Banasthali University

सम्वेद संहिता

Xx · 2009/03

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2312 22. CICCICCiCci Tichaeliciae * ॐ नमः शिवाय*.. श्रीसामवेदसंहिता। छन्दः ॥ ४॥ १ ॥४६७॥ अर्थात् गायत्री छन्दः॥ श्रीमामामृतसिन्धुः । ॥ २ ॥ ४६८ ॥ "घनी छन्द । जसा ॥३॥ ४६॥ श्रीमनिगमागमार्णवसेतु निर्माता मापत्री छन्दः । श्रीसायणाचार्य-प्रणीतभाष्यच्छायानु। १७० ॥ भार्यभाषा-पद्यात्मक अनुवाद का पञ्चम और पष्ठ अध्याय ॥ जिसको-- अजमेर राजकीय पाठशाला के प्रधान संस्कृताध्यापक कविरस्न त्रिपाठी शिधंदत्त काव्यत्तीर्थ न यमाहा । : 4 lu तदनुन साहित्यालंकार पण्डिा राबदत्त त्रिपाठी ने उपयुक्त टिप्पणी से विभूषित कर के प्रकाशित किया ।। श्रीयुत वा मधुराप्रसाद शिवहरे प्रबन्धकर्ता के प्रपन्ध से वैदिक यन्त्रालय, अजमेर में मुद्रित हुआ ॥ M संवतः १६७ OOOOOOOOOOOO AVM leneDSARDANCERTCHODectiCASH

मानार्थ पुरोहित
नस्यत्री विद्यापीठ वनस्पती (जनपुरी
C
पुस्तकालय
दि...16783
तारीख...............
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खूनीपास........ .सूचीपत्र सं..
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सूचीपत्र सं..
पात्र......

अथ पञ्चमाध्यायस्य प्रथमः खण्ड आरभ्यते ।। ३१२ 3 १२ ३१२ १ २ १२ - २३१.२३ १ २ ३ १ २ ३१२ तत्र प्रथमाया अमहीयुमषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः ॥ चा ते जातमन्धसो दिवि सम्याददै । उग्रं शर्म गहि श्रवः ॥ १ ॥ ४६७ ॥ अथ द्वितीयायाः मधुच्छन्दा प्राषिः । सोमो देवता.। गायत्री छन्दः। स्वादिष्ठया पदिष्ठया पवस्व सोमघाश्या । इन्द्राय पात सुतः ॥ २॥ ४६८ ।। श्रथ तृतीपाया भृगुर्वामणिपिः । सोमो देवता । गायत्री छन्द। कृपा पास्त्र धारया गरुत्वते च पत्त । विश्वा दधान ओजस्ता ॥ ३॥ ४६६ ।। अथ चतुर्थाः श्रमहीपुषिः । लोमो देवता । गायत्री छन्दः । यस्त पदो वरेण्य स्तेनापवस्वाधसा । देवावीरघशमहा ॥ ४ ॥ ४७० ॥ हे सोम ! तेरे सुरस का प्राकट्य ऊपर को हुा । श्रीयुक्त जो दिनलोफ उसके मध्य स्थिति को पारा ।। पुनि शक्ति से सम्पन्न ऐसे सुख तथा अत्यन्न को । हम भमि के पासी सफल भलिभाँति सेती पावते ॥ १ ॥ ४६७ ॥ सोमरस ! तुम इन्द्रनामक देव फे पीने लिये । नाना प्रयोगों के किये उत्पत्ति को पाये अत्यन्त स्वाद सगेत परमानन्द को देती रहे। अस दिव्य गुणयुव धार संता वृछिको पर दीजिये ॥ २ ॥ ४६८ ।। हे सोम ! स्तोतमिलापों की वृष्टि को करते. हुए। निज धार से श्री द्रोण घट के बीच में मांजाइये ।। पुनि तुम्हें: हय इन्द्रार्थ दे तवं मन्गित्र सुरैश के। निज पराक्रम से सहन्त धन धरते सुखप्रद हूजिये ।। ३ ।। ४६६ ।। श्री सोम ! तेरा दिव्य रस सुरवन्द के मनभावता । राइस तथा: पामावली को नष्ट भ्रष्टाचनावता ।। अत्यन्त स्तुति के योग्य और प्रमोद को उपजावा ऐसा जु रम स्पृहणीय उसको कलश में वदसावना .४७०॥

(१५०) ३२उ 3१२३ ३११ १२. ३ १.२ १. २०१२ अथ पंचम्यास्त्रितराषिः । लोसो देवता। गायत्री छन्दः । तित्रा पाच उदारत गावोनिमन्ति धेनवः । हरिरोति निक्रदत् ।। ५ ।। ४७१ अथ षष्ठयाः कश्यपषिः । लोलो देवता । गायत्री छन्दः । इन्द्रायेन्दो मरुत्लत पदस्व मधु पत्ताः । अस्य योनिमासदम् ॥ ६ ॥ ४७२ अथ ससम्याः जमदग्निहषिः । खोमो देवता । गायत्री छन्दः । असाव्यशुदायाप्सु दक्षौ गिरिष्ठाः । श्पैनो न योनिमासदद् ॥ ७॥ ४७ अथाष्टम्पा दृढच्युत प्रागस्त्य भाषिः। लोलो देवत्ता गायत्री छन्द पवस्व दक्षसाधनो देवभ्यः पीतये एरे । मरुद्भयो वायवे मदः ॥ ८॥ ४७ 3 १२.३१ २ ३१२ ३२३ १२ श्रीयुत गादिक भेद सेती निधा स्तुतिहिं उचारते । श्री दुग्धदात्री गवे दुहने के लिये रंभाति हैं। श्री हरित रंग का सोमरस अव्यक्त ध्वनि करता हुभा । श्री द्रोणसंज्ञक मख कलश के बीच बहता जावता ॥ ५ ॥ ४७१ हे सोम ! तुम अत्यन्त मीठे स्वाद को रखते हुए । श्री पूज्य यज्ञस्थान में शोभित विराजन के लिये ॥ श्रीयुक्त इन्द्र जु देव उसकी प्रीति को पाने लिये। श्री द्रोणनामा गख-कलश तिस बीच भागम कीजिये।। ६ ।।४ श्री पर्वतों में प्रकट ऐसा सोम सुख भलिभाँति संपादित हुआ जल बीच वृद्धिहिं पात है ।। ज्यों श्वेन वन से मायके निज स्थान में स्थित होनता । त्यों सोम अपना स्थान श्रीयुत द्रोण घट तहँ ठरता ॥ ७ ॥ .श्री हरितवर्ण तथा अमंगल-नाशकारक देवता । बल वृद्धि को करता हुमा आनन्द को उपजावता ।। इन्द्रादि देव-समूह अरु श्री मरुत आदिफ देव हैं। चे पान तेरा 'फरें. इसलिम फलश में भरजाइये ॥ ८॥ ४७४ उपजावने ।

(११) अध नयम्याः फास्ययोऽसितमपि । सोमो देवता । गायत्री छन्दः । परि स्यानो गिरिष्ठाः पमिने सोगो सतरत् । पदेषु सर्नया शसि ॥ ९ ॥ ४७५ ।। अथ दशम्या ऋष्यादयः पूर्ववत् । परिमियाः दिवा कानियांजिनप्त्योदिता । स्वानपत्ति कविक्रतुः॥ १०॥ ४७६।। इति प्रथमः खण्डः। 3२र३२ अथ द्वितीयः खण्डः । सन प्रथमाया: पावादपि। सोमो देवता । गायत्री छन्दः । म सोमासो पदच्युतः अबसे नो पोनाम् । मुना विदथे भक्रमः ॥ १ ॥ ४७७॥ १२ यह सोमनाक रर अतीय विशुद्धि संयुत पात्र में। परिपूर्ण होता तथा श्रीगिरिपृष्ट पै उत्पन्न दै ।। विधिसहित सम्पादित हुथा स्टोतादि के समुदाय में । सम्पूर्ण वाञ्छित मितियों के वर्ग को देता रहे ॥ ६ ॥ ४७५ ।। श्री सोमसंज्ञक दिव्य रस अत्तिबुद्धि को उपजावता । अधिपत्रण के जो फल विन्द के मध्य में स्थापित हुआ | श्रीयुत दिषाभिध लोक फे प्यारे पथिक समुदाय जे उनके सहित वह सोमरस भलि भाँति प्राप्त हुजात है ॥ १० ॥ ४७६ ।। इति प्रथम खण्ड ॥ अथ द्वितीय खण्ड का प्रारम्भ ॥ श्रानन्द के दातार ऐसे सोमसंधक सुरस है। वे दिव्यगुणसम्पन्न उत्तम रीति से हो जात है। तब हग ने संयुक्त हम सम जनों के शुभयाग में। श्री अन्न अरु सत्कीनिहित पात्रों वि भाजात है।।१।४७७ ॥

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अथ द्वितीयायानितऋषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः ।
सोमासो विपश्चितोऽपो नयन्त जर्मयः । वनानि माइघा इन ॥ २॥४७
अथ तृतीयायाः अमहीयुझषिः । लोमो देवता । गायत्री छन्दः
पवस्वेन्दो दृषासुतः कृधी नो यशसो जने । विश्वा भद्विषो जहि ।।३।।
अथ चतुर्गा भृगुषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः ।
हषाशसि भानुना द्युमन्तं त्वा हवामहे । पवमान स्वदेशम् ॥ ४ ॥४८०
अथ पंचम्या काश्यप ऋषिः । सोमो देवता । गायत्री ५
इन्दुः पविष्ट चेतनः प्रिया कवीनां मतिः । सृजदध रखीरिव ॥५॥४
श्री बुद्धि के दातार ऐखे सोमरस जे वाजते ।
'ने जलों को लहरें उन्हीं की तुल्यता को धारते ॥
जिस राति से पशुवर्ग वन की ओर चल के श्रावते ।
उस भाँति से वे सोम-पानावली के विच आवते ॥ २॥ ४.
हे सोग ! तू सींचा हुआ सन सिद्धियों को देवता ।
अपनी विषल धारावली से पात्र विच आजावना ।
श्री देश भर में हमें उत्तम कीर्तियुत कर देवना ।
सब शत्रुओं के वर्ग को विध्वस्त करके गेरना ॥ ३ ॥ ४
हे सोम ! तू निश्चय मनोरथ-सिद्धि को दिलवावता ।
अत्तएव हे पवमान ! सघ कृत्यादि को लख लेवता ॥
श्रीयुत अपने वेज से भलि भाँति छवि को पावता ।
अत्र तुम हम सब यज्ञ कार्यों को विर्षे बुलवावते ॥ ४ ॥
श्री चेतना-दातार देवसमूह का प्यारा घना ।
भी खोग याज्ञिक स्तोत्र से पात्रों विषं भरजावताः।।
जैछे रथी निज अश्व को इस धार में कर देवता ।
वैसेहि नीयुत सोमरस निज पान को भरदेवचा ॥ ५ ॥

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मध षष्ट्या ऋष्पादयः पूर्ववत् ।
अक्षर प्रवाजिनो गव्या सोमासो शवया । शुक्रासा वारयाशवः ।। ६ ।। ४८२ ॥
अथ सप्तम्याः निध्रुविः काश्यपऋषिः सोमो देवता । गायत्री छन्दः ।
परस्य देव भायुपगिन्द्र गच्छतु ते मदः । पायुमारोह धर्मणा ॥ ७॥ ४८३ ।।
प्रधाष्टम्या अंमहीयुफ्रेषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः ।
पर्वमानो भजीजन दिवश्चित्रं न तन्यतुम् । ज्योतिर्वैश्वानरं वृरत् ॥ ८ ॥ ४८४ ।।
अथ नवम्पाः काश्यपोऽसित प्रषिः। सोमो देवता। गायत्री छन्दः ।
स्मानास इन्दवो मदाय पणा गिरा । मधोमपन्ति धारय ॥४॥४५॥
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वलवन्त वेगसमेत श्रीयुत सोमरस जो वाजते ।
श्री गवों की अभिलाप से श्री अश्व की रुचि राखते ॥
भीयुक्त पुत्र-समूह उनका लाभ. हो इस मास से ।
श्री ऋत्विजों के वर्ग मे भत्यन्त रचित हुजावते ।। ६ ॥ ४८२ ।।
दे दिय सोम ! सुपात्र में तू धार से परिपूर्ण हो ।
भानन्दप्रद तेरा सुरस सुरनाथ को मिलजाइ हो ।
श्री धारणा करने समर्थ स्वकीय रस के रूप से
श्री वायुनाग देव को भलि भाँति से मिल जाइ है ।। ७॥ १८६ ।।
श्री शुद्धि का दातार अन पवमान-संज्ञक सोम जो ।
सपने भतीव प्रशस्त श्री वैश्वानराभिध तेज को ।।
श्री युक दिषलोकाभिधानी उपरिवर्तित लोक फे।
पाश्चर्यदाता वफा के पम भली विधि प्रकटित किये ॥ ८॥४८४ ॥
श्री सोमवल्ली से निचुदसे कान्ति को धरते हुए ।
अत्यन्त स्तोत्रस्वरूपिणी अस नाणि के उपयोग से।
भी हर्ष के उपजान वारे सोमं अपनी धार ।
श्री सुरहितार्थ दशा पवित्र विशेष से.चू जावते ॥ ६॥ ४८५ ॥

(१५४) अथ दशम्या कृष्पादनः पूर्ववत् । परिमासिष्यदकविः सिन्धोरूविधिनिता । कारं बिभ्रत्पुरुस्पृक्षम् ॥ १०॥४८६।। इति पंचमः प्रपाठकः । द्वितीयखण्डन्य समाप्तः २३१ २ ३२२ २२३१२ २२ ३२ ३१र२र 39 २ मथ तृतीयः खण्डः । ३२३२३ १.३३१र. उर १३३१ २ तत्र प्रथमाया अमहीघुषिः । स्रोमो देवता । गायत्री छन्दः । उपोषु जातमतुरं गोभिर्भ परिष्कृतम् । इन्दु देवा अयासिपुः ॥ १॥ ४८७ ।। अथ द्वितीयायाः बृहन्मतिरागिरस ऋषिः। लोमो देवता। गायत्री छन्दा पुनानो अक्रमीदभि विश्वामृधोदिचर्षणिः । शुम्भन्ति विमं धीतिभिः॥२॥४८८ ॥ श्री बुद्धिवर्धक तथा सिन्धु-तरंग में 'आश्रित हुभा । भगणित. जनों की स्पृहा के संयोग. को रखता रहा ।। श्रीयुक्त स्तुति-करि. नर को भलो विधि से धारता । अस सोमनामक दिव्यरस पात्रावली विच टपकता ॥ १० ॥४८६॥ द्वितीय खण्ड समाप्त । अथ तृतीय लण्ड का भारम्भ ॥ जो रीति से प्रघटा जलों से प्रेरणा पाया हुआ । रिपुवर्ग का नाशक गवों के घृतादिक से शुधि रहा ॥ उपरोक्त गुण सम्पन्न ऐसा सोमरस कहलात है। श्रीयुक्त सुर-समुदाय उसको भली विधि से पात हैं ॥ ११ ॥ ४८७ ॥ सम्पूर्ण का. द्रष्टा पवित्रपना सदा देता. रहै । भस स्रोश रिपु-समुदाय को अाक्रान्तियुत कर देत है ।। श्री बुद्धि का दातार ऐसा सोमनामक सुरस श्री याशिफों के वृन्द शोभासहित उसको करत हैं ॥ २॥ ४८८ ।। है

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अध तृतीयाचा अतितः काश्यपो जमदग्नि ऋषिः। सोमो देवता।
गायत्री छन्दः।
मादिशाकलशं सुनो विश्वा सपनभि श्रियः इन्दुरिन्द्राय धीयते ।। ३ ॥ ४८६ ॥
अथ चतुर्थाः प्रभृपिः । सोमो देवता । नायनी छन्दः ।
असजित्थ्यौ यथापिविजेचम्बाः सुतः । कान्दाजी न्यभनीत् ॥ ४ ॥३६० ॥
श्रध पंचम्या मेध्यातिधिपिः । सोमो देखता । गायत्री छन्दः ।
मयद्गावो न भूर्ण यस्लेपा अयासो आक्रमुः । नन्तः कृष्णायपत्वचम् ॥५॥४६१॥
अध पठ्या निध्रुवि पिः । लोमो देवता । गायत्री छन्दः ।
अपनपत्र से मृधः ऋतुवितोप रत्सर । नुदस्वादेवयुञ्जनम् ॥ ६ ॥ ४९२ ॥
श्री सोम संपादित कलश के मध्य में आता हुआ ।
उस भाँति की सम्पत्तियों का सुवर्पण करता हुधा ।।
घस सोमरस श्रीयुक्त इन्द्राभिध सुरेश्वर के लिये ।
श्री याज्ञिकों से यह फे पिच प्रतिष्टापित होत है ।। ३ ।। ४८६ ।।
जैसे तुरंगम सुरथ का रथ
से
छुड़ाया जावता ।
तैसेहि गन में अधिषवण फज को विपें निचुड़ा हुआ ॥
श्री सोम पात्रों में धरा प्रसवंग को पा लेवता ।
श्री यारूपी युद्ध में प्राक्रमण को करदेवता ॥ ४ || ४६० ।।
जो त्यरा को करते प्रफाश-समेत गति को धारते ।
एकदेतन पारि अँधेर अभिपव से अलग सरफावते ।।
वह स्रोमरन श्री यज्ञ को ऐसे प्रवृत्त वनात हैं।
जैने फी गायें शीघ्रता से गोष्ठ के प्रति जात हैं ।। ५ ॥ ४६१ ॥
हे सोमरस ! गद करत तू हिंसक रिपुन को मारा ।
हम सपों को श्रीज्ञान देता पात्र विच भर 'जावता ।
'इत्यादि गुणसम्पन्न तू सुरगण
विरोधीवर्गको
विध्वस्त करके हमारे मख सेति दूर हटाइयो ।॥ ४ ॥ ४६२ ॥

११ ३१२३२३१ २ ३२३२ (१५६) अध सप्तम्या ऋष्यादयः पूर्वरत् । भपा पवस्त्र धारया यया सूर्यपरीचयः । हिन्वानी मानुषीरपः ॥ ७॥ ४९३ ।। श्रथाऽष्टम्पा अमहीयुर्ऋषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः । स पवस्व व भावियेन्द्र वृत्राय हन्तवे । वत्रिवास महारपः ॥ ८ ॥ ४९४ ।। अथ नवम्या ऋष्याय उक्तवत् । प्रया बीती परिस्रव यस्त इन्द्रामदेष्वा । अवाहनवतीन ॥ ६ ॥ ४९५ ॥ अथ दशम्या उक्थ्य ऋषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः । परिघुनं सनद्राप भरद्वाजनौ अन्धसा । सानो अर्ष पवित्र मा ।। १० ।।१९६ ।। इति तृतीयः खण्डः । १२३१२ ३१२३ २ 3 १ 3 २३ है मोम ! मानव जाति के हित को निरन्तर भाचरें। 'श्रीजलों के समुदाय को तुम प्रेरणा करते हुए ॥ जिध धार से श्रीयुत प्रभाकर देव को चमकावते । इस धार सेती यज्ञ की पात्रावली बिच भाइये ॥ ७॥४१३॥ है स्रोम ! जो भत्यन्त भारी जनों के समुदाय है। उनकी रुकावट करन वारा वृत्रनाम धराय है। उसको विनाशित करन के लिय इन्द्र की रक्षा करो। वह तुम स्वधारा प्रवाहों से कलश-पूर्तिहिं भाचरो ॥८॥४१४ ॥ हे मोम ! इस रस सेति श्रीयुत इन्द्र के भोजन लिये। श्री यज्ञवर्ती द्रोणघट तिस बीच में तुग टपक्तिये ॥ जो तुम्हारा रस रणों में शंवर कि नौ ऊपर नवे (९९) । भम नगरियों के वर्ग को विध्वस्त करके डारिया ॥४॥४१५॥ श्री दीप्तियुत मौ दियेजाने वार धन पल भन्न को । वह मोमरस हम सबों को भलिभाँति से दे दीजियो । है मोमरस ! तू अभिषवण की क्रिया को पाता हुआ । श्री द्रोण घट के मध्य चारों भोर सेती बरसना ५:॥ ४६६ ।। तृतीय खण्ड समाप्त ।

(१५७) अथ चतुर्थः खण्डः ॥ ३२३१.२३२, ३र २२३२ २३१२ ३१र २र३.२३ १२ ३१ ૨ ॐ २३ २ अ 9 २ १३१र- २र 3 २३ १ २ तन प्रथमाया। मेध्यातिथिऋषिः । लोमो देवता । गायत्री छन्दः । मचिक्रददृपा हरि हान्मित्रो न दर्शतः। स सूर्येण विद्युते ॥ १ ॥ ४६७ ॥ वितीयाया भृगुषिः ! लोलो देवता । गायत्री छन्दः । बै दक्ष पयोभुवं वहिपया वृणीमहे । पान्तमा पुरुस्पृहम् ॥ २ ॥ ४६८ ॥ अथ तृतीयाया उस्थ्य ऋषिः । लोलो देवता । गायत्री छन्दः । अध्वर्यो भद्रिभिः सुतछ सो पवित्र मानय । पुनाहीन्द्राय पासवे ॥ ३ ॥ ४६६ ॥ अथ चतुर्षा अवतार ऋषिः । सोमो देवता। गायत्री छन्दः । तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः। तरस मन्दी धावति ॥ ४ ॥ ५०० ॥ साथ चतुर्थ खण्ड ॥ अभिगत फलों की वृष्टि करता हरे रंग को धारता । श्रीमहा-महिमा-युक्त मित्र समान हित उपजावता ।। अस सुभगता-युत सोमरस अव्यक्त ध्वनि करता रहे । वह सोम रवि के साथ श्रीदिवलोक में चमकत रहै ॥ १ ॥ ४६७ ॥ हे सोम ! यष्टा वर्ग हुम तुब दिव्य गुणयुत वीर्य जो । तिहिं यज्ञ के दिन आज अभिमुख होय. कर आराधतो ।। वह पराक्रम्म सुख देवता धन भादि प्राप्त करावना । रिपुवर्ग से त्रातार जिस को सभी का गण चाहता ।। २ ।। ४९८ ।। अध्वर्यु ! शिल लोढ़ी तथा मूषल उँखल पाषाण से । विधि के सहित निकसा हुआ अस सोमनामक सुरस है ।। उसको सुमख सम्बन्धबारे कलश में पहुंचाइये । भौ इन्द्र के पीने लिये पावित्र्यऽयुक्त बनाइये ।। ३ ।। ४६६ ॥ श्री सोमरस की निचोड़ी हुइ ऐसि जो कोइ धार है। ससको समर्पत कोइ श्रीयुत इन्द्र को हर्षात है । वह यज्ञकर्ता पुरुष पाप-समूह से तर जावता । औ ऊर्द्धवर्ती लोक तिन्ह को भली विधि से पावता ॥ ४ ॥ ५०० ॥ .

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(१५८)
अथ पंचम्या निधुविभ्रषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः ।
मापनस्छ सपत्रिणं रयिं सोम सुवीर्यम् । भस्मे श्रचासि धारय ॥ ६ ॥ ५०१ ॥
अथ षष्ठया ऋष्यादिक मुक्तवत् ।
अनुप्रन्नास भायवः पदं न यो अनमः । रुचे जनन्तसूर्यम् ॥ ६ ॥ ५०५ ।।
अथ सप्तम्घा भृगुऋषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः ।
अर्षालोम घुमत्तमोभिद्रोणानि रोरुवत् । सीदन्योनौ धनेष्वा ॥ ७ ॥ ५०३ ॥
अथाऽष्टम्याः कश्यपऋषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः ।
वृषा सोमधुमा असि पा देव पव्रतः । वृषा धर्माणि दध्रिपे ॥८॥५०४ ॥
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१
:
हे सोम देव 1 सहस्र-संख्या-युक्त जे पुरुषार्थ हैं।
उनके सहित उत्तमोत्तग धन सामने घरमाइये ।।
औ हमारे जो वर्ग तिन्ह के वि अन्नसमूह को ।
तुम कृपा का उपयोग करके भली विधि से स्थापियो ।॥ ५॥ ५०१॥
श्रीपुरावन औ गमनशील
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सोम के
समुदाय
ने।
श्रीयुक्त नूतन स्थान को आक्रमण से संयुत किये ॥
श्री दीप्ति के पाने लिये श्री सूर्य समता धारते ।
अस सोमनामक सुरस को भलि भाँति से प्रकटा दिये ॥ ६॥ ५०२ ॥
हे सोम तू अत्यन्त सुन्दर कान्ति को धरता हुआ।
श्रीद्रोणघट के मध्य पुनि पुनि शब्द को करता हुआ।
श्री यज्ञगृह वा वेदियों पै प्रथम ही स्थिति पावत्ता ।
आगमन करना तथा वर्षण करत ही भर जावना ॥ ७ ॥ ५०३॥
हे सोय ! तू सम्पूर्ण कामों का परसने वार है।
हे दीप्तियुत ! श्रीदेव ! तू मम सिद्धि का दातार है ।।
श्री वृष्टि का व्रत धरणवारा वान्छितों को साधता ।
श्री सोम ! तू सुरनर-हितैषी कृत्य मादिहिं धारता ॥८॥ ५०४ ॥

३१२३ १.२ १२ अथ नवम्पा ऋण्यादयः पूर्ववत् । हएं पवस्व धारया मुज्यमानो मनीषिभिः । इन्द्रो रुचाभिगा इहि ॥६॥५०५॥ अफ दशम्मा अलि अषिः । लोमो देवता। गायत्री छन्दः । * पन्द्रया सोमधारया वृषा पदस्व देवयः । अव्या वारभिरस्मयुः ॥ १० ॥५०६ ॥ भथैकादश्याः कविर्भायोलारबाजोवा ऋषिलोमोदेवता। गायत्रीछंदः । नया सोम सु कृत्य या महान् सन्मभ्यवर्द्ध थाः । मन्दान इषायले ॥११॥५०७॥ १.3 ३१२ 303 उक २. 3 १र२र हे सोम ! ऋत्विग्वर्ग द्वारा भली विधि शोधे गये । हम सभी याज्ञिक-वृन्द के हित. अन्न को देने लिये || निजधार द्वारा पात्र के विच भागमन को जीजिये। श्री दिव्य अन्न. स्वरूप से गो मादि की सुधि लीजिये ॥ ९॥ ५०५ ॥ हे सोम ! तुम सम्पूर्ण वाञ्छित-सिद्धि को बरसात हो । श्रीदेवगण के प्रिय तथा हम से भी चाहे जात हो । हम सभी याज्ञिक वृन्द फी भलि भांति से रक्षा करों। भौ ऊन निर्मित पात्र में सुख धार सेती प्राप्त हो ॥ १० ॥ ५.०६ ॥ हे सोम ! यह अभिषयणरूपी दिव्य गुणयुत काम है। जिससे प्रपूजित होववे श्री देवहित बढ़जाइये ॥ पुनि यज्ञ के विच बहुत ही सन्तुष्टि को पावे हुए । श्रीयुत वृषभ के तुल्य तुम भव्यक्त ध्वनि कर देवते ॥ ११ ॥ ५०७ ॥ अत्यन्त प्राचीनकाल में मनुष्यों को धातुनिर्मित पात्रों ना सुभीता नहीं था। पहिले पाषाण के उल्लूखलाकृति पात्रों से काम चलाते थे, तथा मेड़की उन को मोटी बटकर उसी के नातणे इत्यादि बना कर सोमरस को छानते थे और पृथ्वी में खड्डा खोद कर मोटे ऊनी वस्न को बिछाकर ऊपर पत्ते इत्यादि से रन्धों को ढ कर रम का संग्रह रखते थे।

३१र २२. ३१र २र 3. १ २ 3 २२ ३२ (१६.) अथ द्वादश्याः जमदग्निषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः । अयं विचर्षणिहिता पवमानः स चेतति । हिन्वान प्राप्यं बृहत् ॥१२॥५०॥ मथ त्रयोदश्या अपास्य प्राङ्गिरसो वा ऋषिः । सोमो देवता। गायत्री छन्दः। प्रन इन्दो महे तु न ऊमिन बिभ्रदर्पप्ति । मभिदेवा अयास्यः ॥ १३ ॥ ५०६ ॥ अथ चतुर्दश्याः अमहीयुषिः । सोमो देवता । गायत्री छन्दः । अपघ्नपवते मुधोपसोमो अराव्णः गच्छान्नन्द्रस्य । निस्कृतम् ॥ १४॥ ५१०॥. इति चतुर्थः खण्डः ।। १ २ उपर २२ १२ २२ 3.9 3 १ २ ३ २३ ३ २३ २ . सब भांति से श्रीज्ञानमय श्री पात्र विच स्थिति पारहा । श्रीशुद्धियुत यह सोमजल संयोग से प्रकटित हुआ। अत्यन्त गुण सम्पन्न अन्न समृद्धियों को देवता । सम्पूर्ण पुरुप-समूह से भलि भांति जाना जावता ॥ १२ ॥५.८ ॥ हे सोग ! गीला तू हमारे बहुत से धन के लिये । श्री. द्रोणसंज्ञक कलश तिस के मध्य बह कर जावते ।। इस समय में ऋषि तुम्हारी श्रीतरंगों को धारता । श्रीयुत सुरों के वृन्द तिन्ह को यजन करने जावता ॥ १३ ॥ ५०९ ।। हे सोम ! हिंसफशत्रु अथवा ज्वरादिक को मारता । श्री शक्तियुत होकर कृपण हो उसे भी संहारता ।। पुनि इन्द्र का श्री स्थान तिन को भली विधि पाता हुमा । श्री दिव्य गुणयुत धार उन सेती वरसता जावता ॥ १४॥ ५१० ॥ चतुर्थ खण्ड समाप्त.॥

२३ १२ ३१ सर ३२फ अर २२३ २ २उ ३२७ S र २१ २ २३.२ ३..र..३२३ २३१२ (१६१) अथ पंचनः खण्डः ॥ भरद्वाजः काश्यपोऽनिर्जमदग्निश्च गोतमः। विश्वामित्रो वसिष्ठश्च प्तर्वालामृषयो मताः ।। तत्र सर्वाना पवमानो देवता । वृहती छन्दः। पुनानः सोम वारयापो वसानो पर्यसि । मा रत्नपा पोनिमृतस्य सीदस्युत्सौ दवो हिरण्ययः ॥ १ ॥ ५.११ ।। अथ द्वितीया। परीतो पिंञ्चता सुतं सोमो य उत्तम हविः । दधन्दान् यो नयाँ अवान्तराहपाव सोगमद्रिभिः ॥ २ ॥ ५१२॥ अथ तृतीपा। सोम स्वानो भद्रिभिस्तिरों वाराण्यव्यया । जनो न पुरि चम्बोशिद्धरिस्सदों वने पु दधिषे ॥ ३ ॥ ५१३ ॥ अथ पंचम खण्ड का प्रारम्भ । सोम ! शोधक श्रीवसति वरि जनों को ढफता हुआ । श्री घार द्वारा द्रोण घट के बीच में तू जावता ।। रमणीय धन दातार मख के स्थान को पाजात है। भी दीप्तियुत यहवा सुरों के हेतु सुख पहुंचात है ॥ १ ॥ ५११ ॥ जो सोग श्री सुरवृन्द के लिय श्रेष्ठ इवि हो जात है। श्री नरहिसपी जो वसति वरि जलों के प्रति जात है ।। जिन सोम को मध्वर्यु ने प्रस्तरों सेती झाढिया । उस को इस स्थल से उपरि फो जनों के विच सीचिये ॥२॥५१२॥ सोग ! पापाणों सेती तू अभिपव किय जावत । रक्षक भेद फि ऊन व्यवधान वनावत ॥ अभिमुख हो श्रीद्रोरण-फलश तिस्त्र के प्रति जावत । हरित सोम अधिपण काष्ठ धृत फलशयु पावत ।। जैसे नगरी में पुरुष निज प्रवेश कर देवता । त्यों घुसता तू काठ के पास वि स्थिति लेवता ॥ ३ ॥ ५१३ ॥ --- (१६२) १ ३ ३१ २ ३ २ ३१ २३ १२ २२ ३१२ ३१२ 3 १२ ३१ २ अ १२ ३१ ३१.२ १२ 3 १र २२ २२3 ३ पुर २२ अथ चतुर्थी। म सोम देवचंतये सिन्धुन विप्ये अर्णसा। २२.३२ अंशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छाकोशं मधुश्चुतम् ॥ ४ ॥ ५१४ ।। अथ पंचमी। सोम सप्लाणः सौतमिरधिष्णुभिरवीनाम् । अन्वयेष हरितायाति धारया मन्द्रयायातिधारया ॥ ५ ॥ ५१५ ॥ अथ षष्ठी। तबाई सोम रारण सख्य इन्द्रो दिवदिवे । पुरूणि वभ्रो निचरम्ति मामय परिधी रतिता इहि ॥ ६ ॥ ५१६ ॥ पथ सप्तमी। मृज्यमानः सहस्त्या समुद्रे वाचमिन्वसि । रयिं पिशङ्ग बहुलं पुरुस्पृह पर्वमानाभ्यर्षसि ॥ ७ ॥ ५१७ ॥ हे सोग ! त श्रीदेवगण के पान करने के लिये। सरिता सरिस श्रीवसतिवरि से वृद्धि पा भरजात है ।। इस समय सुखप्रद जागता तू लता खंडज वारि से । श्रीमधुररसनावी फलश फी भोर प्राप्त हुजात है ॥ ४ ॥ ५१४ ॥ उत्पादों के वर्ग सेती भली विधि निचुड़ा हुआ। श्री सोम भेड़ कि ऊन से शुचि होय करके पहुंचता ।। यह विदित है कि सुघोड़ि से भलि भाँति जैसे जात है। श्री हरित धारा मौ सुखप्रद धार से पाजात है ॥ ५ ॥ ५१५।। हे सोम ! तेरा प्रीति से संयुक्त शील स्वभाव है । उस के विषय में प्रति दिवस भलि भाँति से रमता रहूं। हे धध्रु ! अगणित राक्षसों के वर्ग दुख पहुंचावते । समुदाय को तू दलित करके डाल दे ॥ ६ ॥ ५१६ ।। श्री दिव्य अंगुलिवर्ग से हे सोम ! संपादित हुए । पावित्र्य पाफर कुंभ में अव्यक्त ध्वनि को प्रेरते ।। हे सोम ! कंचन रतज ती पीतवर्ण धरावते । अगणित जनों से चहे हमको बहुत मित्त दिलावते ॥ ७ ॥ ५१७ ॥ उन सबों के

317
३२३
१२३ २३१२
२२३१२
3
२२
3 २३
१२३१ २
२३
३१
3१२
३.२७ पर
२२३
१
२
१ २३१
२३१२
२२
३२
प्रधाष्टमी।
जभि सोमास भायवः पवते मचं मदस् ।
समुद्रस्यापिविष्ट मनीषिणो मत्सरासो महच्युतः ॥ ८ ॥ ५१८ ॥ .
अथ नवमी।
२३१२३२
पुनानः सोमनागृदिरव्या चारैः परि प्रियः ।
विषा अभवोनिरस्तम मध्वा यज्ञ मिमिक्षणः ॥ ६ ॥ ५१६ ॥
अथ दशमी।
इन्द्राय परते पदः सोमो मरुत्पते सुतः ।
सहनधारी प्रत्यव्यमर्पति तमी मृनन्त्यायवः ॥ १० ॥ ५२० ॥
अथैकादशी।
पवस्व वाजसातपोऽभिविश्वानि वार्या ।
त्वं समुद्रः प्रथमे विधर्म देवेभ्यः सोम पत्स। ॥ ११ ॥ ५२१ ।।
श्री गमनशील तथा मनों को बहुत प्यारे लागने ।
मानन्द देनेवार ऐसे रसों को टपकाबने ।
श्री सोम रस श्री द्रोणघट के उपरि सुख उपजायते ।
श्री हर्षदायी सुरस को सब और सेति निकासते ॥ ८ ॥ ५१८ ।।
हे सोम ! जागृतिशील, तर्पक शुद्धता को धारते ।
लरड़ी कि ऊन स विनिर्मित श्री पविने में टपकते ॥
श्री श्रेष्ठतायुत भाङ्गिरस ! ज्ञानी पितर नेता रहो।
वे तुम हमारे मखहिं शुचि रस सेति सींचा च्छात हो ॥ ९॥ ५१९ ॥
घानन्द का दातार श्रीयुत सोमरस खींचा हुआ।
श्री मरुद्गणयुत इन्द्र के लिय पात्र में भर जावता ।।
पुनि विविध धारा सेति अव्य पवित्र से छनता रहै
उसको मनुज ऋत्विज भली विधि सेति शुद्ध वनात है ॥ १० ॥५२०॥
हे मोम ! सब स्तोत्रावली के लक्ष्य को करते हुए ।
आधिक्य से अनादिदाता प्राप्त तुम होजाइये ॥
हे देव ! सुरगण हेतु सुखप्रद तृप्ति को दिलवावते ।
वैशिष्टय से पोषक सुमस्त्र में देवहित परमाइये ॥ १२ ॥ ५२१ ॥

(१६४) १२ 3.२.३२३१२ 39 २ अथ द्वादशी। पवमान अमृतत पवित्रमतिधारया। ३१२३ १र २ १२३ २१, ३२२ मरुत्वन्तो मत्सरा इन्द्रिया हया मेधामभिाप्रयांसि च ॥ १२ ॥ ५२२ ।। इति पंचमः खण्डः । भंथ षष्ठः खण्डः । २२३२३२३ १ २३१ १ ३२ २ 3 १ २३ २३१ २ अ १ २३१ २ १२३१ ३२ ३१ २३२ कर 3 १२ तन्न प्रथमाया उशना ऋषिः। सोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । म तु द्रच परिकौशं निषीद नृभिः पुनानो अभिवाजमर्ष । अश्व न त्वा वाजिन मजयन्तीच्छा बहिरशनाभिनयन्ति ॥ १ ॥ ५२३ ॥ अध मित्तीगाया घृषगगवासिष्ठ ऋषिः । सोमो देवता । त्रिष्टुप् छंदः । प्रकाव्यमुशनेव ब्रुवाणो देवी देवानां जनिमाविवति । महिवतः शुचिबन्धुः पावका पदा वराहो अभ्येति रेभन् ॥ २ ॥ ५२४ ॥ श्री मरुद्गण से युक्त शिवप्रद् इन्द्र को प्रिय लागने । श्री स्तुति तथान्नहिं लक्ष्य कर याजकहिं अन धन देवने ॥ श्री यज्ञ में गन्तार श्रीयुत लोग अपनी धार से । श्री पवित्रे को लॉघि करके सुसंपादित होवते ॥ १२ ॥ ५२२ ॥ श्री पंचमाध्याय का पंचम खण्ड समाप्त ।। अथ षष्ठ खण्ड । हे सोम ! झटपट माय के श्री द्रोणघट में बैठिये । श्री ऋत्विजों से शुद्ध यष्टा हेतु भन्नहिं दीजिये ॥ बलवान घोड़े के सरिस तुझ को पुनीत बनावते । अध्वर्यु अंगुलि ले भली विधि यज्ञ में पहुंचावते ॥ १ ॥ ५२३ ॥ उशना सरिस स्तुति को प्रशंसक भलीभाँति उचारता । इन्द्रादि सुर अवतार के गावता॥ श्री पिविध-कर्मा, दिव्यरूप, विशुद्धि को उपजावता । अस सुदिन जनमा सोम ध्वनिकर पान में भाजावता ॥ २ ॥५२४॥ गुण भधिकता से अध तृतीयायाः परशर प्रणिः। लामो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । तिसरे पाच ईरगति प्रयाहन्नई नस्य धोति ब्रह्मणौ मनीपाम् । गावो यन्ति गोप.त पृच्छगानाः सोम यन्ति मतयो वावशानाः ॥३॥ ५२६ ।। अध. चतुर्या वसिष्ठ ऋषिः । सोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । मरूप पा हेमना पूषमानो देवो देधिः समपृक्तरसम् । मुक्तः पवित्र पर्मेति मन् मितेच सम एशनिस होवा ॥ ४ ॥ ५२६ ॥ अध पंचम्याः प्रतर्दन प्रषिः । लोलो देवता । बिटुप् छन्दः । सामः पवते जनिता मतीनां जानता दिवो जनिता पृथिव्याः । जनितारनेजनिता सूर्यस्य जानवेन्द्रस्य जनितांत विष्णोः ॥ ५ ॥ ५२७ ।। र ૩ ૨ १२३१३३१२ ३२३ १२ ७२ 1 २ : ३१ २ 3 १ २ 3 २ ३ ५र ३ १ २ ३१२ २२ यष्टा ऋग्यजुसाग तीन वाणी उच्चारत । श्री मखधरणी महासोम की वाणि सुगावत ।। गायें जिस विधि अधिप वृषभ के निकट सिधावत । तिम विधि पूछत तथा अनेकन इच्छा राखत ॥ स्तोता के समुदाय से यज्ञारंभ हुजावते । श्रीयुत सोम समीप में स्तोन गानहित जाबते ।। ३ ॥ ५२५ ॥ इस सोगप्रेरक स्वर्ण से पावित्र्य को पाता हुआ । श्री दिव्य सोम स्वकीय रस को देवगण सँग जोड़ता ॥ पुनि प्रकट सोग सशब्द पवित्रे ऐति पात्र गमावता । ज्यों देवभक्त मस्त्री व पशु क्रतुशाल में भाजावता ।। ४ ।। ५२६ ।। . श्री सोम. बुद्धि बढ़ावता दिवलोक को प्रकटावता । श्री. धरणि का पोप तथाग्निई तृप्त को दिलवावता ।। सूर्य का सर्पक तथैव. सुरेश को सुख देवता । मौ विष्णु को सुखदाइ अस रस पान के बिच शावता ॥ ५ ॥ ५२७ ।।

२र२र
३१२३.१२
३
१२
(१६६)
अंध षष्टया वसिष्ठ ऋषिः। सोमो देवतां । त्रिष्टुप् छन्दः ।
मामि त्रिपृष्ठं कृपणं वयोधामङ्गोषिणमवावशन्त वाणीः ।
वनावसानो वरुणो न सिन्धुषि रत्नधा दयते वायर्याणि ॥ ६॥ २८ ॥
अध सम्पाः पराशर ऋषिः । सोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः ।
मक्र.समुद्रः प्रथमे विधर्मन् जनयन् मजा भुवनस्य गोपा।
वृषा पवित्र अधिसानो अव्ये वृहत्सोमो वा वृधे स्वानो अद्रिः ॥ ७ ॥ ५२६
प्रधाऽष्टम्या प्रकरावऋषिः । सोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः ।
कनिक्रन्ति हरिराज्यमानः सीदन्वनस्य जठरे पुनानः ।
नृभिर्यतः कृणुते निर्णिनं गायतो मति जनयत स्वाभिः॥८॥ ५३० ।।
१ २
२३१र
२२
393
३१र
२र
२२
१ २ ३.२.३
२. 3
३र
२२
१ २३१
9
२३.१र २र३.१
२
3 १२
श्री तीन सवनों वाल सुखप्रद अन्न को दिलवावत है।
अत्युच्च अनिकतार सोग कि स्तोत्रगण रुचि धारते ॥
श्री जलों को छाता तथा श्री सलिल सोम बहावता ।
श्री वरुण सम रत्नपदाता मंखिहि वित्त दिलावता ॥६॥ ५२८॥
श्री जलों का वर्षक मखादिक कृत्य को निर्वाहता।
श्री सिद्धि का दातार ऐसा सोम अभिपव पावता ।
विस्तीर्ण जल में धरण वाले अन्तरिक्ष सुलोक में ।
श्री प्रजा को उत्पन्न करता सबहिं लांघत जात है ॥ ७॥ ५२९ ॥
।
सब ओर से भाकृष्ट हरित जु सोम पुनि पुनि रव करें।
श्री शुद्ध वांछा योग्य घट के बीच स्थित हो ध्वनि धरै
श्री ऋत्विजों से दमाया गोदुग्ध भादिहिं ढांकता।
निज स्वरूपहिं ग्रह में करै तिहिं स्तुति इविन से गावना ॥ ८॥५३०॥

३ ज to २३. 3 अथ नपस्या उशना ऋषिः । लोलो देवता । त्रिष्टुप छन्दः । एप र मधु माँ इन्द्र तोमो पहष्णः परि पलिने पक्षाः । सहा शतदा भूरिदावा शश्वत्तमं चाहि राज्यस्यात् ।। ६ ।। ५३१ ।। अथ दशम्याः प्रतर्दन ऋषिः । सोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । पवस सोम मधुमाँ नावापों वसानो अघि सानो भव्य अब द्रोणानि घृतान्ति रोह पादेन्तमो मत्सरः इन्द्रपानः ॥ १० ॥ ५३२ ।। इति पष्ठः खण्डः । भथ सप्तमः खण्डः ।। २३ २३ - ३। ३२ ३iz ३ २ ज तत्र प्रथमायाः प्रतर्दन ऋषिः । सोनो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । प्र सेनानी शुग ने रचानां गव्यं नैति हर्पते अरूप सेना । भद्रान कर निन्द्रहवान्तमखिामा सोगों बना रभसानि दत्ते ॥ १॥ ५३३ ॥ हे इन्द्र ! फजदातार यह श्री सोमरस तरे लिये । माधुर्गयुत वर्ष पवित्रे सति टपकत जात है ।। यह सहनों को देत शत को देत अतिधान देवता। श्री वली सोम पुराण गरन में धान निज करता हुगा ॥९॥५३१ ।। हे सोग ! मीठा त वसतिबरि जलों को ढकता हुआ । भत्युच्च ऊनी पवित्र में मध्य से वह जावना ।। पुनि अति सुनद इन्द्रार्थ पीने योग्य रस को देवता । श्री जल पहित श्री द्रोणघट में प्रकट होता जावता ॥ १० ॥ ५३२ ।। इति पाठ खण्ड । मथ सप्तम खण्ड का प्रारम्भ ॥ श्री सेनानी शौर्ययुक्त श्रीसोमनागरस | यजमानों की गऊ भादि पशु फी रुचि राखत रथावली के अग्र भली विधि रण में जावत । इस श्री सोम कि चमू बहुत संतुष्टि धरावत ।। श्री यष्टार्थ सुरेशहित भाकाहन सुखयुत करै । शीघ्र खुलापन वसन सम छादक दुग्धहि लेत है ॥ १॥ ५३३ ।।

२.३
२ ३१२
३ २३
२ ३.२
३१२
२२
६२
३ १२३ १२
१ २३२३
३
(१६८)
अंध द्वितीयाया। पराशर ऋषिः । सोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः ।
प्र ते धारा मधु पतीरसग्रन्तारं यत्पूनो अत्यव्यम् ।
पवान पंचसे धाम गोनी जनयल सूपमपिन्बो मः ॥ २ ॥ ५३४ ॥
अथ तृतीयामा इन्द्रप्रमतिर्वासिष्ठऋषिः । सोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः ।
प्रगायलायचीम देवासोपं हिनोत प्रहते धनाय ।
स्वादुः परतामतिवारपव्यमासीदतु कलशं देव इन्दुः ॥ ३ ॥ ५३५ ॥
अथ चतुर्गा बलिष्ठ ऋषिः । सोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः ।
पहिचानो जनिता रोदस्यो रथो न वाजं सनिपनयासीत् ।
इन्द्रं गच्छन्नायुधा शिशानो विश्वा चमु इस्तयोरादधानः ।। ४ ।। ५३६ ।।
३१
२
३२.३ २३२
२
३१२
२२
१२ ३१
२ ३१र
२२
३१३१२
३ १ २ ३
२
७ २३ १ २
३१
२
तेरी मीठी धारायें तब छोड़ी ज'वत ।
जब तू वस्ती बरी जलों में शुचि होजावत ।।
अनि नातणे से छन कर पात्रों बिच जावन ।
सोम ! गऊ के पयहिं लक्ष्य करि क्षरित हुजावत ॥
पुनि सुपिद्ध होता हुआ तू प्रशस्य द्युतिपुंज से |
श्रीयुत भास्कर देव को भलि विधि पूरण करत है ॥ २ ॥ ५३४ ॥
स्तोता लोगों ! भली भाँति सोम कि स्तुति गाइय ।
हम सब तो श्री देववृन्द का करते अर्चन ||
अति धन औ अभिपव निमित्त श्री सोमहि प्रेरियं ।
पुनि रस अनि पवित्र सेति छन करके चरसिय ॥
श्रीयुत सोमाभिध सुरस दीप्तियुक्त होता हुआ ।
शाभिमुख हो श्री द्रोणघंट तिस के बिच स्थित होवना ॥ ३ ॥५३५॥
याजक प्रेरित तथा धरणि अरु श्री प्रकाश हैं।
श्रीयुत वर्षण तथा हग द्वारा प्रकटावत ।।
अन्न-प्रदाता और भायुधों के समुदायन ।
उत्तमरीति प्रयोग सेत्ति अतितीक्ष्ण बनावत ॥
विविध धनों के वर्ग को हम सब को देने लिये।
हाथों में धरता हुआ सम्मुख भागम करते हैं ॥ ४ ॥ ५३६ ॥

(१६६ )
-
..
२
३
अध पचम्पाः मृडीको वासिष्ठ अपि । मोमो देता । त्रिष्टुप् छन्दः ।
समदी मनमो बननो दाग ये टस्मध तोरनी ।
भादीमायन्दगमावावशाना जुध पनि लल शे गान इन्दम् ।। ५ ।। ५३७ ॥
अथ पष्ठया: गांधा मानिः । सोपा देवना । शिप् छन्दः
साकमुक्षों मगन्त नसागे दश धारस्य धीतयो धनुषीः ।
उरिः पपंद्रवजाः स्यम्य द्रोणं नमक्ष अत्यो न मानी ॥ ६ ॥ ५३८ ॥
पथ सप्तम्या: काण्वो घौरापिः । मोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः ।
मधि यदरिमन्नाजिनीव शुभा गर्द्धन धियः मृर न विशः ।
सपाहणाना पवते कनीयान्त्र जन्न पशुपद्धनाय मना ॥ ७॥ ५३६ ।।
वामिछरा तांता की सुवाणि जिसको हाधवायत ।
मन में स्तुति के योग बन जांग स्थिति पाना ||
सार यह स्तोता कि भारती सोग मगायत ।
पुनि उत्तम सुग्वृन्द हपं को पूर्ण जनगनत ।।
पालक घट में ठहरती इस सोग िचहती हुई।
श्री गायें निज दुग्ध से गिला देन को भावती ॥ ५ ॥ ५३७ ।।
एक साथ ही सींचत नाना काम पनायत ।
इन उन अलि पलत सोम को शुद्ध करावत ॥
दश गलिय देववृन्द द्वारा जो वांछित ।
ऐसा जो श्री सोम सुरस उसको प्रेरत रहै ।।
पुनि श्री सोग हरा रवि कि मिशि परितः चलता रहे।
गगनशीळ घोटक मरिस सोग फलश में बात है. ॥ ६ ॥ ५३८ ॥
जय इस रस के विषय अश्व के छालंकार सम ।
जगा रवि में फिरणालि तथा अंगुलिगण स्पर्द्धत ।।
तदनन्तर वद सोग वसतिवरि जल को ढांकत ।
स्तोतालों को चहत द्रोण घट के बिच मावस ।।
जैसे पशु की वृद्धि हित रक्षणीय स्थल गोष्ठ है।
एम में श्रीगोपाल तस स्रोग तहाँ पे जात है ॥७॥ ५३६ ॥

3 २३ ३ २ ३१२३ ( १७०) प्रधाष्टम्पा मन्युसिष्ठकपिः । सोमो देवता । निठुर् छन्दः । इन्दुजी पवते गौन्योघा इन्द्रे सामः सह इन्चन्मदाय । इन्ति रक्षो बाधते पर्यराति वरिवस्कृण्वन्यजनस्य राजा ।। ८ ॥ ५४० ।। अध नवम्याः कुत्सपिः । सोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । अया पवा पच स्वैना वसूान मांश्वत्य इन्दो सरसि प्रधान । मनश्चिद्यस्य वाता न जूति पुरुमेधाश्चित्तकवे नरं धात् ॥ ६ ॥ ५४१ ॥ अथ दशम्पाः पराशर ऋषिः । सोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । महत्तत्सोगो पहिपश्चकारापा यद्गोवृणीत देवान् । • अदधादिन्द्र पवमान बाजो जनयत्सूर्य ज्योतिरिन्दुः ॥ १० ॥ ५४२ ॥ १ २ ३२ २३१२ ३१ २ ३ २.३ २ ३ ३१२ २२ अर क्षरणशील बलशालि निम्नगागी श्रीरकगण | इन्द्र-हेतु पुरुषार्थ-दाइ रस को प्रेरत रह ।। यष्टा को धन देत तथा श्री बल का अधिपति । ऐसा सोम सुरेश देव को हर्प देन हि ।। पात्रों विच टपकत रहत उसुरों को संहारता । और चहूं दिशि रिपुन को अति बाधा पहुंपावता ॥ ८ ॥ ५४० ॥ श्रीसोम ! इस धारा सहित न धनों को घरमाइयो । हे इन्द्र ! तू महामान्य नहाती धरि कलश विच जाइयो । गारुत सरिस जिहिं सर्वमूला दित्य ने वेग धरा । भौ सर्वज्ञाता इन्द्र भी जिस सोम को पाजावना ॥ ९॥ ५४१ ॥. श्री महासोम-विशिष्ट उस सत्कर्म को करता रहा । जो जलों का गर्भस्वरूप यह सुरों को सेरहा ।। पवगान श्रीसुरराज में पुरुषार्थ को धरता रहा। भरु सोम ने श्री सूर्य में द्युतिपुंज को प्रकटित किया ! १० ॥५४२।।

(१७१)
३२३२३२३ १२
३२ २.३ २३
३
अ
३२३१२
३३.३
३
३
क २२
बथैकादयाः कश्यपऋषिः । सोनो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः ।
पनि क्या यथाजी धिया मनाता मा मनापा ।
दशवसाग अघि सानो भव्ये मृजन्ति चहि सदनेष्वच्छ ॥ ११ ॥ ५४३ ।।
अथ द्वादश्याः प्रस्कएव ऋषिः । लोमो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः ।
अपामिवेदूर्प यस्ततुराणाः प्र मनीषा ईरते सोममच्छ ।
नमस्सन्तोषचयन्ति सञ्चाच विशन्त्युशती रान्तम् ॥ १२ ॥ ५४४ ॥
इति सारमः खण्डः।
अथाटसःवराड:॥
तत्र प्रथमायाः स्यावाश्विषिः । पवमानो देवता । अनुष्टुप् छन्दः।
पुरोहितोको भान्धसः सुताय मादयित्नचे ।
अप श्वान श्वाधिष्ट न सखायो दीर्घ जदया ॥ १ ॥ ५४५ ।।
श्री सुरचित्ताकर्षक, अरु मुखिया भलि विधि स्तुत ।
ध्वनि करता श्री सोग यज्ञ में स्तोत्रवर्ग अंग ।।
जैसे रण में घोड़े को संसृष्ट बनावत ।
वैसे उत्तम रीति सेति संयुत हो जावत ॥
मख-गृह विच दश उँगलिगे सुखद सोम को पात्र में।
ऊंच स्थान ऊनी पविने से सम्यक् प्रेरती ॥ ११ ॥ ५४३ ॥
जैसे जनों की तरंग अति त्वरा को धारण करें।
त्यों देवपूजक यज्ञकर्ता सोम प्रति स्तुति प्रेरते ।।
स्तुतियाँ करति सरकार वांछित उस सुरसडिंग जांति हैं।
संयुक्त हो उस में स्वकीय प्रवेश को त पाति हैं ।। १२ ॥ ५४४ ॥
पंचमाध्याय का सप्तम खण्ड समाप्त ॥
अष्टम खण्ड का भारम्भ
हे मित्र स्तोताओं ! तुम्हारे निकट जिन्ह के जय रहे।
अम्र हर्षप्रद औ प्रकट हुआ श्री सोमनामक सुरस है ।।
उस दिव्य रस के लिये लम्बी जीभ को ओ धारते ।
भस 'कुकु(दिक वा असुरंगण को भलग इटवाइये ॥ १ ॥ ५४५ ॥

(१७२ ) ३२३२ ३२ 3 १२ २ अ २ 3 १२फ २र ३१२ ३.२ 3 २ 33 २ 3.१२ । 3१२ ३१ ૨ ३ १ २ १ २ ३१ २ उ २ 3 ३१ २ 3.१२ ३१२ २ ३१२ ३ १ २ बथ द्वितीयाया ययाति षषिः । पवमानो देवता। अनुष्टुप् छन्दः । अयं पूपा रायर्भगः सोमः पुनानो सर्पति । पतिर्विश्वस्य भुपनी पख्य द्रोदसी उभे ॥ २ ॥ ५४६ ।। सक्ष तृतीयाचा ऋष्यादयः पूर्ववत् । 3 २३१२ सुतासो मधुमत्तमा: सोमा इन्द्राय मन्दिनः । पवित्रवन्सो अक्षरन् देवान् गच्छन्तु वो गदा। ॥ ३ ॥ ५४७ ।। अथ चतु। मनुः सांवरणऋषिः । पवमानो देवता । अनुष्टुप् छन्दः। सोमाः पवन्त इन्दवो ऽस्मभ्यं गातुवित्तमा । २३१२ २ मित्राा स्वाना अरेपसा स्वाध्यः स्वर्विदः ॥ ४ ॥ ५४८॥ अथ पञ्चम्या जिवाम्बरीषौहावृपी।पषमानो देवता। अनुष्टुप् छन्दः । अभी नो वाजसातयं रयिमर्पशतस्पृहम् । इन्दो सहस्रभर्णसं हविद्युम्न विभासाम् ।। ५ ॥ ५४६ ।। श्री सर्वपापक सेव्य धन की प्राप्ति का कारण यहै । श्री पवित्रे से शुद्ध सोम सुकुंभ के पिच जात है ।। श्री विश्ववर्ती प्राणियों की पालना करता हुआ । श्री धरणि और प्रकाश को निन तेज से चमकावता ।। २॥ ५४६॥ अत्यन्त ही माधुर्य-युत अानन्द को उपजानते । अस प्रकट सोम दशा पवित्र पिशेष पै स्थिपि पावते ॥ इन्द्रार्थ पात्रों के विषं अतिक्षरण को पाते हुए । सोगों ! तुम्हारे दिव्य रस इन्द्रादि को मिलजाइ हैं ।। ३ ।। ।। ५४७ ।। श्री दिव्यगुण-सम्पन्न पथ के निकट में लेजावने । श्री देवगण के गिन उत्तम रीति से शोधे हुए । निर्दोष श्रेष्ठ प्रकार सेती ध्यान को फरवावते । श्री स्वर्गप्रापफ दीप्त सोम हमार हित को भावते ॥ ४ ॥ ५४८॥ श्री दीप्ति-संयुत सोग ! शतशः जनों के स्पृहणीय हो । श्री सहस्रों को पालने अत्यन्न अर यशवन्त हो। अत्यन्त भास्वर तथा श्री बलदाइ सुत औ वित्त. जो । उनको हमारे वृन्दहित भलि भाँति प्राप्त कराइयो ।। ५॥ ५४९ ।।

३१ २ ३१२ ३१ २२३ २ ३ १र २२ ३१२ (१७३) अथ षष्टयानलसूदू काश्यपी अपी । परमानो देवता । अनुष्टुप् छन्दः । अभी नवन्ते भएः प्रियपिन्द्रय काम्यम् । पल्सं न पूर्व आयुनि जातं रिहन्ति मात ॥ ६॥ ५५.० ।। अथ लहस्या ऋषिदेवते प्रोक्ते । वृहत्ती छंदः । मा इयुताय धृष्णवे धनुष्टन्वन्ति बौल्यम् । शुक्रा विपन्त्यमुराय निर्णिजे विपामग्रे महीनः ।। ७ ।। ५५१ ॥ अधाष्टम्या विषयावरीषाकृषी । ममानो देवता । अनुष्टुप् छन्दः परित्यं हर्यत हरि वम् पुननिय वारेण । यो देवान्विश्वा इत्परि मदेन सह गच्छति ॥ ८ ॥ ५५२ ।। १ २.३१२ १२ ३२ 3 १२ अर + ज्यों वत्समाता गर्ने पहिली आयु में प्रकटे हुए । अस बाछड़े को प्रेमयुत व्यवहार से चाटति रहें । त्यों द्रोह सेत्ति विहीन वसतीवरी नाम नीर जे । ने इन्द्रप्रिय कमनीय सोमहिं भली विधि मिल जादते ॥ ६ ॥ ५५० ।। सम्पूर्ण से स्पृहणीय रिपुहन्तार सोमहिं पावने । पुरुषार्थ द्योतक श्रेष्ठ धनु पै प्रत्यंचा चढ़वावते ।। विद्वजनों के सामने अध्वर्यु सत्कृति चाहते । श्री धवल पय को सबल रूपहिं शोधने ढक देवते ॥ ७ ॥ ५५१ ।। सर की स्पृदा के योग्य हरित सुवभ्रु वर्ण धराव है। उस मोम को ऊनी पवित्रे सेति शुद्ध बनात हैं ।। जो सोम. सन इन्द्रादि नाना देव के ही वर्ग को। भानन्ददाई सुरम के संग प्राप्त हो तो जावतो ॥ ८ ॥ ५५२ ।। + तात्पर्य यह है कि यह एक प्रकार से सोम की धारा छोड़ने के लिये फैलाये हुए पवित्रे का वर्णन है।

१ २ ३१र २र७ २३ १ २३ १र २२ 3 १२ ३१ २ 3 २३१२ २२ १ २ ३२ 3 २३ .. १ .१ २३ 3 १ २३२३२३१२ 9 (१७४) अपनवाया। प्रजापतिषिः । पपमानो देवता । अतुष्टुप् छंदः ।। प्रसुवानायाम्पसो मर्तो न वष्ट तद्वचः । अप वानराधसं हतामखन भृगयः ।। ६ ।। ५५३ ॥ इति पंचमाध्यायेऽष्टमः खण्डः ।। नथ नवमः खण्डः ॥ तन्त्र प्रधनाया फपिषिा पचमानो देवता । जगती छंदः॥ अभिप्रियाणि परत च नो हितो नामानि यहाँ मषि येषु बढे । मा सूर्यस्य बृहतो वृहन्नधिरयं विष्वञ्चमरुद्विचक्षणः ॥ १ ॥ ५५४ ॥ अष द्वितीयाया ऋष्यादिकं पूर्ववत् ।। प्रचोदसा नो धन्वन्त्विन्दवः प्रस्पानासो वृषदेवेपु हरयः । विचिदनाना इषयो अरातयोों ना लन्तु सनिपन्तु नो धियः ॥ २॥ ५५५ ॥ .. श्री शुद्ध गुणयुत सोम के विख्यातियुत उस वाक्य को । सत्कर्म लोपफ होय वह न फदापि सुनने पाइयो । स्तोताजनों ! ज्यों दक्षिणा से हीन ऐसे याग को । भृगुगणों ने सरका दिया त्यों कूकरे को ताहियो ।। ९ ।। ५५३ ।। इति मष्टम खण्ड ॥ अथ पाम खराड का सारस्स। भोजनाई हितकारि जगत्पालक जल-वहिं। श्रीयुत सोम समस्त दिशांपों से मिल जाइय ।। जिन नीरों में महा सोम यह अति बढ़ जावत । पुनि वह सोम महत्वयुक्त महिमा को पावत ।। श्रेष्ठ सूर्य के सर्वतोगमनकारि रथ के उपरि । सवा द्रष्टा होय फे पारोहण करता रहत ॥ १ ॥ ५५४ ॥ श्री प्रेरणा विन हरित उत्तम रीति से शोधे हुए। अप सोम हमरे अमरगणयुत मखों के पिच माइ पुनि कृपण शत्रु हमार अन्न कि रुचि रखत भूखों मरें। श्री देव विषयक स्तोन हमरे श्री सुरों को प्राप्त हूँ ॥ २ ॥ ५५५ ।। हैं ।

30 ३२ ३ १२ 39 २ ३ २ ३ २१३३१२ १२३१२ अ २३१ २ ३ २.३ १ (१७५ ) अथ तृतीयाया ऋष्पादप उक्तवत् ।। एप प्रकोश मधुमाँ अचिक्रददिन्द्रस्य वज्रो वपुषो वपुष्टमः । अभ्यु३तस्य सुदुघा घृतश्चतो वाश्री अन्ति पयसा च धेनवः ॥ ३ ॥५५६ ।। अथ चतुर्थी ऋषिगणऋषिः । पचमानो देवता । जगप्तीछंदः ।। मो प्रयासी दिन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतं सखा सख्युन प्रपिनाति सङ्गिरम् । मर्य इस युगतिभिः समर्षति सोमा कलशे शतपापना पंथा ।। ४ ॥ ५५७ ।। अथ पंचम्बाः कविर्भार्गवऋषिः । पवमानो देवता । जगती छंदा॥ धता दिवः पवते करव्या रसौ दक्षो देवानामनुमायो नृभिः । सृजामो भत्यो न सत्वभिषा पाजांसि कृणुपे नदीष्वा ।। ५ ॥ ५५८ ।। श्री सुरेन्द्र का वज्र रूप वप्ता से भतिशुचि। यह मधुरता-युक्त सोम श्री द्रोण कलश विच ॥ लखने में नहिं आर अम्रा भव्यक्त शब्द तिहिं । श्रीयुत मख के कृत्य होत रह करत रहत तहँ ।। सत्यफला श्री सुखद् फल जन देती ध्वनि को करत । सोम-धार पय देवनी धेनु तुल्य मिलती रहवं ।। ३ ।। ५५६ ॥ श्री सोम सुरपति शुभोदर में अधिकता से जावता । श्री सखा ( सोम ) मिनोदर निगीर्ण तिसे न दुख पहुंचावता ।। ज्यों तरुण तरुणी से मिले त्यों वसतिवरि से यह मिले । वह सोम शतरन्ध्री पविन्ने मार्ग से घट में धसै ॥४॥५५७।। २ श्री धारक, शुद्धथई सुरस सुरंगण वलदायक । ऋत्विग्जन का पूज्य हरित रंग सोग धरावत ।। अन्तरिक्ष-स्थित दशा पवित्रे से शुचि होवतः । हम सब प्राणिन से प्रकटित होजावतः । जैसे घोटक यत्न मिन यात्रा को करता रहै.. से नेगों को वसतिवरि-प्रवाह में करता है ।। ५। ५५८ I आकर :

१ २
३१
9
३ २3.
३१र
२२ ३२
३१र
२र
3.9
३.१ २ ३
9
२३.२ ३.१
૨
अथ षष्ठयाः कविषिः पवमानो देवता । जगती छन्दः॥
वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो भहां प्रतरीतोषसां दिवः ।
भाणा सिन्धूनां कलशां अचिक्रददिन्द्रस्य हार्याविशन्मनीषिभिः ॥६॥५५६।।
अथ सप्तम्या रेणुर्भागवऋषिः । पचमानो देवता । जगती छन्दः ।।
निरस्पै सप्तधेनवो दुहिरे सत्यागाशिरं परमे व्योपनि ।
चत्वान्या भुवनानि निर्णिजे चालणि चक्र यहतरवर्द्धत ॥ ७ ॥ ५६० ॥
अथाष्टम्या नो भार्गव ऋषिः । पधमानो देवता । जगती छन्दः ।।
इन्द्राय सोम सुपुतः परिस्रदापामीवापरतु रक्षसा सह ।
माते रसस्य मत्स्हत स्याविनो द्रविणवन्त इह सन्त्विन्दनः ॥४॥ ५६१ ॥
१
२
३१२३
१.२३.१२.२२
३१२
३.२
३१२
३ २ ३१ २
३२ ३
१ २
वाछित-वर्षक अतिद्रष्टा दिन और उपा का ।
श्री धुलोक आदित्य देव का उन्नतिदाता ।।
ऐसा वह श्रीसोम भली विधि सिद्ध होवता ।
जलवर्गों से पूर्ण सोम स्तुतियों को पाता ||
श्री सुरेश के हृदय में निज प्रवेश चहता हुआ ।
छलशों के प्रति धार ने चुसता ध्वनि करता रहा ॥ ६ ॥ ५५९ ।।
श्रेष्ठ यज्ञ में स्थित ऐसे इस सोग सुरस हिस ।
इक्किल गायें सत्य दुग्ध पात्रों विच पूरति ।।
बारह मास तथैव पाँच बरतु तीन लोक रवि ।
ऐसे मिल इहोस धेनुओं में पय देवत ।।
इस प्रकार वह दुग्ध औ सोम मखों से बढ़त रह ।
तब वसतीवरि चार जल शोधन सुखरूंपहिं करत ॥ ७॥ ५९०।।
हे सोम ! तू निष्पन्न इन्द्र-निमित्त रख भल छोड़ियो ।
प्रौ रोग राक्षस के सहित अति दुर पै हो जाइयो ।
तुव सुरस के निज अंश झोपी मदसहित नहिं होई हों।
सत्यानृती (पापा) तुव रस मखों में हमारे लिय धनिक हो ॥८॥५६१॥

१ २ ३ १.२ ३२उ ७.२३३ २ ३१र २२ 3 ३२७ 3 २३.२ २३ २3 ३१२ ३१२ २२क र (१७७) अथ नवस्या भरद्वाजो वसुऋषिः । पवमानो देवता । जगती छन्दः । मसावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेच दरमो प्रभि गा अचिक्रदत् । नाना वारमत्यष्पव्यय श्येनीन योनि घृतवन्तमासदत् ॥ ६ ॥ ५६१ ॥ अथ दश्याः वस्त्र प्रीषिः । पवमानो देवत्ता। जगतीछन्दः ।। प्रदेवमच्चा मधुमन्त इन्दवासिष्यदन्त गाष पान धनवः। बहिपदो वचनवन्त ऊषभिः परिवृतमुनिया निर्णिजं गिरे ॥ १० ॥ ५६३ ॥ अधैकादश्या अतिक्रषिः । पवमानो देवता । जगती छन्दः । अञ्जते व्यञ्जते समजते क्रतुं रिहन्ति मध्वाभ्यञ्जते । लिन्धोऽछा से पत्यन्तमुक्षणं हिरण्यपानाः पशुगप्पु गृभ्णये ॥ ११॥ ५६४ ॥ फान्तियुक्त श्री सर्व सिद्धियों को वरसाव । पापहारि वा हरित सोम-संपादित होवत ॥ श्री नरपति सम दर्शनीय जल और लक्ष्य फरि । निज रस देते समय शब्द अव्यक्त करत रहा पुनि विशुद्ध भेड़ी कि श्री अनि पवित्रे से छनत । श्येन सरिस निज का सदन जलमय तहँ चलि जात है ॥ ॥ ५६२॥ श्री मधुर सोम सुरेश प्रति पानावली विच आवते । ज्यों स दुग्धा गायें स्ववरसों हेतु पय टपफाति हैं। औ यज्ञ में स्थित भाती गायें सपय निज गादि ले। चहुँ ओर स्त्रवत सुदुग्ध स्रोमहिं इन्द्रहित धरती रहें।॥ १०॥५६३॥ ऋत्विज सोमहिं गायों के पय से मिलवावत । विधिद्वारा मिलवात भली विधि सेती योजत ।। श्रीसुरवलप्रद सोम सुरस का स्वाद लिवावत । भरु श्रीगोघृत से उसको मिलवात सतियुत ॥ उस सोमहिं जल का अधार उच्चदेश तह जायते । सिंचक स्वर्ण विशुद्ध कर तिहिं दर्शकपन से पावते ॥ ११ ॥ ५१४ ।।

(१७८) 33 २ ३२३१ २३ २२ . २३१ २३२ र २२ ३ १२ ३२ ३२३१ २ ३१२ १ २ ३ १२३.१ २ २१ २ ३२ ३ २ ३१२ ३१२ अधहादश्याः पविनऋषिः । पचमानो देवता । जगती छन्दः । पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुगावाणि पयपि विश्वतः । अतप्ततनून तदापो भभुते शृतास इद्वहन्तः सन्तदाशत ।। १२ ॥ ५६५ ।। इति नवमः खण्डः। अथ दशमः खण्डः ॥ तत्र प्रथमाया अग्निश्चाक्षुषऋषिः । पघमानो देवाला । उष्णिक्छन्दः । इन्द्रगच्छहता इमे सपणं यन्त हरयः । श्रुष्टे जातास इन्दवः स्वर्विदः ॥१॥ ५६६ ॥ अथ द्वितीयायाश्चक्षुर्मानचऋपिः । पवमानो देवता । उष्णिक्छन्दः । म धन्वा लोम नागृविरिन्द्रायेन्दो परिस्रव । झुमन्तं शुष्मपाभर स्वर्विदम् ॥ २ ॥ ५६७ ॥ मंत्रराज श्री सोम ! अंग तुव उज्जल विस्तृव । शक्तिवन्त तू पीय तिन्होंके अंग को पावत ॥ चहुं दिशि तुव उस शुचि पवित्र से जिसका संभव । पयोव्रतादिक सेति जासु नहिं हुआ तप्तततु ।। अस परिपाफविहीन नहिं व्याप्तियुक्त होनात है। पक्क हि मखनिर्वाह फरि उस पवित्र में व्यापते ॥ १२ ॥ ५६५ ।। इति नवम खण्ड समाप्त । अथ दशम खण्ड का आरम्भ। श्री शीघ्रता से बननवारे पान विध टपकत रहे। सर्वज्ञ श्रीयुत हरित रंग सम्पन्न संपादित हुए । उपरोक्त गुण संयुक्त ऐसे सोमसंज्ञक सुरम श्रीकामवर्षक इन्द्रनामक देव को मिलजाइ हैं ॥ १ ॥ ५६६ ॥ हे सोम ! जागृतिशील तू पानावली विच प्राप्त हो । हे सोम ! इन्द्र निमित्त चहुं दिशि पात्र माही बरसियो । श्रीदीप्ति से सम्पन्न श्रीयुत स्वर्ग प्राप्त फरावने । रिपुवर्ग के नाशक बलों को भली भांति दिलाइये ॥ २ ॥ ५६७ ।। हैं १ २ ३२३२ २२ र ३२ ३२३१२ वः सखायो ३२३ २ ३२३१२३१२३२ १२ २३१२ ( १७६ ) आप तृतीयाचा पर्वतमारदापी । पचमानो देवता । उष्णिचन्दः । सलाय मानिपीदत पुनानाय भगाया। शिशुन्न पग परिश्रूपक श्रिये ॥३॥ ५६८ ॥ अथ चतुर्थी ऋज्यादय उक्तवत् । मदाय पुनानमभिगायत । शिशुभ हव्यः स्वदपन्य मूर्तिभिः ॥ ४ ॥ ५६६ ।। अथ पंचम्याशित इषिः । परमानो देवता । उष्णिक छन्द।। माणा शिशुमहीनां हिन्वन्नृतस्य दीपितिम् । विश्वा परिपिया भुवदधद्विता ॥५॥ ५७०॥ अथ पष्ठ्याः लतुषिः । पवनानो देवता । उष्णिक छन्दः । पदण देवीतय इन्दो धारागिरोजसा । मा पालश मधुपान्त्सोम ना सदः ॥ ६॥ ५७१ ॥ हे मित्र स्तोताजनों ! स्तुति को करन प्राय विराजिये । श्रीशुद्धियुत सोमार्थ श्री-सम्पन्न साम उचारिये । जैसे पिता निज पुत्र को भूपादि से भूपित परै ॥ तैसे इसे ( सोम ) शोभार्थ उत्तम इव्य से शोभित रे॥ ३ ॥५६८॥ हे मित्र ऋत्विज्जनों ! तुग श्री सुरों को सुख देवने । भनि भांति से सम्पन्न उस श्री सोम की स्तुति गाइये ॥ श्री घालकों के तुल्य नाना हव्य के समुदाय से नौ विविध श्रीस्तुतिवर्ग द्वारा स्वादयुक्त बनाइये ॥ ४ ॥ ५६९ ।। श्रीयज्ञपूरक पूज्य जल-समुदाय का शिशु तुल्य है । अस सोम मख के प्रकाशक निज सुरस को प्रेरित करै ।। सम्पूर्ण हव्य-समूह तिन्ह में भली विधि से व्यापता । दिवलोफ औ भूलोक दोनों स्थान पें स्थिति पावता ॥ ५ ॥ ५७० ॥ हे सोम ! श्री सुरवृन्द के तुम भोग में पाने लिये। मलयुक्त धारा सेति पात्रों बीच पूरित हूजिये । भी सोम ! अत्यानन्ददायक रसों को बरसावता । अद्रिोण घट जो हमारा है तहां स्थिति को पावमा ॥ ६ || ५७१ ॥

१२ ३१र २२ ४३ १ २ १ २ ३ १२३२३ १ २३१२ 3१र २२ ३१ २३.१२ ३२३२३ ( १८० ).. अध सप्तम्या अग्निषिः पवमानो देवता । उष्णिक छन्दः । सोमः पुनान ऊर्मिणाव्य वार विधावति । अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत् ।। ७ ।। ५७२ ।। अधाष्टम्याः द्वितऋषिः । पवमानो देवता । उष्णिक छन्दः । म पुनानाय वेधसे सोमाय बच उच्यते । भृति न भरा मतिभिर्जुनोपते ॥ ८॥ ५७३ ।। अथ नवम्याः पवतनारदावृषी । पवनानो देवता । उष्णिक छन्दः । गोमन इन्दो भश्वमत्सुतः सुंदक्ष निवः । शुचिं च वर्णमधि गोषु धारयः ॥ ६ ॥ ५७४ ॥ अथ दशम्या ऋष्याद्या पूर्ववत् । अस्मभ्यं त्वा बसुचिदमभि वाणीरनूषत । गोभिष्ट वर्णमभिवासयामसि ॥ १० ॥ ५७५ ॥ शुद्धियुत स्तुति के अगाड़ी शब्द को करता हुमा। भलिभांति श्रीयुत सोमरस उत्पत्ति को पाता हुमा ।। अम सुरस धारा सेति ऊनी पवित्रे से निकलता । नाना प्रकारों से गमन करता हुआ वह जांवता ॥ ७॥ ५७२ ॥ स्तोता कहे हे जीव ! श्रीयुत पवित्रे मे शुचि हुआ। श्रीकर्मधाता सोमके लिय गुणस्तुति को बोलना । भौ स्तोत्र से संतुष्ट के लिय अधिक स्तोत्र बस्त्रानना । जिम रीति में संवापरायण को सुवेतन देवते ॥ ८॥ ५७३ ।। श्री पराक्रम सम्पन्न स्रोम ! सुरीति से प्रकटा हुभा गायों सहित घोड़ों सहित धन हम सबों को देवनी ।। पुनि शुद्धि से संयुक्त और प्रदीप्ति को धरता रहै। अम सुरम को गोरस विर्षे भाल भांति मैं पावता ॥९॥.५७४ ॥ हे मोम धनदाता तुझे धन आदि हमको देवने हम सबों की श्री माणिय सर्व भांति तुव यश गाति हैं। मौ सभी याज्ञिक लोग हम तुव रसहि गोदुग्धादि से । सब भोर में वा भली विधि रक्षित तथाऽऽच्छादित करें॥१०॥ ५७५।।

२३१२३ २ ३१ २ ३२३५२ घयतादया अग्निशानुषविर पदान्नो देवता । उष्णिक् छन्दः । एक इयतों रितिषि रखा। सभ्यः स्तोत्भ्यो दीरलयमाः ॥ ११ ॥ ५७६ ॥ अथ हादश्याः हितषिः । पकसानो देवता । उष्णिक छन्द परिपोर्श मधुश्चत सोमः पुनानो पार्षति । अभिवाणी पीणां सप्तानपच ॥ १२ ॥ ५७७ ॥ इति दशमः खण्डः ॥ इत्यौष्णिहम् ।। 1 ३२७ ३१२ ३१२ अथैकादशः खण्डः। --10:- ३१ २ 3.१२३१२ १.२ ३१२३ १२ तन प्रथमायाःगौरिवीतिशास्त्य ऋषिः। पचमानो देवता। ककुप्छन्द पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम ऋतुवित्तमो पदः । महिं वृक्षतमो मदः ॥ १ ॥ ५७८ ।। स्टणीय हरित सुरंग सोम अतीव सुन्दर थेग से । तिरछे पवित्रों मध्य में से निकल करके जात है। हे सोम ! तुम स्तुति करन वाले याक्षिकों के वृन्द को । श्री वीर पुत्र समेत उत्तम कीर्ति सब विधि दीजियो ॥११॥ ५७६ ।। वह दिव्य गुणयुत सोम श्री माधुर्य टपात सुरल को। श्री द्रोणनामक कलश में भलि भांति से पहुंचावतो ।। इस सोम को श्री सप्त छन्दोबद्ध ऋषि की वाणियां । श्री यज्ञ के विच रीतिपूर्वक गान करत मनाति हैं ॥ १२ ॥ ५७७ ॥ इति दशम खण्ड समाप्त ॥ एकादश खण्ड का.प्रारम्भ। हे सोम अति माधुर्ययुत प्रज्ञा व कर्म दिलावना । श्री पूजनीय प्रषीप्त मंगल मोद को उपजावना ।। श्रीयुक्त इन्द्राभिध सुरेश्वर देव को हर्षावने । भानन्ददाता होयकर श्री शुद्ध वर्षण कीजिये ॥ १॥ ५७८ ।। २४ २२ ૩ ૨ ૨ १ ३१२ ३२३१२ २र३ १२ ३१२ ૬ ૨ ૨ ૧ ૨ ३२३ , २३१२१२ ३१ २ 3१२ 3 १२ 3 २२७ २ २२ (१८२) अथ मितीयाया ऊसद्मा प्रषिः । पचमानो देवता । ककुप् छन्दः । अभियुम्नं बृहद्यश इपरुपले दिदीहि देव देवयुम् । विकोश मध्य युग ॥ २ ॥ ५७६ ।। यथ तृतीयाचा ऋजिवाणिः । पचमानो देवता । ककुप् छन्दः । शासौतापरिपिञ्चतावन्न स्तोममप्तुरं रजस्तुरम् । वनप्रतमुदतम् ।। ३ ।। ५८० ।। अथ चतुः कृतयशा ऋषिः । पचमानो देवता । ककुप छन्दः । एतमु त्यं मदच्युतं सहस्रधार पमं दिपोदुएम् । विधा वसूनि विभ्रतम् ॥ ४ ॥ ५८१ ॥ अथ पंचस्पा वणव ऋषिः । पचमानो देवता गायत्री, पवमध्या, घा ककुप् छन्दो पा। २१ २२१ स सुन्चे यो वागी यो रायामानेता य इकानाम् । सोमो यो सुक्षितीनाम् ॥ ५ ॥ ५८२ ॥ श्री अन्नदाता स्तुत्य सोम ! सुरालि के तुम प्राप्य हैं अस मापकी हम सभी मिलकर प्रशंसा को गात हैं। श्रीदीप्त अन्न कि राशि भभिमुख होय हम को दीजिये । श्री अन्तरिक्षी जलद को वृष्टयर्थ विदलित कीजिये ॥ २ ॥ ५७९ ।। हे ऋत्विजों ! श्री स्रोम घोटक तुल्य द्रुतगति धारता । स्तुत्यई हो गगनस्थ जल को प्रेरणा दिलवावता ॥ श्री ज्योतिप्रेरक पात्र विस्तृत नीरगामी सोम को। अभिमुख करो चहुं ओर श्री वसती वरी से सीषियो । २।। ५८० ॥ श्री हर्य का प्रेरक भनेकन धार को धरता रहै । संपूर्ण वांछा सिद्धिप्रद सव धनों को धारण फरै ।। इन गुणों से सम्पन्न इस श्री सोमसंज्ञक सुरस फो । श्री देववृन्द-हितैपि ऋत्विग्वर्ग ने मिल दुहलियो ॥ ४ ॥ ५८१ ॥ जो धनप्रद जो दुग्धदात्री गवों को दिलवावता। जो भूमिदाता तथा उत्तम मनुज से मिलवावता ॥ उपरोक्त गुण समुदाय संयुत सोमनामक सुरस नह बरविजों के वर्ग से भलि भाँति प्रकटित हो गया ॥ ५॥ ५८२ ॥ २३ 9 २ ३ २ है।

२ २ ३१२ अ १ २.3: २ २१ २र ३ २२३०१ मथच्या शक्तिषिः । पवमानो देवता । ककुद् छन्दः । दं घांग व्यं पवमान जनियानि धुमत्तमः । अमृतत्वाय घोपयन् ॥ ६॥ ५८३ ॥ नथ जपतया उरुषिः । पवमानो देवता । ककुप् छन्दः । एषस्य धारया सुतो व्यावारेभिः परले मदिन्तमः । क्रीडन्नूमिरपापिय ॥ ७ ॥ ५८४ ।। अधाष्टम्या जिवा म्युषिः । पकानो देवता । ककुप् छन्दः । य एसिया भपि या अंतरश्मनि निर्गा अकृन्तदोजसा । भलिब्रज तनिष गव्यपश्यं वर्गीव धृष्णवरुन ॥ ८ ॥ ५८५ ।। इत्यकादशः खण्डः । इति काकुभम् । इति पंचमोऽध्यायः ॥ श्रीयुक्त हे पवमान सोम ! अतीव द्युति को धारसा । तुहि देवगण के जन्म भादिक को भजी विधि जानता ।। उन को अमरपद देन को अत्यन्त द्रुतगति धारता । श्री ऋविजों के वर्ग से अव्यक्त ध्वनि करवावता. ॥ ६ ॥ ५८३ ॥ अति हर्षप्रद जल ऊर्मि सम क्रीडादि को करता हुआ । वह यह श्रीयुत सोमनामक दिव्यरस अभिपुत हुभा ।। श्री भेड़ की जो ऊन उससे बने पवित्र विशेष से । निज धार द्वारा निष्क्रमण कर कलश में टपकत रहे ॥ ७॥ ५८४॥ जो सोम प्रसरणशील औ असुरालि से नभ में धरे । अस मेघस्थित जलवर्ग को बल से दलित कर देत है। वह सोम तु असुरालि-हृत गोवाजि भति फैलावता । हे शत्रुधर्षक ! कवाचि सम सुरावलिहिं विनस्रावना ॥ ८॥ ५८५ ।। इति श्रीमहंधीचवंशावतंमाजयमेरुनगराभिजन, त्रिपाठीत्युपाख्य राजगुरु पण्डित बदरीमालामज कविरत्न शिवदत्त काव्यतीर्थ प्रणीत श्रीसागामृतसिन्धोः पंचमस्तरंगस्समाप्तः । ...

नमः शिवाय
अथ पष्ठोऽध्यायः ।
-:०:
१२
३ १२.१ २२
२३
२
१२
३१२
२२ र
३१ २३१२
तत्र प्रथमाया भरद्वाज ऋषिः । इन्द्रो देवत्ता । वृहती छन्दः ।
इन्द्र ज्येष्ठ न भाभर मोनिष्ठं पुपुरि श्रवः ।
यदिधतेम पत्र हस्त रोदसी उगे सुशिष पमाः ॥ १ ॥ ५८६॥
अथ हित्तीयाया पसिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता। त्रिष्टुप् छन्दः ।
इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधिक्षमा विश्वरूपं यदल्य ।
ततो पदाति दाशुषे पसूनि चोददाय उपस्तुतञ्चिदछ ॥ २ ॥ ५८७ ।।
अथ तृतीयस्याः वामदेव ऋषिः । इन्द्रो देवता । गायत्री छन्दः ।
यस्येदपा रजोयुजस्तुजे जने वनं स्वः ।
इन्द्रस्य रन्त्यं वृछन् ॥३॥ ५८८ ॥
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३.२ ३ १२
३२
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३ २ २२
हे इन्द्र ! अतिस्तुतियुक्त औ अत्यन्त बल दिलवावना ।
अस पूर्तिकारक अन्न हम सब जनों को पहुंचावना ।।
हे वयाहु ! सुनास ! अन्न जिसे धरन हम चाहते ।
जिहिये धरणि आकाश धारै वह अन्न दिलाइये ॥ १ ॥ ५८६॥
जो इन्द्र सम पशुजाति अरु नरवृन्द का अधिराज है।
भूलोकवर्ती वित्त हो उसका भि श्रीसम्राज है ।।
इस हेतु हविदातार यष्टा को धनादि दिलावता।
वह देवे स्तुति से तुष्ट अभिमुख होय वित्त दिवावना ॥ २ ॥ ५८७ ॥
श्रीदीप्ति से सम्पन्न अति कमनीय सुरपति देवता ।
जिसका यहै स्तुति आदि से संयुक्त इवि यह हैरता !!
श्रीस्वर्ग में वा चहूं दिशि दानी जनों के मध्य में ।
भजनीय निश्चय अतः इन्द्र प्रदान श्रेष्ठ अनन्त है ॥ ३ ॥ ५८८ ॥

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अथ चतुः शुनाशेष अपिः। वरुणो देवता । चतुष्पाजगी छन्दः ।
घदुचम बरुण पाशमस्यदक्षाधाम विगध्यमं भयाय ।
प्रथादित्य व्रते चपन्यवानाग सो अदितये स्याट ॥ ४ ॥ ५८६ ॥
वध पंचम्या मृत्लनद ऋषिः। पचमानो देवता। चतुष्पाजगती छन्दः ।
स्वया बयपवमानेन लोपर भरे हयं विचिनुयाम मावन् ।
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति सिन्धुः पृषिती उत यौः ॥५॥ ५६० ॥
नथ पष्च्या दामदेव ऋषिः । विश्वेदेवा देवताः । एकपाजगती छन्दः।
इमं पण कृणुतै कमिन्माम् ॥ ६ ॥ ५६१ ॥
अथ सप्तम्घा अमहीयुक्रषिः । पयमानो देवता । गायत्री छन्दः ।
स न इन्द्राय यायचे वरुणाय मरुभ्यः । वरियोपिपरिस्रव ॥ ७ ॥५६२ ।।
हे वरुण ! ऊंची शीस दाली पाश हमरि फटाइयो ।
नीचा पगोंवाला भि फन्दा शिथिल भाप फराइयो ।
पिचले कमर फे फंद को ढीला भली निधि कीजियो ।
मादित्य ! हम तुम अखण्डित प्रति तिन्हें पावन फीजियो॥४॥५.८९॥
हे सोम ! शुद्ध तिहार सँग हम युद्ध में पहुकृति करें।
इस हेतु तुव साहाय्य सेति अनेक कार्यों को फरें।
सो मित्र वरुण तथा श्रादिति श्रीसिन्धु पृथिवी गौर द्यौ।
वे सभी धन का दानकर हम सबों को रस्न लीजियो ॥५॥५६॥
उपरोक्त मंत्रों में कथित श्रीमिन आदिक देवता ।
इक दानि इस फल देनवारे सोम को प्रकटावना ।।
यह यज्ञ में जो काम सब जनों से धन आवता ।
ऊसको भली विधि से सकल तुम सफल फर वयनावना ॥ ६ ॥ ५९१॥
हे सोम ! वह तू मनादिक सम्पत्ति को दिलवावना ।
हम सघों. का श्रीपूज्य भस जो इन्द्रसंज्ञक देवता ।।
श्रीवरुण औ श्री गरुद्गण पूजाई गाना जावता ।
उनके लिये श्रीसोमरस धाराप्रवाह दिलावना ।। ७ ॥ ५१२ ॥

३१२ २२ ३२उ २३ -१२ अधाष्टम्या अमहीयुमषिः । पवमानो देवता । गायत्री छन्दः । एना विश्वान्यर्य का द्युम्नानि मानुपाणाम् । सिषासन्तो वनामहे ।। ८ ।। ५६३ ।। अथ नवम्घा भात्मा ऋषिः । अन्नं देवता । त्रिष्टुप् छन्द।। अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्वदेवेभ्यो अमृतस्य नाम । पो मा ददाति स इदेव माव दहमन्त्रमन्नमदन्तमभि ।। ६ ।। ५६४ ॥ इती प्रथमः खण्डः ॥ ०१२ २ ३१२ 3 १२ २ ३१ २३२ ३१ २ ३२उ ३१ २०१२ मथ द्वितीयः खण्डः। तत्र प्रथमायाः श्रुतकक्ष ऋषिः । इन्द्रो देवता । गायत्री छन्दः । स्वमेतदधारयः कृष्णासु रोहिणीपु च । परुष्णी पु रुशत्पयः॥ १ ॥ ५६६ ॥ इस सोमरूपी अन्न से नर जाति के धनमात्र जे । उन सभी धनसमुदाय को भलिभांति सेती पावते ।। श्रीरीतिपूर्वक उन सबों को यथावस्थित बांटवे । हम सभी याज्ञिक-वृन्द मख में सविधि बाटि निवाहते ॥ ८॥ ५६३॥ श्री अन्न आत्मा से कहै मैं आदि फा हूं देवता । श्री सुरों से पहले भमर प्रभु से प्रथम प्रकटित हुभा ।। जो मुझे अभ्यागतों को देता वह जग पालता । भौ लोभि इला खाय उसको मैं स्वयं संहारता ||६॥ ५६४ ॥ इति प्रथम खण्ड समाप्त । अथ द्वितीय खण्ड का श्रारभ्भ । हे इन्द्र ! काले रंग को वा लालरंग धरावतीं। अथवा विचित्र प्रकार के जो वर्ण उनको धारती॥ उन गवों में तुम श्वेत रंग के दूध को भलधारते । अत एव उस बल को सभी हम भली निधि से पूजते ॥ १॥५९५ ।।

a १ 39२३२३ ३२३ २३१२ (१८७) अथ द्वितीयायाः पवित्र वषिः । पचमानो देवता । जगती छन्दः। * रुचदुपसः पृश्निरनिय उक्षा मिति भुनने पु वाजयुः । मायाचिनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमादधुः॥२॥५६६ ॥ अथ तृतीयायाः मधुच्छन्दा पैग्वामित्र ऋपिः। इन्द्रो देवता । गायत्री छन्दः। इन्द्र इद्धोः सचा सम्मिया श्लवचौयुजा । इन्द्रो बजी हिरण्ययः ॥ ३ ॥ ५६७ ॥ अथ चतुर्या ऋष्यादय उक्तपत् । इन्द्र पाजेषु नोऽव सहस्रमधनेषु च । उग्र ग्राभिरूतिभिः ॥ ४ ॥ ५६८ ॥ २३ २३ १२.१२ १ २ ३ २३ १२ २३ ११२ उपा समय का पृश्नि मुख्य यह सोम दिवावत । यह पर्जन्य-स्वरूप होय ध्वनि को प्रकटावत ।। प्राणिवर्ग विच उन के अन्नादिफ को चाहत । प्रायुत सुर इस सोम कि प्रज्ञा से रच दिय ॥ उसकी प्रज्ञा से मनुजद्रष्टा पालक देवता । तथा पांगिरस गर्भको औपधि में धर देवते ॥ २ ॥५६६ ॥ श्री इन्द्र ने दी हरि असे निख्यात घोटकयुग्म को । इक साथ उत्तम रीति के उपयोग से योजित कियो । जो घश्व कहने मात्र से रथ साथ झट जुड़जावते । ये इन्द्र वसायुध तथा स्वाभरण को धारते ॥ ३ ॥ ५६७ ॥ हे इन्द्र ! उप्र स्वभाव तुम अत्युपता जो धारती । ऐसी विपक्षी वर्ग के संग सुरक्षा कहलावती ।। उन से रणों में हमारे समुदाय की रक्षा करो। श्री सहस्रों गज वाजियुत संग्राम में भि बचाइयो ।॥ ४ ॥ ५६८ ॥ # श्री उपा का उत्पादक सूर्य भपनी फिरणों द्वारा बनाकर गर्जना करता है । फिर समस्त जीवों के लिये भन्नकी इच्छा करता हुआ रहता है। श्रीवुद्धिशाली देवता इसी की बुद्धि से सबको रचते हैं. अर्थात् इस मोमरस के एकांश मात्र के पीने में ही अग्न्यादि देवता स्वकीय व्यापारों में जगत् को घरते रहते हैं।

१२३ १ २ २१२३ १२ २२ ३१ २३.२. ३१.२२ ૩ ૨ ૩ १ 33 २२ ३१ २ (२८) अथ पचम्या प्रथ प्रषिः । विश्वेदेवा देवताः । त्रिष्टुप् छन्दः । अथश्च यस्प समयश्च नामानुष्टुभस्य हावषो हविर्यत् । ::: धातुर्युतानात्सवितुःश्व विष्णो रथन्तरमाजभारावसिष्ठः ॥ ५॥ ५६६ ॥ यथ षष्ठ्याः गृत्समद ऋषिः । वायुर्देवता । गायत्री छन्दः । नियुत्वान्यायवागह्ययं शुक्रो अयामि ते । गन्तासि मुन्वतो गृहम् ॥ ६ ॥ ६०० ।। अथ सप्तम्या नृमेधपुझमेधावृषी । इन्द्रो देवता । अनुष्टुप् छन्दः । यज्जायया अपूयं मघवन् वृत्रहत्याय । तत् पृथिवीमप्रथयस्तदस्तभ्ना उतो दिवम् ॥ ७॥ ६०१ ॥ १ २ ३२ ३२ १ २.३ १२ ३ २१ ३.१.२२ इति द्वितीयः खण्डः । जिस वशिष्ठ के प्रथ सुत औ जिस भरद्वाज के। सप्रथु अस मभिधान धरावन वार पुत्र थे । उनमें मेरा पिता भनुष्टुभ छंद सहित कर । श्रीहविष्यप्रद रथन्तराभिध सामप्रोक्त स्तव ।। उसे विधाता से तथा दीप्तियुक्त सवितार से । और विष्णु से भली विधि प्रकट हुए को पालिया ॥ ६ ॥ ५९६ ।। हे वायु वाहनवर्ग से संयुक्त तुम भाजावना । यह शुक्ल रंग का सोम तेरे लिये धर रक्खा भला ॥ कारण सुयष्टावर्ग श्रीयुत सोमरस को काढता। में तू चला करके. जावता ॥ ७॥ ६०० ॥ अद्भुत गुणावलि से विभूषित इन्द्रसंज्ञक देवता ! । जिसं सगय वृन विनाश करने प्रकट तू होजावता ।। तष भूमि को अत्यन्त ही काठिन्ययुत. तुमने किया। मौ धुलोकहिं आकाश के सँग बाँध करके थाँभिया ।। ७ ।। ६०१ ॥ उसके सदन के मध्य इति द्वितीय खण्ड समाप्त ।

११८६) अथ तृतीयः खण्डः। .. २ 8 र ४२ ३१२ ३ १ २२ २ ३१२ 3 २३ २२ ३१ २ ३१र २२ 8१ २ 3 २३ २ १ २२ १२ ताप्रघमाचा घामदेव ऋषिः। प्रजापतिर्देवता । अनुष्टुप् छन्दः । मयि बच्चों को शोऽसौ यज्ञस्य यत्पयः । परमेष्टी प्रजापतिदिवि शामित्र हतु ॥ १ ॥ ६०२ ।। अद्वितीयामा गौतम ऋषिः। पवमानो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । सन्ने पयालि समु पन्तु बानाः सहमयान्यभिमातिपाहः । साप्पायमानो अमृताय सोग दिवि श्रर्यास्युत्तमानि षिष्य ॥२॥ ६०३ ।। अथ तृतीयाया परययादिकं पूर्ववत् । संपिमा जारी छोर विचारवमयो अजनयस्त्वनाः । स्वमाननोदाइ लक्षिन्त्वयोतिमा वि तमो वयर्थ ।। ३ ।। ६०४ ॥ नथ तृतीय खण्ड का आरम् ।। श्री सत्यलोक स्थित प्रजापति नामधारी देवता । स्वर्गीय द्युति सम मग तनू विच ब्राह्म तेज बढ़ावना ॥ श्रीयुक्त यश की प्राप्ति को भलि भाँति खेति बढ़ावना । औ यज्ञसम्बन्धी पवित्र शुभान्न को बढ़वावना ॥ १ ॥ ६०२ ॥ हे सोम रिपु हन्तार तोय पाबाई पय मिल जाइयो । श्री व्य मिलियो मापसे औ वीर्य भल मिल जाइयो । हे देव ! तुम अमरत्व पानें हर्ष को पाते हुए। श्री स्वर्ग में उत्कृष्ट गन्न हमार हित लिय धारते ॥२॥ ६०३ ।। .हे स्रोम ! तुम इन सफल पौषधि-वर्ग को रचते गये। तुमने हि जल की वृष्टि भी गो आदि पशु प्रकटित किये ।। तुमने हि वितत प्रकाश सिरजा तथा जो अँधियार है उसको स्वकीय प्रकाश से विध्वस्त कर बिखरा दिये ॥ ३ ॥ ६०४ ।। २५ - - ३१२ ३२उ 3 २३ ૨ ३१ २र २२ १ २३२३क २र 3 २ २२ १२ (१९०) अथ चतुर्धाः अधुच्छन्दा ऋषिः । अग्निदेवता! गायत्री छन्दः । अग्निपीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥ ४ ॥६०५॥ अथ पंचम्पा वामदेव ऋषिः । अग्निर्देवता । त्रिष्टुप् छंदः । से गन्वत प्रथमन्नाम गोनान्त्रिः सप्त परमन्नाम जानन् । ता जानतीरभ्यनूपत ता आविर्भुवन्नरुणीयंशसा गावः ॥ ५ ॥ ६०६ ॥ श्रीयुत पुरोहित यज्ञ का श्री देव पदवी धारता । मख का निमन्त्रक तथा श्रीयुत देवऋत्विज घाजता ॥ श्री यज्ञरूपी रत्न को भलि साँति सेती धारता । अस अग्निनामक देव को मैं विरुद गाय मनावता ।। ४ ।। ६०५ ।। * अग्नि तिहारी स्तुति गावत श्रीयुक्त आंगिरस । पाणी वीजजु शब्दमान तिहिं प्रथम लखत रह ॥ पुनि त्रिसप्त (२१) उत्कृष्ट नाम स्तुति वा छन्दोगण । उनको जान पिछान तिहारी स्तुति गाई भल ॥ वे सर्वज्ञ गुणावली उपा काल को गात रहिं । पुनि रविद्युति से लाल गौ किरण तथा गौ प्रकट भइँ ॥ ५ ॥ ६०६॥ * तात्पर्य यह है कि हे अग्नि ! रपियों ने पहले वाणी का बीज शब्द व परम मंत्र ओंकार को पाया । फिर शब्द का ज्ञान प्राप्त करके ७४३२१ प्रकार के छंदों जा भेद जाना । जिन के नाम ये हैं:- १ गायत्री २ उष्णिक ३ अनुष्टुप् ४ बृहती ५ पति ६ त्रिष्टुप् ७ जगती । १ प्रतिजगती २ शकरी ५ अतिशाकरी ४ अष्टि ५ अत्यष्टि ६ धृति ७ अतिधृति । १ कृति २ प्रकृति ३ आकृति ४ विकृति ५ संस्कृति ६ अतिकृति ७ उत्कृति। इन्हीं के भेदों से अनन्त छन्दों की रचना हुई हैं, जिनके द्वारा तुम्हारी स्तुतियां गाई गई। फिर उन श्रेष्ठ पद्यावलियों ने उषा की महिमा गाई । तत्पश्चात् कान्ति- पुंज सूर्यनारायण की लाल रंग किरणें प्रकट हुई। इत्यादि भर्थ है ।। १.

(१६१) ૨ ૩ 3 १ २३२३२३कर २३ २३ ३१२३१२ २३३२३. मध षष्ठया: गृत्समद मषिः । अग्निदेवता । त्रिष्टुप् छन्दः । समन्या यन्त्युपयन्त्यन्याः समानमूर्ववयस्पृणन्ति । तमूचि शुचयो दीदिवासमपानपातमुपयन्त्यापः ॥ ६॥ ६०७ ।। अथ सप्तम्या वामदेव ऋषिः । रानिदेवता । अनुष्टुप् छंदः। भामागाद्भद्रा युवतिरहः केतूंन्सपीसखि । अभूद्भद्रा निदेशनी विश्वस्य जगतो रात्री ॥ ७॥६०८ ।। १र २र३१२१र२र १२३२ ३७१३ १२. ३ १.१ 3. १ २. * श्री वर्षा के नीर भूमि पर मिलत भली विधि । तथा प्रथम स्थित वहां सलिल मिल जात निकट वनि ॥ पुनि सब इस रंग नदी होय बड़वानल तोपत । जो जल से उत्पन्न शुद्ध द्युति को धर राखत ॥ ऐसा जलनिधिवर्ति जो पावक बड़वानल विदित । उसके पास विशुद्ध जल पास जॉय स्थिति को लहत ॥६॥६०७ ॥ श्री सूर्यताप मिटावनी अानन्द को उपजावनी । अँधियार से संयोग करनी रात्रि सम्मुख भापती ।। श्री चन्द्र की फिरणावली की योजना को चाहती। अतएव श्री जग-मोद देनी रात्रि प्रफट हुजावती ॥ ७ ॥६०८॥ द . * श्री यजुर्वेद पर वेददीपाख्य-भाष्यकर्ता महीधर लिखते हैं कि जिन घड़ों से स्रोम कण्डनार्थ जल. लाया जाता है, वे एक धन. फहाते हैं । इसी से उनके जल को एक धन" कहते हैं । तथा वहीं लिखा है कि उत्तर वेदी के निचयार्थः जिस भूमि भाग में मिट्टी खोदते हैं, वह स्थान "चात्त्राल" कहाता है और "उत्कर" भी स्थान विशेप का नाम है । वेददीफ १ । २५- में लिखा है कि स्फ्य नामक यज्ञपात्र में उनाड़ी हुई मिट्टी को उत्कर कहते हैं,। तात्पर्य यह है कि एरुधन और वसती- वरीमंज्ञक जल होते हैं वे सभः चात्वाल मौर उत्कर नामक स्थानों से मिलकर मेघ मण्डल द्वारा बरसते हुए नदी बन कर समुद्र को प्राप्त होते हैं।

(११२) ३२ ३ १ २ ३२ ३ १ ३१ २ ३१२ १२ ३१र२र३ २.३ १३ ३ १२३३२ १ २ १ ३२ १ २ ३१र २२ २ 9 २७ 3 १ २ २ २ २ 3 १ अथाष्टम्या भरद्वाजो वाईपत्यऋषि वैश्वानरो देवता । जगती छन्दः । प्रक्षस्य कृष्णो अरुपरप न महः प नो बचो दिया जातवेदसे । बधानशय मतिनव्य शुचिः सोम इव पर चारुग्नये ॥ ८॥ ६०६ ।। अथ नवल्या राजऋषिः । विश्वेदेवा देवताः । निष्टुप् छन्दः । विश्वेदेवा मम मृण्वन्तु यज्ञाधे रोदसी अपानपाच मन्म । मा वो वांसि परिचयाणि दोचं सुम्नजिवो अन्तमा मदेम || ||६१०॥ अथ दशम्या वामदेव ऋषिः ! लिझोक्ता देवताः। महा पंक्तिश्छन्दः । यशो मा घावापृषिवी यशौ पेन्द्रवृहस्पती । यशो भगस्य विन्दतु यशो मा प्रतिमुच्यताम् ।। यशरच्या३स्या रहसदोऽई मदिता स्याम् ।। १० ।। ६११ ।। श्री हव्यान्न समेत वृष्टिकर्ता द्युति धारत । अस वैश्वानर मे सुतेज को शीघ्र गनाव ।। अत: हमारे वचन यज्ञ में बहुत प्रशंसा त । ऐसे श्री सर्वज्ञ जातवेदाभिध श्री सुर ।।. श्री नव पावक के लिये शुद्ध सुखद स्तुति निपल फर । यों जायें ज्यों सोमरस दशा पविने से स्रवत ॥ ८ ॥ ६०९ ।। सब देव मेरे श्रेष्ठ स्तव वा हव्य को ले लीगियो। श्री अग्नि औ धरणी प्रकाश मारि स्तुति चित दीजियो । श्री सुरों ! तुम से जो विरुद्ध असे न वाक्य उचारता । औ भापके सान्निध्य में सुख-सहित रह पावते ।। ६ ॥ ६१० ॥ श्री पृथिवी अरु गगन उनहों का सुख मोय मिलियहु । इन्द्र बृहस्पति का भि सुयश मुझको मिलजाइय ॥ श्री भास्कर की कीर्ति प्राप्त मुझको होजावट | औ श्री सुयश कदापि मुझे नहिं छोड़ जाइयउ । श्री यश से सम्पन्न यह सभा तासुं यश नहिं तंजे । मैं सर्वत्र प्रधानतायुत वक्ता होजाइ हो । १० ।-६११ ।।

१ २ ३१२ ३१ २ ३ २ २३२३२३१ २३ २३१ २ 3 3 १२ 9 १ २ ३१२ ३२३२३१२ ३२ 3 १२३१२ २र ...२३२ 3 (१६३) श्रथैकादश्या हिरण्एस्तूपऋषिः । इन्द्रो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । इन्द्रस्य नु वीर्याणि वोनं यानि चकार मधमानि रजी। अहनहिमन्वपस्वत मवक्षणा अभिनत् पर्वतानाम् ।। ११ ॥ ६१२ ॥ अध द्वादश्या विश्वामित्र ऋषिः । अग्निदेवता । त्रिष्टुप् छन्दः । अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतम् चक्षुरमृतरूम आसन् । त्रिपातुरको रजसो विमानोऽजनज्योति विस्मि सर्वम् ।। १२ ॥ ६१३ ।। श्री वनधारी इन्द्र ने पहले पराक्रम जो किये । उनको तरा के साथ उत्तम रीति से वर्णन करूं। जिन मेघ का वध किया अरु जल को धरणि पे गेरिया । श्री पर्वतों से प्रकटि कूलंकपा बिच जल प्रेरिया ॥ ११ ॥ ६१२ ॥ * अग्निदेव जनमत मैं हूं सर्वज्ञ नागधर । घृत है मेरा चच भाज्य वा है मम द्योतक ।। प्रभारूप अविनाशि ज्योति मम मुख पिच निवसत । विधारूप-धार पूज्य श्री प्राण वही मैं ॥ तथान्तरिक्ष स्थान का गापफ वायु मि मैं हि हूं। किंबहुना श्री नित्याति रवि हवि अरु श्री ब्रह्म में ॥ १२ ॥ ६१३ ॥ * पक्षान्तर यह है कि वह ( अग्निः ) में अग्नि प्रकट होता हुमा ही श्रवण मननादि साधनों के विना ही श्री परमतत्व का साक्षात्कर्सा हूं। (घृतं गे चक्षुः ) जो इस समस्त संसार को दिखाने वाला तथा मेरे स्वभाव का द्योतक द दीप्तियुक्त चक्षुस्थानी जो घृत वह अत्यन्त प्रकाशित है । यह जो ( अमृतम् ) कर्म का फल नाना विषयभोगादियुक्त सो (गे) मेरे (पासन् ) मुख में है। इस प्रकार पृथिव्यादिकों में अपना आधिपत्य दिखाकर वायुरूप से अन्तरिक्ष का अधिष्ठा- तृत्व बताते हैं कि अर्क अर्थात् संसार मा स्रष्टा प्राण वही मैं "त्रिधातुः, आत्मा को त्रिधा करके वहां वायुरूप से (रजत: ) अन्तरिक्ष लोक का (विमाता) अधिष्ठाता हूं । भघ मादित्यरूप से द्युलोक का भधिष्ठातृत्व बताते हैं कि ( अजस्रं ज्योति: ) अर्थात् अनुपक्षीय नित्य तेज प्रकाशात्मा द्युलोक का अधिष्ठाता आदित्य भी मैं हूं इस. प्रकार अपनी भोकव्य-रूपता दिखाकर भोग्यरूपता भी दिखाते हैं कि जो कुछ हत्य पदार्थ भोग्य हैं, यह सब मैं ही हूं। PAS (११४.) २३ २३१२ २२ र २२ ३१र२र३ २.3 १, २ ३१ २ 3.पर २२३१ २ 3 १२३ २ २३२३११ २२ अ २३१र २र३.१ २ 3 र र २२ २२३१.२ ३१र .२२३ १२ २२ अथ त्रयोदश्या ऋष्यादय उक्ताः । पात्यग्निदिपो अग्रम्पदं वे पाति यहश्चरणं सूर्यस्य । पाति नाभा सप्तशीर्षाणमग्निः पाति देवानामुपपादमृष्यः ॥ १३ ॥ ६१४॥ इति तृतीयः खण्डः। अथ चतुर्थः खण्डः ॥ तत्र प्रथमाया वामदेव ऋषिः । अग्निदेयता । पंक्तिश्छन्दः । भ्राजन्त्यग्ने समिधान दीदिवो जिहा चरत्यन्त रासनि । स वनो अग्ने पयसा वसुविद्राय बच्चों दृशे दा॥१॥६१५ ॥. श्रथ द्वितीयाया वामदेव ऋषिः । ऋतवो देवता । पंक्तिश्छन्दः। * वसन्त इन्नुरन्त्यो ग्रीष्म इन्नुरन्त्यः । वर्षारयनुशरदो हेमन्त शिशिर इन्चरन्त्यः ॥२॥ ६१६ ।। श्री अग्नि विस्तृत धरातल का मुख्य स्थान पचावता । सामर्थ्ययुत यह सूर्यपद. श्री अन्तरिक्षहिं ढावता ॥ श्री गगनवर्ती मरुद्गण सुरक्षा को आचर। श्री ललित यह सुरसुखद् मख के त्राण को करता रहे ॥ १३ ॥६१४॥ इति सृतीय खण्ड समाप्त । अथ चतुर्थ खण्ड का भारम्भ ।। श्री रचिजों से दीप्त ! श्रीयुत भग्निसंज्ञक देवता । धुतियुक्त जिह्वा मुखवि स्थित हव्य को लेलेवती ॥ हे देव ! धन-प्रापक ! हमारे हेतु तुम हवियुक्त जो । श्री सम्पदा उसको तथा दृष्टयर्थ तंज दिलाइयो ॥ १ ॥ ६१५ ॥. श्री वसन्वाभिध ऋतुहि श्री मंगल-प्रदाता होत है । श्री ग्रीष्म ऋतु सुखदाइ श्री वर्षा भनन्द दिलात है ।। पुनि शरद ऋतु कल्याणकारक गुणों को धारण करै । हेमन्त हर्प दिलाय औ श्री शिशिर सुखप्रद होइ है. ॥ २ ॥ ६१६॥ * चैन वैशास्त्र वसन्त । ज्येष्ठ आषाढ-प्रीष्म । श्रावण भाद्रपद्-वर्षा माश्विन कार्तिक शरद् । मार्गशीर्ष पौष हेमन्त और माघ फाल्गुन शिशिरऋतु ॥, ( १६५ ) अ ३२ अ१२ २२ उ २33333 २३१२३ १२ २ 3 २क ३२ ३ २ १२ 333 २३२उ ३ अथ तृतीयायाः नारायणऋषिः। विराट् पुरुषो देवता । अनुष्टुप् छन्दः। * सहनशीर्षाः पुरुषः सहस्रातः महसपात् । स भूमि सर्वतो कृत्वात्यतिष्ठदशाङ्गुलम् ॥ ३ ॥ ६१७ ॥ अथ चतुर्ण प्रष्यादिकं पूर्ववत् । त्रिपादूर्द्ध उदैव पुरुषः पादोस्ये हामवत्पुनः । तथा दिवळ्यकामदशनाऽनशने अभि ॥ ४॥ ६१८ ।। अध पंचम्या ऋष्यादयः पूर्ववत् । 1 पुरुष एवेदं सर्व यद्भूतं यच्च भाव्यम् । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतन्दिवि ॥ ५ ॥ ६१६ ॥ श्री विराट स्वरूप प्रभु का सहस्र मस्तक धारना । श्री सहस्रों नेत्रवाल और सहस्र चरण रखावता ॥ सर्वत्र चर औ अचर में निज व्याप्ति को फैलावता । श्री दशांगुलि-मित देश को अतिक्रमण कर स्थिति पावता ॥३॥६१७॥ जो यह त्रिपाद परेश माया से परे ऊंचा रहा । इसके इकल्ले अंश से माया त्रिगुण जग रच दिया ।। पुनि स्वमायावश अनगिनत रूपादि सेती व्यापिया । भोक्ता अभोक्ता रूप से संसार में व्यापक हुआ ॥ ४ ॥ ६१८ ॥ यह वर्चमान समस्त जग वह दी परम प्रभु ईश है। यह ही अतीत भविष्य भौ कल्पान्तव्यापी ईश है ।। सम्पूर्ण सृष्टि त्रिकाल की चौथाय इसका अंश है । औ त्रिपादों से स्वर्ग में स्वानन्दयुत यह स्थित है ॥ ५ ॥ ६१९ ॥ * कितनेक विद्वान् दशांगुल से यह भर्थ निकालते हैं कि समस्त प्राणियों की जो जो योनियां हैं उन २ भाकृतियों के अनुसार ही उनकी उंगलियां है, मत: उन सब के नाभि-मण्डलं से दश अंगुलं परिमित स्थान पर हृदयरूपी कमल है, जिस पर वह मन्तयामी ज्योतिःस्वरूप विराजमान हो रहा है । उपनिषदों में जो प्रतिपादन किया गया है कि "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" अर्थात् ईश्वरीय ज्ञान सत्य और ब्रह्म अनन्त है, तो वह चतुष्पाद कैसे हुआ। फिर कहा गया कि एक पाद से तो सब संसार की रचना और त्रिपाद से वद स्वात्मा- नन्द में स्थित है। सो तात्पर्य इसका यह है कि वह अनन्तानन्त-शक्तिसम्पन्न परमेश्वर है, सृष्टि आदि की रचना उसके आगे बहुत छोटी बात है इसी हेतु वह कर्चा धर्ता होता हुआ तथा सध में व्याप्त होता हुभा भी सब से निरन्तर ऐसी अगाध महिमायुक्त केवल वही एक परब्रह्म परमात्मा है अतः विरोधात्रसर नहीं हैं । .

३२उ ३. २३१२ ३१२३१ २२३५र२र 3 १२ १ २ २१२ ३ २ ३. २..3 १२ २ ३१र २२ 3२ ४ ३१ २ ३२ -- (१६६) अथ षष्ठया ऋष्यादयः पूर्ववत् । तादानस्य पहिगाव तो स्पायश्चिपुरुषः । उतामृतत्व स्पेशानोयदन्नेनातिरोहति ॥ ६॥ ६२० ॥ श्रथ सप्तम्याः नारायण ऋषिः । स्रष्टा देवता । धनुष्टुप् छन्दः । * ततो विराडजायत विरालो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्या पश्चाद्भूणिमयो पुरा ॥ ७ ॥ ६२१ ।। प्रधाष्टम्पा वामदेव ऋषिः। चावापृथिवी देवते।त्रिष्टुप् (उपरिष्टा- ज्योति।) छन्दः। मन्ये वान्यावापृथिवी मुभोज सौ ये अपयेथायमितमभियोजनम् । द्यावापृथिवी भवन स्पौने ते नौ मुञ्चत महसः ॥ ६ ॥ ६२२ ॥ इतनी हि गहिगा इन कि नहिं वह पुरुत्र इससे है बड़ा । सो अमर-पद देवत्व उसका परग ईश्वर सर्वथा ॥ अन्नादि भोज्य पदार्थ से जिस जगत का निर्वाह हो । उस नियम से पर तथा विश्वहिं कर्मफल दिलवावतो ॥ ६॥६२० ।। उस आदिपूरुप सेति श्री ब्रह्माण्डतनु प्रकटित हुआ । उसफे अधारहि पै पुरुष, श्री जीव मात्मा होगया ॥ वो श्री विराट स्वरूप से अलग हि स्वस्थिति करता रहा । पुनि भूमि रच श्री सप्तधातु-विशिष्ट तनु रचता भया ।। ७ ।। ६२१ ।। हे धरणि औ आकाश ! तुम को सुरक्षक मैं 'तुम अपरिमित वित्तादि उसको भलि-विधि फैलावना ।। श्री धरातल भौ गगन ! तुमरा कार्य सुखप्रद हूजियो । दोनाहिं वे हग को निपिद्धाचरण सेति बचाइयो ॥८॥ ६२२ ॥ * उस आदिपुरुष से ब्रह्माण्ड देह हुमा । उस विराट् देह के माधार कोई पुरुष विशेष (ब्रह्मदेव ) हुभा । वही फिर माया का आश्रय लेकर जीवात्मा होकर देव, तिर्यक् मनुष्यादि रूपों को धारण करता हुआ । अथर्वणोक्त उत्तर- तापिनी में लिखा है कि वही यह पंचभूत, इन्द्रिय, विराट, देवता भौर कोशों को बना कर जैसे कोई अजान लेख करता है वैसे आप ही अपनी माया से नाना रूपों से व्यवहृत होता है, इसी विषय को उपनिषदों ने विस्तार से दरमाया है। मानता।

. २ २ ३ ३१२ (१९७) अथ नवम्पा वामदेव मषिः । बात्मा देवता । अनुष्टुप् छन्दः । करीत इन्द्र शाश्रूण्युतो ते परितो हरी । तन्वा स्तुवन्ति कवयः पुरुषासो वनर्गवः ॥ ६ ॥ २३ ॥ अथ दशम्या सामदेव ऋषिः । प्रात्मा देवता । अनुष्यप् छन्दः । बादचा हिरण्यस्ण यद्वा बच्चों गवामुत्त । सत्यस्य प्रमणो वर्चस्तेन मास सृजामति ॥ १० ॥ ६२४ ॥ प्रथैकादश्या घामदेव ऋषिः। इन्द्रो देवता । बिष्टुप् छन्दः । सहस्तन्न इन्द्रददयौन ईशे घस्य महतो विरविशन् । ऋहुन्न नृम्णं स्थविरञ्च वाजं वृत्रेषु शत्रून्सहना कृधी नः ॥ ११॥ ६६५ ।। २।२३२३९ ३१ २ २०१२ १२ २३१ ३ र २र १२ ३२३ हे इन्द्र ! डाढी मूछ तेरे खोम से होते हरे । मौ तिहारे घोड़े हरे ही रंग को नित धारते ।। भी काव्य के कर्तार जिनकी भारती पूजाई है । ऐसे महाकवि तिहारी विदावली को गाय है.॥।॥ ६२३ ।। श्री स्वर्णनामक धातु का जो दिव्य गुणयुत तेज है । औ गवों का भथवा किरण-मालावली का सेज है ।। से सम्पन्न श्रीयुत ग्रंझ का जो सेज है। उन सेज-पुंनों से सभी हम तेजवन्त हुजाद हैं ॥ १० ॥ ६२४ ।। श्री सत्य भी सत्यवाक्य सुरेन्द्र । सुत्र रिपुनाशि घल दीजे हमें । कारणं तुही उस परम बन की ईशंता धरता रहें । मतएव इन्द्र ! हमारं तुमम धन अधिक बल दीजियो। रिपुगणों को भी विरोधिन को रोकलें भन शक्ति दो ॥ ११॥ ६२५ ।।

(१९८) ३१२ ३२३ १ २ 3.२.३ १ २ सधमादश्या घामदेव ऋषिः । इन्द्रो देषता । त्रिष्टुप् छन्दः । सहर्षभाः सहवत्साउदेत विश्वा रूपाणि विभ्रतीव्यूनीः । उसापृथरयंषो अस्तुलोक इमा मापस्सुमपाणा इहस्त ॥ १२॥ ६२६ ॥ इति चतुर्थः खण्डः । अथ पंचमः खण्डः ॥ ३२३२३१३ ३२ ३१२. : २२ 3 २३१ *२ तत्र प्रथमाया वानर ऋषिः। (वैखानसा ऋषयः) अग्निः पवमानो देवासा । गायत्री छन्दः । २३ १२ 3 २३२३.१२ ३.१ 3 १ २ अग्न आयूंपि पवस आमुबोर्जमिपञ्च.नः। पारे वाधस्व इच्छुनार ।। १ ।। ६२७ ।। अथ मितीयाया विभ्राट् सूर्यपुत्र अषिः । सूर्यो देवता । जगती छन्दः । विभ्राड् बृपिचतु सोम्यगध्वायुषयज्ञपतावविहतम् । चातजूता यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पिपर्ति बहुधा विराजति ॥२॥६२८ ॥ २ ३२७ ३१.२३१२३१२ श्री वृपभ औ वत्सों सहित दुउ समय दुग्ध प्रदायिनी । श्रीरंग विरंगी गर्ने तुम आनन्द-संयुत आइ हैं ।। लम्मा तथा चौड़ा जगत् यह सकल तुम्हरा इजियो ।।.. ये नीर यह पिन कष्टपेय हुवो तथा यह वैठियो ॥ १२ ॥ ६२६ ॥ पवमानरूपी अग्नि ! तुम हम सब जनों की आयु को। अथवा विविध अन्नर्द्धि को भलिभाँति से बरसात हो । हम सबों के लिय अन्नरस भौं अन्न को भल सो पुष्ट राक्षसवर्ग को हगसे अलगही गरियो ॥ १ ॥६२७ ॥ अतिदीप्त. भास्कर श्रेष्ठतायुत सोमरस को पीजियो । यजमान फो निर्भय अवस्था वान-राशिहिं देवत्तो।। जो सूर्य, प्रेरित घायु में स्वयमेव जग को पालता । :: : वह रवि प्रजा को पोपता अधिकार सेती भाजता ।। २ ।। १२ ।। प्रेरियो (१६६ ) ३२३ २३१२ ३१२३ ६२ ३२ ३१.२३ अर २२. ३१२३ ३१२३२ २ ३२३३ 3.२ अथ तृतीयायाः कुत्लऋषिः। सूर्यो देवता । निष्टुप् छन्दः । चित्रं देवानामुदगादनाचक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः । पापा चाचापपिपी अन्तरिक्ष सूर्य प्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥३॥६२६ ।। अथ चतुर्थाः लार्पराज्ञी प्राषिः । स्यों देवता । गायत्री छन्दः । शायः पृश्निरक्रमीद सदनमातरम्पुरः । स्तिच प्रयत्स्वः ॥ ४ ॥६३० ॥ अथ पंचम्या ष्पादया पूर्वपत् । * अन्दश्चरति रोचनास्पप्राणादपानती। व्यख्यमहिपो दिवम् ॥ ५ ॥ ६३१ ॥ श्रीरशियों का पुंज रवि उगने जगा पाश्चर्य है श्रीमिन्न वरुण तथाग्नि का चक्षुः स्वरूपी होय के ।। धरणी अक्षाश. तथान्तरिक्षहिं उदित-श्रुति से पूरिया । श्रीचराऽपर संसार का श्रीसूर्य आत्मा होरहा ॥ ३ ॥ ६२९ ॥ गतिशील विततप्रकाश इस रवि ने उदय-गिरि पालिया । पुनि पूर्व में जंगमात पृथ्वी को भलीविधि पावता ॥.... उपरान्त दिवा भी अन्तरिक्षाहं शीघ्रता से जावता उत्तमः गमन करता तथा स्वर्धु जोइहिं पाजावता ॥ ४ ॥ ॥३०॥ इस सूर्य की शुभज्योति तनु में प्राण होकर स्थिति फरै । प्रो प्राण खेति अपान वनहर अधोवी होरहे ॥ बस दीप्ति से सम्पन्न श्रीयुत दिवाधीश्वर देवता । श्रीमहामहिम धुलोक भरु. अन्तरिक्षदि धुति देवता ॥ ५ ॥६३१ ॥ * पक्षान्तर में यह भी अर्थ है कि जब. प्रभात को सूर्योदय होता है तब समस्त प्राणियों में प्राणवायुः का संचार अर्थात् काम करने की शक्ति उत्पन्न होती है। और जब भस्त होता है तबः अपानः अर्थात् शिथिलताः सभीः पदार्थों की होने जगती है। ऐसी महिमा इस सूर्यदेव की ही है कि जिससे सत्र संसार का उपनहार सिद्ध होता रहता है।

(२००) १२ अ १ २७१२ २ ३३३ १२ 39 २ २ अथ षष्ठया नष्पादप वक्ताः। विशद्धाप विराजति वाक् पतङ्गाय धीयते । पति पस्तोरह शुभिः ॥ ६ ॥ ६३२ ।। अक्ष सप्तम्याः कारणः प्रकरच षिः । सूर्यो देवता । गायत्री छन्दः * अपत्येतायको यथा नक्षत्रायन्त्यक्तुभिः । सूराय विश्वचक्षसे ।। ७ ।। ६३३ ॥ पथ अष्टम्या ऋष्यादिकं पूर्ववत् । अंदश्रनस्य केतनो वि रश्मयों जना भनु । भ्राजन्तो अग्नयो यथा ।। ८॥ ६३४ ।। श्रीदिवस भौ रजनी फि घड़ियां तीस रवि धुति मे लसें । श्री सूर्यहित स्तुति वाणि सब से गाइ भलिविध जात है। अथमा प्रभाकर नाम घडि भलि भाँतिद्युति धारण करे। तय नयीरूपा वाणि रविहित ये सब से जास है ॥ ६॥ ३२ ॥ पे प्रथित तस्कर-तुल्य तारागणों समुदाय श्री देव गेहस्वरूप अथवा सुगति को जो पावते ।। ने नर्मद्रष्टा सूर्य संज्ञक देवता के तेज से। रजनी गणों के साथ साथहि दूर हट कर जाषते ॥ ७ इस प्रभाकर के किरण चहुँ दिशि तेज को फैलावते । सब जनों के समुदाय को भलि भाँति से लख लेवते ।। तात्पर्य जैसे अभिगण निज सेज से भासित करें। से दिवाकर-रश्मियां सघ को प्रकाशित भाचरें॥८॥६३४ ॥ m * श्रूयते दि, "ऋम्भिः पूर्वाहे दिवि देव ईयवे, यजुर्वेदे तिष्ठति मध्ये महः । साप नास्तमये महीयते, वेदैरशून्यनिभिरेति सूर्य इति" । " श्रुतियों में लिखा है कि ये तारे देवतागों के घरस्वरूपी हैं अथवा जो मनुष्य पुण्य करते रहते हैं ये नक्षत्ररूप से प्रकाश पाते और वे सभी सूर्य के प्रकाश से ऐसे छविहीन होजाते हैं, जैसे धोर प्रत्यादि भी रात के साथ २ ही छिप जाते हैं।

(२०१) २७ २ मथ नषम्या ऋष्याप उता एष। * तरणिचिवदर्शतो ज्योतिष्कृति सूर्य । विश्वमामासि रोचनम् ।। ६ ।। ६३५ ॥ अथ दशम्पा भपि ऋष्यादिकं पूर्ववत् । प्रत्यङ् देवानां विशा प्रत्यड्डदेषि मानुपान् । प्रत्यविश्वं स्वदृशे ॥ १० ॥ ६३६ ॥ ३१ ३२ 25२२३२ SS.97 हे सूर्य ! वा परमेश जग को पार करते तारते । संपूर्ण से द्रष्टव्य, शुद्ध प्रकाश को उपजावते ।। भी विश्व शुचिमाकाश वा संसार को दिपवायते । मस सूर्य वा श्री परमपूरुष तुल्य स्तुति को पावते ॥ ६ ॥६५॥ हे सूर्य ! तुम सुर विट ( प्रजाः ) मरुत् के सामने उगजापवे । भी मनुष्यों के वृन्द के सम्मुख उदय को पावते ॥ श्रीयुक्त सुर-समुदाय उनकी वप्रति श्री सुरलोक है । विलोकन के लिये सम्मुख उदित तुम होयते ॥ १०॥ ६३६॥ .. *हे सूर्य ! तुम तरणि भर्थात् सब संसार की यात्रा करने वाले हो वा रोगों से छुहाते हो । सब से देखने योग्य हो । ( यहाँ तक कि चाण्डालादि निषिद्ध जातियों का समय देखना होतो सूर्य के दर्शन से तजन्य अनिष्ट व रोगादि का निवारण होता है) प्रकाश के दाता अर्थात् समस्त पदार्थों को अपने तेज से मासित करते हो अर्थात् रात्रि में सूर्यास्त होने पर चन्द्रादि पर सूर्य की किरणों गिरकर लौटती और अन्धकार की निवृत्त करती हैं । जैसे घर के द्वार पर दर्पण में सूर्य की किरणें पड़ती और वहां से लौटकर घर के भीतर का मन्धकार हटाती हैं तद्वत् । इससे जाना जाता है कि सूर्य के प्रकाश मे चन्द्रादि का प्रकाशित होना प्राचीन वैदिकों से जाना हमा सिद्धान्त है, नवीन पश्चिमी विदेशियों ने ही इस बात को जाना यह पाव नहीं। भीमायणाचार्य ने अपने भाष्य में इस को भलीभाँति से समझाया है।

(२०३) प्रथैकादश्या अपि ऋषिदेवतायन्दास्युक्तानि । येना पापक चक्षसा भरण्यन्तजना अनु । स्वं वरुण पश्यसि ॥११॥६३७ ।। 3 अधबादश्या धादय उक्ता एव। २१३१२ ३२३१ २ ३१ २ उद्यामेषि रजा पृथ्वहामियानो झुभिः । पश्यजन्गानि सूर्य ।। १२ ।। ६३८ ।। हे सर्व शोधक! दुःखनाशक सूर्य संज्ञफ देवता ।। तू प्राणित्राता लोक की जिस तेज से सुधि लेवता ।। उस दिव्यगुणसम्पन्न तेरे शुद्ध बुद्ध प्रकाश को । हा सयों का समुदाय मिलकर भलीभाँति मनावतो ॥ ११ ॥ ६३७ ।।. हे सूर्य ! तुम विस्तीर्णता-संयुक्त ऐसे लोफ को। औ अन्तरिक्षाभिध सुलोहि भली विधि से जांत हो । श्री दिवस अरु रजनी इन्हीं के साथ मान कराता । श्री प्राणियों के वर्ग इनको दिव्य द्यति पहुंचावता ॥ १२ ॥ ६३८ ॥ ८ द्वितीय पक्ष में (हे सूर्य ) अर्थात् हे सर्वप्रेरक भन्तर्यागिन् ! ( तरणिः ) संसार-सागर से पार करने वाले हो । ( विश्वदर्शतः ) सम्पूर्ण मुमुक्षु जनों से साक्षात् करने योग्य हो । (ज्योतिकृत् ) सूर्यादि प्रकाशित प्रदार्थों के रचयिता हो । इस प्रकार चेतनस्वरूपता से समस्त संसार को तथा दीप्तियुक्त समस्त तेज पदार्थों को प्रकाशित भापही करते रहते हो यथा:- न तम सूर्यो भाति न चन्द्रसारक नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः तमेव भान्तमतुभाति सर्व यस्य भासा सर्वमिदं विभाति । मुण्डकोपनिषद् ।।

दरर. (२०३ ) अथ प्रयोदश्या प्रयादयः पूर्वपत् । करयुक सप्त शुन्युचा सूो रथस्य नप्त्यः । ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः ॥ १३ ॥ ६३६ ।। अथ चतुर्दश्या प्राण्यादयः पूर्वपत् । सप्त वा दरिलो रये परन्ति देप एर्य । शोचिशं विचक्षण ॥ १४ ॥ ६४० ॥ इति पष्टोऽध्यायः समाप्तः ।। २ श्री सूर्य ने शुचिदायिनी श्री घोरिया किरणानि ना । जो सात संख्या धरै उनको स्वरथ-सँग योशित किया । रम-रपिणी तिन्द जोडि रथ संग यागृह को जायगा । ऐ। दिवाकर रेव के निय ६व्य सय पहुँचायना ॥ १३ ॥ हे अगर ! सर्व प्रकाशदाता ! दिवाधीश्वर देवते ! भी किरणरूपी मात अश्व रथस्य पोय लेजावते ।। जिस सूर्य की धुनियाँ दिकेशस्वरूपिणो कहलावतीं । भर शोचिप्लेश दिनेश को भलि भाँति से पहुंचावती ।। १४ ।। ६४० ॥ इति श्रीमदधीचवंशावतंसाजयमेरुनगराभिजन, श्रीजानकी गर्भस गुरव, त्रिपाठीत्युपाख्य राजगुरु पण्डित बदरीलालात्मज कविरत्न शिवदत्त पाव्यतार्थ प्रणीत घीसामामृतसिन्घोप्पष्टस्तरंगा समाप्तः ।। शिवमस्तु ।।

ॐ नमः शिवाय। अथ महानाम्न्याचिकः। :०:- २ र २२ १ २ ३२३ ३ १२ a १.२३.१ २३ 3 २३ १२ 3 २३ अध प्रथमास्तिस्रः सर्वासां प्रजापतिषिः । इन्द्रो देवता। विदा मघरन् निंदा गातुमनुशंशिपी दिशः। शिक्षा शचीनाम्पते पूर्वीणाम्पुरूवसो ॥१॥ ६४१ ॥ आमिष्टममिष्टिमिा स्वाऽयीशु । मचेसन प्रचेतयेन्द्रद्युम्नाय न इपे ॥२॥ ६४२ ।। एवा हि शको राये वाजाय बज्रियः ।। शाविष्ठ वजिञ्जसे मंहिष्ठ बजिन्नन्स आपाहि पिर मत्स्व ॥ ३॥ ६४३ इन्द्रदेव ! तुम लखो क्योंकि सब को लखवत । श्री यष्टा से प्राप्य देश को तुम पहचानउ ।। अथषा निज फी स्तुतियों को तुम भलि विधि जानहु । पुनि यजमान-हितार्थ स्वर्ग का मार्ग यताबहु ॥ श्रीयुत कर्माधीश ! वा असंख्यात प्रज्ञापते ! 1. अतिधनि ! इन विरुदाल से ऋद्धि सिद्धि दे दीजिये ॥ १ ॥ श्री मादित्य समान व्याप्ति को इन्द्र धरावत | अप्रिंशस्तियुत्त ज्ञानवन्त भम इन्द्र नामसुर 1 ।। हम जिस स्तुति को गाय उने भलिभाँसि चित्त घर । इन्द्र ! हमें यश तथा भन्न धन लाभ करन हु॥ निश्चय तुम श्रीशन हो इसलिय दान-समर्थ हो । इसी हेतु हम सक्न हित दान वित्त का कीजियो ॥२॥ वस्त्रायुध-धर इन्द्र देव ! वागमनकारि मुर । श्रीधन किंवा भन्न देन हित तुष्ट हुजाश्य ।। हे अतिशय यशवन्त ! वन भायुध के । हम लब से धन लाभ हेतु पूजे तुम जावस ।। हे भतिदानी ! पूज्यवर ! हम से पूजा पावते । यहां भाय श्रीमोम पी मसिमपन्न होजावे ॥३॥ धारक (२०५ 1, प्रय मितीपास्तिना-1 2.35 १॥ २३१२, २२ १२. दिदा राये सुवीर्पगनो बानानाम्पतिशों मनु ! मंहिष्ठ पजिजसे पा शविष्ठः शूराणाम् ।। ४ ।। ६४४ ।। यो मरिष्ठो मघोनाम शुर्न शोचिः। विदित्वो ममि नो नयेन्द्रो विद तमुस्तहि ॥ ५ ॥ ६.४५ ।। . ईशे दि शास्तमून हवामई जेतारमपराजितम् । सना स्त्रर्पदति दिपा क्रतुश्चन्द प्रतस् वृद॥ ६ ॥ ६४६॥. इन्द्र ! सुमुतिपन वा रणमें मपराभव दीजिय । मन की रक्षा हेतु पकाधिपता को पाइय ।। वांछिवा ममुदाय यथा यनमानों के गए। पनको अपने वशीकरलेवय हों तुम ।।- हेमविशय पल धारने ! जो धनवन्तों में प्रषित । इसी हेतु इन साधनामों से सजित रहो नित ॥ ४ ॥ ॥ ६४१ 1.. श्री धादिस्य समान दीप्तियुत.इन्द्र देवदर ! शानवन्त इगको धन के निकटस्थ. पनामा-1 इन्द्र. परम ऐश्वर्ययुक्त सप में विभुवयरा । उसी देव को, भलीभाँति से.स्तुति को गाम । रपि.मात्मा से करत.भम नित्रप इन्द्र.रिपुन है। म पूष्य इस हेतु ही उसकी स्तुति को गाये. ॥ ५॥ ६.४५ ॥ म. इन्द्रतिरक्षार्थ सभी हम लोग घुलावहि । जो रणजेता तथा परामय पाप कभी नदि। बहै इन्द्र हमरे रिपु को पिनाय चाबहु । पुनि हमरे यज्ञादि कर्म को सफज करावा भी गाययादित स्तुतिर्हि तथा योम से भुरप को अथवा पत्य सुकर्म को भवि फाशसंयुतकीजियो ।। २।। ६.४.६ ।।

२३ १२ 3 १२ ३१२३१२ १ २ ३२.३ 3 ११ २२ ३१२ २२ ३ २ ३२ 2 २ ३.२. २ (२०६ ) अथ तृतीयास्निमः। इन्द्र धनस्य मानये. ईबोमई जवारमपराजितम् । स नः स्त्रप्रति द्विषः स नः वर्षदति द्विषः ।। ७ ।।.६४७।। पूर्वस्य यत्ते शाद्रिवाशुर्मदाय । सुम्न शाहि नो बसो पूर्तिः शविष्ठ शस्यते ।। ३ र १२ १३ वशी हि शक्रो नूनंतन्त्रव्यसन्यसे || 5.॥ ६४८ः॥ प्रभोजनस्य वृत्रहनसमयेषु ब्राप है। शसे यो गोषु गच्छत्ति सखा सुशेवो अद्वयुः ॥ ६ ॥ ६४६ ।। जो रण में नहिं कभी, शिखी, स होत पराजित । मस इन्द्रदि हम धन की रक्षा हित बुलवावत ।। हमरे सँग विद्वेष रखें ऐसे जो रिपुगण । चाहे वे हों वाहा तथा भाभ्यन्तर रिपुदल ।। उन सप शत्रुसमूह को नई इन्द्र विदलित फार । उन सब शत्रु समूह को वहै इन्द्र विलित करै ।। ७ ॥ ६४७ ॥ वजूधारि ! प्राचीन भाव के धारफ हो तुम । अस तुम्हार जो वित्त उसे हम सबहिं दान करु ।। इन्द्र ! यहै जो सोमलता निष्कर्ष सोमरस । हर्षप्रद है बसी । हमें सुख धन में स्थापिय ॥ श्रेष्ठ बली ! श्रीदान तुव सब से स्तुति को पावता। थवाश समर्थ वशी अत: दान तोर स्तुति पावता || ६४८॥ हे स्वामी ! वृत्रारि ! नव्य तुझ को मैं निश्चयः । गख में थरपुं वा नवीन तुम हम से पूजित ।। श्री यज्ञों में बात परस्पर में कर लेवहि । जो समर्थ रणमध्य गवों को लेखन जावत। मित्र इसी से सुख कर सत्यरूप को धारता । इत्यादिक गुण गणों से युक्त इन्द्र है देवता ॥९॥ १६ ॥ . ..

(२०७ ) २ 555555 ३ र घष पश्चपरीषपदानि । एवाहो३३२ एया हारने एवाहीन्द्र । एराहिपूपन् एशाहिदैवाः ॥ १० ॥ ६५० ।। इति महानाम्न्यार्षिक: पूर्वार्धश्च समाप्तः ।। हे इन्द्र ! निश्चय पूर्ववर्णित गुणों से तुम युक हो । इस हेतु हमरे यज्ञ के पिच आइयो पुनि पाइयो । श्री अग्नि भी पूषाभिधानी इन्द्र ! भौ सय देवता ! हम याशिकों के यज्ञ तिन्द में सभी पाप पधारना ॥ १० ॥ ६५० ।। उपरोक्त मंत्र में इन्द्र ही को अग्निवायु और पुपादि नाम से पुकारा है और मन्य समस्त देवों को भी इन्द्र ही के नाम से सम्पोधित किया है और उसी फो या में बुलाया है सो उसी एक ही की स्तुसि से सभी का प्रावाहन समझना चाहिये । ये सभी नाम उस परमेश्वर के हैं और वही सर्व गुण य है, अतः उसी का भावाहन प्रार्थना गा सम्बन्धी कार्यों में समझनी चाहिये । और कहीं ये शब्द मलग २ देवताओं के लिये भी पाते है जैसा प्रसंग हो यहां arही मर्य प्रम माना चाहिये । द्विरुक्ति भत्यन्त श्रद्धा और भक्ति का प्रकाश करती है, इति शम् ॥ इति महानाम्न्याचिफ समाप्त ।। पह महानाम्न्याधिक छंद मार्थिक भार उत्तराधिक दोनों का मध्यवर्ती भाग है । ये एक रीति पे शक्वरी बंद की प्राचा है; जिनका इन्द्र देवता है और भन्त में पुरीषपद नाम से प्रसिद्ध ५ पद हैं । ये गूा में ३ ऋचा हैं परंतु उपसगों के सदिस येदपाठी लोग इन्हें १ (नौ) करके पढ़ते हैं। ऐतरेय-माहाण-विहित पोडशी शार में भी ३ तीन ही महानाम्नी कही है और प्रैलोक्याधार फा वर्णन है। भम यहां प्रश्न होता है कि यदि ये शफरी छंद है तो इनमें छप्पन २ अक्षर होने चाहिये । क्योंकि २४ अक्षरों से लेकर चार अक्षर पढ़ाये हुए जो श्रीपिंगला- नुपार गायत्री से अतिधृति-पर्यंत २१ छंद बनाये जाते हैं तदनुसार ५६ मक्षरों की शक्वरी होती है, परंतु इनमें ५६ से अधिक अक्षर हैं। इसका उत्तर यह है कि स्वत: तो इनमें ५६ ही अक्षर हैं। पर वीच २ में "उपसर्ग" नामक पद मिल रहे हैं जिनमें अधिक भक्षर जान परते हैं । यह यात श्रीसायणाचार्य ने विस्तार- पूर्वक दिखाई है। शिवमस्तु । शिवमरत । शिवमस्तु ।

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समश्य पढ़िये! अवश्य पक्षिका शुम-सूचना॥ विदित हो कि इस बात को प्रायः सभी मतवादी जानते है। परम पवित्र वेदों से बढ़कर कोई भी ग्नन्थ ईश्वरीय ज्ञान से पति है। पर समय के हेर फेर से इनका प्रचार इतना शिथिल होग.. का कुछ ठिकाना नहीं। एक तो यह विषय ही इतना गंभीर ह छहों अंग और छहों दर्शन इत्यादि विषयों में गति हुए विना इनमें प्रवे सहज में कोई नहीं पा सक्ता और दूसरे पठन पाठन की प्रणाली सर्वत्र प्रसार नहीं होने से अत्यन्त कठिन जान बहुत थोड़े लोग इध रुचि करते हैं, इत्यादि कारणों को सोच विचार इन पवित्र ग्रंथों क लेवा करने को यह विचार सूझा कि यदि इनको छंदोषद्ध अनुव लहित छपावें तो आशा है कि लोग राग से बोलते हुए मंत्रार्थों : लमझ सकेंगे और ऊपर वेदमंत्र रहने से मंत्र भी उपस्थित जावेंगे । इस आशय से पहिले श्री सामवेद का प्रारम्भ कराया II) रुपयों में यह अंथ पूर्ण होगा और जो १५०) २० वेद-प्रचार प्रदान करेंगे उनका नाम उसी अध्याय के टाइटल पेज पर प्रद शक के स्थान पर दिया जावेगा। जिससे यहां सुयश और ब- उनका अखण्ड पुण्य बढ़ेगा। श्रीमानों का हितचिन्तक-- शिवदत्त-काव्यतीर्थ, सुदामापोल, अजमेर

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सम्वेद संहिता

Author
Xx
Title
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File name
सम्वेद संहिता
Text
OCR done
Citation
1892
Published
2009/03
Publisher
वैदिक यंत्रालय, अजमेर
Language
Sanskrit
Pages
66
Library
Banasthali University
Classification
Biography
DLI number
405024
Barcode
99999990064817.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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7erctBlHgWC
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