Adarsh Library, Jaipur
Satah Se Uthta Admi
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सतह से उठता आदमी गजानन माधव मुक्तिबोध
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इष्टिकोण *** . मुनियोघ के साहित्य में हमारे संस्कारों को संवारने और उन्हें ऊँचा उठाने को बड़ो शक्ति है । वह हम मध्यवर्गीय पाठकों की दृष्टि साफ़ करता है, समझ बढाता है। इन कहानियों में भी हमें अपने जीवन के विविध पक्षों का भति निकट का परिचय एवं विश्लेषण मिलता है, और मिलती है सामाजिक सम्बन्धों को पैनो परख । एक के बाद एक परदे हटवे जाते है और यथार्थ उघडकर सामने आता जाता है। इन कहानियों को एक और विशेषता यह है कि ये सहज ही हर स्थिति के अतिसामान्य में असामान्य और अद्भुत का भरम पैरा कर देती है । इसे हम सटस्प-सो काव्यमर्मो कल्पना-शनि का कमाल कह सकते है । और इसी वातावरण में हर कहानी एक ऐसे घाव को, एक ऐसी पोड़ा को हमारे सामने उधाड़कर रखती है जिसे हम देखकर अनदेखा और सुनकर अनसुना कर जाते रहे हैं। एक बार इन कहानियों को पढ़ने के बाद पाठक के लिए ऐसा करना असम्भव हो जाता है। लगता है, जैसे इन कहानियों में अनेक मायामो अर्थ छिपे हों। इन्हें पड़ने पर हर बार ऐसा कुछ शेर रह जाता है जो इन्हें फिर-फिर पढ़ने को बामन्त्रित करता है। बात यह है कि ये कहानियाँ जीवन के ठहरे नैतिक मूल्यों पर सोचने के लिए पाठक को विवश करती है।
मुक्तिबोध-साहित्य में इस कहानी-संग्रह का इज़ाफ़ा करने के लिए स्तरीय साहित्य का हिन्दी पाठक कृतज्ञता का अनुभव करेगा। इसका प्रकाशन किसी भी प्रकाशक के लिए गौरव की बात है। -शमशेरबहादुर सिंह मुक्तिबोध का सारा जीवन एक मुठभेड़ है। मुक्तिबोध का साहित्य भी उस यथार्थ से मुठभेड़ की एक अटूट प्रक्रिया है, जिससे जूझते हुए वह नष्ट हो गये । कविता, कहानी, उपन्यास, डायरी, आलोचना-साहित्य की लग- भग हर विधा में जाकर उन्होंने अपने अनुभव को समझने, उसकी परि- भाषा करने और उसे अर्थ देने का प्रयत्न किया । कहानी मुक्तिबोध की सबसे प्रिय विधा नहीं। उनके जीवन-काल में वहुतों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उन्होंने कहानियां लिखी हैं। जाहिर है कि मुक्तिबोध की कहानियों की प्रेरणा कहानी का कोई आन्दोलन नहीं था। हर रचना, उनके लिए, एक भयानक, शब्दहीन अन्धकार को-जो आज भी, भारतीय जीवन के चारों ओर, चीन की दीवार की तरह खिंचा हुआ है-लांधने की एक मौर कोशिश थी। सारा इतिहास मुक्तिबोध के लिए एक चुनौती था। मध्यवर्ग इस इतिहास की एक गुत्थी है, जिसे मुक्तिबोध समझना, सुलझाना चाहते थे। मुक्तिबोध के चारों ओर मध्यवर्ग का नैराश्य, कुण्ठा, अवसाद, मात्म- वंचना और आत्म-परस्ती थी । मध्यवर्ग के संकट को मुक्तिबोध ने जितना समझा, अन्य किसी भी लेखक ने नहीं समझा है। मुक्तिबोध की कहानियाँ मध्यवर्ग के विरुद्ध एक जिरह है। वे मध्य वर्ग के एक लेखक का आत्मस्वीकार मात्र नहीं, बल्कि अपने वर्ग के संहा का स्वप्न भी हैं।
जॉर्ज लूकाच ने टॉमस मान के उपन्यासों के लिए, जिन्हें कि वह घोसवीं सदी को प्रतिनिधि रचना मानते हैं, 'आलोचनात्मक जुआ यपाय- बाद' (क्रिटिकल बू पा रीपलिज्म ) विशेषण का इस्तेमाल किया था। मुक्तिबोध की कहानियों की परिभाषा के लिए इससे अच्छा शन नहीं मिल सकता; हालांकि, क्या विडम्बना है, मुक्तिबोध की कहानियों अपनी धुन्ध, कल्पना और फॅण्टसी के कारण टॉमस मान की नहीं, बल्कि काफ्का की-जिसके साहित्य को जॉर्ज लूकाच ने 'बुर्जुआ यथार्थवाद (बू प्रा रोयलिपम) करार देकर बरख्वास्त किया याद दिलाती है । कम से कम एक बात लूकाच की सच थी और वह मुक्तिबोध के सन्दर्भ में और अधिक कारगर होती है। जॉर्ज लूकाच की मान्यता यो कि इतिहास केवल अतीतोष नहीं, वह वर्तमान का अहसास और उसके प्रति एक दृष्टि है। जॉन लूकाच का तर्क था कि वर्तमान के नाम पर, लेखक अकसर-उन्होंने इस प्रसंग में भेकरे, हिकेन्स और जोला की मत्सना को पी-घटनाओं और आख्यानों को इकट्ठा करते हैं, उनकी तह में नहीं जाते । वे अपने समय का विवरण पेश करते हैं, उसके अर्थ को नहीं पहचानते । 'माधुनिक कथा साहित्य' और 'नयो कहानी' के नाम पर हिन्दी में जो कुछ रचा गया है, उसका अधिकतर समसामयिकता का झूठा दावा है । वह सतह पर ठहरी हुई एक दृष्टि है-उसके पीछे इतिहास-बोध नहीं । स्त्री-पुरुषों, लोगों के दृष्टिकोण में परिवर्तन का कोई परिचय उससे नहीं मिलता। वह अपने समय से मुश्भेड़ नहीं, बल्कि अखबार के उड़ते हुए पन्नों को इकट्ठा कर उन्हें इतिहास के नाम पर चलाने का पाखण्ड-भरा प्रयत्न है। मुक्तिबोध की कहानियां हिन्दी के समकालोन कथा-साहित्य को चुनौती हैं । कयाकारों को यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिए और तलाश करनी चाहिए कि वह क्या चीज है जो मुक्तिबोध को कहानियों को स्पायित्व प्रदान करती है, जब कि उनको अपनी कहानियों में 'सब कुछ' होने के बावजूद यह क्या नहीं है कि वे महज एक उहतो हुई-सी अनुमति , बनकर रह जाती हैं। मुक्तिबोध चित्रकार नहीं थे- कम से कम एक कमर्शियल आर्टिस्ट तो क़तई नहीं। उन्होंने अपनी कहानियों के जरिये कोई खाका नहीं खींचा। जिसे प्राध्यापकीय मालोचना की भाषा में 'चरित्र-चित्रण' कहा जाता है, और जो आज भी भावुकता, कृत्रिमता तथा अर्थहीनता से भरे हुए समसामयिक हिन्दी कथा साहित्य का आधार है, वह मुक्तिबोध की रचना का केन्द्र-विन्दु नहीं था। मुक्तिबोध का प्रयोजन रचना के जरिये रचना और जीवन के भीतर के तनावों और संकटों को समझना था। उनकी रचना-प्रक्रिया इस समूचे संकट को नाम देने की प्रक्रिया है । उनकी तमाम कहानियों में केवल एक ही पात्र है, जो अलग-अलग नामों में, अलग-अलग रूपों में और कभी-कभी लिंग परिवर्तन कर उपस्थित होता है। यह पात्र मध्यवर्ग के आध्यात्मिक संकट का गवाह, व्याख्याता, पक्षघर, भोक्ता, विरोधी-सब कुछ है। कुछ हद तक यह पात्र स्वयं मुक्तिबोध है, और कुछ हद तक यह पात्र वह व्यक्ति है जो मुक्तिबोध के साथ-साथ चलता है । वह केवल मुक्तिबोध की सुनता ही नहीं बल्कि उन्हें सुनाता भी है, नसीहत भी देता है, उन्हें फुसलाने की कोशिश भी करता है । मुक्तिबोध की कहानियां दो पात्रों के बीच एक स्वयं मुक्तिबोध और दूसरा मुक्तिबोध का सहयात्री-एक अनन्त वार्तालाप हैं। इस वार्तालाप का क्रम न तो उनकी डायरी में टूटा है, न ही उनकी कविताओं में । संग्रह की पहली ही कहानी "जिन्दगी की कतरन' का केन्द्र-बिन्दु 'आत्महत्या' है-आत्महत्या के साथ जुड़ी हुई वह जीवन-शृंखला है, जिसे समझने की कोशिश में मुक्तिबोध समझ और ज्ञान के हर तहखाने में गये । मुक्तिबोध के उपन्यास 'विपात्र' की तरह इस संग्रह की अधिकतर कहानियों-'समझौता', 'चावुक', 'विद्रूप', 'सतह से उठता आदमी' के पात्र वे मभिशप्त मध्यवर्गीय स्त्री-पुरुष हैं जो जीवन-दर्शन के अभाव में अन्धकार में प्रेतात्माओं की तरह एक दूसरे से टकरा रहे हैं, एक दूसरे से जूझ रहे हैं और एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं। इन कहानियों को .
पड़ते हुए सार्म के नाटक 'नो एविजट' को याद आ जाना स्वाभाविक जीवन-दृष्टि शिक्षा से नहीं, आत्मसंघर्ष से प्राप्त होती है। इन कहा- नियों के दमाम शिक्षित पायों के विलकुल विपरीत 'आखेट' कहानी का नायक फास्टबिल मेहरवानमिह एक अशिक्षित व्यक्ति है, जिसे केवल उत्पीड़न और जुल्म की ट्रेनिंग दी गयी है। मगर उसको अन्तरात्मा उसे दी गयी शिक्षा से प्रवल है। एक अपाहिज स्त्री पर बलात्कार करता हुआ वह अपनी अन्तरात्मा पर भी बलात्कार करता है । अन्ततः वह पाता है, यह सम्म नहीं । केवल प्रेम ही सम्भव है। सर्वहारा के साथ मुक्तिबोध की कोरी सहानुभूति नहीं थी। उसके पीछे उनकी व्याख्या- परक घुद्धि और अनुभव से उत्पन्न विश्वास थे। उनका विश्वास था कि मध्यवर्ग पर थोपी गयो तथाकथित आधुनिकता मनुष्यवा, करुणा, आदर्श वादिता और सत्य का संहार है। 'सतह से उठता आदमी' के पात्र इस संहार के खंडहर है- भारतीय इतिहास के सर्वनाश के जीवित प्रतीक हैं, जिन्हें परिमापित करने को अनिवार्यता ने मुक्तिबोध को इन कहानियों की रचना के लिए विवश किया। ---श्रीकान्त वर्मा मुक्तिबोध की कविताओं और कहानियों को दुनिया में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। फर्क है सिर्फ माध्यम-मर का । कविताओं में विन्धीकरण और प्रतीकीकरण के छ के जरिये मुक्तिबोध ने जिस भुतहा सच को उपाह- फर सामने रखा है, कहानियों में वही सच मध्यवर्गीय सामाजिकों की जोपनियों के बहाने अनावृत हुआ है। यह कहें कि मुक्तिबोध की कहानिया एक समाज को या स्वयं मुक्तिबोध को अपनी कहानियां है तो यह गलत न होगा । क्लासिकी आचार्यों के लिए मुक्तिबोध का समग्र लेखन कलात्मक असफलता का लेखन हो सकता है, परन्तु अपने-आपमें मुक्तिबोध का लेखन भाषा के उस मुहावरे की खोज है जो क्लासिकी प्रतिमानों के जरिये कभी भी पहचान में नहीं आ सकती। एक तरह से क्लासिको आचार्यों की समझ में न आनेवाला साहित्य एक खास किस्म की चुनौती है जिसकी उपेक्षा करना निहित स्वार्थों की रक्षा करना भी है और अपने अस्तित्व को अभय वरदान देना भी है। इसलिए आज कई समोक्षक मुक्तिबोध के तिलिस्मी 'शब्द-व्यूह' का अनगढ़-शिलाखण्डों का अवशेष भी कह देते हैं और मुक्तिबोध की समग्र रचनात्मकता को सपाट, फलाहीन साहित्य-कर्म कह देते हैं। दरअसल मुक्तिबोध को कला या तथाकथित कुलीन सुन्दरता का अन्तरिक्ष बनानेवाला रचनाकार नहीं कहा जा सकता। शायद इस माने में मुक्तिबोध सारी बूर्जुआ कला-संस्कृति का निषेध करते हुए जन- चेतना के उस सर्वव्यापी असर की खोज करते हुए लगते हैं जिसे भाषा का अटपटापन और दूरारूढ़ कल्पनाएँ ही व्यक्त कर सकती हैं। "अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे," कहते हुए मुक्तिबोध ने सोधा प्रहार किया था : "तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब"-अर्थात् जमे-जमाये सरलीकरणों और साहित्यिक अहंकारों के मठ तोड़ना ही अभिव्यक्ति के खतरे उठाना है। मुक्तिबोध की कहानियां इस मामले में ज्यादा स्पष्ट हैं क्योंकि वे 'मठ तोड़ने' को प्रक्रिया में एक पहल हैं। यह सवाल अहम नहीं लगता कि मुक्तिबोध कवि हैं या कहानीकार, महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी माध्यम के जरिये लेखक की प्राण-शक्ति में वह सामर्थ्य आयो है जो अभिव्यक्ति के खतरे उठाने की विवशता बन जाती है। ठीक इसी तरह अब यह सार्थक नहीं रह गया है कि मुक्तिबोध की कहानियां किस वर्ग, पद्धति या तौर-तरीके की कहानियां हैं क्योंकि कहा- नियों के जरिये मुक्तिबोध मानव-विरोधी संस्कृति के कटघरे में पात्रों के रूप में स्वयं खड़े हैं और सीधे-सोधे बने-बनाये व्यवस्था-तन्त्र के खिलाफ एक अकेली मावाज़ में चिल्लाते हैं। पर इसका मतलब यह नहीं कि एक निरर्थक शोर के बीच मुक्तिबोध को रचनाएं अकेलो आवाज की चिल्लाहट- भर है । बल्कि ये सुद्धतया एक मानवीय संस्कृति के अग्रगामी दस्ते के संकेत है । यानो कुल मिलाकर इस निराश, असन्तुष्ट करनेवाली मारक स्थिति में मुक्तिबोध एक आशावादी दार्शनिक की तरह आते हैं। मुझे मुक्तिबोध की कविता का एक प्रसंग इस सिलसिले में बेहद याद आता है, 'पहुँचना ही होगा दुर्गम पहाड़ों के पार' यहाँ मुक्तिबोध किसी रोमण्टिक की तरह पहाड़ों के पार जाने की व्याधि से ग्रस्त नहीं है, 'आत्महत्या के लिए तत्पर' किसी भगोड़े को तरह गुफा को तलाश में नहीं बल्कि एक छोटे-से संकल्प को दोहराते प्रतीत होते हैं। और यह संकल्प वार-चार मुक्तिबोष की रचनाओं में अनगढ भाषा के बीच से तराशा हुआ चला आता है। मुक्तिबोध ने जो कुछ लिखा है, उससे धीमी किन्तु लगातार आनेवाली अनुगूंज का यही एक मानवीय पहल है। -डॉ. गंगाप्रसाद विमल *
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सतह से उठता आदमी
*
१३
....
४९
५८
जिन्दगी की कतरन
समझौता
आखेट
चायुक
विद्रुप
मत का उपचार
जलना
एक दासिल दफ्तर साँझ
सतह से उठा भादमी
....
१८
....
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ज़िन्दगी की कतरन नीले जल के तालाब का नजारा कुछ और ही है। उसके आस-पास सीमेण्ट और कोलतार की सड़क और बंगले । किन्तु एक कोने में सूती मिल के गेहए, सफ़ेद और नीले स्तम्भ के पोंगे उस दृश्य पर भाधुनिक औद्योगिक नगर को छाप लगाते हैं। रात में वालाब के रुधे, बुरे वासते पानी के विस्तार को गहराई सियाह हो उठती है, और ऊपरी सतह पर विजली को पीली रोशनी के बल्बों का रेखावद्ध निष्कम्प, प्रतिबिम्ब वर्तमान मानवी सभ्यता के सूखेपन और वीरानी का ही इजहार करते-से प्रतीत होते हैं । सियाह गहराई के विस्तार पर ताराओं के धुंघले प्रतिविम्बों की विकीरित विन्दियां भी उस कृष्ण गहनता से आतकित मन को सन्तोष नहीं दे पाती वरन् उसे उधार देती है। तालाब के इस श्याम दृश्य का विस्तार इतनी अजीव-सी भावना भर देता है कि उसके किनारे बैठकर मुझे उदास, मलिन भाव ही व्यक्त करने की इच्छा होती आयी है । उस रात्रि-श्याम जल की प्रतीक-विकरालता स्फुटित होकर मैंने अपने जीवन में सुनी उदास कथाएं अपने सापियों के संवेदना-ग्रहणशील मित्रों को सुनायो है। मह तालाव नगर के बीचों-बीच है। चारों ओर सहकें और रौनक होते हुए भी उसकी रोशनी और सानगी उस सियाह पानी के भयानक विस्तार को छू नहीं पाती है। आधुनिक नगर की सभ्यता की दुखान्त कहानियों का वातावरण अपने वक्ष पर तैरतो हुई वोरान हवा में उपस्थित करता हुआ यह तालाब बहुत ही अजीव भाव में डूबा रहता है । . ज़िन्दगी की कतरन फिर भी इस गन्दे, टूटे घाटवाले, बुरे-वासते तालाब के उखड़े- पत्यरों-डके किनारों पर निम्न मध्यवर्गीय पढ़े-लिखे नये अहलकारों और मुंशियों का जमघट चुपचाप वैठा रहता है और आपस में फुसफुसाता रहता हैं। पैण्ट-पाजामों मोर घोतियों में ढके असन्तुष्ट प्राणमन सई सांझ यहां आ जाते हैं, और वासी घरेलू गप्पों या ताजो राजनीतिक वार्ताओं को चर्चाएं घण्टा-आधा घण्टा छिड़कर फिर लुप्त हो जाती हैं और रात के साढ़े आठ बजे सड़कें सुनसान, तालाब का किनारा सुनसान हो जाता है । एक दिन मैं रात के नौ बजे वर्माशेल में काम करनेवाले नये दोस्त के साथ जा पहुंचा था। हमारी बातचीत महंगाई और अर्थाभाव पर छिड़ते ही हम दोनों के हृदय में उदास भावों का एक ऐसा झोंका आया जिसने हमें उस विषय से हटाकर तालाब को सियाह गहराइयों के पार जल-विस्तार की ओर खींचा। उसपर ध्यान केन्द्रित करते हो हम दोनों के दिमाग में एक हो भाव उदय हुमा । मैंने अटकते-अटकते, वाक्य के सम्पूर्ण विन्यास के लिए अपनी वाक्शक्ति को जबरदस्ती उत्तेजित करते हुए उससे कहा, "क्यों भाई, आत्महत्या....आत्महत्या के बारे में जानते हो.......उसका मर्म क्या है ?" जवाब मिला, जैसे किसी गुहा में से आवाज आ रही हो, "क्यों, क्यों पूछ रहे हो ?" "यों ही, स्वयं आत्महत्या के सम्बन्ध में कई बार सोचा था।" आत्म-उद्घाटन के मूड में, और गहरे स्वर से सायो ने कहा, "मेरे चवा ने खुद आत्महत्या की मैनचेस्टर गन से । लेकिन........' उसके इतने कहने पर हो मेरे अवरुद्ध भाव खुल-से गये । भात्महत्या के विषय में अस्वस्थ जिज्ञासा प्रकट करते हुए मैंने बात बढ़ायो, "हरेक आदमी जोश में आकर मात्महत्या करने को कसम भी खा लेता है। अपनी उद्विग्न चिन्तातुर कलना की दुनिया में मर भी जाता है, पर आत्महत्या करने की हिम्मत करना आसान नहीं है। वायोलॉजिकल शक्ति बरावर जोवित रखे रहती है।" दोस्त का मन जैसे किसी भार से मुक्त हो गया था। उसने सवाई- भरे स्वर मे कहा, "मैं तो हिम्मत भी कर चुका पा, साहब ! हूब मरने के लिए पूरी तौर से तैयार होकर मैं रात के दस बजे घर से निकला, पर इस सियाह पानी को भयानक विकरालता ने इतना हरा दिया था कि किनारे पर पहुँचने के साथ हो मेरा पहला खयाल मर गया और दूसरे खयाल ने जिन्दगी में आशा बांधी। उस आशा की कल्पना को पलायन भी कहा जा सकता है। प्रथम माव-पारा के विरुद्ध उज्ज्वल भाव-धारा चलने लगी। सियाह पानी के आतंक ने मुझे पोछे हटा दिया...वन्दूक से मर जाना और है, वीरान जगह पर रात को तालाब में मर जाने को हिम्मत करना दूसरी चीज !" मिन ठठाकर हंस पड़ा। उसने कहा, "आत्महत्या करनेवालों के निजी सवाल इवना उलझे हुए नहीं होते जितने उनके अन्दर के विरोधी तत्त्व, जिनके अघोन प्रवृत्तियों का आपसी झगड़ा इतना तेज हो जाता है कि नयी ऊँचाई छू लेता है। जहां से एक रास्ता जाता है जिन्दगी और नयो जिन्दगी को ओर, तो दूसरा है मौत को तरफ जिसका एक रूप है आत्महत्या। मित्र के थोड़े उत्तेजित स्वर से हो मैं समझ गया कि उसके दिल में किसी कहानी को गोल-गोल घूमती भंवर है । उसके भावों को गूंज मेरो तरफ़ ऐसे छा रही थी मानो एक वाता- धरण बना रही हो। मैं उसके मूह से आक्रान्त हो गया था। मेरे पैर अन्दर नसों में किसी ठण्डी संवेदना के करेण्ट का अनुभव कर रहे थे। उसके दिल के अन्दर छिी कहानो को धीरे से अनजाने निकाल लेने को बुद्धि से प्रेरित होकर मैंने कहा, "यहां भो तो आत्महत्याएँ यह कहकर मैंने तालाव के पुरे सियाह फैलाव को देखा, उसको ज़िन्दगी को कतरन काली गहराई पर एक पल नजर गड़ायी । सूना की ओर दृष्टि फेरी और फिर अंधेरे में अर्ध-लुप्त किन्तु समीपस्थ, की ओर निहारा और फिर किसी अज्ञेय संकेत को पाकर मैं किनारे रा हटकर एक मोर बैठ गया। फिर सोचा कि दोस्त ने मेरो यह हलचल देख ली होगी। इसलिए की ओर गहरी दृष्टि डालकर उसकी मुख-मुद्रा देखने की चेष्टा कर .. दोस्त की भाव-मुद्रा अविचल थी। घुटनों को पैरों से समेट वहां बैठा हुआ था। उसका चेहरा पाषाण-मूर्ति के मुख के अविचल भाव-सा प्रकट करता था। कुछ लम्वे और गोल कपोलों की मांसपेशियाँ विलकुल स्थिर थीं। या तो वह आधा सो रहा था, अथवा निश्चित रूप,से भावहीन मस्तिष्क के सांवले धुंधलेपन में खो गया था, किंवा किसी घनीभूतः चेतना के कारण निस्तब्ध-सा लगता था। मैं इसका कुछ निश्चय न कर सका मेरी इस खोज-भरी दृष्टि से अस्थिर होकर उसने जवाब दिय "क्यों, क्या बात है ?" उसके प्रश्न के शान्त स्वर से सन्तुष्ट होकर मैंने दोहराया, "इस तालाव में भी तो कइयों ने जानें दी हैं !" "हां, किन्तु उसमें भी एक विशेषता है," उसने अर्थ-भरे स्वर में हंसते हुए कहा । फिर वह कहता गया, "इस तालाब में जान देने वे आये हैं जिन्हें एक श्रेणी में रखा जा सकता है । जिन्दगी से उकताये और घबराये पर ग्लानि के लम्बे काल में उस व्यक्ति ने न मालूम क्या-क्या सोचा होगा अपनी ज़िन्दगी की ऊष्मा और आशय समाप्त होता जान, उसने अनजा अंधेरे पानी की गहराइयों में वाइजत डूब मरने का हौसला किया । उसे पूरा कर डाला । तुम तो जानते हो, अधेड़ तो वह था हो, बच्चे भी न थे। कोई आगे न पीछे। उसकी लाश पानी में न म कहाँ अटक गयी थी। तालाव से सड़ी बास आती थी। किन्तु जब उठी तो उसकी तेलिया काली घोती दूर तक पानी में फैली हुई थी सतह से उठता उसी तरह वह तुम्हारा तिवारी । वह पुरै को तेलिन, पाराशर के घर की बहू । “ये सब सामाजिक-पारिवारिक उसीड़न के ही तो शिकार ये" उसके इन शब्दों ने मुझमें अस्वस्थ कुतूहल को जगा दिया। मेरी कल्पना उद्दीप्त हो उठी। बसों के सामने जलते हुए फॉसफोरसो रंग के भयानक चित्र तरने लगे, और मैं किसी गुहा के अन्दर सिकुड़ी ठण्डी नलीदार मार्ग के अंधेरे में उस आग के प्रज्वलित स्थान की ओर जाता- सा प्रतीत हुआ जो उस गुहा के किसी निभृत कोण में क्रुद्ध होकर जल रही है-जिस आग में ( मानो किन्ही क्रूर आदिम निवामियों ने, जो वहाँ दीखते नहीं है, लापता है ) मांस के वै टुकड़े भूने जाने के लिए रखे हैं जो मुझे ज्ञात होते से लगते हैं कि वे किस प्रापो के हैं, किस व्यक्ति मेरे अस्वस्थ कुतूहल के धक्के ने मुझे ही विचलित कर दिया। मैं वे सब कहानियां जानता था जो मुझे वतायी जा रही थीं। किन्तु फिर भी में उन्हें सुनना चाहता था, दोबारा । मैंने उल्लुक दृष्टि से उनकी ओर देखा जिसका अर्थ था: बदामओ, क्या कहना चाहते हो ? उसने कहना जारी रखा, "माज तक इस सियाह तालाब में सामा- जिक और आर्थिक रसोड़न से ग्रस्त लोगों ने हो जाने दी है। यहां मरे लोगों का तुम श्रेणी विभाजन कर सकते हो। एक शंकर-जैते लोग- वह शंकर जो चक्की के पास रहता था। (मैंने सिर हिलाया : मालूम है, मालूम है!) उसकी स्त्री का उसकी आँखों के सामने हरामजादे कालूराम के गुण्डों ने अपहरण किया और वह चिल्लाता-वीसता रहा । शंकर ने पत्नी-वियोग से जान नहीं दो, किन्तु इस घटना के द्वारा अपनी असहायता का जो बोध उसे हुआ उस दोष ने ही उसको कुचल डाला। पली के जाने के बाद यह कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहा । सामा- जिक लग्जा, नपुंसक क्रोध और असहायता ने उठे दोन-हीन बना दिया पा। प्रेमी युगल यहां मरने नहीं आते हैं । वे अकसर जाते हैं अधामिरी, जिन्दगी की कतरन काकी स्वभावगत चंचलता तो काफूर थी ही, पर । उनको मरने के लिए भी अच्छी-खासी रोमैण्टिक जगह चाहिए मरनेवालों की गुज़री जिन्दगो....... उसका मेरे लिए इतना कहना ही काफ़ी था। रात में इस सियाह तालाब के किनारे जो लोग भी डूबकर मरे हैं उनकी लाइफ़-हिस्टरी में वखूबी जानता हूँ। हमारे महल्ले का एक-एक घर एक कहानी रखता है। मध्यवर्गीय समाज को सांवली गहराइयों की रुंघी हवा की गन्धरे में इस तरह वाकिफ़ हूँ जैसे मल्लाह समन्दर की नमकीन हवा से । मेरी आंखों के सामने जिन्दगी के नक्शे उभरने-विखरने लगे। किन्तु उनके चक्कर से वचने और मित्र के प्रति अधिक ध्यान देने तथा इस बोध से कि उसने अभी अपनी पूरी वात नहीं कही है। कल्पनाओं के वे अनुकूल थों अथवा सियाह तालाब की उपस्थिति ने मेरे मन की अपनी अस्वस्थताओं को असाधारण रूप से उत्तेजित कर दिया था। यद्यपि बातचीत के दौरान मुझसे अधिक बात मेरे दोस्त ने की थी, फिर भी मुझे ऐसा सकारण प्रतीत हुआ मानो उससे तुलनानुसार कम बात करते हुए भी मैंने वार्तालाप की धारा को नियन्त्रित करते हुए अपनी इच्छानुसार चाहे जिधर मोड़ा, घुमाया-फिराया और एक ओर से दूस ओर कर दिया । कदाचित् मेरा दोस्त मुझसे कुछ और भी कहना चाह हो । शायद उसके मन में घूमती हुई वह कहानी निकल नहीं पा रही जो मैं चाहता हूँ कि बिना छेड़े ही किसी उपचेतन तर्क-धारा के अपने-आप ही सरसराती हुई निकल आये । मित्र ने मुझे तिवारी की कहानी पूरी तरह से सुना डाली। आत्महत्या के एक दिन पहले तिवारी से उसकी मुलाकात हुई थी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि वह खत्म हो जाने का इ रहा है । मित्र को जो बात उसके सम्बन्ध में अजीब-सी लगी अ वारे में उसने उससे पूछा और जिसका उसे सन्तोषजनक उ पाया वह यह कि तिवारी का चेहरा विचित्र रूप से जड़ी सतह से किसी जहीमून मावना ने ले लिया था मानो मस्तिक के अतुलनीय नार के द्वारा दबकर चेहरे को मांसोगियों के स्तर पनीभूत होकर जहीभूत हो गये हों। उसका चेहरा या लगता था मानो मिरगी से यदा-कदा बाक्रान्त रहने वाले मनुष्य का चेहरा ज्यों जागरण-काल में भी असाधारण रूप से मार-प्रस्त रहता है। किन्तु तिवारी की आँखों में कोई चिनगारी न पो, जिससे उसके मानसिक उद्वेग की ज्वाला झलक उठे। मित्र के तिवारी से मिलने के बाद शायद कुछ हुआ हो जिसने उसे आकस्मिक और नैमित्तिक रूप से वह भयानक कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया हो । निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता । यह सच है । एक दिन की बात है जब तिवारी से मिलने के लिए मेरा दोस्त गया या। बह शाम थी। मुख्य सड़क को छोड़कर बगलवाली गलो से घुसते एक पुराना वादा लगता था। उसके अंधेरे खतरनाक तीन जोने चढ़ जाने पर पुरानो पलस्तर को हुई ऊंची दीवारों से घिरा बहुत ही बड़ा कमरा, जिसे हॉल कह सकते हैं, लगता था। हॉल की बच्ची जमीन उसड़ी हुई पी और उसपर चिड़ियों की सफ़ेद विष्ठा के पन्चे इधर बिखरे हुए थे। कमरे के वातावरण को देखकर उसकी परित्यक्तावस्या और वीरानी का ही बोध होता था। सई सांझ ऐसे एकान्त हॉल में घुसने की संवेदना रुचिकर न यो । परन्तु तिवारी का कमरा फिर भी अभी तक मिला न या। इतने में परछाई-सा एक व्यक्ति न दिख सकनेवाली गैलरी में से माता हुआ दिखाई दिया। उससे पता चला कि तिवारी का कमरा वायो ओर है । बायीं ओर के छोटे-ठिंगने दरवाजे से घुसने पर एक पुरानो चांदनी लगी, जिसको मुंढेर पर वैफ़िकी के कारण पानो न देते रहने से सूखी हुई भूरी तुलसी और अन्य उसी तरह के दूसरे पौधे झुण्डों में लगे हुए थे जो हरियाली के अभाव में जंगलो, परित्यक्त और वोरानो को निशानो-से प्रतीत होते थे। वहीं खाट पड़ी हुई थी जिन पर मैले व फटे हुए विस्तरे इकट्टे भी नहीं किये गये थे। जिन्दगी की कतरन गोया उनको मरने के लिए भा अच्छा-खासा रामाण्टक जगह चाहिए । यहाँ मरनेवालों की गुजरी जिन्दगो......." उसका मेरे लिए इतना कहना ही काफ़ी था। रात में इस सियाह तालाब के किनारे जो लोग भी डूबकर मरे हैं उनकी लाइफ़-हिस्टरी मैं बखूबी जानता हूँ। हमारे महल्ले का एक-एक घर एक कहानी रखता है। मध्यवर्गीय समाज को सांवली गहराइयों की रुंधी हवा की गन्ध से मैं इस तरह वाकिफ़ हूँ जैसे मल्लाह समन्दर की नमकीन हवा से । मेरी आंखों के सामने जिन्दगी के नक्शे उभरने-विखरने लगे। किन्तु उनके चक्कर से बचने और मित्र के प्रति अधिक ध्यान देने तथा इस वोध से कि उसने अभी अपनी पूरी वात नहीं कही है। कल्पनामों के वे अनुकूल थों अथवा सियाह तालाव की उपस्थिति ने मेरे मन की अपनी अस्वस्थताओं को असाधारण रूप से उत्तेजित कर दिया था। यद्यपि बातचीत के दौरान मुझसे अधिक बात मेरे दोस्त ने की थी, फिर भी मुझे ऐसा सकारण प्रतीत हुआ मानो उससे तुलनानुसार कम बात करते हुए भी मैंने वार्तालाप की धारा को नियन्त्रित करते हुए अपनी इच्छानुसार चाहे जिधर मोड़ा, घुमाया-फिराया और एक ओर से दूसरी ओर कर दिया । कदाचित् मेरा दोस्त मुझसे कुछ और भी कहना चाहता हो । शायद उसके मन में घूमती हुई वह कहानी निकल नहीं पा रही हो जो मैं चाहता हूँ कि विना छेड़े ही किसी उपचेतन तर्क-धारा के द्वारा अपने-आप ही सरसराती हुई निकल आये । मित्र ने मुझे तिवारी की कहानी पूरी तरह से सुना डाली । उसको आत्महत्या के एक दिन पहले तिवारी से उसकी मुलाकात हुई थी, किन्तु कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि वह खत्म हो जाने का इरादा कर रहा है। मित्र को जो वात उसके सम्बन्ध में अजीव-सी लगी और जिसके वारे में उसने उससे पूछा और जिसका उसे सन्तोषजनक उत्तर न मिल पाया वह यह कि तिवारी का चेहरा विचित्र रूप से जड़ीभूत हो गया था। उसको स्वभावगत चंचलता तो काफूर थी ही, पर उसका स्थान सतह से उठता आदमी । किसी जड़ोमूत भावना ने ले लिया था मानो मस्तिष्क के माननीय भार के द्वारा दबकर चेहरे को मांसपेशियों के स्तर पनीभूत होकर नीमूत हो गये हों। उसका चेहरा यो लगता था मानो मिरगी से यहाकदा आक्रान्त रहने वाले मनुष्य का चेहरा ज्यों जागरण-काल में भी असाधारण रूप से भार-ग्रस्त रहता है। किन्तु तिवारी की आँखों में कोई चिनगारी न थी, जिससे उसके मानसिक उद्वेग की ज्वाला छलक उठे। मित्र विवारी से मिलने के बाद शायद कुछ हुआ हो जिसने उसे पाकस्मिक और नैमित्तिक रूप से वह भयानक कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया हो । निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता । यह सच है । एक दिन की बात है जब तिवारी से मिलने के लिए मेरा दोस्त गया था। वह शाम थी। मुख्य सड़क को छोड़कर बगलवाली गली से पुसते एक पुराना बाड़ा लगता था। उसके अंधेरे खतरनाक तीन जीने चढ़ जाने पर पुरानो पलस्तर को हुई ऊंची दीवारों से घिरा बहुत ही बड़ा कमरा, जिसे हॉल कह सकते हैं, लगता था। हॉल की कच्ची जमीन उखड़ी हुई पो और उसपर चिड़ियों की सफेद विष्ठा के पन्चे इधर बिखरे हुए कमरे के वातावरण को देखकर उसको परित्यक्तावस्या और वीरानी का ही बोध होता था। सई सांझ ऐसे एकान्त हॉल में घुसने की संवेदना रुचिकर न थी। परन्तु तिवारी का कमरा फिर भी अभी तक मिलान था। इतने में परछाई-सा एक व्यक्ति न दिख सकनेवाली गैलरी में से माता हुआ दिखाई दिया। उससे पता चला कि तिवारी का कमरा वायो भोर है। बायीं ओर के छोटे-ठिंगने दरवाजे से घुसने पर एक पुरानो चादनी लगी, जिसकी मुंडेर पर बेफ़िक्री के कारण पानी न देते रहने से भूमो हुई भूरी तुलगी और अन्य उसी तरह के दूसरे पौधे झुण्डों में लगे हुए थे जो हरियाली के अभाव में जंगली, परित्यक्त और वीरानी की निशानी में प्रतीत होते थे। वहीं खाटें पड़ी हुई थीं जिन पर मैले व फटे हर विसरे इकट्ठ भी नहीं किये गये पे। जिन्दगी को कतरन - -- "तिवारी महाराज, तिवारी !" मित्र ने हांफते हुए आवाज लगायी। तीसरी खाट पर दरवाजे की ओर पीठ किये हुए तिवारी बैठा हुआ था। इतनी जोर की आवाज़ से चकित होकर तिवारी ने मुड़कर पीछे देखा और उसके चेहरे पर बलात् मुसकान खेल गयी । मित्र ने हांफते हुए प्रवेश किया-"वाप रे ! क्या आपके जीने हैं ! क्या आपका वाड़ा है ! पूरा किला है ! तिलिस्म है, तिलिस्म है तिलिस्म !" कहकर वह खिलखिलाकर हँस पड़ा। तिवारी ने मुसकराकर जवाव दिया, "आलाहज़रत, इस जीने से आदमी सीधा स्वर्गधाम पहुंचता है। मित्र ने डूबती हुई सांझ को प्रत्यक्ष करके कहा, "भाई, मैं बिलकुल जाने के लिए तैयार नहीं, मेरी तो अभी शादी होनी है।" और दोनों जने इसी तरह आगे वातचीत करते रहे। वार्तालाप तिवारी से प्रेरित होकर मिन की शादी के बारे में ही था। तिवारी लगातार मजाक करता जाता था और ताने कसता जाता था, यद्यपि मित्र को रह-रहकर यह लगता कि अपने मीठे स्वभाव के विपरीत तिवारी व्यंग्य क्यों कर रहा है और वह भी स्वयं मेरे विषय की चर्चा छेड़कर ! दूसरे, सानेकशी मोर मजाक वह इस तरह से करता था मानो उनके लिए श्रम कर रहा हो। कृत्रिम रूप से उन्हें मन में उकसाने की चेष्टा कर रहा है। निस्सन्देह, यह उसके स्वभाव के विपरीत था। फिर वह अपने तानों और व्यंग्यों पर विजय-हर्प से हँस भी न पाता जैसा कि अकसर लोग किया करते हैं। इन सब बातों को देखकर इसका रहस्य जानने की भावना से मित्र ने उसकी ओर गौर से देखा। तिवारी का चेहरा जड़ोभूत-सा था मानो दिमाग़ के किसी भयानक भार से दबकर चेहरे की मांसपेशियाँ प्रस्तरीभूत हो गयी हों। पलकें कुछ हलकी सूजी हुई-सी नौर मुख लाल-सा और आँखें भारी-भारी तथा ललाट को त्वचा निर्जीव और रक्तहीन ! मित्र का दिल घस-सा गया किन्तु अपनी भावनाओं को स्वयं वह โ% सतह से एठता आदमी २ ठीक पहचान न पाया। किसो दूर स्थित खतर का छाया अपना स्थात की घोषणा करती हुई भो प्रत्यक्ष और मूर्त नहीं हो पाती। एक बार उसको देखकर मन हर तो जाता है पर उसके रूप को पहचान नहीं पाता। इसलिए एक पल के वाद ही उसको भूलने का प्रयास कर मन उसे भूल जाने में कामयाब हो जाता है । वही स्थिति मित्र की भी हुई। मित्र ने पूछा, "क्यों, तुम्हारी तबीयत खराव है क्या ?" तिवारी ने बनावटी अचरज से कहा, "न, नही तो।" "चेहरा तो तुम्हारा न मालूम कसा मालूम होता है। रात को नीद नहीं पड़ी क्या ?" "हो, यार । कल रात को बहुत देर तक जगते रहे । "क्यों ?" "उपन्यास में कुछ ऐसा मन लगा कि बस ! समय का ध्यान ही न रहा ! और फिर मैं रात को जगता ही कब हूँ। उसके समस्त वातावरण का पान करता रहा, समझिए।" "वाह रे ! वातावरण का पान !" मित्र ने आश्चर्य और कुतूहल से उसकी ओर देखते हुए कहा । इस तरह की बातचीत चलती रहो। न मालूम किन-किन अवचेतन की घूमती हुई पगडण्डियो से चलकर तिवारी के मुंह से यह निकल पड़ा, किसी आत्मिक सन्दर्भ से, किन्तु बातचीत के बाहरी सिलसिले से जो मेरे मित्र के शब्दों में निम्नलिखित प्रकार से है । "सोच नहीं पाता हूँ मैं कि आखिर यह सब क्यों ? सुबह से शाम तक न मालूम कितना पैसा खर्च हो जाता है, दोस्तों में, इधर-उधर ! किन्तु सिवा समप कटने के और कुछ ही नहीं पाता। पढने में मेरा जी नहीं लगता । पढने से फायदा क्या-नौकरी मिलेगी, जीविका चलेगी । लेकिन यह इतना महान् लक्ष्य नहीं है कि जो जिन्दगी को अपनी ओर सोचता रहे, उसे, अपने आकर्षण से मन्त्रमुग्ध कर डाले !! सवाल सचमुच मन्त्रमुग्ध कर डालने का ही है। लेकिन फिर मैं पढ़ता ही रहता हूँ, . जिन्दगी को कवरना - का पि वह खाली-खाली-सा लगता है जैसे मैं आसमान के खाली सहाय अवस्था में उड़ता रहूँ। अध्ययन न करूं तो आत्मा स्वयं को हो कष्ट देती है। कमा नहीं लेता हूँ, ऐसा थोड़े ही है। सवा सौ महीना मेरे लिए काफ़ी है। न मां, न बाप, न भाई, न बहन ! फिर भी कमाने की क्या आवश्यकता है, मित्रों को क्या आवश्यकता है, स्वयं की क्या आव- श्यकता है । रास्ते में अकेले घूमते फिरना, या फिर किसी दोस्त को पकड़- कर पैसा खर्च करना! स्वयं से घबराहट अपने खालीपन से भय ! यही तो मूल कारण है। फिर ( हंसते हुए ) कहा इश्क़ !! वह हरेक को नहीं मिला करता। वह संयोग की बात है। प्रत्येक आकर्षण इश्क नहीं है। यह मैं समझता हूँ। आकर्षण का अपना एक मजा है, पर उसमें अनुराग उद्देश्य क्या है ? इश्क का भी आखिर मतलन क्या ? जो सिनेमाओं और कहानियों में बतलाया जाता है, मूर्खतापूर्ण है सब वात ! मुझे सचमुच समझ में नहीं आता कि ज़िन्दगी क्यों है ? महीने में तनख्वाह मिलते ही मैं अपनी भाभियों ( दोस्तों की स्त्रियों) और उनके बच्चों को खिलौने ला देता हूँ। खिलौने देकर भी कोई खास सन्तोष नहीं होता आखिर, अन्दर के खालीपन को भरने के लिए ही तो यह सब किया ग है। कोई मुझे समझाये कि शादी करके कौन-सा सुख है ! मेरे दोस्तों शादियां की, घर वसाया। और ऐसी अपनी मिट्टी पलीद कर ली देखते ही बनता है । जिन्दगी है या ज़िन्दगी की कतरन ! समज्ञ में आता अगर जिन्दगी मनबहलाव है तो बाज़ आया ऐसे मनबहला क्योंकि इस तरह का मनबहलाव सिर्फ़ खालीपन और उदासी है जाता है । जीवन में यदि केन्द्र स्थान न हो तो बड़ी भारी कोलाह भीड़ में रहते हुए भी आप अकेले हैं, और यदि वह है तो रेगि सूने मैदानों पर भी मापको सहचरत्व प्राप्त है और ज़िन्दगी है !! सिर्फ़ उपन्यास, पैसा, कमाई और अध्ययन, शादी इत्या कुछ नहीं है उसका उसके परे कुछ वृहद् लक्ष्य है और होन किन्तु वह सबको मालूम नहीं है, न तिवारी को आज मालू सतह से लिए वह आज छटपटा रहा है।" मित्र तिवारी के सम्बन्ध में कहता गया, "इस आशय को उसने बातचीत की । यह नहीं कि वह सिलसिलेवार कहता गया । उसके मुंह से उसको गुत्यियो निकालनी पड़ी, लेकिन मैं उन गुत्थियों को हल न कर सका। सन्तोषजनक उत्तर न दे सका । वह एक मनोवैज्ञानिक पल था। उसमें मेरे सभी उत्तर फोके पड़ गये। मैंने तिवारी को समाज की व्यवस्था और स्थिति समझायो, उसे बतलाया कि उसका आईसोलेशन ही उसको जिन्दगी के खालीपन का कारण है। आकर्षणहीनता का जो रोग उसे हो गया है वह तभी दूर हो सकता है जब वह समाज के लिए उसमोगी बने, सामाजिक कार्य करे। उसे मैंने साम्यवाद के भी सिद्धान्त बतलाये, उसके अन्तर्गत सामाजिक क्रान्ति के महत्त्व को भी उसके सामने संक्षेप में व्याख्या को, पर उसका प्रभाव न हो पाया। वह क्षण ही वैसा था। तिवारी से विदा लेते वक्त मैंने उसे अपनी तबीयत को फ़िक्र लेने के लिए कहा, जिसे सुनकर उसने जवाब दिया, "तबीयत खुद अपनी फिक ले लेगी, मुझे अपनी चिन्ता करनी चाहिए।" वह स्वर जिन्दगी से उकताये घोर निराश व्यक्ति का स्वर था। जब मैं नीचे उतर कर घर रवाना हुआ तब मैंने अपनेआप को दिलकुल पराजित अनुभव किया और सोचता रहा कि मुझे एक मास्टरपीस कहानी का मसाला मिल गया है। किन्तु आगे चलकर मैरी अपेक्षाएं भंग होने को थी । यह मैं उस समय जान न सका। दूसरे दिन शाम को यह सुना गया कि तिवारी ने आत्महत्या कर ली है। पाँच मिनिट स्तब्ध नीरवता के बाद मैंने मित्र से पूछा, "सुम सोचते हो कि उसने अपनी निःसंगता और अर्थहीनता के भाव के कारण यात्महत्या कर ली है!" उसने जवाब दिया, "पहले तो मेरा यही खयाल हुआ, पर वह गलत या ! उसकी आत्महत्या के सही कारण क्या है मुझे विस्तृत रूप जिन्दगी की कतरन' - - है खाली-खाली-सा लगता है जैसे मैं आसमान के अवस्था में उड़ता रहूँ। अध्ययन न करूं तो आत्मा स्वयं को हो है। कमा नहीं लेता हूँ, ऐसा थोड़े ही है। सवा सौ महीना मेरे काफ़ी है । न मां, न वाप, न भाई, न वहन ! फिर भी कमाने की आवश्यकता है, मित्रों की क्या आवश्यकता है, स्वयं की क्या आव- ता है। रास्ते में अकेले घूमते फिरना, या फिर किसी दोस्त को पकड़- पैसा खर्च करना ! स्वयं से घबराहट अपने खालीपन से भय ! यही मूल कारण है। फिर ( हंसते हुए ) कहा इश्क !! वह हरेक को नहीं मला करता। वह संयोग की बात है। प्रत्येक आकर्पण इश्क नहीं है, यह मैं समझता हूँ। आकर्षण का अपना एक मज़ा है, पर उसमें अनुराग का उद्देश्य क्या है ? इश्क का भी आखिर मतलब क्या ? जो सिनेमाओं और कहानियों में बतलाया जाता है, मूर्खतापूर्ण है सब वात ! मुझे सचमुच समझ में नहीं आता कि जिन्दगी क्यों है ? महीने में तनख्वाह मिलते ही मैं अपनी भाभियों ( दोस्तों की स्त्रियों) और उनके बच्चों को खिलौने ला देता हूँ। खिलौने देकर भी कोई खास सन्तोष नहीं होता। आखिर, अन्दर के खालीपन को भरने के लिए ही तो यह सब किया गया है। कोई मुझे समझाये कि शादी करके कौन-सा सुख है ! मेरे दोस्तों ने शादियां की, घर बसाया। और ऐसी अपनी मिट्टी पलीद कर ली कि देखते ही बनता है । जिन्दगी है या ज़िन्दगी की कतरन ! समझ में नहीं आता अगर जिन्दगी मनबहलाव है तो बाज़ आया ऐसे मनबहलाव से क्योंकि इस तरह का मनबहलाव सिर्फ खालीपन और उदासी ही छो जाता है । जीवन में यदि केन्द्र स्थान न हो तो बड़ी भारी कोलाहल भ भीड़ में रहते हुए भी आप अकेले हैं, और यदि वह है तो रेगिस्तान सूने मैदानों पर भी आपको सहचरत्व प्राप्त है और ज़िन्दगी भरी- है !! सिर्फ़ उपन्यास, पैसा, कमाई और अध्ययन, शादी इत्यादि म कुछ नहीं है उसका उसके परे कुछ वृहद् लक्ष्य है और होना चा किन्तु वह सबको मालूम नहीं है, न तिवारी को आज मालूम है; . सतह से उठता हुए वह मुझे कमी दिखाई नहीं दी। कभी मैंने उसे हंसते हुए भी नहीं देखा । उस समय उसको मायु माठ या नौ साल के निकट होगी। उसके भाई के घर से हमारे घर का घरोझा या। इस लिए वह कमी-कभी हमारे यहां आया करतो थी, सो भो किसी काम से । मुझे उसके शब्द अनी तक याद आ रहे है हमारी भाभी ने चलनी मंगायी है, हमारी भाभी ने मूसल मंगाया है' आदि । कभी कमी मेरी स्त्री पूछती, 'मोजन कर लिया ।' 'हओ। 'क्या-चया खाया आज।' 'सब खाया। 'सुन तो! फिर वह क्या-क्या खाया, यह गिनाने लगती । दाल, भात, तरकारी रोटो, धो, चटनी। उसके बोलने को मीठो शैली से स्त्री प्रसन्न होती। किन्तु मैं अन्य कारण से नाराज होता । मैं जानता था कि वे लोग बड़े गरोष है हमसे बहुत ज्यादा गरीब । मैं जानता था कि गरीबों का भोजन क्या होता है ! स्त्री के इस प्रश्न और निर्मला के उत्तर के साप हो मेरा मन विविध करुणा से भर उठता। मैं जानता था इस तरह का सवाल गरीबों का अपमान है। इस भाव के फरस्वरूप में अपनो स्त्री पर अधिक नाराज हो उठता। निर्मला का चेहरा मुझे बहुत भाता। उसको गम्भीर उदास मासे, और दूज के फोके चांद-सा उसका मुखड़ा । ( उन दिनों के ) दुअन्नी वार सफ़ेद कपड़े का पोलका । उसकी गरीबो, मातृ-पितृहीनता और स्वमावगत अनावश्यक गम्भीरता ने मेरे हृदय में घर कर लिया। अपनी उस छोटी उम्र में भी यह घर का सब काम करतो तया उसके मत भी वहे-चूडों के समान रहो। मैं जानता था कि उसका मस्तिष्क और हृदय दलित और पोहित है। किन्तु उससे उद्धार का कोई राय न था। गरीब बड़े भाई ने उसकी जिन्दगी को कतरन लूम नहों।" किन्तु मेरा सोचना है कि पाराशर की वहू से उसका सम्बन्ध रहा ा, जहाँ कि वह अकसर आता-जाता रहा है। मित्र के मुंह से पाराशर को बहू का नाम सुनकर मेरे शरीर में काएक ठण्डी संवेदना नखशिख तक दौड़ गयी और दिल बैठता-सा मालूम हुमा । मैं मन ही मन बुदबुदाया, "आखिर, मेरी अपेक्षा सच ही निकली।" आंखों के सामने पाराशर की बहू का चित्र आ गया और उसका जीवन-चरित्र आरम्भ से अन्त तक मेरे मन में घूम गया। किन्तु मेरी इस मनःस्थिति से अनभिज्ञ मेरा दोस्त कहता ही चला गया, "तिवारी की आत्महत्या के दो या तीन दिन बाद तालाब के इसी उत्तर-पश्चिमी कोने में पीपल के पेड़ के नीचे उस टूटे घाट पर से उसने परमधाम प्राप्त किया । वहाने के लिए, वह अपने घोने के कपड़े लेती आयी थी। उनमें से आधे पानी में डूबी हुई पहली सीढ़ी पर ही पाये गये । और आधे ऊपर सूखी हुई जगह पर ही रखे थे। दूसरे दिन सुबह उसकी लाश करीब दस बजे ऊपर आती दिखाई दी। काई से आच्छादित रहने के कारण उसका शरीर हरा दिखाई देता था। उसका वह रूप बहुत ही भयानक था । वह नजारा मैंने अपनी आँखों देखा है...." एक गहरी सांस लेकर मेरा मित्र कहते-कहते रुक गया। हमारे दोनों के बीच गहरी निस्तब्धता छा गयी। किन्तु मेरा मन स्तब्ध नहीं था। आंखों के सामने पाराशर के को बहू का चित्र मूर्त हो उठा था । उसकी गोरी छुई-मुई-सी सूरत मुझे अब भी याद आती है। व में उसका चेहरा अत्यन्त मोहक था। अण्डाकार गौर वदन और कहती हुई सी गहरी उदास आंखें । वह एक निस्संग नीरव वालिका जब मैं उसके बड़े भाई के यहां कार्यवश जाया करता था तो वह देती । परछाई-सी एक तरफ़ से दूसरी तरफ निकल जाती । वस । - से उठता सतह २ ४ हुए वह मुझे कभी दिखाई नहीं दी। कभी मैंने उसे हंसते हुए भी नहीं देखा । उस समय उसको आयु आठ या नौ साल के निकट होगी। उसके भाई के घर से हमारे घर का घरौआ था। इस लिए वह कभी-कभी हमारे यहाँ बाया करती थी, सो भी किसी काम से। मुझे उसके शब्द अभी तक याद आ रहे हैं-'हमारी भाभी ने चलनी मंगायी है, हमारी भाभी ने मूसल मेंगाया है' आदि । कमी-कमी मेरी स्त्री पूछती, 'भोजन कर लिया।' 'हो।' 'क्या-क्या खाया आज।' 'सव खाया। 'सुनूं तो! फिर वह क्या-क्या खाया, यह गिनाने लगती । दाल, भात, तरकारी रोटो, घो, चटनी। उसके बोलने की मोठी शैली से स्त्री प्रसन्न होती। किन्तु मैं अन्य कारण से नाराज होता। मैं जानता था कि वे लोग बड़े गरीव हैं हमसे बहुत ज्यादा गरीब । मैं जानता था कि गरीबों का भोजन चपा होता है ! स्त्री के इस प्रश्न और निर्मला के उत्तर के साथ ही मेरा मन विचित्र करुणा से भर उठता। मैं जानता था इस तरह का सवाल गरीवों का अपमान है । इस भाव के फरस्वरूप में अपनी स्त्री पर अधिक नाराज हो उठता। निर्मला का चेहरा मुझे बहुत भाता । उसको गम्भीर उदास आखें, और दूज के फोके चांद-सा उसका मुखड़ा । ( उन दिनों के ) दुअन्नी पार सफ़ेद कपड़े का पोलका । उसकी गरीवी, मातृ-पितृहीनता और स्वभावगत अनावश्यक गम्भीरता ने मेरे हृदय में घर कर लिया। अपनी उस छोटी उम्र में भी वह घर का सब काम करतो तथा उसके मत भी बड़े-बूढ़ों के समान रहते । मैं जानता था कि उसका मस्तिष्क और हृदय दलित और पीड़ित है । किन्तु उससे उद्धार का कोई राय न था। गरोद वहे भाई ने उसको जिन्दगी को कवरन २५ । उससे कुछ अच्छी स्थिति वाले घर में कर दी। यहीं से उसक न्दगी ने पलटा खाया। उस संयुक्त परिवार को खानदानियत का रोग ।। अपने कुलशोल के कारण, भावों को दबा कर वह अपनी जिन्दगी सर करने लगी। किन्तु, उस घर में रहने का औचित्य प्रदान करने चाली स्थिति यानी पति का अस्तित्व थोड़े ही दिनों में खत्म हो गया। उसकी बीमारी में निर्मला के जो भी गहने थे सब व्यय हो गये। विधवा जीवन के चार वर्ष उसने भौजाइयों के कैदखाने में काटे । उसका चेहरा बदल गया था । गौर मुख सूख चुका था। गालों की हड्डियाँ और नाजुक नाक ऊपर उभर आयी थी। मानो सारे शरीर पर उन्हीं का शासन हो । आँखों के आस-पास त्वचा सूखकर काली पड़ गयी घी । नेत्र में घुआ था, वह धुआं जिसका निमित्त पहचाना जा सकने पर भी, उसके वास्तविक कारण का आकलन नहीं किया जा सकता था। आखिर, निर्मला का भविष्य यह था। एक बार वह अपने घर पर थी, बड़े भाई के मृत्यु के अवसर पर । तब मैंने उसे फूट-फूट कर हुए देखा था। वह उसका युगयुगान्त का अकेला मन रो रहा था संगता धार मारकर क्रन्दन कर रही थी। अपनी इसी असहाय स्थिा उसे अपने मृत पति के घर वापस आना पड़ा, मात्र आजीविका के लिए वह स्वाधीन होना चाहती थी किन्तु, पढ़ी-लिखी न थी। जन्म कठोर कार्यदक्षता के कारण वह उस संयुक्त परिवार में अत्यन्त उपर थी। इसलिए उसकी स्थिति घर के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक एक दिन वह मुझे रास्ते में मिली। मैं रुकना चाहता था। रुकना चाहती थी पर हम दोनों एक दूसरे के लिए रुके नहीं। लज्जा-संकोच-भय की दीवार खड़ी थी। जव वह मेरे दृष्टि पथ पर से गुजर कर निकल गयी, तब मुड़कर देखा। वह, वैसी ही धीमी गति से चली जा रही थी व्यवस्था-बद्ध साड़ी उसकी परिस्कृत रुचि की परिचायक थी से आवाज़ लगानी चाही। किन्तु, न लगा सका । किन्तु यह व सतह से श्रेणी में फूलों की माला पिरोयी हुई थी ! क्या यह नया संकेत नही था ? में उसकी जिन्दगी पर सोचने लगा। मेरे मन में उसकी हजारों यादें थी। उसकी दुख भरी जिन्दगी क्या केवल उसो की है ! नहीं, बहुतों की ऐसी ही है। किन्तु, उसके जीवन में मुझे एक विशेषता नजर थायी । विशेषता क्यों नजर आयी? अन्यों में पयो नहीं दिखी ? क्या सब निविशेष और वही विशेष है ? इन प्रश्नों का जवाब में नहीं दे सका। किन्तु एक बात जानता हूँ कि उसकी सहज बुद्धि जितनी तीव्र थी उतना हो आत्मदमन घोर था। वह एक सचाई के बल पर अपनी सब प्रवृत्तियों को दवा रही थी। वह सचाई क्या थी, मैं ठीक-ठीक नही बतला सकता। उसका किंचित् वर्णन कर सकता हूँ। वह यह कि उसके अपने मनोभाव है, जो आज तक किसी पर प्रकट नहीं हुए। उनके प्रति को गयो चुरा- इयो और अन्याय उनके मन में घिरकर, घुसकर एक विशेष प्रकार को वचकठोरता प्रदान करता है। यह आत्मदमनशील वचकठोरता ही वह सत्य है जिसने निर्मला की गतिविधि को एक विशेष प्रकार को भव्यता, दूरी भरी स्पृहणीयता और जिन्दगी के असंख्य अपमानों के बावजूद अपनी बचपन से चली भा रही मनोभावनाओं का गौरव प्रदान किया है, जो बदल है और जिसे डिगाया नहीं जा सकता। किन्तु यह क्या ? उसकी वेणी में फूल की यह माला कैसी ! इस बात ने मेरे हृदय में एक ही बात साफ़ रख दी कि माखिरकार निर्मला के प्राणों में कहीं तो भी जीवन अंकुरित हो रहा है। निस्सन्देह मैंने सोचा, उसे पल्लवित हो उठना चाहिए । समस्त बन्धन तोड़कर, निर्मला को जिन्दगी में आगे बढ जाना चाहिए। मैंने उसे उसके बाद नहीं देखा। केवल यह सुना कि उस संयुक्त परिवार के खानदानियत के कारण, यह जड़ीभूत जिन्दगी की मिट्टी में डिन्दा गाड़ दी गयी और कत्र के अन्दर के अंधेरे में उसने उस संयुक्त परिवार के लेंगहे होमियोंय सदस्य से अपना सम्बन्ध स्थापित कर अपने पवित होने का प्रमाण-पत्र हासिल कर लिया । अर्थात् एक मृत पुत्र किया। इस अफ़वाह के बाद की स्थिति में नहीं जानता। मैंने उसे बहुत गों से देखा ही नहीं था। नहीं जानता कि तिवारी की पहचान कैसे हो पी, और वे दोनों कैसे यहां तक बढ़ गये । किन्तु पाराशर के परिवार में तो विगत दस वर्ष में कई परिवर्तन हो गये थे। वह इकाई स्वयं छिन्न- भिन्न होकर नवीन इकाइयों में रूपान्तरित हो गयी थी। किन्तु, निर्मला तो अपने जेठ के पास ही रहती थी। उसी घर में अपनी जेठानी के अनु- शासन में । मुझे आश्चर्य है कि तिवारी की वहाँ कैसे पहुँच हो गयो । फिर भी अपने मित्र से तिवारी और निर्मला की खबर सुनकर प्रारम्भ में तो नहीं किन्तु कुछ क्षणों बाद मैं खुश ही हुआ। तिवारी ने उस लड़की को पहचाना, इतना क्या कम है । तिवारी स्वयं बहुत ही संजीदा, साथ ही बहुत हृदयवान् प्राणी था, इसमें किसी को सन्देह नहीं है । निर्मला और वह एक दूसरे का सुख-दुख देख पाये यह मेरे और मेरी स्त्री के लिए खुशी की बात है। निर्मला और तिवारी जैसे सैकड़ों पड़े हैं यह उन दोनों के महत्त्व को कम नहीं करता, ऐसा मुझे लगा। किन्तु, अपने मित्र से तिवारी और पाराशर की बहू निर्मला का हाल सुनकर मैं उस सियाह तालाब के विकराल आकार-प्रकार से घबरा-सा गया, और मुझे लगा कि न मालूम कितनी निर्मलाएं यहां जल-समाधि लेतं होंगी! साथ ही मेरे मन में निर्मला को तसवीर साफ़-साफ़ खिंच आयो मित्र बौर मेरे बीच में पन्द्रह-बीस मिनट का घनघोर मौन था मैंने वह भंग किया, "तो सचमुच ! तिवारी का निर्मला से सम रहा ?" जवाव में, मित्र हँस दिया। एक पल, मौन के बाद बोला, के लिए मसाला तो मिला, वह कहानी जो कभी नहीं लिखो जायेग मुझे सूझा, "ऐसी जिन्दा धटनाओं से कहानी नहीं बनतो। इतिहास है। पर, क्यों जी, क्या यह सच है कि तिवारी से नि अनुचित सम्बन्ध रह गया। अगर यह ठीक है, तो बहुत बुरी से उठ सतह गयी। आई ऐम सॉरी पार हर-मुझे निर्मला के लिए दुस है। मित्र ने कुतूहल से पूछा, "क्यों ? में दो इस पर दुशो नहो!" "मैंने निर्मला को बहुत ही पवित्र रूप में देखा है। मैं उसे इस परि- वतित स्थिति में देखने का अभ्यस्त नहीं हूँ, न देखना चाहता हूँ...' सियाह तालाब के उस पार से उन्हो हवा बहने लगी। रात को गम्भीर मुद्रा अपरिवर्तित थी। उसका गहरा विस्तृत मौन कान में कुछ बोलता हुआ-सा लगता था। दूर, सामने को सड़क के कोने पर नीली रोशनी वाली होटल अभी तक खुली हुई थी। सड़क पर इक्के-दुक्के मादमी आते-जाते दिखाई दे रहे थे। इतने में फायर ब्रिगेड को दो मोटरें जोर-जोर से घण्टी बजाती और सुनसान को गुंजाती हुई गुजर गयो । जाने कहां आग लगी थी। हम तालाब के किनारे पर उसी स्थान पर स्थिर बैठे हुए थे। फायर ब्रिगेड की मोटरों ने हमारा ध्यान भंग कर दिया। यह इच्छा कि स्थान बदल दिया जाये। मैं सहसा उठ बैठा और सिगरेट ले आता हूँ, कहकर उस होटल की तरफ चलता बना जहां पान की दुकान रहने की अपेक्षा थी। मेरा मन अपनेआप से ही बात करता जाता था। सच है कि मैं निर्मला को जिन्दगी में हरियाव, उत्फुल्लता और गति चाहता था पर, वहाँ मात्र अगति और दुर्गति नज़र आयो । क्या वह जीवन अपने आप में पवित्र या? एक तरह से था भी, क्योंकि उस अगति के जड़ीमूत क्षेत्र की सोमा के अन्दर जो साहस निर्मला ने किया वह एकदम गलत था। टमने अगति को बढ़ा दिया, उसे अधिक भयावह कर दिया। इसमे तो उसका प्रारम्भिक मूल मगतिमय जीवन ही क्या बुरा था? उसमें यक-मां दी तो थी, एक धने हुए मार्ग से सामंजस्य तो था, चाहे वह रिटदा हो आत्म-हननकारी तथा जीवन-हननशील हो । जिन्दगी की कोई भी बदादा दोत्र, स्थिति या पल इतने बुरे नहीं होते, जब तक उन्हें छिमी नाकार के सामंजस्य का आधार प्राप्त होता रहता है। यदि यह मानाय बुरा है, अपवित्र है या अवनति की ओर ले जाने वाला है तो उसे वदल कर नयी परिस्थिति पैदा करके नया सामंजस्य पैदा करना वाहिए । किन्तु मैं जानता हूँ। निर्मला के लिए यह असम्भव ही नहीं, उसको स्थिति-परिस्थिति की भयानक दुःस्थिति में इसके अलावा कदाचित् हो कोई दूसरा मार्ग रहा हो। यदि तिवारी ने उसको जिन्दगी में आकर कुछ हरियाली उत्पन्न की हो तो बहुत अच्छा है, परन्तु ऐसा प्रतीत नहीं होता। मैं सोचता चला गया। सतह से उठता समझौता अंधेरे से भरी, धुंधली, संकरी प्रदीर्घ कॉरिडार और पत्थर की दीवारें। ऊंची धन को गहरी कानिस पर एक जगह कबूतरों का घोंसला, और कभी-कभी गूंज उठनेवाली गुटरगूं, जो शाम के छह बजे के सूने को और भी गहरा कर देती है। सूनी कॉरिहार घूमकर एक जीने तक पहुँचती है । जीना ऊपर चढता है, बीच में रुकता है और फिर मुड़कर एक दूसरी प्रदीर्घ कारिद्वार में समाप्त होता है । सभी कमरे बन्द है । दरवाजों पर ताले लगे हैं। एक अजोव निर्जन, उदास सूनान इस दूसरी मंजिलको कॉरिडार में फैला हुआ है। मैं तेजी से बढ़ रहा हूँ। मेरी चप्पलों को आवाज नहीं होती । नोचे मार्ग पर टाट का मैटिंग किया गया है। दूर, सिर्फ एक कमरा सुला है । भोवर से कॉरिडार में रोशनी का एक खयाल फैला हुआ है । रोशनी नही, क्योंकि कमरे पर तक हरा परदा है । पहुंचने पर बाहर, धुंधले अंधेरै में एक आदमी बैठा हुआ दिखाई देता है। मैं उमको परवा नहीं करता। आगे बढ़ता हूँ और भीतर घुस जाता हूँ। कमरा जगमगा रहा है। मेरी आँखों में रोशनी भर जाती है। एक व्यक्ति काला ऊनी कोट पहने, जिसके सामने टेबिल पर कागज विखरे पहे है, अलसायो-धको मांसें पोछना हुमा मुसकराकर मुझसे कहता है, "आइए, हजूर, माइए !" मेरा जी घड़ककर रह जाता है, 'हजूर' शब्द पर मुझे आपति है। समझौता .
उसमें गहरा व्यंग्य है। उसमें एक भीतरो मार है। मैं कन्धों पर फटी अपनी शर्ट के बारे में सचेत हो उठता हूँ। कमर की जगह पैंट तानने के लिए वेल्टनुमा पट्टी के लिए जो बटन लगाया गया था, उसकी गैरहाजिरी से मेरी आत्मा भड़क उठती है । और मैं ईर्ष्या से उस व्यक्ति के नये फैशनेबल कोट की ओर देखने लगता हूँ और जवान चेहरे की ओर मुसकान भरकर कहता हूँ, "आपका काम खत्म हुआ " मेरी बात में बनावटी मैत्री का रंग है। उसका काम खत्म हुमा या नहीं, इससे मुझे मतलब? उसकी अलसायी थकान के दौर में वहाँ मेरा पहुँचना शायद उसे अच्छा लगा। शायद अपने काम से उसकी जो उकताहट थी, वह मेरे आने से भंग हुई। अकेलेपन से अपनी मुक्ति से प्रसन्न होकर उसने फैलते हुए कहा, "बैठो, बैठो, कुरसी लो !' उसका वचन सुनकर मैं धीरे-धीरे कुरसी पर बैठा। यदि कोई बड़ा अधिकारी छोटे को-बहुत छोटे को कुरसी पर बैठने को कहे तो अनुशासन कैसे रहेगा ! अनुशासन, हमारे लिए ! जो छोटे हैं और निर्वल है, जिन्हें दम घोंटकर मारा जाता है और जिनसे काम करवाया जाता है ! मुझे एक लोहे का शिकंजा जकड़े हुए है, कब छूटूंगा मैं इस शिकंजे से ? खैर, शिकंजे को ढीलाकर, जरा आराम ही कर लें। मैं धीरे-धीरे कुरसी पर बैठता हूँ। वह अफ़सर फिर फ़ाइलों में डूक जाता है। दो पलों का विश्राम मुझे अच्छा लगता है । मैं कमरे का अध्ययन करने लगता हूँ। वही कमरा, मेरा जाना पहचाना, जिसकी चीज़ मेरी जमायो है। मेरी देख-रेख में उसका पूरा इन्तजाम हुआ है। खूबसूरत आरामकुरसियां, सुन्दर टेविल, परदे, आलमारियां, फ़ाइलें रखने का साइड-रक आदि-आदि । इस समय वह कमरा अस्त-व्यस्त लगता है, और वेहद पराया। विजली की रोशनी में, उसकी अस्त-व्यस्तता चमक रही है, उसका परायापन जगमगा रहा है । ! . ३२ सतह से उठता आदमी में एक गहरी सांस भरता हूं और उसे धीरे-धीरे छोहता हूँ। मुझे हृदय-रोग हो गया है--गुस्से का, क्षोभ का, सोझ का और अविवेकपूर्ण कुछ भी कर डालने की राक्षसो क्षमता का। मेरे पास पिस्तौल है। और, मान लीजिए, मैं उस व्यक्ति का जो मेरा अफमर है, मिय है, वन्धु है अब खून कर डालता हूँ। लेकिन पिस्तौल अच्छी है, गोली भी अच्छी है; पर काम-काम बुरा है । उस बेचारे का क्या गुनाह ? वह तो मशीन का एक पुर्जा है । इस मशीन में मलत जगह हाथ आते ही वह कट जायेगा, बादमी उसमें फंसकर कुचल जायेगा, जैसे वैगन ! सबसे अच्छा है कि एकाएक आसमान में हवाई जहाज मंडराये, वमवारी हो और यह कमरा ढह पड़े, जिसमें मैं और वह दोनों खत्म हो जायें। अलबत्ता, भूकम्प भी यह काम कर सकता है । फाइल से सिर ऊंचा करके उसने कहा, "भाई, बड़ा मुश्किल है।" और उसने घण्टी बजायी। एक ढोला-ढाला, वेदकूफ़-सा प्रतीत होनेवाला स्थूलमाय व्यक्ति सामने आ खड़ा हुआ अफसर ने, जिसका नाम मेहरबानसिंह या, भौहें ऊंची करके सप्रश्न भाव से कहा, "कैप्टीन से दो कप गरम चाय ले आओ।" मेरी तरफ़ ध्यान से देखकर फिर उससे कहा, "कुछ खाने को भी लेते आना।" चपरासी की आवाज ऊंची थी। उसने गरजकर कहा, "केण्टीन बन्द हो गयो।" "देखो, खुली होगी, अभी छह नहीं बजे होंगे।" चाय और अल्पाहार के प्रस्ताव से मेरा दिमाग कुछ ठण्डा हुआ। जरा दिल में रोशनी फैलो। आदमीयत सब जगह है। इनसानियत का ठेका मैंने ही नहीं लिया। मेरा मस्तिष्क का चक्र धूमा । पैवलॉव मे ठीक कहा पा--'कण्डिशण्ड रिलैक्स!' खयाल भी रिलैक्स ऐक्शन है, लेकिन मुझे पवलॉव की डाढो अच्छी लगती है। उससे भी ज्यादा प्रिय, उसकी दयाल, ध्यान-भरी आंखें । उसका चित्र मेरे सामने तर आता है। - ममयीता मैं कुरसी पर बैठे उकता जाता हूँ। कोई घटना होनेवाली है, कोई बहुत बुरी घटना । लेकिन मुझे उसका इन्तजार नहीं है। मैं उसके परे चला गया। कुछ भी कर लूंगा। मेहनत, मजदूरी । फांसी पर तो चढ़ा ही नहीं देंगे। लेकिन, एक दॉस्तॉएवस्की था, जो फांसी पर चढ़ा और जिन्दा उतर आया। जी हां, ऐन मौके पर जार ने हुक्म दे दिया ! देखिए, भान्य ऐसा होता है। मैं कॉरिडार में जाता । वहाँ अव धुप अवेरा हो गया है । मैं एक जगह ठिठक जाता हूँ, जहाँ से जीना घूमकर नीचे उतरता है। यह एक संकरी आंगननुमा जगह है। मैं रेलिंग के पास खड़ा हो जाता हूँ। नीचे कूद पड़े तो! बस काम तमाम हो जायेगा! जान चली जायेगी, फिर सव खत्म, अपमान खत्म, भूख खत्म लेकिन प्यार भी खत्म हो जायेगा, उसको सुरक्षित रखना चाहिए....और फिर चाय आ रही है ! चाय पीकर हो क्यों न जान दी जाये, तृप्त होकर, सबसे पूछकर बिल्ली जैसे दूध को आलमारी की तरफ़ नजर दौड़ाती है, उसी तरह मैंने विजली के बटन के लिए अंधेरे-भरी पत्थर की दीवार पर नजर दौड़ायो । हां, वो वहीं है । वटन दवाया । रोशनी ने आँख खोली। लेकिन प्रकाश नाराज-नाराज-सा, उकताया-उक्ताया-सा फैला। चलो, मैंने सोचा, चपरासी को रास्ता साफ़ दीखेगा। मैंने ओर के दरवाजे से प्रवेश किया। दूसरी ओर के दरवाजे से चपरासी ने । मेरा चेहरा खुला । मेहरवानसिंह, नाटे-से काले-से, कभी फोस की माफ़ी के लिए हरिजन, कभी गोण्ड-ठाकुर, अलमस्त और वैफ़िक्र, जवान के तेज, दिल से साफ़, अफ़सरी वू, और आदमीयत की गन्ध ! और एक छोटा-सा चौकोर चेहरा! उन्होंने हाथ ऊँचे फर, देह मोड़कर बदन से आलस मुक्त किया और एक लम्बी जमुहाई लो। मेरा ध्यान चाय की पर था । उनका ध्यान कागज़ पर । उन्होंने कहा, "करो दस्तखत...यहां....यहां!" । ३४ सतह से उटता आदमी मैं घोरे-धीरे कुरसी पर बैठा । आँखें कागज पर गड़ायीं । भवें सिकुड़ी, और मैं पूरा का पूरा, कागज में समा गया । मैंने चिढ़कर अंगरेजो में कहा, "यह क्या है ?" उन्होने दृढ स्वर में जवाब दिया, "इससे रमादा कुछ नहीं हो सकता।" विरोध प्रदर्शित करने के लिए मैं वेचैनो से कुरसी से उठने लगा तो उन्होंने आवाज में नरमी लाकर कहा, "भाई मेरे, तुम्ही बताओ, इससे यादा क्या हो सकता है ! दिमाग हाजिर करो, रास्ता मुझाओ!" "लेकिन, 'मुझे स्केन गोट' बनाया जा रहा है, मैंने किया क्या !" चाय के कर में शक्कर डालते हुए उन्होंने एक और कागज़ मेरे सामने सरका दिया और कहा, "पढ़ लीजिए !" मुझे उस कागज को पढ़ने की कोई इच्छा नहीं पो। चाहे जो अफसर मुझे चाहे जो काम नहीं कह सकता । मेरा काम बंधा हुमा है । नियम के विरुद्ध मैं नहीं था, वह था। लेकिन, उसने मुझे जब डांट- कर कहा तो मैंने पहले अदब से, फिर ठण्डक से, फिर और ठण्डक से, फिर सोझकर एक जोरदार जवाब दिया। उस जवाब में 'नासमझ' और 'नास्वाद' जैसे शब्द जरूर थे। लेकिन, साइण्टिफ़िकली स्पीकिंग, गलती उसकी थी, मेरी नही ! फिर गुस्से में मैं नही था । एक जूनियर आदमो मेरे सिर पर बैठा दिया गया, जरा देखो तो! इसीलिए कि यह फला-फलों का खास आदमी, वह 'खास-खास' काम करता था। उस शख्स के साथ मेरी "ह्यमन मिफिकल्टो' थी। मेहरवानसिंह ने कहा, "भाई, गुरुती मेरी भो पी, जो मने यह काम सुम्हारे सिपुर्द करने के बजाय, उसको सौंप दिया। लेकिन, कि फाइलें दौड़ गयी है, इसलिए ऐक्शन तो लेना ही पड़ेगा। और उसमें है क्या ! वानिग है, सिर्फ हिदायत !" हम दोनों चाय पीने सगे, और बीच-बीच में साते जाते । एकाएक उन्हें जोर को गगन भेो हसो पायो। मैं यिस्मिस होकर देखने लगा। जब उनको हंसो का मालोहन रात्म होने को पारित होने समझौता कहा, "लो, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। तुम अच्छे, प्रसिद्ध लेखक हो । सुनो और गुनो !" और, मेहरवानसिंह का छोटा-सा चेहरा गम्भीर होकर कहानी सुनाने । लगा। -~~-मुसीवत आती है तो चारों ओर से । जिन्दगी में अकेला, निस्संग और बी. ए. पास एक व्यक्ति । नाम नहीं बताऊँगा। कई दिनों से आधा पेट। शरीर से कमजोर । ज़िन्दगी से निराश । काम नहीं मिलता । शनि का चक्कर । हर भले आदमी से काम मांगता है। लोग सहायता भी करते हैं। लेकिन उससे दो जून खाना भी नहीं मिलता, काम नहीं मिलता, नौकरी नहीं मिलती। चपरासीगीरी की तलाश है, लेकिन वह भी लापता । कप- वशी घोने और चाय बनाने के काम से लगता है कि दो दिनों बाद अलग कर दिया जाता है । जेब में वी. ए. का सर्टिफिकेट है। लेकिन, किस काम का! मैंने सोचा, मेहरवानसिंह अपनी ज़िन्दगी की कथा कह रहे हैं । मुझे मालूम तो था कि मेरे मित्र के वचपन और नौजवानो के दिन अच्छे नहीं गये हैं। मैं और ध्यान से सुनने लगता हूँ। मेहरवानसिंह का छोटा-सा काला चौकोर चेहरा भावना से विद्रूप हो जाता है । वह मुझसे देखा नहीं जाता। मेहरवानसिंह कहता है-नौकरी भी कौन दे ? नीचे की श्रेणी में बड़ी स्पर्धा है। चेहरे से वह व्यक्ति एकदम कुलीन, सुन्दर और रोबदार, किन्तु घिधियाया हुआ। नीचे की श्रेणी में जो अलकतियापन है, गाली-गलौज की जो प्रेमपदावली है, फटे- हाल ज़िन्दगी की जो कठोर, विद्रूप, भूखी, भयंकर सभ्यता है, वहां वह कैसे टिके ! कमजोर आदमी, रिक्शा कैसे चलाये। नीचे की श्रेणी उसपर विश्वास नहीं कर पाती । उसे मारने दौड़ती है। उसका वहां टिकना मुश्किल है । दरमियानी वर्ग में वह जा नहीं ३ सतह से उदता आदमी सकता । कैसे जाये, किसके पास जाये | जब तक उसकी जेब में एक रुपया न हो। मेहरवानसिंह के गले में आमू का काटा अटक गया । मैं सब समझता हूँ, मुझे खूब तजरबा है, इस माशय से मैंने उनको तरफ़ देखा और सिर हिला दिया। उन्होंने सूने में, अजीब-से सूने में, निगाह गटाते हुए कहा-नायर उनका लक्ष्य प्रोखों ही आँखों में ओमू सोख लेने का पा, जिन्हें ये पताना नहीं चाहते थे-आत्महत्या करना आसान नहीं है । यह टीक है किनपी शुक्रवारी-तालाब में महीने में दो बार आत्महत्याएं हो जाती है। लेकिन यह लाख की जनसंख्या में सिर्फ दो माहवार, यानी साल में चौबीस । दूसरे जरियों से की गयो आत्महत्याएँ मिलायो जायें तो पालाना पपास यादा न होंगी। यह भी बहुत बड़ी संस्था है। आत्महत्या मागान नहीं है। उनके चेहरे पर काला वादल छा गया। यव ये पहपान में नहीं भाते थे। अब वे मेरे अफसर भी न रहे, मेरे परिनित भी नहीं। सिर्फ एक अजनबी-एक भयानक अजनबी । मेरा भी दम घुटने लगा । मैंने सोपा, कहाँ का किस्सा उन्होंने छेड़ दिया ! मैहरवानामह ने मेरी और महानीकार की निगाह से देखा और कहा कि उन दिनों गहर में एक सम माया हुआ पा । बड़ी धूम-धाम यी । बड़ी चहल-पहल । रोज सुबह-शाम सकंस का प्रोसेगन निकलता, बाजे-गाजे के माय, बैण्ड-बाजे के साथ । जुलूस में एक मोटर का ठेला मो धरता, गुला टला, प्लेटफॉर्म-नुमा ! उसपर रंग-बिरंगे, बजीदोगरीद नोकर विचित्र हारनार करते हुए नाचते रहते । लोगों का ध्यान पापित करते। -जो एक लम्बे यरसे से वैधरदार और कार रहा है, टमी इंस्टिवट (प्रवृत्ति) शायद आपको मालूम नहीं ! वट्ट धनि शान्दिार नहीं होता, वह खासतौर से..धुमन्तु "जिमी होटा है। उसे चाहे जो दस्तु, दृश्य, घटना, दुर्घटना, यात्रा, दारिम, कट, दुन, मुन्दर चेहरा, min कूफ़ चेहरा, मलिनता, कोढ़, सब तमाशे-नुमा मालूम होता है । ....खोंचता है....आकर्षित करता है, और कभी-कभी पैर उधर चल ढ़ते हैं। एक बाइडिया, एक खयाल आंखों के सामने आया। जोकर होना क्या बुरा है ! जिन्दगी-एक बड़ा भारी मजाक है; और तो और, जोकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता है । चपत जड़ सकता है । एक दूसरे को लात मार सकता है, और, फिर भी, कोई दुर्भावना नहीं है । वह हंस सकता है, हंसा सकता है। उसके हृदय में इतनी सामर्थ्य है । मेहरबानसिंह ने मेरी ओर अर्थ-भरी दृष्टि से देखकर कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि जोकर का काम करना एक परवर्शन-अस्वाभाविक प्रवृत्ति है । मनुष्य की सारी सभ्यता के पूरे ढांचे चरमराकर नीचे गिर पड़ते हैं, चूर-चूर हो जाते हैं। लेकिन असन्यता इतनी बुरी चीज़ नहीं, जितना आप समझते हैं। उसमें इंस्टिक्ट का, प्रवृत्ति का खुला खेल है, आँख-मिचौनी नहीं। लेकिन अलबत्ता, वह परवर्शन जरूर है। परवर्शन इसलिए नहीं कि मनुष्य परवर्ट है, वरन् इसलिए कि परवर्शन के प्रति उसका विशेष आकर्षण है, या कभी-कभी हो जाता है। अपने इंस्टि के खुले खेल के लिए असभ्य और वर्वर वृत्ति के सामर्थ्य और शक्ति प्रति खिचाव रहना, मैं तो एक ढंग का परवर्शन ही मानता हूँ मेहरवानसिंह के इस वक्तव्य से मुझे लगा कि वह उनका आत्म-निवेदन मात्र है। मैं यह पहचान गया। इसे भांप गया । आँखों में एकाएक प्रकट हुई और फिर वैसे ही तुरत लुप्त हुई रोक मैं यह जान गया । लेकिन मेरे खयाल की उन्होंने परवा नहीं की उनकी कहानी आगे बढ़ी। आखिरकार, उसने जोकर बनने का बीड़ा उठाया। भू काफ़ी निर्लज्ज भी बना दिया था। शाम को, जब खेल शुरू होने के लिए करीब दो घर्ष उसने सर्कस के द्वार से घुसना चाहा कि वह रोक दिया गया सतह से बाने के लिए गिडगिड़ाया। दो मजबूत भादमियों ने उसकी दो बोहे पकड़ ली। वे गोमानीज मालूम होते थे। "कहीं जा रहे हो ?" रौब जमाने के लिए उमने अंगरेजो में कहा, "मैनेजर साहब से मिलना है।" अगरेजी मे जवाब मिला, "वहां नहीं जा सकते ! क्या काम है ?" हिन्दी में-"नौकरी चाहिए !" "अँगरेजी में-"नौकरी नहीं है, मैट-आउट ।" और वह बाहर फेंक दिया गया। दिल को धक्का लगा। वाहर, एक परपर पर बैठे-बैठे वह सोचने लगा-कहीं भी जनतन्त्र नहीं है । यहां भी नहीं । भीख नहीं मांग सक्ता, यह असम्भव है, इसलिए नौकरी की तलाश है । और वह मन ही मन न मालूम क्या-क्या बड़बड़ाने लगा। मेहरबानसिंह ने कहा कि यहां से कहानो एक नये और भयंकर तरीके से मुड़ जाती है। वह मैनेजर को देखने का प्रयत्न करे, या वारस हो ! बताइए, आप बताइए ! और, उन्होंने मेरी आँसो में माँखें डाली। उनके प्रश्न का मैं क्या जवाब देवा! फिर भी, मैंने अपने तर्क से पहा कि स्वाभाविक यही है कि वह मैनेजर से मिलने को एक बार मोर कोशिश करें। जोकर की कमाई भी मेहनत की कमाई होती है ! कोई धर्मादाय पर जीने की बात तो है नहीं। --एक्जक्टली! (ठीक बात है ) उन्होंने कहा । उसने भी यही निर्णय लिया, लेकिन यह निर्णय उसके बागे बानेवाले भीषण दुर्भाग्य का एकमात्र कारण था। वह निर्णयात्मक क्षण या, जब उसने यह तय किया कि मैनेजर से मिलने के लिए सर्कस के सामने वह भूस-हड़ताल वरेगा । उसने यह तय किया, संकल्प क्यिा, प्रण किया। थोर, यह प्रण आगे चलकर उसके नाश का कारण बना! दिल को सचाई, और सही. सही निर्णय से, दुर्भाग्य का कोई सम्बन्ध नहीं है। उसका चक्र स्वतन्य कलपने नियम हैं। हरवानसिंह अपनी कुरसी से उठ पड़े। कोट को जेबों में माचिस लाश करने लगे। मैंने अपनी जेब से उन्हें दियासलाई दी, जिसमें हो तोलियां खेप घी। उन्होंने मुझे सिगरेट ऑफ़र को । मैंने कहा, हों-नहीं, मेरे पास वोड़ी है।" "बरे, लो!! कामरेड !! लाओ मुझे वोड़ी दो !! मैं बोड़ी पोऊँगा !!" कामरेड शब्द के प्रयोग पर मुझे ताज्जुब है । ऐसा उन्होंने क्यों कहा ? मेरे लिए इस शब्द का थान तक किसी ने प्रयोग नहीं किया। मैं मेहरवानसिंह के अतीत के विषय में कुछ जिज्ञासु और सशंक हो उठा। मेरी कल्लना ने कहा-इनके भूतकाल में कोई भूत जरूर बैठा है ! एक सेकण्ड क्लास गजटेड अफसर की रैक का आदमी, इस शब्द का प्रयोग करता है, जरूर वह पुराने जमाने में उपक्का रहा होगा ! मेहरवानसिंह ने नोंहों के परे देखते हुए, मानो आसमान की तरफ देख रहे हों, वोड़ी का एक का खींचा, और कहा, "इसके मागे में ज्यादा -नीं कह सकूँगा, केवल इम्प्रेशन्स हो कहूंगा।" -भूख हड़ताल के आस-पास लोगों के जमाव से घबराकर नौकरों शायद, मैनेजर के सामने जाकर यह बात कही। थोड़े ही समय बाद, जामियाने के अन्दर बनाये गये एक कमरे में वह ले जाया गया । भीड़ वाहर रोक दी गयी । घोड़ी देर बाद सर्कन शुरू हुआ काले पैट पर सफ़ेद झक कोट पहने वह साढ़े छह फुट का एक मोटा ताजा आदमी था, जो विलकुल गोरा, यहां तक कि लाल मालूम हो था। वह या तो एंग्लो-इण्डियन होगा या गोआनोज ! आंखें कंजी, जि हरी झांक थी । वह एकदम बीता मालूम होता था । उतना ही खूबसू वैसा ही भयंकर! उसने साफ हिन्दी में कहा, "क्या चाहते हो?" उने काटो तो खून नहीं। उसके राक्षसो भव्य सफेद सौन्दर्य , कर, वह इतना हतप्रभ हो गया था। से उठत सतह मैनेजर ने फिर पूछा, "क्या चाहते हो ?" दिमाग सुन्न हो गया था। मैनेजर के यासपास खूबसूरत औरतें या- जा रही थी। गुलाव-खिली हुई, या जिन्दा लाल मांस-सी चमकती हुई । लेकिन भयंकर आकर्षक । उसने सोचा, यह एक नया तजरबा है। उसने शब्दों में दयनीयता लाते हुए कहा, "मुझे नौकरी चाहिए, कोई भो । चाहो तो झाडू दे सकता हूँ, कपड़े साफ कर सकता हूँ। मुझे नौकर रख लो। चाहो तो मुझे जोकर बना दो, कई दिन से, पेट में कुछ नहीं, कुछ नहीं ! मैं आपके पांव पड़ता है।" -जो, साहय वह गिड़गिड़ाहट जारी रहो । शन्द, वाक्य वार कामा- फलस्टाप के बहते गये, बहते गये ! वहाँ के वातावरण के चमत्कारपूर्ण भयंकर आकर्षण ने उसे जकड़ लिया। उसने निश्चय कर लिया कि मैं जान दे दूंगा, लेकिन यहां से टलूंगा नहीं। मैनेजर ने ऐसा आदमी नही देखा था। पता नहीं, उसने क्या सोचा । लेकिन उसके चेहरे पर आश्चर्य और घृणा के भाव रहे होंगे। उसने कठोर स्वर में कहा, "मेरे पास कोई नौकरी नहीं है । लेकिन तुम्हें रख सकता हूँ, सिर्फ एक शतं पर ।" वह उसका चेहरा देखता सड़ा रह गया। इस अचानक दया से, उसके मुंह से एक शब्द भी न निकला। उसने केवल इतना सुना, "सिर्फ एक शर्त पर ।" उसने मौखिक व्यायाम-सा करते हुए कहा, "मैं हर शतं मानने के लिए तैयार हूँ । मैं झाड़, दूंगा। पानी भरूंगा। जो कहेंगे सो करूंगा।" (जिन्दगो का एक ढर्रा तो शुरू हो जायेगा।) मैनेजर ने घृणा, तिरस्कार और रौब से उसके सामने एक रुपया फेंकते हुए कहा, "जाओ, खा आओ, कल सुबह पाना!" और मुंह फिरा. कर दह दूसरी ओर चलता बना । एक सीन सत्म हुआ। दुर्भाग्य के मारे इस व्यक्ति ने फिर उस मैनेजर का चेहरा कभी नहीं ४ । देखा। मेहरवानसिंह किस्सा कहते-कहते थक गये-से मालूम हुए। उन्होंने एक सिगरेट मेरे पास फेंकी, एक खुद सुलगायी और कहने लगे, "किस्सा मुख्तशर में यों है कि दूसरे दिन तड़के जब वह व्यक्ति सर्कस में दाखिल तो दो अजनवी आदमियों ने उसकी वहिं पकड़ ली और एक बन्द कोठे में ले गये। उसे कहा गया कि उसकी ड्यू टो सिर्फ कमरे में बैठे रहना है । उस दिन उसे खाना-पीना नहीं मिला। कोठे में किसी जंगली दरिन्दे को वास मा रही थी। उसके शरीर की उन दुर्गन्ध वहाँ वातावरण में फैली हुई थी। कमरा छोटा था। और बहुत ऊंचाई पर एक छोटा-सा सूराख था, जहां से हवा और प्रकाश आता था, लेकिन वह अंधेरे के सूने को चीरने में असमर्थ था। वह व्यक्ति एक दिन और एक रात वहां पड़ा रहा। उसे सिर्फ़ दरिन्दों का खयाल आता। उनके भयानक चेहरे उसे दिखाई देते, मानो वे उसे खा जायेंगे । एक बड़े ही लम्बे और कष्टदायक अरसे के बाद, जव एक चमकदार यहूदी औरत ने कोठे का दरवाजा खोला और उसे कहा, "गुड मानिग", तव उसे समझ में आया कि वह स्वयं ज़िन्दगी का एक हिस्सा है, मौत का हिस्सा नहीं। औरत वेतकल्लुफ़ी से उसके पास बैठ गयी और उसे नाश्ता कराया, जिसमें कम से कम तीन कप गरम-गरम चाय, ताजा भुना गोश्त, अण्डा, सेण्डविचेज़ और कुछ भारतीय मिठाई भी थी। लेकिन, इतना सब कुछ उससे खाया नहीं गया। मरे हुए की भांति उसने पूछा, "मुझे कब तक कोठे में रखा जायेगा, मेरी ड्युटी क्या है ?" यहूदी औरत सिर्फ मुसकरायी। उसने कहा, "ईश्वर को धन्यवाद दो कि तुम्हारी तरखकी का रास्ता खुल रहा है। ये तो वोच के इम्तिहा- नात हैं, जिन्हें पास करना निहायत जरूरी है।" किन्तु, उस व्यक्ति का मन नहीं भरा। उसने फिर पूछा, "क्या मैं मैनेजर से मिल सकता हूँ?" यहूदी औरत ने उसकी तरफ़ सहानुभूतिपूर्वक देखते हुए कहा, “अव सतह से उटता आदमी . ४२ . मैनेजर से तुम्हारी मुलाकात हो ही नहीं सकती। अब तुम दूसरे के पार्ज में पहुंच गये हो, वह तुम्हें मैनेजर से मिलने नहीं देगा।" यहूदी औरत जब वापस जाने लगी तब उसने कहा, "कल फिर आओगी वया?" उसने पीछे की ओर देसा, मुसकरायी और वगर जवाव दिये वापस चली गयो । कोठे का दरवाजा बाहर से वन्द हो गया । और, एक बच्चे को भौति वह उस चमकदार और छाया-विम्न से खेलता रहा। किन्तु, उसका यह सुख क्षणिक ही था। लगभग दो घण्टे घुप अंधेरे में रहने के बाद दरवाजा चरमराया और वासरुट पहने हुए दो काले व्यक्ति हण्टर लिये हुए वहां पहुंचे। वे न मालूम कसी कमी भयंकर कारतें करवाने लगे, जिनका वर्णन नहीं दिया जा सकता। वे कसरतें नहीं पी, शारीरिक अत्याचार था। जरा गलती होने पर वे हण्टर मारते। इस दौरान उस व्यक्ति को काफी पिटाई हुई। उसके हाथ, पैर, ठोढ़ी में घाव लग गये। वह कराहने लगा। कराह सुनते ही, चाबुक का गुस्मा तेज हो जाता। मतलब यह कि वह अधमरा हो गया। उसको ऐसी हालत में छोड़कर, हण्टर-धारी राक्षस चले गये। करीब तीन घण्टे बाद, चाय बायो, डॉक्टर बाये, इंजेक्शन लगे, किन्तु किसी ने दरिन्दों को दुर्गन्ध से भरे हुए उस कोठे में से उसे नहीं निकाला। समय ने हिलना-डुलना छोड़ दिया था। वह जड़ीमत मूने में परि- वर्तित हो गया था। बाद में, दो एक दिन तक, किसी ने उसको घबर नहीं दी। मे प्रतीत होने लगा कि वह किसी के भीतर के अन्तिम पत्थर के नीचे पहा हा सिर्फ एक अधमरा प्राण एकाएक तीनचार आदमियों ने प्रवेश दिया और उसे वह प्रेत हो, एक साफ-सुथरे कमरे में ले गये। वही उसे दो-चार दिन । कुछ रखा गया, अच्छा भोजन दिया गया। कुछ दिनों बाद, ज्यों हो उसके स्वास्थ्य में सुधार हुमा, च, १९ से हटाकर रोछों के एक पिंजरे में दाखिल कर दिया गया। अव उसके दोस्त रीछ बनने लगे। वहीं उसका घर था, कम से कम वहाँ हवा और रोशनी तो थी। लेकिन, उसकी यह प्रसन्नता अत्यन्त क्षणिक थी। उसके शरीर पर अत्याचार का नया दौर शुरू हुआ। उससे अजीबोगरीब ढंग की. कवायद करायी जाती। रोछों के मुंह में हाथ डलवाये जाते, रोछ छाती पर चढ़वाया जाता और जरा गलती को कि हण्टर रीछ बड़े शैतान थे। उसका मुंह चाटते, कान काट लेते। उनके वालों में कीड़े रहा करते और हमेशा यह डर रहता कि कहीं रीछ उसे मार न डालें। शुरू-शुरू में, व्यक्ति को भुना हुआ मांस मिलता। अब उसके सामने कच्चे मांस की थाली जाने लगी। अगर न खाये तो मौत, खाये तो मौत । और हण्टरों का तो हिसाव न पूछो । शायद ही कोई ऐसा दिन गया होगा, जब उसपर हण्टर न पड़े हों, बाद में भले ही टिक्चरमायोडिन और मरहम लगाया गया हो। वह यह पहचान गया कि उसे जान-बूझकर पशु बनाया जा रहा है। पशु वन जाने की उसे ट्रेनिंग दी जा रही है। उसके शरीर के अन्दर नयो सहन-शक्ति पैदा की जा रही है। अब उसे कोठे से निकाल बाहर किया गया और एक दूसरे छोटे पिंजरे में चन्द कर दिया गया। वहां कोई नहीं था, और एक निद्वन्द्व मकेला जानवर था। अकेलेपन में वह पिछली जिन्दगी से नयी जिन्दगी को तुलना करने लगता और उसे आत्महत्या करने की इच्छा हो जाती । इस नये क्षेत्र में, जीवन-यापन का एकमात्र स्टैण्डर्ड यह था कि वह पशु- रूप वन जाये। उसने इसकी कोशिश भी की। अति भीषण क्षण में चार-पांच आदमी पिंजरे में घुसे और उसे घेर लिया। उसकी भयभीत पुतलियां आंखों में मछली-सी तैर रही थीं: सतह से उठता आदमी वह डर के मारे बर्फ हो रहा था। शायद, अब उसे विजली के हण्टर पड़ेंगे! पाँचौं यादमियों ने उसे पकड लिया चोर उसके दारीर पर जयर- दस्ती रीछ का चमड़ा भड़ दिया गया और उससे कह दिया गया कि साले अगर रीछ बनकर तुम नही रहोगे तो गोली से फौरन से पेस्तर उड़ा दिये जाओगे। यहाँ से उस व्यक्ति का मानव-अवतार समाप्त होकर ऋक्षावतार शुरू होता है। उससे वे सभी कवायदें करवायी जाती है, जो एक रीछ कता है। उस सवकी प्रक्टिस दी जाती है और विरस भी कसी- महामोपण ! और अगर नहीं की तो सभी आदमी एकदम उसपर हमला करते है। विजली के हण्टरों को फटकार, गाली-गलौज और मारपीट तो मानी रूटीन हो गयी है। जलते हुए लोहे के पहिये के वोप से उसे निकल जाने को कहा जाता है। उसे खौफनाक ऊँचाई कुदवाया आवा है यादि-आदि। फिर उसे कच्चा मांस, मुना मांस और शराब पिलायी जाती है और यह घोषित किया जाता है कि कल उसकी प्रेविटस अकेले-अकेले सिर्फ शेरों के साथ होगी। शीघ्र ही इम्तिहान का चरम क्षण उपस्थित होता है। वह रात-भर भयंकर दुःस्वप्न देखता रहा है। वैसे तो सर्कस की उसकी पूरी जिन्दगो एक मीषण दुःस्वप्न है, किन्तु कल राठ का उसका सपना, दुःस्वप्न के भीतर का एक मोपण दुःस्वप्न रहा है, जिसे वह कभी नहीं भूल सकता। सुबह उठता है तो विश्वास नहीं कर पाता है कि वह इनसान है। चले गये थे दिन जब वह किसी का मित्र को रिसी का पुत्र था। पेट भूखा ही क्यों न सही, बासे वो सुन्दर दृश्य देख साठी पों और वह मुनहली धूप! आहा ! कसो खूदमूरत ! रखनी ही मनोहर जितनी सुशीला को त्वचा! लेकिन वह अपने पर ही विस्मित हो उठा। यह सच यह रह सका, जिन्दा रह सफा, कच्चा मांस सा सा! मार सा सका और जीवित रह सका! क्या वह आदमी है ? शायद, पशु वनने की प्रक्रिया पहले से हो शुरू हो गयी थी। नाश्ते का समय आया । किन्तु, नास्ता गोल ! राम-राम कहते-कहते भोजन का समय आया तो वह भी गैर-हाजिर ! पेट का भूखा ! क्या करे ! शायद, भोजन आता ही होगा! लेकिन, उसे बिलकुल भूख नहीं है, जवान सूखी हुई है । अगर वह चिल्लाया तो पहले की भांति, मुंह में कपड़ा लूंस दिया जायेगा और उससे और तकलीफ़ होगी। खैरियत इसी में है कि वह चुप रहे, और आराम से सांस ले। एकाएक सामने का एक बड़ा भारी पिंजरा खुला । अब तक उसमें कुछ था नहीं, लेकिन अब उसमें एक बड़ा-डरावना शेर हलचल करता हुमा दिखाई दे रहा था। एकाएक उसका भी मिंजरा खुला और दोनों पिंजरों के दरवाजे एक-दूसरे के सामने हो लिये । और, आदमियों को जो छायाएं इधर-उधर दिखाई दे रही थीं, वे गायब हो गयीं। एकाएक शेर चिंघाड़ा! ऋक्षावतार का रोम-रोम कांप उठा, कण- कण में भय को मन्तिक बिजली समा गयी। रीछ को मालूम हुआ कि शेर ने ऐसो जोरदार छलांग मारी कि एकदम उसकी गरदन उस दुष्ट पशु के जबड़े में जकड़ी गयो । हृदय से बनायास उठनेवाली 'मरा-मरा' को ध्वनि के बाद अंधेरा-सा फैलने लगा। शेर को सांस उसके आसपास फैल गयो, शेर के चमड़े की दुर्गन्ध उसके कानों में घुसी थी कि इतने में उसके कान में कुछ कम्पन हुआ, कुछ स्वर-लहरें घुसी जो कहने लगों : "अब डरता क्या है, मैं भी तेरे ही सरीखा हूँ, मुझे भी पशु बनाया गया है, सिर्फ़ मैं शेर की खाल पहने हूँ, तू रीछ की !" इस बात पर रीछ को विश्वास करने या न करने की फुरसत ही न शेर ने कहा, "तुमपर चढ़ बैठने की सिर्फ मुझे कवायद करनी है, मैं तुझे खा डालने की कोशिश करूंगा, खाऊँगा नहीं। कवायद नहीं की तो हण्टर पड़ेंगे तुमको और मुझको भी! आओ, हम दोस्त बन सतह से उठता आदमी जायें, मगर पशु की जिन्दगी बितानी है तो ठाट से बितायें, आपस में समझौता करके।" मैं ठहाका मारकर हंस पड़ा। बात मुझपर कसो गयो पो। बड़ो देर तक वात का मजा लेता रहा। फिर मेरे मुंह से निकल पड़ा, "तो गोया भाप शेर हैं और मैं रोछ ।"... मुझपर कहानी का जो असर हुआ उसको ओर तनिक भी ध्यान न देते हुए, अत्यन्त दार्शनिक भाव से मेरे अफसर ने कहा, "भाई, समझोता करके चलना पड़ता है जिन्दगी में, कभी-कभी जान-बूझकर अपने सिर चुराई भी मोल लेनी पड़ती है । लेकिन उससे फायदा भी होता है। सिर सलामत तो टोपी हजार ।" यफसर के चेहरे पर गहरा कड़वा काला खयाल जम गया था। लगता था मानो वह स्वयं कोई रटो-रटायो बात बोल रहा हो । मुझे लगा कि जिन्दगी से समझौता करने में उसे अपने लम्बे-लम्बे पैर और हाथ काटने छाँटने पड़े हैं। शायद मुझे देखकर उसे उस बैल को याद आयो थी, जिसके सिर पर जुना रखा तो गया है, लेकिन जो उससे भाग- भाग उठा है। शायद, उसे इस बात की खुशी भो हुई थी कि मुझमें वह जवान नासमझी है, जो गलत और फालतू बातें एक मिनट गवारा नहीं कर सकता। मैं उसको सावलो हड्डोदार सूरत को देखता रहा। हाँ उसपर जिन्दगी से समझौते के विरुद्ध एक क्षोम को कालो भावना छायो हुई पी। मैंने पूछा, "तो मैं इस कागज पर दस्तखत कर दूं।" उसने दवाव के साथ कहा, "विला शक, वानिंग देनेवाला मैं, लेने. वाले तुम, में शेर तुम रोछ ।" यह साहकर हँस पड़ा, मानो उसने अनोखी बात कही हो। मैंने मजाकिया ढंग से पूछा, "मैं देखना चाहता हूँ कि शेर के कहीं दांत दो नहीं है।" "तुम भी अमीर आदमी हो, यह तो सकम है, सविम नहीं।" समझौता 7 "देखो, आज पांच साल की नौकरी हो गयी। एक बार भी न एक्स- प्लेनेशन दिया, न मुझे वानिग आयो। मजा यह है कि यह ऐक्टिग उस वात के खिलाफ़ है जो मैंने कभी की ही नहीं । यह कलंक है उस अपराध का जो मैंने कभी किया हो नहीं।" उसने कहा, "तब तुमने भाड़ झोंका। अगर एक्सप्लेनेशन देने की कला तुमको नहीं आयी तो फिर सर्विस क्या की! मैंने तीन सौ साठ ऐक्सप्लेनेशन दिये हैं । वानिग अलबत्ता मुझे नहीं मिली, इसलिए कि मुझे एक्सप्लेनेशन लिखना आता है, और इसलिए कि मैं शेर हूँ, रीछ नहीं। तुमसे पहले पशु बना हूँ। सीनियॉरिटी का मुझे फायदा भी तो है । कभी आगे तुम भी शेर बन जाओगे।" वात में गम्भीरता थी, मजाक भी। मज़ाक़ का मजा लिया, गम्भी- रता दिल में छिपा ली। इतने में मैंने उससे पूछा, “यह कहानी आपने कहाँ सुनी ?" वह हंस पड़ा । बोला, “यह एक लोककथा है। इसके कई रूप प्रच- लित हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वह रीछ बी. ए. नहीं था, हिन्दी में एम. ए. था।" भयानक व्यंग्य था उसके शब्दों में। मैंने उससे सहज जिज्ञासा के भोले भाव से पूछा, “तो क्या उसने सचमुच फिर से मैनेजर को नहीं देखा।" वह मुसकराया। मुसकराता रह गया। उसके मुंह से सिर्फ इतना ही निकला, “यह तो सोचो कि वह कौन मैनेजर है जो हमें-तुम्हें, सबको रोछ-शेर-भालू-चीता-हाथी बनाये हुए है !" मेरा सिर नीचे लटक गया। किसी सोच के समन्दर में तैरने लगा। तव तक चाय विलकुल ठण्डी हो चुकी थी और दिल भी। -- . m आखेट सामने सड़क पर लोगो का आना-जाना शुरू हो गया। मोटर साइकल, टांगों का जोर भी बढ चला । मुहब्बतसिंह को अपनी अधेरी चौकी में बैठे-बैठे इस तरह देखते रहने, सुनते रहने की आदत पड़ चुको पो मानो देखते हुए कुछ भी न देखता हो, सुनते हुए कुछ भी न सुनता हो। कभी. कमी वह सिर पर का भारी साफा उतारकर अपनी धनी, लम्बी, काली मूंछों पर ताव देता हुआ न मालूम किस सोच में पड़ जाता । अपनी तन्द्रा से यह तभी जागता, जब ड्यूटी पर का लम्बा-चौड़ा सिपाही अपने काले फुल बूट की एक नाल से दूसरे पांव के बूट पर खट जमाकर तानता हुआ लम्बा सलाम कर सामने आता । वह वोलता बहुत कम था, पर सबसे बोलता था। वैसे वह काफी लोकप्रिय भी था। सिपाहियो को पैसे उधार देवा और उन्हें जुर्माने से बचाता, उनके बच्चों से प्यार करता। परन्तु बच्चे डरा करते, दूर से ही 'काका ! काका!' करते, पर पास न बाते । जब वह सामनेवाले हलवाई से जलेवो लाता, तब कहीं रामसिंह का बेटा लछमन, भागवती का लड़का काल्या और इस्माइल का लड़का मकमूद उसके पास बाते । बड़ी अनिच्छा से उन्हें उसके पास जाना पड़ता । जब मुहब्बतसिंह उनको चूमता तो उसको पनी मूंछ उनके कोमल गालों को चूमने लगतो। उसका मोटा डोलडौल, बड़ा सिर, राजपूतानी सीधी नार, आ घड़ी मोर पंनी मानो वह सबको डाकू समझ रहा हो । उसको डरावनी, बड़ी, पनी, लम्बो मूछे सदके हृदय में मोति पैदा कर देतीं। वह अधिक भाखेट ना इसलिए लगता कि उसको घनो भृकुटियां प्रश्न और उत्तर के -साय वक्र होने लगती । परन्तु इस अपने भयावनेपन का उसे बिलकुल 1 न था। वैसे वह दिल का बड़ा उदार और दुनिया को समझनेवाला ज्ञा जाता था। उसको चौको बहुत मामूली चौकियों में से पी। कभी-कभी एक नोर अपनी गद्दी को सिरहाने लपेटकर एक दरी उठाकर लेटा रहता। एक ओर चूल्हा था, जिसने दीवाल को काला कर रखा था, जिसमें राख पर अधजली लकड़ी पड़ी रहती। दरो के पातवाली खूटो पर उसके खाकी झोले में वरदी पड़ी रहतो, उसी के पास दूसरी खूटी पर उसके सादे कपड़े। बाहर की दोवाल पर उसने दो कोलें लगा दी थीं, जिन पर उसकी हरी किनारवाली मोटो घोती सूखती रहती। अनजान में भी यदि कोई उसपर हाथ लगा देता तो उसकी तबीयत सख्त नाराज हो जाती। सुबह और शाम, दोपहर को कभी-कभी, हमेशा रात को वरदो डाटे वह भूत के समान अकेला घूमा करता, कभी-कभी थककर किसी पान- वाले या हलवाई के पास कुरसी पर बैठ जाता और अपनो रोबदार मूंछों पर ताव दिया करता । रात को अपने हलके में कभी भी उसे बैठा हुआ नहीं पाया गया। बलबत्ता वह अचानक अपनी बेडब तानों से सिनेमा के चलतू गीत गाया करता । सुबह से आज उसने वरदो डटाकर घूमना शुरू किया, क्यों बाज देखभाल के लिए पुलिस का नया इन्सपेक्टर जनरल बानेवाला वह बाज अधिक सतर्क, अधिक डरावना और अन्दर से अधिक था। उसकी सतर्कता उसको भौहों को कठिन वक्रता ने मिलकर में हो उठी थी। उसकी बड़ी पैनी नांखें नाज अधिक शंकाशील थीं। गुच्छेदार मूछे उठावदार गालों पर वांकापन लिये हुए थी। जब वह डयूटी से लौटा तो शाम हो गयी थी। सड़कों वैसी ही घो। अपनी अंधेरी चौकी में घुसकर उसने टीन की सतह से उठत जला दी। शहर में विजली की वत्तियां जल उठी। नीले आकाश में सफेद और काले पक्षियों के झुण्ड सूर्यास्त को लाली को और मन्द गति से तैरते हुए यदृश्य हो गये। मुहब्बतसिंह ने वरदो उतारकर, नियमपूर्वक झोले में रख दी। घोती पर बण्डो पहनकर उसने दरो पर हाथ-पांव फैला दिये । वह सारे दिन का थका-मांदा और भूखा था। सामने सड़क पर आने-जानेवालों का सुमुल कल्लोल हो रहा था, परन्तु वह मानो उसके कानों तक ही पहुँचता था। वह अपने आपमें मग्न, एक प्रान्तरिक सुनसान प्रदेश में व्याप्त हो रहा था । एकाएक मानो वह अपनी नीद से जगा, बहुत दिनों में आज उसने समझा, कोई उसे पुकार रहा है। उसने वही से आवाज दी, "इधर सामने आओ।" एक आकृति जिस पर किवाड़ की गहरी छाया पड़ रही थी दरवाजे पर खड़ी हो गयी। मुहम्मतसिंह ने उसे और भागे बुलाया, जिससे उसका मुंह दिख सके । वह आकृति वहाँ से हटकर एक कोने मे सड़ी हो गयी। मैले घाल इधर-उधर बिखरकर उस स्त्री के नाजुक मुंह को बिगाड़ रहे थे। वह लपेटे हुई पी एक पोपड़ा, जिसमें से उसके अंग झांक रहे थे। मुंह पर से दोनता टपक रहो यो । वह सकपकापी हुई सही हो गयी। उसे यह स्त्री पहचान में नहीं आयी फिर उसके शरीर पर ध्यान गया, और उसकी घनी भौंहोंवालो पनी मासें छेदों से भरे हुए कपड़े पर जाकर अटक गयी। वह मानो सचेत होकर बैठ गया। अपने अन्दर इतना सचेत वह पहले बहुत कम हुमा पा। अपने मूंछों पर स्वाभाविक रूप से ताव देते हुए उसने पूछा, "कहाँ रहती है ?" उस स्त्री को जमान बन्द पी मुहम्मतसिंह को भयानक सूरत के मारे । “यहाँ क्यों बापी है ? जिस शहर की रहनेवाली है ?" मुहम्मतसिंह यह सब पूछा गया, पुलिस को रीति के मुताबिक विना उतर पाये। आखेट भयावना इसलिए लगता कि उसको घनो भृकुटियां प्रश्न और उत्तर के साथ-साथ वक्र होने लगती । परन्तु इस अपने भयावनेपन का उसे बिलकुल ज्ञान न था। वैसे वह दिल का बड़ा उदार और दुनिया को समझनेवाला समझा जाता था। उसकी चौकी वहुत मामूली चौकियों में से थी। कभी कभी एक ओर अपनी गद्दी को सिरहाने लपेटकर एक दरी उठाकर लेटा रहता। एक ओर चूल्हा था, जिसने दीवाल को काला कर रखा था, जिसमें राख पर अधजली लकड़ी पड़ी रहती। दरी के पासवाली खूटी पर उसके खाकी झोले में वरदी पड़ी रहती, उसी के पास दूसरी खूटी पर उसके सादे कपड़े । बाहर की दीवाल पर उसने दो कीलें लगा दी थीं, जिन पर उसकी हरी किनारवाली मोटी घोती सूखती रहती। अनजान में भी यदि कोई उसपर हाथ लगा देता तो उसकी तबीयत सख्त नाराज हो जाती। सुबह और शाम, दोपहर को कभी-कभी, हमेशा रात की वरदी डाटे वह भूत के समान अकेला घूमा करता, कभी-कभी थककर किसी पान- वाले या हलवाई के पास कुरसी पर बैठ जाता और अपनी रोबदार मूंछों पर ताव दिया करता । रात को अपने हलके में कभी भी उसे बैठा हुआ नहीं पाया गया। अलबत्ता वह अचानक अपनी वेढव तानों से सिनेमा के चलतू गीत गाया करता। सुवह से आज उसने वरदी डटाकर घूमना शुरू किया, क्योंकि आज देखभाल के लिए पुलिस का नया इन्सपेक्टर जनरल आनेवाला था। वह आज अधिक सतर्क, अधिक डरावना और अन्दर से अधिक खुश था। उसकी सतर्कता उसकी भौंहों को कठिन वक्रता से मिलकर भीषण हो उठी थी । उसकी बड़ी पैनी आँखें आज अधिक शंकाशील थीं। उसकी गुच्छेदार मूछे उठावदार गालों पर वांकापन लिये हुए जब वह ड्यूटी से लौटा तो शाम हो गयी थी। सड़कों पर भीड़ वैसी ही थी। अपनी अंधेरी चौकी में घुसकर उसने टीन की चिमनी सतह से उठता आदमी थीं। ५० मग्न, जला दो। महर में बिजली की वत्तियां जल उौं । नोले आकाश में सफेद और काले पक्षियों के झुण्ड सूर्यास्त को लाली को ओर मन्द गति से तैरते हुए यदृश्य हो गये। मुहम्बतसिंह ने वरदी उतारकर, नियमपूर्वक झोले में रख दी। धोती पर वण्डो पहनकर उसने दरो पर हाथ-पांव फैला दिये । यह सारे दिन का यका-मांदा और भूखा था। सामने सड़क पर आने-जानेवालों का तुमुल फल्लौल हो रहा था, परन्तु वह मानो उसके कानों तक ही पहुंचता था। वह अपने आपमें एक आन्तरिक सुनसान प्रदेश में व्याप्त हो रहा था । एकाएक मानो वह अपनी नीद से जगा, बहुत दिनों में आज उसने समता, कोई उसे पुकार रहा है । उसने वहीं से आवाज दी, "इधर सामने आओ।" एक प्राकृति जिस पर किवाड़ की गहरी छाया पड़ रही पी दरवाजे पर खड़ी हो गयो । मुहम्मतसिंह ने उसे और यागे बुलाया, जिससे उसका मुंह दिख सके । वह आकृति वहाँ से हटकर एक कोने मे खड़ी हो गयी। मैले बाल इधर-उधर विसरकर उस स्त्री के नाजुक मुंह को बिगाड़ रहे थे। वह लपेटे हुई पी एक चोपड़ा, जिममें से उसके अंग झांक रहे थे। मुंह पर से दोनता टपक रही थी । वह सकपकायी हुई खड़ी हो गयी। उसे यह स्त्री पहचान में नहीं आयी फिर उसके शरीर पर ध्यान गया, और उसकी धनी भौहोंवाली पनी मासे छेदों से भरे हुए कपड़े पर जाकर अटक गयीं। वह मानो सचेत होकर बैठ गया। अपने अन्दर इवना सचेत बह पहले बहुत कम हुआ था। अपने मूछों पर स्वाभाविक रूप से वाव देते हुए उसने पूछा, "कहाँ रहती है ?" उस स्त्री को जमान वन्द पो मुहब्बतसिंह को भयानक सूरत के मारे । “यहाँ क्यों आयो है ? विस दशहर की रहनेवाली है ?" मुहम्मतसिंह यह सब पूछा गया, पुलिस की रोदि के मुतावित विना उत्तर पाये। भासेट हर को हवा जबरदस्ती अन्दर घुस पड़ी और दीपक की लौ कांपने । मुहब्बतसिंह का ध्यान दीपशिखा कांपने की ओर गया और नक उसकी नसों में विजली दौड़ गयी। केवल इतना सुना-"मैं . मुहब्बतसिंह ने खड़े होकर एकदम उसका हाथ पकड़ लिया और बकर फिर छोड़ दिया। पाप के समय भी मनुष्य का ध्यान इज्ज़त की तरफ़ रहता है। वह पाप करते समय पाप से नहीं डरता, पाप के खुलने से डरता है। वह डर गया कि कोई आ न जाये, पर वह घबराया नहीं, और अपने ही घर में चोर बनकर हलके पैर, धीरे किवाड़ वन्द कर दिये तथा सांकल लगा दी। दीया न मालूम क्यों, आप ही आप बुझ गया। अंधेरे में क्या हुआ करता है ? पाप ! मानो कोई आदमी किसी पहाड़ की चोटी पर जाने तक अथक परिश्रम करे और चोटी पर पहुंचते ही पांव फिसलकर, उसके ढाल पर से ज़ोर से लटकता हुआ अधमरा होकर वहीं पहुँचे, जहाँ से वह चला था, किसी हद तक वैसी ही हालत मुहब्बतसिंह की हो गयो। पर उसका मस्तिष्क अधिक सचेत हो उठा। उसके अन्दर का एक छिपा हुआ दीपक पूरी ज्योति से जग उठा । वह अंधेरे में वैसे ही पड़ा रहा । बाहर हवा किवाड़ को धक्का दे रही थी। एकाएक मुहब्बतसिंह को अपनी मां को याद आयी जो कहा करती थी, "पाप से वचा कर!" उसकी धुंधली आंखों में मुहब्बतसिंह आज मानो कोई नया सत्य दीखा हो। वे आंखें आज अधिक स्पष्ट हो उसके सामने आयीं और उसको मालूम हुआ मानो उसकी आँखें ग हो रही हों। उसके बाद, उसे पिता भी याद आये, उनकी प्यार बातें उसे याद माने लगी और उसका दिल भारी हो गया। बाहर आंधी चल रही थी और चौकी का दरवाजा खटखटा र अब तक मानो उसने यह नहीं सुना था। अब सुना और सचेष्ट सतह से उठता और अस्नो अवस्था पर उसका ध्यान गया। जाने आन्तरिक जगत् से लुढककर वह समाज और राजनीति के जगत् मे सहा हो गया। वह उठकर सचमुव खड़ा हो गया। जल्दी-जल्दी चिमनी जला दी जिससे वह इस परिस्थिति को मिटा सके। उस स्त्री का शरीर पड़ा था, मानो कोई मुरदा हो, और उसका मुंह दरी के पीछे छिया पा। इस अकल्पित, अजीव परिस्थिति में मुहम्बतसिंह आज ही पड़ा था। इसका एक्दम निपटारा करने का उसने निश्चय कर लिया। यह उसके पास गया, उस स्त्री को एकदम उठाने के लिए और बाहर करने के लिए। लेकिन जब वह उसके पास जाकर बैठा तो हाप पकडकर सोचने के बजाय उसके कृग हाथों पर हाथ फेरने लगा। बादमी में तूफान हमेशा थोड़े ही रहता है। वह स्त्री भूख को सतायो यो, जिसके मां-बाप, भाई-बहन लापता, न रहने का स्थान, न पहनने को कुछ। सारे शहर में पैसे के लिए घूमने पर पेट की ज्वाला से व्याकुल और निराश होकर, इम दरवाजे पर ठहर गयी थी और आवाज दी थी। अव तक वह मानो अचेत-सी थी। वह जगत् को ठोकरो को उरते काग़ज के समान ले रही थी। परिस्थितियो को मान ही नहीं रही यो। परिस्थिति को वह माने जिसमें अपने व्यक्तित्व का भाव हो । व्यनिय ही के लिए समाज और नैतिकता होती है। भूख और समाज को आर्थिक नीति से बुरी तरह कुचले हुए समाज से बाहर समझे जाते हैं। मेवल किसी प्रकार उदर-मरण तक घन सके करते रहना ही इनकी इच्छा, सारांशा और ममता थी। यह कितनी भूखी थी। पर अव जब कि वह सचेत हो उठी थो, मुहब्बतसिंह का गरम हाय उसके शरीर, उसके अस्त-व्यस्त बालों और कपाल पर फिर रहा समें अत्याचार की ज्वाला नहीं यो, भावनाओं की गरमी थी। वह अधिकाधिक सचेत होने लगी। मुहब्बतसिंह हाथ फेर रहा था उसकी पीठ पर और उसके सामने था। रवट की तसवीर थी। कभी-कभी उसको मां इस तरह पीठ पर हाय फेरा रती थी। मानो उसकी वह ममता दोनों के वन्वन-कारण बनेगी। उस स्त्री ने गद्दी से अपना मुंह निकाल लिया और क्षीण आवाज में म्हा, "मुझे भूख लगी है।" सचेतावस्था के साथ ही साथ उसे भूख लगने का भान भी हो जाया। मुहब्बतसिंह ने मानो अब पहचाना कि वह किस लिए आयी है। और हाय रे! उसने क्या कर डाला! मुहब्बतसिंह झटपट उठा और एलुमिनियम का डब्या देखा, उसमें कुछ भी नहीं था। फिर उसके मन में विचार माया, रुपया देकर इसे रवाना कर दे। उसने जेब टटोली पर उसमें क्या था ? वह चुपचाप आकर बैठ गया और फिर वैसे ही हाथ फेरने लगा। मुहब्बतसिंह ने देखा, उसके आंसू बह रहे हैं, उससे रहा नहीं गया, पूछा, "क्यों रोती है ?" "मुझे भूख लगी है," उसने कांपते स्वरों में कहा। उसके भावना के आंसू थे। मुहब्बतसिंह ने आवेग में आकर उसको अपनी गोद में खींच लिया वह वैसे ही खिंच यो और फूट-फूट कर रोने लगी। किन्तु मुहब्बतसिंह के मन में इसी आवेश ने दुविधा उत्पन्न कर दी उसने निश्चय किया था कि किसी तरह इससे सुवह तक निवट लें पर, अव यह निश्चय कांपने लगा फिर उसके मन में, शंकाशील जाग उठी। पर एक असहाय को अपनी गोद में चिपटे देखकर व ही हवा जैसे दीपक के आने पर बंधेरा पीछे हटता है । अव मुहब्बतसिंह अपने लापको संकट में पाने लगा। कान्स्टेविल पुलिस अपने घर में भिखारिन रख ले। यह गैर- वात है। उसकी गोद में पड़ी स्त्री ने जी-भर रोने के बाद उस देखा । मुहब्बतसिंह ने उसके करुण मुख की ओर देखते हुए उन । सतह से पर हाय फेर दिया और अब उसका ध्यान उसकी दशा को और गया। उसने उसको बहुत हलके हाथों गद्दी पर टिका दिया। दरवाजा खोल देने पर बाहर की तुमुल आधी घर के अन्दर घुस पड़ी और दीपक बुझ गया। मुहब्बतसिंह की आंखों के सामने व्यारक कालापन छा गया और आंधी में बाहर जाने से बलात् रोक दिया। उसको मालूम हुआ मानो आन्तरिक और बाह्य सब सनिया उसके विरुद्ध है, और उन सबसे उसे भिड़ना है। टोन के पत्तरों को उड़ानेवाली, दोलतो हुई हवा ने उसकी आँखों में कचरा डाल दिया । आँखों को एक हाप से पोंरते हुए दूसरे से टीन पकड़कर वह सन फोलों के पास पहुँव गया जिन पर धोती सूसने के लिए हाली गयी थी। जिस कील पर उसका हाय गया, उसपर उसे धोती का पता नहीं मिला । अब वह घबराया, अन्दर से। बहुत छोटी कठिनाइयों को जब विस्तृत और रंगोन रूप दिया जाता है, तब वे मन पर उतना ही असर करवो है जितनी कि बड़ी चौर गम्भीर । तब उनमें दूसरों से ली हुई शक्ति आ जाती है । परन्तु उसका पुलिस का दिमाग हिम्मत बांध गया। कैसे उसने कई रातें सुनसान सण्डहरों और कत्रों में गुजार दी थों । वहाँ यह पता नहीं था, पर आज मानो किसी अदृश्य शक्ति ने उसके खिलाफ कमर कसी हो। बह दो कदम आगे चलकर टहर गया और मानो उसके हायों में भाप ही आप धोती का पट्टा मा गया। उसने घोतो दूसरे शोलों से हा ली और घट चौकी के अन्दर घुम गया, दरवाजा बन्द करते हुए। उसने फिर चिमनी जला दी। इसको ज्योति मुमारा उठी । मुहम्वन. सिंह मानो स्वस्थ हो गया । यो उठ बैटो और इस मुहम्मतसिंह नामवाले पुलिस-मन को एक बड़ी अजीव याद आयो, इस स्मो को देखकर- किमी गये जमाने में जब मुहानत अमारह साल का नवपुषा था, WITE गंज माउटपोस्ट पर कान्स्टेबिल था मुसलमान और उसकी एक रत लड़को थी। तब मुहम्मतसिंह स्वप्न देखनेवाला सीधा-सादा का जवान था। सुबह का समय था, पूरब पीला हो उठा था, चे में चिड़ियां चहचहा रही थीं। सरल लड़की सुबह उठा करती और ज बगीचे में फूल तोड़ने आया करती। यह हवा के पास कन्वे पर न्दूक रखकर घूमा करता । उसका जो मचल उठता। उस भोली लड़की , फूल तोड़ते वक्त इस नौजवान, अड़ियल सिपाही का हृदय-फूल भी तोड़ लिया था। एक दफ़ा किसी सुबह, मुहब्बतसिंह के जी में सनक नायो । बन्दूक हवालात के गज़ में अड़ाकर रख दो और बूट से खट-खट करता हुआ, फूल तोड़ने बायो हुई उस सरल लड़की का कोमल हाथ पकड़ लिया। लड़को थी उस समय चौदह और पन्द्रह के वीच की। वह चिल्लायो नहीं, मुसकरा दो जैसे उपा मुसकरा देती है। लड़की ने अपनी चंचलता से कहा, "मुझे वह फूल तोड़ना है, जो सबसे ऊपर है। तुम ला दोगे, मुहम्मत !" उस सुबह के पहले प्यार में यती की सुन्दर चाह पर मुहब्बत प्राण तक देने के लिए तैयार हो गया। उसने कहा, "हाँ, मैं तो इससे भी जार चढ़ा था।" पर मुहब्बत को कठिनाई हुई, क्योंकि वह वरदी पहने हुए था लेकिन फिर भी बढ़ता गया। सचमुच चम्पा का फूल बहुत दूर था पर वह चढ़ता हो गया.... इधर हेड कान्स्टेबिल काल का रूप बनकर नीचे खड़ा था। उ देखते ही मुहब्बत नीचे फिसल पड़ा और पीठ के बल गिरा... इसके बाद वह बदल दिया गया और फिर वह प्यारी सूरत कभी नहीं दिखो.... बाज मुहम्मतसिंह के दिल में समस्त पुरानी पोड़ा एकत्र होकर में छाने लगी पर उसने अपने आपको दवाया पर वह दब न सका मानो उसके उमड़ते प्राण क्सिी मूर्ति की खोज में लगने लगे। वाहर मक्सूद कुंजड़े के मुर्गों ने वांग देना शुरू किया और ए से उठत सतह गाड़ी खड़-स करती हुई चौको से गुजर गयो । आज पुराना रंग फिर मुहचतमिह को आंखों में आने लगा और उसे मालूम हुआ, या भ्रम हुआ, मानो यही-उसकी प्यारी, कोमल हापों से रोज सुबह उठकर फूल तोड़नेवाली बालिका साक्षात् खड़ी है। मानो उस बालिका का पूरा स्नेह सौन्दर्य एकत्र होकर सामने वाली स्त्री मैं उसे देख रहा था। उस स्त्रो में वह उसी बालिका के अलौकिक रूप का प्रत्यक्षा दर्शन करने लगा... .....अब वह व्याकुल हो उठा मानो उपा, फूल और सब कोमल वस्तुओं के प्राण के सौन्दर्य और सुरमि के साथ-साथ उसके प्राण घुले-मिले जा रहे हो.... उसने दरवाजा सोल दिया। ठण्डी, कोमल हवा अन्दर घुम पड़ी और पूरव को पोली आमा उस स्त्री के मुख पर घमक उठो । मुहब्बतसिंह मुसकरा उठा। शाम को स्टेशन पर घूमने जाते समय मैंने उन दोनों को ट्रेन में चढ़ते देखा था। मनुष्य में स्थित जिस पगु ने उस स्त्री को चौकी के अन्दर पर रखते हुए अपना आखेट बना लिया था उसी मनुष्य के भीतर बैठे हुए देवता ने मानो माने आचरण से उभे अनायिनी से सनाधिनी बना दिया था।
बुक ही है क्या ? वही ?" एक बार वह स्वयं से ही बुदबुदाया था । सांझ के समय ऑफ़िस के कमरे से निकलकर एक चुस्त-दुरुस्त लड़की ह पर का अनुमानित पसीना पोंछती हुई किसी की आंखों की राह गुजर गयी थी। वह फिर बुदबुदाया था अपने-आपसे ही “वही है क्या-वही, वही ?" अपने मन से ही फिर उसने सवाल पूछा था, "वही ? वही कौन ?" किन्तु वह इसका सन्तोपजनक उत्तर नहीं दे पाया था। अपने मन के प्रश्न को अपने मन का उत्तर न दे सका था। शाम की ललाई में निलाई से धुले आसमान के चंदोवे के अंधेरे में किशोर खड़ा हुआ था एक मित्र की प्रतीक्षा में। काम की थकान के अनुभव में वातावरण की मिठास घुल रही थी। क्लर्की की ज़िन्दगी की वाहियातपन पर जवानी अब भी छा जाती थी। वह एक ऊँचे कद का तेईससाला नौजवान था, और अपने भुलक्कड़- पन और अव्यवस्था के कारण बहुत बदनाम । ऑफ़िस सुपरिण्टेण्डेण्ट उससे सख्त नाराज़ रहता था। किन्तु उसके सहकर्मी उसे निरीह जीव जान, उसकी ज्यादा आफ़त न होने देते। ऑफिस की टाइपिस्ट से वह कुछ इस तरह पृथक् रहता कि लेखक को भी उसे वेवकूफ़ कहने की इच्छ होती है। किन्तु वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसके आरपार देखा सकता है। एक बात और थी । वह बेहद फुजूलखर्ची था। और आज भी, सतह से उठता शाम के साढ़े पांच बज चुक पे चोर ऑफिस की जिन्दगी शान्त हो रही यो-हो चुकी थी, वह अभी भी सड़ा या । किसी मित्र के लिए-सायद सिनेमा के वास्ते-वह अभी रुका हुआ था। जिस तरह गुड़ के पास चीटियो जमा हो जाती है. उसके आसपास चाय पीनेवाले दोस्त महराते रहते । कहना न होगा कि लेखक भी उनमें से एक है। पायद आज वह बहुत अकेला अनुभव कर रहा था। मित्र आने का नाम न लेता था। वह यह फजूल इन्तजार किये जा रहा था। मन में एक प्रकार की शिथिलता व्याप्त हो रही थी। सूनैपन के कारण उसन्न होनेवाली उद्विग्नता जग रही थी कि इदने में... एक चुस्त-दुरुस्त लड़की खिों की राह गुजर गयी। और पौषियाया-सा, स्वयं ही की किसी आन्तरिक वृत्ति को गति से यह प्रश्न पूछता, "वही है क्या ? वही ?" और उसको आवृत्ति करता, "वही है क्या? वही? वही?" पदाचित् उसको मन को शिथिलता की भूमि से ही यह प्रश्न निकला पा। किन्तु निस्सन्देह वह चौंधिया गया था। उस लड़की की चुस्त-दुरुस्त, फिट-काट रहन-सहन उसे पाबुक मारती। उसको लगता-मेरे व्यक्तित्व से इतना पन्द्रास्ट ! यह कन्ट्रास्ट कि जिसमें एक विशेष स्तर पर घोर औचित्य है । नहीं तो वह....नहीं तो और । और भो तो लड़कियां थीं, किन्तु, वह उसे नाम से जानता । किसी के बारे में उसके लिए इतनी सूचना होना बहुत बड़ी वात पी। वह अपने ( महीनों से पास रहने वाले ) पड़ोसियों के नाम तक न जानता पा। यद्यपि कमी-कमी नमस्कार-विनिमय हो जाना अस्वाभाविक न था। इस तरह वेखबर आदमी किस तरह जिन्दा रह सकता है यह बात कुछ लोगों के लिए अरुचि-सूचक, अन्यों के लिए कुतूहल और स्वकीयों के लिए क्षम्य दुर्गुण पा विषय था। वह यरगद के अंधेरे में वैसा ही पड़ा था। सोश को सोझल होती हुई परछाइयों में यह ययान से मर उठा था कि इतने में उसकी गांपों . घायुक ५९ दोह- क हँसता हुमा सम्भावित सौम्य-बुद्धिमान् चेहरा घूम गया था । और वह खुद-ब-खुद बुदबुदा उठा था, "वही है क्या? वही ? वही ?" उस लड़की का नाम-धाम, अता-पता उसे दिया जा सकता था, या जा सकता था। किन्तु, शायद उसके प्रश्न का वह उत्तर न था। रात-भर धुआंधार वरसात करीवन सुबह पांच बजे थम गयी थी । इसका धुंधला प्रकाश, जो बादलों से उतर न पाया था, बहुत ही निर्जीव-सा था। रात-भर जलते रहने का दम भरनेवाले म्युनिसिपैलिटी के कण्डील की सूरत भरी हुई वुझी हुई थी। गली के चारों ओर बसे घरों की दोवार इस तरह गोली, म्लान और निर्जीव हो गयी थीं कि मानो उनमें जीवन ही सो गया था। पूरी गली सुनसान थो। खिलौने बनानेवाले कुम्हार-कारीगर केशव के पड़ोस का दूधवाला अपना एक पेटेण्ट भजन गुनगुनाता, साफ़ मंजी वालटी हिलाता हुमा निकल गया था। कुछ प्रकाश और हुआ। गली में पैरों की आहट सुनाई दी। आहटें बढ़ती चलीं। कुछ घरों में से बच्चों के रोने की आवाज आयो। किसी की नींद टूटी। कोई नींद टूटने पर मुंह को गिलाफ़ में और भी ज्याद ढककर सो गया। कोई किसी फ़िन की बेचैनी से उठ बैठा और वावजूद अधसोयी के, आगे की तैयारी करने लगा। एक आकृति ने दरवाजा खोला, धीरे से जिससे अन्दर सोने की नींद न ट्टे और बाहर की ठण्डी हवा न लगे। और फिर पदचाप से वह आकृति गली में निकल आयी। साथ में एक छोटा का वरतन था। गली का नुक्कड़, जहां दूधवाला बैठता है, अभी खाली थ आकृति ने चारों ओर भ्रमित दृष्टि से देखा । दृष्टि ने खोज चेष्टा की। सतह से उन यह एक स्त्री की आकृति पी। अस्त-व्यस्त वास और उतना ही अस्त-व्यस्त स्वास्थ्य । एकदम बीमार और वचन छाया थी वह । मासों के आस-पारा मरे हुए निर्जीव काले वर्तुल ! और शरीर पर वह मोटा होने पर भी रक्तहीनता को निर्जीव श्यामला पो । मैली, फटी हुई मरदानी धोती पहने थी वह । अपने इस पूरे साज में वह अत्यन्त मगण्य, तुच्छ मनुष्य को निरा- कारता हो सकती थी। किन्तु उसके चेहरे को सजीव सुघड़ नाक और छोटे-छोटे सुन्दर कान और अपने परेशानी के बावजूद उसकी तरल आखें यह बता देती थीं कि 'यह इमारत बुलन्द पो।' कुछ लोगों को तो इस समय भी बेचन गम्भीर, आपातशील और सोद्देश्य दिखाई दे सकती थी। निराश-सी होकर वह लौट गयी। यासों पर पयादा जोर हो जाने के कारण उसकी नसें दुस-सी रही थी। अबूझ पकान से पैर भी सीधे नहीं पड़ रहे थे। दरवाजे को उसने खोल दिया। लोग अन्दर सो रहे थे। इसकी उसने जरा भी परवा न की। यश क्रोध से वह भर गयो। परेशानी जितनी बढ़ती गयी, वह युद्ध होती चली गयो-अपने पति पर, बच्चों पर, भाग्य पर। एक दाण पहले जब वह गली के नुक्कड़ पर सही, सोज-भरी दृष्टि धारों ओर गडा रही थी, उसके मन में प्रार्थनाएं चल रही थी। उसे पया कहना चाहिए, इसका लगातार रिहर्सल चल रहा था। पहले यह गिड़गिड़ाकर, आँखों में दर्द भरकर, अपनी परिस्थिति का संक्षिप्त वर्णन कर उसका मन जीत लेगी और फिर चार दिन याद पैसे देने का सन्दिग्य यादा करेगी। पटिनाई तो रहेगी ही। पर सुबह का संकट टल जायेगा (और नायर, शाम तक कुछ न कुछ व्यवस्था हो जाये ) किन्तु जितनी बार.प्रार्थना करगती गर्यो, यह उतनी ही निस्सहाय अनुभव भारती मदी-औरदिन होली गयी।
किसी को भी नुक्कड़ पर न पाकर लौट आयो थो। घर के लोग। उसने झकझोरकर उठा दिया। सिगड़ी सुलगा दो। इस अनावश्यक सेवाजी के कारण पति के नाराज़ शब्द गूंजे। उन्हें सुनकर वह और जल उठी। घर के सारे संकट की जड़ 'इनको' वेफ़िकी और आलस पति ने रात को पत्नी को यह कहकर डरा दिया था कि कल ऑफ़िस की जांच होनेवाली है और उसे पिछड़ा हुआ काम पूरा कर डालने के लिए सुबह ही निकल जाना चाहिए नहीं तो शायद नौकरी पर आघात हो जाये। ऑफ़िस में झगड़े चल रहे थे जिनके पति द्वारा होने- वाले थोड़े-बहुत ज़िक्र से ही वह चंचल हो उठती थी। किन्तु पति महाराज उठने का नाम नहीं ले रहे थे। और, नाराजगी जाहिर की जा रही थी। यदि वह इतनी सूख गयी न होती तो उसके छोटे-से तुनुक मिजाज चेहरे पर किसी को प्यार आ जाता, किन्तु गरीबी, अभाव और अस्वास्थ्य के सम्मिलित योग से उसका शरीर एक विद्रूप छाया-दृश्य हो गया था कि आज के उसके चिड़चिड़ेपन को देख पति को भी क्रोध आ गया। अपनी संकटापन्न गिरस्ती की प्रतीक यह गृहिणी न स्वयं सुखी होगी और न किसी को सुख दे सकेगी। उसका म्लान, निस्तेज रक्तहीन सांवला चेहर मात्र कोप के और कुछ नहीं प्रदान कर सकता। रामलाल स्वयं ऊपर नीचे तक जल उठा। रात-भर को वरसात के कारण सुवह भी गोली, धुंधली और मैं थी। निर्जीव था उसका प्रकाश । वह अन्दर के कोठे में चला गया। वह एक अंधेरा कमरा था, एक बड़ा-सा सन्दुक हो। वोच में एक वस्तु पड़ी थी। पैर लगते ही टूट गयो । खीझ भोर शक मारता हुआ वह अन्दर चलता गया । रस पार करके वह मांगन को मोरी में बैठकर हाथ-मह धोने लगा। 1 सतह से उठता २ . बहुत बार ऐसा होता था कि रामलाल देर तक हाय-मह घोता रहता किसो अबूझ तन्द्रा में। वह तन्द्रा नींद न यो। नींद को श्रेणी अपवा रोलो थी। कोई कुछ बोलवा या सुझाता या वकता चलता था उसके दिमाग में; और वह भी इस कदर घोरे (स्वर में ) कि यदि उसका वह स्वयं बौद्धिक रूप से आकलन करना चाहे तो असफल होता, परेशान होता । स्वर में धोमे, किन्तु गठि में दुत और दीर्घ पो वह बकवास जो दिमाग के अन्दर नींद से जागने पर भी, हाय-मुंह पोते तक बराबर चला करती। उस बकवास का स्वर पहचाना-सा, अर्थ जाना-माना-सा, उसको मार बड़ो गहरी, किन्तु-सजग होकर मापा के बन्धन में प्रकट किये जाने की तत्परता के साप उसका अर्थ काफूर, पाराय काफूर । साधारण रूप से यह होगा कि मन को ऐसी स्थिति में यदि उसे चाय वा पर न मिलती तो झल्लाहट को सियाह कड़वी लहरे दिमाग को पकड़ लेती। किन्तु, वह वक-क्षक न करता । पोती को कमर में कसकर, दो यालटियां हाथ में लटकाये यह पुएँ पर चल देता । घर को कोठी में बालटियों के कार बालटियां जोशो-खरोश पड़ती हुई देखकर उसकी पत्नी मन हो मन मुसकराती, और उसे छेड़ने को गरज से कुछ ऐसे वाक्प्रहार करती कि पति की मुद्रा गम्भीर हो जाती। असल बात यह पो कि पति-पत्नी दोनों अपने तात्कालिक क्रोध को संगृहीत न कर पाते । पत्नी होशियार पी, पति के स्वभाव को जानतो पो। उसके पैतरे बड़े तिरछे थे। उसके वाक्प्रहारों को सुनकर, दोनों हाथों में बालटियां पकड़े, पति का अर्धनग्न शरीर और चेहरा झल्ला उठता, और अधिक गम्भीर हो जाता । सल्ला इसलिए उठता कि उसके क्रोप को काफूर करने को यह कूटनीतिक पाल है, यह सोचकर और गम्भीर इसलिए हो उठता कि उसका चेहरा सारी स्थिति को बेवकूफ़ी और स्त्री की चालबाज छप-व्यंग्यवालो विनोद पद्धति को देखकर हंस न पड़े, कहीं सपं ठहाका मारकर हास्य. ध्वनि पहुँ ओर विस्तृत न कर दे। उदाहरणतया, एक बार जब पति महाराज मरने चिड़चिड़ेपन का जाक - जहार करते हुए बगैर चाय पिये, रास्ते में वालटी लटकाये कुएं की या चल पड़े और भरी हुई बालटियों सहित वापस लौटे तो चूल्हे के पास बच्चों के साथ बातचीत करती हुई स्त्री कह रही थी, "हुँ ! तुम्हारे वावूजी; अब बड़े अफसर होंगे; अब जण्डेल होंगे, अपनी कम्पनी खोलेंगे, अपना अखबार निकालेंगे।" बच्चों को समझाते हुए ( बच्चों-जैसे ही) निष्कलुष सीख-भरी वाणी में वह कह रही थी। जवाब में वड़ा वच्चा अपने पैरों के तलुओं को छूते हुए, तुतलाये हुए कहता, फिर हमें पैरों में जूता ला देंगे। छोटा बच्चा बड़े बच्चे की होड़ करता हुआ कहता, "हमें कमीज़ ला देंगे। हमें कोट ला देंगे।" तमाशा यह कि बच्चे सिर्फ इसी खुशी में नाचने लगते । और स्त्री पति के चेहरे को देख मुसकरा उठती। रामलाल का दिल करुणा से भर उठता, और उसके दमन के फल- स्वरूप चेहरा कठोर हो जाता, यद्यपि वह मात्र ऐसा ढोंग था जो बुद्धू में पहचान जाता। उसकी यह स्थिति देखकर, उसके हाथों से वाटियों को छुड पति को चूल्हे के पास बैठा लेती। चाय की प्याली आगे करके पूछ "नाराज़ क्यों हो?" और रामलाल हंस पड़ता। उसके मन में मिठास भर उठती हो मन कहता, 'मुझे मिला लेने का अच्छा तरीका है।' जवाव देता, तुम क्यों नाराज थीं?" और फिर वे एक दूसरे को आंखों में आँखें डालकर परस्पर क देखते, और एक दूसरे को मनाने की मुद्रा में हंस पड़ते । किन्तु उनकी आंखों में नाराजगी के कारणों के चित्र पहचान जाते कि एक दूसरे के प्रति अप्रसन्नता की आड़ में अपने ही से नाराजगी छिपी हुई है। उनके जीवन की प्रधान सम् उनके दिलों को निर्दयतापूर्वक कुचला करती हैं, मांखों के स . सतह से उठती। चाय खत्म कर पति अपनी स्त्री की पोठ टपकारकर और हिम्मत दिलाता हुआ उठ खड़ा होला । किन्तु स्त्री जानती है कि उसके दिल को समझाने मात्र के लिए बात कही जा रही है। वास्तविकता यह थी कि रामलाल अफसर नहीं, जण्डेल नही, असदार का मालिक नहीं, बल्कि एक दरिद्र व्यक्ति हो रहा था। जो एक-एक पैसे के लिए मारा-मारा फिरता रहता है । पति-पत्नी-दोनो के सामने भाशा के स्वप्न-वित्र नये, मूर्त-दृश्य आमा के महल । किसी भी तरीके से गुजारा हो, बीमार को दवा मिले और खाने को रोटी और तन को कपड़ा । उसकी दरिद्रता की ओर गली उठाने वाले समाज को बहुत दूर छोड़कर वे दोनो घर आ बसे थे। साढ़े चार बजे के बाद रामलाल अग्रवाल पर के लिए वैचन हो उठता, मोर घर में बच्चे तया स्त्री उसके लिए। शाम को पाय घर के लोग अलग पी लेते, विन्तु तभी से रामलाल की प्रतीक्षा का काल गुरू होता था। संघर्ष, गरीबी और कष्ट-इन तीनों ने परिवार के सदस्यों को मिन्न बना दिया था। कल उसने अपनी स्त्री को गप दे दी यो कि उसे सुबह ऑफिस पले जाना है, चूंकि उसे निहायत जरूरी काम है । वास्तविक बात यह है कि जिस काम के लिए उसे घर से बाहर निकलना पा, यह ऐसा था जिसके लिए काफी मानसिक दोरता तथा, एक अयं में, निलंग्नता को आवश्य- पता थी । वह सरकारी काम न था। किन्तु स्त्री की ओर से समय को पावन्दी रखवाने की गरज से झूठ का आसरा लेकर उसने अपना इरादा पूरा करना चाहा। माख तो उसकी गुल ही गयो पो। पर ज्यों हो जिस काम के लिए निकलने के खयालात उसे सताने लगे त्यों हो उसके दिमाग में एक अजीब- सो सुस्ती, एक विचित्र प्रकार का अवरोष काम करने लगा। स्त्री का कुपित चेहरा देख, उसके मन में भयानक बेचैनी हो उठी। +7TE वही चेहरा जिसे उसको अभावमयी सन्त्रस्त गिरस्ती का चेहरा कहना चाहिए, अभाव के उस प्रतीक पर वह मन ही मन बिगड़ पड़ा, किन्तु समय कम रहने से, अपने आपको संयमित कर वह दूध लाने निकल गया और वार चाय का इन्तजार किये, वह घर से ही नहीं, महल्ले से भी दूर निकल गया। - - किन्तु जो रास्ता उसने पकड़ा वह उस दिशा से नहीं जाता था जिस ओर वस्तुतः उसे जाना था। फिर भी वह चलता गया । उसके पास साइकिल थी । वह बहुत दूर निकल आया। उसने सोचा, सारा दिन उसके पास है, ऑफ़िस में भी छुट्टी है। दिमाग में जो कुछ था वह जोर-जोर से घूम रहा था और तव एकाएक उसे खयाल आया- अकस्मात् बिजली-जैसा । पल भर के लिए उसकी समस्त चेतना वहां पर केन्द्रित हो गयी। किसी तेज रोशनी से चमकती हुई वे आँखें-मानो किसी पागल की हों। फिर भी वे सचेत थी अपनी हताशा में सम्मिलित प्रतिरोध से भरी हुई सम्पूर्ण निरपेक्ष, किन्तु किसी को उसके कर्तव्य का भान कराती हुई निराश और किसी अमूर्त ( यानी तुरत समझ में न आ सकनेवाले कि क्यों ऐसा है ) क्रोध और क्षोभ में जलती हुई । पोले, कृश, सुघड़ चेहरे की वे आँखें रामलाल के अन्तःकरण में गड़ी जा रही थीं। मानो किन्हीं तेज किरणों की वे लम्बी आलपीने हो । उनकी यह दृढ़ एकाग्र निरन्तर दृष्टि हृदय को आह्लाद देनेवाली न थी। चेतना की गहरी तटों की जबरदस्ती झकझोर, विचारों और वेदनाओं की भयानक स्थिति उत्पन्न कर वे तमोलीन गहराई में से एक केन्द्रीय सत्य का उद्घाटन करती थीं, जो रामलाल के लाख प्रयत्नों के बावजूद छिप न सका। मांखों की तेज रोशनी के एक पल के भीतर हो रामलाल कई बार जन्मा और कई बार मर गया उसके कई पुनर्जन्म हुए। रामलाल के जीवन की पूरी कहानी उसके स्वोकृत-अस्वीकृत, उद्- - सतह से उठता आदमी - घाटित-अनुदद्घाटित अपराधों को तया-कपा बोर यपा-कपा माखों के सामने सै विद्युत् को गति तथा प्रकार का रूप और बैग लेकर सरक गयो । अनेक केन्द्रीय सत्य रहते हुए नील स्फुलिंगों-से-अपनी रखेंग-अनक आमा बिरा- राते हुए विलीन हो गये। और वन निगाहों को तेज नोक रामलाल की अन्तश्चेतना की गहराई तक घुस गयो, उसने बहुत बड़ा धान कर दिया, यद्यपि रामलाल उसके चिरस्थामो वेदनापूर्ण स्वरूप को उस समय पहचान नपाया। साइकिल से वह तुरत उतर पड़ा, और उसको लगा, जो चमका कुछ खो गया हो, मानो उसके पास दस रुपये का नोट या जो मर नहीं रहा। किसी ने उसको उड़ा लिया। किसी ने शायद, उसकी जेब पर ली। और वह सबमुच अपनी जेबों को टटोलने लगा कि शायद उसमें उसे दस रुपये का नोट प्राप्त हो जाये। तमाशा यह यह सब करते हुए भी उसका सचेत मन कह रहा था कि क्या दमाशा कर रहे हो। तुम्हारा बुध पोया नहीं है । दस रूपये तुम्हारी क्षेत्र में हो हो कैसे सकते हैं। एक आना भी तुम्हारी जेब में है ? वाह रे पागलपन ! किन्तु अपने मन के इस स्वर की उपेक्षा करता हुआ मन अस्वास्थ्य के गहन दुख का स्वाद कर लेने में तन्मय था। वह अपनी जेबों की बनातलाशी लेने में मशगूल था। अकस्मात् उसने अपनी जेब के कोने में ये एक चवन्नी और एक आना बरामद किया, और वह खुदा हो गया। उन पैसों के प्रतिकारात्मक रूप से उमे सन्तोप दिला दिया कुछ पलों के लिए। यह सोचता हुआ कि उसके दिमाग में जो अमी-अभी विप्लव हुआ है उसके मूल सार-पूत्रों को वह पकड़ ले और फिर अपने काम पर आगे रहे। वह एक समोपस्य केके में घुस गया। उसके एकान्त कोने में रखे हुए पुरसोरेशिल को तरफ वह पापित हुना और तुति र अधिकार कर लिया । माधुनिक सुविधाओं से मग्जित यह फक्रे विशेष आकर्षक नहीं पा किन्तु उसका विशाल हॉल मिसमें रेविल-पुरसिया तगो हुई पो हवा और प्रश का मुक्त प्रांगन बना हुआ था। रामलाल का घर जहाँ न प्रकाश था, न हवा, उससे विरोधपूर्ण कैफ़े को स्थिति के कारण उसे वह अच्छा लगता था। उसके एक कोने में बैठकर वह विचार कर सकता था । मन की उद्वेगपूर्ण स्थिति में, वह वहाँ आया, वशर्ते कि जेव में कुछ रहे । उसके मित्रों में कोई भी नहीं जानता था कि रामलाल अग्रवाल कभी-कभी यहाँ भी दिखाई देता है। ज्यों ही वह कुरसी पर बैठा उसने फिर उसी चेहरे को अपने मन में विराजित मूर्त करने की कोशिश की। चित्र मन में उभरा किन्तु उसके रंग अब फोके पड़ गये थे। उसने जेब से एक मैला कागज और पेन्सिल निकाली और कुछ नोट करने लग गया । वॉय काफ़ी की ट्रे रखकर चला गया था। कप तैयार कर एक घुट वह पीता जाता था और लिखित पंक्ति को पढ़ता जाता था। पढ़ चुकने के बाद उसने वह कागज जेब में रख लिया और बुदबुदाया, "माज शाम तक व्यवस्था हो ही जानी चाहिए।" किन्तु इस सम्भावना की असम्भावना का खपाल माते ही उसके हृदय में एक टीस उठी। मानो किसी ने उसके दिल में खंजर भोंक दिया हो। जी धंस गया । और उसके शरीर की सारी शक्ति और मन का वल लुप्त हो गया। और पैरों की नसों में एक विचित्र प्रकार की ठण्डो ऐंठन शुरू हो गयी, कुछ क्षणों तक कायम रही। कुछ पलों बाद विजली की चमक-सा एक चित्र उसके दिमाग में कौंध गया। उसने उसके बारे में तो विचार ही नहीं किया था। वह अवश्य देगा। किन्तु कैसे देगा? दे तो वह सकता है किन्तु....! मांगे कैसे ? उसे फैसे समझाया जाये !! यही तो समस्या है। यह सोच लेने के बाद रामलाल फिर अपने पूर्व-विचार पर आ गया। जिस व्यक्ति के पास जाने के लिए वह घर से निकला था, उसी ओर संक्रमण करना चाहिए, यही उसने निर्णय किया। उसे पल-भर के लिए सन्तोष हुमा, जो काफूर हो गया इस खयाल के माते ही कि शायद वा व्यक्ति घर पर न हो अथवा गांव चला गया हो। सतह से उठता भादर वह कुरसो से उठ खड़ा होने को हो पा कि उमको निगाह दुमरे टेबिल पर पड़े एक अखबार पर गयो । उसके नीचे एक दूसरा अपवार भी पा । यद्यपि उसे देर हो रही चो, मोह संवरण न कर सका, और उसने अखबार को उठा लिया । पन्ने पलटते-पलटते वह एक समाचार पर ठिठका । मध्य प्रदेश के किसी फस के एक ग्रामीण शिक्षक ने आत्महत्या कर ली। रेल के नीचे वह कट गया। जेब में एक पुरजा पाया गया। जिसमें लिखा था कि 'चालीस रुपये माहवार सनख्वाह और पांच रुपये महंगाई। कुल रुपये पतालोस में गुजर-बसर करना असम्भव है। घर में बीमारी और बड़ा परिवार । जमाने से तंग और दुनिया से हिरास, दिल से शिकस्त और तिना काम में एक टीचर अपने पारे परिवार का उदर-मरण करने में असमर्थ हूँ। पैतालीस रुपये में पेट और परवालों को सेहतें नहीं पाल सकता । नामुराद और नाकामयाब मैं टीवर खुदकुशी कर रहा हूँ।' यह खबर मोटे-मोटे हपों में निट्ज' में उसने पठी। यह भी पढा कि जगह-जगह समाएं हो रही है। टोचर देशपाण्डे को स्मृति को अमर बनाने के लिए नौजवानों ने गरीब शिक्षक के सवाल पर मान्दोलन छेड़ दिया है । जिन-जिन शहरों, कसवों और गांवों में सभाएं हो रही थी उनके संक्षिप्त समाचार एक के नीचे एक दिये गये थे। जन-सेवी उग्र राजनीतिक पार्टियों और स्वतन्त्र मतवादी कार्यकर्ताओं ने इस साल की अपने हाथों में लिया। सभाओं में सरकार को आलोचना की गयी और प्राथमिक शिक्षक संघ से आग्रह किया कि वह तुरत प्रान्तम्मानी आन्दोलन छेड़ दें। किन्नु शिक्षक संघ के इस फैसले के लिए कने की जरूरत नहीं। जहाँ-वहाँ स्थानीय संघर्ष छेड़ दिये जायें। इस अखबार ने बड़े अच्छे ढंग से इस समाचार को पापा । वह कुछ पुराना होने पर भी, रामलाल को दिलकुल नया लगा। उसको पढ़ते. पढ़ते उसे भी जोश आ गया। उसके दिल को सारी माम्मोदी एक विश्व-व्यापी अंगार में सम्मास्ति होकर उसके दिल को गरमो और मारमा हज़म। किरण प्रदान करने लगी। बीमार का जैसे संहत प्राप्त होतो है, भूखे जैसे अन्न मिल जाता है, निस्सहाय को जैसे कोई उद्धारक अभिन्न- दय मित्र के दर्शन होते हैं-बिलकुल उसी तरह रामलाल को एक सत्य के दर्शन प्राप्त हुए, वह सत्य जिसका वह स्वयं एक अंग है। रामलाल ने अपने-आपको प्राप्त कर लिया, अपने-आपको खोज लिया । क्या रामलाल स्वयं टीचर देशपाण्डे नहीं है, जो रेल के नीचे कटकर मर गया ! क्या उसने कभी नहीं सोचा था कि अपनी उलझनों की दुनिया से फरार होने के लिए निश्चय कर डाले ! पर हां, उसमें और देशपाण्डे में एक फ़र्क था। ग्रामीण शिक्षक मामलो मैट्रिक पास था इसलिए उसे कट मरने की सूझी। रामलाल ग्रेजुएट है, उसने ( अपनी कल्पना में ) एक रिवाल्वर पाया-भरा हुआ रिवाल्वर । उसने अपनी स्त्री पर दो फायर किये । एक-एक फ़ायर से दोनों को खत्म किया। काम खत्म, पैसा खुद खत्म हुए, दुनिया खत्म हुई। उसकी लाचार वेबस गरीबी जिन्दगी पर दया दिखानेवाले मां-बाप, भाई-बहन और रिश्तेदारों की दया के भाव, उस व्यवस्या, उस पद्धति के खिलाफ़ घृणा-ज्वलन्त विषाक्त घृणा के रूप में बदल गये। पर शायद रामलाल को देशपाण्डे से जिन्दा रह का ज्यादा मौका था, इसलिए वह अब तक जीवित रह सका। तो व हुआ ! देशपाण्डे और उसकी श्रेणी एक ही है । रामलाल स्वयं देशपाण्डे है, और विलखता परिवार भी है जो किसी गांव में-दूर किसो गांव में जिन्दगी की सियाह चट्टानों पर वोने की पागल कोशिश कर रहा है। रामलाल वह बेचैन नौजवा है जिसने देशपाण्डे की खुदकुशी की खबर सुन, इनक़लाब की आग की हिम्मत और जुर्रत की और गिरफ़्तार हुआ। रामलाल वह वे जलसे, पोलिटिक्स डिमांस्ट्रेशन भी है जो देशपाण्डे और उसके के लिए माग के शोलों की मानिन्द भड़क उठे। किन्तु सबसे रामलाल की वह सूरत है, वह शक्ल है जो एक टीचर की होती बढ़े हुए, पीले चेहरे पर थकान और संयम का सौन्दर्य । छोटे- -- सतह से + फटेहाल, बच्चों के दिलो-दिमाग में मान का एक-एक कण, एक-एक दोज डालने में प्रवीण, स्नेह-विश्वास-मादगी को मूरत, यह झुलसा हमा पर मुस्तकिल दिमाग, फटेहाल पर गम्भीर, लाचार पर दा, गरीव पर इस्योअमल का बहुत बहा पैग़म्बर यह मामूली टीचर, वह दिमागी मजदूर। समाज में जिसकी कोई वक्रत नहीं, बनिया जिसे हिकारत की नजर से देखता है, अफसर जिसे तुच्छ समझता है, प्रोफेपर जिसे दयनीय मानता है, सरकार जिसे कीडा समझती है और जिससे इकतरफ़ा बलिदान मांगा करती है, वह ग्रामीण शिक्षक ! रामलाल ने अपनी सूरत अपने दिल में देख ली। इन सारे भावों को उसके हृदय में आने और अन्तःकरण में निमग्न होने में तीन मिनट से भी फ्यादा समय न लगा होगा कि उसने पाया- सामने की टेबिल पर एक परिचित मूरत दीख रही है। किन्तु अपने भावों को गरमी अभी गयो नही पो। उमे दूसरों की ओर झोकने को अभी फुरसत कहाँ ? यह तो अभी सोच रहा है। रामलाल ने बौद्धिक रूप से भी कुछ निष्कर्ष निकाले । एक तो यह कि वह स्वयं विशाल भव्य उपन्यास हो सकता है और उसका अगभूत एक पात्र भी। पर अभी वह कुछ नही । पर से होना चाहिए । नवीन शक्तियों को ममा उसमें जरूरत से मादा हो सकती है और एकाएक भड़क सकती है, पर ममो तक वह अपने पापको उसमे बचाता आ रहा है....पर कर तलक ? उसे उनम हो जाना चाहिए । यही धर्म है। उसने सिर चा पर फैफे के हॉल के चारों ओर नजर दौड़ायो । पर पाम की सूरत एकदम दिसाई न दो, किन्तु एक पल के अन्दर हॉल का रिव्यू समाप्त करने के बाद उसपर नजर ठिठकी। चेहरे पर परिचय की मुसकराहट थी। यह मुसकराहट जो कुछ कहना चाहने के पहले ओठों पर सिंच उठती है। रामलाल के मुंह से फिसल गया, "कहिए बाप इयर कैसे?" "क्यों, मैं तो अकसर आती हूँ यहाँ ।"
"सदर में रहती हैं क्या आप ?" "नहीं, जब मानिग शो देखना होता है तब इधर भी.... रामलाल को खयाल आया कि हां, लोग छुट्टो के दिन सुबह का शा देखने आया करते हैं। कला-प्रेमो शिक्षा प्राप्त नागरिक समुदाय इधर झुक जाया करता है। पर रामलाल क्यों इधर माया करता है? पैसे की तलाश में निकला तो इधर भटक पड़ा । लाहौल बिलाकूवत । अपने अभाव के वोध से उसके हृदय में एक टीस उठी । वह अस्थिर हो गया। लड़की उससे कुछ नये प्रश्न-उत्तर यानी वात की अपेक्षा करती हुई नीचे गरदन डाले थी। रामलाल ने ऊंची निगाह कर उसकी ओर देखा और लड़की ने उसकी ओर । पर वह कोरी और सूनी दृष्टि थी। परिचय की मुसकान के वाद सहज संकोच ने अपरिचय का जामा पहन लिया। बहाने से रामलाल ने दूसरे अखवार भी उठा लिये । पर यह सोचता गया, 'कभी-कभी यह भी होता है। एक दूसरे से बिलकुल अपरिचित रहते हुए भी लोग अपनी सारी अपरिचयता को यथास्थान सुरक्षित रख- कर मात्र बातचीत करने के लिए कुछ बोल उठते हैं, उसी का यह उदा- हरण है।' - किन्तु उस लड़की की सूरत मन में दो पल के लिए रंग गयो सब कुछ व्यवस्थाबद्ध, चुस्त-दुरुस्त । पोशाक विलकुल सादी, यहां तक कि कपड़े की राशन दुकान से मिली हुई फत्यई किनारे की मोटी साड़ी और सफेद झम्पर । किन्तु पहनने का तरीका ऐसा कि आंखों में भर उठे। वह लड़की अपनी जगह से उठी और चुपचाप एक अखवार फ़िल्म- पेज रामलाल की ओर खिसकाते हुए बोली, "यह उसको मालोचना । 'मोशिये वेर्दू है आज मेट्रो में ।" इतने में दो सज्जन कैफे में घुसे । वे उस लड़की के पास आये, और मराठी में कुछ वोले जिसे रामलाल ठीक-ठीक न समझ सका। वे लोट गये । रामलाल ने सोचा, शायद सिगरेट-विगरेट लेने के लिए गये होंगे। सतह से उठता आदमी रामलाल ने आलोचना सरसरी तौर पर पढ़ ली और जो पहली पोज उसे लगी वह यह कि उन दोनों में कई या एक है। खुश होकर मुमकराता हुआ यह उम लहको को और देखने लगा वो उसकी नजर सहसा उसके गले में पहो सोने को माला पर गपी। "ये जो दो सज्जन आये थे, आपके कौन हैं ?" "मेरे पिताजी और दूसरे मेरे मामा होते है ।" "पिताजी क्या करते हैं ?" "वकालत, जो चलती नहीं।" रामलाल ने बुतूहल से सिर्फ गरदन हिला दो। लड़को कहती गयी, "इसलिए मुझे नौकरी करनी पड़ी। उन्होंने मुझे पढ़ाया, अब मेरी वारी है दो छोटे भाइयों को पढ़ाने को।" इतने में बाहर गये दोनों सज्जन लौट भाये और लड़की उनसे बातें करने लगी। कॉफो की ट्रै भो आ गयो यो । रामलाल फिर अकेला पड़ गया। उसके मन में लड़की की सोने को माला चमकने लगी। वैसो माला अगर आज उसके पास होती तो उमकी कई कठिनाइयाँ दूर हो जातो। किन्तु जब रामलाल अग्रवाल ने होश संभाला तो उम महाराष्ट्रीय लहको से कही ज्यादा सोना उसके पास था। किन्तु आज कुछ भी नहीं । कठिनाइयों ने न सिर्फ़ सोना सा डाला बल्कि परीर को भी मुसा दिया। उसे कमजोरी और रोग का पर बना दिया । सनवाह की बड़ी रकम डॉक्टरों के पास जाने लगी और फर्श का पहाड़ ऊंचा होता चला । चिन्ता का धुआं दिलो-दिमाग में हमेशा के लिए भर उठा चोर आत्मा को लो घुमाने लगी । जीवन में जीवन की अभिरुचि जातो रहो। पलती का नाम गाड़ी है। किसी तरह जिन्दगी चले, इसकी फिक्र सवार रहने लगी। रामलाल की बहू सावित्री जब वियाहित होकर बायो यो तो उसका रूप ही कुछ और था। एकदम स्वरूप और थाक.पंक । स्वास्थ्य ऐसा कि जो किसी वृक्ष का स्वास्थ्य होता है। जिसमें बड़ी शक्ति और यहत चायुक आत्मसामथ्यं स्वाभाविक रहता है। शाख के या घड़ के कट जाने के वावजूद जो विकसित और संवर्धित होता रहता है। ऐसा था स्वास्थ्य रामलाल की बहू का। किन्तु आज आठ साल बाद, वह एक ऐसा खोखला घर हो गयी जिसे जरा-सी बांधी का हलका-सा थप्पड़ व्हा सकता है। रामलाल के मन में अपनी पत्नी का चेहरा उभर आया और तुरत ही उस रूप में परिवर्तित हो गया जब साइकिल पर बैठे हुए इधर आते समय उसकी कल्पना में विराजित हुमा था। उसका जी धंस गया। वह चेहरा एक कर्तव्य की ओर इशारा कर रहा था-वह कर्तव्य जिसका फल हो न हो। एक चिन्ता एक घोर फिन का खेकड़ा उसके दिमाग की दीवारों पर अपने आठों पांवों से रेंगने लगा। और उसके दिमाग में एक वह खयाल आया-एक ऐसा खयाल सियाह शक्ल को न देखने की कोशिश में था कि इतने में.... "सुना, आपने-इन्दौर में मजदूरों पर गोली चल गयी।" रामलाल अपनी वैचारिक तन्द्रा में से जाग उठा । वह गैर किसी औपचारिक परिचय, 'नमस्ते' आदि क्रियाकलापों के लड़की के पिता का उससे बात करना रामलाल के लिए थोड़ा आश्चर्यकारी सिद्ध हुआ। किन्तु उनके सौजन्य प्रतीति के कारण अपना विस्मय प्रकट न करते हुए उसके मुंह से यह उद्गार फिसल पड़ा। "ऐसा ! जो हो जाये सो थोड़ा... जमाना वड़ा नाजुक है।" लड़की के पिता ने, रामलाल का बुजुर्माना जवाब सुनकर, बहे गौर से उसकी तरफ़ देखा। उनको सूरत उसके प्रति हलके विस्मय और ध्यान के भाव से इस तरह फैल और सिकुड़ गयी कि, रामलाल उनके भाव को ताड़कर एकबारगी हतबुद्धि हो उठा। फिर भी, अपने आपको संभालकर वह कुछ कहने ही वाला था कि पिताजी बोल पड़े, "मुझे कहना चाहिए था कि जमाना नाजुक है....पर वह, दरअसल, इतना .. सतह से उठता जादमी नाजुक नहीं जितना बाप सोचते हैं। उमाना जो है और जो आ रहा है वह सहज है, सरत है।" रामलाल कुछ कहने के लिए कह गया, 'निहायत सस्त..." "....और वह सस्त कदम, सस्त आदमी, सस्त संगटन पसन्द बरवा है...." मूछो में मुमकराते हुए उन्होंने कहा । रामलाल ने सोचा, यह उसपर चोट है । पर, अदब के मारे जवाब में दे पापा । उसने कहा, "घटना क्व की है।" "कल की।" पिताजी, जिस ढंग से वात किये जा रहे थे उससे जाहिर था कि न सिर्फ उन्हें राजनीति में दिलचस्पी है वरन् एक जनवादी दृष्टिकोन भी रखते हैं । बातचीत, बहस-मुवाहिसा के शौकीन तो है ही, माप हो उन्हें दिल और दिमाग भी है। उस व्यक्ति ने रामलाल को अपनी ओर-रस्मी बेतकल्लुफ बातचीत से प्रभावित किया हो मित्र-भाव से उसका बाह्वान भी किया। फिर भी, रामलाल ने सोचा, उनको अपनी बुजुर्गी का खयाल कर उसे लोडा ही समझता था। उसे आवश्यकता से अधिक प्रतिष्ठा और सम्मान दिया । रामलाल को यह सचमुच पटक गया। "आप क्या समझते हैं ? काप्रेसी हुकूमत चन्द दिनों की है। ऐरे जल्म धक नही सकते । अंगरेजों के जमाने में इसमें स्यादा बाजारी भो। मानते है या नहीं आप । गोली चलाना तो एक सैल हो गया है, लिम- वालों के लिए...." इतने में एक सज्जन सादी का कोट-पष्ट पहने हुए इसी बोर माझे हुए दिखाई दिये। और सीधे पिताजी को यसलवाली कुरसी पर बैठ गये । वह गोरा, हजामत किये साफ चमकदार चेहरे का या मुख पर प्रतिमा, महत्त्व और अहंकार को यामा हाक मारती थी। उसे बगल में बैठे देखकर पिताजी ने उसे इस तरह शा मानो संट रहे हों। "क्यों जी ठीक है न?" नवागन्तुक ने व्यंग्यपूर्ण दिस्मित रिया रिती परदा नर, सहरी के पिता वारी-बारी से दोनों को ओर देखते हुए बोले, "अब तो आ रहा है कम्युनिज्म, कम्युनिज्म !!" उनके चेहरे पर ऐतिहासिक भवितव्य की आस्था और उसके ज्ञान- गर्व का लो उठ रहा था। नवागन्तुक और लड़की के पिता में वहस छिड़ती हुई देख रामलाल ने अपने अकेलेपन को संवारते हुए अपने को संवारना चाहा। नवागन्तुक के आगमन की घटना ने उसके मन में एक विचार को जाग्रत् किया, उस विचार ने दूसरे विचार को, दूसरे विचार ने तीसरे विचार को। इस तरह एक धारा चल पड़ी। इस मानसिक आवेग पर एक साँवली परछाई पड़ी हुई थी, उसी सियाह शक्ल को जिसको भुलाने की कोशिश रामलाल ने की थी। पिताजी से बातचीत के दौरान में वह छांह सिर्फ़ एक ओर हट गयी थी, किसी कोने में घनीभूत होकर खड़ी हो गयी थी। किन्तु, अकेला पन मिलते ही, उसकी सांवली परछाईं प्रत्येक भाव और विचार पर पड़ने लगी। सांवली परछाई पड़े इस विचार भावावेग को धक्का देनेवाला वाक्य था वह "अब तो आ रहा है कम्युनिज्म, कम्युनिज्म !" उस वाक्य ने रामलाल के भावों को और भी जटिल, तीव्र और वेदनापूर्ण बना दिया। अब कैफ़े की स्थिति उसे असम मालूम होने लगी। उसे लगा, वह वहाँ से उठ पड़े। साथ ही पिताजी का क्षोम-भरा वाक्य सुनाई पड़ा, "ग्वालियर में क्या किया !" "वह किया जो होना नहीं चाहिए था।" बड़ी संजीदगी के साथ नवागन्तुक ने जवाब दिया। "लेकिन इसकी जिम्मेदारी किस पर है"...उत्तेजित होकर पिताजी ने पूछा उन्हें समझाते हुए नवागन्तुक ने जवाब दिया, "सरकार पर, जनता पर, शासन-यन्त्र पर, समाज पर, हम सब पर।", । सतह से उठता आदमी पिताजी पकड़ में आ रहे थे। एक दूसरा तर्क दिया जा रहा था। लड़की ने अधीर होकर कहा, "मुख्य रूप से किस पर ? जनता पर या समाज पर !" निस्संकोच रूप से नवागन्तुक न जवाव दिया, "जनता पर।" इस उत्तर की किसी को यपेक्षा न थी। उनको हतवृद्धि होते देस. कर उसने कैफियत पेश की, "सवाल यह है कि हम लोग अभी जन- तान्त्रिक उपायों से अनभिज्ञ है। जनतन्न के सिद्धान्त समाते भी हमारी आदतें ऐसी कि सरकार को शक्ति का उपयोग करना पड़ता है। हममें जनतान्त्रिक शक्ति को कमी है । यया कारण है कि फ्रांस, इंगलैण्ड, अमरीका आदि देशों में इस तरह के दृश्य दिखाई नहीं देते । पयोकि ये जानते है कि काम किस तरह करना चाहिए।" ...फिर हमारी बाजादी को तीन हो तो साल हुए हैं.... पिताजी ने दोम और घूगा से उसकी ओर देखते हुए कहा, "हमारे शासक भी जनतन्त्र का उपयोग करते हैं, जन-नेता धने फिरते हैं । गुण्डा ऐक्ट कहाँ-कही किस-किस पर लगाया गया है, जानते हैं आप ! विरोधी पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर ही नहीं, पुराने कांग्रेसी कार्य- कर्ताओं पर भी जो सत्ताधारी दल के खिलाफ बोलते और कार्य करते ये....उनपर भी लगाया गया है । अजो, मेरा मतीजा कब से गुपहा हुमा, याज उसे पन्द्रह साल हो गये कांग्रेस का काम करते-करते, कभी यह गुण्डा नहीं हुआ, और एकाएक काग्रेस पंचायत के चुनाव के मौके पर गुण्डा ऐक्ट के मातहत वह गिरफ़्तार ! वाह रे, जनतन्न !" "विद्यापी अपनी आवाज उठायें, मजदूर और किसान मांगें मुलन्द करें तो गोलियों की बौछार !" लड़की ने भी अपनी प्रतिमा बताने को कोशिष की। "काला बाजार होता है तो जनता का गुनाह है, बनिये का नहीं। रिश्वतखोरी होती है तो जनता का गुनाह है। गोया हमारे नेता और नौकरशाही दूध के घोये है।" मामा साहब को भी जोश या गया बोले, "मुझे यताइए ! इन्दौर के दूरों पर, नव वे अपनी मांगों को लेकर मिल मैनेजर के ऑफ़िस के मने प्रदर्शन कर रहे थे, गोली चलाने की क्या जरूरत पड़ गयो । वैसे 1, ग्वालियर के विद्यार्थियों पर-अजी! चालियर में दोबारा गोली चली उन्हीं विद्यार्थियों पर, जब वे सड़क पर डिमांस्ट्रेशन कर रहे थे। और मध्य भारत सरकार ने प्रेस-कम्यूनिक निकाला । एक शर्मनाक विज्ञप्ति यो वह । साहब, अखवारों ने उस प्रेस-कम्यूनिक की ऐसी धज्जियां उड़ायों !" लड़की ने जोड़ा, "'नवभारत टाइम्स' ने तो अपने प्रधान वक्तव्य में उसकी खूब खबर लो।" मामा साहब ने उत्साह से कहा, "अजी, विलट्ज़ ने भी ऐती खबर ली है ! और अभी तो ख्वाजा अहमद अब्बास का 'लास्ट पेज' याने को है !" और उन्होंने मुसकराकर नवागन्तुक की ओर देखा। किन्तु नवागन्तुक के चेहरे पर लज्जा अथवा संकोच का बोध न था। उसने हंसते हुए चिल्लाकर कहा, "बरे, मुझे कॉफी पिलानो !! नन्बास कम्युनिस्ट है !" वह खतरनाक अभियोग सुनकर तीनों बोल पड़े-"तो हम सब लोग कम्युनिस्ट है ! माफ़ करना, माधवप्रसाद !" माधवप्रसाद बोले, "कॉफ़ी आ गयी, पर वह कम्युनिस्ट नहीं है रन फॉर्म कम्युनिस्ट !" "वे लोग और भी खतरनाक होते है ! आपके लिए तो सात ते र" मामा साहब ने धमकी दी। "मैं जानता हूँ कि फांसी पर लटका देंगे मुझे दे !!" माधवप्रः ने कहा। - रामलाल वीच में टपक पड़ा, "नमस्ते, माधवप्रसादजी !" "नमस्ते, भाई, नमस्ते! तुम यहां कहां! कॉफ़ी पीओ !! ऐ कॉफ़ी लाओ। बहुत दिनों में दिखाई दिये, यार! [ लड़की के लि मोर उन्मुख होकर ] साहब, यह मेरा छुटपन का साथी है- यार । इसने आज से पन्द्रह साल पहले मुझसे 'लेस मिजरेविल्स' माफ़ मॉटेक्रिस्टो' और 'हंच बैंक ऑफ़ नोदाम' उठा ले गया सतह से उठ ये भय तक लौटाने आ रहा है। पन्द्रह सार दरमियान जब-जब ये मिलता रहा, मैंने इसे याद दिलायो, और यह हमेशा वपन देता रहा पर ( हाथ के इशारे से) भूल गया । क्यों थे !" माधवप्रसाद ने प्यार से कहा। सब लोग रामलाल सहित हंस पड़े। रामलाल ने हर्ष से उत्फुल्ल होकर कहा, "और इससे पूछिए, मेरी ये कितनी किताबें ले गया और बेचकर खा गया। मैंने इस बारे में जब इसके घर पर शिकायत की तो वह पिटाई हुई यो कि उसके दाग अभी भी पीठ पर है । बतामो तो पीठ सोलकर, बताओ !" "हमारी इतनी येइपरती नहीं कर सकते जनाव याप!" "तो क्या कर लोगे 1 नौकरी से निकलवा दोगे, और क्या ।" माधवप्रसाद ने दुखी हो पड़ने का नाटय किया। पेहरा कुछ लाल और गम्भीर बनाकर निगाहें उसकी मोर टिका दौं। और धीरे से धीमे स्वर मे कहा, "ऐसो इच्छा होती तो न मालूम कर का तुम्हें निकला देता । पर कुछ सोचकर हो रह गया !" रामलाल ने जवाब देना उचित नहीं समझा पर मन में कहा, "सो तो ठीक है, पानु को नपुसक बनाकर रखना भी तो एक करिश्मा है।" माधवप्रसाद कहा, "आप है हमारे वयोवृद्ध कांग्रेसी सेवी यी आत्माराय वीर एडवोकेट, आप इनके मामा साहब और आप कुमारी डवीर ।" "परिचय हो चुका है !" सन्तोप से गरदन हिलाते हुए रामलाल ने कहा । यह आगे बोला, "तो मैं चलू, इजाजत हो।" "मच्छा," सबने यहा । माधवप्रसाद ने मजाकिया स्वर में पूण, "कितायें कब लौटा रहे हो ?" लड़की ने मह फेरसर उसकी ओर मुनकराते हुए अभिवादन किया। और उगवी सोने की माला रामलान को वासों में चमक ठो। रामलाल के मोहल हो जाने पर लड़की के पिता ने सहानुभूति के TIT में कहा, "वहुत गरीव और नेक मालूम होता है" और उन्हान चप्रसाद के मत के हेतु उसको मोर देखा। माधवप्रसाद ने एक गहरी उसि छोड़ते हुए कहा, "नेक तो खैर हो,” फिर कुछ रुककर आगे कहा, "लेकिन गरीब वह जान-बूझकर ना हुआ है।" "सो कैसे !" लड़को ने उत्सुक होकर पूछा । "जो आदमी गरीव बना रहना चाहता है, उसका कोई इलाज है ? कितनी ही तो नौकरियां छोड़ी उसने-मात्र भावुकतावश । मैंने उसकी कई वार मदद की, पर उसने कभी अपनी हालत नहीं सुधारी। दिमागी फ़ितूर उसपर आज भी सवार है ।" उसने अर्थ-भरी मुसकान से तीनों को मोर देखा और कहा, "भाई, अगर रोटी कमाना हो तो उसका तरीका सोखो । दुनिया की फ़िक छोड़कर अपनी बढ़ती को चिन्ता करो।" "मैंने उसे इतने अच्छे-अच्छे काम दिलाये, पर उसने एक भी मन लगाकर नहीं किया... इतना कहकर माधवप्रसाद ने तोनों की ओर तृप्तिपूर्ण दृष्टि से देखते हुए मात्म-सन्तोष की सांस ली। किन्तु उसकी बातों में सन्निहित गुप्त व्यंग्य किसी से छिप न सका, जिसका उपसंहार उसने इस तरह किया, "ही इज ए नेवर डू वेल' [ वह एक निकम्मा और दयनीय व्यक्ति है।] सतह से उठता विद्रप सम्यता के पूर्वकाल में मनुष्य जाति प्रबोलों में रहा करती थी और सुबह से शाम तक खाद्य के एकत्रीकरण में जुटी रहती । फल तोड़ना, फल बीनना, शिकार करना, पककर सो जाना, और फिर दूसरे दिन- वही-वही। सर्वटे भी यही करता है, लेकिन बोले भीतर के रहकर नहीं, क्योंकि आधुनिक सम्यता में कवीलों का लोप हो चुका है। वह अकेला रहता है, अकेला दौड़ता है । भोला गुन्ताड़ा मिडावा-बशर्ते कि वह गुन्ताड़ा हो और वह भिड़ जाये; लेकिन जिसमें वह भिड़ जाया करता यह गुन्ताड़ा नहीं पा, सिर्फ़ गुत्यी थी, सवाल पे जो एक दूसरे से मिलकर उला गये थे। भोह में भी अगर सर्वटे अकेला रहे दो इसमें उसका कोई दोष नही था। वह समझता पा कि उसकी स्थिति दयनीय है, इसलिए और भी अवेला महसूस करता। हमदर्दी मिलना आसान पा, सहायता मिलना लगमग सम्भव पा। हमदर्द वही थे और हो सकते पे जो उसके जो लाचार हों, वे क्या सहायता देते । स्वयं को लावारी की भावना, उस व्यक्ति को मन ही मन और अमेला बना देती है। इसका एक छोटा-सा कारण और भी था और यह यह कि सवंटे दिखने में, यात में, पाल-दाल में दयनीय नहीं पा; फिर भी वह अपने- पापको दयनीय नही समझता पा! और समझता भी था तो वह मात्मगौरव कई बार सो चुका पा; यह नि बामगौरव समाता है यदि faza उसको रक्षा करता तो अपने परिवार का पालन-पोपण उसके भव हो जाता । वह कई वार भरने मापको वेश्या कह चुका था। सर्वटे अपने आपको दया का पात्र इसलिए नहीं समझता कि वह स व्यक्ति से यदा-कदा सहायता प्राप्त करता था, उस व्यक्ति से वह आप आप घृणा करने लगता। सहायता देनेवाले व्यक्ति से सटे अपने आपको ( जो सहायता प्राप्त कर रहा है ) बहुत ऊँचा समझता । उसका खयाल था कि जो उसे सहायता दे रहा है वह उसकी स्थिति पर दया करके । अपनी मजबूरियों के बोध के कारण, उसे सहायता तो लेनी ही पड़ती। किन्तु सहायक उसके हृदय से दूर, दूर, बहुत दूर, हट जाता। उसे लगता कि वह सहायक से घृणा कर रहा है, यद्यपि लेते समय वह सहायक को ईश्वर का अवतार ही समझता। किन्तु पोठ फिरते हो, तवंटे के हृदय में जहर उबलने लगता, धुआं निकलने लगता। और तब वह पाता कि वह सचमुच वेसहाया है, अकेला है, भयानक अकेला। क्योंकि मानवोचित जिन्दगी बसर करके वह मनुष्य भी नहीं बन सकता। वह निरा पशु है। इस प्रकार सर्वटे कभी अपने आपको पशु, कभी बन्दर, कभी रीछ, कभी सिर्फ कुत्ता अनुभव करते हुए, पुराने असभ्य वर्वर मादिवासी की भांति दिन के भोजन की तलाश में निकल पड़ता। दिन-भर की अकार बाची पेट मेहनत के पसीने से, वह क्रुद्ध हो जाता, चीख उठता ( में वड़बड़ाता कि आत्महत्या कर लो जाये । आत्महत्या की भावना तुरत शारीरिक प्रतिशोध की भावना में बदल जातो) किन्तु, सर्वटे अपने आप चाहे जितना वर्वर मान ले, वह वर्बर समाज का अंग नहीं था। इसीलिए, रास्ता काटकर, कन्नो काटकर निकल जाने की लादत थी। मुझे अगर दूर से उसने नाते देखा, तो वह तुरत हो गलो से निकल जायेगा। इसका कारण सिर्फ इतना ही था, सोचता था कि जिस समाज में मैं घूमता हूँ उस समाज का विधान उसपर लागू हो जायेगा। उस समाज के मानदण्ड से उठत सतह जायेंगे इत्यादि-इत्यादि। और, वह ठोक इन्ही घमासार नियमों और भड़कीले विधानों से डरता, चिढ़ता और लडता था। मिस्टर सर्वटे मेरे तई एक अत्यन्त साधारण पा और साधारणता को इस आत्यन्तिकता में असामान्य मनुष्य था । हो में उसे मनुष्य कहूँगा, उसकी सारी घृणा के बाद । रात का वक्त । मैं शहर के बंगले में हूँ जो असल में याहर भी है, और शहर के भीतर भी। मेरे दोमंद्धि मकान के पोछे ही, रेल की पटरियो चली गयी है। इस महल्ले में शाम के सात बजे। शान्ति छा जाती है। रास्ते पर थावा-जाही लगभग बन्द हो जाती है और सम्भों पर बिजली के बल्य असेले टिमटिमाने लगते हैं। दूसरी.मंजिल की गैलरीवाली खिड़की के पास अपने कमरे में मैं अकेला बैठा हूँ और मुवह को पूरा न पढ़े असवार में दिल जमाने की कोशिश कर रहा हूँ। किन्तु साय हो मेरा ध्यान कोने के गोल छोटे टेविल पर रखे हुए टिफिन के पोतलो हये पर भी है, जिस पर बिजली के प्रकार के कारण, एक चमक-सो मा गयो है । मुझे यहां से उन्ना अच्छा लग रहा है । और सोचता हूँ, डा होने के पहले ही भोजन कर लू। किन्तु, इतने में मेरा ध्यान शेष अव्दुल्ला से पत्रकारों की भेंट पर जाता है, उसके वक्तव्य को पूरा का पूरा पी जाने की इच्छा होती है। मुझे लगता है कि राजनीतिक मत उसके चाहे जो भी हो, किन्तु सर गुजरी है इसलिए उसको वौसलाहट अच्छी लगती है। साथ ही साय उसकी मूरत भी, मुझे पसन्द है जो यहाँ की स्टेट कांग्रेस के एक प्रमाव- शाली नेता से मिलती-जुलती है। सड, सह, पड़ सकल सटखटाने की एक रसी-सी थावार! सायद, पड़ोस में रही यकिल पराटायो गयो है । गेल अनुल्ला की गूरत की तरफ़ मैं ध्यान से देखता हूँ। मेरे-कसमोर की तकदीर पराय है, ( मैंने सोचा ) नही तो वहाने को इतनी जरूरत क्या यो। धनी, जव पी. एस. पी. वाले कांग्रेस में... ह, खड़, खड़ ! फिर से सांकल की डरी हुई, किन्तु शायद ज्यादा आवाज़। ने कान खड़े किये । हाँ, शायद कोई मेरी तरफ़ है । लेकिन, फिर कौन आयेगा! पड़ोस में सांकल बज रही है, लेकिन वे उल्लू है। , उनके यहां ऐसा ही होता है। कोई किसी को नहीं सुनता। तो, अव शेख अब्दुल्ला क्या करेगा ! असल में, अब उसे कश्मीर का पैदल रा करना चाहिए, ढिंढोरा न पीटते हुए, लेकिन इससे भी पहले वह भारत में कश्मीर के विलय का समर्थन करते हुए एक वक्तव्य जरूर दे दे। लेकिन यह क्या इस समाचार में तो यह भी लिखा है कि शेख अब्दुल्ला गौहाटी काँग्रेस में.... खड़-खड़-खड़-खड़-खड़.... अपने दरवाजे को सांकल पर कुछ नाराज़ होता हुआ मैं अपनी जगह से उठा तो देखता क्या हूँ कि पेट में भूख के नश्तर भी चुभ-से रहे हैं । नश्तर एक नहीं, कई हैं और लगता है कि वे मांतों में कई जगह चुभ शायद होटल का लड़का टिफ़िन का डब्बा वापस लेने के लिए आया है । मैंने तो उसे कह दिया था कि वह उसे सुबह वापस ले जाये । पैसे में काहे के देता हूँ। अन्दर से ऊपर की चटखनी खोलते हुए मुझे लगा कि दरवाजे के वाहर विलकुल शून्य है । मैंने किवाड़ खोलते ही पाया कि वहां सचमुच कोई नहीं था, केवल काला अंधेरा जो अन्दर के प्रकाश से फट गया था कोई तो नहीं है ! कहीं चोर तो नहीं है, मैंने जीने के नीचे झांकक देखा-कोई खड़ा था। हलका-सा मय.... इसके पहले कि मैं कुछ कहूँ, या डर के मारे चिल्लाऊँ, एक आ जीना चढ़ने लगी। दिल में एक भुतही घरवरी छा गयी। और मैं दो कदम पी सतह से उठता - गया । और फिर धर्य से अपनी फुरसी की तरफ कदम बढ़ाता हआ कहने लगा-मालती यहां नहीं है, वह एक महीने से लसनऊ है। यहाँ कोई नहीं है। लेकिन, पहले की भांति फुरसी पर बैठने के पहले हो मुझे लगा कि वह भीतर आ रही है। वह एक स्त्री की दुबलो, पोलो, धमई छाया थो, जिसने थाधुनिक ढंग को हलको पोलो साड़ी पहन रखी यो । वह एक सग मर यह ग्रोव. कर खड़ी रहो कि मैं उसे बैठने के लिए फरसो या कोई और आसन दूंगा। लेकिन यह देखकर कि में कुरसी पर बैठ गया हूँ, उसने अगल-बगल देखते हुए एक कुरसी सोची और किनारे पर धौरे से 43 गयो । एक बात कह दूं कि स्त्रियों को चोरी-चोरी देखने को मेरी आदत है । सामने देखते ही मेरे होमोहवास गुम हो जाते है, इसलिए मैं चट ये किसी दूसरी ओर देखने लगता है। किन्तु अब तो उसकी और देखना आवश्यक ही तो था। उसको पीली मूरत को एक बार मुंह-नर देखा कि सामने छोटे गोल टेबिल पर रखे टिफिन के हम्मे को पोतली पोली चमक मुझे दिखाई दी। लेकिन, अब के, पेट में मस्तर नही चुभे । क्षग-मर के अपाह-गहन तनाय-भरे सांवले मौन के बाद, मैंने सप्रश्न दृष्टि से ससको भोर गिर देखा। उसने नजर नीची करके, फिर गल में देखते हुए कहा, "आपने मुझे पहचाना नहीं ! मैं प्रमिला हूँ।" "प्रमिला...फोन प्रमिला ! कोन....है. हूँ !" मेरे मस्तक में ये नीरव शन्द गड़गड़ाने लगे। उसने एक गहरो उसाँस भरकर गोद में हपेली के कार हथेगो रसकर याहा, "अन्या, जाने दीजिए । मालतीजी कब आयेंगी?" लेकिन उसके सवाल पर मेरा ध्यान नहीं गया। बैसे मैदान के धन- घोर अंधेरे में किसी दूर टूटे-फूटे मन्दिर से रियो भारती को घण्टा-ध्वनि विद्रप करे, वैसे कोई हलकी-सी याद मूंजी और मिटी और मैं पहचान या कि वह घण्टा-ध्वनि किस मोर से, किस मन्दिर से आ रही है। मिला ने एकाएक कहा, या मुझे यह आकस्मिक प्रतीत हुआ, फोन ! मैंने यह सुना-"मैं सर्वटे की बहू हूँ।" एक सपाटे-बन्द खंजर जैसे मेरे दिल में चुभ गया हो। एक साथ भाव उठे और मिटे । सन्देह, क्रोध, नाराज़गी, मिठास और विद्रूप भावना मापस में टकराने लगीं। शायद, प्रमिला ने देखा होगा कि रे चेहरे पर कई छांहें गुजर रही हैं, क्योंकि उसकी आँखों में एक हलका विस्मय था, जो मैंने देखा, खूब देखा। "सर्वटे क्यों नहीं आया ? और तुम ? तुम खाचरोद में हमारे पड़ोस में रहनेवाले देशमुख वकील की लड़की तो नहीं हो।" प्रमिला के चेहरे पर सभ्य संकोच की शिष्ट ललाई तैर गयी और इस बात की खुशी कि मैं उसे पहचान गया। उसकी आँखों में पहचान की चमक देखते हुए मैं भीषण रूप से अस्थिर हो उठा और सपाटे से कुरसी से उठकर कमरे में एक चक्कर लगाते हुए बोला, “खाना खामोगी? ताजा खाना।" "नो, थेंक्स !!" "अरे तुम तो अंगरेजी वोलती हो!" मेरे मुंह से निकल गया। प्रमिला कुछ नहीं बोली। वह वहाँ बैठी ही रही। मैं टेबिल पर खाना जमाने के गुन्ताड़े में लगा। मैंने सोचा वह एक या दो मिनिट में चलो जायेगी या उसे चले जाना चाहिए । "अभी भी तुमको घर में लल्लू ही कहते हैं क्या ?" न मालूम मैं फिस मूड में था। मैंने छूटते ही कहा, "लल्लू तो घरवाले अव नहीं कहते, लेकिन उल्लु इता हूँ अपने-आपको।" उसने माख गढ़ाकर मेरे चेहरे के प्रदेश में भाव ढूंढना चाहा ही, उसपर एक झीख नौर खमार पुती हुई दिखाई दी। सतह से उटता प्रमिला ने सिर्फ इतना कहा, "आपके पड़ोस में दोपहर से मेरी मा थायी हुई हैं, लेकिन वहां बूढ़ी काकी के सिवा और कोई नहीं है। वह बीमार भी है। मैं उनके बिस्तर के पास देर तक बैठो रही किन्तु आगे मेरा मन नहीं लगा । इसलिए मालतीजी को दलान में यहाँ चली आयी! अच्छा यव चलूँ।" मैं अपने मुंह में कौर के ऊपर कोर डालता जा रहा था। लेकिन मेरा ध्यान प्रमिला की तरफ भी था। मेरे यहाँ इतनी रात उसके माने के कारण की व्याख्या में असन्तोषजनक समझता हूँ, लेकिन उस समय असन्तोषजनक होने का भाव नहीं हुआ। वह बिलकुल सन्तोपजनक लगा, क्योंकि उस समय तक मैने प्रमिला पर विश्वास परना शुरू कर दिमा था। मैंने पुराने घरौवे के भाव से कहा, "मैं अबतक साना सा रहा हूँ, तबतक बैठो।" वह एक क्षण भर उसी कुरसी पर बैठी रही। फिर धीरे से टेबिल यो पास कुरसी सरका ली, क्योंकि उस टेवित पर मैं साना पा रहा था। यह मैं कैसे कहूँ कि उसकी तबीयत हुई थो यह स्वयं परोने। लेकिन, संकोचवश, मैंने उसे वैसा करने नहीं दिया। जब चूंकि उसकी कुरसी पास ही थी, इसलिए उसके चेहरे के अध्ययन का भी अवसर मिल गया। प्रमिला ने धीरे से संकोच से कहा, "पन्द्रह साल के पहले की बात है । मैंने तुम्हें खूब पीटा था। याद है ?" "प्रमिला, तुम तो सिनेमा-जैसी बात कर रही हो। यह तो बताओ कि तुम क्यों भायो, सर्वटे क्यों नही थाया ?" प्रमिला ने एक गोलो दाग दी चुपचार । उसकी कोई बाबाउ नही हुई। 'मैं जानता था कि सर्यटे नही पायेगा।' प्रमिला का मौन, उनी अचकचायो हुई शारीरिक हरकत, उसके चेहरे का कठोर भाव-वह बन्दूक को गोली ही यो। उसने कहा, "मैंने कहा था आने को।"
मैंने कहा, "क्यों, मुझपर है। "लेकिन, वह यहां आने को डरता क्यों है ।" वह हंस पड़ी। और तब मैं संगीत से चौकन्ना हो उठा। उसने कहा, 'जबतक आपका कमरा हमारा कुट्ठर नहीं हो जाता, कपड़ों से भी आप मुहताज नहीं हो जाते, तबतक आपके मित्र यहां नहीं आयेंगे।" प्रमिला के हृदय में विरक्ति का भाव था। इतनी मेहरबानी क्यों है ?" "आप पर मेहरबानी का सवाल नहीं है । वह सारी दुनिया पर मेहरवानी है ।" प्रमिला ने मुंह पर एक विनम्र घनिष्ठता का भाव लाते हुए कहा, "उन्हें किसी व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। न किसी के लिए उनके मन में कोई दुर्भाव है। लेकिन, सच, उनकी एक फ़िलॉसफ़ी है। फ़िलॉसफ़ी अजीव जरूर है ! उन्होंने इस फ़िलॉसफ़ी की छुट्टी मुझे भी पिला दी है। अच्छी तरह। मैं उस फ़िलॉसफ़ो की कायल तो नहीं हूँ, लेकिन वह उपयोगी बहुत अब प्रमिला और सर्वटे दोनों में मेरी दिलचस्पी ज्यादा बढ़ने लगती है। मैं हाथ-मुंह धोकर स्टोव के पास जाकर चाय बनाने लगता हूँ चूंकि स्टोन रसोईघर में है, इसलिए वहां प्रमिला नहीं आती। प्रमिल सिर्फ वहीं से बैठे-बैठे कहती है, "अरे, आपने चाय बनाना क्यों २ किया?" मैंने जवाब दिया, "अरे, आप महाराष्ट्रीयन्स हैं-चाय बहुत हैं। और क्या खातिरदारी करूं।" चाय लेकर ज्यों ही मैं प्रमिला के पास जाता हूँ, देखता क्या वह अखबार लेकर कुछ पढ़ना चाह रही है । मैंने पूछा, "बताइए, वह कौन सी फ़िलॉसफो है ?" प्रमिला हँस पड़ी। उसने कहा, "फ़िलॉसफ़ी-विलॉसफ़ी कुछ सिर्फ कुछ नियम, कुछ कानून और कुछ दण्ड-विधान, बस ।" "तो, भी ?" "उनका पहला कानून यह है कि मनुष्य को सिर्फ एक ही - . से उ सतह खाना चाहिए । दोबारा नहीं। इतनी कमाई नहीं है। जब कमाई नहीं है तो खाना क्यों खाया जाये, वह भी दोबारा? मेरे लड़के को भी उन्होंने घर से बाहर निकाल दिया, इसलिए कि वह एक बार पाम फो दूध भी गया था। छोटी लड़की ने जब एक बार पादा जिद की तो उन्होंने उसे उलटा टोग दिया। वे अपने आपको भी सूब ६०४ देते है। एक बार उन्होंने गलती से शाम को एक पार्टी में कुछ सा लिया । उन्हें मालूम था कि शाम को कोई नही खाता । ये दो दिन तक लगातार भूसे रहे और काम करते रहे। वे अपना धर्ट चार दिन चलाते है, भले हो यह कितना मैला क्यों न हो जाये । उनका नियम है कि सबके कपड़ों में हर हफ्ते सिर्फ दो भाने का साबुन लगना चाहिए। इससे वादा मही। उनके कपड़ों को देखकर चाहे लोग हंसे या गाली दें, उनकी इसे परवा नही। फिर भी वे उनकी परवा भरते जरूर है, क्योंकि इसीलिए ये उनका मुंह भी नहीं देखना चाहते और उनको छाया से भी मामवे हैं । शायद इसीलिए वे प्रापसे भी भाग रहे है। प्रमिला ने मेरी तरफ सार्थक दृष्टि से देखा । मैंने पूछा, "क्या सबंटे बहुत ग्ररोव सानदान से आया है ?" उसने कहा, "नहीं, मेरे पिताजी बहुत अच्छे वकील पे, उनका घर तो हमसे भी अच्छा साता-पीता था।" मैंने उत्सुक होकर पूछा, "फिर सर्वटे को इतनो बुरी दशा क्यों ?" प्रमिला के चेहरे पर दुख और ग्लानि के साथ एक बान और शाला गयो । उसका चेहरा लाल हो गया। मानो एक र पो माग छा गयी हो । उसने सिर्फ इतना ही कहा, "इसका कारण सिर्फ़ में ही है।" कारण समझने में मुझे देर न लगी। मैंने सिर्फ इतना ही पहा, "al पिताजो ने दण्ड-विधान लागू किया।" प्रमिला कुछ नहीं बोली और कुछ सालों तक मौन छाया रहा ! और विचार व भाव तैरते रहे । फिर उसो ने शून्य भंग करते हुए कहा, वे गरीब परिवार से माते तो उनके मन में इतने कॉपलेसेस नहीं ।
। । वे जिस श्रेणी से आये हैं, उस श्रेणी से गिरे हुए हैं, इसीलिए से नफ़रत है और इसकी उन्होंने एक फ़िलॉसफ़ी बना रखी है। वह टॉसफ़ो वे मुझपर सक्रिय रूप से लागू करते हैं और अपने ऊपर भी। खए न, उन्होंने आपके यहां आने से मुझे बार-बार मना किया था, हा था कि मेरा अपमान होगा। आखिर, मैंने ज़िद ही पकड़ ली । तो उन्होंने कहा कि अव याधुनिक काल में सुदामा की औरत श्रीकृष्ण के यहां जायेगी, सुदामा नहीं। यह मैं तुम्हें शाप देता हूँ। उन्होंने बहुत-से शाप दिये हैं-बहुत-से वहुत-ते !" यह कहकर प्रमिला रोने लगी। उसके मांसू नहीं थमे । अनवरत बहते रहे। वह एक मजीव दृश्य था। रात का सन्नाटा । एक मामूली-सी परिचित स्त्री आपके एकान्त में, फिर भी अकेले, रो रही है । और साप उसकी कोई सहायता नहीं कर सकते। उसकी पीठ पर हाथ भी नहीं फेर सफ्ते । उसे छू भी नहीं सक्ते । वह दूसरे की स्त्री है । मेरे मित्र की स्त्री, इसीलिए मेरे लिए पूज्या, वस्तुतः मेरे लिए भाभी। इसी मुश्किल में मैं पड़ा था कि रोते-रोते प्रमिला हंस पड़ी। और हँसते हुए तथा आंसू पोंछते हुए उसने कहा, "एक दिन उन्होंने बड़ा मजेदार शाप दिया । उन्होंने गुस्से में कहा, 'जाओ, तुम अगले जनम में बहुत धनी परिवार में जनम लोगी । लेकिन मुझ-जैसे गरीब की तलाश में तुम दर ब दर ठोकर खाओगी । और अन्त में आत्महत्या कर लोगी। गौर वह व्यक्ति तुम्हा तिरस्कार करेगा।' यह कहते-कहते वे ज़ोर से हँस पड़े। लेकिन मुझे व बुरा लगा । मैं उनका घर चलाने की बहुत फ़िक्र करती हूँ। दाल में इव पानी डाल देती हूँ कि वह दो वार के वजाय तीन वार चले। उनके नि को मैं बिलकुल भी नहीं तोड़ती। मैं उनसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। उनके हर हालत में खुश हूँ। लेकिन उनसे मुझे डर लगता है। वे चाहेज सकते हैं । इसका कारण उनकी फ़िलॉसफ़ी है। उनके कोई दोस्त न दिल उन्होंने कठोर बना रखा है, जो कि वस्तुतः कठोर नहीं है । से उठता सतह
बिलकुल मुलायम है। इसीलिए मुझे उससे डर लगता है-पोंकि यह
कठोरता भावना का फऔर पत्थर है। यह पाहे जिसको लग सकता है,
सबसे पयादा सुद उनको।"
यह कहते-कहतें प्रमिला की या घराला उठी।
त का उपचार ने एक कहानी लिखी। चार पन्ने लिखने के बाद मालूम हो गया कि वह उस तरह आगे नहीं बढ़ायी जा सकती । मुख्य पात्र की जिन्दगी थी, मैं भाष्यकर्ता दर्शक को हैसियत से एक पात्र बना हुआ था। कहानी बढ़ सकती, बशर्ते कि मैं मूर्खता को कला समझ लेता। और अब मैं यह सोचने लगा कि कहानी आगे नहीं बढ़ रही है । एक दीवार खड़ी हो गयी है। ऐसा क्यों हुआ, मेरे मन ने लिखने से इन- कार क्यों कर दिया। मैंने लिखा था कि वह हाय मटकाता हुआ, वुदबुदाता हुआ रास्ते पर चलता है कि वह किसी बात पर एकाग्र नहीं हो पाता कि वह निकर पहने हुए एक ठठरी है, जो अंगरेजी वोलतो है कि जब-जब उसे बहुत गुस्सा आता है वह अत्यन्त शिष्ट वनता जाता है, और तब उसकी विनय, संकोच और शील सूचित करनेवाली आंखों की ललाई देखने योग्य रहती है। वह एक दिल पिघलानेवाला देवता मालूम होता है। कहानी ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। मैं पूछता हूँ कि क्यों कहानी में कयानक नहीं था, लेकिन पान तो धा। ज़िन्दगी तो थी। क्या है, जिसने मेरे कानों में यह फुसफुसाया कि लिखना बेकार है । बहुत दुख है कि मैं कहानी नहीं लिख पाया। बाद में उसी तर कुछ लकीरें शब्दों में बांध लीं, जो इस प्रकार हैं : फांसी पाना, मरना अच्छा होता है। मन वच्चा है। सवह से उठता
अगर आदमी बना न पामो
उसे मार दो।
मन....
कच्ची माटो याकार न दो उसको
अगर बनाओगे घट
उसको भर न सकोगे
जय घट घाली रहा कि
कोई विशाल प्रतिध्वनि गहरी आवाज
उभरती आयेगी उममें से
इस घट में से गहरी गूंज
निकलती है जो
उसे अनसुनी कर, यो जीनेवालो,
घड़ा फोड़ दो।
उस की आवाज न सह पामोगे ।
मुझे नहीं मालूम किस वस्तुगत से सन्दर्भ में यह बात कही गयो । मैं
पपले में पड़ा हुमा हूँ। बरे, कोई मुझे सहायता दे।
लेकिन यह मैं कैसे कहूँ कि इस कविता का कोई अर्थ नहीं है ? अर्य
है, लेकिन वह मेरी बुनियाद नहीं है । बुनियाद कोई और पी। जहाँ पर
मैं खड़ा था, जहां से मैं चला था।
कहाँ से मैं चला था?
इसी कहानी के दौरान, मैंने एक और पविता भी लिस दी थी।
अगर आप मुझे समझना चाहते हैं तो पता कर उसे पढ़ लीजिए वैसे
मुझे वह कविता सुनानी चाहिए। पहले की कविता पढ़ने को थो, यह
सुनाने की है!
"हाय मटकाते हुए, कुछ बुदबुदाते हुए पागल-सी
भागती वे और धुमती-भड़कती वे ट्रम्प चंचल-सो
स्वयं से विकसी भयंकर ज्वलन रेखाएँ
।
भूत का उपचार
- . - सपटती-सी, लिपटती-सो चौमुखी वे अग्नि-शाखाएँ प्रकट होती, गुप्त होतों नील गहरे चौंधियाती हैं। भासमानी बादलों पर आत्म-चिन्ता फैल जातो है !" कविताएँ मैंने आपको इसलिए वतायों कि जब कहानी लिख न पाया तव उसका भीतर का आवेग मन में बचा रहा । भाव नहीं, कथा तक नहीं, पान नहीं, प्रसंग नहीं। मान एक उद्वेग, मात्र एक आवेग । जब मैंने ये कविताएं लिखी तब मुझे समझ में आया कि आवेग कितना जोर- दार था। उसे किसी न किसी तरह अपने आपको प्रकट करके बिलकुल खो देना था। प्रकट करके अपने आपको खो देने वालो यह बात बड़े मारके की है। शायद हर लेखक को इस समस्या का सामना करके हल खोज लेना पड़ता । मैं तो क्षणिक उच्छ्वासों की कविता करना ही जुर्म समजता मतलब यह कि लिखना टाल जाता हूँ। लेकिन साज यह जरूरी हो गया कि मैं कुछ लिखू। जी नहीं लग रहा था। मन बेचैन था। अजीब परेशानी थी। अगर सुख प्राप्त कर लेना है तो इस तथाकथित आध्यात्मिक मचलाहल को निकालकर फेंक +, क्योंकि इसकी कोई कीमत नहीं है, कोई मूल्य नहीं है । और मैंने एक चित्र बनाना चाहा । एक ऐसा व्यक्ति जो द्विधा-ग्रस्त है, द्विवापन्न है। इस द्विधा का एक कोण यह कि वह एक ओर इस जड़ प्रकृति को जो उसके अन्दर और बाहर फैली हुई है, अपने पंजे में जकड़कर उस पर अधिकार करना चाहता है। वह इतना बहिर्मुख, सचेत और मुस्तैद बनाना चाहता है, इतना कार्यकुशल और दुनियादार होना चाहता है कि इस कोशिश में प्रतिपल हारता हुमा यह अन्तर्मुख, और अन्तर्मुख, अधिक अन्तर्मुख, होता हुआ न जड़ प्रकृति पर विजय करता, न अपने उस आत्म-लोभ को संवार सकता है, जिसकी उसे चाह है। उसकी भीतरी मानवीय, सहज-संवे- दनशील अन्तर्मुस आत्मा में, एक अक्षम, नाजुक किन्तु वांछनीय, परम सतह से उठवा आदमी - पलाध्य परामय छिी हुई है। वह इस पराजय पर पछतावा है क्योंकि उसको भ्रम है कि यदि उसको विजय होगो तो सूप अच्छा होगा। दूसरे शब्दों में उसका अभिप्राय है-बुलबुल की यह घिराय: कि हम चल्लू लेकिन क्या यह पूरा सत्य है ? क्या मैं पूरा सत्य लिए भी सकता हूँ। बड़ा सन्देह है मुझे। बसलियत घुछ और है । वह यह कि वह मरने में समापी हुई जह प्राति पर इवनी विजय तो प्राम कर हो सकता था कि जियो यह सुसरो रहे क्योंकि उसी के अनुगार--- न भूमिन तोयं न तेजो ग वायु- सं नेन्द्रियं वा न तेषां समूहः । विशिष्टानुभूत्या विमुद्धारमवस्यात् सदेको विशिष्टः शिवः घेवलोऽहम् ।। न चोय न चापो न चान्तन पाहां न मयं न तिर्यटन पूर्वा परा दिक् । वियद् व्यापकत्वादसण्डकहर- स्तदेको विशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ठीक है कि मेरा पार इन इलोकों से जरूर कुछ गुग अनुभर करता रहा । यहाँ तक कि शक्ति भो । लेकिन अपने भोवर को नई प्रकृति पर विजय प्राप्त करने में असफल हो जाना मानवीय है। यह यहा सम्मा पा कि उसमें पाप-भावना नहीं थो ( क्योंकि उसमें धर्म-भावना भी नहीं दी) केवल उसमें एक दार्शनिक संगीत-संवेदन यानी एक सामंजस्व-सान था। मन पर वायद विजय प्राप्त की जा सकती है. मारमा को भी पसी. भूत किया जा सकता है, रिनु अपने परित्र को नहीं । पारि स्वयं का परिष-शान होना पड़ा मुस्किल है। उग ज्ञान को सम्पूर्ण उपलधि तो एकदम कठिन। मुझे नहीं मालूम, लेकिन मेरा पात्र स्मयं कहता है कि उसमें कुछ गतका उपचार बुरी आदतें थीं। मैं पूछता हूँ, कौन-सी ? तो वह कहता है, खूब सि पीना और खूब चाय पीना । मेनन के संयुक्त राष्ट्रसंघीय डॉक्टर के टिन में कहा गया था कि वे तीस कप चाय रोज पीते हैं। लेकिन मैंने अपने पात्र से पूछा, "कितने कप चाय रोज पीते हों तो वह बोला, "सिर्फ आठ-दस ।" मेरे हिसाव से, निश्चय ही बुरी आदत है । लेकिन अगर वह चाय पिये तो करे क्या ? जिस मावोहवा में वह है, वह वातावरण उस पात्र आत्म-विकास के विलकुल विरुद्ध है । वह व्यक्ति जब घर में समय में मिलता तो ऑफ़िस में समाकलन गणित में सिर खपाता है। वह एक गणित के नशे में रहता है। उसे गणित में एम. ए. करना है, एम. एस.सी. नहीं। वेवकूफ़ है वह जो एक साहित्य, संगीत और गणित की दुनिया में पड़ा हुमा है । वह न साहित्यिक है, न संगीतज्ञ, गणितज्ञ । इन सबमें पारंगत होने का उसे अवसर नहीं मिला, इसीलि वह खाना खाते समय, ऑफिस से घर जाते समय, अपनी जरा- फुरसत के समय अपने प्रिय विषयों में खो जाया करता है । असल में गुणी आदमी है। तो वह प्रतिकूलता के चौतरफ़ा हमलों के बीच अपने एकान्त के लिए, दिल-दिमाग़ बहलाने के लिए यानी वातावरण बदलने के चाय का सेवन करता है। वह एक स्थानापन्न आनन्द साधन है एवजी ऐश है । वह एवजी ऐश बुरी बला है । मैं उसे जानता हूँ, वह अपने आपको नहीं जानता। उसे इस बात का है कि वह महंगा ऐश है। डेढ़ सौ रुपल्ली में वह सकता। फिर भी वह करता है। जेब में धेला नहीं। कल' मालूम नहीं। बच्चों के पास कपड़े नहीं । ओढ़ने-विछाने की त तब क्या किया जाये ? भाड़े पर विक जाओ! कोई और लेकिन वह मिलेगा तब मिलेगा। कल क्या करेंगे? इस सम्मान में जल मरने या डूब मरने दीजिए। कहीं भीख म से सतह
मांगिए । मर जाइए!
हाथ में पैसा बात हो सुगो इतनी होती है कि मोरल मिला
निपटाकर आगे की तंमारो गुरू हो जाती है ।
ऐसी स्थिति में, सभी नामुरा । पूरा सुरा किसे पर साते है।
इसलिए समाकलन गणित का सवाल हल करते करते, फ देनेयारो
पठान को याद आ जाती है और पुराना पापी यह मन रहता है कि उससे
और रकम ले ली जाये। औरन से पेशतर जिसमे कि आटा-दाल और
दवा-दारू का इन्तजाम किया जा सके ।
लेकिन, क्या जो में यह रहा हूँ वह उस वएत निवेदनीय पा गए मैं
कहानी लिख रहा था ? नहीं, हरगिज नही ।
मैं दास्ताययस्को के चोर की तरह, जो बादतन चोरी करता है,
अपने पात्र को चोर नहीं बताना पाहता पा। मेरा पात्र चोरी नही
फरता। शराय नहीं पीता, जुआ नही रोलता, रण्डीपायी नहीं करता,
ध्यप की निन्दा-स्तुति नहीं करता, किसी के लेन-देने में नहीं रहता।
लेकिन यह इस तरह अपनी जिन्दगी से जुमा खेल रहा है इसलिए
कि वह कार्ड ला-लाकर घर-तंगी दूर करता है, सिर्फ इसलिए कि अपने
गणित के नशे में वह मस्त रह सके । गणित और संगीत के नशे में वह
उन दोनों का मालिक नही हो सकता।
एक बार पात्र ने मुझसे कहा, "मुझे इतना निकम्मा न समझो । मैंने
भी एक नया पन्या सीस लिया है।"
मुझे आश्चर्य का एक धक्का लगा-वा, सचमुच यक्का ! अब
वह क्या करनेवाला है-जुमा, सचमुच गुला जुमा, सट्टा? मैं माया
रह गया।
उसने मुसकराकर यहा, "हे लेराक, तुम येथकफ़ हो।" मेरे विरमय
को सरासर बेवकूफ़ी मानकर उसने कहा, "हमारे मागे में मार
मेरी बहो पूछ है ।"
"क्या ?" और मेरा मंहगुला ही रह
मैंने कहा,
.
भूत का उपचार
उसने कहा कि उसके दायरेक्टर साहब माजशाल उसे बहुत । मैं दायरेक्टर को जानता था, वह मेरे पाप का सिर्फ़ शोषण कर या। मेरे चेहरे पर मुराकान की एक रेखा दौड़ गयी। डायरेक्टर साहब पहले से ही चाहते थे । लेकिन अब क्या नयी बात हुई। उसने कहा, "नहीं, नहीं । मेरे एक दोस्त हैं जो जन्मकुण्डली बहुत अच्छी तरह देखने लगे हैं।" मैंने मजा मारना चाहा, "तो छिपाते क्यों हो? हमारे यहाँ के कई साहित्यिक, काई मन्त्री यहाँ तक कि गाई खासे गुनाहगार भी अच्छी कुण्डली देखते हैं। सुनते हैं, उत्तर प्रदेश के किसी मन्त्री ने यह भी कहा था कि लखनऊ विश्वविद्यालय में उसके नाम पर एक दाध्ययनपीट भी होना चाहिए।" - इसपर मेरा पाय कुछ संकुचित हुमा । उसने गम्भोर होकर कहा, "मेरी पुरती में धारापारा, गॉफिया में पाई ऐसे हैं जो मच्छी कुण्डली देखते हैं। मेरे पिताजी ने मेरी गुण्डली बनवायी नहीं। नहीं तो मैं भी बहत शुग होता। फिर भी, तरणीव तो आ ही गयी है। इसे मैं यया फर?" मेरा पुत्सा भाव सगशकर मेरे पात्र ने व्याख्या करते हुए भागे कहा, "रो नहीं, मेरे सायरेयटर मुझसे इसलिए खुश हैं क्योंकि मैं एक मच्छ गणितज्ञ होने के साथ-साथ खासा राजनीतिमा भी हूँ।" अब तो सचमुच ही मैं भी नया रह गया। मेरी बातों के सामने महन्त रामनारायण दास, मुल्ला अव्युन ताहेर मली-दोनों एम. एल. ए., सन्त गोविन्दानन्द, एम. पी., खाण्टेकर, पी. एस. पी., कामरेड बनर्जी, कम्युनिस्ट; बल्ला मुरलीदास मेनिगालवाला, जनसंघ मालूम गितने ही लोग-पनि अपरिपित सामने हो लिये। फिर भी मेरा पान नगे पुछ इतर था कि जब उसने अपने आपको एगा राजनीतिक आदमी कहा सतह से उठव यश्वास न कर सका भार आवन्यास भा का करता, वह मरापान जापा। मैंने भौहें चढ़ाकर उससे पूछा, "डायरेक्टर साहब ने तुम्हें कैसे राजनीतिक मादमी समझा ? या तो यह डायरेक्टर का बच्चा बेवकूफ इया..." घात काटकर मेरा पात्र घोला, "देसिए, दो वजह है-एक तो वह कि 'प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट १८६७' के अन्तर्गत, मैंने दो असपारों पर मुकदमा चला दिया है। मेरा व्यवसाय भी तो यही है, मैं इसी काम के लिए मुकर्रर हूँ, तनाव हूँ, मेरा सरकारी मोहदा पत्रकार का है । दूसरे, हायरेक्टर साहब सुद पत्रकार है । सरकार को नोति बहुत गरम है । लेकिन गैर-जिम्मेदार तत्वों पर कुछ अनुशासन भी जरूरी है । पह तो महज एक धमकी है।" उसके फूहड़पन पर नाराजगी का भाव बताते हुए मैंने जब उसकी और देखा तो उसने कहा, "हमारे छोटे-से दफ्तर में वड़ा कुचक्र चलता है। या तो लोगयाग कुण्डली देखते हैं, या लड़कियों की चर्चा होती है, या व्यूह रचना होती है । मैं इस भेद को जान गया है।" मैंने अविश्वासपूर्वक अपने पास से पूछा, "तो क्या तुम शिकायत करने गये थे?" पान के माथे पर बल पड़ गये-"बिरादरी के लोगों के वित शिकायत ! राम, राम ! चाहे वे रिवने ही बुरे क्यों न हों, सामुदापिक नतिकता है यह !" पात्र साभिप्राय हंसा । यह बात मुझे समय में नही आयो । मैंने मुसकराफर पूछा, "क्या यात है ?" उसने जवार दिया, "कुछ नहीं। बॉफिस की एक लड़की ने डायरेक्टर ये जाकर शिकायत कर दो। डायरेक्टर ने गुदो बुलाकर कहा कि तुम उम्र में बढ़े हो, चौतरफा नजर रखो, और कोई ऐसी-यसी गय न होने दो । मैं पर दायरेक्टर के यहां से अपने कमरे में लोटा तो पहली बार.... " भूत का उपचार ९९ मैंने बीच में ही कहा, "हाँ पहली बार तुमने उस लड़की की तरफ़ खुलकर देखा।" पान अपनी रौ में कहता गया, "वस इतनी-सी बात है। मैंने जद उस लड़की की तरफ़ साभिप्राय दृष्टि से देखा तो उसने मुझसे सिर्फ इतना ही कहा-हां, मैं जानती थी कि डायरेक्टर तुमसे वैसा कहेंगे।" मेरा पान न शरमाया, न मुसकराया, न खुश हुला, न लज्जित । काठ का उल्लू था वह । मैंने कहा, "हज़रत, जिन्दगी गणित नहीं है, वह जिन्दा चीज है, सस्सन्द, क्या समझे?" वह इस तरह हंसा मानो मैं जो उसका स्रष्टा लेखक हूँ-निरा शब्द- तत्सर मूर्ख हूँ। एकाएक मुझे प्रतीत हुआ कि पात्र का मस्तक दीप्त हो उठा है । वह कुछ कहना चाहता था । लड़की के बारे में नहीं। मॉफिस के बारे में, घर के झगड़ों के बारे में नहीं । उस दिन के बारे में जो उस काल का ही एक विस्तार है । ऋण--एक का वर्गमूल निकालकर जो ऋण राशि निकलती है वह एक काल्पनिक संख्या है। मेरे पात्र को यह दृढ़ धारणा है कि सृष्टि यानी प्रकृति इस काल्पनिक संख्या को मानती है और उसके गणित- शास्त्रीय नियमों के अनुसार बरताव करतो है । गणित-विद्या अगर विज्ञान की रानी है तो इसी कारण ( उस लड़की का नाम भी विद्या ही था) शुद्ध तार्किक भाव-शुद्ध विचार में भी प्रतीक होते हैं-यहां ये सांख्यिक प्रतीक है। इन प्रतीकों को संगति-मूलक विभिन्न व्यूह रचनाओं में विम्बित शुद्ध तार्किक भावों को में लेखक, जो महामूर्ख हूँ, क्या जानें ! वह केवल वैज्ञानिक ही जान सकते हैं। चांदनी रात में खटिया पर लेटे हुए एक बार मेरे पात्र ने मुसकराकर मुझसे प्रश्न पूछा, "एक घन एक क्या होता है ?" मैंने नटसे महा, पात्र ने सितारों की ठण्डी चमक की सोर देखते हुए पहा, "क्या यह सार्वभौम सत्य है ? क्या सचमुच हमेशा ऐसा होता है। तुम्हारा बौंसाके सतह से उठता भादमी दो।
पा कहता है ?" मने झोकार जवार दिया, "अरे पात्र ! मैंने तुझे बनाया है और तू मेरा इम्तहान लेता है ?" पात्र ने अप्रभावित होकर कहा, "कोशिश करो, जवाब दे सकोगे।" मैंने बालक की नाति पात लगाकर कहा, "एक धन एक हमेगा दो होते माये हैं।" पान हंसा । उसने कहा, "एक नदी इधर से आयी, एक नदी उघर से । दोनों एकाकार हो गयों-एक हो गयी। जब नदी एक हो गयी तो उमे दो नहीं कहा जा सकता। एक धन एक बराबर एक भी हो सकता है, दो भी, दाई भी और दो पन दो घरावर चार भी, तीन भी, पाव भी। जड गणित के नियम प्रकृति हमेगा नहीं मानती। समझ गये ! उसमें अपनी स्वयं गति है । स्यं गति के नियमों को दूंना पडता है। गणित के नियम उसके आधार पर चलते है। उसका काम प्रकृति का यरताव खोजना है, उसका चरम सत्य हँदना है।" मैंने पार से चिढ़कर पूछा, "लेकिन उससे मेरा पा ताल्लुक ? में लेखक हूँ, लिखता हूँ कविताएँ । बाज एक कहानी लिखने बैठ गया, तुम मुझर टूट पड़े।" पान ने चांदनी रात में लेटे ही लेटे मुसकराकर पूछा, "लकोर को यश परिमापा है ?" वय तो मेरी घिग्घी बंध गयी। मैंने कहा, "मैं लेखक हूँ, मनुष्य. समाव परखने की कोशिश करता है। माड़ी, टेढ़ी, तिरछी या गोल लकीर से मेरा क्या काम ?" जय पान गदा जिद करने लगा तो मैंने हॉल एण् स्टीवन्म के रेखागणित का मूत्र उमुके सामने बक दिया। उमने मुझसे नम्रतापूर्वक कहा, "क्षमा फरें, आप मेरे सष्टा है। मैंने सिकं मापसे दो सवाल पूछे, जिनका जवाब आप नहीं दे सके । स्यूल rianti.r (sving Room भूत का उपचार h Neng "तुम त मनुष्य-स्वभाव का भी होता है, सो आप ने जान लिया। पमें तटस्थ कल्पना-शक्ति नहीं है। यही कारण है कि स्थूल गणित के त्य आप सार्वभौम मौर सार्वकालिक मानते आये। सीधी लकीर की रिभाषा मैंने पूछी तो वही हाल हुआ। अगर आपकी लकीर को दीर्घतम कर दिया जाये तो वह पृथ्वी का चक्कर काटकर खुद उसी बिन्दु पर आ सकेगी जहाँ से वह चली थी। अगर आपकी सीधी लकीर को सूरज से जोड़ दिया जाये तो वह पृथ्वी के साथ लगातार घूमती जायेगी। वहीं वह ज्यादा लम्बी होगी, कहीं कम, कहीं वह वल खा जायेगी। स्थिर-चित्रात्मक कल्पनाओं का कोई वैज्ञानिक मूल्य नहीं है, समझे।" मैंने झीखकर पान से पूछा, ये ऐंड़े-बेंड़े सवाल मुझसे क्यों कर रहे हो!" पात्र ने मेरी झखभार के प्रति चिन्तित होकर कहा, "आपको रोमांस सिर्फ लड़की में दीखा, उन पेचीदा सवालों में नहीं जो मैं करता रहता हूँ। आपको क्या मालूम कि शुद्ध ताकिक भावों के मैदान में भी एक बड़ा भारी रोमांस होता है। नयी-नयी संगतियों का वह खोज मा नहीं पहचान सकते तो मैं क्या करूँ ? आइन्स्टीन ने दिक् को छोरही किन्तु शान्त वताया, अनन्त नहीं। क्या यह सच है। जहां तारा-वि गोल-गोल घूम रहे हैं वहाँ तो 'स्पेस' या दिक गोल मानी जा सकत किन्तु, सपाट फैले हुए ब्रह्माण्ड-जैसे सुदूर एक नीहारिका में, जो लीजिए स्थिर भी है, जो कि वह नहीं है, दिक् का रूप क्या होगा? होगा ? मान लीजिए, हम माइन्स्टोन की दिक् सम्बन्धी धार खण्डन करना चाहते हैं तो वह हमारे नये वीसियों महत्त्वपूर्ण तक हमारे सारे गणित के वावजूद, वार-बार परीक्षित-सुपरीक्षित करन जांचना पड़ेगा। यह जांच कठोर है, लेकिन जांच और कठोरत में एक अजीव विश्वासात्मक रोमांस है, उसे आप क्या जानो ? मुख्य वात संगीत है, किन्तु उसका आधार होता है। - सतह से . से गणितिक प्रतोक प्रस्तुत होते हैं। मैंने शोखकर पार से पूछा, "यासिर मार मुझे अपना पाडिस्प पयों बता रहे है ?" पान ने नम्रतापूर्वक जवाब दिया, "मेरे भीतर का जीवन थाप या जानो । जो भीतर का है, यह धुआं या कुहरा है, यह गलत है। आप मुझे ऐसा चित्रित करना चाहते है जैसे मैं दुस को, असंगति की, कष्ट को एक मोरी का एक कोटा यानी निम्न मध्यवर्गीय हूँ। जो नही, सष्टा महोदय, में इतना आधुनिक नही हूँ। मेरी आरमा भाषी पारिवी है, माघी रोमानी। मन अहंकार और बुद्धि मात्मा के इन्द्रिय माने गये हैं। यह सर शिल्प विज्ञान है, लेकिन वे नहीं हुए। शिल्प वैज्ञानिय के बदले मुझमें ये थपिक वैमानित हो गये, तो इसे में क्या कर " ईश्वर हे लिए आप मुझे गलत चित्रित न कीजिए । ठीक है कि मैं तन्त्र-गलियों में रहता हूँ, और बच्चों को कपदे नहीं है, या कि मैं फटेहाल है। किन्तु मुझपर दया करने को कुचेष्टा ने कीजिए। अब मैं अपनी तटिया पर गट से उठ बैठा और पात्र के भोले-भाले मुरा को परसने लगा। उसने मेरी बोर देसकर कहा, "मा कीजिए, लेकिन यह सच है कि आप लोग मन को कुछ विशेष यवस्थाओं को ही अत्यन्त महत्वपूर्ण मानकर चलते है-विशेषतया उन अवस्यामों की जहां यह अवसान है, और बाहरी पीड़ाओं से दुपी है । मैं इस अयसन्नता घोर पीड़ा का समर्थक नही, भयानक विरोधी है। ये पीड़ाएं दूर होनी पाहिए । लेकिन उन्हें अलग हटाने के लिए मन में एक भरता लगती है। पाहे यह भव्यता पीडा दूर करने सम्बन्धी हो या गणित शास्त्रोम पल्पना की एक नयी अभिव्यक्ति । उम भग्य भावना को यदि उतारा जाये तो क्या कहना ! इसलिए, जनार्याली, में इस यात का विरोध करता है कि आप निम्न मध्यवर्गीय कहकर मुझे उलोल करें, मेरे फदेहाल कपड़ों को तरफ जान-पूनकर लोगों का ध्यान इस उद्देश्य से सिंचया कि ये मार दया परें उन सालों की ऐसी-ससी !" गृत का उपचार
मुझे लगा कि मेरा पात्र अब मेरे पीछे पड़ गया है कि वह ऐसा
। मेरा पिण्ड नहीं छोड़ेगा। इसलिए जरूरी है कि इस भूत को
या जाये।
सतह से उठ
जलना ज्यों हो उसको मास मुली, उसने पारा किती पर का उसका दवाय अभी तक दूर नहीं हुआ है । सपने में न मालूम यह रिस-किस पर विह. पिटा रही पो, न मालम कौन-कौन सामने-सामने या छिपे तौर पर उमा मह चिढ़ा रहे थे । सारी दुनिया कई टन वजन का टीला पनकर बंटी हुई थी, वह अभी भी बैठी हुई है। समने आगे सोलकर सामने के दरवाजे की तरफ देखा । वह अमी- सक मुंदा हुआ पा । उस दरया पे भीतर से सांसने-संवारने को भावायें भा रही थी, जो उसके बूढ़े साम-रामुर की पों। दूसरे कमरे में शान्ति पो। इसका मतलब यह था कि कोई चाय बनाने नहीं ठा है। घोरे. धीरे उस पूसरे कमरे में से करवशियो को भावाज सनसनाने लगी। लेकिन ज्यों हो सयाल आया कि टमका पति चाय बना रहा है, उसके मन में तेगायो काली गटर पहने लगी। काले सत्परिक एमिर को भयानक यू-बारावाली वह गटर उसके भीतर-भीतर बहती हो गयी, और वह यहां जा मिली जहाँ एक घटना हा चित्र, एक व्यक्ति को मूर्ति सड़ी हुई पो। यह यह भादमी था, जिस पर यह एक जमाने में जान देको यो। लेकिन अब वह बदल गया है। वह उसका पति है। यह ४९ एकदम उही। दिल में जहर भरकर उसने का में सोये हुए बच्चे को इस तरह परशोरकर जगा दिसा डारपुर रो उठे, सब पौधे, इतना तीया शोर करे कि सिर, T .
ससुर, पति, बड़ा लड़का ( जो बी. एस-सी. में पढ़ता है, और उसका कहना नहीं मानता), छोटे चिल्लर-पिल्लर सब उस कर्कश क्रन्दन को सुनकर अशान्त और बेचैन हो उठे, हाय-हाय करने लगें। घर-भर पर यह उसका प्रतिशोध था । वह सबसे बदला लेना चाहती थी, आक्रोश के द्वारा जो उसका अपना नहीं था। वह खाट से उठी । अपने बालों को अस्त-व्यस्त करके उसने रसोई- घर में प्रवेश किया। उसका पति उकई बैठा हुआ चुपचाप चाय बना रहा था। तीन साल का एक दुबला छोटा बच्चा, नंगा, वहीं बैठा हुआ था। बड़ी लड़की नल के पास खड़ी हुई टंकी में बालटी उड़ेल रही थी। पानी बरस रहा था, आड़ा-तिरछा। दो बच्चे, जिसमें से एक को दमे का रोग था, बगैर छाता लिये, विना स्वेटर पहने, स्कूल चले गये ये उसे भी ब्रांकाइटिस की शिकायत रहती थी। लेकिन बिना खुद की या बच्चों की परवा लिये, उसने रसोईघर की मजबूती से वन्द को गयी खिड़की को खोल दिया। दूर दिखती हुई नीली पहाड़ी और सलेटी रंग के फैले हुए तालाब के कई फर्लाग फैले हुए तेज़ लहरदार पानी को पार करके पैड़ों को अपने सामने झुकाती हुई तूफ़ानी हवा, रसोईघर में घुस पड़ी । और उसके साथ आये हुए छोटे कमरे को गीला करने लगे। उबलती चाय को देखती हुई पति की आँखों ने अस्त-व्यस्त बालों- वाली अपनी स्त्री को देखा और सन्न रह गया। उसने जान लिया कि आज उसे किन्हीं पेचीदा हालात से मुकाबला करना है। और उसका मन अपनी पिछली जिन्दगी के वरके उलटने लगा। वैसे वह चुपचाप कप- वशियों में चाय उड़ेलता जा रहा था, बच्चों को हुवम देता जा रहा था कि यह कप नाना को दे आमो, वह कप नानी को दे बायो। उसकी नंगी पीठ पर पानी के बारीक छोटे पड़ रहे थे, धोती का एक सतह से उठता आदमी पल्ला भी अपनीला महसूस हो रहा था। उसने बाहर से आते हुए छोटे बन्द करने के लिए सिटी बन्द करनी चाही। ज्यों हो वह पुरानी चौखट पर नवे के पल्लों को बन्द करने के लिए मुहा, उसकी मां दूर के बादलों के उस पार क्षितिज पर टिक गयी जिसमें पूरव दिशा की किरणे टूटकर धुंधले नस्मोले दादलों पर आक्रमण कर रही थीं। तालाब का कुहरे में खोया हुआ किनारा नीले-मुलेटो रंग में हवा दिखाई देता पा, लेकिन पानी मे चमरते हरे-हरे वृक्षो के शिखर पर ललाई को सम्मावना प्रकट हो रही थी। उम वारपार ले हुए विस्तृत दृश्य को देख वह एकबारगी स्तब्ध हो गया। उस दृश्य में इतनी टण्डा और तारगी थी कि दिल की मन्हूमियत हवा हो गयी और एक अजीब-सी धिरकन नाचने के बन्दा में उभर उठी। और फिर भी यह गम्भीर हो रहा । उसने खिड़को के पल्ले जबर- दस्ती बन्द कर दिये। बच्चों को रसोईघर से भगा दिया। और खुद चाय का कप हाथ में ले टेदिल के पाम टोन को कुरसी पर जा बैठा। एक-एक बूंट चाय पीते हुए वह मन ही मन उस दृश्य का अवलोकन और पुनरवलोकन करने लगा। और अकस्मात् उमे भान हुआ कि मनुष्य अपने इतिहास से जुदा नहीं है, वह कभी भी अपने इतिहास से जुदा नही हो सकता- अपने याए ओपन के इतिहास से, न अपने अन्तर्जीवन के इतिहास से । उसका अन्तर्जीवन अपने स्वप्नों में, अपने तो और विश्लेपणों में डूबता आ रहा है । से अधिकार है कि यह उसमे डूबता रहे, अपने आपसे बाहर निकलने की से उरूरत नहीं है। अपने वाहर वे निषले जिनका वाह्य से कोई विरोंप हो। एपा यह सप नहीं है कि गणित शास्त्र में, जिसका उसने एम. एस- सी. तक अध्ययन रिया था, एक काल्पनिक संस्या भी होती है । यया यह कालनिक संस्था पूजूल है ? क्या प्रकृति की गूक्ष्म क्रियाएँ इसी संख्या दहना । अनुसरण नहीं करती ? क्या ऋण एक राशि का वर्गमूल वस्तु है ? क्या सीधी रेखा वक्र रेखा हो का एक विशिष्ट रूप नहीं है? क्या यह झूठ है कि एक समय वह भी आयेगा; जब वैज्ञानिक विधि-शिल्प इतना बढ़ जायेगा कि मानव-जीवन प्रकृति को शक्तियों का आज से अधिक दोहन करके अधिक विकसित होते हुए अपने पापको बदल डालेगा। आज के प्रश्न और समस्याएं इतिहास को वस्तु होकर बहुत वार हास्यास्पद भी प्रतीत होतो होंगी, उसी प्रकार हास्यासद जिस प्रकार बुन्देला नरेश राणा वंग के युद्ध ! क्या यह सच नहीं है कि आज से सौ साल बाद सामान मनुष्य इतना सुविज्ञ हो जायेगा कि विज्ञान प्राप्त नयी सुविधाओं के कार वह फिलॉसफो और पोएट्रो के प्रश्नों पर बहस करने लगेगा! मजी, दुनिया और समाज की जिन्दगी में सौ साल बहुत थोड़े होते हैं । इतिहास को एक पलक उठती है और गिरती है कि सौ साल हो जाते हैं । उसमें घटा क्या है ! मेरे बच्चे के बच्चे उस नयी आभा को अवश्य देखेंगे अजो, उसके पहले भी यह सम्भव है। आई डोण्ट केयर । आई विं लिव इन माई ड्रोम्स, दिस इज माई प्रायवेट वर्ल्ड, ऐण्ड आई एम एण्टा टिल्ड टु लिव इन इट, आई एम नॉट प्रिपेयर्ड टु लेट अदर्स डिस्ट्रॉय इल उसको पता ही नहीं चला कि कब उसने चाय पी डाली और कव:- कुरता पहना। उसे एक कप गरम-गरम चाय की और प्यास लग इतने में सफ़ेद बालों का उलझा जंगल लिये हुए मां का खांसता- वदन, जो रक्तहीनता के कारण कोयले से काला और विद्रूप हो । उसके पास झुककर खड़ा हो गया। उसने दयनीय भाव से गिड़ कहा, "मुझे एक कप गरम चाय और दे, चुन्नू !" चुन्नू का हृदय उस आई वाणो को सुनकर दुखी हो उस गया मां का वह पुराना ज्ञान, जब वह घर-भर पर शासन क किन्तु माज वह निश्चित संख्या से अधिक एक कप चाय के लिए रही है। नहीं, उसका यह कर्तव्य है कि दमे से जर्जर इस है सतह से १०८ पर, कैसे ? उसने स्वयं ही देखा था कि चाय के पहले दौर में दूध खत्म हो गया है, सिर्फ दो चम्मच मुस्किल से उसको स्त्री के लिए रखा है। अव क्या किया जाये ? उसने मो की तरफ़ देखा, और एकाएक छोर से हंस पड़ा और मां को अपनी बाहों भर लिया, उसके जोर से मां की देह को तकलीफ़ होने लगी। उसे जगह-जगह दर्द होने लगा । यह चीख उठी, "अरे छोड़, अरे छोड़ ! चुन्नू !" उमने मा को जबरदस्ती हाथों से उठा लिया और उसको लेकर लगा नाचने गोल-गोल....पास सड़े हुए आठ साल के यवना को मजा आ गया । वह ताली पीटने लगा। तीन साल का बन्दु यह दृश्य देखकर सड़ा हो गया। आठ साल का वह 'सल्लू' अपनी मां को ( उसकी चिडचिडी स्त्री को ) इस नाटक का समाचार देने के लिए पहुंच गया । रसोईघर के पासवाली छत से चिड़चिड़ाते गुस्से के धमाके फूटने लगे। और अपस्मात् यह नगारा सामने दिखाई दिया कि चुन्नु कमरे में माग्रज पर काराज निकालकर फेंका जा रहा है। वे कागज, जो उसने अवेर के रस थे, संभालकर रखे थे। कमरा विसरे हुए कागजों से अजीय हो उठा है । उस बच्चे को, जिसे वह 'उल्लू' कहता है, विखरे हुए कागजों को फिर से जमाने के लिए कहा गया है । वह बड़ी मुस्तैदी से और फिक के साथ उन्हें छोट-छांटकर जमा करता जा रहा है । और एक समय वह वे कागज छोटे-छोटे गट्ठों में बंध गये और एक बड़ी पेली में समा गये । ये फागज क्या थे? असवारों के टुकड़े, बच्चों को पुरानी वैकाम कापियो, अमरीकी और सी ऐजेंसियों के सरकारी समाचारो के वरफ, पुराने न्यू टाइम्स, पुराने न्यूज़ वीक-जिनको अब तक उसने बहुत संभालकर रखा था, लेशिन जो अब एकाएक अनुपयोगी प्रतीत हए। कन्धे पर पलो लटकाये ज्यों हो चानू या चुन्नीलाल शर्मा, एम. माया, जठना १.९ - सी., असिस्टेण्ट वेचर, जीने से उतरकर नीचे के कमर लगा कि कहीं उसे इस सुबह-सुबह भयानक दुर्घटना का सामना न ना पड़े, यानी कि कहीं पत्नी से मुठभेड़ न हो जाये ! लेकिन नहीं, उसका यह भय निराधार था। रास्ता साफ़ था। उसके पने स्वभाव के अनुसार, सुबह लो रोशनी की ताजगी में उसकी आंखों के सामने स्वप्न तैरने लगे। उसके बच्चे बड़े हो गये हैं। वे खुव मेहनती निकले हैं। हाँ, सही है कि उनके कपड़े फटे हुए हैं, लेकिन वे मास, सार्च और नेहरू के वचन अपने भाषणों में सहज रूप से गूंय जाते हैं। वे किसी सुनहले लक्ष्य के लिए लड़ रहे हैं। उनके हृदय में उत्साह है। जमाना बदल गया है, बव वड़ा परिवर्तन होने को है। मौजूदा पोढ़ी, अपनी बुढ़भस में, हास्यास्पद प्रतीत हो रही है, इत्यादि-इत्यादि । उधर बच्चों की मां ने चाय बना ली थी। वह काली घी, दो चम्मच दूध ने चाय के रंग में विशेष परिवर्तन नहीं किया था। लेकिन उसका गरम-गरम चूंट हलक में उतरते ही उसे अच्छा लगा। तब उसने देखा कि रसोईघर की जो खिड़की उसने खोल दी थी, वह फिर बन्द कर दी गयी है । वह एकदम उठी और उसके पल्लों को जोर से खोल डाला। वादल हट चुके थे और उसकी विपरीत दिशा में-पश्चिम में दौड़ जा रहे थे। नदोदित सूर्य की गुलाली, सुनहली, नारंगी किरणें एक के से चारों ओर दौड़ रही थीं। तालाब के पानी में उनके प्रतिबिम्ब गये थे। हरियाला मैदान लाल-सुनहला हो गया था। और दूर तिक पहाड़ी एकदम नोली दिखाई दे रही थी। वह उस दृश्य को देखती खड़ी रही । उस सौन्दर्याभा का जल चेहरे पर हा गया। उसे अच्छा लगा। पास ही कमरे में, नल से वालटियां लगा दी। फिर वह चूल्हे के पास आ बैठो। उसके लाल अंगारों पर दृष्टि स्थिर हो गयी। उसमें लाल बट्टानें दिखाई दी, जिनके सुनहलो ज्योति निकल रही थी। चट्टानों के पास महीन-गरम सतह से उस
को गलियाँ बन रहो यो। कहीं वारसा को हलको मना हिलो दुई अपने
किसी को बुला रही था।
उमने दो छोटी-छोटो लाहियो और लगा दो। गूल्हे में प्रभास
उठा। एक गति, एक आयेग गर्म या यंगोपर यनने राणा। उसने
रमोईघर में चारों ओर नजर दौडायो। भौत पर लगी हुई थी
पट्टियों पर पावर के बरतन चमचम पमा रहे पं। उनके पोल रंग में
सिडनी मे से आयो हुई मूर्य की कान्ति बताई घोल रही पी।
एकाएक उराको नजर अपनो नहियों पर गयो। ये ना पों।
उनको नीलिमा को गोरु प्रायरंगा उगरी कलाई को मेरे पी।
भस्मात् किसी मरचंदन प्रेरणा से उसने हायों से धूटियों से माये को
धूलिया, मानो वह किसो अदृश्य शनि के गामने ना-EIT हो गयी
हो। और, तर न मालूम फोन- स्वप्न गको पलों में उभर माया ।
उसके पर एक हलको-सो मुगमान और
चूहे में याग तेज हो गयो । लार योर गेग, गिभूरो घोर गुनहरी
ज्वालाएँ ऊँची उटी, नाचने और लहराने लगा।
पून्हा पाली मा। उमर उगने मना नही गया। यह
लकड़ियों को भागे सरकाती जा रही दी। उनका कामदासानाका
था। सनरी गरमी बढती जा रही पी। माननारी और
दौड़ता जा रहा पा । कल रामा पा? हो, मामा पा? पर
घटना, जिसने उसके दिमाग को घोदित पा, रिग टमको कार बना
दिया था।
और लार कोशिश करने पर भी नेट परनामी कार नहीं
मायो । सम्मान: ऐमो कोई पटना हा ही नहीं दी। गरमा-
अनिद विषों ने उसरी नमुना में पारद पनगर मोरपिलर
दिया था। मोर ग विमान में उनके मन में अन्दाजमारे और
भारतराचि थे। यही ये पटाकी, दोपहर बाद में
सिर्फ एक मानमिक वातावरण बनारसेगा पापी।
में अभाव का, किन्तु उस समय जब चूल्हे की अंगारी लाल घाटियों में सुनहली लताएँ और फूल खिल रहे थे, उसे अपने बचपन और जवानी के दृश्य दिखाई देने लगे और उसे अफ़सोस होने लगा कि अगर वह पढ़-लिख जाती और नौकरी करने लगती, तो उसकी इतनी दुर्दशा न होती, उसके घर में पिछवाड़े से चुपचाप वह औरत न आती जो पठान से भी अधिक सूद लेती है, तो उसको इतना अपमानित न होना पड़ता। उसके सामने क्रमशः वे दृश्य तैरने लगे जब उसको साथिनें पढ़-लिख गयों, जिनमें से एक प्राइमरी स्कूल की टीचर है, दूसरी किसी दफ्तर में है, तीसरी नर्स हो गयी है । एकाएक उसके हृदय हानि फा दुख भरता गया । हर तीसरे साल वच्चे, जन्म और मृत्यु, कर्ज और अपमान, बढ़ती हुई जिम्मेदारियां और पेट में अन्न डालने की मुश्किलें भोर काम, काम, काम ! आश्चर्य की बात है कि इन सारे खयालों में पति का खयाल उसे नहीं आया। पति के विरुद्ध विक्षोभ उसके मन में नहीं था, सो भी बात नहीं। परन्तु यह सच है कि वह उससे बहुत ही अधिक प्रेम करती थी। वह क्षण-भर को भी यह नहीं सोच सकती थी कि उसके दुख उसके पति के कारण है, यद्यपि वह अपने दुखों का ठीकरा पति के सिर पर ही फोड़ती है । मनुष्य का मन विचित्र है । और आज जब कि वह पति पर ही अत्यन्त क्रुद्ध है, पति के विरुद्ध उसके मन में विचार आने चाहिए थे । सम्भवतः इसका एक कारण यह भी था कि वह पढ़ने-लिखने के प्रति अपनी उदासीनता को ही सर्वाधिक दोप देती थी। स्त्री चौंक पड़ी। यदि वह शिक्षित होतो, तो शायद अधिक सुखी होती। वह यह समझती थी कि वह कार्य-कुशल है, न कि उसका पति । वह अपने भोले हृदय को भी भोला आनन्द प्रदान कर सकता था। लेकिन जिन्दगी की छोटी-छोटी बातों के लिए जद्दोजहद करने की ताकत और ताव वह नहीं रखता था। उसके अनुसार उसका पति सन्त था, सन्त । मूर्ख उसे न कह सकती थी, न सोच सकती थी। । ११२ सतह से उठता आदमी और इसी तरह के खयालों में गिरनार वह स्त्री जव अपने बाल फैलाये हर घुपचाप सोचती जा रही थी कि अनजाने में चूल्हे मे की एक तहाक से उठी हुई चिनगारी उसको साड़ी के एक कोण में दुबककर बैठ गयी। ठीक उसी वक्त उसका पति चुनीलाल एक मैले-कुचले पंसारी की आलमारी में रखे हुए किसी कम्पनी को चाय के पोले पूडे में बनी हुई औरत की तसवीर को देख रहा था। उस औरत का चेहरा नीला- सविला था और हाय में उसके एक फूलों भरी डाली थी। लेकिन आंखें फ्टी-फटी-सी और काली थी। उसे समझ में नही आया कि आखिर औरत की तसवीर क्यों गोद दी गयी। यह एक चिपचिपे स्टूल पर नीचे पड़ा हुआ पुराना यसवारी काग्रज रखकर बैठ गया । चुपचाप अपनी झोली में से रद्दी कागज निकालने . इन नागजों में उमके बच्चों को लिखावट यो। टूटे-फूटे बोर-तिरछे मसरों में गणित के मौकड़े, देश के विभिन्न राज्यों को राजधानियों के नाम, और संस्कृत की क्रियाओं के रूप लिसे थे वह फिर भविष्य की तरफ देखने लगा। उसके बच्चे बड़े होंगे। कॉलेज एजुवेशन तो क्या ले सकेंगे। इतना पैसा हो नहीं है कि उनके लिए किताबें खरीदें....लेकिन हो, मैं अपने सारे विचार, मेरी अपनो सारो कल्पनाएँ और धारणाएँ उन्हें बता दूंगा । उनका विलकुल सिस्टमैटिकली अध्ययन करा दूंगा। में उन्हें बहे भादमियों की बैठकों से दूर रपूगा और इस तरह छटो दूंगा कि वे उनके तौर-तरीको से घृणा करें, अपने-जैसे गरीबों में हो रहैं, और उन्हें लिखाय-पड़ायें, उन्हें नये-नये विचार दें, उनको भविष्य-कलना तीन कर दें। उनको जगत्-चेतना को विस्तृत मोर यथार्थवादी बना दें, और उनमें भरें और जियें ! मैं उन्हें क्रान्तिकारी बनाऊँगा, मैं उन्हें समाज को तलछट बनाने के लिए प्रेरित करगा, वे वहीं बैठे-ठे किवा लिखेंगे, पाऊलेट छापेंगे और जो मिलेगा उसे सबके साथ जना १३ उन सब भड़कीले दम्भों से घृणा करेंगे, जो शिक्षा और सस म पर चलते हैं.... पंसारी को यह सब मालूम नहीं था । वह तो सिर्फ इतना जानता था. इस तरह की रद्दी छह आने सेर से ज्यादा नहीं बिकती। चुन्नीलाल जब अपने हाथ में पन्द्रह माने देखे तो वह बहुत खुश हुआ और पास । के चायघर में दूध लेने के लिए पहुंच गया। जब वह घर पहुंचा, तो पाया कि वहां कुहराम मचा हुआ है। बच्चे रो रहे हैं । बुढ़ी मां रोती हुई कांप रही है, उसकी सांवली झुर्रियां गीली हैं। और बूढ़े वाप के चेहरे पर श्मशान की छाया है। वह बालटी पर बालटी डाल रहा है । नीचे चुन्नू की स्त्री औंधो पड़ी हुई है-पानी में तर । सारा फर्श गीला है । उसपर मिट्टी के फफोले उभर आये हैं। बच्चों के रोने की आवाजें छत को फाड़कर खिड़की के बाहर निकल रही हैं । और सारे शोर में एक गहरा शून्य है, और वह शून्य उसकी स्त्री है वह स्त्री चुप है । उसकी खीझ गायब है, उसको चिढ़ गोल हो गयी है। वह स्तब्ध है। उस घटना से उसके दिमाग को धक्का लगा था। आग ने उसपर चढ़ाई की, क्यों की, क्यों की? और फिर आग बुझायो गयो, वालटियां डालकर। पीठ पर का आंचल, और आंचल के नीचे का ब्लाउज़ जल गया था। इस वक्त जले हुए हिस्से पर नीलो सियाही लगायी जा रही थी। बहुत-सी जगहों प फफोले उठ गये हैं, कहीं त्वचा खिच आयी है। खैरियत हुई, आग ज्यादा फैल नहीं पायी । बाल-बच्चों के भ अच्छे थे। स्त्री अब भी चुप थी, वह निश्चेष्ट थी। वह अभी भी फटी आँखों से न जाने क्या सोच रही थी। बूढ़े पिता और माता आपको दोपो अनुभव कर रहे थे। वे चुन्नू के दारिद्रय को में भयावह कर देते थे । उनको मुखमुद्रा दयनीय रहती थी, अब उन भी दयनीय हो गया था। सतह से उठत लेकिन चुन्नू अपने-आपको दोपो समझते हुए बामै बड़ा । उसने साना छोड़ दो। निश्चेष्ट पड़ी हुई औरत का सिर हिलाया। उसे विटा देने की कोशिश की। वह उठ बैठी । अधिक सचेत हुई और पति को सामने पाकर आँखें कुछ संकोच से दूसरी ओर कर ली, वहां सभी लोग सहे थे, इसलिए । और मरमात्, चुन्नीलाल को लगा कि अब वह अपने एकान्त को रक्षा नहीं कर सोगा। उसे लड़ाई में कूद पड़ना होगा, उसे मुठभेड़ करनी ही होगी। उसे अपने सपने भूल जाने होगे, परिस्थितियों को वश में करने के कार्य में उसे दक्ष और समर्थ होना पड़ेगा। वर्नोल...वैद्य....डॉक्टर...ये गन्द उसके मन में गूंज गये । पैसा... यह शब्द उसको अन्तगुहा में चीख उठा। सहायता....यह स्त्री-लिंगी ध्वनि उसके हृदय में दुन्दुभि बजाने लगी। उसने अपनी स्त्री को पीठ पर के घाव देखे-कुल छह थे। उनमें चीन कुछ बड़े थे, पाको छोटे-पैसे के आकार के । और तब उसके मस्तिष्क ने तुरत सोच डाला कि उसके लिए वर्नोल काफी है। वद्य और डॉक्टर बुलाने की जरूरत नहीं है । उसने बीवी को यही छोड़ दिया। पड़ोसी वी साइकिल उठाया और तुरत ही वर्गों के लिए निकल पड़ा। तब तक वातावरण बदल गया था। स्त्री वैसी हो शान्त और चुप पड़ो यो। अब उसके फैले हुए पैरों पर नन्हा सेल रहा था, यहा बच्चा उसकी पीठ के दागों पर नौलो सियाही लगा रहा था। धूढ़ी मां रसोईघर में घुस गयी हो। अब वह वर्नाल लेकर लौटा तो वह बीवी के पास जा बंश, उसको अपलक न देखती हुई आँखों में उमने बासें हाल दी। उसके गाल छुए। और तब उसने पाया कि उसकी मांसों में चेतना मुमारा उठी है। उसके होंड भी किसी नन्न, दोन, दयनीय स्थिति में तिरछे हो रहे हैं। पन्नू के जम्मा दय में एकाएक अपने स्वयं के ही भाग्य पर बड़ी दया उत्पन्न हुई दया इसलिए कि उसके भासपास के लोग किसी उपन्यास के केवल पात्र हों, जो लेखक के अत्यन्त निकट होते हैं, और फिर भी दूर, व उसके अपने होते हुए भी वेवल छायात्मक होते हैं। किन्तु इस विचार के उत्पन्न होते ही, उस विचार के लगभग विप- रीत, चुन्नीलाल ने अपनी स्त्री को बग़ल में खींच लिया। और तव एक क्षण के बाद, उसी स्त्री के गले से आवाज निकली। क्षीण, दुर्बल और प्रार्थना करती हुई आवाज़ थी-वह । स्त्री ने कहा, "तुम मुझे छोड़कर मत जाया करो !" वह आवाज़ बहुत ही क्षीण और करुणापूर्ण थी। किन्तु चुन्नीलाल को लगा कि वह आवाज़ किसी पार के परलो तरफ के परे से आ रही है, इतनी दूर से कि वह उसी कारण तीखी हो उठी है और हृदय-विदारक भी । चुन्नीलाल ने अपनी पत्नी को वहीं जमीन पर लिटा दिया । सिरहाने लकड़ी का पट्टा रख दिया। और किसी उत्तेजित अवस्था में रसोईघर की खिड़की खोलकर वह वाहर देखने लगा। वहाँ उसे शहर ही शहर और गांव ही गांव, सड़कें हो सड़कें, गलि ही गलियां दिखाई दी, जिनके भीतर से उठती हुई गूंज उसके पास आ कहने लगी, “तुम मुझे छोड़कर मत जाया करो।" और जब वह एक कप चाय लेकर बीवी को देने गया, तब पाय उसकी आँख लग गयी है । चुन्नीलाल ने जगाने की कोशिश करनी पर वह एक दृश्य देखता ही रहा-नन्हा वालक अभी भी उसके । पैरों के बीच खेल रहा था। तीन साल का बच्चा अपनी जेब में के टुकड़े गिन रहा था। आठ साल का वड़ा लड़का घर की हा स्कूल-दफ़्तर का समय सोचकर थाली में अरहर की दाल बीन उसके हाथ में अभी भी नोली सियाही लगी थी, मानो उसने खिलवाड़ किया हो। चुन्नू का दिल इस दृश्य को देख पिघल गया। वह उसे 3 सतह से प्रतीत हुआ। उसका मन बेहद के मैदान में चला गया। इन सब लोगों पा प्यार वह अपने में नहीं संभाल सकता। उसका दिल मिट्टो का घड़ा है, उसमें सादा भरोगे तो वह टूट जायेगा। एकबारगी उमने अपने सारे घर पर दृष्टि डाली। यह उसका जगत् है, उसे सबको सेवा करनी है । वह जरूर-जरूर करेगा। नहीं तो जिन्दगो का कोई मतलब नहीं। उसने अपनी बीवी को जगाया नहीं । पिताजी को चाय का कप दे दिया। और फिर रसोईघर में आ गया तथा खुद गरम-गरम चाय पीने लगा। ज्यों हो उसने एक घुट अपने होंठों से लगाया कि एकाएक उमे खयाल आया कि उसने बर्नोल का प्रयोग अभी तक नहीं किया, उसके घावो पर वर्नोल लगाना भूल गया। उसने चाय-भरी वशी नीचे रस दो, और भासमान फाड़कर एक तसवीर उसके सामने आ गयी । वह नसकी अपनी समस्या थी यह वर्नोल लगाना भूल क्यों गया ? वह अपने कामों से, दुनिया से रिश्ते जोहे, न कि सिर्फ दिल के उड़ते हुए टुकड़ों से। इतने मे बड़े बच्चे ने आफर सूचना दो, "मां चाय मांगती हैं।" चुन्नू को सुमो हुई। वह तुरत गरम चाय लेकर स्त्री के पास जा बैठा। बच्चों ने देखा कि उनके बूढ़े, झुकी कमरवाले नाना के हाय में बर्नोल है, जिसे वे चुनीलाल के हाथ में दे रहे हैं । - एक दाखिल दफ्तर साँझ कचहरी के लम्बे-चौड़े अहाते के अन्दर नीम, सेमल और इमली के बड़े- बड़े वृक्ष खड़े हैं । जव उनकी आड़ में क्षितिज की कोर पर रक्ताभ साँझ झुक जाती है, और उसके रंगों का प्रवाह आकाश का दूसरा छोर छूने के प्रयास में धुंधला हो जाता है तब रामेश्वर को ऑफिस अपना नहीं पराया मालूम होने लगता है। सहसा उसकी आंखें काम से उचाट खा- कर पेड़ों की ओर मुड़ जाती हैं। यही वह क्षण होता है जब रामेश्वर दफ़्तर से घर की राह लेने का फैसला किया करता है । लेकिन आज वह उठ नहीं पा रहा है । उसे जम्हाई पर जम्हाई मा रही है । पर अंगड़ाई तक माज बेजान है । सन्तोष नहीं दे रही है। किसी मानसिक अवरोध से, वह अधूरी ही रह जा रही है । "छोड़ो....साहब, अब तो जो होना होगा सो होगा।" रामेश्वर को यह आवाज़ आश्रय देती-सी मालूम होती है । सोचता -कुरसी से उठ पड़े । कचहरी के घेरे को पार करके खुली सड़क पर चलने लगे। "आप फुजूल तकलीफ़ कर रहे हैं । ऐसे कौन-से वे लाट साहब है... कल भी जवाब दिया जा सकता है। केस की तो आपने पूरी स्टॅडी कर ही लो होगी।" कमरे में सांझ की मीठी उदास और घनी छायाएं फैल चुकी हैं। आसपास, काग़जों के गट्ठों से लदे टेविल, क्लर्कों के घर चले जाने के कारण और ज्यादा निरर्थक नजर आ रहे हैं। है। we सतह से उटता आदमी रामेश्वर के सामने उसका सहायक धर्मा पापा। नाटा, हरा, सावला कुरूप व्यक्ति जिसको नाक अन्त में महत मोटो होकर कार उठ गयी थी । उसकी आँखों में सुखद हंसी चमक रही थी। उस उल्लासपूर्ण चमक से कुछ चिढ़कर किन्तु भार प्राट न करते हए रामेश्वर ने कहा, "अब तो नाय का भी बन्दोबस्त नहीं हो साता....' पपरासी अपने घर को रवाना हो चुका था। दूसरे कमरे में कम मेहतरानियों को जोर-जोर से कुछ कह रहा था। असिस्टेंट ने पिना. कर उसे चाय लाने का आदेश दिया। फर्राशययड़ाता मा होटल की ओर चल पड़ा। चाय को मासा ने रामेश्वर को कुरसी से और भी चिपका दिया। वर्मा मन ही मन हम रहा था। आखिर यह पही अफगर है मिो अपने मातहतों की छोटी सी गलती को पहाड़ यनाफर दिलाकर अपनी विलक्षण बुद्धि का परोक्ष और विनम्न परिचय देते रहने की यादम पड़ गयी पी। माना कि वह आदमी अच्छा था। किसी का नुकसान करने की प्रवृत्ति उसमें न पो । किसी के पेट पर पाव नहीं पता था। यह सब होते हुए भी, जो वह नहीं पा सो भी महत्वपूर्ण था। भान यह नाटा, कुरूप सहायक इस अहिंग यफमर को परेशान देखकर मन ही मन हेस पा रहा था। तिरछो काट का पैतरा सापता हुआ यह बोला, “हे क्या, माहर, इममें ! आप तो मुंशो है। आपके एक्सप्लेनेपन को मला कोई पाट सरता है।" बात सच थी । यद्यपि रामेश्वर को कॉलेज छोडे मिन.पा ही माम हमा पा, फिर भी कचहरी के कामों में टपले उनी महारत हामिद कर ली थी कि बड़े-बड़े अफसर नी दाद देने लगे थे। हिनुमान महाया इस द्विारे से वह सूरा नहीं हुआ। टममें बादामा दिदीदमा पनि सुनाई दी। वर्मा ने कुछ एककर कहा, "इल मुनी टोदिका सकता है।" एकदाग्निष्ट पटर साँस .. " रामेश्वर नमक उठा-"तुम कुछ जानते नहीं हो। आज शाम को तैयार हो जाना था। तुम कल तक को बात कह रहे हो। मेरा तो । यक्ष-यक.... रामेश्वर ने जीम काट ली। यह वह क्या कह गया अपने नहायक से! अफसर के प्रच्छन्न पश्चात्ताप ने असिस्टेण्ट का प्रच्छन्न कुतूहल कुछ और भड़का दिया। रामेश्वर इतना वेचन है, इसका अन्दाज से न था। इस झंझट के पीछे राज़ है, यह समझ लेने के बाद राज मालूम करने के लिए कुतूहल दवाना और सहानुभूति बढ़ाना उसे जरी मालूम हुआ। ऑफ़िस में हर किसी को दूसरों के राज जानने की इच्छा हमेशा सताया करती थी। वे लोग हमेशा कानाफूसीवाली नजदीकी पर रहते हुए भी किमी के न ये। इनकी सारी जिजीविषा एक दूसरे से मात्र इतना ही जानने पर केन्द्रित हो चुकी थी कि क्या जल रहा है । एक दूसरे की पीठ पीछे बुराई करना, बाकायदा कोई वेमतलब पड्यन्त्र करना इनका नियमित व्यापार था। तमाम शिक्षा-दीक्षा के वावजूद, आधुनिकता के तमाम कारी लेपों के बावजूद इन्होंने अपने संस्कारों के प्रति सच्चे रहते हुए ऑफ़िस को मध्यमर्गीय संयुक्त परिवार का दर्जा दे डाला था। इस कुछ तो निश्चयपूर्वक विघ्न-सन्तोषी थे, शेष विष-वमन से मागे व का साहस नहीं कर पाते थे । प्रत्येक किसी न किसी गुट का था । गुट ऐमे, जिनका कोई स्थायी रूप न था। मित्रता और सन्धि के प्राकृतिक नियम नहीं थे। गुट बनते-बिगड़ते रहते थे। असिस्टेण्ट वर्मा के लिए यफसर रामेश्वर के गुट में शामिल है यह सुनहरा अवसर था। नाटकीय मुद्रा में उसने कहा, करता है। आखिर ऐसी कौन-सी बात है। एक्सप्लेनेशन तो रोज करते हैं। असली मुंशी तो वह-जो किसी तरह का भी एक पूछा जाये, इस तरह जवाब दे दें कि पूरनेवाले के छ । मोटर-ट्रकों का इंचार्ज क्लर्क-वह कुलकर्णी । वह तो इस वार सतह से र करता है कि चाहे जैसा ऐंडा-चैड़ा एक्सप्लेनैशन हो, वह पूछनेवाले के होश ठिकाने कर दे। सिर्फ मजमून की बात है । और फिर आरके कई दोस्त है। कोई आपका बाल-बांका नही कर सकता।" माखिर का वाक्य वर्मा ने जान-बूझकर टोह लेने के लिए कहा। रामेश्वर मूर्ख न था कि वह यह न समझे कि उसको निबलता की स्थिति से वर्मा को पोड़ा-सा ही सही बल मिला, यद्यपि उस बल का प्रतिकूल उद्देश्य न था। रामेश्वर को पल भर के लिए हो यह भ्रम हुआ कि जवाब का सही और गलत होना सिर्फ मजमून पर और मजमून-तराशो के हुनर पर ही निर्भर । किन्तु भावनात्मक रूप से अपनी निस्सहायता को अनुभव कर वह कहने लगा, “नौकरी में, वर्मा साहब, कोई किसी काम दोस्त है, न दुश्मन । जब किसी पर आ बनतो है तब कौन अपनी गरदन फंसाकर दूसरों की मदद करता है।" "पर आप कौन-से ऐसे संकट में फंस गये हैं, हजूर ।" वर्मा जानने के लिए व्याकुल हो उठा । एक राज पर दूसरे राज खुलने की सम्भावना से वह आनन्दित हो गया। इतने में बूढ़ा फर्राश चाय ले आया। वह भी मानो कुछ सुनने के लिए चुपचाप सड़ा रहा। “रखो, रखो ! टेबिल पर रखो और जामो।" वर्मा ने जल्दी-जल्दो उमे रुखसत किया और वह कान लगाकर कहने लगा, "हाँ, साहब ।" रामेश्वर चुपचाप चाय पोता रहा । प्पाला खत्म करके दोला, "आजकल तुम जानते हो, मुपरिटेण्डेण्ट और डायरेक्टर को दोस्ती है।" "यह तो खैर, सूरज को धूप को मानिन्द साफ है," वर्मा ने कहा । "और तुम यह भी जानते हो कि असिस्टेण्ट डायरेक्टर को सुपरि- न्टेंडेंट से अबतक दोस्तो थी।" "पानी !" वर्मा ने बताइटो आश्चर्य से आतीत हुए कहा । "यानी यह कि ए. डो. मुक्ता साइब को मुरिण्टेण्डेण्ट से दोस्ती खत्म हो गयो अब दुश्मनी है।" उक्त वाक्य रामेश्वर ने इस प्रकार कहे कविता साँग श्वर भभक उठा-"तुम कुछ जानते नहीं हो। माज र हो जाना था। तुम कल तक को वात कह रहे हो। मेरा तो " रामेश्वर ने जीभ काट ली। यह वह क्या कह गया अपने कसे! अफ़सर के प्रच्छन्न पश्चात्ताप ने असिस्टैण्ट का प्रच्छन्न कुतूहल कुछ र भड़का दिया । रामेश्वर इतना वेचैन है, इसका अन्दाज़ उसे न था। | झंझट के पीछे राज है, यह समझ लेने के बाद राज मालूम करने के लए कुतूहल दबाना और सहानुभूति बढ़ाना उसे ज़रूरी मालूम हुआ। ऑफ़िस में हर किसी को दूसरों के राज जानने की इच्छा हमेशा सताया करती थी। वे लोग हमेशा कानाफूसीवाली नजदीकी पर रहते हुए भी किसी के न थे। इनकी सारी जिजीविषा एक दूसरे से मात्र इतना है जानने पर केन्द्रित हो चुकी थी कि क्या जल रहा है । एक दूसरे की पीठ पीछे बुराई करना, वाक़ायदा कोई बेमतलव पड्यन्त्र करना इनका नियमित व्यापार था। तमाम शिक्षा-दीक्षा के बावजूद, आधुनिकता के तमाम कारी लेपों के वावजूद इन्होंने अपने संस्कारों के प्रति सच्चे रहते हुए ऑफ़िस को मध्यमर्गीय संयुक्त परिवार का दर्जा दे डाला था। इनमें कुछ तो निश्चयपूर्वक विघ्न-सन्तोपी थे, शेप विप-वमन से आगे बढ़ने का साहस नही कर पाते थे । प्रत्येक किसी न किसी गुट का था । गुट भी ऐसे, जिनका कोई स्थायी रूप न था। मित्रता और सन्धि के कोई प्राकृतिक नियम नहीं थे । गुट बनते-बिगड़ते रहते थे। असिस्टैण्ट वर्मा के लिए अफ़सर रामेश्वर के गुट में शामिल होने का यह सुनहरा अवसर था। नाटकीय मुद्रा में उसने कहा, करता है । आखिर ऐसी कौन-सी बात है। एक्सप्लेनेशन तो रोज़ अप करते हैं। असली मुंशी तो वह-जो किसी तरह का भी एक्सप्लेने पूछा जाये, इस तरह जवाब दे दें कि पूछनेवाले के छक्के छूट ज मोटर-ट्रकों का इंचार्ज क्लर्क-वह कुलकर्णी । वह तो इस बात का "जी धक-ध सतह से उठता १२० करता है कि चाहे जैसा ऐंडा-बड़ा एक्सप्लेनेशन हो, वह पूछनेवाले के होश ठिकाने कर दे। सिर्फ मजमून की बात है। और फिर आपके कई दोस्त है । कोई आपका बाल-बांका नहीं कर सकता।" आसिर का वाक्य वर्मा ने जान-बूझकर टोह लेने के लिए कहा । रामेश्वर मूर्ख न था कि वह यह न समझे कि उसको निर्वलता की स्थिति से वर्मा को योड़ा-सा ही सहो बल मिला, यद्यपि उस बल का प्रतिकूल उद्देश्य न था। रामेश्वर को पल-भर के लिए हो यह भ्रम हुआ कि जवाब का सही और गलत होना सिर्फ मजमून पर और मजमून-तराशी के हुनर पर ही निर्भर है । किन्तु भावनात्मक रूप से अपनी निस्सहायता को पुनः अनुभव कर वह कहने लगा, "नोकरी में, वर्मा साहब, कोई किसी का न दोस्त है, न दुश्मन । जब किसी पर आ बनती है तब कौन अपनी गरदन फंसाकर दूसरों की मदद करता है।" "पर आप कौन-से ऐसे संकट में फंस गये हैं, हजूर ।" वर्मा जानने के लिए व्याकुल हो उठा। एक राज पर दूसरे राज खुलने की सम्भावना से वह आनन्दित हो गया । इतने में बूढ़ा फर्राश चाय ले आया। वह भी मानो कुछ सुनने के लिए चुपचाप खड़ा रहा। "रसो, रखो ! टेबिल पर रखो और जाओ!" वर्मा ने जल्दी-जल्दी उसे रुखसत किया और वह कान लगाकर कहने लगा, "हाँ, साहव ।" रामेश्वर चुपचाप चाय पोता रहा । प्याला खत्म करके बोला, "आजकल तुम जानते हो, मुपरिण्टेण्डेण्ट और डायरेक्टर की दोस्ती है।" "यह तो खैर, सूरज को धूप को मानिन्द साफ है," वर्मा ने कहा । "और तुम यह भी जानते हो कि असिस्टेण्ट डायरेक्टर को सुपरि- स्टेंडेंट से अबतक दोस्तो थी।" "यानो !" वर्मा ने बनावटो आश्चर्य से ओतप्रोत हुए कहा । यह कि ए. हो. शुक्ला साइव को सुपरिटेण्डेण्ट से दोस्ती खत्म हो गयो-अब दुश्मनो है।" उक्त वाम रामेश्वर ने इस प्रकार कहे एक दासिक दपवर साँझ "यानो बैठे " । वह एक नये समाचार का ऐटम वम वर्मा के कार छोड़ रहा हो । वर्मा ने आश्चर्य का नाटक बहुत खूबी से किया। मानो उसे बिजली । करेण्ट छू गया हो। वर्मा की इस मुद्रा से प्रोत्साहित होकर रामेश्वर बोले, "अब तुम समझ जाओ आगे की पूरी बातें....' वर्मा गरदन हिलाकर 'हूँ....हूँ...हूँ किये गया। रामेश्वर चुपचाप कुछ सोचता रहा। फिर एक झटके के साथ रामेश्वर ने वस्ता बांध- कर आलमारी पर उप से फेंक दिया। वर्मा ने फ़शि को दफ़्तर वन्द करने के लिए एक ज़ोरदार आवाज़ लगायी। गौर वे दोनों दरवाजे के वाहर हो गये। बाहर खुली हवा में आकर मात्र वातावरण के कारण वर्मा के बारे में रामेश्वर शायद आश्वस्त हो गया, मानो वे पुराने मित्र हों। हलका- मोटा अँधेरा, बड़े-बड़े दरख्तों से छन्ता हुआ गिर रहा था। दूर, कोलतार की लम्बी सूनी सड़क पर विजली के लटू परिकथाएँ सुना रहे थे। "अब तुम समझ गये न पूरा मामला।" वर्मा ने कुछ हंसकर कहा, "आप समझाएं और मैं न समझू । अपनी अवल पर तो मुझे कोई नाज नहीं है, लेकिन इन मामलों में आपका इशार ही काफ़ी होता है । सुपरिण्टेण्डेण्ट का गुर्गा, गुप्तचर और माज्ञाकारी मि है शर्मा, जो मेरा सहयोगी यानी आपका असिस्टैण्ट है और आपका उ छत्तीसवाला ही हिसाब है। मगर साहब मानना पड़ेगा, आपने निबाहा खूब...." रामेश्वर के कानों में एक हलकी, दबी हुई शिकायत की गू उठी। पल-भर उसके रहस्य को वह समझ नहीं पाया। किन्तु तुरत बाद, मानो घण्टे के ठोके उसके दिल में पड़े हों, एक आगा हुई चोट उसके हृदय में स्वरित हो गयी। रामेश्वर ने चालाकी से वर्मा से पूछा, "हाँ, मैंने शर्मा को निवाहना ही पड़ा। किन्तु इसकी अच्छाई किसके पल्ले ?" रामेश्वर ने कहा, सतह से उ . कहा, "उसको वर्मा ने सरल भाव से जवाब दिया, "आपकेको निशाना बनाकर।" नियत के पल्ले, और आपके लाजवाब व्यवहार कौशल रे फंस गये।" रामेश्वर को वर्मा का कथन कूटनीतिक प्रतीत होते वक पर माकर मद का एक अंग भी वह नहीं मालूम हुआ क्योंकि दस्तुतः वह नहीं थी। दुनिया को जाहिर या कि रामेश्वर अपने पास शर्मा को और न केवल अपनी कर्मण्यता वरन् घोर सहनशीलता का परिचय दे रहा है रामेश्वर को वर्मा के कथन में अंशतः मतिरंजना मालूम हुई। घालाको मफल होते देखकर रामेश्वर ने मीठे स्वर अच्छाई तुम्हारे पल्ले, क्योंकि उसको सफलता तुम्हारे कार निर्भर थी।" रामेश्वर ने बड़े प्यार से वर्मा के कन्धे पर अपना हाथ रख दिया । धर्मा बागवाग हो उठा। अफसर से अपनी तारीफ, चाहे वह थोडी हो क्यों न हो, किसे खुश नहीं करती। फिर वह तारीफ़ झूठी भी नहीं थी। सिर्फ उसमें रामेश्वर का छिपा पैतरा था। रामेश्वर वास्तव में वर्मा की कीमत पर शर्मा को निबाह रहा था। उसे यह भय था कि कहीं वर्मा उससे बगावत न कर बैठे। किन्तु रामेश्वर के सामने वर्मा अपनी पारिवारिक स्थिति के कारण बहुत ही मजबूर और बेसहारा था। वह बगावत नहीं कर सकता, यह रामेश्वर की जानकारी के बाहर को बात थी। यह इसीकिए वर्मा को चुस्ती और फुरती से शंकाल हो उठता था। रामेश्वर ने मानो दर्मा के मन की बात कर दी थी। शर्मा को स्वच्छन्द छोड़ कर वर्मा पर ही सारा भार रामेश्वर डालता रहा । एक ठपहा, सुगन्धित झोंका आया। अफसर और असिस्टैण्ट दोनों ने सुनसान दूरियोंवाली उस डगर पर अपने-आपको एक दूसरे के बहुत निकट पाया। तभी रामेश्वर के मान्न मन में चिन्ता को उद्विग्नता, तीखी लकोर-सी सिंच गयो। उसने वर्मा के कन्धे को थपथपाकर कहा, तो शर्मा को अपने पास रखना ही नही पाहता, किन्तु उस तुनुक मिजाज चिड़चिड़े ए. डी. ने मेरे विरोध की ओर ध्यान न देते हुए मुझपर उम एर दासिक पतर साँझ वह एक नये समाज वर्मा ने आश्चर्ग जो आपका विरोधी और प्रतिस्पर्धी या।" 'र ने जवाब दिया। | करे, या मन लगाकर न करे, वह करेण्ट छू पल्ले ।" वर्मान झ - या नज़र डाली। वह रामेश्वर के पाया। "क्या मतलब ?" वर्मा के गुरु स निकल गया। अपना जवाब लम्बा-चौड़ा होगा, यह सोचकर रामेश्वर लगभग चुप रहा। वर्मा ने अटकल आजमायी, "क्या शर्मा ए. डी. साहब का सी. आई. डी. बन गया है ?" रामेश्वर ने रहस्यात्मक तौर से मुसकराकर कहा, “नहीं । है तो वह सुपरिण्टेण्डेण्ट का आदमी, और सुपरिण्टेण्डेण्ट आजकल मेरे पक्ष में हैं। अब वह मुझे कॉन् फिडेन्स में ले रहा है।" वर्मा आवे पल के लिए उलझन में पड़ गया। किन्तु तुरत बाद ए असम्भव-सा विचार-विन्दु उसके मन में तेजी से विशाल आकार ले लगा । वर्मा अपने-आपको रोक नहीं सका, "तो कहने का मतलब या कि ए. डी. आपके खिलाफ़ हो गया है ?” वर्मा ने चिन्ता प्रकट हुए कहा। "हाँ," एक एक छोटा-सा संक्षिप्त उत्तर किन्तु खतरों की सम प्रकट करता हुआ। "क्यों" वर्मा का सवाल, सीधा, बन्दूक की गोली-सा तेज । "इसलिए कि मैं शर्मा को कुछ नहीं कहता ।" "पर, इसका उन्हें कैसे पता चला ? काम तो बराबर हो वर्मा ने विस्मय प्रकट करते हुए कहा । से उस सतह "ए. डी. को सुपरिण्टेडेण्ट से लड़ना है। शर्मा को निशाना बनाकर।" "तो, दो पाटों के बीच में आप पिस रहे हैं ।....वरे फंस गये।" थोड़ी देर तक वे शान्त और चर रहे। वे अब सड़क पर आकर घोड़ो दूर चल चुके थे। "पर केस क्या है....?" वर्मा ने काफी उद्विग्नता से पूछा । और उसने रामेश्वर को योर देखा। रामेश्वर अत्यन्त गम्भीर था। उसके चलने में एक शिपिलता यो, एक लड़खड़ाहट थो । कम से कम वर्मा को यहो प्रतीत हुआ। वर्मा को लगा मानो रामेश्वर की जीम मुंह के अन्दर समा गयो हो-उसे लकवा मार गया हो। रामेश्वर के मन में सहसा इतनी पकान भर उठी थी कि वह वर्मा से कहना चाहता था कि मुझे किसी टाँगे या रिक्शे में डालकर घर पहुंचा दे। किन्तु वर्मा को रामेश्वर के मन मे आयी हुई वेदना की इस सघनता का पता न मिल सका। रामेश्वर की चुप्पी को देखकर वह मामले की गम्भीरता का ही अन्दाजा लगा सका । इसलिए उसने उत्सुक होकर फिर एक बार रामेश्वर से पूछा, "केस है क्या ?" रामेश्वर ने वर्मा को और न देखते हुए, मानो वह उमसे नहीं वरन् भासमान से या किसी अचेतन पदार्थ से आत्म-निवेदन करना चाहता हो, कहा, "एक बड़ी महत्त्वपूर्ण फ़ाइल थी । आज से दो महीने पूर्व वह आयी यो। माज निबटाता हूँ, कल निवटाता हूँ, सोचते-सोचते मेरे दिमाग से वह बिलकुल गायब हो गयो और तीन या चार दिन बाद ही वह मेरे कमरे से भी नदारद हो गयी। मैंने सब दराजों में, अलमारियों में चुपचाप खोज-तलाश की, पर वह गायब को गायब । सुररिण्टेण्डेण्ट से कहना मैंने ठीक नहीं समझा । क्योंकि एक तो दह न केवल मेरे खिलाफ मामला तैयार कर देता, वरन् इदनामी भी करता । यद्यपि यह मुझे विश्वास में लेता है, मैं कभी उसपर विश्वास नहीं कर सकता।" "फिर क्या हुआ ?" वर्मा ने कहानी सुनते हुए बालक के अन्दार में पदाधिश पूछा। रामेश्वर बोले, "मैंने ए. डी. को जाकर पूरा किस्सा सुना दिया। उसने मुझे सलाह दी कि मैं फ़ाइल खो जाने की रिपोर्ट कर दूं। लेकिन फ़ाइल खो जाने की रिपोर्ट मैंने तैयार नहीं को ! उस फ़ाइल में कुल एक ही तो पेपर था। ए. डी. ने कोई एक्सप्लेनेशन मांगा था। मैंने सोचा, जब ए. डी. को मालूम हो गया है कि फाइल खो गयी तो अपने नोट की कापी भेज देगा। इसलिए मैं चुप बैठ गया ।" कुछ देर चुप रहने के बाद रामेश्वर ने कहा, "शर्मा का इस एक्सप्लेनेशन से कोई सरोकार नहीं था, फिर भी परिस्थितिवश वात जा पड़ती है शर्मा पर ही । ए. डी. शर्मा को हमेशा सन्देह की दृष्टि से देखता रहा । मौका पाते ही, वह उसपर टूट पड़ना चाहता था। उसने खुले तौर पर मुझसे कई वार कहा कि शर्मा के खिलाफ रिपोर्ट करो, कारवाई करूं। पर मैं जानता था कि शर्मा को सुपरिटेण्डेण्ट का आसरा है । ए. डी. को मालूम हो चुका था कि मैंने फाइल खो जाने की रिपोर्ट नहीं की। वह उसने मेरी जवानी सुना और जवाब तलब करते हुए बात आगे बढ़ा दो । डायरेक्टर को इसकी सूचना कर दी।" वर्मा ने पूछा, "डायरेक्टर ने आपको बुलाया था ?" रामेश्वर ने घोंघरे स्वर में कहा, "हां । अब मामला संगीन हो गया वर्मा को रामेश्वर पर पहले तरस नाया, फिर गुस्सा । फ़ाइल गुम हो जाने पर रामेश्वर ने तुरत रिपोर्ट क्यों नहीं की ! वर्मा वोल पड़ा, "वह फ़ाइल शर्मा ने ही गायय की होगी, सुपरि- ण्टेण्डेण्ट के कहने से।" जवाब में वर्मा को रामेश्वर का वेदनापूर्ण स्वर सुनाई पड़ा, "हां, मेरा भी यह सन्देह है।" फिर वर्मा स्वयं में लीन हो गया। रामेश्वर ने ए. डी. से रिपोर्ट क्यों नहीं की। शर्मा पर सारी बात थोप देने में इतनी हिचक श्यों हुई। सतह से उठता आदमी गर्मा से वह डरता है इसलिए कि वह सुपरिण्टेण्डेण्ट हरता है, पर मुपरिण्टेण्डेण्ट से भला वह क्यो एरता है ? वर्मा को सहसा महसूस हुआ कि वह लाख लाचार सही, इस दब्बू और डरपोक आदमो से दबना और डरना उसे शोभा नहीं देता । आदर्श अफसर आदर्श असिस्टैण्ट को निगाहों में अनावृत होने लगा। यह आदर्श अफसर संघर्ष से बराबर बचना चाहता है । इसके लिए चाहे उसे कितनी ही बड़ी कीमत देना पड़े। किन्तु इससे, संघर्ष टलता नही, उसका रूप भले ही दूसरा हो जाये। उससे व्यक्तित्व दोमुंहा हो जाता है, जिसका हरेक मुंह एक दूसरे का विरोधी और उसके अस्तित्व की अनुपस्थिति में विश्वास करनेवाला है। फिर वर्मा को लगा कि शायद ये रामेश्वर के नही, उसके ही व्यक्तित्व के पहलू हैं जो यों उभर आये हैं। वे दोनों पास-पास चलते हुए भी इस तरह थे मानो अकेले लम्बा रास्ता तय कर रहे हों-वह रास्ता जिसका ओर न छोर । वर्मा को महमूस हुआ कि रामेश्वर के दब्बू स्वभाव से सबसे श्यादा नुकसान उसका ही हुआ है । उसको आँखों के सामने अपनी मजबूरी, कष्ट और अपमानों के चित्र तैरने लगे । शर्मा के द्वारा हुए अपमान, जिसका कारण रामेश्वर को कूटनीतिक छम निर्बलता थो, उसे विशेषतः यसह्य हो उठे और वह अन्दर ही अन्दर कुढ़ने लगा। भौंहों के पसीने को पोंछते हुए रामेश्वर ने आह भरकर कुछ सोचते हुए कहा-"बड़ा लम्बा, बडा भारी संघर्ष है।" रामेश्वर यों बोला मानो उसने अपनी जिन्दगी के रूम पर निर्णय दे दिया हो । "पर, आप तो क्रान्तिकारी है।" "क्रान्तिकारी?" चोंककर, अप्रिय भाव से रामेश्वर बुदबुदाया, मानो उसने अपने-आपसे ही कुछ वहा हो। फिर उसने विचित्र दृष्टि से वर्मा को और देखा । फिर पूछा, "क्या कहा ?" "अच्छा, मैं अपने आपको करैक्ट कर लेता हूँ, अवसर प्राप्त क्रान्ति- कारो।" वर्मा क्रूरतापूर्वक जोर से हंस पड़ा । एक दाखिक दफ्तर साँझ "मार खाना चाहते हो।" मजाक के तौर पर लेकिन तमाचा जड़ने • खयाल को दबाते हुए रामेश्वर ने कहा । वर्मा ने व्यंग्य से मुसकराकर कहा, "क्रान्तिकारी शब्द से क्यों डरते हैं आप? हम सभी क्रान्तिकारी हैं-नामहीन क्रान्तिकारी।" "मैं उस शब्द से नहीं डरता, क्योंकि एक समय था जब मैं उस शब्द को अपना विशेषण मानता था।" इसपर, वर्मा अनावश्यक रूप से किन्तु साभिप्राय हंसा । इस हँसने से रामेश्वर भयानक रूप से चिढ़ गया। उसकी इच्छा हुई कि वह वर्मा की गरदन पकड़ ले और उसे जमीन पर दे मारे। उसने वर्मा के कन्धे पर हाथ रख दिया 'मानो मौका पाते ही गरदनिया दे देगा। पल-भर की चुप्पी के बाद रामेश्वर ने कहा, "मैं किसी शब्द से नहीं डरता। लेकिन मैं अब सरकारी नौकर हूँ। पेट की गुलामी कर रहा हूँ, आत्मा को बेचकर। किसी वेश्या को सुहागन कहने से उसका अपमान है होता है। वैसा अपमान तुम कर रहे हो मेरा....और वह भी आज इ मौके पर..." रामेश्वर को फूट-फूटकर रोने की इच्छा होने लगी। व के कन्धे पर से हाथ हट गया और शिथिल होकर नीचे लटकने लगा किन्तु वर्मा को इसकी कोई खबर न थी। उसने अपनी टेक पर रहकर कहा, "आपने अपनी आत्मा ही बेची है या इनसानियत इनसानियत का मतलब है इनसान के लिए लड़ना और आप ल डरते हैं। खयाल भले ही आपके ऊंचे हों, ईमान से आप सुपरिण्टेण्डेण्ट से लड़ाई टालने के लिए आपने शर्मा को छूट दी। से लड़ना टालने के लिए आपने मुझे काम में पीसा, सिर्फ इसरि मजबूर और ग़रीव आपके कहने में था, आपकी भलाई का क आपने मेरे भूखे बच्चों को नहीं देखा । पर सुपरिटेण्डेण्ट की भरी आंखों को जरूर देखा। अच्छे रईस खानदान के लाड को प्रमोशन दिलाया और मैं उससे सीनियर और हर तर होते हुए भी रह गया। आपके आदर्श जिस बेईमानी को . सतह से आपका डर उसकी हो गुलामी करता फिरता है। यह ठीक है कि आप उन आदर्शों की खातिर ही बुरी तरह काम में पिसते रहते हैं। लेकिन मुझे पीसने का आपको या आपके आदयों को क्या हक था?" वर्मा यह कहता हुआ कांप रहा था, फिर उसे अपने कहे पर कपकपी छूट गयी । उसने फोरन विदा लेने में ही भलाई समझो। सामने आकर एक दूसरी सड़क इस सड़क से मिल गयी थी। भूरी सहक थी वह मिट्टी को, कोलतार की नही । वही एक छोटा नीम का पेड़ पा। उसकी मूलती हुई शाखाओं के नीचे एक पानवाले को घुमटी थी। "पान तो खा लो।" एक खट्टो हँसो हंसते हुए रामेश्वर ने कहा। वे दोनों उस घुमटी के पास चुपचार निस्तब्ध अपने-अपने अन्तीवन में लोन और भूत की मानिन्द अकेले से खडे रहे । यद्यपि वे पान के इन्तजार में घुमटी के सामने खड़े थे, पान का सपाल उनके दिमाग से विलकुल गायब था। उन्होंने यन्त्रवत् पान का बीड़ा उठाया और मुंह में डाल लिया और अपने अलग-अलग रास्तो पर चल पड़े । एकदाखित दप्तर साँझ से उठता आदमी घर है जिसके पिछले छज्जे पर बैठकर लगता है, चारों ओर सटे कानों की दीवारें, छतें, जीने, खिड़कियां सिर्फ ज्यामितिक आकृतियों रही है। कन्हैया धूल से भरे टेबल के पास कुरसी पर बैठा एक रद्दी कागज उन सटे हुए मकानों की ज्यामितिक आकृतियां बनाता जा रहा है । खूब धूप खिली हुई है, जिनसे वे मकान नहाये हुए-से हैं, और उनके ई, सफ़ेद, राख-जैसे, काले सांवले रंग उभरकर निखर उठे हैं। या को लगा कि हाँ इन मकानों की आकृतियों में पलने वाला आदमी प चित्रकार होगा, नहीं तो क्या! इतने में एक पीले दुवले चेहरेवाली लड़की चाय ले आती है। चाय भाप उठ रही है । ऐसे सुनहले समय ऐसी बढ़िया चाय ! वह प्रसन्न हो जाता है। लड़की का झम्बर फटा हुआ है, और फाक । लेकिन, कन्हैया को कुछ महसूस नहीं होता। क्योंकि वह जानता है के यद्यपि वह एक प्राइमरी टीचर का घर है, फिर भी उसका यह अपना कान है, पास के गांव में सड़क से लगकर उसके खेत है, और घर में छह महीने का गेहूँ, चावल, दाल और गुड़ भरा हुआ है । हां, यह जरूर है कि ये लोग कोमती शहराती कपड़े नहीं पहनते, या कम पहनते हैं। लेकिन, उनका भोजन अच्छा और रुचिकर होता है। उसका अपना खयाल है कि कुछ रोज में वह मास्टर साहब पांच सौ रुपये उधार लेने का प्रस्ताव भी रखेगा ( क्योंकि आखिर ये लोग के पास सतह से उठता भादमी १३० ...
च्याज-बट्टा भी तो करते हैं। चाय पीने के बाद फन्हैया ने बानी कीमती पंण्ट पर टैरोलिन की बुदार्ट पहनी, जल्दी-जल्दी कंघा किया। तेज उतारवाले जीने पर संभल- कर पैर जमाते हुए, नीचे के आंगन में पहुंचा, जो बहुत गोला था, क्योकि वहाँ वरतन मले जाते और वही नहाया जाता था। एक पुराने ढंग के ठिंगने दरवाजे को पार करके वह तंग गली में घुसा। यह गली मकानों को पीठों को देखती हुई बढ़ रही यो। वह किसी दूसरी गली से जाकर मिली-~एक टूटी-फूटी सड़क से, जिसकी छाती पर को गिट्टी उखड़ रही थी। कन्हैया खुश था । सूब धूप छायो यो । नौ का वा पा। वह लम्बे डग बढ़ाते हुए आगे बढने लगा। लगमग चार फर्लाग पर, पूरव की ओर, उसे एक बंगला-नुमा घर मिला । वह खड़ा हुआ और पुकारने लगा, "कृष्णस्वरूप साहब, कृष्ण- स्वरूप!" बहुत पुकारने के बाद, पैण्ट पहने हुए बड़े पेटवाला एक नादमी दरवाजे पर दिखाई दिया। उसके हाथ में फूलों का एक गुलदस्ता पा। और पास में पन्द्रह साल की एक लड़को, जो आसमानी साड़ी पहने हुए बहुत खूबसूरत दिखती थो-दोनों कोई बातचीत करते हुए दरवाजा खोलने आये थे। पन्हैया ने उन्हें नहीं पहचाना । उसने सड़क पर से हो कहना चाहा, में कृष्णस्वरूप साहब से मिलना चाहता हूँ। लेकिन, वह उस लड़की की ओर ही देखता रहा। वह लड़को खूबसूरत नही थी। उसके लाल टमा. टर जैसे गाल बुरे लगते थे। बाल उलझे हुए और अस्त-व्यस्त थे। क्षण-भर लगा कि यह कृष्णस्वरूप का घर नही हो सकता, वे लोग कोई और हैं । कि इतने में एक जोरदार हमी के साप आवाज फूट पड़ी, "ओरको, तुम कर आये ? भई, वाह !" तब कन्हया को लगा कि वह कृष्णस्वरूप हो है । वह मारे सुसी के सतह से उठता भादमी - - आगे बढ़ा और दोनों दोस्तों की आँखें एक दूसरे पर गड़ा-गड़ाकर लगी । और फिर वे एक दूसरे के बग़ल में पहुंच गये । कन्हैयालाल के चेहरे पर खुशी आयी हुई थी। वढ़िया चाय और नाश्ता कर चुकने के बाद, उसका बदन हलका-सा हो गया था। उसे इस कमरे का वातावरण बहुत अच्छा मालूम हुआ। दीवारें नीली थीं, खिड़- कियों पर नीले परदे लगे हुए थे। एक छोटे-से खुशनुमा स्टूल पर रेडियो रखा हुआ था और रेडियो पर भी परदा था। एक और नीले रंग का उपा फैन रखा हुआ था। खिड़कियों और दरवाजों से, वावजूद परदों के धूप आ रही थी। वह स्वयं गद्देदार बढ़िया कोच पर बैठा था और सामने एक छोटी टेबल रखी हुई थी, जिस पर एक सुन्दर ऐश-ट्रे थी, और वह सिगरेट पीता हुआ वहाँ बैठा था । कन्हैया जहां बैठा था वहाँ से ठीक सामने के दरवाजे में से आग का एक हिस्सा दिखता था। हां, यह सही है कि दायें ओर के वाज जो आंगन का हिस्सा दीखता है, जहाँ एक टूटी हुई खाट पड़ी है एक पुरानी अलमारी भी वहाँ है जिसकी लकड़ियां सड़कर झूल गर्य साथ ही, एक पुरानी सिगड़ी जंग लगी हुई पड़ी है। एक अजीव व्यस्तता और टूटे-फूटेपन का भान वहाँ हो रहा है । कन्हैया को लगता है कि पिछली ज़िन्दगी का वह हिस्सा है पिछली ज़िन्दगी का तव कृष्णस्वरूप बिलकुल ग़रीब था, वह अ दृश्य उस पुरानी गरीबी और पिछड़ेपन का हो तो प्रतीक है ! सामने दिखनेवाले इस नये का योग कन्हैया को भला मालूम हु कृष्णस्वरूप काम से जरा बाहर चला गया था। कन्हैय एकान्त में, सपनों में खो गया। लगभग बीस साल पहले कृ कैसी दुर्दशा यो! कन्हैया ने उसे एक बार पांच रुपये जिन्हें कृष्णस्वरूप ने कभी वापस नहीं किया। आज उसी घर में सोफ़ा-सेट है, उपा फ़ैन है-रेडियो है । भई व कृष्णस्वरूप रोज 'गीता' पढ़ता था। और, आत्मनियन्त्रण सतह किया करता था। घर में उसके झगड़ा रहता था। वीवो उमसे चिढ़ती थी। उससे अनवन, उससे तनाव, हरेक अपने दुख का कारण दूमरे में ढूंढता । और, कृष्णस्वरूप कहता था कि हरेक का अपना व्यक्तिगत इतिहास है, और हरेक के व्यवहार का अरना-अपना औचित्य है । हर आदमी एक दूसरे को परिस्थिति है, एक दूसरे का परिवेश है । हरेक आदमी फासलों में खोया रहता है । कौन गलत है, कौन सही-इसका निर्णय नहीं हो सक्ता। यानी ऐसे निर्णय में बौद्धिक कल्पना को आवश्यकता होती है । वही यह कृष्णस्वरूप जो कहता था कि त्याग और आत्मदमन ही जीने का एकमात्र उपाय है । क्यों ? इसलिए कि 'पैर उतने ही पमारो, जितनी चादर है' यह मिटान्त या उसका । मिक्षान्त अपनी जगह मही था। लेकिन, इसके मौचित्य के लिए वह फिलॉसफो लाता था। वह कहा करता था 'चाहिए, चाहिए, चाहिए' ने सत्यता को विस्त कर डाला है, मनुष्य-मम्बन्ध विकृत कर दिये है । तृष्णा बुरो चोड़ है। हमारा जीवन कुरुक्षेत्र है । वह धर्मक्षेत्र है । एक योद्धा होना चाहिए । बामक्ति धुरी चोज है। लेकिन, कभी-कभी कृष्गस्वरूप अपने आध्यात्मिक उच्चता भाव को छोड़कर नीचे आ जाता। वह कन्हैया से चुपचाप रहा करता। उससे मनोविग्रह पाता। होटल में चाय पीता है, और अपनी बीवी की बास चुराकर, किसी कोने में छिपाकर रखे पैसे झटक लेता है। यह पुरी चीज है। लेकिन, वह क्या करे ! केवल ज्ञान काम में नहीं आता। उन दिनों कृष्णस्वरूप कन्हैया को कहा करता: 'नानामि धर्म न च मे प्रवृत्तिः जानाभ्यधर्म न च मे निवृत्तिः । देनापि देवेन हदिस्थितेन यया नियुक्तोऽस्मि तया करोमि ।' हो, उन दिनों कृष्णस्वरूप यह भी कहता था कि उसके स्वप्न में सतह से उठवा भादमी शंकराचार्य, महात्मा योगो और जवाहरलाल भी आते हैं। कृष्णस्वरूप सचमुच कन्हैया को प्रभावित करता था। लेकिन, किस ढंग से! हाँ, यही तो बात है उसकी फ़िलॉसफ़ी की जरूरत थी, इसलिए उसका जीवन दुर्दशाग्रस्त था। अपने मन को मजबूत बनाने के लिए फिलॉसफी के पलस्तर की जरूरत थी। ऐसी फिलॉसफी कन्हैया को हमेशा अप्राकृतिक मालूम हुई। क्यों मालूम हुई ! इसलिए कि कृष्णस्वरूप बड़ा ही हिसाबी आदमी था। खाने का तेल-सेर-भर अगर नियत समय के पहले खर्च हो जाये तो वह बड़ी कड़ाई से पेश आता था। हर चीज़ वह घर में गिनकर और तौलकर रखता था। यहां तक कि अगर उसके किसी बालक ने घी ले लिया तो वह डांट देता था। अचार की एक फांक अगर किसी ने ज्यादा ले ली, तो वह भभकता है। अपने बच्चों का खाना उसकी आँखों में आ जाता था। ऐसा था कृष्णस्वरूप ! लेकिन, आज ? वह खुशहाल तो है ही, खुशहाली से कुछ ज्यादा है । उसको चाल-ढाल बदल गयी है। वह मोटा हो गया है। पेट निकल आया है। ढाई सौ रुपये का सूट पहनता है। सम्भवतः उसके पास इस तरह के कई सूट होंगे ! इनकमटैक्स की नौकरी सचमुच बड़ी अच्छी होती है । काश, कन्हैया भी उसी ऑफिस में काम करता! इतने में कृष्णस्वरूप बाजार से बहुत-सी चीजें लाकर सीधे रसोई- घर में चला गया। वहां स्त्री से उसकी कुछ बक-झक सुनाई दी। वहां से फौरन लोट पड़ा। और ड्राइंग-रूम में आकर कन्हैया से कहने लगा, "लीजिए, वह आपके सामने आती ही नहीं, उसे अभी भी शमें मालूम होती है।" 'तुम क्यों आधुनिक बनाने पर तुले हुए हो!'-यह कहना चाहा था कन्हैया ने; लेकिन, कहा नहीं । सिर्फ मुसकराकर रह गया। इसके बाद, कृष्णस्वरूप ने बड़े उत्साह और उत्कण्ठा से कन्हैया कं १३४ सतह से उठता आदर अपने पूरे मकान में घुमाया। एक रसोईघर और आँगन छोड़कर, ये सब कमरों में घूम आये । कृष्णस्वरूप उत्साह से दावं बताया गया। कन्हैया भद्र सज्जन की भांति, तारीफ करता रहा। और, अन्त में, वे डाइंगरूम में चले आये । उससे लगे हुए एक कमरे में रेफोजेरेटर था, वार्डरोब था। ड्राइंगरूम में कोच पर बैठने ही जा रहा था कन्हैया कि उसने कहा, "नहीं, नहीं, यह कमरा भी देख लो।" शालीनतावश, कन्हैया उठा और उस छोटे कमरे में भी गया । वहाँ बिलकुल सफेद रेफोजरेटर भी रखा था। और उसके पास ही वार्डरोव खड़ा था। बार्डरोब सचमुच वडा अच्या था। वृष्णस्वरूप ने कहा कि उसने उसे सेकेण्ड हैण्ड खरीदा है सिर्फ डेढ सौ में, जब कि उसको आपको कोमत आठ सौ रुपये है। यहाँ की रियासत को भूतपूर्व रानी ने जब अपने महल का फर्नीचर वैवा तब हमें किफायत से बहुत-सी चीजें मिल गयों। उसके काम भी तो बहुत-से किये थे। लेकिन उसके दीवान को कृपा से सस्ते में सब चीजें पा गये। कृष्णस्वरूप ने वार्डरोब खोलकर बतलाया। सचमुच उसके अन्दर कई ऊनी और सादे लेकिन, सब कोमती, कोट और टाई और पेण्ट लटक रहे थे। लेकिन उसमें उसकी कोई साड़ी न थी। कन्हैया वार्डरोब के भीतर के कपड़े देखकर सचमुच प्रसन्न हो गया। एक जमाना था जब कृष्णस्वरूप फटेहाल घूमठा पा। सर्दी में ठिठुरता था, सिर्फ़ जाधिया पहने घर में घूमता था, और फटी सतरंजी ओढ़कर टण्ड निकालता था । आज उसके पास पहनने का इतना सामान देखकर कन्या को सचमुच खुशी हुई। कम से कम उसने अपने बच्चों का भाग्य तो बनाया। उसके उत्साह को देखकर कन्हैया ने कहा, "यार, एक रेडियोग्राम और खरीद लो, जरूरी है।" कृष्णस्वरूप ने कहा, “नहो, यार, पहले मैं एक कार परीट्यूँगा। सरकार ने ऐसा कुछ झमेला लगा रखा है कि नपो कार के लिए बड़ा सतह से उटता भादमी १३५ इन्तजार करना पड़ता है !" कन्हैया ने कृष्णस्वरूप की पीठ थपथपायो, और फिर वह ड्राइंग-रूम में पहुँचा कि इतने में एक घटना हो गयी। , एकदम बहुत कीमती और बढ़िया सूट पहने हुए एक भयानक आदमी ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया। उसकी सूरत देखते ही कृष्णस्वरूप को काठ मार गया । वह ज्यों का त्यों वुत की तरह खड़ा हो गया। उसकी आँखें फटी-सी रह गयीं और होंठ कुछ बुदबुदाने-से लगे। कन्हैया ने उस आदमी की शकल देखी और फिर कृष्णस्वरूप की हालत देखने लगा, किन्तु उसका अनुमान नहीं कर सका। उसने सोचा कृष्णस्वरूप का मूड विगड़ गया है । बस, इतना ही। लेकिन, ज्यों ही उस भयानक आदमी ने कन्हैया को देखा, वह उससे मारे खुशी के झूल गया-"अरे वाह, कब आये, हमें मालूम ही नहीं था ! यार, दुबले हो गये !" कन्हैया को उसने बोलने ही नहीं दिया और खुशी का बेहद शोर करता चला गया । और, फिर उसने कृष्णस्वरूप का हाथ पकड़ लिया और उसे भी जबरदस्ती कोच पर बैठा दिया। और फिर वह खुद बात करता रहा । कन्हैया को इतना-भर लगा कि वह कृष्णस्वरूप का मजाक उड़ाता है। बीच-बीच में कुछ ऐसी फबती कस देता है कि कृष्णस्वरूप गुमसुम हो जाता है । और, लगातार बात करता जाता है । हाँ, उसकी बात में मजा आता है। भाषा पर उसका अच्छा अधिकार है। और ऐसा लगता है, जैसे दुनिया की हर चीज़ से उसका निजी सम्बन्ध हो। उसकी बात जायकेदार और मजेदार है। बात में उसकी उद्दण्डता और तीखापन भी झलकता है। और एक बात साफ़ होती है कि उसके हृदय में कृष्णस्वरूप के प्रति असम्मान के भाव हैं। लेकिन, मजा यह कि उसके आगे कृष्णस्वरूप की तूती बन्द हो जाती है । वह हकलाने-सा लगता है । हां, एक बात साफ़ है, और वह यह कि । Ram वह कृष्णस्वरूप का गहरा दोस्त है, मगर ऐमा न होता तो कृष्णस्वरूप के अन्तर्मन की उसे इतनी श्यादा जानकारी न होती। उसके सामने कृष्ण- स्वम्प दायू वनकर बैठा है। वह लगातार दोलता जा रहा है, वोलता जा रहा है। इतने में फिर चाय आयो, नास्ता आया । कृष्णस्वरूप ने गला साफ करके सिर्फ इतना कहा, "लीजिए, साहय, इनको भाभी ने ( कृष्णम्वरूप को स्त्री ने ) इन्हें देखते ही नास्ता मिजवा दिया।" "जी हां, और तुम होते तो मुझे घर से बाहर निकलवा देते, अचे साले!" और वह हंस पड़ा। कृष्णस्वरूप ने अब हिम्मत करके और साथ ही आगन्तुक की खुमा- मद करके उसके विरोधी रुख को कम करने के लिए कहा, "भाई साहब, भाज मैं जो कुछ हूँ, सिर्फ इनकी बदौलत, सिर्फ इनके कारण !" आगन्तुक ने कृष्णस्वरूप द्वारा अपनी प्रशंसा को सम्भवतः अपने लिए अपमानजनक समझा, अथवा क्या ईश्वर जाने-वह भभक उठा और तेजी से कहा, "क्या बात करते हो, तुम मेरो क्व से तारीफ़ करने लगे।" इस घुड़की को सुनने के बावजूद, कृष्णस्वरूप ने गम्भीर भाव से कहा, "नही, मैं तुम्हारी खुशामद नहीं कर रहा हूँ। यह एक वा किया है । आज जो मैं इस हालत में पहुँवा हूँ. इसका कारण तुम हो।" कन्हैया बारी-बारी से इन दोनों को देखता जा रहा था। उसे कुछ समझ में नही आ रहा था । एक बात साफ पी वह यह कि इन दोनों के रिश्ते गरमामूली है । लेकिन वे क्या है इस समझना टेढ़ी खीर यो । आगन्तुक सचमुच हतप्रभ पा । शायद उसे भी यह बात भयो मालूम हुई । वह घड़ी-भर चुप रहा और उसने गरदन नौचो कर लो। और कहा, "लीजिए, चाप ठण्डो हो रही है।" एकाएक शान्ति छा गयी। शोरगुल खत्म हो गया। कन्हैया सिकं पाय पी रहा था। उसका ध्यान सि पीने में था। कृष्णस्वरूप सबह से उठता भादमी रामनारायण के बारे में-हाँ, उस भयानक आदमी का नाम रामनाराय ही था-सोच रहा होगा। किन्तु, आगन्तुक क्या सोच रहा था.? एकदम वैठक बरखास्त हो गयी । आगन्तुक दरवाजे के सामने नजे आया। उसने बड़े अदब से कृष्णस्वरूप को सलाम किया और कहा, हां ! फिर मुलाकात होगी। आपसे तो जरूर ! शाम को मिलूंगा।" और, तब कन्हैया ने देखा कि यद्यपि रामनारायण कीमती सूट पह है, फिर भी मैला-कुचैला है, उसपर पान के दाग पड़े हैं। शायद, व उसे पहनकर ही सोया होगा। कोट के नीचे कुरते का कॉलर फटा हुम है और कोट के नीचे को जेब में एक कागज बाहर निकला सचमुच वह भयानक लगता था। चेहरे पर कम से कम दो मही की धनी लम्बी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। किसी वैरागी की दाढ़ी की भांति वह थी। एक आंख इतनी लाल थो, मानो उसमें खून आकर जम गर हो । लेकिन आंखें बड़ी-बड़ी थीं। चेहरा बड़ा था, और माया भी। लेकि सिर पर बाल कम थे---जो थे, विखरे हुए थे और काले थे। और सिर बीचों-बीच सांवली चांद थी। और उस चांद के बीचों-बीच, खजूर भांति लम्बा गोल, एक बड़ा मसा था, जो किसी छोटे-से स्तूप की मानि दिखाई देता था। सारे चेहरे पर एक भयानक अनगढ़पन एक विचि विद्रूपता थी। और ऐसा लगता था कि शायद कोई इसके साथ धूमन पसन्द न करता होगा, क्योंकि विस्मय और कौतूहल के अतिरिक्त औ एक विद्रूप जिज्ञासा का वह विषय बन जाता होगा । उस आदमी के वा में कन्हैया की राय बहुत खराव हो गयी, यद्यपि उसने उसे प्रकट नह होने दिया। वह मकान के बाहर सड़क पर साइकिल से रफूचक्कर हो गया, तर कहीं कृष्णस्वरूप ने आराम की सांस ली। उसके मुंह से निकल पड़ा "ही इज़ ए जीनियस यस, जीनियस !" कन्हैयालाल विस्मय से देखता रहा । वह कुछ बोला नहीं, चुप रहा ।
मन ही मन गुनता रहा। ज्यों ही कन्हया घर वापस आया, उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी शून्य में मा पहुँचा है। उसे यहां नहीं माना चाहिए था। सभी कुछ दूर-दूर-सा उसे लगने लगा । क्यों न वह सिविल लाइन्स तक हो आते। जरा तफरीह होगी। लेकिन यह खयाल उठते ही डूब गया। जो कमरा अब तक उसका इन्तजार कर रहा था, अब मानो उसका कोई मूल्य ही न रहा। फिर भी उसका मूल्य था, क्योंकि उसमें एक खाट थी, जिस पर वह बैठ सकता था, लेट सकता था। कन्हया ने उसे देखा, उसपर बिखरी पड़ी किता देखीं । उन्हें जरा एक ओर करके वह टांगें पसारकर लेट गया । और रामनारायण के बारे में सोचने लगा, कृष्णस्वरूप के बारे में सोचने लगा। कल्पना तेज हो गयी। उसे लगा रामनारायण में अजीब रहस्य है, एक अजीव मुदहापन है, बादापन है। उसे देखकर श्मशान की याद आती है, स्मशान को राख नंगी देह पर मलनेवाले तान्त्रिक योगियों को. सी झलक दिखाई देती है। लेकिन उसके सामने कृष्णस्वरूप क्यों इतना पोला पड़ जाता है, इतना यका-यका-सा सवा-सा हतबुद्धि-सा, घबराया. सा, क्यों दिखाई देता है। इन दोनों के बीच कोई रहस्य है। कोई गुप्त षड्यन्त्र है, जिसके ये दोनों साझीदार है । नहीं तो मला कृष्णस्वरूप मयों कहता कि रामनारायण के कारण उसे दरयुक्त हुई है । सम्भव है, किसी अनुचित और गलत किस्म के मामले में दोनों हिस्सा लेते हो और पैसा कमाते हो । हिक्मत कृष्णस्वरूप को हो, असली काम रामनारायण करता हो । जरूर इन दोनों के बीच में कोई खास बात हो । यह सब वह सोच हो रहा था कि जीने पर मारी धमयम की आवाज शुरू हुई। और वह देखता क्या है कि छोटे-से कमरे के उस भूरे दरवाजे में खुद वृष्णस्वरूप सट्टा है। जीना चढ़ने के कारण कृष्णस्वरूप कुछ हौ-सा रहा था। कोट के सहसेरना आदमी - कुछ उलटे-सीधे लगे हुए थे। लगभग बदहवास था । दरवाजे स एक मनोबैग फेंककर कहा, “इसे मेरे यहाँ भूल आये थे।" मनीबैग खाट पर धप से गिर पड़ा। कन्हैया आश्चर्य से उसे देखता ।। हाँ, सचमुच वह उसी का था, उसका नाम भी तो उसपर था। न्हैया को खोयो चीज़ वापस पाकर खुशी हुई। अपने भुलक्कड़पन पर से आश्चर्य हुआ। "लेकिन, तुम फ़ोन कर देते, यहाँ तक आने की तकलीफ़ क्यों की।" उसने कहा। "मैं नहीं जानता था कि तुम यहाँ तक पहुँच गये हो । सोचा, मनी- बैग की तलाश में इधर-उधर घूम रहे होगे इसलिए उचित यही समझा कि मनोवैग दे आऊँ और एक चिट्ठो भी वहीं रख दूं।" और यह कहकर कृष्णस्वरूप धीरे-धीरे खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। कन्हैया ने कुरसी मागे सरकाकर कहा, "नहीं, नहीं, ऐसे बैठो।" और अकस्मात् कन्हैया को लगा, कृष्णस्वरूप मनोवैग देने नहीं, किसी और काम से आया है, वह काम क्या ? कृष्णस्वरूप खिड़की के पास खड़े-खड़े ही कहता गया, "साले ने सारा मजा किरकिरा कर दिया। मैं तो तुमपर अपना रोव जमा रहा था । लेकिन उसने आकर फुग्गों को फोड़ दिया। मेरे लिए एकदम ऐण्टोक्लाइमेक्स कर डाला।" कन्हैया क्या कहता, वह सहानुभूति से सुनने की चेष्टा कर रहा था फिर भी उसने कहा, "तुम तो उसे जीनियस कहते थे।" ठीक कहता हूँ।" मानो इसी का उदाहरण देने के लिए स्वयं कन्हैया ने अपनी ओ कहा, "इसीलिए, शायद उसने मुझे एकदम पहचान लिया, और लप गले मिला। मैं उसे नहीं पहचानता। भावना का नाट्य करनेवाले मुझे पसन्द नहीं।" कृष्णस्वरूप ने अत्यन्त गम्भीर और सार्थक वाणो से धोरे-धी "बिलकुल सतह से उठता ००० "नहीं, वह तुम्हें अवश्य पहचानता होगा, और तुम्हारे बारे में उसके अच्छे खपाल होंगे। नहीं तो वह देखते ही गाली से बात करता।" उस समय कन्हैया को लगा जैसे कृष्णस्वरूप आने जानेवाटी दाड को भूमिका बांध रहा है, मानो रामनारायण दारे में वह कोई रास्त खोलने के लिए आतुर है, और उसका सम्बन्ध कृष्णदहन के किसी से है । कन्हया को लगा कि वह धीरे-धीरे कृष्णदहन के जीवन में कर रहा है। बीस साल पहले एक दार कन्हैया उसके जीवन का या। लेकिन तब परिस्थितिवश वह उसके बाहर निकर बाया । और कर शायर फिर से उसे प्रवेश करना होगा। और, धीरे-धोरे, क्रमशः, जो कहानी उसके मन में अपना दिल्टार करने लगो वह न सिर्फ अजीब थो वरन् मनुष्य को असंगदिनों की गति उसमें कुछ इस तरह थी कि दार्शनिक होना पड़ता था। कन्हैया के म्न में वह एक के बाद एक नयेनये सवाल खड़े होने लगे। और वे सवाल भी इतने कुछ तीखे कि उनमें मन घुलता था। हाँ, कन्हैया का मन कहानी को शुरुआत से ही तसवीरें बनाने लगा। कन्हैया गरीवी को, उसको विद्रूपता को, उसकी पगु-तुल्य नग्नता को जानता है । साथ ही उसके धर्म और दर्शन को भी जानता है । गांधी- वादी दर्शन गरीबों के लिए बहे काम का है वैराग्य भाव, अनासक्ति और कर्मयोग सचमुच एक लोह-कवच है, जिसको धारण करके मनुव नाषा नंगापन और आधा मूखापन सह सकता है, सिकं सहने की बात नहीं, वह उसके आधार पर यात्मगौरव, आत्मनियन्त्रण और मालदृढ़ता का वरदान पा सकता है। और, भयानक प्रसंगों और परिस्थितियों का निलिप्त भाव से सामना कर सकता है । मृत्यु उसके लिए एक विशेष अनुभव है। गरीबी एक अनुभवात्मक जीवन है, कठोर से कठोर पदार्थ चारों तरफ से घेरै हुए है, एक विराट् नकार, एक विराट् अन्द-सा हाया हुआ है । लेकिन, इस मून्य के जबड़े में मांसाशी दांत और रक्तपानो जीम है ! कन्हैया इये जानता है। सह से उठता भादमी १११ कि तुम और ठीक इसी आर्थिक और दार्शनिक स्थिति में, कृष्णस्वरूप धूमता है। घर काटने को दौड़ता है, क्योंकि उसकी दीवार एक सवाल लेकर खड़ी हो जाती है, हर चेहरा एक प्रश्न उपस्थित करता है और वह यह मेरे लिए क्या कर रहे हो। यह सवाल, जिसे घर की हर चोज और हर व्यक्ति उपस्थित करता है, कृष्णस्वरूप के हृदय में भी खटकता रहता है । इस प्रश्न का एक मात्र उत्तर है-पैसों की कमाई ! कृष्णस्वरूप को, नौकरी के अलावा और कोई आसरा नहीं। यद्यपि वह बी. ए. है, तव भी उसे कुछ नहीं होता। सवा सौ रुपये में खाना- पीना भी नहीं चलता। वह हिसाब से काम करता है। लेकिन, हिसाब पेट तो नहीं भर सकता और घर का हर आदमी उसे आंखों-आंखों ही से पूछता है-तुम मेरे लिए कुछ कर रहे हो ! कृष्णस्वरूप निःसंज्ञ है, उसको रास्ता दिखानेवाला कोई नहीं। हां, समय काटने के लिए वह शाम को लायब्ररी चला जाता है । अखबार पड़ता है। पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ता है। और, वहीं बैठकर कितावें भी पढ़ता है । लायन्नेरी के हॉल में भाषण भी होते हैं। शरद् व्याख्यानमाला और वसन्त व्याख्यानमाला चलती हैं। अन्य अवसरों पर भी विद्वानों के भाषण होते हैं। कृष्णस्वरूप हॉल के पीछे की कुरसी पर चुपचाप भाषण सुनता है। कभी नोट्स भी लेता है। और, मन ही मन गुनता रहता है। उसमें इतना साहस नहीं है कि वह विद्वानों से दो सवाल पूछे। वे बड़े लोग और वह छोटा आदमी। फिर, उसके कपड़े भी अच्छे नहीं रहते, जिन्हें देखकर लोग समझते हैं कि वह कोई चपरासी या डाकिया या ऐसा ही कोई आदमो होगा। हां, कृष्णस्वरूप खुद जानता है कि उसमें हीनता- सन्यि है। लेकिन, उसकी अवस्था सचमुच हीन है यह एक प्रकट सत्य है। ऐसी ही उसकी अवस्था देखकर साधारण खाते-पीते लोग भी अपने- आपको उससे ऊंचा समझते हैं। यही क्यों, अपमान भी कर जाते हैं। सतह से उठना आदमी दुनिया मे अपमान-जैसा और कोई दुख नहीं होता। कृष्णस्वरूप पलटकर जवाब नहीं दे पाता, लेकिन अपमानकर्ता का सनु जरूर बन जाता है। उसे वह माफ़ नही कर मकता । इसोलिए, वह सबसे दबकर रहता है। दबना, कतराना और दूर खड़े होकर तमाशा देखना व वात सुनना, जहाँ महत्त्व को बात है वहाँ सतर्क होकर बात गांठ से दाप लेना उसका मानसिक जीवन है। उसकी इस मनोवृत्ति के कारण हो, लायनेरो में उसके खास दोस्त नहीं बन पाते । वहाँ या तो पेन्शनर बूढ़े आते हैं या नवयुवक विद्यार्थी। और कोई नही । ऐसे निःसंग उद्विग्न और चिन्तापूर्ण जीवन में, एक अजीबोगरीब दाम सामने आता है । उसको मूरत भयानक है । एक आंख लाल, चेहरे पर दाढ़ी है, मानो बैरागी हो, गंजे सिर पर एक मोटा मस्सा है-मानो छोटा कोई स्तूप हो। वह एक अजीब ढंग का मटमैला तंग पाजामा पहनता है । कुरते के कार एक फटा स्वेटर, कभी ऊनी तो कभी सूती। स्वेटर से वह कोट का काम लेता है । हाँ, कृष्णस्वरूप को पहले-पहल उसमे डर लगा । उस डर का बयान नहीं कर सकता । अज्ञात अप्राकृतिक विचित्रता का वह भप या। कृष्ण- स्वरूप के कपड़े अत्यन्त साधारण और मैले रहते, लेकिन उनसे कोई विचित्रता नहीं झलकती। लेकिन, उस अजनवी की पोशाक भी उसे विचित्र बना देती थी। चेहरा तो भयानक और बदमूरत था ही। बातचीत लायब्रेरी में हुई । उस अजनबी ही ने शुरू की। कैसे शुरू हुई, राम जाने । वह किसी किताब पर शुरू हुई। और, वह अजनबी कृष्णस्वरूप को लायब्रेरी के नीचे के रेस्तोरा में ले गया। कृष्णस्वरूप वहाँ पहली बार पहुंचा था। अजनबी धारा-प्रवाह अंगरेजी और हिन्दी बोलता था। सही-सही और जोरदार तपरों में वह बात करता था। ऐसा लगता था कि जो वाते वह कह रहा है, उनार उसने वरसों मनन-चिन्तन किया है। वह एक दवंग और पुरजोर शख्सियत रखता है। सतह से उठता भादमी १४३ उसकी जेबों में कई नोट थे-पांच के, दस के । वह ग़रीब नहीं था। सिर्फ उसका वेश विरक्तिजनक था। वह बेतहाशा पैसा खर्च करता था। पैदल नहीं, बल्कि रिक्सा में घूमता । अठन्नो उसके लिए दो पैसों के बराबर थी। तंग हालत को तंग दीवारों के बीच घिरे हुए कृष्णस्वरूप को वह केवल भयानक ही नहीं मालूम हुमा । उस आदमो में मैदान का फैलाव था, अजीबोगरीब भयानक बरगद की ऊँचाई और घनापन था। कृष्ण- स्वरूप के उद्विग्न निःसंग एकान्त जीवन का शून्य उससे टूट गया । वह उसे रात को मेट्रो सिनेमा में ले गया। अंगरेजी फ़िल्में देखने जाते। दोनों रात को देर से लौटते। और विनोवा भावे के सर्वोदयवाद और एम. एन. राय के रैडिकल हमैनिज्म से लेकर सार्ने के एक्ज़िस्टैशियलिस्म तक की बातें होती। नयो कविता और ऐक्स्ट्रैक्ट पेण्टिग की भी चर्चा होती । उस अजनबी ने, जिसका नाम रामनारायण था, कृष्णस्वरूप के सामने नयी दुनिया हो खोल दी। कृष्णस्वरूप के सारे ध्यान, कार्य और अनुराग का केन्द्र अब वह व्यक्ति हो गया। यह भी सही है कि रामनारायण ने समय-समय पर कृष्णस्वरूप को आर्थिक मदद भी की। दोनों एक दूसरे के घनिष्ठ हो गये। उसकी संगत में रहकार कृष्णस्वरूप का दिल खुलने लगा, मन में विस्तार उत्पन्न हुआ लेकिन, बावजूद इसके, दोनों व्यक्ति एक दूसरे को जोवन-परिधि के आसपास ही घूमते रहते । किसी ने एक दूसरे के वैयक्तिक जीवन में प्रवेश करने का प्रयत्ल नहीं किया । [किन्तु, क्या यह सम्भव था कि कृष्णस्वरूप सचमुच रामनारायण के जीवन से अनभिज्ञ रहता। वैसे उसे बहुत-सी उड़ती-उड़ती जानकारी थी। लेकिन, उससे तृप्त नहीं होता। हाँ, यह सही है कि खाली वक्त में कृष्णस्वरूप रामनारायण के व्यक्तित्व की एक रूपरेखा तैयार कर लेता। सबसे पहली बात जो उसके खयाल में साती वह यह कि १४४ TRI रामनारायण को यह मालूम नहीं है कि उसे क्या चाहिए, हाँ यह जरूर मालूम है कि उसे क्या नहीं चाहिए । परिणामतः, वह हर बात में दोप निकालता । उसको आलोचनात्मक दृष्टि में मार्मिकता और प्रखरता पो, उद्दण्डता और निर्भयता पो । साय हो, एक खारापन, एक वेसहारापन, एक मारामारापन, एक मरामरापन था। चश्करदार राहों पर गोल-गोल घूमते रहने-जैसी कोई मानसिक स्थिति वह थी। उसने न मालूम कितने हो दर्शनों और विचारधाराओं, व्यक्तियों और व्यक्तित्वों में दोष निकाले। उन दोषों को वह इतनी कड़वाहट के साथ कहता मानो उसकी कोई निजी हानि हुई हो। वह बात इस तरह करता मानो उन चीजों का उससे कोई आत्मीय रहस्यमय सम्बन्ध हो। निषेध, निपेघ, निषेध ! कृष्ण- स्वरूप को यह पहचानने में देर न लगी कि निषेध का उसका सोत बौद्धिक नहीं है, वही कही तो भी भीतर है।] वह सारे भद्र समाज से चिढ़ता। वह नगर के एक-एक बड़े आदमी से परिचित था। अनगिनत छोटे भादमियों से उसकी अच्छी पहचान पो। निर्भीक और उद्दण्ड होने के कारण बहुत-से अच्छे आदमी उसको ओर खिंच जाते । उनमें से कई उसको मार्मिक वाक्-धारा से प्रभावित थे । असल में, वह खूब अच्छी और सही-सही गालियां देना जानता था। और, कुछ लोग इस तरह के औघड़ आदमी के खुरदुरेपन को बेहद पसन्द करते। भद्र समाज का वह बेशक दुश्मन हो गया था। वह उनके दम्भ और अहंकार के तरह-तरह के किस्से बनाया करता और वह भी इस तरह से कि सचमुच योता का मन दुख मोर अवसाद, ग्लानि और विरक्ति में डूब जाता। एक आम्यन्तर सिक्त-आम्ल अनुभव से भर उठता। बड़े-बड़े अखबारों के मालिक, महत्त्वाकाक्षी राजनीतिक नेता, मन्त्री और उपमन्त्री, डायरेक्टर और सेक्रेटरी यहाँ तक कि साहित्यिक भी उसको कपाओं के पान रहते । उनका वह एकदम सही-सही विश्लेषण करता। इन लोगो के बारे में उसके पास इतनी जानकारी थी कि कुछ पूछो मत । व्याख्यान- साह से उठता भादमी
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अन्य दर्शनों की आलोचना करते-करते नये दर्शन को रचना होती है, नयी जीवन नीति की रचना होती है। लेकिन, व्यवहार तया बुद्धि दोनों के क्षेत्र में, यहां केवल निपेष था। यानी उन्हें क्या नही चाहिए-यह पूर मालूम था; लेकिन क्या चाहिए-इसकी कोई खास रूपरेखा उनके पास न थो, क्योंकि उनमें से कोई वस्तुतः गम्भीर नहीं था। कृष्णस्वरूप उन सब पर मन्त्र मुग्ध था; फिर भी, कमो कभी उसकी बुद्धि और हृदय उनकी वाचालता और दुर्घवहार के प्रति विद्रोह कर उठते । फिर भी, स्वभावतः दम्बू होने से उनका विरोध करने का उसने कमी साहस नहीं किया। साहस करता तो भो पिट जाता। लेकिन, उसको आस्था रामनारायण पर थी। वह रामनारायण को छाया बन गया था। वह रामनारायण के अन्तर्जीवन में प्रवेश करना चाहता था, उसके चारों कोने छू लेना चाहता था। एक दिन रामनारायण कृष्णस्वरूप को अपने घर ले गया। उस मकान को देखकर, कृष्णस्वरूप को विस्मित हो जाना पहा । वह माली- शान मकान क्या कोठी थी। उसके अब पलस्तर गिर रहा था। टीक सड़क से लगे हुए उस मकान की सात मंजिलें बड़ी दूर से दोसतो थी। दूर से वह मकान बहुत सुन्दर मालूम होता था, उसको सबसे ऊंची छतों पर मेहरावदार मण्डप पे और मन्दिर नुमः शिखर । लेकिन, सबसे आकर्षक वस्तु पो रामनारायण को मां । यह यद्यपि बूढ़ी थी और चेहरे पर झुर्रियां पड़ी थी, फिर भी उसरा रंग एकदम चम्पई था। वह अब भी खूबसूरत यो। उसका नाक-नक्श मानो स्फटिक से गढा हुआ था। उसको देखकर किसी को भी नन और शालीन हो जाना पड़ता। उस परिवार में अब केवल दो ही व्यक्ति पे-माता और पुष । और दो नौकर । दो भैसें भी थों, जो आंगन में बंधी हुई थीं। रामनारायण के कमरे तक पहुँचने के लिए जोना चटकर हॉल पार करके जाना पड़ता। हॉल सजा हुआ था। उसको छत से अभी भी फानूस लटक रहे थे। सबमें पुरानापन या। पुराने कांच लगे हुए थे, १४. सतह से उटता भादमी . थे, आदमकद आईने दीवारों से सटे थे, छत और दो नकर एक कोण बनाते हुए अजीबोग़रीब पुरखों की रंगीन तसवीरें की हुई थीं । और सब पर पुरानेपन की सांस जमी हुई थी। फिर भी, एक बात साफ़ थी। हर चीज़ पुरानी होते हुए भी क़रीने लगी थी। इसके विपरीत रामनारायण का कमरा था। वह अस्त-व्यस्त पा । वहाँ भी टेबल-कुरसी, फैन और एक फ़ोटो लगा हुआ था। कृष्णस्वरूप ने पूछा, "यह फ़ोटो किसका है ?" रामनारायण ने कहा, "मेरा।" "नहीं जी!" कृष्णस्वरूप के मुंह से निकल गया। रामनारायण ने कुछ नहीं कहा। सचमुच वह फ़ोटो जवान का था। वह उसी का था। अपने बीसवें साल में, वह इतना खूबसूरत था । फिर, क्या कारण है कि उसने अपना चेहरा इस तरह बिगाड़ लिया ? आखिर रामनारायण ने अपने-आपको इतना विद्रूप क्यों बना लिया ? कृष्णस्वरूप कुछ क्षण सोचता रहा। माँ से भेंट हुई। मां ने बड़ी आवभगत की। कृष्णस्वरूप अव रामनारायण के यहां, मां से मिलने के लिए जाने लगा। धीरे-धीरे उसे पता चला कि माता और पुत्र में अगर वैर नहीं है तो मनोमालिन्य अवश्य है कृष्णस्वरूप ने रामनारायण के सामने मां की बातचीत करना चाह दोहराना चाही । लेकिन रामनारायण ने कोई दिलचस्पी नहीं ली। भी बात निकलती वह उसे उड़ा देता । और उदास हो जाता। ऐसा तो हो नहीं सकता कि कृष्णस्वरूप से दोनों के सम्बन्ध रहें। असलियत यह थी कि रामनारायण के पिता बड़े ही मस फक्कड़ आदमी थे। ऊंच-नीच का उन्हें कोई खयाल नहीं था। के साथ गांजे की दम लगाने बैठ जाते। हाथ में पुटिया और जनेऊ लपेटे, किसी भी पड़ोसी से घण्टों गप लगाते रहते। वे थे। संगीत और साहित्य के शौकीन । खुद भी अच्छे गायक बनाते और शेर भी गढ़ लेते। नामी संगीतज्ञों और चालू सतह से मंगत में उठते-बैठते और उन्हीं के समान युछ-कुछ सनकी भी थे। महफिलवाज थे । उनको महफिल प्रसिद्ध थी। उसने बनारम को रविडयो और लखनऊ के वापर भी हिस्सा लेते । अपनो इस पन में उन्होंने वाप- दार्दो से चली यायो हुई जायदाद का बड़ा हिस्सा खत्म कर दिया। शायद, इसीलिए उनको अपनी पत्नी से नहीं बनती पो। उनकी पत्नी एक शानदार और खूबसूरत औरत पो जिसकी अनिचि पी प्रबन्ध और व्यवस्था करना। वह सम्राज्ञी थी, जिसे अपनी जायदाद के कामकाज को ठीक ढंग से चलाने, उसे बढ़ाने का शौक था। वह हकूमत करना जानती थी। उसके पति उसके सौन्दर्य पर मुम्ब ए बालक थे। वालक स्वभाव अनुसार हो, उसके पति महोदय जिद्दी यौर चंचल, कम्प कर्म के नितान्त अयोग्य और अव्यवस्थित थे, जबकि पली स्वयं दृद वृद्धि और लक्ष्य परायण थी। इस प्रकार दोनों के स्वभाव-पम्य के कारण पति-पत्नी में कई घटना-प्रधान दुसान्त नाटक हो जाते । नौजवानी में वे दुखान्त नाटक सुखान्त नाटक में भी बदल जाते । लेकिन, ज्यों-ज्यों उन बदती गयो योर महंकार की वाइ आती गयो त्यों-त्यों एक और परम्पर यार्पण के अभाव में एक दूसरे के प्रति कटोरता उत्पन्न होती गयो। माता-पिता के इस झगड़े को कोमल मनवाले छोटे-से रामनारायण ने खूब देखा । उसने कभी पाया कि उसकी मां मान से पलंग पर घंटो हुई है और उसके पिता पलंग के नीचे बैठे स्त्रो को गोद में मह दुवकाये रौ-से रहे हैं । कभी उसने देखा कि मां कह रही है. 'तुम्हें अपनी रमन का खयाल नहीं है, पराने का सपाल नहीं है, पारामी के साथ गांगा पीते हो, उस साले मोठे पोटो के घर जाकर सराव पोवे हो । तुम्हें भरने घर में शायद कुछ भी नहीं मिलता-ताने को भी नहीं मिलता ! इसी लिए कमीनों को सुहरतु में रहवे हो । उनके यहाँ जाकर सा हो !' और पिता ये बातें सुनकर मुसकराकर कह रहे है : 'जाति-पाति पूछ न कोई हरि का न सो हरि का होई" शादी है र मां कहती है, 'अरे, तुम क्या करोगे हरिभजन ! जाओ, पास जाकर बैठो।" र पिताजी जोर से हंस पड़ते हैं और कहते हैं कि सचमुच उन्हें उतना प्रेम नहीं है जितना खुद से है। और एक ग़ज़ल सुनाने । वह ग़ज़ल क्या थी, रामनारायण को याद नहीं है। इस तरह की कुछ धुंधली-धुंधली तसवीरें रामनारायण को याद हैं। नारायण ने बहुत चाहा था कि ये तमाम बातें वह कृष्णस्वरूप को न तायें। लेकिन, जब कृष्णस्वरूप रामनारायण की मां का लाडला वन या तब रामनारायण ने अपनी उभरती भावना को दवा-दवाकर रुकते- रुकते, उखड़ते-उखड़ते ये बातें कृष्णस्वरूप से कहीं। किस्सा मुख्तसर यह है कि पिताजी जायदाद लुटाने लगे और मॉफिया का इन्जेक्शन लेकर दिन गुजारने लगे । माता की इच्छा थी कि उन्हें रायबहादुरी का खिताब मिले, वे समाज में नाम कमायें, बड़े राष्ट्रीय नेता बन जायें । और हुआ यह कि वे एक दिन अपनी पत्नी से बुरी तरह झगड़कर एक दूरदराज शहर में चले गये, और वहीं एक दिन याकस्मिक कारणों से उनकी मृत्यु हो गयी। इवर, पिता की मृत्यु पर, माताजी खूब लेकिन रामनारायण को लगा कि उसके आँसू बनावटी है, दिखावे के हैं। उसने प्रण कर लिया कि वह अपनी मां से कभी प्यार नहीं करेगा, क्योंकि वही पिता की मृत्यु का कारण है। पिता की मृत्यु होने पर रामनारायण अकेला पड़ गया। इस डर से कि कहीं लड़का पिता की भांति ही विगड़ न जाये, मां ने उस नौकर के छुड़ा दिया जो वालक रामनारायण का रक्षक और सेवक था। इस प्रक रामनारायण और भी अकेला और अनाथ हो गया। माता उसे कभी भी यथावत् मातृत्व प्रदान न कर सको। उ ट्यूटर लगाये गये । राजकुमार कॉलेज में भरती कराया गया। ज्य उसने कैम्ब्रिज किया। वहाँ के अत्यन्त अनुशासनबद्ध जीवन से तंग रोयी-बोयों, सतह से उठता वह भाग निकला । कुछेक साल वेकार रहा। फिर, वो. ए. की तैयारी करने लगा। लेकिन, उसे भी पास नहीं कर सका। शहर-भर घूमना, मौर किताबें पढना यही उसका मुख्य व्यवसाय था। माता ने उसका विवाह कर देना चाहा, वह भी उसने नहीं किया । तब तक वह खूबसूरत नौजवान था। लेकिन, ज्यों ही वह शहर में घूमने लगा, माता ने जिन-जिन बातों का निषेध करके रखा था, उन-ठन बातो को गिन-गिन करके उसने किया। माता उसे भद्र परिवार के भद्र और सौजन्यपूर्ण पुत्र के रूप में देखना चाहती थी । ठीक इसी के विपरीत उसने अपना वेश बना लिया। कपड़ों को उसने परवा नहीं की-यह बताने के लिए कि वह भद्र परिवार का नहीं है । यह सब लगभग अनजाने ढंग से हुआ, किसी आभ्यन्तर ग्रन्यि ने एक विचित्र प्रकार के मानवतावाद का रूप धारण कर लिया था। दह भयानक मैले-कुचैलेपन में आनन्द लेने लगा। भद्र परिवारों से उसने प्रासले सड़े कर लिये । और, इन फासलों में उसकी गालियां बने लगी। वह 'कमीनों' के घर जाकर अब गांजे और चरस का मोदन लगाता और कभी-कभी वही पड़ा रहता। उसने इस प्रकार के हर अच्छा सम्बन्ध बना लिया। धीरे-धीरे, उसकी जिन्दगी ने का मस्तियार कर लिया। यहां तक कि वह अव निचली जातिक से सम्बन्ध भी रसने लगा। पैसों की उसके पास कमी नहीं। गांजा, चरस और स्त्री-सम्बन्ध उसके लिए बहुत मानली में। इसी बीच वह एक पूजनीय नेता के चक्कर काम उसपर बहुत प्रभाव पड़ा । चुनावों के दौरान बद्ध र फरता। अगर वे कांग्रेस न छोहते तो वे सन्दर सम्पर्क के कारण, वह बड़े-वहे नेताओं और सम्पर्क में भी आया । निर्भीकता, वानरः के फलस्वरूप वह नितान्त उपेसाक नही नही सतह से उठवा भादमी - OM वाद, (जिसका उसे बहुत धक्का लगा) अनेक पार्टियों के नेता । [यना शुरू किया, क्योंकि वही एक ऐसा था जो ग़रीवों को गन्दी । में महीनों और सालों छिपा रह सकता था। लेकिन उसकी आलो- ात्मक दृष्टि, जो पहले श्रद्धावान् थी, अब यह देखने लगी कि वुजुर्ग ता एक के बाद एक स्वार्थबद्ध हो चुके हैं। उनमें कुलीनता का वही भिमान, धन-सत्ता का वही गर्व, दीन-हीन के प्रति वही उपेक्षा-भाव और दम्भ तथा अहंकार के अतिरिक्त, शासन की वही तृष्णा है, जिसका साकार रूप उसे अपनी मां में दिखाई पड़ता था । मां ने जो भी पुत्र से चाहा, ठीक उसके विपरीत उसने किया- ठीक उसके विपरीत उसका पुत्र बना । लगातार नशे में, और अव्यव- स्थित, उत्तेजनापूर्ण और असंगत जीवन से उसका चेहरा विगड़ गया, आकृति बिगड़ गयी और वह इस विगाड़ को अच्छा समझने लगा, दाढ़ी वढ़ा ली, जैसे कोई वैरागी हो, शरीर दुर्वल हो गया। और, यदि कोई व्यक्ति उसके इस विद्रूप व्यक्तित्व के विरुद्ध मज़ाक करता या आलोचना करता तो वह उसका शत्रु हो जाता। मां ने चाहा कि वह बड़ा आदमी वने, अच्छे ढंग से रहे, समाज में प्रभाव और दवाव रखे, इंगलैण्ड से डिग्री लेकर आये, जायदाद बनाये और बढ़ाये, लेकिन लड़का तो वाप सवाया बनने ही की कोशिश करता रहा । प्रश्न यह है कि पूंजीवाद के विरुद्ध, धन-सत्ता के विरुद्ध, उस माता के विरुद्ध उसकी यह प्रतिक्रिया क्या सचमुच सिद्धान्त और अ के अनुसार है ? निषेध, निषेध और निषेध करके वह क्या स शोपितों का उपकार कर रहा है ? इसी बीच किस्सा यों बढ़ता है कि कृष्णस्वरूप को उसकी माँ लगती है। कृष्णस्वरूप ने उसे बुढ़ापे में देखा है, जब कि उसक शान और महंमन्यता का थोड़ा-सा भी लेश नहीं है । उसके कठोर यातनाएं दीं। वह मां अपने पुत्र के रूप और जीव शिकायत कृष्णस्वरूप से करने लगी, यह सोचकर कि सम् सतह से कृष्णस्वरूप के प्रभाव से उसका लड़का पटरी पर चलने लगे। टमका दुखपूर्ण मातृ-हृदय कातर होकर वृष्णस्वस के सामने वाला रोना रोता । कृष्णस्वरूप को वह दुख सात्त्विक लगा। उसमें माता की ताना- विक चीत्कार और करुण पुकार थी। घोरे-धारे, कृष्णदरून, उसकी माता का दुलारा बन गया। और तब जो भी काम वह कहना चाहती, करवाना चाहती, कृष्णस्वरूप से कहती। और कृष्णस्वर से महां करता, दौड़कर करता। किन्तु यह भी सच है कि कृष्णस्वरूप निःस्वार्थ भाव से ऐसे काम न करता । उसके हृदय में एक लोभ पा, लालच था। वह सोचता कि बड़े और धनो आदमियो के समाज में अगर उसका किसी से परिचय है तो उसी बूढ़ी औरत से। इसलिए, वह परिचय उसके लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कृष्णस्वरूप गरोव था । उसे आश्रय की आवश्यकता पो। संकटपूर्ण परिस्थिति हमेशा ही रहती थी। इसलिए, उस बूढी औरत को वह माता या देवी के समान मानने लगा। साथ ही, उस बूढी माँ को एक ऐसे आदमी की जरूरत थी जो अपनी जिम्मेदारी समझता हो, जो पैसे को पकत करता हो, जिसे जिन्दगी बनाने का शौक हो । संक्षेप में, रामनारायण को मां कृष्णस्वरूप को अपना मातृ-तुल्य प्रेम और साथ ही सम्मान प्रसन करने लगी। यहाँ उसकी पुरानी धार्मिक दृष्टि भी उसके काम बायो। उनकी धार्मिक दृष्टि देखकर, रामनारायण की मां उसको और भो इपरत करने लगी। इसका नतीजा यह हुआ कि बहुत-सी बातों में रामनारायण को मां कृष्णस्वरूप पर निर्भर रहने लगी। उसे लगा कि अगर कृष्ग- स्वरूप-जैसा उसका बेटा होता तो कितना अच्छा होता! उसी को सहायता से कृष्णस्वरूप ने, नौकरी करते हुए, लॉ कर लिया और बाद में एम. ए. भी कर डाला । और क्रमशः वह रामनारायण को मां को वची- सुची जायदाद भी संभालने लगा। जायदाद संभालने के दौरान कई अफसरों से उसका साविका पड़ा। वैसे भी गम्भीर और फतव्य-परायण - सतह से उठता भादमी १५३ कारण, उसका प्रभाव अच्छा ही पड़ता। मां को तसल्ली णस्वरूप के सहयोग से ही क्यों न सही, उसकी जायदाद बढ़ । हां, यह सही है कि इस जायदाद पर कृष्णस्वरूप की आंख नहीं । वह ईमानदारी से काम करके पैसा कमाना चाहता था। जायदाद पनी आँखों से बढ़ती हुई देखकर रामनारायण की मां प्रसन्न थो ही, सने भी अव कृष्णस्वरूप के जीवन के लिए स्थायी प्रबन्ध करने का प्रयत्न किया। रामनारायण की मां, अपने पिता और पति दोनों के सम्बन्ध-सूत्रों द्वारा, नगर और प्रान्त के बड़े आदमियों से जुड़ी हुई थी। एक बार सक्रिय होने की ही तो बात थी। उसने कोई बात उठा नहीं रखी। आखिर, कृष्णस्वरूप को सेण्ट्रल गवर्नमेण्ट की नौकरी दिला ही दी। और, वहां से बदली होकर वह इनकमटैक्स विभाग का एक ऊंचा अधिकारी बन गया। और, इस प्रकार क्रमशः कृष्णस्वरूप का सारा दारिद्रय निकल गया। घर भर गया और कुछ पूंजी इक्ट्ठी हो गयी। यहां तक कि बहुत-से ठेकेदार लोग अब उससे रुपया उधार लेकर नये काम हाथ में लेने लगे। कृष्णस्वरूप सामने बैठा है । यह कहानी कहते हुए, बीच-बीच में व भावना के उद्वेग के कारण हांफता जाता है, रुक-रुककर कहता कन्हैया तन्मय होकर यह कहानी सुनता जाता है। "अव मुझे बताओ, पूंजीवाद के विरुद्ध, धन-सत्ता के विरुद्ध, र माता के विरुद्ध रामनारायण की यह प्रतिक्रिया क्या सचमुच सिद्धान्त आदर्श के अनुसार है ? और, कन्हैया, अब तुम यह भी बताओ कि अनासक्ति, निष्काम कर्म और आत्म-वश रहने की बात क अद्वैतवाद की बात करता था, तो क्या मेरी इस भौतिक आथिर में मेरा अपना अधःपतन नहीं हुआ है । इसका निर्णय तुम करो 'सतह "जब-जब मैं रामनारायण को देखता हूँ तय-तब मैं अपने आपको । और नीचा पाता हूँ। लेकिन, जब उसके बारे में सोचता हूँ तो .ता है कि वह तुझसे भी गया वोवा और निकम्मा है। फर्क यही है उसने अपने गये-बीते पर और निकम्मेपन पर किसी विरोधशोल गानिक पारा का आवरण चढ़ा लिया है। इससे ज्यादा मुझे उसमें जनही दीखता। उसके सब अखबारनवीस साथी अव या तो बहे s( हो गये हैं और पैसे कमाने को भूमिगत मशीन में फंस गये है, या कमाने की खुली मशीन में मजे में अड़े हुए हैं। उनमें से आज फई पे पदों पर है। तो वतामो, मेरे प्रश्न का उत्तर दो।" कन्हया इस सवाल का क्या जवाब दे ! वह शून्य में देखता है । सुन- हली किरणों से चमक रही खिड़की के सिक पर बैठी हुई चिडिया को देखता है, जो दाने चुग रही है । एकाएक कन्हैया पूछ बैंठा, "लेक्नि, यार, तुम्हारे यहाँ जब सुबह रामनारायण आया था, तो क्रोमवी सूट पहने हुए था। हां, वह गन्दा जरूर था। लेकिन सूट क्यों ? उसे तो तुम्हारी कहानी के अनुसार, फटे कपड़े पहनने चाहिए थे।" कृष्णस्वरूप मार्मिक भाव से मुसकराया, बोला, "अब क्या, बताऊँ! मेरे यहाँ जान-बूझकर मूट पहनकर आता है। उसका मुझपर यह आरोप है कि यदि वह दलिद्दर पोशाक में आयेगा तो मैं उसे घर के बाहर निकाल दूंगा। मुझे जान-बूझकर चिढाने के लिए, वह वसा कहता है और मूट पहनकर आता है।" कन्हैया हंस पड़ा। उसके मुंह से अनायास निकल पड़ा, "स्साला बदमाश है।" "परवटेंड जीनियस," कृष्णस्वरूप ने कुत्सा के भाव से कहा। फिर भी तुरत हो जोड़ दिया--"लेकिन, आज मैं जो कुछ हूँ, उसके कारण है। इसलिए माज भी मैं उससे दवता हूँ, और आगे चलकर न भी दर्दू तव भी दवने का नाट्य करूंगा।" और यह कहकर हंस पड़ा। सतहसमा फिर उठते हुए बोला, "तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया । कन्हैया ने एक उसांस छोड़ो, कहा, "मुझे सोचना पड़ेगा। मेरे ग्याल से तुम दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हो। खैर, जो भी हो, आज रामनारायण ने तुम्हें चिढ़ाने के लिए सूट पहना है, कल वह तुम्हें नीचा दिखाने के लिए अपनी जायदाद खुद संभालेगा। और तब चक्र पूरा घूम जायेगा । अगले दस साल के बाद मुझे रिसोर्ट देना। समझे" कृष्णस्वरूप को विदा करने जब कन्हैया नीचे पहुंचा तव न मालूम यने गटर में थूक दिया । क्यों ? पता नहीं।
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