Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Vaidyaka Camatkarchintamani Of Lolimbaraja

Tripathi, Brahmanand · 2010/05

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THE
VIDYABHAWAN AYURVEDA GRANTHAMALA
68
VAIDYAKA
CAMATKĀRACINTAMANI
OF
LOLIMBARĀJA
Idited with
The Vimalā Sanskrit and Hindi Commentaries
Ву
ŚRI BRAHMĀNANDA TRIPATHĪ, M. A
THE
CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
VARANASI-1
1973

+

दिवगत
माता जी
के
करकमलो
में
सादर समर्पित
ब्रह्मानन्द त्रिपाठी

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दो शब्द आचार्य प्रियव्रत शर्मा अध्यक्ष, द्रव्यगुण विभाग : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी। आयुर्वेद वादमय-वारिधि के जितने रस्न अय तक प्रकाश में आये हैं उनसे बहुत अधिक संख्या उन रत्नों की है जो अब तक उसके गर्भ में विलीन है। भावश्यकता है ऐसे गोताखोर सामुद्रिकों की जो उन्हें प्रकाश में ला सकें। आयुर्वेद का क्षेत्र ऐसा रहा है जिसमें पठित व्यक्ति भी लोक- कल्याण में ही प्रवृत्त होता है क्योंकि आयुर्वेद का चरम लघय दुस्व-निवारण ही है। शास्त्रीय अनुसन्धान या निर्माण में कम ही लोग भा पाते है। फिर भी समय-समय पर प्रतिभाशाली शास्त्रज्ञ वैद्यों ने परम्परा को अपनी रचना में गुम्फित किया। सयोग से इनमें अनेक कारयित्री कवि-प्रतिभा के धनी भी निकले। परिणामत ऐसी अनेक रचनाओं का सृजन हुमा जिनमें आयुर्वेद के साथ-साथ कविश्व का भी अपूर्व संयोग रहा । सामान्य भाषा में यों कह सकते हैं कि इन रचनाओं के द्वारा कविश्व की चाशनी में पगा हुआ आयुर्वेद लोक के सम्मुख प्रस्तुत किया गया । ऐसी कृतियों में लोलिम्बराजकृत 'वैधजीवन' सर्वप्रसिद्ध है। लोलिम्बराज एक शास्त्रज्ञ, सहृदय एवं कविवर वैध थे। ऐसे ही वों में 'कविराज' विशेषण सार्थक होता है। इन्होंने अपनी रचनाओं में आयुर्वेद के साथ-साथ कविश्व का ऐसा मणिकाञ्चन योग किया है जो अन्यत्र कहीं नहीं दृष्टिगोचर होता। 'वैद्यजीवन' के अतिरिक्त इनकी अन्य रचनायें भी महत्वपूर्ण और सङ्ग्रहणीय है किन्तु दुर्भाग्य से पे उपलब्ध नहीं रहीं।

( १० ) है। प्रभूत और सस्कृत पण्डित श्री ब्रह्मानन्द त्रिपाठी स्वयं एक अच्छे शास्त्रज्ञ एवं कविवर हैं। आयुर्वेद के साथ-साथ साहित्य में भी उनकी अबाध गति है। इनके लिये स्वाभाविक ही था कि 'लोलिम्बराज' पर इनकी दृष्टि जाती। फलत. इन्होंने लोलिम्वराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर वर्षों के परिश्रम से महत्व- पूर्ण शोध-कार्य किया है जिससे अनेक दुर्लभ तथ्य प्रकाश में आये है । लोलिम्बराज की अन्यतम रचना 'वैद्यावतंस' कुछ वर्ष पूर्व भापके द्वारा सम्पादित होकर प्रकाशित हो चुकी है। अब यह 'चमत्कारचिन्तामणि' प्रस्तुत परिश्रम से इस ग्रन्थ को आपने सँवारा है तथा हिन्दी व्याख्याओं के द्वारा रचयिता के भावों को यथाशक्य अभिव्यक्त करने का यत्न किया है। यद्यपि कुछ अन्य पाण्डुलिपियां उपलब्ध होती तो पाठ-निर्णय मे और शुद्धता आती फिर भी इस अनमोल रन की इस सुन्दर रूप में अभिव्यक्ति ही अपने आप में एक ऐतिहासिक महत्व रखती है। कहना न होगा, पण्डित त्रिपाठी के सहश अन्य कोई व्यक्ति लोलिम्वराज पर प्रामाणिक अधिकार रखने वाला इस समय नहीं है। इस उस्कृष्ट कार्य के लिये मैं आपको बधाई देता हूँ तथा आशा करता हूँ कि भविष्य में लोलिम्बराज की अन्य रचनायें भी आपके द्वारा प्रकाश में भायेंगी। धन्वन्तरि श्रयोदशी दि० ३-११-७२ । -प्रियव्रत शर्मा - प्राक्कथन "ब्रह्मा स्मृत्वाऽऽयुपो वेदम्" चरक के इस पद्याश के अनुसार आयुर्वेद की परम्परा सामान्यत ब्रह्मा से प्रारम्भ होती है किन्तु पौराणिक दृष्टिकोण उक्त मत में सर्वथा भिन्न है। इसके अनुयायी आयुर्वेद की उत्पत्ति ब्रह्मा के मानसपुत्र 'प्रजापति' से मानते है । प्रजापति का ही दूसरा नाम 'प्राचेतस' है। आयुर्वेद- परम्परा मे उक्त प्राचेतस शब्द 'दक्षप्रजापति' के लिये प्रयुक्त मिलता है । यस्तु, इस प्रजापति ने चारो वेदो के विवेचन के पश्चात् आयुर्वेद का सृजन किया । यह चारो वेदो का सारस्वरूप पाचवा वेद उन्होने भास्कर को दिया। उसको भास्कर ने स्वतन्त्र सहिता का रूप देकर अपने शिष्यो को पढाया।' इस पवित्र परम्परा से प्राप्त यह आयुर्वेद पुरुषार्थ-चतुष्टय प्राप्ति का एकमात्र साधन माना जाता है। यही मानव जीवन की सफलता का प्रतीक है, अतएव भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत सहिता मे कहा है --'चिकित्सा से अन्य कोई पुण्यतम कार्य नही है, क्योकि आरोग्यता के अभाव से मानव किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है । इसी इप्टापूर्ति के लिये आप सहिताओ के पश्चात् समय-समय पर मायुर्वेद विद्वानो ने चिकित्सा-ग्रन्थो का निर्माण किया । यद्यपि इस प्रकार के अनेक चिकित्साग्रन्थ कविराज लोलिम्बराज के सम्मुख प्रस्तुत ग्रन्थ के रचनाकाल मे नि सन्देह रहे होंगे, तथापि इसकी रचना का कोई न कोई कारण अवश्य रहा होगा। वह कारण हमारी समझ से आयुर्वेदरूपी समुद्र के मन्थन से अभिनव रत्न की खोज थी, जिसके फलस्वरूप "चमत्कार-चिन्तामणि" नामक ग्रन्थ-रत्न का आविर्भाव हुआ। ग्रन्थकार का दृष्टिकोण - इस ग्रन्थ की प्रस्तावना में लेखक ने "दिवाकरप्रसादेन" इस पद्याश के द्वारा अपने पितृचरणो का स्मरणकर साथ ही पौराणिक परम्परा से प्राप्त आयुर्वेद १ ब्रह्मवैवर्तपुराण, ग्रहमखण्ड अ० १६ । २ चिकित्सितात्पुण्यतम न किञ्चिदिति शुश्रुम ॥ सुश्चत ।। - (१२) की ऐतिहासिकता को भी स्वीकार किया है। जब हम चिकित्सा के विभिन्न प्रकारो की ओर ध्यान देते है तब हमको वैदिक काल से लेकर आजतक इसके अनेक प्रामाणिक उद्धरण उपलब्ध होते हैं । यथा-उदय होती हुई सूर्य की किरणे कृमिनाशक होती हैं ।' सूर्य के प्रकाश से हमारा कभी वियोग न हो। सूर्य स्थावर-जगम की आत्मा है। सूर्य ही प्राणियो का प्राण है । अतएव घर का पूर्वाभिमुख द्वार चरक के मत से प्रशस्त माना गया है" तथा सूर्य से आरोग्य-प्राप्ति करे। इतना ही नही भास्करलवण आदि कुछ योग भी सूर्य के नाम से आयुर्वेदिक साहित्य मे अत्यन्त प्रसिद्ध हैं,, सम्भवत इस नामकरण मे आचार्यों का यही दृष्टिकोण रहा हो । आयुर्वेद मे चिकित्साग्रन्थों का स्थान :- चरक, सुश्रुत, वाग्भट इन तीनो आप संहिताओ के पश्चात् लिखे गये अनेक उत्तमोत्तम विशालकाय चिकित्साग्रन्थ सहस्रो योगो को उर मे पिरोये हुए ग्रन्थ- कर्ता के लेखन-काल मे सुलभ थे किन्तु उनमे से कौन योग अधिक उपादेय हैं, कौन नहीं, यह निर्णय लेना साधारण जनता के लिये कठिन था। चिकित्सा. कार्य मे यह विचिकित्सा न हो, अतएव इस लघुकाय किन्तु सर्वाङ्ग ललित ग्रन्थ- रत्न का निर्माण किया गया। यह ग्रन्थ सिद्धान्तत सत्य, सरल, सक्षिप्त एव ग्रन्थकार के अपने सुपरीक्षित योगो का सकलन है। हमारे विचार से साहित्य एव आयुर्वेद का ऐसा उत्कृष्ट सम्मिश्रण अन्यत्र दुर्लभ है । समय का प्रभाव यद्यपि कविराज लोलिम्बराज के ग्रन्थो मे उनके कालनिर्णयादि के परिचय का कोई निश्चित सकेत नही मिलता तथापि कुछ तथ्यो को लेकर हम इनको १६वी शताब्दी का मानते हैं। इसकाल मे उत्कृष्ट काव्यरचना के अनेक निदर्शन प्राप्त १ उधन्नादित्य कृमीन् इन्ति । वेद । २ न सूर्यस्य सदृशे मा युयोथा । ऋक् २।३३।१। ३ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च । ऋक् ११११५॥१॥ ४ आदित्यो ह वै प्राण । प्रश्नोपनिषद् ११५। ५ प्रामुखमुदङ्मुख वाऽभिमुखतीर्थ कूटागार कारयेत् ॥ च० सू० ० १४१४६। ६ आरोग्य भास्करादिच्छेत् ।

( १३ ) - हैं, विहारी की 'सतसई' इसी समय की अमूल्य निधि है। इसमे मुगलकाल के वैभव का पूरा प्रतिविम्ब झलकता है। उसी विलासमय जीवन की छाप उस समय के आयुर्वेदिक साहित्य मे भी मिलती है, जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण चमत्कारचिन्तामणि तथा 'वैद्यजीवन" है। रसोपधियो तथा वाजीकरण योगो की फलश्रुति इसका देदीप्यमान उदाहरण है। सम्भवत मुगलो के विलासी जीवन के लिये ही तात्कालिक सुधी वैद्यो ने इस प्रकार की रचनाये की हो । चमत्कारचिन्तामणि पर अन्य ग्रन्थों की छाया ऐतिहासिक दृष्टि से दक्षिण प्रदेश मे 'अष्टाङ्गसग्रह' और 'अपाङ्गहृदय' का प्रचार अन्य सहिताओ की अपेक्षा आज भी अधिक है, अतएव ग्रन्थकार की यह प्रतिज्ञा' है, इसके अतिरिक्त भी उक्त ग्रन्थ मे 'चक्रदत्त' 'शाङ्गधरसहिता' 'भैषज्यरत्नावली' तथा 'भावप्रकाश' के आशुलाभकारी योगो का संग्रह मिलता है। महाराष्ट्र मे उस समय भी सग्रह ग्रन्थो के माध्यम से चिकित्सा चलती रही। वहां बगाल के 'चक्रदत्त' या 'वंगसेन' का प्रचार कम हुआ परन्तु इनके ढग पर अन्य अनेक चिकित्सा सग्रह ग्रन्थ लिखे गये, जिनके अन्तर्गत इनकी कृतिया भी सादर उल्लेखनीय हैं । वैद्यजीवन तथा चमत्कारचिन्तामणि ये दोनो ग्रन्थ कविराज लोलिम्बराज के अप्रतिम बुद्धिविलास एव चतुरस्र प्रतिभा का परिचय देते हैं। दोनो मे सवादात्मकता तथा आदर्श चिकित्सा का दृष्टिकोण समानरूपेण विलसित है। साथ ही इनकी स्त्री रत्नकला का वैदुष्य अन्तर्लापिका, बहिर्लापिका, कूट आदि के प्रसग मे अपना एक विशिष्ट आदर्श १ (क) आत्रेयहारीतपराशराणा भोजेन भेडेन समन्वितानाम् । तन्त्राणि चित्राणि मनोहराणि चातुर्यपूर्णानि निरीक्ष्य सम्यक् ।। चमत्कारचि० २।६। (ख) वाग्मटस्य मतमस्ति समस्त सुश्रुतस्य चरकस्य च किश्चित् । तइदत्रिनयनस्य विचित्रा वाग्विलासरचना मम तावत् ।। वैद्यावतस ५५ .

( १४ ) उपस्थित करता है। उक्त दोनो ग्रन्थो का अनेक स्थलो पर भावसाम्य होते हुए भी उक्ति वैचित्र्य प्रशसनीय है।' ग्रन्थकार-परिचय दिवाकर के पुत्र कविराज लोलिम्बराज नासिक के समीप जुन्नर ग्राम के निवासी, शुक्लयजुर्वेदान्तर्गत मध्यन्दिनशाखाध्यायी जोशी ब्राह्मण थे और राजा हरिहर के सभापण्डित थे, जैसा हरिविलास काव्य के प्रत्येक सर्ग के अन्तिम पद्य से ज्ञात होता है ।२ सप्तशृङ्गी देवी की उपासना से इन्होंने अपूर्व कवित्व- शक्ति प्राप्त की। इनके पूर्वज ज्योतिपवृत्ति से अपनी आजीविका करते थे। ये साहित्य, व्याकरण, वेदान्त, मन्त्रशास्त्र, आयुर्वेद तथा संगीत के उद्भट विद्वान् थे। इन्होने अपना विवाह एक सुलतान की 'मुरासा' नामक कन्या से किया। यह 'मुरासा' शब्द 'मेहरुन्निसा' का अपभ्रश प्रतीत होता है। इसका अर्थ होता है-स्त्रियो मे सूर्य के सदृश । सचमुच यह अत्यन्त सुन्दरी रही होगी, अतएव लोलिम्बराज ने सवादात्मकता को प्रधानता से सम्पन्न वैद्यजीवन तथा चमत्कार- चिन्तामणि ग्रन्थो मे प्रयुक्त सम्बोधनो के द्वारा अपनी प्रियतमा का नख-शिख वर्णन कर उसको त्रैलोक्य-सुन्दरी के पद से विभूषित किया है। महाराष्ट्र की परम्परा के अनुसार इन्होंने विवाह होने के पश्चात् इसका नाम रत्नकला रख लिया। वैद्यकवृत्ति इनकी आजीविका का साधन थी। इनकी रचनायें-हरि- १ (क ) औपध मूढवैद्याना त्यजन्तु ज्वरपीडिता । परससर्गससक्त कलत्रमिव साधव ॥ वैद्यजीवन । (ख ) न ग्राह्य मूर्खभिपजो भेपज प्राशरोगिभि । गृहीत यदि कजाक्षि जनयेत्तद्गदान्तरम् ॥ चमत्कार चि० । २ नानागुण खनिमण्डलमण्डनस्य श्रीसूर्यसूनुहरिभूमिभुजो नियोगात् । कान्य कृत हरिविलास इति प्रसिद्ध लोलिम्बराजकविना कविनायकेन । हरिविलास काव्य । ३ रत्न वामदृशा दृशा सुखकर श्रीसप्तशृङ्गास्पद स्पष्टाष्टादशवाहुतद्मगवतो भर्गस्य भाग्य भजे । यमक्तेन मया घटस्तनि घटीमध्ये समुत्पाद्यते पथाना शतमङ्गनाधरसुधास्पर्धाभिधानोधुरम् ॥ वैधजीवन ।

( १५ ) विलासकाव्य, वैद्यजीवन, चमत्कारचिन्तामणि, वैद्यावतस ( सस्कृत में ) तथा वैद्यककाव्य और रत्नकलाचरितम् (मराठी मे) उपलब्ध हैं । इनका समय १४६० से १५३० काव्द तदनुसार १५३८ से १६०८ ई० निश्चित किया गया है। वैद्यजीवन की शैली पर लिखे गये इस चिकित्सा ग्रन्य मे विविध मापध का वर्णन किया गया है। इसमे अधिकाश युक्तिव्यपाश्रय योगो का विस्तृत वर्णन उपलब्ध है। देवव्यपाश्रय तथा सत्वावजय योगो का सकेतमात्र दृष्टिगोचर होता है। भिपग्वर लोनिम्बराज का सत्वावजय से सम्भवत अपथ्यवर्जन का ही अभिप्राय रहा है, अन्यथा मानमरोग प्रतिरोधक औषध द्रव्यो का भी इसमे कही न कहीं अवश्य उल्लेख होता । इस ग्रन्थ मे चिकित्सा मम्बन्धी विषय के अतिरिक्त शब्दालंकार, अर्थालकार, लक्षणा, व्यन्जना, गुण, रीति तथा अनेक वणिक एव मात्रिक छन्दो का समुचित विनियोग किया गया है। कही-कहीं कर्तृगुप्त, क्रियागुप्त, अन्तर्लापिका, वहिर्लापिका और वाकोवाक्य ( सवाद ) की भी विचित्र छटा दृष्टिगोचर होती है। इन सव साहित्यिक तत्वो के समावेश को देखते हुए इस 'चमत्कार-चिन्तामणि' को यदि लघुकाव्य कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। यह ग्रन्थ पाच विलासो मे विभक है । इसकी सम्पूर्ण श्लोक संख्या दो सौ इकतालीस है। तुलना-इसमे विषयानुक्रम प्राय वैद्यजीवन के अनुरूप है तथा वैद्यजीवन के कतिपय पद्य भी अविकल रूप से उद्धृत हैं, कुछ अन्य पद योग की दृष्टि से समान हैं तो उनका साहित्यिक अंश भिन्न है। ऐसे पद्यो को सख्या अत्यल्प है। फिर भी इस ग्रन्थ में उक्त प्रकार की समानता का दिखलाई देना आश्चर्य नही अपितु स्वाभाविक ही है। आप ध्यान दें-चरक सहिता, भेष्ठ सहिता, पाराशर सहिता आदि के रचयितामो के पृथक-पृथक् होने पर भी उनके अनेक भयो में अविकल साम्य है । उस साम्य के समाधान में कहा गया है कि 'आचार्य के उपदेश देने में किसी प्रकार का अन्तर न होने पर भी शिष्यो की १ त्रिविधामीपमिति-देवव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय, मत्यावजयश्चेति । तत्र देव- व्यपाश्रय मन्त्रीपधमणिमगलवल्युपहारहोमनियमप्रायश्चित्तोपवासस्वस्त्ययनप्रणिपातगमनादि। युक्तिव्यपाश्रयम् पुनराहारविहारीपधद्रव्याणां योजना । सत्वावजय पुनरहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनो निग्रह. । चरक सू० अ० ११३५२ ।

( १६ ) 4 मे जन्म 1 बुद्विगन भिन्नता से रचना मे भी भिन्नता आ गयी थी। यहां पर तो ग्रन्थो का रचयिता ही एक है, अतएव दोनो रचनाओ मे यत्र-तत्र समानता का होना बुद्धिसगत ही प्रतीत होता है। इसके योगो की अमोघता, सरलता और सुभलता अनुकरणीय है । प्रेरणा -ब्राह्मण कुल लेने तथा पैतृक संस्कारो के कारण सस्कृत- साहित्य के साथ-ही-साथ आयुर्वेदिक साहित्य की ओर भी मेरी पर्याप्त अभिरुचि रही । अतएव में अध्ययन-काल मे दोनो विषयो की ओर अभिमुख हुआ । उस समय मैंने परमपूज्य गुरुवर श्री लालचन्द्र वैद्य, प्रधानाचार्य अर्जुन आयुर्वेद महाविद्यालय, वाराणसी की प्रेरणा से पाट्यक्रम मे निर्धारित न होने पर भी कविराज लोलिम्बराज विरचित 'वैद्यजीवन' का स्वतन्त्र अध्ययन किया और आयुर्वेद मे इस प्रकार की उत्कृष्ट साहित्यिक रचना को देखकर अत्यन्त प्रभावित हुआ। अध्ययन-समाप्ति के अनन्तर अपने अधीत विषयो के अनुरूप किसी विषय पर अनुसन्धान करूं ऐसी मन मे उत्कट उत्कण्ठा उत्पन्न हुई। तब साहित्यशास्त्र के मर्मज्ञ गुरुदेव पण्डितप्रवर बटुकनाथ शास्त्री खिस्ते जी के अभिन्न मित्र नागपुर निवासी महर्षिकल्प न्यायपश्चानन वसन्त त्र्यम्बक शेवडे जी ने मेरी शैक्षणिक योग्यता के अनुसार 'कविराज लोलिम्बराज और उनकी कृतिया-एक अध्ययन' विषय पर गवेषणा करने के लिये मुझे प्रेरित किया। राजकीय महाविद्यालय नैनीताल के संस्कृत विभागाध्यक्ष परमादरणीय गोपालदत्त जी पाण्डेय के निर्देशन मे आगरा विश्वविद्यालय ने उक्त विषय पर कार्य करने की मुझे अनुमति प्रदान की। टीका–अनुसन्धान कार्य प्रारम्भ करने पर मुझे भिषग्वर लोलिम्बराज की दूसरी कृति 'चमत्कारचिन्तामणि' जो अद्यावधि अप्रकाशित थी, के दर्शन हुए । इसमे भी वही विषय, वही शैली, वही रोचकता और वैसा ही आकर्षण देख मैंने ग्रन्थकार की प्रतिज्ञा के अनुसार इसका सम्पादन प्रारम्भ कर दिया। १ बुद्धेविशेषस्तत्रासीनोपदेशान्तर मुने । चरक सू० अ० ११३२ । • आत्रेयहारीतपराशराणा भोजेन मेडेन समन्वितानाम् । तन्त्राणि चित्राणि मनोहराणि चातुर्यपूर्णानि निरीक्ष्य सम्यक् ।। दिवाकरप्रसादेन रोगारोग्यकहेतवे । रचयामश्चमत्कार-चिन्तामणिमणीयसम् ॥१० चि० श६, ७। -- ( १७ ) इसकी टीका लिग्वते समय श्रीमद्भागवत् की टीका सुखसागर वाला स्वरूप न अपनाकर माधुनिक स्वस्थ परम्परा के अनुसार विशद विवेचन प्रस्तुत कर विषय को समझाने का यथासम्भव प्रयत्न किया गया है। कुछ स्थलो पर आवश्यकतानुसार वक्तव्य देकर तत्-तव विषय सम्बन्धी अपनी मान्यतायें भी व्यक्त की हैं। साथ ही हस्तलिखित प्रति मे व्याकरण सम्बन्धी जो अशुखिया यो उनको शुद्ध करते समय ग्रन्यकर्ता के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए योग अथवा द्रव्य का परिवर्तन अथवा परिवर्धन नही किया गया है। निवेदन-चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस तथा चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी के यशस्वी सञ्चालको की महती मनुकम्पा से प्रकाशित इस अभिनव अन्य को विद्वानो की सेवा मे सादर समर्पित करते हुए अमित आनन्द का मनुभव हो रहा है। इसके सम्पादन मे यदि कहीं किसी प्रकार को श्रुटि रह गई हो तो गुणकपक्षपाती विद्वज्जन क्षमा करें। विदुषां विधेय :- धन्वन्तरि प्रयोदशी २०२९ वि० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी २ च० भू०

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विपयानुक्रमः पृष्ठावा. | विषया' पृष्ठाका १६ १७ ४ १८ २३ २४ २५ ७ २६ २७ विषया प्रथमो विलासः दाहवमीहर कपाय राधाकृष्णस्तुतिः २ पित्तकफज्वरचिकित्सा श्री कृष्णस्तव ३ दाहे घृताभ्यन रामाभ्यर्थनम् (ध्यक्षरम् ) पित्तज्वरे द्राक्षादिकाय. प्रस्तावना दाहप्रतीकार प्रकरणम् चिकित्साविधि ५ पित्तज्वरेऽनुभूतयोग' सवैद्यलक्षणानि वातकफज्वरे पन्चकोलकाय. चिकित्सामहत्वम् ६ । वातश्लेप्मज्वर धाथमाह मओपधसेवने धार्मिकप्रवृत्ति ज्वरहरोऽग्निवर्धको योग मूवैद्यनिन्दा कफज्वरे वचादिकाय. पथ्यस्य प्राशस्त्यम् कफज्वरे कण्टकार्यादिकापः स्वग्रन्यप्रासा भाङ्ग्ादि कयाय रोगाणाम्भयावहत्वम् पित्तज्वरे पटोलादिकाय. ज्वराधिकारः ९ । रुचिकारक कपायः ज्वरादी लंघनम् १० ज्वरे पिप्पल्याचवलेहः वातानुलोमको वह्निदीपकच योग. विदोपज्वरे दशमूलादिकाप. तरुणज्वरे घृतसेवननिषेध ११ | धनुर्वातादी अर्कादिकाय' कासादिहर. काथ. वातादिज्वरेषु फपायः १२ | सन्निपातस्यासाध्यत्वम् सर्वज्वरेषु सामान्य कपाय. १३ / वैद्यप्रशसा वातज्वरे कपाय १४ | कर्णमूलजशोथचिकित्सा पन्चभद्र कपाय कर्णादिरुजाहरोलेपः ज्वरशामको योगः गुडपिप्पली प्रयोग. वटज' कपाय' १५ / जीर्णज्वरे कपायः पित्तज्वरपान्तिप्रकार. १६ ) पन्धमूलपिप्पलीप्रयोगः २८ २९ ज्वरे पाचनम् ३२ ३३ ३४ ܚ ܐ ३५ ( २० ) . पृष्ठावा. | विषयाः ४० विषया मुस्तादिकाथः एकाहिकज्वरे हाथः । तृतीयके चन्दनादिकाथः चातुथिके नस्यम् देवदा दिक्वाथ शीतज्वरे योगत्रयम् चतुर्थकज्वरे नस्यम् शीतज्वरे कषायः विषमज्वरे कषाय. रसोनकल्कप्रयोगः विषमज्वरे चत्वारो योगाः विषमज्वरे पटोलादि काथः विषमज्वरनाशनोयोग. तण्डुलीयमूलधारणम् विषमज्वरे कषाय. अपरो योग' अष्टाङ्गधूप सततकज्वरे काथ लाक्षादितैलम् पट कटवरतैलम् विषमज्वरादिषु घृतप्रयोग असाध्यलक्षणानि देवव्यपाश्रयचिकित्सा ज्वरे वानि द्वितीयो विलास ज्वरातिसारहरो योग ज्वरातिसारे चन्दनादिक्वाथ पञ्चमूल्यादिकाप पृष्ठाताः ३५ | ज्यरातिसारे दशमूलकाथः ५४ शोफातिसारे क्रियाक्रमः ३६ | अतिसारे धान्यादि क्वाथः ५६ ३७ | पित्तातिसारे काय' ( कर्तृगुप्तं पद्यम् ) ३८ । अतिसारे मोचरसादि चूर्णम् ३९ अतिसारे शुण्ठ्यादि चूर्णम् ५८ आमलकीचूर्णप्रयोग अतिसारे श्यामाप्रयोगः अग्निवर्धकोऽतीसारहरश्च योगः ६० ४१ जीर्णातिसारहरो योगः .उशीरादि क्वाथ. ६१ ४२ चन्दनकल्क ६२ ४३ अतिसारे मुस्ताप्रयोग. रक्तातीसारहरा योगा ६४ ४४ | आमशूलादी सगुडविल्यप्रयोगः ६५ जीर्णरक्तातिसारे दाडिमादिकषाय. रक्तातिसारे शतावर्यादिकल्क' धातक्यादिकाथ वालातिसारे धातक्यादिक्वाथ ६७ ४८ | बालरोगेषु कृष्णादिचूर्णम् असाध्यातिसारे गोविन्दनामस्मरणम् ६८ ग्रहणीप्रतीकार. दीपनपाचनो योग ५२ ) अमृतादिकषाय. ६९ ५३ | पुनर्नवादिकषाय ७० पाठादिचूर्णम् समधुजलप्रयोग " - ४७ ५१ ( २१ ) पृष्ठावाः ५३ . विषयाः तिक्तादिचूर्णम् वृहद्दीपनपाचनो योग क्षुविवधंनो योगः चव्यकादिचूर्णम् सीवचंलादिचूर्णम् शुष्कपुरीपप्रतीकार ग्रहण्या सपिः प्रयोग. छागपय प्रयोग. ८५ ८६ . तृतीयो विलासः " " पृष्ठाकार विषयाः ७१ | मूलनाशनो योगः रास्नादिकपाय. ७२ मामवातघ्नोऽपरो योग' ७३ नेत्ररोगप्रतीकार मधुशिग्रुप्रयोग अर्जुनरोगचिकित्सा ७४ | सामान्यनेत्ररोगचिकित्सा नक्तान्ध्यचिकित्सा नेत्रफुसुमे अपराजिताप्रयोग शुभारोगे माक्षिकप्रयोग ७६ | कामलाचिकित्सा पटोलादिकाथ ७७ / कामलाहरो योग प्रथम द्वितीयः तृतीय अन्जनम् गुडूच्यादिस्वरस प्रयोग योनिशूलप्रतीकार ७९ अपरो योग सुखप्रसवोपाय वत्रीदुग्धप्रयोग स्तन्यवृद्धिकरो योग. प्रथम ८१ द्वितीयः रज प्रवृत्ती प्रयोग प्रथम द्वितीय ५२ स्तन्यशोधनोपाय' सूतिकाज्वरादी योग ८३ / प्रदरहरो योग " ७८ - प्रस्तावना विजयादिगुटिका चिन्तामणि योग पवासे वासादिकाप लवङ्गादिवटी यामे वासकछाप कासे पिप्यल्लादिचूर्णम् कासे त्रिफलादिचूर्णम् कासे विकटुचूर्णम् वालकासेऽतिविपाप्रयोग श्वासकासहरो योग. यपरो योग रक्तपित्तादी वासकप्रयोग स्वासे गुडतेलप्रयोगः कासे रास्नादिघृतम् श्वासादी विभीतकप्रयोगः पुण्ठ्यादि पापः वालरोगेष्वतिविपाप्रयोगः ९० ९१ ८० ९२ " ९२ - " 1 ९४ , . . (२२) 'विषयाः पृष्ठाङ्काः । विषयाः पृष्ठावाः "प्रदरे कुशमूलप्रयोगः ९५ | अपरो योगः ( कर्तृगुप्तपदम् ) १०७ गर्भिणीशूलहरः कषायः रुस्तम्भचिकित्सा -स्तनरोगहरोलेपः वान्तिप्रतीकार सवेश्वररसप्रयोगः ९६ | पाण्डुरोगप्रतीकारः मश्मरीनाशनोपायः १०९ चतुर्थो विलासः परिणामशूलहरो योगः प्रस्तावना ९७ / अन्तर्विद्रधि चिकित्सा ११० क्षयरोगचिकित्सा भ्रमप्रतीकारः प्रणप्रतीकार ९८ | शिरोरोगहरो लेप. स्थूलत्वहरो योगः श्वित्रनाशनो योगः १११ पुष्टिकरो योगः ९९ | भगन्दरहरो योगः "शोफप्रतीकारोपायः हिक्कानाशनो योगः धातजतृपानाशनोयोगः १०० | अग्निमान्यप्रतीकारः विषापहरणविधिः ( कर्तृगुप्तपदम् ) ११२ वातरक्तप्रतीकारः १०१ शोकप्रतीकारः विसूचिकाहरो योगः कवेरानन्दाभिव्यक्तिः क्रिमिविनाशनो योग १०२ बहिर्लापिका ११३ -मुखपाकप्रतीकारः शुष्ठी कषायः प्रमेहप्रतीकारः दन्तरोगप्रतीकारः ११४ हृद्रोगेषु अर्जुनप्रयोग. १०३ बकुलप्रशंसा पामाप्रतीकारः दन्तविकारचिकित्सा ११५ 'निदाघोपचार. १०४ दुर्नामादिरोगचिकित्सा पञ्चमो विलासः गण्डमालाप्रतीकार १०५ / सुखिजीवनं विशिनष्टि ११६ अम्लपित्तचिकित्सा १०५ / तदेव प्रकारान्तरेण आमवातप्रतीकार १०६ / वाजीकरणयोग्या स्त्री ११७ 'पित्तप्रतीकारः वाजीकरणयोगः कफप्रतीकार. वीर्यवर्धको योगः . . " " 4

पृष्ठाहाः
१२०
( २३ )
पृष्पक्षः
विपया.
११८ बलवर्धको योगः
वीर्यस्तम्भकरो योगः
यपरो योगः
११९ कामिनीविद्रावणो रस.
अन्यान्ते मङ्गलाचरणम्
ग्रन्थपरिचयः
१२० 'ट्यपरिचयः
१२१
विपयाः
आमलकचूर्णसेवनफलम्
यौवनप्रदो योगः
मात्मगुप्ताप्रयोग.
मधुयष्टीचूर्णप्रयोगः
उच्चटाचूर्णप्रयोग.
शुक्रदाट्यंकरो योग.
काश्यहरो योगः
"
"
१२५
१२४-१२८
-

r
शुद्धिपत्रम्
पृष्ठ
पंक्ति
अशुद्धम्
योगाः
मभिरोषधिभिः
२२
૨૨
-
२२
३०
शुदम्
योगः
आभिरोषधिभिः
कृतो
योगः
विनाशयति
“कृता
२२
२३
योगाः
'विनाशयन्ति
r
२३
१
-

वैद्यक- चमत्कारचिन्तामणिः - . 1 - , , - T* अथ प्रथमो विलासः मङ्गलाचरणम्- लीलावति लताकल्पे कल्पनालिसुसंगमे । करोतु विघ्नं विघ्नानां विघ्नानां नायकस्तव ॥१॥ टीकाकर्तुमङ्गलाचरणम्- साम्ब शिव शिवकर वनजायताक्ष गौरीसुत सकलविप्नविनाशदक्षम् । भरत्या प्रणम्य सतत नमितोत्तमाटोको करोमि विमलां विशदार्थदात्रीम् ॥ अथायुर्वेदमास्नगतचिकित्साविषय मूक्ष्मममीक्षया विपश्चिदपश्चिमाना प्रमोदाय चिकित्सक- चूडामणि कविवरण्यो लोलिम्वराज कमपि नूल 'चमत्कारचिन्तामणि' नामक प्रवन्धरल चिकीर्षुस्तत्परिसमाप्तिप्रमारादिप्रतिवन्धकविप्नीघनिवारणाय श्रुतिवोधितेतिकर्तव्यताकशिष्टा- चारमझीकृत्य मगलाचरणमाचरन् विघ्नविनिवारक विनायकमभ्यर्थयन् रलकला च सम्बो- धयन् आशीर्वादात्मक मङ्गलम् अनुष्टुमा निबध्नाति प्यारया-हे लीलावति । रलकले लताकल्पे 'ईषदसमाप्ती कल्पम्देश्यदेशीयर.' ईपदूना रता इव इनि लताकपा, गौरागीत्वात् । 'उलप गुल्मिनी वीरलता वल्ली मतेति च निघण्टु.। क पनालिसुसगमे कल्पनापरम्परया शोमन सगमो यस्या सा, विघ्नानां नायको गणेशस्तर विनाना प्रत्यूहाना विघ्न विनाश करोतु । हुकृस्करणे, आशिपि लोट विनायको विनराज.' । 'विनोन्तराय प्रत्यूएउभयप्राप्यमर । ( अनुष्टुप् छन्द ।) हिन्दी-रता के ममान सुकोमलागी कल्पनाओं के द्वारा भी सगम सुख का आस्वादन करनेवाली हे रनकले ! सम्पूर्ण विनों का नाश करने वाले श्रीगणेश तुम्हारे विनों का नाश करें। विशेप-श्री छोलिम्बराज अपनी विदुपी प्रियतमा रत्नकला को आयुर्वेद का उपदेश देने के व्याजसे इस ग्रन्थ की रचना कररहे है ॥ १ ॥ - २ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणि - श्रीकृष्णस्य वालसुलभा प्रवृत्ति विवृण्वन् कविदितीय मद्गलाचरणम् प्रस्तौति- वाले चञ्चलकोमले सुवदने ते शैलतुल्यौ स्तनौ तुल्यं मे कुसुमैर्वपुदृढतरं मा मा त्वमालिङ्ग माम् । यद्यालिङ्गसि मां बलादहमिदं सर्व यशोदाऽग्रतो- वक्ष्यामीति भणन् हसन् भवभयाल्लक्ष्मीपतिः पातु माम् ॥२॥ म्याख्या-श्रीकृष्ण कामपि-अप्राप्तयौवना गोपिकाम्प्रति कथयति, वाले, इति, वाले ! अपूर्णपोडशहायने चञ्चला चपला चासौ कोमला च तत्सम्बुद्धौ चञ्चलकोमले, सुवदने सुष्टु शोमन वदन मुख यस्या सा तत्सम्बुद्धी हे सुवदने । 'वक्त्रास्ये वदन तुण्डम्' इत्यमरः। ते तव शैलतुल्यौ कठोरौ स्तनौ कुचौ, अपूर्णपोडशवर्षाया. स्तनयो. शेलतुल्यत्व कठोरत्व प्रसिद्धमेव । मे मम कृष्णस्य वपु शरीर ‘गात्र वपु सहननम्' इत्यमर । कुसुमैः प्रसूनै तुल्य समानमस्तीति । अतस्त्व मा दृढतर गाढ "गाढवाढदृढानि च" इत्यमरः । मा मा नैवालिङ्ग । यदि वलादालिङ्गसि तहिं अहम् इद सर्व तव चेष्टित व्यवहार यशोदाग्रतो मातु. पुरतो वक्ष्यामि कथयिष्यामि, इत्थ प्रकारेण सलपन् मापमाणो हसश्च लक्ष्मीपतिः श्रीकृष्ण भवमयात् ससारदुखात रोगशोकादिभ्य. मा पातु । शार्दूलविक्रीडितम् । हिन्दी-श्री कृष्ण किसी नवोढा गोपिकासे कह रहें हैं-हे चञ्चल स्वभाववाली, नवयुवती, कोमलाङ्गी सुमुखी तेरे स्तन पहाब के समान कठोर है, और मेरा शरीर फूलों के समान सुकोमल है, तुम मुझे आलिङ्गन मत करो, मत करो । यदि तुमने हठ से आलिङ्गन किया तो मैं तुम्हारी सारी बातें माता यशोदा से कहदूंगा। ऐसा कहते हुए भवगान् कृष्ण हंसने लगे, इस प्रकार प्रसन्नचित्त श्रीकृष्ण दुःख दरिद्रता-रोग आदि संसारिक बाधाओं से हमारी रक्षा करें। विशेष—इसमकार की मीदा को माता के समीप कहना और 'मुझे मालिजन मत करो' इस प्रकार का निषेध तथा "तुम्हारे स्तन पहारके समान कठोर है" यह दोनों ओर से बालक्रीड़ा का मधुर निदर्शन है। उपरिलिखित इस श्लोक में आये हुए 'वाले' शब्द का 'राधिका' अर्थ होना चाहिये ॥२॥ कवि पुनरपि प्रकारान्तरेण स्वेष्टदेव रासविलासदक्ष राधाकृष्ण स्तौति- मां हित्वाऽन्यवधू प्रयासि भगवन्नैतन्मृषा वत्सले चेत्सत्यं प्रभवेदिदं यदुपते तर्हि प्रसन्नानने । त्वद्वक्षोरुहशैलराजशिखरात् पातं करिष्ये क्षणात् नान्यत्किञ्चिदितिश्रमं हरतु मे राधाच्युतोक्तं वचः॥३॥ म्याख्या-राधिका कृष्ण प्रति वक्ति-हे भगवन् ! मा राधिका सर्वथा त्वय्यनुरका हित्वा परित्यज्य, अन्यवधू प्रयासि १ अत्र कास्वा व्यज्यते यत् राधिका गमनायोधत कृष्ण - प्रथमो विलासः ३" वारयति सान्टनारोपन्याजेन। एतच्छुत्वा कृष्ण कथयति-हे वत्सले, प्रिये एतत् तव , पच सर्वया मृपा मिथ्या । पुनाराचा पृच्छति-हे यदुपते ! कृष्ण! चेत् इद परवधूसमीपगमर्न सत्य प्रमाणित मवेद १ तदा श्रीकृष्ण प्रतिश करोति, हे प्रसन्नानने ! राधिके । अब त्वद्- वक्षोरदशलराजशिखरात् वक्षसि रोएतीति वक्षोर स्तन , 'जातावेकवचनम्। वक्षोरह एव शैलराट पीनोगतत्वात, तस्य शिखराय, क्षणात् तत्क्षणमेव पात करिष्ये निपतिष्यामि, (कामक्रीटाविधी कामिजनस्य कृते एए प्रकारो महान् दुष्करः, अतएव शपथरूपेण श्रीकृष्णो राधिकासम्मुग्वे कथयति ) नान्यत् किनिदिति नान्यः कश्चिदुपाय., राधा च अच्युतश्च ती, तयो. उक्तं कथितम् एतद् राधाच्युतयो रहस्यवर्णनात्मक बच सलापात्मकं वाक्य मे अन्यकतुं अम हरतु आयास दूरीकरोतु । हिन्दी-रामाकृष्ण के रहस्यसंलाप का वर्णन कर कवि अपने इष्टदेव की स्तुति कर रहा है। राधा कृष्ण से कह रही है-हेभगवन् ! आप मुझको छोड़कर दूसरी स्त्री के पास जा रहे हैं ? नहीं नहीं प्रिये यह सर्वथा मूठ है। फिर राधिका कहती है-हे, कृष्ण यदि यह बात सच हो गई तो? तष कृष्ण कहते हैं-हे सुमुखि ? तुम्हारे पीन एवं उन्नत स्तनों के सुसद स्पर्श का तत्काल त्याग करदूंगा (अर्थात् नुम्हारे स्तनरूपी शलशियर से गिरकर आत्महत्या कर लँगा) और मेरे पास इसका कोई उपाय नहीं है। इस प्रकार राधा कृष्ण की प्रेमभरी बातें अन्यकर्ता के परिश्रम को दूर करें ॥ ३ ॥ स्वेष्टदेवस्तुतावतृप्त कविस्तृनोयेन पधेन रासलीलावर्णनप्रसङ्गमुररीकृत्य परमा- स्वरूपिण श्रीकृष्ण स्तुवन् स्मरणात्मक माल प्रस्तीति- कयाचित्कामिन्या कुचकनककुम्भे विनिहितं कयाचित्संभुक्तं घनतमतमास्तोमगहने । स्मरामस्तं बालं कुवलयदलश्यामलतनु विमूलं चिल्लक्ष्यं कलिकलुपकल्लोलदलनम् ॥ ४ ॥ ध्यालया-कयाचिदगुदीतनामधेयया कामिन्या गोपिकया कुच एव कनककुम्भः गौरपीनत्वात् तस्मिन् विनिहितम् आश्लिष्टम् , कयाचिदपरया पन निविट तमः तस्य सोम समूह तेन गहने देशे स्थाने सम्मुक्त रतिक्रीया निवृत्तम् । कुवलयम् उत्पलं तस्य दल तदिव श्यामला तनुर्यस्य त विमूलम् अनादित्वात्, चिलक्ष्य चैतन्यस्वरूप कलि- कलुपाणां कहोल परम्परा तम्य दलने ऐतुभूत त पाल कृष्ण वय लोलिम्बराजा स्मराम । 'एकत्व न प्रयुखीन गुरावात्मनि चेघरे' इति वचनाद् आत्मनि बहुत्व प्रयुक्तम् । शिखरिणी छन्द हिन्दी-अनादि चैतन्यस्वरूप, कलियुग के पाप-समूह का विनाश करने- चाले और नीलकमलदल के सदृश श्याम वर्ण वाले भगवान् श्रीकृष्ण का हम ध्यान करते हैं। जिनका रासलीला के अवसर पर किसी रमणी ने गाद आलिंगन - --- - वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणि किया और किसी ने उनसे अन्धकार पूर्ण स्थान में सम्भोग जनित सुख प्राप्त किया ॥४॥ एतदनन्तर ग्रन्थकर्ता-आयुर्वेदविषय विवृण्वानोऽपि चित्रकाव्यमुखेन नमस्कारात्मक मङ्गल निवध्नाति- नमामि मानिनं रामं निर्ममं राममारमम् । नुन्नराममनोमानं नरनारीमनोरमम् ॥ ५॥ व्याख्या-मानिन स्वाभिमानवन्त राम, निर्मम चतु'सागरपर्यन्त पितुराज्य परित्य- ज्य बन गतत्वान्मायया रहितम् । राममारम रामा चासो मा लक्ष्मी. तस्या रमण त "रेवतीरमणो राम" इत्यमर । वलरामरूप नमामि । नुन्न प्रेरित किंवा दूरीकृतो रामस्य परशुरामस्य मनसि मान - अभिमान' येन त नरनारीमनोरम सर्वजनप्रिय त नमामि । इति व्यक्षरम् । अनुष्टुप्छन्द । ' हिन्दी:-माया मोह से निर्मुक्त और जिसने परशुराम के अभिमान को दूर कर दिया है ऐसे सर्वजनप्रिय राम तथा लक्ष्मी रूपा रेवती के पति बलराम जी को मैं नमस्कार करता हूँ ॥५॥ मङ्गलाचरणानन्तर ग्रन्थकृद मत्कृतिन केवल कपोलकल्पिता अपितु सर्वशास्त्रसम्मतेति प्रदर्शयन्नाह- 'अथ प्रस्तावना आत्रेयहारीतपराशराणां भोजेन भेडेन समन्वितानाम् । . तन्त्राणि चित्राणि मनोहराणि चातुर्यपूर्णानि निरीक्ष्य सम्यक् ॥६॥ दिवाकरप्रसादेन रोगारोग्यैकहेतवे। रचयामश्चमत्कार-चिन्तामणिमणीयसम् ॥ ७ ॥ व्याख्या-आत्रेय , हारीत , पराशर., भोज , मेडश्च-एतेपाम् आचार्याणा चित्राणि विविधाङ्गयुक्तानि ( विविधानानि यथा-शल्य,, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, अगदतन्त्र, कौमारभृत्य, रसायन, वाजीकरणचेत्यष्टावङ्गानि ). मनोहराणि सर्वजनहित- कराणि चातुर्थपूर्णानि युक्तियुक्तानि तन्त्राणि सम्यक् साधु यथा तथा निरीक्ष्य आद्यन्त विलोक्य, दिवाकर पिता सूर्यश्व, यतो हि-"आरोग्य मारकरादिच्छेत्” इत्युक्ते । तस्य प्रसादेन कृपया रोगाणा विनागहेतवे आरोग्यस्थायिलाभार्थञ्च यथा--"स्वस्थस्य स्वास्थ्य- रक्षणम आतुरस्य व्याधे परिमोक्षणञ्चेति चिकित्साया सिद्धान्त " । अणीयसम् सक्षिप्तं "चमत्कारचिन्तामणि" नामक ग्रन्थ रचयाम । प्रतियुग्मकम् ॥ इन्द्रवजा नथाऽनुष्टुप् । हिन्दी-आत्रेय, हारीत. पराशर, भोज और भेड (ल)इन आयुर्वेट शास्त्र- प्रवर्तक ऋषियों की विविधविपय पूर्ण एवं युक्तियुक्त सहिताओं का पूर्ण मनन करने के पश्चात्-रोगियों के आरोग्य प्रदान करने की इच्छा से तथा नीरोग- : 7 प्रथमो विलासः -१५ प्राणियों के स्वास्थ रक्षा हेतु-श्री दिवाकर (पूज्य पिता) की कृपा से मैं इस ! लघुकाय 'चमत्कार चिन्तामणि' नामक ग्रन्थ की रचना कर रहा हूँ। " । विशेप-"दिवाकर प्रमादेन" शाम्रों में लिखा है कि आरोग्यता का इच्छुक सूर्य की उपासना करे। इस आशय से यहाँ पर दिवाकर शब्द से सूर्य का ग्रहण किया जा सकता है किन्तु ग्रन्थकर्ता के पिता का नाम 'दिवाकर' था-अतः यह भी सम्भव है कि मङ्गलाचरण के प्रसन में लेखक ने अपने पितृचरणों का स्मरण किया हो।॥ ६-७ ॥ चिकित्साविधि.- परीक्षेत रोगस्य लिङ्गानि तावत्ततोऽनन्तरं भेषजं च प्रदद्यात् । इति व्याधिविद् यश्चिकित्सां प्रकुर्याभवेत्तस्य सिद्धिश्च निःसंशयेन ||८|| ग्यालया-यो व्याधिविद् वैध तावत् पूर्व रोगस्य लिङ्गानि लिङ्गयते शायतेऽनेनेति लिङ्ग तानि (निदान पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा । सम्प्राप्तिश्चेति विज्ञान रोगाणा पश्चधा म- तम् । तथापि एते पञ्च व्यस्ता समस्ताश्च व्याधिवोधका भवन्तीति परीक्षेत । यथाए वाग्मट रोगमादौ परीक्षेत तदनन्तरमौषधम् । तत कर्म भिपक् पश्चाज्ञानपूर्व समाचरेत् ॥ तत, परीक्षणानन्तर भेपन च प्रदद्याद् औषधोपचार कुर्यात् 1 एतद्विधिना व्यवहारकर्तु- स्तस्य वैद्यस्य सिद्धि.-रोगसाफल्य नि सगयेन भवेत् । भुजङ्गप्रयातम् । हिन्दी-सर्वप्रथम निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति इन पांच प्रकार के रोग-विज्ञान के साधनों की सहायता से रोग का निश्चय करे, इसके पश्चात् औषध का प्रयोग करे । इस प्रकार चिकित्सा करने वाले वैद्य को निसन्देह सफलता मिलती है ॥ ८॥ अथ सवैद्यलक्षणान्याए। ', सकलशास्त्रपुराणविदुप्यहो गदनिदानचिकित्सितयो पटुः । उदधिजन्मकरः सुताकरः सकरुणोऽकरुणोऽभिमतो भिषक् ॥९॥ व्याख्या-सकलानि शास्त्राणि पुराणानि च वेत्तीति सकलशालपुराणवित् यथाऽऽइ सुश्रुत एक शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् । तस्माद् बहुमुन शास्त्र विजानीयाञ्चिकित्सक ॥ सु सू ४ ॥ तथा गदनिदानचिकित्सितयो पटु. गदाना रोगाणा निदानं गदनिदान तस्मिन् चिकित्सायां च पटु अर्थात-उभयश -ययोवाच भगवान् धन्वन्नरि. मुसुताय-- । यस्तु केवलशास्त्र कर्मस्वपरिनिष्ठित । स 'मुखत्यातुर प्राप्य प्राप्य भीरुरिवाइवम् ।। यस्तु फर्मसुनिष्णातो धाष्टान्छास्त्र वहिष्कृत । स सत्सु पूजा नामोति वध चाईति रामतः ।। . T - - w वैद्यक चमत्कारचिन्तामणिः - , अतएवोमयश. प्रशस्त यत्तूमयशो मतिमान् स समर्थोऽर्थमाघने । आइवे कर्म निर्याद द्विचक्रः स्यन्दनो यया ।। इत्यल पडवितेन, उदधिनन्मकर--पीयूपपाणि । मुकताकरः पुण्यात्मा; सकरणः दयावान, अकरुण शस्त्रक्षाराग्निप्रयोगेपु नि युरो मिपक-अभिमतो राजमान्यो भवति । उक्तन्त्र र सार्णव- शस्त्रे शास्त्र क्रियायां विविधमुनिमतः पूर्वपापापहारी साहित्ये तर्कशाम्ग्रे विमलतरमति पट्गुण पापभीर. ! मन्यानुष्ठानधारो हरिहरभजको नीतिमान् कान्तमृति- धर्मशो भूतवन्धुर्मवति सलु मिप - मगलाय प्रभूणान् ।। द्रुतविलन्वितन् । हिन्दी-उत्तम चिकित्सक के लक्षण-सम्पूर्ण शास एवं पुराणों का ज्ञाता, रोगपरीक्षण एव चिकित्सा कुशल, पीयूपपाणि, पुण्यारमा, दयालु स्वभाववाला, चिकित्साकाल में शस्त्र, क्षार तथा दाह का प्रयोग करते समय निप्टुर इन गुणों से युफ चिकित्सक राजमान्य होता है ॥९॥ अथ चिकित्साया महत्त्वमाह- यशः क्वचिढ़ा द्रविणं कचिद्वा मैत्री क्वचिद्वा सुश्रुतं क्वचिद्वा। शानं क्वचिद्वा प्रभुता क्वचिद्वा चिकित्सितं निष्फलमेव न स्यात् ॥१०॥ म्याख्या-कप्टमाध्याघवम्थाया युक्तियुक्तचिकित्साकरणात कचिद् यश. प्राप्नोति वैध', कचिद् द्रविण धन लमते, कचिन्मग्रीलाम. सायते, कचिद् अनुमवमुखेन शानमर्जयति, कचित् प्रभुता स्वामित्वम् उररीकरोति, क्वचित् मुकुन प्रसिद्धिम् । अत चिकित्सित कुत्रापि निष्फल व्यर्थ न स्यात् । प्रकारान्तरेण रसाणवेऽपि चिकित्साया प्रभुत्वमुपवर्णितन्- कचिद धर्म कचिन्मंत्री क्वचिद्-द्रन्य कचिद् यशः । कर्माभ्यास कचिच्चैव चिकित्सा नास्ति निष्फला ॥ इत्यमेव वाग्मटेनापि स्वकीयाष्टामसाहे-उ०००११२४ ।। उपजाति । हिन्दी-निदान एवं चिकित्सा में कुशल वैद्य जय चिकित्साकार्य प्रारम्भ करता है तो उसको कहीं यश मिलता है कहीं धन की प्राप्ति होती है, कहीं मित्रता बढ़ती है, कहीं से प्रसिदि होने लगती है, कहीं से ज्ञानलाम और कहीं प्रभुता इसप्रकार कुल मिलाकर चिकित्सा-व्यवसाय कहीं व्यर्थ नहीं जाता ॥ १० ॥ मओपधसेवने धार्मिक दृष्टिकोणमुपवर्णयनि- अमृताच्युतकौस्तुभान्समध्ये सह धन्वन्तरिणा गरुत्मतापि । स्मरता यदिभेपजंगृहीतंगदिना तस्यं किमस्ति तर्हि दुःखम् ॥११॥ व्याख्या- सुमध्ये तन्वगि। यदि गटिना रनावता अमृताच्युतकौस्तुभान् अमृत च अच्युतः च कौस्तुम. च तान्, “परवहिन बन्दनत्पुरुपयो" इत्यनेन पुस्त्व निर्दिश्यते । अमृत पीयूपम् औषध वा मैपज्य मेपज मंत्रमगदो जायु रोषधम् । आयुर्योग गदाराति- - प्रथमो विलासः - -- H - * - . - - रमृत च तदुच्यते ।" अच्युन विष्णु, कौस्तुभमेतनामक विष्णोर्मणिं, धन्वन्तरिणा देववैधेन, गरुत्मता विष्णोहिनेन सह अपि स्मरता स्मरण कुर्वता भेषज गृहीत सेवित स्याद तर्हि दुख किमस्ति, अर्थात् स सर्वेभ्यो दु खेभ्य. प्रमुच्यते । मालमारिणी वृत्तम् । यथा-"औषध जाहवीतोय वैद्यो नारायणो हरि" तन्त्रान्तरेष्वपि औषध-सेवनकाले मगवन्नामस्मरण निर्दिष्टम्- धन्वन्तरि गरुत्मन्त मणिराज च कौस्तुभम् । अच्युत चामृत चन्द्र स्मरेद् भैषज्यकर्मणि ।।. हिन्दी-हे कृशागी ! यदि रोगी औपधिसेवन काल में धन्वन्तरि और गरुड़ के साथ अमृत, विष्णु भगवान् तथा उनके कौस्तुभ मणि का स्मरण करे तो उसके सभी रोग शान्त हो जाते हैं । अर्थात् उसका कोई दुख शेप नही रहजाता ॥ ११ ॥ मूढवैधनिन्दामुपवर्णयन्, तन्निर्दिष्टीपधसेवननिषेधमाह- न ग्राह्य मूर्खभिपजो भेषजं प्राशरोगिभिः । गृहीतं यदि काक्षि ! जनयेत्तद् गदान्तरम् ॥१२॥ ब्याण्या-हे फआक्षि ! कमलनयने, प्राशरोगिमिविवेकशीलरातुरै , "प्राशरोगिणो- लक्षणं यथाह चरक प्रागो रोगे समुत्पन्ने वाधेनाभ्यन्तरेण वा । कर्मणा लमते शर्म शस्त्रोपक्रमणेन वा ॥ च सू अ ॥ १२ ॥ मूर्खमिपजो भेषजमौषधं न ग्राम नैव सेवनीयम्, यथाइ भगवान् अग्निवेश भुतदृष्टक्रियाकालमात्राज्ञानवहिष्कृता । वर्जनीया हि ते मृत्योश्चरन्त्यनुचरा भुवि ।। वृत्तिहेतोर्मिपल् मानपूर्णान् मूर्खविशारदान । वर्जयेदातुरो विद्वान् सास्ते पीतमारुता ॥ च सू अ २९॥ यदि रोगिणो मूर्खभिपज , औषधं सेवन्ते तहिं तद् गदान्तरम् अन्य रोग मृत्यु वा जनयेत् । अनुष्टुप् छन्द.। हिन्दी-हे कमलनयने ! विवेकशील रोगियों को 'चाहिये कि वे शाम एवं चिकित्सा ज्ञानरहित मूर्ख चिकित्सक की औपधि का सेवन न करें। यदि वे सेवन करते है तो उससे दूसरे रोगों के होने की अथवा मृत्यु की सम्भावना रहती है ॥ १२ ॥ अथ चिकित्सादौ पथ्यस्यैव श्रेष्ठत्वमुपवर्णयति- पथ्ये सति विकारस्य प्रतीकारो वृथा भवेत् । पथ्येऽसति विकारस्य प्रतीकारो वृथा भवेत् ॥ १३॥ व्याख्या-ग्रन्यकृता वैद्यजीवने प्रकारान्तरेणाइदमेव पंधमुपनिवद्धम् । मन्ये कविराजो लोलिस्वराजो गोमूत्रिकाबन्धदिशा पद्यमिदमुपन्यस्तवान् । द्वितीयाऽर्धेऽसतीति सन्धिाच्छेद। । , r . ܕ- भ वैद्यक चमत्कारचिन्तामणिः 1 है - - - यदि रोगी पथ्याशी स्यात् ताह-अन्यचिकित्साया नाम्नि किमपि प्रयोजनन् । यदि रोगी पथ्याशी नास्ति तथापि-अन्यचिकित्साकरण विफर मेन । यथोक्त चरकेण- विनापि भेपाधि पठ्यादेव नियति । नतु पन्यविहीनन्य भेपजाना शतैरपि ॥ आयुर्वेदशास्त्रीयपयोऽनपेत पश्य "धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते" इति यत् प्रत्यय । विकारो रोग, प्रतीकार. शमनम् । अनुष्टुप् छन्द | हिन्दी-यदि रोगी पथ्य सेवन करता है तो उसको रोग की चिकित्सा कराने की आवश्यकता नहीं है। (क्योंकि पप्यसेवी का रोग विना भीषधिके ठीक हो जाता है) यदि रोगी पथ्यसेवी नहीं है तो उसके रोग की चिकिरसा नहीं करनी चाहिये, (क्योंकि पथ्य के विना औषधियों का पूर्ण प्रभाव रोगी पर नहीं परता) मत चिकित्सा के साथ-साथ पथ्य-सेवन की ओर अवश्य ध्यान देना एवं दिलाना चाहिये ॥ १३ ॥ अथ लोलिम्बराज स्वग्रन्य प्रशसयन्नाह- इह गमिष्यति वैद्यमतिः श्रमं प्रथममेव पुरस्तु महासुखम् । प्रियतमस्य नवीनसमागमे नवकरग्रहणा गृहिणी यथा ॥१४॥ ध्यासया-दह-अस्मिन् चमत्कारचिन्तामणी वैद्यमति मिपगभूषप्रथममेव-अध्ययन- मननकाल एव अम खेद गमिष्यति, पुरस्तु तदनन्तर तु महासुखम् महत् च तद मुखन् "आन्महत" इत्यादिसूत्रेणात्वम् । गमि यतीति वाक्योऽर्थः । प्रियतमस्य प्राणवछमस्य नवीनसमागमे विवाहानन्तर प्रथमरात्री कान्नाविनोदे नवकरग्रहणा नवपाणिग्रहणा गृहिणी पती यथा प्राक् श्रम गच्छति पश्चात् सुखम् अनुभवति तददिव । अस्मिन् पये द्वितीय चरण दृष्टान्तरूपेणोपन्यस्त कविवरेण । द्रुतविलम्वितम् । हिन्दी-उत्तम चिकित्सक बनने की इच्छावाले व्यक्ति को मेरे इस ग्रन्थ के अध्ययन में प्रारम्भिक कप्ट अवश्य होगा किन्तु वाद में वह सुख का अनुभव करेगा। जिसप्रकार नवविवाहिता पत्नी पति के प्रथम सगम काल में कष्ट का अनु- भव कर बाद में प्रारम्भिक कष्ट से अधिक सुख का अनुभव करती है ॥ १४ ॥ रोगाणाम्प्रानल्यमुपवर्णयन्नुपदिशति- त्रैलोक्यस्य महेश्वरेण सकलज्ञानस्य पाथोधिना रुद्रेणापि न शक्यते क्षपयितुं दुष्टः सुधांशोः क्षयः। अस्माकं यदि शास्त्रकिञ्चनधियां स्वस्वामिनां नो प्रती- कारः स्याद् गलितायुपांगुणिगणानो हानिरित्युच्यताम् ॥१५॥ म्याख्या-त्रैलोक्यस्य लोकत्रयस्य महेश्वरेण महांश्चासौ ईश्वर. तेन सकलशानस्य निगमागमविवेकस्य पाथोधिना समुद्रेण "कनन्धमुदक पाथ " इत्यमर । रुद्रेण शिवेन- - - 4 - प्रथमो विलासः ६ . -- - A - अपि सुधाशोश्चन्द्रमसो दुष्ट असाध्यरूप क्षयो राजयक्ष्मा क्षपयितु साधयितु न शक्यते । यदि गलिनानुपा क्षीणायुष्मता शास्त्रकिञ्चनधिया शास्त्रशाने किश्चना स्वल्पा थोपा तेषाम् न अस्माक स्वस्वामिना येपा वयम् आश्रितास्तेपा (च) गुणिगणाञ्चिकित्सक- समाजात प्रतीकार. स्वास्यलाम नो स्यात् “नय नो नापि" इत्यमर' । न भवेच्चेत् तहिं नो हानिरित्युच्यताम् कापि चिन्ता न करणीयेत्यर्थ । अत्र साराम "नहि कर्म महत् किचिव फल यस्य न भुज्यने", इतिशास्त्रमनुसृत्योदाहरणरूपेण प्रस्तूयते पद्यमिद ग्रन्थ- कृता । अत्र स्वगर्व परिहरन् वक्ति लोलिम्बराज -लोकत्रयस्य ईश्वर शिवोऽपि चन्द्रमस नीरज कर्तुम् असमर्थस्तत्र के वय म्वल्पशास्त्रविद इति । शार्दूलविक्रीडितम् ।। हिन्दी-जब तीनों लोकों के स्वामी, सम्पूर्ण ज्ञान के समुद्र भगवान् शंकर चन्द्रमा को राजयपमा रोग से मुक्त नहीं कर सके तब यदि छोटी आयुवाले शास्रों का सामान्य ज्ञान रखने वाले हमारा तथा हमारे स्वामियों का चिकित्सक वर्ग भली भाँति रोगों का प्रतीकार न कर सकें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं ॥ १५ ॥ इति प्रस्तावना। अथ ज्वराधिकारः अय मर्वरोगप्रधानत्वादादी ज्वरमेवोपनिनध्यते- यतः सर्वेपुरोगेपु प्रायशो वलवाज्वरः । ततस्तस्य प्रतीकारं प्रथमं महे वयम् ॥ १६ ॥ व्याख्या-सर्वपु रोगपु यनो यस्मात् कारणात् प्रायगो वाहुल्येन ज्वर वलवान् सवल प्रधानरूपेण भवतीति, ततस्तस्मात् कारणात् वयं तस्य ज्वरस्य प्रथम प्राक् प्रतीकार सशमनोपायम् घूमहे, उपदिशाम । यथोक्तं चरकेण- देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वरोगाग्रजो वली । ज्वर प्रधानो रोगाणामुक्तो भगवता पुरा ॥ रोगराट् सर्वभूतानामन्तकृद दारुणो ज्वर । तस्मात्तस्य विशेषेण यतेत प्रशमे भिषक् ।। वाग्भटोऽपि ज्वरस्याग्रजले समर्थयति, तदित्यम्- ज्वरो रोगपति पाप्मा मृत्युराजोऽशनान्तक । क्रोधो दक्षाध्वरध्वसी रुद्रो नयनोद्भव ॥ एप ज्वरो न केवल मानवान् अपितु मर्वाम् जन्तून् पीडयति, यथाह पालकाप्यो- इस्त्यायुर्वेदे महारोगस्थाने नवमाध्याये- पालक स तु नागानाममितापस्तु वाजिनाम् । गवामीश्वरसशश्च मानवाना ज्वरो मत ।। अजावीना प्रलापाख्य करभे चालसो भवेत् । हारिद्रो महिपीणान्तु मृगरोगो मृगेषु च ॥ इत्यादि। इरिवशे ज्वरस्वरूपमाह- ज्वरस्त्रिपादनिशिरा. पह मुजो नवलोचनः । भस्मप्रहरणो रौद्र कालान्तकयमोपमः ॥ 7 -- - - १० वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः हिन्दी-क्योंकि सभी रोगों में अधिकांश रूप से ज्वर की प्रधानता दिखाई देती है अतः हम सर्वप्रथम उसी की चिकित्सा का वर्णन करते हैं ॥ १६ ॥ ज्वरादी लवनप्रस्ताव 'आमाशये संस्थित आमसंयुतः स्रोतांसि सर्वाणि हुताशनं तथा । निरुध्यदोपः कुरुते ज्वरं यतस्ततो विधेयं प्रथमं च लबनम् ।। १७॥ व्याख्या-ज्वरशामकेपूपायेपु लघनस्य प्राशस्त्यम्, तदेवाह-आमाशये सस्थित., आगत्य स्थित (स्था गतिनिवृत्ती मावे क्त ) दोपः वातपित्तकफात्मक मिथ्याहारविहाराभ्या दोपा यामागयाश्रया । वहिनिरस्य कोठानि ज्वरदा म्यू रमानुगा । किं वा आमसयुत आमदोषससृष्टो वातादिदोपो यत' सर्वाणि रसंवाहीनि स्रोतांसि हुता- शन पाचकानि च निरुध्य ज्वर कुरुते, तत' नस्मात्-प्रथमम् आदी लवन लघु भोजनम् अनशन वा प्रयोज्यम् ॥ इन्द्रवशावृत्तम् । लघन विपयेशास्त्रकाराणान्मतानि- लघनस्य परिमापा- यव किञ्चिल्लाघवकर देहे तल्लग्न त्नृतम् ।। लघने हेतुमाह- आमाशयस्थो हत्वाग्नि मामो मार्गान् पिधापयन् । विदधाति ज्वर घोर तन्माल्लवनमाचरेत् ।। मै० र० ॥ ज्वरे लवनमेवादावुपदिष्टमृते ज्वरात् । क्षयानिलमयक्रोधकामशोकलमोद्मवाद ।। न सर्वे लवनीया इति सुश्रुत.-न लघयेन्मारुतजे क्षयजे मानसे तथा । अलच्याश्चापि ये पूर्व दिव्रणीये प्रकीर्तिता.॥ लड्नस्य प्रमाणम्- प्राणाविरोधिना चैनं लगनेनोपपादयेत् । वलाधिष्ठानमारोग्य यदर्थाऽय क्रियाक्रम । हिन्दी-जय वातादिदोप आमाशय में आकर रुक जाते है अथवा आमदोष से युक्त हो जाते हैं तव वे स्रोतों में रुकावट पैदाकर अग्नि को मन्द कर देते हैं, फलतः ज्वर की उत्पत्ति हो जाती है। अतएव दोष अथवा दोपों की शान्ति के लिये सर्वप्रथम रोगी को लंघन कराना चाहिये ।। १७ ॥ वातानुलोमको वहिदीपकञ्च योग:- लाजाशुण्ठीकणामुस्तासैन्धवोशीरदाडिमैः । वातानुलोमनो मण्डो दीपयेदाशुशुक्षणिम् ।। १८॥ । ग्यास्या-लाना भृष्टधान्य, शुठी नागर, कणा पिप्पली, मुस्ता घना, सैन्धव लवणम्, उशीर नलद, दाढिम च आमि ओपथिमि सिद्धो मण्डो वातानुलोमन करोति तथा पाचकाग्नि प्रदीपयति । 'अनुष्टुप् छन्द तत्र चरक - . - प्रथमो विलास ११ - । 7 1 A मण्डनिर्माणप्रकार.- नीरे चतुर्दशगुणे सिद्धो मण्डस्त्वसिक्थक । गुण्ठी-मैन्धवमयुक्त. पाचनो दीपन' पर ॥ शार्गधरे । मण्टपेयाविलेपीनामोदनस्य च लाघवम् । यथापूर्व शिवस्तत्र मण्टो वातानुलोमनः ॥ वाग्मटे ।' हिन्दी-धान का लावा (खील), सोंठ, पीपल, नागरमोथा, सेन्धानमक, खस और दादिम इनके द्वारा बनाया हुआ मण्ड (मांद) वायु का अनुलोमन तथा जठराग्नि का दीपन करता है। मण्डनिर्माणविधि-रोगानुसार औपध से चौदह गुना जल में चावल आदि से बनाया हुमा सिक्य (सीठी) रहित द्रव पदार्थ मण्ड कहा जाता है ॥ १८ ॥ तम्णज्वर धृतमेननिषेधमाह- रुचिरोरुस्तनश्रोणि तरुणचरिणे घृतम् । परसंसर्गसंसक्तं ' कलमिव साधवः ।। १९ ।। म्याख्या-रुचिरी-ऊरू स्तनी श्रोणि यस्याः सा तत्सम्बुद्धी हे रुचिरोरुस्तनयोणि ! रत्नकले ! तरुणचरिणे आमज्वरयुक्तरोगिणे घृत सपिर्न देयम् । तरुणज्वरवान् रोगी नया धृतलेवन त्यजेद् यथा परससर्गससक्त कलय पुश्चली स्त्रिय साधव सत्पुरुषा त्यजन्ति । अनुष्टुप् छन्द.। यथोक शाइधरसहितायाम्- अजीणीं वर्जयेत् म्नेहमुदरी तरुणज्वरी । दुर्वलोरोचकी स्यूलो मूच्छा? मदपीढित ।। हिन्दी-मनोहर जंघा, स्तन एव कमर वाली ररनकला, मामञ्चर वाले रोगी को चाहिये वह घृत सेवन का वैसा ही त्याग करे जैसा ग्यमिधारिणी सी का सज्जन पुरुप त्याग कर देते है। विशेष-मूल श्लोक में "सजन्तु ज्वरिणो" पाठ है, वास्तव में उसके स्थान पर" तरुणज्वरिणे" पाठ होना उचित हे ॥ १९ ॥ ज्वरे पाचनम्- भो भो पयोधरधराधरभारखिन्ने चेतोहरे सकलकामकले सुशीले। विश्वासघान्यवृहतीद्धयदेवकाष्ठः स्यात्पाचनंप्रथमतोज्वरनिर्जितानाम् २० व्याख्या-मो मो इति सम्बोधनस्य द्विरुक्ति , योगम्यास्य निसन्देहसूचिका, पयोधर- धराधरमारजिने पयोधरी स्तनी एव धराधरी पर्वती पीनोन्नतत्वात तयो मारेण खिन्ने व्यथिते, तोहरे मनोमोहकारिणि, सकलकामकले सम्पूर्णरतिक्रीडासुचतुरे, सुशीले शोमन शील । यस्या सा तत्सम्बुद्धी, इत्यम्भूते. रत्नकले । विश्वो शुण्ठी संघान्य धान्यकेन सहितं -- - १२ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - - - एतीदय कण्टकारी युगल, देवकाठ मुरदारु, आभिरीपधिभि सिद्धः काप. प्रथमनो वर- निजिताना ज्वरमुक्तानां पाचन भवति । वसन्ततिलकावृत्तम । शाधरसहिनायान् नागर "देवकाष्ठ च धान्यक वृाहतीद्वयम् । दद्यात् पाचनक पूर्व ज्वरिताना घरापहम् ।। काथनिर्माणविधिः पानीय पोटशगुण क्षुण्णे द्रव्यपले क्षिपेत् । मृत्पात्रे कापयेत् प्रासमष्टमाशावशेषितम् ।। कर्षादौ तु पल यावद दयात् पोटशक जलम् । तज्जल पाययेद्वीमान् कोष्ण मृदग्निसाधितम् ।। काथमाना- मात्रोत्तमा पलेन स्यात् प्रिमिरक्षस्तु मध्यमा । जघन्या च पलान स्नेहकायोफ्धेषु च ।। पाचनस्य परिमापा- यत्पचत्याममाहार पचेदामरम च यत् । यदपकान्पचेद् दोपास्तद् विपाचनमुच्यते ॥ हिन्दी-पर्वत के सदृश पीन और उन्नतस्तनों वाली, मन को वश में करने चाली, सम्पूर्ण काम-कला में कुशल, सुन्दर स्वभाव युक्त रनकला, सोंठ, धनियां 'दोनों कटेरी, और देवदारु इनसे बनाया हुआ काथ दोप-पाचन के लिये ज्वर- पीड़ितों को देना चाहिये। विशेष-मूल में "विश्वापधानो" पाठ है, किन्तु यह अशुद्ध है और इसमें छन्दोभन दोष भी है। दूसरी वात-"ज्वरनिर्जितानाम्" पाठ भी इसमे भ्रामक है क्योंकि यह पाचन कारक योग ज्वर मे आमदोष को पचाता है। यदि ज्वर ही शान्त हो गया तो फिर इसकी आवश्यकता ही क्या। हमारे विचार से इस पाठ को ऐसा होना चाहिये- "विश्वासधान्यबृहतीद्यदेवकाठैः स्यास्पाचन प्रथमतो वारणां हिताय।" यद्यपि चिकित्सक को अपने अनुभव के आधार पर योग परिवर्तन का पूर्ण अधिकार है, तथापि भ्रामक एवं अशुद्ध पाठों की निवृत्ति के लिये यह विचार किया गया है ॥ २०॥ वातादिज्वरेपु कपाय:- छिनौषधाम्भोधरधन्वयासैः, किराततिक्ताम्युदरेणुयासैः। मुस्ताटरूषौषधधन्वयासैः काथो मरुत्पित्तकफज्वरेषु ॥ २१ ॥ व्याश्या-छिन्ना गुहची : औषध शुण्ठी, अम्मोधरो मुस्ता, भन्वयासो दुरालमा चतुर्मिरेभिर्वातज्वरे काय | किरातो भूनिम्ब , तिक्ता कटकी, अम्बुदो मुस्ता, रेणु. पर्पट. यासोयवास पञ्चभिरेभि पित्तज्वरे क्वाथ । मुस्ता मुस्तकम्, ' आटरूषो वासक , औषध, शुण्ठी, धन्वयासो दुरालभा चतुर्मिरेमि कफज्वरे काय ! उपर्युक्तालय. से -- - - - प्रथमो विलासः १३ - । - काया क्रमेण वातपित्तकफनचरेयु पाचनार्थ शस्ता । श्मे यो योगा सन्निपातज्वरिणे चुगपदेव प्रयोज्या इति चरकाचार्यस्य मतम्- हत्यौ वत्तक मुम्त देवदासमहौषधम् । कोलवहीं च योगोऽय सन्निपातज्वरापह. ॥ शुटी पुष्करमूलन व्याघी शृङ्गा दुरालमा । गुडूची नागर पाठा किरात कटुरोहिणी ।। अनुमीयते यद ग्रन्थकृता सन्निपातोक्ता एते योगा स्वानुमववलेन पृथक पृथक् कृता. किञ्चित्परिवधिना सईव न्यूनतामपि गमिता । उपजातिवृत्तम् । हिन्दी-गिलोय, सोंठ, नागरमोथा और धमासा इनका काथ वातज्वर में, चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, पित्तपापड़ा और जवासा इनका काथ पित्तज्वर में, तथा नागरमोथा, अडुमा, सोंठ और धमासा इनका काथ कफज्वर में देना चाहिये । विशेष-ये तीनों योग चरक चिकित्सास्थान में वर्णित। योग से कुछ घटा बढ़ाकर लिखे गये हैं। यह कार्य देश-कालज्ञ चिकित्सक" अपने विवेकसे कर ही सकता है । यह क्वाथ दोपों का पाचन करने के साथ पिपासा की भी 'शान्ति करता है। यदि इसका प्रयोग सन्निपात ज्वर में करना हो तो तीनों योगों को मिलाकर करना चाहिये। कुछ और यह श्लोक लोलिग्यराज रचित वंद्यजीवन में भी इसी प्रकार उद्धन है। छिन्नोद्भवाम्मोधरधन्वयामै किराततिक्ताग्बुदरेणुयासैः । विश्वावृपाम्भोधरधन्वयासे काथो मरुपित्तकफवरेषु ॥ वै० जी० । इसकी टीका लियते हुए श्रीमद्यतिवर्य सुखानन्द जी लिखते हैं छिन्ना गुडूची, औपधं शुटी, किन्तु यह औषधपद इस-लोक में है ही नहीं, हाँ..चमस्कार चिन्ता- मणि के इस पद्य में "छिन्नौपधाम्मोधर" पाठ अवश्य है। परन्तु यह पाट ध्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है इसके स्थानपर "छिन्नौपधमम्भोधर" ऐसा पाठ होना चाहिये, किन्तु ऐसा करने पर छन्द भग हो जाता है । हमारे विचार से "छिन्नोदभवाम्भो- घरधन्वयासें " वेद्यजीवन के पाठ को ही ठीक 'मान लेना चाहिये। किन्तु गुणों की दृष्टि से वातज्वर 'नाशक योग में सोंट को रखना ही चाहिये। अत यह समस्या उक्त पाठ को इस प्रकार बदल लेने से सुलझ जायगी “छिन्नौप, मुस्तक धन्वयास"॥२१॥ सर्व ज्वरघु सामान्य कपाय पयोवाहभूनिम्बकोशीरकाणां स्थिरासिंहिकायुक् कलस्यौपधीनाम् । गुडची-त्रिकण्ट-प्रयुक्तः कपायो नरं सज्वरं निवरं चर्करीति ॥२२॥ व्याख्या-पयोवाहो मुम्ता, भूनिम्ब किरात , उशीरो नलद", स्थिरा शालपणी, सिहिकायुक् कण्टकारीद्वयम्, गौ पंध शुण्ठी, कलशी पृश्निपणी, गुडूची छिन्ना, त्रिकण्टो । ग .

१४ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः . - - गोक्षुरः, इत्यायोषधीनाम् प्रयुक्त कपाय मज्वर ज्वरयुक्त नर निर्वर स्वररहित च- कर ति । मुजगप्रयातम् । हिन्दी-नागरमोथा, चिरायता, खस, शालिपर्णी, दोनों कटेरी, सोंठ, पिठवन, गिलोय, गोखरू इन औषधियों से निर्मित इस (मुस्तादि) काय का सेवन करने से मानव ज्वररहित हो जाता है ।। २२ ।। वातन्वरे कपाय- विशालमालूरकुचाभिरामे सुपल्लवे वल्लरि काचनस्य । दिलीपपत्नीचरणौ विमोक्षो.लोको हनूमज्जनके ज्वरे स्युः ॥ २३ ॥ म्याख्या-विशालमालूरकुचाभिरामे, वृहविल्वसदृशरमणीयवक्षोजशालिनि ! सुपल्लने शोमनचरणकदेशे किंवा शोमनचैलप्रान्ते, काञ्चनस्य वहरि गौरवर्णवति ! दिलीपपत्नी मागधी तस्याश्चरणौ मूल, विमोक्षो गुडूची लोको विश्व - शुण्ठी, हनुमतो जनकः पिता पवन- स्तत्सम्बद्ध ज्वरे एपः कपाय प्रयोज्य', 'विल्व शाडिल्यशैलूपो मालूरश्रीफलावपि ।' अमिनव- निघण्टु । पिप्पली मागधी कृष्णा वैदेही चपला कणा । अभिनवनिघण्टु । उपजातिवृत्तम् । अष्टाङ्गहृदये चिकित्सास्थाने ज्वरचिकित्साप्रकरणे वातज्वरे कपाय. अथवा पिप्पलीमूल गुहूची विश्वभेषजम् ॥ वाग्भटे || हिन्दी-वेल के सहशस्तन, सुन्दर चरण तथा गौर वर्ण वाली प्रियतमा पिप्पलमूल, गिलोय और सोंठ का काथ वातज्वर का शमन करता है ॥ २५ ॥ वातपित्तज्वरे पनमद्र. कपाय.- छिन्नोद्भवापर्पटवारिवाहभूनिम्बशुण्ठीजनितः कपायः। समीरपित्तज्वरजर्जराणां करोति भद्रं खलु पञ्चभद्रः॥ २४ ॥ ग्याल्या-छिनोमवा गुडूची, पर्पट. तिक्त, वारिवाहो. मुस्ता, भूनिम्बः किरातः शुण्ठी महौषधम्, आमिरोपधिमिनिर्मित कपाय. समीरपित्तन्वरनर्जराणा वातपित्तज्वर- पीरिताना मानवानाम् एप पञ्चमद्रामिधो योग. खलु निश्चयेन भद्रम् उपकार करोति । उपजाति । शाहधरसहितायामपि तथैव- पर्पटाम्दमृताविश्वकैराते. साधित जलम् । पञ्चमद्रमिद शेय वातपित्तन्वरापहम् ।। हिन्दी-गुडची, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, चिरायता और सोंठ इनका काय चातपित्तज्वर में देना चाहिये । इस फ्राय का नाम पनभद्र है ॥ २४ ॥ ज्वरे नापनाशको योग अनन्तादिं भजेत्तावद् यावत्तापः प्रशाम्यति । संशयो नैव कर्तव्यः सत्यं सत्यं पुनः पुनः ॥२५॥ - 1 ।

। प्रथमो। चलासः १५ -- - । - - व्याख्या-अनन्तागणोक्त काथ तावत्सेवनीयो यावत् तापस्य शान्तिर्न स्यात् । अस्मिन् योगे सन्देहो नैव कर्तव्य इति अह पुन पुन सत्य वच्मीति शेषः । यथाह सुश्चत उत्तरतन्त्र- अनन्ता वालक मुस्ता नागर कटुरोहिणीम् । सुखाम्बुना प्रागुदयात पाययेताक्षसम्मितम् ॥ एप सर्वज्वरान् हन्ति दीपयत्याशु चानलम् ।। सु० उ० ॥ अन्यान्तरेष्वपि-अनन्तादियोगो वर्णित । अनुष्टुप् छन्दः । हिन्दी-अनन्तादिकाथ-(सारिवा, सोंठ, कुटकी, नेत्रवाला, नागरमोथा) का सेवन तबतक करना चाहिये जबतक ज्वरजनित ताप की शान्ति न हो जाय । यह शत-प्रतिशत सफल प्रयोग है। इसके सम्बन्ध में सन्देह नहीं करना चाहिये । मैं (लोलिम्बराज) सत्य कह रहा हूँ ॥ २५ ॥ पित्तन्वर पर्पटज. कपाय - स्वयमेव च पैत्तिकं ज्वरं शमयेत् पर्पटजः कपायकः । ' यदि चन्दनसेन्यनागरैः सहितः किं पुनरत्र चिन्तया ॥ २६ ॥ ध्यास्या-पर्पटज. तिक्ताज कपाय. "स्वार्थ क " स्वयमेव एकल पत्तिक पित्तोद्- भव ज्वर शमयेत् । यदि चन्दन रक्तचन्दनम् , “कपायलेपयो प्राय प्रयोज्य रक्त- चन्दनम्", सेव्यम् अमृणालं, नागर शुण्ठी, आमिरोपधिभिर्युक्त पर्पटन , कपायो रोगिणे प्रयुज्यते चेत् तर्हि पुनरम चिन्तया किम् अपितु नैव चिन्ता कर्नव्येति । सेव्यस्य पर्याया वीरणस्य तु मूल स्यादुशीर नलद च तत् । अमृणाल च सेव्य च समगन्धिकमित्यपि ।। अमिनवनिघण्टु । प्रसिद्धतमोऽय योग सवैरपि प्रयुक्त , यथा मैपज्यरत्नावल्याम्- एक पर्पटक श्रेष्ठ पित्तज्वरविनाशने । किं पुनर्यदि युज्येत चन्दनोदीच्यनागरे । शाईघरसहितायाम्-शुण्ठ्या स्थाने नेवलाया, प्रयोग कृत । चक्रपाणिस्तु . तमेव योग समर्थयति चक्रदत्ते। वियोगिनीवृत्तम् , हिन्दी-केवल पित्तपापड़ा का काथ पित्तज्वर का शमन कर देता है, यदि इसमें लालचन्दन, खस और सोंठ भी मिला दिये जाय, तो इसकी सफलता में फिर किसी प्रकार का सन्देह नहीं रह जाता। विशेष-केवल शाझंधर सहितामें सोंठ की जगह नेत्रबाला का प्रयोग किया गया है। शेष योग में कोई अन्तर नहीं है। हमारी सम्मति से "नागरैः" के स्थान पर "वालकै" उपयुक्त प्रतीत होता है। जरा इनके गुणधर्मों पर विचार करें-नेत्रपाला-बालक शीतलं रूक्षं लघु दीपनपाचनम् । सोठ-शुण्ठी रुच्याऽमवातघ्नी पाचनी । कटुकाऽलघुः । सिघोषणा मधुरा पाके कफवातषिबन्धनुत् ॥ २६ ॥ -- " पाठ अधिक १६ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - 1 P अथ प्रकारान्तरेण पित्तज्वरशान्तिप्रकार वक्ति- मायुञ्च मदद् वायुर्व्वलन्मणिमनोहरे । रेवातीरे यतो वेणुकाणोस्त्यत्र हृतव्यथः ॥ २७ ॥ व्याख्या-ज्वलन्मणिमनोहरे भास्वरमणिवच्चेतोहरे । यतोऽत्र रेवातीरे रेवानद्यास्तटे मद्कृद् वायु मादक पवन वेणुकाण वशीनिकण च हृतन्यथ हृता दूरीकृता ब्यथा पीडा येन स अस्ति, अत इमौ वायुकाणी माथु पित्त (तज्जनिता व्यथा च ) च हरत इति निर्गलितोऽर्थ । अनुष्टुप् छन्दः। हिन्दी-मणिके समान कान्ति वाली प्रिया रेवानंदी के तट पर बहने वाली शीतल वायु और वीणाध्वनि सभी प्रकार की व्यथायें दूर करती हैं, अतः ये दोनों पित्तज दाह को भी दूर करती है ॥ २७ ॥ दाहवमीहरकपाय - जलजजलजवाहं हरहरहरति ज्वरम्। प्रवलनिदाघवमी निपीयमानं प्रिये नूनम् ॥ २८ ॥ व्याख्या-जलजम् उशीर, जलजवाहो मुस्ता, एतयो काथ शृत उल निपीयमानः सद् हरहरेति वाक्ययोजना, हे प्रिये । प्रबल वेगवन्त निदाघ दाहज्वर वमि छदिरोगा नून हरति । अत्र केचित् प्रथम जलजपदेन-गुडूची द्वितीय-जलजपदेन बालक स्वी- कुर्वन्ति । एतदपि युक्तियुक्त प्रतीयते । अत्र जलशब्देन गुडचीग्रहणे हेतु जलस्यापरपर्याय अमृत, गुडची अमृतेति नाम्ना प्रसिद्धा । यथाह चक्रपाणि - विश्वाम्बुपर्पटीशीर-धनचन्दनसाधितम् । दद्यात्सुशीतलं वारिं तृट्छदिज्वरदाहनुत् ।। हिन्दी-हे प्रिये ! प्रबल दाहज्वर'तथा छर्दि रोग में खस और नागरमोथा के काथ का सेवन करने से अवश्य ही रोग शान्ति में सफलता प्राप्त होती है ॥२८॥ पित्तकफज्वरचिकित्सा- लोहितचन्दनपद्मकधान्यच्छिन्नरुहापिचुमन्दकषायः । पित्तकफज्वर दाह पिपासा छर्दिविनाशहुताशकरःस्यात्॥ २९॥ व्याख्या-लोहितचन्दनादीना कपाय पित्तकफज्वरदाहपिपासाछर्दिविनाशक - अग्निदीपक च भवति । तद्यथा-लोहितचन्दन रक्तचन्दनम्, परमकम् पद्मकाष्ठ, धान्य धन्याक, छिनरुहा गुडची, पिचुमन्दो निम्ब , पञ्चानामेतेपो क्वाथो लाभकृद् भवति । उक्तश्च चक्रपाणिना चक्रदत्ते-- गुडची निम्बधन्याक पद्मक चन्दनानि च । एप सर्वज्वरान् हन्ति गुहच्यादिस्तु दीपनः ॥ हृल्लासारोचकच्छदि पिपासादाहनाशन ॥ - 7 - - - - . .

प्रथमो विलासः १७ - मन्त्र काथे मधुनिक्षेपणमपि वैद्यानाम्मतम् । यथाह शिवदास --"अत्र अत्यन्तदाइपि- पासाया वृद्धा. शीतीकृत्य मधु निक्षिपन्ति, तत्त्वचन्द्रिका । दोधकवृत्तम् । हिन्दी-लालचन्दन, पमकाछ (पमाख), धनियां, गिलोय, नीम की छाल इनका काथ पित्तकफज्वर, दाह (जलन), प्यास, वमन रोगों को शान्तकर मन्ति का दीपन करता है। विशेष-कुछ वैद्य इस काथ में शीतल होने पर मधु मिलाते हैं। यह मधु मिश्रित छाथ प्यास को पूर्णतया शान्त करता है । इस पथ के मूल पाठ में चतुर्थ पाद इस प्रकार है-"वृपाग्निशमानविशेषात्" इसके स्थान पर "विनाश- हुताशकरः स्यात्" परिवर्तन किया गया है। पाठक औचित्य तथा पाठ की शुद्धा- शुद्धि को ध्यान में रखकर उपयोगी पाठ को अपनाने का कष्ट करें ॥ २९ ।। दाहे घृताम्यग- सहस्रधौतेन घृतेन कर्तुरभ्यद्गमोपः कृशतां विभर्ति । अन्यागनासङ्गमसादरस्य स्वीयेपु दारेषु यथाभिलाषः ॥ ३०॥ व्याख्या-सहस्रधौतेन धृतेन सहस्रवार प्रक्षालितेनाज्येन, अभ्यगम् मर्दन कर्तु पुरुपस्य, ओप दाइ ( उप दाहे ) कृशता क्षीणता विमति यातीत्यर्थः । तत्रोदाहरणमुपस्था- पयति-अन्यानासङ्गमसादरस्य अन्यागना -परयोपित् तस्या सगमे सादर प्रवृत्तः तस्यैवम्भूतम्य कामुकस्य यथा स्वीयेषु दारेयु निजासु पस्नीपु यथा अभिलाप इच्छा इव । यथाह भगवानात्रेय चरके- सहस्रधीत सपिर्वा तेल वा चन्दनादिकम् । दाइज्वरप्रशमनम् च चि अ ३॥ हिन्दी-जिस प्रकार परस्त्रीगामी पुरुष का अपनी पत्नी के प्रति प्रेम क्रमशः घटने लगता है ठीक उसी प्रकार हजार बार धोए हुए घी का अभ्यङ्ग (मालिश) करने से दाह घटने लगता है ।। ३० ॥ पित्तज्वरे द्राक्षादिक्काथ द्राक्षारग्वधयोः क्वाथः पीतः पित्तज्वरापहः । पर्पटान्दामृतातिक्तायुक्तश्चेकिं सुधा ततः ॥ ३१ ॥ व्याख्या द्राक्षा मृदीका, आरग्वध कृतमाल , एतयो काथ पीत सेवितश्चेत् पित्त- ज्वरापद पित्तन्वर विनाशयति । यदि अस्मिन्नेव योगे पर्पट' तिक्तम्, अब्दा मुस्ता, अमृता हरीतकी, तिक्ता कुटकी एतद् भेषजचतुष्टयस्यापि मिश्रण भवेत् तहिं सुधाया अपि प्रयोजनं नास्ति । मनुष्टुप् छन्दः । यथाह-चक्रपाणि चक्रदत्ते--- २ च०चि० ॥ .

१ . . १८ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः द्राक्षामयापर्पटकादतिक्ता काथ. सशम्पाकफल विदध्यात् । प्रलापमूच्छांभ्रमदाहशोपतृष्णान्विते पित्तमवे ज्वरे तु ॥ हिन्दी-मुनका और अमलतास का काथ पीने से पित्तज्वर दूर हो जाता है। यदि इस योग में पित्तपापड़ा, नागरमोथा, हरीतकी और कुटकी मिला दी जाय तो यह अमृत से भी अधिक लाभदायक हो जाता है । अर्थात् इसके गुणों के सम्बन्ध में सन्देह नहीं करना चाहिये ॥३१॥ अथ दाहप्रतीकारप्रकरणम्- अतिमञ्जलवञ्जुलानिलैलिनीसंकुलचञ्चलोत्पलैः । जलकलिकलाकुतूहलैरपिपित्तज्वरजा रुजो जयेत् ॥ ३२ ॥ व्याख्या-अतिमझुलवजुलानिले. अतिमञ्जुलश्चासी वन्जुलानिल तै अत्यन्तरमणी- यैरशोकवायुभि , अलिनीसकुलचम्चलोत्पल अलिनीमिः भ्रमरीमि सकुल व्याप्तै अतएव चञ्चलोत्पलै आन्दोलितपी, जलकेलिकलाकुतूहले जलस्य केलि क्रीडा सा एव कला कौशल तत्सम्बन्धिकुतूहलै कुतुकै एमिरुपादानै पित्तज्वरजा पित्तज्वरसम्बन्धिन्यो रुज पीडा शम यान्ति । वियोगिनी वृत्तम् । चरकेऽपि- नधस्तढागा पभिन्यो हदाश्च विमलोदका । अवगाहे हिता दाहतृष्णाग्लानिज्वरापहा ॥ शीतानि चानपानानि शीतान्युपवनानि च । वायवश्चन्द्रपादाश्च शीता दाहज्वरापहा ॥ च.चि अ३॥ हिन्दी-अशोक वृक्ष की मनमोहक शीतल मन्द-सुगन्ध वायु से, भौरों के मडराने के कारण झूमते हुए कमलों से और उत्सुकत्ता एवं कलापूर्ण जलक्रीराओं से पित्तज्वरजनित दाह की शान्ति होती है। विशेप-इस पन में ग्रन्थकर्ता का आशय यह प्रतीत होता है कि दाह की शान्ति के लिये रोगी को ऐसे बगीचे में रखा जाय जहाँ चारों ओर अशोक वृक्ष लगे हो, बीच में चावड़ी हो और उसमें कमल खिले हों ॥३२॥ सुकलत्रकलत्रपुत्रमित्रैः सुचरित्रैर्जलयन्त्रकैर्विचित्रैः। सरसीसरसीरुहेरुदारैरतिदाघस्य निवर्तनं प्रकुर्यात् ॥ ३३ ॥ व्याख्या सुकलनकलत्रपुत्रमित्रै सुशोभन कलत्र श्रोणि यस्य तत् इत्थभूत यत् कलत्र स्त्री तत् च पुत्र च मित्र च ते, सुचरित्रै देवतोपासनादिसच्चरित्र , विचित्र विभिन्न- प्रकारकै , नैर्जलयन्त्रकै धारागृहै , सरसी कासार , सरसीरुहै कमले , उदार. प्रशस्तै , अतिदाघस्य तीवदाइज्वरस्य निवर्तन समापन प्रकुर्यात् । 'कटि -श्रोणि ककुद्मती', 'कलन श्रोणि मार्ययो ।' 'कासार' सरसी सर.।' सर्वत्राप्यमर । मालभारिणी वृत्तम्। ~~ . m -

प्रथमो विलासः
१६
दाहोपशमनोपाय चरके-
: प्रिया प्रदक्षिणाचारा प्रमदाश्चन्दनोक्षिता । सान्त्वयेयु परै काममणिमौक्तिकभूषणा ।
च चि अ३॥
हिन्दी-कृशोदरी स्त्रियों, योग्य पुत्रों, हितैषी मित्रों, देवतोपासनादिसच्चरित्रों,
विविध प्रकार के फुहारे वाले घरों, विकसित कमलों तथा सुशोभित सरोवरों के
सेवन से तीवदाह शान्त हो जाता है ।। ३३ ।।
लोलावलोकनविलोलविलोचनानाम्-
मुक्तालताऽऽकुलकुचस्थलमजुलानाम् ।
सन्दिग्धमुग्धवचसां सुविलासिनीनाम्-
आलिङ्गनं सकलदाहमपाकरोति ॥ ३४ ॥
व्याख्या-लोलावलोकनविलोलविलोचनाना लीलया हावभावादिकेन अवलोकन प्रेक्षण
तत्र विलोले चञ्चले विलोचने नेत्रे यासां तासाम् , पुन कीदृशोना मुक्तालताऽऽकुलकुचस्थल-
मन्जुलानाम् मुक्तालतामि मौक्तिकमालाभि आकुलाव्याप्ता कुचस्थली स्तनपरिधि अतएव
मक्षुला सुन्दर्य यासा तासाम् , पुन कीदृशीना सन्देहेन युक्त सन्दिग्धम् अतएव मुग्ध
मनोहर वच वचन यासा तासाम् सुविलासिनीना लीलावतीना यद् आलिंगनम् उपगूहन
तत् पित्तज्वरजनित सकलदाह गात्रसन्तापम् अपाकरोति निवारयति । वसन्ततिलकावृत्तम् ।
हिन्दी-स्नेहपूर्ण चञ्चल दृष्टिचाली, मोतियों की मालाओं से सुशोभित स्तनों-
वाली, सकोचवश थोड़ा वोलने वाली, प्रगल्भ एवं प्रियतमा नायिकाओं का
मालिंगन सभी प्रकार के सन्ताप को दूर करता है ॥ ३४ ॥
सरसीकमलं गतपदमलं विलसत्कमलम्प्रसरत्कमलम् । ।
हृतशोकमलक्ष्यधनं किमलं सकलं न निराशितुमोषभरम् ॥३५॥
व्याख्या-सरसी तडाग तस्य कमल जल, गतपक्षमलम् पङ्कमलेन रहित, विलसत्क-
मल विलसन्ति कमलानि यत्र तत् सुशोभितपङ्कजम् , प्रसरत्कमल प्रसरत्कान्तिम ,
हतशोक शोकरहितम्, अलक्ष्यधनम् पर्याप्तवित्तत्वम् एतत् सकलम् ओषभर दाइसमूह
निराशितु दूरीकर्तु किं न अलम् पर्याप्त नास्ति १ अपितु वर्तते एव । तोटकवृत्तम् ।
हिन्दी-कमलों की शोभा से सुशोभित सरोवर का कीचड़रहित निर्मल जल,
शोक' का अभाव और इच्छानुसार धन, क्या ये पदार्थ दाहसमूह का विनाश नहीं
कर सकते ? अर्थात् 'इनके रहते हुए दाह उत्पन्न ही नहीं हो सकता ॥ ३५ ॥
यदा रसालोऽपि वरीवृतीति यदा मयूरोऽपि नरीनृतीति ।
यदा समीरोऽपिसिरीसरीति तदा निदाघस्तु मरीमरीति ॥३६॥

२० वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः ध्याख्या-यदा रसाल आम्रफलम् ( अन रसालशब्द फलाय प्रयुक्त न तु वृक्षाय) अपि वरीवृतीति अतिशयेन वर्नते, यदा मयूरोऽपि नीलकण्ठोऽपि "मयूरो वहिणो वहाँ नीलकण्ठो मुज्नमुक्" अमर. । नरीनृतीति अतिशयेन नृत्यति । यदा यस्मिन् काले समीरो जगत्प्राण सरीसरीति, अतिशयेन वहति, तदा तस्मिन् काले निदाघस्तु ऊष्मा मरी मरीति नून विनश्यति । वर्षारम्मकालस्यैतदवर्णन, तदानीं स्वयमेव निदावशान्तिर्जायते। उपेन्द्रवज्रावृत्तम् । हिन्दी-जब आम पकने लग जोय, मयूर प्रसन्न होकर नाचने लगें और शीतल हवा पर्याप्तरूप में बहने लगे तब गर्मी एकदम शान्त हो जाती है ॥ ३६ ॥ यदि मृगाङ्कमुखी मुखदृग्वपुः सुखकरेण करेण परामृशेत् । श्रमनिदाघतृपां निकरस्तदा ज्वरवतो लवतः किमु संव्रजेत् ॥३७॥ व्याख्या-यदि मृगाकमुखी चन्द्रवदना प्रियतमा सुखकरेण आनन्ददायकेन करेण करपल्लवेन मुस च दृक् च वपु च एतेपा समाहार मुखदृग्वपु “इन्दश्च प्राणितूर्यसेनाना- नाम्" इत्यनेन एकवद्भाव । शरीराङ्गानि परामृशेत् स्पृशेत् चेत् तदा श्रमश्च निदाघश्च तृट् च तासा परिश्रमोष्मपिपासाना निकर. समूह ज्वरवतो मानवस्य लवत सर्वमपि सव्रजेत् किमु नास्त्यत्र सन्देहलेश । द्रुतविलम्बितवृत्तम् । हिन्दी-यदि चन्द्रमुखी नायिका अपने सुखदायक करकिसलय से दाहपीड़ित रोगी के मुख, आंख तथा देह का स्पर्श करती रहे तो थकावट, दाह, पिपासा का सम्पूर्ण कष्ट शान्त हो जाता है। विशेष-"लवतः" के स्थान पर 'तरसा' पाठ होना चाहिये। प्रकारान्तर से दोनों ही पाठ उपादेय हैं ॥ ३७॥ उशीरशीतद्युतिशीतले यः क्षणे क्षणे तापमपाकरोति । सौधानि धाराधरचुम्बितानि हारीणि गीतानि निशामुखानि ॥३८॥ व्याख्या-उशीर नलद शीतद्युतिश्चन्द्र तच्च स च ती तयो द्रवशीतल यत् स्थल तत्सम्बुद्धी, उशीरशीतद्युतिशीतले स्थले य दाहपीडित क्षणे क्षणे प्रतिक्षण तापम् अपाकरो दूरीकर्तुं वान्छति सः धाराधरो मेघ तेन चुम्वितानि स्पृष्टानि सौधानि राजमवनानि हारीणि चित्ताकर्षकाणि गीतानि निशामुखानि सायकालिकदृश्यानि सेवेत । अत्र पथे-"सौध नि धाराधरचुम्वितानि" इत्यनेन कविना पर्वतीयप्रदेशवर्णनस्य सङ्केत कृत , तत्र वार्षिकेप चतुर्पु मासेपु मेघा आभूमि अमिलुठन्तो नेत्रयो पुर जवनिकारूपेण समापतन्ति, अहं दर्शनीयं तट दृश्यम् । उपजातिवृत्तम् । हिन्दी-खस और चन्द्रमा की किरणों के समान शान्ति प्रदान करनेवाल हे प्रियतमा । जो वाहपीडित , रोगी प्रतिक्षण दाहपीड़ा का शमन करना चाहता h -- - प्रथमो विलासः २१ है, वह बादल से घिरे हुए भवनों, मनमोहक गीतों तथा सायंकालिक दृश्यों का सेवन करे। विशेष-"सौधानि धाराधरचुम्यितानि" से अन्यकर्ता का आशय शीत प्रदेशों + (काश्मीर, शिमला, मसूरी, नैनीताल आदि शीतप्रधान पर्वतीय स्थानों) से • है। वहाँ उक्त पाश का अर्थ वरसात के दिनों में सामने दिसाई देता है ॥ ३८॥ सरोजराजिराजिते रजोविरञ्जिताजिरे । गृहे सुदीर्घिका प्रिये निदाघनाशकारिणी ।। ३९ ॥ प्यास्या-सरोजराजिराजिते सरसि जातानि सरोजानि तेपा राजि पक्ति तया राजिते शोमिते रजोविरक्षिताजिरे रजसा कमलपरागेण विरक्षिते रागयुक्त यस्मिन् गृहे अजिरे हागणे या सुशोमना दीपिका वापिका भवति हे प्रिये ! सा निदापनाशकारिणी दाइ- शामिका भवतीत्यर्थ । अनुष्टुप् छन्द । हिन्दी-कमलों की पक्ति से सुशोभित तथा उसी के पराग से सुवासित घर के भोगन के समीप निर्मित बावड़ी के सेवन से निदाघ की शान्ति होती है। विशेष-इसके मूलपाठ में चतुर्थ पाद "द्यावालकारिणी" अशुद्ध है। उसके स्थान पर "निदाधनाशकारिणी" सशोधित पाठ लिखा गया है ॥ ३९ ॥ सारिकाशुकयोः स्वर्णमये पिञ्जरपक्षरे । स्थितयोश्च कलालापाः परमानन्ददायिनः ॥४०॥ प्याल्या-सारिका च शुक च तयो सारिकाशुकयो , पाणिने “अल्पाच्चरम्" इति-अनुशासनवलाद, अत्र शुकसारिकयो इति पाठ साधीयान् । स्वर्णमये सुवर्णरचिते पिजरपअरे पिजर च तत् पसर तस्मिन् पीतवर्णयुक्ते तदागारे स्थितयो निवसतो कला- लापा मधुरसम्माषणानि परमानन्ददायिनो भवन्ति, अतएव शैत्यापादका शान्तिदाश्वे- त्याक्षिप्यते । अनुष्टुप् छन्द । हिन्दी-मोने के पिजड़े में बैठे हुए शुक-सारिका का प्रेमालाप अत्यन्त मानन्द सुख एव शान्तिदायक होता है ॥१०॥ हारेण गुणिना यस्य संगतिः सम्प्रजायते। तस्य दाहः शमं याति नात्र कार्या विचारणा ॥४१॥ व्याण्या-गुणिना हारेण मौक्तिकमालया यस्य दाहसन्तप्तम्य सगति सम्पर्क सम्प्र- जायते बोमवीति । तस्य दाइ औष्ण्य शम शान्ति याति-अय विचारणा न कार्या । अनुष्टुप् - । 1 - - २२ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः हिन्दी-मोतियों की माला धारण करने से दाह का शमन होता है। इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥४१॥ उल्लसल्लोलकलारे सुन्दरीजनसुन्दरे। अगारे रुचिराकारे स्वापो दाघमपोहति ॥ ४२ ॥ व्याण्या-उल्लसल्लोलकल्दारे उत् ऊर्ध्व लसन्ति लोलानि चञ्चलानि कल्हाराणि सन्ध्याविकासिशुष्ठसरोजानि यत्र, सुन्दरीजनसुन्दरे सुन्दरीजनै रमणीमि सुन्दरे रमणीये रुचिराकारे दर्शनसेवनादौ सुखकरे आगारे भवने स्वाप शयन दाघम् ऊष्माणम् अपोहति दूरीकरोनि । अनुष्टुप् छन्द । हिन्दी-चावड़ी के जल के ऊपर लहराते हुए श्वेत कमलों वाले तथा सुन्दरी नायिकाओं से विलसित' सब भाति सुखद गृह में शयन करने से दाहशान्ति होती है ॥४२॥ केदारः कुमुदं कान्ता केतकी काननं कथा । ककारषटकं सन्दिष्टं महादाहविनाशनम् ॥ ४३ ॥ व्याख्या - केदार जलपूर्ण क्षेत्र, कुमुद कैरव, कान्ता प्रियतमा, केतकी सूचिकापुष्प, कानन गृहाराम कथा सुहृजनाना वार्ताप्रवृत्ति एतत् ककारपटकम् महादाइ विनाशन सन्दिष्टम् । दाह शान्त्यर्थम् एतेषाम् प्रयोगा पृथक् पृथक् ग्रन्थेषु प्राचुर्येण समुपलभ्यन्ते किन्त्वत्र कविना दाहंशान्तिवर्णनव्याजेन अनुप्रासच्छटा प्रादर्शि । अनुष्टुप् छन्द । हिन्दी-जलपूर्ण खेत, विकसित कमलवन, प्रियासहवास, केवड़ा का फूल, घर का बगीचा, प्रियजनों के साथ वार्तालाप, क अक्षर से प्रारम्भ नोने वाले इन उपरि- लिखित छ: वस्तुओं के निरन्तर सेवन से तीन से तीव्र दाह भी शान्त हो जाता है॥४३॥ सल्लकीरुचिरमालतमालनारिकेललवलीकदलीमिः। चञ्चलाभिरनिलेन वलेन कस्य दाहमपहन्ति न योगाः॥४३॥ ध्याश्या सल्लकी गजमक्ष्या, यथाह भावप्रकाशे-'शल्लकी गजभक्ष्या च सुवहा सुरभी रसा। महेरुणा कुन्दुकी च वल्लकी च बहुलवा । गुणा ~शल्लकी तुवरा शीता पित्तश्लेष्मा- तिसारजित् ।' आदि । रुचिरञ्च तत् मालम् उन्नतभूतल शीतत्वात किं वा मालद्रुम , तमाल तापिच्छ' "तमाल शालवद् वेद्यो दाइविस्फोटनाशन", भावप्रकाश । नारिकेल दृढफलम्, अस्य गुणा -"विशेषत कोमलनारिकेर निहन्ति पित्तज्वरपित्तदोपान् । तस्याम्म शीतल हृद्यम्", अभिनवनिघण्टु । लवली सुगन्धमूला चञ्चलामि. वायुनान्दोलितामि कदलीमि. प्रसूनेनोत्पन्नेन अनिलेन वायुना अर्थात् कोमलकदलीपत्रपवनेन, अमिरोषधिमि कृता.

प्रथमो विलास - योगा बलेन हठात् कस्य दादास्य दाइ न अपहन्ति, अर्थात् सर्वेषामपि दाहान् विनाश- यन्तीत्यर्थ । स्वागतायत्तन् । हिन्दी-सलई, मनोहर उन्नतप्रदेश, तमाल, नारियल, लवलीलता तथा केला के पत्तों से उत्पन्न शीतल वायु, इनके मेवन से किसकी दाहशान्ति नहीं होती॥४॥ कुसुममायकसायककोमले हरिणलाञ्छनलाञ्छनलोचने । कमलविष्टरविष्टरभूपिते हरति कस्य रुजं न शुकस्य वाक् ॥४५॥ प्यारण्या-कुममसायकसायककोमले कुमुमसायक कामदेव. तस्य सायको याण , पुष्पं तद्वत् कोमले। हरिणलाल्छनलान्छनलोचने हरिणलान्छन चन्द्र तस्य लान्छन हरिण, तस्य लोचनमिव लोचन यस्या मा तत्सम्बुद्धी, कमलविष्टरविष्टरभूपिते कमलविष्टरो ब्रह्मा तम्य विष्टर आमन कमल नेन भूपिने हे प्रियतमे । (अनेन रत्नकलाया पमिनीनायिका- त्वमवगम्यते ) शुकस्य वाक वाणी कस्य रज पीटा शोक दाइ वा न इरति, अपितु सर्वस्यापि रख हरतीत्यर्थ । दृतविलम्बितन् । हिन्दी-पुरप के समान कोमलागी, हरिण के समान चञ्चल नेत्रों वाली, और कमल के सदृश मनोहर रुपवाली रत्नकले । शुक की वाणी किसकी दाहजनित पीड़ा को शान्त नहीं करती। अर्थात् सवकी पीड़ा को शान्त करती है ॥ ४५ ॥ शिशिरदीधितिदीधितिसंहतिः परिमलाऽऽकुलपेलवपल्लवाः। हृदयरखनकोकिलकोकिलाकलकलश्रवणं च निदाघजित् ।। ४६ ॥ प्यामया-शिशिरदीधितिदीधिति शिशिरा शीता दीधितय किरणा यस्य सः चन्द्रमा तस्य दीधितीनो किरणाना या सहति ममूह , परिमलाऽऽकुलपेलवपल्लवा परि- मलेन परागेण आकुला व्याप्ता पेलवा मृदुला पल्लवा किसलयानि, हृदयरञ्जनकोकिल- कोकिलाकलफलपवण हृदय रजयतीति हृदयरमन कोकिल. च कोकिला च कोकिले तयो. कलकसमवण कलरवाकर्णनम् एतवनय निदाघो धर्मातप तस्य जित् जेता मवति, इति प्रयोदशमि पर्दाहशान्तिप्रकरण समाप्यते । द्रुतविलम्बितम् । हिन्दी-चन्द्रकिरणों का समूह, पुष्पपरागों से युक्त नवकिसलय और मन को लुभानेवाली कोयलदम्पति की सुरीली वाणी ये तीनों दाह शान्ति के प्रसिद्ध उपाय है ॥ १६॥ पित्तचरे ग्रन्थकतुं स्वानुभव - पित्तज्वरे किं रसफाण्टलेपैः किं वा कपायरमृतेन किंवा । पेयं प्रियायामुखकमेव लोलिम्बराजेन सदानुभूतम् ।। १७ ॥ व्याण्या--पित्तज्वर पित्तजनिते ज्वर रसफाण्टले पै कि रस प्राणेश्वरवाडवादय , फाण्ट कपायभेद , यथाह फाण्टविधि - २४ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - क्षुण्णे द्रन्यपले सम्यग् जलमुष्ण विनिक्षिपेत् । मृत्पात्रे कुडवोन्मान ततस्तु स्रावयेत् पटात् ।। स स्याच्चूर्णद्रव. फाण्ट | शार्गधरे। लेपः यथा-विभोतफलमज्जाया लेपो दाहानिनाशन । शाधर । किंवा कपायै दाहशामकै काः, काथविधि अस्मिन्नेवाध्याये २० तमश्लोकस्य टीकाया द्रष्टव्य । अनृतेन मुशीत- लेन जलेन किम् , अर्थात् उपरिलिखिता सर्व उपाया व्यर्था तस्मात् एक केवलम् प्रियाया प्रीणातीति प्रिया तस्याः मुख पद्मगन्धिवक्त्रमेव पेयम् आस्वादनीयम् यतो हि लोलिम्बराजेन अन्यकर्ता सदानुभूतम् । एप विधि युवकेषु प्रशस्त वालवृद्धेषु निषिद्ध प्रियाया दुर्लमत्वात् , शकरमावाद वा । इन्द्रवज्रावृत्तम् । हिन्दी-पित्तज्वर की चिकित्सा के लिये ग्रन्थान्तरों में बताये हुए रस, फाण्ट (चाय), लेप, काथ आदि के प्रपश्च में नहीं पड़ना चाहिये। इसके लिये वैयवर श्रीलोलिम्बराज का कथन है कि केवल अपनी प्राणप्रिया के अधर रस का पान करना चाहिये । यह ग्रन्थकार का अनुभूत योग है ॥ ४७ ॥ वातश्लेष्मज्वरे पञ्चकोलकाथ कृष्णाकृष्णामूलचव्याग्निविश्वैरेभिः सर्वैर्जायते पञ्चकोलम् । वातश्लेष्मद्वेपि धत्ते हुताशं मुग्धे कान्ते तन्वि सुभ्र प्रसन्ने ॥४८॥ व्याख्या कृष्णा पिप्पली कृष्णामूल पिप्पलीमूल, चन्य चविका, अग्निश्चित्रक विश्वा नाग- रम् एभि पञ्चमिर्मिलिते सति पञ्चकोलम् भवति । एतत् (एप पञ्चकोलकाथ) वातश्लेष्मज्व- रद्वेपि वातकफज्वरस्य विनाशकर्तृ, हुताश धत्ते जाठराग्नि दीपयति, इति ग्रन्थस्याशय' । मुग्धे सरले, कान्ते प्रिये, तन्वि कृशोदरि, सुभु शोभनभूलते, प्रसन्ने प्रसादगुणयुक्ते, इत्यादीनि सम्वोधनानि स्वप्रियायै प्रयुक्तानि ग्रन्यकर्ता । शालिनीवृत्तम् । प्रसिद्धोऽय योग सर्वत्राप्येव- विधो दृश्यते । यथा- पिप्पलीपिप्पलीमूल चन्यचित्रकनागरम् । दीपनीय शृतो वर्ग कफानिलगदाप६ ॥ पञ्चभि. कोलमानन्तत् पञ्चकोल तदुच्यते ॥ मैपज्यरलावली ॥ हिन्दी-प्रसन्नचित्त, सुन्दर भौंह, सरल स्वभाव एव पत्तली कमरवाली प्रिये! पिप्पली, पिप्पलीमूल, 'चव्य, चीता तथा सोंठ इन पाच द्रव्यों का संग्रह पनकोल कहा जाता है। पञ्चकोल का काथ वातश्लेष्मज्वर को शान्त करता है और अग्नि को दीप्त करता है। विशेष-कोलपरिमाण-मागधमान के अनुसार- मापैश्चतुर्भि शाण' स्यावरण' स निगद्यते । टक स एव कथितस्तद्वय कोल उच्यते ॥ शार्ङ्गधरसंहिता। . - प्रथमो विलासः २५ - - चार मापा का एक शाण होता है, उसी का दूमरा नामः टंक अथवा धरण है। दो शाण का एक कोल होता है। इसी कोल प्रमाण के अनुसार ये पांचों द्रव्य लिये जाते हैं, अतएव इनको पञ्चकोल कहते हैं ॥ ४८ ॥ वातरलेष्मज्वरं काथमाह-- वालेऽवाले वालवालेऽवलेऽस्मै हृच्छूलामश्लेष्मवातज्वरेषु । मुस्तातिक्ताग्रन्थिपथ्याऽरुजानां क्वाथः सम्यग्दीपनः पाचनश्च ।।४९॥ म्याख्या-चाले युवति, अवाले बुद्धिमति, वालवाले कोमलकेशयुक्त, अवले हे स्त्रि ! अस्मै रोगिणे, हृच्छूलामश्लेष्मवातज्वरेपु हृत्पीडायाम् आमदोपयुक्तकफवातज्वरेषु मुस्ता मुस्तक, तिक्ता कुटकी, ग्रन्थि पिप्पलीमूलम् , पथ्या हरीतकी, अरुज मारग्वध -एतेया काथो देय । शालिनीवृत्तम् । एप काथ सम्यक् प्रकारेणाग्नि दीपयति पाचन च करोति । अन्यान्तरेषु योगोऽयम् मारग्वधादिकपायनाम्ना प्रसिद्धो लामप्रदश्वास्ति । तद्यथा- आरग्वधग्रन्थिकमुस्ततिक्ता-हरीतकीभि कथित. कपाय । सामे सशूले कफवातयुक्ते ज्वरे हितो दीपनपाचनश्च ॥ चक्रदत्त । हिन्दी-कोमल केशपाश वाली बुद्धिमती चुवती प्रिये ! इस रोगी को हृदय की पीड़ा में, आमदोपयुक्त कफवातज्वर में नागरमोथा, कुटकी, पीपरामूल, हरड़, अमलतास का काथ देना चाहिये। यह काथ अग्नि को प्रदीप्त कर भोजन को पचाता है । दूसरे ग्रन्थों में यह योग 'भारग्वधादि काथ' के नाम से प्रसिद्ध है। विशेष-इस श्लोक के तीसरे पाद का मूलपाठ इस प्रकार है-"मुस्तातिका- प्रन्यिपथ्या शरबंधानाम्" यह भूल प्रतिलिपिकर्ता की हो सकती है, यहाँ अन्थकार का आशय दृष्टि में रखकर उक्त पाठ का इस प्रकार सशोधन किया गया है-"मुस्तातिकाग्रन्यिपथ्याऽरुजानाम्"। यह पाठ व्याकरण, छन्द तथा उपयोगिता की दृष्टि से शुद्ध है ॥ १९ ॥ ज्वरकार्याय वहिवृद्धये च काथमाह- कृष्णाद्रिकृष्णामलकीहरीतकीकाथे प्रपीते दिवसेपु सप्तसु । ज्वरःस्ववृद्धि दहनाय यच्छतिज्वराय कार्यदहनश्च यच्छति॥५०॥ व्याख्या-कृष्णाद्रि शिलाजतु, कृष्णा पिप्पली, आमलकी धात्री, हरीतकी पथ्या, एतच्चतुष्टयस्य दिवसेषु सप्तसु सप्तमे दिवसे "अत्र निर्धारणे सप्तमी" का प्रपीते सति ज्वर' स्ववृद्धि दहनाय यच्छति ज्वरस्य तीव्रता दन्दयते, दहनो जाठराग्निश्च ज्वराय कार्य यच्छति ज्वरमुत्तरोत्तर शिथिलयति । आयस लौइसम्भव शिलाजतु कृष्णाद्रिनाम्ना व्यवहृतमत्र तदेव सर्वश्रेष्ठ भवति । इन्द्रवशावृत्तम् । यथा भावप्रकाशे- लौह जटायुपक्षाम तत्तिक्त लवण भवेत् । विपाके कटुफ शीत सर्वश्रेष्ठमुदाहृतम् ।। - २६ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - , - सप्ताहानन्तर काथसेवनस्य विधानम् ज्वरित पहरेजीते लघ्वघ्नप्रतिभोजितम् । पाचन शमनीय वा कपाय पाययेत्तु तन् ।। मे०र० 1. हिन्दी-शिलाजीत, पिप्पली, आंवला, हरीतकी, इनका काय सातवें दिन रोगी को देना चाहिये। इसके सेवन से अग्नि प्रदीप्त होकर ज्वर का शमन होता है। फलत. ज्वररोगी नीरोग हो जाता है ॥ ५० ॥ कफज्वरे वचाटिकाथ- उग्रापटोलात्रिफलावृपामृता-तिक्ताकपाये मधुना समन्विते । पीते सति स्यात् ससुखःकफज्वरी नरःसकाम प्रमदाधरे यथा।॥५१॥ व्याख्या-उग्रा वचा, पटोल निक्तक , त्रिफला फलत्रिक, वृपा वासा अमृता गुडूची, तिक्ता कुटकी एनेपा मधुना समन्विते क्षौद्रयुक्ते कपाये काथे पीते मति कफज्वरी तथा ससुख सुन समन्वित स्यात् यथा सकाम नर कामी पुरुप प्रमदाधर कामिन्या अधरा- मृते लख्य सति भवतीत्याशय. । चक्रदत्ते योगोऽय त्रिफलादिकपायनाम्ना प्राप्यते, तद्यथा- त्रिफलापटोलवासाच्छिन्नरुहा रोहिणी च पद्ग्रन्या । मधुना श्लेष्मसमुत्थे दगमूली-वासकस्य वा क्वाथ ॥ तत्वशानवता भियग्वरेण लोलिम्बराजेन उत्तमोत्तमयोगेपु कापि परिवर्तन न कृतम् , अन्यत्र स्वानुभवबुद्धिवलाभ्यां यथायथं विपरिवर्तितम् इत्यम्माक द्रढीयान् विश्वास. । कफ- नाशार्थ पटोलस्य नाल ग्रायम् । यथा भावप्रकाशे-"नाल इलेष्महरम्"। इन्द्रवशा. वृत्तम्। हिन्दी-यालवच, परवल की नाल, हरद, बहेड़ा, आंवला, अइसा, गिलोय, कुटकी, इनके क्वाथ में शीतल होने पर मधु मिलाकर पीने से कफज्वर वाले को वैसा ही सुख मिलता है जैसा कामी पुरुष को अपनी प्रिय नायिका के अधर- रसपान से ॥५१॥ कफज्वरे कण्टकार्यादिक्वाय. व्यावयमृतोपधतोयदभाधन्वयवाससमुत्थकपायः । हन्ति कणारजसा कफजाति पुत्रइव प्रमदः पितृकीर्तिम् ॥ ५२ ।। व्याख्या-त्र्याघ्री कण्टकारी, अमृता गुइची, औषध शुण्ठी, तोयदो मुम्ता, मागी भूगुमवा, धन्वयासो दु स्पर्य एतेपा काथ कणा पिप्पली तस्या र नसा चूर्णन समन्वितः तथा कफजाति कफदोपसमुद्भवा पीडा हन्ति विनाशयति यथा प्रमदो मदोन्मत्त पुत्र. पितृकर्कातिम् पितु समुपार्जित यश हन्ति । दोधकवृत्तम् ।

1 प्रथमो विलास २७ . - . 7 ग्रन्यारम्भ ग्रन्यकर्ता प्रतिश्रुत यद् आयुर्वेदीयमहिताभ्य साररूपेण साहाय्यमङ्गीकृत्य मयाऽत्र किञ्चिल्लिख्यते तदेव सर्वत्र ददृश्यते । कचिदविकलो योग स्वमापाप्रौढथा परि- प्कृत्य समुपात्त कुत्रचिद आवश्यक द्रव्यादिपरिवर्तनश्चापि कृतम् इति तदीयपचे स्पष्ट न्यज्यते। यथा अस्मिन्नेव पधे कतिपयद्रव्यनिरासपूर्वक कफज्वरोक्तो निम्बादिकाथः समुपन्यस्तो भिपग्वरेण लोलिम्बराजेन तद्यथा- निम्बाशिवामृतादारुशटीभूनिम्बपोष्करम् । पिप्पल्पी वृहती चेति काथो हन्ति कफज्वरम् ।। हिन्दी-कण्टकारी, गिलोय, सोंठ, नागरमोथा, भारंगी, जवासा इन द्रव्यों के फाथ मे पिप्पली का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से यह कफज्वर का उस प्रकार लमूल विनाश कर देता है जिस प्रकार मदोन्मत्त पुत्र अपने पिता के सुयश का ॥ ५२॥ अथ भाादिकपाय भागींगुइचीघनदारुसिंही-शुण्ठीकणापुष्करकैः कपायः। ज्वरं निहन्ति श्वसनं क्षिणोति क्षुधां करोति प्ररुचिं तनोति ॥५३॥ व्याघ्या-मागीं भृगुमवा, गुडूची अमृता, घनो मुस्ता, दार देवदारु', सिंही कण्ट- कारी, शुण्ठी महीपध, कणा पिप्पली, पुष्करक पौष्करमूलम् एतेषा कपाय ज्वर निहन्ति विनाशयति, श्वसन यासरोग क्षिगोति शमयति, क्षुधा करोति बुभुक्षा दीपयति, प्ररुचि प्रकृष्टमन्नामिलाप तनोति । उपजातिवृत्तम् । हिन्दी-भारङ्गी, गिलोय, नागरमोथा, देवदारु, कण्टकारी, सोंठ, पीपल, पोह- कर मूल इनका काय वामयुक्त ज्वर का शमन कर भोजन के प्रति इच्छा को उत्पन्न करता हुआ भूख को बढ़ाता है ॥ ५३ ॥ कफपित्तज्वरे पटोलादिकाथ पिवति यः कुलकत्रिफलावचामधुकनिम्बयुतं मधुना तथा । ज्वर उपैति शमं कफपित्तजो गणकरोपकृतो विभवो यथा ॥५४॥ व्याख्या कुलक पटोल, त्रिफला, फलत्रिक, वचा उग्रा, मधुको गुटपुष्प , निम्ब पिचुमर्द एतेषां मधुयुक्त काथ यो रोगी पिवति तस्य कफपित्तजज्वरस्तथा शान्तो भवति यथा गणकरोपकतो ज्योतिर्विदस्तिरस्कारेण विभवो धनादिपदार्थ शान्तो विनष्टो भवतीत्यर्थ । द्रुतविलम्वितवृतम् । उक्तञ्च- हतश्रीगणकान् देष्टि हतायुश्च चिकित्सकान । हतश्रीश्च हतायुश्च ब्राह्मणान् देष्टि भारत ।। महाभारत ॥ अधिकांशद्रयाणां साम्यत्वादेप काथ पटोलादिकाथश्रेणीमधिरोहति । - २८ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः हिन्दी-परवल की पत्ती, हरड़, बहेड़ा, आवला, यालवच, महुआ, नीम की छाल इनके साथ का सेवन कफपित्तज्वर का टस प्रकार नाश करता है जिस प्रकार ज्योतिषी का अपमान करने से सम्पत्ति का नाश होता है ।। ५४ ॥ रुचिकारक कषाय- मम द्वयं विस्मयमातनोति रुचि चरीकर्त्यरुचः कपायः । निपीडितोरोजसरोजकोशा योषा प्रमोद प्रचुरम्प्रयाति ॥ ५५ ।। व्याख्या-अरुच कटुकाया कपाय पित्तज्वरे रुचि मोजनेच्छा चरीकति प्रतनोति किं वा पित्तज्वरजनिता मुखतिक्तता दूरीकरोति । यथाह माधव पित्तवरलक्षणेपु-"प्रलापो वक्त्रकटुतेत्यादि । मुखस्य कटुना रुचेविनाश विधत्ते। निपीडितोरोजसरोजकोशा निपीडिती अतिशयेन मदिती उरोजी एव सरोजकोपौ कुचकमले यस्या एवम्भूता सा योषा सीमन्तिनी प्रचुर प्रकाम प्रमोद मानसोल्लास प्रयात्यनुभवतीत्यर्थ । कटु पदार्थेन रुचे, कुचकमलयो पीडनेन सुखम्योत्पत्ति एतद् द्वय मम ग्रन्थकर्तुं विस्मयम् आश्चर्यन् आतनो- तीति कवेरमिप्राय । उपेन्द्रवज्रावृत्तम् । हिन्दी-लोलिम्यराज कहते हैं कि मुझे निम्नलिखित दो वातों से महान् आश्चर्य होता है। एक तो यह कि कुटकी (स्वाद में अरुचिकारक) के काढ़ा से भोजन के प्रति रुचि बढ़ती है। दूसरा यह कि नवयुवती के स्तनरूपी कमल- कोशों को हाथों से दवाने पर (जब कि वेदना का अनुभव होना चाहिये ) वह प्रसन्नता का अनुभव करती है ॥ ५५ ॥ पिप्पलिपौष्करकटफलभंगी चूर्णकृतो मधुमानवलेहः । श्लेष्मतमस्तपनो ज्वररक्षोदाशरथिः कसनश्वसनन्न ।। ५६ ।। व्याण्या-पिप्पली कणा, पौष्कर पुष्करमूल, कटफ़ल कुम्भिका, शृङ्गी कर्कटशृङ्गी एतेपा चूर्णेन साधितो मधुमिश्रितोऽवलेह श्लेष्मरूपिणे तमसेऽन्धकाराय तपन सूर्य , ज्वर- रक्षसे ज्वरानुकारिणे राक्षसाय दाशरथि दशरथस्यापत्यम्पुमान् - राम तथा कसन कास वसन श्वासरोग एतेपा न विनाशकरः। दोधकवृत्तम् । अवलेहनिर्माणप्रकार. काथादीना पुन पाका घनत्व सा रसक्रिया । सोऽवलेहश्च लेह स्यात्तन्मात्रा स्यात्पलोन्मिता ॥ तस्य परीक्षणम्- सुपक्वे तन्तुमत्व स्यादवलेहोऽप्सु मजति । स्थिरत्व पीडिते मुद्रा गन्धवर्णरसोद्भवः ।। हिन्दी-पिप्पली, पोहकरमूल, कायफल, काकड़ासिंगी इनके चूर्णों के योग से निर्मित मधुमिश्रित अवलेह कफजरोगरूपी अन्धकार के लिये सूर्य के समान, - प्रथमो विलास २६ - एतयो फलन्- ज्वररूपी राम के लिये राम के समान विनाशकारी है। साथ ही यह भवलेह कास एव वामरोग में भी लाभदायक है ॥ ५६ ॥ त्रिदोषज्वर दशमूलादिकाथ:- पञ्चादिद्वयपोकरेन्द्रजगटीदुःस्पर्शराजीफलै- स्तक्ताकर्कटलिभासिहितैरेभिः कृतात् क्वाथतः । हिक्कापार्श्वहृदर्तिवान्तिकसनश्वासत्रिदोपा अपि प्रौढा यान्ति पराभवं खलु यथा वेदान्तिनस्तार्किकात् ॥५७।। व्याख्या पश्चाविदयन् उभयपञ्चमूल नत्र प्रथम- वृहद पदमूलन्- विल्वय्योनाकगम्भारीपाटलागणिकारिका । दीपन कफवातघ्न पञ्चमूलमिद महत् ।। लघुपवमूलन्- शालिपर्णा-पृश्निपणी - वृहतीदय - गोमुरम् । वातपित्तहर वृष्य कनीय पञ्चमूलकम् ।। उमयम्पवमूलन्तु मन्निपातज्वरापहम् । कासे श्वासे च तन्द्राया पार्श्वशूले च शस्यते ॥ चक्रदत्त । पीकर पुष्करमूलम्, इन्द्रज इन्द्रयव , शटी कर्नूर , दु स्पर्श. दुरालमा, राजीफल पटोल, तिक्ता काटकी, कर्फटभंगी कुलीरविषाणिका, भाङ्गी भूगुमवा एतेपा कायत' हिक्का, पार्थक, हतपीटा, वान्ति वमन, कसन कास , त्रिदोप सन्निपातज्वर प्रौढता गता अपि एते रोगा तथा परामद विनाश यान्ति यथा शास्त्रायें तार्किकात् नैयायिकाद् वेदान्निन । यथैकस्मात् ताकिंकाद् अनेके वेदान्तिन पगमव यान्ति तथै वैकस्मात दशमूली- काथाट बहवो रोगा शम यान्तीनि सम्पिण्डितोय । अविकलोऽय योगश्चच्चनदस्ते-अष्टादशा- गनाम्ना व्यवहत. समुपलभ्यते । तद्यथा- दशमूलीशटीशृगीपीकर सदुरालभम् । मागी कुटजवीजन पटोल कटुरोहिणी ॥ अष्टादमान इत्येप मन्निपातज्वरापह । कासद्ग्रहपाार्तिश्वासहिकावमीहर चिक्रदत्त।। निदोपाणा वहुविधत्वम्- शीघ्रगस्तान्त्रिकश्चित्तविभ्रम कण्ठमुम्जक । कर्णको जिलकश्चैव रुग्दाइश्चान्तकस्तथा ।। भुननेत्री विलापश्च प्रलाप शीतलागक । अभिन्यासश्चेति विद्यात सन्निपातांस्त्रयोदश । । माण्डवीये। चरकस्तु तानेव विमजते- सग्निपातज्वरस्योर्व प्रयोदशविधस्य हि । प्राक्सूत्रितस्य वक्ष्यामि लक्षण वै पृथक्-पृथक् ।। भ्रम पिपासा दाहश्च गौरव शिरसोऽतिरुक् । वातपित्तोलणे विद्यालिग मन्दकफे ज्वरे ।। शैत्य कासोऽरुचिस्तन्द्रा पिपासादाहरुग्व्यथा । वातश्लेष्मोल्वणे व्याधौलिङ्ग पित्तावरे विदुः । - - ३० वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः छदि शैत्य मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना । मन्दवाने व्यवम्यन्ति लिन पित्तकफोल्वणे ॥ मन्थ्यस्थिशिरस शूल प्रलापो गौरव भ्रम । वातोल्वणे स्यावधनुगे तृणाकण्ठाम्यशुष्कता । रक्तविण्मूत्रता दाह स्वेदस्तृद वलमक्षय । मूर्छा चेति विटोपे म्यालिङ्ग पित्ते गरीयसि ॥ आलस्यारुचिहष्लाम - दाहवम्यरतिभ्रम । कफोल्वण सन्निपात तन्द्रा कासेन चादिशेत ।। प्रतिश्याच्छदिरालस्य तन्द्रारुच्यग्निमार्दवम् । हीनवाते पित्तमध्ये चिह इलेप्माधिके मतम् ।। हारिद्रमूत्रनेत्रत्व दाहस्तृष्णाभ्रमोऽरुचि । हीनवाते मध्यकफे लिङ्ग पित्ताधिके मतम् ॥ शीतको गोरव तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोऽतिरक् । हीनपित्त वातमध्ये लिग श्लेष्माधिके विदु ॥ श्वास कास प्रतिश्यायो मुखशोपोऽति पाईरुक् । कफहीने वातमध्ये लिङ्ग पित्ताधिके विदु ॥ चलचि०अ०३॥ इत्येवमेतेपा भेदा पृथक् पृथक् चिकित्साग्रन्थेषु विहितास्तेऽत्र ग्रन्थविम्तरमयान्नो- लिख्यन्ते । शार्दूलविक्रीडितम् । हिन्दी-दोनों पञ्चमूल अर्थात् दशमूल (वेल, सोनापाठा, गम्भारी, पाढल, भरणी, शालपर्णी (सरिवन), पृष्टपर्णी (पिठवन), छोटीकटेरी, वड़ीकटेरी, गोखरू, पोह- करमूल, इन्द्रजौ, कचूर, दुरालभा, परवल की पत्ती, कुटकी, काकड़ासिंगी, भारगी इनके क्वाथ के सेवन से हिचकी, पसलियों का दर्द, हृदय की वेदना, वमन, कास, वास तथा सन्निपातज्वर उस प्रकार पराभव को प्राप्त हो जाते है (शान्त हो जाते हैं) जिस प्रकार शास्त्रार्थ में तर्कशास्त्र के विद्वानों से वेदान्ती। जिस प्रकार एक तर्कशास्त्र के विद्वान से अनेक वेदान्ती हार जाते हैं वैसे ही इस एक योग के सेवन से अनेक रोगों का शमन हो जाता है ।। ५७ ॥ धनुर्वातादी-अर्कादि क्वाथ अर्कग्रन्थिकशिदारुचविकानिर्गुण्डिकापिप्पली- रानाभृगपुनर्नवानलवचाभूनिम्बशुण्ठीकृतः क्वाथो हन्ति धनुःसमीरणमपस्मारं प्रसूतिं चलान् कृच्छ्रान् कृच्छ्रतरत्रिदोपदलन. शैत्यस्य विद्ध्वंसनः ।।५८॥ व्यावया-अर्क मन्दार , ग्रन्थिक पिप्पलीमूल, शिग्रु शोभाजन, दारु देवदारु, चविका चव्य, निर्गुण्टिका भूतकेशी, पिप्पली मागधी रास्ता रसना, भृगो मगा, पुनर्नवा शोथनी, नल पोटगल., वचा उग्रगन्धा, भूनिम्ब किरात , शुण्ठी विश्वा एतेषा क्वाथ धनु समीरण धनु - स्तम्भ (“धनुस्तुल्य नमेट् यस्तु स धनु स्तम्भसशक " माधव ) अपस्मार (चिन्ता शोका. दिभिर्दोषा क्रुद्धा इत्स्रोतसि स्थिता । कृत्वा स्मृतेरपध्वसमपस्मार प्रकुर्वते । माधव.) प्रसूर्ति सूतिकान्वर कृच्छ्रान् कष्टसाध्यान् चलान् वातविकारान् कृच्छ्तरत्रिदोषदलन कष्टसाध्य. सन्निपातनाशक त्यस्य विध्वसन शीतताविनाशकरश्च प्रदिष्ट । शार्दूलविक्रीडितम् । - प्रथमो विलास ३१ / हिन्दी-मदार, पिपलामूल, सहजन, देवदारु, चण्य, सम्हाल , छोटी पीपल, रासना, मांग, पुनर्नवा, नल्द, वचा, चिरायता, सोंठ इन औषधियों से बना हुआ काय धनु स्तम्भ, अपस्मार, प्रसूतज्वर, कष्टसाध्य पातविकार, सनिपातज्वर तथा सर्दी से होने वाले सभी विकारों का नाश करता है । ५८ ॥ कामादिएर काथ सुदति सुमुखि वाले चारुभाले सुचले नखलिखितकपोले कामकर्मानुकूले। दलयति दशमूली कृष्णया कण्ठहृद्द्दक श्वसनकसनतन्द्रापावशूलत्रिदोपान् ॥ ५९॥ ध्याग्व्या-सुदति गामना दन्ता यस्या सा तत्सम्बुद्धी सुमुखि रुचिरास्ये, वाले अप्राप्तपूर्णयौवने चारुमाले रम्यमस्तकवति, मुचैले-उत्तमवस्त्रावृते, नसलिखितकपोले कररुपक्षतयुक्तगण्डस्थले, कामकर्मानुकूले मदनक्रीडायोग्ये हे प्रियतमे । (शृणु ) कृष्णा- पिप्पली तया युक्तो दशमूली दशमूलानि सन्ति यस्या सा (वृहत्पश्चमूल लघुपनमूलच ) तस्या कपाय कण्ठपीटा, हृदयवदनां दृष्टिरोगान्, श्वसन श्वास, कसन कास, तन्द्रा,पार्श्वशूल निदोपान् (प्रयोदशविधान् सन्निपानान् ) च दलयति चूर्णीकरोति । मालिनीवृत्तम् । यथा मैपज्यरसावल्याम-उमय पन्नमूलन्तु सग्निपातज्वरापहम् । कासे श्वासे च तन्द्रायां पाचशूले च शस्यते ॥ पिप्पलीचूर्ण , सयुक्त कण्ठद्ग्रहनाशनम् ।। हिन्दी-सुन्दर दांत, मुख, माथा, वस्त्र तथा नखक्षतों से युक्त कपोलों वाली एवं रतिक्रीड़ा योग्य सुन्दरी ! पिप्पली के चूर्ण से युक्त दशमूल का काढ़ा गला, हृदय, दृष्टि के रोगों, श्वास, कास, तन्द्रा, पसलियों के दर्द और सभी प्रकार के सन्निपातों को दूर करता है। विशेप-कण्ठ, हृदय, दृष्टि के रोग, श्वास, कास तन्द्रा, पार्श्वशूल ये जव सन्नि- पातज्वर के साथ उपद्रव के रूप में प्रकट होते हैं तब इस योग से लाभ होता है अथवा तव इसका सेवन करना चाहिये। जहाँ ये रोग स्वतन्त्ररूप से हो वही इनकी पृथक पृथक चिकित्सा उस उस प्रकरण में दी गई है ॥ ५९॥ सन्निपातस्यासाध्यत्वमाह- त्रिदोषेण तुल्यः परेताधिराजः परेताधिराजेन तुल्यनिदोपः। परेताधिराजस्त्रिदोपैर्विजित्रस्तयोरेव साम्यं तयोरेव मन्ये ॥६॥ व्याख्या-पद्यमिद रचयता ग्रन्थका "उपमेयोपमाऽलकार" मुग्वेन सन्निपातस्या- साध्यत्वमुपवणितम्-परेताधिराजोपम त्रिदोपेण सन्निपातेन तुल्यो मारकत्वात् परेताधि-

३२
वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः
-
राजेन यमेन तुल्य' सम त्रिदोप सन्निपात , अत परेताधिराजो यम. त्रिदोपैविजिनो
विजेय । यतो हि तयोर्यमसन्निपातयो साम्य समानत्व यमसन्निपाताभ्यामेव सम्भाव्यम् प्रति
मन्ये । भुजङ्गप्रयातन् । सन्निपातज्वरस्यासाध्यता भयकरतानवर्णयता मावमिण प्रतिपादि-
तम् भावप्रकाशे-
नारायण एव मिपग्भेषजमेतेपु जाहवीतोयम् ।
नैरुज्यहेतुरेको नित्य मृत्युञ्जयो ध्येय ॥
अन्यन्त्र---
मृत्युना सह योद्धव्य सन्निपातचिकित्सुना।
यस्तु तत्र भवेज्जेता स जेताऽऽमयसकुलम् ।।
हिन्दी -यमराज त्रिदोप के समान होता है और त्रिदोष यमराज के समान
होता है, फिर भी त्रिदोप को जीनने से यमराज को जीतना सरल है । अत इन
दोनों की तुलना इन्हीं दोनों से हो सकती है । अन्य किसी के साथ नहीं ॥ ६० ॥
मन्निपातनिवारकवैधप्रशमा-
यः सन्निपातसलिलाधिपती निमग्ना-
जन्तून् समुद्धरति वैद्यपतिः स एव ।
तस्याश्चदान-गजदान-फलानि कां च-
पूजां न सोऽहति भणन्ति महान्त इत्थम् ।। ६१ ॥
व्याख्या-यश्चिकित्सक सन्निपातसलिलाधिपतौ सन्निपात एव सलिलाधिपति समुद्रः
तस्मिन् निमग्नान् सन्निपातज्वरग्रस्ताम् जन्तून् प्राणिन समुद्धरति नीरजान् करोति स एव
वैद्यपति कविराज , तस्य तस्मै अम्र चतुर्थ्यर्थे पष्ठी चिन्त्या, अवदान, घोटकदान, गजदान,
फलदान च दातव्य यतो हि स का च पूजा न अर्हति । अपितु सर्वविधपूजायोग्य स ,
इत्थ महान्तो विवेकशीला भणन्ति कथयन्ति । वसन्ततिलका वृत्तम् । प्रकारान्तरेण चिकित्स-
कस्य:ऋणमुक्तौ शास्त्रनिर्देश-
चिकित्सितशरीर यो न निष्क्रीणाति दुर्मति । स यत्करोति सुकृत तत्सर्व मिपगश्नुते ॥
.
मै० २० ॥
हिन्दी-जो सन्तिपातरूपी समुद्र में डूबे हुए रोगी का चिकित्सा द्वारा उद्धार
कर देता है, अर्थात् नीरोग कर देता है, वही वास्तविक चिकित्सक है । उसको
हाथी, घोड़ा तथा उत्तमोत्तम फल देने चाहिये, इतना ही नहीं और भी सब प्रकार
उसकी पूजा करनी चाहिये । यही महापुरुषों की भाज्ञा है।
विशेष-इस पद्य की तीसरी पक्ति व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध प्रतीत होती है
इसके स्थान पर इस प्रकार का परिवर्तन कर देने से भाषा शुद्ध होकर भाव ज्यों
का स्यों रह जाता है। यथा-"तस्मै गजाश्वफलदानमुशन्ति का "पाठक इस
संशोधन पर ध्यान दें॥६॥

प्रथमो विलासः ३३ ३ - तदेव प्रकारान्तरेण वक्ति- सर्वस्वैः पूजयेद् वैद्यं सन्निपाताद् विवर्जितः । नो चेत् स नरकंयाति शम्भुरित्याह पार्वतीम् ।। ६२ ।। व्याख्या सन्निपाताद विवर्जित सन्निपातरोगान्मुक्तो रोगी सर्वस्वै. स्वकीयसकलधन- धान्यादिभि वैध चिकित्सक पूजयेद् अर्चयेत् । नो चेद अन्यथा कृते सति स रोगान्मुक्तो नरक निरय याति पापभाग्भवति पनि शम्भु पार्वतीम् आह कथितवान् । “नहि जीवित- दानाद्धि दानमन्यद् विशिष्यते” इति शास्त्रानुसार जीवनप्रदाय सुचिकित्सकाय स्वस्थो रोगी यत्किञ्चिदपि ददाति तत्मा स्वरपमेव । अनुष्टुप् । हिन्दी-शिवजी पार्वती से कहते हैं-सन्निपातज्वर से मुक्त रोगी अपने चिकित्सक की सम्मानपूर्वक धनादि उत्तमोत्तम पदार्थों से यथाशक्ति पूजा करे । हे पार्वती जो रोगमुक्त व्यक्ति ऐसा नहीं करता वह नरकगामी होता है अर्थात् दुसी रहता है ।। ६२॥ कर्णमूलजशोथचिकित्सा माह- युक्त्वक्शुण्ठीकारवीकट्फलानां तुल्यांशानां चूर्णितानां विमित्रैः। वारंवार कर्णमूलोत्थ शोथं रक्तस्रावैराज्यपानर्जयेद्वा ॥३॥ व्याख्या-युक्त्वक चित्रकत्वक् शुण्ठी महौषध कारवी शतपुष्पा कट्फलं कुम्मिका तुल्याशाना समभागवतां चूर्णितानाम् एतेषां विमिन मिश्रित लेपै कर्णमूलोत्थ शोथ जये अपहरेत् किंवा रक्तस्राव शृङ्ग्यादियन्त्रैर्जलीकादिभिर्वा रक्तस्राव कारयेत् अथवा आज्यपानविधिना आज्य पाययेत् । शालिनीवृत्तम् । भैपज्यरलावल्यामपि- रक्तावसेचने पूर्व सपिप्पानश्च त जयेत । प्रदेहे कफवातघ्नैर्वमने कवलग्रहै ॥ यद्यपि- सग्निपातज्वरम्यान्ते कर्णमूले सुदारुण । शोफ सजायतें तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते ॥वाग्मट । एतदनुसार सन्निपातान्ते कर्णमूलज शोथ असाध्य किन्तु ग्रन्थान्तरे तस्य विधा गति- निर्दिष्टा, तद्यथा- चरादितो वा ज्वरमध्यतो वा ज्वरान्ततो वा श्रुतिमूलशोफ । क्रमादसाध्य स्खलु कष्टसाध्य मुसेन साध्य कथितो मुनीन्द्र ॥ हिन्दी-चीता की छाल, सौंठ, सौंफ, कायफल, सभी द्रव्यों को समभाग लेकर इनका चूर्ण कर लें, पानी के साथ पीसकर इसका लेप लगाने से सन्निपात ज्वर के बाद होने वाला कर्णमूलजशोथ शान्त हो जाता है। अथवा जोक आदि के द्वारा रक्तस्राव कराना चाहिये या शोथनाशक औषधियों से सिद्ध घृतपान कराना चाहिये ।। ६३॥ ३ च० चि० - ३४ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः कर्णादिरुजाहरो लेप अग्निमन्याग्निरास्नाभिर्मातुलुङ्गस्य मूलकैः। सदारुनागरैर्लेपः कर्णपार्श्वरुजो हरः॥ ६४ ॥ व्याख्या-अग्निमन्थ श्रीपर्णी अग्नि चित्रक. रारला मुवहा मातुला वीजपूरक एतेषां मूलके., दार देवदारु नागर शुण्ठी एताभ्या सह कृतो लेप कास्य कर्णयो. वा पार्थे समीपे या रुक् शोधात्मिका तस्या हर ति । अनुष्टुप् छन्द । मैपज्यरनावल्यामपि योगोऽय लभ्यते- वीजपूरकमूलानि अग्निमन्थ तथैव च । सनागर देवदारु चव्यचित्रकपेपिनम् ॥ प्रलेपनमिद श्रेष्ठ गले श्वयथुनाशनम् ॥ मैं० २० ॥ हिन्दी-भरणी, चित्रक, राना, विजौरा नीवू इनकी जड़ें तथा देवदारु और सोंठ इनको कूट-पीसकर लेप करने से सन्निपात ज्वर के अन्त में होनेवाला कर्णमूलज शोथ शान्त हो जाता है ॥ ६४ ॥ गुटपिप्पली-प्रयोग - अजीर्णजीर्णज्वरपाण्डुकासश्वासाग्निसादाऽरुचिजांस्तु दोपान् । दूरीकरोत्याशु गुडेन कृष्णा कृष्णेव कृष्णेन विमोहमंहः ।। ६५ ।। ग्यास्या-अजीर्ण जीर्णज्वर पाण्डुरोग कास श्वासम् अग्निसादम् अग्निमान्यम् अरुचिजम् । अरुचे कारणेनोत्पन्ना ये दोपा विकारास्तान् विकारान् गुडेन युक्ता कृष्णा पिप्पलीचूर्णम् माशु शीघ्र तथा दूरीकरोति यथा कृष्णेन वमुदेवसूनुना कृष्णा । द्रौपदी (चीरहरणावसरे ) अह दुष्कृत विमोहवैचित्य दूरीकृतवती तद्वत् । यथा द्रौपद्या स्मरणमन्तरा कृष्णेन तस्य शीलरक्षा कृता तद्वद् एव गुटपिप्पलीप्रयोग पूर्वोक्तेभ्यो रोगेभ्य पीटितान रक्षतीति भाव. 1 उपजातिवृत्तम् । यथाह चक्रपाणि जीर्णन्वरेऽग्निसादे च शस्यते गुटपिप्पली। चक्रदत्ते। हिन्दी-अनपच, जीर्णज्वर, पाण्डुरोग, कास, श्वास, अग्नि की मन्दता तथा अरुचि के कारण उत्पन्न दोपों को गुद मिश्रित पिप्पली चूर्ण का सेवन उस प्रकार दूर करता है निस प्रकार चीरहरण के अवसर पर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के कष्ट को दूर किया ॥६५॥ जीर्णज्वरे कपाय जीर्णज्वरं कफयुतं कणया समेतं छिन्नोद्भवोद्भवकषायक एप हन्ति । रामो दशास्यमिव राम इव प्रलम्चं रामो यथा समरमूर्धनि कार्तवीर्यम् ॥ ६६ ॥ - -

प्रथमो विलास
३५
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व्याख्या-प कगया पिप्पल्या समेत सहित यया स्यात्तथा छिन्नोद्भवोद्भवकपायको
गुइचीनिर्मित काथ कफयुत जीर्णज्वर तथा इन्ति यथा रामो दाशरथि दशास्य रावण,
रामो वलराम प्रलम्बम् अमुरविशेप, राम परशुराम समरमूर्धनि युद्धभूमौ कार्तवीर्यम्
महनत् । वसन्ततिलका वृत्तम् । यथा चक्रपाणि.-
पिप्पलीचूर्णमयुक्त कादिष्टनरहोद्भवः । जीर्णज्वरकफवसी पञ्चमूलीकृतोऽथवा ।। चक्रदत्ते।
हिन्दी-छोटी पीपल और गिलोय का साथ जीर्ण कफज्वर का उसी प्रकार
विनाश करता है जिस प्रकार राम ने रावण का, बलराम ने प्रलम्बासुर का और
परशुराम ने युद्धभूमि में कार्तवीर्य का विनाश किया ।। ६६ ॥
पञ्चमूलपिप्पलीप्रयोग
पञ्चमूलसलिलं चपलाया धूलिभिर्विलुलितं प्रपिवन्तम् ।
पूरुपं कफचिरज्वरपीडा संजहाति विधनं गणिकेव ॥ ६७ ॥
प्यास्या-पनमूल बृहत्पन्नमूल चपलाया कणाया लेमि चूर्णे विलुलित मिश्रित
सलिल काय प्रपिवन्त प्रकर्पण नियमानुसार पान कुर्वन्त पुरुष रोगिण कफचिरज्वरपीडा
जीर्णकफज्वराभिधानो रोग तथा तजहाति सम्यक् प्रकारेण त्यजति यथा विधन विगत
धन यस्य त धनरहित पुरुप गणिका वारवधू । स्वागतावृत्तम् ।
हिन्दी-वृहस्पञ्चमूल और छोटी पीपल के क्वाथ को पीने वाले जीर्णकफ-ज्वर
से पीडित रोगी को उसका रोग उसी प्रकार छोड़ देता है जिस प्रकार धनहीन
पुरुप को वेश्या छोड़ देती है ॥ ६७ ॥
मुस्ताटिकाथ
मुस्ताऽमृतानन्तकिरातसिंहीशुण्ठीशटीपर्पटरोहिणीनाम् ।
काथः कणाक्षौद्रयुतः प्रशस्तोजीर्णज्वरे वा विषमज्वरे वा ॥ ६८॥
व्याख्या-मुस्ता मुस्तम् अमृता गुडुची अनन्ता दुरालभा, किरात तिक्त सिंही
कण्टकारी शुण्ठी महौषधम् , शटी कर्चुर पर्पट. वरतिक्त (पित्तपापडा इति ख्यात )
रोहिणी मासरोहिणी कणा पिप्पली एतेपा मधुयुत काथ जीर्णज्वरे किंवा विषमज्वरे
चिकित्सक प्रगस्त । इन्द्रवजावृत्तम् । मैपज्यरलावल्यामपि एप योगो लभ्यते--तद्यथा-
मुस्तामलकगुडूचीविश्वोषधकण्टकारिकाकाथ । पीत सकणाचूर्ण समधुर्विपम ज्वर हन्ति ।
हिन्दी-नागरमोथा, गिलोय, दुरालभा, चिरायता, कण्टकारी, सोंठ, कचूर,
पित्तपापड़ा, मासरोहिणी और पिप्पली इनका काथ मधु के साथ सेवन करने से
जीर्णज्वर एव विषमज्वर का विनाश करता है ।। ६८॥
ऐकाहिकज्वर काथ
वासापटोलत्रिफलाद्राक्षाशम्याकनिम्वजः ।
समधुः ससितः काथो हन्यादेकाहिकं ज्वरं ॥ ६९ ॥

३६ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणि द्वारा लिखित व्यायया-वासा आटरूप पटोल वरतिक्त त्रिफला फलत्रिकम् द्राक्षा मृवीका शम्याक भारग्वध. निम्ब पिचुमदः पतेपा मधुना सितया च सह मिलित काय ऐकाहिक ज्वर प्रतिदिनम् एककाले य समायाति त हन्याट विनाशयेत् । पूर्वाक्ताप्टानाम् ओपीना काथे मिद्धे मति नत्र मधुसितयो प्रक्षेप कर्तव्य । अनुष्टुप्ठन्द । हिन्दी-अहसा, परवल की पत्ती, हरड़, वहेड़ा, आंवला, मुनका, अमलताम, नीम की छाल इसका साथ मधु और मिश्री मिलाकर पीने से ऐकाहिक ज्वर का विनाश करता है। विशेष-घरक, सुश्रुत एव वाग्भट में से ऐकाहिक ज्वर का नामत. उल्लेख नहीं है। केवल निदान के ही लिये लिखे हुए माधवनिदान में भी इसका मूल में तथा इसके प्रसिद्ध टीकाकार श्रीविजयरक्षित एव श्री कण्ठदत्त के मधुकोप टीका में भी इसका शब्दत वर्णन नहीं किया गया किन्तु चिकित्सा. प्रधान ग्रन्थों मैपज्यरत्नावली आदि में ऐकाहिक ज्वर चिकित्सा नाम से अनेक योग मिलते हैं। हमारे विचार से यह अन्येशुष्क ज्वर का पृथग नामकरण मात्र है। यथा-"अन्येधुप्कस्त्वहोरात्र एककाल प्रवर्तते ।" दिन-रात में केवल एकबार आने वाले ज्वर को "अन्येशुक" कहते हैं और ऐकाहिक शब्द का पारिभाषिक अर्थ भी यही होता है। ऐकाहिक आदि विपमज्वरों में देवव्यपाश्रय एव युक्तिव्य- पाश्रय चिकित्सा द्वारा भी लाभ होता है। इसके विविध प्रयोग चिकित्सा ग्रन्यों में मिलते हैं ॥ ६९ ॥ तृतीयकज्वरे चन्दनाढिक्काथ सशिशिरः सधनः समहौषधः सनलदः सकणः सपयोधरः। समधुशर्कर एप कपायको जयति सत्वरमेव तृतीयकम् ॥ ७० ॥ व्याण्या-शिशिर रक्तचन्दन धन धन्याक महीपध शुण्ठी नलदम् उशीर कणा पिप्पली पयोधरो मुस्ता एभिर्द्रव्ये, सहित सावितश्च समधुशर्कर मधुशर्करान्या समन्वितो युक्त एप कपायक सत्वरमेव चीवमेव तृतीयक ज्वरविशेष जयति म्ववशमानयति विनाश- यतीत्यभिप्राय । तत्र सामान्यचिकित्सामूत्रन् “कर्म साधारण जयात्तृतीयकचतुर्थके ।" च० चि० ३ ॥ तृतीयेऽह्नि भव तृतीयक व्याहिक वा । द्रुतविलम्बितवृत्तम् । यथा चक्रपाणि चक्रदत्ते- महौषधामृतामुन्तचन्दनोशीरधान्यकै । काथस्तृतीयक हन्ति शर्करामधुयोजित ॥ हिन्दी-लालचन्दन, धनियाँ, मोठ, खस, पिप्पली, नागरमोथा इन द्रव्यों के द्वारा निर्मित क्वाथ में मयु एव मिश्री मिलाकर पीने से तृतीयकज्वर का शमन हो जाता है। विशेप-जहाँ भी हाथ में शहद मिलाने का निर्देश हो वहाँ काथ के शीतल - प्रथमो विलासः ३७ । होने पर ही मिलाना चाहिये। तृतीयम्वर को माधारण बोलचाल में 'तिजारी बुग्वार' कहते हैं। यह एक दिन का अन्तर देकर पुन तीसरे दिन आता है अत एवं इसको तृतीयक कहते है ॥ ७० ॥ चातुंथिंकज्वरे नस्यम्- चातुर्थिको गच्छति रामठस्य वृतेन जीर्णन युतस्य नस्यात् । लीलावतीनां नवयौवनानां मुखावलोकादिव मुखावलोकादिव साधुभावः ॥ ७१ ॥ व्याख्या-जी न घृतेन पुराणपिपा युतस्य रामटस्य हिलो नस्यात् नावनात चातुर्थिक चतुर्थऽहि भव "चतुर्थहि चतुर्थक" माधव । अन्यदपि "दिनद्वय त्वतिक्रम्य य स्यात्म हि चतुर्धक ", गच्छति शान्ति प्राप्नोति, यथा-नवयौवनाना नवोढाना युवतीना तथा च लीलावनीनां हावभावादिविलासयुक्तानां स्त्रीगा मुखावलोकान्मुखस्य दर्शनात साधुमावो धीरता गच्छति तथा ज्वरोऽपि याति, यद्यपि अस्थिगतमजागतज्वरयो पृथक्- पृथग् लक्षणानि माधवेनोल्लिखितानि तथापि चातुर्थिकविपर्ययाऽऽख्योऽन्य एव विपमज्वरः । इन्द्रवजावृत्तम् । तद्यथा-- अस्थिमजागतो दोपश्चातुर्थिकविपर्यय । जायते भिपजा शेयो विषमज्वर ण्व स ॥ भावप्रकाशे ।। हिन्दी-पुराने घी में हींग मिलाकर नस्य लेने से चौथे दिन आने वाला ज्वर उम प्रकार चला जाता है, जिस प्रकार हाव-भाव, कटाक्षादि में कुशल नवयुवतियों के (मुस) दर्शन से सजनता । यह स्नेहन नस्य है ॥ ७१ ॥ देवदादिकाथ सुरदारूशिवाशिवास्थिरावृपविश्वे. कथितः कपायकः । मधुना सितया समन्वितः परिपीतः शमयेच्चतुर्थकम् ॥ ७२ ।। व्याख्या-सुरदारु देवदारु. शिवा हरीतकी शिवा आमलकी स्थिरा शालपर्णी वृष आटरूपक विश्व शुण्ठी पद्मिरेभिर्द्रन्यै कथितोऽमिहित कपायक काथ मधुना मितया च समन्वित मधुसिताभ्यां मिलित परिपीत कृतपान चतुर्थक शमयेत् चतुर्थऽहि भव ज्वर नाशयेत् । यथा वगसेन स्थिरासामलकीदारुशिवावृपमहीपधै शृत शीत जल दद्यात् सितामधुसमन्वितम् ॥ चातुर्थिके ज्वरे तीने मन्दे चाप्यथ पावके। भावमियोऽप्येन समर्थयति स्थिरातामलकी दारु शिवा घृपमहापधै । सितामधुयुत. काथश्चातुर्थकहर पर ॥ तामलकी - भूधात्री। - ३८ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः तमेव योग चक्रदत्ते चक्रपाणि वासाधात्रीस्थिराठारुपथ्यानागरसाधित सितामधुयुत कायश्चातुर्थिकनिवारण ॥ गाधरसहितायामप्येप पाठ सुलभ । ग्रन्थान्तरेष्वपि सुलमोऽयं योग केवल रचना वैशिष्टयमेव कवे शेवधि । 'गिवा हरीतकी प्रोक्ता भवेदामलकी शिवा' अनेकार्थ । पद्येऽस्मिन् वियोगिनी छन्द । हिन्दी-देवदारु, हरीतकी, भावला, शालिपी, अहसा, सोंठ इनके क्वाथ में मधु और मिश्री मिलाकर पीने से चौथैया ज्वर का शमन हो जाता है ॥ ७२ ॥ शीतज्वरे योगत्रयम्- भज वेपथुमन् सदा हसन्ती गतधूमां च विलासिनी हसन्तीम् । कठिनस्तनमञ्जलोज्ज्वलांगां मधु च यूपणकेन कट्फलं वा ॥ ७३ ॥ व्याण्या-हे वेपथुमन् ! गीतज्वरपीटित, सदा सर्वदा गतधूमा घूमेन रहिता इसन्तीम् अङ्गारधानिकाम् "अङ्गारधानिकाऽङ्गारगकट्यपि हसन्त्यपि", अमर ॥ ( सग्गड, वोरसी) भज सेवस्व । अथवा कठिनस्तनमञ्जुलोज्ज्वलानां कठिनी स्तनौ यत्र तत् कठिनस्तन मन्जुल सुन्दरच तद् उज्ज्वला मन्जुलोज्ज्वलाङ्गम् यस्या एवम्भूता या मा ता हसन्तीम् प्रसन्नमुखारविन्दवती विलासिनी नवोढा नायिका भज आलिद्गय । किंवा विश्वोपकुल्या- मरिचाना समाहार त्र्यूषण कट्फल कुम्भिका एतेपा मधुयुत चूर्ण मज भक्षय । अत्र मधुशब्देन मद्यसेवनम्यापि सङ्केत शीतवारकत्वात् तदित्यम्- मधु मद्य मधु क्षीद्रे मधु पुष्परसे विदु । मधुश्चैत्रे मधुदत्ये मधुकेऽपि मधु स्मृत ॥ इत्यनेकार्थ । मधगुणा मद्य सर्व मवेदुष्ण पित्तकृद् वातनाशनम् । भेदन गीघ्रपाक च रूक्ष कहर परम् ॥ अभिनवनिः । त्र्यूपणस्य गुणा त्र्यूषण दीपन इन्ति कासश्वासत्वगामयान् ।। तदेव । विलासिनीसेवने गुणानाह- कूपोदक वटच्छाया नारीणां सुपयोधरौ । शीतकाले मवेदुष्णमुष्णकाले तु शीतलम् ।। यथा भावमिश्र - त स्तनाभ्यां सुपीनाम्या पीवरोरुनितम्बिनी। युवती गाढमालित्तेन शीतम्प्रशाम्यति ॥ मा प्र म ख । अग्निर्वातकफस्तम्मशीतवेपथुनाशन आमामिण्यन्दशमनो रक्तपित्तप्रकोपण || भावप्रकाशे । ज्वरचिकित्साप्रकरणे प्रयोदशविध स्वेद स्वेदाध्याये निदर्शित । मायाकालविदा युक्त स च शीतज्वरापह ॥ च चि अ३। हिन्दी-हे शीतज्वर से पीड़ित रोगी। धूमरहित जलते हुए कोयलोंवाली योरसी, अगीठी या अंगारधानिका का सेवन कर। अथवा सुरूपा विशाल स्तनों अग्निसेवने गुणा प्रथमो विलास ३६ वाली एवं प्रसन्नचित्त युवनी का मालिंगन कर । नहीं तो सोंठ, मरिच, पीपल, कटफल के चूणों का मधु के साथ सेवन कर या केवल उत्तम कोटि के मद्य (शराब) का उचित मात्रा में सेवन कर)। ये तीनों योग शीतज्वर नाशक है। चतुर्थकम्बरे नम्यम्- अगस्त्यपत्रस्वरसैनस्याद्याति चतुर्थकः । संसारसागर इव पुरारिपुरसेवनात् ॥ ७ ॥ व्याख्या-अगस्त्यपन मुनिद्रुमदल तस्य स्वरसे नस्यात् नावनात चतुर्थक ज्वर. तथा याति यथा पुरारिपुर काशी तस्य से पनात् ससारसागर भवबन्धनम् याति विनश्यति । यथाह चक्रपाणि चक्रदत्त "नस्य चातुर्थक हन्ति रसो वाऽगस्त्यसम्भव "। रेचनस्नेहन- भेदाभ्या नस्यस्य वैविध्यम्- नस्यभेदो द्विधा प्रोक्तो रेचन स्नेहन तथा । रेचन कर्पण प्रोक्त स्नेहन वृहण मतम् ।। शा स । एनन्नम्य रेचनार्थ प्रयुज्यते। कटुनलादिकस्य प्रतिदिन प्रयुज्यमान नस्य वृहण भवति । अनुष्टुप्छन्द 1 हिन्दी-अगस्त्य पत्रों के स्वरस का नस्य लेने से रोगी चौथंया ज्वर से उस प्रकार मुक्त हो जाता है, जिस प्रकार काशीवास करने से मानव भवसागर के यन्धनों से (मुक्त हो जाता है)। यह रेचन नस्य है ॥ ७४ ॥ शीतज्वरे शक्राहादिकपाय शक्राबदद्रुघ्नविषामृतानां निर्गुण्डिकाभृङ्गमहोपधानाम् । शुदायवानीसहितः कपायः शीतज्वरारण्यहिरण्यरेताः ॥ ७५ ॥ घ्याण्या-शकार इन्द्रयव दद्रुघ्न चक्रमर्द घृष वासक अमृता गुडूची निर्गुण्डिका सिन्दुवार भृङ्ग गजा केशराज वा महौषध शुण्ठी धुद्रा लघुकण्टकारी यवानी अजमोदा नवभिरेमिन्यै साधित कपाय शीतज्वरारण्यहिरण्यरेता शीतज्वर एव- वन तस्य विनाशाय अग्निरिव समर्थ । इन्द्रवजावृत्तम् । हिन्दी-इन्द्रजी, चकवढ़ के बीज, अडूसा, गिलोय, सम्हालू, भाग, सोंठ, छोटी कटेरी, अजवायन इन नौ द्रव्यों से निर्मित काथ शीतज्वररूपी वन का विनाश करने के लिये अग्नि के समान समर्थ है। अर्थात् यह क्वाथ शीतज्वर- नाशक है॥७५॥ विपमज्वर नागरादि कपाय सनागराया. सपयोधराया. ससिंहिकाया. सगुइचिकायाः । धाव्याः कपायो मधुना समेतः कणासमेतो विषमज्वरे स्यात् ॥ ७६ ॥ व्याख्या-नागर शुण्ठी पयोधर मुस्ता सिंहिका वृहती गुडची अमृता धात्री . -- ४० वैद्यक चमत्कारचिन्तामणिः आमलकी पञ्चैतासामोपधीना काथ मधुना क्षौद्रेण कणया पिप्पल्या च समेनो विमित्रः विषमज्वरे स्यात विषमज्वरनाशक प्रदिष्ट । यथाह भावमिश्र मुस्तामलकगुडचीविश्वौपधकण्टकारिकाकाथ । पीत. सकणाचूर्ण समधुर्विषमज्वर हन्ति । भा प्र. म ख ।। भैपज्यरतावत्यामपि योगोऽय तथैवोदधृतो दृश्यते । उपजातिवृत्तम् ।। हिन्दी-सोंठ, मोथा, वढ़ी कटेरी, गिलोय, आवला इन पाच द्रव्यों का काथ छोटी पीपल का चूर्ण तथा मधु मिलाकर सेवन करने से विषम ज्वर का नाश होता है ॥ ७६ ॥ रसोनकल्कप्रयोग सुरालये वा भुजगालये वा नरालये वा न रसोनकल्कात् । तैलेन युक्तादपरः प्रयोगो महासमीरे विपमज्वरेऽपि ॥ ७७ ॥ व्याख्या-सुरालये स्वर्गलोके भुजगालये पाताले नरालये भूलोके अर्थात् लोकत्रयेऽपि वा तैलेन तिलतैलेन युक्ताद् रसोनकल्काद् एकेन रसेन ऊन रसोन लशुन तस्य कल्काद् अपर द्वितीय प्रयोग. उपचार' औपध वा महासमीरे तीव्रवातज्वरे विषमज्वरे वा नास्तीति शेप । “सन्तत सततोऽन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थको", एते पञ्चविषमज्वरा । रसोनस्योत्पत्ति' वाग्मटे- राहोरमृतचौर्यण लूनाद ये पतिता गला । अमृतस्य कणाभूमौ ते रसोनत्वमागता ॥ यथाह भावमिश्र यदामृत वैनतेयो जहार सुरसत्तमात् । तदा ततोऽपतद् विन्दु स रसोनोऽभवद् मुवि ।। पञ्चभिस्तु रसयुक्तो रसेनाम्लेन वर्जित । तस्माद् रसोन इत्युक्ता द्रव्याणा गुणवेदिभि ॥ एनामेव कथा समर्थयति हारीत स्वसहितायाम् । कल्कनिर्माणविधि द्रव्यमा शिलापिष्ट शुष्क वा सजलं भवेत् । प्रक्षेपावापकल्कास्ते तन्मान कर्पसम्मितम् ।। कल्के मधु घृत तैल देय द्विगुणमात्रया। सितागुडी समौ देयो द्रवा देयाश्चतुर्गुणा ॥ शाईधरे । रसोनकल्क तिलतैलमिश्र योऽश्नाति नित्य विषमज्वरात । विमुच्यते सोऽयचिराज्ज्वरेण वातामयैश्चापि सुघोररूपै ॥ एप एव योगोऽविकलरूपेण चक्रदत्तेऽपि दृश्यते । उपजानिवृत्तम् । हिन्दी-स्वर्ग, पाताल तथा भूतल अर्थात् तीनों लोकों में तीय ज्वर एवं विषम ज्वर को शान्त करने के लिये तिल तेल मिश्रित लहसुन की चटनी के निरन्तर सेवन के अतिरिक्त दूसरा कोई सफल प्रयोग है ही नहीं। - भैपज्यरतावल्याम्- प्रथमो विलास ४१ विशेप-सूखे अमचूर को पानी के साथ पीसकर कच्चे आम इमली को यों ही पीसकर आवश्यक प्रक्षेपों को डालकर जैसे चटनी बनाई जाती है वैसे ही औपयोक्त द्रव्यों द्वारा करक = चटनी का निर्माण किया जाता है। तीनों लोक में ऐसा प्रभावकारी दुसरा प्रयोग नहीं है यह कहना ग्रन्थकर्ता की स्वानुभूति के प्रति गर्वोक्ति है ॥७॥ विषमज्वर योगचतुष्टयम्- औद्रेण पथ्या विषमज्वरापहाऽजाजी गुडानया विषमज्वरापहा । कृष्णोधमाना विपमज्वरापहा श्रेष्ठा गुडाग्रया विषमज्वरापहा ।। ७८ ॥ व्याख्या-झौद्रेण मधुना सेविता पच्या हरीतकी विषमज्वरापहा विषमज्वर ज्वरान् वा अपहन्ति । अजाजी कृष्णजीरक गुटेन सहिता तदेव कार्य करोति । कृष्णैधमाना वर्धमानपिप्पली विषमज्वर नाशयति । गुडाग्रथा गुरुप्रधाना श्रेष्ठा विशेषगुणप्रदायिनी पिप्पली विपमज्वरापहा भवति । चरके वर्धमानपिप्पलीप्रयोग क्रमवृद्ध्या दशाहानि दापैप्पलिक दिनम् । वर्धयेद् पयसा साध तथा चापनयेत् पुन ॥ जाणे जीर्णे च मुसोत पष्टिक झोरमर्पिपा । पिप्पलीना सहस्रम्य प्रयोगोऽय रसायनम् । पिष्टास्ता वलिमि मेव्या शृता मध्यवले रे । शीतीकृता हस्वदलोज्या दोपामयान् प्रति ।। दशपैप्पलिक श्रेष्ठो मध्यम पट् प्रकीर्तित । प्रयोगो यस्निपर्यन्न स कनीयान् स चानले । च० चि० अ० १॥ विवृद्धथा पञ्चवृद्धथा वा सप्तवृद्धयाऽथवा पुन ॥ इत्यामनन्ति । अन्ये तु- उपरि लिखिता एकरलोकसमापनाश्चत्वारो योगा विषमज्वरान् शमयन्ति । इन्द्रदयावृत्तम् । हिन्दी-मधु के साथ हरीतकी का सेवन, गुड़ के माथ कालाजीरा का सेवन, वर्धमान पिप्पली का प्रयोग अथवा गुद के साथ पिप्पली का सेवन विपम ज्वरों का विनाश करता है। इस एक ही श्लोक में पृथक-पृथक् चार योगों का वर्णन है ।। ७८ ॥ विषमज्वरे पटोलादिकाथ प्रवालतुलिताधरे कुचकुलाचलालङ्कृते विशालजधनस्थले चटुलचारुचलाञ्चले। पटोलकटुरोहिणी-मधुकचेतकीमुस्तके कपायक उदाहृतो विपमशान्तये सूरिभिः ॥ ७९ ॥ व्यास्या-प्रवालतुलिताधरे प्रवाल नवदल तेन तुलितम् अधरपल्लव यम्या सा - ४२ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः तत्सम्बुद्धी, कुचकुलाचलाऽलङ्घने कुचौ एव कुलाचली महोन्नतपर्वती ताभ्यामलटते सुशो- मिते, अत्र कुचयो पीनोन्नतत्वात् कुलाचलप्रयोगो विहित तथथा- महेन्द्रो मलय सय शुक्तिमान् ऋक्षपर्वत । विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तते कुलपर्वता ॥ विशालघनस्थले विशाले विपुले जघने स्त्रीकट्या पुरोमागौ यस्या सा तत्सम्बुद्धौ चटुलचारुचलाञ्चले चटुल चञ्चल च तत् चारु सुन्दर च तत् चलाश्चल शाटिकाप्रान्तमागो यस्या सा तत्सम्बुद्वी, इत्यभूते हैं प्रियतमे। पटोल कुलक कटुरोहिणी कट्वी मधुको गुडपुष्प , चेतकी हरीतकीभेद मुस्तक मुस्ता पञ्चभिरेभिर्द्रव्यै कृत कपाय कुगलैश्चिकि- त्सकैविपमञ्चरशान्तये निर्दिष्ट , इति ग्रन्थकर्तुराशय । पृथ्वीवृत्तम् । हरीतकीभेदा विजया रोहिणी चैव पूतना चामृताऽभया । जीवन्ती चेतकी चेति विशेया सप्तजातयः ।। चेत या उत्पत्तिस्थान हिमालय आकृति त्रिरेखा चेतकी शेया । भा० प्र० । हिन्दी-नवकिसलय के सदृश होठों से युक्त, पीन एवं उन्नत स्तनों से सुशोभित विशाल जाघों और सुन्दर भांचलवाली प्रियतमे | परवल, कुटकी, महुमा, चेतकी नामक हरड़, नागरमोथा इन पाच द्रष्यों से बना हुमा काथ विपमज्वर का विनाश करता है । यह विद्वान् चिकित्सकों का मत है ॥ ७९ ॥ विषमज्वरनाशनो योग यो भजेत् समधुश्यामां श्यामामिव मनोहराम् । विपमेपुव्यथास्तस्य न भवन्ति कदाचन ।। ८० ॥ व्याण्या-य विषमज्वरी श्यामा पोटावापिकी स्त्री तद् मनोहरा रोगनाशकत्वात् प्रिया श्यामा पिप्पली मधुना सह मजेत सेवेत तस्य विपमेषु विपमज्वरेपु व्यथा पीडा कदाचन कदापि न भवन्ति । अथवा य मधुना माक्षिकेण सह श्यामा त्रिवृता भजेत् सोऽपि विपमज्वरेभ्यो मुक्तो भवति । इति द्वितीयोऽर्थ । अथ श्लेपानुप्राणितस्तृतीयोऽर्थ य काम- पीटित समधुश्यामा मधुना मधेन सह श्यामा पोटशवार्षिकी कामिनों भजेत् तस्य विपमेपु. काम तत्य व्यथा पीडा न भवन्तीति । श्यामाया लक्षणानि- स्निग्धनखनयनदशना निरनुशया मानिनी स्थिरस्नेहा । सुस्पर्शा शिशिरमासलवरागना सा मता श्यामा ।। अत्र पधे विषमज्वरचिकित्सया सहैव कामज्वरस्यापि चिकित्सा ग्रन्थका क्षेपमुखेन निर्दिष्टा । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-नवोढा नायिका के समान सुखद मधु युक्त निशोथ का अथवा मधु युक्त पिप्पली का मेवन करने से विषम ज्वरों का शमन होता है। अथवा कामज्वर पीड़ित रोगी यदि नवोढा नायिका का सेवन (आलिङ्गन) करता है तो उसका ज्वर शान्त हो जाता ।। ८० ॥

प्रथमो विलास ४३ तण्डुलीयमूलधारणप्रयोग क्षणमपि चलतां जहीहि सुग्घे शृणु वचनं मम तन्वि सावधाना । वसति शिरसि मेघनादसूले ब्रजतितरां विषमो विशालदृष्टे । ॥ ८१ ॥ व्याण्या-हे मुग्थे । उपयोक्ने अर्थात् चन्चले क्षणमपि स्तोकमपि चञ्चलता चावल्य जहीहि नन्त्यज, हे तन्वि । कृयोदरि सावधाना दत्तचित्ता सती मम मदीयमेतदुच्यमान वचन वाक्य शृणु आकर्णय मेघनादमूले तण्डुलीयकमूले गिरसि शिखाया वसति बद्ध सति है विशालदृष्टे । विनाला विस्तृता दृष्टि यस्या सा तत्सम्युद्धौ विषमो विषमज्वरो व्रजति- तरान् अनिशयेर गच्छनानि माव । रनालाया विशालदृष्टिता सौन्दर्यापादकत्वे सति शालशत्वमपि व्यनक्ति । तत्र विशाला व्यापका शास्त्रान्तरसञ्चारिणीत्यभिप्राय । पुष्पिता- ग्रावृत्तम् । हिन्दी-हे मुग्ध स्वभाव वाली प्रिये । थोड़ी देर चञ्चलता छोड़ो, हे कृशोदरि। सावधान होकर मेरी यात सुनो, हे हरिणाक्षि | चौलाई की जड़ को शिर में बाधने से विषम ज्वर का नाश हो जाता है ॥ ८ ॥ विषमचरे कपाय - विषममपहरत्यसौ कपायो मधु मधुको मधुरामृताशिवानाम् । अहमिव तव कामिनि प्रकोपं चरणसरोरुहयोलुंठन् हटेन ॥८॥ व्यायया-हे कामिनि प्रियतमे । यथा अह हठेन बलात्कारेण तव चरणसरोरुहयो- ठेठन तव चरणकमलयो पतन् मन् प्रकोप हरामि, अनेन पादपतनेन गुरुमानिन्या अपि क्रोधोपशम इति प्रमिद्धि कामशाम्पु । तदवट असौ मधुक मधुयष्टी मधुरा शर्करा अमृता गुडूची शिवा आमलकी एतेपा मधुमधुरो मधुना मधुरीकृत कपाय विपम विपमाऽख्य ज्वरन अपहरति विनाशयतीत्यर्थ । पुष्पिताग्रावृत्तम् । हिन्दी-हे प्रिये मेरी बात सुनो। मुलेठी, चीनी, गिलोय, आंवला इन चारों का काथ मधु मिलाकर पीने से उस प्रकार विषम ज्वर को शान्त करता है जिस प्रकार तुम्हारे अत्यन्त ऋद्ध हो जाने पर मैं चरणों में गिरकर हठपूर्वक तुम्हारे क्रोध को शान्त कर लेता हूँ ॥ ८२ ॥ विपमज्वरनाशनोऽपर कपाय - हे मुग्धे सलिलधरामृताशिवानां सप्ताहं पिव मधुसंयुतं कपायम् । भो कान्त तव विषमज्वरापनोदादत्यन्तं तनुलतिका प्रहर्पिणी स्यात् ॥ व्याख्या हे मुग्धे । प्रियतमे मल्लिधर तोयभृत् मुस्ता, अमृता गुडची शिवा आमलकी एपा प्रयाणा मधुमयुत मधुना मिलित मधुरीकृन कपाय सप्ताह सप्तदिन यावत् पिव । मो कान्ने । रूपसौन्दर्यशालिनि । विषमज्वरापनोटात् विषमज्वरदूरीकरणाद अनेन कपायेण अत्यन्तम् अत्यधिक तव तनुलतिका अहयष्टि प्रहर्षिणी प्रमोदातिशययुक्ता - ४४ वैद्यक चमत्कारचिन्तामणिः 1 -- स्यात् । यथाह वाग्मट अष्टाद्गहृदये-"धात्री मुस्ताऽमृताक्षीदमर्थश्लोकसमापना ।" म०चि० २०५१ प्रहर्पिणी वृनम् । हिन्दी-हे मुग्धे । नागरमोथा, गिलोय, आवला इन तीनों का मधु मिश्रित काथ एक सप्ताह तक पीना चाहिये । हे प्रिये ! इस क्वाथ के सेवन से विषम ज्वर दूर होकर तुम्हारा शरीर प्रसन्न रह ॥ ८३ ॥ ज्वरहरम् अष्टाङ्गपनम्--- अयि कुशाननतीक्ष्णमने मते मतिमतामतिमन्मथमन्थरे । ज्वरहरं रुगरिएशिवावचायवहविर्जतुसर्पपवूपनम् ।। ८४ ॥ व्याख्या-अयोनिस्नेहपूर्वक मन्बोधनन् , कुशाननतीष्णमते ऋगस्य दर्मन्य आनन मुखमिव तीक्ष्या जातव्युत्पन्ना मतिर्यस्या ला तत्सम्बोधने, मतिमता बुद्धिमता मते पूजिने अतिमन्मथमन्थरे प्रवृद्धकामबगान्मन्दगनियुक्ने एतदधोलिखितमष्टाद्गधूपनम् ज्वर नागयती. त्यर्थ. 1 रुक कुष्ठम् अरिष्ट निम्ब शिवा थामर की वचा गोलोमी यव सक्तु इन्द्रयवो वा हवि घृत जतु लाक्षा सर्पप गौरमर्पप इत्यष्टौ धूपनानि, यथाह चक्रपाणि - पलपा निम्बपत्र वचा कुष्ट हरीनकी । नपा मयदा सपि पन ज्वरनागनम् ॥ चक्रहत्ते ।। इतविलन्वितवृत्तम् । हिन्दी-हे कुशाग्र बुद्धि वाली विद्वानों के द्वारा सम्मानित, यौवन के उन्माद से मन्दगति वाली प्रिये । फूट, नीम के पत्ते, आंवला, वच, जो, अथवा इन्द्रजी, बी, लाख और पीली सरसों इनका धूप देने से ज्वर शान्त हो जाता है । ८४ ॥ मततकज्वर तिक्ताढिकयाय तिकोशीरवलाघान्यपर्पटाम्भोधरैः कृतः। क्वाथः पुनः समायातं ज्वरं शीघ्र निवारयेत् ।। ८५॥ व्याग्चा-तिका कुटकी उशीर नलद बला वाट्यालक धान्य धन्याक पर्पट वरनिक्त अम्मोधर मुन्ता पमिद्रव्ये न कपाय पुन समायातम् एकस्मिन्नेव दिने वारद्वयम्, मागच्छन्न सतनाग्य ज्वर शीघ्र निवारयेत् । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-कुटकी, सम्म, बला, धनिया, पितपापड़ा, नागरमोथा इन छ द्रव्यों के द्वारा निर्मित कपाय एक ही दिन में दो बार आने वाले सततक ज्वर का नाश करता है। यह सततक नामक विषम ज्वरनाशक उत्तम योग है ॥ ८५॥ लाक्षादि तैलन्- रास्तामूर्वामधुकरजनीकुष्ठशीताश्वगन्धा- कौन्तीतितामिशिसुरयनस्तुल्यभागैः समस्तम् । नैलं लाक्षारसपरिमितं गर्भिणीनां प्रशस्तं भूतोन्मादज्वरपवनजिद् यक्षरक्षामयघ्नम् ॥ ८६ ॥ - प्रथमो विलासः ४५ A. तस्य प्रयोग - व्याण्या--रास्ना सुबहा मूर्वा मधुरमा मधुक मधुयष्टी रजनी हरिद्रा कुष्ठ रुक् शीत येतचन्दन अश्वगन्धा हयगन्धा कौन्ती रेणुका तिक्ता कुटकी मिशि. शतपुष्पा सुर देवदारु घन मुन्ता लाक्षारसपरिमित तैल च तुल्यभागे समस्तम् एभि समानभागिवार्द्रव्ये साधित तेल गर्भिणीनाम् अन्तर्वतीनाम् "अन्तर्वत्पनिवतोर्नुक", इत्यनेन नुगागमे । प्रशस्त लामदायकन् , अन्यच्च भूतोन्मादवरपवनजिद् भूतोत्थज्वरवातव्याधिविनाशक यक्षवाधा रक्षसा वाधा क्षय राजयक्ष्माण च विनाशयति । मन्दाक्रान्नावृत्तम् । अथ तलसाधनप्रकार कल्काच्चतुर्गुणीकृत्य घृत वा तैलमेव वा । चतुर्गुणे द्रवे साध्य तस्य मात्रा पलोन्मिता ।। काथे जल परिमाणमाह चतुर्गुण नृदुद्रव्ये कठिनेऽष्टगुण जलम् । तथा च मध्यमे द्रव्ये दद्यादष्टगुण पय ॥ अत्यन्त कठिने द्रव्ये नीर पोडशिक मतम् । नत्र पाकम्य त्रैविध्यम्- स्नेहपाकस्त्रिधा प्रोक्तो मृदुर्मध्य खरस्तथा । नस्यायं स्यान्मृदु पाको मध्यम सर्वकर्मसु ॥ अभ्यनाथ सर प्रोक्तो युन्ज्यादेव यथोचितम् ॥ शा० स० । लाक्षादितैलम्य निर्माणविधि लाक्षाढक कायित्वा जलस्य चतुराढ। चतुर्थीश शृत नीत्वा तैलग्रस्थे विनिक्षिपेत् ॥ मत्त्वाढत च गोदध्नस्तत्रैव विनियोजयेत् । शतपुष्पामश्वगन्धा हरिद्रा देवदारु च ।। कटुकी रेणुका मूर्वी कुष्ठ च मधुयष्टिकाम् । चन्दन मुस्तक रास्ना पृथक्कर्पप्रमाणत. ॥ चूर्णयेत्तत्र निक्षिप्य माधयेन्मृदुवहिना । अस्याभ्यगात्प्रशाम्यन्ति सर्वऽपि विषमज्वरा ॥ कासश्वासप्रतिश्यायत्रिकपृष्ठग्रहास्तथा । वातपित्तमपस्मारमुन्माद यक्षराक्षसान् ।। कण्ड शूलन दीर्गन्ध्य गाग्राणा स्फुरण जयेत् । पुष्टगर्भा भवेदस्य गाभण्यभ्यगतो भृशम् ।। शाधरे॥ हिन्दी-रासना, मरोदफली, मुलेठी, हल्दी, कूठ, सफेद चन्दन, असगन्ध, रेणुका, कुटकी, सौफ, देवदारु, नागरमोथा ये सभी द्रव्य समानभाग (१-१ तोला १-१ कप) और लाक्षारस के समान तैल (दोनों १-१ आढक =३ सेर ३ पाव ४ तोला) लेकर इसका निर्माण करे । यह लाक्षादि तैल गर्मिणियों के लिये अत्यन्त लाभदायक है तथा भूतोन्माद, ज्वर, वातविकारों को जीतता है और यक्षवाधा, राक्षसपीडा एव क्षयरोग का विनाशक है। विशेप-लाक्षादि तैल निर्माण के लिये लाख का काथ बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि लाख नीचे बैठकर जल न जाय अत. उसको चलाते रहें। लाख का पाक अन्य काष्ठीपधियों की भांति नहीं होता यह केवल पिघल

दधन
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वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः
जाती है। इस से निर्मित तेल हल्का लाल रंग का होता है। इसके जितने गुण
लिखे जॉय थोडे हैं। तैल साधन में तिल तैल ही लेना चाहिये ॥ ८६ ॥
पटकटवरतैलम्-
रुङमूर्वाजतुचिकसासुवर्चिकानिविश्वाभिः सलिलसदृग्दधिप्रसिद्ध ।
तके षड्गुणगणिते विपक्कमायें तैलं स्यात्सपदि निदाघशीतहारि ॥८७॥
व्याख्या हे प्रसिद्ध आर्ये । रुक् कुष्ठ मूर्वा मधुरमा जतु लाक्षा सुवचिका लवण निट
निशा, निड् अत्र 'वश्वभ्रस्जेत्यादिसूत्रेण शस्य पत्वे जश्त्वचत्वे निट् इति साधु । विश्वा शुण्ठी
सलिलसदृग्दधि सलिलेन जलेन समान तुल्य यद् दधि तेन पक्क तथा पढ्गुणगणिते तके
तैलात् तिलतैलात् 'पद्गुणाधिके तके विपक्व साधितम् एतत्तैलवर सपदि सेवित सत्
निदाघशीतहारि उष्णता शीतता च हरति । प्रहर्षिणीवृत्तम् ।
यथाह चक्रपाणि चक्रदत्ते-
सुवचिकानागरकुष्ठमूर्वालाक्षानिशालोहितयष्टिकाभि ।
तैल ज्वरे पट्गुणकट वसिद्धमभ्यजनाच्छीतविदाहनुत्स्यात् ।।
कटवर परिचय
ससारकस्यात्र तक कटवरमिष्यते ।
घृततैलपाकनिर्णय फेनोद्गमो यदा तैले फेनशान्तिश्च सपिपि ।
तैलमूर्छनविधि कृत्वा तैल कटाहे दृढतरविमले मन्दमन्दानलैस्तत्
पक्क निष्फेनमाव गतमिह हि यदा गैत्यभाव समेत्य ।
मअिप्ठारात्रिलोधैर्जलधरनलिक सामलै साक्षपथ्ये
सूचीपत्राद्मिनीररुपहितमथितेस्तैलगन्ध जहाति ॥
तैलस्येन्दुकलाशिकेन विकसा ग्राह्या तु मूविधौ
ये चान्ये त्रिफलापयोदरजनीहीवेरलोध्रान्विता ।
सूचीपुष्पवटावरोहनलिकास्तस्याश्च पादाशिका
दुर्गन्ध विनिहत्य तैलमरुण सौरभ्यमाकुर्वते ।।
पाच्यास्तैलजगन्धदोषहतये कल्कीकृतास्तद्विदा ॥ भै० र० ॥
हिन्दी-हे अपने सद्गुणों से प्रसिद्ध एव कुलीन रनकला। कूठ, मरोड़फली,
लाख, सौचरनमक, हल्दी, सोंठ ये द्रव्य और जितना दही हो उतना ही पानी
मिलाकर इसका मठा बना लें (यह मठा तैल से छ. गुना अधिक होना चाहिये)
इसके साथ पकाया हुआ यह षटकटबर तेल शीत तथा दाह दोनों का नाश अथवा
उपशमन करता है।
विशेष-किसी भी तैल का निर्माण करने के पूर्व तैल को मूञ्छित कर लेना
चाहिये। इसकी विधि ऊपर व्याख्या में दी गई है। कटवर-मक्खन सहित वही
के घोल को कटघर कहते हैं ॥ ८७ ॥

प्रथमो विलासः - विषमज्वरादियु घृतप्रयोग- गोपीच्यामलकी स्थिरामगधजातिक्ताहिमश्रीफल- द्राक्षाफालिनिसेव्यधावनिविपामुस्तैन्द्रजैः साधितम् । स्यादाज्यं विषमज्वरं क्षयशिरःपार्श्वव्यथाऽरोचक दीप्तं शोफहलीमकाशमयेल्लीलालतामसरि ।। ८८ ।। घ्याण्या-2 लीलालतामारि । लीला एव हावभावादिकमेव लता वल्ली तस्या मअरी वहरी तत्सम्मुद्धी, गोपीप्रमृतिभिरीपधद्रव्य साधितन् आज्य घृत विषमज्वर सन्ततादिसमूह क्षय शोप शिर शूल पार्श्वशूलन् अरोचक दीप्त प्रवृद्ध शोफ शोथ हलीमक पाण्डुरोगभेदम् इमान् रोगान् प्रशमयेव विनागयेत् । तत्रौपधद्रव्याण्याह गोपीद्वय सारि- वायुग्मक (कृष्णा श्वेता च) आमलकी धानी स्थिरा गालपर्णी मंगधना पिप्पली तिक्ता कुटकी हिम रक्तचन्दन श्रीफल विल्व द्राक्षा मृदोका फालिनिका प्रियगु सेन्यम् उशीर धावनी पृदिनपणी विपा अनिविपा मुस्ता मुस्तक इन्दज इन्द्रयव योगेपृक्ताना व्याधीना निदानानि तत्तदग्रन्थेषु द्रष्टव्यानि । शार्दूलविक्रीटितन् । वाग्भटेऽपि योगोऽय विलसति तद्यथा-- पिप्पलीन्द्रयवधावनितिक्तासारिवामलकतामलकीभि विल्वमुस्तहिमफालनिसेव्यैर्द्राक्षयातिविपया स्थिरया च ।। घृतमाशु निहन्ति माधित ज्वरमग्निं विषम हलीमकम् । अरुचि भृशतापमसयोर्वमथु पार्थशिरोरुज क्षयन् ।। तत्र घृतसाधनात्पूर्व घृतमूर्छनप्रकारमाह- पथ्याधाप्रोविमीतर्जलधररजनीमातुलुगद्रवैश्च द्रव्यैरेत समस्तै पलकपरिमितर्मन्दमन्दानलेन । आज्यप्रस्थ विफेन परिपचनगत मूर्च्छयेद् वैधवर्य- म्नस्मादामोपदेश हरति च सकल वीर्यवत्मोग्व्यदायि । मै० २० ॥ ज्वरे दाहानन्तरमेव घृतप्रयोग यथाए चरक - अत ऊर्व कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे। परिपकेयु दोपेषु मर्पिष्पान यथाऽमृतम् ।। च० चि०३॥ हिन्दी-हावभावादि कलाकुशल रत्नकले । काली सारिवा, सफेद सारिवा, आंवला, शालपर्णी, पिप्पली, कुटी, लालचन्दन, बेल, मुनक्का, प्रियगु, सस, पिठवन, अतीम, नागरमोथा, इन्द्रजी इन औषधियों ( का करक बनाकर कल्क से चौगुना घी, घी से चौगुना जल) से निर्मित घी का सेवन विषमज्वर, राजयक्ष्मा, शिर शूल (अर्धावभेदक आदि), पसलियों की पीड़ा, अरुचि, सूजन, हलीमक (पांडुरोग का एक भेद) इन रोगों का शमन करता है।

४९ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः विशेष-"गोपी द्वयामलकी" इस समस्त पद का गोपीद्वय अर्थ, जैसा कि इस टीका में किया गया है, होता है। यदि इसका अर्थ "आमलकीय" किया जाय तो ग्रन्थान्तरों में इसके भी उदाहरण सुलभ है। तब इसका अर्थ आंवला-मुंइ. आवला होगा। इन दोनों अथों से योग के लाभालाम पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। द्रव्यों के गुणधर्मों पर ध्यान दें। चक्रपाणि द्वारा रचित चक्रदत्त में जहाँ यह विपय आया है वहीं भरोचक शब्द का ग्रहण नहीं किया गया है। आचार्य वाग्भट ने तो शब्दत उल्लेख किया है और हमें “वाग्मटस्य मतमस्ति समस्तम्" लोलिम्यराजकृत "वेद्यावतंस" श्लोक सं० ५५ पर ही विशेष ध्यान देना है ॥ ८ ॥ ज्वरे यमाध्यलक्षणानि- ऊष्मादितो यश्च दिनावसाने शीतार्दितो यश्च निशावसाने । हिकार्दितो यः कसनादितो यः स याति मृत्योरवलोकनाय ॥ ८९ ।। व्याख्या-य ज्वररोगी दिनारसाने सायकाले ऊष्मादितो धर्मेण पीडित त्यात यश्च निशावसाने प्रात काले शीतादित. शीतेन पीडित स्यात् किंवा हिक्कादित. हिक्कामिरुप- प्लुत स्यात् अथवा कमनादित कासेनोपद्रुत स्यात् म नृत्योरवलोकनाय मरणाय याति गच्छतीत्यर्थ । इन्द्रवज्रावृत्तम् । असाव्यज्वरलक्षणप्रसगे सुश्चत गम्भीरत्तु ज्वरो शेयो छन्नर्दाहेन तृष्णया । आनद्धत्वेन चात्यर्थ श्वासकासोदमेन च ।। सु० उ० ३९॥ अन्यच्च ज्वरेपूपढ़ेवा कासो मूर्छारचिश्छदिम्तृष्णातीसारविग्रहा । हिक्कावासागमर्दाश्च ज्वरस्योपद्रवा दश ।। हिन्दी-जो ज्वर रोगी सायकाल दाह से पीड़ित रहता हो और प्रात काल के समय शीत से पीड़ित हो तथा जिसको हिचक्यिो भा रही हो या जिसको खांसी का प्रबल वेग हो वह मृत्यु के दर्शनार्थ चला जाता है, अर्थात् मर जाता है ॥४९॥ ज्वरे दैवव्यपाश्रयचिकित्सा- वेदानां श्रवणं हि तस्य चरणं द्रव्यस्य संवर्पणं कृष्णस्य स्मरणं शुभस्य करणं विप्रस्य सन्तर्पणम् । अश्वत्थभ्रमणं सुरत्नधरणं दीनस्य संरक्षणं हन्यादष्टविधं ज्वरं कुमुदिनीनाथो यथोग्रं तमः॥९०॥ व्याख्या-वेदाना श्रवणम् ऋग्यजु सामाथर्वणा किं वा पुराणादीनाम् आकर्णनं, हितस्य चरण पथ्याहारविहारादीना सेवन, द्रव्यस्य सवर्षण धनादिकस्य दान, कृष्णस्य स्मरण विष्णोर्नवधा भक्ति , शुमस्य करण नैमित्तिकमगवदुपासना, विप्रस्य सन्तर्पण ब्राह्मणस्य भोजनदक्षिणादिभि तृप्ति अश्वत्यभ्रमण पिप्पलवृक्षराजम्य प्रदक्षिणा, सुरलधरण - प्रथमो विलासः ४६ मणिमुक्ताहारकादीना विभिन्नप्रकारेण धारण, दीनभ्य सरक्षण भिक्षुकादीना भोजनपाना- दिभि पालनम् एतत्समूहात्मक किं वा पृथक् पृथक् शुभकर्मकरणम् अष्टविधज्वर वातादि- भेदेन त्रिविध द्वन्द्वजादिभेदेन त्रिविध विदोपजम् आगन्तुज च इत्यष्टप्रकारक ज्वर तथा हन्याद् विनागयेद् यथा कुमुदिनीनाथ चन्द्रमा उग्रम् उत्कट तम अन्धकार नाशयति । ज्वरस्याष्टविधत्वे चरक -"अथ खल्वष्टाभ्य कारणेभ्यो ज्वर सजायते मनुष्याणाम्, तद्यथा- वातात पित्ताव कफाद, वातपित्ताभ्या, पित्तकफाभ्या, वातपित्तश्लेष्मभ्य आगन्तोरप्टमात् कारणात् ।। च० नि० अ० १॥ ज्वरोपचारो भावप्रकाशे- तीर्थायतनदेवाग्मिगुरु वृद्धोपसर्पणे । श्रद्धया पूजनश्चापि सहसा शाम्यति ज्वर ॥ तीर्थम् ऋपिजुष्ट जलम् । आयतन देवाधिष्ठित पुरुपोत्तमक्षेत्र श्रीशैलादि । यथा वाग्मट ओपधयो मणयश्च सुमन्या माधुगुरुद्विजदैवतपूजा। प्रीतिकरा मनसो विषयाश्च नन्त्यपि विष्णुकृत ज्वरमुग्रम् ।। उग्र भयङ्करम् उग्रकृतञ्च । उग्र कपदी श्रीकण्ठ इत्यमर । शीताभिप्रायो वैष्णवन्वर । उग्णाभिप्रायो माहेश्वरज्वर । शार्दूलविक्रीडितम् । हिन्दी-वेद-पुराणों का श्रवण, पथ्य आहार विहार भादि का सेवन, यथाशक्ति दान, भगवान् का नामस्मरण, शुभकार्यों का करना, भोजन-दक्षिणा आदि से ब्राह्मणों की तृप्ति, पीपल की परिक्रमा, उत्तम रत्नों का धारण, दीनों की रक्षा, इन शुभकार्यों के करने से आठ प्रकार के (वातज, पित्तज, कफज, वातपित्तज, वात- कफज, पित्तकफज, सन्निपातज तथा आगन्तुज)ज्वरों का उस प्रकार विनाश हो जाता है जिस प्रकार चन्द्रमा के उदय से अन्धकार का ॥ ९० ॥ प्रकारान्तरेण कथयति- सहस्त्रनेत्रस्य सहस्रबाहोः सहस्रवक्त्रस्य सहनमूनः । सहस्रपादस्य सहन्ननाम्नः सहस्रनाम्नां पठनं ज्वरघम् ।। ९१ ।। व्याख्या-सहस्रनेत्रस्य दशगतनेत्रवत सहस्रवाहो सहस्रभुजयुक्तस्य सहस्रवक्त्रस्य सहस्रमुखत्य सहस्रमूर्न सहस्रगिरस सहस्रपादस्य सहस्रचरणस्य सहस्रनाम्न सहस्रा- भिधासमन्वितस्य सहस्रनाम्नां पठन जप रोगनाशकम् । उपेन्द्रवज्रावृत्तम् । यथाह विष्णु- सहस्रनामस्तुती- भवत्यरोगो द्युतिमान् वल रूपगुणान्वित । रोगार्नो मुच्यते रोगात् चरकेणापि तदेव प्रतिपादितम् विष्णु सहस्रमूर्धान चराचरपतिं विभुम् । स्तुवन्नामसहस्रेण ज्वरान्सर्वान् व्यपोहति ।। ब्रह्माणमश्विनाविन्द्र हुतमक्ष हिमाचलम् । गगा मरुद्गणाश्चेष्टया पूजयजयति ज्वरान् ।। भक्त्या मातापितॄणा च गुरूणा पूजनेन च । ब्रह्मचर्येण तपसा सत्येन नियमेन च ॥ ४च० चि० ॥

वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः
यथाह चरक
-
-
जपहोमप्रदानेन वेदाना श्रवणेन च । ज्वराद् विमुच्यते शीघ्र साधूनां दर्शनेन च ॥
च चि अ.३॥
हिन्दी-हजार नेत्र, वाहु, मुख, शिर, चरण तथा नाम वाले विष्णु भगवान के
सहस्रनामस्तोत्र का पाठ करने से ज्वरों का विनाश होता है ॥ ९१ ॥
पुनरपि तमेव कथयति-
गणेश्वरो वा गरुडेश्वरो वा गौरीश्वरो वा दिवसेश्वरो वा ।
माहेश्वरी वा कुलदेवता वा सम्पूजनीया चरिणा प्रयत्नात् ॥१२॥
व्याख्या-गणेश्वर गणेश वा गम्टेश्वर गरडम्य ईश्वर स्वामी विष्णु वा गौरीश्वरो
वा गोर्या पार्वत्या ईश्वर पति शिव वा दिवमेश्वरो वा दिवस्य ईश्वर मूर्य वा महेश्वरस्य
इय माहेश्वरी पार्वती वा कुलदेवता रोगिण इष्टदेवता वा ज्वरिणा रोगिणा प्रयत्नात् स्वगत्य-
नुसार सम्पूजनीया पूजयितव्या स्यात् ।
'सोम सानुचर देव ममातृगणमीश्वरम् ।
पूजयन् प्रयत शीघ्र मुच्यते विषमज्वरात् ।। च चि ३ ॥
मुश्रुतोऽप्याह सम्पूजयेट द्विजान् गाश्च देवमीशानमम्बिकाम् ।। सु उ ३४ ॥
"आरोग्य मास्करादिच्छेत्", अतो रोगिभ्यो भास्करस्योपामनाऽपि विहिता । उपेन्द्र-
वज्रावृत्तम् ।
हिन्दी-रोगी को गणेश, विष्णु, शिव, सूर्य, देवी अथवा अपने कुलदेवता की
यथाशक्ति पूजा एवं उपासना करनी चाहिये। इससे रोगमुक्ति होती है।
विशेप-महर्षि चरक ने ज्वर आदि सभी रोगों की विविध चिकित्सा का
वर्णन निम्न प्रकार किया है-"त्रिविधमौषधमिति-देवव्यपाश्रय युक्तिव्यपाश्रयं,
सत्वावजयश्च, तत्र देवव्यपाश्रयं-मन्त्रौषधिमणिमङ्गलवल्युपहारहोमनियमप्राय-
श्चित्तोपवासस्वस्त्ययनप्रणिपातगमनादि, युक्तिन्यपाश्रय-पुनराहारविहारौपध-
द्रव्याणां योजना, सत्त्वावजयः-पुनरहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनोनिग्रह । च सू अ
११-५२ ।। उसमें भी सर्वप्रथम देवव्यपाश्रय का स्थान है। इसका उचित
स्थान पर प्रयोग करने से आशातीत लाभ देखा जाता है। देवव्यपाश्रय में वर्णित
प्रणिपात का प्रयोग भिन्न-भिन्न देवता के प्रति धार्मिक बन्धनों के कारण होता है।
शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य आदि सम्प्रदायों के लोग उसी देवता की उपासना
गुरुपरम्परा के अनुसार करते हैं, अतएव उक्त श्लोक में पृथक-पृथक देवताओं के
नामों का उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त यह भी देखा गया है कि सम्प्रदाय
देवता दूसरे और कुलदेवता दुसरे भी होते हैं। यथा-शिव के उपासक का
कुलदेव हनुमान । अतः सभी प्रकार के देवों का आराधन रोगी का कल्याण
करता है।॥ १२ ॥

प्रथमो विलास ज्वरमुक्तावस्थाया वज्योनि- गुरुभोजनपानवाहनानि प्रमदास्तानतुपारवारिकोपान् । न भजेज्ज्वरवर्जितस्तु तावत्प्रभवेद् वह्निवलं बलञ्च यावत् ॥९३ ।। व्याख्या-गुरुभोजन पाचशाग्नेरत्पवल्वानिषिद्वम् पानम् असात्म्य विरुद्ध च पान घृततैलयसादीना पान सेवन वाहनानि यानानि आयासदायकत्वान्निपिद्धानि प्रमदा गोमेवन स्नान न्नपन तुपारपारिकोपान् शीतजलप्रयोगान् कोप च ज्वरवजितोऽपि ज्वर- नुक्तोऽपि तावत् न भनेत् न सेवेत यावत वहिवल जाठराग्ने प्रदीप्तत्व तथा वल शारीरिक न्वामाविकज न भवेत । तत्रादौ विगतज्वरिणो लक्षणानि- विगतम्लममन्तापमव्यथ विमलेन्द्रियन् । उक्त प्रकृनिमत्वेन विधात् पुरुप मज्वरम् ॥ च चि ३॥ पमिलमणरुपेन विगतज्वरमपि रोगिण प्रतियेधयेत् वर्जनीयपदार्थश्चिकित्सक । यथाह चरक सज्वरो ज्वरमुक्तश्च विदाहीनि गुरूणि च । अमात्म्यान्न्यनपानानि विरुद्धानि विवर्जयेत् ।। व्यायाममतिचेष्टाश्च स्नानमत्यगनानि च । तथा चर शम याति प्रशान्नो न च जायते ।। व्यायामञ्च व्यवायज स्नान चक्रमणानि च । घरमुक्तो न मेवेत यावन्न वलवान् भवेत् ।। च चि ३॥ यथाह वाग्मट त्यजेदावललाभाच्च व्यायामस्नानमैथुनम् । गुर्वमात्म्यपिटायन्न यच्चान्यज्यरकारणम् ।। न विज्वरोऽपि सहसा मानीनो मवेत्तथा ॥ अह चि अ१॥ मर्वान्नानि मक्षयति धनि मर्यानीन । मालभारिणी वृत्तम् । हिन्दी-घी-तैल आदि से बने भोजन प्रतिकूल अन्नपान, वाहन (कप्टप्रद सवारियां), मैथुन अथवा म्बी सहवास, स्नान, शीतल जल आदि का सेवन तव- तक ज्वर मुक्त रोगी को नहीं करना चाहिये जबतक उसकी जाठराग्नि प्रदीप्त न हो जाय और शरीर में स्वाभाविक बल की उत्पत्ति न हो जाय । विशेष-उपर्युक्त सभी पदार्थ नीरोग पुरुष के सेवन योग्य हैं। स्वस्थ पुरुप भी यदि इनका सेवन मात्रा से अधिक कर ले तो वह भी अस्वस्थ हो जाता है, तब अस्वस्थ की तो बात ही क्या ? जहाँ प्रमदा शब्द का प्रयोग है वहीं स्त्री रोगिणी के लिये पुरुप सहवास निपिह समझना चाहिये ।। ९३ ।। इति नीमलोलिम्बराजविरचिते चमत्कारचिन्तामणी ज्वरप्रतीकारो- नाम प्रथमो विलास समाप्त ।

अथ द्वितीयो विलासः
अथ ज्वरातीसारनागनो योग
कुटजातिविपाकिराततिक्तैरमृताविश्वधनैः कपायकः।
सकलज्वरनाशकारकः सकलातीमृतिनाशकारकः ॥ १॥
व्याख्या-कुटज कलिंग तस्य त्वक् , अतिविपा विपा किरात भूनिम्ब तिक्त.
कुटकी अमृता गुहची विश्व शुण्ठी धन मुस्ता एभि सप्तभिर्द्रव्य. निप्पादित कपाय.
सकलज्वरनाशकर सम्पूर्णज्वरशमन तथा सकलातीसतिनाशकारक पट्विधातीसार-
शामको भवति, वियोगिनोवृत्तम् । एप योगो ज्वरे, अतिसारे च पृथक् पृथग लाभकर भवतु
नाम किन्तु अध्यायानुरोधेन ज्वरातीसारनागनोऽय विद्वदभिराम्नात । यथाह चक्रदत्ते
चक्रपाणि
नागरातिविपामुस्तभूनिम्वामृतवत्सकै ।
सर्वध्वरहर काय सर्वातीसारनाशन ॥
सामान्यचिकित्साक्रम ज्वरातिमारिणामादी कुर्याल्लवनपाचने ।
प्रायस्तावामसम्बन्ध विना न भवतो यत ॥ म र ॥
हिन्दी-कुटज, अतीस, चिरायता, कुटकी, गिलोय, सोंट, नागरमोथा इन
सात द्रव्यों का वाथ सम्पूर्ण अतीसारों का नाश करता है।
विशेप-उपर्युक्त योग में कुटज की छाल के स्थान में अन्य ग्रन्थकारों ने इन्द्र-
जो
(कुटजवीज) का ग्रहण करना लिखा है। किन्तु गुणधर्मों को देखने से ऐसा
कोई महत्वपूर्ण अन्तर दोनों के बीच निघण्टुकारों ने नहीं लिखा है अधिकाश जो
गुण इन्द्रजौ के हैं वे ही कुटजत्वचा के है। केवल एक विशेष गुण "त्रिदोषन"
अवश्य मिलता है। जिसकी साधारण ज्वरातीसार में कोई विशेष आवश्यकता
प्रतीत नहीं होती।
ज्वरातीसार के सम्बन्ध में एक विशेष स्मरणीय बात यह है कि ज्वरनाशक
तथा अतिसारनाशक योगों का मिश्रण करके ज्वरातीसार रोग में कमी प्रयोग
नहीं करना चाहिये, क्योंकि ज्वरनाशक ओपधिया प्राय मल का भेदन करती
है और अतिसारनाशक ओपधिया मल को रोकती हैं अत दोनों के सिद्धान्त
एवं कार्य परस्पर विरुद्ध होते हैं ॥ ३ ॥

द्वितीयो विलासः ५३ व्यरातिसारे चन्दनादिकाथ शीतोशीरकलिद्गबालकवृकीपद्माकधान्यामृता- भूनिम्बाम्बुदवालबिल्वकवृपामुम्तेन्द्रजैः साधितः। काथो माक्षिफसाक्षिको विजयते सर्वातिसारावरान् हल्लामारुचिसर्वदाघवमिभिः सम्मिश्रितान् भो प्रिये ॥२॥ व्याख्या-मा प्रियेशन रक्तचन्दनम् शीर नलद कलिंग इन्द्रयव बालकनेत्रवाला की पाठा पाक परगन्धि (पचार इनि मापायान) धान्या धान्यकम् अमृता गुड़ची निम्य किरात अग्युद मुन्ना वालविल्वा पिवळटी ( आमविल्लन् ) विपा अतिविपा मुस्ता मामुग्ना (मुस्तकम्यैव जानिमेंट ) इन्द्रज कुटजम् एमिश्चतुर्दशीपधिभि साधितो निर्मित , माक्षिकमाक्षिक मधुमिथित काय , हासेन उदयोल्लेशेन, अगच्या भोजनम्प्रति अनिच्या सर्वदायेन सर्वप्रकारम्य दाहेन वमिभि वमन च सयुतान् सर्वातिसारान् पट्- विधातिनारान् स्थाइ नुश्रुन "एकोमश सर्वपश्चापि दोपं गोकेनान्य पष्ठ आमेनचोक्त", मु०७० अ० ४० ॥ ज्वरान् किंमा ज्वरमुक्तान अतिमारान विजयते विनाशयतीत्यर्थ । पंने कहासादय यदा मन्दश्यन्ते नदा शटिति तत्प्रतीकार कर्तव्य यतो हि ज्वरे अतिसारे च प्रतेपाम्प्रादुर्भाव उपद्रवरूपेण भवति । शार्दूलविक्रीटितम् । हिन्दी-हे प्रिय ! लालचन्दन, बस, इन्द्रजी, नेग्रवाला, पाटा, पभाख, धनियां, गिलोय, चिरायता, नागरमोथा, कच्चा बेल का गूदा, अतीस, भद्रमुस्ता, कुटज की छाल इन चौदह दृश्यों से निर्मित मधुयुक्त काध जीमिचलाना, अरुचि, दाह, वमन आदि उपद्रवों से युक्त सभी प्रकार के ज्वरातिसारों का विनाश करता है ॥२॥ अतिमारे पञ्चमूल्यादिकाप- पञ्चानिवृक्यव्दवलेन्द्रवीजत्वक्सेव्यतिक्तामृतविश्वविल्वैः काथ- सर्लान् सवमीन् सकासावरातिसारान्नचिरानिहन्ति । ध्यागया-पवानि लघुपश्चमूल (शालपादि पत्रमूलम् ) की पाठा अब्द मुस्ता वला वाट्यालक इन्द्रवीजत्वक् वीज च त्वक् च अनयो समाहार इन्द्रवीजम् इन्द्रत्वक् च सेव्यम् उमार तिक्ता कुटकी अमृता गुडूची विश्व शुण्ठी विल्बम आमश्रीफलम् एभि पञ्च- दगद्रव्य साधित कपाय सशूलान् शुलयुत्तान् मवमीन् मिसहितान् सकासान् कासेनो- पद्रुताम्वरातिसारान ज्वरेण युक्तानतिसारान् अचिरात् शीघ्रमेव निहन्ति विनाश- यतीत्यर्थ । इन्द्रपजावृत्तम् । आमविश्वपिपये भावमित्र- फलेषु परिपक यद गुणवत्तदुदाहतम् । विल्वादन्यत्र विशेयमाम तद्धि गुणाधिकम् ॥ - - वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः अत विल्वपदेनात्र आमविल्वप्रयोगो विहित । एप एव योगश्चक्रदत्तेऽपि लभ्यते- तद्यथा- पञ्चमूलीवालविल्वगुडूचीमुस्तनागरै पाठाभूनिम्वहीवेरकुटजत्वक्फलै शृतम् ।। हन्ति सर्वानतीसारा ज्वरदोप वर्मि तथा । सशूलोपद्रव उवास कास हन्यात् सुदारुणम् ।। यत्तु पञ्चमूलीशब्देना लछुपञ्चमूल्या प्रयोगो विहित तत्र विपये वृन्द - पञ्चमूली तु सामान्याद् योज्या पित्ते कनीयसी। महती पञ्चमूलीति वातश्लेष्माधिके तथा ।। हिन्दी-लघुपञ्चमूल, पाठा, नागरमोथा, वला, इन्द्रजौ, कुटज, खस, कुटकी, गिलोय, सोंठ, कच्चा बेल की गुद्दी इन पन्द्रह द्रव्यों से निर्मित कपाय शूल, वमन, कास युक्त अतिसारों का शीघ्र विनाश करता है। विशेष-यह क्वाथ प्रायः सभी प्रकार के अतिसारों में लाभ करता है ॥३॥ उभयपञ्चमूलस्य ज्वरातिसारे प्राशस्त्यम् --- कफाधिके वा पवनाधिके वा द्वयाधिके वा गुरुपञ्चमूलम् । पित्ताधिकेस्याल्लघुपञ्चमूलं पुनः पुनः पृच्छसि किं मृगाक्षि ॥४॥ व्याख्या-हे मृगाक्षि । मृगस्य हरिणस्य अक्षिणीव अक्षिणी यस्या सा तत्सम्बुद्धौ पुन पुन बारम्बार किं पृच्छसि १ कथ शङ्कसे, अर्थात् नि शझा भूत्वा त्वया कफाधिके श्लेष्मप्रधाने ज्वरातिसारे किंवा पवनाधिके वातोल्वणे ज्वरातिसारे अथवा द्वयाधिके उभयदोषवृद्ध ज्वरातिसारे गुरुपञ्चमूलम् महत्पञ्चमूलम् प्रयोक्तव्यम् । पित्ताधिके पित्तोत्तरे ज्वरातिसारे लघुपञ्चमूल कनीय-पञ्चमूलस्य प्रयोगो विधेय । गुरुपञ्चमूलस्य गुणा पञ्चमूल महत्तिक्त कपाय कफवातनुत । मधुर कासश्वासनमुष्ण लवग्निदीपनम् ।। लघुपश्चमूलस्य गुणा पञ्चमूल लघु स्वादु वल्य पित्तानलापहम् । नात्युष्ण बृहण ग्राहि ज्वरश्वामाश्मरीप्रणुत् ।। हिन्दी-कफप्रधान या वातप्रधान कफ-वातप्रधान (द्वन्द्वज) ज्वरातिसार में बृहत् पञ्चमूल का और पित्तप्रधान ज्वरातिसार में लघु पञ्चमूल का प्रयोग करना चाहिये। हे मृगनयनी । इस शास्त्रसम्मत सिद्धान्त के बारे में तू वार-बार क्यों पूछती है ?। विशेष-अनेक स्थलों में लोलिम्बराज ने अपनी प्रियतमा रनकला को विदुपी कहा है और इनके इस सवादात्मक ग्रन्थ से ज्ञात भी होता है कि वह विदुषी रही होगी किन्तु इस पद्य में "पुन पुन कि पृच्छसि" वाक्य के द्वारा उसका मुग्धास्व अभिव्यक्षित किया गया है ॥ ४ ॥ उपेन्द्रवज्रावृत्तम् । अथवा द्वितीयो विलासः - - शोफातिसार क्रियाकम सदेवदारुः सविप' सपाटः सजन्तुशत्रुः सघनः सतीक्ष्णः । सवत्सकः क्वाथ उदाहृतोऽसौ शोफातिसारद्विपराजसिंहः ॥५॥ व्याख्या-एप देवदादियोग शोफानिमारदिपराजसिंह शोफेन जात. अतिसार म पव दिपराजो गजराज तस्य विनाशाय सिंह एव । सदेवदारु पूतिकाष्ठसहित सविप अनिविपासमेत मपाठ अम्बष्ठयायुक्त सजन्तुशत्रु विटझेन सह सघन मुस्तकेन साक मतीक्ष्ण मरिचैन मम सवत्मक कुटजेन सार्धम् उदाहृत कथित असी वर्ण्यमान काथ शोफातिमार जयतीत्यर्थ । इलोकेऽस्मिन् मर्वत्र "सदृश्य म स्यात्मशायाम्" इत्यनेन सहम्य मादेश । चक्रदत्ते योगोऽय विटगादिकाथनाम्नालिसित , तद्यथा- विटातिविपामुस्तदारुपाठाकलिगकम् मरिचेन समायुक्त शोधातीसारनाशनम् ।। भावप्रकाशेऽपि शोथनीन्द्रयवी पाठा श्रीकलातिविपापना । कथिता सोपणा पीना शोधातीसारनागना ।। एप गोयातिमार पविधेप्वतिसारेषु नर गण्यते किन्तु आमानिमारे मूर्खभिपजा प्रयुक्ताम्य मग्राहकोपधिरूपो विकार । यथाह भावमिश्र - नामे मग्राहक दद्यादतिमारे कदाचन । सगृहीतो वलादामो विकारान् कुरते वहन् ।। वडा भेषजवलात , विकारा-ग्रहण्याध्मानशूलगुत्मशोधोदरज्वरादय । आनदर्पणे यद्यपि शोफातिसार असाध्यश्रेण्या पठित , यथा- ज्वर तृष्णा काम श्वासमरोचकम् । यदि मूच्छी च हिक्का च हितातीसारिण त्यजेत् ॥ तथापि यदि रोगी जिनेन्द्रिय चिकित्साया चतुष्पादसमन्वित युवा मन्दाग्निरहित स्यात् तटा पप देवढार्वाटिकाथ प्रयुक्तश्चेट रोगिणे जीवन भिपजे साफल्य च प्रयच्छतीति ग्रन्थकर्नुरागय । उपन्द्रवज्रावृत्तम् । हिन्दी-हे प्रिये । देवदारु, अतीस, पाठा, वायविडग, नागरमोथा, काली मिरच, छाल इन सात द्रव्यों से निर्मित काथ शोथज अतिसाररूपी गजराज का विनाश करने के लिये सिंह के समान समर्थ है। विशेष-द्यवर लोलिम्बराज ने अपने द्वारा रचित "वैद्यजीवन" नामक दूसरे चिकित्सायन्य में इस योग का प्रयोग "शोकातिसार" के लिये लिखा है। जब कि उसकी चिकित्सा भावमित्र के अनुसार निम्नलिखित प्रकार से होनी चाहिये- तत्र शोय शूल - को ।

५६ वैद्यक चमत्कारचिन्तामणिः भयशोकमगुदभूती । यो वातानितारवर । तयोगिएरा फार्या एपणाशामने किया । किन्तु इस ग्रन्थ में "शोफातिसारद्विपराजसिंह ", लिम्पकर उन्होंने यह स्वीकार किया है कि यह योग शोथज भतिसार के लिये है, यही अन्य भाचार्यों का भी सम्मत मत है ॥५॥ अतिसारे धान्यादिनाथ प्रौढे यौवनगर्विते प्रियतमे धान्येन किं किंथिया किं विश्वेन पयोधरेण तव किं किं बालकेनापि मे । शात्वा मोहमयी प्रपञ्चरचनां गोपीपतिं ध्यायतो ऽतीसारोऽग्निशमामगृलनिकरो धान्यादिभिः क्षीयते ॥६॥ व्याख्या-प्रौढे नवोचदयौवनेऽन एव यौवनगविने यौवनेन तारुण्यमदेन गविते मत्ते, प्रियतमे प्राणवल्लभे । मोहमयी मोहनात्मिका प्रपगारचना जगत सृष्टिं शात्वा विचार्य गोपीपति राधाकृष्ण ध्यायतोऽभ्यर्चयत मे मम धान्येन धनेन ब्रीडादिना कि व्यर्धमेव, श्रिया लक्ष्या किं, विश्वेन मतारेण किं. नव पयोधरेण पीनोन्नतस्तनयुगलेन किं वालकेन पुत्रेणपि फिम् अर्थात् एनत् सर्व व्यमिति, भक्तिपक्षे । चिकित्सापक्षे तु-धान्येन धन्या- केन । श्रिया आमविल्वेन विश्वेन शुण्टना, पयोधरेण मुम्नकेन बालकेन हीवरेण साधितेन निर्मितेन चूर्णेन वा काथेन अतीसार मलातिनुति अग्निशम मन्दागि आम आमातिसार शूल च एनेपा निकर क्षीयते । धान्यपदेन साहित्ये सप्तदशधान्याना ग्रहणन्- बीहिर्यवो मसूरी गोधूमो मुद्गमापतिलचणका । प्रियामुकोद्रवमकुष्ठा शालिकाध्य । किच कलायकुलत्यो शणश्च सप्तदश धान्यानि । कोप ॥ चक्रपाणिरप्येन समर्थयति-धान्यक नागर मुस्त वालक विल्वमेव च । आमशूलविवन्धन पाचन वहिदीपनम् ॥ चक्रदत्ते ।। हिन्दी-यौवन के मद से मदमत्त युवती प्रियतमे । इस संसार को मोहमयी रचना समझने वाले तथा श्रीकृष्ण के भजन में तल्लीन मेरे लिये क्या धन-धान्य, क्या लघमी, क्या संसार, क्या तुम्हारे स्तनयुगल, क्या बालक-वालिकायें आदि सभी व्यर्थ हो गये हैं। यह अर्थ भक्तिपक्ष का है। चिकित्सा पक्ष में इसका अर्थ निम्नलिखित है-हे प्रियतमे । धनियां, बेल की गिरी, सोंठ, नागरमोथा नेत्र- वाला इन पाँच द्रव्यों से बना हुआ चूर्ण अथवा क्वाथ अतिसार, अग्निमान्य, आमदोप तथा शूल इनके समूह को नष्ट करता है । शार्दूलविक्रीडितम् । अणव -LRAM +-+ --- द्वितीयो विलासः - विशेष-भाचार्य डल्हण का कथन है कि अतिसार में जहाँ काठोपधियों को द्रवरूप में देने का विधान है वहीं द्रव की मात्रा अधिक नहीं होनी चाहिये अपितु काध्य द्रव्यों को चूर्णरूप में देना अधिक हितकर होता है। अतएव उक्त पद्य में चूर्ण एवं क्वाथ का उल्लेख न होने के कारण यहाँ दोनों अर्थ तथा आचार्य ढल्हण का अभिमत भी प्रस्तुत कर दिया है ॥ ६ ॥ पितातिसारे काय - धान्याम्वन्दथियां पित्तजातिसारो निवार्यते । केनाऽत्र ज्ञायते कर्ता त्वां विना विमलानने ।। ७।। व्याण्या-धान्य धान्यकन् अम्बु डोवरम् अब्द मुस्तक श्री आमविल्वम् एपा चतुर्णी केन जलेन पित्तातिसार निवार्यने दूरीक्रियते । हे विमलानने ! विमल न्यच्छव्यङ्ग्यादि- कलकरहितम् अत एव निर्मलम् आनन मुख यम्या सा तत्सम्बुद्धी, त्वा विना अन पधे केन कर्ता शायने । इत्यत्र चिकित्साय्यपदेशेन कर्तृगुप्तपद्यम्य रचना कृतवान् कवि लोलिम्बराज । अस्मिन् पये रलकलाया चिकित्साशानाइते व्याकरणस्य शानेऽपि प्रोदि अनुमीयते । अनुष्टुप्छन्द.। हिन्दी-धनिया सुगन्धवाला, नागरमोथा, कच्चे बेल की गिरी इन चार द्रव्यों के जल ( काय) से पित्तातिसार का शमन होता है। इस पद्य में फर्ना गुप्त है, हे-सुन्दरमुखी । उसको तुम्हारे बिना कोई नहीं जान सकता। विशेप-इम पद्य का मूल पाठ "वुधान्यान्दांश्रिया" है जो प्रयोग की तथा व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है। प्रन्यकर्ता के अभिप्राय तथा ग्रन्थान्तरों के दृष्टिकोण के अनुसार उक्त पाठ को "धान्याम्यब्दश्रिया" इस प्रकार टीक किया गया है। इस पद्य के निर्माणकाल में अन्यकर्ता की प्रवृत्ति चिकित्सानिर्देश के माथ-साय चित्रकाव्य की ओर झुकी प्रतीत होती है। अतएव यहाँ कर्तृगुप्त पद्य को प्रस्तुत किया है ॥ ७॥ अतिसारे मोचरसादिचूर्णम्- मोचरसौपधवत्सकरोधेर्विल्वपयोदमदाकुसुमैश्च । चूर्णमिदं गुडतक्रनिपीतं हन्त्यचिरादतिसारमुदारम् ॥ ८ ॥ व्याख्या-मोचरस शारमल निर्यास ओपध शुण्ठी वत्सकम् इन्द्रयव रोध गालव विल्वम् आमश्रीफल पयोद मुस्ता मदाकुसुम घातकीपुष्पन एभि मप्तभिर्द्रयै कृत चूर्ण गुटेन सयुत यत् तक तेन निपीत तक्रेण सह सेवितम् उदारम् उग्र पुरातन प्राचीनम् अतिमारम् शीघ्रमेव हन्ति विनाशयति । यथाह भावमित्र ।

1 वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः समा । . मुस्तावत्सकबीज मोचरसो विल्वधातकीलोधम् । गुटमथित प्रयुक्त गङ्गामपि वेगवाहिनी कन्ध्यात् ।। तदेव भैपज्यरलावल्याम्-विल्वाब्दधातकीपाठाशुण्ठीमोचरसा पीतारुन्धन्त्यतीसार गुढनक्रेण दुर्जयम् ॥ हिन्दी-मोचरस, सोंठ, इन्द्रजौ, लोध, कच्चे बेल का गूदा, नागरमोथा, धाय के फूल इनके चूर्ण को गुड़ और मठा के साथ सेवन करने से शीघ्र ही भयकर अतिसार शान्त हो जाता है। दोधकवृत्तम् । विशेष-अन्य ग्रन्थकारों ने इस योग के गुणों से प्रभावित होकर यहा तक लिख दिया है कि अतिसार को रोकना तो कौन बड़ी बात है, यह योग तो बहती गगा को भी रोक सकता है । इसमें अतिशयोक्ति अलकार है ॥ ८ ॥ अतिसारे शुण्ट्यादिचूर्णन्- कल्याणि कल्पलतिके ललिताङ्गयटे। हस्ते विलोलकमले ! ललने । शृणु त्वम् । शुण्ठीमदाकुसुममोचरसाजमोदा- स्तक्रान्विताः प्रशमयन्त्यतिसारसारम् ॥ ९ ॥ व्याख्या-हे कल्याणि ! शुभगुणयुक्त। कल्पलतिके तद्वद् इच्छापूर्तिकारिणि ललितागयष्टे ललिता गोभना अगायष्टि यस्या सा तत्सम्बुद्धौ हस्ते करे विलोलकमले विलोल विशेषेण चञ्चल कमल पन यस्या सा तत्सम्बोधने, इत्यभूते ललने प्रिये त्वम् शृणु मद्वाक्यमाकर्णय-शुण्ठी महीपध मदाकुमुम धातकीपुष्प मोचरस शाल्मलीनिर्याम अजमोदा उग्रगन्धा चूर्णीकृता एते पदार्था तक्रान्विता तक्रेण सह सेविता अतिसारस्य रोगविशेषम्य सार मलम् प्रशमयन्ति स्थिरीकुर्वन्ति । वसन्ततिलकावृत्तम् । हिन्दी-हे कल्याणि कल्पलता के समान इच्छाओं को पूर्ण करने वाली सुन्दर शरीर से शोभित कमल को हाथ में लेकर घुमाने वाली प्रिये । तुम सुनो, सोंठ, धाय के फूल, मोचरस, अजवायन इन ओपधियों के चूर्ण को मठा के साथ सेवन करने से भीषण अतिसार शान्त हो जाता है ॥ ९ ॥ आमलकीचूर्णप्रयोग - भो वैद्यनाथा । यदहं ब्रवीमि तद् यस्य कस्यापि पुरो न वाच्यम् । भूधात्रिकाया रज एकसेव दध्नान्वितं हन्त्यतिसारजालम् ॥१०॥ व्याख्या-रत्नकला स्वपति लोलिम्बराजम्प्रति अतिसारचिकित्सामाह-मो वैद्यनाथा सन्बोधनेनानेन तात्कालिकत्रैधेपु अस्य श्रेष्ठत्वमनुमीयते, यदह ब्रवीमि तद् उच्यमानं वच यम्य कस्यापि पुर कुपात्रस्याऽग्रे न वाच्य न कथनीयम् । अथ सा कथयति एकमेव- - CN द्वितीयो विलास ५६ भूधानिकारा भूम्यामलक्या रज चूर्ण दनान्वित सेविन सत् अतिसारजालम् अतिसार- समूह हन्ति पिनाशयति । अग्र भूधारिकापट विचारणीयम्-भूधात्रीपदेन भूम्यामलकी- ग्रारोतव्या दोन्वित् केवलम् आमलका, यतोहि आमलकी भूम्यामलक्या अपेक्षया गुणवत्तरा, तद्यथा एन्नि पात तदम्लत्वात् पित्त माधुर्यशैत्यत । कफ रुक्षकपायत्वात्फल धायास्त्रिदोपजित् ।। भा प्र ॥ भूम्यामलक्या गुणा भृधा वातकृत्तिक्ता फपाया मधुरा दिमा। पिपासाकासपित्तानकपकण्डक्षयापहा ॥ तदेव ॥ हिन्दो-रत्नकला अपने पतिदेव से कहती है-हे वैद्यराज । जिस योग का वर्णन में आप से कर रही हूँ उसको किसी (अयोग्य व्यक्ति) से मत कहिये, भुहआंवला का चूर्ण दही में मिलाकर चाटने से सम्पूर्ण अतिसारों का शमन हो जाता है । इन्द्रवज्रावृत्तम् ॥ १० ॥ अतिसारो श्यामाप्रयोग अतिसारग्रशमनी परमानन्ददायिनी। वृद्धिदा तनुवढेश्च श्यामा श्यामेव शोभते ॥ ११ ।। ध्यापया-दयामा गुणवती कान्ता तल्लक्षणानि यथा- श्यामा गुणवती कान्ता प्रिया मधुरभापिणी । रतेपु धृष्टा या नारी मा स्त्री वृप्यतमा मता ॥ शोभते का न घ्यामेव पोटशवापिकी स्त्रीव कथम्भूता सा परमानन्ददायिनी मान मोल्लगमकारिणी पुन कथम्भृता मा अतिमारप्रशमनी अत्यधिक सार अतिसारो वल तम्य प्रशमनी प्रकर्पण विनागयित्री, यथोक्त तन्त्रान्तरे-"सद्योवलहरा नारी", पुन कथम्भूता मा अननुवाश्च वृद्धिदा अतनु काम अनङ्ग तस्य वहे वृद्धिदा वर्धयित्री कामाग्निवधिनी । इति इलेपप्रतिमोत्यापितोऽर्य । चिकित्सापक्ष-स्यामा प्रियगु इयामा एव कृष्णमारिवा इव शोभते कयम्भूता श्यामा अतिमारप्रशमनी अतिमाररोगविशेषगामिका, अत एव परमानन्ददायिनी नीरोगकर्तृत्वात्, तथा तनुवहेश्च वृद्धिदा तनुश्वासी वहि मन्दाग्नि तस्य वृद्विदा प्रदीपयित्री, अथवा तनुस्थितो वहि जाठराग्नि तस्य वर्धयित्री । तत्र प्रियजुगुणानाह- प्रिया शीतला तिक्ता तुवराऽनिलपित्तहत् । रक्तातियोगदोर्गन्ध्यस्वेददाइज्वरापहा वान्तिभ्रान्त्यतिसारनी रक्तजाड्यविनागिनी । निघण्टु ।। कृष्णमारिवागुणानाह- सारिवायुगल स्वादु स्निग्ध शुक्रकर गुरु । अग्निमान्यारुचिश्वासकासामविषनाशनम् दोपत्रयानप्रदरज्वरानीसारनाशनम् ॥ तदेव ।। . ॥ है। ।

६० वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः । "लोकाल्पभुल्ल का सूक्ष्म शरण दा काम तनु", "त्यग्देहयोरपि तनु", उमयमा प्यगर , अम इलेपालझार , अनन्वयानमारश्च ।। गनुष्ट पद्यन्द । हिन्दी-अतिसार का शमन करने तथा मन्दाग्नि को प्रदीप्त करने के कारण परम आनन्द को देने वाली श्यामा-प्रियंगु अथवा ग्यारिवा उस ज्यामा-पोडशी की भाति है जो कामदेव को प्रदीप्त कर सहवाम के कारण बल-वीर्य को घटाने के साथ-साथ परम आनन्द का अनुभव कराती है ॥ ११ ॥ अभिवर्धकोनीमारनाशकश्च योग पुटपाकविपाचितारलुत्वगसद्दीतहुनाशदीपनी मधुमोचरसप्रयोजिता सहसाऽतिम्रतिनाशकारिणी ॥ १२ ॥ न्यागया-पुटपावाविपाचिता पुटपाकविधिना पाचिता अग्रवक, प्योनाकन्वत मधुमोचरसप्रयोजिता मधुना क्षीद्रेण मोचरसेन शाल्मलीवेटे न सता मती मासा झटिति असद्दीप्ताताशदीपनी न नदीप्नो न मन्यग्वधितो यो हुताशो जाठराग्नि तस्य दीपनी तथा अतिस्रति अतिसार तस्य नाशकरिणी च । अतिमारे स्वभारत अग्नि मान्य गच्छति त प्रदीप्यैपा अरलत्वक अतिमार विनाशयतीत्यर्थ । उक्तज माइधरसहितायान्- अरतुत्ववानश्चैव पुटपाकोऽग्निदीपन । मधुमोचरनाम्यान युक्त मर्वातिसारजित् ।। सुचते किजिविशिष्याह- त्वपिण्ट दीर्घवृन्तम्य पथ सरसयुतम् । काइमरी पनपश्चावेष्टय सूत्रेण महढम् ।। मृदावलिप्त सुकृतमझारेववकूलयेत् । स्विन्नमुद्धृत्य निप्पीन्य रसमाढाय त तत ॥ गीत मधुगुत कृत्वा पाययेतोदरामये । उ अ ४० अथ पुटपाकप्रकार पुटपाकस्य मात्रेय लेपस्यादरवर्णता। लेपश्च दल स्थूल कुर्याद वाऽनुष्ठमात्रकम् ॥ काश्मरीवटजम्यादिपर्वेष्टनमुत्तमम् पलमात्र रसो ग्राह्य कर्पमान मधु क्षिपेत् ।। हिन्दी-पुटपाक विधि से सोनापाठा (टैण्टु) का रस निकाल कर उसमें मोचरस और मधु मिलाकर सेवन करने से मन्द अग्नि प्रदीप्त होकर अतिसार का शमन हो जाता है। वियोगिनीवृक्षम् ॥ १२ ॥ जीर्णातिसारनाशनो योग आम्रास्थिलोध्रवृकियष्टिकलिगवीज- कट्वंग मुस्तकमदातिविषांवुविश्वैः द्वितीयो विलास ६१ - + तथा जम्बूफलामलकविल्वयुतैश्च चूर्ण- जीर्णाखिलातिसृतिहारि सतण्डुलाम्बु ॥ १३ ॥ घ्याख्या-आनाम्धि आम्रवीज, तटगुणानाह- आम्रवीज कपाय भ्याच्छर्यतीमारनाशनम् । ईपदम्र 'च मधुर हदयदानुत् ॥ निघण्ट । सोध रोध यूको पाठा यष्टि मधुयष्टि कलिगवाजन् इन्द्रयव कट्वन इयोनाक मुस्तकं मुन्ना मदा धातकी अनिविपा विपा अम्बु हीवर विश्व शुण्ठी जम्बूफल जाम्यवम् आम रक धात्री विल्यम् आमविश्यम् एनेपा द्रव्याणा चूर्ण नण्डुलान्युना सह सेविन जीर्णासिला- तिननिहारि सविधजीर्णातिसारविनाशकारि प्रदिष्टम् । एप योग मैपज्यरत्नावलीस्थस्व- ल्पगमावरचूर्णेन मह प्राय साम्य भजते, तद्यथा- मुम्तमैन्धवशुण्ठीभिर्धातकालोधवत्सक वित्वमोचरसाभ्याच पाठेन्द्रयववालकै ॥ आम्रबोजमतिविपा लज्जाचेति सुचूर्णितम् । क्षोद्रतण्डुलतोयाम्या जयेत् पीत्वा प्रवाहिकाम् ।। सर्वातीमारगमन मर्वशूलनिमूदनम् ॥ हिन्दी-आम की गुठली, पठानी लोध, पाठा, मुलेठी, इन्द्रजी, सोना पाठा, नागरमोथा, धाय के फूल, अतीम, हाऊबेर, सौंठ, जामुन की गुठली, भावला, कच्चे वेल का गूदा इन सब का कूट पीसकर कपड़छान चूर्ण कर ले। इस चूर्ण का चावल के धोवन के साथ सेवन करने से सब प्रकार के पुराने अतिसारों का विनाश हो जाता है । वसन्ततिलकावृत्तम् ॥ १३ ॥ रक्तातिसारे उशीरादिकाथ- वाले कोमलकुन्तलेऽमलकुले केलीकलालालसे मालामालिनि कोकिलावलिकलालापे विलासाचले। चञ्चत्कुण्डलमण्डले विजयते रक्तामशूलान्वितं सोशीरं कुटजान्दविल्वकविपोदीच्यैः कपायः कृतः ॥१४॥ व्याख्या-सोगीरम् उशीरेण नलदेन सहित कुटज वत्सक अब्द मुम्ता विल्वकम् आम्रविल्व विपा अतिविया उदीच्य हीवरम् एभि पड्भि द्रव्य कृत कपाय रक्तामशूला- चितम् अतिसार विजयते विनागयति । योगम् उक्त्वा वाला विशिनष्टि-हे वाले उद्यद्- यौवने कोमलकुन्तले कोमला च त कुन्तला यस्या सा तत्सम्बुद्धी, अमलकुले निर्मल- वशवति, केलीकलालालसे कामक्रीटाभिलापिणि, मालामालिनि मौक्तिके किंवा पुष्पादि- सग्मि सुशोभिते कोकिलावलिकमालापे कोकिलानामावलि पक्ति तस्या कल मधुरम् . . 1 ६२ वैद्यक चमत्कारचिन्तामणिः - आलाप पक्षिविराव तद्वन् मधुरभापिणि, विलासाचले हावभावादिभि समृद्धे, चद्रत कुण्टलमण्टले चञ्चले तरल कुण्टलयो कर्णाभूपणयो मण्टले चक्रवाले यस्या मा तत्सम्बुद्धी इत्यभूते हे वाले एप उशीरादिक कपाय रक्तातिसार विजयने । मुश्रुतोऽप्याह- विल्लगक्रयवाम्मीदवार कातिविपाकृत कपायो इन्त्यतीसार साम पित्तममुद्भवम् ।। तु० उ० ४० ।। चक्रपाणिरपि चक्रदत्ते--मवत्मक सातिविप सयित्व सोटीच्यमुस्तश्च कृत कपाय । मामे सशूले सह शाणिते च चिरप्रवृत्तेऽपि हितोऽतिसारे ।। हिन्दी-निर्मलकुल में उत्पन्न घुधुराले वालों से युक्त हास्यादि कला में प्रवीण मणिमुक्ता आदि की मालाओं से विभूपित कोक्लिा के समान मधुरभापिणी हावभावादिविलासों से सम्पन्न चञ्चल कुण्डलों से अलकृत हे प्रिये । निम्नलिखित द्रव्यों द्वारा सिद्ध किया हुआ छाथ रक्तातिसार, आमातिसार, तथा शूल (मरोड़) युक्त अतिसार का शमन करता है। क्वाध्य द्रव्य-खस, कुरैया की छाल, नागर- मोथा, कच्चे बेल की गिरी, अतीस और नेत्रवाला । शार्दूलविक्रीडितम् । विशेप-कुटज शब्द से रक्तातिसार तथा ज्वर में इन्द्रजी का ग्रहण करना चाहिये । इसके अतिरिक्त कुटज की छाल का प्रयोग होना चाहिये। एतदर्थ इसके गुण-धर्मों पर ध्यान दें ॥ १४ ॥ अथ चन्दनकल्क चन्दनं विमलतण्डुलाम्वुना संयुतं मधुयुतं सितायुतम् । तृविखण्डनमसृगविखण्डनं खण्डनं प्रचुरदाहमेहयोः ॥ १५ ॥ व्याख्या--विमलतण्डुलाम्वना निर्मलाना तण्डुलाना शारिपष्टिकादीनाम् अम्बुना धौतजलेन महित घृष्ट चन्दन श्वेतचन्दन मधुगुत सितायुत क्षौद्रशर्करामिश्रित सेवित सत् विखण्टन तृट् तृपा तस्या विसण्टन अमनन् असृग्विखण्डन रक्तातीसृतिनागन खण्टन प्रचुरदाहमेहयो प्रचुरी प्रवृद्धी यो दाहमेही दाह ऊष्मा मेह प्रमेह तयो खण्टन करोतीत्यर्थ । यथाह-भावमित्र पीत मधुसितायुक्त चन्दन तण्डुलाम्बुना । रक्तातीमारजिद्रक्रपित्तढाहमेहनुत् हिन्दी-घिसे हुए सफेद चन्दन का चावलों के धोवन में मयु एव मिश्री मिलाकर सेवन करने से तृपा (प्याम) रक्तातिसार दाह तथा प्रमेह की 'शान्ति होती है। रथोद्धतावृत्तम् । विशेष-यदि पित्तज अतिसार होतो सफेद चन्दन का उपयोग, रक्तज अतिसार में लाल चन्दन का प्रयोग और यदि रक्तपित्तातिसार हो तो दोनों चन्दनों का -साथ-साथ व्यवहार करना चाहिये ।। १५॥ - । 4- द्वितीयो विलासः ममधुजलप्रयोग जयति जीवनदायकजीवनं समधु शीतलमुत्पललोचने । अतिसृती गुणगौरवगर्विते परवधूगमनं शुचितां यथा ॥ १६ ॥ व्याख्या-हं गुणगौरवगविने गुणानां मौन्दर्यादीना गौरवेण महत्त्वेन गविन प्रमत्ते तथा च उत्पलगेचनने कमलनेत्र शीतल प्रत्ययुक्त जीवनदायक जीवन ददातीति यत् जीवन जल नव' समधु मधुना मह ममेव्य अतिमता अतिमाररोगान् तथा उ यति यथा परवगमनम् अन्यागनाउमक्ति शुचिता पवित्रतान् । यथा परवधूगमनगीलम्य पुस परिमायचारधान प्रणश्यनि नथैवप योगोऽनिसार जयतीत्यर्थ । तर जलस्य गुणा - पानीय श्रमनाशन कृमिघर मूळपिपासापह तन्द्रान्छदिविवन्धष्टर बलकर निद्राएर तर्पणम् । हृद्य गुप्तरम जीर्णगमक नित्य रित गीतल सत्यच्य रमकारण निगदिन पीयूपवज्जीवनम् ।। १०नि० ॥ हिन्दी-अपने सौन्दर्यादि गुणों से गर्वित तथा कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाली प्रिये । प्राणों की रक्षा करने वाले जल का मधु मिलाकर सेवन करने वाला अनिमार का रोगी शीघ्र ही उस प्रकार उक्त रोग से मुक्त हो जाता है जिस प्रकार च्यभिचारी पुरुष पवित्रता मे । द्रुतविलम्यित वृत्तम् ॥ १६ ॥ अनिसारे मुस्तानलप्रयोग ये घनवनस्याम्य मधुयुक्तस्य सातिसाग नरो योऽम्ति सोधिकारी भवेत् सुखी ।। १७ ।। प्याख्या-अये । पति रत्नकलाम्प्रति सम्बोधनम् , धनवनस्यास्य घन मुम्ता वन जल तस्य मधुयुक्ताम्य पुष्परमममन्वितस्य अभ्य मेवने य अतिसारी अतिसाररोगवान् नर अधिकारी गम्ति स मुखी भवेत् । अय तात्पर्यार्थ ---मुरताजलस्य सेवनेन अनिवार- निवृत्तिर्मवर्तीति । अये । प्रेयसि । मधुयुक्तरय वामन्तीसृपमारिलमितस्य अस्य धनवनग्य पन च तद वन तम्य निविटीयानस्य सेक्ने य अत्यधिक सार बल यम्यास्तीति अतिसारी नेन मह बर्वते पनि सातिमारी अत्यपिकावीर्यवान् नर पुमान अन्ति स अधिकारी भवेत मुरली न्याव । इत्यपरोऽय । श्लपालकार । यथान घरेण केवल मुरताजर प्रयोगो विहिन , न तथा वाग्मटे तन तु मुस्ताकाथमुस्ताक्षीरप्रयोगी निर्दिष्टी- प्रथम मुम्साकाथ "मीस्त करायमेका वा पय मधुममायुतम् ।। नु उ ८० ॥ गुस्ताक्षीरन- “पयम्युत्त्वाथ्य मुरताना शिति ग्रिगुणेऽम्भसि । क्षीरावशिष्ट तत्पीत न्यादामसमीरणम् ॥ वा चि ०॥ अप पर्यायपरिकल्पनावलेन एपोऽपि योग मुस्ताक्षीरामिधान स्यात । यथा-बनशरद सेवन । - 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वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः
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जलवाची जलमेव पय शय्देन व्यवडियते यस्यार्थ दुग्धम् अन वनशब्द. परम्परया दुग्ध-
वाची म्वोक्रियेत चेत् "मुस्ताक्षीर" प्रयोगस्य सिद्धि साधु सम्भवति । तस्यविधिर्यथा-
द्रन्यादष्टगुण क्षीर क्षीरातोय चतुर्गुणम् ।
क्षीरावशेष कर्तव्य क्षीरपाके त्वय विधि ॥
अत्र प्रयोगाय केवल छागीदुग्धमेव ग्रामम् । तस्य गुणा -
छाग कपाय मधुर शीत ग्राहि तथा लघु ।
रक्तपित्तातिसारन्न
क्षयकामज्वरापहम् ।। भावप्रकाशे ।।
मुश्रुतोऽप्याह यथामृत तथा क्षीरमतिसारेपु पूजितम् ।
चिरोत्थितेषु तत्पेयमपा भागस्तिमि शृतम् ।। तु उ ४० ।।
चक्रपाणिरपि जीर्णेऽमृतोपम क्षीरमतिसारे विशेषत ।
छाग त पजै सिद्ध देय वा वारिसाधितम् ॥ चक्रदत्ते ।।
हिन्दी-हे प्रिये । नागरमोथा का जल (काथ) यदि मधु मिलाकर सेवन
किया जाय तो वह अतिसार का रोगी अपने रोग से मुक्त हो जाता है। अनुष्टप ।
विशेष-यदि हम इसको वाग्भट के अनुसार "मुस्ताक्षीर" मान लेते हैं, तो
इसका प्रकार निम्नलिखित होगा। नागरमोथा की जड़ २ तोला, बकरी का दूध
१६ तोला, जल ४८ तोला इन सबको मिलाकर पकाने के बाद जब दूध मात्र शेष
रह जाय तो उतारकर छानकर इसका सेवन करना चाहिये ॥ १७ ॥
रक्तातीमारनाशका योगा
त्वचो रसालार्जुनसल्लकीनां प्रियालजम्बूवदरीद्रुमाणाम् ।
पृथक्पृथड्माक्षिकदुग्धयुक्ता रक्तापहाः स्युर्द्विजराजकन्ये ॥१८॥
व्याख्या-हे द्विजराजकन्ये । द्विजराज चन्द्र , यथाह अमर "द्विजराज शशधर ।"
तम्य कन्ये पुत्रि तदाकारत्वात्तादृशसौन्दर्ययुक्ते रत्नकले, (न चेय चन्द्रमृता अपि तु
सौन्दर्यादि गुणभूयिष्ठत्वादस्या चन्द्रसुतात्वारोप )। रसाल सहकार अर्जुन ककुभः
सल्लकी गजमक्ष्या प्रियाल राजादन जम्बू जाम्बवतरु वदरी कन्धु एतेपामौषध-
वृक्षाणा त्वच
माक्षिक क्षौद्र दुग्ध छागपय आन्या सह पृथक् पृथक् प्रयुक्ता.
सत्य रक्तापहा म्यु रक्तातिसार जयेयु । ग्रन्थक; एकस्मिन्नेवास्मिन् पये पड्योगा.
वणिता । उपेन्द्रवज्रावृत्तम् ।
हिन्दी-हे चन्द्रमा के सदृश सुरूपरत्नकले । आम, अर्जुन, सलई, चिरोंजी,
जामुन अथवा वेर की छाल का चूर्ण मधु एवं बकरी के दूध
के साथ सेवन करने
मे रक्तातीसार का शमन होता है।
विशेष-उक्त एक ही पद्य में छ योगों का वर्णन है किन्तु अनुपान सवका
एक ही है ॥१८॥

द्वितीयो विलासः . आमलादी नगुटविल्यप्रयोगः आमशूलविवन्धान-स्नुतिकुक्षिगदापहम् सेवितं सगुडं विल्वं विल्वतुल्यपयोधरे ।। १९ ।। व्याख्या-वित्वतुल्यपयोधरे । विल्वेन श्रीफलेन तुल्यो समानाकारी दृढी पयोधरी स्तनी य-या सा तत्सम्बुद्धी, मगुट विल्व गुडेन महितम् आमविल्यचूर्णं सेवित सत, आगरालम्-तल्लक्षण यथा- आटोपलासबमीगुरुत्वम्नमित्यकानाइकफप्रसेके कफत्य लिन समानलिजमामोदभव शूलमुदाहरन्ति ।। विन्ध नादिरोधम अम्रसुति रक्तातिमार कुक्षिगदापर जठररोगनाशक च भवतीति । चक्रपाणिरपि गुटेन सादयेट विल्य रक्तातीसारनाशनम् । आमशूलविवन्धन कुक्षिरोगविनागनम् ॥ चक्रदत्ते ॥ हिन्दी-हे बेल के महशस्तनों वाली प्रिये । कच्चे बेल की गिरी को सुखाकर बनाये हुए चूर्ण का गुढ़ के साथ सेवन करने से आमशूल कोष्ट-बद्धता, मूत्रादि अवरोध, रक्तातिसार तथा अन्य उदर रोग भी शान्त होते हैं । अनुष्टुप् छन्दः। विशेष--इसके स्थान पर आजकल चिकित्सक "वेल का मुरव्या" साने की सलाह देते हैं। यह उक्त योग का मंगोधित रूप है। किन्तु चीनी की अपेक्षा गुढ़ का प्रयोग अधिक लाभदायक होता है ॥ १९ ॥ जागरक्तानिमा दाहिमादिकपाय सखि दाडिमवत्सफत्वचा-जनितक्षौद्रयुतः कपायकः । शमयेदचिरादतीसृति रधिरोत्यां सुतरां दुरत्ययाम् ॥ २० ॥ व्याख्या-ससीनि रलकलाम्प्रति सम्बोधनम् यथाह चाणक्य 'भार्या मित्र गृहेषु च' दाटिम दन्तवीज वत्मक कुटज पतयो स्वगजनित निष्पादित कपायक कपाय एव कपायक (स्वार्थ कप्रत्यय ) क्षौद्रयुत मधुना मधित दुरत्यया दु सेन कप्टेन अत्यय विनाशो यस्या सा ता रुधिरोत्या रजनिताम् अतीसनिम् अतिसारम् अचिरात् त्वरित भुतरा सम्यकप्रकारेण शमयेत् । यया चक्रपाणि कपायो मधुना पीतस्त्वचो दाडिमरत्सकाए । सबो जयेदतीसार सरक्त दुनिवारकन् । चक्रदत्ते एप योग मैपज्यरत्नावत्यामपि तथैव मुलम.। हिन्दी-लोलिम्बराज अपनी स्त्री से कह रहे है, हे सखी! अनार और पुरैया की छाल का काथ मधु मिलाकर पीने से कठिन-कष्टसाध्य तथा पुराना रक्तातिसार भलीभाति शान्त हो जाता है। वियोगिनीवृत्तम् । विशेष-एक 'कुटजरसक्रिया' नाम से प्रसिद्ध योग है, जिसमें कुरैया की छाल - - ६६ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणि. - का स्वरस तथा अनार का रस निकालकर दोनों का अवलेह बनाया जाता है। इसका १ तोला की मात्रा में सेवन करने से मृत्यु के मुख में गया हुआ भी रोगी बच जाता है। उक्त योग में भी पदार्थ वही हैं, केवल निर्माण का भेद है। सुपक्क अनार का छिलका ही औपधि के उपयोग में लाना चाहिये। और यह नियम तो सभी काटोपधियों के लिये सामान्यरूपेण लागू होता है कि एक वर्ष के बाद सभी काष्ठौपधियां हीनवीर्य हो जाती हैं। वास्तव में यहाँ एक वर्ष का तात्पर्य यह है कि ओपधिमग्रह के बाद जब वर्षा ऋतु आती है तो ओषधियां बरसाती हवा के कारण खराब हो जाती हैं। अत. ऐसी ओपधियों का प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥२०॥ रक्तातिसारे शतावर्यादिकल्क रक्तातिसारं शमयेत् कल्को वर्याः पयोऽन्वितः। पयः पानं विधातुर्नुस्तया वा साधितं घृतम् ॥ २१ ॥ व्याख्या-वर्या शतावर्या पयोऽन्वित पय दुग्ध तेन अन्वितो मिलित कल्क (चटनी) पय पान विधातु दुग्धपान कर्तु नु मानवस्य रक्तातिसार शमयेत दुग्धान्वित शतावरीकल्क यद्वा शतावरीघृत रक्तातिसारी सेवेतेत्याशय । यथा वाग्भट रक्त विट्महित पूर्व पश्चाद् वा योऽतिसार्यते । शतावरीघृत लेहार्थमुपकल्पयेत् ॥ अ० ह० चि० ९ ॥ चक्रपाणिरपि पीत्वा शतावरी कल्क पयसा क्षीरभुग जयेत् । रक्तातिसारी पीत्वा वा तया सिद्ध घृत नर ॥ चक्रदत्ते ।। हिन्दी-दूध मात्र का सेवन करनेवाला रक्तातिसार का रोगी यदि शतावरी के करक का (१ तोला से ० तोला तक की मात्रा में) सेवन करे तो उसके रोग का शमन हो जाता है। अथवा शतावरी के कल्क से (घृतनिर्माण विधि देखें) घनाये घी का सेवन करें। यह भी लाभदायक होता है। अनुष्टुप छन्द ॥२१॥ धातक्यादि काथ: धातकी विश्वमूलञ्च वत्सकत्वक्समन्वितम् । रक्तातीसारशमनं क्वार्थ मधुयुतं प्रिये ॥२२॥ व्याख्या-हे प्रिये ! धातकी मदाकुसुम विश्धमूल गुण्ठी वत्सकत्वक् आटरूपकत्वक च विमिरेमिट्टैन्यै समन्वितम् मधुयुत क्षौमिलित काय रक्तातीसारशमन मवति । अनुष्टुप्छन्द.। हिन्दी-हे प्रिये । धाय का फूल सोंठ और अडूसा की छाल का काथ शहद मिलाकर सेवन करने से खूनी अतिसार शान्त हो जाता है ॥ २२ ॥ तस्य - द्वितीयो विलासः ६७ वा वालातिसारे धातक्यादिकपाय समदाकुसुमं सविल्वलोधं सजलं नागकणाकृतः कषायः। मधुना परियोजितो निहन्यादतिसारं सकलं स्तनन्धयानाम् ।। २३ ।। प्याश्या-समदाकुसुम धातकीपुष्पेण सहित सविल्वलोध्र श्रीफलरोध्रयुक्त सजल नेवालामिश्रित नागकणाकृत नागकणया कृत कपाय काथ मधुना परियोजित. मधुमिश्रित सन् स्तनन्धयाना क्षीरादवालकानां सकल सर्वविधमतिसार निहन्यात् । एप योगोऽविकलरूपेण शाधरमहितायाम् दृश्यते-- तपथा- धातकीविल्वरोधाणि यालक गजपिप्पली। एमि मृत शृत शीत शिशुभ्य क्षौद्रमयुतम् ।। प्रदद्यादवले सर्वातीमारशान्तये ॥ मैपज्यरलापल्यामपि- धानकोविल्वधन्याकलोघेन्द्रयववालके लेह क्षौद्रेण वालानां ज्वरातीमारवान्तिजित् ।। हिन्दी-घाय का फूल, कच्चे बेल की गुद्दी, लोध, नेत्रवाला और गजपीपल इनके हाथ में मधु मिलाकर देने मे दुधमुहे बच्चों के सभी प्रकार के अतिसार शान्त हो जाते हैं। मालमारिणीवृत्तम् । विशेप-भैपज्यरत्नावली के उक्त योग में गजपीपल के स्थान पर इन्द्रजव परिवर्तित तया धनियां परिवर्धित द्रव्य है। यह चिकित्सक अथवा ग्रन्थकर्ता के अनुभव की विशेप सूममात्र है ॥ २३ ॥ वालरोगेपु कृष्णादिचूर्णम्- कृष्णारुणामुस्तकगिकाणां चूर्णेन पूर्णेन च माक्षिण। ज्वरातिसारः प्रशमं प्रयाति सश्वासकासः सवमिः शिानाम् ॥ २४ ॥ व्याख्या-कृष्णा पिप्पली अरुणा अतिविपा मुस्तक मुस्ता शृगी कर्कटशृङ्गी समाशि- केनतेपा चूर्णेन क्षोदेन तथा च माक्षिक मधु तेन मिश्रितेन शिशूना वालाना ज्वर अतिसार श्वास कास वमि च प्रशम प्रयाति शान्ति प्राप्नोति । यथा मावमिय घनकृणाम्णाशृगीचूर्ण क्षौद्रेण सयुतम् । गिशोवरातिसारन कास श्वास वर्मि हरेत् ॥ केचन आचार्या अग्र अरुणापदेन मजिष्ठामपि प्रयुजन्ते न तद् युक्तम् । मअिष्ठा केवल रक्तानिसारनी, अतिविपा तु-विपा सोष्णा कटुस्तित्ता पाचनी दीपनी हरेत् । जीर्णज्वरातिसारामविपकासवमिक्रिमीन् एप योग ग्रन्थान्तरेषु 'चतुर्भद्र' इति नाम्ना प्रसिद्ध , सर्वत्र वालरोगेषु पूजितश्च । - ६८ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणि" - १ चूर्णनिर्माणविधि अत्यन्तशुष्क यद् द्रव्य नुपिष्ट वनगालितम् । तत्स्याच्चूर्ण रज क्षोटस्तन्मात्रा कर्षसम्मिता। विशेष-इसको 'चातुर्भद्रचूर्ण' भी कहते हैं। यद्यपि चूगों की १ तोला पूर्ण मात्रा लिखी गई है किन्तु सभी चूगों की सभी स्थिति में यह मात्रा मान्य नहीं होती। इसके लिये भोपध द्रव्यों तथा रोगी के बलावल का विचार करके ही मात्रा का निर्वाचन करना युक्तियुक्त प्रतीत होता है। उपजातिवृत्तम् ॥ २४ ॥ असाध्यातिमारे गोविन्दनामस्मरणम्- तृट्श्वासकासज्वरशोफमूर्छाहिक्कासुखारोचकवान्तिशुलैः । खिन्नोऽतिसारी स्मरतु प्रयत्नात् गोविन्ददामोदरमाधवेति ॥ २५ ॥ व्याख्या-तृट् तृपा श्वास कास ज्वर. गोफ शोय मूर्छा हिक्का मुखारोचक अन्न- विद्वेष वान्ति वमन शूल दशभिरेमिरुपद्रव खिन प्रपीडित अतिसारी अतिसाररोगवान् पुरुष सत्यपि शक्तिहामे यतो हि 'मलायत्त बल पुसाम्', प्रयत्नात् कथ कथमपि गोविन्द । दामोदर । माधव । इति भगवन्नामानि स्मरतु जपतु, यस्माद एनर्मरणख्यापकलियुक्त अतिमारवान् रोगी मुमूर्षुरिति विद्यात् । असाध्यातिसार-लक्षणानि यथाह सुश्रुत - तृष्णाटाहारुचिश्वासहिकायार्थास्थिशूलिनम् । सम्मूर्छारतिसम्मोहयुक्त पकवलीगुदन् । प्रलापयुक्त च भिपग् वर्जयेदतिसारिणम् । सु० उ० ४ ॥ श्वामशूलपिपामात क्षीण ज्वरनिपीटितम् । विशेषेण नर वृद्धमतीसारो विनाशयेत् ॥ तत्रैव ३३।। हिन्दी-प्यास, श्वास, कास, ज्वर, सूजन, बेहोशी, हिचकी, अन्न के प्रति अरुचि वमन, शूल इन उपद्रवों से पीडित असाध्य अतिसार का रोगी शक्ति न होने पर भी प्रयत्नपूर्वक गोविन्द दामोदर माधव आदि भगवान् के नामों का उच्चारण करे । इन्द्रवज्रावृत्तम् । विशेष-भगवान का नाम स्मरण सांसारिक रोगों से मुक्ति पाने का एक सर्वोत्तम आध्यात्मिक साधन है। यही मरने के बाद भी उस प्राणी का साथी बनता है ॥२५॥ इति अतिसार-प्रतीकार समाप्त । अथ ग्रहणी-प्रतीकार. दीपनपाचनो योग यवानीनागरोशीरधनिकातिविपाधनः। वालविल्वद्विपर्णीभिर्दीपनं पाचनं भवेत् ॥ २६ ॥ व्याख्या-~यवानी अजमोदिका नागर शुण्ठी उशीर नलदः धनिका धान्यकम् अन्यच्च- - द्वितीयो विलासः ६६ - अतिविपा विपा धन नागरमुस्ता वालविल्वम् आमश्रीफल द्विपणी शालपणों पृश्निपी च एमि कृत कपाय शीतकषायो वा दीपन रुचिवर्धक (अग्निवर्धक ) पाचन वातादीनां शामक च भवेत् । भैपज्यरत्नावल्यामपि योगोऽयमित्युपलभ्यते- नागरातिविषामुस्तैरथवा धान्यनागरे । तृष्णाशूलातिसार दीपन पाचन लघु ॥ चक्रपाणिरपि धान्यकातिविपोदीच्ययमानीमुस्तनागरम् । वला द्विपर्णी विल्वञ्च दद्याद् दीपनपाचनम् ॥ चक्रदत्ते । ग्रहण्या निरुक्तिश्चरके-अग्न्यधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणाद् ग्रहणी मता। नामेरुपरि सा ह्यग्निवलोपस्तम्भवृहिता ॥ अपक्व धारयत्यन्न पक्व सृजति चाप्यध ।।च० चि० १५ ॥ सुश्रुतोप्याह पष्ठीपित्तघरा नाम या कला परिकीर्तिता । पकामाशयमध्यस्था ग्रहणी मा प्रकीर्तिता ।। सु० उ० ४० ।। अतिसरणमाात् परम्परानुवन्धित्वाच्चातीसारानन्तर ग्रहणीसम्प्राप्तिमाह सुश्रुत अतिसारे निवृत्तेऽपि मन्दाऽग्नेरहितागिन । भूय' सन्दूपितो वह्निर्ग्रहणीमभिदूपयेत् ।। हिन्दी-अजवायन, सोंठ, खम, धनिया, अतीस, नागरमोथा, कञ्चेवेल का गूदा शालपर्णी, पृश्निपी इन दस औषधियों का काथ मन्दाग्नि को प्रदीप्त करके पाचन शक्ति को बढ़ाता है। अनुष्टुप्छन्द । विशेष- इस योग में 'बालविल्व' पाठ दिया गया है किन्तु इसी लेखक की दूसरी कृति 'वैधजीवन' में इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये 'बलाविल्व' पाठ दिया गया है। वला=खिरैटी का एक गुण सग्राहकत्व भी है। अत इस पाठ में 'आ' की मात्रा का प्रमादवश परिवर्तन नहीं समझना चाहिये ॥ २६ ॥ ग्रहण्याम् अमृतादिकपाय अमृतातिविपोपधाम्बुवाहैः सदृशैः पाचनदीपनः कपायः। परिसेवित आमवर्पिणीनां ग्रहणीनां शमनो मनोहराऽऽस्ये ॥ २७ ॥ व्याख्या हे मनोहरास्ये ! चारुवदने । अमृता गुडूची अतिविपा विपा औषध शुण्ठी अम्बुवाह घन सदृशे समानभागि कृत कपाय क्वाथ परिसेवित प्रयुक्तश्चेत् आमवपि- णीना ग्रहणीना आमदोपयुक्तग्रहणीविकाराणा शमन शामको मवतीति ।, यथाह चक्रपाणि - शुण्ठी समुस्तातिविपा गुडची पिवेजलेन कथिता समाशाम् । मन्दानलत्वे सततामताया आमानुवन्धे ग्रहणीगदे च ॥ चक्रदत्ते ॥ हिन्दी-हे सुन्दरी प्रिये। गिलोय, अत्तीस, सोंठ, नागरमोथा इन चार ओषधियों को समानभाग लेकर इसका काथ बना लें, इसका सेवन करने से जाठराग्नि प्रदीप्त होता है और खाया हुभा भोजन पचने लगता है, फलत आमदोष युक्त ग्रहणीरोग शान्त हो जाता है। मालभारिणीवृत्तम् ॥ २७ ॥ - -

७०
वैद्यक चमत्कारचिन्तामणिः
ग्रहण्या पुनर्नवादिकपाय.-
पुनर्नवावल्लिजवाणपुंखाविश्वाग्निपथ्याचिरविल्वविल्वैः ।
कृतः कपायः शमयेदशेपान दुर्नामगुल्मग्रहणीविकारान् ॥ २८ ॥
व्याण्या-पुनर्नवा वृश्वीर बल्लिन मरिच वाणपुखा भरपुखा विश्वा शुण्ठी अग्नि
चित्रक पय्या हरीतकी चिरविल्व करम विल्वम् आमविल्वम् एमि ओपधिमि
कृत कपाय अशेषान् निखिलान् दुर्नामा अर्श गुल्म कोष्ठान्तर्गतग्रन्थिविशेष ग्रहणी
च एतान विकारान् शमयेत् । उपेन्द्रवज्रावृत्तम् ।
हिन्दी-पुनर्नवा, कालीमिरच, शरपुखा, सोंट, चित्रक की छाल, हरीतकी,
करक्ष, वेलगिरी इन ओपधियों से निर्मित कपाय के सेवन से अर्श (बवासीर) गुल्म
तथा ग्रहणी रोग शान्त हो जाता है ॥ २८ ॥
ग्रहण्यादिरोगेषु पाठादिचूर्णम्-
पाठाविपानलदवत्सकवत्सकत्वक्तिक्तामदारसजनागरविल्वचूर्णम् ।
सक्षौद्रतण्डुलजलं ग्रहणीप्रवाहीरक्तप्रवाहगुदरुग्गुदजेपु देयात् ॥२९॥
व्याण्या-पाठा अम्बष्ठा विपा अतिविपा नलदम् उशीर वत्मक इन्द्रयव वत्सकत्वक्
कलिङ्गत्वक् तिक्ता कुटकी मदा धातकी रसज रसाधन नागर शुण्ठी विल्वचूर्णम् आमविल्व-
क्षोदम् पभि दशमि ओपधिभि कृत चूर्ण सझौद्र क्षुद्राभिर्मधुमक्षिकाभि निर्मित मधु तेन
सहिय तण्डुलजल ग्रहण्याम् प्रवाहिकाया रक्तप्रवाहे रक्तातिसारे गुदरुजि गुदजेपु मनु
देयात् । 'नागरायचूर्ण'नान्ना चक्रपाणिनापि चक्रटते योगोऽय समुचित
नागरातिविषामुस्त धातकीसरसाशनम् । वत्सकत्वक्फल विल्व पाठा कटुकरोहिणीम् ॥
पिवेत्समाग तच्चूर्ण सक्षौद्र नण्डुलाम्बुना । पंत्तिके ग्रहणीदोघे रक्त यश्चोपवेश्यते ॥
अशीस्यथ गुदे शूल जयेच्चैव प्रवाहिकाम् । नागराद्यमिट चूर्ण कृष्णात्रेयेण पूजितम् ।।
तण्डुलोदकनिर्माणप्रकार -गीतकपायमानेन तण्डुलोढककल्पना।
केऽप्यष्टगुणतोयेन प्रादुम्तण्डुलमावनाम् ॥
हिन्दी-पाठा, अतीस, खस, कुटज की छाल तथा वीज, कुटकी, धाय के फूल,
रसौत, मोठ, कच्चे बेल का गूदा समान भाग इन दस द्रव्यों का सुखाकर बनाया
हुआ चूर्ण मधु के माथ सेवन कर उसके बाद तण्डलोदक को पीने से ग्रहणी
प्रवाहिका, रक्तातिसार, गुदपीढा, अर्श (बवासीर) रोगों का विनाश करना है।
विशेप-तण्डुलोदक निर्माण में कुछ मत भेद है। आचार्य वृन्द का कथन है
कि अठगुना गर्म जल में छानकर तण्डुलोदक बनाना चाहिये किन्तु अन्य आचार्यों
का मत है कि छ'गुने गर्म पानी में चावलों को भिगोकर छान लेना चाहिये।
यह तत्-तत् आचार्यों का अपना अनुभव है। वसन्ततिलकावृत्तम् ॥ २९ ॥

द्वितीयो विलासः ७१ -- तद्यथा- ॥ ग्रहण्यादौ तिक्तादिचूर्णम्- तिक्तातिक्तघनेन्द्रजं त्रिकटुकं पीत्वा समग्रं समं द्वौ भागो शिखिनः कलापरिमितान् भागान् कलिगत्वचः। चूर्ण स्याद् गुडशीततोयसहितं सेव्यं ग्रहण्यां ज्वरे गुल्मारोचककामलातिमृतिजित् पाण्डडुसूर्योदयः ॥ ३० ॥ व्याख्या-तिक्ता चिरतिक्त तिक्ता कुटकी धन मुस्ता इन्द्रजम् इन्द्रयव निकटक यूपणम् एतेपा समग्र सम समाशिक भाग शिखिन चित्रकस्य दो भागी कलिङ्गत्वच. कुटजत्वच कलापरिमितान् पोडशभागान् आदाय चूर्णीकृत्य गुडमिश्रितशीतलजलेन सेवितमिठ चूर्ण गुल्मम् अरोचक कामलाम् अतिसारश्च जयति तथा पाण्हडुसूर्योदय पाण्डु- रोगरूपिणीना तारकाणा विनाशाय सूर्यादय स जागतिं । शार्दूलविक्रीडितम् । एन योग चक्रपाणि भूनिम्बादिचूर्णनाना विलिलेख स्वकीये चक्रदत्तामिधे ग्रन्थे । भूनिम्बकटुकव्योपमुस्तकेन्द्रयवान् समान्। दौ चित्रकान् वत्सकत्वग्भागान् पोडश चूर्णयेत् ।। गुढगीताम्वुना पीत ग्रहणीदोपगुल्मनुत । कामलाज्वरपाण्डुत्वमेहारुच्यतिसारनुत् गुटयोगाद् गुढाम्युस्याद् गुडवर्णरसान्वितम् ।। हिन्दी-चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, इन्द्रजी, सोंठ, मरिच, पीपल इन द्रव्यों को समानभाग लें, चीता की छाल का चूर्ण दुगुना, और कुटज की छाल का चूर्ण १६ गुना लेकर चूर्ण करके शीतल जल में गुड़ मिलाकर ज्वर और ग्रहणी रोग में इसका सेवन करें। यह चूर्ण गुल्म, अरोचक, कामला तथा अतिसार का शमन करता है और पाण्डुरोग रूपी तारों को हतप्रभ करने के लिये यह योग सूर्य के समान प्रभावशाली है॥३०॥ वृहद्दीपनपाचनो योग द्विक्षारपटकटुपटुवजहिड्मुदीप्यैरेभिर्गुडो वदरदाडिमलुंगनीरैः । श्लेष्मानिलग्रहणिकासु च योजनीयोलोकत्रयैकमतिदीपनपाचनेऽलम् ॥ व्याख्या-द्विक्षारी सजिंकायवक्षारो पटकट पडूपणम् - पिप्पलीपिप्पलीमूलचन्यचित्रकनागर मरिचेन युत तत्तु पडूपणमुदाहृतम् ।। पवजो लवणपश्चकम् --सौवर्चल सैन्धवञ्च विडमौद्धिदमेव च । सामुद्रेण सम पञ्चलवणान्यत्र योजयेत् ॥ हिमु रामठ दीप्य यवानी एतान् पदार्थान् चूर्णीकृत्य गुड शुविकारः - तद्यथा- - " वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणि बदर वारिवदर प्राचीनामलक दाटिम दन्तवीज लुन मातुलुङ्गम् एतेपा नी रमै भावयेत् । एतच्चूर्ण इलेष्मानिलग्रहणिकासु च श्लेष्मग्रहण्या वातजग्रहण्यां वा किं वा द्वन्दजग्रहण्या योजनीय प्रयोज्यम् । यस्माद् इद लोकत्रयैक त्रिलोक्या ग्रेप्ठम् अनिढीपन- पाचने अतिशयदीपनकार्ये पाचनकार्य च अल समर्थम् । वसन्ततिलकावृत्तम् । तदेव चक्रपाणि. चक्रदत्ते-चित्रक पिप्पलीमूल द्वौ क्षारौ लवणानि च । व्योपहिग्वजमोदाश्च चन्यश्चैकत्र चूर्णयेत् ॥ गुटिका मातुलुङ्गस्य दाटिमाम्लरसेन वा । कृता विपाचयत्याम दीपयत्याशु चालनम् ।। वाग्मटोप्याह पनि पञ्च द्वी क्षारी मरिच पञ्चकोलकम् । दीप्यक हिमु गुटिका बीजपूररसे कृता । कोलदाटिमतोये वा पर दीपनपाचनी । वा०नि० १०॥ हिन्दी-सजीखार, जवाखार, पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, कालीमरिच, पाचों नमक ( कालानमक, सैन्धानमक, विरियानमक, रेहनमक, साम्हरनमक) हीग, अजवायन इनको फूट पीसकर चूर्ण बनालें । इस चूर्ण में गुड, पानी, आंवला, दादिम-और विजौरा नीबू के रसों की भावना देकर सुखाकर रखलें। यह चूर्ण, कफज, वातज तथा द्वन्द्वज ग्रहणीविकार में लाभदायक है, उत्तम दीपन- पाचन होने के कारण यह तीनों लोकों में श्रेष्ठ है ॥३१॥ ग्रहणीरोगे धुद्विवर्धनो योग क्षारयुगत्रिकटुत्रिपनि मिशिचविकारजनीजरणानि । रामठदीप्यहुताशयुतानि प्रेयसि मर्दय लुगजलेन ॥ ३२ ॥ तक्रयुतं वलराम्वुयुतं वा कोप्णजलेन युतं तुपकैर्वा । गुल्मगुदाकुरजिद् ग्रहणीपु श्रेष्ठमिदं क्षुधमाशु करोति ॥ ३३ ।। युग्मकम् ।। व्याख्या-क्षारयुग सर्जिका यवक्षार च त्रिकटु यूपण विपटूनि विट्रचकसैन्धवानि मिशि शतपुष्पा चविका चव्य रजनी हरिद्रा रामठ हिगु दीप्यम् अजमोदा हुताश चित्रक एभिर्द्रव्यैर्युतानि निर्मितानि चूर्णानि जरणानि पाचनानि भवन्ति अत हे प्रेयसि प्रियतमे एतानि द्रव्याणि लुगजलेन मातुलुङ्गरसेन मर्दय एतच्चूर्ण तक्रयुतम् उदश्चित् सहित वदराम्बुयुत वा स्वल्पकर्कन्धुरसेन युत वा कोष्णजलेन मन्दोष्णवारिणा सह वा तुपके तुपोदक वा सेवित सत् गुरमगुदाकुरजिद् गुल्मम् अर्शीसि विनाशयति, सुधामाशु करोति बुभुक्षा च वर्धयति । उपजाजिवृत्तम् । दोधकवृत्तम् । तिन्दी-हे प्रियतमा | सन्जीखार, जवासार, सोंठ, मरिच, पीपल, तीनों नमक (विड रुचक, सैन्धव) सौंफ, चम्य, हल्दी, हींग, अजवायन, चीता की छाल इन .

द्वितीयो विलास अग्निवर्धक पदार्थों के चूर्ण को विजौरा नीबू के रस में घोटिये। इस चूर्ण का मठा से या अढवेर के रस से या गुनगुने पानी से अथवा तुपोदक के साथ सेवन करने से गुल्मरोग अर्श (बवासीर) ग्रहणी रोग का शमन होता है और इसके सेवन से शीव भूख बढ़ती है। विशेष-तुपोदक निर्माण प्रकार-तुप सहित कच्चे जौ के टुकड़े करके मन्धान की रीति से पानी में भिगो दें। खट्टापन भाने के वाद छानकर प्रयोग में लें॥३२-३३ ॥ ग्रहणीरोगे चव्यकादिचूर्णम्- चव्यकं चित्रकं विश्वं वालविल्वं सुचूर्णितम् । तक्रेण सहितं हन्ति ग्रहणी दुःखकारिणीम् ।। ३४ ॥ व्याख्या-चव्यक चव्य चित्रक वहि विश्व शुण्ठी बालविल्वम् आमश्रीफल प्रत्येक पदार्थ सुचीकृत लष्ण सचूर्ण्य तक्रेण दण्टाहतेन सहित सेवित सत् दु सकारिणी क्लेश- दायिनी ग्रहणी इन्ति विनागयतीत्यर्थ । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-चव्य, चीता, की छाल, सोंठ, कच्चे बेल की गुद्दी इन सवका चूर्ण बनाकर मठा के साथ सेवन करने से दु सद ग्रहणी रोग की शान्ति होती है ॥३॥ ग्रहगीरोगे सोवर्चलादिचूर्णम्- रुचकाग्निमरीचाना चूर्ण तक्रेण शस्यते । ग्रहण्युदरगुत्माओमन्दाग्निप्लीहनाशनम् ।। ३५ ।। व्याख्या-चक सीवर्चलम् अग्नि चित्रक मरिच कृष्णा एपा त्रयाणा वस्त्रगालित चूर्ण तक्रेण सह मेवित सद् ग्रहणीम् उदरम् उदररोंग गुल्म कोष्टान्तर्गत ग्रन्थिम अर्ग दुर्नाम मन्दाग्निं पुन्मान्ध प्लीहानश्च विनाशयति । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दा--कालानमक, चीता की छाल, कालीमिरच, इन तीनों का चूर्ण मठा के साथ सेवन करने से ग्रहणी, उदररोग, अर्श मन्दाग्नि नथा प्लीहा (तापतिल्ली) इन रोगों की शान्ति होती है ।। ३५॥ ग्रहण्या शुकपुरीपप्रतीकार कृच्छ्रेण कठिनत्वेन य पुरीपं विमुञ्चति । सघृतं लवणं तस्य पाययेत् क्लेशशान्तये ॥ ३६ ।। त्याझ्या~य ग्रहणीरोगादित कठिनत्वन वातससृष्टत्वाद बढेन मलेन कृच्छ्रेण सकप्टेन पुरीष मल विमुञ्चति निम्सारयति तस्य रोगिण शशान्तये तज्जन्यकष्टनिरा- करणाय सवृत लवण मर्पिपा सहित सैन्धव पापयेत् अत्र निदानोक्तस्य 'मुहुर्वद्ध' इति लक्षणस्य निराकरणाय ग्रन्यकारस्याय योग । चरकेपि- ७४ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - अग्न्यधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणाद् ग्रहणी मता । नाभेरुपरि सा पग्निवलोपस्तम्भवृहिसा ।। अपक धारयत्यन्न पक समति वाऽप्यधः ॥ च० चि०१५॥ हिन्दी-वायु की अधिकता से मल के सूख जाने के कारण यदि उसके निकलने में कष्ट हो रहा हो तो रोगी को घी और सेंधानमक का सेवन कराना चाहिये। विशेष- यह ग्रन्थकर्ता की अपनी नई सूक्ष है। नमक और घी दोनों ही पाचनकर्ता तथा तीनों दोपों के शामक हैं। यह नई सूझ भी शास्त्र सम्मत होने के कारण विद्वानों द्वारा आहत है। अनुष्टुप्छन्द' ॥३६ ॥ ग्रहण्या सपि प्रयोग वातानुलोमनं सर्पिः शुण्ठीकल्केन साधितम् । कासश्वासज्वरप्लीहाग्रहणीपाण्डुगञ्जनम् ॥३७॥ व्याख्या-शुण्ठीकल्केन साधित शुण्ठी महौषध तस्या कल्केन साधित पाचित सपिं वृत वातानुलोमन तथा कासश्वास-ज्वर-प्लीहा ग्रहणी पाण्डुरोगाणा गलन विनाशक भवतीत्यर्थ । चक्रपाणिरपि- घृत नागरकल्केन सिद्ध वातानुलोमनम् । ग्रहणीपाण्डुरोगन्न प्लीहकासज्वरापहम् ।। चक्रदत्ते । घृतपाकविधि दुग्धे दधिन रसे तक्रकल्को देयोऽष्टमाशक । कल्कस्य सम्यक् पाकाथै तोयमत्र चतुर्गुणम् ॥ घृतपाके व्युपितनिषेधो यथाह वृन्द -नोहिप्राण्यगयो काथो व्युपितो दोपलो मत । हिन्दी-सौंठ के कल्क से बनाया गया घी वायु का अनुलोमन करता है और खासी, श्वास, ज्वर, प्लीहा, ग्रहणी, पाण्डुरोग का विनाश करता है। अनुष्टु- विशेप-धृत निर्माणविधि-घी : सेर, सोंठ १ पाव, जल ४ सेर लेना चाहिये। माचार्य वृन्द के कथनानुसार धी का पाक एक ही दिन में कर लेना चाहिये ॥३७॥ ग्रहण्या छागपय प्रयोग भाजं पयो मोचरसाम्बुवाह-हीवेरविल्वेन्द्रजकल्कसिद्धम् । दिनत्रयाद्धन्ति निपीतमुग्रामामानुवन्धां ग्रहणी सरक्ताम् ॥ ३८॥ व्याख्या-मोचरस शाल्मलीवेष्ट' अम्बुवाहो मुस्तक हीवर वालक विल्व श्रीफलम् इन्द्रजम् इन्द्रवीजम् एतदोषधाना कल्केन साधितम् आजम्पय छागदुग्ध निपीत सेवित सद उग्रा भीपणाम् आमानुवन्धाम् आमदोपसयुक्तां सरका रक्तयुक्ता (पित्तप्रकोपे मलस्य सरकत्व दृश्यते) यथाह जेजट --'दोपलिन मतिमान् ससर्ग तत्र लक्षयेत्' ग्रहो E- द्वितीयो विलास ७५ रोगविशेष दिनमयात नियु दिवसे वेव हन्ति विनाशयति । उपजातिवृत्तम् । भेषजसिद्धस्य छागदुन्धस्य महिमा- जाणेऽमृतोपम क्षीरमतिमारे विगेपन । छाग तद् भेपजे सिद्ध पेय वा वारि साधितम् ॥ ग्रहण्याश्चिकित्मानूप्रम्- ग्रहणीमाश्रित दोपमजीर्णवदुपाचरेत् । अतीसारोक्तविधिना तस्यामन्द विपाचयेत् ।। हिन्दी-मोचरस, नागरमोथा, नेत्रपाला, बेल की गिरी, कुटज के बीज इनके कषक द्वारा पकाये गये बकरी के दूध के तीन दिन के सेवन करने से भयकर आम और रक मिश्रित ग्रहणी-विकार का शमन हो जाता है ॥ ३८ ॥ इति श्रीमल्लोलिम्बराजविरचिते चमत्कारचिन्तामणी ग्रहणीप्रतीकारो नाम द्वितीयो विलास समाह ! - अथ तृतीयो विलासः अथ सवादात्मिका प्रस्तावनामाह, कोमले निर्मले मञ्जुले प्रोज्ज्वले वत्सले चञ्चले वल्लभे श्रूयताम् । यत्त्वया पृच्छयते तन्मया कथ्यते त्वन्तु मांप्रेक्षसेऽद्यापि किंवक्रदृक् ॥ व्याख्या--कोमले मृदुले निर्मले शुद्धहृदये मन्जुले सौम्यस्वभाववति प्रोज्ज्वले दीप्यमानवक्त्राम्भोजे वत्सले प्रिये चञ्चले चपले वहभे सुसिग्धे श्रूयताम् , यत्त्वया पृच्छथते यद् भवती पृच्छति तन्मया कथ्यते तत् सर्वमह कथयन्नस्मि त्वन्तु मा भवती तु त्वदाशा- परिपालक त्वद्गुणानुरक्त वा माम् अद्यापि आज्ञापरिपालनमन्तरापि किं कथ वक्रदृक् क्रूरदृष्टया प्रेक्षसे विलोकयसि । कवि पद्येनानेन इद भङ्ग्या निरूपयति यद एष चमत्कारि- चिन्तामणिनामकश्चिकित्साग्रन्यो मया वार्तालापप्रसङ्गे एव रचित न चात्र पृथक परिश्रम कृत । अत्र वार्तालापप्रसङ्गे प्रत्युत्पन्नमति लोम्बिराज स्वप्रियाया प्रश्नान् उत्तरयन् मनागपि नाक्लिश्यत् किन्तु सुकुमारतया परिश्रान्ता रत्नकला उत्तरप्रदानाद् अविरमन्त स्वस्वामिन प्रति वक्रदृष्टया प्रेक्षत इति अनुमीयते अनेन कवेरस्य 'यद्-भक्तेन मया घटस्तनि घटीमध्ये समुत्पाद्यते पद्याना शतकम्' इति वैद्यजीवनोक्ता गर्वोक्ति स्वभावोक्तिरेवावगम्यते । स्त्रग्विणीवृत्तम् । हिन्दी-कोमल निर्मल मजुल उज्ज्वल प्रिय तया चञ्चल प्राणप्रिये । सुनो, जो तुम पूछती हो उसका मैं (लोलिम्बराज) उत्तर देता जा रहा हूँ-फिर भी तुम मुझे (न मालूम ) क्यों टेढ़ी नजर से देख रही हो। विशेष-इस पद्य द्वारा ग्रन्थकर्ता ने यह व्यक्त किया है कि यह ग्रन्थ हम दोनों (पति-पतियों) का सम्भाषण मात्र है। दूसरी ओर अपनी प्रियतमा को सुकुमारता के कारण थक जाना और अपना निरन्तर कविता का प्रदर्शन ये दोनों ध्वनिया 'यत्वया पृच्छयते तन्मया कथ्यते त्वन्तु मा प्रेक्षसेऽद्यापि किं वाहक' से प्रतिध्वनित हो रही हैं ॥१॥ विजयाटिगुटिका- विजयानागरमुस्तागुडकृतगुटिका धृता वक्ने । शमयति कासं श्वासं हिममिव वक्षोधृता वनिता ॥२॥ व्याख्या-विजया भगा नागरमुस्ता मुस्तक गुडकृता गुडेन रचिता, अर्थात् विजया- मुस्तकयोश्चूर्ण गुडेन सम्मेल्य निर्मिता गुटिका वटी वस्त्रे मुखे धृता सती कास श्वास च के तृतीयो विलास , तथा शमयति निवारयति यथा वक्षोधृता वक्षसालिङ्गिता वनिता प्रियतमा हिम शीतबाधा परिहरति । आर्यावृत्तम् । हिन्दी-भाग की पत्ती, नागरमोथा इनके चूर्ण की गुड मिलाकर गोली वता लें। इस गोली को चूमते रहने से कास और श्वास रोग उस प्रकार शान्त हो जाते हैं जिस प्रकार अपनी प्रियतमा को छाती से लगा लेने पर जाढा ॥२॥ चिन्तामणियोग रास्नावलापद्मकदेवदारुफलत्रिकं यूपणविष्णुचूर्णम् । चिन्तामणि. क्षौदघृतोपपन्न. श्वासांश्च कासांश्च निराकरोति ॥३॥ व्याख्या-राना मुजङ्गाक्षी ( रानाया चिन्तामणिवट गुणा अतएवेय रास्लादिगुटिका चिन्तामणिनाम्ना प्रथिता) वला वाट्यालक पमक पभकाठ देवदारु सुरदार फलत्रिक त्रिफला त्र्यूपण त्रिकटु विष्णुचूर्ण विनोदम् एतान् सर्वान् चूर्णीकृत्य एकत्र स्थापयेत् विपमाशमागेन क्षौद्रघृतोपपन्न एप योगश्चिन्तामणिसशक अय श्वासान् कासाश्च निराकरोति, इन्द्रवज्रावृत्तम् । हिन्दी-राना, बला, पद्माख, देवदारु, हरढ, बहेडा, आंवला, सोंठ, मरिच, पीपल, वायविढग इन सब का समानभाग चूर्ण लेकर रख लें । इस चूर्ण को घी और मधु के साथ मेवन करने से श्वास-कास का शमन होता है विशेष-इस योग का वास्तविक नाम 'रामादिगुटिका' है। किन्तु राना के गुणों से मुग्ध होकर ग्रन्थकार ने इसका नाम 'चिन्तामणिवटी' रसा है। इसमें घृत-मयु का अनुपान लिसा है । इनको विपम मात्रा में मिलना चाहिये ॥३॥ श्वामे वासादिकाथ वासाहरिद्राधनिकागुडची भागीं यथा नागररिंगणीनाम् । काथेन तीक्ष्णेन समन्वितेन श्वासः शमं याति न कस्य पुंस. hell व्याख्या-वासा-आटरूपक हरिद्रा निगा धनिका धान्यक गुडूची अमृता भाङ्गीं ब्राह्मणयष्टिका नागर शुण्डी रिंगणी कण्टकारी एतेपा तीक्ष्णेन मरिचेन समन्वितेन सहितेन काथेन कम्य पुम पुरपन्य श्वास शम शान्ति न याति अपितु सर्वस्यापि शम यातीत्यर्थ । इन्द्रवज्रावृत्तम् । कटारी हिन्दी-अडूमा, हल्दी, धनिया, गियोय, भारगी, सोंठ, कालीमिर्च इनका काय बनाकर सेवन करने से सभी का श्वास रोग शान्त हो जाता है। विशेष-यद्यपि आयुर्वेदिक कोपकारों ने रिङ्गिणी शब्द का अर्थ लिखते हुए 'मुद्गपीलतायाम, कैवर्तमुस्तायाम, कण्टकार्याच' लिखकर अनेक अर्थों में इसका प्रयोग किया है किन्तु मराठी भाषा में केवल कण्टकारी को ही रिंगणी कहते है।

वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणि
इससे अनुमान किया जाता है कि इस महाराष्ट्रनिवासी कविने कविता-प्रवाह में
आकर भारमविभोर हो कण्टकारी के लिये अपनी मातृभाषा में प्रयुक्त रिंगणी शब्द
का प्रयोग किया हो । अन्यथा वह इसके अन्य संस्कृत नामों का प्रयोग करता ॥४॥
लवगादिवटी-
समलवंगमरीचविभीतकैः खदिरसारसमैरवलोडितैः।
क्वथितवन्बुलिकासलिलैवटी मुखधृता कसनं श्वसनं जयेत् ॥५॥
व्याख्या-लवग देवकुसुम मरिच वेलज विमीतकम् अक्षफलम् एते त्रय पदार्था'
समभागयुक्ता सर्व सम खदिरसार दन्तधावननिर्यास वञ्चुलिकासलिल वम्बूलकाथै
कथिता पाचिता वटी गुटिका मुखधृता वदनमध्ये धृता सती कसन कास, श्वसन वाम च
जयेत् । आर्यावृत्तम् ।
हिन्दी-लवंग, कालीमि, बहेड़ा इन तीनों का चूर्ण समानभाग और इन
तीनों के समान खदिरसार (वस्था) मिलाकर बवूल के छाथ की भावना देकर
गोली बनाकर रख लें । इस गोली को चूसने से श्वास कास का शमन होता है ॥५॥
कासरोगे वासककाथ-
पुलोमजावल्लभसूनुपत्नीतातात्मभूशेखरकेतनस्य ।
सौन्दर्यदूरीकृतरामरामे कयायकः काससमीरसर्पः॥६॥
व्याण्या-सौन्दर्यदूरीकृतरामरामे सौन्दर्येण शरीरलावण्येन दूरीकृता न्यकृता
रामरामा सीता यया सा तत्सम्बुद्धी, पुलोमजा शची तस्या वल्लभो देवराज इन्द्र तस्य
मूनु अनुज , 'मूनु पुत्रेऽनुजे रवी', इति विश्व । उपेन्द्र श्रीकृष्ण त स्य पत्नी लक्ष्मी तस्या
तात समुद्र तस्यात्मभू पुत्र चन्द्र स शेखरे यस्य स शिव तस्य केतन वाहन वृप
वामक , यथाइ भेदिनीकोशकार ।
वृपो धर्मे वलीवर्दे शृग्या पुराशिभेदयो । श्रेष्ठे स्यादुत्तरस्थश्च वासमूपिकशुक्रले ।।
तस्य कपायक काथ काससमीरसर्प कास एव समीर तस्य विनाशाय सर्प पवनाशन
एव विद्यते । अत्र काससमीरसर्प , इति रूपकालङ्कार । पक्षान्तरे पुलोमजा देवेन्द्रपत्नी तस्या
वल्लभ स्वामी इन्द्र तस्य मूनु पुत्र अर्जुन तस्य पक्षी द्रौपदी तस्या तात पिता द्रुपदः
तस्यात्मभू पुत्र शिखण्डी शिखण्टश्चूडाऽस्यास्तीति सर्प फटावान् स एव शेखरे यस्य स
शिव तस्य केतन वाहन वृप सिंहास्य शेपपूर्ववत् । उपजातिवृत्तम् ।
हिन्दी-अपने सौन्दर्य से सीता के सौन्दर्य को भी तिरस्कृत करनेवाली
प्रियतमा । अङ्कसा का क्वाथ कामरूपी वायु का विनाश करने के लिये साक्षात् साप
मिश्रित अडूसा का काथ (वातज) काल का शमन करता
है। अर्थात् मयु
है
॥६॥

तृतीयो विलासः ७६ कामे पिप्पल्यादिचूर्णम् - पिप्पलोपिप्पलीमूलविभीतकमहोपवैः । मधुना सेवितैः कासः प्रशाम्यति कुतूहलात् ॥ ७॥ व्याख्या-पिप्पली कृष्णा पिप्पलीमूल ग्रन्थिक विमोतक अक्ष महोपध शुण्ठी मममागयुक्ततपा मधुना सेवितं चूण. कास कुतूहलात् मरलतया प्रशान्यति शम यातीत्यर्थः । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-पिप्पली, पिप्पलीमूल, बहेढा, मोंठ इन सबको समानभाग लेकर चूर्ण कर लें । इमको मधु के साथ सेवन करने से मामानी से खासी दूर हो जाती है। कामरोगे त्रिफलादिचूर्णम्- फलवयच्छिन्नरुहागुतागरालाकृमिध्वंसिकटुत्रयाणाम् । चूर्ण समांशं सितया समेतं कासं जयेन्नात्र विचारणीयम् ॥ ८ ॥ व्याख्या-फायच्छिमाहाताशरानाकृमिध्वसिकटुत्रयाणाम् पय्याधात्रीविभौतक- गुडूचोचित्रकमुत्रहाजन्तुन्नशुण्ठीमरिचपिप्पलीना समाग मममाग चूर्ण क्षोद मितया इक्षुविकारेण समेत काम जयेद् विनाशयेट । अत्र न विचारणीय सन्देहो नैव कर्तव्य 'ममागम्' इत्यन्य स्थाने नव 'मम स' इत्यपि पाठोऽस्ति । उपजातिवृत्तम् । हिन्दी-हरद, यहेछा, आँवला, गिलोय, चीता की छाल, राना वायविडग, सोंठ, मरिच, पीपल इन सबको समपाग लेकर चूर्ण कर ले और चूर्ण के बराबर उसमें मिश्री मिला दें। इसके सेवन से कास का शमन होता है, इसमें कोई मन्देह नहीं ॥८॥ कामे त्रिकटुचूर्णम्- संयुतं गुडसर्पियो चूर्ण त्रिकटुसम्भवम् । निहन्ति तरसा कासांत्रासानिव सतां हरि.॥९॥ ध्याख्या-त्रिकटुममव शुण्ठीमरिचपिप्पलीकृत चूर्ण गुडसपियो मयुत मिलिम सत् तरसा हेलया तथा कासान् निहन्ति विनाशयति यथा हरि. भगवान् सता मननाना त्रासान् हरतीति । यनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-सौंठ, मरिच, पीपल का चूर्ण गुड़ और घी के साथ मिलाकर सेवन करने से उस प्रकार कासरोग का सरलता से विनाश करता है, जिस प्रकार भगवान् सजनों के कष्टों का ॥९॥ बालकासे अतिविपाप्रयोग - मनोहरे मानिनि मजघोपे शरीरशोभाजितमघोपे। ज्वरं वमि कासमपि छिनत्ति क्षौद्रेण युक्ताऽतिविपा शिशूनाम् ॥

८० वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणि . व्याख्या-मनोहरे चेतोहरे मानिनि स्वाभिमानयुक्ते मक्षुषोपे मञ्जलस्वरे शरीरशोमा- जितम घोपे शरीरशोभया देहकान्त्या जिता न्यस्कृता मन्जुघोपा स्वर्वेश्या यया सा नत्स- म्बुद्धौ, क्षौद्रेण माक्षिकेण युक्ता मिलिता अतिविपा प्रतिविपा शिशूना वालकाना ज्वर वर्मि कासमपि च्छिनन्ति दूरीकरोति । उपेन्द्रवज्रा। हिन्दी-हे सुन्दरि । मधु के साथ अतीस का चूर्ण चटाने से बालकों के ज्वर, वमन (उलटी) तथा कास रोग शान्त हो जाते हैं ॥ १० ॥ श्वासकासहरो योग - शृगवेररसचन्द्रशेखरे माक्षिकालिनिकरण सुन्दरे । श्वासकासयुगमंहसञ्चयं सेविते सति सति प्रणश्यति ॥ ११ ॥ व्याख्या-शृङ्गवेररसचन्द्रशेखरे शृगवेरस्य शुण्ठया रस एव चन्द्रशेखर शिव तस्मिन् माक्षिकालिनिकरण सुन्दरे माक्षिक मधु तदेव अलिनिकर भ्रमरसमूहस्तेन सुन्दरे हे सति । सच्चरित्रशालिनि । तस्मिन् सेविते सति श्वासकासयुगमहसञ्चय श्वासकासयुगम् एव अह पाप तस्य सञ्चय समूह प्रणश्यति विनष्टो भवति । रथोद्धतावृत्तम् । हिन्दी-हे प्रियतमे । सोंठ के रस में शहद मिलाकर सेवन करने से श्वास कास का विनाश हो जाता है। विशेप-सोंठ सूखी होती है अत इसका रस निकाला नहीं जा सकता अतएव इसका हिम अथवा काथ बनाकर प्रयोग करे ॥ ११ ॥ श्वासकासनाशने योगा- रेश्वासिनः कासिन औपधानि वहूनि कष्टात् किमिति क्रियन्ते । एक मरीचालिरजो विहाय सितामधुभ्यां मधुराधरोष्ठि । ॥१२॥ व्याख्या-समीपस्थिता स्वप्रिया मधुराधरोष्ठीतिसम्बुद्वय श्वासिकासिन प्रति योग विशेपकथनमारभते-रे मासिन श्वासरोगोऽस्तीति श्वासी तत्सम्बुद्धौ जसि रूपम् रे कासिन कासरोगाभिभूता कष्टात् परिश्रमाधिक्यात्, धनव्ययाद् वा सितामधुभ्या सह मम्प्रयुक्तम् एक केवल मरीचालिरजो विहाय मरीचमेवालि भ्रमर श्यामत्वात् तस्य रज चूर्ण तद विहाय त्यक्त्वा बहून्यनेकानि औपधानि भेपजोपचारा किमिति कथकार क्रियन्ते यतो हि सर्वाण्युपचाराणि व्यर्थानि क्लेशकराणि वेत्याशय । इन्द्रवज्रावृत्तम् । हिन्दी-ग्रन्थकार अपनी पत्नी से वार्तालाप करता हुआ श्वास-कास रोगियों के प्रति कह रहा है-हे श्वास-कास के रोगियो । मिश्री और मधु मिले हुए कालीमिर्च के चूर्ण का सेवन छोड़कर भाप और अनेक ओपधियों के सेवन का व्यर्थ कष्ट क्यों करते हैं । अर्थात् यह भारम्भिक श्वास कास में अत्यन्त लाभकारक योग है ॥ १२ ॥ 1 तृतीयो विलास ८१ रक्तपित्तादी वासकप्रयोग रक्तपित्तकसनक्षयापहं रे द्विजोत्तम भजोत्तमं वृषम् । एप धर्म उचितः सुरद्विपां भेपजेऽपि वृपशब्द इप्यते ॥ १३ ॥ ध्यारया-रे द्विजोत्तम ! मो वाहाणश्रेष्ठ! उत्तम श्रेष्ठ रक्तपित्तकसनक्षयापद रक्त- पित्तकासराजयक्ष्मरोगापहारिग गृप वासक मज सेवस्व । एप योग कधित । उत्तरार्द्ध तु प्रियम्प्रति माषमाणाया रनकलाया पशब्दपरत्वेन परिहासप्रवृत्ति , तत्पक्षे तुरे द्विजो- 'तम । उत्तम पीन वृप वृपम मन भुक्ष्य । अत एव वक्ति सा एप धर्म सुरदिपा राक्षसा- नान् रचित किम् अन्यत्र भेपजेऽपि घृपशब्दश्यते १ अपितु नेप्यत इत्यर्थ. अभिनव- निघण्टी वामकगुणा वासको वातास्वर्य' कफपित्तास्रनाशक । श्वासकासज्वरच्छदिमहकुष्ठक्षयापद ॥ हिन्दी-है द्विजराज । रक्तपित्त कास तथा क्षय का विनाश करने वाले उत्तम गुणयुक्त अहसा का सेवन कीजिये । निम्नलिखित पंक्ति में वृप शब्द के श्लेपारमक मर्थ को ध्यान में रखकर परिहासपूर्वक रत्नकला अपने पति से कह रही है- वृप = बैल का सेवन = भक्षण तो राक्षसों के लिये उचित है, क्या ऐसी वस्तु का उपयोग भोवधि के लिये करना चाहिये ? । रथोदतावृत्तम् ॥ १३ ॥ श्वासरोग गुढतैलप्रयोग - कटुतैलेन संयुक्तो गुडो यावन्न सेवितः। सप्तरानं कथं तावत् श्वासिश्वासो विनश्यति ॥ १४ ॥ व्याण्या-वासरोगिणा सप्तरात्र सप्ताह यावत् कटुतलेन सर्पपतैलेन सयुक्तो मिलितो गुटो न सेविन तावत् काठपर्यन्त श्वासिश्वास श्वासरोगोऽस्यास्तीति श्वासी तस्य श्वामो रोगविशेष कथ केन प्रकारेण विनश्यति । अनुष्टुप्छन्द । चक्रपाणिरपि- गुट कटकलेन मिश्रयित्वा समं लिहेत् । निसपाहप्रयोगेण श्वास निर्मूलतो जयेत् ।। हिन्दी-श्वासरोगी जबतक लगातार एक सप्ताह पर्यन्त गुड़ और कहुआ तेल का सेवन नहीं करता तब तक उसका श्वास रोग शान्त नहीं होता। विद्योप-लोलिम्बराज के लिखित इस गुड़ तेल के सेवन का समय एक सप्ताह का है, और चक्रपाणि के योग में तीन सप्ताह का समय दिया गया है। इस अवधि के निर्णय के लिये चिकित्सक से परामर्श करना चाहिये ॥१४॥ कासरोगे रास्नादिधृतम्- कल्केन रास्नात्रिकटुत्रिकण्टवलादिमुख्येन च कण्टकार्याः । रस विपक्चेन घृतेन सद्यः कासाः समस्ताः प्रलयं प्रयान्ति ॥१५|| ६ च० चि० - - ८२ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः व्याख्या-रास्नात्रिकटुत्रिकण्टयलादिमुख्येन सुवहाशुण्ठीमरिचपिप्पलोगोक्षुरवाट्यादि. प्रधानेन कल्केन तथा च कण्टकार्याः कण्टालिकाया रसे विपक्वेन वृतेन सद्य सपदि समस्ता पञ्चविधा कासा प्रलय प्रयान्ति विनष्टा भवन्तीत्याशय. । 'उपजानिवृत्तम् । यथोक्तम्- चक्रपाणिना चक्रदत्ते- घृत रानाबलाव्योपश्यदष्ट्राकन्काचितम् । कण्टकारोरसे सपि पञ्चकासनिपृदनम् ॥ हिन्दी-रास्ना सोंठ मिरिच पीपल गोग्वरूविरेण्टी इन सबका फरक = चटनी बनाकर कण्टकारी के रस में घो को पकाकर सेवन करने से पाचौ कासों का शमन होता है। विशेष-गो घृत ४ सेर करकद्रव्य १ सेर कण्टकारी का रस १ सेर इन सबको एक साथ मिलाकर घृतपाक विधि से पकावं । तयार हो जाने पर इसका सेवन ६ माशा से लेकर १ तोला तक को मात्रा में करें। यदि स्वरस प्राप्त न हो तो ८ सेर कण्टकारी के पन्चाङ्ग को लेकर ६४ सेर जल में पकाकर १६ सेर शेष रहने पर उताफर प्रयोग करें ॥ १५॥ श्वासादौ विभीतक प्रयोग'- दशाननस्य तनयो वदने संस्थितो जयेत् । श्वसनं कसनं वापि तमिवानिलनन्दनः ॥ १६ ॥ व्याख्या-दशाननस्य राव गस्य तनय पुत्र अझ अत्रोपधार्ये अक्षपदेन विभातकस्य ग्रहणम्, वदने मुखे सास्थित धृत सन् श्वसन श्वासरोग कसन कासरुज नथा जयेत्, यथा त रावणपुत्रम् अझम् अनिलनन्दन अनिलस्य वायोर्नन्दन सूनु हनूमान् ( अक्ष- कुमारम् अजयदिति ) । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-रावण का पुत्र भक्ष जिसका पर्यायवाची शब्द बहेड़ा है इसको मुख में रखकर चूसने से श्वास तथा कास का उत्सप्रकार विनाश होता है जिस प्रकार हनुमान जी ने उस (अक्षकुमार ) का विनाश किया ॥ १६ ॥ शुण्ठयादि क्वाथ - अयि प्राणप्रिये जातीफललोहितलोचने । शुण्ठीभागाकृतः काथः कलनश्वसनाहिराट् ॥ १७ ॥ व्यापा-अयोति सम्बोधन जातोफसलोहितलोचने मालतोफलबद् आरक्तनेत्रप्रान्त- वति प्राणप्रिये वरलमे ! शुरठो महोपध मानी पमा-एनयो कुनो रचित काय काय कसन कास श्वसन श्वास उमयोविनाशाय अहिराट् सर्पराड् एवास्ति । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-जातीफल के समान लाल नेत्रों घाली प्राणप्रिये । सौंठ और भारङ्गी - तृतीयो विलास. ८३ . के काय का सेवन कास पुष श्वाम रोग के लिये सर्पराज के समान विनाश फारक है। विशेष-यों पर 'अहिराट' शब्द मे प्रन्यकार का अभिप्राय यातज कास और वातज श्वास से दी है क्योंकि सदिय रोग का नाशक नहीं अपितु 'पवनाशन' होने के कारण यायु फा भएक (अतएव नाशक) होता है ॥ १७ ॥ दारोगेषु अतिविपाप्रयोग ज्वरचम कसनानि विनाशयेदतिविषा मधुना सहिता शिशोः। सुमुग्नि सुभ्र सुवर्णविराजिते मुतनु सुन्दरि देव्यपराजिते ॥१८॥ च्यारण्या-मुगि रुचिरास्ये सुभ्र कमनीयभूलनायुक्त सुवर्णविराजिते काञ्चनाभर- नदिने किंच रमणीयवर्णन ससिने मुतनु शोदरि नन्दरि चित्ताकर्षक देवि दिव्य गुण- मण्टिने, अपराजिने म्याभिमानिनि मधुना धोटेण सहिता अतिविपा शृङ्गी शिशो बाल. कस्य स्वरबमांकमनानि विनाशयेत् । अतिपिपागुगा -'जीर्णचरातिसारामविपकासवमि. क्रिमीन् , दिगि पूर्वणान्वय । उपेन्द्र वावृत्तम् । हिन्दी-हे सुन्दर मुप भौंह वर्ण शरीर तथा गुणों वाली स्वाभिमानिनि प्रिये ! अतीम को मधु के साथ चटाने से बालकों के ज्वर वमन (उलटी) तथा सासी ये रोग शान्त हो जाते है। विशेष-वास्तव में अतीस का प्रयोग बाल रोगों में धारयधिक लाभदायक देखा जाता है ॥ १८॥ शूलनाशनोयोग नश्यन्ति शुलाः फटिकुक्षिवस्तीस्लूकतैलाद दशमूलमिश्रात् । यथा नराणां धनिनां धनानि समागमाद्वारविलासिनीनाम् ।।१९।। व्याख्या-दशमूलमियाद उमयपञ्चमूलसयुताट रूफलाद परण्टतलात् करिकुक्षि- वरितमवा चूला तथा नश्यन्ति यथा धनिना विपुलेश्वर्यवता नराणा पुमा धनानि वार- विलासिनीनां पण्यवधूनां समागमात सम्पाद, चक्रपाणिरपिचक्रदते- दशमूलाकपायेण पिवेद वा नागराम्भसा । कुक्षिवास्तिकटीशूले नेलमेरण्डसम्भवम् ।। अन्यदपि आमवातगजेन्द्रस्प कीविपिनचारिण । एक एव निहन्ताऽसी-परण्टस्तैलकेसरी ॥ हिन्दी-दशमूलमिश्रित एरण्ड तेल के सेवन से कमर कुक्षि और पस्ति में होने वाला शूल का उस प्रकार का नाश हो जाता है जिस प्रकार वेश्या का समागम करने से धनिकों के धन का । अनुष्टुप्छन्दः ।

८४ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः रास्नादिकपाय - रास्नामृतानागरदेवदारुपञ्चाघ्रियुग्मेन्द्रयवैः कपायः । रुबूकतैलेन निषेव्यमाणो भेत्ता भवेदामसमीरणस्य ॥ २०॥ व्याख्या--रास्ना सुवहाअमृता गुहची नागर शुण्ठी देवदारू सुरदारू पञ्चाधियुग्मम् उभयपनमूलम् इन्द्रयव कुटजबीजम् एतेषां कपायो रूकसैलेनएरण्डजस्नेहेन निषेव्यमाण प्रयुज्यमान सन् आमसमीरणस्यामवातस्य भेत्ता विनाशको भवति । इन्द्रवज्रोपेन्द्रवजो- पजाति । हिन्दी-रास्ना गुइची सोंठ देवदारू दशमूल इन्द्रजी इनके क्वाथ का एरण्ड के तेल के साथ सेवन करने से आमवात का विनाश होता है ॥ २० ॥ आमवातनोऽपपरोयोग- विलासिनीविलासेन विलासिहृदयं यथा । तथा गुडुचीविश्वेन हरेदाम समीरणम् ॥ २१ ।। व्याख्या-यथा विलासिनी नायिका तस्या विलासेन हामभावकटाक्षादिना विलासि- हृदय रसिकपुरुषस्य चेतो हरेत् तथा गुडूची छिनरुहा विश्वेन शुण्ठ्या सहयुक्ता आम- समीरणम् आमवात हरेत् । अनुष्टुप्छन्द । इत्यामवातप्रतीकार. । हिन्दी-जिस प्रकार नायिका के हावभावादि से रसिक का हृदय हरा जाता है उसी प्रकार गुरुच का सोंठ के साथ सेवन करने से आमवात का अपहरण होता है ॥ २१ ॥ अथ नेत्ररोगप्रतीकार शोभाभिः परिभूतभू-तनये त्रैलोक्यगीतान्वये कान्तेऽरण्यकुलस्थिकाश्छगणजे नीरे निधायाम्बरे । सुस्विना वितुषीकृताः कररुहैर्वामध्रुवां चूर्णिताः पिष्ट्वा सैन्धववोलचूर्णसहिताः सर्वाक्षिरोगापहाः ॥२२॥ व्याख्या--शोमामि सुपमाभि परिभूता तिरस्कृता भूधतनया गिरिराजसुता पार्वती यया सा तत्सम्बुद्धौ, त्रैलोक्यगीतान्वये त्रैलोक्ये त्रिलोक्या गीत स्तुत अन्वयो वंशो यस्या सा तत्सम्बोधने, कान्ते प्रियतमे । अरण्यकुलस्थिका वन्यकुलत्थ अम्बरे वस्त्रे निधाय छगणजे नीरे गोमयरसे सुस्विन्ना पाचिता वामभुवा कामिनीना कहरुहेर्नखै वितुपीकृता' त्वरिवरहीकृता पश्चाच्चूर्णिता पिष्ट्वा च सैन्धव सिन्धूत्थ बोल जातीरसम् अनयोश्चूर्णसहिता. सर्वाक्षिरोगापहा सर्वविधनेत्रामयग्ना भवन्तीति । शार्दूलविक्रीडितम् । हिन्दी-अपने शरीरसौन्दर्य से पार्वती को लजित करनेवाली तीनों लोकों में प्रसिद्ध वंश वाली प्रिये ! जगली कुलथी को कपड़ा में वाधकर उसका गोमूत्र - तृतीयो विलासः में म्वेदन कर छिलके उतार कर सुसाने के बाद चूर्ण बनाकर इसमें सैन्धा नमक और बोल (गन्धरस) चूर्ण महित सबको एक साथ पीसकर अन्जन करने से सभी प्रकार के नेत्र रोगों का शमन हो जाता है ॥२२॥ जयति मारुतपित्तकफैः कृतांबदुविधामपि लोचनयोय॑थाम्। दृढतरं मधुना बहुलीकृतो बहलपल्लवपल्लवजो रसः ॥२३॥ व्याख्या-चहलपल्लवो मधुशिग्रु तस्य पल्लवजो रसो नवकिसलयोत्यस्वरस , मधुनां माक्षिकेण बहुलीकृत स्फीतता नीत सम्मृत दृढतर वाद सेवित सन् माझतपित्तकफै- निदोष कृता मिलिने पृथक् पृथग वा कृता वहुविर्धा विभिन्नप्रकारवतीम् अपि लोचन- चोय॑या नेत्रपीटा जपति विनाशयतीत्यर्थ । वाग्मटोऽप्याह- वातपित्तकफसन्निपाता नेप्रयोर्वहुविधामपि व्यथाम् । शीवमेव जयति प्रयोजित शिग्रुपल्लवरस समाक्षिक ) अष्टाङ्गहृदये ।। चक्रपाणिरपि गिग्रुपल्लवनिर्यास मघृष्टस्तानसम्पुटे। घृतेन धूपितो हन्ति शोथहर्षानुवेदना ॥ अत्र योगे घृतस्य यौगिकत्वेनास्य प्रयोगो विहितो वर्तते एतदेव तस्माद वैशिष्टयम् । हनविलम्बिततम् । हिन्दी-लाल सहजन की पत्ती का रस मधु मिलाकर भांखों में ढालने से वात पित्त कफ जनित तथा और भी अनेक प्रकार की नेत्र वाधायें निश्चित दूर हो जाती हैं ।। २३ ॥ अर्जुनचिकित्सासाह- कुवलयनयनेऽर्जुन कफोत्थः सह सितयाशु निराचरीकरीति । प्रियकरमिव कामिनी नवोढा निहितमुरोजयुगे लघुप्रमाणे ॥२४॥ व्याख्या हे कुवलयनयने कुवलय नीलकमल तटवन्नीले नयने नेत्रतारिके यम्या: सा तत्सम्युद्धौ, सइ सिनया प्रयुक्त' कफोत्थ समुद्रकफ अर्जुन तदाऽऽरव्यनेत्ररोगम् आशु निराचरीकरीति दूरीकरोति । यथा नवोढा नवविवाहिता कामिनी कामप्रवणापि लघु- प्रमाणे स्वल्याकारवति उरोजयुगे स्तनयुग्मे निहितम्प्रयुक्त प्रियकरमिव पत्यु पाणिपल्लव- मिव आशु निराचरीकरीति, पूर्वेण सम्बन्ध । पुप्पिताग्रावृत्तम् । अर्जुनरोगस्य स्वरूपम् - एको य शशरूधिरोपमश्च विन्दु.1 शुक्लस्थो भवति तमर्जुन वदन्ति ॥ सु उ प ४ ॥ मतान्तरे यथाह रविगुप्त -कृष्णमागे सित विन्दु शुक्ल विधात कफारमकम् । रक्त च शुक्लभागस्थमर्जुन शोणितोमवम् ।। चिकित्सासाम्यम् - शट्ख क्षौद्रेण संयुक्त कनक सैन्धवेन वा। सितयाऽर्णवफेनो पृथगअनमर्जुने । चक्रदत्ते। ५ वा ८६ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - हिन्दी-नीलकमल के सदृश नेत्रवाली प्रियतमे । मिश्री के साथ समुद्र फेन का प्रयोग उस प्रकार अर्जुन (फूली) नामक नेत्र रोग को शीघ्र दूर हटाता है, जिस प्रकार नवविवाहित कामिनी अपने छोटे स्तनों के ऊपर रखे गये अपने प्रियतम के हाथ को ॥ २४ ॥ सामान्यनेत्ररोगचिकित्सा- इति निगदितमार्ये नेत्रसारं विधत्ते घृतमधुसमवेता सेविताग्या निशायाम् । शशिमुखि रतिलीलालोलदृष्टे त्वमग्या कथमहह विधत्से वैपरीत्यं परन्तु ॥ २५॥ व्याख्या--हे आर्ये ! रत्नकले । धृतमधुसमेवता गव्याज्यमाक्षिकाभ्यां सम्मिलिता अग्या त्रिफला निशाया रात्री सेविता प्रयुक्ता सती नेत्रसार नयनसुख विधत्ते करोनीति निगदित कथितम् । हे शशिमुखि । चन्द्रवदने! रतिलीलालोलदृष्टे रतिलीला कामक्रीडा तस्या लोला चश्चला दृष्टि यस्या सा तत्सवुद्धी, यद्यपि त्वम् अग्या बुद्धिमती विदुषी च तथापि, अहह ! इत्याभर्ये परीत्प मैथुनरूप विपरीताचरण कथ कस्मात् कारणात् विधत्तें करोपि, यतोहि नेत्ररोगेपु मैथुनम् अपथ्यत्वेन निपिद्धम् । तद्यथा- क्रोध शुच मैथुनमश्नुवायुविण्मूत्रनिद्रावमिवेगरोधान् । नरो न सेवेत हिताभिलाषी रोगेषु सर्वेषु दृगाश्रयेषु ॥ हिन्दी-हे आर्य गुणोंवाली रत्नकला | रात में घी और मधु के साथ त्रिफला का सेवन करने से सभी प्रकार के नेत्र रोगों में लाभ होता है। चन्द्रमा के सहश मुख तथा काम क्रीडा में चञ्चल चितवन वाली प्रियतमा यद्यपि तुम श्रेष्ठ हो फिर भी इस प्रकार का विपरीत आचरण क्यों कर रही हो । मालिनी वृत्तम् । विशेष-इस पद्य में त्रिफला सेवन की विशेषता एव नेत्र रोग में मैथुन अपथ्य होता है, इन दो बातों का उल्लेख ग्रन्थकार को अभिमत है ॥२५॥ नक्तान्ध्यचिकित्सा- निराकरोति नक्तान्ध्यं तथा गोशकृता कणा। यथा रतन रमणी रमणस्य महावलम् ॥ २६॥ व्याख्या-मोशकृता गोमयरसेन युक्ता कणा पिप्पली नक्तान्ध्य रात्र्यन्धत्व तथा निराकरोति दूरीकरोनि यथा रमणी नवोढा नायिका रमणस्य मैथुनशीलस्य पुस महावलम् (निराकरोतीत्यर्थ ) । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-रतौंधी रोग में गाय के गोबर के रस में पीपल को पीसकर नेत्रों में लगाने से उक्त रोग उस प्रकार क्षीण हो जाता है, जिस प्रकार अधिक मैथुन करने से मानव का वल (क्षीण हो जाता है) ॥ २६ ॥ - - - h तृतीयो विलासः नेप्रकुसुमरोगे अपराजिता प्रयोग श्वेतापराजितामूलं धर्पितं शीतवारिणा । अञ्जनान्नेत्र कुसुमं कुसुमस्य निकृन्तनम् ॥ २७ ॥ व्याज्या--शीतवारिणा शिशिरजले न घपित घृष्ट श्वेतापराजितामूल गिरिकाणिकाया जटां तरय अनात् प्रयोगात् नेत्रकुम्म चक्षुरथपुष्पाऽऽरव्यरोग तस्य कुसुमरूपरोगस्य निकृन्नन विनागकर मवनि । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-सफेद अपराजिता की जड को जीतल जल में घिसकर आंख में लगाने से कुसुम (फुली या फूला ) रोग का शमन होता है ।। २७ ॥ शुक्ररोगे माक्षिकप्रयोग - नारिकेलफलस्थूलस्तनमोहितमानसे। हरिणाक्षि हरेच्छुकं माक्षिकं माक्षिकान्वितम् ।। २८ ॥ व्याख्या-नारिकेलफलम्युलन्तनमोहितमानसे दृढफलवत्पीनकुचयुगलाभ्या मोहित स्वायत्तीकृत मानस मन यया सा तत्सम्बुद्धी इत्थम्भूते हे हरिणाक्षि हरिणग्य अक्षिणी- श्व अक्षिणी यस्या सा तत्सम्बोधने हे मृगनयनि ! माक्षिकान्वित क्षोद्रेण सहित माक्षिक स्वर्णमाक्षिक शुक्र शुक्ल कुसुमाऽऽख्य रोग हरेट विनाशयेत् । अनुष्टप्छन्द । चक्रपाणिरपि तथैव व्याचक्षते- ताप्य मधुकसारो वा वीजञ्चाक्षरय सैन्धवम् । मधुनाअनयोगा स्युश्चत्वार शुक्रशान्तये ॥ हिन्दी-नारियल के सदृश स्थल स्तनों से मन को मोहित करनेवाली, हरिण- के समान विशाल एव चवल नेत्रों वाली प्रिये । स्वर्णमाक्षिक को शुद्धपरके मधु के साथ घिसकर उसका अन्जन लगाने से शुक्र (फूली) रोग का शमन होता है ॥२८॥ इति नेत्ररोगचिकित्सा समाप्ता । अथकामलाचिकित्सामाह- सवासावयस्थे सभूनिम्बनिम्बे सतित्तोत्तसे क्षौद्रयुक्ते कपाये । निपीते ध्रुवं क्षीयते पाण्डुरोगान्विता कामलाकोमलाऽकोमलापि ॥२९॥ व्याण्या--हे उत्तमे श्रेष्ठगुणशालिनि ! सवासावयस्थे वासकहरीतक्यौ (वयस्था शब्देन गुडूचीमपि गृहन्ति ) ताभ्या सह सभूनिम्वनिम्बे किरातपिचुगर्दा या साक सतिक्ता कटकया सम क्षौद्रयुक्त मधुमिश्रिते कपाये का निपीते सेविते सति चोमला नवीना अकोमला प्राचीनापि पाण्डुरोगान्विता पाण्टुरोगेण सयुक्ता कामरा ध्रुव क्षीयते विनश्य- तीत्यर्थ । एपयोग कामलाया पाण्डुरोग च पृथक् पृथक प्रयुक्तोऽपि लाभकरो भवति । मुजगप्रपातम् । कामलापाण्डुरोगलक्षणानि चरकादिपु द्रष्टव्यानि।

८८ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - यथाह चक्रपाणि:- फलनिकाऽमृतावासातिक्ता भूनिम्बजे कृन । काथ क्षौद्रयुतो हन्यात पाण्डुरोग सकामलम् ॥ चक्रदत्ते । हिन्दी-हे रस्नकला! अडूसा हरीतकी चिरायता नीम की छाल और कुटकी इनके क्वाथ का मधु के साथ सेवन करने से नवीन अथवा पुराना पाण्डुरोग सहित कामला रोग का शमन होता है ।॥ २९ ॥ पटोलादि क्वाथ पटोलपाठाकटुरोहिणीनां छिन्नोद्भवाशीतमधुम्रवाणाम् । क्वाथो विपच्छर्दिवलासपित्तकुष्ठज्वरारोचककामलासु ॥३०॥ व्याख्या-पटोल राजीफल पाठा अम्बष्ठा कटरोहिणी कटका तासा, तथा छिन्नोद्भवा गुडूची अशीतम् ऊपणम् मधुस्रवो गुडपुष्प समांशकांनाम् एतेपा द्रव्याणा कृत कपाय विषे तज्जन्यविकारे छी वमने वलासे कफोत्थे रोगविशेषे पित्तविकारे ज्वरे अरोचके कामलायाश्च सेन्य । उपजातिवृत्तम् । हिन्दी-परवल पाठा कुटकी गिलोय मरिच महुआ इनको समभाग लेकर क्वाथ बनावे । यह क्वाथ विष विकार वमन कफ और पित्त विकार कुष्ठ ज्वर अरुचि तथा कामला रोग में लाभ करता है॥३०॥ कामलाइरो योग - उडुनाथवलापिचुमन्दवला त्रिफला कटुका कथितं सलिलम् । घृतमाक्षिकम किल कामलयासहितस्य हिताय बुधैः कथितम् ॥३१॥ व्याख्या-उडुनाथ सोमराजी वला महावला पिचुमन्दो निम्ब वला अनिवला, त्रिफला हरीतक्यादिफलत्रय कटुका कटुरोहिणी एभिर्द्रव्ये कथित सलिल परिपक्वजल घृतमाक्षिकमद् गोघृतमधुभ्या मिलित कामलया सहितस्य पाण्डुरोगस्य हिताय लाभाय बुधै तद्विद्य वैये. कथितम् आम्नात किलेति प्रसिद्ध । तोटकवृत्तम् । हिन्दी-धाकुची महावला (सहदेई) नीम की छाल अतिवला (कधी) त्रिफला कुटकी इन ओपघियों से निर्मित क्वाथ में (विषम भाग) घी और मधु मिलाकर सेवन करने से कामलायुक्त पाण्डुरोग शान्त हो जाता है, ऐसा विद्वान् वैचों का कथन है ॥ ३१ ॥ कामलाहरो योग त्रिफलया मधुना रजसाऽयसः कटुकया पिचुमन्दसमेतया । प्रलपमेति मनस्विनि कामल। सवृतयाऽमृतया कुसुमाम्बुना ॥१२॥ व्याख्या-मनास्वनि स्वात्माभिमानिनि । अपोलिखितस्त्रिभियांग रोगविशेष प्रलयमेति विनश्यति, योगा -त्रिफलया फलत्रिकेण अयसो रजसा लोहमस्मना कामला तृतीयो विलासः मह . मधुना क्षोद्रेण च एको योग , पिचुमन्दसमेतया निम्वयुक्तया कटुकया तिक्तया इत्यपरो योग सघृतया गन्येन महितया अमृतया गुइच्या कुमुमाम्बुना मधुना, ति तृतीयो योग । हिन्दी-हे स्वाभिमानवाली रत्नकला ! नीचे लिखे हुए तीन योगों से कामला रोग का विनाश होता है। अर्थात् इनका सेवन करने वाला कामला रोगी अपने रोग से मुक्त हो जाता है। योग-त्रिफला का चूर्ण, लोह, भस्म, मधु के साथ या नीम तथा कुटकी का चूर्ण, अथवा घी और मधु के माथ गुरुच । द्रुतविलम्बित वृत्तम्। विशेप-इस श्लोक का प्रथम पद मूल में इस प्रकार है, "ममधुलोह रजस्त्रि- फलामृता" व्याकरण की दृष्टि से इसकी अर्थ सगति नहीं होती अत. उन्हीं द्रव्यों को इस प्रकार "त्रिफलया मधुना रजसाऽयस" बदल दिया है ॥ ३२ ॥ अपर. कामलाइरो योग हिमुना पूर्णनेत्राणां पूर्णनेत्राणां द्रोणपुप्पीरसेन वा। कामला मूलतो याति देहिनां पथ्यकारिणाम् ॥ ३३ ॥ व्याख्या-हिना हिगुपनीरसेन पूर्णनेत्राणा रोगिणा द्रोणपुष्पी द्रोणा ( गूमेति लोके- प्रसिद्धा) तस्या रसेन वा 'पथ्यकारिणाम्पथ्याशिना देहिना शरीरिणा रोगिणा कामला रोगविशेपो मूलतो याति समूल विनश्यतीत्यर्थ । अनुष्टुप्छन्द । यथाह चक्रपाणि अअन कामलार्ताना द्रोणपुष्पी रस. स्मृत ॥ चक्रदत्ते ।। कामलारोगे पथ्यम् -पुराणयवगोधूमशालयश्च पुनर्नवा। मुद्गाढकोमसूराणा यूपो जागलजो रम ॥ पटोल घृद्धकूष्माण्ट तरुण कदलीफलम् । मत्स्येपु मुद्गर शृङ्गी तक धान्यभया घृतम् ।। रसोन पकमाम्रञ्च वार्ताकुरमृता निशा । कामलारोगिणामेतत् पथ्यमुक्त चिकित्सक ॥ हिन्दी-कामला रोगी के नेत्रों में हिंगुपत्री का या द्रोणपुप्पी (गूमा) का रस डालने से और पथ्य का सेवन करने से कामला रोग का समूल विनाश हो जाता है ॥३३॥ कामलारोगनाशकम् अजनम् - कामलामलमूलस्योन्मूलनं किल कल्पयेत् । गौरीगैरिकगौरीभिरञ्जन जनरजनम् ॥ ३४॥ व्याख्या-गौरी हरिद्रा गैरिक स्वर्णगैरिक गौरी धात्री गोरोचन वा एमिर्द्रव्यैः निर्मितम् एतद् असन जनरजन रोगनाशकत्वात् लोकप्रमोदकर भवति अत एतेन

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वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः
।
कामलामलमूलस्य कामला एव मलो रोग तस्य मूलस्य रोगोत्पत्तिकारणस्य उन्मूलन
विनाशन किलेति प्रसिद्ध कल्पयेत् । अनुष्टुप्छन्द ।
यथाह चक्रपाणि चक्रदत्ते-
निशागैरिकधात्रीणा चूर्ण वा सम्प्रकल्पयेत् ।
हिन्दी-हल्दी स्वर्णगैरिक (हिरोजी) और भावला के चूर्ण का 'अञ्जन
लगाने से कामला रोग का विनाश हो जाता है। रोग विनाशक होने के कारण
यह अत्यन्त लोक प्रिय है ॥ ३४ ॥
कामलारोगे स्वरसप्रयोग..
छिन्नारसो वा त्रिफलारसो वा दार्वीरसो वा पिचुमन्दकं वा।
प्रातः प्रपीतो मधुना समेतः सफामलानां सुधया समानः ॥३५॥
व्याख्या-छिन्ना गुडूची तस्या रस वा, अथवा त्रिफला फलनिक तस्य रस वा,
दावी हरिद्रा तस्या रस वा, पिचुमन्दक निम्ब तस्य रस वा प्रात प्रभाते मधुना समेत
क्षौद्रेण मिश्रित प्रपीत पीत सन् कामलाना कामलारोगवता कृते सुधया समान पीपूप•
कल्पो भवति । इन्द्रवजावृत्तम् । यथाह चक्रपाणि ।
चक्रदत्ते-त्रिफलाया गुडच्या वा दाा निम्वस्य वा रस ।
प्रातर्माक्षिकसयुक्त शीलित
कामलापह ॥
हिन्दी-गुरुच त्रिफला दारुहरुदी अथवा नीम इनमें से किसी एक के रस को
मधु मिलाकर प्रातःकाल सेवन करने से कामला रोग का विनाश होता है। यह
योग कामला रोग से पीड़ित मानवों के लिये अमृत के समान लाभदायक है ॥३५॥
इति कामलाप्रतीकार।
अथ योनिशुलप्रतीकार
पिचुमन्दसमीरशत्रुबीजैः पिचुमन्दस्य रसेन साध्यमाना ।
गुटिका भगगर्भवर्तमाना भगशूलस्य महाबलस्य हन्त्री ।। ३६ ॥
ब्याख्या-पिचुमन्दो निम्ब समीरशत्रु एरण्ड एतयो बीजै फलचूर्णे पिचुमन्दस्य
रसेन साध्यमाना विरच्यमाना गुटिका वटी भगगर्मवर्तमाना योनिमध्यस्थिता सती महा-
बलस्य तीवस्य भगशूलस्य योनिवेदनाया हन्त्री विनाशिका भवतीति । मालभारिणी
वृत्तम् ।
हिन्दी-नीम तथा एरण्ड के बीजों के चूर्ण को नीम के रस की भावना देकर
गोली बनाकर योनि के भीतर रखने से तन योनि शल का शमन होता है ।। ३६ ॥
अपरो योग:-
छागीघृतेनोत्तरवारुणीनां मूलानि पिष्ट्वा गुटिका निबद्धा।
तन्व्याः सुष्टे सुभगे भगस्था भर्गायुधाऽऽख्यं गदमाशुहन्ति ॥ ३७॥

तृतीयो विलास ६१ - . - व्याख्या-हे सुदृष्ट! शोभना दृष्टिर्यस्या स तत्सम्मुद्धी, तथा हे सुभगे ! ऐश्वर्य- शालिनि ! उत्तरवारणीनाम् इन्द्रवारुणीना मूलानि जटा छागी घृतेन अजाया आज्येन पिष्ट्वा चूर्णीकृत्य निवडा घटिता गुटिका वटी तन्व्या कृशोदर्या भगस्था योनिमध्यधृता भगांयुधाऽऽरव्य मर्ग शिव तस्य आयुध शल त गद रोगम् आशु शीघ्र हन्ति विनाशयति । इन्द्रवज्रावृत्तम् । हिन्दी-हे सुन्दर दृष्टि एवं ऐश्वर्य युक्त रत्नकला इन्द्रायण की जड़ को घी में पीसकर गोली बनाकर योनि के भीतर रखने से योनिशूल का शमन होता है ॥३७॥ सुखप्रसवोपाय पिष्टानि यष्टीमधुवीजपूरवीजानि मध्वात्ययुतानि पीत्वा । सूते शरश्चन्द्रमुखी सुखेन सूर्खस्य वैद्यस्य विकल्पनाऽत्र ॥ ३८॥ ध्याण्या-यष्टी मधुयष्टी मधु मधुकर्कटी, यथोक्तम् अभिनवनिघण्टी 'वीजपूरोऽपर प्रोक्तो मधुरो मधुकर्कटी' वीजपूरो मातुलन एतयो पिष्टानि चूर्णीकृतानि बीजानि मध्वा- ज्ययुतानि धृतमधुमिश्रितानि पीत्वा शरच्चन्द्रमुखी चन्द्रवदना सुखन सूते वाल जनयति, अत्र योग मूर्सग्य वधस्य विकल्पना सन्देह , न त्वन्यस्य । इन्द्रवजावृत्तम् । यथाह चक्रपाणि- मातुलझस्य मूलानि मधुफ मधुसयुतम् । धृतेन सह पातन्य मुख नारी प्रसूयते ॥ चक्रदत्ते ॥ हिन्दी-मुलेठी मधुकर्कटी (कुमाउनी भाषा में-मतकाकड़ी) बिजौरा नीवू इनके बीजों को पीसकर घी और शहद के साथ मिलाकर पीने से सुखपूर्वक प्रसव होता है। इस योग के सम्बन्ध में केवल मूर्स वैद्यों को ही सन्देह होता है और किसी को नहीं ।। ३८॥ वज्रीदुग्ध प्रयोग अपूर्वमेकं विहितं त्वया नो कल्याणशीलेऽचपले चलाक्षि । चोभूयते मूर्धनि वज्रिदुग्धे न्यस्ते वधूनां सुखतः प्रसूतिः ॥ ३९ ॥ व्याख्या--हे कल्याणशीले परोपकारवति अवपलेऽचञ्चले साध्वि चलाक्षि चञ्चल- नयने त्वया एकम् अपूर्व योग विहितम् उपदिष्टम् । मूर्धनि शिरसि वज्रिदुग्धे स्नुहीपयसि न्यस्ते धृने सति वधूना गर्मिणीना सुखत प्रसूति गोभूयते सम्भवतीत्यर्थ । उपजातिवृत्तम् । हिन्दी-हे कल्याणकारक स्वभाव सरल तथा चञ्चल नेत्रों वाली निये। तुम ने एक अपूर्व याग का वर्णन किया । वह योग निन्नलिखित है-प्रसवकाल में यदि गर्भवत! के शिर मैं सेहुण्ड का दूध रख दिया जाय तो अधिक सरलता के साथ प्रसव होता है ॥ ३९ ॥ - ६.२ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः . स्तन्यवृद्धिकरो योग कृतप्रशंसे प्रथमप्रसङ्गे विलासिनीनां कठिनस्तनीनाम् । कुर्याद् विदारीजपयःपयोभिः पयोभिवृद्धि कुटिलालकानाम् ॥४०॥ व्याण्या-प्रथमप्रसङ्गे प्रारम्मिकसमागमकाले कृतप्रगसे कृता प्रगसा यस्या सा तत्सम्बुद्धौ, कठिनस्तनी कठोरस्तनवतीनां कुटिलालकानाम् अरालकेशीना विलासिनीनां नवयुवतीना विदारीजपयः विदार्या चूर्णन सिद्ध पय दुग्ध पयोमि गवा दुग्धैं सह सेवित पयोऽभिवृद्धि दुग्धस्फीतिं कुर्यात् । उपेन्द्रवज्रावृत्तम् । हिन्दी-प्रथमसमागमकाल से प्रशसित धुंघुराले बाल वाली तथा कठोरस्तन चाली प्रियतमे । दूध में पकाये हुए विदारी चूर्ण का दूध के साथ सेवन करने से विलासिनियों के दुग्ध की वृद्धि होती है ॥ ४० ॥ दुग्धवृद्धिकरो द्वितीयो योग भजन्ति या निर्मलतण्डुलानां रजांसि दुग्धेन सह स्थितानि । क्षीरोदनेनैव सहस्थितानां तासां बधूनां सखि दुग्धमृद्धम् ॥४१॥ व्याख्या-हे सखि ! रलकले ! अत्र सखिशब्देन लोलिम्बराज स्व प्रेयसी सम्बोधयति, यथोक्त चाणक्येन 'भार्या मित्र गृहेषु च'। या स्त्रियो दुग्धेन पयसा सह स्थितानि मिलितानि निर्मलतण्डुलाना विमलशालिना रजासि चूर्णानि भजन्ते सेवन्ते तासा किंवा क्षीरोदनेनैव सहस्थिताना दुग्धौदनमात्रभोजनपराणां वधूनां दुग्ध स्तन्यम् ऋद्धम्भवति वर्धते । उपजातिवृत्तम् । दुग्धेन शालितण्डुलचूर्णपान विवर्द्धयेत् । स्तन्य सप्ताहत क्षीरसेविन्यास्तु न सशय ॥चक्रदत्ते।। हिन्दी-हे सखी ! साफ किये हुए शालि चावलों के चूर्ण का दूध के साथ सेवन करनेवाली, तथा केवल दूध के साथ शालि चावलों का भात खानेवाली स्त्रियों का दूध बढ़ जाता है ॥४१॥ रज प्रवृत्तौ प्रयोग इन्द्रवारुणिकामूलं योनिमण्डलमध्यगम् । प्रतीप्रदर्शिनी पुष्प रोधध्वंसनसाधनम् ॥ ४२ ॥ व्याण्या-योनिमण्डलमध्यग भगमध्यधृतम् इन्द्रवारुणिकामूल गवाक्षीमूल प्रतीपद- शिनी नारी तस्या पुष्परोधध्वसनसाधन रज प्रवृत्ती कारणम्भवतीति । सत्या गर्भस्थिती योगोऽय न प्रयोक्तव्य (अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-इन्द्रायण की जड़ का बाहरी भाग छील कर हटा दें फिर उसको पीसकर योनि के भीतर रखने से नष्टार्तव अथवा कष्टार्तव रोग दूर हो जाता है। विशेष—इसकी बत्तीसी बनाकर गर्भाशय के मुख के भीतर डाल देने से भार्तव की प्रवृत्ति शीघ्र होने लगती है। इसके सेवन के पूर्व यह मालूम कर लेना T तृतीयो विलास ६३ चाहिये कि मासिक धर्म गर्भाधान के कारण तो रुका नहीं है। गर्भावस्था में इसका प्रयोग क्दापि न करें ॥ ४२ ॥ नमेव योग प्रकारान्तरेण- यदि भवदनुजायाः पुष्परोधोऽस्ति मुग्धे क्षिप मृदुलमुपस्थे म्धूलमूलं गवाक्ष्याः । वदति वचनमित्थं लाललोलिम्मराजे हर हर हरिणाक्षी हीसपुढे निमग्ना ।। १३ ॥ व्याख्या-हे मुग्धे । प्रेयसि । यदि भवदनुजाया तवमगिन्या पुष्परोधोऽस्ति नष्टातेवरोगोऽस्ति तहिं मृदुलमुपस्थ कोमलाया योनी गवाक्ष्या इन्द्रवारुण्या स्थूलमूल वृहदाकारा जटां क्षिप परेशय इत्थं पूर्वोक्तप्रकारक वचन लोलिम्बराजे स्वस्वामिनि वदति सति हर हरेनिलजाया नीत्रानुभूति तस्या, हरिणाक्षी मृगनयनी ही समुद्रे डी लज्जा एव ममुद्र तस्मिन निमग्ना पतिता, अर्थात् लज्जावनननुखी जातेत्यर्थ । मालिनी वृत्तम् । हिन्दी-हे रसाला । यदि तुम्हारी बहिन को नष्टार्तव रोग है तो उसकी योनि मैं इन्द्रायण की मोटी जड़ को डाल दो (इसमे मासिक नाव खुलकर होने लगेगा।) इतना सुनते ही रनकला ला रूपी समुन्द्र में मानो डूब गई । अर्थात् उसने लजित होकर अपना सिर नीचा कर लिया। विशेष-लोलिम्वराज ने इस पथ में उपहास का स्वरूप मात्र प्रदर्शित किया है। यही योग इसके पूर्व श्लोक में वर्णित है। ग्रन्थकार का 'लोलिम्घराज' के अतिरिक्त 'लोलिम्मराज नाम भी अनेक स्थलों पर प्राप्त है।॥ १३ ॥ स्तन्यशोधनोपाय दुष्टं भवेद्यदि पयः पुरतो भवत्या- स्तहि प्रियस्तनि भजस्व सुखं कपायम् । गोप्यौपधामृतवृकीकटुकान्दमूर्वा- भूनिम्बदारुसुरराजयवप्रयोगम् ॥ १४ ॥ व्याख्या--हे प्रियस्तनि रमणीयकुचवति ! यदि मवस्या रलकलाया' पुरत अग्रे पय दुग्ध दुष्ट दृपित मवेव तहिं मुग सुखकर निम्नलिखित कपाय काय मजस्व । काथ्य- द्रव्याणा निर्दश -गोपी सारिवा औषधं शुण्ठी अमृता गुड्ची की पाठा कटुका तिक्ता अब्द मुस्तक मूळ पीलुपी भूनिम्ब किरात दारु देवदारु मुरराजयव इन्द्रज एतेषां द्रव्याणा काथरूपेण प्रयोग कुरु । वसन्ततिलकावृत्तम् । हिन्दी-हे सुन्दर स्तनों वाली रनकला । यदि आगे कभी आपके स्तनों का दूध दूपित हो जाय तो उस रोग में लाभदायक निम्नलिखित दस द्रव्यों के हाथ ६४ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - का सेवन करना चाहिये। द्रव्य-सारिवा सोंठ गिलोय पाढल कटुकी नागरमोथा मूर्वा चिरायता देवदार और इन्द्रजौ ॥ ४४ ॥ सूतिकाज्वरादौ योग श्रीखण्डपर्पटघनामृतधान्यसेव्य- ह्रीवरयासकवलातिविषारलनाम् । क्वाथो हितो भवति गर्मिणि सूतिकासु सद्यो रुगामरुधिरातिस्मृतिज्वरघ्नः ॥ ४५ ॥ व्याख्या-हे गर्मिणि । गर्मोऽस्यास्तीति गर्भिणी तत्सम्बुद्धी, श्रीखण्ड रक्तचन्दन पर्पट वरतिक्त घन मुस्ता अमृता गुडूची सेव्यम् उशीर होवेरम् उदीच्य यासक. यवास वला महावला, अतिविपा विपा अरलु श्योनाक एनेपा काय सूतिकामु प्रसरकालादारभ्य सार्धमासपर्यन्त जायमानेषु विकारेपु प्रयोज्य तथा एप योग सघोरुगामरुधिरातिसूति- ज्वरम्न सघोरुज तात्कालिकी वेदनाम् आमातिसार रक्तातिसार अतिसार ज्वरश्न विनाश- यति । वसन्ततिलकावृत्तम् । हीवेरादिकपाय- हीवेरारलुरक्तचन्दनवलाधान्याकवत्सादनी- मुस्तोशीरयवासपर्पटविषाक्वाथ पिवेद गर्भिणी । नानादोपयुतातिसारकगदे रक्तस्रुतौ वा ज्वरे योगोऽय मुनिभि पुरानिगदित सूत्यामये शस्यते ॥ चक्रदत्ते । हिन्दी-हे गर्भिणी | निम्नलिखितयोग सुतिका रोग, तात्कालिक वेदना आमातिसार रक्तातिसार तथा ज्वर का विनाश करता है। काथ्यद्रव्य- लालचन्दन, पितपापड़ा, नागरमोथा, गुरुच, खस, सुगन्धवाला, जवासा, खिरेंटी अतीस, सोनापाठा। विशेष-प्रसव काल के बाद ४५ दिन तक होने वाले विकारों को सूतिका रोग कहते हैं। चक्रदत्त आदि चिकित्सा ग्रन्थों में यह योग हीबेरादि काथ के नाम से प्रसिद्ध है। चक्रपाणि ने इस योग में धनियाँ अधिक लिखा है ॥ ४५ ॥ प्रदरहरोयोग रसाञ्जनाम्भोधरदारुपीताभूनिम्बभल्लाततिलैः कषायः। क्षौद्रान्वितश्चञ्चललोचनानां नानाविधानि प्रदराणि हन्ति ॥ ४६ ।। ध्यारथा-रसाशन दावीरसोद्भव द्रव्यम् अम्मोधर मुस्ता दारुपीता दारुहरिद्रा भूनिम्ब किरात मलात शोभकृत तिल कृष्णतिल एभि द्रव्यै । कृत क्षौद्रान्वित मधुना सहित कपाय काय चञ्चललोचनाना नवयुवतीनां नानाविधानि चतुष्प्रकारकाणि प्रदराणि इन्ति विनाशयति । उपजातिवृत्तम् । A तृतीयो विलास. ६५ -- दायादिकाय -दावीरमासनवृपादकिरातविल्य महातकैरवकृतो मधुना कपाय. । पीतो जयत्यतिवल प्रदर सशूल पीतासितारुणविलोहिननीलशुकुम्।।चक्रदत्त।। हिन्दी-रसौत नागरमोथा दारुहन्दी चिरायता भिलावा काला तिल इनके फाथ में मधु मिलाकर सेवन करने से नव युवतियों के सभी प्रकार के प्रदरों का विनाश हो जाता है ।। ४६ ॥ प्रदरे कशमूलप्रयोग भुवनत्रितयेऽपि निस्तुले कुशभूल प्रदरं विनाशयेत् । कलिकल्मपनाशनोचितं विमलं शालिजलेन सेचितम् ।। ४७ ॥ व्याख्या-हे मुवनत्रितयेऽपि निस्तुले त्रिलोक्यामपि यस्या रूपगोलादीना तुलना नास्ति, त्यम्भूने स्लकले ! कलिकरमपनाशनोचित कलियुगोत्पन्न पापममूहविनाशदक्ष कुशमूल दर्मजटा विमल विशुद्ध मालिजलेन तण्डुलवारिणा सेवित प्रदर स्त्रोणा रोगविशेष विनाशयेत् (यथाइ चकराणि - कुशमूल समुदधृत्य पेपयेत्तण्डुलाम्बुना । एतत्पीत्वात्र्यहानारी प्रदरात परिमुच्यते ॥चक्रदत्तो। हिन्दी-तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ रखकला! सम्पूर्ण कलियुग के पापों का विनाश करने वाली कुश की जड़ निर्मल शालि चावलों के धोवन से मेवन करने पर प्रदर रोग का विनाश करती है। वियोगिनीवृत्तम् ॥ ४७ ॥ गर्मिणीशूमहर कपाय उरुधुककुशकाशगोक्षुराणां कनकलते ललिताकृते स्त्रि मूलैः। तमिदमपहन्ति दुग्वमिन्दुद्यतिपुखि गर्भवतीजनस्य शूलम् ॥४८॥ ध्याख्या-उरकाशकाशगोक्षुराणाम् एरण्टदर्मपोटगलनिकण्टकाना मूले जटाभि मृत पाचित दुग्ध पय गर्भवतीजनस्य धृतगर्माया स्त्रिय शूल वेदनाम् अपहन्ति विनाशयति । हे कनकलते कृशोदरि ललिताकने रुचिरतनु इन्दुपुति चन्द्रमुखि स्त्रि! उपरिलिखिनोऽय योगो गर्मपतीशूल हरति । यथा चक्रपाणि - कुगकाशो चूकाणां मूलैगोक्षुरकस्य च । शृत दुग्ध सितायुक्त गर्मिण्या शुलनुर परम् ॥चक्रदत्ते।। हिन्दी-हे कृशोदरी सुमुसी चन्द्रमा के समान कान्ति वाली स्त्री | रेट की जह कुश कास तथा गोस की जड़ों के करक से पकाया हुआ दूध, गर्भिणियों के शूल को शान्त करता है ॥ १८॥ स्तनरोगहरो लेप सुन्दरि कामिनि मनलमूत्रं यौवनशालिनि निर्मलवृत्ते । शाम्यति सत्वरमेव विशालामूलविलेपनतस्तनपोडा ॥ ४९ ।। व्याख्या-सुन्दरि रमणीये, कामिनि वासनायुक्ते मालमूर्ते सोम्याकृतिमति, यौवन- - - ६६ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - - शालिनि नवोदयौयने निर्मलवृत्ते सच्चरित्रवति विशालामूलविलेपनत• इन्द्रवारुणीमूल- लेपात् स्तनपीडा सत्वरमेव यथाशीघ्र शाम्यति । यथाइ चक्रपाणि विशालामूललेपस्तु हन्ति पीडा स्तनोत्थिताम् ॥ चक्रदत्ते ।। हिन्दी-सुन्दरी कामिनी सौम्य आकृतिवाली युवती तथा सञ्चरित्र रत्रकला। इन्द्रायण की जड़ का लेप स्तनों की पीड़ा को शीघ्र ही शान्त करता दोधकवृत्तम् ॥४९॥ सर्वेश्वररसप्रयोग- अशुभेपु गदेषु भीरुमुख्य सखि ! सर्वेश्वर एव सेवनीय. । सगुणो निरपत्यताकुठारः पवमानो द्विपदन्तकार्तिहारी ।। ५० ।। व्याख्या-हे भीरमुख्ये कातरस्वमावप्रधाने सखि ! अशुभेपु कुष्ठादिरोगेपु सर्वेश्वर सर्वश्वरलौह एव सेवनीय , यतो हि एप लोह. सगुण सद्गुणे पूरित निरपत्यताकुठार सन्तानप्रद वीर्यवर्धकत्वात् , पवमान वायु द्विपच्छत्रु अन्तको मृत्यु. तस्याति. नस्या- हारी विनाशकारी सम्प्रदिष्ट । मालभारिणीवृत्तम् । सर्वेश्वरलौह- शुद्धसूत पल गन्ध द्विपलन्तु मृताभ्रकम् । त्रिपल मृतताम्रश्च पलार्द्ध स्वर्णमाक्षिकम् ।। जैपाल चित्रक मान शूरण घण्टकर्णकम् । ग्रन्थिक त्रिफलाव्योप त्रिवृता खर मारी ॥ दण्टोत्पला वृश्चिकाली कुलिश नागदन्तिका । सूर्यावर्तञ्च सन्चूर्ण्य कर्षमान विमर्दयेत् ॥ आर्द्रकस्य रसैरेव चूर्णयित्वा पुन क्षिपेत् । त्रिपल लौहचूर्णस्य तत खादेच्छुभेऽहनि ।। सम्पूज्य भास्कर विष्णु गणनाथ द्विजोत्तमम् । गुञ्जाद्वयश्च मधुना कृत्वा शीतजल पिबेत् ।। चूर्ण सर्वेश्वर नाम सर्वरोगहर मवेत् । कठोरप्लीहनाशाय गुल्मोदरहर तथा । कामला पाण्डमानाह यकृतकृमि कृतामयान् । विचर्चिमम्लपित्तञ्च कण्डू कुष्ठ विनाशयेत् ॥ प्लीहानमस्रपित्तचाप्यग्निमान्द्य सुदुस्तरम् । श्रीकर पुत्रजनन शुक्रायुर्वलवर्धनम् ॥ मै० र०॥ हिम्दी-हे भीरुस्वभाववाली रत्नकला कुष्ठ आदि अशुभ रोगों में सर्वेश्वर लौह का सेवन करना चाहिये। इसमें अनेक गुण हैं । यह सन्तान कारक, वातरोग रूपी शत्रु का नाशकर्ता एवं अकाल मृत्यु से भी बचाने वाला है। विशेष—यह योग सचमुच सर्वेश्वर=सवका स्वामी अथवा सव योगों का स्वामी है। किन्तु इस नाम से चिकित्सा ग्रन्थों में अनेक योग देखे जाते हैं जिनके प्राय द्रव्य अलग-अलग हैं, इसके लिये गुल्म कुष्ठ वातरक्क आदि प्रकरणों को देखें ॥५०॥ इति श्रीमहोलिम्बराजविरचिते चमत्कारचिन्तामणी विविधरोगप्रतीकारो नाम तृतीयो विलास ।

गया अथ चतुर्थो विलासः तत्र प्रथम प्रस्तावना- माणिक्यावलिविलसत्पदारविन्दे, सानन्दे बहुलरुजां श्रुताश्चिकित्साः। अल्पानां किमिति कृशेशृणोपि नत्वं, विक्रीते करिणि किमङ्कुशे विवादः॥ व्याख्या-माणिक्यावलिविलसत्पदारविन्दे मौक्तिकमालामि विलसित पदमेव अरविन्द कमल यस्या. सा तत्सम्बुद्धी सानन्दे प्रसन्नमुखमुद्रे कृशे कृशोदरि ! त्वया बहुलरुजाम् अनेकरोगाणा चिकित्सा रोगापनयनपद्धतय श्रुता , त्वम् अल्पाना रुजाम् अवशिष्टस्वल्प- रोगाणा चिकित्सा किमिति कयद्वार न शृणोपि न आकर्णयसि, यतो हिं विक्रीते करिणि गजमूल्ये प्रदत्ते सति किमङ्कुशे विवाद स्वल्पमूल्यवति वस्तुनि अङ्कुशे निवादेन को लाम । प्रहर्पिणीवृत्तम् । हिन्दी-मणिगण जटित पायलों से शोभित चरण कमल वाली, प्रसन्न चित्त युक्त कृशोदरी ! तुमने ज्वर आदि अनेक रोगों की चिकित्सा सुनी, भव थोड़े से रोगों की चिकित्सा शेप है उसे क्यों नहीं सुनना चाहती हो, क्योंकि जब हाथी धिक तो अङ्कुश के मूल्य में क्या झगड़ा। विशेष-इम पद्य से यह ज्ञात होता है कि भगवती सप्तशृगी के प्रसाद से अविरल काव्यधारा के प्रवाह में तत्पर अधान्त कवि लोलिम्यराज समस्त रोगों की चिकित्सा को कह देना चाहते हैं किन्तु सुकुमारी रत्नकला थक जाने के कारण विश्राम चाहती है ॥ १ ॥ क्षयरोगचिकित्सा- अयि सुन्दरि सुन्दरानने रुचिरापाङ्गतरङ्गलोचने। नवनीतमधूपलाशनादुडुराजोऽपि भवेत्क्षयक्षयः ॥२॥ ण्याख्या-अपि सुन्दरि सौम्याकारे सुन्दरानने सुन्दर रुचिरम् आनन मुख यस्या सा तत्सम्वोधने, रुचिरापाङ्गतरालोचने रुचिरौ शोमनौ यो अपाली नेत्रान्तौ तयोस्तरङ्गा वीचय ययोस्तादृशे लोचने नेत्रे यस्या सा तत्सम्बोधने नवनीतम् हैयगवीन मधु माक्षिक उपला शर्करा प्रयाणामेतेपामशनाट् मक्षणाद् उडुराजोऽपि नक्षत्रेशस्याऽपि, राज़ दोप्तो कि , क्षयो राजयक्ष्मा तस्य क्षयो भवेत् ॥ वियोगिनीकृतम् । शर्करामधुसयुक्त नवनीत लिइन् क्षयो । क्षीराशी लमते पुष्टिमतुल्ये चाज्यमाक्षिके ॥ चक्रदत्ते ।। हिन्दी-हे सुन्दरी प्रसम्ममुख वाली रक्तिम नेत्र प्रान्तों से सुशोमित रनकला! ७ च० चि० - ६८ वैद्यक चमत्कारचिन्तामणिः मक्खन, मधु और मिश्री को मिलाकर सेवन करने से चन्द्रमा का भी क्षय रोग क्षीण हो जाता है। मनुप्यों की तो बात ही क्या है। विशेष-अनुपान के लिये मधु नवनीत अथवा मधु घृत की समान मात्रा नहीं होनी चाहिये ।। २२ अथ व्रणप्रतीकारमाह- सुतनो ! सुतनोस्त्वमौपधं सकलं वेत्सि परन्तु वच्म्यहम् । त्रिफलाजनितः कपायकः सहितो गुग्गुलुना व्रणं जयेत् ॥ ३॥ व्याख्या-हे सुननो रत कले। सुतनो गोमनगरीरवतो राजकुमारादिकम्य त्व सकलम् अखिलम् औपध वेत्सि परन्तु तथापि वच्म्यह कथयामि गुग्गुलुना गुग्गुलुर्दवथूप तेन सहितः मिलित त्रिफलाजनित फलत्रिकोत्थ कपायक काथ' व्रणम् म जये विनाशयेत् । यथाह चक्रपाणि - ये छेदपाकनुतिगन्धवन्तो व्रणा महान्त' सरुज सशोथा । प्रयान्ति ते गुग्गुलमिश्रितेन पीतेन शान्ति त्रिफलारसेन ॥ चक्रदत्ते ।। हिन्दी-हे रत्नकला ! तुम सुकुमारों के सभी रोगों की गोपधि जानती हो फिर भी मै तुमसे कहता हूँ-शुद्ध गुग्गुलु के माथ त्रिफला का क्वाथ पीने से व्रण नष्ट हो जाते हैं। वियोगिनीवृत्तम् । विशेप-त्रिफला के हाथ में रत्ती की मात्रा में शुद्ध गुग्गुल मिलाकर पीना चाहिये । यह एक सामान्य मात्रा का निर्देश है ॥ ३ ॥ स्थूलत्वहरो योग मदनज्वरकारिनामवेये शृणु सवेणि सुवाणि वर्णिनि त्वम् । प्रपिचन् समधूदकं प्रभाते गणनाथोऽपि भवेत् किलास्थिशेपः॥४॥ व्याख्या-मदनज्वरकारिनामधेये मदनज्वर कामज्वर करोति तच्छील नामधेय नाम यस्या सा तत्सम्बुद्धी हे. रलकले ! सद्वेणि सत्केशपाशे सुवाणि मधुरालापवति वणिनि महिलाग्रगण्ये त्व शृणु, प्रभाते प्रात काले समधूदक मधुमिश्रित जल गणनाथोऽपि रन्वोदरो ऽपि प्रपिवन पान कुर्वन् सन् अस्थिशेप अस्थिमात्रावशिष्ट भवेत् किलेति योगस्य प्रसिद्धि । - चक्रपाणि- रप्या चक्रदत्ते- प्रातर्मधुयुत वारि सेवित म्यौल्यनाशनम् । उष्णमन्नस्य मण्डश्च पिवन् कृशतनुर्भवेत् ॥ स्थौल्यरोगे पथ्यम्- श्रमचिन्ताव्यवायाध्वक्षौद्रजागरणप्रिय हन्त्यवश्यमतिस्थौल्य यवश्यामाकभोजन ॥ अस्वप्नश्च व्यवायश्च व्यायाम चिन्तनानि च । स्थौल्यमिच्छन् परित्यक्तु कमेणाति प्रवर्धयेत् ॥ तत्रैव ।। -

चतुर्थो विलासः
६६
हिन्दी-फामदेव को भी कामज्वर से सताने वाली सुन्दर चोटी तथा वाणी
से
चुक्त
स्त्रियों में सर्वश्रेष्ठ रनकला । यदि सब से प्राचीन
स्थूलता
करोगी गणेश
जी भी शहद का शर्वत बनाकर प्रतिदिन प्रात काल पीने लगें तो उनकी भी
हड्डियों शेष रह जायेंगी । मोटाई की तो बात ही क्या कहनी है।
मालभारिणीवृत्तम्।
विशेप--इसका प्रयोग लाभ करता है। गणेश जी की स्थूलता दूर होने से
प्राचीन रोग में भी लाभकारक है, यह सिद्ध होता है ॥ ४ ॥
पुष्टिकरो योग
सदये सदये सरोजराजीरजसोरोजगिरी विराजमाने।
सुभगे सुभगे कृशस्य पुंसस्तिलकोपृष्ठकृतोऽतिपुष्टिहेतुः ॥५॥
व्याख्या-उरोज पयोधर स एव गिरि उन्नतत्वात् तस्मिन् या मरोजाना परिस
तस्या रजमा विराजमाने स्थिते, सदये सदये इत्यानेडितम् अर्थात् अतीव दयाशीले अथवा
नत् समीचीन अय शुभावहो विधि यस्या तत्सबुद्धी दयया सहिते सदये, सुभगे सत्कीर्ति-
युक्ते सुमगे ऐश्वर्यशालिनि नुष्टु भग यस्या तत्सबुद्धौ रत्नकले । अङ्गुष्ठकृत कृशस्य पुस
अनुष्ठवत्कार्य गतम्यापि मानवस्य तिलक क्षुरक पुष्पविशेप पुष्टिहेतु स्वास्थ्यकृद् भवति,
'भग श्रोयोनिवीर्यच्छाशानवैराग्यशीतियु। माहात्म्यैश्वर्य यत्नेषु धर्म मोक्षेऽथ ना रवी' इति
मेदिनी।
तिलकस्य गुणानाह- तिलक क्षुरक श्रीमान् पुरुपदिछन्नपुष्पक ।
तिलक कटुक पाके रसे चोष्णो रसायन ।
कफकुछकृमीन वस्तिमुसदन्तगदान् हरेत् ॥ अ० नि० ॥
हिन्दी-कमलपराग से मुशोभित उन्नत स्तनों वाली, अत्यन्त दयामयी,
कीर्ति एव ऐश्वर्यशालिनी रनकला अगुष्ट के समान दुबला पतला मानव भी
तिलक (पुप्पविशेष) की छाल का विधिवत् मेवन करने से हृष्ट-पुष्ट हो जाता है।
मालभारिणीवृत्तम् ।
विशेष-प्राचीन काल में स्तनों के ऊपर चन्दन, केशर, कस्तूरी आदि शीतल
एव सुगन्धित पदार्थों से पत्र रचना की जाती थी। यहीं पर कवि ने उसी का
स्मरण दिलाया है ॥५॥
शोफप्रतीकारोपाय
कान्ते मृणालवलये ललिते सुलास्ये-
त्रैलोक्वशालिनि रसालरसालचित्ते।
शोफ किरातकमहोपधयोः कषायो-
दूरीकरोति रघुनाथ इवारिवीरम् ॥ ६॥

१०० वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः व्याख्या-मृणालवलये विमकटके ललिते सुन्दरि मुलास्ये ननकुशले त्रैलोक्यशालिनि अतिशयशोभायुक्ते रसालरसालचित्त रसालवद रसाल रसमरित चित्त यस्या सा तत्सम्बुद्धी, किरात तिक्त महौषध शुण्ठी एतयो कपाय शोफ शोथ तथा दूरीकरोति यथा रघुनाथ अरिवीर रावणम् । वसन्ततिलकावृत्तम् । इति शोफप्रतीकार । विशेप-हे कमलनाल का कंकण धारण करने वाली रतकला! चिरायता और सोठ का वाथ उस प्रकार शोथ का विनाश करता है जिस प्रकार राम ने अत्यन्त वीर अपने यात्रु रावण का विनाश किया ॥६॥ वातजतृपानाशनो योग शृणु पद्मिनि । पद्मिनीद्यते सुवि पझोपमिते सपनके। सगुडं दधि सेवितं तृपं पवमानप्रभवां नियच्छति ॥ ७॥ व्याख्या-हे पभिनीधुने पभिन्या कमलिन्या घुतिरिव धुति यस्या सा तत्सम्बुद्धी, मुवि पृथिव्या पद्मोपमिते कमलेन सदृशे सपम्मके विकचपुण्टरीकालङ्कृते इत्थम्भूते हे पभिनि शृणु । अनेन सम्वोधनेन रलकलाया पभिनीनायिकात्वमभिव्यज्यते। सगुडम् इक्षुविकारेण सहित दधि पवमानप्रभवा तृप वातजा पिपासा नियच्छति निवारयति । यथाह चकपाणि.- - तृष्णाया पवनोत्थाया सगुट दधि शस्यने । रसाश्च वृणा शीता गुडच्या रस एव च ॥ चक्रदत्ते ।। प्रसङ्गवशात् पित्तजत्तृष्णाचिकित्सापीह समुद्धियते, यथाइ ढल्हण - पित्तनवगैस्तु कृत कपाय सशर्कर क्षौद्रयुत सुशीत । पीतस्तृपा पित्तकृता निहन्ति क्षोर भृत वाप्यथ जीवनीयै ।। पित्तन्नवर्गे काकोल्यादिगण तथा उत्पलादिगण पठित । वियोगिनीवृत्तन् । हिन्दी-कमल के सदृश शोभा युक्त, कमल की उपमा से विभूषित कमल को धारण करने वाली हे पनिनी नायिका रनकला | गुड़ के साथ दही का सेवन वात- जन्य पिपासा को शान्त करता है॥ ७ ॥ - - विपापहरणविधि कामकेलिचतुरे मनोहरे पीवरोरु मधुराधराधरे । मेघनादरजनीरसो वुधैरीरितो विषविनाशकारकः ॥ ८॥ व्याख्या-कामकेलिचतुरे रतिक्रीडानिपुणे मनोहरे चेतोहरे पोवरोरु पीनसक्यिमति मधुराधरे मधुर आस्वायश्च य अधर त धरतीति धरा तत्सम्बुद्धौ, मेघनाद तण्डुलीयक रजनी हरिद्रा तयोः रस बुधै विपनाशकारक ईरित कथित । रथोद्धतावृत्तम् ।

चतुर्थो विलासः १०१ हिन्दी-रति-क्रीडा-कुशल मन को वश में करने वाली मांसल जांघ पाली तथा मधुर अधर से सुशोभित रनकला। हल्दी का चूर्ण चौलाई के रस के साथ सेवन करने से सामान्य विप का विनाश होता है ॥८॥ वानरक्तप्रतीकारमाह- रतिकेलिकलाकुशले ललने विमले मलयाचलतुल्यकुचे। अमृतव्रतती रुघुतैलयुता शमयेदनिलानमुदारतरम् ॥ ९॥ व्याण्या-रतिकलिकलाकुशले रती सुरते या केलय परीहासा तासु सुरतकीटासु या कला ताम कुशला शिक्षिता या सा तत्सम्बुद्धी, ललने रामे विमले निर्मले मलयाचल- तुल्यकुचे मलयेन चन्दनाद्रिणा समानी स्थूलत्वेन कठिनत्वेन शीतलस्पर्शवत्वेन च तुल्यौ समानाकारी कुचौ स्तनी यस्या मा तत्सम्बुद्धी रुनुतैलयुता एरण्डतैलेन सहिता अमृतबनती गुहची लता उदारतरम् मनिलाल प्रवृद्ध वातरक्त शमयेत् । अत्र चरकोक्त वातरक्तनिदानम्- वायु प्रवृद्धो वृद्धेन रक्तेनावरित पथि। कृत्स्न सन्दूपयेद्रक तज्ज्ञेय वातशोणितम् ।। एप योगश्चक्रपाणिनापि चक्रदत्ते समुद्धृत तथा- वृतेन वात सगुटा विवन्ध पित्त सिताट्या मधुना कफञ्च । वातासगुण सबुतैलमिश्रा शुण्ठ्यामवात शमयेट् गुडूची । अयमेवाविकल पाठो भपज्यरत्नारल्यामपि दृष्टिपथमायाति । तोटकवृत्तम् । हिन्दी-रति-क्रीडा में निपुण प्रिया स्वच्छ एव मलयाचल के सदृश शीतल सुगन्धित स्थूल तथा उन्नत स्तनों वाली रस्नकला । रेड़ी के तेल के साथ गिलोय का सेवन भीषण वातरक्त को शान्त करता है ॥९॥ विमूचिकाएरो योग लशुनजीरकगन्धकसैन्धवत्रिकटुरामठचूर्णमिदं समम् । जयति निम्घुरसेन विसूचिकां हृदयहारिविहारिणि वत्सले ॥ १० ॥ व्याख्या-विहारिणि विदरणशीले वत्सले प्रियतमे रत्नकले लशुन' रसोन जीरक अजाजी सैन्धवम् सिन्धुज लवण गन्धक सौगन्धिक त्रिकटु विश्वोपकुल्यामरिचात्मक त्र्यूपण राम हि लशुनादीनां समाहार. (समाहारे नपुसकम् ) एतेपा सम समानभाग चूर्ण निम्युरमेन, निम्बुफजलेन भाविन हृदयहारि सुस्वादु एतच्चूर्ण विसूचिका रोगविशेप हरति । द्रुतविलम्वितवृत्तम् । विमूचिकास्वरूपम्-सूचीभिरिव गात्राणि तुदन् सतिष्ठतेऽनिल । यत्राऽजीर्णन मा वैद्य विसूचीति निगयते ।। हिन्दी-हे मनोहर पिहार प्रिय रनकला। लशुन, जीरा, शुद्ध गन्धक सैन्धा- नमक, सोंठ, मरिच, पीपल, हींग इन सब का समभाग चूर्ण लेकर नीबू के रस -

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१०२
वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः
की भावना देकर गोली बनाकर सेवन करने से विसूचिका ( हैजा) का शमन
होता है। यह योग अत्यन्त प्रसिद्ध है ॥ १० ॥
क्रिमिविनाशनो योग
निकटुनिफलानिवृत्कलिङ्गः खदिरोग्रापिचुमन्दजः कपायः।
पशुमूत्रसमन्वितो निपीतः किमिकोटीरपि हन्ति हन्ति वेगात् ॥ ११ ॥
व्याख्या-त्रिकटु यूपण त्रिफला फलनिक त्रिवृत् विमटी कलिङ्गम् इन्द्रयव खदिर'
रक्तसार उग्रा वचा पिचुमन्द निम्ब तन पशुमूत्रमजामृत्र तेन समन्वित. युक्त कपाय
वेगात् किमिकोटीरपि बहुमर याकान् किंवा बहुविधान् क्रिमीन् हन्ति मारयति । अत्र
द्वितीयहन्तिप्रयोग' निश्चयेन विनागयतीनि सङ्केतयति एनेनोदरस्था क्रिमय भ्रियन्ते
पुरीपेण सह बहिरायान्ति च । द्रुतविलम्बितवृतम् ।
हिन्दी-सौंठ, मरिच, पीपल, हन, चहेता, आँवला, निशोथ, इन्द्र जी, खैर
की छाल, वाल चच, नीम की छाल इनका कपाय गोमूत्र के साथ लेवन करने से
शीघ्र ही क्रिमियों का विनाश हो जाता है ॥१३॥
मुखपाकप्रतीकार माह-
अमृतासुमनःप्रवालदा:त्रिफलादीप्यकगोस्तनीकपायः ।
कवलग्रहणान्मुखस्य पाकं मधुमिश्रः शमयेदशेपमाशु ॥ १२ ॥
व्याख्या-मधुमिश्र क्षौद्रसयुक्त अमृता गुइची सुमन प्रवाल जातीपलव दार्वी
दामहरिद्रा वा अमृता गुढ़ची सुमन पुष्प दावीप्रवाल दामहरिद्राकिसलय त्रिफला
फलत्रिक दीप्यक अजमोदा गोस्तनी मृदीका द्रव्याणामेतेपा कपायै कवलग्रहणाद्
ग्रासवटमुसे धारणाद् मुसस्य अशेप पाकन् आशु शीघ्र शमयेत् । द्रुतविलम्वितवृत्तम् ।
हिन्दी-गुरुच के फूल, दारुहल्दी के कोमल पने या गुरुच, चमेली का पल्लव,
दालहल्दी, हरद, बहेड़ा, आवला, अजवायन, मुनझा, इनके साथ में शहद मिला-
कर कवलधारण करने से सभी प्रकार के मुखपाक शीघ्र शान्त हो जाते
विशेप-कवल-ग्राम का धारण, जिस प्रकार भोजन करते समय कोई भी
खाद्य पदार्थ मुख में उतना ही डाला जाता है जितना इधर उधर हिलाया जा सके
उसी प्रकार औषध द्रव्यों से साधित क्वाथ को मुख में रखकर हिलाते रहते हैं
कुछ देर बाद थूक देते है इसके साथ मुखगत दोप भी लार के रूप में निकल
जाते हैं ॥ १२॥
अथ प्रमेहप्रतीकारमाइ-
अमृतास्वरसो निपेवितः सन् सकलं सेहमपाचरीकरीति ।
विपरीतरते रते नितान्तं यमिनां धैर्यमिवागनाकटाक्षः ॥ १३ ॥

चतुर्थों विलासः
१०३
व्याख्या-हे विपरीतरते पुरूपायितप्रिये रत्नकले यथा रते सुरते अङ्गनाकटाक्ष त्रिय
हावभावादि यमिना नियमवता ( अपि ) धैर्य धीरता नितान्तम् अत्यन्तम् अपाचरीकरीति
दूरीकरोति तथा अमृतास्वरस निपेविस प्रयुक्त सन् सकल सर्वविध मेह, प्रमेहमिति
पूर्वणान्वय । यथोक्तम्-गुडच्या स्वरस पेयो मधुना सर्वमेहजित् । वियोगिनीवृत्तम् ।
हिन्दी-हे विपरीतरतिप्रिय रत्नकला | जिस प्रकार मैथुन काल में नायिका
के कटाक्ष बड़े बड़े स्यमी पुरुषों को धैर्यच्युत कर देते हैं उसी प्रकार गुडुची के
रस के सेवन से कठिन प्रमेह दूर हो जाते है ॥ १३ ॥
हृदरोगेपु अर्जुनप्रयोग
ये सन्ति केचिद् हृदयस्य रोगाः सर्वेऽपि ते यान्ति शमं त्रिरात्रात् ।
बेत् पार्थकल्कं स्वरसं प्रसिद्धं सर्पिनिवेत नरः सपथ्यः ॥ १४ ॥
व्याख्या-चेट् यदि सपथ्य पथ्येन सहित हिताहारविहारादिभि युक्त नर पुमान्
पार्थकल्क पृथाया अपत्य पुमान् पार्थ अर्जुन ककुभ वृक्षविशेष तस्य त्वचया सिद्ध कल्क
किं वा स्वरसन अथवा एतन्नाम्ना प्रसिद्ध सर्पि द्रोगापनयने प्रख्यात घृत निपेवेत
प्रजीत तहिं ये केचित् समस्ता हृदयस्य हत्सम्बन्धिनो रोगा. सन्ति ते सर्वेऽपि निरावात
प्रयाणा रात्रीणा ममूह विराम तस्मात् दिनत्रयस्य सेवनात् शम शान्ति यान्ति । यथाह
चक्रपाणि चक्रदत्ते-
'पार्यस्य कल्कस्वरसेन सिद्ध शम्तं घृत महदामयेपु।' इति अर्जुनघृतम् । एप योग.
भैपज्यरत्नावत्यामपि दृश्यते हृदरोगेषु अर्जुनस्य बदुविधा प्रयोगा प्रसिद्धा ग्रन्थान्तरेपु
समुपलभ्यन्ते । इन्द्रवजावृत्रम् ।
हिन्दी-यदि हित आहार-विहार करने वाला मनुष्य अर्जुन की छाल का
कएक-चटनी उसी का ग्वरम अथवा अर्जुन घृत का सेवन करे तो जितने भी
हृदय सम्बन्धी रोग है वे सब तीन दिन में शान्त हो जाते हैं।
विशेष-यद्यपि ग्रन्थकार ने अर्जुन की छाल का कल्क, स्वरस और घृत का
अलग अलग प्रयोग लिया है किन्तु घृत-निर्माण में भी इन तीनों की एक साथ
आवश्यकता पड़ती है जैसा कि चक्रपाणि ने लिखा है-चिकित्सा-ग्रन्थों में हृदय
रोग की शान्ति के लिये विविध प्रकार से अर्जन का प्रयोग देखा जाता है,
अर्जुन-सिद्ध क्षीर, अर्जुन चूर्ण, अर्जुनादि काथ, अर्जुनाचवलेह, अर्जुनारिष्ट
आदि-आदि ॥ १४ ॥
पामाप्रतीकारक-
रसद्विजीरद्विनिशामरीचसिन्दूरलेलीतमनःशिलानाम् ।
घृतेन युक्तैरपयाति पामा विपद्यथा शङ्करमन्त्रपाठः ॥ १५ ॥

१०४ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः व्याख्या-रस शिववीज द्विनीरी शुकृष्णभेदाव दो जीरको विनिशे हरिद्रा दारुहरिद्रा च मरीचम् ऊषण सिन्दूर नागसम्मव लेलीत गन्धक मन शिला कुनटी चूर्णीकृतघृतेन युक्तराज्यसयुक्तैरेभिव्यै पामा कच्छू तथा अपयाति यथा शङ्करमन्त्रपाठ. विपद् कष्ट ( याति)। उपनातिवृत्तम् । हिन्दी-शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, सफेद जीरा, काला जीरा, हल्दी, दारुहल्दी, मरिच, शुद्ध सिन्दूर, शुद्ध मैनशिल इनको पीसकर गाय के घी में मिलाकर लगाने से खुजली रोग उस प्रकार दूर हो जाता है जिस प्रकार भगवान् शकर को माराधना से विपत्ति। विशेष-पारद, गन्धक, सिन्दूर तथा मैनशिल इनका शोधन करके ही उपयोग करना चाहिये अन्यथा ये स्वय भी रोगों को उत्पन्न कर देते हैं। शुद्ध करने के बाद पहिले पारद गन्धक की कजली बनाकर तय शेप द्रव्य ढालें ॥ १५ ॥ निदाघोपचारमाह- रमारम्याकारे चतुरवचने चारुलपने तडिद्वल्लीतुल्ये करतललसन्नीलनलिने । निदाघः सातः किमु तव सरोजन्मकदली- दलैः क्लप्ते तल्पे स्वपिहि यदि सौरभ्यभरिते ॥१६॥ व्याख्या-रमारम्याकार रमा लक्ष्मीस्तटवद् रम्य. स्वभावसुन्दर , आकार आकृति यस्या सा तत्सम्बोधने, चतुरवचने सम्भापणकुशले चारुल्पने मधुरभापिणि, तटिवल्लीतुल्ये विद्युल्लतेव रम्ये करतललसन्नीलनलिने करस्य तलोऽनूर्वभागस्तस्मिन् लसत् शोभमान नीलनलिनम् इन्दीवर यस्या सा तत्सम्बुद्धी तव निदाघ धर्म सभात किम् ? इति प्रश्ने यदि सात तहिं सरोजन्मकदलीदलै फ्लप्ते सरोजन्मन पङ्कजस्य कदल्या. रन्मायाश्च दलानि पत्राणि विरचिते सौरभ्यमरिते सुवासिते तल्पे शय्याया स्वपिहि शयन कुरु । शिखरिणीवृत्तम् । हिन्दी-आकार में लक्ष्मी के सदृश, सम्भापण में प्रवीण, मधुर वाणी वाली, विद्युत् लता के समान चञ्चल, हाथ में नीलकमल को धारण की हुई रत्नकला तुम्हें ल लग गई है क्या ? यदि हाँ तो कमल और केले के पत्तों वाली सुवासित शय्या में सो जाओ ॥१६॥ दुर्नामादिरोगाणा चिकित्सामाह- पथ्यातिलारुष्करकैः समांशैर्गुडेन युक्तैः खलु मोदकः स्यात् । दुर्नामपाण्डुज्वरकुष्टकासश्वासाञ् जयेत् प्लीहयुतस्य पथ्यः॥ १७ ॥ . ।

चतुर्थो विलासः १०५ म्याण्या-पध्या हरीतकी तिला कृष्णतिला अरुण करोति अरुष्करको मल्लातक एने समाशे समानमागै गुडेन युक्त खलु निश्चये मोदको लट्बुक स्यात्, अस्य प्रयोग दुर्नामा अर्श पाण्डु ज्वर कुष्ठ कास श्वास च सर्वानेतान् रोगाम् जयेत् एप मोदक प्लीहयुतम्य रोगिण पथ्य शारशेपु प्रदिष्ट । इन्द्रवजावृत्तम् । गुटपाकपरीक्षा- सुखमद सुखस्पर्शा गन्धवर्णरसान्वित । पीटितो मजते मुद्रा गुड. पाकमुपागत ॥ हिन्दी-हरद, तिल और शुद्ध मिलावा इन तीनों को समान भाग लेकर इन सय का दूना गुढ लेकर गुढपाक-विधि से पकाकर लब्द्ध बना लें। इसके सेवन से बवासीर, पाण्ड, ज्वर, सामान्य कुष्ट, कास तथा श्वास का शमन होता है। यह मोदक प्लीह रोगी के लिये भी हितकर है ।। १७ ॥ अथ गण्डमालाप्रतीकारमाह- भल्लातकासीसहुताशदन्तीमूलैर्गुडम्नुनविदुग्धदिग्धैः। प्रलेपितैर्गच्छति गण्डमाला समीरपूरैरिव मेघमाला ॥ १८ ॥ व्याख्या-महातको वीरक्ष कासीसम् उपधातुविशेष हुताशचित्रक दन्तामूल, एरण्डनटा एमिश्चतुमि कीदृशै गुटस्नुग्रविदुग्धदिग्धै गुडेनेक्षुविकारेण स्नुहीदुग्धेन, अर्कदुग्धेन च दिग्ध म्फीत प्रलेपित लिप्ते गण्टमाला तथा गच्छति यथा समीरपूरै वायुवेग मेघमाला गच्छति लुप्ता भवति । एप गण्टमालाया ग्रन्धि विदार्य तच्छान्ति करोतीति व्यवहार , योगोऽय कतिपयद्रव्यविकल्पनेन भैपज्यरलावरयां परिदृश्यते, तद्यथा- दन्ती चित्रकमूलत्वक स्नुपर्कपयसी गुढ । मल्लातकास्थि काशीश लेपो मिन्धामिछलामपि ।। इममेव योग चक्रपाणि चक्रदतेऽप्याह । उपजातिवृत्तम् । हिन्दी-भिलावा, हीरा फासीम, चीता की छाल, जमालगोटा की जड़, रेद की जद इन चार वस्तुओं के चूर्ण को गुढ सेहुण्ड का दूध मदार का दूध में मिलाकर लेप करने से गण्डमाला उस प्रकार नष्ट हो जाती है जिस प्रकार वायुवेग से मेघ नष्ट हो जाते हैं।॥ १८॥ यन्लपित्तचिकित्मामाह- भूनिम्बनिम्वत्रिफलाकलिङ्गवासामृतापर्पटभृगराजैः। क्वाथ. समेतो मधुना निपीतो विनाशयेदुल्वणमम्लपित्तम् ॥ १९ ॥ व्याख्या-भूनिम्व चिरतिक्त निम्ब पिचुमर्द त्रिफला फलनिक कलिङ्ग कुटन वासा आटरूपक अमृता गुढची पर्पटो वरतिक्त भृगराज भृत मधुना समेत मोद्रेण मिलित एतेपा काथ निपीत सन् , उल्वणम्प्रवृद्धम् अम्लपित्त विनाशयेत् । यथाइ चक्रपाणिवक्रदत्ते- वासामृतापर्पटकनिम्यभूनिम्यमार्क. । त्रिफलाकुलकै काथ सझौद्रश्चाम्लपित्तहा ॥ -- .

१०६ वैषक-चमत्कारचिन्तामणिः हिन्दी-चिरायता, नीम, दरर, योदा, आंवला, पुटा की हार, अदमा, गिलोय, पित्तपापा और भृाराज का जाय गद मिठार पीने मे चढ़ा हुमा सम्लपित भी मानत हो जाता है. पत्रात्तम् ॥ १९ ॥ जामताप्राकारमा- चूर्णा. कपाया गुटिका तानिनेलानि मांगन नियोजिनानि । विलासिनां चानविनाशनार चिन्द्राग्निनीना परिभणानि ॥२०॥ व्यागना- याविनानि मनि II, मुटिश ना ना भरेत मितानि पानि , निना यानि मामार नियो नि पानानि लमका गतिविभिना माना चाममा गगनाना पीना परिन नानि नलगानानि प्रगान मार-गि । वन्य प्रयोग पुनपुसकायो मन 1 उपजागिर हिन्दी-चाननाशक ओपधियों से निमित री, माध, गोरी अथवा उन्दी समीपधियों से मिन्द किये हुए वी और तेल सामान्य वान रोगों को शान्त करते हैं किन्तु कामीजनों की रोगशानि के लिये कामिनियों का आरिहनही वानरोग नाम होता है। ऐसा ग्रन्थकार का मत है ॥ २० ॥ पित्तप्रकारमार- अमृतममृतजं निराकरोति इतसुपलाकलितं करालपित्तम् । तरुण इव नितम्बिनीनितम्बाम्बरमतनुज्वरजर्जरीकृतान ॥ २१ ॥ गाख्या-अमृतम पृतज अताजातन् जतज गुरची किंवा अाज गुहनीप्रभवा गृत ल या अमृत दुग्ध तन लम् उपलाकानि सरया मिश्रित पारालपित्तन् उला पित्त त पा निराकरोति दूरीको प्रगमयतीत्यर्थ , यथा अतनुज्जरजर्जरोताह अनु काम तलनिर्तन अरेण जर्जरीझतन् यय TT युवा पुरुप नितम्बिनी कामिनी तन्य नितम्याम्बर माटिका निराकरोतात्यभिप्राय । पुप्पितामात्तन् । हिन्दी-मिश्री मिला हुआ गिलोय का स्वरस अथवा घी बटे हुए पित्त दोप को उम प्रकार हटाता है जिस प्रकार काम-वासना से प्ररित पुस्प कामिनी के भधानस को । अर्थात् यह शीघ्र ही पित्त का शमन करता है ।। २१ ॥ कफप्रतीकारमाह- मनस्विनी सुभ्र सुचञ्चलाक्षि घनस्तनश्रोणितटाभिरामे । कफप्रकोपस्य शमाय योग्यो योगो यथाऽयं न तथान्ययोग. ॥२२॥ व्याख्या-हे सुभ्र शोमनभ्रूलतायुक्त सुचञ्चलाक्षि चपलनयने धनस्तनश्रोणितटामिरामे निविटकुचस्त्रीकटिप्रदेशेन रमणीये रलकले । कफप्रकोपस्य प्रवृद्धस्य श्लेष्मदोपस्य शमाय - चतुर्थो विलासः १०७ - शान्तये योग्य समर्थ यथाय मनम्विनी स्त्रीनेशनरूप. योगोऽस्ति तथा तद्विध भन्यो योगो नास्तीति । उपेन्द्रवजावृत्तन् । हिन्दी-हे सुन्दर भौह, चजलनेत्र, रमणीयम्तन तथा जाबों से गोभित रस्नकला। बढ़े हुए कफ दोप की शान्ति के लिये जितना लाभप्रद मनम्विनी श्री का सेवन है उतना दुसरा कोई योग नहीं है ।। २२ ॥ अपरा योग कफाद् भवति भो भीरु ! च्छिन्नावाथो मधूदनः । अम्यार्थी लभ्यत नब तन्वनि तब सध्यवत् ।। २३ ॥ व्यागया-भो भोग । मयाले मधूदर मधु बदम् उदरे यम्य न छिना गुही तस्या पाथ कपाय कफाद कफविनामर भरति । कफ माम् अत्तीति कफाट । नवनि रुगोदर तर म यर कटिप्रदेशयद् अत्य अयमुपार लिसिनो नव लभ्यते यथा वस्त्रातस्तव कटिप्रदेश । यथातर कटिवज्ञापनयनन गमवाधिकारि कटि प्रत्यत्री मति नान्यस्य तथैवाधिकारिण पण्डितस्याप्यस्यार्य प्रत्यक्षो भवताति मात्र । कर्तृगुप्त । अनुहन्द । हिन्दी-डरपोक स्वभावशाली कृशोदरी । मयुमिश्रित गिलोय का काय कफ नाशक होता है। इस पद्य का अर्थ माधारण रूप से इस प्रकार प्रतीत नही होता जसे साढी से ढका हुगा तुम्हारा मध्यभाग (कमर)। अर्थात् इस पद्य में कफाट् यह प्रणमा विभक्तिका रूप है, पञ्चमी का नहीं ॥ २२ ॥ ऊगस्तम्मचिकित्साविधि- पुनर्नवानागरदारूपथ्या-भल्लातकच्छिन्नराहाकपायः । दशानिमियः परिपंय ऊरस्तम्भऽथवा मूत्रपुरप्रयोगः ॥२४॥ व्याख्या-पुनर्नवा गोयनी नागर शुण्टी दार देवदार पच्या दरीतकी भडानक अग्निगुग्र छिनरहा गुडची दमानिमिय पञ्चमूलीमयमाहित वाय ऊगस्तम्भे परिपेय सेव्य अथवा मूत्र गोमूत्र पुर गुग्गुलु एतयो प्रयोग करणाय । उपेन्द्रबजावृत्तम् । अयमाशय गोमूण मद गुग्गु सेवनीय पति । यथा- चक्रपाणि चक्रदत्ते-मलातकामृताशुण्ठी दाम्पश्यापुनर्नवा । पञ्चमूलीहयोन्मिश्रा ऊरुस्तम्भनिवारणा ॥ हिन्दी-पुनर्नवा, मोट, दारहल्दी, हरड, भिलावा, गुरुच, दशमूल इनका काय ऊरुस्तम्भ में पीना चाहिये अथवा गोमूत्र के साथ शुद्ध गुग्गुलु का प्रयोग करना चाहिये ॥२४॥ - २०८ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - - चान्तिप्रतीकारमाद- इभचन्दनलाजकोलमजा-ललनैलाब्दलवंगपिप्पलीनाम् । रजसा समधूपलेन वान्तिः कफपित्तानिलजापि शान्तिमेति ॥२५॥ व्याख्या-म नागकेसर चन्दन रकचन्दन लाना मृटशालय कोलमजाजदरमज्जा एला त्रुटि भय्द मुस्ता लया देवकुनम पिप्पली कणा पा समधूपलेन मधुमिप्रित. शर्करया युक्तेन रजसा चूर्णेन कफपित्तानिलजापि वान्ति यमनं गान्निति प्रशम यानि । किम्पुन साधारणा वान्ति । मारमारिणीवृत्तम् । हिन्दी-नागकेसर, लालचन्दन, लाजा (सील) का चूर्ण, बेर की गुटली, भाम की गुटली, इलायची, नागरमोथा, लोग, पिप्पली इनका चूर्ण मिश्री और मधु के साथ मिलाकर देने से सग्निपातज वमन भी शान्त हो जाते हैं। साधारण की तो बात ही क्या है। विशेष-गर्भिणी स्त्रियों को भी वमन हुआ करता है किन्तु वहाँ इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥२५॥ अथ पाण्डुरोग-प्रतीकार.- अयश्चूर्णतुल्यं वराव्योपवेल्ला-ग्निमुस्तारजालौद्रतकाम्बुकाज्यैः । प्रयुक्तं जयेत् कामलाकुष्ठहदृक्-प्रमेहार्शसां नाशनम्पाण्डुरोगम् ॥२६॥ ज्याण्या-वरा त्रिफला न्योप पिकटु वेल विडा अग्नि चित्रक मुस्ता नुस्तक समेपामैतपा रज क्षोद अयश्चूर्णतुल्य लौहमरमममान क्षोहतकाम्युकाज्यै प्रयुक्त क्षौद्रेण मधुना तऋण उदश्चिता अन्बुना गोमूत्रेण घृतेन वा सेवित पाण्डुरोग जयेद् विनाशयेत् । कामलाकुष्ठहद्दप्रमेहार्शसा नाशन मतम् । एप योग 'नवायसलौह' नाम्ना प्रथितो ग्रन्थान्तरेपु । भुजङ्गप्रयातम् । जवायसलौहम्-त्र्यूपण त्रिफलामुस्तविडङ्गचित्रका नवायोरजसोभागास्तच्चूर्ण मधुमपिपा। भक्षयेत् पाण्डुहदरोग-कुछार्श कामलापहम् ॥ चक्रदत्ते ।। हिन्दी-हरड़, बहेड़ा, भांवला, सोंठ, मरिच, पीपल, वा यविडंग, चीता की छाल, नागरमोथा इन सब को समान भाग लेकर चूर्ण बना लें। इन सब के बराबर लौह भस्म मिलाकर रख लें, इसका सेवन पाण्डुरोग, कामला, कुष्ठ, हृदयरोग, नेत्र रोग, प्रमेह, घवासीर का विनाश करता है। इसका अनुपान-शहद, मठा, गोमूत्र अथवा घी है। विशेष-अन्य चिकित्सा ग्रन्थों में यह योग 'नवायसलौह' नाम से प्रसिद्ध है। चक्रपाणि द्वारा स्वीकृत पाठ ऊपर ध्याख्या में उद्धत है ॥२६ ।। समा । -----

चतुर्थो विलासः
१०६
-
अम्मरीनागनोपाय
अयि निधुवनशीले चञ्चले चञ्चलाभे-
बकुल मुकुलमालाशालिकण्ठप्रदेशे।
रुचिरचरणयुग्माम्भोजगुअहिरेफे
पहलदलकपायः क्षोद्रयुक्तोऽश्मरीघ्नः ॥ २७॥
नाघ्या-अयोति सम्बोधनन् , निधुवनगीले नुरताभ्यासवति, चखलेऽस्थिरे
चञ्चलाने विद्युनिभे वकुलमुकुलमालागालिकण्ठप्रदेश मधुगन्धकुहमलहारमोभिकन्धरे रुचिर-
चरणयुग्माम्भोजगुअद्विरेफे मनोहरपादयुगलपहजशब्दायमानभ्रमरे बद्दलदल मधुगिग्रु
तत्य मधुयुक्त क्षीद्रमिश्रिन कपाय फाय अश्मरीन भवनि । मूमन्तु मूत्रकृच्छू स्यान्मूत्र•
रोधोटमगे च मा। मालिनीवृत्तम् ।
हिन्दी-हे मेधुनामिलापिणी चन्चल स्वभाव वाली बिजली की भौंति कान्ति
वाली, गले में मौलसिरी की माला धारण करने वाली जिमके रमणीय चरणकमलों
में कमल के समान सुगन्धि के कारण भौरे गूज रहे हों ऐसी रत्नकला। लाल
सहजन की छाल का काय मधु मिलाकर सेवन करने से अश्मरी रोग की
शान्ति होती है ॥ २७ ॥
परिणामशूलएरो योग
शिशिरकिरणजिन्मुखारविन्दे पृथुलकलापिकलापकेशपाशे।
शमयति परिणामक सखण्डं समधु रजः कणलोहचेतकीनाम् ।। २३ ।।
व्याख्या-शिशिरकिरण शशाङ्क त जयतीति जिद् इत्थभूत मुखारविन्द मुखकमल
यस्था मा तत्सम्बुद्धी पृथुलकलापिकलापकेशपाशे पृथुलकलापी मयूर तस्य कलाप इव
केशपाग कवसमूहो यस्या सा तत्सम्बुद्धी, तद्वत् कणलोहचेतकीना रज. कणा पिप्पली
लोहरजो लोहमस्म चेतकी हरीतकीमेद एतेपा चूर्ण समधु क्षौद्रसहित सखण्ड शर्करा-
सहितञ्च परिणामकम् एतनामक शुल शमयति विनाशयतीत्यर्थ । तन्निदान यथा-मुक्त
जीर्यति यच्छल तदेव परिणामजम् ।
भैपज्यरलावल्याम्-कृष्णामयालोहचूर्ण लियात् समधुशर्करम् ।
परिणाममव शूल सद्यो हन्ति सुदारुणम् ।।
चक्रपाणिनाप्येष योग चक्रदत्ते निवद्ध किन्तु तत्रानुपानभेद कृत ।
हिन्दी-हे चन्द्रमा से भी सुरूप मुखकमल तथा मयूर के केशयाश से भी
अभिराम केशों वाली रत्नकला। पिप्पली, चेतकी नामक हरड़ का चूर्ण और-
लोहभस्म इन तीनों को मिलाकर मधु और मिश्री के साथ सेवन करने से परिणाम
शूल का शमन होता है। यह शूल भोजन के पचने पर भारम्भ होता है, अतएव
इसको परिणामशूल कहते हैं ॥ २८॥

११० वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः - अन्तविंद्रधिचिकित्सामाह- शिगुरूवुवरुणैः सपिप्पलैर्यामिनीद्वययुतैः कपायकः । वोलचूर्णसहितोऽन्तरुत्थितं विद्गधिं प्रशमयेदसंशयम् ।। २९ ॥ व्याख्या-शिग्रु मधुशिग्रु रुनु एरण्ड वरुण तिक्तशाक एभिर्युतै सपिप्पले. कणामि सहित यामिनीदययुतै हरिद्रादारुहरिद्राभ्यां मिलित तथा वोलचूर्णसहित गन्ध- रसमिश्रित कपायक काथ अन्तरुत्थितम् अन्तर्जात विद्रधिम् असशय नि सन्देह प्रशमयेत् । रथोद्धतापृत्तम् । हिन्दी-लाल महजन, रेड की जड़, वरुण, पिप्पली, हल्दी, दारुहल्दी और वोलचूर्ण इनका काथ नि सन्देह भीतर के मंर्गों में उत्पन्न विद्रधि = फोड़ा को शान्त कर देता है। विशेष--यह काथ रक्तशोधक होने के कारण प्रारम्भ में ही सेवन करने पर विद्रधि (फोडा) को बैठा देता है ॥ २९ ॥ अथ भ्रमप्रतीकार - मलयानिलकल्लोल-लसत्परिमलानने । दुरालभाकषायेण सघृतेन भ्रमो व्रजेत् ॥ ३० ॥ व्याख्या-मलयानिलकल्लोललसत्परिमलानने दक्षिणानिलतरङ्गै लसद् विलसद् यत् परिमल तट्वट आनन मुस यस्या सा तत्सम्बुद्धौ, सघृतेन दुरालभाकाथेन साज्यदु स्पर्शा- कपायेण भ्रमो रोगविशेपो व्रजेत् नश्येत् । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-हे मलयाचल की सुगन्धित वायु की लहरों से सुशोभित मुखवाली रत्नकला । धृत-मिश्रित दुरालभा वाथ से भ्रम = चक्कर का आना शान्त हो जाता है ॥३०॥ दारुणाऽऽख्यशिरोरोगहरो लेप द्राक्षा पथ्या वृषः कण्ट-गिरिकर्णसमन्वितः। रसालास्थिशिवाचूर्ण पूर्ण नीरेण सत्वरम् ॥ प्रलेपैः सप्तभिर्मूनों दारुणं दारुणं जयेत् ॥ ३१ ॥ व्याख्या--द्राक्षा गोस्तनी पथ्या हरीतकी वृप आटरूप कण्ट गोक्षुर गिरिकर्ण अश्वखुर रसालास्थि रसालमज्जा शिवाचूर्ण आमलकी चूर्णम् पूर्ण नीरेण वारिणा पिट्वा सप्तभि प्रलेप मून' शिरस दारण भयावह दारुणम् एतनामक रोगविशेष सत्वर शीघ्र जयेत् । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-मुनका, हरड़, असा, गोखरू, घोढा का खुर, भाम की गुठली, -

चतुर्थो विलासः
१११
आंवला, इनके चूर्ण को पानी से पीसकर शिर में लगाने से भीपण दारुणक नामक
शिरोरोग शान्त हो जाता है ॥ ३१ ॥
विषनागनो योग
राजवृक्षत्वचः क्वाथः सोमराजिरजोऽन्वितः ।
गुडन सहितः सेव्यः श्विनक्षत्रभृगूद्वहः ।। ३१ ।।
व्याण्या-लोमराजिरजोन्वित वाकुचीचूर्णसयुक्त राजवृशत्वच आरग्वधत्वच बाथ
कपायो गुडन विकारेण सहित मेव्य । एप योग श्विनक्षत्रभृगूदह चित्रकुष्ठ एव क्षत्रिय-
बा नस्य विनागाय परशुराम (मारक ) अस्ति । अनुष्टुप्छन्द ।
हिन्दी-याकुची के चूर्ण के साथ अमलतास के छिलके का काथ बनाकर उसमें
गुढ मिलाकर सेवन करने से श्वेत कुष्ठ का नाश हो जाता है। अर्थात् यह योग
श्वेत कुष्ठ रूपी क्षत्रिय वंश के विनाश करने के लिये परशुराम है ॥ ३२ ॥
मगन्दरहरी योग
किमुपैति बुधो देवो 'देवदत्तद्विपं किमु ।
लेपः श्वास्थ्नां खराम्भोमि. किं न हन्ति भगन्दरम् ।। ३३ ।।
व्याख्या-बुध विदान् देव मुर वा देवदत्तद्विप देवदत्त शस तस्य हिट अनि
स एव चित्रक तम् किमु व्यर्धम् उपति किम् इति प्रश्ने, अर्थात्तद् व्यर्थं तैरय मेवनीय
सराम्भोमि गर्दभमूत्रे स्वास्थ्ना कुकुरस्टना लेप भगन्दर किं न हन्ति, अपि तु हन्त्येन ।
अनुष्टुप्छन्द ।
हिन्दी-विदान् अथवा देवता भगन्दर की शान्ति के लिये चित्रक का
प्रयोग क्यों करते हैं? इसकी शान्ति के लिये कुत्ते की हट्टी को गधा के मूत्र में
घिसकर लगाना चाहिये। मालूम होता है कि इसकी अपवित्रता को देखकर
ही प्रथम पति का योग उन्होंने अपनाया है ॥ ३३ ॥
हिपानाशनो योग
कणानागरधात्रीणां रजसा समधूपलम् ।
नस्येन विश्वगुडयोहिक्का नश्यति तत्क्षणात् ॥ ३४॥
व्याख्या-समधूपल मधुना क्षौद्रेण उपलया शर्करया च सहित, कणानागरपात्राणा
पिप्पलीशुण्ठीशिवाना रजसा चूर्णेन किंवा विश्वगुढयो विश्व शुण्ठी गुट इक्षुविकार
एतयो नस्येन नावनेन तत्क्षणात् त्वरितमेव हिफा नश्यति । अनुष्टुप्छन्द ।
हिन्दी-पिप्पली, सोंठ, आंवला इनका चूर्ण मिश्री और मधु के साथ सेवन
करने से अथवा सोंठ और गुद का नस्य लेने से शीघ्र ही हिका रोगः शान्त
हो जाता है।॥ ३४॥

११२ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः . - असिमान्धप्रतीकारमाह- सैन्धवाद्भभुजो रोगं भस्मीकुर्यान्न संशयः । अत्र कर्तृपदं ज्ञातुं दत्तं कल्पचतुष्टयम् ॥ ३५ ॥ व्याख्या-सैन्धवाभुज सैन्धवेन लवणविशेषेण सह आर्द्रक भक्षयतीति मुक तस्य र अग्नि अग पर्वत पापाणम् अपि भस्मीकुर्यात् विदहेत् अत्र सशय सन्देहो नाति । अत्रास्मिन् पद्ये कर्तृपद शातु बोधु कल्पचतुष्टय दत्तम् । एतावत् कालपर्यन्तमपि अत्र कः कर्ता इत्युत्तरणार्यम् , कर्तृगुप्तस्योदाहरणम् । अनुष्टुप्छन्द । अन्यत्राप्यस्य योगस्य प्रशस्ति. सुलमा यथा- भोजनाग्रे सदा पथ्य लवणाईकमक्षणम् । वहिसन्दीपन रुच्य जिहाकण्ठविशोधनम् ।। हिन्दी-सेन्धानमक और अदरख मिलाकर जो प्रतिदिन भोजन के पहिले खाया करता है उसकी पाचकाग्नि पहाड़ों को भी पचा डालती है भोजन की तो वात ही क्या है। यह कर्ता गुप्त पध है, अतः कवि कहता है इसमें कर्ता ढूंढने के लिये चार युगों का समय दिया गया है ॥ ३५ ॥ शोकप्रतीकारमाह- द्विपतां मम सन्नितम्बविम्बे मधु हृच्छोकमपाकरोतु सद्यः । सुहृदां तव सद्विलासलास्ये मधु हृच्छोकमपाकरोतु सद्यः ।। ३६ ॥ व्याख्या-हे सनितम्बबिम्बे शोभननितम्वप्रदेशे रत्नकले मम दिपता मम शत्रूणा सध तत्क्षण हृच्छोक मानमिक दु ख मधु मघम् अपाकरोतु दूरीकरोतु । हे विलासलास्ये विलासादिकमेव लास्य नृत्य यस्या सा तत्सम्वुद्धौ, तव सुहृदा त्वन्मित्राणा हच्छोक स-मधु अधरामृतम् अपाकरोतु दूरीकरोतु । मालमारिणीवृत्तम् । मद्यविपये प्राचा मतम्- मयप्रयोग कुर्वन्ति शूद्रादिषु महार्तिपु । द्विजैस्त्रिभिस्तु न ग्राह्य यथप्युज्जीवयेन्मृतम् ।। हिन्दी-हे रत्नकला मेरे शत्रुओं के हृदयशोक को मय दूर करे और तुम्हारे मित्रों के हृदय शोक को तुम्हारा अधरामृत दूर करे ॥३६ ॥ कवे आनन्दाभिव्यक्ति देशे देशे दृश्यते सिन्धुतीरं तीरे तीरे वञ्जुलानां निकुञ्जः। कुजे कुळे सुध्रुवां सीधुपानं पाने पाने वर्तते सर्वलोकः ॥ ३७॥ गास्या--देशे देशे सर्वत्र मिन्धुतीर नदीना तट दृश्यते तोरे तीर सर्वस्मिन् तटप्रदेशे कन्जुलानां वेतसा निकुन कुज , कुजे कुजे सर्वत्र स्वापिहितोदरे सुचवा कामिनीर्ना मोधुपान मघरसास्वाद', पाने पाने मथपाने सवों लोक मत्तो भवति । शालिनीवृत्तम् । हिन्दी-इस देश में सब जगह नदियों के तट है, सभी तटों में बेत की लतामों -- ११३ चतुर्थो विलासः की शादियां हैं, सभी में विलासिनियां मद्यपान में रत है, उनके साथ नायक भी मद्य पी-पी कर मदमत्त हो रहे है ॥ ३७॥ बहिर्तापिका प्रस्तीति कवि किमु पिवति समूहः शोकभाजां जनानां निपतति युवतीनां कामिनां कः स्तनेषु । व्यथयति सुरते कः कैरवाक्षी नवोढां स्मर सुहृदि वसन्ते जायते कः समृद्धः ॥ ३८ ॥ व्याख्या-शोकमाजा जनानां दुःखतप्ताना पुसा समूह समाज किमु पिबति ? मधु, युवतीना नवोढाना म्तनेषु कामिना कामुकाना क , पतति १ कर सुरते निधुवनावसरे नवोढाम् उद्यौवना करवाक्षी कमललोचना क व्यथयति पीडयति १ अदय , स्मर विचारय मुद्ददि बसन्ते मित्रवत् प्रिये मधुमासे क समृद्ध. सम्पन्न. जायते ? मधुकरोदय । मालिनीवृत्तम् । हिन्दी-दुख में हुवे हुए लोगों का समूह क्या पीता है ? मधु, युवतियों के स्तनों पर कामी पुरुषों का क्या पड़ता है ? करः (हाय), मैथुन के समय नव- युवती कमलनयनियों को कौन कष्ट देता है ? अदयः (निर्दयी) याद करो प्रिय वसन्त में कौन समृद्धिशाली होता है ? (सब प्रश्नों के उत्तरों को मिलाकर चौथे पाद का उत्तर है) 'मधुकरोदयः । भौरों का समूह । विशेष-यहिापिका के पध में प्रश्नमात्र होता है उसका उत्तर बाहर से हूंढना होता है । इसके ठीक विपरीत अन्तापिका होती है ।। ३८ ॥ शुण्ठीकपायमाह- कीलालं विश्वजं यः प्रपियति पुरुषस्तस्य वक्ने रुचिः स्या- नैर्मल्यं चित्तदृष्टयोर्जठरजठररुपीनसश्वासकासाः। नश्यन्ति क्षुत्प्रवोधो धुतिरपि वपुषो जायते मञ्जुघोषो भूलोके मञ्जुघोषे सुदति मम परं विस्मयो वर्ततेऽत्र ॥ ३९ ॥ ध्याख्या-य. स्वस्थोऽस्वस्थो वा पुरुप विश्वज शुण्ठ्या सम्भव फायीकृत कीलालं जलम्, “पय कीलालममृत जीवन भुवन वनम्" इति अमर । प्रपिवति पान करोति तस्य वक्ने मुखे रुचि भोजनेच्छा स्यात्, चित्तवृष्टथो मनसि नेप्रयोश्च नैर्मल्य स्वच्छता स्यात् जठरजठररुपीनसश्वासकासा अग्निमान्धप्रतिश्यायश्वासकासा नश्यन्ति शाम्यन्ति, भुरप्रवोध बुमुक्षोत्पत्ति वपुपो धुतिरपि कान्तिमच्छरीरमपि जायते तथा मन्जुघोपः सरसवाक् च भवति, हे मजुघोपे ! मधुरमापिणि ! सुदति ! अत्र भूलोके मम लोलिम्व- ८च० चि० - ११४ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः राजस्य परम् अत्यन्त विस्मयोऽ मुत वर्तते । यत. एक एव शुण्ठ्या कपायः किं किं न करोतीति विस्मये हेतु । विस्मयप्रदर्शनव्याजेन शुण्ठ्या. माहात्म्यातिशयो ध्वनित कविना । अपरपक्षे गहादिजलाना महत्त्व प्रदर्शयन्नाश्चर्य प्रकटयति कधि । वृत्त शार्दूलविक्रीडितम् । हिन्दी-स्वस्थ अथवा अस्वस्थ जो भी मानव सोट का काथ प्रतिदिन पीता है उसकी भोजन के प्रति इच्छा बढ़ती है, चित्त में प्रसन्नता, भांखों में ज्योति आ. जाती है, मन्दाग्नि प्रतिश्याय (जुकाम)श्वास (दमा) कास इनका नाश हो जाता है, भूख बढ़ने लगती है शरीर कान्तिमय हो जाता है, वाणी सुरीली हो जाती है, हे सुरीली वाणी तथा सुन्दरदन्तपंक्ति वाली रत्नकला | इस ससार में मुझे सोंठ के इतने गुणों को देखकर अत्यन्त आश्चर्य है। दूसरे पक्ष में गम आदि के जलों का महत्व दिखाया गया है ॥ ३९ ॥ दन्तरोगप्रतीकारमाह- धन्योऽसि रे वकुल सन्मलयाख्यशैल. मन्दानिलेन चपलीकृतवालपत्र । त्वद्वल्कलस्य रजसः परिघर्षणेन दन्ता भवन्ति चपला अपि वज्रतुल्याः ॥ ४० ॥ व्याख्या-सन्मलयाख्यशैलमन्दानिलेन चपलीकृतबालपत्र सश्चासी मलय सन्मलय., स आख्या यस्य स स चासौ शैल पर्वत तस्य मन्दानिलेन वायुना चञ्चलीकृतकिसलय रे वकुल मधुगन्ध, त्व धन्योऽसि कृतार्थोऽसि । त्वद्वल्कलस्य रजस चूर्णस्य परिषर्पणेन चपला चञ्चला अपि दन्ता वज्रतुल्या कठोरा स्थिरा भवन्ति । वसन्ततिलकावृत्तम् । तस्य गुणा वकुलस्तुवरोऽनुष्ण कटुपाकरसो गुरुः । कफपित्तविपश्चित्रकृमिदन्तगदापह ॥ अ०नि०॥ हिन्दी-मलयमरुत से आन्दोलित किसलय युक्तरे वकुल (मौलसिरी) वृक्ष ! तुम धन्य हो, तुम्हारी छाल के चूर्ण का मान करने से हिलते हुए दांत भी वज्र के समान कठोर हो जाते हैं ॥४०॥ प्रकारान्तरेण वकुलमेव प्रस्तौति- केलीशैले चकुलपटलं वर्तते यत्त्वदीये चन्द्रास्ये तत्सकलभयतो यत्नतः पालनीयम् । कस्मात् स्वामिन् भवति सुतरां त्वत्कृपा नेतरेषां तस्य त्वग्भिर्दशनदृढता दृश्यते तन्वि यस्मात् ॥ ४१ ॥ - . 1 - चतुर्थो विलासः ११५ ग्याल्या हे चन्द्रास्ये ! चन्द्रवदने ! यत्वदीये स्वत्सम्बन्धिनि केलीशैले क्रीडापर्वतके वकुलपटल मधुगन्धवृक्षसमूहो वर्ततेऽस्ति तत् पटल सकलमयत. सम्पूर्णाभ्यो वाधाम्यो यक्षत प्रयत्नपूर्वक पालनीय रक्षणीयम् । कस्मात स्वामिन् त्वत्कृपा तव दया इतरेपाम् उपरि सुतरा न भवति (किम् )। इति रलकलया पृष्टे सति समादधाति लोलिम्बराज:- हे तन्वि ! हे कृशोदर । यस्मात्कारणात् तस्य वकुलस्य त्वग्मि दशनदृढता दन्ताना स्थैर्य दृश्यते, न केवल शास्त्रेषु श्रूयते एव । मन्दाक्रान्ता वृत्तम् । हिन्दी-हे चन्द्रमुखि ! जो तुम्हारे मनोविनोद के लिये बगीचा बना रखा है उसमे एक जगह मौलसिरी के पेट हैं, उनकी भली-भाँति रक्षा करनी चाहिये, किसलिये पतिदेव । आपकी कृपा और वृक्षों के ऊपर नहीं है क्या ? । तव लोलिम्वराज उत्तर देते हैं, हे कृशोदरी ! क्योंकि बकुल की छाल के चूर्ण का मजन करने से दांत स्वच्छ एव हृढ हो जाते हैं ॥४१॥ दन्तविकारचिकित्मामाह- कान्ते कामिनि भामिनि प्रियतमे तन्वनि चन्द्रानने सुभ्र प्रेयसि मानिनि स्मररणक्षोणि क्षणं श्रूयताम् । रुग्लोनाम्धुदतेजविड्विरजनीतिक्तासमंगावृकी तेपां चूर्णविधर्पणादपहरेत् कण्डं रुगननुतिम् ॥ ४२ ॥ व्याख्या-कान्ते सुन्दरि कामिनि कामशीले भामिनि क्रोधने प्रियतमे वत्सले तन्वनि कृशोदरि चन्द्रानने मृगाकमुखि सुन्नु सद्मलते प्रेयसि अतिशयप्रिये मानिनि गर्विणि स्मररणक्षोणि कामयुद्धाधारे रनकले क्षण श्रूयताम् । रुक् कुष्ठ लोध रोध अम्बुदः मुस्ता तेजवल्कल तेजपत्र विट् लवण द्विरजनी हरिद्रा दारुहरिद्रा च तिका कटुका मभिष्ठा की पाठा तेषां पूर्वोक्ताना चूर्णविधर्पणा दन्तानां कण्ड रुजम् पीडाम् असम्नुति-रक्तस्रावम् अपहरेत । वृत्त शार्दूलविक्रीडितम् । हिन्दी-अनेक सद्गुणों से अलकृत हे रनकला ! जरा सुनो! कुछ पठानीलोध नागरमोथा तेजपत्ता विड़ नमक (कालानमक) हल्दी दारुहल्दी कुटकी मजीठ पाठा इनका वारीक चूर्ण करके दांतों में मलने से खुजली और रक का नाव होना बन्द हो जाता है। यह दन्तरोगहर मान है ।। ४२ ।। इति श्रीमल्लोलिम्पराजविरचिते चमत्कारचिन्तामणी क्षयादिरोगप्रतीकारोनाम चतुर्थो विलास. समाप्तः ।

- अथ पञ्चमो विलासः सुखिनीवन विशिनष्टि- शयनं यदि पल्लवपुष्पकृतं गहनं यदि मत्तपिकं सरतम् । यदि चारुवपुर्यदि भूरिधनं किमतः परमस्ति सुखं घुसदः ॥ १ ॥ व्याख्या-पल्लवपुष्पकृत किसलयै कुसुमैश्वरचित यदि शयन शय्या स्यात्, यदि गहनम् उद्यान मत्तपिकावलीसहित तथा सरुत पक्षिणा विरावै सहितम्, यदि चारु सुन्दर नीरोगश्च वपु शरीर यदि भूरि विपुल धन स्यात् । मो घुसद सुरा अत पर किं सुसम् अस्ति । स्वर्गेऽपि एतदतिरिक्त न किमपि वर्तते, इत्यभिप्राय । अत एव धुसद इति सम्बोधनम् । तोटकवृत्तम् । हिन्दी-कोमल फूल तथा पत्तियों से रचित सुगन्धित शयन, मद माती हुई कोयलों के कलरव से पूर्ण वगीचा, सुन्दर एव सुखी शरीर तथा इच्छानुकूल धन इतनी वस्तुयें यदि प्राप्त हों तो हे देवताओ ! स्वर्ग में इससे बदकर क्या और कुछ सुख है ? अर्थात् कुछ नहीं ॥१॥ तदेव प्रकारान्तरेण वर्णयति- अमन्दामोदमन्दारे प्रमोदोदयदायिनि । मरुदान्दोलितोदारचञ्चञ्चम्पकचारुणि ॥ २॥ भ्रमभ्रमरमालाभिर्मालवीमिरलङ्कृते । स्फुरद्वने सुखावासः कामिनां कामदो भवेत् ॥शायुग्मकम्।। म्याग्या-प्रमोदोदयदायिनि प्रमोदस्य आनन्दस्योदय त ददातीति तस्मिन् अमन्दामोदमन्दारे अमन्दो विपुलश्चासौ आमोद. सुगन्धि तेन युक्त मन्दारे पारिजाते, मरुदान्दोलितोदारचम्मच्चम्पकचारुणि मरुता वायुना आन्दोलित कम्पितम् उदारश्च तत् चश्चच्चपल चम्पक स्वर्णपुष्पक तेन चारु तस्मिन् , भ्रमभ्रमरमालामि भ्रमन्त्यश्च ता भ्रमराणां द्विरेफाणां माला (पक्तय तामि मालतीमि जातीमि अलस्कृते सुशोभिते स्फुरद दीप्यद् यद् वन तस्मिन् गृहारामे मुखावास कामिना कामेच्छासनाथीकृतचेतसा विलासिना कृते कामद मनोवान्छितार्थप्रद भवेदिति शेष । अनुष्टुप्छन्द'। 'हिन्दी-आनन्द को देनेवाले अत्यन्त सुवासित पारिजात वृक्ष पाले, हवा के सोको से झकझोरे हुए सुन्दर चम्पक पुष्पो से सुगन्धित, मडराते हुए भौंरों की माला से घिरे हुए पुष्पित मालती वृक्षों से सुशोभित घर के बगीचे का सुखद निवास कामीजनों की इच्छा को पूर्ण करता है ॥२-३ ॥ 3 पञ्चमी विलासः ११७ - + वाजीकरणयोग्यस्त्रीलक्षणमाह- रहसि गलितलज्जा वाह्यदेशे सलजा कुचभरनमिताही चन्दनक्षालिताही। मृदुतरमुपयान्ती श्रोणिवक्षोजभाराद् दृढयति कमलाक्षी कस्य कामं न कामम् ।।४।। व्यासया-रहसि एकान्ते गलितलजा गलिता क्षीणा लज्जा यस्या. सा निर्लज्जा बाघदेशे समाजे सलजा छीमती, कुचमरनमिताही स्तनयोर्भारेण आनतपूर्वकाया चन्दनक्षालिताही मलयजलिप्तदेह। प्रोणिवक्षोजभारात् प्रोणि ककुद्मती वक्षोजी स्तनी तेपा' मारात् मृदुतर शिथिलशिथिलम् उपयान्ती गच्छती, अनेन गजगामिनीत्वमस्या व्यज्यते। एतादृशी कमलाक्षी सरसिजनेत्रा कस्य पुस काम रिरसा कामम् अत्यन्त न द्रढयति । अपितु सर्वस्यापि काम द्रढयतीत्यर्थ । मालिनीवृत्तम् । हिन्दी-एकान्त में निर्लज किन्तु समाज के सामने अत्यन्त लज्जाशील स्तनों के भार से झुकी हुई चन्दन के लेप से शीतल एवं सुवासित, नितम्घ और स्तन के भार से धीरे-धीरे चलने वाली (अर्थात् गजगामिनी) कमलनयना किसकी कामवासना को पूर्ण रूप से दृढ नहीं कर देती ॥४॥ वाजीकरणयोग- सुन्दरि विदारिकायाः सम्यक् स्वरसेन भवितं चूर्णम् । सर्पिःक्षौद्रसमेतं लीढ्वा रसिको दशांगना रमयेत् ॥ ५॥ व्याण्या-हे सुन्दरि ! रखकले ! विदारिकाया विदार्या चूर्ण स्वरसेन विदार्या रसेन मावित सपिं क्षौद्रसमेत घृतमधुभ्यां सह सम्यग् यथाविधि लीदवा रसिको रिरसु दशांगना दशस्त्रिय रमयेत् । हिन्दी-हे रतकला । विदारी के चूर्ण को उसी के रस की भावना देकर सुखा ले, फिर इस चूर्ण को घी और शहद के साथ मिलाकर चाटे । इसके सेवन से वह दस स्त्रियों के साथ रमण कर सकता है ॥ ५॥ वीर्यवर्धको योग चूर्णमामलकजं मृगनेत्रे भावितं स्वजनितेन रसेन । शर्करामधुपयोवृतयुक्तं यः पिवेत् प्रतिदिनं रतलुब्धः ॥ ६ ॥ व्याया-आमलकज धात्रीसमुद्भूत चूर्ण स्वजनितेनामलकीजेन रसेन भावित मृगनेने मृगचर्मणि शुष्कीकृत शर्करामधुपयोध्तयुक्तम् उपलाक्षौद्रदुग्धसपिं समेत य कामुक पिवेत् स प्रतिदिन रतलुब्ध रिरसु भवेत् । - 1 १२० वैद्यक चमत्कारचिन्तामणिः में मन्द हिन्दी-हे कमलनयना रनकला ! शतावरी और सफेद गुला का चूर्ण सुखी जीवन चाहने वाले व्यक्ति सदा सेवन करें। यह चूर्ण पतले शुक्र को गाड़ा करके उसमें स्थिरता लाता है ॥ १२ ॥ काश्यहरो योग सर्पिपा पयसा वाऽथ अश्वगन्धापलार्धकम् । प्रभाते सेवनं कुर्यात् कृशानां पुष्टिकारणम् ।। १३ ।। व्याण्या-सपिपा घृतेन पयसा दुग्धेन वा अश्वगन्धा हयगन्धा तस्या पलाधक तोलकद्वयपरिमित तच्चूर्ण प्रमाते प्रत्युपसि सेवन कुर्यात्, एतच्चूर्ण कृमाना तनुतनुमा पुष्टिकारक स्थौल्यमम्पादने साहाय्य करोति । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-घी अथवा दूध के साथ असगन्ध का चूर्ण दो तोला लेकर प्रातःकाल प्रतिदिन सेवन करे। इसके सेवन से कृशता दूर हो जाती है। विशेष-नागौरी असगन्ध का दो तोला चूर्ण लेकर आधा सेर दूध मन्द आंच से पकाकर रबड़ी जैसा होने पर उतार कर रख दें। इसमें मिश्री मिलाकर सेवन करने से कृशता के कारण शरीर तथा चेहरे पर पड़े हुए गढ़े शीघ्र ही भर जाते हैं और दिनों दिन स्वास्थ्य लाभ होने लगता है ॥ १३ ॥ बलवर्डको योग'- तूलिनीपुष्पचूर्णन्तु क्षौद्रकर्ष लिहेदनु । दुर्वलो बलमाप्नोति मासकेन यथा शशी ॥ १४ ॥ व्याख्या-तूलिनीपुष्पचूर्णन्तु तूलिनी शाल्मली तस्या पुष्पचूर्ण क्षौद्र मधु तस्य कर्ष कोलद्वयम् अनु पश्चालिहेच चेत् दुल क्षीणशक्ति पुरुष वलमाप्नोति पुन. बलवान् भवति यथा कृष्णपक्षे समायाते शशी क्षीण भवति पुन मासै केन एकमासाभ्यन्तरे एव पूर्णता याति तद्वन्मानवोऽपि बलवान् भवति । अनुष्टुप्छन्द.। हिन्दी-सेमल के फूलों का चूर्ण १ तोला मधु के साथ चाटने से दुर्वल पुरुष उस प्रकार पुन बलवान् हो जाता है जिस प्रकार एक महीने में चन्द्रमा ॥ १४ ॥ वीर्यस्तम्भकरो योग अश्वमारजटालेपं यः करोति करे मणौ । वीर्यस्तम्भं स लभते कर्णाटीसुरतेष्वपि ॥ १५॥ व्याण्या-य कामी अश्वमारजटालेप श्वेतकरवीरमूललेप करे हस्ते मणौ शिश्नमुण्डे च करोति स कर्णाटीसुरतेष्वपि द्रविडस्लीमै थुनेपु अपि वीर्यस्तम्म लमते प्राप्नोति । अनुष्टुप्छन्द.. - पञ्चमो विलासः १२१ - हिन्दी-जो कामी पुरुप सफेद कनेर की जड़ का लेप हाथ की हयेली तया लिग के अग्रभाग में मैथुन से कुछ समय पूर्व करके फिर मैथुन करता है यह कर्नाटक देश की स्त्रियों के साथ मैथुन करने में भी वीर्य स्तम्मन का लाभ उठाता है ॥ १५॥ अपरो वीर्यस्तम्मकरो योग.- कार्थ पिवेत् खानसवल्कलानां सर्पियवानीगुडमिश्रितं यः। प्राप्नोति भूयः सुरतेपु दाढ्य भवेद् रिरंसुः कलविंकवत् सः ।। १६ ।। व्याख्या-य' रिरसु मैथुनेच्छावान् सपिर्यवानीगुडमिश्रित सपि धृत यवानी अनमोदा गुड. इक्षुविकार एमिर्मिलित खाखसवल्कलाना खसतिलफलत्वचा काय कपायं पिवेत् स भूय पुनरपि कलविकवत् सुरतेपु दाढर्थ चटकवन्मैथुनेपु स्थायित्व प्राप्नोति लमते । इन्द्रवज्रावृत्तन् । हिन्दी-जो मैथुनाभिलापी पुरुष घी अजवायन और गुड़ के साथ पोस्ता की स्वचा (छिलका) के शाथ का सेवन करता है, वह फिर से गौरया की भांति मैथुन में स्थिरता को प्राप्त करता है । अर्थात् उसका वीर्य शीघ्र स्खलित नहीं होता ॥१६॥ कामिनीविद्रावणो रस सकर्पूरो रसक्षौद्रजातीरजविमिश्रितः। लिगलेपात् करोत्येष द्रावणं हरिणीदृशाम् ॥ १७ ।। व्याख्या-सकर्पूर धनसारेण सहित रस. पारद क्षीद् मधु जातीरज टकणः निमिरेभिर्विमिश्रित सम्पृक्तो लेप समायते । एप लिङ्गलेपात् हरिणीशा मृगनयनीना द्रावण विद्रावण करोति । अनुष्टुप्छन्द । हिन्दी-कपूर शुद्ध पारा शहद सुहागा इनको मिलाकर एक लेप बनता है, इसका मैथुन के पूर्व लिंग के ऊपर लेप कर सम्भोग करने से स्त्रियाँ शीघ्र स्खलित हो जाती है ॥ १७ ॥ ग्रन्थान्ते जगन्मङ्गलात्मक मगलाचरणम्- वक्षोजन्मभरालसाः सुजघनाः सम्पूर्णचन्द्राननाः श्यामाश्चञ्चललोचनाः सुवसना गम्भीरनाभिहदाः । क्षामा वन्धुरकन्धराः सुदशनाः विम्वाधराः सुस्वरा भन्यानां भवनेवसन्ति वनिता विश्वेश्वरानुग्रहात् ।। १८ ॥ ग्याण्या-वक्षोजन्ममराल्सा. स्तनयुगलमरेण शिथिलीकृता , मुजघना. शोभनं - -- १२२ वैद्यक-चमत्कारचिन्तामणिः जघन यासां ता जघन स्वीकट्या. पुरोमाग तेन युक्ता सम्पूर्णचन्द्रानना राकाविधुमुरयः श्यामा पोटशवापिक्य युवतय चाललोचना चपलनयना', सुवसना सुवाससः गम्मीरनामिहदा गभीरनाभितटागा क्षामा कृशोदर्य वन्धुरकन्धराः उन्नतग्रीवाः मुदशना शोभनरदना विम्वाधरा. विम्वफलवद्रत्तदशनच्छदा सुस्वरा मन्जुघोपा. वनिता स्त्रिय विश्वेश्वरानुग्रहात् शम्मो कृपान मव्याना श्रीमता भवने गेहे गेहे वसन्ति निवास कुर्वन्ति । इत्यभूता सुलक्षणा देव्य सर्वपा गृहे वसन्तु सर्वे भव्या श्रीमन्तो भवन्तु इत्याकारिका शुभाशसा कवेर्ग्रन्थान्ते लोककल्याणाय मनिवद्धा। वृत्त शार्दूलविक्रीडितन् । वाजीकरणप्रकरण समाप्तम् । सप्तयुग्माभ्रयुग्मेऽब्दे वैक्रमे पञ्चमीतियौ । माघशुक्छे भानुवारे कृतिमें पूर्णतामगात् ॥ हिन्दी-पीन एवं उन्नत स्तनों के भार से अलसायी हुई, सुन्दर जाघ वाली, पूर्ण चन्द्र के सहश मुख वाली, पोडशी, चञ्चल चितवन वाली, वस्त्राभूपों से भलंकृत, गम्भीरनाभियुक्त, कृशोदरी, लम्बी गरदन सुन्दर दन्त पंक्ति, विम्व फल के समानाकार होंठ और सुरीली वाणी वाली स्त्रियों भगवान् विश्वनाथ की कृपासे श्रीमानों के घरों में निवास करती है ॥ १८ ॥ विशेष-यह अन्तिम पद्य कवि ने अपनी रसिकता के अनुरूप विश्वकल्याण की भावना से प्रस्तुत किया है। इसके द्वारा वह कामना कर रहा है कि- उक्त प्रकार की सुलक्षणा देवियां सबके घरों में निवास करें, सभी श्रीमान् हों और सुखी रहें। इति श्रीमल्लोलिम्वराजविरचिते चमस्कारचिन्तामणी वाजीकरणद्रव्यवर्णनंनाम पञ्चमो विलास समाप्तः। -

ग्रन्थ-परिचयः
श्रीमल्लोलिम्बराजास जयति विवुधाग्रेसरः सप्तरडग्या,
सद्भवस्याऽवाप्रदीक्षः कविकुलकमलोल्लासहासे नदीप्ण ।
नासिक्याऽऽसन्नभूमी दिवसकरगृहे जन्मलाभो यदीयः
सोऽयं घिद्वद्वरेण्यो हरिहरनृपते राजमन्त्रित्वमाप ॥ १ ॥
पती रवकला कलासु कुशला वैदुप्यसीमाजिता
शोमा कामपि पुष्णती यवनजा याऽऽसीन् मुरासाऽभिधा।
सामुद्वा कविधकार सुघहून् संवादरूपोधुरान्
प्रन्थान्
ये. कवितालता रसवती सापुष्पिता राजते ॥२॥
तांस्तान् प्रन्यवरान् निरीक्ष्य परितः सिद्धाशयान् कामदान्
साहित्यप्रषणान् मिपरवरहितान् सद्भिः समभ्यर्चितान् ।
मचेतो मुखरीबभूव कुतुकात् तेपा दिक्षाविधी
तस्मादेष मणिश्चमस्कृतिकर' प्रस्तूयते व
पुर.॥३॥
प्रन्योऽय योगररनैरनुभवसुलम. शास्त्रपूतैश्च सिद्ध
राधन्तं मण्डितोऽपि श्रयति सरसता ग्रन्थफर्तु प्रभावात् ।
तस्मादेषोऽपि कृरना कलिकलुपवतां कायिकी मानी च
व्याधियातोरथचिन्ता व्यपनयात चमत्कारचिन्तामणिः॥ ४ ॥
सधोलाभो ध्रुवो लामश्चमत्कारी प्रकीर्तिती।
कथ स्यातामियं चिन्ता तो निराकुरते मणिः ॥५॥
अभिप्रायो बुधस्यास्य सम्भविष्यति तेन यत् ।
अस्य नाम घमस्कारचिन्तामणिरिद कृतम् ॥ ६ ॥
श्रीगुरु स्मरणम्
सांख्ये व्याकरणे नयेऽथ विनये मैपज्यविधास्वलं
साहित्येऽपि च यस्य धीतिमती तत्वार्थसम्बोधिनी ।
यः शिप्येषु सुधामयाननुभवान् वर्षस्यजन मुदा
सोऽस्माकं गुरुलालचन्द्रविवुधो ध्येय. सुराचार्यवत् ॥ ७ ॥
मायुर्वेदोदकर्यनिविधमपि ‘मल क्षालयत्येव पुंसां
योगज्ञानेन चित्तं विशदयतितमा पाणिनीयेन वाचम् ।
साक्षाच्छेपावतार. प्रवहति विपुला धीधुरं शान्तचित्तो
विद्ववृन्दाप्रगण्यो जयति गुरुवरो लालचन्द्रो मनस्वी ॥४॥
इति कतिपयपथैन्यकतगुरोश्च प्रणयरससनाथ' संस्तवो यो मयोका।
विशदगुणमहिन्नोः प्रीतये स्याव स चेत् सविपुलमुवमुपेयाम्भक्तिभावोपपन्नः ॥९॥
तारादत्ततनूजस्य
ब्रह्मानन्दत्रिपाठिन.।
मनया टीकया मोद' परं स्यात् सुधियां सदा ॥ १० ॥

९० .. अलङ्कारादि परिचयः प्रथमो विलासः अलार: श्लोकसंख्या अलहारः श्लोक संख्या | मुद्रालङ्कारः ८३ अनुमासः उपमा लक्षितलक्षणा द्वितीयो विलासः भावध्वनिः ४ रूपकम् भ्यक्षरम् ५ कर्तृगुप्तम् यमकम् ९ अनुप्रासः लाटानुप्रासः १३ अनन्वय ११ उपमा १९ अनुप्रासः १५ अनुप्रासः २८ तृतीयो विलासः उपमा ३० उपमा ९ अनुप्रासः ३२ | रूपकम् ३५ यमकम् ३९ उपमा २४ ४३ ४४ अनुप्रास: ३४ •छाटानुप्रास: ४५ लक्षणा ३७ ४६ अनुप्रास. अनुप्रास “उपमा क्रियादीपक. चतुर्थो विलासः ५३ विरोधाभास. ८ हटान्तः ९ उपमा ५७ १८ उपमा भनुप्रास भनन्वयालङ्कारः ६० फूटश्लोक २३ उपमा ६५ कर्तृगुप्तम् ३५ -मालोपमा ६६ ३६ लाटानुप्रास उपमा ६७ यहि पिका पञ्चमो विलासः .४ अनुप्रासः रूपकम् ३ ८० | दृष्टान्तः १४ ४३ ७ ५५ / अनुप्रास' ३८ -श्लेप , उपमा प्रयुक्तौषधद्रव्याणाम् अकाराद्यनुक्रमः अगस्त्य अजवायन कपूर गजपीपल गधा का मूत्र गम्भारी गिलोय कमल अडूसा भतिवला भतीस करज काकदासिंगी अदरख कायफल अनार अपराजिता कालाजोग कालातिल अमचूर अमलतास भरणि अर्जुन अशोक कालानमक कालीमिरिच कालीसारिवा गुग्गुल गुढ़ गूमा गोखरू गोधृत गोघर गोमूत्र घुघची घृत घोड़ा का खुर चकवड़ चकोतरा अमगन्ध आंवला कास किंवांच कुटकी कुटज कुत्ता की हड्डी कुलथी - कुश आम इन्द्रनी इन्द्रायण इमली इलायची एरण्ड कंधी केला केवड़ा स्वस खिरटी चावल का धोवन- चित्रक चिरायता चिरौंजी चीनी चेतकी (हरड़) चौलाई जमालगोटा खैर का छाल कचूर कच्चे येल का गूदा कण्टकारी (छोटी) कण्टकारी (बदी) गंधक गंधरस जल ( १२६ ) जवाखार नीलकमल जवासा नेग्रवाला पठानीलोध मिलावा मुँइ भावला मृगराज , जामुन की गुठली जायफल जी जोक पभाव मक्खन मजीठ पादल पानी भावला मठा मय तमाल तिलकपुप्प तिलतेल त्रिफला तुपोदक तेजपत्ता दही दादिम दारुहल्दी दुरालभा देवदारु द्रोणपुप्पी धनिया पारद पिठवन पितपापदा पिप्पलीमूल प्रियंगु पीपल पीली सरसों पुनर्नवा पोस्ता पोहकरमूल बकरी का दूध मदार मधुकर्कटी मधु मरिच मरोडफली महाबला महुभा मांट मांसरोहिणी मिश्री मुनका मुलेठी मूर्वा मैनशिल मोचरस मोती मौलसिरी बवूल काथ धमासा धान का लावा वला बहेवा वाकुची यालबच विजौरा नीवू बेर बेल बोल चूर्ण भद्रमुस्ता भांग भारंगी धाय के फूल नलद नागकेसर नागरमोथा नागौरी असगन्ध नारियल निशोथ नीम की छाल रसवत् रात्रा रुचकलवण रेद की अड़ रेणुका (१२७ ) रेह लवण लवंग लहसुन लाग्न सिन्दूर सुगन्धवाला सेमल के फूल सेहुण्ड का फूल मैंधानमक लाजा सोचर लवण लालचन्दन लोध लौहभस्म सोठ सोना पाठा वचा श्रीफल नजीखार सफेद कनेर सफेद गुला सफेद चन्दन सम्हालू समुद्रफेन सरसों का तेल सलाई सहजन (लाल) सहदेई स्वर्णगैरिक स्वर्णमाक्षिक साम्हर लवण सारिवा (काली सारिवा (सफेद) सिंहिका वरुण वायविडंग विदारीकन्द शतावरी वरपुरखा शालिचावल मालीप शिलाजीत सौंफ हरीतकी हल्दी हाऊबेर हिंगुपत्री हिरौंजी हींग हीरा कासीस

सहायकग्रन्धानां सूची
१ चरकसहिता
२ सुश्रुतसंहिता
३ वाग्मट सहिता
४ हारीत संहिता
५ शाघर सहिता
६ भाधवनिदान
७ रमेन्द्रसारसंग्रह
८ भैपज्यरत्नावली
९ चक्रदत्त
१० भावप्रकाशनिघण्टु
" अभिननिघण्टु
१२ रमार्णवतन्त्र
१३ हस्स्यायुर्वेद
-
१५ वैद्यावतंस
१५ वैद्यजीवन
१६ महाभारत
१७ मरस्यपुराण
१८ हरिवंशपुराण
१९ अग्निपुराण
२० सिदान्तकौमुदी
२१ अमरकोशः
२२ मेदिनी कोशः
२३ हरिविलास काम्य
२४ विष्णुसहस्रनामस्तो
२५ चाणक्यनीति

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Vaidyaka Camatkarchintamani Of Lolimbaraja

Author
Tripathi, Brahmanand
Title
Vaidyaka Camatkarchintamani Of Lolimbaraja
File name
Vaidyaka Camatkarchintamani Of Lolimbaraja
Text
OCR done
Citation
1973
Published
2010/05
Publisher
Varanashi, Chukhmba Vidya Bhawan
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327568
Barcode
99999990003153.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
7qwO46aELS0
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