Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Shraman Sanskriti Manaveer Jayanti Bhag 3
Front matter
प्रकाश- श्री महावीर जयति उत्सर समिति ७३, म तु क्लाथ मारेंट, इदौर मम्पाद- श्री नेमीचन्द जैन श्री स्वरूपकुमार गांगेय प्रबध सम्पादक- श्री मिश्रीलाल सोनी गति-क्रम 'दर्शन, ज्ञान, चरित्र-त्रिवेणी नविध-सत्य सगम गवान महावीर- "गवान महावीर और उनके उत्तराधिकारी श्री 'तामय' धुश्वारिया महात्मा भगवानदीन १ श्री कन्हैयालाल मिन 'प्रभार वर्द्धमान ने कहा है - २४ ४५ , ४१ . महावीर और उनका सदेश धी यशपादन 'नमोस्तु ते दह सुखाति निस्पृही श्री अनूप शर्मा १६ यह केन्द्र, यह परिधि, यह वृत्त! श्री शिवरचन्द जैन स्वर्ण द्वीप श्री हरिकृष्ण प्रेमी २१ श्रात्मा का फाया से वियोग, मोक्ष है श्री 'मित्र' । गौतम ने , भारतीय दर्शन की परम्परा श्री रामचन्दश्रीवास्तव चन्द्र २७ १२ श्राज का विश्व महावीर के पथ पर मुनि श्री मुशीलकुमारी ३३ १३ भाई निजहित कारज करना (कविता) श्री दौलतराम १५ निज समषित सारस होता। श्री भागवत १५ मनुष्य जी रहा है-मनुष्यता मर श्री नेमाचार जैन १६ नागरियोचित सस्कृति १७ मसीहा ने कहा १८ "मैं जैन हूँ" थी भानुकमार जैन १६ सत विनोवा ने कहा २० नागवल्लरी (कहानी) धौ स्वरूपकुमार गागेय ०१ महावीर का परिग्रहवाद बनाम मार्क्स का साम्यवाद श्री तन्मय बुखारिया ६२ २२ संस्कृति बनाम रोटी श्री दिनेश कुमुमार २३ रुढिवाद का श्रामह छोहिये पलाइनो प्रमाद ठी ०५ अजीव सवाल (कहानी) श्री चन्द्रशेखर दुबे २५ ओ विहार, शुभ वसुधरे अतिवीर प्रमू-वर श्री हरिपवाद हरि' २६ सम्पादकीय ४८ ४६ १२ ७४
।
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,
न लवेज्ज पुट्ठो सारज,
न निरठ्ठ न मम्मयम् । ।
अप्पणट्ठा परट्ठा वा,
उभयस्सन्तरेण वा॥
अपने लिए, दूसरों के लिए और दोनों
म स किसी के लिए भी प्रछने पर पापयुन,
निरथा तथा मर्मानक वचन न रह |
दिठ्ठ मियं असदिद्ध,
पडिपुरण विय जियम् ।
अयपिरमणुविग्ग,
भास निसिर अत्तवम् ।।
आत्मार्थी को इष्ट, परिमित, असदिग्ध,
परिपूण, स्पष्ट, अनुभूत, वाचालता रहित
तथा किसी को भी उद्विग्न न करने वाला
याणी बोलनी चाहिये।
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भास्कृति
थप ३
चैत्रशुमा त्रयोदशी वी नि सं २४७E
वर्ष ३
'दर्शन, ज्ञान, चरित्र'-त्रिवेणी,
त्रिविध-सत्य-संगम।
'समय' पुग्वारिया
धग के नीचे है पाताल, गगन पर बसा हुआ है स्वर्ग,
बीच में अधर मनुज का अहम्,
न जिसका श्रादि, न जिसका श्रत, चिरतन गमन आगमन-क्रम,
इसी को पइते जीवन
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१
पाप फा इधर, पुण्य का उधर
जिदगी दो फूलों के बीच ,
सिधु-सी दूर मुस्करा रही
निगल जाने को पाकुल मीच,
ठहरते यने, न चलना इष्ट, पथिक के सम्मुख दिग-दिग भ्रम
धरा के नीचे है पाताल, गगन पर घमा हुआ है स्वग ,
बीच में अधर मनुज का अहम् ।
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. फूल है पर शूलों से विद्ध, सुरभि, पर अवरोधों से युक्त , तृप्ति है, किन्तु सुपा के साथ , प्राप्ति, पर दोनों कर उमुक्त, विरह की श्वासें भरता हुआ जी रहा परिचय मिलन स मम। धरा के नीचे है पाताल, गगन पर बसा हुआ है संग, यीच मे श्रधर मनुज का अहम् । ३ . कि आखिर क्यों किसलिए विमूढ चेतना या यह अस्थि-समूह, कि जिसके भीतर भरे थनंत ज्ञान के अनगिन चक्रव्यूह ? दे चुका जो 'चौनीसों' पार धुनौती ईश्वर पो सम्म । धरा के नीचे है पाताल, गगन पर वसा हुआ है स्वर्ग, घीय में अपर मनुज फा अहम् । तत्त्व का भूला जीवन अर्थ, अनर्थों में उलझा विश्वास तभी तो उर्ध्वमुखी चितना , कि तु प्रतिपल नीचे ही हास । मूल प्रति को विवश किये जग-जड़ता का 'गुरुडम'" धरा के नीचे है पाताल, गगन पर बसा हुआ है स्वर्ग, धीच में अधर मनुज पा अहम् । अरे ओ सपनों के प्राणियों में सर्वोच्च विधान मुक्ति-वधन-दोनों कि तू अपने को तो पहचान चरिय' त्रिवेणी, त्रिविध सरय-सम धरा के नीचे है पाताल, रागन पर बसा हुआ है स्वग घीच में अधर मनुज का अहम् । न जिसका श्रादिन जिस श्रत, चिर तन गमन श्रागमन क्रम' इसी फो कहते जीवन हम श्रात्म की ५ सम्राट ॥ सकल्प . 'दर्शन, ज्ञान, - भगवान महावीर महात्मा भगवानदीन मंधागी चिन्ता, तत्वदर्शी विद्वान, लोरप्रिय विचारस भरा नगानो म मरे घर और भरे-पूरे भडार को छोड़कर चल दन वाले यथानाम तथा गुग बद्धमान वे बचपन के बारे में तो लिगा मिलता है, वह सुनने म बढ़ार लिया गया ना जान पहना है, पर अमल म उनक भीतर जलनी माला सामो यह बढ़ाकर लिवा भी कम लिगा रह जाता है। राजपाट छोड़कर चल दने की जव कोइ वानरी वजह मिलती ही नहा तर यह मानना हा पड़ता है कि वह पैदायशी नायर थे। नायर जोशीले नहीं हुगा करते, गभीर होते हैं। जोश म घर छोड़ा ना माना है, रानपाट भी, पर सदा के लिये नहीं। सदा के लिये यह छोड़े जाने हैं किसी सिद्धान्त रे मातिर । सिद्धात यों ही नहीं बन पाया करता उसका विकास होता है। वह निदगी का हिस्सा बन जाया करता है। तभी तो किसा कवि ने उनका पद पिछली जिदगियों की तस्वीर सबर मामन रस दी है । इम उन तस्वारों ने पैमल ने भमर मे न पहबर यह असनी वात समझ लेगी है शि सिद्धान एक नहीं, दि जीवन ता साथ रहार पूरा हुआ करता है। हाँ, तो महावीर स्वामी का घर छोडाएर सिद्धान्न की यात था। पच्चीस बरस मागो में को दिसत तो नहीं होनी चाहिय, पर सोलह । होन से पच्चीम तक कम से कम परे सौ वरस याना एस मा के गर्भ गभालने से बारह गुना ज्यादा, ता हमारे शायर सानिदगी में सिद्धान के गर्भ भार को जहर मभान रर | साधारण गर्भ को मभालने में एक मा से नितना मतक रहना पड़ता है, उसम 1 गुना रातर्क रहना पड़ता है मिद्धान्त र मर्म को समालने में। इन मार ने नौ वरम ५ कुश्निया जानने, हाथी पछाडी से काररामि ग्राम यादमियों के कानों को भले ही भले लगें, पर उन नोजियों और धम के प्यासा को तनिक भी चिकर ही हो साते, तो महावीर वायर मुल्य और दुनिया का उछ मना कर जाना चाहते हैं। पद नो यह मानना नाहग मि इन नौ चरसों म उही अपन कुटुम्चियों, रिश्तेदारा, नौकर चारों, पट्टोमा राज्यों को अपो मिद्धात समझाने और आके गले उतारो म क्या क्या कोशिशें य? स्तिनी मपनना मिली १ स्तिनी कठिाणे श्राद? मिस किरा मदद किम किगोमावट सनी की ? घर छोड़ना क्यों जरुरी हुया ? इत्यादि । रामकुमार सिद्वार का मुशील मुदरी, विदुपा और सरो सगिनी यशोधरा और प्यारे मनमोहन अ ध पालन गहुल को ग्राधी रात सोने छोड़कर चल देश हम यह मानने के लिये मनपूर करता है कि रानकुमार पदमा महावीर स्वामी के रास्ते में ही बड़ी मुसीबतें श्राइ हागी। मालूम सिक्नि कठिनाइयों में ये अपन माता पिता, राना राना रो घर छोड़ चा दने पर राजी कर सर होंग ? मिद्धार्थ या गम्ता तो वर्द्धमान साफ कर गय थे, पर वईमान का रास्ता नो भाइ झारों से भरा था। उन्होंने उसे विस यन ने मार पिया १ और पैसे ? हो गाना है कि सिद्धार्थ प्राँगुया का मुकाबला करन म निमल रहे हो और फिर वह दिवस्त मुर नान भी चुरे हा, पर वर्डमा नो नो । मुसायला परना ही पड़ा। उन्होंने किस तरह मा पर काबू पाया और दिसस्तों को क्यों पर जीता ? यही तो बाते हैं, जो जाननी हैं। लिगी हो न मी मिल, उस अवस्था म प्रवेश कर जरूर पानी ना रास्ता हैं। घर के बाद नगल म बीठिन तपस्या को उारे मन भने ही अनु पम और शायद अनुकरणीय भी समझे, पर म तो सोलह मे पच्चीग नक की तपस्या को ही महत्व देता रहूँगा। जाम की वही चीन है। वाना में नान यही कुँगो । महावीर वही पैदा कर गाती है । उठती नानी यी गदा की याद मन बहकर अपनी राह ही चलना, पान न डगमगाो देना, साना घटा घूमा, पर पीच न हटा तपस्या नहो तो श्रीर क्या है ? राय लक्ष्मी व नया वाणों से भिदो छाती लिय अम्चिना छोरी ५ पाणिग्रहय थे लिये धीरता के सार धागे श्राग ही वन्ने जाना, मुहार मान देगना तपस्या नहा तो क्या है ? माता पिता के टट्टे मोटे स्नेह-जल म रात दिन हम रहे, प्याम लगन पर भी होट तक तर न करता तपम्ना नहीं तो क्या है ? विमार शन्यता ने नायुमाल से वीतगगता की साग याच गर छाती पुला युपनिया का प्रेम राग पाश में बांधो की पृग छुट वा पर साम , पाश ढीला कर साफ वाहर श्राजाना तपस्या नहीं तो क्या ह । म गौर मुग मे नो गी प्रहुन अभूतपूर और मूर तपस्या का हाल जाना न लिये गिर से पान ता कान पोरे है। वह तपस्या तपस्या यो, मुश्किल थी। ऐमी ही पापि वपन पहा कर पाना म गोता मारो और विता पड़े भिगोये चार सानो।
हाँ, तो हमारे पैदायशी गाया रानमार रद्ध मान मिगे भीगते हो क्या खते हैं, सैरह साधु अपने चारों ओर पाच पाच श्रग की ढेरा लगा, “यान में लगे पम्या कर रह हैं। गौचने लगे, यड नप किम शानि लिये ? धुमार पाना दमा गर्मी में यह कम्बल श्रोद लेना है, पसाना लार बुखार उतारने के लिय, ड़े पर लोग गम गम पुल्टिमें वाधन हैं पा र मलार निकाल फोन लिये और यह किम रोग की शाति र निये प्राग नपार पसाना यहा रह है। उत्तर न मलने पर हृदय टटोला । वह याप ही तपस्या करता मिला। एक ओर उस जल रही है हिमा की याग, धू धू करना सारी दुनिया जला अन्नने के लिय साता निव्हा लपलपाती बढनी हा चला जाता है। जमीसे लगी हु यह दूगरी देगे। यह झूठ का गरम भूभल है। वह लोगों श्रात्मानों का भून डालने पर तुला है। तीसरा तरा से चोरी की लपटें मिल निक्ल कर यापार, राज्य, यहा तर 7 पुरोहितों तक को अपना लपट म लन को कोशिश कर रहा है। परिग्रह का अाग का चौथा देगा अपने दगा पनोपा हा है। पर दम ने जलानी, एक को सरमाता और फिर वैस दस सरसार हुओं को भस्म करती और गीए को मराती मा काम म लगी हुई है। भारी मीठा मुलगा पागका पाचन अब्रह्म नाम रारा भातर ही भातर नाता चली जाती है। ग्लनी धीर धार है, पर मुस्तैदोन साथ "नाग ही बदनी ना रहा है। यह सब दगार राजकुमार मुसराय, हृदय को पाशीराद दिया और गोल-"वत्म, तरा तपश्या सफल होगा।' और सोचा लग -आहो, अगिा व लिय भापा म एक श द भा नही! हिसा पर लोग इतने मुग्ध ! काड़े मोने की तान सर, पशु स लेकर प्रादमा तक किमी का मा छूट हां 1 बरा स बचने, व्यापार TT श्रार घर-गहमी चलान से कार्मा म होने वाला जमरा पुराइ 7 रूप म हा हिमा काम ही पानी । वह तो धान द नदान और कल्याण (धम) फैलान 4 काम मा कर रहा है। फिर हिसा लिये श द गदने कान तरूरत है न पुरसन । अब? श्रन, अब गगा एक हथियार-नया, चतुत ते।। हिसा से हिसा न मरंगी । वह हधियार हो नही, वर्दी हो सकता है। और सत्य ! हा ! सत्य और निमल जल को, रूदि के यहा गर्दै कपड़े धो- (४) धोत्र शाला के पानी स भी ज्यादा गदला बना दिया है ! गत्य पा श्रादा है सही, पर उप श्रागा पर बैठा भूठ हाता पूना पा रहा है । यो यह आपा हा नही चाहता कि वह क्मिरी पूना कर रहा है सियर ग्गा है शायें द और मदिरा किरदी है बुद्धि मद । अहिगा मर जी, रत्य मिगर रहा है। इसा की वर्दी पहा कर ही मत्य म जान डाला ना गाती है सत्व 'अमर है, यह भरन रा TET | टरन मा क्या नाम सत्य यात्म घम ५ सिपाही गावच ग्गा । तरच चलिये इससे मजदून चीन और हो भी यया मक्ता है। चाय । यह और लो। हमर लिये मी शद नदारद । बस फिर क्या है, मारो हाय ! ठूस-ठूस कर पेट भरा क लिय चोरा-चोग महा, पर "ज (टोफ) “यापार म म दशा ज्यादा लना पोरी चोरी मही, पर धर्म विस्त नहीं। टूमर दश को वाट बल व बून या चालाको स दवा बैठा चोरी, पर गधम दगाो धर्म रहता ! चोरासी र इतनी पहुँच तब अगर र लिय श द न होना टाक ही है 1 परवाह नहीं अचीय गो ढाल बनाइ नायगा। अपरिग्रह । हमको तो कोई जानता ही नहीं । काइ मुनना मा ही चाहता । कोई मुनना है तो झट पोल उरना है, "यह कोई शादी ह | "" जाडार गढ़ लिया है । परिग्रह धम है अरे हम है परिमकी, या धमामा । रमह करना धम है । स्गहरत धान्य नाम वाला है धनाता धम मा होता है। धमात्मा ही TET, धर्मा मानों की जान बचाता है । समह 7 गा पाप है। मह 7 वरने घाला गरीन या निधन कहलाता है । निधन होना यानी मसा । निधन मारो मौन । टोक भाग, टो) समभा । अपरिग्रह सड़या दवा है । महा गले 7 उतरगा । पर मिपाही को तो इसका चूट पीता ही होगा । परिग्रह पड़ा है, सिपाही को श्राग बदा ही न दगी। इस साटमा सिपाही को शाल बनाइ जाय । सिपाही रेटीना, करीना राह पर बखटर चल सरगा। परिग्रह बड़ी नाल बनार अपरिग्रह न गइ थौर काम मचान होगइ । ब्रह्मचय । अडिगा न मम पर यह रोजा रहा है। यह टीक है मित्रा अमर ह और सत्य का तरह हा अमर है, पर इमर जीन की अहिगा ही मर सकती। हिमाय मरने पर इसका ताता रहना भद स वाला नहीं । ब्रह्मचय की मज टटोली त्राय । यह नो ग्रागिरी मासे ले रहा है । वत्यागामी राना ही नहीं, कोह भा यादमी ब्रह्मचारी ही माना जाता है । वेश्या पर नारी रहा है । गुच, स्व-स्त्रा फा बहुपचा याररण सिद्ध हो नहा, पम सिद्ध भी है। अब १
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५)
भगवान पाश्यनाथ के समय य सिपाहिया को शायद इसकी जरूरत न रही
हो, पर श्रान तो यह श्रारमपम 7 हरएक सिपाही से अपनाया जायगा।स्व स्त्रिया नहीं,
स्न स्त्री भा नहा मांगा र मातर सत्रा ही ब्रह्मचय का श्रथ रहता थाया है और
रहेगा । पाय-याम हालनों म इसस श्रागे बढ़ने का छुट रहेगा और वह जरूरा मी
है। श्रामथम य सिपाहियों का इसमा खोदर बाया जाय । हृदय व उत्तम उद्गारी
की रक्षा सय र और निमल विचारों की रक्षा ब्रह्मचय के मिपुर्द ।
एगी वर्दी पहा माम मदिरा और अविवेक पूरा मैथुन गा कौन सेवा
करेगा ? ग्या यह मापर चला जाये' हागिन नहीं। सिपाहियों के लिय 7 मही,
पौरों य लिय इसका जरूरत है। टार, अच्छा तो यही थाट । यात्मधर्म र
सिपाहियों की पहचान ।
(')"हिमा (२) सत्य, (३) अस्तेय, (४) अन्यरिम, (५) ब्राचय
(६) मानल्याग, (७) मदिरा-त्याग, (८) अ विवेक-पूण मैथुन त्याग ।
इम सिपाही य हथियार?
हथियार य है--
(१) श्रात्मा है और है।
(.) वह और वे अनर श्रमर, प्रनादि, अन त ह और है।
(३) प्रात्मा पुरुषाथ से परमात्मा हो सस्ता है।
पौर भडा
भडा रहेगा-
सामान, शन, चारि य ।
श्रार धनी (नारा)
सारा है-
माग मानर एक जाति
परम धर्म प्रेम।
४ युद्ध म पहनन या लोहे का टोर।
भगवान महावीर और उनके उत्तराधिकारी पन्द्रयालाल मित्र प्रभार [हि दाम नइ निर ध शैली रे प्रश्ना पकार माहित्यवेत्ता) पुष्पा र उत्तराधिकारी होते है उनके पुत्र-पौत्र या दत्ता ओर महापुम्पों व उत्तराधिकारी होते है ना अनयाया । पुरुष अपने उत्तराधिकार म छोड़ नाल . पर, नाग पीर धा और महापुरुप छोड जाने हैं विश्वास निमाण केयरने पूरे पर सर और अग्न विचारों से याती। पुरषा व उत्तराधिकार का परम्परा तो सृष्टि क श्रारम्भ से अभी तर या काकी त्यों बना पा रहा है-पर महापुरुषों के उत्तराधिकार की परम्परा यह आश्चय नना है कि सृधि के प्रारम्भ से ही गिड़ी हु है। उनर उत्तरा धिकारी ये अनधिकारा घोषित होने रहो उनके नगे माला को पूण भरोम तो असफल होने हैं, उनके निमार्ग को सनो भर रसने म मी श्रपान ही सिद्ध होते हैं उनराश पाता की मरम या कसोटी यह है कि वे यह भूल जात है कि मापु परे विचारा को सनो भर रखने का श्रथ होता हतार हाथों से उt विश्न म फैलाया। चे करते हैं यदि ग्न विचारों से कागना पर लिप कर अचे स्थानों म रख देते हैं। इस तरह उस निवारा या प्रचार तोर जाता है पर उन कागजों का पूजा होने लगता है । य लोग 37 महापुम्पों पर भी अपा। 'हालमा लगा दने हैं । इस तरह य महापुरुप विश्व रो प्यानी अात्मा रेरा रह कर उन उत्तराधिकारियों का सम्पत्ति मी हो जाते हैं और यह उत्तराधिकारी एक चग का रूप धारण कर महापुम्पा गम और विचारां पर वैमा हो कता घर लेने है जैसा मारग 17 न अमन पिता पर पिया था । मगर म धर्मों के निमाण का यही इतिगम है यार सामगम्पों के उत्तराधिकार का स्वरूप है। इस सरूर का एक प्रार रूप है, जो सम्भवत विश्व की सबसे दुवात घटा है कुछ लोग हैं जो इमान्दारा य माय महापुरुष के अधूरे सक्ल्यों को पूरा करने म रात दिन अपनी प्राणाहुति दते रहते हैं और अपने पून का पाग भगवान् के छोने घागहरुमा पितो के एक श्रादि उद्गम का नाम महावीमय व्योर मन (५) ग्वेलते रहते हैं पर उत्तराधिकारियों का वर्ग नपने में शुमार नहीं कर यापुर्वक इस अपा मे दूर ररता है । क्याकि ये 37 पुस्तकों की पूजा करने में विश्वास नहीं रापने और मापुम्पा पर हालमा (तरकारी र) लगाने का विरोधारते हैं। विश्वकारि श्री रवीन्द्रनाथ टाकुर पी एस कहानी हरिया में बड़ा मर्मस्पर्शी प्रकाश डालती है । एर धापर के बड़ी र के याद पुत्र उत्साहुया । वह एक दिन पालो म सो रहा शानिएक गिल भीष मागने वहाँ श्राद । भिवारिता गोद म भी उतना ही पहा पु- यही कोई १० ११ दिन का 7 मा । भिगारिशोएर सूझ हुए और न मी से अपना पुर पालन म मुना दिया और सेठ के पुन को प्राचन में हम चली गई। दोनों बड़े गुए। घाबर का पुत्र भीप मागा करत', चिनिः पटा धनकुर की गहा पर बैठता । धनकुवर मर गया और वहा भाव हुया । हम अक्षाभोज म धनकुनेर सा सच्चा उत्तराधिकारी, पर नमन का यह बेटा भी घुम पाया । वह प्राय तो न था! पनवर र भिवारन के पारतविर पुन ने उसे दमा और धरिया पर, मार निकारा दिया | धनकुवर मा गच्या पुन धाएर वे हा द्वार पर दिया गया, उन हाथा, नो नान इसी द्वार पर मास मागो, HिATT इत्तरे साो पात्र थे। हम हम राजी मम का पल भर लिनुन कर सके तो राह उठें। मवीर भगवान भी विश्व सहामुस्थ थे । प्रश्न है ना उत्तरा धिारा मौन है ? लाग्गों कण्ठ कनेको नैयार है कि ! ३३ मिनो पास महावीर सरी मूर्तिया है, पुस्त। हे श्रार हान 'अनारक निगा, पर मरे प्रश की दिशा दूगरी है। म पृङना हूँ मारन म तरिम उत्तराधिकारी सीन हैं? प्रश्न का पूरा एप अोर प्रश हे भगवा छोड़ गये, निमो उत्तराधिकारी का यह पोत है ? इस गोज दो पति हैं। पहले प्रकार मिलेगा।
() भद हो, प्राणिमात्र का जीवन का समान अधिकार हो, सारी भिक्षा य रूपम नहीं अधिकार के रूप में मान ग्रहण कर, हम निये भी और जो भा दे, हम स्वन उता स सोचे और दूसरों को भी सोचने दें, यह मायना का विधान है, पर कुछ लोगों ने मा, धन और अधिकार को बपीता बना लिया, गारी को पद दलिन पर प्रतिष्ठित बदी का रूप दे दिया, पशुश्रा को सावन के अधिकार से वचित कर दिया और दूसरा से पतनता पृवक गोग्ने विचारा का भी अधिकार छीन लिया। इससे मी मथर यह हुआ कि समान-व्यवस्था श्रीर शासन ने दम दुयवस्था स रक्षा का मार अपने सिर ल लिया और प्रसार इस प्रामाणिस्ता दे दी। इसी प्रमाणिकता के विटि भगान् महायोर न पिणे का भडा भारतीय श्रामाश म पहला वार पहराया। यह भन्ग रिसी गनाप हाथों म न था, एक म त ती यङ्कर के हाथों में था। फ्ला यह एप मौलिर विलोह धादा विद्रोह प पीउ महापीर की बीवन साधा थी-रिसी राज्य मीनारगिणी सना नहीं। यह विद्रोह अभी अपण है-जब ता नद सरकृति-नई गमान यनस्था सी स्थापना न हो जाय, यह अपूर्ण रहेगा। यह विद्रोह अपूर्ण है, पर मदेर प्रगतिशील है। कबीर स सन्नों, रदास जैसे भक्तों ने इस अग्नि-माला को प्र पलित रखा है, भारत ने इम नया पथ दिपाया है, लनिा ने उम जमा पर उनाग है और गाधी के समय हाथों में इमा विद्रोह को पता रही है। नो फिर तो पिर क्या प्रश्न भी स्पर है और उगमा उत्तर भी। भगवान् विगहरे ग्रादि सोर थे, यही वे अपनी परोहर में छोड़ गये हैं । विश्व म भी लोग समानता, स्यनरत और सदभावना का युद्ध लट है, वे किसी दश म जम हों, पले हों, वे किसी माषा म योलने हो, उनका नाम मिगी भी वम के रजिर में हों, वे ही भगवान महावार ने मुघ उनराधिकाग।।
वर्द्धमान ने कहा- - श्रमस्थ सपो सय दिस्स, पाणो पियाय । न हणे पाशिणो पारणे, भियवरात्रो उबरा ।।। भय और वैर से वृित्त साधर, नीना के प्रति मोह ममता रापने वाले सब प्राणियों को सर्वत्र भापता हा ग्रात्मा के समान र आकी कभी भी हिंगा का 'दि मिय असदिद्ध, पडिपुराण विय जिय । श्रयपिरमणुविग्ग, भास निसिर अत्तत्र । ग्रामार्शी साधर को दृष्ट (मत्र), परिमित, असदिग्ध, परिपूर्ण, पत्र, अनुभूत, वाचालता रहित, और किसी को भी उद्विग्न न करो पाली वाणी घोलनी चाहिये। " चित्तमतमचित्त वा, अप्प वा जद या घहुँ । दत सोहणमित्त पिउगह से प्रजाइया । सचेता पदार्थ हो या अनन, अल्पमूल्य पदार्थ हो या बहुमूल्य, और तो क्या, दात पुरेदने की मांग भी जिम गृहप के अधिकार में हो उसम अाशा लिय विता पूर्ण गयमी गोधक नमी स्वय ग्रहण करते हैं, न दूसरों को ग्रहण करने के लिए प्रेरित करते हैं, और सहण करो पालों का अमोदन ही करते हैं। दुजा यामभोगेय, निच्चयो परिव जए । सफ्हाणाणि स पाणि, र जेनो पणिहाणय ॥ स्थिर चित्त भित, दुर्नय काग मोर्गों को मैशारे लिए छोर है। इनमा ही नहीं, जिनमे ब्रह्मचर्य में तनिक मा क्षति पहुँनो की राभारना हो, गमव शास्थानों का भी उगे परित्याग कर पानानिए!' लोहरसेम श्रगुप्पासो, मने श यरामवि । जे सिया सतिद्दी कामे गिही, पवहान से I राय करना, यह अदर रहने वाले लोभ की गला । श्रतएप में माता * मिजो माधु मयाला पिरत माह कग्ना नाहता है, वह गृहस्थ है-माधु न। . । ama Hor महावीर और उनका संदेश यशपाल जैन इस पृयो पर जर 74 धम की हानि होती है, कोई को महापुरुष उसान हो नाता है और वह माय माापी गिरक, यहानी लेखा के विश्वास, श्रास्था और निष्ठा गम्पादक 'कौवासाहित्य, को नवीन स्फूर्ति और नया बल प्रदान करता है। महावार ऐसे ही महापुरुषों में से एक थे । उहाँ। दिमा नय धर्म की प्रतिष्ठा नही की माय लेता प्रति मिन्न बलि मानव और मानव समुदाय शचियों में श्वर के मिन मिन्न में खोय विश्वास को पापित रूपां की रचना कर दयता के रूप किया। म उसकी पना करते थे पर एम भारत एक विशाल भूखण्ड है। ममय थाया कि ये कियावाडो की उसम अनेक जातियाँ यसनी है, हा मोद का साधन मानने लगे। निन अलग-अलग धम है और इश्वर की उपासना के लिए उन्होंने अलग-अलग धार्मिक मायनाएँ हैं। पिन यनों की सूचि की थी, उनमें प्राचान काल म व थाय जाति हनारों पशुओं की पनि दनेवाल यहॉ थाइ तो यह जगह मार मानव माव जाते वे गब पहले नहीं बेटा, विभिन्न स्थाना में पैल एक थे । मुभीने की दृष्टि से उन्होंने गइ। उसकी शापाय बनी थोर यार्य विभाजन कर लिया था लेकिन क्षेत्रपाल ने अनुसार उनर मन श्रय यह धिमाजन घर के रूप म मतान्तरों म भा परिपत्तन होगया। परिर्वात होगया और एक षण्ण धारे धारे वे एक दूसरी स दूर पनी दूसरे मे अपने को पृथक ही नहीं, गइ और कालाता म उनो मता उच्च भी मानो लगा । शुद्र और ग्रहों के कारण उनमें धारामा दामों का एक ऐमा घग बन गया, असहिष्णुता पैदा होगा । इतना ही पिसे मानवना सामान्य अधिकारा नहीं, उनने धम का मल रूप और से भी प्रचित होना पड़ा । आदमी मूल्य मान्यताएँ भी धागे ननकर श्रादमी म बीच दूरी श्रागई और बदल गई । वे एक ईश्वर के उपा प्रम तथा भ्रातृ भान ने स्थान पर वर्या-देष श्रादि क्याया ने घर तात्यय यह कि अनेक विघ्न बना लिया। धाधाएँ उमा माग म श्राइ, उपसर्ग ऐसा विषम परिस्थिति म शातर हुए लेकिन वह डिगा नहा। अपनी गण के राजघराने में यह मान साधना मलान रहा। नाममा बालक पैदा हुश्रा । घह तरहवें वर्ष उनकी तपस्या सफरन असाधारण वाला या, पर उसका हुई। उन्हें 'देयली' पद प्रात हुआ। बचपन बहुत कुछ घैसा ही बीना, और वह दुनिया के सुप दुख, जैसा श्रय बालों का बीता करता भोग विलास, मोह माया श्रादि से है। एर बोज उसमें बचपन से हा ऊपर उठ गये। वह वर्द्धमान से विद्यमान था, और ज्यों-ज्यों वह बड़ा महापोर बन गये। अब वह सिद्धार्थ होता गया उस बाज की जमनी और त्रिशला व बर याशातृरगण पे गई । बाल्यावस्था पार होने पर राजघराने के राजकुमार नहीं, उसका विवाह हुश्रा उसे यशोदा बलि मानवता के मागदशक नामकी बहुत ही सुशील पक्षी मिली, बा गय। लेकिन उसका मन भोग विलास या राज पाट के धैभव भ नहीं रमा । महावीर ने जैन धम का स्था श्रदर श्रदर बान जोपा रहा था। पना नहीं की। वह धम तो बहुन श्रोर जर घर के लोग श्रार राय पहले स्थापित हो चुका था और महानोर से पून २३ तीथार पार को प्रजा यह प्राशा घर रही या हे चुप थे महावीर ने तो उस पुराने कि कुछ दिन बाद राजपाट काभार उसकी पर श्रा सायगा उसा धमकावल प्रदान क्यिा । उसम जो सुपर स सबम लात मारा और बुराइया भागइ थी, वे दूर करें। माना पिता व दहासान य दो वर्ष ज्ञान प्राप्त होते ही चारों शोर से लोग श्रावपित होकर उनर पास बाद भरा जनाना म घर स निरल श्राने लगे और थोड़े ही समय म गया । तीस यप का अवस्था, भरा उनक अनुयायियों की संख्या लासा पूरा घर, मुशील पदी, लक्नि कुछ भी उसे नहीं रोष मरा! बारह वर्ष तक उसने घोर तपस्या की। प्रश्न उट मरता है कि जवाना काया नम्ब गर, वस्त्र नोर्ण होकर के धानद और गन-पाट के मुग्म Tट होगये, जगली पशु-पक्षियां ने को तिलाजलि दपर उहें साधना उम सताया, लोगों ने मारा-पाटा फे कठोर माग पर चलने की क्या हो गई।
(१२) श्रावश्याना थी ? 'प्रय' ग माग दूमरा सवाल यह होता है कि जय मामले खुला या तो 'श्रेय' क महारारा वाणी में, आके शब्दों मार्ग का अगलम्बन करो की क्या म इतना जादू कहाँ से या गया ? पड़ी था। अपना बड़ा सम्पत्ति म मिलाया परनारी उनके संघ स भर भर ली दान करद ये मया मिल १ इगमा उत्तर भी गराग का निवारण कर साते साफ है और वह यह कि उन्हाने थे तो उसने उस दुलभ और अपन मुंह से कभी एर भी एगा रहहणाय अवसर को क्या सोया? शद नहारिकाला जिसमा प्राव इतने बढ़ राज्य र पाने के अधिकारा रण उडान भरने नाम में न दिया होते हुए भी, उधर से मुंह गोहार हो । अहिसा की बात कही, लेग्नि स्वेच्छा से यह क्यों अस्चिन बने । तरना उन्होंने स्त्रय मन वचन आर वाय से हिसा को छोड़ दिया। यान ये युग म इन प्रश्नों का अपरिग्रह की बात तब मुँह से उत्तर पाना सरा कटिन ई लक्नि निकाली नरसय पिचन बन युग की दृष्टि से न दार महावीर गए। सत्य का प्रतिदन पिया की दृष्टि से देगें तो उत्तर स्पष्ट है तर व सत्यपी पूर्ण प्रतिष्ठा अपने आर वह यह मिश्रराला मुग और हृदय म करली । ब्रम्हचर की बात सच्चा शांति वैभव म यह है, लाग तर मुंह स बाहर निगला जब म है और जोउन को कृतावता स्वय पृण सयमी ब्रम्हचारी बन गए भौतिक उपलब्धियर्या में नहीं यात्मा उनी क्या और करती म तरि मोशीम है । महावीर को नैसे भा भद न रहा और यही उनी ही यह शाा हुयामि लाया-करोड़ों वाणा की शक्ति का रहस्य था। को सम्पत्ति होते हुए मा जिसकी बारह वप वा दुधाप साधना यामा दखल है ना पाया का दाम उन्हों। यही तो दिया था। है यह अमीर नहीं है ओर नौग महानार ने एपम अधिर और पाग न होत हुए भा निरसी नामा मार श्रार उस नीरन की बलिट है वह नाम्नव म अमीर है। पावनता पर दिया है। क्यों? उहें अपना भारा एश्य छोड़न इसलिए कि हम दुनिया मि मूलभूत और यात्मा की उनति म लीन साइ माय है । यदि यादमी होने ननिा भी दर न लगी, हिचक अच्छा है तो ससार अच्चा हुए तो भला होना ही क्या थी। विना नहीं रहगा | यदि श्रादमी म उरा है तो कोई मा शनि इम मानवता ६ लिए उनका यह मदर्श दुनिया को अच्छा नहीं वा सम्ना। अाया की एक अमृत किरण लेकर महापौर ने अपने समय की श्राया । उसने बुराइया ६ दलदल मयावह स्थिति को देना । गाना म फसे लोगों को उसमें से बाहर प्रकार की बुराइया म समूचा समान क्लिने का एक प्रेरक शक्ति प्रदान जबर हो गया था। प्रादमी इतना की। उक हर शब्दा ने उसे बड़ा स्वाय परायण पार भोग निठ बन स्मृति प्रदा7 का-'निवेशी पुरुष गया था कि उस अपने साथ श्रार जान म या धनजात में कोई अघम भोग 4 ग्रागे और कुछ दीयता कृत्य र पेठ तो अपनी प्रामा ही नही था। वह भटकना था रोशीन उसस हटाल और फिर और दुभाग्य से उस मटाने को दूसरी बार वैमा न करे। फिर हो वह सच्चा यानद समझ बैठा या डहोंन कहा कि मानय व श्रदर वह बचेन था, लग्नि उसे इतनी श्रसनी शक्ति अहिमा, सत्य, अस्तेय, चतना ही 7 रही था कि यह समझ अपरिग्रह और ब्रम्हचय इन पाँच कि यह बचैन है। व्रता पालन से हा उत्पन्न हो महावीर ने माव सस्ता है। तो गृहस्य हैं, जिा पर दिशा दी। उहोंने कहा कि कोई परिवार ना मार है, वे यदि सूक्ष्म मा यक्ति मूलत बुरा नहीं है और रूप स इन व्रतों का पालन नहीं कर यदि वह गलनी से बुरे माग पर सक्ते तो स्यूल-रूप से हो रे, चला गया है तो वह उस माग को अर्थात् नभ र हिसा न करें, छोड़ पर एर दिन प्रच्छा भी बन भूट न वोलें चोरी न करें, परिग्रह सकता वह यह सस्ते य फि न र श्रीर असयमा न पर्ने । तो एघार विगढ़ गया उसका कभी जाम या श्वननान एसा हो मुधार अगम्भा है, लेफ्नि उम दशा भी जाय तो निराश 7 बल्कि म शायद उह सारी दुनिया यो इन व्रता पालना करें। हा खो देना पड़ता और फिर उहोंने यह भी कहा कि- रात्य का यह पुनारी जानता था युराइयां का मूल गरण यह है # व्यक्ति भूल स हा गलन रास्ते मिश्रादमी अपनी ओर देख कर पर जाता है समझ-बूझ कर अनु दूसरों की ओर देखता है । इसलिए चित माग पर जाने वाला करोड़ो अपनी दृष्टि को अंतमुपी करके में एक भी मुश्किल से मिलेगा। अपने दोषों को देखो और उहें को है । दूर परो की कोशिश करो-'अपने दता, त्याग 1 प्रायह रचना है श्राप तातो। अपने श्राप वह श्या को प्रोत्साहन नही देता, जानना हा वास्ता म दुनय है।' मम का स्थापना करता है, वा यमहावार यशदथ। महत्वााँग को घरसर नहीं दना, यात्ममयम या पाट पलाता है। ममार म निनने धम हैं सबकी एमा माग सरल देस हो माता है मूल मान्यता प्राय यहा है। मरे लेग्नि निम श्रादमी से महावीर दरनेम श्रासना कद भी ऐमा र बताय हम राजमाग पर चलने घमनहां प्राया तो यह रहता हो का एक बार चा लग गया कि गि मनुष्य पुरा ना र६ तब भी फिर और कोई भी माग उम अच्छा ममार अग्ला हो पाना है या कि नहीं लगेगा। मनुष्य भाग लिन रह पर उगामी घन मक्ता है । सान मा धम है मरे लिए धम का मर्म यही जो यह कह सस्ता है कि पैर म है । दुर्भाग्य स ाा धर्म की परि बैर शॉत होता है और हिसा से भाषा आज कुछ और ही होगद हिसार है । ग्रौरी का वा क्या करें मगीर पर अपना एधिकार सवाल उठता है कि महावीर पने याल उसे अनुयाया भी का सदश इतना व्यापर कैसे ? उन माग को भूल बैट है। उन्होंने इमलिए उदोन अपने को भार समकाएदामो यावत् जाड रखवा अपना बात को पिसा बंगशिप है, धम की श्रात्मा को याद दिया तक मामिन नहा रक्या । उनक हार समझ है कि यावत् लिए नपाइ उच्च पण या था न रूदियों का पाला करय वे धम निम्न पण का। मानव मानव के नाते माघन कर रहे हैं। सब एक या इसीलिए उनसरा सटश सारी मानव जाति के लिए था और इसका बहुत बड़ा कारण तो मानर की स्वय को दुचलता है। है। दूसरे उहाँने ऐसी भाषा का लकिन एर महत्वपूए कारण यह प्रयोग किया निसे सब श्रामानी से है कि पश्चिमी सभ्यता जोरों लोगों प्रयोगबर मान थे। पर अपना प्रभार डाल रही है। उन माग निश्चय हा गारी यह सम्यता मुख्यत भौतिक है और शकर की चोटी पर चढ़ने व समान इसीलिए उसने श्राज के मानव और है। वह मोग की अनुमति नहीं प्रारक समान को भौतिकता का (१५) प्रेमी बना दिया है । वह स्थल वस्नु रिए फरती है । बनर मानर को चाहो लगा है और उा सूक्ष्म निग पशु नहीं हो पाना, पता नत्वों को योर से उदासीन होता मानपता का एक कण भी उसम ना रहा है, नो उसके भौतिक सानद शप रहना है नाता निराश होने में सहायक नहीं होते, उल्टे उममें का कोई कारण नहीं है। हमें इस पलल डालते हैं। गाना गत्य को नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी यनि मुलत' पर हमसे निराश होने की अंग नहीं है और निरा दिन उसे श्रावश्यकता नहीं है। उपा र श्राग अपने दोर्या का भान हो नायगा, मन से पूर्व रात्रि का अगर बहुत वह उनसे मुक्त होने और भागे ही गहन हो उठता है । उस अप उको पुनगवृत्ति न पाने का कार को चीरकर ही प्रमाश की प्रयान अवश्य करेगा। जहाँ तकदोसफेगा- "वत लेना दुर्बलता का परिचायक हां, वह पल का हा परिचा या है। कोई कार्य यदि उनित है तो उसे करना ही चाहिये, इसका नाम बन है और इमी म शनि है। किन्तु "माँ तक हो सबगा" इस तरह की बात तो करता है वह अपनी दुर्वलता या अभिमान का परिचय दता है। शुभ मल्ल रे मम्बध म "नहाँ ना हो सकगा" दग तरह का वास्य विष की तरह है। "हा तर हो सकेगा, मत्य का पालामगा।" हा प्रकार के यायायो अध नहीं होना । -महात्मा गांधी अमृत कोथिप पनाइये- मनुष्य को चाहिये कि यह धम को दंभ, पृणा, विवाद और गन मराबी का कारण न यावे । नो वा अमन बनाने र लिय है उसको विहीं बना डालना चाहिये । हम उस भैंस के समान हाहाना नाहिये तो माफ पानी व नालाब म नागर गको मालालता है, और गदलार इसम प्राादानुभव करता है। -चावर्ती राजगोपालाचार्य नमोस्तु ते, देह-सुखाति निस्पृही "सदा अहिंसा रखना स्व धम है "विपक्ष में हो सम भाव पक्ष में, श्रदत्त लेना अपना न कर्म है,! तथा गृपा भाषण मे न प्रीति हो, मनुष्य जो उत्तम यात्म-निग्रही न सत्य सा हे तप और विश्व में उन्हें अविश्वास सदा अधर्म में । पहा गया है, त ब्रह्म-रूप है। मार्ग पाथेय विना सुगम है, "मनुष्य प्रस्मेय विचार उक्त जो सुधर्म साथी पर लोक का सदा, वही प्रती श्रादरणीय है सदा, न काल जाके फिरता कदापि है, ' न पालना जो जन ब्रह्मचर्य है 'अधर्म का पादप पुष्प-हीन है। उसे नहीं श्रास्पद मोक्ष पा मिला। सभी त्रस स्थापर प्राणि विश्व के । 'परिग्रही है. यह जो पदाव पे, श्रध्य ही है न, अडनीय हैं, ममत्व मूर्या रखता सदेव है, विनीत होते जब दड-नाम से, । धरित्रि में रामहणीय एप ही कदापि प्राणी मरना न चाहते ।। सु वस्तु है निर्मम-भाव-पत्पना । "नमोस्तु ते, देह सुसाति निरहो नमोस्तुते मोक्ष-स्मार्थ-विग्रही, नमोस्तुते हे अपरिग्रही, प्रभो। नमोस्तुते भक्त अनुग्रही, विभो। -द्वमा : (श्री अनूप शमा) से साभार - यह केन्द्र- यह परिधि- यह वृत्त- जब म नदन ३ बारे म शिपरचद जैन सोचता हूँ, तत्र बरबस मुझे हसा श्रा हो जाती है, चाहे मैं कितना भी मौन साधक, लेखक, कहानी अपने को रोपने का प्रयन पयों न करू ? सारो दीया उस पर हमी *, और यपि में स्वय उस है, और में भी उस पर हसू, यह । अच्छा नहीं लगता। पर अच्छा हसा है, तो भी मैंन सदा उस लगे या धुरा, हसी तो हगा ही है, पक्ष लिया है। उमे रोना सिमी व पश सी बचपन स लेकर उसके यात नडी1 अतिम छोर तक मैं उसने मैंन कई बार अपने मित्रों को रहा। साथ रहत उममी श्राप समझाने का प्रयन रिया है। हम रूप मुझे माफ दिगाई दते थे, गिन रह हैं। म उम चपन से और रडे दिमाइ देते थे, ठीक नानता रहा है। उमा मदा मैं पद तैलचित्र के समान । अल्पश दुर्दा लिया है।' पर मित्रा को मैं नहा रे समान सरे राजीव थारति मममा पाया हूँ। इसलिये नाम में मुझे धव और रंग के हर अाज अापको इस सममाना चाहता गहरे भगव हा दिवाइ दते थे। है और श्राप उम न समझ पायें, उममा वह सजीव चित्र सच्चा योर फिर भी स, तर मै बुरा नहीं गया है। इस सच्चे चित्र में से मानू गा! क्या में श्रापको उमे सम वैसे धीरे धीरे उम्मीरूप रेखायें झाना चाहता है, यह तो म भा नहीं गई हैं, वह धुधला हो गया है, जानता, पर कोइ भुगमे कहता है कि मुझे मालूम पाता है। अब = में अापसो, समभाउ । इसालियं, मास हा में ममे देस पाता यम, इमीतिय उमे आपको समझाना सीलिये कुछ उल्टी सी किया चाहता हैं। म ही समभाना चाहता है। वह मुझे घर साफ साफ हैं क्याशिम उममा प्रमि रहा मैं मे समभाऊ श्रापकी, श्रय - पहले मश्रापको उसरे पागश यह मरे अधिर शिक्ट ई। पहले पा या मूना की ताजी वात हो वह मुभ पर मुभला उटता था, • सुनाता है। उसकी मरणान अवस्था नारान हो जाता था, सभी-कभी भी । हम मब उमरे जीवा से महिला तक बोलना 7 था। और गिरा हो चुर थ। डॉ दयाल फिर किमी दिन हम मिला को श्राय थे और यह उप थे, "पदा य ध्यागुल हो नान, मिल नाते, घुल बचाकी श्रव कोई प्राशा ही, मिल जाने | नीवन म एस श्रवगा हम अब औषधि न कर उग मुग्न ना याय गये। परन्तु श्रव वह शाति महा परला यात्रा को मदा मता रहता है, दुर्णिया पर दना नाहिय। हम लोगां श्रीर उसके हमता रहना है। दुनिया उम भूल परिवार य लिय यह को अप्रत्या गई है। यह श्रव उग पर नहीं शिन बात नभी। यह भी जानता हम पाता है। अब नो वह ही मब था कि लोग और डाटर क्या पर हमला है। हमता है बड़ा ही रहते हैं। पर, उसने भी अपने गम्भारता से, निडर होकर । दुनिया को बचाने के लिये नहीं कहा । और ने उसे मृत्व समझा । अब वह दुलिया हमसे बराबर कहता रहा, 'म मरगा को मम मममता है। इमलिय उस नहीं। यदि डॉ. दयाल क्या, म्लय की दुनिया के सम्बन्ध को वान व धमन भी कहे कि म मर रहा हूँ मग ममझ म नहीं पाता तर मुमे तो मग्नकी यथती को असत्य गिद्ध उस इम दुराव पर झुझलाहट पर दूगा । होती है। कभी कभी म श्रधार हो मत से पहल पह मा प्रसन्न उठता हूँ कि में भी उमम उमारे रहा । गमने कभी हमारी मेवा साध होकर हम तर दग्न गाना, सहायता की श्राकाक्षा या पक्षा तो क्या ही अच्छा होता। नहीं का। कभी-कमी पड़े पड़े ही वह इतने जोगस हम दता कि हम पर, जाम हैं, तो अाप है, जो उमर मादपरत या सन्निपात प्रस्त वह है, हम एम ही रहे हैं, एम ही होने का मदह होना, पर सब हम रग इमालिय हम भाकाक्षाया और प्रवीक्षाओं में परे पहुंचकर श्राने ग्म गारधान और मचेत पाने। तुल द.ले और समझ-सोन लेना हाँ पर याद सम्म थी, पोनी चाहिया या मित्र अाता और कहता 'दा (११) घवराओ नहीं, तुम शान ही अच्छ और उठने में भी असमर्थ नदन हो जाओगे। अपने बाल बच्चों की उई प्रम से उठाना, पाम वैठाता, चिता मत करना नदन हम पर है प्रबोध करना और फिर बलन मेन किसलिय ? रम्म-छम्म तो हमारे है। ता। उनक जान पर मुह ढक कर पुर है।" उनको हम सहानुभूति पर रोना, कराहना, मोचता राग रोप भी उस हमी श्राजाती। वह अपन गुण दोष मयी दुनिया की विडम्बना को रोक नहा पाना। वह पिल पर | गोचना, क्या सचमुच दुनिया खिला उठता और कहता "दादा अमत्य है? क्या इमम अमत्य ही मच तो कहन हो, म अछा तो हूँ। सत्य है । तब लोग क्या याय और घबराता कहाँ हूँ। श्रीर, श्रापक मत्य का बातें करत हैं । क्या श्रादश समान पड़ोमी तो दुनिया का पीट व नर पर मिर मुकार उसकी पर भी नहीं मिलेंगे। इसीलिये ना अपहलना क्रो हैं। क्या यारहा म निश्चित है। बच्च तो श्राप रिकता को राजरानी बनाएर उसका ही है। श्रापक समान दयालु, पृता करत हैं। वह सोचता मय म पुण्यात्मा और सहृदय लोगो र यल लोगों को चिद या है। क्यों व पर ही तो स्नयुग बरस रहा है। जानबूझार, श्रमाय को माय मान श्रापकी गहरा सहानुभूति र लिय कर मरीअचना म हो निरनर श्राभार मानता हूँ।" लान रहत हैं। इस तरह प्रतिदिन एसा कुछ वह कहता और को नई पुनारा उसक पास श्रा मुनत । वह हमता, मुस्कराता श्रीर हा ताता ए रंग, श्राकृति और य स्वोभते । उह बार्ने चुमनी। वे पथनों म वह भिन होता, पर नदन अन्यमनस्क होकर लौट जान श्रार सारसाग पर वह अपना चिर फिर प्राय आरोगनाम न लन। परिचित नही होता, जो प्रतिदिन, उनक बच्चे जब रम्मू-छम्मू को पान, प्रतिक्षण उमम मिलन श्राता रहा ढकलत, मिठाइयां बनाकर मुह है। इसलिय अपने चिरपरिक्ति विचकात तब से उई उना चोटा मित्र के मिलन पर बरबस वह हम स भर मन को मारी प्रसनता होता। ही दता । उसको बातें जान्हल हान रे तर्क पर रम्म-छम्मू को दोषी और हास्य भरे वातावरण को स.ष्टि कर अपनी सतानों को निदाप पात। ही दतां । व दोनों भीतर ही भीतर रुग्णावस्था म य प्रसग रम्मू-धम्म के सिन पर ऊपर से प्रसन्न हो विदा पिता नदन के पास अवश्य पहुंचते। देत-सते ।
(२०) . 1 मापसे पूछना है, श्रार ही हमारा प्रभिाय पूर्ण श्रा, इधर रतलाइये, क्या श्राप एस मनुष्य से बैं या गी बारी। ओर या मूस न पहंग? जो वारचार टगा तो मालूम हुया कि वा माहरा पर कभी नहीं साग्रता हो, फिगल पाग चाय पाणी येमा पैम रही। फिमल कर भी सम्हलने का चष्टा न उनकी हम स्थिति सा पता करता हो । नदन ऐसा ही मूस था। हमारी महला म लगा। अभिनय । मनुष्य एक बार गिरकर फिर स सदा गिरने से बचना है। एक बार तो समाप्त हो गया था, उसमा श्रव शप सम्भालना था। कि मित्र ठगा जाता है तो गम दूध स जली बिल्ली के समान छाल को भा पूक धारे धार विमल गया रह गये हम मकर पीता है। पर नदन का मैंन तानां । कक वायू गिड़गिड़ाय, दुगी' सीबते कभी ही देगा। यह जीना हुए। उन पिना सम्पनथे । उहोंन एमा ही बताया। और शाम हो भर भूलता ही रहा। लगभग दस वप पहले की बात रुपये वापस पर दो के अनेक है। हमारी मित्र मडली न प्रसाद शाश्वासा दिय । म देना नहीं नाटक का अभिनय पिया था। चाहता था, नदा १ पास कुछ था व हमारी रिहसल प्रारम्भ हुई थी, नहीं, श्रार होता भी तो म दने मी बहमने उसे भी बुला लिया था। नहीं देता। पर पाछे मालूम हुन्या सकी हम श्रायश्याता थी। उसो गिरीश वानू नदन के घर पहुंचे। "भिाय में भाग लिया था, श्रीर वह उससे अक्ले में मिले। नदन ने छ निर्देशन मा कर देता था । हम पनी को स्वण मुद्रा निकाली। यह गांव साथियों म एक बैंक बाबू गिरवी रखी गइ और बाबा अपने घर भन गर । उम अंगूठा को । थे। पड़ सज्जन, मिलनसार र अमिनता। वे हमारी मडलो लगर क्याहुना, यह सरअलग क्था इतन घुलमिल गय कि उन्हों। है। पर उस दिन स वायूनी । नी धरू श्रावश्यक्ताओं और कोई समाचार नहीं मिले। नदन मकी भोर धान नहीं दिया। काश्ममान ता पहुंचाने पवादस मैं नहीं जानता। ससे पृथक पिये जा रहे थे। क्या था, व हमारे अभिनय म तो श्राज नदन यापन पर म तल्लीन हो गये। उधर जनमत जानना चाहता हूँ।
स्वर्ण-द्वीप
हरिकृष्ण प्रेमी
प्रतस् के गायक
जन प्रिय नाट्यकार
मुलेग्वक
१
खड़े थे आसमान को छूने वाले, उनको देखा।
मॉका अपनी कुटिया में, खिंची व्यथा की तीखी रखा।
सागर ये उस तट से दुनिया स्वर्ण लिए पाती है।
। देख देख पगाला की जलने लगती छाती है।
क्ल तक थे जो सखा हमारे
श्राज न हमसे हाथ मिलाते।
देख फ्टे से वस्त्र हमारे
नपरत करते, हंसी उड़ाते ।
न पड़ा, "जगत से लड़पर स्वर्ण लूट कर ले आऊँगा।
है रनों से सज्जित कर निरख निरस कर सुख पाऊँगा।"
बोली, "प्रिय, विभव प्राप्ति की धुन मे तुम सतोष न खोना।
गँवा पर रह जाता है जीवन मे रोना ही रोना ।
नियतम, सोता तो कठोर है,
उसको पाफर क्या पायोगे?
-
(२२) ३ पूरी हुई न यात तुम्हारी, हा खनापन शद पट्टी पर । "प्रसने का अधिकार नहा .' सोचा, "रह फ्गाल मही पर।" सजनि 'खनासन' पश-दो म सुन न सपा तुम क्या क्या बोली। सूता ने मेरी नसनस मे सहसा पिपी पुहिया घोली। तुमन प्रोम् भरी निगाह से मेरी द्वारा या तोला। फिर वेबसा भर हाया में ममता ५ यधन यो खोना। । जो नौका मिल गई उमो पर पदपर मैं लहरों मे पेना। और ले चला नाव जहाँ पर लगता है भर पा मन्ना। लहरें गरजां उनमे बोला "तुमया हूँ मैं बहुन अपना।" आँधी आई, तूराना ने चार रिया, मैंन सघ मेला। पहुँच गया में स्वर्ण द्वीप में रितु सिपाही ने पथ या! "यहाँ काम क्या है सुम जैसे फ्ट हाल झिगु लोगों था।" । मर उर म श्राग जल उठी, मैंन छान उमी पा भाला, छानी छेद, एक सगण में ही काम तमाम वहा फर डाला। जिस पास शपि होती है उसी ही है स्वण धपोती। हाथ रक्त से रंग यर मैंन दी जगभर फो, सजान, घुनौती । घर फर पर नगा होफर, घसुधरा पर खुलकर नाचा। । जिमने यहा, "होश मे श्राओ।" उस जड़ता गया तमाचा। ६ मैंने कहा, "मूर्ख पहा पे भीतर सारा जग नगा है। जो खुल फर नगा रहता है, पासे बाजों से पंगा है। ।
(२३)
इसी समय लक्ष्मी ने पार पहनादी मुझ को घर माना।
फिर मेरे नगे शरीर पर गौरव पावतार डाला।
ऋद्धि सिद्धि परियाँ भी श्राई,
भर भर नाई मद की प्यानी
भूल गया, तुम पिए प्रतीक्षा
सि कुटिया में बैठी, श्राली।
मुझको स्वर्ग द्वीप के लोगों ने तव अपना नृपति बनाया।
ताज उतार शीश से अपने लक्ष्मी ने मुभको पहनाया।
लक्ष्मी के वाहन ने सहसा सुदर मगल-गान सुनाया।
उल्लू को मैना समभा या मैं लक्ष्मी को घर की माया।
एक लहर भाई जो पल में
लूट ले गई वैभव सारा
लक्ष्मी तो चचल है उससे
पितने दिन मैं लगता प्यारा।
८
.
गया सिंधु के तट पर "तल में चलू" अचानक मन म प्राया।
"यह तो कायरता है, ग्यारे" सुना किसी ने गाना गाया।
"देखा, एक नाव पर बैठी तुम मुसफाती गाती पानी।
सारे जीवन में न सुनी थी मेंने ऐसी मधुर प्रभाती।
श्रापरवोली,"चलो प्राण धन,
फिर अपनी कुटिया में जाने।
महलों की विजली तज, घर में
सरस स्नेह का दीप जलावें।
श्रात्मा का काया से- वियोग, मोच है जैा मान्यता के अनुसार जीर लिये श्री रवीद्रनाथ ठाकुर । लिपी एक बड़ी ही मार्मिक का और देह (कर्म दह-पर द्रय) नीचे दी जाती है--- . का एक्मेकी (पर गुणारी) "जीव में बड़ा ही पद् रावध अनादि काल से चला श्री कौशल है कि वह शरार का नि रहा है। किंतु यह सम्बध इसी पौणाम ऐगा गीत बनाता है बात पर चला श्रा रहा है कि नीर ऐसा दृश्य पैलाना है- जि का दह (परद्रश्य % पुल द्रय गध स्पश शदादि श्रपनी ज पुङ्गल के स्पश रस गध पण गुण तमा शदादिक पर्याय - परीछोहार एक सनीन यातु मन हैं।" "जीव अपनी श्रवो विषयों) प्रति राग (पुनगल दय अनुगामिनीको किन तरह ह में मुन्च की भाति शल्प) होने से है?" "वह देह ये प्रत्यक पर जीन मुग्प मूल अपने आपको भूला में एक प्रकाराशाकाक्षाका हुया है। किंतु निम समय जार उरान कर देता है। उस श्रार करण लधि (श्रत परण प्राप्ति की प्रति शरीर के द्वारा भेद विज्ञान) करपे वीतराग होजाय होता। उसका योगों के साम तो यह कम से कम अनर्मुहून में सरोदय उपस्थित करता है, और ज्यादा में ज्यादा श्रद पुद्गल सदिय का अंत पास थाम्ब परावर्तन (लय चिन्तु सात) सस शक्ति में बाहर की बात है। मह से सम्बध विच्छेद (मुक्ति दह के पास जोर जो संगीत प्राति) कर सकता है। स्थित करता है, उसको अपने सम्बधी दशा म ये दोना कैसे मरता श्रगा शनि कोश घनिए अभेद रूप से रहते हैं और बाहर का काम है। भेद विज्ञान प्राप्त होने पर नीव रैमा प्राणों के द्वारा उत्साहित निष्ठुर होकर मम्बध विच्छेद कर सगिनी मी लता के समान । देता है, वह इसी बात बतलान शार शाहाए फैलाकर प्र (२५) होकर उसको धालिंगन-पाग में जाना है।" दह उस ममय नार फे दांपता है वह जीव को धार कधीरे पैर पकड़ कर कहती है-प्रिये, यदि प्रसन्न कर लेती है। बड़े यो पर्ना तुम्हें श्रत यो जात्रा ही यायदि से छाया में समा गय माथ तुम मुझको मिलेमें मिलाकर नाना रहता , और उसकी सराम कोई हो चाहनें हो तो इती दिनाता भी नि दा होन ग्ला ! "इन (अनागिल से अवता) अपने प्रकार प्रेम हो। पीद ए दिन । प्रेम म मुझनो मुला क्यों ? नाप श्रपती श्रारत और अनुगत अपो प्रेम से मन ममका महिमा देहलता को भूमि म लोग्नी-बिल यती या बाया ? हाय, मैं तुमारे एती हुइ होडवर नजा जाता है। योग्य नहीं है। मेरे दिम गुण जाने क ममय जीव देह से कहतार तुम मुग्ध हो गये 4-परन्तु इन है--प्रिय, मैं तुमको अपन से अलग प्रश्नों का उत्जर (मारे शर्मक) नहीं समझता था परन्तु (माही वह विदशी (शिद्ध क्षेत्र निवासी) मा- अब नीयोज्य पुद्गलाश्चान्य" कुछ नहा दमा और इठोपदेश ५. यह भेद विज्ञान समग-सम्या पा गया है अतएव) -चिनिन प्रबध मे श्रान तुमसे थनायास छोड़कर -दौलतराम मित्र भगवान महावीर के सिद्धातों का अनुसरण गाश्वत महज धात्मीय पान का अमोघ उपाय है। प्रत्येक श्रात्मा में जो स्वभाव है-स्थायी रस है, उसका अनुभव पूर्ण निरीह नैसर्गिय भगवान का उपदश हम म प्रारमाओं या वैमागिर सिद्धात है। महापौर ने जो पिया यही पहा, इसलिये गनपी उपासना गुमुनु पी लोपोनर विभूति है। -सहजानन्द प्रत्येक धर्म ये दो पहलू होते है-विचार और प्राचार । धर्म या प्राधार यया है। इसे समझने के लिए विचार पी अावश्यक्ता होती है, उमे दर्शन या जाता है धर्म को जीवन में उतारना यह श्रापार है। --सालावली - गौतम ने कहा- "मोक्षस्योपनिषत्सौम्य वैराग्यमिति गृहता । धैराग्यस्यापि सचद सविदो शान दर्शन ।। मोत का उपनिषद् (ग्रापार, गौर ले जात याला) गौम्य वेगाप है मा समभो । गम्परा भी उपनिर सम्पर गार है और मम्मम् जान या उपनिष शान मादा है। मानस्योप निपश्चैव समाधिम्प धार्यता। समाधेरण्युपनिपरमुग्व शारीर मानस शान का उपनिषद् ममाधि समझा, ममापि का भी उपनिषद् शारी और मानसिप मुर समभा। "प्रश्रधि यायमानस सुपस्योपनिषत्परा। प्रभधेरप्युपनिषत्प्रीनिरण्यागम्यतां ॥" शारीरिक और मानमिक मुग का उपनिषद् परम यानि और शान्ति का उपनिषद् है परम प्रीति । "तथा प्रीतेस्पनिमामो र परमै मन । प्रामोद्यस्याप्य ह लेख पुरामेष्य कृतेपुवा ।।" प्रीति का उपनिषद् परम शानद मारा गया है और श्राद का भी उपनिषद् है कुकार्यों श्रार अ-कायों से पाहा न होना । 'अहल्लेखस्य मनसः शीलं त्य निन्छति । अत शील नयत्ययमिति शोले विशोषय ॥" मानसिक पाड़ा ये अभाव का उपनिषद है पवित्र शील । म प्रकार शीन ही प्रधान है और (ग्रता की ओर ले जाने वाला ता है) सलिए शील शुद्ध करो। "शील नाच्छीलमित्युक्त शीलन सेवनादपि । सेवनं तन्निदशाच निदशश्च महाप्रयात् ॥" शालन म शील कहा गया है। शीलन मेवन (बार बार पे अभ्यास) में होता है सपन किमी चाज य लिय स्तर इच्छा होन से होता है और इच्छा रमा ही पाश्रय मे होती है। पशील हि शरणं सौम्य कामार इवहेशिक । मित्रस्य घधुश्च रक्षाघ धन प चलमेच" शील, है मौम्य, शरण है *गल म पथ प्रदशक पे गमान है मित्र, बधु, रक्षक धन और बल है। [अभ्यघोष क्त 'सो दर नाद महाकाय के १३ ये सर्ग से -- -- । - -- भारतीय दर्शन की परम्परा रामचन्द्र श्रीवास्तव'चद्र' तल्ख अालोचक मनस्वी चिन्तक साहित्यवेत्ता किसी मी दश अथवा जाति को सस्कृति प्रवाहामक होती है। प्रारम्भ से, यदि उसके श्रारम्भ की कल्पना को जासके तो, क्याकि सस्कार शनै शनै होता है, अद्यावधि परिवर्तन चाह जितने होलें, पर प्रवाहात्मा एक तानता कभी रितुण्ण नही हो पाती। एक-एक लहर पर धारा श्रागे बढ़ती है, कभी अवरोध पा रुकनी मी दीखती है, कमी उस अपरोध को धक्ल पंक्ती श्रार तीव्र गति लाम करती है कभी प्रवाह पाछ को लौटता दीखता है तो कभी मैंवर पड़ते जाते, ऐमा प्रतीत होता है कि जल यहाँ का वह वसाकार हो रुक गया है । पर यह बदता है, बढना ही जाता है। व्यक्ति व विरास म तो शिक्षा का महत्व है, वही महत्त्व जानिक इतिहास में सस्कृति का है। शिक्षा व्यक्ति थे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास क विषय को लेकर नमसर होती है और संस्कृति किसा जाति प शरीर (पारस्परिक मगठन), मन (सामुहिक चेतना), तथा समाज (अन्य जातियों से पारस रिक श्रादान प्रदान, योगायोग) 4 विकास में साधन बननी है । सस्कृति श द ही पैस तो प्रवाह का द्योतक है, पर उसम स्थैय का भावना भा निहित है । सस्कृति गत्यात्मा भी है , स्थिर माजिस प्रकार किमी यत्ति की वर्तमान शैक्षणिक स्थिति को जाने और फिर पिस प्रकार शनै शनै वह शिश के इम स्तर को प्रात पर मरा है यह जानने का प्रयत्न करे, इमा प्रसार किसी जानि की काल विशेषम शारीरिक, मानमिक और सामाजिक स्थिति जानना यह सस्कृति का स्थिर रूप है, पर यह रूप उसे कैसे प्राम हुमा यह उसका गत्यात्मक रूप है। व्यक्ति की शिक्षा और जाति की 'साकृति के काल विशेष में स्थैय का अध्ययन जब हम कर रह होते हैं, तब भी संस्कृति का प्रवाह जारी रहता है, एक नहीं जाता। वैसे तो व्यक्ति के शरीर, मग और समाज को एक दूसरे से विलग (२८) गवता, . नहीं पिया जा सकता, स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन ना नियार रह सकता है श्रार स्तम्य मन हाशगर श्रार समाज को स्वस्थता प्रदान कर सकता है, फिर भी मन का महत्व विशष है, उसस विकाम शरीर और समाज दोनों को साध रहता है, दोनों स्वय बनाये रखता है। वही बात जातीय संस्कृति की भी है । सस्कृति जातोय मन ३ विकास को लेकर अग्रसर होती है, ज्ञान विज्ञान के द्वारा यह उस ज्ञान पन्न का सम्पश करती है, तो मय-कलादि तथा धम को लेकर वह उस दृदय का मस्कार करता है। इस प्रकार मुसस्कृत ज्ञान और मारना कालपरवद जातीय याचारकापरिकार करती श्रार जाति को हम योग्य बनाती है कि विश्व के सास्कृति र भाण्डार मयोग प्रदान कर सर। यत्तिकाभाति तातीय मन भीज्ञाा, भावा ग्रार कृतित्व, तीन पलुप्राम काय करता दीप पड़ता है। रिसी जाति के ज्ञान, भाव । श्रार नित्य का चिरागात्मक प्रययन हो उसरा सस्कृति का अध्यया है। फिर मा विचार को दृपिस हम.ए एक पर पृथक् विनार कर मान है। शान पन का यदि हम लेन दशन २ रूप म इमको अभिन्यसि मुरन्यन पग्लिनित होता है, पर यवल दर्शन घ रूप म हो भान रा अभियान हुद ह यह तो नहा रहा जासाना फिर भी एक पान वहुत हा ध्यान दने योग्य है, वह यह कि दशन का इतना यापक रूप प्रदा पिया गया है कि जान विज्ञान के समस्त देर उमा म ममा दिये गये हैं और प्रत्येक शेष को दर्शन की श्राप स हा दगा परखा गया है। हम प्रकार भारत म दर्शन को प्रधानता रही है । वेदों क साल म लकर उपनि पर काल पर्यंत हम ज्ञान, भावना और तित्व का नैस कि समय पाते हैं, या या कहिए कि ताग को विलगता प्रदान कर पृथर पृथक् विसर्जित करने का प्रयन्न हम उस युग में TET देखने हैं। प्राकृतिक शक्तिया एक हा मसा सो अभियत्तिय प म स्वीकार की ग हैं, जिनर प्रति माल मानव ने अपन हृदय की समग्र वृत्तियों को अर्पित पर दिया है। एकश्वरसाद ( Mont in) का मूल यहाँ विद्यमान है तो धम की दृशिम-भावना रा श्रमियति का हटि से~एवेश्वर की मावनात्मक याराधना भी वहाँ विद्यमान है और जातीय इतित्व की अभियक्ति के रूप -- - -- मिस प्रकार यत्ति में पात, भावना और कृतित्व एक दूसरे से विलग नहीं दिये जा मकन, एक ही चेतना के लोन पहलू है, उसी प्रकार जानार मन २ शान, भावना एवं तित्व को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा - . में 'मगच्छप, मवदन सवोमनामि जानताम्' की ध्वनि उस युग म मुनाइ पड़ती है। जिमने एक को पहिचाना है, उमा एक की याराधना की है, वह - अपन जैस अन्य प्राणियों माथ मिल कर एक हो जान का मदश क्या न - प्रात करगा । भारत की यह मौलिक दृष्टि-ज्ञान, पामना और कम तानां क्षेत्रों में ग्रादि-मूला हाते हुए भी अपने म ममम है, अपने में पुण है । इसी कारण वेदों को इश्वराय ज्ञान और 'मब सत्य विद्याओं को पुम्ना' माना गया है। वह शान, धम और कम विचार की कसौटी पर रम कर चाह न देम गय हो, चाह विश्लेषण और मश्लेषण व सराद पर न चढ़ाये गये हो, पर भूगम मे निकाले गये हारे के समान अपने में अपने मूल्य को समाय हुए हैं, जिसको लेकर भागे पहल निकालते रहने मर का वाय ही सम्पादन होता रहा है। एसा करने स हम तीनों ही क्षेत्रा म उन मालिर हीर के अनेकानेक पहल देखने को मिले हैं जिगरा उपोनि क प्रकाश म सप्पूण विश्व नापूर होगया है। उपनिषद् काल में हमारी दृधि अपनी योर मी गर है। जब मानव विश्व में चेतना दररता है तोअपने में भी चेतना का नामास पाता है । वेदों म 'म' का उल्लंघन नहीं है, पर मैं क्या हू को अपना वह क्या है, कैसा है- 'कम्मेदवाय हविषादिधर्म' को पनि हा मुन पढ़ती है। उपनिपर म चतना का द्वैध पारर उपस्थित हो जाता है। 'द्वासुरणा मयुनासपाया रूपर इमी पोर को - गित करना प्रतीत होता है। प्रकृति कपी वृक्ष पर दो पनी चैट है, एक उमका फल पाता है और टुगभागी बनना है, दूसरा उगा फल को नहीं मोगता और दुस स मुक्त रन्ता ह ।' टपनिपद् र उस रूपकाश्रित वाग्य में इश्वर, जाव श्रीर प्रकृति तानों अस्तित्व और पार स्परिक मध या इ गित है, पर वास्तविर लक्ष्य दो पक्षी ही है। इसम यह तो गिन मिल ही जाता है कि प्रागे चल कर विचार के हतु एक दो नहा, तीन-तीन सनाए चुनौती प्रस्तुत करती है और अपने अस्तित्व एव पारम्पपिप सम्पध हेतु विचारक का अाहान करती हैं । पट्दशन-युग इसी चुनौनी का उत्तर है । इश्वर, नान, प्रकृति क्या हैं, हनक पारस्परिक सम्बध क्या है, यही तो दशन या विषय है-यहीं क्या सवत्र हो यह तीनों मत्ताएँ ही दशन या विषय हैं और रही है। शास्त्रा में भी वेदात और सारज्य इन दोनों का उत्त दृष्टि से विशेष महत्व है। वेदान्त को लेकर मत भेद है। एर मत तो यह है कि घेदान्त ने अद्वैत अझ का प्रतिपादन (३०) नहीं किया। वह इश्वर और जीन की सत्ता पृथा स्वापार करता है। दूमरा मत चदात म अद्वैत ब्रह्म की सत्ता स्वीकार करता है । सारज्य विपन म भी मतभेद है । एक मन प्रति पुग्प दो यो हा स्वीकार करता है और पुरुष का अथ अात्मा भर मानता है और 'श्वराऽसिद्ध' सून का प्रस्तुत कर इश्वर की सत्ता को स्वाकार ही परता । दूसरा पक्ष कहना हम इश्वर श्रमिद्ध ह'इसरा यह तात्पय नहीं कि वह है नहा, यह है त) पर अगिद्ध है।४ जिन तका स प्रशी पुस्प (आत्मा) की सिद्धि सम्भव है उन नशे के आधार पर इश्वर की सत्तामा गिद्ध नगरिया ना माता। वदा श्रार मारर पिया उन मनों म स कौन सा उचित है कौन सा अनुचित यह निणय दना हमारा काम नही, पर हनना श्रदाय है कि वदान धीर सारय को लेकर दो परस्पर विरोधी दल उपस्थित हो गय है ए ब्रा को स्वीकार करता है ना दूसरा प्रकृति और जोन कार पर यह साशा विरोध भी शाराचाय के पश्चात् दीय पढ़ना है। जैन और बौद्ध धम दाशनिक पक्ष से अपन स पृव यह दो मुख्य प्रवृत्तियाँ प्रात एक प्रति ईश्वर और उमा कृतित्व को मारती या और दूसरा प्रवृत्ति प्रति और पुरुष को। प्रकृति का प्रमार अपने चार श्रोर ही है, हमारे अपने शरीर क निर्माण भी प्राकृतिक है, तब उसस मुँह माहा नहीं जा सकता। हम चलते हैं, वोलत है, हरते-खेलत हैं, विचार करते और मुख दुःस का अनुभव करत हैं तर हम घल प्रकृति नहीं है, कुछ श्रार भी हैं । बस यह कुछ और ही अात्मा है, प्रकृति के साथ निवास करन वाला पुग्प है । Drcarte डेकार ने भा कुछ एसा ही तक दिया था यह कहत हुए-'Cogro erga sum' अर्थात् 'I Think Therefore I am' इसस पागे बद कर यह भी कहा जा सकता है कि-'मस्मीभूतस्य दहस्य पुनराम कुन ।' और कहा मी गया है, भारत म भा, पश्चिम में भा परिणाम स्वरूप एक ओर चारूवाल है तो यहता है-'ऋण कृत्वा धृत पिवत्' और यही 'धृत' मदिरा का रूप भी ले ही लेता है। 'पीत्वा पीत्वा पुन पुर्न मन वियते ।' पश्चिम में भौतिकवाद का प्रचण्ड रूप Epneureansena और Hidonism के रूप मप्रति पलिन हुश्रावन यह सकता है कि योरप के बाऊ उदाऊ जीनन की तह में आज भी Epicursanisru की - x पाश्चात्य दाशनिक राम से मिला कर दग्विए।
मार नही दौर रही है, मैज्ञानिक निदा भने ही धागे नला गया हो, जीवन उगहा गाथ नही द गहा । अनु, पौर और 37 दाना न दला भर के नाम पर कित वैदिक धन की पापा में क्या युष् ही होगामार भगक नाम पर दिमा। उग धर्म लोभम कान कहगा । एम पारधार ईभर के प्रति किस धारमा रा गाएगी। प्रनिमिया + पोद भोर धन धमकी भर-रामुग्य पर दिया । इमर का ये रूप में पदापि नहा, मानयाधानार मोगा थे शहार स्थर्य परमात्मा बन गक्ता है, जैन पम ने प्रतिगादा किया। बोर पन ने इस विषय में एकदम उयी राधा श्राना सिर को लेकर बोर पम पम पेतना मर योनीकार कर गा, पर न जान फेम पुनजान कमिन को यह प्रस्वीकार न कर पायापार मां न्यार सयामा को स्वीकार कर गया । यदि पुनम का गिमातम मारा गया, होता ना बौद पानी पदिय माता पार ९ विज्ञान ये युग १ अनुरूप होती। एक मान पान दाका दिन में सपने मोrint शेष में गणममगोमा रिया ना दूसरे स्पातार कोरिपरि ए: दूगर ग , मार दोनों ५ मा प्रेस माय ? धार परिणाम भी ही पात् सपा को गडिया प्रदा । मम्प माग ग्राम + Primation को गायम गदर राममारता धार ग्यद्वा Agan term को मम्मुम रगर गांग्रप की मॉनि घम म प्रत्यक्ष प्रमाय का विशप महत्त्व हैrit কষে গাল পিপি সি স্মা पुग्ण याला प्राति ही गर द्वारा माप दुर है। यह बैसे कि दान उपयुक्त तीनों परम्पर विरोधी नव्या का विशेष बना | धमग मिन दशन का न मान्यता 1 श्रीमछागाय का प्रतिक्रिया का नाम दिया। 7ी पूर्वाग्न दिनार पा अर्थात् वेट नानुमीनिन म का गसा कोह। म्यागार क्यिा श्रार म्पपर गमथन क निमित्त "पार गुना प्राधार पर अशा नरागार निर्मित किया । उडान या कम विनियो नास्ति' पर गएका म्यारसिक शानभान 1 को हरान मधि में ईभर कान मान पर सिदि* में प्रमका प्रतिनि यो हा गरि माना । माय मगन दिय जप करने पर मका'-31पम मे पगदपार पाली । भामिन बद गाडीमा (३२) शार 7 समय ना मूर्तिपूना श्रोर साकार भक्ति भारत मश्रा ने और उसका प्रावत्य हो चला था। पर शार अद्वैत से उनमा मल नहीं बैठना था तब द्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैन, विशिष्णद्वैत के रूप में अद्वैत विरोध परीके हेतु जैसे कि उमर ही चार पात्मज पड़े हुए । पर अद्वैत का बोल याला कसा ही रहा । अाधुनिक्यान मार उममा पश्चिमाय मस्करण ब्रहोगमान व रूप म “यन ग्रा, नो पश्चान् श्री रामकृष्ण परमहस, स्वामी विवेशनाद तथा स्वामी रामतीय के रूप म उममा मायामा मधुर रूप यत्त हुा । पर अपनी यात्रा म शर प बहापाद के पोत को स्वामा दयानंद ये 'नवाद' की शोर से ऐमा भारा ठोकर लगी है सिमविष्य म उमा गई हो तान की सम्माताा है। पतपान पा रहामा जब विदूरन हो 'नाएगा नव वास्तविस्तास पता लगेगा और तव शररा प्रदानाद मनरे का घटी दे रहा होगा। सस्कृति सीधे सादे शदों मे सस्कृति या तो मैं यही अथ मानता है कि यह समूचे मानव-जीवन या वियसित स्प है । यह केवल सभ्यता का श्रा यास्मिा पहल नहीं है जैसा अक्सर सस्कृति का अर्थ लोग लगाते है। यह मानव समाज की प्रगति के लिये दिग्दर्शक यत्र और नाविक दोना है। यह मानव जीवन को सार्थक बनाता है और उसे पशु तथा द्विज जीवन से पृथक् करता है । सस्कृति से ही मनुष्य प्राथमिक अवस्था मे जीवन के वास्तविय श्रथ और मूल्य को समझता है और श्रत मे अपने उस वास्तविक पदय तक पहुँचता है, जहाँ उसे एक मात्र अनत शान्ति, प्रेम, पान द, मुक्ति तथा मंगल प्राप्त होते हैं। -प्रो० थान युन शान (चौनी विद्वान) साना विडा खाहावीर के पथ पर मुनि श्री सुशीलकुमारजी मेधावी यिनारक विड निवार मानवीय उदात्त भावनात्रों से श्रोतप्रोत महावीर यो रम्किन जैमा उम्र थोर टालस्टाय वैसा शांत विचा सनद्दो क्हा पा रास्ता-क्योंकि वे जारा एकांगी रूप हैं, वे तो सावान् मााय, व्यत्तित्व प्रधान विभूति भनोग्वी प्राय पाए म बन्नयात मी गिराली ज्योनि और रन-जन के सूचमनम जीवन में उलझी और पनी हुइ मानसिक गुलिया को मुलझाने वाले दीन हीन पाना भगवाही कहे जा सकते हैं जो कि मानय ही उत्तम रूप है। उनका गौरवण, हिय ललाट, पचस्य चेहरा धीर तेजस्वी शॉखें नपा मुगग्नि देह सर मानय नैगी ही पी। उनमें कुछ मी तो अन्नर हींगा" उनका स्वभाव रहा ही कोमल नगनीत से भी अधिक द्रवणशील, उनका बौद्धिक विकाम बाहुन ऊँचा, उनए जोया या चितनशील शिरा मन गहरी और मजबूत चिन्नु मम मातह। पह, मन, बुद्धि, इन्द्रिय, प्राण, और भारमा सब हमारी इस तरह की । उगवी परिस्थिति हमारे में अधिर विकट । धर्माधता, मताधता, कहरना, महामूर्खता, निरक्षरता और अमान वीयता प्राजमाने में भी ज्यादह। पशुओं को प्रग्नि में फूंक दें और नारा को पैरा का नूती सममें एमा विक्ट समय था तव । उनकी श्रादने धधिमाँश में महामा गाधी से बहुन माग मिलनी-जुलता थी। विनोदा, मयस्वाला और रगडन मी सादगी उनक भाग पाती थी। ये तो मोटे मोटे पत्र पाने सो हैं पितु ये तोइस गरीब भारत काएनन्नुभी नहीं लने मब गीनों य लिय छोड हुए थे। लेकिन य गर कुछ मिलमिला पर भी उनकी लम्बीर नहीं बनती। श्रयेले गांधी को भी उसका उपमान नही राम माने क्योंकि, महावीर को एम्दों के रंगों में उतारना परिन ही + -- नहीं अपितु श्रममा है । ता अनिता नीय माहसी, प्रयोगात्मा, दार्प-नास्त्री युग दृण श्रीर युग-सा पर ये म्प म पारायण ये। महावीर प्रायड रेस स्वप्न मिद्धाती और मीरे पैसे , यारागावद्ध, तथा मार्ग स भौतिकवादी नहीं थे। यह टीक है कि अपरिग्रह और माम्य भावना + वे सर्वप्रथम मदाता श्रषश्य थे। महावीर कपिल से ज्ञान प्रधान और पातम्जनि जैम किया प्रधान भी नहीं थे। वे मीमा बैग या प्रधान और घेदान्नियों जैसे निता त बसवादी भी नहीं थे, गौतम नैसे इश्वर समर्थक श्रीर चार्वार मे ईश्वर विरोधी मा नही थे भगवान क्या ये य कहना कठिन अवश्य है किंतु अमामा ही । हा, अनुमा का श्ररलम्बन तो लना हो पड़ेगा । महापौर साम्यवादी होने पर भी ट्राटसी और लेनिन से पनी माति वे समयक नहीं थ। ये ये सब कुछ और कुछ एक नही थे । 7 पड़ पादी और ब्रह्मपादा नहीं होने पर भी जर और चेताय की सरा को बिल्कुल सतुलित रूप में स्वीकार करत थे । रितु जड़ से चैनर और तय से जद की उपत्तिको चेन कल्पना मानते थे। महावीर प्रान कवियों से श्राराधक नहीं थे अपितु साधा थे। अटारिया और महलों में करीनों से भूगो, गा, दरिद्रों और मजदूर्ग के चित्र रॉचो वाले भाव में प्रगतिवादियों नेमे मा महावीर नहीं थे। विधवाओं और समाजरी दुरवस्था पर माँग्न पर थूर लगामर रोने का अभिनय परो वाले ग्रान नेताओं से भी महावीर नहीं थे। और 7 हो शद नित्र ने पाले माहित्यार ही वा थे। महावीर मेरे श्रादशवाद पर ही भूलत पे और दही कटु यथाथवादी की तरह काटें निगेरते थे। यह तो जीया २ पारगी, नपस्या की मट्टी में समूचा सुग्व-गुपिधानों को मौक देने वाले उद्भर साधक, जोरट और सत्य का साक्षात् करने वाल जीवन-दृष्ट महापुरुष वे महानतम थे और उन गाधनाएँ उमसे भी अधिक ऊँचा श्री- मगन थी। मितुवे भी सर विश्व कल्याण के लिय। ससार प समर प्राणियां की रक्षा और दया + लिये (मरजग जीवरसपण दयपाए समान फेधारण और पोपण के लिये क्षेम और शान्ति के लिय । (तर- पढ़म अहिंसा नगथावर क्षेम करी रात्र जगनीच हिश नित्थदयत्तेहि 1 उन तमगारनयप विहार प्रान्त ये कुण्डापुर नगर म दृश्रा था । जिन प्रकार एक मानवी बालक के लिये मगलोत्म क्यिा जाना है उसी प्रकार ।
+ - उगसे मीअधिक रानमीठाउबाट साथ उनका नाम मगन मनाया पाल्यकाल सेल उनकी साह सा, धीरता, मातृभक्ति, वात्सल्य इन बालमुलम चेष्टाया मे भरपूर 'यश्य है किन्नु साहित्यकारों ने उनको ता अतिरमित रूप दे दिया है कि श्रा क बुद्धियादी युग में बिल्कुल | मानवीय से लगने हैं, और उनम 'ल्पधारा तथा पचोट, गहन स्वाभा गेला पाहिय थी यह दीपती नहीं। गी मन्दिग्ध अवस्था में हम उनकी मारना की पुण्यरथली में ग ही छ निन का प्रयन बरंग। महावीर सयपता जीवन में श्यात्मक प्रियि दु । सर्यानी 'योगपरते रह। उसमदद वह मात्माधिन प्राप्त हो गकी इसम मागे पदार उऐहिक जी की वैधायक प्रवृशियों पर निपधामा रोण को परगो का प्रयन प्रारम्भ हेया। यह गरे जीवा या पटोर पौर कदभरा अगाय था, तु दई इसमें सफलता की मला दिसाद दी और ये एक दम इस प्रायमर राशि में उर दुये और दूगर ही रागा भयार तरपी गेंगटे मड़े पर से याली विधिया और दिल को फंपा दोवाली दारय यथाएँ इन पीछे लग गई। 'मोहनौर अशान भी जागतिक रिश्तेदारियों पर गड़ी हुइ दीवाग को लापन म उहें उछ देर मानहा लगी। वे ममार का श्रादिम श्ररथा म रहो थाले मान की तरह अपरिग्रही, पावटा, और कृषिमता व त्यागी महावीर गजसी मुख मुविधाओं को टुक्रावर विश्व व अशान भूरपएडों को नायो चल पो। यही उनका महा भिनितमगा था । मोगा-परखने यी धुन न उ ये चेता प्रदान की थी। उपसंहानि काल में पनपने हुसे दुरग राघपक महार विजेता महावीर जीवन के संपदनशील हृदय पर, चौर करने वाले मर्मस्पर्शी मम्मरण, लिग अनुचित नहीं लगेंगे। महापार स्टोर माके पर बदते हुये चले जार, एस मठ या जाता है, ठहरोका निमत्रपट- माधीश महाकार- चिर मित्र अचानक पहन वितिज गिर रहा है महन्न पेहरा है। भगवान र मागते हैं, में उमााrary के दिमाएक 19 यहाँ ही ठहरें और उधर महापार भी हैं। मकानों का अपहा मर गाय क उपयुक्त समाधि स्थान देखकर स्वीकृति लिग नितान्त अभिशापयामि द दते हैं और चार भाग लिय धामण्यता यी भूमि में मोह का, गिरलर ध्यानस्प हो जाते हैं। अविद्या का श्रोर अधम या पीज योया गावन के महीने म उमड़ने वाले जाता है। संमार मोती बादल भी उम ग्राम से रूट रहने हैं, तम विभूतियां काम मठ के शट ने पानी की एक धूद भी नहीं बरगती। निगल कर रातमी चाला पहाया है। पशु और मनुष्यों में प्राहि त्राहि मच "मानय ये किराल परा जाता है । भूख से तड़पती हुई गायें प्रतिनिधि रामणि पद और गगम झोपड़ी ये तिथे तिनके चाट जाती दो हो भगयाये मयारतम पीड़ा है। महावार उपेक्षित समाधिस्थ रहत और दारुण पाटदायक बने और ये हैं। कभी महत घर या निकलता है, ऊपर नगा श्रासमान और नाचे नेगो समस्त विपनियों का घनीभूत ममियो को भी पार करत चल जाते हैं। को झोपही महल में लिय घृणा, म्लानि सरना है कि उना रातमत्त पर और मोध का विषय बन जाती है। मायता पा विनयो उद्घोष अथवा बोल उठता है 'श्ररे यो योगी! इस मानवीय इदय अन्तराल में मर झोरड़ी या पास भी न बचा राब, टोक मरे मित्र सिद्धाय ने जो तुम्हे राज्य 7 रहने वाले देवामुर गाम या यह दिया नहीं तो यह भी कहाल पार्थिव रूप कयात्रा द्वारा अभि ৗ নাসা यक्त किया गया हो। बुछ भा हो यह ध्यान मुद्रा में निमग्न महावीर सो मानना हो पाया कि मिरिगोपाल कोपाल महत की मोहमयी वाणी पर चढ़ाम पहले सूफियो म शेतात, पुनाद पड़ती है। उधर उनका मन इस योगियां में दागना और श्राय तर स्वार्थी मनुष्य पर द्रवित हो जाता है स्वियों म राक्षसा में तुमुल युद्ध कर के और पे सदा के लिये फिमी एक बने ही साधक श्राग बढ़ बनाय मरान म रहने की अपेक्षा जगला अयथा नहीं। पहरा और भग भवना का प्राश्रय माधना मथान पाल परा और लेने की प्रतिज्ञा करते हैं। दिल तोड़ दन वाल राक्षमा प्रहारा के महावीर चल पड़ते हैं, नुदा की पारकर आगे बढ़ने की भावना की पृष्ठ गोद म और निर्जन और नि स्वन बन भूमि में हम महावीर के हृदय में धध में जा अपनी साधनाए प्रारम्भ कर देते कने वाली खोज की चाह ही देखते हैं 1 मुभ उना जाग्न में सबसे भी उस प्यार भरा दृष्टि स दया । अधिध पीता-जागता सोर करने राप मारता रहा और महावीर की अन्तम् निकासा वा धक्ता निश्चल तथा निम्तध खड़े उसके सदा ही अनुमा होता है। ये काटने म सहयोग देते रहे । भय, संमार मर व ममम्न प्राशियां की डर और अाशका की गलियों म एक हा चाह अार एस हाराह न घुसने वाला विष उन निर्मीक भग ग्य कैसे दूर हो और सुषमा माग वान पर कुछ भी असर नहीं कर कौन गा है। बग येवल "दुपा येण सरा। यह गरल अमृत बन गया कर" हमा समस्या का सफल समा और प्रेम कुण्ड से वहो वाल उम धान प्रयोगात्मा रूप म दूढना प्रमिल रत को पीकर वह सर्प भी चाहत थ । निपर दुप हो। उधर उनकी श्रार दमन रागा। मृदु प्यार व उम दुपदर के दरान करने ग्रलौकिर श्रास्वाद विलक्षण अनु अवस्व ते उर्ह मालूम हुआ कि भर, दिव्यमूर्ति और भव्य ललाट की इस माग म पगधर विषैला सप स्नेह सिन धारा मकर माँग अपनी गलती श्रगारमा दृष्टि से अपने को सो बैठा, भूल गया, अमृत प्राणियां को देता है। उसका पान में मुग्प हो गया। माननीय श्रॉ भाग बरसने वाले परतों की शाति प नाग सॉप गो मा घुटो तरह लागा उगलनी है। टाने पड़े। यह था मानना का मामा य मनुष्य के लिय इतना दिय चमत्कार निमसे वह मप भी हा मुाना पर्यात था, दिल कॉप मानवता का अमर पुनारी बन जाना और भैरवा, मयाननी सम्वीर गया। और उधर साधर महावीर मी पो मन म बनाएर भाग खड़ा एक विशाननेता सी तरह अवपण होना। किन्तु व लोह पुम्प, चहानी करने र । उहें सफलता मिलीमि दिल चाल महागार हँसते हँसते ग्धर मचमुच दुख मानरको विषग्यात्मक चल दिये। धुद्धि के कारण मारा पड़ा है। यह मप श्रिाहट सुनी, पप उठाया उसकी स्वयं की उपन नी है। और एबम पुफकारता हुना महा दु और सुख इच्छाओं के दाम चीर पर टूट पड़ा। सीधा धरना मानव को अनुकूल और प्रतिकूल विपनुमा दाँत महावीर के पैर म परिस्थितिया पर थोप र पिसा चुमो दिया और उधर भन्य स्निग्ध किनारे म कल्पना यो टिकाये रखा मदमुम्कान विसेरते हुये भगवान ने पर विवश होना पड़ा है। यदि (३६) परिस्थिति हो दुख और सुख पा मारते थे और गवार मनुष्य चोर उपादान कारण होती तो एक ही उचामा समझ पीटते थे। पितु परिस्थिति को मानन समुदाय दुग महावीर मनुष्यत्वं में छिपे हुय राक्ष और मुग्यात्मक रूप म क्यों ग्रहण मत्व और पशुल से परे देवत्व क करता १ पुत्रोत्सव माता पिता ५ सम्पूर्ण दशन करना चाहते थे लिय हद्रिक मा और शत्रु, प लिये पाशविक और राक्षसी रूप को विमी दुवोद्रेक का क्या कारण बनता ? पिका मानवीय घृणा का सघात रूप मानना पड़ेगा कि दुम ममत को है जिसे दपत्य ने माननीय जगत रे कल्पना पर प्रतिष्ठिन है और कल्पना निसासित कर दिया है। महावी इच्छा पर, इच्छा मोह पर, मोह उस दल प्रतिष्ठिन मानता के अविद्या और अधार पर प्राश्रित परामाष्ठा को उपलध करने व है। दुसया मूल कारण हमारी उद्देश्य रसकर चले ये । यही कारण श्रातरिक घृगा है जिसने द्वेष और है कि यह अपनी योजक लि इस पूरक के रूप म राग को स्था जीवन को तरह जान को हथेली पर पना की है। घृणा और प्रासक्ति स रग कर बदते हा चले गये श्री उत्पन भुग और दुख मानव की प्रतम भाकर सफलता प्रासा। प्रात्मा से सम्पधित न होकर अधिक पिछले जिन कथाहनों को से अधिा यवहारात्मा बुद्धि से ही रह गया हूँ ये कहानिया नहीं। सम्पध रयस है। फिर भी हम अपितु ए मानवीय जीवन उसे भ्राप्तिवश श्रग मान रह है। श्रायास्मिा लड़ाइया है। महासरी इस अपनत्व की सीमावदी से लई थे, दुधप योद्धा की तरह, नौ निफ्लते ही दुप की कोई रूपरेया इन युद्धों में नो नो सफल अनुभ ही नहीं रहती। वह या जीवन उहें प्रास हुए उसीस उन्होंने इ. दशन महावीर का-जिसकी सोज सपल सूत्रों की अभिव्यक्ति की म महापौर मुग समृद्ध देश विहार महात्मा गांधी अहिंसा को राजनी छोड़कर हशियों में मुल्क लाट दश में प्रयोग करय देसने वाला पहल म कितने ही बार गय और अनपढ़ श्रादमी पैदा हुया और पाय बच्चों काम विठ्ठला कामिनियों और स्मिा अहिसा दशन या दृष्ट्या इ गपार मूरों तथा दरिद कुत्तों का जमीन पर अलौकिक महामान शिकार होना पड़ा । कुत्ते काटते ये, भगवान महावीर हुया। खिये ठग करती थी, बच्चे पत्थर मठ की कहानी में लोम श्री च (३६) त्याग की लड़ाई सप पे म्पक में ब्रह्माण्ड की ओर और सीमा से हिंसा और अहिंसा का युद्ध, रागम असीमा की पोर ही चे चले थे। और शल पाणि यक्ष की प्राल्या ग्राज यह भी युग पाया है यिका में राक्षसल श्रीर मानवता कि विश्व महावीर की शोर चला का संघर्ष लाट देश के गवारों का है । अगात सम्यता के चल पलना चोर समझने की भ्रान्ति म अनधि में विहार करने वाला पान ग कार और स्वत्त्व का दूद, गमि इसा7 सुपशान्ति की सास लेन ये लियों में कयन में व्यभिचार और लिये अहिंसा की अोर भाग रहा ग्रहावय की हार-जीत का सेल है । भौतिक विज्ञान का उपचय हास दुम और मुख को सोना की के गढ्ढे में गिरा जा रहा है, प्रवृत्ति म सत्य और असत्य को अन्तिम बुझते दीपर की चमक दूदने की चाह ही मुख्य रूप से एवम्ब, उद्रजन बम्ब के रूप में दिखाई गई है। हा सर घनायों में चमान को है विश्व के विनाश गफलता महावीर को श्रोर रही स डरी युद्ध परत जनना सत्य है, श्रात्मविश्याग, अलौकिक श्रद्धा अहिंसा का गान मुना चाहता और जीवन दरान भगवान् को प्राप्त है अणुशक्ति के उपासक स्रा और हुअा है इसीलिये हिंगा से अहिंसा अमेरिका मी शान्ति के लिये छट को, असत्य 7 सत्य को, चौर्य पटा रहे हैं। अहिमा का विज्ञान से अचीय को, व्यभिचार से प्राचर्य और विधेयामक दृष्टिकोण राममो को और लोम से मतोष को मान + लिये वैशनिमें श्रीर राज यता का वास्तविक रप मानने का नातिशों में मिशा भारत में धार ही धनुरोध किया है। हिसा और समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। अहिमा को श्राप इतने यापक रूप हम अहिसा का महत्ता न भी से समझ लानिये कि केरल हिंमा हैं और भगवान महानीर ने अनु म समम्त श्रगानीय प्रत्तियों का भर तथा हिसा भैरव रूप अपन समावेश हो जाता है और अहिया सामने रख लें तो भी हमारे सामा 417 में समस्त माता अहिंमा की उपयोगिता स्पष्ट समभ शिया का एस दिा था जब में थानायगी। देखिय, मामाजिक महानोर न विश हित के लिये स्थिति में यदि हम एम एस दुदित विश्व की अोर प्रयाण किया था, को कल्पना करलें जिस दिन केवल व्यरि से समष्टि की ओर, अएर से मानव कोरी हिंसा, कोरा -असत्य (४०) और चौरी तथा “यमिवार का जो धार्मिर रिया काण्डों में जाकर प्राश्रय ले ले तो क्या श्राप मा। मूर हो जाता हो, उपानी म श्रार मरने हैं कि एक क्षण के लिये भी बलि में जो अहिंगा हिंगा पा दम मानव टिका रह माना है। भरती हो मी हिंसा यमी भी मिल्कुल ही, श्रान ये गे मानर मानम गरिराट् शापि और शान्ति ग्रमाज मा पसाया श्रापको दोष की धार नहीं ले जा सामा। रहा ह य सर अहिया के कारण म विश्व की उन तमा विभू ही १ मा पुत्र की अहिंमा करता है तियों को पवित्र माता, और श्रीर इसी प्रकार सारा समान एक ग्न समार के समग्न मर्मी 'माधा, दूगर पी हिसा रखता है तथा महापुम्पों न दग अहिंगा का ही समान बनता है नहीं तो माव अयलम्पा लिया है, मैं यह माता ममुदाय हिमा अपनान तो मा है धुरा, जरथुम्त, अरस्तू, बनाया ममी मेल बिगड़ जाय? यार मुहम्मत की भी विश्व को यहा इमान नहीं बलि र पत्थर महारानम टन है, वह अपनी अपनी 1 तुम्ह दीग और रखने वाली शिपलायों म मायानगीय और ये होंगी पहादी चाटिया । पृज्यास्पद से कि- कौनसा माग अपाना चाहत मयममाग में युद्ध, का में हो हिंमा का या अहिंगा का दूसरे इमा, गानवीय मुधारों में जरथुस्त, शाम निमा चाइन हो या सामाजिर यास्था में अरस्तु श्रीर विम? विकास या मिनाश। यदि विश्वास जगाम मुहम्मद अपनी सत्य काम रल्याण और उत्थान अपनी शानी नहीं रमन किन्न मी अानाक्षा है तो याद रफो। हा अहिसा की व्यारया का प्रश्न मा वाय ममार तुम्ह हिमा को मया रटेगा वहा तो हम उस दिन र अहिमा थे शा तसाम्राज्य तपस्वी महानगर का ही म लेना या मनग लेा ही पड़ेगा इसके पड़ेगा। युद्ध को गुला दना घाइते साथ यह दूसरा बात मी याद हो और अहिमा की स्वागीण गगनी पड़ेगी कि हिमा भी वह यारया समझना चागत हो तो जो यामाजिर स प्रारम्भ होकर प्रायो महावीर की वाणी मुले अात्मा तक पिशुद्ध रूप से पनपती और उनके अनुभव से लाम है, रही ग्ल्याण रा सीढ़ा तक उठायो । गाथाजीनी अहिसा या चा सकता है किन्तु वइ अहिगा योन महावीर की नीरनामा “ पामा अहिंसा का यारया हा है किन्नु कर रहा है और शीम से शाम गाधीना का अहिंसा को ससार ने तम इस अभिशाप से मुक्त होना राजनैतिक रूप में ही देखा है उसके चाहता है । “बम्हुणा कम्मुगा दूसरे मुख्य भाग का अाभ्यात्मिा होई" (ग्राहण कार्य पर निर्भर दर्शन नहीं क्यिा है । हालाँति है जातित्व पर नहीं।) की पनि घुमाफ्राि कर धान का जगत् विषम व अनुसार भान विश्व इस जाति परिस्थितियों की टक्कर सागर उधर गत समस्या का समाधान कर्म व ही जा रहा है । समाज में अहिंसा, आधार पर हा कर रहा है । ऊच, सम्पत्ति म अपरिग्रह धौर मतमता नीच, स्प्रश्य और अस्पृश्य, ब्रह्म न्तर म समवय करन को श्राज और शूद्रक नाम पर हमान को का बड़े से बड़ा वैज्ञानिक अपनी बाटन वाला भारत यान म्वय महान् सफलता समझता है।" अफ्रिका में नातित्ववाद के विरोध हम तो हर्ष इस बात का है मिपावापुरी म निर्वाण पाने वाल धर्म, मत और मतान्तर के नाम इस महापुरपका चिरस्ट साध्य पर इसाना दुनिया म बहुत गहरा गाधनाएँ किसी न किसी रूप म अत्याचार हुआ है। ताग, पापण्ड, पनप अवश्य रही हैं किन्तु स्तिना वैर, विरोध इर्ष्या श्रादि दुर्गुण मत अच्छा होता जमाना पहल हा मान वाद का श्रोट म बहुत पनप है। जाता या आज भी उसे शन्द रूप रोमन कैथोलिक और प्राटरटेंट, सिया म समभने का प्रयास करता। परि और मुनी,श्वताम्वर और दिगम्बर, स्थिति चकर देकर तुम्हें अहिमा शैव और वैष्णय, हीनयान और अपरिग्रह और अनेकान्त पर लाकर महायान श्रादि एक ही जड़ दो गड़ा करद इसम तुम्हारा कुछ रूपों में बहुत म्बन-सरावा हुआ है। तारीफ नहीं यासिर करना वही कुछ पड़ेगा और तुम वही कुछ यदि इस स्थान पर थनेरात करोगे लेकिन पिछह पिछड़ कर। और समवय की भनेरादी दृष्टि का इसमें कुछ आनद न । याद उनम दृष्टिकोण अपनाया जाना तो रखोयाज से २५०० वर्ष पहले ग्रान यह रत-पात नहीं हो सकता जिस दीर्घ तपस्वी न जानित्यवाद था। क्या धर्म, क्या विज्ञान, और विरोध में श्रावास उठाई थी धान क्या सिद्धान्त मद ममवय 4 बाद पिमधिमाकर विश्व मा यहा कुछ अपना श्रमियक्ति र सम है। किंत (४) एक युग में इतना रानसन बढ़ा या दम सङ्कीए मनोवृत्ति को मम्मीभूत किमान मानव धर्म + नाम पर करने के लिये ही उटय मितु हुश्रा एक दूसरे का वैरी । यद्यपि दम विपरीत विही व नाम से धर्म का उद्देश्य समस्त प्राणि नगत् बड़े बड़े सम्प्रदाय चल पड़े। इसमें म एक अभेद्य गगात्मक सम्बध का भगवान तो शरण नहीं कह ना पिकाम करना था। क्योकि समस्न मकने बलि ने लोग जो इनके नाम प्राणिवग मा धम स्वभाव लगभग से कुछ अलग मोर्चाव दी रोक एक नैमा है। सब मूल रूप में एक इच्छा थे। उछ दूसरी बात यह नैमा इच्छा लकर गति प्रगति और भी थी कि उस मघर्षरत युग म कोई क्रियमाण प्रक्रिया म लग हुये हैं। विचार गरा बिना मत परम्परा का मानव पार्थिव पिएड पर अाधारित प्रानय लिय पनप हा नहीं सस्ती मा है, यही कारण है कि मनुष्य यो। गिन्नु ब्राज युग म फिर रतनात्मर विज्ञान को अपना भौतिर वही मचाइ थोर समयसी पवित्र पदाध नगा पर अधिक विश्वास भावना ने अगड़ा ली है और वहा करता है। यह स्वाय की भुग्व धम अनकान्त मिस विनयी बनने जा 7 अनुष्ठान नगत् पर ग्राज तक रहा है। महावीर मा कोइ मम्प्रदाय अधिकार जमाये रही है। कदाचित् नहीं था और न जाति पटलने का यहीं से साम्प्रदायिकता ने नम लिया गोद ढग और न धम परिवतन का हो । तदनन्तर श्रज्ञान, परम्परा, कोई रास्ता तथा न सामाजिर प्रथा, रीनि, ग्विार और न्द यवस्था । हाँ, मानव समुदाय निस क्रियाएं करच बनार इस पिशानिनी हम मानव समान कह सकत है माम्प्रदायिस्ता को प्रनय दती रही उसकी अधिक से अधिक मुष समृद्धि है। जिसके कारण मानव हम अधी १ लिये अहिंसात्मा ग अवश्य विचार परम्परा के साथ अाज तर बताये। बढते हुये मिथ्यार को रोक्ने किमीन किमी रूप म चिपका हो मलिय सत्य, मानव व निर्माण ५ रहा है। भगवान महावीर ने हमी लिय ब्रह्मचय, मामातिर यवस्था के को एपाल यास, एमाली दृष्टि और लिये अधिकार और मर्यादा तथा अपूण खोज के नाम से पुकारा था। अपरिग्रह का श्रादश उहाने पिया। यदि मैं क्टु सत्य कह दू तो माना य समस्त नियम उहाने दवाव थोर ही पढ़ेगा कि ये पवित्रतम रितिया विरोष पर नहीं अपितु मानवाय मगवान महावार और महान बुद्ध उत्तेजना रन्ति अधिकारी समान अनुसार रखे। इसीलिये इनमें करता है। उनका ऐसा कहना है कि मयादा का भी विधान किया। समार दो विरोधी तत्वों का सम्मि त्रित रूप है। इसी प्रकार आन्तरिक श्रीमती माएसरी सेंगर विश्व चेतना और बहिजगत दोना विरोधी जनीन परिवार नियोनन के लिये होने पर भी एक दूसरे से सम्बद्ध गर्भ निरोधक केन्द्र स्थापित करवा अवश्य है, विरोधी होने के कारण रहा है। स्तिना अच्छा हो कि चेतना का धन के प्रति आकर्षण ही पासना के काचः सं निग्ल कर दीवता है। मूल रूप में नहीं है। महनतम साहस और उत्साह का दोनों स्वतत्र और महयोगी है। तूकान चलाने वाले वार्य गंवर्धना ऐसा न होता तो एक का श्रापस में स्मा ब्रह्मचर्य का उपदेश दिया जाय श्राकर्षण ही नहीं हो मकता था । और मानव को पवित्र बनाया जावे । यदि मार्स ग्रान्तरिक चतना को साबिर श्राना हसी माग पर पड़ेगा भौतिर जगत् का उच्छिा और लेकिन वासना का दुर्फल पाकर । पारित रूप न नाता तो वह भी कितना अच्छा हो कि नैटिक ब्रह्मचय अपरिग्रह क नन्य युगीन यारया का पालन किया जाय और साथ म कार मान लिये जाते। कीड़ों मरोड़ा की तरह बदती दुर जनसरपा का प्रश्न मी सुलझ जाय । जिसका मूल स्रोत अपरिग्रह दर्शन महात्मा गाधा, श्रीसम्पणांनद, श्री ही रहता। वह तो मानव समाज राधान् श्रादि नता, पण्डिन, का विभिन अपस्था देख कर दार्शनिक भी इसी तथ्य पार निष्कप बौखला उग है और चेतना के को व्यवहारात्मक बनाने का उपदेश दे साक्षात्कार में गहरी भ्रान्नि खा रहे हैं। भौति जगत् का यारया गया है। मैं मानता हूँ कि बाह्य कार माक्स प्रातरिक माननीय विषमतायों का जाम इस सम्पत्ति के चेतना को इस पार्थिव जगत् पर विषमीकरण पर हा निर्भर है किन्तु एकातत अाधारित मानता है। मानमिक और यात्मिक स्तरीम लेनिन, थार ट्राटस्ती इसकी हों में चनना भी अपना अलग अस्तिार हाँ, मिलाते हैं। और दूसरे पूजा रखती है उससे तो इनगर नहीं वादी दश पूजी स इसान की कीमत किया जा सकता। यह याद रखने ऑक्ते हैं जिससे उनको पार भी वाली बात है श्रान्तरिक चेतना से पुष्टि हो जाती है। किन्तु महावीर शल्य यह मातिक नगत कोरा का अन्तदर्शन इस बात का विरोध अभावात्मक और उनड़ा गहर da- गाहा दागेगा। निमाविमाश्म दंगों या जीपा दा पा रहाई। इन नही मर है। थोर पुन प्राग पदम पाता भगयान महावीर पा को म पनि पर पहुँनारियाज का रिश्प यहा परने काउनु मनुष्य की यहारमा घरहर मानत है। और अन और नल का है जहाँ कि भगवान उसे पगा पाहत ५ । पर नि गोगापटा धावश्यक महयागी तत्व । जिगर पनाहग विभिन्न मनि मानय का और श्रीगा, मग, ममप मार শশা দ্বী বি মিল। गानि नाम पर पm पि अनि नहीं हो सकता यस गा वि गमाएं दिगा में अलग और दिमा रगी कुछ महत्ता नहीं मागत। फो धार मनी मानव मना गीलिप हाने स्पार्य पेरा पत्तियां उमा मसापीर मिदिर पर का गहन कर रही हैं। प्राजका यी सरह मुयण का देश निकाला 1 विश्य असा पराम उमाया, यर उमसे मूर्दा त्याग श्रोर उगमा और उनका तया उपसाधना मयादा का उपदेश दिया । जिस पर प्रतिठिन फागा नाहना । माव वीश्रामलिमी का हो मुभ तो एमा लग रहा है यह गहस्य पार मामारित व्यवहार भी भा युग था कि जर महापार ग चल गरमञ्चर वृत्ति ये भगधा। जगत् + हित रन लिए अपना पिराधी ये धार विषन्ति पराया प्रणालीम भयादित वन का यह विराट् माधना म तत्पर ग्राम पिर गुभ येना प्रारी विश्व उपदरा दन थे।माधीसद कीप राप्रपा प्रशान जननासम रोपा में लगभग महावार य मुन्य महावीर का दिश्य पी में शरा तत्वा कोमोर म्प से ग्रहण तो पर श्रापको महाधार पाना चाइना लिया है किन्तु उनका श्रायास्मिाना है। लगभग म तो विश्व कप हुपी रहा है। क्ण से यही मायना मा पा रहा अन्त में विगोवा में गर्या हरिप्रभो! दययाद म, पलीलजिनान व माय याद म, पूर्व और पश्चिम व शान्ति "भयतोमा महावीरवं गमय वादियों में मैं तो वहा भगवान तमसो मा योनिगमय महार व बनाए हुये अहिसात्मक मृत्योर्मागून गमप" भाई। निज हित- निज समकित- कारज करना। सारस हीता + F - निज हित कारज करना भा) निज हित कारज परना । मनम मरन दुस पावत जाते, सो विधि-गध फतरना !! शान दरसपरराग परस रस, निज पर पिद भ्रमरना । सधि भेद पुधि ऐनी त कर, निन गहि पर परिहरना ॥ परिमही अपराधा शंके स्यागी अभय विचरना । यही इक धर्म मून निज समकिन सारस इंटा समरिन महित नरक मासा बुधग्न चट तह ने निकमि देवास मुरान ददर , स्वावाम प - तह दे - , खेनु डर मार रपी पर पाहबंध दुम्वदायर, स्यागत मा मुम्न मरना ॥ जो भर भ्रमन न पाइनो पर, मुगुरु सीसा दर धरना । 'दौलत परम गरम पाग, ज्यो जिनमे मारना भानित कारजदरमा नाकार मनुष्य जी रहा है-मनुप्यता मर रही है उपनिषद् व युग से श्राज तर नेमीच द जैन मनुष्यता को अमानुषीर तत्वों से जो सघर्ष करना पड़ा है उसका लगा, पगार, कहानगर इतिहास जहा एक थोर क्सक स पूण है वही दूसरी ओर वह उन मनुष्य का माप्यता में उसकी 'लाल मिशानों' की योर सङ्केत चेतना प्रथम सत्य है, मगुप्य दूमरा। करने वाला भी है जिहें हम यद्यपि यह सहा है कि मनुष्य धार अक्सर तब भूल जाया करते है मनुष्यता दोगा अस्तित्व सरापत है जय हम मनुष्य पे लियास में किन्तु इस युग के कुतूहलपूर्ण मनुष्य न रहकर मनुष्यत्र का दम्भ भौतिक चमत्काराने हस सत्य यो लिये उसकी जीवित लाश हाते हैं। कि मनुष्य मान्यता का 'कीट' उतार तब से हम बहुत उट है, तब से हम कर मा जीवित रह सकता है, अधि बहुत गिरे हैं । हमार उठन था याधिक प्रचारित रिया है ।धान मानदह भौतिकता और गिरन का मनुष्य ना रहा है। मनुष्यता बिलग्न पैमाना ग्राभ्यात्मिकता रहा है। रही है स्थार उमरी मास टूटन अरसर हमने अपन प्राभ्यन्तर को को हैं । पिछले दिनों 'भौतिक इरोनिन' 'श्रई', 'ब' 'निन' 'स्वयम्भू (Materialistic Eo on) श्रादि, सशाओं स निम शक्ति का के भयकर पिवतों में डाला है और सम्बोधन दाशनिर युगों म अब तक उसको मत है वाटवर बड़ प्रसन होता रहा वह हमारी श्राभ्यन्तरिक हुए हैं। हम उटे हैं वह बड़े यों क्षमता हो जो पान की साथ इंसान की उस ताक्त को समस्यायों की दाहय झाटे पार होड़ देकर की मूलत 'याध्यात्मिर बुरी तरह झुलग गद है । जो हो मूल्य' पर श्राधारित है। हमने इतना तो मानना हा चाहिय कि मनुष्य की चेना को श्रावरण म मनुष्य का मन श्रान पहले में बहुत रसार उसकी शारीरी शत्तियों छोटा धार सोटा हो गया है । और सम्पत्तियों को ही प्राथमिाता छोटा हो सो तो कोई बात नही, दी है। किन्तु त्रियुगी सत्य इसर पर खोट उसम उत्पन्न हो यह विपरीत है। वह यह कि बिना चित्ता का विषय है। धर्म बद्द है स्वस्थ चेतना के स्वस्थ रक्त सस्थान तो मन ५ दायर को दरिया की स्थिति असम्भव है। बनाये । नाति वह है जो मन को - (४७) नयन दे । कर्म व है जो इस गोत मनुष्यत्व' । त्रिवेणा है । यही को पाकर मई-भूत-हित में लगे । मनुध्यता का महान् तीय है। यही और यदि बाब यह मर नहीं अपगाह पर युगों की चेतना र है तो निश्चय हा कोई ऐसी बुनियादी तर निप्प हु है । श्रार 'मशीन' वजह होना चाहिये निसने इन सब की गर्मी ने इस निवेणा का जल मानव मूल्यों को अपनी वास्तविकता मोम्ब लिया है हमालिये मानव स नारे गिराया है। यह बुनियादी महलिया मोनर से तलफ रही हैं। घुन है-"जीयन का श्रम स तन" नो हो यह सुनिश्चित है कि अब नावन ने श्रम को छोड़ दिया तर रीन गये पानी से मनुष्य का है गालिय उसका श्रमणत्व गिर मगल घट पूरा नहीं जाना | मानन गरा है । दूमर लफ्जों में- ममात्र उत्तरोत्तर पतन के महागत्त हम बावन म श्रम व सामञ्जस्य को में विवत्त लेना हुधा उतरता जायगा, उतर रहा है। हा मनुष्यता मानते हैं। वह इन दिनों मनुष्य हलका नहीं मनुष्यना हा क्या जो पिर वोझीला बना है। दुनिया जानती (Statc) हा श्रीर यदि वह है हलकी वस्तुओं गमोद श्रीर क्रियाहान नहीं है तो निश्चय हा मूल्य यजना वस्तुओं को अपक्षा व गतिशाला (Dynamic) है। अधिक ही होता है-बशर्ने यह मनुष्यता बढ, घट नहीं, इसा सी स्वभाव का हलमापन नहीं पर्याय पहरदारा युगा स-धम, दशन और का हलकापन हो। स्वभाष को यह जीवन व अन्य सत्यावषी तथा ग्युश-नसीचा परिग्रह से नहीं परिग्रह म्ला शोधक मूल्य करत श्रारह हैं। अभाव से ही सम्भव है। मम्यक् मनुष्य श्रमणत्व से बच नहीं धाज पाचरण ने भा'कर्म का माना। और यदि वह श्रमपत्र म माथ छोड़ दिया है। यह भी एक चचना है तो निश्चय मानिये उसम कारण है जिमने मनुष्य के गम्यमत्त का अश दिनों दिन तुझ कोक्षन विनन किया है। सत्य व सम्यक्त्व रहा है। उसके हम अंश की युभा सचरण की इस दिशा को जब तक हट में ही उसकी नीते नी मौत है म नहीं समझ पाते तवता मनुष्य दुःख है मण्टापन स्थिति है। 'श्रीता रहेगा तो क्या, उसमें ग्राम्य वाज का युग की मबस बड़ी... न्नर का प्रमुम्ब अश-"मनुध्यता"- अपक्षा 'श्रमणत्व, सम्यक्त्व और उत्तरोत्तर मरता रहगा।
नागरिकोचित संस्कृति महापडित श्री आशाधरजी ने श्रमणोपासक नागरियोचित सस्कृति पैसी होनी चाहिये, इस यात का एक श्लोक में (सा धपो) वर्णन किया है। जो कि इस प्रकार है- x १ याय से धन यमान वाला हो अर्थात् श्रमजीवी हो, जुबारी न हो। २ सद्गुण सेवक हो । अर्थात् गुरजन (गुणीजन-सजन ) सेवक हो, दुजन सेवक न हो। ३ हित मित प्रिय भापी हो। ४ निवग (धर्म अथ काम ) को परस्पर विरोध रहित सिद्धि प्रानि- फरने वाला हो। * ५ नागरिप हो । अर्थात् सामाजिक नियम पालक तथा दाम्पत्य जीवन वाला हो। ६ लजालु हो । देशरमे न हो। ७ योग्य (मद्य मोस रहित) आहार तथा योग्य विहार करने वाला हो। ८ सत्-सजन-सगति करने वाला हो। १ विचारफ हो। १० कृतज्ञ हो। ११ इद्रियों को वश में रसने वाला हो। १२ धर्म विधि को सुनने वाला हो। १३ दयालु-दानी- हो। अर्थात् अज्ञानी, भयभीत नगे भूखे, तथा रोगी-अपंग, इन चारों प्रकार के दुखी जीवों के लिये यथाशक्ति तन मन धन त्याग करने वाला हो । x१४ पाप (हिंसा, भूठ, चोरी, कुशील, परिप्रह) से डरने वाला हो। x जूश्रा, मद्य, मांस तथा पच पाप, इन पाठ का कुछ न कुछ रूप में त्याग करना, नागरिक के ये आठ मूत गुण कहलाते हैं। • सागार धर्मामृत ६०६२ ३०१ (जिनसेन श्राचाय आदि पुराण) थी संयोगिताग, महावीर जयति महोत्सव कमेटी सपोगितागंज, नदी- द्वारा प्रचारित २ । 1 मसीहा ने कहा- "तुम सुन चुके हो, कि पहा गया था, कि आप रे बदले श्रास और दांत के बदले दांत । परतु मैं तुम से यह पहता हूँ कि बुरे का सामना न करना परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे उसरी ओर दूसरा भी फेर दे। यदि कोई तुझ पर नालिश फरपे तेरा कुरता लेना चाहे तो उसे दोहर भी ले लेने दे। और जो कोई तुमे 'कोस भर वेगार में ले गाये तो उसके साथ दो कोस चला जा । जो पोई तुझसे मांगे उसे द, और जो तुझसे उधार लेना चाहे, उससे गुह न मोड़। *"तुम सुन चुके हो, यि पहा गया था कि अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने यैरी से बैर । परतु मैं तुमसे यह कहता हूँ, कि अपने पैरियों से प्रेम रसो और अपने सताने वालों के लिये प्रार्थना क्रो। जिमसे तुम अपने स्वर्गीय पिता पी सतान ठहरोगे क्योंकि वह भनों और बुरों दोनों पर अपना सूर्योदय परता है, और धर्मियों और अधर्मियों दोनों पर मेह बरसाता है। क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखने वालों ही से प्रेम रसो, तो तुम्हारे लिये क्या फल होगा? क्या महसूल लेने वाले भी ऐसा ही नहीं उरते ? "तुम पुत्री के नमक हो, परतु यदि नमर का स्वाद विगढ़ जाये, तो वह किस वस्तु से नमकीन किया जायेगा ? पिर वह किमी काम का नहीं, फेवल इसके कि बाहर फेंका जाय और मनुष्य रे पैर तले रोधा जाये । तुम जगत् की ज्योति हो, जो नगर. पहाद पर वसा हुअा है यह छिप नहीं सकता। और लोग दिया जलापर पैमाने (एक धर्तन जिसमें डेद मन अनाज नापा जाता है) फे नीचे नहीं परतु दीवट पर रपते हैं, तय ससे घर के सब लोगों को प्रकाश पहुँचता है। उस प्रकार तुम्हारा अजियाला मनुष्यों के सामने चमके कि वे तुम्हार भले कामों यो देसपर तुम्हार पिता की, जो स्वर्ग में है, पढ़ाई करें। "मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा, हूँढो, तो तुम पाओगे, खट खदानो, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। क्योकि जो कोई मांगना है उसे मिलता है, और जो हुँतता है, वह पाता है, और जो सट खटाता है, उसके लिये खोला जाता है।" . .
नागरिकोचित संस्कृति महापंडित श्री आशाधरजी ने श्रमणोपासर नागरिफोचित सस्कृति कैसी होनी चाहिये, इस यात का एक श्लोक में (साध) वर्णन किया है। जो कि इस प्रकार है- x १ “याय से धन कमाने वाला हो अर्थात् श्रमजीवी हो, जुआरी न हो। २ सद्गुण सेवक हो । अर्थात् गुरजन (गुणीजन-समन) सेवा हो, दुजन सेवक न हो। ३ हित मित-प्रिय भाषी हो। ४ निवग (धम अथ पाम) की परस्पर विरोध रहित सिद्धि प्राप्ति धरने वाला हो । * ५ नागरिक हो । अर्थात् सामाजिक नियम पालय तथा दाम्पत्य जीवन याला हो। ६ लजालु हो । बेशरमे न हो । ७ योग्य (मद्य मास रहित) श्राहार तथा योग्य विहार करने बाला हो। + सत्-सब्बन-सगति करने वाला हो। । विचारक हो । • फतक्ष हो। १ इद्रियों को वश में रखने वाला हो। २ धर्म विधि को सुनने वाला हो। ३ दयालु-दानी- हो । अर्थात् अज्ञानी, भयभीत, नग भूखे, तथा रोगी-अपग, इन चारों प्रकार के दुखी जीवा के लिये यथाशक्ति तन मन धन त्याग करन वाला हो। १४ पाप (हिंसा, भूठ, चोरी, सुशील, परिग्रह) से डरने वाला हो । । जूश्रा, मद्य, मांस तथा पच पाप, इन आठ फा कुछ न कुछ रूप में त्याग करना, नागरिफ फे ये आठ मूल गुण कहलाते हैं। • सागार धर्मामृत ३ ६०६२ ३०३१ (जिनसेन प्राचार्य श्रादि पुराण) सयोगितागत, महावीर जयति महोत्सव कमेटी सयोगितागज, दौर द्वारा प्रचारित - - निय वे अमय भी है। विज्ञान का नहीं होता। 'सत्य' प्रत्यत्त होता है। कसौटी पर जिस दिन भी वे मत्य माधुनिर व्यापार, लाभ की दृष्टि स, मिल हो जायेंगे, मरा 'न' उस व्यवहार म लोग 'मत्य' मान लेत समय उहें मन्य मान लगा। हैं । यान काला धागार भी सत्य है महामा गाँधी को मृत्यु को मैंने पर यहा नो 'अमाय' है। स मत्य 'निर्वाण' का रूप मान लिया है। धम य मानन याला को मजैन' 'मोत' और 'निमाण का परिभाषा कैस यह सकता है, म कहता हूँ-- श्रा कप में महामा गाँधानी उत्तम क्षमा, मादन, श्राव, सत्य, अग्धि निमनन किया को मान गया शौच, मयम, तप, त्याग, किचन, हूँ। जैन शायो म शायद यहा तो ब्रह्मचय य मा मत्य हैं । 'मदाचार कहा गया है कि 'मोन' याने म धम' मत्य है लेकिन 'निया कमकार्ड' मन राधा पुनई म समभार मुक्ति धर्म व 'मस्य' नहीं। य मामयिक और उसका रूप है-शरारा श्रानार भद हैं। परिवताशाल है। कप रवन्'उड़ जाना । यह वपरन् मिलान कलिये इनम परिवर्तन उड़ जान का मतला है निमका यश उचित है अपथा 'सत्य' का कल्याण मारम दशों दिशाग्राम प्रमारित हा ना हो सकता । पराधी को उठे-महक उछ ।, क्या इस युग में परिभाषाएँ गहा म्प में समझना महात्मा गांधा सम्धि मिजन चाहिय शास्त्रा अवलोक्न स किया गसार कानकोन म जल मदानार का प्रतिमाएँ'-दर्जा र दर्जा भवतात्रों चरणों में उत्म सहित धारण करने का क्रम निर्धारित कर परो को मे हा नहीं था। दिया गया है। इसलिये श्राक्षेपक यदि यी, तो 'निवाण' मरे, पहले इस सत्य को विचार लें। भवतुत हा गया । मलख विस्तार की दृषि से अधिक नहीं कि महावीर का निर्वाण लिवू गा, लेकिन म मानता हूँ कि ऐसी ही प्रक्रिया थी। -सत्य' सापेक्ष 1 + 'मैं जैन है %3D 1 लोग अक्सर मुझसे पूछ बैठते हैं--"तुम अपने नाम के साथ 'न' श्री भानुफुमार जैन लगान हो, रात्रिभोजन का तुम्हें अनुवादक, विचारत, पत्रकार त्याग नहीं है, मदिर नाते नहीं हो, कम काड का पालन नहीं करते कैम 'नन' हो"यश्न सही है । मेग है, पार्श्वनाथ न मी यही पिया हो, निवेदन -नैनधर्म के प्रवर्तक लेकिन निशासा से यह बात सिद्ध श्रादिनाथ याने ऋषभदव थे। होती हैं कि वे सत्र महात्मा सत्य को उदोंने स्याद्वाद, अपरिग्रह, अनेकात शोधो वाल थे, और ना बात उन्हें श्रीर धीतगगता के ग्राधार पर उपयुक, उस समय का विचार-बुद्धि जैनधम प्रतिष्ठापित रिया । इन स लगी, वह धर्म प्रवतन के रूप विचारों की स्थापना म पृष्ठभूमि उस में 'वीकार कर ली। म भी इसी समय का सामाजिक समस्या रही मयता को लेकर "शद की होंगी । महागीर व समय भी 'हिमा, अभियनना को धारण किए हुए हूँ । यज्ञ और बलि' ये तांडर सी बात श्राचार और वियाकर्मकांड की दृधि इतिहास प्रसिद्ध है। यनि मनो म मुझम और धाम । जैनियों में बढ़त दन का परिणाम ही सामापित प है । मैं बुद्धि और तक की धारणाओं की प्रतिष्ठापना है । शोध, पौटी पर श्राचरण कर, अपन को, विनार उममा जरिया है। श्रापमाव मधम के संस्थापक ऋषभदव और या महावीर ने नाय विज्ञामु होकर तक पाश्च नाथ, मावीर की माग पे लिय चिंतन किया । इगेने पापग में ही एक अनुयायी मानता पृव को प्रतियापित नहीं किया पुद्धि है। 'मत्य' को सापत मानना मेरे श्रीर अनुभव ग सहारा लिया। निय भी समय नहीं है, प्रत्यक्ष मत्य गमारमाय शायद अनन वर्षों में है। मानक इस वैज्ञानिक युग में में प्रतिपादित 'भगवान' की उपक्षा मनिता है-स्वर्ग, नरक, व्यतर मीलिय महावीर ने कर दी। नाति र दव, पुजम, माग्य नादि एतिहागिक गान मुझ ही है, मभव विषय तकनय नहीं है, और दमा लिय व असत्य भी हैं। विज्ञान का नहीं होता । 'सत्य' प्रत्यन होना है। कसोटी पर जिस दिन भी वे सत्य अाधुनिक व्यापार, लाभ की दृष्टि से, सिद्ध हो जायेंगे, मेरा 'जैन' उस व्यवहार म लोग "मत्य' मान लेने समय उन्हें मृत्य मान लेगा। है । यान सला बाजार भी मत्य है महात्मा गाँधी को मृत्यु को मने पर यही तो 'असत्य है। ऐस सत्य 'निगण' का स्वरूप मान लिया है। धम , मानन वार्ता को मजैन' 'मोक्ष' और 'निर्वाण' का परिभाषा कैसे यह माना है, म कहता हूँ- श्राज प म में महात्मा गाँधा का उत्तम क्षमा, मादव, श्राजव, सत्य, अगि विसजन किया को मान गया शौच, सयम, तप, त्याग, अश्चिन, हूँ। जैन शास्त्रो म शायद यही तो ब्रह्मचय य सर सत्य हैं । 'सदाचार कहा गया है कि 'मोन' याने. इस धम सत्य है लेकिन 'निया कमकाई' मत्र पाया पुनर्जन से सनार समुत्ति, धम र 'मत्य' नहीं । य सामयिक और उसका रूप है-शरीर का श्राचार भद हैं। परिपतनशील है। प्रवन् कप रवत् निधिलाने लिये इनम परिपतन उड़ जाने का मनलब है निसका यश उचित है श्रा'सन्या कल्याग सौरम दशों दिशाश्राम प्रसारित हा ना हा साता। दशधा की उठे-महा उठ। क्या इस युग म परिभाषाएँ सी रूप में समझना महात्मा गाँधा रानस्थि विसजन चाहिये । शात्रा के अवलोक्न से क्रिया समार के कोने-कोने म नल सदाचार की प्रतिमाएँ'-दजा र दर्जा देवताओं ५ चरणों में उत्मय सहित धारण करने का क्रम निर्धारित कर प्रवाहित परने की एमाहा नही या दिया गया है। इसलिये आक्षेपक और यदि यो, नो 'निर्वाण' मर, पहल इस सत्य को विचार लें। मामने प्रस्तुत हो गया है । म लेप विस्तार की दृष्टि से अधिक नहीं मान गया कि महावीर का निवाए लियूँगा, लेकिन मैं मानता हूँ Ar उस समयाकी ऐसी ही प्रक्रिया थी।' मज" म लिग्व रहा था नसत्य' सापक्ष A 'उड़े जाना। .
मानविनोबा
-
ने कहा-
।
में तो सिर्फ यही समझता हूँ कि जो अपने
पास है, राम दूसरा की सेवा के लिये है। आखिर यह
जो चोला हमे मिला है, वह किम काम लिये ? इस
लिये कि 'मुले नयन पहचानो, सुदर रूप निहारो।' ये
कान जो हमें मिले हैं, रिस लिये ? इसलिये न, कि
ज्ञान की चर्चा सुनें ? जिस दिन झार की चया सुनने
को नहीं मिली, उस दिन ये सात, कान नहीं रह जाते,
साप के थिल के समान बन जाते हैं। ये
हैं ? क्या लोगों को सताने के लिये ? नहीं, हाथ इसी
लिये मिले हैं कि बीमारी की मेवा परें, डरे हुओं को
श्राश्वासन दें, सज्जनों को प्रणाम करें। इस तरह
हमारी सारी शक्तियाँ हम गरीबों की सेवा में लगा देनी
है, ताकि जव समय आवे तब, 'ज्यों की त्यों धरि
दीनी चदरिया।
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हाय सिलिये
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।
কানা नागवल्लरी . स्वरूपकुमार गागेय महानाकार, गीतकार, लेखक , शयां पुरानी बात है- गकुमार कमलनानी सोलहवी यगाठ का समारोह मनाया जा रहा है । राजमहल ये उत्सत्र मवन में उत्माह और श्रद्धा की घरता पर गम्भीरता यात है। लाया 4 कक्ष में नामी घरानां की ममक्ष रख नटित सिंहमुम्बा सिहासन कुलकामिनिया राजकुमार कमल पर मम्राट कीर्तिविजय, समीप हा नयन प सादर्य पर 'वारी वारी अश्वमुपा दमाते शासन पर जाऊ' का उमिया हृदय सागर में रानमार कमलापन, और चरण उचालती र अधरिले पुसुम से दो चरण पाछ हटार मेदामुनी उल्लसित मुकुमार पर दृष्टिया ठिटमा सादे धामन पर महामात्य शवदेव कर मन ही मा प्रशस्ति म उलझ विराजमान हैं । अलंकारों से विभू मुलभ रहा है । और उधर दूसरे पिन एक रास्त राजरानिया भी कोने में एक श्रोर मिट्टी या मूरत महारानी के साथ रेशमी धागों को पड़ी है । मूरत है एक अदनग स्त्री जाल पट्टिका की श्रोट में उपस्थित का। इसे भूत की मोटी दान पर है। सामने दुछ नीचे दशागण लटा हुआ दिखाया गया है और चुप्पी माथे उत्सुकता भरी इणियों में पासु-पाम पद्रह वीस यधिक दाना राजघराने की शोमा निहार रह अहहास 4 साथ उछलते-कुरते हैं। भरी सभा में प्रथम दो-तीन उसरे प्राण ले रह हैं । अति पधियां भराय के बड़ बढ़ राव का भूतिकार है नागदन्न, जो रग उमराव, सरदार, महाकाय सट विरगी पगड़ी पहिने उल्नाम का साकार जमे हुये हैं, और उनके मामा चेहरे पर उमारकर मूरत क पीए कमरा मुख्य मुख्य अधिकारी पाग ही पटकाणी चौका पर बैठा मानव ममारोह लइ रितु लगा है और जब am है। सरकारी प्रनार न हम मुरत जान लिय लाग हट कर रन पातिया' म मा माा है ह, नापदन है किम कसा को श्रार, हमर वध पिया भी प्रादकरन याल ५ वंश का नारा प्रभा राजकुमार मलनवन हो जाता है। कहन है कि इस हाया मम्पन्न होगा। या तो वाम थाल राय या महामत्रा इस राज्य म निसर राजमाग है। वह माना है। दृश्यर में उस सौ वागाटा पर 'मिति वध' व हा वन प्रम अधिकार दिये हैं। उमा मनाथ जात प्रारह है, ]ि डिगामु भ' मान होकर उप हो जात समाधानमारस तथा म ला। है, और उस पडितों ने प्रचारित ग्रनभिज्ञ ही है। रहा हैं बतमा मम्राट कीतिविनय प पिना मय सी राजकुमार विजय इस प्रया का गुरू किया यमन न यर सालहवा जन्म था। रायाममा पनि श्रीर विद्वान किम है। बीन पन्द्रह वर्षों का रहने ? म महाराजधिराम गुरा नाह हम वर भी, थाही हा विजय पता राजरिध ऊचा उठाना र पर उनर हाथ पध किया चान य, इगलिग प्रतिष - मन वालो | जब राजकुमार को पांट 4 दिन मन मोह नीरों में 'मूरत' राजकुमार द्वारा यह 'विशतिध' होयर दस, तर मनात यात्तिविनय परवाया करत थे । और उमा गराएर प्रहार स 'भूरत को परम्परा धे थनुमार वृक्ष पर गुर र स देंग। याद स्पर्य लटा दियाद गर 'माटा की मूरत', रामसुभार, मनिसार को वन भूषण मतिकार गदन द्वारा इस घप कर सम्मानित करेंग-पिर भी गत्वाद गर है । नागदत को उत्म की समाप्ति को पोरणा कर भी रायानय प्राम है। माहाराजा दानापेगा। धिराज सूयविजय । समय में इसका ममय लगभग पा लगा है। बाप माद ये प्रारतिया बनाया और श्रर दर्श गांगुर भी करता था | पडिता ने 31 श्रा हो उट है। उत्पन भान + बाहर प्रचलित कर रखा है उस कुछ बड़ भी दूर तक जन सागर लहरा रहा धूद नहीं मानत । ये इस सम्पय म है। यह मनन कुछ ऐसे हग से कोर 'भूद 'कहानी नामते से निर्मित किया गया है कि बाहर अरसर अमि वड़ लोग भी भीतर चनने वाले उठाकर सब को शान्त हो जाने या मारोह को देख सकन हैं। इशाग किया। भा भवन निम दीक ममा महामात्य खड़े हुय गि दशक तो शात हो गय, किंतु धार मानन्द्रको बाहर कोलाहल घट गया । मन वादन किया। वाइर न रख धीमा लोग घूम-घूम कर पा रसने लग, पड़ गया | सपन भरदार सफेद महामात्य भा बोगनत बानते रुक मूहां से आच्छादिन ओठ' हिले, गय । इसने म ही एर मल्ल दौरा और प्रशस्त ललाटी गहर्ग थाया और महामात्य ५ कान में मुरियों को रि मी अधिक गहरा बोला दिएर क्षीय मुद्धा बरवा बनान हुए महामात्य बोले, भीतर श्राना चाहती है । यह कहती का दिन बहुत शुभ और मंगलमय है कि वह सम्राट रे समद राज्य ।, पइ अत्यधिक हा विषय है। की भला की बात एवना, चाहती हमारे प्रिय गगुमार श्राप हे । और ऐमा भी कहना है कि गेलहन वर्ष म प्रवेश पा चुरे ह। यदि उस रोका गया तो प्राण तक यह ना आप सब जानते ही है कि दगी । इतना नहीं, यहा तक 'विनि-यध' का ममागेहगन्य में बाल रही है कि सम्राट और स्मार विधानियों से करने से मे पिता मिले यदि हमर गई नो प्ररणाएँ ने क लिये मनाया जाता गन पर प्राप्त दर पगी । महा मात्य लापवाही को हल्का मस्कार है। श्रापको प्रति वष इस 'माटी की मूग्न' का परिचय दिया जाता है। उमार कर बोले, 'यह काई पगली होगी। एवरे कर बाहर करो इस वर्ष मी म यह पता चाहना और लोगो म शान रहने के लिय हूँ कि यह श्राति पाप और क्ल महो। महामात्य से प्रादश पाकर पता की मूरत है और इसे हम भत्य लोग हा चाहता था कि का वाहन है ।' प्रथम नान परियो म बेटे हुए गर उमराव सम्राट ने उस युवावर सोलाहल के नालिया पाटकर म्मार और रात बारे म पृटा तो भृत्य ने मम्राट को यो का त्यां सुना दिया। सम्राट कुमार की जय जयकार वर्गलग। महामात्य ने गद्गद होकर अत्यन्त महामात्य बो मुलाका थापा दी कि मायुस्ता रो मम्रा और कुमार उस वृद्धा को श्राने दिया जाय। को पिर श्रमिवान किया। सम्राट महामात्य ने एक सण मोग फिर मुस्कराय और महामात्य 'हाय बोल, 'महागब वह तो एव पुगला.
. स्त्री है। उसी समय राजकुमार ने नारी समान योयूब भाया । शाय हट पृषक कहा 'पगली हो तो स्मा, इसीलिये माया होगा कि वह एक धुछ देर मारन ही होगा। नारी का श्रापति था। और चाह महामात्य चुप थे । वृद्धा को स्वीकृति उस भूरत को किसा भी रूप में , मिल गद। सब लोग देखने लगे वहा ररसा गया हो, किन्तु पुरुप पिहाथ में फूल माला लेकर बही की निष्ठुरता थौर दम्भ को चुनौती घड़ी याम्खों वाली बुढ़िया मच का दार नारी ने नाराक प्रताक को पोर चली आ रही है। सर अोर सम्मानित किया है, यह यात अन्न, निस्तधता छा गई । र वृद्धा मी से उटरर अवश्य उत्सव समीप पहुँची तो मूर्तिकार नागदन्त मरन का सभी स्त्रियों व ऊपरी से चार उठा । वह अपनी भारा चेता मन म म गई, तमी तो, वे सुर बुध भूल बैटर । उसने थोठ अपोलापको गौरवान्वित अनुभव कुछ गोलने के लिये परफरा उदे, कर अरुण हो उठीं।.. रितु उसे भीतर से किसी ने लैस यह करने के बाद वृद्धा रोक लिया। उसका गला ग्ध गया। ने सम्राट से प्रार्थना की आज उमको नि भय और अचान स अब कि वह गज में बुराइयों को बध गई । वृद्धा ने सबसे पहिले उस नष्ट करन का दिन मना रहे हैं तो अद नग्न नारी की 'मूरत' र गल राज की भलाई के लिये उसे एक में माला डाली और फिर कापो सत्य प्रस्ट करने की श्राशा दी जाय । हुये हाथों स पाच सात तालिया महामात्य धीच हीमधील उटकि और रानाभार पगली ये प्रलाप में समय नए वरना उसे पागल ममगार मुस्वराये, यथ है। सम्राट के कुछ बोलने के तथा महामात्य सूरत उतारकर पहिले ही राजकुमार ने कहा कि साश्चय दवन लगे। परदा नोट वृद्धा को कुछ देर बालने दिया में बेटी राजरानियों और 'वाल जाय । महामात्य चुप रहे। वृद्धा क्नी' में बेटी कुल कामिनियों के को श्राज्ञा मिल गई। पहिले वृद्धा चेहरे गौरव से अरण हो उटे | घे कनखियों वे नागदन्न की ओर देखा। कुतूहल पूर्ण दृष्टि में दखने लगी। नागदन पत्थर की तरह निर्जीव सा वह 'माग की मूरत तो विकृतियों वेवस था, जैसे उसे किसान कोल की 'मरत' या न, शिन्तु फिर भी दिया हो। फिर यह बोलने लगी, न जाने क्यों वृद्धा का यह कृत्य 'पुषो। विकृति का मूरत, श्राप देख बनाई । सम्राट रह हैं 71 में इसकी सच्ची कहानी दिया नाय' व रानामार के रानों भाब बताना चाहती है महामात्य म 'मा' श द टाराया तो उहोंने आगन स या होकर उटे और महामात्य रोका थीर बहा कि मम्राट् में प्रायना वी कि वृद्धा को वृद्धा को भोलो दिया जाय । महा अनर्गल प्रलाप परो मे रोका जाय । मात्य असहाय से हाथ मलते बैन प्रथम पत्ति में बैठे हुये कुछ बूदे गवों गय । सम्राट ने हस्तक्षेप नहीं दिया। और उमगा भी गड़े होर वृद्धा बोलने लगी, 'तो हम नप महामारा साथ दिया। उत्सव भवा विदिया की वर्षगाठ मा रहे थे ने बाहर भारी भीड़ में शोर हुया कुछ अनजारो लोगों ने यकायक कि पक्षा को बोलो दिया जाय । हमला किया और चिटिया को उठा गजकुमार ने कहा कि र बुदिया पर ले भाग। बहुत खोजने के बाद किमी मत्य बात से उह शवगत पता लगा कि वह किसी पलशाली कराना चाहती है तो रोका क्या गिरोह के दिन सरागृह म पद जाय ? अाज का दिा तो विकृतियों है। उसे बाहर निकाल लागा किसी को नष्ट करने का ही दिन है। सब ने भी वश नी बात नहीं है। मेरे सव चुप हो गये वृदा बोलने लगो, पति नागदन्त य पिता ने 'पुभो । महागनाधिराज सूर्यविनय लोग मूर्तिकार नागदन्त सो श्राश्चय जी के समय की बात है। एक दिन से दबोलगे। राघराने सीधा जब म अपने पति पे साथ (मूरत भी गदत को धूरो लगा । नाग की ओर इंगित करते हुय) इसी दत उभान्त घर में चिल्ला उठा, बेटी की सोलहवी वर्ष गाठ मा 'मा मा तू यरें क्यों नाई। शर्म रही थी कि महागाय गरज नहीं पाती, गम्राट का अपमा। उटे, 'पागल है ले जानो इसे यहाँ परती , पिगने तुझे यहाँ मजा से।' सम्राट ने भी श्राज्ञा दी वि है? (समाट की ओर) सम्राट वृद्धा को पागलगाो पहुँचा दिया क्षमा करना इममा मस्तिष टीर नाय और योग्य चिकित्सा का प्रबंध ममा के लिये प्राण करवा दिया जाय ।' उधर मूर्तियार दादी भीप मागता हूँ।' गा नागदन्त दान किट वियर वृद्धा कुमार शीम बोल उटे, 'पागदन्त, को लाल ग्रामों से देखने लगा। हम तुम्हारी मा न पान मुर्नेग याहर से आवाजें श्राइ, 'मा को (महामात्य का पोर) महामान्य चलो दिया T को बोलने इस रहस्यमय कथा को , दो। इससे राज मुसहत होगा। में उत्सुक्ता भी साप रही थी। महामात्य ने श्रधारना से भुस्थर वृद्धा 7 उप स्वरों में मूर्तिकार नाग कहा, 'प्रियकुमार । मुझे शाशंका दन की मम्बोधित किया, 'चा है कि नहीं हमसे राश श्रपमा नागदन ! तुम ही जानने। मैं तिन हा नाय! फिर महामात्य म्ह श्रान गब कुछ बताउगी। पई सम्राट् यी इच्छा जाना य लिय दिौस मोच रही थी कि तुम्हे कुछ उसी योर सपने लगे। समाट 1 घता रितु प्रिय राजकुमार य राजकुमार का मारपते हुये कहा परिपार होनान का गह में दल दि मयादा ा ध्यान रखते हुय रहा यो। धान ममय अनुकूल है।' बुढिया को बोलने दिया जाय । मृदा उमा एक तण का अवकाश लिया बोलने लगी 'सो नागदत के बाप ने फिर प्रधिा उनेजित होकर बोलो लास जतन क्येि, किन्तु मेरी बेटी लगी, 'बेटा, श्रच्छ कामों से राज्या नागपली वापस लौटी, न लौटी। भय नहीं मिला करता। राज्यालयों उमर कई रिनों बाद पापियो न उम पपार भी बड़े बड़े रहस्य होते हैं। एक दिा वृक्ष पर अन्य अवस्था (मूग्न की थोर) इस भूरत को म लटका दिया और नलती मशालों तरा बाप भी बताया परता था रिन्नु से असरप वेदनाए पचाते हुए लाचारी वश मौत के घर और उमर पाए ले लिये। इस माना । कुछ न मालूम हो स, इस मूरत मुख्य कारण यही था कि उमन उम को बनाने में तू अपना गौरव राम कारागृह मे सहाम्रो मुदरियों को झता चला या रहा है। बेटा यह एक रात मुक्ति दिलवा दी था। यह मुरत तेरी उसी बहिन की है' नाम स्वय भी भाग निक्लनी, रितु गुप्त दन पागल की तरह चिल्ला उठा, चरों ने उस पकड़ लिया। महा 'मा। क्या यह नागवल्लरी पी मात्य कोष से साप रहे थे। ऐसा मूरत है ? महामात्य + श्रधार लगता था मानो उहं जेस कोई होर कहा, 'सम्राट् रोकिए, मयागा मालों से गोद रहा हो। सम्राट भी टूट रही है। दिन है रोकिये।' श्राश्चय, शोध और तहल की सम्राट भी गमतमा उटे रानकुमार सम्मिलित भावनाओं से उद्विग्न होत ने फिर भी मुग्ने की ही उत्तठा जा रहे थे। रामकुमार बधी दृष्टि प्राट की। वृद्धा की वाणी वेगमयी से वृद्धा यो देखते हुये स्मिा गहराई हो उगे। वह दु नगनि से बोलने में जैसे उतर रहे थे। उनकी अाखा लगी, 'हा बेटा यह नागवल्लरी ही है। न इसे बड़े चाव स बनाना उटो, 'बेटा! घूई महामात्य सब चला या रहा है। अपराध तेरा जानते हैं। (दात किटक्टिार) नहीं है। मैंने ही तुमने यह सब हा, यह घूदा रत्ती रनी जानता है। हुमा कक्षा या! मैं इसी दिन में सम्राट के लिये नहीं रहता, ये उन लिय नी रहा थी। श्राज मचमुच दिनों नासमझ थे। दनस सब कुछ मरी जिन्दगी माधक हुई। यह नहा छुपाकर रवाया गया है। हाँ तो करती तो न जान फ्तिी पीढ़ियों का बोलकर मुनलो उस सारी तुक तेरी बहिन और हमार गुल घटना + पोछे और कोई नहा महा का अपमान होता रहता और त् राजाधिरार सूयविजय ही थे । मच वरा मत्ताने श्रपा अपको गल्या कहती है व मुदरियों के प्यास ५ ।' अयी मानार न जान पता अपन महामाय ने तलवार गीचली और हा माथ अनिचार करती रहती।' मतपाल मनग की तरह वृद्धा की कलाकार नागदतमी पाखें दमा श्रोर दौड़ पड़। सभा र राव उम उटी । फिर अॉमें लबालन भर रावार उच्च श्रेणी के गागरिक पाह। वह उटा और नागरल्लगे दहाद उटे, 'मारो, मारो, बुदिया का मुरत व चरणों में माथा धरसर को मार डाला' सम्राट की श्रॉखों स निश्वासे छोड़ने लगा। नाच सभा ज्वालाए घरसने लगीं। राजकुमार स्तथ थी । मच पर गनपराता भय, घृणा, दया और उमाद की कीलित या । महामात्य राय स भावनाओं में हतप्रभ स दीगो लगे। उठ। उनि तमतमार नलगार ग्शमा जाल-पत्रिका पीछ विस्मय बाधायच लिया और यादश और दोष स गनरानियाँ झुमके की प्रतीक्षा म सम्राट् का अोर मुग्या हिल डुल उर। थाहर महन्त्रों कठ निव हुय । वृद्धा कशी नहीं। वह पट पर, 'मा । जय । गवल्लरी 'घटा। उठो एक वान की जय ।। नागदन्त की जय और सुनलो अन्तिम बात । इसी वृद्धा र चेहरे पर मय नहीं होन्माद अतिम वात में मेरा मौत छुपी हुई व श्रायू प्रवाहित हो रहे थे । उसके है। नागदन्त ने मूरत व चरणा से गिर पर महामात्य की तलवार भाल ऊपर उठाया | उसका भागों चमी तो नागदान ने झपट पर के पटोरे मोध, शोक पश्चात्ताप महामात्य थे कापने हाथ से उसे और इप मिश्रिन यामुओं से भर छीन लिया । सम्राट राजकुमार पूर थे। 'वृद्धा बिजली सी कदक सहित सरट की इस स्थिति में बोलता गई, (६०) रेशमी परद की ग्रोट म सरक गये। वास नहीं हो साता मरे पितामह पिन्द्रले दरवाज से जनता भीतर घुस जो कुछ कर गये, वह अत्यन्त पृरिणत पड़ी और लोग वृद्धा और नागदत साय गा। उनर काले कारनामों कोपाहर निकाल लाये। महामात्य मा प्रायश्चित मुझ करना होगा। यशव देव धायल होर मच पर म हम पशा पला धोऊगा। देर हो गये। हा, यदि मुझ से प्यार है तो रोय x x म 'नागवल्लरी दवी' का एक मदिर इम घटना व दो दिन बाद वनना दानिये। क्लाफार नागदन नागदत और मृदा पाड़ लिय गय । और उस 'मा' को कारागृह म नहीं सम्पूर्ण राय म श्रातर का साम्राय अपने हृदय में स्थान दीनिये। स्थापित कर दिया गया। थोड़े मुझ अपार सुशी है कि उस दिन समय बाद एस दिन श्राघीरात म वृद्धा ने श्रागामी सदियों को प्रेरणाए दने के लिये, घृणित और भारतम राजकुमार कमल नयन यायन 7 जाने कहाँ गायब हो गय। दौट सामतशाहीनी विकृति को साहस धूप शुरू हो गइ। नगर नगर, डगर पूर्वर उपस्थित किया । 'मा' ने डगर गुप्तचरा ने टू ढने म रात दिन हमारे जम-जमान्तर पाप घो एक कर दिय । बीहड़ वनों, पहाड़ों दिय । म इस सूने म नागवल्लरियों पदरात्रों म योज को गइ किन्तु (पान की दलों) के पास बैठा बैठा रायुमार नहीं मिल । राजमहल देख रहा हूँ कि अम्बर से प्राश्लिष्ट म शो र वादल छा गये । राम्राट् सम्वृति का अविच्छिन नालोक मोति विजय पन दुप म वार शने शनै धरती पर उतर रहा है। एका तवासी जापन ध्यतीत करने जिस दिन नागवल्लरी देवी के मदिर की मुमधुर घण्टियां का रव एक दिन सुबह जब सम्राट प्रवाह की तरह यह निकलेगा, म सोर उठ तादहरो पर एक पर उसी प्रहमान-लहास सगीत की पड़ा मिला। पत्र रानमार का उच्छल तरगों पर सतरण करता ही था। पर इस प्रकार या दुग्रा एक दिन लौट गा । अापस 'पूय पिताना। भी मिलू गा। -हा, पर बधू गा म जीधिन है। अब मुझ सुप यहाँ | माताजी को चरण स्पर्श और और विलाम के मसार स विरक्ति उम 'मा' को भी जो करागृह में हो चुकी है। राम मइला म मेरा दिन काट रही होगी। कलाकार लगे।
-- - फिर श्रात्त नागदन को मी प्रणाम महामात्य पेशव देवर ने लगढ़ाते समल ना' लगड़ाते कन में प्रवेश किया। पर पढ़कर उस) एलान हम सम्राट ने इष विषाद और रोप के सम्राट कार्निविनय विक्ल हो उठे। सम्मिलित भावों को चेहरे पर उभार रुछ क्षणी तर गवाक्ष से वे नीले कर महामात्य को रामार का पर श्रासमावो दम्पते रहे, दिया। फिर कुछ देर कर रहे और स्वर म पूर पढ़े, 'सर स्वीकार है वोले, 'यह सब शान हो, गाना कमल, मुझे सव स्मोगर है । और चाहिये !' महामात्य ने समते करने फ्फर फरक कर रोने लगे। जव कहा, 'किन्तु मम्राट " रानाट् कुछ हल्ले हुय तो श्राधाज देकर उत्तेजित हो उठ,'बादेश का पाला भृत्य को मुलाया और पाशा दो कि हो।' गानुनी देशों याले पिक महामात्य को इसी समय उपस्थित लाग महामात्य गदन झुकाकर परा किया जाय। थोड़ी ही देर बाद जित से लगढ़ाते-लगढ़ात लौट गये । कन्फ्युशस ने कहा है- 'जैन का अर्थ मनुष्यों से प्रेम करना है । जैन से युक्त व्यक्ति अपना भरण पोषण करता हुआ दूसरों का भी भरण-पोषण करता है। अपना विकास करता हुआ दूसरों को भी विकसित होने म मदद देता है और अपने प्रति जैसे यवहार की अपेक्षा करता है, दूसरों के प्रति ठीक उसी प्रकार का व्यवहार करता है।' महामा क पगुशस का एक सिद्धात F प्राधना धीर याचना की पुकार है, वहाँ माम्यवाद के अधिकार दो-शदों म एक अाग्रह है, दवार है, धमसी है, कि अधिकार शद के गर्भ म ही चलात् प्राप्ति का बीन समाया हुआ है-उसम याचा या मुभार को पुरार नहीं, चलि चुनौती से स्पदित ललकार है। इरा विश्लेषण से विर्य निक लता है मिश्रपरिग्रहवाद यदि अहिंसा भी छाया का प्रयास है तो साम्यवाद हिसा की चिल चिलाती धूप का गपर, छाया-छाया में हमें चलना है कि धूप की तादाता के बीच हमें धैंग पढ़ना है- यह विचारणीय विषय है, और सोचते ममय, निस्सदेह, यह भी नहीं भूल जाना है कि ससार में छाया कम और धूप अधिक है । यहाँ यह कहना यदि अप्रामगिक नहीं तो यथ तो होगा ही मि चुनाव हम इहीं दो म से किसी एर वा करना है और अवश्य ही करना है, कि यह निश्चय करा वी पनवता हमें नहीं है कि हम चलेंगे हा नहा- स्थिर रहगे, ठहरे रहगे, क्योंकि गति-वह चाहे प्रगति हो श्रधा प्रति गनि, तो अनिवाय ही है, जीवन का श्रनुपक्षणीय तकाजा ही है कि हम ठहर नहाँ मक्ते, हम चलना ही होगा, अत , मतभेद अाज यह नहीं कि विषमता की वनमा तग और गदी गलियों म से निम्ल, भौतिन मुख शाति सम्पन्नता की महान मजिन की ओर हमें बदना चाहिए या नहीं, बलिल यह कि किस पाद पे तृित्व म श्रीर किस मनोभूमि पर हमें कदम रटाना है-यह प्रश्न है। x X ऊपर, मोकहा कि चाय हमें दही दो म मे किसी एक का कराा और अवश्य करना है। क्या अवश्य परा है-इस पर विचार किया जा चुरा है । अब, दो में से ही क्या चो- यह दापना है, यद्यपि मिश्राशिक सकेन इग मुम्रय म दे चुका है। पिर भी और अधिन स्पष्ट बहना प्रासगिक ही होगा-गि सस्य के विद् वोपरिवेटित करने वाली अन्याय को परिधियों है, वे अस्तित्व की दृष्टि से है अवश्य, स्न्नुि, सचमुर, उना अपना पन इतना उभरा हुअा नहीं है कि- उई भिन भिन रूपों म मान्य पिया ना सके, क्योंकि दम दस, बीसबीस कदम अलग-अलग चलकर चे- सभी, इहा दो में से किसी एर न एर म अात्म समपण र पेटती - विलीन हो जाता है, इसीलिए मेरी धारणा है कि ये विचारणाय नहीं। अवश्य ही, श्राज हमारे युग में, गाँधा वाद के नाम से निर पथरी प्रसिद्धि हुइ है, और नाज़गी 7 कारण जिमम प्रारपण भी है तथा निमोनिगाहों को अपनी ग्रोर गीचा भी है, किन्तु सूक्ष्म या स्थूल विसा भी धैय दृशिरो यदि हम द नो थोड़े से परिश्रम के पश्चात स्पर ।
(६५) हुए बिना नहीं रहेगा कि महावीर सम्मुख दो हैं-दो ही हैं । दुर्भाग्य प अग्निहवाद स भिन गाँधीपाद वश, विमुरता उस समय और मी की को अपनी स्वतंत्र अथनीति बढ़ जाता है कि जन एक दिशा की नहीं और सच तो यह हि अपने योर उ मुग्व खड़े पधिका का दूसरे समूचे रूप में गाँधीवाद याशित रूप पथ पर स्थित यात्रियों के प्रति मे महावीरवाद र अतिरिक्त है ही सभ्नेह निमन होता है कि ने क्या १ पार, हमारी पीड़ा म से अपनी राह को गलत समझ लें और कोन यह नहीं जानता कि गाँधानी उसी बगल में धाकर अपगी भूल ने स्थय भिी भी यह याग्रह नहीं मुधार ले। और, जर यह नेह दिया कि उनके प्रतिपादन को निमनण यनुक्ल प्रभावोत्पादन नहीं मौलिक तथा ता विशेषण प्रदान पर पाता तो म्बमारतया स्नेह किया नाय, कि उना निर्देशन विरोध में परिणत हो जाता है और मारत के अनेकानर प्राचीन मा निमरण का स्थान चुनौतियों प्रार पुरुषों ५ विचार-याधार पर हो अमयादित यारोप ले लेते हैं। फिर प्रास्थित है, निरतर ही विनम्रता तो दोनो ही कैम्पा स घोषणाएँ की पूवक वे यह उद्घोपिन रत रह । जाता है कि पुण्य सवल उन्हीं ५ नर, इस तोडाय कुल अनिभावुर परम है, अत मुक्ति भी उन्हीं की भत्तों का निर्दोष नाश ही रहना सत्गगिना है, कि उद्धार, मागे, चाहिए कि ये गांधावाद को एस रही तम्बू ५ सम्मुर पहरा द सपथा स्वतन पथ के रुप म प्रवा है। और, दग 'त न', 'मम', शित करो का मोह श्रीर अह नहीं प पीच, चौगह पर पड़े हम अवि छोड़ पाते, अयथा, निश्चय हा शप व्यक्तियों के सम्मुख अनायास ही गाधाबाद अपने प्रात्मिा म्प म, समस्या या उपस्थित होती है रि मूलन गीतावाद, बुद्धवाद और जैन हम फिस पर विश्वास करें। हमार वाद-ग्रवान् मारतारतावादा सरल तरल नेत्र निसरी ओर ग्राशा एक सम्मिपित एव समश्विन सम्व मरा पलमें उठाएँ। हमारे दिम रण हो तो है। मिसमा अनुसरण नरें-वे दम कि ता यह निविद्याद है कि चाहते जो टटने के लिए मनर हैं, विवश हुए भी, प्रयजपूवक ठहर रहना ही है कि मर रवि शदों म हमारे यस की बात नहीं और यह चचल हुए-सगति हुए जिनका भी मुनिश्चित है कि राम्ने हमारे निवाह है ही नहीं कि थोड़ी दर " भी यदि वे और नहा उटत तो समस्या समाधान की प्राशा भूग लगन नारंग- तृष्णा के अतिरिन और स्पा गिद्ध 'पुण्य का उधर पाप या इधर, हो सकेगा। जिन्दगी दो पूजा में नीच , हाँ, ते इकर, बवारा अतीत सिंधु-सी दूर मुग्परा रही हम तो कुछ महायता द पाना है, निगल जाने यो पातुर मीच, वह यम इतना ही कि हम उस ठहरते पने, न चराना इट। "यनुभवों स यह गान पर ले सस्ते पविष के सम्मुस दिगदिम् भ्रम' कि दो पाद प म र विसरा धरा के नीचे ६ पाताल, सौदा अपनाइन अधिा सम्ना है गगन पर बसा हुआ है स्वग श्रोर विमा अधिक महँगा। हाँ बीच में अधर मनु का अहम नक मूल्य का प्रश्न है, पर है कि श्रीर इस प्रकार दिग्भ्रमित, माम्यवाद या अधिकारयाद इस प्रथ द्विविधा मग्न हम पब, भविष्य की म गहँगा हा मदेव रहा है कि वह श्राशा म, यतमान से घरा कर परशुराम की तरह पर रक्तदान अतीत की शरण में जाते हैं कि चाहता है, परिप्रपरिमवादो शायद यहॉ से कोई लिविवाद इगित मा यद्यपि करवानी को नामत मांगी प्रास हा पाए, तो दुभाग्यवश, है, कि दयाचि दाग व प्रात्म निराशा ही हाथ ग्रामर रह जाती विसनन 7 रूप म है। किन्तु, है, क्योंकि इतिहास सादी है कि अधिकारवाद जहाँ कान कप में श्रान क वत्तमान की मॉति प्रनीत महँगा, पहा वह प्रास फल न रूप को भी ऐसे ही भम म पहार, तर म मम्ता मा है, कि उगर माध्यम से तर, दोन हा प्रसार प प्रयोग करना बगदा हसा सौदा हन्तामनस्यत् पड़े है, इसलिए कि नासिर, श्रान ताल प्रान होकर ही रहना है, चाहे वह भले ही अतीत की मजा पाद, वह थोड़ी दर बाद किसी र पा गया हो कि, उर ममय ता वह ज्ञानयनात धम्म से फिर क्यों 1 वमान हा था, और History लुटर लाए और उसको दुवारा rreats itself-इतिगस अरा लिए पुरा उतना हो मुल्य क्या 7 श्राप को दोहराता है-पदि यह रच दाा परे । दूसरा योर प्रपरिम है तो हम अपने वत्त मा को प्रतान वाद या हृदय परिवतनबाद एस का ही पुनर्भूत रूप कहा चाहिए और मूल्य 7 मामल म कहाँ गस्ता पिर, एगो स्थिति म, रिंगत में और साबिर है, यहाँ उसमें मुलम - ।
फ्ल, बटुत दर में प्राप्त होगर, असा देश म, फलम् जगा जो हमारी मात्र हा सारे के गरे व्यापार यो धिनि , प्रर ही है, और महँगा बना दना है। मां कहा गाँधाज्ञा स सुन्छ ही दिशा पाले चाहिये हिमाम्ययाद यदि Short 'बलवाद' या 'अधिका वादा Kut 'लधुगध' है-Teni, गॉट प्रयोग, स म ललिक्यिा था, सक्दो आँधा पाना और अधिकार फलत, हा जाना ह दिसमT म मरा, किन्तु, निम पर जर मा पाल मुन्ना और समृद्ध हा है, पति कि चिनली चमक उठती है तो श्रान समार का प्रथम शक्तियों म मनिल भी दीप जाती है, तो अपरि स एक है, प्रत्या प्रयोग स्वत सिद्ध प्रवाद Long unt'दीप पर है प्रमाण हे इस सचाइ था कि एक एर दम अबाध श्रार प्रमश परित, Long cute और पर Short किन्तु इतना सुविस्तृन कि मजिल य cut स्थान पर दूर ना वितिर हा बम, इस अधिक, अब म उछ नितिन दिवाई ना रहता है। 1 गायबल इनना ही कि दोनों ही माग हमारे पास गामने यह चुका है जि प्रयाग दाना पहा रिय गय है-यन सुदूर प्रशस्त है। य हम कर लेना है अतीत म और स्टि प्रतीत में भी, कि किम शोर हम चल पड़े। श्रम, सुदूर अतीत में, एक बार दराव यह मग नहीं, श्रापरा भी नहीं, रहित हदय परिचननवादा प्रयाग पलिल दानों हा मार्गों प समथकों महापार पिया था, पनन धान का पन य है कि वे, क्वन हवा रागार म बारह लाग्य तपारथिन यानों म हाँ, यत्ति प्रत्याहोस जन मतानुयाया है, श्रार नभा उमो प्रमाणों ५ श्राधार पर ही हमारे समर के पार पाम दवाव सहित श्राप सम्मुग्म प्रदर्शित प्रेरित करें समानयरिवी का प्रयोग मुहम्मर मियाँ जापन अति श्रेयम्फर ने भी किया था, परिणामत ममार और प्राह य है । जहाँ ता मयुक्ति म दूगरी भवस बड़ी प्रागदा नया क्षेत्रमा प्रश्न है, निश्चय ही यह कथित मुसलमाना की है और अभी निम्मदारी महावीर के अनाय मुरादा दिनों पहले-निस्ट अतीत अनुयायो रानिया ने क्यों पर महृदय-परिवर्तनवादया निनवाद है कि जो, दुर्भाग्यवश, भानता का प्रयोग, हमारी आँखों के सामने अपने सामूहिक यबहार मे विपरील गाँधीजी ने किया था अपने ही प्राश ही उपस्थित करने का (६८) और हर प्रकार लोगा को वाय करते श्राए हैं कि वे महापोर क राद का सदैव ग़लत रूप में ही समझने रहें शिव महावीर पाणी को श्राचरण की सबलता और गाथस्ता प्रदान गरें और जहाँ तक यापक नेत्र का प्रश्न है, यश्चमर, समस्त भारत का ही यह नैनिक दायित्न हेरि यह भारतीगावाट या 'यात्म पिसजावाद' को अाचरण की गरिमा से महिन कर समार को दिशा नान देने का प्रयन करें, इसलिए कि यदि एसा नहीं रिया साता-या यदि ऐसा किया जाना यदि अमभर ही है तो निश्चय हो, कोइ भा शक्ति, कोई भा विचार धारा, मोई भा नीति ऐसी नहीं कि तो चौराहे पर बड़ी दुनिया को सहन सुलभ साम्यवाद का दिशा का घोर उमुप होन से वनित कर सरे-उम साम्यवाद से योर मि निमका पक्ष प्राश रूस और चान व प्रागण को दीतिमा कर रहा है, और उस दुनिया को कि वो चला लिए श्राने श्रापम मानूर है, विवश है-चचल है ! श्रन्धकारमेसे प्रकाशमे मधुकर जीरन को लायो ज्योतिमय । असारमसे प्रसाशम। हटे दुपार मादि प्रधाएँ, मानवको सर घोर यथाएँ-- मिटा सकें वह बल हमसे दो-- नर उमग सं, नई पाश म। यमन्त धरता के ऊपर, झरे शान्तिका निमन निर्भर, नृम बने ततम नगत फिर शीतलता 7 ना प्रमादम । भागोलिक यह भद न माने, अपनी मामाएँ पहचान, वसुधा बने कुटम्म एक फिर हट निमिर अब उपोल्लासम ।
सस्कृति बनाम रोटी श्री रत्नेश 'कुसुमार । हमारा देश धर्म ग्रौ सम्वृति प्रधान रहा है। य धनेस वादा, (महागीकार, रवि, पत्रकार) না, মল মলী । ভল लिया, व किशमित, पुष्पित, और जवित मी हुए बार अपना चमक दमा छोहार इतिहास प्रार शोध ने अपने स्थाय को दीजीपी रखने का वस्तु बन गये। काल के गुर असा प्रवाह म यही धम, यही 7 लिए मस्कृति का मनमाना श्रम कति अानी गरिमा अनुरण रख लगाना प्रारभ पिया, चरा, ना से सका, जो सत्य में सतत अवेपण वह विकृति बन गई । सहनि य निमन जल म घग पम्य सो का मूल प्रनि पर प्राधारित था। ही कारण इस जहाँ अने क्लिबिलाने लगे। शामा धौर रनिया के भरन गएनहर का शामित, शोषक और शोपित एस गर, नहा भारतीय सम्पति के दो दा म सारा समाज पट गया। मदिर का फलश श्राज भी अपनी पहले गुण और ज मजात प्रतिमा विमयी श्रामा रो विश्व यो श्रालो का विशेष स्थान था, अब वर्ण किन कर रहा है। इतिहास मानी विशप म म को प्रधान म्यान है, पश्चिमोत्तर सीमात और दिया जाने लगा। इस विभेदात्मक सामुद्रिा मार्ग मे याँ विदेशी प्रति ने यानि और ममा7 को मात्रामयों कई श्रापा, तुफान मस्ति या डाला हमा नया बरण्डर ग्ट, कि अन म प्रभार क्ला गौशल और प्राधिक भारतीय जीवा और मम्मृति के योगों पर भी पड़ा। धन की पूजा प्रशान्त महासमुद्र म बुदखुद के होने लगी। कट्टरता न श्रागा जमा समान इनको निलुम ना जाना पड़ा। लिया। वनल इगरमोत के शार्दा तर और विज्ञान का हमारी म इसको सहजिक प्रतिक्रिया यह सरकृति ने भी विरोध नहीं किया, हुई कि "शताब्दियां तर स्वतत्र लेकिन जैस जैसे समाज निय तानों पापी को परमात्मा के लिए अप (6) मान न समझा गया । इमान मुख्य हो गय | 17 प्रसार गारा दारी से अपने विचार प्राट परो मागतिर जाया अवनति और स बार कोई बात श्रधित इन्द्रमालिक माया ये धूनमय पर 'पारिता' नहीं समझा गह। युगों दौड़ लगाने लगा। इसकी फलति तक बुद्धिमानों यह गिले रहे। ৫ম গ্লান্দকাল ফী ঘেীনা ? निमशालों को सत्य ने जतारा रूप में उपल ध । था, नि गाहम ऊपर उटावर गि युग-चता के ज्वार ने ले चलना पा, व रत्त म उभा दी इसी वड़ियों य यधा टूप-दूक कर गह।" हम प्रतिनिया 4 युग से दिय है। श्रान तो हम हमारी दश माहाणपाद अपना मर गति का नया श्रथ और न्या छदार पर चढ़ार भी टिकाय रूपविधात स्थिर करना है, ताकि रमा । रितु याद म गौतम और श्रगुला य पर पर मुश्यिल मरिने महावीर न दस- नीमून पी जा साने वाले 'मगरमच्चों में उसाई का । य नया उझाप, वाम ताल में समाज री गणित नहवायो योर नद दियाभा लकर मीरा सके। औरन अयसर सामो श्राप । गादा जागा, उच भागियों, तथा श्रम से कतराने वाला विचार, उरलता भार मुना, एर विशिष्ट यग ही इसे अपने एकषि पथनी एकरना का साम्य उनके कार में पातु मान लो की विद्रोहको आधार शिला यो । पल गनती दुहराएँ। यह टुया कि समाती निनाधारा सरकृति की पहचान समाज के ने एक नया मोड़ लिया धारा रहन सहन, पानार विचार और तानों को अपना लिया । पर पह उस ढारस होती है। वहाँ एक मम विक माल तक नहीं टिर लाप पारे एक हमार गुलबरें सका । राजनैतिक उतार-चढ़ाय और न ही सी बनावे, शप और प्राथिक-सोनों की श्रीयता मुटन भर दाने के लिए दम तोड़ते ने इमम मा अनैतिक तवा का जहर हो, वहाँ म कृति का स्वरूप यदि घोल दिया । भिक्षु गर्घा म प्राचार गर्हित, विग्लाग तथा रुक्ष मिले फैलने लगा। उनमें चारित्रिक तो धा चय ही क्या ! गनि के. सम्पनि रही। उनका पोग्बलापन सास स्वाधीरता है। और स्वाधी (शीघ्र ही सगाई बनर) सामने नता का श्रय परिश्रम और पुरान या गया। प्रदशन और कर्मकाण्ड क्लुनो या नूनन मापदड निधारित करना है ! वहाँ तक सस्कृति का यदि सम्कृति रोटा की सम या हल माकना या परा है, यदि यह नहीं करती है, तो उसकी उपयोगिता समान की मूल समस्याओं का समा हा नष्ट हो नावेगी। धान नहीं करती दा अपना अस्तित्व यहाँ तक सास्कृतिक क्रान्ति के ही गमॉ दगा। सति में समन लिए पृष्ठभूमि तैय्यार करने का रना मार ग्रस्त हो जायगा । मरध है, "यन् मन् नाणिकम्" और अपमान माघ, माना नहीं तो है नह क्षणिक है, न पर है-- होना, दाना होता है। नारे से हम बचना होगा। नहीं तो धार का बलत प्रश्न है यह ए ऐगा मनोभूमिका निर्मित गी। सिर दो अनरों का जोड़ा पर दगा, जिसमें दुनिया बदलने केनुरा दो अक्षरों म क्इ को निष्ठा समाप्त होकर एर प्रसार शान्तियां की लपलपाती ज्वालाएं की पलायनवादिता भानायगी । यह दिरी बेटी हैं। जीवन का कटु सत्र पनायनवादिता एस म्प पतरा है । है कि सब पद खाली होता है, तब एक नई राष्ट्रीय संस्कृति के न तो धम की बातें मुहाती हैं और निर्माण म हमें जुटना है । इसमी 7 सस्कृति व उपरन म ही मासेर अाधार शिता के रूप म शरीर श्रम करने को कहता है। पट घी याग की प्रतिष्ठा ना ना नहीं की जाता, म विश्वामित्र जैसे चल परल रोटी की समस्या नहीं मुनमेगी। नपोधनी को जन् चाण्डाल के घर पौर जरा रोटा का सर मुलम में पुस मूत ना7 की टॉग वा हल प्रस्तुत हीं होता, को मा लेने को उग्रत कर देती है, तत्र स्कृनि जापित नहा रह गफ्नी । जनमाधारण की भूग प्रौर उसकी प्रत श्रम देसायागमा ममता । परालना, क्या यही रा सवेगी ! और भाह र पवेद दीररु संगोन प्रासुकी रायमानि 7 मूल म भूष लिए हम सनद्ध होना है, तभी दी थी, जिमने इतिहास के लोग नद सकृति का श्रालोक मानवता ये मोटिइ कोएर नई गनि दी। श्रन उन्नयापन को प्रशस्त कर सकेगा ।
रूढिवाद का ग्राग्रह छोड़िये । लाहली प्रसाद मेटा साविस विचारक, सम्पादा मजदूर क H हिटस्ताा ये पिछले मदियों में इतिहास ने हमें यह मानने को राध्य पिया है कि रूदिवाद ने हमारा बहुत कुछ सयानाश किया है। कुछ मानस शास्त्रियों ने समय और परिस्थिति के अनुकूल समान को वस्थित करने लिए कुछ परिपा दियों का निमाण किया था। एक एस परिपाटी हमा13म समय यी समस्यामा का समाधान था । उसम सामयिक पिनाना गुवन पी। ऐसी एक नहा मैक्दा परिपाटिया, दिया यापरम्पगए जो समर अनुाल था।' ग्रान वे घातक है । उनम वतमान रे अनुकूल परिवतन करने का परम पावत्याता है। क्योकिरन ढियोगी अात्मा को मर चुगी । अब बदरी 7 रच्चे की तर उनर मृन शव को छाता स चिपकाये फिरने की कार नरूरत किमी की भी गुलामी भयर सदियों दी दासता नई. रूढिवाद निसको हम यमी दक्यिान्मी या ग्रापन या लम- का-फकीर ग्रादि नामों से पुकारन इसने हमने इस तरह बड़े र छटपटा कर हजारों परिवार मौत मुहमत गये। रूरियाद की तह में कुचल न साथ, प्रभुत्न, प्रकार और प्र. पलन लग गये । उन गि प लोगा ने अपनी जगह मुरा रसने के लिए दूगर लोगों को क शाला में पहुंचा दिया । इस सम्म यस्थापने मान के साथ निदयता का नाम नहीं दिया लोग चानने तो सभी भी इस मर मुपी धारा की श्रीर जाने में भाइयों को रोक सकते थे। ऐसा समय इन लोगों ने हा दिया। र समय ने समाज के मुह नमाचा लगाया तब लोगों को कुछ देश, काल और परिस्थितियां * तुमार को राष्ट्र श्रायश्या परि वतन अपना सामाजिक, आर्थिक, सा नीनिक और जीवन नानियां में नहीं परता, बह पीट रहनाता है, माना अार्ग वर नाता है । युग किसी का इलनार नहीं करता।
(७३) ऐसी हालत है कि दपिनम और मग लागा म गीचा अनमनी हुइ है। द नग्ह छ मन म सड़े हो गए हैं। प्रापग म राम ENTनहगा है। ममा म नाम दिमाग को ध्याप्ति होता जा रहा ररिसरोह दाना तारहा है। का विचार, रइ मद, गइ मलिनता पर करनी लाता रहा है। गदि सोई इसरण करे तो उसे दिपाई दगा +ममान की नहों में से गदग साटा तुओं व दल दन उमे समा यस बरे जा रहे हैं। दियाद ने गमानवा नियन्त्रित नोलो नाग श्री. नर पर दिया लेnि गरीर थमार, बार-बड़े गौरव पटीने r, मन की धारा पर मा रिये । रियादीवन को विभान्ति राछोरमोद दास पना लिया उाकी गायों में बाहर स्लिो हो महारापारा दिन भि दो नागा मे भय और 7 पनुष्य को रही भातर दिया गया सकी सहाध रो गए मातापित जीतपिपास हो *दियाद । मात्र काम इतनी मोटी तीरे डाल दी है कि यह 37वधा हुया कम्पग रहा है । हमार लिमोरा यह विलकुल श्रय नहीं है कि ममाननीय निा प्रापारा कामिटार मनात काय ग्गल हो ना पाहिए । मयादा नाद डालो चाहिए । मह मयध को तार पान समाा गवता या चाहिए । हमारा ना पय ना मिफ इतना है मिदिया म7 तर तिल गया है, इसलिए उनमा। श्रनुवन्न, नयाा समानTI TI गनपान ग्ना नादिए। दिया गमान का प्रालि श्रीरभतिा शक्षिका पण पर रही है, उमाकर दता चाहिए। Tा युग है, गल पा Tir 41ोर ग्रामाशना चाहिए। निगम प्राणी प्रागा पीनिया 71 यह दिवाग्निा या पिशान Fam 11THE पलभूत माधार, EिL गदा सि ग्रार प्रतिपादा घा17 T"दर्शियों पिया 1, 17 RT मारमणकारागानादर नाहि त्री Friप 77 ग तिविमिना ।
अजीब सवाल (कहानी) हो माता है हमय पहिल मुझ বযানী इम भिवारी की श्रावाज शहागी उदायमा हानीकार हो और दसरा हम यत्त रोन मरे घर के मामने से गाते हुये गुनरना तुरा लगा हो, किन्तु थान तो मैं कमी से पड़ा पड़ा भाग रहा हूँ और मइतनी बनैनी से परा इन्तजार मोच रहा हूँ कि न जाने सरेरा कर कर रहा है। मुझे मिलने वाली होगा और क्च वह भिगारा गाना अप्रत्याशिन सफलता ने पिछल राग हुवा श्रायेगा ? म श्राज उगी का द्वेष से मरे हृदय से बिलकुल इतनार कर रहा हूँ। निकाल दिया है। षयोंकि कल रात कॉलेन में मगर वह भला श्रादमी यान माग्कृतिक कार्यक्रमा के अवसर पर, अभी तक प्राया क्यों नही उजला भिसारा का कुशल अभिनय करो होने को है किनु की प्रभाती पर, तो मुझ यश प्राप्त हुवा था काम्बर मरेगनों से अाज क्यों नहीं उसका श्रेय इस भिग्वारी को ही था। टारा रहा है १ . । शायद यह हम भिसारी म ही मैंन मन कुछ पा रहा है। हाँ हाँ यह उमीरा मीखा था। या यह वह नो अधिर पर है--'नागिय गोपाललाल भोर उचित होगा कि मने पल रात इम भई प्यारे ।' मैं दूर स श्राो पाला भिग्वारी की विकृत नाल मात्र हो इस श्रापान मा माथ दो लगा है। का थी। मगर मुझे क्या मालूम था प्रापान न नाम श्राती जा रही है। कि, इस भिखारी की यह विकृत में निम्तर छोहार पोर नोर से यह नरल मात्र हो, मुझे इतनी शोहरत गान गुन-गुनान हुवे, कमरे से बाहर दिलवा देगा और मुभ एर कुशल निरल पाया हूँ। हाँ हाँ वह नन क्लाकार बना देगी! श्रान मरा दो ही श्रा गया है। मैं लपक कर रोग रोम इसे दवा दे रहा है और अपने श्रहाने पाक पर जा बड़ा दुधा हूँ। यह भिकारी रोज को मुझे बारा को यह निराशापूण तरह अपनी छोटी मारगी बजात रात अच्छा नहीं लगी। इसलिये हुवे, अपनी चुल द धापान म यह मैंने इस बात को यहीं गतम पर गीत गाता हुवा चला पा रहा है। यहा-बाबा म ल रात के खेल में उमरी मारंगा की मधुर श्रावान वं पड़ा गामयार रहा। लोगों ने मेरी माय बनते दुव धुंघरूयों को हर बड़ा तारा की। मुझ माल मिला। मन पर, मेरा दिन नान नाच बाबा ईरत स मरा वात सुनने उठा है ! मैं सोचता हूँ यह स्तिना लगा मने मती ग स दस का नोट अछा बजाता गाला है। मने कल निमालार, उमय हायां पर रख रात क्या वाकवनापागाया था। दिया और बोला-बाया इम काश म भी इसी तरह गाना कामयाबी का नह तुम्ही हो । समता । क्तिना शालाप लेता है, तुम्हार गेरर कपड़ा ने मुझ बिलकुल पह-'जागिय गोपाललाल भोर भइ नुम्हार जैमा पा दिया था। और प्यार'-कहत हुये। वृदा हो गया जा मने तुम्हारी झोली वगैरा है, मगर इसकी थावान म तिनी लटा ली थी तो हूबहू तुम जैसा हा दीन्ने लगा था। तुम्हें यकीन थर यह मरे बिलकुल मजदीर नहीं होता, न १ मै अपना उस वेश या गया है । श्रान मर मुँह म सहमा का पोटो नब तुम्हे बतलाऊँगा तो निकल पड़ा है-यामा ! नुम् गरी तुम मी मुम नहीं पहचान समोगे। थावाज म कितनी मिटास। मर मव ना पहचा। नाले पार यात्रामरी चाल मुनगर गाना रोज मिलन पाले तर भी मुझ स्टज रद कर महन हम उता है। रहना पर यकायर पहनान नहीं पाये थे। उछ नहीं। तुर दर तक उसे एक भी फेटो नैयार नहीं हुवा है। र देवन में बाद में पत्र बैठा है- म तुम नर तलाऊँगा। मगर पाया मरी यात मुनार गुम हमे वायाम तुम्हारे जैमी सारगा नहीं क्यों? क्या तुम्हें खुद को अपना रजा पाया और तुम्हारे हम गीत गाना पसन्द नहीं? को इतना उठा हो पाया। लेकिन बाबा फिर हँस दिया। मगर इसस पोरन नहीं हुआ वाया। इस बार बोला भीया, गा मरा वाम लोगों 1 चेहद पसाद गाना थाना । पेट भरने का बहाना किया। तूब तालियाँ पिरी गई। है। मेरे घराचर फोरो नि। गये। मेरी मियम है?
तारीपा गई। पदक दिय गए। अरल भी गुम हो गई है। और या धारा, म गाता म लिल इम पर य मुम्हारा अजीव बातें। ह गया। मुझ पर मरी समया। गर पड़ पनार, झोली लटरा या नगा ना चढ़ रहा है। प्रदर कर, म सही सारगी बना वजा ग्रामोना । वाया गुत बना मरी पाने कर, मरे इस गीत को गाने पर सुना रहा थायर होला- लोगा या नाह वाहता, भया, एम पात पर। तालियाँ पग्निा नुम्ह महल देना, कह दियाहा हा एक तुम्हाग नाराफ परना, तुम्हार नदा नार पार्ने पला । यान म पायपींचना-- म अनीर पाने पहुन मुश है । शरमायापही म्पयों हैं या नहाम तो रान यहा कपड़े कारन सहत हो तो ला यार दम पहन पर यही झोला लटमा गर, ले लो। यहा गात गाता हुवा, हर घर पे बाना यह सुन एसया गोल मामा म, र मौसम म गुजरता उग-नहा, ना। यह वात ना है, मगर मुस्लि 7 पेट भरने है। म यह ना लाया पाटाटा पाता है। लोग मगर मन उसर मना करने पर माध मुँह बात तर तो करत रही, भा दग का नोट, उसर हाथों पर नाराप करना तो दूर रहा । लोग श्रार रप दिया। यार मुभरात घर के सामने या तो रहने नहीं हुरे बोला-अच्छा यह बात Ti दत "नाग दो" रा नारा लगाने है ना सा पात है, मृलो। लगते है । फोग लेना तो दूर की बान । म गाता हुया गुतरता पापा हिम्मत पर अब वोला- है तो लोग कहते हैं-यह बुद्दा भेशा मुझ तुम्हारा सर रग ढग मरा मुह मुबह चिल्लाकर नींद अना लग रहा है। मुझ तुम्हारी हराम पर दता है। तुम खुद भी उक भी बात समझ म नी या शायद परल यही कहते थे न ? रहा है । न म ही-तुमने र मगर भैय्या तुम्हें न जाने क्या पर बंगरा मुभम मांग थ, नभा हो गया है। तभी तो कहता हूँ, स-मग ममम म कुन ना यारहा मुझ तुम्हारा रग उग यत्र समझम है। मगर पूजा का रिम्मत नहीं नहा रहा है। हुइभ या ! और ग्रात य इतने जागा यह रहार चुप हो रुपय पाकर तो मरी रही सही (शेष पृ ८० पर) श्रो विहार, शुभ वसुन्धरे-प्रतिवीर-प्रसू-बर हरिप्रसाद हरि' धरा पद श्रो मुग्पुर से भी आज अलौपिर वर विहार है, घहती रहती जहां शाति की सरस धार है । भूपर भी है अमर लोक आलोषित होता, भये जहाँ मुख सलिल मत्री वर निमल सोता । कुदनपुरि भी 'प्राज रला को फेलि-कुन्ज है, अलका पुरि से रम्य याकि न दन निकुञ्ज है। जहां उर्वरा सदा धरती हरियाजी व्यक्त कर रहे ६ नर पल्लव नृतन लाली । सजी वाटिका जहा नाटिका सा हस उठते है फूल जहां धीरज सा छोड़ । फही भार से दयी जा रही सान डाल है, दानवीर सड़े हुए दिखते रसाल मग-मग में कर रहे विटप-घट निमल छाया, पग-पग पादप-पुञ्ज दिसाते निज-निज-माया । चलती मुरभि-समीर मन्जु बासरी-बजाती, गजी-ाली हर-गली मोद से ई-खिल जाती। मिल जाती ह मधु-मलिद की मोहक तानें , लग जाती हैं मीठे-स्वर से कोयल गानें । विविध विहगम गा उठते रसमय विहाग है, जग जाते जगती पर जितन मधुर राग हैं। धान रवग की भी तो प्रतिमा मद हुई है, भू-सौरभ से स्नग मुरभि निगध हुइ है । अमर-लोष भी तो होता जाता है सूना , बढ़ता जाता है भू का गौरव दिन दूना । - जब से त्रिशला ने सोलह सपने देसे है सोते म ही सजग भाग्य अपने देसे है। श्रमर नोक म भो फैली यह खुशहाली है, जगपति पो ही जग-जननी जनने वाली है। स प्रमोद इस मोदमयी चचा को सुनकर, उमड़ पडा सुर तोय सभी आने को भूपर । श्री, बिहार । वर वसुधर " तू इसी पान है, प्रलयापुरि को सुदरता पपना मात्र है। यह उठती कल्पना उठा सिलती कलियों से, भूम रहे मुख चूम रहे प्रेमी अलियों से । में भी लेकर फूल गोद अपनी भूभूगी। चित्रित सी हो, चित्र देख , झुर मुख-चूमू गी। गोदी का जब लाल फिलफ सिल इस जायेगा। तव श्राशामा का नवीन जग-बस जायेगा । मेर भी अतर के इस सूने उपचन म, पोलाहल से रहित मुसद इस राज भवन मे । मा, श्री मा । यह प्यारा शद प्रवाही होगा, क्तिना पानद सुधारावाही होगा। विविध भाति प्रोड़ा करना हस सेल मचलना। पीर पर धरणो पर गिरना फिर चलना ॥ यह मिठास से युक्त और अयक्त अमोली, स्तिनी मोदमयी होगी वह तुतली बोली । रोने में भी क्तिन गीत भरे प्रिय हागे। देने को सतोष फ्ल्पनामय हिय होंगे । इस प्रकार यह विविध कल्पनाश्रा के धन से रानी होता धना पुनक्ती अतर मन से। अपने म ही सोच अतुल जो श्रान द पानी लघु लेखनी भी लिखने को सहसा-कर जाती । -(अप्रकाशित 'महावीर' महाकाय से) त , सम्पादकीय---- सस्कृति का प्रशश्राज की परिस्थितियों म बुनियाद का प्रान है। हम चाह भौतिम वादियों की प्राग्यों म तरकमा व किसी भी प्रासमान पर क्या न पहुँच नायें। किन्तु यदि माननिर और वैयक्तिक जीपा रानीव में-श्राध्यात्मिा शिलायों का बल नहा होगा तो हमारी गुम्पन का गौरर भौतिर तत्वों के हलो स भाने से घराशायी हो जायगा। तो यह जरूरी है कि हमारे श्यायात्मिक उत्थान के प्रासाद की शिलाए मजनूत और वतनदार हों। धे नो अपर मे मौन रहत हैं और भीतर से निर्मल और निमल होते हैं, इस तरह के उत्थान मुग्वी महान की पहली शिला होते हैं । मस्कृति के चरण चिह, सस्कृति र पैमाने इही महापुरुषों की जीवन विमानों द्वारा बनन दें। य ही र “यक्तित्व है निामें धरती मा धैर्य और पासमान सा प्रौदार्य रहता है। बद्धमान जिन्दगी की सबसे बड़ी ऊँचा है। व उस शिरवर + प्रतीक हैं जहाँ हमें अपनी सम्पूर्ण त्रुटियां की थालोचना के साथ निरता विमल होते हुए पहुंचा है। विश्वास रखिये-नैस ही हम यह मजिल हारे हमारा पतन हमारे सामने मौत-सा मुह वाये सड़ा होगा। मसाहा ने मौत से मुरारला क्यिा, व जाते और दुनिया । उनम साम ला। गौतम ने करुणा की बरसात की, और दुनिया को अडिसा का पानी पिलाया, उभी हरे भरे हो उट। इसी तरह महावीर ने भी इन सबसे पहले एक ऐसा गभीर स्वर घोष क्यिा सिंगो मका मन का मैल माटा, उ है पास-पास स्यिा उनपरा हिसा और अपरिग्रह का मलिटका, मर प्रफुल्ल हो उठे । उदारव का ममता जितनी इन प्रतीरों म जीवित है, उनना माता और उसके प्रसून मुन म छोर मभन है कहीं भी टम्पने को न मिले। तो, अब हम अपनी सम्पूण भौतिक दुविधामा को छोड़कर, गमार को विविध परिमहयादी चिनायो, माक्सवाद, ममाजवाद, माम्य पाद, कामेस वाद, को
छोड़ार श्र परिग्रह और त्याग के उस अाश्रय को ग्रहण करें निसरी नीव पाताल में
है । इमर अतिरिक्त शेप नितो हैं पाना रे बुलबुले और मथल भी मरीचिका
से अधिक नहीं है । साकृति की पुनियादा मान्यता यही है कि हम वाद्य को अपक्षा
प्रतरग को हा अविक रामृद भार वैभाशील बनायें । मो बाहर से जितना साफ
मुथग होगा, वह मिया का यात्रा में उतना हा चा उठगा । श्रन बा की
मालगिरह पर इससे अधिक कार और निमल तामा होगा कि दम बाहर
भाना स साप मुथरे न मानता को अपन आप म अधिक से अधिक मिरने श्रीर
नमको जितमी र अत्यन्त रिट पर दें।
(पृष्ट ७६ का राप)
गया । मेरे मुँह से कोई जवाब नहा हुवा हैं | बलि तुम्हारे इन दे
निस्ला। पावा ममझा कि में सवाला ने मेरा जमान बद करदी
नारान हो गया है । इसलिये वह है | छोड़ो न वानों को । अाग्रो
हाथ नोडार कहने लगा-भैय्या तुम्हारा सामान लेलो।
मूरग श्रादमी हैं । वाइ गलन बात
मे श्राग भागे हो लिया हैं व
रह गया है तो मुरम समझ पर वाघा मेरे पीछ पीछे । मगर मैं
माप करदो भाया।
सोचता जा रहा हूँ कि बाबा के
अर मुझे कहना पड़ा-नही
मपाल
का स्या
नही वाचा, मैं नाराज कतई नहीं
उवाच हूँ।
इम अनीव
प्रकाशकीय- निश्चय ही हम भगवान महावीर का जन्म दिवस एक लम्बे असें से मनाते चले प्रारह हैं। हदौर म इस पुनात परम्परा _सूनपान ग श्रेय वा सूरनमलना जैन को है । बापूजी न, अपनी अपूर्व प्रतिमा और तेजस्विता से उन दिनों कि माजनिस्तामाधम द सिद्धान्तों म यो विश्वास न था, विविध ठिनाइयों के बावजूद भी वीर जर तो मनाने की परिपाटी का शिलान्यास क्यिा । सबसे पहला जय ती मन् १९७३ में मधुण मापननिर रूप से श्रायोनित की गई। यह वह जय नी यी जो अत्यन्त सार्वजनिक स्तर पर जनता के अधिकाधिक महयोग से मनाई गई थी। इन जय ती ममारोहों में बाबूजा को जैन तरुणाई के अजस तूफान की प्रतीक श्री बद मान शान प्रचारिणा ममिति स स्मरणीय सहयोग मिनना रहा। तत्पश्चात् नवयुमा को गनूजी का निरन्तर माग दशन मिलत रहने के कारग क- वर्षों का नयनी 4 मायक्रम उत्साह, उमग और प्रास्थापूर्वक मनाय नान रह । किन्तु म हा गपूनी की अपरक और अनिवाय क्षति हुइ नवयुवकों का सम्पूण नोश ममात हो गया, उस पर श्मशान-सी निष्क्रियता बिछ गई, पर शून्य मा बन गया और शनै शनै इम तरह अनेक कठिनाइयों से शुरू हुइ हमारी यह निमल थोर बलवनी परम्परा नवयुवकों व ग्राफस्मिक अनुत्माह, प्रमाद और निफिय तत्वों से समास माहोचली। निक्रियता का वातावरण अधिक दिनों तक नहीं चल सका। शन्य के ज्वालामुग्यो से नरुणाई को चालाए फूट निक्लीं-अकर्मण्यता और गमाहट ५ इन क्षणों में श्री महावीर जैन नव-युवा महल ने जयन्ती समारोहों में अपनी उमगों से पुन नये प्राण ३ दिये और वह और मी अधिक मानिक रूप से मनाई जाने लगी। तत्पश्चात् नवयुवकों के नये उत्साह में से हा कोई कमी महसूस हुई, उनके जोश में कोई फर्क पाया कि श्री मिश्रीलाल सोनी तथा इदौर और सयोगिता गज ये अन्य वियुवका के प्रयदों ने जयन्ती के कार्यक्रमों को मुन्द सार्वजनिक रूम दे दिया।
अपने श्रतात की इसा प्रतिष्ठा और परम्परा के अनुकुल पिछले कई वर्षों से दौर का न जनता अधिक मे अधिक प्रभावना और गाजनिता य साथ इस पर को मना रही है। दुरिया क घूमे फिरे अनुमयी निचारक सारा कालेलकर, नलवेत्ता विद्वान् महात्मा भगवानदीन एन हिदी क तेनम्मी लेवा भी जोद्र कुमार ने मी जयन्ती के इसी मच से भगवान धद्धमान ने जागनदारी सिद्धार्ता की घोषणा की। नयन्ती के इन गौरवान्वित इतिगम को नापत श्रर ऐसी कोई वजह नही रद्द जाती कि हम यहाँ सहलों को सख्या में होते हुए भी, उनकी अपक्षा नो इकाइयों में भा नहीं गिने जा सकने, म उत्साह और उमग में अपने इस राष्ट्रीय मूल्य के पर को मनायें। वास्तव में हमारे प्रयत्न तो जय ती को अधिक से अधिक बड़े पैमाने पर मनाने के होने चाहिये और होने चाहिय कि यह पव अनर्राष्ट्रीय रूप ग्रहण कर मर । मुभ विश्वास है कि नैन ननता महयोग, श्रास्या, विश्वास, श्रम, उमग और उत्माइ ५ माथ इम पर्व को, इस प्रकाशन को अधिकाधिक मार्वजनिक थोर शानदार परम्परा दगी। -गुलाबचम्द सोनी ..
न विचार-कण- १--पूण अहिंसा मनुष्य ही मुक्ति पाता है। २-जिसके हृदय म पुर्ण अहिंसा विराजता है-- [क] वह किसी मनुष्य से उसके विचारों को बदलने का याग्रह राहों सरता। [स] वह मनुष्य मनुष्य म मद ही रिला। [ग] वह अपने विचारों हामो सत्य और दूसरे व पिचारा को मिथ्या प्रमाणित करने की कोशिश नहीं करता। [प] उमा हृदय पृथ्वी की तरह विशाल होता है । स प्रश्वा उच्चातिउच्च को और नीनातिनाच को, पवित्र म पवित्र और अपवित्र से अप वित्र को, अत्याचारी और अत्याचारी पीदित को, दुगध और सुगध को, उसका पट चीरने और उस पर हरियाली उगाने वाल का अपनी छाता पर समान स्ने- भान से खेलने-कूदा देती है, उमा तरह पूर्ण अहिमा भी सर तरह व नावों को अपने विशाल हृदय म सान देता है। ससस पर ।' तरह की उराइयों या मलाइया को भुन जाता है। वह कपल यह समझता । है कि ये राग द्वेष से पाहित जीव हैं । इमलिए हो सके तो इनका भलाई करनी चाहिए। अगर उनका भलाइ शगर से न होगा तो वचन मे और मन से करनी चाहिए। [1] उसकी दया चादनी मगार की टु वाग्नि से जलते हुए सभा प्राणियों को शीतल बनाती है। [] अहिंसा क मावों से जमा हुई उमरा का किरणें भभी से बल दती हैं, सबर हत्य-कमलों को विकमित करती हैं। [1] गुणो और निगुण, मूग और बुद्धिमान , जानी र अजानी, पार्थ-परायण और निस्वार्थ सभी हिसा म समभावी बने हुए उमर शान हृदय से कल्याणकारी श्राशावाद पाते हैं। भगवान् महावीर इसी तरह के अहिमक थे । उहान इमी अहिमा मा, घमस्थावस्था म अाचरणाय और मनपातम्या म मौग्विा भी उप-श दिया था। दि इन्दौर मालपा युनाइटेड मिल्स लिमिटेड , इन्दौर . .
SARKA जय हिन्द तार-"मिन" इन्दौर फोन न ५०१ और ४७ हर प्रकार के आकर्पक और मजबूत कपड़ों के लिये HASMAMMAR कम हमेशा याद रखिये दी कल्याणमल मिल्स लिमिटेड, इन्दौर सेवा और स्वदेशी हमारा ध्येय है मेनेजिंग एजन्ट- मेसर्स--तिलोकचन्द कल्याणमल एण्ड कम्पनी, इन्दौर PRASHARISM DNANAANIANRANIAANANANAD मगलमय महावीर के पुनीत जन्म की स्मरण-वेला में सुपरफाइन कपडे के लिए मध्यभारत का -एक मात्र स्थान- जिमे आप सदैव याद रख सस्ते है दि हीरा मिल्स लि. उज्जैन द्वारा निमित * सुपर फाइन धोती जोडे * काम्ड सूत की मलमल * ऊँची जात की जगन्नाथी, हरक * पक्के रग की माड़ियाँ, पातल * हरक, चादर, लुगड़े คลพลเจลลลลล 'और नित्यप्रति उपयोग में आने वाले यस्रों की प्राप्ति के लिये मैनेजिग एजेन्टस् सर सरूपचंद हुकमचद एन्ड कम्पनी, इंदौर BUNUNUNUNUNUN NYO NIANTARNA ।
टेलीफोन नं १०६ तारका पता-NAND
स्वदेश फी उन्नति कीजिये
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१९२२ में रजिस्टर्ड
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संस्थापित १६१४ सार का पता-विनोद, उज्जैन बिनोद मिल्स लिमिटेड, उज्जैन (दीपचन्द मिल्स सहित) श्रीमत सिंधिया नरेश, राजप्रमुख मध्यभारत संघ द्वारा सरक्षित हमारी कई विशेषताए १ कपड़ा-उपयोगी सस्ता, टिकाऊ, समो प्रकार का । जिसे खोग बढ़े चाव से खरीदकर उपयोग में नाते हैं। एक बार अवश्य खात्री करें। २ एक्सारसेंट काटन पूल-खानी में भारत सरकार द्वारा पसन्द मध्यभारम, राजपूताना प्रादि प्राता के अस्पतालों में काम में लिया जाता है। ३ लिट-इसे हमने सभी चालू किया है। बम्बई की सर्जिकल इमिग कम्पनी ने पसन्द कर अभी ज्या सागर में खरोंच है। ४ाटिफीशियल सिएक फ्लाथ-तरह तरह के पे को और रंग बिरगे कण्हे मलमल, बदिया जाना वापन व मटन वगैरह तैयार किये जाते हैं। ५ मरेद्र केमिकल यर्स- उसमें जटेबल टेली, माफर योग, टरको रेड पाइल, साम्पिग पग्लेज पेन्ट बिन टेकम फिनाइल प्रादि धनते हैं जो मिों में काम पाते हैं। मध्यभारत में एकही फैक्ट्री है । अवश्य इस मान का उपयोग करें। ६ कैलाश सोप फेन्ट्री-इसमें लिया किस्म का साघुन नहाने व कपड़ा धोने के काम का तैयार किया जाता है जो कीमत में सस्ता है। ७ भूपेन्द्र प्रायन पाह मेटल घर्स-८ नरेन्द्र प्राइल मिल्स -ये दानों कारखाने मौ चालू हैं।' उपरोक्त वस्तुयो को अवश्य एक बार खरीद कर परीक्षा करें दि फिमोद मिल्स लिमिटेड उज्जैन मैनेजिंग एजन्दम-मेसर्स विनोदीराम गलचन्द बैंकर्म
पूर्णतया भारतीय पूजी पोर श्रम के
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देश में अपनी विशेषताओं के लिय विख्यात
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- - विचार-कण- १-पूर्ण अहिंसक मनुष्य हा मुक्ति पाता है । -त्रिसर हृदय म पूर्ण अहिंसा विरानती है-- [*] वह किसी मनुष्य मे उस विचारां को बदलने का आग्रह नहीं करता। [4] वह मनुष्य मनुष्य में भेद नहीं करता। [ग] वह अपने विचारों हा को मत्य औरटमरे क विचार को मिथ्या प्रमाणित करने की कोशिश नहीं करता। [५] उमका दृदय पृथ्वी की तरह विशाल होता है। जैस हना उच्चारिन को और दीनातिनीन को पवित्र स पवित्र और अपवित्र से अप वित्र को, अत्याचारा और अत्याचारी पोदिन को, दुगध और मुगर को, मा पर चीरने और उस पर हरियाली उगाने वाले को अपनी छानी पर - गमान नह भान से ग्वेलन-क्दन रना है, उसी तरह पूर्ण अहिंसा मी पर सरहनी को अपने विशाल हृदय म स्थान देता है। मनकी म। औरह की उराइयों या भलाइयों को इन जाता है। वह येवल यह समझना है कि ये राग द्वेष से पादित चोर हैं। इसलिए हो सर तो इनका भनाइ परनी माहिए। अगर उनकी भलाई शरीर म न हो मक नो पचन स और मन स । करनी चाहिए। [4] उसकी दया यांना समार की दु ग्याग्नि से जनने हुए मभा प्राणियों को शीतल बनाता है। [0] अहिमा : भाग से पमा दुइ उसको कणा किरणे समी को चल देती है, सबो हदय-कमला को विकसित करती हैं। [7] गुणा और निर्गुण, मूग और युद्धिमान , ज्ञानी श्री मिशाती, स्थाय-परायण और निम्नाय ममी अहिमा म मममावी बन हुए मधे शात हृदय म कल्याणकारी आशीर्वाद पाते हैं। भगवान् महावीर इसी तरह अहिमा । उही इमो अहिया । पा, रामस्थावस्था में प्राचर शा” और -मवभागा- म मावि भा पाश दिया था। ३ - ~ -- Y 1 - दिइन्दौर मारवा युनाइटेड मिलम लिमिटेड , इन्दौर , BARSHAB%8 1 जय हिन्द तार-"मिल" इन्दौर पोनन ५०५१ और ४५७ हर प्रकार के आकर्षक और मजबूत कपड़ों के लिये HEARSARSURAwmixMARSHAN हमेशा याद रखिये दी कल्याणमल मिल्स लिमिटेड, इन्दौर. सेवा और स्वदेशी हमारा ध्येय है मेनेजिंग एजन्ट- मेसर्स-तिलोकचन्द कल्याणमल एण्ड कम्पनी, इन्दौर SANH442 BMINMILAIMm " ONANAANANARNIARNANAANAS मगलमय महावीर के पुनीत जन्म की '- स्मरण-बेला में सुपरफाइन कपड़े के लिए मध्यभारत का -एक मात्र स्थान- जिसे पाप सदेव याद रख सकते हैं दि हीरा मिल्स लि. उज्जैन द्वारा निमित * सुपर फाइन धोती जोडे * काम्ह सूत की मलमल, * ऊँची जात की जगन्नाथी, हरक * पक्के रंग की साड़ियाँ, पातल लुगड़े ANANE . * हक, चादर, -और । NANANANUANIAANANTARNA नित्यप्रति उपयोग में आम वाले वस्रों की प्राप्ति के लिये मैनेजिंग एजेन्टम् सर सरूपचंद हुकमचंद एन्ड. कम्पनी, इदौर SUNNNNNNN arwal
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