ( ) रोगमुक्ति दिने पाठक प्रामण, पापपण-संम्पा १५७ विशेष नियम-प्रतिदिन प्रस्के मायके भारम्भमें पबम सपके नारसिंग-मन्त्र (भ १८ मे ८) पाठ करे। दिन विभामसम्रपन्य ममाय बाग भम्पाम । २ ५ . ५ ७ ૨૨ (७) सप्तापापपणके प्रयोग (खव दिनके) काबरामिति और सम्मानिने पाठका मामण पाराय-संध्या १९॥ विशेष नियम-प्रतिदिन पाठो भारम्म एष समासिम । सम्पी रेषतानि (म मे ११-१)का पाठ रमा चाहिये । पाठविधि- रन विभामह-सम्प अम्पाय योग अध्याय २९ २ २ २ ६ ८ ४ २४. ९ २ १ १५ १ ५ १२ (1) पुत्र और मोनधि दिने पाठकलो प्रामण ५. पारायण-सम्पा १५५ निरोप नियम-प्रतिदिन प्रत्येक मप्पाप मारम्म पर भन्दमें पचम सन्प प्रममय (म १८ मे १८) पपठो दिन विभामम-सम्प मम्माय । ૨ ४३ ३ ८ १ २ " .२ योग भम्पाव (८) से मुसा दिने पाठकता ययाप्रम ७, पारायण-संस्पा १५॥ विशेष नियम-प्रतिदिन पाठ भारम्म एवं मन्तम (एम स्१ ।२९ १९०५।१५ २०१९ १ । ११ मार । २५-रन भोधेन पाठ करना ग्राहिये। दिन विमामसम्-सम्म भष्पाप ६१ ૨ ३ योम भम्पाय २८ (१२) निचरक समरिने पाठभता प्रमाण १. पापयण-सस्पा १९८ विशेष नियम-प्रविपिन पाठ भारम्भ एवं सम्पतिमें व भीमद्भागवत चतुर्व सन्मात्री भुवस्तुति (म १) पाठ करे। दिन विभामसम्सन्म अपाय पोग मपान १ ૨ ३ ५२ ४ ८ सब प्रभारी प्रमाणे सिरक निवे दिन विभामास-सन्म अप्पाय योगभग १८ ८ २ ८ ८ ३ ४ १२ ८२ (२१) पतुरापाययप (घर दिन) पापनाशक सिख दिन विभामसक-सन्ध भम्पार योग मम्मान २५ ८८ २ ८२ ८१ १२ (२२) पाइपापण (पर विनय) समर्मी प्रति दिने दिन विभामक्ष सब अभाव मोग ममार १ २ ८ ८५ १ ८५ (२३) पशाहपापक्य ( पाँच दिन) दिन विभामसम्म ममाम योग मनाव योग मप्पास (१३) एकाहपापपण (एक दिन) हरिप्रेमप्राधि दिन विभामसम्-कन्य अमान्य १ १२ (१४) पहपारायण (दो दिन) परामक-प्रति किले दिन विमामस्सम् सम्म मपाप १ २ १२ (१५) व्यापारायण (रो दिन) गोम-सिपिक लिने दिन विमामलम्-सन्म मणाम ४ योग अध्याय ४ ४ योग भणाय . १८२ Y ९ बोगभष्मास २ प ४ ५ १७ . २ (१५)पाहणाययप (ऐ दिमत्र) विधमिवृत्ति के किने दिन बिमामसम्-स्पण ८ ૨ १२ (१७) पहपाएपण (वीन बिना) मोगप्रतिनि दिन विभामस्सम-सम्म १ ८ २ १ १२ १२ (१८) पहपाययण (न दिन) पपर्य-प्राप्ति संसर-कमा मुक्ति दिने दिन निभामास-सम्म भम्पाय (२४) पादपाययप (पॉप दिनच) सन मना-प्रतिदिन पाठक प्राधण ९, पारापप-सम्मा २५२ दिन विभामसम् सम्म योग भार योग भष्मान अम्माम ४ १ . २ १२२ २४. ४ १ योग मन्याय (२५) परापारापण ( दिन) मन प्राधिक रिते विभामाम्-साम्प माम गोगमपार . ३ ९ ૨ ७ ५२ १ १५८ १२ (१९) पतुरापापपण (चार दिनप्र) स्वर-निवारको दिने दिमामममममम भप्पाम पोपमम्पाय ८ ५८ . १४ न ४ ४ २ १ १ १२ (२१) परहपारापण (निम्र) बममम त्यानाश मन्दिर ८५ (.) पारपापपण (पर दिन) भीमद्भागवत-पाठके विमिम प्रयोग पाठका प्रामण पायपण-संम्मा १४४ विमामल-रूप पोगमपाय १ २ ५ १४ ८ २४. दिन विभामस-सन्म मध्याय मोगअन्याय ५ . ९ ४३ १२ (३१) नवापारायण ( नी रिना) सुयसप्रति दिन विभामसक-समय मम्पाय पोग भम्पाय २ ૨ २ २५ १ ५ ૨ १ ७ २९ १ (२७) मगदपापपण (माठ दिनम) रखिता नारनीति विभामसम-सम्म मम्मान मोगमध्याव ३ १५ . ९ ८ २ ४ १ २ ६ ७ ४८ ७ १ ८ २१ ૨૫ ४ १८ १ १ २८ ९ (३२) मषाहपापपण ( नोमन) माप्राधिक किन विभामसम्-रूप ममाम पोय अध्यान 4 १८ ५ ११ (२८) मापापयण (माठ दिनन) रोगस गुटकारा पा लिये दिन सिमामस-सन्य मम्मान २. २ ५ पोगमष्मान १ २ . ७ ५. २ २ १ ८५ २१ १ ११ ९ १२ (६) पचावपापपण ( दस दिन) नप्रमिक दिन दिन विभामसम्म मम्पान योग भभाव ८ १८ (२९) मणहपापयण (माठ दिन) ममनितिक हित दिन विभामसह समय मम्माय बांगमम्मम १ २ ११ १ ४१ २८ ७ ૨ ३ Y ४ ९ १ ४ ५ . ८ ८ ४ ५ ४२ १ १ ८ ८ ७९ २१ ९ १ (.) मग्राहपापपण (भाठ दिन) मध्यममा पनि दिन विभामस-सम्प भपाय १ ३ ८ २ ३ योगमध्यान (३४) शाहपापयप विभामसम-सम्प माप दिन मग मम्पाय २३ ४ २ श ८ ५ १००४ श्रीमद्भागवत दिन मिमामलम्-सन्म मन्माप योग अध्याय अमान योग ममार विमामलम् रूप १ दिन ८ १ १ - ८ १ ५ १ 1 ७ योग भपाय १ ७१ १४ १२ १२ १ २५ १२ २१ (३८) चतुर्दशाहपारापण (पौर विनय) (३५)पशाहपारपण (ग्यारह दिन) सय प्रपरकी भरिसे छुटपरा को दिन ममोसमनाकी सिविकसित दिन विभामसम्-सम्म भमाम प प्रमात दिन वित्रामलम्-सन्ध मम्पाय मोम भन्याय १ २ १८ १८ २ २ २२ २५ ४ ४ २१ ५ ५ ५ . २ ८ ७ ९ १४ ८ १८ २४ ८ ९ ૨૨ ४८ १७ २५ ९ १ ८१ १ . २५ १ २२ १ २६ ५० १२ १२ २ (११) मावशाहपारायण (बर रिमन) २५ शान्तिले २१ १२ दिन विभामसम-स्त्र भम्पाय (३१) पक्षपारायण (पंना रिना) २ २ २२ १ २२ पथ) माल भौर ऋतपणन प्रविम् विक्सेि प्रारम्म २९ लिप था-सनियम नही। रवि-समास २७ नियम है। ५ दिन रिभामसम-सम्म योगभार २ ૧૧ २ १ २५ १८ २२ २५ २५ १ ४८ २५ ५ २१ ८ २५ ८ २ ८ २२ १२ २५ २५ (३७) प्रयोपशाहपाययम ( वेग रिनप्र) अमसे पुरमा पनि १ १ दिन १ ४८ २४ भम्म योग भम्पाय १ २ १८ २ १२ १ २ २८ ३ ४ ११ ૧૨ ५ ५ ५ १२ ८ ८ (५.) पभशापारापण ( परमप) सर प्रमरप्रमन सिदि ४ Y २१ २६ - भीमद्भागवत-पाठके विमिम प्रयोग १००५ दिन विभामसम-सन्म दिन १ १ . योगभमाय २५ ૨ १ १ Y १८ ८६ २८ १८ १ ४ विभामरस:-सन्म मम्पाप मोगमभ्यास २ २ २ २५ २२ २७ २३ ૨૧ २३ ८ ५ ९ २५ १ २२ १ २२ ४९+ २३ १ २ २२ २५ २३ १५ (५१) पोशापारायण (सोमा दिनम) पायी प्रान्तिक कि रिन विभाममा सम्प मम्माम १ १८ २ ३ १२ २ १२ (४३) मावशाहपायपण ( ममय दिनम) मायनकी प्रति दिने दिन मिमामस्थम् सम्म भमाम पोगमम्माम - - ८ २ १ ३ ४ ૨૬ ८ २५ २ ५ ४ ५ ७ पोग भष्मास १ ८ ७ १ २ १ ८ १ - २२ ४ ४ و و و و و . २३ २४ ५ १२ १८ Y २५ २२ ७ ८ १८ १ १ १ ८ ८ ७३ ९ २ २० १ १२ १८ १८ (४) उशिस्पहपापयन ( उबीस दिनका) निसप्रधिक किन दिन विभामसम्-स्मान मम्पाय मोग भष्याप २९ १ १ - २२ १ २ . ३ ४ २ (५२) सपशाहपारापम (सा दिनर) भमन्दवृदिरे दिन दिन सिमामस्म-सम्प ममाप १ २ २३ २ ३ ग्रेग भम्पाय Y ४ ५ २६. २ ८ २२ . ४ १ २५ १२ ८ ९ १ १ १ ८ ८ १ २५ ५ १.०६ भीमनाममत विभामम-सन्य माम मोगमम्पाय दिन १५ विभामसम-स्त्र भन्माय योम मत १ १८ हिन १७ १८ १ २ २७ -- २१ २५ . १८ २८ २ - १२ (५५) विवाहपारायण (बीस रिना) १२ (४७) मार्षिरस्यापापपण (बाईस दिन) झानसिकसि दिन विभामस-ज्य योम भन्सार विभामम-ससन्न भभाप योग भम्मान १ ३ २ ३ २ २ २ १ ३२ १८ ४ २५ १८ ८ १ २१ ५ ५ । १२ २. ८ ९ ९ १ R . १ ८ २९ १२ ८ १ २२ १८ १ १ २ . २१ १ १ २५ २५ ८८ १८ १२ २ २० १ ५४ २१ १८ १ ८ ८ २ २ १७ १ २१ १२ २ २२ १२ ११ (५८) अयोषियत्यापाययण (वेईस दिन) योग भाव (४५) एपिधपापारापन (इस दिनप्र) सब प्रकारक ग्योपशान्तिरिक दिन विमाममा-सन्म मम्म १ १२ २ । १ ३ ३ २८ योग भम्म मम्पाय १ - दिन १ २ ३ भिभामा-रूप १ २ । ३ ५ ८ ४ २१ २ ४ १ ९ १८ . ४ १८ ५ - ८ ८ ९ ४ ८ १ १८ १२ ५ ८ ~ --- २ भीमसागवत-पाठके विभिन्न प्रयोग विमसम्-स्मना भन्मय योग माय दिन भिभामसम्म भभ्यास योग मध्याय १० ९ ९ ७ १ २ a १ ६ २ २ २२ १ . ८ २३ ८ ए ८१ ८९ १ १ ८ १८ ९ १ ७ १ १२ १८ २३ १२ २ (१) बर्षिशस्पहपापयण (पौबीस दिन) स्म्रप्रम्पकी प्रासिक से दिन विभागल-सम्म ममाय योग मनाप १ १ १ १५ ૨ १२ ८ १ १ २ २२ १८ १ ३ ४ २ १ २४ ४ . २५ १२ (५१) पर्विचस्पापारायण (म्मीस दिन) ४ १८ योपमम्मान ८ १ ८ विमाममा समय १ २ २ २ २१ ८ 22:4 ८ - २५ १ २ ८ २२ ८ ३ ७ १२ १ १ ५ - १८ २ १ 4 १ १ १२ Y १॥ ८ ८ २२ २ ८ २१ ८ २२ २ १२ ४ १५ १२ (५०) पचविशस्पहपापपम (पचीस दिन) र प्रमारसम्भश्री शान्ति रिख विभामसम्म मम्पाय ८ ८ १ ३ Y ४ ५ . १८ २५ १२ १ १८ यौपमम्माय १ ४८८ २ ११ २२ २१ १ ८४ :01 १२ २ ४ २५ २५ १.०८ श्रीमद्भागवत योग भाग विभामरसम्रूप ९ ९ भभाम ४ (५२) सप्तविंशस्यहपायपण ( सचाईस दिनप्र) सबमें कीम्बकी अधिक दिने दिन विभाममा रुप अभाय मोग मम्माम १ १८ ૨ २ १ २ १४ ३ २ १५ १ ११ १ १८ Y ७ २ २१ २२ २ - ४ १२ १ २८ १२ २३ ८ २५ २१ ९ ८ . ८ ८ ८ . ५ २२ ८ २४. १ १ २८ (५४) समशिवपापपण ( उन्तोव दिनस) विभप्राधिकरते दिन नियमसम-सस मम्पाप योगमा १ . ५ १ २ १३ २ १२ २५ ३ ३ Y ८ २२ १८ ૨૨ १८ २ १ ८ ७ १ १ ४ १ ८ - १ १२ ५ ५ 4 १२ ८ २ १ २७ (५१) मार्षिास्पहपापयण ( मत दिनम) किसीका रश सोखि रिन विभामसम-सम्म भम्पाप मोम भपाय १ २ १८ ३ ३ १ ३ । ८ ए ८ ८ १ ३ ७ १ १८ . Y ४ ४ ८ १ . । ५ २५ १ १२ ११ २८ - ८ १२ दिन निभामसम-समय अम्पाय यग मन्पाप (५५) मासपारायण (महीनेभरप) विभामसम्-सन्म भम्पाय योग भभमाय ८ " १२ देन १ २ १८ ૨૨ , १ ૨ ३ ८ ८ ८ १ १२ ૨૨ १ १ ८ २४ २५ १० १८ ५ ९ १ १ ४ ३ Y २३ २ ८ R १ . २८ १ ૨૧ १२ १२ १ १ ७० ५ ८१ १ १४ १५ ८ १२ २५ २५ २० ૨૮ ८ ११ २८ ९ ૨૨ . १३ २४० ३ १ ૨૨ (.) मासपारायण ( महीने मरन) समस्त प्रमनामांकी सिद्धिक कम विभामस्सम् सन्म भन्याय योग अमाप दिन १ २३ १ २ १२ १२ २ ३ २ २ २५ - ११ २५ ९ ६ २० २८ २ . २ १ , ५ १ (५१) मासपारायण ( महीने मरन) १ ५ २ दिन विभामम-रय मागमाय माय ५ ११ १२ ५ ६ - ॥ १ ७ २ ३ ४ १ ९ २ १ ८ ३ ९ १८ १ ४ १ ११ ६ २ - ७ ८ . ८ २२ १ १२ १५ ૨૨ ૨૨ १५ १ १ १ ४२ ५ भासव १०१० भीमद्भागवत दिन विमामलम्-सन्य भनाम योग माप दिन शिभ्रामस्पा स्कन्ध ९ अम्माम मोगमबार १ ५ ७८ १ ८० . ५ . २७ ૨૮ ३८ ३ ७ १२ २१ २ ११ १ . (५८) अमुपारायण ( दो महीने) पिभामरसम्मघ भपाप ४२ रिन . योग भध्याय ૨૨ २८ - २ २ 4 २ १ ५ २८ २ - ' ४॥ १ ५ ६ ६ ४८ १ ५५ . ४ २ २ २ २ १ १ ५८ ८ -- ५ १ २ Y ३ २ १ ૮૮ ७ २४ ४ ७ १२ २८ 4 4 ३ ५ . १८ ७ ७ ७ Ն Ծ १५ ४ १२ ५८ ४ Y १२ १८ ५ २ ऐमा माना जाता है निमम्मिलित सफिलिम लिखित अभााँपर विमाम नहीं करना चाहिये । ऐल्प करनेवाले प्रसिद्ध नहीं होंगे। भन्मान ५ २२ २३ २ २६. ६ १ ८. ७ २५ ६ ६ २ ३ १८२ २२ ७ ५ २८ . ~ ३ " ' ८ ८ १ . . ८ ८ २२२९३ १२७५७ ॥ १८

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Shrimadbhagwatmahapuranam Khand-2

Author
Vedvyas, Maharshi
Title
Shrimadbhagwatmahapuranam Khand-2
File name
Shrimadbhagwatmahapuranam Khand-2
Text
OCR done
Citation
1918
Published
2011/08
Publisher
Gorakhpur, Geetapress
Language
Sanskrit
Pages
1111
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314069
Barcode
99999990312219.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
7dG3q9gjIUs
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