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Upnayan Paddatti

2012/08

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श्रीमहामत्तकमासामंताधिपतिश्रीरा. मदत्तविरचिता उमानयनपद्धतिः भाषाटीकासहिता। राजधानीकर्परस्यठ निवासि गौतमगोर (शोरि) अन्वयालकृत श्रीदेवदुनिचन्द्रात्मजपण्डित বিবিকরা nod- साच श्रीकृ गदासात्मजक्षेमराजेन शुख्खयां वी गली खम्बाटा लेन) (स्रोतबाट स्वर्काये"श्रीवेकदा घर" स्टीम्-मुद्रणयन्त्रालये ए मुद्रा प्रकाशिना शके १८३६. सवत् १९ पुनर्मुद्रण दय सर्वे गजनियगत प्रका- (४) विज्ञापन । भाषाटीकासहित पांचप्रकरणों में बनाया है । प्रथम प्रकरणमें उपनयनके मुहूर्त, द्वितीयमें ब्रह्मचर्य यज्ञोप वीतधारण, तृतीयमें वेदारंभ, चतुर्थमें समावर्तन, पंचमप्रकरण जिसमें ॐ कारप्रशंसा वेदोंके अनध्याय यज्ञोपवीतका निर्माण और धारणप्रयोग तथा पारस्करोक्त उपनयनसूत्र है । इसलिये सजन पुरुए. इस अत्युत्तम सर्वोपयोगी उपनयनपद्धतिके पुस्त- कको स्वीकारकर अपना मनोरथ और हमारा परि- श्रम सफल करें। और इससे परमात्मा श्रीरामचंद्र प्रसन्न हों। प्रार्थना-पदशुचमसंबधयज्ञानाञ्च कतं मया । विद्वद्भिः क्षम्यतां सर्व वालवादयमंजलिः । कर्पूरस्थलनिवासी-- दैवज्ञदुनिचन्दात्मज ( शोर) पण्डितविष्णुदचशर्मा वैदिक.

॥ श्रीः ॥
अथ उपनयनपद्धतिः।
(भपाटीकासमेता.)
प्रथमप्रकरणम् १.
ॐस्वस्ति ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ विप्रा-
णां व्रतवन्धनं निगदितं गर्माजनेऽष्टमे
वर्षेवाप्यथ पंचमे क्षितिभुजां पठेतथैका-
दशे॥ वैश्यानां पुनरष्टमेप्यथ पुनः स्या-
द्वादशे वत्सरे कालेऽथ द्विगुणे गते निग-
दिते गौणं तदाहुवुधाः ॥१॥
ॐनमो गणेशाय ।। स्वस्ति श्रीः ॥ श्रीगुरवे नमः।।
हेरम्ब शारदां शम्भु राम सीतासमन्वितम् । प्रणम्य
भक्त्या स्वगुरुं कुवें टीका मनोरमाम् ॥ १॥ नवग्रहे-
न्द्रवामनं पितृव्यमाधवं तथा । स्वपूर्ववंशसंभवान मु-
हुर्मुहुः प्रणौम्यहम् ।। २ ।। कृताकृतं हि यन्मया अशु-
छित्तोलतोद्भयम्। असंस्कृतं घनक्षरं महापैश्च सध्य-
ताम् ॥ ३॥ कर्पूरस्य स्थले रम्ये उद्यानादिसुशो-
भिते । विष्णुदत्तेन विदुपा कृता टीका समासतः॥४॥
व्याख्याकृतोपनयनपद्धते। विलोक्यताम् । उल्लसि-
प्यन्ति दृष्यन्ति सन्तोऽसन्तश्च भूतले ॥५॥१॥

उपनयनपद्धतिः ।
"आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम्
इत्यादि शास्त्रमामाण्य और शिष्टाचारफलदर्शन ' श्रेय-
स्कामो मंगलमाचरेत' इति श्रुतिबोधितनमस्कारात्म-
कमंगलको विधानकर प्रथम वेदाध्ययनविपयकफल
निरूपण करतेहैं ( यथा याज्ञवल्क्यस्मृति अध्याय
प्रथम स्मृति ४० से आदिले ४८ पर्यन्त ) यथा-
"यज्ञानां तपसां चैव शुभानाञ्चैव कर्मणाम् ।
वेद एव द्विजातीनां निःश्रेयसकरः परः ॥ ४० ॥
मधुना पयसा चैव सदेवाँस्तर्पयेद्विजः ।
पितॄन्मधुघृताभ्याञ्च ऋचोधीते च योऽन्वहम् ४१॥
यपि शक्तितोऽधीते योऽन्वहं सघृताऽमृतेः।
प्रीणाति देवानाज्येन मधुना च पित॒स्तथा ॥ ४२ ॥
सतुसोमघृतैर्दैवाँस्तयेद्योन्वहं पठेत् ।
सामानि तृप्तिं कुर्याच्च पितृणां मधुसर्पिपा ॥ ४३॥
मेदसा तर्पयेद्देवानथर्वाङ्गिरसः पठन् ।
पितॄश्चमधुसर्पिर्ध्यामन्वहं शक्तितो द्विजः ॥ १४ ॥
वाकोवाक्यं पुराणं च नाराशसीश्च गाथिकाः।
इतिहासाँस्तथा विद्याः शक्तयाधीते हि योऽन्वहम् ॥
मांसक्षीरोदनमधुतर्पणं स दिवौकसाम् ।
करोति ताप्तं कुर्याच्च पितॄणां मधुसर्पिषा ॥ ४६॥
ते तृप्तास्तर्पयंत्येनं सर्वकार्मफलैः शुभैः ।
यं यं ऋतुमधीतेऽसौ तस्यतस्यामुयात्फलम्॥४७॥

भायाटीकासमेता। (७) विवित्तपूर्णपृथिवीदानस्य फलमश्नुते ।. तपसो यत्परस्येह नित्यं स्वाध्यायवान्द्रिजः४८" अर्थात जो पुरुप भलीप्रकार ऋग्वेद यजुर्वेद साम- वेद अथर्वणवेद वाक् अनुवाक् पुराण नाराशंसी गाथिका इतिहास रामायण भारतादि तथा और विद्या शिक्षा कल्प व्याकरण निरुक्त छंद ज्योतिष धर्मशास्त्र दर्शन आदि साथ वेदोंके व्यस्त वा समस्त पढतेहैं प्रतिदिन अभ्यास करतेहैं वे पुरुष मधु (शहद) पायस दुग्ध अमृत घृत आदि अत्युत्कृष्टपदार्थोंसे देवताओंको और मधु घृत तिल आदिवृष्यपदार्थोसे पितरोंको तृप्त करतेहैं वे पितर और देवतागण तृप्त भये इनको पुत्र पौत्र धन यश सुख आदि सर्व कामनासे तृप्त करतेहैं और जिस यज्ञको जो पुरुप सार्थक सुस्वर पढताहै वह उस यज्ञके फलको प्राप्त होताहै. इत्यादि महाफलदाता वेदाध्ययन फलको वही पुरुप प्राप्त होताहे कि, जिसका शुद्ध यथाकाल वक्ष्य- माणमें चंद्रतारादि शुद्धिमें यथावत् उपनयनसंस्कार किया हो और उपनयनके अनंतर देव पितृ ऋपि य- ज्ञादिकर्मों में अधिकारी होताहे प्रमाण (याज्ञ० अध्याय प्रथम स्मृति१५) यथा- (उपनीय गुरुः शिष्यं महा- व्याहृतिपूर्वकम् । वेदमध्यापयेदेनं शौचाचारांश्च शिक्ष- - (८) उपनयनपद्धतिः । येत्) अर्थात् शिष्यको यज्ञोपवीत धारण करवाय गुरु महाव्याहतिपूर्वक शिष्यको वेद पढावे और शौच आ- चारकी शिक्षा करे-इत्यादि स्मृति प्रमाणोंसे उपनीत पुरुपही वेद पढ़नेका अधिकारी है।। अन्यथा उपनयन रहितको वेदका अधिकार नहीं, यथा-"स्त्री शूद्रो- ऽनुपनीतश्च वेदमंत्रान्विवर्जयेत्"। अर्थ-स्त्री शुद्र और जिसका उपनयनसंस्कार न हो यह तीन वेदोंको न पठन करें और विना उपनयनके द्विजत्व ब्राह्मण क्ष. त्विय वैश्यको नहीं होता अर्थात् उपनयनसंस्कारके अनंतर इनकी द्विजसंज्ञा होतीहै इसमें प्रमाण (याज्ञव० स्मृ०अ०१स्मृति३९) यथा-"मातुर्यदये जायन्ते द्वि- तीय मौनिबंधनात् । ब्राह्मणक्षत्रियविशस्तस्मादेते द्विजाः स्मृताः"॥ इस लिये उपनयनसंस्कारसे अधि- कृत होनेसे और उपनयनमें मुख्यता कालको होनेसे प्रथम कालनिरूपण करते हैं तद्यथा [ विप्राणां व्रतव- न्धनमिति] गर्भसे वा जन्मसे अष्टमवर्पमें ब्राह्मणोंको व्रतबंधन अर्थात् यज्ञोपवीतका धारण करना चाहिये अथवा पंचम वर्षसे । इसीप्रकार क्षत्रियोंको पष्ट ६वा एकादशवर्ष में और वैश्योंको अष्टम ८और द्वादश१२ वपमें यज्ञोपवीतधरण कहा अथवा कालातिकम हो- नेसे पोडश१६ वर्प ब्राह्मणको और द्वाविंशति २२ भाषादीकासमेता। (५) वर्ष क्षत्रियको और चतुर्विशति २४ वर्षमें वैश्यको उप नयनमें गौणकाल कहाहे ।। अर्थाद उपनयनसंस्का- में नित्य काम्म गौण भेदसे तीन प्रकारका काल लिखाहै जिसमें ब्राह्मणको गर्भ वा जन्मसे अष्टम ८ क्षत्रियको एकादश ११ वैश्यको द्वादश १२ वर्षमें नि- त्यकाल कहाहै, इसीप्रकार ब्राह्मणको पंचम क्षत्रियको पष्ट वैश्यको अष्टम यह काम्य काल है और ब्राह्मणको पोडश १६ क्षत्रियको दाविंशति २२ वैश्यको चतुर्वि- शति २४ वर्षमें उपनयन गौणकाल कहा है | इनवर्षों- के ऊपर गायत्रीका अधिकारी नहीं होता ॥ प्रमाण (याज्ञवस्मृ अध्याय स्मृति१४)यथा-"गमाष्टमेऽए- मेवाब्दे वाह्मणस्योपनायनम् । राज्ञामेकादशे सैके विशा- मेके यथाकुलम्" यथाकुलम् अर्थात् काम्यकाल पंचम पष्ट अष्टम वर्ष में इसलिये फल बोधित होनेसे पैठीनसी मुनिजी काम्यकाल विधान करते हैं (गर्भ- पंचमेऽव्दे ब्राह्मणमुपनयेदिति गर्भपष्टेऽयमे च क्षत्रियवि. शोयिम् गर्भादिसंख्या वर्णानामिति) मनुजी भी लिखतेहैं-"ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्य विप्रस्थ पंचमे । राज्ञो बलार्थिनः पठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे" और गौण काल भी याज्ञवल्क्यादिधर्मशास्त्रोक्तलिखतेहैं । प्रमाण (याज्ञव० अ०१ श्लोक ३७१३८) यथा-"आपोडशादा- द्वाविंशाच्चतुर्विंशाच्च वत्सराव । ब्रह्मक्षत्वविशां काल (१०) उपनयनपद्धतिः ।। औपनायनिकः परः। अत उर्व पतन्त्येते सर्वधर्मवहि- प्कृताः । सावित्रीपतिता त्रात्या त्रात्यस्तोमाटते क्रतो' मनुजीभी लिखतेहैं-"आपोडशाद्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते । आदाविंशाह्मबंधोराचतुर्विशतेर्विशः ॥ अत उध्वं त्रयोप्यते यथाकालमसंस्कृताः। सावित्रीपति- ता व्रात्या भवन्त्यपि च . गर्हिताः” इति ॥ और पारस्करजीभी लिखतेहैं ( गृह्यसू० कांड २) "अष्टवयं ब्राह्मणमुपनयेद्गीष्टमे वैकादशवर्ष राजन्यं द्वादशवर्प वैश्य यथामंगलं वा सर्वेपाम्-आपो- डशाद्वद्रिाह्मणस्यानतीतः कालो भवति । आदावि- शादाजन्यस्याचतुर्वि ५ शाद्वेश्यस्यातऽउर्व पतित- सावित्री का भवति नैनानुपनयेयुर्नाध्यापयेयुर्नयाजये- युनचैभिर्व्यवहरेयुः कालातिक्रमे नियतवत् त्रिपू- रुप पतितसावित्रीकाणामपत्त्ये संस्कारो नाध्यापनं च तेपा ५ संस्कारप्सु त्यस्तोमेष्ट्या काममधीयीरन् व्यवहार्या भवतीति वचनात्” । क्षिप्रध्रुवाहिचरमूलमृदुत्रिपूर्वा रौद्रेर्क- विद्वरुसितेन्दुदिने व्रत सत् । त्रिीपुरु- द्ररविदिप्रमिते तिथौचकृष्णादिमत्रि- लवकेपि न चापराह्ने ॥२॥ क्षिप्रसंज्ञकनक्षत्र अर्थात् हस्त अश्विनी पुष्य.अभिजित।

भाषाटीकासमेता।
(११)
ध्रुवसंज्ञकनक्षत्र अर्थात् उत्तरफाल्गुनी उत्तरापाढा
उत्तराभाद्रपदा रोहिणी । आश्लेपा। चरनक्षत्र- स्वाति
पुनर्वसु श्रवण धनिष्ठा शतभिपा । मूलामृनक्षत्र-मा-
शिर रेवती चित्रा अनुराधा । पूर्वाभाद्रपदा पूर्वाफाल्गुनी
पूर्वापाना आ इन नक्षत्रोंमें । रवि बुध बृहस्पति शुक्र
चन्द्र इनदिनोंमें । द्वितीया तृतीया पंचमी एकादशी
द्वादशी दशमी इन तिथियों में कृष्णपक्षकी पंचमीपर्यंत
ये सब उपनयनसंस्कारमें नक्षत्र तिथि दिन पक्ष शुभहैं
और अपराह्नकाल अशुभ हे अर्थात् पूर्वमध्यभाग दिन
के शुभ होते हैं ॥२॥
कवीज्यचन्द्रलग्नपा रिपो मृतौ व्रतेऽधमाः।
व्ययेजभार्गवौ तथा तनौ मृतौ सुते खलाः
उपनयनमें लमशुद्धि लिखतेहैं । उपनयनलमसे
पष्टस्थान और अष्टमस्थान ८ में कवि (शुक्र)
इज्य ( बृहस्पति ) चन्द्रमा लग्नेश ये अधम अर्थात
अशुभ होते हैं। इसीप्रकार चन्द्रमा, शुक द्वादशस्था-
नमें अशुभ होते हैं लग्न और अष्टम पंचम स्थानोंमें
पापी ग्रह अशुभ होते हैं । यथा बृहज्जातकमें 'क्षीणेन्द्र-
कमहीसुतार्कतनयाः पापा बुधस्तैर्युतः' । अर्थात्
क्षीणचन्द्रमा सूर्य मंगल शनैश्चर यह पापी ग्रह होते हैं
यदि इनसे युक्त बुध होय तो वह भी पापी होताहे॥३॥

(१२) उपनयनपद्धतिः । व्रतवन्धेऽष्टषड्रिष्फजिताः शोभनाः शुभाः। विषडायेखलाः कर्कगोस्थःपूणोंविधुस्तनौ ॥४॥ व्रतबंधमें पष्ठ ६ अष्टम ८ द्वादश १२ स्थानसे रहित शुभग्रह हो अर्थात् प्रथम द्वितीय चतुर्थ पंचम सप्तम नवम दशम इनमें शुभग्रह होवें और तीसरे पष्टस्थान एकादशस्थानमें पापी ग्रह शुभ होते हैं और पूर्णचंद्रमा कर्क वृप राशिका हो लममें स्थित हो तो अति शुभ है ॥४॥ विनाधीशौ भार्गवेज्यौ कुजार्को राज- न्यानामोषधीशो विशां च ॥ शुद्राणां ज्ञश्चान्त्यजानां शनिः स्याच्छाखेशाः स्युजीवशुक्रारसौम्याः॥५॥ चतुर्वणोंके शाखेश क्रमसे ये होते हैं शुक्र और बृहस्पति ब्राह्मणो की शाखाके स्वामी हैं। मंगल सूर्य क्षत्रियोंके शाखेश हैं, वैश्योंका चंद्रमा शाखेश है और शूद्रोंका बुध शाखेश है अन्त्यज अर्थात् चांडाल शवर निपादादिकोंका शनैश्चर शाखेश होताहै तथा वृह- स्पति ऋग्वेदका स्वामी शुक यजुर्वेदका और मंगल सामवेदका तथा बुध अथर्वण वेदका स्वामी है ॥ ५॥ शाखेशवारतनुवीर्यमतीवशस्तं शाखेश- भापाटीकासमेवा। (१३) सूर्यशशिजीववले व्रतं सत् । जीवे भृगौ रिपुगृहे विजिते च नीचे स्यावेदशास्त्र- विधिना रहितो व्रतेन ॥६॥ शाखेश अर्थात् अपनी २शाखाका स्वामी उसका (वार दिन) और शाखेशका लग्न और बलयुक्त शाखेश . यह व्रतबंधन उपनयनमें अतिश्रेष्ठ होते हैं । और शा. खेश सूर्य चंद्रमा बृहस्पति यह बलयुक्त उपनयनमें श्रेष्ठ होते हैं यदि शुक्र वृहस्पति शत्रुस्थानमेंहों अथवा पराजित वा नीच हों उसकालमें उपनीतपुरुप वेदशास्त्रविधिसे रहित होता है ॥ ग्रहोंका उच्च नीच बृहज्जातकोक्त लिखते हैं । यथा-'अजवृषभमुमृगांगना- कुलीरा झपवणिजौ च दिवाकरादितुंगाः। दशशिखिम- न्युकृतिथीन्द्रियारोत्रिनवकविंशतिभिश्च तेऽस्तनीचाः' अर्थात् मेपके१० अंश सूर्य पूर्णउच्च और तुलाके १० अंश पूर्ण नीच होताहै. इसप्रकार वृषके३अंश चंद्रमाका उच्च वृश्चिकके३अंश पूर्ण नीच होता।और मंगल मकरके२८ अंश उच्च कर्कके २८ अंश नीच । बुध कन्याके १५ । अंश उच्च और मीनके१६ अंश नीच । बृहस्पतिपर्क- के९ अंश उच्च और मकरके ५ अंश नीच । शुक्र मीनके २७ अंश उच्च और कन्याके २७ अंश नीच। शनैश्चर

(१४) उपनयनपद्धतिः।
तुलाके २० अंश उच्च और मेपके २० अंश पूर्ण नीच
होता है ॥६॥
जन्मर्भमासलग्नादौ व्रते विद्याधिको व्रती॥
आद्यगर्भपि विप्राणां क्षत्रादीनामनादिमे ॥७॥
जन्मनक्षत्र जन्ममास जन्मलग्न जन्मतिथि ब्राह्म-
णोंका आद्यगर्भ अर्थात् ज्येष्ठ बालकका उपनयन कर-
नेसे उपनीत अधिक विद्यासंपन्न होता है और इन
तिथी वार नक्षत्रादिमें क्षत्रिय और वैश्यके प्रथमगर्भको
उपनयन श्रेष्ठ नहीं अर्थात् द्वितीय तृतीय पुत्रादिकों
काजन्ममासादिमें उपनयन संस्कार अति श्रेष्ठ है ॥ ७॥
बटुकन्याजन्मराशेस्त्रिकोणायहिसप्तगः।
श्रेष्ठो गुरुः खपत्र्याचे पूजयाऽन्यत्र
निन्दितः॥८॥
बृहस्पतिजीकी शुद्धि कहते हैं कि, बटु (बालक)
कन्याकी जन्मराशि अर्थात् जन्मसमय जिस राशिमें
चन्द्रमा स्थित हो उससे नवम पंचम द्वितीय एकादश
सप्तम स्थानमें स्थित वृहस्पति श्रेष्ठ होता है और
पष्टस्थान तथा तृतीयस्थान दशम लग्नमें पूजनसे
वृहस्पति शुभ हे अन्यत्र अर्थात् चतुर्थ अष्टम द्वादश
स्थानमें निंद्य अथीत वृहस्पति अशुभ होता है ॥ ८॥

.
भापाटीकासमेता। (१५)
स्वोचे स्वभे स्वमित्रे वा स्वांशे वर्गोत्तमे
गुरुः॥रिष्फाष्टतुर्यगोपीष्टो नीचारिस्थः
शुभोप्यसत् ॥ ९॥
स्वीच अर्थात् पूर्वोक्त अपने उच्चमें स्वभे अर्थात्
अपने राशिमें मित्रकी राशिमें अर्थात सूर्य चंद्र मंगलकी
राशिमें हो वा अपने नवमांशमें हो अथवा वर्गोत्तम
स्थानमें स्थित होकर यदि द्वादश अष्टम चतुर्थ स्थान
में स्थित गुरुभी होयतोभी श्रेष्ठ होताहै और नीच वा
शत्रुकी राशिमें स्थित हुआ यदि शुभ स्थानमेंभी होय
तो वहुभी अशुभ होताहै ॥ राशीश बृहज्जातकोक्त
लिखतेहैं ॥ क्षितिजसितज्ञचंद्ररविसौम्यसिताव-
निजाः । सुरगुरुमंदसौरिगुरवश्च गृहांशकपाः' ॥
अर्थात् मेष और वृश्चिकका मंगल स्वामी । वृप और
तुलाका शुक्र स्वामी।मिथुन और कन्याका बुध स्वा-
मी। कर्कका चंद्रमा स्वामी। सिंहका सूर्य स्वामी।
धन और मीनका वृहस्पति स्वामी। मकर और कुंभका
शनैश्वर स्वामी होताहे ॥ वोत्तम चरराशिका प्रथम
नवमांश होताहै । प्रमाण वृह० वर्गोत्तमाश्चरगृहा-
दिपु पूर्वमध्यपर्यंतगाशुभफला नवभागसंज्ञाः ॥९॥
कृष्णे प्रदोपेऽनध्याये शनौ निश्यपरानके ॥
प्रासंध्यागजिते नेष्टो व्रतबंधों गलग्रहे॥१०॥

(१६) उपनयनपतिः। प्रथम विभागरहित कृष्णपक्ष और प्रदोप अनध्याय जो आगेकहेहैं उनमें और शनैश्चर वार तथा रात्रि काल- में अपराह्नकालमें प्रातःकालकी संध्यामें यदि मेघश- ब्दहो उसमें और गलग्रह गततिथिवा त्रयोदशी चतुर्द- शी आमावस्याप्रतिपत् और सप्तमी अष्टमी नवमी और चतुर्थी यह तिथियोंको गलग्रह कहते हैं । प्रमाण गुरु:- "त्रयोदश्यादि चत्वारि सप्तम्यादिदिनत्रयम् । चतुर्थी- चैकतः प्रोक्ता अष्टावते गलग्रहाः" । यदि इन पूर्वोक कृष्णपक्षादिमें उपनयन हुआ हो मधुमासविना तो फिर संस्कारके योग्य होताहे । अन्यथा गलग्रहदोपमें स्वल्पायु होताहै ॥ प्रमाण दैवज्ञमनोहरका-"प्रदोपे निश्यनध्यायें मंदे कृष्णे गलग्रहे । मधु विनोपनी- सस्तु पुनः संस्कारमईति । गलग्रहे प्रदोपे च स्वल्पा- युरुपजायते" । इति ॥ १० ॥ क्रूरोजडो भवेत्पापः पटुः षट्कर्मकृटुः॥ यज्ञार्थभाक्तथामूॉरव्याचंशेतनौकमात्॥ अंशफलको यथाक्रमसे लिखतेहैं । यदि लग्नका न- वमांश सूर्यका होय तो क्रूरस्वभावयुक्त होताहै । इसी प्रकार चंद्रमा होय तो जड । मंगल होय तो पापशील।बु- ध होय तो पटु अर्थात् चतुराबृहस्पति होय तो पट् क- र्मकृत् अर्थात् यजन यांजन पठन पाठन दान प्रतिग्रह भाषाटीकासमेता। (१७) इन कर्मोंके करनेवाला होताहोयदि शुक्र होय तो यज्ञा- र्थभाक अर्थात् यज्ञार्थके भोगनेवाला होताहै । यदि शनैश्चरका नवमांश होय तो मूर्ख होताहे ॥११॥ विद्यानिरतः शुभराशिलवे पापांशगते हि दरिद्रतरः॥ चन्द्रे स्वलवे वहुदुःख- युतः कर्णादितिमे धनवान्स्वलवे॥१२॥ जिस किसी राशिमें चंद्रमा स्थितहो उसमें यदि शुभग्रहराशिके नवमांशमें हो तो विद्यासंपन्न पुरुप होताहै । यदि पापग्रहके नवांशमें हो तो अतिशय निधन होताहै। यदि कर्क राशिके नवमांशमें हो तो बहुतदुःखयुक्त होताहै । यदि श्रवण और पुनर्वसु नक्षत्रमें उपनयनहो अपने नवमांशमें चंद्रमा होय तो धनवान होताहै ॥ १२॥ राजसेवी वैश्यवृत्तिश्शस्त्रवृत्तिश्च पाठकः ॥ प्राज्ञोर्थवान्स्लेच्छसेवी केन्द्र सूर्यादिखेचरैः१३ अथ केंद्रों में स्थित सूर्यादि नवग्रहका फल कहतेहैं यदि सूर्य केंद्रस्थान ॥ १॥४॥७॥ १०॥ इन स्थानोमें स्थित होय तो राजाका सेवक होताहै। चंद्रमा होथ तो वैश्यवृत्ति व्यापारयुक्त होता है। मंगल होय तो शस्त्रधारणकर आजीवन करताहै। बुध पठन पाठन (१८) उपनयनपद्धतिः। वृत्ति करता है।बृहस्पति बुद्धिमान कर्ता है । शुक्र धनी, शैनश्चर म्लेच्छ सेवक क्रमसे करता है ॥ १३ ॥ शुक्रे जीवे तथा चंद्रे सूर्यभौमार्किसंयुते ॥ निर्गुणः क्रूरचेष्टः स्यान्निघृणासाते पटुः१४ शुक बृहस्पति चन्द्रमा इन तीनोमें यदि एक साथभी सूर्य संयुक्त होय तो उपनीतबालक निर्गुण होताहै। यदि मंगलयुक्त हो तो क्रूरस्वभाव होताहे । यदि इनके साथ शनैश्वर युक्त होय तो लना और दयाहीन होताहै। यदि चंद्र शुक्र बृहस्पतिके साथ शुभग्रह युक्त होय तो सर्वविद्यामें निपुण उपनीत बा- लक होनाहे.॥१४॥ विधौ सितांशगे सिते त्रिकोणगे तनौ गुरौ॥ समस्तदेदविद्वतीयमांशगेऽतिनिघृणः ॥ १५॥ चंद्रमा शुक्रके नवमांशमें स्थित होय और शुक्र उपनयनलग्नसे नवम पंचम स्थानमें स्थितहो बृहस्पति लग्नमें स्थितहोय तो इसमें यदि उपनयनसंस्कार होय तो संपूर्णवेदोंके जानने वाला बालक होताहै। यदि शनै- श्वरके नवमांशमें चंद्रमा होयू लग्नमें गुरु और शुक्र नवम पंचम होय तो अत्यंत निवृण अर्थात् कृतघ्न. झोताहै ।। १९॥ शुचिशुक्रपौषतपसां दिगविरुद्रार्कसंख्य- भापाटीकासमेवा। (१९) सिततिथयः ॥ भूतादित्रितयाष्टमी संक्र- मणंच व्रतेष्वनध्यायाः ॥ १६ ॥ उपनयनसंस्कारमें अनध्याय लिखते हैं आपाढ शुक्ल दशमी।ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीयाापौषशुकएकादशी। माघ शुक्लद्वादशी। और चतुर्दशी । पूर्णिमा अमावस्या प्रति- पदा अष्टमी संक्रांति चकारसे मन्वादितिथियोंमें भी अनध्याय होता है।॥ १६॥ अर्कतर्कवितिथिषु प्रदोषः स्यात्तदग्रिमैः ॥ रान्यर्धसार्धप्रहरयाममध्यस्थितैः क्रमात्१७॥ प्रदोपकहतेहैं, जैसे द्वादशीकी अर्धरात्रिमें त्रयोदशी होय तो प्रदोष होताहपष्टीके डेडप्रहर गत्रिके मध्यमें सप्तमीका प्रवेश होय तो प्रदोष होता है ॥ तृतीयाके प्रहर रात्रिके मध्यमें चतुर्थीका प्रवेश होय तो प्रदोप होताहे ॥१७॥ प्रारब्रह्मौदनपाकाइतवन्धानंतरं यदि चेत्॥ उत्पातानिध्ययनोत्पत्तावपि शान्तिपूर्व- कं तत्स्यात् ॥१८॥ ब्राह्मण मिक्षितमोजनके पूर्व ब्रतबंधनके अनन्तर उत्पात वा अनध्यायोंकी उत्पत्ति होय तो शांतिपूर्वक यज्ञोपवीत धारण करे।।३८॥इसकी शांति लिखते हैं।

(२०) उपनयनपद्धतिः। "स्वस्तिवाचनपूर्व तु हवनं कारयेवुधः ॥ प्रधानं पायसं साज्यं द्रव्यशांतियतो भवेत् ॥ सूक्तं वृहस्पतेर्विद्वान् पठेद्विद्यासमृद्धये ॥ गायत्री युञ्जतो मंत्रः प्रायश्चित्तं तु सर्पिपा ॥ धेनुं सवत्सकां दद्यादाचार्याय पयस्विनीम् ॥ शिलां होमविधेः पश्चात् स्थापयेत्तत्र संसदि ।। ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चात्ततो ब्रह्मौदनं चरेत् ॥ वेदक्रमाच्छशिशिवाहिकरत्रिमूलपूर्वासु पौष्णकरमैत्रमृगादितीज्य॥ध्रौवेषु चाश्वि- वसुपुष्यकरोत्तरेशकणे मृगांत्यलघुमैत्र- धनादितौ सत् ॥ १९॥ वेदक्रम अर्थात् मृगशिर आर्द्रा आश्लेपा हस्त चित्रा स्वाति मूल पूर्वात्रय यह नक्षत्र ऋग्वेदियोंको श्रेष्टहें रेवती हस्त अनुराधा मृगशिर. पुनर्वसु पुष्य उत्तरा त्रय रोहिणी यह नक्षत्र यजुर्वेदियोंको श्रेष्ट होते हैं।अश्विनी धनिष्टा पुष्य हस्त उत्तरा त्रय आर्द्रा श्रवण यह नक्षत्र सामवेदियोंको श्रेष्ट होते हैं ॥ मृगशिर रेवती हस्त अश्विनी पुप्य अभिजित् अनुराधा धनिष्टा यह नक्षत्र अथर्वणवेदियोंको श्रेष्ट होतेहे ॥ १९ ॥ नांदीश्रादोत्तरं मातुः पुष्पे लग्नांतरे नहि ॥

भापाटीकासमेवा। (२१) शांत्याचौलं व्रतं पाणिग्रहः कार्योऽन्यथा नसत् ॥ २०॥ नांदीसुखश्राद्धके उपरांत चूडाकर्म और उपनयन और विवाहलमके अंतर मध्यमें यदि माताको घुप्प अर्थात ऋतु आजावे तो शांतिपूर्वक चूडाकर्म उपनयन पाणि- ग्रहण श्रेष्ट होता है । अन्यथा श्रेष्ट नहीं ॥२०॥ विचैत्रव्रतमासादौ विभौमास्ते विभूमि- जे॥छुरिकाबंधनंशस्तं नृपाणां प्राग्वि- वाहतः॥२१॥ नृप क्षत्रियोंको विवाहके पूर्व छुरिकाबंधन चैत्रमास रहित यज्ञोपवीतमुहर्तके जो नक्षत्र तिथि मासमें श्रेष्ठ होताहै परंतु भौम (मंगल ) यह अस्त न होय और मंगलवार न होवे तो शुभ है ॥२०॥ । केशांतं षोडशे वर्षे चौलोक्तदिवसे शुभम् ॥ व्रतोक्तदिवसादौ हिसमावर्तनमिष्यते॥२२॥ इति श्रीयज्ञोपवीतमुहूर्त सम्पूर्णम् ॥ केशान्त अर्थात् गोदान पोडश१६वपमें चूडाकर्मका जो नक्षत्र दिन उसमें शुभ होताहे ॥ प्रमाण (याज्ञ- वल्क्यस्मृतिका अ० १) यथा-'केशान्तश्चैव पोडशे'। और यज्ञोपवीतके नक्षत्रदिनमें समावर्तनसंस्कारकहा।

(२२) उपनयनपद्धतिः। श्रीहरिः ॥ २२ ॥ इति श्रीकपूरस्थलनिवासी गौतम- गोन (शौरि ) अन्वयालंकृत दैवज्ञ दुनिचंद्रात्मज- श्रीपण्डितविष्णुदत्त वैदिककृत उपनयनमुहूर्तटीका समाप्तिममात् । सा च शुभावहास्यात्कुलदेव्याःप्रसा- दात॥श्रीरामचंद्रः प्रसन्नोऽस्तु ॥ श्रीः॥ (समाप्तं चेदं प्रथमं प्रकरणम्.)

भापाटीकासमेता। (२३) अथ उपनयनसामग्री। रोली मोली केशर बतासे आटा चावल पुष्प धूप पुष्पमाला दीप ताम्बूल,यज्ञोपवीतर, प्रणीतापात्र ३, प्रोक्षणीपात्र ३, कांस्यपात्र ३, छायापात्र, सुवर्ण १, कुशा सुवा गोमय एरने पलाशसमिधा पूर्णपात्र ३, उपणे ५, धोतियाँ ९, कोपीन ५, मृगचर्म १, पलाशदंड १, गूलरशाखा मेखला मुंजकी सुहालियां सेर १, पुरवा ८,लोटिया (कलश)८, नारिकेलर, ख- डावा जोडा ३, पट्टी चंगेर लाठी गुथली कंसार २॥ सेर घृत तिलदधि सुपारी आम्रपत्र वृक्षादेपर अंजन दर्पण बूस मोती उपानह बढना श्वेतदुर्वा दोने १०, अबीरवेल ६, ब्राह्मणभोजन दक्षिणा यथायोग्य पंचरंग ।। २५॥ इति उपनयनसामग्रीसमाप्ता।

(२४) उपनयनपद्धतिः । ॥ॐस्वस्ति॥श्रीगणेशाय नमःअथोप नयनम्॥श्रीः। तत्र शुद्धसमये रविगुरु- चंद्रतारादिशुद्धौ जन्मतो गर्माष्टमेऽन्दे वानुकूल्ये षोडशसंवत्सराभ्यंतरे ब्रह्म- वर्चसकामस्य पंचमेप्युदगयनआपूर्य- माणपक्षेनध्यायषष्टीरिक्ताद्यतिरिक्तति- थौ।रविगुरुशुक्रान्यतमवारेमध्याह्लाद- क्।ि कुमारपित्राभ्युदयिकेकृतेतदमा वेआचार्येणैव हृते ब्राह्मणान्माणवकं च भोजयित्वा सशिखकृतक्षौरस्नानानंतरं यथाशक्त्यालंकृत्वावहिःशालायां तुष- केशशर्करादिशून्यपरिष्कृतभूमौ आ- चार्योऽग्निस्थापनं कुर्यात् ॥ अस्वस्ति ॥श्रीगणेशाय नमः।। नत्ताविन्नपगौरी कु. मारमारशासनं देवम् । सानुजसीतासहितं रामं नयना- भिरामं हि ।। कर्पूरस्थल निवासिना विष्णुदत्तेन धी मता ।। उपनयनपद्धतेाख्या लोकोपकृतये कृता यद्यशुद्धसम्बद्धमज्ञानाच्च कृतं मया ॥ विद्भिः क्ष म्यता सर्व बालत्वादयमनलि ॥ श्रीमान् महामत्तक भापाटीकासमेता। (२५) महा सामन्ताधिपति श्रीगणेशसूनु श्रीरामदत्तजी अथ शब्दसे मंगल आचरण करते हैं । प्रमाण यथा अथ मंगलानंतरारम्भप्रश्नकात्स्याधिकारप्रतिज्ञासमुच्चयेषु इतितत्त्वबोधिन्याम् ॥ अथ इसके अनंतर शुद्ध काल गुरुचंद्र तारादिशुद्धिमें जन्मसे वा गर्भसे अष्टम वर्षमें अनुकूलकाल पोडशवपके अंतर और ब्रह्मवर्चस इच्छावान्को पंचमवर्षमें उत्तरायण शुक्लपक्षमें अन- ध्याय षष्टी चतुर्थी चतुर्दशी नवमी इनसे विना और तिथियोंमें रवि शुक्र बृहस्पति वारमें मध्याह्नकालसे वालकका पिता उसके अभाव वा असमर्थ वा दूरस्थ होनेसे आचार्य आभ्युदयिक नांदीमुखश्राद्ध करेतदनंतर ब्राह्मणको और माणवकको भोजन करवा साथशिखाके क्षोरकर मानके अनंतर यथा- शक्ति अलंकार कर वाहिर शालामें तुप ( तोह ) केश (रोम ) शर्करा ( रेतकणके ) इनसे रहित हस्तमात्र परिमित भूमिमें आचार्य अग्निस्थापन करे । १ कालकी शुद्धि चंद्रताराको अनुकूलता यह पूर्व प्रकरणमे अति श्रेष्ठ लिखेहैं । २ अष्टम वर्षमें जो उपनयन लिखाहै वह ब्राह्मणके वास्ते लिखाहै उती प्रकार एकादशवर्ष क्षत्रियको द्वादशवर्ष धेश्यके लिये यह सब पूर्व लिखाहै ॥ ३ अनध्यायमी पूर्वप्रकरणमें लिखे है । ४ भोजन ब्राह्मणोंको और वाटकको भोजन करवायकर | सायशिखा के क्षौर करना वेदविहित श्रेष्टमार्ग है अन्य गौणहै।

(२६) उपनयनपद्धतिः। तत्र हस्तमात्रपरिमितचतुरस्रभूमिंकुश- करणकसमूहनानंतरं गोमयोदकेनोप- लिप्या नुवमूलनप्रागग्रप्रादेशमात्रमुत्त- रोत्तरक्रमण विरल्लिख्य॥ उल्लेखनक- मेणाऽनामिकांगुष्ठाभ्यांमृदमुदत्यजले. नाभ्युक्ष्य। नवीनकांस्यपात्रणाग्निमा- नीय स्वाभिमुखंनिध्यात्।ततःकुमा- रमाचार्यः शिष्यहाराग्ने पश्चादक्षिणपा- वेऽवस्थापयति । ततः कुमारं वदाज लिं संवोधयति॥ओंब्रह्मचर्यमागामिति- ब्रूहि ॥ इति प्रेपानंतरम् ॥ तिसमें हस्तमात्र परिमित चतुरस्त्र (चनुकरी)भूमि को कुशोदकेसे समृहनकर गोमय (गोवर )युक्त जलसे लेपन कर सुबके मूलभागसे पूर्वाग्र प्रादेशमात्र अर्थात अंगुष्ट अनामिकामात्र विस्तृतउत्तरोत्तरक्रम अर्थात उत्तरक्रमसे तीनवार उल्लेखन कर उसी प्रकार अना- मिका अंगुष्टसे मृत्तिकाको उद्धरण करे अर्थात् उईको फैके तदनंतर जलसे अभ्युक्षण अर्थात् सिंचन कर नवीन ( नूतन ) कांस्यके पात्रमें अग्नि मँगवाय. अपनेसे पूर्वकी तरफ रक्खे । तिसके अनंतर .

भापाटीकासमेता। (२७) कुमारको शिष्यके द्वारा अग्निके पीछे अपनेसे दक्षिण पार्थकी ओर बैठावे । तदनंतर. बद्धाञ्जलि अर्थात् हाथ जोडकर जो आगे स्थितहे उसको गुरु संबोधित करता है ॥ (ब्रह्मचर्यमागाम् ) यह तुम कहो अर्थात ब्रह्मचर्यको में प्राप्त हुआ इस प्रैपके अनन्तर । ब्रह्मचर्यमागामिति कुमार आहाततः ॐब्रह्मचार्यसानीति ब्रूहीत्याचार्यणोक्ते ॐ ब्रह्मचार्यसानीति कुमार आह ॥ अथमाणवकमाचार्योवासः परिधापय- ति।तत्र आचार्यपठनीयो मंत्रः॥ ॐ येनेंद्राय वृहस्पतिर्वासः पर्यदधादमृतं तेनत्वापरिदधाम्यायुषेदीर्घायुत्वाय व. लाय वर्चसे।ततोमाणवकस्यद्विराचम- नम् । अथ माणवकस्य वेष्टनत्रयेणत- प्रवरग्रथितां मेखलामाचार्यों वध्नाति। तत्र माणवकपठनीयोमंत्रः। (ब्रह्मचर्यमागाम् ) यह बालक कहै ।। तदनंतरं ब्रह्म चारी असानि यह अचार्यवाक्यके अनंतर ॐब्रह्मचार्य- सानि यह बालक कहै । इसके अनंतर गुरु कुमारको (२८) उपनयनपद्धतिः। वस्त्र पहनाता है ॥ ॐयेनेंद्राय वृहस्पति इस मंत्रसे [ मंत्रार्थ जैसे- ] देवताओंका गुरु वृहस्पति जिस प्रकार यह वस्त्र अमृत अर्थात् हत छिद्र दग्धता जीर्ण- तादि दोपरहित यह वस्त्र पहनाता भया तिस प्रकार आयु चिरंकाल जीवन और बल सामर्थ्य तेज कांतिके लिये हम तुमारेको पहनाते हैं ॥ वस्त्र पहनेके अनंतर बालक द्विवार आचमनकरे प्रमाण (याज्ञः स्मृति अध्या० १ श्लोक ६६) “स्नात्वा पीत्वा क्षुते सुप्ते भुक्त्वारथ्योपसर्पणे । आचांतःपुनराचामेद्वासो विप- रिचाय च" अर्थात् स्नान पानं क्षुत ( छींक) शयन भोजन बाजारसे आकर आचांतकृत पुरुप फिर आच- मन करे भावार्थ इनमें दोबार आचमन करना चाहिये। अनंतर माणवक प्रवर सदृश त्रिगुण मुंजकी मेखलाको ग्रंथि दे आचार्य बालकके बंधन करे। इयंदुरुक्तं इस मंत्र को बालक पढे॥ ॐ इयंदुरुक्तं परिवाधमाना वर्ण पवित्रं पुनतीमआगात् । प्राणापानाभ्यां वल- मादधानास्वसादेवीसुभगामेखलेयम् । ॥३॥ॐ युवासुवासाः परिवीतऽआगा- त् सउश्रेयान् भवति जायमानातंधी- रासः कवय उन्नयंतिस्वाध्यो मनसादे- भापाटीकासमेवा। (२९) वयंत इति वा॥२॥ तत आचाराद्य- ज्ञोपवीतसहितभांडाष्टतयं ब्राह्मणेभ्यो दत्त्वातत्सदद्यामुकगोत्रः स्वकीयोपन- यनकर्मविषयकसत्संस्कारप्राप्त्यर्थे । इदं भाण्डाटतयं सयज्ञोपवीतं सदक्षिणं यथा यथा नामेति॥ (मंत्रार्थ-इयंदुरुक्तमिति) यह मेखला मेरा जो अ- नुपनीत दुष्ट वाण्यादिदोष उनको संपूर्ण तरहसे ख- ण्डन करतीहुई आई इसलियोस्तुतियोग्य होनेसे देवी है पवित्र अति सुंदरवणको पवित्र करती हुई ऐसी यह मेखला स्वसा अर्थात् भगिनीवत् प्राण और अपा- नसे बलकी वृद्धि करती अति कोमल नित्य अभ्युदय मंगलकी संभावना करनेवाली हो वा 'युवा सुवासा' इस मंत्रसे मेखला बंधन करे ॥ तदनंतर आचारसे यज्ञोप- वीतसहित अष्टभाजन ब्राह्मणोंको दे॥ तत्सत् इत्यादि देश और काल कथनपूर्वक अमुक गोत्र अपने उपन- यन संस्कारकी श्रेष्ठता प्राप्तिके लिये यह अष्ट भाजन यज्ञोपवीतदक्षिणादियुक्त यथा .२ नामगोवादियुक्त ब्राह्मणों को देताहै॥ ततो यज्ञोपवीतं परिदधाति माणवका (३०) उपनयनपतिः । ॐयज्ञोपवीतमितिमंत्रस्य परमेष्ठीऋषि लिंगोक्ता देवता त्रिष्टुप्छंदो यज्ञोपवीतप- रिधानेविनियोगः॥ॐयज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यसहजं पुरस्तात्। आ- युष्यमण्यं प्रतिमुंचशुभ्रंयज्ञोपवीतंवल मस्तुतेजः॥ इतिमंत्रण।तत ऐणेयमजि- नंतूष्णींपरिधत्ते।ततो माणवककेशपरि- मितपालाशदण्डमाचार्यः तूष्णींतस्मै प्रयच्छति ॥ 'तदनंतर यज्ञोपवीत धारण बालक करताहै। यज्ञो- पवीत इस मंत्रका परमेष्ठी ऋपिहै लिंगोक्त देवता जो यज्ञोपवीत धारण प्रयोगमें आगे लिखे हैं त्रिष्टुप्छंद यज्ञोपवीत धारणमें यह मंत्र विनियुक्त है ॥ (मंत्रार्थ यज्ञोपवीत मिति) हे माणवक यज्ञोपवीतको प्रतिमुंच अर्थात् धारणकर (प्रतिपूर्वक मुंचधातु धारणार्थमें होताह ) कैसा यज्ञोपवीत है आयुकी वृद्धि करनेवाला अग्र्य(श्रेष्ठ) शुभ्र निर्मल और बृहस्पतिजीके साथ जो प्रादुर्भूत हुआ ऐसे यज्ञोपवीतके धारण करनेसे आयु तेज बलकी वृद्धि तुमको अस्तु हो आयु बल तेजके लाभके लिये यज्ञोपवीत धारण करे यह वाक्यार्थ है।

भापाटीकासमेता। इसके अनंतर कृष्णाजिनको तृष्णीं धारण करे। अनं- तर माणवाके केशपर्यंत पालाशदण्ड आचार्य तूष्णीं शिष्यके प्रति देवे॥ तंचयोमेदण्ड इति प्रजापतिपिदण्डो देवता । यजुर्दण्डग्रहणे विनियोगः । ॐ योमेदण्डः परापतबेहायसोधिभूम्याम् ॥ तमहं पुनरादद आयुपे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्च- साय । इति मंत्रेण माणवको गृहाति ॥ तत आचार्यो वारिणा स्वमञ्जलिं पूरयि- वा कुमारस्यांजलितेनैवांजलिजलेनपूर- यति ॥ ॐ आपोहिष्टामयोभुवुस्तान- ऽअर्जेदधातन । महेरणायचक्षसे ॥ ॐ योव-शिवतमोरसस्तस्यभाजयतेहनं उशुतीरिवमातरः ॥ॐ तस्माअरंगमाम- वायस्थक्षयायजिन्वय । आपोजुनयथा- चनः ॥ इतिऋगभिः॥ योमेदण्डइति प्रजापति ऋपि दण्ड देवता यजु- १ यह मन यजुर्वेद, अध्याय ११ मन्त्र ५० में है ।

(३२) उपनयनपद्धतिः । श्छंद दण्डग्रहणमें यह मंत्र विनियुक्तहे ॥ [ मंत्रार्थ ] आकाशसे जो उद्भुत अर्थात् उत्पन्न जो दण्ड भूमिपर पडता भया तिसको फिर आयुचिरकाल जीवन के लिये ब्रह्मणे ब्रह्म अर्थात् वेदप्राप्तिके लिये ब्रह्मवर्चस तेजके- लिये में ग्रहण करताहूँ. वाक्याथ यहहे कि, पूर्व जन्म- मेंभी मैं द्विज था इस जन्ममें भी अब ग्रहण कर्ता हूँ । तदनंतर गुरु जलसे अपनी अंजलि पूर्णकर तिस जलसे माणवककी अंजलि आपोहिष्टा इस मंत्रसे पूर्ण करताहै ॥ [मंत्रार्थ) आपोहिष्टा इत्यादि तीन मंत्रोंका सिंधु- दीप ऋपि गायत्रीछंद जलदेवता मार्जनमें विनियुक्त है ॥ मंत्रार्थ [ हे जलदेव प्रसिद्ध यश और अनुभव किये तुम मुझको बलके लिये और अन्नादि भोगनेके लिये धारण करे और महान् सुंदर देखने योग्य अत्यंत कल्याणके देनेवाले बलपुष्टि करनेवाले दुग्ध घृत स्तन्य पानादिसे माताकी नाईं आप मुझको रस देवें और जिस पापके नाशके लिये उत्पन्न करतेहैं,तिस रसके लिये हम शीघ्र जातेहेही जलदेव आप मोक्ष प्राप्तिके लिये योग्य हमको उत्पन्न करो अर्थात तुम्हारी कृपा और आचरणसे शौचादिसे हमको मोक्ष हो ॥ प्रमाण जैसे पातञ्जल दर्शन "शौचात्स्वांगे जुगु. प्सापरैरसंसर्गः" इति ॥

भापाटीकासमेता। (३३)
ततः सूर्यमुदीक्षस्वेति आचायप्रषानंत
रम् ॥ ॐ तचक्षुदुवाहतपुरस्तांच्सक्रम
चरत ॥ पश्यमशुरद-शुतंजीवेमशु
रद शुत शृणुयामशरद-शुतप्रवाम
शुरदशतमदीना स्यामशुरद शतंभूयं
श्वशरद शुतात् ॥३॥ इत्यनेनादित्यं प
श्यति॥अथकुमारस्यदक्षिणांसंसहृदयं
दक्षिणहस्तेनस्पृशत्याचार्यः ॥ ॐ म
मत्तेतेहृदयंदधामि ममचित्तमनुचित्तं
ते अस्तु । ममवाचमेकमनाजुषस्व वृ
हस्पतिवानियुनतमह्यम् ॥ इतिमंत्रण ॥
सूर्यदेखो इस गुरुवाक्यके अनंतर [ मंत्राथ]तच्चक्षुः
इस मंत्रका- दध्यहाथर्वण ऋपि अक्षरातीति पुर
उष्णिक छंद सूर्य देवता सूर्यके उपस्थानमें विनि
युक्त है। स्वाहा स्वधा प्रभृति संपूर्ण देवता और पितर
जिसके उदय होनेसे तृप्त होतेहैं । ऐसा देवहितनेत्रो-
त्पन्न होनेसे चक्षु जो सूर्य भगवान् ! प्रमा० यजु०अध्या
१ यजुमच्या० ३६ मत्र २४

(३४)
उपनयनपद्धतिः।
३५ ( चक्षोः सूर्योऽजायत) अर्थ-विराट् भगवान्केनेत्रों
से सूर्य प्रादुर्भूत भया। आदिमें कामादि और अविवादि
दोषरहित उदय होता ऊर्ध्वको प्राप्त होताहे। उस सूर्य
भगवान्को हम शत १०० वर्ष देखें और जीवत रहें
कर्णो से यश श्रवण करें। वाणीसे श्रेष्टस्तुत्यादि करें
और दीनता रहित शत वर्पसे अधिक वीस वर्ष जीवत
रहे ॥ तदनंतर कुमारके साथ हृदयके दक्षिण अंशको
दक्षिण करसे आचार्य स्पर्श करताहे ममत्रते इस मंत्रले
(मंत्रार्थ ) मेरे शास्त्रविहितनियमाचरणमें तुम्हारे हृदय
को बृहस्पति धारण करे और मेरे चित्तके अनुकूल
तुम्हाराचित्तहोवे और मेरे वचनको सुखपूर्वक करो ॥
ततः कुमारस्यदक्षिणहस्तं गृहीत्वातंट
च्छति । कोनामासि श्रीअमुकशर्मा
अहंभो।इति कुमार आह॥कस्य ब्रह्म
चार्यसीत्याचार्यः । भवत इति कुमार
आह ॥ पुनराचार्यों भाषत। इंद्र
स्यब्रह्मचार्यस्याग्निराचार्यस्तवाहमाचार्यः
श्रीअमुकशमन् । अथ माणवकंवद्धांज
लिंपूर्वादिदिक्षु प्रदक्षिणमुपस्थानं कार
यति ॥ अथाचार्योमाणवकं भूतेभ्यः

भापाटीकासमता। (३५)
परिददाति । तत्र आचार्यस्य मंत्रपाठः॥
ॐप्रजापतयेत्वापरिददामीति प्राच्याम
ॐदेवायत्वासवित्रेपरिददामि इति दक्षिण
स्याम् । ॐअझ्यस्त्वोषधीभ्यः परिद
दामि इति प्रतीच्याम् । ॐ द्यावाथि
बीभ्यां खा परिददामि इति उदीच्यास् ।
अविश्वेभ्यस्त्वादेवेभ्यः परिददासीत्यः
ॐसर्वेभ्यस्त्वाभूतेभ्यः परिददाम्यार
ट्ये इत्यूर्ध्वम् ॥
तिसके अनंतर कुमारके दक्षिण हन्तको ग्रहण कर
। गुरु पूँछताहे किसका ब्रह्मचारी है। तुम्हारा नई माणवक
कहे(मंत्राथोत्रिलोकी नाथ इंद्रका ब्रह्मचारी हो तुम्हारा
अग्नि आचार्य और हम है ॥ प्रमाण--गुरुरनिद्विजाती
नाम् अनंतरं बद्धांजलि कुमारको पूर्वादि दिशोंमें
उपस्थान गुरु कराताहै । और भूतोंके प्रति समर्पण
करताहै । ( मंत्रार्थ ) हे माणवक तुमको बृहस्पति और
सूर्यदेव और जल ओपधी आकाश भूमि संपूर्ण
इंद्रादिदेवताके प्रति तथा सर्व राक्षसादिभूतोंके प्रति
आपत् (विपत्ति ) नाशके लिये पूर्वादि क्रमसे समर्पण
करतेहैं॥
ततोऽग्निंप्रदक्षिणीकृत्य आचार्यदक्षिण

(३६) उपनयनपद्धतिः।
दिशिउपविशतिमाणवकः । ततःपुष्पचं
दनतांबूलवासांस्यादाय ततः ॐअद्यकर्त
व्योपनयनहोमकर्मणि कृताऽकृतावेक्ष
गरूपब्रह्मकर्मकर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं
ब्राह्मणमेभिः पुष्पचंदनतांबूलवासोभित्र
मत्वेन त्वामहंणे इति ब्रह्माणं वृणुयात्
इति । वृतोस्मीतिप्रतिवचनम्। पुष्पचंदन
तांबूलवस्त्राण्यादाय । ॐअद्यकर्तव्योपनय
नकमणिहोतृत्वकर्मकर्तुममुकगोत्रममु
कशर्माणं ब्राह्मणभिः पुष्पचंदनतांबूल.
वासोभिर्होतृत्वेनत्वामहंणे । इतिहोतारं
वृणुयात्।ॐ स्वस्तीतिप्रतिवचनम् । ॐय
थाविहितंकर्मकुर्वित्याचार्यणोक्ते । ॐक
स्वाणीतिब्राह्मणो वदेत् । ततोऽग्नेर्दक्षि
णतः शुद्धमासनं दत्त्वा । तदुपरिणागग्रा
नकुशानास्तीर्य ब्राह्मणमग्निं प्रदक्षिणं
कारयित्वास्मिन्कर्मणि त्वमे ब्रह्माभवेत्य
भिधायभवानीति तेनोक्ते । तदुपरि ब्रह्मा-

भापाटीकासमेता। (३७)
णमुदङमुखमुपवेश्य । ततः प्रणीतापा
नंपुरतःकृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशैरा
च्छाद्य ब्रह्मणोमुखमवलोक्याग्नेरुत्तरतः
कुशोपरि निदध्यात्।ततः परिस्तरणंव
हिषश्चतुर्थभागमादायाग्नेयादीशानांतम् ।
ब्रह्मणोऽग्निपर्यन्तं नैऋत्याहायव्यांतम
अग्नितःप्रणीतापर्यन्तं ततोऽनेरुत्तरतःपू
श्चिमदिशि पवित्रच्छेदनार्थंकुशत्रयंपवि
करणार्थ साग्रमनंतर्गर्भकुशपत्रहयंप्रो
क्षणीपात्रम् आज्यस्थालीसंमार्जनार्थ
कुशाः उपयमनकुशाः समिधस्तिनः
स्रुव आज्यं पटपंचाशदुत्तराचार्यमुष्टि
शतहयावच्छिन्नामतण्डुलपूर्णपात्रं पवि
बच्छेदनकुशानांपूर्वपूर्वदिशिक्रमेणासा
दनीयंततःपवित्रच्छेदनकुशै पवित्रेच्छि
वा सपवित्रकरणप्रणीतोदकं त्रिःप्रोक्ष
णीपात्रेनिधायअनामिकांगुष्ठाभ्यां गृही
तपवित्राभ्यां तज्जलं किञ्चित्रिरुत्क्षिप्य
प्रणीतोदकेनप्रोक्षणीत्रिरभिपिच्या प्रो

(३८) उपनयनपद्धतिः। क्षणीजलेनासादितवस्तुसेचनं कृत्वाऽ शिप्रणीतयोर्मध्येप्रोक्षणीपात्रं निदध्यात् । . तदनंतर अग्निको प्रदक्षिण कर आचार्यके दक्षिण दिशामें माणवक वैठताहे । फिर पुष्प चंदन तांबूल वस्त्रको लेॐ अद्यकर्तव्य इस संकल्पसे ब्रह्माको वर्गी दे ! फिर इसी प्रकार पुण्य चंदन ताम्बूल वस्त्र ले होताको वर्णी दे । यह दोमें स्वस्ति कहे । यथा विहितकर्म करो ऐसे आचार्य वाक्यके अनंतर,करताहै थह ब्रह्मा कहे । अनंतर अमिके · दक्षिणकोणमें शुद्ध आसनको दे उसके ऊपर पूर्वाग्रकुशको बिछाय ब्राह्माको अग्निकी प्रदक्षिणा करवाय इस उपनयनमें आप ब्रह्मा हो यह कह उदङ्मुख ब्राह्मणको बिठावे । तद नंतर प्रणीतापात्रको आगेकर जलसे भर कुशसे आच्छादनकर ब्रह्माके मुखको देख अग्निसे उत्तर कुशा- पर रखें। फिर कुशसे चतुर्थ भागले अग्निकोणसे ईशीनपर्यंत ब्रह्मासे, अग्निपर्यंत नितिकोणसे वायव्यकोणपर्यंत हवनाग्निसे प्रणीतापर्यंत क्रमले पूर्वोत्तर कमसे कुश आस्तरण करे । तदनंतर अग्निसे उत्तर पश्चिमदिशामें पवित्रछेदनकेलिये तीन कुशपवित्र करणके लिये मध्यकी शाखारहित साथ अग्रके कुश- भापाटीकासमेता। पत्र दोप्रोक्षणीपात्रम् आज्य-घृतकी स्थाली-संमार्जन (शोधनके लिये कुशा उपयमनकुशा तीनसमिधा- व ब्रह्महस्त) घृत ( २५६) मुष्टिमात्र अर्थात् एक ब्राह्मणतृप्तिकारक तंडुलोंसे युक्त पूर्णपात्र पवित्रच्छेदन कुशाके पूर्वकी तरफ यह क्रमसे रखने ॥ तिसके पीछे पवित्रछेदनञ्जशोंसे पवित्र छेदनकर पवित्रसहित हस्तसे प्रणीताके जलको तीनवार प्रोक्ष. णीपात्रमें स्थितकर पवित्रयुक्त अनामिका और अंगुष्ठसे वह जल किंचित्मात्र त्रिवार सिंचनकर तदनन्तर प्रोक्षणी जलसे प्रोक्षणीको त्रिवार ऊपरको फैक प्रणीता जलसे सर्ववस्तु सिंचन करे अग्नि और प्रणीतापात्रके मध्यमें प्रोक्षणी पात्र स्थित करे ॥ आज्यस्थाल्यामाज्यनिर्वापः । अधिश्र यणं ततः कुशं प्रज्वाल्याज्योपरि प्रद- क्षिणं भ्रामयित्वा वनौतत् प्रक्षिप्य सुर्व त्रिःप्रतप्य संमार्जनकुशानामौरंतरतो मूलैर्वाह्यतः सुवं संमृज्यप्रणीतोदकेना- भ्युक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरसनं कृत्वा पुनः प्रोक्षण्युत्पवनसातत उत्थायोपय- मनकुशान्वामहस्ते कृत्वा प्रजापति (१०) उपनयनपद्धतिः । मनसा ध्यात्वा तूष्णी घृताक्तास्तिस्रः समिधः प्रक्षिपेत् उपविश्य सपवित्रप्रो- क्षण्युदकेन प्रदक्षिणक्रमेणाग्निं । पर्युक्ष्य प्रणीतापात्रे पवित्र निधायपातितदक्षि जानुःब्राह्मणान्वारब्धः समिद्धतमेनौ सुवेणाज्याहुतीर्जुहोति तत्र तत्तदाहुत्य- नंतरं वावस्थित वृतशेपस्य प्रोक्षणी- पात्रे प्रक्षेपः॥ आज्य (वृत)स्थाली पात्र में घृतको स्थितकर अग्निपर रख उतार कुशको जलाय दक्षिण कमसे भ्रमण करवाय अमिमें फेंकनी । और युवको तीनवार तप्तकर संमार्जन कुशके अग्रभागसे अंतरसे और. • मूलसे बाहिर संमार्जन (शुद्धकर) प्रणीताजलसे अभ्युक्षणकरे । यदि घृतमें कुछ अशुद्ध वस्तु हो वह निकाल फिर प्रोक्षणीवत् उत्पवन (ऊर्ध्वको फेंकना) कर तदनंतर उठकर वेणीरूप उपयमन कुशाको काम- हाथमे ले ब्रह्माका ध्यानकर चुपचाप (तूष्णी) घृत- युक्त तीन समिधा अग्निमें क्षेपण करे । फिर बैठ पवित्र युक्तमोक्षणीजलसे प्रदक्षिणक्रमसे अग्निको पर्युक्षण-कर प्रणीतामें पवित्रे स्थितकर दक्षिण जानु (गोडा) भापाटीकासमेता। निवार ( नम्रकर ) कुशद्वारा ब्रह्मासे युक्त हो प्रदीत अनिमें वसे धृतआहुति हवनकरे । आहुतिके अनं- तर शेपधृत जो सुवमें लग हो उसका प्रोक्षणीमें प्रक्षेप करे (पाये)॥ ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । ॐ इंद्राय स्वाहा इदमि-. द्राय । इत्याघारौ। ॐ अग्नये स्वाहा। इदमग्नये ॥ ॐ सोमाय स्वाहा इदं सो माय । इत्याज्यभागौ ॥ ॐ भूः साहा इदमग्नये। ॐभुवः स्वाहा-इदं वायवे । ॐवः स्वाहा-इदं सूर्याय ॥ एतामहा- व्याहृतयः॥ यजुवेद अध्याय ॥२१॥ मंत्र-३ ॐत्वन्नोऽअग्नेवरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडोऽअक्यासितीष्ठादा यजिष्टो वह्नितमन्शोरोंचानो विश्वा द्वेषां सिंप्रमु मुग्ध्युस्मत्स्वाहा। इदमनीवरुणाभ्याम्। शुव्यजु अध्या० २१ मंत्र-४ ॥ ॐ सत्वन्नोऽअग्ने वुमोभवीतीनोदिष्ठोऽअ

(४२) उपनयनपद्धतिः।
स्याऽउपसो व्यो।अवं यक्ष्वनो वरुण
शराणो ब्वीहिमृडीक सुहवौ न एधि
स्वाहा ॥ इदमनीवरुणाभ्याम् ॥
प्रजापतये स्वाहा यह सप्तमहाव्याहृतियाँहें प्रथममंत्र
मनमें कहना । त्यत्रो और सत्वनो इनमंत्रोंका वामदेव
ऋपिविष्टुप्छद अग्नि और वरुण देवता सर्वप्रायश्चित्त
निवृत्तिमें विनियुक्त [ मंत्रार्थत्वन इति ] हे अग्ने तुम
इस कर्ममें वैगुण्य होनेसे वरुणदेवके क्रोधको दूरकरो
कैसे तुमहो जो सर्वकमीमें साक्षी चतुर हो और सर्वसे
उत्तम ( श्रेष्ठ ) हो और सर्व देवताओंको यज्ञका भाग
देनेवाले हो प्रकाशमान हो इसलिये मंदबुद्धिवाले हमारे
को जान हमारेसे की हुई अवज्ञा(अनादरको) क्षमा कर
सर्वप्रकारसे कल्याण ( सुख ) देवो ।। [मंत्रार्थ-सत्वन्न
इति) हे अग्ने तुम सर्यको पालन करनेवाले हो इसलिये.
आज (अध) दिनके प्रातःकालले लेकर मुझको रक्षा
करो। केवल रक्षा नहीं किंतु हमारेकरं बुलाये हुए तुम
सुखपूर्वक आकर सुखके देनेवालाजो चरु (द्रव्यविशेप)
वह यज्ञके स्वामी (मालिक).वरुण देवताजीको देकर
पूजन करो। जिससे वरुण देवमी प्रसन्न हो हमारेको
सुखदेवें ॥ इति ॥

.(४३)
भापाटीकासगेता।
यजु० अध्याय मंत्र ॥ ॐअयाश्चा
नस्यनभिशस्तिपाश्चसत्यमित्वमयाऽअ
सि। अयानो यज्ञवहास्य यानो धेहि
भेषजस्वाहा । इदमग्नये ॥ यजुर्वेद
ध्याय मंत्र ॐ येतेशतं वरुणयेसहस्त्रं
यज्ञियाः पाशाविततामहान्तातेभिन्नों
अबसवितोत्तविष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः
स्वाः स्वाहा ॥ इदं वरुणाय सविने वि
ष्णवे विश्वेभ्यो मरुद्धयास्वर्केस्यः ॥
(मंत्रार्थश्च अयाश्चामा इति) हे अग्ने तुम सर्वान्तर्यामी
और प्रायश्चित्तद्वारा सर्वप्राणियोंको (पुरुषोंको) शुद्ध
करनेवाले और शुभके दाता हमारे किये हुए यज्ञको
कृपालु होनेसे इंद्रादिदेवताओंको देनेवाले हो इस लिये
ये हमकोभी (भेपज) अर्थात् सुखके देनेवाला दुःख
विनाशक अपूर्व आनन्द देवो ॥३॥ (मंत्राथ) येतेशत-
मिति) हे वरुण यज्ञके विनसे पैदा भये हुए बडे २
भारी महान् कठिन जो तुम्हारे शतसंख्याक और सह
स्रसंख्याक पाश है वह पापरूप पाश हमारे सविता
(सूर्य) विष्णुरूप इंद्र और सर्व देवता वायु सुन्दर हृदय
वाले आदित्य आदि हमारे पापोंको नष्ट करें इति॥४॥

(४४) उपनयनपद्धतिः।
यजुर्वेद-अध्याय १२ मंत्र १२ ॐ उर्दू
त्तुमं वरुणुपाशमुस्मदवाधुमं विमध्यम
श्रथाय ।। अर्थाव्वुय मादित्य व्रते तवा
नागसोऽअदितयेस्यामः स्वाहा।। इदंव
रुणाय ॥ एताः सर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः
(ततोऽन्वारब्धंविना) ॐ प्रजापतये
स्वाहा॥इदं प्रजापतये । इतिमनसा
प्राजापत्यमाॐअग्नये स्विष्टकृते स्वाहा
इदमग्नये स्विष्टकृते ततः संडवप्राशनं
आचमनंचाततो ब्रह्मणे दक्षिणादानम्।
ॐअद्यएतस्मिन्नुपनयनहोमकर्मणिक
ताऽकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्टार्थमिदं
पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतममुकगोत्राया
मुकशर्मणेब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तु
भ्यमहसंप्रददे इति दक्षिणादानम् ॥
(मंत्रार्थ उदुत्तममिति ) उत्तम मध्यम अधम ये
तीन वरुणके पाश हैं। हे वरुण जो तुम्हारा उत्तम पाश
है उससे हमारी रक्षाकरो और जो मध्यम पाश है उससे
भी हमारी रक्षा करो (अर्थात ) पाशको शिथिलकरो

भापाटीकाममता। (४५)
सुखपूर्वक गमन करो (जाओ) प्रमाण ( यज्ञोवै विष्णु
रिति ) हे अंतर्यामि ब्रह्मस्वरूप यह यज्ञका फल तुम्हारे
अर्पण किया जाताहे तुम वायुको अर्पण करो ॥ इति ॥
हैं वरुण हम ब्रह्मचर्यसे तुम्हारेसे निरपधार (अपराध
रहित ) होकर दीनतासे रहित होतेहैं । प्रमाण--(दीन
तायां दिति प्रोक्ता दितिस्स्यादैत्यमानरि) इस वचनसे
दिति नाम दीनता काभी है ॥५॥ अनंतर प्रजापतये
इस संघको मनमें कह आहुति देवे । और संस्रवका
प्राशन तदनंतर ब्रह्माको दक्षिणाका दान तत्सद।
इत्यादि देशकालसंकीर्तन कर देखें ।
स्वस्तीतिप्रतिवचनम् । ततोवनग्रंथि
विमोकः ततः। यजु-अध्याय-मंत्र।
ॐ मुभित्रियानआपऽओषधयःसंतुइति
पवित्राभ्यांजलमानीयतेनशिरः संमृज्य
ॐदुर्मित्रियास्तस्मैसंतुयोऽस्मान्द्वेष्टिय
ञ्चवयंद्विष्माइत्यैशान्यां प्रणीतां न्यु-
व्जीकुर्यात् । ततःस्तरणक्रमेणवहिरुत्था
प्यवृतेनाभिघार्यहस्तेनैव जुहुयात्॥ य
जुर्वेद-अध्याय-मंत्र ॥२१॥ ॐ देवांगा
तुविदोगातवित्वातुगामितामनसस्पतऽ

(४६) उपनयनपद्धतिः।
दुभंदेवयुशवाहाब्बातधास्वाहा-इति
वहिहोमः॥
स्वस्तिहो यह ब्रह्मा कहे । तदनंतर ब्रह्मग्रंथिको
मोचन करना (मंत्रार्थ) [ सुमित्रियान इति ] जल और
औपधी हमारेको परम सुख देवे । इसमंत्रसे शिरमें जल
सिंचन करें।[दुर्मित्रियान इति ] और जो हमारेसे देप
करते और जिनको हम शत्रु मानतेहैं उनके प्रति यह
जल औषधी दुःख को देवे। इस मंत्रसे जलसहित
प्रणीतापात्रको न्युज--अर्थात् पुट्टी (मुंधी)करे ईशा-
नकोणमें ।। अनंतरे पूर्वोक्त आस्तरणक्रमसे कुश उठाय
वृतसे युक्त कर देवागातु यह मंत्र पढ हाथसे हवन करे
( मंत्रार्थ) [ देवागातु इति] हे देवतालोक' तुम यज्ञके
जाननेवालेहें इस लिये विष्णुरूपका यज्ञको जानकर
सुखपूर्वक गमन करो (जाओ) प्रमाण--(यज्ञोवे विष्णु
रिति) हे अंतर्यामि ब्रह्मस्वरूप यह यज्ञका फल तुम्हारे
अर्पण किया जाताह तुम वायुको अर्पण करो ॥ इति।
तत आचार्यः कुमारस्यानुशासनंकरोति।
ॐब्रह्मचार्यसीत्याचार्यः ।ॐअसानीति
ब्रह्मचारी।ॐअपोशानइत्याचार्यः । ॐ
अशानीतिकुमारः ॐकर्मकुर्वित्याचार्यः।
.

भापाटीकासमेवा!
(४७)
ॐकरवाणीतिमाणवकः ॐमादिवासुपु
प्वइत्याचार्य ॐनस्थपानीतिकुमारः।
ॐवाचंयच्छइत्याचार्यः । ॐयच्छानी
विकुमारः। ॐसमिधमाधेहीत्याचार्यः
ॐआदधानीतिमाणवकः ।अथाग्नेस्त्त
रतः प्रत्यङ्मुखायोपविष्टायाचार्याचर
जोपसंग्रहणपूर्वकसुपसन्नायाचार्य समी
क्ष्यमाणायाचार्यः स्वयमपिसमीक्षिता
यास्मैनिवारितशंखतूर्यादिशब्द इष्टांश
केसावित्रीमन्वाह॥
तिसके अनंतर आचार्य (गुरु) वालकको शिक्षा
कर्ताह हे वालका तुम ब्रह्मचर्य धारण किया-उत्तर गुरुजी
किया। हे कुमार तुम आपोशन क्रिया पूर्वक अन्नभक्षण
करना । गुरुजी करूंगा। आपोश क्रिया लिखतेहे कि
जिसकाल भोजन भक्षण करना हो उसके प्रथम (अमृतो
: पस्तरणमसि ) इस मंत्रसे दक्षिणक्रम अन्नवाले पात्रको
अभिमंत्रण करना अर्थात् जलसे रक्षाकरनी तदनंतर
ॐभूपतये स्वाहा इस मंत्रसे प्रथम ग्रासः भुवन पतये
स्वाहा इस मंसे द्वितीयग्रासःभूतानां पतये स्वाहा इस
मंगसे तृतीय (तीसरा ) ग्रास अर्थात अन्नको तीनखंड

(४८) उपनयनपद्धतिः। क्रमपूर्वक पृथिवीपर स्थित करने ( रखदेने और जल सिंचन करना तदनंतर घृतयुक्त अन्नकी पांच आहुति मुखमें डालनी इनपांचमत्रोंसेप्राणाय स्वाहा-१ । ॐआपानायस्वाहा-२ॐउदानायस्वाहा-३। ॐ व्यानाय- स्वाहा-४ । ॐ समानायस्वाहा-५॥ अनंतर तूष्णी हो यथारुचि भोजनकर पीछे । ॐ अमृतापिधानमसि [हाथमें जल ले यह मंत्रपढ पृथिवीपर प्रक्षेप (फैक) देय यह प्रतिदिन भोजन कालमें द्विजातिमात्रको कर्तव्य है इसको आपोशन क्रिया कहते हैं] ॥ प्रमाण भी जैसे-याज्ञवल्क्यस्मृति-अध्याय १ प्रथम स्मृति ३१ यथा-'कृताग्निकार्यो जीत वाग्यतो गुर्वनुज्ञया । आपोशनक्रियापूर्व सत्कृत्यानमकुत्सयन्' ॥ अर्थ- अग्निमें प्रातहोंमकर भोजन-कालमें गुरुको आज्ञा ले वाग्यत (चुपकर) आपोशनक्रियापूर्वकअन्नका सत्कार कर नानिंदताहुआ भक्षण करे और भोजनका काल (प्रथम प्रहरके अनंतर द्वितीयके बीच २ में लिखाहै भावप्रकाशमें-यथा-'याममध्ये नभोक्तव्य यामयुग्मं न लंघयेत्'-) (कर्मसंध्यादिकरोइसगुरुवाक्यके अनंतर : करताहै यह शिष्य कहै । ब्रह्मचारीको जो प्रतिदिन कर्म कर्तव्यहे वह याज्ञवल्क्यजी लिखतेहैं ॥ याज्ञ० स्मृ० अ०१-स्मृ०२२।२३।२४।२५ ।२६।२७॥

भापाटीकासमेता। (४९) यथा-"स्नानमब्दैवतैर्मत्रैर्मार्जनं प्राणसंयमः । सूर्य स्यचाप्युपस्थानं गायत्र्याः प्रत्यहंजपः ॥ गायत्रींशिर सासार्द्धजपेयाहृतिपूर्विकाम् । प्रतिप्रणवसंयुक्तांत्रिर यंप्राणसंयमः॥प्राणानायम्य संप्रोक्ष्य ऋचेनाव्दैवतेनतु। जपन्नासीतसावित्री प्रत्यगातारकोदयात् ॥ सन्ध्यांप्राक प्रातरेवह तिष्ठेदासूर्यदर्शनात् । अग्निकार्यं ततःकुर्या- संध्ययोरुभयोरपि ॥ ततोऽभिवादयेबृद्धानसावह- मिति ब्रुवन् । गुरुञ्चैवाप्युपासीतलव्धंचास्मै निवेदयेत हितंचास्य चरेन्नित्यं मनोवाकायकर्मभिः ॥" स्नानकर संध्या कर गायत्रीका जपकरे इसीतरह सायंकालकी संध्यकरे (तथामध्याह्नकालकी) अगिमें होम प्रातः- काल और सायंकालमें। अनंतर अपना नाम ले गुवी- दिवृद्धजनोंको अभिवादन (प्रणाम) करे और वेदादि पढने के लिये गुरूकी आज्ञा ले समीपजावे प्राप्तवस्तु गुरुजीको निवेदनकरे अर्थात् मन वाणी शरीरसे गुरुके हितको आचरण करे॥दिनमें शयन(सोना)नहीं करना यह गुरुवाक्यके अनंतर नहीं शयन दिनमें करूंगा यह 'शिष्य कहे ॥ दिनके शयनमें बडेमारी दोप चिकित्सामें लिखे हैं। रात्रौजागरणं दिवा च शयनमित्यादि।वाचं- यच्छ इस गुरुवाक्यके पीछे यच्छानीति यह शिष्य कहें समिध ग्रहणकर करताहूँ इत्यादि । अब जो ब्रह्मचारी (५०) उपनयनपद्धतिः। को वर्जनीय वस्तुहे सो वह लिखतेहैं-मधु (शहद)मांस अंजन (सुरमा) उच्छिष्ट (जूंठ) शुक्त (बासाअन्न) स्त्रीसे भोग समीपवासादि प्राणियों की हिंसा और उदयास्तका- लमें सूर्यका अवलोकन निदा विवाद हठ इत्यादिवर्जन करे प्रमाणभी-जैसे--याज्ञ-स्मृति अ० प्र०स्मृ-३३ मधुमांसाधनोच्छिपशुक्तस्त्रीप्राणिहिंसनम् . ॥ भास्कर रालोकनाश्लीलपरिवादादि वर्जयेत्--आदिशब्दसे दंभ मात्सायर्यादि ॥ अथ शिक्षा ग्रहणके अनंतर ५ अग्निके उत्तर प्रत्यङ्मुख गुरुके चरण ग्रहण कर नम्रीभूत हो- कर जो गुरुको देखता औ आपभी उसकी ओर (तरफ) देख शंखतूर्यादिशब्दको निवारणकर यथोचित लग्न मु- हूर्त इष्ट नवांशमें गुरुशिष्यको परीक्षा कर. गायत्री उ- पदेश करे॥वर्ष पट्मास परीक्षा कर गायत्री उपदेश वा ब्राह्मणको शीघ्रही करे । प्रमाण गृह्यसूत्र-“सद्यस्त्वे- व गायत्री ब्राह्मणायानुबयादाग्नेयो ब्राह्मण" इति श्रुतेः। गायत्री उपदेश करनेकी विधि पद्धतिकारोंने नहीं लिखी इसलिये सूत्रकारका प्रमाण देते हैं- (गृह्यसूत्र पारस्करकांड--२--यथा पच्छोईर्चशः' सर्वां च तृतीयेनानुवर्तयति ) अर्थात् प्रथमवार सप्तव्या- हतिपूर्वक एक पाद गायत्रीका उपदेश करना द्वितीय (दूसरी)वार अर्द्ध मंत्र उपदेश करना तृतीय (तीसरी) .. आपाटीकासमेता। (५१) बार आवृत्तिमें संपूर्ण मंत्र उपदेश करना चाहिये। तद्यथा । ॐभूः ॐभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ प्रथमावृत्तौ ॥ ॐभूः ॐभुव- अस्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भगोंदेवस्य धीमहीति द्वितीयावृत्तौ ॥ ॐभूः ॐभूवः स्वः ॐतत्सवितुर्वरेण्यं । भगों देवस्य धीमहि । धियोयोनः प्रचोदयात् । आयोज्योति रसोमृतं ब्रह्म- भूर्भुवः स्वरोमिति ।। यह क्रम गृह्यसूत्रमें लिखाहै ।। पद्धतियोंमें संपूर्ण मंत्रकी निरावृत्ति कराई जाती है। (गायत्रीयरूपमाड) ॐ३म् भूर्भुवः वन्तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो योन प्रचोदयात् ॐ ३॥ (तत्) तस्य ( सवितुः ) जगदुत्पादयितुः सर्वान्त- मिणः सूर्यस्य (वरेण्यं ) वरणीयं अतिश्रेष्टमित्यर्थः K भर्गः ) तेजः ( देवस्य ) द्योतनात्मकस्य दीप्यमान- स्येत्यर्थः (धीमहि) वयं ध्यायामः ( चिंतयामः )- (धियः ) धर्मादिविपचिणीर्बुद्धीः (यः सविता (नः अस्माकं (प्रचोदयात) प्रेरयति ।। अन्वयः-यः सविता रयिता नः अस्माकं धियः धर्मादिविषयबुद्धीः प्रचोदयात् तत् तस्य सवितुः प्रेर- (५२) उपनयनपद्धतिः। कस्य सूर्यस्य (बाणः ) देवस्य दीप्यमानस्य-(दिवु कीडाविजिगीपाव्यवहारघुतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकांतिग- तिपु-) वरेण्यं वरणीयं भजनीयमिति भरादिसतलो- कप्रकाशकम् आपः स्वरूपं ज्योतिःस्वरूपं रसः आनं- दस्वरूपम् अमृतं मोक्षरूपं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरूपम् कार स्वरूपं च भगः तेजः धीमहि ध्यायामः ॥ (संक्षिप्त-भाषार्थ) जो सविता देवता हमारी चतुर्वर्ग (धर्म अर्थ काम मोक्ष) विपयवाली बुद्धिको शुभकामोंमें प्रेरणा करे उसः जगत्के उत्पन्न करनेवाले द्योतमान प्रकाशमान ब्रल- स्वरूप सूर्य भगवानके अतिश्रेष्ठ सप्तलोक जल तेज रस ॐकाररूप भर्ग तेजको हम ध्यान करतेहैं । भारद्वाजस्मृतौ गयपद्यात्यां गायत्र्यों दर्शितो यथा- "अथाहमर्थ गावच्याः प्रवक्ष्यामि यथातथम् ॥ द्विजोत्तमानां सद्भत्या जपादीनि प्रकुर्वताम् ॥ १॥ विश्वासभक्तिजननं मन्त्रैर्यज्ज्ञानमुत्तमम् ॥ तस्मादर्थ विजानीयायत्नेन जपकृद्दिजः॥२॥ द्वाभ्यां विश्वासभक्तिभ्यां जपादीनां महत्तरम् ।। फलं भवेजपकृतामिति वेदेषु भापितम् ॥३॥ पदानि दशमंत्रस्य तदादीनि यथाक्रमात् ॥ पदं प्रत्यर्थनिप्पत्तिः स्पष्टं तु क्रियतेऽधुना ॥४॥"

भापाटीकासमेता। । (तत् १) इति द्वितीयैकवचनम् । अनेकजगदुत्प- त्तिस्थितिलयकारणीभूतमुपकथ्यमानं निरुपमं तेज्य: सूर्यमण्डलाभिधेयं परं ब्रह्माभिधीयतासवितुरितिरए- प्टयेकवचनम् । पृप्राणिप्रसवे इत्यस्य धातोरेतद्रूपम् । सर्वस्य भूतजातस्य प्रावितरित्यर्थः।रेण्यं ३ वरणीयं प्रार्थनीयं नियमादिभिरपगतकल्मपैः सततं ध्येयम् । भर्गःभलो आमर्दने भृजिभजन इत्येतयोर्धात्लोभजतां पापभन्ननहेतुभूतम् । अथवाभाजदीप्तापित्य अस्य धातो भगः तेज इत्यर्थः । देवस्य ५ वृष्टिदानादिगुणयुक्तस्य निरतिशयस्येत्यर्थः । दीप्यतेः प्रकाशार्थत्वात् । धीमहि ६ मध्ये चिंतयामि निगमनिरुक्तविद्यारूपेण चक्षुपा योसावादित्यो हिरण्मयः पुरुषः सोहमिति चिन्तयामि । धियः ७ इति द्वितीया बहुवचनम् ॥ य इति ८ छान्दसत्वाल्लिंगव्यत्ययः । यत्तेजः सवितुर्दे- वस्य वरेण्यमस्माभिरभिध्यातम् भगों जपतां पापभजन हेतुभूतं धीमापास्महे । तत्तेजो नोऽ ९ स्माकंधियो १० बुद्धीःश्रेयस्करेषु कर्मसु प्रचोदयात् प्रेरयेदित्यर्थः।। "एपाव्याख्या तु गायन्याः सर्वपापप्रणाशिनी। विज्ञातव्या प्रयत्नेन द्विजैः सर्वशुभेच्छुभिः॥ जपस्याभ्यंतरे व्याख्या स्मर्तव्या मनसा द्विजैः। स्मरणात्सर्वपापानि प्रणश्यति न संशयः॥"

(५४) उपनयनपद्धतिः।
अथ प्रत्यक्षरं देवताभेदमाह योगियाज्ञवल्क्यः ॥
अक्षराणां तु देवत्य संप्रवक्ष्याम्यतः परम् । आग्नेयं
(तत्) प्रथमं ज्ञेयं वायव्यं (स) द्वितीयकम् ॥ तृतीयं
(वि) सूर्य दैवत्यं चतुर्थं (तु) वैद्युतं तथा ॥ पञ्चम
(व) यमदैवत्यं वारुणं (रे) पष्ठमुच्यते । बार्हस्पत्यं
सप्तमं तु (ण) पार्जन्यमष्टम (यम्) विदुः । ऐंद्रं तु
नवन (भ)ज्ञेयं गांधर्व दशमं ( गोः) तथा । पौष्ण
मेंकादशं (दे) प्रोक्तं मैत्रावरुणं (व) द्वादशम् । त्वाएं
त्रयोदशं ( स्य) ज्ञेयं वासवंतु चतुर्दशम् (धी) मारुतं
पंचदशकं (म) सौम्य पोडशकं (हि) स्मृतम् । सप्तदशं
(घि) त्वाङ्गिरसंवैश्वदेवमतः परम् । ( यः ) आश्विन
कौनविशं ( यः) प्राजापत्यं तु विशकम् । (नः) सर्व
देवमयं प्रोक्तमेकविंश (प्र) मतः परम् ॥ रौद्रद्वाविं-
शक (चो ) प्रोक्तंत्रयोविंशन्तु (द) ब्राहाकम् । वैष्मवं-
(यात् ) चतुर्विंशमेता ह्यक्षरदेवताः। जपकाले तु-
संस्मृत्य तासां सायुज्यतां व्रजेत् ॥
(विशेष द्रष्टव्य)
शंका करतेहैं कि छंदशास्त्रमें पट् ६ अक्षरके पाद
वाला गायत्री छंद लिखाहै । यथा-वृत्तरत्नाकरे--उक्ता
त्युक्ता तथा मध्या प्रतिष्ठान्यासपूर्विका । गायत्र्युष्णि-
गनुष्टुपच वृहती पंक्तिरेव च ॥ त्रिष्टुप् च जगतीचेव

hinermope भापाटीकासमेता। तथातिजगती मता । शाकरी सातिपूर्वास्यादष्टय त्यष्टी ततः परम्॥धृतिश्चातिधृतिश्चैव कृतिः प्रकृतिरा कृतिः। विकृति-संस्कृतिश्चापि तथातिकृतिरुकृतिः।। इत्युक्ता छंदसा संख्येति ।। अर्थ-उक्ता छंद । एक १ अक्षरके पादका है । अत्युक्ता २--अक्षरोंके पादका। मध्याछन्द ३--अक्षरोंके पादका । प्रतिष्ठा ४-अक्षरोंके पादका । सुप्रतिष्ठा ६--अक्षरोंके पादका गायत्री छन्द- ६-अक्षरोंके पादका । उष्णिक ७--अक्षरोंके पादका इत्यादि २७ अक्षरतकक्रमपूर्वक छन्दोंके पाद होतेहैं इसलिये चारही वेदोंमें पद् अक्षर पाद वाले गायत्री नामसे बहुत छंद हैं तो इसमंत्रका उपदेश किया जाता है उत्तर यह है कि ( पंकज) --पंकाजायते इति. पंकजम् अर्थ--जो पंक (कीचड) से उत्पन्न हो उसको पंकज कहतेहैं यद्यपि पंकसे कुमुद्र (कंमीया) नापे- रोड इत्यादि अनेक वस्तु उत्पन्न होती तोभी पंकज शब्द कमलकाही रूटि प्रसिद्धिका वाचक है इसप्रकार यद्यपि गायत्री छंद अनेक हैं तथापि रूढि प्रसिद्धिसे गायत्री छंद इस मंत्र काही वोधक है और इस मंत्रको ही सर्व सिद्धि भुक्तिमुक्तिदायक प्राणरक्षक होनेसे उपदेश कियाजाताहै। प्रमाण व्यासो यथा-"गायन्तंचायते यस्मात् गायत्रीय ततः स्मृता" इति ॥ इसलिये इस

(५६) उपनयनपद्धतिः।
गायत्री मंत्रकीही, अति प्रशंसा ( स्तुति) फल महा-
त्मा योगी याज्ञवल्क्य जी लिखतेहैं-
प्रमाण ।
.
गायत्री चैव वेदांश्च तुलया समतोलयत् ।
वेदा एकत्र मांगास्तु गायत्री चैकतः स्थिता ।।
सारभूतास्तु वेदानां गुह्योपनिपदो मताः ।
ताभ्यः सारस्तु गायत्री तिस्रो व्याहतयस्तथा ।
ॐकारपूर्विकास्तिस्रो गायत्री यश्च विन्दति।
चरित्रं ब्रह्मचर्यस्य स वै श्रोत्रिय उच्यते ॥
एतया ज्ञातया सर्व वाङ्मयं विदितं भवेत् ।
उपासितं भवेत्तेन विश्वं भुवनसप्तकम् ॥
एवं यस्तु विजानाति गायत्री ब्राह्मणस्तु सः ।
अन्यथा शूद्रधर्मा स्याद्वेदानामपि पारगः ॥
तथाच ऋष्यशृगः ।
सर्वात्मना हि या देवी सर्वभूतेषु संस्थिता ।
गायत्री मोक्षहेतुर्व मोक्षस्थानमलक्षणम् ।
धर्मपुराणे ।
गायत्री देवजननी गायत्री पापनाशिनी।
न गायन्याः परं जप्यमेतद्विज्ञानमुच्यते ॥
गायत्री वेदजननी गायत्रीपापनाशिनी।
गायत्र्यास्तु परं नास्ति दिवि चेह च पावनम् ।।

भाषाटीकासमेता। (५७) हस्तप्राणप्रदा देवी पततां नरकार्णवे। तस्मात्तामभ्यसेन्नित्यं ब्राह्मणो हृदये शुचिः॥ ऐसा गायत्रीका फल निरूपण कर अब इसका जो अर्थ बृहदारण्यकमें लिखाहै वह लिखतेहें (बृहदार- ण्यके) भूमिरन्तरिक्ष द्यौरित्यष्टावक्षराणि अष्टाक्षरं हवा एकं गाक्यै पदमेतदुहेवास्या एतत् सयाबदेषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥१॥चो- यपि सामानि इति अष्टावक्षराणि अष्टाक्षरं वा एक गायव्य पदमेतदुहेवास्या एतत् स यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥२॥ प्राणोऽपानो व्यान (विआनः) इत्यष्टावक्षराणि अष्टा- क्षरं हवा एक गायन्यै पदमेतदु वास्या एतत् सयार: दिदं प्राणिति तदै जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ॥३॥ अथाम्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजाय एष तपति य? चतुर्थं तत्तुरीयं दर्शतं पदमिति दहशे इव एप परोरजा इति सर्व ोप रज पर्युपरि तपति एवं हैप श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥४॥ सैपा गायत्री एतस्मिस्तुरीये दर्शते पदे परो- रजसि प्रतिष्टितेत्यादि ॥२॥ एतद्वैतत् सत्यं बले प्रति- टितं प्राणो वै बलंतत् प्राणे प्रतिष्टितमित्यादि । साहेपा गयास्तत्रे प्राणा वै गयास्तान प्राणांस्तत्रे (५८) उपनयनपद्धतिः। यस्माद्गयांस्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम ॥६॥ सयामे वामुमन्वाह वैपसो स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणां स्त्रायते ॥७॥ अथ छांदोग्योपनिपदुक्तगायत्रीव्याख्यालिखते हैं। गायत्री वा इदं सर्वभूतं यदिदंकिञ्च । वाग्वै गायत्री वाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १ ॥ यावै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिवी अस्यांहीदें सर्वं भूतं प्रतिष्ठितम् एतामेव नातिशीयते ॥ २॥ यावे सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन् पुरुपे शरीर अस्मिन् हीमे प्राणा प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशयन्ते ॥३॥ यद्वै तत् पुरुष शरीरमिदं वाव तयदिदम स्मिन्नन्तः पुरुपे हृदमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्टिताः एतदेव नाति शीयन्ते ॥ ४ ॥ सैपा चतुष्पदा पड्विधा गायत्री तदेतचाभ्यनूक्तम् ॥ ५॥ ऋ० एतावानस्य महिमातोज्यायाँश्च पूरुपः । पादो ऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ यजुर्वेदमें अध्याय ३१ में एतावान् यह विशेप है ।। अस्य शाकरमाप्यम् । तावान् अस्य गायत्र्यास्यस्य ब्रह्मणः समस्तस्य महिमा विभूतिविस्तारः यावान् चतु पादपइविधश्च ब्रह्मणो विकारः पादः गायत्रीति व्याख्यातः । अतस्त भाषाटीकासमता। स्माद्विकारलक्षणात् गायव्याख्यात ततो ज्यायान् मह त्तरश्च परमार्थसत्यरूपोऽविकारः पुरुपः सर्वपूरणात् पुरिशयनाच ॥ तस्यास्य पादाः सर्वाः सर्वाणि भूतानि तेजोबन्नादीनि सस्थावरजङ्गमानि ॥ त्रिपाद् चयः पादा अस्य सोऽयं त्रिपाद् अमृतं पुरुष्याख्यं समस्तस्य गायत्र्यात्मकस्य दिवि द्योतनवति स्वात्मन्यवस्थित मित्यर्थः॥ अथ महीधरभाष्योक्तगायत्रीका अर्थ लिखते हैं। यजु० अ० महीधरः ॥ तदिति पष्टयर्थे । तस्य द्यो- तनात्मकस्य सवितुः प्रेरकस्यान्तर्यामिणो विज्ञानान न्दस्वभावस्य हिरण्यगर्भोपाध्यवच्छिन्नस्य वा आदि- त्यान्तरपुरुपस्य वा ब्रह्मणो वरेण्यं वरणीय सर्वैःप्रार्थनीय भगों सर्वपापानां सर्वसंसारस्य च भजनसमर्थं च तेजः सत्यज्ञानादिवेदान्तप्रतिपाद्यं वयं धीमहि ध्यायाम इति महीधरभाष्यम् ॥ तत् यह पष्टीके अर्थ में है ।। उस (देव) प्रकाशस्व- रूप (सविता) प्रेरक अन्तर्यामि विज्ञान और आनंदस्व भावका अर्थात् हिरण्यगर्भनामसे युक्तका अथवा सूर्य- मण्डलके मध्यमें स्थितपुरुषका अथवा ब्रह्मका(वरेण्य) सर्वसे प्रार्थना करने योग्य (मर्ग) लब पापोंके सब संसारके भूजने में नाशकरनेमें समर्थ तेजको अर्थात् (६०) उपनयनपद्धतिः । 'सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतिसे सिद्धकिये गये को हम ध्यान करते हैं। अथ गायत्रीपर सायनमाप्य लिखते है- यः सवितादेवः नःअस्माकं धियः धर्मादिविपयाबुद्धीः प्रचोदयात् प्रेरयेत् तत् तस्य सर्वासु श्रुतिपु प्रसिद्धस्य देवस्य द्योतमानस्य सवितुः सर्वान्तर्यामितया प्रेरकस्य जगत्वष्टुः परमेश्वरस्य आत्मभूतं वरेण्यं सर्वैरुपास्यतया ज्ञेयतया च सम्भजनीयं भर्गः अविद्या तत् कार्ययोर्भ- जनाद्भगः स्वयंज्योतिः परब्रह्मात्मकं तेजः धीमहि ॥ ( अर्थ मापामे ) जो सविता देव हम लोगोंकी बुद्धिको अर्थात् धर्मादिविपयवृद्धिको प्रेरणा करे उस सब श्रुतियोंमें प्रसिद्ध प्रकाशमान सविता अर्थात् सबके अंतर्यामी होकर प्रेरक जगत्के उत्पन्न करनेवाले परमेश्वरका आत्मस्वरूप वरेण्य अर्थात् सबोंसे उपासना करनेके योग्य और भजन करनेके योग्य भर्गको अर्थात् अवि- या अज्ञान और उसके कार्य संसारके भूजनेसे नाश करनेसे भर्गपद वाच्य स्वयं प्रकाश परब्रह्मरूप जो तेज उसका ध्यान करताहूं ॥ यद्वा यः सविता सूर्योषियः । कर्माणि प्रचोदयात् अथना।

(६१) भापाटीकासमेता। प्रेरयेत् तस्य सवितुस्सर्वस्य प्रसवितुर्देवस्य द्योतमानस्य सदृश्यतया प्रसिद्धं वरेण्यं सर्वेः संभजनीयं भर्गः पापानां तापकं तेजः धीमहि ध्येयतया मनसा धारयेम ॥ इति माधवाचार्यः ॥ (अर्थ भाषामें ।) जो ( सविता) सूर्य हमलोगोंकी बुद्धि अर्थात् कर्मी को प्रेरणा करे उस (सविता ) सबके उत्पन्न करनेवाले (देव) प्रकाशमानका सबको दीख पडताहै उससे प्रसिद्ध ( वरेण्य) सबसे भजनकरनेके योग्य (भर्ग) पापोंका नाश करनेवाले तेजका ध्यान करते हैं अर्थात् मन धारण करते हैं। अब श्रीयोगियाज्ञवल्क्यजीने जो गायत्रीका अर्थ लिखाहै सो वह लिखते हैं (तत्) तच्छन्देन तु यच्छ- ब्दो बोद्धव्यः सततं बुधैः । उदाहते तु यच्छन्दे तच्छ व्दः स्यादुदाहृतः ( सवितुः) सविता सर्वभूतानां सर्व भावान् प्रसूयते । सवनात्पावनाञ्चैव सविता तेन चोच्य ते ॥ (देवस्य) दीव्यते कीडते यस्मादुच्यते शोभते दिवि। तस्मादेव इति प्रोक्तः स्तूयते सर्वदैवतैः ।। (प्रचोदयात् ) यो नः (भगः) चिन्तयामो वयं भर्ग धि यो यो नः प्रचोदयात् । धर्मार्थकाममोक्षेपु बुद्धिवृत्ती पुनः पुनः॥ (भर्गः) भूसूज पाके भवेदातुर्यस्मात्पा- -1

(६२) उपनयनपदतिः ।
चयतेह्यसौ । भ्राजते दीप्यते यस्माजगवान्ते हरत्यपि
(भगः) कालाग्निरूपमास्थाय सप्तार्चिः सप्तरश्मिभिः ।
भ्राजते तत्स्वरूपेण तस्माद्भर्गः स उच्यते॥ (भर्गः )
भेति भ्राजयते लोकात्रेति रंजयते प्रजाः । गइत्यागच्छ
तेजस्रं भरगोभर्ग उच्यते ॥ ( वरेण्य) वरेण्यं वरणी
यं च जन्मसंसारभीरुभिः । आदित्यान्तर्गतं यच्च भर्गा-
ख्यं वै मुमुक्षुभिः ॥ (धीमहि ) जन्ममृत्युविनाशाय
दुःखस्य त्रिविधस्य च। ध्यानेन पुरुषो यस्तु द्रष्टव्यः
सूर्यमण्डले॥
सतव्यातयः ।
भूरायाश्चैव सत्यांताः सप्तव्याहृतयस्तथा । लोका-
स्त एव सप्तैते उपर्युपरि संस्थिताः ॥ सप्तव्याहतयः
प्रोक्ताः पुराकल्पे स्वयंभुवा । ता एव सप्तच्छंदांसि
लोकाः सप्त प्रकीर्तिताः॥
अथ भूराह ।
भवंति चास्मिन् भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
तस्माद्भूरिति विज्ञेया प्रथमा व्याहृतिः स्मृता (भुवः)॥
अथ भुपराह ।
भवति भूयो लोकानि उपयोगक्षये पुनः । कल्पन्ते
उपभोगाय भुवस्तस्मात्प्रकीर्तिता ॥ (भुवः)॥
शीतोष्णवृष्टितेजांसि जायते तानि वे सदा आलयः
अय स्वराहा

भापाटीकासमेता। अय महराह! जय जनमाह। सुकृतानां च स्वलोकः स उदाहृतः ॥ (स्वः ) ॥. अधरोन्तरलोकेभ्यो महांश्च परिमाणतः । हृदयंसतलोकानां महस्तेन निगद्यते ।। ( महः ) । कल्पदाहे प्रलीनास्तु प्राणिनस्तु पुनः पुनः । जायते च पुनः स्वर्गे जनस्तेन प्रकीर्तितः ।। (जनः) ।। सनकाधास्तपः सिदा ये चान्ये ब्रह्मणः सुताः। अधिकारनिवृत्तास्तु तिष्ठत्यस्मिस्तपस्ततः ॥(तपः) । अथ तप आह । अथ सत्यमाहा सत्यं तु सप्तलोका वै ब्रह्मणः सदनं तनः ।। सर्वेषां चैव लोकानां मूनि सन्तिटते सदा ॥ ज्ञानकर्मप्रति- टानां तथा सत्यस्य भाषणात् । प्राप्यते चोपभोगार्थ प्राप्यं न च्यवते पुनः॥ तत्सत्यं सप्तमो लोकस्तस्मा- दुवं न विद्यते ॥ (सत्यम् )॥ अर्थ गायत्री मंत्रकी व्याख्या यथावद्धि वेदवेदांगध- र्मशास्त्रादिद्वारा सिद्धकर विनियोगका वर्णनकरते हैं । जिसमंत्रका जपकरनाहो उसका प्रथम ऋषि छंद देव- ताका यथार्थ ज्ञान चाहिये ॥ प्रमाण. योगियाज्ञव- स्यका “ आप छंदच दैवत्यं विनियोगस्तथैव च ।। वेदितव्यं प्रयत्नेन ब्राह्मणेन विशेषतः" । अर्थमंत्रका (६४) उपनयनपद्धतिः।. ऋपि छंद देवता विनियोग यह प्रयत्नसे जानना चाहिये। और ना जानने में प्रायश्चित्त लिखाहै "अविदित्वातुयः कुर्याद्याजनाध्यापनं जपम् । होममंतर्जलादीनि तेभ्यो ऽल्पाल्पफलं लभेत्” तथा च. कात्यायनः-द्रष्टार ऋ- पयः स्मारः परमेष्टयादयः; देवतामन्त्रान्तर्भूता अग्यादिका हविर्भाजः स्तुतिभाजोवा । छन्दांसि गाय- व्यादीनि। एतान्यविदित्वायोऽधीतेऽनुत्ते जपति जुहो- ति यजते याजते वा तस्य ब्रह्म निर्वीयं यातयामं भव- त्यन्तरा सुगतं वापद्यते स्थाणुं वर्च्छति प्रमीयते वापा- पीयान् भवति । इसलिये गायत्रीछंदका ऋपि देवता विनियोग लिखतेहैं ॥ तथा च योगियाज्ञवल्क्यः॥ सविता देवता तस्या मुखमग्निस्तदित्युत । विश्वामि- ऋपि छन्दो गायत्री तु विधीयते ॥ विश्वस्य जगतो मित्रं विश्वामित्रः प्रजापतिः ॥ विनियोगोपनयने प्राणायाम जपे तथा ॥ अर्थ। गायत्रीका विश्वामित्र ऋपि सविता देवत्ता अग्नि मुख उपनयनमें विनियुक्त है ॥ श्रीः । अलमतिगाहा वगाहेन ॥ श्रीः ।। — एपा व्याख्या तु गायत्र्याः सर्वपापप्रणाशिनी।विज्ञा- तव्या प्रयत्नेन द्विजः सर्वशुभेप्तुभिः ॥ जपस्याभ्यंतरे m भाषाटीकासमेवा । (६५) ख्या स्मर्तव्यामनसा द्विजैः । स्मरणात्सर्वपापानि पश्यति न संशयः ॥ इति ॥ अथ माणवक आचार्यदक्षिणदिशि अग्निपश्चिमोपविष्टो घृतातशुष्कनिषि देतरेधनेन जुहुयात् ॥ ततः ॐअग्नेसु अवः सुश्रवसंमांकुरु यथावमग्नेसु श्रवः सुश्रवा असि । ॐएवंमा सुश्रवः सोश्रवसंकुझ ॐयथात्वमग्ने देवानां यज्ञ स्य निधिपोऽअसि।एवमहं मनुष्या णां वेदस्यनिधिपोभूयासम् ॥ ततः प्रद क्षिणमग्निंवारिणा पर्युक्ष्य उत्थाय स्वग्रा देशमितांताक्तपलाशसमिधमादाय॥ ॐअग्नयेसमिघमाहा वृहतेजातवेदसे यथात्वमग्ने समिधासमिध्यसएवमह मायुपामेधया वर्चसा प्रजया पशुभित्र- ह्मवर्चसेनसमिधे जीवपुत्रो ममाचार्यों मेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादोभूयासश्वा हा ॥ इतिसंत्रेणजुहुयात् ॥

हो (६६) उपनयनपद्धतिः। अथ गायत्र्युपदेशके अनंतर आचार्यसे दक्षिण अग्निसे पश्चिमस्थित हुआ शिष्य घृतयुक्त शास्त्रविहि- तगोमय (एरने ) से हवन करे [ मंत्रार्थ-अग्ने सुश्रव इति । सुश्रव शोभन नाम युक्तहै अग्नि देव (मा मां) मुझको सुश्रव श्रेष्टकर्णीवाले करो जैसे तुम सुश्रव तद्वत् सुन्दर श्रवणसे उत्पन्न ज्ञानशाली करो। हे भांडा- गारिके गृहमेधीय अग्ने जैसे तुम यज्ञ संबंधसे इंद्रादि देवताओंके निधिप अर्थात् रक्षक हो(अर्थात् भाण्डा- गारिकहो ) इसीप्रकार ( अहं ) मैं मनुष्योंका और वेदोंका निधिप रक्षक हूंगा इति ॥ तिसके अनंतर प्रद- क्षिण क्रमसे जलसे अनिको पर्युक्षण कर और उठकर (स्व) अपने प्रादेशमात्र घृतयुक्त समिधा 'लेकर (अग्नये)इस मंत्र हवन करे मंत्रार्थ-अग्नये इति हे अग्ने में समिधाको (आहार्पम्) आहृतवानस्मि ग्रहणकर्ता रहे अतिशयसे प्रकाशमान तुम्हारे लिये हे अग्ने जैसे तुम मुझकर दीहुई समिधासे वृद्धिको प्राप्त होतेहो इसी प्रकार में आयु(चिरजीवन) मेधा अर्थात् धारणश- क्तिवाली बुद्धि (वर्च ) तेजसे (प्रजया ) प्रजा पुत्रा- दिसे (पशभिः) गवादिकोंसे (ब्रह्मवर्चसा) ब्रह्मतेजसे वृद्धिको प्राप्त हूंगा और मुझको गुरुजी बहुत पुत्र बुद्धियुक्त होवें।। (अहं अनिराकरिष्णुः भवामि) अर्थात् में नित्ययज्ञके करनेवाला हूंगा। और में यशयुक्त तेज-

भापाटीकासमेता। (६७)
वाला वेदाध्ययनशील और ( अन्नाद) अर्थात् अन्नके
देनेवाला और भोजन करनेवाला हूंगा अर्थात् अन्नका
वियोग हमारेको कभी नहीं इस कामनासे अग्निके
लिये स्वर्गत हो॥
एवंसमिदंतरदयंजुहुयात् ॐ अग्नेस
श्रवः सुश्रवसंमाकुरु ॐ यथात्वमनेसु-
श्रवः सुश्रवाअसि । ॐ एवंमांसुश्रवः
सौश्रवसंकुरु । ॐ यथात्वमग्ने देवानां
यज्ञस्यनिधिपोऽअसि । ॐ एवमहंमनु-
ष्याणां वेदस्यनिधिपोथूयासमा ततःप्रद
क्षिणमग्निंपर्युक्ष्यतूष्णी पाणी प्रतप्य सु-
खंप्रतिमंत्रांतेऽवमृशतिातिनूपाअग्लेसि
तन्वमे पाहि। ॐआयुर्दा अग्नेस्यायुमें
देहि । ॐवोंदाअग्नेसिवोंमेदेहि । ॐ
अग्नेयन्मेतन्वाऊन तन्म आपण। ॐमे
घांमदेवः सविता आदधातु ! ॐमेधामे
देवीसरस्वतीआदधातु । मेधामश्वि
नौदेवाबाधत्तांपुष्कराजौ। ततः सर्वगा
त्रादिषु दक्षिणपाणिनास्पर्शः॥

(६८) उपनयनपद्धतिः। इसी प्रकार दोंसमिधाका हवन करे ॥ अग्ने सुश्रवः इस मंत्रका पूर्व अर्थ लिखाहै ॥ तदनंतर प्रदक्षिण कमसे अग्नि पर्युक्षणकर तृष्णीं हो. हाथको तपाय मंत्र के अनंतर स्पर्शकरे ॥ (मंत्रार्थ तनूपा इत्यादि )हे. अग्रे! तुम तनु-शरीरके रक्षक हो इसलिये हमारे शरोरकी रक्षा करो अर्थात् पुष्टि करो हे अग्ने, आयुके तुम दाता हो. इसलिये आयुकी वृद्धि करो हे अग्ने वच तेजके दाता तुम तेजको देवो ॥ हे अग्ने जो मेरे "भरीरमें ऊन ( न्यून ) है वह पूर्ण करो ॥धारणशक्ति वाली बुद्धि(सविता) सूर्य मुझको देवे । सरस्वती वाग- विष्ठात्री देवता बुद्धिको देवे ॥ कमलोंकी मालावाले अश्विनी कुमार बुद्धिको देवें ॥ तदनंतर अंगोंको दक्षि- ग हाथसे स्पर्श करना क्रमसे। ॐअंगानिचम् आप्यायताम् ॥इतिसर्व गात्रालंसने ऊँयाक्चस आप्यायतामि तिमुखाप्राणश्चम आप्यायतामिति नासिकयोः॥ ॐचक्षुश्चम आप्यायता मितिमंत्रपाठमात्रम्।ततोदक्षिणकराना मिकाग्रगृहीतमस्सना ललाटेग्रीवायांद क्षिणवाहमूलेहदिचच्यायुपंकुर्यात् ॥ मंत्रोयथा-ॐ न्यायुपंजमदग्नेः-इतिल भापाटीकासमेता। लाटे। ॐकश्यपस्यन्यायुषमितिग्रीवा याम। ॐयवेपुव्यायुषं-इतिदक्षिणवाहसू लोॐतत्रोऽअस्तुत्र्यायुपम्-इतिहृदयति , तोव्यस्तपाणिभ्यां पृथिवींस्पृशन्नभिवाद नंकुर्यात।।तत्रप्रकारः ॥ ॐअमुकगोत्री हममुकशहिंमोवैश्वानर त्वामभिवाद ये॥ ततस्तेनैवक्रमेणसंवोध्यवरुणमभि वाद्याचार्यतथैवाभिवादयेत् । ततःआयु मानभवसौम्येत्याचार्यान्यात् ॥ अंगानि शरीरके अंग और वाक वाणीका कारक इंद्रिय प्राण वायु चक्षु नेत्र श्रोत्र कर्ण यश बलमें मेरे वृद्धिको प्राप्त होवें । इन मंत्रसे सर्व शरीर १ मुख २ नासिका ३ चक्षु ४ श्रोत्र कर्ण ५ स्पर्श करने यशोबलं यह केवल उच्चारणमात्र ॥ तदनंतर दक्षिण हस्तकी अनामिकासे हवनकी भस्म ले प्रथम ललाट फिर ग्रीवा और दक्षिण अंशमें व्यायुपं इस मंत्रसे लगावे [मंत्रार्थ-व्यायुपमितिात्रिआयुकी ऐक्यताकोन्यायुप- कहाहे वह व्यायुप अर्थात् कल्याणदायकशुभंसूचक जो जमदग्निनाम ऋपिको और कश्यपजीको और इंसा- दिक देवताओंको होती भइ वह न्यायुप मुझको होने इति तदनंतर व्यस्त (उलटे) हाथोंसे पृथिवीको स्पर्श (७०) उपनयनपद्धतिः । करताहुआ अभिवादन करे-कि, अमुकगोत्र अमुक प्रवर अमुक शर्मा में हे वैश्वानर अग्ने तुमको अभिवा- दन करताहूँ इसीप्रकार वरुण ( जलाधिष्ठातृदेवता) को तदनंतर गुरुजीको प्लुतउच्चारणसे अभिवादन करें। आयुवाला हो यह गुरु आशीर्वाद कहे ॥ ततोभिक्षापात्रमादाय प्रथमं मातु:सका शात् ॐभवति भिक्षां मे देहि-इतिप्रा र्थनानंतरं तदत्तां चादायाचार्याय निवे दयेत् तथैव भिक्षांतरं याचयेत् । तत आचार्येण सुंश्वेत्यनुज्ञातो भिक्षां स्वी कुर्यात् । ततः फलपुष्पचंदनवृतपूर्ण वेण ब्रह्मचारिदक्षिणकरस्पृष्टेनाचार्यः पूर्णाहुतिं दद्यात् । तत्रमंत्रः॥ (यजु० अध्याय ७ मंत्र २४) ॐ मुनिंदिवो अरुतिं पृथिव्या वैश्वानरमृतऽआजातम ग्निम् । कुवि सुम्राजुमतिथुिजनानामा सन्नापात्र जनयंत देवाः स्वाहा-इदम- प्रये ततः सुवेणभस्मानीय दक्षिणाना- मिकाग्रगृहीतभस्मना (१) ॐ त्र्यायु । भापाटीकासमेता। (७१) पंजुमदग्ने इतिललाटे-ॐकुश्यपस्य न्या युपम इतिग्रीवायामायवेषु व्यागुषम् इति दक्षिणबाहुमूलेॐ तोऽअस्तुत्र्या युषम् । इतिहदि । कुमारपक्षे तत्रो इत्य स्य स्थाने तत्तेइतिविशेषः॥ अथक्षार लवणमधुमांसादिनिरत्तिः । उद्धृतजल स्नानदंडकृष्णाजिनधारणवृक्षारोहणवि षमभूमिलंघननग्नस्त्रीनिरीक्षणस्त्रीसंभोग व्यसनव्यावृत्तिरूपा ब्रह्मचारिणो निय- मागतदिनेवाग्यतो ब्रह्मचारी अहः शेष स्थित एवं गमयेत् । ततः सायंसंध्यां कृत्वा तस्मिन्नेवाग्नी पूर्ववत् पर्युक्षणपरि समूहने कृत्वा वाचं विसृजेता परिसमू हनांत शुष्कनिपिढेतरेधनस्याग्नौप्रक्षे पाततः संध्यामुपास्य प्रतिदिनं सायं प्रातरपि ब्रह्मचारिणा कर्तव्या इति ॥ तदनंतर भिक्षापात्रको ग्रहण कर प्रथम मातासे ब्रह्मचारी मिना लेने । तदनंतर अन्यस्त्रियोंसे ।। यदि ब्राह्मण ब्रह्मचारी हो तो ( भवति भिझां देहि ) (७२) उपनयनपद्धतिः। यह कहे अर्थात भवत् शब्दको प्रथम कहै । यदि क्षत्रिय. ब्रह्मचारी हो तो (भिक्षा भवति देहि ) यह कहे. अर्थात् भवति शब्द मध्यमें कहें । यदि वैश्य ब्रह्मचारीहो तो (भिक्षां देहि भवति ) यहकहे अर्थात् भवति शब्द अंतमें कहे ॥ प्रमाण भी यथा गृह्य सूत्र २ कांडमें-(भवत्पूर्वां ब्राह्मणो भिक्षेत् भव- न्मध्यां राजन्यो भवदन्त्यां वैश्य इति )और याज्ञव- ल्य स्मृति अध्याय प्रथममें लिखाहै ॥ "आदिम- ध्यावसानेषु भवच्छब्दोपलक्षितम् ।' ब्राह्मणेषु चरेत भेक्ष्यमनिन्द्येष्वात्मवृत्तये " अर्थ-आदिमध्यअंतमें ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य भवत् शब्दको देकर ब्रह्मचारी भिक्षाकरे अनिन्ध ब्राह्मणोंके गृहोंसे ॥ अपनी अन्नपू- तिकेलिये प्रथम भिक्षा लेकर गुरुजीके आगे धरदे ॥ तदनंतर गुरुजीकी आज्ञासे भिक्षाको ग्रहण करे।।इसमें प्रमाण याज्ञवल्क्य-स्मृति अध्याय प्रथम-यथा- “कृतानिकार्यों मुंजीत वाग्यतो गुर्वनुज्ञया" अर्थात् हवन कर गुरुकी आज्ञाले तूप्णी होकर भोजन करे॥ तदनंतर फल पुष्प चंदन घृतसे पूर्ण ब्रह्मचारीका दक्षिण हाथ अपने हाथसे स्पर्शकर वसे आचार्य पूर्णाहुतिको हवन करताहे मूर्धानं इस मंत्रसे ( मंत्रार्थ मूर्दानमिति) इस मंत्रका भरद्वाज ऋषि वैश्वानर भापाटीकासमेता। (७३) देवता त्रिष्टुप् छंद पूर्णाहुतिके होममें विनियुक्तहे ॥ अर्थ-स्वर्गादि लोकसे ऊपर पृथिव्यादि पांचभूत अर्थात् पृथिवी--अप-तेज-वायु-आकाश-इनसे विर- क ब्रह्माण्डको प्रकाश करनेवाला ईश्वर सत्यरूप जन्मादि पड्भावरहित निर्विकार,प्रकाशमान सर्वज्ञ परमानंद तीन कालसे रहित सृष्टि-(उत्पत्ति ) लयमें प्राणिमात्रका पात्रभूत और जो देवताओंको उत्पन्न कर अपने २ व्यापारमें लगाताहै तिस परमेश्वरके लिये यह आहुति सुहुत हों ।। तदनंतर बैठकर सुबसे भस्मको ले दक्षिण अनामिकासे. ललाट १ ग्रीवा २ दक्षिण बाहु ३ हृदयमें आचार्य लगाकर पीछेसे यथा- क्रम शिष्यके (चायुपं) इस मंत्रसे लगावे।। तन्नो इसके स्थानमें तत्ते यह कहना। इसके अनंतर ब्रह्मचारी क्षार (खारीवस्तु ) लवण मधु (शहद ) मांसकी निवृत्ति आदिशब्दसे करे अंजन (सुरमा) उच्छिष्ट--शुक्त (बासा अन्न) स्त्री संभोग, हिंसा, निंदा विवाद-और उदयास्तकालमें सूर्यका अवलोकन छोडदे ॥ प्रमाण. याज्ञः स्मृ०अ--० १ "मधुमांसाधनोच्छिष्टशुक्तस्त्रीपाणिहिंसनम् । भास्क- रालोकनाश्लीपरीवादादि वर्जयेत्- और निकाल- कर जलसे स्नानकरना दण्ड मृगचर्म धारणकरना । वृक्षपर नहीं चढना । विपमकठिनभूमिका लंघन, नग्न- (७४) उपनयनपद्धतिः। स्त्रीका दर्शन, स्लीसे विपयव्यसन द्यूत चोरी आदि ब्रह्मचारीत्यागदे। प्रमाण-याज्ञ स्मृ०अध्याय १-प्रथम --श्लो०-३२॥ ३३॥ ३४ । ३५ । ३६ । ३७३८ । ३९ । ४० । पर्यंत--कथा "नसंशयं प्रपद्येत नाकस्मा दप्रियं वदेत् । नाहितं नानृतं चैव नस्तेनः स्यान्नवा- धुंपी ॥ दाक्षायणी ब्रह्मास्त्री वेणुमान्सकमण्डलुः । कुर्यात्प्रदक्षिणं देवमृगोविप्रवनस्पतीन् ॥ नतुमेहेन्नदी च्छायावहँगोष्टांभस्मसु । नप्रत्यम्यर्कगोसोमसंध्या स्त्रीद्विजन्मनः ॥ नेक्षेतार्क न नग्नां स्त्रीं न च संसृष्टमै- थुनाम् ॥ नच मूत्रं पुरीपे वा नाशुची राहुतारकाः ॥ अयमेवज्रइत्येवं सर्व मंत्रमुदीरयेत् ॥ वर्पत्त्यप्रावृतोग- च्छेत् स्वपेत्प्रत्यशिरा न च॥ष्टीवनासृक्शकृन्मूत्ररेः तांस्यप्सु न निक्षिपेत् । पादौ प्रतापयेन्नानौनचैनमः भिलंघयेत्॥जलं पिवेन्नांजलिना शयानं न प्रबोधयेत् । नाः क्रीडेनधर्मनेाधितर्वा न संविशेत् ॥ विरुद्ध वर्जयेत्कर्म प्रेतधूमं नदीतरम् । केशभस्मतुपांगारकपा- लेपुचसंस्थितिम् । नाचक्षीत धयन्ती गां नाद्वारेण विशेकचित् । न राज्ञः प्रतिगृह्णीयात् लुब्धस्योच्छा- स्त्रवर्तिनः ॥ इति ॥ तिस दिनका शेपभाग वाणीका संयम कर व्यतीत करे फिर सायंकालकी संध्याकर उस अनिमें पूर्ववत् पर्युक्षणादिकर वाणीको त्याग न करे। ब्रह्मचारिको प्रथम संध्या सायकालकी आती है वह- भापाटीकासमेवा। (७५) करे। प्रमाण-या० स्मृ० अ० १] (उपास्य पश्चिमां संध्या हुत्वानीस्तानुपास्यचेति ) परिसमूहनके अंतमें श्रेष्ट काट वा गोमयका अनिमें प्रक्षेप करना । इसप्र- कार साय प्रातः कालकी प्रतिदिन ब्रह्माचारीने संध्या करनी अवश्य है ॥ संध्याके नकरनेका दोप च्यासस्मृतिमें लिखाहे ॥ संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता । जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चैव जायते ॥ तस्मानित्ये प्रकर्तव्यं संध्योपासन मुत्तमम् । तदभावेऽन्यकर्मादावधिकारीभवेन हि ॥ नानुतिष्टति यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् ॥ स शूद्रवहिप्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥ यथा प- शुभारवाही न तस्य भजते फलम् । द्विजस्तथार्थानभि ज्ञो न वेदफलमश्नुते।। इति।।इसलियेबाह्मणक्षत्रियवेश्य ब्रह्मचारिगृहस्थीवानप्रस्थीको संध्या सायप्रातः अवश्य करनी चाहिये । अन्यथा अतिदोषभाग होताहै।। इति श्रीकपूरस्थलनिवासी; गौतमगोत्र शोरि ) अन्वयालं- कृतश्रीदेवज्ञ-दुनिचंद्रात्मज-पंडितविष्णुदत्तकृता भा- पाटीका समाप्ता॥ (इति द्वितीयं प्रकरणम्) अन्य।

(७६) उपनयनपद्धतिः।
ॐस्वस्तिश्रीगणेशायनमः ।
अथ वेदारम्भः।
तृतीयप्रकरणम् ३.
तत्र कृतनित्यक्रियः आचार्यः कुशैहस्तप
रिमिताभूमि परिसमुह्य तान्कुशानेशान्यां
परित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य स्रुव
मूलेन (स्क्येन वा) उत्तरोत्तरतः प्राग
ग्रप्रादेशमात्रं त्रिरुल्लिख्य उल्लेखनक्रमे
णानामिकांगुष्ठाभ्यां मृदमुद्धत्य जलेना
भ्युक्ष्य कांस्यपात्रेणाग्निमादाय स्वाभिम
खंनिदध्यात् ॥ पुष्पचंदनतांबूलवस्त्राण्या
दाय ॥ ॐ अद्यकर्तव्यवेदारंभहोम
कर्मणि कृताऽकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म
कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमे
मिः पुष्पचंदनतांबूलवासोभिर्ब्रह्मत्वे
नत्वामहंणे । इति ब्रह्माणं वृणुयात् ।
ॐ वृतोस्मीति प्रतिवचनम् ॥ ॐ यथा
विहितं कर्म कुर्वित्याचार्यः करवाणीति
तेनोक्त अग्नदक्षिणतः शुन्हमासनं दत्ता

भापाटीकासमेता। (७७)
तदुपरिप्रागग्रान्कुशानास्तीर्य ब्रह्माणम
ग्निप्रदक्षिणक्रमेण भ्रामयित्वा अस्मि
कर्मणित्वमे ब्रह्माभवेत्यभिधाय
भवानीति तेनोक्ते ब्रह्माणमुदङ्मुखंतत्रो
पवेश्य प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा
परिपूर्य कुशैराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमव
लोक्याग्नेरुत्तरतः कुशोपरि निदध्यात् ॥
ततः परिस्तरण चर्हिषश्चतुर्थमागमादा
य आग्नेय्यादीशानांतं ब्रह्मणोऽग्निपर्य
तं नात्याहायव्यांतमग्नितः प्रणीताए
यतं ततोग्नेस्त्तरतः पश्चिमदिशि पवित्र
च्छेदनार्थ कुशवयं पवित्रकरणाथै सा
ग्रमनंतर्गर्भकुशपत्रह यम् । प्रोक्षणीपात्रम् ।
आज्यस्थाली । संमार्जनकुशाः । समिध
स्तिस्रः। युवः आज्यं । पूर्णपात्रं पवित्र
च्छेदनकुशालांपूर्वपूर्वदिशिक्रमेणासादनी
यसाततः पवित्रछेदनकुशै पवित्रेछित्त्वास
पवित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिः प्रोक्षणीपात्रे
निधाय । द्वाभ्यामनामिकांगुष्ठाभ्या

(७८) उपनयनपद्धतिः ।
मुत्तराग्रेपवित्रेगृहीत्वा निरुत्पवनम् ।त.
ताप्रोक्षणीपानं वामहस्ते गृहीत्वा दक्षि-
णहस्तानामिकांगुष्ठाभ्यां त्रिरुदिंगनम्।
ततःप्रणीतोदकेन प्रोक्षणीपात्रमभ्युक्ष्य
प्रोक्षणीजलेनयथासादितवस्तुसेचनक
खा अग्निप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपानं
निध्यात्।। ततआज्यस्थाल्यामाज्य
निरूप्याधिथपणमाततःकुशंप्रज्वाल्या
ज्यस्याग्नेश्वोपरिप्रदक्षिणभ्रामयित्वाअ
गौतत्प्रक्षेपः । ततस्त्रिः खुवप्रतपनं संमा
जनकुशानामग्ररंतरतोमूलैर्बाह्यतः सुवं
संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्यपुनस्त्रिः प्र
तप्य दक्षिणतोनिदध्यातातत आज्यम
निप्रदक्षिणंभ्रामयित्वाऽवतार्यानिदध्या
त्।ततः आज्ये प्रोक्षणीवद्वत्पवनम् अवे
क्ष्य सत्यपद्रव्येतन्निरसनाततः प्रोक्षणी
वडत्पवनम् अवेक्ष्य सत्यपिद्रव्ये तन्निर
सनं ततः प्रोक्षण्युत्पवनम्। तत उत्थायो
पयमनकुशानादाय प्रजापति मनसा

भापाटीकासमेता। (७१) ध्यात्वा तूष्णीमग्नौ वृताकाः समिधस्ति स्त्रः क्षिपेत्। ततउपविश्य सपवित्रप्रोक्ष- ण्युदकेन प्रदक्षिणक्रमेणाग्निं पर्युक्ष्यप्र- णीतापात्रे पवित्रेनिधायब्रह्मणान्वारब्धः पातितदक्षिणजानुःसमिहतमेग्नौजुहुया ततत्र प्रथमाहुतिचतुष्टयेनवावस्थित हुतशेपस्यप्रोक्षणीपात्रेप्रक्षेपः ॥ ॐप्र जापतयेस्वाहा-इदंप्रजापतये । इतिमन सा॥ ॐइंद्रायस्वाहा-इदमिंद्राय इत्या घारौॐअग्नयेस्वाहा । इदमग्नये।ॐसो मायस्वाहा-इदं सोमाय ॥ इत्याज्यमा गौततःप्राकृतोऽनन्वारब्धकर्तृकोहोमः ॥ कृतनित्यक्रिय आचार्य इति अर्थात् नित्यनियाजो प्रतिदिनकर्तव्य संध्योपासनादि वह जिसने किये हे ऐसा आचार्य शिष्यको वेदारंभ अर्थात् वेदका अ- ध्ययन करवावे । नित्य कर्मोंमें प्रमाण यथा पाराशरी धर्मस्मृति अध्यायः॥संध्या स्नानं जपो होमो देवताना ञ्चार्चनम् । स्वाध्यायं वैश्वदेवं च पद कर्माणि दिने- दिने ॥ भर्थ-संध्या स्नान १ जपरहोम ३ देवपूजा स्वाध्याय बेदका प्रतिदिन अभ्यास वैश्वदेववलियह

(८०) उपनयनपद्धतिः।
पट्कर्म प्रति दिन कर्तव्यहै ॥ और कुशकंडिकाका
अर्थ प्रथम लिख चुके हैं इसलिये फिर पिएपेपण नहीं
करते और जो विशेप, वह लिखतेहैं। ब्रह्माकी वर्णीके
संकल्पमें इस स्थान (वेदारंभहोमकर्मणि ) यह ( पद
कहना ॥ अधार आहुति वेदिके वायव्य (वायु ) को
णसे अग्निकोणपर्यंत त्रुबसे आहुति पाणि इसको
आधार कहतेहैं । और आज्यभाग नैर्ऋतवेदिके को-
णसे ईशानकोणपर्यंत त्रुवसे घृतकी आहुतिको आज्य
भाग कहते हैं । इनके अनंतर विना अन्वारब्धके होम
करना चाहिये छंदोभ्यः स्वाहेति और कुशकंडिका
सर्वत्र एकसी होती है इसमेंप्रमाण गृह्यसूत्र प्रथम कां-
डमें (एपएव विधियंत्र क्वचिद्धोमः) अर्थ-यहां कहां
होम हो वहां यही विधि जाननी॥
ॐअंतरिक्षायस्वाहा-इदमन्तरिक्षाय॥
ॐवाय स्वाहा-इंदं वायवे । ॐब्रह्मणे
स्वाहा-इदंब्रह्मणे ।
ॐ छंदोभ्यः
स्वाहा इदंछंदोभ्यः ॥ एताः सामा
न्याहुतयः ॥ ॐ प्रजापतयेस्वा-
हा-इदंप्रजापतये॥इतिमनसा । ॐ देवे-
भ्यः स्वाहा ।इदंदेवेभ्यः। ॐ नपिभ्यः

भापाटीकासमेता। (८३) स्वाहा-इदंऋपिभ्यः ॐ श्रद्धायै स्वाहा इंदंश्रद्धायै। ॐ मेधायस्वाहा-इदंमे धायै । ॐसदसस्पतयेस्वाहा-इदंसदस- स्पतये । ॐअनुमतयेस्वाहा-इदमनुस- तये ॥ ततोऽन्वारब्धकर्तृको होमः ॥ तत्तदाहुत्यनंतरं सुवावस्थितहतशेपस्य प्रोक्षणीपात्रेप्रक्षेपाऊथः स्वाहा-इदम नये ॐभुवः स्वाहा-इदंवायचे ॐ स्वः स्वाहा-इदंसूर्याय ॥ एतामहाव्याहृत- यः॥यजुः०अ० २१ मंत्र-३ ॥ ॐ वन्नों अग्लेवरुणस्य विद्वानदेवस्यहेडो अब यासिसीष्ठा । यजिष्ठोवह्नितमऽ शोशुचानौविश्वाषांसिप्रमुग्ध्युस्म स्वाहा-इदमनीवरुणाभ्यास ॥ १अंतरिक्ष (आकाश)२ वायु ३ब्रह्म छन्द (वेद)४ ऋग् यजु सामाथर्वण ॥ यह सामान्य आहुति, ॐ प्र- जापतये यह मनसे कहना ॥ और देव ऋपि-श्रद्धा मेधा (धारणावती बुद्धि ) सदसस्पति अनुमति यह आहुति विना अन्वारब्धके हवन करना ॥ भूः इसका

(८२) उपनयनपद्धतिः।.
अग्नि, अधिष्ठातृदेवता । भुवका वायु । स्वःका सूर्य
देवता हैं । त्वन्नो अग्ने इस मंत्रके साथ विनियोगके अर्थ
पीछे लिखाहै इसलिये कुशकंडिकाके मंत्र सत्वन्न इममे
वरुण तत्त्वायामि येतेशर्त अयाश्चाग्ने उदुत्तमं भवतन्नः।।
इनकाभी अर्थ पूर्वोक्त जानना ॥
ॐसत्वनौ अग्नेयमोभवोतीनेदिष्टोऽअ
स्याऽउपसोव्युष्टौौअवयक्ष्वनीवरुणु
ररांणोबीहिमृडीक महवा नएधिस्वा
हाइमनीवरुणाभ्याम्॥ ॐअयाश्चाग्ने
स्यनभिशस्तिपाश्चसत्यमित्वमयाअसि।
अयानोयज्ञवहास्ययानोधेहिमेषजय
स्वाहा इदमग्नये॥ॐयेतेशतंवरुणयेसहस्रंय
ज्ञियाः पाशाविततामहान्त तेभिनोंअ
घुसवितोतविष्णुर्विश्वेमुंचन्तुमस्तूःस्व
कीः स्वाहा ॥इदंवरुणायसवित्रेविष्णवे
विश्वेभ्योदेवेभ्योमरुदयःस्वभ्यश्च०॥
ॐउद्दुत्तमवंरुणुपार्शमस्मदवाधर्मविम
ध्यमध्थाय । अर्थाव्वयमादित्यत्र
६ यह मंत्र यनु० भ०२ मंत्र १२ है।

भापाटीकासमेवा। (८३) तेक्वानगिसोऽअदितस्यामस्वाहा ।। इदंवरुणाय०॥इतिसर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः ॥ ॐ प्रजापतयेस्वाहा-इदंप्रजापतये। इंतिमनसाइतिप्राजापत्यम्।। ॐअग्नये स्विष्टकृतेस्वाहा।इदमग्नयेस्विष्टकृते०॥ इविस्विष्टकहोमततःसंखवप्राशनम्।। ततआचम्यॐअधकृतैतवेदारंभहोमक मणिकृताऽकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रति वार्थमिदंपूर्णपात्रं प्रजापतिदैवत्यममुक गोत्रायामुकशर्मगेब्राह्मणायब्रह्मणेतुभ्य. महंसंप्रददे ॥ इति दक्षिणांदद्यात् ॥ स्वस्तीतिप्रतिवचनम् ॥ संत्रवप्राशन ( अर्थात् बुवसे च्युत घृतका प्राश- न जो प्रोक्षणीपात्रमें प्रक्षिप्तहै ) ब्रह्माकी दक्षिणाके संकल्पमें (वेदारंभहोमकर्मणि) यह विशेप है। और पूर्वववहे । स्वस्तिहो यह ब्रह्माजी कहे ॥ ततोब्रह्मग्रंथिविमोकः ॥ ॐ सुमिनिया न आपओषधयः सन्तु । इतिपवित्राभ्यां

(८४) उपनयनपद्धतिः ।
प्रणीताजलमानीयतेनशिरः समृज्य ॐ
दुर्मित्रियास्तस्मसंतुयोऽस्मान्डेष्टि यंचव
यद्विष्मः ॥ इतिमंत्रणऐशान्यां प्रणीतांन्यु
ब्जीकुर्यात् । ततस्तरणक्रमेणवर्हिः आनी.
यवृतेनाभिधार्य क्रमेण. हस्तेनैवजुहुयात
ॐदेवामातुविदोगातुंबिवागातु सितम
नसस्पतइमदेवयज्ञश्स्वाहावातेधाः स्वा-
हा ॥ इतिवहिौंमः ॥ ततः काश्मीरग
मनम्। तत इष्टांशकवेदारंभ गुरुः कार
येत् ॥ तत्रक्रमः॥ ॐभूर्भुवः स्वः। तत्सवि
तुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्यधीमहि । धियोयोनः
प्रचोदयात् ॥ ॐइतिप्रणवांतपठित्वा ॥
पंक्तिनमस्कारंचकारयित्वा ॥ ॐस
मिधानिंदुवस्यतघृतबोधयतातिथिम्
अस्मिनहव्याजुहोतन ॥ सुसमिद्धाय
शोचिषततीव्रजुहोतन । इतिकंडिकांतर
वा फकिकांतरं वा पाठयेत् ॥
ब्रह्मग्रंथिविमोक वहांहे यहां साक्षात् वेदकर्मप्रवीणश्री
त्रिय ब्राह्मण नहो वहांकुशाका ब्रह्मा बनाकर उसमें ब्रह्मा

भापाटीकासमेता।
(८५)
जीका आवाहनध्यान करना उस स्थान कुशाके ब्रह्मा
कीथिका मोचन करना (यथा-प्रमाण-पंचाशता भवेत
ब्रह्मा) अर्थात् ब्राह्मणके अभावमें पचासकुशोंका ब्रह्मा
बनाना । वेदारंभ प्रथम ओंकार सप्तव्याहति पूर्वक गाय
त्रीमंत्र पढ समिधाग्निं-इपेत्वोर्जेवा-अग्निमीळे पुरोहित
शनोदेवी इत्यादि कण्डिकापर्यंत वा फकिकापर्यंत
प्रथम पढ पीछेले चार वेद वा एक वेद अपनीशाखा
अवश्य पढे॥ प्रमाण याज्ञः स्मृतिः अध्याय-3-
(उपनीय गुरुः शिष्यं महाव्यातिपूर्वकम् । वेदमध्याप
येदेनं शौचाचारांश्च शिक्षयेत् ॥ ) अर्थ-गुरु शिष्यको
यज्ञोपवीतधारणकरवाय महाव्याहृतिपूर्वक वेद पढा
वे और शौच (पवित्रता ) अचारकी शिक्षा करे।
ततः सप्रणवं स्वस्ति वाचयिताउत्था
य फलपुष्पसमन्वितत्राचारिदक्षिणकर
स्पृष्टेन वृतपूर्णेन पूर्णाहुतिं दद्यात् ।
मृडानं दिवोऽअरतिं पृथिव्यावैश्वानर
मृतऽआजातमग्निम्। कविसम्राजमति
थिंजनानामासन्नापात्रंजनयंतदेवाः। इति
पूर्णाहुतिः ॥ ततः उपविश्य सुवेणभस्मा
नीय दक्षिणानामिकाग्रगृहीतभस्मना

(८६) उपनयनपतिः। त्र्यायुषं जमदग्नेरिति ललाटे । कश्य पस्यत्र्यायुपं इतिग्रीवायाम् । ॐयद्देवेषु त्र्यायुषं इति दक्षिणवाहुमूले ॥ ॐतन्नो अस्तुत्र्यायुषं इतिहदि।अनेनैव क्रमण ब्रह्मचारिललाटादावपि तत्र तत्तेः इति विशेषः ॥ इतिवेदारंभः॥ *स्वस्ति यह कहवाकर ब्रह्मचारिके दक्षिणहस्त का स्पर्शपूर्वक आचार्य पूर्णाहुति देवे ( पूर्णाहुतिमुत्त- मांजुहोति ) इस श्रुति प्रमाणसे ॥ और मूनिंदिवः ।। व्यायुपं जमदग्ने इत्यादिके पीछे कुशकंडिकामें अति विस्तारसे अर्थ लिखाहै वहांसें समझना चाहिये ॥ विस्तारके भयसे वारंवार नहीं लिखते ॥ . इति श्रीकपूरस्थलनिवासिगौतमगोत्र (शोरी ) अन्व यालंकृतदैवज्ञदुनिचंद्रात्मजश्रीयुत पण्डित-विप्पादत्त- कृता वेदारंभटीका समाता ॥ शुभमस्तु ॥ (इति तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ) Amitab आपाटीकासमेता। (८७) (अथ चतुर्थप्रकरणं प्रारभ्यते), अथसमावर्तनम् ॥ तत्रशुभेदिने प्रही भूय आचार्य स्नास्यामीति कुमार आ चार्य भाषते तत्रस्नाहीत्याचार्यः ततो ब्रह्मचारिणि आचार्यसन्निहितदक्षिण दिशि उपविष्टे कृतस्नानादिराचार्यः॥ वेदारंभके अनंतर समावर्तनसंस्कार लिखते हैं । तत्रेति ॥ समावर्तनसंस्कार उसको कहा जाताहै कि जो वेदोंको और ब्रह्मचर्यको संपूर्ण पीछसे गुरुजीकी आज्ञाकर गृहस्थ आश्रममें आनेके लिये जो स्नान कियाजाय ॥ इस लिये ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथ- वण वेदके पढनेकी और ब्रह्मचर्य धारणकी अवधि कहतेहैं कि जैसे-गृह्यसूत्र पारस्कर कांड--२-अष्टच- त्वारिंशद्वर्षाणि वेदब्रह्मचर्य चरेत् द्वादश द्वादश वा प्रतिवेदं यावद्हणंवेति । अर्थ-अठतालीस. १८ वर्ष वेद और ब्रह्मचर्यको आचरण करे वा एक वेद प्रति द्वादश १२ वर्ष ब्रह्मचर्य धारण करे वा ग्रहणांतिक अर्थात् जबतक वेद पढाजाय उतना चिर ब्रह्मचर्य धारण करे ॥ और मनुजी भी लिखतेहैं । मनुः-पत्रिं शदाब्दिकं चयं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् । तदर्दिकं पादिकं वा ग्रहणांतिकमेववा--इति ॥ तथा याज्ञवल्क्यस्मृति (८८.) उपनयनपद्धतिः। अध्याय १ प्रथम स्मृति यथा-प्रतिवेदः ब्रह्मचर्य द्वादशाव्दानि पंच वा। ग्रहणांतिकमित्येके केशांतश्चैव पोडशे॥ अर्थ- एकवेद प्रति द्वादश १२ वर्प ब्रह्मचर्य करे वा पंच वा ग्रहणांतिक अर्थात् जबतक वेदकी समाप्ति नहोऔर स्नातक तीन प्रकारके होतेहैं एक विद्यास्नातक द्वितीय (दूसरे ) व्रतस्नातक तृतीय (तीसरे) विद्यावतस्नातक ॥ विद्यास्नातक वह होता है जो वेदोंको पढ शीघ्र तीक्ष्ण बुद्धिद्वारा ब्रह्मचर्यको न पूरण कर जो स्नान करे अर्थात् समावर्तन संस्कार कर गृहस्थाश्रममें प्राप्त होजावे।। व्रतस्नातक वह है जो केवल व्रत (ब्रह्मचर्य ही) पूरणकर स्नान करे और वेदकी समाप्ति नाकरे। विद्याव्रतस्नातक वह है जो वेद और ब्रह्म- चर्यको समाप्त कर स्नानकरे-प्रमाण-गृह्यसूत्र पारस्कर २-कांडमें-त्रयः स्नातका भवति । विद्यास्नातको तस्रातको विद्यावतस्तातक इति । समाप्य वेदमसमाप्य तं यः समावर्तते स विद्यास्नातकः समाप्य व्रतमसमाप्य दं समावर्तते स व्रतनातक उभय ५ समाप्य यः समावर्तते स विद्यावतस्नातक इति ॥ ॥ यदि समग्र चार वेद नापढे जांय तो अपनी शाखाका वेद पढे यदि वह भी पढा ना जा तो संहिता मात्र पढे। यदि इसमें भी असमर्थ होतो संस्कार संध्या अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय भापाटीकासमेता। (८.) वैश्यको जो अवश्य कर्तव्य है वह तो यत्नसे पढना चाहिये। यह गीण पक्ष है। (तति) वेदादि पढ शुभ- दिनमें (प्रही भूय-) हे गुरो में स्नान करों भो शिष्य स्नानकर इस वाक्यके अनंतर आचार्यकी दक्षिणकोणमें स्थित हो स्नान करे। प्रमाण-याज्ञवल्क्यस्मृति अध्याय १ प्रथम-(गुरवे तु वरं दत्त्वा स्नायीत तदनुज्ञया । वेद अतानि वा पारं नीत्वा झुभयमेव वा ) इति ॥ कुरोहस्तभावां भूमि परिसमुह्य तानशा न्यां परित्यज्यगोमयोदकनोपलिप्यस वमूलेन स्पत्येन वोत्तरोत्तरक्रमेण विरु ल्लिख्य उल्लेखनकमेणोद्धृत्य जलेनाभ्यु क्ष्य कांस्येनाग्निमानीयप्रत्यङ्मुखं निद ध्यात् । ततःपुष्पचंदनतांबूलवासांस्या दाय ॐ अद्यामुकस्य कर्तव्यसमावर्त नहोमकर्मणि कृताऽकृतावेक्षणरूपब्रह्म कर्मकर्तुममुकगोत्रममुकशाणंब्राह्मण मेभिः पुष्पचंदनतांबूलवासोभिः ब्रह्मले नत्वामहं वृणोत्तोस्मीतिप्रतिवचनम्॥ यथाविहितं कर्मकुर्वित्याधाय । ॐ

(९०) उपनयनपद्धतिः।
करवाणीतितेनोक्ते अग्नेर्दक्षिणतः शुद्ध
मासनं दत्त्वा तदुपरि प्रागग्रान्. कुशा
नास्तीय अस्मिन्कर्मणि त्वं मे ब्रह्माभ
वेत्यभिधाय ॐ भवानीति तेनोक्ते
ब्रह्माणमुदङ्मुखं तत्रोपवेश्यततः प्रणी.
तापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य
कुशैराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्याड
ग्नेरुत्तरतः कुशोपरि निदध्यात् ॥
कुशकंडिकाका अर्थ पूर्व लिखाहै ॥ ब्रह्माकी वर्णीमें
(अस्य कुमारस्य समावर्तनहोमकर्मणि ) यह कहना ॥
प्रणीतापात्रका लक्षण लिखतेहैं । वरण वृक्षका द्वादश
(१२) अंगुल दीर्घ और चार अंगुल विस्तारमें खोदा
हुआ प्रणीतापात्र होता है।
ततः परिस्तरणम् । वर्हिषश्चतुर्थभागमा
दायाग्नेयादीशानांतंब्रह्मणोऽग्निपर्यन्त नै
त्याहायव्यांतं अग्नितः प्रणीतापर्यंत
ततोऽनेरुत्तरतः पश्चिमदिशिपवित्रच्छे
“दनार्थं कुशत्रयम्।पवित्रकरणार्थसाग्र
मनन्तर्गर्भकुशपत्रदयं प्रोक्षणीपात्रमाज्य

.
भापाटीकासमंता। (९१).
स्थालीसंमार्जनार्थ कुशाः उपयमन
कुशाः समिधस्तिस्रः सुवःआज्यं पूर्व
पूर्वदिशिक्रमेणासादनीयमा ततःपवित्र
च्छेदनकुशैः पवित्रेछित्त्वासपवित्रकरण
प्रणीतोदकंत्रिः प्रोक्षणीपात्रेनिधायाना
मिकांगुष्ठाभ्यां पवित्रे गृहीत्वात्रिरुत्पूय
प्रोक्षणीपात्रंवामकरेणादायाऽनामिका
गुष्टगृहीतपवित्राभ्यांतज्जलं किंचित्रिः
प्रक्षिप्य प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीमभ्युक्ष्य
प्रोक्षणीजलेनयथासादितवस्तून्यभिपि
च्याग्निप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रंनिद
ध्यात् ॥ ततआज्यस्थाल्यामाज्यनि
पिः॥ अधिश्रपणम्॥ततस्तुणं प्रज्ञा
ल्याज्यस्याग्नेश्वोपरि प्रदक्षिणं भ्राम,
यित्वा वह्नौ तत्प्रक्षिप्यसुवं त्रिः प्रतप्य
संमार्जनकुशानामग्रैरंतरतोमूलैर्वाह्यतः
सुवं संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनः
प्रतप्य स्वस्य दक्षिणतो निदध्यात् ।
तत आज्यमग्नि प्रदक्षिणं भ्रामयित्वाऽ

'(९२) उपनयनपद्धतिः।
वतार्यत्रि-प्रोक्षणीवदुत्पूयावेक्ष्य सत्यप
द्रव्ये तन्निरसनं कृत्वापुनः पूर्ववत्प्रोक्षण्यु
त्पवनं ततउत्थायोपयमनकुशान् वाम
हस्ते कृत्वा प्रजापति मनसा. ध्यात्वा
तूष्णीमनौ वृताक्ताः समिधस्तिस्रःक्षिपे
त्। तत उपविश्यसपवित्रप्रोक्षण्युदकेन
प्रदक्षिणक्रमेणाग्निंपर्युक्ष्यप्रणीतापात्रेनि
धाय पातितदक्षिणजानुः समिद्धतमेऽ
नौब्रह्मणान्वारब्धः सुवेणाज्याहुतीर्जुहु
यात्। तत्रप्रथमाहुतिचतुष्टये प्रत्याहुत्य
नन्तरं खवावस्थितहुतशेषस्यप्रोक्षणीपा
वे प्रक्षेपः। ॐ प्रजापतये स्वाहा-इदंप्र
जापतये इतिमनसा। ॐ इंद्रायस्वाहा
इदमिंद्राय इत्याघारौ। ॐअग्नयेस्वाहा
इदमग्नये॥ॐ सोमायस्वाहा-इदंसोमा
यः॥इत्याज्यभागो।ततोऽन्वारब्धकर्त
कहोमः॥ॐअंतरिक्षायस्वाहा । इदमंत
रिक्षाय० ॥ ॐवायवेस्वाहा-इदंवायवेक
ॐ ब्रह्मणेस्वाहा-इदंब्रह्मणे । ॐ छंदो

भापाटीकासमेता भ्यः स्वाहा-इदंछंदोभ्यः०॥ ॐ प्रजाप- तयेस्वाहा-इदंप्रजापतये इतिमनसा॥ ॐदेवेभ्यः स्वाहा इदंदेवेभ्यः ॥ ॐन- विभ्यः स्वाहा-इदुमृषिभ्यः०॥ ॐश्रद्धा यैस्वाहा इदंश्रद्धायैः ॥ॐमेधायैस्वाहा इदंमेधायै ॥ ॐ सदसस्पतयेस्वाहा- इदंसदसस्पतये०॥ ॐअनुमतयेस्वाहा इदमनुमतये ॥ ततोब्रह्मणान्वारब्धो जुहुयात् ॥ अनाहुतिदशतयैतत्तदाहु त्यनंतरंखवावस्थिताज्यस्यग्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः॥ॐ भूः स्वाहा इदमग्नये०॥ ॐ भुवः स्वाहा-इदं वायवे०। ॐस्वःस्वा हा-इदंसूर्याय० ॥ एतामहाव्याहृतयः॥ (१)प्रोक्षणीपात्रका लक्षण देवलोक्त लिखतेहैं। यथा-प्रणीतानैर्ऋते भागे तवायव्यगोचरे । वारणं संविजानीयात्सर्वकर्मसुकारयेत् ॥ सर्वसंशोधनार्थोद पात्र वारणमिप्यते । द्वादशाङ्गुलिदीर्घ च करतलो न्मितखातकम्।पद्मपत्रसमाकारं मुकुलाकारमेववा। इति (२) आज्यस्थालीका लक्षण यथाव्यासस्मृतौ- तैजसीमृन्मयीवापि ह्याज्यस्थाली प्रकीर्तिता द्वादशी (९४) उपनयनपद्धतिः। गुलविस्तीर्णा प्रादेशोचाप्रमाणतः) अर्थ-तैजस अर्थात् कांस्यरजतआदिधातुकी बनीहुई वा मृत्तिकासे वनी- हुई द्वादश १२-अगुली विस्तृत और प्रादेशमात्र ऊँची आज्यस्थाली होतीहै । ( ३ ) चरुस्थालीका लक्षण यथा-चरुस्थाली तथैवापि दीर्वोच्चा तु प्रमाणतः नानयोरन्तरंयस्माद्रव्य संस्करणार्थका इति ॥ अर्थ ॥ आज्यस्थालीवत् चरु- स्थालीमी प्रमाणसे दीर्घ और ऊँची होतीहै इनका भेद कुछ नहीं जिस लिये यह द्रव्य संस्कारके वास्ते है (४) संमार्जनकुशामें प्रमाण- सुवसंमार्जनार्थं तु कुशत्रयमुदीरितम् । इति व्यासस्मृतौ ।। (५) उपयमन कुशामें प्रमाण यथा-उपयमनार्थ- माख्यातास्त्रिपण्नवमिताः कुशाः। वेणीरूपानिरोधार्थी निरोधे बहुभिः सुखम् ॥ इति भृगुवचनम्॥अर्थ-उपय- मनके लिये त्रि ३ पट् ६ नव ९ परिमित कुशा वेणी- रूपनिरोधके लिये कहीहै ॥ (६)समिधस्तिस्रः-प्रमाण. पराशरस्मृतौ-पाला- शजं प्रादेशमानं दैर्येण स्थूलता । कनिष्ठिकासमंध्या स्वाविधिमनौ क्षिपञ्चतत् ॥ अर्थ-पलाशकी प्रादेश मात्र कनिष्टिका समस्थूल ब्रह्माजीका ध्यानकर अग्निमें क्षेपकरे॥

भापाटीकासमेता।
(९५)
ॐ त्वन्ना अग्नु वरुणस्य :विद्वान देवस्य
हेडोऽअर्व यासिसीष्ठा । यजिष्टो वह्नि
तमुन्शोशुचानो विश्वाद्वेषां सिप्रमु
मुग्ध्यस्मत्स्वाहा। इदमनीवरुणाभ्याम्
(१) सत्वन्नो अग्ने वमो भवोतीनेदि
ष्टोऽअस्या उषसो व्युष्टौ । अव यक्ष्वनो
वसणु ५ राणोव्वीहि मुंडीक "सुहवीं
नएधि स्वाहा ॥ इदमनीवरुणाभ्यां ॐ
अयाश्चाग्नेस्यनभिशस्तिपाश्चसत्व मित्व
मया असि। अयानो यज्ञवहास्य या
नोधेहि भेपज स्वाहा । इदमग्नये ॥ ॐ
येते शतं वरुणयेसहस्रंयज्ञियाः पाशा वि
ततामहांतः। तेभिनों अद्यसवितोत वि-
ष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतः स्वाः स्वाहा।
इद वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो
मरुझ्यः स्वकेंभ्यश्च ॥ ॐउर्दूत्तम वरुण
पाशमुस्मदांधमुविम ध्युम ५ श्रेथायाँ

उपनयनपद्धतिः। अथांबुयमादित्यव्रतेववानागमोऽअदि तयेस्यामस्वाहा । इदंवरुणाय० ॥ इति सर्वप्रायश्चित्तम्॥ त्वन्नो अग्ने यहमंत्र शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २१ मंत्र ३ है।और सत्वन्नो अग्ने यह मंत्र शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २१ मंत्र है। अयाश्चाग्ने यह मंत्र शुक्लयजुर्वेद अध्याय मंत्र है. येतेशतं यह मंत्र शुक यजुर्वेद अध्याय. मंत्र. है उदुत्तमं वरुण यहमंत्र शुक्ल यजुर्वेद अध्याय १२ मंत्र १२ है यह सर्वप्रायश्चित्त निवृत्तिमें आहुति हैं। ॐप्रजापतये स्वाहापइदं प्रजापतये। इतिमनसा इतिप्राजापत्यम् । ॐअग्नये स्विष्टकृतेस्वाहा-इदमग्नयेस्विष्टकृते। इति स्विष्टकृत्॥ततः संस्रवप्राशनम् । तत आचम्य॥ ॐ अद्य कृतैतत्समाव- तनहोमकर्मणि कृताऽकृतावेक्षणरूप- ब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदंपूर्णपात्रं प्रजाप तिदैवत्यममुकगोत्रायामुकर्मणे ब्राह्म णाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे॥ १ यजु० अध्याय २१ मंत्र ३ ।

"
+
भापाटीकासमेता। (१७)
इति दक्षिणां दद्याताॐस्वस्तीति प्रति
वचनम्॥ ततो ब्रह्मग्रंथिविमोकः। ततः
पवित्राभ्यां प्रणीताजलेन ॐ सुमित्रि
यानऽआप ओषधयः सन्तु ॥इतिमंत्रण
शिरः संमृज्य ॥ ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै
संतुयोऽस्मान्दृष्टि यं च वयं द्विष्मः ॥
इतिमंत्रेणैशान्यांप्रणीतान्युजीकरणम्।।
(७) सुव वा ब्रह्महस्तका लक्षण. यथा-कात्या-
यनः-सुवस्तु ब्रह्महस्ताख्यः स्कंधांतो बाहुरुच्यते ॥
स्वाहाकारस्वधाकाखपट्कारसमन्वितः ॥ दण्डाकारो
भवेन्मूले स्यादरत्न्यां तु तत्समः। सकङ्कणस्तु दण्डाये.
हस्ताकारस्ततो बहिः ॥ अष्टांगुलीपरीमाणं तन्मूला-
भ्यंतरेत्यजेत् ॥ दशांगुलीपरीमाणं तन्मूलाभ्यंतरे
त्यजेत् ॥ दशांगुलीपरीमाणमारभ्यकङ्कणावधि ।
हस्तमात्रं भवेदस्ताव इत्यभिधीयते ॥ खादिरः
शैशिपोवापि ह्यन्यो वा पुण्यवृक्षजः । धावकोपि समा
ख्यातो होमार्थ मुनिभिः कृतः । इति ॥
(८) घृतलक्षणम्-तथाच स्मृतिः-गव्यमाज्यंजु-
हुयात्तदभावे माहिपं स्मृतम् ॥ तथा च श्रुतिः ॥
गव्यमाज्यं जुहुयात्तदभावेमाहिपेयमिति ॥
។

(९८) उपनयनपद्धतिः। (९) चरुलक्षणम्-वीहितण्डुलसंसिद्धो मुख्यः प्रोक्तः सुरभित्यिाचारचंद्रोदये ॥ . (१०) पर्यग्निलक्षणम् । तथाच श्रुतिः-पर्यग्निं कुर्वन् ज्वलदुल्मुकमादाय प्रदक्षिणमाज्यचर्वोः समं- ताद भ्रामयेत् ॥ इति ॥ (११) समिधोलक्षणम् (यथा-पलाशखदिराश्वत्थ- शम्युदंबरजा समित् । अपामार्गाकदूर्वाश्च कुशाश्चेत्य- परे विदुः।सत्वचःसमिधःस्थाप्य ऋजुलक्षणाःसमास्त- था। शस्ता दशाङ्गलास्तास्तु द्वादशांगुलिकास्तु ताः ॥ आः पक्कासमच्छेदास्तर्जन्यंगुलिवर्तुलाः । अपाटि- ताश्च विशिखाः कृमिदोपविवर्जिताः । ईदृशीहोमये- त्पाज्ञः प्राप्नोति विपुलां श्रियम्)। इतिव्यासकात्याय, नगौतमभरद्वाजाः ॥ अर्थ-पलाश (पलाह) खदिर ( खैर ) अश्वत्थ (पिप्पल )शमी ( जंढी ) उदुबर (गृलर) अपामार्ग (फुटकंडा ) दूर्वा (घास) कुशा इनकी समिधा त्वचायुक्त १० दश अंगुलीकी वा १२ द्वादश अंगुलीकी श्रेष्ठ सीधी आर्द (गिल्ली) पक्कतर्ज नीकीवत् वर्तुल ( गोल ) फटीहुई नहो कृमिदोपसे रहित ऐसी समिधा हवन करनेसे विपुल लक्ष्मीको . प्राप्त होताहै ॥ ततस्तरणक्रमेणवर्हिरानीय घृतेनाभि-

.
भापाटीकासमेता। (९९)
घार्यहस्तेनैव जुहुयात् । ॐ देवांगातु
विदोगातुवित्वागातुमित मनंसस्पतऽ
इमदेवयज्ञ स्वाहाब्बातेधात्स्वाहा ॥
इति वहिहोमः । ततोब्रह्मणान्वारब्धक
र्तृकं कर्म । ततोग्निपश्चिमोपविष्टोब्रह्म
चारीपरिसमूहनंकुर्यात् । तत्रघृताक्तशु
ष्कनिषिदेतरेन्धनेन पंचाहुतीर्हस्तेनैव
जुहुयात् ॥ ॐ अग्नेसुश्रवःसुश्रवसंकुरु
ॐयथात्वमग्नेसुश्रवः सुश्रवाअसि ॐ
एवंमांसुश्रवः सौश्रवसंकुरु।यथात्वम
नेदेवानांयज्ञस्यनिधिताअसि। ॐएवम
हमनुष्याणांवेदस्यनिधिपोभूयासम् ।
ततःप्रदक्षिणमग्निं वारिणापर्युक्ष्य उत्था
यताक्तांप्रादेशमितसमिधमादायजुहु
यात्।तत्रमंत्रः ॐअग्नयेसमिधमाहा
वृहतेजातवेदसोयथात्वमग्नेसमिधासमि.
ध्यसू एवमहमायुपामेध्यावर्चसाप्रजया
पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनसमिधेजीवपुत्रोममा
(१) यहमत्र यजु० अध्याय ८ मत्र २१ मे है।

he (१००) उपनयनपद्धतिः। चार्योंमेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यश स्वीतेजस्वी ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भूयास स्वाहा॥ततःसमिदंतरहयमनेनैवक्रमेण प्रत्येकं हुवा॥ (मंत्रार्थ अग्नेसुश्रव इति ) सुश्रव शोभन नामयुक्त अग्निदेव मुझको सुश्रव श्रेष्ठ कर्णोंवाला करो । जैसे तुम सुश्रवहे तद्वत् सुंदर श्रवणसे उत्पन्नज्ञानशाली करो। हे भाण्डागारिके गृहमेधी अग्ने जैसे तुम यज्ञसंबंध- इन्द्रादिदेवताओंके निधिप रक्षकहो इसीप्रकार मनुष्योंका और वेदोंका रक्षक होऊँ ॥ इति ॥ (मत्रार्थ-अग्नयोहे अग्ने ! मैं समिधाको ग्रहणकरताहूँ अतिशयसे प्रकाशमान तुम्हारेलिये । हेअग्ने ! जैसे तुम मुझकर दीहुई समिधासे वृद्धिको प्राप्तहोतेहो । इसी प्रकार मैं (आयु ) चिरजीवन ( मेधा) धारणा शक्ति वाली बुद्धि (वर्चस) तेज (प्रजया) पुत्रादिसे ( प- शुभिः) गवादिकोंसे ( ब्रह्मवर्चसेन) ब्रह्मतेजसे वृ- द्धिको प्राप्तहोऊँ । और मेरा गुरु जीवनपुत्रवुद्धियु- तहोवे ॥ और मैं नित्ययज्ञके करनेवाला वेदाध्ययन शील तेज यश युक्त अनके देनेवाला और भोगनेवा लाहोऊँ । अर्थात् अन्नादिका वियोग हमको कभी न हो इस कामनासे दीहुई आहुति अनिके लिये स्वर्गत हों।

भापाटीकासमेता। (१०१) उपविश्यतेनैवक्रमेणपंचाहुतीर्घताक्तशु कनिपिढेतरेंधनेनजुहुयात् ॥ॐअग्नेसु श्रवः सुश्रवसंमाकुरु। ॐयथात्वमग्नेसुश्र वासिएवंमांसुश्रवः सौश्रवसंकुरुायथा त्वमग्नेदेवानांयज्ञस्यनिधिपाअसिॐएव महंमनुष्याणां वेदस्यनिधिपोभूयासम्॥ ततः प्रदक्षिणमग्निवारिणापर्युक्ष्य तूष्णी पाणीप्रतप्य मुखंप्रतिमंत्रांतरेऽवमृशति। ॐतनूपा अग्नेसितन्वंमेपाहि।ॐआयुर्दा अग्नेस्यायुम्भैदेहि॥ ॐवोंदाअग्नेवोंमे देहि।ॐअग्नेयन्मेतन्वाऽऊनंतन्मऽआपण ॐमेधांमेदेवः सविताआदधातु। ॐमे धांमेदेवीसरस्वतीआदधातु ॥ ॐमेधांमे अश्विनौदेवावाधत्तांपुष्करस्रजोतत्रस र्वगात्रादिषुदक्षिणपाणिनास्पर्शः। तत्रा त्येकमंत्रः ॥ ॐअंगानि चमआप्यायतां इतिसर्वगात्रालम्भने ॥ ॐवाक्चमआ- प्यायताम् । इतिमुखालंभने॥ ॐप्राणश्च

मआप्यायताम् ॥ इतिनासिकयोः॥ॐ
चक्षुश्चमआप्यायताम्॥ इतिचक्षुईयस्प
ॐश्रोत्रं च म आप्यायताम्। इति
श्रोत्रदयस्पर्शः ॐ यशोबलंचमआप्या
यताम् । इतिमंत्रपाठमात्रम् ॥
अग्नेसुश्रवःसुश्रवसंमाकुरु इत्यादि । तनृपा अग्नेसि
इत्यादि । मेधांमदेवः सविता आदधातु इत्यादि। अं;
गानि च म आप्यायतामित्यादि मंत्रोंकेअर्थ पीछे लि
खेहैं इसलिये इस स्थान में नहीं लिखे ॥
ततोदक्षिणानामिकाग्रगृहीतभस्मनाच्या
युपं कुर्यात् ॥ ॐत्र्यायुषंजमदग्नेः । इति
ललाटेॐकश्यपस्यत्र्यायुषम्। इतिग्री
वायामाऊँयद्देवेषुत्र्यायुषमिति दक्षिणवा
हुमूले ॥ॐतन्नोऽस्तुन्यायुपमितिहदि ॥
ततोव्यस्तपाणिभ्यां पृथिवीस्पृशनप्रथ
मवैश्वानरंसंवोध्याभिवादयेत्॥ तत्रामु
कगोनोऽहममुकप्रवरोहममुकशर्माहंभो
वैश्वानरत्रामभिवादये। तथैवाचार्यचा
भिवादयेत्॥ततआयुष्मान्भव सौम्यइ

-
भापाटीकासमता।
(१०३)
त्याचार्योब्रूयात्।ततोऽग्नेरुत्तरतः प्राग
ग्रान्कुशानास्तीर्यतदुपरिदक्षिणोत्तरक्रमे
णासादितवारिपूर्णकलशाष्टतयेकलशा
नांपुरतःप्रागग्रेपुकुशेपुस्थित्वा एकस्मा
दाम्रपल्लवेनोदकगृहीत्वा ॥यजु अध्या
य-मंत्र यथा-ॐयेप्स्वंतरग्नयः प्रविष्टा
गोबउपगोह्यो मयूपोमनोहास्खलोवि
रुजस्तनूपेहपुरिद्रियहातन्विजहामियो
रोचनस्तमिहनामि॥इतिमंत्रणाततस्ते
न-मामभिषिचामिश्रियै यशसे ब्रह्मणे
ब्रह्मवर्चसाय॥ इत्यात्मानमभिषिंचति।
ॐयेप्स्वंतरग्नय इति मंत्रेणगृहीत्वा
आम्रपल्लवेनाभिषिंचति ॥
तिसके अनंतर अग्निसे उत्तर कोणमें पूर्वाग्रकुशा
बिछाय उनके ऊपर दक्षिणोत्तर क्रमसे अर्थात् जो शु-
भकार्य होताहै उसकी पूर्व वा उत्तर दिशामें समाप्ति
करी जातीहै इस लिये दक्षिणसे आदिले क्रमसे उत्तरकी
तरफ समाप्तिकरनी चाहिये ॥ अष्टकुम्भजलसे पूर्णकर
पूर्वाग्रकुशोंपर स्थित हो एकर आम्रपत्रसे जलग्रहणकर

(१०४) उपनयनपद्धतिः। (येप्स्वंतरग्नयः ) इममंत्रसे ॥ (मत्रार्थ येप्स्वंतरमय इति) (अप्सु) जलोंके मध्यमें जो गोह्य १ उपगोह्य २ मयूप ३ मनोहा ४ खल ५ विरुज ६ तन्द्रुषु ७ इंद्रि- यहा ८ यहजोअग्नि अष्ट प्रकारकी तिनका जो अपने २ नामसेही दोषोंके प्राप्त करने वाली है इनको त्याग- न करताहूँ ॥ और इस जलमें जो रोचनानामसेअग्नि है अर्थात् कल्याण कांति प्रीतिके देनेवाली (प्र० रुचदी- तावमिप्रीतो च) तिमको ग्रहण करताह स्नानके लिये तदनंतर । श्री लक्ष्मी यश ब्रह्मवर्चस (ब्रह्मतेज) आ- युवृद्धिके लिये आत्माको अभिषिचनकरें । ॐयेनश्रियमकृणुतां येनावमृशता सु रांयेनाक्षावभ्यपिंचतां यहा तदश्विना यशः॥इतिमंत्रेण ॥ततस्तेनैव क्रमेणपु नः येऽपवंतरग्नय० इत्यनेनतृतीयक लशस्थजलमादाय॥ॐआपोहिष्ठामयो भुवस्तानऽऊर्जे दधातन । महेरणायच- क्षसे इतिमंत्रेणाभिपिच्य॥तेनैव क्रमेण येवंतरग्नयइतिमंत्रेण चतुर्थकलशस्थ जलमादाय॥ॐ योवः शिवतमोरसस्त स्यभाजयते हनः उशतीरिवमातरः।

। भापाटीकासमेवा। (१०५)
इतिमंत्रेणाभिषिच्य पुनः पुंचमकलश
स्थंजलं येप्स्वंतरनय इतिमंत्रेण तथैवा
दाय ॥ ॐतस्मा अरंगमामवोयस्य
क्षयायजिन्वथू आपोजनयथाचनः ॥
इतिमंत्रेणाभिषिच्य॥
मित्रार्थ-येन श्रियमिति](श्रियम्)लक्ष्मीलाभके लिये
यशसे यशलाभके लिये ब्रह्मज्ञान ब्रह्मतेज लाभके लिये
जिस जलसे अश्विनीकुमार लक्ष्मी युक्त होते भये
और (सुरा) मदिग से जो उत्पन्नदोप तिमको मार्जन
करते भये। अर्थात् नाश करते भये । और जिसजलसे
(अक्षि) नेत्र अभिपिचन करते भये पूर्वोक्त गुणयुक्त
जलसे अपने आत्माको अभिषिचन करताहै। अथवा
जिस जलसे अश्विनीकुमारोंने लक्ष्मी उत्पन्न करी और
सुराका दोष नाश किया और (चक्षु )नेत्र अभिपिंचन
कर दिव्यकिये तिनका ऐसे नित्य (अभ्युदय ) मंगल
की इच्छावाला जो जल उस जलके (अभिपक )स्नान
से मुझको लक्ष्मी यश ब्रह्मतेज यहहो । इतिवाक्यार्थः।
आगे येप्स्वंतरमय-इसमंत्रसे एक २ घटसे जलको
ग्रहणकर आपोहिष्ठेत्यादितीनमंत्रोंसे क्रमपूर्वक अभि
पिंचन करे॥ आपोहिष्ठेत्यादि तीन मंत्रोंका अर्थ पूर्व में
लिखनेसे पुनः नहीं लिखते ॥

(२०६)
उपनयनपद्धतिः।
ततोऽवशिष्टकलशत्रितयजलंतथैवये-
प्स्वन्तरनय इतिमंत्रणप्रत्येकंगृहीत्वा।
तूष्णींप्रत्येकमभिपिंचति । ततोमेखला
मोचनंशिरोभागेन ।। ॐदुत्तमंवरु
गुपामस्मदवाधुमविमध्यम थाय।
अाव्वयमादित्वव्रतेतवानांगसोऽअर्दि
तयेस्याम॥इविमंत्रण॥दण्डकृष्णाजि
नेतूष्णीभूमौनिधाय॥अन्यद्वस्त्रंपरिधा
योत्तरीयंचकृत्वाचम्य बद्धांजलिरादित्य
मुपतिप्ठेत् ब्रह्मचारी॥
शेपकलशत्रयोंसे येऽस्वंतरग्नय इसमंत्रसे जलको
क्रमसे ग्रहणकर तूष्णींहो अभिपिचन करे ॥ तदनंतर
शिरोभागसे मेखलामौंजी (तडागी) का मोचन करे
अर्थात् उतार दे उदुत्तमं इसमंत्रसे ॥( मंत्रार्थ-उदुत्तम
इति ) हे वरुण तुम्हारा उत्तम पाश है उसको
ऊपरसे श्लथकरो। और जो मध्यम पाश है उसको अवा
चीनतासे श्लथकरो। हे अदितिके पुत्र वरुणत्रत अर्थात्
ब्रह्मचर्यको धारण कर हम तुम्हारेसे अनपराधी (अपरा-
१ यहमत्र यज. अ.१२ । म, १२ का है ।।

भापाटीकासमेता। (१०७) धरहित) होकर अदीनताके लिये होंगे अर्थात् दीनतासे रहित होंगे ।। इति ॥ इसके अनंतर दण्ड कृष्णाजिन तूष्णीं होकर पृथिवीपर उतारकर घरदे ॥ तदनंतर • अन्यबस्त्र और उत्तरीय अर्थात् उपरके लेनेवाला वस्त्र धारण कर हाथ जोड़ आदित्यका उपस्थान करे उद्य- न्भ्राजिष्णु इत्यादि मंत्रोंसे ॥ ॐउद्यभ्राजिष्णुरिंद्रोमरुद्भिरस्थात् । प्रातर्यावभिरस्थात् दशसनिरसिदश सनि माकुर्वाविदन्मागमयोद्यन्भ्राजि ष्णुरिंद्रोमरुद्भिरस्थाददिवायावावभिर स्थाच्छतसनिरसि शतसनिमाकुर्वाति- दन्मागमयोद्यन् भ्राजिष्णुरिंद्रोमरुद्धि- रस्थात्सायं यावभिरस्थात्। (सायंयाव भिरस्थात्) सहस्रसनिरसिसहस्रसनि माकुर्वाविदन्मागमय ॥ इतिमंत्रेण ॥ [ मंत्रार्थ ] ऐश्वर्ययुक्त आदित्य सूर्य भगवान । (उद्यन्-उदयं कुर्वन)अर्थात् उदयको प्राप्तहोता भया (अस्थात् ) स्थित होता भया (किंभूतः) केसा (भ्राजिष्णुः)भ्राजमान रश्मिकिरणोंको जो धारण करें (प्रातः) प्रातःकाल में (यावद्भिर्मरुद्भिर्देवैःसह अस्थाव) (१०८) उपनयनपद्धतिः। सर्व देवताओंके साथ स्थित होताभया ॥ (उत हे वि- द्वन् )सर्वजाननेवाले (आदित्यस्त्वंदशसनिरसि बहुध नोसि) तुम बहुत धनवाले हो (अतः)इसलिये(दशसनि मामांकुरु)बहुनधनयुक्त मुझको करो (किंच मामां ब्रह्म- चर्यादुत्तीर्णमागमय-जानीहि ) और मुझको ब्रह्मचर्यसे उत्तीर्णको जानो।और पुनः पुनःपाठमें दिन और सायं- कालमें यावद्भिः शतसनि सहस्रसनियह विशेप ।। और शत सहस्रशब्द यह बहुतके वाचक हैं ॥ वाक्यार्थ यह है कि-सूर्य दिन और सायंकालमें रश्मियोंको धारण करता साथ देवता गणके उदय होता है उसकी प्रार्थना करी जातीहै कि हे बहुधन सूर्य ! मुझको भी बहुधन देओ और ब्रह्मचर्यसे उत्तीर्णको जानो ॥ या- वभिः इस स्थान (वर्णागमो वर्णविपर्ययश्च ) इस वच- नसे दकारका लोप भया ॥ ततोदधितिलान्वा प्राश्याचम्य । जटालो मनखादीश्छेदयित्वा स्नात्वाऽऽचम्यप्रादेश मितोदंवरकाप्टेनदंतधावनं कुर्यात् । ॐअ न्नाद्याऽयव्यूहध्व सोमोराजायमागतम् । समेमुखं प्रमायते यशसा च भगेनच ॥ इतिमंत्रेण ॥ ततोदंतकाष्टं परित्यज्य 'आ भापाटीकासमेता। (१०९) चम्य सुगंधिद्रव्येणोहर्तनानंतरं स्नात्वा हिरा चम्यचंदनकुंकुमादिना. नासिकाया मु खस्यालंभने ॥ ॐप्राणापानौमेतर्पय ॥ ॐचक्षुमेंतर्पय ॥ ॐश्रोत्रंमेतर्पय ॥ इति मंत्रणानुलिम्पति । ततः पाणी प्रक्षाल्या दक्षिणाभिमुखः पातितवामजानुः कृता पसव्यो द्विगुणभुग्नकुशत्यतिलजलान्या दाय ॥ आस्तृतकुशत्रयोपरि पितृस्तर्प येत् ॥ ॐपितरः शुधध्वमितिमंत्रण ततः सव्यं कृत्वा आचम्यानुलिप्यजपेत 'उपस्थानके अनंतर दधि तिल प्राशनकर जटा (केश) लोम (रोम) नखादि छेदन करवाय स्नान- कर आचमनकरे ॥ प्रांदेशमित (आँवर )-गृलरके काप्टकी दंतधावन (दांतन) (ओमन्नाधाय ) इसमंत्रसे करे। मंत्रार्थ-अन्नाद्यायेति हे वनस्पति वृक्ष तुम प्रबुद्ध हो इस विपयमें वनस्पतियोंका स्वामी चंद्रमा जिस वृक्षमें आताभया सो वनस्पति मेरे मुखको यश और सौभाग्यतासे प्रमार्जनकरे अर्थात् शुद्ध करे अन्नप्राप्तिके लिये । अनंतर दंतकाप्टको त्याग आचमन कर सुगं- धिद्रव्यसे उद्वर्तन ( बटना) मलस्नान कर द्विआच- .

(११०)
उपनयनपद्धतिः।
मनकरे ।। प्रमाण. या स्मृ० अध्यायः १ प्रथम-(स्ना-
त्वा पीत्वा क्षुते सुप्ते भुक्त्वा रथ्योपसर्पणे । आचांतः
पुनराचामेद्वासो विपरिधायच) ॥ अनंतर चंदन कुंकु-
मादिकोंसे नासिका मुखका स्पर्शकरना ॐ प्राणापानी
मेतर्पय इसभंवसे ॥ चक्षुमेंतर्पय इससे नेत्र ॥ श्रोत्रमे
तर्पय इससे कर्णका आलंभनकरे ॥ अनंतरहस्तप्रक्षा
लनकर दक्षिणकी तरफ मुख कर वामजानु (गोडा)
नम्रकर निवाय ॥अपसव्य यज्ञोपवीत कर मोटकतिल
जल लेकर । कुशवयके ऊपर ओपितरः शुधध्वमिति
इसमंत्रसे पितृतर्पण करे (शुन्धध्वम् ) अर्थ शोधनकरो
यह याच्यावाक्यार्थ है ॥ अनंतर यज्ञोपवीत सव्यकर
आचमन कर अनुलिप्त हो यह मंत्र कहे सुचक्षेति ॥
ॐसुचक्षा अहमक्षीभ्यांभ्यास सुवर्चा मु
खेन सुश्रुत् कर्णाभ्यां भूयासम् ।। इति ॥
ततोऽहतवास परिधानम् ॥ ॐपरिधास्यै
यशोधास्यै दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि
शतं च जीवामि शरदः पुरूचीरायस्पो
षमभिसंव्ययिष्ये इतिमंत्रेण । ततो
.यज्ञोपवीतपरिधानम् ॥ ॐयज्ञोपवीतं
परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।

भापाटीकासमेता। (१११) आयुष्यमयंप्रति मुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं वल मस्तुतेजः॥ इतिमंत्रेण॥ द्वितीयग्रहणम् ॥ यज्ञोपवीतमिति प्रजापतिऋषिर्यजश्छंदः उपवीतदेवता यज्ञोपवीतपरिधाने विनि- योगः ॥ यज्ञोपवीतमसियज्ञस्यत्वा यज्ञो. पवीतेनोपनह्यामि ॥ आचमनम् ॥ नेत्रोंसे सुचक्षशोभनदृष्टियुक्त और मुखसे प्रताप शाली कणोंसे सुंदर श्रवणकरनेवाला में हूँगा ॥अनंतर अहत (अर्थात् दग्ध जीर्णतादिदोपरहित) वस्त्र नवीन (परिधास्यै ) इसमंत्रसे परिधानकरे अर्थात् पइने ॥ (मंत्रार्थ-परिधास्यै ) परिधान करूंगा अर्थात् पह- गूंगा । यशोधास्यै-कीर्तिधारण करूंगा । अर्थात् वस्त्र धारणसे कीर्ति को प्राप्तहूंगा। इससे मेरी ( दीर्घा- युवाय) दीर्घायुहो किंच ( जरदष्टिः) वृद्ध में होऊं । (शतंचजीवामि शरदः) शतवर्पजीवित रहूँ (शतायुर्वे पुरुप ) इतिश्रुतेः (पुरूची-वा सुवर्चाः ) शोभनतेज युक्त (रायस्पोपम्) धनवृद्धि के लिये * रायोवैधनानि इति * (अभिसंव्ययिष्ये ) चारोंओरसे भलीप्रकार, आवरण कर्ताहूँ पहनताहूँ ॥ अनंतर द्वितीयवस्त्र में उत्तरीय पहने ( प्रमाण-तथाच पारस्करः-अथोत्त- (११२) उपनयनपद्धतिः। रीयं परीधत्ते यशसामाद्यावापृथिवीति ) अर्थ-उत्तरीय- उपरके धारणकरनेवाला वस्त्र यशसामाद्यावा पृथिवी इस मंत्रसे धारणकरे ॥ मंत्रो यथा-ॐयशसा मायावा पृथिवी यशसेन्द्रा बृहस्पती। यशो भगश्च माविदद्य- शोमा प्रतिपद्यताम् । इति ।। [ मंत्रार्थ ] यशसे द्यावा- पृथिवी ( आकाश-भूमि) आच्छादन करे इस प्रकार इंद्र देवताओंका राजा बृहस्पति देवगुरु यशसे मुझको आच्छादन करे । और यश मुझको प्राप्तहो और सौभा- ग्यता प्राप्त हो ॥ वारंवार कहना वारंवार आदर अतिशयके लियेहै । इसलिये इसमंत्रसे उत्तरीयवस्त्र- धारण करना चाहिये [ यज्ञोपवीतं इसमंत्रका अर्थ प्रथम लिखाहै ] इसस्थान इसमंत्रसे द्वितीय यज्ञोपवीत धारण करना ॥ अथोत्तरीयम् ॥ यशसामाद्यावापृथिवी यशसेन्द्रासहस्पतीयशोभगश्चमाविदद्य शोमाप्रतिपद्यताम् ॥ इतिमंत्रेण ॥ ततः पुष्पमालाग्रहणेविनियोगः ॥ ॐ याआ हरजमदग्निःश्रद्धायैकामायेंद्रियाय ता ऽअहं प्रतिगृहामि यशसाचभगेन च॥ इतिमंत्रेणपुष्पमालाग्रहणम्॥ततः पुष्प

आपाटीकासमेता। (११३)
मालापरिधानम् ॥ॐयद्यशोप्सरसामिंद्र
श्चकारविपुलंपृथुतेनसंग्रथिताः सुमनस
आवनामियशोमयि इतिमंत्रेणपुष्पमा
लापरिधानम्॥अथवैसुप्रतिष्टा ॥ उष्णी
पेणशिरोवेष्टनस।।ॐ युवासुवासाःपरिवी
तआगातसउश्रेयान्भवतिजायमानः॥
तधीरासः कवयउन्नयंतिस्वाध्योमनसा
देवयंतः॥इतिमंत्रेणा ततः कुंडलेपरिद
धाति॥ ॐअलंकरणमसि भूयोलंकरणं
भूयात्॥ततोंजनम् ॥ॐत्रस्यासिकनी
नकचक्षुर्दा असिचक्षम्म देहि । ततआ
दर्शआत्मदर्शनम् ॥ ॐ रोचिष्णुरसि
इतिमंत्रणाततश्छत्रग्रहणम् ॐवृहस्पते
छदिरसि पाप्मनोमामन्तधेहि तेजसो
यशसोमामंतधेहि। इतिमंत्रेण ॥ ततः
पयामुपानहाँ प्रतिगृह्णाति । ॐ प्रति
टेस्थोविश्वमापातम्॥इतिमंत्रेण ॥ ततो
वैणवदंडधारणम् ॐविश्वाभ्योमानाष्टा
भ्यस्परिपाहिसर्वतः। इतिमंत्रेण ॥
१ वमुप्रतिष्ठा अर्थात् धनस्थापन करना ।

(११४)
उपनयनपद्धतिः।
( मंत्रार्थ-या आहरत) जमदग्निनाममहपिने श्रद्धाके
लिये जो पुष्पोंकी माला ग्रहण की सो वही पुष्पमाला
यश और सौभाग्यप्राप्तिकेलिये में ग्रहणकरताहूँ ॥ यश
साच भगेन च यह चतुर्थीके अर्थमें तृतीयाविभक्तिह।।
इस मंत्रसे पुष्पमालाग्रहणकर यद्यशोप्सरमां इस मंत्रसे
धारण करे ॥ ( मंत्रार्थ-यद्यश इति ) इंद्र देवराट
अप्सरा घृताची मेनका रम्भा उर्वशी तिलोत्तमा सुके-
शी मंजुघोपा इत्यादिको यह रूपवतीहे ऐसे श्लाघा-
करनेसे जोयश विस्तृत किया तिस विपुलयशसे ग्रथि-
त की हुई यह पुष्पमालिका यश(ऐश्वर्य) के लिये में
धारण करता हूँ॥अर्थात् इस मालासे मुझको यश मिले
इसमंजसे पुष्पोंकी माला धारण करे ॥ वसुकी प्रतिष्ठा
के अनंतर (युवासुवासाः) इमंत्रसे उष्णीप ( पगड़ी)
से शिरका वेएन करे (मंत्रार्थ युवा सुवासेति ) या यु-
वा (जो यौवन युक्त पुरुष) परिवीतः (वस्त्रोंसे वेटित
अर्थात् वस्त्रधारणकरेहुए ) ( आगात-आगतवान् )
आताभया । (सः) सो ( उत) वितर्कस्तोभार्थमें है
(श्रेयान् भवति ) श्रेष्ठ होताहै। कैसा ( सुवासाः)
शोभन वस्त्रधारी । (जायमानः) अतिशययुक्त (तं)
तिसयुवको (धीरासः) पण्डित पुरुष ( उन्नयति)
उत्कर्षताको प्राप्तकरता है। कैसे-(कवयः) कीर्ति-

भापाटीकासमेता। (१२५) करनेवाले( स्वाध्यः) सुंदरसिद्धिवाले फिर कैसे (मन- सा देवयंतः) मनसे हृदयसे स्तवनकरनेवाले ।। इति ॥ इसके अंनतर अलंकरणमसि इसमंत्रसे अलंकार धार ण करे ।। [मवार्थ-अलंकरणमसि ] है कर्णकुंडल तुम्हारा स्वरूप प्रसाधन शरीरकी शोभाके लिये इसलिये वारंवार मुझको भूपण हो इति ॥ अनंतर (वृत्रस्यासि) इस मंत्रसे अंजन करे [ मंत्राी हे अंजन तुम वृत्रनाम महाबली असुर की (कनीनिका) अर्थात नेत्रोंका कालिमाहै (प्र. तारकाक्ष्णः कनीनिका) इत्यमरः । इस कारणसे तुम चक्षु दायक हो इसलिये मुझको चक्षु नेत्र देवो ॥ तदनंतर दर्पण ( मुकुर) आदर्श में रोचिष्णु इसमंत्रसे मुख देखे [ मंत्रार्थ ] हे दर्पण तुम प्रकाशशाली हों इसलिये मुझको सर्वत्र प्रकाशस्वरूप करो।। इसके अनंतर (बृहस्पतेदिरसि) इसमंत्रसे छत्र (छतरी ) ग्रहण करे ॥ (मंत्रार्थ) हे छत्र तुम देव गुरु बृहस्पतिजीका अपवारण छन है इसलिये मुझको पापसे और तेजसे (अर्थात् सूर्यकी आतप ) धूप से अंतर्धानकरो (अर्थात रक्षाकरो) यशके लिये ॥ वाक्यार्थ यह है कि हे छत्र जिससे तुम बृहस्पतिजीको पाप तापमे आवरण रक्षा करते हो इसलिये मेरी

(११६) उपनयनपद्धतिः।
रक्षाकर यशयुक्त करो ॥ यशसः यह चतुर्थीके अर्थमें
पष्टी है ॥ छत्र धरणके अनंतर ( उपानह ) जूता
पादोंमें धारण करे ॥ (मंत्रार्थ) हे उपानहो तुम चलने
दुरनेमें उपकांत गति होनेसे मतिष्टावाले हो इसलिये
संपूर्णगतिके विरोधी कंटकादिसे मेरी रक्षा करो ॥
अनंतर वैणव वाँसका दण्ड । विश्वाभ्यो० ( इसमंत्रसे.
ग्रहण करे॥) हे वेणव दंड ! संपूर्ण राक्षस सर्प सिंह
नाशकारी भूतोंसे मेरी सर्वतोभावसे रक्षाकरो ॥
अत्र स्नातकस्य नियमाः॥ गानवादित्र
नृत्यत्यागः ॥ नतत्रगमनक्षेमेसतिनरा
प्रोग्रामांतरगमनंनधावेत् न कूपेऽवेक्षणं
नवृक्षारोहणं फलनोटनममार्गेण न ग
च्छेत् नमोनम्नायात्। नसंधिशयनम्
नविषमभूमिलंघनम् । अश्लीलंनोप
वदेत् । उदितास्तमयेसूर्यनपश्येत् ।
जलमध्येसूर्यमाकाशस्थंनपश्येत् । देवे
वर्षतिनगच्छेत् । उदके आत्मानंनप
श्येत् ।अजातलोम्नी प्रमत्तांपुरुषाकृति
पंढां च नगच्छेत् ॥ इत्यादि। ततओ

भापाटीकासमेता। (११७)
चार्यय वरं दक्षिणां दद्यात् । ततः
मुनिंदियोऽअरतिपृथिव्या वैश्वानरमु
तऽआजातमुग्निम्। कवि सम्राजुमतिथिं
जनानामासन्नापा–जनयन्तदेवाः स्वाहा
इतिमंत्रण- फलपुष्पसमन्वितवृतपूर्ण
सुषेणमाणवकदक्षिणकरस्पृष्टून उत्थाय
पूर्णाहुतिमाचार्यःकुर्यादिति॥ ततउप
विश्य । सुवेणभस्मानीय दक्षिणानामि
काग्रग्रहीतभस्मना ॐन्यायएं जमदग्ने
रितिललाटे । कश्यपस्यत्र्यायुषमि
तिग्रीवायाम् । ॐयद्देवेषुत्र्यायुपमिति
दक्षिणवाहुमूले । ॐतन्नाऽअस्तुत्र्यायुष
मितिहदि ॥ अनेनैवक्रमेण कुमारलला
टादावपि तत्रतन्नो इत्यस्य स्थानेतत्ते
इतिविशेषः॥ ततोमूर्द्धाक्षतादिग्रहणम्।
इतिश्रीमहामत्तकमहासामंताधिपतिश्री
रामदत्तविरचिता वाजसनेयिनामुपन
यनपद्धतिः समाप्ता । शुभम् ॥
१ यह मा यजु. अन्याय ७ मत्र २४ का ॥

(११८) उपनयनपद्धतिः।
गीत (राग) वादिन (बाजा) नृत्य नर्तन (नाच)
इनका त्याग करना और वहाँ न जाना। प्रगृह्यसू०
पारस्कर.२ कांड । ( अथ स्नातकस्य यमान्वक्ष्यामः
कामादितरो गीतवादिवाणि न कुर्यात् ) अर्थ-विना-
कामचेष्टाके गीत वादिवआदि नकरे। क्षेमकल्याणके
होनेपर रात्रिमें अन्यग्राम ( नगर ) को नजावे
अर्थात् अत्यावश्यमें निषेध नहीं ॥ और धावन
( भागना )छोड़ दे । और कूपके जलको नम्र होकर
ऊपरस्थित होन देखे । वृक्षपर चढे नहीं। फलोंको
न तोडे । अमार्ग (कुराह) से नचले और नग्न होकर
स्नान न करे। और जिस स्थानके गिरनेका संशयहो
वहां न शयनकरे ॥ प्रातःकाल और सायंकाल न
शयन करे । और विषमभूमि-ऊँची नीची पृथिवीका
लंघन न करे । अश्लील दुर्वाक्य वा ग्राम्य शब्द न
कहे । उदयास्तकालमें सूर्यको न देखे ॥ जलमें खडाहो
आकाशमें सूर्यको न देखे॥ वृष्टि होनेपर न जावे यदि
अत्यावश्य होतो छत्र धारण कर जावे ॥ जलमें अपना
मुख न देखे ॥ और जिसके रोम नहीं परंतु पुरुपाकृति
प्रमत्त पंढ (नपुंसक) के साथ गमन न करे ॥ इत्यादि
अयोग्यपुरुप व्यवाय न करे ॥ इत्यादि वेद शास्त्र
लोकविरुद्ध बातें त्याग दे ॥ इनके अनंतर गुरुजीको
भूयसी (बहुत) दक्षिणा दे।अभावमें यथाशक्ति दे ॥

भापाटीकासमेता। (११९) और (मूर्टानं दिवो अरति ) इसमंत्रसे फल पुष्पादिसे युक्त घृतसे पूर्णाहुति करे। (प्र० पूर्णाहुतिमुत्तमांजुहोति ) व्यायुपं इसमंत्रसे ललाट ग्रीवा दक्षिणबाहु हृदयमें सुवसे हवनकी भस्म ले अनामिकासे लगावे अपने और शिष्यके गुरु । अनंतर शिष्यके मस्तकपर गुरु अक्षत पुष्प आदिकों का आरोपण करे ॥ इति श्रीः॥ इति श्रीमहाराजाधिराजश्रीजगजीतसिंहरक्षितशतद्रु- विपाशांतर्गतराजधानीकर्पूरस्थलनिवासिगौतमगोत्रा- (शोरि) न्ययालंकृत-श्रीमच्छ्रीतुलसीरामात्मजदेव- ज्ञचूडामणिपंडितवर्यश्रीदुनिचंद्रात्मजसर्वबंधुश्रीयुतप- ण्डितविष्णुदत्तवैदिककृतोपनयनवेदारंभसमावर्तनपद्ध- तिटीका स्वरयुगाङ्कचंद्रमिते वैक्रमे १९४७फाल्गुन कृष्णैकादश्यां भृगुवासरे समाप्तिमगात् ॥ शुभमस्तु श्रीरामचंद्रसगुणब्रह्मप्रसादात् ॥ (इति चतुर्थं प्रकरणं समाप्तम् ) (१२०) उपनयनपद्धतिः। ( अथ प्रकीर्णप्रकरणमारभ्यते) नमो गणेशाय। अथोङ्कारनिरूपणम्। योगियाज्ञवल्क्यः। प्रणवाद्याः स्मृता मन्त्राश्चतुर्वर्गफलप्रदाः । तस्माच निसृताः सर्वे प्रलीयंतेच तत्र वै ॥ माङ्गल्यं पावनं धर्म्य सर्वकामप्रसाधनम् । ओंकारः परमं ब्रह्म सर्वमंत्रेषु नायकः॥ प्रजापतेर्मुखोत्पन्नस्तपःसिद्धस्य वै पुरा ॥ यथा पर्ण पलाशस्य शंकुनैकेन धार्यते । तथाजगदिद सर्वमोङ्कारेणैव धार्यते ॥ जपेन दहते पापं प्राणायामै- स्तथा मलम् । ध्यानेन जन्म निर्यातं धारणाभिश्च मुच्यते ॥ मनुराह च। अकारं चाप्युकारञ्च मकारञ्च प्रजापतिः । वेदत्रयान्निरदुहहूर्भुवःस्वरितीति च ॥ गीतायाम् । ओतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्म- णास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ तस्मादोमि- त्युदाहृत्य यज्ञदानतपाक्रियाः। प्रवर्त्तते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ।

भापाटीकासमेता। (१२१) योगियाज्ञमल्ल्यः। सिद्धानां चैव सर्वेषां वेदवेदान्तयोस्तथा । अन्येपा- पि शास्त्राणां निष्टाप्योङ्कार उच्यते ॥ प्रणवाया यतो वेदाः प्रणवे पर्युपस्थिताः । वाङ्मयं प्रणवः सर्व तस्मा- त्प्रणवमभ्यसेत् ॥ आयं यत्राक्षरं ब्रह्म त्रयो यत्र प्रति- टिताः। स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद् वेदोयो वेदैनं स वेदवित् ।। एक एव तु विज्ञेयः प्रणवो योगसाधनम् । गृहीतं सर्व सिद्धान्तरितरेब्रह्मवादिभिः ॥ वेदभारभरातों यः सवे ब्राह्मणगर्दभः।योवेत्ति ब्रह्म गोप्यंतं त्रिमात्रापु तिष्ठति । यथाऽमृतेन तृप्तस्य पयसा किं प्रयोजनम्।तथोङ्कार- विधिज्ञस्य ज्ञानतृप्तिन विद्यते । सर्वमंत्रप्रयोगेषु ओमि- त्यादौ प्रयुज्यते । तेन संपरिपूर्णानि यथोक्तानि भव- न्ति हि ॥ यन्यूनमतिरिक्तञ्च यच्छिद्रं यदयज्ञियम् । य- दमेध्यमशुद्धञ्च यातयामं च यद्भवेत् । तत्तदोङ्कार- युक्तेन मंत्रेणाविफलं भवेत् ॥ त्रिमावस्तु प्रयोक्तव्यः सर्वारम्भेपु कर्मसु । तिस्रः सार्दास्तु कर्तव्या मात्रास्तत्रार्थचिंतकैः ॥ देवताध्या- नकाले तु प्लुतं कुर्यान संशयः । तैलधारावदच्छिन्नं दीर्घघंटानिनादवत् । अप्लुत प्रणवस्यान्तं यस्तं वेद स वेदवित् ॥ स एस।

(१२२) उपनयनपद्धतिः। ओंकारम्प पिनियोगमार व्यासः । प्रणवस्य ऋपिब्रह्मा गायत्री छंद एव च ।.देवोमिः सर्वकार्येषु विनियोगः प्रकीर्तितः॥एवमादिकं स्मृत्वा तत ओंकारमभ्यसेत् । साई घिमात्रमुच्चार्य दीर्घ दानिनादवत् ॥ प्यानप्रकारगाह यमः। स्वदेहमरणिकृत्वा प्रणवञ्चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मन्थनाद्विष्णुं पश्येदग्निनिगूढवत् ॥ गीताया भगनद्वाक्यम् । ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ।। छन्दोगगृह्यपरिशिष्टे ॐकाराहतेनिरर्थकत्वप्रतिपादनम् यदोङ्कारमकृत्वातु किञ्चिदारभ्यते तद्वजं भवति तस्माद्वभयाद्रीत ओंकारं पूर्वमारभेत् ॥ तमेवानुनदति छन्दोगपरिशिष्टे । ॐकारपूर्वहि योगोपासनं यानि नित्यानि पुण्यत- मानिकर्माणि दानयज्ञतपःस्वाध्यायजपध्यानसन्ध्यो- पासनप्राणायामहोमदेवपितृमंत्रोच्चारणत्रमारंभादियचा- न्यत् किञ्चित् सर्व प्रणवमुच्चार्य प्रवर्तयेत् समाप- येच ॥ इति । ब्रह्मशब्देन वेदास्तेपामारम्भः ॥ तक। स्वरितोदात्त एकाक्षर ओङ्कार ऋग्वेदे, स्वर्योदात्त भापाटीकासमेता। (१२३) ओङ्कारोयजुर्वेदे। दीर्घोदात्त एकाक्षरःसामवेदे । संक्षिप्तो: दात्त एकाक्षर ओङ्कारः अथर्ववेदे ॥ अथ ओङ्कारस्य मात्राविशेपाभिधानफलं प्रश्नोप- निपदि निर्णीत यथा॥ एतदै सत्यकामः । परञ्चापरं ब्रह्म यदोङ्कार- स्तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति । स यद्येक- मात्रमभिध्यायीत स तेनैवसंवेदितस्तृणमेव जगत्या- मभिसम्पद्यते। तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पनो महिमानमनुभव-- ति । अथयदि द्विमात्रेण मनसि संपद्यते सोंतरिक्ष यजु मिस्त्रीयते । ससोमलोकम् । ससोमलोकेविभूतिमनुभूय पुनरावर्तते । यः पुनरैतन्त्रिमात्रेणैवोमित्येतेनैवाक्षरेण परंपुरुपमभिध्यायीता सतेजसि सूर्यसंपन्नः । यथापादो- दरस्त्वचाविनिर्मुच्यत एवं ह वे सपाप्मना विनिर्मुक्तः ससामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं सएतस्माजीवधनात् परात् परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते । तदेतौ श्लोको भवतः ॥ तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अन; विप्रयुक्ताः। क्रियासु बाह्यान्तरमध्यमासु सम्यक्, प्रयु- तस्तु न कंपतेःऋग्भिरेत यजुमिरन्तरिक्षंससामभिर्य- त्तत्कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणेवायतनेनान्वेति विद्वान यत्तच्छान्तमजरममृतमभयंपरश्चेति ॥ इतिश्रीदेवज्ञदुनि - (१२४) उपनयनपद्धतिः। 'चंद्रात्मज [शोरि] कर्पूरस्थलनिवासिपण्डितवर्यवि- 'ष्णुदत्तसंग्रहीत कारनिरूपणं समाप्तम् ॥ अथ वेदस्यअनध्यायमाह। ( याज्ञवल्क्यस्मृती प्रथमाध्याये) त्र्यहंप्रेतेष्वनध्यायः शिष्यत्विग्गुरुबन्धु षु ॥ उपाकर्मणि चोत्सर्गे स्वशाखा- श्रोत्रिये तथा ॥ संध्यागजितनिर्घातभू कंपोल्कानिपातने ॥ समाप्य वेद पनि शमारण्यकमधीत्यच ॥ पञ्चदश्यां च तुर्दश्यामष्टम्यां राहुसूतके । ऋतुसंधिषु भुक्त्वा वा श्राद्धिकं प्रतिगृह्य चापशुम ण्ड्कनकुलमार्जाराश्वाऽहिमूपकैः । कृते न्तरेत्वहोरात्रंशक्रपाते तथोच्छ्रये ॥श्व- कोष्टगईभोटकसामवाणात निःस्वने ॥ अमेध्यशवशुद्रांतश्मशानपतितांतिके॥ देशेऽशुचावात्मनिचविद्युत्स्तुनितसंप्लवे मुक्ताद्रपाणिरम्भोन्तरर्द्धरात्रेतिमारुते ॥ पांसुवर्षे दिशो दाहे संध्यानीहारभीतिः। धावतः प्रतिगन्धेच शिष्टे च गृहमागते।

भापाटोकासमेता। ( १२५) खरोष्ट्रयानहस्त्यश्वनौवक्षेरिणरोहिण।सप्त त्रिंशदनध्यायानेतांस्तात्कालिकान्विदुः।। शिष्य-ऋत्विक-गुरु और बंधु इनके मरनेपर और उपाकर्म वेदोंका आरंभ भाद्रमासमें । उत्सर्ग पोप मासमें वेदोंके उत्सर्गमें जो अपनी शाखाका उसीको दूसराभी पडताहो और मरजाय तोभी तीन दिनका अनध्याय होताहै ॥ संध्यासमय मेघगर्जताहो आकाशमेंकोई उत्पात शब्द हो भूकंपन । उल्काप- तन (ताराकाटूटना ) और वेदसमाप्तकर वा आर- ण्यक पढ चुकेहो तो एक दिनरात्र अनध्याय होताहे ॥ अमावस, पूर्णिमा, चौदश, अष्टमी, चंद्रसूर्यका ग्रहण और जिसप्रतिपत्को ऋतुओंका आरंभहो; और श्रा- में भोजनकर वा दान लियाहो तो भी एक दिन- रात्र अनध्यायकरना ॥ कोई पशु मेढक डडू नेवल कुत्ता सर्प विडाल और मूसा यदि पढनेपढानेवालोंके मध्यसे निकलजावे और इंद्रध्वज जो संवत्सरके फल ज्ञानके लिये खडीकरीजाय वा उतारे तो एक दिन- रात्रि अनध्याय होताहै ॥ श्वान मृगाल गर्दभ उलूक पक्षी सामवेदवंशी और आतुरपुरुपका शब्द सुनपडे कोई अपवित्र वस्तु मृतक शुद्र अंत्यज ( चंडाल) श्मशान और पतित येसमीपहों वा इनके समीप ॥अप- (१२६) उपनयनपद्धतिः । वित्र देश भूमि अशुद्ध देह हो । वारंवार विजली चम- के वारंवार मेव गजें। भोजन करनेसे गीले हाथ हों जलके बीच खडाहो आधीरात्रिमें और बहुत वायु-बह- तीहो। धूलिवर्पती हो । दिगदाह हो । संध्यासवेरेके धुंध कोई भय हो दौडता जाता दुर्गंध आतीहो कोई शिष्ट अपने घर आजाय गर्दभ ऊंट रथ हाथी घोडा नौका वृक्ष और ऊपरभृमि इनपर स्थित हो तो तत्काल वेद न पढे ॥ यह तैतीस अनध्याय उतना काल हो तेहैं जबतक इनकी संभावना रहै ॥ जैसे धूलि वर्पती हो तो अनध्याय धूलिके नाश होनेपर वेदका पढना इत्यादि ॥ इति श्रीदेवज्ञदुनिचंद्रात्मज पं० विष्णुदत्तसंग- हीतं वेदानामनध्यायप्रकरणं समाप्तम् ॥ ॐस्वस्ति श्रीगणेशायनमः ॥ अथयज्ञो पुवीतधारणप्रकारमाह ॥ सूतकेमृतके चैव गते मासचतुष्टये । नवयज्ञोपवी तानि धृत्वा जीर्णानि संत्यजेत् ॥ अर्थात् सूतक पातकों और चारमासके अनंतर नवीन यज्ञोपवीत धारणकर जीणको त्यागदें। अन्यच्च॥ कठाः काण्वाश्चचरका विप्रा वाजसनेयकाः। वह्वचाः सामगाश्चैव

भापाटीकासमेता। (१२७)
येचान्ये यजुःशाखिनः। कण्ठादुत्तीय्य
सूत्रं तु पुनः संस्कारमहति॥
अर्थ-कठशाखाके काण्वशाखाके चरकशाखाके
वाजसनेयी शाखाके बश्व ( ऋग्वदी सामवेदी और
जो यजुर्वेदी शाखावाले वह कंठसे यज्ञोपवीत उतार
कर फिर संस्कारके योग्य हो जातेहैं ।
मय यज्ञोपवीतनिर्माणप्रकरणम् ।
छंदोगपरिशिष्टे॥ पा० गृ० सूत्रेहरिहर
भाष्ये ॥ विदूर्व वृतंकार्य तन्तुत्रय
मधो स्तम् । त्रिस्तं चोपवीतं स्यात्त
स्यैकोग्रंथिरिष्यते। आवेष्टय षण्नवत्या
तत्रिगुणीकृत्य यत्नतः ॥ अलिङ्गकै
स्त्रिभिः सम्यक् प्रक्षाल्योलतंचतत्।
अप्रदक्षिणमावृत्तं सावित्र्या त्रिगुणीक
तम्॥अधः प्रदक्षिणावृत्तं समस्यान्नवसू
ऋकमा त्रिरावेष्ट्य हद बद्धाहरिब्रह्मेश्वरा
नमन् । (यज्ञोपवीतं परममितिमंत्रण
धारयेत्)सूत्रंसलोमकंचेत्स्यात्ततः कृत्वा
खलोमकमासावियादशकृत्वोझिमन्त्रि

(१२८) उपनयनपद्धतिः।
ताभिस्तदुक्षयेत् । विच्छिन्नं वाप्यधोयातं
भुक्त्वा निर्मितमुत्सृजेत् । स्तनादूर्ध्वम
धोनामेन धाय॑ तत्कथंचन ।
(मायामाह तम)
ब्रह्मचारिण एकं स्यात्स्नातस्य हे बहूनि
वा। तृतीयमुत्तरीयं वा वस्त्राभावे तदि
ध्यते ॥ ब्रह्मसूत्रेऽपसव्येसे स्थिते यज्ञोपवी
तिता । प्राचीनावीतिता सव्ये कंठस्थे तु
निवीतिता ॥ अन्यच ॥ कृते पद्ममयं सूत्रं
त्रेतायां कनकोद्भवम् । द्वापरे राजतं प्रोक्तं
कलौ काससंभवम् ॥ अन्यच्च ॥ विना
यज्ञोपवीतेन तोयं यः पिवते द्विजः । उप
वासेन चैकेन पंचगव्येन शुद्धयति ॥
विना यज्ञोपवीतेन विण्मूत्रोत्सर्गकृद्यदि।
उपवासद्वयं कृत्वा दानोंमैस्तु शुद्धयति॥
संग्रहे-उपाकर्मणि चोत्सर्ग गते मास
चतुष्टये । नवयज्ञोपवीतानि धृत्वा पूर्वाणि
संत्यजेत् ॥ पूर्वयज्ञोपवीतानि शिरोमा
र्गेण संत्यजेदिति ॥

भापाटीकासमेवा।
(१२९)
अय यज्ञोपवीतधारणप्रयोगः।
आचम्य प्राणानायम्य । संकल्पः ॥
अयेत्यादिममश्रौतस्मातकर्मानुष्ठानसि
ड्यर्थ यज्ञोपवीतधारणमहं करिष्ये ।
सूत्रत्रिणीकरणम् । इदंविष्णुरितिमेधा
तिथिर्ऋषिः। विष्णुर्देवता। गायत्रीच्छंदः।
सूत्रत्रिगुणीकरणे विनियोगः ॥ ॐदुदंवि
ष्णुविच॑क्रमेत्रेधानिदंधेपदम्। समूढमस्य
पासुरैस्वाहाँ । १५ । प्रक्षालनम् । आपो
हिप्ठेतितिमृणां सिंधुदीप ऋषिः। आपो
देवता। गायत्रीच्छंदः । यज्ञोपवीतप्रक्षा
लने विनियोगः। ॐआपोहिष्ठामयोभुव
स्तानऽऊर्जेर्दधातन । मुहेरणायुचक्षसे ।
। योवं-शिवतमोरसुस्तस्य भाज -
यतेहुन । उशतीरिव मातर-३२६ । ॐ
तस्माऽअरङ्गमामवीयस्थक्षयायुजिन्यथ ।
आपोजुनयथाचन । ४ । ततो यज्ञोप
९

+
(१३०) उपनयनपद्धतिः।
वीतानि प्रक्षाल्यानंतरं दशगायत्रीमन्त्रै
रभिमंत्र्य तन्तुदेवतानामावाहनं कुर्यात्॥
प्रणवस्य ब्रह्मा ऋषिः । परमात्मा
वता गायत्रीच्छन्दः । प्रथमतन्तौका
रावाहने विनियोगः । ॐप्रथमतंतौ ॐ
कारायनमः ॐकारमावाहयामि । अग्निं-
दूतमितिमेधातिथिर्ऋषिः । अग्निदेवता ।
गायत्रीच्छन्दः। द्वितीयतन्तौ अग्यावा
हनेविनियोगः । ॐ अग्निन्द्रुतम्पुरोदंधेह
व्युवाहुमुपब्रुवे । देवा आदिया
। द्वितीयतन्तौ अग्नये नमः
अग्निमावाहयामि ॥ नमोस्तु सर्पेभ्य इत्य
स्य प्रजापतिर्ऋषिः। सर्पा देवताः । अनु
ष्टुप्छन्दः । तृतीयतंतौ सवाहने विनि-
योगः ॥ ॐनमोऽस्तु सुत्भ्योयेकेचं पृथि
वीमर्नु । येऽअन्तरिक्षेयेदिवितेभ्यन्सु
भ्योनमः ६ । तृतीयतन्तौसर्पेभ्योनमः
सर्पानावा० । वयसोमेत्यस्य बन्धु
दिह । ५

भापाटीकासमेता। (१३१) ऋषिः । सोमोदेवता । गायत्रीच्छंदः। चतुर्थतन्तौ सोमावाहने विनियोगः॥ॐ व्यसामव्रतेतवुमनस्तुनूषुविन्ध्रतः प्रजावन्तत्सचेमहि ॥७। चतुर्थतन्ती सोमाय नमः सोममावा०॥उदीरतामि त्यस्य शंखऋषिः पिनरोदेवता त्रिष्टु- छंदापंचमतन्तौपित्रावाइनेविनियोगः। ॐ उदीरतामवरउत्परांसुऽउन्मड्य- माः पितर सोम्यासं ॥ असुंय्याईयुरं छुकाऽऋतुज्ञास्तेोऽवन्तु पितरो हर्वेषु॥ पंचमतन्तौपितृभ्योनमः पितृना प्रजापतेइत्यस्य हिरण्यगर्भ ऋषिःप्र जापतिर्देवता त्रिष्टुपछंदः षष्ठतन्तौ प्रजापत्यावाहने विनियोगप्रजापते नत्वदेतान्युन्यो विश्वारूपाणिपरिताब भूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नाऽअस्तु व्य स्यांमुपतयो रयीणाम्॥ ९ षष्ट (१३२) उपनयनपद्धतिः। तन्तौ प्रजापतये नमः प्रजापतिमावा०॥ आनोनियुद्भिरित्यस्य वसिष्टऋषिः। अ- निलोदेवता। त्रिष्टुपछंदः । सप्तमतौ अनिलावाहने विनियोगः ॥ ॐआनो नियुद्भिःशुतिनाभिरध्वर संहस्रिणीभि रुपयाहियज्ञम् । ब्वायोऽअस्मिन्त्सर्वन मादयस्व युयम्पातत्स्वस्तिमिल्सदान १०३४ांसप्तमतन्तौअनिलायनमः अनि लमावा० सुगावइत्यस्यात्रिर्ऋषिःगृहपत यो देवता आर्षी विष्टपछंदःअष्टमतन्तौं यमावाहनेविनियोगः॥ॐसुगावा देवाह सदंनाऽअकर्मयऽआजग्मेदई सर्वन जुषाणाः ॥ भरंमाणा व्वहमानाहवी, ष्ष्यस्स्मेत्तव्यसब्योव्वसूनिस्वाहां ११ अष्टमतन्तौ यमायनमः यममावा०॥ विश्वेदेवासऽआगत इत्यस्य मधुच्छ- न्दा ऋषिः विश्वेदेवा देवताःत्रिष्टुपछंदः भापाटीकासमेवा। (१३३) नवमतन्तौ विश्वेषां देवानामावाहने वि नियोगः ॥ ॐविश्वेदेवासुऽआर्गत.ऋ- णुतामऽडुम "हवंम् । एदम्वहिनिषीदत १२मानवमतन्तौ विश्वेभ्यो देवेभ्योनमः विश्वान देवानावा यज्ञोपवीतग्रंथिदेवता वाहनम् । ब्रह्मजज्ञानमित्यस्यप्रजापति ऋषिः ब्रह्मादेवता त्रिष्टुप्छंदःग्रन्थिमध्ये ब्रह्मावाहने विनियोगः॥ॐब्रह्मजज्ञान प्रथमम्पुरस्ताहिसीमतत्सुरुचौँ वेनऽ विलासबुध्न्याऽउपमाऽअस्य विष्टाई सुतश्चयोनिमसंतश्च विव+१३ । इदं विष्णुरित्यस्य मेधातिथिर्ऋषिः विष्णु देवता गायत्रीच्छंदः । ग्रंथिमध्ये वि ठण्यावाहने विनियोगः ॥ ॐ इदं विष्णु- विचक्रमेधा निदधेपुदम् ॥ समूढम- स्यपामुरेस्वाहाँ १४३५ । त्र्यंबकमि त्यस्य वसिष्ठ ऋषिः रुद्रो देवता विराटु में (१३४) उपनयनपतिः। ब्राह्मी अनुष्टुप्छंदः ग्रंथिमध्ये रुद्रावाह ने विनियोगः॥ ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिऍष्टुिवर्द्धनम् ॥ उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयुमामृतात् । १५० यज्ञोपवीतग्रंथिदेवताभ्योनमः ग्रंथिदे- वता आवाहयामि । प्रणवाद्यावाहितदे- वताभ्योनमः यथास्थानमहं न्यसामि । मानसोपचारैः संपूज्य । अथध्यानम् । प्रजापतेर्यत्सहज पवित्रकाससूत्रोद्भ- वब्रह्मसूत्रम्। ब्रह्मत्वसिहयै च यशःप्र- काशं जपस्यसिद्धिं कुरु ब्रह्मसूत्रम् ॥ ॐ युवासुवासाः परिवीत आगातसउश्रेया- न्भवतिजायमानः ॥ तन्धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥ यज्ञोपवीतधारणम् ॥ यज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्टीऋपिः लिंगोक्तादेवताः । त्रिष्टुपछंदः यज्ञोपवीतधारणे विनियो- गः ॥ यज्ञोपवीतंपरमपवित्रं प्रजापते .र्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमय

भापाटीकासमेवा। (१३५)
प्रतिमुञ्चशुभ्रं यज्ञोपवीतं वलमस्तुतेजः॥
यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्यत्वा यज्ञोपवीते
नोपनह्यामि । अनेनमंत्रेण यज्ञोपवीता
नां पृथक्पृथग्धारणं कुर्यात् । प्रतियज्ञो
पवीतधारणस्य आद्यन्तयोराचमनम् ॥
धारणान्ते जीर्णसूत्रत्यागमंत्रं पठेत् ॥
तद्यथा-एतावदिनपर्यंतं ब्रह्मत्वं धारितं
मया। जीर्णत्वात्वंपरित्यक्तं गच्छ सूत्र
यथासुखम् ॥ इतिमंत्रेणजीर्णयज्ञोपवीतं
शिरोमार्गेण निःसार्य भूमौ त्यजेत् ॥
पश्चाद्यथाशक्ति गायत्रीमंत्रजपंकुर्यात् ॥
अर्पणम् । अनेननवयज्ञोपवीतधारणार्थे
कृतेन यथाशक्ति गायत्रीजपकर्मणा
श्रीसविता देवता प्रीयतां नमम ॥ ॐ
तत्सब्रह्मार्पणमस्तुः॥ यस्य इतियज्ञोपवी
तधारणप्रयोगः ॥
आचमन पूर्वक प्राणायामकर संकल्प करें ( अये-
त्यादि देश कालसंकीर्तनकरे ॥ इदंविष्णु० इसमंत्रसे
सूत्रको त्रिगुण करना । और आपोहिष्ठा इत्यादि तीन

(१३६), उपनयनपद्धतिः।
मंत्रोंसे यज्ञोपवीतका प्रक्षालन करना ॥ इनकाअर्थ
पीछे लिखाहै ॥
अथ संक्षेपतो यज्ञोपवीतधारणप्रयोगः।
यज्ञोपवीतान्युदकेन प्रक्षाल्यानन्तरमा-
चम्य प्राणानायम्य (संकल्पः) अद्ये-
त्यादि मम श्रौतस्मातकर्मानुष्ठानसि-
इयर्थममुककर्माङ्गत्वेननवीनयज्ञोपवी
तधारणमहं करिष्ये । इतिसंकल्प्य
यज्ञोपवीतानि करसंपुटेदशगायत्रीमंत्र
रभिमंत्रयेत् । तदनंतरम् ॐ यज्ञो
पवीतंपरमंपवित्रंप्रजापतेर्यत्सहजं पुर
स्तात । आयुष्यमण्यं प्रतिमुञ्चशुभ्रं
यज्ञोपवीतं बलमस्तुतेजः। ॐयज्ञोपवी
तमसियज्ञस्यत्वायझोपवीतेनोपनह्यामि
इतिमंत्रौपठित्वापृथक पृथक् यज्ञोपवी
तानि सव्यहस्तहाराधार्याणि ॥ प्रति
यज्ञोपवीतधारणान्ते आचम्य । पश्चात
यथाशक्तिगायत्रीजपेत्। ततोजीर्णयज्ञो
पवीतत्यागः कार्य्यः (अर्पणम्)अनेन

भापाटीकासमेता। (१३७) नवयज्ञोपवीतधारणार्थे कृतेन यथाश क्ति गायत्रीजवाख्येन कर्मणा श्रीसूर्य नारायणः प्रीयतां नममॐतत्सब्रह्मा०॥ इति संक्षेपतोयज्ञोपवीतधारणप्रयोगः॥ यदि पूर्वोक्त यज्ञोपवीत धारण प्रयोग कार्यान्तरसे नहोतो इससे अवश्य यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये। आपोहिष्टा इत्यादि तीनोंमंत्रोंसे प्रक्षालनकर अनं- तर दशगायत्री मंत्रसे अभिमंत्रण करे॥ पीछेसे प्रथम तंतुसे ॐकारका आवाहन करे । और अनिदूत इसमं- त्रसे द्वितीयतन्तुमें अग्निका आवाहन करे। नमोस्तुस- पेंभ्य इसमंत्रसे तृतीयतंतुमें सप्पोका आवाहन करे ॥ और वयसोम इस मंत्रसे चतुर्थतन्तुमें सोमका आवाहन कीउदीरता इस मंत्रसे पंचम तन्तुमें पितरोंका आवाह न करे ॥प्रजापते इस मंत्रसे पष्टतन्तुमें प्रजापतिजीका आवाहन करे । आनोनियुद्भिः इसमवंसे सप्तमतंतुमें अनिल (वायु) का आवाहन करे ।। सुगावो इसमंत्रसे अष्टमतंतुमें यम (धर्मराज) का आवाहन करे ॥ विश्वे देवा इसमंत्रसे सर्वदेवताओंका आवाहन नवमतंतुमें करे ॥ यथा प्रमाण छंदोगपरिशिष्टे कारः प्रथमेततो द्वितीयेऽग्निस्तथैव च। तृतीये नागदैवत्यं. चतुर्थे सोम देवता ॥ पंचमे पितृदेवत्यं पष्ठे चैव प्रजापतिः॥ सप्तमे (१३८) उपनयनपद्धतिः। मारुतश्चैव अष्टमे सूर्यमेव च ॥ सर्वदेवास्तु नवम इत्ये तास्तन्तुदेवताः इति ॥ इदंविष्णु इसमंत्रसे ग्रंथिमध्यमें विष्णुका आवाहन करना।व्यंबकं इसमंत्रसे रुद्रजीका आवाहन करना ॥ अनंतर ध्यान प्रजापते इसमंत्रसे। अर्थ-ब्रह्माजीके साथ उत्पन्न भया पवित्र श्रेष्ठकार्पास (कपास) से रचित हे ब्रह्मसूत्र आप जपकी सिद्धि यश का प्रकाश करो। युवा सुवासा इसमंत्रका अर्थ समा: वर्तन प्रकरणमें लिखाहै ॥ यज्ञोपवीतं परमं पवित्र इस मंत्रसे सव्य हस्तसे यज्ञोपवीत पृथक् पृथक्धारण करे प्रति यज्ञोपवीतके आदिअंतमें आचमन करना॥धार- णकर जीर्ण पुरातन यज्ञोपवीत शिरोभागसे एतावदि- नपर्यंत इस मंत्रसे त्यागन करे ॥ पश्चात् यथाशक्ति गायत्रीजप करे ॥. अनंतर जपको श्रीसूर्यनारायणके अर्पण करे॥इति श्रीगौतमगोवा-(शोरि )न्वयालंकृत दैवज्ञदुनिचंद्रात्मजपण्डितविष्णुदत्तकृता यज्ञोपवीत धारणप्रयोगटीका समाप्ता। शुभं भूयात् सर्वान्तर्यामि परमेश्वरप्रसादात् ॥ अनेन कर्मणा परमेश्वरःप्रीयताम् । तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तु ॥ इति यज्ञोपवीतधारणप्रयोगटीका समाप्ता। १ सपएर च इति कचित् पाठः । ।

(१३९
भापाटीकासमेता।
॥ श्रीः॥
अथ उपनयनसत्रेपारस्करः।
पारस्कर गृह्यसूत्र काण्ड २ द्वितीयसूत्र
३।४।५।६।७।८।९।१०॥प
र्यन्त ॥
तद्यथा ।
अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयेद्गाष्टमेवैकादश
वर्षशजन्यं द्वादशवर्षवैश्यंयथामंगलं
वा सर्वेपां ब्राह्मणान्भोजयेत्तञ्चपर्युप्त
शिरसमलंकृतमानयन्ति॥पश्चादग्नेरव
स्थाप्यब्रह्मचर्यमागामिति वाचयति॥
ब्रह्मचार्यसानीतिचाथैनवासः परिधापय
ति येनेंद्रायवृहस्पतिर्वास पर्यदधामृतम्।
तेनत्वापरिदधाम्यायुपेदीर्घायुत्वायवलाय
वर्चस इति मेखलां वनीता इयंदुरुक्तंपरिवा
धमाना वर्णपवित्रंपुनतीमआऽगात् । प्रा
णापानाभ्यां वलमाधानास्वसा देवी
सुभगामेखलेयमिति। युवा सुवासाः परि

११४०)
उपनयनपद्धतिः ।
वीत आगात्सउश्रेयान्भवतिजायमानः।
तंधीरासः कवय उन्नयंतिस्वाध्यो
मनसादेवयंत इति वा तूष्णीं वात्र यज्ञो
पवीतपरिधानमायज्ञोपवीतं परमंपवित्रं .
प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्य
मत्र्यप्रतिमुञ्चशुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु
तेजः। यज्ञोपवीतमसियज्ञस्यत्वायज्ञो
पवीतेनोपनह्यामीत्यथाजिनं प्रयच्छति
मित्रस्य चक्षुईरुणं बलीयस्तेजोयश
स्वीस्थविर समिद्धम्। अनाहनस्यं
वसनंजरिष्णुः परीदं वाज्यजिनंदधेह
मिति तूष्णीवा दंडं प्रयच्छतितं प्रतिगृ
हाति योमेदण्डः परापतबेहायसो
धिभूम्याम् । तमहं पुनरादद आयुषे
ब्रह्मण ब्रह्मवर्चसायेति दीक्षावदेकेदीर्घस
त्रमुपैतीति वचनादथास्यादिरञ्जलिना
अलिंपूरयत्यापोरिष्ठतितिमृभिरथैन;

. भापाटीकासमेवा। (१४१) समधि हृदयमालभतेममव्रतेतेहृदयं द धामिाममचित्तमनुचित्तन्ते अस्तु।ममवाच मेकमनाजुषस्व वृहस्पतिष्ट्वानियुनक्तुम- ह्यमित्यथास्यदक्षिण छहस्तं गृहीत्वाह कोनामासीत्यसावहंभो ३ इंतिप्रत्याहा- थैनमाह कस्यब्रह्मचार्यसि भवत इत्यु च्यमान इंद्रस्यब्रह्मचार्यस्यग्निराचार्यस्त वाहमाचार्यस्तवासावित्यथैनं भूतेभ्यः परिददाति प्रजापतयेत्वापरिददामि। सर्वेभ्यस्त्वाभृतेभ्यः परिददाम्यरिष्टया ऽइति ॥ ३ ॥ प्रदक्षिणमग्निं परीत्यो पविशत्यन्वारब्धआज्याहुतीर्हवा प्रा शनांतेथैन/सर्थशास्तिब्रह्मचार्यस्यपो शानकमकुरुमा दिवासुषुप्थावाचंयच्छ समिधमाधेशपोशानेत्यथास्मै सावित्री मन्वाहोत्तरतोग्ने प्रत्यङ्कमुखायोपविष्टा योपसन्नाय समीक्ष्यमाणाय समीक्षिता यदक्षिणतस्तिष्ठतआसीनायवैके पच्छो

.
(१४२) उपनयनपद्धतिः ।
ईर्चशः सञ्चितृतीयेनसहानुवर्तयन्
संवत्सरे षण्मास्य चतुर्विशत्यहे
द्वादशाहे षडहेन्यहेवासद्यस्त्वेवगायत्रीं
ब्राह्मणायानुब्रूयादाग्नेयो 'वैब्राह्मणइति
श्रुतेत्रिष्टुभराजन्यस्यजगतींवैश्यस्य
सर्वेषांवागायत्रीमत्रसमिदाधानम् पाणि
नाग्निंपरिसमूहत्यग्नेसुश्रवः सुश्रवसंमाकु
रु॥ यथात्वमग्नेसुश्रवःसुश्रवाअस्येवंमा
सुश्रवस्सौश्रवसंकुरुयथात्वमग्ने देवानां
यज्ञस्यनिधिपाअस्येवमहंमनुष्याणांवे
दस्यनिधिपो भूयासमिति प्रदक्षिणम
ग्निंपर्युक्ष्योत्तिष्टन्त्समिधमादधात्यग्नये
समिधमाहार्पहते जातवेदसे ॥ यथा
त्वमग्ने समिधासमिध्यसऽएवमहमायु
पामेधयाब्रह्मवर्चसा प्रजया पशुभित्र
ह्मवर्चसेनसमिंधेजीवपुत्रोममाचार्यों मे
धाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वीतेज
स्वीब्रह्मवर्चस्यन्नादोभूयास,स्वाहेत्येवं
द्वितीयांतथातृतीयामेपात इतिवासमुच्च

भापाटीकासमेता। (१४३) योवापूर्ववत्समूहनपर्युक्षणे पाणीप्रतप्य मुखंविमृष्टेॐ तनूपाअग्नेसितन्वंमेपाहि ह्यायुर्दाऽअग्नेस्यायुमेदेहि वक़दाऽअग्नेसि वक़मेदेहि अग्नेयन्मेतन्वाऽऊनन्तन्म आपण मेधासेदेवः सविता आदधातु मेधादेवी सरस्वतीआदधातुमेधामश्वि नौदेवावाधत्तां पुष्करस्रजाविति मेधां मेतिहाभ्यांततअंगान्यालभ्यजपत्यंगा निचमआप्यायतां वाक्प्राणश्चक्षुः श्रो त्रं यशो वलमिति त्र्यायुपाणिकरोति भस्मना ललाटे ग्रीवायां दक्षिण से हृदिचन्यायुषमिति प्रतिमंत्रम् ॥ ५॥ अत्रभिक्षाचर्यचरणम् । भवत्पूर्वी ब्राह्म णोभिक्षेतभवन्मध्या शजन्यो भवदं त्यांवैश्यस्तिस्रोऽप्रत्याख्यायिन्यःषाहा दशापरिमिता वा मातरं प्रथमामेक आ चर्याय भैक्षं निवेदयित्वा वाग्य तोह शेषतिष्टेदित्येकेहि सन्नरण्यात्स

(१४६) उपनयनपदतिः।
शीस्यात्सावित्र षड्रावंत्रिरात्रसद्यः
काले वाचरेत्तदेवव्रतमुदीक्ष्य दण्डमपो
निधाय मेखलायज्ञोपवीतं चाप्स्वन्तरि
तिप्रत्यूचनमोवरुणायेति त्रिमधुरंदत्त्वा
ततोऽस्याग्नेयं प्रथमं वेदव्रतमादिशेद्राह्म
णक्षत्रियविशांपंचसांवत्सरिकाणि वेदव्र
तानिभवत्याग्नेयशुक्रियादिषुशुक्रिय
शुक्राभिःश्रावयेदौपनिषदमौपनिषद्भिः
शौलमध्शौलभिनीभिरथवा विद्यमान
ऽआब्रह्मन्त्रुमुदीरतामानोभद्राऽआशुः शि
शान इमानुमितिच वेदशिरसावगुंठ
येवगुंठनीं चगोदाने गोमिथुनंतस्मादोदा
नमिति॥णावेदसमाप्यस्नायाब्रह्मचर्य
वाष्टाचत्वारिवंशकंहादशकेप्येके गुरुणा
नुज्ञातोविधिर्विधेयश्चतर्कः षडंगमेकेन
कल्पमात्रेकामं तु याज्ञिकस्योपसंग्रह
'गुरुछ समिधोभ्याधायपरिश्रितस्योत्त
रतः कुशेषु प्रागग्रेपुपुरस्तास्थित्वाऽ
टानामुदकुंभानां येप्वंतरग्नयः प्रविष्टा

भाषाटीकासमता।
गोह्यऽउपगोटोमयूपोमनोहास्खलो वि
रुजस्तनुडुषुरिंद्रियहान्विजहामि योरो
चनस्तमिहगृह्णामीत्येकस्मादपो गृहीत्वा
तेनाभिषिंचतेतेनाहमभिषिचामिश्रियैयश
सेब्रह्मणेब्रह्मवर्चसायेतियेनश्रियमकृणुतां
येनावमृशता,सुरांयेनाक्ष्यावभ्यपिंचतां
यहा तदश्विनायशऽइत्यापोहिष्टेति च
प्रत्यूचंत्रिभिस्तूष्णीमितरैरुद्धत्तममितिमे
खलांप्रमुच्य दण्डनिधाय वासोन्यत्परि
धायादित्यमुपऽतिष्ठत उद्यन्भ्राजिष्णुरि
न्द्रोमरुद्धिरस्थाच्छतसनिरसि शतसनि
माकुर्वाविदन्मागमयोद्यन् भ्राजिष्णुरि
न्द्रो मरुद्भिरस्थात्सायंयावभिरस्थात्स
हस्रसनिरसि सहस्रसनिमाकुर्वाविदन्मा
गमयेतिदधितिलान्वा प्राश्य जटालोम
नखान् स " मृत्यौदुम्बरेण दंतान्धावे
तान्नाद्याय :हध्वः सोमोराजायमागमत्
समेमुखं प्रमायते यशसा च भगेनचे

(१४६) उपनयनपद्धतिः।
शीस्यात्सावित्र षड्रात्रंत्रिरात्रछसद्यः
काले वाचरेत्तदेवव्रतमुदीक्ष्य दण्डमपो
निधाय मेखलांयज्ञोपवीतं चाप्स्वन्तरि
तिप्रत्यूचनमोवरुणायेति त्रिमधुरंदत्त्वा
ततोऽस्याग्नेयं प्रथमं वेदव्रतमादिशेद्राह्म
णक्षत्रियविशांपंचसांवत्सरिकाणि वेदव
तानिभवंत्याग्नेय शुक्रियादिषुशुक्रिय
शुक्राभिःश्रावयेदोपनिषदमौपनिषद्भिः
शोलभ७शौलभिनीभिरथवा विद्यमान
ऽआब्रह्मनुमुदीरतामानोभद्राऽआशुः शि
शानऽइमानुमितिच वेदशिरसावगुंठ
यैवगुंठनीं च गोदाने गोमिथुनंतस्माद्गोदा
नमितिजावेद समाप्यस्नायाब्रह्मचर्य
वाष्टाचत्वारिछशकंडादशकेप्येके गुरुणा
नुज्ञातोविधिविधेयश्चतर्कः षडंगमेकेन
कल्पमात्रेकामं तु याज्ञिकस्योपसंगृह्य
गुरुछ समिधोभ्याधायपरिश्रितस्योत्त
रतः कुशेषु प्रागग्रेषुपुरस्तास्थित्वाऽ
प्टानामुदकुंभानां येप्स्वंतरग्नयः प्रविष्टा

भापाटीकासमेता। (१४९) रोवेष्टयतेयुवासुवासा इत्यलंकरणमसिशू योलंकरणं सूयादिति कर्णवेष्टको त्रस्ये त्यवेक्षिणी रोचिष्णुरसीत्यात्मानमा दर्श प्रेक्षते छवं प्रतिगृह्णाति हम्पते छदिरसि पाप्मनो मामन्तधेहि तेजसो यशसोमामन्तघेहीति प्रतिष्टेस्थो विश्व तो मापातमित्युपानही प्रतिमुञ्चते वि- श्वाभ्यो मानाष्टाभ्यः संपरिपाहि सर्वत इति वैणवंदण्डमादत्ते दंतप्रक्षालनादीनि नित्यमपि वासच्छनोपानहश्वापूर्वाणि चेन्मंत्रः॥ ८॥ स्नातस्य यमान्वक्ष्यासः। कामादितरो नृत्यगीतवादित्राणि नकु र्यान्नच गच्छेत्कामंतुगीतंगायति वैगी ते वारमत इति श्रुतेद्यपरं क्षेमे नक्तं ग्रा- मान्तरं नगच्छाच धावेदुदपानावेक्षण वृक्षारोहणफलप्रपतनसंधिसर्पणविद्य-

उपनयनपद्धतिः।
न
भिक्षेतापह वैनात्वाभिक्षा
वर्पत्यपाहतो ब्रजेदयमेवज्रः
मपहनदित्यप्वात्मानं
लोनी विपुसीपंडंचनोपहसेत्
गच्छेद्दर्भिणी
.स
मितिनकुलंभगालमितिकपालं मणि-
नुरितींद्रधनुर्गाधयन्तीम्परस्मै
तोर्वरायामनंतर्हितायां म
नमूत्रपुरीषेकुर्यात्स्वयंप्रशीणेन काप्टेनगु
दंप्रमजीतविकृतवासोनाच्छादयीत
व्रतोवधत्रः स्यात्सर्वतऽआत्मानंगापाये
सर्वेषामित्रमिवशुक्रियमध्येष्यमाणः॥९
तितोरात्रीव्रतं चरेदमा साश्यमृन्मय
पायीस्त्रीशद्रशवकृष्णशकुनिशुनां चाद
र्शनमसम्भापणं चतैश्शवशुद्रसूतिकान्ना
निचनाद्यान्मूत्रपुरीपेष्ठीवनं चातपेनकु-
र्यात्सूर्याचात्मानं नांतर्दधीततप्तेनोदका
र्थान्कुर्वीतावज्योत्यरात्रीभोजनसत्यव
चनमेववादीक्षितोप्यातपादीनिकुर्यात्प्रव
W
स

( १५२) (वंशवर्णनम् ) भितेन ॥ श्रीविष्णुदत्तेन सुदर्शनेन कृताहि टीका जतांजने।।६॥ नत्वागुरुं शास्त्रनिविष्टनेत्रं :. वावभूतम् ॥ अभूतपूर्वञ्च हि सम्प्रभूतं किलशास्त्रियम् ॥ ७॥ काश्युद्भवं विद्यासमूहस्यतुमुख्यमोकः ॥ यस्मादधीतं. सर्ववेदं गोपालशास्त्रिस्वगुरुंपणौमि ॥ ८ ॥ महात्मानं शास्त्रिणं प्रणमाम्यहम् ॥ यस्य समालब्धं ज्ञानं विज्ञानमेवच ९॥ साधुरामश्च विष्णुदासं तथैव च । ज नोऽन्यान्नमस्कृत्य पुनःपुनः॥ १० ॥ रम्ये वसुवेदांकभूमिते(१९४८)॥ वैकमे माधवे कृता टीका मनोरमा ॥ ११॥ (श्रीहरिः परमेश्वरो विजयतेतराम् ) पुस्तक मिलनका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदाम, श्रीवेटेश्वर स्वाग यन्नाट "

Upnayan Paddatti

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Upnayan Paddatti
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Upnayan Paddatti
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Citation
1836
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,shri Krishan Das Satmaj Kshemraj
Language
Sanskrit
Pages
147
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405187
Barcode
99999990292284.00
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