Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Nayastilak
Front matter
श्रीबालमुकुन्द-प्रन्पमाता-७
能變差
त्यासतिलक
पिता-
-
सर्वतन्त्रस्वतन्त्र फविताफिसिंह वेदान्ताचार्य
श्रीवेङ्कटनाथ देशिक (श्रीवेदान्त दशिक)
हिन्दी व्यायापार
श्रोभाप्यमिहासनाधिपति
स्वामी श्री नीलमेघाचार्य जी काशी
ण्ठवासी सेठ मानोराम जी वांगड की
पुण्यस्मृति में
সাহির
{ सन् १९६०
प्रथम सस्करण
सवत् २०१७
सम्पादक, मुद्रक, प्रकाशक
राघवाचाय
प्रकाशक
मुद्रक
प्राचायपीठ माचायप्रेस
घरेली (उत्तरप्रदेश)
निवेदन प्राचार्यमार्वभौम श्रीवेदान्तदेशिक के स्तोत्रो में 'न्यासतिलक' ऐसा स्तोत्र है जिसमे स्तोत्र की शैली से गरणागति का तत्त्व प्रदर्शित किया गया है। स्तोत्र मे कुल मिलाकर बत्तीस ग्लोक है। शरणागतिशास्त्र की त्रिपुटी-शरणागत, शरणागति और गरण्य-का प्रामाणिक अनु- भव इन ग्लोको के द्वारा प्राप्त होता है। शरणागति करने के पश्चात् शरणागत की जीवनचर्या कैसी होनी चाहिये, इसका वर्णन इस स्तोत्र में आत्मोपदेश के ढग से किया गया है । श्रीमाष्यसिंहासनाधिपति स्वामी श्री नीलमेघाचार्य जी महाराज इस ग्रन्थ की विशद हिन्दी व्याख्या की है। वैकुण्ठवासी सेठ श्री मगनीराम जी वांगड की पुण्यस्मृति में उनके आचार्य अनन्त श्रोसमलकृत जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री उत्तराहोविलझालरियामठाधीश्वर स्वामी श्री वालमुकुन्दाचार्य महाराज के नाम से अलकृत श्री बालमुकुन्दग्रन्थमाला का प्रारम्भ किया गया है । इस ग्रन्थमाला के छ पुष्प प्रकाशित हो चुके हैं। सातवें पुष्प के रूप में उपर्युक्त हिन्दी व्याख्या समेत न्यासतिलक स्तोत्र प्रकाशित हो रहा है। शरणागतिमार्ग के अनुरागी इसे अपनाकर अनुगृहीत करेगे, ऐसा विश्वास है । ने --सम्पादक विषय-सूची श्लोक संख्या विपय पृष्ठ ७ १५ २२ २५ २७ की दया ३४ ४१ १ गुरुपरम्परा की वन्दना २ शरणागति की पुनरावृत्ति का निवारक अभय हस्त ३ श्री लक्ष्मी की शरणागति ४ श्री लक्ष्मी का पुरुषकार एव उपाय भाव ५ भगवान् की शरणागति ६. भगवान का सौलभ्य भगवान् का स्वामित्व भगवान् है भगवान् के उपकार १०. भगवान् का उपायभाव ११ आचार्यनिष्ठा १२ शरणागति के अधिकारी, अंग तथा स्वरूप १३ शरणागति के उत्तरकाल में प्रपनो के कर्तव्य १४ प्रपन्नों को प्राप्त होने वाले दुख का रहस्य १५. प्रपत्ति की विशेषता १६ प्रपत्ति, त्याग, आत्मसमर्पण आदि की एकात्मता १७ भक्ति और प्रपत्तिमे व्यवस्थित विकल्प १८ सर्वफलदायिनी शरणागति १६ महाविश्वास २० प्राचार्यानुग्रह २१. प्राचार्य सम्बन्ध की उपादेयता २२ श्रीरामानुजसम्बन्ध को उपादेयता ४७ ५९ ६४ ६८ ७५ ७३ ८९ E
१०४
११२
२३ विषयतृष्णा का त्याग
२४ चिन्ता का त्याग
२५ इंद्र प्रभुपों का त्याग
२६ पाणी, शरीर एवं मन को उपदेश
२७ शुद्ध प्रभुमों से विरकि
२८ भगवस्त्रायना में विधाम
२९ अनन्यता का मादर्श
३० कैकर्य की प्रायना
फल प्राथना
३२ महाफल
१२१
१२७
१३२
श्रीमते लक्ष्मी हयवदनपरब्रह्मणे नमः श्रीमते रामानुजाय नम श्रीमते निगमान्तमहादेशिकाय नम श्रीमनिगमान्तमहादेशिकैरनुगृहीतं न्छासतिल्कम् श्रीमान् वेङ्कटनाथार्य कविताकिककेसरी । वेदान्ताचार्यों मे सन्निधत्ता सदा हदि ।। ( १ ) गुरुभ्यस्तद्गुरुभ्यश्च नमोवाकमधीमहे । वृणीमहे च तत्राद्यौ दम्पती जगतां पती॥ सर्व कल्याणगुणपरिपूर्ण अवाप्तसमस्तकाम श्री वैदिकसप्रदाय- परमाचार्य श्रिय पति श्रीमन्नारायण भगवान् ने इस कलियुग के प्रारम्भ से लेकर श्रीशठकोपसूरि श्रीमन्नाथमुनि स्वामी जी श्रीमद्या- मुनाचार्य स्वामी जी और श्रीमद्रामानुज म्वामी जी इत्यादि प्राचार्यों की परम्परा को इस भूतल मे अवतार देकर कलिमलग्रस्त जगत् को उज्जीवित किया है। उन आचार्यों के द्वारा जिन परमवैदिक सदर्थों का उपदेश हुआ है, उन अर्थों को अत्यन्त उज्ज्वल रूप में प्रकाशित करने के लिये श्री वेङ्कटेश भगवान् ने अपनी दिव्यधण्टा का श्रीवेदान्त- देशिक स्वामी जी के रूप में अवतार कराया है। श्री देशिक स्वामी जो ५ वर्ष की अवस्था मे ही प्राचार्य तथा प्राचार्य के विशेष कटाक्ष के पात्र बनकर २० वर्षों के अन्दर वेद इत्यादि सर्व विद्यापी का अध्ययन कर श्रीहयग्रीव भगवान के कृपाकटाक्ष के पात्र बन गये थे तथा श्रीरङ्गनाथ भगवान् के आदेश से "वेदान्ताचार्य" विरुद श्रीरङ्ग- नायिका महालक्ष्मी जी के अनुग्रह से “सर्वतन्त्रम्वतन्त्र" बिरुद और विद्वत्ता से प्रसन्न विद्व मण्डली के अनुरोध से कवितार्किकसिंह बिरुद को प्राप्तकर मापने प्रोविशिष्टाद तसिद्धान्त की सुह स्थापना की थी आपने अपने जीवन में ३० बार श्रीमाष्य का प्रवचन किया जिसका महत्त्व थीरामानुज स्वामी जी ने प्रथम कड्य कह कर बढाया है। आपने पोरग मे विराजमान रहते समय वहां के यौवयवाचार्यों के द्वारा शरणागति के मन को प्रकाशित करने के लिये प्राथना किये जाने पर लोककल्याणार्थ शाखीयदृष्टि से न्यासविंशति ग्रन्थ का निर्माणकर स्तोत्र की शली से शरणागति ममप्रकाष न्यासतिलक अन्य का निर्माण किया है। उसका प्रथम दलोक गुरुण्यस्सदगुरम्य इत्यादि है। धरणागति मत्ररत्न (यमन्त्र) का प्रधान प्रतिपाद्य प्रय है। मनाप का अनुमधान करने के पूर्व गुरुपरम्परा का प्रवक्ष्य अनु सपान करना चाहिये। यह शास्त्रविधि है। इस बात को ध्यान मे रखकर श्रीदेशिक स्वामी जी प्रथम इलोक से गुरुपरम्परा को नमस्कार करते है। गुरुभ्यस्तद्गुरुभ्यन नमोबाकमधीमहे हम लोग गुस्मों के प्रति तथा उनके गुरुमों के प्रति भी नम शब्द का प्रयोग करते है अर्थात् नमस्कार करते है । मैं अकेला नमस्कार करता है सो बात नही किंतु हम लोग नमनार करते है मै मेरे शिष्यगण सब्रह्मचारी भोर शिष्ट श्रीमपण सर मिरकर नमस्कार करते है सब से मिलकर गुरुपरम्परा की वदना करने पर एक विलक्षण प्रानन्द प्रस्फुटित होता है। मायापों को गुरु इसलिये कहा जाता है कि वे मजाना धकार को दूर करते है। उनमे सवप्रथम हम अपने पापाय को नमस्कार करते हैं । यद्यपि अपने मानाय एक है तथापि बहुवचन बहकर उनकी पूजा को व्यक्त करते हैं प्राचाय ने हमारे प्रज्ञाना धकार को दूर पिया हम उनके प्रति ऋणी हैं। हम प्राचार्य को प्रणाम पर वन प्राचार्यों को भी प्रणाम करते है । गाब मे भाशा ऐमी ही है- स चावायवशी जय प्राचार्यापामसावसाविश्पामगवत । यहम सागा है। प्रर्थान भाषायों में प्रमुर अमुक पर प्रत्येक प्राचाय - (३) का नाम लेकर श्रीभगवान् तक गुरुपरम्परा का अनुसन्धान करना चाहिये । इस शास्त्राज्ञा के अनुसार हम सर्व प्रथम अपने आचार्य का अनुसन्धान कर बाद उनके प्राचार्यों का अनुसन्धान करते है। तद्गुरुभ्यः ऐसा बहुवचन प्रयोग कर सभी पूर्वाचार्यों को नमस्कार करते है, एक भी पूर्वाचार्य को छोडने की इच्छा नहीं है, मब पूर्वा- चार्यों को प्रणाम करते हैं। हम आचार्यों के प्रति नम शब्द का प्रयोग करते है। नम शब्द के जितने अर्थ है सभी हमे अभीष्ट हैं, मन से नम्र होना, वाणी से नम शब्द का प्रयोग करना गरीर से साष्टाग दण्डवत् प्रणाम करना तथा आत्मनिवेदन करना ये सब नम शब्द के अर्थ हैं, नम शब्द के इन सभी अर्थों को हम प्राचार्यों के प्रति करते हैं । आचार्यों के विपय मे प्रतिक्षण बढने वाली भक्ति हम से यह सब कराती है तथा वढनी रहती है। प्राचार्यों के प्रति नम शब्द का यह प्रयोग वेदाध्ययन के समान है। यह गुरुपरम्मरा भजन वेदाध्ययन के समान श्रुति और स्मृति से विहित परमकर्तव्य है । वेदाध्ययन की तरह यह गुरु भजन भी श्रीपरागर मैत्रेय आश्वलायन और मधुरकवि इत्यादि शिष्टपुरुपो द्वारा अनुष्ठित है। वेदाध्ययन के समान यह गुरुभजन भी धर्मानुष्ठान के काम मे आने वाले तथा तत्त्व और हित आदि के विषय में होनेवाले तत्त्वज्ञान का मूलकारण है। जिस प्रकार वेदाध्ययन न करने पर प्रत्यवाय लगता है उसी प्रकार गुरुभजन न करने पर भी प्रत्यवाय लगता जिस प्रकार वेदाध्ययन भोग और मोक्ष देने वाले सभी मन्त्री की सिद्धि के लिये प्रधान कारण है, उसी प्रकार यह गुरु भजन भी सर्व मन्त्रसिद्धि के लिये प्रधान कारण है, मूल कारण है। जैसे वेदाध्ययन के समान शास्त्रोक्त इस गुरुभजन के लिए हम नम शब्द का प्रयोग करते है। वैसे ही कल्याणकामी प्रत्येक सज्जन को करना चाहिये। तत्राद्यौ जगता पती दम्पती वृणीमहे च । उस गुरु परम्परा मे प्रथम गुरु दिव्यदम्पति है, अर्थात् श्रीमहालक्ष्मी जी तथा श्रीमन्नारा- यण भगवान् हैं । ये दोनो अन्यान्य गुरुप्रो के समान नही है किंतु होने से ।
। (४) उन सब में भी उपास्य इष्टदेव हैं। इनको हम इस प्रकार धरण करते है कि ये हम को प्राप्य तथा प्रापक हों ये हमे मोक्षद तथा मोक्ष में मनुभाव्य भी हो यह हमारी प्रार्थना है । ये अन्याय गुरुमो के समान केवल प्रज्ञानमात्र को हटाने वाले नही किंतु मोक्ष देने वाले है तथा मोक्ष में प्राप्य भी है । ऐमा क्यो ? ये दोनो जगत् के पति है परब्रह्म हैं परब्रह्म होने के कारण ये दोनो मोक्ष देने वाले है तथा मोक्ष में प्राप्य भी हैं । ये दोनो दम्पति है श्रीमहालक्ष्मी जी परनी है थीमनारायण भगवान् पसि है । ये दोनों ईश्वर हैं हम लोगों के प्रति स्वामी है ईश्वर कोटि मे निविष्ट होने पर भी इनमें मतभेद नही होता। क्योकि दोनों दम्पति के रूप मे प्रति पति-पत्नी के रूप में प्रमसूत्र मे बधे है। जब मुक्त और ईश्वर मे तथा नित्य सूरि और ईश्वर मे मतभेद नही होता है तब अटूट प्रेमसूत्र मे बंधे हुये इन दिप दम्पतियों में मतभेद की सम्भावना क्यो हो' इनमें श्रीमहालक्ष्मी जी श्रीभगवान् को छोडकर और सबके लिये स्वामिनी है श्रीमगवान महालक्ष्मी जी तथा अन्यान्य सबके प्रति स्वामी है । इस प्रकार परस्पर प्रेमसूत्र मे बधे हुये तथा जगत् के स्वामी अन दिव्यदम्पतियों का वरण करते है जो गुरुपरम्परा मे प्रथम गुरु माने जाते है । ये दोनो दिव्यदम्पति हम लोगो के लिये प्राप्य बनें सपा प्रापक बने यही प्राथना है ॥शा । प्राय प्रपदने पुसा पौन पुन्य मिवारयन् । हस्त श्रीरङ्गभर्तुमिव्यावभयमुद्रित ।। शरणागति मत्र की प्रधानप्रतिपाय यासविद्या के विषय मे मपनिर्माण के लिये श्रीदेशिक स्वामी जी ने पूर्व श्लोक मे मगला चरण के रूप मे गुरुपरम्परा की वन्दना की । इस श्लोक में श्रीरङ्गनाथ भगवान के श्रीहस्त के वर्णन के व्याज से एक शका के समाधान को सूचित करते है । शङ्का यह है कि न्यासविद्या प्रति धरणागति भी एक ब्रह्मविद्या है । ब्रह्मसूत्रकार श्रीवेदव्यास जी ने ( ५ ) प्रावृत्तिरसकृदुपदेशात् इम ब्रह्मसूत्र का निर्माण कर यह बताया है कि ब्रह्मविद्या का वारम्बार पावर्तन करना चाहिये । बारम्बार आवृत्ति करने पर ही ब्रह्मविद्या फल दे सकती है। प्राप्रयाणा- तत्रापि हि दृष्टम्" इस मूत्र से श्रीव्यास जी ने यह सिद्ध किया है कि मरणपर्यन्त यहाँ तक कि अन्तिम म्मरणपर्यन्त ब्रह्मविद्या की प्रावृत्ति करनी चाहिये । श्रीव्याम जी के उपर्युक्त सिद्धान्त के अनुमार यह मानना आवश्यक हो जाता है कि जिस प्रकार अन्यान्य ब्रह्मविद्यानो की ग्रावृत्ति करनी चाहिये उसी प्रकार न्यासविद्या अर्थात् शरणागति की भी प्रावृति अपेक्षित है यदि एक बार ही गरणागति की जाय तो वह फलप्रद नही होगी। यह सका है। इम शङ्का का ममाधान इस श्लोक में निहित है। पुसा प्रपदने पौन पुन्य प्रायो निवारयन् श्रीरङ्गभर्तुरभय- मुद्रितो हस्तो मामव्यात् भका का ममाधान यह है कि भले ही अन्यान्य ब्रह्मविद्यानो मे आवृत्ति अपेक्षित हो शरणागति मे प्रावृत्ति की अपेक्षा नहीं है । एक बार की गई भरणागति अवश्य फल देगी। सकृत् कृतः शास्त्रार्थ गेमा मामान्य न्यास है जिसका भाव यह है कि एक बार किया गया म.धन फल देना है, एक बार करने में ही शाखाजा का पालन हो जाता है । यह सामान्य न्याय मभी शास्त्रीय साधनो मे समन्वित होता है । इस मामान्य न्याय का उन माधनो मे ही सचार नही होता है जिन साधनो को बारम्बार करने के लिये विधान है । अन्यान्य ब्रह्मविद्यायै तेल की धारा के समान विच्छिन्न न होने वाली स्मृतियो का मन्तानरूप है। अतएव उनकी प्रावृत्ति करनी पड़ती है तभी स्मृतियो का मन्तान बन सकता है। मरणपर्यन्त ब्रह्मोपामन करने का विधान उपनिषदो मे मिलता है। उपनिषद् बतलाती है कि स खल्वेध वर्तयन् यावदायुष ब्रह्मलोक- मभिसपद्यने न च पुनरावर्तते । अर्थात् इस प्रकार मरणपर्यन्त ब्रह्मोपासन करने वाला माधक ब्रह्मलोक पहुँचता है, वहाँ से इस ममार मे लौट कर नहीं पाता । इस प्रकार विशेष विधान के कारण अन्यान्य ब्रह्मविद्यानो मे "सकृत् कृत शास्त्रार्थ" यह न्याय प्रवृत्त (६) नहीं होता । शरणागति मे उस प्रकार मावृत्ति करने का विधान नही है । इस लिये इसमे सकुत कृत शास्त्राथ इस न्याय का लाग्र होना स्वाभाविक है। पिच स्पष्ट विधान से भी सिद्ध होता है कि धारणागति एक बार ही करना चाहिमे । सकृदेव हि शास्त्राय कृतोऽय तारयेन्तरम् ऐसा विधान है। अर्थात् यह शरणागतिरूप शास्त्रार्थ एक ही बार किमै जाने पर साधक को ससार के पार पहुँचा देता है। श्रीवाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्डस्थ विभीषण शरणागति के प्रसंग में भगवान् श्रीरामचन्द्र जी स्पष्ट प्रादेश देते है कि- सहदेव प्रपन्नाय तबास्मीति व याचते । प्रभप सबभूतेश्यो वाम्येतदवत मम ॥ अर्थात्--ओ एक बार ही शरण मे आया हो तथा मैं पापका होकर रहूँ ऐसा मांगता हो उसको मैं सब प्राणियो से अभय देता हूँ, मह मेरा व्रत है । इन वचनो से स्पष्ट सिद्ध होता है कि शरणा गति में प्रावृत्ति की पावश्यस्ता नहीं है। एक बार ही शरणागति करना चाहिये। इस शालार्थ को श्रीरगनाथ भगवान् का दक्षिणहस्त स्पष्ट सूचित करता है । दक्षिणहस्त अभयमुद्रा से प्रलात है। अभयमुद्रा से प्रतीत होता है कि श्रीरङ्गनाम भयवन शरणागतो को अभय दे रहे है साप में अभयमुद्रा से श्रीभगवन यह भी व्यक्त करते है कि शरण मे पाने वाले साधक बारम्बार शरणागति न कर । एक बार शरण गति से ही हम सब मनोरणों को पूर्ण करने के लिये तैयार है, अनेक बार शरणागति करने पर मुझे ऋणी बनना होगा योकि उन शरणागतो के लिये देने योग्य कोई वस्तु मेरे पास नही है । बारम्बार शरणागति करके लोग मुझे ऋणी न मनाय । एक बार शरणागति करने पर ही जब मै सब कुछ देता हूँ यहाँ तक कि उभयविभूतियुक्त स्वय को अब में खुद उठाकर दे देता है सवास्मि अर्थात् पापका होकर रहता है ऐसे कहने वाले शरणागतो (७) के प्रति मै तवास्मि कहकर उनके अधीन होकर रहता हूँ, इसमे अपना सौभाग्य समझता हूँ | क्या नब बारम्बार शरणागति करने की आवश्यकता है ? शरणागतो को यही चाहिये कि वे मेरी इच्छा के अनुसार चलें। स्वामी की इच्छा के अनुसार चलना ही दमो को शोभा देता है, वे मेरे औदार्य का स्याल करें, यह ममझें कि स्वामी की इच्छा के अनुकूल चलना मेरा स्वरूप है । शरणागति के प्रभाव को भी समझे। एक वार की शरणागति मर्वफल दे सकती है। इन सब वातो को समझकर शरणागतो को एक बार ही गरणागति करना चाहिये । अनेक बार शरणागति कभी न करे । श्रीरङ्गनाथ भगवान् अभयमुद्रा से अलकृत करतल से इस अभिप्राय को व्यक्त करते हैं । लोक मे वह मुद्रा अभय देने के प्रमग में भी पाती है तथा मना करने के प्रसग मे भी आती है। श्रीग्गनाथ भगवान् के दक्षिरणहस्त मे विराजमान उम मुद्रा को देखने पर यही प्रतीत होता है कि श्रीभगवान् इस मुद्रा से अभय देते है तथा किसी वात को मना भी करते हैं। वह कौन सा बात है? जिसे मना करते हैं । शास्त्र दृष्टि से विचार ने पर यही विदित होता है कि श्रीभगवान् वारम्बार की जाने वाली शरणागति के विषप में मना करते है । उम मुद्रा को देखने पर ऐसी उत्प्रेक्षा प्रकट होती है । अस्तु, प्रार्थना यही है कि श्रीरगनाथ भगवान् का अभयमुद्रा से अलकृत दक्षिण श्रीहस्त~जो साधको की बारम्बार शरणागति को मानों मना करता रहना है--मेरी रक्षा करे ।।२।। अनादेनिस्सीम्नो दुरितजलधेर्यनिरुपम विदुः प्रायश्चित्तं यदुरघुधुरोणाशयविदः । तदारम्भे तस्या गिरमवदधानेन मनसा प्रपद्ये तामेकां श्रियमखिलनाथस्य महिषीम् ।।३।। पूर्व श्लोक से श्रीदेशिक स्वामी जी ने बतलाया कि शरणागति एक बार ही करना चाहिये श्रीरगनाथ भगवान् का श्रीहस्त इसी अर्थ को सूचित करता है । इस श्लोक मे श्रीदेशिक स्वामी जी अपने अनुष्ठान के द्वारा श्रीमहालक्ष्मी जी के विषय में रणागनि वा बएन करते है। प्रपनो को श्री भगवान की शरण में जाने क पूर्व श्रीमहालक्ष्मी जी की शरण में जाना पड़ता है। इसे ही श्रीअपत्ति कहते है। श्रीमहालक्ष्मी जी की रण म जाने वाल मापक इम श्लोक का अनुसयान परते हुए श्रीमहालक्ष्मी जी दी दारण म जाय इस प्रकार शिक्षा देने के अभिप्राय स श्री देगिर स्वामी जी इस श्लोर मे स्वय महालक्ष्मी जी को पररा र जात है। परयुपुरोणाशपियो नादेनिस्लोम्नी दुरितमसयनिरुपम प्राय शिस यद् विदुः । बद जीवों को भी श्रीभगवत्प्राप्ति में महज अधि कार है क्योकि ये भी श्रीभगवान के दास है जिम प्रकार म्वाभाविक दास होने के कारण नित्यमूरि और मुक्तगण ब्रह्मानन का अनुभव लेते श्री भगवान् की मेवा करते है उमी प्रकार महज दास होने के कारण बट जीवो को भी ब्रह्मानद का अनुभव लेना तया श्री भगवान वा कड्य परना चाहिये था परन्तु बद्ध जीव उस सौभाग्य को अभी तक प्राप्त न पर मके इमपा वारण यही है कि ये बच जीव अनादि काल स श्री भगवान की प्राज्ञा का उल्लघन करते हुए नाना प्रकार के २.५ परते प्राय है । र म ये बद्ध जीप धीभगवान् की भाशा का उल्गषन करने लगे तथा पाप बटोरने लगे इमका कोई पता नहीं है । बड २ महपिंगण भी जब इसका पता लगाने लगे तब उह यही प्रतीत हुमा कि यह जाम पूर्वजन्म के कर्मों का पल है, पूर्वजम भी उनके पूर्वज मोरे बों का फल है इस प्रकार कर्मों के पूर्वजम तथा जमो के पूर्व वर्मा का पता चला। सवप्रथम जमकमा हुमा इस प्रश्न के उतर मे उन लोगो ने मही पमा कि सर्वप्रथम पम कोई नहीं जिम जम को सवप्रथम जम मान लिया जाता है उसके पूर्ग भी अनेक जम हुए है। इन सब बातो का पता लगाकर त्रिकालदर्गी महपियों ने पही निर्णय निकाला कि अनादिकाल से बाव को ससार लगा है ससारजमपरम्परा और कमपरम्परा अनादिकाल से जीव से मबट है। इनके प्रारम्भ का पता बिलकुल नही चलता है। इसलिये ?
मानना पड़ता है कि वद्धजीवो का कर्म अनादि है। यही कर्म भगवत्प्राप्ति का प्रतिबन्धक है पुण्य कर्म मामारिक फलो में प्रासक्ति बढाकर भगवत्प्राप्ति की रोक देते हैं, पापकर्म दुख भुगाने के लिये जीवो को समार मे रखकर तवाग भगवत्प्राप्ति को रोक देते हैं । पुण्य और पाप ये दोनो भगवत्प्राप्ति के प्रति- बन्धक होने के कारण पापकोटि मे ही गिनने योग्य हैं । भगवत्प्राप्ति के चाहने वाले सज्जनो को यह दोनो कर्म अनिष्ट फल ही देते हैं । इनको पाप कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है इसलिए यह दोनो कर्म दुरित कहलाते है । अनादिकाल से अजित यह दुरित कम नहीं है, किन्तु समुद्र के समान अपार है, जिस प्रकार समुद्र नदियो के जल से भरता रहता है उसी प्रकार यह पापसमुद्र भी प्रत्येक जन्म मे प्रतिक्षण मे किये जाने वाले छोटे मोटे पापो से भरता ही जारहा है । जिम प्रकार ममुद्र का अन्त नहीं है, उसी प्रकार इस पाप का भी ताता मिटता नही है। जिस प्रकार ममुद्र को सुखाना कठिन है, अनादिकाल से अजित इस अपार पापराशि को नष्ट करना भी कठिन है। यद्यपि धर्मशास्त्रो मे पापो को नष्ट करने केलिए प्रायश्चित्त कहे गये हैं, परन्तु वे प्रायश्चित्त एक-एक पाप को नष्ट कर सकते हैं, सपूर्ण पापों को नष्ट नहीं कर सकते क्योकि एक-एक पाप का नाम लेकर ही उनको नष्ट करने केलिए उन प्रायश्चित्तो का विधान धर्मशास्त्रो मे पाया जाता है । तब क्या इस अनादि नि सीम पापसमुद्र को नष्ट करने केलिए कोई एक प्रायश्चित्त नही है। क्यो नही | अवश्य है । वह प्रायश्चित कौन है ? श्री भगवच्छरणागति हो वह प्रायश्चित्त है जिससे भगवत्प्राप्ति के प्रतिबन्धक सभी पाप नष्ट हो जाते है । भले ही अन्यान्य प्रायश्चित्त सम्पूर्ण पापो को नष्ट करने केलिए सामर्थ्य न रक्खें, श्री भगवच्छरणागति तो सभी पापों को नष्ट करने केलिये पूर्ण सामर्थ्य रखती है । श्री भगवान की प्राज्ञा उल्लघन करने से बनने वाले पाप श्री भगवान् के मन मे निग्रह- सकल्प को उत्पन्न कर जीवो को भगवत्प्राप्ति से वचित कर देते है क्योकि जीवो के पापाचरण को देखकर श्री भगवान् के ऐसे-ऐसे (१०) निग्रहसकल्प होते है कि यह पापाचारी जीव हमको प्राप्त न करल, हमारी प्राप्ति के साधनो को न कर सासारिप यातनाय भोगते रह इत्यादि । थी भगवान की सग्निधि मे गरणागति करने पर श्री भगवान् के मन में ऐसा उच्चकोटि का अनुग्रह सरस्प उत्पन्न होता है जिसके सामने सभी निग्रहसक्ल्प शान्त होते है पापा का नष्ट होने मे शका कसी अन्यान्य प्रायश्चित्ता को करने पर श्री भगवान् के मन में ऐसा उच्चकोटि का अनुग्रह उत्पन्न नहीं होता । वह तो शरणागति करने पर ही उत्पन्न होता है । अन्यान्य प्रायश्चित्तों से साधारण सकल्प ही उत्पन्न होता है जिससे एक २ फापकम से उत्पन्न एक २ निग्रहसकरूप ही मान्न होना है । शरणागति से ही सर्वविध पापो को नष्ट करने वाला तथा सवविध निग्रहसाल्पा को नष्ट करने वाला अनुग्रहसकरप उत्पन्न होता है । अतएव परगा गति सर्वोत्तम मानी जाती है। शरणागति के समान प्रायश्चित्त कही नही है । इस मम का थी मगवान् रामचन्द्र तथा श्रीमगवान कृष्ण पद्र की दिव्य प्राज्ञामो के रहस्य को समझने वाले हमारे पूर्वाचार्यों ने हो समझा है। श्रीभगवान् रामचद्र जी रघुवशियो मे धुरीण थी भगवान कृष्णचन्द्र जी यदुवंशियो मे धुरीण है। श्री भगवान रामचन्द्र जी ने युद्धकाण्ड विभीषण शरणागति के प्रसङ्ग मे विभाषण को अभय देते हुये कहा है कि- बोषो यपि तस्य स्थात् सतामेतहितम् । सकृदेव प्रपन्नाय प्रपन्नाय सवास्मोति च माधते । अभय सबमूतेभ्यो बदाम्येतर प्रत मम ॥ अर्थात् यदि शरण मे भाने वाल में दोष मी हो तो भी उसे कोई पर्वाह नही सत्पुरुषो के लिये शरणागतो का दोप गहित नहीं होता । जो एक बार ही शरण में आया हो तथा मै भापका होकर रहूँ ऐसा मागता हो उसको में (श्री राम जी) सब प्राणियों से प्रभय देता है यह मेरा पत है। श्री भगवान् की इस उक्ति से सूषित होता है कि सर्वभूतो से समय देने केलिये सभा श्री भगवान् (११) अपनी तरफ से भी उसको भय न देने केलिये सन्नद्ध है। श्रीभगवान् के निग्रहसक्ल्पो के कारण ही तो यह महाभयावह ससार जीव के पीछे लगा है, कभी जीव को छोडता नहीं । यहा श्रीभगवान् का यह भाव व्यक्त होता है कि शरणागतो को मै अभय दे देता हूँ, गरणागतो को न मुझ से डरना चाहिये, न सर्व प्राणियो से। गरण मे आने पर मैं महाभयावह ससार मे पहुँचाने वाले सभी निग्रहसकल्पो को त्यागकर अत्यन्त अनुग्रह के साथ अभयपद पहुँचा देता हू इससे सिद्ध होता है कि श्रीभगवच्छरणागति सर्व- पापो का प्रायश्चित्त है। श्री भगवान् कृष्णचन्द्र जी ने श्री गीता के चरमश्लोको में यह कहा है कि हे अर्जुन तुम सर्व धर्मों को छोडकर मुझ एक की गरण मे आजाओ, मै तुम को सर्वपापो से छुडा दूंगा तू गोक मत कर । इससे सिद्ध होता है कि श्री भगवान् भरणागतो को मर्व पापो से छुडाने के लिये तैयार है, तथा शरणागति सर्वपापो का प्रायश्चित्त है। भरणागति को प्रायश्चित्त कहने मे यह ध्वनित होता है कि साथको को भगवत्प्राप्ति के प्रतिवन्धक पापो को नष्ट करने के लिये ही उद्योग करना चाहिये । प्रतिबन्धक नष्ट होने पर श्री भगवत्प्राप्ति अपने अप हो जायगी। जिस प्रकार बाँध को तोड़ने पर जल अपने आप बहने लगता है, जल का वहना स्वाभाविक है, उसी प्रकार प्रतिवन्धक सभी पापो को मिटाने पर जीवो को भगवत्प्राप्ति अपने पाप हो जायगी, जीवो को भगवत्प्राप्ति न्यायप्राप्त है। उसके लिये अलग प्रयल करने की आवश्यकता नही । यह अर्थ शास्त्रो मे "यथा न क्रियते ज्योत्स्ना" इत्यादि ग्लोको मे कहा गया है। "तदारम्भ तस्या गिरमवदधानेन मनसा तामखिलनाथस्यका महिषों श्रिय प्राद्य" । इस अर्थ से श्रीदेगिक स्वामी जी यह बतलाते हैं कि श्रीभगवच्छरणागति सपूर्ण प पो का प्रायश्चित है । इसमे सन्देह नहीं है । मै थी भगवान् की शरण में जाने के लिये सन्नद्ध हू परन्तु भय लग रहा है कि अनादिकाल से अनन्त अपराध करने वाला (१२) मै श्रीभगवान् की शरण में जाने के लिये से हिम्मत कर । अभी तक यही होता पाया है कि हम अपराध करने गये, थीभगवान् भी दण्ड दते गये प्रायश्चित्त न करने पर किसी भी पाप के विषय में श्रीमगवान् ने क्षमा नही की। पापो को गिन गिनकर श्रीभगवान दण्ड देते माये है । इसमे श्रीभगवान का कोई दोप नहीं है सपूण दोप मैरा है। मेरे द्वारा प्रपराध बनने पर ही तो श्रीभगवान ने दण्ड दिया है। शासक अपराधी को दण्ड द, यह उचित ही है। श्रीभगवान् जगत् के पिता हैं पिता हितपो होते है हितपी पिता के समान श्रीभगवान भी जीवो को सुधारने के लिये ही न कि पीडा पहुँचाने के लिये अपराधी जीवो को दण्ड देते है । श्रीभगवान् में पोप न होने पर भी अपराधी हमको धीमगवान की गरण म जाने मे भय और सकोच हो रहा है, समक्षउपस्थित अपराधी हमको धीभगवान् कही दण्ड न ६ यह भय लगता है। गरण मे जाने पर भी यदि दण्ड मिले तो वह पारणागति किस काम की ? इससे शरण मे न जाना ही कही अच्छा है। क्या करूं? ससार भय में बचने के लिये शरणागति ही एक भाधन रह गया उसको करने में भी कठिनाई है क्या किया जाय ' अपराधी हमको सवलोकनारण्य श्रीभगवान भी शरण न रहे मया हमारी इस दुदशा का पन्त नहीं १६स प्रकार के विचारों में डूबे हुए हमको श्री महालक्ष्मी जी के उस पचन का स्मरण हुमा जो उन्होंने श्रीभगवान् की शरण मै जने के लिये उत्सुक तथा भयभीत साधको के प्रति कहा है कि- मामेका देवदेवस्य महिषी शरण अपेद' अर्थात्-श्रीमगवान् की पारण में जाने मे उत्सुक तथा भयभीत साधक देवाधिदेव श्रीभगवान की प्रधानमहिषी मुझ एक की शरण में भाजावे । श्रीमह लक्ष्मी जी के इस वचन पर हमने अब ध्यान देकर विचार किया सर प्रतीत हुमा कि श्री महालक्ष्मी जी जगत् की मावा है लोक में देखा जाता है कि माता का अपराधी पुत्रो पर भी सहमस्नेह हुमा करता है। मासा, दण्ड देना वो जानती नहीं वह समझाबुझाकर पति के क्रोष को शान्त कर अपराधी पुषो को (१३) पति के समीप पहुँचा देती है । जगन्माता श्रीमहालक्ष्मी जी मे यह वात पूर्ण रूप मे घटती है। शरणागत अपराधी जीवो को भी अपनाने के लिये श्री महालक्ष्मी जी श्रीभगवान् से माग्रह निवेदन करती है कि हे प्राणनाथ । यदि आप अपराधी को गिन २ कर जीवो को दण्ड देते ही रहेगे, तथा सर्वदा के लिये वैकुण्ठ द्वार को वन्द करके रक्खेगे तो इन जीवो का उद्धार कैसे होगा? क्या आप का ये जीव सम्बन्धी नहीं है, आप इनके म्वामी है, ये आपका दास है, यह सम्बन्ध अाज का नहीं है, यह नित्यसिद्ध है, क्या यह मम्वन्ध कभी मिट मकता है ? क्या इस प्रकार के अमिट सम्बन्ध के रहते आपको इनकी उपेक्षा करना उचित है ? क्या खोये हुए जीवो को प्राप्त करना आपका लाभ नहीं है। भगवन् । शरणागत जीवो को अपनाने पर आपका ही अलभ्य लाभ होता है। खोई हुई वस्तु को प्राप्त होने पर स्वामी को जितना आनन्द होता है उतना दूसरे किसी को नहीं होता। यह सर्वानुभूत सत्य है । अस्तु । प्राप ने इस विचार से तो सृष्टि का प्रारम्भ किया कि सृष्टि करने पर जीव करण और कलेवर को प्राप्त होगे, उनमे कई जीव इन इन्द्रिय और गरीर के द्वारा साधनो का अनुष्ठान करके हमको प्राप्त करेंगे । सर्वदा प्रलय मे रखना उचित नही। आपका ध्यान सर्वदा इस बात पर ही तो रहता है कि कब कौन हमारे जाल में फैमेगा फंसे हुए को कव में उठालू। इस ध्यान के साथ ही तो आप सर्वदा जीवो को खोजते रहते है आपको कोई भी बात हमसे छिपी नही रहती है। ऐसी स्थिति में सम्मुख पाये हुए इन शरणागत जीवो को उपेक्षा करना क्या प्रापको उचित है ! क्या इससे आगे पापका पश्चात्ताप नहीं होगा? यदि पाप यह विचार करते हो कि अपराधी जीवो को अपनाने पर दण्डविधायक शास्त्रो का क्या महत्त्व रहेगा? में पूछनी हूँ कि यदि अाप इस प्रकार दण्ड देते ही रहेगे तो आपके दया क्षमा और प्रौदार्य इत्यादि गुणो का क्या महत्त्व रहेगा? उचित तो यही है कि शाखो का महत्त्व भी बना रहे तथा आपके कल्याणगुणो का महत्त्व भी बना रहे । तदर्थ आप ऐसा करे कि (१४) द विधायक शालो को अपराध करने वाले उन जीया के विषय में लागू र दीजिये जो प्रापसे विमुग हैं। आप दया क्षमा मौर उदारता इत्यादि कल्याणगुणो को जीवा के विषय मे लगा दीजिये जो अपराधी होने पर भी प्रापके शरण में माये हुए हैं इस मोहमय ससार मे निरपराध जीव मिरना ता सपथा असमव है। कश्चिमापराध्यति । सब से कुछ न कुछ अपराध तो होता ही रहता है। निरपराध जीवो को प्राप्त करने की प्राशा छोड दीजिये। इस ससार मे तो अपराधी जीव ही मिलगे। इन अपराधी जीवों के विषय में दण्डविधायक शाखो के अनुमार तथा सम्मुख प्राधित भीयो के विषय में कल्याणगुणो के अनुमार यवहार कीजिमैं । तभी पापके शाख पौर कल्याणगुण जीवित रहगे । इस प्रकार श्री महालक्ष्मी जी जोरदार शब्दों में जब श्रीभगवान को समझाती है मारग्राही बीभगवान् को मुकना ही पड़ता है। शरणागतो के विषय म यह सब करने के लिये श्री महालटमी जी सवदा सनद प्रतएव उपयुक्त वचन से कहती है कि हे पपराधी जावो! तुम लोग हमारे शरण म प्राजाभो मै आप लोगो को श्रीभगवान के शरण मे पहुचा दूगी भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं । में देवदेव श्रीभगवान की प्रधान महिपी है मेरी बात को श्रीभग वान् टाल नहीं सकते । श्रीभगवान देवो के भी देव है प्रत्येक देव एक २ लोक का नाथ है देवा के देव भी भगवान सभी लोकों के नाथ है, वे सवसमय है सत्यसकता है उतका सकल्प होते ही पाप लोगो की रक्षा हो जायगी। जिस प्रकार श्रीभगवान के शरण म जाने के पूर्व मेरे शरण म पाना पडता है दसे मेरे शरण में पाने के पूर्व दूसरे किसी के पारण म जाने की नौबत नही होगी । मुझ एक के शरण म हो भाजायें । मै सब कुछ दूगी। अपराधी जीवो के दण्डदाता श्रीमगवान् की शरण म जाने के पूर्व श्रीभगवान् के कोप को शान्त पाली मेरी शरण म माना नितान्त आवश्यक है। मैं तो मग वनिग्रहा हूँ दण्ड देना तो मै बानसी नही अपराधी जीवों को (१५) भी निर्भय होकर मेरी शरण में प्राजाना चाहिये। दूसरे किसी के शरण मे जाने की आवश्यकता नहीं। यह उपर्युक्त श्रीमहालक्ष्मी जी के वचन का भाव है । श्री देशिक स्वामी जी श्रीमहालक्ष्मी जी के वचन में स्थित देवदेव पद को अखिलनाथ पद से सूचित करते हुए तया एकान् और महिषी पद को वैसे ही लेते हुए इस श्लोक के उत्तरार्ध से कहते है कि मैं श्री भगवान् के शरण मे जाने के पूर्व श्री महालक्ष्मी जी के वचन के भावार्थ को पूर्ण रूप से हृदयगम कर अखिललोकनाथ श्रीभगवान की प्रधान महिषी जगन्माता श्रीमहालक्ष्मी जी के शरण में जाता हूँ ।।३।। ( ४ ) महेन्द्राग्नाविष्णुप्रभृतिषु महत्त्वप्रभृतिवत् प्रपत्तव्ये तत्त्वे परिणमितवैशिष्ट्यविभवाम् । प्रधृष्यत्न धूत्वा कमितुरभिगम्यत्वजननी श्रियं शीतापाजामहमशरणो यामि शरणम् ॥ पूर्व श्लोक मे श्री देशिक स्वामी जी ने श्री महालक्ष्मी जी के कथन के आधार पर श्रीभगवच्छरणागति के पूर्व श्रीमहालक्ष्मी जी के गरण मे जाने का वर्णन किया है। इस श्लोक मे अपने अनुष्ठान के द्वारा श्री महालक्ष्मी जी को पुरुपकार एव उपाय मानकर उनके शरण में जाने का वर्णन करते है । पुरुषकार उनको कहते है जो जो प्रार्थी मन्जनो को समर्थ एव दयालु महानुभाव के समीप पहुँचा कर इन सज्जनो के मनोरथ को पूर्ण करने के लिये उनको नाना प्रकार से समझाकर प्रोत्साहित करते है। भव यह है कि घटक- सत्पुरुप पुरुपकार कहलाते है । श्रीमहालक्ष्मी जी प्रार्थना करने वाले भरणागतो को श्रीभगवान् के यहाँ पहुँचाकर इनकी रक्षा करने के लिये श्री भगवान् को नाना प्रकार से प्रोत्साहित करती रहती है। इसलिये श्री सप्रदाय मे श्रीमहालक्ष्मी जो पुरुषकार मानी जाती हैं । यह श्री लक्ष्मी का एक प्राकार है । श्रीमहालक्ष्मी जी का दूसरा आकार यह है कि श्री लक्ष्मी जी श्री भगवान् के समान उपाय (१६) मनती है। जिस प्रकार श्रीभगवान् गरणापतों के लिये उपाय बनते है, उसी प्रकार श्री महालक्ष्मी जी भी उपाय बनती है। यहाँ यह विशेषता ध्यान देने योग्य है कि ये दोना पलग २ उपाय नहीं बनते कितु दानों मिलकर बनते हैं धीमहालक्ष्मी जी पत्नी होने के कारण विशेपण के रूप म श्रीभगवान् पति होने के कारए विशेष्य के रूप में मिलकर उपाय बनते है। यह अथ इन बाब्दों में कहा जाता है कि महालक्ष्मी से विशिष्ठ नारायण उपाय हैं । इस प्रकार विशेषण के रूप म उपाय बनना श्रीमहालक्ष्मी जी का दूसरा प्राकार है । श्री महालक्ष्मी जी का तीसरा मावार भी है वह यह है कि श्रीमहालक्ष्मी जी प्राप्य भी बनती हैं, जिस प्रकार शरणागतो को श्री भगवान प्राप्य है वसे ही थीमहालक्ष्मी जो भी प्राप्य हैं । अतएव श्री सप्रदाय मे दिव्यदम्पति प्राप्य म ने जाते है । इस प्रकार श्रीमहालक्ष्मी जी के सीन प्राकार सिद्ध होते है। वे ये है कि पुरुषकारभाव उपायभाव और प्राप्यमाव । अताव श्रीमहालक्ष्मी जी की स्तुति मे प्राकारत्रयसपनाम् ऐमा वर्णन पाया है। श्री देशिक स्वामी जी को श्रीमहालक्ष्मी जी के मे सोना प्राकार मान्य हैं । श्रीसप्रदाय मे कई प्राचाय श्रीमहालक्ष्मी जी के पुरुष कारत्व और प्राप्यत्व इन दोना प्राकारो को ही मानते है उपायस्व को नही मानते । इन प्राचार्यों का भाव यह है कि अकेले श्री भगवान ही उपाय बनते है दिव्यदम्पति उपाय हो सो बात नही । दिव्य दम्मति प्राप्य हो सकते है उपाय नही उपाय केवल श्रीभगवान् ही होते है, श्रीमहालक्ष्मी जी केवल पुरुपकार बनती हैं उपाय नहीं । जब यीभगवान् उपाय बनते हैं तब थीमहालक्ष्मी जी विशेषण के रूप मे उपाय नहीं बनती। उस समय धीमहालक्ष्मी श्री उपलक्षण बन जाती हैं विशेषण नहीं । उपलक्षण और विशेषण का मन्तर दृष्ट न्तों के द्वारा समझना चाहिये । दृष्टान्त यह है कि एक पुरुष दूसरों से पूछता है कि रात्रि मे माकाश मे चमकने वाल इन ग्रह नक्षत्र और साराभो में चद्रशब्द से प्रतिपाच वस्तु कौन ( १८ ) इसका उत्तर दोनो प्रकार से दिया जा सकता है । एक उत्तर तो यह है कि इस शाखा के अग्र भाग मे जो दिखाई देता है वह चन्द्र है । यहाँ पर चन्द्र शब्द से प्रतिपाद्य न होती हुई शाखा चन्द्र की सूचनामात्र देती है अतएव शाखा उपलक्षण मानी जाती है क्योकि वह चन्द्र शब्द के वाच्यार्थ कोटि मे अन्तर्भूत नहीं होती । यहाँ पर दूसरा उत्तर यह दिया जा सकता है कि इन ग्रह नक्षत्र और तारागण मे अधिक प्रकाशवाला पदार्थ चन्द्र है। यहाँ पर वह अधिकपकाश, चन्द्र के विशेपण के रूप मे वाच्यार्थ कोटि में अन्तर्भूत हो जाता है क्योकि वह प्रकाश चन्द्र को कभी छोडता नही । गाखा तो कुछ समय बीतने पर उस ऋजुतारूपी सबन्ध को छोड देती है जो पहले चन्द्रमा के साथ रहा है। इसी प्रकार प्रकृन में यह समझना चाहिये कि जब श्रीभगवान् प्राप्य होते हैं तद्र श्रीमहालक्ष्मी जी विशेषण के रूप में प्राप्य होती हैं अतएव दिव्यदम्पति प्राप्य कहलाते है इसलिये ही द्वयमन्त्र के उत्तर भाग भे-जो प्राय स्वरूप को बतलाता है~श्रीमते नारायणाय यहाँ पर श्री जी विशेपण मानी जाती है । उसी मन्त्र के पूर्वखण्ड मे-जो उपाय स्वरूप को बतलाता है-श्रीमन्नारायण इस निर्देश में श्री जी उपलक्षण बनकर रहती है क्योकि वह उपाय नही बनती हैं। उपाय वही बन सकते है जो मोक्ष देने का सकल्प कर सके, मोक्ष देने का मकल्प केवल श्रीभगवान् ही करते हैं। मोक्ष देने का सकल्प श्रीमहालक्ष्मी जी नहीं करती। मोक्ष देने का सकल्प श्रीमहालक्ष्मी जी नही करती है क्योकि इनको मोक्ष देने का अधिकार नहीं है, वह अधिकार श्रीभगवान के लिये सुरक्षित है। यह कई प्राचार्यो का मत है। यह उपर्युक्त मत श्रीवेदान्तदेगिक स्वामी जी को मान्य नही है। श्रीनिक स्वामी जी मप्रदायप्राप्त उपदेश के अनुसार धोमहान०मी जी के पूर्वोक्त तीन आकारो को मानने वाले है पीगिक वामी जी का मिद्धान्त यह है कि द्वयमन्त्र में पूर्वखण्ड एनम में एक ही प धीमत् गद विद्यमान है। उसका (१८) मर्थ दोनो खण्डो में एक ही रूप से करना चाहिये । यही मायानुमो दित है। इन दोनो श्रीमच्छब्दों के अथ में मतर करना अन्याय । जिस प्रकार उत्तरखण्ड में श्रीमहालक्ष्मी जी को विशेषए मान कर दिव्यदम्पतियो को प्राप्य माना जाता है उसी प्रकार पूवखण्ड मे श्रीमहालक्ष्मी जी को विशेषण मानकर दिव्यदम्पतियो को उप य मानना चाहिये। श दस्वारस्य के अनुसार सिद्ध होने वाले भय का मनादर करना उचित नहीं । जिम प्रकार लक्ष्मीविशिष्ट भगवान् प्राप्य होते है उसी प्रकार उपाय भी बन सकते है। मवदा श्रीभगवान् के साथ नित्य साध रखने वाली तथा श्रीभगवान् के प्रत्येक रक्षाकाय में सहयोग देनेवाली सहयमचारिणी महालक्ष्मी जी जीवो की रक्षा करने के लिये समल्प न कर यह बात हो नही सकती। मोक्ष देने म दिव्यदम्पति दोनों का समान अधिकार है। परमदयालु और प्रजातनिग्रह होने के कारण श्रीमहाला मी जी प्रथमत ही मोक्ष देने का सकल्प करती है सथा श्रीभगवान के कोप को गान्त कर उनके द्वारा भी सकल्प करा देती है इस प्रकार दोनो के द्वारा सकल्प बन जाने पर साधको को मोक्ष मिलता है। लोक मे देसा जाता है कि दोनो का स्वामित्व जिस वस्तु मे है उस वस्तु को देने के प्रसग मे उन दोनो मे अत्यत दयालु व्यक्ति देने की इच्छा रखता हुमा दूसरे को भी समझाकर उपकी भी देने की इच्छा को उत्पन्न कर देता है दोनो की इच्छा के अनुसार वह वस्तु प्रार्थी को मिलती है बसे हो प्रकृत में भी समझना माहिये । जिस प्रकार इन दिव्य दम्पतियों को अगत मे समान स्वा मित्व है जिस प्रकार ये दोनो प्राप्य हैं उसी प्रकार इन दोनों को समन रूप से उपाय भी मानना चाहिये । इस प्रथ का विस्तृत वर्णन श्रीमद्रहस्यत्रयसार में है । विस्तार होने के भय से भागे का कोटिक्रम यहाँ छोड दिया जाता है। श्रीदेशिक स्वामी जी इस श्लोक मे श्रीमह लक्ष्मी जी के उपा पत्व और पुरुषकारत्व इन दोनो प्राकारो मा वणन करते हुए उनके शरए म जाते हैं।
( १६ ) म्हेन्द्राग्नाविष्णुप्रभृतिषु महत्त्वप्रभृतिवत् प्रपत्तव्ये तत्त्वे परि- पमितवैशिष्ट्यविभवाम् अघृष्यत्व धूत्वा कमितुरभिगम्यत्व जननी शोतापागा श्रियमशरणोऽहं शरण यामि अर्थात् मै सर्वथा शरणहीन कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग ये उपाय तो मेरे यहाँ है ही नहीं, अज एव असमर्थ मैं इन उपायो से सर्वथा शून्य हो गया हूँ, यह मेरी अत्यन्त दयनीय स्थिति है, सर्वलोकशरण्य श्रीभगवान भी मेरे लिये भरण नही रह गये है । अपराधो के अनुरूप दण्ड देने वाले श्रीभगवान् के शरण मे जाने मे हमको हिम्मत नहीं होती, मुझे भय लग रहा है कि कही वे हमको दण्ड न दे। इस प्रकार सर्वथा शरणहीन हमको एक हो शरण रह गया है। वह शरण कौन है ? वे श्रीमहालक्ष्मी जी हो है । श्रीमहालक्ष्मी जी जगन्माता होने के कारण हमारे अपराधो की क्षमा करके हमको शरण दे सकती है। दयामयी माता श्री जी किसी को दण्ड देना तो जानती नही, आये हुए जीवो का उपलालन करना ही जानती है । उन दयामयी माता के शरण में मै जाता हूँ। श्रीमहालक्ष्मी जा म्वय अश्रय देती है इतनी ही बात नहीं, किंतु श्रीभगवान् के शरण मे हमें पहुँवा भी देती हैं, इस काम को करने में कभी वह हिचकनी नही श्रीभगवान् हमारे अपराधो को देवकर अतिमात्र कुपित क्यो न हो हम लोगो को दुरासद क्यो न हो तथा किसी के भी दबाव मे न पाने वाले क्यो न हो, परन्तु पारुणामयी जगन्माता उनकी इस कठोरता दुराधर्पता एव कोप को मिटाकर उन्हे हम लोगो के प्रति प्रसन्नमुग्व बना देती है, जिससे हमे भय एव नकोच को छोटकर उनके घरण में जाने में उत्साह बढ जाता है। श्री भगवान् कितना ही रुष्ट क्यो न हो, श्रीमहालक्ष्मी जी उनके कोप को शान्त कर ही देती हैं। उन दोनो का प्रेमवन्धन लना मुदृढ है जिममे श्रीभगवान को भी अन्त मे श्रीमहालक्ष्मी जी सीवान को मानना ही पड़ता है। इस प्रकार श्रीमहालक्ष्मी जी हम श्रीभगवान् के मनिधि मे पहुचाकर रक्षा करने के लिये उन्हे नाना प्रकार में प्रोत्माहिन करती रहती है । यही श्रीजी का पुरुष- ( ." कारत्व है । श्रीमहालक्ष्मी जी पुस्पकार बनती है इतनी ही बात मही कितु श्रीजी उपाय बन जाती है। शरणागतों के विषय में श्रीमन्नारायण अर्थात् धीमहालक्ष्मीसमेत नारायण उपाय बनते है। यहाँ विचार करने पर सिद्ध होता है कि श्रीजी और नारायण भगवान् दोनो उपाय बनते हैं। श्रीविशिष्ट नारायण जव उपाय बनते है तब श्रीजी विशेषण के रूप में और नारायण भगवान विशेष्य के रूप मे उपाय बनते है। इस प्रकार दोनो विशेषण और विशेष्य के रूप में उपाम बनते है। गरणागतो या केवल लक्ष्मी जी उपाय नहीं हैं तथा केवल भगवान भी उपाय नही है किंतु लक्ष्मी विशिष्ट नारायण ही उपाय है । यह यमत्र पूषखण्ड के श्रीमनारायण पद से व्यक्त है। वहाँ श्री लक्ष्मी जी विशेपण के रूम मे धीभगवान् विशेष्य के रूप में प्रतिदिन होते है। ये दोनों अलग अलग उपाय नही हैं किंतु मिलकर ही उपाय है। जिस प्रकार एक ही द्वित्व सख्या दोनों पदार्थों म समाविष्ट रहनी है उसी प्रकार एक ही उपायत्व श्री जी और नारायण म समाविष्ट रहता है । इस प्रथ को अनेक वैदिक हान्तो के द्वारा हृदयगम करना चाहिये। वे वैदिक दृष्टान्त तीन है। उनका वणन इस प्रकार है (१) बेद म महेद्रयाग का विधान है। उस याग म महेद्र पाराध्य है। महेन्द्र शम्द का प्रय है महत्त्वविशिष्ट पद्र। यह महत्यविशिष्ट इन्द्र उस यांग भै दवता बनते है केवल इन्द्र नही । महेन्द्र शब्द से महत्त्वविशिष्ट प्रतिपादित होने के कारण वही उस याग मे देवता माने जाते है केवल इन्द्र नही। उसी प्रकार प्रकृत मे इयमत्र पूबखण्ड स्थित श्रीमनारायण शल से थीविशिष्ट नारायण प्रति पादित होने के कारण धीविशिष्ठ नारायण ही उपाय मानने योग्य श्रीजी को छोडकर केवल नारायण नहीं। (२) वेद मे पाना वैष्णव याग का विधान है । इस याग मे अग्नि और विष्णु दोनों मिलकर देवता माने जाते हैं क्योकि भाग्नावैष्णव शब्द मे पाना विष्णु समास के बाद देवतार्थ को बतलाने वाला तावत प्रत्यय उपस्थित हुभा है । वहाँ अग्नि भोर विष्णु मे एक ही देवताख (२१) माना जाता है, उन दोनो का नाम लेकर एक ही बार आहुति दी जाती है । अलग अलग देवतात्व होने पर प्रत्येक का अलग २ नाम लेकर अलग २ पाहुति देनी पडती, परन्तु दोनो मे एक ही देवतात्व विद्यमान होने के कारण एक ही आहुति दी जाती है। वैसे ही प्रकृत मे भी समझना चाहिये । शरणागति मे श्रीविशिष्ट नारायण के प्रति आत्मरूपी हवि तथा रक्षाभार का समर्पण एक वार ही किया जाता है इस समर्पण के प्रति जो उद्देश्यता है, वह एक ही विशिष्ट नारायण मे रहती है। अतएव श्रीविशिष्ट नारायण मे उपायत्व एक कहा जाता है। (३) वेद मे यह विधान है कि इन्द्राय पुत्रिणे पुरोडाशमेकादशकपाल निर्वपेत् । अर्थात्-पुत्रविशिष्ट इन्द्रदेव के लिये ग्यारह कपालो मे संस्कृत पुरो- डाग द्रव्य से याग करे। इस याग मे पुत्रविशिष्ट इन्द्र देवता है, केवल इन्द्र नही केवल पुत्र भी नही, किंतु पुत्रविशिष्ट इन्द्र देवता है। एक ही देवतात्व पुत्रविशिष्ट इन्द्र में माना जाता है । पुत्र- विशिष्ट इन्द्र का नाम लेकर एक ही बार आहुति दी जाती है । वैसे ही प्रकृत मे द्वयमन्त्र के पूर्वखण्ड से श्रीविशिष्ट नारायण मे एक ही उपायत्व वोधित होता है । वह एक ही उपायत्व विशेषण बनने वाली श्रीलक्ष्मी जी तथा विशेप्य बनने वाले श्रीभगवान् इन दोनो मे द्वित्व सख्या की तरह समाविष्ट रहता है । इस प्रकार श्रीमहा- लक्ष्मी जी शरणागति में विशेषण के रूप मे उपाय बनती है। इस प्रकार उपाय बनना श्रीमहालक्ष्मी जी का दूसरा आकार है । तीसरा प्राप्यत्व आकार तो है ही। उसमे किसी का भी विवाद नही । श्रीमहालक्ष्मी जी इस प्रकार पत्नी होने के कारण विशेषरण बनकर उसी प्रकार श्रीभगवान् की महत्ता को वढा रही हैं जिस प्रकार प्रभा विशेषण बनकर प्रभावान दीप की महत्ता को बढाती है। जिम प्रकार दीप्ति विशेषण बनकर दीप्तिविशिष्ट रत्न के बढाती है, तया जिस प्रकार सुगन्ध विशेषण बनकर सुगन्धयुक्त पुष्प की महत्ता को बढाता है उसी प्रकार श्रीमहालक्ष्मी जो विशेषण बनकर श्रीभगवान् की वस्तु बनकर श्रीभगवान् की महिमा को मूल्य को (२२) बनाती है । इस प्रकार श्रीमहालक्ष्मी जो एक तरफ श्री भगवान की महिमा को बढाती है तो दूसरी तरफ करुणापूग्ण गीतल दृष्टिपातों से माश्रित जीवो को निहारती है। साराश यह है कि इस श्लोक से थीदेशिर स्वामी जी कहते हैं कि शरणहीन में महेद्र अग्नाविष्णु और पुत्रविशिष्ट इन्द्र इत्यादि मे महत्त्व इत्यादि के समान शरण देने वाले श्रीभगवान् के विषय मे विशेषण बनकर, महत्व को बढानेवाली विशेष के रूप में उपाय बनने वाली श्रीमगवान् के कोप को शान्तकर उनको हम लोगों के प्रति सुमुख बनाने वाली तथा सबदा करणारसपूरित शीतल दृष्टिपात करनेवाली श्रीमहालक्ष्मी जी के शरण में जाता हूँ ॥४॥ ( ५ ) स्वत सिद्ध श्रीमानमितगुरणभूमा करण्या विधाय ब्रह्मादीन् वितरति मिजादेशमपि य । प्रपस्या साक्षाढा भजनशिरसा वापि सुलभ मुमुक्षुर्देवेश तमहमधिगच्छामि शरणम् ॥ श्रीदेशिक स्वामी जी ने दोनो श्लोकों से श्रीमहालक्ष्मीशरणागति का चयन किया है । वे इस श्लोक से श्रोत प्रमाए को सूचित करते हुए श्रीभगवान के शरण में जाते है तथा साथ ही श्रीभगवच्छरणा गति के स्वरूप का भी वणन करते है। श्वेताश्वतर उपनिषद् मे मुमुक्षु की भगवच्छरणागति का वणन है। उससे सिद्ध होता है कि मोक्ष चाहने वाले सम्बनो को श्री भगवान के शरण में जाना चाहिये । वह उपनिषदवचन यह है कि- विवाति पून यो पांच प्रहिणोति तस्म । सह देवमात्मबुधिप्रसाद मुमुलुई शरणमह प्रपद्ये ॥ अर्याद-विस श्रीभगवान् ने सर्वप्रथम ब्रह्मा जी को चष्टि की तथा जिस भगवान् ने ब्रह्मा जी को बेदी का उपदेश दिया था अपने विषय मे बुद्धि का प्रकाश करने वाले उन इष्टदेव श्रीमगवान् मो ब्रह्माण (२३ ) के शरण मे मै मुमुक्षु जाता हूँ। इस मन्त्र से फलित होता है कि मोक्ष चाहने वाले साधको को श्रीभगवान के शरण में जाना चाहिये। इम मन्त्रार्थ को स्पष्ट करते हुए श्रीदेशिक स्वामी जी इस श्लोक मे श्रीभगवान् के शरण में जाते हैं । स्वत. सिद्धोऽभितगुरणभूमा य: श्रीमान् करुणया ब्रह्मादीन विशय निजादेशमपि वितरति मुमुक्षुरह प्रपत्त्या साक्षाद्वा भजन- शिरसा वापि सुलभ तं देवेश शरणमधिगच्छामि अर्थात् मोक्ष चाहने वाला मै देवो के ईश्वर श्रीमन्नारायण भगवान् के गरण में जाता हूँ। वे श्रीभगवान् कैसे है ? वे श्रीभगवान् प्रपत्ति अर्थात्त शरण गति के द्वारा ही प्राप्य हैं। शरणागतो को ही श्रीभगवान् मिलते है । गरणागति दो प्रकार की है। एक स्वतन्त्र प्रपत्ति है, दूसरी अङ्ग प्रपत्ति है । स्वतन्त्र प्रपत्ति करने पर साक्षात् भगवान् प्राप्त होते हैं, स्वतन्त्र प्रपत्ति करने वाले साधको को शरणागति के उत्तरकाल मे श्रीभगवत्प्राप्ति के लिये कुछ भी करना नहीं पडता । अङ्ग प्रपत्ति करने वालो को मरणागति के बाद भक्तियोग करना पडता है, भक्तियोग सपन्न होने पर नोभगवान् मिलते है। प्रपत्ति करने के वाद श्रीभगवान् चाहे साक्षात् मिलें, चाहे भक्तियोग के द्वारा मिलते है भरणागतो को ही। जो किमी प्रकार से भी शरण मे न पाया हो उसको श्रीभगवान् कभी नहीं मिलते । ये ही श्रीभगवान् मृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा जी इत्यादियो को सृष्टि करके उनको वेदो का प्रदान करते है। यहाँ पर कोई महा- नुभाव यह गका भी कर सकते हैं कि जिस प्रकार श्रीभगवान् ने ब्रह्मा जो की मृष्टि की उसी प्रकार श्रीभगवान् को सृष्टि किसने की इम शङ्का का उत्तर यह है कि किसी ने भी श्रीभगवान् की ष्टि नहीं की क्योकि वे स्वत सिद्ध है अर्थात् नित्य है। नित्य पदार्थ की मुष्टि कैसी ? ब्रह्मा इत्यादि जीवगण प्रलयकाल में प्रकृति मे लीन हो जाते है, इसलिये पुन उनकी सृष्टि करनी पड़ती है, प्रलयकाल मे श्रीभगवान् प्रकृति मे लीन नही होते, किंतु प्रकृति श्रीभगवान् में लीन हो जाती है। श्रीभगवान् तवंदा एक रूप से (४) । बने रहते है। इस विराट सष्टि का सजन करना वस्तुत बडी सिदि है। इस सिद्धि को श्रीभगवान् ने कसे प्राप्त किया? क्या किसी साधनानुष्ठान के द्वारा प्राप्त किया ? उत्तर यह है कि श्रीभगवान् ने किसी साधनानुष्ठान के द्वारा इस सिद्धि को नहीं पाया क्योकि वे स्वत सिद्ध है, स्वय सदसिदिसम्पन्न हैं। वे श्रीमान हैं श्रीजी सवसिद्धियो की स्वामिनी है वे श्रीजी श्रीभगवान् का पात्रय लेकर ही सौभाग्यवती हो रही है यदि सब सिद्धियों की स्वामिनी श्री जी के स्वामी सिद्धिसपा रहे इसमे कोई प्राय नही । सिद्धि सपन न होने पर ही आश्चर्य मानना चाहिये । श्रीभगवान् स्वरा सिद्ध है इतना ही नही किंतु मरिणत एवं अपार कल्याण गुणों के निधि है। उन मे परस्व का समर्थन करने वाले ज्ञानशक्ति बल ऐश्वय वीय भोर तेज ये छ गुण विद्यमान हैं तथा सौलभ्य को सिद्ध करने वाले सौशील्य वात्सल्य मादव आजव सौहाद साम्य कारुण्य गाम्भीय प्रौदार्य इत्यादि कल्याण गुण भी विद्यमान है। श्रीभगवान् मे विद्यमान मे गुण घरमसीमा पर पहुंचे हुए है । ऐसे उच्चकोटि के कल्याण गुण अन्यत्र कही नहीं मिल सकते । श्रीभगवान् को मनन्त इसलिये कहा जाता है कि कोई भी उनके गुणो के अन्त तक न पहुच सकता है न जान सकता है न बन कर सकता है नाम्त पुरणानो गन्धन्ति सेनानम्तोऽयमुच्यते । सवकल्याणगुणनिषि स्वत सिद्ध श्रिय पति भगवान प्रलय काल मे करण मौर शरीर से शून्म तथा बेतनाशक्किहीन जह प्राय जीवो की दुर्दशा को देखकर द्रषितमन कि होकर करणा से ब्रह्मा इत्यादि बीवों की सष्टि करते है उनमे ब्रह्मा जी की सृष्टि स्वम करते है ब्रह्माजी के अन्तर्यामी होकर ब्रह्माजी के द्वारा भन्यान्य जीवो की सृष्टि करते है । सृष्टि में उनकी करुणा ही प्रधान कारण है। सष्टि में वीव देह भोर इन्द्रिय इत्यादि को प्राशर जब प्राचीन दुर्वासनाभो के अनुसार दुर्भाग मे ही चलने लगते है सब उनके प्रशान को दूर कराने तथा हिन और महित का ज्ञान कराने के लिये श्रीमगवान् पूर्वकल्पस्थित वेदो का उपदेश ब्रह्माजी ( २५) को देकर उनके द्वारा जीवो मे वेद आदि गावो का प्रचार करते हैं, वेद इत्यादि ग्रन्थो को शास्त्र इसलिये कहते है कि उनमे श्रीभगवान् के करयाणकारी शासन निहित है। उन शासनो के अनुसार चलने पर जीव अवश्य कल्याण का भागी होगा । उन अाज्ञामो का उल्ले- धन करने के कारण जीव दण्ड का भागी होता है तथा ससार में पडकर नापत्रय को भोगता रहता है। इस प्रकार जो भगवान् ब्रह्मा इत्यादियो की सृष्टि करके उन्हे अपने प्राज्ञाहपी वेदो का प्रदान करते हैं, प्रपत्ति करने पर साक्षाद अथवा भक्ति के द्वारा प्राप्य होने वाले उन श्रीभगवान् के शरण मे में मुमुक्ष जा रहा हूँ ॥५॥ वृन्दानि यः स्ववशयन् वजसुन्दरोगा वृन्दावनान्तरभुवा सुलभो बभूव । श्रीमानशेषजनसग्रहणाय शेते रङ्ग भुजगशयने स महाभुजङ्गः ।। ग्लोक में श्रीदेशिक स्वामी जी ने भगवच्छरगति का वर्णन किया है। इस श्लोक मे श्रीभगवान् के सौलभ्य गुण का वर्णन करते हैं। श्रीभगवान् मे मोलभ्य गुण होने के कारण ही हम लोग श्रीभगवान् का आश्रय लेते रहते है। उनमे सौलभ्य गुण न होने पर हम लोगो को उनके आश्रय लेने में कठिनाई अवश्य होगी। श्रीवैकुण्ठ में विराजमान श्रीपरवासुदेव भगवान में केवल परत्व है । अतएव उनका आश्रय लेना हम लोगो से नहीं बनता। श्रीभगवान के मर्यादापुरुषोत्तमरूपवतार श्रीभगवान् रामचन्द्र जी मे नया मन्दिरो मे विराजमान अर्चावतारो मे सौलभ्यगुण अधिक मात्रा मे विकसित है, अतएव इनका पाश्रय लेने मे विलकुल कठिनाई नही होती। काप्ठाप्राप्त मौलभ्यगुण अविनार में ही है। उनका श्राश्रय लेने से पल्याण अवश्य मिद्ध होगा। यह अर्थ इस श्लोक से भूचित होता है।
1 1 यो प्रमसुन्दरीण पृदानि स्वयशयन वृन्दावनान्तरभुषों सुलभो बभूव स श्रीमान् महाभुजङ्गोऽशेषजनसग्रहणाय रङ्ग भुजङ्गरायने शेते । श्रीमनारायण भगवान ने जीवा की सष्टि करके उनको वेदों का प्रदान किया था। वेदा को प्राप्त करके भी जीव वेदाज्ञा के अनुसार नही चलते थे, ब्रह्मानन्द को भूलकर क्षुद्र विषयानद म ही मग्न रहते थे। जीवो की इस दुदशा को देखकर श्रीभगवान् ने विचार किया कि जिस प्रकार हाथी के द्वारा ही हामी पकडे जान है पक्षियो के द्वारा ही पक्षी पकडे जाते हैं उसी प्रकार हमको इनका सजातीय बनकर ही इनको पकडना चाहिये। सभी काय सिद्धि होगी। इस प्रकार विचार कर श्रीभगवान् ने देव तिर्यक और मनुष्य प्रादि के बीच मे उनके सजातीय रूप को धारण कर सुलभ होते हुए उनको प्रावृष्ट किया। इस सोलभ्य की सीमा पाँच सहस्र वष पूर्व प्रवतीण श्रीकृष्ण भगवान् मे खूब देखने में माती । श्रीकृष्णचद्र भगवान् ने वृन्दावन में विराजते समय कामुक पुरुष के समान वेप धारणकर विस्तृत वृन्दावनभूमि के मध्य में यहाँ जन्म लेने वाली सभी ब्रजसुदरियों के समूहों को नाना प्रकार के हावभाव दिखाकर पूर्ण रूप से अपने वश में कर लिया था, इस प्रकार श्रीभगवान् धनसुन्दरियो को वश में करक उनके लिये सुलभ बन गये थे इतना ही नही कितु वृन्दावन के मध्य में उत्पन्न पशु पक्षि गुल्म वृक्ष और लता इत्यादिको को भी सुलभ गये थे उनका उदार करते रहे । उस समय जम लिये सभी सात्विक प्रवृति के लोगो ने श्रीभगवान् के इस सौलभ्य गुण से खूब लाभ उठाया । परन्तु अस्मदादि भगरिएत अमागे जीव श्रीकृष्णावतार के समय यहाँ रह गये थे पता नही, हम सरीखे मनुष्य तो श्रीकृष्णावतार के समय लाभ नही उठा सके । यदि लाभ उठाये हुए होते तो भाज जन्म रोना ही नही पडता। परन्तु श्रीभगवान ने हम लोगो को नही छोडा है कामुक भूमिका को धारण परने वाले थे श्रीकृष्यभगवान् हो सम्पूण मनुष्यों के संग्रह करने का सपल्प करके इस थोरज में मादि शेषरूपी शयन पर धरना (२७) हुए शयन कर रहे हैं । प्रतीत होता है कि जिस प्रकार धरना देने वाले लोग अपना मनोरथ पूर्ण होने पर ही धरना देने से विरत होते हैं. उसी प्रकार ये श्रीरङ्गनाथ भगवान् भी सब जन्म लेने वाले देहधारी जीवो का उद्धार करके ही उठेगे, जब तक सभी जीवो का उद्धार सपन्न नहीं होता तब तक इसी रूप में धरना देते रहेंगे। श्रीकृष्ण भगवान ही अपनी अवतार लीला के अवसान मे सम्पूर्ण जीवो का सग्रह करने के लिये उत्तर द्वार से श्रीरङ्ग मन्दिर में प्रवेश कर आदि शेष शयन पर शयन कर रहे हैं । ऐसा प्रतीत होता है । ऐसे परमसुलभ अर्चामूर्ति श्रीभगवान् का आश्रय लेकर सव को कल्याणभागी बनना चाहिये ।।६।। ( ७ ) रङ्गास्तीर्णभुजङ्गपुङ्गववपुःपर्यवयं गतो सर्गस्थित्यवसानकेलिरसिकौ तौ दम्पत्ती नः पती । नाभीपङ्कजशायिनः श्रुतिसुखैरन्योन्यबद्धस्मितो डिम्भस्याम्बुजसभवस्य वचनैरोंतत् सदित्यादिभिः।। पूर्व श्लोक मे श्रीदेशिक स्वामी जी ने श्रीभगवान् के सौलभ्य गुण का वर्णण किया। शरण देने वाले में जिन २ गुणो अत्यावश्यकता है, उनमे सोलभ्य गुण प्रथम है। द्वितीय गुण स्वामित्व है। स्वामी ही दास जनो को शरण देकर रक्षा कर सकते है। उस स्वामित्व गुण का यर्णन इस श्लोक मे कर रहे है। रङ्गास्तीर्णभुजङ्गपुङ्गववपु पर्यडूवयं गतौ सर्गस्थित्यवसानकेलि- रसिको नाभीपद्धजशायिनोऽम्बुजसभवस्य श्रुतिसुखैरोंतत् सदित्यादि- भिर्वचनैरन्योन्यबद्धस्मितो तो दम्पती न. पती। श्रीभगवान् सब के स्वामी हैं, सभी चेतन और अचेतन उन्ही की वस्तु हैं । सर्व- स्वामी श्रीभगवान् जीवो का उद्धार करने के लिये श्रीरङ्ग मे बिछे शेषनाग के दिव्यविग्रहरूपी श्रेष्ठ पर्यत्र पर शयन कर रहे है। श्रीमान् आदि शेप को श्रीविग्रहरूपिणी शय्या श्रीभगवान् को अपार (८) श्रीभगवान मानन्द देती है शेषनाग के विग्रह का नाम ही सस्कृत भाषा में भोग है, यदि यह को भोग सुख का प्रदान करे इसमें क्या पाश्रय है । शय्या यदि विशाल उन्नत वोमल और सुगन्धयुक्त हो तो वह उत्तम शय्या मानी जाती है। आदिशेषरूपिणी शय्या में ये सब गुण पूण मात्रा में विद्यमान है। इस शय्या के महत्व का कहाँ तक वपन किया जाय ? यह शय्या स्पा होते ही सवन भगवान् को भी निद्रा में डाल देती है। इससे इसका प्रभाव जाना जा सकता है। इस प्रकार श्रीलक्ष्मी और श्रीनारायण भगवान् श्रीशेषनागरूपी दिव्यपयडू के ऊपर विराजमान होकर इस जगत का शासन कर रहे है । यह दिव्यपयह ही उनवा दिय सिंहासन है जो जगत्साम्राज्य का प्रधान प्रतीक माना जाता है जिम प्रकार सिंहासन में विराजने वाले व्यक्ति को देखकर उसको राजा समझने में किसी को देर नहीं लगती उसी प्रकार मादिशेषषयरूपी दिव्य सिहासन मे विराजने वाले श्रीमनारायण को देखकर किसी को भी उनको सरगर समझने में देर नहीं लगती। श्री मादिशेपसूरि अत्यन्त विशाल तथा उन्नत होने के कारण रजतमय भवन के समान दिखाई दे रहे है उसके ऊपर विराजने वाले उन्नत श्यामल श्रीभगवान, पर्वत के ऊपर शयन करने वाले अलमारत मेध के समान दिखाई दे रहे है यह दशन अत्यन्त प्राकर्षक प्रतीत होता है। प्रस्तु, महाँ कहने का भाव यह है कि प्रादिशेषपयनुरूपी दिव्य सिंहासन पर विराजमान श्रीभगवान को देखने पर उनका सव स्वामित्व स्फुट विदित हो जाता है । दशनमात्र से हो उनका स्वामित्व विदित हो जाता हो इतना ही नही किंतु उनकी कृति को देखने पर भी उनका स्वामित्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। ये क्या करते १ वे पाराप्रवाह रूप से इस सम्पूर्ण जगत को चष्टि स्थिति पौर प्रलय करते हैं। इस प्रकार विराट धष्टि स्थिति और प्रनय करने मे उनको प्रणमात्र भी फ्लेश नहीं होता, यह तो उनकी लीला है। इस लीला में वे रस लेते रहते हैं इस लीला को उनसे छोडते नहीं बनता। यह लीला उनका सलए बन जाती। तभी तो है (६) श्रुति और ब्रह्मसूत्रकार ने जगत्कारणत्व को ब्रह्म का लक्षण कहा । यह लीला द्यूतक्रीडा के समान रूप को कभी कभी धारण करती है। जिस प्रकार विशाल फलक मै नानाविध कोष्ठको को बनाकर उनमे राजा मन्त्री सेनापति घोडा और हाथी इत्यादि खिलौनो को रखकर धूत खेला जाता है, उसी प्रकार प्रकृति के द्वारानिर्मित इस विशालब्रह्माण्डरूपी फलक मे ब्रह्मा इत्यादि देवता आदि के स्थान वाले चौदहभुवनरूपी कोष्ठको मे उन २ जीवो के कर्मानुसार कई जीवो को ब्रह्मा इत्यादि देवताओ के पद मे रखकर श्रीलक्ष्मी जी और श्रीमन्नारायण कर्मफलप्रदानरूपी धूत खेल रहे हैं । ब्रह्मा इत्यादि देवतागण खिलौनो के समान परतन्त्र हैं। इस प्रकार ये दोनो दम्पती सर्वदा सृष्टिस्थितिप्रलयरूपी लीला करते रहते हैं। इसे देखने से प्रतीत होता है कि यह चेतनाचेतनमय जगत श्रीभगवान् की वस्तु है, श्रीभगवान् इसके स्वामी हैं। जिस प्रकार खेत मे हल चलाते बोज बोते पानी देते तथा धान काटते रहने वाले किसान को देखकर किसी को भी उस किसान को खेत का स्वामी समझने मे क्लेश नही होता उसी प्रकार इस चेतनाचेतनमय जगत में सर्वदा सृष्टि स्थिति और प्रलय इत्यादि रूप से कुछ न कुछ कार्य करते रहनेवाले इन दिव्य दम्पतियो को देखने पर इनको भी जगत का स्वामी मानने में किसी को क्लेश नहीं होना चाहिये । इस जगद्व्यापार से इन दिव्य दम्पतियो का स्वामित्व स्फुट विदित हो जाता है। कई वादी श्रीभगवान् को सर्वस्वामी नही मानते, वे कहते हैं कि श्रीब्रह्माजी और श्री शिवजी श्रीभगवान् के समान हैं, श्रीभगवान् इनके स्वामी नहीं है, श्रीभगवान् को सर्वस्वामी मानना मिथ्या है इत्यादि । श्रीदेशिक स्वामी जी इस पूर्वपक्ष का समाधान उत्तरार्द्ध से करते है। श्रीदेशिक स्वामी जी कहत हैं कि श्री शिवजी श्रीब्रह्माजी के पुत्र है, यह अर्थ शास्त्रो में वर्णित है। श्राब्रह्माजी श्रीभगवान् के नाभिकमल से उत्पन्न हुए हैं यह अर्थ भी शाखो मे वरिणत है । इसमें कोई शका उठ ही नहीं सकती। नीचे श्रीभगवान् (२८) मानन्द देती है, शेषनाग के विग्रह का नाम हो सस्कृत भाषा में भोग है, यदि यह श्रीभगवान् को भोग सुख का प्रदान करे इसमें क्या प्राश्वर्य है । शच्या यदि विशाल उषत कोमल भोर सुगपयुक्त हो तो वह उत्तम शम्या मानी जाती है। आदिपरूपिणी शम्या में ये सब पुरा पूण मात्रा में विद्यमान है। इस शय्या के महत्त्व का कहाँ तक वणन किया जाय' यह शय्या स्पश होते ही सर्व भगवान् को भी निद्रा में डाल देती है। इससे इसका प्रभाव जाना जा सकता है। इस प्रकार श्रीलक्ष्मी और श्रीनारायण भगवान घोशेषनागरूपी दिव्यपया के ऊपर विराजमान होकर इस जगल का शासन कर रहे है। यह दिव्यपया ही उनका दिव्य सिंहासन है जो जगत्साम्राज्य का प्रधान प्रतीक माना जाता है जिस प्रकार सिंहासन में विराजने वाले व्यकि को देखकर उसको रामा समझने में किसी को देर नहीं लगती उसी प्रकार प्रादिशेषपयरूपी दिव्य सिहासन में विराजने वाले श्रीमनारायण को देखकर किसी को भी उनको सर्वेश्वर समझने में देर नहीं लगती। श्री मादिशेपसूरि अत्यन्त विशाल तथा उन्नत होने के कारण रजतमय पवन के समान दिखाई दे रहे है उसके ऊपर विराजने बाले उन्नत श्यामल श्रीभगवान्, पवत के उपर शयन करने वाले जलभरित मेप के समान दिखाई दे दे है यह दशन अत्यन्त प्राकएक प्रतीत होता है। अस्तु यहाँ कहने का भाष यह है कि माविशेषफ्यवरूपी दिव्य सिंहासन पर विराजमान श्रीभगवान को देखने पर उनका सब स्वामित्व स्फुट विदित हो जाता है। दर्शनमात्र से हो उनका स्वामित्व विदित हो जाता हो इतना ही नही किंतु उनकी कृति को देखने पर भी उनका स्वामित्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। वे क्या करते है' के घाराप्रवाह कम से इस सम्पूर्ण जगत की दृष्टि स्थिति और प्रलय करते है। इस प्रकार विराट सष्टि स्थिति और प्रलय करने मै उनको प्रणुमात्र भी क्लेश नहीं होता यह तो उनकी लीला है। इम लोला मे ये स लेते रहते है, इस नीला को उनसे छोड़ते नही बनता। यह भोला उनका लक्षण बन जाती। तभी तो (६) श्रुति और ब्रह्मसूत्रकार ने जगत्कारणत्व को ब्रह्म का लक्षण कहा। यह लीला धू तक्रीडा के समान रूप को कभी कभी धारण करती है। जिस प्रकार विशाल फलक मे नानाविध कोष्ठको को बनाकर उनमे राजा मन्त्री सेनापति घोडा और हाथी इत्यादि खिलौनो को रखकर धूत खेला जाता है, उसी प्रकार प्रकृति के द्वारानिर्मित इस विशालब्रह्माण्डरूपी फलक मे ब्रह्मा इत्यादि देवता प्रादि के स्थान वाले चौदहभुवनरूपी कोष्ठको मे उन २ जीवो के कर्मानुसार कई जीवो को ब्रह्मा इत्यादि देवतापो के पद मे रखकर श्रीलक्ष्मी जी और श्रीमन्नारायण कर्मफलप्रदानरूपी धूत खेल रहे है । ब्रह्मा इत्यादि देवतागण खिलौनो के समान परतन्त्र हैं। इस प्रकार ये दोनों दम्पती सर्वदा सृष्टिस्थितिप्रलयरूपी लीला करते रहते है। इसे देखने से प्रतीत होता है कि यह चेतनाचेतनमय जगत श्रीभगवान् की वस्तु है, श्रीभगवान् इसके स्वामी हैं । जिस प्रकार खेत मे हल चलाते बीज बोते पानी देते तथा धान काटते रहने वाले किसान को देखकर किसी को भी उस किसान को खेत का स्वामी समझने मे क्लेश नही होता उसी प्रकार इस चेतनाचेतनमय जगत मे सर्वदा सृष्टि स्थिति और प्रलय इत्यादि रूप से कुछ न कुछ कार्य करते रहनेवाले इन दिव्य दम्पतियो को देखने पर इनको भी जगत का स्वामी मानने में किसी को क्लेश नही होना चाहिये । इस जगद्वयापार से इन दिव्य दम्पतियो का स्वामित्व स्फुट विदित हो जाता है। कई वादी श्रीभगवान् को सर्वस्वामी नहीं मानते, वे कहते हैं कि श्रीब्रह्माजी और श्री शिवजी श्रीभगवान् के समान हैं, श्रीभगवान् इनके स्वामी नही है, श्रीभगवान् को सर्वस्वामी मानना मिथ्या है इत्यादि । श्रीदेशिक स्वामी जी इस पूर्वपक्ष का समाधान उत्तरार्द्ध से करते है। श्रीदेशिक स्वामी जी कहते हैं कि श्री शिवजी श्रीब्रह्माजी के पुत्र हैं, यह अर्थ शास्रो में वर्णित है। श्रीब्रह्माजी श्रीभगवान् के नाभिकमल से उत्पन्न हुए हैं यह अर्थ भी शाखो मे वर्णित है । इसमें कोई शका उठ ही नही सकती। नीचे श्रीभगवान् ।
(३०) पौर महालक्ष्मी जी आदि शेपपयड पर शयन करते रहते है। श्रीभगवान का नाभिकमल ऊपर है उसमे उत्पन्न ब्रह्माजी शिशु के रूप में शयन करते रहते है उनके मुखों से सत् सत् इत्यादि वेदमत्र निकलते रहते हैं, उस वेदध्वनि को सुनकर श्रीलक्ष्मी नारायणस्पी दिव्यदम्पनि उसी प्रकार मदस्मित करते रहते है जिस प्रकार बच्चों के प्रत्यक शब्दो को सुनकर मातापिता हसते हैं । इस कमानक से सिद्ध होता है कि श्रीलक्ष्मीनारायण मातापिता है श्रीब्रह्माजी पुत्र है। पुत्र पिता का माना जाता है। श्रीब्रह्मा जी के द्वारा श्रीशकर जो से लेकर सपूण जगत की सष्टि हुई है । इमसे सिव होता है कि श्रीब्रह्मा जी और धीशकर जो श्रीभगवान् के समान नही हो सकते है कितु पुत्र और पौत्र होने का कारण बे थीभगवान के हैं श्रीभगवान् ही सवस्थामी । यह अथ श्रीरङ्गनाथ भगवान् के नामिकमल मे स्थित ब्रह्माजी को देखने पर स्पष्ट विदित होता है। इस प्रकार प्रादिशेपरूपी दिव्य सिंहामन मे विराजने, सष्टि स्थिति प्रलयरूपी लीला करते रहने तथा नाभीकमल में श्रीब्रह्माजी को उत्पन्न करने के द्वारा बीरगनाथ भगवान् अपने स्वामित्व को स्पष्ट विदित करा रहे हैं। उनके सवस्वामित्व पर किसी को सन्देह नही करना चाहिये थीभगवान सब के स्वामी हैं तथा श्रीमहालक्ष्मी जी सव की स्व मिनी है। अतएव श स मे कहा गया है कि- प्रस्था मम व शेष हि विभूतिवमयारिमका । अर्थात् श्रीभगवान् कहते है कि लोलाविभूति और भोगविभूति ये दोनो विभूतियां मेरी सया श्रीमहालक्ष्मी जी की भी शेष हैं, अर्थात हम दोनो की वस्तु हैं। पडयसक्षप मे धीराम मित्र स्व मी जी ने कहा है कि उभयापिष्ठान चक शेषित्वम् अर्थात् एक ही स्वामित्व श्रीलक्ष्मीजी पौर श्रीभगवान् में प्रतिष्ठित है। कहने का भाव यह है कि इन दोनो मे अलग २ स्वामित्व नही रहता किंतु एक ही स्वामित्व इन दोनो मे रहता है एममे फलित होता है कि यह विश्व के इस छोलो की साझेदी वस्तु है।
सर्वस्वामी होने के कारण ये दोनो दिव्यदम्पति जीवो के उद्धार को अपना कर्तव्य समझते है, क्योकि दासजनो का उद्धार स्वामी की कर्तव्य कोटि मे आ जाता है। किंच, ये दोनो स्वामी होने के कारण जीवो की प्राप्ति को अपना लाभ समझकर उद्धार मे सदा दत्तचित्त रहते है। खोए हुए जीवो की प्राप्ति वास्तव मे दिव्य दम्पतियो का लाभ ही है। इस प्रकार सर्वस्वामित्व को प्रकट करने वाले श्रीभगवान् के शरण मे सब कल्याण कामियो को जाना चाहिये ॥७॥ ( ८ ) घनकरुणारसौषभरिता परितापहरा नयनमहाछटां मयि तरङ्गय रगपते । दुरितहुताशनस्फुरितदुर्दमदुःखमषी- मलिनितविश्वसौधदुरपह्नववर्णसुधाम्।। पूर्व श्लोक मे श्रीदेशिक स्वामी जी ने श्रीभगवान के स्वामित्व का वर्णन किया है। इस श्लोक मे श्रीभगवान् की दया का वर्णन करते अपने ऊपर कृप दृष्टि डालने के लिये श्रीभगवान से प्रार्थना करते है । श्रीभगवान के सभी कल्याणगुण जीवो को कल्याणकारी हैं । उनमे ज्ञान, शक्ति और करुणा प्रधान माने जाते है। उनमे भी करुणा अत्यन्त श्रेष्ठ है । श्रीभगवान् का स्वामित्व, ज्ञान और शक्ति ये गुण निग्रह तथा अनुग्रह में भी काम आते है। उनसे अनुग्रह ही होता हो सो बात नही, उनसे निग्रह भी हो जाता है। श्रीभगवान् स्वामी होने के कारण जीवो को ससार में भी रख सकते है, और परम पद मे भी तथा थीभगवान् सर्वज्ञ एव सर्वशक्ति सपन्न होने के कारण जीवो के दुष्कर्मों के अनुसार उन २ अनिष्टो को जानकर जोवो को भुगा सकते है तथा जीवो के शुभकर्मों के अनुसार उन २ इष्टो को जानकर जीवो को भुगा सकते है। इस प्रकार थोभगवान् का स्वामित्व, ज्ञान और शक्ति ये गुण जीवो को - (३१) संसार में रखने में सहायक होते हैं, तथा परमपद में रखने में भी सहायक होते हैं । भतएव वे निग्रह मोर मनुग्रह के साधारण कारण माने जाते है। बीमगवान की करुणा अर्याद दया तथा उसके विस्ताररूप सोशीत्य वात्सल्य समा सौहार्द पौदार्य इत्यादि गुण जीओं पर अनुग्रह करने में ही सहायक होते हैं। प्रतएव श्रीभगवान की की दया सर्वदा अनुमहपरामण कहलाती है इसलिये इस गुण महत्ता बढ़ जाती है। इस मर्म कोबताने के लिये श्रीवेदान्तदेशिक स्वामीजी यायतकम दया को विशेषतामों का वरदान करते हुए सौ लोगो से एक या गुण की स्तुति की । इस श्लोक में श्रीदेशिक स्वामी जी धारणागति को सुष्ट प्रकार से सपन्न कराने के लिये श्रीभगवान से दयाइष्टि की भिक्षा माग रहे है। धनकरणारसोपरितो परितापहा दुरितहुताशनस्फुरितपुरम gaमामालिनितविक्षोभरपतववर्षभुषा नपनमहायता है अपने ममितराय। हे वीरनाम भगवन् । भाप मेरे ऊपर कृपा अलिये। पापक दिव्य नेत्रों से तेष को छटा प्रवाह की तरह निकल रही है, इसको गति मेरी और कृपया मोर दीजिये । मेरी इग्या है कि नेत्रों को कान्ति छटा मेरे ऊपर लहर मारती रहे प्रति क्षण अधिकाधिक स मे बह छटा पदि मेरे मार पडली रहेगो, तो मुझको छोडकर दूसरा गन्तब्य स्थान न मिलने के कारण मेरे कारसहराती रहेगी। ऐण होना मेरे लिये अत्यन्त ममोष्ट है। तवर्ष में लालायित दवा है। आप श्रीरङ्ग के स्वामी है भवएव रहपति महलावे है रहपति को इस कान्तिछटा को बरगित करने में क्या कविताई है पाप को मनायास इसे तक्षित कर सकते है उसके प्रस जीव का कल्याण हो जायगा । भापके इन नेत्रों से निकलने वाली कान्ति के समूह की महिमा को मैं जानता है। अतएन ऐसी कामना करता हूँ। यह कान्तिसमूह ऐसा है जिसमे करुणा रूपी विमल श्रम का पनवाइ भाकर भरता जाता है उस करुणा सप्रवाह से सदा यह कानिसमा भरपूर है पापको नेमकान्ति सर्वदा कपणारस से प्राप्तावित रहती है जिस प्रकार चन्द्रमा की ( ३३ ) ज्योत्स्ना शीतता से व्याप्त है, उसी प्रकार आपकी नेत्रकान्ति करुणारस से व्याप्त है, जिस प्रकार नदीप्रवाह अथवा ज्योत्स्ना सूर्य से उत्पन्न ताप को नष्ट करतो है उसी प्रकार आपकी नेत्रकान्ति का यह समूह भी चारो तरफ बढ़ने वाले प्राध्यात्मिक प्राधिभौतिक और आधिदैविक इन त्रिविध तापो को समूल नष्ट कर देता है । यह तापत्रय दूसरे किसी के द्वारा नष्ट होने वाला नहीं है, पापकी कृपादृष्टि की वर्षा से ही नष्ट हो सकता है अतएव में तदर्थ प्रार्थना करता हूँ। किंच, हे श्रीभगवन् | आपकी कृपादृष्टि का प्रभाव अपार है। उसके पड़ने पर ही यह विश्व उज्ज्वल बन जाता है। यह विश्व मानो प्रासाद है । मान लिया जाय कि प्रासाद मे अग्नि जलती रहती है, उससे निबिड धूम निरन्तर निकलता रहता है, उससे वह प्रासाद अपनी सहज उज्ज्वलता खोकर अवश्य मलिन हो जायगा, काला हो जायगा, इसमे सन्देह नही । वैसे ही इस विश्व में पापरूपी अग्नि निरन्तर जलती रहती है क्योकि मनुष्यो मे पाप करने वाले ही अधिक है, धर्म करने वाले विरल है। पापरूपी अग्नि के निरन्तर जलते रहने के कारण इस विश्वप्रासाद में दु खरूपी धूम भर जाता है। जिस प्रकार अग्नि से धूम निकलना अवश्यभावी है उसी प्रकार पाप से दु ख उत्पन्न होना भी अवश्यभावी है, यह टाला नही जा सकता { पाप परिपक होते ही दुख फूट निकलेगा, दुख को दबाना अथवा रोकना अस मव है । इस प्रकार दुखरूपी धूम से यह विश्व- प्रासाद अत्यन्त मलिन हो गया है। जिस प्रकार उस प्रासाद मे प्रत्येक भाग अपनी उज्ज्वलता को खोकर मलिन' बन जाता है उसी प्रकार इस विश्व में प्रत्येक जीव इस दुख के कारण अपने सहज स्वरूप को खोकर अथवा भूलकर देहात्माभिमान इत्यादि के कारण मलिन हो जाता है। वह मलिन प्रासाद सुवा के अर्थात् चूने के लेप से उज्ज्वल हो जाता है, धूम की कालिमा सुधा की उज्ज्वलता को दवा नहीं सकती, किंतु सुधा की उज्ज्वलता ही धूम की कालिमा को दबाकर अथवा नष्ट कर उस प्रासाद को उज्ज्वल बना देती है। उस प्रासाद का प्रत्येक भाग मपनी स्वाभाविक उज्ज्वलता को प्राप्तकर दशनीय बन जाता है उसी प्रकार पापाग्नि से उत्पन दुखघूम से व्याप्त इस विश्वप्रासाद को उज्ज्वल करने वाली यदि कोई वसुधा है तो वह भापकी कृपादृष्टि का प्रवाह ही है दूसरी कोई नही । मापको कृपादृष्टि पड़ते ही इस विश्वप्रासाद का सपूर्ण दुखधूम ना हो जाता है। जिस प्रकार मधकार सूब प्रकाश को दवा नहीं सकता उसी प्रकार विरकाल से जोचों पर अधिकार करने वाले ये दुख भी पापकी कृपादृष्टि को दबा नहीं सकते, किंतु कादृष्टि के समक्ष उनको दबना पड़ता है महाँ तक कि उनको न होना पड़ता है। इस प्रकार प्रापकी कृपादृष्टि सपूरण दुखों को नष्ट कर इस विश्वप्रासाद को उज्ज्वत कर सकती है उसका इतना प्रभाव है। आपकी कृपादृष्टि पडते ही इस विश्व में रहने वाला प्रत्येक जीव अपने इस विकृत रूप को छोड़कर सहज स्वरूप को प्राप्त कर उजवन बन जापगा। कई बन भी गमे हैं। इसके प्रभाव को मै पूणरूप से समझता है । अतएष पाप से प्रायना करता है कि हे श्रीमगवन् । श्राप दिव्यनेत्रों के विमल तेज के प्रवाह को जो करुणारस से मोत प्रोत है, मेरे सर प्रवाहित कीजिये। (९) दुर्मोबोटकमकोटिटिलोऽप्यादेशषश्य कृती बाई नव विमोहितोऽस्मि कुदर्शा पक्षन विक्षोभित । यो माहानसिको महान् यतिपतेन तश्च वरपौत्रज्ञान माधानानिति मधुप अयि ते स्वल्पावशिष्टो भर ॥ इसके पूर्व तीन पलोकों से धीदेशिक स्वामी जी ने श्रीमगवान् के यौलम्म स्वामित्व मौर काम्य गुण का वर्णन किया है ये गुण नारायण शम्दाप के अन्तर्गत है । इस लीक से धीदेशिक स्वामी जी कहते हैं कि उपर्युक्त कल्याणगुणों से सपन्न बीमगवान ने मेर विषय में ऐसे २ उपकार किये है जो दूसरों के लिये सर्वथा.
(३५) असाध्य हैं। श्रीदेशिक स्वामी जी इस श्लोक मे उन उपकारो का वर्णन करते हुए श्रीभगवान् से प्रार्थना करते हैं कि श्रीरङ्गनाथ भगवन् । आपने मेरे विषय में उच्चकोटि के महान् उपकार किये हैं, अव थोडी ही कसर रह गयी है, उसको भी पूरा करके आप मेरा उद्धार करदे। दुर्मोचोटकर्मकोटिटितोऽप्यादेशवश्य कृत । हे श्रीभगवन् । आपने अब तक मेरे विपय मे असख्य उपकार किये हैं। उनमे कई उपकारो को मैने जाना ही नहीं। कई उपकारो को जानकर भी उत्तरकाल में भूल गया । जिन प्रधान उपकारो को भूल ही नही सक्ता, उन महान् उपकारो का दिग्दर्शनमात्र यहाँ कराता हूँ। हे प्रभो । मैं अनादिकाल से पापकर्मों का अर्जन करता आ रहा हूँ उन पापकर्मों ने मुझे ऐसा कसकर बाँध लिया है कि उनसे छूटना सर्वथा अशक्य है। वे कर्म अत्यन्त बलवान है, तथा आगे २ बढते ही जा रहे है उनका घटना असभावित है। ऐसे कर्म एक दो नही अपरिमित हैं। वे कर्म मुझे कसकर बाँधकर ससार- मार्ग मे ले जारहे है। में कर्मप्रवाह में ऐसा बह रहा हूँ जैसा भयकर महानदीप्रवाह में कोई दुर्वल प्राणी बहता हो। भयकर नदी प्रबाह मे बहने वाले मनुष्य के प्रति यदि कहा जाय 'तुम वही खडे रहो अन्यथा मारे जाओगे' वह मनुष्य इच्छा रहने पर भी उस अज्ञा का पालन नहीं कर सकता क्योकि उस प्रवाह के वेग में उसे बहना ही पड़ता है । वैसे ही कर्मप्रवाह मे बहने वाला में भी उस प्राज्ञा का प.लन नही कर. सकता क्योकि उस प्रवाह के वेग में मुझे वहना ही पड़ता है कर्मप्रवाह मे बहने वाला मैं आपकी शास्त्राज्ञा का पालन करने में असमर्थ रह गया। ऐसे अनेक जन्म मुझे बीत गये । मैं उन जन्मो में आपकी आज्ञा का पालन नहीं करता था शास्त्र ही आपकी भाज्ञा है। मैं उन जन्मो में शास्त्र की अवहेलना ही करता था। बुद्धि कर्मा- नुसारिणो इस कहावत के अनुसार प्राचीन कर्मों के अनुसार ही मैं सोचता तथा करता था। किंच मै तिर्यक् और स्थावर योनियो (३६) में अब जम लेता था तब भापकी माशा को सुनने और समझने में सवथा असमय रहा, मानना और पालन करना तो दूर की बात है। अपकी प्राज्ञा को सुनने एव समझने में समय मनुष्य योनि में माने पर भी मै अनेक जमो मे आपकी प्राज्ञा की अवहेलना में करता रह गया, उन जमों में कम मुझे जिधर लेजायें उधर जाता रहा, कम जो करावे सो में परता रह गया। अब उस प्रतीत का स्मरण करने पर मुझे दुख होता है। इस प्रकार प्रबल कमपाशों से बंधे हुए हमको पापने आज्ञाकारी बनाया । जो मैं पहले वेद आदि शाखों का जो पापको प्राज्ञारूप हैं अवहेलन करता था वही में आपके शुभसकल्प के कारण शालों को परम प्रमाण मानने वाला तथा तदनुसार चलने वाला बन गया हूँ। यह मापके शुभ सकल्प का ही प्रभाव है। मुझे इस स्थिति में पहुँचाने के लिये प्रापको जो कुछ करना पड़ा उसे पाप ही जान सकते है । मुझ मे उसे समझने की योग्यता कहाँ ? प्रबल रस्सियों में बचे हुए मनुष्य से यदि कोई कहे कि दौठो दौडो तो यह मादेश व्यय ही होगा। इसमे सदेह नहीं । यदि रज्जुवद्ध मनुष्य के द्वारा भी अपनी माझा का पालन कोई करा सके तो अवश्य उस पाज्ञादाता का प्रभाव मोकोत्तर होगा। इसमे सन्देह नही । बसे ही कमपाशो से बदहमको आपने मशापालक बनाया, यह भी एक आश्चय की वस्तु ही है। यह पापका प्रथम उपकार है जो दूसरो से सवया प्रसाध्य है । अब द्वितीय उपकार सुनिये । बाहानब विमोहितोहिम मापने कृपा करके मुझे वेदवार बादियों के चुगल से बचाया जिससे ये मुझे फैसा नहीं सके। वेदो को प्रमाण न मानने वाल वादो वेदवाह्य कहलाते है क्योकि वे वेदो के बाहर रहते है । पार्वाक बौद्ध और जन वेदबाह है ये घेदों को प्रमाण नहीं मानते। इनके वाद कपट युक्तियों से पूण है उनकी युक्तिमो के थोथेपन को न जानने वाले साप रण मनुष्य उनके वादों को सुनकर उनके सिद्धान्तो को समीचीन मान कर उनमे फम जाते है। मैं उनके वादो से मोहित नही हुमा (३८) का कपोलकल्पित अथ करते हैं। इनके पक्षो से भी मे विचलित नहीं हुआ है, यदि विचलित हुपा होता तो मेरा भी आरमनाश निधित था। मनु महाराज ने क्या ही प्रच्या कहा है कि मा वेवमहा स्मृतयो पाश्व काश्च पुष्टय । सर्वास्ता निष्फला प्रेत्य तमोमिष्टा हिता स्मृता ॥ अर्थात् जो वेदबाह्य स्मृति प्रथ है तथा कुदृष्टि अप हैं ये सब निष्फल है मरने के बाद कुछ भी सुफल नही दे सक्ते क्यों किये नरक पहुँचाने वाले हैं अथवा तमोगुण पर आधारित है तमोगुण प्रसूत होने के कारण उन अर्थों में भ्रात पारणामों की ही मर मै मार है। प्रतएव उनसे किसी का भी कल्यार नहीं होता। कुटष्ठियों के पक्षों से विचलित नहीं हुमा है यह मेरे हाथ की बात नही, मुभ में उतनी शक्ति कहाँ । यह भी पाप की ही कृति है मापने कुपा करके मुझे उनके पक्षों से विचलित होने नही दिया यह भागका महान् उपकार है। मापने इवने ही उपकार नहीं किये किन्तु पागे भी एक विलक्षण उपकार किया है। उसे बतलाता है। सुनिये- यो यतिपमहान माहामसिक तत्पौत्रबामाचामनह मो इति है जय मयि से मर स्वल्पावशिष्ट हे श्रीरङ्गनाथ भगवन मतिराज श्रीभाष्यकार स्वामी जी के एक रसोइया थे उनका नाम भएतातिहर स्वामी जी' है। बे रसोई बना करके प्रति दिन थीभाष्यकार जी को मिक्षा देते थे। यहां पर श्री गुरुपरम्परा प्रभाव में वणित यह चरित प्यान देने योग्य है। श्रीभाष्यकार स्वामी जी जब धीरज मे विराजते थे उस समय कई पुष्टों के द्वारा बहकाये हुए एक गृहस्थ नै भिक्षाप्रसग में श्रीमाष्यकार स्वामी जी की मौलो मे विमिमिक्षा डाल दी। श्री भाष्यकार स्वामीजी में उसे कक दिया। एक काक उसे खाकर सुरन्त भर गया । बीभाष्यकार स्वामी को उसी दिन से अपवास करने लगे। यह चुता बिजली की तरह चारों तरफ फल गया इस सान्त को सुनकर श्रीगोटीपूर्ण स्वामी जी तथा महापूर्ण स्वामी जी गोयोपुर ( ३६ ) से श्रीरङ्ग आये। श्रीरामानुजाचार्य उन प्राचार्यों के शुभागमन को सुनकर अगवानी करनेके लिये चल पडे । इधर से श्रीरामानुज स्वामी जी चले थे, उधर से वे दोनो आचार्य प्राये, दक्षिण कावेरी के मध्य में सम्मिलन हुआ। श्रीरामानुज स्वामी जी ने दो चार बार श्रीमहापूर्ण स्वामो जो को साष्टाग प्रणाम किया श्रीमहापूर्ण स्वामी जी ने आगे प्रणाम करने से रोक दिया। बाद श्रीरामानुज स्वामी जी श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामी जी को प्रणाम करने लगे । दस बीस बार साशग करने पर भी श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामी जी ने श्रीरामानुज स्वामी जी को विरत होने के लिये नही कहा । मध्यान्ह का समय है, रेतीली भूमि है कडी धूप है श्रीरामानुज स्वामी जी साष्टाग प्रणाम करते ही रहे । श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामी जी से कुछ कहने के लिये किसी को भी साहस न हुआ । उस समय श्रीरामानुज स्वामी जी के क्लेश को देखकर नही सहते हुए एक महानुभाव शिष्यमण्डली को चीरकर दौड कर पाये। श्रीरामानुज स्वामी जी को वाहुबन्धन मे लेकर उन महानुभाव ने श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामी जी से कहा कि आप क्या इनको जीवित रखना नही चाहते हैं। ये तो सात दिन से उपवास कर रहे है अतएव बहुत कृशित हो गये हैं इस कडे धूप मे इस वालुका मे आप को वारम्बार प्रणाम करते हुए थकते जा रहे है. इस दुर्दशा मे भी आपका हृदय पसीजता नहीं क्या यही प्राचार्यधर्म है ? उत्तर में श्रीगोष्ठोपूर्ण स्वामी ने कहा कि हम इनको सौ वर्ष से अधिक जीवित रखना चाहते हैं, हमारा हृदय पहले से ही पसोज गया है, अतएव उस वृत्तान्त को सुनकर श्रीगोष्ठीपुर में दौडकर पारहे हैं, हम इस शिष्यमण्डली मे आपको ढूंढते थे। धीभाप्यकार स्वामी जी के श्रीविग्रह पर विशेष प्रेम करने वाले पाप मिल गये हैं। प्राज से आप ही इनको भिक्षा दें। इनको सात घरो मे जाकर भिक्षा लेने की मावश्यकता नही । कलि इतना बढ़ गया है कि गृहस्थ सन्यासी को भी विपमित्र भिक्षा देने लग गये हैं। इस कलिकाल मे सन्यासी को ऐसे ही व्यक्ति के यहाँ भिक्षा लेना चाहिये जो सन्यासी के शरीर में विशेष (४०) अक्षा रखते हों। इसलिये सब सोच विचार कर हम प्रादेश देते है कि श्रीरामानुज स्वामी जी को पाप ही भिक्षा दें तथा श्रीरामा- तुज स्वामी जी भाप से ही भिक्षा लें। इस प्रकार श्रीगोष्ठीपूण स्वामी जी ने व्यवस्था दी । वे महानुभाष श्रीप्रणतातिहर स्वामी जी ही है। उसी दिन से श्रीप्रणतातिहर स्वामी जी श्रीभाध्यकार स्वामी को भिक्षा देने लगे। श्रीप्रयतातिहर स्वामी जी ज्ञान पराग्य भक्ति और अनुष्ठान में अद्वितीय थे। "वेदान्तोदयन' ऐसा उनका विरुद है। न्यायशास मे श्रीउदयनाचाय का जो स्थान है, वही स्थान इनका वेदान्त शास मे है । इनका दूसरा नाम श्रीकृष्णाचाय है। इन्होने श्रीभाष्यकार स्वामी जी के सन्निधि में बारह बार वेदान्त शाल का अध्ययन किया है। इनके प्रपौत्र अर्थात् पौत्र के पुत्र ही श्री पात्रेय रामानुजाचाय स्वामी जी है। इनका 'वादि हसाम्यवाह ऐसा विरुद्ध प्रसिद्ध है। जिस प्रकार मेघ हसों को भगाता है, उसी प्रकार ये शाखाम मे परवादियों को भगाते थे। भतएव इनको वादिहसाम्बुवाह" ऐसा विरुद्ध प्राप्त हुमा । धीमात्रयरामानुजाचार्य स्वामी जी भी शान बैराम्य भक्ति और अनुष्ठान के भण्डार थे। श्रीदेशिक स्वामी जी धीरङ्गनाथ भगवान से कहते हैं कि हे श्री भगवन् ! प्रापने कृपा करके श्रीप्रणतातिहर स्वामी जी के प्रपौत्र बीमात्रय रामानुजाचाय स्वामी जी के सनिधि मे मुझे पहुँचा लिया। वे मेरे पापाय है में उनका शिष्य हूँ, इस दिव्य सम्बध के कर्ताधर्ता सब कुछ भाप ही है, भाचाय के अनुग्रह से मुझे सब कुछ मिल गया। यह सब पापकी कृपा का फल है। मेरे विषय मे पापका कर्तव्य भार स्वल्स ही ह गया है मुझे इस शरीररूपी कारागृह से निकालकर चिरादि मार्ग से परमपद लेजाकर स्वल्पाविर्भावपूर्वक कैडर्ष साम्राज्य में अभिषिक्त करना ही बाकी रह गया है इसे भी पाप ही पूण कीजिये । आपने इतो महाप उपकार किये हैं, बचे हुए भाग को भी पूर्ण कर दो ऐसा मेरा मटम विश्वास है। यह कहावत प्रसिद्ध है कि विक्रांत करिणि किमकुरो विवाद अर्थात् हाथी के बिक जाने पर भकुश वलवादेरनपेक्षणात तनुनृतां मन्यादिवद व्यापिनी अगणागति की दूसरी विपना यह है कि इनमें सब का अधिकार है। पी जीव गरणागति कर सकते हैं। भक्तियोग में यह बात नहीं । इन- निपदों में जो ब्रह्माविबायें कही गई है, वे भक्तियोग कहलाती है। उन ब्रह्मविद्याओं में वणिक मनुष्य ( ब्राह्मण मत्रिय और वन्ध ) और देवताओं का ही अधिकार है। ये ही उन ब्रह्मविद्यायो का अनुदान कर मक्ते है । यह अयं ब्रह्मसूत्रों में अपनद्राविका और देवताविकरण में वपित है। इसका कारण यह है कि उनिपदों के द्वारा ब्रह्म को जानकर उन ब्रह्मविद्याओं का अनुरान करना होगा । शूद्रों को अनिषों के द्वारा ब्रह्मानान ही नहीं सकता क्योति उनको वेदाध्ययन निषिद्ध है । वेदाव्ययन का अग न्यन है तीनों वर्णों को ही उपनयन विहित है भूद्रों को उसनयन विहित नहीं है। उपनयन न होने कारण भी मृद्रों को वेदाध्ययन में अधिकार नहीं है, मृद्र न बंद काही अव्ययन कर सका है, न वेदान्त उपनिषद का ही। उपनिषदों के द्वारा ब्रह्मजान उन्हें प्राप्न नहीं होता। उपनिषदों के द्वारा ब्रह्मनान न मिलने के कारण शुद्धों का ब्रह्मविद्याओं में अधिकार नहीं माना जाता । सूत्रों को ब्रह्मविद्यामों में अविकार न होने में दूसरा कारण यह भी है कि उपनिषणित ब्रह्मविद्या प्रति भक्तियोग याग आदि वर्मों 1 (४२) को हो न करता है साध्यक्ति अर्थात् प्रपत्तियोग प्रारब्ध को भी मष्ट करता है। श्रीभगवन् ! प्रापके श्री चरणों में प्रपत्ति करने वाले साधक दो प्रकार के है (१) भातप्रपन्न मौर (२) हाप्रपन्न । पातापम उनको कहते है जो इस शरीर के रहते प्राप्त होने वाले श्री ब्रह्मा जी के ऐश्वय को भी परिपूर्ण भगवदनुभव का विरोधी समझ कर त्याग देते हैं तथा वर्तमान शरीरसम्बध को महाग्नि के समान दुसह मानते हुए शरणागति के अनन्तर क्षण मे ही मोक्ष चाहते है शरणागति सपन होने पर श्रीमगवत्प्राप्ति में मरणमात्र का विलम्ब भी नही सह सकते हैं ऐसे उच्चकोटि के प्रपन ही मातप्रपन कहलाते हैं। शरणागति इन मातप्रपलों को उसी क्षण फल दे देती है, अनन्तर क्षणा से लेकर भोगने के लियै चितने प्रारब्ध रह गये हैं उन सब प्रारब्बों को भी नष्कर शुरन्त फल र देती है । यह योग्यता शरणागति को छोड कर दूसरे किसी साधन में है नहीं। सदग्यविषयेऽश्चिन्नवहान्ता हप्तप्रपन्न दूसरी कोटि के शरणागत है। हप्तमपन्न उ हैं कहते है जो दूसरे जम लेना नहीं चाहते है किन्तु इस घरीर का अवसान होते ही मोक्ष पाहते है। पिन श शरीर के अन्त में मोक्ष को अवश्यम्भावी मानकर प्रसन्न रहते है। शरणागति इन हप्त प्रपन्नों के जन्मान्सर देने वाले प्रारधों को भी नष्ट कर इस शरीर के अवसान में मोक्ष दे देती है प्रारष का यह नियम नही है कि वह एक हो जम दे प्रारब्ध अनेक पाम भी दे सकते हैं। उन जमान्तरो को देने वाले प्रारयो को भी धारणागति मत कर देती है। सुप्त प्रपन्नी के विषय मे यह व्यवस्था है। चाहे प्रातमपत्ति हो।माहे दृप्तपत्ति हो दोनों ही प्रपत्तियां प्रारथ को भी नष्ट कर देती हैं प्रार्तप्रपत्ति मा रक्षण से लेकर फल देने में उत्तर संपूर्ण प्रारब को नष्ट कर देती है हपाप्रपति दूसरे जग्मों को देनेवाले पारधो को ना कर देती है। पारस्य को नष्ट करने की दामता प्रपत्ति मे हो भलि में नही । यह प्रपत्ति को पसाधारण विशेषता है।
(४३) । वह्नयादेरनपेक्षरणात् तनुभृता सत्यादिवद् व्यापिनी शरणागति की दूसरी विशेषता यह है कि इसमें सब का अधिकार है। गभी जीव शरणागति कर सकते हैं । भक्तियोग मे यह बात नही । उप- निपदो मे जो ब्रह्मविद्यायें कही गई हैं, वे भक्तियोग कहलाती है । उन ब्रह्मविद्याओ मे त्रैवणिक मनुष्य ( ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य ) और देवताओ का ही अधिकार है। ये ही उन ब्रह्मविद्यायो का अनुष्ठान कर सकते हैं । यह अर्थ ब्रह्मसूत्रो में अपशूद्राधिकरण और देवताधिकरण मे वरिणत है। इसका कारण यह है कि उपनिपदो के द्वारा ब्रह्म को जानकर उन ब्रह्मविद्याप्रो का अनुष्ठान करना होगा। शूद्रो को उपनिपदो के द्वारा ब्रह्मज्ञान हो नहीं सकता क्योकि उनको वेदाध्ययन निषिद्ध है । वेदाध्ययन का अंग उपनयन है तोनो वों को ही उपनयन विहित है शूद्रो को उपनयन विहित नहीं है। उपनयन न होने कारण भी शूद्रो को वेदाध्ययन मे अधिकार नही है, शूद्र न वेद का ही अध्ययन कर सकते है, न वेदान्त उपनिषद का ही। उपनिषदो के द्वारा ब्रह्मज्ञान उन्हे प्राप्त नहीं होता। उपनिपदो के द्वारा ब्रह्मज्ञान न मिलने के कारण शूद्रो का ब्रह्मविद्यानो मे अधिकार नही माना जाता । शूद्रो को ब्रह्मविद्यानो में अधिकार न होने में दूसरा कारण यह भी है कि उपनिपरिणत ब्रह्मविद्या अर्थात् भक्तियोग याग आदि धर्मों • की अपेक्षा रखता है क्योकि वैदिक याग आदि धर्म उस ब्रह्मविद्या के अग हैं। वैदिक याग में शूद्र का अधिकार नही क्योकि वैदिक याग आधान के द्वारा प्राप्त हुए अग्नि तथा अध्ययन के द्वारा प्राप्त हुए ज्ञान की अपेक्षा रखते हैं, शूद्रो का अग्नि के आधान में अधिकार नही क्योकि आधान वसन्ते २ बाहारणोऽग्नीनादधीत ग्रीष्मे राजन्य शरवि वैश्य इस बचन से त्रैवर्षिणको के लिये ही विहित है शूद्रो के लिये नही यह अर्थ पहले ही कहा गया है कि शूद्रो का वेदाध्ययन मे अधिकार नही है। इस प्रकार शूद्रो को न आधान के द्वारा अग्नि प्राप्त होता है, न अध्ययन के द्वारा ज्ञान ही प्राप्त होता है । अग्नि और ज्ञान न होने के कारण शूद्रो को याग में अधिकार नही होता - - (५५) करते हैं कि हम श्री भगवान के परतन्त्र हैं श्रीभगवान की प्रेरणा से ही हम भक्तियोग का अनुष्ठान करते हैं श्रीभगवान ही हम से भक्तियोग करा रहे है इस प्रकार हम साधन करते समय श्रीभगवान के परतन्त्र रहते हैं, इतना ही नही फलप्राप्ति के विषय मे भी हम श्रीभगवान के परतन्त्र है। इस साधना से प्रसन्न होकर यदि श्रीभगवान फल देंगे, तभी हम फल प्राप्त कर सकते है। इस प्रकार भक्त साधना और फलप्राप्ति के विषय मे अपनी पर- तन्त्रता का अनुसन्धान करते हुए साधना करते हैं । शरणागति करते समय प्रपन्न यह धारणा रखते है कि हम श्रीभगवान के अत्यन्त परतन्त्र हैं । जिस प्रकार ज्ञान और शक्ति न होने के कारण अचेतन कोई साधना नही कर सकता उसी प्रकार चेतन होता हुआ भी मै कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग के विपय मे ज्ञान और शक्ति से शून्य होने के कारण किसी भी मोक्षोपाय को नही कर सकता। मेरे लिये उपाय श्री भगवान ही है में अचेतन के समान उनका परतन्त्र हूँ। जिस प्रकार स्वामी अपनी अचेतन वस्तु की तरफ से किसी भी साधना की आशा न रखते हुए अपनी इच्छा से ही अचेतन वस्तु को ऊंचे स्थान पर पहुँचा देते हैं उसी प्रकार हमारे स्वामी श्रीभगवान भी ज्ञानशक्तिहीन मेरी तरफ से किसी भी साधना की प्रतीक्षा न करके स्वय ही उपाय बनकर मुझको परम- पद मे पहुँचा दें। मैं सब प्रकार से अचेतन के समान उनका पर- तन्त्र है। इस प्रकार समझते हुए प्रपन्न श्रीभगवान के शरण में जाते हैं । इस प्रकार की अत्यन्त परतन्त्रता की अवस्था मे प्रपत्ति ही काम देती है, उस अवस्था मे प्रपत्ति ही उचित मानी जाती है भक्ति वैसा औचित्य नही रखती। अपिहितस्वोपायभावा त्वय्येव त्वदुपायधोर्मेऽस्तु श्रीभगवान को प्राप्त करने के लिये श्रीभगवान को ही उपाय मानना शरणा- गति है । गरणागत साधक श्रीभगवान को प्राप्त करने के लिये श्रीभगवान को ही उपाय मानते हैं, दूसरे उपायो मे हाथ नही लगाते । शरणागति मे फल और साधन दोनो श्रीभगवान ही 1 (४४) है। शूद्रो को याग में अधिकार न होने के कारण प्रगरूप में यागों की अपेक्षा रखनेवाली ब्रह्मविद्या मे अधिकार शूद्रों को हो नही सकता । इस विवेचन से सिद्ध होता है कि प्राणको को हो प्रोप निपद ब्रह्मविद्यामो मे अर्थात् भक्तियोग मे अधिकार है। इससे यही निष्कप निकलता है कि शूद्र इत्यादि लोग भक्तियोग से लाभ नही उठा सक्ते। उनके उद्धार के लिये भक्तियोग साधन नहीं बन सकता। भक्तियोग मे सबका अधिकार नहीं है किन्तु कतिपय उच्च वणों का ही अधिकार है। यह एक प्रकार से भक्तियोग की न्यूनता ही है । प्रपत्तियोग में न्यूनता नही है प्रपत्तियोग में सब का अधिकार है । शरीरधारी सभी बद्ध जीव प्रपति के अधिकारी है, चाहे वह प्रपत्ति अपनी तरफ से की जाप या दूसरों के द्वारा की जाय । इसमे कारण यह है कि प्रपत्तियोग वैदिक याग इत्यादि धर्मों की अपेक्षा नहीं रखता है, यह तो प्रानुकूल्यसकल्प इत्यादि पांचों भगो की हो अपेक्षा रखता है। न इसमें प्राधान से प्राप्त होने वाले अग्नि की आवश्यकता है न अध्ययन से प्राप्त होने वाले शान को प्रावश्यकता है। अग्निविद्याशून्प वदिकयागानधिकृत शूद्रो का भी प्रपत्ति मे अधिकार प्रक्षुण्ण रहता है। प्रतएव प्रपति में उसी प्रकार सब का अधिकार माना जाता है जिस प्रकार सत्य भापण मे सब का अधिकार माना जाता है। प्रपत्ति में बाहाण क्षत्रिय वैश्य शूद्र देवता पशु पक्षी और वृक्ष इत्यादि सब का अधि कार है । प्रपत्ति इन सब का उतार कर देती है। यह विशेषता अपत्ति में ही ह। - पायवारमनियतत्यस्पात योषिता हे श्रीरङ्गनाथ भगवन् हम सभी जीव पापो परत न है मह परत ती है, यह परत त्रता हमारे पारमस्वरूप के साथ गाढ सवद्ध है जब तक हम लोग रहेंगे तब तक परत रता भी हम लोगों में बनी रहेगी। हम सभी जीव नित्य है सवदा रहने वाले हैं आपके प्रति परत प्रसा भी हम लोगों में सर्वदा बनी रहेगी। इस परताना से अपत्ति अधिक मेल रखती है भक्ति वसे मेल नहीं रखती है । भक यह समझ कर भक्तियोग (५५) करते है कि हम श्री भगवान के परतन्त्र हैं श्रीभगवान को प्रेरणा से ही हम भक्तियोग का अनुष्ठान करते हैं श्रीभगवान ही हम से भक्तियोग करा रहे हैं इस प्रकार हम साधन करते समय श्रीभगवान के परतन्त्र रहते है, इतना ही नही फलप्राप्ति के विषय मे भी हम श्रीभगवान के परतन्त्र है। इस साधना से प्रसन्न होकर यदि श्रीभगवान फल देंगे, तभी हम फल प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार भक्त साधना और फलप्राप्ति के विषय मे अपनी पर- तन्त्रता का अनुसन्धान करते हुए साधना करते हैं । शरणागति करते समय प्रपन्न यह धारणा रखते हैं कि हम श्रीभगवान के अत्यन्त परतन्त्र है । जिस प्रकार ज्ञान और शक्ति न होने के कारण अचेतन कोई साधना नही कर सकता उसी प्रकार चेतन होता हुआ भी मै कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग के विषय में ज्ञान और शक्ति से शून्य होने के कारण किसी भी मोक्षोपाय को नही कर सकता। मेरे लिये उपाय श्री भगवान ही हैं मैं अचेतन के समान उनका परतन्त्र हूँ । जिस प्रकार स्वामी अपनी अचेतन वस्तु की तरफ से किसी भी साधना की आशा न रखते हुए अपनी इच्छा से ही अचेतन वस्तु को ऊँचे स्थान पर पहुंचा देते है उसी प्रकार हमारे स्वामी श्रीभगवान भी ज्ञानशक्तिहीन मेरी तरफ से किसी भी साधना की प्रतीक्षा न करके स्वय ही उपाय वनकर मुझको परम- पद मे पहुँचा दें । मैं सब प्रकार से अचेतन के समान उनका पर- तन्त्र है। इस प्रकार समझते हुए प्रपन्न श्रीभगवान के शरण मे जाते हैं । इस प्रकार की अत्यन्त परतन्त्रता की अवस्था मे प्रपत्ति ही काम देतो है, उस अवस्था मे प्रपत्ति ही उचित मानी जाती है। भक्ति वैसा औचित्य नही रखती। अपिहितस्वोपायभावा स्वय्येव त्वदुपायघोर्मेऽस्तु श्रीभगवान को प्राप्त करने के लिये श्रीभगवान को ही उपाय मानना शरणा- गति है। गरणागत साधक श्रीभगवान को प्राप्त करने के लिये श्रीभगवान को ही उपाय मानते हैं, दूसरे उपायो मे हाथ नही लगाते । शरणागति मे फल और साधन दोनो श्रीभगवान ही (४६) है । प्राप्त होने से श्रीभगवान फल माने जाते हैं। उपाय होने से श्रीभगवान साधन माने जाते हैं। लोग हरी घास को हाप में लेकर गो को दिखाकर गौ को बुलाते हैं, उस पास को दिखा दिखाकर गौ को गोष्ट में पहुँचाकर तब उसे खाने को देते हैं, यहा पर घास यापन और फल दोनों है। पास के सहारे से ही गो गोष्ठ पहुँचानी जाती है इसलिये घास साधन है पास पन्त में गौ को खाने के लिये दी जाती है, गो का खाध होने से पास फल भी हैं। वैसे ही मत मैं समझना चाहिये । शरणागति में प्राप्य और प्रापक दोनों श्रीमगवान ही है। जिस प्रकार मकियोग मोक्ष का साधन है बसे हो प्रपतियोग भी मोक्ष का साधन है। यह प्रर्थ शाखाथविचार से सिद्ध होता है। जिस प्रकार मजस्व भाम कहकर भक्ति का विधान किया गम है। उसी प्रकार शरण कह कर प्रपत्ति का विधान किया गया है। भक्तियोग मोर प्रपतियोग में अन्तर इवना है कि साधक भक्तियोग करते समय यक्ति को उपाय समझ सकते हैं पर प्रपत्तियोग करते समम प्रपत्ति को उपाय नहीं समझ सकते हैं। इसमें कारण यह है शरणागति करते समय सापक श्रीभगवान को ही उपाय भानवे है, उस समय शरणागति को उपाय नही मान सकते हैं। श्री भगवान को ही उपाय मानना था शरणागति को भी उपाय भानना ये दोनों पार्टी एक साथ नही भास सकती । शाख से शरणी गति का पामत्व सिद्ध होने पर भी धारणागति के अनुशानकाल मे शरणागति का उपायन बुदिविषय नहीं होता श्रीभगवान का हो पायव अनुसहित होता है। उस समय धीभगवान के उपायस्य से धरणागति का पायत्व उसी प्रकार प्राच्छादित हो जाता है। जिस प्रकार दिन में सूर्य के प्रकाश से वारागरण का प्रकाश भाज्या दित हो जाता है। श्रीदेशिक स्वामी जी मोरङ्गनाम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे श्रीभगवान ! शरणागति करते समय मेरे मन में यही भावना बनी रहे कि श्रीभगवान को प्राप्त करने के लिये श्रीमगवान ही आप है, इस भावना से दूसरी भावना- (४७) कि शरणागति भी उपाय है-दबी रहे, अभिभूत रहे एक मात्र आपके विषय मे ही उपायत्व भावना रहे। शरणागति के उपायत्व तक को ख्याल न करके एक मात्र श्रीभगवान को उपाय मानना ही उच्चकोटि की शरणागति है। हे श्रीभगवन, कृपा करके इस प्रकार की उच्चकोटि की शरणागति को मुझसे सपन्न कराइये । यही प्रार्थना है ॥१०॥ - । ( ११ ) स्वय्याचाविनिहितभरास्तावका रङ्गनाथ त्वत्कैदूर्यप्रवरणमनसस्त्वद्गुणास्वादमत्ताः त्वय्येकस्मिन्नपि विजहतो मुक्तवत् साधनत्वं स्वच्छेषत्वस्वरसरसिकाः सूरयो मे स्वदन्ताम् ।। शरणागति तीन प्रकार की है (१) स्वनिष्ठा (२) उक्तिनिष्ठा और (३) आचार्यनिष्ठा। कई महानुभाव प्राचार्य के उपदेश से स्वस्वरूप और परस्वरूप इत्यादि के विपय मे विशदज्ञान को प्राप्त कर स्वय भगवान के शरण मे जाते हैं । इसे स्वनिष्ठा कहते हैं। कई महानुभाव विशदज्ञान न होने पर भी यह समझते हुए कि- शरण मे जाने पर श्रीभगवान अवश्य रक्षा करेंगे-श्रीभगवान के सन्निधि मे जाकर वहां प्राचार्य के द्वारा उपदिष्ट द्वयमन्त्र का उच्चारण करते हुए श्रीभगवान के शरण मे जाते हैं । इसे ही उक्तिनिष्ठा कहते है । इससे भी प्रसन्न होकर श्रीभगवान फल देते । भले ही साधक को द्वयमन्त्रार्थ के विषय मे विशदज्ञान न हो । परन्तु श्रीभगवान को विशदज्ञान है । अतएव श्रीभगवान साधक को फल देते हैं । यहाँ पर दो दृष्टान्त ध्यान देने योग्य हैं (१) उपनयन सस्कार को प्राप्त हुआ छोटा बालक भवति भिक्षां देहि इस वाक्य का अर्थ न जानता हुआ भी यदि उदार पुरुषो के द्वार पर उपस्थित होकर भवति भिक्षां देहि इस वाक्य का उच्चारण करता है तब उन गृहस्थो को खियाँ इस वाक्य का अर्थ जानकर - हैं।
(४८) ब्रह्मचारी को भिक्षा देती है, उच्चारण करने वाले को अयज्ञान न पर भी पाक्य बुद्धिमान श्रोताओं को बोध करा ही देता है। इस प्रकार विना समझ के कहे हुए वाक्य से ब्रह्मचारी का मनोरयपूरण हो जाता है। (२) बलवान राणा के द्वारा युद्ध में दूसरे राजा का सहार होने पर विषित राजा का अवोध बालक घाई के द्वारा सिखाये गये महाराज मां पाहि इस वाक्य को रटता हुमा जब विजेता राजा के समक्ष पहुंचता है, सब बिजेता राजा उस वाश्य का अर्थ समझकर अवश्य उस बालक की रक्षा करता है। कारण यह है कि प्रबोध बालक भले ही उस वाक्य का अथ न जाने तथापि बुद्धिमान राजा जानता है, अतएम उस बालक की रक्षा हो पाती है। वैसे ही प्रकृत में समझना चाहिये । परणामत यदि इतना ही जानकर कि शरण मे जाने पर श्रीभगवान अवश्य रक्षा करेंगे, आचाम के द्वारा उपदिष्ट इयमन्त्र का उच्चार करता हमा श्रीभगवान के शरण में जाय भले ही यमत्र के प्रयं को अच्छी तरह से न पाने, तपापि इसके मुखसे निकले द्वयमत्र के प्रथ को समझने वाले सर्वज्ञ श्रीभगयान उक्तिनिष्ठा शरणागति करनेवाले शरणागत को भी रक्षा कर देते हैं। शरणागति का वीसरा प्रकार भाषामनिधा है। प्राचार्यनिष्ट शरणागत अन्यान्य कारणागतों के समान स्वय धीमगवान के शरण मे नही जाते है किन्तु प्राचाय के शरण में ही रहते हैं । ये समझते है कि प्राचार्य ही हमारे लिये शरण है उनकी कृपा से हो हमको मोक्ष मिलेगा। प्राचाय के द्वारा इनको मोक्ष इस प्रकार प्राप्त होता है कि प्राचाम अपने माषित जीवों की रक्षा करने के लिये श्रीभगवान से इस प्रकार प्रापना करके मर समर्पण कर देते है कि है घीभगवन् । ये जीव मेरे प्राश्रित , पाप इनकी रक्षा का भार ल, मेरे शरण में रहने वाले इन जीवों को रक्षा कृपया पाप करें मै मापकै थी चरणों में इनकी रक्षा के भार जो समर्पित करता है। इस प्रकार प्राथाय के द्वारा भरसमपण जाने पर श्रीभगवान प्रसन्न होकर भाषाय के चरण में रहने 7 की रक्षा करते है । इसे ही प्राचार्यनिष्ठा कहते हैं।
(४६) पूर्व श्लोक मे श्रीदेशिक स्वामी जी ने स्वनिष्ठा शरणागति का वर्णन किया। इस श्लोक मे प्राचार्यनिष्ठा का वर्णन करते हुए श्रीभगवान से प्रार्थना करते हैं कि इन प्राचार्य निष्ठ शरणागतो पर हमको श्रद्धा भक्ति और प्रेम बढे। प्राचार्यनिष्ठा मे निम्नलिखित वचन प्रमाण है । लक्ष्मीतन्त्र मे कहा गया है कि- आत्मात्मीयभरन्यासोह्यात्मनिक्षेपउच्यते । अर्थात् अपने रक्षाभार तथा आत्मीय जनो के रक्षाभार को श्रीभगवान के चरणो मे समर्पित करना आत्मनिक्षेप कहलाता है । शाण्डिल्य स्मृति में कहा गया है कि- पुत्रःप्रेष्यस्तथा शिष्य इत्येवं च निवेदयेत् । अर्थात् आचार्य पुत्र शिष्य और सेवक का नाम लेकर इनके भार को श्रीभगवान् के चरणो मे समर्पित करदें। आचार्यनिष्ठ महानुभावो के विषय मे यह श्लोक प्रवृत्त है । हे रङ्गनाथ ! त्वय्याचार्यविनिहितभरास्तावका हे श्रीरङ्गनाथ भगवन् | आचार्यनिष्ठ शरणागत यद्यपि साक्षात् स्वय आपके शरण में नहीं पाते हैं किन्तु प्राचार्य के शरण मे ही रहते हैं, परन्तु उनको आश्रय देने वाले आचार्य उनके रक्षाभार को आपके यहाँ समर्पित कर देते हैं, इस प्रकार उनकी भी शरणागति सपन्न हो जाता है। उन लोगो का रक्षाभार प्राचार्य के द्वारा आपके चरणो मे समर्पित हो जाता है इसलिये वे आपके हो जाते है। आप उनको भी अपना मान लेते हैं। प्राचार्यनिष्ठ शरणागतो में आपका प्रेम वढ जाता है । आपने ठीक कहा है कि मम मद्भक्तभक्तेषु प्रीतिरभ्यधिका भवेत् अर्थात् हमारे भक्तो के प्रति जो भक्त है उनके विषय मे हमको प्रीति बढ जाती है, खास हमारे भक्तो के विषय मे भी हमको उतना प्रेम नही जितना प्रेम उन भक्तो के विषय मे होता है। वे भी आचार्य को इष्टदेव समझकर आपके दास बन जाते हैं। उनका आपके साथ सम्बन्ध प्राचार्य के द्वारा होता है, वे इसी सम्बन्ध को (५०) उसी प्रकार पक्का एव परम पुनीत समझते हैं जिस प्रकार माता पिता के द्वारा सपादित होने वाले पतिसम्बध को कन्या पक्का एव परम पवित्र समझती है। वे स्वनिष्ठा शरणागति को स्वयंवर के समान तथा पाचायनिष्ठा को धार्मिक ववाहित सम्बध के समान समझकर उसी प्रकार मापके अधीन रहते है जिस प्रकार विवाहित वधू पति के अधीन रहती है। त्वकरणप्रवणमनसस्वदगुणास्वादमत्ता पाचायनिष्ठ शरणा गों का मन सर्वदा मापके कर्य में उसी प्रकार मासक रहना है जिस प्रकार विवाहित सी का मन पति सेवा में प्रासक रहता है। पापके कार्य के सिवाय उनको दूसरा कुछ भी पुरुषार्थ नहीं माता । जब वे कलम से विरत होते है तव पापके गुणानुभव में लग जाते हैं। पापके कल्याणगुणों का मास्वाद करते करते मस्त हो जाते है। श्रीराम और श्रीकृष्ण इत्यादि अवतारों में प्रापने जिन जिन दिव्य कल्याणगुणों को प्रकाशित किया था उन उन चरित्रों के अनुसार उन कल्याणगुणों का अनुभव करते हुए वे निर्भर निर्भय एव इष्ट मन वाले बन जाते हैं। वे सबदा यही कहते रहते है कि जब श्रीभगवान ने जगमाता थी वो के विपम में असम अपराध करने वाले पर भी कृपा की तथा लगातार तीनों बमों में कैप करनेवाल शिशुपाल को भी सायुज्य मुक्ति को तव हमे क्यों न अपनायेंगे हमने तो वैसा अपराध नही किया। परिपूर्ण विश्वास है कि श्रीभगवान हमें प्रवश्य प्रपनामेंगे । श्रीभगवान परम स्वतत्र होते हुए भी आश्रितों के सामने परतत्र बन जाते है सवश होते हुए भी प्राधितों के अपराध के विषय में अविज्ञात बन जाते है, सर्वस्वामी होते हुए भी माश्रितों के दास बन जाते है। सब से श्रेष्ठ होते हुए भी निपादराज सुग्रीष एवं शबरी तथा श्री सुदामा जी कुब्जा और गोपिकामों से हिलमिलकर रहने में ही रसानुभव करते है । कहाँ तक कहा जाय श्रीभगवान के कल्याणगुण मनन्त है वत्सत श्रीभगवान मेरे अपराध को बिना देखे ही मुझे अवश्य अपनायगे । स्वामी श्रीमगवान भैरी प्राप्ति को अपना नाम (५१) समझ कर सहर्ष मुझे स्वीकार करेंगे । सुशील श्रीभगवान अत्यन्त विश्वसनीय हैं, उनसे दूत्य सारथ्य इत्यादि के समान अनुचित कार्य भी लिया जा सकता है, वे किसी भी काम को अनुचित न समझते हुए सर्वदा आश्रितो के मनोरथ पूर्ण करने मे ही दत्तचित्त रहते है । सर्वज्ञ श्रीभगवान हम लोगो को देने योग्य सर्वविधिहितो को दूर करने योग्य विरोधी तत्त्वो को सर्वदा समझते रहते हैं। सर्वशक्ति- सम्पन्न श्रीभगवान अत्यन्त नीच बने हुए हम लोगो को भी नित्य सूरियो की परिपद् मे बैठा सकते है । सत्यसकल्प श्रीभगवान अपने प्राश्रितरक्षण सकल्प को कभी व्यर्थ होने नही देगे। परमदयालु श्रीभगवान शरणागति इत्यादि क्षुद्र साधनो को भी निमित्त बनाकर अवश्य रक्षा करेंगे । कृतज्ञ श्रीभगवान हम लोगो के द्वारा सम्पन्न अत्यल्प अनुकूल व्यापार को भी परमोपकार मान कर अवश्य कृपा करेंगे। स्थैर्यगुणयुक्त श्रीभगवान अत्यन्त अन्तरङ्गो के द्वारा विरोध किये जाने पर भी हम लोगो को नहीं छोड़ेगे। श्रीविभीपण जी को अपनाकर श्रीभगवान ने इस दिव्य गुण को प्रकाशित किया। परिपूर्ण श्रीभगवान सेवा में दिये जाने वाले पदार्थों के मूल्य पर ध्यान नही देंगे किन्तु भाव पर ही ध्यान देगें । परमोदार श्रीभगवान उपाय की क्षुद्रता उपेय की महत्ता एव पात्र के निकर्प पर ध्यान न देकर सर्वस्व भी देंगे। इस प्रकार प्राचार्यनिष्ठ श्रीभगवान के कल्याणगुणो का आस्वाद लेते हुए मस्त हो जाते हैं। श्रीभगवद्- गुणानुभव से प्रेरित होकर द्विगुण उत्साह से कैर्य करते रहते हैं। त्वय्येकस्मिन्नपि साधनत्व मुक्तवद्विजहत. हे श्रीभगवान् । आप सब से मुख्य हैं, आप उपायो मै सव से प्रवान उपाय हैं। प्राचार्य- निष्ठ शरणागत आपके विपय मे भी उपायत्व भावना नही रखते हैं। वे समझते हैं कि श्रीप्राचार्य ने मेरे लिये शरणागति की। प्राचार्य जो श्रीभगवान को उपाय समझ रहे हैं उससे ही मेरा कल्याण हो जायगा । हमको अलग श्रीभगवान को उपाय समझने की आवश्य- कता नहीं हैं । जिस प्रकार मुक्त लोग सर्वविध मनोरथ सपन्न होने के कारण श्रीभगवान मै उपायत्व भावना नहीं रखते हैं, उसी प्रकार (५०) उसी प्रकार पक्का एवं परम पुनोत समझते हैं जिस प्रकार माता पिता के द्वारा संपादित होने वाले पतिसम्बर को बाम्पा पक्षका एव परम पवित्र समझती है। वे स्थनिष्ठा रणागति को स्थावर के समान तथा पाचायनिक को पामिर बाहिर सम्बय के समान समझकर उसी प्रकार प्रापदे पपीन रहते है जिस प्रकार विवाहित बध पति के प्रधान रहती है। सत्करप्रवणमनसस्वद्गुरखास्याबमत्ता पानायनिष्ट सरणा गतों का मन सदा मापक सूप में उसी प्रकार पासक रहता है जिस प्रकार विवाहित स्त्री का मन पति सेवा में पासक रहता है। भापके के सिवाय उनको दूसरा कुछ भी पुरमाय नहीं भाता है । जव वैक्डूप से विरत होते हैं तर भापके गुणानुभव में लम माते है। प्रापक कल्याणमुखो का मास्वाद परते परते मस्त हो जाते हैं। धीराम पौर श्रीकृष्ण इत्यादि अबतारों में प्रापने जिन जिन दिव्य कल्याणगुणों को प्रकाशित किया था उन वन चरित्रों के अनुसार उन कल्याणगुणों का अनुभव करते हुए निर्भर निर्भय एव हट मन माल बन जाते हैं। ये सबदा मही कहते रहते है कि जब श्रीभगवान ने जम्माता श्री जी के विषय में प्रसहा अपराध काले बाल पर भी कृपा की तया लातार तीनों जमो में शेप करलेवान शिशुपाल को भी सापुग्य मुक्ति दी तय हो बमों न अपनायगे । हमने तो वैसा शराब नही किया। परिपूर्ण विश्वास है कि श्रीभगवान हमे बस अपनायगे। श्रीभगवान परम स्वतच होडे हुए भी आश्रितों के सामने पर बन जाते है सर्व होते हुए भी पाश्रितों के अपराध विषय में मवितात बनाते है सर्वस्वामी होते हुए भी प्राश्रितों के दास बन बाते । सबसे श्रेष्ठ होते हुए भी निपादराब सुपोष एव शबरी या श्री सुदामा जी कुना और गोपिकामों में दिलमिलकर रहने मे ही रसानुमब करखे है । कहाँ तक कहा जाय श्रीमगवान के कल्याणगुण अनन्त हैं बसाल श्रीभगवान मेरे अपराध को बिना देखे हो भुके अवश्य अपनायेगे। स्वामी थीभगवान मेरी प्राप्ति को अपना भाम ( ५१ ) समझ कर सहर्प मुझे स्वीकार करेंगे। सुशील श्रीभगवान अत्यन्त विश्वसनीय हैं, उनसे इत्य सारथ्य इत्यादि के समान अनुचित कार्य भी लिया जा सकता है, वे किसी भी काम को अनुचित न समझते हुए सर्वदा आश्रितो के मनोरथ पूर्ण करने मे ही दत्तचित्त रहते है । सर्वज्ञ श्रीभगवान हम लोगो को देने योग्य सर्वविधिहितो को दूर करने योग्य विरोधी तत्त्वो को सर्वदा समझते रहते है। सर्वशक्ति- सम्पन्न श्रीभगवान अत्यन्त नीच बने हुए हम लोगो को भी नित्य सूरियो की परिषद् मे बैठा सकते हैं । सत्यसकल्प श्रीभगवान अपने प्राश्रितरक्षण सकल्प को कभी व्यर्थ होने नही देगे। परमदयालु श्रीभगवान शरणागति इत्यादि क्षुद्र साधनो को भी निमित्त बनाकर अवश्य रक्षा करेंगे। कृतज्ञ श्रीभगवान हम लोगो के द्वारा सम्पन्न अत्यल्प अनुकूल व्यापार को भी परमोपकार मान कर अवश्य कृपा करेंगे । स्थैर्यगुणयुक्त श्रीभगवान अत्यन्त अन्तरङ्गों के द्वारा विरोध किये जाने पर भी हम लोगो को नही छोडेंगे। श्रीविभीषण जी को अपनाकर श्रीभगवान ने इस दिव्य गुण को प्रकाशित किया। परिपूर्ण श्रीभगवान सेवा में दिये जाने वाले पदार्थों के मूल्य पर ध्यान नहीं देंगे किन्तु भाव पर ही ध्यान देगें । परमोदार श्रीभगवान उपाय की क्षुद्रता उपेय की महत्ता एवं पात्र के निकर्ष पर ध्यान न देकर सर्वस्व भी देंगे। इस प्रकार आचार्यनिष्ठ श्रीभगवान के कल्याणगुणो का आस्वाद लेते हुए मस्त हो जाते है। श्रीभगवद्- गुणानुभव से प्रेरित होकर द्विगुण उत्साह से कैङ्कर्य करते रहते हैं । त्वय्येकस्मिन्नपि साधनत्व भुक्तवद्विजहतः हे श्रीभगवान् । प्राप सब से मुख्य हैं, आप उपायो मै सव से प्रधान उपाय हैं । आचार्य- निष्ठ शरणागत आपके विषय मे भी उपायत्व भावना नही रखते हैं वे समझते हैं कि श्रीआचार्य ने मेरे लिये शरणागति की। प्राचार्य जो श्रीभगवान को उपाय समझ रहे है उससे ही मेरा कल्याण हो जायगा । हमको अलग श्रीभगवान को उपाय समझने की आवश्य- कता नही हैं । जिस प्रकार मुक्त लोग सर्वविध मनोरथ सपन्न होने के कारण श्रीभगवान मे उपायत्व भावना नही रखते हैं, उसी प्रकार (५२) माचायनिष्ठ महात्मा सोग भी पाचाय के द्वारा की गई शरणार्गात से अपनी इष्ट सिद्धि को अवश्यभावी मानकर श्रीभगवन् ! पाप में उपायत्वभावना नही रखते तथा जो कुछ बडय करते रहते हैं उसे भी उपाय नाही मानते । स्वच्छेषत्वस्परसरसिका पूरयो मे स्वताम है श्रीभगवन् इस प्रकार प्राचायनिष्ठ सत्पुरुष अपने द्वारा सपन्न होने वाले पैडम के विषय में तथा भापके विषय में भी उपायत्व भावना को तिला अलि देकर सवदा प्रापकी सेवा में रस लेते रहते हैं । विमो न रिसी प्रकार से आपके उपयोग में पाने में ही उन्हे रस मिलता है। उन को और सब कुछ नीरस तथा प्रापकी सेवा रसमय प्रतीत होती है । इस प्रकार नि स्वाथ भाव से विशुद्ध सेवा में रत यह प्राचायनिछ महात्मा लोग हो वास्तव में विद्वान कहलाने योग्य हैं। हे श्रीभगवन् मेरी पही प्रापना है कि ऐसे भाचायनिष्ठ शरणागतों के प्रति मेरे मन मे रुचि अदा भक्ति और प्रेम बनें। ये सर्वदा हमको अच्छे लगते रहें ॥११॥ ( १२) कल्पस्तोमेऽप्यपास्तत्वदितरगतयोऽशक्त्यधी भकि भून्ना रङ्गश प्रातिकूल्यक्षरणपरिणमनिविघातानुकूल्या । प्रातार त्वामभेधाच्छरएवरणतो नाय निविघ्नयन्त- स्त्वनितिमात्मरक्षा प्रति रमसजुषस्स्वप्रवृत्ति त्यजन्ति ।। पूर्वश्लोक मे श्रीदेशिक स्वामी जी ने प्राचार्यनिष्ठ का वर्णन किया है इस श्लोक में श्रीदेशिक स्वामी जी परणागति के प्रषि कारी, शरणागति के प्रण और स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते है कि शरणागत शरणागति के बाद अपने अभिमत फल को प्राप्त करने के लिये किसी उपाय मे भी नहीं लगते हैं । हे रङ्गश नाथ पिशवधीमतिमूम्बा कारसस्तोमेऽप्यपास्तरव वितरणतम हे श्रीरङ्गनाथ भगवन् । भाप नाय हो, आपके शरण (५३) में आना ही न्यायप्राप्त है। आपके शरण मे पाने के लिये वे अधिकारी योग्य माने जाते है जो सर्वथा उपायहीन हैं। उनकी यह धारणा होती है कि चाहे सहस्रो कल्प बीत जाये तो भी श्रीभगवान को छोडकर दूसरा कोई उपाय हमे नही दिखाई दे रहा है। यह वात तो होने वाली नही है कि अधिकाधिक जन्म लेने पर हम उपायान्तर के लिये योग्य अधिकारी बन जाय, चाहे अनेक जन्म ले तो भी ऐसे ही रह जायेंगे । सुधरने की तथा उपायान्तर के योग्य अधिकारी बनने की कोई पागा नही है । उन जन्मो मे भी ऐसे ही कोरे रह जायेगे। श्रीभाष्यकार स्वामी जी ने भी श्री वैकुण्ठगद्य मे इस अर्थ का वर्णन किया है। श्रीभाष्यकार स्वामी जी की यह वाणी है कि तत्प्राप्तये च तत्पादाम्बुजद्वयप्रपत्तरन्यन्न मे कल्पकोटि- सहले रणापि साधनमस्तोति मन्वान । अर्थात् अकिंचन माधक समझता है कि कोटिसहस्र कल्प भी बीत जाये तो भी हम को श्रीभगवान् के चरणारविन्दद्वन्द्व मे शरणागति करने के सिवाय दूसरा साधन प्राप्त होने वाला नही है। श्री भगवान् को प्राप्त करने के लिये भक्तियोग शास्त्रो मे विहित है। भक्तियोग प्राप्त करने के लिये ज्ञानयोग एव ज्ञानयोग प्राप्त करने के लिये कर्मयोग का विधान शास्रो में किया गया है। इनमें कर्मयोग और ज्ञानयोग भक्तियोग के द्वारा मोक्षसाधन हैं, भक्तियोग साक्षात् मोक्षसाधन है । कई साधक श्रीभगवत्प्राप्ति को चाहते हुए भी इन उपायो मे हाथ लगाने के योग्य नही होते हैं। इसमे कारण कई है। उनमे चार कारण मुख्य है । (१) उनमे इन उपायो को करने के लिये पर्याप्त शक्ति नहीं रहती है। (२) उनमें इन उपायो को समझने के लिये पर्याप्त बुद्धि नहीं है। (३) वे उपाय वरिणको के द्वारा ही करने योग्य है । जिन मनुष्यो ने त्रैवणिक कुल में जन्म नहीं लिया है उनको उन उपायो को करने का अधिकार नही है । (४) प्रेम का प्राधिक्य चौया कारण है। कई साधक ऐसे ही मिलते है कि वे उपायान्तरो को करने के लिये पर्याप्त शक्तिज्ञान और ऋणिक जन्म से सपन्न रहते हैं साथ ही श्रीभगवान् में अपार प्रेम से भी युक्त होते हैं। ।
थी भगवान् मे उनको इतना प्रेम रहता है कि शीघ्रातिशीघ्र श्रीभगवान् को प्राप्त करना चाहते हैं। श्रीभगवान् को प्राप्त किम बिना उनसे रहा नही जाता । ऐसे साधको के लिय उपायान्नर काम नही दे सकते, क्योंकि उपायान्तर विलम्ब से भगवत्प्राप्नि बराने वाले है, ये शीन भगवत्प्राप्ति चाहते है। मी स्थिति में इनवे लिये शरणागति ही एक उपाय रह जाता है जा अपक्षित समय म भग वत्प्राप्ति करा सकता है। इस श्लोक में प्रशक्ति गल म प्रथम कारण प्रपो शब्द से द्वितीय रण मोर भक्तिनाब में चतुथ नारण निर्दिष्ट हुए। यह तृतीय कारण का भी उपलक्षण है। प्रत उम भी यहाँ लेना चाहिये । इन चार निमित्तो स जो माधा उपायान्तर से शून्य हो जाते है ये साधक हो अक्चिन कहलाते हैं तथा ये ही शरणागति के अधिकारी है। भक्तपादौ शक्तधभाव यह 'लोक यहाँ अनुमय है। कई ग्रीकोशो मै प्रशक्तिपी भक्तिभूम्ना ऐगा पाठ है। उमा अथ इस प्रकार है कि जो साधक उपायानरो को समझने की गति नही रखते, जो साधक समझने के लिये प्रयाप्त बुद्धि बल से संपन्न होने पर भी उन साधनो को निभाने के लिये पर्याप्त शारीरिक बल से सपन्न नहीं तथा जो साधक पर्याप्त बुद्धिबल और शारीरबल से सपन होने पर भी धीभगवान् मे अपार प्रेम होने के कारण जल्दी ही थीभगवान को प्राप्त करना चाहते है ये तीनों हो साधक गरया- गति के अधिकारी माने जाते है। जो साधक इन कारणो मे ध्यान देते हुए यह समझते है कि अनेक कल्प बीतने पर भी हम हाथ लगाने योग्य नही बन सकते हैं एक शरणार्गात ही हमारे लिये रह गई है ऐसे साधक ही शरणागति के अधिकारी है। हे ही प्रकिचन कहा जाता है । मोक्षाय शरणागति के लिये केवल मकिपन बनना ही पर्याप्त नहीं कि तु मन पगति भी बनना चाहिमे । मंकिंधनोइन यगति धरण्य यह धीयामुनाचाम स्वामी जी की पीसूकि है । अनयगति रहे कहते है जो श्री भगवस्त्राप्ति को छोडकर पूसरे किसी फल को भी नहीं चाहते, दूसरे फलो मे इच्छा । (५५) न होने से क्षुद्रफल देने वाले किसी देवता का भी आश्रय नही लेते ऐसे साधक यह धारणा रखते है कि हम श्रीभगवत्प्राप्ति को छोडकर दूसरे किसी फल को अभी ही नही कितु अनेक कल्प वोतने पर भी कभी नहीं चाहेगे । ऐसी धारणा रखने वाले अकिचन अनन्यगति साधक-हे श्रीरङ्गनाथ भगवन् । आपके शरण मे आते हैं। इस प्रकार श्री देशिक स्वामो ने शरणागति के अधिकार का वर्णन किया है। इससे कार्पण्य अग भी सूचित होता है । आगे श्री देशिक स्वामी जी शरणागति के अगो का वर्णन करते हुए कहते है कि प्रातिकूल्यक्षरणपरिणमन्निविघातानुकूल्याः शरणागति के अङ्ग पाँच है । (१) प्रानुकूल्यसकल्प (२) प्राति- कूल्यवर्जन (३) कार्पण्य (४) महाविश्वास और (५) गोप्तृत्ववरण । हे श्रीरगनाथ भगवन् । उपर्युक्तगुणसपन्न साधक आपके समक्ष अपनी अकिंचनता एव अनन्यगतिता का निवेदन करते हुए कार्पण्य अग का अनुष्ठान करते है तथा आपके सन्निधि मे प्रातिकूल्यवर्जन सकल्प करते हुए यह निवेदन करते हैं कि हे श्री भगवन् । आज से मैं आपके प्रति प्रतिकूल व्यवहारो को छोड दूंगा । वेद आदि शाख आपकी आज्ञा है । आपकी आज्ञा के विरुद्ध जितने आचरण होते हैं, वे सब आपके प्रति प्रतिकूल आचरण है, उन आचरणो को अाज से मै सर्वथा त्याग दूंगा। प्रपन्न माधक आपके समक्ष प्रानु- कूल्यसकल्प करते हुए यह निवेदन करते है कि प्रभो । आज से हम आपके अनुकूल होकर रहेगे शास्त्रो के अनुसार आचरण करेंगे तथा पापको विभूति बने हुए सभी चराचर प्रारिणयो के प्रति अनुकूल बनकर रहेगे। इस प्रकार वे न केवल सकल्प करते हैं, किन्तु सर्वथा प्रतिकूल आचरण का परित्याग कर देते है तथा सर्वथा अनुक्कल आचरण ही करते रहते है। प्रतिकूल आचरणो को छोड देने के कारण अबाधितगति से उनके अनुकूल आचरण वढते रहते है। अभेद्याच्छरणवरगतस्त्रातारं त्वां निर्विघ्नयन्त. हे प्रभो । इन प्रपन्न साधको को आपके चरणो में अटूट विश्वास रहता है, वे - करने समझते है कि श्रीमगवान परम दयालु हैं जोबो पर मनुषह मे चनको अपार मानन्द मिलता है श्रीभगवाद समशक्ति सपन्न भी हैं पाश्रय लेने पर परम दयालु तथा सवसमथ श्रीभगवान अवस्य मेरी रक्षा करेंगे। इनका यह विखास प्रति प्रबल तूट युक्तियों से भी डिगने वाला नही है । इस महाविश्वास के कारण ही इनको भरणा गति अभेद्य बन जाती है। हे माय । मापके श्री चरणों में भरणा गति करते हुए ये साधक रक्षा बनने के लिये पाप से प्राथना करते है। है श्रीभगवन् । भाप स्वभाव से हो जीवों की रक्षा करने में उधक है। भापके रक्षकत्व में बीवो के द्वारा ही विघ्न डाले जाते हैं जीम नाना प्रकार के पाप और सकाम कम करते ही रहते है । ये ही कम बीवों को रसा मैं रोड बन जाते है। सकाम वर्मों के द्वारा सासारिक पा चाहने वाले तथा समार में रहने को ही पस करने वाले इन प्रभाग्योपहत जीवों की मापको प्राप्त करने के लिये इच्छा ही नहीं होती है। ऐसी स्थिति मे चाहने पर भी मापके द्वारा इनकी रक्षा होने नही पाती । जब ये शरणागत रक्षक बनने के लिए पापसे प्राथना करने लगते है, तब जीवो की स्वीकृति को प्राप्तकर पाप अबाध गति से उनकी रक्षा में प्रवृत्त हो जाते है । माप स्वीकृति भर चाहते है वह मिल गई तब देर क्यों हो पाप निविघ्न रूप से उनको रक्षा कर देते है । अतएव शाबों में कहा गया है कि- सर्वजोऽपि च विश्वेश सदा कारिणकोऽपि सन् । संसारस प्रवाहित्वासापेक्षा प्रतीमते॥ मर्थात् श्रीमगवान् सर्वश सर्वशासक तमा सदा दयालु होते हुए भी निर्दोष बनकर संसार का संचालन करने वाले है। मतएव जीवों की तरफ से होनेवाली रक्षापेक्षा भर की प्रतीक्षा करते रहते हैं। भाव यह है कि अब तक जो भोवो की रक्षा नही हुई है इसमे मह कारण नहीं है कि ईश्वर उन हितों को न जानते थे जिनको जीवों को बैना था भयवा ईश्वर उन विरोधियों को न बानते थे जिनको जीवो के यहाँ से हटाना था। वास्तविक बात मह है कि ईश्वर सपा है प्रतएव सब हिदो भोर विरोषियों को सुष्प्रकार से जानते (५७) है। ईश्वर में ज्ञान की कमी के कारण जीवो की रक्षा न हो मको हो सो वात नही । ईश्वर मर्वशक्तिमपन्न नहीं है जो अब तक जीवों की रक्षा नही हो सको यह बात भी ठीक नहीं, क्योकि इ-वर विश्वेश है अतएव सर्व समर्थ है। अब तक जोवो की जो रक्षा नहीं हुई है इसमे यह कारण भी नहीं है कि ईश्वर दयालु नहीं था । वान यह है कि ईश्वर सदा काणिक है उममे सर्वदा कममा भगे रहती है । ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठता है कि मवन मवंशक्तिमपन तथा परम दयालु होते हुए भी ईश्वर ने अब तक जोवो को रक्षा क्यो नही की ? उत्तर उत्तरार्ध मे स्पष्ट है । श्रीभगवान् ममार के संचालक है अपने में कोई दोप न लगे उमी प्रकार वे ममार का संचालन करते है अतएव उनको जीवो के द्वारा होने वाली रक्षापेक्षा की प्रतीक्षा करके ही जीवो की रक्षा करना पडती है । जीवो के द्वारा श्रीभगवान से प्रार्थना न किये जाने पर भी यदि श्रीभगवान् जीवो की रक्षा में प्रवृत्त होते तो उन्हे मब जीवो की रक्षा करनी होगी अन्यथा उनमे वैषम्य और नघुण्य दोप लग जायगे । यदि श्री भगवान् कुछ जीवो की रक्षा करते तथा कुछ को न करते तो उनमे वैषम्य दोप पा जायगा तथा जिन जीवो की रक्षा नही करते है उन जीवो के विषय मे नधुण्य अर्थात् निर्दयता का दोष लग जायगा । यदि श्री भगवान् सब जीवो को रक्षा करते तो उनकी लीला वन्द हो जायेगी तथा लीलाविभूति भी उच्छिन्न हो जायेगी। किंच जीवो के द्वारा प्रार्थना न किये जाने पर भी यदि श्रीभगवान् जीवो की रक्षा करते तो पुरुषार्थ दाता नही बनेंगे । जीव जिस फल को चाहता है उसे पुरुपार्थ कहते हैं, जीव जिस फल को प्राप्त करने के लिये प्रार्थना नही करता है, वह फल पुरुपार्थ नही कहा जा सकता, न उस फल को देने वाले श्रीभगवान् ही पुरुपार्थदाता कहे जायेंगे। श्रीभगवान् को पुरुपार्थदाता बनने के लिये भी उन्हे जीवो की प्रार्थना की प्रतीक्षा करनी पडती है जीव को राजी किये विना उसको मोक्ष देना भी श्री भगवान् को अभिमत नही है। इन कारणो से यही मानना पडता है कि श्रीभगवान् जीवो के द्वारा प्रार्थना किये जाने
(५८)
पर ही जीवों की रक्षा करते है। शरणागत शरणागति करते
समय रक्षक बनने के लिये खो श्रीभगवान से प्रार्थना करता है, जिसे
मार्ग
गोप्तववरण कहा जाता है उससे धीमगवान् को रक्षा करने का
प्रशस्त हो जाता है । बीवों के द्वारा जितने पाप बन चुके है जिनके
ही कारण श्रीभगवान के द्वारा रक्षा करने में विघ्न उपस्थित होता
है, शरणागति उन सब पापों के लिये प्रामश्चित बन जाती है।
शरणागति से वे सभी पाप नष्ट हो जाते है जो विघ्न डाल रहे थे।
पब वे निर्विघ्नरूप से खा करने में प्रवृत हो जाते है। इस प्रकार
धरणागति करके प्रपन्न श्रीभगवान को मवाधरूप से रक्षा करने
के माग को प्रशस्त कर देते है।
निसजुषस्त्वनिमिप्तारमरक्षा प्रति स्वप्रवृत्ति स्मजन्ति प्रभो ।
शरणागति करनेवाले साधक शीघ्र पापको प्राप्त करना चाहते है
पापको प्राप्त करने में खरा उनको है। त्वरा होने पर भी वै
साधनान्तर मे प्रवृत नही होते है। अपने रक्षामार को होने
माप मै समर्पित कर दिया है मापने उस भार को स्वीकार भी
किया है। ऐसी स्थिति में वे सोचते है कि श्रीभगवान् निरपेक्ष
उपाय है पे किसी साथन को अपेक्षा नही रखते उनके श्रीचरणों
में अपने रखामार को समर्पित करने के बाद हमे निर्भर निमय एव
हृष्टमनवाले होकर रहना चाहिये। उनमे रक्षामार को समर्पित
करने के बाद भी यदि हम श्रीमगवत्प्राप्ति में स्वरा के कारण किसी
साधन में प्रवत होते यह उनके प्रति अविश्वास माना जायगा ।
शरणागति छूट जायगी । वे रक्षा करने से हट जायेंगे। तब हमारी
दुर्गति होगी। हनुमानजी को ब्रह्माब से बांधने के बाद भी राक्षसो
ने रस्सिों से श्रीहनुमान जी को अब गांधा तब ब्रह्मास हट गया
वैसे ही शरणागति करने के बाद यदि हम दूसरे किसी चपाय मे प्रवृत्त
होगे चाहे वह प्रसि फ्लप्राप्ति में त्वरा के कारण ही क्यों न हो,
शरणागति अवश्य छूट जायगी। मेरी रक्षा मसम्भव हो जायगी
ऐसा सोचकर शरणागत उत्तरकाल में कभी भी उपायान्तरो में हाप
नहीं लगाते, केय में भाग लेते है ॥१२॥
(E) -- ( १३ ) त्यतोपायव्यपायांस्तदुभयकरणे सपान सानुतापान् । भूयोऽपि त्वत्प्रपत्त्या प्रशमितकलुषान् हन्तु सर्वसहस्त्वम् । रङ्गिन न्यासान्तरङ्गाखिलजनहिततागोचरत्वनिदेश- प्रीतिप्राप्तस्ववर्णाश्रमशुभचरितान् पासि धन्याननन्यान् ।। पूर्व श्लोक मे श्री देशिक स्वामी जी ने पांच अगो से युक्त शरणागति का वर्णन किया है । इस श्लोक मे श्रीदेशिक स्वामी जी शरणागति के उत्तरकाल मे प्रपन्नो के कर्तव्य का वर्णन करते उस उत्तरकृत्य मे त्याज्य और संग्राह्य अर्थों का वर्णन करते है। रङ्गिन ! सर्वसहस्त्वं त्यक्तोपायव्यपायान् हे श्रीरगनाथ भग- वन् । आप सब कुछ सहने वाले हो अतएव आप प्रपन्नो के द्वारा उत्तरकाल में अपराध बन जाने पर भी उन प्रपन्नो को नही त्यागते, किंतु किसी न किसी प्रकार से उन अपराधो को नष्ट कर उन प्रपन्नो को अपनाते है। आपकी सहन शक्ति अपार है। शरणागति सपन्न होते ही आप शरणागतो के रक्षाभार को अपने ऊपर लेकर उसी क्षण से उनके उद्वार के विषय में जागरूक रहते है । अतएव आप प्रपन्नो के उत्तर जीवन को मध्यममार्ग मे ले चलते है। आपके अनुग्रह से ही प्रपन्न उत्तरकाल मे उपाय और अपायो मे प्रवृत्त न होकर मध्यम मार्ग पर चलते है। जिस प्रकार मार्ग के बीच मे सुरक्षित रहते है, मार्ग के पार्श्व मे चलने वालो को कण्टक आदि से विध जाने का भय रहता है उसी प्रकार प्रपन्नो को उत्तर जीवन में कैर्य समझकर वर्णाश्रम धर्मों का अनुष्ठान करना चाहिये। यह मार्ग मध्य मे चलने के समान निरापद है । उत्तर जीवन मे प्रपन्नो को न उपायो को करना चाहिये न अपायो को । उपायो और अपायो को करना मार्ग के दोनो पाश्वों मे चलने के समान आपत्तिग्रस्त है इससे प्रपन्नो को कष्ट भोगना पडेगा। प्रपन्नो को उत्तर जीवन मे उपायान्तरो को त्याग देना चाहिये, उनमे हाथ लगाने पर शरणागति छूट जायगी, श्री (६०) भगवान् रक्षक नहीं बनगे रखामार पुन जीयों के ऊपर पड जायगा। प्रपन्नों को उत्तर जीवन में अपामों को अर्थात् पापों को न करना चाहिये । प्रपन्नों को काम्य कम भी अनिष्टफलप्रद होने कारण पाप ही है क्योकि वे सासारित फल देकर ससार में ही बांध रखने वाले है। निषिद्ध कम तो पाप है ही। ये पापक्षम ही अपाय है। प्रपन्नों को इनसे से भी वक्षना चाहिये प्रतएव स्वरूपश प्रपन इन उपायों और अपायों से हाथ खीच लेते हैं। हे प्रभो पाप ही कृपा करके उत्तम प्रपन्नों को इस निष्ठा पर पहुंचाते हो जिससे वे सदा कर्मयोग मानयोग भजियोग और इन उपायों से तथा काम्य और निषिद्ध इन अपायों से बचते हुए बइयप्रधान विशुद्ध उत्तर जीवन बिताने लगते है। ताभयकरणे सनपान सानुतापान भाग्यसपन्न धरणागत उपायान्तर और अपायो को त्यागते हुए निरपराध उत्तर जीवन बिताते है । परन्तु कई भाग्यहीन शरणागत उपाय और अपाय भी कर बठते है । दूसरों से उनम यही विशेषता है कि उपायान्तरी में हाथ लगाने पर उनको उत्तरकाल म लज्जा उत्सान होती है। समझते है कि हमने क्या किया। श्री भगवान हमारे रसाभार को स्वीकार कर चुके है वे हमारी तरफ से किसी उपायान्तर की अपेक्षा नही रखते है, अतएव उन्हे निरपेक्ष उपाय कहा जाता है। उनके लिये किसी उपायान्तर की पावश्यकता नही । न के उपायान्तर की सहायता लेकर ही रक्षा करने वाल हैं। ऐसी स्थिति म यह समझ- कर-कि उपायान्तर से श्रीभगवान को मदद मिलेगी-मैने जो समायान्तरों का अनुशान किया, यह तो एक परिहासयोग्य बात हुई। ऐसा मुझको नही करना चाहिए था। बड़ी भूल हो गई। ऐसा समझकर वे अत्यन्त लग्जित होते है तथा उपायान्तरों को सर्वदा के लिये छोड देते है । यह तो हुई उपायान्तरो में हाथ लगाने वालों की बात । अव अपायों में हाप लगाने वालों की बात कही जाती । काम्यकम भोर निषिद्धकर्म श्रीभगवत्राप्ति में बाधा डालनेवाल मनिष्ट फलो को देनेवाल होने के कारण अपाय माने जाते हैं। 1 है (६१) भाग्यमपन्न प्रपन्न इन अपाय कर्मों को कभी करते ही नहीं। यदि भाग्यहीन कोई प्रपन्न इन अपाय कर्मों को कभी कर भी जायं नो प्रापकी कृपा से उनको उत्तरकाल मे पश्चात्ताप होने लगता है । वे मोचते है कि हमने बहुत अनुचित किया। श्रीभगवान् का मुरवोल्लास कर उत्तम कैडूर्य करने के लिये हमने उत्तर जीवन अपनाया है। इन अपायभूत कर्मों को करके हम श्रीभगवान् के कोप के भाजन वन गये है। कितनी भूल हो गई। हमे श्रीभगवान के अनुग्रह का भाजन बनना चाहिये था, वह तो दूर रहा । अब हमे श्रीभगवान के निग्रह का पात्र बनना होगा। ऐसा सोचते ही उनके मन मे अपने विषय में घृणा और पश्चात्ताप होने लगते है। यह भी, हे प्रभो । आपकी कृपा से ही होता है । आप शरणागतो का परित्याग करने वाले नहीं है। अतएव प्रायश्चित के द्वारा उनको शुद्ध करने के लिये ही आप उनके मन मे पश्चात्ताप को उत्पन्न करते है। भूयोऽपि त्वत्प्रपस्या प्रशमितालुषान् हे श्रीभगवान् । श्राप उनके मन मे न केवल पश्चात्ताप को उत्पन्न करते है किंतु प्रायश्चित मे भी प्रेरित करते है जिससे वे उन प्रायश्चित्तो को-जो धर्म- शास्त्र मे उन २ पापो के लिये प्रायश्चित्त के रूप मे वरिणत है- करने लगते है। यदि कोई शरणागत धर्मशास्त्रणित उन प्राय- श्चित्तो को करने में असमर्थ हो तो वे तदर्थ प्रायश्चित्त के रूप में पापके चरणो मे शरणागति करते है। इसे प्रायश्चित्त शरणागनि कहा जाता है । शास्त्रो में कहा गया है कि- अपायसप्लवे सद्यः प्रायश्चित्त समाचरेत् । प्रायश्चित्तरियं साऽत्र यत्पुन शरणं व्रजेत् ।। उपायानामुपायत्वस्वीकारेऽप्येतदेव हि॥ अर्थात् अपाय वन जाने पर प्रायश्चित्त करे। प्रायश्चित्त यही है कि पुन श्रीभगवान् के शरण मे चला जाय । उपायान्तरो को अपनाने पर भी यही प्रायश्चित्त करना चाहिये । इस प्रकार उपाया- न्तर और अपाय मे हाथ लगाने वाले शरणागत उत्तरकाल मे और पश्चात्ताप को प्राप्त कर प्रायश्चित्त के रूप मे आपके (६२) शरण में प्राकर आपसे क्षमाप्रार्थना करते हैं। यह भी आपके अनु मह से ही सपन्न होता है। यासातरजाखिलजनहिततायोधरस्वनिदेशप्रीतिप्राप्तस्ववीयम शुभरितान् हे प्रभो । जिन महानुभावों का मन शरणागति में रम जाता है वे पापको अत्यन्ताभिमत हो जाते है। चाप सवा उनके हित का ही चितन करते है । आप सोचते है कि ये मेरे शरण मे भागये है। इनके रक्षामार को मैंने अपने ऊपर ले लिया है। प्रत इनको उपायों में प्रवृत्त होने की पावश्यकता नहीं। न मुझे ही इनको उनमें प्रेरित करने की पावश्यक्ता है। इनको प्रारमयात्रा प्रर्थात् मारमोटार की चिता से छुड़ा दिया गया है । इनको देह यात्रा के विषय में चिता नहीं करनी चाहिये । इनकी देहयात्रा अर्यास् देहनिर्वाह प्रारब्ध के अनुसार अवश्य होगा । प्रारमयात्रा बल्याण का भार मैने लेलिया तथा देहयात्रा का भार प्रारघ ने ले लिया । प्रत इनको दोनों यात्राओं से निश्चिन्त होपर परमपल मय में भाग लेना चाहिये। मुझे भी इनको कैद्य मे ही प्रेरित करना चाहिये। जिस प्रकार विवाह संपन्न होने पर कन्या पति प्राप्ति की चिन्ता से निवृत्त होकर पितृग्रह में उन कर्मों को सीखती जि हैं इसे पतिगृह में पहुँचने पर करना है। उसी प्रकार प्रपन्नों को भी पारमयात्रा और देहयात्रा की चिन्ता को छोडकर उन कदुर्यों को इस संसार में रहते समप सीखना चाहिये जिहे इन्हें श्रीवैकुण्ठ में पहुंचकर करता है । इनके लिये कडूयप्रवृति ही हिता वह है । प्रत इन को कैप मे प्रेरित करना चाहिये । कइय वही है जिससे मेरा मुखोल्लास होगा। मेरी प्राशामो को मानकर चलने पर ही मुझ को अधिक सतोप होता है । मेरी प्रथम माशा यही है कि मनुष्य वर्णाश्रमों का अनुष्ठान करें। शाब में कहा गया है कि- यभिमाचारपसा पुषण पर पुमान् । विष्णुराराध्यते पन्ना नान्यस्ततोषकारक ॥ प्रति षधिमधर्मों का अनुष्ठान करने वाले पुरुष के द्वारा हो परमपुरुष धी विष्णु भगवान् भाराषित होते है। वर्णाथमपों को ।
(६३) छोडकर दूसरा कोई रास्ता नहीं है जिससे श्री भगवान् सन्तुष्ट हो जायें । वर्णाश्रमधर्मो का अनुष्ठान करने वाले थी वैष्णव हो मेरे आज्ञाकारी सेवक हो सकते है । उनको ही हम अपना समझते हैं । अतएव हमने शास्त्रो के द्वारा यह घोपणा की है कि- श्रुति स्मृतिर्ममैवाजा यस्तामुल्लडच वर्तते । प्राज्ञाच्छेदी ममद्रोहीमद्भक्तोऽपि न वैष्णव ।। अर्थात् श्रुति और स्मृति मेरी ही प्राज्ञा है जो उस प्राज्ञा का उल्लघन करके आचरण करता है, वह मुझ से द्रोह करने वाला माना जायगा। मेरा भक्त होता हुआ भी वह वैष्णव नहीं है अर्थात् मेरा नही है । वर्णाश्रमधर्मों का पालन करने से मेरे मुखोल्लास के द्वारा इनका कल्याण तो होगा ही साथ ही उनके आचरण को आदर्श मानकर चलने वाली जनता का भी हित होगा। ऐसा सोचकर हे प्रभो । आप इन प्रपन्नो को वर्णाश्रमधर्मानुष्ठान मे शास्त्र ज्ञा के द्वारा प्रेरित करते है। आपको प्रेरणा के अनुसार ये प्रपन्न यह समझते हैं कि हम श्रीभगवान् के शरण में आगये हैं, श्री भगवान के द्वारा हमारा उद्धार अवश्य होगा। हमे शेष जीवन में श्री भगवान् का कैर्य ही करना है, वही कैडूर्य उत्तम है जो श्री भगवान् की इच्छा के अनुसार किया जाय । हमे पता नही कि श्री भगवान् की इच्छा क्या है । हम वे नित्यसूरि और मुक्त तो है नही जो श्री भगवान की इच्छा को प्रत्यक्ष जानकर तदनुसार कैडूर्य करते है, हम बद्ध जीव हैं, अज्ञानवर्धक ससार मे फसे हैं, हम श्री भगवान की इच्छा के विषय में क्या जाने ? श्री भगवान् की इच्छा को बिना जाने कैडूर्य तो बनता नही । क्या करें? इस प्रकार चिन्ता मे पड़े हुए प्रपन्न जब शास्त्रो के द्वारा श्री भगवान् की आज्ञा को समझने लगते है तब उनको अपार सतोष होता है। वे समझते है कि श्री भगवान् शास्त्रो के द्वारा वर्णाश्रमधर्मों का पालन करने के लिये हमको आज्ञा दे रहे हैं। हमें उनकी आज्ञा का पता लग गया आज्ञा का पालन करना चाहिये । ऐसा समझकर आज्ञा पालन मे अपार प्रेम होने के कारण (..) प्रीति से प्रेरित होर प्रपन विगुणित उत्माह मे वधिमधर्मों का अनुष्ठान करते रहते है भी उममे शिरत नहा होते। यह भी आपकी कृपा से ही सपन्न होता है। धपाननन्यान् पालि हन्त आपरी पाना के अनुमार वरपाथम धमपालनस्पी कडूय म भाग गने वाले प्रपन ही धन्य है । वर्णाश्रम धर्मों का अनुष्ठान करते समय जर देवता तरा का नाम लेना पड़ता है तब वे उन २ देवतानो को थीभगवान् या देवल वन्चुक समभ कर देवतातरस्पी कन्चुर पहने हुए अन्तयामी श्रीभगवान को ही पाराभ्य समझते हुए देवता सरत्राचा गल्ला या भाव परमात्मा तक लेते है । इस प्रशर वे उन वश्रिमधर्मो म श्री भगवान् का ही पाराध्य समझते है देवतान्तरा को नहा अतएव उसकी अनन्यता मे बाधा नहीं पड़ती। रिच व इमलिये भी अनय माने जाते है कि आपको छोडकर दूसरे तिमी प्रयोजन को नहीं चाहते है तथा प्रापको छोडार किमी दूमरे को उपाय नही मानत है आपको छोडकर दूसरे रिसी के रण में भी नहीं जात है। रोमे रणागता वे रक्षाभार को प्राप अपने ऊपर ल लते है तथा मा प्रगर से उनकी रक्षा करते है आपका प्राथित कभी गिरता नहीं, इसलिए तो आपका अच्युत नाम पड़ा । वास्तव में वे शरणागत धम जिनकी रक्षा करने का जिम्मा मापने अपने ऊपर लिया ॥१३॥ ( १४ ) शोकास्पदोशमथन श्रयता भवाब्धी रागास्पदाशसहज न रुगत्सि दुखम् । नो चेवमी जगति रङ्गधुरीण भूय क्षोदिष्ठभोगरसिकास्तव न स्मरेयु ॥ पूर्व श्लोक मे श्री देशिक स्वामी जी ने यह कहा कि श्रीमगवान् अपनो की रक्षा अवश्य करते है शरणागति के उत्तर काल में प्रपनों के द्वारा अपराध बन जाने पर भी थी भगवान् प्रपनो के द्वारा प्रायश्चित करार उनको निर्दोप बनाकर निर्दिष्ट समय मै उनको 1 कभी (६५) मुक्ति देकर रक्षा करते हैं। प्राप्रपन्नो को तो उसी क्षण मुक्ति मिल जाती है उनसे अपराध बनने की सभावना भी नही है कभी हप्त प्रपन्नो के द्वारा ही अपराध बन जाते हैं, उनका विस्तार श्लोको में कहा गया है । इस श्लोक मे श्री देशिक स्वामी जी कहते हैं कि इस ससार मे रहते समय दृप्त प्रपन्नो को जो कभी कभी दुख भोगना पडता है, उसका कारण श्री भगवान् की दया ही है । श्रीभगवान् दया से ही प्रारब्ध के अनुसार प्रपन्नो को दुख भुगाते हैं । हे रङ्गधुरीण! भवाब्धौ श्रयतां शोकास्पदांशमथनः हे श्रीरगनाथ भगवान् ससार समुद्र में पड़े हुए कई जीव सौभाग्य से आपके शरण में आ जाते है । वे सचितकर्म और प्रारब्ध कर्म के अनुसार आगे होने वाले जन्मो का स्मरण कर बहुत चिन्तित हो जाते हैं तथा सोचते रहते हैं कि आगे किस जन्म मे हमे क्या २ क्लेश भोगना होगा। इस प्रकार उनको उत्तरजन्म चिन्ता का विषय बन जाते है। उन उत्तरजन्मो का स्मरण कर वे सर्वदा शोक करते ही रहते हैं। आप उनके शोक के प्रास्पद उत्तरजन्म तथा उनके देने वाले प्रारब्ध एव सचित कर्मों को नष्ट कर देते हैं तथा उन्हे चिन्ता से उन्मुक्त कर देते हैं। आप शरणागतो के द्वारा प्रपत्ति वाक्य का उच्चारण होते ही उनको मोक्ष देने के लिये त्वरित होते हैं। ऐसा अनुग्रह करना आपका स्वभाव है। ऐसे स्वभाव रखने वाले आप यदि प्रपन्नो के चिन्ताविषय उत्तरजन्म और उनके हेतुभूत कर्मों को नष्ट कर देते हैं तो यह आपके लिए उचित ही है। इसमे सव की सम्मति है किसी की भी विप्रतिपत्ति नहीं है। रागास्पदाशसहजं दुख न रुगत्सि हे प्रभो । शरणागतो मे हप्त प्रपन्न इस ससार मे रहना चाहते है। वे आपसे शरीरावसान मे मोक्ष की प्रार्थना करते है। यद्यपि आप प्रपत्तिवाक्य के उच्चारण में ही उनको मोक्ष देने के लिये त्वरित होते हैं, तथापि उनकी इस प्रकार की प्रार्थना को सुनकर आप उनकी इच्छा को पूर्ण करने के लिये इस शरीर तक उनको ससार में रखने के लिये राजी हो जाते हैं। आप उनके प्रारब्ध मे उतने ही अंश को रहने देते हैं जितने को अहे इस शरीर में भोगना है। उस प्रारब्यभाग म पुण्य भोर पाप दोनों समाविष्ट है । पाप पुण्य के अनुमार उह सुप भुगाते है तथा पाप के अनुसार उन्हें दुस भुगात है। प्राप रह जो दुप भुगाते हैं इसका मम विरले ही साधक जानत हैं, सब नहीं जानते । अतएव कई इस प्रकार की धका बरते है कि श्रीभगवान् प्रपना को इस प्रकार दुख क्यो भुगाते है ? यदि थीमगवान प्रपना को दुपरहिन जीवनयापन के लिये यवस्था करते तो बहुत अच्छा होता, भगवान् ऐसा क्यों नहीं करते। इस शका का समाधान प्रागे कहा जाता नोचेदनी जगति भूय सोविएभोगरसिकास्तव न स्मरेस प्रभो। यदि आप अपनों के लिये यही व्यवस्था करते जिसस हप्त अपनों को उत्तर जीवन मे सुख ही सुख भोगना पड़े दुख सपा भोगना ने पह-तो ये रप्त प्रपन्न सवदा ससार में रहना ही पसद करणे भगवत्प्राप्ति का नाम तक नही लगे। ये बारम्बार क्षुद्र पिया नुभव में रत रहेगे। इन लोगो ने मात प्रपनों की तरह प्रपत्ति सम्पन्न होते ही अनन्तर क्षण मे ही मोक्ष प्राप्त करने के लिये मापसे प्रार्थना नही की किन्तु शरीर छूटने के बाद मोक्ष प्राप्त करने के लिये प्राथना की । इससे व्यक्त होता है कि पारीर रही समय तक इनको सधार मे रहने की इच्छा है। पाप तो उसी क्षण मे ही मोक्ष देने के लिये सन्न होते रहे परन्तु इन प्रपनो की इच्छा को सफल करने के लिये मापने कुछ समय तक इस प्रपत्रों को संसार में रखना स्वीकार किया । यदि आप संसार मे रहते समय इनको दुख से सबषा रहित र सुखों को ही भुमाते रहे तो इनकी यह ससाररुचि कमी नहीं मिटेगो तथा भगवदनुभव मे भोग्यता बुद्धि भी न बढगी इसलिये भाप इनके प्रारष मे अन्तग: पापों को निमित्त बनाकर दुख भुगाते हुए इनको सांसारिक दोपों का अनुभव कराकर ससार से विरक बना देते है जिस प्रकार हितषी पिता चाबुक प्रादि की सहायता लेकर दुष्ट प्रति वाले पुत्रो को दण्ड देकर उनकी दुष्प्रवृति छुड़ा देते है उसी प्रकार ही पाप करते (६७ ) है । यह भी आपका अनुग्रह करने का एक प्रकार है । अापने साधको को ससार से विरक्त तया श्रापमें अनुरक्त बनाने के लिये सपने कर्तव्यो का इस प्रकार वर्णन किया ही है कि- यस्यानुग्रहमिच्छामि धन तस्य हराम्यहम् । बान्धवैश्च वियोगेन भृश भवति दु खित ॥ यदि मा तेन दुखेन सततो न परित्यजेत् । त प्रसाद करिष्यामि य सुरैरपि दुर्लभः ।। अर्थात् जिस पुरुप के ऊपर हम अनुग्रह करना चाहते है, उसको सम्पत्ति को हम हर लेते है हम उसे वन्धुप्रो से वियुक्त कर देते है, वन्धुप्रो के वियोग से वह सदा दुखी रहता है । यदि उस दु ग्व से सतप्त होता हुआ भी वह हमारा परित्याग नही करेगा तो उसके ऊपर हम वह अनुग्रह करेगे जो अब तक देवताग्रो को भी नही मिला है। यह अापकी श्रीमुखसूक्ति है। शास्त्रो मे भी कहा गया है कि- हरिई खानि भक्तभ्यो हितबुद्धया करोति हि । शस्त्रक्षाराग्निकर्मारिण स्वपुत्रस्य पिता यथा ॥ अर्थात् श्रीभगवान् हित करने के विचार से ही भक्तो को उसी प्रकार देते है, जिस प्रकार पिता पुत्र को कठिन रोग से बचाने के लिये शस्त्र क्षार और अग्नि से चिकित्सा करते हैं। आप भी ससारवैराग्य और श्रीभगवदनुभव मे भोग्यताबुद्धि के बढाने को परम हित समझकर उसको सिद्ध करने के लिये इन ससारपतित दृप्त प्रपन्नो को दुख देते हैं । किंच सासारिक सुख और दुख साथ साथ रहने वाले है इनलिए ही आपको सुख भुगाने के लिए भी दुख भुगाना पडता है । दुखानुभव होने पर ही अच्छी तरह से सुख का पास्वादन किया जा सकता है। अतएव शास्त्र में कहा गया है- अग्ने शीतेन तोयस्य तृषा भक्तस्य च क्षुधा । क्रियते सुखकर्तृत्व तद्विलोमस्य चेतर ।। अर्थात् शीत ही अग्नि को सुखप्रद वनाता है तथा पिपासा और क्षुधा जल और अन्न को सुखदायक बनाते है, वैसे अग्नि इत्यादि दुख दुख भी शीत इत्यादि को सुम्पप्रद बनाते है। भाव यह है कि पीतात पुरुष ही अग्नि से, पिपासित पुरुष ही जल से तथा क्षुधात पुरुष ही मन से सुख को प्राप्त करता है। शीत पीडा तथा भूम प्यास इत्यादि दुख देने वाले हैं इनसे होने वाले दुख के तारतम्य के मनु सार ही अग्नि इत्यादि से, तारतम्म से सुप प्राप्त होता है । इस विवेपन से फलित होता है कि दुख ही सुख को मधुर बनाता है। दुख दिये बिना माप सुख नही भुगा सरते। प्रतएव सुख भुगाने के लिये भी आपको अपनों को दुख भुगाना पड़ता है क्योंकि सुख दोनो परस्पराश्रित है। इस प्रकार माप अवजनीय समझकर अथवा हितावह समझकर हप्त प्रपनो को दुख भुगाते हैं। प्रारधा- नुसार होने वाले दुख को नही रोकते । यही प्रापका दुख भुगाने मे का प्रकार है । यह एक विलक्षण अनुपह है जो सब को समझ नहीं पाता है ॥१४॥ { १५) हेतुर्वेथे विमर्श भजनवितरत कि स्वनुष्ठानकाले वेधत्य पभेवो विविध इह स तपायतान्यानपेक्षा । ङ्गिन प्रारम्धभङ्गात् फलमधिकमनावृत्तिरष्टिवत्त- भाना शम्दाविभेदात् प्रपवनभजने भूचिते सूत्रकार ॥ पूर्व श्लोक मे श्री देशिक स्वामी जी ने यह कहा कि श्रीभगवान् हुप्त प्रपन्नो को मिलने वाले दुखों को जो नहीं रोकते हैं उसमे कुछ रहस्म है इस रहस्य का उद्घाटन पूर्व इलोक में हुषा । इस लोक मे धीदेशिक स्वामी जी कई शकाओं का समाधान करते हुए भक्तियोग से प्रपत्तियोग की विशेषता का वर्णन करते है। यहाँ ३ शंकायें होती है (१) भक्ति और प्रपत्ति में भेद क्यों माना जाता है। (२) यदि प्रपत्रो के लिये प्रपत्ति उपाय है तो श्रीभगवान् को उपाय क्यों माना जाता है ? (३) भक्ति और पत्ति मैं मन्तर क्या इस श्लोक में इन शकामों का परिहार है। 7 (६६) रङ्गिन इतर वैध विमर्श भजनवद्वेतु प्रपत्तियोग भी भक्तियोग के समान उपाय है। श्री भगवान् ने गीता मे मुमुक्षु के प्रनि भजस्व माम् (गो० अ० ६ श्लोक ३३) अर्थात् हमको भजो ऐमा कहकर भक्तियोग का विधान किया है अतएव भक्तियोग मोक्ष का उपाय माना जाता है। वैसे हो श्रीभगवान् ने गीता मे मुमुक्षु के प्रति शरण व्रज अर्थात् मेरे शरण मे आओ ऐसा कहकर शरणागति का विधान किया है। इस से सिद्ध होता है कि शरणागति मोक्ष का उपाय है । इस प्रकार विधि शाख का विचार करने पर भक्ति की तरह प्रपत्ति भी मोक्ष का साधन सिद्ध होती है। यहां पर प्रश्न उठता है कि जिस प्रकार भक्तो के लिये भक्ति उपाय है, उसी प्रकार यदि प्रपन्नो के लिये प्रपत्ति उपाय है तो प्रपन्नो के लिये श्रीभगवान् को उपाय क्यो कहा जाता है ? इस प्रश्न का उत्तर भागे दिया जाता है। किं तु अनुष्ठानकाले वेद्यत्व पभेदो विविध इह स सु अन्यानपेक्षा उपायता यद्यपि विधि शाख का विचार करते समय भक्ति और प्रपत्ति ये दोनों समान रूप से मोक्ष का उपाय सिद्ध होते है कितु अनुष्ठान करते समय इनकी विशेषताये दृष्टिगोचर होती है । भक्ति- योग को ब्रह्मविद्या कहते है । उपनिषदो मे ३२ प्रकार की ब्रह्मविद्यायें वर्णित हैं। प्रत्येक ब्रह्मविद्या मे ब्रह्म ही उपास्य है । सभी ब्रह्म- विद्यायो मे उपास्य ब्रह्म एक होने पर भी उनमे भेद इसलिए माना जाता है कि किसी ब्रह्मविद्या मे किन्ही गुणो से युक्त ब्रह्म उपास्य है दूसरी ब्रह्मविद्या दूसरे गुणो से युक्त ब्रह्म उपास्य है। इस प्रकार उपास्य गुण भिन्न २ होने से ब्रह्मविद्याप्रो मे भेद सिद्ध होता है । सर्व गुणो से युक्त ब्रह्म का उपासन तो नही हो सकता क्योकि ब्रह्म के गुण अनन्त हैं, उपासक को गुणो का अनुसन्धान करते ही ब्रह्म का उपासन करना पडता है । उपासक सर्वज्ञ नहीं है, सर्व गुणो का अनुसन्धान उससे हो नही सकता, कतिपय गुण विशिष्ट ब्रह्म का ही वह उपासन कर सकता है। ब्रह्मविद्याप्रो मे भिन्न २ गुणो को लेकर ब्रह्म का उपासन करना पड़ता है। विविध गुणो मे भेद होने - (७०) से ब्रह्म का उपास्मय भी विविध बन जाता है प्रपत्तिविद्या म कौन से गुण से युक्न ब्रह्म का अतुस धान करना चाहिये ? वह बतलाया जाता है मह सतपायताज्यानपेक्षा प्रपत्ति विद्या में बहा निरपेक्ष उपाय है। इस प्रकार निरपेक्षा उपायस्व गुण को लेकर ब्रह्म का अनुसधान करना पड़ता है। परब्रह्म परमात्मा श्रीभगवान् सब को फल देते है। फल देने वाले होने के कारण वे इष्टसाधन माने जाते है । इध साधन उपाय कहलाता है । मश्तियोगनिष्ठ माधकों को श्रीमगवान् मोक्ष देते है, अतएव धीभगवान उनके लिये उपाय बनते हैं। उन लोगों ने भक्तियोग किया तदथ थीभगवान् उनको मोक्ष देते इसलिये धीभगवान उनके विषय में भक्तियोग की अपेक्षा करते हुए उपाय बनते हैं । अतएव उनके विषय में श्रीभगवान् को सापेक्ष उपाय कहा जाता है। श्रीभगवान् प्रपन्नों के विषय में सोये उपाय मनवे है, भक्तिमोग की अपेक्षा न रखकर श्रीभगवान प्रपनों को मोक्ष देते है । अतएव कहा भाता है कि श्रीभगवान् प्रपन्नों के लिये भक्नि योग के स्थान में स्वय खड होकर फल देते है। उपायान्तरा के स्थान में स्वय खडे होकर फल देते है। उपायान्तरो के स्थान में स्वयं निविष्ठ होकर पल देने के कारण श्रीभगवान् प्रपनों के लिमें उपाय बन जाते है न केवल उपाय बनते है निरपेक्ष उपाय भी बनते अर्थात् प्रपन्नों के और से कमयोग ज्ञानयोग और भक्तिपोग की अपेक्षा न रखकर प्रपन्नो के फलदाता बनते है। उपायात- की अपेक्षा न रखकर फलदाता बनना ही श्रीभगवान का निरपेक्षोपापत्व है। इसका मह अथ नही कि श्रीभगवान् प्रपति को भी अपेक्षा नहीं रखते। यदि श्रीममवात् प्रपत्ति की अपेक्षा न रखकर फल देने वाले होते तो उन्हे सब को फल देना होगा। अन्यथा उनमै वैषम्यनंषुण्ण दोष सग जायेगे । इसलिये मानना पड़ता है कि श्रीभगवान् अपनो को फल देने में प्रपत्ति की अपेक्षा अवश्य रखते है। प्रपतिको अपेक्षा रखने पर भी उपायान्तरों की अपेक्षा नहीं रखते हैं। इसलिये उहें निरपेक्ष उपाय कहा जाता है । यहाँ पर इस बात को निम्न (७१) लिखित दृष्टान्त के द्वारा समझना चाहिये । एक राजा है, वह जनता मे भूमि को बाँट रहा है । धनिकों के द्वारा अधिक से अधिक जितना धन मूल्य रूप मे चुकाया जा सके, उतने धन को उनमे मूल्य स्प मे लेकर राजा उन धनिको को भूमि प्रदान करते है। उम प्रमग में एक अकिंचन अनन्यगतिक मनुष्य आकर अपनी शक्ति का निवेदन करता हुया विना मूल्य लिये ही केवल कृपा से ही अपने को भूमि देने के लिये प्रार्थना करता है उदार राजा उसकी दगा को देखते हुए इस प्रार्थनामात्र से प्रमन्न होकर विना कुछ लिये ही उसको भूमि देते हैं । वहाँ पर यह वात देखने में प्रातो है कि राजा अकिंचन जनता से कम से कम प्रार्थना की अपेक्षा अवश्य रखते है मूल्य की अपेक्षा नही रखते है अतएव वहाँ यह कहा जाता है कि राजा ने मूल्य निरपेक्ष हो कर अकिचन को भूमि दी। वैसे ही प्रकृत मे राजा के स्थान मे श्रीभगवान् को मूल्य के स्थान मे भक्तियोग को धनिको के स्थान में भक्तो को अकिचन प्रजा के स्थान में शरणा- गतो को प्रार्थना के स्थान मे शरणागति को रखकर समझना चाहिये । साराश यह है कि शरणागति प्रावश्यक होने पर भक्ति- योग के समान मोक्ष का मूल्य नही मानी जा सकती । आवश्यक होने के कारण शरणागति उपायान्तरो के समान उपाय मानी जाती है साथ ही मूल्य वनने की क्षमता न होने के कारण केवल व्याजमात्र बन जाती है। अकिंचन साधको के ओर से कर्मयोग आदि की अपेक्षा न रखकर प्रार्थनामात्र से प्रसन्न होकर फल देने के कारण ही श्रीभगवान् निरपेक्ष उपाय माने जाते हैं । श्री देशिक स्वामी जी श्रीरङ्गनाथ भगवान् को स्तुति करते हुए कहते हैं कि हे श्रीरङ्गनाथ भगवान् ? विधिशास्त्र का विचार करने पर प्रपत्ति भी भक्ति की तरह मोक्ष का साधन सिद्ध होती है । इस प्रकार समता रहने पर भी अनुष्ठान काल मे उनमे भेद खुलता है । भक्तियोग नाम से पुकारी जाने वाली अन्यान्य ब्रह्म- विद्यालो में उपास्य आपके अन्यान्य विविध गुण अनुसन्धेय होते हैं। प्रपत्ति नाम से पुकारी जाने वाली न्यासविद्या मे मापका निरपेक्षो- (२) पायत्वगुण अनुम धेय होता है। प्रतएव पाप प्रगानो के विषय में उपायान्तर की अपेक्षा न रखकर स्वय ही उपाय बनकर फल देने हो। हप्रारम्पमताद फलमषिक भक्ति की अपेक्षा प्रपत्ति में यह विशेषता है कि प्रारष को भी नष्ट करती है। भक्ति प्रारब्ध को नष्ट नहीं करती है किंतु सचित मात्र को ना करती है । प्रपत्ति तो सचित और प्रारब्ध इस दोनों प्रकार के कर्मों को नष्ट करती है। प्रतएव शाख में कहा गया है कि उपायभक्ति प्रारायव्यतिरिक्तायनाशिनी । साध्यक्तिस्तु सा ही प्रारम्यस्यापि भ्रमसो॥ भात उपायभक्ति और भक्तियोग प्रारब्ध व्यतिरिक्त सचित कों को नष्ट करता है साध्यभक्ति और प्रपत्तियोग प्रारष को भी नष्ट करता है। प्रतियोग प्रानप्रपन्नों के सपूण प्रारब्ध को नष्ट करता तमा हप्त प्रपन्नो के विषय में उसने प्रारब्ध को नष्ट करता है जितने का नाश तृप्त प्रपन्न चाहते है। इस प्रकार प्रारब्ध नायकत्व प्रपत्ति की विशेषता है। इससे ही प्रपत्ति अधिक फलप्रा मानी जाती है। पहेविनावत्तिश्ता प्रपत्ति में दूसरी विशेषता भी है । भक्ति- योग मे श्रावृत्ति की भावश्यकता है श्पत्ति मे भावृत्ति अनावश्यक भाव यह है कि भफियोग निष्ठ सापकों को मकियोग की प्रतिदिन करना चाहिये। श्रुति करती है कि सत्येव पतयन् पविवायुष बाह्मलोकममिसंपवले जो साधक इस प्रकार मायुपर्यन्त प्रतिदिन भक्रियोग को प्रावृत्ति करता रहेगा वही ब्रह्मलोक अर्थात् परब्रह्म श्रीभगवान के बकुण्ठ लोग पहुंचता है। इससे सिद्ध होता है कि भक्तियोग निष्ठ साधकों को प्रतिदिन मषियोग की भावति करना चाहिये । प्रपत्ति के विषय में शाम मे कहा गया है कि सहदेव हि शास्त्राच कृतोऽय सारमेनरम् अर्थात् यह प्रपति~जो शाब की प्रतिपाद्य वस्तु है-एक हो बार करने पर पुरुष को संसार का पार लगा देगी। विभीषणशरणागति मे थीभगवान की यह सूक्ति प्रसिद है कि- (७३) सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभय सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रत मम ।। अर्थात् जो एक बार ही मेरी शरण मे आया हो तथा यह मागता हो कि मै आपका होकर रहूँ उसको मै सर्वभूतो से अभय दे देता हूँ अर्थात् उसे किसी प्राणी से भी डरना न पड़े ऐसा मै कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है इससे सिद्ध होता है कि एकवार ही शरणागति करनी चाहिये जैसे फलार्थ याग एकवार किया जाता है। इस विवेचन से उपायान्तर एव शरणागति मे यह विशेप सिद्ध होता अन्यान्य उपाय आवृत्ति की अपेक्षा रखते है, शरणागति आवृत्ति की अपेक्षा नहीं रखती। है ar सूत्रकार. प्रपदनभजने शब्दादिभेदात् नाना सूचिते ब्रह्मसूत्रकार इस बात को सूचित किया है कि भक्तियोग और प्रपत्तियोग भिन्न भिन्न उपाय है । उपनिपदो मे मोक्षप्राप्त्यर्थ अनेक ब्रह्मविद्याओ का विधान है उनमे न्यासविद्या एक है, यही शरणागति कहलाती है। अन्यान्य ब्रह्मविद्याये भक्तियोग शब्द से व्यवहृत होती है। श्री वेदव्यास जी ने ब्रह्मसूत्र के तृतीयाध्याय तृतीय पाद मे नाना शब्दादि- भेदात् इस सूत्र का निर्माणकर ब्रह्मविद्यामो मे भेद को सिद्ध किया है । उस अधिकरण मे विवेचन इस प्रकार है कि उपनिषदो मे वर्णित ब्रह्मविद्यायें भिन्न २ हैं या एक हैं। पूर्वपक्षी ने कहा कि विभिन्न उपनिषदो मे वणित ब्रह्मविद्याये एक ही हैं, एक ही ब्रह्म- विद्या का सभी उपनिपदो मे वर्णन है । जब उनके नाम फल रूप एव विधायक शब्द मे एकता है, तब उनमे भो ऐक्य ही मानना चाहिये । पूर्व मीमासा मे भी एक वा सयोगरूपचोदनात्याविशेषात् इस सूत्र से उपर्युक्त चार वातो मे ऐक्य होने पर कर्म मे ऐक्य माना गया है। मोक्ष साधन का विधान करने वाले विद्यात् उपासीत निदिध्यासितव्य स्मरेत् और भजस्व इत्यादि शब्द पर्याय माने । इससे सिद्ध होता है ब्रह्मविद्याओ के विधायक शब्दो मे एकता है । सब ब्रह्मविद्यानो का ब्रह्मविद्या नाम है। इससे नाम गये है (७४) मे ऐक्य सिद्ध होता है। सब ब्रह्मविद्यामों में ब्रह्म ही उमास्य है। इससे रूप मे ऐक्य सिद्ध होता है। सब ब्रह्मविद्यानो का फल ब्रह्म प्राप्ति ही है। इससे फल में भी एकता सिद्ध होती है। इस प्रकार चारों बातों में एकता होने के कारण ब्रह्मविद्यापों म ऐक्य मानना चाहिये । मह पूर्व पक्ष है । इस पूर्व पक्ष पा निराकरण करते हुए व्यास जी ने माना शम्दादिभेदात् इस सूत्र से यह सिद्ध किया है कि शन्द प्रादि मै मेप होने के कारण ब्रह्मविद्यामा में मेद सिद्ध होता है । यहाँ व्यास जी ने जिन कारणो से ब्रह्मविद्यामी मे भेद को मिद पिया है उन कारणो से भफियोग और शरणागतियोग म भेद सिद्ध होता है। वेद उपासीस इत्यादि शब्दासे मकियोग का विधान है, शरम व्रज इत्यादि दादो से शरणागति का विधान है। विधायक शब्द भिन्न होने के कारण भक्तियोग और शरणागति उसी प्रकार भित्र है जिस प्रकार विधायक पान्द भेद के कारण भाग, दान और होम भिन्न होते है। यहाँ न केवल मेस ही भेट सिद्ध होता है, किंतु गुणभेद, प्रकरणभेद, नाममे अधिकारिमेद एवं परिकरमेद से भी भेद सिद्ध होता है। मनुसधेय प्राकार गुण कहा जाता है अन्यान्य ब्रह्मविद्यापों में श्रीमगवान के अपहतपाप्मत्व इत्यादि कल्याणगुण अनुसन्धेय है शरणागति में निरपेक्षोपायस्क अनुसन्धेय है। इस प्रकार गुणमेद सिद्ध होता है। अन्यान्य ब्रह्म विद्याये तथा शरणागति बिभिन्न प्रकरण में वर्णित है। प्रत इनमें प्रकरण मेद सिद्ध होता है। मयान्य ब्रह्मविद्याभो के सविधा बहरविधा इत्यादि नाम हैं शरणागति का मासविधा ऐसा नाम है। इस प्रकार नाम में भी भेद है । अपान्य ब्रह्मविद्यायो मे शक सापक अधिकारी है शरणागति मे अशक प्राधिकारी है। इस प्रकार अधिकारी भी मिल है । अन्याय प्राविधानो का प्रग यज्ञ आदि है। शरणागति का मर मानुल्यसकल्प इत्यादि है। इस प्रकार परिकर भी भिम है। इन मेदसाधक प्रमाणो से भफियोग एव शरणागति में भेद सिद्ध होता है। सूत्रकार ने इस बात को माना माहिमेवात इस सूत्र से सिद्ध किया है। इस श्लोक से -- (७५) श्रीदेशिक स्वामी जी ने प्रमाणो से भक्ति और प्रपत्ति मे भेद को सिद्ध किया तथा इन दोनो उपायो मे विद्यमान विशेषताओ का भी वर्णन किया साथ ही प्रपन्नो के प्रति श्रीभगवान की उपायता तथा शरणागति की उपायता के रहस्य को भी खोला। उपर्युक वातो पर प्रकाश डाल कर श्रीदेशिक स्वामी जी ने अवतारिका में परिणत गकामो का निराकरण किया है ॥१५॥ ( १६ ) भक्तो रङ्गपते यथा खलु पशुच्छागादिव दन- ध्यानोपासनदर्शनादिवचसामिच्छन्त्यभिन्नार्थताम् । व्यक्त ये क्याच्छरणागतिप्रपदनत्यागात्मनिक्षेपण- न्यासाद्यषु तथव तन्त्रनिपुणैः पर्यायता स्मर्यते ॥ पूर्व श्लोको मे श्रीदेशिक स्वामी जो ने भक्तियोग एव प्रपत्ति- योग में भेद को सिद्ध करके बतलाया है कि ये दोनो ही मोक्ष के साक्षात् साधन है इन दोनो मे किसी को अपनाये बिना मोक्ष नही प्राप्त हो सकता । यहाँ पर यह शङ्का उठती है कि इन दोनो को हो मोक्षसाधन मानना उचित नही, त्याग और समर्पण इत्यादि को भी मोक्षसाधन मानना चाहिये क्योकि वे भी मोक्षसाधन के रूप में शास्त्रो मे विहित हैं। इस शका का समाधान करते हुए थीदेशिक स्वामी जी इस श्लोक से दृष्टान्तप्रतिपादनपूर्वक सिद्ध करते हैं कि शरणागति प्रपदन न्यास निक्षेप और समर्पण इत्यादि शब्दो से भिन्न २ उपाय नही बतलाये जाते है किन्तु इन शब्दो से एक हो उपाय बतलाया है। एक उपाय व्यक्ति को बतलाने वाले ये शब्द पर्याय है। इसमे श्रीभाष्य वर्णिन सिद्धान्त दृष्टान्त माना जा सकता है। हे रगपते पशुच्छागादिवद् वेदनध्यानोपासनदर्शनादिवचसा भक्तावभिन्नार्थतामिच्छन्ति हे श्रीरङ्गनाथ भगवन् । उपनिषदो मे नि शब्दो से मोक्षसाधन वणित है कही वेदन अर्थात् ब्रह्मज्ञान - (७६) मोक्षसाधन कहा गया है। प्रपत्र ध्यान अर्थात् ब्राध्यान मोक्ष साधन कहा गया है। यही प्रधानुस्मृति मोक्षसाधन कही गई है। किसी उपनिषद् में उपासन भोक्षसाधन बतलाया गया है। यही पर बह्म का दशन मोक्षसाधन कहा गया है। श्रीभगवदगीता में भक्ति मोक्षसायन कही गई है। यहां पर शमा उरती है कि क्या यहाँ सधन एक ही पाय मोक्षसाधन बतलाया गया है या भिन्न मिल पदाथ मोक्षसाधन बतलाये गये हैं। इस पाका का समाधान परते हए थीभाष्यकार स्वामी जी ने श्री भाप्य मे यही सिद्ध किया है कि इन शब्दो से एक ही प्रथ मोक्षसाधन बतलाया गया है। इस अथ को श्रीमाष्यकार स्वामी जी ने अनेक न्याया से सिहाया है। म्याप ये है कि (8) यदि इन शब्दो से विभिन्न पदाय मोशसाधन बतलाये जाय तो यह विरोध उपस्थित हो जायगा । वेद मे कही गया है कि तमेव विद्वानमृत इह भवति नान्य पथा वितेऽधनाम प्रति इस प्रकार श्रीभगवान को सममने वाला मुक्त होता है ज्ञान के सिपाय दूसरा कोई मोक्ष का साधन नहीं है। श्रीमद्गीता में श्रीभगवान ने कहा कि- नाह वेवन तपसा न बनेन मवेज्यया । शक्य एवविषो द्रष्ट पृषानलिमा यथा अशापा त्वना या शमय पहमेववियोऽजुन । मात अष्ट्र च तस्वेन प्रवेष्ट छ परतप ।। अर्थात् मै अध्यापन प्रवचन पध्ययन अवण एष जप का विषय बनने वाले वेद याग दान होम और तपस्या से इस प्रकार नही देखा जा सकता जिस प्रकार तूने देखा। यदि मै साभन भक्तिरहित होते तो इनसे में देखा नहीं जा सकता। मन म भक्ति होने पर हो मे शालों से अन्छी तरह से जाना जा सकता है यथाप रीति से साक्षात्कृत हो सकता है तथा अनन्य भक्ति से ही पथार्ष रीति से मुझ में प्रवेश पाया जा सकता है। पङ् गीतावधन बतलाता है कि थोभगवद्भक्ति ही मोक्षसाधन है, मक्ति को छोड़कर दूसरा कोई मोक्षसाधन नहीं है। उपर्युक्त उपनिषदमन बतलाता है कि ज्ञान (७७) ही मोक्षसाधन है, दूसरा कोई नही ' यदि ज्ञान और भक्ति भिन्न भिन्न पदार्थ होते तो इन वचनो मे विरोध उपस्थित होगा। भक्ति- व्यतिरिक्त बनने वाले ज्ञान के मोक्षसाधनत्व का निपेघ गीता से फलित होगा तथा ज्ञान से व्यतिरिक्त बनने वाली भक्ति के मोक्ष- साधनत्व का निपेध उपनिपद्वचन से फलित होगा । ऐसा होने पर इन वचनो मे विरोध अवश्य उपस्थित होगा। यह विरोध वाछनीय नही है । अत मानना होगा कि भक्ति और ज्ञान एक ही पदार्थ है, उस एक पदार्थ को ही विभिन्न शब्दो से मोक्षसाधन कहा गया है । (२) दूसरा न्याय यह है कि ज्ञान ध्यान उपासन ध्र वानुस्मृति दर्शन एव भक्ति को भिन्न भिन्न पदार्थ मानकर इनको अलग अलग मोक्ष- साधन यदि माना जाय तब अनेक मोक्षसाधन सिद्ध होगे । यह उचित नही है क्योकि इसमे गौरवदोप होगा । जहाँ तक बने एक वस्तु को मोक्षसाधन मानना ही अच्छा है क्योकि इसमे लाघव है । किंच इनको पृथक् पृथक् मोक्षसाधन मानने पर इनमे विकल्प उपस्थित होगा क्योकि ये एक ही मोक्ष को देने वाले है, इनमे किसी एक को अपनाना ही पर्याप्त होगा। ऐसी स्थिति मे इनमे कठिन वनने वाले साधन को कोई भी साधक अपनाएगा नही, इनमे ज्ञान सरल है, ज्ञान से ध्यान एवं उपासन कठिन है, इनसे ध्रु वानुस्मृति कठिन है, उससे भी दर्शन कठिन है । सभी साधक सरल साधन ज्ञान मे प्रवृत्त होगे, ध्यान आदि कठिन साधनो मे कोई भी प्रवृत्त नही होगा । ऐसी स्थिति में उन कठिन साधनो का विधान करने वाले शास्त्र व्यर्थ हो जायेंगे । अत मानना होगा कि इन शब्दो से भिन्न भिन्न साधन वणित नही है किन्तु एक ही साधन विभिन्न शब्दो से वरिणत है। (३) तीसरा न्याय यह है कि उपनिषदो मे किसी किसी ब्रह्मविद्या के प्रारम्भ मे कहा गया है कि ब्रह्मज्ञान मोक्षसाधन है, उन्ही उपनिषदो मे उसी ब्रह्मविद्या के उपसहार में कहा गया है कि ब्रह्म का उपासन मोक्षसाधन है। कई उपनिषदो मे ब्रह्मविद्या के प्रारम्भ मे कहा गया है कि ब्रह्म का उपासन मोक्ष- साधन है उन्ही उपनिषदो मे ही उसी ब्रह्मविद्या के उपसहार मे - में (2) कहा गया है कि ब्रह्मशान मोक्षमाधन है। प्रारम्भ में बल्कि अप का ही उपसहार में भी वणन होना न्यायप्राप्त है। प्रारम्भ किसी का उल्लेख कर अन्त मे दूसरे का उल्लेख करना न्यायविरुद । इस दृष्टि से विचारने पर सिद्ध होता है कि ब्रह्मशान व ब्रह्मो पासन एक ही वस्तु है, वह एक वस्तु ज्ञान भी कही जा सकती है तथा उपासन भी कहीं पा सकती है। (४) चौथा न्याय यह है कि पूर्व मीमासा मै धागपशुयाम धाणत है उसके अनुसार विचार करने पर सिद्ध होता है कि ज्ञान उपाधन ध्यान प्रधानुस्मृति दयन एवं भकि ये शब्द एक ही प्रथ के वाचक है। उस याय का विवरण इस प्रकार है कि वेद में पशुमा पजत नह पर पशु सै याग करने को कहा गया है। धार परणपाले प्राणी पशु कहलाते हैं। उनमें किससे याग करना चाहिये । ऐसी जिज्ञासा होना सहज है। दिक মগ ম গ গবাধা অং জ্ঞান জা দায়ী না তার है। पशु सन्द सामान्यवाचक है क्यो चार चरण वाले सभी प्राणी पशु कहे जाते है । छाग शब्द विशेष वाचक है क्यों कि वह धकरे को ही बतलाता है । सामा वा विशेष मे पमवसान होना उचित है। इससे सिद्ध होता है कि एक ही लाग सामान्यवाचक पशु शर से तथा विशेष चाचक झाग शब्द से बतलाया गया है। इसे ही छागपन्याय कहते हैं। इस “याय के अनुसार विचार करने पर मानना पडता है कि जान ध्यान ध्रुषानुस्मृति दशन एक अति में सामान्य विशेष भाव होने के कारण एक ही साधन इन सामाय राब्दी से बतलाया गया है। सभी भान शान कहे जा सकते है उन ज्ञानों में निरन्तर होने वाले शान हो ध्यान कहे जाते है उनमे कभी भी न टूटने वाली स्मृति ही प्रवानुस्मृति कहलाती है ये स्मरण प्रत्यक्ष के समान विशद स को धारण करने पर दान कहे जाते है तथा प्रीति स्म होने पर कि कहलाते है। इस प्रकार इनमे सामा न्य विशेष भाव है । इससे फलित होता है कि एक ही साधन कही कही पर सामान्य रूप से बतलाया गया है, कही कही पर विशेष रूप से बतलाया गया है। श्री देशिक स्वामी श्री कहते है कि हे ।
( ७६ ) श्रीरंगनाथ भगवन् | जिस प्रकार छागपशुन्याय इत्यादि न्यायो के अनुसार विचारने पर विद्वद्गण ज्ञान उपासन ध्यान दर्शन एव भक्ति इत्यादि शब्दो को एकार्थवाचक मानते है, उसी प्रकार मीमासा- शास्त्रज्ञ विद्वानों ने शरणागति प्रपदन त्याग आत्मनिक्षेप और न्यास इत्यादि शब्दो को भी एकार्थवाचक ही माना है। इन शब्दो से एक ही साधन वणित है भिन्न भिन्न साधन नहीं । जान ध्यान उपासन दर्शन और भक्ति इन शब्दो मे से शरणागति प्रपदन त्याग आत्म निक्षेप और न्यास शब्द में यही अन्तर है कि ज्ञान आदि शब्द सामान्यविशेषभाव से एक ही अर्थ का प्रतिपादन करते है, शरणा- गति आदि शब्द विना हो सामान्यविशेषभाव के एक ही व्यक्ति का प्रतिपादन करते है। इससे इनमे एकार्थवाचकत्व अत्यन्त सुदृढ होता है । महर्पियो ने भी इस अर्थ का वर्णन किया है । श्रीपाश्चरात्र सहिता लक्ष्मा तन्त्र मे कहा गया है कि- निक्षेपापरपर्यायो न्यास. पञ्चाङ्गसयुत । सन्यासरत्याग इत्युक्त. शरणागतिरित्यपि ।। अर्थात् निक्षेप शब्द से कहा जाने वाला पांचो अगो से युक्त न्यास ही सन्यास त्याग और शरणागति शब्द से अभिहित होता है । इस भाव को लेकर श्री देशिक स्वामी जी इस श्लोक के उत्तरार्ध मे कहा है कि तथैव तस्त्रनिपुण शरणागतिप्रपदनत्यागात्मनिक्षेपरगन्या- सायेषु व्यक्त्यं क्यात् पर्यायता स्मर्यते ॥१६॥ ( १७ ) विश्वासायासभूम्ना न्यसनभजनयोगौरवे को विशेष- म्तत्सद्भावेऽपि धर्मान्तर इव घटते कर्तृ भेदाद्विकल्पः । तईदो रङ्गशायिन्ननितरगतिताद्य स्थशोकातिरेकात् । सद्विद्यादौ विकल्पस्त्वभिमतिभिदया तेन तत्रैकराश्यम् ।। पूर्व श्लोक मे श्रीदेशिक स्वामी जी ने कहा है कि मोक्षसाधन को बतलाने वाले ज्ञान ध्यान उपासन दर्शन धूवानुस्मृति और भक्ति - दोनों । (0) इत्यादि शब्द भिन्न भिन्न पथ के वाचक न होकर एक भफियोग के ही वाचक बनते है तमा शरणागति प्रपदन यास मारमनिक्षेप और न्यास इत्यादि शब्द भी विभिन्न प्रर्यों के वायकम होकर एक शरणागति के ही वापक होते है। इससे सिद्ध होता है कि मजि- योग पौर शरणागति ये दोनों ही साक्षात् मोक्ष देने वाले साधन हैं । शाखों में मोक्षसाधन को बतलाने के लिये प्रयुक्त शब्द इन साधनों में किसी एक को बतलाते हैं श्रीभगवान ने स्पष्ट कहा है कि- भरुषा परमपा वापि प्रपस्या वा महामुने । प्राप्योह मान्यषा प्राप्यो मम कबुलिप्सुभि ।। अर्थात हे महामुने । मै परम भक्ति प्रथवा प्रपत्ति से प्राप्य हो सकता है, मेरा कर्य चाहने वाले साधकों को मे दूसरे किसी उपाय से प्राप्य नही हो सकता । इस श्लोक में श्री देशिक स्वामी जी इन दोनों साधनों में व्यवस्थित विकल्प का वणन करत है। विश्वासायासभूम्मा न्यसनमजनयोगारदे को विशेष भक्तियोग और प्रपत्तियोग एक ही मोक्षफल को देनेवाले साधन हैं। इन दोनों मे किसी एक को अपनाने पर मोक्ष प्राप्त हो सकता है दोनों को अपनाने की मावश्यकता नही । इसलिये इन दोनों साधनों में विकल्प माना जाता है। विकल्प का अर्थ यही है कि एक ही फल देने वाले साधनो मे किसी एक का अपनाना ही पर्याप्त है। यहाँ पर यह शहा उठती है कि इन दोनो मे सम विकल्प मानना उचित है या व्यवस्थित विकल मानना उचित है? एक फल देने वाले जिन साधनो मे बिना अधिकारभेद के विकल्प माना जाता है, वहाँ सम विकल्प होता है। प्रति अमुक अधिकारी अमुक साधन कर इस प्रकार अधिकारी भेद के बिना ही जिन एकफल साधनो में किसी एकको अपनाने के लिमे खुली छूट दी जाती है, उन साधनो मे सम विकल्प माना जाता है । एक फल देने वाले होने पर मो जिन साधनो के विषय में यह व्यवस्था छ कि मामुक मायकारी ही अमुक सापन करें उन साधनो में व्यवस्थित विकल्प माना जाना है।
यहां पर यह (०१) जिज्ञासा होतो है कि मोक्ष देने वाले भक्तियोग और प्रपत्तियोग मे समविकल्प है या व्यवस्थित विकल्प । उत्तर यह है कि इनमें व्यवस्थित विकल्प होता है अर्थात् अमुक अधिकारी अमुक साधन अपनावें ऐसी यहाँ व्यवस्था मानी जाती है। इस प्रकार व्यवस्था मानने पर ही साधनो को अधिकारी प्राप्त होगे । अन्यथा कठिन साधन के लिये अधिकारी मिलना असभव हो जायगा। एक दृष्टि से विचार करने पर सिद्ध होता है कि इनमें भक्तियोग कठिन है तथा प्रपत्तियोग सरल है क्योकि भक्तियोग की आवृत्ति प्रति दिन करनी होगी, वह भी मरणपर्यन्त करनी होगी, यहाँ तक मरते समय में भी श्री भगवान् के विषय में अन्तिम स्मरण करना होगा । प्रपत्तियोग जीवन में एक ही वार करने का है, इसमे अपने प्रयत्न से अन्तिम स्मरण करने की आवश्यकता नही है। भक्तियोग वर्णाश्रमधर्म यज दान तपस्या और शमदम इत्यादि उन अगो की अपेक्षा रखता है जिन्हे मरणपर्यन्त करना पड़ता है, प्रपत्तियोग क्षणकालसाध्य आनुकूल्यसकल्प इत्यादि पांच अगो की ही अपेक्षा रखता है । इस दृष्टि से विचार करने पर सिद्ध होता है कि भक्ति- योग दुष्कर होने से कठिन है तथा प्रपत्तियोग सुकर होने से सरल है। कठिन भक्तियोग से भी मोक्ष प्राप्त होगा तथा सरल प्रपत्ति से भी मोक्ष प्राप्त होगा। यहाँ पर यदि यह निर्णय दिया जाय कि कोई भी मुमुक्षु साधक किसी भी साधन को अपनावे तव तो सभी मुमुक्षु साधक सरल साधन को ही अपनाने में प्रवृत्त होगे कोई कठिन साधन में प्रवृत्त होने के लिये तैयार नहीं होगा ऐसी स्थिति में कठिनोपाय भक्तियोग का विधान करने वाले शास्त्र निरर्थक हो जायेंगे । शास्त्र निरर्थक न हो तदर्थ मानना पडता है कि ये दोनो साधन भिन्न भिन्न अधिकारियो को कर्तव्य हैं, उन उन अधिकारियो के द्वारा किये जाने पर ही वे लाभदायक होगे। उन माधनो को करने वाले अधिकारी व्यवस्थित होने के कारण उनमे व्यवस्थितविकल्प ही सिद्ध होता है तथा उन उन अधिकारियों के लिये उन उन साधनो का विधान करने वाले शास्त्र भी सफल होगे।
(२) यहाँ पर एक प्रश्न उठता है जिसका उल्लेख इस श्लोक के प्रथम पाद में किया गया है वह यह है- है रमशायिन विश्वासापासभूम्ना यसनमजनयोगौरवे को विशेष हे रङ्गनाथ भगवन् । कई विद्वानों का यह मत है कि भक्ति पौर प्रपति ये दोनों ही कठिन हैं इनमें कोई भी सरल नहीं है। भक्तियोग में अधिक परिश्रम की अावश्यकता है मरणपपन्त प्रति दिन मावृत्ति करते रहने पर हो भक्तियोग सघता है। इसलिये मानना पडता है कि भक्तियोग कठिन उपाय है। प्रपत्तियोग मे इस प्रकार की कठिनता न होने पर भी दूसरे प्रकार की कठिनता है। प्रपत्ति मे महाविश्वास की आवश्यकता है। श्रीमगवान अवश्य रक्षा करेंगे ऐसा महाविश्वास प्रपत्ति मे अपेक्षित है। ऐसा महा विश्वास सब को नही होता है । इस दृष्टि से प्रपत्ति भी कठिन ही सिद्ध होती है। इन दोनो मे किसी को सरल तथा किसी को कठिन कहना उचित नही है दोनों को ही कठिन मानना चाहिये । इस प्रकार कई विद्वानो के मत को प्रथम चरण से उपस्थापित कर थी देगिक स्वामी जी विवेचना पूर्वक निएम देते हुए कहते है कि- तत्समावेऽपि यन्तिरे व कस भैवाहिकल्पी घटते । भाव यह है कि यहां पर भफि और प्रपत्ति इन दोनों उपायों को कठिन कहने वाले विद्वानी का नया अभिप्राय है। इस पर विचार करना होगा । यदि उनका यह अभिप्राय है कि दोनो उपाय कठिन है कोई भी मुमुक्षु किसी को भी अपना सकता है इनमे यह अधिकारिव्यवस्था नहीं है कि अमुक साधक ही अमुक साधन को अपनाये वो कहना पडता है कि उनका अभिप्राय असगत है क्योकि शाखो से यह व्यवस्था सिद्ध होतो है कि प्राचिन पर्यात् उपायान्तर होन सापक ही शरणागति कर सकते हैं । पाश्चरान महिषु न्य सहिता में एक वचन है, जिसका उद्धरण पूर्वाचार्य बारबार देते रहते हैं, उससे यही प्रमाणित होता है कि प्रकिषन साधक ही शरणागति करे। वह वचन यह है कि- (८३) महमस्म्यपरापानामालयोऽकिचनोऽगति त्वमेवोपायभूतो मे भवेतिप्रार्थना मतिः ॥ अर्थात् साधक श्रीभगवान् से प्रार्थना करता है कि हे श्रीभगवन् में अपराधो का वासस्थान हूँ, अकिंचन हूँ अर्थात् उपायान्तर से सर्वया रहित हूँ तथा अनन्यगति हूँ अर्थात् श्रीभगवत्प्राप्ति को छोड कर दूसरे किसी फल को चाहने वाला नहीं हूँ। आप ही मेरे लिये कृपया उपाय बन जाइये । यह प्रार्थनात्मक ज्ञान ही शरणागति कहलाता है । श्रीभगवान के विषय मे इस शरणागति का प्रयोग करना चाहिये। इस वचन को ध्यान में रखकर श्रीयामुनाचार्य स्वामी जी ने भी स्तोत्ररत्न में कहा है कि- अकिंचनोऽनन्यगतिः शरयस्त्वत्पावमूल शरण प्रपद्ये । अर्थात् हे शरण देने वाले श्री भगवन् अकिंचन अनन्यगति मे आपके चरणारविन्द के शरण मे आता हूँ। इन प्रमाण वचनो से सिद्ध होता है कि उपान्तर करने की योग्यता रखने वाले साधक भक्तियोग इत्यादि उपायान्तर करे तथा उपायान्तररहित साधक शरणागति करे। इस विवेचन से फलित होता है कि इनमे अधिकारी व्यवस्थित है। कोई भी साधक इनमे किसी को अपनावे, आपत्ति नही है, ऐसा मानना अनुचित है । यदि भक्ति और प्रपत्ति इन दोनों उपायों को कठिन कहनेवालो का यह कहने मे अभिप्राय है कि अधिक विश्वास वाले गरणागति करें, अधिक परिश्रम करने में समर्थ साधक भक्तियोग करे तो इससे अधिकारिव्यवस्था ही फलित होगी। परन्तु इस व्यवस्था मे एक बाधक है उस पर ध्यान देना होगा । वह बाधक यह है कि उपयुक्त प्रकार से अधिकारिव्यवस्था मानने पर यह फलित होगा कि अधिक परिश्रम करने में असमर्थ होने पर भी जो साधक श्रीभगवान् मे महान् विश्वास रखते हैं, वे शरणागति के अधिकारी है तथा श्रीभगवान् मे कम विश्वास रखने वाले साथ ही अधिक परिश्रम करने में समर्थ साधक भक्तियोग के अधिकारी है इस व्यवस्था मे (४) यही दोष है कि यह व्यवस्था सवत्र लागू नहीं हो सकती क्योंकि अध्यात्मशाल के प्रवतक श्री वेदव्यास प्रादि महपिगण श्रीभगवान मे पूर्ण विश्वास रखते हुए भी भक्तियोग ही करते थे। इसलिये यह व्यवस्था-कि पूनविश्वास बालों को हो भक्तियोग में अधिकार है अधिक विश्वास वालों को शरणागति में प्रधिकार है-प्रसगत सिड होती है । प्रत' यहाँ पर दूसरे प्रकार से ही अधिकारि व्यवस्था मानना चाहिये । जिस प्रकार ब्रह्मविद्या नाम से पुकारी जानेवाली विद्याभो म समानरूप से कठिनता होने पर भी मधुविद्या में उन साधको को ही अधिकार है जो वसु प्रादि के पद को प्राप्त कर बाद मैं परब्रह्म को प्राप्त करना चाहते है, पञ्चाग्निविद्या म ब्रह्मात्मक परिशुद्ध-स्वात्म स्वरूप प्राप्ति को चाहनेवालो का अधिकार है इस प्रकार समान कोटि को ब्रह्मविद्यानों में विभिन्न सापकों का ही अधिकार माना जाता है, उसी प्रकार भक्ति भार अपत्ति में विश्वास पौर प्रायास की महत्ता की आवश्यकता को देखने पर समान रूप से कठिनता सिद्ध होने पर मो अधिकारिमेद से व्यवस्था माननी होगी। पधिकारिमेद को किस प्रकार मानना चाहिये? इस पर प्रकाश डालते हुए सर्वत स्वतन्त्र बी देशिक स्वामी जी निणय देते हैं कि- अनितरगतितायस्पशोकातिरेकातडू द पाहे भक्ति और प्रपत्ति में इस प्रकार वैषम्य हो कि भक्ति कठिन है तथा प्रपति सरल है माहे इनमे समान रूप से कठिनता हो क्योकि भक्ति म अधिक भायास की आवश्यकता है प्रपत्ति में अधिक विश्वास की पावश्यकता है तो भी इनमें अधिकारिमेद अवश्य भानना होगा, क्योकि शाब मे वह वणित है। वह अधिकारिमेद इस प्रकार है कि भक्तियोग करने के लिये पर्याप्त ज्ञान पर्याप्त शक्ति एष प्रणिक जम में तीनों योग्यता जिन म हो, भक्तियोग विलम्ब से फल देने वाला होने के कारण जिनको विलम्ब से फल प्राप्त करने की इच्छा हो वे ही भक्तियोग के भीषकारी है इन पार विशेषतानों से सपत्र साधकों को हो भक्तियोग करना चाहिये। जिन सापको में इन चार (६५) विशेषतानो मे एक न हो, या दो न हो, अथवा तीन न हो, यद्वा चारो ही न हो, वे सब महाविश्वास सपन्न सब महाविश्वास सपन्न होने पर प्रपत्ति का अधिकारी है, भक्तियोग का अनुष्ठान करने के लिये पर्याप्त ज्ञान और शक्ति से सपन्न होने पर भी जो साधक शीघ्र मोक्ष फल चाहते हैं अर्थात् विना प्रारब्ध को भोगे ही शोघ्र श्री भगवान् को प्राप्त करना चाहते हैं उन्हे भी शरणागति ही करनी चाहिये । जो शीघ्र श्री भगवान् को प्राप्त करने के लिये लालायित हो उनको शरणागति ही उपाय है क्योकि शरणागति ही प्रारब्ध को भी नष्ट कर शीघ्र मोक्ष दे सकती है, भोग के द्वारा प्रारब्ध नष्ट होने पर ही भक्तियोग मोक्ष देने की योग्यता रखता है। शक्त यभाव ज्ञानाभाव त्रैवणिक- जन्माभाव एव विलम्ब सहन इनमें से किसी भी निमित्त के कारण जो साधक उपायान्तर मे हाथ डालने योग्य न रह गये, अतएव उपाया- न्तर ही बन गये है साथ ही श्रीभगवत्प्राप्ति को छोडकर दूसरे किसी फल को नही चाहते है, ऐसे साधको को-जो तीव्र मोक्षेच्छा होने पर भी उपायान्तर के योग्य न रहने से अतिमात्र शोक से व्याकुल है-शरणागति मे अधिकार है। श्रीवेदव्यास इत्यादि महर्षिगण श्री भगवान् मे पूर्ण विश्वास होने पर भी भक्तियोग का ही अनु- छान करते थे, इसका कारण यह है कि उनमे भक्तियोग करने के लिये अपेक्षित ज्ञान शक्ति और ब्राह्मण जन्म ये विशेषतायें विद्यमान थो, साथ ही वे आधिकारिक पुरुष होने के कारण विलम्ब से हो मोक्ष चाहते थे। श्रीभगवान् ने उनको इस ब्रह्माण्ड मे उन उन अधिकार पदो पर नियुक्त कर रक्खा है, अधिकार के अवसान में ही उन्हें मोक्ष प्राप्त करना होगा। इस विवेचन से सिद्ध होता है किसी भी कारण से हो जो साधक उपायान्तर शून्य होने के कारण अत्यन्त गोक से व्याकुल हैं, वे शरणागति का अधिकारी है, जो साधक उपायान्तर मे प्रवृत्त होने के लिये पर्याप्त योग्यता रखते है, माघ ही विलम्ब से मोक्ष चाहते हो, वे भक्तियोग के अधिकारी है। इस प्रकार भक्ति और प्रपत्ति में अधिकारिभेद व्यवस्थित रहता है। प्रतएव इनमें व्यवम्यित विका मानना ही न्याय सगत होगा। - । (६) सहिचादी स्वमिमतिभिवया विकल्प सेन तकरायम उपनिषदों में सद्विधा दहरविद्या शाण्डिल्यविद्या प्रक्षरविद्या और न्यासविद्या इत्यादि अनेक ब्रह्मविद्याय वरियत है । उनमें ज्यासविद्या हो शरणागति है। अन्याय ब्रह्मविद्यायें भक्तियोग कहलाती है। इनमें यासविद्या और पन्या य ब्रह्मविद्यापों में व्यवस्थित विकल है जो अबतक कहा गया है । अपाय दिया इत्यादि ब्रह्मविद्यामों मे सम विकल्प है क्योकि यहां अधिकारिभेद नही है जो साधक भान शक्ति एवं प्रणिक जम से सपन हो साथ ही विलम्ब से फल प्राप्त करना चाहत हो वे ही उन ब्रहाविद्यानो के अधिकारी है वे अपनी इच्छा से किसी एक ब्रह्मविद्या को अपना सकते हैं। अतएव उन ब्रह्मविद्यापो म समविकल्प माना जाता है प्रतएव धे विद्याय एक भक्तियोग वे वग में गिनी जाती है ॥१७॥ (१८) प्रवधिकृतिभेदात्कमवद्रङ्गवासिन फलति फलमनेक स्वापदे भक्तिरेका। शरणवरणयाणी सचहेतुस्तथाऽसौ कृपरणभजननिष्ठा बुद्धिदोबल्यकाठा ॥ पूर्व श्लोक में श्रीदेशिक स्वामी जी में प्रतिपादन किया है कि मवित और प्रपत्ति में व्यवस्थित विकल्प है भक्तियोग के नाम से नही जाने वाली अन्यान्य ब्रह्मविद्यामो मे सम विकल्प है । इस श्लोक में श्री देशिक स्वामी जी कहते है कि भक्ति के समान शरणागति भी सर्व फलप्रदायिनी है। हे रजवासिन् । स्वत्पद्ये एका भक्ति कमवविकृतिभवादनेक फल पुष फलति श्री रग मे विराजने वाले है श्री रङ्गनाम भगवान् जिस प्रकार अग्नि होत्र इत्यादि एक ही कम उन अनेक फलों को प्रदान करता है जिहे कम करनेवाले अधिकारी चाहते हो। कम करनेवालो की इच्छा के अनुसार एक हो म अनेक फल देता है मह पात्र सिद्ध अकाट्य सिद्धात है उसी प्रकार ही मानना पड़ता - । (८७) है कि आपके चरणारविन्द के विषय में की जानेवाली एक ही भक्ति साधको की इच्छा के अनुसार अवश्य अनेक फल देती हैं। इसमे सन्देह नहीं है । आपने गीता मे स्पष्ट कहा है कि- चतुविधा भजन्ते मां जना सुकृतिनोऽर्जुन । प्रा” जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञनो च भरतर्षभ । अर्थात् हे अर्जुन । आर्त अर्थार्थी जिज्ञासु और ज्ञानी ऐसे चार प्रकार के धर्मात्मा सज्जन मेरा भजन करते है। इनमे आर्त नष्ट ऐश्वर्य को प्राप्त करने के लिये भगवद्भजन करते हैं अर्थार्थी नये ऐश्वर्य को प्राप्त करने के लिये भजन करते है, जिज्ञासु कैवल्य पुरुषार्थ को प्राप्त करने के लिये भजन करते है, ज्ञानो श्री भगवान् को प्राप्त करने के लिये भजन करते है। सभी भजन ही करते है वह एक भक्ति ही कामना के अनुसार उन उन साधको को विभिन्न फल देती है। भक्ति के द्वारा साधको को विभिन्न फल इस प्रकार प्राप्त होते है कि भक्ति से प्रसन्न होकर श्री भगवान् भक्तो की कामना के अनुसार उनको विभिन्न फल देते हैं । अतएव भक्ति अनेक फल साधन मानी जाती है । तथाऽसौ शरणवरणवारणी सर्वहेतु जिस प्रकार एक ही भक्ति अनेक फल देती है, उसी प्रकार एक ही शरणागति सर्व फल देती है। यहाँ तक कि शरणागति वाक्य का उच्चारण भी सर्वविध फल देता है । जिस प्रकार धनिको के गृह द्वार मे पहुँच कर विना अर्थ जान के भवति भिक्षा देहि कहने वाला वालक भिक्षा प्राप्त करता है, उसी प्रकार नाना प्रकार की कामनानी को लेकर श्री भगवान् के समक्ष उपस्थित होकर विना ही अर्थ-ज्ञान के शरणागति वाक्य का उच्चारण करने वाला साधक भी अपनी कामना के अनुसार अनेक फलो को प्राप्त करता है । यह गरणागति वाणो का प्रभाव है । माख मे श्री भगवान् को सम्बोधित कर कहा गया है कि- तावदातिस्तया वाञ्छा तावन्मोहस्तथाऽसुखम् । पावन याति शरणं त्वामशेषाघनाशनम् ।।
(4) पर्यात् श्रीभगवन् । मनुष्यों को तब तक प्राति अर्थात् ऐश्वय नष्ट होने के कारण बेचनी बनी रहेगी, तबतक वान्छा अर्थात् नये ऐश्वम को प्राप्त करने की लालसा बनी रहेगी, तब तक मोह अर्थात् भारमानुभव का अभाव बना रहेगा तथा तब तक ससार दुख वना में रहेगा जब तक सम्पूण पापों को नष्ट करने वाले भापरे शरण नावे मापके शरण में प्राने पर सव फल प्राप्त होगे। इस बचन से सिद्ध होता है कि शरणागति सव फल साधन है। कृपस भजन निद्या बुद्धिदोबल्यकाटा इस प्रकार भक्ति और प्रपति सव फल साधन तभी बनते है जव योग्य अधिकारियों के द्वारा किये जाय । यदि भक्तियोग के लिये पर्याप्त योग्यता न रखने याला साधक प्रपत्ति में विश्वास की कमी के कारण भक्तियोग मे प्रवृत्त हो तो उसे मन्द बुद्धि हो मानना होगा, क्योकि वह भक्ति योग को निमा नहीं सकता, प्रसाध्य मे हाथ डाल दिया जो शरणा गति उससे निभ मकसी उसमे तो उसका महा विश्वास नहीं, उसको फल प्राप्त होना कठिन है। प्रतएव शाब में कहा गमा है कि मरस्म बुद्धिदौबस्यादुपायान्तरमिष्यते अर्थात् उपायान्तर की योग्यता न रखने वाला साधक शरणागति में विश्वास की कमी के कारण ही उपायान्तर को अपनाना चाहता है, विश्वास की वमी हो बुद्धि की दुबलता है । उपायान्तर मे प्रवृत्त होने वाले असमय सापकों को बुद्धिदोषल्य की सीमा पर पहुंचे हुए मानना चाहिये । माष यह है कि साधको को अपनी योग्यता पर ध्यान रखकर योग्य साधन को चुनना चाहिये ॥१॥ 1 ( १९) कतव्य सकृदेव हत कलुष सर्व ततो नश्यति अमेशाविसुदुलभ पदमपि प्राप्य मया द्रागिति । विश्वासप्रतिधिचितनमिव पर्मस्यतिन्यस्मता रङ्गाधीश रमापतित्वसुभग नारायणस्व तब ॥
। (६) पूर्व श्लोक मे श्री देशिक स्वामी जी ने कहा है कि शरणागति सकलफलसाधन है। शरणागति में विश्वास की न्यूनता के कारण ही वे लोग भी भक्तियोग में हाथ डालने लगते है जो तदर्थ पर्याप्त योग्यता नही रखते है। इस श्लोक मे श्री देशिक स्वामी जी महा- विश्वास को नष्ट करने वाले विचारो को उपस्थित कर समीचीन युक्तियों से उन विचारो का खण्डन करते हुए महाविश्वास को सुदृढ करते हैं। हे रङ्गाधीश | कर्तव्य सकृदेव हन्त तत सर्व कलुष नश्यति ब्रह्म शादिसुदुर्लभ पदमपि मया द्राक् प्राप्यम् इति विश्वासप्रतिवन्धि न्यस्यतामिद चिन्तन रमापतित्वसुभग तव नारायणत्व पर्यस्यति हे थोरङ्गनाथ भगवन् । अापके श्री चरणो मे अपने रक्षाभार का समर्पण करना ही शरणागति है। ऐसी शरणागति करने वालो को प्राप मे महाविश्वास अत्यावश्यक है क्योकि महाविश्वास गरणागति का एक विशिष्ट अग माना जाता है। बडे बडे माधको के मन में ऐसे अनेक दुर्विचार उठकर महाविश्वास को जमने नहीं देते उन दुर्विचारो को नष्ट करने का एक मात्र उपाय यही है कि आपके लक्ष्मापतित्व और नारायणत्व का अच्छी तरह से अनुसन्धान किया जाय । इम अनुसन्धान से हो वे दुविचार मिट सकते है दूसरा कोई साधन नही। वे दुर्विचार ये हैं कि शरणागति मुझे एक बार ही करनी होगी उसमे सर्वविध पाप नष्ट हो जायेंगे तथा वह पद भी मुझको शीघ्र प्राप्त हो सकता है जो ब्रह्म और रुद्र इत्यादि को भी दुर्लभ है ? ऐसा विश्वास कैसे किया जाय । मरणपर्यन्त प्रावृत्ति किये जाने वाले भक्तियोग से भी सचित पुण्य पाप ही नष्ट होते है, प्रारब्ध नष्ट नही होता। सम्पूर्ण प्रारब्ध भोगने के बाद ही परमपद प्राप्त होता है । जव गुरु उपाय भक्तियोग को यह स्थिति है तो लघु उपाय शरणागति पर यह विश्वास कैसे किया जा सकता है कि जीवन में एक बार कर्तव्य क्षणकालसाध्य इस शरणागति मे मम्पूर्ण सचित और प्रारब्ध नष्ट होकर वह परमपद मुझ धोर अपराधो के प्राकर को तुरन्त मिल नायगा।
." यदि इस विचार का विश्लेपण किया जाय तो विदित होगा कि इस मे पौष पुर्विचार निहित है। ये हैं (1) साधक सोचता है कि मै अनन्त अपराधो का भण्डार हूँ पतएव में श्री भगवान को विशेष कृपा का पात्र नहीं बन सका। यदि पात्र बना होता तो यह दुदशा नही होती, तब तो में कम से कम कर्मयोग का अधिकारी बन ही पाता। अधिकारी तो बना नही इससे व्यक होता है कि अनन्त अपराध के कारण हो मे थी भगवान की कृपा का भाजन नहीं बन सका । श्री भगवान सवा है, मेरे सब अपराधों को जानते है, श्री भगवान् सवचिसपन्न है प्रत्येक पपराध के लिये दण्ड दे सक्ते हैं ऐसी स्थिति मे मुझ अपराधी को श्री भगवान कसे पाश्रय दे सकते हैं । यह शका श्री भगवान् को लक्ष्मीपति ममझने पर दूर हो जाती है। श्री भगवान् श्री महालक्ष्मी पर अपार प्रेम करले बाल है । श्री महालक्ष्मी जी के मुखोल्लास के लिये ही श्री भगवान ष्टि स्थिति मोर प्रलय इत्यादि लीला करते रहते हैं। श्री भगवान श्री महालक्ष्मी जी की प्रायना को टाल नहीं सकते। शरणागतों को अपनाने के लिये श्री महालक्ष्मी जी जब श्री भगवान् से अनुरोध करती है श्री भगवान् ठुकरा मही सकते श्री महालक्ष्मी जी के अकाट्य मनुरोध के कारण श्रीभगवाम् सर्व प्रपराधों को क्षमा करते हुए ऐसे बन जाते हैं मानों उन अपराधों को बिलकुल महीं जानते हों प्रतएव श्री भगवान् को प्रविज्ञाता ऐसा नाम पड़ा है। ऐसे पविज्ञासा बनने वाले धो भगवान् अपराधियों को भी माधय दें, इसमे क्या चाश्चर्य है। इस प्रकार श्री भगवान के लक्ष्मीपतित्व को हृदयगम करने पर प्रथम शका दूर हो जाती है। (२) साधक सोचता है कि श्री भगवान को देने वाले है। इसलिये उन्हे कर्मानुरूप फलप्रद श्री भगवान् भले ही श्री महालक्ष्मी जी के अनुरोध हेने के लिये राजी हो जाम, पर वे मुझे महा फल म पर कैसे विश्वास किया जाय ' क्योकि मैने प्रब अपराध कर गले है।
(६१) श्री भगवान् को उन कमों का फल देना होगा, ऐसी स्थिति में अनन्त फल मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? विश्वास को हिलाने वाली यह शका नारायण शब्दार्थ के अन्तर्गत स्वामित्व गुरण का अनु- सन्धान करते ही नष्ट हो जाती है। श्री भगवान् कर्मानुरूप फलप्रद होने पर भी इस शरणागतिरूपव्याज से प्रसन्न होकर प्राप्तिप्रति- वन्धक पापो को नष्ट कर देते हैं तथा दासस्वामिभाव सबन्ध के कारण भगवत्प्राप्ति के महान् फलमोक्ष का भी प्रदान करते है। कारण यह है कि श्री भगवान् स्वभावत स्वामी है, जीव स्वभावत दास है । दास को स्वामो की सेवा मे सहज अधिकार है, प्रतिवन्धक होने के कारण अब तक जोब उस महाफल को प्राप्त नही कर सका है प्रतिबन्धक दूर होते हो जीव को उसे प्राप्त करना न्याय- प्राप्त है । जीव को साधनानुष्ठान, प्रतिबन्धक दूर करने के लिये करना पडता है न कि भगवत्प्राप्ति के लिये । प्रतिवन्धक दूर होते ही भगवत्प्राप्ति अवश्य हो जायगी। श्री भगवान स्वाभाविक दास स्वामिभाव सबन्ध के कारण दायधन के समान न्याय प्राप्य भगवद- नुभव एव कैडूर्य का अवश्य प्रदान करेंगे। इस दासस्वामिभाव सम्बन्ध का अनुसन्धान करने पर दूसरी शका मिट जाती है । (३) साधक के मन में यह विचार भी कभी उठ सकता है कि श्री भगवान् परिपूर्ण हैं, अवाप्तसमस्तकाम है, उनको किसी द्वारा कुछ उपकार प्राप्त करने की आवश्यकता नही है। ऐसे भगवान् शरणा- गतिरूप अल्प व्यापार को निमित्त बनाकर क्योकर अनुग्रह करेंगे । इस तरह इस विचार से भी विश्वास उठ सकता है । पर यह दुर्विचार भी नारायण शब्दार्थ के अन्तर्गत स्वाभाविक दया इत्यादि गुणो की महत्ता को समझने पर मिट जाता है । जिस प्रकार दयालु सौजन्यगुण-- युक्त राजा प्रजा के प्रत्यल्प अनुकूल व्यापार से प्रसन्न होकर प्रजा के मनोरथ को पूर्ण करने मे तत्पर हो जाता है उसी प्रकार सब प्रकार से परिपूर्ण होते हुए भी परम दयालु श्री भगवान् जीव के भरणागतिरूप अत्यल्प अनुकूल व्यापार से प्रसन्न होकर जीवकृत क्षुद्र व्यापार को परमोपकार मानकर कृतज्ञतापूर्वक उस पर (२) अनुग्रह करते है तथा जीप के मसाध्य मनोरष को पूर्ण कर (४) कभी साधक यह सोषता है कि अन्याय देवता नीप्रफल देने वाले है श्री भगवान विलम्ब से फल देने वाले है। यह विशेषता शाससिद्ध है। ऐसी स्थिति में इस बात पर कसे विश्वास किया जाय कि श्री भगवान् शरणामत को शरीर छूटते ही मोक्ष देंगे। यह शका नारायण वागय के अन्तगत सकल्पगुरा के महत्व पर ध्यान देने से दूर हो जाती है। भले श्री भगवान् उन फला को दने में विलम्ब कर जो जीवों का हितावह नही हो। मोक्ष फल जीवों का प्रत्यन्त हितावह है, इस फल को यो भगवान् हिनपो होने क कारण शीघ्र फल दे देते है, शोधदेने में थी भगवान समथ है उनका सकल्प प्रमोध है, उन्हें किसी दूसरे सहकारिकारण की प्रतीक्षा करनी नहीं पड़ती। (५) साधक के मत में कभी यह विषार उठता है कि श्रीभगवान पात्रापात्र विचार करके देने वाले है। इस बात पर कसे विश्वारा किया जाय कि कुपात्र बद्धजीव को सर्वोत्तमफल मुलि का प्रदान करेंगे। यह शका भी नारामण शब्दार्थ के अन्तगत श्री भगवद्गुणों पर ध्यान देने से दूर हो जाती है। श्री भगवान परम स्वतत्र साथ ही अपना लाभ समझ कर जीवो का कल्याण करमा उनका स्वमाप है। वे जीवो को सुपात्र बनाकर के ही मोक्ष देते है। जिस प्रकार दयालु उदार राणा राजकुमार को दूध पिलाते समय तियक शुक को भी दूध पिलाते है उसी प्रकार दयालु उदार श्री भगवान इन यह जीवों को सुक बनाकर नित्यसूरियों के समान भोग दें सो इसमे कोई दोष नही है। श्री भगवान ने श्री रामावतार में कोसमदेशस्थ प्राणिमात्र को मोक्ष देकर अपने इस दिव्यशुण का परिचय कराया है। इस प्रकार श्री देशिक स्वामी जी श्री रङ्गनाथ भगवान् का संबोधन पर कहते है कि श्री भगवान् मापके धिय पतिस्त्र और नारायणत्व का अच्छी तरह से अनुसन्धान करने पर महाविश्वासप्रतिवधा भी दुविचार दूर हो जाते है ॥१६ ॥ (६३) (१०) धीकर्मभक्तिरहितस्य कदाऽप्यशक्तया रङ्गश भावकलुषप्रगतिद्वयोक्तः । मन्ये बलं प्रबलदुष्कृतशालिनो मे त्वन्मूलदेशिककटाक्षनिपातमाधम् पूर्वश्लोक में श्री देशिक स्वामी जी ने उन सद्विचारो का इङ्गित किया है जिनसे महाविश्वास सुदृढ होता है । इस श्लोक मे अस्मदा- दियो को अनुसन्धान करने योग्य पद्धति को प्रस्तुत करते हुए वतलाते हैं कि दीन हीन जीवो को प्राचार्यानुग्रह ही अवलम्व है। हे रङ्गश अशक्त्या कदापि धीकर्मभक्तिरहितस्य भावकलुष- प्रगतिद्वयोक्ते. प्रबलदुष्कृतशालिनो मे प्राद्य त्वन्मूलदेशिफकटाक्ष- निपात बल मन्ये हे श्री रङ्गनाथ भगवान् | मै अनादिकाल से भयकर प्रवल पापो का भण्डार बन गया हूँ, उन पापो से मेरी सम्पूर्ण शक्ति नष्ट हो गयी है, मुझम कर्मयोग जानयोग एव भक्तियोग समझने की शक्ति तक नहीं है उन्हे करने की शक्ति की तो बात ही क्या। यह दशा आज की नहीं है, अनादिकाल से यहो दशा अनुवृत्त है, प्रतीत होता है कि सम्भवत यह दशा अनन्तकाल तक बनी रहेगी। न मे कल्प- कोटिसहस्रणापि साधनमस्तीति मन्वान श्री भाप्यकार स्वामी जी का यह कथन मुझ में अक्षरश चरितार्थ होता है क्योकि प्रतीत होता है कि मुझ को कोटिसहस्रसख्याक कल्प बीतने पर भी कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग हाथ नहीं लगेंगे। भूत भविष्य और वर्तमान इन तीनो कालो मे भी मुझे मोक्षसाधन से दूर ही रहना है । मुझ से कर्म ज्ञान भक्ति सब नहीं सकते। मै जो आपके समक्ष शरणागति करता हूँ तथा द्वयमन्त्र बोलता हूँ वह भी गारनिर्दिष्ट रीति से सपन्न नही हो रहा है। शास्त्रीयरीति से करने पर द्वय मन्त्र का उच्चारण भी महाफल दे सकता है। आपके मन्निधि में शुद्ध भाव से प्रेरित होकर किये जायें तो प्रणाम शरणागति और का उच्चार मोक्ष माधन बन सकते है, महाँ मुझसे जो 51r- (१४) कुछ बन रहा है वह शुद्ध माष को लेकर नहीं हो रहा है। प्रणाम शरणागति और दयमन्त्र का उच्चारण ये सब दुर्भावों से व्याप्त हैं। अतएव कनुपित है, इनसे उद्धार की प्राशा रखना अपने को धोखा देना है क्यमत्र का उच्चारण तक मुझ से शाखीय रीति से नहीं बन रहा है, पापमे महाविश्वास मुझको नही होता है, भाप में अविश्वास करना महान दुर्भाव है इस दुर्भाव को लपर किया गया हयोच्चारण कैसे फलित हो सकता है। मेरी यह दुना मयत शोचनीय है, प्रबल पापों ने मुझे इस दु-शा म पहुँचा दिया है। इस दुष्परिस्थिति में भी मापने मुमतो एक अवलम्ब दे रखा है, उसका स्मरण करके ही मै प्राश्वस्त निभर निभय एव हापनवाला बन रहा है, वह अवलम्ब दूसरा कोई नही पाचाय का कृपाकटाक्ष ही वह अबलम्व है । पापके द्वारा ही वह अवलम्ब मुझे मिला है। अनादिकाल से मै नाना योनियों में भटकना रहा उन योनियों में जो दुख भोगने पर वे वणनातीत है। अापने ही इस काम में ममते समय मुझ पर महतुकी कृपा से दृष्टिपात किया उस दृष्टिपात का हो यह प्रभाव है कि मै सात्त्विक बन गया मोक्ष चाहने लगा, साधु अन्त महात्मायो से प्रम परने लगा उनके सदुपदेश से सदाचाय सम्बन्ध प्राप्त करने का उत्कण्ठा बढी। इस प्रकार आपने सुझे सदा चाय सनिधि तक पहुंचा दिया । सदाचाय स्वभावत दयालु होते है उनको कृपादृष्टि मुझ दीन होन पर पसे। दयानु भाषाय ने मेरे रक्षामार को प्रापके चरणो मे समर्पित कर सर्वदा के लिये मारहोन भयहीन सशपहीन बना दिया सपा सन्तुष्ट एव हुण्ट बना दिया है। इन सब का मूलकारण आप हैं। प्रापके द्वारा समादित इस माथायसम्बध से ही मेरा उद्धार होने वाला है. यही मेरा महान धन है। यही मेरी धारणा है ॥२॥ (२१) अन्योन पग्रहरणवशगो याति रङ्गश मदद पङ्ग नौकाकुहरनिहितो नीमते नाविकन (६५) भुड्क्ते भोगानविदितनृपः सेवकस्याकादि- स्त्वत्संप्राप्तौ प्रभवति तथा देशिको मे दयालुः ।। -- - पूर्व श्लोक मे श्री देगिक स्वामी ने प्राचार्यसम्बन्ध के महत्त्व का वर्णन किया है। इस श्लोक में अनेक दृष्टान्तों द्वारा इस अर्थ का वर्णन करते है कि प्राचार्य के द्वारा मोक्ष कैसे प्राप्त होता है । हे रङ्गश! यद्वद् अन्धोऽनन्यग्रहणवशगो याति, यत् पङ्ग नौका- कुहरनिहित सन् नाविकेन नीयते यद्वविदितनृप सेवकस्या- भकादि भोगान् भुइक्त तथा मे त्वत्सप्राप्तौ दयालुर्देशिक प्रभवति है श्री रङ्गनाथ भगवन् । यद्यपि मैं ज्ञान और शक्ति से रहित हूँ, तथापि विश्वास करता हूँ कि दय लु मात्रार्य मुझे ग्रापके चरणो तक पहुँचा देंगे। लोक में ऐसे अनेक दृष्टान्त देखे गये है जिनमे उक्त अर्थ का समर्थन होता है। वे दृष्टान्त ये है । (१) अन्ध पुरुप मार्ग मे चल सकता है, मार्ग देख नहीं सकता अतएव उसको स्वय मार्ग में चलना कठिन प्रतीत होता है यदि वह अन्य पुरुष किसी नेत्रगक्ति- सपन्न पुरुप के प्राधीन हो जाय तो गन्तव्य स्थान पर पहुँच जाता है. वैसे ही मै जानहीन ज्ञानमपन्न प्राचार्य के प्राधीन आ गया हूँ, प्राचार्य हमें आप तक पहुँचा देंगे इसमे सन्देह नही । (२) लगडा मनुष्य मार्ग देख सकता है किन्तु मार्ग मे चल नही सकता, नदी का पार पाना तो असभव ही है। यदि कोई दयालु मल्लाह उसे अपनी नौका के किसी कोण मे रख ले तो उसे अवश्य तीर पहुँचा देगा, इसमे सन्देह नही, उसी प्रकार हो मुझ शक्तिहीन को शक्तिसपन्न प्राचार्य मिल गये, वे मुझे अपने अभिमान के अन्दर ले चुके हैं, मुझे अपना समझते है, मुझे समार के पारभूत आपके पास अवश्य पहुँचा देगे। (३) राजसेवक का पुत्र और सो इत्यादि वन्धुवर्ग राजा को जानता तक नही राजा की सेवा करना तो दूर की बात है। राजा का भजन अर्थात् सेवा करने के लिये न उसके पास ज्ञान है, न शक्ति, ऐसी स्थिति में वह बन्धुवर्ग राजदत्त भोगो को भोगता रहता है, इममें कारण उनका राजसेवकके साथ सवन्ध ही है और कुछ - नही । उसी प्रकार प्रकत में भल ही हम श्री भगवान के स्वरूप रूप पुरण स्वभाव और लीला इत्यादि को न जाने, श्री भगवान की सेवा करने के लिये पर्याप्त ज्ञान एवं शक्ति से सपन्न भले न हों तो भी श्री भगवान का मजन अर्थात् सेवा करने वाले सदाचाय के साथ संबन्ध होने के कारण हम भी मोक्षानन्द को भोगने के लिये अधिकार रखते है । जिस प्रकार राजसेवक अपने बी पुत्र प्रादि को सुखभोग पहुंचाता है उसी प्रकार हमारे दयालु सदाचाय हमयो मोक्षानन्द मुगाने में समर्थ है। यहाँ पर जानाभाव के विषय में प्रघात भक्त्यभाग के विषय में पड़ हटान्त उमयाभाव के विषय मे सेवकपुत्राधान्त कहा गया है अथवा ज्ञानयोगाभाव के विषय में अधष्टान्त कम योगामार के विषय में पडगुदृष्टान्त भक्तियोगाभाव के विषय में सेवकपुत्रदृष्टान्त कहा गया है। यह विभाग ध्यान देने योग्य है॥२१॥ ( २२ ) उपल्या पनपविभोपरयलक्ष्मया ते प्रत्याप लक्ष्मणभुनेभवता वितीयम् । शुत्वा धर तदनुब धमवावलिम नित्य प्रसीद भगवन् मयि रङ्गनाथ ।। पूर्व श्लोक मै श्री देशि स्वामी श्री ने अनेक दृष्टान्तों से इस अथ का समर्थन किया है कि प्राचायसवन्ध से उद्वार अवश्य होगा इस श्लोक में श्री भगवडामानुजसम्बन्ध का उल्लेख कर उम अर्य की पुष्टि करते हुए श्री भगवान से प्रार्थना करते है श्री भगवद्रामानुज स्वामी जी मुझ अनुयायी पर प्रसन्न होजाइयेगा। हे भगवन रङ्गनाय! पनाविभीषणलरुपया ते रक्षपा प्रमाय लक्ष्मण्मुनेभवता मिसोरणं पर भूत्वा तदनुदपमदापलिस मपि निरय प्रसार हे धीरङ्गनाप भगवन् ! जब श्री भाष्यकार स्वामी (६७) जी ने शरणागतिगद्य में आपके चरणो में शरणागति की तब आपने उनको उद्धार का प्राम्वासन देते हुए अन्त मे यह कहा है कि- 'मा ते भूदत्र सशय.।' 'प्रनृत नोक्तपूर्व मे न च वक्ष्ये कदाचन' 'रामो द्वि भिभाषते ।' 'सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभय सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रत मम ॥' 'सर्वधर्मान परित्यज्य मामेक शरणं वज । प्रह त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥' इति मयंव ह्य तम् अतस्त्व लव तत्त्वतो मज्ज्ञानदर्शनप्राप्ति मज्ज्ञानदर्शनप्राप्तिषु नि सशय सुखमास्व ॥ तथा तुम तुम को अर्थात् हे श्री यतिराज । तुम मेरे गरण में आगये हो मैने तुम्हारे रक्षाभार को अपने ऊपर ले लिया है, को यह कह कर पाश्वासन दे दिया है कि तुम्हारा उद्धार अवश्य कर गा। तुम इस बात के विषय मे कभी समय न रखो। तुम यह न मानोगे कि खुश करने के लिये मै नै ऐमा कहा । यदि मैं ने मन में दूमग भाव रखकर ऐमा कहा होता तो मेरे लोकप्रसिद्ध वचन मे विरोध उपस्थित हो जायगा। मैं अपने वचन के विरुद्ध कहने वाला मिद हो जाऊगा, मैं ने अन्यत्र म्वय यह कहा है कि इसके पूर्व कभी मिथ्या भापण नहीं किया, विशेप कर आश्रितो के ममक्ष कभी मिथ्या भापण नहीं किया। अब तक मिथ्या भापण न करने पर भी स्वतन्त्र होने के कारण अागे मिथ्या भापण कर गा, ऐसा किमी को भी मन्देह नहीं करना चाहिये क्योकि आगे भी कभी मिथ्या भापण नही करू गा । सत्य मत्य कहना यही मेरा स्वभाव है। अतएव श्री रामावतार मे मेरे विषय में यह प्रमिद्धि हो गई है कि रामो द्विाभिभाषते अर्थात् श्री रामचन्द्र जी दो वार नहीं बोलते । प्रथम में कुछ कहे बाद उसके विरुद्ध कहै, यह स्वभाव श्री रामचन्द्र जी में नही। श्री रामचन्द्र जी जो एक बार कह दें, उमसे ही सब कुछ सिद्ध हो जायगा । मैने श्रीरामावतार में समुद्रतीर पर भरी सेना के मध्य मे श्री विभीपणशरणागति के प्रमग में विरोध करने वाले श्री सुग्रीव इत्यादि वानर वीरो को समझाते हुए ममुद्र- (६८) घोष को दबाने वाले उच्च स्वर से जो घोपणा की है, उससे कभी पीछे नही हट सकता। हाथो का जो दांत निकल गया सौ निकल गया, वैसे ही मेरे मुख से जो निकल गया सो निकल गया, उससे मैं कभी पीछे नहीं हट सकता । उस घोषणा को फिर मै तुम्हारे सामने दोहराता है, वह यह है कि- सहदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । प्रमय सर्वभूतेम्यो बदाम्येतद् प्रत मम ॥ अर्थात हे सुग्रीव । ममय देना मेरा व्रत है, किनको मैं अभय देता है सब प्रपन्नाय जो एक बार शरण मे प्राजाते है उनको अभय देता है, अनेक वार शरणागति करने की आवश्यकता नहीं है, एक बार की गई शरणागति ही पर्याप्त है। अन्याय उपायो में भावृत्ति अपेक्षित है अपत्ति में मनावृत्ति पपेक्षित है। यही शाम सिद्ध अर्थ है। शरणागति परमफल मोक्ष से प्रत्यन्त घनिष्ठ मेल रखती है, मोक्ष में पहुँचाने पर अनावृत्ति होती है अर्थात् साधक को पुन इस संसार में पाना नहीं पड़ता धारणागति में भी अनावृत्ति है । इस प्रकार दोनो में मेल है एक बार की गई शरणा गति ही पर्याप्त साधन है । यह शरणागति इतरनिरपेक्ष होकर मन पाहा फल दे सकती है । प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । जो साधक मुझ से यह भाषना करते हुए-कि श्री भगवान पाप मेरे लिये रक्षक बन जाइये इस प्रकार प्रात्मसमपण करते है कि मै मापका हूँ आप मुझे अपनाइये । प्रपनाय-पाचते-जो मन से शरणागति करते है, तथा वाणी से मह कहते हुए कि-म आपका हूँ-वाधिक शरणामति करते है । जो साधक अपत्ति शरणागति करते हुए ऐसी फलप्राथना करते हैं कि में भापका होकर रहना चाहता हूँ, माप मुझ से सर्वविध कैसे लेकर प्रसन्न हो जायेगा।प्रानाय तवास्मीति चयापते-जो साधक दूसरे किसी प्रयोजन को प्राप्त करने के लिये शरण में प्रापे हो तपा जो साधक-पापका होकर रहूंगा-इस प्रकार कैकयंप्रापना करते हुए अनन्यप्रयोजन होगर मेरे शरण में (१००) अपेक्षा नही रखती, यहाँ तक कि स्नान प्राचमन और शोच इत्यादि उन धर्मों को भी अपेक्षा नहीं रखती है जिनके आचरण से मनुष्य को धर्माचरण करने को योग्यता माती है ऐसे योग्यताकारक प्रमों को भी त्यागते हुए अर्थात् मगरूप में न लेते हुए मेरे शरण में पानाप्री, क्योकि प्रपत्ति निरपक्ष साधन है। (४) हे प्रजुन । को साधन अपने लिये अशक्य है उनमे घ्यथ परिश्रम मत करो, उहे छोडकर मेरे शरण में प्राजानो। (५) वे साधन भी सध जायगे ऐसी प्रत्याशा करते मत रहो उस प्रत्याशा को छोड़कर मेरे शरण मे पाजामी। (६)शरणागति ब्रह्माब के समान है इससे यदि दूसरे साधन जोडे जाये, तो शरणागति इस प्रकार हट जायगी जिस प्रकार रस्सियों से बाँधने पर थी हनुमान जी से ब्रह्मास्त्र हट गया या। दूसरे साधनों को साधनबुद्धि से मत करो साधनबुद्धि से किये जाने वाले अन्यान्य मोक्षसापनों को सबषा स्याग कर मेरे कारण मे पाजामो। मामेक शरण व्रज (१) हे अर्जुन । मुझ एक ने शरण में भाजायो । मैं कौन हूँ कसा हूँ, इस बात को मैने धवनाररहम्य एव पुरुषोत्तमविधा मे बतला ही दिया है। मैं सर्वरक्षक अवस्वामी सर्वेश्वर हूँ। मै रक्षा के लिये अवसर डूबता रहता है। यही प्रतीक्षा करता हूँ कि कौन जीव किस समय मुझ से रक्षा करने के लिये प्राथना करेगा। ऐसे अवसर की प्रतीक्षा करने वाले मेरे शरण मे पाने मे क्या कठिनाई है । मैं वत्सल है अर्थात् प्राधितो के दोष को देखकर उनका पनादर करने वाला नहीं हूँ, मैं सुशील है तथा सुलम है। इन बातों को तुम जानते हो हो । तुम इस समय तक शत्रु कौरवो मे पनुचित स्नेह एव दया करते रहे हो क्षत्रियो के परम धर्म भुद को अधर्म समझकर उससे विरत होने के लिये तैयार हो गये हो मैने तुम मे इन ढोपों को देखकर प्रनादर नही किया। इससे तुम समझ गये होगे कि मै कितना वस्सल है मैने तुम को इस उपदेश में बता ही दिया कि अपराप्रकृति बडतस्व पराप्रकृति जीवतत्त्व एव उनसे होने वाले सभी पदार्थ मेरे है मैं जव - (१०१) सब का स्वामी हूँ। इससे तुम को भेरे स्वामित्व के विषय मे पता लगा ही होगा। मै कितना सुशील हूँ. इसे तुम जानते ही हो । जव तुम हे कृष्ण हे यादव हे सखे ऐसा सवोधन करते रहे मैं अणुमात्र भी अप्रसन्न नहीं हुआ, मै तुम्हारा सारथि बन गया, तुमने विश्वरूप दिखाने के लिये कहा, तुरन्त मैने दिखाया, तुमने सौम्यस्प देखने के लिये कहा, तत्क्षण मै सारथि रूप में प्रकट हो गया। इससे समझ सकते हो कि मैं कितना सुलभ हूँ। तुमको दूरदेशस्थ अपरिचित श्री वैकुण्ठनाथ रूप के शरण मे जाने को आवश्यकता नहीं । किन्तु परत्व और सौलभ्य को सूचित करने वाले इस पार्थसारथि रूप के शरण मे आजारो। मुझ एक के शरण मे आजारो। मैं हो प्राप्य है, तथा साथ मे ही प्रापक उपाय भी हूँ यहाँ प्राप्य और प्रापक एक है, ध्यान रक्खो। (२) शरण मे पाते समय मुझ एक को ही सिद्धोपाय समझो, शरणागति करने वाले अपने को एक सिद्धोपाय मानकर मुझसे अपने को मत जोडो, मुझे अकेले ही सिद्धोपाय बनने दो तभी कार्य सिद्ध होगा। (३) ऐसे ही माध्योपाय गरणागति को भी एक उपाय समझकर उसे मुझ से मत जोडा करो। कहाँ मेरी योग्यता कहाँ इस जड माध्योपाय की योग्यता, मुझे अकेले ही उपाय बनने दो। (४) दूसरे उपायो से मुझे मत मिलाओ। (५) वर्णाश्रमधर्म और शमदमादि अन्यान्य अगो के माध भी मुझे मत मिल'यो । मै अकेला ही उपाय बन सकता हूँ। (६) सर्वधर्म सर्वपागो को नष्ट करते हैं, तुम सर्वधर्मों के स्थान में मुझ एक को ही उपाय बना दो। अह त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि-मैं तुम्हे सर्वपापो से छुदा दूंगा। मै सर्वस्वतन्त्र हूँ, चाहूँ तो सब कुछ कर सकता हूँ, मेरी अघटितघटनाशक्ति सर्वविदित है । मुझ सर्वेश्वर ने ही अपराध करने वाले जीवो को बन्धन मे डाल खखा है, मैं ही छुडा मकता हूँ, तुम पर अनुग्रह करते समय मेरे सहज कारुण्य इत्यादि गुण, मूल कारण बनकर कार्य करते हैं, शरणागति से उत्पन्न प्रसन्नता मध्यम कारण बनकर कार्य करती है, मेरा निराश - (१०२) स्वातंत्र्य अन्तिम कारण बनकर काय करता है। मेरा सहम कारण्य प्रल्स पाल को निमित्त रूप में लेकर से प्रसाद को उत्पन्न करता है जिससे मै अनन्त अपराधों को क्षमा कर देता है। यही प्रसाद करुणा से मिलित होकर मेरे निरङ्कुश म्बात को आश्रितों के सवविध विरोधिया को दूर करने के लिये प्रेरित करता निरङ्कुश स्थातथ्य से तत्क्षण काय सपन्न हो जाता है । इस प्रकार में इन मुरणो से तुम्हारी रक्षा करने के लिये सनद रहता है । मै अनादि काल से ही प्रतीक्षा करता रहता हूँ कि कब मै इन व चेतनो को निमल बनाये गये भूपणों की तरह अपनाऊँगा । ऐसी स्थिति मे शरणागति के द्वारा जीप के यहाँ से सम्मति प्राप्त होने पर क्या मैं चूत गा । मै उन सब पापों को नष्ट कर देगाना जीवो को मुझे प्राप्त करने मे बाधा डालते है। केवल पापों को ही नष्ट न कहेंगा किन्तु पापो के कारण और काय के रूप में जीप से लगे हुए प्रजान विपरीत वासना, विपरीत रुचि और प्रकृतिसम्बध पी न कर दूमा। जीव के पास कुछ भी गेप में रहने न दूंगा। जड़ के साथ सब प्रतिबधको को नष्ट कर दूगा। मुझे इनको नष्ट करने के लिये अधिक परिश्रम करना नही पड़गा । मेरा निग्रहसकल्प नष्ट होते ही सब नष्ट हो जायेंगे। प्रसाद उत्पन्न होत ही सब प्रकार के निग्रहसकल्प निवृत्त हो जायेंगे। हे अर्जुन । इस प्रकार सब प्रतिवपक नष्ट होने पर मेरी प्राप्ति मे विलम्ब न होगा। बौष टूटने पर जाल अपने प्राय बहने लगता है प्रतिबन्धक राह हटते ही बद्रमा मै ज्योति अपने पाप मर जाती है बसे ही प्रकृत मे भी प्रतिबंध हटते ही उसी क्षण मेरी प्राप्ति हो जायेगी। बम इव राहोमसात्ममुख्य इस प्रश्रुति ने राहु के मुख से छूटे हुए चन्द्र को मुक्तात्मानो के दृष्टा त के रूप में उपस्थापित किया है। जीवों को भुझे प्राप्त करने मे सहज अधिकार है तदप कुछ भी करने की भावश्यकता नही है, प्रतिबधन भर को दूर करना है प्रतिबन्धक दूर होते ही मै प्राप्त हो जाऊगा। मा शुब मैने अत्यन्त गोप्य सरल साधन का उपदेश दे दिया है तुम्हारा इससे उबार अवश्य होगा, शरणागति सपा होने पर । ।
- (१) मैं तुम्हारे उद्धार का उत्तरदायित्व अपने गिर पर गलूगा तुम शो मत करो। है यतिराज | इस प्रकार मेने ही तो महाभाग्न मग्राम में अर्जुन से कहा है। श्री रामकृष्णावतार में मेने जो कहा है, वह सर्वजीवो के उद्धारार्थ ही कहा गया है। जिम प्रकार बाजार मे खेल दिखाने वाला मायावी किसी एक मनुष्य मे बाते करना हमा सभी दर्शको को समझाता है उमी प्रकार मेने भी विभीषण और अर्जुन को निमित बनाकर मर्व जीवो के समक्ष अपने हृदय को खोल कर रख दिया है । मव को ममझाने मे ही मेरा तात्पय है। तुम शास्त्रीय रीति से मेरी शरणागति कर नुके हो, तुम्हारे उद्धार का भार मेरे ऊपर पा गया है। नुम जो मेरे विषय में तत्त्वज्ञान तात्त्विकदशन तथा तात्त्विक प्राप्ति चाहते हो, इनके विषय में सशयहोन रहो। तुम्हारे ये सब मनोरथ पूर्ण हो जायेगे। मैने भार ले लिया है, तुम अपने भविष्य के विषय मे निश्चिन्त होकर ग्रानन्द से विराजमान रहो । थी देशिक स्वामी जी कहते है कि श्री रगनाथ भगवन् पापने श्री रामावतार मे विभीपणशरणागति के प्रमग में सकृदेव पन्नाय इत्यादि जो कहा तथा महाभारत सग्राम मे अर्जुन के पति सर्वधर्मान् परित्यज्य इत्यादि जो कहा, उन सब का उद्धरण देकर आपने श्री भाष्यकार स्वामी जी को समझाते हुए अन्त मे यह वर भी दिया है कि आपके समान मेरे शरण मे पाने वाले आपके सम्बन्धिसम्बन्धियो का भी उद्धार कर दूंगा । मै श्री भाष्यकार म्वामी जी को शिष्यपरम्परा मे हूँ, इस प्रकार मै उनका निकट सम्बन्धी हो गया हूँ, साथ ही आपके शरण मे भी आ गया हूँ। आपको मुझ पर प्रसन्न होना चाहिये । श्री भाष्यकार स्वामी जी के सम्बन्ध से मेरा उद्धार अवश्य होगा, यह समझकर मै गर्व से फूल जाता हूँ । इस प्रकार आपके दिये हुए वर के अनुसार श्री भाष्यकार स्वामी जी के सम्बन्ध के कारण अपने उद्धार को अवश्यभावी मानकर फलने वाले मुझ शरणागत पर आप प्रसन्न हो जाइये । आपने दृष्टि - (१०४) के प्रारम्भ से लेकर मेरे उद्वाराथ जो योजना बनाई थी वह आज फलित हो गई है । मे शरण मे प्रागमा, आपका मनोरथ पूर्ण हो गया, पापके प्रसन्न होने पर मेरे मनोरथ भी पूर्ण हो जायगे । कृपया श्री भाष्यकार स्वामी जी के परम्परासम्बधी इस परणागत पर प्रसन्न हो जाइयेगा यही प्रार्थना है ।।२२।। ( २३ ) सदमि विनताना सवदे सबदेहि- न्युपनिषभिधेये भागधेये विधेये । विरमति न कदाचि मोहते हा हतोऽहं विषमविषयचि तामेदुरा में दुराशा ।। श्री दशि स्वामी जी ने पूर्व श्लोक मे कहा है कि श्रीभाष्यकार स्वामी जी के सम्बन्ध के कारण मुझ शरमागत का उदार अवश्य होगा । मागे श्री देशिक स्वामी जी कहते है कि शरग्गागत शरणामति के बाद पारीर छूटते समय तक ससार मे रहते है । पर्चावतार की सेवा करने के लिये तथा सत्कयाकालक्षप द्वारा दूसरो का कल्याण करने के लिये शरणागत शरीर छूटने तक ससार में रहने के लिये तयार हो जाते है मामामय संसार मे रहते समय उन पर माया का प्रभाव पडना प्रनिमाय है। उस समय विषयपरायणता इत्यादि दोपो का शिकार न बन तदथ मागे उल्लिखित रीति से नित्यप्रति अनुसन्धान करते रहना चाहिये जिससे वे दोप घट जायेगे। इस अभिप्राय को लेकर उत्तर क्नोक प्रवृत्त है। उनमें विषयाशाके विषय में कसा अनुसन्धान बरना चाहिये ? इस अर्थ का प्रतिपादन अपने अनुसधान के रूप में प्रवृत अग्रिम श्लोक में निहित है। थी दशिक स्वामी जी अपने अनुसन्धान के रूप में कहते है कि- सकृदपि विनताना सर्व सवदेहिनि उपमिषभिषये भागधेये विषये सति विषमविषयचिन्तामेदुरा मे दुराशा कदाचिन्मोहतो न विरमसिहा मह हतोऽस्मि । परमभोग्पभूत श्रीभगवान् विराजमान रहते मेरी माशा विषयो मे दौडती रहती है उनसे हटना नहीं । ।
कि (१०५) चाहती। विषय बडे भयकर होते है। शास्त्र में कहा गया है कि- विषस्य विषयाणां च दूरमत्यन्तमन्तरम् । उपभुक्त विष हन्ति विषया. स्मरणादपि ॥ अर्थात् विप और विपयो मे आकाश पाताल का अन्तर है, विप तो ग्वाने पर मारता है पर विषय तो स्मरण मात्र से ही मारते हैं। इससे सिद्ध होता है कि विषय विप से भी भयकर है। उन भयकर विषयो को प्राप्त करने के लिये तथा प्राप्त विषयो को सुरक्षित कर रखने के लिये मुझको चिन्ता होती रहती है । मै जानता हूँ कि चिन्तन करने मात्र मे हो श्री भगवान प्राप्त हो सकते है क्योकि वे परम चेतन हैं । जानते हैं हमारा अमुक माधक चिन्तन कर रहा है उससे मिलना चाहिये ऐमा समझ कर श्री भगवान पधार जाते हैं, इस प्रकार चिन्तनमात्र से ही जीव को श्री भगवान मिल जाते हैं पर चिन्तन करने से विषय नहीं मिलते, वे जड है, वे नही समझ सकते हैं कि यह मेरा चिन्तन कर रहा है उससे मिलना चाहिये । वे तो परिश्रम से साधन करने पर हो प्राप्त हो सकते है । इस मर्म को मै समझता हूँ, तो भी चिन्ता श्री भगवान के विषय में नहीं होती, भयकर विषय के विषय में हो होती है। ऐसी चिन्ताओ से मेरी माशा सदा अोतप्रोत रहती है । मेरी यह विपयाशा मुझको दुर्गति के गर्त मे गिराने वाली है । यह विषयागा इतनी बढ़ गई है, प्रतीत होती है कि कभी पूर्ण होने वालो नहीं । यह दृढ विषयाशा क्षणमात्र भी शान्त नही होती, अग्निज्वाला के समान सदा धधकती रहती है। विश्लेषणपूर्वक विचार करने पर भी पता नही लगता है, यह प्राशा श्रीभगवान को प्राप्त करने के लिये क्यो नही बढती विपयो को प्राप्त करने के लिये क्यो लालायित रहती है ? क्या यह प्राशा यह समझती है कि श्री भगवान को प्रमन्न करना कठिन है, विपयो को प्राप्त करना मरल है । यह समझ केवल भ्रान्तिमात्र है क्योकि थीभगवान एक- बार भी की गई गरगागति मे अत्यन्त प्रमत्र होते है, पर विषय - बारम्बार खटपट करने पर भी नहीं मिलते। यदि कहा जाय कि ।
। - मिलते श्री भगवान से मल्प फल ही मिलते हैं, विपया से अनन्त सुख है यह कपन भी समीधीन नहीं क्योवि श्री भगवान सब कुछ देने बाल है इसीलिये तो कहा जाता है कि-सकलफलप्रदो हि विष्णु विषयो से सणभगुर दुःखमिश्र सुख मिलता है। थी भगवान धम अथ काम और मोक्ष इन चारा पुष्पायों को देने वाला है यहाँ सक कि अपने तक को उठाकर देने वाल है तथा अपना अनुभव करने के लिय पर्याप्त बल देने वाले है प्रतएव उनक विषय में श्रुति कहती है विन्य प्रात्मा बलव । इस प्रकार थी भगवान मवस्य ने के लिय सकल्प किये हुए है । विषयों में नौ ऐसी योग्यता है ही नहीं। था भगवान सब के अन्तर्यामी है, उन २ देवतायो । द्वारा जीवो को भी अभिमान उन २ फला को देने के लिये ही थी भगवान देवतायो के अन्तर्यामी बनकर विराजमान हो ये है। श्री भगवान मापकों को ब्रह्मानन्द भुगाने के लिम संकल्प करणे शो मी शक्ति समार में नहीं है जो उस सकल्प में बाधा डाल सक वोनि जगत के चेतन और पचेतन सभी पदाथ उम परमात्मा का मरीर है मात्मा की इच्छा का अनुसरण करना शरीर का काम है । जागतिक सभी पदाच ईश्वर की इच्छा का अनुसरण करने वान है उस इया में बाधा डालने वाले नहीं। सिंच श्री भगयान जीवों को मोक्ष प्रदान कर प्रात्यन्तिक रक्षा करने के लिये उनके अतर्यामी बने हुए है। किष श्री भगवान प्राप्त होने पर मभी प्राप्य प्राप्त होणावे है, कोई भी प्राप्य अप्राप्त नही रहता क्योकि श्री भग बार्यातरिक सभी वस्तुए श्री भगवान के शरीर के रूप मे प्राप्त हो नाती है, जगत में लोलाविभूति भागविभूति एवं वहां के बड़े मुक्त पौर नित्मसूरि इत्यादि जितने पदार्थ है. ये सब श्री भगवान का पारीर है इन सब से विशिश होकर श्री भगवान प्राप्य होत है सी स्थिति में एवविध सवारीक श्रीमगवान प्राप्य हाने पर माना जाता है कि सब कुछ प्राप्त हो गया है, अब कोई भी प्राप्तम्य नहीं बचा है । प्रतएव श्रुति ने कहा है कि अल्बेहास्ति च नास्ति तबहिमन समाहितम् अर्थात् इस संसार में जो कुछ है अथवा जो (१) नही है, वह मव परमात्मा में निहित है । एमी भगवान Ir होने पर सब कुछ प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार ग] का नागन पर मब पुष्परसो का स्वाद प्राप्त हो जाता है उगी प्रकार श्री भग. वान का अनुभव प्राप्त होने पर मर पदार्या के पन ग ग प्राय होने वाले सुन्न प्राप्त होते है। यह योग्यता थियो में नही है। एक २ विषय के अनुभव मे एक २ गुम ही प्राप्त हो गाना। उपनिषदो का प्रधान प्रतिपाद्य अथ श्री भगवान है। श्री भगवान की गवविध महिमा उपनिषदो में उद्यौगित है विषयों का महत्त्य किपी प्रमाण से भी मिद नहीं होता, प्रत्यक्ष न्यादि सभी प्रमाणा से विषयो के दोष हो विदित होने है, उपनिषद बतलातो है . श्री भगवान जोव की रक्षा करने दान है, प्रत्यक्ष प्रादि प्रमाण गित करते हैं कि विषय अधिक दुव ही देते है। श्री भगधाम जीया । भाग्यस्थानीय है, भाग्य में जीव की रक्षा होती है श्री भगवान में जीद का मर्वविध कल्याग होता है। भाग्य जीव ग गान, सम्बन्ध कर ममय समय पर जोव के मनाग्य को गुणा करना है, श्री गग- धान जीवो में (स्वामिभाव इत्यादि ) गाद गम्बन्ध पाकर गमय. पर मनोरथो को पूर्ण उते हैं विषय नो दोभाग्यम्यानीय है. दुख देता है, विषय दुप देने । विमहिमपत्र श्री भगवान गरमागतो के लिये विषय बन जा, अग्गागा कथन के अनुसार काय करने के लिये गदा मन रहते हैं, विध श्री भगवान सदा विद्यमान रहते है, भयकर विपर्याचसापाग व्याप्न मेरी यह दुष्ट याया क्यो क्षणमात्र भी मान्न नही हाती । क्या मोक्षम्पी फल अल्प है। क्या माल का मापन यनगमाय? क्या मोक्ष टेने ये अधिकृत श्री भगवान में किया कमी है? या थी भगवान के माय हम लोगों का कोर्ट सम्बन्ध नहीं है या मोक्ष मे अनभाव्य पदार्थ नि है ये मश्र बान नो है नहीं। रोगी स्थिति में यही मानना पटमा है कि मेरी वाया जाता होकर जो प्रतिक्षरण बनती जाती है,मरा कारगा मोह ही है, जयना मोह बना रहेगा, तब तक विषयतृष्णा के घटने की गमायना नदी दौर्भाग्य (१०) है । बडे दुख की बात है कि वृद्धसवा से उपाजित तत्त्वज्ञान से भी मोह नष्ट नही हुमा । हाय । क्या करूं मैं मारा गया, पदि स ही विषयतष्णा बनी रहेगी तो मेरा उद्वार अस होगा ? हे प्रभो । दोनबधो । माप ही रक्षक है । आप ही विषयतृष्णा का नष्ट कर अपने विषय मे प्रेम को वडाइयेगा । इस प्रकार थीरङ्गमाष भगवान से प्रार्थना करते हुए श्री देशिक स्वामी जी शरणागतों को यह सच्छिक्षा देते है कि वे भी प्रतिदिन इस प्रकार अनुमधान करते हुए विपयष्णा को घटाने तथा श्री भगवत्प्रेम को बनाने में तत्पर हो जाय ॥२३॥ ( २४ ) यापजीव जगति नियता देहयात्रा भयित्री स्यका सर्वे त्रिचतुरदिनालामभोगा नमोगा । बत रङ्गी निममपि पद देशिकादेशकाडली किते चिते परमभिमत खिद्यते यत् पुनस्त्वम् ।। पूष श्लोक में श्री दशिक स्वामी जी ने अपने घनुस घान कद्वारा यह सच्छिक्षा दी है कि बढती हुई विषयतृष्णा को नष्ट करने के लिय किम प्रकार के सहचार अपनाने योग्य है । इस श्लोक म श्री देशिक स्वामी जी चिन्ता को शान्त करने के लिये उपयुक्त सविचारो को उपस्थापित करते है। जगति देहयात्रा मावजीव मियता भवित्री-है बिन्ते । तुम क्या खेद पा रही हो प्रतिक्षरण कुछ न कुछ सोचता हो रहती हो, कुछ न कुछ सोचकर सदा खिन्न रहती हो क्या बात है? किस बात को लेफर तुम चिन्तित होती हो? क्या योगक्षम के लिये चिन्तित होती हो? क्या यह सोचती हो कि इह नाक में जीवन निर्वाह कैसे होगा। इसके लिये तुम्हे चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं पयोपि जीवनभर देहयात्रा अर्थात् शरीरनिर्वाह संपन्न होता ही रहेगा वह कभी याद न होगा। यह मुनिश्चित सिद्धान्त है कि बसमान देहनिर्वाह का भार प्रारम्प ने ले रखता है। - (280) बब ऋण ही नही है नव देवतागण क्या बाया दालग। यह गात्र- वचन प्रमिद है कि- देवपिभूतात्मनग्गा पिनगा न किमगे नायमृग्गी च गजन । सर्वात्मना य गण गगय नागयण लीफगुनं प्रपन्न । अर्थात् है गजन करगायक देव ऋषि भून मनृत्य और पितगे का मेवक नहीं है. न उनका मार ली है ना मवको शरण देने मे ममय लोकगुरु श्रीपयागया भगवान के चरण म मर्वभाव में पहुँच गया हो। हे चिन्न । नृमग नव का ममझकर देवताग्री के विषय मे चिन्ता लाग। ग्गी देशिकादेगकादशी निजमपि पद दनं है चिन्ने । क्या तुम मोक्ष के लिये चिन्निनहा रही हो? तुम उम निन्ना को छोड दा। हम ग्रावान, प्राचाय कारगा म भग्ममपगा कर जब प्रार्थना करंग नव श्री गनाय भगवान राम प्रार्थना को पाना मान कर परमपट अर्थात अपना निन घाम देने के लिये तैयार होने वाले हैं। श्री रगनाय भगवान परमदयालु है, प्राचार्य की प्राना को प्रतीक्षा करते रहने है, ग्रामा मिला दी नक्षगा मोक्ष देने के लिये मन्नद रहते हैं। यह श्री भगवान का मन्त्राग्वगता है कि प्राचार्य की प्रार्थना मानकर कार्य करने लगते है। प्राचार्य की प्रार्थना को प्राजा मान । (११०) पागलपन नहीं हो सो पार क्या है । सत्य लोक में भी मिलने वाले भोगो की यही दशा है। वे पारलौकिक सुख अल्प अस्थिर और दुखमिश्रित है इसलिये इन पारलौकिक सभी सुख भोगों को मैने त्याग दिया है इस लिये तदर्थ चिन्ता करना भी उचित नहीं है। चिन्ते 1 क्या तुम स्वग मादि लोक में रहने वाले इद्र आदि रेवतामो के विषय में सोचती हो । अभी तक हम लोग इद्र आदि देवतापो की सेवा करते पाये हैं। इद्र ग्रादि देवगण हम लोगों से उसी प्रकार सेवा लेते म ये हैं जिस प्रकार मनुष्य पशुओं से सेवा लेते है। इन्द्र भादि देवगण भी यह नहीं चाहते है कि मनुष्य श्री भगवान का प्राश्रय लेकर ससारबन्धन से छूट जायें क्योकि व जानते है कि यदि मनुष्य बधन से छूट जायें तो हमारे सैवको में कमी हो जायगी । इस मम को समझकर ही देवगण मनुष्यों को मोक्षमाग मै चढ़ने नहीं देते। तो क्या मोक्षमाग मे बाधा डालने वाले देवतामो के प्रति चिन्ता होती है। इस शका के उत्तर में धी देशिक स्वामी को कहते हैं कि-त्रिवतुरदिनालानभोगा सर्व नभोगात्स्यक्ता हे चिन्ते ' तुम स्वग श्रादि लोक में रहने वाले देवतायो के विषय में चिता मत करो। हम श्री भगवान की शरण में भागये हैं। उन देवताभी को पहले ही त्याग दिया है। उन देवताओं के मात्रय मैं रहने से क्या लाभ ? यदि देवता अधिक से अधिक प्रसन्न हुए मपना सायुज्य अर्थात् अपने समान भोग दे सकते है। देवतामों का भोग क्या स्थायी है। नही वह तो दो चार दिन मे मिटने वाला है ऐसी स्थिति में स्वय नश्वर भोग को भोगने वाले देवगण हम दोगो को स्थायी भोग कसे दे सकते है। जब देवतानो को नष्ट होना पडेगा तब उनके पाश्रित कसे टिक सकते है। इस मम को समझ करके ही मैंने देवताग्री को छोडकर श्री भगवान का भाप लिया है अब रह गई बात देवताओं के द्वारा पाषा डालने की। तदर्ष भी तुरको चिन्तित नहीं होना चाहिये । कारण श्रीभगवान अपने शरणापन्न जोवो को देवरुण इत्यादि ऋणों से मुरु कर अपनी सेवा में से लेते हैं । भगवरपागतो को बुछ मी ऋण चुकाना नहीं पड़ता। तो । (१११) जब ऋण ही नहीं है तब देवतागण क्यो बाधा डालेगे? यह शाख- वचन प्रसिद्ध है कि देवर्षिभूतात्मनणा पितृणा न किफरो नायमृणी च राजन् । सर्वात्मना य शरण शरण्य नारायण लोकगुरु प्रपन्न. ।। अर्थात् हे राजन् । वह साधक देव ऋपि भूत मनुष्य और पितरो का सेवक नही है. न उनका कर्जदार ही है जो सवको गरण देने में समर्थ लोकगुरु श्रीमन्नारायण भगवान के शरण मे सर्वभाव से पहुँच गया हो । हे चिन्ते । तुम इस तत्त्व को समझकर देवताग्रो के विषय में चिन्ता छोड दो । रङ्गी देशिकादेशकाक्षी निजमपि पद दत्ते हे चिन्ते । क्या तुम मोक्ष के लिये चिन्तित हो रही हो? तुम उम चिन्ता को छोड दो । हम प्राचार्यनिष्ठ है, प्राचार्य के शरण मे भरममर्पण कर जब प्रार्थना करेंगे तब थी रगनाथ भगवान उस प्रार्थना को प्राज्ञा मान कर परमपद अर्थात् अपना निज धाम देने के लिये तैयार होने वाले हैं। श्री रगनाथ भगवान परमदयालु है, प्राचार्य की आज्ञा को प्रतीक्षा करते रहते है, आज्ञा मिलते. ही तत्क्षण मोक्ष देने के लिये सन्नद्ध रहते हैं । यह श्री भगवान को भक्तपरवशता है कि प्राचार्य की प्रार्थना मानकर कार्य करने लगते है। प्राचार्य की प्राथना को आज्ञा मान श्रो रगनाथ भगवान अवश्य हम लोगो को शरीर छूटते ही मोक्ष देगे । श्री भगवान को प्राचार्यों पर इतना प्रेम है कि प्रार्थना सुनते हो अपना पद तक देने के लिये सन्नद हो जाते हैं। इसलिये हे चिन्ते । मोक्षार्थ भी तुम्हे त्रिन्तित न होना चाहिये । हे चिन्ते । ते पर किमभिमतम् यत्पुनस्त्व खिद्यसे । हे चिन्ते । तुम्हे समझा दिया गया है कि इस लोक मे योगक्षेम के लिये चिन्ता नही करनी चाहिये । पारलौकिक मुख भोग के लिये भी चिन्ता नही करना चाहिये । मोक्ष के लिये भी चिन्ता नही करना हिये । ये तीन ही अर्थ चिन्ता के विपय हो सकते है, उचित हेतुप्रो ा निरूपण कर मिद्ध किया गया है कि इन तीन बातो के लिये चिन्ता नही करनी चाहिये । हे चिन्ते क्या इनके अतिरिक भी चोभा कोई मनोरम है जिसके लिये तुम चिन्तित होतो हो? ऐसा पतुष कोई मनोरण वो हो नहीं सकता, यदि हो तो बतलामो । उसके विषय में उत्तर दूंगा। इस प्रकार चिन्ता को सबोधित कर उपदेश देते हुए धो देशिक म्वामी जी ने शरणागतों को निश्चिन्त रहने का प्रादेज दिया ।।२४॥ (२५) अपि मुहरपराधरप्रकम्प्यानुवम्पे वहति महति योगक्षेमवृक्ष मुकुन्दे । मक्षकलुषमनीषावलेपावलेपान अनुगुणयितुमाहे न प्रभूनप्रभूतान् ॥ पूर्व इसोक मे श्रीदेशिक स्वामी जी ने यह कहा है कि धारणा गतों को किसी भी वियय को लेकर चिन्ता नहीं करनी चाहिये । इस श्लोक में थी देशिक म्वामी जी शरणागता के लिये प्रावन उपस्थित करते अपने सुद्ध मध्यवसाम को इस प्रकार व्यक्त करते हैं कि सवफल देनेवाले परमदयालु श्री भगवान विराजमान हैं मे राजाओं को अपने अनुकूल बनाने के लिये अणुमात्र भी प्रयत्न नगा। मुहरपराधरपि प्रकम्प्यानुकम्पे योगोमवन्द । बहति महति मुकुटे (सति)(प्रहम) माकलुषमनीपावलेपावलेपानभप्रभूतान प्रभून अनुगुणयितु मेहे। श्री देशिक स्वामो जी कहते हैं कि श्रीभगवान परम दयालु हैं। दुल से कापवै हुए दुःखी बोष को दसकर दयालु श्रीभग पान स्थय काप जाते हैं। यह उनका स्वभाव है। इससे समभाना चाहिये कि उनमे कितनी दया भरी होगी। श्री भगवान की दवा किसी भी कारण से देखने वालो नही है। भयकर अपराधी के अप राषो से भी श्री भगवान की दया नबती नहीं चाहे वह प्रपराधोंबार म्बार अपराय करता जाय बारम्बार अपराध करलेयाल जाव मी यदि 1 (१९३) श्री भगवान का आश्रय लेना चाहे तो दयालु श्री भगवान तत्क्षण उनको आश्रय देते हैं। उनके अपराधो को देखकर कभी घृणा नहीं करते। श्री जनकनन्दिनी के चरणारविन्दों में भयकर अपराध करने वाला काक जब श्री भगवान की शरण में पाया तव श्रीभगवान ने उसके अपराध का विचार न करके उसकी रक्षा की। अपराधो जीवो को भी श्री भगवान आश्रय देते हैं, इतना ही नही, किन्तु प्राश्रय लेने के बाद भी यदि जीव अपराध कर जायें तो भी श्री भगवान की दया कुण्ठित नहीं होती। उन अपराधो को भी किमी न किसी प्रकार से नष्ट करके श्री भगवान प्राधितो का उद्धार कर देते हैं। आश्रितों पर श्री भगवान की दया अपार है अतएव श्री भगवान सात्त्विक प्रकृति के आश्रितो के द्वारा कभी २ अपराध वन जाने पर उनको धर्मशास्त्रोक्त उन २ प्रायश्चित्तो मे प्रवृत्त कराकर अपराधो को नष्ट कर देते हैं धर्मशास्त्रोक्त प्रायश्चित्तो को करने में असमर्थ याश्रितो को प्रायश्चित्त शरणागति में प्रवृत्त कराकर उनके अपराधी को क्षमाकर देते हैं। जो प्राश्रित कठिन प्रकृति के हैं प्रतएव प्रायश्चित्त शरणागति भी नही करते हैं उन प्राश्रितो को भी दयालु श्री भगवान यमलोक जाने से बचाकर यही ससार मे रहते समय मे ही नाना प्रकार की तापत्रय यातनाओं को भुगाकर उन अपराधो को फल देकर नष्ट कर देते हैं। उन अपराधो के फल को भोगने के लिये कभी यमलोक नहीं भेजते । यह श्री भगवान की दया है । यह अर्थात् न खलु भागवता यमविषय गच्छन्ति इहै- वैषां फेचिदुपक्लेशा भवन्ति । इस श्रुति से प्रमाणित है। अर्थात् भगवद्भक्त यमलोक नही जाते हैं। यही उनको पापफलस्वरूप नानाविध क्लेश प्राप्त होते है। इस प्रकार आश्रितो के द्वारा बारम्बार अपराध बनने पर भी श्री भगवान की दया में बाधा नहीं पडती, श्री भगवान उनका उद्धार कर देते हैं। एवविष परमदयालु श्रीभगवान के विराजमान रहते समय हम उनका आश्रय छोडकर राजा इत्यादि क्षुद्र धनिको को प्रसन्न करने के लिये क्यो प्रयल करें। हम वैमा करना नही चाहते । ये राजा इत्यादि पनिक कैसे (११४) होते हैं १-मदकलुषमनीषाबलेपावलेपान उन राजा इत्यादि प्रभुमो की बुद्धि सदा मद से मलिन रहती है जिस प्रकार पल पैक से मलिन रहता है उसी प्रकार उनकी बुद्धि सदा मद से मलिन रहती । वे सदा यह समझते रहते हैं कि हम बडे धनिक है, हम से बढकर सपन्न संसार मे नही है। इस प्रकार समझते रहने से इनकी बुद्धि मद से व्याप्त रहती है मलिनता उसमे घर कर जाती है । मद से मलिन उस बुद्धि में गर्व सदा बना रहता है जिस प्रकार बच लेप को दूर करना कठिन है उसी प्रकार उनके मन से गव को दूर करना भी कठिन है। उनके मद मलिन मन में गव वय लेप के समान गार लग्न होकर बना रहता है। ऐसे मलि प्रभुओं के मन मे दया कमे रह सकती है । वे अपराधी को न पाश्रय द सकते है, न अपराधी के अपराध को क्षमा कर सकते है दण्ड देने में ही उनका प्रानन्द है । ऐस मदोन्मत्त प्रभुमो को अनुकूल बनाने के लिये हम क्यो प्रवृत्त हों। मेरे लिये प्रभु दयालु श्री भगवान विराजमान हैं। हम इनको प्रसन्न करने के लिये प्रयत्ल करेंगे । किंच श्रीभगवान स्वामी है उनके साथ हमारा दास स्वामि भाव सम्बध अविशेष है। अपने स्वामी का मात्रय लेने मे शोभा है। इन सासारिक प्रमुमो के साथ हमारा कोई सम्बध नहीं । न पहले ही कोई सम्बन्ध रहा न अब भी है, न आगे भी बना रहेगा क्योकि इन मदो मत्त प्रभुमो को उस सम्बन्ध को तोड़ने में देर मही लगेगी। ऐमी स्थिति में इन प्रशात कुलशील प्रमुओं वा माश्रय लेता फलप्रद होगा इसमें सन्दह ही है। किंध महति धीभगवान महापुरुष है पुरुषोत्तम हैं य लौकिक प्रभु मप्रभूत क्षुद्र है थी भगवान के समक्ष ये कोई मूल्य नही रखते । किच श्री भगवान विश्व के स्वामी होने से महान है, उनकी विभूति पर्षात् सम्पत्ति अपार है । ये लोकिक प्रभु दो चार ग्रामो के स्वामी हैं। ये विश्वपति के समक्ष नगण्य हैं। श्री भगवान महापुरुष है उनकी सेवा केवल मन से भी की जा सकती है। भलोग जो मन (११) से श्री भगवान का स्मरण करते उसे श्री भगवान सेवा ममम- कर प्रसन्न हो जाते है। चिन्तन मात्र से श्री भगवान की सेवा को जा सकती है। ये लौकिक प्रभु मन से चिन्तन करने मात्र से प्रसन्न नही होते है, किंतु वडे परिश्रम से शरीर से सेवा करने पर ही कही प्रसन्न होते है, श्री भगवान पूर्ण काम हैं, अतएव स्मरण के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहते स्मरण मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं । ये लौकिक प्रभु अपरिपूर्ण है सापेक्ष हैं, अतएव म्मरण मात्र से प्रसन्न नहीं होते ग्लेशसाध्य विविध सेवा करने पर ही प्रसन्न होते है । किंच श्री भगवान योगक्षेमवृन्दं वहति योगक्षेम का वहन करनेवाले है । श्री भगवान सासारिक योगक्षेम का वहन करते है, इतना ही नहीं, पारलौकिक योगक्षेम का भी वहन करते है । अप्राप्त वस्तु को प्राप्त होना योग है, प्राप्त वस्तु को रक्षा करना क्षेम है। श्री भगवान जोवो को तत्त्वज्ञान से लेकर मोक्ष पर्यन्त सिद्धियो को प्रदान करते है जो प्रवतक नहीं मिली हैं, उन मिद्धियो को रक्षा भी करते हैं । इस प्रकार नाना प्रकार के योगक्षेमो को प्रदान करने के लिये श्री भगवान उनको अपने शिर पर लेकर प्राधितो के पोछे फिरते रहते हैं। ये लौकिक प्रभु भले थोडा बहुत गरीर के योगक्षेम को सन्हाले तो सम्हाले, आत्मा के योगक्षेम को अर्थात् आत्मकल्याण को कभी नही सम्हाल सकते हैं किंच श्री भग- वान मुकुन्द है, भोग मोक्ष देने वाले हैं। गाब में कहा गया है कि- शरोरारोग्यमांश्च भोगांश्चवानुषङ्गिकान् । ददाति ध्यापिना नित्यमपवर्गप्रदो हरि ॥ अर्थात् ध्यान करने वालो को मोक्ष देने के लिये तत्पर रहने वाले श्री भगवान इस ससार में रहते समय उनको सदा गरीर का प्रारोग्य सपत्ति तथा गौणरुप से विविध भोगो को प्रदान करते हैं । इस प्रकार श्री भगवान इस लोक एव परलोक में मदा मंगल करने के लिये मन्नद रहते हैं ये लोकिक प्रभु तो इस लोक में भी पूर्ण रूप मे मुस नहीं पहुंचा सकते, परलोक मे कल्याण करना नो असम्भव (११६) । ऐसी स्थिति में मैंने बो निणय किया है कि सब कल्याण गुणोपेत श्री भगवान को छोडकर इन क्षुद्र प्रमुषों को अनुकूल बनाने के लिये कभी प्रयत्न न करू मा, मह नितात उचित ही है । प्रपनों को भी ऐसे ही प्रध्यवसाय रखना चाहिये ॥२५॥ ( २६ ) मातर्भारति मुञ्च मानुषचटून हे देह लन्धरल सुग्धद्वारदुरासिकापरिभवस्तोष जुषेया मन । वाचस्सोमनि रङ्गधामनि महान दोनमद्भूमनि स्वामि यात्मनि वेटेबरको स्वेनापितोऽयं भर ।। पूर्व इलोक मे श्री देशिक स्वामी जी ने कहा है कि मैं मर्व कल्याणगुणोपेत विविध मगल प्रद स्वामी श्री भगवान को छोडकर शुव प्रमुभी का मनुकूल बनाने के लिये चेष्टा नहीं करूंगा। इस प्रकार वह पर यह दर्शाया कि प्रपनों को कसे अध्यवमाय रखना चाहिये । इस श्लोक मे श्रीशिक स्वामी जी यह बतलाते है कि मैंने अपने रक्षामार को श्री रङ्गनाथ भगवान के श्री चरणों मे मर्पित कर दिया है। इसलिये हे वाणी मन और शरीर आप लोगो को विषयान्तरों से हटकर श्री भगवतिपय में लग जाना चाहिये । इसी में कल्याण है। इस प्रशर गरीर मन और वाग्गी को सम्बोषित कर इस श्लोक में उनको समझाते है। हे मातर्भारति मानुषधदन मुश्च हे वाणी ! पाप मेरी माता हो । जिस प्रकार माता बच्चे के मनोरथो को पूर्ण करने के लिये सब के यहाँ जाकर खुशामद करके कुछ न कुछ मागती रहती है उसी प्रकार अाप भी मेरे मनोरयो को पूर्ण करने के लिय क्षुद्र मनुष्यो ने यहां जाकर नाना प्रकार के प्रिय वचन सुनाकर चनको खुश करके कुछ न कुछ मागा करती थी। हे मात वाशी! भाप से मै करबद्ध प्रार्थना करता है कि प्राण से पाप मनुष्यो की खुशा मद करना छोड द । मनुष्यों को खुश करने के लिये बनकी स्तुति करनी पड़ती है उसमे मिध्यामापण ही करना पड़ता है व्यर्य भूड़े (११.) गुणों को कहना पडता है । नर स्तुति मे मिथ्याभापण जन्य पाप के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगता। हे मात अब तक जो कुछ हुआ सो हुआ, यही प्रार्थना है कि आगे आप मेरे लिये मनुष्यो को स्तुति करना छोड दे। उनके हे देह लब्धरलम् हे देह | जितने मिलते हैं उनसे ही तृप्त रहो, अधिकाधिक प्राप्त करने के लिये व्यर्थ चेष्टा मत करो। प्रारब्ध मै जितना लिखा है, उतना ही प्राप्त होगा, अधिकाधिक दौडधूप करने से क्या कुछ अधिक मिलेगा। देखो कितने लोग इस समय कुछ न करते हुए भी अधिकाधिक सुख भोगते है, कारण क्या है, प्रारब्ध मे सुख भोगना लिखा है। देखो, कितने ही लोग अधिकाधिक परिश्रम करते हुए भी अधिक सुख भोगने नही पाते हैं। कारण क्या है ? कारण यही है कि उनके प्रारब्ध मे सुख भोगना नहीं लिखा है । इसलिये कहता हूँ कि हे देह । तुम्हे जितना मिलता है उतने से ही सन्तोष पाओ । देखो, तुमको दो अवस्थाये है-(१) देहत्वावस्था और (२) शरीरत्वावस्था। देहत्वावस्था में तुम बढते रहते हो, शरीरत्वावस्था मे तुम घटते रहते हो । यदि तुम मे देहत्वावस्था है तो प्रारब्धानुसार मिलने वाले सारहीन भोग्य पदार्थ से भी तुम बढ सकते हो यदि तुम मे शरीरत्वावस्था है तो सारवत्तर पदार्थों को खाने पर भी तुम एक इश्च भी बढ नही सकते हो, घटते ही रहोगे। याद रक्खो, कठोपनिपद् मे कहा गया है कि- सस्थमिव मत्य पच्यते सस्यमिवा जायते पुन. । अर्थात् मनुष्य धान की तरह पक जाता है, तथा धान की तरह पुन उत्पन्न होता है। भाव यह है कि धान जब बढ़ने की अवस्था में है तब जल और खाद इत्यादि मिलने पर बढता रहता है, जब धान पूर्ण रीति से पक जाता है, उसमे मञ्जरी इत्यादि लग जाती है, तव अधिकाधिक मात्रा मे जल इत्यादि मिलने पर भी नहीं वढने आता किंतु बराशायो हो जाता है, वैसे ही मनुष्य भी बाल्य यौवन इत्यादि बढ़ने की अवस्थामों में हो सूखे अन्न खाकर भी वढता रहता है सन्तान इत्यादि भखरी लगने पर तथा वृद्धावस्था उपस्थित होने पर घटने लगता है चाहे उत्तमोत्तम पदार्थ क्या न मिला करें, तो भी जीर्णशीण होकर मृत्यु के मुख में चला जाता है। इसलिये कहता है हे देह जव तक तुम में देहत्वावस्था है, तब तक तुम मिले हुए रूपे सूखे पदार्थ से भी बढ़ सकने हो । इसलिए प्रारब्धानुमार मिलने वाले पदार्थों से सन्तुष्ट रहो। हे मन 1 सुधद्वारखुरासिकापरिमास्तोष जुषथा है मन ! मया तुम नहीं जानते हो, लोभी लोगों को पसा पसा जोग्ने मे ही सुख प्राप्त होता है। व एक पमे को भी किसी को देना नही पाहते यदि कही देना पडे तो उनको मृत्यु के समान दुख होने लगता है। उन लोभी अभ पिशाचा को तुमने लोभी नहीं समझा । किंतु उन्ह धनी समझकर तुम ने उनसे कुछ प्राप्त करने के लिये उनके द्वारो मै बहुत समय तक बैठ कर उपासना की यदि तुमने श्री भगवान के द्वार पर बठकर उपासना की होती तो अवश्य मुस मिलता। किंतु वसा किया नहीं। केवल लोभियो के द्वार पर बठ कर उपासना की। यह उपासना अन्त मे दुखद ही सिद्ध हुई। लामी तो द्वार पर याधक को उपस्थित जानकर बाहर निकलते ही नही क्योकि निकलने पर उहे देना पड़ेगा। तुम भी 'अब निकलगे सब निकलनें इस प्राशा से बैठे ही रह गये। बसे जसे अधिकाधिक समय बीसता पा वसे बसे सुमको अधिकाधिक कष्ट होता था इस प्रकार कष्ट पाकर भी अब तुम उनके द्वार पर महे रह जाते, तन उस लोभी के द्वारा भेजे गये नौकर पाकर तुम को अनेक विष अपमान करते, कभी गाली देते, कभी बस से मारते कभी धक्का न्ते । इस प्रकार नानाविध परिमयों को प्राप्तकर अन्त मे निराश होकर तुम्हे लौटना पड़ा। ऐसा एकबार परिभव हुमा, सो बात नही, अनेकबार परिभव हुए। हे मन ! उन परिभवो को याद कर सन्तोष पायो अब तक जो मिला वही शिक्षा पाने के लिये पर्याप्त है, तुम्ह उन परिभवो को पाव कर शोकात होपर यह प्रतिशा - - (११६) करना चाहिये कि आगे कभी ऐसा न करेंगे, मरण पर्यन्त दुख उपस्थित होने पर भी लोभियो के द्वार पर नही जायंगे। इस प्रकार श्री देशिक स्वामी जी ने वाणी शरीर और मन को सम्बोधित करके उनको उचित उपदेश दिया। आगे कहते है कि हे शरीर, मन और वाणी । यदि तुम लोग यह समझ बैठे हो कि हम तीनों तो करण हैं, विना कुछ किये रह नही सकते हैं, हमे कुछ न कुछ करते रहना चाहिये । सुनो । तुम्हे उचित दिशा पर प्रवृत्त होने के लिये बतलाता हूँ तुम तोनो श्री भगवान की तरफ जुट जाओ। सम्पूर्ण प्रवृत्ति श्री भगवान के विषय मे हो जाय, इसमे सब का कल्याण है । श्री भगवान को है ? वाच सोमनि श्री भगवान वाणी की सीमा मे है, वाणी से श्री भगवान के गुणो का अधिकाधिक वर्णन होने पर भी आगे आगे श्री भगवान के ऐसे गुण विद्यमान है, जो अब तक वर्णित नही हुए हैं । इस प्रकार श्री भगवान मे विद्यमान गुणो का वर्णन करते रहने पर भी वाणो पार नही पा सकती। श्री भगवान मे विद्यमान गुणो का वर्णन ही जव वाणी से नही बनता, तब मिथ्या गुणो का वर्णन करने का प्रसग ही नही उठता । दुख की बात है कि मनुष्यो को स्तुति करते समय, कई बार वाणी को मिथ्याभापण करता पडा किंतु यदि वाणी श्री भगवत्स्तुति में प्रवृत्त हो जाय तो वाणी पूर्ण मात्रा मे सत्यवादिनी बन जायगी। इसलिए कहता है कि वाणो से अगम्य अनन्त कल्याणगुणो से अलकृत श्री भगवान की स्तुति मे वाणी को जुट जाना चाहिये। रङ्गधामनि श्री भगवान वैकुण्ठधाम से अवतीर्ण होकर श्री रङ्गधाम में श्री रङ्गनाथ भगवान के रूप में विराजमान रहते हैं। प्रतीत होता है कि श्री रगौन्दर में श्री रगनाथ भगवान इस अभिप्राय को लेकर ही शयन करते रहते है कि इस भूलोक मे रहने वाले सब जोवो का उद्धार करके ही उठेंगे । इस प्रकार जीवो. गरार्थ अवतार के रूप में विराजने वाले श्री रगनाथ भगवान (१२०) को प्रणाम करने प्रदक्षिण करने तया पूजन करने इत्यादि विविध सेवा में लगकर शरीर को कृताथ बनाना चाहिये। श्री भगवत्सेवा मे लग जाने पर ही शरीर की सपलता है। महामन्दोनम मनि थी भगवान महान मान से सदा परि पूर्ण रहते है, मानद वद्धि से श्री भगवान का महत्व बढ़ जाता है म्वरूप रूप गुण, विभूति, लीला और घाम ये मय श्री भगवान को अत्यन्त अनुकूल प्रतीत होते रहत है, इसलिये उनका मानद प्रति क्षण वृद्धिगत होता रहता है। ऐसे आनन्दमय श्री भगवान के अनुभव मे मन को प्रवृत्त होना चाहिय । श्री भगवाका निरन्तर अनुमधान करते रहने पर उनका अनुभव प्राप्त होता है। रस स्वरूप श्री भगवान का अनुभव प्राप्त होने पर मन को अपार मानन्द प्राप्त होगा। श्रुति कहती है कि-रसो बस रस होवाय लध्वानदी भवति । अर्थात् श्री भगवान् रस म्वरुप है। रस स्वरूप श्री भगवान का प्राप्तकर जीव पान दानुभव प्राप्त करता है। इसलिये कहता हूँ कि मन को मानन्दमय श्री भगवान के अनु- भव म लग जाना चाहिये । स्वामिनि श्री भगवान स्वामी है शरीर मन और वाणी स श्री भगवान की सेवा करने पर उसी प्रकार दिव्य मानद प्राप्त होगा जिस प्रकार पतिव्रता को पति को सेवा से विमल मानद प्राप्त होता है। लौकिक प्रभुया की सेवा करने पर इसलिये मुख प्राप्त न हुमा, वे स्वामी नही है। प्रतएव उनकी सेवा दुखद हो मिद्ध हई। श्री भगवान स्वभावत स्वामी है हम स्वभावत दाम है इस स्वाभाविक सम्बध के कारण श्री भगवत्सेवा दिभ्य प्रानन्दती है । लौकिन प्रभुत्रों के साथ दास स्वामि भाय सम्बध कमकृत है म्वाभाविक नहीं प्रसएप उसका परिणाम अच्छा नहीं होता। स्वामी को सेवा से स्वम्प उज्ज्वल होगा। इसलिये वहता हूँ कि तीनों करणो को थो भगवत्सवा मे प्रवृत्त होना चाहिये । मात्मनि श्री भगवान श्रीवात्मायो का भी यात्मा है उनका पारमा कोई नही है अतएव वे परमात्मा कहलाते है। मभी जीव (१२१) श्री भगवान के शरीर के समान हैं, लोक मे देखा जाता है कि सब कोई अपने शरीर की रक्षा में स्वयं प्रवृत्त होते है, वैसे श्री भगवान भी अपना शरीर बने हुए जीवो की रक्षा मे स्वय प्रवृत्त हैं । ऐसी स्थिति में अपनी रक्षा के लिये दूसरे जीवो का आश्रय लेने की क्या भावश्यकता ? शास्त्र में कहा गया है कि रक्षते भगवान विष्णु- भक्तानात्मशरीरवत् अर्थात् श्री भगवान अपने शरीर की तरह प्राश्रित भक्तो की रक्षा करते हैं। वेङ्कटेश्वरकवेरयभर स्वेनापितः हे वाणी देह और मन ! वेङ्कटेश्वर कवि मैंने स्वय अपने रक्षामार को आज वारणी की सीमा में रहने वाले अपार आनन्द के कारण अधिकाधिक महत्त्व रखने वाले स्वामी एव परमात्मा श्री रङ्गनाथ भगवान के श्री चरणो में समर्पित कर दिया है अथवा श्री भगवान ने ही अनादि कर्मप्रवाह मे अनुकूल मौका पाकर आज हमारे रक्षाभार को अपने श्री चरणो में समर्पित करा लिया है। आज से मेरी रक्षा का भार श्री भगवान ने ले लिया है, वे अवश्य रक्षा करेंगे। तुम लोगो को अन्यान्य विपयो से हटकर श्री भगवद्विषय मे लग जाना चाहिये । मेरी रक्षा के लिये तुम लोगो को क्षुद्र प्रभुनो को प्रसन्न करने के काम में नहीं लगना चाहिये किंतु सर्वरक्षक श्री भगवान की सेवा मे प्रवृत्त होना चाहिये। इस प्रकार कहकर श्री देशिक स्वामी जी ने प्रपन्नो को यह दर्शाया कि शरीर वाणी और मन से किसे त्यागना चाहिये तथा किसे अपनाना चाहिये ॥२६॥ ( २७ ) दास्यं लास्यवताऽनु मनसा रङ्गश्वर त्वत्पदे नित्यं कि करवाण्यहं न तु पुनः कुर्या कदर्याश्रयाम् । मोलच्चक्षुषि वेल्लितभ्र रिण मुहुर्दत्तावमानक्षरे भोमे कस्यचिदायकस्य वदने भिक्षाविलक्षादृशम्।। पूर्व श्लोक मै श्री देशिक स्वामी जी ने श्री रङ्गनाथ भगवान के दिव्य चरणो में अपने रक्षाभार को समर्पित करके शरीर, मन .
(१२९) पौर वापी को सम्बोधित कर कहा कि तुम लोग भाज से विषया 'तर से हटकर श्री भगवान की सेवा में लग जायो । तुम लोगों को मेरी रक्षा के लिये कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है, कारण श्री रङ्गनाथ भगवान ने मेरे रसाभार को भपने ऊपर ले लिया है। इस श्लोक में धी रङ्ग देशिक स्वामी जी श्री रङ्गनाथ भगवान मे प्रापना करते है कि देवाधिदेव । धाप ऐसी कृपा करें कि मैं मापके चरणाविदों में दासता को स्वीकार कर सदा कम करता है। तथा भीख मागने के लिये दूमरे किमी क्षुद्र प्रभु पर मुझको हटिपात करना पड़े। हे रकवर। मह नास्याता मनसा स्वस्पदे दास्थमनुमत्य निस्प कि करवाणि । मोलम्नपि वेल्लिसणि मुहताबमानसरे भीमे कस्यचिवायकस्य पदने मिथिला दर्धात्र शन पुन कुम । हे रगेश्वर । है श्री रगनाथ भगवान ! पाप परमदया है मा बीवी की रक्षा करने मे उधत रहते है। आप ब्रह्माण्ड में रहने बाल जोवो के कल्याणाप सवप्रथम सत्यलोग पधार वही श्री ब्रह्मा जी द्वारा पाराधित रहे। अनन्तर भूलाक में रहने वाले मनुष्यो का उद्धार करने के लिय श्री प्रयो या में पधारे यहाँ मनु इत्यादि सूर्यको राजामा क द्वारा पाराधित होकर विराजमान रहे। पूर्णावतार मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी ने भी थी जनकनन्दिनी के साथ प्रापको माराधना की थी। पश्यपद पधारते समय श्री रामपाद जी ने सवा पापको पूजा करते रहने के लिये शरणागत थी विभीषण बी के हाथ मे कुल धन प्रापको समर्पित किया । मापने नया पधारते समय दोनों कविरी के मध्य में विराजमान श्री रगयाम में विराजता ही पसन्द किया । प्रस्म बादि जीचो पर करुणा करके ही मापने ऐसा किया। प्रतीत होता है कि प्रब माप से सकल्प लेकर शमन कर रहे है कि अस्मादि जीयो का उबार करके ही उठेंगे। माप स्वय हम लोगों को कल्याण पने के लिये हमार वासस्थान पर पधारे हो । पापकी दया अपार मासकी दया की जय हो।
- (१२३) स्वत्पदे श्री भगवन् ! आप नित्य निर्दोष है, समस्त कल्याण- गुणसागर हैं, तथा सुशील स्वामी है । आपका आनन्दमय चरणार- विन्द परम भोग्य है। उसकी सेवा करने के लिये किसको उत्कण्ठा न होगी। . গায় अह लास्यवता मनसा दास्यमनुमत्य में आपका दास बनना चाहता हूँ। मैं आपका दास बनूगा, इस बात को समझकर मन हर्प से नाच रहा है। दुष्कर्म के कारण लोक में दूसरो के प्रति दाम वनना पडता है, वह दासता कर्मकृत होने के कारण दुखद होती है, सासारिक दासता मे मन मदा खिन्न रहता है । आप के लिये दास वनना जीवो का म्वाभाविक धर्म है। म्वामी बनकर विराजना आपका स्वभाव है, श्री भगवान का दास बनना जीवो का स्वभाव है। यह सम्बन्ध नित्यसिद्ध है, कभी मिटने वाला नहीं। में डके की चोट यह बात कही गई है कि- वासभूता. स्वत सर्वे ह्यात्मान परमात्मन । आत्मदास्य हरे स्वाम्य स्वभाव च सदा स्मर ।। अर्थात् सभी जीवात्मा स्वभावन. परमात्मा के दास है । मदा स्मरण रक्खो कि जोवात्मानो की दासता तथा श्री भगवान का म्वामित्व स्वभाव सिद्ध है । जिम प्रकार गुणवान पुत्र को पिना की सेवा करने में अपार आनन्द प्राप्त है, जिस प्रकार पतिव्रता साध्वी को पति की शुश्रूषा करने मे अपार सुख प्राप्त होता है, उसी प्रकार आप गुणनिधि सुशील स्वामी की सेवा करने में सहजदास हम लोगो को भी अपार प्रानन्द प्राप्त होता है। यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि जीव अपने को जैसा मानता है उस मान्यता के अनुसार ही वह भोग्यवस्तु को चुनता है । शास्त्र में यह बात कही गई है कि- अन्न भौज्य मनुष्यारणाममृत तु दिवौकसाम् । श्वपशू वितृणाहारौ सन्तो दास्यकजीवनाः ।। अर्थात् जो जीव अपने को मनुष्य मानते है, मनुष्य शरीर को हो अपना ममझते हैं उनको मनुष्य शरीर के प्रति अनुकूल प्रतीत (१२४) होने वाला मन्त्र ही परम भोग्य प्रतीत होता है। जो जीव अपने को देव मानते हैं उनको देव शरीर के प्रति अनुकूल लगने वाला अमृत ही भोग्य प्रवीत होता है जो जीव अपने को कुत्ता और पशु मानते हैं उनको विष्ठा और ए इत्यादि ही भोज्य प्रतीत होते हैं । तथा बो जीव अपने को देह न मानकर अपने को श्री भगवान का दास मानते हैं उन सन्तों को श्री भगवान की सेवा ही परम भोग्य प्रतीत होती है पदथ ही उनका जीव चलता है ऐसी स्थिति में अपने को श्री भगवान का सहनदास मानने वाले हम लोगों को आपकी सेवा में अपार मानन्द मिले तो इसमें क्या पाश्चय है। मैं सर्वेश्वर श्रीमगवान का दास हूँ, चराचरपति श्री भगवान मेरे स्वामी हैं, इस बात को समझते ही अपार मानद उमड पडता है, मन हष मारे नाच उठता है । इस प्रकार हप से नाचने वाले भन से सलाह लेकर मैंने माज अापके प्रति दासता स्वीकार करने की पक्की प्रतिज्ञा करती है। अनुमत्य है श्री भगवान् । मैं प्रापये प्रति दामता को म्बीकार करता है। स्वीकार करने के बाद ही में दास बनता हूँ ऐमी बास नही है । म तो अनादिकाल मे पापका दास बना ही हुमा हूँ। क्योकि जीव थी भगवान का स्वरूपत दास है। जब से जीव सब से वह श्री भगवान का दास ही है। जीव नित्य है, जीव का दासत्व भी नित्य है । मैं प्रज्ञानवश पर अपने को मापफा दास नहीं मानता था तब भी भापका दास ही बना रहा । कुछ न कुछ आपको सुख पहुंचाने के लिये करता ही रहा। भले ही मैं मापको सुख पहुँचाने के भाव से न कह तो भी मेरी करनी से भापको सुख मिलता ही था । यहाँ तक कि संसार में प्रापके प्रति प्रतिकूल प्राचरण करते समय भी मैं पापको लोनारस का अनुभव कराता था। माप मेरे प्रतिकूलाचरण को देखकर अधिकाधिक दण्ड देकर प्रसन्न होते थे। मेपयुद्धलीला सपा कुक्कटपुटलीला इत्यादि मे उन लीलामों का प्रायोजन करने वालों को उन युनों को देखकर मानद मिलता है किन्तु उस लीलाविभूति में भाग लेने वाले मेष भोर कुक्कूट ।
स्यादि को दुख ही मिलता है उमा प्रसार म लीलाविभूति में नौला में भाग लेने वाले हम दोनो मे ग्रापको लीलारम मिलता था, याकि आप अपराधियो को दण्ड देकर प्रसन्न होते थे, म नीसा से हम लोगो को तो दुख ही मिलता पा। कुछ भी हो, ममार में ममता को न समझते समय में प्रापको लीलारम पहुँनाना हो हा। इस प्रकार में आपको सीलारम नटाकर दाम ही बना रहा। दामना मुझमे कभी नही टूटी । नित्यदास वनने पर भी दामता को समझने के कारण मुझको प्रतिकूलाचरण के फलम्बाप दण्ट भोगना पड़ा । अब मैने दासता को समझ लिया, तथा उमे स्वीकार भी किया। स्वीकार करने का यह फल होगा प्राज से मै प्रतिफूला- चरण छोडकर अनुकूलाचरण करता हुआ प्रापके अनुग्रह का पात्र नकर अापके भोगरस का वर्षक बनगा। भोगरम में पापको भी फानन्द होगा तथा मुझे भी प्रानन्द प्राप्त होगा । भगवहाम्य को स्वीकार कर में यह चाहता हूँ कि-नित्य कि करवाण्यहम् सदा मैं पापका कैडूर्य करता रहै. सर्वदेश सर्वकाल एव सर्वविध प्रवम्या म प्रापका कार्य करता रहूँ। वह कंदर्प भी अपने स्वार्थ के लिये न रू, किंतु केवल आप के लिये ही करू, अापका मुम्बोलास हो अधान रद्देश्य हो। चेतन होने के कारण यदि मुझे कुछ घानन्द मिले तो वह प्रानुपङ्गिक ही माना जायगा। वह प्रधान उद्देश्य न । न तदर्थ ही कार्य किया जायगा। केवल आपके सतोप के लिये ही कैड्य किया जायगा। इस प्रकार केवल परार्थ कड्यं सदा करता रहूँ। यही प्रार्थना है, हे श्री भगवन् । कृपया अाप इस मनोरथ को पूर्ण करदें। कि करवाण्यहम् इस प्रकार केतय करने पर ही मुझको सत्ता प्राप्त होगी। अब तक मैं कैडूर्य छोडकर विनष्ट प्राय हो गया था, मेरे प्रात्मस्वरूप को मत्ता, विकास, उज्ज्वलता केहूर्य में ही निहित है, कैर्य करने पर ही वे प्राप्त हो सकेंगे। मोलरपि इत्यादि । हे श्री भगवन् ! मेरी दूसरी प्रार्थना भी है, उसे भी आप कृपया पूर्ण करदें। वह प्रार्थना यह है कि मुझे होगा (१२६) उनके किसी क्लिष्ट अवस्था म भी कृपणा का प्राधम लना न पड, द्वार पर जाना न पडे उनसे बुछ मागना न पड़े। लोभी कृपणों के मुख को तो में प्रांख उठाकर भी देखना नही चाहता हूँ मुझे उस मुख का ध्यान करते ही भय होता है। उनका मुख कैसा होता मोलच्चक्षुषि गर्व से उनके नेत्र मदा भाषे मिचे हुए रहते है, समक्ष उपस्थित याचकों पर उनका मादर भाव नही हैं, अतएप वे नेत्र खोलकर यह देखना नही चाहते, गव और अनादर भाव से उनक नेत्र हाथियों क नेत्र की तरह सदा अनिमीलित ही रहते हैं। कभी नेत्र खोलकर देखने भी लगें तो बेल्लित णि श्रोध से उनकी भौहे पट जाती हैं। इन याचकों का दशन एक प्रकार से महान अपशकुन हुमा नेत्र खोलते ही अपशकुन देखना पडा ऐसा समझकर वे क्रोषाध हो जाते है उनकी भौहे टेडी हो जाती है मुहबसाव मानामरे वे क्रापाप पर्ष नेत्र मीचकर भौहे चढाकर नाना प्रकार के कटुवचन सुनाने लगत है, उनषे मुख से निकलने वाल प्रत्येक शब्द से अपमान टपक्ता रहता है। प्रतीत होता है कि वे सम्मान करने का एक भी शब्द नही जानते । एकाधवार व कटुवचन कहते हो सो बात नहीं। किंतु बारम्बार वे अपमानजनक शब्दों का उच्चारण करत रहते है थकते कभी नहीं। जिस प्रकार घल्मीक से सप निकलते रहते है उमी प्रकार उना मुख स निदा गर निकलते रहते हैं वे समक्ष उपस्थित याचकों का अपार दुख देते हैं। प्रतीत होता है कि उनक पास भपशब्द के सिवाय दूमरा कोई शब्द है ही नहीं इसलिय वे अपशब्दो को ही प्रदान करत है। वह मुख बहुत भयकर प्रतीत होता है, जिसमे भौहे वढी हो जिससे गाली भब्दों की धारा निकलती रहती हो । जिसमे गव और पनादरभाष नाचते हों वह मुख अत्यन्त भयकर ही होगा । उस मुख का प्राकलन । करत ही हम को रोमान्च होने लगता है उम मुसको में देखना सक नहीचाहता किस्पचिवाध्यकस्य में उस धनिक का नाम तालना नही पाहता । पुष्पात्मामों का नाम लेने से पुण्य प्राप्त होगा, पापियो का नाम लेने से पाप हो तो प्राप्त होगा। इसलिये में उनका नाम नहीं वे । (१९७) लेना चाहता । प्राव्यफस्य दे वास्तव में चिनिष्ट धनिक नहीं है। धनिक का स्वाग धारण करते हैं, इतना ही है । यदि विशिष्ट धनिक होते तो सम्मान के साथ बात करते । कृति से प्रतीत होता है कि क्षुद्र धनिक है । उनका मुख तक में देखना नहीं नाता। उनने सामने उपस्थित होकर उनके उस भयकर मुख पर दृष्टिपात कर कुछ मागना तो सर्वथा अशक्य है। उनके मुख मे निकलने वाले उन अपमानजनक शब्दो को सुनते ही लज्जा मे वारणी बाहर निकलना ही नही चाहती। मागने के पूर्व ही मेरे नेत्र लज्जाभाव को व्यक्त करते रहते हैं। सभी भाव नेत्रो में झलकते रहते है। मागने में लज्जा होती है, लज्जा से वाणी नहीं निकलना चाहती, मन कुढ जाता है, गरीर मे सकोच या जाता है, असह्य वेदना सनाती है हे श्री भगवन् । मै यही चाहता हूँ कि उन क्षुप्रधनिको के भयकर मुख पर भीख मागने के लिये मुझका दृष्टिपात करना न पडे । मेरो इस प्रार्थना को आप पूर्ण करदें, तथा अपनो मेवा देकर कृतार्थ बना दे यही प्रार्थना है। यह प्रार्थना भी पाप से ही पूर्ण हो सकती है। आपने मेरे रमाभार को अपने ऊपर ले लिया है। हमारी इस निर्दुध प्रार्थना को पूर्ण करना आपको न्यायप्राप्त है। अत आपसे यह निवेदन किया गया है। प्राशा है अाप अवश्य पूर्ण करेंगे ॥२७॥ ( २८ ) त्वय्येकाञ्जलिकिकरे तनुभृता निळजसर्वसहे कल्याणात्मनि रङ्गनाथ कमलाकान्ते मुकुन्दे स्थिते । स्वामिन् पाहि वयस्व देहि कुशलं जीव प्रभो भावये- त्यालापानवलेपिषु प्रलपितु जिह्रति जिह्वा मम । पूर्व श्लोक मे थी देशिक स्वामी जी ने श्री रणनाथ भगवान से यह प्रार्थना की, कि हे प्रभो । आप कृपा करके मेरे इन मनोरथों को पूर्ण करें, मैं चाहता हूँ कि बडे हर्ष मे आपका दास बनकर सदा कैडूर्य करता रहै, तया लोभो क्षुद्र प्रभुमो के भयकर मुख को देखने - । (१२६) उनके किसा क्लिष्ट अवस्था में भी कृपणा का प्राधय लना न पड, द्वार पर जाना न पडे उनसे पुछ मागना न पड़े। लोभी कृपणों के को तो मै माँख उठाकर भी देखना नहीं चाहता हूँ मुझे उस मुख । का ध्यान करते ही भय होता है। उनका मुख फैसा होता है मोलच्याषि गव से उनके नेत्र मदा प्राधे मिचे हुए रहते है, समक्ष । उपस्थित याचकों पर उनका पादर भाव नहीं हैं, अतएव वे नेत्र खोलकर वन्ह देखना नहीं चाहते, पव और पनादर भाव से उनक मेष हाथियों के नेत्र की तरह सदा अनिमीलित ही रहते हैं। कभी नेत्र खोलकर देखने भी लग तो वेलित थिोष से उनकी भौहे चढ़ जाती हैं। इन याचकों का दशन एक प्रकार से महान अपशकुन हुमा, नेत्र खोलने ही अपशकुन देखना पड़ा ऐसा समझकर ये क्रोधाघ हो जाते है उनकी भौहे टेढी हो जाती है मुक्ताव मामासरे वे गोधाध प्रथ नेत्र मीधर भौहे चढाकर नाना प्रकार के कटुवचन सुनाने लगते है, उनके मुख से निकलने वाल प्रत्येक शब्द से अपमान टपकता रहता है। प्रतीत होता है कि वे सम्मान करने का एक भी शब्द नही जानत । एकाधवार 4 कटुवचन कहते हो सो बात नही। किंतु बारम्बार वे अपमानजनक शब्दों का उच्चारण करते रहते हैं थकत कभी नही। जिस प्रकार वस्मीक से गप निकलते रहत है उमी प्रकार उन मुख स निदा गन निकलते रहत है वे समक्ष उपस्थित याचको का अपार दुख देते हैं। प्रतीत होता है कि उनक पास अपशब्द के सिवाय दूमरा कोई गब्द है ही नहीं इसलिय ये अपशब्दो को ही प्रदान करत है। वह । मुख बहुत भयकर प्रतीत होता है जिसमे भौहे सही हो जिमसे गाली शब्दों की धारा निकलती रहती हो। जिसमें गव और अनादरभाव नाचते हों वह मुख प्रत्यन्त भयकर ही होगा । उस मुख का प्राकलन । करत ही हम को रोमाश होने लगता है उस मुख को मैं देखना सक नहींचाहना कस्यचिदायकस्य मै उस घनिक का नाम तरना नहीं पाहता । पुण्यात्मानों का नाम लेने से पुण्य प्राप्त होगा, पापियो का नाम सने से पाप ही तो प्राप्त होगा। इसलिये मैं उनका नाम नहीं (१२) एव मांगने का प्रसग नही पाये। इस श्लोष में षी देशिक स्वामी भी श्री रगनाप भगवान से विनय कप्ते हैं कि परत्व और सोलभ्य निषि पाप रक्षा करने के लिये सदा उधत करते है, ऐसी स्थिति मे खुद प्रभुओं के यहां जाकर उनके समक्ष नानाप्रकार की ध्वर्य प्राथना करने में मुझे बहुत सकोच होता है, जिह्वा कुण्ठित हो भाती है, इस बात को प्राप जानते ही है। इसलिये प्रायना है कि पाप ऐसी कृपा करें कि यदि मुझे कुछ प्रापना करनी पड़े तो भापके अनिषि मे ही करें। हे रङ्गनाय! अनुभवामेकालिकिकरे, नियजिराषसहे कल्माणा- मनि कमलाकात मुहरे यि स्पिते प्रवतेपिषु स्वामिन पाहि बयस्य यस देहि प्रमो मायेत्यालापान प्रलपितु मे चिह्रा बिहति । हे बी रङ्गनाथ भगवान ! भाप मे दो विशेषता विध मान है-(१) परल और (२) सोलम्य । पाप सब से मद तरह से बड़े है इसलिये माप मे सर्वस्मात् परत्व माना जाता है । मब से बड़े होते हुए भी भाप भत्यन्त सुलम भी है। पाप मे परत्व और सोलभ्य विधमान होने के कारण ही पापसे जगत का फस्याण होता रहता है। यदि भाप केवल बडे होते सुलम नहीं होते वीवों को पापा माश्रय लेना ही कठिन हो जाता कल्याण होगा तो असम्भावित ही था । यदि माप कवल सुलम होते सर्वषध नहीं होते तो शकिपादि पूणों की धूनता के कारण जगत का कल्याण सिस नहीं होता। स्वर्णमय होने में श्रेष्ठ होने पर भी सुमेरु पर्वत पुलभ होने से जीवो का अनुपकारक है का और पत्थर इत्यादि सुलभ होने पर भी महत्व न होने के कारण निस्पक रह जाते है । माप में परल और सोमस्य दोनों विद्यमान है। सोलम्य होने से जीप अनायास भापका भाषय लेते हैं। भाप में अपार प्रभाव होने से जीवों की रक्षा नी तत्क्षण सपन्न हो जाती है। माप सुलभ इतने है कि समुमतामेकाजनिकिकरे कोई प्राणी पदि भापरे समक्ष एकवार भो हाप मोड़ तो पर उनके लिये (१२४) किंकर अर्थात् सेवक बन जात हैं। उनके सर्वविध मनोरथो को पूर्ण हुए सदा उनको प्रसन्न करने के लिये उद्यत रहते हैं। अञ्जलि बांधना तो सरल कार्य है, तदर्थ आप यदि उनकी सेवकाई करते है तो इसे सौलम्प की पराकाष्ठा ही समझना चाहिये । एकबार अलिबन्ध हो आपको प्रसन्न करने के लिये पर्याप्त है, यदि अनेक बार अलि वाँधी जाये, वह आपको भारस्वरूप प्रतीत होता है। इसलिये तो अभयमुद्रा के द्वारा एकबार की गई अञ्जलि के लिये अभय देते हुए अनेक बार की जानेवाली अञ्जलि को मना कर रहे है । उस समय आपकी अभयमुद्रा निषेधसूचक मुद्रा के रूप में परिणत हो जाती है । एक अञ्जलि के लिये भी किकर बनकर आप अपार सौलभ्य को व्यक्त कर रहे है। आपका सोलभ्य झरे प्रकार से भी व्यक होता है। तनुभृतां निजसवंसहे प्रापका आश्रय लेने वाले सब तरह के प्राणियो के सर्वविध अपराधो को भी पाप क्षमा कर देते है। माप जो अपनी म्वाभाविक कृपा से सब अपराधो को क्षमा कर देते है उस पर दृष्टिपात करने पर प्रतीत होता है कि भक्ति और धरणा- पति इत्यादि साधन भी उसके लिये पर्याप्त साधन नहीं हैं। प्राप कृपा करके उन्हे निमित्त बनाकर क्षमा करते है। परन्तु विचारने म यही सिद्ध होता है कि ये उन भयकर अपराधो को क्षमा करने में पर्याप्त साधन नहीं है आपको अपराधो को क्षमा करने में महज कचि है इमलिये पाप क्षमा करते है । इन साधनो को जो श्राप निर्मित बनाते है उममे यही रहस्य है कि आपने वैषम्य और निर्दयत्व इत्यादि दोषो से बचने के लिये ऐसी व्यवस्था को है यह पापको लोला है । आप सहब दया से निर्हेतुक ही सर्व अपराधो को भामा करने वाले हैं यह पक्की बात है। इससे भी प्रापका परम सोलम्प प्रमाणित होता है। अाप परम सुलभ हैं, इतना ही नही, आपमें परत्व अर्थात् सर्व प्रकार से वहनन भी है। आपका बड़प्पन इसी में है कि आप - (१२) परमारणारमान परममगलस्वरूप है। आपसे जगत का कल्याण ही हो मरता है, कभी प्रकल्पास हो ही नहीं सकता किच कस्यालामान पाप ज्ञानान व स्वरूप है। आपमें अदर और बाहर मानव ही मानन्द भय है। जिस प्रकार मिश्री में अरबाहर और चारों तरफ मधुर रस ही व्याप्त रहता है उसी प्रकार माप मे सपत्र प्रानन्द व्याप्त रहता है। मानन्दमय भापके स्वरूप का बडप्पन सर्वोपरि किंच कल्याणात्मनि जिस प्रकार भापका स्वरूप सर्वोत्तम है उसी प्रकार पापका दिव्य वियह भी परम विलक्षण है। उसमें सौन्दय यौवन मौकुमाय और लावण्य इत्यादि गुण भरे है । मापका स्वरूप परममगलकारी है परन्तु साधक उसका प्रारम्भ मैं पाकसान नही कर सकते। भापका दिव्य विग्रह अनायास प्राकलन करने योग्य है तथा परम मंगलकारी भी है, इमलिये उसे शुभाश्रय कहते है। ऐसा दिव्य विग्रह दूसरे किसी का नहीं होता है इसस भी प्रापका परस्य झलकता है। कमलाकाते माप लक्ष्मीपति है, लक्ष्मीकटाक्ष में सर तरह का वभव प्राप्त हाता है। ब्रह्मा इत्यादि देवतागण श्री महालक्ष्मी जो की कृपादृष्टि के लवलशको प्राप्त करने के लिय सना लालायित है। सवमगनिधि पक्षणामूर्ति जगमाता उन महाल भी बी के माप अनुरुप मनोहर पति है। श्रीमहालक्ष्मी जी आपको कमी छोटना नहीं चाहती । जब माप अवतार लेते है तब वह भी माय अवतार लेती हैं । मर्वकल्याणप्रदा महालक्ष्मी जो 4 प्रेमपात्र पाप है। इसमें भी मापका बड़प्पन परम सीमा तक पहुंच मुकुन्ने स्खदि स्थिते सति कष्णाभूति अनुप्रदमयो जगमाता श्रीमहालक्ष्मी जी को प्रेरणा से श्राप भोग भोर मोष सब कुछ दने के लिये सदा सनद रहते है। मोक्षानन्द देने के लिये उपयुक्त परम पाम लेजाकर उनको मोक्षमाम्राज्य पर आसीन करने के लिये भाप लालामित रहते है। इस प्रकार परव और तौलम्य को सिख करने वाले सर्वविधमगलगुणो मे विभूषित पाप विद्यमान रहते है। ऐसे आप विराजमान रहते ममय में दूमगे के यहां जाकर कैमे उन प्रार्थनानो को व्यक्त कर जिन प्रार्थनायो को प्रापके सन्निधि में करना नितान्त उचित है। उनके यहां जाकर क्या २ कहना पटना है। उसे ध्यान मे लाते ही हँसो पाती है । उनके यहां जाकर क्या गया कहना पड़ता है कि-स्वामिन् पाहि दयस्व देहि कुशल जोध प्रभो भावय हे स्वामी जी । मेरी रक्षा कीजिये, मुझ पर दयाभाव रखिये, मुझको श्राप कुशल दे, आप सैकडो वर्षों तक जीते रहिये, मुझे अपना आश्रित समझिये, मेरी उन्नति कीजिये इत्यादि रूप से उनके समक्ष प्रार्थना करनी पड़ती है। क्या ये मव प्राधनायें उनके मामने करने योग्य हैं ? क्या वे यथार्थ में स्वामी हैं, वघा मै वाम्नव में उनका दाम हूँ, क्या वे रक्षा करने में समर्थ हैं । जो स्वय अक्षित है वे कैसे रक्षा कर मक्ते हैं, क्या उन निर्दयो मे दया की भिक्षा मागना मूर्खता नही है ? जो म्बय अमगलो से प्रताडित हैं वे क्या मगल देगे जो जन्म काल में ही मृत्यु मे ग्रस्त हैं, उनसे जीयो जोयो कहना क्या परिहाम नही है ? जो नाना प्रकार की पर- तन्त्रता की बेडियो से जकडे हुए हैं उन्हे प्रभो प्रभो कहना क्या अज्ञान नहीं है। उनमे यह कहना कि-ग्राप मुझे अपनी आधित कोटि मे ममझ-कितनी शोचनीय बात है। जिनके यहां जाकर इस प्रकार प्रार्थना का जाती है क्या वे इन प्रार्थनाप्रो को मुनने के लिये तैयार हैं ? नहीं, वे सुनने के लिये तैयार नहीं प्रवलेपिषु वे बड़े गर्वीले है, मदोन्मत्त है वे सुनने के लिये तैयार नही किंतु नाना प्रकार में अपमानित करने के लिये मन्नाह हैं। - प्रलपितु मे जिह्वा जिह्रति उनके यहाँ जाकर इस प्रकार प्रार्थना करना कोई अर्थ नही रखता, वह तो केवल एक अर्थहीन प्रलयमात्र है। उनके ममक्ष इन प्रकार प्रलाप करने के लिये मेरी जिह्वा उद्यत नहीं होती, वह तो लज्जा के मारे मिकुडतो जाती है। उससे एक शब्द निकलना भी कठिन है। यह मेरी वास्तविक स्थिति है। इसे आप जानते ही है । इसलिये है श्री भगवन्, प्रार्थना है कि , - (१२) पदि इस प्रकार प्राथना करने की आवश्यकता हो तो यह पापके समक्ष हो हो, उससे स्वरूप मा उज्ज्वल होगा ॥२॥ ( २९ ) त्वयि सति रणधुप शरणागतकामदुधे निरवधिकप्रवाहकरुणापरिणाहवति परिमितदेशकालफलवान् फलवाकृतिकान् कथमधिकुमहे विधिशिवप्रमुखानमुकात् ॥ पूर्व लोक में श्री देशिक स्वामी जी ने श्री रङ्गनाथ भगवान का सम्बोधित कर कहा कि मुझको दूसरों के यहां जाकर नाना प्रकार से प्रार्थना करने मे लना होती है, वैसी प्रायना आपके सनिधि में करनी चाहिये । इस श्लोक मे श्री नशिक स्वामी जी श्री भगवान को संबोधित कर विनती करते है कि इस लोक में किमी से प्राथना करने की इच्छा नही होती इतना ही नही किंतु श्री ब्रह्मा जी श्री शिव जी इत्यादि देवताभों से भी प्रार्थना करने की इच्छा नही होती क्योकि सवफलप्रद मापके विराजमान रहते मुझको देवतातरा से प्राथना करने की क्या प्रावश्यकता ? इस प्रकार देनिक स्वामी जी इम लोक मे अनन्यता का प्रादर्श उपस्थित करते है। हे रङ्गषय । निरवधिकप्रवाहकरणापरिणाहबति शरणागत कामवुघे स्वपि सति परिमितवेशकालफलदान फलवातिका प्रमुकान विषिशिवप्रमुखाम् कथमषिकुमहि । है घी रजनाथ भगवन् पापमै अगणित कल्याणगुण है उनमें कपणा प्रधान है । कक्षणा से ही जीवो का उद्धार होता है। कपणागुण बहुत विस्तृन है आपमे सवत्र करपा छाई हुई है। निषधिकप्रवाहकापापरिणाहवति मापन करुणागुण अधिक मात्रा में होने के कारण वह पाप में समाने नही पाता, वह अनेक प्रवाहो पाप कर जोवो पर प्रवाहित होता है। सोशोल्प पारसल्प क्षमा (१३) - उदारता मार्दव प्रार्जव और कृतनता इत्यादि त्यो वा धारण कर व करुणा जीवो पर प्रवाहित होता रहती है। उसने प्रवाह की मी कोई अवधि नही कि यहाँ तक हो फने यहाँ न फैले, करपा वा प्रवाह वो सब को डुबाला सर्वत्र फैलता रहता है। जिन प्रकार प्रवाह अधिक बढ़ने पर ऊंची भूमि नक इव जाती है. ऊँची भूमि के ऊपर भी प्रवाह वहने लगता है उसी प्रकार करणा का प्रवाह आश्रितो के उन सम्बन्धियो के घर भी~जो पापान्मा होने के कारण करुणा के अयोग्य हैं अतएव ऊंत्री भूमि के समान है- प्रवाहित होने लगता है । श्री ब्रह्लाद जी के विपर मे प्रवृन आपकी करुणा का प्रवाह उसके अनधिकारी पिता के आर भी बह गया। अतएव गान में कहा गरा है कि श्री भगवान अपने आश्रितों को २१ पीढ़ियो का भी उद्धार करते हैं। इस प्रकार पापात्म जीवो पर भी करुणा प्रवाह को प्रवाहित करने वाले अपार करणाममुद्र पाप हैं। ऐसे करुणामिन्यु होने के शरण ही आप शरणागत- कामदुघे शरणागतो के नवविध मनोरथो को पूगा परते है। स्वपि सति जव अपार करणावरुणालय एवं शरणागनमनो- रयपूरक आप विद्यमान है तब मैं दूसरे देवताओं का प्राधय क्यो नू? हाँ । दूसरे देवता यदि आपमें अधिक देने वाले हो तब उनका पाश्रय लेना भी एक प्रकार से उचित ठहर मक्ता है, किंतु वे देवना यापमे अधिक फल देने वाले नहीं हैं। किंतु परिमितवेशकालफलदान मे ही फल देते हैं जो परि- मित देश मे परिमित काल तक हो मित्र सकते हैं। में अनिन्य फल देने वाले देवताओ का प्राश्रय लेने से क्या लाभ श्राप स्थायी मोक्षपद तक देने के लिये सन्नद हैं 1 ऐसी स्थिति में आपका छोडकर उनका पाश्रय क्यो लिया जाय । 7 देवताओं के द्वारा दिया जाने वाला फल नम्वर क्या होता है ? कारण यह है कि-फलदाकृतिकान् देवतागण अधिक से अधिक aur होने पर अपना सायुज्य दे मऋते है, स्वय जैमा सुग्व भोगते हैं वैसा सुख दे सक्से हैं, उससे अधिक नहीं। देवतागण अब तक अपने पद मे रहते हैं तब तक ही प्राधितों को वसा भोग दे सकते । महाप्रलय उपस्थित होने पर देवतामों को भी मरना पड़ता है, वे पदच्युत होकर नष्ट हो जाते हैं उनका शरीर फटकर नष्ट हो जाता है। ऐसी स्थिति मे जब उनको बने रहना हो कठिन हो जाता है तब वे अपने प्राधितो को मुखभोग की गारण्टी कस दे सकते हैं' इसलिये प्राश्रयदाता देवताओं के पदच्युन होते ही उनके प्राषितो को भी स्वग इत्यादि भोग से हाथ धोना पडता है । अतएव सत्य लोक पयन्त सुखभोग नश्वर माना जाता है। विधिशिवप्रमुबानमुकान कथमधिकुमहे ऐसी स्थिति में ब्रह्मा रुद्र इत्यादि देवताओं का-ओ नश्वर फल ही दे सकते हैं-माश्रय हम क्यों लें, हम उनका उपासन क्यों करें? इस जगत में आप एक ही नित्य तत्त्व हैं पाप एक ही अविनाशी स्थायी मोक्षपद देने वाल हैं हम पापका ही माश्रय लेकर कृतकृत्य कृताय एवं चाय बनेंगे । दूसरे देवतामों से हमारा कोई सरोकार नहीं है, यही हमारी प्रन न्यता है । अनन्यता मे ही कल्याण है, अनन्य माश्रितों का ही पाप उद्धार करते हैं ॥२॥ घोमित्यभ्युपगम्य रङ्गनृपते नान्योधिता शेषता स्वातच्यादिमयीं व्यपोह्य महतीमाधामविधास्थितिम् । नित्यासहविसीमभूम (ति) गुणयोर्यायामनायासत सेवासपदमिदिरेश युधयोरकान्तिकार्यातकीम् ।। श्लोक में श्री रेशिक स्वामी जी ने प्रपन्नों को देवता तर परित्यागपूर्वक परमकान्ती अर्थात् अनप बनने का प्रादश उपस्थित किया। इस श्लोक मे श्री देशिक स्वामी जी मूलमन मर्यात थीमदष्टाक्षर मात्र के अर्थका अनुप धान करते हुए तथा मत्राय के विषय में अपनी निष्ठा को ध्यककरते हुए श्री रजनाथ भगवान से कैसूर्य प्रार्थना करते हैं।
हे इन्दिरेश रङ्गनृपते नान्योचिता शेषतामोमित्यभ्युपगम्य हे धी भगवन् | आप श्री महालक्ष्मी जी के परमप्रिय पति हैं, अतएव आप सर्वश्रेष्ठ हैं, इस प्रकार परात्पर होते हुए भी आप अस्मदादियों के उदारर्थ परममूलभ बनकर प्रो रङ्गधाम में श्री रङ्गनाथ के रूप में विराज रहे हैं। मदाचार्य ने कृपाकर हमका श्रीमदष्टाक्षर महामन्त्र का मार्थक उपदेश दिया । में अष्टाक्षरम्य तीन पदो में प्रतिपादित अयों में अविचल निष्ठा सम्बना हूँ। महा- मन्त्र अष्टाक्षर में प्रथम पद प्रोकार जीव को श्री भगवान का दोय अर्थात् दास बतलाना है। वह इस प्रकार है कि-मोकार में अहम ऐसे तीन अक्षर हैं। एक एक अक्षर एक एक पद है । इनमें "अ" यह प्रथम अक्षर श्री विष्णु भगवान को बतलाता है। "अ" यह अक्षर "प्रव" धातु मे बना है जिसके रक्षण इत्यादि अनेक अर्थ हैं । यहाँ पर प्रधान रक्षण अर्थ लिया जाता है । श्री विष्णु भगवान सर्व जगत की रक्षा करने वाले हैं इतना ही नहीं, किंतु सर्व जगत की उत्पनि रक्षा और प्रलय भी वे ही करते हैं । अवतीति प्र इस व्युत्पनि के अनुसार मर्व रक्षक श्री भगवान "अ" शब्द का अर्थ है । "म" का अर्थ जीवात्मा है। नत्वमागरसहिना में बतलाया गया है कि "क ख ग घ ड" ये पाँच अक्षर पञ्च महाभूतो के वाचक हैं, 'च छ ज झ ञ' ये पात्र वर्ण कमेन्द्रियो के वाचक है। " दृ" इन पाँच घणों में पात्र नन्मात्र कहे जाते हैं, "प" वर्ण मन को "फ" अहकार को "" अक्षर महत्त्व को "म" अक्षर प्रकृति को बतलाता है । "म" यह अक्षर जीवात्मा को बत- लाता है जो प्रकृति मे अत्यन्त विलक्षगा है। इस निरूपण से मिद होता है कि मकार जीव वाचक है। यह मकार व्याकरणप्रक्रिया के अनुमार "मन जाने" "मदी ह" "मसी परिमारणे" इन तीनो धातुग्रो में निष्पन्न होकर नानानन्दमय एव अणुपरिमाणवाने जीवात्मा को बतलाता है अथवा यह मकार अम्मच्छब्द मे "अम्" और "अ" भाग का लोप होने पर "म्" ऐमा बचा हुग्रा रूप है। यह तो मर्वविदित है कि अम्मच्छब्द चेतन को बतलाता है । अन्नु ।
(१३६) इस विवेचन से सिद्ध होता है कि "" यह प्रक्षर जीववाघन है। "उ" यह मध्यमाक्षर एव पक्ष में लक्ष्मीवाचक है, दूसरे पक्ष में अवधारण अर्थात् निश्चय का द्योतक है। प्र" के ऊपर चतुर्थी विभक्ति सुप्त है । सस्कृत में " का पर्याय एव शब्द है । लुप्त विभक्ति को मिलाकर देखने पर 'भतम् मै तीनो पद "प्राय उम् ऐसा बन जाते है उनका अथ यह होता है कि जीवारमा थी भगवान के लिये बना है । यदि कोई पदाम दूसरे को उपकार करने के लिये रहवा हो तो उस पदाथ को शेप कहत है। उससे उपकार पानेवाल को दोषी कहते हैं। भोंकार से सिद्ध होता है कि जीव श्री भगवान के लिये ही बना है इससे फलित होता है कि जोव किसी न किसी प्रकार से श्री भगवान का उपकार करने के लिये ही बना है दूसरों को उपकार करना जीव का प्रधान कतव्य नही है स्वय उपकार पाना भी जीव का प्रधान उद्देश्य नहीं है। ये सब गौग्ग है। श्री भगवान का उपकार करना, किसी न किसी प्रकार घीभगदान के उपयोग में माना यही जीव का प्रधान कतव्य है। इससे सिद्ध होता है कि जीव श्री भगवान का ही शेप है, दूसरों का नहीं। इसी शेपता को दासता कहते है। श्री देशिक स्वामी जी कहते है कि मैंने श्रीमदशाक्षर महामत्र मे भोकार से प्रतिपाद्य अर्थ को हृदय स स्वीकार कर लिया तथा यह निश्चय कर लिया कि में श्री भगवान का ही शेष है, दूसरो का शेप नहीं हूँ, माज से मै श्री भगवान को सुख पहुँचाने के लिय ही काय करूगा, दूसरो को सुख पहुँचाने में लिये काय वरना मेरे स्वरूप के विरुद्ध है। म्बय सुख पाने के लिय स्वाथर्बुद्धि से काय वरना भी म्वरूपविष्ट ही है। इस प्रकार श्री भगवच्छेपता की स्वीकार करने से मेरे कल्याण का माग प्रशस्त गे गया है । यह निश्चित सिद्धान्त है कि- निश्चित परशेषत्वे शेष सम्परिपूयते । भनिश्चित पुनस्तस्मिन् प्रत्यत्सर्वमसत्तमम् ॥ अर्थात् यदि जीव निश्चय परले कि मै थी भगवान का दास हूँ यह निश्चय मुहट प्रतिलि हाने पर उत्तरकाल मपाय विशेषताय - (१३०) . भी प्राप्त की जा सकती हैं यदि जीव अपने को धोभगवान का दाम नही मानता हो तो उसमें विद्यमान कर्म ज्ञान भक्ति इत्यादि विशेपताये नहीं के बराबर है, उनसे कुछ भी लाभ नहीं हो सकता । जिस पतिव्रता स्त्री का मगलसूत्र अत्यावश्यक है, यदि मौभाग्यचिह्न मगलसूत्र रहे, अन्यान्य भूषण भले ही न रहे, तो भी वे भूषण उत्तर- काल में प्राप्त किये जा सकते हैं, यदि मौभाग्यचिह्न मगलसूत्र न रहे तो वह विधवा ही मानी जायगी, वह विधवा यदि विविध भूषणो को धारण करे तो उससे उसको निन्दा ही होगी, उसी प्रकार यदि जोव को भगवद्दासत्व निश्चय हो तो अन्यान्य कर्म ज्ञान भक्ति और वैराग्य इत्यादि विशेषतायें उत्तरकाल में प्राप्त की जा सकती हैं। यदि जीवात्मा मे भगवदासत्व निश्चय न हो तो उसमे विद्यमान कर्म ज्ञान भक्ति वैराग्य इत्यादि विशेषतामो से कुछ भी लाभ नहीं होता प्रत्युत साधुसमाज मे बदनामी ही होगी। इसलिये मर्वप्रथम जीवात्मा को अपने को श्री भगवान का स्वाभाविक दाम मान लेना चाहिये । इसलिये यहाँ पर श्री देशिक स्वामी जी कहते है कि है श्री रंगनाथ भगवन् । मै मोकारार्थ को पूर्णरूप से हृदयगम कर आपका दाम बन गया हूँ, दूसरो का दास न बनूगा । स्वातत्यादिमयी महतीमाद्यामविद्यास्थिति व्यपोह । हे श्री भगवन् । श्रीमदष्टाक्षर महामन्त्र में दूसरा पद जो "नम" शब्द है उसी के अर्थों को मैने सुष्टु प्रकार से हृदयगम कर समार के मूलभूत अज्ञानान्धकार को सर्वदा के लिये दूर कर दिया। स्वम्वरूप को यथार्थ रीति से न समझना तथा विपरीत समझना इत्यादि अज्ञान है । इम अजान के कारण ही जीव ससार मे फमा है । यह अजान दो प्रकार का है (१) अहकार (२) ममकार । अहकार दो प्रकार का है । (१) अपने को देह आदि के रूप में ममझना अर्थात् देह आदि को ही "मैं" ऐसा मान लेना और (२) अपने को म्वतन्त्र मानता। यह वस्तु मेरी है, ऐसा समझना ममकार है। इस प्रकार और ममकार के कारण ही जोव ने मसार को अपने ऊपर ले रवावा है, कभी उतारना नहीं चाहता ।
(१२) इनमें देहात्मनमरूपी महकार, मोंकार में मकाराय को हृदयगम करने से दूर हो गया, क्योकि मकार चौबीस प्रकार के प्रकृतितत्त्वों से विलक्षण जीवात्मा को बताता है इससे सिद्ध होता है कि जीवात्मा देह इत्यादि प्राकृत पक्ष्यों से परे है। में प्रकृति मौर प्राकृत पदार्थों से सर्वथा भिन्न हूँ ऐसा समझने से देहात्मभ्रमरूपी महकार नष्ट हो जाता है। स्वत यात्मभ्रमरूपी महकार तथा ममकार ये दोनों भ्रम 'मम शब्द के अथ को अच्छी तरह से समझने पर दूर हो जाते है। नम' शब्द का अर्थ इस प्रकार है । "नम" शब्द में 'न" म' ऐसे दो पद है । इन पदों का यह प्रय होता है कि मै मेरा निर्वाहक नही हूँ' अथवा "भुमको स्वत त्रता नही है"। इस प्रय का मनूस पान करने पर तत्रात्मभ्रम नष्ट हो जाता है। क्योकि श्री भगवान ही सर्वनिर्वाहक एव परमम्बत त्र हैं जीवात्मा उनका परतत्र है। "नम' शब्द का दूसरा पथ भी होता है वह यह है कि मेरा कुछ भी नहीं है। इससे ममकार नष्ट हो जाता है । सभी पदाथ श्री भगवान के है, श्री भगवान ही सब के स्वामी हैं उन्होंने कमपलस्वरूप जीवों को कुछ काल तक के लिये कुछ पदाथ दे रक्खे हैं जब चाहे तब उठा ले सकते है। ऐसी स्थिति में धरोहर के रूप में कुछ काल तक के लिये ईश्वर के द्वारा दिये गये पदार्थों में ममत्व भावना रखना मूर्खता नही तो और क्या है। इस प्रकार 'नम' श-के पथ को बारम्बार मनन करने पर महकार और ममकार इत्यादि समस्त अविधा भर्थात् प्रज्ञान नष्ट हो जाता है जो समार का मूल कारण बनकर प्रनादि काल से अनुवृत्त है जिसका नाश अब तक नहीं हो सका उस महती मविद्यामयी दुस्थिति को भी हे श्री रगनाय भगवन् । मैंने नम शन्दाथ के अनुसन्धान से नष्ट कर दिया। मैंने श्रीमगवदासता को स्वीकार किया तथा मशानाध कार को नष्ट किया। यह सब कुछ हुपा किंतु एक मनोरष शेष रह गया है प्रार्थना है उसे भी प्राप पूर्ण करदें। वह मनोरथ "नारापणाय' इस बन्द के पथ का अनुसन्धान करने से उदित हमा है। वह यह है कि- { १३६) हे इन्दिरेश नित्यासत्यविसीमभूम (ति) गुणधोएंवयोरेकान्ति- कात्यन्तिको सेवासपदमनायासतो मायाम् हे लक्ष्मीपते । मैं आप दोनो दिव्यदम्पतियो के सन्निधि में सेवा करना चाहता हूँ सेवा ही मेरे लिये संपत्ति है, कैडूर्य ही मेरा साम्राज्य है। मै अपनी सपत्ति को प्राप्त करना चाहता हूँ। आप दोनो के सन्निधि में कैडूर्य बडे सोभाग्य से मिलता है अाप दोनो मेरे लिये स्वभावत स्वामी हैं, आप दोनो स्वरूप रूप गुण विभूति धाम और लीला की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ हैं आपका स्वरूप नित्य निर्दोष सर्वकल्याणनिधि सकल विलक्षण एव अनन्त जानानन्दमय है आप का रूप सर्वभूपणभूपित तथा सौन्दर्य सौकुमार्य लावण्य और यौवन इत्यादि गुणो मे अलकृत है, आपके कल्याणगुण नित्य है, अगणित हैं तथा सीमारहित है, आपको लोलाविभूति यह प्रकृतिमण्डल तथा भोगविभूति परमपद ये दोनो हो नित्य हैं, अगणित पदार्थो से परिपूर्ण हैं, लीलाविभूति नीचे तथा भोगविभूति ऊपर सीमा से रहित है, आपकी लीलायें ६चित्र एव अनन्त हैं । ऐसी विशेपत्तानो से परिपूर्ण आप दोनो के दरवार में कौन कैडूर्य करना नहीं चाहेगा? मै हृदय ते सेवा करना चाहता हूँ। वह सेवा भी ऐमी होनी चाहिये ऐकान्तिक एव प्रात्य- न्तिक हो । भाव यह है कि आप दोनो की ही सेवा करनी पडे, दूसरे की सेवा करनी न पडे, सेवा के लिये ही सेवा करना चाहिये, दूसरे किसी फल को प्राप्त करने को इच्छा से सेवा न करना चाहिये । सेवा म्य फल वन जाना चाहिये । यह सेवा सदा होती रहे कभी उसका विच्छेद न हो । इस प्रकार सर्वदेश सर्वकाल एव सर्वावस्थानो मे उचित सर्वविध सेवा को स्वय प्रयोजन बुद्धि से करता रहूँ, यह सेवा अनायास प्राप्त हो तदर्थ हे भगवन, आप कृपा करें। श्रीमदष्टाक्षर महामन्त्र मे चतुर्थन्त नारायण शब्द का अर्थ यही तो है कि मैं नित्य अग- गिन पीर मोमार्गहत गुग्ण और विभूतियो से अलकृत श्रीमन्नारायण भगवान के लिये कवर्य करता हूँ। चतुर्थ्यन्त नारायण पद के अर्थ को हृदयगम कर मैं कैडूर्य करने के लिये मनोरथ कर रहा है विश्वाम है कि माप दयानिधि इस मनोरथ को भी पूर्ण कर देंगे ॥३० (१४०) (३१) प्राचार्यविङ्गधुप यसमधिगमे लन्धसव तदात्वे विश्लिष्टाविष्टपूर्वोत्तरदुरितभर यापितारन्धदेहम् । नीत स्वकिस्त्वया या निरवधिकदयोवनतबोषाविरुम स्वद्भोगकस्वभोग पितमनुचर स्वरकृते मा कुरुष्व ॥ पूर्व श्लोक मे श्री शिव स्वामी जी ने श्रीमदष्टाक्षर महामन के अर्थ के अनुसन्धान से उद्भूत अध्यवसायों को व्यक्त करते हुए थी रङ्गनाप भगवान से कसूर्य प्राप्त करने की प्रापना की थी। इस श्लोक में भी देशिक स्वामी जी श्री भगवान से प्रकारान्तर में फलप्राथना ही करते है। हे रणय भाषायां पसपियमे सम्पसलम है श्रीरगना भगवन् ! मै मनादिकाल से वायुवेग में फसे हुए पत्र की तरह कर्म प्रवाह में फंसकर संसार में नानाविध यातनाय भोगता रहा। आपने ही अनुकूल समम पाकर महैतुकी कृपा से मुझको भदाचाय मिलाया। प्राचार्य सम्बन्ध के बाद मेरे जीवन में भारी परि वर्तन हुआ । प्राचार्यसपदेश पाकर मुझ सुधरे हुए ने उनको कृपा से उस महामन हममत को प्राप्त किया जिसमें एकबार उच्चारण में जीव ससारसमुद्र को पार कर जाता है तथा जिसको एकवार श्री भगवान के सनिधि में भुनाने पर जोब कृतकृत्य हो जाता है भागे जीव का कुछ कर्तव्य शेष नहीं रहता । एषविधमहिमसपन्न व्यमान को सदाचार्य से प्राप्त कर मैंने उनकी प्रेरणा से पापक मनिधि मे शरणागति को तभी मैंने भत्ता पायो, समता मे प्रमालल्प पति विनमाय था, श्रीभगवरमाप्तिस्प महाफल को पाणरने का सर्वथा अधिकारी था । यमन मे शरणागति हो आने पर है उत्तम मे उत्तम मोक्षपद को प्राण करने के लिये सुयोम्म अधिकारी मिन हो गया है यह प्रापको क्या का फल है । ता विलियारियॉत्तरितभरम है भी भगवन मैने प्रयम का उच्चारण कर भाप सनिधि में । में - (१०१) व अापने अत्यन्त प्रसन्न होकर मेरे ऊपर अपार अनुग्रह किया । पने मेरे कर्मवन्धनों को तोड डाला। मैने अब तक जितने कर्म किये है वे दो प्रकार के है । उनमे कई पुण्य है जिनका फल म्वर्ग इत्यादि लोको में जाकर भोगना पडेगा। उनने कई पाप है जिनका फल नरक इत्यादि मे भोगना पडेगा। वे पुण्य भी भग- उत्प्राप्ति के प्रतिवन्धक होने में एक तरह से पाप ही है। जिम प्रातर मोने की जजीर तथा लोने की जजोर ये दोनो परस्पर मे अन्तर होने पर भी समान रूप से गति को प्रतिवन्धक होती है, अनाण्य दोनो तोडने योग्य है उमी प्रकार पुण्य और पाप में अन्तर होने पर भी दोनो ममान रूप से भगवत्प्राप्ति में वाधक बनते है। पाप नरक ग्रादि के भोग मे फमाकर भगवत्प्राप्ति को रोक दना है, पुण्य स्त्रग प्रादि के भोग मे फसाकर भगवत्प्राप्ति को रोक देता है, अतएव ये दोनो नष्ट करने योग्य है। अब तक किये गये मेरे पुण्य पाप दो श्रेणियो मे विभक्त है, उनमे कई प्रारब्ध कहलाते हैं जो इस जन्म में फल देने लगे हैं। कई सचित कहलाते है जो अब तक फल नही दे पाये है, किंतु पागे अवश्य फल देगे। उनमें जिनने मचित पुण्य पाप है, उन सबको अापने शरणागति मपन होते क्षण में ही नष्ट कर दिया, वे मुझको कभी फल नही भुगा मरते । प्रारब्ध कर्मों में जितने अश को मैने चाहा उतने अश को पापने रहने दिया और गेप मत्र को नष्ट कर दिया। भाव यह है कि शरणागति मपन्न होते ही पाप गरणागत को मोक्षपद मे पहुँचाने के लिये अदम्य त्वरा करने लगते है । शगणागत चाहता है कि जब नर यह भगेर रहे नब तक मै इम लीलाविभूनि में रहकर मिद्धान्त- प्रचार और अविताग्मेवा इत्यादि करता रहे, तदर्थ कुछ प्रारब्धाय नी बना रहे क्योकि विना प्रारब्ध के यह गरीर रह ही नहीं माना । गागत की इस प्रकार को इच्छा को देवकर आप दयानु उसने ही प्रारब्ध को रहने देते है जितने मे यह शरीर जीवित गा सकता है। प्रधान प्रारब्ध को पाप नष्ट कर देते हैं। इस प्रसार प्रापने मेरे गण मधिन और प्रारब्ध शेग को भी उमी (१४) समय नष्ट कर दिया जब शरणागति सपन हुई है। प्रापने पूर्वामित पुण्य पापों को नष्ट किया इतनी ही बात नहीं, किंतु पापने आगामी प्रामादिक पापों के विषय में यह व्यवस्था की कि वे भूल से होने वाले प्रामादिक पाप शरणागत को छुएँ नही । जव उनका स्पश हो नहीं होता तब फलभोग से हो सकता है। इस प्रकार प्रापने कई पुण्य पापों को नष्ट कर वश्या के स्पक्ष तक को रोक कर मुझ पर महान उपकार किया। इसने "यक्त होता है कि शरणागतो मे मापका कितना प्रम है। यापितारम्यहम् विश्वास है हे श्री भगवान् | आप प्रारब्ध के अनुसार इस शरीर का निर्वाह करावगे। प्रारब्ध के अनुसार मिलने वाले सुख दुख दोनों मुझे अभीष्ट है उनमे सुखानुभव से इदिया प्रसन्न होकर प्रापकी सेवा में लगेगी दुखानुभव से पिन्न होता हुमा मन ससार से विरत तथा श्री भगवत्प्राप्ति में उत्कण्ठित होगा । इस प्रकार दोनो मे लाभ ही है। इस प्रकार भोग भोगने के बार जब यह गरीर छूट जायेगा प्राथना है कि तब बाप कृपया यह यवस्था कर कि- त्वाकरस्पया वा नीतम् जब गरीर त्याग होते ही बाग इत्यादि दसा इन्द्रियों मन मे लीन होती है भनन्तर क्षण मे मन में एक स्मृति होती है उस अन्तिम स्मृति में प्राप स्वय पधारकर उस स्मृति को अपने विषय में चनाल। आपके विषय मे अन्तिम स्मृति होने के वाट दश इन्द्रियों से युक्त मन प्राण मे बह प्राण जीव में वह जीव पवभूतसूक्ष्मो म इन सब से समेत जीव आप अतर्यामी मे विधाति पाने के लिये मार मिल जाता है, उस समय पाप पूरण रियान्तिसुस दकर उसे अनुगृहीत पर । इस प्रकार मरने वाले सभी जीतो वो ग्राप मे विधान्ति लेनी पडती है। यहाँ तक की वस्था गव के लिए एक रूप है । मागे नाडियों के द्वारा निकलने मे पन्सर पड़ता है। जब कहता है कि उस समय आप पया मुमुक्षु सापकों के लिये सुपुम्ना नाडी के द्वार को प्रकाशित कर सुपुम्ना गाडी से मुमुक्षषो को ल जाते है । प्रार्थना है कि आप मुझे भी बसे (१) हो ले जायें । आप सुपुग्ना नाडी के द्वारा मुमुक्षयो को सूर्यकिरण पकड़ा कर पागे अचिरादिमार्ग मे "अचिस्" "ग्रहम्" "शुक्लपक्ष" "उत्तरायण" "सवस्मर" "वायु" "मूर्य" "चन्द्र" "वियुत्पुम्प अमानव" और उनके सहायक "वरुण" 'इन्द्र" एव "प्रजापति" ये देवता गौणरूप मे तथा प्राप प्रधान रूप से उन २ मीमानो में विलक्षण भोग भुगाते हुए मुझे ले जायें । ब्रह्माण्ड एव मप्न आवरणों का भेदन कर मुझे विरजा नदी मे नहलाकर ग्राप मेरी वामनायो को मिटा दे । विरजा नदी के उस पार अमानव के करम्पर्श ने मुझे शुद्ध बनाकर राजोपचार के माथ ग्राप मुझे परमपद ले जा यह प्रार्थना है। निरवधिकदयो तवोधादिरूपम् हे श्री भगवन् । प्रार्थना है कि आप परमपद में अपने दिव्यसन्निधि में मुझे लेजाकर अपनी अपार कृपा से मेरे उम स्वरूप को विकसित करद जो ससार में निरो- हित था जिसका विकास होने पर जीव एक तरह से श्री भगवान का सम बन जाता है । जैसे परमात्मा मे अपहतपाप्मत्व इत्यादि आठ गुण है, वैसे ही जीवात्मा में भी वे अाठ गुण हैं किंतु वे समार- दशा मे तिरोहित रहते हैं, मोक्ष में ही प्राविर्भूत होते हैं । है श्री भगवन् । मेरे छिपे हुए स्प को प्राप विकमित करदे, ममार मे मेरा ज्ञान अत्यन्त सकुचित रहता है, उम ज्ञान को आप रोमा विकसित करदें कि वह विभु बनकर मर्व पदार्यो का मदा माक्षा- त्कार करता रहे, मसार में कर्मफलम्वरूप ज्ञान कई पदार्यों को प्रतिकूल ग्रहण कर दुखस्प बन जाता है, पाप मोक्षदगा में कर्म न रहने के कारण मेरे ज्ञान को ऐमा विकमित करदे कि वह सभी पदार्थों को अनुकूल रूप में ग्रहण करता हुया मदा ग्रानन्द रूप बन जाय । हे श्री भगवन् | मोक्षदया मे ग्राप मेरे भकल्प को रोमा प्रबल बना दे जिसमे मकल्प करते ही मनोरय मिद्ध हो जाये । इस प्रकार आप मेरे स्वरूप को विकमित कर मुझे मायुज्यपद पर बैठा दे। यह कार्य प्रापको अपार दया से ही मपन्न ट्रो माता है।
(१५) स्वद्रोगकस्वभोगम् हे श्री भगवन् । मै यह चाहता हूँ कि मोक्षपद मे पहुंचने पर चेतन होने के कारण मुझे प्रानन्दानुभव प्राप्त होगा, उसका भान मुझको होता रहेगा यह मानन्द मुझे स्वतत्र रूप से न मिले । आपके पान ६ में ही मुझे आनन्द मिले, पापको आनन्दित करते रहने मे हो मुझे आन द मिरो। आपको मानदित करके आपके हप को देखकर हर्पित होना ही मुझे अभीष्ट है। इस प्रकार में त्वत्सुखसुखी बन जाऊँ अर्थात् अापके सुख म ही अपना सुख मानने वाला बन जाऊ, स्वाथ बुद्धि से स्वतत्र रूप से कुछ भी सुख मुझे भागना न पड । एमो पाप पवस्था करके मेरे स्वम्प की रक्षा कर। दपितमनुधर त्वरकृते मां कुरुष्य प्राप मुझे परम प्रिय सेवन बनाइये पाप जहां वहाँ जाय जिस जिस लोक मे जाय वहाँ सवत्र आपके साथ जाकर मै मापकी सेवा करू, पाप प्रागे भागे चले मे नास पीछे पीछे चलता हुमा सवविध सेवा कहप्रार्थना है वि ऐसा पाप मुझे अपने लिये बना लीजियेगा। मैं आपके लिये ही मब कुछ करना चाहता हूँ अपने लिये कुछ भी नही । मै विशुद्ध परापर्फनिष्ठ बनना आहता हूँ स्वार्थक्य को फटी नजर से भी देखना नही नाहता । यही मेरी अन्तिम प्रार्थना है । प्राचार्यसम्बन्ध से लेर इतना सब कुछ परने वाले पाप इस पतिम निर्दुष्ट मनोरथ को पूर्ण करणे ऐमा मुद्दष्ट विश्वास ॥३१॥ (३२) विधान रङ्ग शावधिगतवती बेङ्कटकवे स्फुरद्वर्ण वक्त्रे परिकलयतो "यासतिलकम् । इहामुत्राप्येष प्रगतजनचितापिगिरि स्वपयरे सेवा निशति फरिणपयरसिक ॥ पति बीरविताकिसिहस्य सर्वतावस्वतन्त्रस्य श्रीमा झुटमापस्य वेगातायापस्य प्रतिषु पासतिला सधणम् ।
. (१६) श्री देशिक स्वामी जी पूर्व श्लोक में फल प्रार्थना का वर्णन कर इस श्लोक मे इस न्यासतिलक गन्थ का अनुसन्धान करने वाले महानुभावो को मिलने वाले महाफल को दृष्टान्तपूर्वक वर्णन करते हुए इस ग्रन्थ का उपमहार करते यहाँ विवक्षित दृष्टान्त यह है कि लोक मे रङ्गमञ्च में आकर नाटक खेलनेवालो के स्वामी जो सूत्रधार है वे दूसरो को वम मे लाने में काम आने वाले नानाविध तिलको को बनाने की विधि जानते हैं। किस मूलिका से कौन तिलक बनाये जाते है, उसको बनाने में कौन कौन द्रव्य किस मात्रा मे लिये जाते है, किस तिलक का धारण करने पर कोन वश होता है, किम तिलक को बनाने की विधि कौन सी है । इत्यादि बातो को वे अच्छी तरह से जानते है । रङ्गमञ्च के सूत्रधार में उस विधि को जानकर यदि बैसा तिलक बनाकर मुख पर धारण करे, अथवा उनसे उम तिलकद्रव्य को लेकर दूसरे कोई अपने ललाट में धारण करे । उन सब को महाराज तक के महापुरुप वश हो जाते हैं और वे उन मत्र महाराज इत्यादि महापुरुषो के अन्तरङ्ग मे जीवन यापन करने है । यह दृष्टान्त इस लोक मे अभिप्रेत है। रङ्ग शाद्विधानमधिगतवतो वेङ्कटकवे. श्री देगिक स्वामी जी कहते है कि मै वेङ्कटनाथ नामक कवि हूँ । जिस प्रकार कोई विद्वान रङ्गमञ्च के स्वामी सूत्रधार से दूसरो के वश में करने के लिये तिलक बनाने की विधि सोख लेते है, वैसे ही मुझ वेङ्कटनाथ कवि ने भी जगत्स्वधार थी रङ्गनाथ भगवान से इस न्यासतिलक को बनाने की विधि को सीख लिया था। यह ग्रन्थ न्यासतिलक इसलिये कहा जाता है कि यह ग्रन्थ न्यासविद्या अर्थात् गरणागति का प्रति- पादक है, तथा उप तिलक के ममान महापुस्प श्री भगवान को भी वश मे लाने वाला है। यह ग्रन्थ शरणागतिप्रतिपादक ग्रन्थो में तिलक के समान है इसलिये न्यामतिलक कहलाता है । अस्तु । बेझूटकवे वक्त्रे स्फुरद्वर्ण ग्यासतिलकं वक्त्रे परिकलयताम् जिम प्रकार तिलक बनाने की विधि को मील कर विद्वान उस सेवक वनकर मुग्ध तिलक को अपने मुख पर अर्थात् ललाट में धारण करते है ललाट में धारण करने पर उस सिलक का वण अर्थात् रग चमकता रहता है उसी प्रकार मै भी श्रीरङ्गनाथ से इस न्यासतिलक बनाने की विधि को सीखकर उस न्यासतिलक को मुख में धारण करता हूँ अर्थात् इस न्यासतिलक ग्रन्थ को मुख से उच्चारण करता हूँ उस समय इस न्यासतिला अन्य का प्रत्येक वर्ष अर्थात् अक्षर प्रस्फुरित होता रहता हैं । भाव यह है कि इस यासतिलक ग्रन्थ का निर्माण करने वाल वास्तव मे श्री रगनाथ भगवान है, उनके सकल्प से ही यह प्रय मेरे मुख को सुशोभित करता हुआ मेरे मुख से निकल रहा है । जिस प्रकार उस विद्वान से तिलकद्रव्य को लेकर अयान्य लोग भी ललाट मे धारण कर सकते है उसी प्रकार बो महानुभाव मुझ से इस यासतिलक ग्रथ को सीखकर अपने मुख म धारण करते हैं अर्थात् इस न्यासतिलक पप को थी रगनाथ भगवान के सन्निधि मे सुनाते है उनको जो महाफल मिलता है उसका वणन पिया जाता है। प्रएसजनचिन्तामणिगिरि फरिणपयरसिक एष इहामुत्रापि स्वपय सेवां विशति जिस प्रकार उस तिलक को ललाट में धारण करने वालों के राजा महाराज इत्यादि महापुरुष वश हो जाते है तथा उन्हे अन्त पुरपरिजनपद पर रख कर अपनी अन्तरग सेवा करने की आज्ञा देते है वे अन्तरग सेवा कर वभवसमृद्ध जाते है उसी प्रकार इस यासतिलक अय को मुख में धारण करने वालों के श्री रगनाथ भगवान वा हो जाते है । श्री रगनाथ भगवान भरणागतों के सर्वविध मनोरथो को पूर्ण करने वाले है । जिस प्रकार चिन्तामणि अपने प्राधितो के मनोरथ को पूर्ण करता है उसी पवार शरणागतो के मनोरथों को पूर्ण करने वाले श्री रंगनाप भगवान चिन्तामणि पक्त के समान है। श्री रगनाथ पो प्रादिशेष स्पी पय पर विराजमान रहने मे अपार प्रान ६ मिलता है। पर्यद विद्या मे यह कहा गया है कि श्री वैकुण्ठनाथ भगवान आदि शेषरूपी पर्या पर विराजमान रहते है। वे वैकुण्नाप भगवा (१४७) हम ही है, इस बात को सब को जताने के लिये श्री रगनाथ भगवान भी आदिशेपरूपी पर्या पर विराजमान रहते हैं। श्री भगवान् यमन्त्र के द्वारा शरण मे आनेवालो को श्रीमहालक्ष्मी जी का ममर्थन प्राप्त होने के कारण अन्त पुरपरिजन मानते है। इस प्रकार श्री रगनाथ भगवान शरणागतो को भन्त पुरपरिजनपद पर अभि- पिक्क कर भूलोक मे रहते समय उन शरणागतो को श्री गधाम मे अपने पर्यङ्कममोप उपस्थित होकर अन्तरग मेवा करने का सौभाग्य प्रदान करते है। शरीर छूटते हो उन शरणागतो को श्री वैकुण्ठधाम में लेजाकर श्री वैकुण्ठनाथ के रूप में विराजने वाले अपने सन्निधि में पर्यड के समीप मे आकर सेवा करने का सौभाग्य प्रदान करते हैं । इस न्यासतिलक ग्रन्थ का अनुसधान करने वालो को यह महाफल प्राप्त होता है । इस प्रकार फल का वर्णन कर श्रो देशिक स्वामी जी इम ग्रन्थ को पूर्ण करते हैं ॥३२॥ इस प्रकार कवितार्किकसिंह सर्वतन्त्रतन्त्रस्वतन्त्र वेकटनाथ वेदान्ताचार्य के ग्रन्थो मे न्यासतिलक सपूर्ण हुआ । कविताकिकसिंहाय कल्याणगुणशालिने । श्रीमते वेङ्कटेगाय वेदान्तगुरवे नम ॥ धीमते निगमान्तमहादेशिकाय नम ।