Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shrijinprabhsuri Ane Sultan Muhammad
Front matter
(di लेखरूप प्रथम आवृत्तिना प्रकाशकनुं वक्तव्य. महान सम्राट् सत्ता उपर अपूर्व प्रमा पाडीने तीर्थों अने शासनसमृद्धिर्नु संरक्षण करनारा धुरंधराचार्य जैन- ज्योतिर्धर श्रीदीरविजयसूरिना प्रसिद्ध इतिहासधी पण लगभग २५० वर्ष पहेलां एटले विक्रमनी चौदमी सदीना उत्तरार्धमा मुस्लीम आक्रमणना विपम युगमा परम प्रभावक श्रीजिनमभसूरिए सुलतान महम्मद उपर पाडेली अजब प्रभानो अप्रगट इतिहास आलेखमां बहु जीणवटथी अने विस्तारपूर्ण टिप्पण-टीका साथे प्रगट करवामां आव्यो छे. जो के आ लेख छेक अरे मळवाथी तेनो केटलोक भाग छोडी देवो पञ्यो छे; छतां लेख- कना संस्कृत-प्राकृत अभ्यास अने वडोदराना ओरी- एन्टल खाता द्वारा संशोधनना मेळवेल फंडा अनुभवनो लाभ समाजने आ लेखथी मळशे-तेम खात्री छे." -संपादक 'जैन -'जैन रौप्य महोत्सव अंक वि.सं. १९८६ [पृ. २१९] प्रास्ताविक आनंद-प्रमोदनो प्रसंग छे के-लगभग एक दसका पहेला संक्षिप्त लेखरूपे प्रकाशित भयेल अम्हारो शुभ प्रयास, विशेष समृद्ध थइ विस्तृत स्वरूपमा आजे ग्रंथरूपे प्रकाशमां आवे छे. एना अन्वेषणमां-प्रामाणिक ऐतिहासिक संशोधनमा केटलो परिश्रम उठाव्यो हो ? वर्षाना केटला प्रयत्नी केवी केवी मुश्केलीओ वच्चे मा गवेपणा घइ हशे ? 'श्रेयांति बहुविनानि । सूक्तने यथार्थ प्रामाणिक करता केवो केवा विघ्नोमांधी पसार थइ आनी संकलना थइ हो ? अने वर्षों पछी आवा स्वरूपमा आजे आ प्रसिद्धिमा आवे छ, ते दरम्यान पण लेखकने फेवा केवा प्रतिकूल संयोगो पसार करवा पज्या हशे ? ते लेखके स्वयं उच्चारयु अप्रस्तुत लेखाय. इतिहासप्रेमी परिश्रमविश सजनो कदाच ए समजी शके. आ परिश्रम, आवा संशोधित-यर्षित नवीन स्वरूपमा प्रका- शमां आवी शक्यो छे, तेनो वास्तविक सुयश, इतिहासप्रेमी गुणज्ञ ननाचार्य श्रीजिनहरिसागरसरिजी महारानने घटे छे, जेमना प्रेरणा-प्रोत्साहन विना आ निबंध-ग्रंथन प्रकाशन कार्य प्राय: अशक्य अयुं होत. शासन-प्रभावक माननीय पूज्य पूर्वन आचार्योना इतिहास-संशोधनमा अने तेना प्रकाशनमा असाधारण उत्कंठा धरावनार उपयुक्त आचार्यना आदर्शने स्तज्ञ जन्य महा- भावी पण अनुसरे-एम इच्छीY.
श्रीजिनप्रभमूरि-मूर्तिः
श्रीशत्रुञ्जयतीर्थं सग्तरबसतो प्रतिष्ठिता।
श्रानद प्रम-भावनगर.
. - . श्रीशत्रुजय तीर्थ पर (खरतर-वसहीमां) रहेली मूर्ति परथी तैयार करावेल प्रस्तुत जिनप्रभसरिनो फोटो अहि समुचित लागशे. प्रबल इच्छा होवा छतां पण योग्य प्रतिरूति प्राप्त न थवाथी सुलतान महम्मद (तुगलक)नो फोटो अहि न मूकातां न्यूनता लागशे, परंतु ते माटे निरुपाय छं. जिनचंद्रसूरि अने सम्राट अकवरना नामे प्रख्याति पामेलुं चित्र, चरित्र-प्रसंग विचारता म्हने तो जिनप्रभ- सूरि अने सुलतान महम्मद(तुगलक)नु होय, तेम लागे छे. विशेप वक्तव्य न करतां निज्ञासुओने सूचवीए के- विषयानुक्रम, ऐतिहासिक नामोनी अनुक्रमणिका, ऐतिहासिक घटना-निर्देशक संवत्सर-सूची विगरे योजनाओ साथे आ निबंध, इतिहास-प्रेमीओने विशेष उपयोगी थशे-एवी आशा छे. आ ग्रंथ-रचनामा उपयुक्त थयेला ग्रंथोनुं सूचन, ते ते स्थळे करवामां आव्युं छे. श्रीयुत अगरचंदजी नाहटा जेवा जे इति- हासप्रेमीओए आ प्रकाशनमा प्रत्यक्ष के परोक्ष प्रेरणा, सहायता के सहानुभूति दर्शावी छे, ते सर्वनो हुँ आभार मानुं छु. संकलनामां अने संशोधन-प्रकाशनमा बनी शकी तेटली सावधानी राखी छे, छतां आमां कोइ स्खलना दृष्टि-गोचर थाय, तो ते साक्षरो मने जरूर सूचवे, पुनः प्रसंगे ते सुधारी शकाशे, सज्जन विद्वानो आनुं निप्पक्षपात दृष्टिथी साद्यन्त अवलोकन करो, अने ग्रन्थ-रचना- प्रकाशन-परिश्रम सफल थाओ-एम इच्छु छ. वि.सं. १९९५ विद्वदनुचर- अक्षयतृतीया वडोदरा. लालचंद्र भगवान् गांधी.
विषयानुक्रम विषय विषय पृष्ठ १-३। जिनप्रभसूरिने पातशाहर्नु उपक्रम परिचय आमंत्रण ३१ अन्य ग्रंयकारने साहाय्य ४-५ पातशाहे जिनप्रभसूरिनो विद्वत्ता प्रने विहारस्थळो ५-७ फरेल सत्कार जैन श्वेतांबर-समाज-रक्षा ग्रन्थ-रचना ७०० स्तोत्रोनी रचना अने तोर्य-रक्षा-फरमान ३४ फलर-प्रदीप तोर्य-कल्प १८-२१ वंदी-मोचन राज-प्रसाद श{जय महावीर-प्रतिमानुं समर्पण- कल्प २२-२२ सन्मान ३५ दिल्लीश्यर हम्मीर महम्मदनी त्रि-विहार प्रसन्नता २२-२५ देवगिरि(दौलतावादामा ३६ फमाणयनयर-कल्पमा प्रतिष्ठान (पठण)पुर-यात्रा ३६ जणायल ऐतिहासिक वृत्तांत २५ दिल्लीमां सुलताने समर्पल महायोरनी प्राचीन मनोहर सराई, चैत्य, उपाश्रय विगैरे ३७ प्रतिमा २७ फनाणय-चीर-फल्प-परिशेष ३८ साहायुद्दोन घोरीना अमलमां दोलतावादमा प्रभावना गुप्त २८ पातशाह फरेल स्मरण महावीर-प्रतिमार्नु पुनः अने फरी आमंत्रण ४५ प्रकट पर्यु २९ प्रयाण, अल्लायपुरमा उपद्रय उपद्रयना पखतमा Vतुगलमायादमां शादी- खजानामा ३० दिल्लीमा सूरिनु स्वागत निधारण ४७ सिरोहमा सरकार ४७ ४८ विषय पृष्ठ विषय पर्युषणामा प्रभावना विजययंत्र-महिमा ६० सत्कर्तव्यो १९ वडनु वालg विगैरे सुलताननी माताना शकुंजयमां रायणयी दूध सन्मानमा वरसापधु ६७ दीक्षा विगैरे कर्तव्यो ५० गिरनारमा जैनविय-प्रतिष्ठा अन्य प्रसंगो गोष्टी-विनोद ७० सुलताने समर्पल भट्टारक- समकालीन इतिहास सराईमा प्रवेशोत्सव ५१ पथडशाह देवगिरि( दोल- मथुरा तीर्थनो उद्धार विगेरे ५२ तावाद)मां राजा रामदेव हस्तिनापुर-यात्रा-फरमान ५२ अने मंत्री हेमादिना सम- संघ साथे हस्तिनापुरमा यमां जिनदेव-मंदिर केयी प्रतिष्ठा-महोत्सव ५३ रीते कराव्यु ? जेनी रक्षा महावीरना विथनी पुनः जिनप्रभसूरिए करी हती. ७८ स्थापना ५५ पेयडशाह ७९ पातशाही फरमानथी जैन- पेथडशाहे करावेला समाज अने जैन तीर्थोमां ८४ जिन-प्रासादो ८२ निर्भयता ५५ पेयडशाहनां सुक्रतो देवगिरिमां जिन-प्रासाद प्रमावक जिनप्रभसूरिना केवी रीते कराव्यो? ८९ प्रमावथी प्रयतेला धार्मिक देवगिरिमा रामदेव राजाना महोत्सवो ५६ राज्यमा शाह देसल अने मुलताननी सभामा रिजीनी सहजागाहे करावेल जिन. वचन-प्रभाव ५७ मंदिर, जेनी रक्षा जिनप्रम- कल्प-परिशेषनो उपसंहार ५७ सरिए करी हती जिनप्रभसूरिना चमत्कारी भयानक अल्लाउद्दीन-युग १०३ वृत्तान्तो, पीरोज सुलतान- कन्नाणपुरना जैन शिल्प- पर प्रभाव ५९ शास्त्री ठक्कर फेरु १०७ .
८ विषय पृष्ठ विषय पृष्ट दिल्लीवर पातशाहोथी व्यंतरनोवळगाड दूर करवो १३९ समकालीन राघवचैतन्यने हराया सन्मानित १४१ अन्य जैनाचार्यो १०९ ६४जोगणीओने वश करवी १४३ शाहि मुहम्मद अने पेरो फलंदरनो गर्व हरवी जयी गौरवित गुणभद्र अदभुत निमित्त-कथन १४६ सूरि अने मुनिभद्रसरि ११० वडने साथे चलाया महम्मदशाहथी प्रगसित महावीरनी प्रतिमाने वोलती महेन्द्रसूरि १११ करवी १४८ पेरोज पातशाहना मान्य महावीरनुं सम्मान-पूजन गणितज्ञ महेन्द्रसूरि ११३ कराय १५० अन्य चमत्कारी १५० पेरोज पातशाहथी सत्कृत रत्नशेखरसूरि ११४ खंडेलवालोने जैनो कर्या १५० जिनप्रभसूरिनी अप्रकट मुलतान-सन्मानित शाह जगसिंह अने महणसिंह; कृतियो १५४ जेना देवगिरिना जिन- मिनप्रभसूरिनी पह-परंपरा १५४, मंदिरनी प्रशंसा मिनप्रभ- जिनदेवसूरि १५४ सूरिए करी हती ११५ जिनमेरुसूरि १५७ जिनप्रभसूरिनो विशेष जिनहितसूरि परिचय १३४ चारित्रवर्धन याचनाचार्य १५९ श्रीमालसंघना गुरु जिन अन्य अनुयायीओ सिंहसरि १३४ उपसंहार १६४ जिनप्रभसूरिना जम्म, दीक्षा, सूरिपदादि १३६ पद्मावतीना प्रमावधी ऐतिहासिक घटना-निर्दे- चमत्कारो १३७ शक संघरसर-सूची १८८ महम्मदशाहनी मुलाकात १३८ शुद्धि-पत्रक ऐतिहासिक नामोनी अनु- क्रमणिका १६६ जिनप्रभसूरि अने सुलतान महम्मद. KE (ले. पं. लालचंद्र भ. गांधी. प्राच्यविद्यामंदिर, बडोदरा ) पोतानी विद्वत्ता अने सच्चारित्रताथी जन-समाज पर उपकार करनारा, जैन-शासननी कीर्ति-पताका फरकावनारा, जैन-शासनना उज्ज्वल गौरवने प्रकाशित करनारा, जन- समाजमां अने राजा-महाराजाओमां हिंदु राजाओ अने मुसल्मान पातशाहो पर अपूर्व प्रभाव पाडनारा प्रभावशाली जे जे प्रभावक महापुरुषो धई गया छे; तेमां जिनप्रभमूरिनु विशिष्ट स्थान छे. विक्रमनी चौदमी सदीना उत्तरार्धमां-मुसल्मानी आक्र- मणना भयानक विपम युगमा, दिल्लीश्वर सम्राट् महम्मद तुघलक पर अनुपम प्रभाव पाडी जैनसमाजने निरुपद्रव वनावनार, जैन-तीर्थो-मंदिरोने तुरकोना दुःखद विप्लवोमांथी वचाची निर्भय करनार, तुरकोना कब्जामां गयेल शासन-नायक महावीरना विचने सत्कारपूर्वक पार्छ वाळी प्रतिष्ठित करनार, जन-समाजने सुरक्षित करनार, सुलतान महम्मद तघलकथी सन्मानिव थयेला आ सत्पुरुपने आपणे कमभाग्ये हजु यथार्थ रूपमा ओळखी शक्या नथी; एथी आ लेखद्वारा ए आचा- २] [ जिनप्रभसूरि अने र्यनो ऐतिहासिक प्रामाणिक परिचय करावया कंईक यत्न करूं छु. आ प्रयत्नथी, महम्मद तघलक संबंधी अन्यत्र जाणवामां न आवेली-प्रकाशित अतिहासिक पुस्तकोमा यांचवामां नहि आवेली; छतां तेना समकालीन परिचित विद्वान जैन लेखकोए प्राकृतभाषामां लखी राखेली ऐतिहासिक घटना प्रकाशमां आवशे के जे पुरातत्यप्रेमी इतिहास-रसिक जिज्ञासु पाठकोने आनन्दप्रद थशे तेम धारु छ. जैनाचार्य हीरविजयसरि तथा जिनचंद्रमरि (सपरिवार) अने सम्राट् अकबरनी इतिहासप्रसिद्ध विशिष्ट समागमवाळी संतोपकारक सफळ घटना पहेला लगभग अढीसो वर्ष पर थयेल चिरस्मरणीय आ ऐतिहासिक वृत्तान्त हालमां प्रकाशमां आवे छे एमां पण कुदरतनो कंडक संकेत हशे. जैन ज्योतिर्धरोना झळहळता तेजने न सहन करी शक- नारा, ए महाविभूतियोने यथार्थ रूपमा न ओळखी शकनारा, अथवा ओळखवा छतां गमे ते अव्यक्त तुच्छ कारणे ए सत्पु- रुपोने विकृत रूपमा आलेखनारा, ए विशिष्ट उच्च ज्योतिर्धरो सामे जाण्ये-अजाण्ये रज उडाडी तेमने झांखा पाडवानी उपहासयोग्य स्वभाव-सुलभ व्यर्थ चेष्टा करे ए स्वाभाविक वनवा योग्य छे, परंतु आपणे तो एमांथी पण प्रेरणानो बोध- पाठ मेळवी. प्रमादनो परित्याग करी,आपणी तन-मन-धनादिक शक्ति मेनो क्षुद्र कलहादिमां दुर्व्यय न करता, जीवननी अमूल्य - .
सुलतान महम्मद.] क्षणोनो सदुपयोग करी एवा ज्योतिरोने प्रकाशमां लावया जोईए अने तेमना सद्गुणो तथा सत्कर्तव्योथी परिचित थई, तेमांथी शुभ प्रेरणा प्राप्त करी, प्रगतिने पंथे प्रयाण करतां एवा ज्योतिर्घरो प्रकटाक्वा प्रयत्नशील थर्बु जोईए. जेनी सफळतामां स्व-परर्नु श्रेयः समायेलुं छे. प्रस्तुत प्रयत्न पण प विचारनुं परिणाम छे. प्रस्तुत जिनप्रभरिनो सांसारिक परिचय, माता-पितादि, ज्ञाति-गोत्र, पूर्वनाम, जन्म-समय, परिचय जन्म-स्थल, दीक्षा-समय, दीक्षास्थान ए विगेरे संबंधमां खास कई जाणवामां आव्युं नैथी; तेम छतां तेओ विक्रमनी चौदमी १. आ न नामना अने आ आचार्य पहेलां पचीशेक वर्ष पूर्वे थई गयेला लगभग समकालीन बीजा एक जिनप्रभसूरि आगमिकगच्छना हता. तेओए विक्रमनी तेरमी सदीना अन्तमा तथा चौदमी सदीना पूर्वार्धमां शत्रुजयमां रही प्राकृत-अपभ्रंशादि भाषामां नाना-म्होटा अनेक ग्रंथो रच्या छे, जे पाटण विगेरेना जैन भंडारोमा मळी आवे छे [ जुओ पाटण भं. सूची भा. १ गा. ओ. सिरोझ ]. पोताने शत्रुजय-सेवक तरीके ओळखावनारा आगमिकगच्छना ए जिनप्रभसूरिथी खरतरगच्छना आ जिनप्रम- सूरिने जुदा समजवा नोइये. २. विक्रमनी १७ मी सदीना अंतमां रचायेळी जगाती एक - ४] [ जिनप्रभसूरि अने सदीना वीजा चरण( वि. सं. १३२५ पछी )थी चोथा चरणना अंत (वि. सं. १३९०) सुधी विद्यमान हता, तथा तेओ खरतरगच्छमां थयेला जिनसिंहसूरिना पट्टधर हता, एम तेमना पोताना उल्लेखो परथी जणाय छे. जिनप्रभसरि नामनो प्रथम उल्लेख, नागेन्द्रगच्छना उदयप्रभसरिना पट्टधर मल्लिपेणमरिए अन्य ग्रंयकारने शकाब्द ५२१४=वि. सं. १३४९ मां साहाय्य रचेली सुप्रसिद्ध स्याद्वादमंजरी (हेम- चंद्राचार्यरचित अन्ययोगव्यवच्छे. द्वामिंशकानी विस्तृत विवृति)मां कयों छे. ए स्थळे विशेष ख. ग. पट्टावलीमां मळता उल्लेख प्रमाणे प्रस्तुत जिनप्रभसूरि, वाग देशना झूझणू (वढोद्रा) नगरना तांबी श्रीमालगोत्र (? ज्ञाति) वणिक्ना पांच पुत्रोमांथी मध्यम(वीजा उल्लेख प्रमाणे अने दशमां लघु)पुत्र हता. १. आ जिनसिंहमूरिथी वि. सं. १३३१ लगभगमां खरतर- गरछमाथी एक शाखा प्रकट थई हती, जे लघु खरतरगया नामथीं प्रसिद्धिमा आवो इती-एम खरतरगच्छनी पट्टावलीओमाथी सूचन मळे दे. ए शाखा-भेदने कारणे मूलगच्छ, जे वृहत्खरतरगच्छ नामधी ओळखावा लाग्यो, तेनी पट्टावलीओमा आ आचार्योनो विशेष परिचय फगव्यो जणातो नथी. २. " श्रीजिनप्रभसूरीणां साहाय्योदभिन्नसौरमा । श्रुतावुत्तंसतु सा वृत्तिः स्याद्वादमसरी || -स्याद्वादमंजरी [प्रशस्ति लो०८] .
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सुलतान महम्मद.]
[५
स्पटवा न होवाथी निश्चितरूपमां कही शकाय तेम नथी के-ए
मंजरीमां सौरभ प्रकट करवामां प्रस्तुत जिनाममरिनी न
सहायता होय, मात्र समान समयने क्या नाम साम्यने लईने
तेमनी संभावना करवामां आवे छे.
आ जिनप्रभरिए रखेली कृतियोमा प्रथम जणाती
कातंत्रविभ्रम ग्रंथनी टीका छे. तेमा
विद्वत्ता अने
सूकया प्रमाणे ए रचना वि. सं.
विहार-स्थळो १३५२ मां योगिनीपुर(दिल्ली)मा
माथुरवंशीय ठक्कुरकुलीन कायस्थ
खेतलनी अभ्यर्थनाथी भई हती. व्याकरणविषयक २६१
श्लोकप्रमाण आ वृत्तिनी प्रति, जेसलमेरना जैन भंडारमा 'छे.
आ टीकाना अंतमां पोताने 'अप्रौढधीः । विशेषण आप्यु
छे. ए पोतानी वयविषयक लघुता सूचक्या बापर्यु होय एवी
कल्पना करीए तो पण ते वसते तेमनुं वय वीशेक वर्षतुं कल्पी
शकाय; कारण के एज टीकाना अंतमा 'मूरि' पद साथे पोताना
नामनो निर्देश कयों छे. विभ्रम उपजावनार व्याकरणविषयक
१. गायकवाड ऑरिएन्टज सिरीझ् नं. २१ मा प्रकाशित
थयेल 'जेसलमेर भाण्डागारीय प्रन्थसूची' [पृ. ४८-४९] मां
तथा तेना 'अप्रसिद्धप्रन्य-प्रत्यकृत्परिचय' [पृ. ५८] मां
अम्हे आ ग्रन्थ साथे प्रन्थकारनो संस्कृतमा संक्षेपमा परिचय
गव्यो छे.
,
[ जिनप्रभसूरि अने प्रयोगो संबंधमां सूक्ष्म ज्ञान थQ अने एप्रयोगोने व्याख्यानद्वारा समजावयानी शक्ति प्राप्त थवी, सूरिपद-प्राप्ति थवी ए सर्वनो समय लक्ष्यमां लई विचार करतां जिनप्रभसरिनो जन्म वि. सं. १३२५ लगभगमां थयो हशे एम संभावना करी शकाय. वि. सं. १५०३ मां सोमधर्मगणिए रचेली उपदेश-सप्ततिमां थयेला एक उल्लेखने तेमना जन्मसमय संबंधमां घटावीए तो वि. सं. १३३२ मां तेमनो जन्म कल्पी शकाय. तरुण वयमां ज तेमनी दीक्षा थई जणाय छे अने सुरिपद पण वि. सं. १३५२ पहेलां थयु होवू जोइये एम विचारी शकाय छे. वि. सं. १३९० सुधीनी तेमनी कृतियो जाणवामां आवी छे. वृद्धावस्थाने लीधे छेल्लां दशेक वर्ष तेमने निवृत्ति स्वीकारवानी जरूर पडी होय अने विक्रमनी चौदमी सदीना अंतमा तेमनुं अवसान थयु होय एम विचारतां तेमनी आयुष्य-मर्यादा लगभग ७५ पोणोसो वर्पनी संभवे छे. तेमनी देह-विलयनी भूमि निश्चितरूपमा जाणवामां आवी नथी, तेम छतां तेमन विहार अने वास-स्थानमां तथा ग्रन्थ-रचनामां दिही, देवर्गाि (दोलताबाद ) अने अयोध्याने प्राधान्य मळ्यु होय ते १. " दन्त-विश्वमिते वर्षे श्रीजिनप्रभसूरयः ।। अभूवन् भूभृतां मान्याः प्राप्तपद्मावतीवगः ॥ -उपदेशसप्तति (जैन आत्मानंद सभा-भावनगर- द्वारा प्रकाशित 9.५८ - सुलतान महम्मद. ] [७ जणाय छे. विशेषतः ते तरफनो प्रदेश, तेमना स्मरणीय प्रभायो, उपदेशो, स्मारको अने उपकारोथी पावन थयो हतो. जिनप्रभसरिए रचेली कृतियोमा संवत्ना निर्देशवाळी ग्रंय-रचना कृतियो आ प्रमाणे जाणवामां आवी छे:- वि. सं. १३५२ मां योगिनीपुर कातंत्रविभ्रम-टीका (दिल्ली)मां ग्रं.२६१ वि. सं. १३५६ मा श्रेणिकचरित्र (दू-वा- श्रयकाव्य) तपोटमतकुट्टनशतक वि. सं. १३६३ मां कोसलानयर विधिप्रपा (प्रा. श्राव- विजयादशमी (अयोध्या)मां कोनी अने मुनिओनां प्रथमादर्श ले. वाच- कृत्योनी सामाचारी) नाचार्य उदयाकरगणि] ग्रं. ३५७४ वि.सं. १३६४ मां कल्पमत्र-वृत्ति(पंजिका संदेहविपौपधि) ग्रं. २२६८ वि. सं. १३६५ मां दाशरथिपुर अजितशांतिस्तव-वृत्ति १. जिनप्रभसूरिए पर्युपणा-कल्पना दुर्गम पदो पर विवरण- रूप पंजिका रची हे, जेर्नु अपरनाम सन्देहविपोषधि छे. जामनगर- निवासी पं. ही.ई. द्वारा आ ग्रंथ प्रकट थयो छे, परंतु तेमां ८] [ जिनप्रमरि अने पोपमा (अयोध्या)मां (बोधदीपिका).७४० साकेतपुर उपसर्गहरस्तोत्र-वृत्ति पोप व. ९ (अयोध्या)मां (अर्थकल्पलता) साकेतपुर भयहरस्तोत्र-वृत्ति पोप शु. ९ (अयोध्या)मां (अभिप्रायचन्द्रिका) वि. सं. १३६९ मां फलोधीमां फलपर्धिपार्श्व स्तोत्र वि. सं. १३८० मां पादलिप्तकृतवीरस्तोत्र- वृत्ति रचना-समयवाळो उल्लेख जोवामां आवतो नथी, अन्य प्रति परथी तेनी रचना वि. सं १३६४ मां ययेली जणाय छे- सुरीन्द्रस्यान्वये जातो नवागोवृत्तिवेधसः । श्रीजिनेश्वरसूरीणां पौत्रः पात्रमनेघमः ।। पुत्रः श्रीमज्जिनसिंहसूरीणां रीणरेफसाम् । जान्य प्रन्यमेवं श्रीजिनप्रभमुनिप्रमुः ।। वैक्रम स्त्रीला-विश्वेदेवसाव्ये तु वत्सरे xx ही. र. कापडियाए चतुर्विशतिजिनानन्दस्तुतिनी भूमिका [पृ. ४४ ] मां 'विश्व' शब्दनी तेर संख्यावाचकानुं समर्थन करवामां · विश्वदेव ' शब्दवाळा उपर्युक पाठने दशावतां 'श्रीफला ने बदले 'ऽस्ति कला' पाठ दर्शाव्यो , ते असंगत लागे छे. हालमा प्रचलित कल्प -किरणावली, कल्पलना, फल्पसुबो- विका, करप-कलिका, कल्प प-दीपिका विगेरे कल्पसूत्रनी वृत्तियो, "
सुलतान महम्मद.]
[९
~~
.
वि. सं. १३८१ मां राजादि-रुचादिगण-वृत्ति
साधुप्रतिक्रमणमत्र-वृत्ति
सरिमंत्राम्नाय(सरिविद्या कल्प)
वि.सं. १३८५ मां [दिल्लीमां] शत्रुजयकल्प(राजप्रसाद)
वि. सं. १३८६ (शकव.१२५१)मां टीपुरी-तीर्थस्तोत्र
वि.सं. १३८७ मां देवगिरि(दोल- पावापुरी-कल्प
ताबाद )मां (दीपालिका-कल्प)
वि. सं. १३८९ मां योगिनीपुर तीर्थकल्पनी पूर्णता
(दिल्ली) मां
वि. सं. १३९० मां हस्तिनापुरमा हस्तिनापुरतीर्थ-स्तोत्र
जिनप्रभसारि पछी लगभग सो वर्षे थयेला तयागच्छीय
पं. सोमधर्मगणिए वि. सं. १५०३
७०० स्तोत्रांनी मां संस्कृतमा रचेली उपदेशसप्ततिमां
रचना सूचव्युं छे के- जेणे विविध प्रका-
रनी श्रेष्ठ प्रभावनाओवडे सुलतानने
उपर्युक्त जिनप्रभसूरिनी संदेहविपोपधि पछी लगभग अढीसो वर्षे
रचायेली छे. पाछळना वृत्तिकारोए जिनप्रमस्निी उपर्युक्त पंजिकानो
घणे अंशे आधार लीधो हशे, एम मानवू अयुक्त नहि गणाय.
१. केटलाक लेखकोए आनो रचना-समय वि. सं. १३२७
जणाव्यो छे, ते समजफेरथी कर्यो जणाय छे.
२. " इत्यादि नानाप्रवरप्रभावनाभरैः सुरत्राणमपि व्यबुधत् ।
[ जिनमममूरि अने " - , पणं विशिष्ट वोध पमाड्यो हतो, जेणे सातसें स्तोत्रो अने बहु उपकारी ग्रंथो गुथ्या हता, समस्त अज्ञान-अंधकारने दूर करनारा, शासन-प्रभावक ते जिनप्रभसरि संघर्नु भद्र- कल्याण करो। जिनप्रभारिना रचेला सिद्धान्त-स्वव पर विवरण-अव- चूरि रचनार आदिगुप्त-शिष्य (तपागच्छीय ? विशालराज- गणि शिष्य?) उपर्युक्त रचना-संबंधमां विशेपमा जणापे छे के- पहेलां, प्रतिदिन नवीन स्तवन निर्माण कर्या पछी निदोष आहार ग्रहण करवाना अभिग्रहवाळा जिनप्रमगरिए स्तोत्राणि या सप्तशतीमितानि च प्रन्यांश्च जमन्य बहूपफारिणः । स श्रीजिनप्रभसूरिरिताशेषतामसः । मद्रं करोतु सयाय शासनस्य प्रमाक्फः ।। --उपदेशसप्रति (भावनगर आ. सभा म. पृ. ५८-५९) १. " पुरा श्रीजिनप्रभसूरिभिः प्रतिदिनं नवस्तवनिर्माणपुर- रसरं निरवद्याहारमहणाभिमवद्भिः प्रत्यक्षपद्मावतीदेवीवच साम(s). भ्युदयिनं श्रीतपागच्छं विभाज्य भागवतां श्रीसोमतिलकसूरीणां स्वशैक्ष-शिष्यादिपठन-विलोकनाद्यर्थे यमक-ष-चित्र-छन्दो- विशेषादि-नवनवमीसुमगाः सप्तशतीमिताः स्तवा उपदीकता निजनामाविताः।" -सिद्धान्तस्तवावरि (नि. सा. फाव्यमाला गुच्छक ,पृ.८६) सुलतान महम्मद.] प्रत्यक्ष पद्मावती देवीना वचनथी तपागच्छने अभ्युदयबाळो जाणी, पूज्य सोमतिलकमूरिने पोताना शिष्य-शिष्याओ १. वृद्धक्षेत्रसमास, सप्ततिशतस्थान ( रचना सं. १३८७ ) विगेरेना कर्ता आ. सोमतिलकरिनो जन्म वि. सं. १३५५ मां, दीक्षा वि. सं. १३६९ मां, सूरिपद वि. सं. १३७३ मां जंघ. सलनगरमां वीरमंदिरमा संघपति गजे करेला २५००० टकोना व्यय- पूर्वक, अने स्वर्गवास वि. सं. १४२४ मां थयेल होवानुं सूचन मुनिसुंदरसूरिए वि. सं. १४६६ मां रचेली गुर्वावली ( यशोवि- जय जैन ग्रन्थमालाप्रकाशित पृ. २८-३१)मां फयु छे. जिनप्रभसूरिए रचेला पुष्कल स्तोत्रोमाथी हालमा उपलब्ध स्तवन-स्तोत्र नीचे सूचक्वामां आवे छै:- भाषा, विशेष. प्रारंभ. पद्यसंख्या, प्रकाशन-स्थळ. १ ऋषभदेवस्तव (सं. दशदिपाल- ११ प्रकरणरत्नाकर स्तुतिगर्भ । अस्तु भा.४, पृ. २४, श्रीनामिभूर्देवो) जैनस्तोत्रसमुच्चय पृ. २६ ] २ (अष्टभापामय । निर [प्र. २. भा. २, बधिरुधिरज्ञान) पृ. २६३] (पारसीभाषामय । ११ [जैन पृ.२४७] अल्लालाहि) * आ स्तोन पर अवचूरि छे. स्तोत्रनाम. " " ४ । - नाथो भगवान्) १२] [जिनप्रभसूरि अने विगेरेने भणवा, जोवा विगेरे माटे यमक, श्लेप, चित्र-छन्दो- (प्रा. आज्ञाप्राधान्य ११ [जैनस्तोत्रसंदोह नय-गम-मंगपहाणा) पृ. २२७ ] ५ अजितनाथस्तवन (सं. यमफमय । वि. २१ [प्र. २८-३२] श्वेश्वरं मथितमन्मथ) ६ चंद्रप्रमस्तवन ( पड्भापामय । नमो १३ [प्र. र. भा. २ महासेननरेन्द्रतनूज) पृ. २६९] स्तुति (सं. देवयंस्तुष्टुये तुष्टेः) ४ [., २६२] ८ शांतिजिनस्तवन (से, श्रीशान्ति- २० [म. र. भा. ४, पृ. २६ ] ९ मुनिसुव्रतस्तोत्र (सं. निर्माय नि- यिगुणद्धि) (सं. क्रियागुप्त । २० [म. र. भा. २, श्रीहरिकुलहीराकर) पृ. २४४] ११ पार्श्वस्तव (सं. का मे यामेय! १७ मि. २. भा. ४, पृ. ३०, का.मा. ७ गुच्छ पृ.१०७ (सं. अधियदुपनमन्तो) १२ [, पृ. ११७) ८ [प्र. र. भा.२ पू. २५१] (सं.श्रीपार्श्व ! पादान्त ८ [ ,,पृ. २९२] नागराज !) १० नेमिस्तव शक्तिः) (सं. पार्श्वपमुं श. श्वकोपमान) १४ सुलतान महम्मद.] [ १३ विशेष विगेरे नवा नवा प्रकारोथी सुन्दर, पोताना नामांकित १५ (सं. प्रातिहार्य । त्वां १० [म.र. भा. २, विनुत्य महिमश्रि पृ. २६९] श्रियामई) (प्रा. नवमहात्मक। १० [जैनस्तोत्रसंदोह दोसावदारदक्खों) पृ. २२८] (सं. श्रीपार्धे भा. ९ [प्र. र. भा.४, वतः स्तौमि) पृ. २३] (सं. श्रीपार्श्वः ४४ [, पृ. २६] " " १७ १८ । श्रेयसे भूयात् ) " ........ " । २२ वीरस्तव (सं. पार्श्वनाथमनघ) ९ २० (सं.जीरापल्ली। जी- १५ [म.रभा. २, रिकापुरपति सदैवत) २६८] (प्रा, फलवधि। १२ [, २६९] सयलाहि-वाहिजलहर !) (सं. कंसारिक्रम- २५ [प्र. र. भा. २, निर्यदापगा-) पृ. २४५, का.७ गुच्छ पृ. ११२] . . (सं. निर्वाणफल्या- १९ [, १. ११९] णक । श्रीसिद्धार्थनरेन्द्रवंश-) * आस्तोन पर टिप्पनक छे, .
" २४] [जिनप्रभसूरि अने ७०० सातसो स्तोत्रो भेट का हता. २४ चीरस्तव (सं. चित्रस्तष । २७ [जैनस्तोत्रसं. चित्र: स्तोप्ये जिन वीरं) पृ. ९२] (सं. पंचवर्गपरि- २६ [म. र.भा. २ हार । स्वःश्रेयसंसरसोरुह ) पृ. २४२ २६ (सं. पंचकल्याणमय । ३६ [., पृ. २४९] पराक्रमेणेव पराजितोऽयं) २७ (सं. श्रीवर्द्धमानः ९ [,, पृ. २५१] सुखवृद्धयेऽस्तु) २८ (सं. लक्षणप्रयोगमय। १७ [., पृ. २६०] निस्तीर्ण विस्तीर्णभवार्णव -) २९ (सं.विविधळदोनातिरुचिर । २५[प्र.२.भा.४, असमशमनिवास) पृ. २८] (सं. श्रीवर्द्धमान १३ [म. र. भा. २, परिपूरित) पृ. २१७] (प्रा. सिरिवीयराय ! ३५ देवादिदेव !) ३२ चतुर्विशति- (सं.कनककान्तिधनुः) २९ [प्र. र. भा. २, जिनस्तक पृ. २४७, का. ७गुच्छ पृ.११५] ३० ........ Y सुलतान महम्मद.] [ १५ तीर्थकरो, गणवरो, तीर्थो, वीर्यरक्षको, शारदादेवी, .३ चतुर्विशति- (सं. ऋपम ! २९ [प्र. र. भा. ४ जिनस्तवन नम्रसुगसुरशेखर !) सं. पृ. १४९] ३४ (सं. आनन्दसुन्दर- २९ [, पृ. १९१] पृ. ३१; जैनस्तो. पुरन्दरनम्र!) ३५ " ३६ ३५ " ३ (सं. पात्वादिदेवो २९ [प्र. र. मा. २, देश कल्पवृक्षाः) पृ. १७५] (सं. प्रणम्यादि. २८ [प्र. र. भा. २, जिनं प्राणी) पृ. २५८] (सं. निपम! ७ [प्र. र. भा. ४, प्रीणितभव्य सार्थ) पृ. २२] (सं.आनननाक्रि. २५ [प्र. र. मा. ४, पृ.३०२] (सं. यमक्रमय । त- २८ [प्र. र. भा. १, त्वानि तत्वानिभूतेषु सिद्ध) पृ.३०३] (सं. शेषमय।ये ३० [जैनस्तोत्रसंदोह सततमक्षमालो) पृ.२१६] (सं. ऋषभदेवम- ३० अप्रसिद्ध नन्तमहोदयं) * मा स्तवनी मरि जयचन्द्ररिए पीछे पति) " . --- स्वद १६] [ जिनप्रभसूरि अने पोताना गुरु (जिनसिंहसरि ) ए विगेरेने उद्देशीने संस्कृत, ४२ नंदीश्वरवल्प- (सं. आराध्य श्री ४८ [प्र. र. मा. २, जिनाधीशान) पृ. २५२] ४३ धीवरागस्तवन (सं. जयन्ति पादा १६ [प्र... भा. २, जिननायकरथ) पृ. २६१] ४४ मंत्रस्तव (सं. स्व:श्रियं ५ [प्र. र. मा. २, श्रीमदईन्तः) पृ. २५१] ४५ अईदादिस्तवन (सं. मानेनोवी ८ [प्र. र. मा. ४, व्यहृत परितो) पृ. २२] ४६ पंचपरमेष्टिमहा- (प्रा. किं कप्प- १३ [प्रा. जैनस्तो. सं.] मंत्रस्तव तरु रे!) ४७ पंचनमस्कृति- (सं. प्रतिष्टिनं ३३ [प्र. र. भा. २ तमःपारे) पृ. २५६. ४८ कल्याणपंचक- (सं. निलिम्प- ८ [प्र. र. भा. २ स्तवन लोकायितभूतलं प. ५६० ४९ मंगलाष्टक (सं. नतसुरेन्द्र ९ [प्रा. जैनस्तोत्रसं. ५० गौतमस्तोत्र (सं. श्रीमन्तं २१ [म. र. मा. २ मगधेषु ) पृ.२४३ का.७ गुच्छ पृ.११० (प्रा. जम्म पवि- २५ जनस्तोत्रसंदो जिनेन्द्र) त्तिय सिरि) सुलतान महम्मद.] [ १७ प्राकृत, अपभ्रंश विगेरे विविध भाषामां, विविध छंदोमां, विविध अलंकारोमां, विविध चातुर्यथी रचायेलां चित्रमय मंत्रादिगर्मित ए मनोहर स्तोत्रोमांथी लगभग ७० सीत्तेर जेटलां स्तोत्रो आजे पण उपलब्ध थई शके छे. एमांना केट- लांक निर्णयसागरनी काव्यमाला( गु. ७)मां, प्रकरण- रत्नाकर (भा. २-४) मां, जैनस्तोत्र-संग्रहोमां, जैनस्तोत्रसमु- चय, जैनस्तोत्रसंदोह विगेरेमा प्रकाशित थयेलां जोवाय छे.बीजां -~- ६२ (सं. महामंत्रमय । ९ [, पृ. २३ ॐनमनिजगन्नेतुः) । ५३ जिनसिंहमूरि- (सं. प्रभुः प्रदद्या- १३ [प्र. र. मा. २, स्तवन न्मुनि-पक्षिपले) पृ. २११] ५४ जिनागमस्तवन (सं. नत्वा गुरुभ्यः) ४६ [प्र. र. भा. ४, पृ.३०० का.७ गुच्छ पृ.८६] ६५ शारदास्तवन (सं. वाग्देवते! १३ [प्र. र. भा. २, भक्तिमतां स्वशक्ति) पृ. २९१] ५६ (सं. अष्टक | ॐ ९ अप्रसिद्ध नमनिजगद्वन्दित) १ ९७ पद्मावती (जिनशासन चतुष्पदिका अवधारि) दो १८ वर्धमानविद्या (पा, इय बद्धमाणविना) १७ -- ।
[जिनप्रभसूरि अने १८] केटलांक पाटण, खंभात, लोंबडी, बीकानेर विगेरेना जैन भंडा- रोमां जडी आवे छे. तेओए पारसी भापामां रचेलं ऋपभजिन स्तोत्र (जैनसाहित्य-संशोधक वं. ३, अं.१ मां तथा नि. सा. प्रकाशित 'जैनस्तोत्रसमुच्चय ' मां प्रकाशित ) पाठकोनुं खास ध्यान खेंचे तेवु छे. तेमने ते विदेशी-विजातियोनी भाषा पर पण काबु हतो, जे भाषादिना अभ्यास तरफ केट- लाक डाह्या (1) घृणा धरावे छे. जिनप्रभारिए तो आ भापा ज्ञानथी अने बीजा केटलाक व्यवहारज्ञान-चातुर्यादि सद्गु- णोथी विदेशी पातशाहीमां-दिल्लीश्वरना राज-दरबारमा पण सन्मान मेळव्यु हतुं अने तेओ समाजने उपयोगी अनेक सत्कर्तव्यो करवा भाग्यशाळी थई शक्या हता. शहेनशाह अकवरना दरवारमा सन्मान मेळवनार तपागच्छना उ. भानु- चंद्र अने सिद्धिचंद्र वाचक विगेरेए ए विदेशी भाषा पर काबू मेळव्यो हतो-जेओ आ आचार्य पछी लगभग वसा व थयां. ए उपर सूचवेलां स्तोत्रो, वृत्ति-टीकाओ अने वीजा ग्रंथोमां कल्प-प्रदीप तेमनो कल्प-प्रदीप नामनो तीर्थकल्प १ 'कविवर समयसुंदरना प्रशिष्यरानसोमे करेल रमनिन- स्तवन पारसी भाषामा मले थे, तथा संभवतः जिनामसूरिजीका शांतिनाय-स्तवन पण पारसी भापामां उपलब्ध थाय छे' एम अगरचंद नाइटा जणावे छे.
सुलतान महम्मद.] [ १९ तीर्य-कल्प ग्रंथ ऐतिहासिक दृष्टिए अति महत्चनो छे. सौराष्ट्र, गुजरात, राजपूताना, मालवा, मध्यदेश, पूर्वदेश अने दक्षिणमां आवेलां जैन तीधोना विश्वसनीय प्राचीन इतिहासनो परिचय करारनार ए ग्रंथ तेओए देश-पर्य- टनादिद्वारा बहोळो अनुभव मेळया पछी वृद्धावस्थामां रच्यो जणाय छे. तेमना तीर्थ-कल्पनु अवलोकन करतां समजाय छे के-जिनप्रमारिए अनेक देशोमां पर्यटन कयु हाँ, अनेक तीथोंनी यात्रा-प्रतिष्ठा करी हती, अनेक वार राज-सभाओमां प्रवेश कयों हतो, अनेक शास्त्रोर्नु अवलोकन कर्यु हतुं, अनेक भापाओमां प्रवीणता मेळवी हती, काव्य-साहित्यकलामां कुशलता प्राप्त करी हती, अनेक पंडितो साथे चातुर्यगोष्ठी करी हती, अनेक मुनियोने अध्ययन करावी विद्या-वृद्धि करी हती. तेमना तीर्थ-कल्पमा मुख्यताए नीचे जणावेल तीर्थो अने तीर्थ-भक्तो संबंधी संक्षेप अने विस्तारथी परिचय आपत्रामा आव्यो छ- " तीर्या १ शत्रुजय ५ अर्बुद (आयू) २ उज्जयंत (गिरनार) ६ मथुरा ३ पार्थ (स्तंभन-खंभात) ७ अश्वावरोध (भरुच) ४ अहिच्छत्रा ८ चैमारगिरि (राजगृह) Prime २० [ जिनममरि अने ९ कौशांबी २५ हरिकंखी-पार्थ १० अयोध्या २६ शुद्धदंती ११ पावापुरी २७ अभिनंदन १२ कलिकुंड २८ चंपापुरी १३ हस्तिनापुर २९ पाटलिपुत्र(पटना) १४ सत्यपुर (साचोर) ३० श्रावस्ती १५ अष्टापद ३१ वाराणसी १६ मिथिला ३२ कोका-पार्श्व (पाटण) १७ रत्नपुर ३३ कोटिशिला १८ कनाणयनयर(कनानर, ३४ चेल्लण पार्श्व (दिपुरी) दक्षिण) वीर ३५ कुडंगेश्वर (उज्जयिनी) १९ प्रतिष्ठान(पैठण)पत्तन ३६ माणिक्यदेव(कुल्पाक,दक्षिण) २० नंदीश्वर ३७ अंतरिक्ष पार्श्व २१ कांपिल्यपुर ३८ फलबर्द्धि (फलोधी) पार्थ २२ अरिष्टनेमि(शौरीपुर) ३९ समवसरण-रचना २३ शंखपुर २४ नासिकपुर ४१ तीर्थ-नामसंग्रह तीर्थ-भक्तो १ कपर्दियक्ष २ कोइंडिय देवी ४. महावीर-नाणघर सुलतान महम्मद.] [२१ 01 - ३ अंबिका देवी ५ व्याघ्री (शगुंजय पर ४ आरामकुंड- अनशन करनारी वाषण) पद्मावती देवी ६ मंत्रीधा वस्तुपाल तेजपाल जिनप्रभसरिए संस्कृतमां बने प्राकृतमां गद्यमां अने पद्यमा छटादार शैलीथी रचेला ग्रं.३५०३ (६०) श्लोक प्रमाणवाळा आ तीर्थकल्प ग्रंथमा उपर्युक्त तीयों अने तीर्थ-भक्तो साथे संबंध घरावती पोताना समय सुधीनी अनेक घटनाओर्नु विश्वसनीय वर्णन कर्यु छे. जेमाथी ते ते देशो, नगरो अने राज्योनी स्थितिनो पण सारो ख्याल थई शके छे, बीजो पण घणो उप- योगी जाणवा लायक इतिहास एमांथी मळी आवे छे, ए सर्व तीर्थोना कल्पो संबंधी विशेष परिचय करावतां आ लेख- निवन्ध एक ग्रन्यरूप पनी जाय; एथी अहि मात्र प्रासंगिक मूचवीशु. आ तीर्थ-कल्पमा सौथी प्रथम मजयनो कल्प छे. तेना अंतमां तेनो रचना-समय वि. सं. राज-प्रसाद १३८५ माघ व.७ शुक्रवार सूचवेल छे शत्रुजयकल्प ते माथे एक खास विशेषता तेमा सूचवी छे के-' आ(शत्रुजय-कल्प)नो प्रारंभ करतांज राजाधिराज, संघ पर प्रसन्न थया; आधी आ -- . " २२] [ जिनप्रभसूरि भने कल्प 'राज-प्रसाद ' नामे लांचा वसत सुधी जयवंत रहो.' उपर्युक्त उल्लेख पस्थी विचारने अवकाश मळे अने जिज्ञासा थाय ए स्वाभाविक छे के-आमा सूचयेल दल्लीश्वर हम्मीर राजाओनो अधिराज-महान सम्राट् कोण? महम्मदनी अने ए संघ पर केवी रीते प्रसन्न थयो ? प्रसन्नता. कोना प्रभावथी प्रसन्न थयो ? प्रसन्न थईने तेणे शुं कयु ? आ जैनाचार्य साथे एने शो संबंध-परिचय ? के जेथी आ ग्रंथकारने एना स्मरण माटे पोठानी एक कृतिनु-शझुंजय-तीर्थना कल्पनुं 'राज- प्रसाद ' एy नाम राखबार्नु उचित समजायु. आ संबंधी अन्यत्र तपास करतां पहेला आ ग्रंथ परथी शुं जणाय छे, ते तपासीए. उपर्युक्त तीर्थकल्पना अंतिम भागमां जिनप्रभसरिए ग्रंथकार तरीके पोताना नामनो निर्देश चातुर्यथी सूचवी कल्पप्रदीप' अपरनामवाळा आ ग्रन्थने वि. सं. १३८९ "प्राम्मेऽप्यस्य राजाधिराजः सो प्रसन्नवान् । अतो राजमसादास्यः कल्पोऽयं जयताचिरम् ।। श्रीविक्रमाव्दे योगाई-विश्वदेवमिते शितो। सप्तम्यां तपसः काव्यदिवसेऽयं समर्पितः ।।" -तीर्थकल्प (शत्रुजयकरप) . १
सुलतान महम्मद
]
[ २३
"
१
मां भाद्रपद २०१० ने दिवसे पृथ्वीन्द्र ( पातशाह ) हम्मीर
महम्मदना प्रतापी राज्य अमलमां योगिनीपत्तन(दिल्ली)मां
परिपूर्ण कयों हेतो-एम सूचव्युं छे. ए उपरथी विचारी
शकाय छे के शत्रुजय-कल्पना अंतमा सूचवायेल राजाधि-
राज ए अन्य कोइ नहि, परंतु दिल्लीश्वर सुलतान हम्मीर
महम्मद होवो जोइये, के जेने इतिहासमा 'महम्मद तपलक'
नामथी ओळखवामां आवे छे अने जे वि. सं. १३८१
(ईस्वी सन् १३२५) थी वि. सं. १४०७ (ईस्वी सन्
१३५१ ) सुधी-आजथी लगभग छसो वर्ष पर दिल्लीना
को(का)ऽर्थं भ( सृ )जेत् ? किं प्रतिपेधवाचि ?
पदं ब्रवीति प्रथमोपसर्गः ।
कीदृग् निशा ? प्राणभृतां प्रियः फ:
के प्रथमेत रचयांप्रचक्रुः ? ॥
-श्रीजिन प्रभसूरयः।
नेन्दानेप-शक्ति-शीतगुमिते श्रीविक्रमोर्वीपले-
वर्षे भाद्रपदस्य मास्यवरजे सौम्ये दशम्यां तिथो ।
श्रीहम्मीरमहम्मदे प्रतपति इमामण्डलाखण्डले
प्रन्योऽयं परिपूर्णतामभजत श्रीयोगिनीपत्तने ।।
तीर्थानां तीर्थभक्तानां कीर्तनेन पवित्रितः ।
कल्पप्रदीपनामाऽयं प्रन्यो विजयतां चिरम् ॥
-~-तीर्थकल्प [ का. प. ६४]
.
२६ ] [जिनप्रभसूरि अने नयर( कानानूर, दक्षिण )मां विक्रम- जैनधर्मना प्राचीन इतिहास' [ भा. १, पृ. ३६] मां, जैनग्रंथावली' [पृ. ३३ ] मां, 'जैनसाहित्यमें इतिहास के साधन ' [जैनमाहित्य-संमेलन रि. ले. पृ. १०] विगैरेमां पण तेवु नाम दविलुं जोवामां आवे छे; परंतु ए संबंधमां वधार विचार अने तपास पर्या पछी जणाय छे के-दक्षिणमा चोलदेशमा श्रीगंगम टापू( पट्टन )नी उत्तरं पांच माइल पर आवेलु, हालमा कन्नानूर( कानानूर) नामथी ओळखातुं ते ज आ नगर होवू जोइये. जे नगर एक वखते होयसाल राजाओनी गजधानी नरीक उन्नत यई प्रसिद्धिमा हतुं. होयसाल वीर सोमेश्वरे तेने किल्लाथी मुरक्षित कर्ये इतुं. विशेष माटे जुओ केम्त्रीज हीस्ट्री ऑफ इन्डिया [ वॉ. ३, पृ. ४८१, ४८४, ४८८ ] आ नाम निश्चित करवामां बगेटा कॉलेजना इतिहासना प्रोफेसर म्हारा स्नेही श्रीयुत केशव- लालभाई हिं. कामदारनो हुँ खास आमारी छ. विक्रमनी तेग्मी सदीना पूर्वार्धमा त्यां महावीर-प्रतिमानी प्रतिष्टा थयेली होई श्रीमान् जैनोन ए वास-स्थान पन्यु होवू जोइए अने ते समये ते व्यापार विगेरेथी सुसमृद्ध स्थितिमा होवू जोइये. १ अहिं सूचवेल विक्रमपुर पण उपर्युक्त पुस्तकमां सूचवेल दक्षिणमार्नु उपयुक्त फन्नानूरनी समीपर्नु जणाय छ, जिनपति सूरि-समां-' अत्यि मरुमंडले नयरविक्कमपुरे जसोवद्धणु जग जाणिए ए' जणावेल होइ विक्रमपुर जेसलमेर-निकटवर्ती स्थान होवू जोइए' एम अगरचंदजी नाहटा जणावे छे, ते विचारणीय छे.
सुलतान महम्मद.] [२७ -- महावीरनी पुरवासी, जिनपतिसरिना काका शाह प्राचीन मनोहर मानदेवे करावेली अने वि. सं. १२३३ प्रतिमा मां आपाढ शु. १० गुरुवारे अम्हारा ज पूर्वाचार्य श्रीजिनपतिमरिए प्रतिष्ठित १ आ जिनपतिसूरिनो संस्कृतमा संक्षेपमा परिचय अम्हें 'जेसलमेर-भांडागारीय-ग्रंथसूची' ना अप्रसिद्ध अन्य-प्रन्यकृत्प- रिचय [पृ. २८ ] मां तथा अपभ्रंशकाव्यत्रयी 'नो भूमिका [पृ. ६१-६८ ] मां आप्यो छे. ते परथी समजाशे फे-संघपट्टक- टीका, पंचलिंगीविवरण, प्रबोधोदय वादस्थल विगैरे प्रथो रचनारा आ प्रौढ विद्वान् वि. सं. १२१० थी १२७७ सुधी विद्यमान हता. तेमना पट्टधर जिनेश्वासूरिए अने जिनपाल उपाध्याय, सूरमभ उपाध्याय, पूर्णभद्रगणि, सुमतिगणि विगैरे विद्वान् शिप्योए पण अन्य-रचनादिद्वाग जन-समाज पर घणो उपकार कर्यो छे. आ जिनपतिसूरिए गुजरातनी भूमिमां आशापल्ली(आसावळ)मा अने पृथ्वीराजनी सभामा प्रतिवादियोने परास्त करी वादमा जय मेकन्यो हतो अने विधिमार्ग विस्तार्यो हतो-एवा अनेक उल्लेखो मळी आवे छे, जे अम्हे त्यां दर्शाच्या होवाथी अहिं आ लेखने विस्तारीशुं नहि. २ आ शाह मानदेव, ऊकेश( ओसवाल ) वंशना हता, 3 तेमना वंशनुं विस्तृत वर्णन, जिनपविसूरिना प्रशिष्य अने जिने- श्वरसूरिना शिष्य कुमारगणि कविए चंद्रतिलफ उपाध्यायना अभय- ~ ३०] [ जिनप्रभमूरि अने पण तेओने प्राप्त थयो नहि. कोइपण स्थळ-परिसरमां ते रह्यो होवो जोइए. प्रशस्ति वर्ष विगेरे तेना पर ज लखेखें संभवे छे. एक वखते न्हवण थया पछी भगवंतना शरीर पर परसेवो पसरतो दीठो, लूहवा छतां पण ते अटक्यो उपद्रवना नहि; तेथी विदग्ध श्रावकोए जाण्यु के- वखतमा कोइपण उपद्रव अवश्य अहिं थशे.' एवामां प्रभातमा जट्टय(जेठबा) राजपूतो (१ यवनो )नी धाड आवी. नगरने चोतरफथी विध्वस्त- विनष्ट कयु. एवी रीते प्रकट प्रभाववाळा स्वामी वि. सं. १३८५ सुधी पूजाया. वि. सं. १३८५ मां आवेला आसीनगरना विय (१) चशमां धयेला घोर परिणामवाळाए (? तुगलकायादमां घोरीए) श्रावकोने अने साधुओने चंदी शाही खजानामां (केदी) करीने विडव्या. पार्श्वनाथ- शैलमय वि भांग्यु अने महावीरनी ते प्रतिमाने अखंडित ज गाडामां चडावीने दिल्लीपुरमा १ इ. सन्. १३२८ [वि. सं. १३८५ ]नां दक्षिणमा मुसलमानी हुमलो थयो हतो, अने ते वखते मदुरा अने तेनी वहारवें मुख्य कन्नानूर, महम्मद तघलके कब्जे फयु हतुं, एवो इतिहास मळी आवे छे (जुओ केस्त्रीज हिस्ट्री ऑफ इन्डिया वॉ. ३, पृ. १८८). संभव छ के-उपर्युक्त खेदजनक घटना ते चखते बनी हशे.
सुलतान महम्मद ] [३१ आणीने तुंगुलकावादमा रहेला सुलतानना मंढारमा स्थापी. ते एवा आशयथी के-'सुलतान अहिं आव्या पछी जेम फरमावशे तेम करशुं. एथी ते प्रतिमा १५ मास सुधी तुरकोना कब्जामा रही. कालक्रमे महम्मद सुलतान देवगिरि (दोलताबाद) नगरथी योगिनीपुर(दिल्ली)मां आव्यो. जिनप्रभसूरिने अन्यदा खरतरगच्छना अलंकाररूप, पातशाहनं जिनसिंहसरिना पट्ट पर प्रतिष्ठित थयेला आमंत्रण जिनप्रभसूरि विविध देशोमां विहार करता दिल्लीनासाहपुर(शाखापुर-परा)मांआव्या. क्रम प्रमाणे महाराज-सभा(पातशाही दरवार)मां पंडितोनी गोष्ठी थतां महाराजाए( पातशाहे ) पूज्यु के-'अतिशय विशिष्ट पंडित कोण छे ?' जोपी धाराधरे तेमना (जिनप्रम- सरिना) गुणोनी स्तुति करी. त्यारपछी महाराजे ते १ आ तुघलकाबाद, दिल्हीथी पूर्वमा ६ माइल पर ग्यास्- उद्-दीन तपलके (महम्मद तघलकना पिताए ) इ. सन् १३२१ (वि. सं. १३७७) लगभगमां वसाव्युं हतुं, तेम अन्यत्र इतिहा- समां बांचवामां आवे छे. एतुं चित्र पण मळी आवे छे. २ वि. सं. १३३१ लगभगमा खरतरगच्छनी लघुशाखा आ आचार्ययी प्रवर्ती हती, ए पहेलां कहेवाइ गयुं छे. .
३२]
{ जिनप्रभसूरि अने
( पं. धाराधर )ने ज मोकली जिनप्रभमरिने बहुमानपूर्वक
आमंत्रण करी बोलाव्या.
[वि. सं. १३८५] पोप शु. २ नी सांझे सूरिजी महा-
राज महाराजाधिराज(महम्मद)ने मेट्या.
पातशाहे सुलताने सरिजीने अत्यंत पासे बेसारी
जिनप्रभसूरिनो कुशलादि वृत्तान्त पूछयो. सरिजीए नवीन
करेल सत्कार काव्य रची आशीर्वाद आप्यो, ते वेणे
सांभळ्यो. लगभग अर्धी रात सुधी एका-
तमा गोष्टी करी. राते त्यां( पातशाही महेलमा) ज वास
करावीने प्रभाते परिजीने फरी बोलाव्या. संतुष्ट थयेला महा-
नरेंद्रे १००० गायो, द्रव्यसमूह, श्रेष्ठ वाग, १०० वखो,
कांबल अने अगर, चंदन, कपूर विगेरे सुगंधी द्रव्यो देवा
मांड्या; परंतु साधुओने ए न कल्पे एम महाराजाने समजावी,
गुरुजीए ते सर्व वस्तुओनो प्रतिपेध कयों. तेम छतां'राजाधिरा-
जने अप्रीति न थाओ' एम विचारी राजाभियोगवडे गुरुजीए
तेमांथी कंबल, वस्त्र, अगर विगेरे कंडक अंगीकार कयु. ते
पछी विविध देशांतरमाथी आवेला पंडितो साथे वाद-गोष्ठी
करावी सुलताने मदकल(श्रेष्ठ) वे हाथीओ अणाव्याः तेमांना
एक पर गुरुजी (जिनप्रमसूरि )ने अने वीजा पर जिनदेव
१ अहि सूचवेल जिनदेवगि, जिनप्रमसूरिना पट्टधर
अणाय थे. जैनप्रन्थावली[ पृ. ३२, ७९ मां जिनदेवसूरिने
.
--
सुलतान महम्मद.] [३ आचार्यने चडावी, सुलताननी आठ मदन मेरीओ वागतां, यमल शंखो फुकातां, मृदंग, मर्दल, कंसाल, दोल विगेरेना शब्दो घुमघुम थतां, भट्ट-चट्टो पाठ करते छते, चारे वों साथे अने चारे प्रकारना संच साथै सूरिजीने पोसहशा- लाए( उपाश्रये) पाठव्या. श्रावकोए प्रवेश-महोत्सव कयों, महादानो आप्या. कनाणय-कल्प-परिशेष रचनाग आगळ जणावेला विद्यातिलक अपरनाम सोमतिलकरिना शिष्य सचन्या छे; परंतु ते विद्या- तिलकमुनिना ज जगावेला। उल्लेख प्रमाणे प्रस्तुत जिनप्रभसूरिना शिष्य सिद्ध थाय छे. वि. सं. १३८३ (१)मां हैमनाममालानो शिलोन्छ(नि. सा. ना अभिधानसंग्रहमा प्रकाशित) रचनार जिनदेवसूरि पण एज होबार्नु अनुमान है. १ आ प्रमाणे जैन आचार्ये हाथो पर चडj, ए मुनिधर्म- विरुद्ध विचारणीय विचित्र घटना छे छता एपर्युक्त उल्लेप परथी एवो आशय समजाय छे. राजाभियोग आदितुं अवलंबन लइ भवि- व्यना लामालामनी तरतमता विचारी समय-धर्मने मान आपी, अपवादथी एम कयु हशे. वि. सं. १३३४ मा प्रभाचंद्रसूरिए रचेला प्रभावकचरित्र(पृ. २५१ थी २६०)मा जगाच्या प्रमाणे--सूराचार्य नामना विद्वद्वर्य जैनाचार्य भोजरामानी सन्मुख जतां हाथी पर आरूढ थया हवा अने मीमदेवे तेमनो पाटणमा प्रवेशोत्सव कर्यो ३
[ जिनप्रभसूरि अने
विशेपमां पातशाहे सकळ श्वेतांवर दर्शनने उपद्रवथी
रक्षण करवामां समर्थ फरमान समर्पण कयु.
जैनश्वे.तीर्य-रक्षा गुरुजीए तेनी नकलो चारे दिशाओमां
फरमान मोकलावी. शासननी उन्नति थइ. अन्यदा
सरिजीए शचुंजय, गिरनार, फलोधी
विगेरे तीर्योना रक्षण माटे फरमान माग्यु. सार्वभौमे ते ते ज
क्षणे आप्यु. तेने तीर्थोमां मोकलाव्युं.
चंदी-मोचन गुरुजीनुं वचन थतां ज राजाधिराजे
अनेक बंदी केदी तरीके पकडेला )ओने मुक्त कर्या हता.
फरी सोमवारना दिवसे गुरुजी राज-कुलमा पहोंच्या.
त्यारे पण तेओ हाथी पर आरूढ थया ना. चैत्यवासीओना
प्राबल्यकालमा अने मुमलमानी आक्रमणना युगमा शिथिलाचार न
गणातां शासन-प्रभावना अथवा दर्शन-गौरवना रूपमा ए गणायु
जणाय छे.
१ आ परथी स्पष्ट समजी शकाय तेम छ के-पहेलां नणा-
व्या प्रमाणे वि.सं. १३८५ मां माय व.
७ शुक्रवारे रचायेल
शवनय-फल्प, दिल्लीमां रचायो होवो जोइए अने राजाधिराजे
(महम्मद नपरफे) एज ममयमा जिनप्रभ सूरिना परिचयथी
तेमना वचनने मान आपी संघ-रक्षानां तथा शत्रुजय विगेरे तीर्थोनां
फरमानो आप्यां जणाय छे.
सुलतान महम्मद. ]
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वरसता चरसादमां सुलतानने भेट्या.
महावीर-प्रतिमान गुरुजीना कादवथी खरडायेला पगने
समर्पण-सन्मान महाराजाए मलिक कापू( )र पासे
श्रेष्ठ वस्त्र-संडवडे लूहाव्या. त्यारपछी
आशीर्वाद आपतां अने वर्णना-काव्यतुं व्याख्यान करतां महा-
नरेन्द्र चित्तमां अत्यंत चमत्कार पाम्या. अवसर जाणीने सर्व
स्वरूप कहेवापूर्वक भगवंत महावीरनी ते प्रतिमा मागी.
एकछत्र वसुधाना अधिपतिए( महम्मद सुलताने) सुकुमार
गोष्ठीओ करतां ते आपी. तुगुलकावादना खजानामांथी
असूअग( अश्या करनार! ) मलिकोनी खांधे स्थापन करावी,
सकल सभा समक्ष पोतानी आगळ अणावी, दर्शन करी, गुरु-
जीने ते समर्पण करी. त्यारपछी सकल संघे महोत्सव प्रभा-
वनापूर्वक सुखासन( पालखी )मा स्थापी ते प्रतिमाने मलिक
ताजदीन-मराईमा चैत्यमा स्थापी. गुरुजीए वासक्षेप करता
महापूजाओथी पूजाय छे.
त्यारपछी महाराजना आदेशण्डे जिनदेवमूरिने बीना
चोद साधुओ साथै (पोताना प्रति-
सरि-विहार निधि तरीके) दिल्ली-मंडलमा स्थापी,
गुरुजीए अनुक्रमे महाराष्ट्र-मंडल (दक्षिण)
तरफ प्रस्थान कयु. थावकोना संघ साथे जता गुरुजीने राजा-
1. घिराजे वळद, ऊंट, घोडा, गुलयिणी(तंय), सुखासन(पालखी)
विगेरे सहायक सामग्री आपी दती,
५ ~wvan ३६ ] [ जिनप्रभसूरि अने कच्चे आवेलां नगरोमां प्रभावना करता, पगले पगले संघोवडे सन्मान कराता अने अपूर्व देवगिरि तीर्थोंने नमता सूरिजी अनुक्रमे देवगिरि (दोलताबाद)मां (दोलताबाद ) नगरे पहोंच्या. संघे प्रवेश- महोत्सव कयों. संघ-पूजा थइ. संघपति जगसीह, साहण, मल्लदेव विगेरे संघ साथे पइट्टाण( प्रतिष्ठान-पेठण )पुरमां जीवंत- प्रतिष्ठान(पैठण) स्वामी मुनिसुव्रतनी प्रतिमानी यात्रा पुर-यात्रा करी. पछी आ तरफ दिल्लीमां विजयकटकमां जिनदेवसरिए १ देवगिरि(दोलताबाद)मां सं. १३८३ का. शु. १३ ने दिवसे राजसीहना सुत शाह तिहुणसिंहे उपदेशमाला-लघुवृत्ति लखावी हती (जुओ पिटर्सन रि. ३, पृ. १३१). ए विगेरे जोतां विक्रमनी चौदमी सदीना उत्तगर्धमा आ नगरमा श्रीमान जैनो वसता होई आ नगर व्यापारादिद्वारा सुसमृद्ध अने उन्नत स्थितिमा हतुं-तेम जणाय छे. अन्यत्र मळता इतिहास परथी जणाय छे के-आ महम्मद तघलक पातशाहे आ देवगिरिने पोतानी गजधानी बनाववा दौलतथी आबाद (दोलताबाद) बनान्युं हतुं. २ जिनप्रभसूरिना तीर्थकल्पमा प्रतिष्ठानपत्तननो पण फल्प छे, ए उपर सूचित थइ गयुं है. ।
von सुलतान महम्मद [३७ महाराजने दीठा (सुलताननी मुलाकात दिल्लीमा सुलताने करी.)महाराजे(सुलताने) बहु मान आप्युं. समल सराई, एक सराई आपी, तेनुं नाम 'सुलतान- चैत्य,उपाश्रय चि. सराई स्थाप्यु,त्यां ४०० चारसो श्राव- कोनां कुलो(कुटुंगो)ने वास माटे आदेश कों. कलिकाल-चक्रवतीए (सुलतान महम्मद) त्यां पोसहशाला ( उपाश्रय ) अने चैत्य कराव्यु. ते चैत्यमां ते ज(कन्नानूरना) देव महावीरने स्याप्या. भगवंतने परतीथिको( अन्यधर्मीयो) तथा श्वेताम्बर अने दिगंबर भक्त श्रावको त्रिकाळ महामूल्य पूजा-प्रकारोथी पूजे छे. एवी रीते महम्मदशाहे करेली शासननी उन्नति जोई लोको पंचम काळने पण चोथा काळ( आरा) तरीके ज अनुमये छे. क्लेश दूर करनारा धारजिनेशन, मन अने नयनोने आनंद आपना, विघ्नादिने प्रतिहत करनारं आ बिच यावच्चंद्र- दिवाकरौ जयवंत रहो. कमाणयपुर( कनानूर )मां रहेल देव महावीरनी प्रति- मानो आ कल्प, जिनसिंहमुनींद्रना शिष्य मुनीश्वरे (जिनप्रमे) लख्यो छे." १ जिनप्रभसूरिए ३५०३ साहानण हजार श्लोकमाण रचला आ तीर्थकल्पना अन्तमा पोताना नामनो निर्देश कों हे, - ३८] [ जिनप्रभसूरि अने re [२] " हवे संघतिलकसरिजीना आदेशथी विद्यातिलकमुनि. तेम तेमां आवेला जुदा जुदा कल्पोना अन्तमां पण प्रायशः पोतार्नु नाम सूचित फ्यु छे; तेम छतां तेमां ज आवेला आ कन्नाणयनयर (कन्नानूर )-बीरना कल्पना अंतमा पोतानुं नाम स्पष्ट रीते न सूचवतो प्रकारान्तरे सूचव्यु छे. तेम करवानो हेतु एवो समजाय छ के-आ फ्ल्पमा सूचवेली महत्त्वनी घटना साथे ए कल्पकारनो निकट संबंध होइ पोताना महत्त्वने प्रकाशित करनारी छे. जैन- शासनना गौरवने सूचवती, जैनसमाजने आनन्दजनक ए घटना . वास्तविक इतिहास-प्रतिपादननी दृष्टिए एमने वर्णववी पडी छे। तेम बना कोई एने आत्मग्लाया-दोपहप न समजे एवा आश- यथी पोतानी लघुता सूचवा अने ए महत्त्वनां कार्यो थवामां गुरु. प्रमाव ध्वनित करवा 'जिनसिंहमुनीन्द्रना शिष्य मुनीश्वरे आ कल्प लख्यो छे.' एवं जणायु ई. जिनसिंहसूरिना शिष्य सूरि सगेफे 'जिनप्रभसूरि नामर्नु सूचन, आज तीर्थकल्प ग्रंथमा पहेला आवी गयेल होवाथी अहिं स्पष्ट नामनिर्देश न करवा छतां आ यानाणयनया( फ.मानूर )-बीर-पल्पना फर्ना तरीक्षे ए जिनप्रम- सूरि ज समजवा जोईए. १ आ संघतिलकसूरि, रुद्रपल्लीय गच्छना गुणशेखरसूरिना शिप्य इना. तेओए विद्याभ्याम आ जिनप्रभसूरि पासे को हतो. तेमणे वि. सं. १४२२ मां सारस्वन पत्तन( पाटण )मां 'सम्य- .
सुलतान महम्मद.] - कन्नाणय-वीरकल्पनो परिशेप लेश कहे के कृत्वसप्तति' ग्रंथ पर गद्य पद्य संस्कृन प्राकत कथाओनी छटा. ७७११ श्लोकप्रमाण विस्तृत विवृति रची हती. तेना प्रारंभमा पोताना विद्यागुरु तरीके, शाइ महम्मदने मुदिस करनारा आ जिनप्रभसूग्नुिं स्मग्ण फयु छ:- दि(दिल्ल्यां साहिमहम्मदं शफकुलमापालचूडामणि येन ज्ञानकलाकलापमुदितं निर्माय पदर्शनी । प्राकाश्यं गमिता निजेन यशसा साकं स सर्वागम- ग्रन्थज्ञो जयतात् जिनप्रमगुरुर्विद्यागुरुनः सदा ॥" -सम्यक्त्वसप्ततिवृत्ति (दे.ला. पु. फंड प्रकाशित लो०८) भावार्थ:-जेणे दिल्लीमां शककुलना गजाओमा चूडामणि जेवा शाह महम्मदने ज्ञानकलाना समूहथी हर्पित करी पोनाना यश साथे छ दर्शनोने प्रकाशमा आण्यां; सर्व आगम-अन्योना जाण अने अम्हारा विद्यागुरु ते जिनप्रभसूरि सदा जयवंत रहो. मो. पिटर्सनना रि. ४ थामां आ अंथनो उल्लख थयेलो छे, परंतु त्यां आ श्लोकनो आशय समजवामां फेरफार यशथी आ एक ज जिनप्रभसूरिने जुदा जुदा ओळखावी बीजा. जिनप्रभसूरिने रुद्रपल्लोयगच्छना अने पड्दर्शनी प्रय बनावनार तरीके सूचव्या छे. एनो अनुवाद अन्यत्र जैनधर्मना प्राचीन इतिहास (पं. ही. ई. मा. १, पृ. ३७ ) मां, 'गच्छमत-प्रबंध' (अध्यात्म ज्ञान प्र. मंडळ प्र. पृ. ४७) मां तथा वीजा ग्रंथोमां पण गतानुगतिकतायी 1 -
-
.]
[ जिनप्रमसूरि अने
भट्टारक श्रीजिनामसरिए ते वखते [वि. सं. १३८५
उवर्ग आयेल छे. स्वरी रीते जोता खरतरगच्छना आ जिनप्रभसूरिथी
अन्य रुद्रपल्लीयगच्छना जिनप्रमस्रि ययानुं त्यां सूचन नथी,
तेम तेओए पड्दर्शनी अन्य रच्यानो आशय, उपरना श्लोकमाथी
नीफळतो नथी.
संघतिलकसरि, रुद्रपरमीयगच्छना गुणशेखरसूरिना शिष्य
होवा छतां तेमणे उपरनी कृतिमा विद्यागुरु सरीके जिनप्रभसूरिनुं
स्मरण फयु के अने पोताना एक शिष्य विद्यातिलक मुनिद्वारा
कन्नाणय वीर-कल्पनो परिशेप रचावी, पोताना विद्यागुरु तरफ
कृतज्ञता दर्शायो छे.
२ आ विद्यातिलकमुनि, अपर अणावेला संघतिल करिना
शिष्य हना अने तेमनुं बोजु नाम सोमतिलकसरि जणाय छे.
वि. सं. १३९७ मां लघुस्तवनी वृत्ति रचनारा आ विद्वाने
वि. सं. १३९४ (१) मां शीलोपदेशमाला ग्रंथ पर ७००० श्लोक
प्रमाण शीलनरंगिणी नामनी विस्तृत विवृति रची छे. तेमां पोताना
गुरु संपतिलकसग्निो परिचय करावतां, शकराजाने प्रतियोघ करनारा
प्रस्तुन जिनप्रभसूरिद्वागतेमने प्राप्त ययेल रिपद प्रमुख तत्त्रविद्यानुं
सूचन फयु छे. पं. ही. ई.द्वारा प्रकट थयेली आवृत्तिमा अन्तिम
प्रशस्तिनो माग जोवामां आवतो नथी, परंतु अहिं प्राच्यविद्या-
मन्दिग्नी प्रतिमा छेः-
" तदीयचरणद्वयोससि पुष्पन्धयः
।
-
bai सुलतान महम्मद.] [t -१३८७ मां] दोलताबादनगरमा शाह स सङ्घतिलकप्रभुर्जयति साम्प्रतं गच्छराट् । शकक्षितिपबोधकृत्प्रमुजिनप्रभानुप(अ)हा- न्यवाप्ठगु(ग)गभृत्पदप्रमुखतत्त्वविद्यागमः ॥" --ए१२५, ग्लो०९ आ वृचिना अंतमा तेना कर्ता भरीके विद्यातिलक अने सोमविठक ए बने नामो वांचवामां आवे छे- ' इति श्रीशीलोपदेशमालावृत्तौ स्वभावशीलपालनलीलायत. श्रीरुद्रप० मट्टा० संघ० सूरिशिध्यविद्यातिल[क]पू विरचि.'- ".तत्पादपाईसोऽधिवृत्ति शीलोपदेशमालायाः । श्रीसोमतिलकसूरिः कृतवान् श्रीशीलतरङ्गिणीम् ।। लालासापोस्तनुजः प्रगुणनिधिः साधुसेढानुमया(१) छाज: शीलोपदेशनजममलधिया सूत्रतोऽधीत्य सम्पम् । अर्थ विज्ञानमस्या युग-'निधि-मुरवो वत्सरे विक्रमांक वृत्ति नव्यां स विद्यातिलकमुनिवरात् कारयामास साधुः ।।" -मा. वि. पति प.१२४-१२५ ग्लो०१०-११ उपर्युक्त संघतिलकमरिना योगा शिष्य अने पूर्वोक्त सोमति- लकमूरिना लघुगुरुबन्धु देवेन्द्रमुरिए प्रश्नोत्तररत्नमालानी वृत्ति वि. सं. १४२९ मा रचेली छे, तेनी प्रांत प्रशस्तिमा पोताना वडिल गुरुबन्धु नाम सोमतिलकसूरि सूचवी, तेने शोलोपदेश- माला-वृत्तिकार तरीकं ओळखान्या छे.
४२] . [ जिनप्रभसूरि अने दोलतावादमा पेयड, सहजा अने ठ. अचलना करायेला प्रभावना चैत्योनो तुरको द्वारा करातो भंग, फर- ए उल्लेसो जोतां सामान्य( मुनि) अवस्थामां विद्यातिलक नामथी विख्यात थयेल, पाछळथी सूरिपद पछी 'सोमतिलक' नामी प्रसिद्धिमां आव्या होय ए संभवित छ, उपर उद्धृत करवामां आवेल कन्नाणय-वीरकल्पनो परिशेष, ' विद्यातिजमुनि नामयी सूचव्यो होवाथी सूरिपद मळ्या पहेलां अने संभवत: जिनप्रभसरिनी अने महम्मद तपलकनी विद्यमानतामा -विक्रमनी चौदमी सदीना अंतमा ज ते रच्यो होचो जोइए, एम आ परिशेषना अन्तिम सल्लेखथी पण विचारी शकाय छे. १ अहिं सूचवेल सहजा, वि. सं. १३७१ मां शत्रुजय-तीर्थना उद्धारक संघपति समसिंहना ज्येष्ठ बन्धु जणाय छे. जेणे दक्षिण मंहलना देवगिरि( दोलताबाद )मां चोवीश मिनवाळु मंदिर रघावी, तेमांमूलनायक तरीक पार्श्वनाथने म्थाप्या हता, तेम उपयुक्त शवजय तीर्थंना उद्धार-प्रतिष्ठा प्रसंगे त्यांथी संघ लइ भजयमां उपस्थित थया हता; एवं तेमना समकालीन अने परिचित निवृत्ति. गच्छना आम्र( अंब )देवसूरिए वि.सं.१३७१( ? )मां ग्चेला संघपति समसिंहरास (गा. आ. सिरीझना प्राचीन गर्नर काव्य-संग्रहमां तथा आत्मानंद समाना जैन ऐतिहासिक गर्नर काव्य-संचयमा प्रकाशित )मां तथा उपोशगच्छना कक. मूरिए पि. सं. १३९३ मां कंजरोटपुग्मां ग्चेला नाभिनंदनोद्वार- प्रधमा वर्णव्यु ई.
सुलतान महम्मद.] [ ४३ मान दर्शावीने निवायों हतो. तेवी रीते जिनशासननी अतिशय प्रभावना करता, प्रातीच्छको( ग्रहण करवा इच्छता शिष्यो)ने सिद्धांतनी वाचना आपता, तप- स्वीओने अंगप्रविष्ट अने अनंगप्रविष्ट आगमोनां तप करावता, शिष्योने तथा अपरंगच्छना मुनियोने पण प्रमाण, व्याकरण, १ रुद्रपल्ली यगच्छना संपतिलकसरिए जिनप्रभसूरिने पोताना विद्यागुरु तरीके जणाव्या छे, ए उपर दर्शावाइ गयु छे, ते सिवाय हर्षपुरीयगच्छना मलधारी गजशेखरसूरि, के जेणे वि. सं. १३८७ मां प्राकृत दयामयवृत्ति तथा चतुरशीतिप्रबंध( विनोद कथा-संग्रह), पड्दर्शनसमुच्चय, नेमिनाथ-फाग विगेरे रचेल छे. लथा पूर्णिमागच्छना पं. ज्ञानचंद्रे रचेल रत्नाकरावलारिका- टिप्पनने, वि. सं. १४०१ मा मेस्तुंगसूरिना स्तंभनेन्द्र-प्रबन्ध (पहा पुरुष-चरित )ने भने वि. सं. १४१० मा मुनिभद्रसूरिए रचेला शांतिनाथचरित महाकाव्यने जेणे शुद्ध पर्यु इतुं. दुर्भिक्ष-दुःखने दलनाग तथा महम्मदशाह( तघलक )थी गौरवित थयेला श्रीमान जगत्सिंहना षड्दर्शनपोषक सुपुत्र महणसिहे दिल्लीमां पोते आपेली वसतिमा जेमनी पासे वि. सं. १४०५ मा जेठ शु. ७. प्रबंधकोश( चतुर्विशति-प्रबंध ) ग्रंथ कराव्यो हतो-- " तत्सनुः सामन्तस्तत्कुलतिलकोऽभवजगत्सिहः । दुर्मिक्षदुःखदलनः श्रीपहम्मदसाहिगौरविनः ।। तज्जो जयति सिरिभवः पदर्शनपोपणो महणसिंहः । विरं दिल्ल्यां स्वदत्तवसतो ममिमं कारयामास ।। .
-~~
"
४४]
[ जिनप्रभसूरि अने
काव्य, नाटक, अलंकार विगेरे शास्त्रोने मणावता, उद्भट वाद
करनारा वादि-दोना अतिदर्पने अपहरता सरिजीए त्यां
लगभग त्रण वर्ष व्यतीत कया.
शेर-गगन-मनुमितान्दे ज्येष्ठामूलीयधवलसप्तम्याम् ।
निष्पन्नमिदं शाखं श्रोत्रध्येत्रोः सुखं तन्यात् ॥
एज राजशेखरसूहिए, श्रीधानी न्यायक्रन्दली पर संक्षिप्त
विवरण रचतां, कृतज्ञताथी पोताना अध्यापक तरीके जिनप्रमसूरिनुं
स्मरण कयुं छे-
" श्रीमजिनप्रमविभोरधिगत्य न्यायकन्दली फिश्चित् ।
तस्यां विवृतिलवमहं करवे स्व-पगेपकाराय ||
[ पिटर्सन रि. ३, पृ. २७३ ]
मूळ आधार न तपासतां नकलीया गतानुगतिकताथी जैन.
धर्मनो प्राचीन इतिहास (ही. ई. भाग १, पृ. ३६) तथा अभि.
धानगजेन्द्र( भा. ४, पृ. १५००)मां अने अन्य फेटलेक
स्थळे फेटलाफ लेखकोए राजशेखर नामने बदले रत्नशेखर नाम
प्रकट फयु छे, ते पि.रि.नी परंपंगयो उतरी आवेली भूल जणाय छे.
वर्तमान साधु-समान, आवी रीते विद्वान् आचार्यों अने
मुनियोपासेषी विद्याभ्याम करतो होय,तो केटलोयो लाम थई शके?
१ देवगिरिनगर( दोलतायाद )मा म्हेनां जिनप्रभसूरिए
वि. म. १३८७ मा भादग्या व. १२ ने दिवसे दीवाळी पर्वनी
मुत्पचिना कथनयी रमणीय पावापुरी-कल्प गयो हतो-
hnuuNAN सुलतान महम्मद.] आ तरफ योगिनीपुर( दिल्ली )मां महम्मदशाहे कोइ अक्सरे सभामा पाडताना पातशाहे करेल गोष्ठी-प्रसंगे शास्त्र-विचारमा संशय स्मरण अने फरी थतां गुर जिनप्रभरि )ना गुणोने आमंत्रण संभारी फयु के-'जो ते भट्टारक आ समये म्हारी सभाने अलंकृत करता होत, तो म्हारा मनमा रहेला संशय-शल्यने सहजमां उद्धरत. खरेखर, बृहस्पति पण तेमनी बुद्धिी पराजित थई भूमिने तजी शून्य इय पावापुरि-कप्पो दीवमहुप्पत्तिभणणरमणिजो । जिणपहसूगैहिं को ठिपहिं सिरिदेवगिरिनयरे ॥ तेरहसत्तासीए विकमवरिसमि भदवयबहुले । पूसक्यारसीए समस्थिनो ससस्थिकरो 'जैनसाहित्यमें इतिहासके साधन' (जनसाहित्य-संमेलन रि. पृ. १०) मां अने अन्यत्र वीजा लेखकोए आनो रचना-समय सं. १३२७ सूचन्यो छे, ए पण परंपराथी उतरी पावेल भल जणाय छे. चतुर्विशति जिनानन्द-स्तुति (भा. समिति प्र. ) नी भूमिका(पृ. ४०)मां ही. र. कापडियाए वि. सं. १३३७ जणाव्यो छे; परंतु पायेल अने लखेल पुस्तकनो उपर्युक्त आधार- पाठ विचारता ते योग्य लागतो नथी.. वि. सं. ११८७ यराबर । संभवे छे. जे प्रकट थइ गयेल छ. तपागच्छीय जिनसुंदरसूग्निोसं. दीपालि-कप, वि.सं. १४२३ मां रचायेल होइ आ पछीनो छे. " ॥
" - ४६ ] [ जिनप्रभसूरि अने आकाशमां पाई गयो जणाय छे., आवी रीते राजावडे गुरु( जिनप्रभमरि )ना गुणोनी वर्णना( प्रशंसा) कराइ रही हती, तेज वखते दोलताबादथी आवेला अवसरना जाण ताजलमलिके भूमितल पर- भालपट्ट लगाडी विज्ञप्ति करी के-" महाराज ! ते महात्माजी (जिनप्रभसूरि) त्यां (दोलता- यादमा) छे, परंतु ते नगरना नीरने सहन करी शकवाथी अत्यंत कृश शरीरवाळा थइ गया छे. त्यार पछी गुरुना गुणोने संमारता भूमिनाथे एज मीरने आदेश आप्यो के मलिका जल्दी जइने दुवीरखाने फरमान लखाव अने त्यां तेवी सामग्री साथे मोकलाब के भट्टारक फरी अहिं आवे. ' त्यार पछी तेणे (मलिके) तेवीज रीते करीने फरमान मोकल्यु. अनुक्रमे दोलताबाद दीवान पासे पहोंच्यु. नगर-नायक कुतूहलेखाने भट्टारकने विनयपूर्वक दिल्लीपुर प्रति प्रस्थान फरवार्नु पात- शाहर्नु आवेखें फरमान जणाव्यु. त्यारपछी ७ (१०) दिवसमां सज्ज थइ जेठ शु. १२ ना राजयोगमा संघ-सार्थिकोनी परिपथी १ इतिहासनां पुस्तकोमा जेने क्युत्लघखान मलिक क्या- मुद्रीन नामथी ओळखाव्यो छे, ते न आ नणाय छे. (विशेष परिचय माटे जूओ--म्प्रीन हिस्ट्री ऑफ इन्डिया बा.३ पृ.१३०, १५४, १५६, १६५)
सुलतान महम्मद ]
[७
प्रयाण अनुगमन कराता गुरुजी (जिनप्रभसरि)
अल्लावपुरमां, मोटा आडंबरपूर्वक चाल्या. अनुक्रमे
उपद्रव-निवारण स्थान स्थानमा सेंकडो महोत्सबो प्रकट
करावता, विषम दुःपम काळना दर्पने
दळता, वच्चे आवता सकळ देशोना मनुष्योनां नयनोने कुतू-
हल उपजावता, धर्मस्थानोनो उद्धार करता, दूरथी उत्कंठित
थईने सामे आवता आचार्य-वर्गवडे वन्दन कराता गुरुजी
राजानी भूमिना भूषणरूप अल्लावपुर दुर्ग (अलीगढ १) पहोंच्या.
तेवा प्रभावनाना प्रकर्षाने न सही शकता असहिष्णु म्लेच्छोए
विप्रतिपत्ति करो हती, ते जाणीने तेज गुरुना
उत्तम शिप्य, गुरु-गुणोधी अलंकृत अने राज-सभाने शोभा-
वनार जिनदेवमरिए सुलतानने विज्ञप्ति करी; सुलताने बहु-
मानपूर्वक सामे फरमान मोकली मलिक मार्फत सार्थिको
( साथेनां माणसो)नी सवळी वस्तुओ पाछी अपाची हती.
एवी रीते विशेषताथी जिन-शासननी प्रभावना करता मरिजोए
दोढ मास रहीने अल्लाबपुरथी प्रस्थान कर्यु हतुं.
धरणीनाथे( पातशाहे ) फरी पाछा सिरोह नामना
महानगरमांसामे मोकलावेलां अति कोमळ
सिरोहमां अने युमाशवाळा देवदूष्यप्राय दस
सत्कार खोपडे सरिजी सत्कृत या हता.
अनुक्रमे रिजी हम्मीरवीर( महम्मद तघलक )नी
-1 [ जिनप्रभसरि अने राजधानीना परिसर-प्रदेशमा पहोंच्या. दिल्लीमा आ तरफ लांचा वखतथी पुष्ट थयेला सूरिनुं स्वागत भक्ति-रागवडे सामे आवेला, अने मात्र दर्शनथी पण जाणे अमृतकुंडमां न्हाया होय तेम पोताना आत्माने धन्य मानता आचार्य, यति-संघ अने श्रावकोना समूहथी परवरेला युगप्रधाने भादरवा शु. २ ने दिवसे राज-समाने शोभावी. ते वखते अतिशय आनन्दित थयेली आंखोबडे अभ्युत्थान आचरता होय तेवी रीते धरणि- राज महम्मद पातशाहे कोमल वाणीथी कुशलप्रवृत्ति पूछी. स्नेहपूर्वक गुरुजीना हाथने चुन्यो. अने अत्यंत आदरपूर्वक पोताना हृदय पर धर्यो. गुरुजीए तत्क्षण नवीन रचेल काव्य- वडे आशीर्वाद आप्यो. एथी नरेश्वरनुं मन चमत्कार पाम्यु अने महोत्सवपूर्वक विशाल पोसहशालाए मोकल्या. महीनाथे गुरुजीनी साथे जवा माटे प्रधान पुरुषोने, हिंदु राजाओने अने दीनार विगेरे मोटा मलिकोने आज्ञा करी. लांबा वखतथी उत्कंठित थयेला सेंकडो, हजारो श्रावक लोको प्रणाम करता हता. लांग वखतथी दर्शनातुर थयेला नगरना लोको आवी मळ्या. प्रकृति( राज्यना प्रधान अधिकारीओ) अने देशना मनुष्यो कुतूहळ्थी एकठा थया. त्यारपछी चंदीना समूहबडे विरुदावलीथी स्तवाता अने राजाए प्रसादित करेल मेरी, वेणु, वीणा, मर्दल, मृदंग, पटु पटह, यमल, शंख, मंगल विगेरे घणा प्रकारनां विपुल वायोना ध्वनिवडे दिशाओना अन्तरालने सुलतान महम्मद.] [४९९ वाचाळ पनावता, विप्रवर्गवडे वेदधनिद्वारा स्तवाता तथा गंधर्वोबडे अने सुभग-सधवायोथी मंगल-गीतबडे गवाता सरिजी 'सुलतान-सराई। पोसहशालाए पहोंच्या. संघना पुरुषोए वर्धापन महोत्सवो कर्या. भादरवा शु. ३ ने दिवसे सकळ संघे श्रेष्ठ महोत्सव करीने श्रीपर्युषणा-कल्पवंचाव्यो. आगमन- पर्युषणामा प्रभावनाना लेखो स्थाने स्थानमा पहोंच्या. प्रभावना- सकळ देशना संघो रंजित थया. राजाना सत्कर्तव्यो मंदी तरीके बंधायेला अनेक श्रावकोने लाखोना राजदेय(दंड, कर)यी मुक्क कराव्या. अने इतर लोकोने करुणावडे केदखानामांथी मुक्त कराव्या. अप्रतिष्ठित थयेलाओने प्रतिष्ठा आपी-अपात्री. अनेक प्रकारे जैनधर्मनी प्रभावना करी-करावी. एवी रीते नित्य राज-समामां जवाथी तथा पंडितो अने वादीओना वृंद पर विजय मेळावाथी प्रभावना प्रवर्ततां अनुक्रमे वर्षारात्र-चोमासु वीत्यु. अन्यदा फागण मासमां दोलताबादथी आक्ती मगदूमई- १ सुलताननी मातानुं नाम आ सिवाय अन्यन वाचवामां मायतुं नथी, परंतु तेणी पणी दयालु, दानेश्वरी, उदार अने विवे- फिनी इती. तेणीनुं मरण थयुं त्यारे फक्त सुलतानने अ नाहि, प्रजा. जनोने पण घेणुं दुख थयु तुं; कारण के ए सद्गुणी राज-माताना - + [ जिनप्रभसूरि अने जहां नामनी पोतानी जननी सामे चतुरंग तानना मा- चम् साथे सज्न थई जतां सुलताने अभ्य- ताना सन्मानमां र्थना करी गुरुजीने पोतानी साथे चला- व्या. वडथूण(?) स्थानमां महाराजे जननीने भेटी सर्वने महादान आप्यु. प्रधान विगेरे सर्वने चलोनी पहरामणी करी.अनुक्रमे महोत्सवमयी (चजा-पताकाथी शणगारेली) राजधानीमां पहोंच्या. वस्त्रो, कपूर विगेरेवडे गुरुजी, सन्मान कर्यु. चैत्र शु. १२ ने दिवसे राजयोगमां महाराजानी अनुम- तिथी( रजा लइ ) पातशाहे आपेल दीक्षा विगेरे साइवाणनी छायामां नंदी करी, त्यां पांच कर्तव्यो शिष्योने दीक्षित कर्या. मालारोपण, सम्यक्त्वारोपण विगेरे धर्मकृत्यो काँ. थिरदेवना नंदन ठ. मदने (मदत्ते) वित्त वावयु. आपाढ शु. १० ने दिवसे नवां करावेलां १३ विबोने महोत्सवपूर्वक प्रतिष्ठित कॉ. तेमां जैनयिंघ विच करावनाराओए अने खास करीने प्रतिष्ठा साह म(स)हराजना पुत्र अजयदेवे बहु विच वापर्यु हत्. प्रमावे अनेक लोको गा-प्रकोपयी पची गया हता [जूओ केनोज हिस्ट्री ऑफ इन्डिया वॉ. ३, पृ. १६.].
बुलतान महम्मद.]
[ ५१
अन्यदा 'गुरुजीने दूरथी हमेशां पासे आवत्रामा कष्ट
छे. १ एम विचारी सुलताने खुद पोते ज
सुलताने समर्पल पोताना प्रासाद( महेल) पासे शोभतां
मारकसराईमां भवनोवाळी अभिनव(नवी) सराई आपी.
प्रवेशोत्सव श्रावक संघने त्यां वसवा माटे फरमाव्यु.
खुद सुलताने तेनु 'भद्दारक-सराई एवं
राम कयु. पातशाहे त्यांज वीर-विहार अने पोसह-शाला
करावी. त्यारपछी वि. सं. १३८९ वर्षे आपाट वदि ७ ने
दिवसे सुमुहूर्ते महीपतिए फरमावेल गीत, नृत्य, वाद्य विगेरे
विभूतिद्वारा प्रकट कराता असाधारण महान् उत्सवपूर्वक, खुद
सुलतानवडे अपाचा महादानपूर्वक, मंगल-गीत गवावा भट्टा-
रके( जिनाममरिजोए ) पोसहशालामा प्रवेश कर्यो. प्रीति-
दानवडे विद्वानोने संतुष्ट कर्या हता. दानद्वारा दीन, अनाथ
आदि लोकोनो उद्धार को हतो.
ते पड़ी [वि. सं. १३९० मां J मागशिर मासमा पूर्व
दिशा तरफ जय-यात्रा माटे प्रस्थान
१ ईस्वी सन् १३३३ [वि. सं. १३९०]मां महम्मद तघलके
पूर्वदेशमा विजय-यात्रा मादै प्रयाण फ्र्यु इतुं, एम अन्यत्र उल्लेख
मळे छ [ जूओ केम्पोज हिस्ट्री ऑफ इन्डिया वॉ. ३, पृ.
१४४-१४८]
। ५२] [ जिनप्रभसूरि अने मथुरा तीर्थनो करता महाराजाए( पातशाहे ) सूरिजीने उडार वि. प्रार्थना करी पोतानी साथे चलाव्या हता. सूरिजीए ठेकाणे ठेकाणे चंदी- मोचन विगेरे द्वारा जिनधर्मनी प्रभावना करावी हती. मथुरा तीर्थनो उद्धार को हतो; तथा दानादिवडे ब्राह्मणो, गरीबो विगेरेने संतुष्ट कर्या हता. 'नित्य प्रवासी गुरुजीने स्कंधावार(लश्करी कृच)मां कष्ट थाय छे.' एम मानता महीनाथे हस्तिनापुर- (महम्मदे) खोजेजहां मलिक साथे सत्य यात्रा-फरमान प्रतिज्ञावाळा गुरुजीने आगरानगरथी राजधानी(दिल्ली) तरफ पाछा मोकल्या हता. हस्तिनापुरनी यात्रानुं फरमान लइ मुनिपति पोताना स्थानमा आन्या हता. १ जिनप्रभसूरिए विविध तीर्थोना फल्पोमां मथुरा-कल्प पण ग्च्यो छे [ जूओ ए. सो. वेंगाल प्रकाशित तीर्थ- ५५-६४]. २ महम्मद वघटकना मान्य एफ प्रधान पुरुप तरीके ग्वानाजहान ' नुं नाम इतिहासमां बहु प्रसिद्ध छे .[ओ पेम्प्रीज हिस्ट्री ऑफ इन्डिया वॉ. ३, पृ. १३४. १४०, १४३, १४८, १५२, १५८, १७२ ]. .
सुलतान महम्मद.] त्यारपछी चतुर्विध संघ मेळवी शाह वो पुत्र साथे संघपतिनुं तिलक केरा, संघ साये हस्ति- विगेरे परिवार साथे गुरुजीए शुभ मुहूर्त नापुरमा प्रतिष्ठा हस्तिनापुरनी यात्रा मारे प्रस्थान कर्य महोत्सव हाँ, संवपति बोहित्थे ठेकाणे ठेकाणे महोत्सवो कर्या हता. तीर्थभूमिए पहोंच्या, बद्धावणुं कयु. नवा करावेलां शांति, कुंथु अने अरजिननां १ जिनप्रभसूरिए संघ साथे आ यात्रा, शकाब्द १२५५ (वि. सं. १३९० ) मा वैशाख शु. ६ ने दिवसे करी हतो, ते वखते तेओए गन( हस्तिना )पुरतुं स्तोत्र रथु हतुं तैना अन्तमा ए स्पष्ट सूचन कर्यु छ- " इत्थं पृपत्क-विषयोर्कमिते शकाब्दे वैशाखमासि शितिपक्षगपष्ठतिथ्याम् । यात्रोत्सवोपनतः संघयुतो मुनीन्द्रः स्तोत्रं व्यधाद् गजपुरस्य जिनममाख्यः ॥" -तीर्थकल्प [ का. प. ६४-६५ ] पिटर्सन रि. ४ था [ पृ. ९९ ] मां उपर दशावेल श्लोक टोक्यो छे, पण त्यां याणवाची पृषक शब्द न समनायायो पृथक [यक्व ] एवो अशुद्ध पाठ छपाव्यो जणाय छे. उपफेशाच्छोय ककसूरिए वि. सं. १३९३ मां कंजरोट.
८] [ जिनप्रभसूरि अने विवोने गुरुजीए त्यां प्रतिष्ठित काँ अने अंबिकानी प्रतिमा स्थापी. संघपतिए चैत्य-स्थानोमा संघ-वात्सल्य विगेरे महो- त्सवो कर्या हता अने संघे वस्त्र, भोजन, तांबूल विगेरे द्वारा याचकोना समूहने संतुष्ट कर्यो हतो. पुरमा रचेला नाभिनंदनोद्धार-प्रबंधमां जणाव्युं छे फे-वि. सं. १३७१ मां शत्रुजयतीर्थनो उद्धार करनारा सुप्रसिद्ध समरसिंहे पातशाह(ग्यासुदीन)ना फरमानथी संघपति थइ घणा संघ-पुरुपो अने जिनप्रभसूरि साथे मथुरा अने हस्तिनापुरमा तीर्थ यात्रा करी हती. जे समरने पातशाह ग्यासुदीने( तघलके ) पोताना पुत्र तरीके अने तेना पुत्र उल्ल[ग]खाने विश्वासपात्र पोताना भाइ तरीके स्वीकारी तिलंगदेशनो स्वामी( सूबो ) बनान्यो हतो; अने जे समराशाहे सुलतान( ग्यासुदीन तघलक )ना बंदी बनेला पांडु( पांड्य ) देशना स्वामी वीरवल्ल ( वीर बल्लाल ) गजाने पानशाह पासेथी मुक्त करावी, पुनः तेने तेना देशमा स्थपावी राज-संस्थापनाचार्यता उपानी हती. जेणे तुर्कोथी बंदी तरीके पक- हायेल लाखो मनुष्योने मुक्त कराव्या हता, अनेक राजा-राणा- ओ अने व्यवहारियो पर पण अनेक वार उपकार फर्या हना, जेणे मर्व देशोमाथी योलावी श्रावकोना कुटुंबोने तिलंगदेशमा स्थापी, उरंगलपुरमा जिनालयो करावी जनशासननुं महत्व वधायुं हतुं. आमा सूचवेल उल्लगखान, ए प्रस्तुत लेग्य साथे संबंध धरा- सुलतान महम्मद ] यात्राथी आवतां ज गुरुजी(जिनामसरिज, शु. १० ना दिवसे सकळ देn. महावीर-विबनी विनो दूर करनार ते ज श्रीमहावीरना पुनः स्थापना विवने साहिराजे(पातशाहे) करावेला विहार (जैनमंदिर)मा श्रेष्ठ महोत्सवपूर्वक स्थाप्यु हतुं, त्यारथी ते संघद्वारा विशेष प्रकारे पूजाय छे. दिग्विजय यात्राथी महाराज(पातशाह) पाछा आवतां चैत्योमा अने वसतिमां उत्सवो प्रचते छे. सार्वभौम उत्तरो- तर मान आपीने गुरुजीन सन्मान करे छे. दरेक दिशामां । सूरि अने सार्वभौमना प्रभावक श्रेष्ठ यश:-पटहो वागे छे. शाक-सैन्यवडे दिक्-चक्र पराभव पामवा छतां पण खरतरगच्छना अलंकाररूप गुरु जिनप्रम- पातशाही फर- सूरि)ना प्रसादथी राजाधिराजे आपेल मानी जैन फरमान हाथमा राखनारा श्वेतांबरो अने समाज अनं दिगंबरो सर्व देशोमां उपसर्ग विना विचरे जैन तीर्थोमां छे. गुरुजीए फरमान ग्रहण करीने श्री निर्भयता शत्रुजय, गिरनार तथा फलोधी विगेरे तीर्थोने अकुतोभय-निर्भय कर्या छे. चनार महम्मद तघल जणाय छे. जूओ केबीज हिन्ट्री ऑफ इन्डिया [ वॉ. ३, पृ. १२९-१३१] हस्तिनापुरमा पोते करेली आ प्रतिष्ठा, वि. सं. १३९० मां 1] [जिनप्रभसूरि अने ए विगेरे कृत्योबडे पालित्तमूरि, मल्लवादी, सिद्ध- सेन दिवाकर, हरिभद्रसरि, हेमचंद्रसरि प्रभावक जिन- प्रमुख पूर्वपुरुषोने उद्योतित कर्या-दीपा- प्रभसूरिना प्रभा- व्या छे. बहु कहेवाथी शुं ? मरि-चक्र- वधी प्रवर्तेला वति(जिनप्रभसरि)ना गुणोथी सुलतान धार्मिक महो- आवर्जित(अनुकूळ-अनुरागी) थतां सकळ त्सवो धर्म-कार्योंना आरंभो प्रकट रीते प्रवर्ते छे. प्रतिप्रमाते चैत्यो अने वसति(उपाश्रयो)मां यमल-शंखो वागे छे. वीर-विहारमा धार्मिकोवडे मर्दल, मृदंग, भूगल, ताल विगैरे वाद्योनी गंभीर धनि साथे प्रेक्षणकोथी सारभूत महा- पूजाओ कराय छे. श्रीमहावीरनी आगळ भव्यलोकोबडे उद्ग्रहण करावातो(उखेवावो) कपूर अने अगरना परिमलनो उद्गार(सुवास), दिक्चक्रने सुवासित करे छे. हिंदुओनां राज्यमा जेम होय तेम, दूपम-सुपमकाळ- (चोथा आरा)नी जेम; अनार्यराज्यमां पण अने दूपमकाळमां पण जिन-शासननी प्रभावनामां परायण जैन मुनिओ स्वेच्छाए संचरे छे; एटलं ज नहि, इतर पांचे दर्शनवाळा, परिवार साथे ययेली होत. ते पहेलां वि. सं. १३८. मां पूर्ण करेल तीर्थकल्पमा सूपयेला हस्तिनापुर-नीयल्पमा ए वर्णन आपो शके ए सममी शनाय तेम हे.
सुलतान महम्मद.] गुरुजीना पादपीठमा किकरोनी जेम आळोटे छे. जेम गुरुजीना वचनने स्वीकारे छे. आ लोक अने परलाकना कार्यना अभिलापी परतीथिको(अन्यधर्मीओ) गुरुजीना दर्शन माटे उत्सुक थइने निरंतर वसतिना द्वारदेशने सेवे छे. राजानी अभ्यर्थनाथी गुरुजी हमेशां राज-सभामां जाय छे. चंदि-बर्गने मुक्त करावे छे. महा- सुलताननीसभा- पुरुषोना चरितने आचरता, सुचारित्रने मां सूरिजीनो पाळनारा सूरिजी, जिनवचनने अनुसरता वचन-प्रभाव युक्तियुक्त वचनोवडे निरंतर राजा (सुलतान)ना मनमां मोटुं कुतूहल उपजाये छे. पगले पगले प्रभावना प्रवर्ते छे. गंगा-जळ जेवा स्वच्छ चित्तवाळा सूरिजी पोतानी यश-चंद्रिकापडे दिशाओना अंतराल(मध्यभाग)ने धवल-उज्ज्वल करे छे. पोतानां वचना- मृतोबडे जीवलोकने उज्जीवित करे छे.स्वदर्शनी अने परदर्शनीओ समग्र व्यापारोमा गुरुजीनी आज्ञाने शिर पर स्थापी वहन करे छे. युग-प्रधान आचार्य(जिनप्रभसरि) अनन्यसाधारण शैलीवडे स्व-पर-सिद्धान्तनुं व्याख्यान करे छे. आवा प्रकारना प्रकट रीते अनुभवाता, नित्य प्रवर्तता प्रभावनाना प्रकों, अल्पमतियोवडे केट- उपसंहार लाक कही शकाय? मात्र आ सरिवर करोडो वर्ष जीवता रहो अने लांचा वखत .
4८] [ जिनप्रभसूरि अने , सुधी श्रीजिन-शासननी प्रभावना करो." श्रीजिनप्रभसूरिना गुणोनी आ लेश स्तुति, प्रभाव- नाना अंगरूप छे-एम विचारी कन्नाणय-वीरकल्पना परि- शेपमां कहेवामां आवी छे." १ आ कथन, जिनप्रभसूरिजीना जीवितकालमा उच्चरायु होय, एम विचारतां जणाय छे. २ तपागच्छना पं. शुभशीलगणिए वि. सं. १५२९(१)मा रचेला पंचशतीप्रबंध-कथाफोश(इ. प्रति)मां जणाव्यु छ के-"एक वखते सुलताने कान्हड गाम भाग्युं. त्यांनी वीरनी प्रतिमाने लावीने यवनोए दिल्लीमा मसीतने बारणे पाथियाने ठेकाणे राखी हती. त्यारपछी एक वखते सुलतान, सूरिना खभा पर हाथ राखता जेटलामां मसीतमा प्रवेश करे छे; तेवामां सूरि, वीरनी प्रतिमाने जोइने एक तरफ ऊभा रह्या. त्यारे सुलतान वोल्या के- एम पेम कयु ?' जिनप्रभसूरिए कह्यु के-'प्रभु ! देव छे.' सुलतान बोल्या फे-'आ भूत शुं जाणे ?, कंइ नहि.' सूरिए कह्यु के-'भा देव सत्यवादी ज्ञानी छे.' राजा बोल्या-'तो बोलावो. सूरिए कह्यु के-'स्वामिन् ! ज्यारे भूतनुं स्थानक उपदेश माटे करावाय, त्यां मंडावाय, पूजाय, त्याग्पछी पूछाय, त्यारे पूछेलु कहै. ' त्यारपछी स्वामिए(पातशाहे) देवगृह(मंदिर) कराव्यू. ज्यारे प्रतिमा न उपडी त्यारे सूरिए को फे- तमे हाथ लगाडो, जेथी मुठे.' त्यारपछी तेवी रीते कार्य करता ते प्रतिमाने देवालयमां सुलतान महम्मद.] [३] जिनप्रभसूरिनां चमत्कारी वृत्तान्तो. पीरोज सुलतान पर प्रभाव. जिनप्रभसरि पछी लगभग पोणोसो वर्ष पछी थयेला, तपा- गच्छना पं. सोमधर्मगणिए वि. सं. १५०३ मां रखेली सं. उपदेशसप्ततिमां जिनप्रभमूरिना केटलांक चमत्कारी वृत्तान्तोनुं सूचन कयु छे त्यां महम्मद सुलतानने बदले पीरोज सुलता- ननुं नाम जपाव्युं छे- कलियुगमा केटलाक सरिओ, जिन-शासनरूपी भवनमां दीवा जेवा थइ गया; आ विषयमां, म्लेच्छपतिने प्रबोध करनार जिनप्रभसरिनु निदर्शन(दृष्टांत) कहबाय ठे-- पद्मावतीथी वरदान] प्राप्त करनारा, राज-मान्य जिन- प्रभमरिजी [वि. सं. १३३२ वर्षमा थइ गया. एक वखत स्थापी, श्रेष्ठ भोगवडे पूजावीने बच्चे वस्त्र बंधावतां गजा जे जे संबंधी पूछे तेना तेना उत्तर आपती हती. २१ प्रिय कहां, सुलतान हर्पित थयो. शंकाथी वस्त्र दूर करता पण तेज प्रमाणे कछु, तेथी विशेष करीने वीर ए प्रमाणे ख्याति थइ. ए प्रमाणे कान्हडा महावीरने स्थापन करवामां जिनप्रभा- चार्यनो संबंध दर्शाव्यो.
[जिनप्रभसूरि अने तेओ योगिनीपुर( दिल्ली )मां चोमासु रह्या हता; के ज्यां राजा पीरोज सुलतान विराजे छे. ते नगरमां एक वखते उपद्रव करनारा म्लेच्छोने, तेओए (जिनप्रभसरिए ) डोक मरडीने तेने साजी करवी विगेरे प्रकारोथी शिक्षा करी हती. विश्वने विस्मय करनारा ते वृत्ता- न्तथी ते आचार्य, राजाथी लइ गोपाळपर्यन्त जगतमा विख्यात कीर्तिवाळा थया. राजावडे चोलागायेला ते आचार्य, प्रतिदिन धर्म-कथनपूर्वक अवसरोचित वाक्योवडे ते राजाने प्रसन्न करता हता. ते राजाए विजययंत्रनो आम्नाय पूछयो. सरिए तेने कह्यु के-ते तेवाओनो विपय नथी. . ' हे विजययंत्र- राजन् ! जेनी समीपमा आ यंत्र होय महिमा तेने देवताइ अस्त्र पण लागे नहि अने रोपाडे रातो थयेलो पण वेरी तेने पीडा करी शके नहि. ' ए प्रमाणे सांभळ्या पछी राजाए ते यंत्र करावीने परीक्षा माटे एक कराना कंठ पर बंधाव्यो. तेणे १ महम्मद नघलक पछी दिल्लीनी गादीए आवनार पीरोज- शाइनो गज्य-ममय वि. सं. १४०७ थी १४४४ मनाय छे. जिनाममूरिजी तेना राज्यअमलमा विद्यमान होवान शंकित छे, एयी आ वर्णवेल घटना महम्मद तपलकना राज्यकालमां-पीरोज मघलकना युवराज-कालमां संमवे छे.
सुलतान महम्मद.] [६१ भूकावेला तरवार विगेरे अस्त्रोना महारो, बख्तर धारण करेल होय तेम तेना शरीरे लागता न हता. ए विजययंत्रने छत्रदंड पर बांधीने, तेनी नीचे उंदर राखीने कौतुकी ते राजाए विला- डीने प्रेरी-टुकारी हती. ते उंदरने जोवा मात्रथी पैर उत्पन्न थवाथी तेना तरफ दोडी, पासे रहेलाओए तेने प्रेरी, तो पण ते (बिलाडी) ते विजययंत्रवाळा छत्रनी छायामां आनी नहि. ए बने अद्भुत जोइने ते राजाए ताम्रमय( तांबानां) बे यंत्रो करावीने तेमांथी एक यंत्र पोतानी पासे रखाव्यु, अने एक पूज्य गुरुजीने भेट कर्यु: केमके सजनो उपकार कदापि भूलता नथी. त्यारपछी आ राजा, स्थान, यान, घर, गाम, सभा, विजन ( एकांत ) के वनमा क्यांय गुरुजीने मूकतो नहि ( साथे ज राखतो हतो.) एक वखते सुलताने, गुजरातमां जवानी इच्छाथी गाम- नी बहार एक वडनी नीचे प्रस्थान कयु पडतुं चालवू हतुं. शीतळ, लीली छायावाळा विशाळ १ ही. २. कापडियाए मेरु० “चतु. स्तुतिनी भूमिका[ पृ. ४५ ]मां जणाव्यु छ के- तेमणे म्लेच्छोना आक्रमणथी पीरोज सुलतान पीरोजशाह ? )नुं केवी रोते विजययन्त्रद्वारा ग्क्षण फ्युxx चोरेली साधुनी सिक्किका(१)नी. पुनः प्राप्ति xx' मावो आशय उपदेशसप्ततिमाथी केवी रीते फाढयो, ते समजी शकातुं नथी.
-
[ जिनप्रभसूरि अने
ते वडने वारंवार जोतां सुलताने गुरुजीने हृदयमा
रहेढं पूज्यु के-'सरि ! आ वड सारो छे.' तेना
मनना भावने जाणनारा सूरिजी पण बोल्या के- जो तमारी
चाहना होय तो आ वडने साथे चलावीए. राजाए ते स्त्री-
कारतां राजा चाल्यो त्यारे ते वड पण सूरिना प्रभावथी
सेवकनी जेम चालवा लाग्यो. ते वडने चालतो जोइ लोको
प्रफुल्लित आंखोवाळा थइ पगले पगले सूरीन्द्रनी अने नरेन्द्रनी
प्रशंसा करता हता. केटलोक मार्ग ओळंग्या पछी राजाए
गुरुजीने कयु के-' आ वडने विसर्जन करो. आने बहु फेरो
थयो. ' सरिजीए बडने कह्यु के-'राजाने नमीने तुं स्व-स्था-
नमा जा. ' वडे पण सुशिष्यनी जेम तेवी ज रीते कयु.
राजा ज्यारे मरुस्थली( मारवाड )मां आव्यो, त्यारे
१ तपागच्छना पं. शुभशीलगणिए वि. सं. १५२९ (१)
मां ग्चेला पंचशतीप्रबंध-कथाकोश[ह. लि. प. १ मा सूचव्यु
छ के-" एक वखते सुलतान गग्मीनी ऋतुमा नगर बहार वडलाना
झाड नीचे रझा हना. छायावाळा ते वृक्षने जोह जिनप्रभ आगळ
वोल्या के-'जो आवा प्रकारनी शीतळ छाया साथे आवे तो
अत्यन्त सुख थाय.' त्यारपछी सूरिए फा के-'वृक्ष साथे
आवशे.' त्यारपछी सुलतान चालतां ते झाड पण सांझ सुधी
चाल्यु. पाछळ स्थान जोयु, त्यां न जणायु. पछी.
वृक्ष (बड)ने
विसर्जित कयों, पोताने ठेकाणे गयो. राजा चमत्कार पाम्यो.
"
सुलतान महम्मद.] [६३ त्यांना नगरजनो भेटणां हाथमा लइने ठेकाणे ठेकाणे सामे आवता हता; तेमने सामान्य वेपवाळा जोइने राजाए ते गुरुजी (जिनप्रभसरि)ने पूछयुं के-आ लोको लुटायेलानी जेम आवा प्रकारना केम जोवामां आवे छे ? ' [ सरिजीए जणाव्यु के-] राजन् । देशना आचारथी अने घणा द्रव्यना अमा- चथी अहिं प्राये आवा नकारना लोको होय छे वीजु कंड कारण नथी. त्यारपछी प्रत्येक नर दीठ दिव्य पांच पांच वस्त्रो अपाव्यां अने प्रत्येक स्त्री दीठ सोनाना बब्बे टंका (चलणी नाणु) अने साडी अपवी. ए प्रमाणे मेघनी जेम लोकनी आशाने पूर्ण करता [जिनप्रभसरि ] अनुक्रमे पत्तन (पाटण) पासे जंघराल नामना मोटा नगरे पहोंच्या. त्यां पहेलेथी तपापक्षना सोम- १ त. शुभशीलगणिए कयाकोश[इ. लि. प. २ मां जणाव्यु छ के-" एक वखते सुलतान, मरुस्थली( मारवाड)मा आयो हतो. ज्यारे गामडानी नारीओ अक्ष( चोखा) आणी वधावा लागी, त्यारे सुलताने धन आपीने कछु के-'खीओ आभरणथी रहित केम जोवामां आवे छे ! कोइवढे लुटाइ छ । अथवा दंडाइ छे के शृं!' मुरिए फर्ष के-'आ मरुस्थली रक्ष अने धनहीन छ.' त्यारपी सुलताने प्रत्येक खो दीठ सो सो दीनार (सोनामहोर) आपो जुहार फयों. . " ६४] [ जिनप्रभसूरि अने प्रभसरि हता, तेमने मळवा माटे सूरिजी( जिनप्रम ) नगरमां गया. त्यां सोमप्रभमरिजीथी अभ्युत्थान, आसन विगेरे द्वारा बहु मानित थयेला जिनप्रभसरि तेमना प्रत्ये बोल्या के-'तमे आराध्य छो, के.जेमनी आवा प्रकाग्नी क्रिया छे. तेओ (सोमप्रभसरि ) पण प्रत्युत्तररूपे बोल्या के-'प्रभो ! अमारी प्रशंसा शी करवानी होय १, तमे धन्य छो, के जेना आधारे जिन-शासन जागे छे.. ए प्रमाणे प्रीतिपूर्वक ते वंने आचार्यों ज्यारे परस्पर वात करता हता, तेवामां शालामां जे कौतुक थयुं ते कहेवामां आवे छे-' एक साधुनी सिक्किका( सीकली)ने उंदरे विनष्ट करी हती, ते मुनिए गुरुजीनी आगळ आवीने राव करी. ते वखते जिनप्रभसूरिजीए विद्याओवडे आकर्षेला, शालानी अंदरना सर्व उंदरो उपस्थित थया. म्हों ऊंथी नमावी, वे हाथ (आग- ळना वे पग) जोडी भय-भीरु ते उंदरो विनीत शिष्योनी जेम गुरुजीनी आगळ ऊमा रह्या. [जिनप्रमसरिजीए कह्यु के-] 'हे उंदरो ! सांभळो, जे कोई अपराधी( गुन्हेगार ) होय, ते रहो भने वीजा क्या जाव, स्वेच्छापूर्वक हरो-फरो. 'ए प्रमाणे आचार्य(जिनप्रभसरि )ना वचनने सांभळी सघळा उंदरो खराथी पग उपाडता कूदीने गया अने एक तो चोरनी जेम आगळ रखो. सूरीन्द्रे तेने पण का के.- डर नहि, धीरता धारण कर. अमे साधुओ छीए, कोइने पण पीडा करता नथी.
सुलतान महम्मद.] -- v . एम कहीने तेने पण शालामाथी बहार काठ्यो. ए विगेरे कौतुकोबहे तेओए (जिनप्रभसरिजीए ) साधु-वर्गने घणा बखत सुधी प्रसन्न कयों हतो.' १ जिनप्रभसूरि-प्रबंध( व. का. )मां जणाव्यु छे के " गामनी सीममा श्रेष्ठ शोभाशळा आंबाना झाड नीचे गया पछी सुलताने सूरिजीने कयु के-' आ पृक्षनी छाया फेषी सारी छे?' स्यार पछी ते वृक्ष साथे चाल्यो हतो. बीजा प्रयाणमां राजार सूरिने फयु के-'आ आगळथी साथे शा माटे आवे छे १' सूरि- 'तुम्हारी मया हुइ तो पाछळ वधावणुं करे' मि. प्र.(व.का.)-मार्गमां सुल.-' आस्त्रीओ आमरणो, श्रेष्ठ येष, पट्टाल वि.थी रहित केम जोवामां आवे के १ शु कोइए खूटी दंडी छे के शु. म.-' आ देश निद्रव्य छे, तेथी एवा वेषवाळी छे.' त्यार पछी सुलताने प्रत्येक स्त्री दीठ पांच पांच सोनाना टंको माजनगां नाखी सर्वने जोहार कर्या. पाटण सुधी सघळा य मार्गमां एवी रीते कयु." जि.प्र. (व, का.) मां जणाव्यु छ के-॥ सैन्य जंघरा- लमा बहार उतयं. जिनप्रमसूरि गाममा तपापक्षना पूज्य सोमप्रम- त्रिजीनी पोसहशालामा उता. सोमप्रभमूरिए जिनप्रभसूरिनी प्रशंसा फरी के-' भगवन् ! तम्हारा प्रसादे फरीने जिनधर्म जयवंत य छे.' त्यार पछी जिनप्रमसरिए पर्यु के- अम्हे अत्यंत १६] [ जिनप्रभसूरि, अने अविरती छोए. सुलतानना सैन्य साथे प्रतिदिन परवश. तरीके मवाय छे. अम्हे तम्हारा पगनी रज सरखा पण नथी. हालमा चारित्र तम्हारा आधारे छे.' तेवामा साधुओए प्रतिलेखन करवा माटे सिकिका (झोळी) मतारी. एक साधुनी सिक्षिकाने उंदरे करडेली जोइ जिनप्रभसूरिए रनोहरण भमाडीने फयु के-सघळा उंदरो अहिं आवो. तम्हारा- माथी जेणे सिक्षिका करडी होय ते रहो, बीजा जाओ. एक रमो, यीजा गया. तेने देश-त्याग कराव्यो. ते प्रतोली( पोळ) मूकी पीजे गयो. अहिं सूचवायेल जंघराल स्थान, ऐ. दृष्टिए महत्त्ववाळु जणाय छे. अणहिलवाह पाटणमा भीमदेवर्नु राज्य हतुं, ते समयमां-वि, स. १२९५ मां दीशापाल आम्नाय( डीसावाल झाति:)ना चीर नामना सुश्रावके जगचंद्रसूरि( तपागच्छाधार )ना वचन- श्रवणथी ज्ञातासूत्र विगेरे अंगोनी ताडपत्रीय प्रति लखावी हती; जेर्नु भा जंघराल स्थानना युगादिनिन-मंदिरमा देवेन्द्रसूरिए वि. सं. १२९७ मां संघ आगळ व्याख्यान कयु हतुं (जे ताड प्रति खंमातमा प्राचीन शांतिनाथजी जैन भंडारमा विद्यमान छे). उपर्युक्त सोमप्रभसूरिजीनो जन्म वि. सं. १३१० मा, दीक्षा वि. सं. १३२१ मां, सूरिपदप्रतिष्ठा वि. सं. १३३२मां अने स्वर्गगमन वि. सं. १३७३मां थयु हतुं. आ सोमप्रभसूरिना पट्टने शोभावनार सोमतिळकसूरिने आचार्यपद वि. सं. १३७३मा सुलतान महम्मद ] [६७ रिजी( जिनप्रभरि ना उपदेशवडे त्यार- शQजयमां पछी सुलतान, सैन्य अने संघ साये रायणथी दूध शानुजय पर्वत पर गयो हतो. त्यां ते वरसाचQ. वखते संधपति वरीकेनां कृत्यो करनारा . जंघरालनगरमा वीर-मिनालयमां, त्यांना संघपति गजे २१००० कोना व्ययद्वारा करेला महोत्सवपूर्वक प्राप्त थयुं हतु-एम मुनि. मुंदरसूरिनी वि. सं. १४६६ मा रचायेली गुर्वावली [ य. वि. पं. सो० २६६, २७२-२८४] विगेरे परथी नणाय छे. तपोटमतकुटन शतक (वडोदरामां प्राच्यविद्यामंदिरमा तथा आत्मारामजी जैन ज्ञानमन्दिरमा इ. लि. प्रति ) की छवि रची तपागच्छना तत्कालीन साधुओ प्रत्ये गमे ते कारणे वैमनस्व दर्शावनार जिनप्रभमूरि, तपागच्छना उपर्युक्त आचार्य सोमप्रभसूरिने प्रीतिपूर्वक मळया होय तो खुशी थवा जेवू घे; परन्तु पीनी रीते विचारता ए घटना शंकास्पद लागे छे. वि. सं. १३३२ मां रिप प्राप्त करनार सोमप्रभसूरिनो स्वर्गवास वि. सं. १३७३ मां ययेल होवार्नु तपागच्छ-पट्टावली विगेरे साधनोथी जणाय छे. महम्मद तघलक वि. सं. १३८१ मा दिल्लीना वख्त पर आरूट थयानु, तथा जिनामरिए तेनी प्रथम मुलाकात वि. सं. . १३८५ मां कर्यानुं विश्वस्त साधनो द्वारा पहेलां (पृ. २३, ३२)., सचवाई गयुं छे. अन्य साधनो द्वारा सुलतान महम्मद तपटकनुं . सथा ६८] [ जिनप्रभसूरि अने राजा पर सरिए रायण झाडथी दूध वरसाव्युं हेतुं. गुजरातमा आगमन वि. सं. १३९० पहेलो थयुं होय तेम जणातुं नवी. ए सर्वनो विचार करतां सोमप्रभसूरिना पट्टधर सोमतिलकसरि साये जिनप्रभसूरिनो समागम संभवे छे. ११. शुभशीलगणिए वि. सं. १५२१ मां रचेला पंच- शतीप्रभंध फयाकोश[इ. लि. कथा ९]मा गणाप्यु के के- एक वखते सुलतान योल्या-जेवी रीते चमत्कारी तीर्थ, कान्हस महावीर छे, तेवी रीते बीजु पण कोइछे ११ स्यारपछी. सरिए शत्रुजयतीर्थनुं व्याख्यान फयु. त्यारपछी संघ भने जिनप्रभ- सूरि साथे सुलतान शत्रुजय गयो, त्यां तीर्थ भोइने से ज्यारे चमत्कार पाम्यो, त्यारे सूरिय फयु के-'मा रायणने जो मोतीमओ- वठे वधाववामां आवे तो क्षीर( दूध ) झरे जे.' स्यारपानी तेम करवामां आवता (रायणने मोतीओथी वधावसां) रायण दूध झरी. राजाने संघपतिनो आचार फराव्यो. त्यां लस्नायु के-'जे आ तीर्थनी अवज्ञा करशे, ते पातशाहनी अवज्ञा फरे छे. ' स्यार- पञ्ची त्यां पाषाणोवडे ७ रेखामो फरावी. स्यारपछी नीचे उतरीने सर्य लोको प्रत्ये फ्यु के-'पोतपोताना देवने लावो.' त्यारपछी लोको महादेव, विष्णु, ब्रह्मा, जिन विगेरे पोतपोताना देखने लाव्या. राजाए सर्व देवो मंडावीने पूण्य के-' था पधा देवोमा द( पहा )देव कया छ ?' ज्यारे लोको न योल्या त्यारे जिन- अतिमाने मुख्य स्थानमा येसारीने हरि, प्रधा विगैरेनी प्रतिमाकोने . .
सुलतान महम्मद.] [६९ गिरनारमा. रैवतक गिरनार)मां पण एखी रीते गुरुजी साथे यात्रा करी सुलतान श्रेष्ठ उत्सवपूर्वक योगिनीपुर- (दिल्ली)मा पहोंच्या हता. चौतरफ आसपास राखी अने पोते आसन पर सीने चोत- रफ इथियार सहित सेवकोने स्थापीने सुलतान योध्या के- कोण वृत(बडो) कहेवाय ?' लोको बोल्या के-' स्वामी ज वृद्ध (पहा ) छे.' सुलताने फयु के-' जो एम नछे, तो जिन, शस्रोथी रहित होवाथी घृद्ध( अडा) छ भने हथियारवाळा सर्व 'सेवको छे.' त्यारपछी लोकोए की के-'प्रभु( पातशाह )तुं वचन प्रमाण छे. जि. प्र. (व. का.)-" सुलताने सूरिजीने पूछयु के- सर्व पर्वतोमा मोटो पर्वत कयो ' सूरिजीए शत्रुभय कह्यो. त्यां गया. सु०-'आनो शो प्रभाव छ?' सूरि-'जे कोई संघपविनो आचार करे तेना उपर दूधवडे झरे छे.' सुलतान तेम फरी रायगना झाड नीचे रहो. सर्व तुरको अने वणिकोना उपर फंकू, फेसर अने दूध वि. थी वृष्टि करी हती. सुलताने रंजित थइ सोनाना टंकामोथी 'थाळ भरावी रायणने वधावी हती. , " १ स. शुमशीलगणिए कथाकोरा इ. लि. कथा१०]मो जणा- न्यु के फे-" त्यारपछी मुलवान गिरनारगिरि पर गया हता. स्यां नेमिनाथनी अच्छेद्य अमेद्य प्रतिमा जाणीने घा-प्रहारो का.
.
७० ]
[ जिनप्रभत्रि अने
एक वखते सुलतान, सभामां बेसीने सरिजी साथे इष्ट
अर्थने साधनारी प्रीति-गोष्ठी करता हता,
अन्य प्रसङ्गो ते वखते त्यां तेनो कोइ गुरु आव्यो; तेणे
गोष्ठी-विनोद माथा पर रहेली टोपीने आकाशमां निराधार
राखी. सरिए लकुट जेवा पोताना रजोहरण
(ओघा)वदे ते टोपीने प्रहार करी पाडी नाखी अने ते(रजोहरण)ने
न्यां राख्यु. आचार्ये तेने( सुलतानना गुरुने ) कछु
के जो तारी कंइ पण शक्ति होय तो आ( रजोहरण)ने
पृथ्वी पर पाड, नहि तो मौन रहे । घणो वखत जवा छतां
ते तेने पाडवामां समर्थ थइ शक्यो नहि. त्यारपछी गुरुजीए
पोवे ते ग्रहण कर्यु. ते( सुलताननो गुरु) लज्जित थयो,
लोकोथी इसायो.
चीजे दिवसे पण पणे(सुलतानना गुरुए) पाणीथी
मरेला घडाने आकाशमा राख्यो अने ते बहु ज गर्व करवा
लाग्यो. ते ज सरिए (जिनप्रभसरिए) घडाने पण प्रहार करी
खंड खंड कयों, उतां पाणीने तो पोतानी विद्यावडे त्यां ज
चंभाव्यं. ते चमत्कार जोइने मात्र तेना एक गुरुने मूकी कया
मायी स्फुलिंग( अग्निना तणखा ) नीसरवायी सुलताने प्रभुने
प्रणाम करीने, समावीने सोनाना [१०] टंफाओवढे
बघाव्या हवा."
:सुलतान महम्मद.] [.७१ माणसोने विसय थयो न हतो? त्यारपछी सौ पोसपोताने घरे गया. . . १ शुमशीलगणिए फयाकोश[इ. लि. कथा २]मा भणाऱ्या ले के-" एक वखते जिनमप्रसरिजी पीरोज सुलतान साथै गोष्ठी करता बैठा इता त्यारे त्या मलाणको(मलाणा-मौलाना-मुल्लाओ) आव्या. एक मुलाणके( मौलानाए) पोतानी टोपी आकाशमा उछाळी, ते त्यां निराधार रही. सुलताने जिनप्रभसूरिनी सामे गोई फयु के-अहो ! मोठं आश्चर्य ! सूरि बोल्या-सालं. त्यारपछी सूरिए ते टोपीने त्यां अ थंयावी. त्यारपछी सुलतान बोल्या-टोपी आणो' त्यारपछी तेणे( मौलानाए) आकर्षण मन्त्रनो प्रयोग कयों, पण टोपी आवी नहि. त्यारपछी सुलताने कर्यु के-जिन- प्रभसूरि ! तमे आणो. त्यारपछी सूरिए रजोहरण(ोपो) फेंक्यु. तेणे त्यां जइ टोपी आणी, तेथी सुलतान चमत्कार पाम्या. जि. प्र. (व. का.)-" योगिनीपुर( दिल्ली)मां पातसाह पीरोजसुलतानना राज्यमा जिनशासनना प्रमावक जिनप्रभसूरि यया. तेना केटलाक चमत्कारो लखवामां आवे छे.- पातसाहनी सभामा एक मुल्लाणके टोपीने आकाशमां निरा- धार गखी. सुलताने जिनप्रमसूरिजीना सामु जोयु, सरिए रनोहरण :(ओपा )वडे टोपीने प्रहार करी नीचे पाडी भते रजहरणने त्यां( अदर ) सस्यु. मुल्लाणके बहु करवा छता, पण न पहयु. - ।
७२] [ जिनप्रमरि अने ए विगेरे विविध थष्ठ' प्रभावनाओवडे जेणे सुलतानने पछी सरिभीए हाय उंचो फरी ते लइ लीधुं." [आ प्रसंगने सूचवतुं एक चित्र पण प्राप्त याय छे ]. शुभशीलगणिए कयाकोप[कया २]मा जणाव्यु ऐ के- "पीणे दिवसे माया पर रईल, पाणीयी भरेल पडावाळी पनिहारी ज्यारे राजा आगळ चाली त्यारे मौलानाए तेQ फ्यु के मेथी बने घटाओ आकाशमा निराधार रहा. स्त्री तो आगळ गइ. माये घडाने न जोता अने त्यां निराधार जोई गमा चित्तमा चमत्कार पाम्यो, यी गजाए ज्यारे तेनी प्रशंसा करी त्यारे गुरुए कहुं फे-'मो पाणी निराधार रहे तो श्रेष्ठ फला. त्यारपद्धी राजार ते मौलानाने कायु, परंतु ते ते कळा न आणतो होवाथी मौन रखो. त्यारपछी गुरुए कांकरावडे बंने पहा फोही पाणीने निराधार राख्युं, राजा चमस्कार पाम्यो." मि. प्र. (व. का.)-" बीजे दिवसे पाणीथी भरेलो घडो आकाशमा राख्यो. सुलताने सामे जोयु. सूरिए पापाणथी प्रहार फरी कपालो( घडानां ठीकरां) पृथ्वी पर पायां. पाणी निराधार [लाहवाना आकार ] ज रह्य. शासननी महाप्रभावना थइ. १. शुमशीलगणिए कथाकोश[ह. लि. कया ४] मां जणाव्यु छ के-" एक वखते सुलताने फ[--'जिनप्रभसूरि ! तमे विज्ञ यो. कहो, आगे हुं नगरना कया धारणायी नीकलीश !' त्यार- सुलतान महम्मद. ] [७३ पण विशेष प्रकारे बोध पसाध्यो हतो. x x" -उपदेशसप्तति [अधि. ३, उप. ५, आ. समा पृ. ५७-५९] . पछी जिनप्रभरिए पत्रमा लखीने बंध करीने सुलतानने ते लेख आप्यो भने कयु के-'नगरथी बहार गया पछी लेख वांधवो.' त्यार- पछी सुलताने [काका नामना] किल्लाना २१मा लंगक पासेनी(३१ थरोनी) इंटो दूर करावी, बहार नीकल्या. पछी लेख वांच्यो. जेवी रोते नीकल्यो हतो तेवी रोते न लखेलुं हतुं. राजा हर्षित थयो." [कथा १ मा] एक वखते सुलतान पोल्या फे-" आजे हुं | '- -खाइश " त्यारपत्री सूरिए लेख लखीने अंध करीने आप्यो अने फर्छ के-'जभ्या पद्धी बांचवो.' त्यारपछी सुलताने खोळ खाघो. त्यार- पछी लेख जोता खोळ खावातुं लखेलु जोयु. राजा हर्षित थयो." [कथा ६ मा]एक वखते सुलतान बोल्या के-'सूरि ! कहो, साकर शेमा नाखतां मीठी लागे ? ' मंत्रीओने अने पंडितोने पूछयु. अने ज्यारे कोइए पण न फयुं त्यारे सूरि बोल्या के-' म्होंमां नाखतो' [कथा ७ wi] एक वखते सुलतान बहार बागमो गया हता. पाणीथी भरेलु मोटुं सरोवर जोइ सघळानी आगळ फयु के-"आ सरोवर धूळ पूर्या विना नानुं फेम थाय ?' एम पूछतां ज्यारे कोइए पण उत्तर न आप्यो त्यारे मूरिप( जिनप्रभे )..कह्यु के- " सरोवरनी पासे बीजं मोटुं सरोवर करावाय तो आ नानु थाय.' राजा हर्षित थयो. आ ७४ ] [ जिनप्रभसूरि अने १ [कथा ११ मां ] " एक वखते सुलताने जिनप्रभसूरिने फूछ्यु के–' पृथ्वी पर कयुं फूल मोटुं ?' सूरिए फयु-'जगत्ने ढांकतुं होवाथी वणि(वण-कपास)मुं.' शुभशीलगणिए कथाकोश[ कथा १६ ]मां सूचव्यु के के-" एक नगरमां श्रावकोमा रोग उत्पन्न थयो हतो, ते फोइ रीते निवर्ततो न इतो. त्यांची वे श्रावकोने जिनप्रभसूरि पासे मोकल- वामां आव्या हता. ते बंने श्रावको ज्यारे ध्यान करता जिनप्रभ- सूरिजीनी पासे आव्या, त्यारे तेओए गुरुजीनी पासे ये युवतीओ नोइ, तेथी ते बने विचारवा लाग्या के-" गुरुजीने स्त्रीओनो- परिग्रह विद्यमान छे' ते बंने ज्यारे पाछा फर्या के स्तंभित 'थइ गया. ध्यान पछी ते बने देवीओए पूछयु के- अम्हने बनेने अहिं केम आणी छे ?' गुरुजीए कह्यु के-' तमो बने द्वारा श्रीसंघने उपद्रव करवामां आवे छे, आ कारणथी शिक्षा आपवामा आवशे.' त्यार पछी ते देवीओ बोली के- आमथी (हवे पछी) श्रीसंघने उपद्रव नहि करवामां आवे. त्यारे ते बनेने विसर्जित करी इती. बंने भावको मुक्त यया. गुरुजीने नभ्या. स्त्री-संबंध पूछतां गुरुजीए कयु के-आपना नगरमा श्रावकोने उपद्रव सांभळ्यो हतो, ते हालमा निवार्यों छे. आप बनेए जोयुं. त्यार पछी ते यंने मावकोए पोसाना नगरमा भइ गुरुए करेलं नणान्यु हतुं." जिनप्रमस्निा प्रवन्धनी जूदी जूदी प्रतियोमा .पण योडा ' सुलतान महम्मद.] . फेरफार साथे पर जणावेलो, वथा वींटी विगेरेनो बीमो पण केटलोक वृत्तांत मले छे. एक ह. लि. पोथी[ १७ श. प. जय. भं. मा प्राचीन गुजराती भाषामां एवा आशयनो सल्लेख मले छ के-" वि. सं. १३३१ मां लघुखरतर जिनसिंहसूरिना पट्ट पर जिनप्रभसूरि महान् यया. तेमना गुरुजीए छ मास सुधी आययिल करता पद्मावतीदेवीने आराधी हती. पद्मावतीए प्रत्यक्ष थइ कहुं इतुं फे- भगवन् ! तम्हारं आयुष्य थोडं थे, सम्हारा शिष्य जिनाम. सरिने फलदायिनी थइश. वागड देशमां बडोद्रा(द) गाममा अमुकने त्यो नानो बेटो पगे धाइ ( खोडवालो ?), तेने दीक्षा आपो. 'एम कही पद्मावती अदृश्य थई इती. गुरुजीए त्यां पाइ दीक्षा दीधी. शिष्यने पाट मापी गुरुजी परलोक पहोंच्या. जिनममसूरिने ११ मे वर्षे पद दीधुं. ते जिनमभरिए दिल्ली( दिल्ली) नगरमा महम्मद पात- साहने प्रतिबोध्यो हतो. अलावदीव [ थी ! ] पण मोटो-पातशाह प्रतिबोध्यो. महावीरनी पापाणमयी प्रतिमा बोलावी. पातशाह पासे प्रासाद कराव्यो. श्रीशत्रुनयनी यात्रा करावी, पद दीया, रायण दूधे बरसावी. वार गाऊ वष्ठ घलान्यो. ( मौलाना )ओ साथे वाद कर्या. राघवचैतन्य -साधे बाद कयों. पातशाहनी , हर्म राणी बालादेने क्षेत्र( खेतर)पाठ 'लाग्यो हतो, ते थंडाव्यो. जाते पीपलनी शाखा मांगी - प्रेठो मलाणा- . .
[जिनप्रभसूरि अने
समकालीन इतिहास.
जावालिपुर( जालोर )मा रहेला जिनेश्वरमरिए पोतानो
अंतसमय जाणी पोताना पट्ट पर पोताना हाथे वाचनाचार्य
प्रबोधमूर्ति गणिने स्थापित कर्या हता, सकळ संघ आगळ
बोलाव्यो. पातशाहना चित्तना अनेक चमत्कारो पूरा कर्या.
मंत्रगर्भित ७०० स्तोत्रो को x x मोटा अधदातवाला
(अतिशयवाला प्रभावक) पुरुष थई गया.
धी. ज्ञानभंडारनी ७ पत्रवाली बीजी पट्टावलीमा सूचव्यु छे
लघुखरतर श्रीजिनप्रभसूरि थया. जेणे महावीरनी मूर्तिने
चोलावी, अमावास्यामाथी पुनम करी, अलावदीन (1) पातशाहने
शत्रुजयनो संघवी कयों, रायणथी दूध वरसाव्युं, संघ साथे वह
पळाव्यो, कलावंत शेखनी कुलह( टोपी )ने मुहपत्तिथी मारी
आकाशथी माथे आणो, ब्राह्मणनी पाणी भरेली गागर, आकाश•
मांयी ओघावडे भांगी ठीकरांने हेठल नांख्या. पाणी पिण्डरूप
थयु, पातशाहे हाथ धर्यो, ऊपरथी पाणी ऊर्यु. शीतज्वरने
झोलीमां बांध्यो, लघुखरतरगच्छमां एवा चमत्कारी थया.
ख. ग. नी एक पट्टावली [ साक्षर जिनविजयजी द्वारा
संगृहीत अने स्व० यायू पूरनचंदजी नाहर प्र. पृ. ५४ मां
आ प्रमावफ जिनप्रभसूरिना घणा अवदातो होपातुं जणावी अन्य
ग्रंयमांयी पद्य सध्धुत करी मूक्युं छे, ते पाठान्तर साथे सूचq छं.
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सुलतान महम्मद.] [७७ तेनुं नाम जिनप्रबोधसरि आप्युं हत-एम तेमना शिष्य कवि सोममूर्विगणिए रखेला जिनेश्वरपरि-धीवाह-रास (ऐ. जैन गू. काव्य-संचय पृ. २२६-२२७ पद्य २९ थी ३१ मां सूचित कयुं छे. वि. सं. १३३१ ना आश्विन व. ५ जिन- प्रबोधसरिनी पद-स्थापना अने ते पछी बीजे दिवसे (व. ६) जिनेश्वरमरिनो स्वर्गवास थयो इतो, पम रास, ख. ग. पदावली वि. परथी जणाय छे. आ जिनप्रबोधसरिए वि. सं. १३२८ मा (हरि-च्छ- पति थया पहेला ) कातंत्रदुर्गपद-प्रबोध रच्यो इतो, तथा सरिपद थया पछी वि. सं. १३३३ मा प्रतिमा-प्रविष्ठा करी हती. ए विगेरे अम्हे जेसलमेर मां. सूची (अप्रसिद्धग्रन्थ- अन्यकृत्परिचय )मां जणाव्युं छे, तथा ए जिनप्रबोधसूरिए वि.सं. १३३४ मा प्रतिष्ठित करेल जिनदत्तमूरि-मूर्तिनो फोटो अम्हे अपभ्रंशकाव्यत्रयीमां प्रकट कराव्यो छे. "गयणथकी जिनि(णि) कुलइ नापि(आणि) ओघइ उत्तारी, फिद्ध महिप(य) मुष(ख)बाद नयर पिक्खा नव वारी; दिली(दिल्ली)पति सुरताण पूठि ससु (वह)वृक्ष चलाविय, रायणि सेजि सिहरि दुद्ध जलहर बरसाविय; दोरडा मुद्र कीधी(किय) प्रकट, जिन-प्रतिमा पुति वयणि, जिनप्रभसूरि सम कवण ?, भरतखंड-मंडिण स्यगि."
७८]] [ जिनप्रभसूरि अने जिनेश्वरमरिना पट्ट पर उपर्युक्त जिनप्रयोधसरि नियुक्त थया ए अवसरे वि. सं. १३३१ मां जिनेश्वरसरिना अन्य शिष्य जिनसिंहमरि (श्रीमालवंशी)द्वारा खरतरगच्छमाथी एक शाखा-मेद प्रकट थयो, जे लघु खरतरगच्छ( गण) तरीके ओळखायो. स. ग.नी केटलीक पट्टावली तथा जिनप्रभसरि- प्रबंघ( व. का. )मां जणाव्युं छे के-" आ जिनसिंहस्रिए ६. मासना आयंबिल द्वारा पद्मावती देवीनुं आराधन कयुं हतं; देवीए तेमनुं अल्प आयुष्य सूचवी तेमना योग्य पट्टधर राज- प्रतिबोधक अने प्रभावक जिनप्रमसरि थशे, तेनो परिचय आपी तेमना पर प्रसन्न थवा वचन आप्युं हां." पेथडशाहे देवगिरि( दोलतावाद )मां राजा रामदेव अने मंत्री हेमाद्रिना समयमां जिनदेव- मंदिर केवी रोते कराव्यु ? जेनी रक्षा जिनप्रभमूरिए करी इती. मुनिसुंदरमरिए वि. सं. १४६६ मा रचेली. गुर्वावलीमा सूचव्युं छे के-" वि. सं. १३२७ मां देवेन्द्रसरि अने तेना प्रथम पट्टधर विद्यानन्दसूरि १३ दिवसना अन्तरे स्वर्गवासी थतां तेमना वीजा पट्टधर विद्यानन्द-बंधु धर्मकीर्ति गणी ( गणनायक ) थया हता, जे धर्मवोपरि नामे प्रसिद्ध थया १. जुओ पृ. ४१-१२ नो उल्लेख.
सुलतान महम्मद.] [७९. हता. उदार बुद्धिवाळा ते गुरुए माळवा मंडळनी मिना विम्- पणरूप मंडपदुर्ग( मांडवगढ ) नामना नगरमा शाह पृथ्वीधर( पेथड )ने आहेत धर्मनो प्रबोध को हतो. त्रिकालज्ञानी दे भगवाने सम्यक्त्व साथे पारवत अंगीकार करता. ते(अनाढ्य)ने पण पांचमा व्रत( परिग्रह-परिमाण )मां लाख द्रव्य(रू.)नी छूट रखायी हती. अनुक्रमे ते( पृथ्वीधर) मालव- मंडलना राजानु प्रजाओथी पूजातुं सचिवत्व प्राप्त करी शक्यो इतो. ऋद्धि वडे कुबेर जेवो थयो हतो. ते पृथ्वीधरे (पेथडशाहे) चैत्योद्वारा पृथ्वीने व्याप्त करी इती, सद्गुणोद्वारा मनीपी- ( सज्जनो)नां हृदयोने व्याप्त कर्यो हतां, कीर्तिओद्वारा दिशाओने व्याप्त करी हवी. धनद्वारा भंडारोने न्याप्त कर्या हता, अने पड्गुणना जाणकार एवा तेणे पृथ्वीना प्रभुओ ( राजाओ) पर पण प्रकृष्ट शासन कयु हतुं. पोताना गुरु धर्मयोप ज्यारे ते नगर( मांडवगढ )मां. पधार्या, त्यारे ते पृथ्वीधरे हर्पथी ३ अयुत अने ६ हजार (३६०००) जूना टंकाओना व्ययवडे तेमनो प्रवेशोत्सव कों हतो. प्रसन्नथयेला गुरुए आपेल क्रम(अनुष्ठानादि आम्नाय)वाळा १. प्रभावक चमत्कारी आ योगी रिनो स्वर्गवास वि. सं. : १३९७ मां थयो झोत्रानुं गुर्वावलो, तपागच्छ-पट्टाक्ली विगेरे साधनोथी जणाय छे. - ८० ] [ जिनप्रभसूरि भने भने क्रमथी द्रव्यव्ययनां स्थानो जाणनारा आ पृथ्वीधरे उज्ज्वल ८४ चैत्यो कराव्यां हतां. श्रेष्ठ उदार धीर अचिन्त्य चरितोबडे तेणे लांचा काळ पर थइ गयेला, हरिपेण चक्रवर्ती, संप्रति अने कुमारपाळ राजार्नु स्मरण कराव्युं हतु. मुक्तिलक्ष्मीथी संयुक्त जिन-नायकोथी विभूषित थयेला ते विहारो (जिनमंदिरो), भूमिरूपी भामिनीना हृदय पर रहेला मोतीना हारो जेवा शोमे छे. 'कोटाकोटि ' एवा नामथी प्रसिद्ध महिमावाळो अने शांतिनो शत्रुजय पर, तथा 'पृथ्वीधर । एवी संज्ञावरे सुरगिरिदेिवगिरि-दोलताबाद)मा अने मंडपाद्रि(मांडवगढ) मां अने पृथ्वी पर नगरो, गामो विगेरेमा रहेला तेना बीजा पण घणा ऊंचा प्रासादो मुक्तिरूपी वलभी पर चडवाने नीसर- णीना दंड जेवा शोमे छे. पृथ्वीधरशाहे करावेला प्रासादोना स्थानोनी संख्या अने मूलनायक जिनोनां नामो विगेरे वक्तव्य, पूज्य गुरु सोमतिलकसरिजीए करेलु स्तोत्र, अहिं उतारीने पठन कर जोइए; ते आ प्रमाणे छे- "दीन विगेरेने सुविधिपूर्वक उत्कृष्ट दान आफ्नार, जयसिंह राजा प्रत्ये भक्तिवाळा, पोतार्नु औचित्य साचवनार, अर्हन्तोनी भक्तिथी पुष्ट, गुरुना चरण सेवनार, मिथ्यामतिने . सुलतान महम्मद ] पेथडशाह [८१ परिहरनार, सत्शील विगेरेथी पोताना जन्मने पवित्र करनार, प्राये रोपनो नाश करनार, सारी रीते विशाल अनेक पौपध- शालाओ करावनार, मंत्रमय स्तोत्रद्वारा विदीर्ण थयेला लिंगथी विवृत(प्रकट)थयेल श्रीपार्थनी पूजा करनार, चियमालिदेवे करेल, देशधिदेव नामथी प्रख्यात महावीरनी देदीप्यमान प्रतिकृति( मूर्ति )नी आडंबरथी पूजा करनार, नित्य निकाल जिनराजनी पूजन विधि तथा बे वखत आवश्यक प्रतिक्रमण) करनार, धार्मिक मात्र साधु पर पण मोटी भक्ति करनार, संसार पर विरक्ति करनार, सारां पर्वोमां करनार, साधर्मिकोर्नु सदा वैयावृत्त्य अने उच्च प्रकारे हर्पथी वात्सल्य करनार, पुण्य-सागर श्रीमत् संप्रतिराजाना, कुमारपाल भूपालना अने सचिवाधीश वस्तुपालना चरितने संभारी संभारीने उदार हर्परूपी सुधा-सागरनी ऊर्मियोमा उन्मजन करता, श्रेयरूपी उद्यानने सिंचित करवामां वकालना श्रेष्ठ मेघ जेवा सजन पृथ्वीधर( पेथड )शाहे सम्यग् न्यायथी सारी रीते उपार्जित करेला यहोळा धनने सारा स्थानोमां स्थापतां वि. सं. १३२० चीत्या पछी नेत्रोने प्रसाद-जनक, सुख आपनारा जे जे प्रासादो, जे जे गिरि (पर्वत) पर, श्रेष्ठ नगरमां. अथवा गाममा कराव्या, प्रासादोने तेमा रहेला जिननायकोना नाम साथे श्रद्धापूर्वक हुँ स्तबु छ- ६ ८२] पेथडशाद फरायला [जिनप्रमसरि अने वि. सं. १३२० लगभगमा पेथडशाहे करावेला सोनाना दंड-कलशवाळा ८४ जिन-प्रासादोनां मुख्य स्थानो. मूलनायक जिन-नाम ८ नग-नगरादि-नाम. १ मंडपगिरि( मांडवगड-माळवा )मां आदिजिन २ निंबस्थर पर्वत पर (गिरनार-स्मारक) नेमिजिन ३ नीचे भूमि पर पार्श्वनाथ ४ उज्जयिनीपुर(उजेणी-माळ्या)मां ५ विक्रमपुरमा नेमिजिन ६-७मुकुटिका(मकुडी)पुरीमां पार्थजिन अने आदिजिन विन्धनपुरमा मल्लिनाथ आशापुरमां पार्श्वनाथ घोपकीपुरमा आदिजिन अर्यापुरमां शांतिजिन १२ *धारा नगरमां नेमिनाथ १. रत्नमंडनगणिए रचेला सुकृतसागर काव्यमां शत्रुमयावतार (शबुंजय-स्मारक) नामना आ चैत्यने ७२ जिनालयोवाळ, सोनाना दंड-कलशवाळु १८००००० अढार लाख द्रम्मोवडे करावेलु नणाव्युं छे. 1 मुलतान महम्मद.] गिन यासाद [८३ १६ पर्धनपुरमा नेमिनाप १४ पंद्रकपुरीमा आदिजिन १५ जीरापुरमा २६ जलपद्रमा पार्थनाय १७ दादडपुरमा १८ हंसलपुरमा चीरजिन १९ मान्धाताना गुलमा अजितनाथ धनमानकापुर(पणियावी? )मा आदिजिन २१ मंगलपुरमा अभिनंदन जिन २२ चिक्सलपुरमा पार्श्वनाथ २३ जयसिंहपुरमा पीरजिन सिंहानकमा मिजिन २५ सलक्षणपुरमा पानाप २६ अन्द्रीपुर(इंदोर मां ताहणपुरमा शांतिजिन २८ दस्तिनापुरमा अरजिन २९ कर टक(फरदंडा)मा पार्श्वनाथ ३० नलपुरमां नेमीश्वर ३१ दुर्गमां १-२. सु. सा. मां चंद्रावती तथा ज्यापुर जणायल छे. ३. आ. ८६ नो टिप्पणो जुओ.
८४] पेथडशाहे करावेला [ जिनप्रभसूरि अने mnni वीरजिन कुंथुनाथ आदिजिन " ३२ विहारक(बिहार ? व्यारा ?)मा ३३ लंबकर्णीपुरमां खंडोह( खंडवा )मां ३५ *चित्रकूटाचल( चित्तोडगढ )पर ३६ पर्णविहारपुरमा ३७ चंद्रानकमा ३८ वं(वां)कीमा नीलकपुरमा ४. नागपुरमा ४१ मध्यकपुरमा ४२ *दर्भावतिकापुर( डभोइ )मां ४३ *नागहूद (नागदा)मां ४४ धवलक (धोळका ) नगरमां ४५ जीर्णदुर्ग( जूनागढ )मां ४६ सोमेश्वरपत्तन(प्रभासपाटण )मां शंखपुरमां ४८ सौवर्तकमा *वामनस्थली(वणथली)मां नासिक्य(नाशिक)पुरमा ५१ सोपारपुरमा ५२ रूणनगरमां पार्श्वनाथ आदिजिन अजितनाथ . आदिजिन पार्श्वनाथ चंद्रग्नभजिन नमिनाथ मल्लिनाथ पार्श्वनाथ ४७ मुनिसुव्रत जिन महावीर जिन नेमिजिन चंद्रप्रभ जिन. पार्थजिन " सुलतान महम्मद.] जिन-प्रासादो. ८५. उगल( वरंगल )मां पार्श्वजिन ५४ प्रतिष्ठान( पैठण )मां ५५ सेतुबंधमा नेमिजिन ५६ वटपद्रविडोदरा )मां वीरजिन ५७ नागलपुरमा टकारिकामा *जालंधरमां ६० देवपाल( देपाल )पुरमा ६१ देवगिरि दोलताबाद मां चारूपमा शांतिजिन द्रोणतमा नेमिजिन ६४ रत्नपुरमा अर्युकपुरमा अजितनाथ ६६ *कोरंटकमां मल्लिनाथ ६७ ढो(द्वारसमुद्र (पशुसागर ) देशमा पार्श्वनाथ ६८ सरस्वती पत्तन( पाटण )मां ६९ शत्रुजय पर कोटाकोटि' जिनेन्द्रमंडप साथे शान्तिनाथ ७० *तारापुरमा आदिजिन ७१ *वर्धमानपुर( चढवाण ? बडवाणी? )मां मुनिसुव्रतजिन १ सु.सा.मां आने ८ मार-प्रमाण सोनाना ७२ दंड-कलशवाळो प्रासाद सूचव्यो छे. भार-प्रमाण माटे पृ. ८७ नी टिप्पणी वांचो.
पेथडशाहनां [ जिनप्रभसूर्ति अने " ७७ . ७२ वटपद्र ( वडोद ?) मां आदिजिन ७३ गोगपुरमा ७४ पिच्छनमा चंद्रप्रभजिन ७५ ओंकारंपुरमा अद्भुत(उत्कृष्ट) तोरणवालं जिनमंदिर ७६ मांधातु(ता)पुरमा त्रिक्षण विकनपुरमा नेमिनाथ चेलकपुरमा आदिजिन एवी रीते पृथ्वीधरे प्रत्येक पर्वत, नगर, गाम अने सीममां सर्वत्र ( चोतरफ) हिमालयनां शिखरो साथे स्पर्धा करनारां उंचां चैत्योमां, पृथ्वीरूपी युवतिना माथाना मुकुट जेवां जिनोनां जे विधोने स्थाप्यां तेने तथा देवोए अने नरवरोए * आवी निशानीवाळां नगर, गाम विगैरेनां नामो सु. सा. मां पण सूचवेल छे. १. पुरण-प्रख्यात ' संबंधी एक परि. चयलेख 'वाणी' हिन्दी पत्रिकाना वि. सं. १९९१ना 'नीमाड' २ अंकमां छे. ओंकारपुरमा पेयडशाहै हेमाद्रिना नामे चलावेल सत्र मोजन- दानशाला माटे आगल वांचो, अनेक राज्य -परिवर्तन उथलपाथल अने अन्य आस्मानी-सुलतानी पछी हालमा अहिं ते श्वे. जैन मन्दिरोनां दर्शन यतां नयी, परंतु ओंकारजीमां अर्वाचीन दि. जैनमन्दिर 'सिद्धवरकूट' सिद्धक्षेत्र नामथी ओळखावाय छे. 'ओंकार-मान्धाता . .
सुलतान महम्मद.] सुकृतो. [८७ करावेला अने न करायेला( अकृत्रिम-शाश्वत) अन्य जिन-चिंचोंने पण हुं चंदन करु छ," पृथ्वीधरशाहे करावेलां चैत्योर्नु (श्लो० १८६ थी २०१) १६ काव्योवाल्लं स्तोत्र, पूज्य सोमतिलकसरिए करेलुं छे. फरकता घजरूपी हसोथी शोभती आकाशगंगाने चन्द्रकांत रत्नना पाणीवडे स्रवतो, स्फटिकरत्नमय कलशरूपी चंद्रने मस्तकपर धारण करतो, मरकतमणिद्वारा नीलकंठवाने तेनो उज्ज्वल चैत्योनो समूह, ज्योत्स्नावाळा हर महादेव )ना विलासनो आश्रय करे छे. (महादेवना विलासनी जेवो शोमे छे). आ( पृथ्वीधर-पेथडशाह )नुं वारंवार वर्णन शुं कराय ? जेणे हपंथी २१ घडी प्रमाण सोनाना व्ययद्वारा, शत्रुजय पर सुमेरुपर्वतना शिखर जेवु आदीश्वरनुं सुवर्णमय मंदिर कराव्यु हतुं. वेना पुत्र- झंझणदेवने उत्तम जनो उदार कहो अथवा कृपण कहो; आश्चर्य छे के-जेणे शत्रुजयमां अने रैवतक- (गिरनार )माँ पण सोना रूपानो एक ज ध्वज आप्यो हतो. केटलाक कहे छे के-'सोनानी ५६ घडीनो व्यय करी वेणे लीलामात्रथी हर्षपूर्वक इंद्रमाला पहेरी हती.' पृथ्वीने त्रण १. गणितसार विगेरे प्राचीन गणित ग्रंथोमां, सोनाना तोल संबंधमा सूचव्युं छे -५ गुंजा (चणोठी)= मासो. १६ मासा- १ कप. ४ कर्ष१ पल, ६ पल-पा मण १२ पल अधमण, २४ पल-१ मण. आवा १. दश मणनी १ घडी अने १. घडी मार गणाय छे. .
८८] पेयडशाहे देवगिरिमा [जिनप्रभसूरि अने दिशामां धारण करता कूर्म (कच्छप ), वराह अने शेष घणु कट पामता हता; तेओ ते पृथ्वीने चोधी दिशामां धारण करनार पृथ्वीधरने प्राप्त करीने हर्पित थया. मोक्ष आपवामां जामीन जेवां, जिनोए कथन करेला समग्र शास्त्रो लखावीने तेणे उच्च प्रकारनां सरस्वती-क्रीडागृहो जेवा ७ श्रेष्ठ कोशो ( भंडारो) भराव्या हता. स्तंभतीर्थ( खंभात )मां निवास करता प्रभावक संघ- पति भीमे शील (ब्रह्मचर्य) स्वीकारतां, समस्त साधर्मिकोनो सत्कार करतां पृथ्वीधरने पण उचित वेप मोकलान्यो हते. प्रथमिनी नामनी सुपत्नी साथे, वेवी रीते (ब्रह्मचारी थइने) ज सार्मिकपणानो विचार करतां ३२ वर्पनो भट (शक्ति- संपन्न युवक ) होवा छतां पण, कामने जीती, शील (ब्रह्मचर्य) स्वीकारीने पृथ्वीघरे ते घेप पहेयों हतो. आ(पृथ्वीधर )नी प्रिया प्रथमिनी पण सतीओमा प्रथम तरीके प्रख्यात थइ हती; गुरु- रु-देव-भक्त एवी जे पण कोइ वार पण, क्यांय पण पुण्य कृत्योद्वारा पृथ्वीधरथी हीन थइ न हती. राजाए अर्पण करेल मालवा(देश)नी रक्षानी महाचिंता- वाळो होवा छतां पण गुरुना उपदेशने वश रहेनार, चंने वार प्रतिक्रमण करनार, नित्य ३ वार जिन-पूजन, गुरु-नमन, साधर्मिकोर्नु अम्यर्चन( सन्मान), दीन विगेरेनो उद्धार, मुशास्रो, पठन, पर्वदिवसोमां पौपघ, ए प्रमाणे कृत्योने ते सुलतान महम्मद.] जिन-प्रासाद केवी रोते कराव्यो? [८९ आश्चर्यकारक रीते करतो हतो. श्रेष्ठ उदार समग्र सद्गुणोवाळो, सदा ६ आवश्यकोमा तत्पर, अर्हद्-गुरु-मक्त, मत-प्रभावक ते (पृथ्वीधर=पेथड ) पृथ्वीना अलंकाररूप थइ गयो." [मुनिसुंदरमरिनी सं. गुर्वावली श्लो० २०२ थी २१२] देवगिरिमां जिन-प्रासाद केची रीते कराव्यो? पं. रत्नमंडनगणिए विक्रमनी १६ मी सदीमां रचेला पेथडशाहना ऐतिहासिक प्रबंघरूप सुकृतसागर नामना मंडनांक सं. काव्य( चतुर्थ तरंग )मां सूचव्यु छ के- " ते प्रासादोमां, देवगिरिपुरमा एक दिव्य प्रासाद, जे रीते बन्यो, ते प्रबंध जाणवा योग्य छे- " हाथीओनी मद-वृष्टिनी सुगंधथी बहेकता मुख्य द्वार- बालं, घणा सुवर्णधी सार्थक नाम धरानतुं देवगिरि( देयोनो पर्वत स्वर्णगिरि=मेरु)पुर छे. प्राकार( किल्लो), परिखा (खाइ) अने आराम(उद्यानो)नी पंक्तिओथी परिवेष्टित थयेला श्रीबीज जेवा जे नगरने शत्रुओ एकतानबाळा थइ संमारे (ध्यानमां घरे) छे, ते नगरमां ध्वनि करतां घार हजार वाघोद्वारा ‘शत्रुओने बास पमाडनार, मनी मानाप्रयोजनरूप थये शस्त्रो विगैरेनी सामग्रीवाळो, तथा १ मोतीनी जोड,२चित्तने चोरनार स्त्री, ३ कष्टभंजन घोडो अने ४ पावनाचंदन ए चार रत्नोबालो,. ५६ करोड सोनेयाघाळो, ८०००० एंशी ९० पेयडशाहे देवगिरिमा [जिनप्रभसूरि अने । हजार घोडाओवाळो तथा १२००० बार हजार हाथीओपाळो राम नामनो राजा हतो. तेनो धी-सख ( मंत्री) हेमादि' हतो, जेनी पासे घणु हेम विगेरे हतं. आश्चर्य छे के जेणे कृपणताथी पोतार्नु पाप पण याचकोने आप्युं न हतु. ते वखते त्या ब्राह्मणोनु एकछत्र १ उपर सूचवायेल हेमादि ए देवगिरि-राज्यमा दक्षिणना इतिहासमां सुप्रसिद्ध हेमाद्रि एक नामांकित अधिकारी थइ गयेल छे. तेनो परिचय फरतां पहेला आपणे गुजरात अने दक्षिणनो तत्कालीन पूर्व इतिहास लक्ष्यमा लेवो मोइए. विक्रमनी १३मी सदीना उत्तरार्धमां देवगिरिना राजा सिंहणे मोटुं सैन्य मोकली गुजरात पर चढाइ करवानी एक तक साधी इती, परंतु गूर्जरेश्वर-महामात्य मंत्रीश्वर वस्तुपालनी-वीरता. मरी समयसूचकताथी तथा महामंडलेश्वर वाघेला लावण्यप्रसाद अने महाराणा वीरधवलनी वीरतायी तेमां तेने सफलता मळी जणाती नथी.भरुचनी सरहदमां-नर्मदा अने तापी नदीना तट पर बने पक्षनां सैन्योए भयानक परिस्थिति उपस्थित करवा छतां अंते संधि थयार्नु सूचन मळे थे. गूनरेश्वर-पुरोहितकवि सोमेश्वरे रचेली कीर्ति- कौमुदी ( सर्ग ४, लो० ४३-४७), जयसिंहसूरिए रचेल हम्मी- ग्मदमर्दन नाटक, तथा मं. यस्तुपालनो ऐ. परिचय कगवतां केटकांक अन्य साधनो परथी ए जणाय छे. गा. ओ. सि. हर- फयी प्रकाशित थयेली लेखपद्धतिमा यमलपत्रना उदाहरण तरीके सुलतान महम्मद.] जिन-प्रासाद केवी रीते कराच्यो ? [ ९१ सामान्य हतुं न चैत्य करावनाराओने तेओ बलपडे अटकावता हता. ए यात सांभळीने देदना नंदन पेथडशाहे चिचायु के-'जो कोई पण रीते आ नगरमा विहार(जिनमंदिर) करावाय तो घणो लाम थाय अने जैनदर्शननी प्रभावना थाय. फरी विचार कयों के 'तो हेमादि साथे हुँ प्रेम धारण करु, जेथी तेनी प्रेरणाद्वारा म्हारुआ प्रयोजन राजाथकी सिद्ध थाय. सर्वांग-पूर्ण लक्ष्मीवाळो आ राजा तो घणा सोनावडे, माणेकोबडे, घोडाओवडे के हाथीओवडे तुष्ट करी शकाय तेम नथी. 'प्रधानने संतुष्ट कर्या विना राजाने तुष्ट करवा'-ए न्याययुक्त नथी. 'वारणाना विवने 'वि. सं. १२८८ वै. शु. १५ना निर्देश साथे ए संधिनी शरती सूचवी छ के-" सिंहणदेवे अने महामंडलेश्वर राणा लावण्यप्रसादे पूर्व रूढि प्रमाणे पोतपोताना देशमा रहेg, कोइए पण कोइनी भूमि पर आक्रमण कर नहि-दबाववी नहि; शत्रुथी हल्लो थाय तो एक- बीजाए सैन्यनी सहायता करवी." सिंहणनी विरुदावलीमां तेने 'गूर्जरराज-हस्त्यंकुश' तरीके तथा गूर्जरेश्वर वीसलदेवने 'सिंघण- सैन्य-समुद्र-संशोषणवडवानल' तरीके ओळखावेल छे. उपर्युक्त चंद्रवंशी सिंहण पछी, जैत्रपाल पछी, राजधानी देवगिरि( दक्षिण )नी गादी पर आवेल महादेव राजाना अने तेना उत्तराधिकारी रामदेव राजाना राज्यमा (विक्रमनी ११ प मी सदीना पूर्वार्धमां) श्रीकरणाध्यक्ष हेमाद्रि नामनो अतिबुद्धिशाली राज्याधिकारी थई गयो. पुरायो, स्मृतियो विगेरेमाथी उधृत करी' , ९२] पेथडशाहे देवगिरिमां [जिनप्रभसूरि अने ? पूज्या विना मूलनायक पूजाय नहि. ' तेथी सत्र (सदावत- दानशाला-भोजनशाला ) मांडवामां आये अने त्यां हेमादिनु नाम कहेवामां आवे तो लोकमां पोतानो प्रासुक (पोते न करेल, न करावेल ) यश सांभळीने ते तुष्ट थाय. एवी रीते तेनुं तोपण अने दानथी उत्पन्न यतुं म्हारं पुण्य-'आंबाने पाणी सिंचाय अने पितओने तृप्ति थाय । ए विगेरे नीतिनी जेम-ए वंने कार्यों थाय." उपर प्रमाणे विचार करीने पृथ्वीघरे (पेथडशाहे) मुसा- फरोने आनंद आपनार विशाळ सत्रागार ( सदादान-भोजन-: शाळा) ओंकारनगरमां मंडाव्यु. त्यां सज्जनोने उज्ज्वल पाणीवडे १ वत, २ दान, ३ तीर्थ अने ४ मोक्ष ( परिशिष्ट साथे ) विषय पर योजायेल 'चतुर्वर्ग चिंतामणि' नामनो विशाल संग्रह ग्रंथ ए हेमाद्रिनी कृति तरीके ओळखाय छे. तेमां देवगिरिना यादव (जाधव ) राजाओ साथे हेमाद्रिनी पण प्रत्येक परिच्छेदमा प्रशंसा करवामां आवी छे. ए विचारतां वास्तविक रीते ते संग्रह कति, हेमाद्रिना आश्रित कोई विद्वान्नी जणाय छे. आ हेमाद्रि संबंधा मराठी भाषामा ' हेमाद्रि ऊर्फ हेमाडपंत ' नामनुं विस्तृत माहिती- वाळ पुस्तक, केशव आप्पा पाध्ये, बी. ए. एल एल्. वी. (अॅडव्होकेट, मुंबई हाइकोर्ट) द्वारा सन् १९३१मा प्रकाशा आवेलु ई, एटले अहिं तेनो विशेष परिचय कराववानी खास अपेक्षा रहेती नथी.
, * सुलतान महम्मद. ] जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो ? [ ९३ स्नान करावाता हता. प्राकृत ( सामान्य ) मनुष्यो माटे पग घोवा लायक पाणी तैयार रखाता हतां. सबनी समीपमा विहार (जैन मंदिर)मा अर्हन्तोने प्रणाम करावी साधर्मिक थयेला सर्वने विवेकथी भोजन करावातां हता. घणां पत्रानो, खांडथी भरपूर मंडो (मालपूडा ), अखंड उज्ज्वल शालि (चोखा ), पीळी गुणकारी दाळ, नाकथी पीवाय एबुं घी, घणां शाको, पित्तने शांत करनारा करंभा, स्निग्ध (तर-चीकाशवाल) दहीं, लवंगना संगथी सुगंधि पाणी मनुष्योपडे स्वेच्छापूर्वक आ. स्वादित करातु हाँ. नागरयेलनां पानो, कपूर अने सोपारी *साथै अपातां हता. पछी निद्रा विगेरे माटे दिव्य खाटो ( पलंगो ) अपाती हती. त्यां आवेला प्रवासीओ स्वादु भोजन • करता अने सुखे सूता छता पोतानी स्त्रीओना अने माताओना हाथोने तथा पोतानां घरोने संभारता नहि. पूछ- नाराओनी आगळ तो हेमादिनुं ज नाम कहेवामां आयतुं हतुं. एवी रीते पेथडशाहे त्यां ज्यारे ३ वर्षों सुधी सत्र चलाव्यु: त्यारे भोजनथी प्रसन्न थयेला, देवगिरिमां गयेला भाट विगेरे, ३ वर्ष सुधी हेमादिनी आदरथी एवी रीते स्तुति करता हता के- "ओंकारपुररुपी क्यारामां, पृथ्वीना जनोने अतिप्रिय ए सत्र, यतिओना समूहक्डे परम ध्येय पविन बीज जेबु आ- चरण करे छे ते थकी उत्पन्न थयेली अने कवितारूपी, आ ९४] पेयडशाहे देवगिरिमां [ जिनप्रभसूरि अने नीकोपडे विस्तरेली तमारी असाधारण कीर्तिरूपी लता आजे मांडवानी जेम ब्रह्मांड पर चडे छे." ए विगेरे प्रकारर्नु प्रशंसावालं खोटुं वर्णन नित्य सांमळतां देमादिए एक वखते चित्तमा विचार कयों के-" में जन्मथी मांडीने याचकोने पण कांह आप्यु नथी, तो आ लोको सत्र (दानशाला-भोजनशाला )Y कहे छे १ अने आ वळी जो कदाचित् कोइ एक कहे तो खोटु होइ शके; परंतु आटला बधा लोको आटला वखत सुधी असत्य बोलनारा न होइ शके." एवो विचार करीने ते जोवा माटे तेणे एक माणसने ओंकार- पुरमा मोकल्यो. त्यां जइ आवेला ते माणसे जाणेलो संबंध जणाव्यो के-" सर्व प्रकारना स्वाद रसवाळी ते भोजनशालामां जे मोजननो स्वाद ग्रहण करे, ते ज रसना( जीम )ने हूं रसज्ञा जाणुं छु, वीजी जीभने तो रसना कहो. त्यां आवेलो कोइ पण माणस असंतुष्ट थइने जतो नथी, तेम ज अन्य भोज- नोनी अवज्ञा कर्या विना जतो नथी, तथा तमारी प्रशंसा कर्या विना जतो नथी. तमने ते भोजनशालामां आटला वखतमा सवाकरोड द्रम्मनो व्यय थयो; परंतु तमारो यश अने पुण्य करोड कल्प पर्यन्त रहे तेवां थयां छे. कानरूपी नीकद्वारा आवेलां आ वचनरूपी पाणीवडे सिंचायेला हेमादिना शरीर पर रोमांचरूपी अंकुरा प्रकट थया. त्यार पछी आंकारपुरमा जइ भोजनशालाना अधिकारीओने सारी रीते पूछीने ते भोजन- शाला चलावनार तरीके पृथ्वीधर( पेथडशाह )ने जाणीने .
4 सुलतान महम्मद. ] जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो? [ ९५ हेमादिए तेनी स्तुति करी के-" ते पुण्यवती स्त्रीनी कुक्षिना ओवारणा लउँ, के जेणीए पृथ्वीधर नामथी प्रख्यात पुरुष-रत्न उत्पन्न कयु. ते पुत्रवती सती युवती भले गर्वधारण करो के जेणीने गुणोबडे अलौकिक पृथ्वीधर( पेथड) जेवो पुत्र छे," "पोजाना द्रव्यवडे पोताना नामने प्रख्यात करे तेवा पुष्कळ मनुष्यो छे; परंतु पोताना द्रव्यवडे वीजानी ख्याति करावनार तो मात्र पृथ्वीधर( पेथड )ज छे" ए प्रमाणे स्तुति करीने हेमादि, स्वर्गनगरीना गौरवने न्यून करनार दुर्ग ( मांडवगढ )मां जइने पेथडशाहने मळ्यो. पेथडशाहे तेनो हर्षथी सत्कार कयों. हेमादिए तेने कयु के तमोए आवी भोजनशाळा म्हारा नामे मांडी, तेनो जे हेतु होय ते खुशीथी मने कहो. जो के तमारा उपकारनो बदलो तो हुँ कोइ रीते चाळी न शकुं, तो पण म्हारा योग्य कार्यतुं कथन करी मने आनंदित करो। प्रधान(हमादि) वडे आग्रहपूर्वक पूछातां पृथ्वीधरे( पेथडशाहे ) कछु के-'जो विलंब विना कार्य- सिद्धि थाय, तो कार्य कहेवामां आवे. ' हेमादिए कह्यु के-'बहु शुं कहुं ?, तमोए इच्छेलु कार्य, मारे द्रव्यवडे, बल- वडे अने शरीर द्वारा पण करखानुं छे.' पेथडशाह बोल्या-'तो देवगिरि पुरनी मध्यमां विहार , (जिनमंदिर )ने योग्य एवी मोटी भूमि मने अपायो. ब्राह्मणोनी उद्धताइथी दुःसाध्य एवं पण ते कार्य, प्रौढ .
९६ ] पेयडशाहे देवगिरिमा [जिनप्रमसूरि अने उपकारना मारथी दवायेला ते बुद्धिशाळी मंत्री हेमादिए ते न चखते स्वीकार्यु. त्यारपछी सपरिवार ते बंने देवगिरि पुरीमा गया. उमादिए मंत्री पेथडने रमणीय हH( हवेली)मां उतार्या. 'चैत्यनी भूमि माटे हुँ जाते राजाने विज्ञप्ति करीश, आ विषयमा तमारे कांइ पण चिंता न करवी.. एम कही हेमादि घरे आव्यो. हेमादि अवसर जोतो हतो; कारण के अवसर विना करातुं कार्य सारं यतुं नथी. एवामां एक सारो अवसर मळी गयो. घोडा येचनारा त्यां आव्या. राजाए तेमांथी एक श्रेष्ठ घोडो लेवा प्रधानने का. अश्वलक्षणना विचक्षण परीक्षक हेमा- दिए एक जातिवंत घोडो दर्शाव्यो. समस्त लक्षणवाळो देवसची ते घोडो राजाने पसंद पट्यो. गति विगेरेधी तेनी परीक्षा करी ६०००० साठ हजार टंका(रू.)वडे ते घोडो लइ राजा घरे गयो. अन्य प्रसंगे पाणी-पार उतरतां हेमादि मंत्रीनी प्रतिभाथी ते जातिवंत( कुलीन ) घोडानी उत्तमतानी प्रतीति थइ. राजाए तेनुं नाम ' कष्टभंजन : प्रकट कर्यु. श्रेष्ठ सत्कार कयों. हेमादिना विस्मयकारी ते विज्ञानथी तुष्ट थइ राजाए अमीष्ट मागवा कहो. ए अवसरे मंत्री हेमादिए माग्यु-' मारो एक पन्धु अहिं मनोहर बिहार( जिन-मंदिर ) कराववा इच्छे छे ते माटे मनोऽभिलषित स्थानमां भूमि अर्पण करो. ' राजाए कडं के-ब्राह्मणोनी अप्रीति होवा छतां पण में तमने भूमि
सुलतान महम्मद. ] जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो ? [ ९७
आपवी छे ज; परंतु कहो के-ते बन्धुर्नु नाम सुंछे? अने ते
क्यां वसे छे?' हेमादिए कह्यु के- राजन् ! अवंती
(माळवा )नो अलंकार, धर्मकर्ममा कुशल पृथ्वीधर (पेथड)
नामनो जीभथी मानेलो म्हारो बंधु छे, माळ्यामां जयसिंह
नामना राजा विचमात्र छे छत्र अने चामरोथी रहित होवा
छतां पण पृथ्वीधर( पेथड ) ज पति( राजा ) छे, ते प्रात:-
काले प्रभु( आप महाराजा )ने प्रणाम करवा माटे
आवे त्यारे स्नेहथी घरे आवेल मालवराजने योग्य एवा सर्व
गौरवने योग्य छे.'
राजाए( रामदेवे ) ए अवधारण करी हृदयमा निश्चय
कर्यो. हेमादिए हर्पित थइ पेथडशाहने सूचित कयु. वीजे
दिवसे माळवाना मंत्री पेथडशाह, राजसभामां राजाने मळवा
आव्या त्यारे थाळमां सोनानी महोरो उपर श्रीफळ( नाळी-
एर )नी भेट घरी, समीप आवतां राजा( रामदेव ) जल्दीथी
ऊमा थइ हपथी तेने भेट्या.
राजाए पेथडशाहने योग्य आसन पर बेसारी, स्वागतादि
पूछी, नाळिएर ग्रहण करी भेटणुं पाई आप्यु. प्रधानने पहेरामणी
करी राजा पृथ्वीना दान माटे घणा परिवार साथे घोडा पर
बेसीने नगरीमां गया. चौटानी अंदरनी पृथ्वीनी प्रार्थना
4. थतां राजाए ते आपी, ब्राह्मणो दून थवा छतां पण दोरी
७
९८] पेयइशाहे देवगिरिमां [ जिनममसूरि अने देवरावी. प्रधाने भेट माटे आणेला सोनयाओ बडे, नगरीना जनोने संतोपित करी वाद्योना ध्वनिपूर्वक हर्पथी महोत्सव कयों. कच्छ-भंगनी उचिस्ता विचारी महेभ्य-श्रीमानोनी ७ हवेलीओ थइ शके तेटली भूमिमां हाट, घर विगेरे सघल्लं पडावी नाख्यु. शुभ दिवसे ३ चांस प्रमाण पायो खोदावतां घj स्वादिष्ट अपूर्व पाणी प्रकट थयु. ते जाणीने मत्सरी भूदेवो- (ब्राह्मणो )ए उत्सुक थइ सांझे रामदेव राजाने विज्ञप्ति करी-' राजन् ! पहेला अहिं क्यांय स्वादु पाणी न हतुं, ते हालमा तमारा भाग्यथी विहार( जिनमंदिर )नी भूमिमा प्रकट थयु छे, तो त्यां वाव करावो. अहिं तरस्या अढारे वर्ण पाणी पीशे; तेमां तमने जे पुण्य थशे तेनो तो पार नथी. हे राजन् ! कूवा विगेरेमांथी निपान( अवेडो) कराववामां पुराणमां पण चोरना उदाहरणपूर्वक बहु पुण्य कहेवामां आव्यु छे, तो चैत्यने योग्य भूमि चीजे आपी आ स्थळमां घणा पुण्य माटे कृपा करी वाव करावो. ब्राह्मणोना वाक्यथी राजार्नु चित्त दोलायमान थयु. ' सबारे त्यां आवी, पाणी पीने स्वादु जणातां विपुल वाव ज करावाशे' एम कहीने राजाए तेओने विसर्जित कर्या. पेथडशाहे पोताने उतारे हमेशां आवता, राजाना एक नापित( नाइ-हजाम )ने तुष्ट करेलो हतो, तेणे पेथडशाहने ते जणाव्यु. अवसरज्ञ माळवानो अमात्य पेथडशाह राते लवण- सुलतान महम्मद. ] जिन-प्रासाद केवी रीते कराव्यो ? [ ९९ बालदि ( भीठाना अगर) जाणी, द्वारपाळने द्रव्य आपी पोट्योने नगरीमा दाखल करावी, मीठं नसावी, पाणी खारु करी, तेमने खाना करी, घरे आनीने सुखे सूतो. सबारे त्यां आवेला राजाए माणसो द्वारा मंगावी ते पाणीनो जाते आस्वाद कों. सारं जणातां थूकी नाख्यु. 'बाह्मणोए मत्सरथी खोढं कायु ' एम विचारी ब्राह्मणोने उपको आप्यो. पृथ्वीधर(पेथड )तुं सन्मान कयु, एवी रीते बुद्धि- भंडार प्रधान पेथडने प्रासाद माटे पृथ्वी प्राप्त थइ. पा [कहे छे के-सिद्धराजे रुद्रमहालय कराव्या पछी ते कर- नार सूत्रधारने ' एना जेवू शिल्पकाम ए अन्यत्र न करे । ए हेतुथी अंध को हतो. सूत्रधारे एथी पण श्रेष्ठ जैनप्रासाद करवा प्रतिसाथी इच्छा राखी हती. अपूर्णाश ते सूत्रधारनी पेढीनो पांचमो वंशज कला-रत्नाकर रत्नाकर भमतो भमतो ते अवसर पर मंत्री(पेथड)ने मध्यो हतो.] बुद्धिशाली मंत्री पेथडशाह, ते रत्नाकर सूत्रधारद्वारा कर्मस्थायनो आरंभ करावी स्यां वणिपुत्रो( वाणोतरो)ने मूकी माळवा गया अने तेओए कर्मस्थाय माटे सोनाथी भरेली ३२ साढणी मोकलावी आपी. ते माटे हजार हजार इंटो पाव- + नारा १० नीभाडा थया हता. ३ बांस प्रमाण पायावाळी पापाणनी ३ संघियोमा अनुक्रमे ५ शेर, १० शेर अने १५ १०० ] पेयडशाहे देवगिरिमा [ जिनप्रभसूरि अने शेर लोढानी पादुकाओ हती. १४४४ थरमां केटलीक पापा- पानी पट्टीओ (पाटो),१९(३९) गजनी लांबी हती. इंडं चडा- ववानी पाटने वच्चे रहेला किल्लाथी विघ्न थतुं सांभळी साहसिक पेथडशाहे त्यां आधी रात्रे तेटला भागमा किल्लाने पडावी नाख्यो हतो; पछी बने तरफना पद्या(पाज)ना खंडोने संयुक्त करावी, इंडं चडावी किल्लाने पाछो सज्ज करावी दीधो हतो. आ चैत्यमा संपूर्ण घाट, सारोदार( सारूआर )थयो हतो, जेनाथी सामान्य चैत्यो ८४ थइ शके. ८४ हजार टंकोनां दोरडा तुट्यां हता, १ लाख टंकोना दीवा राते कर्म--- स्थायमां वळ्या हता. ' ए प्रमाणे वणिकपुत्रो द्वारा चैत्य करा- वतां थयेलो धन-व्यय सांभळी उदार पेथडशाहे लेखांनी वहीने पाणीमां नसावतां लोकोए आ प्रासादने 'अमूल्य- विहार ' नामथी प्रख्यात को हतो. ते जिन-प्रासादमा स्थापन करवा माटे चंद्रनी ज्योति जेवा आरासण पाषाण, ८३ आंगळ-प्रमाण श्रीवीरनुं विच कराव्युं हतुं.' मनोहर पूतळीओ तथा निपुणताथी उत्तीर्ण करेल (उकेरेल ) वस्तुओनी आकृतिवाळो वणो रमणीय प्रासाद तैयार थतां ते प्रासादनी, प्रतिमानी, सुवर्णकलशनी, दंडनी १. विक्रमनी १५ मी सदीमा ग्चायेला जणाता एक सं. स्तोत्रमा भिन्न भिन्न स्थानमा रहेला वीर (जिन-विय )ना -
. सुलतान महम्मद ] जिन-प्रासाद केवी रीते फराव्यो? [ १०१
अने ध्वजनी प्रतिष्ठा-पूजा बहुलक्ष्मीना व्ययथी महोत्सवपूर्वक
करायी हती. माधव नामना मंगलपाठके लाखोश्रीमंतोनी पद्मा
पेथडशाहनी साचा पृथ्वीघर तरीके प्रशंसा करी हती (विशेष
वृत्तान्त माटे सुकृतसागर काव्य यांचg).
देवगिरिमा रामदेवराजाना राज्यमा शाह देसल
अने सहजाशाहे करावेल जिनदेव-मंदिर,
जेनी रक्षा जिनप्रभसूरिए करी हती.
उपकेशगच्छीय ककसरिए वि. सं. १३९३मां कंजरो-
कर (कंजरडा)पुरमा रचेला नामिनंदन-जिनोद्धार प्रबंध (प्र.
२, श्लो. ९२२ थी ९५३ )मां जणाव्युं छे के-" वि. सं.
१३७१मां शत्रुजय पर उद्धार प्रतिष्ठा करावनार ओसवाल
संघपति देसलशाहे पोताना सद्गुणी मोटा पुत्र सहजने
देवगिरिपुरमा वास माटे मोकल्यो हतो. सहजे देवगिरिमां
उल्लेखोमा, पृथ्वीधरे( पेयडे ) देवगिरि ( दोलताबाद )मा फरावेला
म्य विहारमा रहेला तथा योगिनीपुर( दिली )मा रहेला
नामना वीरदेवर्नु पण संस्मरण मळे छे-
श्रीपृथ्वीघरकारिते सुरगिरी रम्ये विहारे स्थित
कन्नाणाभिषयोगिनीपुरगतं देवं सदारासणे ।
- श्रीजाबालपुरेऽपि पचरि(सहित पंचासरे वायडे
श्रीवीरं वरभीमपल्लोकमिति ख्यातं स्वेटिके ।।
रत्नाण
"
"
. १०२] सहजाशाहे करावेल [ जिनप्रभसूरि अने रामदेव राजाने गुणोवडे तेवो वश को हतो, के ते वीजानी कथा पण न करे. कर्पूरना पूरथी सुभग एवं तांबूल आपता जे( सहज )ने मंगल-पाठकोए । कर्पूरधाराप्रवाह । विरुद आप्यु हतुं. जे( सहज )नी सांभळेली कीर्तिथी प्रेराइ तिलंगाधि- पतिए पोताना नगरमां देव-मंदिर माटे स्थान आप्यु हतुं. कर्णाट अने पांडुदेशमां सदा पसरता जेना जशे त्यांना राजा प्रमुख लोकोने तेना दर्शन माटे उत्कंठित कर्या हता. देसलशाहे देवगिरिमां नवं जैनमंदिर कराववानो मनो- स्थ सिद्धसरिने बणाव्यो हतो. सुरिए प्रोत्साहित करी मूल- नायक पार्श्वजिन करावया सूचना करी हती. त्यार पछी जिन- मंदिर माटे देसलशाहे सहजने आदेश आप्यो हतो. सहज- शाहे एथी हर्पित थइ रामदेव राजाने भेटणांओथी संतोष पमाडी जिनमंदिर माटे भूमि लीधी हती. घणा धनदानवडे वैज्ञानिको( शिल्पीओ )ना उत्साहथी थोडा दिवसोमां संपूर्ण देवमंदिर तैयार थयुं हतुं. देसले चंद्र जेवा उज्ज्वल आरासण-शिलामय मूलनायक( पार्श्वनाथ ) कराव्या हता. तथा २४ जिन अने २ मोटा वियो तथा सत्या बनी १५ शारदायुगल तथा गुरुनी मूर्तियो करावीनी में भिन्न स्थो सिद्धगरिने साथे लइ स्कंधवाहो (सचिका) .
-- सुलतान महम्मद.] जिन-प्रासाद [१०३ -- -- (मजूरो)ना सभा पर विधोने आपी देसलशाह देवगिरि तरफ चाल्या हता. सहजपाल, मूलनायक अने अन्य जिनवित्रोनी तथा गुरुनी सामे संघ साथे ४ प्रयाणो सुधी गया हता. देवगिरि पहोंचतां मंगल वायोना घनिथी श्रेष्ठ प्रवेश-महो- त्सव कराव्यो हतो. घरेघर तोरणो अने पूर्णकळशोनी शोभा थह हती. देसलशाहे देवगृहनी तथा पौपधालयनी प्रतिष्ठा सिद्धमुरिद्वारा करावी हवी. देसलशाहे श्रेष्ठ भोजनो मने घस्रो द्वारा चतुर्विध संघर्नु हपंथी पूजन कयु तु. प्रासाद आगळ विशाल मंडप, २४ देवकुलिकाओ साये कराव्यो हतो. प्रासादनी चोतरफ रम्य हम्यों सहित दुर्ग बनाव्यो हतो, प्रासाद उपर स्वर्णमय दंड साधे सुवर्णकलश स्थाप्यो हतो. त्यार पछी देसलशाह, गुरुजी साथे पाटणा( गुजरात ) गया हता. भयानक अल्लाउद्दीन-युग. वि. सं. ८४५ मां गजणवइ हम्मीरना सैन्यद्वारा वल- भीनो भंग अने शिलादित्यनुं मरण थया पछी लगभग सवा- सो वर्षों पड़ी गुजरात मांगीने, वि. सं. १०८१मां चडी आयेला धीजा म्लेच्छराज गजगणव(गजनवी)ए, ते पछी घणे काळे आवेला मालवी राजाए अने वि. सं. १३४८ मां आयेल काफरना प्रश्ल सैन्ये अन्यत्र आक्रमण उपद्रव कर्या छतां ज्यांना महावीरना प्रभावे साचोरनी सीम चंपाणी न हती 4 १०४ ] अल्लाउद्दीन-युग. [जिनप्रभसूरि अने ते संबंधमां सत्यपुरकल्पमा प्रस्तुत जिनप्रभसरिए पोताना सम- यमा वनेली ऐ.दुःखद घटना सूचवीछे के-"वि. सं. १३५६ मां अल्लावदीन सुलताननो नानो भाइ उलूखान ढि(दिलीपुरथी, मंत्री माधवथी प्रेराइने गुजरातनी धरा तरफ चाल्यो हतो. ते वखते चित्तकूड( चित्तोड )ना राजा समरसिंहे दंड आपीने मेवाडदेशनी रक्षा करी हती. त्यार पछी ते हम्मीर-युवराज वागडदेश अने मुहडासा (मोडासा) विगेरे नगरोने भांगीने आसावल्ली (आसावळ, अमदावाद पासे) पहोंच्यो हतो. कर्णदेव राजा नाठो.' सोमनाथने घणना बाथी भांगीने गाडामां चडावी दिल्ली( दिल्ली) मोकल्या हता. फरी वामणथली( वणथली ) जइ मंडलीक राणाने दंडी सोरठमां पोतानी आण प्रवर्तावी आसावळमां पडाव नाख्यो हतो. मठो, मंदिरो, देवळो विगेरे चाळी देवामा १. उपकेशगच्छना ककसूरिए वि. सं. १३९३ मां कंजरोट- पुरमा पूर्ण करेला नाभिनंदन-जिनोद्धार प्रबंध ( ३ जा प्रस्ताव)मां सूचव्यु छ के-उछळवा घोडाओरूपी फलोलोवडे समुद्रनी जेम पृथ्वीने व्याप्त करनार अलावदीन सुलतान ते वखते त्यां( पाटण- मां) राजा थयो हतो. जेणे देवगिरिमां जइ तेना राजाने बांधीने पोताना जयस्तंभनी जेम फरी त्यां ज स्थाप्यो इतो. सपादलक्ष( सेवालिक )ना रणथंभोरना स्वामी अभिमानी चोर हम्मीर राजाने हणी तेनुं सर्वस्व लइ लीधुं तुं.
.
सुलतान महम्मद.]
अल्लाउद्दीन युग.
[१०५
आव्यां हता. अनुक्रमे सत्तसयदेशमां पहोंच्यो. साचोरमां
ढका-नादथी म्लेच्छोनुं सैन्य पलायन करी गर्यु हतुं; परंतु
त्यार पछी भवन, गोमांस अने लोहीथी छंटातां देवताओ दूर
थतां, भवितव्यता अलंय होनापी, दुःपमकाळना विलासयी
अधिष्ठायक ब्रह्मशांति यक्ष प्रमादी थइ असंनिहित थतां
अल्लावदीन राजाए वि. सं. १३६७मां तेज भगवान महा-
वीर( विच )ने दिल्लीमा लावी आशातना-पान कर्या हता. 'ते
कालांतरे फरीथी पाछा चीजी प्रतिमामां प्रकट प्रभाववाळा
थइ पूजा-योग्य थशे. " कनाणयनयर( कानानूर )वाळी
महावीर-प्रतिमाने दिल्लीमा सुलतान महम्मद तवलकद्वारा
सन्मानित-प्रतिष्ठित करावी उपर्युक्त भविष्यवाणीने वि. सं.
१३८५ थी १३९०मां जिनप्रभसरिए साची करी बताती हती.
चित्रकूटदुर्ग( चित्तोडगढ )ना राजाने बांधी तेनुं धन
लइ तेने नगरे नगरमा वानरनी जेम ममाड्यो हतो.
जेना प्रतापथी गुजरातनो राजा कर्ण, जल्दी नाशी, विदे-
शोमां भमीने रंकनी जेम मरण पाभ्यो.
माळवानो गला पण पुरुषार्थ-रहित बनी किल्लामां फेदीनी
जेम घणा दिवसो वीनावी त्यां( किल्लायां ) ज मृत्यु पाम्यो हतो.
जेणे कर्णाट, पांड, तिलंग विगेरे देशोना समस राजामोने
वश कर्या हवा.
.
१०८ ] दिल्लीश्वर पातशाहोथी [ जिनप्रभसूरि अने रत्न-परीक्षा नामना ग्रन्थना अंत(प्रा. सं.)मां तेणे सूचव्यु छे के-" धंधकुलमा कनाणपुरमां कालिय नामना शेठ हता. तेना पुत्र ठक्कुर चंद्रनो पुत्र फेरु थयो, तेणे दिल्लिय(दिल्ली)पुरीमा वि. सं. १३७२मां अलावदीनना राज्यमां संक्षेपथी रल-परीक्षा रची हती. ढि(दिल्लीनगरमा श्रेष्ठ बुद्धिशाली, जिनेन्द्रवचनना वि- चारकोमा अग्रणी फेरु नामनो वणिक्-शिरोमणि थयो. तेणे लोकोना हित माटे विद्वानोने चमत्कार करे तेत्री, प्रासादोनी अने वियोनी क्रिया-रत्नोनी सारभूत परीक्षा स्फुट करी हता." वास्तुसार ग्रंथना अंतमां तेणे जणाव्युं छे के-" धंधक- लसकुलमा उत्पन्न थयेल चंद्रना पुत्र फेरुए कनाणपुरमा रहीने पूर्वशास्त्रोनुं निरीक्षण करीने वि. सं. १३७३मा १ " सिरिधंधकुल आसी कन्नाणपुरम्मि सिद्विकालियो । तस्स य ठक्कुरचंदो फेरु तस्सेव अंगरुहो ।। तेण य रयण-परिक्खा रइया संखेवि ढिल्लियपुरीए । र-मुणि-गुण-ससिरिसे अलावदीणस्स रचम्मि ।। श्रीढिल्लीनगरे वरेण्यधीषण: फेरु इति व्यक्तधी- मूर्धन्यो वणिनां जिनेन्द्रवचने वैचारिकप्रामणोः । तेनेयं विहिता हिताय जगतां प्रासाद-विम्ब-क्रिया- रत्नानां विदुषां चमस्कृतिकरी सारा परीक्षा फुटा। " . सुलतान महम्मद.] सन्मानित जैनाचार्यों. विजयदशमीने दिने स्व-परोपकार माटे वास्तुसा५ ४. प्रतिमा-लक्षणादि ) शास्त्रने रच्युं हतुं." अम्हारा स्नेही पं. भगवानदासजी जैनीए हिंदी अनु- वाद साथे जैन विविध ग्रंथमाळा, जयपुर सिटीथी हालमां प्रसिद्ध करेला आ ग्रन्थमां कन्नाणपुरने कल्याणपुर (करनाल, देहली) सूचवेल छे, परन्तु अम्हारा धारवा प्रमाणे जिनप्रभ- सूरिना कन्नाणयनयर-कल्पमां सूचित ते चोलदेश(दक्षिण)र्नु कानानूर संभवे छे. संभव छे के ठ. फेरुए पितामहना प्रसंगथी पहेलो कनाणपुरमा यसबाट अने शास्त्र-निरीक्षण कर्या पछी दिल्लीमा आवी उपयुक्त ग्रन्थ-रचना करी होय. दिल्लीश्वर पातशाहोथी सन्मानित समकालीन अन्य जैनाचायों. वि. सं. १४१० मा ६२७२ श्लोकप्रमाण सं. शांति- १. “ सिरिधंधक लसकुलसंभवेण चंद्रामुएण फेरेण । कनाणपुरठिएण य निरिक्खिउँ पुवसत्याई ।। स-परोवगारहेऊ वयण-मुणि-राम-चंदवरिसम्मि । विजयदसमीइ रइशं गिह-पडिमा-लक्खणाईणं ।। एमजैनचन्द्राङ्गजबकुरफेरुविरचित वास्तुसारे प्रासाद- विधिप्रकरणं तृतीयम् ।
" ११०] दिल्लीश्वर पातशाहोथी [ जिनप्रभसूरि अने नाथ-चरित महाकाव्य रचनार, पेरोज शाहि महम्मद पातशाहनी सभामा प्रतिष्ठोदय प्राप्त कर- अने पेरोजथी नार मुनिभद्रसरिए पोताना गुरु गुण- गौरवित गुण- भद्रमूरिनो परिचय करायता सूचव्यु छे भद्रसूरि अने के-"ते ( बृहद्गच्छना मानमद्रमरि )ना मुनिभद्रसूरि पट्टने शोभावनार गुणभद्रसूरि सुगुरु थया, जेओ व्याकरण, छंद, नाटक, तर्क, साहित्य, अलंकार विगेरे सर्व शास्त्रोमां चातुर्य धरावता हता. जेना श्लोकोना व्याख्यानथी रंजित थइ अयुत( दस हजार ) सौवर्णटको( सोनया ) आपता मापाल-चूडामणि शाहि मुहंमदनी आगळ ' तपस्वीओथी ए ग्रहण न ज कराय' एम बोलतां जेणे चारित्रने स्थापित कयु हतुं.' १. " तस्य श्रीगुणभद्रसूरिसुगुरुः पट्टावतंसोऽभवद् यः श्रीशाहिमुहंमदस्य पुरतः क्ष्मापालचूडामणेः लोकव्याकतिरञ्जितस्य ददतः सौवर्णटकायुतं प्राह्यं नैव तपस्विनामिति वदंश्चारित्रमस्थापयत् ॥ x x तच्छिष्यो मुनिभद्रब्रिजनि स्याद्वादिसंमाननः श्रीपेरोजमहीमहेन्द्रसदसि प्राप्तप्रतिष्ठोदयः । तेनेदं निरमायि मन्दमतिना श्रीशान्तिवृत्तं नवं वत्तजन्मसहस्रसंचितमहादुष्कर्मविच्छित्तये ।। १ xx सुलतान महम्मद.] सन्मानित जैनाचार्यो. [१११ वि. सं. १४१२ ना राजगृहीना जैनमंदिरना शिला- लेखमा सूचन छे के-सकल महीपालोथी नमन कराता सुल- तान शाह पेरोजना राज्यकालमां तेना हुकमथी मगधमा मलिकवयो (१) नामना मंडलेश्वरना समयमां, तेना सेवक सह- णासदुरदीननी सहायताथी उपयुक्त पार्थनाथ जैनमंदिर रचायु हतुं. जेनी प्रतिष्ठा, खरतरगच्छना जिनचंद्रमरिनी आज्ञाथी उपाध्याय भुवनहिते करी हती. वि. सं. १४२२ मां ६३०७ श्लोकप्रमाण सं. पद्य महम्मदशाहथी कुमारपाल-चरित महाकाव्य रचनार, प्रशंसित कृष्णपिंगच्छीय जयसिंहमूरिए पोताना महेन्द्रसूरि गुरु महेन्द्रसरिनो परिचय कराता सूचव्युं छे के- अन्तरिक्ष-रजनीहृदीश्वर-ब्रह्मवक्त्र-शशि-समन्यवत्सरे । वैक्रमे शुचितपोजयातिथौ शान्तिनाथचरितं व्यरच्यत ।। --मुनिभद्ररिना शांतिनाथचरित महाकाव्यनी प्रशस्ति (श्लो. ७, ९, १७ य. वि. प्र.) १. " सकलमहीपालचक्रचूलामाणिक्यमरीचिमचरीपिचरित- चरणसरोजे सुरत्राणश्रीसाहिपेरोजे महीमनुशासति । तदीयनियोगान्मगधेपु मलिकवयोनाममंडलेश्वरसमये तदीय- सेवकसहणासदुरदीनसाहाय्येन xx" 11 १९२] दिल्लीश्वर पातशाहोथी [जिनप्रभसूरि अने " प्रतिवर्ष दीन, दुःस्थो (खराब स्थितिवाळा दुःखी)ना उद्धार सुकृत माटे मानपूर्वक साक्षात् अपाती लाख दीनारो ( सोनामहोरो )ने जेणे निर्लोभमावथी तृणनी जेम तजवां आ ते एक ज महात्मा छे, बीजो नथी.' एवं स्तोत्र राजा महम्मदसाहि तरफथी प्राप्त कयु हतुं, ते भगवान् महेन्द्रसरि अम्हारा ता(पा)पनो विनाश करो.' श्रेष्ठ भृगुपुर( भरुच )मां गणकचक्र-चूडामणि (ग- विशेष माटं जुओ स्व. वायू पूरनचंदनी नाइरनो जैन लेखसंग्रह (मा, १ लो), तथा जिनवि. प्रा. जैनलेखसंग्रह (मा. २, ले. ३८०). १. " प्रत्यहं दीन-दुःस्थोतिसुकृतकृते दीयमानं समान साक्षाद् दीनारलक्षं तृणमिव झटिति(कटरि!) प्रोज्ज्ञय निर्लोभभावात्। एकः सोऽयं म्हात्माऽनघ (न पर ) इति नृपश्रीमहम्मदसाहे: स्तोत्रं प्रापन् स ता(पा)पं क्षपयतु भगवान् श्रीमहेन्द्रप्रभुनः॥ ७॥ तत्पट्टपूर्वाचलमण्डनैफचण्डद्युतिः श्रीजयसिंहमूरिः । कुमारपालक्षितिभृचरित्रमिदं व्यधत्त स्वगुरुप्रसादात् ॥ ८ ॥ xx "श्रीविक्रमनृपाद् द्वि-द्वि-मन्वन्देऽयमजायत । अन्यः ससप्त-त्रिशती-पटसहस्राण्यनुष्टुमाम् ।। -~-ही. ई. तरफ्थी वि. सं. १९७१ मां अने विजयदेवसूरि -संघ पेढी, मुंबई तरफयी वि.सं. १९८२ मा प्र.कुमारपाल-चरित प्र.
. सुलतान महम्मद.] सन्मानित जैनाचार्यों [ ११३ णितज्ञ विद्वानोमा श्रेष्ठ), राज-संस्तुत पेराज पाप्तशा- (सन्मानित) मदनमरि नामना विद्वान हना मान्य गणि- गुरु थया; तेना पद(हरिपद)थी शोमता तज्ञ महेन्द्रसूरि. महेन्द्रगुरुए परोपकार माटे शकान्द १२९२=वि. सं.१४२७ मां गहन गणित- शास्त्र सुयंत्रागम (यंत्रराज) ग्रंथनी रचना करी इती. तेनी व्याख्या रचनार तेमना विद्वान् शिष्य मलयेन्दुरिए उपयुक्त गुरु महेन्द्रसूरिने पेरोज पातशाहना सर्व गणको(गणितज्ञ विद्वानो )मा अग्रेसर तरीके सूचव्या छे.' चंद्रकीतिरिना शिष्य हपफीतिसरिए स्वोपज्ञ धातुपाठ- वृत्ति( धातुतरंगिणी )नी प्रशस्तिमा पोताना पूर्वजोनो परिचय कराव्यो छे के- अभूद् भृगुपुरे वरे गणकचक्रचूडामणिः कुनी नृपतिसंस्तुतो मदनसूग्निामा गुरुः । तदीयपदशालिना विरचिते सुयन्त्रागमे महेन्द्रगुरुणोदिनाऽजनि विचारणा यन्त्रमा || xx श्रीपेरोजमदेन्द्रसर्वगणका पृष्ठो(क-मठो) पहेन्द्रमभु- जतिः रिवरस्तदीयचरणाम्भोकभृङ्गाता(ति:)। सूरिश्रीमलयेन्दुना विरचितेऽस्मिन् यन्त्रराजागम- व्याख्याने प्रविधारणादिकथनाध्यायोऽगमत् पञ्चमः॥ विशेष माटे जुमो यंत्रराज ( सुधाकर द्विवेदीद्वारा संशोधित, सं. १९३९मा काशीमा प्र.). - १ ८ ११४ ] दिल्लीश्वर पातशाहोथी [जिनप्रभसूरि अने " अवनितलने पवित्र करनारा जे गच्छमां, हम्मीरदेवथी पूजायेला सद्गुणी जयशेखरमरि सुचरित पेरोज पातशा- पुरुषोमां मुकुट जेवा थइ गया. रूणा- यी सत्कृत पुरीमां सीहडना वचनथी अल्लायदी[न] रत्नशेखरसूरि. राजावडे सद्वस्त्र साथे फरमान-दानपूर्वक पूजायेला वजसेन गुरु पछी विद्यानिधि रत्नशेखरसूरि गुरु थइ गया, जेने पातशाह पेरोज साहिए इर्पथी श्रेष्ठ वस्रोद्वारा सारी रीवे पहेरामणी करी हती. भने नागपुरीय श्रेष्ठ पाठक हंसकीर्ति, दिल्लीमां साहि सिकंदर आगळ प्रतापथी अधिक थइ गया.'' १. " गमछे यत्र पविनितावनितले हम्मीरदेवार्षितः सूरिः श्रीजयशेखरः सुचरितभीशेखरः सद्गुणः । एणायां पुरि सीइटस्य वचनादलावदीभूभुमा मद्वास:-फुरमानदानमहिना श्रीवमसेनो गुरुः ॥ १ ॥ सूरिभीप्रभुररनशेखरगुरविद्यानिधियं मुदा सरक्षोः किल पर्यधापयदरं पेरोजसाहिप्रभुः । श्रीमतसाहिसिकंवरस्य पुरतो आत: प्रतापाधिको दिल्ल्यां नागपुरीयपाठकवर श्रीहंसकीावयः॥२॥" -भातुसरंगिणी-प्रशस्ति (भां. रि. १८८२-८३) लतान महम्मद.] सम्मानित जैनो [११५ वृहद्गच्छमां धयेला रत्नशेखरसूरिए प्रा. सिरिखालफहा श्रीपालकथा दे. ला. नं. ६३ ) रची हती. जेनी प्रथमादर्श तेने वि. सं. १४२८मा तेमना शिष्य साधु हेमचंद्रे लखी मो. सिद्धचनयंत्रोद्धार, गुणस्थान-स्वरूप(क्रमारोह), गुरु- गपत्रिंशतपट्ििशका, क्षेत्रसमास, संरोधसत्तरी, छंदाकोश गेरे ग्रंथरत्नो रचनारा पग आज रत्नशेखरसूरि जणाय छे. वि.सं. १४२९मां का. शु. ४ रविवारे पत्तन (पाटण)मां र्णिमापक्षना ज्ञानफलश मुनिद्वारा लखायेल नलायन महा- व्य पुस्तकना अंतमा उल्लेख छ के-ते समये महाराजाधि- ज पीरोज पातसाहिथी नियुक्त खान दफरखान समस्त जर धरित्रीचें परिपालन करता हता. लतान-सन्मानित शाह जगसिंह अने महणसिंह जेना देवगिरिना जिन-मंदिरनी प्रशंसा जिनप्रभसूरिए करी इती. तपागच्छनायक रत्नशेखरररिए वि. सं. १५०६ मां ली खोपज्ञ श्राद्धविधिनी ६७६१ श्लोकप्रमाणनी विधि- सौमुदी नामनी वृत्ति [प्र. १६३] मां सूचव्युं छे के-"देव- गरिमा शाह जगसिंहे पोतानी समान करेला ३६० णिकपुत्रो (वाणोतर) द्वारा ७२००० टंकाओना व्ययद्वारा तिदिन एकैक साधर्मिकवात्सल्य कराव्यु हतुं. एवी रीते प्रति- पना ३६० साधर्मिक वात्सल्यो थतां हता."
११६] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने . वि. सं. १५१७ मां भोज-प्रबंध विगेरे रचनार रत्नम- दिगणिनी उपदेशतरंगिणी(य. वि.ग्रे. पृ. १६५)मां तथा जिनप्रभसरि-प्रबंध(सं.)मां पण आने मळतो उल्लेख छे. वि. सं. १५२१ मां पं. शुभशीलगणिए रचेला कथा- कोश(कथा २२ मी)मां साधर्मिक-भक्ति पर जगसिंहनो संबंध सूचव्यो छेके-'साधर्मिकोना वात्सल्यन फळ मुक्ति-सुख प्राप्त करावनारुं छेएम सांभळी जगसिंह शाहे देवगिरिमां धन-व्यवसाय विगेरेमा सांनिध्य कर विगेरे प्रकारोथी ३६० व्यवहारीओने पोतानी समान (समृद्ध ) साधर्मिको कर्या हता. त्यार पछी प्रतिदिन एककना घरे पक्वान्न विगेरे रसोई बनावाती। हती. त्या सर्व श्रावको कुटुंब साथे जमता हता. त्यां प्रतिदिन ७२००० पोतेर हजार द्रव्यनो व्यय थतो हतो. एवी रीते प्रत्येकना घरे जमतां वर्पने अंते धीजी वार वारो आवतो हतो. तेवी रीते धर्म-कृत्य करता जगतसिंह शाहे भरत, दंडवीर्य राजाओने याद कराव्या हता." तपागच्छाधिपति सोमतिलकसरि, देवगिरिमां साह जगसिंहने घरे देवोने नमन करया गया, त्यारे तेणे संघनी भक्ति कर्यानुं सूचन उपदेशतरंगिणी(पृ. १५९-१६०)मा मळे छे. पं. शुभशीलना कथाकोश( कथा २३)मां जणाव्यु छ के- "एक वखते जगसिंह शाई सोमतिलकसरि पासे धर्मर्नु सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह [ ११७ स्वरूप पूछयु हतु. x x गुरुजीनो उपदेश सांभळी जगसिंह शाहे २९९ गाडां, हजारो घोडा, ५२ देवालयो विगेरे संघ तथा सोमतिलकसरिजी साथे शत्रुजय अने गिरनारनी यात्रा करी इती." जिनप्रभसूरिना सं. प्रवन्धमा उल्लेख छ के-"जिनप्रम- सूरिजी सर्वत्र चैत्य-परिपाटी करता [महम्मद सुलतान साथे देवगिरिमां पहोंच्या त्यारे ते सा. जगसिंहे ३२००० पत्रीश हजार टंकाना व्ययथी प्रौढ प्रवेश-महोत्सव अने संघ-पूजन विगेरेथी तेमनो सत्कार को हतो. वेना देवतावसरमां, देवोने नमस्कार करवाना अवसरे माधुं धूणावतां तेमने सा. जगसिंहे कारण पूछयु; त्यारे जिनप्रभसरिए जणाव्यु के-हालमां वे अपूर्व तीर्थो जोयां-एक तम्हारं आ रत्नमय चिंब अने बीजुं जंगम तीर्थ अणहिलपुरमा तपागच्छेन्द्र सोमतिलकसरिजी." ए सांभली तेना भक्त होवाथी सा. जगसिंहे विशेप प्रकारे भक्ति करी हती." 'जिनप्रभमूरिए देवगिरिमा शाह जगसिंहना अद्भुत गृह-चैत्यनां दर्शन कर्या हतां. ए प्रसंग-संबंधमां पं. शुभशी- लना कथाकोश( कथा २१)मा सूचव्यु छे के- एक चखत्ते जिनप्रभसूरिजी नगरे नगर अने गामे गाम देवोने नमन करवा चाल्या हता, अहम्मद (१) एवा अपर- शाह जगसिंह . ११८ ] [ जिनप्रभसूरि अने नामवाळा पीरोज सुलतान साथे देवगिरि पहोंच्या हता, त्य. तेमना पुर-प्रवेश-महोत्सवमा श्रावकोए घणा धननो व्यय कर्यो हतो. सर्व प्रासादो( जिनमंदिरो )मां देवोने नमस्कार करी, गृहचैत्योने वन्दन करता जिनप्रभसरिजी शाह जगत- सिंहने घरे गया हता. त्यां सृरिए श्रेष्ठ धैर्यरत्नमय, स्फटिक- रत्नमय, स्वर्णमय, रूप्यमय, पित्तलमय प्रतिमाओने वंदन कर्यु हतुं. ते घर-तीर्थ जोइ सरिजीए माथु धूणाव्यु: तेथी जगसिंहे पूछ के-' माथु कैम धूणाव्यु ? ' गुरुजीए कयु के-अम्हे स्थाने स्थान, गामे गाम, नगरे नगरमां देवोने चांद्या, परंतु हालमां एक आ आपनुं घर-चैत्य अने बीजं जंघरालपुरमा तपा श्री सोमतिलकसरिजी वांद्या. हमणां आ चंने उत्कृष्ट तीर्थो मनमा आव्यां, आधी माथु धूणाव्युं. 'xx प्रासंगिक धर्मोपदेश सांमळीने अने धर्मिष्ठो प्रत्ये अनुराग जाणीने शाह जगसिंहे श्रेष्ठ बनना तथा अन्न-पानना दानथी जिनप्रभसूरिजीनी विशेष प्रकारे भक्ति करी हती." वि.सं.१५०३मां पं. सोमधर्मगणिए रचेली उपदेशसप्तति- (पांचमा गृहस्थधर्माधिकारना उ० ६)मां जणाव्यु छ के- " पीरोज सुलताननी सभाने शोभावनार जगतसिंह नामनो शेठ योगिनीपुर(दिल्ली)मां थइ गयो. जे त्रण वखत जिन-पूजा अने वे बखत आवश्यक (प्रतिक्रमण) ए पांच वेळा साचातो हतो. समस्त नगरमां अद्वितीय सत्यवादी तरीके सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह प्रतिष्ठा-प्रसिद्धि पाम्यो हतो. तेनी तेत्री ख्याति सांभळी, तेनी परीक्षा करवा इच्छता सुलताने तेना मर्म जाणनारा दुर्जनीने एकान्तमा पूछयु के- आ शेठ पासे केटलं धन छ । सेना द्रोहीओए ७० लाख करा. केटलाफ दिवसो पछी सुलताने जगतसिंहने पूछयु के- 'समारे त्यां केटल धन छे। तेणे प्रत्युत्तरमांजणाव्यु के-'विचा- रीने कडेवाशे । पछी चीजे दिवसे धरना सरसामाननी संभाळ करी सूचव्यु के-'पातशाह! म्हारे त्यां चोराशी लाख द्रव्य छे. वीजा लोकोए पहेलां जणावेली संख्याथी अधिक कहे- वाथी आ साचो ज छे पोसाना द्रव्यनी संख्याना कथनमा प्राये थोडा ज सत्यवादी होय छे. एवो विचार करी सेना सत्य वचनथी संतुष्ट थयेला पातशाहे सोळ लाख आपीने से शेठने कोटिध्वज( करोडपति) को हतो.' "..- , १. वि. सं. १५०६मा रत्नशेखरसूरिए रघेलो श्राद्धविषि- वृत्ति पृ. ९६ ]मां जणाव्युं छे फे- " संभळाय छे के दि(दिल्लीमां ' शाह महणसिंह मस्य- वादी छे । एवी ख्याति सांभळी परीक्षा माटे सुलताने तेने पूछयु फे-' तम्हारे त्यां फैटलुं धन छे ? ' तेणे कडं फे-लेखं जोइने - जयावीश, ' पछी सपळु लेखं ठीक करी राजानी भागळ { फ- म्हारे घरे अनुमानथी ८४००००० घोराशी वास टंको १२०] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने संभवे छे.'' में थोडं सांभळ्युं हतुं, प्राणे घणुं क्यु' एवी सत्य सक्तिथी हर्पित थयेला राजाए तेने कोशाध्यक्ष (राज-भंडारी) चनाम्यो इसो. वि. सं. १९२१ मां पं. शुभशीलगणिए रचेला पंचशती. प्रबंध ( इ. लि. कथाकोश कथा १२ )मां सूचव्युं छे के-" एक मनुष्ये सुलताननी आगळ फयु के-'अगसिंह शाह खोटुं वोलता नथी.' त्यार पछी सुलताने पूछयु फे-'जगसिंह ! तम्हारा घरमां केटसुं धन छे ?' तेणे का के-काले कहेवाशे' त्यार पछी घरे जइशाहे घरनी सर्व लक्ष्मीनी संख्या करी सुलताननी पासे अइ फ्यु के-'म्हारा परमां चोराशी लाख सोनाना टंको छे.' ते पछी सुलताने 7 सत्य माणी सोळ लाख पोताना खजानामांधी अपाच्या अने तेने फोटिभ्या को हतो." वि. सं. १५५५मां इंद्रहंसगणिए रचेली उपदेशकल्पवल्ली- [पल्लव ७] मां सूचन मळे छ के- "सत्यवादी तरीके प्रसिद्ध महणसिंहने असत्यवादी करवानी इच्छाथी कोइ दुर्जने ६४ [हमार] सोनाना टंकावाळी तेनी लक्ष्मी प्रकाशित करी.पातशाहे सभामां तेने पूछयु फे-'तमारे त्यां फेटलं धन छे ?' महणसिंहे कयु के-'तमे ७ दिन आपो, जेथी ते धन गणी शकुं.' त्यार पछी मोइने साचे साचुं जणाव्यु के-'चोगशी (१) हमार लाख छे. ते सिवाय रू'विगेरे घरनो बीजो सार जुद्दो आणवो. राजा (पातशाह ) आश्चर्य पाम्यो के-कोइ क्यांय मर्वस्व सुलतान महम्मद ] अने महासिंह [ १२१ पातशाहे एक वखते जगतसिंह शेठने पोताना खजाना- माथी मंगावीने सूर्य जे वेजस्ति रत्न दाज्यु अने पूछयु के 'आ रत्न जेवू बीजू रत्न पृथ्वीमां कयांय छे १ । जगतसिंहे जवाच आप्यो के-'पृथ्वी पर शुं वे पातशाहो होय ! तेना चचनथी रंजित थयेला पातशाहे ते उत्तम रत्न तेने स्थापन करवा माटे (थापणरूपे ) आप्यु हतुं. भेद विना नेनी गाढ प्रीति थह हती.' & . कहेतुं नथी. जेने म्हारा तरफथी द्रव्यना अपहरणनी चीक पण न लागी' सुलताने सत्यवादी मंत्रीनी गुण-प्रशंसा करी के-'आ सचिव म्हारा गज्यमा पृथ्वी पर शिरोमणि छे. तथा तेनो सत्कार करी पहेरामणी आपी, तेनो यश पृथ्वी पर विस्तयों हतो." एक यखते सुलताननी आगळ फोइए ३ रत्नो वेघवा आण्यां इता. रस्न-परीक्षको( झवेरीनो)ने बोलाववामां आव्या. सघळाए रत्नो वखाण्यां. त्यार पछी शाह जगसिंहने दर्शावतां तेणे फयु के-'पहेलु अमूल्य छे, वीजु लाख मूल्यनुं अने श्रीजु कोडीना मूल्यनुं है.' रामाए पूछयु के-कम जणाय ?' पहेलु घणना सो घावडे पण भांग्युं नदि, बीजं घणना दस घा थता सहज उच्छ्वसित ययुं (उखड्यु), अने त्रीजु घणनो घा वाथी : वे कडाइ गयु. पहेलो घा था सूक्ष्म देडकी नोकळी. तेथी शाद मानीता थया. ते वणिक( वेपारी ने पहेला ग्लना ३ लाख शाह जगसिंह . १२२ ] [ जिनप्रभसूरि अने अपाठया, पीजा रत्नना एक लाख अपाच्या अने त्रीजा रत्ननी फोडी अपावी इती. [इ. लि. कथाकोश कथा १५] एफ वखते सुलताने पोताना हाथमा श्रेष्ठ रत्न लइ पूछयु के 'जगसिंह ! आ रत्नथी योजु कोइ मोटुं श्रेष्ठ रत्न छे के नहि ?' शाहे कयु के ' माथी मेष्ठ रत्न आप छो.' सुलताने एथी रंजित थइ घणी लक्ष्मी आपी इती.” (कथाफोश कथा १३) " धर्मधुरंधर शाह जगसिंहे बचन-माधुर्यादि गुणोथी धरापीठमा प्रशस्त नाम धारण फर्यु हतुं. जेने सुलताने एफ वखते राजसमामां पूछयु हतुं फे-' शाह ! आ मणि (रत्न) सरखं योj छ ? कहो.' शाहे प्रत्युत्तर आप्यो हतो के-पातशाह ! पृथ्वीमां सुलतान एफ न होय, योजो नहि. ते वचनी रंजित थयेला राजाएतेने महाप्रसादपूर्वक पहेगमणी करी हती." (उ. फ.) वि. सं. १५१५ मां इंद्रहंसगणिए रचेली उपदेशकल्पवल्ली सि( ७मा पल्लव )मां प्रतिक्रमण फरवाना विषयमां महण- सिंहनो प्रबंध सूचव्यो छे- " सुख संपदाओवें स्थान, अनुपम गामो अने आरामोथी अलंकन भूमिवाळो देवगिरि नामनो देश शोभतो इतो. त्यां ऊकेश. यंशमा शिरोमणि जगसिंह नामनो धनिक वसतो हतो. जे अनर्गल लक्ष्मीवाळो, महेभ्योनी मंडलीमा मणि जेवो, सौजन्यपात्र इतो. राज-समाने शोभाववामां हीरा जेया, गुण-लक्ष्मीना घरममा ने धन्य श्रेष्टीए अनर्गल धन-वृष्टियी समस्त याचकोने पोध्या इता. .
सुलतान महम्मद.] अने मदणसिंह [ ૨૨૨ शुभ कर्मोद्वारा जेणे स्नाकरथी उत्पन्न धनराशि उपार्जन फरी सुयश विस्तार्यो हतो. संसारनी असारता जोनार, मद मत्सरने तजनार, सदाचारी ने श्रीमान् चार प्रकारनी बुद्धिना सागर हता. मगत्ने आनंद पमाडनारा जे दानी, मननी आति दूर करी धनने सदा सात क्षेत्रोमा वास्ता हता. दुर्भिक्ष( दुष्काल )मा, क्षीण- संपत्तिना प्रसंगमा ज्यारे दुरवस्थायी अने अक्षेमधी लाखो लोको खळभळी उठ्या हता त्यारे ते श्रीमान् सेवा फरवा योग्य थया हता. प्राप्त थयेली बहोळी चंचळ लक्ष्मीनुं सुफल हुं लइश. एम विचारी जे श्रीमान् चडता उत्कृष्ट हर्षथी साघमिझ लोकोने कुटुंब साथै सर्वदा जमाडे, परंतु ते साधर्मिको प्रतिदिन भोजन माटेनुं निमंत्रण मानता न हता; एथी तात्विक बुद्धिशाली जे श्रीमाने व्यवसाय( वेपार-उद्यम )ना पहानायी पोतानुं द्रव्य आपी ३६० वणिकोने पोतानी समान कर्या इता, अने तेमनी द्वारा वर्णना ३६० दिवसोमां सहा नवीन नवीन प्रकारथी साधर्मिक-वात्सल्य कराव्युं हतुं. ' सारी अवस्थावाळा गृहस्थोना ते सत्सवो खरेखर प्रशंसायोग्य गणाय के जेमा सत्क्रियावाळा तत्त्वज्ञ समनोनो सत्कार करवामां आवे.' ए जगसिंहनो पुत्र कामदेव जेवों रूपवंत, कपट रहित मनवाळो, सर्व शाहोमा श्रेष्ठ, क्रियानिष्ठ,मंत्रिराम महणसिंह धर्मकृत्योमा द्रव्यव्यय करतो हतो. यंने वखन प्रतिक्रमण करतो तो. अन्य जनोनी आपदा हरतां पुण्यनो भंडार भरतो अने संसाररूपी सागरथी x १२४ ] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने केटलोक काळ चीत्या पछी कोइ पण कारणथी पातशाह तेना पर रुट थया!! तेथीपातशाहे तेने केदखानामां नखान्या, तेनी रक्षा माटे पोताना एक सेवकनी योजना करी हती. तेवा वखते पण शेठने पातशाहे करेली परतंत्रताथी नही, परंतु पोताना पांच वेळाना धर्म-व्यतिक्रमथी खेद थतो हतो. तेथी ते सेवकने खानगीमा एकैक सोनानो टंको अपाबी ए धर्मिष्ठ श्रीमान् पोतानी पुण्य-वेलाओने साधतो हतो. २१ दिवस मुधी २१ टंका अपावी तेणे पोतानां धर्मकायों कयाँ हता. त्यार पछी सुलताने प्रसन्न थइ तेने पोतानां शरीर परनां पांच आभूपणो अने पांच पंचरंगी दुकूलो ( उत्तम चत्रो)नी पहेरामणी करी हती. त्यार पछी घणां वाद्यो अने घणा लोको साथे वाजते गाजते, याचकोने इच्छित दान आपता शेठ पोताने घरे आव्या हता. पातशाह विगेरेथी डरतो ते रक्षक, एकांत थतां आवीने ते लीधेला टंका पाछा आपवा लाग्यो. शेठे कयु के-'भद्र ! पोतानो उद्धार करतो हतो. सजनो पर उपकार फरतो अने जनोनो तिरस्कार करतो ते जगत्मा शोभतो इतो. "चंचल अधिकारोने प्राप्त करीने जेणे शत्रुओ पर अप- फार कर्यो नहि, मित्रो पर उपकार कर्यो नहि, बंधु-वर्गोनो सत्कार कों नहि; तेणे शुं फयु ?"
सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह [ १२५ में आ टेका तने समर्पण कर्या छे, तेथी । एने जेम रुचे तेम दे, भोगत्र अने सुखी था; कारण के में तारा प्रसादथी धर्मनुं अनुष्ठान कर्यु धर्म संबंधी एक क्षण, करोडथी पण दुर्लभ छे. तेवा पांच पांच क्षणोने में एकैक टंकाद्वारा कृतार्थ कर्या. तेथी तने एथी पण अधिक द्रव्य आपq जोइए; तेने पदले सेवाय केम ? एम कही फरीथी वधारे दान आपी तेने विसर्जित कर्यो.' [ उपदेश--तरंगिणी ( य. वि. ग्रं. पृ. २१३ )मा सा. जगसिंहने बदले भूलथी साजणसिंह नाम छपायुं छे त्यां पीरोज पातशाह द्वारा बंदी करातां ५० हाटको (सोनया) द्वारा ५० प्रतिक्रमणो कर्यानो अने पाछळथी सुलताने तेनो सत्कार कर्यानो उल्लेख छ.] १ " लोकने प्रसन्न करनार गुणवाळा, सुवर्ण-भूषणोधी भूषित थयेला, अमृत जेवू भापित करनारा ए अमात्यरूपी चंद्रमा वचन- छलथी सुलताने रोपथी लाल आंखवाळा थइ अधिकार-विषयक कंइफ दूपण हृदयमा विचार्य, अने तेने निगडो(बेडी)थी अफडी फेदमां नाख्यो. चंदि( फेदी )स्थानमा रहेवा छतां पण नियममा तेनी दवा हती, लांघण यवा छतां पण ते प्रतिक्रमण करतो हतो, प्रतिदिन बब्ये सोनाना टंका आपराधी रक्षको तेने प्रति. क्रमणनी वेळाए बंधनयी छोडता हता. क्रियामा रुचिवाळा, तेणे शाह जगसिंह 'AAPvAAAA १२८ ] [ जिनप्रभसूरि अने पर तथा जगतसिंह पर घणो प्रसाद विस्तार्यों हतो. एवी रीते जीवन पर्यंत पांच पुण्य वेळाने आराधतां अने सत्य भाषा बोलतां शेठ जगतसिंह जैनशासनने लांवा वखत सुधी जागतुं को हतुं." उपर्युक्त जगतसिंह शेठनो पुत्र मदनसिंह पण चतुर होइ लोकोमा तेवो ज प्रख्यात थयो हतो. पहेलां खुरासाणनिवासी धनद नामनो वस्तुपति तेना पितानो प्रीतिपात्र हतो. जगत- सिंह स्वर्गवासी थया त्यारे ते योगिनीपुर(दिल्ली)मां व्यव- साय माटे आव्यो हतो, अने तेने घरे पण आव्यो हतो. कुटुंवर्नु कुशल तथा सेनो निर्वाह, व्यवसाय विगेरे पूछी जगतसिंहनी जेम तेना पुत्र साथे पण व्यवहार करवानी इच्छावाळो थयो हतो, परंतु तेनी परीक्षा माटे वेणे उपाय को. मायावडे कृत्रिम आदर दर्शावी तेणे मदनसिंहने का के-'तारा पिता पासेनुं मारुं जे लेणु छे, ते तुं आप कारण के घणां वर्षों सुधी में तारा बाप साथे व्यवहार कयों, पण परस्पर मळी जनाग शिव-शवक्ति नामनां, मोतीओने लइ महणसिंह दिलीमा गयो हतो, अने त्यां पातशाहने नमीने गंगाजल जेवां निर्मल ए मोती भेट कीं इसां. ए मोतीओनो प्रभाव सांभळी सुलतान 'चमत्कार पाम्या. पातशाहे महणसिंहने पोताना अंत:पुर(जनानखाना)नो रक्षाधिकारी बनाव्यो हतो. गाजमान्य थइ ते सदा धन्य अने उदार बन्यो हतो." ( उ. क.) , '
सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह [१२९
तेथी लेणदेण पण घणी थइ. पहेला सो घोडा आपीने देवं
पाळच हत, अने उत्सुकताथी पोताना नगरमां पहोंची गया
त्यारे चाकीनु लेणु अहि रही गपु हतुं. 'केटल लेणुं छे ?
एम पूछातां तेणे कई के-जूनां नाणां प्रमाणे ३२००० वत्रीश
हजार लेणा थाय, जो परावर होय तो आपो. मदनसिंहे पण
का के-"पिताजीनुं देवू थोडं अथवा पधारे वहीमा में जे
प्रमाणे जोडे ते नाम प्रमाणे में आपी दीधुं छे, परंतु तेमां
आपनुं नाम में कयांय जोयु नथी, तो लख्या बोल्या विना
लेणु केवी रीते लेणु थइ शके?" चित्तमां हर्षित थवा छतां
पण ते शेठ रुष्ट जेवो थइ तेना प्रत्ये बोल्यो के-'अरे ! पितानुं
देवु पुत्र मापे मां विचार शो ?' मदनसिंह-'शेठ ! आप आ
फोकट प्रयास शा माटे करो छो? साक्षी विना अथवा लखाण
विना लेणु लइ शकाशे नहि. ते शेठ सुलताननी सभामां गयो
अने एकांत करावी सुलतानने विज्ञप्ति करी के-'परीक्षा माटे
जगतसिंहना पुत्र साथे में बनावटी कलह मांड्यो छे जे ते
प्रलाप करवामां मने कोई दोप देवो नहि.' एवी रीते खानगीमा
महणसिंह चंने वखत प्रतिक्रमण अने त्रिकाल देव-पूजा
करतो हतो. साधुओने वहोरावी( दान आपीने ) ज जमतो इतो.
प्रतिवर्ष प्रण वार साधर्मिक-वात्सल्य अने प्रण वार संघ-पूजा
करतो हतो." (उ. क. प. ७) श्राज महणसिंहे दिल्लीमा वि.
सं. ११०५मा पोते आपली वसतिमां वास करावी रानशेखर.
.
८
शाह जगसिंह - १३०] [ जिनप्रभसूरि अने कही सर्व समक्ष ते बोल्यो के-'पातशाह! जगतसिंह पासे म्हारे पहेलानुं लेणुं छे, ते आ वेनो पुत्र आपतो नथी; तो शुं करवामां आवे?ए आप फरमावो.' पातशाहना बोलाव्याथी सभामां आयेला जगतसिंहना पुने पण पोतानुं स्वरूप का. तेणे पोतार्नु कयु. नेनो विवाद थयो. वस्तुपति बोल्यो के- 'जो वारा बाप पासे लेणुं न होय तो सौना देखतां तुं यापना सोगन कर. ' पुत्र(मदनसिंह) धीरजपूर्वक बोल्यो के- आप लहेगुं ल्यो अथवा म्हारं सर्वस्व ल्यो, परंतु हुं पिताजीना सोगन नहि करूं. करोडो उपकारोथी पण जेनो बदलो वाळी शकाय नहि तेवा पिताजीने शुं हुं ३२००० वत्रीश हजारमा वेचु ?' 7 महणसिंहनी एका प्रकारनी उक्ति सांभळी सौ सम्योए विस्मयपूर्वक तेनी प्रशंसा करी. ते वस्तुपति पण बोल्यो के-"वत्स ! तुं धन्य-शिरोमणि छो, के जेनुं आवा प्रकारचें साहस छे. में आ परीक्षा करी, म्हारं लेणु कंइ ए नथी.' सिंहनो बच्चो सिंह जेवो होय, सूर्यथी अंधकारनी वृष्टि न होइ शके, चंद्रथी अंगाराओनी पुष्टि न होइ शके. एवी रीते तेणे तेनी प्रशंसा करी तेने जगसिंहना श्रेष्ठ स्थान पर स्थापी तेनी जेम महणसिंह साथे पण व्यवहार विस्तार्यों हतो. 'एवी सूरिद्वाग चतुर्विशति-प्रबन्ध प्रन्थः कराव्यो हतो-ए पहेला (पृ. ४३ मां) अम्हे जणाव्यु छे. १" ऊकेश (ओसवाळ ) ज्ञातिना आगेवान शाह जग-
सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह [१३१
रीते मदनसिंह पण राजा विगेरेमा बल्लभ थयो हता, 'ज्यां ज्यां
गुणोनो आदर होय, त्या त्या प्रतिष्ठा समवे छे.'
" एक बखते मांदा थयेला सुलतानने मेवाडथी आवेला
पोला नामना महावैये रोगरहित कयां हता. विविध औषधो
अने योगोनो जाणकार, रसांगवेदी शास्त्रज्ञ ते वैद्यराज त्यारथी
राजा विगेरेनो पण मान्य थयो हतो. अत्यंत बलवान् ते वैद्य.
राज एक साथे ९ नालिएर भांगी नाखतो हतो, अने सोपारी-
ने पोताना अंगुठाबडे नाळिएरमां नाखी शकतो हतो. वेने
टींचणो पर, वेने काखमां, वेने कफोणि पर, वेने खमा पर अने
१- एकने चिवुक पर राखीने ते नव नाळिएरने चूर्ण करी
सिंहने घरे कोइ खरसाणो वणिक पांच लाख टका थापण मूकी
करीने गयो हतो. ७ वर्षों गया. त्यार पछी तेणे जगसिंहने मृत्यु,
पामेलो सांमळी विचायु के-'धन गयु.' फरी विचायु के-
• तेनो पुत्र मुहणसिंह छे, तेनी परीक्षा फरीए.' त्यार पछी त्यां
आवीने तेणे कयुं फे- 'मुहणसिंह ! तम्हारा पिता म्हारा
तमारा पिठानी पासे : ४ ते धने
सुलवाननी पासे गया, बनेए पोतपोतानो संबंध फह्यो.
साणीए फह्यु के- आप पिताना सम करो. ' महणसिंह फह्यु
के-पांच लाखबडे शु पापने येचे ?' त्यार पछी तेने पांच लाख
आप्या. खासाणीए जगसिंहना अक्षरो दर्शावीने फयु के- सिंइथी
सिंह ज थाय हे.' एमा, थयु. मुहणसिंहने. एक लाखनी पहे.
.
.
मित्र हता.
शाह जगसिंह । १३२] [ जिनप्रभसूरि अने नाखतो हतो. ते महावैद्य एक वखते महाजन साथे शाला ( उपाश्रय )मां आव्यो हतो. त्या वेपधारीद्वारा कराता व्या- ख्यानमां वेठो हतो. त्यां कोइक अधिकारमा तपागच्छनी अव- हीलना अने पोतानी प्रशंसा करी त्यारे पोलाक बोल्या:-'अरे घोकडा! शुं बोले छे १ महाजनने जोतो नथी ? एम कही एकदम ऊठीने तेने लातथी प्रहार को हतो. वेपधारी रोपथी लालचोळ थइ सुलताननी समामां गया अने वैद्य पण त्यां पहोंच्या. बनेए पोतपोतानो वृत्तांत कह्यो. चनेनुं मान्यपणुं होवाथी राजा बोल्या नहि, तेवामा मदनसिंह बोल्या-'पातशाह ! आमां विचारणा शी ? एके जीभ वापरी अने बीजाए हाथ चलाव्यो. एकनो दंड थतां बीजानो पण दंड थवो जोइएः तेथी बनेनो- पण न करवो. । ए सांभळी पातशाहे अंतःकरणमा हसतां ते बनेने मृदु वचनोथी सान्त्वन पमाडी पोतपोताना स्थानमा विसर्जित कर्या हता.'" (उपदेशसप्तति अ. ५, उ.७, पृ. ८६) रामणी फरी. मैत्री करीने ते गयो,” (शु. कथाकोश कथा१४) १ एक वखते मेवाडी वैद्य पाल्हाक, सुलताननी चिकित्सा माटे आव्यो हतो, ते कोमलसूरिनी शालामा गयो हतो, त्यां तेओए (कोमल यति-सूरिओए ) तपागच्छना सूरिवरोनी निंदा करी हती, तेथी तेणे कोमल यतियोने हक्षित कर्या, तेथी कलह थयो. फेटलाकना हाथ भांग्या, केटलाफनां मोढां भांग्यां, त्यार पछी वाद करता सौ सुलताननी पासे गया हता. सुलताने सर्वनी चेष्टा जाणी फयु के-कोनो दंड कराय ? सर्वे न्यायी १ फेटलाक '- सुलतान महम्मद.] अने महणसिंह [ १३३ अने सो अन्यायो छो. हवे पछी कोइए पण कलह करवो नदि. ए प्रमाणे समता पर पीरोज सुलताननो संबंध" जिनप्रभसूरिना अवदात संबंधोमां शुभशीलना कथाकोश [कथा १७ मां मणाघेल है. फेटलाफ दुर्भनोए असद् दूषणोनी घोषणा करी पवित्र एवा महासदने पण दूपित फयों इतो, अंत:पुरना द्वार पर आवतां भूपाले (पातशाह ) ते स्थानमाथी नीफळता ते( महणसिंह )ने जोयो. प्रचलिक कोपानिनी घालायी लालचोळ आंखोवाळा थइ पावशाई तलवार खेंची; वस्रो उतरावी प्रहार फरतां ७ ताळांवाळो फच्छोटो जोयो. पातशाहे ताळांओ उघाइवा कयु. महणसिंहे जणान्यु के- • कुंचीओ स्त्रीना हाथमा छे.' घर गया पद्धी ताळाओ पाहबानुं बनशे. ' [ग्रीक राज्योमा भावी पद्धति होवार्नु जणाय छे ]. पातशाहे तेना शरीर-नियंत्रणनी अने उज्वल शीलनी प्रशंसा करी. शोलना माहात्म्यथी मसिंहनी कीर्ति आदन( एडन) वंदर सुधी पहोंची हती. सर्व कलाओथी युक्त कामलता नामनी रूपत्ती वेश्या तेनुं नाम सांभळी खेंचाइने त्यां आवी. अद्भुत नृत्य करतां नतकीए सुलतानने रंजित फर्यो. दानना अक्सरे तेणीनी याचना प्रमाणे महणसिंहने घर नाटक( नृत्य ) प्रकट फरवार्नु पातशाहे फरमायु, ते चतुर नर्तकीए त्यां आवी ७ वार नृत्य कर्यु छता आ महणसिंह छे' एम जाण्यु नहि. त्यार पछी गुणी महणसिंहे नाटक कराव्यु. तेने जोइ हट तुष्ट थयेली, पोताने धन्य . मानती ते नर्तकीए नृत्य कयु. गुणवंत महणसिंहनी परीक्षा करी सुलतान आगळ प्रशंसा करी हती." ( उपदेशकल्पवली प. ७) .
१३२ ] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने नाखतो हतो. ते महावैद्य एक वखते महाजन साथे शाला (उपाश्रय )मां आव्यो हतो. त्या वेषधारीद्वारा कराता व्या- ख्यानमां वेठो हतो. त्यां कोइक अधिकारमा तपागच्छनी अय- हीलना अने पोतानी प्रशंसा करी त्यारे पोलाक पोल्या:-'अरे बोकडा! शुं बोले छे १ महाजनने जोतो नथी ? ' एम कही एकदम ऊठीने तेने लातथी प्रहार कर्यों हतो. पधारी रोपथी लालचोळ थइ सुलताननी सभामां गया अने वैद्य पण त्यां पहोंच्या. बनेए पोतपोतानो वृत्तांत कह्यो. चनेनुं मान्यपणुं होवाधी राजा बोल्या नहि, तेवामा मदनसिंह बोल्या-'पातशाह ! आमां विचारणा शी? एके जीम वापरी अने वीजाए हाथ चलाव्यो. एकनो दंड थतां बीजानो पण दंड थवो जोइए; तेथी बनेनो- पण न करवो. ए सांभळी पातशाहे अंतःकरणमां हसतां ते वनेने मृदु वचनोथी सान्त्वन पमाडी पोतपोताना स्थानमा विसर्जित कर्या हता.'" (उपदेशसप्तति अ. ५, उ.७, पृ.८६) रामणी करी. मैत्री करीने ते गयो." (शु. कथाकोश कथा१४) एक वखते मेवाडी वैद्य पाल्हाक, सुलताननी चिकित्सा माटे आव्यो हतो, ते कोमलसूरिनी शालामा गयो हतो, त्यां तेओए (कोमल यति-सूरिओए ) तपागच्छना सूरिवरोनी निदा फरी हती, तेथी तेणे कोमल यतियोने हफित कर्या, तेथी कलह थयो. केटलाकना हाथ भांग्या, केटलाकनां मोढां भाग्यो, स्यार पछी वाद करता सौ सुलताननी पासे गया इता. सुलताने सर्वनी चेष्टा जाणी फयु के- कोनो दंड कराय ? सर्वे न्यायी . १ सुलतान महम्मद विशेष परिचय [१३५ . . दंडो अकस्मात् 'तडतड' एवो शब्द करीने वे फकडा थइ गयो. सरिए पूछयु के-शिष्यो ! आ शब्द कैम थयो ? शिष्योए जोइने कडं के स्वामी ! तम्हारो आखो दंडो वे ककडा थइ गयो. ते पछी आचार्य विचार कयों के-" म्हारी पाछळ ये गच्छो थशे, तो हुँ जाते ज गच्छने म्हारा हाथमां करीश" आ ज अवसरमा श्रीमाल संघोए मळीने विचार्यु के- आ देशमां कोई गुरु आवता नथी. चालो गुरु पासे, गुरुने लाबीए.' सकल संच मळीने गुरु पासे गयो. आचार्य ने चांदीने सकल संघे विज्ञप्ति करी के-'स्वामी! अम्हारी देशमां कोई - पण गुरु आवता नथी, तो अम्हे शुं करीए? गुरु विना सामग्री (धर्म-साधना ) न थाय. गुरुए पूर्व निमित्त जाणीने श्रीमालवंशमा उत्पन्न थयेला जिनसिंहगणिने योताना पट्ट पर स्थाप्या. 'जिनसिंहहरि । एवं नाम कयु अने कयु के-'आ श्रावको में तमने सोप्या, संव साथे जाओ.' त्यारपछी गुरुने चांदी जिनसिंहमूरि श्रावको साथे आव्या. सर्व श्रीमाल संघोए कह्यु के-' आजथी मांडीने आज अम्हारा धर्माचार्य छे.' २. एमना पूर्वाचार्यों संबंधी वृत्तांत अन्यत्र प्रकाशित थयेल होबाथी अने पेटलाकनो परिचय अम्हे अन्यत्र आपेल होदायी अहिं प्रस्तुत प्रबंधनो ज अनुवाद प्रकट करवामां मावे छे. पहेलो सूचवेला उल्लेखो साये तुलनात्मक दृष्टिए सरसावबाथी आ प्रबंधनी उपयोगिता सम- जाशे अने पुनरुक्ति जणाशे नहि. -- १३६ ] मिनप्रभसूरिनो [ जिनप्रमसूरि अने थाथी वे गच्छो थया. वि. सं. १२८० संवत्सरे पल्हपुर (पाल- णपुर नगरमा जिनेश्वरमरिए जिनसिंहने सरि कर्या, पद्मावती- मंत्रनो उपदेश कों. केटलांक वर्षा पछी जिनेश्वरसूरि देव- लोकमां गया. जिनेश्वरसरिना पट्ट पर जिनसिहसरि थया, तेओ पमा- वतीना मंचनी साधनामां तत्पर यह जिनप्रभसूरिनां नित्य ध्यान धरता हता. ध्यानना जन्म-दीक्षा- अंतमां पद्मावतीए कह्यु के -“ तम्हारु सूरिपदादि आयुष्प छ मास (1) छे.' सरिए कहां के म्हारा शिष्योने प्रत्यक्ष थजो, म्हारा पट्ट पर कोण थशे ? ए कहो.' पद्मावतीए का के-" सो(१मो) हिलवाडी नगरीमां तांची गोत्रने पवित्र करनार महाधर नामनो महर्दिक( श्रीमान् ) श्रावक छे. तेना पुत्र रलपालने खेतल. देवी भार्याथी उत्पन्न थयेल सुमटपाल नामनो पुत्र सर्वलक्षण- संपन्न छे, ते तम्हारा पट्ट पर जिनप्रभसरि नामना भट्टारक जिनशासनना प्रभावक थशे." ए वचन सामळी जिनसिंहमरि त्यां गया. मोटा महोत्सव- पूर्वक श्रावके पुर-प्रवेश कराव्यो. पछी सूरि महाधर शेठने वरे गया.आचार्यने जोइ [शेठ] सात आठ पगला सामे गया. वंदन करी आसन पर निमंत्रण कयु- भगवन् ! म्हारा उपर मोटो . कयों के-आप म्हारे घरे पधार्या, परंतु आगमननुं प्रयो- [ १३७ सुलतान महम्मद.] विशेष परिचय जन कहो, त्यारपछी गुरुए कह्यु-' महानुभाव ! तम्हारे घरे हुँ शिष्य-निमित्ते आव्यो छु, म्हने एक पुत्र आपो. । तेणे 'तथा' कही ते स्वीकार्यु. अन्य पुत्रो साथे वस्त्र विगेरेथी संस्कार करीने ते पुत्र आण्यो, अने कयु के-'आगांधी तम्हने जे रुचे, तेने ग्रहण करो. ' गुरुए कक्षु के-आ (अन्य ) पुत्रो दीर्घ आयुष्यवाळा थइ तम्हारे घरे रहो, परंतु जे सुभटपाल चाल छे, ते आपो. । तेमज कयु. वहोराव्यो( अर्पण कर्यो ), तेने सुमु- हुर्ते दीक्षित कों, वि. सं. १३२(३)६ वर्षे दीक्षा, शिक्षा आपी, पद्मावती-मंत्र समर्पित कर्यो. अनुक्रमे ते गीतार्थ- चूडामणि थया. वि. सं. १३४१ वर्षे किढिवाणा नगरमां जिनसिंहरिए सुमुहूर्ते पोताना पट्ट पर जिनप्रभसूरिने स्थाप्या; जिनसिंह- मरि देवलोकमां गया. जिनसिंहमरिना पट्ट पर जिनप्रभसूरि थया. तेने पूर्व पुण्यना यशथी पद्मावती प्रत्यक्ष थई पद्मावतीनाप्रभावी हती. सूरिजीए एक बखते पद्माव- चमत्कारो तीने पूछयु के–' भगवति ! कहो, कया नगरमां म्हारी उन्नति थशे?" पद्मावतीए जणाव्यु के-" तम्हारो विहार जोगिणी-पीठ ढीली(दिल्ली)नगरमा महोच्छ्य( महोदय वाळो थशे, त्या तम्हे जाव." त्यार पछी गुरुए विहार कयों, अनुक्रमे योगि- नीपुरमां आव्या. यहार वाहा( शाखा)पुरमा उतर्या, .
१३८] जिनप्रभसूरिनो [ जिनप्रभसूरि अने
एक वखते सरि, यहार शौचभूमि तरफ गया हता. त्यां
मिथ्यादृष्टि अनार्यो( मुस्लीमो) लेष्टु
महम्मदशाहनी ( ढेफां-ढेखाळा ) विगेरेथी परा-
मुलाकात भव करवा लाग्या. तेथी गुरुजी
पोल्या के-'पद्मावति ! सारो महो-
च्छ्रय थयो ! ' त्यार पछी पद्मावतीए ते वध करनारनी ज ते
लेष्टु(टेफां-ढेखाळा) विगेरेथी पूजा करी. तेथी अनार्यों
(मुस्लीमो) पलायन करता महम्मदशाहनी पासे गया.
सूरिनो वृत्तांत कह्यो. तेथी चित्तमा चमत्कार पामेला शाहे
पूछथु के-' ते पुरुष कयां छे ? ' तेओए जणाव्यु के-" अम्हे
तेने यहारना प्रदेशमा जोयो हतो." पातशाहे प्रधान पुरुषोने
आदेश कों-'जाओ, तम्हे तेने अहिं आणो, जेथी हुँ तेने
जोउं. १ तेओए जइने गुरु पासे निवेदन कर्यु के-' स्वामी !
अमारा प्रभु( शाह ) पासे आवो, त्यार पछी तमे जजो.'
त्यार पछी आचार्य पोळ( राजमहेल )ना द्वारे जइने
रहा. सेवकोए जइने निवेदित क्यु, तेओ शाहने निवेदन
करे ते समयमां सूरिए शिष्योने कह्यु के-' हुं कुंभकासन करूं
छु, ज्यारे शाह आवे, त्यारे तम्हारे कहेवु के-'आ अम्हारा
गुरु छे. त्यार पछी ते कहेशे के जेवा हता, तेवा
करो. त्यार पछी । तम्हे भीनुं वस्त्र धरी उठाडजो." ए
प्रमाणे कहीने गुरु ध्यानमां बेठा, कुंभ-समान थया., त्यार
सुलतान महम्मद
विशेप परिचय
[ १३९
दूर करवो
पछी महम्मदशाहे आधीने शिष्यने पूछधु के- तम्हारा गुरु
कयां छे ११ तेणे कमु के- तम्हारी आगळ देखाय छे.'
शाहे कथु के-' ते पहेला जेवा हता, तेवा करो. ' त्यार पछी
शिष्ये वस्त्र सरस करी सन्न कर्या. ऊठीने सूरिए धर्म-लाभनी
आशिप आपी. त्यार पछी धनेनो कथा-संलाप थयो.
शाहे कयु के-'स्वामी ! अम्हारी प्राणप्रिया बालादें
राणी छे, तेने व्यंतर वळग्यो छे तेथी
व्यंतरनो वलगाड तेणी पोताना देहपर वस्त्रोने ग्रहण करती
(पहेरती) नथी, शुश्रूपा पण करती
नथी. तमे प्रसन्न थइने तेने साजी
करो. में मंत्र-जंत्रना जाणकाराने अने चिकित्सा करनाराओने
बोलाव्या हता; परंतु ते जेने जेने जुए तेने तेने लेष्टु (ढेफां-
देखाळा ), लाठी विगैरेथी हणे छे. तमे प्रसाद करीने हमणां
तेने जुओ. ' गुरुए कह्यु के-" तम्हे तेनी पासे जाओ अने
एवी रीते निवेदन करो के-जिनप्रभसरि तम्हारी पासे आये
छे. " शाहे जइने कह्यु. ते वचन समिळी सहसा ऊठीने
तेणीए कह्यु-' दासी ! वस्त्र लावो. ' त्यार पछी दासीओए
लागीने वस्त्र पहेराव्यु, तेथी शाह चमत्कार पाम्या, आवीने
गुरुने क -'तेनी समीपमा आवो, वेने तम्हे जुओ. ' सरि
त्यां गया अने तेने जोइने सुरिए कयु के-रे दुष्ट! तुं अहि कयां
आव्यो? तुं आनी पासेयी जा. तेणे क्षणाव्यु के-'ई केम
"
१४० ]
जिनप्रभसूरिनो [ जिनप्रभसूरि अने
जाउं ? सारं घर मल्यु छे.' गुरुए कह्यु के-'बीजे घर
नथी । तेणे जणाव्यु के-'आवा प्रकारचें नथी. त्यार
पछी गुरुए मेघनाद क्षेत्रपालने बोलाव्यो अने कह्यु के-'आ
(व्यंतर )ने दूर कर.' त्यार पछी मेघनादे ते व्यंतरने खूब
पीडा करतां व्यंतरे जणाव्यु के-हुँ क्षुधातुर छु-भूखथी
पीडा छु, म्हने कंइक भक्ष्य (खायानु) आपो. 'शुं आपुं?'
एम पूछतां तेणे कयु के-'मने पाडा विगेरे आपो. ' गुरुए
कह्यु के-' म्हारी आगळ एवं न बोलो, हुं तमने मजबूत
बंधनथी बांधु छ. ' त्यार पछी सूरिए मंत्रनो जाप कर्यो. ते
पछी व्यंतरे कयु के- स्वामी ! तम्हे सर्व जीवो प्रत्ये दयाने
पाळनारा छो, म्हने केम पीडो छो ? ' मरिए. कह्यु के-'तुं
आ स्थानमाथी जा. ' तेणे कधु के-' म्हने कंइ पण आपो.'
शुं आपुं ? ' एम पूछातां तेणे कर्यु के-' घी, गोळ साथे
लोट आपो.' शाहे कयु के- ते आपुं छु., गुरुजीए कयु
के-'हुँ केम जाणु के-तुं गयो छे । तेणे कयु के-म्हारा
जतां अमुक पीपळानी डाळ पडसे, तेथी जाणज्यो. त्यार
पछी रातना समये ते प्रमाणे ज थयु. प्रभातमा पालादे
राणीने सन( साजी) थयेली जोइने शाहने महान् हर्ष
थयो. वेणे निवेदित कर्यु के-'प्रिया! जो आ महानुभाग
( महाप्रभावक) न आव्या होत तो तुं कयां होत ?' ए
सांमळीने तेणीए कयु के-" स्वामि ! आ (पूज्य पुरुष)
सुलतान महम्मद.] विशेष परिचय [१४१ म्हारा पिता-सरखा छे. आ महात्मा ज्यारे तमारी पासे आवे त्यारे तमे एमनी आगता-स्वागता करज्यो, एमने अर्घा आसने बेसारज्यो." शाहे ते प्रमाणे स्वीकार्यु, राजा गुरु पासे जता हता, गुरुने पोताने घरे ( राज-महालमां) लावता हता, अर्धासन आपता हता. एपी रीते सुखे सुखे काल व्यतीत थतो हतो. त्यार पछी सर्व पाखंडो( दर्शनानुपायी-मववाळा नो प्रवेश थयो. आ प्रसंगमा वाणारसी राघवचैतन्यने (बनारस-काशी )थी चौदे विद्यानो हराचवा पारगामी,मंत्र-तंत्रनो जाणकार, राघव- चैतन्य ब्राह्मण आव्यो. ते आवीने राजाने मळ्यो. शाहे तेने बहु मानीतो कयों. ते हमेशां राजा पासे आवतो हतो. एक प्रसंगे सरि( जिनप्रम ) सभामां बेठा १ एपिमाफिआ इन्डिका (पृ. १९२-१९४ ) मां तथा निर्णयसागर प्रेसनी माचीन लेखमाला (भाग २, ले. १००) मां प्रकट थयेल यमकच्छटावाला ज्यालामुखी-देवी-स्तोमना रच- नार रापवंचतन्य मुनि आ जणाय छे, ते स्तोत्र(शिलालेख)मा तेना नामनुं सूचन छे, कांगरा(डा) (पंजाबमा) रामा संसारचंद्रनी र प्रशस्ति पछी त्या प्रस्तुत साहि महम्मदनी कीर्तिरूप ते परम योगिनी(ज्वालामुखी)ने सूचदशमां भावी है- १४२] जिनप्रभसूरिनो [ जिनप्रभसूरि अने हता, राघवचैतन्य विगेरे कथा-विनोद करता हता.राघवचैतन्ये दुष्ट स्त्रमावथी चितव्यु के-'आ जिनप्रभमूरिने दोपवंत करीने आस्थानमांधी अटकावु-कढा. एवो विचार करी तेणे विद्याना पलथी शाहना हाथमांथी मुद्रारल(वींटी )नुं अपहरण करीने सूरि न जाणे तेवी रीते जिनप्रभमूरिना रजोहरण( धर्मध्वज- ओवा )मां नाखी दीधुं. पद्मावतीए सरिने निवेदित कयु के- 'तम्हने चोर बनावधानी इच्छाथी राघवचतन्ये शाहनी पासे. थी मुद्रारत्ननुं अपहरण करी तम्हारा रजोहरणमां नाखेल छे. तमो " श्रीमद्राघवचैतन्यमुनिना ग्रह्मवादिना । [स्तव रत्नावली सेयं ज्वालामुख्ये समर्पिता || ' श्रीमत्साहिमहम्मदस्य जयतात् कीर्तिः परा योगिनी।' नि. सा. नी काव्यमालाना प्रथम गुच्छकना प्रारंभमां मूका. येठ मंत्रमालागर्भित महागणपतिस्तोत्रना फर्ता पण आ कवि जणाय छे. तेनी व्याख्या-टिप्पणीमां तेने ' परमहंस परिखानका. चार्य ' विशेषणयी परिचित कराव्या छे. शाघरे शायरपद्धति (मुमापितावली)मां फेटलांक पद्यो । श्रीराघवचैतन्यश्रीचर- णानां ' उल्लेख साये सूचवेलां छे, तथा शाकम्भरीश्वर हम्मीर चाहवाण( चौहाण )नी राजसभाने शोभावनार द्विजाग्रणी राबवदेवना पौत्र तरीके पोतानो परिचय कराव्यो हे. एथी ए राघवदेव ज संन्यासी यथा पछी राघव चवन्य नामे प्रसिद्ध थया हरो-एम जणाय छे.
सुलतान महम्मद.] विशेष परिचय [ १४३ सावधान थजो. त्यार पछी सूरिए ते मुद्रारत्न लइ, राघव- चैतन्य न जाणे तेवी रीते तेना माथा परना पत्रमा नाख्यु. महम्मदशाह जुए छे, तो मुद्रारल नथी. आगळ पाछळ जुए छे, परंतु मुद्रारत्न जोवामां आवतुं नथी. शाहे पूछयु के-' अहिं म्हारं मुद्रारत्न हतुं, कोणे लीधुं ?' एम पूछातां रापये कयु के-शाह ! आ भूरि पासे छे. । शाह सरि पासे मागवा लाग्या. सूरिए जणाव्यु के-'आ (राघब )नी पासे छे, तेणे पोतानां यस्रो दर्शव्यां सूरिए कयु के-शाह ! आ(राघव)ना माथा पर छे. माथा पर जुए छे, तो मुद्रा (बीटी) जोवामां आवी, शाहे ते लोधी अने राधवचैतन्यने कयु के-'धन्य छे !, तुं खरो सत्यवादी छो, के पोते लड़ने जिनप्रभसरिने दूपण आपे छे ! । तेथी राघवचैतन्य श्याममुखबाळो थइ पोताने घरे गयो. एक वखते ६४ जोगणीओ श्राविकाओनुं रूप करी छळवा माटे सरि पासे आवी, सामायिक लइने ६४ जोगणीओने व्याख्यान सांभळती वेठी, पद्माव- वश करची. तीए सरिने जणाव्यु के-'तमने छ- ळवा माटे आ ६४ जोगणीओ आवी छे. सरिए वेमने जोइ तो तेओ व्याख्यान-रसमां लुब्ध थइ अनिमेय दृष्टिए (आंखनो एलकारो कर्य विना) सरि तरफ दृष्टि राखीने बेठी हती. रिए ते वधीने त्यांज सीली . १४६] जिनप्रमसूरिनी [ जिनप्रभरि अने कोई छे ? जे आ( टोपी )ने उतारे. ' शाहं समा सामे जोयु, त्यार पछी मूरि, महम्मदशाह प्रत्ये बोल्या के-'राजन् ! म्हारा बडे एनुं जे कराय ते तम्हे जुओ.' त्यार पछी पूरिए आकाशमा रजोहरण( ओपो ) फॅक्यु, तेणे जइने ते कुटद( टोपी )ने माथे पाडी. त्यार पछी फरी पाछा ते कलंदरे एक स्त्री द्वारा लइ जबाता माथे रहेला पाणीना घडाने आकाशमां अद्धर ज थंभाव्यो. [ पहेलां प्रमाणे ] फरी पाछा शाइने कहा. सूरिए ते घडाने मांगीने पाणीने घडाना आकारवालं कयु. शाहे कंधु के-'पाणीना कण-फुसिया (छूटा) करो.' सरिए तेज प्रमाणे कयु. कलंदरनो अहंकार गयो. फरी पाछा एक वखते सभामां बेठेला अदभुत निमित्त शाई कयु के-'म्हारी समामां बेठेला विनो। मने आजे कहो के-प्रभातमा हुँ कया मार्गे थइने रयवाडी ( राज- पाटी )ए जश?' त्यार पछी सर्व विज्ञोए पोतपोतानी घुद्धि प्रमाणे विचारीने चिट्ठीमां लखीने शाहने आप्यु. शाहे सरि (जिनप्रम ने कहा-' तमे पण आपो. मूरिए पण पोतानी नद्धि प्रमाणे चिठी आपी. ते सर्व चिट्टीओने लइने पोताना दुपट्टामा गांधी. शाहे विचायु के-' आ बधा असत्यवादी (खोटं बोलनारा) यने तेम करूं. एवो विचार करी शाह कयन
+
- सुलतान महम्मद.] विशेष परिचय [१४७
चंदर बुरजो भांगीने नोकळ्यो. जइने बहार क्रीडा करी. एक
स्थानमा वेठेला सरि विगेरे सर्वने बोलाव्या, अने
तेओने कयु के-' पोतपोतानुं लखेलु वाचो. ते अधाए
योतपोतानु लखेलुं वांच्यु. सरि( जिनप्रभ )ने कयु के-
'आपनो लेख वांचो. । आचार्ये लखेलं वांच्यु के-" बंदर
पुरजो भांगीने क्रीडा करीने शाह वडना झाड नीचे वीसामो
करशे. ए सांभळीने शाह चमत्कार पाम्या' अने बोल्या के-
'अहो ! मा आचार्य( जिनप्रभसरि) परमेश्वर सरखा छे, के
देवो पण एनी सेवा करे छे..
१ आने मळती एक प्राचीन घटना जाणवामां आवी छे के.
मालवाना सुप्रसिद्ध महाराजा भोजे, पोते करावेला सरस्वती.
कंठामरण नामना शिव-प्रासादमांथी व्रणद्वारवाळा मंडपमाथी पोते
फया मार्गे थइने नीकलशे ? आयो प्रश्न परमाईत कवि धनपालने
पूरथो हतो..पंडित धनपाले त्रिकालयती सर्व वस्तुओना ज्ञानवाळा
केवलि-प्रणीत अछी चूडामणि नामना प्रश्नमय अतिप्रशस्त
अन्थना आधारे प्रश्न विचारी, तेनुं फल पत्रमा लखी, ते पत्रने
माटीना गोळानी अंदर नाखी स्वगीधाने आपी महाराजाने पधा-
रखा कयु हतुं. जैन देव, गुरु अने आगम साये तेने असत्यवादी
ठरावधानी इच्छाथी सूत्रधारोने बोलावी, मंडपनी पद्मशिलाने दूर
- फरावी राजा उपग्ना मार्गयी नीकल्यो हतो, पछी पत्र वांच्यु तो
तेमां तेवी रीते नीकलवान लख्युं हतुं---
-
-
१५० ] जिनप्रभसूरिनो [जिनप्रभसूरि अने बोल्या के- आ(महावीर देव)ने महावीरनुं सन्मान हुँ शुं आपुं?" सूरिजीए कह्यु के- पूजन करावयूँ शाह ! आ देव सुगंधी द्रव्योथी तुष्ट थाय छे.' त्यारपछी शाहे (मह- म्मदे ) खरह अने मातंड वे गाम आप्यां. श्रावको धूप लावीने सदा धूप-पूजा करवा लाग्या. सुलताने ते(महा- वीर )नो प्रासाद कराव्यो. राघवचैतन्य संन्यासीने जीत्यो, सुलतानना हाथर्नु मुद्रि- कारत्न राघवचैतन्यने माथे नाख्यु, अन्य चमत्कारो संक्रमण दर्शाव्यु, सुलतानने शत्रुजय पर लइ जइ संघपति कर्यो. रायणझा- डने दूधथी वरसाव्यु. अमावास्या तिथिने पूनम तिथि करी बतावी. खंडेलपुर नगरमां सं. १३४७( ७४ १)मां जंगलदेश ( राजपूताना )ना शिव भक्तोने खंडेलवालोने जिन-शासन-धर्ममां स्थाप्या; तेमनुं जैनो कर्या स्वरूप कहेवामां आवे छे-एक वखते खंडेलवाल गोत्रवाळा विष्णु(शिव)- भक्तो द्रव्य समुपार्जन करवा माटे गोळ, खांड विगेरे व्यवहार (पेपार) करता हता. वेपार करतां तेमने.घणा दिवसो थइ गया. खंडेलपुर नयर तेरस्सए चउत्ताले । जंगलया सिवमत्ता ठविया जिणसासणे धम्मे ॥ १ " । सुलतान महम्मद.] विशेष परिचय [१५१ घणो गोळं एकठो थइ गयो. तेनुं मध करवा माटे सेव- कोने जणाव्युं. त्यारपछी मघ( दारु ) करावीने वैचाक्या लाग्या. लोकमां मद्य करनारा तरीके विख्यात थया. मांथी- केटलाके गुरुना उपदेशथी मधनो वेपार तज्यो अने केटलाक ते तजवामां अशक्त बनी तेज वेपार करता रह्या. त्यारपछी जिनप्रभसूरिए पमावतीना उपदेशथी जंगलगोत्रवाळाने प्रति- बोधित कर्या." जिनप्रभसूरिए कन्नाणयनयर( कनानूर )-कल्पमा अने विद्यातिलक मुनिए तेना परिशेपमा सूचस्ता अवशिष्ट रहेल जिनामसरिना ऐतिहासिक परिचयनी पूर्ति, तेमना ज कोइ (अज्ञात ) निकटना अनुयायीए रचला जणाता आ प्राकृत प्रबन्धथी थएली जणाशे. पाछळना केटलाक लेखकोए जिन- प्रभारिनो संबंध, पीरोजशाह(फी रूज तुवलक) साथे जोड्यो छे, परंतु उपर्युक्त कल्प, परिशेप अने आप्रबन्धना आधारे महम्मद तघलक साथे सम्बन्ध मानवो विशेष प्रामाणिक जणाय छे. विशे- पमां जिनप्रभरिनां तत्कालीन गुण-वर्णनात्मक स्वागत गीतो वाकानेरना जैन पुस्तक भंडारोमाथी उत्साही श्रीमान अगर- चंदजी, भंवरलालजी अने शंकरदानजी नाहटा बंधुओना प्रयत्लथी हालमा प्रकट थयां छे* तेमां पण कनाणयनयर- * ऐतिहासिक जैनकाव्य-संग्रह (अमय लैन प्रय-
१५२ ] जिनप्रभसूरिनो [जिनप्रभसूरि अने
कल्पमा अने तेना परिशेपमा पूर्वे (पृ. ३१-३३ मा)
जणायेली महम्मदशाहवाळी घटनाको निर्देश के.
माला पु. ८ पृ. १२-१३)मां प्रकट थपल २ गीतो उचित
संशोधन करी अहिं दर्शावाय -
(१)
के सलहट ढीलो नयर थे, के वरनउ वखाणू प;
जिनप्रमसूरि जा सलहीजइ, जिणि रंजिउ सुरताणू. १
चलु सखि ! वंदण जाद, गुण-गरायउ जिनप्रभसूरि;
रलियइ ससु गुण गाहिं, राय-रमणु पंडिय-तिलड. (बांधली)
बागम सिद्धांतु पुराणु वखाणिइ, पडियोहइ सबलोइ ए;
जिणप्रभसूरि गुरु-सारिखर हो, पिरला दीस(इ) कोइ ए, २
आठाही आठमिहि घटथी, तेडावइ सुरिताणु ए;
पुसितु मुख जिणप्रभसूरि चलिया निमि ससि इंदु विमाणि ए. ३
अखपति कुतुपकीनु मनि रंजित, पीठलि जिणप्रभसूरि ए;
एकतिहि मन-सासर पूछइ, राय-मणोरह पूरी ए,
गाम भूरिग पटोला गावल, तूठउ देइ सुरिताणू ए;
जिणप्रभसूरि गुरु पं पिनइच्छर, तिहुअणि अनलियमाणू ए. ५
ढोछ दमामा अरु नीसाणा, गहिरा वाजइ तूराए;
एणपरि जिणप्रभसूरि गुरु आवइ, संप-मणोरह पूरा ए.
3
.
सुलतान महम्मद.]
विशेष परिचय
११५३
Amar
or
(२)
उदयले खरतरगच्छ-गयणि, अभिनवउ सहसकरो;
सिरिजिणप्रमुसूरि गणहरो, जंगम कल्पतरो.
वंदहु भविक जन ! जिणशासग-वण-नववसंतो;
छत्तीसगुणसंजुत्तो वाइय-मयगल-दलण-सीहो. (आंचली)
तेर पंचासियई पोस सुदि आठमि सणिहि वारो;
मेटिउ असपते महमदो सुगुरि ढोलियनयरे.
२
आपुणु पास पइसार ए, नमिवि आदरि नरिंदो;
अभिनव कवितु वखाणिवि, राय रंजइ मुर्णिो. ३
हरपि तु देह राय गय तुरय, पण कणय देस गामा;
भणइ अनेवि जे चाह हो, ते तुइ दिन इमा.
लेइ गहु किंपि जिणप्रभसूरि, मुणिवरो अतिनिरीहो;
श्रीमुखि सहित पातसाहि, विविहपरि मुणि-सीहो. ५
पूनिवि सुगुरु वस्त्रादिकहि, करिवि सहिथि निसाणु;
देइ फरमाणु अनु कारवइ, नववसति राय सुजाणु. ६
पाटहथि चाडिवि जुग-पवरु, जिणदेवमरि-समेतो;
मोफलइ राउ पोसालई, यहुमलिक-परिकरीतो.
वाजहि पंचसद् गहिर सरि, नाचहि तरुण नारि
इंदु जिम गईद-सहितु, गुरु भावइ वसतिहिं मझारे. ८
४
१५४ ]
जिनप्रभसूरिनी [ जिनप्रमसूरि अने
जिनप्रभसूरिनी अप्रकट कृतियो.
जिनप्रभसूरिए 'पउमाम गाथानी अनुयोगचतुष्टयवाळी
व्याख्या (अनेकार्थ रत्नमंजूपा दे. ला. नं. ८१ मां प्र.) मा
सूचवेल रहस्यकल्पद्रुम तथा जिनाममूरिनी अन्य अप्रकट
कृतियो जो उपलब्ध थाय, अने तेनो संग्रह प्रकाशमां मुकाय
तो नवीन जाणवार्नु पनी शके.
जिनदत्तमरि-चरित्र(अगरचंदजी नाहटाद्वारा प्रकाशित
उत्तरार्ध पृ.४३१-४३३ )मां प्रकाशित थयेल व्यवस्थापत्र(सं.
साधुसामाचारी) जिनप्रभसूरिकृत होवार्नु जणाय छे.
जिनप्रभसूरिनी पह-परम्परा ।
जिनप्रभसूरिनो शिष्यादि-परिवार विशाल हशे,तेम तेमनी
मळती केटलीक कृतियोथी अने अन्य
जिनदेवसूरि केटलाक उल्लेखो(पृ. ५०)थी जणाय
छे. ते सौमां जिनदेवसरि अग्रस्थाने
( पट्टधर ) होवार्नु जणाय छे. शाह मुहम्मद तुघलके वि. सं.
धम्म-धुर-धवल संघवइ सयल, जाचक जन दिति दान
संघ-संजुत्त बहुभाति-भरि, नमहिं गुरु गुण-निधानु. ९
सानिधि पउमिणिदेवि इम, जगि जुग जयवंतो;
नंदउ जिणनमसूरि गुरु, संजमसिरि-तगत कंतो,
पह-परम्परा सुलतान महम्मद ] [१५५ १३८५मा दिल्लीमां जिनप्रभसरितुं स्वागत-सन्मान कयु, स्यारे बीजा हाथी पर एमने विराजमान करवामां आव्या हता-ए पहेला( पृ. ३२-३३मां ) उल्लेख थह गयो छे, तथा उपर्युक्त गीतमा पण कथन छे. जिनप्रभसरिए दिल्लीथी महाराष्ट्र-मण्डल तरफ प्रयाण कयु, त्यारे पातशाहनाकथनथी पोताना प्रतिनिधि तरीके चौद साधुओ साथे जिनदेवसरिने दिल्लीमंडलमां पातशाह पासे मूकी गया हता-ए उल्लेख पण उपर (पृ.३५मां)दर्शाव्यो छे. तथा त्रण वर्ष पछी वि.सं.१३८९मां पातशाहना आमंत्रणथी जिनप्रभसरि देवगिरिथी पुनः दिल्ली तरफ आता हता, त्यारे मार्गमां अल्लावपुर दुर्गमा तेमना सार्थिकोने असहिष्णु म्लेच्छो द्वारा सतामणी थइ, त्यारे समा- चार मलतां सुलतानने विज्ञप्ति करी ते उपद्रव दूर करारनार जिनदेवसरि हता-ए पहेलां (पृ. ४७मां) कहेवाइ गयूं छे, विगेरे परथी मुहम्मद तुघलकना-दिल्लीश्वरना शाही दरबारमा जिनदेवसूरिनुं पण ऊंचुं गौरवभर्यु स्थान हतुं, ए विचारकोना लक्ष्यमा सहज आधी शके तेम छे. आ जिनदेवसरिनी विशेष ग्रन्थ-रचना उपलब्ध थड़ शकी नथी, तेम छतां जे मळी आये छे, ते परथी पण वेमनी विद्वत्ता प्रतीत थाय छे, सचित्र कल्पसूचना परिशिष्टमां ९७ पद्योवाळी सं. कालकाचार्य-कथाना अंतमा तेओए पोताने ' जिनप्रभसूरि-स्वाङ्क-पर्यङ्क-लालितः । विशेषण- द्वारा ओळखान्या छे.
५६ ] जिनप्रभसूरिनी [ जिनप्रभसूरि अने
हेम नाममालाना शिलोञ्छ-(नि. सा. ना अभि-
संग्रह सं.२,११५.) कार, आ जिनदेवसूरि होवार्नु उपर
३३ मां) सूचवाइ गयुं छे.
जिनदेवसृरिनुं संक्षिप्त परिचयात्मक प्राचीन गीत ऐति-
कनकाव्यसंग्रह (अभयजैन-ग्रन्थमाला पु. ८, पृ. १४)
जोवामां आवे छे. *
* योग्य संशोधन-संस्कार करी ते अहिं प्रकाशित करवामां
-
१
उपम-गुणगण-मणि-निधानु संजमि-प्रधानु;
रु जिणप्रभसूरि-पट-उदयगिरि उदयले नयल भाणु.
हु भविय हो ! सुगुरु जिणदेवरि ढिल्लिय वरनयरि देसण;
मेयरसि वरिसए मुणिवह भणु घणु ऊनविउ. आंचली.
हे कन्नाणापुर-मंहणु सामिठ वीरजिणु;
हम्मदराइ समप्पिड थापिउ सुभ लगनि सुभ दिवसि.
२
णि विन्नाणि फला-कुसळे विद्या-अलि अजेड;
खण छंद नाटक प्रमाण वखाणए आगमि गुण अमेउ.
तु कुलधरु जसु कुलि उपनु इहु मुणि-ग्यणु;
नु वीरिणि रमणि-चूडामणि जिणि गुरु उरि घरिउ.
नु जिणसिंघसूरि दिखियन धनु चंद्रगछ;
जिणप्रभसूरि निज गुरु जिणि निज पाटिहि थापियउ.
५
सुलतान महम्मद.] पट्ट-परम्परा
[१५७
उपर्युक्त जिनदेवमरिए पोताना पट्ट पर जिनमेसरिने
स्थापित कर्या हता, एम जिनप्रभसूरि-
जिनमेरुसूरि गुरु-परंपराना एक गीत द्वारा
जणाय छे.*
हलि सखे ! घणन(इ) सोहावणिय रलियावणिय;
देसण जिणदेवसूरि मणिगयहं जाण नितु सुणउ.
महि-मंडलि घरमु समुधरप जिण-सासणिहि;
अणुविण प्रभावन फरइ गणधरो अवयरिउ वयरसामि.
वादिय-मयगल-दलण-सीहो विमलप्सील-धरु;
छत्तीसगुणधर-गुण-कलिउ चिरु जय जिणदेवमरि गुरु.
*x जिणचंदसूरि जिणपतिसूरि, जिणेसरु गुण-निधान
तवणुक्रमि उपनले सुगुरु, जिणसिंघसूरि जुग-प्रधानु.
तासु पाटि-उदयगिरि उदयले, जिणप्रमरि भाणु;
भविय-कमल-पडियोहणु, मिच्छत्त-तिमिर-हरणु. ३
राउ महंमदसाहि जिणि नियगुनि रंजियज;
मेढमंडलि दिल्लियपुरि जिण-धरमु प्रकटु फिउ.
तसु गच्छ-धुर-घरणु भयलि जिणदेवसूरि सूरिगए;
तिणि थापिर जिणमेरसूरि नमहु जसु नमइ (नरगठ.
गीत पवीतु गायए सुगुरु-परंपरह;
सयल समीहि सिझहिं, पुहविहिं तसु नरह. ६
६
१५८ ]
जिनप्रभसूरिनी [जिनप्रभसूरि अने
विक्रमनी सोळमी सदीमां
उपर्युक्त जिनमेरुमरिना पट्ट पर जिनहितमरि स्थापित
थया हवा, एम जिनप्रमसूरि सुगुरुनी
जिनहितसूरि परंपराना उपलब्ध प्राकृत गाथाकुल-
कना उल्लेखथी प्रकट थाय छे. *
ऐतिहासिक जैन काव्य संग्रह( अभयजैनप्रन्थमाला पु. ८,
पृ. ११)मा जिनप्रभसूरि-गीत तरीके जणावेल आ सुगुरु-
परंपरा-गीत योग्य शुद्धि साथे अहिं दर्शाव्युं छे.
*xx संजम सरसइ निरुयं(ह)सु(वमु) मुणीण तित्यभर-च(धोरणं ।
मुगुरुं गणहर-स्यण वंदे जिणसिंहसुरिमहं
॥९॥
जिणपहसूरि मुर्णिदो पयडियनीसेसतिद्वयणाणंदो।
संपइ जिणवरसिरिवद्धमाणतित्यं पभावेइ
॥ १०॥
सिरिजिणपहसूरीणं पट्टमि पइट्ठिओ गुणगरिठ्ठो ।
जयद जिणदेवसूरी नियपन्नाविनियसुरसूरी ॥ ११ ॥
जिणदेवसूरिपदो(हो)दयगिरिचूडाविभूसणे भाणू ।
जिणमेरुसूरि-सुगुरू जयउ भए सयलविजनिही ॥ १२ ॥
जिणहितसूरिमुगिदो तप्पट्टे मषिय-फुमुयवण-चंदो ।
मयण-करि-कुंभ-विह्इण-दुद्धरपंचाणगो जयठ ॥ १३ ॥
सुलतान महम्मद.] पट्ट-परम्परा जिनप्रभसरिनी शिष्य-परंपरामां विक्रमनी पन्नरमी सदीना अंतमां तथा सोलमी सदीना प्रारं- वाचनाचार्य भमां चारित्रवर्धन नामना विद्वान चारित्रवर्धन मुनि वाचनाचार्य थइ गया. सेओए पोताने तेमनी परंपराना जिन- हितमरिना शिष्य भूमीशवंदित कल्याणराज उपाध्यायना शिष्य तरीके ओळखाव्या छे. तेओ बयुदिशाली वाद- विद्या-कुशल, साहित्य, नाटक, अलंकार शास्त्रोमां तथा न्याय, बौद्ध, वेदांत विगेरे दर्शनशास्त्रोमा निष्णात हता-तेवू सूचन करे छे, नरवेप वाणी (सरस्वती) गणाता हता. तेमनी रचेली कल्याणमंदिर-स्तोत्रनी ४२३ श्लोकप्रमाण टीका वडोदराना प्राच्यविद्यामंदिरमा छे. तेओए श्रीमालयंशी उक्कुर भीषणनी अभ्यर्थनाथी, वि. सं. १५०५ मां वैशाख शु. ८ गुरुवारे सोमप्रभाचार्यना सिन्दूरप्रकर नामना प्रसिद्ध काव्य पर दृष्टांतोथी सरस. ४८०० श्लोकप्रमाण तात्पर्य रीका रची हती, जे ए ज वर्षमा पं. धर्मदासद्धारा लखाइ हती. तेनी सं. सुगुरु-परंपर-माहाकुलयमिणं जो पढइ पञ्चूसे। सो लइइ मणोवंछियसिद्धि सम्बं पि मन्वनणो ॥ १४ ॥ ऐतिहासिक जैनकाव्यसंग्रह( अभयजैनप्रथमाला पु. ६, पृ. ४१-४२)माथी संशोधन करी उद्धत.
१६० ]
जिनप्रभसुरिनी [ जिनमभरि अने
१९६६ मा लि. प्रति वडोदराना जैनज्ञानमंदिरमा प्र. कान्ति-
मिजयजी मुनिराजना संग्रहमा छे.
आज याचनाचार्य चारित्रवर्धने कवि कालिदासना सु-
प्रसिद्ध रघुवंश महाकाव्य पर पण श्रीमालवंशी शाह सालि-
गना पुत्र अरडकमलनी अम्पर्थनाथी शिशुहितैषिणी नामनी
८००० लोकप्रमाण टीका रची इती, जेनी प्रति वडोदराना
माध्यविद्यामंदिरमा तथा संभात वि. भंडारोमां मळे छे.
प्रो. पीटर्सनना रिपोर्ट(३, पृ. २१०)मो थानो आयन्त भाग
प्रकट थयो छे.
आ न चारित्रवर्धन मुनिए वि. सं. १५११मां वै. शु.
११ तिथिए सुप्रसिद्ध नैषधकाव्यनी टीका रची हती.
सुलतान महम्मद. ] के-" जिनवल्लभ सुगुरुना वंशमां सिद्धान्त-शास्त्रार्थना जाण, गर्विष्ठ प्रतिवादीरूपी हाथीओनी घटाने परास्त करवामां सिंह जेवा, विविध नव्य रमणीय काव्योनी रचना करनार, विचारणीय विशुद्ध प्रज्ञावाला, विज्ञोथी नमन करायेला मोड- प्रतापी सरिराज जिनेश्वर थइ गया. तेमना शिष्य सूरीश्वर जिनसिंहमरि थया, जे प्राणि-समूहना हितार्थ-संपादनर्मा कल्पवृक्ष जेवा अने विपक्ष-बादीरूपी हाथीओने प्रतिहत करवामां पंचानन जेवा हता. तेना पट्टरूपी पूर्वाचल पर सूर्य जेवा मूरि-पुरंदर जिनप्रभ थया, जेमनी जीमने युधेन्द्रोए वाग्देवता( सरस्वती )ना आस्थानपट्ट वरीके वर्णवी हती. तेमनी पछी पोतानी बुद्धिवडे बृहस्पतिने तर्जना करनार, निरुपम समरसरूपी द्रव्यवाळा, जयशाली सूरिवर जिनदेवसरि थया. " त्यारपछी थयेला जिनमेरसूरि, जिनहितमूरि, जिनससरि, जिनचन्द्रसरि, जिनसमुद्रसरि, जिनविलकसरि १. " वंशे श्रीजिनवल्लभस्य सुगुरोः सिद्धान्तशास्त्रार्यविद् दपिष्ठप्रतिवादिकुजरघटा-कण्ठीरवः सरिराट् । नानानन्य-सुमध्यकाव्यरचनाकाव्यो विभाज्यामल- प्रज्ञो विज्ञनतो जिनेश्वर इति प्रौढप्रतापोऽभवत् ॥ १॥ शिष्यस्तदीयोऽजनि जन्तुनातहितार्थसम्पादनकल्पवृक्षः । विपक्षवादिद्विप-पञ्चवक्ता सूरीश्वरश्रीजिनसिंहसरिः॥२॥ ११ ~MAR . . १६२ जिनप्रभरिनी [ जिनप्रभसूरि अने अने जिनहितमरिना शिष्य कल्याणराज उपाध्याय(पोताना गुरु)नो परिचय कराव्यो छे. जिनप्रभमूरिना संतान-परिवारमांथयेला अनेक मुनिओ- र परिशिष्टपर्व विगेरे अनेक पुस्तको लखाव्यां हता, जेमांनां. केटलांक हालमां पण दृष्टिगोचर थाय छे. वि. सं. १५८५ वै. शु. ५ गुरुवारे जिनप्रभसरिना परिवारमा थयेला मुनिराजना उपदेशथी श्रीमालवंशी सत्पुत्र- वती श्राविका रूपाईए सचित्र कल्पमत्र अने कालकाचार्य- कथानुं पुस्तक लखाव्युं हतुं. जिनप्रमसरिना संतानमा थयेला जिनचंद्रसरिना समयमा उ. सागरतिलकना शिष्य समयध्वजोपाध्यायने श्राविका पूरीए समर्पित करेलु उपर्युक्त ह. लि. पुस्तक बीकानेरना जयचंद्रजीना मंडारमा विद्यमान छे. चिफमनी सत्तरमी सदीमा वि. सं. १६३१मां ज्ये. व. १२ बुधवारे जिनप्रभसरिना तत्पपूर्वाद्रिमहाशिमजिनप्रमः रिपुग्न्दरोऽभूत् । वाग्देवताया रसना यदीयामाच्छाद(स्थान)पटुं जगदुर्घधेन्द्राः।।३।। नदनु जिनदेवरिः स्वशेमुपीततित्रिदशसूरिः । निरुपमम(श)मरसमूरिः सूरिवरः समजनिष्ट जयो ॥ ४ ॥ -चारित्रवर्धनाचार्यनी सिन्दूर प्रकर-टीका, नषधमहाकाव्य- टीका विगरेनी प्रशरिसमा.
पट्ट-परम्परा ४ सुलतान महम्मद] [१६३ संताननां थयेला था. भारतीचंद्रना शिष्य भानुतिलके लिखित गुणस्थानप्रकरण-टीका चुनी. मां उपलब्ध थाय छे. वि. सं. १६३५मां का. व. ७ गुरुवार जिनप्रभाचार्यना अन्वयमा थयेला देवतिलक मुमुसुए जिनप्रमरिनी पर्युषणा- कल्प-पंजिका(ग्रं. ३०११)नी प्रतिने आगरा राजधानीमां लखी हती. वि.सं. १६४१मां वीजा शुचिमास शु. ६ शुक्रवारे, कमला( पद्मा )देवीना वर-प्रसादपात्र जिनप्रभाचार्यना अन्न- यमा थयेला जिनहितरिना शिष्य आदिदेवमुनिए सिंघा- नकपुरमां जिनमानुमरिना समयमां लिपीकृत समयसार नाटक वृत्तिनी प्रति घीकानेरमा जयचंद्रजीना भंडारमा विद्यमान छे. विक्रमनी अदारमी सदोमां. वि. सं. १७२६मा फा. शु. १० श्रीमाली स्वरतर- गच्छमां जिनप्रभसरिना संतानमां धयेला ३. लब्धिरंगना शिष्य पं. नारायणदासनी प्रेरणाथी कवि हेमराजे रचेली सुटीक नयचक्रनी बचनिका( भाषा) बीकानेरना दानसागरजीना संग्रहमा उपलब्ध थाय छे. विशेप अन्वेषण कखामां आवे तो प्रमावक जिनाममूरिवी - शिष्य-परमानो मोनो इतिहास मळया संभा छे, परंतु अति विस्तारना भययी अहिं आठला मंशोधनयी संतोष मानी\.
१६४] उपसंहार [ जिनप्रभसूरि अने आ निवन्धनी पुनरावृत्तिना प्रसङ्गे पूर्वोक्त कल्पो उपरान्त जिनप्रभसूरि-प्रबन्ध (सं.)नी लगभग उपसंहार मळतीचे प्रतियो उपलब्ध थइ हती [१] वडोदरा आ. जैन ज्ञानमंदिरनी प्र. कान्तिविजयजी मुनिराजना संग्रहनी, तथा [२] वि.सं. १८९५ मुंबईमा, अने वि. सं. १९२२मां अजीमगंजमा लखाएल परथी अगरचंदजी नाहटाए बीकानेस्थी मोक्लाबेली नकल. तथा जिनहरिसागरसूरिजीए पाडलथी मोकलावेल प्राकृत प्रबन्धनी प्रति, जिनप्रभसूरिनी तथा तेमनी शिष्य-परंपरानी कृतिओ अने खरतरगच्छनी अन्य सं. गु. पट्टायलीओ, उपदेशसप्तति, श्राद्ध- विधि, शुभशीलगणिनो कथाकोप (छाणी जैन ज्ञानमंदिरनी ह. लि. प्रति ), उपदेशकल्पवल्ली, उपदेशतरंगिणी विगैरे अनेक ऐतिहासिक साधनो साथे समन्वय करी लीधेला तेमांना उपयोगी अंशो आ निबंधमा योग्य स्थाने दृष्टिगोचर थशे अने उपयोगी जणाशे-एवी आशा छे. मा प्रयत्नथी महम्मद तघलकना समकालीन परिचित इन्ने बतूता जेवा परदेशी इतिहास-लेखके न जणावेली, 'मिराते मुहम्मदी (उर्दू), झीआउद्-दीन यरनीनी 'तारीख- इ-फीरोजशाही , तथा 'दी क्रॉनीकल्स् ऑफ दि पठान किंग्ज ऑफ दिल्ही' 'सुलतानम् ऑफ देहली' 'दी ट्रॅव्हलर ऑफ ' 'कॅम्त्रीज हिस्टरी ऑफ इण्डिया, . 'ऑक्स- मुलतान महम्मद.] उपसंहार [१६५ फर्ड हिस्टरी ऑफ इण्डिया ' जेवां ऐतिहासिक प्रमाणभूत मनातां इंग्लीश पुस्तकोमा न जोवामां आवती, उतां मुहम्मद तुब(ग)लकना समकालीन अने गाढ परिचयमां आवेला आ देशना विश्वसनीय अन्य लेखकोए प्राचीन प्रा. सं. मां लखी राखली तेमनी साथे संबंध घरावती, जनशासनने गौरव आपती, जिनप्रभमूरिनी प्रामाणिक ऐतिहासिक अनेक घटना प्रकाशमां आवे छेए इतिहासचिसो वांची-विचारी शक्शे. पुरा- सच-प्रेमी इतिहासना सम्पासीओने मध्यकालीन भारतना तथा दिल्लीश्वर पातशाहोना इतिहासना अभ्यासमां, जैन आचार्यानो अने जैन गृहस्थोनो अप्रकट इतिहास उकेलवामां, हिन्दु- मुस्लीम-कलह निवारवामां, परस्पर सहानुभूतिमरी मैत्री वधार- वामां मने शुभप्रेरणाओ मापवामां आ प्रयत्न यदकिंचित उपकारक यशे; तो लेखक पोतानो वर्षोंनो प्रयत्न सफल थयो समजशे. " -ला. भ, गान्धी. समाप्त . , जिनप्रभसूरि अने सुलतान महम्मद आ निबंधमां आवेलां ऐतिहासिक नामोनी अनुक्रमणिका. अ. नाम अ. नाम F अचल २५,४४ पृष्ट. पृष्ठ. अब्बर २, १८ अन्ययोगव्यवच्छेद ४२ अपभ्रंशकाव्यत्रयी २७, ७७ अजमेर १२६, १४४ अभयकुमारचरित अजयमेर अजमेर अमयदेव सूरि १३४ अजितनाथ-मूर्ति अभिधानगजेन्द्र विधिचत्य १०६-१०७ अमिधान-संप्रह ३३,१५६ अजित-शांति-स्तव-वृत्ति ७ अभिनंदनभिन(मूर्ति) अनिमगंज १६४ अणहिलबाह पाटण अमूल्यविहार अणहिल्लपुर पाटण अंबदेव सूरि ४२,१०७ अनुयोगचतुष्टयव्याख्या १५४ अंबा-अयिका अनेकार्यरत्नमंजूषा १५४ अंबिकादेवी(प्रतिमा) ५४,१०२ अंतरिक्षपाश्व-कल्प २. करूप २१ पे, नाम तीर्थ-कल्प जैनज्ञान-मंदिर २१,६७ सुलतान महम्मद.] अनुक्रमणिका [१६७ पृष्ठ है. नाम अयोध्या आचार-दिनकर आत्मारामजी अरजिन-बिर ५३,५४,८३ अरडकमल्ल १६० आदन (एडन) अरिष्टनेमि-फल्प आदिगुप्त-शिष्य १० अवुकपुर ८५ आदिमिन-मूर्ति २८,८२-- अर्बुदतीर्थ-फल्प ८७,१०६ अर्यापुर ८२ आदिदेव मुनि १६२ अईच्छीचूडामणि आप्रदेव अंबदेव हि अलपावान १०६-१०७ आगमकुंड-पद्मावती-कल्प २१ अलावदीन (ण) ७५.७६, आशापल्ली आसावल्ली १०३.१०८.११४ आशापुर अलाउद्दीन: अलावदीन आमावल २५,१.४ अल्लाबपुर दुर्ग ६७.१५५ आसावली-आसान अवंती-मालवा आसीनगर अधावबोध-कल्प इंद्रहंस गणि १२०,१२२ अष्टापदतीर्थ-कल्प २० इन बतूता ३१ उञ्जयत-गिरनार अहम्मदाबाद अहिच्छत्रा-फल्य उज्जयिनीजणी आगरा ५२, १६२ उजेणी २०,८२,१४४,१४५ असूअग मलिक १०४ तीर्थ-कल्प १९ १६८ ] ऐतिहासिक नामोनी [ जिनप्रभसूरि अने 2. नाम उदयप्रम सहि उड्याकर गणि पृष्ठ . नाम पृष्ठ. ऐ. जैन काव्य-संग्रह १५१, १५६१५९ टपकेश गच्छ ४२,५३,१०१, ऐन्द्रीपुर १०१,१०७ ओंकारपुर(जी) ८६,९२-९४ उपदेश-कल्पवल्ही १२०,१२२, मांधाता ऑक्सफर्ड हिस्टरी- तरंगिणी ११६,१२५,११४ ऑफ इंडिया १६४ " माला-लघुवृत्ति ३६ ओसवाल उकेश सप्तति ६,९,५९,६१,७३, फरक सूरि ४२,५३,१०१, ११८,१३२,१६४ १०४, १०७ उपसर्गहरस्तोत्र-वृति ८ कंजरोटपुर ४२, ५३, उरंगलपुर ५४,८५ १०१, १०४ जिनालय ६४ कथाकोश-पंचशतीप्रबंध सदखान कन्नागपुर १०७, १०९, उम[ग]सान १४८, १५६ अग्रेश वंश (झाति) २७.१०१, फन्नाणयनयर २५, २६, २९, १०६,१२२,१३०,१३४ ३०, ५८, १०५, १५१ अपजिन-स्तवन ३७,३८, १९, एपिप्राफिया इंडिका १४१ ६८, १०१ तिहासिक गूर काव्य-संचय फल्प २०,२५,२६,१०९, ४२,७७ १०४ वीर " " ~ कायर ওও सुलतान महम्मद.] अनुक्रमणिका [ १६९ ऐ. नाम पृष्ठ ऐ. नाम परिशेष ३३,३९,१०,५८ कल्याणपुर १०९ कन्यानयनीय नाणय कल्याणमंदिर-टीका कपर्दियक्ष-कल्प कल्याणराज कमलादेवी पद्मावती कष्टभंजन १६ फयंयास स्थल फांगग (डा) करनाल १०९ १४१ फरहेटफ कार्तबापवप्रबोध करहेडा-करहेटक कावंत्र-विभ्रम-टीका कर्णदेव कानानूर कन्नाणयनयर १०४, १०५ कणांट कान्हड-कनाणयनयर १०२, १०५ कर्पूरचीरधाराप्रवाह १०२,१६० महावीर, महावीर कान्हडदे-प्रबंध फलंदर कलिकुंड तीर्थ-कल्प ३५, १०३ २० कामलता कल्पप्रदीप-तीर्थकल्प झांपिल्यपुर-कल्प २० “कल्पसूत्र १५५,१६२ कायस्थ कलिका कालकाचार्य-कथा १५५,१६२ कल्पलता किरणावली कालिफापुराण १४४ दीपिका कालिदास पंजिका सुबोधिका काव्यमाला १२,१६,११२ " काफूर मलिक + ८ " ७, १६२ कालिय " १७. ] ऐतिहासिक नामोनी [ जिनमरि अने पे. नाम - १५० पृष्ठ. ऐ. नाम पृष्ठ. किढिवाणा १३७ क्षेत्रसमास ११५ कीतिकौमुदी खंडवा-खंडोह कुहंगेश्वरतीर्थ-कल्प २० खंडेलपुर कुतुबदीन १४२ खंडलवाल १४० कुतूहलखान-क्युठलघखान खंडोह ८४ कुंथुजिन-बिय ५३,५४,८४ खमात स्तंमतीर्थ कुमारगणि कवि शांतिनाथ जैनभंडार १८,६६ कुमारपाल ८०,८१ खरतरगच्छ (गण) ४,३१, चरित्र १११,११२ ४०,१५,१०६,१११,१५३ कुलघर पट्टावली ३,४,७६.७८, कुल्पाक २० १६३,१६४ कृष्णपिंगच्छ १११ " (वृहत् ) केम्पोज हिस्टरी ऑफ इंडिया (लघु) ३१,७५-७८, २६,३०,४६,१६४ कोका पाश्वनाथ- २० खरमाणी १३१ कोटामोटि खरद खाजेजहां मलिक बाजाजहान् कोमला-अयोध्या सापरराज कोइंडियदेवी-कर २०. खुगसाण १२८,१४५ कोशांची तीर्थ- संतापाल क्यूतलयन्सान मेसल कोमल सूरि ५ पे, नाम * * * सुलतान महम्मद, ] अनुक्रमणिका [ १७१ ऐ नाम पृष्ठ पृष्ठ खेतलदेवी १३६ गरेश्वर ख्वाजामहान् पुरोहित गच्छमतप्रबंध महामात्य गज संघपति ११.६७ गोगपुर गज्जणव (वी) १०३ ग्यास्-उद्-दीन तघलक ३१ गणितसार ८७ घोपकीपुर गिरनार तीर्थ ३४,५५,६९, चतुरशीतिप्रबंध ८२,८७,११७ चतुर्वर्गचिंतामणि ९२ गुजरात १९,२७,६१,६८, गर्विशतिजिनानंदस्तुति ४५,६१ ९०,१०३-१०५,११५ चतुर्विशतिप्रबंध-प्रबंधकोश गुणभद्र सूरि ११० चन्द्र (ठ.) १२८, १०९ गुणशेखरसूरि ३८,४० चंद्रकपुरी गुणस्थान-स्वरूप ( क्रमागेह) चंद्रकीर्ति ११५ चंद्रगच्छ , " ११५ चंद्रवंशी टीका चंद्रतिलक उ. २७ गुरुगुणपट्त्रिंशत् चंद्रप्रभ जिन ( मूर्ति) ८१,८६ पट्त्रिंशिका गुर्वावली ११,६७,७८,७९, चंद्रानक चंपापुरी तीर्य-कल्प २० गुजरपरिनी गुजरात चारित्रवर्धन १४९,१६०,१६२ राजहस्त्यंकुश चारूय १७२] ऐतिहासिक नामोनी [ जिनप्रभसूरि अने ऐ. नाम पृष्ठ. पे. नाम चाहुयाण चौहाण चिक्खल पुर , वीरमंदिर १६२ . चौहाण फुल जाज २९ चित्तव चित्तोड जठुय (जेठग) राजपूत ३० 'चित्रकूटाचल=चित्तोड गढ़ जयचंद्रजी-मंडार चित्तोड ८४, १०४, १०५ जयसिंह राजा ८०,९७ चेलफपुर ८६ जयसिंह सरि चेलणपार्श्व-कल्प १११, ११२ चैत्य ४२ जयसिंहपुर चैत्यवासी जळपद्र चोल देश २४, २६, १०९ जसोवद्धण यशोवर्धन २८ छंदःकोश ११५ जाधव-यादव छाजू शाह जालंधर जगचंद्र सूरि ६६ जालोर ७६, १०१,१०६. जगसीह-जगतसिंह जावड शाह २८ जावालिपुर जालोर ११५-१३० जिनचंद्र सूरि (१) जंगल गोत्र जंगल देश १११ जंगच्या ११, ६३- १४५ जगतसिंह ३६,४३, २ . " अंपराल नगर ese सुलतान महम्मद.] अनुक्रमणिका [१७३ ऐ. नाम . ७७ जिनसर्व सूरि ऐ. नाम पृष्ठः पृष्ठ. जिनचंद्र सरि (६) १३४,१३६,१४२-१६४ प्रबंध (प्रा. सं.) ६१,७२, १६२ ७४,७६,११६, ११, जिनतिलक सरि १३२, १३४ जिनदत्त सरि १३४, १४५ जिनभानु सूरि १६२ चरित्र १५४ जिनमेरु सूरि१५७,१५८,१६१ मूर्ति जिनवल्लभ सूरि १३४, १६१ जिनदेव सूरि ३२-३६, ४७, जिनसमुद्र सूरि ११३-१५८, १६१, १६२ जिनसिंह सूरि ४,३१,३७,३८, जिनपति सरि २७, २८, १३४ ७५-७८,१३६, १३७,१५६-१५८ २६ १६१, १६२ जिनपाल उ. २७ १७ ४९ जिनप्रबोध सूरि ७७,७८,१३४ जिनसुंदर सूरि जिनप्रभ सूरि (आगमिक) ३ जिनहित सूरि १५८,१५९ जिनमम सरि (खरतरगच्छीय)१, १६१,१६२ १३४ ३-१०, १८, १९, जिनेश्वर सरि (१) २१-२४, ३१-४७, जिनेश्वर सूरि (२) ६,२७,७६- ५१-७६,१०४-१०६, ७८,१३४,१३६ १०६, १९९, ११७, १९०११६१ ११५,१६८ रास +- ऐ. नाम ६ १७. ] पेतिहासिक नामोनी [ जिनप्रमसूरि अने पृष्ठ. ऐ. नाम पृष्ठ. जिनेश्वरसरि-गस जनस्तोत्रसंदोह १२,१८, जीरापुर जीर्मदुर्ग-जूनागढ जनस्तोत्रसमुच्चय ११,१७,१८ जूनागढ़ जोइरस ज्योतीरस ८४ जेसल जोग(गि)णी (६४) १४३ जेसलमेर मोग(गि)णी-पीठ १४४ २६ जैनभंडार • ६६ ज्ञातासूत्र ज्ञानकळश मुनि ग्रंथसूची ५,२७,७७ ज्ञानचंद्र ४३ जैत्रपाल ज्योतीस २८ जैन ग्रंथावली ज्वालामुखी (योगिनी) १४१ मैनतीर्थ- स्तोत्र १४१,१४२ झंझणदेव जैनधर्मनो प्राचीन इतिहास २६, झोआन्द-दोन घरनी १६९ टकारिका जैन साहित्यसंमेलन रिपोर्ट २६, टी(टी)पुरी तीर्थ ४५ स्तोत्र नसाहित्यमें इतिहासके ठक्कुर कुल साधन २६,४५ डमोइ जनसाहित्य-संशोधक डीसावाल ज्ञाति १७ दिल्ली (ढोली)-दिल्ली -रक्षा फरमान दर्शन " am जैनस्तोत्रसंग्रह सुलतान महम्मद.] अनुक्रमणिका [ १७५ ऐ. नाम " पहावली ऐ. नाम पृष्ठ. पृष्ट ढोरसमुद्र तुग(घ)लकावार संघलक-तुगलक तुरक २,२९,३१,४२,१४,६९ संत्रसार दक्षिण देश (मंडल) १९,२६, तपागच्छ (पक्ष)१०,११,१८, ३०,४२,९०,१०९ ४५,५८-६७,११५. दंडवीर्य ११८,१३२,१४५ दफरखान ६९७९ दर्भावति का डभोई नपोटमतकुटनशनक ७,६७ दाशरथिपुर-अयोध्या ताजदीन मलिक-सराई ३५ दाहडपुर ताजल मलिक दि क्रोनिकल्स ऑफ तापी दि पठाण किंग तांबी (श्रीमाल-गोन) ४,१३६ ऑफ दिल्ही तागपुर दिल्ली ५,७,९,२३,३०.३६, तालणपुर ८३ तिलंग देश ६०,६९,७१,७५,१०१, तिलंगाधिपति५९,१०२,१०५ १०१,१०९,११४,११८ तिहुणसिंह १२८,१२९,१३७,१४४, तीर्थकल्प ९,१८,२१,२५, ३६-३८,५३ दिल्लीश्वर २,१८,२२,२३, तीर्थनामसंयह २० ७७,१०९ तुग(पालक ४८. दीनार मलिक ४ १७६] ऐतिहासिक नामांनी [जिनप्रभसूरि अने ऐ नाम पृष्ठः ९ " दुवीरखान . ऐ. नाम पृष्ट. दीपालिका-फल्प (१) दयाश्रय महाकाव्य (२) धणियावी दीशापाल-डीसावाल धनपाल (पं.) १४७ दुर्ग ८३ धनमातृकापुर-धणियावी धंधकलस (कुल) देव धर्मकीर्ति गणि देपालपुर धर्मघोप सूरि ७८,७९,१४५ देवगिरि ६,९३१,३६,४१- धर्मदास १५९. १९,७८.८०,८५, धवलक-धोळका ८९.९३,२५,१०१, धातुपाठ-वृत्ति १०४,११५-१२२,१५५ धारा देवतिलक देवपालपुर देपालपुर धाराघर (पं. जोपी) ३१,३२ देवाधिदेव महावीर धी ट्रॅव्हलर ऑफ इस्लाम १६४ देवेन्द्रसरि (१) घोळका ८४ ६६,७८ (२) ममिनाथ (मूर्ति) देसलवंश १६. नयचक्र-वचनिका देसल शाह १०१-१०३,१०७ नयचंद्र फवि १०६ देहली दिल्ली नर्मा दोलनायाद-देवगिरि नापुर द्रोणत नलायन महाकाव्य ११५ मुलतान महम्मद.] अनुक्रमणिका [१७७ ऐ.'नाम पपनाम कवि नागदा-नागाहद नागपुर ८४ नागपुरीय नागलपुर मागहृद नागेंद्र गच्छ नाभिनंदननिनोद्वार प्रबंध ४२, ५४,१०१,१०,१०० नारायणदास नासिकपुर-कल्प २०,८४ नासिक्यः नासिक(क) निवस्थूर पर्वत ਕਿ ਗਦਰ ४२ नीमाड अक ८६ नीलकपुर नेमिनाथ (मूर्ति) ६९,८२-८६ फाग नैषधमक्षाकाव्य-टीका १६२ न्यायकंदली-विवरण पैदाण पुर २०,३६,८५ १२। करप २० पउमिणि देवी-पप्रावती पंचलिंगी-विवरण पंचशती-प्रबंध ५८,६२,६८, ६९, ७२, ७४, १२०, १२२, १३२, १६४. पटणा पाटलिपुत्र पट्टावली ७६,१६१ पत्तन-पाटण १०६ पग्रावती ६,१०,११,५९,७१, १३६-१३८,१५४, १६०,१६२ चतुष्पदिका परिशिष्ट पर्व १६२ ८१ पर्दूषणाकल्प-कल्पसून ४९ पल्हूपुर-पालणपुर पाटण ३३, ६१, ६६, ८५, १०३, १०६, ११५, पर्णविहार पुर प १७८] ऐतिहासिक नामोनी [जिनप्रभसूरि अने . नाम -रामा प. नाम जनभंडार-ग्रंथसूची ३, १८ पूर्णमद्र गणि. पाटलिपुत्र-कल्प २० पूर्णिमा गच्छ (पक्ष) ४३,११५ पांडु देश १०२, १०५ पूर्वदेश-तीर्थ १९ पांडुभूमंडलाखंडल- पृथ्वीघर पेथड स्थापनाचार्य १६० पृथ्वीराज २७,२८ पांड्यदेश- ६४ पेठण-पइट्ठाण पादलिप्त सूरि पेथड शाइ ४२,५८,८२-- पार्श्वनाथ (बिंब, मंदिर ) ३०, ८६, १०१ ४२,८१-८५ पेगेन पीरोज पालगपुर १३४,१३६ पोल्हाक( पोला)=पारहाक पालित्त पादलिप्त सूरि प्रकरणरत्नाकर ११-१३, पाल्हाक १३१,१३२ १५,१६ पावापुरी सीर्य-कल्प ९,२०, प्रतिष्ठान-पइट्ठाण पत्तन ४४,४५ प्रबंधकोश प्रयोघमूर्ति गणि ७६ ३९,४४,१६० २७ ५९-६२, ७१,११०-११५, प्रमावरुचरित्र ११८,१२१,१२५, प्रभासपाटण १६२ प्रमोचररत्नमाला-वृत्ति ११ पिटर्सन-रिपोर्ट २४,२५.३६, पीरोज पानशाह प्रयोयोदय वादस्पल , प्रमाचंद्र सूरि .
अनुवामणिका सुलतान ,महम्मद.] पे. नाम ८ भारतीचंद्र. ऐ. नाम पृष्ट. पृष्ठ. प्राचीन गूमरकाव्यसंप्रदः ४२, भट्टारक-निनप्रभ सूरि १०७ सराइ (पोसहशाला) ५१ प्राचीन जैनस्तोत्रसंग्रह भयहरस्तोत्र-वृत्ति . प्राचीन लेखमाला १४१ भरत प्राच्यविद्यामंदिर ४०,६७ भरुच भगपुर फलवर्षी ८,३४,५९ भानुचंद्र उ. पार्श्व-कल्प २० भानुतिलक १६२ स्तोत्र फलोधी फलवर्षी भीम संघपति ८८ फीरूज-पीरोज भीमदेव (१) फरमान १०७-१०९ भीमपल्लीक १०१ यंदी-मोचन ३४,५४ भुवनहित छ. बालादे राणी भृगुपुर ९०, ११२, चीकानेर. १३१,१११,१६२ " ज्ञानमंहार ७६,१६२, भैरव १६० भोज राजा ३३,१४७,१४८ २४ वृहट्टिपनिका वृहत्संहिता २८ प्रबंध वृहद्गच्छ ११०,११५ मकुही (२ । बोहित्य शाइ. ५३ मगदूमई जहां मगध . १११ ब्रह्मशांति यक्ष १८०] ऐतिहासिक नामोनी [ जिनप्रभसूरि अने मंडलीक ५२ कल्प " पे, नाम ऐ. नाम मंगलपुर मल्लिनाथ(मूर्ति) ८२,८४,८५ मंडप गिरिमांडव गढ मरिरूपेण सूरि मंडप दुर्ग= महणसिंह ४३, ११५, मैंडपादि ११९, १२०, १०४ १२३, १२७-१३३ मयुरातीर्य-उद्धार महम्मद तघलक (सुलतान,. १९ पातशाह) १,२,१८,२१-२४, यात्रा. ३०-३९,४३-४८, ५१, , मदन सूरि ५२,१५,६८,७५,१०५, मदनसिंह मणसिंह ११०-११२,११७,१३८-. मदुरा ३० १५७, १६४ मध्यकपुर महागणपति-स्तोत्र मध्यदेश-तीर्य महाघर १३६ मम्माण शेल २८ महाराष्ट्र मंडल ३५, १५५ मरुस्थली (मंडल) २६,६२ महावीरमाणपरकल्प मलिक महावीर-मूर्ति ३६,५५,५६, वयो १११ ७६,७७,८१,८४,१०१, मलयेदु सूर ११३ १०९, १४८-१५० मल्लदेव ३६ महेन्द्र मुनि १११-११३ माल वादी ५६ माणिक्यदेव-कल्प मल्लाणा मांडव गढ ७९,९,८२,९६ ११२ "२० सुलतान महम्मद ] अनुक्रमणिका [ १८९ ऐ. नाम माथुर वंश मानदेव शाह पृष्ठ मातंड १५. मेद मंडल ५ मेक्तुंग सरि माधव १०१ मेवाड(डी) ५०४, १३२ मंत्री १०४ मौलाना महाणा २६, २८ म्लेच्छपति ५९ मानभद्र सूरि ११० यंत्ररात्र मांधातमूल यादव ९२ मालव देश (मंडल) १९,७८, युगादिमिन-मंदिर ८२, ८८,९७, ९८, योगिनी (६१) १४१, १४५ १४४, १४७ पचन-दिल्ली मालवराज ९७, १०३ पीठ मिथिला तीर्थ-कल्प पुर- मुकुटिकामडी रघुवंश--टीका (शिशु- मुनिभद्र सूरि ५३,११०,१११ विपिणी) १६० मुनिसुन्दर सरि११,६५,७८,८९ रणथंभोर मुनिसुत्रत (मूर्ति) ३६,८५,८५ रत्न-परीक्षा मुहाणक रत्नपाल मुहरमोडासा १०१ रत्नपुर मुहणसिंह महणसिंह মুহুল=মহমর रत्नमंडन गणि मेघनाद रलमंदिर गणि " १०८ . तीर्थ-कल्प " १८२] ऐतिहासिक नामोनी [जिनप्रभसूरि अने पे, नाम . ~ पृष्ठ. ऐ. नाम रत्नशेखर सूरि(१) ११४,११५ रूणनगर ८४,११४ (२) ११५,११९ रुणापुरी-रूणनगर ९९ रूपाइ रत्नाकगवतारिका-पंजिका ४३ रेवतक-गिरनार रविवाटक १०१ लब्धिरंग रहस्यकल्पद्रुम १५४ लंपकर्णीपुर राघवचैतन्य ७५,१४१-१४३ लाला साधु (शाह) ४१ राघवदेव राघवचैतन्य लावण्यप्रसाद '९०,९१ रोजगृही लींबडी-जैन ज्ञानभडार १८ राजपूताना लेख-पद्धति राजपसाद शत्रुभयतीर्थकल्प वंकी ( वांकी) राजशेखर सूरि ४३,४४,१२९ वनसेन सूरि रानसीह वटपद्र४,७५,८५,८६,१.५९, राजसोम राजादि-रुचादि-गण-पृत्ति ९ वड्यूण (१) वडोद(द्रा) वटपद्र वडोदरा रामदेव (राजा) ७८,९०,९१, , वढवाण ( ? वडवाणी ) ९७,९८,१०१,१०२ वर्धमान पुर रामदेव (शेठ) वयली वामनस्थली रुद्रपल्लीय गच्छ ३८,४१,४३ वरंगल-उरंगल रुद्रमहालय ९९ वादेव . ५० राजाधिगज-महम्मद .
अनुक्रमणिका [१८३ सुलतान महम्मद.] . वर्धमान पुर ७ . ये. नाम ऐ. नाम वर्धनपुर विद्यानंद वर्धमान तीर्थ १५८ विद्यापुर-बीजापुर ८५ विद्युन्माली देव वलभी-भंग विधिप्रपा वस्तुपाल-तेजपाल-कल्प २१, विधिमार्ग २७ ८१,९० विनोदकथा-संग्रह .४३ वागड देश विन्धनपुर ८२ वाघेला विविधतीर्थ-कल्प तीर्थकल्प वाणारसी-वाराणसी विशालरान गणि वाणी ८६ विहार(क)-जिनमंदिर ८४,९३ वामनस्थली वीजापुर वाराणसी १४१ २८ कल्प वीरजिन (बिंध, विहार ) ३७ वास्तुसार १०८,१०९ ५१,९६,५८,६७,८३.८५, वाइड १३ ८ स्तोत्र-वृत्ति विकन(म) पुर=विक्रमपुर ९० विक्रमपुर वीरधवल २६,८२,८६ विजयकटक वीरवल्ल (बल्लाल) विजययंत्र ६०,६१ वीरिणि विद्यातिलक मुनि ३३,३८,१०० वीसल देव ४२,१५१ वृद्ध( वृहत )क्षेत्रसमास ११ १.१५ " बृहपृत्तांत " " १९६ .
१८४] ऐतिहासिक नामोती [ जिनप्रभरि अने । . नाम ऐ. नाम १११ " स्तवन. " पृष्ठ पृष्ठ वेस गोत्र १६० शाकंभरीश्वर १४२ वैभारगिरि तीर्थ-कल्प १९ शाकिनी व्यवस्थापत्र १५४ शान्तिनायमिन (विष) १३,५४, न्याघ्री-कल्प ८२, ८३, ८५ ध्यारा विहारक प्रासाद शक फुल चरित (महाकाव्य) ४३, राजा ३९-४१ १०९, १११ सैन्य १८ शकाधिराज महम्मद शारदा (मूर्वि) १०२, १६० शंखपुर शाईघर ८४ शंखपुर तीर्थ-कल्प पद्धति २० शत्रुजय तीर्थ ३, २८, ३४, शिलादित्य १:३ शिव-शक्ति (मोती-जोडी)१२८ ५५, ६७,६८, ७५-७७, शिशुपालवध महाकाव्य १६० ८०,८१,८७, १०६,११७ शीलतरंगिणी १०, ४१ "उद्धार १२, १४, १०७ शुद्धदंती तीर्थ-कल्प २० कल्प ९, १९, २१-२४, शुभशील गणि ५८, ६२, ६८- ३४, १०६ सेवक ७४, ११६, ११५ शत्रुजयावतार शेख सहायुद्-दीन (पोरी) २८ , श्राविधि " १२०, १३३ सुलतान महम्मद.] अनुक्रमणिका [९८५ पे. नाम ये. नाम पृष्ठ. श्रावस्ती-तीर्थकल्प समयसार नाटक-वृत्ति १.६२ श्रीधर समयसुंदर श्रीपालकथा सिरिवालकहा समरसिंह १२, १४, १२४, भीमालवंश(शो) १३४, १३५, १०६,१०७ वास १५९-१६३ समवसरण-कल्प संघ १३४, १३९ समियानक भीरंगम् टापू (पट्टन) संप्रति श्रेणिकचरित्र (व्याश्रय) संबोधसत्तरी संघतिलकाचार्य ३८, ४०- सम्यक्त्वसप्तति-वृत्ति ३९,१४८ सास्वती-कोश (७) संघपट्टा टीका २७ सरस्वतीपत्तन पाटण सत्तस्रय देश सत्यपुर-तीर्थकल्प २०,१०५ सलक्षणपुर सत्या(सच्चाइ-सच्चिकादेवी) संसारचंद्र सहजा शाह ४२, १०१,१०२ ९३, १४ सणासुदुरपीन(नासरुद्दीन)१११ संतिकर स्तवन सहनमल्ल संदेवियोपपि साइपुर साइयाण ५० सपादलक्ष १०४, १२६,१२७ सप्ततिशवस्थान ११ साकेतपुर-अयोध्या समयध्वज १६२ सागरतिलक .
१८६ ] ऐतिहासिक मामोनी [ जिनप्रभसूरि अने ऐ. नाम " पृष्ठ ऐ. नाम 'पृष्ठ साचोर १०३,१०५ सिंहा(घा)नक ८३, १६२ साधुपतिक्रमणसूत्र-वृत्ति सीहड ११४ सामंत ४३ सुकृतसागर काव्य ८२,८९,१०१ सारस्वतपत्तन-पाटण सुगुरु-परंपरा-गाथाकुलफ १५९ सारूआर घाट प्रासाद १०० गीत १५९ सालिग १६० सुमटपाल साहबदीन शहाव-उद्-दीन १३६, १३७ सुमति गणि साहण सिकंदर सुरगिरि देवगिरि सिद्धचक्र-यंत्रोद्धार सुरत्राण-सुलतान सिद्ध सूरि १०२,१०३,१०७ सुलतान महम्मद सिद्धराज ऑफ देहली ९९, १४४ २७ सिद्धवाकूट . " सराइ सूरप्रभ उ. सूगचार्य सिद्धसेन दिवाकर सिद्धांतस्तव २७ , अवचरि १० १० सूरिमंत्राम्नाय (विद्यापल्प) ९ सेतुबंध ८५ सेत्तुज-शत्रुजय सिद्धिचंद्र वाचा सिंदूरप्रकर-टीफा १५९,१६२ सिरि सिरिवालकदा सिरोह सिंहण देव सोपार पुर सोमतिलक सरि (१) १०,११, ६६, ६८,८०,८७, ऐ. नाम हंसकीर्ति राजा १०४ सुलतान महम्मद.] अनुक्रमणिका [ १८७ ऐ. नाम (२) ३३,४०-४२ हरिभद्र सूरि ५६ सोमधर्म गणि ६,९,१९,११८ हरिपेण सोमनाथ १०४ वर्षकीर्ति सरि सोमप्रभाचार्य ६३-६८,१५९ हर्षपुरीय गच्छ ४३ सोममूर्ति गणि सोमेश्वर पत्तन हंसलपुर २६ हस्तिनापुर १८,८३ सोरठ तीर्थ-कल्प २०,५६ सो( ? मो )हिलवाडी १३६ प्रतिष्ठा सौराष्ट्र तीर्य यात्रा सौवर्तक स्तोत्र १८ स्तंभतीर्थ ६६, ८८, १०६ हिंदूराजा (राज्य) ४७,५६ स्तंभनपार्श्व-तीर्थंकल्प १९ हीरविजय सूरि स्तमनेंद्र-प्रबंध ४३ हेमचंद्र साधु स्याद्वादमैनरी हेमचंद्राचार्य १,५६,१३४ हम्मीर हेमनाममाला-शिलोंछ ३३,१५ चौहाण हेमाड पंत-हेमाद्रि १०२ देव ११४ हेमाद्रि(दि) ७८,८६,९०-९ 'हेमाद्रि उर्फ हेमाड पंत' हरिपंखी-पार्श्व-कल्प २० होयसाल राजा ५४ २ ४ " मद-मईन २ " -महम्मद १८६ ] ऐतिहासिक मामोनी [ जिनप्रभसूरि अने ऐ, नाम पृष्ठ ऐ. नाम पृष्ठ ८३, १६२ " १३६, १३७ '२७ सुमति गणि साचोर सिंहा(घा)नक साधुपतिक्रमणसूत्र-गृत्ति सीहड सामंत ४३ सुकृतसागर काव्य ८२,८९,१०१ सारस्वतपत्तन-पाटण सुगुरु-परंपरा-गाथाकुलक५५९ सारूआर घाट प्रासाद १०० गीत १५९ सालिग सुमटपाल साहबदीन शहाब-उद्-दीन साहण सिकंदर सुरगिरिदेवगिरि सिद्धचक्र यंत्रोद्धार सुरत्राण-सुलतान सिद्ध सूरि १०२,१०३, १०७ सुलतान महम्मद सिद्धगज ऑफ देहली १६४ ९९, १४४ सिद्धवरकूट सिद्धसेन दिवाकर सिद्धांतस्तव अवचूरि सूरिमंत्राम्नाय (विद्यापल्प) ९ सिद्धिचंद्र वाचक सेतुबंध सिंदूरप्रकर-टीका ११९,१६२ सेत्तुंज=शत्रुजय सिरि ४३ ८४ सिरिवालकहा सोमतिलक सरि (१)१०,११, सिरोह ६६, ६८,८०,८७, सिंहण देव " सराइ ३७,४९ २७ सूरप्रभ उ. सूराचार्य १० १० सोपार पुर पृष्ठ ७७ . ७७ मोतिहासिक घटना-निर्देशक संवत्सर-सूची विक्रम संवत् पृष्ठ विक्रम संवत् १३२७ १३२८ १०८१ १३३ १ ४,३१,७५,७७,७८ १३३२ १२१० १३३३ १२३३ ३३,७७ १२४८ १२७७ १३३७ (अयुक्त) ४५ १२८० ९१ १३४७ (१७१) १५० १२९५ ६६ १३४८ १२९७ १३४९ १३५२ ६६ २९ । १६५६ ७,१०४ १३२० ८१,८२ १३९७ .७९ १६६ १३४१ १०३ . ७ १३६४.. , १९०] ऐतिहासिक घटना-निर्देशक [जिनप्रभसूरि अने विक्रम संवत् पृष्ठ विक्रम संवत् पृष्ठ १३६५ ७८ १३८९ ९.२२, २३, १३६६ १०६ १३६७ १०५ ४, ६,९,५१, १३६९ ८, ११,१०६ ५३, ५५, ६८,१०५ ४२, ५४, १०१,१०६ १०१, १०४,१०७ १३७२ १०८ १३९४ २३७३ १३९७ १०८, १०९ १३७७ १४०१ १४०५ ४३, ४४, १२९ ९,२३, ६७, १४०७ १३८३ ४३, १०९, १९८५ ९, २९, ३०, ३२,३,४०, ६७, १०५, १०६, ११२२ ३८, १११,११८ २५३, ११५ १४२४ १३८६ १४२७ १३८७ ९, ११, ११, १४२८ ४२,४४, ४५ | १४२९ २३, ६० .
संवत्सर-सूची [ १९. सुलतान महम्मद.] विक्रम संवत् पृष्ठ विकम संवत् पृष्ठ १६२ ६० १४४४ १४६६ १४८३ ११,६७, ७८ १५०३ ६, ९, ५९, १७२६ ११८ १८९५ १५०६ ११५, ११९ १९२२ १६० १६४ ११३ १०६ १५१२ १५१७ १५२१ ५८, ६२, ६८, १९७१ २९, ११२ १९७९ (सन् १९२३) २४ १९८२ ११२ १९८७ (सन् १९३१) ९२ १२०, १२२ १५५५ १५८५ शुद्धि-पत्रक पृष्ठ पंक्ति ८ ९ " अशुद्ध ८ -चीरस्तोत्र वीरस्तोत्र(स्वर्णसिद्धिर्मित) सरि- सूरिमंत्र-प्रदेश विवरण २२ इरयादि इत्यादि पंचकल्याणमय कल्याणकमय अप्रसिद्ध प्रसिद्ध नमस्त्रिजगद्वन्दित- नमस्त्रिदशषन्दितक्रमे १९, २०पारसी फारसी २० (शौरीपुर) २१ आराम- आराम (आमर)- निवृत्ति निति- ४५ २२ ९४२३ १४८३ ५८, ६२८, १९ १५२९ (१) ૧૬૨૨ २ कथाकोश कथाकोश (कथा २) -कोश -कोश ( कथा ) ६३ १४ -कोश -कोश (फया पुरण पुराण ૨૨ म्हारे १२८ शक्ति शकि ૨૨ पदी पछी धाकानेर बीकानेर भरव भैरव सग सर्ग " " ) "