Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Shri Alpaparichit Saidhantik Shabda Kosh

Acharuya Shri Anandsagarsurishwarji · 2010/10

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Front matter

. 2 इदै पुस्तकं सूर्यपुरे श्रेष्ठि-देवचन्दलालभाई जैन पुस्तकाद्धारसंस्थाया अवैतनिककार्यवाहक-मोतीवंद-मंगनभाई चोंकसी इत्यनेनसरस्वतीमुद्रणालये, गोपीपुरा, मुद्रणमन्दिरे बालुभाई-हीरालाल-लालनद्वारा मुद्रापितम् । . अस्य पुनर्मुद्र गाथाः सऽधिकारा एतद्भाण्डागारकार्यवाहकैरायत्तीकृता । All Rights Reserved By The Trustees of the Fund. Printed By Balubhai Hiralal Lalan at the 'Sarasvati Mudranlaya' Gopipura, Surat, Published By Sheth -Devchand Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund, At Sheth Devchand Lalbhai Jain Boarding House for Shri Ratansagarji- Jain Boarding, Badekhan Chakla,. Gopipura, Surat. By the Hon. Managing Trustee, Motichand Maganbhai Choksi.

Sheth Devchand Lalbhai Pustakoddhar Fund Series No. 101
Shree
Alpaparichit
Saidhantik Shabda - Kosh
FIRST
PART
( A TO AOU)
i Author :-
Agmoddharak Acharya Shree Anandsagarsurishwarji
.: Editor
Agmoddharak Shree Anandsagarsurishwarji 's Sishyo
Muni Kanchanvijay and Muni Kshemankarsagar
Collected:-
SHREE GUNSAGARJI
SHREE ANANDSAGARSURISHWARJI'S ANTEWASI
Publisher :-
Motichand Maganbhai Choksi
Managing Trustee for :-
Shethi DEVCH AND LALBHAI JAIN PUSTAKODDHAR FUND
SURAT
First Edition
Vikram Samvat 2010.
am
Price Rs. 6-0-0
Copies 500
Christation Era 1954.

4
The Board of Trustees:
Nemchand Gulabchand Devchand Zaveri
Talakchand Motichand
-
Babubhai Premchand
Amichand Zaverchand
Keshrichand Hirachand
Motichand Maganbhai
Hon. Managing Trustee.
Choksi
卐
.-
"
संस्थान ट्रस्टी मंडळ :-
श्री नेमचंद गुलाबचंद देवचंद झवेरी
तलकचंद मोतीचंद
बाबुभाई प्रेमचंद
अमीचंद झवेरचद
केशरीचंद हीराचंद
मोतीचंद मगनभाई चोकसी
ऑन. मेनेजींग दृस्टी
।
।

THE LATE
SHETH DEVCHAND LALBHAI JAVERI.
DID 1IH JANUARY 1000AD, IBOMBAI
BORN 18 DSLR NT
-
श्रेष्ठी देवचन्द लालभाई जहवेरी.
जन्म १९०९ वैक्रमादे
कार्तिकशुक्लैकादश्या (देवदीपावलीदिने)
सूर्यपूरे.
निर्याणम् १९६२ वैक्रमाने
पौषकृष्णतृतीयायाम् (मकरसंक्रान्ततिर्थी
मोहमयीनगर्याम्
-
.

४ आगमोनु मुद्रण-याचना-आ कलिकालमां विक्रमनी बीसमी सदीमां एवो पण एक समय आधी के ज्यां शास्त्रीय वोघ ओडो थवा लाग्यो अने हस्तलिखित प्रतो वांचवानी तेमज वांचवा माटे प्रती मेळवबानी पण मुझकेली ओ ऊभी थई. आथी जो लखाण छापेलु मळी जाय अने तेनो जो बाब अवाय नो ते हितावह निवडे. आ हेतुथी आगमो छपावचा अने तेनी वाचनाओ आपबी म प. पू. भागमोद्धारक्रगुरुदेवश्रीनी प्रेरणाथी नक्की. थयु. अने संपादननुं कार्य अने वाचनानुं कांचे आगमज्योतिर्वर, अग्रमादी. आगमोद्धारकथीने ज करवानुं थयु. आधी जेम जेम आगभो लगाता नेम तेम पाटण५ आदि स्थलोप 'वाचनाओ' अपाई अने तेनो सेंकडो साधुसाध्वीओए कालीगे. भागमा पी लागर थने तेमां आवता विपयो पण ए सागरना उपसागरो जेवा छे. परतु छूटा छ्टा पडया होय तो उपसागर रूपे देखाय, तेथी ते वधा प्रवाहो एकत्र करी हुदा उपसागरो बनाववा. आ मुद्दाए जेम आगमो छपाता गया तेम तेम वर्तमान श्रुतना - धारगुरुदेवधीर आगमोमां जुदा जुदा विपयोने जणावनारा त्रेपन (५३) अंको पाड्या मं नर मादेना शब्दो अंगे पण फूल 'नुं एक निशान कर्यु ए निशानो एवां हतां या सन्दर्था त्यां सुधीनो भाग लेवानो छे ते जणाववा माटे आदिमां अने अंतमा कन्न नाले क्षेत्र वामां आवतो हतो. ज्यारे आ कोपना शब्दोने अंगे फूलनु निशान नहुँ हदं. नेना पण बी करवामां आवती हती के-जो शब्द एक अक्षरनो होय तो न है तो वेनी वच्चे, यावत् जेटला अक्षरनो होय तेना मध्य विन्दुए निशान नब का अर्श रीते शब्दोती संकलना थई. आ वधा विषयो अने शब्दो लहिया मनपान करवाता हता. संग्वें नम प्रोअल्पपरिचितसद्धान्तिकशब्दकोप' राखवामा आव्यु छ कारण को गरमपरायेला तमाम शब्दो नथी, एरंतु जे शब्दनो परिचय अल्प ८. १९७ना महा सुद १० ने सोमवार २५-१-१९१५ना दिवसे सोनु आगमोद्धारव कृत 'आगासमितिस्थापनास्तव • आगासमितिस्थापनाम्तव' अमाग समादित 33 वाचना आपेल ग्रन्थोना नाम दादेशिक श्रीसूत्रकृतागसूत्र, २॥ पढ़ शिकाओं। रिहा, श्रीयोगदृष्टिसमुन्चय, श्रीअनुयोगद्वारसूत्र १/- न १५, श्रीउत्तराध्ययनसूत्र १/३। किशाश्वतन्त्र ८४, श्रीस्थानागसूत्र १/२॥ देवावयासून १२, श्रीस्थानागसूत्र १,२, श्रीऔपातिकसूत्र जान्न श्रीआचारागसूत्र 121 : :, आचारागसूत्र १,२, श्रीअनुयोगद्वारसूत्र १/२, का A २ tak "ति, भौण्डिनियुक्ति, श्रीभगवर्त सूत्र ८४१, न३३।। श्रेप्रतापनासूत्र : श्रीसमवायागमूत्र r 1

THE LATE
SHETH DEVCHAND LALBHAI JAVERI.
ROR 185) HRAT
OLD IMIJIHARI 100GAD, BOMBAY
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श्रेष्ठी देवचन्द लालभाई जहवेरी.
जन्म १९०९ वैक्रमादे
कार्तिक शुक्लकादश्या (देवदीपावलीदिने)
सूर्यपूरे.
निर्याणम् १९६२ चैत्रमा
पोपकृष्णतृतीयायाम् (मकरसंक्रान्ततिर्था
मोहमयीनगर्याम्
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f ܫ1 ܝ f ܬ ܙ ܛܢ ܢ ܕܕ 1 ܕ ; ܙ ܝ ܙ 1 ܐ ܙ 1 ܝ ܝܢ ܐ ܢܝ ܛ v ܙ 1 ܨ ܙ ܫܢ v ܕ ܀ 1 ܐ ܝܫܝܢ . प्रकाशकीय - ' आ अवसर्विणी कालना दुपम आरामा चरमगासनपति श्रमण भगवान् महावीर स्वामीना शासनमां शासनना पुण्य प्रतापे ते ने समये आचार्य भगवंतोले 'आगम' वगेरे साहित्यनो उद्धार, पुनरुद्धार करीने आ कलिकालमा वीसमी सढीमां जे विद्यमान रास्युं छे ते आपणुं अहोभाग्य छे. तेथी तेवा साहित्यने प्रकाशन करवा माटे अमारी आ संस्था सं १९६४मां प पू. आगमोद्धारक गुरुदेवश्रीना उपदेशश्री स्थपाई हती. आ सस्था मारफत अमे आज सुधी १०० ग्रन्थो प्रकाशीत करी चूक्या छी अने अमे १०१मा ग्रन्थाइ तरीके श्रीशल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपना नामे आ ग्रन्थने सहर्प प्रगट करी छी नारक आगमोद्धारक गुरुटेवश्रीप आ कलिकालना विषम वातावरणमां आगमोनो बोय दुर्वाध न थई जाय ते हेतुझे आगमोदयसमितिनी स्थापना करावी अने आगमवाचना आपवान कर्यु. तेथी ते समितिथे आगमो छयायवानुं काय शरू कयु. तेमज आ संस्थाए पण अनुयोगद्वार वगेरे आगमो छयाव्यां ते वखते अने पछीथी आगमोद्धारक गुरुदेवश्रीर आगमोना जुदा जुदा विषयो तारवतां 'आगमकोयनो पण मेक विषय तारव्यो हतो अने कोप छपाचवो हतो आ विचारो- त्पत्ति आजथी पांवीन वर्ष पहेलां थई हति प. ता गुरुदेवश्रीना सदुपदेशश्री नीचेना सद्गृहस्थो तरफथी नीचेनी रकमो अमारी संस्थाने मळी हती. ते आ प्रमाणे - १ अमदावादिनिवासी शा डाह्याभाई पीतांबरदास रू १५०१. २. सुरतनिवासी अवेरी सोभागचंद सुरचंद रू १००१. ३ सुरतनिवासी झवेरी सांकळचंद सुरचद रू ५०१ आचार्य देवनो विहार माळवा, बंगाळ तरफ लंबायो होवाथी ते कार्य धणी मुदत सुधी पड़ी रघु हतु. ते ( छपावधान कार्य ) अमे आगमोद्धारक गुरुदेवश्रीनी संमतिथी शरू कर्यु आ नीर्णय सं २००४मां थयो - आथी प. ता गुरुदेवश्रीनी आशा अनुसार पू मुगिमहाराज श्रीगुणसागरजी पासे थी श्रीअल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपर्नु प्रेस मेटर अमे मेळव्युं ते श्रीसरस्वतीमुद्राणालय, सुरतमा छपाचवा माटे आप्यु अने तेनुं सपादन करवा माटे मुनिमहाराज श्रीकंचनविजयजी तथा श्रीक्षेमकरसागरजीने विनंति करी तेओश्री आगमोद्धारकगुरुदेवश्रीना अनन्य पटघर, विद्याव्यासंगी, श्रुतस्थविर, आचार्य महाराज श्रीमाणिक्यसागरसूरीश्वरजी महाराजनो संयोग मल्यो त्यां सुधि प्रफ चंचायवा पूर्वक अने ते पछीथी स्वतंत्रपणे ( ते मुनियों) आ संपादन कार्य कयु तेथी अमो आ अद्वितीय आगमतलस्पर्शीशाता, आगामतत्त्व पारदृश्या, आगमज्योतिर्धर, शासनसंरक्षणवद्धकक्ष, तत्त्वशिरोमणि, आगमाव्युवित्तिकर शिलाताम्रपत्रोत्कीर्णागमकारापक, गंभीरानेकग्रन्थप्रणेता, अन्त्यसमये पक्षावधि अर्धपद्मासनस्थायी, ध्यानस्थस्वर्गत PAP । भ २ आगमोद्धारक आवार्यवर्य श्रीआनन्दसागरसूरीश्वरजी महाराजे 'संकलित' करेलो श्री- अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषनो 'संपूर्ण स्वर' सुधीनो पहेलो भाग सहर्ष प्रकाशित करीए छीए आ संस्थाना प्रथम पुस्तकना संपादक तरीके पण आचार्यदेव श्रीआणंदसागरसूरिश्वरजी म हता अने बीजा सेंकडानी शरुआतना प्रथम पुस्तक तरीके पण तेओश्रीनो सकलीत अमूल्य कोप प्रसिद्ध करीए छीए. कोषनी विशिष्टता अंगे संपादकिय निवेदनमा घणु कयुं छे, छतां अमारी संस्थाए आना प्रकाशनमां वधारे रस लीघो तेनु मुख्य कारण ए छे, के आज सुधी छपायेला प्राकृतकोषोमां अभिधानराजेन्द्रकोष, पाइयसद्दमहण्णवो आदि केटलाक कोषो छे पण तेमां न्यूनाधिकरुपे विचार करतां उपयोगितामा बाध आवे छे-जेमके अभिधान राजेन्द्र कोष प्रमाणमां एटलो वधो मोटो छे के तेमांथी कोइ शब्द शोधवा माटे वधारे परिश्रम पडे अने छपाईमां के सम्पादनमा त्रुटी रहेवाने लीधे सूत्रो अने ते ते प्रकरणो घणा परिश्रम पछी पण जडतां नथी पाईयसहमहण्णवोमां जैनसैद्धान्तिक शब्दो उपर वधारे भार मूक्यो होय तेम जणातुं नथी. पण प्रस्तुत ग्रन्थमां कोई पण जैन के जेनेतर विद्वान् प्रवलित जन पारिभासिक शब्दोनो यथार्थ परिचय टुंकमा अने सहेलाइथी प्राप्त करी शके एवी तक छे, तथा मुनिराजो पण ग्रन्थ सम्पादनना कार्योमा सहायता लइ शके तेम पण छे. अमे इच्छीए छीए के आना प्रकाशनने विद्वज्जनो योग्य आदर करशे ज. आ कोषने अंगे सज्ञाओनी समजणो तथा ते ते ग्रन्थोनां पानांओनी सूची पण संपादक पू महाराजोए आपी छे ते अंगे 'संपादकीय' वांचया वांचक वर्गने अमारी विनंति छ आ ग्रन्थना संकलनाकार प पू. आगमोद्धारक गुरुदेवश्रीन स्तोत्र सुमनोहर गूंथी ग्रंथने ४ नो अलंकृत करनार सदा झानोद्यमीव्याकरण-साहित्य-न्यायविसारद उपकार मानीए छीए अमारा प्रकाशन कार्यमा जे जे महाशयोए अमने मदद करी छे ते ते महाशयोना अमे ऋणी छीए. लि० भवदीय वि. सं. २०१० आशो सुद १५ विजयादशमि मोतीचंद मगनभाई चोकसी विगेरे ट्रस्टीओ ता ७-९-१९५४ x x x . " १ तेओश्रीनो सुरत उपर तो अनहद उपकार छे तेओश्रीने सवत १९७४ ना वैशाख सुद १० ना सुरतमा ज आचार्य पदवी अपाइ हती. श्रीजैनानदपुस्तकालय, श्रीवर्धमानजैनताम्रपत्रागममदिर वगेरे सुरतमा ज छे. अने स. २००६ ना वैशाख वद ५ मे ‘स्वर्गवास' पण सुरतमा ज थयो छे. तेओश्रीनो अग्निसस्कार पण सुरत शहेरनी मध्यवर्ती गोपीपुरामा आगमनमदिरना सामे जूनीअदालतथी ओळखाती जमीनमा थयो हतो. वळी तेज जग्या उपर गुरुदेवधीना स्मरण तरीके सपूर्ण इतिहामने जणावनारु 'श्रीआगमोद्धारकगुरुमदिर' वधाववामा आव्यु छे. २. तेओश्रीनु मूख्य कार्यक्षेत्र सुरत ज रघु हतु. तेनी प्रतिकतरीके अनेक ज्ञान विपसानी सस्थाओ स्थाइ हति. (१) शेठ देवचद लालभाई जैन पुस्तकोद्धार फड. (२) शेठ नगीनभाई मछुभाई जैन साहित्योद्धार फड. (३) श्रीरत्नासागरजीजैनमीडलरकुल ( विद्याशाला ) कायमि फड श्रीजैन तत्वबोध बोय पाठशाला वीगरे अनेक सस्थाओ तेओना उपदेशनु अ परिणाम छे.

३ संपादकीय वक्तव्य क १ "ॐ णमो चउवीसाए तित्ययराणं उसभाईमहावीर पजवसाणाण । णमो गोयमाईमहामुणीणं । इक्कारस अंगाई, वारसुवंगा पइन्नगा दस य। छेया छ चऊ मूला, नंदी अणुओगा णमंसामि ॥१॥" साहित्यमां ऊंडा ऊतरेला रसिकोने विविध विषयोना वोधनी आवश्यकता रहे छे. जे विपयनो वोध जे मनुष्यने होवो जोइ ते बोध सिवायनो मनुष्य ते विपयने ग्रहण करवा जाय तो अज्ञानी वांदरानी जेम "मने पकडयो-मने पकडयो" जेवी अनी दशा थाय तेथी ते विषयना बोध माटे ते विषयना शब्दना ज्ञाननी, अर्थना शाननी अने तेना भावार्थना ज्ञाननी, अर्थात् ते पदार्थना शब्दार्थ, भावार्थ अने ऐदंपर्यानी जरूर छे जो ते समज्या सिवाय प्रवृत्ति काय तो भोजन करवा बेठेलो 'सेंधव' मंगावे अने 'घोडो' लावे तेना जेवु थाय शब्दना बोधने करनारूं जे साहित्य होय तेने 'शब्दकोष' आदि शब्दथी संवोधी शकाय. एवा 'शब्रकोषो'नी उत्पत्ति कां तो आगमोमां आवेला पर्यायो रूपे आपी होय कां तो निघण्टु जेवा 'शब्दकोषो' रूपे होय, अथवा वीजा घणा 'शब्दकोषो' रूपे होय. आथी दरेक भापावार अनेक 'शब्दकोपो' योजाया छे अने योजाय छे. जैन दर्शन माटे तो ते शब्दोना अर्थ टीकाकारोए प्रकरणना आधारे जे रीते मंजुर कर्या छे ते रीते ज लेवा योग्य छे शब्दो-यौगिक, रूढ अने मिश्र एम साहित्यकारोए मान्या छे, ते यथार्थ छे. आथी जैन दर्शनमां ऊंडा ऊतरवावाळाने पण ते वोधनी जरूर तो छ ज, तेथी तेवा प्रकारना 'शब्दकोष'नी जरूरियात मानवीज पडे. आ उद्देश लक्ष्यमां लइशुं तो जैन दर्शनमा आवता शब्दोना अर्थवाला अनेक कोषो होवा छतां पण आ नवा कोष माटे स्थान छे ज. संकलनाकार-ग्रन्थकार स्वतंत्र लेखिनीथी जे ग्रन्थ करे तेमनी ज कृति कहेवाय छे. परंतु वीजा ग्रन्थोमांथी अकत्रित करेलुं होय तो आ वधुं वीजा ज ग्रन्थोमांनुं छे, एम जणाववा माटे पोते संकलना करी छे एम जणावे छे. तेथी महत्त्वपूर्ण अनेक जैन ग्रन्थोना संपादक अने संशोधक, तेमज सस्कृत, पाकृत अने गुजरातीमां विविध विषयोनी कृतिओ रचनारा,२ आगमोद्धारक आचार्य श्राआनन्दसागरसरीश्वरजी महाराजे सैद्धान्तिक शब्दोनी आ कोपमा संकलना करी छे, आथी आ ग्रन्थना 'संकलनाकार' प. ता. आगामोद्धारकगुरुदेवश्री छे १) मगळाचरण तरीके आपेलु समग्र अधमागधी छेल्ला अक शब्दने छोहीने 'शिलोत्कीर्ण आगमों'नी पीठिकामानु छे जुओ-आगमरत्नमजूषा शिला न. १/१. (२) जुओ अमारी सपादन बरेली पुस्तिका-(१) प्रशमरति अने सबधकारिका, परि. ३ थी ८ 'आगमोद्धारकनी साहित्यसेवा', (२) उपदेशरत्नाकर (भावार्थ) पृ १९-२७ 'आगमोद्धारकनी साहित्यसेवा', (३) आचारागसूत्र पृ २५२-२५६ 'आगमोद्धारकनी साहित्यसेवा', (४) आनदसुधासिन्धु भा २ परि. ४ 'आगमोद्धारकना व्याख्यानोनी सूत्रों तथा 'आगमोद्धारककृत चैत्यावदनादि', (५) आराधनामार्ग भा. १ पृ २२-२३ 'आगमोद्धारककृत चैत्यवदनादि. ३) आ सवधमा जुओ-"आगमोद्धारकविरुद" नामनो प्रो हीरालाल २. कापडियानो लघु लेख मे लेख सुरनना "प्रभाकरपत्रना ता १४-५-५०ना अकमा छपायो छे -- ४ आगमोनुं मुद्रण-वाचना-आ कलिकालमा विक्रमनी वीसमी सदीमां एवो पण एक समय आव्यो के ज्यां शास्त्रीय बोघ ओछो थवा लाग्यो अने हस्तलिखित प्रतो वांचवानी तेमज वांचवा मोटे प्रतो मेळववानी पण मुश्केलीओ ऊभी थई. आथी जो लखाण छापेलु मळी जाय अने तेनो जो बोध अपाय तो ते हितावह निवडे. आ हेतुथी आगमो छपाववा अने तेनी वाचनाओ आपत्री एम प पू. आगमोद्धारकगुरूदेवश्रीनी प्रेरणाथी नक्की. थयु. अने संपादनेनुं कार्य अने वाचनानुं कार्य आगमज्योतिर्थर, अप्रमादी. आगमोद्धारकश्रीने ज कर गर्नु थयु आथी जेम जेम आगभो छपाता तेम तेम पाटण५ आदि स्थलोप 'वाचनाओ' अपाई अने तेनो सेंकडो साधुसाध्वीओए लाभ लीयो. आगमो रूपी सागर अने तेमां आवता विषयो पण प सागरना उपसागरो जेवा छे. परंतु ते अखात. रूपे छूटा छूटा पडया होय तो उपसागर रूपे देखाय, तेथी ते वधा प्रवाहो एकत्र करी जुदा जुदा उपसागरो वनाववा. आ मुद्दाए जेम आगमो छपाता गया तेम तेम वर्तमान श्रुतना ज्ञाता आगमोद्धारकगुरुदेवश्रीए आगमोमां जुदा जुदा विपयोने जणावनारा त्रेपन (५३) अंको पाड्या अने 'शब्दकोप' माटेना शब्दो अंगे पण फूल 'नुं एक निशान कर्यु ए निशानो एवां हतां के-अंकोमा यया शब्दथी क्यां सुधीनो भाग लेवानो छे ते जणाववा माटे आदिमां अने अंतमा निशाननी साथे अंक भूकवामां आवतो हतो. ज्यारे आ कोषना शब्दोने अंगे फूलनुं निशान भूरवामां आवतुं हतं तेमां पण खूबी करवामां आवती हती के जो शब्द एक अक्षरनो होय तो एकनी नीचे, बेनो होय तो बेनी वच्चे, यावत् जेटला अक्षरनो होय तेना मध्य बिन्दुए निशान मूकवामां आवतुं हतुं आवी रीते शब्दोनी संकलना थई. आ वधा विपयो अने शब्दो लहिया द्वारा उताराईने एकत्रित वरावाता हता. नाम-आ कोपर्नु नाम 'श्रोअल्पपरिचितसद्धान्तिकशब्दकोप' राखवामां आव्यु छ कारण ९ छे के-आ कोपमां आगमोमां वपरायेला तमाम शब्दो नथी, एरंतु जे शब्दनो परिचय अल्प छे वि स १ पाटण १९७१ ४ आगमो छपाववा माटे भोयणीतीर्थमा म १९७१ना महा सुद १० ने सोमवार २५-१-१९१५ना दिवसे श्रीआगमोदयसमितिनी स्थापना थई. आना अगेनु आगमोद्धारक कृत 'आगमसमितिस्थापनास्तव अमाग समादित आचारंगसूत्र (भाग १) (व्या. स ) मा छपायु ५न स्थळ वाचना आपेल ग्रन्थोना नाम श्रीदशवकालिक, श्रीसूत्रकृतागसूत्र, २॥ पशिकाओ। २ कपडवणज १९७२ श्रीललितविस्वरा, श्रीयोगदृष्टिसमुच्चय, श्रीअनुयोगद्वारसूत्र १/- श्रीआवश्यकसूत्र १/४, श्रीउत्तराध्ययनसून १/३ । अमदावाद १९७३ श्रीशेिषावश्यकसूत्र ८/४, श्रीस्थानागसूत्र १/२ । सूरत श्रीविशेपावश्यकसूत्र १/२, श्रीस्थानागसूत्र १/२, श्रीऔषपातिकसूत्र श्रीउत्तराध्ययनसूत्र २/३, श्रीआचारागसूत्र १/२ । सूरत १९७५ श्रीआवश्यकसूत्र ३/४, आचारागसूत्र १/२, श्रीअनुयोगद्वारसूत्र १/२, श्रीनन्दीसूत्र। ६ श्रीओधनियुक्ति, श्रीविण्डनियुक्ति, श्रीभगवत सूत्र ८/४१, श्रीप्रजापनासूत्र ३३/३६ । रतलाम (मालवा) १९७७ श्रीभगवतीसूत्र ३३/४१, श्रोप्रतापनासूत्र ३/३६, श्रीसमवायागसूत्र ar ४ १९४ ५ पालीनाणा ७ ५ ~ छे, तेवा आगमगत-सैद्धान्तिक शब्दोनो आमां संग्रह करवामां आवेलो छे. आ 'श्रीअल्पपरिचित- सैद्धान्तिकशब्दकोष' माटे हवे पछी 'अ सै श.' एवी संज्ञानो उपयोग कराशे. शब्द अने तेना अर्थो-अ. से श.मां जे शब्दो जणाव्या छे ते शब्दो घणे भागे तो जेवा छे तेवा ज राखवामां आव्या छे. अर्थात् अकार अने थोडा आकार सिवायना बाकी बधा शब्दो जे मूलना छे ते अर्धमागधीमां छे अने टीकाकारोए टीकामां आपेला जे शब्दो जे भाषामां छे तेज भाषामां मोटे भागे कायम राख्या छे एटले के अकार अने थोडा आकारमा आवेला संस्कृत शब्दो अर्धमागधीमां पण आप्या छे. शब्दोना बहुश्नुत टीकाकारोए भिन्न भिन्न टीकाओमां भिन्न भिन्न अर्थो कर्या छे, तेथी भिन्न भिन्न स्थळोमांधी से ते अर्थो लईने ते ते टीकाकारोना अनि कायम राख्या छे. आ कारणथी आ अ से शमां छेदना प्रणना ज शब्दो लेवामां आव्या छे तेमज बृहत्कल्प जेवा कोईकमां आगमोद्धारकगुरुदेवधीना हाथना ऊतारेला शब्दो छे. तेमा टीकाकारोना आधारे अर्थोनुं हुंकाववा- पणुं पण छे ४० वैद्यकम् ४३ विधि ६ तारवेला ५३ अकोना नामो- ( चोथा पानानी फुटनोट) १ विषयानुक्रमः * १४ छन्दोविचार. २७ खण्डनपक्षा २ अधिकारानुक्रम १५ अलकारा २८ पाठान्तराणि ४१ नया. ३ विषेशोपयोगिनो विषया. १६ न्याया २९ प्रस्तावना ४२ स्थापनानि ४ विशिष्टा १७ साझिभूतप्रन्या ३० सूत्राद्यकारादिक्रम ५ साक्षिपाठानामकारादिक्रम १८ उपोद्धात प्रशस्तिश्च ३१ शङ्कासमाधानानि ४४ कार्थिकशब्दाः ६ वादा १९ आचार्यवामानि ३२ काठिन्यार्थ. ४५ अल्पबहुत्वम् ७ लक्षणदूषाणाधिकार. २० प्राचिनमतानि ३३ सुभापितानि ४६ अनुमानानि ८ विशेषनामानि २१ मताना समाधानानि ३४ निक्षेताना सग्रह. ४७ सङ्कलनाः ९ इतिहास २२ सूक्तावलि. ३५ वायुवृष्टिः ४८ प्रत्येकवुद्धनामानि १० भूगोल. २३ राजकीयविभाग ३६ समानशब्दाना पर्यायः ४९ विसवादा ११ ज्योतिष्क २४ प्रज्ञाप्यम् ३७ गच्छा पट्टावल्यश्च ५० सग्रहश्लोकाः १२ प्रचलितमतानि २५ लोकोक्तिसग्रह ३८ दृष्टान्ता ५१ स्थलनिर्देश १३ व्याकरणविचार २६ व्याख्यानान्तराणि ३९ सम्प्रदाया ५२ सामुद्रिकम् ५३ निशीथाद्यकारानुक्रम निशीथभाग्यगाथाद्यपदानि च * नन्दी आदि २७ना विषयानुक्रम अने सूत्रादि अकारादि वगेरे छपाया छे, तेमा नीचे प्रमाणेना नवरो सूत्रोने अपाया छे- १ नन्दी, २ अनुयोगद्वार, ३ आवश्यक, ४ ओधनियुक्ति, ५ दशवैकालिक, ६ पिण्ड नियुक्ति, ७ उत्तराध्ययन, ९ सूत्रकृताङ्ग, १० स्थानाग ११ समवायाज, १२ भगवती, १३ ज्ञाताधर्मकथा, १४ उपासक, १५ भन्तकृद्दशा, १६ अनुत्तरौपपातिक्दशा, १७ विपाक्श्रुत, १८ प्रश्नव्याकरण, १९ औपपातिक, २० राजप्रश्नीय, २१ जीवाजीवाभिगम, २२ प्रज्ञापना, २३-२४ सूर्यचन्द्रप्रज्ञप्तियुग्म, २५ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति २६ निरयावलिका भने २७ प्रकीर्णकदशक । (५३ नपरोमांना न. २२, २५, ३३ भने ५० आगमीयसूक्तावलीना नामे छपोया छे ) , ८ आचाराग, 7 ६ आ अ. सै. श.मां भिन्न भिन्न शब्दो व्याकरणना प्रयोगो रूपे, कोई तेवां नामो रूपे, कोई इतिहास तरीके, कोई भूगोळ तरीके तथा कोई पर्यायो तरीके पण आव्या छे. काचो खरडो-शरूमातमां लहियो, एकेक आगम लईने कापलीमां ते शब्दने ऊतारतो अने टीकाकारनो वतावेल अर्थ लक्ष्यमां आवे तो ते अर्थ लखतो. आवी रीते ऊतारेली छूटी कापलीओने प. पू आगमोद्धारकगुरुदेवश्रीना विनयगुणसंपन्न, तीक्ष्णबुद्धि, स्वर्गस्थ मुनिराज श्रीमहेन्द्रसागरजीए अकारादि क्रममां गोठवी कागलमा सलग चोटाडीने तैयार करी ते उपरथी ए लखाण लहिया आदि द्वारा लखाधीने तेमज तेओश्रीए (श्रीमहेन्द्रसागरजीप) पोते पण लखीने काचो खरडो तैयार कर्यो. प्रकाशननी तैयारी-आ अ. सै. श ने छपाववानी प. ता आगमोद्धारकगुरुदेवधीनी घणी इच्छा हती तेथी लगभग त्रण दशका ,उपर सद्गृहस्थो पासेथी अ से श ना प्रकाशनने अगे रूपिया शेठ देवचन्द्र लालभाई पुस्तकोद्धारकफंडने अपान्या हता. ते पछी वि स. २०७४ मां ने संस्थाय आ अ से श छपायवा माटे ठराव कर्यो. आधी मुद्रणालयपुस्तिका करवानुं कार्य पू स्थ. मुनिश्री महेन्द्रसागरजीना शिष्य मुनिश्रीसौभाग्यसागरजीने (तेओश्रीना-लघुबन्धुने) सोपायुं तेथी तेओ दरेक आगमना ते ते पत्रमा ते ते शब्दो मेळवता अने तेना अनि पण मेळवता तेमज ज्यां टीकाकारना शब्दो लेवाना हता त्यां प. ता आगमोद्धार कगुरुदेवश्री पासेथी तेना मूळ शब्दो बनावी लेता अने जे शब्दोना अर्थ टीकाकारे न आन्या होय तेना अर्थो पण पूछी लेता आवी रीते तेमणे लगभग चार फार्म सुधीनें मेटर तैयार कयु. उपर जणावेली संस्था (दे +ला )ना ट्रस्टीओओ प ता. आगमोद्धारकगुरुदेवश्रीनी जीवन पर्यत सेवा करनार मुनिराज श्रीगुणसागरजी महाराज पासेथी आ कोपीनुं लखाण मेळ युं अने छपाववा माटे प्रबंध कर्यो तेमज अमने संपादन माटे विज्ञप्ति करी. तेथी अमे आ संपादननु कार्य शरू कयु. साथोसाथ मेटर पण तेयार करवा मांडयु सपादन पद्धति-दरेके दरेक शब्द ते ते आगमनी साथे मेळवयो अने तेमा जणावेल अर्थ मेळवी-लेवो ते रीते कार्य करतां केटलाक आगमोना अंगे शब्दोना प्रश्नो ऊभा थया तेमां श्रीव्यवहारसूत्रना त्रीजा उद्देशाना शब्दो हता पण ते सिवायना बाकीना उद्देशाना शब्दो न हता. तेथी प ता आगमोद्धारकगुरुदेवश्रीए व्यवहारनी आखी प्रतमा निशानो की आप्यां आथी तेनी कापलीओ उतारी तेना शब्दोनो उमेरो कर्यो आगळ जतां वीजा पण आगमोना शब्दो नथी पम देखायु, तेनी तपास करतां-नदी, अतगड, अगुत्तरोवाइय, उपासकदसा, रायप सेणीय, अने निरयावलिना शब्दो न हता. तेथी तेना शब्दो पण उतार्या. अने ते शब्दो धीरे धीरे मेळववामां आव्या. आगळ चालतां नायाधम्मकहाना शब्दो बिलकुल नथी एम मालम पडयु. लायाधम्मकहानी प्रत तो प. ता आगमोद्धारकगुरुदेवश्रीनी निशानवाळी प्राप्त न थई, तेमज जे समये शब्दो नथी तेवी शका थई ते समये तो अमारु पुण्य' पण 'न' हतु के पू गुरुदेवश्री ‘विद्यमान' होय आथी अमे अमारी मंदमति अनुसारे आ आगमनी सटीक प्रतमां निशानो कर्या, शब्दो तारख्या अने ते तारवेला शब्दोने कोशमां स्थान प्राप्यु आ अ. से. श. मां अग्यार अग, वार उपांग, त्रण (वृहत्कल्प, व्यवहार अने निशीथ) छेदसूत्र, चार मूल, ओधनियुक्ति. विशेपावश्यक, नंदी, अनुयोगद्वार, अने दशवैकालिकचूर्णिना शब्दोनो संग्रह ७ विस्तारथी चूर्णि वगेरे जेना पर ' नयी तेजा जीतकल्प, 'विकेन्य, दशाश्रुतस्कंध, अंने महानिशीयना शब्दो लीवा नथी -~ ॥

. - . करवामां आवेल छे. तेमज दशाश्रुतस्कन्ध, दशप्रकीर्णक, पउमचरिय, उपदेशमाला, अने तस्वार्थ. सूत्रना केटलाक शब्दो पण लेवामां आवेल छे. संज्ञा पत्रक-अ से. श. मां जे शब्दोनो संग्रह करवामां आव्यो छे अने तेमां आगमो-शास्त्रो वगेरेनी जे संज्ञाओ आपवामां आवेली छे, ते संज्ञाओना स्पष्टीकरण माटे तेमज लीधेली प्रत-टीका वगेरे शेनी छे. ते जणाववा अने तेना संपादक तथा प्रकाशक जणाववा एक संज्ञापत्रक नामथी प्रकरण राख्युं छे तेमज बीजी वीजी प्रतोनी साथे पण शब्दो मेळववानुं शक्य बने ते उद्देशथी पत्राङ्कसूचा नामथी एक प्रकरण आप्युं छे. वर्णकम-अ. सै. श. मां अनुस्वारने पहेलं स्थान आपवामां आव्युं छे. कारण के शरूआतमा प ता. आगमोद्धारकगुरुदेवश्रीए आ रीते शरू करवानुं जणाव्युं हतुं. आथी ए पद्धति कायम राखी छे. पण आनो हेतु हमे जाणी शक्या नथी, तेथी अत्रे हेतु आप्यो नथी विद्वज्जनो प्रत्ये-सुज्ञ विद्वज्जनो! अमो गूर्जर भाषाना संपावनना कार्यमा अनुभव मेळयतां संपादनमा आगळ पध्या छीर ते रोते संस्कृत अने प्राकृतना संपादनमा प्रवेश करता थया एवा समयमा प ता गुरुदेवधीनी सेवाना प्रताप अमने 'अ. से. श.' - संपादन कार्य मळ्यु. आथी अमे ते कार्यमा रस लीधो ने संपादन कार्य शरु कर्यु आथी पंडितोनी अपेक्षाए के विद्वानोनी अपेक्षाए अमारा आ संपादनना अगे जे सूचनाओ करवी उचित छे ते अमे विद्वज्जनोनी समक्ष रजू करीए छीण १ मूळ शब्दो विभक्तिवाला तेम विभक्ति वगरना अम बन्ने प्रकारना , तेथी ते जे लिंगनो जे शब्द होय ते शब्द तेवी तेवी विभक्तिथी ते ते लिंगमां समजी लेवो. जेमके-अंकुर (पृ. १, २), अंकृसय (पृ. १, २) इत्यादि (कोर्डक -शब्दकोशमां विभक्ति सहित शब्दो नथी तेवू पण प्राये अमारा जाणवामां के २ जो के शब्दो वधा अक जातना विभक्ति विगर अगर मेक विभक्तिथी मेगा लेवा जोई, परंतु आमां भिन्न भिन्न लेवाया छे. जेमके-अंकावइ (पृ. १, २), अंकावइओ (पृ. १,१) इत्यादि. ३. वैकल्पिक शब्दोना विकल्पने साचववा माटे अर्थात् तेवा प्रयोगोने साचवी राखवा माटे आमां भिन्न लेवाया छे जेमके कवडसर (पृ. १, ५), अंकावडिंसर (पृ १, १) इत्यादि. ४ टीकाकार महाराजे जे शब्दोना प्रयोगो टीकामां कर्या छ ने ते शब्दो मूळमां नथी तेवा शब्दोमुं प्राकृत जे काँसमा अपाय छे ते प पू आगमोद्धारक गुरुदेवश्रीने पूछीने मुनिश्रीसौभाग्यसागरजीओ आपेलु छे. वळी तेवा शब्दो कोई वखत शरुआतमां अपाया छे. अने कोइ वखत संस्कृत- शब्दनी पछी पण अपाया छे. तेनी बन्ने बाजुओ वनतांसुधी कौंस आप्यो छे जेमके (अकील नर्तक ( पृ १, १), अंगार (इंगाल) (पृ २२) इत्यादि ५. शरूआतमां तो शब्दोना अर्थो अने शब्दोना संग्रहनी शैलि नियमित रही नथी, पण जेम जेम अनुभव थतो गयो अने तेना अभ्यासमां वधारो थतो गयो तेम तेम पद्धतिमा सुधारो थतो गयो छे. छतां अटलु कहेवानी जरूर छे के पहेला भाग करतां बीजा भागमां पद्धति इत्यादिनो सुधारो मळेला अनुभव प्रमाणे करी शकीशुं ओवी आशा छे. ६ (१) अध्ययन, (२) विशेषनाम, (३) वनस्पतिना नामना अगे तेनी साथे अर्थना रूपमा संस्कृतमां अपायुं छे जेमके (१) अंडे-विपाकश्रताद्यश्चत० (पृ. २, २), (२) अगारवई- अंगारवती सवेगोदाहरणे० (पृ २, २), (३) अंकोल्ल वृक्षविशेष (पृ २, १) इत्यादि ७' टीकाकारोए शब्दोना जे जगो पर अर्थ नथी कर्या तेवा शब्दो पण अत्रे अर्थ वगर अपाया छे. जेमके ओल्ली (पृ २२५, २), उबट्टगा (पृ. २०७, २) इत्यादि वळी आ शब्दोना अर्थो जो कदाच मेळवी शकी' तो परिशिष्मां आपवा विचार छे. - .

८ ९. ८. देशी शब्दोना अंगे 'देशीय' अगर 'देशी' एवं काँसमां लखायुं छे. अर्थात् टीकाकारे आपेलु कायम राख्युं छे, जेमके-उत्तुइउ (देशी०)-गर्वे (पृ. १८७, १) चूर्णिकार महाराज चूर्णिनी अंदर प्राकृत अने संस्कृत अम बन्ने भाषाना प्रयोगो करे छे, तेथी चूर्णिना शब्दोना अर्थोमां प्राकृतना अने संस्कृतना वन्नेना प्रयोगो छे. परंतु बहुधा तो प्राकृत ज होय छे. १०. आ 'अ. सै. श. मां एवा पण शब्दो छ के जे अभिधानराजेन्द्र के पाइयसहमहण्णवोमां न होय. अ स श.नुं सपादन कार्य शुरू थतां सुरतमा हता त्यां सुधी एक वखतनु प्रुफ जोई आपवा प. ता. आगमोद्धारकगुरुदेवश्रीना एकेव पट्टधर, श्रुतवारिधि, शास्त्रतत्त्वदर्शी, गच्छनायक, आचार्यश्रीमाणिक्यसागरसूरीश्वरजी महाराजे कृपा करी हती. ए रीते संपादनन कार्य चालतुं हतुं, तेमा प्रथम भागनुं पंदर आनी काम थई गया पछी सुरतथी दक्षिण तरफ विहार थवाना कारणे अने प्रेस आदिना प्रतिकूल संयोगोमां अमारी अनिच्छाए पण नहि जेवा कार्यमां वर्षोनां वर्षों वीती गया वाद आजे आ श्रीअल्पपरिचित सैद्धान्तिक- शब्दकोषनो 'प्रथम भाग' विद्वानोना करकमळमां उपस्थित करी शक्या छीए. आ प्रथम भागमां 'संपूर्ण स्वरो' आपवामां आवेला छे स्वरोमां तेमज बीजा रही गयेला शब्दो' तथा देशीनाममालाना शब्दो श्रीअल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोष पूर्ण थतां 'परिशिष्ट' तरीके आपवा विचार छे. प. पू. आगमवाचनादाता, देवसूरतपागच्छसामाचारीसंरक्षणकटिबद्ध, अनेक ग्रन्थोना प्रणेता, वादीमानमर्दक, चरमशासनपति महावीर परमात्माना शासनमां आगममंदिरोना संस्थापक, जैनआनन्दपुस्तकालयादि संस्थाना संस्थापक, शैलानानरेशप्रतिषोधक, युगप्रधानसदृश, वर्तमान श्रुतना ज्ञाता, स्वआराधनथै आराधनामार्ग करनारा, मौनपणे रही अर्धपद्मासने स्वर्गे संचरनार, प. पू आगमोद्धारक *आचा वर्यश्रीआनन्दसागरसूरीश्वरजी महाराजनी पुनित सेवाना प्रतापे जे केई बोध-शक्ति मेळवेल छे, ते आधारे अमे अमारी बुद्धि केळवीने काळजीपूर्वक आ श्रीअल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोष संपादन कयु छे. मुनिराज श्रीअभयसागजी महाराजे संजोग मळतां आमां मार्ग बतान्यो छे. तेओश्रीने तेमज प्रो. हिरालाल र. कापडीयाने पण हमे अत्रे भूलता नथी. आमां जे अशुधिओ जणायी छे तेनुं शुद्धिकरण पण आप्यु छे, छतां विद्वज्जनो प्रति अमारी प्रार्थना छे के क्षति देखाय तो जणाववा उदारता दाखवे. वीरसं. २८८०, वि सं. २०१० ज्येष्ठ पुर्णिमा हींगनघाट (मध्यप्रदेश) आगमोद्धारकउपसंपदाप्राप्त शिष्याणु कंचनविजय तथा आगमोद्धारक शिष्यलव क्षेनंकरसागर छे * जेमना स्मरणार्थे सुरतमा 'आगमोद्धारक गुरुमदिर' झलहळी रघु

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शेठ देवचन्द लालभाई-जैनपुस्तकोद्धार
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कार्यवाहक
चोकसी मोतीचंद मगनभाई : सुरत

शेठ-देवचंद-लालभाई-जैनविद्यार्थी भुवन
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जेमा
शेठ देवचंद लालभाई जैन पुस्तकोध्धार फंड तरफथी
पुस्तकालय अने
प्रसिद्धथतां पुस्तकोनो संग्रह अने वेचाण थाय छे.
गोपीपुरा, बडेखांनो चकलो, सुरत
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FF
आ मकान
शेठ देवचंद लालभाई जैन पुस्तकोद्धार फडनी कायमी रकमी खरीदवामां आवेलु छे.
रु- १,१०,०००. एक लाख दश हजार.
V
24
++
पचंद गलभाई जान पुरस्कौद्धार पड मिलनसार D
आयामापारका
★★k
★★★
O
HREATURAITrans
कालवादेवी नं १६६ आ मकान छे. तेमां भोयतळीए शयाजी विजय वाशिंग कु. पहेले माळे-
एल. काशिनाथ बेकर वीजे माळे- जादवी प्रेमजी गांधी ना बोर्डो छे.

શેઠ દેવચંદ લાલભાઈ જૈન પુસ્તકોદ્ધાર ફંડના હાલમાં મળતા નવીન ગ્રંથ, ૧૦૧ ૨-૮-૦ -0-0 ૨-૦-૦ ૮૫ -૮-૦ ૧-૪-૦ ૧-૦-૦ ૧-૦-૦ ગ્ર વાંક ને, અલપ પરિચિત સિદ્ધાન્તિકશબ્દકેપ (વિભાગ પહેલે સંપૂર્ણ સ્વર) પ્રેરક-આચાર્ય આણ દસાગરસૂરિજી ૬-૦-o ૧ ૦૨ શ્રાવક ધમ પંચાકચૂર્ણ ૧૦૩ દશવૈકાલિક લઘુતિ સુમતિસાધુઝુરિ આવશ્યકસૂત્ર મલયગિરિ ત્રીજો ભાગ ૮૬ લોકપ્રકાશ મૂલ વિભાગ પ્રત ૮૭ ભરતેશ્વર બાહુબલિ વૃત્તિ દ્વિતીય વિભાગ સંપૂર્ણ ૮૮ પ્રશમરતિબકરણ બૃહદ્ગછીય શ્રી હરીભદ્રસૂરિ-કૃત વિવરણ સમેત ૧-૪-૦ ૮૯ અધ્યાત્મકલ્પમ રત્નચ ગણિ વર્ધનવિજયગણિ કૃત ટીકા યુક્ત ૯૦ ગૌતમય કાવ્ય રૂપચંગણિત ૧ સટીક વૈરાગ્યશતકાદિ ગ્રંથપ ચકમ ૯૨ અભિધાનચિંતામણી કોશ ગ્રંથક નં ૯૩ જૈન કુમારસંભવ ૯૪ સિદ્ધહેમશબ્દાનુશાસન બ્રહવૃત્મણી નવપદ અવચૂર્ણિકાર શ્રીમદ્ અમરચ૮ ૫-૦-૦ ૯૫ વીતરાગમતોત્ર અવચૂર્ણ વિવરણ અને ભાષાતર સમેત ૧-૮-૦ ૯૮ પંચપ્રતિક્રમણ વિધિ સહિત ૯૯ શ્રમણુસૂત્રાદિ અવસૂરિ વદન પ્રતિક્રમણ અવરિ ૧૦૪ ઉત્તરાધ્યયન અવચૂરિ પ્રેમમાં ૧૦૫ પિડનિયુક્તિ અવચેરી ૧૦૬ શ્રાદ્ધવિધિ ૧૦૭ નંદિ અવચૂરી ૧૦૯ સૂયગડાંગ દીપીકા ૧૧૦ જબુદ્વિપ ચૂણી ૧૧૧ ચંદ્રપ્રજ્ઞાતી ૧ ૦ ૦ ૧-૮-૦ ૨-૦-૦ ૧-૮-૦ 29 ૧-૦-૦ ૪-૦-૦ આગમાદય સમિતિ પ્રકાશિત ૫ ગ્રંથક નં ૫૫ ન ાદિ ગાથાલંકારાદિ યુતો (સપ્તસૂત્ર) વિષયાનુક્રમ ૨-૦-૦ ૫૬ આવશ્યક મલયગિતિ ટીકા યુક્ત પૂર્વભાગ ૪-૦-૦ પ૭ લોકપ્રડાશ પ્રથમવિભાગ, દિવ્યલેક ૧ થી ૧૧ ૯-૦-૦ ૨-૮-૦ ૫૦ ૧-૮-૦ ભાપાતર ૩-૮-૦ ગ્રંથક નં ભક્તામર સ્તોત્ર પાદપૂર્તિપ કાવ્ય પ્રથમ વિભાગ ટીકા ભાષાંતર ૪૭ પંચસ ગ્રહ ટીકા સહ જીવસમાસ પ્રકરણશતક ૫૧ તુનિ ચતુર્વિશતિકા સચિત્ર શબનમુનિકૃત સંસ્કૃત પર સ્તુતિ ચતુર્વિશતિકા સચિત્ર કવિ ધનપાલકૃત સ્તુતિ ૫૩ સ્તુતિચતુવિણતિકા સચિત્ર બપ્પભટ્ટસૂરિકૃત ભાષાતર યુક્ત ભકતામર સ્તોત્ર પાદપૂર્તિરૂપ કાવ્ય બીજો વિભાગ ટીકા ભાપાતર ૮-૦-૦૦ ૬-૦-૦ ૫૯ ચતુર્વિશતિકા જિનાનદ સ્તુતિ મે વિજયાત ભાષાતર સમેત ૬-૦૦ આવશ્યક મલયગિરિતદત ટીકા યુક્ત બીજો ભાગ ૨૮-૦ ૬૧ લોકપ્રકાશ દ્વિતીય વિભાગ, ક્ષેત્રલોક સર્ગ ૧૨ થી ૨૦ ૬-૦-૦ ૩-૮-૦ ૫૪ ૩-૮-૦.

संज्ञा पत्र कम्। क्रमा- ङ्क संज्ञा प्रकाशक सूत्रनाम सम्पादक आगमोद्धारक. | देला. जै २ आ. स ३ आ स " ४ आउ. आ स. आ.स " ६ आ स. उत्त, दे ला जै गा. उपा. ९ आ. स. १० ओघ १ | अनु मल्लधारगच्छीयश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचितवृत्तियुक्तं श्रीअनुयोगहारसूत्रम्। अनुत्तश्रीचान्द्रकुलीनाचार्याभयदेवसूरिसूत्रितविवरणयुतं श्रीअनुत्तरोपपातिकदशाङ्गम् । अन्त. श्रीचान्द्रकुलीनाचार्यभयदेवसूरिसूत्रितविवरणयुतं श्रीअन्तकदृशाङ्गम्। श्रीआतुरप्रत्याख्यानप्रकीर्णकम् (गाथा )। आचा | नियुक्तिकलितशीलाक्षाचार्यविहितवृत्तियुतं श्रीआचारा- गसूत्रम्। आव. | नियुक्तियुतभाष्यकलितश्रीभवविरहहरिभद्रसूरिविहित- वृत्तियुतं श्रीआवश्यकसूत्रम् । नियुक्तियुतानि श्वादिवेतालश्रीशान्तिसूरिसूत्रितवृत्ति युतानि श्रीउत्तराध्ययनानि । ८ | उप मा श्रीधर्मदासगणिदृब्धा श्रीउपदेशमाला (गाथा)। श्रीचान्द्रकुलीनाचार्याभयदेवसूरिसूत्रितविवरणयुतं श्रीउपासकदशाङ्गम्। भाण्ययुता श्रीद्रोणाचार्यसृत्रितवृत्तिविभूपिता श्रीओधनियुक्ति श्रीचान्द्रकुलीनाचार्याभयदेवरिसत्रितविवरणयुतं श्रीऔपपातिकोपागम् । १२ ग श्रीगच्छाचारप्रकीर्णकम् (गाथा)। १३ | गणि श्रीगणिविद्याप्रकीर्णकम् (गाथा )। श्रीचतु शरणप्रकीर्णकम् (गाथा)। १५ | जं प्र उपाध्यायश्रीशान्तिचन्द्रविहितवृत्तियुतं श्रीजम्बूद्वीप- प्राप्त्युपागम्। १६ जीवा श्रीमलगिर्याचार्यसूत्रितविवरणयुतं श्रीजीवाजीवा- भिगमोपाङ्गम्। शाता. श्रीचान्द्रकुलीनाचार्याभयदेवसूरिसूत्रितविवरणयुतं श्रीज्ञाताधर्मकथाङ्गम्। १८ | ठाणा श्रीचान्द्रकुलीनाभयदेवसूरिसूत्रितविवरणयुत श्रीस्थानाङ्गसुत्र । १९ । तं. श्रीतन्दुलवैचारिकप्रकीर्णकम् (गाथा)। दे ला जे. शेठठेवचन्दलालभाईजैनपुस्तकोद्धारफड । आ स-श्रीआगमोदयसमिति। आ स. ११ । औप आ. स आ स. " आ स आ स. दे ला ज. दे ला जै आ स आ स आ स. १ २ - १० २० १ आ स. आ. स. जै प्र. " चू " तत्त्वा | भाष्योपेतं श्रीतत्त्वार्थसूत्रम् (अध्यायः, सूत्रम् )। आगमोद्धारक ऋ के २१ दश. नियुक्तिभाष्योपेतं श्रीभवविरहहरिभद्रसूरिविरचित- विवरणयुतं श्रीदशवकालिकसूत्रम् । २२ | दशचू | श्रीदशवैकालिकचूणिः हस्तपोथी जै.४ पु नं १६७३ २३ | दशाश्रु | श्रीदशाश्रुतस्कन्ध २४ | देव. श्रीदेवेन्द्रस्तवप्रकीर्णकम । आगमोद्धारक २५ | नंदी श्रीमलगिर्याचार्यविहितवृत्तियुत श्रीनन्दीसूत्रम् । २६ | निरय | श्रीचन्द्रसूरिविरचितवृत्तियुत श्रीनिरयावलिकापंचकम् । श्रीदानविजयगणी वीर ५ २७ / नि चू. भाष्यचुर्युपेतस्य श्रीनिशीथसूत्रस्य प्रथमो विभाग. हस्तपोथी पुन ४८३ २८ | नि. चू द्वितीयो जै पु नं ४८४ द्वि २९ / नि तृतीयो ज पु.नं.४८५ ३० श्रीविमलाचार्यविरचितं 'पउमचरियं' (उल्लासः) प्रो,हर्भन जेकोबो जै. ३१ पिंड । भाष्यश्रीमलयगिर्याचार्यविहितवृत्तियुता पिण्डनियुक्ति. आगमोद्धारक / दे ला जै पिण्ड । ३२ श्रीमलयगिरिसूरिविहितविवरणयुतं श्रीप्रज्ञापनोपाङ्गम् । श्रीचान्द्रकुलीनाचार्याभयदेवसूरिसूत्रितविवरणयुतं श्रीप्रश्णव्याकरणाङ्गम् । ३४ | बृ प्र | नियुक्तिभाण्यटीकोपेतस्य श्रीबृहत्कल्पसूत्रस्य प्रथमो विभागः हम्तपोथी जे. पु.नं ३०३ जै पु नं, ३०४ द्वितीयो जै.पु नं.३०५ तृतीयो श्रीभक्तपरिज्ञाप्रकीर्णकम् (गाथा)। आगमोद्धारक. ३८ श्रीचान्द्रकुलीनाचार्याभयदेवसरिसूत्रितविवरणयुतं श्रीभगवतीमूत्रम् (श्रीव्याख्याप्रज्ञप्ति )। मर ।। श्रीमरणसमाधिप्रकीर्णकम् (गाथा)। मरण. ४० महा. ।। श्रीमहाप्रत्याख्यानप्रकीर्णकम् (गाथा)। पउ आ स. प्रज्ञा ३३ प्रश्न. आ स " वृदि. " ३६ | वृत ३७ आ स. भक्त भग. आ. स. ३९ मर आ स आ. स महाप्र ३ ऋ के =शेठऋषभदेवजीकेशरीमलजी, रतलाम ४ जे पु न =त्रीजनआनदपुस्तकालय, सुरत, हस्तपोथी नवर ५ वीर =श्रीवीरसमाज, अमदाराद. नियक्ति अने भाष्यगायाना मात्र प्रतीक छे ६. ध =श्रीजैनधर्मप्रसारक सभा, भावनगर. सूत्र, ४१ राज. आ स आ स. व्य प्र श्रीमलयगिर्याचार्यमूत्रितविवरणयुतं श्रीराजप्रश्नीयोपाङ्गम आगमोद्धारक ४२ | विपा | श्रीचान्द्रकुलीनाचार्याभयदेवरिमूत्रितविवरणयुत श्रीविपाकश्रृताङ्गम्। ४३ विशे. | मल्लघारिश्रीहेमचन्द्रसूरिविरचितवृहद्धत्तियुतं श्रीविशेपावश्यकभाष्यम् । पं हरगोवनदासः य ज. ४४ नियुक्तिभाष्यटीकोपेतस्य श्रीव्यवहारसूत्रस्य प्रथमो विभागः हस्तपोथी जे पु नं ४८७ ४५ व्य द्वि द्वितीयो पु नं. २६६ ४६ । सं श्रीसंस्तारकप्रकीर्णकम् (गाथा)। आगमोद्धारकः ४७॥ श्रीचान्द्रकुलीनाचार्याभयदेवसरिसूत्रितविवरणयुत श्रीसमवायाङ्गम्। सूत्र. नियुक्तिभाप्यशीलाङ्काचार्यविरचितविवरणयु श्रीसूत्रकृताङ्गम् । ४९ | सूर्य श्रीमलयगिरिसूरिविहितविवरणयुत श्रीसूर्यप्रज्ञप्त्युपाङ्गम م م 9 आ स सम. आ स ४८ आ स. आ स. " १ य जे. श्रीयशोविजयजीजैनग्रन्थमाला सूत्रादिना मात्र प्रतिक ज छे १२ पत्राङ्क सूचा श्रीआचाराङ्गम् प्रथम श्रुतस्कध अध्ययनानि आपत्र अध्ययनानि आपत्र अध्ययनानिआपत्र शतकानि आवत्र श्रीज्ञाताधर्मकथाङ्गम् प्रथम श्रुतस्कध अध्ययनानि आपत्र १ ८१ ४ १२१ ४१५ १ १४८ १४१ ४४३ १७ ७३१ २ १७४ ६ १५३ १८ ७६० ३ ९६ १९५ १६५ १० ५२८ १९ ७७३ ४ ९९ ८०० २३१ ५ ११३ ६ २५८ २१ ८०२ ६ ११४ २९६ २२ ८०४ १२० ८ ८०५ ११ ३१७ २४ ८५१ ९ १६९ द्वितीय श्रुतस्कंध ९२८ १७० चूला-१ २६ ९३७ ११ १ ३५८ ८ १७५ श्रीसमवायागम् ९ १८६ आविषय आपत्र १० १९५ | सागरोवम- काटाकोटी १०५ २०७ २२९ गणिपिटक १३३ २४० अवसरपिणि १५२ निगमनम् १६० १४ २५२ श्रीभगवतीजी २६० शतकानि आपत्रं १६ २६६ १ १०८ द्वितीय श्रुतस्कर २ १ ३०३ १५२ २०२ २ ३४२ २०६ ३ २४२ ३७० ३८५ २८६ ९३८ १२ १७७ ३७४ २८ १३ १८२ ३ ३८४ ૨૨ १४ १९२ ३९१ ३० २ १५ १९५ ३९८ mr ३१ ९५० १६ २२६ ६ ४०१ ४ ९५३ १७ ७ ४०६ ३३ ९६४ १८ २४२ चूला-२ ४२७ ६ ९७० २४५ om ४२९ ३२७ ६ ३५ ९७१ ४०५ ४२७ द्वितीय श्रुतस्कध १.१० २५४ ८ ४२४ " ४३२ श्रीस्थानङ्गम् ९ ४९२ श्रीसूत्रकृताङ्गम् श्रीउपाशकदशाङ्गम् १ ३८ १० ५०८ ३८ प्रथम श्रतस्कध २ १०१ ११ ५५२ १-१० अध्ययनानि आपत्र ३ १७९ १२ ५९२ ४० ९७५ श्रीअन्तकृशाङ्गम् १ ४ ५२ २८९ ६२९ १३ ९८१ ४१ वर्गा. आपत्र ३५२ १४ २ ६.८ १-८ ६९६ १०१ ३ ३८० ६ १५ १३ श्रीराजप्रश्नीयं अनुत्तरोपपातिक- दशाङ्गम् वर्गा आपत्र पदानि आपत्र पदानि आपत्र श्रीजम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति वक्षस्कारा आपत्र आविपय आपत्र ८ ४ १७८ ३२ ५३५ १ ८८ २ १७८ १-३ सूर्याभ यानविमानादि श्रीप्रश्रव्याकरणागम् कुटाकारदृष्टान्त अध्ययनानि आपत्र | स्नानपूजादि २५ | मोक्षवर्णन ur २१८ ३४ ४ ५५२ ३ ३८० ११३ ७ २२० ३५ ५५८ ४ ३८२ १५० २२३ ६११ ४२४ २ سيا ४३२ ६४ १० २४५ ५४६ श्रीसूर्यप्रज्ञप्तिः प्रामतकानि आपत्र ११ २६८ ५ ९८ १२ २८३ १ يا ११३ १३ श्रीनिरयावलिका २८८ ६२ २ १२१ १४ २९२ ३ ६६ / वां आपत्र श्रीजीवाजीवाभिगम ८ १२९ १५ १ १८ १४१ प्रतिपत्तय आपत्र १६ ३२९ २ २० १० १६५ १ १७ ६ ८२ ३ ३६ २ ८८ १८ ७ ८३ ४ श्रीविपाकश्रुताम् ३८ ३ ४०७ १९ ३९५ ४२ प्रथम श्रुतस्कघः ३३त. २० ४०७ ९९ ४२६ २१ ४३४ १० १९६ ६ ४२८ २२ ४५२ ११ २०१ २-१० ८८ ४३१ ४९१ २३ द्वितीय. श्रुतस्कंध. १२ २३३ ४३२ २४ १-१० ४९३ १३ २४३ ४६७ ४९४ १४ २४४ श्रीऔपपातिकसूत्रम् २६ २५५ आविषय आपत्र श्रीप्रज्ञापनोपाङ्गम् १६ २५६ राजधाण्यादि २४ पदानि आपत्र ५२४ २५७ ४८ १ ७० २९ ५२७ १८ २६७ साधुगुणा पर्पनिर्गम सिद्धवर्णन २ ११२ ३० ५३१ १९ २८४ ११९ ३ १६७ ३१ ५३४ २० श्रीनिशीथसूत्रम् हस्तपोथी लीथोप्रिन्ट भाग. उद्देशक आपत्र भाग आपत्र श्रीबृहत्कल्पसूत्रम् श्रीव्यवहारसूत्रम् हस्तपोथी हस्तपोथी मुद्रित. भाग उद्देशक. आपत्रं आगाथा भागः उद्देशक आपत्र उद्देशक. आपत्र १ १ १२९ १ २०२ १ १ ५०० १ १ १७४ १ १-६१ २ १८२ ० २ ३०८ १००० १-९९ ३ १९४ ३३४ २३५ १५०० १-३७० २२२ ३०४ २१३० २ २१९ २ १-८७ ५ २४७ ४४५ २ १११ ३००० ३ २५८ ३ १-७३ ६ २५३ ४६३ १५५ २ ११० ४ १-१०४ w २५७ ४७८ २०३ ४६४ १३५ ५ १-२९ २७० ५०५ ३ २९३ ७२८ ६ १९९ ur ९ ३ ६४ ११९२ २८३ १-९५ १० ३६१ ६६५ ४ १६८ ८०५ ८ ८ १-६० २ ११ ४ २१२ ९ ७७३ १-२३ १२ ८२ ८३२ ६ २६७ ४३० १० १० १-११४ १३ १०३ ८७५ मुद्रित १४ १२३ ९१६ १५ २७३ १००८ १ १ २५४ ८०५ ३ १६ ५६ ११४१ ६१० २१२४ ११६० ३ ९२१ ३२८९ १८ ६५ ur ११६७ ४ १०२२ १९ ८४ १२१२ ३ १३०६ ४८७६ २० १७२ १३३८ ४ १५०२ ५६८१ +२ १५९९ ६०५९ +३५ ६ ६ १७१२ ६४९० १५ श्रीआवश्यकसूत्रम् श्रोदशवैकालिकम् टीका चूणि श्रीउत्तराध्ययनानि मुद्रित हस्पोथी मुद्रित अध्ययनानि आपत्र आपत्र आपृष्ठ अध्ययनानि आपत्र अध्ययनानि आपत्र आविषय आपत्र पिठिका १ ८१ ३२ ७० १ १९ ४६५ १३६ २ ९९ ४१ १४. २० ४८१ प्रथमवरवरिका द्वितीयवरवरिका १८८ ३ ११९ ५२ ११७ ३ १८९ २१ ४८७ गणधरवाद. ४ १६० १५८ २२८ २२ ४९६ ३२५ १९० २०६ २५४ २३ ५१२ निण्हववाद नमस्कार नियुक्ति १ सामायिकनियुक्ति ४५२ ६ २३४ ६ २४ ५१९ ४९२ २२३ ११५ २६५ २८५ २५ ५३१ २ अध्ययनम् ५१० ८ १२८ ८ २९७ २६ ५४७ ३ ५५० ९ २५८ १४३ ३२९ ५५३ ७६३ १० २६८ १५२ ३४८ १० ३४१ २८ ८०१ चू १ २७७ २९ ५९७ ६ चू. २ २८६ १६६ ३८० ३ ३ ६०९ श्रीविशेषावश्यकम् १३ श्रीपिण्डनियुक्ति ३९२ ३१ ६१८ १४ ४११ ३२ ६३९ पृष्ठ आविषय आपत्र ४१९ ३३ ६४८ आभिनिवोचिकनान २८ १६ ४३० ३४ ३ ६६२ केवलज्ञान उदेशादिद्वारव्याख्या आपत्र आविषयः २४९ पिण्ड निरूपणम् २९९ | उद्गमादिदोषा ६६२ | उत्पादनादोषा ८३६ | प्राषिणा ११९ १७ ४३६ ३५ ६६८ १४६ १८ ३६ ७१४ गणधरवाद १७८ १०४४ श्रीअनुयोगद्वाराणि आविषय श्रीनंदीसूत्रम् ११८० आपत्र निण्हववाद अहन्नमस्कार. सिद्धनमस्कार प्रशस्ति आपत्र ४३ ६४ १०४ ९८ १५० १२२७ आविषय १३६० पर्षद् अवधिज्ञानम् आपत्र | मन.पर्यवज्ञानम् १२७ केवलज्ञानम् २०७ | मतिज्ञानम् २३७ श्रुतज्ञानम् आवश्यकश्रुतस्कध- निक्षेपा आनुपूर्वी दशनामाधिकार प्रमाणद्वाराधिकार निक्षेपाधिकार अनुगमाधिकार नयाधिकार. श्रीओधनियुक्ति आविषय प्रतिलेखनादि पिण्डद्वारम् विशुद्धिद्वारम् १२१ २४१ १२९ २५७ १८४ २६२ २४७ २६७ शुद्धि पत्र कम् शुद्धम् पक्ति अशुद्धम् पृष्ठ विभाग पक्ति शुद्धम् द्वीप २ द्वाप पृष्ठ विभाग पक्ति. अशुद्धम् ८७ अठाचसाना स्था- विषयतृ. १ अहा १ विपतृ० ९ १ वराणा वा आत्मन परस्य वोपकाराय दशाय-य. दशाध्यय. आन्त० शब्दोप० १ ७ १ २ अन्त० शब्दो-प० हिंसाऽर्थदण्ड दिग्गा० आचार्य १५ ३५ १ दिगार० २८ or १ १८ आचाय. ०त्त १ १८ ०युष्मा० १८ २ सम० २० ०युष्ममा० समा० नियुक्त्या० १३ २ १६ सूत्रव्याख्यान नियु- रुचि - १ १२ क्या. २१ ९ २४ क्षिप्पते त् आर्जवम् २५ १ २६ ९ २७ २ १ व्हेत्व इति नेति देवाता० श्रद्धानम् हेतव इति आदान नेति आदान. देवता० सद्दो तीर्थे० १ १ ०सदो ८ २ तीर्थ . १ .. उत्क० उत्क्षि० २ २४ २ पनक ३६ •त्तुण २ नक्षत्र नक्षत्रगोत्र. ११५ १ ष्टपदिष्टयु. •ष्ट्युपदिष्ट० ११९ ។ सा वा १२१ १ क्षिप्यन्ते १२८ १७ ०द् अजीवप्राद्वेपिकी ऋजो -रागद्वेषवक्र- त्ववर्जितस्य सामा १३६ यिकरत कर्म भावो | १३९ वा आर्जव सवर १३९ इत्यर्थः, तस्य स्था- १४५ नानि-मेदा आज १६२ वस्थानानि २५ प्रझा प्रज्ञा १७१ १ कर कर. १७२ १९ अनिश्रेयम अनि श्रेयसाय १८९ २ २०४ १ भापी भासी २०९ १-२ ३५,१ अर्यते-गम्यत इति अर्यते-गम्यत इति अर्थ | २११ १ आद्रा० आर्द्रा० ૨૨૭ १ १९ द्वापे द्वीपे २२७ अधर्म २२८ २ २५ श्रतम् श्रुतम् २३ त्ति-नि० त्तिनि २३१ कलिका ०कल्पिका २३२ नाये २३३ इत्यर्थ १ ७ १७ ३९ ०शस्त्र विषयी २ ० १ ४१ नु० २६ न० नारका० ५ १ १ ४३ ५३ ओतद्रूप . उक० उक्षि० पनाका ०शास्त्र विषयः नादका० अतद्रप ०वचसि साद्० अर्वाका० ०चरा ओमद्विया मासाथिस्ना० १ वचसि १ ११ ० ما ५८ २ ३५ अधर्म १ २२ साधु अक्का० ०चरा ओमदिया मासास्थिस्ना० १ २ २८ १० ६४ ६५ २ २ १ नार्थ प्रयुजान १ ७८

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छा आगीद्वार- धानसतानामणि -चित्रलागतात.।। दा)या रान ठान - ... 9 આચામથી આન-માઅરમમ મહારાજ -- पीन) चित्रहारबन्ध: [ छन्द - शार्दूलविक्रीडित. ] शश्वच्छान्तिप्रयान महामतिमत: कल्यङ्करान कर्मठान्, भव्यापत्तिभरापहान जलजवजन्तुभ्य आनन्ददान् । दान्तान् नौमितमा विभावितविधीन व्याख्यानसव्यासनान् , प्रौढान् सत्यसखान् सदा नतिधिया :ऽनन्दाधिसूरीश्वरान् ॥ १२८ ।।

卐
प्र
समर्पण
आगमोद्धार-आचार्य
श्री आनन्दसागरसूरीश्वरजी महाराजना
चरणकमलमां समर्पण.
जेओए अमारा
शहेर सूर्यपुर अने संस्थाना
सर्वोदय माटे अहोनीश अमोघउपदेशोद्वारा
कृपा वरसावी उत्कर्ष सधाव्यो छे. अमारी संस्थाना
वीजा सेंकडानु प्रथम पुष्प प्रातक पण तेओने ज
समर्पण करवामां अमो अमारी कर्तव्यता
अनुभवीशुं. ा ग्रन्थ तेश्रोश्रीना अागमोद्धारना
दोहन रूपे जीवनकार्य
गणाशे
- प्रकाशको
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卐

卐 녀 Pleas- MIn B DHAM - IN NA ५ CONT प्राजानमाएरुपा नादशाग) શ્રી તામ્રપત્રાગમ મંદીર - સુરતના ભૂમિગૃહમાં ઉત્કૃષ્ટ ॥ॐ॥ श्रुतमारमा स्थित स्वाक्षरी मागम ५३५ ॥ 卐 ज संकलनाकार 卐 ज 卐- 卐 आगमोद्धारक श्री आनन्दसामरसूरीश्वरजी हा रहने वाला का इलाका है.

५ ॥ गीतार्थसूरये नम ॥ ॐ श्रीआगमोद्धारक-स्तवः 5 [ अनुष्टुप्छन्द ] श्रीमत्पाW १ सदापाच, नत्वा ध्यात्वा च सद्गुरून् । प्रकुर्वे भक्तिप्रबोऽहमागमोद्धारकस्तवम् ॥१॥ [ उपजातिछन्द ] सद्भि प्रशस्येन सुधर्मभाजा, जैनागमज्योतिसमर्थन सत् । कृतं २ सदाराद्धश्रुतेन येन, जीयात्स 'आनन्दसूरीश्वरेन्दु ' ॥२॥ [ वसन्ततिलकाछन्द ] शैलाणराजमनसि श्रुतधर्मतुण्या, 3 हिंसानिपेधविधिना कृतधर्मपुष्टिम् । गीतार्थहेमनिकर्ष श्रुतसारमुष्टि- 'मानन्दसागरगुरुं' नुत मुक्तरुष्टिम् ॥ ३॥ [ मन्दाक्रान्ताछन्द ] स्वस्तिकाराद्विवुधमहिनाध्यात्मतत्त्वात्प्रकृप्टे, ६ धर्मार्थ श्रीन्द्रियसुखभरे 'भारते 'भारतेऽस्ति । जैनेन्द्राक्षाऽप्रहतविधया राजमानो वदान्य श्रीधीप्राज्य प्रथितमहिमा 'गूर्जरत्रा'ख्यदेश ॥ ४॥ तस्यापाऽऽधरितधनदश्रेष्ठिधर्मिष्ठकीर्ण, शोभाभासे सुगुणवहुले मण्डले खेटकाख्ये। ८ धर्मज्ञप्तौ सुविशदमतेलब्धतत्त्वप्रतिष्ठं, सर्वोत्कृष्टं 'कपडवणज' राजते पूर्गरिष्ठम् ॥ ५॥ यत्रोत्तहँ नवजिनगृहं 'पाश्वनाथादि'मुख्यं, यहास्तव्याः बहुभवभयाः दीक्षिता नैकभव्याः पट्टावल्या ९ 'अभयमुनिप'-स्वर्गभूमि' सुगीता, 'वाणिज्याख्यं 'कपडसहितं तन्नु वयत केन ? ॥६॥ १ मध्यमपदलोपिसमासोऽत्रज्ञेय । २ सत् सम्यम् आराद्ध ध्रुत येने त विग्रह । ३ अमारिपटहार्थपरकोऽय शब्द । ४ सारसचयार्थपरकाऽय शब्द । ५ क्रोधवाची शब्दोऽयम् । ६ धर्मस्यार्थ श्री इन्द्रियाणि सुखभरच यस्य (देशस्य ) इति दिग्रहोऽत्र ध्य ।। जैनेन्द्राज्ञाया अप्रहतत्वरूपप्रकारेणेत्यथ । ८ धर्मावबोधे । ९ नवाजीवृत्तिकारश्रीअभयदेवसूरीश्वरस्येत्यर्थ । - २ श्रीआगमोद्धारक स्तवः ॥ ८॥ ४ तस्योत्तंसे कलिमलहरे पर्य'दालालपाटे,' 'मीठाभ्रातु' भवभयमथोपाश्रयस्योपकण्ठम् । ख्यातं रम्यं जनिततिहरं 'वासुपूज्यस्य चेत्यं, तत्सान्निध्ये विहितकुशल 'भाइचन्दो'ह्यवात्सीत् ॥ ७॥ तस्यासीद्वै सुकृतरुचिरा सुश मञ्छा ख्यपत्नी, शीलोदात्ता सुगुणसदना धर्मतत्त्वे प्रवीणा । धर्माबाधं समनुभवतो १ पुण्यसारं तयोर्वे, 'ताराचन्द्रा'नुज मगनलाला'ख्यपुत्रो वभूव २ य पूर्वाराधितसुचरणज्ञानवैराग्यसारात् , ३ सारूप्याप्तेवर धनगिरे।' कालवैषम्यवारी। शास्त्राभ्यासाद् तनुभवरतिस्साधुभावस्पृहालु 'वज्रस्वामे'जनक इव यो जातरागाल्यभाव ॥९॥ यद् भोगान् किल धनगिरिमन्यमानो विधाता , वाग्दानार्थ सुवहु यतत शुद्धबुद्धि. समारपत् । दीक्षां लास्ये सपदि सुतरां कार्यमालोच्य कार्य- मेतच्छुत्वा चकितमनस' श्रेष्ठिनो मौनमासुः ॥ १० ॥ तद्वद्गाढ शमितमनसा 'मग्नलाले'न कन्या- ८ दानात्स्वेटप्रभवनलपा श्रेष्ठिनोऽकारि मोघा । किन्यम्बादेस्समधिकमुहः मानस तोपयन् वे, औपायस्तातिरति यमुना'ख्यां १० कणेहत्य कन्याम् ॥ ११ ॥ मोहाद्वैते जगति सुतरामुन्मनीभूय सम्यक, ससारीयां कृतिकुशलतां व्यज्य विश्वास्य सर्वान् । कालच्छिद्राधिगतिमुदित संविजानोऽग्रहीद्य', सार्वी दीक्षां सुमुनिसविधे भावशुद्धिप्रकर्षात् ॥ १२ ॥ १ शुभानुवन्धि सुखमित्यर्थ । २ पूर्व जन्मन्याराधिताना सच्चरणज्ञानवैराग्याना सारभूतान्निर्विकारभावादित्यये । ३ श्रीवज्रस्वामिपितु धनगिरिमहर्षगृहस्थावस्याया यादृशी मनोदशाऽऽसीत्तादृशीं शुभा परिणति समधिगम्य तत्सादृश्यवता येन मग्नलालेन चरित्रनायकजनकेनाअज्ञप्रमादिजनयुक्तिठलरुपकालदिपमतोया प्रथितमिति द्वितीयपादरहस्यम् । ४ मोह जन्यासक्तिसूचकमिद पदम् । ५ वेदोदयसूचकमिद पदम् । ६ मोक्षमार्गेऽन्तरायभूतानित्यर्थ । व्यवहारे ‘सगाई' पटेन अतदर्य प्रतीत । ८ स्वस्य इष्टस्य-लग्नसम्बन्धस्थापनरूपस्य प्रभवन लपन्ति-कामयन्ति ये ते इति विग्रह । ९ प्रबलमोहवत इत्यर्थ । १० 'अनिच्छये'त्यर्थकमेतदव्ययम् । ८ असारत्व । श्रीगमोद्धारक-स्तवः १ किन्त्वज्ञानाहितमतिभराः 'मग्नलाल'स्य स्वीयाः, दीक्षाच्यावां प्रचुरविधयाऽकापुरूजस्विचेष्टाम् । झञ्झावातैरचलप्रतिमं नकविघ्नैश्च मत्वा, राजद्वारेऽसदभियुजनात् कार्यसिद्धि प्रचक्रुः ॥ १३ ॥ एवं देवाद् विषमभवके चारके ३ वद्धरूपात्, भोगान् भव्यान् प्रवलविधिना भुञ्जमानादकामम् । लेमे पत्युः सुभग यमुना'देस्तथा पुत्ररत्नं, शुक्तिमुक्तां लभति हि यथा स्वातिजाद् वारिवत् ॥ १४ ॥ १ ऊर्वीब्रह्मग्रहशशधरादे सदाषाढमासे, ४ दर्शायाहे ५ विदितमहस' धुर्यस्वप्नात्सुतस्य । सच्चन्द्रार्कज्ञभृगुसहिते कर्कलग्ने सुरम्ये, जातास्वाधु मुदितपितरो 'हेमचन्द्रेति संक्षाम् ॥१५॥ यो व वाल्ये धृतिमतियुत ७ मार्गदीपस्य भद्रे नाभिव्येजे पुलिससविधे छद्मतां सत्यनिष्ठ । धर्माभ्यास व्यवहृतिकलां द्राग् समभ्यस्य चित्रं, वाचां पत्युः सुमतिलघुतां स्वीयवुद्धया हि व्येजे ॥ १६ ॥ जनाचारे स्वपितुरनिशं प्रेरणाल्लब्धनिष्ठ- स्तत्त्वज्ञानाद् विमलमनसा भोगवैगुण्यमानी । आत्मोन्नत्यै प्रगुणमतिक मोहभूपं जिगीषु सच्चारित्रग्रहणपरतां व्येज उद्वाहकाले ॥ १७॥ ६ पूज्यवर्याणा जन्मकुण्डलिकेयम् । १ व्यवहारे घेतत्पदभावार्य धमाल-तोफान'शब्देन व्यज्यते। २ लग्नविधान- शु ४ ( कायदो )स्यासदालम्बनेनासदारोपहेतुकाधिकरण( दावो-केस )प्रयोगेनेत्यर्थ । ३ क आगमोद्धारकश्रीणां जन्मकुडली बद्धसदृशादिति भाव । ४ अमावास्यायामित्यर्थ । ५ वृषभस्वप्नादिति भावः । टम १०श १ ७ 'युनिसिपालिटीफानस' इत्यर्थपरसोऽयशन्द। . ११ श्रीआगमोद्धारक-स्तवः किन्तु प्रेम्णा परवशधियां १ बन्धूनां विघ्नरूपा २ सन्निर्वन्धाञ्चरणमलनाच्छन्दतस्स्निग्धमातु । मन्वानो वै परिणयविधि ३ चारकापत्तिरूपां, 'माणेको'ख्या कुलजसुकनी ४ पर्यणैपीडिचेताः ॥ १८ ॥ मोहान्ध्याढये जगति विषमं ५ प्रस्तरूपोऽपि दुखा- ग्न्युत्तापाद्यः ६ प्रकृतिमजन 'हेमवच्चन्द्र'शुद्ध । ज्येष्ठभ्रातुः सुमुनिभवनाच्चेरणाद् भूरि ७ वप्तुः, छित्त्वा मोहं समयमिषतः प्रावजद्धमचन्द्र.' ॥ १९ ॥ न्यायाध्यक्ष ૧ ૨ किन्तून्मुहाच्छ्वशुरजननिस्वीयकैान्ध्यवृत्त- यायागारे १० परिणयविधे व्याजतो ११ रावितं चै। चकितमम धैर्यसारस्सदुक्तै , कृत्वाऽप्याप्तद द्विगुणचरणाकर्मणा च्यावितोऽसौ ॥२०॥ १३ नन्द्यार्दादिप्रकृतिजहनाकर्मणोऽपूर्वशक्ते- मोहात्क्रान्तोऽपि १४जनकसुचोद्यात् स्त्रियोभूषणार्थम् । १५आहम्मद्ये पुरि शुभविधेर्जग्मुषो जम्धुरासात् , सीक्षोत्कोऽगाज्जनकसहगो ‘निम्वपुर्या' 'सुराष्ट्र' ॥२१॥ ७ १ ५ वप्ता 'झव्हेराब्धी'न् कुमततिमिरोज्जासकान् दिव्यधाम्न', निश्रायेतिश्रुतिनिधिविधौ माधशुक्लपुधन। प्रव्रज्या नन्दयुतजलधि हेमचन्द्रो' बभूव, तुष्टो निजसुतहितश्रेष्टरीतिप्रसेधात्।। २२ ।। १ विधनभूतादसदाग्रहादित्यर्थ । २ चारित्रस्यान्तरायभूतादित्यर्थ , अतद्धिछदत 'पदविशेषण ज्ञेयम् । ३ कारागारप्रसनरूपा- ४ विमनस्क इत्यर्थ । ५ प्रस्तसदृशोऽपीति ६ स्वजनसम्बन्धिवर्गजनितनानाकष्टख्याग्नेहत्तापादि- भिरित्यर्थः । ७ पितुरित्यर्थ । ८ प्रक्षेण मोद्दाधीना इत्यर्थ । ९ अतत्पदग्याथों हि लोकभाषायां धांधल' इति पदेन व्यवहियते । १० लग्नविधान (कायदो) स्रेत्यर्थः । ११ लोके हि 'फरियाद करी' इति कथ्यते । १२ भेतत्पादस्याय भावार्थ : हेमचन्द्रो हि कर्मणा विवशीभूतस्सन् द्विगुणवरणात-द्विविधचरणात् (अक च बाह्यवेषरूप द्वितीयं चान्तरभावस्फीतिरुप) च्यावित, इति। १३ (कर्मविवशतया चरणपतिताना ) नदिषेणाकुमारादीना प्रकृते (स्वभावस्य ) जहन (त्याग -परिवर्तन- मितियावन् ) यस्मादिति विग्रह , इद च 'कर्मण इत्यस्य विशेषणम् । १४ पितु.शुभप्रेरणयेत्यर्थ. । १५ अहमदाबाद- नगरे इत्यर्थ । मित्यर्थः । भाव । . १ श्रीआगमोद्धारक-स्तव , १ ३ 'आनन्दाधिः' शिवसुखजनौ संयमे दत्तचित्त- श्चातुर्मासं प्रथममुपित. 'लीम्बडो' गुर्बुपान्ते। वह्वभ्यस्तं यतिजनहितं तत्र देवात्प्रतीपात्, मार्गस्याश्वेतभवदिवसे पूज्यपादा ययु स्व ॥२३॥ उद्यद्रोहे हिमपतनवद् गुर्वभावाधिक्षिप्तो ऽप्युद्यद्धयों गुरुवरवचो धारयन्नागमीयम् । 'आनन्दाख्या'नुगुणमनसा क्षिप्तमोहो द्वितीयां, चातुर्मासी सुविधि विदधे 'ऽहम्मदे शाहपूरे' ॥ २४ ॥ यात्रां कुर्वन् विहरणविधेः 'केशरीयादितीर्थे'- प्वातीत्याप्तस्सदुदयपुरे' लोकसंख्यां सुवर्षाम् । मौने धर्म सुबहु सुयतन शास्त्रवार्तासु विज्ञ- स्तीथॉद्भासी कुसमयमथान् 'मारवाडे' व्यहार्षीत् ॥ २५ ॥ सिद्धान्तोन्या विशकलयिता लुम्पकादिप्रचारं, कृत्वा यात्रां वरमुनिमतां 'गोलवाडेपुतीर्थ्यो । 'पालो' तुर्य जिनमतमहेवृष्टिकालं व्यतीत्या- स्थात् सद्वत्त पठनसुयती 'सोजते'ऽक्षाङ्कवर्षाम् ॥२६॥ सार्व तत्वं सुविशदमथो बोधयन् भव्यजन्तून् , विहृत्योनं 'मरुधरभुवि' प्राप्तवाद गूर्जरत्रान् । तम्योत्तंसे 'चन्तरभुवो' भूषके 'पेटलादे, संजुष्टौ 'जीव-मणिविजयों वप्तृबन्ध सुदीक्षौ ।। २७ ।। ५ ६ . ऐहामुत्रोपकृतिचतुरं रुग्णमायुक्तचेता., निर्याम्याप्ताचरितचतुरः पष्ठवर्षामवात्सीत् । 'संवत्सर्या अवमतिथिजे बुद्धिमेदप्रसङ्गे, पर्यायाल्पोऽप्यधिगतरहश्शास्त्रमान्यं जुघोष' ॥२८॥ १ मागशीर्षकृष्ण एकादशी तिथौ इत्यर्थ । २ श्रीमद्भि झव्हेरसागरपूज्यपादैरन्तिमसमये स्वशिष्यायानन्दसागराय आगमाभ्यासपरताया श्रुतप्रचारस्य च भारपूर्वक शिक्षादत्ताऽऽसीत् । ३ अहमदावादनगरे शाहपुरमध्ये इत्यर्थ । ४ तृतीया । ५ गालवाटीयपचतीर्थ्यो । पचमीमित्यर्थ । ७ पिता ज्येष्ठनाता चेत्यर्थ ।

६ श्रीआगमोद्धारक-स्तवः वर्षान्ते 'चारुतर'जनतां वोधयित्वार्यतत्त्व, १ २ 'छाणीग्रामे ऽवसदृषिमितं वृष्टिकालं सुधीर । मूतिन्हावाजिनमतरिपून दुण्ढकान् जोपमाऽऽस्य, 'कल्लोलाख्येपुरि विहरता येन दीप्तं सुचारु ॥२९॥ ३ शास्त्रव्याख्याचकितसुवुधस्स्तम्भने यो ह्यकार्षी- च्चातुर्मासं वसुमितमथो कृप्तधर्मप्रचारः । प्रशोकजिनमतहितात् पार्श्वचन्द्रान्यतीर्थान् , कृत्वा वादे प्रतिहतधियो भासिता जनदृष्टि ॥३०॥ द वर्षान्ते पड्रियुतभविक सङ्घमादाय भव्यं, योत्रां कृत्वा विमलगिरिसत्तीर्थराजस्य सम्यक् । भव्योद्योधं सुविधिविचरन वर्य साणंद पुर्या', चातुर्मासं नवममवसच्छास्त्रतत्त्वप्रकाशी ॥३१॥ ५ चातुर्मासत्रय महमदावाद'माश्रित्य लब्धा, शाब्दे न्याये रुचिरपटुता येन विद्वत्सुमान्या। कृत्वा रम्यां सुविधि तमसा नोदिकां तीर्थयात्रां, दुष्कालात्ता सहकृतिनिधि कारिता 'पट्टणे' यै ॥ ३२ ॥ ६ ८ ५ ९ १ ९ - नागाक्षाद्धेन्दुमितशरदो माघराकाहिरम्ये, प्रायच्छद्धर्मजजरणछोडाय दीक्षां सुशिक्षाम् । आयं शिष्यं 'विजयसहितं सागरान्त विधाय, वर्षी ब्रह्मपुनिधिकुभवां भावपुर्या मवात्सीत् ॥ ९ १० १ सप्तमम् । २ मूर्तेरपलापकारिण । ३ अष्टमम् । ४ एवं हि शब्द भाषाया 'छरीपालतो सब' इत्युच्यते । ५ व्याकरणे इत्यर्थः । ६ पापानामित्यर्थ, । ७ 'सहायकारी फड' इति भाव । ८ गूर्जरदेशीयाणहिदपुराख्य पणे (पेटलादापन्न) भाव: धामजवासिने रणछोडदासाख्यपाटीदारजातिकाय भव्यायेत्यर्थः। १० भावनगरे इत्यर्थ । इति. ९ श्रीआगमोद्धारक-स्तवः १' २ शास्त्रोपज्ञ हितमुपदिशन भूरिभव्यप्रवोधं, वर्षाकालं मनुमितमथो राजपुर्या'मुवास । सत्रा श्री नेमिमुनिपति'नोदूह्य सिद्धान्तयोगान् , 'पन्न्यासाख्य' पदमलभत ज्येष्ठशुक्ल दशम्याम ॥ ३४ ।। वर्षा नीत्वा ‘कपडवणजे' धर्मकृत्यैस्तुरम्यै- र्यात स्सौराष्ट्रमथ विचरन देशनादानदक्षः । कृत्वेतस्तारणवरगिरेस्स्पर्शनां धर्मवाचा, प्रोनैः ‘पेथापुर परिषदो योजकैस्सन्कृतोऽभूत् ॥ ३५ ॥ ३ ४ ६ . मज्जद्भव्यान् भवजलनिधौ रक्षिता जैनवाग्भि- वर्षे नीत्वाऽऽगमविधियुते 'भावराजाख्यपुर्यो' । 'सूयझे' विविधसुमहेस्सत्कृतस्सूरतीय- श्चातुर्मासी ‘सुरतनगरे' यापयास रम्याम ॥ ३६ ॥ , चैत्यान् सर्वान् सविधि 'सुरते'श्राद्धसङ्घन नत्त्वा, गत्वा 'मुम्वापुरि' भविजनैः प्रार्थित. 'लोलवागे'। गौराहाणां 'समितशिखरे' हय॑सन्निमिमीयां, धैर्यात् सत्ताभियमगणयन् ध्वस्तवान् यः क्षणेन ॥३७ ।। 'देxला. भ्रातु'निधिमपि वरं स्थापयित्वोपदेशा- दारेमे सद्विषयखचितग्रन्थरत्नप्रकाशम । सङ्घ नीत्वाऽभयविधु'मुखं 'चान्तरीक्षाबतीर्थे,' यानां चक्रे रसरिनिरतैः श्राद्धवयैस्समेतः ॥ ३८ ॥ ९ धार्थ नग्नस्सुवहु विहितं तत्र पूजाप्रसङ्गे, मिथ्याभ्याख्यानमपि च ततो न्यायगेहे प्रयुक्तम् । जित्वाऽकार्यु झगिति गुरवस्सत्यतत्त्वप्रयोगा- दाड्ग्लन्यायाधिपतिहृदये जैनधर्मप्रकाशम् ॥ ३९ ॥ १ चतुर्दशममित्यर्थ । २ राजनगरे-अहमदावादपुरे। ३ तारगातीर्थस्येत्यर्थ । ४ पेथापुरीयप्रान्तिकपरिषदि गुरुवरस्य जातसत्कृतेस्सूचकोऽयपाद । चातुर्मासद्वयमित्यर्थ.। भावनगरे-राजनगरे। '७ अभयचद्रझवेरिणस्सधपतिपदेन नियोजितमित्यर्थ । ८ 'छरी पालतो सघ' इतिभाव. । ९ दिगम्बररित्यर्थः । ५ ؟ श्रीआगमोद्धारक-स्तव १ बाणार्यवेन्दुमितसमसि प्रावृपं 'येवलायां,' स्थित्वोद्वाह्य प्रथममुपधानव्रतं श्रावकाणाम । 'सूर्यद्रङ्गे जलदसमयौ यापितौ धर्मकृत्य- दीक्षित्वैतर्हितनगणपं 'माणिक' चान्यभव्यान् ॥ ४० ॥ २ 3 धर्मक्रान्तिच्छलमुपदधन लालनाख्यो हि विद्वन- मन्य स्सिद्धाचल'भुवि तदाऽपूजयत्स्वं शिवायैः। पाखण्डं तत् भृशमपगतं कर्तुकामैर्गणीन्द्रे- मन्दश्रीः कान्तिविजयमुखैस्सङ्घबाह्य कृतस्स ॥४१॥ ५ ६ स्थित्वा व विषयजिनमो 'स्तम्भतीर्थे' च'छाण्यां,' ज्येष्ठभ्रात्रे 'विजयमणये' वर्यपन्न्यासभूषाम । दत्वा तीर्थाणि सविधि नमन् ‘पत्तनं चाणहिल्लं.' भव्यश्रोतृन जिनमतसुधां पाययन्नाप रम्यम ॥ ४२ ॥ ८ ११ तत्रायाप्य शुनवरमुदायायिनी भव्यवी, १० सङ्घस्थित्यां तपसि धवले दिक्तिथी मल्लितीर्थे । अज्ञानान्धंतमसमथनायागमोद्धारकर्ती, श्रीज्यां संस्थाप्य समितिमथो हर्षयामास भव्यान ॥ ४३ ॥ १२ T 1 T आभप्तं यत्स्वगुरु जयवीरा भिधैरागमाना... मुद्धारार्थ चरमसमये पालितुं तद् यथेष्टम । बहायासेन च गणिवरस्साधुसखोपकृत्य, प्रारेमे मुद्रणमथ महत् स्वाश्रयेणागमानाम ॥४४॥ १ वर्षे । २ वर्तमानकालीनगन्छाधिपतिमिति भाव : शिवजीदेवशीप्रभृतिभि । ४ प्रवनककान्ति- विजयमहाराजमुख्यै सूरिभिरित्यध्याहार्यम् । ५ चातुर्मासद्वयम् । ६ त्रयोविंशति-चतुर्विंशतितममित्यर्थ । ७ श्रुतज्ञानस्य वरमुद -इर्षस्याप्यायिनी-पोषिकां । १८ चतुर्विधसघस्योपस्थितिसूचकामिद पदम् । ९ वैशाखमासे । दशम्याम् । ११ भोयणीतीर्थे । १२ भागमोदयसमितिसूचकोऽय शब्द । १० - ।

श्रीआगमोद्धारक-स्तवः a. वर्षायां 'पाटण'मुपगतैर्वाचनाऽद्या ह्यकारि, नियन्थानां वरमतिमतामागमाभ्यासवृद्धयै । तस्यां श्री'सूयगडदशवकालपत्रिंशिकादीन् , व्याख्यायाऽयुः 'कपडवणजे' वाचनायै गणीशा. ॥४५॥ १ २ । तत्र व्याख्याय पटु 'ललितावश्यकादीन् सुयत्न जग्मुर्वर्षार्थ महमदपुर्या' स्वधर्माभिवृद्ध्यै । तत्र स्थानाङ्ग'मथ सविशेपाकरं वाचयित्वा, वर्षामस्थात् 'सुरतनगरे' भासयन् जैनधर्मम ॥४६॥ ३ तत्राकापुर्युगशरमिते वाचने 'चानुयोग- श्रीनन्द्याचारमुखमहदावश्यकाद्या गमानाम् । एवंकारात् सुयतिसमजे कालदोषात्प्रहीणं, सच्छास्त्राणां विततपठनं संततं वृद्धिमाप ॥ ४७ ।। ६ 'आनन्दाब्धेः प्रवरगणिनस्तत्त्वनिष्ठागरिष्ठौ, भत्तयुत्साही श्रुतजिनमतस्फीतिकायषु दृष्ट्वा । (४)(७)(९)(१) वऽयात्रिग्रहतनुमते राधशुक्ल दशम्या- मा यत्वं 'कमलविजया'स्सूरयः ‘सूरतेऽदुः ॥४८॥ . स्वर्ण माणिक्यमिव खचित योग्यसाम् च सूरे- वक्ष्यि प्रोतस्सुमहमकरोत्सूर्यपुर्या' स्सुसङ्घ ।' . न्यायागारे ललनविषयानिष्टवादं विजित्य, धर्मभ्राजी मुनिपतिरथो 'मोहमय्यां' समेत. ॥४९॥ १ ललितविस्तरा--आवश्यकसूत्र -अनुयोगद्वारसूत्र-योगदृष्टिसमुच्चय-उत्तराध्ययनसूत्र ग्रन्थानित्यर्थः । २ अमदावादनगरे। ३ विशेषावश्यकभाष्य सहितमित्यर्थ.। ४ चतुर्थो-पचमो चेति भावः । ५ ललितविस्तरा-योगदृष्टि० अनुयोग-भाव- श्यक०१-उत्तराध्ययन-विशेषावश्यक०६- स्थानाग०१-सूत्राणामित्यर्थः । ६ साधुसङ्गे इति भावः । ७ वैशाखशक्के । ८ लालन- शिवजीप्रकरणे न्यायागारेऽपि विजित्येत्यर्थ । २ . - श्रीआगमोद्धारक-स्तव. १ (२८) लब्ध्यङ्कप्रावृषि वृषमहिम्नोऽर्जको नैककाय- मिक्षार्तीयनिधिकरणेऽप्रेरयद् दानशौण्डान् । 'कीकाभ्रातु'भवनमुषितस्सूरिराइ 'भायखल्ले. स्वाग क्षान्त्यै विहितविनय प्रार्थितो लालनेन ॥५०॥ २ ३ ४ (५) (७) (९) (१) चातुर्मासे शरमुनिनवेन्दौ श्रुतप्रोक्तरीत्या, देवस्वोत्सर्पणविवदने वादगल्भान् विजेतु. । सूरेस्सङ्घार्पितनिखिलसद्ग्रन्थरत्नानि सङ्घो 'जैनानन्दश्रुतवरगृहे'ऽस्थापयत्सूरतीयः' ॥५१॥ 'सिद्धाने वणनवलचन्द्रोहि यत्प्रेरणातो, यात्रासङ्घ विविधसुमहैः पादचारं निनाय । कृत्वा यात्रां सह सुभविकैस्सूरिवर्यश्चकार, 'पालीताणे' गुहमुखमितां वाचनां साधुसङ्घ ॥ ५२ ॥ 'पिण्ड-प्रज्ञापन-भगवतीनोघनियुक्तिका'ञ्च, व्याख्यायो राह्य शुभमुपधानव्रतं भाविकानाम् । विज्ञप्ति मालववसिमतां मानयित्वा च सूरि- शिष्यै साक किल 'रतिललामाख्यपुर्या' समेत ॥५३॥ धर्मोन्नत्या 'ऋषभसहितां केशरीमल्लनाम्नी, संस्थां' तत्राखिलजिनमतोद्भासिकां स्थापयित्वा । 'व्याख्याप्रज्ञप्तिसमवयसूत्रादिप्रज्ञापना'नां, चक्रे व्याख्यां कुलगिरिमितां वाचनां कत्तकामः ॥५४॥ ६ ७ ८ 'शैलाणाख्यं' पुरमथ यतीन्द्रो हि सङ्घाग्रहेण, चातुर्मासार्थमुपगमितो धर्ममुढान् प्रवोद्धम् । मत्वा धन्यं नृपतिरपि गुच्छात्रवाचो निशम्या- मायुद्घोष दयितहृदयरस्वीयराज्ये चकार ॥ ५५ ॥ १ धर्मप्रभावनाया इत्यर्थ । २ उत्सर्पण(वोली स्याशास्त्रीयताया देवद्रव्यस्य च चर्चासूचकमेतत्पदम् । ३ श्रीजैनानन्द- पुस्तकालये इत्यर्थः । ४ षष्ठीमित्यर्य । ५ रतलामनगरे इत्यर्थः । ६ खिलशब्दो हि विनापरपर्यायोऽतोऽत्र निर्विघ्नतया जिनमतस्योद्भासकारिणीमित्यों झेय । ७ छन्दोभगभिया विहित श्रीसमवायाङ्गसूत्राथै एतादृशपदप्रयोग. मर्पणीय. धीधनै विद्वद्भि । ८ सप्तमीम् ।

श्रीआगमोद्धारक-स्तव १ पूर्ण शैलाणनृपविषये ह्यष्टमीरुद्रदर्शा- ऽऽख्याताह पर्युषणदिवसे मारीचार न्यषैधीत् । प्राच्यं वृत्तं ह्यकवरविबोध्धु स्मृति 'हीरसूरे'- २ रानीयायाद्विविधनिगमान पावयन् 'रत्नपुर्याम् ॥५६॥ प्रेमक्षप्त्या श्रुतवरतपस्सम्यगुद्वाह्य चान्यैः- पुण्यै कृत्यैर्जलदसभये भ्राजयित्वा सुधर्मम । ३ ४ 'माण्डूतीर्थ'प्रचलितविधौ वाधकं 'धारभूपं ५ हस्तक्षेपोनिरसविधयेऽवोथयत्तत्र गत्वा ॥५॥ 'माण्डू-भोपावर'लसितसच्चैत्ययोस्स्वोपदेशा- ज्जीर्णोद्धारं प्रवरभविकै कारयित्वा यतीन्द्र । बोध पञ्चेडपुरपतये' 'सेमलीठक्कुराय, प्रादात्ताभ्यां निजभुवि ततो मारयो वारिता वै ॥ ५८ ॥ ६ वर्षाकाले जिनमतविभां वर्धयन् 'रत्नपुर्या,' शास्त्रैर्वादे यतिपविजयं त्रिस्तुतीयं व्यजेषीत् । सङ्घस्याभ्यर्थनमथनिशम्योपधानं सुवाह्य, 'सम्मेताद्रिव्रजितुमभिवग' प्रतस्थे मुनीन्द्रः ॥५९ ॥ मध्ये मार्ग निजप्रतिभया धर्मभासं वितन्वन् , लोकं नानाविधमुपदिशान् ‘कालिकाता मयासीत् । (४) (2) चातुर्मासे युगगुणमिते तत्र चैत्यादिधर्म्य- स्थानस्थित्यै बहुतरनिधिः कारितो देशनात ॥६०॥ १ अष्टम्यामेकादश्याममावास्याया पर्युषणासु चेत्यर्थ । २ रतलामनगरे। ३ माडवगढार्थपरकमिद पदम् । ४ धारसस्थाना- धीशमिति भाव । ५ उत्कर्पण निरसनार्थमित्यर्थ । ६ हिंसा । ७ श्रीयतीन्द्रविजयाह मितिभाव ।

श्रीआगमोद्धारक-स्तवः (०) (२). तीर्थेशानां खयमलमितानां सुनिर्वाणभूमे- 'स्सम्मेतान्द्रे प्रथितयशस पुण्ययात्रामकार्षीत् । राशो 'दुद्धेडियविजअसिंहस्य भक्त्या विहृत्य, वर्षाहेतोस्सुमुनिपतयोऽजीमगर्छ' न्यवात्सुः ॥६१ ॥ बाबूलोकं विषयजसुखास्वादलीने विवोध्य, सवेगापूरितसुवचनैर्धर्ममार्गे न्ययुक्त। दीक्षाब्रह्मवतविधियुतानुत्सवान् कारयित्वा, पाव पार्व विविधनिगमान् ‘सादही'ग्राममापु ॥६२ ॥ पावं पावं जिनमतसु(भव्यलोकं यतीन्द्र , प्राग्वाटानां मरुजसहजं वैमनस्य चिरत्नम्। कृत्वा दूरे थुततपविधि सोत्सवं कारयित्वा, बोद्ध धर्म शिथिलकृतिकान् 'मेदपाट' विजहे ॥ ६३ ।। १ (७) (3) नीत्वा वर्षामुदयनगरे' सम्मितां धातुत्वै- जग्मुस्सचेन सह गुरव 'केशरीया'ख्यतीर्थम । तत्रौद्दण्डत्यं क्षपणककृत स्वीयबुद्धया व्यपास्या- ध्यारोप्योच्चैस्सितपटयशोऽवर्धयन् सद्धजं वै ॥ ६४ ।। नग्नाटीयै प्रतिहतमथो धर्भतेजो विवर्य, न्यायागारेऽधिगतविजया आययुजरत्रान्'। चातुर्मासं सुमुनिसहिता इम्मदाबादपुर्यो,' तस्थुर्भव्यान् विविधममलं जैनतत्वं दिशन्त ॥ ६५ ।। । 'माकुभ्रातु'विनतिवशगा 'आश्विनी सेद्धचक्री- मोली दिव्यां नवपदमहो वोधिकां कारयन्त । संस्थां संस्थाप्य च नवपदाराधिका स्वोपदेशा- यंग मेन्सोसायटिविनयतश्चख्युरास्तिक्यतत्त्वम् ॥६६॥ ३ -- १ उदयपुरे। २ दिगवरविहितम् । ३ श्रीनवपदआराधकसमाजस्थापनाया. सूचक अष पाद । ४ विद्याशाला(डोशीचाडानी पोळ) मध्ये आस्तिक-नास्तिक चर्चा स्कोटस्वरूपप्रसिद्धव्याख्यानवार्ता सूचकोऽयं पाद ।

श्रीआगमोद्धारक-स्तव १३ १ २ तद्व्याख्यानात् क्षुभितमतिकान् शिक्षितान शास्त्रपाठ- स्सन्तोष्यार्थ धनवितरणौचित्यतत्त्वं विवोध्य । याता. 'श्रीदेशविरतिसमाज' ततस्स्थापयित्वा, ३ ४ ६ 'श्रीभोयण्या'मतिशुभमहैराद्यतन्मेलकाय ॥ ६७ ।। (९) (३) वर्षावासं निधिगुणमितं याषितुं 'जामपुर्या' यान्तौ मार्गे'ऽहमदनगरे' 'तीर्थसिद्धाचलस्य' । रक्षाहेतोस्सपदि निधये प्रेरयित्वा सुमव्यान, लक्षाधिक्यं द्रविणचयनं कारयामासुराशु ॥ ६८॥ स्थाने स्थाने जिनमतमहं वर्धयन्तो गणोन्द्रा- स्थित्वा वर्षा 'नवलनगर' चारुवाग्भिस्स्वकीयैः । सत्रचामाम्लगृहमथ चास्थापयन् छात्रगेहं, दान्ताः पूज्यै धृतिमतिबलात् बालदीक्षाविरुद्धाः ॥ ६९ ॥ पश्वादेता स्सुरतनगरे' जैनसाहित्यवृद्धि- सत्कोशार्थ धनिक नगिनं मछुपुत्रं'व्यवोधन् । 'मुर्शीदाबादपविजयसिंह'म्समेतोऽत्र सूरे- भक्तिव्यक्तीकरणपटुको भावतो दर्शनाय ॥ ७० ॥ ८ ९ १० - आसीच्छ्री देशविरतिसमाजस्य' पर्षत्सुरम्या, दत्ता तस्यां भविकहितदा देशना सारगर्भा। १३ 'रत्नाम्भोधे 'पठनसदनस्थायि कोशं विवद्धर्थ, दृब्धा 'तत्त्वप्रसारणकरी वोधमालाख्यसंस्था' ॥ ७१ ॥ - १ आंग्लशिक्षाप्रभावितान् नवयुवकानित्यर्थः । २ धनस्य व्यये दाने वा पात्रापात्र विवेकमित्यर्थः, एतद्धि तस्मिन् समये ज्ञान- प्रचारनाम्नी भौतिक्वादसमर्थककेलवणीपोषककॉलेज-हाइस्कूल-वोटिं गादीनां हिताहितकरत्वमीमांसा सूचक पदमस्ति। ३ श्रीदेशविरतिसमाजस्य प्रथमाधिवेशनायेत्यर्थः । ४ जामनगरे। ५ षष्ठिसहस्राणि रुप्यकाना वार्षिक दत्त्वा तीर्थस्वामित्वनिर्णय- स्यानुकूल्याय श्रीसिद्धाचलरखोपाफहपोषणप्रवृत्तिरेतच्छ्लोके प्रदर्शितास्ति। ६ जामनगरमियः । ७ सत्रं-भोजनशाला, आचाम्लगृह आविलखातु। ८ बोहि गाख्यविद्यार्थिगृहमिति भावः । ९ निष्फलप्रवृत्तिमतः कृता इत्यर्थः । १० जैनसाहित्योद्धारक- फडमित्यर्थ । ११ नगीनमाई-मछुभाई-श्रेष्ठिनमित्यर्थ । १२ अधिवेशनमित्यर्थः । १३ श्रीरत्नसागरजैनवोहि गस्थाथिफंड- मिति भाव ।

१४ श्रीआगमोद्धारक-स्तव - प्रव्राज्यानेकभविकजनान् पावयन्त स्तुराष्ट्रान्', प्रावृट्कालं शुभकृतिभरैस्स्तम्भतीर्थ व्यतीयु । सस्था प्याहम्मदपुरमितास्तत्रसंस्थाय वर्षा, श्रुत्वोद्यच्छन् 'वटपुरनृपाज्ञां सुदीक्षाविरुद्धाम् ॥ ७२ ॥ १ सूरेदशास्त्राभ्यसनमुदिता जङ्गमज्ञानशाले- त्येवं चाशंसदतिविदुषी जानी क्राउझाख्या' । (२) (४) नेत्राम्भोधिप्रमितजलमुक्काललाभस्पृहावन्- मुम्बापुर्यागतभविजनप्रार्थनातो विजद्दे ॥ ७३ ॥ शास्त्रव्याख्याप्रथितयशसो 'लालबागे' हि सूरे र्दीक्षापुष्टि प्रवचनविधेः क्षुब्धयूनां प्रचारैः । व्यामूढाया ऋजुजनततेर्मोहहत्य समित्या, ३ पत्र संस्थाप्रथनजनितं चालितं 'सिद्धचक्रम् ॥ ७४ ॥ . 'माणेकाम्भोनिधि'सदुपदेशात्प्रकृतोपधाने, मालारोपोत्सवमुपगता 'घट्टकाढे पुरे' वै। व्याख्यानैस्स्वैस्समयसहितैस्संयमायोग्यसूचि- नाट्यं रुद्धा युवजनमतं भासितं शीलनं हि ॥७५ ॥ पश्चाद्यातास्सुरतनगरं' शिष्यवृन्दैस्समेता- स्संवत्सर्यास्तिथिगतविसंवादमुन्मुद्य शास्त्रै । भाव्युत्सूत्राध्वगविषमता याञ्जसा व्यञ्जिता सा, किन्नोऽद्यापि प्रकटविदिता वर्तते पर्वतिथ्या.? ॥ ७६ ॥ - १ वडोदराराज्यदीक्षाप्रतिवन्धककायदार्थपरकमेतत्पदम्। २ चातुर्मासवाची अय शब्दः । ३ श्रीसिद्धचकसाहित्यप्रचारक- समिते स्थापन सिद्धचक्राख्यपाक्षिकप्रारभवेत्यर्थः । ४ घाटकोपरे इत्यर्थः। ५ दीक्षाया अयोग्यताप्रदर्शक युवकसंघप्रेरित नाटकमित्यर्थः।

श्रीआगमोद्धारक-स्तव १५ १ नानाप्रश्नोत्थितमतिगतभ्रान्तिशान्त्यै सुपर्षत् , सङ्घायासात् सितपटमतालम्विनां सद्यतीनाम् । 'आकाशाङ्काकशशिसहिते वत्सरे राजपुर्या, जाता यस्यां यतिपतिवरास्सम्यगामन्त्रिता वै ॥७॥ . २ शङ्कापक भविकमनसो क्षालितुं दत्तचित्ताः, गत्वा तत्र स्वकमतिभराच्छास्त्रपाठश्च सर्वान्' । सन्तोष्यता भविकविनयानीरदैस्साकमेवा- सेक्तुं सांसारिकजनगणं सूरयो 'मेहसाणाम् ॥ ७८ ॥ ३ ४ ५ मध्ये वर्ष सुबहु विहितश्शासनोन्नायिकायें- रत्न क्षेत्रे सुभविकनृणां धर्मपीयुषसेक । यूरोपीय. श्रुतिपटपुटै' उन' सूरिशसां, पीत्वाऽत्रेतो ह्यमृतवचनैर्वीततृड्कशशंस ॥ ७९ ॥ काले काले पुनरपि पुन सूरय पालितेम्य , शिक्षा-दीक्षा-वितरणमपि प्रायशो योग्यमेव । तस्मात् पादार्पणकरुणया पावयन्त्वेषमोऽस्मा- नेवंसवादरभरभृत: संययु. पालिताणाम् ॥ ८०॥ ६ चातुर्मासे गतवति यथा भ्राजते शारदी श्री, पद्मव्याजैस्सरसि सरसा सन्ततं तद्वदेव । सज्ज्ञानश्रीरपि गुरुवराणां च सन्तन्यमाना, नानारूपैनवनवमहेर्धर्मकृत्यैश्च रेजे ॥ ८१ ॥ १ समेलनमित्यर्थः। २ राजनगरे-अहमदावादे । ५ अन्तःकरणरूपक्षेत्रे- इति भावः । ६ आता नहि । ३ चातुर्मासमध्ये इत्यथ । शासनप्रभावककायैरिति - भाव. ।

१६ श्रीआगमोद्धारक-स्तवः १ 'श्रीमाणिक्य' 'कुमुदविजय'श्चेत्युपाध्यायवयाँ, पन्न्यासौ द्वौ बहुगुणयुतौ भक्ति'ते'पद्माभिधौ च । अत्युत्साहस्सह शुभकृपासिन्धुवद्भ्यो भवद्भ्यो लब्ध्वाऽऽचार्याह्वयमुपदवीं धर्मभ्राजो विरेजु ॥ ८२ ॥ 'आनन्दस्याम्बुनिधिरिति यद् वर्तते नाम सत्यं, प्रत्यक्षन्तत् भुवि विदधती किं न जैनी प्रजाऽभूत्। तस्मात् सूरीन् झगिति 'नगरे जामपूर्वे'ऽपि सङ्घ, प्रार्थ प्रार्थ कथमपि चतुर्मासवासाय निन्ये ॥ ८३ ॥ २ अज्ञ कैश्चित् श्रुतकथितसिद्धान्तवाचा विरुद्धं, प्रोक्तं वृद्धिक्षयविषयक पर्वतिथ्याः मत यत् । उग्र तत्खण्डनमथ कृतं शास्त्रदृष्टयापि लोकं वोषित्वाऽरं नवमतवतो लजितास्यान् प्रचक्र ॥ ८४ ॥ तत्रैवाग्ग्रे जलदसमये स्थापितो 'देवबाग- लक्ष्म्या'नाम्नाऽऽश्रमवर उपादिश्य लोक सुखेन । पश्चाद् भक्तो 'नगरधनपः पोपटाह'स्सुभक्त्या, सौराष्ट्रीयाखिलजिनपसत्तीर्थसंस्पर्शनाय ।। ८५ ।। ३ सङ्घ नीत्वाचरणचलनं पब्रिसम्पालनोत्कं, सानन्दोऽगात्, सकलमपि तद्वर्णनं चारुरीत्या। 'तीर्थाः सौराष्ट्रविषयभवा. सङ्घयात्रा च' नाम्ना- ख्याते ग्रन्थे लसति तदिवाऽऽयोक्तुमाकेतयन् ॥ ८६ ॥ (संदानितकम् ) १ श्रीमाणिक्यसागरोपाध्याय श्रीकुमुदविजयोपाध्याय-श्रीभक्तिविजयपन्यास-श्रीपद्मविजयपच्यासेभ्य आचार्यपदप्रदानसूचकमिद पूर्वाद्धम् । २ जामनगरे। ३ आनन्दसागरसूरीश्वरेण सहेत्यर्थ । ४ 'सौराष्ट्रना तीर्थो भने सधयात्रा' इत्याख्यग्र थे इति भाव ।

श्रीभागमोद्धारक-स्तवः - (८) (४) एवं वस्वन्धिमितमथ ये वृष्टिवासं जनानां, पुण्याढ्यानामतिविनयत. सिद्धक्षेत्रे हि कृत्वा । 'खातारम्मं चरमजिनपस्यास्या ह्यागमानां, रक्षागेहस्य च' सुभविकै. कारयामासुरत्र ॥ ८७ ।। २ अन्यत्तत्र श्रमणनिकरग्रन्थसंग्राहि सहं, संस्थाप्यारं शुभ महमदावादपुर्या ' यतीन्द्रा । भक्त श्रीमोहन' इति महच्छेष्ठिना सव्रतानां; रम्ये हाधापनविधिमखेऽभ्यर्थ्यमानाः प्रजम्मु ॥ ८८ ॥ ३ सिद्ध शास्त्रैरुपकृतिकरं लक्षशो रूप्यकैस्तं, सम्पाद्योद्यापनविधिमलं 'शाम्पडापोल' मध्ये । (५)(५) ९४१) तत्रावास्तु शरनवनवैकाञ्चितेऽन्देऽव्दकाले, चाळ वीथ्यां सुगुरुचरणा 'नागजिद् भूधराणाम्' ।। ८९ ॥ ५ ६ पश्चादेता. क्षरणसमयं यापयित्वाऽऽगमाना- मागारस्य प्रचलितविधि वीक्षितुं 'पालीताणाम् । सागोपाझं टिविरहितं सत्यमारब्धकृत्य, त्यक्त्वा सर्वस्वमपि सतत साधयन्त्येव सन्त ॥ २० ॥ कृत्वा लोकोत्तरसुचरितं ये तरन्तीह लोकं, धन्यास्ते वै सफलजनना भूभरा. सन्ति चान्ये । सत्यामेतां भंणितीमथ ते कर्तुकामा यतीन्द्रा- स्तत्रातिष्ठन् वरसलिलदाऽऽसेककालत्रयीं ते ॥ ९१ ।। ८ १ श्रीवर्धमानजैनागमभदिरस्य खातमुहूत्तमिति भावः । २ श्रमणसधपुस्तकालयाख्यज्ञानालयस्थापनामित्यर्थः। ३ श्रेष्ठिवर्य- श्रीमोहनलाल छोटालाल इति माव । ४ वृष्टिकाले। ५ पोलवाची अय शब्दो शेय.। ६ चातुर्मासमिति भावः। ७ शिलोत्कीर्णागममदिरस्येत्यर्थः। ८ चातुर्मासत्रयमित्यर्थः ।

१८ श्रीआगमोद्धारक-स्तव दीर्घायासैर्गणधरवरप्रोक्तजैनागमानां, पाठ शुद्ध दृषदुदरगं शिल्पविद्याप्रवीणैः । कारं कारं किमु न कलितं सूरिभि. कर्म चित्रं, यस्माज्जातो झुपलनिकरोऽप्यागमज्ञ (भ्राट्) परे के ? ॥ ९२ ॥ रम्योपाध्यायकपदमदु 'श्रीक्षमासागरेम्य , श्रीमच्चन्द्रेभ्य उचितपद चारू पन्न्यासकाम् । वर्षे चाग्रे गणधरगृह सिद्धचक्रापूर्व, संस्थाप्यैव जिनमतविभाभासकं सत्समाजम् ॥ ९३ ॥ १ , (९)(९) ९) १) अङ्काकाङ्काजमितशरदि ह्यागमानां गृहस्य, सत्यां पूर्तावभिनवप्रतिष्ठाविधि माघमासे । पञ्चम्यामानशुभशलाकोत्सवेनापि सत्रां, सन्मूर्तीनां श्रुतविधियुतं कारयामासुरत्र ॥ ९४ ।। सम्पाद्यैवं 'कपडवणजश्रेष्ठिचीमनलाल- डाह्याभाईत्यभिधपरमश्रावकप्रार्थनात. । निश्रायां सूरिवरसुगुरोश्चारु संयोजिताया एताश्चैव्या नवपदसमाराधनायाः सुसिद्धये ॥ ९५ ॥ चातुर्मास भविकहितकृच्चापि तत्रैव कृत्वा, श्रीसङ्घस्यानुनयसहितप्रार्थना मोहमय्याः' । धर्मोद्भासं विहृतिममलां कुर्वतां भक्तवृन्द- स्स्थाने स्थाने मुदितमनसा.स्वागतं सुष्टु चक्रे ॥ ९६ ॥ १ श्रीसिद्धचगणधरमदिरमित्यर्थ । २ श्रीजैनधर्मप्रभावकसमाजाख्यसस्थास्थापनसूचकोऽय पदसमूह ।

श्रीगमोद्धारक-स्तव, १.२ शाम शाम चिरसमयजां सदिक्षा पिपासा, व्याख्यानैः स्वरपि च जनता अभ्यषिञ्चन् प्रकामम् । सम्प्राप्ता 'श्रीसुरतनगरं यत्र चाभूतपूर्व, भव्य भव्ये कृतमतितमा स्वागतं भासमानम् ॥ ९७ ॥ १ २ अर्धक्रोशादपि चलसमारोह आसीद् दवीयान, यस्मिन् केतुप्रवरलसितप्राग्रहस्ताश्च केचित् । सुप्रेष्ठास्संवरगुणमिता. बेण्डवाघीयसङ्घा. (1) वादं वादं शुभततधनानद्धवाद्यान् विरेजुः ॥ ९८ ॥ ३ लक्षाधिक्या नगरजनता राजमार्गेऽभिसूरिं, शीर्वाण्युच्चैर्गुणरतिभरान्नम्रयन्ती बभूव । मार्ग मार्गे वसन-कुसुम-स्वर्ण रुप्यादिपात्र, श्चालं द्वाराण्यति विरचितान्यार्थ सद्भक्तिभावै ॥ ९९ ॥ ४ ५ गिन्नीमुक्ताप्रभृतिसमुहद्दश्च रत्नेगईली, वह्वचजातश्शुचिगुणलसद् रागदादि यतीशे । स्वर्णैः रौप्यैवरसुमभरेस्सत्यमुक्तासुलाजैः प्रोद्यद्रङ्ग विविधसुमहैस्सत्कृत स्सूरतीयै' ॥ १०० ।। (७) (५) साम्बेलानांभयशरमितानां मुदापादिदीप्ति, स्सूरे नासुगुणमहिमाख्यायकास्साधुवादाः । रीत्या चैवं प्रचुरनिरावर्णितुश्चाप्यक्या, ग्रन्थाज्ञया प्रविशनकथा 'सागरस्वागता'-ख्यात् ।। १०१ ॥ ६ वक्खारीयाकुलजसुजनै. क्षत्रियैः मीलपैवे, एकासि विंशतिमियसहस्त्राधिकं राय॑यित्वा । सूरे पादार्पणमुदितया कारयित्वा सुभत्या, पायं पायं जिनमतसुधां सूरिवक्त्राजहर्षुः ।। १०२ ।। १ स्वागतयात्रा (सामैयु) २ झहा-निशानघारिण । ३ उत्तमा. । ४ श्रेष्ठकुसुमसमूहैः । ५ सत्यमुक्ताफलानां वर्धापनरितिभावः । ६ व्यवहारे हि एतच्छन्दार्थ. “साइन वॉहों' इतिपदेन कथ्यते। ७ अन्यालयपतिरिति ।

२० श्रीआगमोद्धारक स्तव सत्रा सङ्घन च विधियुता 'चैत्ययात्रा सुरम्या- ऽकार्यास्ते यद् समविवरणं मुद्रितं. 'पुस्तके वै। सोत्साहं विंशतिमणमितान् मोदकान् संवितीर्य, धन्या जाता 'सुरत'-जनता देशनादर्शनाभ्याम् ॥ १०३ ॥ ४ चातुर्मासं तदनु विहितं 'मोहमय्यां' प्रशस्तं, यस्मिन् धर्मोन्नतिततिकृतीः कारयित्वा सुबहव्यः । भूयोऽप्येतास्सुरतनगरं श्रावकाभ्यर्थनात- स्तत्राभूवन् रुचिरचरमाः वृष्टिवासाश्च पञ्च ॥ १०४ ॥ २ ० ० २ द्वया-काशाभ्रद्विमितशरदो ५माधवे मासि शुक्ले, ोकादश्यां शुभशनिदिने श्रावकेभ्यः सुशस्ता। संस्थाऽस्थापि ताम्रपत्रागमानां, भव्यादर्शस्थितिकरमहन्मन्दिरस्थापनायै॥ १०५ ॥ प्रयतमनसा ८ ९ १० वर्षे चाग्रेऽहमदवरपूःश्रेष्ठिनो माकुनाम्न हस्ताभ्यामागमवरगृहस्यादिम खातकर्म । संस्कार्यारं तदनु च शिलारोपणं वाडीलाले- त्याख्यश्रेष्ठिप्रवरकरत कारितं मोदपूर्वम् ॥ १०६ ॥ ३०८२ वर्षे रुद्रा-क्ष-ख-ख-मिथुने ह्याश्विने शुक्लपक्षे, आशातिथ्यां सुजिनप्रतिमा पालिताणात इद्धा.। सद्विशत्युत्तरशतमिता आगमागारहेतो- रानाय्याकारि च सुविधिना तत्र भव्यप्रवेश ॥ १०७ ॥ ११ १२ ४ ० ० २ १३ 'तुर्योदर्द्ध-द्वयभ्र-नयन-मिते हायने माघशुक्ले, शुक्र श्रेष्ठे क्षणतिथियुते सन्मुहूः समासाम् । सन्मूर्तीनामपरिगणितोत्साहयुक्तैर्जनौघे- रम्ये तस्मिन् श्रुतवरगृहे कारिता सुप्रतिष्ठा ॥ १०८ ॥ १ चैत्यपरिपाटीत्यर्थ । २ 'सूर्यपुरनु स्वागत' इत्याह इति शेष । ३ मुबाईनगरे । ४ धर्मस्योन्नतिविस्तार- कारिकार्याणीत्मर्थ । ५ वैशाखे इत्यर्थ । ६ श्रावक्द्वारेत्यर्थ । ७ २००३ वर्षे इत्यर्थ । ८ अमदावादनगरवासिन इत्यर्थ । ९ माकुभाईत्यभिधया प्रसिद्धस्य माणेकलाल-मनसुखलालाख्यश्रेष्ठिन इत्यर्थ । १० मुंबापुरीयख्यातव्यापारि श्रीवाडीलाल चत्रभुजाहश्रेष्ठिकरत इत्यर्थ । ११ दशमीदिने। १२ १२० सख्याका । १३ क्षणशब्दस्य कालवाचित्वमत्र ज्ञेयं, कालस्य च भूतवर्तमानभाविरूपेण त्रैविध्यस्य विदितत्वात् तृतीयायामित्यथों बोध्य ।

श्रीआगमोद्धारक-स्तवः २१ . संवत्सर्यास्तिथिवरसमाराधनायाः प्रसङ्गे- ऽस्मिन्नेवाब्दे “समुदितविसंवादनिर्यासकार्ये । नैकैर्वः प्रचलितविधेर्य श्रुतप्रोक्ततां वै, संसाध्यान्यानपि जिनपथ. पोपणोत्कान् प्रचकु ॥ १० ॥ काले गच्छत्यविरतमितो ह्यग्रिमे पोपमासे, कृष्णे पक्षे 'शरतिथिगतेऽचिन्तितो वायुरोगः। वृद्धिं यातो वहुतरचिकित्साविधि सुयत्नात्, सज्जा जातास्समुपचरिता किन्तु शान्तो,न जात ॥ ११० ॥ सैवाऽपूर्वा स्थितिरथ तदाऽऽसीन्नचाल्पाप्यशान्ति- श्वेतोऽप्राक्षीज्जिनपतिपदेऽभूदपूर्वोऽनुरागः। स्थित्यां तस्यामपि नवनवश्लोकनिर्माणकार्य, ज्ञानध्यानादिकमपि मनाङ् नावरुद्धं कदाचित् ॥ १११ ॥ ० २ ६ षड-खा-काश द्वि-मितपरवाणी पुनर्वायुवेगो वारंवारं प्रवलरभसा पीडयामास देहम् । मध्ये यस्य स्थितिपरवशाच्छोनमस्कारमन्त्र- स्यायातोऽभूदहह ! सनतं श्रावणस्य प्रसङ्गः॥ ११२ ॥ आदे स्वभ्यस्तमथ च तथा देहोस्थत्यादि सम्यग् दाढ्य येनेतरजनगणासह्यरोगेऽपि शान्त्या। ये स्तम्भाद्याश्रयविरहिताश्चारु पद्मासनेन, स्वेष्टस्मृत्यामथ निजमनो योजयामासुरारात् ॥ ११३ ॥ दृष्टाऽऽश्चर्य भृशमुपगता डॉक्टरा, अप्यवोचन् , धन्या एते यदिह विषमस्थेऽपि रोगे सुशान्ता । अन्यः कश्चिद् यदि गदहतोऽस्यां स्थितौ स्यात्तदा तु, स्वान्तीत. स खलु सहसान्यां दशामेव यायात् ॥ ११४ ॥ १ पचमीतिथौ । २ अयशब्द सवत्सरापरपर्याय इति हैमलिंगानुशासने ।

- २२ श्रीआगमोद्धारक-स्तव एवं रुग्णां स्थितिमथ निजां वीक्ष्य विज्ञाय चास्या- १ ऽनित्यत्वं वै सपदि वपुषो माधवे शुक्लपष्ठठ्याम् । सर्वानाहूय च निजशरीर ततो व्युत्सृजन्तो- ऽस्मार्षभक्त्या जिनपतिवरान् ह्यर्धपद्मासनस्था ॥ ११५ ॥ सन्त्यक्ताशाः २ एकादश्यां निशि कविदिनेऽप्येकवारं त्वतीव- वेगादाक्रान्तिरभवदहा! येन सर्वेऽप्यचेष्टा । जिनवरवच श्रावयामासुरागु, सत्पुण्यानामतिबलतया किन्त्वितं दुदिनं तत् ॥ ११६ ॥ वैशाखस्यासितदलगते पञ्चमेऽहन्यस्तकाले, सूर्यस्याभूत् त्रिदशनिलये श्रीगुरूणां प्रयाणम् । हन्ताकस्माद् सुरतजनताऽचिन्त्यदम्भोलिपाताद् , भीता व्यग्रा प्रकृतिविधुरा कृत्यशून्या वभूव ॥ ११७ ॥ 'सडेनोच्चैस्तरशिखरिता चारु दोला ह्यकारि, प्रासादस्यानुकरणकरी सत्कलाभिश्च युक्ता। विद्युत्पत्रैरधिगतसमाचारवन्तश्च भक्ता ५ भक्ताः ग्रामादग्रामादरमुपगता अन्त्ययात्रार्थमाशु॥ ११८ ॥ दोलोत्थानाय च कृतसहस्रादिमुद्रापणा वै, स्वीयं मनुजजननं सार्थकीचक्रुरेव । अन्ये प्रादुर्द्रविणनिचयं वह्निसंस्कारकाये, भव्या यात्रा निखिलनगरे भ्रामिता भक्तिभावै.॥ ११२ ॥ पश्चाद्गोपीपुरपरिसरे स्वागमौकःसमीप, संस्थित्यां चापरिमितजनानां गुरूणां सुभव्यम् । नानाकाष्ठेमलयगिरिजैर्दाहसंस्कारकृत्यं, नाभूत् पूर्व न च परमितो भावि तादृग् बभूव ॥ १२० ॥ ६ १ वैशाख मासे । २ किंतु इत = गतम् इति पदच्छेदोऽत्र यो व्य ।३ गूर्जरदेशीयपद्धत्येद ज्ञेय, पूर्णिमान्तमास ( शास्त्रीय) पद्धत्या तु ज्येष्ठस्येति बोध्यम् । ४ तार-टेलिग्रामाख्याधुनिकशीघ्रसदेशावहपत्रेरित्यर्थ । ५ अरम् शीघ्रम् । ६ सुदरागममदिरपाव - श्रीआगमोद्धारक-स्तव: २३ १२५. १२ शिष्या पादोत्तरशतमिताः अष्टत्रिंशत् सुसंस्थाः, ज्ञानागारा मुनिमितमता सन्ति यत्कीर्तिदीपाः। यैश्चाकारि श्रुतहितकरीर्वाचनाः सप्त यासु, ग्रन्था लक्षद्वयधिकगणितश्लोकमात्रा ह्यवाचि ॥ १२१ ॥ १ २ सप्तत्रिंशत्सुरपनयनाङ्गाधिकाना नवीन- प्रलोकानां ते भुवि रचयितार. कथ स्युन नम्या । ऊनाशीत्युत्तरगतशतग्रन्थसम्पादकास्ते, धन्याः पञ्चाशदधिकशुभग्रन्थसङ्ग्राहकाश्च ॥ १२२ ॥ १७९ Fo व्याख्यानानामपि कतिपये ग्रन्थवर्याः प्रसिद्धा', ३ येपां सन्ति प्रथितविभवा भूमिका प्राथमिक्यः। व्यनाशीतिप्रमितरुचिरग्रन्थरत्नेषु येषां, मार्ग लोकान् जनिहितकरं बोधयन्त्यो लसन्ति ॥ १२३ ॥ १२ आदित्याका सुततमुपधानव्रताः कारिता यै, शोधं शोधं सकलसुजिनोक्तागमानां सुपाठान् । सल्लोकानामुपकृतिहित मजु मुद्रापयित्वा, नैकान् योग्यानभ्यसकृतिनोऽधीतयेऽयूयुज॑श्च ॥ १२४ ॥ एवं नानावतजपतपोध्यानदीक्षाप्रतिष्ठा- यात्रास्नात्रादिकवहुविधोद्यापनैश्चोपधाने । भव्यान् जीवान् जिनपगदिते रम्यमार्गे नियुज्य, त्यत्ववा देहं सुरपतिगृहं संययु सुरिवर्या ॥ १२५ ॥ १ २३३३४२ लोकप्रमाणग्रन्था वाचनासु वाचिता । २ सप्तत्रिंशत्सहनमितानामित्यर्थः। ३ प्रस्तावना इत्यर्थ ।

श्रीआगमोद्धारक-स्तव येषां कीर्ति विमलविमलामश्मताम्रागमाना- मागारस्था दिशि दिशि दिशन्त्य पताका नितान्तम् १ यावच्चन्द्रारुणकिरणवन्तौ दिवि द्योतमानौ, गायं गायं तद्वधि मुदा रञ्जयिष्यन्ति लोकम् ॥ १२६ ॥ ॥ अन्त्यमंगलम् ॥ (शिखरिणी) कृतं यैलोकानामुपकृतिहितं वाचनिकया, श्रुतानामभ्यासस्त्रटिविरहितः सम्प्रचलितः। सुपूज्यॉस्तान 'श्रीसागर' इति शुभाख्याप्रथितकान् , नमामः सूरीन्द्रान् श्रुतवरसमुद्धारनिरतान् ॥ १२७ ।। चित्र-हार-बन्ध* KAD २ ३ (शार्दूलविक्रीडितम्) शश्वच्छान्तिमयान् महामतिमतः कल्यङ्कारान् कर्मठान्, भव्यापत्तिभरापहान् जलजवज्जन्तुभ्य आनन्ददान्। दान्तान् नौमितमां विभाषितविधीन् व्याख्यानसव्यासनान्, प्रौढान् सत्यसखान् सदा नतधियाऽऽनन्दाधिसूरीश्वरान् ॥ १२८ ॥ ४ ५ ६ ७ (स्रग्धराछन्द ) धन्या मान्या वदान्या गुणिगणगणनास्वग्रगण्या महान्तो, विद्वद्ग गरिप्ठाः जिनपतिचरणेन्दीवरेन्दिन्दिराश्च । वादीन्द्रा देशकेन्द्रा अविकलनिगमज्ञाततत्त्वा महिष्ठा. 'आचार्यानन्दवर्याः' प्रथितगुणगणा 'सागरान्ता' जयन्ति ।। १२९ ॥ ॥ आगमपर्यालोचनप्राण आगमोपजीवी च श्रमण श्रामण्यसारमवाप्नोति लभतेच निवृतिम् । 25K ॥जीयासुरागमोद्धारकाः सद्गुरवः । १ यावच्चन्द्रार्कावित्यर्थ । २ क्ल्यशब्दो हि कल्याणापरपर्यायभद्रवाचस्तत भद्रङ्करानित्यर्थोऽत्र ज्ञेय.। ३ किया- कुशलान् । ४ व्याख्यानलब्धप्रतिष्ठानित्यर्थ । ५ तीर्थकृच्चरणकमल भ्रमरा इत्यर्थ. । ६ शास्त्रापरपर्यायोऽयम् । ७ पूज्या । अय हि लोक आधुनिकभूपणपरिभाषया नेकलेसेत्याख्य स्वर्णमयरत्नहाररूपेण सयोजितोऽस्ति-तत्त्रतिकृति- रप्यस्मिन्नेव ग्रथे मुद्रिताऽग्त्यन्यत्र ।

-- + + ॥ ॐ अर्हम् ॥ णमोऽत्थु णं समणस्स भगवओ महावीरस्स । शेठ देवचन्द्रलालभाइ-जैन-पुस्तकोद्धार-ग्रन्थाङ्के-१०१ आगमोद्वारक-आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलित:- - - अल्पपरिचितसैद्धांतिकशब्दकोषः - अंकुर-अकुरः, प्रवाल । जं० प्र० ३० । अंकुर-अकुर , शाल्यादिवीजसूचि । भग० ३०६ । जं. प्र० १६८ । अंकुल्ल-अकोठ• । वृक्षविशेषः । प्रज्ञा० ३१ । अंकुसं-महाशुक्रे विमानविशेष । सम० ३२ । अंकुश, येन रजोहरणमकुशवत्करद्वयेन गृहीत्वा वन्दते तत् । कृतिकर्मणि षष्ठदोषः । आव० ५४३ । अंकुस-अकुश , सृणि. । प्रश्न० २३ । अंकुसपलंब-महाशुक्रे विमान विशेषः । सम० ३२ । अंकुसयं-अकुशकम् , तरुपल्लवग्रहणार्थमंकुशाकृति । भग. ११३ । अंकुसये-अकुशका, देवार्चनार्थवृक्षपल्लवाकर्षणार्थम् । औप० अकार: अका-लाञ्छनम् । जीवा० पृष्ठ २७० । अङ्कः, उत्मनः । ओघ. १४३ । रत्नविशेष | ज० प्र० २३ । अंककरेलुग-शाकविशेष । आचा० ३४८ । अंकणं-अङ्कन, तप्ताय शलाकादिना चिह्नकरणम् । प्रश्न० २२ । लाञ्छनम् श्वशृगालचरणादिमि. । आव० ५८८ । अंकधाती-अकधात, धात्रीदोषे । नि० चू० द्वि. ९आ । (अकपतिता)-दासी । उत्त० २६२ । अंकमुहसंठिया-अङ्कमुखसस्थिता, पद्मासनोपविष्टोत्सगमुख- वत् अर्धवलयाकार । सूर्य० ७१ । अकलिवी-लिपिविशेष । प्रज्ञा० ५६ । अकवडेंसए-ईशान कल्पपूर्वदिगावतंसक । भग० २०३ । अकविधा-(अकविज्जा) गणितम् । ज० प्र० १३६ । अफहरो-अवधर , चन्द्रमा । जीवा० २७० । अकावा-अकावती, वक्षस्कारपर्वतः । जं० प्र० ३५७ । अकावई-अहावती, रम्यविजये राजधानी नाम । ज० प्र० ३५२ । शीतोदादक्षिणकूले वक्षस्कार । ठाणा० ८० । दक्षिणवर्ती वक्षस्कार । ठाणा० ३२६ । अकावईओ-महाविदेहे विजयराजधानी । ठाणा० ८० । अकावडिंसए-अङ्कावतमक , ईशानस्य पूर्वस्यामवतमक | जीवा० ३९१ । अंकितो-अङ्कित , चिह्नित । आव० ८२२ । (अंकिल्ल)-नर्त्तक । औप० -३ । (अंकुडिओ)-अकुटिक , नागदत्तक , | ज० प्र० ५० । जीवा० २०५ । अंकुसो-अकुशः । अकुशाकारो मुक्तादामावलम्बनायभूत । जीवा० २१० । अंके-अककाण्ड खरकाण्डे चतुर्दर्श काण्डम् । जीवा० ८९ । अक , | प्रज्ञा० २७ । उत्सङ्गे । जं० प्र० ३८ । मणिमेद. उत्त० ६८९ । श्वेतरत्नविशेष । प्रज्ञा० ३६१ । रत्नविशेषः । जीवा० २३ । अंकेल्लण-अकेलण, तर्जनकविशेषः । जं० प्र० २३५ । अंको-अङ्क, पृथिवीमेद । आचा० २९ । रत्नविशेष । भग० ४७९ / एकोरुमैथुनं । नि० चू० प्र० २५५आ । रूढ़िगम्य , शंखजातिविशेष । प्रश्न० ३७ । रत्नविशेष । जीवा० १८०, १९१। पद्मासनोपविष्टस्योत्सङ्गरूप आसनवन्ध । सूर्य० ७१ । जं० प्र० ४५४ । अंकोल-गुच्छविशेषः । प्रज्ञा० ३२ ।

अंकोल्ल ] आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः- [ अंगारा - . अंकोल्ल-वृक्षविशेष । भग० ८०३ । शिष्य । आव० ७०४ । येनोपशमे सत्यवाप्त सामायिकम् अंकोल्लाणं-गुल्मविशेष । भग० ८०३ । । आव० ३४७ । अंग-अङ्गम् , अगविषयम् । आव० ६६० । कारणमवयव. | अंगलोअं-अङ्गलोकं, म्लेच्छजातीयजनाश्रयस्थानम् । जं. । ठाणा० ३। कारणम् । प्रश्न० १०३ । शरीरावयवप्रमाण- प्र० २२० । स्पन्दितादिविकारफलोद्ावकं शास्त्रम् । सम० ४९ अंगवंसो-अङ्गवंश , अङ्गराजसन्तानस्य सम्बन्धिनः सप्त- समग्रं वपु । जीवा० २७० । कारणम् । जं० प्र० ९९ । सप्ततिराजान प्रव्रजिता । सम० ८५ । अज्यते व्यक्तीक्रियतेऽस्मिन्नित्यङ्गम् । आचा० ५ । मेद अंगविगारं-अङ्गविकार , शिर स्फुरणादिस्तच्छुभाशुभसूचक कारणं वा । दश० ९० । शिर.प्रमृति । दश० २३७ । शास्त्रमपि । उ० ४१७ । आग–अक्षिबाहुस्फुरणादिकम् । सूत्र० ३१८। शिर स्फुरणादि | अंगविजं-अङ्गविद्याम् , शिर प्रमृत्यंगस्फुरणत शुभाशुभ- । ठाणा० ४२७ । सूचिका विद्याम् । उत्त० २९५ । अंग-अजानि । शिक्षादीनि षडङ्गानि । भग० ११४ । अंगविजा-अङ्गविद्या, अङ्ग-पाद विद्या प्रासादपातनात्मिका अंगओ-अङ्गकः, भद्रप्रकृतिक । आव० ७०४ । ( सत्कारपुरस्कारपरिषहे दृष्टांतपदम्) । उत्त० १२५ । अंगचूलिया-अगचूलिका, अगानामुपासकदशाप्रमृतीनां | अंगहारिका-नृत्यकलाद्वितीयभेदः । सम० ८४ । पंचाना चूलिका-निरयावलिका । व्य० द्वि० ४५४आ । अंगा-अगा, जनपदविशेष· । प्रज्ञा० ५५ । अंगणं-मंडवथाणं । नि० चू० प्र० १९२अ । अजिरम् । अंगाई-अगानि, शिर.प्रभृतीनि । प्रज्ञा० ४६९ । एकादशांगानि प्रश्न० १३८ । अङ्गग-षट्स्थंडिलभूमिस्थानम् । ओघ० २०० । प्रज्ञा० ५६ । अवयवा' । ठाणा० १७० । शिर.प्रभृतीनि, अंगणेत्रिका-हस्तमालक आभरणविशेष. । औप० ५५ । । उत्त० ४२८ । अंगदं-बाहुशीर्षाभरणविशेष । जीवा० १६२ । केयूरम् | अंगाणं-देशविशेष ·। भग० ६८० । । जं० प्र० १०६ । अंगादाणं-मेढ़म् । नि० चू० प्र० ११६अ । अंगदे-केयूरे । ठाणा० ४२१ । अङ्गनिका । उत्त० ७८ । अंगादानं-मेहनम् । नि० चू० द्वि० ३०आ । अंगनाम-शिरउर पृष्ठवाहूदरपादनामानि । तत्त्वा० ८ । अंगार:-(इंगाल), विगतज्वालोऽनि , । भग० १२२ । अंगपडिहारिणि-अन्त पुरप्रतिहारिणी । आव० ७०० । विगतधूमज्वालो दह्यमानेन्धनात्मक । उत्त०. ६९४ । अंगपविठू-गणधरकृतं मातृकापदत्रयप्रभवं वा ध्रुवश्रुत वा कृष्णवर्णवस्तु । आचा० २९ । । ठाणा० ४९ । अङ्गप्रविष्टम् । ठाणा० २०० । अंगारओ-अगारकः, महाग्रह । जीवा० ३३६, ३३७ । अंगप्रविष्टं-गणधरदृब्धमाचारादि । तत्त्वा० १-२४ । अंगारकारिका-(इंगालकारिया), अग्निशकटिका । भग० अंगवाहिरे-अङ्गबाह्यम् , स्थविरकृतं मातृकापदत्रयव्यतिरिक्त ६९७ । व्याकरणनिबद्धमध्रुवश्रुतं वा उत्तराध्ययनादि । ठाणा० ५१। | अंगारदोषः-(इंगालदोस), आहाररागाद्गाद्धर्याद्गुञ्जानस्य अंगमंग-अङ्गमङ्गम् , गात्रम् । औप० ११ । चारित्रांगारत्वापादनाद् । आचा० ३५१ । अंगमंगो-अङ्गमङ्गम् , अङ्गप्रत्यंगम् । जीवा० २७७ । अंगारमईकः-(अगारमद्दय) द्रव्यप्रव्रजित । दश० ११५ । अंगमंदिरंमि-चंपाचैत्याभिधानम् । भग० ६७५ । उत्त० ५६६ । विशे० १०६४ । अंगमदियाओ-अंगखल्पमर्दनकारिका । भग० ५४८ । अंगारय-अगारक, मंगल । औप० 1 औप० ५२ । अंगयं-अगदं, बाह्वाभरणविशेष. । जीवा० २५३ । प्रश्न० | अंगारवई-अगारवती, सवेगोदाहरणे शिशुमारपुरपति- '७१ । बाहुशीर्षाभरणविशेषरूपम् । प्रज्ञा० ८८ । धुन्धुमारदुहिता श्राविका । आव० ७०९ । अंगेय-अङ्गके, मूभदौ । जं० प्र० १८९ । अगदम्, बाह्वा- अंगारवई प०-अगारवती प्र० । आव० ६७ । भरणविशेष । भग० १३२ । अंगारशकटिका-(इंगालकारिया) । आचा० ३०९ । अंगरिसी-अङ्गर्षि , आर्जवोदाहरणे भद्रक कोशिकार्यज्ये- | अंगारा-(इंगाल), लघुतरामिकणा । ठाणा० ४२० । - - (२) अंगारियं ] अल्पपरिचितसैद्धांतिकशब्दकोषः [ अंजणपव्वय अंगारियं-अंगारकित, विवर्णीभूतम् । आचा० ३४९ । अश्चियं-दुर्भिक्ष । नि० चू० प्र० १४८आ । दात्रसधी अंगिरसा-गौतमगोत्रोत्तरमेद । ठाणा० ३९० । 1 नि० चू० प्र० १८३आ। नाट्यभेद । नि० चू० तृ० १। अंगुटुं-अगुष्टम् । आव० ८४५ । अञ्चितं, नाट्यम् । जं० प्र. ४१७ । आव० ३९९ । अंगुट्टपसिणा-विद्याविशेषः । नि० चू० प्र० १७७४ । अंचेइ-आकुञ्चयति । औप० २५ । अंगुडिं-मानम् । नि० चू० प्र० १९१आ । अंछति-आकर्षन्ति । विशे० ३८३ । आव० ४८ । अंगुट्ठी-अगुष्टी, शिरोऽवगुण्ठनम् । आव० ९५ । अंछणं-पण्हपसिरणं । नि० चू० प्र० १९१आ । अगुल्या अंगुलपुहुत्तिया-अगुलपृथक्त्वम् । जीवा० ३९ । लिप्तस्य रंगितस्य । ओघ० १४४ । आकर्षण-समारणम् । अंगुलभावो-अगुलभाव , शुभाशुभपदार्थ । विशे० ८७६ । ओघ० १४४ । अंगुलिं-अगुलि , करशाखा । आचा० ३८ । अंछमाणाणं-आकर्यताम् । आव० ४८ । अंगुलिको चर्ममयोपकरणम् । नि० चू० प्र० १३७अ । अंछवियंछियं-आकर्षविकर्षम् । आव० ८३२ । नखभंगादिरक्खट्ठा । नि० चू० द्वि० १८अ । अगुलिकोश , | अंछिऊण-आकृष्य । आव० ४२७ । श्रृङ्गमयो दारुमयो वंशमयो वा येनागुलिसलमेन तन्त्री | अंछित्ता-अपहियतां माया । व्य० द्वि० ८४आ । आन्यते स । जीवा० १९५ । अगुलिकोशक , शृङ्गदारु- | अंछिय-आकृष्यते, प्रक्षाल्यते । बृ० प्र० ८१अ । दन्तादिमयः । जं० प्र० ४० । अंछियनयना-आकृष्टनेत्रा । प्रश्न० २१ । (जिब्भिन्दियं- अंगुलिजं-अंगुलीयकम् , अंगुल्याभरणविशेषः । औप० ५५। छिय) आञ्छितम्-आकृष्टम् (आकृष्टजिह्वेन्द्रिया)। प्रश्न ६० । अंगुलिजग-अंगुलीयकम् , मुद्रिका । जं० प्र० १०६ । अंछिया-आकृष्टा । आव० २२७ । अंगुलिजयं-अंगुलीयकम् । आव० १७० । अंजणं-आणतकल्पे विमानविशेषः । सम० ३५ । सौवीरा- अंगुलिधणुहओ-अंगुलधनु । आव० ४८४ । जनादि । बृ० द्वि० ९२अ । सोवीरयं रसंजणं वा । नि० अंगुलिभमुहा-कार्योत्सर्गदोष । आव० ७९८ । चू० प्र० २१८आ। अजनम् , सौवीरादि । आव० ५३० । अंगुलिसत्थयं-शस्त्रकोशविशेष । नि० चू० द्वि० १८अ । अंजण-अञ्जनं, तप्ताय शलाकया नेत्रयो म्रक्षणम् वा देहस्य अंगुलीयगं-अगुलीयकं, भूषणविधिविशेष । जीवा० २६९ । क्षारतैलादिना । सम० १२६ । अञ्जनं, सौवीराजनादि । अंगुले-प्रमाणमेद ।भग० २७५। अंगुष्ठ-प्रश्नमेद । ठाणा० प्रज्ञा० २७ । सौवीराजनम् । जं० प्र० ६० । अन्जना , ३०१ । अंगुष्ठप्रश्न , शुभाशुभसूचक प्रश्न. । उत्त० ४४६ । अजनरत्नमयत्वात् । ज० प्र० १६३ । अंगोवंगाई-अंगोपांगानि । प्रज्ञा० ४६९ । अंजणई-वल्लीविशेष । प्रज्ञा० ३२ । अंगोहलिं-अंगरूक्षणम् , देशस्नानम् । आव० ४१७ । अंजणाए-अजनक , वनस्पतिविशेष । औप० १० । व्य. द्वि० ४०५अ । अंजणकेसिया-अजनकेशिका, वनस्पतिविशेष. । जं० प्र० अंचइ-अच्चति, उत्पाटयति । जं० प्र० ४२१ । जीवा० ३३ । २५५ । अंजणकेसियाकुसुमं-अञ्जनकेसिकाकुसुमम् , वनस्पति- अंचिरं-अञ्चित, नृत्यविशेष । जं० प्र० ४१२ । विशेषपुष्पम् । प्रज्ञा० ३६१ । अंचिअंचियं-उत्पतनिपता पार्श्वत करोति । ठाणा० ५२२ । अंजणगं-अजनक , पर्वतविशेषः । आव. ८२७ । अंचिओ-अञ्चित , व्याप्त । आव० १६७ । अञ्चितनामा | अंजणगपव्वय-अजनकपर्वत । आव० ३८९ । सम० ९० । पञ्चविंशतितमो नाट्यविधि. । जीवा० २४७ । अंजणगा-अञ्जनका , नन्दीश्वरचक्रवालमध्यवर्तिन. पर्वता अंचितरिभितं-अञ्चितरिमितनामा सप्तविंशतितमो नाट्य । प्रज्ञा० ९६ । ठाणा० ४८० । विधि । जीवा० २४७ । अंजणगिरि-अजनगिरि । जं० प्र० १९६ । अंचितांचि-गमागम । भग० ६८३ । अंजणपव्वय-अजनपर्वत, नन्दीश्वरद्वीपे पर्वतविशेष । अश्चिते-सकृद्गते । भग० ६८३ जीवा० '० ३५८ ॥ । (३.), अंजणपुलए ] आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः [ अंतचरे - 1 अंजणपुलए-अञ्जनपुलककाण्डम् , एकादशं, अञ्जनपुलाकाना , एकादश, अञ्जनपुलाकाना | अजू-प्रगुणोऽव्यभिचारी । सूत्र० ५१। अंजू, व्यक्तम् , प्रगुणेन विशिष्टो भूभाग. । जीवा० ८९ । न्यायेन खरसप्रवृत्त्या वा । सूत्र० २९६ । अंजु , व्यक्त अंजणप्पभा-अञ्जनप्रभा, पुष्करिणीनाम । ज० प्र० ३६० । निर्दोषत्वात्प्रकट , (ऋजुर्वा) वक्रकान्तपरित्यागादकुटिल । अंजणमओ-अञ्जनमयः, अजनरत्नात्मक । जीवा० ३५८ । । सूत्र० ३९३ । अंजू , सार्थवाहसुता । विपा० ३५ । अञ्जु , अंजणसमुग्गयं-अजनसमुद्कम् । जीवा० २३४ । धनदेवसार्थवाहसुता । विपा० ८८ । शकस्याग्रमहिषीनाम (अंजणसिज्झ)-अजनसिद्धः । दश० १२८ । । जै० प्र० १५९ । भग० ५०५ । अंजणा-पर्वतविशेप ।ठाणा० ८० । अजना, पुष्करिणीनाम अंजूए--शकाग्रमहिषीराजधानी । ठाणा० २३१ । । जं० प्र० ३३५ । जं० प्र० ३६० । अंड-अप्डम् , काष्ठनिश्रितो जीवविशेषः । आचा० ५५ । अंजणागिरि-अजनागिरि , दिग्हस्तिकूटनाम।जं० प्र० ३६०। अंडए-अण्डज., हंसादि. ममायमित्युल्लेखेन वा प्रतिवन्ध,, अंजणि अंजनिका, कजलाधारभूता नलिका । सूत्र० ११७ । अण्डजं-पट्टसूत्रजम् । ठाणा० ४६५ । हंसादि मयूराण्डकादिः अंजणे-प्रभंजनेंद्रलोकपाल: । ठाणा० १९८ । सीता वा अण्डज , पक्षी कोशिकारकीटाण्डकप्रभवं वस्त्रं वा । दक्षिणवर्ती तृतीयवक्षस्कारः । ठाणा० ३२६ । अजन., औप० ३६ । अंडओ-अण्डक , जन्तुयोनिविशेष । प्रश्न. ३३ । वेलम्बाभिधानवायुकुमारराजस्य लोकपाल', वरुणस्य पुत्रस्था- अंडग-अण्डकम् , आहार । भग० २९२ । मुख । व्य० द्वि० नीयो देव. । भग०३९८ । सहप्रलापीमते कृष्णपुद्गलविशेषा' ३३३आ । अण्डजा', अण्डाजाता । ठाणा० ११४ । । सूर्य० २८७ । अजनकाण्ड दशम, अञ्जनानां विशिष्टो अंडय-अण्डज , हंसादि. । भग० ३०३ । अण्डजा , पक्षि- भूभाग. । जीवा० ८९ । कर्मजीवमालिन्ये हेतुत्वात् । जं. गृहकोकिलादयः । दश० १४१ । प्र. १४८ । अञ्जनो वक्षस्कार । जं० प्र० ३५२ । सौवीरा- जनं रत्नविशेषो वा । प्रज्ञा० ३६१ । रसाजनादि । अंडसुहुम-अण्डसूक्ष्मम् , मक्षिकाकीटिकागृहकोलिंकाब्राह्मणी- कृकलासाद्यण्डम् । दशे० २३० । अण्डसूमम् , मक्षिका- दश० १७० । अंजणेइ-अञ्जनं, सौवीराजनं रत्नविशेषो वा । जं० प्र० ३२ । कीटिकागृहकोकिलाब्राह्मणीकृकलास्याद्यण्डकमिति । ठाणा ४३० । अञ्जनं, कृष्णरन्नविशेष । ठाणा० २३२ । अञ्जनं सौवीराज- अंड-अण्डु, अन्दुकं काष्टमय लोहमयं वा हस्तयोः पादयोर्वा । नादि । जीवा० २३ । कज्जलम् । उत्त० ६५२ । समीरकम् । औप० ८७ । उत्त० ६८९ । रज़ोमेद । आचा० ३४२ । अंडे--विपाकश्रुताद्यश्रुतस्कंधतृतीयाध्ययनम् । ठाणा० ५०७ । अंजणगपव्वय-अंजनकपर्वत । सम० ९० । ज्ञाताया तृतीयाध्ययनम् । आव० ६५३ । सम० ३६ । अंजलिं-अञ्जलि', हस्तन्यासविशेष ।सूर्य० ६ । भग १४ । अप्डम् , षष्ठागे तृतीयं ज्ञातम् । उत्त० ६१४ । • अञ्जलि, मुकुलितकमलाकारकरद्वयरूपम् । जं० प्र० १८७ । अन्तःकरणम्-मनः । आव० ५८५ । अंजली-अखलि , हत्थुस्सेहो । द० चू० १२९ । नि० चू० अन्तःशल्य:-(अतोसल्ल), अन्त -मध्ये मनसीत्यर्थ , शल्य- प्र० ७अ । अजलि, द्वयोर्हस्तयोरन्योऽन्यान्तरितागुलिकयो मिव शल्यमपराधपद यस्य सो अन्त शल्यो-लज्जाभि- सम्पुटरूपतया यदेकत्रमीलनं सा । जीवा० २४३ । सयुतह मानादिभिरनालोचितातिचार । सम० ३४ । स्तमुद्राविशेष । ज० प्र० १७ । प्रसूतिद्वयम् । नि० चू० अंतं--अन्त शब्दो मध्यवचन ( विशे० १९७ । परिजीर्णम् , , द्वि० १२०आ। | वृ० द्वि० १७५आ । वस्त्रस्य दशान्तम् । बृ० द्वि० अंजु-ऋजु , ऋजो -संयमस्यानुष्ठानात् । आचा० ३०३ । २३५अ । अन्त्यम् , अन्ते भवम् , जघन्यधान्यम् । औप० मायाप्रपञ्चरहितत्वादवक्र । सूत्र० १७७ 1 ४० । अन्त्रम्-पुरीतत् । प्रश्न० ८ । कुल्मापादिकम् । अंजुया-शान्तिजिनप्रवर्तिनीनाम । सम० १५२ । अंजुका, वृ० प्र० २२०आ । शक्रदेवेन्द्रस्याप्रमहिषी । जीवा० ३६५ । (अंतचरे)-आन्तम्-अन्ते भव-आन्तम्-भुक्तावशेष वल्लादि अंजुल-वनस्पतिविशेष । भग० ८०२ । , (तच्चरति) । ठाणा० २९८ । । । , (४) [ अंतंतं अल्पपरिचितसद्धांतिकशब्दकोषः अंतरंतगो] , अन्तयोः-अचलयो.। भग० ४७७ । भूभाग. भग०१२२ । | अंतगडो-अन्तकृत् , अंतगडो-अन्तकृत् , ज्ञानावरणीयादिकान्तकृत् । आव० अवसानम्। पज्ञा० ३९७ । भूमिभाग ।, भग० ३२३ । १६३ । तेनैव भवेनेति । आव०, ११७ । अन्तकृता- ठाणा० १३९ । समीपम् । जं० प्र० ४५५ । वलचणकादि। तीर्थकरादयः । सम० १२१ । प्रश्न० १०६ । समीप । ठाणा० ११७ । अधिकरणप्रधान- अंतगतावधिः-(अतगतावही)-आत्मान्तगत , - शरीरान्त- मव्ययम् । उत्त० २६१ । (अतचरे)-आन्तम् , अन्ते भवं गत , अवधिक्षेत्रान्तगत (पुर पृष्ठपार्श्वेषु )। प्रज्ञा० ५३७ । आन्तम् , भुक्तावशेषवल्लादि (तच्चरति ) । ठाणा० २९८ । अतगो-अन्तक', विनाशकारी, आत्मनि वा गच्छीति, अंतंतं-पर्युषितं वल्लचणकादि । ओघ० १८८ । आन्तर आत्मगो वा। सूत्र० १७८ । अन्तग , अन्त अंत-अन्त ,निश्चय । भग० २९० । परिच्छेद.1 ठाणा० १७४। गच्छतीति, दुष्परित्यज्य । सूत्र. १७८ । अंतओ-अन्तक , विषतृष्णाया पर्यन्तवर्ती। सूत्र० २५९ । अंतचारी-अन्तचारी, पार्श्वचारीति । ठाणा० ३४२ । अन्तकम् , पर्यन्तम् । उत्त० ६२८ । अतदीवगं-सव्वेहिं अभिसवज्झात अमज्जमसासी भवेज्जा । अतकडे-अन्तकृत् । भग० १११ । अन्तो भवस्य कृतो येन दश० चू० १६३ । सः अन्तकृत । ठाणा० ३६ । अंतदीपकम्-प्रागुक्तेष्वपि समन्वय । विशे० ३३० ।। अंतकम्म-अन्तकर्म, अञ्चलकर्म वा न लक्षणम् । औप० अंतद्धाणं-अदृश्य. । नि० चू० प्र० ७६ अ । ५५ । अन्तकर्माणि, अञ्चलयोर्वा न लक्षणानि । ज० प्र० अतद्धाणपिंडो-अप्पाणं अतरहितं करेत्ता जो पिडं गेण्हति २७५ । अन्तकर्म, अञ्चलयोर्वा न लक्षणम् । जीवा० २५३ । सो अतद्धाणपिडो भण्णति । नि० चू० द्वि० १०२ अ।' अतकम्मा-अन्तकर्मा, प्रान्त । औप० ११ । अंतकरे-अन्तकर , भवच्छेदकर । भग० २१९ । अंतरं-उववासो। नि० चू० प्र० १७४ आ। अन्तर प्राप्ति । विशे० २४७१ मज्झं। नि० चू० तृ० १४० अ । समुद्रमध्यम्। अंतकरो-अन्तकर , प्रशस्तभावकरविशेषः, कर्मण समारस्य उत्त० ७०० । उत्तरम् । आव० ४४२ । विशेष । उत्त० २१७ । अवसर । आचा० १०७ । अवकाश. । प्रज्ञा० अंतकिरिआ-अन्तक्रिया, निर्वाणलक्षणा। आव० १३५ । ६९ । मध्य. । जीवा० ४६ , शैलान्तरम्-कन्दरान्तरम् , अंतकिरिय-अन्त्य(न्त )क्रिया, अन्त्या च सा पर्यन्त- वनान्तरम् वा आश्रयरूप | प्रज्ञा ६९। अन्तरालम्। वर्तिनी क्रिया चान्त्यक्रिया। अन्त्यस्य वा कर्मान्तस्य आव० ३३ । विशेपो रूपनिर्माणादिभि । ठाणा० क्रिया अन्तक्रिया । कृत्स्नकर्मक्षयलक्षणा मोक्षप्राप्तिम्। २०३। पूर्वत्यागापरवस्त्रादानकाले-प्रतिमाविशेष । नि० चू० द्वि० १६३ आ। पार्श्वरूपम् । जं० प्र० ३८७ । अंतकिरिया अन्तक्रिया, अन्त.-कर्मणामवमानं तस्य व्यवधानम्। जीवा० १२२। अन्तरायम्। ओघ० क्रिया-करणम् , कन्तिकरणं मोक्ष इति । प्रज्ञा० ३९६ । १७६ । उपवास । आव० २०३। राजगमनस्यान्तरम्। निर्वाणम् । भग० ९१। प्रज्ञापनाया विंशतितम पदम् । प्रज्ञा विपा० ५३ । अवसर । विपा० ७३। अपान्त- ६। मोक्ष । ११८॥ भवस्यान्तकरणम्। रालम् । सूर्य० प्रश्न० ४२ । ठाणा० १८.. ग्रामादीनामर्धपथ । ५२। पृष्ठोदरयोरन्तरालं अंतकुलाणि-अन्तकुलानि-वस्टम्पिकादीनाम् । पार्श्व इति। जीवा. २७७ । विचालं । व्य० प्र० १२८ अ। ४२० । अंतरंजिया-अन्तरञ्जिका, नगरी यत्र त्रैराशिकदृष्टिरुत्पना, अंतक्खरिया-लिपिविशेष 1 प्रज्ञा० ५६ । बलश्रीराजधानी । उत्त० १६८ । पुरी यत्र त्रैराशिकनिहवस्य अंतगडदसा-अन्तकृद्दशा, अन्तो-भवान्त कृतो विहितो दृष्टिस्त्पन्ना। आव. ३१८ । नगरी। विशे० ९८१ । यैस्तेऽन्तकृताः, तद्वक्तव्यताप्रतिवद्धा दशा -दशायध्यनरूपा अंतरंत-अतरतो नाम असहा मूधा । व्य. द्वि० १० आ- ग्रन्थपद्धतय इति । अन्त.१। अंतरंतगो-गिलाण । नि० चू० प्र० १९८ अ। वा अतकर । आव ४९९ । 1 भग० ४९ । सम० ४९। अवसर । प्रश्न. ठाणा. (५) [अंतर आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अंतरोदगाणं ] । - + अंतर-वौषणामेद ।आचा० २७७ । अन्तरशब्दो मध्य अंतरवीहि अन्तरवीथी,अवान्तरमार्ग' । ज० प्र० १८८ । वाची। प्रज्ञा० ५० । अन्तरे, पृष्ठोदरयोरन्तराले, पार्श्वे। अंतरा-अगृहीतवीप्सा । जीव० । १९९ । जं० प्र० ११७। अतराणि-पार्श्वदेशः। प्रश्न. ८३ । अंतराइयदोसो-अन्तरायिकदोषः, अन्तर्भवो दोष. । अंतरकंदे-अन्तरकन्दः । जलजवनस्पतिविशेपकन्द । प्रज्ञा. आव० ८३८ । ३७ । अंतराए-अन्तराय., शक्त्यभावः । सूत्र. १८४ । अन्तरा- अंतरकरणं-औपशमिककालः । प्रज्ञा० ३८७ । 'यिक (मध्यभव )। आचा० ३४० | अंतरगए-अन्तरगतः, संस्पर्शी । सूर्य० ७९ । अंतराणि-उत्कर्षापकर्षात्मकविशेषरूपाणि निवासभूतानि अंतरगामम्मि-अपान्तराल वा गिरिकन्दरविवरादीनि । उत्त० ७०१ । एव यो ग्रामस्तस्मिन् । ओघ० ७७ । अंतरापहे-अन्तरापन्था , अन्तरालमार्ग । भग० ११६ । अंतरगिरिपरिरओ-अन्तगिरिपरिरय , गिरेरन्त. परिक्षेप । अंतरायं-अन्तराय असङ्खडास्वाध्यायादिभिः । आव० ५८०। जीवा० ३४३। अंतरालं-अन्तरालं, अन्तरम् । उत्त० ३८१ । आव० ३३ । अंतरजातम्-भावभाषाजातः तृतीयो मेद । अन्तरे अंतरावणं-अन्तरापण ! उत्त० अंतरावणं-अन्तरापण । उत्त० २२२ । आवणान्तरम् । भाषाद्रव्यमिश्रणं। आचा० ३८५। उत्त० २०९ । राजमार्गमध्यभागवतिहट्टम् । विपा०,५८.। अंतरतेणों-गांमदेसंतरेसु हरंतो । नि० चू० द्वि० ३८ आ। अंतरावासं-वृष्टेरवसर , वर्षाकालश्च । भग० ६६ ' । अंतरदीव-अन्तरद्वीपः । भग० ४२५ । अंतरिए-लघ्वन्तररूपा । जं० प्र० ४९ । अंतरदीवगा-अन्तरद्वीपगा, अन्तरे, लवणसमुद्रस्य मध्ये अंतरिओ-अन्तरित , । आव० ४२९ । द्वीपा अन्तरद्वीपा , तद्गता अन्तरद्वीपगा । प्रज्ञा० ५०। | अंतरिका-अन्तरस्य-विच्छेदस्य करणमन्तरिका। जं० प्र० अंतरदीवगो-अन्तरद्वीपः, लवणसमुद्रमध्ये अन्तरेऽन्तरे १५०। 'द्वीप। जीवा० १४४ । अंतरिक्ख-अन्तरिक्षं, आकाशप्रभवंग्रहयुद्धमेदादिभावफल- अंतरदीविगा-आन्तरद्वीपजा । ठाणा ११५ । निवेदकशास्त्रम् । सम० ४९ । अंतरद्धा-अन्तर्धानम् , अंश । आव० ८२७ । अंतरिक्खो-मेहो । दश० चू० ११४ । अंतरद्धाए-अन्तरकालेऽर्धसलिखिते देहे । आचा० २९१।। अंतरिच्छा-अन्तरेच्छा, अन्तरा-मध्ये इच्छा-अभिमत- अन्तरद्वीपजा:-अन्तरम् , इह समुद्रमध्यं तस्मिन् वस्त्वभिलाष । उत्त० ४७४ । द्वीपास्तेषु । उत्त० ७०० । अन्तरद्वीपजा , सम० १३५। | अंतरिजं-अतरिज्जं णाम पाउरणं अथवा जं सिज्जाए अन्तरद्वीपाः, अन्तरम् । इह समुद्रमध्यं तस्मिन् द्वीपा । हेट्ठिल्लापात्त । निः चू० द्वि० १६३ आ । अंतरिया-अन्तरिका । सूर्य १४१ । लध्वन्तररूपा । अंतरपल्ली-अन्तरपल्लिकावृषभग्रामयोरन्तरालम् । बृ० प्र० जीवा० २०४ । विच्छेदकरणम् । भग० २२० । ३०५। अंतरीयं-परिधान । बृ० प्र० ९८ अ । अंतरपल्ली-बहि सन्निवेश. । नि० चू० प्र०३३६अ । मूल- | अंतरुच्छुअं-इक्षुपर्वमध्यम्। आचा० ३५४ । अन्तरे-पथि। ओघ० ६६ मध्ये परस्परविभाग । ठाणा० ग्रामादर्धतृतीयगव्यूतान्तर्गतो ग्रामः । बृ० तृ० १२१ आ । २२७। अन्तरे, अन्तराले । उत्त० ३८१ । अन्तरे, अवसर । तस्माद्रामात्परतो योऽन्य आसन्नग्राम । ओघ० १०४ । भग० ३८१ अंतरंभासिल्ल-अन्तरभाषिल्ल, अन्तरभाषावान् , गुरुवचना- पान्तराल एव स्वाभिमतभाषक । उत्त० ५५२ । अंतरो-अन्तर., अवसर । आव० ४२१ । अंतरभासा-अन्तरभाषा, आचार्यस्य · भाषमाणस्यान्ते | अंतरोदगाणं-अन्तरोदकानाम् , जलान्तर्वत्तिसन्निवेशविशे- यद्भाषते सा। आव० ७९२ । पाणाम्। जं० प्र० २७७ । --- o उत्त० ७०० । - (६) [ अंतर्मुहर्तम् अल्पपरिचितसैद्धांतिकशब्दकोषः अंधकण्टकीयम् ] ठाणा ८०। अंतर्मुहूर्तम्-मुहूर्तस्यान्तरं, मुहूर्तमपि न्यूनम् । उत्त. ४०२।अन्तः निवेशनस्य। आव० ७४५। अन्तो, रोग.,भङ्गः, ६९७ । मिन्नमुहूर्त्तम् । जीवा० १३० । विनाश । विशे० १३०७। अन्तः,मध्यभागे। जीवा० २०१॥ अंतर्हितः-(अतद्धिओ) अदृश्य । ठाणा० ५१३ । मार्ग । आव० ६८६ । विभाग. 1० प्र० ४५९ । भिन्नम्। अंतलिक्ख-अन्तरिक्ष, ग्रहमेदादिविषयम् । आव० ६६० । आव० ५८४ । मार्ग.। आव० ४८५ । आव० १८९ मध्ये। प्रज्ञा० ४७ । इन्द्रियाननुकूल आश्रय.। प्रश्न० १३८ । अंतलिक्ख-अन्तरिक्षम्, नभः । दश० २२३। अमोघादिकम्। मध्यकरणम्। आव० ५८३ । चतुर्दशमेदान्तरप्रन्थ । सूत्र० ३१८। उत्त० २६१ । अंतलिक्ख-अन्तरिक्षम्-गंधर्वनगरादि। ठाणा० ४२७ । अंतोजलगयपव्वय-जलान्तर्गतपर्वत । उत्त० २६४ । अंतवाले-अन्तपाल, अन्त-त्वदादेश्यदेशसम्बन्धिनं पाल- अंतोधूम-अभ्यन्तरधूमम् । आव० ६६२ । यति-रक्षयति उपद्रवादिभ्य इति । जं० प्र० २०३ । अंतोनायं-अन्तोनादं , हृदये सदुःखमारसन् । आव० ६६१ । अंतसो-अन्तश , निरवशेषतः। सूत्र. १७१ । अंतोनियंसणी-निर्मथ्युपकरणविशेषः । ओघ० २०९ । अंता:-अवयवा । उत्त० ४५९। उत्त० ५८५। अंतोमुहुत्त-अन्तर्मुहूर्त्तम् , मिलमुहूर्तम् । भग० २९ । अंता-अते ठिता, ण अता अणंता । नि० चू० प्र० २५५ आ। उत्त० ६९७॥ अंताक्षरिका-(अतक्खरिया) क्रीडाविशेष । उत्त० ४७ । अतोवणीते-आहरणतद्दोषविशेष । ठाणा० २५३ । अंतिए-अन्तिके, समीपे। भग० ९० । उत्त० २७७ । अंतोवाहिणी-अन्तर्वाहिनी नदी । जं० प्र० ३५५ । अंतिमधनं-अतिमे-अकस्थाने परिमाणं । व्य० प्र०.७६ । अंतिमराइयंसि-रानेरवसाने। ठाणा० ५०२। भग० ७११। अंतोवेइया-प्रतिलेखनादोषः । नि० चू० प्र० १८२। अंतिमसरीर अन्तिमशरीरम् , चरमशरीरम् । भग० २१९॥ अंतोसंबुक्कावट्टा-गोयरपिंडेसणाए कमेणं ति, तत्य गोय- अंतियं-समीपम्। भग० ६५९ । अत्यन्तमरणं, मरणस्य रातिमे।अभिग्गहविसेसतो जाणियव्वा । नि० चू० तृ० १२ । तृतीयो मेद । २३० । आन्तिकं, मामीप्यम्। अंतोसल्लं-अन्तःशल्यमरणम् । मरणस्य षष्ठो भेद.। आव० २६७॥ उत्त० २३० । अंतिय-अन्तिकम् ,आसन्नम्। भग० २१७॥ अत्यन्तमरणम्। अंतोसल्लमरणे-अन्तःशल्यमरणम् , अन्तं शल्यस्य द्रव्य उत्त० २३० । तोऽनुद्धृततोमरादे , भावत सातिचारस्य यन्मरणं तत् । अंतिया-आन्तिकी समीपाभ्युपगता । उपा० १५ । भग० १२० । सम० ३३॥ अते-अन्त , पर्यन्त , अतिदूरं वा। सूत्र० २०४ । अन्ते, अंतोहिंतो-गृहादेर्मध्यावहिर्नयन्त । ठाणा० ३५३ । अग्रे। उत्त० ६०१ । परिसमाप्ति । बृ०. द्वि० १९९ आ। अंत्यः-आनुपूर्व्यन्त्यपक्त्यका । सूत्र. १० । विशेषम् । अंतेउरे-(आत पुरिकी), आतुरस्य नाम गृहीत्वा आत्मनोऽगं ठाणा० ३९१ । प्रमार्जयति-आतुरश्च प्रगुणो जायते । व्य• द्वि० १३३ आ। अंदुकम्-हस्तिवन्धनविशेष । उत्त० ४११ । अंतेण-मार्गण । नि० चू० प्र० ६ आ । अंदेरे-गुच्छाविशेष. । प्रज्ञा० ३२ । अतेणं-आन्त्रेण । ठाणा० ५०२ । अंदोलगा-पक्ष्यन्दोलकाश्र तत्र यत्रागत्य २ मनुष्या अंतेवासि-भर्तृज्जुका । नि० चू० प्र० २५० अ । आत्मावमन्दोलयन्ति । जं० प्र० ४४ । अंतेवासी-शिष्य । जं० प्र० १५ । भग० ११ । अंदोलगो-आन्दोलक. यत्रागत्य मनुष्या आत्मानमन्दो- अंतेहि-अरसतया सर्वधान्यान्तवर्तिभिर्वल्टचणकादिभि । लयति सः । जीवा २०० । भग० ४८४ । रागद्वेषौ । आचा० १५८ । आचा० १६६ । अंध-अन्ध , अज्ञानः। भग० ३१२ । अंतो-अन्तो, विभाग । भग० ३९३ । विभाग: । ठाणा० अंधकण्टकीयम्-अतर्कितसम्भवो न्यायविशेष । आचा० ३८० । अन्त , परिच्छेद । प्रज्ञा० ५३२ । मार्गः। आव० उत्त० - १८॥ (७) [अंधकारे आचार्यश्रीमानन्दसागरसूरिसङ्कलितः अंवरिसी] - प्र० अंधकारे-अन्धकारम् , तमोरूपम्। भग० २७० ।। अंवखुज-आम्रकुब्ज , आम्रफलवत् कुब्जो वक्र । भग० अंधकारेति-तमस्कायनाम । ठाणा.' २१७ । ९० | पादतलमध्यम् । बृ० द्वि० २२३ अ । तं० अंधगवण्हिणो-अहिपा-वृक्षास्तेषा वह्रयस्तदाश्रयत्वेनेत्य- | अंबगपाणगं-पानकविशेष । आचा० ३४७ । हिपवयो वादरतेजस्कायिका । भग० ७४६ । अंबगपिंडी-आम्रपिण्डी । आव० ६९७ । अंधगवण्ही-अन्धकवृष्णिः, द्वारवत्यां राजा यादवविशेष । अवचोयए-आम्रत्वक् । भग० ६८१ । अन्त० २। दश० ९७। अंबचोयगं आम्रछल्ली। आचा० ४०५ । अंधतमसं--अन्धतमसम् । आव० ३६६ । अंवजुज्झं-पादतलमध्यम् । नि० चू० प्र० १३७ अ। अंधपुरं-नगरविशेष । बृ० तृ० १०८ आ० । नि० चू० | अंवट्ठ-अम्बष्ट., ब्रह्मपुरुषेण वैश्यस्त्रियां जातो वर्ण. ! द्वि० ४२आ। आचा० ८। अंधप्रदीप्तपलायनम्-(अधपलितपलाणं)। दश० १५८ 1 अंवट्ठो-अम्बष्ट , ब्राह्मणेन वैश्याया जात । उत्त० १८२ । अंधमूढि--अविमर्शकारिता। आचा० ६२ । अंबडे-अम्बड माहणपरिव्राजकमेद । औप० ९१ । अंधय-अन्धकम् , नयनयोरादित एवानिष्पत्ते , कुत्सिताङ्गम्। (अमड ) परिव्राजकविद्याधरश्रमणोपासक । ठाणा० ४५७ । विपा० ३६ । अम्बड. । सम० १५४ । अंधलीभूय-अन्धीभूत । आव० ६८८ ॥ अंबडो-अम्बड अमूढदृष्टित्वोदाहरणे लौकिकऋषि. । अंधिय-चतुरिन्द्रियविशेष । प्रज्ञा० ४२ । दश० १०२। सुलसाश्राविकापरीक्षकपरिव्राजक । व्य० अंधिया-चतुरिन्द्रियजीवमेद.। उत्त० ६९६ । चतुरिन्द्रिय १८ आ। म्लेच्छविशेष । प्रज्ञा० ५५ । अम्बडपरि- जन्तुविशेष । जीवा० ३२ । व्राजक । प्रज्ञा० ६१ । अधिल्लगो-अधिल्लक , जात्यन्ध । प्रश्न० १६२ । अंबपलंब-फलविशेष । आचा० ३४८ । अंधीयताम्-अन्धीभवतु । दश० १०६ । अंवपेसी-आम्रफाली। आचा० ४०५ । अंधो-अन्ध , चिलातदेशनिवासी म्लेच्छविशेष । प्रश्न. १४। | अयप्पहारो-प्रहारातः । उत्त० १९३ । अंधोपल -(अधोवल), अन्धपाषाण । दश० ४० । अंवमित्तयं-आम्रार्द्धम् । आचा० ४०५ । अंधोपलादिः-छायारहितपाषाण विशे० ९१८ । अंबय-आम्र । आव० ४१७ । अध्र-(अध), अध्रादिदेशोद्भवा म्लेच्छप्राया, आर्यभाषामजा- अंबयरुक्खे-अष्टादशजिनचैत्यवृक्ष । १५२ । नाना। व्यद्वि० २८अ । अम्वरतलम्-(गगनयल)। सूर्य० २६४ । . अंध्री-(अधी), अन्ध्रदेशीया स्त्री, उत्कृष्टरूपा ।' आव० ५८१। अंवरवत्थं-अम्बरवस्त्र, स्वच्छतयाऽऽकाशकल्पम् । अंव-अम्लवचनयोगाद् परुषवचनव्यवहार । व्य० प्र. २५६। प्र० ४०६ । स्वच्छतयाऽऽकाशकल्पवसनम् । भग० १७४ । अंव-आम्र । प्रज्ञा० ३१ । अंबरसे-अम्बा-पूर्वोक्तयुक्त्या जलं तद्रूपो रसो यस्मात् तन्नि- अंव-आम्रम् । प्रज्ञा० ३२८ । फलविशेष । प्रज्ञा० ३६४ । सक्तितोऽम्बरसम्। भग० ७७६ । थोवेण ऊणं अर्व भण्णति। नि० चू० द्वि. १२४आ।' अंबरिस-अम्बरीष , द्वितीय परमाधार्मिक । भग० १९८ । अंवए-अग्रप्रलंबविशेष । वृ० प्र० १४३आ। अंबरिसी-नारकान् कल्पनिकाभि खण्डश कल्पयित्वा अंबकंजिय-सुगंधिकालिकम् । ओघ १६० । भ्राष्ट्रपाकयोग्यान् करोति। सम० २८ । अम्बर्षि , द्वितीय अबकुजं-पादतलमध्यम् । वृ० द्वि० २२३ आ । परमाधार्मिक । सूत्र. १२४ । पञ्चदशसु परमाधार्मिकेषु अंवकूणए-आम्रास्थिकम् । भग० ६८१ । द्वितीय । उत्त० ६१४ । नरके द्वितीयः परमाधार्मिक । आव० ६५० । विनयविषये उज्जयिन्यां ब्राह्मण श्रावक । अंवकूणगहत्थगए-आम्रफलहस्तगत । भग० ६८४ ।' अंबक्खलगं-अम्लखलम् । आव० ३५३ । सम० ज० । आव० ७०८। (८) [ अंवरिसे अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अंसी] + अंबरिसे-अम्बरीषः, कोष्टक । जीवा० १२४ । अम्बरीषम्- | अंविलि-आम्लभाजनम्, चिञ्चिणिकापात्री । आव० ६२४ । भ्राष्ट्रम्। प्रश्न १७ । अम्बरीषा-भ्राष्ट्रा आकरणानि । ब्बा । बृ० प्र० २८आ। ठाणा० ४१९ । अंविलिबीयं-अम्लिकाबीजम् , चिश्चिणिकाबीजम् । आव० अंबले-अम्बरागि । वृ० द्वि० २८३ अ। ६२४ । अंवसालवणं-आम्रशालवनं, आमलकल्पानगर्या वनवि- अंबिलोदए-आम्लोदकम् ,अतीवस्वभावत एवाम्लपरिणामम्। शेष. । उत्त० १५९। चैत्यविशेष । आव० ७०७ । जीवा० २५। आम्लोदकम् , स्वभावत एवाम्लपरिणाम काजिकवत् । प्रज्ञा० २८ । आम्रशालवनम्। आव० ३१४ । अंबा-विद्याविशेष । आव० ४११ । जलम् । भग० ७७६ । अंबूखुज्जो-आम्रकुब्जः । आव० ६४८ । अबे-आम्ल । नि० चू० प्र० ३५६ आ। प्रथमपरमा- अंबाडगं-अम्बालकम् , फलविशेष । अनुत्त० ६ । अवाटकं- धार्मिक | सम० २८ । अम्ब , नरके प्रथम. परमाधा- फलविशेषः, अधोगतिमत् । प्रज्ञा० ३२८ । र्मिक. । आव० ६५० । पञ्चदशसु परमाधार्मिकेषु प्रथम । अंबाडग-बहुबीजको वृक्ष । भग० ८०३ । अवाडक- उत्त० ६१४ । अम्ब , प्रथम परमाधार्मिक । सूत्र० १२४ । वहुवीजविशेष । प्रज्ञा० ३२ । आम्राटक -कापोतलेश्यारसे। अंबेल्ली- (रब्बा ) । आव० ९१ । प्रज्ञा० ३६४ । अवो-आम्रवृक्ष , भावुके दृष्टात | ओघ० २२३ । अवाडगपलंवं-फलविशेप । आचा० ३४८ । अंमिया-प्राप्ता। नि० चू० द्वि० १० आ । अयाडगपाणगं-पान कविशेष । आचा० ३४७ । अंमेउं-प्राप्तुम् । नि० चू० प्र० २०२ अ । अंवाडिओ-तिरस्कृत । वृ० प्र० ३०आ। तिरस्कृत । अंवाडेति-खरंटेति । नि० चू० प्र० २११ आ। आव० ९१ । तर्जित । आव. १८७ । उपालब्ध । अंस-अनि , पर्यवासनोपविष्टस्य जानुनोरन्तरं, आसनस्य आव० ३९८॥ ललाटोपरिभागस्य चान्तर, दक्षिणस्कन्धस्य वामजानुन-. अंघाडिय-निर्भसित । आव० ३०६ । श्वान्तरं, वामस्कन्धस्य दक्षिणजानुनश्चान्तरम् । चतुर्दिग्वि- अंबाडिया-तिरस्कृता । आव० २२५ । भागोपलक्षितः शरीरावयवो वा। भग० ११ । अपु- अंबाडेइ-तिरस्कुरते । उत्त. १४७ । उपलभते । आव० कोणेषु । ज० प्र० ११५। अश , सत्पर्यायोऽयं शब्द । २२३ । नि० चू० प्र० २११ आ । उत्त० ५८९ । अंवाण-गंधाने, आम्रा । वृ० प्र० १४३आ। असलग-असगत | तं० । अंबारेवई-अम्बारेवती, व्यन्तरीविशेष । आव० ६९१ । अंसहरा-अशधरा, अश-प्रक्रमाज्जीवितव्यभागं धार- अंवावल्ली-वल्लीविशेष । प्रज्ञा० ३२ । यन्ति-मृत्युना नीयमानं रक्षन्ति । उत्त० ३८८ । अश - अंवियपहारो-प्रहारातः । आव० ६६६ । दुखभागस्त हरन्ति अपनयन्ति ये ते । उत्त० ३८९। अंविया-प्राप्ता गवेषितलब्धा वा । वृ० द्वि० ८२अ । असातो-एकस्मात् । ठाणा० २३६ । अविलं-अम्लम् । आव० २०० । अम्लम् , तक्रारना- | अंसिया-अविभक्तोऽश । वृ० द्वि० १९९ आ। गाम- दश. १८० । आचाम्लम्-अवश्यानम् । ततियभागादि । नि० चू० द्वि० ७०आ। अंशिका-यत्र आचा० ३४६ । ग्रामस्याई, आदिशब्दात् त्रिभागो वा चतुर्भागो वा गत्वा अंबिल-पर्वगवनस्पति । भग० ८०२ । अम्बोऽम्लिका स्थितः सा ग्रामस्याश एव अशिका | बृ प्र. १८१ आ । द्याश्रित । जे. प्र. १७४ । हरितविशेष । प्रज्ञा० ३३ । असियालए-अहयालये। दश० ३७ । रब्बा। बृ० प्र० २९ । अंसी-अस्ति , चतुर्दिग्विभागोपलक्षित शरीरावयव । अविलजवागू-अम्लयवागू । आव० ९१ । जीवा० ४२ । प्रज्ञा० ४१२ । ( अर्शासि ) रोगविशेष, । अंबिला-आम्लिका । ओघ० २१५ । नि० चू० प्र० १८९ अ । । लादि। । (९) [ अंसुए आचार्यश्रीभानन्दसागरसूरिसङ्कलितः अइबले ] - - आव० अंसुए-लक्ष्णपट्ट । बृ० द्वि० २०१ आ । अइक्कमओ-अतिक्रमः, अनानुपूर्वी भवनम् । विशे० १७४ । अंसुयं-वस्त्रम् । नि० चू० प्र० २५४ आ। दुकूल- | अइक्कमे अतिक्रामेत् , प्रविशेत् । उत्त० ६० । विशेषरूपम् । जीवा० २६९ । अइक्कमो-अतिक्रम , आधाकर्मनिमन्त्रणे प्रतिशृण्वति साधु- अंसुय-श्लक्ष्णपट्ट । ठाणा० ३३८ । क्रियोलचनरूपः दोषविशेष', यावदुपयोगकरणम्। आव० अंसुयाणि-अशुकानि, वस्त्राणि । आचा० ३९३ । ५७६ । अतिलछनम्। आव० ८२३ । पीडात्मको महा- अंसो-अश , मेद । विशे० २५१। अनिः, चतुर्दिग्वि- व्रतातिकमो वा मनोऽवष्टब्धतया. परतिरस्कारं वा। भागोपलक्षितः। सूर्य० ४ । अस्रि , पर्यट्वासनोपविष्टस्य सूत्र० १७३ । जानुनोरन्तर १, आसनस्य ललाटोपरिभागस्य चान्तरम् २, अइगच्छिहिति-अतिगमिष्यति । आव० ३६९ । दक्षिणस्कन्धस्य वामजानुनश्चान्तरम् ३, वामस्कन्धस्य | अइगतो-पविट्ठो। नि० चू० तृ० १३ आ। अतिगत । दक्षिणजानुनश्चान्तरं ४ । सूर्य० ४ । अश-मेद । आव० ३४९ । प्रज्ञा० ६०१ । अश'-भाग । उत्त० १८८ । भाग । अइगमणं-अतिगमनम् , अतिगमनकथा, राज्ञ आगमन- आचा० १७७ । सम्बन्धी विचार , राजकथाया द्वितीयमेद । आव० ५८१ । अई-अमुना। बृ० द्वि० २१३ अ । उत्तरायणम् । भग० १४७ । अइंताणं-अतियता-आगच्छता। व्य. द्वि० ३६६ आ। अइगया-अतिगता। ओघ० १५८ । अइंति-प्रविशन्ति। ओघ० ६७ । आगच्छन्ति । प्रश्न० १२० । अइगुविलगवरा-अतिगुपिलगह्वरा । आव० ३८४ । अइंतु-प्रविशन्तु। ओघ० ७९ । अइचारो-अतिचारः, स्खलना। ओघ० ३८ । मिथ्यात्व-, अइंते-प्रविशति । बृ० द्वि० ६०अ । अइंतो-आगच्छन् । आव० २६५ । मोहनीयकर्मोदयादात्मनोऽशुभ. परिणामविशेष । ८१३ । अतिचरणानि-चारित्रविराधनाविशेषा । विशे० ५५० अइ-अयि, आमन्त्रणे । उत्त० ३५४ । अइचिराविओ-अतिचिरायित । आव० ५१२ । अंइअच्च-अतिगत्य, अत्येत्यातिक्रम्य । आचा० अइच्छ-अतीच्छा, अदाने सत्यतिगच्छेति वचनम् । अविगणय्य । आचा० ३०३ । आव. अइआरो-अतिचार , पापम् । आव० ७७८ । अतिक्रम। | अइच्छओ-अतिक्रामन् , भिन्दान. । बृ० प्र० आव० ५७५। स्खलना। ओघ० ३८ । अइण्णं-आकीर्णम् , सव्वलोगो आयरइ। नि० चू० प्र० अइकाप-अतिकाय , दक्षिणनिकाये सप्तमो व्यन्तरेन्द्र । भग० १५८ । अइणा-गोरमिगादिणो। नि० चू० प्र० २५५ अ । अइकाय-अतिकाय., महोरगेन्द्र । जीवा० १७४ । अइनिद्धं-अतिस्निग्धम् , हवि प्रचुरम् । आव० ५६८ । अइकुंडियं-अतिवाधितम् । आव० ५७४ | अइपंडुकंबलसिला-अतिपाण्डुकम्बलशिला। आव० १२४। अइकोहग्गहघत्थं-अतिक्रोधग्रहग्रस्तम् , अतीवोत्कट- अइपडागा-अतिपताका, एका पताकामतिक्रम्य या रोषग्रहाभिभूतम् । आव० ५८८ । पताका सा। औप० ५। पताकोपरिवर्तिनी । भग० ४७६ । अइकंतं-अतिक्रान्तम् , अतिकान्तकरणात् । आव० ८४० । | अइ(णु)परियट्टित्ता-अति(नु)परिवर्त्य, सामस्त्येन, परि- अइक्वंत-अतिकान्तम् , अतिक्रान्तकरणादतिक्रान्तम् । भग० भ्राम्य । प्रज्ञा० ६०० । २९६ । अइपहाए-अतिप्रभाते । आव० ६४१ । अइक्वेता-अतिक्रान्ता, जाता। उत्त० २१५ । अतीता । अइप्पयं-अतिप्रभाते । ओघ० ९८ । . अइवले-आगामिन्या पञ्चमो हरि । सम० १५४ । अतिवल - आचा० १७८ । अइक्कतो-अतिक्रान्त , पर्यन्तवर्ती । प्रज्ञा० ९१ । भरतसताने तृतीय । ठाणा० ४३० । आचा० २४१ । ४७८ । १७ आ। २७४ । । -- (१०) -- .

[ अइभद्दा अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अओज्झा ] - प्र० अन्त० १८॥ अइभदा-अतिभद्रा, प्रभासमाता। आव० २५५ । भग० ५५२ । अतिपातः, हिंसादिदोषः। ओघ० ३६ । अइभारे-अतिभार , प्रभूतपूगफलादे. स्कन्धपृष्ठयादिध्वा वध.। भग० २८९ । रोपणम् । आव० ८१८॥ अइवालग-अजापालक , वाचकविशेष । बृ० तृ. २०आ। अइभूमि-अतिभूमि , गृहस्थैरनुज्ञाता यत्रान्ये भिक्षाचरा न अइवेलं-अतिवेलं, स्वाध्यायादिवेलातिक्रमेण । उत्त० ११० । अतिवेला अन्यसमयातिशायिनी मर्यादा समतारूपा। यान्ति । दश० १६८ । उत्त० ११०॥ अइमत्तं-अतिमात्र , अतिरिक्तम् , अतिक्रान्तमर्यादम् । अइसंधणपरो-अतिसन्धानपर , परवञ्चनाप्रवृत्त । आव० उत्त० ४२९ । ५८९ । अइमत्ते-अतिमात्रे, बृहत्प्रमाणे । ओघ० १७० । अइसंपओगो-अतिसम्प्रयोग , गार्थ्यम् । सूत्र० ३२९ । अइमुत्तग-पुष्पविशेष । नि० चू० प्र० ११८ आ । अइसय-अतिशय , आमर्पोषध्यादि । सम० १२४ । अर्थ- अइमुत्तगचंदसंठाणसंठिते-अतिमुक्तकचन्द्रसस्थान- विशेष । बृ० प्र० १९२ आ। सस्थितम् , घ्राणेन्द्रियसस्थानम् । प्रज्ञा० २९३ । अइसुहुमं-अतिसूक्ष्मम् । आव० ५३६ । अइमुत्तगणा-वल्लीविशेष । प्रज्ञा० ३२ । अइसेस-अतिशय , अतिशयनं, अवध्यादिप्रत्यक्ष ज्ञानं । अइमुत्तय-लताविशेप । प्रज्ञा० ३८२ । ओघ० १४ । अतिशयी-अवध्यादिज्ञानयुक्त । दश० १०३ । अइमुत्ते-अतिमुक्त , महावीरस्वामिन कुमारश्रमण शिष्य । सूत्रार्थसामाचारीविद्यायोगमत्रातिशय । बृ० भग० २१९ । अन्तकृद्दशाना षष्ठवर्गस्य पञ्चदशाध्ययनम् । २०३ आ। अइसेसी-अतिशायिनी, स्निग्धमधुरद्रव्याणि । वृ० प्र० अइयंचिय-अतिक्रम्य । ठाणा० ३०० । २४६ आ। अइयारो-अतिचार , गृहीते आधाकर्मणि दोषविशेषः, याव- | अइसेसो-अतिशेष , अतिशायी। जीवा० २७७ । शेषाणि- द्वसति गत्वेर्यापथप्रतिक्रमणाद्युत्तरकालं लम्वनोत्क्षेप । मत्यादिचक्षुर्दर्शनादीनि अतिक्रान्तं-सर्वाववोधादिगुणैर्यत्तदति- आव० ५७६ । अतिचरणं.-चारित्रस्खलनाविशेष । आव० शेषमतिशयवत्केवलम् । ठाणा० २१३ । ७८ । अपराधम्। उत्त० २३३ । अईइ-अतीति, आगच्छति, प्रविशति । आव० २३२ । अइर-अचिरा, शान्तिमाता। आव० १६१ । अईतेआ-अतितेजा --चतुर्दशरात्रिनाम । जं० प्र० ४९१ । अइरत्त-अतिरात्र , अधिकदिनं, दिन वृद्धि । ठाणा० ३७० । अईया-अतीता , अतिक्रान्ताः । आचा० १७८ । अइरत्तकंवलसिलाओ-मेरुमस्तकशिला । ठाणा० ८० । अईह-अतियासी । आव० १७३ । अइरा-अचिरा, शान्तिजिनमाता । १६० । अउअगाति-अयुतागानि, संख्याविशेष । ठाणा० ८६ । सम० १५२ । सम० १५१ । सूर्य० ९१ । भग० ८८८ । भइरित्तसिजासणिए-अतिरिक्तशय्यासनिक , चतुर्थम- | अउआति-अयुतानि, सख्याविशेष । ठाणा० ८६ । सूर्य समाघिस्थानम् । आव० ६५३ । ९१ । भग० ८८८ । भग० २९० । भग० २७५। अइरेगो-अतिरेक , अतिशायिता । जीवा० २७४ । अति- | अउज्झं-अयोध्यम् , अनभिभवनीयम् । जं० प्र० २१२ । शय । जीवा० २६७ । अउज्झा-अयोध्यानि, पर्योद्धमशक्यानि । प्रज्ञा० ८६॥ अइवत्तियं-पातकादतिपातिका, निर्दोषाम् । आचा० ३०५ । अउज्झाओ-नगरविशेष । ठाणा० ८० । अइवाइज्ज-अतिपातयेत्, व्यथेत । आचा० १२८ । अए-अज , बर्कर । प्रज्ञा० २५२ । उत्त० २७५ । अइवायमि-अतिपाते । ठाणा० ३२९ । अओज्झा-अयोध्या, राजधानी। जं० प्र० ३५७ । अजि- अइवाय-द्वादशशतके प्राणातिपातादिविषय पञ्चमोद्देशक । तस्य प्रथमपारणकस्थानम्, 'आव० १४६ । आव० ० (११) [ अमोमुहदीवे आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अकरंडुअं] भग० २४०। अओमुहदीवे-अतरद्वीपविशेष । ठाणा० २२६ । अकम्मसो-अकर्माश , अशाः-कर्मणोऽवयवास्तेऽपगता अओमुहो-अयोमुख., अन्तरद्वीपविशेष. । जीवा० १४४ । यस्य स. । उत्त० २५७ । अकंटए-अकण्टक , कण्टकरहित । जीवा० १८८ ॥ अकम्म-आक्रम्य, बलात्कारेण । आव. ६६२ । अकंठंगमणाई-अकण्ठगमनादि,कण्ठेन भक्तकवलो नोप- | अकम्मर्ग-अकर्मकं, अविद्यमानदुश्चेष्टितं । सम० ५२ । क्रामति । ओघ० ८० । अकम्मभूमगा-अकर्मभूमका , अकर्मा-यथोक्तकर्मविकला अकंडूयते-अकण्डूयक , न कण्डूयत इति । ठाणा० २९९। भूमिर्येषां ते अकर्मभूमा , ते एव अकर्मभूमका । प्रज्ञा० अकंतं-सरोषभणितम् । नि० चू प्र० २७८ अ । ५०। सम० १३५ । अकंतत्ता-अकान्तता, अकमनीयता। २३ । | अकम्मभूमी-अकर्मभूमि , हैमवतादिकभोगभूमि । प्रश्न. असुन्दरता। मग० २५३ । अकान्तता । प्रज्ञा० ५०४ । ९६ । ठाणा० ११५। अकंतदुक्खी-अनभिप्रेताशातावेदनीया। आचा० ४३० । अकम्मयं-अकर्मक, अप्रमादम् । सूत्र० १६९ । उत्त०७००१, अकंता-अकान्ता', अकमनीया । भगळ ७२ । अकम्मयारो-अकर्मकारी, स्वभूमिकानुचितकर्मकारी । प्रश्न. अकंपिए-अकम्पित , अष्टमगणधर । आव० अकक्कस-अकर्कशम् , सुखम् । भग० ३०५ । अकम्मा-अकर्मा, न विद्यते कर्माऽस्येति, वीर्यान्तराय- अकजं-अकार्यम्-मैथुनासेवालक्षणम् । व्य० प्र० २०५ आ। क्षयजनितं जीवस्य सहज वीर्यम् । सूत्र० १६८ । अकडजोगी-यतनया योगमकृतवान् । व्य० प्र० २५१ । अकम्हा-अकस्मात् , वाह्यनिमित्तानपेक्षम् । आव० ६४६ । अकडसामायारी-सामायारि जो न करेति सो अकड- अकस्मात् क्रिया, अकस्माद्यत्करणम् , क्रियायाश्चतुर्थो मेद । सामायारी । नि० चू० तृ० ८१अ । आव० ६४८) अकपणा-अकर्णनामा अन्तरद्वीपा । प्रज्ञा० ५० । अकम्हादंडे-अकस्माद्दण्ड. | सम० २५। अकण्णो-अकर्ण , अन्तरद्वीपविशेष | जीवा० १४४ । अकम्हाभयं-अकस्माद्यम् , वाह्यनिमित्तानपेक्षं गृहादिष्वेवा- अकति असङ्ख्याता अनन्ता वा । ठाणा० १०५ । वस्थितस्य रात्र्यादौ यद्भयम् । आव० ६४६ । सम० अकतिसञ्चिता-असङ्ख्याता, एकैकसमये उत्पन्ना सन्त १३ । ठाणा० ३८९ । स्तथैव सञ्चितास्ते । ठाणा० १०५ । अकयकरणो-अकृतकरण अनभ्यस्तविद्य । अकतिसंचया-कतिसंचिता न ये। भग० ७९६ । ७०३ । अकृतकरण । आव० ३४४ । अकन्नदीवे-अकर्णद्वीप , अन्तरद्वीपविशेष । ठाणा० २२६ । अकयकिरिए-अकृतयोगोद्वहन । नि० चू० प्र० २९२ अ । अकप्प-अकल्पः, शिक्षकस्थापनाकल्पादि । दश० १९६ । | अकयपरलोयसंवलो-अकृतपरलोकशम्बल ।आव०३६७ अकप्पए-अकल्पिके, वसतिपालके । व्य. द्वि० १३ अ । अकयन्नुया-अकृतज्ञता । आउ० । अकप्पट्ठवणा -अयोग्यानीतपिंडवर्जनम् । नि० चू० प्र० अकयपुण्णे-अकृतपुण्य । उत्त० ३२९ । अकयपुण्णो-अकृतपुण्य, अविहिताश्रवनिरोधलक्षणपवित्रा- अकप्पणारुमणा-अकल्पनारुग्मनस | मरण० । नुष्टाना । प्रज्ञा० ९८ । अकप्पे-सामायिकसयम , भस्थितकल्पवतुर्यामधर्मों वा। अकयमुहो-अकृताक्षरसस्कारमुख. । बृ० तृ० २५ आ । वृ० तृ० १२५ अ। अकयरूवो-वकलपिंडठितो। नि० चू० द्वि० ८७ अ । अकप्पो-अकल्प ,आव० ७७८ । अकृत्यम् । आव० ७६१ । अकयागम-अकृतकम्र्मोदय । आव० २७४ । अकव्वरसुरत्राण-मोगलनृप । ज० प्र० ८८ । अकरंडुरं-अकरण्डुकम् , अनुपलक्ष्यमाणपृष्ठवंशास्थिकम् । अकम्मंसे-अकर्माश । आव० ६१५ । औप० आव० २४२ अ। ० १९ । (१२) [ अकरंडुयं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अकालिचरिया ] अकरंडुयं अघिद्यमानपृष्ठिपास्थिकम् । प्रश्न० ८१। रोधशीलता। दश० १७७ । निरभिप्राय । भग० ३६ । अकरंडय-अकरण्डक , अनुपलक्ष्यपृष्ठास्थिक । प्रश्न०८४। निर्जराद्यनभिलाषी । भग० ३६ । अकरणं-मैथुनम् । व्य० प्र० २५१ अ । अकामकामे-अकामकाम', कामान्-इच्छाकाममदनकाम- अकरण-अलेश्यस्य केवलिन कृत्स्नयो यदृश्ययोरर्थयोः केवलं मेदान् कामयते-प्रार्थयते य. स कामकामो न तथा ज्ञानं दर्शनं योपयुञानस्य योऽसावपरिस्पन्दोऽप्रतिषो अकामकाम , अकामो-मोक्षस्तत्र सकलाभिलाषनिवृत्तेस्तं वीर्यविशेष स । ठाणा० १०६ । भग० ५७ । कामयते य. स तथा। उत्त० ४१४ । अकरणतयैव-अक्रिययैव संयमानुष्ठानमन्तरेण । आचा० अकामणिजराए-अकामनिर्जरया। आव०, ६५ । १४९ । अकामतण्हा-अकामतृष्णा । औप० ८६ । अकरणयाइ-अकरणेन, अपूर्वानुपार्जनेन । उत्त० ५८७ । अकामनिकरणं अकामनिकरणम् , अकामो वेदनानुभावेऽ अकरणयाप-अव्यापारतया । आचा० ३०५ । निच्छाऽमनस्कत्वात् स एव निकरणं-कारणं यत्र तदकाम- अकरणिज-अकृत्यम् , असंयम मन्दधर्माण.। आव० निकरण-अज्ञानप्रत्यय, अनिच्छाप्रत्ययम् । भग० ३१२ । अकामनिर्जरा- पराधीनतयाऽनुरोधाच्चाकुशलवृत्तिराहारा- अकरणिज्जो-अकरणीय । आव० ७७८ । दिनिरोधश्च । तत्त्वा० ६-२० । अकरितो-अकुर्वन् । आव० ५०९ । २४१। अकाममरणम्-बालमरणाद्यमप्रशस्तम्। उत्त० अकलिजंता-अज्ञायमाना। ओघ० १६० । अकाममरणं-उत्तराध्ययनेषु पञ्चमाध्ययनम् । उत्त० ९।. अकलुसे-अकलुष , द्वेषवर्जित । अन्त० २२ । अकाममरणिज-उत्तराध्ययनेषु पञ्चमाध्ययनम् । सम० ६४ अकलेवरसेणि-अकडेवरश्रेणि , कलेवर-शरीरं अविद्यमान कडेवरमेषामकडेवरा सिद्धास्तेषां श्रेणिरिव श्रेगि. क्षपकश्रेणि- अकारए-अकारक , अरोचक । विपा० ४० । रिति । उत्त० ३४१ । अकारकम्-अपथ्यम् । ओघ० १३९। ओघ० १८३ । शीतलम् । ओघ० १७६ ॥ अकल्पम्-(अकप्प)-असमर्थ । आचा० १०६ । अकारिजणो-अकारिजन । आव० १७६ । अकविल-अकपिला, श्यामा । जं० प्र० ११५ । अकारिणो-अकारिण आमोषायविधायिन. 1 उत्त० ३१३॥ अकसिणपवत्तगो-अकृत्स्नप्रवर्तक । आव० ४९३ । अकाल-अवर्षा । ठाणा० ३९९ । अकसिणा-आचारप्रकल्पस्य अष्टाविंशतितमो भेद । सम० ४७ । अकृत्स्ना-यत्र किंचित् झोष्यते। व्य० प्र० १२४ आ। अकालपडिबोधी-रातो चेव पडिबुझंति । नि० चू० अकसिणो-अकृत्स्न । विशे० ४२४' । तृ० ४३ अ । एषा न कश्चिदपर्यटनकाल. । आचा० ३७७ ॥ अकस्मात्-(आकस्मिक ), नियुक्तिक । आचा० २६६ 1 अकालपरिभोगी-रातो सव्वादरेण भुजंति । नि० चू० अकस्मात्-कस्मादिति हेतुर्न कस्माद् अकस्मात् । आचा० तृ. ४३ अ । एषां न कश्चिदभोजनकाल. । आचा०३७७॥ अकालपरिहीण-अविलम्बेन । भग० ७३८ । निर्विलम्बम् । अकस्माद्दण्ड -अनभिसन्धिना दण्ड । प्रश्न० १४३॥ ज० प्र० ३९७1 अकस्माद्भयम्-बाथनिमित्तानपेक्षम् । प्रश्न १४३ ।। अकालसज्झायकारए-अकालस्वाध्यायकारक।सम०३४॥ बाह्यनिमित्तमन्तरेणाहेतुक भयम् । आव० ४७२ । अकालसज्झायकारी-अकालस्वाध्यायकारी, य कालिक- अकहा-अकथा, मिथ्यात्वमोहनीय कर्म वेदयन् विपाकेन या श्रुतमुद्घाटपौरुष्या पठति, चतुर्दशमसमाधिस्थानम् । आव० काञ्चिदज्ञानी कथा कथयति सा। दश० ११५-1 ६५४ । अकालस्वाध्यायकरणम् , पञ्चदशमसमाधिस्थानम्। अकांडे-अकाले । वृ० प्र० १५५ । प्रश्न. १४४ । अकाऊण-अकृत्वा, अभणित्वा । ओघ० १५५ । अकालिचरिया-अकालचर्या, रात्री पथि गमनम् । व्य० अकाम-अकाम , मोक्ष. । उत्त० ४१४ । अकाम., उप- . I प्र० १९ आ। (१३) [अकालियं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अतिया ] । -- । आचा० ४४। -- पञ्चमः . अकालिय-आकालिक, यथास्थित्यायुरुपरमादागेव । उत्त० अकुऊहले-अकुतूहल, कुहकादिष्वकौतुकवान् । उता ६३० । ६५१। अकाले-अकाल , मध्याह्नादि । विपा० ६९ । अकुओभय-अकुतोभयः; संयम , अप्कायलोको वा। अकाहलं-अमन्मनाक्षरम् । प्रश्न० १२० । अकिंचणे-अकिञ्चनः, न विद्यते किमप्यस्येत्यकिञ्चन', 'अकुक्कुए-अकुक्कुचः, अशिष्टचेष्टारहितः । उत्त० १०९ । निष्परिग्रह । आचा० ४०३ । अकिञ्चन-निष्परिप्रहत्वम् । अकुत्कुच., कुन्थ्वादिविराधनाभयात्कर्मवन्धहेतुत्वेन कुत्सितं उत्त० ५९०। हस्तपादादिमिरस्पन्दमानः । उत्त० १०९। अकौत्कुच अकिञ्च-अकृत्यम् ,' अकरणीयम् , प्राणवधस्य मुखविकारादिरहित । आचा० ३१५ । पर्याय । प्रश्न. ५ । मेहुणं । नि० चू०प्र० ७९ आ। अकुक्कुयं-अकुक्कुच, अस्पन्दमानम् । उत्त० ५८ । 'अनिर्वर्तनीयम् । भग० १०४ । अकुक्कुय-कुत्सितं कूजति-पीडितः सन्नाक्रन्दति कुकूजो न अंकिट्ठ-अकृष्टः, अक्लिष्टो वा, अविलिखित', अवाधितो तथेत्यकुकूजः । उत्त० ४८६ । निर्वेदनमिति वा । भग० १८० । अकुचो-निश्चल । नि० चू० प्र० १६७ अ । अकित्तिम-अकृत्रिम, कमाद्रत्नखानिसम्भूतानुप्तसम्भूत- अकुट्टिले-अहेि। दश० चू० १५१ । रुपशोभित । जं० प्र० ७० । अकुट्ठो-( आकुष्ट.)। जारजातोतिवयणेण । नि० । चू० अंकित्ती-अवर्णवादभाषणम् । वृ० तृ. ९९ आ । प्र० २९६ में। अकिरियं-अक्रिया, नास्तिवाद । आष० ७६२ । अकुसल-अकुशल., अनिपुग स्थूलमतिश्चरकादि । दश० ६४। अकिरियवादी-अक्रियावादी, क्रिया-जीवादिपदार्थो नास्ती- त्यादिका वदितुं शीलं यस्य स । सूत्र० २०८ । अकुसलो-अप्रधान वन्धाय ससाराय । नि० चू० प्र० अकिरिया-अक्रिया। आव० ३६८ । योगनिरोधः । भग० १४१। अक्रिया । आव० ४१२ । अवर्ण । आव अकुहए-कुहर्ग-इंदजालादी त न करेइत्ति वाइप्तादि वा । २९ । आव० ४१२1 दश० चू० १४०। अकिरिया-दुष्टकिया मिथ्यात्वाग्रुपहतस्यामोक्षसाधकमनुष्ठा- अकेल्ला-राजस्तोत्रपाठका । नि० चू प्र० २७७ अ। अकोवणिजो-अकप्पो अदूसणिजोत्ति वुत्त भवति । नि० नम्। ठाणा० १५३ । योगनिरोध । ठाणा० १५७ । योगनिरोधलक्षणा नास्तिकत्वं वा। सम० ५। अविद्य- चू० द्वि० १३९ । मानकिय, व्युपरतक्रियाख्यं शुक्लध्यान चतुर्थमेद । उत्त० अकोसापंतं-विकाशीभवत् । औप० २० । ५८६ । अकोहणे-अक्रोधनः,अपराधिन्यनपराधिनि वा न कथचित् अकिरियाओं-अकप्पपडिसेवणं । नि० चू० तृ० २० । क्रुभ्यति । उत्त० ३४५ । अकिरियावाइ-क्रियाभाववादिनः, आत्माभाववादिन., अकोहे-अक्रोध., स्वल्पक्रोधेण । जं० प्र० १४८ । 'चित्तशुद्धिवादिनः । भग० ९४४ । अकंडे-अकाले ( आउ०) अकिरियावाती-एकात्मकवाद्यादयोऽष्टौ । ठाणा० ४२५ । | अकंता-आक्रान्ता । आव० ५०४ । अवष्टब्धा । आचा० नास्तिका. । ठाणा० २६८ । २५७1 अकीयकडं-अक्रीतकृतः, न क्रीयते-न क्रयेण साध्वथै | अकंतितो-अडाडाए चला हरतो द्वि० कृतः। प्रश्न० १०८। ३८ आ। अंकित्ती-अकीर्तिः, एकदिग्गामिन्यप्रसिद्धिः । ठाणा० ४१८६) अक्रतिया-न कुतोऽपि विभ्यति ये स्तेना। वृद्वि० ~ । २५ आ। । । . ११८.अ। १ - भग० ४९०। (१४) . [ अक्कते अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अक्खर] . . अकंते अचित्तस्य प्रथमो मेद. । ओघ० १३३ । आक्रान्ते- | अक्खओदए-अक्षयोदकः, अक्षयसम्यग्ज्ञानोदकः । - पादादिना भूतलादौ यो भवति स । ठाणा० ३३६ । अक्षतोदय , अक्षत उदय प्रादुर्भावो वा । उत्त० ३५३ । अर्कतो-आक्रान्तः । आव० २२७ । अक्षणिक-(अक्खणिए), व्यग्रः । ओघ१ १७५ । अकंदणं-आक्रन्दनम् , महता शब्देन विरवणम्। आव० अक्खणिओ-अक्षणिकः, निर्व्यापारः । दश० चू०.५८ । १५८७ । मक्खति-आख्याति (गणि.). अक्क-(अर्कतूलम् )। नि० चू० द्वि० ६१ 'म । अक्खपडिय-अक्षपतितः, अक्षपातनिका । आव० ४५३ । अक्वोंदी-वल्लीविशेषः । प्रज्ञा० ३३ । अक्खपाडओ-अक्षपाटकः । जीवा० २५५ । चतुरस्राकार अकबोंदीणं-वल्लीविशेष । भग० ८०३ । पाटक । जीवा० २२८॥ अकम-आक्रम , तदुच्छेद इतियावत् । आव० ६० । अक्खपाद-हेतुसत्थं । नि० चू० तृ० ३० आ । अक्खमाते-अक्षमाय-अयुक्तत्वाय । ठाणा० १४९ / अनु- अक्कमण-आक्रमणम् । विशे० ४८६ । आक्रमणं-पादेन 'पीडन । आव० ५७३ । चितत्वाय असमर्थत्वाय वा । ठाणा० २९२ । असहतवाय अक्षान्त्यै वा । ठाणा० ३५८ । अक्कमइ-आक्रामति, अवष्टभ्नाति। उत्त०' १३४ ।' अक्कमित्ता-हत्वा। भग० ६३७ । आक्रम्य-मिश्रीकृत्य । अक्खयं-अक्षयम् , साद्यपर्यवसितस्थितिकस्वात् ततो नाश- ओघ रहित , महावीर । भग० ७ । विनाशकारणाभावात् । १९५। अकिट्ठा-अक्लिष्टा , खशरीरोत्थक्लेशवर्जिता । जं० प्र० जीवा० २५६।। अक्षया , अवयविद्रव्यस्यापरिहाणे. । ज. प्र० २५७ । अपुनरावृत्तिक । सम० १२० । १२६ । अक्टिो-अक्लिष्ट', स्वशरीरोत्थक्लेशरहित । जीवा० २८४ । अनाश-साद्यपर्यवसितस्थितिकत्वात् , अक्षतं वा परिपूर्ण- अक्कोडियाओ-प्रवेशिता । बृ० प्र० ३० आ । त्वात् । सम०.५। अक्कोस-आक्रोश , अनिष्टवचनम् , अक्खयणिहि-अक्षयनिधि., देवभाण्डागारम् । विपा० ७७ द्वादश परीषह । आव० ६५६ । यकारादिभि । दश० २६७ । दुर्वचन- अक्खयणिही-अक्षयनिधि । आव० ३६० । परीषह.। सम० ४१ । अक्खया-अक्षया, अक्षयत्वात् । जीवा० ९९ । न विद्यते क्षयो यथोक्तस्वरूपाकारपरिभ्रशो यस्याः सा । ज० प्र० २७ । अक्कोसेज-आक्रोशेत् , तिरस्कुर्यात् । उत्त० १११। अक्कोसो-आक्रोश , अक्खयायारचरित्तो-अक्षताचारचारित्री, अक्षताचार असभ्यभाषणम् । ६२ । एव चारित्रं तद्वान् । आव० ७६३ । आक्रोशनं, असभ्यभाषात्मक । उत्त० ८३ । म्रियस्वेत्यादि अक्खरं-अक्षरम् , निरुक्तिविधिनार्थकारलोपादक्षरम् , अथवा वचनम् । प्रश्न० १६० । क्षीयत इति क्षरं न क्षरमक्षरम् , अन्यान्यवर्णसंयोगेऽ- अक्खं-अक्षम् , चन्दनकम् । आव० ७६७ । अक्षाटकम् । नन्तानर्थान् प्रतिपादयति, न च स्वयं क्षीयते येन आव० ३४४ । वराटका । आव० ८८ । आत्मा। ठाणा० तेनाक्षरमिति भावः । विशे० २५५ । अविशुद्धनयाभि- ४९ । इन्द्रियम् । प्रज्ञा० ८८ । अनीते नवनीतादिक्रमित्य- प्रायेण सर्वमपिं ज्ञानमक्षरम् , तथा सर्वेऽपि भावा अक्ष- क्षो-धू । उत्त० २४७ । रास्तथापि रूढिवशाद्वर्ण एवेहाक्षर भण्यते । विशे० २५४ । अक्ख-अक्षः, अक्षोपाङ्गदानवञ्चेति साधोरुपमानम् । दश० अक्खरं सो य चेयणाभावो' अक्षरं, क्षर-सञ्चलने, न १८ 1 जीव इन्द्रिय था। भग० २२२ । सखाणियप्पदोसो क्षरति न चलति-अनुपयोगेऽपि न प्रच्यवत इत्यक्षरम् । अण्णतरं इंदियजाय वा। नि० चूं० प्र०.२५५-अ। अक्ष- विशे० २५३ । अक्षरम् । आव० ७९३ । चक्रनाभिक्षेप्यकाष्ठम् । जं० प्र० १७१ । अक्खर-अक्षरम् , न क्षरति न विनश्यति । विशे० अक्खए-अक्षयम् , अविनाशी । भग० ११९ । सदाभावेन, १११६ । अक्षराणा 'स्व' शब्दो-पतार्पयो अक्षराणा अवयविद्रव्यापेक्षया अक्षतो वा परिपूर्णत्वात् । ठाणा० ३३३॥ व्यञ्जनाना स्वरणेन सशब्दनेन स्वरा अकारादय प्रोच्यन्ते, । उत्त० . (१५) [ अक्खरडियत्ति आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अक्खे ] भग अथवा अक्षरस्य चैतन्यस्य स्वरणात् सशब्दनात्स्वरा । अक्खाणं-आख्यानं, त्वामिमुख्येन वाऽऽदरेण वा । विशे० विशे० २५५ । न क्षरतीत्यक्षरं, तच्च ज्ञानं चेतनेत्यर्थः । १३१८ । समवसरणस्य । आव. २६८ आव० २४ । अक्खाणग-आख्यानकम् । नि० चू० द्वि ७१ अ। अक्खरडियत्ति-अखरडितम् । ठाणा० ३८६ । अक्खाणयं-आख्यानक । नि० चू० प्र० ३४६ आ। अक्खरपुट्टिया-लिपिविशेष । प्रज्ञा० ५६ । अक्खातित-आख्यायिकानिश्रितं तत्प्रतिवद्धोऽसत्प्रलापः। अक्खरसंन्निवाति-अक्षरसंनिपातः, अकारादिसयोगाः । ठाणा० ४८९। ठाणा० १७९ । अक्खायं-आख्यातं, सकलजन्तुभाषाभिव्याप्त्या कथितम् । अक्खरसम-तत्र दीर्घ अक्षरे दीर्घ स्वरः कियते, इस्वे उत्त० ८०। इस्व., प्लुते प्लुतः, सानुनासिके सानुनासिक तदक्षरसमम्। अखाय-आख्यातम् , केवलज्ञानेनोपलभ्यावेदितम् । दश० ठाणा० ३९६ । १३६ । अक्खराणि-लिपिज्ञानम् । वृ० द्वि० १६३ अ । अक्खायगो-आख्यायक, य शुभाशुभमाख्योति सः । अक्खवाउ-अक्षपाद.। विशे० ६४९ । विशे० ६४८ । जीवा० २८१। अक्खसोय-अक्षश्रोतः, चक्रधुरः प्रवेशरन्ध्रम् । अक्खायपयं-आख्यातपदम् , साध्यक्रियापदम् । प्रश्न ३०९ । ११७1 अक्खा-अक्षा', चंदनका । नि० चू० प्र० १०६ अ । अक्खासुयं-आख्याश्रुतम् , आख्यानकप्रतिवद्धश्रुतम् । अनुयोगे भङ्गचारणोपकरणम् । बृ० द्वि० २५३ आ । प्रश्न० १०८॥ अक्खिसंति-आख्यास्यन्ति । नि० चू० प्र० ३५० आ । आख्या, शब्दप्रथा । प्रज्ञा० ६००। अक्खित्त-आक्षिप्तम् , आवर्जितम् । दश० ११४ | अक्खाई-अक्षाणि, इन्द्रियाणि । प्रज्ञा० ६०० । अक्खित्तनियंसणा-आक्षिप्तनिवसना,आकृष्टपरिधानवना । अक्खाइ-आख्याति प्रथमतो वाच्यमात्रकथनेन। जं० प्र० प्रश्न० ५६ . ५४० । अक्खित्ते-ठिता। नि० चू०प्र० १८६ अ । अक्खाइउवक्खाइया-आख्यायिकोपाख्यायिका । सम० अक्खित्तो-आक्षिप्त । आवं० १७५ । ११९ अक्खिवणं-आक्षेपणम् , चित्तव्यप्रतापादनम् । प्रश्न० ४३ । अक्खाइयं-आख्यातिकम् , नामिकादिपंचसु पदेषु चतुर्थ । अक्खीण-अक्षीण, अक्षीणायुष्कमप्रासुकम् । मंगे6 ३७२ । आव० ३७९ । अक्खीणझंझए-अक्षीणझञ्झ ,अक्षीणकलहः । आव०६६१। अक्खाइयाणिस्सिया-आख्यायिकानि सता, यत्कथाख- अक्खीणमहाणसितो-अक्षीणमहानसिकः । उत्त० ३३२ । संभाव्याभिधानम् । प्रज्ञा० २५६ । अक्खीणमहाणसियं-अक्षीणमहानसिकम् । आव० २९१ । अक्खाइया-आख्यायिका । सम० ११९ । ठाणा० ३३२ अक्खाओ-आख्यायिका, कथानका । सम० ११९ । अक्खीणमहाणसी-अक्षीणमहानसी, अत्रुटितभिक्षालब्ध- अक्खाग-म्लेच्छविशेष । प्रज्ञा० ५५ । भोजनवान् । औप० २८ । अक्खाडए-अक्खाटकः, मल्लयुद्धस्थानम् । पिंड० १२९ । | अक्खुडिय-आस्फालित , स्खलित । आव० ५५५ । अक्खाडगा-आखाटका, प्रेक्षाकारिजनासनभूता । ठाणा० अक्दइ-चक्खिउं मुंचति । नि० चूठ द्वि० १२४ अ। २३०॥ अक्खुन्नइ-आक्षुणत्ति, विलिखति । वृ० द्वि० ६६अ। अक्खाडगे-आखाटक -आखाटक , प्रेक्षास्थाने आसनविशेषलक्षण. | | अक्खुना-अमर्दिताः । वृ. द्वि० ७८ अ । भग० २७१। अक्खे अक्ष., शकटावयवविशेषः । भग० २७७ । सम० अक्खाडगो-चतुरस्र । ठाणा० १४५ । ९८ । आख्या-प्रसिद्धिः । जं० प्र० ६२ ॥ । 1 । (१६) . [अक्खेइ अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अगणि] अक्खे इ-षण्णवतिरङ्गुलानि एकोऽक्ष । जं० प्र० ९४ । | अक्षरकोविदपरिषद्-(विद्वत्परिषद् )। आचा० १४६ । अक्खेव-आक्षेप , प्रश्न.। भग० ११४ । आव० ९७ । अक्षरश्रुतम्-ज्ञानं इन्द्रियमनोनिमित्त श्रुतग्रन्थानुसारि तदा- उत्त० ५२४ । वरणक्षयोपशमो वा। आव० २४ । अक्खेवणि-आक्षेपणी, धर्मकथाया प्रथमो भेद , आक्षि: अक्षि-नेत्रम् । आचा० ३७ । प्यन्ते मोहात्तत्त्वं प्रत्यनया भव्यप्राणिन इति । दश० ११० । अक्षीणमहानसीलब्धि -येनाऽऽनीत , भैक्षं बहुमिरप्यः धर्मकथामद । आचा० १४५ । न्यैर्भुक्तं न क्षीयते किन्तु स्वयमेव भुक्तं निष्ठां याति । अक्खेवणी-आक्षिप्यते-मोहात् तत्त्वं प्रत्याकृष्यते श्रोताऽ- विशे० ३८५। नयेत्याक्षेपणी। ठाणा० २१० । आक्षिप्यते-मोहात्तत्त्वं | अक्षोपाङ्गन्याय -(अक्खुवंजण )-चक्रोजनं । दश० १८०। प्रत्याकृष्यते श्रोता यकासिरिति । औप० ४६ । अखंड-अखण्डः, सम्पूर्णावयव । आव० २३९ । अखण्डम् - अक्खेवी-आक्षेपी, आक्षिपति वशीकरणादिना य स ततो अस्फुटितम् । दश० १९५ । मुष्णाति स । प्रश्न० ४६ । अखमे अक्षमा, परकृतापराधस्यासहनं । भग० ५७२ । अक्खेवो-आक्षेपः, आक्षेपणम् , आशका । आव० ३७७ । अखित्तं-इन्द्रकीलादियुत प्रामादि । बृ० तृ० ३६ अ । पूर्वपक्ष । बृ० तृ० १२५ अ । परद्रव्यस्य, अधर्मद्वारस्यैकोन- | अखुण्णा-अमर्दिता । नि० चू० प्र० ३३५ अ । विंशतितम नाम । प्रश्न० ४३ । अखेत्तं-जं० छिण्णमडवं । नि० चू० प्र० ३४१ आ । सचि- अक्खो-अक्ष , युतपासक ! आव० ५०२ । फलविशेष , तपृथ्व्यादिमदस्थण्डिलम् । वृ० द्वि० १४० आ। अनुत्त० ६। अगंथिमा-कयलआ मरहट्टविसये फलाण कयलक्कपमाणाओ अक्खोडगा-क्रियाविशेष । नि० चू० प्र० १८२ अ । पेण्डीओ एकमि डाले वहुक्कीओ भवन्ति ताणि फलाणि खंडा- अक्खोडभंगपरिहरणा-आस्फोटकभङ्गपरिहरणा, आस्को खडीकयाणि । नि० चू० तृ० ३९ अ । टकाना यो भङ्गस्तस्य प्रतिलेखनादिविधिविराधनापरि- अगंधण-अगन्धन , मानी सर्प । दश० ३७ । हरणा। आव० ५५२ । अगंधणा-अगन्धना, सर्पजातिविशेष । उत्त० ४९५।। अक्खोडयं-अक्षोटकम् , अक्षोडवृक्षफलम् । प्रज्ञा० ३६४ । अगंधिं-दुर्गन्धि । बृ० तृ० ९९ अ। अक्खोमे-अक्षोभ , अन्तकृद्दशाना प्रथमवर्गस्याप्टमा- अगइचरमे अगतिचरम , न गतिचरम । प्रज्ञा० २४५ । ध्ययनम्। अन्त० ११ अन्तकृद्दशाना द्वितीयवर्गस्य | अगड-कूप । बृ० प्र० १०९ आ । अवट खडा । प्रथमाध्ययनम्। अन्त० ३ । आव० ६९१ । आव. २०४। कूप. । भग० २३८ । जं. अक्खोलं-फलविशेष । प्रज्ञा० ३२८ । प्र० १२३। अक्खोवंगं-चक्रोंजनं। अगडदत्तो-अगडदत्तः, अमोघरथरथिकपुत्र । अक्खोवंजण-अक्षोपाञ्जनम् , शकटधूम्रक्षणम् । भग०२९४१ २१३ । रक्षकविशेष । व्य० द्वि० १७० आ। अक्रियावादिन -क्रिया-अस्तीतिरूपा सकलपदार्थसार्थव्या- | अगडमहेसु-कूपमहेषु। आचा० ३२८ । पिनी सैवायथावस्तुविषयतया कुत्सिता, अक्रिया नत्र अगडाति-अवटा-कूपा । ठाणा० ८६ । कुत्सार्थत्वात्तामक्रिया वदन्तीत्येवशीला अक्रियावादिन , अगडेसु-अवटेषु, कूपेषु । प्रज्ञा० ७२ । यथावस्थितं हि वस्त्वनेकान्तात्मक तन्नास्त्येकान्तात्मकमेव | अगडो-कूप । नि० चू० प्र० ४३ अ । अवट , कूप । चास्तीति प्रतिपत्तिमन्त इत्यर्थ । ठाणा० ४२५.। प्रज्ञा २६७ (अकिरियावाई)-नियतकृष्णपाक्षिका । दशाश्रु० १६ । अगणि-अमि , इन्धनस्य प्लोषक्रियाविशिष्टरुपस्तथा विद्यु- अक्षः-बिमीतक । प्रज्ञा० ३१ । दुल्काशनिसर्षसमुत्थित , सूर्यमणिसंसृतादिरूपश्च । आचा० अक्षर-घोलना स्वरविशेष । जीवा० १९५। ४९। आव० ६२१ । अय.पिण्डानुगत । दश० २२८ । अक्षरकुटी-अक्षरच्छेदेन । विशे० ८३,२ । दश० १५४ । अग्निभयात्-प्रदीपनभयात् । ओघ० ११८ । गणि० । उत्त. (१७) [ अगणिज्झामिय आचार्यश्रीभानन्दसागरसूरिसङ्कलितः अगुणरिणं] प्र० ४२९। - अगणिज्झामिय अग्निध्यामितम् , वह्निना ध्यामितं, श्यामी- | अगारट्ठिय-अगारस्थितभाषा-गृहस्थभाषा। व्य० कृतम् । भग० २१३ । ५४ आ। अगणि-झूसिए-सेवितः, क्षपित.। भग० ६८३ । अगारधम्म-अगारधर्मम् , गृहाचारं गार्हस्थ्यम्।उत्त०५७८। अगणिज्यूसिय-अग्निना शोषितं, पूर्वस्वभावक्षपणात् , अगारवंधणं-गृहपाशं पुत्रकलनधनधान्यादिरूपम्।आचा० अग्निना सेवितं वा। भग० २१३ । अगणिपरिणामिय-अग्निपरिणामितम् , सजाताग्निपरिणा- अगारस्थेभ्यः-(गारत्येहिं ),अनुमतिवर्जसर्वोत्तमदेशविरति- प्राप्तेभ्य । उत्त० २५०1 मम्। भग० २१३ । अगणी-अमि. । ओघ० १५६ । चतुर्दशशतके पञ्चमोद्देशक । अगार-अगारा, गृहिण। ठाणा० ५३ । अगाराओ-गृहवासात् । जं० प्र० १४५ । भग० ६३०॥ अगतं-नकुलाज्जादि । नि० चू० प्र० ७६ अ । अगारिसामाइयगाई-अगारिणो-गृहिणः सामायिक-सम्य- अगतो-अगद', औषधि । आव० ८३५ । क्त्वश्रुतदेशविरतिरूपं तस्याङ्गानि-नि शङ्कताकालाध्ययनाणु- अगस्थिओ-वृक्षविशेषः । अनुत्त० ५। व्रतादिरूपाणि अगारिसामायिकाङ्गानि । उत्त० २५१ । अगत्थिगुम्मा-अगस्त्यगुल्मा.। जं० प्र० ९८ । अगारी-अगारी, क्षत्रियादिक । सूत्र. १४३ । गृही, अस- यतः। ठाणा० १८१० प्र० १४५ । अगत्थी-अगस्ति ,ग्रहविशेष । जं० प्र० ५३५। ठाण। ० ७९ । अगदो-अणेगदव्वेहि । नि० चू० द्वि० १८ आ। अगारो-अगार , गृहस्थस्तस्येदमगारिकं, देशचारित्रसामा- यिकं देशविरतिसामायिकम् । विशे० १०६३ । अगमा-वृक्षा । वृ० द्वि० १८३ आ। नि० चू० प्र० १५२ अगालिणो-अगारिण । बृ० द्वि० २८२ अ। आ, १८३ अ। अगाहा-अगाधा, अपरिमितजला । आव० ८१९ । प्रायोग- अगमेत्त-ज्ञात्वा, आज्ञापयेदात्मानमनासेवनयेति। आचा० भीरम् । दश० २२० । अगिण्हियव्वं-अग्रहीतव्यम् , अनुपादेयं, हेयम् । दश० अगम्मगामी-अगम्यगामी, भगिन्याद्यभिगन्ता। प्रश्न०३६ । अगर-अगुरु -दारुविशेष. । प्रश्न० १६२ । अगिला-अग्लानि । नि० चू० प्र० १७ आ । अग्लान अगरला-सुविभक्ताक्षरता। औप० ७८ । उचितकर्तव्यसहिष्णुः । आचा० २८१ । अगरिहि-अगर्हणीयम् , सामायिकनवमपर्याय । आव० अगिलाए-अग्लान्या, अखिन्नतया बहुमानेनेत्यर्थ । ठाणा० २९९ । विशे० ८७५ । अगलदत्तो-अगडदत्त , । उत्त० २१५ । अगिलायउ-अग्लान्यैव, शरीरश्रममविचिन्त्यैव । अगहणे-अग्रहणे-अकरणे। ओघ० १४९ । ५३६। अगा-वृक्षा । नि० चू० तृ० १४० अ । अगीयत्थं-अपरीणामग, अतिपरिणामगाय । नि० चू० प्र० अगामितं-अगामिक, अकामिक-अनभिलषणीय। ठाणा० ४५ आ। ३१४ । अगीयत्थत्त-अगीतार्थत्वम् । आव० ५२ । अगामियं-अगामिका, अकामिका वा-अनभिलाषविषय- अगीयत्थो-जेण आवस्सगादीयाण अत्थो ण सुतो। नि० चू० भूताम् । भग० ६७२ । तृ० २५ अ । अगारं-अगै कृत गृहम् । नि० चू० तृ० १४० अ । गेहम्। अगुण-अगुण , अविद्यमानगुण । दश० २६३ । प्रश्न० ८ । गृहम् । भाव० ३२९ । अगार ,गृहस्थ । आव० अगुणगुणे-वक्रता। आचा० ८६ । अगुणरिणं-अगुणा एव अणंतगुणाणं अणंति वा रिणति वा एगट्ठा तं च । दश० चू० ८९ । अगार-अगारम् , गृहम् । दश० ६२ । (१८) २१९। ८० । - ४७४ । उत्त.

[ अगुणा : अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः अग्गाई] ९७॥ अगुणा अगुणा , मिथ्यात्वादयो दोषा । उत्त० ४३१ । अग्गपिंडो-जइ दिणे २ दाहिसि, अग्गपिंडो अग्गकृगे। अगुत्ती-अगुप्ति , इच्छाया अगोपनम् । परिग्रहस्य त्रयो नि० चू० द्वि. ९. आ । अप्रपिण्डम्-निष्पत्नस्य शाल्यो- विशतितमं नाम । प्रश्न० ९२। दनादेराहारस्य देवताद्यर्थ स्तोकस्तोकोद्धारं । आचा० ३३६ । अगुरु-अगुरु , सुगन्धिद्रव्य. । आव० १०१ । काष्टविशेष । काकपिण्ड्या। आचा० ३४० । शाल्योदनादेः प्रथममुद्धृत्य जीवा० १३६ । भिक्षार्थ व्यवस्थाप्यते। आचा० ३२६ । अप्रवृत्ते परिवेषणे आदावेव यो गृह्यते। ठाणा० ५१५। अगुरुलहु-अगुरुकलघुकम् , अत्यन्तसूक्ष्म भाषामन - कर्मद्रव्यादि। ठाणा० ४७५ । अग्गबीए-अग्रवीजाः, अग्रे वीजं येषामुत्पद्यते ते तलताली- अगुरुलघु-यदुदयात् प्राणिना शरीराणि न गुरूगि नापि सहकारादय. शाल्यादयो वा, अग्राण्येवोत्पत्ती कारणतां प्रतिपद्यन्ते येपां कोरण्टादीनां ते वा। सूत्र० ३५० । लघूनि तत् । प्रज्ञा० ४७३ । सूक्ष्मपुद्गलद्रव्याणि । जं० प्र० अग्गवीय-अग्रवीजा , को कोरण्टकादय । दश० १३९ । आचा० १३०॥ ५८ । व्रीह्यादय.। ठाणा १८६। जपाकुसुमादि । आचा० अगुरुलहुफासपरिणामे-स्पर्शविशेष । सम० ४१ । ३४९। अगेहि अगृद्धि -भोजनादिषु परिभोगकाले अनासक्ति । भग० अग्गभावे-अग्रभावम् , धनिष्ठा गोत्रम् । ज० प्र० ५०० ! अग्गमहिसी-अग्रमहिषी, पट्टराज्ञी । जीवा० १६२ । ठाणा० अगो-अगः, विपाककालेऽपि जीवविपाकितया शरीरपुद्गला- दिषु बहि प्रवृत्तिरहित , अनन्तानुबन्ध्यादि । उत्त ०१९ । अग्गरसो-अग्र्य रसश्च, प्रधानो मधुरादिकश्च, अम्यो अगाधे-(गाधे ), पदप्रचारालछनीये । विशे० ५७६ । रसः शृङ्गारादिक. । उत्त० ४०५ । अग्गं-अग्रम् , अपरिभुक्तम् । जीवा० २५४ । अग्र्यम् , प्रधा- | अग्गल-अर्गलम् ,गोपुरकपाटादिसम्वन्धि । दश० १८४ | नम्। प्रश्न० १३६ । अन्त । भग० ३५1 मूर्धा। प्रज्ञा० अग्गल-अर्गल , षडशीतितमग्रहनाम। जे० प्र० ५३५ । १०८। परिणाम । सूर्य० २८० । आलम्वनम् , आव० । अग्गलपासाया-अर्गलाप्रासादा., यत्रार्गला नियम्यन्ते। २६५ । परिमारम् । भग० ३५ सयमतपसी मोक्षो वा। जै० प्र० ४८। जीवा० २०४ । आचा० १६० । भवोपग्राहिकर्मचतुष्टय । आचा० १६० । अग्गला-गोवाडादीहारेसु भवति । दश० चू० ८५। अर्गला, प्रमाणम् । ठाणा० ४६२ । कोटि । उत्त० २८३ । अग्र, वर प्रतीता। जीवा० २०४ । जीवा० ३५९। अधिकं । उत्त० प्रधान अवा जं पढमम् । नि० चू० प्र० १४२ अ। ७,६६०। अग्ग-निर्वाणस्थानम्। आव० १४८ । द्रव्यावगाहनाद्यग्रेषु । अग्गलापासाय-अर्गलाप्रासाद , प्रामादे यत्रार्गला प्रविशति आचा० ३१८॥ स । जीवा० ३५९ । अग्गकूरमंडी-अग्रकरमण्डी, गोदनस्योपरिभाग । आव० अग्गवपूरओ-परिधानविशेषः । वृ० तृ० १०२ भ! अग्गविडवं-अग्रविटपम् , शाखामध्यभागाग्य, ५७५ विस्ताराग्रं अग्गकोडीणं-अग्रकोटय , प्रकृष्टा विभागा । जं० प्र० ९५ । वा। प्रश्न० ९२ । अग्गजायाणि-अग्रजातानि, वनस्पतिविशेषः । आचा० अग्रशिरः-(अग्गसिरा), उष्णीषलक्षणम् । ज० प्र० ११३ । अग्गसिंगं-अप्रशृङ्गम्। आव० अग्गहणं-अनादर । ओघ० ९४ । बृ० प्र० २४५ अ। अग्गजिब्भा-अप्रजिह्वा, जिह्वाग्रं । ठाणा० ३९५ । अग्गहत्था-अग्रहस्ता, बाहोरप्रभूता शया । अनुत्त० ६ । अग्गतावसगोत्ते-अप्रतापसभोत्रम् । सूर्य० १५० । अग्रहस्तो, भुजौ। प्रज्ञा० ९१ । अग्गपलंवं-आम्रातकफल । बृ० प्र० १४३ आ। तलादि- अग्गहत्थो-अग्रहस्त ,बाह्वप्रभागवर्ती हस्त । जीवा० २७५ । प्रलंबा । नि० चू० द्वि० १२४ आ । अग्गाई-अग्र्याणि, मद्यस्कानि । जं० प्र० २१८ । १७४। । (१९) [अग्गासणे आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अग्गो] ४२ । भग० २७१ । अग्गासणे कूर-अग्रासनम् , प्रतिगृहं सदक्षिणं भोजनम् । ) अग्गियए-अग्नि , तितिक्षोदाहरणे प्रथमो दासचेटः । आव० आव० ६७९ । ७०२ । अग्निक , भस्मकामिधानो वायुविकार । विपा० अग्गाहारो-अग्रासनम्। आव० ३०० । अग्गितेण-अग्न्यन्तेन, अग्निमार्गेण । आव० ७१ । अग्गियओ-अमि , दासचेट । आव० ३४३ । अग्गियतो-अग्निक ,इन्द्रदत्तराजस्य दासचेट । उत्त० १४८ । अग्गि-तीर्थकरविशेषशिविका । सम० '१५१ । अग्गिल्लए-ग्रहविशेष । ठाणा० ७९ । अग्गिउत्तं-ऐरवतावसर्पिणीतीर्थकर । सम० १५३ । अग्गिओ-अग्निक , उत्सन्नवंशजो दारक । आव० ३९१ । अग्गिवेससगोते-कृत्तिकानक्षत्रनाम । सूर्य० १५० । अग्गिवेसाणं-अमिवेशस्यापत्यं वृद्ध अग्निवेश्यो 'गर्गादेर्य' अग्गिकुमारा-अग्निकुमारा., सोमस्याज्ञोपपातवचननिर्देश- | जिति यत् प्रत्यय तस्याप्यपत्यमाग्निवेश्यायन । नदी० ४८ । वर्तिनो देवा । भग० १९५। भवनपतिमेदविशेषः । प्रज्ञा० अग्गिवेसायणे-गोशालनिशाचर. । भग० ६५९ । ६९ । अग्गिवेसे-अमिवेश्य , शास्त्रीयचतुर्दशदिवसनाम । सूर्य अग्गिकुमारीओ-अग्निकुमार्यः, सोमस्याज्ञोपपातवचननिर्दे- १४७ । द्वाविंशतिमुहूर्तनाम । सूर्य० १४६ । जं० प्र० ४९१ । शवर्त्तिन्यो देव्य । भग० १९५ । अग्निवेश्म-शास्त्रीयचतुर्दशदिवसनाम । जं० प्र०४९० । अग्नि- अग्गिघरं-अमिगृहम् । आव० २९५ । वेश्य-कृत्तिकागोत्रम् । ज० प्र० ५०० । अग्गिञ्चा-कौशिकगोत्रमेद । ठाणा० ३९० । सुप्रतिष्ठाभ- विमानवासी अष्टमो लोकान्तिकदेव । अग्गिसिहा-अमिशिखम् , वनविशेष । दश० १०३ । अग्गिसिहे-अग्निसिंह , दत्तवासुदेवपिता । आव० १६३ । ठाणा० ४३२ । अग्गिच्चामे-कृष्णराज्यवकाशान्तरे लोकान्तिकविमानम् । अग्गिसिहो-विष्णुविशेषपिता। सम० १५२ । अग्गिसीहे-अग्निसिंह , दक्षिणदिग्वर्तिनामग्निकुमाराणा- ठाणा० ४३२ । सम० १४ । मधिपति । जीवा० १७० । ठाणा० ८४ । प्रज्ञा० ९४ । अग्गिच्चो-अग्निः, मरुत् । आव० १३५ । पञ्चमो दक्षिणनिकायेन्द्र । भग० १५७ । अग्गिजोओ-अग्निद्योत , पुष्पमित्रजीव । आव० १७१ । अग्गिसेणं-ऐरवतावमर्पिणीतीर्थकर । मम० १५३ । अग्गितरोगी-अग्निकरोगी। आव० २७४ । अग्गिहोत्त-अग्निहोत्र , अग्निकारिका । उत्त० ५२५ । अग्गिभीरु-अमिमीरु , प्रद्योतस्य रथ , द्वितीय रत्नम् । अग्गिहोत्तसाला-अमिहोत्रशाला । आव० २२५ । आव० ६७३ । अग्गी-अग्नि , ग्रहविशेष । जं० प्र० ५३५ । वहि । अग्गिभूई-अग्निभूति , अग्निद्योतजीव । आव० १७२। आचा० ३३ । आव० २७३ । द्वितीयगणधर । आव० २४० । श्रीवीरस्य द्वितीयगणधर । अग्गीसेणं-ऐरवतावसर्पिणीतीर्थकर । सम० १५३ । भग० १५३ । सम ८४ । अग्गुजाणं-अग्रोद्यानम् , अग्न्युद्यानम् । आव० १९० । अग्गिमाणव-अग्निमानवः, उत्तरनिकाये पञ्चम इन्द्र. । अग्गे-दसिकापर्यन्ते । ओघ० २१४ । भग० १५७ । अग्गेई-आग्नेयी, पूर्वदक्षिणमध्यवर्तिदिक् । आव० २१५ । अग्गिमाणवे-अग्निमाणव , उत्तरदिग्वर्तिनामग्निकुमाराणाम- अग्गेज्ज-आग्नेय , मण्डलकोण । सूर्य० २२ । धिपति । प्रज्ञा० ९४ । ठाणा० ८४ । जीवा० १७० । अग्गेणियं-द्वितीयपूर्वम् । सम० २६ । अग्गिमेह-अग्निमेघा , अग्निवद्दाहकारिजला मेघा । भग० अग्गेणीयं-अग्रायणीयम् , द्वितीयपूर्वनाम । ठाणा० १९९ । अग्गेया-वत्सगोत्रान्तर्गत गोत्रम् । ठाणा० ३९० । अग्गिमो-प्रथम । ओघ० ३३ । अग्गेयी-अग्निकोण । भग० ४९३ । ठाणा० १३३ । अग्गिय-व्याधिविशेष. । नि० चू० द्वि० ६० अ । अग्गोवरयंकरेति। नि० चू० द्वि० ३५ अ । , (२०), १०९। [ अग्गोदयं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अचियत्ता] अग्गोदयं-अग्रोदकम् , देशोनयोजनार्धजलादुपरि षर्द्धमानं | अचरमसमयनियंठो-अचरमसमयनिर्ग्रन्थः, अचरमा- जलम् । जीवा० ३०९ । षोडशसहस्रोच्छ्रितायां वेलाया आदिमध्यास्तेषु यो वर्तमान स । उत्त० २५७ । यदुपरि गव्यूतद्वयमानं वृद्धिहानिस्वभावं तदनोदकम् । अचरिमं-अचरमम् । प्रज्ञा० २३४ । अप्रान्तं, मध्यवर्ति । सम० ७५ । प्रज्ञा० २२८। अग्धं-अर्घम् । आव० ३००। महार्ण्यम् । आव० ८२७ । अचरिमंतपएस-अचरमान्तप्रदेशः। भग०, ३६६ । आव० २९५ । अर्घ्यम्-मूल्यम् । आव० ८२६ । अचरिमो-अचरमः, अभव्य. सिद्धश्च । प्रज्ञा० १४३ । अग्धंति-अर्घन्ति, महापन्ति । आव० ८२९ । जीवा० ४४४ । अग्यविए-अर्पितम् , कृतमूल्यम् । दश० ६१ । अचल-(अयलो) कलाशिक्षायामुदाहरणगत पुरुषः । दश० अग्घाडग-गुच्छाविशेष । प्रज्ञा० ३२ । अग्धाया-आघ्राता , आहूता.। विशे० ९६० । अचलेन्द्रः-मेरु. । आव० ४७ । अग्घियं-बहुमोल्ल । नि० चू० प्र० १३९ अ । अचले-अचलः, अन्तकृद्दशानां द्वितीयवर्गस्य पंचमाध्यय- अग्घेइ-अर्हति । उत्त० १४२ ।। नम् । अन्त० ३ । अग्घेऊणं-अर्पित्वा । आव० २६१ । अचवचवं-चवचतिशब्दरहितम् । प्रश्न० ११२ । अचव- अग्यो अर्घ , मत्स्यकच्छपविशेष । जीवा० ३२१ । चवम् । अनुकरणशब्दोऽयम् । भग० २९४ । वल्कमिव अग्निमानव-भवनपतीन्द्रविशेष । ठाणा० २०५ । चर्वयन् न चवचवावेइ । ओघ० १८७ । अग्निशर्मा-यो मिथ्यादृष्टपदिष्टयुतपसाऽपि अनन्त कालं | अचवलं-अचपलम् , मानसचापल्यरहितम् । भग० १४० । संसारे पर्याटत् । सूत्र. ५७ । अचवलो-अचपल, कायिकादिचापल्यरहित । प्रश्न० ७४ । अग्निशिख-भवनपतीन्द्रविशेष | ठाणा० २०५ । नाऽऽरब्धकार्य प्रत्यस्थिर , अथवा अचपलो-गतिस्थान- अग्निष्टोम-यागविशेष । दश० २७६ । भाषाभावमेदत चतुर्धा । उत्त० ३४६ । अग्रश्रुतस्कन्धः-द्वितीयश्रुतस्कध । आचा० ३१८ । अचिअत्तं-अप्रीतिकरम् । दश० २२१ । अग्राहा-अप्रमेय । जीवा० १८७ । अचिअत्तकुलं-अप्रीतिकुलम् , यत्र प्रविशद्.ि साधुभिर- अघा- गर्ता हुदो । बृ० प्र० १०९ आ । प्रीतिरुत्पद्यते तत्कुलम् । दश० १६६ । अघोर-मन्त्रविशेषः । उत्त० २६७ । अचिअत्ति-य साधुभिरागच्छद्र्दुि खेनास्ते । ओघ० ९३ । अङ्कुसल-अकुशयुक्त । (मर०) अचिणित्तु-आचित्य, आन्मप्रदेश. सहोपचित्य । प्रश्न० ९८॥ अङ्गमंगो-अगोपागानि । (मर०) अचित्तं-आयु क्षयेणाचित्त न परसयतार्थम् । वृ० द्वि० १०६ अचंड-अचण्ड., सौम्य । उत्त० ४७ । अ । अचित्तम् , दग्धदेशादि । दश० १७८ । अचंडो-अचण्ड., कारणविकलकोपविकल । प्रश्न० ७४ । अचित्तद्रव्यपरिधून--(अचित्तदव्वपरिज्जुण्ण ), जीर्णप अचक्किय-अचकिता , अत्रामिता । उत्त० ३५३ । टादि । आचा० ३५। अचक्खुदंसण--अचक्षुर्दर्शनम् , चक्षुर्वर्जशेषेन्द्रियमनोभि- | अचित्त-अचित्तमहास्कन्ध । आव० ३५ । दर्शनम् । जीवा० १८। अचित्तस्कन्ध-द्विप्रदेशिकादिस्कंध । विशे० ४२४ । अचक्खुसे-अचाक्षुषम् , चक्षुरिन्द्रियाग्राह्यम् । दश० २०२। अचियत्त-अचियत्त , स्वचेतसि करोति वाचा न किमपि अचक्खुस्सं-अनिष्टम् । ६० तृ०.४१ अ । ब्रूते एष देशीभाषया । बृ० प्र० २४६ अ । अचक्षुषा-चक्षुर्वर्जेन्द्रियचतुष्टयेन मनसा। ठाणा० ४४८ । अचियत्त-अदानशीलं । ओघ० १५६ । अप्रतीति । ओघ० अचरम-अचरम , यस्य , चरमो भवो न भविष्यति सो. १६९ । अप्रीतिकम् । आव० १९१ । आव०११८। ऽचरम। भग० २५९ । अचियत्ता-न रोचते । ओघ. १९४ । * - (२१) [अचियत्ते आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अच्चिमाली] 7 ४९०॥ १८९। । - अचियत्ते-अचियत्तः, अनभिमतः । सूत्र० ३३७ । अप्री- | अञ्चल्लीणो-आसण्णं । नि० चू० प्र० १७५ अ । तिकर । उत्त० ३४६ । अप्रीतिकानि-नास्ति प्रीति. साधुषु अञ्चल्लूढो-अतीव प्रज्वलिते। नि० चू० प्र० १७५ अ । गृहमुपगतेषु येषां तानि । बृ० प्र० २३५ अ । अच्चसणे अत्यशनः, शास्त्रीयद्वादशदिवसनाम। जं० प्र० अचियत्तो-साधुन् प्रत्यप्रीतिमान् । प्रश्न० १२४ । अप्रती- त्युत्पादक. । प्रश्न. ६४ ॥ अश्चा-प्रतिमा। वृ० तृ०. २६आ। नि० चू० प्र० अचियत्तोग्गहो-अप्रीतिकावग्रह. । आव० ३०४ । आव० ११७ आ । अर्चा, मनुष्यतनुर्भाविनी। औप० ८१। तनुः, शरीरं, पद्मादिका लेश्या वा। सूत्र० २३८ । लेश्या अचिरं-स्थानम् , स्थण्डिलम् । आचा. २९४ । चित्तवृत्तिः । सूत्र० २३४ । अचिरकालकयं-अचिरकालकृतम् , द्विमासिके ऋतौ यद- अधासणयाए-अत्यन्तं सततमासनं-उपवेशनं यस्य सोऽ- ग्न्यादिना प्राशुकीकृतम्। ओघ० १२३ । त्यासनस्तद्भावस्तत्ता तया । ठाणा० ४४६ । अचिरवत्तवीवाहे-अचिरवृत्तवीवाहः । सूर्य० २९२ । अचासणे-अत्यशनः, शास्त्रीयद्वादशदिवसनाम । सूर्य० १४७ । अचुल्ला-चुल्लीए समीवे । नि. चू० प्र० ३२८ आ । अचासाइत्तए-अत्याशातयितुम् , छायाया भ्रंशयितुम् । अचेल-अचेल, अल्पचेलो जिनकल्पिको वा। आचा० भग० १७५। २४२ । अपगतचेलोऽल्पचेलो वा अचलनस्वरूपो वा । अच्चासायणा-अत्याशातना, किमेभिः कलहशास्त्रैरिति । आचा० २४५ । य. साधु स्य चेलं-वस्त्रमस्तीति अचेल , आव० ५८०। अल्पचेल इत्यर्थः । आचा० २४४ । नास्य चेलं-वस्त्र- | अश्चि-ब्रह्मलोककल्पे विमानविशेष । सम० १४ । मित्यचेल । आचा० २४४ । षष्ठः परीषह. । आव० ६५६ । अश्चि-अर्चिः, छिन्नज्वालम् । दश० २२८ । मूलानिवि- अचेलक-अवमानि, असाराणि लघुत्वजीर्णत्वादिना चेलानि च्छिन्ना ज्वाला । दश० १५४ । अनलविच्छिन्ना ज्वाला । वस्त्राण्यस्येति । उत्त० ३५९ । अविद्यमानचेलका कुत्सित जीवा० १०७॥ चेलको वा। उत्त० ५०० । अच्चिकंतं-अर्चि कान्तम् , विमानविशेषः । जीवा० १३८ । अचोक्खं-अचोक्षम् , अपवित्रम् । जीवा० २८२ । अच्चिकूडं-अर्चि कूटम् , विमानविशेष । जीवा० १३८ । अचोक्षा:-पिशाचमेदविशेष । प्रज्ञा० ७० । अच्चिज्झयं-अर्ध्विजम् , विमानविशेष । जीवा० १३८५ अश्चंतत्थावरा - अत्यन्तस्थावरा, अनादिवनस्पतिकाया- अच्चिप्पभं-अर्चि प्रभम् , विमानविशेष । जीवा०' १३८ । दुवृत्त्य । आव० ४६५) अच्चिमालिं-कृष्णराज्यवकाशान्तरे रोकान्तिकविमानः । अचंतिओ-आत्यन्तिक , सर्वकालभावी । सूत्र० ३९५ । सम० १४ । भग० २७१। अचंतिया-तेन सह तत्रैवासितुकामा । वृ० तृ० १३२ । अच्चिमाली-अर्चिौलि , अर्चिषां माला। प्रज्ञा० १०१।म- अञ्चइओ-व्यथित., पीडित । दश० ४४ । चिर्माली, चन्द्रस्य तृतीयाग्रमहिषी। जं० प्र० ५३२।शकाग्र- अश्चणिज-अर्चनीयम् । सूर्य० २६७। चन्दनगन्धादिभिः । महिषीराजधानी । ठाणा० २३१ । सूर्यस्य तृतीयाग्रमहिषी । औप० ५। ठाणा० २०४, भग० ५०५ । चन्द्रस्याग्रमहिषी । ठाणा० अञ्चणिज्जाओ-चन्दनादिना। भग० ५०५ । २०४, भग० ५०५। दक्षिणपूर्वरतिकरपर्वतस्यापरस्या अञ्चणिय-अर्चनिका। आव० ३५० । शकदेवेन्द्रस्य शच्या अग्रमहिष्या राजधानी । जीवा० ३६५ । अश्चणियवावडा-अर्चनिकाव्यामृता। आव० ८६३ ॥ अचीषि-किरणास्तेषां माला, साऽस्यास्तीति किरणमाला- अञ्चतो-विबुद्धोवि जं फुडं ण सभरति सभरतो वा जस्सत्थं परिवृत इति । जीवा० ३८७ । चन्द्रस्य सूर्यस्य च ज्यो- ण वि बुज्झति मो अच्चंतो। नि० चू० द्वि० ८६ अ । अन्त तिपेन्द्रस्य तृतीयाप्रमहिषी । जीवा० ३८४ । कृष्णराज्यव- मतिकान्तोऽत्यन्त । उत्त० ६२१ । अनादि । उत्त० ६२१ । काशान्तरे लोकान्तिकविमान । ठाणा० ४३२॥ द्वितीयं अतिकान्तपर्यन्तम् । उत्त० ६३९ । लोकान्तिकविमानम् । भग० २७१ । (२२) [ अच्चिरावत्तं 'अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अच्छवी] ठाणा ४९ । अच्चिरावतं-अर्चिरावतम् , विमानविशेषः। जीवा० १३८ । अच्छ-ऋक्षा, प्रसिद्धः। भग० १९०, नि० चू० प्र० अच्चिरुत्तरावडिंसए-अर्चिहत्तरावतंसकम् , विमान १३८ आ। ऋक्ष.।। भग० ३०९१ ऋक्षा, भच्छभल्ला. । विशेषः । जीवा० १३८ । जं० प्र० १२४। अच्चिलेस्सं-अचिर्लेश्यम् , विमानविशेषः । जीवा० १३८ । अच्छउ-तिष्ठतु । दश० ३७ ॥ अच्चिवनं-अचिर्वर्णम् , विमानविशेष | जीवा० १३८।। अच्छणं-अवस्थानम् । बृ० प्र० २३६ अ । 'सन्निधौ आस- अच्चिसिंगारं-अर्चि शृक्षारम् , विमानविशेष । जीवा० नम् । आव० ५२४ । । १३८ । अच्छण-उपविश्यावस्थानम् । बृ० प्र० ११० अ । अच्चिसिटुं-अर्चि मृ(शि)टम् , विमानविशेषः। जीवा० अच्छणए-यत्र स्वाध्यायं कुर्वद्भिरास्यते। ओघ० ९४ । अच्छणधरं-अवस्थानगृहकम् , यत्र यदा तदा वाऽऽगत्य १३८। वहव सुखासिकयाऽवतिष्ठन्ते । जीवा० २०० । अच्ची-अर्चि , अनलाप्रतिबद्धा ज्वाला। प्रज्ञा० २९, जीवा० २९ । प्रथम लोकान्तिकविमानम् । भग० २७१ । अच्छणघरगा-अवस्थानगृहकाणि | जं० प्र०.४५ । अच्छणजोए-अक्षणयोगः, अहिंसाव्यापार । दश० २२८ । कृष्णराज्यवकाशान्तरे लोकान्तिकविमान । ४३२ । अर्चि , शरीरस्थरत्नादितेजोज्वाला । औप० ५०, अच्छणिउपूरे-संख्याविशेष. । भग० ८८८ । अच्छणिउराति-सख्याविशेष । ठाणा० ८६ । भग० १३२ । विमानविशेष । जीवा० १३८ । स्वशरीर- अच्छणिउरे-सख्याविशेषः। भग० २१० । भग० २७५ । गतरत्नादितेजोज्वाला। जीवा० १६२ । अर्चि, लेश्या । अच्छणिकुरंगाति-सख्याविशेषः । ठाणा०. ८६ । सूत्र० १९० । दायपतिबद्धो ज्वालाविशेषोऽर्चि. । आचा० अच्छणे-आसने, प्रक्रमादाचार्यान्तरादिसन्निधौ अवस्थाने । उत्त० ५३५॥ अच्चीकरणं-गुणवण्णणं । नि० चू० प्र० १९५ आ । अच्छण्णपडिच्छण्णो-आच्छादितप्रत्याच्छादित । जीवा० अच्चीसहस्समालिणीय - चन्द्रप्रभाशिबिकाविशेषणम् । १४५। आचा० ४२३ । अच्छते-तिष्ठति । आव० ८३२ । अच्चुओ-अच्युत , देवलोकविशेष । आव० ११७ । अच्छभल्ल-ऋक्ष । नि० चू० द्वि० .५८ अ । वनजीवा। अच्चुत्तवडिसग-अच्युतकल्पगतविमानविशेष । (मर०) अच्छभल्लो-ऋक्षः। नि० चू० द्वि० १२९ अ । अच्चुदयं-अत्युदकम् , महान् वर्ष । ओघ० ३१ । अच्छरं-आस्तरकम् , आच्छादनम् । जीवा० २१० । अच्चुयवडिसए-अच्युतावतंसक ,अच्युतदेवलोकस्य मध्ये | अच्छरसा-अच्छरसा , अतिनिर्मला. । जं० प्र० १९२ । ऽवतंसक | जीवा० ३९३ । अच्छरा-अप्सरा, चप्पुटिका । सूत्र० ३२५ । शकस्यानमहि- अच्चुया-अच्युताः, कल्पोपपन्नवैमानिकभेदविशेषा । प्रज्ञा पीनाम | भग० ५०५। ६९ । अच्युत -आयात । ओघ० ५० अच्छराणिवातो-अप्सरोनिपात ,चप्पुटिका । प्रज्ञा० ६००। अच्चुव्वाया-परिश्रान्ता । बृ० द्वि० २११ आ। अच्छराते-शकस्याप्रमहिष्या राजधानीविशेष । अच्चेइ-अत्येति, अतिकामति । आचा० १४४ । २३१ । अच्छं-ऋक्षम् । आचा० ३३८ । अतिस्वच्छम् । जीवा० अच्छरानिवाए-अप्सरोनिपातः, तिस्रश्चप्पुटिका । औप० १६० । स्फटिकवच्छुद्धम् । जीवा० १२३ । आकाशस्फटिक १०९ । चप्पुटिका । भग० २६९ । जीवा० १०९ । वदतिस्वच्छम् । प्रज्ञा० ८७ । अच्छरीयं-आश्चर्यम् । आव० ३९५ । अच्छंद-अच्छन्द , अववश । दश० ९१॥ अच्छवि-अक्षपि, अशरीर., अव्यथक । भग० ८९२ । अच्छंदो-यथाछन्द , पाषण्डस्थः । आव० १९३ । अच्छवी-अच्छवि , अव्यथक । उत्त० २५७, ठाणा० ३३६ । सम० ४१ । . a ठाणा (२३) [ अच्छह आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अजताभासविवज्जी] - प्रज्ञा , अच्छह-तिष्ठत । ओघ० १५८ । अच्छियाइओ-स्थितवान् । आव० ६८३-1 अच्छा-अच्छा., आकाशस्फटिकवत् । ठाणा० २३२ अच्छिरे-चतुरिन्द्रियजीवमेद.। उत्त० ६९६ । अच्छा अच्छापुरी, वरणजनपदे आर्यक्षेत्रम् । प्रज्ञा० ५५। अच्छिरोडा चतुरिन्द्रियजन्तुविशेष । जीवा० ३२ । चतुरि सनखपदविशेषः। ४५। आकाशस्फटिकवदति- न्द्रियविशेष । प्रज्ञा० ४२ । स्वच्छा। जं० प्र० २०। अच्छिवेयणा-अक्षिवेदना, नेत्रपीडा। भग० १९७ । अच्छाडेइ-आच्छादयति। आव० ४३४ । अच्छिवेहए-चतुरिन्द्रियजीवमेद. । उत्त० ६९६ । अच्छारियभत्तं-लाघकभक्तम् । आव० २०७ । अच्छिवेहा-चतुरिन्द्रियविशेष । प्रज्ञा० ४२ । अच्छारिया-लावकम् । आव० २०७ । मूल्यप्रदानेन शालि- अच्छिवेहो-अक्षिवेध , चतुरिन्द्रियजन्तुविशेष । जीवा० ३२॥ लवनाय कर्मकरा , अस्तारिका क्षेत्रे क्षिप्पंते ते । व्य० द्वि० अच्छुत्ता-उद्धृत्य । नि० चू० द्वि० १४ आ। १६९ आ। अच्छुरंति-आस्तृण्वन्ति । ओघ० ८३ । अच्छाविजइ-स्थाप्यते। आव० ६३३ । अच्छुरलमे-प्रचुरलामे । नि० चू० द्वि० १४ आ । अच्छावित्तो-स्थापित । आव० ३५२ । अच्छुढं-अक्षिप्तम् । ओघ० १६५ । अच्छावेइ-स्थापयति । आव० ६३१ । अच्छि-(रोडए), चतुरिन्द्रियजीवभेद.। उत्त० ६९६ । अच्छे-अच्छ., सुनिर्मल , जाम्बूनदरत्नबहुलत्वात् मेरुनाम । जं० प्र० ३७५ । ऋक्ष.-अच्छभल्ल । प्रज्ञा० २५३ । अच्छि-अक्षी। आव० १९२। बीजप्रदेशस्थानानि यस्या. अच्छेओ-अच्छेक., अविकल । आव० ५२७ । सा निदिता ।, ओघ०,२१८ । अच्छिउं-स्थातुम् । उत्त० १५३ । अच्छेज-आसीत । भग० ९० । आच्छेद्य-षष्ठशवलदोषे । अच्छिक्को-अस्पृष्टः । व्य० प्र० १८६ आ । अच्छिचमढणं-चक्षुषोर्मीलनम् । वृ० दि० २०७ आ। अच्छेज्जे-आच्छेद्य-वलाद् भृत्यादिसत्कमाच्छिद्य यत्स्वामी साधवे ददाति । ठाणा० ४६० । अच्छिज्ज आच्छेद्यम् । आचा० ३२९ । अच्छेज्जेह-भोजनदोषः । भग० ४६६ । अच्छिढोकणियं-अक्षिछादनम् ।, आव० ५६१ । अच्छिणिउपूरंगे-सख्याविशेष. । भग० ८८८ { अच्छेण्णं-आच्छेद्यं, यदाच्छिद्य भृत्यादिभ्य स्वामी ददाति । अच्छिपणे-अच्छिन्न , अव्यवहित नान्यैः शब्दान्तर्वातादि- अच्छेरं-आश्चर्यम् । जीवा० २७७ । कैर्वाऽप्रतिहतशक्तिक । प्रज्ञा० २९९ । अच्छिद्द-अच्छिद्रम् , अविरलम् , निर्दूषणं वा.। भग० अच्छेरगा-आश्चर्याणि, अद्भुतानि । ठाणा० ५२३ । अच्छेरियं-आश्चर्यम् , आश्चर्यवस्तु । दश० ५५ । १३६ । । अच्छिदजालो-अच्छिद्रजालः, अमुल्यन्तरालसमूहरहित । अच्छो-अच्छ., स्वच्छ । सूर्य० ७८ । ऋक्ष । जीवा० जीवा० २७२ । ३८ । नाखरविशेषः । प्रश्न ७।. अच्छिद्दे-गोशालकदिशाचर. । भग० ६५९ । अच्छोड-आच्छोटनम् । ओघ० १३३ ।- अच्छिद्रपाणि-प्रतिमापन्नो जिनकल्पिको वा। आचा० | अछिन्नछेयनयाई-अच्छिन्नच्छेदनयिका-सूत्रविशेष । सम० प्रश्न० १४४। । प्रश्न० १५५ । . . २७७ । १२८। अच्छिन्न-अच्छिन्न , अपृथग्भूत । ठाणा० ४७२ । अच्छिपत्ताई-अक्षिपत्राणि, नेत्ररोमाणि । जं० प्र० ८१ । जीवा० २३४। अच्छिफुल्लयं-अक्षिपुष्पिका । नि० चू० प्र० ७ अ । अच्छियं-वृक्षविशेष फलम् । आचा० ३४९ । अजगर-अजगरः, शयुपर्यायः, उर परिसर्पविशेष । प्रश्न ७ । सम०। १३५ । अजजो-अजय्य , जेतुमशक्य. । उत्त० १६९ । अजताभासविवजी-अयताभाषाविवर्जी, दुप्वाक्परि-- हर्ता । आव. ७७५ । (२४) अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः [ अजयं अजीवारंभिया ] १८॥ . अजयं-अयतम् , अनुपदेशेन । दश० १५६ । अणुवएसेण । | अजीरं-अजरणम् । ओघ० ६३ । दश० चू० ७०। अजीरगं-अजीर्णत्वम् । आव० ६५५ । अजय-अयतः, अयत्नपर. । ओघ०३७ । तत्तत्पापस्थाने- अजीरय-अजीर्णम् । भग० १९७ । भ्योऽनुपरत । उत्त० १९४ । अजीर्णम्-रोगविशेष । जीवा० २८४ । अजरणं-अजीर्णम् । आव० १३१ ॥ अजीव-अजीवाः, जीवविपरीतस्वरूपा । प्रज्ञा० ७॥ अजवणिजोदए-अयापनीयोदका , अयापनीयं-न यापना- अजीवअपच्चक्खाणकिरिया - यदजीवेषु-मद्यादिष्व- प्रयोजनमुदक येषां ते। भग० ३०६ । प्रत्याख्यानात् कर्मबन्धनं सा अजीवाप्रत्याख्यानक्रिया । अजसो-छायाघातः। बृ० तृ. ९९ अ। ठाणा० ४१1 अजहण्णमणुक्कोसे-अजघन्योत्कृष्ट., अजघन्योत्कृष्टस्थितिः। अजीवकरणं-अजीवभावकरणं, परप्रयोगमन्तरेणाभ्रादेर्ना- आव० ३३५। नावर्णान्तरगमनम् । आव० ४६४ । अजाकृपाणीयम्-अवितर्कितसम्भवो न्यायविशेष.। आचा० अजीवकिरिया-अजीवक्रिया, अजीवस्य-पुद्गलसमुदायस्य यत्कर्मतया परिणमनं सा अजीवक्रिया । ठाणा० ४० । अजाणंतिया-अजानती पर्षत् जे होइ पगयसुद्धा । बृ० प्र० अजीवणेसत्थिया-अजीवनैसृष्टिकी, यत्तु काण्डादीना धनुरा- ५८ अ. दिभिः निसर्जनम् । ठाणा० ४३ । अजाणू-अज्ञस्य अज्ञानात् वा व्यावृत्तिः । ठाणा. १७४ 1 अजीवपाउसिया-अजीवप्राद्वेषिकी, अजीवस्योपरि प्रद्वेषाद्या अजाता-उत्तरगुणैवाधाकर्मादिभिरशुद्धा । ओघ० १९३ । क्रिया प्रद्वेषकरणमेव वा । भग० १८२ । अजीवे-पाषाणादौ अजायकप्पिओ-अजातकल्पिको, अगीतार्थः । बृ० स्खलितस्य प्रद्वेषात् । ठाणा० ४१ । अजीवपाओगि-अजीवप्रायोगिकम् , अजीवप्रयोगेन नि- अजाया-अजाता, याऽतिरिकनिरवद्याहारपरित्यागविषया। वृत्तं, जीवप्रायोगिकद्वितीयमेद । आव० ४५७ । आव० ६४१ । अजीवपारिग्गहिया-अजीवपारिग्रहिकी, पारिग्रहिकीक्रियाया अजिओ-अजित , परीषहोपसर्गादिमिर्न जित , द्वितीयजिन', द्वितीयो मेद । आव० ६१२ । यस्मिन् गर्भे सति माता राज्ञाऽजिताऽत । आव० ५०२1 अजीवमिस्सिया-अजीवमिश्रिता, प्रभूतेषु मृतेषु स्तोकेषु अजिणं-अजिनं, चर्म । सूत्र. ३०७, आचा० ७१ । जीवत्सु एकत्र राशीकृतेषु-अहो महानयं मृतो जीवराशिरिति अजिण्णओ-अजीर्णम् । आव० ३५२ । भाषा । प्रज्ञा० २५६ । अजिम्हं-अमन्दम् । प्रश्न. ८४ । अजीवमीसए-अजीवानाधित्य मिश्रमजीवमिधं । ठाणा० । अजिम्ह-अमन्दे, भद्रभावतया निर्विकारचपले । जं० प्र० ११५ अजीवमीसग-अजीवमिश्रा, सत्यामृषाभाषामेदः। दश० अजियसतित्थयं-अजितशान्तिस्तव.। आव० ६३८ । अजियसेणं-ऐरवतावसर्पिणीतीर्थकर.। सम० १५३ । अजीववेयारणिया- पुरुषादिविप्रतारणबुद्धयैव वाऽजीवं अजियसेणे-अजितसेन , अज्ञातोदाहरणे कौशाम्बीराजा । भणत्येतादृशमेतदिति । ठाणा० ४३ । आव० ६१९ । अतीतोत्सर्पिणीकुलकर । सम० १५०। अजीवसामंतोवणिवाइया - अजीवसामन्तोपनिपातिकी , अलोभोदाहरणे श्रावस्त्यामाचार्य । ७०१॥ सामन्तोपनिपातिकीक्रियाया द्वितीयो भेदः । आव० ६१३ । वसतपुरे नृप खड्गप्रमादिसैनिकशिक्षक । प्रज्ञा० ४४१ । | अजीवसाहत्थिया-यच्च खहस्तगृहीतेनैवाजीवेन-खङ्गादिना अजियं-अपराजिता (आज्ञां)। आव० ५९६ । जीवं मारयति सा अजीवस्वाहस्तिकी । ठाणा० ४२ ॥ अजिया अभिनन्दनजिनप्रवर्तिनीनाम । सम० १५२ । अजीवारंभिया - जीवकडेवराणि पिष्टादिमयजीवाकृतींश्च- अजिरं-अङ्गणम् । प्रश्न० १३८ । वस्त्रादीन् वा आरममाणस्य सा अजीवारभिकी। ठाणा० ४१॥ ११२ आ। ४९०। २०९। आव० (२५) [ अनुतं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अंजव] . -- ठाणा. अजुतं-अयुतम् , चतुरशीतिरयुतायतसहस्राणि । जीवा.. अज्जगो-आर्यकः, वनस्पतिविशेष. लोके आजओ। जं. ३४५। प्र. ४२४ । प्रत्येकवनस्पतिविशेष । नि० चू० द्वि०.६० । अजुतंगं - अयुताङ्गम् , चतुरशीतिरर्थनिकुरशतमहस्राणि । अज्जगोविंदो-आर्यगोविन्द , मिथ्योपस्थितायामुदाहरणम् । जीवा० ३४५। आव० ८६१ । अजुत्तं-अयुक्तम् , अनुपपत्तिक्षमम् , सूत्रदोषविशेष । आव० अज्जचंदणा-आर्यचन्दना, आर्याविशेषः, यस्या पार्वे ३७५। मृगावत्या केवलोत्पत्ति । आव० ४८५, नि० चू० तृ. अजुत्तो-अनुपयुक्तः । वृ० तृ. ६ आ। १३४ आ। अजुरणया-शरीरापचयकारिशोकानुत्पादनेन । भग० ३०५। अज्जत्ताए-आर्यतया, पापकर्मबहिर्भूतया अद्यतया वा अजो-अजः, छगलको द्विखुरश्चतुष्पद । जीवा० ३८ । अधुनातनतया वर्तमानकालतया । भग० ६५६ । अजोगव-अयोगवम् , वैश्याशूद्राभ्या जातो वर्ण । आचा० ८ । अज्जपयं-आर्यपदम् , शुद्धधर्मपदम् । दश २६९ । अजोगी-अयोगी, निरुद्धयोगः, शैलेश्या गतो हुखपश्चाक्षरो- अज्जप्पभिई - अद्यप्रमृति, सम्यक्त्वप्रतिपत्तिकालादारभ्याद्य द्विरणमात्रकाल यावत् , भूतग्रामस्य चतुर्दशं गुणस्थानम् । यावत् । आव० ८११ । आव० ६५०। अज्जभावे-आर्यभाव भार्यिकादिज्ञानादियुक्त । अयोनिभूतम्-(अजोणिभूए), विध्वस्तयोनि, प्ररोहासमर्थम् । दश० १४० - अजोसिया-अजुष्टा, असेवित्ता, क्षयं वा अवसायलक्षणम- अज्जमंगू-आर्यमङ्गु , ऋद्धिरससातगौरवदृष्टान्ते मथुराया- माचार्य । आव० ५७९ | अवसनाचार्य । नि० चू० तीता। सूत्र० ७० । । प्र० ३५१ अ । आचार्यातिसेवक. दुर्वलाऽऽचार्य । व्य० अजंहिज्जो-अद्यश्व.] आव० ७१५ । द्वि० १७४ आ । अज्ज-अद्य, आरब्ध , आर्यः ।' उत्त० ३६३ । आर्य - अज्जमणग-आर्यमणक , आर्यश्चामौ मणकथेति, विग्रह आरात्सर्वहेयधर्मेभ्यो यात -प्राप्तो गुणैरित्यार्य । प्रज्ञा० ५। पण्मासैर्दशवैकालिकस्यान्येता । दश० २८४ । भावाराधनयोगादाराद्यातः सर्वहेयधर्मभ्य इत्यार्य । दश० अज्जमहागिरि-स्थूलभद्रदत्तगणधारकाचार्य । नि० चू. २८४। आर्या-प्रशान्तरूमा चण्डिका। भग० भग० १६४ । प्र०२४३ अ। अद्य-सान्प्रतम् । ज० प्र० २४६, आचा० १५८ | आर्य.- ( गौतम )। आचा० १५८ । पापकर्मवहि तत्वेनापा अज्जमहागिरी-आयरिओ । नि० चू० ,तृ० ४४ आ । (क्षेत्रादिभेटेन नवधा)। ठाणा० २०८ । अज्जमूलं-आर्यमूलम् ,मातामहपादमूलम् । आव० ६८४ । ३०५। अज्जए-हरितविशेष । प्रजा० ३३ । अज्जय-आर्यकः, पिता। उत्त० ९८ । आव. अज्जकण्हा-आर्यकृष्णा', आचार्या । उत्त० १७८ । भग० ४७० । आव० ३५७ । अज्जकण्हो-आर्यकृष्ण', आचार्य । आव० ३२३ । अज्जयमंजरी-आर्यमञ्जरी । आव० १२५ । अज्जकालका-नाम आयरिया। वृ० प्र० ३९ अ। अज्जरक्खितो-मातृकानुनाकृढाचार्य । नि० चू० द्वि० अज्जकालगायरिए-चतुर्थी प्रवर्तको युगप्रधान । नि० चू० अज्जरक्खिय-गोष्टामाहिलप्रेषकाचार्य । नि० चू० प्र० प्र० ३३९ आ। अजकालंगो-आर्यकालकः । आव० ३६९ । ३३५ आ, १०१ आ । उज्जयिन्यामचेलकत्वे । (मर०) । अजकालय-प्रज्ञादृष्टान्त । (मर०) आर्यरक्षित । विशे० १००० । आचार्यविशेष । व्य. द्वि० अज्जखउडो-विद्यासिद्ध आचार्य । नि० चू० प्र० ३०४ अ, ३१९ अ। निक चू० प्र० २७६ मे, नि० चू० प्र० १६ अ। अज्जव-आर्जवम् , परस्मिन्निकृतिपरेऽपि मायापरित्याग । आर्यखपुटः, विद्यासिद्ध आचार्यविशेष । आव० ४११ । द० २६३1 । - . १०९ अ। १ -- --- (२६), [अजवइरसामि : अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अज्झत्थं ] १०१ आ। २८९। 40 १८। १४७ . 7 . अज्जवइरसामि-आर्यरक्षितविद्यागुरुः। नि० चू० प्र० अज्जिए-आर्जिका, आर्यिका मातु. पितुर्वा माता। दशः २१६॥ अज्जवहरा-आर्यवैरा। विशे० ९२८ । आर्यवज्र , वात्स- अज्जिया-पितामही मातामही वा। बृ० द्वि० ५८'आ। ल्योदाहरणे आर्य । दश० १०३ । माउ पिठ वा जा माता सा। दश. चू० १०९ । अज्जवहरो-आर्यवैर । आव० २८५: । आर्यवज्र , युग- अज्जिया-आर्यिका । आव० ७९३ । प्रधान । आव० ३०२ । आर्यत्रैर , चैत्यभक्तिद्वारे'आचार्य। अज्जियालाभो-आर्यिकालाभ',आर्यिकाभ्यो लाभ । आव० आव०.५३६ । ५३५। अज्जवट्ठाणा-आर्जवम् , सवरभेदाः । ठाणा ३०२ । अज्जुण-अर्जुन, वृक्षविशेष । प्रज्ञा० ३२ । अर्जुनाभिधानं. अज्जवे-आर्जवम् , ऋजुता योगसङग्रहे दगमो योग । यत्पाण्डुरस्वर्णम् । जं० प्र० २४२. । बहुबीजविशेषः । भग आव० ६६४ । ८०३ । चौरविशेष । व्य० द्वि० १७१ आ,। तृणविशेष. । अज्जसमिओ-आर्यममित , सुनन्दाभ्राता। आव० प्रज्ञा० ३३ 1 आर्यसमित । उत्त० ३३३ । अज्जुणए-अर्जुनक , राजगृहे मालाकारविशेष"। अन्तः अज्जसमिया - आर्यसमिता , वनस्वामिनो मातुलाः । आव० ४१२ । अज्जुणओ-अर्जुनक , राजगृहे मालाकार । उत्त० ११२ । अज्जसमुद्दा-आचार्यातिशेषानतिसेवि । व्य० द्वि० अज्जुणगस्स-अर्जुनक., गोशालपरावर्तिस्थानम् । भग०. अ। नि० चू० प्र० १५१ अ । ६७४ । (अज्जसा)-अजसा, प्रगुणेन न्यायेन । विशे० ७७९ । अज्जुणमालार-अर्जुनमालाकार , आक्रोशसह । (मर०)- अज्जसामस्स-आरात्मर्वहेयधर्मेभ्यो यात -प्राप्तो गुणैरि- अज्जुणसुवणं-अर्जुनसुवर्ण, श्वेतकाञ्चनम् । औप० ११५ । यार्य स चामौ श्यामश्च आयश्याम , तस्मै । प्रज्ञा० ५। अज्जुणस्स-गौतमगोत्रो गोशालगृहीतत्यक्तशरीर । भग० अज्जसुनन्दा-आर्यसुनन्दा । उत्त० ३२१ । ६७३ । अज्जसुहत्थी-आर्यसुहस्ती, योगसग्रहेऽनिश्रितोपधानदृष्टान्ते अज्जुण्णो-अर्जुन , सुघोषनगरनृपति. । विषा० ९५ । आर्यस्थूलभद्रस्य लघु शिष्य । आव० ६६८ । स्थूलभद्र- | अज्जुन्ने-गोशालकदिशाचर । भग० ६५९ । दत्तगणधारकाचार्य । नि० चू० प्र० २४३ अ । आयरिओ। अज्जे-आर्य । उत्तः २८६ । अद्य, आर्य, स्वामिन् । नि० • चू० तृ० ४४, वृ० द्वि० १५३ आ। अज्जसुहम्मे-आर्यसुधर्मा, महावीरस्यान्तेवामी स्थविर । अज्जो-आर्य , पितामह ,तीर्थकराणाम् प्रथम.। आव० १६८ । आर्य । आव० ७९३ । श्रीवर्धमानस्वामी। ज० प्र० ५४१ । अज्जहिजो-अद्यय (श्व)। आव० ६९२ । अज्जोत्ति-आरात्पापकर्मभ्यो याता आर्यास्तदामन्त्रण अज्जा-तुलसीसमो वनस्पतिविशेष । भग० ८०२। मुनि- आर्या। ठाणा० १३५ । मुव्रतजिनप्रवर्तिनीनाम। १५२ ॥ आर्या, सातचतु कल- | अज्जोरुह-हरितविशेष । प्रजा० ३३ । गणादिव्यवस्थानिबद्धा मात्राछन्दोरुपा। जं० प्र० १३८ । अज्झत्त-अध्यात्मम् , चेत । दश० १६ । अज्जाकल्पं-आर्यानीतम् । ( गणि०) अज्झत्थं-अध्यात्मम् , सुखदु खादि । आचा० ७६ । भात्म- अज्जाघरे-आर्यागृहे । ठाणा० ३७२ । विषय । जीवा० २४२। आत्मस्था मिथ्यात्वादय । अज्जावेयव्वा-आज्ञापयितव्या । आचा० १७८ । उत्त० "४०२ । अन्त करणम् । आचा० २९० । अध्यात्मम् । अल्जासाढो-आर्याषाढः, स्थिरीकरणोदाहरणे उज्जयि आचा० २०८। अध्यात्मक्रिया-यस्केनापि कथञ्चनाप्यपरि- न्यामार्याषाढ । दश १०३ । वत्सभूम्यामाचार्यविशेषः । भूतस्य दौर्मनस्यकरणम् । ठाणा० ३१६ । अध्यात्म - उत्त० १३३ । आचार्य । आव० ३१५। परिणाम । व्य० प्र० १८१आ। अध्यात्मम्-मन'। ठाणा०५५ - भग० १७६ । . प्रश्न० १॥ . (२५) । [अज्झत्थदंडे आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अज्यवसियं] - : अज्झत्थदंडे-अध्यात्मदण्ड , शोकाद्यभिमव.। प्रश्न०१४३।। अज्झप्पसंखुडे-अध्यात्मसवृतः, स्त्रीभोगादत्तमना. सूत्रार्थो- अज्झत्थनिष्फन-अध्यात्मनिष्पन्नम् , अध्यवसानोद्गतम् । पयुक्तनिरुद्धमनोयोग । आचा० २१९ । दश० २२६ अज्झप्पे-अध्यात्मनि, आन्तरम्। सूत्र० २३० । अज्झत्थवयणं-अध्यात्मवचनम् , अभिप्रेतमर्थ : गोपयितु- | अज्झयणं-अध्ययनम् , विशिष्टार्थध्वनिसन्दर्भरूपम् । जीवा० कामस्य सहसा तस्यैव भणनम् । प्रश्नः ११८ । यदन्यच्चे ४। ठाणा० ६। पाठः । आव० ७३२, विशे० ४५० । तसि निधाय विप्रतारकबुद्धयाऽन्यद् बिभणिपुरपि सहसा सज्झाओ। दश० चू० १२५ । स्वस्वभावे आनीयते- यच्चेतसि तदेव ब्रूते तत् । प्रज्ञा० २६७, आचा० ३८७ । ऽनेनेति आनयनं प्रस्तावादात्मन , निरुक्तविधिना। उत्त० अज्झथिए-अध्यात्मिक , अभ्यर्थित । विपा० ३८ । ६ । निरुक्तविधिनाऽर्थनिर्देशपरत्वाद्वाऽस्य अयतेरेतेर्वाऽधि- अध्यात्मिक.-आत्माश्रित । भग० ४६३ । आध्यात्मिक - पूर्वस्य । उत्त० ७ । नाम । सूर्य० ९, १४६ । आव० ७१५ । क्रियास्थानविशेषः । सम० २५ । अध्यात्मानयनाच्चेतसो विशुद्धथापादनात्। दश० १३८ । अज्झत्थिओ-आध्यात्मिकः, आत्मविषयः, सङ्कल्पविशेष.। अनेन करणभूतेन साधुर्बोधसयममोक्षान् प्रत्यधिकं गच्छति जीवा० २४२ । यस्मादेवं तस्मादध्ययनम् । दश० १६ । अध्यात्मानयनं, अज्झत्थियं-अध्यवसितं, सङ्कल्पम् । आव० ६६९ । आध्या- अधिगम्यन्ते परिच्छिद्यन्ते वा अर्था अनेनेत्यधिगमनमेव प्राकृ. त्मिक-अन्तःकरणोद्वम्। सूत्र३११ । तशैल्या तथाविधार्थप्रदर्शकत्वाच्चास्य वचसोऽध्ययनमिति, अज्झत्थीओ-अध्यात्मस्थ । आव० ६४९ । अधिक नयनमधिकनयनं चाध्ययनम् । दश०१६ । अध्या- अज्झत्थेव-अध्यात्मन्येव, ब्रह्मचर्ये व्यवस्थितः । आचा० त्मानयन-अध्ययनश्रुतनाम । दश० १६ । शास्त्रम् । दश० २८४। २०८ । अज्झत्थो - आध्यात्मिक , आत्मन्यध्यध्यात्म - तत्रभव अज्झयणछक्क-अध्ययनषट्कं । विशे० ४१५ । दण्डविशेषः। सूत्र. ३०६ । अज्झल-म्लेच्छविशेष. । प्रज्ञा० ५५ । अज्झवसाए-अध्यवसाय , सूक्ष्मो मन परिणामसमुत्थ । अज्झप्पं अध्यात्म, सद्दावनारूढं चित्तमेव । प्रश्न० १३४ । आचा०६८ । सूक्ष्म आत्मन परिणामविशेष.। आचा० ३१॥ आध्यात्मिकं, आत्मन्यधीत्यध्यात्म तत्र भवम् । आन्तरशक्ति- अज्झवसाणं-अध्यवसानं, अन्त करणप्रवृत्ति । सूत्र० ३४०। जनित सात्त्विक । सूत्र० १६७ । आत्मानमधिकृत्यात्मा- मनोविशेष । औप० ९९ । जीवा० १३० । अन्तःकरण- लम्वनम् । प्रश्न० १२८ । मन । सूत्र०६५। अधि आत्मनि सव्यपेक्षम् । आव. १८४ । रागस्नेहभयमेदानि अध्यव- वर्त्तत इति अध्यात्म-ध्यानम् । आव० ७७४ । रूढितो मन । सानानि। आव० २७२ । अध्यवसाया । प्रज्ञा० ५४३ । उत्त० ७। आत्मनि । उत्त० ६१८ । चेतः । आव० ५२५। श्रवणविधिक्रियाप्रयत्नविशेषरूपम् । औप० ६० । मन धर्मध्यानादिकम् । सूत्र० २६९ । मन. । आचा० २१९ । एकाग्रतालम्बनम् । आव० ५८३ । रागस्नेहभयात्मकोऽध्य- आत्मनि। उत्त० ४६५ । मन । उत्त० ५९१ । वसाय । ठाणा० ४००। विशे० ८४२ । अज्झप्पजोग-अध्यात्मयोगः । ( महाप्र०) अज्झवसाणावरणिज्जाणं-भावचारित्रावरणीयानि । भग० अज्झप्पजोगसाहणजुत्ते - अध्यात्मयोगमाधनयुक्त , अध्यात्म-मनस्तस्य योगा - व्यापारा धर्मध्यानादयस्तेषा अज्झवसाणेहि-अध्यवसाने , मन परिणामै । जं० प्र० साधनानि एकाग्रतादीनि तैर्युक्त. । उत्त० ५९११ २७९ । अज्झप्पज्झाणं-अध्यात्मध्यानं, अमुकोऽहं अमुककुले अमु- एकोऽहं अमुककुले अमु- अज्झवसिए-अध्यवसितम् , परिभोगक्रियासपादनविषयम् । गसिस्से अमुगधम्मट्टाणठिइए न य तश्विराहणेत्यादिरूपम् । भग० ८९ । अध्यवसानम् , प्रयत्नविशेष । भग० ८९ । प्रश्न० १२८। अज्झवसियं-अध्यवसित, क्रियासंपादनविषयम् । औप० अज्झप्परए-अध्यात्मरतः,प्रशस्तध्यानासक्ता। दश२६७। - (२८) [ अज्यवस्संति अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अवसट्टा ] 12 गत । भग० - दश. . अज्झवस्संति-अध्यवस्यत । दश०' ३५ । अज्झोववणं - अध्युफ्पन्न , विषयपरिभोगायत्तजीवितः । अन्झाइतं-अधीतम् । आव. ३४७ । आचा' ७८ अज्झाय-अध्ययनम् । विशे० ५०६ । अध्याय । भग० ४ । अज्मोववण्णो-अध्युपपन्नः, आसक्तः । ओघ० ६९४ । कुबुद्धीना मन पीडाना वा आयः। भग० ४ । पाठः। अध्युपपन्न । आव० ३५९, ९२ । उत्त० ७१३ । शास्त्रोऽगविशेष । आव० ६८ । अध्यय अज्झोववनं-अध्युपपन्न , आमक्त । दश० ४५ । अप्रा नानि । उत्त० ७१२ । प्ताहारचिन्तामाधिक्येनोपपन्न । भग०. ६५० । अज्झारुहो-अध्यारुह , वृक्षयोनिकेषु वृक्षेषु कर्मोपादान- अझोववन्ने- अध्युपपन्न, तदेकाग्रता निष्पादितेषु उपर्युपरि अध्यारोहतीति, वृक्षोपरिजातो वृक्ष', २९२ । मूञ्छित । विपा० ३८ ॥ वल्लीवृक्षाभिधान कामवृक्षाभिधानो वा वृक्ष । सूत्र० ३५२ । अज्झोववन्नो-अध्युपपनः । आव० ३९९-! अज्झावसित्त-अभ्युष्येति । ठाणा० ३५१ । अज्झोववाय-अध्युपपात , ग्रहणैकाग्रचित्तता। प्रश्न० १५३ । अज्झियगं-उपयाचितक । बृ० तृ० ७४ आ। अज्झोवात-अध्युपपात -श्रद्धा । व्य० प्र० २१७ आ । अज्झीणं-अक्षीणम् । विशे० ४५० । अक्षीणश्रुतनाम । अझंझपत्ते- अझम्माप्राप्त , अकलहप्राप्त सम्यग्दष्टिर्वा । १६ । यद्दीयमानं न क्षीयते स्म तद् अक्षीगम् । सूत्र. २३४ । वीतरागः। सूत्र. २३५ । ठाणा० ६। अक्षातोञ्छवृत्ति-(अनाउञ्छवित्ती), कुले कुले भिक्षणम् । उत्त० ४०४। अज्युववातो-अगमगमणामवणे वि ( आमक्ति )। नि० चू० द्वि० ७१ आ। अज्ञानम्-अनाभोग., अननुस्मरणं वा । दश० १७९ । अज्झुसिरं-अशुषिरम्-अग्गंथिला दशिका निषद्या च । अट्ट-आतम् , सक्लिष्टाध्यवसाय । दश० चू० १४ । ऋतस्य ओघ० पीडितस्येदं वचनमिति कृत्वा । अधर्मद्वारस्य षोडशनाम । अज्झुसिरे-तृणादिच्छन्नं न । ओघ० १२३ । २६ । आर्तध्यान - शोकाक्रन्दनविलपनादिलक्षणं अज्झुसिरो- गृहिसीवनिकारहितः प्रतिथिग्गलरहितो वा। ध्यानम् । आव० ५८२ । बृ० द्वि० २५२ आ। अट्टहासं-अट्टाट्टहास्यम् । आव० १९१ । अझोअर - अध्यवपरकम् , अट्टहासो-अट्टहास । आव० ८३० । खार्थमूलाद्रहणप्रक्षेपरूपम् । दश० १७४ | नि० चू० प्र० १४२ आ। अट्टणसाला-व्यायामशाला । भग, ५४२ । अदृनशाला। औप० ६५ । अझोयरए इ-भोजनदोष । भग० ४६६ । स्वार्थमू- , अट्टणे-अट्टन , योगसङ्ग्रहे आलोचनादृष्टान्ते उज्जयिन्यां लाद्रहणे .माधाद्यर्थ कगप्रक्षेपणमध्यवरक । मलविशेष । आव० ६६४ । ४६०। अट्टणो-अनः, उजयिन्या जितशत्रुराजमल्ल । उत्त० १९२ । अझोवगमियाए - आभ्युपगमिकी, प्रव्रज्याप्रतिपत्तितो | अदुहवसट्टे-आतंदु खार्त्तवशार्स । उत्त० ३३१ । ब्रह्मचर्यभूमिशयनकेगलम्चनादीनामशीकारेण निर्वृता वेदना । अदृदुहट्टा-आर्त्तदु खस्थिता ,आर्त्तदुःखार्ता. । आव० ३२५॥ भग०६५। अट्टदुहट्टो-आर्त्तदु खातः। आव० ० ८८ । अज्झोववजंति-अध्युपपद्यन्ते-तदेकचित्ता भवन्तीति तद- अनियट्टियचित्ता-आर्सनिर्वतितचित्ताः, आर्त निर्वतितं र्जनाय वाधिक्येनोपपद्यन्ते उपपना घटमाना । ठाणा० २९२ ॥ चित्ते यैस्ते तथा, आर्ताहा निर्वतितं चित्तं येस्ते । भृग अज्झोववजणं-अध्युपपादन, क्वचिदिन्द्रियार्थेऽध्युपपत्तिर- मिष्वङ्ग । ठाणा० १७४ ।। अट्टमगा-अमिमारका । निः चू० द्वि० '१६ अ । अज्झोवजिज-अभ्युपपद्येत, अभिष्वग्नं कुर्यात् । दश० अट्टमट्टाइ-अर्दवितर्द । उप० गा० ४८६ । अवसट्टा-आर्त्तवशार्ता । आव २८८ । ०२१४। प्रश्न ठाणा० - 1 । १२१ । । (२९) [ अज्झत्थदंडे आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अज्झवसियं] २८४। अज्झत्थदंडे-अध्यात्मदण्ड., शोकाद्यभिभव.। प्रश्न. १४३ । | अज्झप्पसंवुडे-अध्यात्मसमृतः, स्त्रीभोगादत्तमना सूत्रार्थो- अज्झत्थनिष्फन-अध्यात्मनिष्पन्नम् , अध्यवसानोद्गतम् । पयुक्तनिरुद्धमनोयोग । आचा० २१९ । दश० २२६ । अज्झप्पे-अध्यात्मनि, आन्तरम्। सूत्र. २३० । अज्झत्थवयणं-अध्यात्मवचनम् , अभिप्रेतमर्थ गोपयितु- | अज्झयणं-अध्ययनम् ,विशिष्टार्थध्वनिसन्दर्भरूपम् । जीवा० कामस्य सहसा तस्यैव भणनम् । प्रश्न० ११८ । यदन्यच्चे ४। ठाणा० ६ । पाठ. । आव० ७३२, विशे० ४५० । तसि निधाय विप्रतारकवुद्धयाऽन्यद् विमणिपुरपि सहसा सज्झाओ। दश० चू० १२५ । स्वस्वभावे आनीयते- यच्चेतसि तदेव ब्रूते तत् । प्रज्ञा० २६७, आचा० ३८७ । ऽनेनेति आनयनं प्रस्तावादात्मनः, निरुक्तविधिना। उत्त० अज्झथिए-अध्यात्मिक , अभ्यर्थित । विपा० ३८ । ६ । निरुक्तविधिनाऽर्थनिर्देशपरत्वाद्वाऽस्य अयतेरेतेऽधि- अध्यात्मिक.-आत्माश्रित. 1 भग० ४६३ । आध्यात्मिक पूर्वस्य । उत्त० ७ । नाम । सूर्य९ ९, १४६ । आव० ७१५ । क्रियास्थानविशेष. । सम० २५ । अध्यात्मानयनाच्चेतसो विशुद्धयापादनात्। दश० १३८ । अज्झथिओ-आध्यात्मिकः, आत्मविषयः, सङ्कल्पविशेषः । अनेन करणभूतेन साधुर्बोधसंयममोक्षान् प्रत्यधिकं गच्छति जीवा० ० २४२ । यस्मादेवं तस्मादध्ययनम् । दश० १६ । अध्यात्मानयन, अज्झस्थिय-अध्यवसितं, सङ्कल्पम् । आव० ६६९ । आध्या- अधिगम्यन्ते परिच्छिद्यन्ते वा अर्था अनेनेत्यधिगमनमेव प्राकृ- त्मिक-अन्तःकरणोद्भवम् । सूत्र० ३११ । तशैल्या तथाविधार्थप्रदर्शकत्वाच्चास्य वचसोऽध्ययनमिति, अज्झत्थीओ-अभ्यात्मस्थः । आव० ६४९ । अधिक नयनमधिकनयनं चाध्ययनम् । दश० १६ । अध्या- अज्झत्थेव-अध्यात्मन्येव, ब्रह्मचर्ये व्यवस्थितः । आचा० त्मानयन-अध्ययनश्रुतनाम । दश० १६ । शास्त्रम् । दश० २०८ । अज्झत्थो - आध्यात्मिकः, आत्मन्यध्यध्यात्म अज्झयणछक्कं-अध्ययनषद्कं । विशे० ४१५ ॥ तत्रभव. दण्डविशेषः। सूत्र० ३०६ ॥ अज्झल-म्लेच्छविशेषः । प्रज्ञा० ५५ । अज्झवसाप-अध्यवसाय , सूक्ष्मो मन परिणामसमुत्थः । अज्झप्पं-अध्यात्म, सद्भावनारूढं चित्तमेव । प्रश्न० १३४ । आचा०६८। सूक्ष्म आत्मनः परिणामविशेष। आचा० ३१॥ आध्यात्मिकं, आत्मन्यधीत्यध्यात्म तत्र भवम् । आन्तरशक्ति- अज्झवसाणं-अध्यवसानं, अन्त करणप्रवृत्ति । सूत्र० ३४०। जनित सात्त्विक । सूत्र० १६७ । आन्मानमधिकृत्यात्मा- मनोविशेषः। औप० ९९ । जीवा० १३० । अन्त करण- लम्बनम् । प्रश्न० १२८ । मनः । सूत्र०६५। अधि आत्मनि सव्यपेक्षम् । आव. १८४ । रागस्नेहभयभेदानि अध्यव- वर्तत इति अध्यात्म-ध्यानम् । आव० ७७४ । रूढितो मन । सानानि। आव० २७२। अध्यवसाया। प्रज्ञा० ५४३ । उत्त० ७॥ आत्मनि । उत्त० ६१८ । चेतः । आव० ५२५] श्रवणविधिक्रियाप्रयत्नविशेषरूपम् । औप० ६.। मन धर्मध्यानादिकम् । सूत्र० २६९ । मनः । ओचा० २१९ । एकाग्रतालम्बनम् । आव० ५८३ । रागस्नेहभयात्मकोऽध्य- आत्मनि। उत्त० ४६५ । मनः। उत्त० ५९१ । वसाय.। ठाणा० ४००। विशे० ८४२ । अज्झप्पजोग-अध्यात्मयोगः । ( महाप्र०) अज्झवसाणावरणिजाणं-भावचारित्रावरणीयानि । भग० अज्झप्पजोगसाहणजुत्ते - अध्यात्मयोगसाधनयुक्त , अध्यात्म-मनस्तस्य योगा - व्यापारा . धर्मध्यानादयस्तेषां | अज्झवसाणेहि-अध्यवसानै, मन परिणामै । जं० प्र० साधनानि एकाग्रतादीनि तैर्युक्तः । उत्त० ५९१ । २७९ । अज्झप्पज्झाणं-अध्यात्मध्यानं, अमुकोऽहं अमुककुले अमु- अज्झवसिए-अध्यवसितम् , परिभोगक्रियासपादनविषयम्। गसिस्से अमुगधम्मट्ठाणठिइए न य तश्विराहणेत्यादिरूपम् । भग० ८९ । अध्यवसानम् , प्रयत्नविशेष. । भग० ८९ ॥ अज्झवसियं-अध्यवसित, क्रियासपादनविषयम् । औप० अज्झप्परप-अध्यात्मरत,प्रशस्तध्यानासक्त । दश०२६७।। ६० । प्रश्न० १२८। (२८) [ अन्झवस्संति " अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अट्टवसट्टा ] गतः। भग. ठाणा० ६. अज्झवस्संति-अध्यवस्यत । दश०' ३५ । अज्झोववण्णं - अध्युपंपन्नः, विषयपरिभोगायत्तजीवित.। अज्झाइतं-अधीतम् । आव. ३४७ । आचा' ७८ । अज्झाय-अध्ययनम् । विशे० ५०६ । अध्याय । भग० ४ । अझोववण्णो-अध्युपपन्न, आसक्त । ओघ. १९४ । कुबुद्धीना मन.पीडाना वा आयः। भग० ४ । पाठ । अध्युपपन्न । आव० ३५९, ९२ । उत्त० ७१३ । शास्त्रोऽविशेष.। आव० ६८ । अध्यय- अज्झोववनं-अध्युपपन्न , आमक्त । दश० ४५ । अप्रा- नानि | उत्त० ७१२ । प्ताहारचिन्तामाधिक्येनोपपन्न । भग०. ६५० | तटेकाग्रता अज्झारुहो-अध्यारुह , वृक्षयोनिकेषु वृक्षेषु कर्मोपादान- अज्झोववन्ने-अध्युपपन्न , निष्पादितेषु उपर्युपरि अध्यारोहतीति, वृक्षोपरिजातो वृक्ष , २९२ । मूञ्छित । विपा० ३८ । वल्लीवृक्षाभिधान कामवृक्षाभिधानो वा वृक्ष । सूत्र० ३५२ । अज्झोववन्नो -अध्युपपन्नः। । आव० ३९९-1 - अज्झावसित्त-अभ्युष्येति । ठाणा० ३५१ ! अज्झोयवाय-अध्युपपात., ग्रहणैकाग्रचित्तता। प्रश्न० १५३ । अज्झियगं-उपयाचितक । बृ० तृ० ७४ आ । अज्झोवात-अध्युपपात -श्रद्धा । व्य० प्र० २१७ आ । अज्झीणं-अक्षीणम् । विशे० ४५० । अक्षीणश्रुतनाम । अझंझपत्ते- अझञ्झाप्राप्त , अकलहप्राप्त सम्यग्दष्टिर्वा । दश० १६ । यद्दीयमानं न क्षीयते स्म तद् अक्षीगम् । सूत्र. २३४ । वीतरागः। सूत्र. २३५ । अज्ञातोञ्छवृत्ति-(अन्नाउञ्छवित्ती), कुले कुले भिक्षणम् । अज्झुववातो-अगमगमणासवणे वि (आमक्ति )। नि० उत्त० ४०४ । चू० द्वि० ७१ आ। अज्ञानम्-अनाभोगः, अननुस्मरणं वा । दश० १७९.। . अज्झुसिरं-अशुषिरम्-अग्गंथिला दशिका निषद्या च । अट्टे-आतम् , सक्लिष्टाध्यवसाय । दश० चू० १४ । ऋतस्य ओघ० ०२१४ । पीडितस्येदं वचनमिति कृत्वा। अधर्मद्वारस्य षोडशनाम । अज्झुसिरे-तृणादिच्छन्नं न । ओघ० १२३ । प्रश्न० २६ । आर्तध्यान - गोकाक्रन्दनविलपनादिलक्षणं अज्झुसिरो- गृहिसीवनिकारहित' प्रतिथिग्गलरहितो वा। ध्यानम् । आव० ५८२ । बृ० द्वि० २५२ आ। अट्टहासं-अट्टाहास्यम् । आव० १९१ । अन्झोअर - अध्यवपूरकम् , अट्टहासो-अट्टहास । आव० ८३० । खार्थमूलाद्रहणप्रक्षेपरूपम् । दश० १७४ | नि० चू० प्र० १४२ आ। अट्टणसाला-व्यायामशाला । भग० ५४२ । अनगाला अझोयरए इ-भोजनदोष । भग० ४६६। स्वार्थमू- अट्टणे-अट्टन , योगसङ्प्रहे आलोचनादृष्टान्ते उज्जयिन्या लाद्रहणे . माध्वाद्ययं कगप्रक्षेपणमध्यवपूरक । मल्लविशेष । आव० ६६४ । अट्टणो-अट्टन , उज्जयिन्या जितशत्रुराजमल्ल । उत्त० १९२ । अज्झोवगमियाए - आभ्युपगमिकी, प्रव्रज्याप्रतिपत्तितो अट्टदुहवसट्टे-आर्त्तदु.खार्त्तवशातः । उत्त० ३३१ । ब्रह्मचर्यभूमिगयनकेशलुम्चनादीनामङ्गीकारेण निर्वृता वेदना । अदुहट्टा-आतंदु खस्थिता ,आतंदु खा". । आव० ३२५॥ अट्टदुहट्टो-आर्त्तदु खार्त्त । आव०' ८८ । अझोववजंति-अध्युपपद्यन्ते-तदेकचित्ता भवन्तीति तद- अनियट्टियचित्ता-आर्त्तनिर्वतितचित्ता , आत्तं निवर्तित र्जनाय वाधिक्येनोपपद्यन्ते उपपन्ना घटमाना । ठाणा० २९२ । चिते येस्ते तथा, आर्त्ताद्वा निर्वतितं चित्त येस्ते। भग०० अज्झोववजणं-अध्युपपादनं, क्वचिदिन्द्रियार्थेऽध्युपपंत्तिर- मिष्वङ्ग । ठाणा० १७४ । अट्टमगा-अमिमारका | नि चू० द्वि० ११ अ ।। अज्झोवजिज-अभ्युपपद्येत्त,' अभिष्वग्नं कुर्यात् । दश० अट्टमट्टाइ-अर्दवितर्द । उप० गा० ४८६ । अवसट्टा-आर्तवंशार्ता । आव. ३८८ । । औप० ६५ । ठाणा० ४६०। भग०६५। - - १२१ । t (२९) [ अट्टहासं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अट्ठसयंसिओ] २४२ अ। 1 ठाणा० ४४०॥ अष्टम. अट्टहासं-अट्टहासम् । आव० ६३४ । अट्टगुणे-अष्टगुणा.। ठाणा० ३९४ । अट्टा-आर्ताः, दुखिनः रागद्वेषोदयेन । आचा० १८३ । अट्ठजायं-अर्थकायां अर्थिकार्या अर्थप्रयोजना वा। बृ० तृ. अट्टाल-प्राकारसम्वन्धिन्यट्टालादौ। आचा० ४११ । अट्टालक-प्राकारकोष्ठकोपरिवर्ति आयोधनस्थानम् । उत्त० अट्ठजुत्तं-अर्थयुक्त-अर्थते-गम्यत इत्यर्थस्तेन युक्तमन्वितम् । ३११॥ उत्त० ४६ । अट्टालक - अट्टालकः, प्राकारस्योपरि भृत्याश्रयविशेषः । अट्टमियं-अष्टाष्टमिका, भिक्षुप्रतिमाविशेषः । अन्त० २९। जीवां० १५९ । अमिया-अष्टावष्टमानि । सम० ७७ । अष्टावष्टमम् । अट्टालका-प्राकारस्योपर्याश्रयविशेषा । सम० १३७ । अट्टालगं-अट्टालक । जीवा० १६९ । अट्ठपयंति-अनुभागसंक्रमस्वरूपनिर्धारणम् । ठाणा० २२२ । अट्टालग-अट्टालक., प्राकारोपरिवत्ती आश्रयविशेष. । प्रश्न अट्ठपिट्टपुट्ठा(निहिया)-अष्टवारपिष्टप्रदाननिष्पन्ना । जीवा. ८। अट्टालकम् , प्राकारोपर्याश्रयविशेषः। भग० २३८ । ३५१ . अट्टालगा-पागारस्स अहे अट्टहत्थो मग्गो। नि० चू० अटुपिट्ठणिट्टिया-अष्टपिष्टनिष्ठिता, अष्टभि शास्त्रप्रसिद्ध पिष्टैनिष्टिता। प्रज्ञा० ३६४ । प्र० २६५ । अट्टालगो- अट्टालक, प्राकारस्योपरि मृत्याश्रयविशेषः । प्राकारस्योपरि मृत्याश्रयविशेषः । अट्ठफास-अष्टस्पर्शम् , वादरपरिणामम् । भग० ९६ । जीवा० २५८ । अट्ठभाइया-अष्टमभागमात्रो मानविशेष । भग० ३१३ । अट्टालय-अट्टोलकं । आव० ६७५ । अट्ठमंगलए-अष्टमङ्गलकानि, अष्टेति सख्याशब्द', अलकानीति चाखण्ड सजाशब्द.। जं० प्र० १९२ । अट्टालय-अट्टालका , प्राकारस्योपरिवत्यधियविशेषाः । जं. प्र० ७६, १०६ । औप ३ । प्राकारस्योपरि भृत्याश्रयवि अट्ठमभसं-अष्टमभक्तम् , त्रिरात्रोपवास ।, आव० २२८ । समयपरिभाषयोपवासनय, यद्वाऽष्टमभक्तमिति सान्वयं नाम, शेषाः । प्रज्ञा० ८६ । प्राकारस्योपर्याश्रयविशेष. । जीवा तञ्चवम्-एकैकस्मिन् दिने द्विवारभोजनौचित्येन दिनत्रयस्य २७९। अट्टालयसंठिमो-अट्टालकसस्थितः । जीवा० २७९ । षण्णा भक्तानामुत्तरपारणकदिनयोरेकैकस्य भक्तस्य च त्यागे- नाष्टमं भक्त त्याज्यं यत्र । ज० अहे झाणे-ध्यानस्य प्रथमो मेद । भग० ९२३ । त्रयस्य सज्ञा। जं० प्र० ११८ । अट्टो-आर्त , मनसा । विपा० ४।। अहमभत्तिा-अष्टमभक्तिका, दिनत्रयमनाहारिण । जं. अटुं-अर्थ. । आव० ७९३ । प्र० २३९। अट्ठ-अर्थान् , वर्णादीन् । जं० प्र० ९८ । अर्थाय । उत्त अट्टमेणं-अष्टमेन, उपवासत्रयलक्षणेन । ज० प्र० अट्ठय-तलं। आव० ६४३ । अट्टकरण - अर्थकरणं, अर्थाभिनिर्वर्तकमधिकरण्यादि येन अट्टरससंपउत्त-अष्टभी रसैः शृङ्गारादिभिः सम्यक् प्रक- द्रम्मादि निष्पाद्यते। अर्थार्थ वा करणं, यत्र राज्ञोऽर्थाश्चि- पेण युक्तम् । जं० प्र० ३९ । न्यन्ते । अर्थ एव वा नैस्तैरूपायैः क्रियत इति । उत्त. अटुसइआहिं - अर्थशतानि यासु सन्ति ता अर्थशति- १९५। कास्तामि , अथवा अर्थाना-इष्टकार्याणा शतानि याभ्यस्ता अट्ठखंभसतसंनिविट्ठा-अष्टोत्तरस्तम्भशतमन्निविष्टा, सभा अर्थशतास्ता एवार्थतिका.। जं.प्र. १४३, भग. विशेष । आव० ३४२ । अट्ठग-अष्टकः । ओघ० १४४ । अटकम्-चतुर्विंशत्य- अट्ठसते-अष्टशतं । आव० ३४२ । धिकशतसत्कभागाष्टकप्रमाणम् । सूर्य० २३८ । अट्ठसयं-अष्टाधिकं शतम्। ज० प्र० ६० । अट्ठगुणाए-अष्टगुणया। आव० ६३। अट्ठसयंसिओ-अष्टगतान्त्रिक । आव० ३४२ । . प्र० १९७ । उपवास- १५१॥ ४८२ । (३०) ४१०। प्रजा० ४४ । [ अटुसहस्सं. अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अद्वे ] अट्टसहस्सं-अष्टमहस्रम् , अष्टोत्तरं सहस्रम् । जं० प्र० । अट्टाहिरं-अष्टाहिकाम् , अष्टानामहा-दिवसानां समाहारो- ऽष्टाहं तदस्ति यस्यां महिमाया सा अष्टाहिका ताम् । जं. अट्ठसहस्सवरकंचणसलागा-अष्टौ सहस्रागि-अष्ट सह प्र० १६३ नसङ्ख्याका वरकाञ्चनशलाका-वरकाञ्चनमय्य शलाका येषु अट्टाहिया-अष्टाहिका, महामहिमाविशेष । जीवा० ३६५ । तानि । जं० प्र०, ५९ । ज० प्र० ४२३ । अट्ठसिरे-अष्टशिराः, अष्टकोण. { औप० १० । अहि-अस्थि, कीकशम् । प्रश्न० ८, भग १३५। अट्ठसोवण्णि-अष्टसुवर्णा मानमस्येत्यष्टसौवर्गिक, सुव- अट्टिकच्छभा-ये अस्थिबहुला. कच्छपास्ते अस्थिकच्छपा । र्णमानमिदम् चत्वारि मधुरतृणफलान्येक श्वेतसर्षपः, पोडश श्वेतसर्षपा एक धान्यमाषफल, द्वे धान्यमाषफले एका द्वे धान्यमाषफले एका | अट्टिकच्छभो-अस्थिकच्छप, कच्छपविशेष. । जीवा० ३६ । गुञ्जा, पञ्च गुजा एक कर्ममाषक , षोडश कर्ममाषकाः एक. | अट्टिकरकम्-तन्दुलोदकम् । दश. १७७ । सुवर्ण । जं० प्र० २२६ । अद्विखंडं-अस्थिखण्ड । आव० ३६९ । अद्विग-अस्थिकम्-कीकसम् । भग० ३०८ । अट्ठा-अर्थक्रिया, अर्थाय यत्करणम् , क्रियाया प्रथमो मेद । अहिचम्मावणद्धे-अस्थिचर्मावनद्धम् , अस्थीनि चर्मावन- आव० ६४८। द्वानि यस्य। भग० १२५। अट्ठाणं-अस्थानम् , अयुक्तं, असाम्प्रतं वा। सूत्र० १६० । अहिज्झामे- अस्थिध्यामम् , अस्थि च तद्ध्याम च- शब्दप्रतिबद्धावसतिः । ६० तृ० १९७ आ । अग्निना ध्यामलीकृतं-आपादितपर्यायान्तरम् । भग० २१३ । अटाणट्टवणा-अस्थानस्थापना-गुर्ववाहादिके अस्थाने प्रत्यु- | अद्वितग्गाम-अस्थिकग्रामम् , पूर्व वर्द्धमानकनामकम् । पेक्षितोपधे स्थापन-निक्षेप । ठाणा० ३६२ । अट्ठादंडे-अर्थाय-शरीरस्वजनधर्मादिप्रयोजनाय दण्ड -त्रस- अडिभंजणं-अस्थिभञ्जनम् , कीकसामईनम् । प्रश्न. २२ । स्थावरहिंसा। सम० २५ । अद्विमिंज-अस्थिमिज-त्रीन्द्रियजीवविशेष । उत्त० ६९५ । अट्ठावय-(अष्टापदः) पर्वतविशेषः । आव० ८२७ । अट्टिमिंजा-अस्थिमिजा, अस्थिमध्यम् । सूत्र० ४०८ । भग अट्ठापदं-अर्थात्पदम्। आव० ३५२ । अट्ठारसवंको - अष्टादशवक , ,अष्टादशसरिको हार.। अट्ठिय-आर्थिक , अर्यत इत्यर्थ.-मोक्षः, स प्रयोजनमस्येति अर्थ. स एव प्रयोजनरूपोऽस्यास्तीति। उत्त० ६५। . अट्ठारसवंजणाउलं-अष्टादशव्यञ्जनाकुलम् । सूर्य० २९३ । अट्ठियकढुट्टियं-अस्थिकाष्ठोत्थितम् । उत्त० ३२९ । ठाणा० ११७ अहियगाम-अस्थिकग्राम-श्रीवीरस्य प्रथमचातुर्मासंग्राम। अट्ठावए-अष्टापदम् , द्युतम् , अर्थपद वा। दश०- ११७ ॥ भग०६६१॥ अट्ठावओ-पर्वतविशेष । आव० १४८ । अहिलग्गो-मुष्टिं कृत्वा । आव० ६९० । अट्ठावयं-अष्टापदम् । जीवा० २७६ । अर्थपदम् । आव० महिलगो-अस्थि (बीजम् )। नि० चू० प्र० ५६ आप ४१२ । शारिफलकबूतं तद्विषयकलाम् । ज० प्र० १३७ । अहिसरक्खा-अस्थिसरजस्को-कापालिका । व्य. द्वि० यूतफलकम् । प्रश्न. ८४ । पर्वतविशेष, । आव० १५१ । २७३ आ। द्यूतकीडाविशेष । सूत्र० १८१1 यूतफलक, कैलाश पर्वत- | अहिसेणा-वत्सगोत्रान्तर्गतं गोत्रम् । ठाणा० ३९० । विशेषो वा। प्रश्न. ७० । अष्टापट, पर्वतविशेष । आव. अहि-अस्थि-मजा । अनुत्त० ५ । एसरक्खा । नि० ० ८२७ । यतफलकम् । ज० प्र० ११४ । द्वि० १७२ । अट्ठावयसेलसिहरसि - अष्टापटशैलशिखरे । ६० प्र० अहुप्पत्ती-ववहारो। नि०, चू०, तृ० १०१ भ! अढे-अर्थ , भाव । भग० ३८ । आव० १८९ । ५२६ । - आव० ६८१। t . १५८॥ (३१) [ अट्रेति आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अणंगकीडा] - । । -- -- ८८८। - . । अट्टेति-निवसति । नि० चू० द्वि० ६२ आ । अडुयालित्ता-आश्रिन्य, बलात्कारं कृत्वा । दश० ३८ । अट्टो-अर्थित्वं च धर्मः । आव० ३४१ । अर्थ-विज्ञानम् । अडेइ-चढापयति, लगयति । आव० ६९० । सूत्र. ३९८ । अर्यन इत्यर्थो मोक्षः । उत्त० ६५ । अडो-लोमपक्षिविशेष । जीवा० ४१ । अष्ट्रियकप्पा-मभ्यमजिनाना महाविदेजिनानां वा साधवः । अडोलिया-यवोनाम राजा तस्य दुहिता । बृ० प्र० १९१ वृ० त० २५४ आ। अ। उंदोइयाए। वृ० प्र० १९१ ।' अडडिमकुदंडिम-अदण्डिमकुदण्डिमम् , दण्डोनिग्रहस्तेन । अंड-तिर्यग्वलितम् । जीवा० २०७। तिर्यक् । आव० ३६० । निवृत्त राजदेयतया व्यवस्थापित दण्डिमं, कुदण्ड -अस- | अड्डपल्लाणं-लाटविषये प्रसिद्धम् , यदन्यविषये थिल्लीरिति म्यग्निग्रहस्तेन निर्वृत्तं द्रव्यं कुदण्डिम, ते अविद्यमाने यत्र रूढम् । जीवा० २८२ । प्रमोदे स: । विपा० ६३ । अडया-कंबिका । नि० चू० प्र० १६७ अ । थिली । भग० अडडं- चतुरशीतिरडडाजशतसहस्राणि । जीवा० ३४५ । ३९९। अडडंग-अडडाग, चतुरशीतित्रुटितशतसहस्राणि । जीवा० अडवियड-अर्दवितर्दम्-क्रमहीनम् । ओघ०. १७७ । विप्र- ३४६ । सख्याविशेषः । ठाणा ८६ । भग० कीर्णम् । नि० चू० तृ. १३ अ । अडडागः, सख्याविशेष. । सूर्य० ९१ । अडुवियडा-अक्रमम् । ओघ. १७६ । अडडाति-सख्याविशेष.। ठाणा० ८६ । अडिया-अडिका, द्वात्रिंशत् , लौकिक्रमबद्धकरणम्.। आव० अडडे अडड , सख्याविशेष.। सूर्य० ९१। भग० २१०, ४६५ । २७५, ८८८। अह-आट्यम्', परिपूर्णम् । औप० १०१। अध्यालं-अष्टचत्वारिंशत् , प्रशस्तं वा। जीवा० १६० । अढ-आब्य , धनधान्यादिभि. परिपूर्ण । भग० १३४ । अडयालशब्दो देशीवचनत्वात् प्रशंसावाची । प्रना० ८६ । अड्डग-आख्य , सम्पन्न.। आव० २६४ । देशीगब्द. प्रशसावाची अष्टचत्वारिंशद्रोदभिन्नविच्छित्तय अवरत्त-अर्द्धरात्र , निशीथ । दश० १०४ । आर्धरात्रिक । । कृता वनमाला येषु तानि। जं० प्र० ७६ । व्य. द्वि० २५५ आ । अडयालकोटगरइय - अष्टचत्वारिंशद्भेदभिन्नविचित्रच्छ- अट्ठाई-धनवन्ति । ठाणा० ४२१ । न्दगोपुररचितानि । सम० १३८ । अड्ढाइजा-अर्द्धतृतीयानि । आव ३९ । अडयालकोट्टरइयं-अष्टचत्वारिंशत्कोष्ठकरचितम् , अष्ट अड्ढायति-आद्रियते । आव० ८४८ । चत्वारिंशद्भेदभिन्नविच्छित्तिकलिता कोष्ठका - अपवरका अड्ढेऊण-अवष्टभ्य । आव० ६२० । । रचिता -स्वयमेव रचना प्राप्ता येषु तत् । प्रशस्तकोष्ठक- अड्डेज - आढ्यत्वं-धनपतित्वं मुखकारणत्वात्सुख अथवा रचित वा । जीवा० १६० । आढये क्रियमाणा इज्या-पूज्या आन्यज्या । ठाणा० ४८८ । अडयालिय (ल)-शब्द. किल प्रशंसावाचेकः । मम० अड्ढोकंति-अर्धापकान्त्या। नि० चू० प्र० ११७ आ। अड्ढोकंती-अर्धापकान्ति । बृ० द्वि० १९ अ। अडविंगतो-देस देसेण हिंडइ.। व्य; प्र० १६२ अ । अड्ढोरुगो-क्रटिविभागाच्छादक निग्रंथ्युपकरणम् । ओघ० अडविणीहुत्तं - अटवीनि मृतम् , अरण्यानिष्क्रान्तम् । . २०९। निर्ग्रन्थ्युप्रकरणविशेष । नि० चू० प्र० १७९ आ । उत्त० ३७५। अणं-कम्म । दश वृ० १४५। पापम् । विशे० ११०९ । अडविमिगी-अटवीमृगी। आव० ३९२ । अणं-अगति-गच्छति तासु तामु , जीवां योनिप्वनेनेति अडवी- अटवी, अटव्यो-दूरतरजननिवासस्थाना भूमय । पापम् , सावद्ययोग वा। आव०.३७३ । कर्म । आचा० ज० प्र०६६। १४७ । ऋणम् ; कर्म । दश २६२ । अडिला-चर्मपक्षिविगेप। जीवा० ४१ । अडिल्ला, चर्मप- अणंगकीडा-अनङ्गक्रीडा, अनङ्ग-कुचकक्षोरुवदनादि, मोहो- क्षिविशेष । प्रना. ४९ । व्योदतस्तीवो मैथुनाध्यवसायाख्य कामो वा, तेन तस्मिन + १३८ । - - (३२) . [अणंगपडिसेवणी अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अणंतवत्तियाणुप्पेहा ] 1 . २०९ । - वा क्रीडा कृतकृत्यस्यापि,स्वलिङ्गेनाहायें, काष्टफलपुस्तमृत्ति- | अणतजीविया-अनंतजीविका-पनकादयः । ठाणा० १२२ । काचर्मादिघटितप्रजननोषिदवाच्यप्रदेशासेवनम्।। आवक अणतणाणी-अनन्तज्ञानी, केवली । आव० ६६२ । ८२५ । कुचकक्षोरूवदनादिमोहोदयोद्भुतस्तीवो मैथुना अणंतते-अनन्तकम्-एकश्रेणिक क्षेत्रम् । ठाणा० १४७ । ध्यवसायाख्य काम :। आव० ८२५ । मैथुनादावर्थक्रिया- अणंतमिस्सिया- अनन्तमिश्रिता, मूलकादिकमनन्तकाय सम्प्राप्तकामस्य चतुर्दशो मेद' । दशः १९४ । तस्यैव सत्कै परिपाण्डुपत्रैरन्येन वा केनचित्प्रत्येकवनस्पतिना अणंगपडिसेवणी-मैथुने प्रधानमङ्गं मेहनं भगश्च तत्प्र मिश्रमवलोक्य सर्वोऽप्येषोऽनन्तकायिक इति वदतो भाषा। तिषेधोऽनङ्ग तेनानझनाहार्यलिंगादिना अनगे वा-मुखादी प्रज्ञा० २५९ । ठाणा० ४९० । प्रतिसेवाऽस्ति यस्या अनग वा-काममपरापरपुरुषसपर्कतो- | अणंतमीसग-अनन्तमिश्रा, सत्यामृपाभापामेद । ऽतिशयेन प्रतिषेवत इत्येवंगीलाऽनङ्गप्रतिषेविणी। ठाणा० । ३१३ । अणंतयं-अनतकम्-जिनम् । सम० १५३ । अणंगसेण-सुवण्णगागे, भद्रविमर्गे दृष्टान्त । नि, चू० अणंतरं-अनन्तरम् , बहिर्भूतम् । सूर्य० ३४ । सम० तृ० ५ अ। १२८ । अणंगसेणा-अनगसेना, गणिकामुख्या। अन्त० २-1 अणंतरगढिया-अनन्तरग्रथिता, अनन्तर- व्यवस्थापित अणंगसेणो-चम्पावास्तव्य स्वर्णकृत् , हामाप्रहासालुब्ध । ग्रन्थिभिः सह प्रथिता (जालिका) । भग० २१४ । वृ० द्वि० ४४ अ। अणंतरपजता-अनन्तरपर्याप्तका -प्रथमसमयपर्याप्तका। अणगरति-अनङ्गक्रीडा । वृ० तृ. १०७ आ । ठाणा० ५१४ । अणतं-अनन्तम । विशे० ३९६। केवलात्मनाऽनन्तत्वात् । अणंतरपुरक्खडे-अनन्तरपुरस्कृतः, अनन्तरं-अव्यववा- जीवा० २५६ । अनन्त , अनन्तार्थविषयज्ञानस्वरूपत्वा नेन पुरस्कृत -अग्रेकृतो य स । सूर्य० ९० । । दन्तरहित । भग० ७, सम० ५। अपरिमाणम् । भग० ६६ । अणंतरबंधे-येषा पुद्गलाना बद्धाना सतामनन्तर समयो अनन्तकर्मपुद्गलनिर्वृत्तत्वातदनन्तमिति अनन्ताना वा भवाना वर्तते तेषामनन्तरवन्ध । भग० ७९१ । तुर्यत्तदनन्तम् । ओघ० १२८ । अणंतरहिता-अते ठिता-अता न अता-अनता सचिता। अणंतकायं-मूलकादिकम् । प्रज्ञा० २५९ । नि० चू० प्र० २५५ आ । नि० चू० द्वि० ८२ आ । अणंतकिरिया-अनन्तक्रिया, परम्परामुक्तिफला । उत्त० अणंतरहियाए - अनन्तर्हि (रहि)तया - अव्यवहितया । आचा० ३३७ । अणतखुत्तो-अनन्तकृत्व , अनन्तवारान् । भग० १३० । अणंतरा-अनन्तरौ, एष्यातीतौ । आव० ७६९। अणतग-कम्बलादिवत्रम् । ओघ० ३४ | अणंतरिया-अनन्तरिका, अन्तरस्य विच्छेदम्य करणम् । अणंतगमजुत्त-अनन्ता-अपर्यवमिता गम्यते वस्तुस्वरूप भग० २२० । मेभिरिति गमा-वस्तुपरिच्छेद ।कारा नामादयस्तैर्युक्तानि- अणंतरो-अनन्तर -वर्तमान समय । ठाणा० ५१४ । अन्वितान्यनन्तगमयुक्तानि । उत्त० ३४२ । अणंतरोगाढं-अनन्तरावगाढम् , येषु प्रदेशेष्वात्मावगाट- अणंतगुणपरिहाणीप - अनन्तगुणपरिहागि , अनन्तगु स्तष्वेव यदवगाढ तदन्तगभावेनावगाढत्वादनन्तगवगा. थाना परिहाणि । ज० प्र० १२९ । ढम् । भग२१ । अव्यवधानेनावगाढम् । जीवा० २० । अणतगुणविसिट्टतरा - अनन्तगुणावशिष्टतग । सूर्य० । अणंतरोगाढे-उत्पत्त्यनन्तरसमयावगाढत्वम् । भग० ९३७ । अणंतरोववण्णगा-उपप(प)निप्रथमसमयवर्तिन । प्रजा अणंतघाई-अनन्तघातिन-अनन्ने ज्ञानदर्शने हन्तु गील येषा ३०४ । ते। उत्न. ५८० अणंतवत्तियाणुप्पेहा - अनन्तवर्तितानुप्रेक्षा । अणतजिणेण-गगषजेता, जानी नित्यश्च । आचा० ४३ ०।। १९२ । भवसन्तानस्यानन्तवृत्तिनानुचिन्तनम् । औप० ४५ ५८३। २९४ । ठाणा (३३) [ अणंतविजए आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अणञ्चाविअं] - १४॥ ६४ । अणंतविजए-आगामिन्यां उत्सर्पिण्या भरते चतुर्विशे जिन अणईइपत्तो-अनी.तपत्र , न विद्यते ईति -गडरिकादिरूपेति नाम । सम० १५४ । ऐरवते भविष्यजिन । सम० १५४ । रहितपत्र. । जीवा. १८८ । अणंतवीरिय-अनन्तवीर्य । आव० ३९२ । अणकरो- ऋणकर, ऋणं-पापं करोतीति, प्राणवधस्य अणंतसंजयं-एकेन्द्रियादिषु सम्यग् यतः । आचा० ४२९ । चतुर्विशतितम पर्याय.1 प्रश्न. ६॥ अणंतसंसारा-अपर्यवसितससारा अभव्या । बत्त० ७१३ । अणको-अणक चिलातदेशवासी म्लेच्छविशेष.। प्रश्न अणंतसंसारवडणा-अनन्तससारवद्धन. । उत्त० ३३० । अणंतसेणे अनन्तसेन , अन्तकृद्दशानां ' तृतीयवर्गस्य अणक्खित-परीक्षित । नि० चू० द्वि० ८१ आ। द्वितीयाध्ययनम् । अन्त० ३। भरतेऽतीतोत्सर्पिणीकुलकर 1 अणगार-अनगार', सूत्रकृताङ्गे पञ्चममध्ययनम् । आव० सम० १५० । ठाणा० ५१८ । ६५८ । साधु । दश० ६२ । सूत्रकृतास्यकविंशमध्ययनम् । अणंतसो-अनन्तश', अविच्छेदेन । सूत्र० ३४ । उत्त० ६१६ । चतुर्दशशतके नवमोद्देशक । भग० ६३० । अणंतहिअ-अनन्तहितम्-मोक्ष. । दश० २५० । द्रव्यतो भावतश्वाविद्यमानागार । दश. १५९ । न विद्यते- अणंता-तित्थकरा। वृ० प्र० २२४ आ । ऽगार गृहमेषामित्यनगारा.-यतय । आचा० ३६ । तीर्थिक- अणंताणुवंधी-अनन्तानुवन्धी, अनन्तं ससारमनुवघ्नन्ती प्रव्रजिता । आचा० ३०९ । अनगारी-यति. उत्त० ५७८ । त्येवंशील । प्रज्ञा० ४६८ । षोडशकषाये प्रथमो मेद । सम० साधु. | आव० ३२९ । ३१, आचा० ९१ | अनन्तं भव अविच्छिन्न करोति, | अणगारमग्गे-उत्तराध्ययने पचत्रिशत्तमाध्ययनम् । सम० अनन्तो वाऽनुवन्धो यस्य । ठाणा० १९४ । अणंतियं-अनन्तिकम् , नबोऽल्पार्थत्वान्नात्यन्तमन्तिकम- अणगारसुयं-सूत्रकृताने एकविंशतितमाध्ययनम् । ममः दूरासन्नमित्यर्थ । भग० २१७ । अनासन्नम् । भग० २१७ । ४२ ॥ अणंतेहिं-अनादित्वात् अनन्ता । भग० ६१० । अणगारस्सभिक्खू-अनगारास्वभिक्षु , अस्वेषु भिक्षुरस्त्र- - अनन्तः अनन्तकांगजयात् , अनन्तानि वा भिक्षु -जात्याद्यनाजीवनादनात्मीकृतत्वेनानात्मीयानेव गृहि- ज्ञानादीन्यस्येति, चतुर्दशो जिन', रत्नखचितमनन्त दाम णोऽन्नादि भिक्षत इतिकृत्वा, स च यतिरेव, ततोऽनगा- स्वप्ने जनन्या दृष्टमतः। आव० ५०४। अपर्यवसित । रश्चासावस्वभिक्षुध । उत्त० १९ । उत्त० २१३ । अनन्तानामेकैक शरीरम् । ओघ० ३४ । अणगारिय-अनगारिक ( अनगारितं वा), अनगारेषु-भाव- अणंधो-राजविशेष । नि० ० चू० द्वि० ४२ आ । मिक्षुषु भवं अनुष्ठानम् । उत्त० ३३९ । अणंविलं-अनाम्लम्-स्वस्वादादचलितम् । आचा० ३४६ । अणगारे-अनगार , न विद्यते अगारं-गृहं यस्यासी माधु । अण-अगा , अणन्ति-शब्दयन्ति अविकर हेतुत्वेनासातवेद्य जीवा० १४२ । भावितात्मा लब्धिसामर्थ्यात्। भग नारकाद्यायुष्कमिति, अनन्तानुवन्धिन. क्रोधादयो वा । ५९६ । न विद्यते अगारं-गृहं द्रव्यतो मावतश्च यस्यासौ आव० ८१ । नारकाद्यायुष्क च शब्दयन्त्याकारयन्तीत्यणा सयत इति । प्रज्ञा० ३०३ । न विद्यते अगार-गृहं यस्य स । अना. । विशे० ५६१ । सूर्य० ४ । अगा:-वृक्षास्तैर्निष्पन्नमगारं तन विद्यते त्यक्तर- अणइक्कमणाइ - अनतिक्रमगं, सयमयोगानामनुल्लचनम् । हपाश । आचा० ४०३ । उत्त० ५४३ । अणगारो-ऋणकार , ऋणमिव कालान्तरफ्लेशानुभवहेतु- अणइक्खा-अनाख्याता । (गणि०) तया ऋणम्-अष्टप्रकारं कर्म तत् करोतीति, तथा तथा अणइवत्तिय - अनतिपत्य-यथावस्थित वस्त्वागमामिहितं गुरुवचनविपरीतप्रवृत्तिभिरूपचिनोतीति । उत्त० २० । तथाऽनतिक्रम्य। आचा० २५६ । अणगालो-दुष्काल । वृ० तृ. २३ अ । अणइवरं-अनतिवर, अविद्यमानहामतया प्रधान न विद्यते | अणघा-गिरोगा। नि० चू० प्र० ८० अ । ऽतिवरं यस्मानत। औप. ४ । अणच्चावि-अनर्नायितम। ओघ, १०९ । 4 (३४) ५ [अणञ्चावित अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अणमिग्गहिओ.] A , २०९। प्रश्न० ४० । १० आ। अणश्चावित-वस्त्रमात्मा वा यत्र न नर्तित । ठाणा० ३६१। अणत्ते-ऋणपीडित.। ठाणा०. १६५ । । प्रस्फोटन प्रमार्जनं वा। उत्त० ५४० । अणत्थको-अनर्थक, परमार्थवृत्त्या — निरर्थक , परिग्रह अणञ्चासादणाविणए-आशातना तनिषेधरूपो विनयो स्याष्टाविंशतितम नाम। प्रश्न. ९३। ऽनत्याशातनाविनय.। भग० ९२२ । अणत्थदंडे-अनर्थदण्डः, अप्रयोजनदण्ड.। आव० ८३० । अणज-अनार्यम अनार्यवचनत्वात् . अधर्मद्वारस्य | अणथमियसंकप्पे - सूर्यानस्तसमयभोजनसकल्पवान् । तृतीय नाम । प्रश्न० २६ । वृ० तृ० १७९ अ । अणजधम्मे-अनार्यधर्म , करकर्मकारी। सूत्रः १५८ । अणत्थो-अनर्थ अपाय । प्रश्न० ६२। अनर्थहेतुत्वात् अणजभावे-अनार्यभाव क्रोधादिमान् । ठाणा० परिग्रहस्यैकविंशतितमं नाम । प्रश्न. ९२ । अणजे-अन्याय्य , न न्यायोपेत । प्रश्न० ५। अणदिट्ट-अनादिष्टं-अविशेषितम्। बृ० तृ० ६६ अ। अणजो-अनार्यः, म्लेच्छचेष्टित । दश० २७५ । पापकर्मा। | अणन्नदंसी-अनन्यदशा-यथावस्थितपदार्थदृष्टा, भरावदुप- देशादन्यत्र न रमते। आचा० १४५ । अणज्झाए-अकाले, अस्वाध्यायिके वा। नि० चू० प्र० अणन्नपरम-अनन्यपरम -सयम । आचा० १६६ । अणनारामे - अनन्यारामो-मोक्षमार्गादन्यत्र न रमते । अणट्टा-अनार्त -आर्तध्यानविकल । उत्त० ४४८ 1 सकल आचा० १४५। दोषविगमतोऽबाधिता। उत्त० ४४९ । अणपज्झो-अजाणमाणो । नि० चू० प्र० ११९ अ । अणट्ठा-अनर्थक्रिया, अनर्थाय यत्करणम् , क्रियाया द्वितीयो | अणपन्निय-अवान्तरव्यन्तरमेद । जीवा० १७२ । मेद । आव. ६४८ । अणप्पगंथो-अनल्पग्रन्थ (अनर्प्यग्रन्थ ) बबागम अवि- अणट्ठादंडे-अर्थविलक्षणो दण्ड । सम० २५ । द्यमानो वाऽऽत्मन सम्बन्धी ग्रन्थो-हिरण्यादिर्यस्य सः । अणणुगामी-अननुगामुक -स्थितप्रदीपवत् । आव० ४२ । भावधनयुक्त । औप० ३७ । अणण्णं-अनन्य -ज्ञानादिक । आचा० १६३ । अणप्पज्झ-(देशी) अनात्मवशः। वृ० द्वि० २०९ अ. अणण्हकर - 'स्नु-प्रश्रवण' इति वचनात् आस्नव - अणप्पज्झो-अनात्मवश । बृ०' तृ० २५८ अ। आश्रव कर्मोपादान तत्करणशील आस्नवकरस्तभिषेधा- | अणप्पियं-अनर्पितविषयविभागम् । बृ० तृ० ११० अ । दनास्नवकर -प्राणातिपात द्याश्रववर्जित इत्यर्थ । ठाणा. अविशेषितम् । ठाणा० ४८१। अणप्फिडत-अचलत् । नि० चू० द्वि० २२ अ । ' अणण्हय-अनाधव । आव २८० । अणवलो-ऋणबल , बलवानुत्तमर्ण । प्रश्न० ३० । अणण्हयत्तं-अनहस्कत्वम्-अविद्यमानकर्मन्व। उत्त० ५८६। अणभुवगओ-अन भ्युपगतः, श्रुत् सम्पदाऽनुपसम्पन्नोऽनि- अणण्हयफले-अनाश्रवफल , सयम । भग० १३८ । वेदितात्मेत्यर्थ ।' विशे० ६२५ । अणति-प्रज्ञापयति । उत्त० १२८ । शब्दयति । अणभअक:-ऋणं-देय द्रव्य भञ्जति-न ददाति य स । ७८८ । आदते-गृण्हाति। नि० चू० द्वि. ९ आ। प्रश्न० ४६। अणतिक्कमणिज-अनतिकमणीयम् , अचालनीयम् । भग० अणभिकंत-अनमिक्रान्त , अनतिलचित.। आचा० १९३ । १३५॥ नाभिकान्ता जीवितादनभिकान्ता सचेतनेत्यर्थ । आचा. अणत्तट्टिए-अनात्मार्थिक , नात्मार्थ एव यस्यास्त्यमों पर- मार्थकारी। प्रश्न ५११ । अणभिगताणं-अपरिगता। बृ० प्र० १३० अ । अणत्तट्टियं-अस्वीकृतम्। आचा० ३२५ । अणभिग्गहिओ- अविद्यमानमभीति-आभिमुख्येन गृहीतं अणत्तपन्ने-अनात्मप्रजा -नात्मने हिता प्रज्ञा येषा ते ग्रहण-ज्ञानमस्येत्यनभिगृहीत - अनभिज्ञ । उत्त० ५६५ आचा० २३४ । अनङ्गीकृता । उत्त. '५ । - आव० (३५), [अणभिग्गहिय आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अणसणं ] । . . अणभिग्गहिय - न विद्यते आभिमुख्येनोपादेयतया गृहीतं- ४७४ । सामायिकम् । आव० ३६४ । पापानुवन्धरहितम् । ग्रहणमस्येत्यनभिगृहीत । प्रना. ६०) अनिश्चितमशिवा दश० ११५। दिभिनिर्गमभावात् । ठाणा०० ३०९ । अणवज्जय-अणवर्ण्यता, पापवय॑ता। आव० ३७३ । अणभिग्गहियमिच्छादसणवत्तिया - अनभिगृहीतमि- अणवज्जुत्तो-तत्रस्थ , अपृथग्भूत । आव० ७५८ । थ्यादर्शनप्रत्ययिकी, जेहिं न किंचि कुतित्थियमय पडि- | अणवट्टप्पा-अनवस्थाप्य -नावस्थाप्यते-नाधिक्रियते। ठाणा वण्ण | आव० ६१२ । १६४ । कृततपसो व्रतारोपणम् । भग० ९२० । अणभिग्गहिया-अनभिगृहीता, अनभिग्रहा यत्र न प्रतिनि- अणवठ्ठप्पारिहे-कृततपसो व्रतारोपणम् । भग० ९२० । यतार्थावधारण सा भाषा ।' प्रज्ञा० २५६ । असत्यमृषा- अणवट्ठया-अनवस्थाप्यता, हस्ततालादिप्रदानदोषाद्दुष्टतर- भाषांमेट । दश० २१० । अर्थानभिग्रहेण योच्यते । भग० परिणामत्वाद् व्रतेषु नावस्थाप्यते इति अनवस्थाप्य , तद्भाव । ५००। आव० ७६४ ठाणा० २०० । अणभिजोर-अनभियोग , इच्छा । आव० ६६८ । अणवडिओ-अनवस्थित । बृ० प्र० १२५ अ । अणभिहियं-अनमिहितं, अनुपदिष्ट स्वसिद्धान्ते सूत्रदोप- अणवट्टियं-अनवस्थित, मन्ततम् । जीवा० ३४५ । अनि- विशेष । आव० ३७५ । यतप्रमाणम् । सूर्य० ८७। अणमिजय-अच्छिद्रे, अभिन्ने । (मर०) अणवट्ठिया-नावश्यभाविन । ठाणा० ३७४ । अणराए-रण्णो कालगते-भिए वि जाव णो राया ठवि- अणवट्ठिया-अनवस्थिना-यन पुन प्रतिसेदितेनोत्थापना- या अप्ययोग्य सन कचित्काल न व्रतेषु स्थाप्यते यावन्नाद्या- जति । नि० चू० तृ० ७१ अ। पि विशिष्ट तपश्चीर्ण भवति पश्चाच्च चीनपास्तदोषोपरतो अणरायं-राजयुवराजोभयाभिषेकरहितं राज्यम् । बृ० द्वि० ८२ अ। मते रायाणे जाव मूलराया युवराया य एते दोवि व्रतेषु स्थाप्यते । व्य० प्र० १४ आ । अणवत्था अणभिमित्ता। नि० चू० द्वि० १० आ। अनवस्था, यद्यकार्यममाचरणात्प्रायश्चित्त न दीयते क्रियते वा सा। ओघ. २२७ । अणलगिरि-अनलगिरि । आव. २९९ । अणवदग्गं-अनवटग्रम् , अनन्तम् । प्रश्न० ६३ । ठाणा० अणला - अपर्याप्ता , दीक्षापालनेऽसमर्था । वृ० द्विः १२० । औप० ४८ । अपर्यवमानम् । सूत्र. ३७२-1 अणवनिय - अणपन्निका , व्यन्तरनिकायानामुपरिवर्तिनो अणलो-अनल., असमर्थ । आव० २५९। वेयावच्च व्यन्तरजातिविशेषा । ६९। वाणमन्तरविशेष । प्रति सुत्ते अत्थे अभिगमे परिहरणे । नि० चू० द्वि० ४९ आ। अणवयक्खित्ता-अन्वेश्य पश्चादागमनवलोक्य। भग० अणल्लिअंता-अनाश्रयन्त । ओघ० ९७ । ३१२ । अणवः-स्वत्पा । उत्त० ४२० । अणवयग्गं-अनवन ताग्र-अपर्यन्तम् । ठाणा० ४४ । अनन्त, अणवं-ऋणवान । सूर्य. १४६ । ज० प्र० ४९१ । अपार, अनवनताग्र-अनवनत-अनासन्न अग्र-अन्तो यस्य अणवकंखवत्तिया-अनवकाक्षाप्रत्ययिकी, विशतिक्रिया- तत् । अनक्मतीन-अनवगत-अपरिच्छिन्न अग्र-परिमाण मध्ये पञ्चदशी। आव० ६१२। अनवकाक्षा-स्वशरीराद्य- यस्य तत् । भग० ३५ । कालतोऽपरिमाणम् । व्य० प्र० नपेक्षत्व सैव प्रत्ययो यस्या सा । ठाणा० ४३ । इहलोक- २५५ अ। परलोकापायानपेक्षस्येति । ठाणा० । ३१७ । अणवयग्ग-अनवदत् , अनपगच्छन् । उत्त० ५८५ । । अणवगल्ल-अनवकल्प , जरमा अनभिभृत. । भग० २६ अणविक्खया-अप्रेक्षणा ( गणि. ।) अणसणं-अनशन; भोजननिवृत्ति । औप. २७ । बाह्यतपो- अणवजं- अनवद्यम् , मामायिकदशमपर्याय। आव० २८७ आ। प्रश्न. प्रझा० ९५ । ज० प्र० ९० । ऽग । उत्तर ६००। (३६) [ अणसण अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अणागारं] - - - - अणसण-अनशनम् , आहारत्याग.। दश० २६ । भग० अकलुष. । प्रश्न० १११ । अकलुषः,शुद्धस्वभाव.] प्रश्न ९२१1 अणसणा-अनशनम् , प्रतविशेषः, उपवास 1 भग० १२८ । व्रतविशेषः, उपवास 1 भग० १२८1 अणाइसेसि-अनतिशयी, अवध्याद्यतिशयरहितः। आव० . अणसायणा-अनाशातना, अहीलना । दश० २४१। भनो २४० । वाकायैरप्रतीपप्रवर्तनम् । उत्त० १७॥ अणाई-अनादि , नास्यादिरस्तीति ससारः। सूत्र० ३४१.। - अणसिओ- अनशित , न अशित.-भिक्षाप्रदानानभिज्ञेन अणाउट्टी-अनाकुट्टि. । आव० ३७३ । लोकेनाभ्यर्हित.। आव० १४४ । अणाउत्तं-असावधानता। औप० ४२। अनुपयुक्त. । अणहं-अनघ, अक्षतम् । सूर्य० २९२ । अणहशब्दोऽक्षत ठाणा० ४३ । पर्यायो देश्यस्तेनाणहं-अक्षतं । ज० प्र० २२१ । अणाउत्तआइयणया - अनायुक्तवस्त्रादिग्रहणता । ठाणा० अणहवीया-अविणट्ठवीया। नि० चू०प्र० ८० अ । अणहारप-ऋणधारक । विपा० ७२ । अणाउत्तपमजणया-अनायुक्तपात्रादिप्रमार्जनता। ठाणर० अणहारेणं-स्वदेशजाहाराभावेनेति । ठाणा० ५४ । ४३ । अणहिमपरमत्था-अनधिगतपरमार्था । (गणि? ) अणाउत्तो-अनाकुल -अक्षणिकता । बृ० तृ०.४४..आ।. अणहिकडा-अनधिकृता-तल्लक्षणायोगतस्तत्रानन्त विनी। अणाउल-अनाकुल, क्रोधादिरहित । दश० १६६। अणाउले-अनाकुल । आचा० ४२४ । प्रज्ञा० २४८ । अणहियासिया-अनध्यासिनी । आव० ४२८ । अणाउलो-अनाकुल: । आव० ४०४ । अणहियासी--अनधिकासिका., सञ्जावेगोत्पीडित सन् या अणाए-अनया। आव० ३९९ । याति सा। ओघ० २०० । अणाएसे-अनादेश , न आदेशः, सामान्यम् । उत्त० ३२॥ अणहे-अनघ , नास्याघमस्तीति, निरवद्यानुष्ठायी। सूत्र० अणागई-अनागति , सिद्धिः, अशेषकर्मच्युतिरूपा लोकाग्रा. काशदेशस्थानरूपा वा। सूत्र० २२३ । ६९। अणहो-अनघ., अक्षतशरीर । प्रश्न० ११५ । अणागतं-अनागतम् , अनागतकरणात् , पर्युषणादावाचा- र्यादिवैयावृत्त्यकरणान्तरायसद्भावादारत एव तत्तंप करणम् । अणाइण्णं-पणगपरिहाणीक्रमेण पत्त। नि० चू० द्वि० ८४०, ठाणा० ४९८ । १५७ ॥ अणागमणधम्मिणो-अनागमनधर्माण यस्मिन् मनुष्य- अणाइण्णा-अणासेविय । नि० चू० द्वि० १४४ आ । लोके अनागमन धर्मो येषां ते, न पुनर्गृहं प्रत्यागमनेप्सर्व । अणाइन-अनाकीर्ण -असकुल । उत्तर ४२८ । आचा० २४३ । अणाइय-अणातीतं, अनादिकं, अज्ञातिकं, ऋणातीतं अणा- अणागमो-अनागम -अनवसर. । आचा० १२२ । तीत वा, अविद्यमानादिकं, अविद्यमानस्वजनं, ऋणं वाऽ- अणागयं-अनागतम् , एष्यत्कालम् । आव० ५०९ । तीत ऋणजन्यदु स्थतातिक्रान्तम् , दुस्थतानिमित्ततयेति अणागय-अनांगताम्-आयत्याम् । आव० ५०९। अनार ऋणातीत, अणं वा अणकं-पापमतिशयेनेत-गतमगातीतम् । गत, अनागतकरणादनागतम् । भग० २९६ । भग० ३५ । आ-समन्तादतीव इतो-गतोऽनाद्यनन्ते समारे | अणागलिय-अनिर्गलित -अनिवारितोऽनाकलिन । भग आतीत , न आतीत अनातीन , अनादत्तो वा समागे येन ६७३ । स तथा, ससारार्णवपारगामी । आचा० २८६ । गारं-अनाकारम् , अविद्यमानाकारम् । आव० ८४०-1 अणाइत्तो-अनुपयुक्त । (महाप्र०) ठाणा० ४९८ । अविद्यमानाकारं-यद्विशिष्टप्रयोजनसम्भवा- अणाइयंतो-विवादानतिक्रामन् । व्य० प्र० १० अ । भावे कान्तारदुर्भिक्षादौ महत्तरायाकारमनुच्चारयनिर्विधीयते , अणाइले-अनाविल , अदीनस्य चतुर्थ नाम । अन्त० २२ । तदनाकारम् । भग. २९६ । P T . - (३७) [अणागारपासणया आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अणायण] 1 अणागारपासणया-अनाकारपश्यता-चिन्त्यमानाया प्रकृष्टं | अणादीओ-अणादिकः, अणं-पापं कर्म, आदिः-कारणं यस्य परिस्फुटरूपमीक्षणमवसेयम् । प्रज्ञा० ५३० । सः। ऋणातीतः, ऋण-अधर्मेण न देयं द्रध्यं तदतीतो. अणागारो-अनाकार., यथोक्ताकारविकल. । जीवा० १८। ऽतिदुरन्तत्वेनातिकान्त । प्रश्न० ४। अनादिकः, प्रवाहा- सामान्यग्राही । भग० ७३ । पेक्षयाऽऽदिविरहितः । प्रश्न. ४ । अणाजीवी-अनागसी । नि० चू० प्र० १८ अ । अनाजीविको- | अणादीयं-नास्त्यादिरस्येत्यनादिक । ठाणा० ४४ । नि स्पृहः । दश० १०६ । अणादेज-अनादेयम् यद्रुदयवशादुपपनमपि ब्रुवाणो नोपा- अणाडिया-अनाति. । ' आव० ९५। अपराध । बृ० देयवचनो भवति, नाप्युपक्रियमाणोऽपि जनस्तस्याभ्युत्थानादि प्र० ३० आ। समाचरति । प्रज्ञा० ४७५ । अणादायमाणे-अनाद्रियमाण.-सखडिमनादरयन् । आचा० अणापुच्छा-अनापृच्छा। आव० १९८ । ३२९ । अणावाहं-अनावाधकत्वं वेदनाभावत्ववत् । उत्त० ५१० । अणाढिअस्स-अनाहतनाम्नः जम्बूद्वीपाधिपते ।जं० प्र० अणाबाहि-अनावाध -मोक्षसुखम् । ठाणा० ४८८ । ३३४, जीवा० ३०६ । अणाभिगता-अगहियमुत्तत्था। नि० चू० तृ. १४३ । अणाढिउ जम्बूवृक्षस्थो देव' । ठाणा० ६९ । अणाभिडंतो-अस्पृशन् । नि० चू० प्र० १८७ अ । अणाढियं अनादृतम् , अनादर सम्भ्रमरहितम् ,.' कृति भणामोगं-अनाभोगम् , अतिचारविशेष । आव० ५६४ । कर्मणि प्रथमदोष । आव० ५४३ । विस्मृतिः। ठाणा० ४८५ । अणाढिय-अनादृतः, जम्बूद्वीपाधिपतिय॑न्तरसुर । उत्त० अणाभोगनिव्वसिए - अनाभोगनिवर्तित , यदा त्वेवमेव ३५२ । अनाहताद्-अनादराया सा अनादृता, शिथिलस्य तथाविधमुहूर्त्तवशाद्गुणदोषविचारणाशून्य परवशीभूय कोपं या सा। ठाणा० ४७४ । कुरुते तदा सकोप.। प्रज्ञा० २९१ । अणाणता-अनानात्वा -नानात्ववर्जिता येष्वेवाधारभूता- अणाभोगबकुसो - अनाभोगबकुश , योऽनाभोगेनाजानन् कागप्रदेशेष्वेके तेष्वेवेतरेऽपि। भग० ९६१। नानात्ववर्जिता करोति स , बकुशस्य द्वितीयो मेद । उत्त० २५६। देशभेदेनालक्षितनानात्वा । प्रज्ञा० ७४ । सहसाकारी । ठाणा० ३३७ । अनाणाए-अनाज्ञया, स्वैरिण्या बुद्धया। आचा० ११३ । | अणामोगवत्तिया - अनाभोगप्रत्ययिकी, विंशतिक्रिया- स्वमनीषिकाचरितोऽताचार.। आचा० २२७ । मध्ये चतुर्दशी। आव० ६१२ । अनाभोगेन पात्राद्याददतो भणाणुकित्ती-जो एवं ण कथयति । नि० चू० प्र० ३३३ आ निक्षिपतो वा। ठाणा० ३१७। अनाभोग-अज्ञानं प्रत्ययो- अणाणुगामिते-अवधिज्ञानस्य द्वितीयो मेद.। ठाणा ३७० । निमित्तं यस्या. सा। ठाणा० ४३ । भणाणुगामियत्ताते-अननुगामिकत्वाय-अशुभानुबन्धाय ! अणाभोगे-अनाभोग-अज्ञानम् । भग० ९१९ ।-एकान्त- ठाणा० १४९, ३५८ । विस्मरणम् । व्य. द्वि० ३३२.आ। अणाणुपुदी-अनानुपूर्वी, यत्र पूर्वपश्चाद्विभागो नास्ति ! अणामोगो-अनाभोग , अत्यन्तविस्मृति । आव० ८५० । ८० । अत्थरगहणाईए पदे अप्पत्तो। नि० चू० नि० चू० प्र० २९ आ । अज्ञान । नि० चू० प्र० १४७ आ। द्वि० ५३ अ। अनियतकमानुपूर्वी । ठाणा० ४। यथोक्तप्र विस्मृति. । आव० ८४८ । कारद्वयातिरिक्तस्वरूपा। अनु० ७३ । अणायगे-अनायक , अन्यो न विद्यते नायकोऽस्येति अणाणुवंधि-न विद्यतेऽनुबन्धः-सातत्यप्रस्फोटकादीनां यत्र अनायक'-स्वयम्प्रभुश्चक्रवर्त्यादि । सूत्र० ६१ । अविद्यमान- तदननुबन्धि । ठाणा० ३६१।। नायको राजा। सम० ५३ । मणादिट्ठी-अनादृष्टिः, अन्तकृशाना तृतीयवर्गस्य त्रयो अणायण-अनायतनम् , विरुद्धस्थानम् । 'दश२२६ ।- दशमध्ययनम् । अन्त० ३ । अस्थानम् , वेश्यामामन्तादि । दश. १६५। . ३ भग . (३८) [अणायतणं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अणिमूहियबलविरिप] ० J - अणायतणं-अनायतनं, साधूनामनाश्रय 1 प्रश्न. १३८ । अणासन्नं-अनासन्न, यद्रव्यासनं भावास वा न भवति । नि० चू० प्र० ११६ अ । स्त्रीपशुपण्डकसंसक्त स्थानम् । भोघ० १२३ । ओघ १२ । अणासवो - अनाश्रवः, मध्यस्थो रागद्वेषरहित । सूत्र अणाययणं-पशुपक्षिमद्गृहं । बृ० तृ० १९५ आ । २४४ । कर्मबन्धनिरोधोपायत्वात् , अहिंसोया पचत्रिशंत्तम अणाययण-स्त्रीपशुपण्डकससकगृहवजणं । नि० चू० तृ. नाम । प्रश्न० ९९। अनाखवा-व्रतविशेषाः । आचा० १८२ ॥ २५आ । अणासायणाविणअ- अनाशातनाविनय, उपचारविन- अणायरिया-अनार्या-अर्द्धषर्विंशजनपदबाह्यानि । आचा० यमेदः। दश. २४९ । ३७७॥ अणासेवियं-अनास्वादितम् । आचा० ३२५ । अणायवेतियं-छायायाम् । नि० चू० द्वि० ७६ आ। अणाहपव्वजा-उत्तराध्ययनस्य विंशतितमाध्ययननाम ।' अणाया-अनात्मा घटादिपदार्थ । सम० ५। सम०.६४ । अणायार-अनाचारः, सावद्ययोग.। दश० २३३ । अणाहप्पाओ-अनाथात्मानौ। आव० ७१ । अणायारो-अनाचार.। आव० ७७८ । गिलिते सति आधा अणाहसाला - अनाघशाला-आरोग्यशाला। व्य० द्वि. कर्मगि दोषविशेषः, यावलम्बनोत्क्षेपोत्तरकालम् । आव० ५७ आ। नि० चू० द्वि० ३८ आ। ५७६ । व्यभिचारः। आव० ५७८ । आचारस्य साध्वा- अणाहसालालंओ-अनाथशालालयः । आचा.. ११९ । - चारस्याभाव परिभोगतो ध्वंस.। व्य० प्र. ९० अ । अणाहारो-अनिष्ट शोभनमपि न रोचते परि अणाहारो अणारखं-अनारब्धम् , अनाचीर्णम् । आचा० १४८ । भवति । नि० चु० द्वि० ५१ अ। अणारिओ-अनार्यः म्लेच्छादिः । प्रश्न० ५। करकर्माण । अणाहूय - अनाहूत., अनित्यपिण्ड , अनभ्याहृतो वा, आचा० १८६ । स्पर्धारहितः। भग० २९३ । भग० २९४ । अणारिय-आचार्य मुक्त्वा । बृ० प्र० २४५ अ । म्लेच्छा । अणिंगालं-रागपरिहारेणेत्यर्थः । प्रश्न० ११२ । ठाणा० ३०९। अणित-अनिर्गच्छन् । नि० चू० प्र० २५८ मा । अणारिया-कामकहा। नि० चू० प्र० २५८ अ । अनार्य - | अणिदियं-अनिन्दितं-शिष्टनिन्येन - स्वपरप्रशंसादिहेतुना क्षेत्रभाषाकर्मभिर्वहिष्कृतः। सूत्र. ३९३ । उत्त० ३५८ । नुत्पादितम् । उत्त० ६६७ । अनार्यः-न आर्य, अज्ञानावृतत्वादसदनुष्ठायी। सूत्र० ३३ । अणिदिआ अनिन्दिता, अष्टमी दिकुमारी । ज० प्र० ३८३ । अणारोहए-अनारोहक , योधवर्जित.। भग० ३२२ । अणिदिया- अनिन्दिता, अधोलोकवास्तव्या दिकुमारी। अणालावे-अनालाप.-कुत्सित आलापः। ठाणा० ४०७ ॥ अणालिओ-अचेष्टा। आव० ३७० । अणिदिया - अनिन्द्रिया अपर्याप्ताः, केवलिन , सिद्धा. अणावडतो-अस्पृशन् । नि० चू० प्र० १८७ अ । उपयोगत.। ठाणा० ३५५, ५१९ । अणावसं-अवशम् । (मर०) अणिगणा-अनमा, अनमा नाम द्रुमगणा- ज० प्र० ९१ अणावाय-अनापात.। आचा० ३३५१ अनापात-आपा- अणिगामसुक्खा-अनिकामसौख्या.-अप्रकृष्टसुखा । उत्त. तादिरहिता उच्चारभूमी । दश० २३१ । उत्त० ५१८ 1 विज- नम् । आचा० ३३९ । स्न्याद्यापातरहित । उत्त० ६०८1 | अणिगिण- अनमत्वम् , सवंत्रत्व तद्धेतुत्वादनमा इति । अणावायमसंलोए-अनापातासलोकम् । ओघ० १२२ ॥ अणाबाहो-मोक्खो।' दश० चू० १३ । अणिगृहंतो अनिगूहन् , प्रकटयन् । आव० .५३४ । अणासगं-परिज्ञा। नि० 'चू० प्र० ३५२ आ। अनशनं । अणिगूहियवलविरिए - अनिगृहितबलवीर्यः, न निगृहिते निं० चू० प्र० २५८ अ । बलवीर्य येन स वलं-शारीरं वीर्य-आन्तर. शक्तिविशेष । अणासप-अनश्व', अश्वरहित । भग. ३२२ । ' आव० २५९ । . आव० १२१ । ४०० । सम० १८। (३९) [ अणिग्गहो- आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अणिसिटुं] - १ . अणिग्गहो-अनिग्रह , अनिषेधो मनसो विषयेषु प्रवर्तमान- अणिद्यत्तियं-(अणिज्जंत) कम्म ण कारविजति । नि० . स्य, अब्रह्मण एकादशं नाम । प्रश्न. ६६ । स्वैरः। चू० द्वि० १०६ अ। प्रश्न० ३१ । अणिमिसच्छो-अनिमेषाक्ष , निश्चलनयनः । आव० ७८४ । अणिश्चं-अनित्यम् , 'न नित्यमस्थिरत्वात् । प्रश्न० ९६ । अणिमिसनयणे-अनिमिषनयनम् , विकसित नयनम् । अणिच्चमावासं-अनित्यावासः-मनुष्यादिभवस्तच्छरीरम् । भग० १७१। अणिमिसा-अनिमेषा। आव० १२४ । आचा० ४२९ । अणिचाणुप्पेहा - अनित्यानुप्रेक्षा-जीवितादेरनित्यस्यानु- अणिमिसे-अनिमिषा , मत्स्या । दश० १०२ । प्रेक्षा । ठाणा० १९० ॥ अणियं-अणिकं, अग्रम्-तुण्डम् । प्रश्न० ११५ । अनीकं-कट- अणिश्चेऊण-अ(न)र्चयित्वा । आव० १४६ । कम्.। उत्त० ४३८ । अणिच्छियत्ता-अनीप्सितता, आप्तुमनिष्टता । भग० २३ । अणियट्ट-अनिवर्तः, मोक्षः । आचा० १९३ । प्राप्तुमनभिवाञ्छितत्वम् । भग० २५३ । प्रज्ञा० ५०४ । अणियट्टिबायरो-अनिवृत्तिवादरः, निवृत्तिबादरादूर्ध्व लोभा. मणिच्छियव्वो-अनेष्टव्यः, मनागपि मनसाऽपि न प्रार्थ- णुवेदनं यावत् भूतग्रामस्य नवमं गुणस्थानम् । आव० नीय । आव० ५७२, ७५८ । ६५०। अणिअट्टी-भरते भविष्यज्जिन । सम० १५४ । अणिजिण्णा-अनिर्जीण., सामस्त्येनात्मप्रदेशेभ्योऽपरिशा- अणियण-अनग्नकारणत्वादनमा-विशिष्टवस्त्रदायिन., सज्ञा. टितः । प्रज्ञा ६०२ । शब्दो वाऽयमिति । ठाणा० ३९९ । अणिज्जुहियाअंसी-अनियूढा-कृतविभागापि नान्यत्र नीता- अणियणो-अनम । आव० १११ । शिका। बृ० द्वि० १९९ आ । अणियतो-अनियतः, अनियमवान् , अनवस्थित. । प्रश्न अणिज्झाएत्ता-अनिद्धर्थाय, चक्षुरध्यापार्य। भग७ ३१२ । २८ । अणिटुं-अनिष्टम् , सतामनमिलषणीयम् । आव० ५८९ । अणियत्तो-अनिवृत्त । आव० ८२३ । अणिट्टत्ता-अनिष्टता, इष्टा-मनसा ' इच्छाविषयीकृती तद्वि- अणियदरिसणं -हयगजरथपदात्यनीकदर्शनम् । नि०-०. परीता अनिष्टा तस्याभाव । प्रज्ञा ५०४ । अनिष्टता, द्वि० ७१ । इच्छाया अविषयता मिगठ४३५३"। अणियया-अनियता-अनिर्धारिता । प्रज्ञा० ३३९ । अणिण्हवणं-अनपलापः । नि० चू० प्र० ९ अ । अणिया-अनिदा, अकारणम् । आचा० ३४ । मेधाधारणे- अणितणा-वनदायिनः । 'ठाणा० ५१७ । न्द्रियपादवदेहायुर्वर्धन कारी। नि० चू० प्र० २५४ अ। अणितिए-अनितिक अविद्यमाननियतस्वरूप ।भग० ४६९ । अनाभोगत । सम० १४६ । अणित्थत्थं - अनित्थस्थम् , इतीदंप्रकारमापन्नमित्थं, इत्थं अणियाणे-प्रार्थनारहित । भग० १२३ । तिष्टतीति इत्थंस्थे, न इत्थस्थ अनित्थस्थमिति, केनचित्प्रकारेण अणियाहिवई - अनीकाधिपतय -गजादिमैन्यप्रधाना ऐरा- लौकिकेनास्थितमिति । आव० ४४५ । नेत्थं तिष्ठतीति, अनि- वतादय.। ठाणा० ११७ । यताकारम् । जीवा० २५ । अणिलामयी-वातरोगिणी। बृ० द्वि० २१९ अ। अणित्थंथे-अनित्थस्थं परिमण्डलादिव्यतिरिक्तम् । भग० अणिलो-निलओ जस्स नत्थि । दश० चू? ९८ । ८५८, ८५९ । अणिवारिए-अनिवारित , निषेधकरहित । विपा० ५२ अणिदा-अनिदा-अनिर्धारणा । भग० ४४ । चित्तविकला | अणिविद्धं-कम्म ण कारविनति । नि० चू० वि० १०६ अ । सम्यग्विवेकविकला वा । प्रज्ञा० .५५७ । अणिवणं-सचित्तं । नि० चू० प्र० ४३ आ । अणिदाणो-अनिदान , देवेन्द्राद्यैश्वर्याप्रार्थक -1 प्रश्न० १४७। 'अणिसिटुं-अनिमृष्टं, वहुमाधार । सत् यदेक एव ददाति । अणिद्देसं-अनिद्देश्य । विशे० १५५ । प्रश्न १५५ । परिहारिकम् । नि० चू० प्र० १६१ आ । मृद:: . " । ग T - . । 1 - (४०) [अणिसिद्धो अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अणुओगो] . . . . प्रश्न कर्तव्यं । ओघ० २१४ । ठाणा० ४६० । भग० ४६६ । | अणीयसे - अन्तकृद्दशानां तृतीयवर्गस्य प्रथममध्ययनम् । नि० चू० तृ० १६ अ, ४८ आ। तत्स्वामिनाऽनु अन्त० ३। त्सकलितम् । आचा• ३२५ । दोषविशेषः । आचा० अणीसहूं-हस्तमानावग्रहादस्फिटितम् । बृ० द्वि० २३९ अ । ३२९ । साधारणं वहूनामेकादिना अननुज्ञातं दीयमानम्। | अणीहारि-अनि रि, तपोभेदः । उत्त० ६०० । ठाणा० ४६७ । दोषविशेषः । प्रश्न. १४४ । अणीहारिमे-अनिर्हरणाद् गिरिकन्दरादौ अनशनम् । ठाणा० अणिसिद्धो-अनिषिद्ध , अनुपयुक्त. । आव. २६७ । ९४ । जइ बहिं पडिवज्जइ । नि० चू० वि०.५८ अ । अणिस्सि(म्भि)अप्पा-अनिभृतात्मा, अनिदानः । आव० अणु - अनु-प्रतिदिवसम् । सूर्य० १३६, १३३ । थेवे । ८४३ । दश० चू० ८९ । स्तोकप्रदेशम् । प्रज्ञा० २६३ । पश्चाद्भावे अणिस्सिए-अनिश्रितः, द्रव्यभावनिश्रारहित प्रतिबन्ध- स्तोके च । वृ० प्र० ३३अ, । स्तोकम् । प्रज्ञा ५०२ । विमुक्त । दश० २२३ । प्रमाणतो वनादि। दश० १४७ । लघुः, हीन । सूर्य २६१ । जं० प्र० ५२२ । अणिस्सिओवहाणे-अनिश्रितोपधान, ऐहिकामुष्मिकापेक्षा- विकल तप, योगसग्रहे चतुर्थो योग । आवं. ६६४ । अणुमतणुअ-अनुकतनुकाना-अतिसूक्ष्माणाम् । र्ज प्र. २३७ । अनिश्रित तप.1 प्रश्न० १४६ । अणुओग - अनुयोग , अर्थकथनम् सूत्रादनु-पधादर्थस्य अणिस्सितं-अनिश्रितम् । आव० ३५८ । सर्वार्थसारहितः। योगोऽनुयोग सूत्राध्ययनात्पश्चादर्थकथनम् । अगोर्वा लघी- भग० ३८५। यस सूत्रस्य महताऽर्थेन योगोऽनुयोग.1 आचा० २ अणिस्सियं-अनिश्रितम् , कीर्त्यादिनिरपेक्षम् । व्याख्यान । ओघ० ७१ । १२६ । अणिस्सिय - अनिश्रितम् , कुलादिष्वप्रतिबद्धम् । दश० अणुओगत्थो-अनुयोगार्थ , व्याख्यानभूतोऽर्थ । आचा०.७ । अणुओगदारं - अनुयोगद्वारम् , सूत्रविशेष । आव० ७२ । ७४० । अस्वाध्याये परिहर्तव्यसूत्रविशेष 1 -नि०, चू० अणिस्सेयस - अनिश्रेयस -अमोक्षाय । ठाणा० १४९ । तृ० ७१ आ० । अकल्याणाय, अमोक्षाय । ठाणा० २९२ । अकल्याणाय। अणुओगदारे-अनुयोगद्वारम् ; अनुयोगद्वारसूत्रम् । भग ठाणा० ३५८. अणिस्सो-अनिश्र -कस्यचित्सवन्धिनाऽवष्टम्भेन रहितः । अणुओगस्स-अनुयोगस्य । विशे० ५९३ । उत्त० ६३३ । अणुओगो- अनुयोग , सूत्रस्यार्थेनानुयोजनम् , अभिधेये अणिहय-अनिहत , अन्तकृद्दशानां तृतीयवर्गस्य तृतीयम- व्यापार सूत्रस्य योगो वा, अनुकूलोऽनुरूपों वा योग । ध्ययनम् । अन्त० ३ । आव० ८६, ठाणा० ४८१ । निजेनाभिधेयेनार्थनानुयोजनें- अणिहे-अनिभ , अमाय. । दश० २६८ । अनिह , परीषहो सम्बन्धनम् । विशे० ५९३ । सूत्रपाठानन्तरमनु-पश्चात्सू- पसर्गनिहन्यत इति निह , न निह अनिह --उपसर्गेरपरा त्रस्यार्थेन सह योगो-घटना। जीवा० २। अनुकूल-अवि- जित इति । सूत्रः ६९। अस्निह -अष्टकर्मरहित , रोधी सूत्रस्यार्थेन सह योगो वा। जीवा० २ । सूत्रस्यार्थेन अराग-रागद्वेषरहित ,भावरिपुभिरनिहत ।आचा०.१९०। सह सम्बन्धन, अनुरूपोऽनुकूलो वा योगो व्यापार सूत्र- स्निह्यत इति स्निह , न स्निह अस्निह -मर्वत्र ममत्वरहित स्यार्थप्रतिपादनरूप । अगो-लघो पश्चाजाततया वाऽनुश- इति । सूत्र. ६९ । अकुटिले । दश० चू. १५१ । ब्दवाच्यस्य योऽभिधेयो योगो-व्यापारन्तत्सम्बन्धो वाऽणु- अणीए-अनीकम् , सैन्यम् । भग० ८९ । योगो अनुयोगो वा। ४ । हष्टिवादचतुर्थो अणीयजसे - अनीकयशा , नागम्य गाथापते कुमार । मेद । मम० १२८। नियोग । आव० ६९४ । अनुयोजनम् , अनुकुलो वा योग । अणु-सूत्रं, महान २२१ ॥ जं० प्र० अन्त. (४१) - A [ अणुकंपं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अणुग्घाडिया ] अर्थस्ततो .महतोऽर्थस्याणुना सूत्रेण योगो वा। ओघ० | अणुगमिओ-अनुगमित , अनुनीत । आव० ५५ । ४। विचार.1 ठाणा० ४८१, ४९५ । अनुरूपोऽनुकूलो - अणुगमो-अनुगमः, सूत्रार्थयोरनुरूपसंबंधकरणम् । विशे० । वा योगः। मम० १३१ अध्ययनार्थः । आव० ५४। ४३१ । निक्षिप्तसूत्रस्यानुकूल परिच्छेदोऽर्थकथनम् । ज० सूत्रस्पर्शकनियुक्ति सूत्रानुगमश्च। आव० ८६ । परीक्षा। आव० १५७। अणुगयं-अनुगतं, अनवच्छिन्नम् । प्रश्न० ६६ । युक्तम् । अणुकंपं-अनुकम्पां-उपष्टम्भम् । ठाणा० १७० । दश० २०७ । अभिप्रायानुवर्तिनमात्मानम् । उक्त० ३२२ । अणुकंपो-अनुकम्पकः-अनुरूपक्रियाप्रवृत्तिः। उत्त०-३५९ । युक्त.। उत्त० ६३१ । अणुकंपा-अनुकम्पा, अनुग्रहः । दश०.६७ । भक्तिः । ओघ० अणुगार्म-अनुग्राम , प्राममार्गानुकूल. लघुर्वा प्राम., रूढित १९६ । आव० ३४८ । सम्यक्त्वगुणविशेष. । आव० ५९१ । एकस्माद्वा प्रामादन्यो ग्राम । उत्त० ९९ । अनुक्रोशः। सम० १२७ । दीनानाथविषयं दानम् । ठाणा० अणुगामियत्ताए-अनुगामिकता-परम्परया शुभानुबन्धसु- ४९६ । खाय भविष्यति । जीवा० २४२ । अणुकंपाए-अनुकम्पया-अनुग्रहेण । व्यः द्वि०.१७२ आ। | अणुगीया-अनुगीता तीर्थकरादिभ्यः श्रुत्वा प्रतिपादितां । अणुकंपे-अनुकम्पते, उपकुरुते। उत्त० ४१९ । उत्त० ३८५। अणुकहा-अनुकर्षयति। आव० २१८ । अणुग्गह-अनुग्रहः, अनुग्रहपरिहरणा अक्खोडभंगपरिहरणा, अणुकुएति-प्रच्छादयति, अणुक्षिप्ता । नि० चू० प्र०१८० अ। (अकृष्टभूशुल्कपरिहार ) आव० ५५२ । ज्ञानाद्युपकार । अणुकुयितं-अश्लयम् । बृ० द्वि० २५२ अ । ठाणा० १५५ । अणुकूला-सजमविग्घकरा ( राज्यार्पणादिका )। नि० चू० अणुग्गहकसिणं-छण्डं मासाणं आरोवियाणं छद्दिवसा प्र० १९४ आ1 गता, ताहे अण्णो छम्मासो आवण्यो, ताहे जं तेण अद्धवढं अणुकंतो-अनुक्रान्त -अनुचीर्णः । आचा० ३०६ । त ज्झोसितं जं पच्छा आवण्ण छम्मासित तं ' वहति, अणुक्कम-अनुक्रमः । आव ३४२.। पारम्पर्यम् । उत्त. एत्थ पंचमासा चउव्वीसं च दिवसा जेग ज्झोसिया। नि० चू० तृ० १३५ अ । अणुकमंतो-अनुक्रम्यमाण., प्रेर्यमाण । सूत्र. १३६ । अणुग्गहत्थं - अनुग्रहार्थ-अनुग्रह उपकारोऽभिधीयते, अणुक्कसाई-अनुत्कशायी, अणुकषायी, उत्कण्ठित.. सत्का अर्थशब्द प्रयोजनवचन. । ओघ० ४ । , रादिषु शेत' इत्येवं शील उत्कषायी, न तथा.। यो न | अणुग्गहपरिहारो-अनुग्रहपरिहार -राजकृतानुग्रहवशेन ए- सत्कारादिकमकुर्वते कुप्यति, तत्सम्पत्ती वा नाहकारवान् कद्वित्र्यादिवर्षमर्यादया यथोक्तरूप खोटादिभजन एक द्वे त्रीणि भवति सः । उत्त० १२४ । अणव -स्वल्पा. सज्वलननामान वर्षाणि यावत् वसति, यावन्तं वा कालं राज्ञानुग्रह कृत- इतियावत् काया -क्रोधादयो यस्य । उत्त० ४२० । स्तावन्तं काल वसति, न च हिरण्यादि प्रददाति, नापि वेष्टि अणुगच्छइ-अनुगच्छति, आसन्नो भवति । जं० प्र० १८७ । करोति, न चापि चारभटादीनां भोजनादि प्रदान विधत्ते, एष अणुगच्छण-अनुगमनम् । आगच्छत प्रत्युद्गमनम् । दश० खोटादिभगो । व्य० प्र० ४५ अ । तत्तिय काल सो दव्वादिसु परिहरिजति तावत्कालं न दप्पेतेत्यर्थ । नि० चू० तृ० ८९आ। अणुगच्छमाणो-अनुगच्छन्-अवगच्छन्-वुद्धयमान सन् । | अणुग्गहो-अनुग्रह , उपकार. । ओघ० ४ । अणुग्गामो-अनुग्रामः, विवक्षितप्रामानन्तरो ग्राम. । औप. अणुगम-अनुगमः, अनुगमनमनेनास्मादस्मिमिति वा अर्थ- कथनम् । आचा० ३ । अन्वयः । विशे० ९६४ । अणुग्घाई-अनुवातिक-यत्र गुस्मासादि प्रायश्चित्त वर्ण्यते । अणुगमणं-अनुगमनम् , आगच्छतः प्रत्युद्गमनम् । उत्त० प्रश्न. १४५। अणुग्घाडिया-अनुवाटिता, अस्पृष्टा । दश० ४१। १ १४७॥ २४१ । आचा०२२२॥ (४२) 4 [ अणुग्धाता अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अणुण्णास] आचा० १४७॥ अणुग्घाता गुरव । नि० चू० प्र०.८७ अ। अणुजीवंति - अनुजीवन्ति-तदुपार्जितवित्ताद्युपभोगत. उप- अणुग्घातियं-ज गिरंतरं वहति गुरुं। नि० चू० प्र० जीवन्ति । उत्त० ४४१ । ३०५ आ। गुरुगं । नि० चू० प्र० २५७.अ । अणुजोगगत - तीर्थकरादिपूर्वभवादिव्याख्यानेग्रंथो गण्डि- अणुग्घायं-आचारप्रकल्पस्य सप्तविंशतितमो मेदः । आव० कानुयोगश्च मरतनरपतिवंशजानां निर्वाणगमनानुत्तरविमान- ६६० । वक्तव्यताव्याख्यानग्रन्थ इति द्विरूपेऽनुयोगे गतोऽनयोग- अणुग्घायकसिणं-जं कालगं जहा मासगुरुगादि अहवा गत । ठाणा०.४९१ । ज गिरंतरं दागं एस मासलहुगादिपि णिरतरं दिजमाणं | अणुजोगी - अनुयोगी-अनुयोगो-व्याख्यानं प्ररूपणं वा । अणुग्घात भवति। नि० चू० तृ० १३५ आ। ठाणा० ३७५। अणुग्घायण-अणोद्घातन-अणत्यनेन जन्तुगणश्चतुर्गतिक अणुजोगो-अशो.-लघो पश्चाज्जाततया वा अनुशब्दवाच्यस्य ससारमित्यण-कर्म तस्योत्-प्रावल्येन घातनम्-अपनयनम् । सूत्रस्य योऽभिधेये योगो-व्यापारस्तेन 'सम्बन्धो वा सो- ऽणुयोगोऽनुयोगो वेति। ठाणा०३ । अणु-पच्छाभावओ अणुग्घायाणि-गुरूणि प्रायश्चित्तानि । बृ० तृ. ६७ अ । यथेवे याबृ०प्र० ३३ अ । विचार । सम०५०। सूत्रस्यार्थेन अणुघटुंता-अतृप्यन्तः। ओघ० ७८ । सह सम्बन्धनम् , सूत्रस्यार्थप्रतिपादनरूपः । ठाणा० ३ । अणुघाइय-अनुद्धातं , न विद्यते उद्घातो--लघुकरणलक्षणो अणुजंगी-अनवद्योगी, शिवादेवीविशेषणम् । उत्त० ४९६ । यस्य तपोविशेषस्य तत् यथाश्रुतदानं, तोषा प्रतिषेवा. श्रीमहावीरस्वामिन सुता जमाले र्या, प्रियदर्शनाऽपर- विशेषतोऽस्ति ते। ठाणा० ३११ । नाम । उत्त० १५३ । अणुचरिया-चरिका, नगरप्राकारयोरपान्तरॉले । वृ० तृ० अणुजइजमाणाई-एकं स्वरूपतोऽनृजूनि अपर च तेषां ५३ अ। क्वचित्कार्येऽनुपयोगात्केनचिदनृजूक्रियमाणानि। उत्त० ५४९ । अणुचिण्णो-अनुचीर्णम् , आचरितम् । आव० २२७ । अणुजता-ऋजुभावविरहित । नि० चू० प्र० २८९.आ। अनुष्ठित । ओघ० १०३ । अणुजा-अनवद्यागी, श्रीमहावीरस्वामिनो ज्येष्ठा भगिनी, अणुचिंतणं-अनुचिन्तनम् , पर्यालोचनम् । आव० ५८९ । सुदर्शनाऽपरनाम । उत्त० १५३ | महावीरस्वामिन पुत्री- अणुचिन्नं--अनुचीर्णम् , सम्यक् तदर्थावगमासगशक्तिग. नाम । आचा० ४२२ । निवर्तकसमभावप्राप्त्या धर्ममेघनामकसमाधिरूपेण परिणमि- | अणुजियत्तं-वराकत्वम् । बृ० तृ० २ आ। तम् । जीवा० ४ । अनुचीर्णाः-कायसंगमागता सम्पाति- अणुज्जुए - अनृजुक , कश्चिकर्नुमशक्यतया । उत्त० मादय । आचा० २१७1 अणुचिय-अनुचित -भावित. शैक्षो वा। बृ० द्वि० २३८ । अणुज्जुकं-अनृजुकम् , वक्रम् , अधर्मद्वारस्य नवम नाम । अणुजत्तं-अनुयात्रम् | उत्त० ३०४ । अनुयात्रा, राजपा प्रश्न० २६ । टिका । आव० ७२० । अणुट्ठाणे-अनुत्थाने । ठाणा० ३३० । अणुजत्ता-अनुयात्रा । आव० ३६५ 1 अणुट्ठिएसु-अनुत्थितेषु-धावकादिषु । आचा०- २५६ । अणुजाए-अनुजातः, सदृश । सूर्य० २३३ । अणुट्ठिया-अनुत्थिता, निविष्टा । आव० ७२७ । अणुजाणं-रथयात्रा। बृ० द्वि० १५५ अ । वृ० प्र० २५८ | अणुठ्ठिहंतो-अनुत्तिष्ठन्त । बृ० तृ० ४ अ । आ । व्य० द्वि० १७ आ । अणुण्णवण-अनुज्ञापयति । ओघ०-१९९ । अणुजाणपेक्खओ-अनुयानप्रेक्षकः । आव० ५७७ । अणुण्णवणाजयणा - वसत्याद्यनुज्ञापनदोषगुणा । नि. अणुजाणे-अनुजानन् । उत्त० २९३ । चू० तृ० १२ आ। अणुजाते-पितृसम । ठाणा० १८४ । अणुण्णवेति-अनुज्ञापयन्ति । आव० ११७ । अणुजायं-अनुयात, भृतम् । जं० प्र० २१२ । अणुण्णासं-नासिकाविनिर्गतस्वरानुगतम्.। जं० प्र० ४० । - - '(४३) [ अणुण्णेत्ता आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अणुपालात्ता] h भग० २२४ । - आव० ५४८ । . उत्त० अणुपणेत्ता-अनुनीय-प्राप्य ध्यात्वा । सम० १२३ ।। अणुधरी-अनुद्धरी, आत्मदोषोपसहारविषये द्वारवत्यामहमि- अणुतडियमेय-अनुतटिकामेदः, अवटतटमेदवद् यो मेद. । श्रेष्ठिभार्या । आव० ७१४ । अणुद्ध - अनुभृताम् , आनुरूप्येण यथामार्दशिकविधि अणुतडियाभेदे-अनुतटिकामेदः, इक्षुत्वगादिकः । प्रज्ञा० उद्धृता-वादनार्थमुत्क्षिप्ता । जं० प्र० १९४ । २६७ । अणुधम्मो-अनुधर्म । सूत्र० ३९९ । अणुत्तपत्तो-लजनीय। नि० चू० प्र० २६६ आ। अणुनई-अनुनदि, नदी नदी प्रति । आव० ४५३ । अणुत्तरं-अनुत्तरम् , सम्यक् । दश० १५९ । अनन्यसदृशः। अणुनवन-अनुज्ञातम् । ओघ० १६० । ६० । अनुत्तर-सर्वसयमस्थानोपरिवर्तिनं । उत्त० अणुनाओ-अनुज्ञात.। ओघ० २१५ । ३९३ । अनुत्तरा-सर्वलोकाकाशोपरिवर्तिनीमतिप्रधानां वा। नासं-सानुनासिक नासिकाकृतस्वरम् । ठाणा० ३९६ । उत्त० ३९३। अणुन्नया-अनुन्नया-नोर्ध्वमुखा। व्य. द्वि० २३७ आ । अणुत्तर-अनुत्तरम् , वृद्धिरहितम् । आचा० १४ । अणुन्नवणा-अनुज्ञापना, वन्दनके द्वितीय स्थानम् । आव० अणुत्तरणवासो-अनुत्तरणपाश , आत्मन पारतन्त्र्यहेतु- तया पाशवत्पाशः, अनुत्तरणश्चासौ पाशश्च । उत्त० ४३ । अणुनविय - अनुज्ञापित । आचा० ४२६ । अनुज्ञाप्य- अनुचरणवास न विद्यते उत्तरणं-पारगमनमस्मिन् सती- याचित्वा । आचा० ३३८ । त्यनुत्तरण , स चासौ वासश्च-अवस्थानम् । उत्त० ४३ । अणुनवेमाण - तत्स्वजनादींस्तत्परिष्ठापनायानुज्ञापयन्त । अणुत्तरनाणी-केवलज्ञानवान् । उत्त० २७० । ठाणा० ३५४ । अणुत्तरधरे न विद्यते उत्तरमन्यत्प्रधानमेषामिति । अणुन्ना-अनुज्ञा, अनुमोदनम् । सूत्र० ३२९ । सूत्रार्थयोरन्य- ३५७ । प्रदानम् । व्य० प्र० २६ अ। अधिकारदान । ठाणा. अणुत्तरधरो-अनुत्तरधर., न विद्यते उत्तर-अन्यत्प्रधानमे- १३९। षामित्यनुत्तस , ते च प्रक्रमात्प्रकर्षप्राप्ता ज्ञानाटय एव गुणास्तान् धारयतीति । अनुत्तरान् गुणान् धारयतीति वा। अणुनायं अनुज्ञातम् , भोग्यतयैव वितीर्णम् । प्रश्न० १०२ । उत्त० ३५७॥ अणुपभु-जुवराया, - जुवराया, सेणावति । नि० चू० प्र० १७४ आ। अणुत्तरविमाणे-नैषामन्यान्युत्तराणि विमानानि सन्ति इति सेनाधिपति । ६० प्र० ९०आ। अनुत्तरविमानानि । अनु०, ९२ । अणुपरियन्ति-अनुपरियन्ति, सातत्येन पर्यटन्ति । उत्त० अणुत्तरे- स्थित्यादिभिः सकलनरकज्येष्ठेऽप्रतिष्ठान इति । २९६ । अणुपरिवइ - अनुपरिवर्तयते, आत्मनश्चावयते। सूर्य उत्त० ३९२ । अणुत्तरो-अनुत्तर -न विद्यन्ते उत्तरा -प्रधाना स्थितिप्र. भावसुखद्युतिलेश्यादिभिरेभ्योऽन्ये देवा । उत्त० ७०२ । अणुपरिवट्टिय अनुपरिवर्त्य, प्रादक्षिण्येन परिभ्रम्य । अणुत्तरो-अनुत्तर , कृष्णवासुदेवागमनम् । आव०, १६३ । जीवा० ३७५, ३९९ । अचल १ विजयभद्र २ वलदेवत्रयागमनम् । आव० १६३ ।। अणुपरिहारी-जतो जतो परिहारी गच्छति ततो ततो अणुत्तरोववाइय-अनत्तरोपपातिकम् । भग० २२२ । अणुपिट्ठतो गच्छति । अणु-थोत्रं पडिलेहणादि 'माहेज्ज अणुत्तरोववाइया-अनुत्तरोपपातिका । प्रज्ञा० ६९ । करेतीति । नि. चू० तृ. १३२ आ । अणुदिन्नं-( अनुदीर्णम् )। भग० ५८ । अणुपविटे अनुप्रविष्ट -तदुदयवती । ठाणा० अणुदिसा-अनुदिश , प्रतिदिश । दश० २०१ । एकप्रदेगा अणुपस्सओ-अनुपश्यत -पर्यालोचयतः । उत्त० ३१० । अनुत्तरा (दिक्कोगा )। ठाणा० १३३ । अणुपात्तं-कम्मंण कारविज्जतित्ति । नि० चू० द्वि० १०६ । अणुदिहो-अनुद्दिष्ट ,गन्तिकादिभेटवर्जित । प्रश्न० १०८1। अणुपालइत्ता-अनुपाल्य-सततमासेव्य । उत्त० ५७२ । - । 0 १०७ ॥ 1 २१९। (४४) [मशुपालणा - अल्पपरिचितसैद्धान्तिकेशन्दकोषः अणुभयो ]. + । ४४० । , • " ७६१ । " -T: म अणुपालणा अनुपालना, अनु विशुद्धिः, प्रत्याख्यान- ] अणुप्पवादपुर्व अनुप्रवादपूर्वम् । आव० ३१६ शुद्धया पञ्चमो भेद । आव 2017: अणुप्पविसे - अनुप्रविशेत् , मनसि लब्धास्पदो भवेत् । अणुपालणासुद्धे अनुपालनाशुद्ध-कान्तारादिषु न भनं उत्त० २७ । यत्प्रत्याख्यानम् । ठीणा ३४९ : अणुप्पसूयाई-अनुप्रसूता-आश्रिता। आंचा०.३४८ । रेणुपालिय अनुपोलित, पूर्वकालेसाधुभि मालितत्वाद्विव- अणुप्पियं-अनुमतम् । बृ० द्वि० ३ म। क्षितसाधुभिश्चानु-पश्चात्पालितमिति । प्रश्न० ११२ । : अणुपेच्छा-अविह्वला । उप० मा० १४० । अणुपालिया- आत्मसंयमानुकूलतया पालिता। हाणा० अणुप्पेह'-धर्मध्यानस्य पश्चात्प्रेक्षणानि-पालोचनान्यनु- प्रेक्षा । भग० ९२६ । अणुपालेइ अनुपालयति । भग० - १२५ । अणुपालेमि- अनुपालयामि, पौन.पुन्यकरणेंन। आव. अणुप्पेहा-मनसा । बृ० द्वि० ५४ आ । अनुप्लेक्षा, अईहानां मुहुर्मुहु. सततमनुचिन्तना । आव० ५८६ । यो सनसा अणुपिट्टि आनुपूर्ध्या । सम६८ परिवर्तयति, न वाचा । दश० ३२ । ध्यानोपरमकालभा- विनी अनित्यत्वाद्यालोचनारूपा । आव० ५९० ५ सूत्रार्था- अणुपुव्वलो-अनुपूर्वत', क्रमेणं उत्त३२५२ । आनुपूर्व्या- नुस्मरणं ध्यानस्य पश्चात् पर्यालोचनानि, भावना! ठाणा० क्रमेण उH०.५१८ 1 ) PER अणुपुन्वि - आनुपूर्वी, १९०। सूत्रवदर्थेऽपि सम्भवति निस्मरणमतः सोऽपि-परिभा- मूलादिपरिपाटी। जै० प्र० शास्त्रीयोपक्रममेद । आचा० ३। चनीय इत्यनुप्रेक्षणं, चिन्तनिका । ठाणा: ३४९ : प्रथार्थयो चिन्तनम् । ओघ० १८९ । . अणुपुग्विविहारीणं - अनुपूर्वविहारिणां-प्रतिपालितदीर्घस- ‘यमाना' शास्त्रार्थग्रहणप्रतिपादनोत्तरफालमवसीदत सयमा- अणुप्फासे-अनुस्पर्श., अनुभाव । दश० १९८१1-- ध्ययनाध्यापनक्रियाणा निष्पादितशिष्याणामुत्सर्गत दिश- अणुफालो-अणुभवो। दश० चू०, ९६ । । सवत्सरसलेखनाक्रमसंलिखितदेहानां । आंचा० २६ अणुबंध-अनुबन्ध , निरन्तरम् । ओघ० १५८ । मन्तान- आवेन प्रवृत्ति । जं.प्र० १२५ । । ५ -- अणुपुत्रेणं-आनुपूा-यथेष्टकालावश्यकक्रियारूपया चतु- र्थषष्टाचाम्लादिकया। आंचा २८४ । अनुक्रमेण परिपाच्या अणुबंधो-विवक्षितपर्यायेणाव्यवच्छिन्नेनावस्थानम् । भंग योगपद्यन। आचा० २४१ ।* ८०४। सातत्येन भवनं तम्मरणानीम् । -उत्त०. २३९ । अणुपुञ्चो- अनुपूर्वी पूर्वस्या. पूर्वस्या अनु। जीवा० अणुबद्धं-अनुबद्धम् , मन्ततम् । आव० २२८ । ठाणा० ४३० । अगुपेहा अनुप्रेक्षा, अनुपश्चादावे प्रेक्षक, प्रेक्षा, स्मृति , अणुबद्धरोसपसरो-अनुबद्ध. सन्तता कोऽर्ध. 2 अव्यव- ध्यानाद्मष्टस्य चित्तचेष्टा आचा० ५३ च्छिन्नो रोपस्य-क्रोधस्य प्रसरो-विस्तारोऽस्पति अबद्ध- अंणुपेहे-अनुगुणनं करोति न ओपन रोषप्रसरः। उत्त०७११, - -EPTE अणुप्प-अनर्ण्य अनार्पणीय , अदौकनीयः । ठाणा०६५। अणुवद्धा-मन्तत्तमालिंगिता । सम० १२६ । अणुप्पग्गथे - अनुरूपतया औचित्येन विरतेनत्वपुण्योदया- अणुबल-अनुवलम् । उत्त०.१७४ । *- दणुरपि चा-सूक्ष्मोऽप्यल्पोऽपि प्रगतोोग्रन्थो-सानादिस्य अणुभडो-अनुगट , अनुल्बण । जीवा० २७५ । उत्त० 'अस्माहा. ठाणा: - अणुप्पयाउं - अनुपटातु-परपरकेश यादातुमान व्यूठ प्र. अणुभवणसणा-अनुभवनसंज्ञा , आहारांद्या आंचा ཝནྣཱ:༤ཎྜལ༌ཏུ༌ अशुप्पवाए अनुप्रवादः, पूर्वविशेषः शक नविशे० अणुभवो-अनुभव , स्वेन स्वेत-रूपेण प्रकृतीना निषाकसो Rig Armer वेदनानुभवः । विशे० १००६ - L ८ . । " ५८७ । २१७ आ। १२ । F- ९६१ । स (४५) [ अणुभाग आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अणुराधा ] A - ठाणा० ४८४1 1 4 ठाणा० २५४।। २५४ अ।- - अणुभाग-- अनुभाग , आयुर्दव्याणामेव विपाक..। भग अणुमया-अनुमता, अनुज्ञाता। प्रज्ञा० २५७ । विप्रियद- ,२८० । अचिन्त्या शक्तिक्रियकरणादिका। ठाणा ० ६९, १४४। र्शनस्य पश्चादपि मता। विपा० ४२ । अणुभागकम्मे - अनुभागकर्म-कर्मप्रदेशानां सवेद्यमानता- अणुमहत्तरो- मूलमहत्तरे असण्णिहिते-जो- पुच्छणिज्जो विषयो रसस्तद्रूपं कर्म । भग० ६५ । धुरे ठायति सो। नि० चू० प्र० १५८ आ! अणुभागो-अनुभाग., विशिष्टवैक्रियादिकरणविषयाऽचिन्त्या अणुमहयरो-मूलमहत्तराभावे प्रष्टव्य -पुर-स्थानश्च । बृv शक्ति.। जीवा० १०९। सामर्थ्यम् । प्रज्ञा० ८८ । द्वि० १९. आ। अणुभावकम्मे-यथाबद्धरसो वेद्यते तदनुभावतो वेद्यं कर्मा- | अणुमाणं-अनुमानम् , स्वार्थम् । आव०-४२७ । दृष्टान्त । नुभावकर्मेति। ठाणा० ६६ । दश० १३०, १२६ । अणुभावनामनिहत्ताउए - अनुभावनामनिधत्तायु -अनु- | अणुमाणइत्ता-लघुतरापराधनिवेदनेन मृदुदण्डादित्वमाचा. भाव.-प्रकर्षप्राप्तो विपाकः, तत्प्रधानं नाम, यद्यस्मिन् भवे र्यस्याकलय्य यदालोचनम् । भग० ९१९ । अनुमानं कृत्वा । तीव्रविपाक नामकर्मानुभूयते त(य)था नारकायुषि अशुभ-' घर्णगन्धरसस्पर्शीपघातानादेयदु स्वरायश.कीर्त्यादिनामानि अणुमाणे अनुमानम् , अनु-लिङ्गग्रहणसम्बन्धस्मरणादेः प्र. तदनुभावनाम तेन सह निधत्तमायुरनुभावनामनिधत्तायुः । श्वान्मीयतेऽनेनेत्यनुमानम् । भग० २२२-1.अन्विति-लिंग- प्रज्ञा० २१८। दर्शनसम्वन्धानुस्मरणयो पश्चान्मानं - ज्ञानमनुमानम् । अणुभावे-अनुभाव., विपाको रसविशेषः । भग० ३५ । तीव्रतमदु खादि । आव० ४९६ । अनुभाव । सूर्य० २७९ । अणुमाणेउं - अनुमान्य, सम्यक् क्षमयित्वा। व्य० प्र० विपाक उदयो रम इत्यर्थ.'। ठाणा० ४१४ । भणुभावो-अनुभावः, माहात्म्यम् । सूत्र० १२६ । विपाकः । अणुमोदणे-साइज्जणामेओ । नि० चू० प्र० १०३ आ। प्रज्ञा० २१८ । स्वभाव , स्वरूपम् । जं० प्र० २९९ । | अणुम्मुतो-अनुन्मुञ्चन् , अपरित्यजन् । आव० ४०७ । तीवादिभेदो रसः । सम० १०॥ शापानुग्रहसामर्थ्यम् । उत्त० अणुयत्तंतं-अनुवर्तयन् । आव० ३०५ । । ३६५। प्रभावः। जं० प्र० २४६।' रसः, विपाक । अणुया-अणुकाः।-दश. १९३.। विशे०, ५६५ कारणम् । जीवा० ३३९ । विपाकोदय । अणुयाणं-रथयात्रा । बृ० तृ०-६१ आ। पडिमातिमहिमा । जीवा०.१३० । सोमादिलक्षण । आव० ५९६। विपाक. । नि० चू० प्र० २३९ आ । • । आव० ५९८ । रमः । उत्त. २३० । अणुयोग-अनुयोगो, व्याख्यान विधिप्रतिषेधाभ्यामर्थप्रा. अणुभासा-अणुभापते। आव० ३११ । णम् । विशे० -२ -अणुभासणा अनुभाषपा,प्रत्याख्यानशुद्धि । आव०,८४७ । | अणुरंगा-गडीए । नि० चू• प्र०-३२४ अ। धुमिका, यान- भणुभासमाण-अनुभाषमाणः । विशे० १००५ ॥ विशेषः। बृ० द्वि० -१२५ आ। अणुमए-अनुमतम् , मानितम् । भग० १२२ । कार्य्यव्या- | अणुरंगिणी-अनुरझिनी, अनुरज्यते-अनुकारं विदधातीत्येव- घातस्य पश्चादपि मत.। भग०४६८। शीला । ज०' प्र० ५१८'। सूर्य० १३६ । अणुमो-अनुमत ,, अभिष्टोमोक्षाङ्गता । आव० ३२६॥ अणुरगो-घंतिओ 1 नि० चू० तृ० ३७ आ। अभिप्रेता। वृ०.प्र. २८९ आ । अणुरत्ता-अनुराग भावत' प्रतिवन्धः । उत्त० ३९४ । अणुमगा-शीघ्रम् । (आउ०) आन्तरप्रतियोगत परस्परस्नेहवन्तौ । उत्त० ॥२१ । अनु- अणुमतं-अनुमत, वैगुण्यदर्शनस्यापि पश्चान्मतम्। औप० ९६। रक्ता-सतत प्रतिबद्धा.। उत्त० ७०८ । . अणुमन्ना-अनुमतिः । वृ० तृ० १२८ अ। अणुराओ-अनुराग । आव० ३०४ । अणुमयं-अनुमत्तम् अभिरुचितम् । ओघ०.-६४ । अनु- अणुरागयं-अन्वागतम् , अनुरूपमागमनम्। भगठ ११७ मतः-मम्मन । जीवा० २७६ । अणुराधा-अनुराधा, नक्षत्रविशेष । सूर्य १३० । - . । ܙ - . - . (४३) [ अणुराहा अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अणुवायगाइए] - - प्रज्ञा ९९ । प्रज्ञा ८०-1 'अणुराहा नक्षत्रविशेषः । ठाणा० ७७ । अणुवढेति-करोति । भग० ३२०. अणुलिंपह-अनुलिम्पति। जीवा० २५४ । अणुवस-अनुवृत्त-भूयः प्रवृतो वारद्वयं प्रवृत्तः।व्य.द्वि अणुलिंपणं-अनुलिम्पन-सकृलिप्ताया भूमे पुनर्लेपनम् । ४४१ भा प्रश्न० १२७॥ अणुवत्तइ-अनुवर्तते। आव० ५६१ । अणुलिहतं - अनुलिखत् , अभिलक्ष्यत् । सूर्य, २६४, अणुवत्ति-अनुवृत्ति -सर्वेषु अर्थेषु अप्रतिकूलता। वृ० प्र० जीवा० ३७९, ज० प्र० २९७ । अनुलिग्वत्-अतिलच्यत्। ४३ अ। अणुवत्तिओ-अनुवर्तित । आव० १११ । परिगृहीतो अणुलिहति-अनुलिखति, अभिलक्ष्यति। जीवा० २०९ । महाजनेन । व्य. 'द्वि० ४४१ आ। वणं - अनुलेपनम् , मकृग्लिप्तम्य पुन - पुनरुपलेपनम्। अणुवतिया-परिवेष्टिता । नि० चू० प्र० १८४ आ। अणुवत्ती-अनुवृत्तिः । भाव० ५१५ ॥ अणुलोम-अनुलोमम् , अनुकूलमनुगुगं वा। जीवा० ३ ॥ अणुवस्ते-अनुवर्तमान -साम्प्रतकालभावी। दश० ६२ । अनुकूलकरणम्। ठाणार ३७६.1, अणुवदिह-जं नो आयरियपरंपरागय मुत्कलव्याकरण- अणुलोमछाया-अनुलोमच्छाया, सूर्यच्छायाविशेष. । सूर्य वत् । नि० चू० द्वि० २३ आ। अणुवदेसा-अनुपदेश.-गुरुणाऽनुक्त ओघ० १५१ । । अणुलोमणा-अनुलोमना-प्रज्ञापना। बृ० तृ. १२३ आ । अणुवभुज्जो - समक्तासवपिशितादिराहार., शुषिरतृणवल्क- अणुलोमवाउवेगो- अनुलोमवायुवेग । अनुलोम -अनु. लादिरुपधिः । वृ० तृ० ४७॥अ ।। कलो वायुवेग , शरीरान्तवर्त्तिवातजवो यस्य स । वायु- | अणुवमा-अनुपमा। जीवा० २७८ । गुल्मरहितोदरमध्यप्रदेश । जीवा० २७७ । अणुवयमाणा-अनुवदत'-अनु-पश्चाद्वदत'-पृष्ठतो वदतो- अणुलोमिअ-अनुलोमम् , मनोहारि । दश० २२३ । ऽन्येन वा मिथ्यादृष्ट्यादिना कुशीला इत्येवमुक्तः । आचा. अणुलोमियं-कटुगफरिमादिदोसवज्जिय जं भासमाणो अभा. २५१ सओ लभइ । दश० चू० ११५। अणुवयारं-निहुरे । नि० चू० प्र० - २७८- अ । अणुल्लय-हीन्द्रियविशेष । उत्त० ६९५ । अणुवरय अनुपरतम् , अविरतम्। 'भग० १८१॥ अणुल्लसिओ-असिच्यमान । आव० ६२१ । अणुवरयकाइया - अनुपरतकायिकी देशत सर्वतो वा अणुल्लावे-अनुलाप-पौन पुन्यभाषणम् । ठाणा० ४०८ ॥ मावद्ययोगाद्विरत नोपरतोऽनुपरत कुतश्विदप्यनिवृत्त इत्यर्थ अणुवउत्तो- अनुपयुक्त', माधुं प्रत्यदत्तावधान । ओघ० तस्य कायिकी। प्रज्ञा-४२६ २३ । अणुवरयकायंकिरिया-अनुपरतस्य-अविरतस्य सावद्यात अणुवकयं-अनुपकृतम् , परैरवर्तितम् । आव० ५९७ । मिथ्यादृष्टे सम्यग्दृष्टे कायक्रिया-उत्पादिलक्षणाकर्म- अणुवघाइए - अनुपघातिके-उपघातश्च यत्र न भवति बन्धनिबन्धनम् । ठाणा० ४१ । उडाहादि तस्मिन् । ओघ० १२२२। अणुवसंते अनुपशान्त , उदयावस्य । प्रज्ञा०२११ । । अणुवघाइया आचारप्रकल्पस्य पड्विंशतितमो भेद.। अणुवसंपन्जमाणगती - अनुपसम्पद्यमानगतिः, परस्पर- मुपष्टम्भरहिताना पथि गमने, विहायोगतेश्चतुर्थो भेद । अणुवचओ- अनुपचय , अनुपचीयमानता, अनुपादान- मिति । उत्त० ६।। अणुवसु-अनुवसु-मरागः श्रावकैश्च । भाचा - २४० । अणुवटुंते - अनुपतिष्ठति, अरुयमाणे अमज्मते। ओघ. अणुवाए-अनुपातः, अनुसार । प्रज्ञा १४४॥ अनुगमन- अनुराग उत्त०.६३३॥ अणुवट्टावणीया-अनुवर्तनीया। ओघ. १३४ ।। अणुवायगरप-अनुपातगति.-अनुसारगति । सूर्यष १६ D . ३ 17 सम० ४७ । प्रज्ञा० ३२७ । १४५१ (४७) [ अणुभाग आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः 'अणुराधा ] । - ठाणा० ४८४ । - 1 ठाणा० २५४ । - २५४ अ1- अणुभाग-- अनुभाग , आयु व्याणामेव विपाकः। भगः अणुमया-अनुमता, अनुज्ञाता। प्रज्ञा० -२५७ 1-विप्रियह. २८० । अचिन्या शक्तिक्रियकरणादिका। ठाणा०६९, १४४। र्शनस्य पश्चादपि मता। विपा० ४२ ॥ अणुभागकम्मे - अनुभागकर्म-कर्मप्रदेशानां सवेद्यमानता- | अणुमहत्तरो - मूलमहत्तरे- असण्णिहिते जो- पुच्छगिज्जो विषयो रसस्तद्रूपं कर्म । भग० ६५ । धुरे ठायति सो। नि० चू० प्र० १५८ आन अणुभागो-अनुभागः, विशिष्टवैक्रियादिकरणविषयाऽचिन्त्या अणुमहयरो-मूलमहत्तराभावे प्रष्टव्यः -पुर-स्थानश्च । बृक शक्ति. । जीवा० १०९। सामर्थ्यम् । प्रज्ञा० ८८ । द्वि० १९० आ। अणुभावकम्मे-यथावद्धरसो वेद्यते तदनुभावतो वेद्यं कर्मा- अणुमाणं-अनुमानम् , स्वार्थम् । आव०-४२७ । दृष्टान्तः । नुभावकर्मेति । ठाणा० ६६ । दश० १३०, १२६ । भणुभावनामनिहत्ताउए - अनुभावनामनिधत्तायु:-अनु- अणुमाणहत्ता-लघुतरापराधनिवेदनेन मृदुदण्डादित्वमाचा- भाव:-प्रकर्षप्राप्तो विपाकः, तत्प्रधानं नाम, यद्यस्मिन् भवे. र्यस्याकलय्य यदालोचनम् । भग० ९१९ । अनुमानं कृत्वा । तीवविपाकं नामकर्मोनुभूयते त(य)था नारकायुषि अशुभ- धर्णगन्धरसस्पर्शीपघातानादेयदु स्वरायश.कीर्त्यादिनामानि अणुमाणे-अनुमानम् , अनु-लिङ्गग्रहणसम्बन्धस्मरणादेः प्र- तदनुभावनाम तेन सह निधत्तमायुरनुभावनामनिधत्तायु । श्वान्मीयतेऽनेनेत्यनुमानम् । भग० २२२.१ . अन्विति-लिंग- प्रज्ञा २१८ दर्शनसम्बन्धानुस्मरणयो पश्चान्मानं - ज्ञानमनुमानम् । अणुभावे-अनुभाव , विपाको रमविशेष । भग० ३५ । तीव्रतमदुःखादि । आव० ४९६ । अनुभाव । सूर्य० २७९ । अणुमाणेउं - अनुमान्य, सम्यक् क्षमयित्वा । व्य० प्र० विपाक उदयो रम इत्यर्थ'। ठाणा ४१४ । भणुभावो-अनुभाव , माहात्म्यम् । सूत्र० १२६ । विपाक । | अणुमोदणे-साइज़्जणामेओ । नि० चू० प्र० १०३ आ। प्रज्ञा० २१८ । स्वभाव , स्वरूपम् । जं०प्र० २९९ । अणुम्मुअंतो-अनुन्मुञ्चन् , अपरित्यजन् । आव० ४०७ । तीव्रादिमेदो रसः । सम० १०। शापानुग्रहसामर्थ्यम् । उत्त.. अणुयत्तंतं-अनुवर्तयन् । आव० -३.०५- ३६५१ प्रभाव । जं० प्र २४६।' रस., विपाक । अणुया-अणुका.। दश. १९३ । विशे०, ५६५ 7 कारणम् । जीवा० ३३९ । विपाकोदय । | अणुयाणं-रथयात्रा । बृ० तृ० ६१ आ) पडिमातिमहिमा । जीवा०.१३० । सोमादिलक्षण । आव० ५९६ । विपाक | नि० चू० प्र० २३९ आ । : आव० ५९८ । रसः । उत्त. २२३० । अणुयोगं-अनुयोगो, व्याख्यान विधिप्रतिषेधाभ्यामर्थप्राण- अणुभासद-अणुभापते । आव० ३११ । णम् । विशे० २। अणुभासणा अनुभाषशा प्रत्याख्यानशुद्धिः आव०.८४७ । | अणुरंगा-गड्डीए । नि० चू• प्र०-३२४ अ। घमिका, यान- •अणुभासमाण अनुभाप्रमाण| विशे० १००५ । विशेषः। वृ० द्वि० -१२५ आ। अणुमए अनुमतम् , मानितम् । भग० १२२ । कार्यव्या- | अणुरंगिणी-अनुरङ्गिनी, अनुरज्यते-अनुकारं विदधातीत्येव- घातस्य पश्चादपि मत.। भग० ४६८॥ शीला । ज० प्र० ५१८१ सूर्य० १३६ । अणुमओ-अनुमत ,, अभिष्टो मोक्षाङ्गता । आव० ३२६। अणुरगो-सिओ। नि० ऋ० तृ० ३७-आ। अभिप्रेता। वृ० प्र० २८९ आ । अणुरत्ता-अनुराग भावत प्रतिबन्ध । उत्त० ३९४ । अणुमगा-शीघ्रम् । (आउ०) आन्तरप्रतियोगतः परस्परस्नेहवन्तौ । उत्त० ॥२१ । अनु- अणुमतं-अनुमत, वैगुण्यदर्शनस्यापि पश्चान्मतम् । औप० ९६॥ रक्ता-सतन प्रतिवद्धा.। उत्त० ७०८ । अणुमन्ना-अनुमति । वृ० तृ० १२८ अ । अणुराओ-अनुरागः । आव० ३०४ । अणुमयं-अनुमतम, अभिरुचितम् । ओघ०६४ । अनु- अणुरागयं-अन्वागतम् , अनुरूपमागमनम्। भगठ:११७' मत-सम्मन । जीवा० २७ । अणुराधा-अनुराधा, नक्षत्रविशेषः । सूर्य १३० 1 , । (४१) 1 [ अणुसिट्ठी- अल्पपरिचितसद्धान्तिकशब्दकोषः अण्णउत्थिर] G १९। अणुसिट्ठी-अनुशासनमनुशास्ति, सद्गुणोत्कीर्तनेनोपबृहणं सा | अणेव्वाणी - जाहे ताणि सुरादीणि ण - लभति ताहे तेसिं विधेयेति यत्रोपदिश्यते सा । ठाणा. २५३ । अनुशिष्टिः अभावे परमं दुक्ख समुग्पज्जतित्ति, मोक्खऽभावो वा। उपदेशप्रदानम् । व्य० प्र० ११७ अ । शिक्षाम् । उत्त० दश० चू० ८८। ३२३ । धर्मकथाम् । ओघ ७ । अणेसणा-अनेषणा-भिक्षादोषविशेष । आव० ५७५ । अणुसूयगा - अनुसूचका -नगराभ्यतरे चारमुपलभन्ते, अणेसणिज-अनेषणीयम-आधाकर्मादिदोषदुष्टम् । आचा. सर्वमनुसूचकेभ्य. कथयति। व्य० प्र० १७० आ। ३२१॥ अणुसूयत्तं-अपरशरीराश्रितता, परनिश्रा। सूत्र०,३५७ । अणोकंता-अनुपक्रान्ता अनिराकृता। औप० ३४ । अनुस्यूतत्वं-परनिश्रया कृम्यादित्वम् । सूत्र. ३५७ । अणोग्घसिअ-अनिर्मार्जनम् । ज० प्र० ५७ ] अणुसोयचारी - अनुश्रोतश्चारि-प्रतिश्रयादारभ्य भिक्षा- । अणोजा-अनवद्या, स्वामिदुहिता । आव० ३१२ । चारी। ठाणा० ३४२ । नद्यादिप्रवागामी । ठाणा० २७२ । अणोतप्पया-अलज्जनीयता । बृ० प्र० ३०९ मा । अणुस्सासिय-अनुच्छ्वसत् । दश० अणोदरया-अपारा (स.) अणुस्सियत्त-अनुत्सितत्वम्-अनुद्धतत्वम् । उत्त० ५९१ । अणोमदंसी-अवमं-हीनं मिथ्यादर्शनाविरत्यादि तद्विपर्य- अणुस्सुयं-अनुश्रुतम्-अवधारितम् । उत्त० २४७ । स्तमनवमं तदृदृष्टुं शीलमस्येत्यनवमदर्शी, सम्यग्दर्शनशान- अणुस्सुयत्तं-अनुत्सुकन्वम्-विषयसुख प्रति नि स्पृहत्वम् । चारित्रवान् । आचा. १६४ । उत्त० ५८६। अणोमाणं-अपमान अनादरकृतं न भवति । ओघ० १०३ । अणूया-अनूप , मजलप्रदेश । विशे० ७२७ । अणोरपारं-अनर्वापारम्-विस्तीर्णस्वरूपम् । प्रश्न० ६२ । अणेगचित्ते-अनेकचित्त ,, अनेकानि चित्तानि कृषिवाणि- अनाद्यपर्यवमितम् । आव० ६०१ । अर्वाग्भागपरभाग- ज्यावलगनादीनि यस्यासो, खलुरवधारणे, समारसुखाभि- वर्जिनमनाद्यनन्तम् । सूत्र. ४०३ । अनर्वापारमिव लायनकचित एव भवति । आचा० १६३ । अनेकसख्यानि महत्त्वादनर्वापारम् । प्रश्न० ५१ ।. देशीवचनं, प्रचु- चञ्चलतया चित्तानि-मनामि यासा सा । उत्त० २९७ । राणे, आरागागपरभागरहिते। आव० ३४५ । (भक्त०) अणेगगुणा-अनेकगुणा.-अनेकप्रकारा । बृ० प्र० ७५ अ ! अणोल्हविज्जंतो-अविध्यापित' । आव० ३८४ । अणेगतालाचराणुचरियं- नानाविधप्रेक्षाचारिसविताम् । अणोवणिहिआ- अनौपनिधिकी -वक्ष्यमाणपूर्वानुपूर्व्यादि- क्रमेणाविरचनं प्रयोजनं यस्या इति । अनु९ ५२ । भणेगदम्बो-अनेकद्रव्य । विशे० ४२४ ।। अणोवमा-अनुपमा । प्रज्ञा० ३६४ । अणेगपत्ती-अनेकपत्नी। आव० ९५ । अणोवमाइ-खाद्यविशेष । ज० प्र० ११८ । अणेगरूवधुणा-बहूनि वस्त्राणि एकीकृत्य धुनाति । ओप० । अणोहटुं-अज़ाजिय, कोटलाति उवकारेण विरहिय। नि: चू० प्र० १८३ अ। अणेगरूवधुणे - अनेकरूपा चासो सहयात्रयातिक्रमणतो अणोहतरा-समारतरणासमर्थाः । आचा० १२ । युगपद्नेकवस्त्रग्रहणतो वा धूनना च प्रकम्पनात्मिका अने- अणोहट्टिए-अनपधट्टक , यो बलाद्धस्तादौ गृहीत्वा प्रवर्स: करूपधूनना। उत्त० ५४२ । मान निवारयति मोऽपघट्टकस्तदभावात् । विपा० . ५२ । अगेगवासानउयं-अनेकवर्षनयुत, अनेकवर्षाणा-असह्वयेय- अणोहिय - अविद्यमानजलौघिकामतिगहनत्वेनाविद्यमानोहा वत्सराणा नयुत-सङ्ख्या वगंषम् । उत्त० २७७ । अणेगावाती-परस्पर विलक्षणा एव भावा इति वादिनः । अण्णउत्थिए - अन्ययूधिका अन्ययूथ-विवक्षितसघादपर ठाणा० ४२५ । सघस्तदस्ति येपा तेऽन्ययूथिकाः तीर्थान्तरीया । भग० अणेलिस-अनीश-अनन्यमदृशम् । आचा. ४२९ । ९८ । अन्यतीर्थिका । जीवा १४ । भग० ५४४.। । ११०। - वा। भग ६७० 1 (४९) -- २५ अ। ܐܐ 1 -- । अणुसजित्थानान्तः, कालात्कालान्तरमनुवृत्त [अणुवालए. आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अणुसासितो.] अणुवालप-गोशालकधावकविशेष },भग० - Hom: । अणुव्विग्गो-अनुद्विमः-प्रशान्त पारीपहादिभ्योऽविभ्यत् । अणुयासग - अनुपासका, मिथ्यादृष्टिः नि० 'चू० द्वि० दश० १६३, १७९ - जीजा अणुसंचरे - अनुसम्बरे, अन्विति--लक्षीकृत्य ; सञ्चरे -त्वं अणुवासणा-अनुवासना, “अपानेन जठरे तैलप्रवेशनम् । सम्यक् सयमाध्वनि याया । उत्त० ४४६.' . विपा, ,४१३. अणुसंसरर अनुससरति; दिग्विदिशा गेमन भावंदिगागमनं अणुवित्तिबुद्धी-अनुवृत्तिबुद्धिः-अनुगताकारबुद्धि । विशे० वा स्मरति, अनुसंस्मरति वा । आचौ०२०।" -- अणुसजइ-अनुसजति, सन्तानेनानुवर्तते । जीवा० २४४ । अणुविद्ध-अनुविद्धं-मिश्रा व्याप्ताय । ज० प्र९३ । अणुसर्जणा-अनुसर्जना। आर्व पनि मध्यवच्छेद अणुवीइ-अनुवीचि आनुकूल्यम् , मैथुनाभिलापम् मनसूब० करोति । उत्त० ५८४ अनुवर्सना बृ प्र. २४ १११ । अनुचिन्त्य, विचार्य- सम्यग्निश्चित्या आजीव ८६ । अणुसजमाणा-अनुसञ्जन्त., सन्तानेनानुवर्तमाना। 'ज. आलोच्य । दश० २rir मनट प्र५ . PET PRA अणुवीइनिहाभासी - अनुविचिघर निष्ठाभाषी विचार्य अणुसजित्था-अनुसंक्तवन्त ; अणुसजित्था अनुसक्तवन्त , पूर्वकालाकालान्तरमनुवृत्त- निश्चितभाषक | आना ३९२ ।। "वन्तः । भग २७८ ॥ अणुवीइभासप-अनुविचिन्त्यभाषकार पर्यालोय भाषकः, - द्वितीयप्रतस्य द्वितीया, भावना आव ६ वन्त. सन्ततिभावेन, भवन्ति स्म । जं० प्र० अणुवीति-चितेऊण । नि० चू०-६० ०१०४. अणुवीयि-पुचि बुद्धीए अणुचितिय ।, दशः चू० ११४५ अणुसट्ट-अनुशिष्ट-उत्कलनम् । व्य० प्र० १९९ अ । अणुव्हेत्ता-अनुवृंहयिता-परेण स्वस्य क्रियमाणस्य तस्याः अणुसट्ठि-अनुशासनम् - अनुशास्ति. सद्गुणोत्कीर्तनेनोपर्बु- नुमोदयिताद्भावे हर्षकारीमा : हणम् । दश० ४६ !-धमकहां । नि० चू० द्वि११७० अ। अणुवेलंधर-लवणसमुद्रशिखारक्षक. । सम० ३३॥' अणुसट्टी, उवदेसपदाणं, थुतिकरणं वा । दिबूत अणुवेलंधरराया-अनुवेलन्धरराजा, (नगेन्द्रामाजीका १३४ आ । सद्गावपुरस्सरं . प्रज्ञापना । बृ० वि०५ मा । ३१३ | Cre . THERE .:. : SITE उवदेसो। नि० चु, प्र०:३०७ आशीम इहलो- 'अणुर्वेलंधरनागरांतीण-अनुवेलंधस्ना साना नागजाति- सजमा ठापा कापायदर्शनम् । बृदि० १०.३,२- अनुशासनमा विशेषाठिाणा २२, ६-5 | FIGHT - HTTEE अणुवेहसलागा-शस्त्रकोशविशेषः। नि० चुभद्वि० १ आ। अणुसम-अनुसमासअनुपाः अविषमा। ठाणाधु | अणुबहे अनुद्वर्सयन तनस्थ एबीआर ३३ अणुसमय-समयमाश्रित्य । उत्त० २३१ । अनुसमयं प्रति- अणुव्वणले गति लिन क्षगम् । सूर्य० ८५ स०.२०, सततम् । उनकपुरमा । अणुव्वतं-अनुव्रतम् । आव० रा FTE अणुसया-अनुशय पायाताया। ज०प्र० १२३६ अणुव्यत्ता-अनुव्रतानि अनु-महाप्रतकथनस्य पश्चात्तदप्रति- अणुसारं-अनुस्मारवदनुस्वारम् । विशे७२.७४ । अनक्षर. रमती यानि नतानिन्काध्यन्ते - तानि अपना- सर्वविरतापे- मपिः यदर्नुस्वारवटुच्चार्यते. हुकारकरणादिवतन्तत । आव० १ .या सोमलंघोगुणिनोन्नतानि ठाणा ।" २५। अलाक्षणिक मुखमुखोच्चारणार्थ । दश० CATE अणुव्वय - अनुवर्तिनी, परिगामिकी बुद्धिदृष्टान्ते मार्या ! अणुसासणाणि अनुशासनानि-दुःस्थस्य संस्थत्तासपाद- आव.० ४३५ •ि अन्विति कुलानुरूपं तम आचारोऽस्या नानि । सम० ११८ । शिक्षणम् । उ०५६ अनुश्नता पतिव्रता इति, वयोऽनुरूपा वान उता.६ । अणुसासम्मि अनुशास्ति ने उत्तर-पूरा अनुव्रतं-स्थूलप्राणातिपातनिवृत्ति ।- दश० -१९२-re अणुसासिज्जंतो-अनुशास्यमानः, तत्र नत्र चोद्यमानः । अणुब्वाणं-अनाध्या(स्यान-स्निग्धम् । ओव० १७१। दश०' २५६ । 13 MIX - लता - 17 M १५५ । . - 1 (१८) [ अगुसिट्ठी- अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अण्णउत्थिए] १९। अणुसिट्ठी-अनुशासनमनुशास्ति,-सद्गुणोत्कीर्तनेनोपबृहणं सा अणेवाणी - जाहे ताणि सुरादीणि ण - लभंति ताहे तेनि विधेयेति यत्रोपदिश्यते सा । ठाणा० २५३ । अनुशिष्टि' अभावे परमं दुक्ख समुपज्जतित्ति, मोक्खऽभावो वा। उपदेशप्रदानम् । व्य० प्र० ११५ अ। शिक्षाम् । उत्त. दग० चू० ८८ । ३२३। धर्मकथाम् । भोघ० ७३ । अणेसणा-अनेषणा-भिक्षाटोपविशेष । आध० ५७५ । अणुसूयगा - अनुसूचका -नगराभ्यंतरे । चारमुपलभन्ते, अणेसणिज-अनेषणीयम-आधाकर्मादिदोषदुष्टम् । आचा. सर्वमनुसूचकेभ्य कथयति। व्य० प्र० १७० आ। ३२१। अणुसूयसं-अपरशरीराश्रितता, परनिश्रा। मुत्र० ३५७ । । अणोकता-अनुपक्रान्ता-अनिराकृता। औप० ३४ । अनुस्यूतत्वं-परनिश्रया कृम्यादित्वम् । सूत्र. ३५७ । अणोग्घसिम-अनिर्मार्जनम् । जं० प्र० ५७ । अणुसोयचारी - अनुश्रोतश्चारि-प्रतिश्रयादारभ्य भिक्षा- | अणोजा-अनवद्या, स्वामिदुहिता। भाव० ६१२ । चारी। ठाणा० ३४२ । नद्यादिप्रवाहगामी । ठाणा० २७२ । अणोतप्पया-अलज्जनीयता । बृ० प्र० ३०९ आ । अणुस्सासिय-अनुच्छ्वसत् । दश० अणोदरया-अपारा (स.) अणुस्सियत्त-अनुत्सिक्तत्वम्-अनुद्धतत्वम् । उत्त० ५९१।। अणोमदंसी-अवम-हीन मिथ्यादर्शनाविरत्यादि तद्विपर्य- अणुस्सुयं-अनुश्रुतम्-अववारितम् । उत्त० २४७ । स्तमनवम तदृदृष्टुं शीलमस्येत्यनवमदर्शी, सम्यग्दर्शनमान- अणुस्सुयत्तं-अनुत्सुकत्वम्-विषयसुख प्रति नि स्पृहत्वम्। चारित्रवान । आचा० १६४ । उत्त० ५८६। अणोमाणं-अपमान अनादरकृत न भवति । ओघ० १०३ । अणूया-अनूप., मजलप्रदेश । विशे० ७२७ । अणोरपारं-अनर्वापारम्-विस्तीर्णस्वरूपम् । प्रश्न० ६२१, अणेगचित्त-अनेकचित्त , अनेकानि चित्तानि कृषिवाणि- अनाद्यपर्यवमितम् । आव० ६०१ । अग्भिागपरभाग- ज्यावलगनादीनि यस्यासी, खलुरवधारणे, समारसुखाभि- वर्जितमनाद्यनन्तम् । सूत्र० ४०३.। अनर्वापारमिव लायनकचित्त एव भवति । आचा० १६३ । अनेकसख्यानि महत्त्वादनर्वापारम् । प्रश्न० ५११. देशीवचनं, प्रचु- चञ्चलतया चित्तानि-मनामि यासा सा। उत्त० २९७ । रार्थ, आराद्गागपरभागरहिते । आव० ३४५ । (भक्त०) अणेगगुणा-अनेकगुणा -अनेकप्रकारा । बृ० प्र० ७५ अ । अणोल्हविज्जंतो-अविध्यापितः। आव० ३८४ । अणेगतालाचराणुचरियं- नानाविधप्रेक्षाचारिसेविताम् । अणोवणिहिआ - अनौपनिधिकी -वक्ष्यमाणपूर्वानुपादि- क्रमेणाविरचन प्रयोजन यस्या इति । अनु१ ५२ ।, अणेगदम्बो-अनेकद्रव्य । विशे० ४२४ । अणोवमा-अनुपमा । प्रज्ञा० ३६४ । अणेगपत्ती-अनेकपत्नी। आव० ९५ । अणोवमाइ-खाद्यविशेष । ज० प्र० ११८ । अणेगरूवधुणा-बहूनि वस्त्राणि एकीकृत्य धुनाति । ओघ० अणोहटुं-अजाजियं, कोंटलाति उवकारेण विरहियं । नि० चू० प्र० १८३ अ । अणेगरूवधुणे - अनेकरूपा चासो सङ्ख्यावयातिक्रमणतो अणोहतरा-ससारतरणासमर्थाः । आचा० १२३ । युगपदनेकवस्त्रग्रहणतो वा धूनना.च प्रकम्पनात्मिका अने- अणोहट्टिए-अनपघट्टक , यो बलाद्धस्तादौ गृहीत्वा प्रवर्त्तः करूपधूनना। उत्त० ५४२ । मान निवारयति सोऽपघट्टकस्तदभावात् । विपा० . ५.२. अगेगवासानउयं-अनेकवर्षनयुत, अनेकवर्षाणा-अमङ्खयेय- | अणोहियं - अविद्यमानजलाधिकामतिगहनत्वेनाविद्यमानोहा वत्मगणा नयुत-सङ्ख्या विशेषम् । उत्त० २७७ । अणेगावाती-परस्पर विलक्षणा एव भावा इति वादिनः । अण्णउत्थिए - अन्ययूथिका अन्ययूथ-विवक्षितसघादपर सघस्तदस्ति येषा तेऽन्ययूथिका तीर्थान्तरीया । भग. अलिस-अनीश-अनन्यमदृशम् । आचा० ४२९ । ९८ । अन्यतीर्यिका । जीवा० १४३ । भग० ५४४. . । ११०। वा। भग ६७२ । ठाणा० ४२५१ (४९) [अण्णउत्थिया आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अण्हायगो] प्र० ८१७ । १११ । अण्णउत्थिया - तच्चणियादि बंभणा खत्तिया गारत्था । अण्णाएसि-अज्ञातैषी, अज्ञातो जातिश्रुतादिभिः एषति- नि० चू० द्वि०। उञ्छति पिण्डादीति। उत्त० १२४ । अण्णओमुहो-अन्यतोमुख । आव० ६४० । अण्णाणं-अज्ञानम् , चतुर्थ कुडङ्ग । आव० ८५६। अण्णओहुत्तं-अन्यतोभूतम् । आव० २०५ । एकत्रिंशतितम परीषहः, कर्मविपाकजादज्ञानानोद्विजेत । अण्णगच्छेल्लय-अन्यगच्छीय । आव० ३२३ । आव० ६५७ ॥ अण्णगिलायं-अन्नग्लान -पर्युषितमन्नं मया भोक्तव्यमि- अण्णाणदोसे-अज्ञानदोष । औप० ४४ । त्येवं प्रतिपन्नाभिग्रह.। वृ० प्र० ३१२ अ। अण्णाणिय-अज्ञानिकः, कुत्सितं ज्ञानमस्यास्तीति। आव. अण्णगिलायए-अन्नग्लायक.। औप० ३९+ बृ० ११२ आ। अण्णाणियवाई - सप्तपष्टिमेदा अज्ञानवादिनः । सम. अण्णतिथियपवत्ताणुजोगे-अन्यतीर्थिकेभ्य -कपिलादि- भ्यः सकाशाद्य. प्रवृत्तः-स्वकीयाचारवस्तुतत्त्वानामनुयोगो- अण्णाणो-अज्ञान , कुदृष्टिमोहित । आव० ३४६ । विचार तत्पुरस्करणार्थ शास्त्रसंदर्भ इत्यर्थ सोऽन्यतीर्थि- | अण्णातचजा-अज्ञातचर्या । आव० ८२२ । कप्रवृत्तानुयोग. । सम० ४९ ॥ अण्णातपिंडे-अज्ञातपिण्ड , अन्तप्रान्त , अज्ञातेभ्यो वा- अण्णतित्थिया- रक्तपटादयः । नि० चू० प्र० ७६ अ। पूर्वापरासस्तुतेभ्यो वा पिण्डोऽजातोञ्छवृत्त्या लब्ध । अन्यतीर्थिका - चरकपरिव्राजकशाक्याजीवकवृद्धश्रावकप्रभृ- सूत्र० १६४ । तय । नि०. चू० प्र० १४७ आ । अण्णायं-अज्ञातोञ्छ । वृ० द्वि० १८६ आ। अण्णत्थ-अन्यत्र, परिवर्जनार्थे । आव० ८५० । अण्णाय-अज्ञातम् , अनुमानत अज्ञातम् । भग० १९७, अण्णत्थे-अन्वर्थ-अनुगत सवद्ध परमैश्वर्यादिकोऽर्थो यत्र स.। विशे० २२॥ अण्णायया-अज्ञानता, तपसोऽप्रकाशनम् । प्रश्न. १४६ । अण्णदत्तहरे-अन्यदत्तहर -अन्येभ्यो दत्त-राजादिना विती गं अज्ञातता, तपस्यजातता, योगसङ्ग्रहे सप्तमो योग । हरति अपान्तराल एवाच्छिनत्ति । उत्त० २७४ । अन्याद आव० ६६४। तहरः-ग्रामनगरादिषु चौर्यकृत् । उत्त० २७४ । अण्णावदेसो-अदमियभावो। नि० चू० प्र० ७२ आ । अण्णमण्णघडत्ता-अन्योऽन्यघटता, अन्योऽन्यं घटा- अण्णियपुत्तो-अर्णिकापुत्र । नि० चू० प्र० १९४ आ। समुदायरचना यत्र सदन्योऽन्यघटं तदभावस्तत्ता; जालिका। अणिया अर्णिका, दक्षिणमथुराया वणिक्युत्री। आव० ६८८ । अण्णवं-अर्णव -अर्गो-जलं विद्यते यत्रासावर्णव । उत्त० अणियापुत्ते-अर्णिकापुत्र । बृ० तृ. २३५ आ । अण्णोयत्ता-ईषदवनता। व्य० द्वि० १२४ आ। अण्णसंभोइय-अन्यसाम्भोगिक. । आव० अण्हयंति-क्षरति (तं.) अण्णहम्मिणी-परतीर्यिका अगारस्था अविरतिका । वृ० अण्हय-आस्तव, आ-अभिविधिना स्नौति-श्रवति कर्म तृ० ४७ आ।। यस्मात् स आश्रव प्राणातिपातादि । प्रश्न. २। अण्णाइट्टसरीरं-अन्याविष्टशरीरम्,व्यन्तराधिष्ठितशरीरम् । अण्हयकर- अण्हयकर-आश्रवकर। औप० ४२ । आच० ६३३ । अण्हयकरि-कर्माश्रवकरीं। आचा० ३८८ । अण्णाइटो-अन्याविष्ट., परायत्त , यक्षाविष्टो वा । उत्त० अण्हयकरे-कर्माश्रवकारी। आचा० ४२५ । ११३ । आविष्टः । अन्त २० । अण्हाणं-अस्नानम् । आव० १५४ । अण्णारत्तो-अपराद्ध । नि० च. तृ० १०१ अ । अण्हायगो-अस्नायक । आव० ८३१ । २००। भग० २१४ । २४१ । ८४७ । (५०) [ अतजाय अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः अतितेया ] अतज्जाय-अतजातपारिस्थापनिकी, पारिस्थापनिक्या द्वितीयो | अतिकाए-महोरगेन्द्र.। ठाणा० ८५। अतिकाय -महो- मेद । आव० ६१९ । रगमेदविशेष । प्रज्ञा० ७० । अतज्जायं-अतजातीयं, भिन्नजातीयम् । आव० ६२३ । अतिकमा - अतिक्रम -अतिलचनं, विनाश | आचा० अतडं-अतीथे, अन्यतीर्थ वा । वृ० द्वि० ३१ अ । अतित्थं । १३५ । प्रतिश्रवणतो मर्यादाया उल्लंघनम् । व्य० प्र० ९० । नि० चू० तृ. १७ अ । अतिक्कीलावालो- अतिक्रीडावास , सुस्थितलवणाधिपस्य अतति-सततमवगच्छति । ठाणा० १० । भौमेयविहारविशेष । जीवा० ३१५ । अतन्त्रम्-शानलक्षगरहितम् । आव० १२० । अतिक्खतुंडो - अतीक्ष्णतुण्डम्-अतीक्ष्णमुखम् । आव० अतरं-तरीतुमशक्यं, विषयगणं भवं वा । उत्त० २९२ । ७६४ । अतरंतं-ग्लानम् । वृ० प्र० २२९ आ। अतरन्त-अति- अतिक्रान्ता-अतीता। आचा० १७८ । ग्लान । ओघ. १८३ । अतिखद्ध-प्रभूतम् । वृ० द्वि० १८७ भ । अतरंत-ग्लाना । ठाणा० १३८ । अतिखद्ध - गुरोरालोके भोक्तव्यम् , अतिप्रचूर भक्षयेत् । अतरते-अतरत्-असह । ध्य. द्वि० ३७ अ। ओघ० १८२ । अतरंतो-अतरन , अशक्नुवन् । आव० ८४७ । अशक्नु- अतिगए-अतिगत | आव० १७३ । वन् - असमर्थ । दश० ८९। अशक्नुवान् । आव० अतिगओ-अतिगत । दश० ४१ । ६३७ । ग्लान । ओघ० ४५। यदाऽऽकाशव्यवस्थिता- अतिगता-प्रविष्टा । वृ० द्वि० १८४ । भ्यां पादाभ्या न शक्नोति स्थातुं तदा। ओघ० ८४ । | अतिगमणं-प्रवेश । वृ० द्वि० १६३ आ । अतिगमन, प्रवे. गिलाणो। नि० चू० प्र० ४३ अ, ३० आ, ३६० अ । शनम् । वृ० प्र० २७५ आ । ग्लान । वृ० तृ० ५ आ, नि० चू० प्र० ८४ अ। अतिगुपिल-अतिगूढम् । आव० २९६ । अतरण--अतरण , अशक्त , ग्लान । ओघ० ६७, वृ० प्र० अतिगुलिका-(अइगुलिया)-कुक्कुसा। बृ० तृ० १९५ अ । २३४ आ। अतिघरं-सजतिपडिस्मतो। नि० चू० प्र०.२३७ आ। अतरो-ग्लान । बृ० द्वि० २२४ अ । रत्नाकर । वृ० प्र० अतिचारो-व्यतिक्रम स्खलनपर्याय । तत्त्वा० ७-१८ । अतिच्छिए- अतिकोन्तायाम् । ओघ० १५२ । अतसी-अयसी,धान्यविशेष । ठाणा० ४०६ । गुच्छविशेष । ! अतिजाति-पविमति । नि० चु० प्र० ३४ आ । प्रजा० ३२ । धान्यविशेप । नि० चू० प्र० १४४ आ । अतिजाते-समृद्धतर. । ठाणा. १८४ । अतहणाणे-अतथानानम् । ठाणा. ४८१ । अतिजाणं-अतियानम् | आव० ३६६-1 अतारं-अतारम् , तरितुमशक्यम् । भग० ८२ । अतिजाहि-अतियास्यति-प्रवेक्ष्यति। ठाणा० .४६३। अतारिमा-दुस्तरा । सूत्र. ८६ । अतिणिओ-आनीत । आव० २०४ । अति -अतिशयवान । ठाणा० ४७३ । अतिणीओ-अतिनीत., प्रापित.। आव० ८०० । अतिति-प्रविशन्ति । नि० चू० प्र० २०३ अ । अतिणे-प्रवेश्य। वृ० तृ. ७४ आ । अतिंतिणः-अतिन्तिण , अलामेऽपि नेषयत्किञ्चनभाषी । | अतिण्णो-ग्लान' । वृ० प्र० २८८ आ । दश. २३३ । अतिन्तिन , न सकृत्किञ्चिदुक्त सन्नसूयया अतितणित-आगच्छद्गच्छत् । नि० चू० प्र० १२० आ। भूयो भूयो वक्ता, प्रतिपूर्ण सूत्रादिना। दश० २५८ । अतिताणकहा-अनियानकथा-नगरादौ प्रवेशकथा । ठाणा. अतिअत्तिय - आदियात्रिका., मार्थरक्षका.। वृ० द्वि० २१० । १२५ । अतिताणगिहाति-अतियानगृहाणि-नगरादिप्रवेशे यानि अतिउच्चाओ-अतिश्रान्तः, प्राघूर्णकादि । ओघ० १८६ । गृहाणि । ठाणा. ८६ । अनिउव्वरिए -अत्युद्धरिते। ओघ० १३८ । अतितेया-अतितेजा, रात्रिनामविशेष । सूर्य. १४७ ॥ ३७ अ। । , (५१) [अतित्थ आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसकलितः अतिसेसे] - - अतित्थ -,अतीर्थम् , तीर्थस्याभावोऽतीर्थम् , तीर्थस्याभाव अतियाण-अतियानं-नगरप्रवेशः । ठाणा० १७३ । प्रवेश । श्वानुत्पादोऽपान्तराले व्यवच्छेदो वा। प्रज्ञा० १९ । नि० चू० प्र० २७३ अ। अतित्थसिद्धा-अतीर्थे-तीर्थान्तरे साधुव्यवच्छेदे जाति- अतियातो-अतियात , गत । उत्त० ४८१ । स्मरणादिना प्राप्तापवर्गमार्गा मरुदेवीवन सिद्धा अतीर्थसिद्धा । अतियारे-अतिचार -अतिचरगं ग्रहणतो व्रतस्यातिकरणम्। ठाणा० ३३ । व्य० प्र० ९० । अतित्थाविते-प्रत्याख्यात , निषिद्ध । नि० चू० प्र० अतिराउले-स्वामिकुलम् । प्रज्ञा० २५३ । १८५। अतिरायितं-अताडितम् । ओघ० ११० अतिथिओ-अस्तमितो। नि० चू० प्र० ३१२ अ । समा- अतिरिच्छच्छिन्नं- अतिरश्चीनच्छिन्न-तिरश्चीनमपाटित । प्तेत्यर्थ । नि० चू० तृ० १२६ अ। आचा० ४०५ । अतिथिसंविभाग-न्यायागताना कल्पनीयानामन्नपानादीना अतिरित्तं - अतिरिक्तम् , कुक्षिपराहारप्रमाणातिप्रान्तम् । दव्याणा देशकालश्रद्धासत्कारकमोपेत परया आत्मानुग्रह प्रश्न. १५४ । बुद्धया सयतेभ्यो दानम्। तत्त्वा० ७-१६ अतिरित्तसज्जासणिए-अतिरिक्ता-अतिप्रमाणा गय्या- अतिददाति-(अडए) प्रकरोति अतिगच्छति वेति । ठागा० वसतिरासनानि च पीठकादीनि यस्य सन्ति मोऽतिरिक्त २९८ । गय्यामनिक. । सम० ३७ । अतिघाडिय-अतिधाडित -भ्रामित । प्रश्न० ५३ । अतिरित्ता-घंघशाला । नि० चू० प्र० १०६ आ । अतिपरिणामकं अपवादैकसति । वृ० प्र० १३० अ । अतिरूप'-भूतभेदविशेष । प्रज्ञा० ७० । अतिपरिणामा-अतिपरिणामा , अतिव्याप्त्याऽपवाददृष्ट- अतिरेगं-अतिरेक, आधिक्यम् । भग० १८६ । अतिरेकम्- योऽतिपरिणामा । विशे० ९.१ । अतिव्याप्त्या परिणामो अत्यर्थम् । ओघ० २२७ । यथोक्तस्वरूपो यस्य स । व्य. प्र. ७२ अ। अतिलोलुप -अतीव रसलम्पट । उत्त० ३४५ । अतिपात-प्राणिन विभ्रश. । ठाणा० २२० । अतिवमाणे - अतिवनमान -सर्वबायात मर्वाभ्यन्तर अतिपातनम्-प्राणवता सह वियोजनम् । ठाणा० २६ । प्रतिगच्छन । सम० ९७ ! अतिपासं - अतिपाव-एग्वतावसर्पिणीतीर्थकर । समा अतिवट्टिय-अतिवर्तित -भ्रामित । प्रश्न० ५६ । अतिवतित्ताणं - अतिव्रज्य-अतिशयेन गत्वा । प्रना० अतिपुरुष -किंपुरुषभेदविशेष । प्रज्ञा० ७० । ५१० । अतिप्पणया - अश्रुलालादिक्षरणकारणशोकानुत्पादनेन । अतिवयती-अतिव्रजति, वाहुल्येन गच्छति । जीवा० १२९ । भग० ३०५ । अतिवासा-अतिवर्षा, अतिगयवर्षा वेगववर्षणम् । भग० अतिवलराया-अतिबलराजा। आव० ११६ । १९९। अतिमन्द्रः-गम्भीर । जं० प्र० ५२९ । अतिवाहयति-प्रेरयति, विनयति च । प्रश्न० ६४ । अतिम(मुत्तकुमारो-राजर्पिनाम । नि: चु० द्वि० २७ आ। अतिविजे-अतिविद्यः, तत्त्वपरिच्छेत्री विद्या यस्य । आचा० अतिमुक्तकः-पड्वर्षप्रवजित । भग० ५८६ । अतिमुक्तक - १५९ । नालवद्धपुष्पविशेष । प्रज्ञा० ३७ । अतिविद्वान्-विदितागमसद्भाव सन । आचा० १९२ । अतिमुक्तकचन्द्र-(अइमुत्तचंदए) पुष्पविशेषदलम् । भग० अतिवेगो-अतिवेग -अतिकान्ताशेषवेग । प्रश्न ५१ । १३१ । अतिशुक्लो-शुखशुक्लो । ठाणा० ३७४ । अतिमुत्तग-अतिमुक्तकलता-लताविशेष । जीवा० १८२ ॥ अतिसेसे-शेषाण्यतिक्रान्त मातिशयम् । ठाणा० ३८४ । अतिमुत्ते-अतिमुक्त , कुमारश्रमण । अन्त० । विज अतिशेषा.-अतिगया। ठाणा० ३२९ । अनिगपे-अतिगये। यराज श्रीदेव्याः मुन । अन्त. २३ । . १५३ ।। उत्त० २८७ । (५२) [ अतिसंधे अल्पपरिचितसेद्धान्तिकशब्दकोषः अत्तलद्धि - अतिसंघेइ-अतिसन्दधाति । आव० ११० । अत्त-आत्मा, सिद्धि । उत्त० १०४। आप्त , अप्रतारकः । अतिसओ-मन पर्यवावधिज्ञाने अतिशयवन्त्यध्ययनानि च । दश० ७५ । नि० चू० प्र० १६ अ । अत्तए-आत्मज-पुत्र । भग० ४६०। अतिसाहसिक-आत्मवत् प्रसाधितममिलोक य प्रत्याच- | अत्तगवेसए-आत्मगवेषक --आत्मानं गवेषयति-कथ मया क्षीत स । आचा० ५२ । ऽऽत्मा भवानिस्तारणीय इत्यन्वेषट ते । उत्त० १०४। अतिसेसि-स्फीतानि । ओघ० ९६। मन पर्यवाद्यतिशय- आत्मानं-चारित्रात्मान गवेषयति-मार्गयति। उत्त० १२० । वान् । नि० चू० प्र० १६ अ । अतिसयदव्वा उक्कोसा । अत्तगवेसी- आत्मगवेषी, आत्महितान्वेषणपर। दश० नि० ० चू० प्र० २०० अ । अतिसेसी-पात्रभूत., प्रवचनाधार. । वृ० द्वि० २१ आ। अत्तचिंतओ अभ्युद्यतजिनकल्पयथालन्दकल्पानामेकतरं अतिस्निग्धमधुरम्-वाण्यतिशय । सम० ६३ ! विहारं प्रतिपत्स्य इत्यात्मचिन्तक , गणे वा तिष्ठन् न वहति अतिहिपूआ-अतिथिपूजा आहारादिदानेन । दश० २४० । तनिमन्येषा साधूनाम् । व्य० प्र० २३२ आ । अतिहिवणीमते-भोजनकालोपस्थायी प्राघूर्णकोऽतिथिस्तद्- अत्तट्ठागुरुओ-आत्मार्थगुरु , आत्मार्थ एव जघन्यो गुरु - पापप्रधानो यस्य स । दश. १८७। दानप्रशसनेन तद्भक्तात् यो लिप्सति सोऽतिथिमाश्रित्य वनी- पकोऽतिथिपनीपक । ठाणा० ३४१ । अत्तट्ठियं-स्वीकृतम् । आचा० ३२५ । अतिहिसंविभागो - अतिथिसविभाग - साधुसविभागः । अत्तट्टेति-आत्मार्थयन्ति-परिभुञ्जते । बृ० द्वि० २७८ अ । अत्तट्ठो-अप्पगो अट्ठो भत्तादिउ । नि० चू० तृ० १३२ आ । आव० ८३७ । अत्तणा-आत्मना कृतं । ठाणा० ४९२ । अतिही-अतिथि -भोजनार्थ भोजनकालोपस्थायी, आत्मार्थ अत्तणिस्लेसकारए-आत्मनि शेषकारक , आत्मनो नि . निष्पादिताहारस्य गृतिन मुख्य साधुरेव । आव० ८३७ । शेषमिति-शेषाभाव प्रक्रमात् कर्मण करोति-विधत्त इत्यात्म- नि स्पृहोऽभ्यागत । आचा० ११५ भोजनकालोपस्था- नि शेषकारक । उत्त० ३०५ । व्यपूर्वी वा । आचा० ३२५ । आगन्तुकम् । आचा० ३१४, अत्तणोउवन्नासं-आत्मन उपन्यास । दश० ५२ । भग० ५२० । विशिष्टतिध्यभावे । बृ० प्र० ९० अ । अत्तते-आत्मज । ठाणा० ५१६ । अतीओ-आगत । आव० १४५ । अत्तत्ता - आत्मता – जीवास्तिता स्वकृतकर्मपरिणतिर्वा । अतीय-अतीतम्-उत्तीर्णम् । भग० २९३ । आचा० २३८ । अतीति-एति । उत्त. ३०२ । | अत्तत्तासंवुड-आत्मान्मसवृत आत्मन्यात्मना सवृत -प्रति. अतीमि-अटामि। आव० २२० । सलीन । भग० १८४ । अतीरंगमा-अतीरङ्गमा , तीरं गच्छन्तीति तीरशमा, अत्तदोस-आत्मापराधम् । ठाणा० ४०४ । तीरङ्गमा अतीरङ्गमा । आचा० १२४ । अत्तदोसोवसंहार-आत्मदोषोपसहार , योगसङ्ग्रहे एकवि- अतुक्कोसे-आत्मन परेभ्य सकागाद्गुणैरुत्कर्षणम्-उत्कृष्ट शतितमो योग । आव० ६६४ । ताभिधानम् । भग० ५७२ । अत्तपण्हहा-आत्मनि प्रश्न आत्मप्रश्नस्तं हन्यात्मप्रश्नहा । अतुरियं-अत्वरितम् , कायिकत्वरारहितम् । भग० १४० । स्तिमितम् । ओघ० १०८ ॥ अत्तभासिओ - अण्णस्स मतियलाभ णो भुजति । . अतुरियगति-अन्वरितगति -मन्दगति । उत्त० ७११ । चू० प्र० ३३४ ॥ अतुरियभापी-अत्वरितभाषी । आचा० ३९२ । अत्तमाया-आत्मना आदाय । भग० २८६ । अतोया-शीतोदक िरहिता संपत्य कालिकेनाचामनका- अत्त तीरंतस्स-अशक्नुवत ग्लानादे. । ओव० १०७॥ रिणी । वृ० दि. १८० अ । अत्तलद्विउ-पदात्मना लभते तदाहारयति । अघ० १.०। न उत्त० ४३४। (५३) [अस्तव आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अत्थनिउरे] , - .. E - . अत्तव-आत्मवान् , सचेतनः । दश०: २३६ । ४४८ । : व्याख्यान । 'ठाणा०५२ । सूत्रस्य व्याख्याने । अत्तसंपग्गहिए-आत्मसम्प्रगृहीत , आत्मैव सम्यक् प्रक ठाणा० १७० । विशे० ५९२ । पण गृहीतो येन । दश० २५६ । अत्यंगओ-अत्थे पव्वए गतो, अचक्खुविसयपंथे वा गतो। अत्तसमाहिए-आत्मसमाहित., आत्मना समाहित. ज्ञान दर्श० चू० १२३ । दर्शनचारित्रोपयोगेन सदोपयुक्त इत्यर्थ । आत्मा वा समा- | अत्यंतमयम्मि-अस्तमयति । उत्त० ४३५ । हितोऽस्येत्यात्मसमाहित. । सदा शुभव्यापारवानित्यर्थ ।। अत्थंतरं-अर्थान्तरम् , पृथग्भूतम् ।' आव० ६०१ । आचा०, १९१ । अत्यंतरभावे-अर्थान्तरभाव -मेंद' । आव० ४७६ । अत्तसरिसो-आत्मसदृश , कुलानुरूप । उत्त० ४० । अत्थ - अर्थ, शब्दादिविषयभावेन परिणतद्रव्यसमूहः । अत्तहिय - आत्महित., मोक्ष । दश. १५० । मोक्खो। विशे० १६२1 दश० चू० - ६८ । अत्थ-(अत्थपुरिसे) अर्थपुरुष , अर्थार्जनपर । आव० २७७ । अत्ता-आत्मा । आव० २९८ । मोक्ष , संयमो वा । सूत्र. अर्थः, निरुपमसुखरूपमोक्ष । दश. १८९ । अर्थनम् , ९० । आत्ता.-गृहीताः, स्वीकृताः। ठाणा०. ६३ । आ असम्प्राप्तकाममेद , तदभिप्रायमात्रम् । दश० १९४ । अभिविधिना त्रायन्ते-दु खात् सरक्षन्ति सुख चोत्पादयन्तीति अस्त , अस्तपर्वत अदर्शन वा । दश० २३२ । आदेश । आत्रा आप्ता वा--एकान्तहिताः। भग० ६५६ । आर्ता:- वृ० प्र० २२ आ नुत्तड्भ्या पीडिता , आप्ता रागद्वेषरहिता, आत्ता अत्थअवगमो-अर्थावगम , अर्थपरिच्छेद । दश० १२५ । गीतार्था । वृ०- द्वि० १४३ अ । अत्थई-गुच्छविशेष । प्रज्ञा० ३२ । अत्ताणओ-अत्राण. । आव० २११ । अत्थकंखिया-प्राप्तेऽप्यर्थेऽविच्छिन्नेच्छा । भग० ६७१। अत्ताणा-यष्टिद्वितीया पान्या , कार्पटिका., सयता वा। अत्थकरो-अर्थकर , विद्याद्यर्थकर गशील , भावकरविशेष । वृ० द्वि० ८२ आ । आव० ४९९। अत्ताणो - अत्राण , अनर्थप्रतिघातवर्जित । प्रश्नः १९ । अत्थकहा - अर्थकथा, विद्या शिल्पमुपायोऽनिर्वेद मञ्चयश्च त्राणरहित , अनर्थप्रतिघातकाभावात् । प्रश्न० ११ । गवा. दक्षत्व साम दण्डो भेद उपप्रदानम्। दश० १०७ । दिहारिणो। नि० चू० द्वि० ११ अ । भत्थक-अकाण्ड -अनवसर । दश० ९३ । अत्ताहिट्टिय-आत्माधिष्ठित । ओघ० १५० । अत्थगधेसणया-अर्यगवेषगया, अर्थगवेषगनिमित्तम । सूर्य अत्ति(ति)मुत्तय-अतिमुक्तक', पुष्पप्रधानवनस्पतिविशेष । जं० प्र० ४६ । अस्थग्धं-अस्ताघ. ! ओघ० ३२ । अस्ताघम् । आव ० ४१९ । अत्तुक्कोसे-आत्मोत्कर्ष । सम० ७१ । आत्मगुणाभिमानः। अत्थजुत्ती-अर्थयुक्ति , हेयेतररूपा अर्थयोजना। दश० १६२। ठाणा० २७५ । अत्थजुत्तो-अर्थयुक्त , अर्थमार , अपुनरुक्तो, महावृत्त । अत्तेय-आत्रेय ऋपिनाम । आव० ३७२ । जीवा० २५५। अत्तो - आप्त , मोक्षमार्ग , प्रक्षीणदोष., सर्वज्ञ. । सूत्र० । अत्थदूसणं-अर्थदूपणव्यमनम् । अर्थोत्पत्तिहेतवो ये सामा- १९५। रागादिरहित । दश० १२८ । द्युपायचतुष्टयप्रभृतय प्रकारास्तेपा दृषणम्। व्य० प्र० अत्तोवणीए - आत्मैवोपनीत - तथा निवेदितो-नियोजितो १५७ । यस्मिन् । ठाणा० २५९ । अत्थधम्मगइं-अर्थश्च धर्मधार्थधर्मो यदि वाऽर्यते-हिताथि- अत्य-अन्नम् , नाराचादि क्षेप्यायुधम् । प्रश्न०.११६ । अर्थ, भिरभिलध्यते, गतिः-गत्यर्थाना ज्ञानार्थतया हिताहित- विषय । आव० २८३ । अर्थ -ज्ञेयत्वात् सर्वमेव वस्तु, लक्षणा स्वरूपपरिच्छित्ति । उत्त० ४७२ । सीधेय । उत्त० ३६८ । अभिधेय , जीवादितत्त्वरूपो वा। अत्थनिउरंगे-सख्याविशेष । सूर्य० ९१ उक्० ३८५ । अर्थ्यत इत्यर्थ -स्वर्गापवर्गादि । उन अस्थनिउरे-सख्याविशेष । मर्य० ९१ ! r । . (५१) [ अत्थनिकुरं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अस्थि ] प्र० L ४९२ । अत्थनिकुरं-अर्थनिकुर, चतुरशीतिरर्थनिकुराङ्गशतसहस्त्राणि । | अत्थसिद्धे - अर्थसिद्ध , शास्त्रीयदशमदिवमनाम । सूर्य जीवा० ३४५ ६४७, ज० प्र० ४९० ।' अस्थनिकुरंगं -- अर्थनिकुराङ्गम्', चतुरशीतिर्नलिनशतसह- अत्थस्स-अस्तो मेरुयंतस्तेनान्तरितो रविरस्त गत' इति स्नागि । जीवा० ३४५ । व्यपदिश्यते तस्य पर्वतराजस्य गिरिप्रधानस्य । समः ६५। अत्थपज्जाया-अर्थपर्याया, ये तु तेषामेव वाचकशब्दाना- | अत्था-अर्था , द्रव्याणि । उत्त० ३८४ । अर्थ्या., प्रार्थनीया मभिधेयार्थस्यात्मभूता मेदा , यथा कनकस्य कटककेयूरादय, वा । उत्त० ३८४ । अर्यन्त -- गम्यन्त गम्यन्त - इत्यर्था । ते सर्वेऽप्यर्थपर्याया भण्यन्ते। विशे० २२८। ये तु तदे- ओघ० ५। शब्दादयः । ठाणा० २५३, आचा० २०१। कदेशमभिदधति तेऽर्थैकदेशप्रतिपादका पर्याया अर्थपर्याया फलानि, वस्तुनि। ठाणा० ३३ । अर्थ्यन्ते-अभिलष्यन्ते उच्यन्ते । विशे० २२७ । क्रियाथिभिरर्यन्ते वा अधिगम्यन्ते । ठाणा० ३३५ । निर्यु- क्तिभाष्यसग्रहणिवृत्तिचूर्णिपञ्जिकादिरूपा । सम० १११। अस्थपयं-अर्थपदम् , युक्तिर्हेतुर्वी। सूत्र० १५३ । अत्थाणं-देशविशेष । भग० ६८०] अस्थपलिमथो-अर्थपरिमन्थ । विशे० ६२८ । अस्थपिवासिय - अप्राप्तार्थविषयसजाततृष्णा । भग० अस्थाणमंडविया-आस्थानमण्डपिका। आव० ८९ । अत्थाणि-आस्थानिका। उत्त० ११५ । ६७१ । अस्थपुहुत्त-अर्थपृथक्त्व-श्रृंताभिधेयोऽर्थ तस्मान् सूत्रं पृथक्, 'अत्थाणिमंडवो-आस्थानमण्डप । नि० ० चू० प्र० २७४ आ। अर्थेन वा पृथु अर्थपृथु ते द्यावे अर्थपृथुत्व ।, आव० ६१। अत्थाणियं-आस्थानम् । उत्त० १४६ । अर्थात् पृथक्त्व कथञ्चिद्वंदो यस्य, विस्तीर्णमर्थपृथु । विशे० | अत्थाणियमंडविया - आस्थानमण्डपिका । वृ० २७ आ । अत्थाणी-आग्थानी । आव ६७२ । आस्थानिका । आवृ० अत्थमणमुहुत्तं - अस्तमनमुहूर्त्तम् , अस्तोपलक्षितं मुह- १४५, २९८ । तम् | ज० प्र० ४५९ । अत्थाणीवरगओ-आस्थानीवरगत । आव. २१६ । अस्थमंत-अर्थवताम् , प्रयोजनवताम् । भक्षणाद्यर्हाणाम् । अस्थादाणं-अष्टाङ्गनिमित्त प्रयोग । बृ० तृ. ८६ अ ।, जं० प्र० २४३ । अत्थामा - अस्थामान , सामान्यत शक्तिविकला । जं. अस्थमंतमेत्त - अस्तमयति मित्रे-सूर्ये, सायम् । जं. प्र० प्र० २३९। अस्थामा, मामान्यत शक्तिविकल । भगं० २४३ । ३२३ । अत्थरणं-आस्तरणम् , आस्तरण करोति । ओघ० ४।। अस्थायणयं-आस्थानिका । आव० ३४२ । अत्थरय आच्छादनम् । जा प्र. ५५ । आस्तरकेण, 'अत्थायाणं-अर्थादानं-द्रव्योपादानकारणमष्टागनिमित्त तद्द- अस्तरजसा वा । भग० ५४२ । दत्-प्रयुजान. । ठाणा० १६४ । अत्थलोला-अर्थ लोला -अर्थलोला -लम्पटा -चौरादय । अस्थावत्ती-सामर्थ्यगम्या। बृ० द्वि० १२१ आ। उत्त० ५९० । अत्थावत्तीदोसो-अर्थापत्तिदोष , यत्रादिनिष्टापत्ति , सूत्र- अत्थविगप्पणा-अर्थविकल्पना । आव० ४८४ । दोषविशेष । आव. ३७४ । अत्थविणिच्छय-अर्थविनिश्चयं -अपायरक्षक कल्याणावह अस्थाहं-अस्ताघम् , अविद्यमानस्ताघम् , अगाधम् । भंग वा अर्थाविनयभावम् । दश० २३९ । ८२। अस्ताध -निरस्ताधस्तलम् । भग० ८२ अप्र- अत्थसंजुत्तं-सभावमजुत्तं । दश० चू० ८९ । माणम् । आव० ३७४ । अत्थसंपयाणं-सावत्सरिकार्थदानम् । आचा० ४२२ । अस्थि-येन येन यदा यदा' प्रयोजनं तत्तत्तदा तदाऽस्ति- अत्थसत्थं-अर्थशास्त्रम् । आव. ४२२ । अर्थोपायप्रतिपा भवति जायते इति सुसमानन्दहेतुत्वादिति । ठाणा० ४८८ । दनं शास्त्रम् । प्रश्न. ९७। नीतिशास्त्रादि । जं. प्र. ०१९ अस्ति, विद्यन्ते, सन्तीत्यर्थ , अयवाऽस्ति अय पक्षो यदुत । . 7 -- (५५) [-अस्थिकाए आचार्यश्रीभानन्दसागरसूरिसङ्कलितः अदढो] । भग० ३२ । प्रदेशः। भग० १४९, जीवा० ६ । अस्ति, ५८८ । अर्यत इति, विवृतं प्रबोधितं विकचकल्पम् । आव० निपात सर्वलिङ्गवचन । प्रज्ञा० ५६३ । प्रदेश । आव. ८६ । अभिप्रेतपदार्थ । आव० ४१५। द्रव्यम् । आव० ६०० । त्रिकालवचनो निपात । अभूत् , भवति, भविष्यति ६०७ । अर्थ्यत इति। उत्त० ६८ । विद्यादि । दश० ११४ । च । आव० ७६८ । अस्तिद्वारम् , अस्त्यन्यश्चैतन्यरूप । अत्थोग्गहणं-फलनिश्चयम् । भग० ५४१ । दश० १२५] स्वामी । विशे० ६७२ । अत्थोग्गहे-अर्थावग्रह , अर्थस्यावग्रहणम् , अनिर्देश्यसामा- अस्थिकाए-अस्तिकाय प्रदेशराशि । भग० ३२४ । न्यरूपाद्यर्थग्रहणम् । व्यञ्जनावग्रहोत्तरकालमेकसामायिकमनि- भत्थिकाय - अस्तिकाय , प्रदेशराशि , अस्तीति सन्ति देश्यं सामान्यमात्रार्थग्रहणम् । प्रज्ञा० ३११। अर्थम्य- आसन् भविष्यन्ति च ये काया प्रदेशराशयस्ते अस्तिकाया । सामान्यनिर्देश्यस्वरूपस्य शब्दादे. अवेति-प्रथम व्यञ्जनाव- भग० १४८ । प्रदेशसङ्घात । जीवा. ६। धर्मास्तिका- ग्रहानन्तर ग्रहणं-परिच्छेदनमर्थावग्रह । सम० १२ । भग यादि.। दश० १३४। ३४४ । व्यञ्जनावग्रहचरमसमयोपात्तशब्दार्थावग्रहणलक्षणः। अस्थिकायउहेसए - भगवतीद्वितीयशतकस्य दशमोद्देशक- आव० १० । अर्यते-अधिगम्यतेऽर्थ्यते वा अन्विष्यत इत्यर्थ - नाम । भग० ६०८। सामान्यरूपादे. प्रथमपरिच्छेदनमर्थावग्रह । ठाणा० ५१ । भस्थिकायधम्म-अस्तिकायधर्म । दश० २१ । अत्थोभ- अम्तोभक, वैहिहकारादिपदच्छिद्रपूरणस्तोभकनि- मस्थिकायधम्मे-अस्तय--प्रदेश स्तेषा कायो-राशिरस्ति- पातशून्यम् , सूत्रगुण । आव० ३७६ । - काय म एवं धर्मो-गतिपर्याये जीवपुद्गलयोद्धरणात् । ठाणा० अथंडिलं-सचित्तभूमी। नि० चू० प्र० ३८ आ । ५१५ । अथ-अथशब्द प्रक्रियाप्रश्नानन्तर्यमङ्गलोपन्यासप्रतिवचनस- अस्थिक-आस्तिक्यम्-जीवस्यास्तित्वनित्यत्वकर्तृत्वभोक्तृत्व- मुच्चये ध्वत्यानन्तर्यार्थ । ठाणा० ४९५ । वाक्योपन्यासार्थ मोक्षसत्साधनश्रद्धानम् । आव० ५९१ । परिप्रश्नार्थो वा। भग० १४। प्रक्रिया प्रश्नानन्तर्यमङ्गलोप- अस्थिनत्थि-अस्तिनास्तिनामपूर्व । ठाणा० १९९ । न्यामप्रतिवचनसमुचयेषु । प्रज्ञा० २४७ । अत्थिय-अस्थिक-बहुबीजवृक्षविशेषः । प्रज्ञा० ३२ । अस्ति- अथक-अप्रस्ताव । ६० प्र० ५५ आ । काय । भग० ८१ । अत्थिकम् , अस्थिकवृक्षफलम् । दश० अथकागओ-अकाण्डागत । आव० ८०० । १७६ । अथको-अविश्रान्त । आव० १०२ । भत्थिया-यहुबीजकक्ष । भग० ८०३ । मत्थी-अर्थज्ञाता। वृ० प्र० ११२ अ । अथालंदोग्गहो-यथालन्दिकावग्रह ।नि० चू० प्र० २३९ अ अथाहं-जत्य पुण वुडति नासिया त । नि० चू० द्वि०७८ आ। अत्थीनस्थिपषायं - यद्यथा लोके अस्ति नास्ति च तद्यत्र तथोच्यते चतुर्थपूर्वनाम । सम० २६ । अथिरो-अस्थिर., क्षणावस्थायी। सूत्रः ६ । भत्थुआ-आस्तृता। आव० १७३ । अदंडे-अदण्ड , प्रशस्त योगत्रयम हिंसामात्र वा । सम० ५। अदंसणो-अन्ध । ठाणा० १६५ । अत्थुरणं-पाउरण । नि० चू० द्वि० ६१ अ। अत्युवइ-(अत्थुरड) आस्तोर्यते । ओघ ८ । अदक्खु-अदक्ष , अनिपुण । सूत्र. ७४ । अदृष्ट , अर्वा- ग्दर्शन । सूत्र० ७४ । अत्ये - अनेन यन्तरित सूर्यादिरस्त इत्यभिधीयते। मेरू नाम ज० प्र० ३७५ । अदक्खुदंसणो-अचक्षुर्दर्शन अचभुर्दर्शनमम्यानौ, केव- अत्थेगइया-मन्त्येकके। प्रज्ञा० ५४', । लदर्शन , सर्वज्ञ । सूत्र० ७४ । अत्थो-अर्थ, अभिधेय प्रयोजनं वा । प्रश्न० ११५। अदक्खेयब्वं-ग्राह्यम् । ओघ. १६ । कारणं, तात्त्विक पदार्थो वा । जीवा० ९८ । अर्यते-गम्यत अदट्ठमेव-अदृष्ट्वैव । उत्त० २१३ । इति । आव० १० । पव्वओ, अचक्खुविसयपयत्यो वा। अदढो-विणावि गेल गएग जो दुव्यलो। नि० चु, प्र० दगा चु० १२३ । अर्थ -य सूनस्याभिप्राय । विशे० १९८ । । । भी . (५३) [ अदपणा अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अहपुरं ] । आचा० ४७३ : 1 अदण्णा-विपादीकृता। नि० चू० प्र० ३२१ अ। अदुट्ठो-अद्विष्ट अदुष्टो वा दायके आहारे वा। प्रश्न० १०९ । अदत्तं-अदत्तम् , अदत्तद्रव्यग्रहणम् । प्रश्न० ४। अविती- | अदुतं-अद्रुतं, अनुत्सुकम् । प्रश्न० ११२ । र्णम् , अधर्मद्वारस्य तृतीयं नाम । प्रश्न० ४३ । अदुत्तरं-अथोत्तरम् , अथापरम् । भग० १५५, ३०६ । अदन्न-आत्मरक्षणपरा । वृ० प्र० १९० आ। अथान्यत् । जीवा. १६६ । अथापरं। औप० ३७ ।' अदसा-अदशा-दशिकारहिता क्षौमा। ओघ० २१७ । अदुयं-अशीघ्रम् । भग० २९४ । अदसी-अलसी । आव० ८५४ । अ(अ)दुयबधणं-अन्दुकवन्धनम् । सूत्र. ३२८ । अदिच्छाविजिहिह-अदित्सिष्येथे, निषेत्स्येथे । दश०१०। अदुवं-अथवा। उत्त० ११० । अदिट्ठ-अदृष्टम् , प्रत्यक्षापेक्षया अदृष्टम् । भग० १९७, २००। अदुव-अथवा । भग० १३० ।। अदिट्ठलाभिय - अदृष्टिलाभिक , योऽदृष्टपूर्वेण दीयमानं | अदुवा-अथवा, पक्षान्तरोपन्यासद्वारेणाभ्युच्चयोपदर्शनार्थः । गृह्णाति स । प्रश्न० १०६ । अदिट्टहडा-अदृष्टाहृता, अदृष्टोत्क्षेपमानीता, प्रामृतिका । अयालियं-उन्मिश्रितम् । उत्त० १४६ । आव० ५७६ । अदूरं-प्रत्यासन्नम् । आव० २३२ । अदिद्वि-अदृष्टे-तिरोहिते । ओघ० १६७ । अदूरसामंते - अदूरसामन्तम् , नातिदूरे नातिनिकटे । अदिण्णे - अदत्तादानक्रिया, अदत्तादानाय यत्करणम् , सूर्य० ५। क्रियाया, सप्तमो भेद । आव० ६४८ । अदेसकालप्पलावी-जहा भायणं पडिक्कमियं अट्टकरणंपि अदिनादाणवत्तिए-अदत्तादानप्रत्यय । सम० २५ । से कयं लेवितं, रूढं ततो पमाणतं भग्ग ताहे सो अदेस- अदिन्ने-अदत्तादानक्रिया-आत्माद्यर्थमदत्तग्रहणम् । ठाणा० कालप्पलावी मए पुव्वं चेव णायं एयं भजिहिति । नि० चू० ३१६ । तृ. ८० आ । अदेशकालप्रलापी, अतीते कार्ये यो वक्ति- अदिस्समाणे- अदृश्यमान , अनपदिश्यमान । आचा. यदिदं तत्र देशे काले वाऽकरिष्यत् तत. सुन्दरमभविष्य- दिति । उत्त० ३४७ । अदीणवं-अदीनवन्तम् , अदीन, दैन्यरहितम् । उत्त० २८२ । अह- आर्द्रम् , सरसम् । प्रज्ञा० ९१ । सूत्रकृताशस्य षष्ठम- अदीणसत्तु-नमिनाथपूर्वभवनाम । सम० १५१ । ध्ययनम् । उत्त० ६१६ । आव०. ६५८ 1 गुच्छविशेषः । अदीणसत्तू - अदीनशत्रु', हस्तिशीर्षनगरनृपति । विपा० प्रज्ञा० ३२ । ८१ । ठाणा० ४०१, ४०२ । अद्दइज-आर्द्रकीयम् , सूत्रकृताङ्गस्य षष्ठमध्ययनम् । - सूत्र० अदीणो-पसण्णमणो। नि० चू० प्र० १८९ अ । अदीन ३८५। सूत्रकृतागाध्ययननामविशेष । सम० ४२ । अविक्लव । उत्त० १२० । अदीनाकारयुक्त । अनुत्त० ४ । अनन्तकायमेद । भग० ३०० । शोकाभाव । अन्त० २२ । अहकुमारिज-आर्द्रककुमारीयम् (महाध्ययनम् )। ठाणा. अदु-अथ, 'अत' इत्यर्थे। सूत्र० ६१ । अथवा । उत्त० २९५ । अदुअक्खरिय-जुगुप्सिता, अद्वयक्षरिका। नि० चू० तृ० अद्दक्खु-अद्राक्षु, दृष्टवन्तः। भग० २१९ । अद्दण्णो-पीडित । आव० ७०० । अधृतिमापन्न , कातर.। अदुआलिआ-मथिका, मन्थनकारिणी । दश० ६० । आव० ८०० । अधृतिमुपगत ) आव० ४१६ । अधृति- अदुक्खणया-अदु खनता, दु खस्य करणं दुखन तदविद्य मापन्न । दश० ४८ । अक्षणिकः । वृ० द्वि० ४६ में मानं यस्यासावदु खनः, त गावस्तत्ता अदु खकरणमित्यर्थ । अधृतिमुपगत । आव० १९० । भग० ३०५। अह(१)न-मल्लविशेषनाम । व्य० द्वि० ३५७ अ । अदुगुंछिअं-अजुगुप्मनीयम् , सामायिकाष्टमपर्याय । आव० अद्दन्ना-आकुलीभूताः । बृ० प्र० २९० आ। अद्दपुरं-आर्द्रपुर, आईकराजधानी। सूत्र० ३८५ । १३१ । . अदए-आर्द्रकम् , - ३८७ १८ अ। ४७४ । (५७) [ अहया आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अखपेला.] 1 1 अद्दया-आर्द्रका, हरिद्रा। उत्त० २१८ । || अद्धकायसमाणा-आलोककव्यन्तरादिकायाप्रमाणा।जं. अहवदवं-आर्द्रवद्रवम् , निगालितम् । आव० ८५४ । प्रे० ५७ । मंदसुतो-आर्द्रसुतः, भाईकराजकुमार । सूत्र० ३८५ । अद्धखल्लया-पादार्धाच्छादक चर्म । वृ० द्वि० २२२ भा। अहहिज्जति-आदहति । नि० चू० प्र० ३१७ भ । अद्धखल्ला-अद्धं जाव खल्लया जीए उवाणहा । नि० चू० अहहिया-आद्रहणम् । आव० ८५४ । प्र० १३६ आ। अद्दा-आद्रानामनक्षत्रम् । ठाणा० ७७॥ अद्धखित्तं - अर्द्धक्षेत्रम् । यदहोरात्रप्रमितस्य क्षेत्रस्याई अदाए-आदर्शः । नि० चू० प्र० ३४७ अ । चन्द्रेण सह योगमश्नुते तनक्षत्रम् । सूर्य० १७७ । जं. अदाओ-आदर्शः । आव० २९८, ४१६ । प्र० ४७८ । भाग-आईकं । ओघ० १७२ । दर्पणः । बृ० प्र० १३६ आ। भद्धचंदं-अर्द्धचन्द्रः, बाणविशेष । आव० ६९७ । आदर्शः । ठाणा० २४३, सम० १२४ । ओघ० १४८ । अद्धचंदा-अर्द्धचन्द्राः, खण्डचन्द्रप्रतिबिम्बानि चित्ररूपाणि । अहागो-आदर्श.। ठाणा० ५१२ । जं० प्र० २०१३ मदाणक्खत्ते-आ नक्षत्रम् । सूर्य० १३० । अद्धचंदो- अर्द्धचन्द्रः, सोपानविशेष । प्रश्न० ८। द्वारा- अहामलगमेत्तं-आमिलकमानं । आव० ८५७ । दिषु रत्नमयश्चिहविशेष । प्रज्ञा० ९९, सूर्य० २६४ । आव. अहाय-आदर्श. । आव० ६५ । ४२५, जीवा० १७५ । अहाय-आदर्श. । प्रज्ञा० २९३ । अद्धचक्कवाला-चक्रवालार्धरूपा। भग० ८६६ । अर्धव- महारिटे-आरिष्ठ., कोमलकाक । जं० प्र० ३२ । लयाकार. । ठाणा० ४०७ । अबिजमाणेहि-आर्दै:-पुत्रकलवाद्यनुषङ्गाजनितस्नेहादार्टी.. अद्धजंघा-जवार्धपिधायि चर्म । बृ० द्वि० २२२ आ । कियमाणे.। आचा० २१२ । अद्धजंघमेत्तो-अद्धजचा । नि० चू० द्वि० ७९ आ। अद्दी-अर्दिः, याचा । प्रश्न० ९३ । अद्धद्धामीसग-अददमिश्रा, सत्यामृषाभाषामेद. । दश० महीण-अद्रीणः, अक्षुभितः । प्रश्न० १०९ । २०९ । अहीणमाणसे-अदीनमनसा । आचा० ४२४ । अद्धधामीसए-अद्धदामिश्रकं, अद्धा-दिवमो रजनी वा अहीणा-अदीना, कथं वयममुत्र भविष्याम इति वैक्लव्य तदेकदेशः प्रहरादि. अदद्धा तद्विषयं मिश्रक-सत्यासत्यं । रहिताः परीषहोपसर्गादिसम्भवे वा न दैन्यभाज.। उत्त. ठाणा० ४९१ । अद्धाद्धा, दिवसस्य रात्रेर्वा एकदेश । प्रज्ञा० २५९ । अदद्धा, दिवसरजन्येकदेशः । दश० २०९ । भद-भर्द्धम् । सूत्र० १६ । अद्धद्धामिस्सिया-अद्धाद्धामिश्रिता, दिवसस्य रात्रेर्वा एक- अद्धसं-उत्तरासङ्गः । वृ० तृ० २५४ अ। नि० चू० प्र० देशोऽद्धाद्धा सा मिश्रिता यया सा भाषा । प्रज्ञा० २५६ । .. १९१ ॥ अद्धनारायं-अर्द्धनाराचम् , यत्रैकपार्श्व मर्कटबन्धो द्वितीये अद्ध- अदाकाल:-चन्द्रसूर्यादिक्रियाविशिष्टोऽर्द्धतृतीयद्वीपसमु च पार्श्व कीलिका तत् । जीवा० १५, ४२ । प्रज्ञा० ४७२ । द्रान्तर्वर्ती, समयादिलक्षणः । आव. २५७ । कालो। नि० अद्धपत्थए-मानविशेष | भग० ३१३ । चू० प्र० ३३७ भ। अर्द्धम् , भागमात्रा। भग० २०८ । | अद्धपलितंका - अर्द्धपर्यका- रावेकपादनिवेशनलक्षणा । तिर्यग्वलितम् । ज० प्र० ५२ । ठाणा० २९९, ३०२ । भद्धकविद्वगसंठाणसंठिते- अर्दकपित्यसंस्थानसंस्थितम् , | अद्धपलियंकसंठिते-अर्द्धपल्यङ्कसस्थितम् । सूर्य० १३० । चन्द्रविमानस्वरूपम् । सूर्य० २६२ । अद्धपल्लंका-एक जानुमुत्पाटयोपवेशनम् । वृ० तृ० २०० अ । अद्धकवित्थसंठाणसंठियं - अर्द्धकपित्थसस्थानसस्थितम्, अद्धपेडा-गोचरचर्याभिग्रहविशेष । उत्त० ६०५ । ठाणा० उत्तानीकृतमर्दकपित्थं तस्येव यत्स्थानं तेन सस्थितम् । जीना. ३७८ । अद्धपेला-गोचरचर्याभिग्रहविशेष । नि० चु० तृ० १२ अ । . । -२८२। (५८) [ अद्धमंडलं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः 'अद्धाणं ] अद्धमंडल-अर्द्धमण्डलम् । जं० प्र० ४७८ । अद्धहारवरावभासमहावरो- अर्द्धहारवरावभासमह असमंडलसंठिती- अर्द्धमण्डलसंस्थितिः, अर्द्धमण्डलव्य वरः, भर्द्धहारवरावभासे समुद्रेऽपरार्द्धाधिपतिर्देवः। जीवा वस्था । सूर्य. १६॥ अद्धमागहविभम-अर्द्धमागधविभ्रमम् , गृहविशेष । जीवा० अद्धहारवरावभासवरो-अहारवरावभासवर', अर्द्ध २६९ । जं० प्र० १०७। हारवरावभासे समुद्रे पूर्वार्धाधिपतिर्देवः। जीवा० ३६९ अद्धमागहा - अर्धमागधी, अई मागध्या इत्यर्द्धमागधी | अद्धहारवरावभासो - अर्द्धहारवरावभासः, द्वीपविशेष भाषा। भग० २२१ । मागधभाषालक्षणं किञ्चित्किञ्चिच्च समुद्रविशेषश्च । जीवा० ३६९ । प्राकृतभाषालक्षणं यस्यां सा, अर्द्ध मागध्या इत्यर्द्धमागधी। अद्धहारवरो-अर्द्धहारवरः, अर्द्धहारवरे समुद्रे पूर्वार्धाधि भग० २२१ । मगहद्धविसयभासानिवद्धं, अट्ठारसदेसीभासा- पतिर्देवः । जीवा० ३६९ । द्वीपविशेषः, समुद्रविशेषश्च णियतं । नि० चू० द्वि० ३६ भ । जीवा० ३६८। अद्धमासिपसु-अर्धमासिका। आचा० ३२७ । अद्धहारो-अर्द्धहार', नवसरिक । औप० ५५। जीवा. अद्धरत्तकालसमओ-अर्द्धरात्रकालसमयः । आव० १२१॥ १८१ । भूषणविधिविशेषः । जीवा० २६८ । द्वीपविशेषः समुद्रविशेषश्च । जीवा० ३६८१ प्रज्ञा० ३०७। अचसंकासा-अर्द्धसङ्काशा, सर्वकामविरक्तताविषये देवलासुत- राजस्य तापसावस्थायामुत्पना पुत्री। आव० ७१४ । अद्घा-अध्वा, पन्था । आव० ६६२ । समय । विशे० ९६१ भद्धसम-अर्द्धसमम् , पद्यविशेषः। दश० ८८ । एकतरसमम् । काल, अर्धतृतीयद्वीपसमुद्रान्तर्वर्ती समयादिलक्षणः । विशे० ८३७ । कालम् । ठाणा०४४ । कालस्याख्या। प्रज्ञा ९। ठाणा० ३९७॥ अवधिलब्धिकालः । आव० ४३ । अध्वा-मार्ग। आव० अद्घसेलसुत्थियं-अर्द्धशैलसुस्थितम् । जीवा. २६९ । ६१७ । काल.. भाव. ८४०। दिवसो रात्रिी। प्रज्ञा अद्धहारा-अर्धहारा, नवसरिक. । जं० प्र० २४, १०५ । अद्घहारमहो-अर्धहारभद्र., अर्द्धहारे द्वापे पूर्वार्धाधिपति- २५९। अद्धा, षषष्ठयधिकरात्रिन्दिवशतत्रयपेरिमाणा । सूर्य. ११। जलाए भद्धं जाव कोसो। नि० ८० प्र० देव । जीवा० ३६९। १३६ आ । अद्धहारमहाभद्दो-अर्वहारमहाभद्र , अर्द्धहारे द्वीपे- अद्घाउए - अदा-काल तत्प्रधानमायु:-कर्मविशेषोऽद्धायुः, ऽपरार्धाधिपतिर्देव । जीवा० ३६९। भवात्ययेऽपि कालान्तरानुगामी । ठाणा० ६६ । अद्धहारमहावरो- अर्द्धहारमहावर , अर्द्धहारे समुद्रेऽ. अद्घाए-कालस्य पौरुष्यादिकालमानमाश्रित्य इति । ठाणा० परार्धाधिपतिर्देव । जीवा० ३६९ । ४९८ । काले अर्थादागामिन्याम् । उत्त० २८० । अद्धहारवरभद्दो - अर्द्धहारवरभद्र , अर्द्धहारवरे द्वोपे अद्घाकाल: काल , कालशब्दो हि वर्णप्रमाणकाला. पूर्वार्धाधिपतिर्देव । जीवा० ३६९ । दिष्वपि वर्तते, ततोऽद्धाशब्देन विशिष्यत इति । ठाणा० अद्धहारवरमहाभहो-अर्द्धहारवरमहाभद्र अर्द्धहारवरे २०१। चन्द्रसूर्यादिक्रियाविशिष्टोऽर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्रान्तर्वर्त्य- द्वीपेऽपराधिपतिर्देव । जीवा० ३६९ । द्धाकाल । दश० ९ । अद्धहारवरमहावरो- अर्द्धहारवरमहावर, भईहारवरे अद्धाकाले-चन्द्रसूर्यादिक्रियाविशिष्टोऽर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्रान्त- समुद्रेऽपरा धिपतिर्देव. । जीवा० ३६९ । वर्ती समयादि । भग० ५३३ । अद्धहारवरावभासभद्दो-अर्द्धहारवरावभासभद्र , अर्द्ध- अद्धाढए-अढिक, मानविशेष । भग० ३१३ । हारावमासे द्वीपे पूर्वार्दाधिपतिर्देव । जीवा० ३६९ । अद्घाणं-पहो । नि० चू० प्र० ५१ आ । महदरण्य । बृ० अद्धहारवरावभासमहाभद्दो- अईहारवरावभासमहा द्वि० १७४ आ। अध्वा-पन्थाः । वृ० वि० १२२ । भद्र, भईहारावभासे द्वीपेऽपरार्धाधिपतिर्देव.। जीवा. महंता अडवी। नि० चू० प्र० ५० आ। छिन्नापातं महदर. व्यम् । ३० दि० २१ आ। उत्पत्तिप्रलयरूपम् । उत्त० २६८। । अद्धैव काल , । (५९) [ अद्धाण आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अधिगरणसि] TE । भाव। । " अद्धाण-अवनः । आव ० ५३५ । अवा-विप्रकृष्टो मार्ग । अधरिमं - अविद्यमानधारणीयद्रव्याम् ऋणमुत्कलनात् । वृ० प्र० २३८ आ। भग० ५४४ । अद्धाणतेणो-पथे मुसतो। नि० चू० द्वि० ३८ आ। अधरो-अधरः, अधस्तनौष्ट । प्रश्न० १४० । अधीर । अद्घाणपडिवन्ने-अध्वप्रतिपन्न , मार्गप्रतिपन्न । भग० उत्त० १५३ । ११६ । अधरोट्टा-अधरोष्ट , अधस्तनो दन्तच्छद. । ज० प्र० ११२ । अद्धाणपरिस्संतो-अद्धानपरिश्रान्त । ओघ० १०७ । प्रश्न० ८१ । अद्घाणपवण्णगो-अध्वप्रपन्नक. । आव० ५७८ । अधस्तनकाय-पादपाणिशिरोग्रीवमुच्यते । ठाणा० ३५७ । अद्धाणसीसए-यत परं समुदायेन गन्तव्य, सम्यग्मा अधस्तारका-पिशाचमेदविशेषः । प्रज्ञा० ७० । वहनात्। वृ० तृ० ६१ आ । अधारणिजं-अधारणीयं, धारयितुमशक्यम् , स्थातुं वा- अद्धाणसुत्ते-अद्धाणविहिजयणाविदसणसुत्तगं । नि० चू० ऽशक्यम् । विपा० ६२ । अविद्यमानाधमर्णम् । विपा० ६३ । द्वि० १४८ अ। अप्रशस्तप्रदेशखञ्जनादिकलकाट्कितत्वात् । आचा० ३९६ । अद्धामिस्सिया-अद्धामिश्रिता, अद्धा-काल. स चेह प्रस्ता- अधिकरणं-अधिक-अतिरिक्तं उत्सूत्रं करणं, अवग वाद्दिवसो रात्रिर्वा, स मिश्रितो यया सा भाषा । प्रज्ञा० ०५६ । अधमा जघन्या गति तामात्मानं ग्राहयति। कपाय- अद्धामीसए कालविपयं सत्यामत्यम् । ठाणा० ४९० । नि० चू० प्र० २९४ अ। अधोकरणं, अद्धामीसग-अद्धामिश्रा, सत्यामृषाभेट । दश० २०९ । अधितिकरणं, अवुद्धिकरणम् । नि० चू० प्र० २१३ अद्धासमय-कालसमय., अद्धाया निर्विभागो भागो वा। आ । कलहो । नि० चू० प्र० ३४४ आ, २३९ अ । जीवा० ६ । अधिकरणनित्तिनी - खगादिनिर्वतिनी, अधिकरणिकी- अद्धिती-अधृति । आव० ३५३ । क्रियाया द्वितीयो मेद । आव० ६११ । अधुट्ठाई-अर्द्धचतुर्थानि । आव० ३९ । अधिकरणप्रवर्तिनी-चक्रमह पशुवन्धादिप्रवर्तिनी क्रिया, अधुट्ठाण-अभ्युष्टानाम् , अधिकतिसृणाम् । प्रश्न० ७३ । अधिकरणिकीक्रियाया प्रथमो भेद. । आव० ६११। अधोवमिए - अद्धौपमिकम् – यत्कालप्रमाणमनतिशयिना । अधिकरणसाला-अधिकरणशाला, लोहपरिकर्मगृहम् । ग्रहीतु न शक्यते तत् । ठाणा० -९० । भग० ६९७ । अद्भुतम्-वाण्यतिगय । सम० ६३ । अधिकरणाणं-अधिकरणाना-कलहाना यन्त्रादीना बोत्पा- अधम्मजुत्ते-येन उक्तेन प्रतिपाद्यस्याधर्मवुद्धिरुपजन्यते यिता। सम० ३७ ! तदधर्मयुक्तम् । ठाणा० २५३ । अधिकरणिखोडी-अधिकरणिखोडी-यत्र काटेऽधिकरणी अधम्मपलजणो-अधर्मप्ररक्त , अधर्मप्रायेषु कर्ममु प्रकर्पण निवेश्यते। भग० ६९७ ॥ रज्यत इति । सूत्र. ३२९ । अधिकरणिसंठिते-अधिकरणीमस्थितम् । ठाणा० ४३४ । अधम्मपलोई-अधर्मप्रलोकी, अधर्मानेव-परसम्बन्धिढोपा- | अधिकरणीतो-चुली । नि० चू० द्वि. १०१'अ । नेव प्रलोकयति-प्रेक्षते इत्येशील । विपा० ४८ । अधिकासिका-या मजावेगेनापीडित मुखेनैव गन्तुं शक् अधम्मो - अधर्म., अचारित्ररूपत्वान । अब्रह्मण पोडश नोति ता 1 ओघ० १९९ । नाम । प्रश्न. ६६। अधर्मास्तिकाय स्थित्युपष्टम्भगुण । अधिक-अर्गले । उत्त० ६६० । ठाणा० ४० । अधर्मे-श्रुतलक्षणविहीनत्वादनागमे अपौरु- अधिक्खाउ-अधिकतर खाए मो। नि० चू० प्र० १५१ अ। पेयादौ । ठाणा० ४८७ । अधर्मास्तिकाय । सम० ६. अधिगम-दर्शनभेद । आव० ५२७ ॥ अविद्यमानसदाचार । उत्त० ४३४ । अधिगरणं-अधिकरणं, अधिकियते-स्थाप्यते-नरकादिवा- अधरं-आत्यन्तिक कारणम् । वृ० तृ० १९ अ - त्माऽनेनेति, अनुष्ठानविशेष । प्रज्ञा० ४३५ । अधरफाणू-पाणिका । व्य० दि० २९९ अ । अधिगरणसि-विरोधे । ठाणा० ४४१ । । (६०) " . [ अधिगरणिया अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः मनवत्राप्यता निक अधिगरणिया-आधिकरगिकी, अधिकरणेन निर्वृत्ता। प्रज्ञा० | अधोवेदिकी-जानुनोरधो हस्तयोर्निवेश । ठाणा० ३६२ ॥ अधिगारो-अधिकार.. नियोग. । प्रश्न० ६६ । [ ४३५ । अध्यसनं-अजीर्णे भोजनम् । ठाणा० ४४७ ॥ अधिघटिकया-कपिलदरिद्रदृष्टान्तविशेष । आचा० १६३ । । अध्यास्यन्ते-सद्यन्ते । प्रज्ञा ८० । अधिट्ठणं-सगिसेजवेढिए चेव उपवेसगं । नि० चू० अध्याहार-व्याख्यानम् । आचा० ५५ प्र० २४६ आ । अध्येष्टया-यदृच्छया। सम० ३७ । अधिहाणं-अधिष्ठानम् । ओघ० १४८ । अध्वर-यज्ञ. । उत्त० ५२५ । अधिट्टिजा-अधितिष्ठेत् योन्याकर्षणेन सगृह्णीयात् । ठाणा अनंगप्रविष्ट-गणधरानन्तराद्याचार्यदृब्धम्। तत्त्वा० १-२०। अनकभिन्नेहि-अनस्तितै । भग० ३७२ । अधिट्टेति-परिभुञ्जति। नि, चू० प्र० २२५ आ । अनग्गओ-अनग्नकः, दुमविशेषः । जीवा० २६९ । अधिमरगा-अहिवत् अनपकृतेऽप्यपकारे मारका । चू० अनङ्गसेन-चंपावासिसुवर्णकार । बृ० तृ० १०८ आ। द्वि० ११ ॥ भनतिचारम्-छेदोपस्थापनीयभेदविशेष । ठाणा० ३२३ ।' अधियं-अधिकम् , वर्णादिमिरभ्यधिकं, सूत्रदोषविशेषः । | अनतिविलम्बितम्-वाण्यतिशयविशेष.। सम० ६३। : आव० ३००। अनध्यवसायः-संशयो विपर्ययो वा। आचा० १५० । अधियासितो-अध्यासितः, अधिवासित । आव० ३४३ । अननुक्रमाद्-पश्चानुपूर्व्या । विशे० २८४ । अधिशय-आश्रयत.। आचा० २५५ । अनन्तकम्-समयभाषया वस्त्रमिति । ठाणा० ३४६ । अधिष्ठानम्-गुदास्थानम् । दश० ११८ । अनन्तगुणितम्-अनन्तगुणितं, अनन्तशो गुणितस् । विशे० अधीकारो-प्रयोजनम् । १० द्वि० २२५ अ। २६८ । अधीकारवशः-प्रसङ्गः । आचा० २४१ । अनन्तरवल्ली-मात्रादय षट् । बृ० तृ. ४२ आ । अधीता-अधीता, श्रुतनिषद्धा सती पठिता । प्रश्न० १०५। मनन्यत्वद्रव्यशुद्धि -आदेशतो द्रव्यशुद्धेर्भेद , यथा शुद्ध अधीतान्वीक्षिकीकस्य-दुर्गृहीतहेतुदृष्टान्तलेशस्य । आचा० दन्त । दश० २११ । अनपनीतम्-वाण्यतिशयविशेष' । सम० ६३ । अधुवं-अध्रुव-नावश्यभाविनम् । प्रश्न० ९६ । प्रातिहारिकम् । अनभुवगओ - अनभ्युपगत , श्रृंतोपसम्पदानुपसम्पन्न । नि० चू० द्वि० ११७ आ। अधुववग्गणा-अध्रुववर्गणा, इतश्चोर्ध्वमित्यमेवैकोत्तरवृद्धि- क्रमेण वर्द्धमाना ध्रुववर्गणाभ्य इतरा अनन्ता भवन्ति । अनभिग्रहिकः-मिथ्यात्वविशेष । ठाणा० २७ 1 विशे० ३३॥ अनममाणे-अनममानान् , निपुणतया सावद्यानुष्ठायिन. । अधुवे-न ध्रव ,सूर्योदयवन्न प्रतिनियतकालेऽवश्यभावी। भग० आचा० ० २५४। ४६९ । अधुव-स्वल्पकालानुज्ञापनात् । आचा० ३९६ । अनर्गलितकपाटम्-उद्घाटकपाटम् । ओघ० १६६ । नित्यो न । उत्त० २८९ । अनर्थकम्-अर्थशून्यम् । आव० ५१। अधो-भूमौ । ओघ० १६२ । अनल - अनलम्-अभिष्टकार्यासमर्थ हीनादित्वात् । आचा. अघेणू-सुक्का वञ्झा वा। नि० चू० प्र० ३२७ अ । ३९६ । न अलो अनल:-अपश्चल । नि० चू० द्वि० २५ आ। अधोघट्टना-अधो भुव घट्टयति । ओघ०-१०९ । अनलगिरी-अनलगिरि, प्रद्योतस्य हस्ती, तृतीय रत्नम् । अधोणता-गजदंतवत् अवनता । नि० चू० द्वि० ४९ आ । आव० ६७३। अधोदृष्टिता-दोषविशेष । उत्त० ४९० । अनलसा-उत्साहवन्त । ओघ० १००। अधोभागा-भूमिभाग. । जं० प्र० ३२१ । अनवत्राप्यता-अविद्यमानमवत्राप्य-अवत्रपणं लंजनं यस्य अधोभावो-अधोभाव., तिरस्कारबुद्धि । आव० ६९९ । स., अवत्रापयितुं-लज्जयितुमर्ह , शक्यो वाऽचत्राप्यो भधोविवृतम्-अनाच्छादितममालगृहम् । ठाणा० १५७ । लज्जनीयः न तथा तद्भाव । उत्त० ३९ । २२३॥ आव० १००। I (६१) [अनवगतानि आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अनिष्पनीतापना ] 4 - - अनवगतानि-असङ्कल्पितान्यनालोचितानि । विशे० १४५। | अनित्यत्वम्-अतादवस्थ्यम् । ज० प्र० २६ । अनवद्यागी-महावीरभगवद्दुहिता । विशे० ९३५ । अनिद्देस-अनिर्देशदोषः, यत्रोद्देश्यपदानामेकवाक्यभावो न अनवयग्ग-अनवदग्रम् , अनन्तम् । भंग. २४८ । क्रियते, एतादृश सूत्रदोषविशेष । आव० ३७४ । अनवसर-अनागमः । आचा० १२२ । अनिभृता-निष्ठुरवक्रोक्त्यादिरूपा। बृ० प्र० २१३ अ । अनाकारा-सामान्याशग्रहणशक्तिः । भंग ७३ 1 अनिदोज्ज-अनिर्भय, अस्वस्थम् । व्य० द्वि० २४३ आ। अनाघात-(अणघायं ), अमारिघोषणा। आचा० २६.1 अनियमि-अनिवृत्ति-शुक्लध्यानचतुर्थमेदरूपम्। उत्त० ५८९॥ अनाचारश्रुतम्-सूत्रकृताङ्गस्य पञ्चममध्ययननाम । ठाणा० आ सम्यग्दर्शनलाभाद् न निवर्तते । विशे० ,५३५ । ३८७ । अनियट्टी-ग्रहविशेष । ठाणा० ७९ । जं० प्र० ५३५ । अनाचीर्णम्-अनारब्धम् । आचा० १४८ । अनियओ-अनियतः, अनियतवृत्ति । उत्त० २६९ । अनायुक्ता-(अणाजुत्ता )-'लोपता। ओघ० १८६ । अनियतवृत्ति-अनियतविहाररूपा। उत्त० ३९ । अनियत- अनाद्यन्तं-आद्यन्तरहितम् । ठाणा० १२० । विहार । ठाणा० ४२३ । अनानुगामिकः-अनानुगामिकः-शृङ्खलाप्रतिवद्धदीप इव यो अनियाओं -अनियता । ओघ० ७३ । गच्छन्तं पुरुषं नानुगच्छति । प्रज्ञा० ५३९ । अनियाणे-अनिदानः, न विद्यते निदानमस्येति निराकाङ्क्षो. अनाभवद्वयवहार-अस्वामित्वव्यवहार। आव० ८२१ । ऽशेषकर्मक्षयार्थी संयमानुष्ठाने प्रवर्तेत । सूत्र २६४ । अनाभोगिक-मिात्वविशेष । ठाणा० २७ । अनिरक्खिय-क्षिप्त.। आव० ६८१ । अनालीढं-(अणालीढं )-अनववुद्धः । ओघ० २२७ । 'अनिरुद्ध-अनिरुद्ध , अन्तकृद्दशानां चतुर्थवर्गस्याष्टमाध्यय- अनालोचितानि-असङ्कल्पितान्यनवगतानि। विशे० १४५ । नम् । अन्त० १४ । अनाहो-अनाथ , नाथरहितः, योगक्षेमकीरिनायकाभावात् । अनिरुद्धो-अनिरुद्ध , कृष्णवासुदेवापत्यनाम । प्रश्न० ७३ । प्रश्न ११ । योगक्षेमकारिविरहित । प्रश्नः १९ । अनिर्विष्ट-न न दत्तफलम्। बृ० प्र० ५० आ। अनिव्वुइ-अनिर्वृति', अस्वास्थ्यनिवन्धना कायादिचेष्टा । अनिंदं-अनिन्द्यम् , सामायिकसप्तमपर्यायः । आव० ४७४ । अनिन्द्रियं-मन. । बृ० प्र० ९आ । अनिल -अनिलनरेन्द्र यवराजर्षिपिता । बृ० प्र० १९० आ। अनिकाम-परिमितम् । बृ० द्वि० ४ अ । अनिलसुओ-अनिलसुत यवराजा । बृ० प्र० १९१ अ । अनिन्दितः-किन्नरमेदविशेषः । प्रज्ञा० ७० । अनिलंछिएहि-अवर्द्धितकै । भग० ३७२ । अनिउणमई-अनिपुणमति. । आव० ४९२ । अनिवृत्तिकरण - सम्यक्त्वप्राप्ती करणविशेष । ठाणा. अनिग्गहे-अनिग्रह.-न विद्यते इन्द्रियनिग्रह -इन्द्रियनिय- ३१। अनिवृत्तिकरणं, न निवर्तनशीलम् । आव० ७५ । मात्मकोऽस्येति। उत्त० ३४४ । अनिवृत्तिवादर -दर्शनसप्तकलोभोपशमयोरन्तरम् | आव० अनिज्जूहित्ता -अदत्वा । भग० ७०१ । अनिटुं-अनिष्टम् , इध्यन्ते स्मेतीष्टास्तन्निषेवादनिष्टा । भग० अनिवाणि-अनिर्वाणि -असुखम् । व्य० प्र० ६२ अ । खेद (गगि०) अनिट्ठता-अनिष्टता, अवल्लभता । भग० २३ । अनिव्वुइकरो- अनिवृतिकर , अस्वास्थ्यनिवन्धनकायादि- अनिट्ठभओ-अनिष्टीवक , मुखश्लेष्मणोऽपरिष्टापक । प्रश्न० चेष्टाकर. । आव० ४९९ । अनिव्वुडं-अचित्तभोजी त्रिदण्डोवृत्तभोजी । दश० चू०५१ । अनित्थंत्थं- अनित्यस्थ, इदंप्रकारमापन्नमित्थं, इत्थं तिष्ठ- | अनिश्रितवचनता-रागाद्यकलुषितवचनता । उत्त० ३९ । तीति इत्थस्थं, न इत्थंस्थ अनित्थस्थ-वदनादिशुषिरप्रतिपूरणेन | अनिष्पन्नातापना-( अणिप्फण्णायावणा)-आतापनाया पूर्वाकारान्यथाभावतोऽनियताकारमिति । प्रजा० १०९ । मेदः । औप. ४० । आव० ४९९। ८२ । १०७ । (६२) [अनिसाह अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अनुसारगतिः] ११८ आ। - 1 2 अनिसाइ-अनिशादी । सम० २० । अनुद्धातकृत्सन - 'कालगुरु निरन्तर वा। व्य० प्र० अनिसीहं-अनिशीथम् , निशीथाद्विपरीतम् । उत्त०-२०४ । वद्धश्रुतम् । आव० ४६४ । अनुद्धरिः-कुन्थुविशेष , त्रीन्द्रियजीवमेदः । उत्त० ६९५ । अनिहुआ-त्रिदण्डिन । बृ० द्वि० २३५ आ। कन्दर्पबहुला चलनेव कुन्थुः स विभाव्यते । ठाणा० ४३० । मायिनश्च । बृ० तृ० १९५ मा । अनुनादि-वाण्यतिशयविशेषः । सम० ६३ । अनिहो-अनिह.-अमायः, न निहन्यत इति वा परीषहै- | अनुपथ-मार्गमध्यः । आचा० २६५ । रपीडित , अस्निह -स्नेहरूपवन्धनरहित । सूत्र० ४००। | अनुपरतम्-उत्सन्न, वाहुल्येन । आव० ५९० । अनीकाधिपतयः-दडनायकस्थानीया । तत्त्वा० ४-४ । अनुपरिहारकाः-पारिहारकवैयावृत्त्यकरा । ठाणा० ३२४ । अनीहडं-अनिर्गतम् । आचा० ३२५ । अनुप्रवाचयति-(अनुपयाएइ), अनु-परिपाटया प्रकर्षण अनीहारिमे-अनिर्झरितम् । अटव्यादिकृतमनशनम् । भग० विशिष्टार्थावगमरूपेण वाचयति । जीवा० २५४ । १२० । गिरिकन्दरांदी अनशनम् । ठाणा० ९४ । भग अनुप्रास-अलङ्कारविशेष । जं० प्र० १४३ । ६२५॥ अनुप्रेक्षा-मनसा प्रन्थार्थयोरभ्यास'। तत्त्वा० ९-२५ । अनु-पश्चात् । आव० २४२ । सातत्यम् । उत्त० ६२७ । अनुप्रेक्षितम्-ध्यातम् । ठाणा० १७३ । अनुकूलं अनुगुणं, अनुलोमं च । जीवा० ३ । अनुगमः-सूत्रस्य न्यासानुकूल. परिच्छेद । ठाणा० ४ । अनुभवसझा-स्वकृतासातवेदनीयादिकर्मविपाकोदयसमुत्था। जीवा० १५ । संहितादिव्याख्यानप्रकाररूप , उद्देशनिर्देशनिर्गमादिद्वारकला- पात्मको वा । सम० ११५ । अनुगमनम् , अनुपात । उत्तः अनुभूयते-लक्ष्यते । विशे० १७६ । अनुमतं-कामम् । आव० ५२७ । ६३१ । अनुगामि-यन्मोक्षाय अनुगच्छति । व्य० वि० ३९८ अ। अनुमानं - साधनधर्ममात्रात् साध्यमात्रनिर्णयात्मकम् । अनुगामिकता-परम्परया शुभानुबन्धसुखम् । जीवा० २४२ । अनुगुणं-अनुकूलमनुलोमं च । जीवा० ३ । अनुयोगद्वाराणि-व्याख्यानानि । आचा० ३ ।' अनुग्गहे-अनुग्रहकृत्स्नं, यत् षण्णा मासानामारोपितं षट अनुलिखन्-अभिलायन् । जीवा० १७५ । दिवसा गतास्तदनन्तरमन्यत् षण्मासान् आपनस्ततो यत् अनुलेपनेन-सकृलिप्तस्य पुनः पुनरुपलेपनेन । सम० १३६ । अव्यूढं तत्समस्तं झोषितं पश्चात् यदन्यत् पाण्मासिकमा- अनुलोम--उत्सर्गः । ओघ०६५।' पन्नं तद्वहति । व्य० प्र० ११८ आ । अनुलोमवचनसहितत्वं-प्रतिरूपविनयविशेष । व्य. प्र. अनुज्येष्ठ-पश्चावृत्त्यङ्क । विशे० ४४३ । अनुशा-विधि । आव० ७१३ । अनुल्वण-अनुद्भट । जीवा० २७५ ।' अनुशातभक्तादिभोजनम् - अदत्तादानविरमणचतुर्थभा- | अनुपातनम्-उच्चारणम् । आव० ८३५ । वना। प्रश्न० १२८ । अनृतम्-असत्यम् । ठाणा०.५००। अनुक्षातसंस्तारकग्रहणम् - अदत्तादानविरमणद्वितीय- अनेकजातिसंश्रयाद्विचित्रम्-वाण्यतिशयविशेष । ममः ठाणा० ४९२। - . २२ । । भावना। प्रश्न० १२७॥ अनुशापनाय-अनुमत्यै । आव० ५४२ । अनेकान्तिक -हेतुदोषविशेष. । ठाणा० ४९३ । अनुतटमेदः-वंशवत्' तटमेद: । ठाणा० ४७५ । अनुशय:-क्रोध । उत्त० ३७७ । अनुत्संकलितम्-अवितीर्णम् । आचा० ३६ । अनुश्रेणि-ऋजुश्रेणिः । उत्त० ५९७ । मनुदिश-उपाध्यायप्रवर्तिनीलक्षणम् | व्य० द्वि० २०० भ। अनुष्ठानं-(अणुट्ठाण)-विहितम् । आव० ६१९ । अनुदिक् । व्य० द्वि० १९६ आ । व्य० द्वि० २०४ आ। अनुसारंगैति -अनुपातगतिः । सूर्य० १६ । (६३) [ अनं आचार्यश्रीमानन्दसागरसूरिसङ्कलितः अन्नाणियवाई] अनं-अन्यत् । उत्त० १३७ । मण्डकखण्डखाद्यादिसमस्तमपि | अन्नमनघडतार-परस्परसमुदायता। भग० ७५८ । भोजनम् । उत्त० ३६९ । अन्नमनपुट्ठाई-आगाढाश्लेषतः । भग० ७५८ । अनंति-अनुयन्ति, आगच्छन्ति । ओघ० १२६ । अन्नमनबद्धाइं-गाढाश्लेषतः । भग० ७५८ । अनंदाई-असूया, अन्यामिदानी वा । आव० ५०९ । अन्नमनभारिता-अन्योऽन्यभारिकता, अन्योऽन्यस्य यो अन्न-अन्यः । भग० ३१७ । अन्न-भत । दश० २१६ । भार स विद्यते यत्र तदन्योऽन्यभारिक तट्टावस्तत्ता । भग० अन्नइलाय-अन्नतिलाए, दोषानभोजी । प्रश्न० १०६ । २१५ । . अन्नइलायए-अनं विना ग्लानो भवति । भग. ७०५ । अन्नयरंसत्य-अन्यतरत् शस्त्रम् : सर्वशस्त्रम् , एकधारादि- अन्नइलायचरए-अम्मग्लानको दोषानभुगिति, अथवा अन्नं शस्त्रव्यवच्छेदेन सर्वतोधारशस्त्रकल्पम् । दश० २०१ । विना ग्लायकः - समुत्पन्नवेदनादिकारण एव, अन्यस्मै | अन्नयर-अन्यतरम्, स्तोकम् । दश०.१९८ । प्रतिकूलम् । वा ग्लायकाय भोजनार्थ चरतीति अन्नग्लानकचरकोऽन आचा० ३४२ । ग्लायकचरकोऽन्यग्लायकचरको वा । ठाणा० २९८ । अन्नयरायम्मि-अन्यतरस्मिन् । उत्त० ५४३ । अन्नउथिए - अन्यतीर्थिक , चरकपरिव्राजकभिक्षुभौता- | अन्न भण-अन्येनाकृष्यमाण । ओघ० १६५ । दिकः । आव० ८११1 अन्नलिंगे-अन्यलिङ्गम् , साधुलिङ्गम् । आव० १३४ । अन्न उत्थिता-अन्ययूथिकाः-अन्यतीथिका । ठाणा० १३५। अन्नवत्थुवन्नास-अन्यवस्तूपन्यासः, -उपन्यासस्य द्वित्तीयो अन्नउत्थिय-अन्यपूथिक., अन्यतीर्थिक', चरकादिकः । मेद, । दश० ५५-1 जीवा० १४३ अन्नवालए-अन्यपाल.-अन्ययूथिक ।. भग० ३२३ । भन्नकाले-अन्नकालः, सूत्रार्थपौरुष्युत्तरकालं भिक्षाकाल. । अन्नवेल-तत्रान्यस्या- भोजनकालापेक्षयाऽऽद्यावसानरूपाया सूत्र० ३०११ वेलाया-समये चरतीति । ठाणा० २९८ । अन्नकिञ्चकरो-अन्यतृप्तिकरः। आव० ७२० । अन्नहाभावो-अन्यथाभावः । बृ० द्वि० २८९ अ । उनिष्क- भन्नगिलाय-पर्युषितम् । आचा० ३१३ । मणाभिप्राय.। ओघ० ८१ । अन्नत्थ-अन्यत्र, परिवर्जनार्थे । प्रज्ञा० -२५३ । व्य० प्र० अन्नाइटे-अन्याविष्ट.-अभिव्याप्त । भग० ६६३ । १६४ आ। अन्नामो-अन्यस्मात् , अन्येन द्वारेण । उत्त० २१९ । । अन्नधम्मिय-अन्यधार्मिकः, मिथ्यादृष्टि.। ओघ० २४ । अन्नाणं-अज्ञानम् , मिथ्याज्ञानम् । उत्त० १५१ 1 मिथ्या- अन्नपर-अन्यपरं-अन्यरूपतया परमन्यत् । आचा० ४१५ । त्वतिमिरोपप्लुतदृष्टीवस्य विपर्यय । विशे० ८७३। द्रव्य- अन्नपाणं-अन्नपानम् , गोदनकालिकादि। उत्त० ३६३ । पर्यायविषयबोधाभाव । ठाणा० १५४ा लौकिकश्रतम्। ठाणा. अन्नमयं-परचक्कभय । नि० चू० द्वि० २१ अ । ४५१ । अत्रभावेणं-अन्यभाव -योऽसौ गन्ता सोऽन्यभावः, उनि- अन्नाणतावादा-अज्ञानमेव श्रेय इत्येवं प्रतिज्ञा.। ठाणा.. क्रिमितुकामः । ओघ० २२ । अन्नम-अन्योऽन्य-परस्पर । ठाणा० १६२ । अन्नाणकिरिया - अज्ञानात् वा चेष्टा कर्म वा सा। अन्नमन्त्रओगाढाई-एकक्षेत्राश्रितानि । भग० ७५८ । ठाणा१५३ । अन्नमन्नगढिया - अन्योऽन्यप्रथिता, परस्परगुम्फिता । अन्नाणदोसे - अज्ञानदोष -अज्ञानात् - कुशास्त्रसस्कारात् भग० २१५ हिंसादिष्वधर्मस्वरूपेषु नरकादिकारणेषु-धर्मवुद्धयाऽभ्युद• भन्नमनगुरुयत्ता- अन्योऽन्यगुरुकता, अन्योऽन्येन ग्रन्थ यार्थ वा, प्रवृत्तिस्तल्लक्षणो दोष , अज्ञानमेव दोष 1 ठाणा. नागरुकता-विस्तीर्णता । भग. २१५। अन्नमन्त्रगुरुयसंभारियत्ता-अन्योऽन्यगुरुकसम्भारिकता, | अन्नाणियवाद-कुत्सितं ज्ञानमज्ञानं तयेषामस्ति तेऽज्ञानि- अन्योऽन्येन गुरुकं यत्सम्भारिकं तद्भावस्तत्ता । भग० २१५। कास्ते च ते वादिनथेत्यज्ञानिकवादिनः। भग० ९४४ । । १९॥ (६४) [ अन्नाणी अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः । अपक्खाणा] २९८ । 1 दश० २८०। -- अन्नाणी-अज्ञानी, मिथ्याज्ञानः । जीवा० ४३९ । ज्ञान- । अन्यपुष्टः (अण्णपुट)-कोकिल । उत्त० ६५३ ।...- निह्नववादी। सूत्र. २०८। अन्योऽन्यक्रियासप्तकक-सप्तमसप्तकम् । ठाणा० ३८७॥ अन्नाणमूढा-जो सक्कादिमता अन्नाणा जाणवुद्धीए - गेहूति, अन्योऽन्यप्रगृहीतम्-वाण्यतिशयविशेषः । सम० ६३.1. पणे जतिण हेठसएहिं दंसिय घडमाणमत्थंपि गिलति । अन्योऽन्याविभागसम्बद्ध-क्षीरनीरादिकसम्बद्धम् । आव० नि० चू० द्वि० ४३ अ। ३२२ । अन्नातचरते-अज्ञात.-अनुपदर्शितखाजन्यर्द्धिमत्प्रवजिता- | अन्वीक्षिण्यामि-अन्वेषयिष्यामि । आचा० २८२.। . दिभाव सन् चरति-मिक्षार्थमटतीत्यज्ञातचरक । ठाणा० अन्वेषयेत्-प्रार्थयेत् । आचा० २९० । अन्यतीर्थिक-सरजस्कादय । आचा० ३२४ । अन्यानि अन्नायउंछं- अज्ञातोञ्छम् , विशुद्धोपकरणग्रहणेविषयम् । च तान्यहत्प्रणीततीर्थादन्यत्वेन तीर्थानि च-निजनिजा- भिप्रायेण भवजलधेस्तरणं प्रति करणतया विकल्पितत्वेनान्य- अन्नायएसी - अज्ञातैषी-अज्ञात -तपस्वितादिमिर्गुणैरनव तीर्थानि तेषु भवा , ते च शाक्यसरजस्कादयं । उत्त० गत एषयते-प्रासादिक गवेषयति। उत्त० ४१४ । २९९ । अन्ति-अन्यदीयम्। सूत्र. ३०८।' अपइट्ठाणे-अप्रतिष्ठान ,सप्तम्या नरकावासविशेष । प्रज्ञा० अन्निआपुत्तो-गद्गाप्राप्तफेवल आचार्य । (सं०) ८३ । अन्निकापुत्रिक-आचार्यविशेषनाम । व्य० प्र० १९२ आ । अपकर्षणं-ह्रास । ठाणा० २२२ । भन्नितो-अन्वितः-युक्त । उत्त० ४४८ । अपकसंती-परिहसन्ती नीयमाना वा। ठाणा० ३२८ । अन्नियपुत्ता-अर्णिकापुत्रा', वैनयिक्यामाचार्या । आव० । अपकिट्ठ-अपकृष्टम् । किञ्चिदूनम् । भग० २९२ ।। अपक्खग्गाही-अपक्षग्राही, न पक्ष शास्त्रवाधितं गृह्णाति अन्नियपुत्तो-अन्निकापुत्र', आर्यिकालाभद्वारे आर्यिका- इति। ठाणा० ४४१ । ऽऽनीताहारभोक्ता आचार्यः। आव० २३७ । - अपक्खो-कालपक्खो। नि० चू० द्वि० ३३ आ। अन्ने - नानादेशापेक्षया गौरवकुत्सादिगर्भमामन्त्रप्रवचन- अपचयद्रव्यमन्द - कृशशरीरतया प्रवासं न क्तुमीष्टे । मिदम् । । दश० २१६ । बृ० प्र० ११३ ॥ अन्नेसमाण-अन्वेषमाण, भगवदासमिनुपालयन । दश० अपचयभावमन्द -बुद्धरभावेन हिताहितप्रवृत्ति-निवृत्ती न १८७ealth कर्तुमीश. । 'बृ० प्र० ११३ अ । अन्नेसिं-अन्वेषरेत्-गर्वेषयेत् । आचा० ७७ । अपश्चक्खाणकसाएं-देशविरतिप्रतिवन्धको मोह । सम अन्नो-अन्यदीयम्, सत्ता 4.1 अन्नोन्नं-अन्यदन्यासो० १४३ । अपञ्चक्खाण किरिआ-सूत्रकृताङ्गे द्वितीयश्रुतस्कन्धाभ्ययन- अन्नोन्नकारणं-परस्परवैयावत्यकरणम् । वृ० द्वि० २९२ । विशेष । सम० ४२ ) अन्नोन्नघडत्ता - अन्योऽन्यघता, परस्परसम्बद्धता । अपञ्चरखाणकिरिया-अप्रत्याख्यानक्रियो, विंशतिक्रिया- जीवा० ९३ । मध्ये पञ्चमीक्रिया । आव०-६१२। अविरतिस्तनिमित्त. अन्यत्वम् ~ अनगारद्वय सम्बन्धिनो ये पुद्गलास्तेषा मेद । कर्मबन्ध । ठाणा०-४१ । निवृत्त्यभावेन क्रिया-कर्मबन्ध- कारणम् , सम्यग्दृष्टेश्चतुर्थी क्रिया । प्रज्ञा० ३३४ । प्रत्या- अन्यत्वद्रव्यशुद्धि-अन्यद्रव्यशुलि., आदेशतो यशुद्धे । ख्यानक्रियाया अभाव , अप्रत्याख्यानजन्य. कर्मबन्धो वा । भैद , यथा शुद्धवासा । दश० २११ । अन्यद्रव्यनानाता-परमाणो.र्थ एकादिमेदभिन्नता । आव० अपञ्चक्खाणा-अप्रत्याख्यान । प्रज्ञा०४६८ कषाया एव । आव० ७७ । देशविरत्यावारकः । ठाणा० १९४ । ४२९ । F .. भग० ७४१ ।। 4 भग० १०१। २८१ ।

[ अपचलो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अपयं] - - अपश्चलो-अपञ्चल., असमर्थ । आव० ५३७ । अयोग्यः। अपत्तियं-अप्रीतिकम् । आव० २७३ । अपात्रिकाम्-अविद्य. । नि: चू० दि० २५ आ। मानाधाराम् । भग० ७०५। मपच्छिम-अपश्चिमम् , चरमम्। आव० ५४४ । पश्चात्काल- | अपत्तियंते-अप्रत्येति । बृ० द्वि० २२८ आ। भाविन्य. । सम० १२० । अपत्थं-अपथ्य-अहितम् । उत्त० २७६ । अपच्छिमा-अपश्चिमा । आव० ८३९ । पश्चिमैवामङ्गल- अपत्थिअपत्थिा-अप्रार्थितप्रार्थकः । आव० १९२ । परिहारार्थमपश्चिमा। ठाणा० ५७ । अपत्थियपत्थए-अप्रार्थितं प्रार्थयते य स । भग० १७४ । अपजत्तं-अपर्याप्तम्-अशक्त । उत्त० ४०८ । अपदंसो-पित्तारुअं । नि० चू० प्र० ११७भ । भपजत्ता- अपर्याप्ता, पर्याप्तभाषाविपरीतो भाषामेद । अपदपतितं । जीवा. १९९ । 'अपद्रापयेत्-जीविताद्वयपरोपयेत् । आचा० ४२८ । दश० २१० । अपजत्तिया-अपर्याप्तिका, या मिश्रतया उभयप्रतिषेधात्मक- अपदलम्-अपशद द्रव्यं (दल) कारणभूतं मृत्तिकादि यस्या- तया वा न प्रतिनियतरुपतयाऽवधारयितुं शक्यते सा, सावपदलः, अवदलति वा दीर्यत इत्यवदल आमपक्वतया भाषाया द्वितीयो मेद । प्रज्ञा० २५५ । ऽमार इत्यर्थ. । ठाणा० २७९ । अपजीसवण-अपत्ते अतीते वा नो पज्जोसवति । नि. अपद्रावन्ति-प्राणान्मुञ्चन्ति । आचा० ५५ । अपद्वारं-कुत्सितद्वारम् । ठाणा० ४०२ । चू० प्र० ३३६ अ । अपडिकम्म-शरीरप्रतिकर्मवर्जितम् । भग० ६२६ । अपद्वारिका - (अवदारिआ) स्थानविशेषः । १० द्वि. २७२ आ। अपडिण्णे-अप्रतिज्ञः, नास्य प्रतिज्ञा विद्यते । आचा० १३२१ अपध्यानम्-विस्रोतसिका। आव० ६०२ । अनिदानो, वसुदेववत् संयमानुष्ठान कुर्वन् निदान न करोति। | अपनीत -विधूत प्रकर्पितो वा। आव० ५०७ । आचा० १३३ । यदि वा स्याद्वादप्रधानत्वान्मौनीन्द्रागम- अपनीता-विनाशिता। ओघ० ४६ । स्यैकपक्षावधारणं प्रतिज्ञा तद् रहित । आचा० १३३ । अपभ्रंशः-तत्तद्देशेषु शुद्ध भाषितम्। उ० प्र० ३५९ । . अनिदानः । आचा० ३०६ । अपमजियं-अप्रमार्जितम् , द्वितीयासमाधिस्थानम् । आव० अपडियद्धया - अप्रतिवद्धता, स्वजनादिषु स्नेहाभाव । ६५३ । अपमजियचारि-अप्रमार्जितचारी, असमाधिस्थाने द्वितीयो भेद । सम० ३७। अपडिभाणी-अप्रतिभाषी। भाचा० ३०६ । अपडिरूवा-अप्रतिरूपा। उत्त० ११३ । अपमजियटुप्पमजियसिज्जासंथारए-अप्रमार्जितदुष्प्र- अपडिलेह-अल्पार्थे नम्, ततोऽप्रत्युपेक्षित इति अल्पोप- मार्जितशय्यासंस्तारकः, शय्यादेश्चक्षुषा न प्रत्युपेक्ष, शय्या- करणत्वादरपत्युपेक्षः। उक्त० ५९० । देरुभ्रान्तचेतसा प्रत्युपेक्षगं दुष्प्रत्युपेक्षगं यस्य स । आव० अपडिवाती-अवधिज्ञानभेद । ठाणा० ३७० । अपमत्ते-अप्रमत्तः-निद्रादिप्रमादरहित । 'आचा० ३०७ । अपढमसमयनियंठो - अप्रयमममयनिर्ग्रन्थ , य. शेषेषु | अपमानभीरु-भिक्षा भ्रमन्नपि न यस्य तस्यैव वेश्मनि समयेषु वर्तमान मः। उत्त० २५७ । प्रवेष्टुमिच्छति, यदि वा 'ओमाण' ति प्रवेश , स च स्वपक्ष- अपतिट्टिए-अप्रतिष्ठितः - आक्रोशादिकारणनिरपेक्ष. केवलं परपक्षयोस्त द्वीमहिप्रतिवन्धेन मा मा प्रविशन्तमवलोक्यान्ये क्रोधवेदनीयोदयाद् यो भवति स । ठाणा० , १९३ । साधव. सौगतादयो वाऽत्र प्रवेश्यन्तीति । उत्त० ५५२ । अपत्तं-अपात्रं-अभाजनम् । नि० चू० तृ. ८० अ। अपमित्यक:-पष्ठ. शवलदोषः । प्रश्न. १४४ । अपत्तपडिच्छण-अप्राप्तामपि वेलाम् प्रतिपालयति। ओघ० अपयं-अपदम् , पद्यविधी पद्ये विधातव्येऽन्यच्छन्दोऽभि- धानम्। सूत्रदोपविशेष । आव० ३७४ । न विद्यते पदम्- भपत्ति-अप्रीति । आव० २०११ अवस्थाविशेषो यस्य म। आचा० २३१॥ - . भग. ९७। (६६) [ अपयाण अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अपरिसार्डि] . १४७ । अपयाण-अपादान-मर्यादया दानं (खण्डम)।आव० २७८ । अपरिखेदित-वाण्यतिशयविशेषः । सम० ६३ । . अपया-लोमसीआदि 1 नि० चू० प्र० ३ । अपरिगहियागमणे - अपरिगृहीतागमनम् , वेश्या अन्य- अपर-संयम. । आचा० १६७ । सत्कगृहीतभाटी कुलागना अनाथा वा तस्या गमनं- अपरच्छं-अपराक्षम् , असमक्षं, अधर्मद्वारस्य त्रिंशत्तम मैथुनासेवनम् । आव० ८२५ । नाम । प्रश्न० ४३ । अपरिग्गहो-अपरिग्रह , धर्मोपकरणवर्जपरिप्रात्यवस्तुधर्मो- अपरद्धो-अपराद्ध , व्याप्तः । आव० १०८ । पकरणमूर्छावर्जित.। प्रश्न. १४२ । न विद्यते धर्मों- अपरम-दुक्खम् । दश० चू० ६२ । पकरणाइते शरीरोपभोगाय स्वल्पोऽपि परिग्रहो यस्य स । अपरमविद्धम्-वाण्यतिशयविशेष । सम० ६३ । सूत्र. ४९ । अगीतार्थ तदायप्ताश्च । व्य० प्र० २३३ भ। अपराइआ-वप्रावतीविजये अपराजिता राजधानी । जं. अपरिणत-अमार्गस्थः । आव० ८५१ ॥ प्र० ३५७ । अपरिणते-भोजनपरिणत्यभावः । ओघ० २३ 1 अपराइए-प्रतिवासुदेवनाम । सम० १५४ । अपरिणय-सेहप्रायः। ओघ० ८९ । कालप्रणभावोs- अपराइय-पद्मबलदेवस्य पूर्वभवनाम । सम. १५३ । पगतोऽन्यचित्तो वा जातः। ओघ०२०३। अपरिणत -एषणा- अपराजिअ-अपराजितः, अरजिनप्रथमभिक्षादाता । आव० दोषविशेष । आचा० ३४५ । अविध्वस्त । आचा० ३४८ । अपरिणामा- अपरिणामाः, अपरिणतजिनवचनरहस्या । अपराजिआ- अपराजिता, राजधानीनाम। जं० प्र० विशे० ० ९३१ । अपरिणामिक । व्य० प्र० ७२- अ-1 ३५२ । पौरस्त्यरुचकवास्तव्याऽष्टमी दिक्कुमारी। जं० प्र० अपरितंतजोगी- अपरितान्तयोगी, अविश्रान्तसमाधि.। ३९१ । रात्रिनाम । ज० प्र० ४९१ । चन्द्रस्याप्रमहिषीनाम। अन्त० २३, अनुत्त० ४ । अपरितान्ता.-अश्रान्ताः योगा जं० प्र०.५३२ । पद्मबलदेवमाता। आव. १६२ । मनःप्रभृतय सदनुष्टानेषु यस्य सः । प्रश्न. १०९- अपराजिए-ग्रहविशेष । ठाणा० ७९ । अपरितंतो-वैयावृत्त्यादौ अनिर्वेदी । बृ० तृ० ९२ । भपराजित-जगतीद्वारनामविशेष । सम० ८८ । अनिविण्यो । बृ० प्र० २२१ अ। अपराजिता - अपराजिता, अञ्जनपर्वते पुष्करणीविशेष । अपरिताविय-अपरितापितः, स्वत: परतो वाऽनुपजात- ठाणा० २३१ । अनुप्तरोपपातिकविमानविशेष । प्रज्ञा० ६९ । कायमन परिताप | जीवा० २८४ । अपराजिते-जगतीद्वारनामविशेष । ठाणा० २२५ । अपरिपुण्णं-अपरिपूर्णम् , सद्गुणविरहात्तुच्छम् ।सूत्र० ३२६॥ अपराजिय-कुन्थुजिनप्रथमभिक्षादाता। सम० १५१ । अपरिभुत्तं-अपरिभुक्तम् । आचा० ३२५ । अपराजिया - अपराजिता-सैद्धान्तिकरात्रिनाम । सूर्य० अपरिभुत्त-अपरिभुक्त; अनाक्रान्त. । ओघ० ५७ । १०७॥ अष्टमबलदेवमाता । सम० १५२ । अङ्गारकम- | अपरिमाण-अपरिमाण:-अनन्त' । आचा० २४१ । हाग्रहस्याग्रमहिषी । भग० ५०५, ठाणा० २०४ । सुविधि- अपरिमितम्-अमितम् । आव०.५९५ । नाथदीक्षाशिविका । सम० १५१ । विदेहेषु राजधानीविशेष- अपरिमियपरिग्गह-अपरिमितपरिग्रह । आव० ८२५ । नाम । ठाणा० ८०। राजधानीविशेष । ठाणा. ८०1 अपरिमियमणंता- अपरिमितानन्ता.- अत्यन्तानन्ताः । अपराधालोचना-आलोचनामेद । व्य० प्र० ४८ आ। प्रश्न. ९२। अपरिआविआ-भपरितापिता , स्वत परतो वाऽनुप- अपरियाइत्सा-अपर्यादाय-समन्तादगृहीत्वा । ठाणा० २० ॥ जातकायमन.परितापा । ज० प्र० १२६ । अपर्यादाय-अगृहीत्वा। भग०, ६४३ । जीवा० ३४५ । अपरिकम्म-अपरिकर्म-व्याघाते गिरिभित्तिपतनाभिघातादि. ठाणा० ४६ । रूपे सलेखनामविधायैव भक्तप्रत्याख्यानादि क्रियते तत् । अपरियाणित्ता-अपरिज्ञाय । ठाणा० ४६ । ६०३। अपरियावणया-शरीरपरितापानुत्पादनेन । भग० ३०५ । अपरिक्खिउ-अनालोच्य । नि० चू० प्र० ९८ मा । अपरिसाडि-अनवयवोज्झनम् । भग० २९४ । उत्त० (६७) [ अंपरिसाडि भाचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अपुसो] . H 7 १२४ । لم अपरिसाडि-अपरिगाटि, परिशाटिवर्जितम् । प्रश्न० ११२ । | अपहतान्योत्तरम्-वाण्यतिशयविशेष । सम० ६३ । अपरिसाडी-वसकषिमादी । नि०-चू० प्र० १६८ अ । अपाईणवाए-अप्राचीनवात., य. प्रतीच्या दिश- समागच्छति अपरिसुद्धं-अपरिशुद्धम् , अयुक्तियुक्तम् । आव० ५७६ । वात' स । प्रज्ञा० ३० । अपरिस्साइ - न परिश्रवति-नालोचकदोषानुपश्रुत्यान्यस्मै अपाचीनैः-अशुभै । आचा० २५० । प्रतिपादयति य एवंशील सोऽपरिश्रावीति । ठाणा० ४२४ । अपान्तरालम्-अवाधा। जीवा० ९४ । अपरिस्सावी-अपरिश्रावी-अबन्धको निरुद्धयोग । भग० अपान्तरालसामान्यम्-वृक्षत्वगोत्वगजत्वादिकम् । विशे० ८९२ । अझरक. (आउ० ८९५ । अपरिहत्थो-अदक्ष । आव० ५६७। , अपायं-अपादम् , विशिष्टच्छन्दोरचनायोगात् पादवर्जित अपरिहरित्ता - अपरिहत्य - द्वित्रैर्मासैर्व्यवधानमकृत्वा । गद्यगुण । दश० ८८। आचा० ३६६ । अपाय-सम्यग्सम्यगिति गुणदोषविचारणाध्यवसायापनोद. । अपरिहारिया-अपरिहारिका-साधर्मिका । आचा० ३५२ ।। तत्त्वा० १-१५॥ अपरीत्ता-साधारणशरीरा । ठाणा०- १३२ । अपायतो-विदलेषत । ठाणा० ४२८ । अपर्याप्ति-तत्परिणामयोग्यदलिकद्रव्यमात्मना नोपात्तं (सन्नपि । अपारंगमा-अपारङ्गमा , पारः-तट परकूल तद्गन्छन्तीति तत्पुद्गलेषु स परिणामो -रुध्यते)। तत्त्वा० ८-१२ । पारना न पारङ्गमा. अपारगमा । आचा० अपवरगो-अपवरक । जीवा० २६९ । अपवरकम् , ' अपावते-अपापक शुभचिन्तारूप । ठाणा० ४०९। : अन्तर्गृहम् । ओघ० १५३ । | अपावभाव-अपापभाव', शुद्धचित्त । दश० २३ । अपवरिका-अपवरकम् । व्य० द्वि०. २०७ आ। . . अपाश्रय-आधार । विशे० ४१५ । अपवर्त्तनम्-कर्मणा स्थित्यादेरध्यवमायविशेषेण हीनताक- अपिः - सम्भावनानिवृत्त्यपेक्षासमुच्चयगर्हाशिष्यामर्षणभूषण- • रणम् । भग० २५ । उपमैरायुष्कस्य शीघ्र - पाक । तत्त्वा० प्रश्नेविति। ठाणा० ४९५। बाढम् । जीवा० १९ । विद्यमान । २-५२ । आव० ४५० ।च | उत्त० १८२ । इति । ओघ०३६ ।यथा- अपवर्तमा-हानिकरणम् । सूर्य० ११३ । शब्दार्थ, समुच्चयार्थश्व । आचा० ६५ । पुन । आचा० अपवर्तयन्-तिरथीनं कुर्वन । आचा० ३४३ । २८२ । बाढार्थे । जे० प्र० ४६ । एवकारार्थे । अपवाद -करणं, विशेषवचनं च। ज० प्र० ५४१ । ५४९ । अभ्युपगमवादससूचक । आव०. ५३१ । बाढम् । विभाग । नि० चु० तृ० १.५ आ। ज० प्र० ४१३ । अपवादम्-प्रवचनरहस्यम् । बृ० प्र० १३१ अ। अपिट्टणया-यट्यादिताडनपरिहारेण । भग० ३०५ । । अपवादापवादरूपम्-शाक्यादीना प्रयोजने र द्राज्ञो विज्ञाप- अपियत्ता-अप्रियता, सर्वेषामेव द्वेष्यतया। भग० २३ । नम् । ठाणा०।३१२ । | अपीओ-अपीत , न पीत । उत्त० ८७ ।' अपव्वावितो-न प्रबंजित.' न मुडितानि कृतानि । व्य० अपुंजो-अपूज्य , अवन्दनीय । आव० ५१९ । द्वि० २८ आ।- अपुट्ठवागरणं-अपृष्टव्याकरणम् , अपृष्टे सति प्रतिपादनम्। असत्यविहींयगति - अप्रास्तविहायोगति-- नामकर्म भग. १५७ । विशेष । प्रज्ञा० ४७४ । अपुणरावत्तयं-अपुनरावर्त्तकम्', कर्मवीजाभावाद्वावतार- अपसिणा-अप्रश्ना -या पुनर्विद्या मत्रविधिना जप्यमाना रहितम्। भग० ७॥ अपृष्टा एव शुभाशुभं कथयन्ति एंता । सम० १२४ । अपुणरावित्ति-अपुनरावर्तकम्-अविद्यमानपुनर्भवावतारम् । अपसू-अपशु.-द्विपदचतुष्पदादिरहित । आचा० - ४०३ । अपहार-मत्स्य । ठाणा० ३०९ । अपुत्तो-अपुत्र , स्वजनवन्धुरहित , निर्मम इत्यर्थ. । आचा० अपहुप्पंते- अप्रभवति , अपर्यमाणे । पिण्ड० ८८ । । आव० 3 सम० ५। 1 - | (६८) [ अपुफिय अल्पपरिचितसद्धान्तिकशब्दकोषः अप्पझंझे ] अपुफिय-अपुष्पितं-तरिकारहितम् । ओघ० १२२ । मच्छम्। अप्पं अल्पम् , मूल्यत एरण्डकाष्टादि। दश० १४७ । अभाव बृ० प्र०६८ अ स्तोक वा । आव० ५८६ । अपुम-नपुंसकम् । ओघ० ९० । अप्पइट्ठाणे-अप्रतिष्ठान । सम०२ । मोक्ष । आचा० २३१॥ अपुरिसंतरकडं - अपुरुषान्तरकृतं-तेनैव दात्रा कृतम् । | अप्पइट्टिते - अप्रतिष्ठित -निरालम्बन एव केवलक्रोधवेद- आचा० ३२५। नीयादुपजायते य क्रोधः। प्रज्ञा० २९० । मपुरिस-अपुरुष , नपुंसक. । ठाणा० ३७२ । अप्पईकारं-अप्रतीकारम् , सूतिकर्मादिरहितम् । प्रश्न० २२ । अपुब्बो-अपूर्व , अननुभूतपूर्वोऽनुभूतपूर्वो वा। अनु० १३७। | अप्पउलिओसहिभक्खणया-अपक्वौषधभक्षणता । आव० अपुवं-अपूर्वम् , अपूर्वकरणम् । आव० ८५२ । ८२८ । अपूर्वश्रुतप्रत्याख्यानम्-आतुरप्रत्याख्यानादिकम् । आव० अप्पए-शरीरे। आव० ५५५ । ४७९ । अप्राप्तपूर्व, स्थितिघात-रसाघाताद्यपूर्वार्थनिर्वर्तकम् । | अप्पकम्मपञ्चायाते - अल्पकर्मप्रत्यायात. -अल्पै -स्तोकै विशे० • ५३५ । अवृत्तपूर्वम् । आव० २३०, बृ० प्र० १९४अ । कर्मभि करणभूतै प्रत्यायात -प्रत्यागतो मानुषत्वमिति, अपुवकरणं-अपूर्वकरण-असदृशाध्यवसायविशेषम् । भग० अथवा एकत्र जनित्वा ततोऽत्पकर्मा सन् य प्रत्यायातः ४३६ । अप्राप्तपूर्वम् । आव० ७५। सम्यक्त्वप्राप्ती करण स तथा लघुकर्मतयोत्पन्न । ठाणा० १८० । विशेष । ठाणा० ३१ । अप्पकिरियतराए -अल्पक्रियत्वम् - तथाविधकायिक्यादि- अपुहुत्ते-अपृथक्त्वं, अपृथग्भाव , चरणधर्मसङ्ख्याद्रव्यानु कष्टक्रियाऽपेक्षम् । भग० ७६९ । योगाना प्रतिसूत्रमविभागेन वर्तनम् । आव० २८५ । अपृ. अप्पकुक्कुई - अल्पकौत्कुच , अल्पस्पन्दनः, अल्प-असत् थक्त्वानुयोग -एकस्मिन्नेव सूत्रे सर्व एव चरणादय प्ररूप्यन्ते। 'कुकुयं' कौत्कुचं-करचरणधूभ्रमणाद्यसच्चेष्टात्मकमस्येति । दश० हैं। अपूरतो-अपूरयन् , अकुर्वन् । आव० २७१ । अकुर्वन् , अप्पक्खमं-आत्मक्षमा-आत्महिताम् । ओघ० १८९ । अनाचरन् । आव० २६३ । अप्पक्खरं-अल्पाक्षरम् , सूत्रगुण. । आव० ३७६ । अपूर्वभक्तिकम्-अपूर्वरचनाकम् । ठाणा० ४०१ । अप्पग्घ-अल्पाघम् , स्वल्पमूल्यम् । भग० १९९ । अपेक्षाकारणम् - दिग्देशकालाकाशपुरुषचक्रादि । ठाणा० अप्पञ्चओ-अप्रत्ययः, प्रत्ययाभाव. । अधर्मद्वारस्य चतुर्वि- शतितम नाम | प्रश्न० २६ । अप्रत्ययकारणत्वात् । अधर्म- अपेज-अपेयम्। जीवा० ३७० । अपेयम्-मुरादिकम् । द्वारस्य सप्तदा नाम । प्रश्न० ४३ । अप्पचक्खाण-अप्रत्याख्यानम् , सर्वप्रत्याख्यान देशप्रत्या- अपोद्धार:-साक्षादुक्ति । आचा० ४९ । निराम । आव० ख्यानं च येषा उदये न लभ्यते । विशे० ५४४ । ३०९। अप्पश्चक्खाय -अप्रत्याख्याय-अनिराकृत्य। उत्त० २६६ । अपोरसीय-अपौरुषेयम् , अपुरुषप्रमाणम् । भग० २९० । अप्पच्छन्दमईओ-आत्मच्छन्दमति ,आत्मच्छन्दा-स्वाभि- अपोरुसियं-अपौरुषेयम् , पुरुषप्रमाणरहितम् । भग० ८२ । प्रायकार्यकारी । आव० १०० । अपोह-अपोह , पृथग्भाव । ओघ ० १२ । अपोहन-निश्चय । अप्पजूहिए-सिद्धेऽप्योदनादिके। आचा० ३३५ । आव० १८ । विपक्षनिराम । भग० ४३३ । अपोहनमपोहो- | अप्पज्झं-आत्मवश, स्वस्थचित्तम् । वृ० द्वि० २१० अ । निश्चय । विशे० २२६ । अप्पज्झाणं-आत्मध्यानम् , अमुकोऽहं अमुककुले अमुग- अपोहए-यदादिष्ट गुरुमिरेवं निश्चिनोति । विशे० ३.३ । सिस्से अमुगधम्मट्ठाणट्ठिइए न य तश्विराहणेत्यादिरूपम् । अपोहते-एवमेतत् यदादिष्टमाचार्येणेति पुनस्तमर्थमागृहीतं धारयति करोति च सम्यक्तदुक्तमनुष्ठानमिति । आव० २६ । अप्पझंझे-अल्पझञ्झः, अविद्यमान कलहविशेष । औप०३९ । उत्त० ५९ । 1 ४९४। व्य० प्र० ८ अ। प्रश्न० १२८। (६९) [ अप्पझंझा आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अप्पमजणा]] भग स । भग० ७ ॥ . सदा करोपीत्यादि अप्पझंझा - अल्पझंझा - विगततथाविधविप्रकीर्णवचनाः। त्यङ्गीकरणतः पापकर्म-ज्ञानावरणाद्यशुभं कर्म येन स । भग० ठाणा० ४४२ । अप्पडिकुटाई-अप्रतिक्रुष्टे-अनिवारिते। ठाणा० ९३'! अप्पडिहयवरनाणदंसणधरे - अप्रतिहतवरज्ञानदर्शन. अप्पडिवद्धे-अप्रतिवद्ध -मनसि निरभिष्वंगता। उत्त० ५८७ धर', योऽप्रतिहते कस्कुट्यादिभिरम्खलितेऽविसवादके वा अप्पडिबुज्झमाणे-अप्रतिवुद्धधमान -शब्दान्तराण्यनवधा- वरे-प्रधाने ज्ञानदर्शने-विशेषसामान्यवोधात्मके वारयति रयन् अप्रत्युह्यमानो वा - अनपह्रियमाणमानसो। ४८३ । अप्पडिहो-अप्रतिघ (भक्त०) अप्पडिरूवा-अप्रतिरूपा । आव० ६७५ । अप्पणं-अर्पणं, प्राधान्येन विवक्षणम् । विशे० १२७७, ७७१। अप्पडिरूवे-अप्रतिरूप , अविद्यमान प्रतिरूपमतिप्रकर्षवत्त्वे- अप्पणच्चिय-आत्मीयम् , स्वकीयम्। भग० १३२ । नानन्यतुल्यमस्येति । उत्त० १८८ । अप्पणट्ठा-आत्मार्थम् , आत्मनिमित्तम्। दश० २४९ । अप्पडिलेहणा-अप्रत्युपेक्षणा, मूलत एव चक्षुषाऽनिरी- | अप्पणियं-आत्मीयं । आव० १८९ । क्षणा। आव० ५७६ । अप्पणिया-आत्मीया । आव० २१२ । अप्पडिलेहियदुप्पडिलेहियउच्चारपासवणभूमि-अ- अप्पतिढाणं-अप्रतिष्ठानम् , नरकविशेष । आव० ३४८ । प्रतिलेखितदुष्प्रतिलेखितोचारप्रश्रवणभूमि -पौषधेऽतिचार । | अप्पतुमंतुमा - अल्पतुमन्तुमा - विगतकोधकृतमनोविकार- आव० ८३५॥ विशेषा । ठाणा. ४४२ । अप्पडिलेहियदुप्पडिलेहियसिज्जासंथारए - अप्रतिले- अप्पतुमंतुमे-अल्पम्-अविद्यमानं त्वं त्वमिति स्वल्पाप. राधिन्यपि त्वमेव पुराऽपि कृतवान् त्वमेवं खितदुष्प्रतिलेखितशय्यासस्तारक -पौषधेऽतिचार । आव० पुन पुन प्रलपनं यस्य स । उत्त० ५८९ । ८३५ । अप्पतेअ-अल्पतेज -तेजशून्य । दश० २७६ । अप्पडिलेहियदूसे-अप्रतिलेखितदूष्य । ठाणा० २३४ । अप्पडिलेहियपणयं-अप्रतिलेखितदूष्यपञ्चकम् , दूष्यपञ्च- | अप्पत्तियं-अप्रीतिकम्। उत्त० ९० । दश० चू० १२५ । कस्य प्रथमो मेद , तूल्यु १पधानकरगण्डोपधानालिगिनी४- पञ्चामरिसकरणम् । नि० चू० प्र० ३१ अ। मनस पीडा पोतमयमसूर५भेदभिन्नम् । आव० ६५२ । कुर्यात् । आचा० ४०५ । क्रोध । सूत्र० ३४ । अप्रेम । अप्पडिवाइ-अप्रतिपाति, अनुपरतस्वभावम् । आव० ६०८ । भग० २९२ । मनम दुष्प्रणिधानम् । सूत्र० ३३१ । अप्पपरिकम्म-तूननं, सन्धानं दशाछेदनं वा। वृ० द्वि० अप्पडिसुणणं-अप्रतिश्रवणम् , अप्रतिश्रोता।आव० ७२६ । अप्पडिसेवी-अप्रतिसेवी-न कुत्सित कर्म आचरति । ओघ० अप्पपाणं-अल्पप्राणम् , अपा--अविद्यमाना प्राणा.-प्रागि- १६५ । नो यस्मिस्तत , अवस्थितागन्तुकजन्नुविरहितम् । उत्त०६० । अप्पडिहओ-अप्रतिहत ,मौगन्धिकानगर्यधिपति. । विपा० अप्पपुण्णेहिं-अपुण्यै -अनाय पापाचारै । आचा० ३०३। अप्पभाए-अप्रभात । आव० ३०१ । अप्पडिहङ-अणपगित्ता । नि० चू० प्र० १६९ अ । अप्पभक्खी-अत्पलघुभक्षी-अत्पानि-स्तोकानि लघूनि नि. अप्पडिहयं-अप्रतिहत, अप्रतिस्खलितम् । जीवा० २५६ । साराणि निष्पावादीनि भक्षयितु शीलमस्य । उत्त० ४२० । अप्पडिहयपच्चक्खायपात्रकम्मे - अप्रतिहतप्रत्याख्यात- अप्पभु-अप्रभव - मृतकाढय । ओघ० १६३ । पापकर्मा, न प्रतिहत तपोविधानेन मरणकालादारात्क्षपित | अप्पभूतं-अल्पभूता-अत्पा। ठाणा० २९४ । प्रन्याख्यातं च मरणकालेऽप्याश्रवनिरोधेन पापकर्म येन स । अप्पमजणा-अप्रमार्जना, मूलत एव रजोहरणादिनाs- न प्रनिहत सम्यग्दर्शनप्रनिपत्तित. प्रत्याख्यात च सर्वविर स्पर्शना। आव० ५७६ । २०२ आ। + ९५। (७०) [ अप्पमजिय० अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अप्पाहारे ] ठाणा. ४४२ । सम० पञ्चाशत्तम नाम । प्रश्न० ९९ । अप्पमजियदुप्पमजियउच्चारपासवणभूमी - अप्रमा अप्पसत्थाओ-अप्रशस्ता.-आश्रेयस्योऽनादेया। ठाणा०१७५॥ जितदुष्प्रमार्जितोच्चारप्रश्रवणभूमि -पौषधेऽतिचार | आव० अप्पसद्दा - अल्पशब्दा -विगतराटीमहाध्वनय । ८३५ । अप्पमत्तो-अप्रमत्त , गुरुपारतन्त्र्यापहारिप्रमादपरिहर्ता । गुरुपारतन्त्र्यापहारिप्रमादपरिहा। अप्पससरक्ख-अल्परजस्कम् । आचा० ३३७ । उत्त० २२३ । अप्रमत्तसयतग्राम , भूतग्रामस्य सप्तम गुण- | अप्पसागारियं-अल्पसागारिकम् । आव० १९५। अल्प- स्थानम्। आव० ६५०। आत्महितेषु जाग्रन् । आचा० गृहस्थम् । उत्त० ९० । आव० ३५८ । १७२ । प्रयत्नवान् । ओघ० २२१ । अप्पसावजं - अल्पसावद्यम् , अपापं, स्तोकपापं वा। अप्पमाए-अप्रमाद , योगसङ्ग्रहे षड्विंशतितमो योग । आव० ५८६ । आव० ६६४ । अकर्मकम् । सूत्र० १६९ । अप्पसाहणो-अल्पसाधन', वलादिरहित । आव० ७१२ । अप्पमाओ-अप्रमाद , उत्तराध्ययनेषु एकोनत्रिंशत्तममध्यय- अप्पहाणो-अप्रधान , लघु । उत्त० १४९ । नम्। उत्त० ६४ । उवओगपुव्वकरण- अप्पहिढे-अप्रहृष्टम् , अहसन् । दश० १६६ । क्रियालक्खगो। नि० चू० प्र० २९ अ । अप्पा-आत्मा, अभिहितरूपस्तदाधाररूपो वा देह । उत्त. अप्पमाणमोती - अप्रमाणभोजी, द्वात्रिंशत्कवलाधिकाहार ५३ । शरीरम् । प्रज्ञा० ३०५। अतति सन्ततं गच्छति भोक्ता। प्रश्न० १२५॥ शुद्धिसक्लेशात्मकपरिणामान्तराणीति । उत्त० ५२ । नि० अप्पमातो-अप्रमादः प्रमादवर्जनम् , अहिंसाया एकोन चू० प्र० १५ अ । आत्मा-स्वभाव.। ठाणा० ६१ ।' अप्पाइय-आप्यायितः। आव० ७१६ । अप्पयं-आत्मानम् । अल्पमेव वा। उत्त० ९० । अप्पाउरण-अप्रावरण , अभिग्रहविशेष । आव० ८५४ । अप्पयाणयं-अप्रयाणम् । आव० ३८५ । अप्पाणं - आत्मानम् , अतीतसावद्ययोगकारिणमइलाध्यम् । अप्परए अत्परत , अत्प-अविद्यमान रतमिति क्रीडित अत्राणम्-अतीतमावद्ययोगत्राणविरहितम् । अतनम्-अतीत मोहनीयकर्मोदयजनितमस्येति, लवसप्तमादि , अल्परजा , सावद्ययोगं सततभवनप्रवृत्त निवर्तयामि । आव० ४८६ । प्रतनुवध्यमानकर्मा । उत्त० ६७ । अप्पाणमेव-आत्मनैव । उत्त० ३१४ । आत्मानं-अतरा- अप्परिसाडियं-अपरिमाटिकम् , परिसाटविरहितम् । उत्त० त्मानम् । आचा० २८३ । ६१ । अप्पायंक-अल्पातङ्क, रोगरहित । आव० ७९३ । अरोगी। अपरिहारिप-अपरिहारिक - पार्श्वस्थावसन्नकुशीलससक्त- आचा० ३९३ । यथाच्छन्दरूप । आचा० ३२४ । अप्पाहंति-सन्दिशन्ति । बृ० तृ० ४४ आ । अप्पलीयमाणा - अप्रलीयमाना -अनभिपक्ता । आचा० अप्पाहटु-आहृत्य, व्यवस्थाप्य, अपाहृत्य वा । सूत्र० २७४ । अप्पाहणया-सन्देशकस्तथैव दातव्य । ओघ० १०२ । अप्पलेवा-अल्पलेपा, निलेपा, चतुर्थी पिण्डैषणा । आव० अप्पाहारं-अपधारणा, सामर्थ्यम् , अप्पाहारता जत्थू तं। ५७२ । आपलेवा-जस्म दिजमाणस्म गिप्पावचणगादिगस्स नि० चू० तृ० ८२ आ । लेबो ण भवति सा। नि० चू० तृ. १२ अ । अप्पाहार-अल्पाहार., ऊनोदरताया प्रथमो मेद.। दश० अप्पवणिजोदग-अपातव्यजला मेघा । भग० ३०६ । २७ । ठाणा० १४९ । अप्पवुटिकाए- अल्पवृष्टिकाय , अल्प -स्तोकोऽविद्यमानो | अप्पाहारे-अल्पाधार -तमेव पृष्ट्वा सूत्रार्थवाचना ददाति । वा वा घृष्टि -अध पतन वृष्टिप्रधान कायो-जीवनिकायो वृ० तृ० १३३ आ। अल्पाहार , अष्टकवलाहार । औप०३८ । व्योमनि पतदप्काय इत्यर्थ , वर्षणधर्मयुक्त वोदकं वृष्टि ९२१ । स्तोकाहार , साधु । भग० तस्या कायो-राशिर्वृष्टिकाय अल्पवासी वृष्टिकायश्चाल्पवृष्टि स्तोकाशी, षष्ठाटमादिसलेखनाकमायातं तप कुर्वन् यत्रापि काय । ठाणा० १४१ । पारयेत्तत्राप्यल्पमित्यर्थ । आचा० २९० । २४१ । (७१) [अप्पाहारो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अफासुभ] २८० । - - . ठाणा० ४८। अप्पाहारो-जो आयरिओ सकियसुत्तत्थो तं चेव पुच्छिउं | अप्पोदए-अल्पोदके-भौमान्तरिक्षोदकरहिते। आचा० २८५॥ चायणं टेति, तारिसं ति मोर्नु ण गंतव्वं । नि० चू० तृ० अप्पोल्लं-दृढवेष्टनाद् घनवेष्टनात् । ओघ० २१४ । ९३ आ। अप्पोवही- अल्पोपधिः, अनुल्बणयुक्तस्तोकोपधि. । दश० अप्पाहिति-सन्दिशन्ति । बृ० द्वि० ११४ आ। सन्दिशतः । आव० ३०२ । अप्पोसे - अल्पावश्याये – अधस्तनोपरितनावश्यायवि ड्- अप्पाहिकरणे-अल्पाधिकरण-निष्कलह । ठाणा० ४१६ । वर्जिते । आचा० २८५ । अप्पाहितो-सन्दिष्ट. । उत्त० २१९ । . अप्फंदणया -- भाण्डोचितहस्तपादादिचेष्टाविकलता। व्य. अप्पाहे-तद्गुरोस्तत्प्रवर्तिन्या वा एवं सन्दिशति-यथैतामा- प्र. २३६ अ। त्मसकाशे कुरुत । ओघ. ४३ । अप्फश्चितो-अइक्कते। नि० चू० प्र० १४७ आ । अप्पाहेइ-सन्दिशति । दश० १०३ । अप्फालिया-शिक्षिता -उपालब्धा , उक्ता । आव० ५५७ । अप्पाहेति-सदिसइ । नि० चू० प्र० २११ आ। अप्फालेइ- आस्फालयंति, हस्तेनाऽऽताडयति-उत्तेजयति । अप्पाहेत्ता-सन्दिश्य । उत्त० १७३ । आव० ३१० । औप० ६४ । अप्पिच्छे-अल्पेच्छ , अल्पा-स्तोका, अल्पशब्दस्याभाववादि- | अप्फिडिऊण-आस्फाल्य । आव० ३४४ । त्वेनाविद्यमाना वा इच्छा-वाञ्छा वा यस्येति । उत्त० १२४ । अप्फुण्णा-व्याप्ताः । ६० तृ. ७० आ। न्यूनोदरतयाऽऽहारपरित्यागी। दश० २३१ । अप्फुण्णे-आपूर्ण -परिपूर्णशरीर. । उत्त० ४८३ । अप्पिणिचिया-आत्मीया। आव० २०२ । अप्फुण्णो-ध्याप्त । आव० ३५४ । अप्पितणप्पिते-अर्पित-विशेषित, अनर्पित-अविशेपितम्। अफेया-वल्लीविशेष । प्रज्ञा० ३२ । अफोआ-वनस्पतिविशेष: । जं० प्र० ४६ । अप्पियं-अर्पितम् , आहितम् । भग० ८९ । अष्फोडेइ-आस्फोटयति, करास्फोटं करोति । भग० १७५ । अप्पिय-अप्रियम् , अनिष्टम् । भग० ७२ । अर्पितः, अप्फोया-वनस्पतिविशेष । जीवा० २०१ । विशेषः । विशे० १३४६ । अप्फोव-आस्तीणे, वृक्षगुच्छगुल्मलतासंछन । उत्त० ४३८ । अप्पियणियं-अप्रीतिकम् , कलहः । इत्त० ३५५ । अप्पियत्ता-अप्रियता, अप्रेमहेतुता । भग० २५३ । प्रजा० अप्रकीर्णप्रसृतं-वाण्यतिशयविशेष । सम० ६३ । अप्रतिहत-( आपडिय)-कटकुटयपर्वतादिमिरस्खलिते, अप्पियवहा-अप्रियवधा -अप्रियं-दु खकारणम् तत् नन्ति। अविसवादके वा। सम० ४ । आचा० १२२ । अप्रत्याख्यानम्-द्वितियकषायचतुष्कम् । आचा० ११ । अप्पुण्णकप्पिया-अपूर्णकलिका-अन्योन्यस्य मुखदु खोपस- अप्रमार्जितचारित्वम् - द्वितीयमममाधिस्थानम् । प्रश्न पदं प्रतिपद्यते। व्य० द्वि० ३७८ आ। अप्पुत्थायी- अल्पोत्थायी, अल्पमुत्थातुं शीलमस्येति । अप्रोषितः-सामानिक , सन्निहित । विशे० १०६५ । प्रयोजनेऽपि न पुन पुनरुत्थानशील. । उत्त० ५८ । अप्सरा-दक्षिणपश्चिमरतिकरपर्वतस्य दक्षिणस्या भूतावतं- अप्पुस्सुए-अल्पौत्सुक्य । भग० १७४ । त्वरारहिन । सिकाराजधान्यधिष्ठात्री, शक्रदेवेन्द्रस्य द्वितीयाग्रमहिषी । भग० १२३ । अविमनस्क । आचा० ३७९ । जीवा० ३६५। शक्रस्याप्रमहिषी। जं. प्र. १५९ । अप्पे-आप्य , अपा प्रभव हृद । भग० १४१ । अफलवंतकी-अफलवान् , अप्राप्तिक । प्रश्न. ६४ । अप्पो-अल्प , सर्वथाऽविद्यमान' । जीवा० १२१ । नास्ति , अफव्वंता-अलभमाना । नि० चू० प्र० १८३ आ । किञ्चिदित्यर्थ । ओघ १७७। निपद्याद्वयोपेतं रजोहरण अफासुअ-अप्रामुकम् , सचिनसम्मिश्रादि । दश० २३१ । मुखवत्रिका चोलपट्टकाश्च । वृ० प्र० १५० आं। | मचित्तम् । आचा० ३२१ । ५०४ । १४४ । । (७२) [ अफासुए अल्पपरिचितसद्धान्तिकशब्दकोषः अमंतरे ] अफासुए-अप्रासुकम् , न प्रगती असव:-असुमन्तो यस्मा | अबाल-अष्टाधिकवर्ष । नि० चू० प्र० १७३ आ। तदप्रासुकम्-सजीवमित्यर्थः । भग० २२६ । अवाहा-अवाधा, कर्मणो बन्धोदययोरन्तरम् । भग० २५५ । अफुडिय-अस्फुटित -राजीरहित । आव० २३९ । अन्तरं, अन्तरालत्वाप्रतिघातरूपा। अव्यवधानेनान्तरम् । अफुपणे-आपूर्णम् । प्रज्ञा० ५९२ । ज०प्र० ४३५। दूरवर्तित्वेनानाक्रमणमपान्तरालम् । ज० प्र० अफुसं-अस्पृश्यम् , अवन्धनीयम् । भग० १०४ । ६४ । अन्तरं-व्यवधानम् । जं० प्र० ६५ । अपान्तरालम् । अफुसमाणगतिपरिणामे-अस्पृशद्गतिपरिणाम , अस्पृ. जीवा० ९४, २०४। अन्तरालत्वाव्याघातरूपा। जीवा० शतो गतिपरिणाम । प्रज्ञा० २८९ । ३०२ । अन्तरालम् । ओघ० ९० । आव० ४६ । विशे० अफुर्समाणगती-अस्पृशद्गति.,यत्परमाण्वादिकमन्येन पर ३७६ अन्तरं । जं० प्र० ४३५ 1 माण्वादिना सह परस्परसम्बन्धमननुभूयं गच्छति सा, अबाहाए-अवाधया, व्यवधानेन कृत्वा। सम० २१ । विहायोगतेर्द्वितीयो मेद । प्रज्ञा० ३२७ । अबाधायां कृत्वा, अपान्तरालेषु मुक्त्वा । जीवा० २२२ । अबंधव-अबान्धव , स्वजनरहितः। पश्न० १९ । अबाहिरा-अबाह्यः, न बाह्य इति । आव० ४५ । अबंधवो-अवान्धवः, बान्धवरहित', स्वजनसम्पाद्यकार्या- अबितिजओ-अद्वितीय., सहायो न भवति। प्रश्न०, १२१ । भावात् कर्मनिगडवद्ध । प्रश्न० ११ । अबुद्धा अवुद्धजागरियं-अवुद्धाः केवलज्ञानाभावेन यथा- अबंधिउं-पात्रकवन्धग्रन्थिमदत्त्वा। ओघ० १४४ । सभवं शेषज्ञानसद्भावाच्च बुद्धसदृशास्ते चाबुद्धानां-छद्मस्थ- अभं-अब्रह्म, अकुशलं कर्म, मैथुनम्। प्रश्न. ज्ञानवतां या जागरिका। भग० ५५४ । अकुशलानुष्ठानम् , अब्रह्मग. प्रथम नाम । प्रश्न० ६६ । अवुहजण-अवुधजन , अविपश्चिजन -परिजनो यस्य सः, मैथुनम् । आव० ६५३ । बस्त्यनियमलक्षणं । आव० ७६१ । अकल्याणमित्रपरिजन । दश० ८६ । अबंभ-अब्रह्मवर्जक , श्रावकस्य षष्टी प्रतिमा । आव० ६४६। अवोट-अनाक्रमणीय। ओघ० ९२ । अबंभचारिणो-अब्रह्मचारिण , मैथुनं आसेवितु शील धर्मों | अबोहि-अबोधि , मिथ्यात्वकार्यम् । आव० ७६२ । मिथ्या- वा येषा ते। उत्त० ३५८ । त्वसंहति । दश० २४४ । अबद्धिा-अबद्धिकाः, अवर्द्ध सत्कर्म कंचुकवत्पार्श्वत अबोहिअ-अबोधिकम् , मिथ्यात्वफलम् । दश० २०५। स्पृष्टमात्रं जीवं समनुगच्छन्तीत्येवं वदन्ति । औप० १०६ । अबोहिकलुसं-अबोधिकलुषः, मिथ्यादृष्टि । दश० १५८ । अबद्धिगा-अवद्धिका , स्पृष्टकर्मविपाकप्ररूपका । आव० अब्बहुलकाण्डम्-रत्नप्रभाया तृतीयकाण्ड । सम० ८८ । ३११ । अवद्धिक , बद्धं-जीवप्रदेशैरन्योऽन्याविभागेन सम्पृक्तं अब्बुयं-द्वितीयसप्ताहगर्भावस्था (त० ) न बद्ध-अबद्ध, अर्थात्कर्म, तदभ्युपगमविषयमेषामन्तीति । अभं-अभ्रम् , मामान्याकारेण प्रतीतम् । जीवा० २८३ । अभंगिएल्लय-स्नेहाभ्यक्तशरीर । ओघ० ७४ । उत्त० १५२ । अभंगिओ-अभ्यगित । आव० ११७ । अबद्धिता-अवद्धिका -स्पृष्टकर्मविपाकप्ररूपका । ठाणा०४१० अभंगेति-थेवेग अभंगगं । नि० चू० प्र० ११६ जा। अबला-अबला , शारीरशक्तिविकला । जं० प्र० २३९ । अभंगो-योवेश । नि० चू० प्र० १८८ अ । अबले-अबल , शरीरशक्तिवर्जित । भग० ३२३ । अम्मतरं-लोकेऽन्यैरनुगतम् । दश० चु० १४ । अवहुस्सुर - अल्पश्रुताय-अवगाढस्तोकशास्त्राय । सूर्य० | अभंतरकरणं - द्वयोः सा वो गच्छमेढीभूतयोरभ्यन्तरे २९६। कुलादिकार्यनिमित्त परस्परमुल्लपतोस्तृतीयस्योपशुश्रूपो बहि । अबहुस्सुतो-जेग आयारपगापो ण झातितो। नि० चू० करण । व्य० प्र० २३८ अ । तृ० २५ । अब्भतरगे-अभ्यन्तरम्-अभ्यन्त मध्ये भवं। ठाणा० ५५ । अवहोड-अवखोटक , वन्धविशेष । उत्त० ११३ । अभंतरे पोग्गले-भवधारणीयेनौदारिकेण वा शरीरेण ये अवाध-अन्तरालम् । विशे० ३७६-1 क्षेत्रप्रदेशा अवगाढास्तेष्वेव ये वर्तन्ते तेऽवसेयाः, विभूषा- अवाधाए-अवाधया अपान्तराल । सर्य० २६२ । पक्षे तु निष्ठीवनादयोऽभ्यंतरपुढला । ठाणा० १०५। , (७३) [ अभक्खाणं आचार्यश्रीमानन्दसागरसूरिसङ्कलितः अभितरलावणग] है अभक्खाणं-अभ्याख्यानम् , परमभि असता दोषाणामा- | अभावगासं-अङ्गणम् । नि० चू० प्र० १९२ अ। ख्यानम् , अधर्मद्वारस्य सप्तदशं नाम। प्रश्न० २६ । अभावगालियं-आकाशम् ।, वृ० द्वि० १७९ अ। असदभियोग । सूत्र० ' २६२ । असदुषणाभिधानम् । प्रश्न अब्भासं-पच्चासणं । नि० चू० प्र० ६० अ । अभ्यास '४१। असद्दोषारोपणम् । प्रज्ञा० ४३८ । असतभावुञ्झाषणं । हेवाक. । ठाणा० २८५ । नि० चू० तृ० २५ अ । 'असदोषाविष्करणम् । भग० ८० । अभास-अदूरसामत्थे, अच्छेअन्वम् । दश० ३१ अभक्खाणे-अभ्याख्यानम् , आभिमुख्येनाख्यान-दोषा- | अभासकरणं-जो धम्मच्चुओ तं पुणो धम्मे ठवेंतेण । 'विष्करणम् । भग० २३२ । नि० चू० प्र० २३८ अ । अभडिओ-आस्फालित , आहत.। आव० ४३१ । अभासगं-अभ्यासकम् । ओघ० १५९ । अब्भत्थं-अध्यात्मस्थम् , अभिप्रतम् । उत्त० २६५ । यद्यस्या- अब्भासवत्ति-अभ्यासवर्ती-गुरोरभ्यासे-समीपे वर्तते इति 1 मिमतं सुखम् । उत्त० २६५। अध्यात्ममात्मनि यद्वर्तते, | शील , गुरुपादपीठिकाप्रत्यासन्नवर्ती। व्य० प्र० २० आ। मन । उत्त० २६५१ अध्यात्मकरणम् , क्रियाया अष्टमो अभासवत्तियं-प्रत्यासत्तिवर्तित्वम् ,श्रुतार्थिना हि आचा- | भेद । आव० ६४८ । र्यादिसमीपे आसितव्यम् । ठाणा० ४०९ । अभ्यासो-गौर- अब्भत्थिए-अध्यात्मिक , आत्मविषय । भग० ११५ । व्यस्य समीपं तत्र वर्तितुं शीलमस्येत्यभ्यासवर्ती तद्भावोऽ. अब्भत्थियं-अभ्यथितम् । आव० ३५९ । भ्यासवर्तित्वं, अभ्यासे वा प्रीतिक-प्रेम । भग० ९२५ । अष्भत्ये-अभ्यस्ते, अनवरतं दृष्टपूर्वे, विकल्पिते, भाषिते अभासवत्तिया-अभ्यासवृत्तिता, समीपतित्वम् । औप० • च विपये पुन क्वचित् कदाचिदेवलोकिते । विशे० १७५ । अभपडलं-अभ्रपटलम् , मेघवृन्दम् । औप० ६६ । प्रज्ञा० अन्भासासन-अभ्यासासन-उपचरणीयस्यान्तिकेऽवस्थानं । २७ । मणिभेदः, पृथिवीमेद. । आचा० २९ । उत्त० ६८९ । अभपडली-अभ्रपटल । प्रज्ञा० २६६ । जीवा० २३ । अम्भासिया-द्रविडादिदेशोद्भवा । वृ० द्वि० २११ आ। अब्भ(त)रया-अभ्यन्तरका-ये राजानमति प्रत्यासन्नीभूयावल- | अव्भासे-अभ्यास , अदूरासन्नम् । दश० ३१ । आसन्ने । गिन्ति । व्य. द्वि० २८२ अ। ओघ० ७८ । समीपे । ओघ० १४० । अभरहितो-आसन्नो । नि० चू० द्वि० ० १३ आ। अभासो-अभ्यास , आसेवनालक्षणः । आव० ५९१ । अम्भरुक्खो-अभ्रवृक्ष , अभ्रात्मको वृक्ष । भग० १९५ । अब्भाहतो-अभ्याहत , मत्त । उत्त० ३०० । वृक्षाकारपरिणतमभ्रम् । जीवा० २८३ । अभितरं-आभ्यन्तरम् , प्रायश्चित्तादि । प्रश्न० १५७ । अब्भरुह-अभ्यासह वृक्षस्योपरिवृक्ष, वनस्पतिविशेष ।भग० अभितर-अभ्यन्तरावधिरुक्त । विशे० ३६९ । योऽवधि सर्वासु दिक्षु स्वद्योत्य क्षेत्र प्रकाशयति । प्रज्ञा० ५३६ । अन्भवालुए-अभ्रवालुका, मणिमेद , पृथिवीमेद । आचा० आभ्यंतर - चित्तनिरोधप्राधान्येन कर्मक्षपणहेतुस्तप ! सम० ४३॥ । सम० ९५। । । ८०२ । २९ । १२ । ठाणा० २८७1 अभवालुया-अञवालुका, अभ्रपरलमिश्रा वालुका । प्रज्ञा० अभितरए-अभ्यतरम् आन्तरस्यैव शरीरस्य तापनात , २७ । उत्त० ६८९ । जीवा० २३ । सम्यग्दृष्टिभिरेव तपस्तया प्रतीयमानत्वाच्च । औप० ३७ ॥ अन्भसंथडा-अभ्रसस्थितानि, मेधैराकाशाच्छादनानीत्यर्थ । | अभितरओ तवो - लौकिकरनभिलक्ष्यत्वात्तन्त्रान्तरीयश्च भावतोऽनासेव्यमानत्वान्मोक्षप्राप्त्यन्तरंगत्वाच्चाभ्यन्तरतप। अभा-अभ्राणि । भग० १९५ । दश० ३२ । ठाणा ३६५। अभाइक्खइ-अभ्याख्याति-निराकरोति । आचा० ५२। अभितरमलो-आभ्यन्तरमल , मूत्रपुरीपादि। आव० ७५८॥ अभाइक्खिज्जा-अभ्याख्यानम्-असदमियोग । आचा० अभितरलावणग - आभ्यन्तरलावगिक , लवणसमुद्रे ४४ । प्रकटममद्दोपारोपणम् । ठाणा. २६ । गिखाया अविचारी चन्द्र । जीवा० ३१८ ॥ (७४) [ अभितरसंवुका अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अंभग्गजोगो । । अभितरसंवुक्का-सखनाभिखेत्तोवमाए आगिइएं अतो आढ ६३७ । जओ दीसइ तो चेव कायव्वं । दश० ३०॥ वति बाहिरओ सणियट्टइ । उत्त० ६०५ । आगतस्याभिमुखमुन्थानम् । दश २४० । अभितरिया-अभ्यन्तरिका, नगरीविशेष । आव० २०० । अन्भुट्ठिज-सिंहासनादभ्युत्तिष्ठेयुरिति । ठाणा० ११७ । अभिडिऊण-आस्फाल्य । उत्त० १४९ । अब्भुटिओ-अभुट्टिएति सामाइयकडो पंडिक्कता व्रतारो- अब्भुक्खेइ-अभ्युक्षति, अभिमुख सिञ्चति । जीवा० २५६ । पित । नि० चू० तृ० ८४ आ। अभ्युक्षति, सिम्पति, स्नपयति। ज० प्र० १९२ । अब्भुट्टितो-वैयावृत्त्यकरणोयतः । नि० चू० प्र० ३३४ अ । अभुक्खेंति-अभ्युक्षन्ति सिञ्चन्ति । ज० प्र० २७५ । अन्भुट्टित्तए - अभ्युत्थातुम्-अभ्युपगन्तुम् । ठाणा० ५७ । अब्भुग्गए - अभ्युद्गतः, आभिमुख्येन सर्वतो विनिर्गत । अब्भुट्टियं-अभ्युत्थितम्-अभ्युद्यतं । उत्त० ३०७। अभ्यु- • सूर्य० २६३ । स्थापन-वंदनकप्रतीच्छनकादिक । व्य० प्र० १७२ आ ।. अभुग्गओ-अभ्युद्गत , आभिमुख्येन सर्वतो गत. । जीवा अभ्युत्थित-उद्यत.! ओघ० १८० । १७५ । अभ्रोद्गत:-यद्वा आकाशे उद्गता प्रवलतया सर्व- तस्तिर्यक् प्रसृता । ज० प्र० २९७ । अन्भुटेमि-अङ्गीकरोमि । भग० १२१ । अभुत्तरोमा-प्रदीप्तरोमा । नि० चू०, द्वि० ६१ अ। : अब्भुग्गय-अभ्युद्गतः, आभिमुख्येन सर्वतो विनिर्गत । प्रज्ञा० ९९ । अभिमुखमुद्गत , अग्रिमभागे मनाक् उन्नत । जीवा० अभुदए-अद्भुतकान् , आश्चर्यरूपान् । उत्त० ३१७ । । २०५। संजात । सम० १३९ । अब्भुदओ-उत्सवविशेष । बृ० द्वि० १९८० अ। अब्भुग्गयमूसिय-अभ्युद्गतोच्छ्रित , अभ्युद्गतमभ्रोद्गतं | अब्भुनय-अभ्युनतः, अभिमुखमुन्नत । जीवा० २७५ । वा यथाभवत्येवमुच्छ्रित , अथवा मकारम्यागेमिकत्वादभ्यु- | अम्भुवगमिया-आभ्युपगमिकी, या स्वयमभ्युपगम्य वेद्यते गतश्चामावुच्छ्रितश्चेत्यभ्युद्गतोच्छ्रित , अत्यर्थमुच्च इत्यर्थ । (वेदना)। भग० ४९७ ॥ 'भग० १४५ । अब्भुवगमे-स्वेच्छया अभ्युपगम्य वादकथा क्रियते। बृ० अब्भुग्गया-अभ्युद्गता, आभिमुख्येन सर्वतो विनिर्गता। प्र० ३१ आ। जीवा० ३७९ । अग्रिमभावे मनागुन्नता। ज० प्र० ५० । | अभुवगमो-अभ्युपगमः, स्वयमङ्गीकार । प्रज्ञा० ५५७ । अभ्युद्गता, अतिरमणीयतया द्रष्टृणा प्रत्यभिमुखमुत्-प्रावल्येन भग० ६८३ । स्थिता । जीवा० २२६ । अमे-आभिन्द्यात् , आच्छिन्द्यात् । आचा० ३८ । अभुग्गयाओ-अभ्युद्गतान्यभ्रोद्गतानि वोच्चानि । भग० ६७२। अभोवगमिया - आभ्युपगमिकी-केशोल्लुम्चनातापनादिभिः अब्भुग्गयुच्छितपभासिय-अभ्युद्गतोत्सृतप्रभासितं, अ- शरीरपीडा । प्रज्ञा० ५५७ । शिरोलोचब्रह्मचर्यादिनामभ्युप- *मुद्गता-आभिमुख्येन सर्वतो विनिर्गता उत्सृता -प्रवलसया गमे भवा (वेदना)। ठाणा० २४७ । सर्वासु दिक्षु प्रसृता या प्रभा तया सितम् । जीवा० ३७९ । अब्रह्म-मैथुनम् । आचा० ३३१ । अन्भुजयं-अब्भुज्जतमरणेग अब्भुजयविहारेण वा। नि० अभओ-अभय । आव०.९५। अभयकुमारोऽष्टमकारी । चू० तृ. ३५ ॥ अब्भुजया-अभ्युद्यता, सुविहिता । अनुत्त० ३ । अन्त० ९ । व्यक्तिविशेष । आव० ३६८। उदाहरणदोषे अभुजियविहारो- जिणकप्पादि । नि० चू० प्र० २६३ आ। अभयकुमार । दश० ५३ । नामविशेषः । वृ० प्र० ४६ आ। अब्भुट्ठाणं - अभ्युत्थानम् , आगच्छति गच्छति च दृष्टे अभओ सव्वस्सवि - अभयं सर्वस्यापि प्राणिगणस्याभ- गुरावासनमोचनम् । उत्त० १७ । ससम्भ्रममासनमोचनम्। यम् । अहिंसाया द्विपञ्चाशत्तमं नाम । प्रश्नः ९९ । उत्त० १२४ । अमीत्याभिमुख्येनोत्थानं-उद्यमनम् । उत्त०५३५। अभक्कार्थः-खमण, क्षपण । व्य० प्र० १८१ आ। विनयाहस्य दर्शनादेवासनत्यजन । ठाणा० ४०८ । आसन- | अभग्गं-अभग्नम् , अपीडितम् । आव० ७७२ । त्याग । सम० ९५ । गौरवाईदर्शने विष्टरत्याग । भग० । अभग्गजोगो-अभग्नयोग । भाव. ७९३ । - - L (७५) [ अभग्गसेण- आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अभिओगे ] १४१ आ। अभग्गसेण-भभग्नसेन', 'विजयस्य चौरसेनापतेः स्कन्द- अभयसेण-अभयसेनः, सवेगोदाहरणे वारत्रकपुरे राजा । श्रीभार्याया पुत्रः । विपा०- ५७। विजयस्य चौरसेनापते. आव० ७०९। पुत्र । विपा. ६० । अमग्नसेन, विपाकश्रुताध्ययनम् । अभयसेणो-वारत्तपुरं नगर, तत्थ अभयसेगो राया । निक ठाणा० ५०७॥ चू० तृ० ५४ आ। वारत्रकपुरराजा । बृ० द्वि २४९ आ। अभग्गो-अभग्न , अभग्नसेन', विजयाभिधचौरसेनापति- | अभयसेन-छर्दितदोषदृष्टान्ते राजा। पिंड० १६९ । पुत्रः, अन्तकृद्दशासु तृतीयाध्ययनम् । विपा० ३५ । अभयसेना-वापीनाम । जं० प्र० ३७० । अभजियं अभग्नाम्-अमर्दितामविराधिताम् । आचा० ३२३। | अभया-हरीतकी । आचा० १३० । नि० चूल द्वि० अभडप्पवेसं-अभटप्रवेशम् , कौटुम्बिकगेहेषु राजवर्णवता भटानामविद्यमानप्रवेशम् । विपा० ६३ । अभये-अभयः, अनुत्तरोपपातिकदशानां प्रथमवर्गस्य दश- अभसच्छंदो-अभक्तच्छन्द , भक्तारुचिरूपः । उत्त० ७८ । माध्ययनम् । अनुत्त० १। अभसर्ट-अभक्तार्थम् , उपवासः । आव० ८५२ । अभवसिद्धिय-अभवसिद्धिकः, अभव्य । जीवा० ४४९ । अभत्तट्ठो-अभक्तार्थ , न भक्तार्थः, उपवासः। आव० ८५३ । ठाणा० ३०। अभय-अभय , श्रेणिकपुत्रनाम। सूत्र० १०३ । दानविशेष ।। अभविय-अभव्य -अयोग्य.। उत्त० ७१३ । प्रश्न० १३५ । अभयः, सयमः । आचा० ६२ । कुमार अभाग-अभाग्य , अशोभनः । आव० ७०८। विशेष । नि० चू० प्र. ७ आ, नि० चू० तृ० ३७ अ । अभावं - नव कुत्सायामपि दर्शनादशोभनं भावं-सर्वतो वृक्षाधिष्ठायकव्यंतरदर्शी। व्य० प्र० १७ अ । निष्काशनलक्षणं- पर्यायम् | उत्त० ४६ । अभयकरा-मल्लिजिनदीक्षाशिबिका। सम० १५१ । अभाविआ-अगीतार्था । वृ० द्वि० १६६ आ । अभयकरो-अभयकरः । आव० ४९९ । अभाविओ-अभावित । आव० १०१ । अभावित -अपरि- अभयकुमार:-प्रद्योतस्यापकारकः । सूत्र० ३१३.। विशेष णतजिनवचनस्तस्य निर्लेपनाभावे मा भूद् विपरिणाम । नाम। विशे० ६१२। औत्पातिकीबुद्धेष्टात. । वृ० प्र० १८६अ। वृ० प्र० २७२। आर्द्रकुमाराय प्रतिमाप्रेषकः । सूत्र. ३८५ । प्रद्योतगणिका- | अभावित-अससर्गप्राप्तं प्राप्तससर्ग वा । ठाणा० ४८१ । भिर्धार्मिकवञ्चनया वञ्चित । सूत्र० ३२९ । कालसौकरिकसुत- | अभावितो-कृताभ्यास । नि: चू० तृ० १३१ आ। सुलससखा। सूत्र० १७८ । मवपूर्विकैहिकार्थसिद्धौ दृष्टान्त । अभावुक-नलस्तम्ब । ओघ २२३ । ज० प्र० १९७। रोहिणीयस्य लौकिकसूक्ष्मपरिनिर्वा- अभावो-असभव. । दश० ३९ । विनाश । वृ० द्वि० ७२ आ। अभासो-स्वदेशभाषाया अज्ञ । वृ० द्वि० १९ आ । अभयकुमारो-द्रष्टातविशेष. । नि० चू० प्र० १९४ अ । अभि-पृथम् । वृ० द्वि० १९५ अ । अभयदए - अभयदय., प्राणापहरणरसिकेऽप्युपसर्गकारिगि अभिई-अभिजित् , नक्षत्रविशेष । सूर्य० ११४ । ठाणा० ७७. . प्राणिनि यो न भय दयते ददाति, अभया सर्वप्राणिभय- | अभिओग-अभियोग., आज्ञाप्रदानलक्षण । दस० २४९ । 'परिहारवती वा दया - अनुकम्पा यस्य स । भग० विकुर्वगा। भग. १९१। बलात्कार । उत्त० ३६५॥ ७। अभय - विशिष्टमात्मन. स्वास्थ्य नि श्रेयसधर्म- अभिओगकया-अभियोगकृता, या वशीकरणचूर्णमन्त्रयोः भूमिकानिबन्धनभूता परमा धृतिरितिभाव. तदभय ददति । १ सयोजिता सा। ओघ० १९३ । जीवा० २५५। अभिओगपावणं - अभियोगप्रापणे, हठाव्यापारवर्तनम् । अभयदयेणं-अभयदय , न भयं दयते प्राणापहरणरमिको. पसर्गकारिण्यपि प्राणिनि ददातीत्यभयदय.। मम० ४ । अभिओगिओ-आभियोगिक ! आव० १२४ । अभया ,वा-सर्वप्राणिभयपरिहारवती दया-घृणा यस्याया- अभिओगे-अभियोगः, प्रेष्यकर्मणि व्यापार्यमाणत्वम्। जीवा० वभयदय। मम० ४। पणः । व्य० प्र० २०९आ। प्रश्न० २२ । (७६) [ अभिओंगो अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अभिघट्टिजमाणस्स ] T , -। - १९९ आ। भग . अभिओगो-अभियोगः, पारवश्यम् । विपा० ५४ । गर्व । | अभिगमरुई - अभिगमरुचि --यस्य श्रुतज्ञानमर्थतो दृष्टं स आव० ७७२ । वशीकरणचूर्णो मन्त्रश्च । ओघ० १९३ । भवति । प्रज्ञा० ५६ । अभिगमो-ज्ञानं ततो रुचिर्यस्य स, अभिओग्गो-अभियोग्य , अभिमुख कर्मसु युज्यते व्यापा येन याचारादिक श्रुतमर्थतोऽधिगत भवति स. ठाणा० र्यत इति वा, तस्य भाव कर्म वा। जीवा० २८० । ५०४ । अभिगमरुचि -अभिगमो-ज्ञान तेन सचिर्यस्य स । अभिकंख-अभिकाक्ष्य-उद्दिश्य । आचा० २८१ । पर्या उत्त०.५६३ । लोच्य । आचा० ३८८ । अभिगमसड्ढे-अभिगमश्राद्धक -यत्र कारणे आपन्ने प्रवि- अभिकखमाणो-अभिकाङ्क्षन्, मायारहित.। दश० २५२ । श्यते। ओघ० १५६ ॥ अभिकता - अभिकान्ता-शपायास्तृतीयप्रकार । बृ० प्र०, अभिगममहो-सम्मद्दिट्ठी-गिहीताणुव्वओ। नि० चू० प्र० । ९३ अ। अभिकतं-अभिकान्तम् , अभिक्रमणम् । प्रज्ञापकं, प्रत्यभि- | अभिगम - अभिगम , विस्तरवोध । १००। मुख मणम् । दश० १४१ । प्रतिपसि । भग० १३७ । अभिक्कमंति-अभिलसति । दश० चू० ६२ । अभिगमो- अधिगम , यथावस्थितपदार्थपरिच्छेद । आव० अभिक्कममाणे-अभिकामन् गच्छन् । आचा० २१७ । ८३८ । साधूणमागयाणं जा विणयपडिवत्ती सा । दशः अभिक्खसेवा-पुगो पुणो गमनं । नि० चू० प्र० ३९ आ। चू० १४१। अभिक्खं-अभिर्ग-अनवरतं । आव० ११९ । अभिगया-जीवाजीवादिपदार्थाभिगमोपेता श्राविकेत्यर्थ । बृ० अभिक्खणं-अभिगं, अनवरतम्। भग० २२, ४१ । तृ० १३९ आ। आचा० ३६५। सूत्र० ११५ । उत्त० ३४३, २१४ । अभिगहियट्ट- अभिगृहीतार्थम् , प्रनितार्थस्याभिगमनात् । आव० ४०७ । अनुममयम् । भग० ४३ । पुन पुन । भग० १३५ । उत्त० ३४४, ४२८, ठाणा० ३०१ । अभिगाहइ-सेवते। आचा० ११४। अभिगाहन्ते-सेवन्ते। अभिक्खणं अभिक्खण ओहारइत्ता- शवलदोष । आचा० १३३ । सम० ३७ । अभिगिज्झ-अभिगृह्य, आलोच्य । दश० २१६ । अङ्गीकृत्य, अभिक्खणंऽमिक्खमोहारी-अभीक्ष्णमभीक्ष्गमवधारक तदभिमुखीभूय । ठाणा० ५६ । योऽभी गमवधारिणी भाषा भाषते, यथा ,दासस्त्वं चौरो | अभिग्गह-अभिग्रह , गुरुवियोगकरणाभिसन्धि । दश० वेति, यद्वा शङ्कित तनि.शङ्कित भगति । एकादशममसमाधि- स्थानम् । आव० ६५३, ६५४ । अभिग्गहियमिच्छादसणवत्तिया - अभिगृहीतमिथ्या अभिगच्छति-अभिगच्छन्ति, समीपमभिगच्छन्ति। भग दर्शन प्रत्ययिकी, मिथ्यादर्शनप्रत्ययिकीक्रियाया द्वितीयोमेद । १३७ । आव०६१२॥ अभिगता-अभिगता , अभिगतजीवाजीवा. । आव० ३०४ । अभिग्गहिया-अभिगृहीता, प्रतिनियतार्थावधारणम् । प्रज्ञा अभिगम-अभिगम , ज्ञानम् । उत्त० ५९२ । बोधिलाभ । २५६। अभिग्रहिका-वस्त्रागि वा पात्राणि वा पूरणीयानि अपरेण सम० १२० । मैथुनासेवना, गमनं च । आव० ८२५ । वा येन प्रयोजनमिति प्रतिपनाभिग्रहा । वृ० प्र० ९९ अ। अभिगम्य, विज्ञाय, आसेव्य । दश० २५८ । अभिग्गहो-अभिग्रह -प्रत्याख्यान विशेष । आव० ८५२ । अभिगमकुसले-अभिगमकुशल , लोकत्राघूर्णकादिप्रतिपत्ति- कुमतपरिग्रह । ठाणा० ४९ । नियम, '। भग० ६२ । दक्ष. । दश० २५५ । अभिग्रहिक -मिथ्यात्वविशेष । ठाणां० २७ । अभिगमणं - अभिगमन, सर्वरायान्मण्डलादभ्यन्तरप्रवेश- अभिघट्टिजमाणस्स-अभिघट्टयमानस्य-वेगेन गच्छतः । नम् । जीवा० ३४५ । सूर्य० २४३ । ज० प्र० ३७ । जीवा १९३ । . २४१॥ - (७७) [ अभिघातो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अभिण्णाय ] - - अभिघातो-उवलओ वा घत्तिजति । नि० चू० प्र० १०५आ। | अभिजोययंति-वशीकुर्वन्ति। वृ०.द्वि० २५५ भ । अमिचंदे-अस्यामवसप्पिण्या चतुर्थकुलकर । सम० १०३, , अभिज्ज-अमेद्य । उत्त० २०७। १५० । अभिचन्द्रः, अन्तकृद्दशानां द्वितीयवर्गस्याष्टमा- अभिजा - अभिध्यानममिध्येत्यस्यः। सम० ७१। लोभः, ध्ययनम् । अन्त० ३ । अभिचन्द्र -मुहर्त्तविशेषः । सूर्य अभिध्यानं वा । प्रश्न. ९७ । १४६ । जं० प्र० ४९१ । कुलकरविशेषः । आव० १११ । अभिज्झा-अभिध्या-अढाभिनिवेश , चित्तलक्षणः । भग. जं० प्र० १३२ । अभिचन्द्र -अमुष्यामवसपिण्या चतुर्थ ५७३ । अभिध्या, अभिभ्यानम् , अभिलाषः। प्रज्ञा० कुलकरः । ठाणा० ३६८ । ५०४ । अभिचारकमन्त्रविद्यादि - अशिवपुररोधादौ तत्प्रशम- | अभिज्झिम-अभिन्यातम् , इष्टम् । दश०. २७७ . नार्थ । ठाणा. १६४। अभिज्झियत्ता-अभिध्यितता, भिभ्या-लोभः सा साता अभिचारुअं-चारकता । नि० चू० प्र० २७४ आ। यत्र सो भिभ्यितो, न भिध्यितोऽभिध्यितस्तद्भावस्तत्ता। भग० अभिचारुकं-वसीकरणं । नि० चू० प्र० १०१ आ। २५३ । अभिभ्यितता, अभिध्यानमभिन्या-अभिलाषः, सा अभिजाए-अभिजात , शास्त्रीयद्वादशदिवसनाम । जं० प्र० सजाताऽस्मिन् तस्य भावः । प्रज्ञा० ५०४ । अभिध्येयता- ४९० । विनीत । उत्त० १८८ 1 कुलीन । ज० प्र० १८२। अहृद्यत्वं, अशुभत्वं । भग० २३ । । अभिजाओ-शिष्ट. । वृ० द्वि० २५५ आ। अभिणए-अभिनय , चतुर्भिरागिकवाचिकसात्त्विकाहार्यभेदैः अभिजाणइ-अभिजानाति, विवेचयति । आचा० . २०३ । समुदितैरसमुदितैर्वाऽभिनेतव्यवस्तुभावप्रकटनम् । जं० प्र० अभिजातं-वाण्यतिशयविशेष । सम० ६३ । अभिजाति-कुलीनता। उत्त० ३४७ । अभिणंदणो- अभिनन्दन , अभिनन्द्यते देवेन्द्रादिभिरिति, अभिजातिए - अभिजातिगः, अभिजाति.-कुलीनता ता चतुर्थजिन , गर्भात्त्रभृतिरभीक्ष्णं शक्रोऽभिनन्दितवानिति । आव० ५०२ । गच्छति-उत्क्षिप्तभारनिर्वाहणादिनेति । उत्त० ३४७ । अभिजाते-अभिजात., शास्त्रीयैकादशदिवसनाम । सूर्यः अभिणदिए-अभिनन्दित.-लोकोत्तरप्रथममामनाम । ज० प्र० १४७॥ अभिणदियाइओ-अभिनन्दितवान | आव० ५०२ । अभिजाय-अभिजातम्-कुलीनम् । भग० ४६९ । अभिणंदे-अभिनन्द , लोकोत्तरप्रथममामनाम। सूर्य० १५३ । अभिजायइ - अभिजायते, उपभोग्यतयाऽऽभिमुख्येनोत्प- अभिणिक्खंतो-अभिनिष्वान्तः । आव० ११७ । यते। उत्त. १८७। अभिणिवोहे-अभिनिवोध., अर्थाभिमुखो नियत प्रतिनियत- अभिजित्-नक्षत्रदेवविशेष । प्रश्न० ९५ । उदायनपुत्र । स्वरूपो बोधो-बोधविशेषः, अभिवुध्यतेऽस्माद् अस्मिन् वेति । ठाणा० ४३१ । तदावरणकर्मक्षयोपशमः । प्रज्ञा० ५२६ । अभिजुजंति-अभियुजते, योजयन्ति । प्रश्न. ३६ । अभिणिवट्टमाणे - अमिनिवर्तमान , पृथग्भवन । सूत्र अभिमुंजित्तए - अभियोक्तुम् , विद्यादिसामर्थ्यतस्तदनुप्रवे- ३५४ । शेन व्यापारयितुम् । भग० १९१ । अभिणिविट्ठ- अमिनिविष्ट, विशिष्टविशिष्टतराभ्यवसायभाव- अभिमुंजिया-अभियुज्य, व्यापार्य, स्मारयित्वा। सूत्र० तोऽतितीत्रानुभावजनकतया व्यवस्थितम् । प्रज्ञा० ४०३ । १३९। योजयित्वा, अभियोग प्राहयित्वा, व्यापारयित्वा। अभिणिवेसे-अभिनिवेशः, चित्तावष्टम्भ । औप० १०६ । आचा० १२३ । आश्लिष्य-वशीकृल । ठाणा० १०६ । अभिणिवट्टित्ता-अभिनिवर्त्य, समाकृष्य । सूत्र० २७९ । सम्बन्धमुपगत्य, प्रतिस्पर्य। ठाणा० १७७ । अभिषणाणं - अभिज्ञानं, चिह्नम् । उत्त० १४९ । आव० भमिजोइंति - तिरस्कुर्वन्ति, निर्भयन्ति। वृ० प्र० ३४४ । अभिण्णाय-अभिज्ञातम् , अमिमतम् । भग० १९७ । ४९० । । २८१ अ। (७८), [ अभितावयंति अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अभिभुखं ] भग० ४८९ । व्य० प्र० ४० आ। अभितावयंति-अभितापयन्ति, अपनयन्ति । सूत्र० १३३ ।। अभिनिविट्ठाइं-अभि-अभिविधिना निविष्टानि-सर्वाण्यपि अभितुर-अभि-आभिमुख्येन त्वरस्व-शीघ्रो भव । उत्त० ३४०। जीवे लमानि । भग० ५६९ । अभितोसइजा-अभितोषयति, येन वा तेन वा यापयति । अभिनिवुडच्चे-अभिनिवृत्ताच-शरीरसंतापरहित ।आचा० दश० २५३ । २८४ । अभिदुग्गा-अभिदुर्गा, आभिमुख्येन दुर्गा-दु खोत्पादिका। अभिनिवेशिक-मिथ्यात्वविशेषः । ठाणा० २७ । सूत्र. १२९ ।। अभिनिवेसए-अभिनिवेशयेत् , कुर्यात् । दश० २३२ । अभिहवं-अभिद्रवन्ति । आचा० ४२९ । अभिनिवेसं-अभिनिवेशः । आव० ३११ । आग्रहः । अभिहुय-अभिद्रुतः, सर्वात्मना व्याप्त. । जीवा० १३० । अभिधानं-वचनपर्याय । आव० २९ । अभिनिव्वट्टित्ता-अभिनिवर्त्य, विधाय । भग०. २२४ । अभिधारए-अभिधारयेत्-यायात् । दश १८६ । किमेते | अभिनिविगड-विष्वक् अपवरक: । व्य० द्वि० १९० आ। उपसर्गा ममाचलितचेतस. .कर्तुमलमिति चिन्तयेत् । अभिनिव्वगडा-अभिनिर्व्याकृत-पृथग्विभिन्नद्वाराया वसती। उत्त० १०९ । अभिधारयेयु.-अन्तर्भावितेव । उत्त० १०९ । अभिधारणा - धारणा, विचारणा, सकल्पः । व्य० द्वि. अभिनिव्वगडाए-अभि-प्रत्येकं नियतो वगड:-परिक्षेपो ३७३ आ। यस्या सा अभिनिव्वगडा । व्य. द्वि० १८१ । अभिधारयामो-गर्हणाबुद्धयोद्घट्टयामः । सूत्र. ३९२ । अभिनिसिजा-अभिनिषद्या-रात्रिस्वाध्यायभूमि , अभिनषे- अभिधारेमाणे-अभिसन्धारयतः-गच्छत । आचा० ३२९ । धिकी-सामान्यस्वाध्यायभूमि । व्य० प्र० १२५ म । अभिधास्ये-कीर्तयिष्ये । आचा० ४ । अभिनिसिट्ठो- अभिनिसृष्टः, अभिमुख - बहिर्भागाभिमुख अभिनंदिजा-अभिनन्देत् , अनुमन्येत । उत्त० १२० । निसृष्ट । जीवा० ३६१, २०६ । अभिनयिका-नृत्यकलामेद । सम० ८४ । अमिनिस्सवति-अभिनि श्रवति, जिघ्रतामभिमुख निस्स- अभिनव-विशिष्टवर्णादिगुगोपेत । जीवा० १२१ । रति । जीवा० १९२ । अमिनवम्-नवम् । सूर्य. १८ । अभिन्न-अव्यपगतजीवं । बृ० प्र० ३५ मा। अभिनिक्खमणं-अभिनिष्क्रमण-दीक्षा । आचा० अभिनाय-अभिधाय-ज्ञात्वा। आचा० ३०४ । अभिनिक्खमति-अभिनिष्क्रामति-धर्माभिमुख्येन गृहस्थ- अभिप्पाओ-अभिप्राय , बुद्धिः । आव ४१४ । पर्यायानिर्गच्छति । उत्त० ३०६ । अभिनिचरिका-आभिमुख्येन नियता चरिका सूत्रोपदेशेन | अभिप्पेय-अभिप्रेत , कामयन् । दश० १९५ । अभिप्रेते- वहिजिकादिषु दुबलानामाप्यायनिमित्तं पूर्वाह्नकाले समु- अभिरुचिते। उत्त० २५४ । अभिभवे-अभिभवकायोत्सर्ग - उपसर्गाभियोजने द्वितीय । स्कृष्ट समुदान लब्धु गमनं । व्य० द्वि० ६९ अ। आव० ७७१। विशे० ६१२ । अभिनिदुवारं-अनेकद्वारम् । बृ० द्वि० १२ मा । अभिनिवोध-अर्थाभिमुखोऽविपर्ययरूपत्वानियतोऽसशयरूप- अभिभूत -आकुल. । आव० ५८९। प्रारब्ध., अपराधो त्वाद् बोध-संवेदनम् । ठाणा० ३४७ । अभिनिपयाए-अभिनि प्रजा-अभि-प्रत्येकं नियता-विविक्ता | अभिभूय-तिरस्कृत्य । आचा० ३०८। सर्वथा तत्सामर्थ्य प्रजा चुरी। व्य० द्वि० ३३९ । मुपहत्य । उत्त० ८१ । पराजित्य। सूत्र० १४५ । अभि- अभिनिवर्त्तनम्-क्रिया । उत्त०' ५८१ । व्याप्य। सूत्र. २८५। अभिनिविद्या-अभिनिर्वृत्ता | आव० २२० । अभिमरए-अभिमरक । आव० ८१९ । भभिनिविटुं-अभिनिविष्टम् । तीव्रानुभावतया निविष्टम् । अभिमरा-अभिमरा । उत्त० १६२। आव० ३१६ । अभिमुखं-अभिमुख । व्य० प्र० ९९ भ । ४२२। वा। प्रश्न०६०। भग० ९० ।। (७९) 1 आव० २७७ । ठाणा० ११३ । [ अंभिमुखनामगोत्रः आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अभिव्यज्यते] अभिमुखनामगोत्रः - (अभिमुहनामगोत्तं), नोआगमतो अभिलावपुरिसे - अभिलापपुरुष. पुल्लिङ्गाभिधानमात्रम् । द्रव्यद्रुमस्य तृतीय. प्रकारः । दश० १७ । अभिमुखे-संमुखे जघन्योत्कर्षाभ्या समयान्तर्मुहर्तानन्तरभावितया नामगोत्रे | अभिलाष:-तीव्रलोभोदयप्रभव आत्मपरिणामः।आव०५८०१ इन्द्रसम्बन्धिनी यस्य स तथा । ठाणा० १०३ । अभिलोयणं-अभिलोकनम् , अभिलोक्यते यत्रस्थैस्तत् , अभिमुखनामगोत्रा - ये पुनर्वादरापर्याप्ततेज कायिकायु- उन्नतस्थानम् । प्रश्न. १३८ । मिगोत्राणि पूर्वभवमोचनानन्तरं साक्षाद्वेदयन्ते तेऽभि- अभिवंदओ-अभिवन्दक, अभिवन्दिष्यत इति । आव० मुखनामगोत्राः । प्रज्ञा० ७६ । अभिमुह-पव्वनामिमुहो, संपट्टितो। नि० चू० प्र० अभिवंदिऊण-अभिवन्द्य, अभिमुख वन्दित्वा-प्रणम्य- । १६७ । . १०४ अा प्रज्ञा० ३। . । । . 4 । १७१ । अभिमुहो-अभिमुख , उद्युक्तः । दश० २४५ । अभि-भग- अभिवहिए-अभिवद्धितः, तृतीयः पञ्चमश्च युगे सवत्सरोन वन्तं प्रति मुखमस्य । सूर्य० ६ । सूर्य० १५४ । ठाणा० ३४४ । अभियोग-आज्ञा । ठाणा० ५२१ । प्रहणप्रवण , अर्थवला- अभिवहिए णं मासे-अभिवर्द्धितसंवत्सरस्य चतुश्चत्वारिंशद ऽऽयातत्वेन तन्नान्तरीयकोद्भवः । विशे० ५३ । कार्मण होरात्रद्विषष्टिभागाधिकत्र्यशीत्यधिकशत्त्रयरूपस्य द्वादशो कुर्यात् । वृ० प्र० ९९ आ । भाग । सम० ५६ । अभिवर्द्धितमास , अभिवदितो नाम अभियोग-आभियोग्यः, अभियोगार्ह आदेशकारी देव. । मुख्यतस्त्रयोदशचन्द्रमासप्रमाणसवत्सर । वृ० प्र० १८६ आ। प्रश्न० १२१ । अभियोगो-वशीकरण । व्य० द्वि० ३१५ आ । अभिवडियवरिसं-जत्य अधिकमासगो पडिति वरिसे ते । नि० चू० प्र० ३३९ । अभियोजनम् - विद्यामन्त्रादिभि परेषां वशीकरणादि । अभिवडियसंबच्छरे-अभिवतिसवत्सर । सूर्य० १६९, प्रज्ञा० ४०६। अभिरई-अभिरतिः, आभिमुख्येन रति । आव० ४५१ । अभिरामयंति-अभिरमयन्ति, आभिमुख्येन विनयादिषु अभिभवंति-अभिभवन्ति-न्यकुर्वन्ति । ठाणा. १७७ । युजते। दश० २५६ । अभिवद्धी-अभिवृद्धि , उत्तराभाद्रपदाया देवता । ज० प्र० अभिरू-मध्यमग्रामस्य सप्तममूर्छनानाम । ठाणा० ३९३ । ४९९ । अभिरूइए-स्वादुभावमिवोपगतः। भग० ४६७ । अभिवयणा-'अभी'त्यभिधाय कानि वचनानि-शब्दा अभि अभिरूप-अभिमुखमतीवोक्तरूपं आकारो यस्य सः। सूर्य० २ । वचनानि, पर्यायशब्दाः । भग० ७७६ । अभिरूवं-अभिरूपं, अभि-सर्वेषा द्रष्णा मन.प्रसादानुकूल- अभिवादणं - अभिवादनम् , शिरोनमनचरणस्पर्शनादि- तयाऽभिमुख रूपं यस्य तत् , अत्यन्तकमनीयमिति। पूर्वमभिवादये इत्यादि वचनम् । उत्त० १२४ । जीवा० १६१ । प्रज्ञा० ८७ । अभिवायण-अभिवादन-नमोक्काराइकरगं । दश० चू० १६३ । अभिरूवा-अभिरूपागि, कमनीयानि । सम० १३८ । अभि- अभिवाहारो- अभिव्याहार , आचार्यशिष्ययोर्वचनप्रतिव- सर्वेषा द्रष्टगा मन प्रसादानुकूलतया अभिमुख रूपं यस्यः सा, चनेऽभिव्याहरणम् । आव. ४७१ । अत्यन्तकमनीया। ज० प्र० २१ । अभिरूपा -कमनीया.। अभिविधग्गहणं-पर्यापन्नपरिष्ठापितादेर्ग्रहणम् । वृ० द्विः ठाणा० २३२। अभिलंघमाण-अभिलइयत् , अनुलिखत् । ज० प्र० २९७। अभिवृद्वित्ता-अभिवi । सूर्य० १२ । अभिलसंति-अभिलपन्ति । औप० २४ । अभिवुढेमाणे-अभिवर्धयन् । सूर्य० १२ । अभिलसह-अभिलपति,अभिलपग-तल्लालसतया वान्छनम्। अभिव्यज्यते-अनन्तपरिणामस्य द्रव्यस्य तत्तत्सहकारिका: उत्त० ५८७ । रणसन्निधाने तत्तद्रूपम् । ठाणा० ४९० । २४ ॥ (८०) [ अभिशंसनम् अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः- अभूइभाव] अभिशंसनम् - अमदध्यारोपण, अभ्याख्यानं च । आव० अभिसेओ-अभिषेक -सूत्रार्थतदुभयोपेत आंचार्यपदस्थाप- ८२१ । नाई । व्य० प्र० १४१ आ। जीवा० -२७६ । अभिसंधारिजा-अभिसन्धारेयत् , पर्यालोचयेत् । आचा० अभिसेक्कभंडे-अभिषेकभाण्डम् , अभिषेकोपस्करः । जीवा. ३२९ । अभिसन्धि-आलोचनम् । प्रज्ञा० ५०० । अभिसेग-अभिषेक , अभिषिक्तः । बृ० प्र० १७७ मा। अभिसंभूया-अभिसम्भूता , प्रादुर्भूताः । आचा० ३७६ । अभिसेगपत्ता - अभिषेकप्राप्ता-प्रवर्तिनीपदयोग्या। बृ० अभिसमण्णागए-तभोगापेक्षया । भग. १५९ । गवेष द्वि० २२ आ। ग्रता लब्ध । भग० २२८ । अभिसेगसिलाओ - अभिषेकशिला', तीर्थकराणामभिषे- अभिसमन्नागच्छामि - अभिसमागच्छामि, अभिविधिना कार्था शिला । ठाणा० २२५ । साङ्गत्येन चावगच्छामि-सत्रै परिच्छित्तिप्रकारै परिच्छि- अभिसेजं-अभिशय्या, अभिनिषद्या । व्य० प्र०-१२८ अ । ननि। भग० ७२५ । अभिसेजा-अभिशय्या, द्वितीयवसति । विशे० १३०९ । अभिसमन्नागयं - परिणमयितुमारब्धम् । भग० २२४ । अभिसेय-अभिषेक -उपाध्याय । व्य. द्वि० १६५ भ। उदयाभिमुखीभृतम् । भग० ९० । अभिसमन्वागतम्-उद- अभिसेयसभा-अभिषेकसभा । जीवा० २३६ । याभिमुखीभूतम् । प्रज्ञा० ४०३ । विशेषत परिच्छिन्नम् । | अभिसेयसभा-अभिषेकसभा, यस्या राज्याभिषेकेणाभि- भग. २२३ । षिच्यते । ठाणा० ३५.२ । अभिषेकभवन विमानभाविनी सभा। अभिसमन्नागया-अभिसमन्वागता', अभि-आभिमुख्येन प्रश्न० १३५ । सम्यग्-इष्टानिष्टावधारणतयाऽन्विति-शब्दादिस्वरूपावगमा- अभिहआ-अभिहता , अभिमुखेन हता , चरणेन घट्टिता , त्पश्चादागता ज्ञाता -परिच्छिन्ना यस्य। आचा० १५३ । उत्क्षिप्य क्षिप्ता वा। आव० ५७३ । भोग्यावस्था गता । ठाणा. २४५ । अभिहड - अभ्याहृतम् , स्वग्रामादे साधुनिमित्नमभिमुख- अभिसमन्नागयाइं-अभिविधिना सर्वाणत्यर्थ समन्वा मानीतम् । दश० ११६ । गृहस्थेनानीतं । आचा० ३.२५ । . गतानि-सम्प्राप्त नि । भग० ५६९ । निष्पन्नमेवान्यत समानीतम् । आचा० ३६१) अभ्याहृत्तं-. अभिसमागच्छति-अभिसमागच्छति, साध्यसिद्धौ व्यापा स्वग्रामादिभ्य आहृत्य यद्ददाति । ठाणाः । भग रणत सम्यक् प्राप्नोति । भग० २३९ । - ४६७। अभिसमागम - अभिसमागम , वस्तुपरिच्छेद । ठाणा० अभिहणंति - अभिनन्ति, अभिमुखमागच्छन्तो नन्ति । १७२॥ प्रजा० ५९२। अभिसमेश्चा- आभिमुख्येन सम्यगित्वा-जात्वा । आचा० अभिहणह-आभिमुख्येन हथ । भग० ३८१ । अभिहणिज- अभिहन्यात , पादेन ताडयेत् । आचा० अभिसित्त-अभिषिक्त , दीक्षासस्कृत । दश० २४५ । अभिसेअ-अभिषेक , श्रियोऽभिषेक । आव. १७८ । अभीक्ष्णमवधारकत्वम्-शकितस्याप्यर्थस्यावधारकत्वम् । अभिसेमसिला - अभिषेकशिला, अभिषेकाय-जिनजन्म- प्रश्न 1४४ । स्नात्राय शिला। ज० प्र० ३७१ । अभीति-अभिचि , उदायननृपपुत्र । भग० ६१८ । अभिसे-पवत्तिणी। नि. चू० प्र० १३२ आ अभीयी-अभिजित् , नक्षत्रविशेष । सूर्य० १२९ । अभिसेए-आचार्यपदस्थापनाह', सूत्रार्थतदुभयोपेत. । वृ०॥ सूत्रार्थतदुभयोपेत. । बृ०॥ अभीरू-सत्त्वसम्पन्न । ओघ० २०२ । द्वि० २८३ आ। अभु(भुजियमरणं-परिण्णादि । नि० चू० प्र० २६३ आ। अभिसेएण-अभिषेकेण,शुकशोणितनिषेकादिकमेणेति। आचा. अभुत्त-अभुक्त, य कुमार एवं प्रव्रजित । ओघ० ९१ अभूइमाव-अभूतिभात्र , अमम्पदाव । दश० २४३। ४२८ । । - (८२) [ अभूषणं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अमम्मणा] अभूपणं-अभूतेन, असद्भुतेन । सम० ५२ । अमच्छरी-अमत्सरी, परगुणग्राही। प्रश्न० ७४ । अभूतोद्भावनम् यथा सर्वगत आत्मा । ठाणा० २६ । अमण-अवसानम्। विशे० १३०७ । अभूतिभावो-विणामभावो । दश० चू० १३१ । अमणाम-अमनोऽमम् , न मनसा अन्त सगम्यन्ते, पुन अमेज-अभिध्या, रौद्रध्यानम् । प्रश्न. ४२ । पुन. स्मरणगम्यम् । भग० ७२ । अमेजलोभो - अभिध्यालोभः, रौद्रध्यानान्विता मू । अमणामत्ता-अमनोऽम्यता, अमनोगम्यता। भग० २३ । प्रश्न. ४२॥ अभैत्सुः-कणिकाकार कुर्यु. । आचा० ३४३ । न मनसा अम्यते-गम्यते सस्मरणतोऽमनोऽम्यस्तद्धा. अभ्यंतरंतप-सवरनिर्जराद्वारा निर्वाणप्रापकं । तत्त्वा०९-४६ ॥ वस्तत्ता, प्राप्तुमवाञ्छितत्वम् । भग० २५३ । भोज्यतया मन आग्नुवन्तीति मनापाः प्राकृतत्वाच्च पकारस्य मका. अभ्यन्तरशम्बूका - यस्या क्षेत्रमध्यभागाच्छचवृत्तया रत्वे मणाम इति सूत्रे निर्देश , न मनापा अमनपा । परिभ्रमणभङ्गया भिक्षा गृहन क्षेत्रबहिर्भागमागच्छति । वृ० प्रज्ञा० ५०४। प्र० २५७ अ। अभ्यन्तरान्-अवगाहक्षेत्रम्थान् । ठाणा० २८४ । अमणुण्ण-अमनोज्ञम् , न मनसाः-अन्त.सवेदनेन शुभतया अभ्यन्तरानिर्वृति-वाद्यनिर्वृते खगधारासमानाया स्वच्छ- ज्ञायन्ते । भग० ७२। अमनोज्ञ -रटनशील। ओघ. तरपुलसमूहात्मिका । प्रज्ञा० २९४ । १५३ । अमनोज्ञ-असविमः । ओघ १२० । अभ्यस्तः-जित उचितो वा। आव० ५९४ । अमणुण्णसंपओगसंपउत्ते- अमनोजसम्प्रयोगसम्प्रयुक्त.- अभ्यस्तम्-कृत, निर्वतितम् । आव० ५९३ । अमनोज्ञ -अनिष्टो य शब्दादिन्तस्य यः सप्रयोगो-योगम्तेन अभ्यागत-अतिथिः । उत्त० ३८१ । सप्रयुको य स। औप० ४३ । अभ्यासगुणे-(अब्भामगुणे ), भोजनादिविषय | आचा. अमणुण्णा-असाम्भोगिका । वृ. वि. १८ आ। ८६ । अमणुन्नत्ता-अमनोज्ञता, न मनोज्ञा अमनोज्ञा., विपाककाले अभ्यासराशि-गुणकार । सम० ९१ । दु खजनकतया न मन प्रह्लादहेतु । प्रज्ञा० ५०४ । न मनमा अभ्युद्यतविहारेण-जिनकल्पादिना । बृ० प्र० २१० आ। ज्ञायते सुन्दरता। भग. ३५३ । कथयाऽप्यमनोरमतया। अमंडलिउवजीचों-अमण्डल्युपजीवकः-तत्र योऽमण्टल्युप भग० २३। जीवकः स साधुर्मुरुसगास गत्वा तमेव गुरुं भगति-यथा अमणुन्ने - अमनोज्ञो-न कश्रित प्रतिभाति रटनशीलत्वात्त है आचार्या ! सदिगत-ददत यूयमिद भोजन प्राधूर्णक तश्चकाकी हिण्डते। ओघ० १५० । सर्वेपामा यनिष्ट । वृ० क्षपक-अतरन्तवालवृद्धशिक्षकेभ्य -साधुभ्य इति । ओघ० प्र० २६६ अ॥ अमणो-अमनस्क , मनोरहित -सम्मईज । ओघ० २.१। अमंथरम्-अविलम्बितम् । ओघ० १८७ । अमत-अमृतम्-क्षीरोदविजलम्। जीवा० २१० । अमओ-अमय , न किम्मयोऽपि । दश० १२३ । अमम-अममः, ममकाररहित । भग० २७६ । द्वादशोऽर्हन । अमग्गो-अमार्ग , मिथ्यात्वादि. । आव० ७६२ । ठाणा. ४३४ । जातिवाचक शब्द । ज० प्र० १२८, अमच-अमात्य , राज्याधिष्टानक । भग० ३१८ मचिव । ३१३ । भरते व मनुष्य मेदविशेष । ज० प्र० १२८ । दश० १०७॥ अममायमाणे-अममीकुर्वन्-अस्वीकुर्वन् । आचा० १३० अमचा-अमात्या', राज्याधिष्टायका । भग० २६४ । अमचो-अमात्य ।'आव. ११६ । राज्यचिन्तक । प्रना अममे-जिनविशेषनाम । सम० १५३ । शतद्वारे द्वादयोऽहन । ७९, ९६। राज्याधिष्ठायकः । औप. १४ । राजमन्त्री । १६। अमम , पगितितमो मुहर्त्त । . वृ० तृ. ३३ अ । यो राज्ञोऽपि शिक्षा प्रयच्छति यो। प्र. ४९1। मुहूर्तनामविशेप. । सूर्य० १४६ । व्य. प्र० १६९ आ। उत्त० ३८० | अमम्मणा-अनपखन्यमानना । औप० ७८ । १७८ । । अन्त. (८२) [ अमयं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अमुणी] ४४७ । १७४ । १४४ । प्रश्न० ८४ । अमयं-अमतं, अशोभन मतम् , नास्तिकादिदर्शनम् , | अमिअतित्तो - अमृततृप्त , आवाधारहितत्वात्। आव० अमृत वा, अमृतमिवामृत, आत्मनि परमानन्दोत्पादकतया धनम् । उत्त० २०६ । अमृतस्य-क्षीरोदधिजलस्य। ज. अमिए-अमित , भवनपतीन्द्रविशेष.। जीवा० १७० । प्र० ५५ । अमिजं -(अमेयं), विक्रयप्रतिषेधादेवाविद्यमानमातव्या, अवि. अमयघोसो-चडवेगच्छिन्नो मुनि । ( स०) द्यमानमाया वा। भग० ५४४ । अमयमेहे - अमृतमेधा-यथार्थनामा महामेघ । जं० प्र० | अमितकौतुका:-( कोउगामिगा), कौतुकान्मृगा इव मृगा अज्ञत्वात्प्राकृतत्वादमितकौतुका । उत्त० ५०१ । अमयरसरसोवमं-अमृतरसरमोपमम् , परमानम् । आव० अमितगति-मवनपतीन्द्रविशेषः । ठाणा० २०५ । अमितवाहणे-उत्तरदिग्वर्ती वायुकुमारेन्द्र ।ठाणा० ८४ | अमर-अमर -देव । आव० ६०। मयूर , अमरो वा। अमितवाहन-भवनपतीन्द्रविशेषः । ठाणा० २०५।- अमिनसेणे-भरतेऽतीतोत्सर्पिणीकुलकर । ठाणा० ५१८ । अमरकट्टा-घातकीखंडपूर्वभरते पद्मनाभराजधानी।प्रश्न० ८७ अमित्रक्रिया-यन्मातापितृस्वजनादीनामल्पेऽप्यपराधे तीव्र- अमरवइ-अमरपति -इन्द्र । भग० १५८ । दण्डस्य दहनाकनताडनादिकस्य करणम् । ठाणा० ३१६ । अमरसोवम-आम्ररसोपमम् । नि० चू० प्र० ३४७ अ । अमियं-अमृत्तम् , अमितम् , मृष्टा पथ्यां वा, सार्थिका अमरिसं-अमर्ष , असहिष्णुता। दश० ३८ । अपरिमितम् । आव० ५९५ । अमितम् , अनेकभवोपात्त- अमरिसणा - अमसणाः, प्रयोजनेष्वनलसा अमर्षणा वा, मनन्तम् । आव० ६१० । अमित -प्रमाणाभ्यधिक । ओघ० अपराधेष्वपि कृतक्षमा । मम० १५७ । अमर्षगा, अपराधा- १४२ । अमित -दिक्कुमाराणामधिपतिः । प्रज्ञा० सहिष्णव अममृणा वा कार्येष्वनलमा । प्रश्न. ७४ । ( अमित ), अष्टमो दक्षिणनिकायेन्द्र । भग० १५७ । अमियगती-वायुकुमारेन्द्रविशेष । ठाणा० ८४ । अमरिसिओ-अमर्षित , । आव० ५६५ । अमर्प -मत्सर- अमियणाणि-अमितज्ञानी, जिन. । सम० १५३ । विशेष । आव० २४१ । भमियवाहण-अमितवाहन, भवनपतीन्द्रविशेष । जीवा० भमरिसो-अमर्ष , अत्यन्ताभिनिवेश । उत्त० ६५६ । अमर्षाधमात:-मत्मरपुरित । आव० २४१ । अमियवाहणे-अमितवाहन , दिकुमाराणामधिपति । प्रशा० अमला-कदेवेन्द्रस्याप्रमहिषीनाम । जं० प्र० १५९ । भग० ९४ । उत्तरनिकाये अष्टम इन्द्र । भग० १५७ । ५०५ । दक्षिणपश्चिमरतिकरपर्वतस्य पूर्वस्या भूताराजधा- अमिल-अमिलम् , ऊर्णावस्नम् । दश० १९३ ॥ न्यधिष्ठात्री, शरदेवेन्द्रस्य प्रथमाऽग्रमहिषी । जीवा० ३६५। अमिला-उरभ्रा । ओघ० १३५। उन्निया। दश. चू० अमलाते-गकस्याप्रमहिण्या राजधानी वेशेष । ठाणा० २३१ । ९२ । वस्त्रागि। नि० चू० प्र० १४४ आ । रोमेसु कया। अमाइ-अमायी, य शाठयेन शिष्यान वाहयेत् म । दश०५। नि. चु० प्र० २५५ अ । नमिजिनप्रवर्तिनीनाम । मम० अमाघाओ-अमाघात , अमारि , अहिंसायान्त्रिपञ्चाशत्तम १५२ । अम्लान (अव्यादि)। ठाणा० ३४० । अमिलाणि--महाधनमूल्यानि वस्त्रागि। आचा० ३९३ । अमात्यः-राजमन्त्री । आव० ५५। अमात्य । ठाणा०१५५॥ अमिलाया-अम्लाना (त०)। अमायपुत्ते-अमातापुत्र -रौद्रे नगरविनाशे स्वस्वजीवितर- अमिलियं-अमिलितम् । विशे० ४०६ । क्षगाक्षगिकतया यत्र माता पुत्रं न स्मरति | बृ० प्र० अमुगिश्वगं-अमुकदेशोद्भवम् । बं० प्र० ९८ आ। ३०४ अ। अमुच्छ-(अमूर्छा) उपधावसरक्षणानुवन्ध । भग० ९७॥ अमावासासंगुणं-अमावास्यासगुणम् , याममावास्या ज्ञातु- अमुणिओ-अमुनय , गृहस्थाः । आचा० १५२ । मिच्छसि तत्मड्वयया गुणितम् । सूर्य११३ । अमुणी-अमुनय , मिथ्याटष्टय । आचा० १५२ । १७१ । - नाम । प्रश्न० ९९ । . (८३) [ अमुत्ती आचार्यश्रीमानन्दसागरसूरिसङ्कलितः अयपुले] नाम । प्रश्न. ९२ । १६१। अमुत्ती- अमुक्तिः, सलोभता, परिग्रहस्य पविशतितमं मिद्धशिलानाम । (दे०)। सूर्यविम्वस्याधःकदाचिदुपलभ्यमा- नशकटोद्धिसस्थिता श्यामादिरेखा । जीवा० २८३ । अमुय-अस्मृतम् , मनोऽपेक्षया अस्मृतम् । भग० १९७। अमोहे-अमोह , वैश्रमणस्य पुत्रस्थानीयो देव । भग० अमुह-अमुख, निरुत्तरम् । व्य० द्वि० १६० अ। २००। ग्रेवेयकविमानप्रस्तटनामविशेष । ठाणा० ४५३ । अमुहा-अमुखा, निर्वाच. । भग० ३७६ । अमोहो-अमोघ । उत्त० ४०३ । अमोघ., आदित्यकिरण- अमूढ-अमृढः, भविप्लुत । दश२६६ । विकारजनित मादित्योदगमनास्तमयने आताम्र कृष्णश्यामो अमूढदिट्ठी-अमूढदृष्टिः, बालतपस्वितपोविद्यातिशयदर्शनैर्न वा शकटोर्द्धिसस्थितो दण्ड , यूपक । यूपक । आव० ७३६ । मूढा स्वभावाचलिता दृष्टि.-सम्यग्दर्शनरूपा यस्यामावमूढ अमोह , शाहजनीनगर्यां देवरमणोद्याने यक्ष. । विपा० ६५॥ दृष्टि । प्रजा० ५६ । अचलितसम्यग्दृष्टिः । दश० १०२ ॥ अम्मड-(अम्मड.), परिबाजक । भग० ६५३ । ऋद्धिमत्कुतीर्थिकदर्शनेऽप्यनवगीतमेवास्मद्दर्शन मिति मोह- अम्मधाई-धात्री। उत्त० ३३१ । विरहिता सा चासौ दृष्टिश्च-बुद्धिरूपा । उत्त० ५६७ । अम्मया-अम्बा, पुरुषसिंहवासुदेवमाता । आव० १६२ । अमूढलक्खो - अमृढलक्ष , सर्वज्ञेयाविपरीतवेत्ता । आव० अम्बा। आव० ८१६ । अम्माहिती- पञ्चमवासुदेवमाता। सम० १५२ । व्य. अमृतरसा-वापीनाम । ज० प्र० ३७१ । प्र. १८० आ। अमेझं-अमेध्यम् । आव० २१३ । अम्मि(भि)ओ-अभ्यागत.। आव० ५६० । अमोसलिं-न विद्यते' मोसली यत्र तटमोसलि। ठाणा० । अम्मो-अम्बा। आव. २७२ ) अम्मोगइया अहंपूर्विका । आव० २९३ । अमोह-अमोघम् , अन्तरिक्षम् । सूत्र० ३१८ । अवन्ध्यम्। । अम्मोगतिया:-अभिमुख । आव० ३०० । दश० २३३ । जूवगो। नि० ऋ० तृ. ७०आ। अम्ल -(अत्रिले), आश्रवणक्लेदनकृत् । ठाणा० २६ । अम्लम्- अमोहदंसणं-अमोघदर्शनम् , पुरिमनाले उद्यानम् । विपा० : (अबिलं), कालिकम् । ठाणा० ४९२। रसविशेष । प्रज्ञा०४७३ । | अम्लवेतस-अम्लरमपरिणता । प्रजा. १० । अमोहदंसि-अमोहदी, योऽमोह-यथावत्पश्यति । दश० : अम्हएहिं-अस्मदीयम् । आव० ८१३ । अम्हश्चयं-अरमदीयम् , अस्मत्सम्बन्धि । दश० ११० । अमोहदंसी - अमोघदर्शी, पुरिमतालनगरेऽमोघदर्शनीद्याने ) अम्हच्चय-अम्माकीन । आव २९५। यक्ष । विपा० ५५ । अम्हे-अम्माकम् । प३० २८-४६ । अमोहपहारी - अमोघप्रहारी, जितशत्रो गज्ञो रथिक ।। अयं-अय, प्रत्यक्षगोचरीभत ममारी। आचा० १६३ । इटफल, कर्म । जीवा. १२। लोहं। भग ६९७ । इट- अमोहरहो-अमोघरथ., जितशत्रो राजो रथिक । उत्त० : फलम् । भग, ४ । अयंतिय-अयन्त्रित , अनियमित । उत्त० ४७८ । अमोहम्मत्थ-अमोघशस्त्रम् । आव० ४०७ । अयंते-( अइत), पुन कायिका व्युत्मज्य वमति प्रविगत । अमोहा- अमोघा, पूर्वदिग्भागञ्जन पर्वतस्य दक्षिणस्या दिगि । ओघ० ८१ । पुष्करिणीविशेष. 1 जीवा० ३६४ 1 ठाणा० २३० । अनि । अयंपिर-अजत्पनशीला, नोच्चलमविलग्ना । दश० २३६ । फला, जम्ब्बा सुदर्शनाया द्वितीयं नाम । जीवा० २९९ ।। अयंपुले - वरुणस्य पुत्रस्थानीयो देव । भग० सफला। ज० प्र० ३३६। अमोघाः, आदित्योदयास्तमय मत्स्यवन्धविशेष । विपा० ८१ गोगालकश्रावक । मग० योगदित्यकिरणविकारजनिता दण्डाः । १९६ । उत्त०१४। भग ६८० 1 (८४) [ अयंवुले अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः अरइकम्मं ] . ४६८। दश० अयंबुले-आजीवकोपामकविशेष । भग० ३७० । स्वाभाविकप्रायोगिकचलनहेत्वभावात् । सम० ५। अय-अय', लोहः। प्रज्ञा० २७ । पृथिवीमेद । आचा० २९। अयवीही-अजवीथी, शुकमहाग्रहस्य सप्तमी.वीथी। ठाणा । अयआकरो-लोहाकरः, यत्र लोहं ध्मायते । ठाणा० ४१९ । अयकक्करभोई - अजकर्करभोजी, अज'-छागस्तस्य कर्कर- | अयशःकीर्तिनाम-( अजसोकित्तिणाम ), यदुदयवशात् यच्चनकवद्भक्ष्यमाणं कर्कररायते तच्चेह प्रस्तावान्मेदोदन्तुरम- मध्यस्थस्यापि जनस्याप्रशस्यो भवति तद् । प्रज्ञा० ४७५ । तिपक्क वा मास तदोजी वा । उत्त० २७४ । अयशोभयम्-अश्लाघाभयम् । आव० ६४६ । अयकरए-अजकरक , ग्रहविशेष । ठाणा० ७८ । जं० प्र० अयसि-अतसी, धान्यविशेष । १९३ । भग० ५३४ । ८०२, ८०३ । भङ्गी, धान्यविशेष । भग० २७४ । अतसी- अयकोटुंसि-लोहप्रतापनार्थे कुशूले। भग० ६९७ । पुष्पम् । उत्त० ४६० । कुसुंभिआ । ओघ० १४६ । अयकोट्ठसंठितो-अय.कोष्ठसस्थित , अय कोष्ठ , लोहमय, अयसिकुसुम-अतसीकुसुमम् , । प्रज्ञा० ३६० । कोष्ठस्तद्वत्सस्थिता । जीवा० १०५। श्रयसिवणं-अतसीवनम् । आव० १८६ । अयगरा-अजगरा , उर परिसर्पमेदविशेषाः । प्रज्ञा० ४५ । अयसिवणे-( अतसीवनम् )। भग० ३६ । अयसी-औषधिविशेष । प्रज्ञा० ३३ | धान्यविशेषः । उत्त. अयगरो-अजगर , उर परिमर्पविशेष । जीवा० ३९ । अयगोलो-वालो गिद्धम्मो वा। नि० चू० प्र० ६२ अ । ६५३ । अयणं-अयनं, त्रय ऋतव । जीवा० ३४४ । सूर्य० ९१॥ अया-द्विखुरविशेष । प्रजा० ४५ । अतन-सातत्यभवनप्रवृत्त । विशे० १३४३ । अयागरं-अयआकर , यस्मिन् निरन्तरं महामूषास्वयोदल प्रक्षिप्याऽय उत्पाटयते सः। जीवा. १२३ । लोहाकर अयणाति-अयनानि-ऋतुत्रयमानानि । ठाणा० ८६ । यत्र लोहं थमायते । भग० १९९ । अयणे-( अयनं ), त्रय ऋनव । भग० ८८८ । अयि-अयि !, कोमलामन्त्रेण प्रयुज्यमान शब्द । दश अयतं-(अजय), अयतनया। ओघ० २१९ । अयथार्थम्-पलाशाभिधानवन । आव० ५१ । | अयोगी-न मन्ति योगा यस्य स, न योगीति वा यो- अयमाणे-आददान , प्रवर्त्तमान । मर्य० १२ । आयान- ऽमावयोगी, शैलेशीकरणव्यवस्थितः । ठाणा० ५० । अयोग्य -( अजोग्गो), अनल , अपचल । नि० ० द्वि. अयमाणे ( अयमीण )-अददान । ज० प्र० ४४२ । अयराइं-अनगणि, सागरोपमाणि । विशे० १२७१ । अयोध्या-दशरथराजधानी। प्रश्न० ८७ । भरतसगरादि- अयरामरं - अजरामरम् , अविद्यमानौ जगमगै यम्मिन चक्रवर्तिना नगर्ग। प्रजा० ३००। कोशला । जं. न. तन । आव० ८।। अयलं-अचल म्वाभाविकप्रायोगिकचलनकियाव्यपोहान ।। अयोमुहा-अयोमुग्त्र , एकादशमान्तरद्वीप । प्रज्ञा० ५० । जीवा० ०५६। अचल -स्वाभाविकप्रायोगिकचलनहेन्व- । अव्यापारोपेक्षा:-मृतकस्वजनीटिभिस्त मस्क्रियमाणमुपेक्ष- भावान निधल। मग. ७ । माणास्तत्रोदामीना । ठाणा० ३५३।" अयलपुरं-अचलपुर, नगरविगेप । उन्न, ९९। पिट. अव्याहतपौर्वापर्यम्-वाण्यतिशयविशेष । मम० ६३ । अरंजर - अरजरम , उदकुम्भो, अलबरम् । ठाणा० २८३, अयलभाया-अचलभ्राता, नवमगणधर । आव. अयले-अचल , प्रथमबलदेव । आव० १५९, १७४ । समः अरइ-अरति , मोहनीयोदयाचित्तोद्वेग । भग० ८०। ८८ । अन्तकृद्दशाना प्रथमवर्गस्य पष्ठाभ्ययनम् । अन्त० १ । अरइकम्मं - अरतिकर्म, यदुदयेन तेष्वेवारतिरुत्पद्यते तन् । अयलो -अनल, उनगिन्या वणिग्दारक । उत्त० २१८॥ ठाणा. ४६९ । आगच्छन् । सम० ९४ । -- -- । २५ आ। - १३६1 ०४०। २०८। (८५) [ अरबमोहणिजं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अरहमित्तो] । - अथवा- अरहमोहणिज-अरतिमोहनीयम्-यदुदयवशात् पुनर्वाधा- ! हारयतीति, अरसो वाऽऽहारो यस्यासावरसाहार । ठाणा. भ्यन्तरेषु वस्तुघु अप्रीतिं करोति तत् । प्रज्ञा० ४६९ । २९८॥ अरइयं-अरतितो जं ण पचति । नि० चू० प्र० १८९ अ । अरसाहि-प्रहरणविशेषै । उत्त० ४६० । अरई - अरति., इटाप्राप्तिविनाशोत्थो मानसो विकार। , अरसिया-अर्शामि । उत्त० १२१ । आचा० १६८ । वातादिजनितश्चित्तोद्वेगः। उत्त० ३३८ । । अरसेहि-अविद्यमानरसैः । भग० ४८४ । अरए-अरजा., प्रहविशेष । जं० प्र० ५३५ । ठाणा० ७९ । अरसो-अरस., हिङ्ग्वादिभिरसंस्कृत । औप० ४० । अरक्खुरी-आरक्षुरीम् , संवेगोदाहरणे मित्रप्रभस्य प्रत्यन्त- अरहंत-अर्हन्त., अशोकाद्यष्टमहाप्रातिहार्यादिरूपा पूजाम- हन्तीति । दश० ६२ । नगरम् । आव० ७१० । अरगंतरं-अरकान्तरम् । आव० ३४४ । अरहतघरं-अर्हद्गृहम् । आव० २९५ । अरगाउत्तासिया-आरकोत्तासिता, अरकैरायुक्ता-अभिवि. अरहंता -अर्हन् , अमरवरविनिर्मिताशोकादिमहाप्रातिहार्य- धिनाऽन्विता भरकायुक्ता, 'सिय'त्ति स्यात्-भवेत् , रूपां पूजामर्हतीति । भग० ३१ अरहोऽन्त -अविद्यमान रह ऽऽरकाउत्तासिता-आस्फालिता यस्यां सा। भग० १५४ । एकान्तदेशोऽन्तो-मध्यं गिरिगुहादीना सर्ववेदितया येषा ते अरघट्टघटीनिवहादिः। उत्त० ५९९ । भग० ३। अरथान्त -अविद्यमानो रथ -स्यन्दन. सकल- अरजा-अरजपू । जं० प्र० ३५७ । परिग्रहोपलक्षणभूत अन्त -विनाशो जराद्युपलक्षणभूतो अरणी-काष्ठविशेष. । प्रज्ञा० २९ । येषा ते । भग० ३ । अरहन्तः क्वचिदप्यासक्तिमगच्छन्त । अरणं-अरण्यम् , काननम् । दश० १४७ । भग० ३ । अरहयन्-प्रकृष्ट रागादिहेतुभूतमनोज्ञेतरविषय- सम्पर्केऽपि वीतरागत्वादिकं स्वं स्वभावमत्यजन् । भग० ३। अरण्णवडिसगं-विमानविशेषः । सम० ३९ । अर्हा-अर्हन्त । आव० ४०६ । प्रजा० ५५। अशोका- अरण्णानी-अरण्यम् । उन० ३८१ । द्यष्टमहाप्रातिहार्यादिपूजामहतीति तीर्थकर । आव० ४८ । अरति - अरतिः, मोहनीयोदयजश्चित्तविकार उद्वेगलक्षण । अर्हत्ता । ठाणा० ३३२ । ठाणा० २६ । अरहंतुवएसो-अहंदुपदेश , आगम । आव० ४५१ । अरते - अरजा, ब्रह्मलोके विमानप्रथमप्रस्तटनाम । ठाणा अरह-अर्हन , अष्टविधमहाप्रातिहार्यम्पपूजायोगान् ठाणा. ३६७ । ४६५। अहं -पूजाई । भग० ६७ । अरय-अरजामि स्वाभाविकरजोरहितत्वात् । सम० १४०। अरहह-अरघटिक । ( आउ० )। अरयं-अरतं, रतस्याभावरूप , अरजो-रजसोऽभावरूप । अरहट्टो-भरघट्टः । ओघ० १५८ । अरस-शृङ्गारादिरसाभावम् । उत्त० ४४८ । अरहण्णए-मुनिविशेष । (मर०)। अरविंद-अरविन्द, प्रत्येकवनस्पतिविशेष । प्रज्ञा० ३७ । अरहण्णओ-महन्नक , ईर्यासमिती यस्य देवतया पाद. जलरुहविशेष. । प्रशा० ३३ । च्छिन्न । आव० ६१६ । अरसं-अरमम् , हिग्वादिभिरसस्कृतम् , प्रश्न. अरहण्णग - तगरायामुष्णाभिहत (मर०)। अहतक , प्रश्न० ६३ । अविद्यमानाहार्यरसम् । हिग्वादिभिरसम्कृत सढव्यवहारकाचार्य । व्य० प्र० २५६ आ । मिति । प्रश्न० १९३ । असपत्तरसम् । दश० चू० ८३ । अरहदत्ता - अर्हद्दना, अप्रतिहतगजकुमारमहाचन्द्रभार्या । असम्प्राप्तरसम् , हिग्वादिभिरसस्कृतम् । दश० १८० । विषा० ९५ अरसजीवी - अरमेन जीवितुं शीलमाजन्मापि यस्य स । अरहन्नओ-अहन्नक | आव० ३८८ । उत्त० ९० । ठाणा. २९६ अरहन्नग-अग्हम्नक , मुनिविशेप । वृ. द्वि० ४९ अ । भरसमेहं-अरसमेघ , अमनोज्ञमेघ. | भग० ३०६ । अरहमित्तो-अहमित्र , आत्मदोपोपसहारविषये द्वारवल्या अरसाहारे - अग्माहारः, अरस-हिग्वादिभिरसस्कृतमा श्रेष्ठिविशेष । आव० ७१४। अईन्मित्र । आव २८८ । , १०६ । (८६) [ अरहया अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशध्दकोषः अरुणवरावभासवरो]. 1 अरहया-अर्हत्ता, तीर्थकरता। आव० २३५ । अरिहंतचेश्य-अर्हच्चैत्यम् , तीर्थकरप्रतिमा। आव० ७८६ । " अरहस्सं - अतीवरहस्यभूतं छेदशास्त्रार्थतत्त्वम् । बृ० तृ• अरिहंता-अरिहन्ता, कर्मारिविनाशक. । भग० ३ । कर्मारि- २६५ आ। हन्ता। भग० ३। अरिहन्तारः, इन्द्रियविषयकषायपरी- अरहसिजा-अर्हच्छत्र्या, अर्हद्भवनम् । व्य० प्र० २५ आ। षहवेदनोपसर्गशम( नाश )का । आव० ४०६ । अरिह- अरहा-देवादिकृतां पूजामर्हन्तीति अर्हन्त , अरहस' अथवा न्तार , रजोहन्तारः। आव. ४०६ । नास्ति रह --प्रच्छन किञ्चिदपि येषां प्रत्यक्षज्ञानित्वात्ते । अरिहमित्तो-अईन्मित्र । उत्त. ९०। ठाणा. १७४। जिन | सम० १५३ । अर्हन्-पूजा. : अरिहा-अर्हाः। आव० ३८७ । महतीति । अरहा , नास्य रहस्यं विद्यत इति वा । उत्त० , अरिहो-अई , अर्घ । प्रश्न० ७६ अरी-अरिः, शत्रु । जीवा० २८० । अरहितं-समपादेनेक्षणं लेष्टुकारोहेण वा साधुसाच्यो परस्परं । अरुअ-अरु व्रणं । बृ. द्वि० ११ भा। अरु.-वणं | बृ० दृष्टिवन्धो वा। बृ० द्वि० १४ अ । तृ० २०८ आ। अरातिः-व्याधि । विशे० ७७९ । अरुगं-अरुक, व्रण'। बृ० द्वि० २५४ भ। अरायाणि-अराजानि, यत्र राजा मृत । आचा० ३७८ । अरुज्झंते-अरुह्यमाणे-एतस्मिन् पात्रके। भोघ० १४५ । अरि-अरि , सामान्यत शत्रः । ज० प्र० १२० । अरुण-अरुण , नन्दीश्वरसमुद्रानन्तरं द्वीपः, तदनन्तरं अरिक्को-अरिन. । ओघ० १९९ । समुद्रोऽपि । प्रज्ञा० ३०७ । सप्तमहाकुष्ठेषु प्रथमभेद । अरिष्टु-अरिष्ठ , पिचुमन्द. वृक्षविशेष । प्रज्ञा० ३१ । आचा० २३५ । अरिट्टनेमि-अरिष्टनेमि । आव. २७३, ५१५ । दश० २५३, ५१५ । दश० : अरुणुत्तरवडिंसगं-ब्रह्मलोककल्पे विमानविशेष । सम० १४ । ३६, ९६ । तीर्थकरविशेष । वृ० प्र० ३० आ । अन्त० अरुणप्पभ-गीतलनाथदीक्षाशिबिका। सम० १५१ । २, ५। ममुद्रविजयमुत । उत्त० ४८९ । ममुद्रविजयस्य , अरुणप्पभो-अरुणप्रभ', चतुर्थोऽनुवेलन्धरनागराज. तस्यै- प्रथम पुत्र । उत्त० ४९६ । वावामपर्वतश्च । जीवा० ३१३। ठाणा० २२६ । अरिट्ठयं-अरिएक, फलविशेष । पज्ञा० ३६० । | अरुणमहावरो-अरुणमहावर., अरुणवरोदे ममुद्रेऽपरा - अरिद्वा-मडवगोत्रस्य नामविशेष । ठाणा० ३९० । धिपतिर्देव. । जीवा० ३६७ । अरिटे-धर्मजिनप्रथमशिष्य । मम० १५२ । अरुणवर-अरुणवर , अरुणसमुद्रानन्तर द्वीप , तदनन्तर अरिणो-अरय , इन्द्रियविषयकषायपरीषहवेदनोपमर्गरूपा । समुद्रोऽपि। प्रजा० ३०७। द्वोपविशेष । ठाणा० २१७ । आव० ४०६। अरुणवरभदो-अरुणवरभद्र , अरुणवरद्वीपे पूर्वार्धाधिप- अरिदमन-अरिदमणो, अभयदानप्राधान्ये वमन्तपुरे राजा। तिव.। जीवा० ३६७॥ मूत्र. १५०। अरुणवरमहाभदो-अरुणवरमहाभद्र , अरुणवरद्वीपेऽप- अरिमर्दन-सवासदृष्टान्त वसन्तपुरे राजा। पिंड. ४८ । रार्धाधिपतिर्देव । जीवा० २६७ । अरिएनगरम्-राममातुलहिरण्यनाभराजधानी । प्रश्न० ८८ । अरुणवरावभासः अरुणवरसमुद्रानन्तरं द्वाप. तदनन्तर अरिष्ठपुरम्-रुधिरराजधानी । प्रश्न० ९० । ममुद्रोऽपि । प्रजा. ३०७ । अरिस-अर्शामि, रोगविशेष । विपा० ४० । नि० चू० प्र० अरुणवरावभासभद्दो-अरुणवरावभासभद्र , अरुणवरा- १८९ अ। नि० चू. हि. ६२ आ । अर्ग ,गुढाकुर।। वभासद्वीपे पूर्वार्दाधिपतिर्देव । जीवा० ३६७ । ज० प्र० १२५ । अरुणवरावभासमहाभहो - अरुणवरावभासमहाभद्रः, अरिहंत-अन्त , अमहन्त.-न रुहन्तीति। दश० ७९ । अरुणवरावभासद्वीपेऽपराधिपतिर्देव, । जीवा० ३६७ । अशोकाद्यष्टमहाप्रातिहार्यादिरूपा पूजामहन्तीति अन्ति - ! अरुणवरावभासवरो- अरुणवरावभासवर , अरुणवरा- धान्तार । आव० ११९। वभायममुद्रे पूर्वार्दाधिपतिर्देव । जीवा० ३६५ । (८७) [ अरुणवरावभासो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अर्थजाता ] । १४ । १०। अरुणवरावभासो- अरुणवरावभामः, अरुणवरोदसमुद्र- अरुवी-अरूपि, अमूर्तम् । भग० १५० । सत्को द्वीप ! जीवा० ३६७ । अरेण-आरत: । आव० २८५ । अरुणवरो-अरुणवर , अरुणोदसमुद्रसत्को द्वीप.। जीवा अरुणोदसमुद्रसत्को द्वीप.। जीवा० । अरो-अर , तीर्थकृचक्रवर्तिविशेष.। उत्त० ४४८ । सप्तम- ३६७। अरुणवरोदे समुद्रे पूर्वार्धाधिपतिर्देवः । जीवा० ३६७ । चकवर्ती। आव० १५९ । सम. १५२। सर्वोत्तमे कुले अरुणवरोप अरुणवरोद., अरुणवरद्वीपमत्क. समुद्र । वृद्धिकरो जायतेऽत , अष्टादशो जिन', यस्मिन् गर्भगत जीवा० ३६७। मात्रा स्वप्ने सर्वरत्नमयोऽतिसुन्दरोऽतिप्रमाणवारको दृष्टो अरुणा-शिखरिपर्वतवासिदेवनाम। ठाणा० ८० । ऽत । आव० ५०५। अरुणाभ-ब्रह्मलोककल्पे विमानविशेष । सम० १४ । अरोगी-अरोगी-रोगविप्रमुक्त । दश० २०५ । अरुणामे-अरुणाभ', रावप्रलापीमते कृष्णपुद्गलविशेष । अरोस-अरोष , चिलातदेशनिवासी म्लेच्छविशेप । प्रश्न सूर्य० २८७। सौधर्मकल्पे विमान. । भग० ५५१ । अरुणावभासो- अरुणावभास', अरुणावभासद्वीपमक अर्कतूलम्-उत्त० ६७७ । प्रज्ञा० अर्गलम्-अधिकम् । उत्त० ६६० । समुद्र । जीवा० ३६७ । अरुणे-प्रहविशेष. । ठाणा० ७९ । अर्गलपाशका-अग्गलपासगागि, यत्रार्गलाऽप्राणि निक्षिपन्त। आचा० ३३७ । अरुणो-अरुण लोकान्तिकदेवविशेष । आव. १३५। अर्गला-( अग्गल ), उपकरणमेद. । आचा० ६० । परिघ । महाकुष्टस्य प्रथमो मेट । प्रश्न० १६१ ग्रहविशेषः । जं० प्र० उत्त० ३११ । ५३५। द्वीपविशेष., यो देवप्रभया पर्वतादिगतवरत्नप्रभ- अर्घति-( अग्घड ), अर्हति । उत्त० ३१६ । या चारुण इति । जीवा० ३६७ । देव । ज० प्र० ३०५। अर्चा- (अच्चे ) लेश्या, शरीर, क्रोधाद्यध्यवमायात्मिका अरुणोए-अरुणोद , अरुणद्वीपसत्क समुद्रः, मुभद्रसुमनो- भद्रदेवाभरणद्युत्याऽरुणम-आरक्तमुद्रक यम्यामो। जीवा० अञ्चि-(अच्ची ), अन्छिन्नमल । ठाणा० ३६ । अचि - मूलप्रतिवद्धा ज्वलनशिवा । उत्त० ६९४ । अरुणोदए-अरुणोदक अन्धकार, तमस्कायस्य नाम । अश्विपा-(अच्चीए), शरीरनिर्गततेजोज्वाला । ठाणा० ४२१ । अर्जितदुःखा-अर्जित- उपार्जित टु ख यैस्ते । उत्त० २६३ । अरुणोद-समुद्रविशेष । ठाणा० २१७ । अर्जुन-नगविशेष । प्रज्ञा० ३ ० । उन० ६९ । जीवा० २६। भरुणोपपात-मृत्रविशेष । वृ० प्र० ६२ आ। अरुणोववाते-अरुणोपपात, इहारुणो नामदेवन्तत्समयनि- अर्जुनसुवर्णकम् ( अज्जुणमुवन्नग ), अर्जुन-शुक्ल तच्च वद्धो ग्रन्थस्तदुपपातहेतु , अभ्ययननाम । ठाणा० ५१३ । तत्सुवर्णकम । उन० ६८५ । अरुयं - अरक्, अविद्यमानरोग । भग० अर्जुनसुवर्णमयी-मर्वात्मना कनकमयी। जं० प्र० ३७३ । व्रण । मृत्र. ९२ । अरुज, शरीरमनसोरभावेनाधिव्यावि- अतिः-( अट्ट), शारीरमानमी पीडा तत्र भवा। आचा हितम् । जीवा० २५६ । अमजम्-अविद्यमानरोग गर्ग रमनगोरभावान । मम. ५। अर्थ-अर्यत-गम्यत, परिन्छिद्यत इति । आव० १• आजा। अरुयं-अम् । आव. ८२० । आव० ६०४ । मिदशब्दपर्याय । ठाणा. २५। अरुह-न रुहोऽरुह अपुनर्भावी । आचा० ०२१॥ अर्थम्-निमित्तम् । उत्त० ४७१ । अरुहंत-अगेन , क्षीणकर्मवीजत्वादनुपजायमान । भग। अर्थकर-( अट्टकर ), मन्त्री, नैमित्तिक । ठाणा ० २४१ । अगेहन , अनुपजायमानः क्षीगकर्मयोजत्वान। भग. ३ । अर्थजाता-(अजाय) अर्थ -कार्यमुत्ववाजनन स्वकीय- अरुहय-अर्हता। विशे० ८६१ परिणत्रादेति यया मा, पतिचौगदिना सुयमाच्चान्यमाने- अपिण:-अमूर्ता । ठाणा. १९ः। त्यर्थम्ता वा। ठाणा. २९ । ज्वाला। आचा० २८४ । भग. २७० । ज० प्र० १३ । ९। अरु १३९ । (८८) [अर्थदण्डः अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अलमत्थु ] . प्र० ४२० । भर्थदण्डः-(अट्ठादंडे ), दण्डयतेऽऽत्माऽन्यो वा प्राणी येन | अर्याक्-अधः । आव० ८२७ । स दण्ड, । ठाणा० ३१६ । भईन्-सातिशयरूपसम्पत्समन्वित.। आचा० ४१२ । अर्थधर्माभ्यासानपेतम्-वाण्यतिशयविशेष । सम० ६३ । भलं-अलम् , अत्यर्थम् । दश० २३८ । अर्थनिर्यापणा - अर्थस्य पूर्वापरसाङ्गत्येन गमनिकेत्यर्थः । भलंकार-अलंकार । नि० चू० प्र० २७६ आ। अलका- ठाणा० ४२३ । अर्थ -सूत्राभिधेय वस्तु तस्य निरिति रान् , वस्त्रादीन् । जं० प्र० १४५ । आव० १८२। भृश यापना-निर्वाहणा पूर्वापरसाप्रत्येन स्वय ज्ञानतोऽन्येषा | अलंकारियसभा-अलङ्कारसभा । जीवा० २३६ । अल- च कथनतो निर्गमना । उत्त० ३९ । कारभवनविमानभाविनी सभा। प्रश्न. १३५ । अर्थपदम् । भग० २०२॥ अलंकारित-अलङ्कारिका, यस्यामलकियते । ठाणा० २५२ । मर्थपदानि-( अट्ठपदा ) अर्थप्रधानानि पदानि। उत्त. अलंकियं-अलङ्कृतम् , उपमादिमिरूपेतम् । सूत्रगुणविशेष । आव० ३७६ । अन्योऽन्यस्फुटशुभस्वरविशेषाणा करणात् । अर्थशास्त्रं-धनुर्वेदादि । बृ० प्र० १३० आ । जं० प्र० ४० । मुकुटादिभिर्विभूषितम् । भग० ११९ । अर्थाशया - पुनरभिनिवेशतोऽन्यथा प्ररूपणादिलक्षणया । काव्यालङ्कारयुक्तम् । ठाणा० ३९७। अन्यान्यस्वरविशे- सम० १३२ । षाणा स्फुटशुभाना करणात् । ठाणा० ३९६ | अलंकृतं । जं. अर्थात्-( अट्ठ), निमित्तात् । उत्त० ४९१ । अर्थाधिकारः-(अत्याहिगारो), शास्त्रीयोपक्रमस्य पञ्चममेद । अलंगारो-अलङ्कार , आभरणम् । जीवा० २४५ । आचा० ३ । ठाणा० ४ । वक्तव्यताविशेष एव, स चैक- अलंदं । नि० चू० द्वि० ९१ आ। त्वविशिष्टात्मादिपदार्थप्ररूपणलक्षण इति । ठाणा० ५। आव० अलंदकं-वंसीमूलम् । बृ० द्वि० १७९ अ । ५६ । अध्ययनसमुदायार्थः । आव० ५८ । अलंधुसा-अलम्बुषा, उत्तररुचकवास्तव्या दिकुमारी। आव० अर्थान्तराभिधानम् - गामश्वमित्याद्यन्यार्थप्रतिपादनम् । १२२ । उत्तररुचकवास्तव्या प्रथमा दिकुमारी महत्तरिका । जं० प्र० ३९१। आव० ५८८। अलकम्-ललाटम् । जीवा० २७३ । अर्थान्तरोक्ति-मृषावादविशेष । ठाणा० २९० । अलकापुरी-अलकापुरी, लौकिकशास्ने धनदपुरी। जं. अर्दवितर्दा-विह्वला। जं० प्र० १७० । प्र० १८१ । वैश्रमणयक्षपुरी। अन्त० ।। अर्द्धचन्द्र-अद्धचद । मम० ३०, १३९ । अलक्का-सविषश्वा । (भक्त०)। अर्द्धतृतीया-अर्द्ध तृतीयं येषा ते । प्रज्ञा० ४७ । अलक्खं-अलक्षम् , गुप्तम् । आव० ४२१ । अर्द्धपेटा-यस्या तु साधु क्षेत्रं पेशवश्चतुरच विभज्य मध्य. अलक्खणया अलक्षणता-असमञ्जसा, अभिधायिता। वर्तीनि गृहाणि मुक्त्वा चतसृण्वपि दिक्षु समश्रेण्या भिक्षा- विशे० २०५। मटति सा पेटा, एवमेव, नवरमईपेटामदृशसस्थानयोटिंग | अलक्खे-अलक्ष्य , वाणारस्या राजा। अन्त० २५ । द्वयमम्बद्धयोहश्रेण्योरत्र पर्यटति । वृ० प्र० २५७ अ । अन्तकृशाना षष्टमवर्गस्य षोडशाभ्ययनम् । अन्त० १८ । अर्द्धभारम्-पलमहस्रात्मकम् । ज० प्र० २५३ । अलत्त-अलक्तक । उत्त० ६५३ । अर्द्धमागधभाषा-भाषाविशेष । ज० प्र० १४ । अलत्तगपहो - जमेत अलत्तगेण पादो रजति तमेत्तो अर्धासन्यासम्-उत्तरासगरूपम् । बृ० प्र० १२५ अ। कद्दमो जमि पहे सो अलत्तगपहो । नि० चू० ७९आ। अर्धापक्रान्ति - ( अड्ढापकतीए), एतदेवार्धापकान्त्या अलत्तगा-रंगविशेष । नि० चू० प्र० १८८ अ । शिशिरे कुर्वन्ति, तत्रार्धस्यासमप्रविभागरूपस्यैकदेशस्य वैका- वैका- अलब्धमध्यमः-गम्भीर । उत्त० ५५४ । दिपदात्मकस्यापक्रमणमवस्थानम् , शेषस्य तु द्वयादिपदम अलमंथु-समयभाषया समर्थोऽभिधीयते । ठाणा० २१६ । शातरूपस्यैकदेशस्योध गमन यस्या रचनाया मा समय अलमत्थु-अलमस्तु, पर्याप्तं भवतु। भग० ६७॥ निषेधो परिभाषया अर्धापक्रान्तिस्च्यते। विशे० ५५८ । भवतु, निषेधक । ठाणा. २१६ । (८९) . [ अलल्ल प्राचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसइलितः अल्लि ] 1 । प्रश्न. ४० । । अलल्ल-अलल्ला, व्यक्ता भाषा । दश६ २३५ । द्वारस्य प्रथम नाम । प्रश्न० २६ । सद्भुतार्थनिहवरूपम् । मलवो-अलप , मौनव्रतिको निष्ठितयोग , गुडिकादियुक्तो प्रश्न. १२१ । अनृतं-अभूतोद्भावनं भूतनिद्रवश्व, सूत्रदोष- वा। सूत्र० ३९३ ॥ विशेष । आव० ३७४ । विशे० ४६४ । शुभफलापेक्षया अलसंडविसयवासी- अलसण्डविषयवासिन', म्लेच्छवि- निष्फल | प्रश्न. २७॥ शेपा । जं० प्र० २२० । अलियवयणे-अलीकवचनम् । ठाणा० ३७० । अलस-अलस , अन्येन सह प्रभूतं पर्यटितुमसमर्थः । ओघ० अलिया-अलिका, पक्षिविशेषः । अनुत्त० ४ । १५० । गण्डलकः । प्रश्न. २४ । अलियाण-अलीकाज्ञ , अलीका आज्ञा-आगमो यस्य म । अलसगे-हस्तपादादिस्तम्भ. श्वयथुर्वा । आवा० ३६२ । अलसा-अलसा', प्रयत्नरहिता । भोघ० २२२ । द्वीन्द्रि- अलिसिंदा-चवलगारा । नि० चू० प्र० १४४ आ। राजीवमेद. 1 उत्त० ६९५ । अलुद्धो-अलुब्ध. । आव० ८५९ । मलाउ-मलाबु, भलावुतुम्बयोलम्वत्ववृत्तत्वकृतमेद.। जं. अलेप-म्रक्षणेन मर्पिषा-घृतेन वमया च निवृत्तो लेपोऽ- प्र० २४४ । अलात-उल्मुकम् । ओघ० १७ । लेपो ज्ञातव्य । बृ० प्र. ८२ आ। अलाउय-अलावुकं । आचा० ४०० । अलेभडो-अस्थिरः, अनाहार । आव० २१२ । अलाते-अलातम् , उल्मुकम् । जीवा० २९, १०७ । प्रज्ञा० अलोए-अलोक.-केवलाकाशरूप । औप० ७९ । २९। ओघ० १७ । ठाणा० ३३६ । दश० १६९ । अलोला-इंदियक्सियणिग्गहकारी, एमणं ण पेल्लेति । नि० अलातद्रव्यम् वकतयाऽवभासमानमेकान्तवाद्यभ्युपगतं चू० प्र० ३३२ आ। वा वस्तु । ठाणा० ४८२ । अलावुकं । ओघ० १४५। अलोलुओ-अपडिवतो । दश० चू० १४० । अलाभ-अलाभ', याचितमिक्षाद्यलाभ., पञ्चदश परीषह । अलोहे-अलोभ , योगसाहेऽष्टमो योग. । आव० ६६४ । स्वल्पलोभ. । जं० प्र० १४८ । आव० ६५७ । अभिलषितविषयाप्राप्तिः । उत्त० ८३ । अलायं-अलातम् , उल्मुकम् । उत्त० ८३ । दश० २२८, अलौकिकत्वम्-अमाधारणम् । दश० १६७ । अल्पगृह भिक्षादः। आचा० ३३६ । १५४। अलायचक्र-अलातचक्र, कालमेदेन दिक्षु भ्रमत् । विशे अल्पझञ्झ-अविद्यमान वाकलह । उत्त० ५८९ । अल्पपरिकर्माणि-यानि क्वचिन्मनाक् तर्णितानि । ओघ ० ९७५। अलाहि-अलम् । आव० ११६, ७.२ । भग ओघ १५९ । । अल्पलेपा-चतुर्थी पिण्डेपणा। आचा० ३५७ । भलिंजरम्-कृप्यम् । दश० २६० । अल्पार्थके- ठाणा० ३३० । अलिंद-कुण्डकम् । ओघ० १६६ । अल्लइ-वृक्षविशेष । भग० ८०३ । अलिंदडिओ-अलिन्दकस्थितः । उत्त• ३५५ । अल्लइकुसुम-अल्लकीकुमुमम् , लोके प्रतीतम् । प्रज्ञा० ३६१। अलिंदाति । नि० चू० प्र० १६२ अ । अलिंदेण-अलिन्देन-कुण्डकेन । ओघ० १६७ । अल्लगं-आईकम् , कन्दविशेष । आव० ८२८ । आद्र आर्टकं अलिंटो-दोषविशेष । बृ० द्वि० ६२ अ । नट इव । व्य. च । आव० ८२८ । अल्लचम्मे । नि० चू० प्र० १९० अ। प्र. १६४ अ। अलिए-अलीकम् , भतनिलवरूपं, असत्यं वा । भग० २.११ अल्लपल्लो-अली, वृश्चिकपुन्छाकृति । विपा. ७१ । अलित्तय-अलिनम् । आचा० ३३ । | अल्लय-आर्द्र (स०) भलिय-अलीकं, मृषावाद' । प्रश्न० ९५ । मि या, अधर्मः . अल्लिउं-अभिद्रोतुम् , आश्रयितुं वा । आव० ४ । ४७०। १३२॥ ज० प्र० ३४॥ (९०) [ अल्लिए अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अवउडगं] ० १५९ । आव० ६९९। ४९। । अल्लिए-आश्रयेत् । (गणि० ) अवंगो-अपाङ्ग, नयनोपान्तम् । जीवा. २०६ । अल्लितो-अर्पित । आव० ४३४ । अवंश-अवन्ध्यं, एकादशपूर्वनाम । ठाणा० १९९ । अल्लियतु-उपसर्तुम् । आव० ६५ । अवझपुर्व-अवन्ध्यपूर्व-यत्र सम्यग्ज्ञानादयोऽध्या -सफला अल्लियतो-आश्रयन् । आव० ४०० । वर्ण्यन्ते तत् , एकादशपूर्वनाम । सम० २६ । अल्लियइ-आश्रयति । आव० ६९५ । अवंतिवद्धण-अवन्तीवर्धन., अज्ञातोदाहरणे प्रद्योतात्मज- अल्लियउ-अलगीत् । आव० १११ । पालकसुतः । आव० ६९९ । अल्लियस्सह-आश्रयत । उत्त० ३९६ । अवंतिसुकुमार-प्राणिन आहारविमोचने दृष्टांत । आचा० अल्लियह - आलीयेताम्- आश्रयताम् । उत्त० ओघळ अवंतिसुकुमालो-अवन्तिमुकुमाल , योगसङ्ग्रहेऽनिश्रितो- मल्लियावं-प्रवेशम् । आव० ३४१ । पधानदृष्टान्ते उज्जयिन्या सुभद्रापुत्र । आव० ६७० । वश- अल्लियावणबंधे-अल्लियावणं-द्रव्यस्य द्रव्यान्तरेण श्लेषादिना कुडंगेऽनशनी (मर०)। शृगालीभक्षितः (भक०)। ऽऽलीनस्य यत्करणं तद्रूपो यो बन्ध स । भग० ३९५ ।। अवंतिसेण - अवन्तीषेण , अज्ञातोदाहरणे धारिणीपुत्रः । अल्लियावो-प्रवेश., आश्रयणम् । उत्त० १४५ । अल्लिविओ-अर्पित । आव० ४२१ । अवंती - देशविशेष । बृ० तृ. २१८ अ । उत्त० अल्लिवेई-अर्पयंति, ददाति । आव० ५६० । अवंतीजणवए - अवन्तीजनपद', देशविशेष. । आव० अल्लीण-आलीनम् , सुश्लिष्टम् । जं० प्र० ५२९ । आलीन मस्तकभित्तो किचिल्लमो न तु टप्परौ । जं० प्र० ११३ । २८९ । उत्त० ४९ । नि० चू० प्र० ६४ आ । मनोवाकायगुप्तावाश्रिती वा, यद्वा अलीनौ-पृथगवस्थानेन अवंतीजणवय-देशविशेष । व्य० प्र० १४९ आ । परस्परमश्लिष्टौ । उत्त० ४९९ । गुरुजनमाश्रितः । अनु. अवंतीसुकुमार-नामविशेषः, उदाहरणविशेष. । वृ० द्वि० शामनेऽपि न गुरुषु द्वेषमापद्यन्ते, अथवा आ-ममन्ता- त्मर्वासु क्रियासु लीना-गुप्ता नोल्वणचेष्टाकारिण । जं० प्र० । अवंतीसुकुमालो-वंशकुडंगेऽनशनी (मर०)। शृगालीभ- ११७ । जीवा० २७८ । गुरुमाश्रित । औप० ८८ । इष- क्षित (भक्त०) लीन. । आव० १९ । आलीन । आव० ६३ । आश्रित । अवंतीसुत-शृगालीभ क्षतो मुनिः । (सं.) ( आउ० ) । आ-ममन्तात् लीना आलीना । व्य. द्वि० । अवंतीसोमालो। नि० चू० प्र० १३७ मा । अव-अपृथक्त्वम् । आव. २७८ । अधः । प्रज्ञा० ५२६ । अल्लेसेहि-अश्लेष । आव० ६३ । उत्त० ५५७ । मर्यादया एतावत्क्षेत्र पश्यन । विशे० ५४ । अवं-( अवाङ्), अधम्तात् । आचा० ६३ । अवइद्धो- अपविद्ध , तोमरादिना सम्यग्विद्ध । प्रश्न अवंगाओ-अपाङ्गा , नयनप्रान्तम् । ज० प्र० '५२ । अवंगुअ-अप्रावृतम् । नि० चू० प्र० २०४ अ । अवइन्नगो-अवकीर्णक । आव० ७१८ । अवंगुदुवारे- भप्रायनहार -कपाटादिभिरस्थगितगृहद्वार । अवउजिअ-अधोऽवनम्य । आचा० ३४४ । औप. १००। अवउज्झत्ति-परित्यज्यते । आव० ७६५ । अवंगुय-अप्रावृतम् , न स्थगयति । बृ० दि. २५ आ, अवउन्मियथोवमाहारो उज्झितस्तोकाहार , उज्झित. वर्मा स्तोक -स्वल्प आहारो यस्य म । आव० ५६८ । अवंगुतमि-उद्घाटिते। वृ० द्वि० २५० आ। अवउडगं - अवकोटनम् , ग्रीवाया पवादभागनयनम् । अवंगुयदुवारो-अप्रावृतद्वार , अप्रावृतं द्वारं येन म , उद् विपा० ५: । अवकोटक , कृमाटिकाया अधोनयनम् । घाटिनहार । मूत्र ३३५। विपा. ४७ । २२४ । ४४० आ। १६४ अ। (९१) [ अवय आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः भषच ] भवए-अवकम् , अनन्तजीववनस्पतिमेद । आचा० ५९ । | अवक्खारणं-अपक्षारणम् , अपशब्दं क्षारायमाणं वचनं, जलरुहविशेष । प्रज्ञा० ३१, ३३ । साधारणबादरवनस्प अपक्षकरणम्-सानिध्याकरणम् । प्रश्न. ४.1 तिकायविशेष । जीवा० २६ । प्रज्ञा० ३४ । साधारणव- अपक्खित्तो-आक्षिप्त' । उत्त० ११७॥ नस्पतिविशेष । प्रज्ञा० ४० । अवगति-बुद्धि.। उत्त० ३९२ । अवपडए-तापिकाहस्तकान् । भग० ५४८ । अवगम-सज्ञा । आचा० १२ । अवोडयचंधणयं - अवमोटनतोऽवकोटनतो , वा पृष्ठदेशे | भवगाढ-अवस्थिताः । ठाणा० ५१४ । वाहुशिरसा संयमनेन, वन्धनं यस्य स । अन्त० १९ । अवगाढगाढ गाढावगाढम् , अतिगाढम् , प्राकृतत्वादेवं भवफंखइ - अवकाक्षति, अपेक्षते, अनुकम्पते । भग० रूपम् । भग० ३७ । १०२१ भवगाढा-आश्रिता । ठाणा० ५२७॥ भवफरिसो-अपकर्षः-अभाव.। प्रश्न० ६२ । अवगाढाअवगाढं - अवगाढावगाढम्-अत्यन्तव्याप्तिदर्श. अवकारं-अपकरणम् , अारोपरिक्षेपः। प्रश्न० ४० । नम् । भग० १५३ । अनकिन्नतो-अवकीर्णकः, करकण्डो प्रथम नाम । उत्त० अवगायति-परिभवति । आचा० १०६ । अवगासो-अवकाश , यद्यस्योत्पत्तिस्थानम् । सूत्र० ३५० । अवकिरति-उत्सृजति । आव० ७७१ । - अवस्थानम् । विशे० ७७१ । गमनादिचेष्टास्थानम् । आव० भवकिरियव्वं-अवकरणीयम् , विक्षेपणीयम् , त्याज्यम् । ८३५। अवस्थानमवतारो। ठाणा० २३७। यहूना प्रश्न० ९६ । विवक्षितद्रव्याणामवस्थानयोग्य क्षेत्रम् । भग० ६०५ । अवकुंडिय-अवगाढ-व्याप्त । (मर०) अवगाहणा-आश्रयभाव । भग० ६०९ । अवस्थानरूपा। अवकुन्जियं-उट्टाए तिरियहुत्तकरण। नि० चू० तृ० ५९ भ । विशे० ८६२ । अवकोडकबंधणं-अनकोटकवन्धनम् , बाहुशिरसा पृष्ठदेश- अवगीत-वामात्रेगापि केनचिदप्यननुवय॑मानः । आचा. वन्धनम्। प्रश्न. १४ । १०६ । अवकोडयं-अवकोटकम् , कोटाया.-प्रीवाया अधोनयनम्। अवगीतम्-निन्दितम् ! भग० ११ । प्रश्न० ५६ । अवगुणंति-अपावृण्वन्ति । भग० ६८३ । अवकंत-अपक्रान्त , सर्वशुभभावेभ्योऽपगत -भ्रष्टः, अप- अवगृहितो-अवगृहित. । आव० ३४४ । कान्त.-अकमनीयः । ठाणा० ३६६ । आव० ५०४ । अव- अवगुण्ठ्यते-लिप्यते। आचा० १४७ । कान्त-अवस्थितः । उत्त० १५६ । अवग्गहो-अवग्रह , अव इति-प्रथमतो, ग्रहणं-परिच्छेद- अवकमाइ-अपकामति, च्यवते । जीवा० ११० । गच्छति । नम् । ठाणा० २८३ । अवष्टम्भ । ओघ० २११ । सामा- जीवा. २४३,३०६, ३२२, ४०० । अपकामति । आव० न्यार्थस्याशेषविशेषनिरपेक्षानिर्देश्यस्य रूपादेरवग्रहणम् । १९६ । अपकाम्यति । उत्त० १५७ । अवकमिज्जा-अपकामेद-गच्छेत् । आचा० ३८५ । अवग्रह-ओगाह, अव्यक्त यथास्वमिन्द्रियविषयाणामालोच- भवनमित्ता-अवक्रम्य, गत्वा । दश० १७८ । नावधारणा । तत्त्वा० १-१५ । अवक्कमेज - अपक्रामेन , अपमर्पत , उत्तमगुणस्थानकाद् अवग्रहावधि-कारणे आपन्ने सयमार्थ यो गृह्यते । ओघ० हीनतरं गच्छेदित्यर्थः । भग० ६४ । २०८ । अवकासे-अपकर्षणं, अवकर्षगं, अप्रकागो वा। भग अवघाटनप्रायश्चित्तं शेषप्रायश्चित्तानि शोधयति । व्य० प्र० ५५२ अपकर्ष । सम० ७१। ९३ आ । भवक्कियं-असक । दश० चू० ११३। | अवघाडो। नि० चू० प्र० १२६ भ। अवक्रम्य-विनिर्गत्य। व्य. प्र. १४६ आ । अवच-जघन्य । सूत्र० १९० । . आव० ९ । -- . (९२) IHA [ अवचए अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अवणेजा ] आव० ४०५ । अवचए-अपचय ,हास', शरीरेभ्य पुद्गलाना विचटनम्। | अवटुं-अपार्द्धम् , अर्धमात्रम् । सूर्य० ३०, १०४ । अर्द्ध- प्रज्ञा० ४३२ । देशतोऽपगम । भग० ५४० । ध्रुवमात्रम् । ओघ० ८६ । भवचयो-अपचय -हीनत्वम् । सूर्य० १६ । अवहुक्खेत्ता-अपार्द्धक्षेत्रम् , अपार्द्ध-समक्षेत्रापेक्षया अर्द्ध- अवचनम्-त्रिविधवचनप्रतिषेध । ठाणा० १४१ । । मेव क्षेत्रम् । ठाणा० ३६७ । अवड्डखेत्तं-अपार्द्धक्षेत्रम् , अर्धमात्रक्षेत्रम् । सूर्य. १०४ । अवचुल्लकम् । बृ० प्र० २९८ आ । पञ्चदशमुहूर्त्तभोग्य नक्षत्र अभिचिर्वा, पञ्चदशमुहूर्तभोग्यानि अवचूल-अवचूलम् । भग० ३१८ । अवच्चलेणसारक्खणा - अपत्यलयनसरक्षणा । भरणी आर्द्रा अश्लेषा स्वातियेष्ठा च । बृ० तृ. १४८ आ। अवडगोलावलिच्छाया-अपार्द्धगोलावलिच्छाया, गोला. अवच्चे-अपत्ये । आव० १९९ । नामावलि!लावलिम्तस्या छाया गोलावलिच्छाया अपा- भवच्छेए-अवच्छेद , देश । ठाणा० भया -अपार्द्धमात्राया गोलावले छाया। सूर्य० ९५ । अवजाते-अपजात --अप-हीन , जातोऽपजात , पितु सका- अवड्डचंदो-अपार्धचद्र -अर्धचंद्र । वृ० प्र० १०९ अ। शादीपद्धीनगुण । ठाणा० १८४ । अवह्ववाविसंठित-अपार्द्धवापीसस्थित । सूर्य० , १३० । अवजं-अवद्यम् , पापं । विशे० १३१७ । आव० ३६४ ! अवड्ढा-अपार्द्धा । ठाणा० १४९ । अवजपडिच्छन्नो - अवद्यप्रतिच्छन्न , पापप्रच्छादित । पापप्रच्छादित । अवडो-अर्द्ध । नि० चू० प्र० १४२ आ । आव० ५३७ । अवहोमोअरिआ-उपाविमोदरिका, द्वात्रिंशतोऽर्द्ध षोडश, अवजभीरू-अवद्यभीरु , साधु । ओघ० २२४ । एवं च द्वादशानामर्द्धसमीपवर्तित्वादुपार्ड्सवमोदरिका द्वाद- अवज्जुत्तं-पृथग्भूतम् । आव० ७५८ । शभिरिति । औप० ३८ । भग० २९२ । अवज्झा-अवध्या, गन्धिलविजयराजधानी। ज० प्र० ३५७। अवणए-अपनय -पूजासत्कारादेरपनयनम् । ठाणा० ४१८ । अवज्झाओ। ठाणा० ८० । अवणयं-एकान्ते स्थापनम् । बृ० द्वि० २६३ अ । अवज्झाणायरिए - अपभ्यानाचरित , अप्रशस्तभ्यानाच अवणिजंतु-अपनीयन्ताम् । आव० ४३६ । रित । आव० ८३० । अवणितमूलो-अपनीतमूलः, अपनीतमूलंत्रिभाग , त्रिभा- अवटिए-अवस्थित , नित्य । भग० ७६० । एवमुभयरूप- गनिर्वाटितवाट , ऊर्ध्वमागादपि त्रिभागहीन इति । जीवा० ३३३ । निश्चलत्वात्। ठाणा० ३३३ । अवस्थितानि-शाश्वतानि । ठाणा० १४६। अवधे पञ्चममेद । अवणीओवणीयवयणं - अपनीतोपनीतवचनम् , यन्नि- प्रजा. ५४३ । आव ० २८ । न्दित्वा प्रगमति । प्रज्ञा० २६७ । अवट्ठिय-अवस्थित , स्थितम् । भग० ११९ । अवद्धिष्णु। अवणीयं-अपनीतम् , स्थानान्तरस्थापित निराकृतगुणं वा । जीवा० २७२। अवस्थिता-स्वप्रमाणावस्थिता। जीवा० ९९ । स्वप्रमाणेऽवस्थिता मानुयोत्तरपर्वताद्वहि ममुद्रवन। अवणीयवयणं-अपनीतवचनम् , निन्दावचनम् । प्रज्ञा. २६७ । गुणापनयनरूपम् । प्रश्न० ११८ । निंदावचनम् । अवट्ठिया कप्पा -अवस्थिता करपा -सामायिकमाधूनाम- आचा० ३८७॥ वश्यंभ विन । ठाणा० ३७४ । अवणीयोवणीयवयणं - अपनीतोपनीतवचनम् , यत्रैक अवडिसगभूयं - अवतसकभृतम् , शेखरकल्पम् , प्रधान गुणमपनीय गुणान्तरमुपनीयते। प्रश्न० ११८ । अरूपवती मित्यर्थ। प्रश्न० १३७ ॥ स्त्री किन्नु मवृत्ता । आचा० ३८७ । अवडेंसग-अवतमक , शेखरक । भग० ३२२ । अवणेति-महामगि प्रकागयति । नि० चू० प्र० ११६ आ। अवई -कृकाटिकाम् । भग० ६७९ । अवणेजा-अपनयेत् , परित्यजेत् । दा. १५६। तया। ठाणा. ३५५ । औप० ३९ । है ज० प्र० २७ । (९३) [ अवष्ण आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अवभासियं] ७१०। अवण्ण-अवर्णः, अवज्ञा वा, अनादरः, वर्णनाया अकर- । अवदू-कृकाटिका । विपा० ७२ । णम्। औप० १०५। अश्लाघात्मकः । उत्त. अवद्दहणा-दम्भनम् । विपा० ४१। निन्दा। आव० १०३ । अवदारं-अपद्वारम् । आव. ३०६ । अवण्हाणं-अपस्नानम् , तथाविधद्रव्यसस्कृतजलेन स्ना- अवद्धगाढलगोलछाया अपार्द्धगाढलगोलच्छाया। सूर्य नम् । विपा० ४१। ९५ । अवतंसो-पुरुषव्याधिनामको रोग । बृ० तृ. २४९ म। अवद्धगोलच्छाया-अपार्द्धगोलच्छाया। सूर्य० ९५ । अवतासण-बाहाहिं अवतासिता। नि० चू० प्र० ११३ । अवद्धगोलपुंजछाया-अपार्द्धगोलपुअच्छाया । सूर्य० ९५ । भयत्त - भप्राप्तम्-अस्पृष्टम् । भग० १२७ । अव्यक्ता, अवद्धचंद-अपकृष्टमर्द्ध चन्द्रस्यापार्द्धचन्द्र । ठाणा० ७१। अष्टानां वर्षाणामधो वाल: । ओघ० १६२। अवद्धजवरासिसंठाणसंठिए - अपार्द्धयवराशिसस्थानस- अवत्तदसणे - अव्यक्तदर्शनः-अव्यक्तं-अस्पष्टं दर्शनं स्थित., अपगतमद्धं यस्य सः, स चामौ यवश्व राशिध अनुभवः । भग० ७०९ । अपार्द्धयवराशी तयोरिव यत्मस्थानं यस्य तेन सस्थित.। अवत्तमय-अव्यक्तमता , सयतासयताधवगमे सदिग्धवुद्धय । जीवा० ३४३ । विशे० ९३३। अवद्धपोरिसी - उपार्द्धपौरुषी, अपगतमद्धं यस्या मा अवत्तव्वं-अवक्तव्यम् । प्रज्ञा० २३४ । यञ्चरमशब्देनाच अपार्दा मा चायौ पौरुषी। सूर्य० ९५ । रमशब्देन वा स्वस्वनिमित्तशून्यतया वक्तुमशक्यं तत् । । अवध-मिथ्यात्वकषायनोकषायलक्षणम् । आव । प्रज्ञा० २३५। अनन्तगुणं । दश. २२१ । अवद्राय-मृत्वा । जीवा० २६२ । अवत्तव्वगसंचिता-अव्यक्तव्यकसचिता--समये समये एक- अवधारियं-तात्पर्यग्रहणतो हृदये विश्रामितं । व्य० प्र० तयोत्पन्ना.। ठाणा० १०५ । २५७ अ॥ अवत्ता - छगणमट्टियाए पाणिएण य । नि० चू० प्र० अवधिकेवली - केवलिद्वितीयमेद । नि० ० द्वि० २३२॥ १३९ आ । अवत्तिता-अव्यक्तिका., अव्यक्तं-अस्फुटं वस्तु अभ्युप- अवधिजिनः-विशिष्टावधिधर. । आव० ५.१ । गमतो विद्यते येषा ते। ठाणा० ४१० । अवधिज्ञानम्-ज्ञानस्य तृतीयमेट । ठाणा० ३३१ । अवसो-मोलसवरिसारेण वयसा । नि० चू० प्र० २९० आ। ' अवधिज्ञानजिना:-विशुद्धावधिज्ञाना । व्य० प्र० ८.१ । अवत्थयं-अपार्थकम् , पौर्वापर्यायोगादप्रतिसम्बद्धार्थ, चतुर्थ अवधीरयेत्-उपेक्षेत । उत्त० ११२ । सूत्रदोषः । आव० ३७४ । असवद्धार्थम् । विशे० ४६४ । । अवधीरित:-परिभूत । आचा० १०६ । अनु० २६१ । अवधूतम्-अवज्ञातम् । ओघ० १५ । अवदारं-अपरम् । आव० ३०६ । अवनं-अवर्णम् , निन्दा । आव० ६६२ । अदलाघामवना । अवदारियं-अवदारितम् , उद्घाटम् । आव० ६४७ । ठाणा० ३६० । अवदाल-पादादिन्यासेऽधोगमनम् । भग० ५४० । अवना-अवज्ञा, परिभव । ओघ. १८६ । अवदालिमओ-अवदारित.। आव० १७५ । अवपंगुरे-अपवृणुयात् , उद्धा येत । दश० १६७ } अवदालिय-अवदालितम् , रविकरैर्विकाशितम्। औप. ' अवपात - पर्वतविशेषा.,.येषु वैमानिका देवा अवपतन्नि १७ । रविकिरणेविकामितम् । जीवा० २७ । मञाना अवपत्य च मनुष्यक्षेत्राटावागन्छन्ति । प्रश्न० ९६ । वदलने-विकमितम् । प्रश्न. ८२ । अवपीलइ-अवपीडयति, जलेन प्लावयति । जीवा० १२ः। अवदाली-अवदारयति-शकटं स्वस्वामिन विनाशयतीत्येवं- अवरोह-अवबोध., मति. । आचा० । शीलः। उत्त० ५४८ । अवभासियं-अपभासितं, दुष्टभाषण, विरूप मापते । व्य. अबदालेइ-अवदालयनि, उत्पाटयति । प्रना. ६०० । 1 - - -- 1- प्र० २० । (९४) - [ अवमंथित अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अवरविदेहकूडे ] भग अवमंथित-अवाङ्मुखीकृत । वृ० प्र० ८० आ। । अवयाणं-तैलविशेष । बृ० द्वि० २२१ मा । अवमः-लघु पर्यायेण । ठाणा० २४२ । अवयानी-अनुश्रोतोगामिनी। व्य० प्र० २५ भा। अवमण्णइ-अवमन्यते, अवज्ञाऽऽस्पदं मन्यते। भवयारो-अवतारः, प्रस्ताव । व्य. दि. २५ मा । १६६। अवयासं-आलिङ्गनम् । ओघ. १६४ । भवमण्णह - उचितप्रतिपत्त्यकरणेन । भग० २१९ । अवयासणं-वृक्षादीनामालिशापनम् । बृ० प्र० २१५ अ। अवमद-अवमद । जं० प्र० १०१। अवयासि-आलिङ्गनम्। वृ० त० २६ । अवमई-अपमर्दम् , उपमर्दनम्। प्रश्न० ३७ । अवयासिजमाणे - अपत्रास्यमान , अप्रयास्यमानो वा। अवमप्रतिजागरणम्-गुणविशेष । आव० ५२४ । औप० १०२। अवमा-हीना। आचा० ३३२ । अवयासित्ता-अवकाश्य । आव० ३५७ । अवमाणणं-अपमाननम् , विनयभ्रश । प्रश्न. ९७ । अन- अवयासेउ-निवारयितुं, निरोद्धम् । आव० ४३८ । भ्युत्थानादिकरणम् । भग० २२७ । मानहरणम् । प्रश्न० ४१ । अवरं-अपरं, पश्चात्कालभावी । आचा० १६७ । अपमानम् , अपूजनम्। औप० ४६ । भवरज्झियाउ - अपराद्धवान् । आव ८३५ । अवमाणो-अपमान , दैन्यम् । प्रश्न० १३८ । अवरकंका-अपरकङ्का, ज्ञातायां षोडशाध्ययनम् आव० अघमानं-हस्तादि। ठाणा० १९८ । ६५३ षष्ठाझे षोडशं ज्ञातम् । उत्त० ६१४ । सम० ३६ । अधमारियं-अपस्मार -अपगत म्मार स्मरणं यम्मात् स अवरगजभो-अपरगर्जभः । आव० ३८७ । अपस्मार , तस्मिन् मति तद् रोगिण सर्वविषया स्मृति अवरज्झइ-अपराध्यति, अपराधमानोति । दश० १९६ । नश्यति । आचा. २३३ । अवरण्हसंखडी दिया गहियं रायो भुत्त, राईभोयणस्स अवमोदर -अवम-ऊनमुदर-जठर यस्य म । ठाणा० वितियभो । नि० चू० द्वि. १५ अ । अवरओ-अवरत , जघन्यत । विशे० ५३० । अचम्मो-अवाम्य । आव० १०१। अवरत्त अपरात्र , अपकृष्टा रात्रि , पश्चिमस्तद्भागः । अवयकाओ-अवपाक्यास्तापिका । भग० ५४८ । भग० १२७ । रत्तीए पच्छिमजामो। दश० चू० १६४ । अवयक्खंत-अपेक्षमाण. ( भना० )। पृष्टतोऽभिमुख निरू- भवरदक्खिणा-अपरदक्षिणा । आव० ६३० । पनयन । ओघ. १२७ । अवरदारिता- अपरद्वारिकानि, अपरस्या दिशि गम्यन्ते अवयक्खमाणस्स-अवकाशनोऽपेक्षमाणस्य था। भग० येषु । ठाणा. ४१४ । अवरद्ध-अपराद्धम् , दप्तम् । उत्त० १४३ । अवयग्गं अन्त , अन्तवाचको देशीवचनोऽयं शब्द । अवरद्धिगा-लूता फोडिआ, तस्यां लूतास्फोटिकायामुत्थि- भग० ३५। अवदनम् -पर्यन्तम् । ठाणा. ४४ । । ताया दाहोपशमार्थमचेतनेन पृथिवीकायेन परिषेकः क्रियते । अवयणं-अवचनम् । आव. ३४३ । ओघ० १३० । मर्पदंशस्तस्मिन परिषेकादि क्रियते । ओघ. अवयव-अवयवाः, प्रतिनाटय । दा ७५। अवयव प्रमाणाङ्गलक्षण । दश. ७७ । अवयवा. तथाविधविचित्र- ७७ । अवयवा. तथाविविचित्र- अवरभू-अवरभु , अधोभ । सूर्य० ४६ । परिणामापेक्षया । ठाणा० ११ । अवररायं-अपररात्रं-राने भवयविद्रव्यता-तथाविधैकपरिणामिता। ठाणा० ११ । अवयवी - अवयवाना तथारूप सझातपरिणामविशेष । अघरविदेहकृडे-अपरविदेहकूटम् , निपधे अटमकूदः । ज. जीवा. ६ प्र० ३०८ । अपरविदेहाधिपकूटम् । जं.प्र. ३७७ । १४८। - । ११०। पाश्चात्य याम । आचा. २१०। (९५) [ अवरविदेहे आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अवगं] ८० । आव० भवरविदेहे-अपरविदेह', मेरोजम्बूद्वीपगत पश्चिमविदेह । अवलंबणवाहा-अवलम्वनवाहा, उभयोरुभयो पार्श्वयो- जं० प्र० ३१० । महाविदेहापरभाग. | ठाणा० ६८ । रवलम्बनाश्रयभूता भित्ति । जीवा० १९८ । निषधे कूटविशेष । ठाणा० ७२ । नीले कूटविशेषः । ठाणा० अवलंवनीयम्-लम्वयितव्यं रज्ज्वादिनिबद्ध हस्तादिना धरणीयम् । भग० ४७ । अवरवीयादो-अपरवीजाप. । आव. ३८७ । अवलंबमाणे - अवलम्बयन् हस्तवस्त्राञ्चलादी गृहीत्वा । अवरा-अपरा। आव० ६३० । ठाणा० ३५३ । अवराइअ-अपराजित , पद्मवलदेवपूर्वभवनाम । आव० अवलंवमाने - अवलम्बमान , पतन्तीं वाह्यादौ गृहीत्वा धारयन् । ठाणा० ३२७ । अवराह-अपराजिता, शङ्खविजये नगरी । जं० प्र० अवलगका-सेवका । भग० ४६४ । ३५७ । अवलगनं-सेवा। आचा० १३२ । अवराओ। ठाणा० अवलद्ध - अपलब्ध न्यक्कारपूर्वकतया । ठाणा० ४६६ । अवराजिआ-अपराजिता, पूर्वदिगुचकवास्तव्या दिकुमारी। ईपलब्ध , अलब्धो वा। प्रश्न. १३८ । आव० १२२ । अवलद्धि-अपलब्धि , अलाभोऽपरिपूर्णलाभो वा। भग० अवराजिया - अपराजिना, उत्तर दिग्भाव्यञ्जनपर्वतस्योत्त १०१ । रस्या पुष्करिणी। जीवा० ३६४ । अवलम्बए - अवलम्बेत-अवष्टम्भादिका क्रिया कुर्यात । अवराह-अपराध , गुरुविनयलधनरूप । आव० ५४१ । आचा० २९३ । अवराहखामणा-अपराधक्षामणा, वन्दनके षष्ठ स्थानम्। अवलिंयाति । ठाणा० ८६ । ५४८ । अवलित-वस्त्र शरीर वा न वलितं कृत तत् । ठागा० ३६१ अवरुडिओ-आलिगित । आव० २७४ । ययाऽऽत्मनो वस्त्रस्य च वलितमिति मोटनं न भवति । अवरुज्जय। आव० ६३८ । उत्त० ५४१ । अवरुत्तरा-अपरोत्तरा। आव० ६३० । अवलियं-अवलितम् । ओघ० १०९ । अवरुद्धो-अवरुद्ध , अन्तर्भूत । विशे० ११६७ । अवलुपण | आचा० ३७८ । अवरेय-अवरेक , रिक्तता। उत्त० ३०५ । अवलहणिया - वामामु कद्दमफेडणी। नि० चू० प्र० अवरेण-अपरेग-जन्मादिना सार्द्धम् । आचा० १६७ । १२४ अ। अवरो-अववादो। नि० चू० तृ० १४६ अ । अवलेखक-मायाया लक्ष गम् । आचा० १७० । अवरोप्परमसंवद्ध-परस्परमसम्बद्ध. । आव० ६३५ । अवलोकनम्-गवाक्ष । बृ० प्र० २०७ अ। अवण्णे - अवर्ण , अश्लावा । अमद्दोषोद्धट्टनम् । ठाणा० अवलोवो- अपलोपः, वस्तुमद्भावप्रच्छादनम् । अधर्मद्वा. २७५ । अयश , सर्वदिगारमिन्यप्रमिद्धि । ठाणा० ४१८ । रस्य त्रिंगत्तमं नाम । प्रश्न. २७ । । अवन्न-अवर्ण अप्रसिद्धमात्रम् । भग० ४८९ । अइलाधा। अवल्गन । आचा० १०६ । ओघ० १२१ । अयग । ओघ० १२५ । अवल्ल-गोणी । आव० ६६५ । अवलंवण - अवलंबिजतित्ति अवलवगं, सो पुग वेतिता अवल्ल खेवा-मविलंबा क्षेपा । नि० चू० द्वि० ७८ अ । मत्तावलंबो वा। नि० चू० प्र० ११९ अ। बाह्वादिमा- । अवल्लगं । ओघ० ३३ । निर्यामका (मर०) । त्रैकदेशग्रहणम् । बृ० तृ० २३० अ। अवतरतामुत्तरताम- अवयं - अववम् , चतुरशीतिरववागमतसहस्रागि। जीवा वलम्बन हेनुभूता । ज० प्र० ४३ । अवलम्बन , अवतर- तामुत्तरता चालम्बने हेतुभूत । जीवा० १९८ ।अवलम्बनं अववंग-अववागम् , चतुरगीतिरडडशतसहस्राणि । जीवा देशे ग्रह्णम् । ठाणा० ३२७ । ३४,। भग० ८८८ । . (९६) [ अववंगाति अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अवा ] गा. ४००। अववंगाति । ठाणा० ८६ । | अवस्कन्दः-शिविर । आचा० १४० । अववरय-अपवरक., गृहान्तर्भागः । दश. ४२ । अवस्थानम्-सस्थिति । सूर्य० ७ । अववाइयं-आपवादिक यद्राव्यक्षेत्राद्यपेक्षम् । उप० मा० अवस्सं-अवश्यम् , नियोगत । आव. २६५ । अवस्सकरणिजं - अवश्यकरणीयम् , अवश्यकरणीयम् , आवश्यकपर्याये अववाओ अपवाद, द्वितीयपदम् । नि० चू० द्वि० द्वितीयनाम । विशे० ४१५ । ९२ अ। अवह-अव्याप्रियमाण । वृ० द्वि० २७ आ। अववाडणं-अवपाटनम् , विदारणम् । भग० १२० । अवहट्टण-त्याग । (मर०) अववाति । ठाणा० ८६ । अवहट्ट - अपहृत्य, त्यक्त्वा । भग० १०० ! परिहृत्य । अववाय-अपवाद , परदूषणाभिधानम् । प्रश्न० ११६ । औप० ० २४ । परित्यज्य । ओघ० ११४ । आहृत्य-निष्कृष्य, अववायसुत्तं-तिण्हमन्नयरागस्स इत्यादि । बृ० प्र० २०१ त्यक्त्वा। आचा० ४०० । आ। नि० चू० तृ० ११ अ । अवहट्टुअसंजमे-अपहृत्यासंयम.-अविधिनोच्चारादीना परि- अववायाववाओ-अववाए पुण अन्नो अववाओ। नि० चू० ष्ठापनतो य स । सम० ३३ । द्वि० ६५ आ। अववायाववातियं । नि० चू० प्र० २२५ आ। अवहट्ठसंजमो - अपहृत्यसयम -प्राणिभि संसक्तं भक्त अवविहे-आजीविकोपासकविशेष भग० ३६९ । पानमथवाऽविशुद्धमुपकरणं पानादि यद्वाऽतिरिक्त भवेत् तत्प- अववे-कालविशेष । भग० २१०, २७५, ८८८ । सूर्य० ९१ । रिष्ठापन विधिना। आव० ६५३ । अवश्रावणम्-आयामम् । ओघ० १३३ । अवहडे-अपहृतम् । भग० २७७ । अवष्टम्भम्-उपग्रह । ओघ० १५४ । उत्त० ५५ । अवहन्न-उदूखलम् । ६० द्वि० ६० अ। अवतब्धा-आक्रान्ता । आचा० २५८ । अवहारइ-अवधार्यते, प्रथमतया स्थाप्यते । सूर्य० ११३ । अवसण्णा-अवमन्ना । ६७५। सग्गूडप्राया. । अवहारवं-अवधारणावान् । ठाणा० ४८४ । ओघ० १५६। अवहाराइ-अपहृतवन्त -गृहीतवन्त । आचा० अवसद्दो-अपशब्द । आव० ४०१ । अवहारो - अपहार , अधर्मद्वारस्य दशमं नाम। प्रश्न अवसरो-अवसर , उपयोगकाल । सत्र० ११। विभाग ४३ । जलचरविशेष । प्रश्न० ६२ । अवधार्य -ध्रुवराशि.। पर्यायः, देश , प्रस्ताव । विशे० ८३७ । सूर्य० ११३ । ज० प्र० ५०७ । . अवसर्पणं । आचा० ३६४ । अवहितचित्तः-एकाग्रमना । उत्त० ५९९ । अवसाणं - अवसानम् । आव० ३८४ । अन्त । प्रज्ञा० । अवहीयं - अपधीकम् , अपमदा-निन्द्या धीर्यस्मिंस्तत् । ३९७ । अधर्मद्वारस्याष्टाविंशतितम नाम। प्रश्न० २६ । वसाय-निश्चय. । प्रश्न० १०४ । अवहीयए-अवधीयते, अवशब्दस्याव्ययत्वेनानेकार्थत्वाटधो- अवसावणं-अवश्रावणम्, कालिकम् । बृ० द्वि० १२९ आ। ऽचोविस्तृत धीयते-परिच्छिद्यते रुपिवस्तु तेन ज्ञानेनेत्य- अवसिओ-अवमित , जित । विशे० ९९४ । । वधि , अथवा अव-मर्यादया एतावत्क्षेत्र पदयन् , एता- अवसिद्धंतो-अपनिद्धान्त । आव० ३२० । वन्ति द्रव्याणि, एतावन्त काल पश्यतीत्यादिपरस्परनिय- अवसोहिय - अवशोध्य, अपमार्य, पृथक् कृत्य, परिहृत्य। मितक्षेत्रादिलक्षणया धीयते-परिच्छिद्यते। विशे० ५४ । उत्त० ३४० । अवहेडयं-अर्द्धशिरोरोगम् । उत्त. १४३ । अवसेसं-अवशेषम् , उद्धरितम् । उत्त० ५९६ । भिक्षा- अवहेडियं-अवहेठितम् , अवेत्यधो, हेठित-बाधित अधो- प्रक्मात्माननियोंगोद्धरितम् , यद्वाऽपगत शेपमपशेषम् । नामितमिति । उत्त० ३६७। उत्त० ५४४। अवाअ-अपाय , उदाहरणस्य प्रथमो मेद । दया १५ आव० - . (९७) [ अवाईण आचार्यश्रीमानन्दसागरसूरिसङ्कलितः अविकडिय] १६८ आ। अवाईण-अवाचीनम् , अधोमुखम् । औप० । अवाती- भवायाणुप्पेहा - अपायानुप्रेक्षा, अपायानुप्रेक्षा, आश्रवाणामपायानामनु- नानि, न वातोपहतानि, न वातेन पातितानि । ज० प्र० प्रेक्षा। ठाणा. १८८ । अवालुयाखिल्ल-अवारितश्लेष्म । (तं०) अवाईणपत्ता-अवाचीनपत्रा , अधोमुखपर्णा , अधोमुख- अवावारे-अव्यापार , इन्द्रियाव्यापार.। आव० ६५२ । पलाशा वा। औप० । भवातीनपत्रा -अवातोपहत. अवाहाणं-देशविशेष । भग० ६८०। बर्हा.। औप० ९। अविंदतो-अलभमान । आव० ५३५ । अवाउड अप्रावृतम् , प्रावरणरहितम् । दश० ११९ । अविंधणं-आव्यधनम् , मन्त्रावेशनम्। प्रश्न० ३८ । अप्रावृता। ओघ. १६७। प्रावरणाभाव. । भग१२५ । अवि-अपि, अपिशब्द पद्यवन्धत्वेन पादपूरणार्थ एवाका- भचाउउप-अप्राकृतक', प्रावरणवर्जक । औप. ४० । न रार्थो वा। जं. प्र. २४५। प्रकारवाची। नि० चू० प्र० विद्यते प्रावरणकम् । ठाणा० २९९ ! अवाउडिय-अप्राकृतिक, सकलां रात्रि यावद् भप्रावरणाभि- अविभ-अपिच, अभ्युच्चये । ओघ० ३६ । प्रहवान् । वृ० द्वि० २९२ अ। अविभत्तो-अव्यक्तः, मुग्ध -महजसद्विवेकविकलः । सन्न अवाए-अवायः, अवधारणात्मको निर्णय । प्रज्ञा० ३१०। अपाय -अवग्रहजानेन ईहितस्यार्थस्य निर्णयरूपो योऽभ्य. अविह-समन्ताद वीचय इव वीचय । उत्त० २३१॥ वसाय। प्रज्ञा० ३१० । अविउट्टमाणो-पीज्यमान । सूत्र. ५१४ । अवाओ - अवाय -प्रान्तार्थविनिश्चय । भग० ३४४ । अविउप्पकड-अविद्वत्प्रकृता, अव्युत्प्रकटा वा न विशेषत ईहार्थविशेषनिश्चय.। आव० ९। उत्-प्रावल्यनश्च प्रकग । भग० ३२५। अपिशब्द सम्भा- अवाघाय - अव्याघात , प्रव्रज्यासूत्रार्थग्रहणादिकयाऽऽनुपू. वनार्थ उत्-प्राबल्येन च प्रकृता-प्रस्तुता प्रकटा वा उत्प्र. ा विपक्त्रिममायुष्कक्षयमनुभवतो यो भवति मोऽव्याघात । , कृतोत्प्रकट वा। भग० ७५३ । आचा० २६२ । अविउस्सिया-अव्युत्सृज्य, अपरित्यज्य। सूत्र• ३९४। अवाच्यप्रदेश.-गुह्यम् । प्रज्ञा० ४३० । अविभोगिओ - अवियोगिक , वियोगासहिष्णु । आव० अवातदंसी-अपायदर्शी । ठाणा० ४८४ । अघातीणपत्तो-अवातीनपत्रः, न वातोपहतं पत्रं, वाते. अविओगो - अवियोग , धनादेरत्य जनम् । परिप्रहस्य नापातित पत्रम् । जीवा. १८७ । पञ्चविंशतितम नाम । प्रश्न० ९२ । भवाते-अपाय:-अनर्थः । ठाणा० २५३ । अविओसित - अव्यवमितम् , अनुपशान्तम् । ठाणा भवादाणे-अपादान -विशेषतो मर्यादया दीयते, खुज्यते, गृह्यते, अवधिमात्रम् । ठाणा० ४२८ । अविकत्थण-अविकत्थन.-न बहुभाषी । दश० ५। अवि- भवाय-अपाय , विवेक. । विशे० ८७३ । कथनम्-हितमितभाषणम् । आचा० । भवायदंसी-आणालोएतस्म पलिउंचतस्म पनिछत्त अकरें । अविकप्पं-अविकल्प , निश्चय । आव० २६४ । तस्स समारे ,जम्मणमरणादीढुलभबोहीयत्तं च परलोगा. अविकलकुल-अविकलकुला., ऋद्धिपरिपूर्णकुला । भग वाए दरिसेति लोगे च ओमामिवादी मो अवायदंसी। ४६९। नि० चूः तृ० १२८ आ। मातिचारस्य पारलौकिकापा. : अविकोविओ-जो वा भणिओ अज्जो! जइ भुज्नो भुज्जो मे यदर्गीति । ठाणा०:४८६ । अपात्यान्-अनर्थान शिष्यचि. विहिमि नो ते छेद मूल वा दाहामो, एमो विकोविदो, एतमि तभङ्गानिर्वाहादीन् दुर्भिक्षदौर्बल्यादिकृतान् पश्यतीत्येशील चेव विवरीता जो य पढमताए पन्छित्तं पडिवज्जति ते सम्यगनालोचनाया वा दुर्लभवोधिकत्वादीन अकोविआ भणति । नि. चू० तृ. १२१ भ । शिष्यम्य दर्शयति । ठाणा० ४२४ । अविकडिय-अविकटित, भग्वडित । न्य. दि. भा। - भपायान (९८) [ अविकयेण अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अविमणे ] २२१ । । अविक्कयेण-अविक्रयेण-भाटकेन । व्य० प्र० २३८ आ। अविण्णाय-अविज्ञातम् , अवध्यपेक्षया अज्ञातम् । भग अविक्किम - असस्कृतम् , मुलभमीदृशमन्यत्रापि । दश० १९७, २००। अवितथभाव-अर्थविनिश्चय । दश० २३५ । अविक्कीवो-आसायमाणो । दश० चू० १२३ । अवितहं - अवितथम् , सत्यम् । आव० ७६१। भग अविकूलं-अपूतिकूलं । (मर०) अविगणिया-अविमता। आव० ६९२ । अवितहमेयं-अवितथमेतत्-न कालान्तरेऽपि विगताभि- अविगियवयणो-अविकृतवदन., नात्यन्तनिर्धाटितमुख. । मतप्रकारम् । भग० ४६७। ओघ. १८२ । अविदलकडाओ-अद्विदलकृता , न द्विदलकृता अद्विदल- अविगीत-अविप्रतिपन्नः। व्य० प्र० १९२ भ! कृताः, अनूलपाटिता । आचा० ३२३ । अविगुह-अवारित। (मर.) अविद्दवंतो-अविद्रवन् । उत्त० २७९ । अविग्गहगइसमावन्नग - भविग्रहगतिसमापन्न , ऋजुग- अविद्धकन्नए-अविद्धकर्णः, अव्युत्पन्नम् । भग० ६७७ । तिक., स्थितो वा। भग० ८५ । विग्रहगतिनिषेवाजु- अविद्धत्थ-अविश्वस्त., प्ररोहसमर्थ । दश० १४० । गतिक अवस्थितश्च । भग० ८७७ । अविद्यमानम्-मासलतयाऽनुपलक्ष्यमाणम् । जीवा० २७१ । अविग्गहमणे-अविग्रहमना , अकलहचेता अव्युग्रहमना भविधिभिन्ने - उर्ध्वफालिरूपा पेश्य कृतं तदृजुकभिनं, वा, अविद्यमानासदभिनिवेश. । प्रश्न० १११ । यत्पुनस्तिर्यक्बृहत्कत्तलिकाकृतं तच्च कलिकाभिन्नमेते द्वे । बृ० अविघाटा-अप्रकटा । व्य० द्वि० २०३ अ । प्र० १७५ अ। अविघुटुं-विक्रोशनमिव यन्न विस्वरम् । ठाणा० ३९६ । अविधो-कुच्छितो। नि० चू० प्र० २७७ अ । विक्रोशनमित्र यद्विस्वरं न भवति तत् । ज० प्र० ४० । अविनेया- ग्रहणधारणविज्ञानेहापोहवियुक्ता महामोहाभि- अविचिंतियं-अविचिन्तितम् , अविवक्षितम् । विशे० ७३ । भूता दुष्टावग्राहिताश्च । तत्त्वा० ७-६ । अविच्युति-धारणामेद. । दश० १२५ । अविपक्कदोसा-कषायेन्द्रियनिग्रहेऽसमर्था, अकोविदा वा। अविजा-अविद्या, न विद्या-मिथ्यात्वोपहतकुत्मितज्ञाना वृ० द्वि० १४१ अ। मिका। उत्त० २६२ । अविपरीतदर्शनः-साम्प्रतेक्षी । सूत्र. ३९४ । अविजापुरिसा- अविद्यापुरषा , अविद्या-मिथ्यात्वोपहत- अविपु(घु)टुं-अविपु(घु)ष्टम् , न विस्वरं क्रोगतीव । जीवा. कुत्सितज्ञानात्मिका तत्प्रधाना पुरुषा अविद्यमाना वा विद्या-प्रभूतश्रुत येषा ते । उत्त० २६२ । अविपकड - अविप्रकटा, आनुकूल्येन प्रकृता-प्रकान्ता, अविक्षोपचितम्-अविज्ञानमविज्ञा तयोपचित, अनाभोग अथवा न विशेषेण प्रकटा अविप्रकटा । भग० ३२५ कृतमिति । सूत्र. ११ । अविप्पणासो-अविप्रणाश , शाश्वत, सिद्धाना नमस्कारा. भविणए-अविनय । आव० ७९३ । हत्वे हेतु । आव० ३८३ । अविणासी- अविनाशी, क्षणापेक्षयाऽपि न निरन्वयना- भविप्पण्णं । नि० चू० द्वि० ३१ आ । धर्मा। दश० १२९ । अविवंधणो- अविवन्धन , अविद्यमानमन्त्रादिनियन्त्रणः। अविणीअप्पा-अविनीतात्मा, भवान्तरेऽकृतविनय । दया. २४९ । विनयरहिता अनात्मज्ञा । दशः २४८ । अविभागा-अविभागाः, अनुभागा । ठाणा० २२२ ॥ भविणीओ- अविनीत., सूत्रार्थदातुर्वन्दनादिविनयरहित । अविभागपलिच्छेदो- अविभागपरिच्छेद , केवलिप्रनाछे ठाणा० १६५ । अविनीता , ये वहुशोऽपि प्रतिनोद्यमाना देनाविभागम् । वृ० तृ. १५ आ । प्रमायन्ति, ते च छन्देऽवर्तमाना भण्यन्ते । वृ० अविमणे - अविमना , न शुन्यचित्तः, अदीनस्य द्वितीय १९४। उत्त० ४७९। प्र० नाम। भन्द० २२॥

[ भविमोत्ति आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अविसारओ] -- २० । .) । अविमोत्ति-अविमुक्ती, गृद्धि । नि० चू० प्र० १५५ अ । अविरयसम्मद्दिट्ठी-अविरतसम्यग्दृष्टि , देशविरतिरहित. अवियं-उच्छिष्टम् । वृ० प्र० २७१ आ। सम्यग्दृष्टि , भूतग्रामस्य चतुर्थ गुणस्थानम् । आव० ६५० । अवियत्तकुलं-जत्थ वहुणावि कालेण भिक्खा न लब्भइ । अविरलं-परस्परासन्नम् । प्रश्न० ८३ । दश० ० ७७ । अविरलपत्तो अविरलपत्र । जीवा० १८७ । अवियद्धो-अविदाध , अतृप्त । (महाप्र०) अविरहिए-अविरहितम्-चूकस्खलितन्यायादपि न विरहित , अवियाई-इत्येवमादीनुद्दिश्य । आचा० ३५३ । अथवा प्रदीर्घकालोपभोग्याहारस्य सकृद्ग्रहणेऽपि भोगोऽनु- अवियाउरी-अप्रसविनी। आव० २१२ । समयं स्यादतो ग्रहणस्यापि सातत्यप्रतिपादनार्थम् । भग० । अवियाणओ- अविजानन् , हिताहितप्राप्तिपरिहारशन्य- अविरहिय-अविरहित , अविमुक्त । आव० ५३२ । मना । आचा० ७० । अवियारं-अपराक्रममप्रभवति काले । ( भक्त० अविरहो-अविरहः, सातत्येनावस्थानम् । आचा० ६९ । अवियार-अविचारम् , चेष्टात्मकविचारविरहितमरणानगन- अविराहणं-अविराधना । भग० ८९८ । अविराहियसंजम-अविराधितसंयम , प्रवज्याकालादार- तप. । उत्त. ६०२ । अविकारा-गीतादिविकाररहिता । झ्याभमचारित्रपरिणाम., मञ्ज्वलनकषायसामर्थ्यात्प्रमत्तगुण- वृ० प्र० ३१० आ। अवियोगज्झवसाणं - अवियोगाभ्यवसानम् , अविप्रयोग- स्थानकसामर्थ्याद्वा स्वत्पमायादिदोषसम्भवेऽप्यनाचरितच रणोपघात । भग० ५० । दृढाध्यवसाय । आव० ५८५ । अविरिका-अविरक्ता, अविभक्तरिक्या । बृ० तृ० २४३ अ । भविरइ-अविरति , इच्छाया अनिवृत्ति । भग १०१ । अविरेकः-रोष । व्य० द्वि० १३७ अ । अविरइय - अविरतिक । आव० २१८, ६२०, ६४०, अविरुद्धो-अविरुद्ध , वैनयिक । औप० ९० । '४०४, ५६० । दश० ८९ । गृहस्थी। ओघ० १९४ । अविलं - लोगपमिद्धं । दश० चू० ६ । गडुलमाकुल वा। अविरए - अविरत , प्राणातिपातादिविरतिरहित', विशेषण सम० ५३। वा तपसि रतो यो न भवति स । भग० ३६ । अविलंबियं-अविलम्बितम् , नातिमन्थरम् । भग० २९४ । अविरओ-अविरत ,न विरत , सावद्यव्यापारादनिवृत्तमना । अमन्थरम् । ओघ० १८७ । अनतिमन्दम् । प्रश्न० ११२ । प्रज्ञा० २६८ । अविवजओ-अविपर्यय । विगे० ६४१ । अविरतओ-अविरत । आव० ३९६ । अविशुद्धकोटि । आचा० २७१ । अविरतकायिकी-कायिकीक्रियाया प्रथमो मेद । मिथ्या- अविवन्न-अविपन्न., अप्राप्तविपत् मन्त्रादिभिरनियन्त्रित । दृष्टेरविरतसम्यग्दृऐश्व उत्क्षेपणादिलक्षणा क्रिया कर्मवन्ध- उत्त० ४७९ । निवन्धना । आव० ६११ । अविसेस-अविशेप , विशेपरहित.। भग० ९६१ । प्रजा० अविरति - अविरति , अब्रह्म। ठाणा० ३७२ । अप्रत्या. ख्यानमथवा अविरतिरूपो भाव , शस्त्रम् । ठाणा० ४९२ । अविसंधि-प्रवाहणाव्यवच्छिन्नम् । भग० ८७१। अव्य- अविरति । आव० ९३ । वन्छिन्नम् । आव० ७६१ । भविरतिया - अविरतिका, न विद्यते विरतिर्यस्या सा । अविसंवावण-अविसवादनम् , पराविप्रतारणम् । उत्त' । ठाणा० ३७२ । अविरतिका। आव. ३९६ । ५९१ ॥ अविरत्ताए-अविरक्तया विप्रियकरणे। भग० ५७९ । अविसंवायणाजोगे-अविमवादनायोग । ठाणा. १९६ । अविरत्तो-अविरक्त । औप० १: । अविसाढी-अविपाटी, चिन्तारहित , अदीनस्य पनम नाम । अविरय-अविरत , अनिवृत्त । प्रभ० ३० । मिल्यादृष्टि अन्त २२ ॥ सम्यग्दृष्ट्रिय। आव ५८८ । अविसारओ-अविशारद । प्रज्ञा. ६० । - (१००) [ अविसुद्धलेस्से अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अन्वाणं] - । , अविसुद्धलेस्से अविशुद्धलेश्य , कृष्णादिलेश्य । जीवा० अव्युच्छेदम्-वाण्यतिशयविशेष , विवेक्षितार्थाना सम्यक्- १४२ । विभंगज्ञान । भग० २८४ । सिद्धिं यावदनवच्छिम्नवचनप्रमेयम् । मम० ६३ । अविसुद्धो - पासत्यादी तेसिं मज्झातो जो आगतो विहारा- अन्वइओ। दश० चू० २७ । भिमुहो तस्स जो पुव्वोवही सो अविसुद्धो। नि० चू० अव्वए-अव्ययम् , व्ययरहितम् । भग० ११९ । द्वि० ११३ अ। अव्वओ-अव्यय , अव्ययशब्दवाच्य । जीवा० १८३ । अविसेसियं-अविशेषितम् , विशेषरहितम् । ज० प्र० ८८। अव्वते-अव्यय पर्यायापगमेऽप्यनन्तपर्यायतया । ठाणा. अविसोहिकोडी-अविशोधिकोटि । दश० १६२ । ३३३ । अवयवापेक्षया । ठाणा० ३३३ । व्ययाभाव । अविहडं-बालक (देश्याम् )। बृ० प्र० । भग० ७६०। अविहम्ममाण - विविध परीपहोपसगैहन्यमानो विहन्य- अवत्तं-अव्यक्त , अव्यक्तमतं, अस्फुटमतं, संयताद्यवगमे मान न विहन्यमानोऽविहन्यमान , न निविष्ण सन् सन्दिग्धवुद्धि । आव० ३११ । अव्यक्तम् । औप० १०६ । वैहानस गाईपृष्ठमन्यद्वा वालमरण प्रतिपद्यत इति । आचा० शब्दोल्लेखरहितं, अनिर्देश्यम् । विशे० १५५ । अगीतार्थस्य २५९। गुरो सकाशे यदालोचनं तत् । ठाणा० ४८४ । अविहाड-अप्रगत्भ । व्य० द्वि० ३७९ अ । अब्वत्तगसंचिया-अवक्तव्यसञ्चिता , हयादिसङ्ख्याव्यव- अविहाव-अविभाव्य, अविभावनीयखरूप । प्रश्न० १९ । हारत शीर्पप्रहेलिकाया परतोऽसङ्ख्यातव्यवहारतश्च सट्- अविहि - अविवि । आव० ५२ । अयतना। वृ० द्वि० ख्यातत्वेनासवख्यातत्वेन च वक्तुं न शक्यतेऽसावव- १५ ॥ क्तव्य स चैककस्तेनावक्तव्येन-एककेन एकत्वोत्पादेन अविहिगहिअ - अविविग्रहणम् , अशुद्धस्य-उद्गमादिदोषा- मच्चिता । भग० ७९६ । न्वितस्य यद् ग्रहण, अथवा गुडादेव्यस्य मण्डकादिना अव्वत्तलिंगो- अव्यक्तलिङ्ग । आव० ३५२ । अप्रत्यक्ष- प्रच्छाद्य यदेकत्र पात्रकदेशे स्थापन तत् । ओघ० १९२ । लिङ्गा । आव० ५६५ । अवि हेपरिट्ठावणिया - अविधिपरिष्टापनिकी । आव० अव्वत्तस्त-अव्यक्तस्य-अगीतार्थस्य सूत्रार्थापरिनिष्ठितस्य । ६३८ । आचा० १९६। अविहेडए-अविहेढक , न क्वचिदुचितेऽनादरवान् । दश० अव्वत्तो- जाव कक्खादिसु रोममंभवो ण भवति, ताव २६६। अहवा जाव सोलसवरिसो ताव अन्वत्तो। नि० चू० अवीइ-अवीचि , वीचि -विच्छेदस्तदभावात् । उत्त० २३१ । तृ० ८२ अ । श्रुतेऽगीतार्थ , वयसि अर्वाक् पोडशभ्य । अवीरिए-अवीर्य , उत्थानादिक्रियाविकल । भग० ९५ । बृ० तृ० १३२ अ । अगीयट्ठो। नि० चू०प्र० १७३ आ। मानसशक्तिवर्जित । भग० ३२३ । अव्चया अव्यया । जीवा० ९९। अव्ययशब्दवाच्या, अवीरिय-अवीर्य , सिद्ध । भग० ९५ । मनागपि स्वरूपचलनस्य जातुचिदप्यसम्भवात् । ज. प्र. अवीसंभो - अविश्रम्भ , अविश्वास , प्राणवधस्य तृतीय २७ । तदारम्भकप्रदेशापरिहाणे । ज० प्र० २५७ । पर्याय । प्रश्न० ५। अव्ववसितस्स-अव्यवसितस्य-अनिश्चयवतोऽपराक्रमवतो अधीहीपुच्छण-अविधिपृच्छा, वस्त्रपात्राशुपकरणं विहारार्थ वा। ठाणा० १७६ । मुद्ग्राह्य पृच्छन्ति । वृ० प्र० २४१ अ। अवहिओ-अव्यथित परेणानापादितदु ख । ज० प्र० अवुन-अपुण्यम् । उत्त० २१० । १२६ । जीवा० ९९ । आचा० ४२४ । अदीनमना । अवृत्तपूर्वम् । आव० २३० । दा० २३२ । अदीणो। दग० चू० १२३ । अवेइअ-अवेदित , मनसाऽयनालोचित । आव० ४१५ । अवहे-अव्यथम् , देवादिकृतोपसर्गादिजनित भयं चलने अवोच्छिन्ना-अव्युच्छिन्ना यावटेकोऽपि तिष्ठति तावत । वा व्यथा तस्या अभावो अव्ययम् । ठाणा० १९२ । आव० २७ । अवाणं-आस्यानं, उद्यान, उद्धानम् । ओघ० १७१ । । . (१०१) [ अव्वाचा, आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अष्टापदम् ] - - भव्यावाधं,०ह-अव्यावाधम् , केनापि विवाधयितुमशक्य- | अम्बोच्छित्तिणयट्ठया-अव्यवच्छित्तिनयार्थता, अव्यवन्छि- त्वात् । जीवा० २५६ । वन्दनके तृतीय स्थानम् । आव० त्तिप्रधानो नयोऽव्यवच्छित्तिनयस्तस्याों-द्रव्यमव्यवच्छित्ति- ५४८ । अव्यायाध , परेषा पीडाकारित्वाभावाद्विनष्टवाध । नयार्थस्तद्भावस्तत्ता । भग० ३०२ । भग० ७ । अव्यावाधम्-उपरतसकलपीड मौक्तम् । उत्त० अब्बोच्छिन्न-अव्यवच्छिन्नम् , अखण्डितम् । आचा० ४०५। ५७८ । अव्यवच्छिन्ना', अनवरतम् । ओघ० १२६ । अव्वाबाह-शुक्राभविमानवासी सप्तमो लोकान्तिकदेव । | अव्वोच्छिन्ना-कृतेऽपि भागे मूलराशेरव्यवच्छेदो यावत् । भग० २७१ । ठाणा० ४३२ । अव्याबाध सप्तमलोकान्ति वृ० द्वि० १९९ आ । कदेव । आव० १३५। अपीडाकारित्वम् । सम० ५। अब्बोच्छिन्नाओ-अव्यवच्छिन्ना , व्यवच्छिन्ना-जीवरहिता अव्यायडा-अव्याकृता, अस्पष्टा अप्रकटार्था, असत्यामृषा न व्यवच्छिन्ना अव्यवच्छिन्ना | आचा० ३२३ । भापामेद । दश० २१० । अव्वोयडा-अव्याकृता, गम्भीरशब्दार्था मन्मनाक्षरप्रयुत्ता अचावारपोसहे-अव्यापारपौपधः । आव० ८३५ । वाऽनाविर्भावितार्था । भग० ५०० । अव्वाहयं अव्याहतम्, एकान्तिकमिहपरलोकाविरुद्धं अशरणानुप्रेक्षा अगरणस्य-अत्राणस्यात्मनोऽनुपेक्षा । फलान्तराबाधितं वा । आव० ४१५ । ठाणा० १९०। अवाहितो-अव्याहितः, अनाहूत । जीवा० १६६ । अशुषिरे-अज्मुसिरे, तृणपर्णाद्यनाकीर्णे। उत्त० ५१८ । अवितिगिट्ठ - अव्यतिकृष्टे, उद्घाटाया पौरुष्यामित्यर्थ । अशून्यान्तरा-न शून्यानि अन्तरागि यासा ता। आव० व्य. द्वि० २२७ आ। अव्वुकताई - अव्युत्क्रान्ता , अधिध्वस्तपर्याया । आचा. अशोकपल्लवप्रविभक्ति विशतितमो नाट्यविधि.। ३४८ । जीवा० २४७ । अव्वुच्छित्तिनयट्ठया- अव्युच्छित्तिनयार्थता, द्रव्यास्तिक- | अशोकलता-लताविशेष । आचा० ३० । नयमतम् । सूर्य० २८६ । अश्रयः-(अस), कोणा , कोटय । ठाणा० ४३५ । चतुर्दि- अव्वुच्छिन्ननयट्ठता-अव्यवच्छिन्ननयार्थता, द्रव्यास्तिक ग्विभागोपलक्षिता शरीरावयवा पर्यशासनोपविष्टस्य जानु नयमतम् । सूर्य० २५८ ॥ नोरन्तरं, आसनस्य ललाटोपरिभागस्य चान्तरम् , दक्षि. अव्वो-सबोधने, अहम् । व्य० द्वि० २०३ मा । णस्कन्धस्य जानुनश्चान्तरम् , वामस्कन्धस्य दक्षिणजानुन- अब्बोगडं-अव्याकृतम् , गुरुभिर्विशेषतोऽनाख्यातम् । भग० शान्तरमिति । ज० प्र० १५। चतुर्दिग्विभागोपलक्षिता. १०० । दायादादिभिरविभक्त अननुज्ञातं वा। वृ० तृ० शरीरावयत्रा । ठाणा० ३५७ । ५० अ । अव्याकृतं नाम दायिना मामान्यं न पुनस्तैर्वि- अश्रुतनिश्रितम्-यत्युन पूर्वं तदपरिकर्मितमते क्षयोपश भक्त, यदिविकृतं न केनापि विकारमापादित, यद् भवेत् मपटीयस्त्वादौत्पत्तिक्यादिलक्षणमुपजायते तत् । आव० ९ । पूर्वराजेन सदिष्ट, वंगस्य परम्परया समागतम् । व्य० द्वि० अश्वंदमः-वाहक. । उत्त० ६२ । २७९ आ । अविभक्तम् । व्य० द्वि० अश्चिती-प्रथमं नक्षत्रम्.। दश. २३६ । २७९ अ । अव्यक्तोऽपरिस्फुट । आचा० ३२० । अष्टभाग-अट्ठभागो-अष्टमो भाग । भग० ८३२ । अब्बोगडा-अव्याकृता, अविसस्ता। आव० ७२७ । कृते अएमीपोपध -अट्टमीपोमहो - अष्टम्या पौषध -उपवागा- ऽपि भागे निर्देशहीना अगिका । वृ० द्वि० १९९ आ । अत दिकोऽटमीपौपच । आचा० १२७ । गम्भीरशब्दार्था, अव्यक्ताक्षरप्रयुक्ता वा असत्यामृपाद्वाद- अहमीपोपधिका - अट्टमीपोमहिया-उत्सवा । शभेद । प्रज्ञा० २५६ । ३२७ । अवोच्छित्तिणए - अव्यवच्छित्तिनय , द्रव्यास्तिकनय । अष्टापदम्-अट्टावय, तीर्थविगेप । आचा० ४१८ । आव० उत्त० १५॥ २८७ । वृ० तृ० ५२ अ । आचा० (१०२) + 10 [ अष्टाएकिका अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः असंतासंते ] १८ अ। । अष्टाष्टकिका-चतु षष्टि । व्य० द्वि० ३४७ मा । असंचइआ-असचयिता -ये मासिके द्वैमासिके त्रैमासिके अष्ठीवती-जानुनी । प्रश्न० ८० । चतुर्मासिके पञ्चमासिके षण्मासिके वा प्रायश्चित्ते वर्तन्ते अष्ठीवान्-जानु । जीवा० २७० । ते। व्य० प्र. ९७ आ । असंकप्पिय-असकल्पित, असङ्कल्पितानि च तानि शब्दादि- असंचेअयो-असचेतयत , अजानानस्य । ओघ० २२० । विषयभावेन परिणतद्रव्यरूपाणि । विशे० १४५ । असंजअ-असयत , गृहस्थ । आचा० ३४२। अप्रशस्ता- असंकमणो-अशङ्कमना , न विद्यते शङ्का यस्य मनस ध्यवसायवान् । विशे० १०२७ । स्तदशकम् , अशक मनो यस्य स । आचा० १२२ । असंजगविसओ- भगवया पडिसिद्धो। नि० चू० वि० असंकिया-अशकिता। आव० ५६१ । असंकिलिट्ठ-असद्धिष्टम् , निर्दूषणम् । औप० ४९ । विशु- असंजण-असगो, अगेही। नि० चू० प्र० ८१ अ। द्धयमानपरिणामवान् । प्रश्न० ११० । असंजमो-असयम , प्राणवधस्य चतुर्दशपर्यायः। प्रश्न असंक्षेपकाल: । ठाणा० ३७८ । ५। अधर्मद्वारस्य षष्ठं नाम। प्रश्न० ४३ । असंखडं-कलहः, वैर वा। बृ० तृ० ४८ अ। बृ० प्र० भसंजय - असयत चरणपरिणामशून्य.। भग० ४९ । ८६ अ । नि० चू० प्र० ३१ अ। कलह । (गगि०)। गृहस्थ । दश० २२२ । असयमवान् । प्रश्न० ३० । ओघ ८० । असंजलं जम्बूद्वीपैरवते पञ्चदशतीर्थकरनाम । सम० असंखडबोलो-कलहबोल । आव० ६५४ । १५३ । असंखडि । आव० ६३० । असंजातकिणस्कन्धः। आचा० ८७ । असंखडिओ-अमवडिक , कलहकारक | ओघ० १५१ । असंजोगरया-असयोगरता -सयोग -सम्बन्ध पुनकलत्र- असंखयं-असस्कृतम् । दश० १०५ । उत्तराध्ययनेषु चतु मित्रादिजनितस्तत्र रता सयोगरतास्तद्विपर्ययेणैकत्वभावना- र्थमध्ययनम् । उत्त० ९ । सम० ६४ । भाविता असयोगरता । आचा० १८० । असंखया-असङ्ख्यका , मह्वयाविरहिता | उत्त० ३१६ । असंजोगिमे - भसयोगिम , सयोगिमाद्विपरीत आदित्य- असंखेजजीविया असङ्ख्यातजीविका वृक्षविशेषा । बिम्बादि । उत्त० २१२ । भग० ३६४ । यथा निम्बाम्रादीना मूलकन्दस्कन्धत्वक्छा असज्झा-असन्ध्या, विगतसन्ध्या। भोघ० २०२ । खाप्रवाला । ठाणा. १२२ । असण्णी-असशी-अविदितपूर्वमूदातम् । व्य० द्वि०३७७ आ। असंखेजवित्थडे-असङ्खयेयविस्तृत , असंङ्ख्येयं विस्तृतं असंतई-असन्तान', असत्ता वा। वृ० प्र०। असन्तति. यस्य स । जीवा० १०६ । (त्ता) परिणामविशेष । आव० ८४८ । असंखेप्पद्धा - असक्षेप्याद्धा, त्रिभागादिना प्रकारेण या असंतकं-असत्कम् , असदर्थाभिधानरूपत्वात् , द्वितीयाधर्म- सक्षेप्नुं न शक्यते सा चासौ अद्धा च । प्रज्ञा० ४८९ । द्वारस्य पञ्चम नाम । प्रश्न० २६ । असङ्खयेयकः । अनु० २४० । असंतगं-असत् , असद्भतार्थम् । अंगान्तं-अनुपशमप्रधा- असंगहरुई-असङ्ग्रहरचि , गच्छोपग्रहकरस्य-पीठादिकस्यो नम् , अशोभनं वा । प्रश्न० १२१ । असत्क-अविद्यमाना- पकरणस्यैषणा दोषविमुक्तस्य लभ्यमानस्यात्मभरित्वेन न र्थम् , असत्यमिति । प्रश्न० ३६ । विद्यते सङ्ग्रहे रचिर्यस्यानौ। प्रश्न० १२५ । असंतती-भायणवोच्छेदो अभाव इत्यर्थ । नि० चू० द्वि० वैश्रमणस्य पुत्रस्थानी यो देव । भग० ११६ आ। २००। असंतय - अशान्तक , अनुपशान्त अमत्-अशोभनम् । असंघयणो - आदिस्टेहिं तिहिं सघयणेहिं वजितो। नि. चू० तृ० १३० । असंतरणए-असस्तरणे। ओघ० १४३ । असंघातिमो-एगांगओ। नि० चू० द्वि० ७९ अ । असंतासंते-मार्गितम्याप्यलाभ । वृ० द्वि० २७२ आ। असंगे- असम्म , , प्रश्न० ४१ । (१०३) [ असते आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः असंवुडवरसो] ४८७ । । असंते-असत् , नाभाववचन शब्दोऽयम् । आचा० ७४ । असंपग्गहिया-असप्रग्रहिता-सप्रग्रहरहितता। व्य. दि. आवद्यमान. | उत्त० ६१७ । ३९१ । असंतोसो-असन्तोप., परिग्रहस्य त्रिंशत्तम नाम । प्रश्न असंपत्त-असम्प्राप्त । दश. १९४ । असलग्नम् । जीवा० १८१ । विशिष्टान् वर्णादीननुपगत । जीवा० २३ । असंथडाई - असमृतानि, वीजादिभिरव्याप्तानि । उत्त० असंप्रग्रह.-आत्मनो जात्याद्युत्सेकरुपग्राहवर्जनमिति भाव । ठाणा० ४२३ । असंथडो-छट्टऽद्वमादिणा तवेण किलतो असथडो, गेलण्णेण असंप्रग्रहता-असम्प्रग्रहः, समन्तात्प्रकर्पण जात्यादिप्रकृ- वा दुब्बलगरीरो, दीहठाणेण वा पज्जत अलभतो। नि० ष्टतालक्षणेन ग्रहणम्-आत्मनोऽवधारण सम्प्रग्रहम्तदभाव । चू० प्र० ३१३ । जात्याद्यनुत्सिततेति । उत्त० ३९ । असंथरताणं-अणुघटुंताणं । ओघ० ७८ । असंफुरो-असवृत । वृ० तृ. ३ आ, बृ० द्वि० २२४ असंथरमाणा-असस्तरमाणा , अतृप्ता । ओप० ७८ । आ। सङ्कुचितपादो, ग्लान । वृ० द्वि० २२९ अ। असंथरे-असस्तरताम् । ओघ० १५४ । असंवद्ध-असम्बद्धम् , स्वशरीरात्पृथग्भूतम् । जीवा० १२० । असंथुओ-इय वइरित्तो सणायगो अनायगो वा । नि० चू० असंभंते-असम्भ्रान्तम् , असम्भ्रान्तज्ञान । भग० १४०। द्वि० १२१ आ। असंभवंता-असम्भवन्त , ते गौरवत्रिकान्यतरदोपाज्ज्ञा- असंदिग्धम् - वाण्यतिगयविशेषः, असशयकारिता । मम० नादिके मोक्षमार्गे न सम्यग्भवन्त -नोपदेशे वर्तमाना' । आचा० २५०। असंदिग्धवचनता-परिस्फुटवचनता । उत्त० ३९ । असंभासो-असम्भाष्य । आव. २२१ । असंदिद्धं - असन्दिग्धा, स्पष्टाम् । दश० २१३ । अमन्दि- असंभम-असम्भ्रम , न भयं कर्त्तव्यम् । ओघ० ५२ । ग्वम्-सूत्रस्य द्वितीयगुण , सैन्धवगव्दवह्मवणघोटकाद्यने का. असंमत्त-असम्यक्त्वम् , द्वाविंशतितम परीपह । आव० र्थसशयकारि न भवति । आव० ३७६ । सन्देहवर्जितम् । ६५७ । असंलोए - असलोके, न विद्यते सलोको-दूरस्थितस्यापि स्वपक्षादेरालोको यस्मिंस्तत् । उत्त० ५१८ । आचा० असंदीणो- असन्दीन , सन्दीनादितर जलालावनात् न क्षयमाप्नोति । उत्त० २१२ । आदित्यचन्द्रमण्यादि । आचा. असंववहारिए - असाव्यवहारिक, अनादिकालादारभ्य २४७ । प्रचुरेन्धनतया विवक्षितकालावस्थायि । निगोदावस्थामुपगता एवावतिष्टन्ते ते व्यवहारपथातीत- २४७ । कपतापच्छेदनिर्घटितोऽसन्दीन । आचा० २४८ । त्वात् । प्रना० ३८० । कुतप्रधृष्यतयाऽसन्दीन अक्षोभ्य , प्राणिना त्राणाया- असंविग्गा -पासत्थोसण्गो कुनीलो ससत्तो अहदो। नि० इवासभूमि । आचा, २४८ । चू० त० ३३ । असंधिप-असन्धित , असयोजित । उत्त० २१२ । असंधिया-पोरवजिता । नि० चू० प्र० १६१ अ । असंविभागी-सविभजति-गुरुग्लानवालादिभ्य उचितमगा- नादि यच्छतीत्येवशील सविभागी, न तया य आत्मपापक- असंनिहिसंचय-असन्निधिसञ्चय , न विद्यते मन्निधिरूप त्वेनैव स । उत्त० ४३४ । आचार्यग्लानादीनामेपगागुण- सञ्चयो यस्य स । जीवा० २०८ । विशुद्धिलब्ध मन्न विभजतेऽमौ। प्रश्न० १२५ । असंपओगचिंता - कथञ्चिदभावे मत्वमम्प्रयोगचिन्ता । असंवुडणं । नि० चू० प्र० २१६ आ। आव० ५८५ । असंबुडवउसो - अमवृतबकुशः, यो मूलगुणाटिप्वनात असंपोगाणुसरणं - पति वियोगे सम्प्रयोगानुम्मरणम्- सन करोनि, वकुगस्य चतुर्थी भेट । उत्त० २५६ । भग० चिन्तनम् । आव० ५८८ । ८९०। प्रकटकारी । ठाणा. ३३७ । भग० १२१ । आचा० 6 --- (१०४) १५ "TIT. " . न' Trar T [ असंवुडे अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः असद् ] -- । ८११ । मण्डको. २४४। असंवुडे-असंवृतः, प्रमत्त । भग० ३१५ । असझं(भं)-प्राम्यवचनं, कर्कशं, कटुक, निष्ठुरं, जकारा- असंशुद्धम्-सङ्कीर्णम् । आव० ७६० । दिक वा । नि० चू० त० ८० आ। असंसट्ठा-दायगो अससटेहिं हत्यमत्तेहिं देतित्ति । नि० चू० असज्झाइयं - अखाध्यायिकम् , अशोभन आध्याय एव, तृ. १२ अ । अससृष्टा-अक्खरडिय । ठाणा० ३८६ । रुधिरादि कारणे कार्योपचारात् । आव० ७३१ । असंसारसमावण्णा-असमारसमापना , मुक्ता । प्रज्ञा० असढ-शठभावरहित । ओघ० २२० । १८ । असढकारणो-'मढ' च्छादने, जो अप्पाणं मायाए ठाति- असंसारो-अससारः, समारप्रतिपक्षभूतो मोक्ष । जीवा० असढो होऊगं करण करेति । नि० चू० तृ. १४९ अ । ८। न ससारोऽससार , मोक्ष । प्रज्ञा० १८ । असढत्तणं-अशठत्वम् । आव० ५२ । असंहनन-असघयण, आदिमाना त्रयाणां सहननानामन्य- तमेनापि सहननेन विकल । व्य० प्र० ११४ अ । असण-अशनम् , घृतपूर्णादि । आव० अस-अशनरूपागि । व्य० द्वि. १२९ आ । दनादि, आशु-शीघ्र क्षुधा-वुभुक्षा शमयतीति । आव० ८५० । बीजक । आव० १८६ । अश्यत इत्यशनम् , असई-असकृद्, अनेकधा। उत्त० ३१३ । ओदनादि । दश० १४९ । अश्यते-भुज्यत इति अशेषा- असइ-अशति , अवाङ्मुखहस्ततलरूपा मुष्टि । ज० प्र० हाराभिधानम् । उत्त० ६०० । असई-असती। ओघ० १४६ । सस्तरणाभावे । बृ० द्वि० असणवण-अशनवनम् , बीजवनम् । आव० १८६। वनविशेष । भग० ३६ । १९३ आ। असईपोसणया-अमतीपोषणता, असती पोषयति । आव० असणि-अशनिः, वज्रम् । दश० १६४ । आकाशे पतन्न- ८२९ । ग्निमय कण । जीवा० २९ । प्रज्ञा० २९ । वइरोयर्णिदस्म असकओ-असस्कृत , स्वभावसम्पन्न । आव० ११४ । अग्गमहिसी । भग० ५०४ । ठाणा० २०४ । असक्कय-असस्कृत , न विद्यते सस्कृत-सस्कारो यस्य स । असणिमेहा-अशनिमेघा , करकादिनिपातवन्त , पर्वता- असत्कृत -अविद्यमान सत्कार । प्रश्न० ४१ । दिदारणसमर्थजलत्वेन वन्नमेघाः । जं० प्र० १६८ । कर- असक्कयमसक्कय-असस्कृतामत्कृत अविद्यमानसस्कारस- कादिनिपातवन्त पर्वतादिदारणसमर्थजलत्वेन वा वनमेधा । ' त्कार । न विद्यते सस्कृत-सस्कारो यस्य मोऽसस्कृत, भग० ३०६॥ असत्कृतः-अविद्यमानसत्कारः। प्रश्न. ४१ । असणे-अशन, घृक्षविशेष । प्रशा० ३१ । वीयक । उत्त. असगडतातो-ज्ञानासह्न । (मर०) असगडपिया-अशकटपितो, अशकटाया पिता। उत्त. असपणातय-असज्ञातीय । आव. ८४६ । १३० । नामविशेष । व्य० प्र० १८ अ। नि० चू० प्र० असति-असकृत् , अनेकवारम् । जीवा० १२८ । १५ । असतिणिवेसणे। नि० चू० प्र० १६२ अ। असगडा-अशकटा । उत्त. १२९, १३० । एतन्नाम्नी असतिवाडगा। नि० चू० प्र० १६२ अ । आभीरपुत्री । दश० १०५ । असतिसाहीओ। नि० चू० प्र० १६२ अ। असगडाताए-अशकलापिता। व्य० प्र० १८ अ । असत्थ-अगस्त्रम् , सप्तदशमेद सयमः । आचा० ५३ । असञ्चसंधत्तणं- असत्यसन्धत्वम् , भमत्य-अलीक सन्द असत्थस्स-अशस्त्रस्य, निरवद्यानुष्टानरूपस्य संयमस्य । धाति अच्छिन्न करोनीति, तद्भाव । द्वितीयाधर्मद्वारस्य आचा० १५६ । पड्विंशतितमं नाम । प्रश्न. २६ । असदध्यारोपणम्-आव० ८२१ । असच्चो-अमल्ल , मटभ्योऽहित । प्रश्न. ३० । असद्-अविद्यमानम् । उत्त० ३४७ । , (१०५) . 1 ।

[ असहतो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः असम्मोहे ] असद्दतो-अश्रद्धानः, अश्रद्दधान । आव• १८१ । असमंजसं-अननुकूलम् । उत्त० २२६ । असदहणं-अश्रद्धानम् । आव० ५७३ । असमओ- असमयः, असम्यगाचार , द्वितीयाधर्मद्वारस्य असद्भुतैः-साधोः कर्तुमयुक्त. । आचा० २४२ । पञ्चविंशतितम नाम । प्रश्न० २६। असनिरूपेण-ईतिरूपो हि पतङ्गादेरापात इति दश० १६४ । असमणपाउग्गो-अश्रमणप्रायोग्य.। आव० ७७८ । असनो-अशन , यीयकः । आचा० ४११ । असमणुन्न - असमनुज्ञः, आचाराशेऽष्टमाध्ययनस्य प्रथ- असन्निभाउए-असंन्यायुः, असञ्ज्ञी सन् परभवयोग्य बद्ध मोद्देशक । आचा० २६० । असमनोज्ञाः, असाम्भोगिकाः । मायु । भग० ५१। ओघ० ५४ । असन्निभूए-असज्ञिभूतः, असम्ज्ञिभ्य उत्पन्न । प्रज्ञा० असमर्था-अतिभारेण न शक्नुवन्ति फलानि धारयितुम् । ५५८ । आचा० ३९१। असन्निभूय-अमज्ञीभूता, भसज्ञिनां या जायते सा। असमाणो-असमानः, न विद्यते समानोऽस्य गृहिष्वाश्र- प्रज्ञा० ३३९ । यामच्छितत्वेनान्यतीर्थिकेषु वाऽनियतविहारादिनेति, असहन, असन्नी-असञ्झी, मिथ्यादृष्टिरमनस्को वा । प्रज्ञा० ३३९ । समानो वा साहकारो न तथेति । उत्त० १०७ । यथोक्तमनोविज्ञानविकल । प्रज्ञा० ५३३, ४०७ । असमारभमाणस्स - असमारभमाणस्य, मट्टादीनामवि- असयलायारे-अशवलो यस्य सितासितवर्णोपेतवलीवर्द षयीकुर्वत । ठाणा० ३२४ । इव कर्वर आचारो-विनयशिक्षाभाषागोचरादिक. । व्य. असमासदोसो-असमासदोष , समासम्यत्यय सूत्रदोषयि- प्र० २३५ । शेष । आव० ३७४ । असवलो-अशवलः, एकान्तशुद्ध । उत्त० २५७ । असमाहडा-असमाहृता, अनजीकृता । सूत्र. ३१४ । असभं - असभ्यम् , अनुचितं जकारमकारादि । आव० ५८८ । असमाहडाए-अशुद्धया लेश्यया-उद्गमादिदोषदुष्टमिदमिन्येवं असम्भावं-असद्गावम् , अविद्यमानाः सन्त -परमार्थसन्तो चित्तविप्लुत्या । आचा० ३३२ । भावा-जीवादयोऽभिधेयभूता यस्मिन् तत् । उत्त० १५१ । असमाहि-असमाधि , अस्वाथ्यनिवन्धना कायादिचेष्टा । असभावगिहंतरं-गृहस्य पार्श्वत पुरोहडेऽगणे मध्ये वा।। आव० ४९९ । ममाधि -समाधानं-ज्ञानादिघु चित्तकाम्य, न समाधि । उत्त० ६१४ । चित्तोद्वेगरूपम् । उत्त० ५५१ । वृ० तृ० २३ आ। असम्भावठवणा - एक एवाक्ष. पिण्डकल्पनया वुया असमाहिकरो-असमाधिकर , अम्बायनिवन्धनकर । कल्प्यते तत् । ओघ १२९ । असद्दावस्थापना, अमद्गा- वकल्पना। जीवा० १२२ । असमाहिठाणा - असमाधिस्थानानि, न चिनखामा य. असभावपट्टवणा-असद्भावप्रस्थापना। आव० १५१ । स्याश्रया । प्रश्न० १४४ । मम० ३७ । असम्भावभावणा-असद्भावभावना । उत्त० १६५, २२३। असमिक्खियप्पलावी- बुद्धीए अहिय पुठ्वावर इह- असम्भावुभावणा - अमदावोहावना। उत्त० १५७॥ परलोयगुणदोस वा जो महमा भण्इ। नि० चू० तृ. आव० ३१४ । ८० मा । अममीक्षितप्रलापी, अपर्यालोचितानकवादी। असम्भावो-अमड़ाव । आव० ३२० । प्रश्न०६। असम्भूए - अमद्भुतम् , अभूनोदावनरूपमशोभनरूपं वा । असमित्त-अवमित्र । विशे० ९३८ । भग० २३२॥ असमीक्ष्य-अनालोच्य। उत्त० ३४७ । असम्भूय-असद्तम् , अनृतम् । आव० ५८८ । असमोहएणं-अनुपयुकेनात्मना । भग० ६८ । असभ्यम्-भालीलम् । भाव० ८३ । । खरपस्पादि। उत्त० : असमोहयावि-दण्डादुपरता असमुद्धाता वा। भग० ७६४। असम्मोहे- अमम्मोह , देवादिकृतमायाजनितम्य सूक्ष्म- आव० ४९९ । (१०६) है -------- AnimT पान - [ असरण अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः असिपत्त ] - २१ । पदार्थविषयस्य च मम्मोहस्य मूढताया निषेधात् । ठाणा० असाहुया-असाधुता, द्रोहस्वभावता। उत्त० ११४ । १९२। असाहू-असाधुः, अपगतभावसाधुत्व. । उत्त० ५८ । असरण-अशरण , शरणरहित , अर्थप्रापकाभावात् । प्रश्न असि-असिः, खड्ग. । जीवा. ११७ । भग० १८२ । ११। अर्थकारकविरहित । प्रश्न० १९ । गृहं नात्र शरण. प्रज्ञा० ९७ । तलवार. । आव० ५८८, ४८७, ३६० । मस्तीत्यशरण सयम । आचा० ३०३ । शरणमनालम्ब. खड्गाभ्यासम् । प्रश्न० ९७ । खड्ग.-करवालः। भग० १९१ । मानोऽदीनमनस्कः । आचा० ३०६ । शस्त्रविशेषः । आव० ३६० । असहीण-अमत् । बृ० द्वि. १८७ अ । अस्त्राधीन, परा- । असि-अमितम् , कृष्णमशुभं च ससारानुबन्धित्वात् । यत्त । आचा० १५२ । आव. ४३९ । असहु - सुकुमारो राजपुत्रादिप्रव्रजित । ठाणा० १३८ । असिअएणं-दात्रेण । भग० ६५० । अशक्तिष्ट । नि० चू० प्र० ३६० अ । असहिष्णु । ओघ० असिए - असित -अवद्ध -तैः मार्ध सगमकुर्वन् भिक्षु । १४३ । सुकुमारगरीर । उपमा० गा० ४०३ । असमर्थ - अचा० ४३० । गजपुत्रादि । ओघ० १३८ । असिकच्छप-अस्थिकच्छपः, कच्छपविशेष । सम० १३५ । असहू - असमर्थ -भुत्पीडित । ओघ० ४४। राजादि । असिक्खग-अशिक्षक , चिरप्रवजित । दश० ३९ । दीक्षित । बृ० द्वि० २२४ अ । रायाजुवराया सेट्टि अमच्च असिखेस्गं-असिखेटकम् , असिना सह फलकम् । प्रश्न. पुरोहिया य एते अमहू। नि० चू० प्र० १०१ भ । भिक्षा- वेला प्रतिपालयितुमशक्त । ओघ० ८६ । अमहिष्णु । असिचम्मपायं-असिचर्मपात्रम्-स्फुरक , अथवा असि - आव० ८५८ । असमर्थ । ओघ० १९५ । खड्गश्चर्मपात्र च-स्फुरक , खड्ग कोशको वा। भग० १९११ असांव्यवहारिक'-छेक । आव० ५२७ । असिचम्मपायहत्थकिञ्चगए-असिचर्मपात्रहस्तकृत्वाकृत , मसाए-असात , असातोदयकलित । जीवा. १३० । असिचर्मपात्र हस्ते यस्य स तथा कृत्यं मचादिप्रयोजनं गत असाडभूई-आसाढभूति , मायापिण्डोदाहरणे धर्मरुचि- आश्रित कृत्यगतस्तत' कर्मधारय , अथवाऽसिचर्मपात्रं शिष्य । पिण्ड० १३७ । कृत्वा हस्ते कृत यनासौ असिचर्मपात्रहस्तकृत्वाकृत , प्राकृ- असाढए-तृणविशेष । प्रज्ञा ३३ । त्वाच्चव ममामः, अथवाऽसिचर्मपात्रस्य हस्तकृत्या-हस्त- असाढा-अषाढा, पूर्वोत्तराषाढानक्षत्रविशेषः । आव० १२० । करणं गतः-प्राप्तो यः स तथा। भग० १९१ । असाधू-अमाधव , असयता । ठाणा० ३९९ । असिट्टो-अशिष्ट , अप्रतिपादित । प्रश्न० १११ । अगिष्टः । असामन्नं अमामान्यम् , अनाचीर्णपूर्वम् । सूर्य० २३८ । । आव० २१८ । असारजरढा-अकालवृद्धा। ओघ० २१८ । असिणार - अन्ये श्रमणादयो येऽमुमपिण्डमगितवन्त । असारणा-अगवेषगा। बृ० प्र० १५६ अ। आचा० ३३७॥ असारवणा-अगवेमणा । नि० चू० द्वि. 1३६ अ। असिणाणए-अस्नानतया। आचा. २६४ । असारहिप-असारथिक , मारथिरहित । भग० ३२२ । असिता-गृहवासविमुक्ता। आचा. २२२ । असारिए-अमागारिके । नि० ० द्वि० ३१ आ। असिद्ध-न मिद्ध , हेतुदोषविशेष । ठाणा० ४९ । समारी । असावज-अमावद्यम् , आयतनस्य प्रथम पर्याय.। ओघ० जीवा० ४३६ । असिपंजरं-असिपअरम् , यक्तिपरम् । प्रश्न० ११५ । भसासर-अगाश्वतम् , प्रनिक्षगमाचीचीमरणेन मरणम् । ' असिपत्त-अमिपत्र, असीना पत्रम् । विपा. ७१ । खड्ग- आचा०६६। क्षणनवरत्वम् । भग० ४६९ । १०६ । अमि.-खड्ग स एव पत्रम् । असासयं-अगाश्वतम् , प्रतिक्षण विशरारत्वम्-अनित्यम् । ठाणा. २५३ । अमय. वडास्तवद्भेदकतया पत्रागि- प्रश्न. ९६ । पनि यस्मिस्तत । उत्त. ४६० । प्रना० ८० । परमा. - , - परम् । जीवा. (105) [असिपुत्रिका आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः असुरा] वार्मिकेषु नवमः । उत्त० ६१४ । नवम. परमाधार्मिक । दिवर्जितत्वात् अशुचि., शास्त्रवर्जितो वा अश्रुतिः । भग० आव. ६५० 1 सूत्र. १२४ । सम० २९ । ३०८ । स्नानब्रह्मचर्यादिवर्जिताः, अश्रुतय , शास्त्रवर्जिता । असिपुत्रिक । उत्त० ४५। जं. प्र. १७० । विगन्धं शरीरमलादि । जीवा० २८२ । असिय-असित , कृष्ण । प्रज्ञा० ९१ । असुण्णंतरा-अशून्यान्तरा., एकोत्तरवृद्धया सर्वदैवाशून्या. असियअं-दानम् । आव० २९५ । न्यव्यवहितान्यन्तराणि यासा ता अशन्यान्तरा। विशे० असियग-असियगम् , दात्रम् । आचा० ६१ । ३३१ । असिरयणं - अमिरत्नम् , चक्रवर्तेरेकेन्द्रियपञ्चमरत्नम्। असुति-अशुचीनि, अमेध्यानि मूत्रपुरीषाणि । ठाणा० ४७६ । ज० प्र० २३८ । ठाणा० ३९८ । असुद्ध-अशुद्धम् , आधाकर्मादि । ओघ० १७७ । असिलट्ठी-असियष्टिः, खड्ग लता। विपा० ५६ । असि - असुन्नकाल-अशून्यकाल, नारकभवानुगससारावस्थानका• खड्ग म एव यष्टि -दण्डोऽसियष्टि.,अथवा असिश्च यष्टिश्च । लस्य द्वितीयमेद.। भग० ४७ । जं० प्र० २६४। असुभ-अशुभकार्ये मृतकस्थापनादौ । व्य० प्र० १६९। असिलायं-विस्वरम् । बृ० तृ. २५ आ। असुभजोग-अशुभ योग , अनुपयुक्ततया प्रत्युपेक्षादिकरणम् । असिलिटुं-अश्लिष्टम् । आव० ९९ । भग० ३२ । असिलोगभते - अश्लोकभयम् , अकीर्तिभयम् । ठाणा. असुभणाम - अशुभनाम, यदुदयवशात् नामेरधस्तना ३८९ । अश्लाघाभयम् । आव ४७२ । पादादयोऽवयवा अशुभा भवन्ति तत् । प्रज्ञा० ४७४ | असिलोगो-अश्लाघा, अयशः। आव० ६४६ । असुभत्ता-अशुभता; न शुभता । प्रज्ञा० ५०४ । अम- असिव-अशिवम् , व्यन्तरकृतं व्यसनम् । आव० ६२६ । जल्यता । भग० २५३ । उद्दाइयाए अभिद्दत । नि० चू० प्र० ९७ अ । नि० चू० प्र० असुभाणुप्पेहा-अशुभानुप्रेक्षा, अशुभत्वं संसारस्यानुप्रेक्षण- ७५ अ। व्यन्तरकृत उपद्रवः । वृ० प्र० २३१ । अनुस्मरणम् । ठाणा० १८८ । देवतादिजनितो ज्वराग्रुपद्रव । ओघ० १३, १४ । असुभाते-असुखाय-दु खाय । ठाणा० १४९ । अशुभाय, असिवाइखेत्तं-अशिवादिक्षेत्रम् , अशिवादिप्रधानं क्षेत्रम् , अपुण्यबन्धाय असुखाय वा । ठाणा. २९२ । पापाय, आदिशब्दादूनोदरताराजद्विष्टादिपरिग्रह । दश. ३९ । असुखाय वा-दु खाय। ठाणा० ३५८॥ असिवुवसमणी-अशिवोपशमनी कृष्णस्य चतुर्थी मेरी । असुयंग-अश्रुताङ्गम् , नोश्रुताङ्गम् । उत्त० १४४ | असुय-अश्रुत परवचनद्वारेण । भग० २००, १९७ असिवोवसमणी-अशिवोपशमनी, कृष्णस्य चतुर्थी मेरी, असुर-रौद्रकर्मकारी। उत्त० २५६ । पण्मासान् मर्वे रोगोपशमनी । वृ० प्र० ५६ म। असुरकुमार-असुरकुमारा , 'देवविशेषा । भग. १९७ । असी-अमि , अस्युपलक्षित सेवकपुरुष । जीवा० २७९ । असुराश्च ते नवयौवनतया कुमारा इव कुमाराचलमुर- हीरो। नि० चू० द्वि० १४१ मा खड्ग , यमुपजीव्य जन. कुमारा । ठाणा० २८ । -भानपतिभेदविशेष । प्रज्ञा मुखत्तिको भवति, यद्वा साहचर्यलक्षणया अमिगब्देन अन अस्युपलक्षिता पुरुषा गृह्यन्ते । जं० प्र० १२२ । | असुरकुमारीओ-अमुरकुमार्य , देवीविशेषा । भग० १९५॥ असील-अशील , अविद्यमानशील , सर्वथा विनष्टचारित्र- असुरदारे-सिद्धायतनस्य द्वितीयं द्वारम् । ठाणा० २३० । धर्मः । उत्त० ३४५१ अशीला -दु शीला. । ठाणा० १५३ ।। असुरसुरं-असुरमुरम् , अनुकरणशब्दोऽयम् । भग० २९४ । अमीलया-अशीलता चारित्रवर्जितत्वात । अब्रह्मग मात । बरडमरड अकरितो । ओघ० १८७ । एयभूतगन्दरहितम् । दश नाम । प्रश्न०६६। असुआ-असूया, अव्याजम् , ईर्ष्या । दश० २४ । असुरा अमृग, न मुग अमृग, भवनपतिव्यन्तरा । असुइ-अशुचि अश्रुतिर्वा । पश्न० ६३ । स्नानब्रह्मचर्या- ठाणा. २२। भवन पतिविशेषा , भवन पतिव्यन्नरा वा । आव० ९७ । । प्रत्र. ११२। - (१०८) - [ असुरो अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अस्थिका ] ठाणा० १०४ । असुरकुमार । भग० १३५ । भवनपति- ) असोगसिरी- पाडलिपुत्ते असोगसिरी राया। नि० चू० व्यन्तरलक्षण.। ठाणा० ४६६ । तृ० ४४ आ। बृ० द्वि० १५३ मा। अशोकश्रीः, बिन्दुसा- असुरो-असुर., आसुरभावान्वितत्वाद् यक्ष. । उत्त० ३६६ । रपुत्र । विशे० ४०९ । भवनवासी। बृ० द्वि० २६४ अ । असोगा-अशोका, नलिनविजयराजधानी। जं० प्र० ३५७ । भसुह-अशुभम् , अशुभस्वभावम् । भग० ७२ । अशुभ नागकुमारेन्द्रस्याप्रमहिषी । भग० ५०४ । ठाणा० २०४ । अतीवासातरूपः। जीवा० १०३ ।। असोचा-अश्रुत्वा । भग० ४२५ । आगमानपेक्षम् । भग० असुहदुक्खभागी - असुखदु खभागी, दु खानुबन्धिदु ख- ४५५। भागी। भग० ३०८ । असोणिअ-अशोणितम् , रक्तरहितम् । आव० ७६४ । असुहया-अशुभदा, असुखदा । आव० २३६ । असोत्थो-अश्वत्थ । आव० ४१७ । असुहिय-असुखित., अविद्यमानसुहृद् वा। प्रश्न० ४१ । असोयणया-अशोचनता, दैन्यानुत्पादनेन । भग० ३५ । असूइअ-असूचितम् , व्यञ्जनादिरहितम् । दश० १८१ । असोयलया-अशोकलता, लताविशेष. । भग० ३०६ । असूचया-साक्षात् । ठाणा० ३०४ । असोयव.सए । भग० १९४ । असूयपुत्तो-असूयपुत्र । आव० २११ । असोयाओ। ठाणा० ८० । असूया-अप्पणो दोस भासति ण परस्स । नि० चू० प्र० असोही-अशोधि , प्रतिसेवना, स्खलना-। ओघ० २२५ । २७८ भ । आतगता । नि० चू० प्र० २७८ अ । अस्तमयनप्रविभक्तिः-नवमनाट्यमेदः । जं० प्र० ४१६ । असूचा-स्फुटमेव परदोषोद्धट्टनम् । बृ० प्र० १२८ भ । अस्तान्ते-अत्यतमि, अस्तमयपर्यन्ते । उत्त० ४३५ । असेयं-मुख । नि० चू० प्र० ८८ आ । अस्ति-अस्थि, प्रदेशः। ठाणा० १५, ५१६ । असोंडो-अमजपाणो। नि० चू० द्वि० १४४ अ। अस्तिकाय:- अत्यिकाय, धादिपञ्चविधास्तिकायमाश्रित्य असोअ-अशोक , सुप्रभवलदेवपूर्वभवनाम । आव० १६३ । काय । आव० ७६७ । अरुणद्वोपे महद्धिको देवविशेष । जीवा० ३६७। द्विसप्त- अस्तिकायधर्म - अत्थिकायधम्म, अस्तिगब्देन प्रदेशा तितमग्रह । ज० प्र० ५३५ । वृक्षविशेष । जीवा० २२२ । उच्यन्ते, तेषा कायो-राशिरस्तिकाय. स चासो सज्ञया किन्नरच्यतराणा चैत्यवृक्षः। ठाणा० ४४२ । अशोक धर्मश्चेति, गत्युपष्टम्भलक्षण धमास्तिकाय ।ठाणा० १५४। नामदेव । जं. प्र. ३२० । लताविशेष । प्रज्ञा० ३२ । योऽस्तिकायाना धर्मादीना धर्मो-गत्युपष्टम्भादि. । उत्त०५६६ । बिन्दुसारपुत्र. । वृ० प्र० ४७ अ। वृक्षविशेष । भग० अस्तिकाया:-अत्थिकाया, अस्तीत्यय त्रिकालवचनो निपात , ८०३ । एकास्थिकवृक्षविशेष । प्रज्ञा० ३१ । ठाणा० ७९ । अभूवन् भवन्ति भविष्यन्ति चेति भावना, अतोऽस्ति च मल्लिनाथस्य चत्यवृक्षः । सम० १५२ । विजयपुरस्य नन्दन. ते प्रदेशाना कायाश्च राशय इति, अस्तिशब्देन प्रदेशा. वनोद्याने यक्ष । विपा० ९५। बिंदुसारपुत्तो। नि० चू० क्वचिदुच्यते, ततश्च तेषा वा काया अस्तिकाया । ठाणा० प्र० २४३ अ। १९६ । अस्तीना-प्रदेशाना सङ्घातात्मकत्वात् काय. । असोगचंदो-अशोकचन्द्रः, योगसङ्ग्रहेपु शिक्षाया दृष्टान्त.। ठाणा० १५। आव० ६७९ । अस्तिनास्तिप्रवादपूर्वम् - अत्थिनत्थिप्पवातपुव्वं, चतुर्थ असोगदत्तो-अशोकदत्त , मायोदाहरणे मकेतपुरे समुद्र पूर्वम् । ठाणा० ४८४ । तत्र यद्वस्तु लोकेऽस्ति धर्मास्ति- दत्तसागरदत्तपिता। आव० ३९४ । कायादि यच्च नास्ति खरशृङ्गादि तत् प्रवदति, मर्व वस्तु असोगललिए-चतुर्थवलदेवपूर्वभवनाम । सम० १५३ । स्वरूपेणास्ति पररूपेण नास्तीति प्रवदति। नदी १४१ । असोगवण - अगोकवनम् । आव. १८६ । पुष्करिण्या , अस्थानस्थापनम् - अठाणठवणं - अयोग्यतास्थापनम् । वनम् । ठाणा० २३० । वनखण्डनाम। जं० प्र० ३२० ओघ० १३१॥ भग० ३७। अस्थिका-अट्टिग, कपालिकापर्याय । व्य० प्र० ००६ अ । (१०५) [ अस्थितकल्पिकः आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः भहक्खायं] A ७८ । । अस्थितकल्पिकः-साधुमेदविशेष । भग० ४ । अस्सलेसा-नक्षत्रविशेष । ठाणा० ७७ । भस्थिमिजा-अद्विमिंजा, अस्थिमध्यरस । ठाणा० १७०1 अस्सवाणियओ-अश्ववणिक् । आव० २२० । अस्थिमिजानुसारि-अद्विमिंजाणुसारी। ठाणा० ३७५ । अस्सवाहणिया-अश्ववाहनिका । उत्त०२७७ । आव० ५६ । अस्थिरम्-अथिर, जीर्णम् । आचा० ३९६ । अस्ससेणे-अश्वसेनः, सनत्कुमारपिता। आव० १६२ । अस्थिरणाम -(अथिरणाम ), यदुदयवशान्जिह्वादीनामवय पार्श्वपिता। आव० १६१ । वानामस्थिरता भवति तत् । प्रना० ४७४ । अस्सादणसगोत्ते - आस्वादनसगोत्रम् , अश्विनीनक्षत्र- अस्तिहः-(अणिह), स्निह्यते-श्लिष्यतेऽष्टप्रकारेण कर्म गोत्रम् । सूर्य० १५० । णेति स्निहः, न स्निहोऽस्निह , यदि वा स्निह्यतीति स्निहो अस्सामिणी-अस्वामिनी। आव० २२४ । रागवान् यो न तथा सोऽस्निहः, उपलक्षणार्थत्वाच्चास्य | अस्सायणे-आश्वायनम् , अस्सायणे-आश्वायनम् , अश्विनीगोत्रम् । जं० प्र० ५०० । रागद्वेषरहित इत्यर्थ । आचा० १९१ । स्नेहरहित.। | अस्सासणे - अष्टाशीतिमहाग्रहे चतुर्दशमहाग्रह. । ठोणा० आचा० २१० । स्निह्यतीति स्निहो, न स्निहोऽस्निह रागद्वेपरहितत्वात् अप्रतिवद्ध । आचा० २५८ । अस्सासो- आश्वासः, प्राणिनामेव आश्वासनम् , अहिं- अस्पृशद्गति-समयप्रदेशान्तरमस्पृशती। आव० ४४१ । सायाः पञ्चाशत्तमं नाम । प्रश्न० ९९ । अस्फुटितम्-अफुडिआ, सर्वविराधनापरित्याग.। दश० अस्सि-अयम् । ठाणा० १३८ । १९६ । अस्सिपडियाए-एतत्प्रतिज्ञया एतान् साधून प्रतिज्ञाय- अस्संजए-असयतः-गृहस्थ , स च श्रावक प्रकृतिभद्रको उद्दिश्य । आचा० ३६१ । वा। आचा० ३२९ । असंयता:-असयमवन्तः, आरम्भ- अस्सिलोए-अय लोक , अयं मनुष्यलोक । जीवा० ३४४ । परिग्रहप्रसक्ता , अब्रह्मचारिणः । ठाणा० ५२४ । अस्सिणि-अश्विनी, नक्षत्रविशेषः । सूर्य० १३० । ठाणा० अस्संजतो-गिहत्थो। नि० चू० प्र० ३० आ । ७७ । मेतार्यजन्मनक्षत्रम् । आव० २५५ । अस्संजमो - असंयमः, प्राणातिपातादिलक्षण । अस्सीइ-अश्विनी, नक्षत्रविशेष.। ठाणा० ४६९ । अस्लेसा-अश्लेषा । सूर्य० १३० । अस्संपडियाए - न विद्यते स्वं-द्रव्यमस्य सोऽयमस्त्रो अस्सो-अश्वः, घोटक , एकखुरश्चतुष्पद । जीवा० ३८ । निर्गन्ध इत्यर्थ , तत्प्रतिज्ञया । आचा० ३२५ । अर्श । जीवा. २८४ । प्रज्ञा० ४५। अस्सकण्णी- अश्वकर्णी, वनस्पतिविशेष. । आचा० ५७ । अहं-अधं-अधस्तात् । आचा० ६३ । अब,-बुध्ने । ओघ० माधारणवनस्पतिकायिकमेद. । जीवा० २७ । १६८। अस्सकन्ने-साधारणवादरवनस्पतिकायविशेष । प्रज्ञा०३४।। अह-एप। नि० चू० प्र० ११८ अ। व्य० प्र० १०७ आ। अस्सकन्नी-अनन्तकायभेद । भग० ३०० । भग० ८०४ । अयं । नि, चू० द्वि० ९२ आ। कन्दविशेष. । उत्त० ६९१ । अहक्खाओ-यवास्थित । (मु०) अस्सतरो-अश्वतर , खरतर , एकखुरश्चतुष्पद.। जीवा० । अहक्खायं - अथाख्यातम् , अथाख्यातम् , अबगब्दो यथार्थ, आङ्- ३८ । एकखुरचतुष्पद.। प्रज्ञा० ४५ । अभिविवी, याथातथ्येनाभिविधिना वा यत् ख्यात-कथित मस्सपुर-अश्वपुरम् , पुरुषसिंहपुरम् । आव० १६२ । अकपाय चारित्रम् । प्रज्ञा० ६८। यथारख्यानम्-अकपा. अस्सपुरा - अश्वपुरी, पश्मविजयराजधानी। जं० प्र० यमित्यर्थ । विशे० ५४७। ययाख्यातं-सूक्ष्मसम्पगया. ३५७॥ नन्तर सर्वत्र साधुजीवलोके ख्यात-प्रसिद्ध, पनम मर्वविशुद्ध भस्तरोनिवाए - आमरोनिपातः, चापुटिका । जीवा० चारित्रम् । विशे० ५५५। यथाख्यात-ययवाख्यातम्- ३९९ । अपायम् । आव० ७८ । यथैवाख्यातं यथाख्यातं प्रसिद्ध अस्सलालापेलवं । आचा० ४२३ । सर्वस्मिन जीवलोके, अकपायचारित्रमिति । आव. ७.! आव० । -- (११०) १५ ""TIHTI [ अहक्खित्तो अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अहवण्णवेद ] ५०४। मग अथशब्दो यथार्थ , आख्यातं-अभिहितं अथाख्यातम् । | अहम्मजुत्तं-अधर्मयुक्तम् , पापसम्बद्धम् । दश० ५२ । ठाणा० ३२४ । अहम्मपलज्जणे-अधर्मप्ररजन', अधर्मे हिंसादौ प्ररज्यते अहक्खित्तो। नि० चू० प्र० १६४ अ । अनुरागवान् भवतीति। विपा० ४८ । अहगुरु-येन प्रवाजितो यस्य वा पार्श्व अधीत , रत्नाधि- अहम्माणी-अहंमानी, अहमेव विद्वान् इति मानोऽस्येति । कतरकः । व्य. द्वि० ३९५ अ । । आव० २४१ । अहछंदो-यथाछन्द , यथेच्छयैवागमनिरपेक्षं प्रवर्तते य । अहम्माणुए-अधर्मानुगः, अधर्मान्-पापलोकान् अनुगच्छ- आव० ५१८ । तीति । विपा० ४८ । अहछंदिया-अथाछन्दिका, अव्यापारिता, स्वयं प्रवृत्ता। अहम्मिट्ठा-अधर्मीष्टा अधर्मिष्ठा वा-धर्म:-श्रुतरूप एवेष्टो- बृ० द्वि० २६१ । वल्लभ पूजितो वा येषा ते धर्मेष्टाः, धर्मिणा वेष्टा धर्मीष्टाः अहण्णे-अधन्य । उत्त० ३२९ । अतिशयेन वा धम्मिणो धर्मिष्टास्तनिषेधादधर्मेष्टा. अध- अहतह-यथातथ, सूत्रकृताजाद्यश्रुतस्कन्धे त्रयोदशमध्ययनम्। hष्टा अधर्मिष्ठा वा । भग० ५६० । आव० ६५१। सूत्रकृताङ्गस्य त्रयोदशमध्ययनम् । उत्त० | अहम्मि?-अधर्मिष्ठ , अतिशयेनाधर्मो-धर्मरहित. । विपा ६१४ । ४८ । अधर्मेप्ट , अधर्मो-धर्मविपक्ष -पापमिति स इष्ट अहतानि । भग० ५०६ । अभिलपितोऽस्येति, यद्वा अधर्मगुणयोगादधर्म , अतिशयेना- महत्ता-अधस्ता, गुरुपरिणामता । प्रज्ञा० धर्म । उत्त० २७४ । २३ । जघन्यता। भग० २५३ । अहम्मियं-आधार्मिक-अधार्मिकाणामिदम् । प्रश्न ११० । महत्थे-यथास्थान् , यथावस्थितान् यथार्थान् वा-यथाप्र अहय-अहतम् , मलमूषिकादिभिरनुपदूषित, प्रत्यामिति । योजनान् भावान् जीवादीन् , यथा द्रव्यान् , पर्यायान । • ६६ । अव्यवच्छिन्नम् । औप० ७४ । अपरिम- .ठाणा० ३५१ । लितम् । जीवा० २५४ । तंतुम्गतं । नि० चू० प्र० अहप्पहाण-यथाप्रधान. । भग० ६७९, ६८३ । यथाप्र २५३ अ । आख्यानकप्रतिबद्धम् , अव्याहतं, नित्यं, नित्यानु धान , यो यत्र ग्रामादी प्रधान । ओघ० ५९ । बन्धि वा । जीवा० २१७ । प्रज्ञा० ८९ । जं० प्र०६३ । अहम-अधमम् , जघन्यम् । आव० ५८५ । अव्याहतम् । भग० १५४ । सूर्य० २६७ । अपरिभुक्तम् । अहमंती-अहं अता इति अन्तो-जात्यादिप्रकर्षपर्यन्तोऽस्या भग० २५४ । स्तीत्यन्त. अहमेव जात्यादिभिरत्तमतया पर्यन्तवर्ती । अहर-अधरम् , अध -नरकतिर्यक् । दश० २७२ । नरक । ठाणा ४७३ । आव० ५३२ . अहमिंदा-अहमिन्द्राणि, अहं अहं इत्येवमिन्द्रा । सम० ४३१ । अहरगतिगमणं- अधरगतिगमनम् , अधोगतिगमनकार- अहमो-अधम , मलाविलवाज्जुगुप्सित । सत्र. ८२ । णम् । प्रज्ञा० ३६८ । अहम्म-अधर्म , असयम । दश० २७१। धर्मविपक्ष अहराई-अहोरात्रिकी । आव० ६४८ । पापम् । उत्त० २७४ । धर्मप्रतिपक्ष । उत्त० २४८ । अध अहव-अथवा-अथार्थे । विशे० ११३० । र्म , अधर्मपोषक दान अधर्मकारणत्वात् । ठाणा० ४९६ । अहवण-अथवा । वृ० द्वि० १४ आ। विकल्पप्रदर्शने । नि. भारहरामायणादिपावसुत । नि० चू० हि० ४ आ । चू० प्र० २९० । विकल्पार्थो निपात. । वृ० द्वि० धर्मविपक्ष विषयासतिरूपम् । उत्त० २८५ । २४६ आ । अहम्मक्खाई - अधर्माख्यायिन , न धर्ममाख्यान्तीत्येवं अहवा-अनन्तरम् । नि० चू० प्र० १८ आ। अय निपात । शीला , न धर्मात् ख्यातिर्येषा ते। भग० ५६० । नि. चू० प्र० १६८ आ। अहम्मखाई-अधर्माख्यायी, अधर्मभापगशीले । अधर्मख्या अहव्वणवेद-अथर्वणवेद , चतुर्णा वेदानां चतुर्थ वेद । ति -अधार्मिक प्रनिद्धिको वा विपा० ४८ । भग. ११२ । - [ अहसंथडं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अहाभावो] T १९९। भग १९ । अहसंथर्ड-निष्प्रकम्पं चम्पकपट्टादि । वृ० तृ० ३१ अ । | महाजायं-रजोहरणमुखवत्रिकाचोलपट्युत. रचितकरपुटश्च । अहसिता-न सहेतुकमहेतुकं वा हसन्नेवास्ते । उत्त० ३४५ । बृ० तृ० १० आ। महसुद्धो-यथाशुद्ध , निर्दोषोपदेशदाता । वृ० तृ० ७१ आ। अहाडं-यथाकृतम् , परिकर्मशून्य । बृ० द्वि० २०२ आ। अहस्सिरे-अहसनशील। उत्त० ३४५ । अहाणी-असीयण । नि० चू० प्र० ५ आ। अहस्ससच्चे-अहास्यात्सल्य , हास्यपरित्यागात्सत्य , द्वितीयत्र- अहातचं-यथातत्त्वम् , तत्त्वानतिक्रमेण वर्तमानम् । भग० तस्य प्रथमा भावना। आव० ६५८। १२४ । सप्तसप्तमिकेत्यभिधानार्थानतिक्रमेणान्वर्थसत्यापनेने. महाभत्थं यथार्थम्-नियुक्त्यादिव्याख्यानानतिक्रमणेत्यर्थः । त्यर्थ. । ठाणा० ३८८ । शब्दार्थानतिक्रमेण । ठाणा. ठाणा० ३८८ । अर्थस्य नियुक्त्यादेरनतिक्रमेण । ठाणा० ५१९ । ५१९ । अहातच्चे-यथातथ्यो यथातत्त्वो वा, यथा-येन प्रकारेण महाउभकाल-यथायुष्ककाल , देवाद्यायुष्कलक्षण । दश० तथ्य-सत्य तत्त्वं वा । भग० ७०९ । अहातच्चो-जहेव दिहो तहेव जो भवति मो अहातच्चो महाउनिव्वत्तिकाले-यथायुर्निवृत्तिकाल , यथा-येन प्रका- भवति । नि० चू० द्वि० ८६ अ। रेणायुषो निर्वृत्तिः-बन्धनं, तथा य काल -अवस्थितिरसौ। अहापजत्तं-यथापर्याप्तम् । भग० १३९ । भगः ५३३। अहापडिरूवं - यथाप्रतिरूपम् । आव० महाउयं-यधायुष्कम् , यघाबद्धमायुष्कम् । प्रश्न. यथायुष्कम् । आव० ११५, २५८ । यथायु--आयुषोऽन- | अहापदं-यथापदम् । आव० ३५२ । तिक्रमेण । उत्त० १८८ । महाकडं-यथाकृतम् , गृहस्थेन स्वार्थ निर्वतितम् । प्रश्न अहापरिग्गहिए-यथाप्रतिगृहीतम् , यथाप्रतिपन्नम् । भग० १३६। १२७॥ महाकडा-आधाकृता, साधूनाधाय-सम्प्रधार्य कृता। बृ० अहापरिनाय-यावन्मात्र क्षेत्रमनुजानीषे तावन्मानं कालं तावन्मानं च क्षेत्रमाश्रित्य वयं वसाम इतियावत् । आचा० ४०३ । अहाकप्पं-यथाकल्पम् , प्रतिमाकल्पानतिक्रमेण तत्कल्पव- स्वनतिक्रमेण वा। भग० १२४ । कल्पनीयानतिकमेण अहापवत्तं-यथाप्रवृत्तम् । आव० ११५ । प्रतिमासमाचारानतिक्रमेण वा । ठाणा० ३८८ । अहाबायरा-यथावादरा., यथोचितवादरा आहारपुद्गला महाकम्पं-यथाकर्म, बद्धकर्मानतिकमेण । भग० ६५ । इत्यर्थ । भग० १८९ । यथावादराणि, स्थूलतरस्कन्धा. अहाकम्मिए । भग० ४६६ । न्यसारागि । भग० २५१ । महागडा-प्राशुकानि, अल्पपरिकर्माणि । ओघ० ९२ । अहावायरे-यथावादरम् , स्थूलप्रकारम् । भग० २५१। महागडे-यथाकृतम् , आत्मार्थमभिनिर्वतितम् । दश० ७२ । असारम् । भग० १५४ । अहाचरा-अधश्चरा बिलवासित्वात्सोदय । आचा. महाभांगो-यथाभद्रक. । आव० ७३९ । अहाभद्दे-यथाभद्र ,शासनवहुमानवान् । वृ० प्र० ३ ३ अ । अहाञ्चयं-दृष्टिवादे सूत्र मेद. । मम० अहाभद्दो-दाणच्यी । नि० चू० प्र० १९९ । ईसणविरहितो अहाच्छंदे-यथाछन्दान् , स्वच्छन्दान् । ओघ० ५६ । अरहंतेमु तस्मासणे माधू उभयभद्दगीलो । नि० चू० प्र० अहाछंद-यथाउन्दा -यथा कथञ्चिन्नागमपरतन्त्रतया छन्द. ३२५ अ। अभिप्रायो-बोध । भग० ५०२। यथा स्वाभिप्रेत तथा अहाभावो - स्वपरिग्रहे धारणम् । वृ० द्वि० २४ आ । प्रज्ञापयन् । नि० चू० द्वि० २३ आ। अधाप्रवृत्ति । नि० चू० प्र० २५१ आ। प्रतिस्वामित-प्रति. अहाजातो-अप्पोवधी । नि० चु० द्वि १:१ आ । गृहीतं न तु भुज्यते यत्पात्रादि । वृ० द्वि० ८६ आ। प्र० ९२ अ। २९१ । १२८ । (११२) . H . - [ अहामग्गं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अहिगरणं ] १२४ । दश० २१ । अहामग्गं-यथामार्गम् , ज्ञानादिमोक्षमार्गानतिकमेण क्षायो- | अहासुहुमबउस-बकुशस्य पञ्चमो मेदः । भग०. ८९० । पशमिकभावानतिक्रमेण वा वर्तमानम् । भग० उत्त० २५६ । यथासूक्ष्मवकुश , योऽक्ष्णोः पुष्पिकामपन- मार्ग -क्षायोपशमिको भावस्तदनतिक्रमेण । ठाणा० ३८८ । यति, शरीराद्वा धूल्यादिकमपनयति । उत्त० २५६ । अहारिणो-मनसोऽनिष्टा । आचा० २४२ । अहासुहुमे-यथासूक्ष्मान् सारान् । भग० १५५ । अहारिय-यथारीतम् , रीतं-रीति -स्वभाव , नस्यानति- | अहि-सर्पः, पृथिव्याश्रितो जीवविशेष । आचा० .. ५५ । क्रमेण वर्तते तत् , यथास्वभावमित्यर्थ । भग० २१२ । सर्प । उत्त० ६९९ । उर परिसर्पभेदः । सम० १३५ । यथाऽऽयम् । आचा० ३७९ । यथाऋजु । आचा० ३८१ । परिसर्पविशेष । प्रज्ञा० ४५ । अहालंद - मध्यममष्टपौरुषीमानम् । बृ० तृ० ३५ आ । अहिंडेतओ-अहिण्डमान , असहिष्णोद्धितीयभेद । आव० पोरिसी। नि० चू० तृ० १८ अ । जघन्येन तरुणीदकाईक ८५८ । रशोषकाल , उत्कृष्टत पूर्वकोटी । बृ० द्वि० ३२ आ । सजोग- अहिंसा-अनुकम्पा । प्रश्न० १०३ । प्राणातिपातविरति । वर्जिते तृतीय भेद । नि० चू० प्र० २३९ अ। यावन्मानं कालं भवाननुजानाति । आचा० ४०३ । अहिअ-अधिकम् , अहितम् , अपथ्यम् । ज० प्र० १६७ । महालहुस्सए-स्तोकप्रायश्चित्तदानम् । वृ० तृ० २०९ आ। अहिअगामिणिं - अहितगामिनीम् , उभयलोकविरुद्धाम् । दश० २३५। अहालहुस्सगाई-यथालघुस्वकानि, 'यथेति-यथोचितानि लघुस्वकानि-अमहास्वरूपाणि, महता हि तेषा नेतुं गोप- अहिउत्थ-अभ्युषित । उत्त० १२० । यितुं वाऽशक्यत्वादिति यथालघुस्वकानि, अथालघूनि- अहिकरणं-अधिकरणम् , गन्त्रीयन्त्रकादि । भग० १३५ । महान्ति वरिष्ठानीति वृद्धा । भग०। अहिकरणकरी- अधिकरणकर , योऽन्येषा कलहयति, अहावञ्चा-यथापत्यानि, पुत्रस्थानीया । भग० १९७ । द्वादशमसमाधिस्थानम् । आव० ६५३ । अहासंथडं-णिपकपं पढें । नि० चू० प्र० १७० अ । अहिकरणोईरण-अधिकरणोदीरण , योऽन्येषां यन्त्रादीन्यु- अहासंथडा-अचला। नि० चू० प्र० १६० आ। दीरयति, त्रयोदशमसमाधिस्थानम् । आव० ६५३ । अहासचं-यथासत्यम् , इद यन्मया कथित कश्यमानं च अहिकिच्च-अधिकृत्य-आश्रित्य । भग० २८ । तद्ययासत्यम् , याथातथ्यम् । आचा० १८३ । अहिक्खेव-अधिक्षेप , निन्दाविशेष । प्रश्न० ४१ । अहासन्निहिआ-यथासन्निहिता | आव० १७५ । अहिगमरुइ-अधिगमरुचि , विशिष्ट परिनानं तेन रुचि- अहासम्म-यथामाम्यम् , ममभावानतिक्रमेण वर्तमानम् । र्यस्यासौ । प्रज्ञा० ५८। अहिगमास-अधिकमास । दश० २७० । अहासुत्तं - यथासूत्रम् , सूत्रानतिक्रमेण । ठाणा० ३८८ ।। अहिगमो-अधिगम , विशिष्ट परिज्ञानम् । प्रज्ञा० ५० । सामान्यसूत्रानतिकमेण वर्तमानम् । भग० १२४ । ज्ञानम् । आव० ५३० । अभिगम -सेवा। मम० ५३ । अहासुहुमणियंठो - यथासक्ष्मनिर्ग्रन्थ , यथासूक्ष्म एतेषु अहिगरणं-अधिकरणम् , कलह । सूत्र० ६६ । वृ० तृ. सर्वेषु । उत्त० २५७ । १५२ आ। कूटपाशरूपम् । भग० ९३ । अधिक्रियते आत्मा अहासुयं-यथाश्रुत यथासूत्र वा । आचा० ३०१ । नरकादिषु येन तदधिकरण-अनुष्ठान बाह्य वा वस्तु चक्र. अहासुहुमकसायकुसील-कषायकुशीलस्य पञ्चमो मेद । महादि । आव० ६११ । कलह, यन्त्रादि वा । आव० ६५४ । ज्योतिषादि । आव० ६६२। अनुष्टान विटोपः, अहासुहुमपुलाए -पुलाकस्य पञ्चमो मेद । भग ८९० । बाह्य वा वस्तु चक्रसङ्गादि । भग. १८१ । अनुष्ठान यथासूक्ष्मपुलाक , पुलाकस्य पञ्चमो मेद । पञ्चस्वपि पुलाकेषु । वाह्य वा वस्तु। ठाणा० ४१ । वास्तुदूपलशिलापुत्रकगो. या म्तोक स्तोक विराधयति म । उत्त० २५६ । मयन्त्रकादि । आव ० ८३१। राटि । ओघ० १८२ । भग० १२४ । भग० ८९० । । (१९१३) [ अहिगरणकिरिया आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः अहिर्बुध्न ] अहिगरणकिरिया - अधिकरणक्रिया, दुर्गतौ ययाऽधि. ) अहिद्वित्तए-अधिष्ठातुम्-परिभोक्तुम् । वृ० द्वि० २१८ भ। क्रियन्ते प्राणिन सा । प्रश्न० ३७ । अहिद्वित्ता-अधिष्टाय, आरोहण कृत्वा । दश० ६१ । अहिगरणि-अविकरणि , सुवर्णकारोपकरणम्। जं० प्र० अहिठाणि-अधिष्ठाने, अपानप्रदेशे। ओघ०६९। २२६। अहित -अनुचितविधायी। वृ० प्र० २१४ अ । अपथ्यम् । अहिगरणिए-अधिकरणकर-कलहकरम् । आचा० ४२५ । उत्त० २७६ । अहिगरणिया-अधिकरणिकी-अधिक्रियते नरकादिष्वात्मा- अहितुंडए-आहितुण्डिकः, गारुडिन । दश० ३७ । ऽनेनेति अधिकरण-अनुष्ठानविशेष बाह्य वा वस्तु चक्रख- | अहिनंदइ - अभिनन्दति, बहु मन्यते । आव० ५९० । शादि, तत्र भवा तेन वा निवृत्ता, क्रियामेदविशेष । अहिन्नायदंसणे अभिज्ञातदर्शने-सम्यक्त्वभावनया भावि. भग० १८१ । अधिक्रियत आत्मा नरकादिपु येन तदधि त । आचा० ३०४ । करणम्-अनुष्टानं वाह्य वा वस्तु चक्रमहादि, तेन निर्वृत्ता अहिमडे-अहिमृत , मृताहिदेहः । जीवा० १०६ । क्रिया । आव० ६११। सम० १० । अहिमन्त्र-मन्त्रसाधनोपायशास्त्राणि । सम० ४९ । 'अहिगरणी-अधिकरणी, यत्र लोहकारा अयोधनेन लोहानि अहिमर-अभिमर., अभिमुखमाकार्य मारयति म्रियते वेति । कुट्टयन्ति । भग: २५१ । ओघ० १८ । राजादिघातकः । विशे० ७४७ । विशे० ९७१। अहिगरणे-अधिकरणसिद्धान्त । वृ० प्र० ३१ आ । अभिमुख परं मारयति यः स । प्रश्न. ४६ । अहिगारनिउत्तो-अधिकारनियुक्त । आव० ७३८ । अहिमरका-घातका । वृ० द्वि० ८२ आ । अहिगारो-अधिकार , प्रयोजनं, प्रस्ताव । आव० २७६ । अहिमार-अभिमार., वृक्षविशेषः । उत्त० १४३ । विशे० ८५९ । ओघत प्रपञ्चप्रस्तावरूप । दश० २७८। । अहिमासयम्मि-अधिकमासे । आव० ५५७ । आ-अध्ययनपरिसमाप्तेयोऽनुवर्तते स । दश० १३ । दश० १३ । अहियं-अधिक, अहितं वा अधिक, अपथ्य वा । भग० नियोग । प्रश्न० ६६ । प्रयोजनम् । दश० १३५ । व्य० प्र० ३०६ । अर्गलम्। उत्त० ६२३ । अर्गलं, शीघ्रतरम् । उत्त० ४ भ । तृप्ति । उप० मा० गा० ३७१ । ७ । अतिशयेन । जीवा० २२९ । जीवा० ३५५ । अहि- अहिगरिणता - अधिकरणिकी-खङ्गादिनिर्वर्तनी । ठाणा. तम् , अश्रेय । आचा० ३८ । ३१७ अहियपिच्छणिजं-अधिकप्रेक्षणीयम् । आचा० ४२३ । अहिछत्ता - अहिच्छत्रा -- नगरीविशेष । उत्त० ३७९ । अहियाते-अहिताय, अपभ्याय । ठाणा० पार्श्वनाथस्य धरणेन्द्रमहिमास्थानम् । याय। ठाणा० २९२। अपथ्याय । ठाणा० ३५८ ॥ जङ्गलेषु जनपदेष्वार्यक्षेत्रम् । प्रज्ञा० ५५ । सङ्गपरिहरणवि. । अहियासएजा-अविसहेत , वर्तयेत् , पालयेत । सत्र० पये पुरी। आव० ७२३ । अहिजुजिय-अभियुज्य, वशीकृत्य, आश्लिप्य वा। भग० । अहियासणा-अभिमहना, उपमर्गमहनम् । आव० ६६० । १३२ । अतिमहना। आव० ७९९ । अहिज-अधित्ल । उत्त० ३६२ । अहियासेत्तए-अभ्यामितुम् । दश० ९३ । अहिजिउं-अध्येतुम् , पठितुम् , श्रोतु, भावयितुम् । दश० । अहियासेमि - अभ्यासयामि-वेदनायामवस्थानं करोमि । १४९ । अपा. आचा० ४१८ । १६४। १३८1 ठाणा० २४७ । अहिट्ठए-अधिष्ठाता, तप प्रभृतीना कर्ता। दश० २३८ । अहियोगो-अभियोग , बलात्कार । वृ० तृ. २७ अ । अधितिष्ठति यथावत् करोति । दश० २५६ । अहिराया-अविराजा, मौल पृथिवीपतिः । वृ० तृ० ४ अ । अहिट्ठग-अधिष्टाता, कर्ता । दश० २०६। अहिरिवं-उत्रासनम् । व्य० प्र० १४९ भ। अहिट्ठाणं-अधिष्ठानम् , अपानप्रदेश । आव० ४१९ । अहिरीमाणा-अह्रीमनमः-अलजाकारिण. । आचा० २४१ । अहिहाणजुद्ध-अधिष्टानयुदम् । आव० ९८ । अहिर्बुध्न-उत्तरभाद्रपदादेवता। ज० प्र० ४९९ । (११४) [ अहिलाणं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः अहोरत्ता ] १९० आ। उत्त० ४४९ । अहिलाणं-मुखसयमनम् । भग० ४८०, ज० प्र० २६५ । | अहुमरेतो-उपद्रवन् । आव० २७३ । औप० ७१। मुखसयमनविशेष । जं० प्र० २३५ । अहे-अध , आकाश । सूर्य० ४५ । अथशब्दार्थे । बृ० द्वि० अहिलिंति-समागच्छन्ति । बृ० द्वि० १०८ अ । १७९ अ । आमन्त्रणार्थो निपात । भग० ४६० । अथ- अहिलोडिया- गोपालिकाख्यो हिंसकजीव । बृ० तृ० आनन्तर्यार्थोऽयं शब्द । भग० ८३, ८६ । गर्तायाम् । उत्त० २१३ । भूमितले। प्रज्ञा० ८० । अध । ठाणा० अहिल्लियाए-अहिन्निका, मैथुने दृष्टान्त । प्रश्न० ८९ । १६२। अथेति परिप्रश्नार्थ । ठाणा० ४०६ । अध.- अहिवई-अधिपति -आचाय । ओघ० ७४ । अधस्तात् नीचे । भग० २६९ । अथशब्दश्चेह पदत्रयेऽपि अहिवास-अधिवास -अवस्थान । भग० ४७० । प्रयाणामप्याश्रयाणा प्रतिमाप्रतिपन्नस्य साधो कल्पनीयतया अहिवासिऊण-अधिवास्य । आव० २६१ । तुल्यताप्रतिपादनार्थः । ठाणा० १५७ । यथार्थ, । ठाणा. अहिसंका-अमिशट्टा, तथ्यनिर्णय । सूत्र० ३९३ । ३२४ । अथशव्दार्थे । बृ० द्वि० १७९ भ। आवाकर्म । अहिसकणं-उस्सूरे आगच्छति । नि० चू० प्र० १४२ आ। वृ० प्र० ८३ अ। अभिष्वष्कणं-तस्यैव विवक्षितकालस्य सवर्द्धनं, परत कर- अहेपनगद्धरूवो-अध पन्नगार्द्धरूपः, अधस्तनं यत्पन्नग- णमित्यर्थ । बृ० प्र० २६८ आ । स्यार्द्ध तस्येव रूपमाकारो यस्य स , अध पन्नगाढवदति- अहिसरणेहिं-अग्गतो वा सरेति । नि० चू० द्वि० ४९ आ। सरलो दीर्घश्च। जीवा० २०६ । अध:-अधस्तनं यत्पन्न- अहिसरिया-अभिमृता । आव० ३७२ । गस्याड़ तस्येव रूपम्-आकारो यस्य सः । जीवा० ३६१ ॥ अहिसलागा-मुकुलि-अहिमेदविशेष । प्रज्ञा० ४६ । अहेऊहिं - अहेतुभि , क्रियावाद्यादिपरिकल्पितकुहेतुभिः । अहिसेया-अभिसेका, गणावच्छेदिनी । बृ० द्वि० २६३ अ। अही-अहि , सर्प , उर परिसर्पविशेष । जीवा० ३९ । प्रज्ञा० अहेवाए-अधोवात , योऽध उद्गच्छन् वाति वात स. । ४५ । मुकुलि-अहिमेदविशेष । प्रज्ञा० ४६ । सामान्यत. जीवा० २९ । सर्पः । ज० प्र० १२५ । अहेविगडे - अधोविकटे-अव -कुड्यादिरहिते छन्नेऽप्युपरि अहीणपडिपुन्नपंचिंदियसरीरं-अहीनप्रतिपूर्णपञ्चेन्द्रियश तदभावेऽपि च । आचा० ३०९ । रीर , प्रतिपूर्गानि स्वकीयस्वकीयप्रमाणत , प्रतिपुण्यानि अहेवियर्ड-पार्श्वतोऽपावृतं गृहम् । बृ० द्वि० १८१ अ । वा--पवित्राणि पक्षेन्द्रियाणि-करणानि यस्मिस्तत्तथा, अही. अहेसणिजे यथाऽसावुद्गमादिदोषरहित एषणीयो भवति नमङ्गोपाङ्गप्रमाणत प्रतिपूर्णपञ्चेन्द्रिय प्रतिपुण्यपञ्चेन्द्रियं चा तथाभूतो दुर्लभ । आचा० ३७६ । यथाऽसौ मूलोत्तर- गरीर । ठाणा० ४५८ । गुणदोषरहितत्वेनैषणीयो भवति, तथाभूतो दुर्लभ इति । अहीणपुग्नपंचिंदियसरीरं-अहीनानि-स्वरूपन पूर्णानि आचा० ३६८. मङ्ख्यया, पुण्यानि वा-पूतानि पञ्चेन्द्रियाणि यत्र तत्तया अहेसि-अभूवम् । आव० १४६ । अभूत् । उत्त० ४९६ । तदेवविधं शरीर यस्य स । मग० ५४१ । अहो-अध , अर्वाक् । आव० ८२७ । दीणभावे, विम्हए, अहीणो - अहीन , प्रकृष्ट , अधीनो वा वायत्त । प्रश्न आमंतणे य। दश० चू० ९६ । उदगथ्रोतोऽनुकुलम् । नि० ० चू० त० ६३ आ। अहीनग्रहणं-समग्रहणम् । व्य० प्र० ८६ आ । अहोकायं-अध काय पादलक्षण । आप० ५४७ । अहीलणिजं - अहीलनीयम् , अवज्ञातुमनुचितम्। उत्त. महोत्था-अभूत् । उत्त० ४७५ । ३६५ अहोधारं-अहतधारा चर्पा। आव० २९१ । अहुणुव्वासिय-अधुना यदुद्वमितम् । ओघ० ५७ । अहोधिय - नियतक्षेत्रविषयोऽवधिस्तद्रूप ज्ञानदर्शनम् । 'अहुणोत्तणो-अधुनातन । आव ४२१ । ठाणा० ४७३। अहुगोववन्ने-अधुनोपपन्न , अचिरोपपन्न । ठाणा० १८७ । अहोरत्ता-अहोरात्रा -त्रिंगन्मुहर्तप्रमाणा । ठाणा ० ८ । १३६१ (११५) [ अहोरत्ते आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आइण्णा ] - प . १४४ । प्रज्ञा० १४४ । अहोरत्ते-अहोरात्रम् । भग० ८८८ । ९८ । ईषद् भाषन्ते । ठाणा० १३६ । आचक्षते । आचा. अहोराइयाभिक्खुपडिमा - अहोरात्रप्रमाणा एकादश १७८ । भिक्षुप्रतिमा । सम० २१ । आइक्खगा-आख्यायका', शुभाशुभकथका । ज० प्र० अहोलोए-अधोलोक , तिर्यग्लोकस्याधस्ताल्लोक । प्रज्ञा० १४२ । य शुभाशुभमाख्याति । प्रश्न० १४१ । आइक्खणं-सहितोच्चारणम् । बृ० तृ. २५ अ। अहोलोयतिरियलोए-अधोलोकतिर्यग्लोक , यदधोलोक- आइक्खिए-मातंगविद्या यदुपदेशादतीतादि कथयन्ति डो. स्योपरितनमेकप्रादेशिकमाकागप्रदेशप्रतरं यच्च तिर्यग्लोकस्य ण्ड्यो वधिरा इति लोकप्रतीता । ठाणा० ४५१ । सर्वाधस्तनमेकप्रादेशिकमाकाशप्रदेशप्रतरम् , एतद्वयमपि । आइगर-आदिकर, ऋषभनामा भगवान् । उत्त० ६२० । आइञ्च - आदित्यः, अर्चिमालिविमानवासी द्वितीयो लोका. अहोवाए-अधोवात , अध उद्गच्छन् यो वाति वात स । कान्तिकदेव । भग० २७१ । आदिल्यमासो येन कालेना. दित्यो राशि भुक्ते । सम० ५६ । आदित्य । आव० प्रज्ञा० ३० । १३५ । सूर्य० २९२ । अहोविहारो-आश्चर्यभूतो विहार. । आचा० १०७ । अहोवेइया - अधोवेदिका, यत्र जान्वोरधो हस्तौ कृत्वा आइच्चजसाई-आदित्ययश प्रभृति । नन्दी २४२ । प्रतिलिख्यते सा। ओघ० ११० । जाणू हेढाओ द्वितेसु आइञ्चजसे-आदित्ययशा, भरतचक्रिपुत्र । ठाणा० ४३० । आइञ्चपेढं-आदित्यपीठम् । आव० १४६ । हत्थेसु पडिलेहेति । नि० चू० प्र० १८२ अ । अहोसिरा-अधःशिरम , अधोमुखाः । जं० प्र० १५४ । आइञ्चसंवच्छरे-आदित्यसवत्सर , युगभाविसंवत्सरविशेष । सूर्य० १६८ । 'पुढविदगाण' मित्यादिलक्षण सवत्सरविशेष । सूर्य० १७१ । आ आइज-आदेय -रम्य । प्रश्न० ८३ । आंगुल-व्याक्षिप्त । नि० चू० प्र० ३४७ अ । आइज्जा-आदेया, दर्शनपथमुपगता, उपादेया सुभगा च । आंटरगमादि-वनस्पतिविशेष । नि० चू० ० १५७ अ। जीवा० २७१। आई-निपात । भग० ६७५ । विस्मयतश्चर्यन्ते। ठाणा० | आइटुं-विशिष्टम् । वृ० तृ० ६६ अ । आविष्टा-अधिष्ठिता । ५२३ । वाक्यालद्वारे । भग० १७६ । वाक्यालङ्कारार्थ । ठाणा० ३२८ । प्रश्न० ११७ । अलङ्कारे । प्रश्न० १२६ । वाक्यालङ्कारे, अव- आइ(य)हि - आत्मर्द्धि , आत्मशक्ति , आत्मलब्धिर्वा । वारणे वा निपात । उपा० २७ । आदि -धर्मस्य प्रथमा भग० १०७, ४९० । प्रवत्ति । जीवा० २५५ । गणितप्रक्रियाया आदि (अगा. आइणग-चर्ममयं वस्त्रम् । जं० प्र० ३६ । मपकादिचर्म कसख्यान्यास )। सूत्र० ९। यस्मात्परमस्ति न पूर्वम् । निष्पन्नानि । आचा० ३९४ । अनु० ५४ । स्वमेद । अनु० ३४ । आजिनक-चर्ममयो वस्त्रविशेष । भग० ५४० । आइंखिणिया-डोम्बी तस्या कुलदैवतं घटीकयक्षोनाम स आइण्णं आइण्णं - आकीर्णम् , समन्तान्निक्षिप्तम् । भग० १५३ । प्रष्टः सन् करणे कथयति, सा च तेन शिष्ट-कश्रित सदन्य. सम्बाधन स्त्रीस्पर्शादिदोपा.। ओघ० ४८। आचीर्गम् । म्मै कथयति, घटीय मिट्ठ परिकहेइ । बृ० प्र० २१५ अ । नि० चू० द्वि० १५७ अ । भावितकुलम् । वृ०प्र० २७० आ आइअत्ती-सार्धचिन्तक । वृ० तृ० २४९ अ। आइण्णंतो-प्रोतयन् । आव० ४२७ । आइक(ग)रे-आदिकर , आदौ-प्रथमत श्रुतधर्मम्-आचा- आइण्णपोग्गलं-जं काकमाणादीहिं अणिवारियविपकिरण रादिग्रन्यात्मकं करोति तदर्थप्रणायकत्वेन प्रणयतीत्येवंशील. । (मास) नि.जति । नि० चू० तृ. ७२ अ । आइण्णा-आकुला । नि० चू० प्र० १८६ अ । माधूण काप- आइक्खंति-आख्यान्ति, मामान्यतः कथयन्ति । भगः गिजा । नि० चू० प्र० १८६ अ । सकुला । आचा० १३१॥ द्वि भग० ७॥ (११६) [ आइण्णे अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आउजिय] आइण्णे-षष्ठाने सप्तदश ज्ञातम् । उत्त० ६१४ | सम० आइस्सइ-आविश्यते-अधिष्टीयते। भग० ७४९ । आई-आदिः, ससार , धर्मकारणाना वाऽऽदिभूत शरीरम् । आइण्णो-आकीर्ण , गुणैाप्त: । जीवा० २७० । जात्य । सूत्र. १६२ । सामीप्यम् , व्यवस्था, प्रकार , अवयवश्च । औप० ७१। खित्तमिव खलियं गुणेहिं जयविजयाईहिं आपू प्रश्न. ७ । निवेश । औप० ५ । रिओ, अस्सो जातिरेव वा । दश० चू० १६५। आईए-आतीतः, आ-समन्तादतीव इतो-गतोऽनाद्यनन्ते ससारे | आचा० २८५। आइद्ध-आरब्ध । (मर०)। आदिग्ध , आलिङ्गित । प्रश्न ४१। आविद्ध , प्रेरित । आव० ६०२ । आईणं-आजिनकम् , चर्ममयं वस्त्रम् । जीवा० १९२ । आइन्नं - आचीर्णम् , आसेवितम् । आचा० ५ । आयरिय- आईणगं-आजिनकम् , चर्ममयं वस्त्रम् । जीवा० २१० । परंपर एण वालुकलाओ आदिण्ण णिम्मीसोवक्खड भासे. औप० ११० प्र० ५५ । ज० प्र० १०७ । निरया० १। वित त आइन्न । नि० चू० द्वि० १५७ । आत्मीया- आईय-आ समन्तादतीव इतो-गतोऽनाद्यनन्ते ससारे भ्रम- त्मीयाऽऽवासमर्यादानुलघनेन व्याप्ता ।भग० ३७। कल्प्यम्। णम् । आचा० २८६ । पिण्ड० १६५ । आकीर्गम्-राजकुलसङ्खड्यादि । दश० २८० । | आईयटे-आ-समन्तादतीव इता -ज्ञाता परिच्छिन्ना जीवा- आइन्नवर-जात्यप्रधान । भग० ३२२, ४८१ । दोऽर्था येन सोऽयमातीतार्थ आदत्तार्थो वा, यदिवाऽ- आइन्नसंलिपख-स्वयादिचित्राकीगं । आचा० ३८१ । तीता -सामस्त्येनातिकान्ता अर्था -प्रयोजनानि यस्य स आइन्ना-आकीर्णानि, गुणवन्ति । ज० प्र० २३२ । तथा, उपरतव्यापार । आचा० २८६ । आइन्ने-आकीर्ण , आकीर्यते-व्याप्यते विनयादिभिर्गुणैरिति | आउ - वैद्यकम् । आव० ६६० । भवस्थितिहेतव कर्म- जात्यादिगुणोपेत । उत्त. ३४९ । व्याप्त । उत्त० ३४८ । पुद्गला । आचा० १०२ । आइन्नो-आकीर्ण , सङ्कीर्ण , गुणव्याप्तो मनुष्यजन । औप० । आउंटणं - आकुचनम् , गात्रसङ्कोचलक्षणम् । आचा० ५७४ । २। विनीत । उत्त० ४८ । आचार्यगुणैराचारश्रुतसपदादि- भिर्व्याप्त.-परिपूर्ण । उत्त० ५५० । आउंटणपसारणं-आकुञ्चनप्रसारणम् । आव० ८५३ । आइमउ-आदिमृदु, प्रथमत कोमलम् । अनु० १३१ । आउटियं-सकोचितम् । भग० ६३१ । आइमूल-वृक्षादिमूलोत्पत्तावाद्यं कारणम् । आचा० ८७ । आउ-आयु , स्थिति । भग० २३६ । उताहो। वृ० प्र० आइयणं-अदनं, भक्षणम् । आचा० ७२६ । व्य० प्र० २५० अ। एति-उपक्रमहेतुभिरनपवर्त्यतया यथास्थित्यै- १८० अ । भोजनम् । बृ० द्वि० १२६ आ। समुद्देशनम्-भोज वानुभवनीयता गच्छतीति । उत्त० ३३५ । जीवित । ठाणा. १०८ | आयुः, कर्मविशेष । ठाणा. २२० । नम् । वृ० तृ. ४ आ। आपानम् । वृ० द्वि० ३४ अ। आउकाए-अकाय , पूर्वसमुद्र , पश्चिमसमुद्रो वा। सूर्य ठाणा० ३३१ । भूय प्रत्यापिबति । वृ० तृ० १८५ आ। आइयंति-आददति, गृहन्ति, बचन्तीत्यर्थ । ठाणा० ३२० । आइयति-आदत्ते । उत्त० १९८ । आउक्खएणं-आयु क्षयेग, आयु पूर्णीकरणेन । आचा० ४२१। आउखेम - आयु क्षेम-आयुष सम्यक पालनं । आचा० आइलं-आविलम्-गडुलम् । जीवा० ३७० । २९० । जीवित। आचा० २९१ । आइल्लचंदसहिय-उद्दिष्टचन्द्रमहित । सूर्य० २८० । । आउज्जं-आतोद्यम् , वादिन, मृदंगादि । आव० ५२८ । आइसुए - आदिश्रुत , सामायिकादिश्रुत । वृ० प्र० पम्हमेरीवशवीणाझादीनि । आचा० ६१ । ३८ आ। आउज्जंग-आतोद्यानम् , आतोद्यकारणम् । उत्त. १४३ । आइसुयं-पञ्चमलम् । वृ० तृ. २४९ आ। आउजिय-आयोगिक , उपयोगवान , जानी। भग० १४० । 0 - (१२७) .

[ आउजिया आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आउयकम्मस्स सं०] आउजिया-आयोजिका, आ-मर्यादया केवलिदृष्टया योजन २८२ आ| आवृत्त. व्यवस्थित । आत्रा० २७९ । सम- शुभाना योगाना व्यापारणम् । प्रज्ञा० ६०४ । न्तात् व्यवस्थितः । आचा० २७९ । आउजियाकरणं-आयोजिकाकरणम् । प्रज्ञा० ६०४ । आउद्देउ-आवर्ण्य । वृ० तृ. ३४ अ । आउजीकरणं-आवर्जीकरणम् , उदीरणावलिकाया कर्म- आउद्यो -व्यावृत्तः । उत्त० ३३२ । आवर्जित । हृष्टः । उत्त. प्रक्षेपव्यापाररूपम् । औप० ११० । आवर्जितकरणम् । ३३२। स्वस्थ । उत्त० ३५५। आव० २२० । उत्त० प्रजा. ६०४ । १०८ | आवृत्त । आव० ५७८, २९४, ५३६ २८७ ॥ आउज्जो-आवर्ज , आत्मानं प्रति मोक्षस्याभिमुखीकरणं- उत्त० ३२४ । आवर्जित । आव० ४१२ । आत्मनो मोक्ष प्रत्युपयोजनमिति, अथवा आवय॑ते-अभि. आउडिजमाण-'जुड' बन्धने, इतिवचनाद् 'आजोड्य. मुखीक्रियते मोक्षोऽनेनेति वा-शुभमनोवाकायव्यापारविशेष.। मानेभ्य' आसम्बध्यमानेभ्यो मुखहस्तदण्डादिना सह शत- प्रज्ञा० ६०४ । पटहशलादिभ्यो वाद्यविशेषेभ्य आकुट्यमानेभ्यो वा एभ्य आउट्ट-आकुट्टम् , आलजालम् । उत्त० १४६ । आवर्जित । एव ये जाता शब्दास्ते, आजोड्यमाना आकुट्यमाना एव वृ. द्वि० ३४ आ। वोच्यन्ते, अतस्तानाजोड्यमानानाकुट्यमानान् वा शब्दान् आउट्टइ-आवर्तते, प्रवर्तते । भग० २८९ । शृणोति, इह च प्राकृतत्वेन शब्दशब्दस्य नपुसकनिर्देश., आउट्टणं-आकम्पनम् । बृ० तृ. ८५ अ । अथवा आकुट्यमानानि-परस्परेणाभिहन्यमानानि । भग० आउट्टणया-आवर्तना, आवर्त्तते-ईहातो निवृत्यापायभावं प्रत्यभिमुखो वर्तते येन बोधपरिणामेन सः, तद्भाव', अपा- आउडेर-आजुडति, सम्बद्ध करोति, लिखति। ज० प्र० यपर्यायः। नन्दी १७६ । २५० । आकुट्टयति, ताडयति। जं० प्र० २२४ । आकु- ट्टयति। भग० १७३ । आवट्टति-निवर्तते । सूत्र० १९० । आवर्तते-निवर्तते तमा. आउत्त-आयुक्तम् , उपयोगपूर्वकम् । भग० १८४ । सम्यक् लोचयतीत्यर्थः । ठाणा० १३९। करोति। नि० चू० प्र० प्रवचनमालिन्यादिरक्षगतया । प्रज्ञा० २६८। उपयुक्त । ठाणा० २५६अ। ४०९ । प्रयत्नपरो मरणाराधनयुक्त । उपयुक्त । ओघ० आउट्टा - आराधिता। वृ० द्वि० ११२ अ। आवर्जिता। २०२। उपयोगतत्परम् । भोघ० १७६ । आयुक्त । व्य० ओघ० १५९ । द्वि० २६६ । आउट्टामो-प्रवर्तामहे। आचा० ३३१ । आउत्तगो-आवर्तक । उत्त० ३०४ । आउट्टावेज-अभिमुखयेत् । आचा० ३६४ । आउत्तियं-आयुक्तिकम् । उत्त० ११९ । आउट्टिाए-आकुट्या-उपेत्य । सम० ३९ । आउत्तो-आयुक्त , व्यवस्थित । दश० २२६ । आउट्टिजमाणं - आकोट्यमानम् , सङ्कोच्यमानम् । सूत्रों आउय-आयुष्कम् , जीवितम् । आव० ३४१। आयुष्क- २९८ । काल , देवाद्यायुष्कलक्षण । आव० २५७ । आउट्टि-उपेत्य । व्य० प्र० १६ आ । आउयकम्मस्स गालणा-आयु कर्मणो गालन, प्राणवधस्य आउट्टिय-जात्वा। आव० ७५८ । उत्तमार्थकृत आहार । द्वादश पर्याय । प्रश्न० ५। नि० चू० द्वि० ५५ आ। आउयकम्मस्स णिट्ठवणं-आयु कर्मणो निष्ठापनम् , प्राण- भाउट्टिया-भाउट्टिया नाम आभोगो जानान इत्यर्थ । नि० वधस्य द्वादश पर्याय. । प्रश्न० ५। चु० द्वि० ५९ आ। आवर्जिता । 'बृ० द्वि. १८६ आ। आयुकम्मरस मेय - आयु कर्मणो मेदः, प्राणववस्य द्वादश आउट्टी-समाधानम् । वृ० तृ० १२३ आ। पर्याय । प्रश्न० ५। आउट्टे - कर्तमभिलपेन् । आचा० ४१७ । निवर्तयेत् । आउयकम्मरस संवट्टगो-आयु कर्मण सवर्तक , प्राण- १११। आवर्तयेत्-अनुकृलयेन। व्य० द्वि० । वधस्य द्वादश पर्याय । प्रन० ५। -- आचा (१९८) - r - [ आउयकम्मस्सुवद्दो अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः आएस] । । । आउयकम्मस्सुवद्दवो-आयु कर्मण उपद्रव , प्राणवधस्य आउसं - आयु -जीवित तत्सयमप्रधानतया प्रशस्तं प्रभूत द्वादश पर्याय । प्रश्न. ५। वा विद्यते यस्यासावायुष्ममास्तस्यामन्त्रणम् । ठाणा० ७ । आउयबंधद्धा-आयुर्वन्धाद्धा। प्रज्ञा० ४८९ । आउसंत-आयुष्मान् , चिरजीवी। दश० १३७ । आवसन् आउयसंवट्टए-आयु सवर्तक-आयुरुपक्रम.। ठाणा० ६७ । गुरुमूलमावसन् वा । दश० १३७ । आउर-आतुर , शरीरसमुत्थेनागन्तुकेन वा व्रणेन ग्लान । आउसंतेण-आजुषमाणेन, श्रवणविधिमर्यादया गुरून् सेव- दश० २७० । क्षुधा पिपासया वा पीडित । व्य० प्र० मानेन । उत्त० ८० । भगवतेल्यस्य विशेषणमायुष्मता-चिर. २३ आ। दृष्टान्त । नि० चू० प्र० २०२ आ । आतुर , जीवितवता। सम० २। श्रवणविधिमर्यादया गुरूनासेव. क्वचिदपि स्वास्थ्यमलभमान सन् आकुल । जीवा० १२२ । मानेन । ठाणा० ९। आयुष्मदन्ते, आयुष्मता। नंदी आतुर -दुस्थ' । भग० ७०५ । ग्लाने सति प्रतिजागरणार्थ २१२। आजुषमाणेन-प्रीतिप्रवणमनसा। सम० (प्रतिसेवा)। ठाणा० ४८४ । अत्यन्ताकुलतनु, । उत्त० आयुष्मन् । सम० २। नंदी २१२ । आमृशता-गुरुकमयुगल ८६ । कामेच्छाऽन्धा' । आचा० २३८ । प्रतिसेवनामेद। सस्पृशता । सम० २। गुरुमूलमावसता । दश० १३७ । भग० ९१९ । आतुर,, चिकित्साया अविषयभूत । विपा. आवसता गुरुकुले। सम० २। आयुष्मन् , शिष्यामन्त्रणम्। ७६ चिकित्साया अविषयभूतो रोगी । बृ० प्र० २८१ आ। उत्त० ८० । मर्तुकाम । उत्त० २७३। आउसंवट्टण आयुरुपक्रम । नि० चू० प्र० २७४ अ । आउसणाहिं - आक्रोशना मृतोऽसि त्वमित्यादिभिर्वचनैः । आउरपञ्चक्खाण - नोपूर्वश्रुतप्रत्याख्यानमेदः । विशे० भग० ६८३ । १३२० । प्रकीर्गकनाम। आव० ८०४ । श्रुतप्रत्याख्या. आउसेइ-आक्रोशयति, शपति । भग० ६८३ । नम् । आव० ४७९ । अखास्थ्यमना । आचा० ७२ । आउसो-आयुष्मन् , पुत्रादेरामन्त्रणम्। भग० १३५ । आतुर -चिकित्साक्रियाव्यपेत तस्य प्रत्याख्यानवर्णनम् । आउस्स-आक्रोश , असभ्यवचनरूप । सूत्र. ९३ । नदी २०६ । अपूर्वश्रुतप्रत्याख्यानम् । आव० ४७९ । आउस्सियकरणं - आवश्यककरणम् , आवर्जिकरणम् । आउरसरणं-आरोग्गसाला। दश० चू० ५३ । प्रज्ञा० ६०४ । आउरस्सरण-आतुरशरणम् , दोषातुराश्रयदानम् । दश० | आउहं-आयुधम् , क्षेप्यं शस्त्रम् । प्रश्न० ४७ । अक्षेप्यम् । ११८ । आतुरस्मरणम् , क्षुधाद्यातुराणा पूर्वोपभुक्तास्मरण विपा० ४६ । खेटकादि । जीवा० २५९ । क्षेप्यास्त्रम् । भग० चानाचरितम् । दश. ११७ । १९४ । शस्त्रम् . अथवाऽऽयुधं-अक्षेप्यशस्त्रं खड्गादि । भग० आउरीभूएहि-आकुलीभूतै , आतुरीभूतै । वृ० प्र० ३९। ३१८॥ आउल-आकुलम् । व्यग्रम् । आव० ५८५ । प्रचुरम् । भग० आउहसाला-आयुधशाला-शस्त्रागारम् । आव० १४८ । ९५ । आकुल , स्कंध । विशे० ४२६ । गडुल, आदिल आऊ-आयु , एति-आगच्छति प्रतिवन्धकता स्वकृतकर्म- वा। सम० ५३ । वद्धनरकादिकुगतेनिष्क्रमितुमनसो जन्तोरिति । अथवा आ- आउलगमणं-आकुलगमन-एकत्र मिलिता गच्छन्ति।ओघ० समन्तादेति-गच्छति भवाद् भवान्तर तरमकान्तौ विपाको- १२६॥ दयमिति वा । प्रज्ञा० ४५४ । माउलमाउलं-आकुलाकुलम् , ज्यादिपरिभोगविवाहयुद्धा. आए-अनन्तकाय -कुहणविशेष । प्रज्ञा० ३३ । आत्मना। दिसस्पर्शननानाप्रकारम् । आव० ५७४ । ठाणा १३९ । आउला-आकुला, त्वरमाणा। वृ० द्वि० ६५ अ । आरस-प्राघूर्णक । ओघ० ६७ । निग । नि० ० आउलाकुल-आकुलाकुल , अतिव्याकुल । प्रश्न. ५० | १९ आ । प्राघूर्णक आयात.। ओघ० १०।। आउली-तडवडावृक्ष । जीवा० १९१ । आज्ञा । नि० चू० प्र० २८५ आ। आदेश-कृत्रिमकृत- आउलो-आकुल , अभिभूत । आव० ५८९ । भृकुटीभगादय । आचा. ९१ । प्राघूर्णक । आचा. (११९) [ आएसणं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आकाशगाः] -- मा० गा० - 1 १२९, ३५२ । कर्मकरादि । आचा० ४१५ । व्यापारनि- / आएसियं-आदेशम् , विभागौद्देशिकतृतीयभेद । पिण्ड ० ७९ । योजना । आचा० ३१८ । दृष्टात । आ० २६२ । आओ-आय , प्राप्ति । विशे० ४५० । उताहो । बृ० द्वि० आदिश्यते इत्यादेश आचार्यपारम्पर्यश्रुत्यायातो वृद्धवादो, ७ अ। भाग । आव० ३४२ । लाभ , उपादानं, हेतु । यमतिहमाचक्षते। आचा० २६२ । वृद्धवाद । आचा० विशे० ५४३ । ज्ञानादिनामायहेतुत्वादध्ययनम् । ठाणा० २६३ । प्राधूर्णक.। ठाणा० १३८ । उपचारो, व्यवहारः ६। भूमिस्फोटकविशेष । आचा० ५७ । (देशे प्रधाने च ) । ठाणा० २२३ । एतद्भविष्यतीत्यादि- आओग- आयोग , द्विगुणादिवृद्धया अर्थप्रदानम् । भग. निर्णय । उप० ११५। आदेग, विशेष., १३५। द्विगुणादिवृद्धयर्थ प्रदानम्। जं. प्र. आदिति मर्यादया विशेषरूपानतिक्रमात्मिकया दिश्यते अर्थलाभ । औप० १२। अर्थोपाय यानपात्रोष्ट्रमण्ड- कथ्यत इति । उत्त० ३२ । प्राघूर्गकसाधुः। आव० लिकादि । सूत्र० ४०७ । परिकर । औप० ६३ । २६३ । प्राघूर्णक । ओघ० १८३ । आदेश.-प्रकार सामा- आओगपओगसंपउत्ताई आयोगेन द्विगुणादिलामेन न्यविशेषरूपम्तत्र चादेशेन-ओघतो द्रव्यमात्रतया न तु द्रव्यस्य प्रयोग -अधमर्णाना दानं तत्र सम्प्रयुक्तानि-व्यापृ. तहतमर्वविशेषापेक्षयेतिभाव , अथवा आदेशेन-श्रुतपरिक तानि तेन वा सम्प्रयुक्तानि-सङ्गतानि तानि । ठाणा० म्मिततया। भग० ३५७ । आदेशः, कथनम् । उत्त० ४२२ । आयोगो-द्विगुणादिवृद्धयाऽर्थप्रदानं, प्रयोगश्च-फला. १४७ । सखडिविषयो दृष्टान्त । वृ० द्वि० १३५ आ । न्तर तो सप्रयुक्ती-व्यापारितो यैस्ते। भग० १३५ । उपचार । विशे० १३१५ । प्राघूर्णक । नि० चू० प्र० १४ आओगपयोगसंपउत्ते -आयोगप्रयोगा-द्रव्यार्जनोपायवि. आ। पाहुण्णक। नि० चू० प्र० २९३ आ। प्राघूर्णक । शेषा सप्रयुक्ता -प्रवर्तिता येन । ठाणा० ४६३ । वृ० द्वि० १९५ अ। प्रायश्चितप्रकार । वृ० द्वि० ९८ | आओडावेह-आखोटयति, प्रवेशयति। विपा० ७२ । आ। सूत्रमुच्यते । विशे० २३१। आदेशो नाम ज्ञातव- आओसे-प्रदोषे । ओघ० ७६ । स्तुप्रकार । स च द्विविध.-सामान्य प्रकारो विशेष प्रकारश्च । आओसेजा-आक्रोशयेत् । उपा० ४२ । विशे० २३० । असत्यार्थादेश । प्रश्न० १७ । विभ्यन्तरम् । | आओहणं-आयोधनम् , (युद्धम् ) । ठाणा० ४०२ । दश० १३ । व्यपदेश । आचा० ७४ । अभ्यर्हित । आकंदियं-आक्रन्दितम् , वा विशेषकरणम् । प्रश्न० २० । पाहुणकम् । उत्त० २७२ । अधिकार । वृ० आकंपइत्ता-यावृत्त्यादिभि आकम्प्य-आवर्ण्य । ठाणा २७६ आ । प्रकार. । विशे० ९२२ । अनुज्ञा । व्य० द्वि० ४८४। यदालोचनाऽऽचार्य यावृत्यकरणादिनावय॑ यदा- ३४६ अ । उपचारः, व्यवहार., स च बहुतरे प्रधाने लोचनम् । भग० ९१९ । वाऽऽदिश्यते । ठाणा० २२३ । नयान्तरविकल्प । व्य० आकट्टविकडिं-आकर्पवैकर्षिकाम् । भग० ६८५ । द्वि० ३५४ मा । आदिश्यते-आज्ञाप्यत इत्यादेश -कर्म- आकर्टि-आकृष्टिं । भग० ६८३ । करादि. । आचा० ४१५ । आकडविकहिं करेइ-आकविकटिं करोति, आकर्षविक- आएसणं-आवेशनं, अयस्कारकुंभ कारादिस्थानम् । औप० पिका करोति । भग० १६७ । १ । आकरणम् - आगरण, आहानम् । ओघ० २०४ । आपसणाणि - आदेगनानि-लोहकारादिगाला.। आचा० आकाशम् आहिति मर्वभावाभिव्याप्त्या काशत इति । उत्त० ६७२ । सर्वभावावकाशनात् , आ-मर्यादया कागन्ते- भाएसपर-आदेश -कर्मकरादि म चामी परश्रादेशपर । दीप्यन्ते पदार्थमार्था यत्र तत् । आ-अभिविधिना काशन्ते- आचा० ४१५ । दीप्यन्ते पदार्था यत्र तत् । अनु० ७४ । आलिति मर्यादया- आएसा-आदेश , प्रतिवचनमुत्पादव्ययध्रौव्यवाचकं पद स्वस्वभावापरित्यागरूपया कागन्ते-स्वर पणे। प्रनिभामन्ते प्रयम् । विशे० २९८ । तस्मिन्पदार्था इति । उत्त० ६७२ । वृ० प्र. ९१ अ । आपसावि-आगमिण्या । मत्र. ७६ । आकाशगा आगामगा, भूतविशेषा । प्रना. о (१२०) re - -[ आकासाहि अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आगमववहारी] । 1 आकासाहि-आकर्षय । आचा० ३७८ । आगंतुय-आगन्तुकः । दश० १०८ । आकासिइ-खाद्यविशेष । जं० प्र० ११८ । आगंतू-आगन्तुकः । उत्त० १९३ । आकिणं-अतिकीर्ण । नि० चू० तृ. १३ अ । आगंपिया-वशीकृता । नि० चू० द्वि० ९७ अ । आकुट्टि-हिंसा । आचा० ३०५ । आगइ-आगतिः, प्रत्यावृत्त्या-प्रातिकूल्येनागमनम् । आव० आकुट्टिय-उत्पेत्य । बृ० तृ० १२२ आ । २८१ । प्रज्ञापकप्रत्यासस्थाने आगमनम् । ठाणा० १३३ । आकुल-आकुल, व्याप्त• 1 ० प्र० १४८ । आगम- आगमनम्-आगम.-आ-अभिविधिना मर्यादया आकूतम्-अभिप्रेतम् । विशे० ८८५ । वा गम-परिच्छेद इति। आव० २६ । आचार्यपारम्पर्येणागतः, आकृष्टिविकृष्टि । व्य० प्र० ९४ आ । आप्तवचनं वा । अनु० ३८ । आगम्यन्ते-परिच्छिद्यन्ते अर्था आकेवलिआ-आफेवलिकाः, न केवलं अकेवलम् , तत्र अनेनेति, केवलमन.पर्यायावधिपूर्वचतुर्दशकदशकनवकरूपः । भवा आकेवलिका -सद्वन्द्वा -सप्रतिपक्षा इतियावत् अस. ठाणा० ३१७ । सूत्रार्थोभयरूपः । आव० ५२४ । आग- म्पूर्णा वा। आचा० २४१ । म्यन्ते-परिच्छिद्यन्ते अर्था अनेन इति आगमः-आप्तवचन- आकोट्टिमं - आकुट्टिकं यथा रूप्यकोऽधस्तादपि उपर्यपि सम्पाद्यो विप्रकृष्टार्थप्रत्यय । ठाणा० २६२ । गुरुपारम्पर्ये- मुख कृत्वाऽऽकुट्यते । दश० ८६ । णागच्छतीति आगमः, आ-समान्ताद्गम्यन्ते-ज्ञायन्ते जीवा- आकोडनं-आकोग्नम् , कुट्टनेनाले प्रवेशनम् । प्रश्न० ५७ । दय पदार्था अनेनेति वा । अनु० २१९ । आप्तप्रणीतः । आकोडेमाणे - उडेमाणे, आकुट्यमानम् , आहन्यमा- आचा० ४८ । (आगमसिद्धः)। ठाणा० २५ । सूत्रम् । आव. नम् । भग० २५१। ६०४ । श्रुतपर्याय । विशे० ४१६ । अध्ययनम् । आव० आकोसायंतं-आकोशायमानम् , विकचीभवत् । जीवा० ३०० । आगम , प्राप्ति । दश० १६ । सङ्ग्रहम् । ६० २७१। ज० प्र० १११ । प्र० ३२ आ। अर्थपरिज्ञानम् । व्य० प्र० २५१ आ । आक्षोधुका-क्षुधा रहिता। दश० १२७ । आ-अभिविधिना सकलश्रुतविषयव्याप्तिरूपेण मर्यादया वा आख्यातिकम्-क्रियाप्रधानत्वात् धावतीति । अनु० ११३। यथावस्थितप्ररूपणारूपया गम्यन्ते-परिच्छियन्तेऽर्था येन आख्यायिकास्थानानि - अक्खाइयठाणाणि, कथानक- स । नंदी २४९ । आगच्छति गुरुपारम्पर्येणेत्यागम । स्थानानि । आचा० ४१३ । भग० २२२। आगमः । विशे० ४३२ । आगंतागारं-गामपरिसट्ठाण, आगंतागार-बहिया वासो । नि० चू० प्र० १८३ अ । आगन्तुकानां कार्पटिकादीनाम- आगमकुसला-आगम:-श्रुतिस्मृत्यादिरूपस्तस्मिन् कुशला- गारमागन्तागारम् । सूत्र. ३९३ । ग्रामादेर्वहिरागत्यागत्य घागमकुशलौ । उत्त० ५२१ । पयिकादयस्तिष्ठन्ति । आचा० ३६५। आगमणं-प्रयोजनपरिसमाप्तौ पुनर्वसतिं गमनम्। भाव० आगंतार-यत्रागारिण आगत्य तिष्ठन्ति तदागन्तुकागारम् । ५७३ । आकसण । नि० चू० तृ० ६३ आ । बृ० तृ० ४८ आ। प्रसायाता आगत्य वा यत्र तिष्ठन्ति | आगमणगिहं - सभाप्रपादेवकुलादिपथिकस्थानम् । वृ० तदागन्तारम् , तत्पुनामानगराद्वा वहि स्थान तत्र । द्वि० १७९ आ। आगमनगृह-सभाप्रपादि, पधिकादीनामा. आचा० ३०७ । आगन्तागारम् (धर्मशाला )। आचा० गमनेनोपेत, तदर्थ वा गृहम् । ठाणा० १५७ । ३०६ । पत्तनादहिहम् । आचा० ३४८ । आगमतः-आगममाश्रित्य (ज्ञानापेक्षयेत्यर्थ)। अनु० १४ । आगंतु-आगन्तुक -पथिकादिरगारस्थजनो यत्रागल्य सन्तिष्ठते । आगममाणे आगमयन्-आपादयन् । आचा० २७८ । वृ० द्वि० १७९ आ। २८३ । अवगमयन, बुध्यमान | आचा० २४५ । आगंतुओ-आगन्तुक', कण्टकादिप्रभव.। आव० ७६४ । आगमववहारी-आगमववहारी,छबिहे-केवलणाणी ओही. आगंतुगो-आगामुक । आव० २७० । आगंतुएण सत्या णाणी मणपज्जवणाणी चोद्दसपुवी अभिण्णटमपुव्वी णव. तिणाकओ जो मो। नि० चू० प्र० १८८ आ । पुच्ची या नि० चू० तृ. १०० भ। आगमव्यवहारिण , (१२१) " [ आगमसत्थ आचार्यश्रीमानन्दसागरसूरिसङ्कलितः आगाढपण्ण] व्यवहारपञ्चके प्रथममेदः । व्य० प्र० ५ अ । प्रत्यक्षज्ञानिनः । आगर - आकर, यत्र सनिवेशे लवणाद्युत्पद्यते। ठाणा. ध्य० प्र०६३ । ४४९ । उत्पत्तिस्थानम् । (मर०)। अन्त० ७६ पृथिव्या- आगमसत्थ-आगमशास्त्रम् , आ-अभिविधिना सकलश्रुत. द्याकर.! आव० ६२२ । लोहायुत्पत्तिभूमिः । ठाणा. विषयव्याप्तिरूपेण मर्यादया वा यथावस्थितप्ररूपणारूपया २९४, ७८६ । आकरः, हिरण्याकरादि। प्रज्ञा. ४८॥ गम्यन्ते-परिच्छिद्यन्तेऽर्था येन स आगमः, स चैवं व्युत्पत्त्या खानि । प्रश्न० ३८ । ओघ० ९ । रलादीनामुत्पत्ति अवधिकेवलादिलक्षणोऽपि भवति ततस्तद्वयवच्छेदार्थ भूमि । प्रश्न० १३४ । उत्त० ६.५। हिरण्याकरादिक । विशेषणान्नरमाह-'शास्त्रे ति शिष्यतेऽनेनेति शास्त्रमागमरूपं जीवा० २७९ । लोहाद्युत्पत्तिस्थानम्। प्रश्न० १२७ । शास्त्रमागमशास्त्रम् । नंदी २४९ । अनु० १४२ । आगत्य तस्मिन्कुर्वतीत्याकरः । आचा० ५। आगमिपल्लगो-ज्ञातः । आव० ३१७ ॥ हिरण्याकरादिः। जीवा० । ४० । लोहागुत्पत्तिस्थानम् । आगमिओ-आगमितः, ज्ञातः । आव० ४३७ । भग०.३६ । भिल्लपल्ली भिलको वा । नि० चू० तृ० ५२ आगमियं-ज्ञातम् । आव० ११६ । ओघ० १०५ । ज्ञातः । भ। बृ० द्वि० २४६ अ। कुत्रिकापणादि । वृ० द्वि० आव० ३१६ । २४२ अ । जत्थ घरट्टादिसमीवेसु वहुं जव भुमु सो । नि० चू० आगमियाणि-प्राप्तानि, अधीतानि । आव० ४३३ । प्र० ६२ म। रूप्यसुवर्णाद्युत्पत्तिस्थानम् । नंदी २२८ । आगमिस्सं-आगमिष्यम् , आगामि । आचा० १६७ । सुवर्णादेरुत्पत्तिस्थानम् । ओघ० ९५। ताम्रादेरुत्पनिस्थानम् । आगमिसस्समद्दत्ताए - आगमिष्यदिति - आगामिकाल. आचा० ३२९ । सुवर्णादिधातूनां खानि.। नि० चू० भावि भद्र-कल्याण यस्मिँस्तथा तस्य भावस्तत्ता तया, यदि द्वि० ७० आ। वाऽऽगमिष्यतीत्यागमः-आगामी कालस्तस्मिन् शश्वद्भद्र- आगरमहेसु-आकरमहो-खानिमहोत्सवः। आचा० ३२८ । तया अनवरतकल्याणतयोपलक्षितम् । उत्त० ५८५ । आगररूवं-आकररूपम् । 'भग० १९३॥ आगमिस्सा-आगामिकाल । आव० ५३२ । आगरिस-आकर्ष -चारित्रस्य प्राप्ति.। भगः ९०५। आकर्ष:- आगमेति-जानाति । विपा० ७३ । तथाविधेन प्रयत्नेन कर्मपुद्गलोपादानम्। 'प्रशा० प्रशा० ०१८॥ आगमेयवं-आगमयितव्यम्-ज्ञातव्यम् । वृ० प्र० १९२ । आकर्षणम् , प्रथमतया मुक्तस्य वा प्रहणम् । आव० आगमेसा-आगमिष्यन्ती । आव० १७४ । ३६३ । एकानेकमवेषु प्रहणानि । आव० १०५। आक- आगमेसिभदा-आगमिष्यत् भद्रा-द्वितीयभवे अन्तकृतः । पगमाकर्ष:-एकस्मिन्नानाभवेपु वा पुन: पुन: मामायिकम्य उपा. २९) ग्रहणानि प्रतिपत्तये। अनु० २६० । आगमेस्संति - आगमिम्यामि-गृहीष्यामि । व्य. द्वि आगलणं-वैकल्पम् । व्य० प्र० १३२ आ। आगलति-आकलयन्ति, जेष्याम इत्यध्यवस्यन्ति । भग आगमेस्सा-भविष्यत. (मर०)। १७४। आगमेस्साणं-आयत्याम् । आव० ३५८ । भविष्यताम् । आगलेइ-गृहाति। उप. मा. गा० ३१३ । (महाप्र०)। आगमोग-आगमौक , पथिकाद्यगारिणां स्थानं, तेषा आग. आगल्लो-ग्लानः। ६० तृ. १२२ आ । मने वा यद् गृहं तत् । वृ० द्वि० १७९ आ । आगसणं-आकृष्यत इति आगमण तं च दविणं । नि. आगयं-आगतम्-स्वीकृतम् । आचा० १८१ । चू० प्र० १७४ आ। आगया-आगता--सिद्धा.। रागद्वेषाभावात् पुनरावृत्ति- आगाढ-कर्कशम् । वृ० द्वि०७३ आ। तीवः (आव० ५८८ । रहिता' मर्वज्ञाः । आचा० १६७ । अत्यर्थम् । व्य० प्र० २५२ अ । आगयपण्हय आयातप्रश्रवा पुत्रस्नेहादागतम्तनमुखस्त- आगाढजोग-आगादयोगः, गणियोग । ओघ० १८१६ न्येत्यर्थ । भग० ४६० । आगाढपण्ण-आगाढप्रज; आगाढा-अवगाटा परमार्थ- ४१८ आ। . (१२२) [ आगाढो अल्पपरिचितसद्धान्तिकशब्दकोषः आघं] प्र० १९७ ॥ पर्यवसिता तत्त्वनिष्ठा प्रज्ञा-बुद्धिर्यस्यासौ। सूत्र. २३७ ॥ तत्र मर्यादायामाकाशे भवन्तोऽपि भावा. स्वात्मन्येवाऽऽसते शास्त्राणि । व्य० प्र० २२६ अ। नाकाशता यान्तीत्येवं तेषामात्मसादकरणाद् , अभिविधौ तु आगाढो-आगाढतरा जम्मि जोगे जतणा सो। नि० चू० सर्वभावव्यापनादाकाशमिति। ठाणा० ५५। 'आङ्' इति मर्या- दया स्वस्वभावापरित्यागरूपया काशन्ते-स्वरूपेण प्रति- आगामिपहं-आगामिपथ , आगामिनो-लब्धव्यस्य वस्तुन' भासन्ते अस्मिन् व्यवस्थिता पदार्था इत्याकाशम् , यदा पन्था । ठाणा० ९८ । त्वमिविधावाङ् तदा आङ्' इति सर्वभावामिव्याप्त्या आगार-गृहम् । अनु० २४४ । आकारः आक्रियतेऽनेना काशते इत्याकागम् । प्रज्ञा० ९ । आकाशम्-तृणादिरहितम् । मिप्रेत ज्ञायत इति, बाह्यचेष्टारूप । आव० । आव० २८१ वृ० प्र० ९१ अ । आ-मर्यादया अभिविधिना वा सर्वेऽर्थाः प्रत्याख्यानापवादहेतवोऽनाभोगादय । आव० ८४० । आ काशन्ते-स्व स्वभावं लभते यन्न तदाकाशम् । भग० ७७६ । कार - आक्रियत इत्याकार -प्रत्याख्यानापवादहेतुर्महत्तराद्या आठिति मर्यादया स्वस्वभावापरित्यागरूपया काशन्ते-स्वर- कार ।भग० २९६ । आकारा -प्रत्याख्यानापवादहेतवोऽना. पेणैव प्रतिभासन्ते तस्मिन्पदार्था, इत्याकाश, यदा त्वभिविधा- भोगादय । ठाणा. ४९८ । शरीरगता भावविशेषा । व्य० वा तदा आङिति-सर्वभावाभिव्याप्त्या काशत इति। उत्त. प्र. ६४ आ। प्रतिनियतोऽर्थग्रहणरिणाम । प्रज्ञा० ५२६ । ६७२। तच्छायामात्रम् । प्रज्ञा० ३७१ । प्रत्याख्यातापवादहेतुरनाभो- आगासगामितं-आकाशगामित्वम् । ठाणा० ३३२ । गादिः । आव० ८४० । बाह्यचेष्टारूप । विशे० ८८५ । आगासगयं-आकाशगतं-व्योमवर्ति आकाशकं वा-प्रकाश- आकृतयः, खरूपाणि । अनु० १३१। ठाणा० ३९५ । दिग मित्यर्थ । सम० ६१ । वलोकनादि । बृ० प्र० ४३ अ। आकृतिः । जीवा० २०७। आगासतल-आकाशतलम् ।जीवा० २६९ । कटाद्यच्छन्न- प्रभा । जीवा० २६५ । प्रतिवस्तु प्रतिनियतो ग्रहणपरि कुट्टिमम् । जं० प्र० १०६ । आव० ६९५, ६९९ । णाम. । जीवा० १८ । मूर्ति । जीवा० २७३ । विशेषाश- | आगासथिग्गलं - आकाशथिग्गलं, शरदि मेघापान्तराल- ग्रहणशक्ति । भग. ७३ । स्थूलधीसवेद्य प्रस्थानादिभावा वाकाशखण्डम् । प्रज्ञा० ३६० । शरदि मेघमुक्तमाकाश- भिव्यञ्जको दिगवलोकनादि. । उत्त० ४४ । सनिवेशविशेष । खण्डम् । जं० प्र० ३२ । सूर्य० २९३ । आगासफलिहं-आकाशस्फटिकम् , अतिस्वच्छस्फटिकवि- आगारधम्म - आगारधर्म -द्वादशव्रतरूपो गृहस्थधर्म । शेष । जीवा० २५३ । जं० प्र० २७५ । भग० १० । आगारभाव-आकारभाव , स्वरूपविशेष । जं० प्र० १८ । आगासफलितोवमा-आकाशस्फटिकोपमा। प्रज्ञा० ३६४ । जीवा० १७६ । आकार एव भाव । आव० ३३८ । आगासफलोवमाइ-खाद्यविशेषः। जं० प्र० ११८ । आगारभावपडोयारे-आकारभावप्रत्यवतारः,आकारस्य- मागासवासिणो- जातिजुगितविशेषाः । नि० चु० वि० आकृतेर्भावा -पर्याया , अथवा आकाराश्च भावाश्च आकार- ४३ आ। भावास्तेषा प्रत्यवतार -अवतरणमाविर्भाव. । भग० २७७ । आगासाइवाई-आकाशादिवादिन., अमूर्तानामपि पदार्थानां आगारभावमायाए-आकारभाव एव आकारभावमात्र । साधन(ने) समर्थवादिन । औप० २९ । आकाशातिपातिन आव० ३३८ । आकाश-व्योमातिपतन्ति-अतिक्रामन्ति आकारागामिविद्या- आगारमेप-आकारमेद । प्रज्ञा० ५३१ । प्रभावात् पादलेपादिप्रभावाद्वा आकाशाद्वा हिरण्यपृष्टयादिक- आगाल-आगाल , आगालनमागाल -समप्रदेशावस्थानम् । मिष्टमनिष्टं वाऽतिशयेन पातयन्तीत्येवंशीलाः। औप० २९ । आचा० ५। आगासिया-आकाशिता, आकागं-अम्बरमिता-प्राप्ता, आगास - आकाशम् , अनावृत्तस्थानम् । प्रश्न० १३८ । आकर्षिता वा-आकृष्टा, उत्पाटितेति वा । औप० २२ । आकाशम् , सर्वद्रव्यस्वभावानाकाशयति-आदीपयति तेषा आघं-सूत्रकृतागे प्रथमश्रुतस्कधे दगमाध्ययननाम । सूत्र० स्वभावलामेऽवस्थानदानादिति,आङ्-मर्यादाऽभिविधिवाची, १८६ । आख्यातवान् । सूत्र. १८८॥ - . (१२३) [आधसणं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आजिणवरमहो] - आघसणं-एतेहिं एवं सिं आघसण । नि० चू० द्वि० ११९ अ । पूर्वपुरुषाचरितो ज्ञानाद्यासेवन विधि., तत्प्रतिपादको प्रन्य.। नि. चू० प्र० १९० अ। नंदी २०९। चारित्रम् । उत्त० ५८३ । आचरणमाचार - आघवइत्ता-धर्ममाख्याय, आख्याय सामान्यतो यथा उचितक्रिया विनय इतियावत् । उत्त० ३४४ । कार्यों धर्मः । ठाणा० ११९ । आख्यायक -प्रज्ञापकः । आचारप्रणिधि:-(आयारपणिही), दशवैकालिकस्याष्टम- ठाणा० २६७। मध्ययनम् । दश० २२४ । आववउ-आख्यातः, तस्मिन् क्षेत्रे प्रसिद्ध । आव० ५२४ । आचारवस्तु - (आयारवत्थू), नवमपूर्वगततृतीयवस्तु । आघवणा-आख्याना। उपा० ४७ । उत्त० २५८ । आधविए - आख्यात , सामान्यविशेषपर्णयाभिव्याप्तिकथ- आचारसम्पत्-( आयारसपया), सयमध्रुवयोगयुक्ततादि- नेन । उत्त० ५९८ । चतुर्भेदभिन्ना सम्पत् । उत्त० ३९ । आधविजंति-प्राकृतशैल्या आख्यायन्ते-सामान्यविशेषाभ्या आचारिकम्- (आयरियं), निजनिजाचारभवमनुष्टानम् । कथ्यन्ते । सम० १०९। नंदी० २१२।। उत्त० २६६ ।। आघवियं- अर्घापितम् , अर्घ.-पूजा तस्य आपः-प्राप्ति आचार्यपरिभाषित्वम् - (आयरियपरिभासितं ), पञ्चम- र्जाता यस्य तत् , अर्घ वा आपितं--प्रापितं यत्तत् । प्रश्न समाधिस्थानम् । प्रश्न० १४४ । ११३ । आचालो-आचालः, आचाल्यतेऽनेनातिनिविड कर्मादीला. माघवे - आख्यापयति सामान्यविशेषरूपतः । ठाणा० चाल. । आचा० ५। ५०२ । भग० ७११। आच्छिदणं - एकसि ईषद्वा छेदनम् । नि० चू० प्र० आघवेज-आग्राहयेच्छिष्यान् अर्घापयेद् वा-प्रतिपादनत. १८९ । पूजा प्रापयेत् । भग० ४३६ । आजवंजवीभाव-पुन: पुनर्भमणभाव । आचा० ७९ । आघाम,०ए-आघात । दश० २०१। मरणम् । सूत्र० उत्त० ३३६। १७८ । तथाविधयतनयाऽन्यप्राणिनामात्मनश्च विधिवत् सलि. आजवंजवे-अजवजवी, पुनः पुनर्धममाम् । आचा० १६१ । खितशरीरतया यस्मिस्तत् । उत्त० २४९ । आजाइ-आजायन्ते तस्यामित्याजाति , आचारपर्याय. । आघातणं-आघातनम् , यत्र सङ्ग्रामे बहुनि मृतानि तत् । आचा० ६ ।आजाति-मनुष्यजन्म गर्हिता जात्यैश्वर्यरूपा- आव० ७४४ । दिरहिततया। ठाणा० ठाणा० ४१९। सम्मूर्छनगर्भोषपाततो आघातो-जावतो भूतो अगणि मगासमलियते ते सव्वे जन्म। ठाणा० ५१२। च्युतस्योवृत्तस्य, वा कुमानुषत्व- घातयतीति । दश० चू० ९८ । तिर्यक्त्वरूपा गर्हिता कुमानुषादित्वादेव । ठाणा० १३२ । आधादियं-कथयित्वा । नि० चू० द्वि० ७१ अ । आजाइसहस्स-आजातिसहस्रम् , अनेकेषु देवादिजन्मम आघायठाणं-आघातस्थानम् , धधस्थानम् । आव० ७४१। प्रतिजीवं क्रमप्रवृत्तेषु अधिकरणभूतेषु वहन्यायुष्कसहस्राणि त आघायणं-आघातनम् , वभ्यभूमिमण्डलम् । प्रश्न० ५९ । त्स्वामिजीवानामाजातीना च बहुशतसहस्रसह्वयत्वात् । भग० जत्थ (मूपकादि) हतो त । नि० चू० तृ० ७२ अ। २१५ । आघायाय-आघातयन् , सलेखनादिभिरपक्रमकारणै सम आजिणभदो-आजिनभद्रः, आजिने द्वीपे पूर्वाधिपति- न्ताद्धातयन-विनाशयन । उत्त० २५४ । देव । जीवा० ३६९ आचरिय-आचरितम् , कल्प्यम्। दश० ११६ । आजिणमहाभद्दो-आजिनमहाभद्र , आजिने द्वीपेऽपरार्धा- आचार:-(आयार), चक्रवालमामाचारीरूप । वृ० प्र० धिपतिर्देव । जीवा० ३६९। २४९ आ । साध्वाचारप्रतिपादको ग्रन्थ । विशे० ६४८ । आजिणयं-आजिनकम् , चर्ममयं वनम् । जीवा० २६९ । शास्त्रविहितो व्यवहार । उत्त० ७११। व्यवहार । ठाणा० आजिणवरभद्दो-आजिनवरभद्र , आजिनवरे द्वीपे पूर्वा ६४ । वेषधारणादिको बान्य क्रियाकलाप । उत्त० ४९९।। धिपतिर्देव । जीवा० ३६९ । - 1 (१२४) [ आजिणवरमहाभहो अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आढणं ] प्रज्ञा० । आजिणवरमहाभद्दो - आजिनवरमहाभद्र , आजिनवरे | आजीवभयं-आजीविकाभयम् , निर्धन कथं दुर्भिक्षादावा- द्वीपेऽपरार्धाधिपतिर्देव. । जीवा० ३६९ । त्मान धारयिष्यामीति भयम् । आव० ६४६ । वृत्तिभयम्। आजिणवरमहावरो-आजिनवरमहावर, आजिने समुद्रे प्रश्न. १४३ । दुर्जीविकाभयम् । आव० ४७२ । आजिनवरे समुद्रे चापरार्धाधिपतिर्देव । जीवा० ३६९ । आजीवियसुत्तपरिवाडीए-आजीविकसूत्रपरिपाट्याम् गो- आजिणवरावभासभद्दो-आजिनवरावभासभद्र , आजिन शालकमतप्रतिवद्धसूत्रपद्धत्याम् । सम० ४२ । वरावभासे द्वीपे पूर्वार्धाधिपतिर्देवः। जीवा० ३६९ । आजीविया- आजीविकाः, पाषण्डिविशेषा , नाग्न्यधारिणः आजिणवरावभासमहाभद्दो-आजिनवरावभासमहाभद्र', गोशालकशिष्या , आजीवन्ति वा येऽविवेक्लिोकतो लब्धि- आजिनवरावभासे द्वीपेऽपरार्धाधिपतिर्देव । जीवा० ३६९ । पूजाख्यात्यादिभिस्तपश्चरणादीनि ते आजीविकाऽस्तित्वेनाजी- आजिणवरावभासमहावरो-आजिनवरावभासमहावर , विका । भग० ५० । पाखण्डविशेषा., गोशालमतानुसारिणः, आजिनवरावभासे समुद्रेऽपरार्द्धाधिपतिर्देव । जीवा० ३६९। आजीवंति येऽविवेकतो लब्धिपूजाख्यात्यादिभिश्वरणादीनि । आजिणवरावभासवरो-आजिनवरावभासवर , आजिन ४०६ । औप० १०६ । आजीविका -गोशालक- वरावभासे समुद्रे पूर्वार्धाधिपतिर्देव । जीवा० ३६९ । शिष्या । भग० ३६७ । ठाणा० २३२ । आजीविका. आजिणवरावभासो - आजिनवरावभास , द्वीपविशेष , गोशालकप्रवर्तिता । सम० १३० । समुद्रविशेषश्च । जीवा० ३६९ । आजीवी-वेषविडम्वक. । उप. मा. गा० २९८ । आजिणवरो-आजिनवरः, आजिने समुद्रे, आजिनवरे समुद्रे | आजोमणंतरं-आयोजनान्तरम् , योजनपरिमाणम् । आव० च पूर्वार्धाधिपतिर्देव । जीवा० ३६९ । द्वीपविशेष , समुद्र. २३१ । विशेषश्च । जीवा० ३६८ । आजोग-आयोग व्यापारणम् । उत्त० ७१०। आव० आजिणो - आजिनः, द्वीपविशेष समुद्रविशेषश्च । जीवा० ६९४ । ३६८। आजोजिया-आयोजिका, आयोजयति जीवं संसारे इति, आजीव-आजीव , आजीविका। पिण्ड० १२१ । आजीविक । क्रियाविशेष. । प्रज्ञा० ४४५। व्य० प्र० १६३ अ। भगवत्यष्टमशतकपंचमोद्देशक । भग० आडंबरो-आडम्बर , मातङ्गनामा यक्ष । आव० ७४३ । ३२८ । पटह । ठाणा० ३९५ । अनु० १२९ । यक्ष । व्य० द्वि० । आजीवक-निहव । उप० मा० गा० ४५९ । (आजीवग ) | आडहइ-आदधाति, नियुङ्क्ते । औप० ६४ । गोशालकमतानुसारी । दश० २२२ । आडा-लोमपक्षिविशेष । प्रज्ञा० ४९ । भाजीवगदिटुंतो - आजीवदृष्टान्त , आ-सकलजगदभि- आडासेतीय-आडासेतीक , पक्षिविशेष । प्रश्न० ८ । ध्याप्त्या जीवाना यो दृष्टान्त -परिच्छेद स , सकलजीव आडुआलित्तं-मिश्रितं, विलोडितम् । आव० ३४२ । दर्शनम् । जीवा० १३७॥ आडोव-आटोपः, स्फारता। प्रश्न. ४८ । औप० ५३ । आजीवगा-आजीविका पडरभिक्खूआ। नि० चू० द्वि० | आडोवेइ-आटोपयेत् , वायुना पूरयेत् । भग० आडोहितो-जल विलोढयन् । वृ० द्वि० ७२ आ। आजावगो-आजीवग , आ-समन्ताज्जीवन्त्यनेनेत्यानीव आढइ-गुच्छविशेष । प्रज्ञा० ३२ । आढकी, गुच्छविशेष । अर्थनिचयस्त गच्छति-आश्रयत्यमौ, आजीवग -अर्थमद । सूत्र. २३७ । आढए-आटक , मानविशेष । भग० ३१३ । आजीववत्तिया - आजीववृत्तिता, जाल्याद्याजीवनेनात्मपा- आढगं-आठक , प्रथचतुष्टयनिष्पन्न । अनु० १५१ । चतु • लना। दश० ११७ । प्रस्थपरिमाणम् । आव० २३८ । आजीवण पिंडो-जातिमातिभाव उवजीवतित्ति आजीवण- | आढगमो-आढकक , मानविशेष । उत्त. १४३ । पिंडो। नि० चू० द्वि० ९७ आ। आढणं-आदर । वृ० द्वि० ७६ आ । ८२॥ ९८ अ । आचा० ५७॥ (१२५) -- [ आइत्तं आचार्यश्रीभानन्दसागरसूरिसङ्कलितः आणय ] थाढतं-आरब्धम् । भग० २८२ । आणंदा-आनन्दा, पूर्वदिग्रुचकवास्तव्या दिक्कुमारी। आव. यादत्ता-आरब्धा । आव० २३७ । १२२ । दक्षिणदिग्भाव्यञ्जनपर्वतस्यापरस्या पुष्करिणी । आदत्तो-आरब्ध । आव० १०३, ४१३, २६२ । दश० ९७ । जीवा० ३६४ । अजनकपर्वते पुष्करिणी। ठाणा० २३० । आढयं-आठकः, सेतिकाप्रमाण । जं० प्र० २४४ । पौरस्त्यरुचकवास्तव्या तृतीया दिकुमारी । जं० प्र० ३९१ । आढवेह-आरभते । दश० ३८ । आणदिए-आनन्दितः, तुष्ट', हृष्ट , ईषन्मुखसौम्यतादिभाव आढवेऊण-आरभ्य। आव० ३४१ । समृद्धिमुपगतः । भग० ११९, ३१७ । आढा-आदर । वृ० द्वि० ६७ आ। आणंदियं-आनन्दितम् , स्फीतीभूतम् । जीवा० २४३ । आढाति-आद्रियते। दश० ५९ । आव० ९२, ८१२ । आण-आज्ञा, श्रुतपर्याय । विशे० ४२३ । आढायमाणे-आद्रियमानः । आचा० २८४ । आणइंति-आनयन्ति। वृ० द्वि० १०९ अ। आणं-आज्ञा-योगेषु प्रवर्तनलक्षणाम् । ठाणा० ३३१ । विधि- आणक्खिऊण-परीक्ष्य । आव० २९१ । विषयमादेशम् । ठाणा० ३८६ । आणक्खिस्सामि - अन्वीक्षिष्यामि - अन्वेपयिस्यामि । आणंतरिए-आनन्तर्यम्-सातत्यमच्छेदनमविरहः । ठाणा० आचा० २८२ । आणक्खे-परीक्ष्य । ओघ० ३३ । अनुमीथ । वृ० तृ. आणंद-आनन्दः, द्वितीयमासक्षपणे भिक्षादाता। आव. १६४ आ । २००। उपासकदशागाद्यध्ययनम् , तमाम श्रावक.। उपा० आणक्खेऊण-ज्ञात्वा, निश्चित्य। नि० चू० प्र० ६ आ। १। गाथापति । आव० २१५। नालंदवाहिरिकाया गाथा आणतं-एकोनविंशतिसागरोपमस्थितिक विमानम् । सम० पतिः । भग० ६६२ । आनन्दः, पष्टो वलदेवविशेषः । आव० ३७ । १५९) श्रुतेन सामायिकाप्तौ दृष्टातः । आव० ३४७ । षोडश आणत्तं-अन्यत्वम्-अनगारद्वयसम्बधिनो ये पुद्गलास्तेपा मूहर्तविशेषः । सूर्य० १४६ । जं० प्र० ४९१ । धरणेन्द्र मेदः। भग० ७४१ । रथानीकाधिपतिः। ठाणा० ३०२ । षष्ठो बलदेवः । सम० आणत्तिअं- आज्ञप्तिकाम् , आज्ञा प्रत्यर्पयत। ज० प्र० १५४ । शीतलजिनाद्यगणभृत् । सम० १५२ । भगवान् महा- १६२ । वीरशिष्य । भग० ६६८ । अवधिनिर्णयविषये श्रमणो- आणत्तो-आज्ञप्तः । आव० ४१९ । पासक' । सूत्र० ९ । प्रथमश्रावकनाम । आव० २१५ । आणपाण-आणप्राण । सूर्य० २९२ । आणंदकूडे-आनन्दनाम्नो देवस्य कूटमानन्दकूटम् । जं. आणपाणकालो-आनपानकाल', उच्छवासनि श्वासी समु. प्र० ३१३१ दितावेक । जीवा० ३४४ । आणंदपुरं - आनन्दपुरम् , इहलोकगुणविषये कच्छदेशे आणपाणलद्धी - अतर्मुहर्तन चतुर्दशपूर्वपरावर्तनगनि । नगरम् । आव० ८२४ । द्रव्यमूढोदाहरणे पुर । नि० चू० ओघ० १७८ । द्वि० ४२ भ । स्थलपत्तनविशेष । नि० चू० प्र० २२९ । आणमंति - आनन्ति । भग० १९ । उन्सन्ति, अन्त - (मार्गापसपदि ) नगरविशेष । नि० चू० प्र० २४१ अ। स्फुरन्तीमुच्चासक्रिया कुर्वन्ति, आनमन्ति उच्छमन्ति । नगरनिशेप । नि० चू० द्वि० ७१ अ। क्षेत्रविपर्यासे नगर- प्रज्ञा० २१९ । 'णमु प्रहृत्वे' इत्येतस्यानेकार्थत्वेन श्वमनार्थ- विशेषः । नि० चू० द्वि० ८ अ । त्वात् , आनन्ति इत्यनेनाध्यात्मक्रिया। भग० १९ । आणंदपुरे मूलचैत्यगृहे सर्वजनसमक्ष दिवसत· कल्पकर्षण आणमणिया-आज्ञापनी, विंशतिक्रियामध्ये द्वादशी क्रिया । भवति । नि० चू० प्र० ३५५ । आव०६१२ । कार्ये परस्य प्रवर्तनं ययेदं कुर्विति भाषा । आणंदरक्खिए. आनन्दरक्षित , पार्थापत्यस्थविरनाम । प्रज्ञा० २५६ । भग० १३८ । आणय-आनत , नवमदेवलोकनाम । प्रजा. ६९ | - (१२६) -- .

[ आणरुई अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आणापाण] आणरुई - आज्ञारुचि, आज्ञा-सर्वजवचनात्मिका तस्या रगीतार्थस्य पुरतो देशान्तरस्थगीतार्थनिवेदनाय गीतार्थो सचिः-अमिलाषो यस्य स आज्ञारुचि । जिनाजैव मे तत्त्व यदतिचारनिवेदनं करोति सा। ठाणा० ३०१ । यदगीतार्थस्य न शेष युक्तिजातमिति योऽभिमन्यते स आज्ञारुचि । पुरतो गूढार्थपदैर्देशान्तरस्थगीतार्थनिवेदनायातिचारालोचनं प्रज्ञा० ५६ । इतरस्यापि तथैव शुद्धिदानं सा। भग० ३८४ । ठाणा० ३१८ । आणरुती-आज्ञारुचि -आज्ञा-सर्वनवचनात्मिका तया रुचि आदेश । भग० १२२। जीवा० २४३ । 'सर्वज्ञवचना- यस्य स तथा, यो हि प्रतनुरागद्वेषमिथ्याज्ञानतयाऽऽचा त्मिका । प्रज्ञा० ५८ । आङिति स्वस्वभावावस्थानात्मिकया र्यादीनामाज्ञयैव कुग्रहाभावाज्जीवादि तथेति रोचते स. । मर्यादयाऽभिव्याप्त्या वा ज्ञायन्तेऽर्था अनयेति, भगवदभि- ठाणा० ५०३ । हितागमरूपा। उत्त० ४४ । आगम । सूत्र० ४०५ । आव० आणवणप्पओगे-आनयनप्रयोग । आव० ८३४ । इह ८६२ । उत्त० ४४९ । अनुज्ञा । पिण्ड ० १६९ । गुरुनियोगा- विशिष्टावधिके भूदेशामिग्रहे परत स्वयंगमनायोगाद्यदन्य त्मिका। उत्त० ५७२ । यथोक्ताज्ञापरिपालना। नंदी २४८ । सचितादिद्रव्यानयने प्रयुज्यते सन्देशकप्रदानादिना त्वयेदमाने द्वादशागं सूत्रार्थोभयभेदेन त्रिविध, द्वादशागमेव चाज्ञा, यम् इत्यानयनप्रयोग ( देशावकाशिके अतिचार ) । आज्ञाप्यते जन्तुगणो हितप्रवृत्ती यया साऽऽक्षेति, अथवा उपा० १०। पंचविधाचारपरिपालनशीलस्य परोपकारकरणैकतत्परस्य आणवणिया-अज्ञापनिका, जीवाजीवानानाययत । ठाणा० गुरोहितोपदेशवचनमाज्ञा । नंदी २४८ । श्रुतस्य पर्याय । ३१७। आज्ञापनस्य-आदेशनस्येयमाज्ञापनमेव वेत्याज्ञापनी विशे० ४१६। सैवाज्ञापनिका, तज्ज कर्मबन्ध , आदेशनमेव वेति, आना- आणाइणो-आज्ञादय , आज्ञाभमादय । पिण्ड० ६९ । यन वा आनायनी । ठाणा० ४३ । आणाइयं - आज्ञातिगं-आज्ञा-जिनादेशमतिगच्छति-अति- आणवणी-आज्ञापनी, असत्यामृषाभाषामेद । दश० २१० । कामति यत्तत् , अधर्मद्वारस्य पाठान्तरेणाप्टाविंशतितम नाम। कार्ये परस्य प्रवर्तनी। भग० ५०० । प्रश्न० २७॥ आणवेस्सामि-आनाययिष्यामि । आव० ४१० । आणाईसरसेणावञ्च-आजेश्वरसेनापत्यम् , आज्ञाप्रधानस्य आणा-आज्ञा, मौनीन्द्रवचनम् । आचा० ४४। तीर्थकर- सतो यत् सेनापत्यम् । भग० १५४ । स्वस्वसैन्यं प्रत्य- गणधरोपदेश । दश० २६५ । ज्ञानाद्यासेवारूपजिनोपदेश । भग० ५४ । कर्तव्यमेवेदमित्याद्यादेश । भग० द्भुतमाज्ञाप्राधान्यम् । प्रज्ञा० ८९ । १६७ । आणाकंखी-आज्ञाकाक्षी, आगमानुसार प्रवृतिक । आचा० दुवालसग गणिपिडग । नि० चू० तृ. ४ अ । उपदेश । २१०। सूत्र १८३ । अर्थ । आव० ६०४ । आज्ञाप्यत- हिताहितप्राप्तिपरिहाररूपतया सर्वज्ञोपदेश : । आणानिदेसयरे - आज्ञानिर्देशकर , आना-'सौम्य ! इदं आचा० ११३ । आज्ञया सूत्राज्ञया अभिनिवेशतोऽन्यथा- कुरु इदं च मा कार्षी ' इति गुरुवचनं तस्या निर्देश , इदमि. पाठादिलक्षणया अतीतकाले अनंता जीवाश्चतुरन्त ससार- स्थमेव करोमीति निश्चयाभिधानं, तत्कर । उत्त० ४४ । कान्तारं-नारकतिर्यग्नरामरविविधवृक्षजालदुस्तर भवा-वीगह- भगवदमिहितागमरूपया उत्सर्गापवादाभ्या प्रतिपादनमाज्ञा- नमित्यर्थ , अनुपरावृत्तवन्तो जमालिवत् अर्थाज्ञया पुनराभि- निर्देश इदमित्थं विधेयमिदमित्थ वेत्येवमात्मक तत्करणशी- निवेशतोऽन्यथाप्ररूपणादिलक्षणया गोष्टामाहिलवत् उभयाज्ञया लस्तदनुलोमानुष्ठानो वा। उत्त० ४४। आज्ञानिदेशतर:- पुन. पंचविधाचारपरिज्ञानकरणोद्यतगुर्वादेशादेरन्यथाकरण- आज्ञानिर्देशेन वा तरति भवाम्भोधिमिति । उत्त० ४४ । लक्षणया गुरुप्रत्यनीकद्रव्यलिंगधार्यनेकश्रमणवत् सूत्रार्थोभये- आणानिइसे-आज्ञानिर्देश , आज्ञा-भगवदभिहितागमरूपा विराध्येत्यर्थ , अथवा द्रव्यक्षेत्रकालभावापेक्षमागमोक्तानुष्ठान- तस्या निर्देश -उत्सर्गापवादाभ्या प्रतिपादनम् । उत्त० ४४ । मेवाज्ञा तया तदकरणेनेत्यर्थ । सम० १३३ । हे साधो ! आणापाण- आनप्राण , उच्छ्वासनि श्वासकाल । भग. भवतेदं विधेयमित्येवरूपामादिष्टि । ठाणा० ३०१ । गूढार्थपदे २१३ । आज्ञा (१२७) स [ आणापाणू आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आतियणो] ८२ । आणापाणू-आनप्राणा - उश्वासनि श्वासकाल: सख्याताव- | आणुगामियत्ताए-आनुगामिकत्वाय, शुभानुबन्धायेत्यर्थ । लिकाप्रमाणा । ठाणा० ८५ । भग० ४५९ । भवपरम्परानुबन्धसुखाय । भग० ११५ । आणाफलं - आजाफलम्-जनेन यथोदितवचनप्रतिपत्तिरूपा आणुपुब्बी-आनुपूर्वी, शिष्यप्रशिष्यपरम्परामिका । उत्त. फल प्रयोजन अस्य । उत्त० ५८० । ८ । कमेण मरणकाल पत्तस्स आणुपुवी। नि० चू० द्वि० आणाम-(अननम्-श्वसनम् ) । भग० १०९ । ५३ अ। वृषभनासिकान्यस्तरज्जूसस्थानीया, यया कर्म- आणामियं-आनामितम् , ईपन्नामितम् । प्रश्न पुद्गलसहत्या विशिष्टं स्थानं प्राप्यतेऽसौ, यया वोर्घोत्तमा. आरोपितम् । जीवा० २७३ । साधश्चरणादिरूपो नियमत शरीरविशेषो भवति सा । आव० आणाय-आज्ञाय, स्वरूपाभिव्याप्त्याऽवगम्य । उत्त० १.४ । ८४ । यथाऽऽसन्नम् । भग० २१। मूलादि- परिपाटी। जीवा० १८७ । आव० ८०३ । क्रमेण यथाऽऽ. आनायम् , जालम् । उत्त० ४०७ । प्रश्न० २२ । आणारुइ-आज्ञासचिः, आज्ञा-सर्वज्ञवचनात्मिका तया रुचि- सन्नम् । जं० प्र० ४६१ । शास्त्रीयोपक्रमाद्यसेद । ठाणा० र्यस्य सः । उत्त० ५६३ । आज्ञा-सूत्रव्याख्यानं नियुक्त्या- ४ । आव० ५६ । यदुदयादन्तरालगतौ जीवो याति तदा- दिश्रद्धानम् । औप० ४४ । नियुक्त्यादि तत्र तया वा रुचि । नुपूर्वीनाम । सम० ६७। उत्त० ६४१। आनुपूर्वी-यया. सन्नम् । जीवा० २० । ठाणा० १९० । भग० ९२६ । आणुपुदिवगढिया-आनुपा-परिपाट्या प्रथिता-गुम्फिता आणाविजए आज्ञाविचयम्, आज्ञागुणानुचिन्तनम् । इति आनुपूर्वीग्रथिता । भग० २१४ । औप० ० ४४ । प्रवचनपर्यालोचनविषयमाज्ञालोचनविषय धर्म- आणुपुब्बो-आनुपूर्व , क्रमेण नीचर्नीचस्तरभावरूप.। जीवा० ध्यानम् । ठाणा० १९० । आणाविजय-आज्ञा-जिनप्रवचनं १९८ । तस्या विचयो-निर्णयो यत्र तदाज्ञाविचयम् । भग० ९२६ । आज्ञा वा विजीयते अधिगमद्वारेण परिचिता क्रियते यस्मि- आणू-उस्सासो । दश० चू० ५४ । आतंतमे - आत्मतमः-आत्मानं तमयति-खेदयति इति मिति । ठाणा० १९०। आ-अभिविधिना ज्ञायन्तेऽर्था आत्मतम.-आचार्यादि । आत्मनि तम -अज्ञानं क्रोधो वा यया साऽऽज्ञा-प्रवचन सा विचीयते-निर्णीयते पर्यालोच्यते यस्य स आत्मतमा. ठाणा० २१४ । वा अस्मिन्तत् । ठाणा० १९० । आत-(आय)-अप्पा। नि० चू० प्र० ३२ अ। आणावियं-आनायितम् । आव० ४२२ । आतवेतावश्चकरे - आत्मवैयावृत्यकर , अलसो विसम्भो. आणासापमाणे-अनाशयमान', आशाविषयमकुर्वाणोऽना- गिको वा । ठाणा० २४१ । आत्मवैयावृत्त्यकर:-यस्मात् स स्वादयन वाऽभुजानोऽतर्कयन्नस्पृहयन्नप्रार्थयमानोऽनभिलपन् । तपसा पूर्वसचितकर्ममलं शोधयन्नात्मन एवोपकारे वर्तते उत्त० ५८८ । तत. स । व्य० प्र० १४८ आ । आणितिल्लयं-आनीतः । आव० ५५८ । आतसरीरसंवेगणी- आत्मशरीरसवेगनी - यदेतदस्मदीय आणिमलो-अनलगिरिगजस्य विष्टा । नि० ८० प्र० ३४९ अ । शरीरमेतदशुचि अशुचिकारणजातमशुचिद्वारविनिर्गतमिति न आणुकंपिए-अनुकम्पित , कृपावान् । भग० १६९ । प्रतिबन्धस्थानमित्यादिकथनरूपा । ठाणा० २१२ । आणुग-अनूप -नद्यादिपानीयवहल । वृ० प्र० १७५ आ। आतानवितान-( आयाणवियाण), तन्तुषु वेमादिकिया। आणुगामिप-देशान्तरगतमपि ज्ञानिन यदनुगच्छति लोच- विशे० ८६९ । नवदिति तदेवानुगामिकम् । ठाणा० ३७०। चूमादिहेतुर- आतावणा-आतापना । प्रश्न० १०७ । नुगामि ततो जातमानुगामिकम्-अनुमान तद्रूपो व्यवसाय । आतावते - आतापयति-आतापना गीतातपादिमहनस्पा ठाणा० १५११ करोति इति आतापक । ठाणा० २९९ । आणुगामियं-आनुगामिकम् । औप० ५८ । आनुगामुक आतियं-आचितम् , रचितम् । प्रश्न० ४७ ॥ अनुगमनशील । आव० २८ । आतियणो-अदने-भक्षणे । व्य० प्र० १८. अ। - . (१२८) - -- . - आतियाणे 'अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आदाणीय ] । तियाणे-मुंजणवेलाए ठाति। नि० चू० तृ० ३८ आ। आददति-विदधति । प्रश्न० १०७ । तुरीभूः । नंदी १५४ । आदर्शकगृहं-भरतकेवलज्ञानस्थानम् । प्रज्ञा० २० । तूलुगा-साधारणवादरवनस्पतिकायविशेषः । प्रज्ञा० ३४ । आदर्शसमानः (अद्दागसमाण), आदर्शसमानो, यो हि साधुभि तो-आयः । उत्त०१४७ । आहोस्वित् । उत्त० ३२३ । प्रज्ञाप्यमानानुत्सर्गापवादादीनागमिकान् भावान् यथावत्प्र- तो(उ)जं-आतोद्यम् , वाद्यम् । प्रश्न० ८ । पटहादि. । तिपद्यते सन्निहितार्थानादर्शकवत् स आदर्शसमानः । णा०६३ । ठाणा० २४३॥ त्तएणं-आदत्तेन-गृहीतेन, आत्मीयेन वा । अनु० २२ । आदाण - आदानम् , आदानम् , आदीयते-स्वीक्रियतेऽष्टप्रकार कर्म त्ततर:-दृढतर , अयमनयोरतिशयेनात्तो-गृहीतो यत्नेना येन तत्, कषायाः, परिग्रहः, सावद्यानुष्टानं वा। व्यवसित इत्यर्थ । आचा० २९४ । सूत्र. २६४ । ( वहिद्धादाणं)-बहि -मैथुनम् आदानं च- तप्रज्ञाहा-( अत्तपण्णहा), आत्तां-सिद्धान्तादिश्रवणतो परिग्रह , परिग्राह्य वा वस्तु धर्मोपकरणाद् बहि.। ठाणा० हीतामाप्ता वा-इहपरलोकयोः सद्बोधरूपतया हिता २०२। मोक्षार्थिनाऽऽदीयते-गृह्यत इति, संयमः । सूत्र० ज्ञाम्-आत्मनोऽन्येषा वा बुद्धि कुतर्कव्याकुलीकरणतो हन्ति २२९ । कारणम् । नि० चू० प्र० ११६ अ। प्रभव, । म । उत्त० ४३५ । प्रसूति । नि० चू० प्र० ११६ अ । ग्रहणम् । आव० ८२२ । मछन्दाः- आत्मनैव उपधेरानयनाय छन्दोऽभिप्रायो आदीयत इति, धनम् । आव० ६४६ । नि० चू० प्र० द्यते येषां ते आत्मछन्दस । व्य. द्वि० २१ आ। ३१७ अ। आदानः, अश । सूर्य० २०९ । त्मरक्षा-शिरोरक्षस्थानीया । तत्त्वा० ४-४ । आदाणणिक्खेवणासमिती-आदाननिक्षेपणासमितिः, त्मरक्षी- विषयाभिलाषविगमान्निर्निदान. सन् आत्मानं वत्थपायसथारगफलगपीढगकारणहा गहनिक्खेवकरण पडि- क्षत्यपायेभ्य. - कुगतिगमनादिभ्य इत्येवंशील.। उत्त. लेहिय पमज्जिय सा । नि० चू० प्र० १७ अ । भादाणनिक्खिवणअणाभोगकिरिया-आदाननिक्षेपा- त्मिवादी-अस्त्यात्मा खतो नित्य इति वादी । आव० नाभोगक्रिया, रजोहरणेनाप्रमार्ण्य पात्रचीवरादीनामादानं निक्षेपं वा करोति सा । आव० ६१४ । त्मसमीपे-आत्मोत्सङ्गे । ओघ० ११८ । आदाणभयं-आदानभयम् , धनस्य चौरादिभ्यो यद्भयम् । त्मिसंवेदनीय-आत्मना क्रियत इति । आव० ४०५। आव० ६४६ । धनहरणभयं । आव० ४७२। आदानं- त्मिागम-अत्तागम, गुरूपदेशमन्तरेणात्मन एव आगम.। धन-तदर्थ चौरादिभ्यो यद्यम् । ठाणा० ३८९| द्रव्य- भनु० २१९ । माश्रित्य भयम् । प्रश्न० १४३ । त्माधिष्ठितयोगी - अत्ताहिट्ठियजोगी, आत्माधिष्ठितेन- | आदाणभरियसि-आद्रहणभृते । उपा० ३४ । लब्धेन भक्तादिना युज्यत इति, अत्तलद्धिओ। ओघ आदाणिजं-आदानीयम् , सूत्रकृताङ्गस्य पञ्चदशाध्ययनम् । १५१ । सूत्र० २५२ । त्मार्थ-अत्तहे, अyमानतया स्वर्गादि , यद्वा आत्मैवार्थ.। आदाणियं-आदानीयम् , आदीयते-गृह्यते उपादीयत इति, उत्त० २८४ । विशोधनम् । व्य० प्र० ११५ अ। पदमर्थो वा। सूत्र. ९ । आत्मार्थिकम्-अत्तट्ठिय, आत्मनोऽर्थ., आत्मार्थस्तस्मिन् | आदाननिक्षेपणासमितिः-रजोहरणपात्रचीवरादीना पीठ- भवम् । उत्त० ३६० । फलकादीना चावश्यकार्य निरीक्ष्य प्रमृज्य चादाननिक्षेपी। दिसग-आदर्शक -दर्पण. । उत्त० ६५० । दिसगहत्थिआ-आदर्शहस्ता । आव० १२२ । आदाणीय-आदानीय , उपादेय । सम० दिसिआइ-खाद्यविशेष । ज० प्र० ११८ । ३६९ । परमार्थतो भावादानीयं ज्ञानदर्शनचारित्ररूपं तत् । पदण्ण-खिन । आव. ९४, ३५५ । - तत्त्वा० ९५ । ८१, ठाणा. आचा० १४०। (१२९) दश० २११॥ १२ । - आनगारिकम् - अनगारेपु-भावभिक्षुषु भवमानगारिक [ आदितियमरण आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आनन्द] आदितियमरण-यानि हि नरकाद्यायुष्कतया कर्मदलिका- | आदेशिक-श्रमणानुद्दिश्यादेशम् । भृ० प्र० ८३ । न्यनुभूय म्रियते मृतश्च न पुनस्तान्यनुभूय पुनर्मरिष्यत | आदेसं-उद्दिढे । नि० चू० प्र० २३० आ। विशेष प्रति. इत्येवं यन्मरणं । भग० ६२४ । नियतव्यक्त्यात्मकम् । उत्त० ६७३ । आदि-मादि , कारणम् । प्रश्न० ४ । आदेसतिगं-आदेशत्रिकम् , मतत्रिकम् । पिण्ड० १.। सादिए-आददीत, गृह्णीयात् । उत्त० ५१७ । आदेसदव्वसुद्धी- आदेशद्रव्यशुद्धिः, द्रव्यशुदिमेद । आदिकरः-आइगर, आदी प्राथम्येन श्रुतधर्ममाचारादि- ग्रन्थात्मक करोति - तदर्थप्रणायकत्वेन प्रणयतीत्येवंशील | आदेसफलं-आदेशफलम् । आव० ३४३ । आदिकर । सम० ३ । प्रथमतया प्रवर्तनशीलः । व्य० | आदेसा-पाहुणा । नि० चू० प्र० १११ अ । प्राघूर्णका । द्वि० ३८५ अ। बृ० प्र० ८५ आ। मादिगरमंडलग-आदिकरमण्डलम् । आव० १४६ । आदेसे - आदेशः, आदिश्यते यस्मिन्नागते सम्भ्रमेण परि मादिच्चो-आदित्य. । जीवा० ३२१ । सूर्यसवत्सरः । सूर्य० । जनस्तदासनदानादिव्यापारे स , प्राघूर्णकः । सूत्र० ३०० । आदेसो-आदेशः, प्रकार । जीवा० ५३ । सुत्ताएसो। नि० आदिट्ठ-आदिष्टः, विशेषितः । भग० ४७. । चू० प्र० ७१ अ । अनुज्ञा। व्य. द्वि. ३४६ म । नया आदिट्ठा-गृहीता। नि० चू० प्र० २०७ आ। न्तरविकल्प. । व्य. द्वि० ३५४ आ । आदित्यमास:-त्रिंशदहोरात्राणि रात्रिन्दिवस्य चाई, दक्षि आद्यशब्द - तर्कणादोषादिप्रतिपादनः। नि० चू० प्र. णायनस्योत्तरायणस्य वा पष्ठभागमान । वृ० प्र० १८६ आ । २२५ । आदित्ययशा-भरतपुत्रनाम । व्य० द्वि० १२९ आ। आद्रहणम्-उच्छलदुष्णजलम् । दश० १७४ । पिण्ड० ३५॥ आदिमा सावा आवश्यकादय. सूत्रकृताङ्गं यावद् ये आधरिसितो-आधर्षितः। भाव० ३७१ । आगमग्रन्थास्तेषु ये पदार्था अभिधेयास्ते। वृ० प्र० १२८ आ। आधत्त-आधत्तम् , प्रहणके मुक्तम् । बृ० द्वि० १२० । मादित्यरथः-वालिसुग्रीवपिता विद्याधर । प्रश्न० ८९ । आधरिसेहिति-आधर्षिष्यति । आव १७४ । आदियणं - गहणं । नि० चू० प्र० १३४ अ । पिवंतस्स । आधाकम्मिए-आधाय-आश्रित्य साधून् कर्म-सचेतन नि० चू० तृ. ६५ आ । स्याचेतनीकरणलक्षणा अचेतनस्य वा पाकलक्षणा क्रिया यत्र आदियण-आदानम् , ग्रहणम् । आव० ६१४ । भक्तादौ तदाधाकर्म तदेवाधाकम्मिकम् । ठाणा० ४६० । मादियणा-आदानम् , परधनस्य ग्रहण, तृतीयाधर्मद्वारस्य आधायणं-जत्य वा महा सगामे मता । नि० चू० ४० पञ्चदशं नाम । प्रश्न० ४३ । ७३ अ । आदिश्यते । जीवा० १४० । आधिः-मनःपीडा । भग० ४ । आदीअदिट्ठभावे - आदौ-आवश्यकादिशास्त्रेषु वर्तमाना | आधिदैविकम्-देवादिसत्क दु खम् । उत्त० २६६ । अदृष्टा भावा येन स । वृ० प्र० १२६ आ। आधिभौतिकम्-अन्यभूतसत्कं दु खम् । उत्त• २६६ । आटेज-आदेया, दर्शनपथमुपागता सती पुन पुनराकारक्ष आधूय - भ्रमयित्वा, जलेन सदाहत्याहत्य। जं• प्र. णीया। ज० प्र० १११। आदेय , रम्य । प्रश्न० ८३ । २३० । आदेजनाम-आदेयनाम, यदुदयवशात् यच्चेष्टते भाषते वा | आधूयारुहकम्-हरितभेद । आचा० ५७॥ तत्सर्व लोक प्रमाणीकरोति दर्शनसमनन्तरमेव च जनोऽभ्यु- आध्यात्मिकम्-अज्झत्थिय, आत्मसल्कं दुःखम् । टत त्यानादि समाचरति तत् । प्रज्ञा० ४७५ । २६६ । आत्मनि क्रियमाणम् । आचा० ४१६ । आदेयवचनता-सकलजनग्रायवाक्यता। उत्त० ३९ । आदेशकषाय-कैतवकृतभृकुटिभंगुराकार । आव० ३९० । मनुष्टानम् । उत्त० ३३९ । रदेशतः। नंदी ७०। । आनन्द-श्रुतसामायिकलामे दृष्टान्तः । आव० ३४७ । (१३०) [ आनन्दपुरम् अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आभरणाणि ] आनन्दपुग्म्-स्थलपत्तने मगरविशेष । बृ० प्र० १८१ आ। आप्त-भत्त, ज्ञानदर्शनचारित्राणि येनाप्तानि स, रागद्वेषप्रहीण , जितारिराज्ञ राजधानी । बृ० तृ० १०७ आ । नगरविशेष । इष्टा शोध्य शैधि विषये ये आप्ता । व्य० द्वि० व्य० प्र० १४६ अ, ४ आ। व्य० द्वि० २६६ अ । ३८९ आ। मानन्दविजयः-आचार्यनामविशेष.। जं० प्र० ५४५ । आप्तप्रज्ञाहा- सिद्धान्तादिश्रवणतो गृहीतामाप्तां वा इह- आनन्दविमल:-आचार्यनामविशेष । ज० प्र० ५४३ । परलोकयो सद्बोधरूपतया हिता-प्रज्ञाम्-आत्मनोऽन्येषा आनुगामिकः-आ-समन्तादनुगच्छतीत्येवंशीलमानुगामिक., वा बुद्धिं कुतर्कव्याकुलीकरणतो हन्ति य. स.। उत्त० अनुगम प्रयोजनं यस्य सः। प्रज्ञा० ५३९ । अनुगच्छति ४३५ । साध्याभावे न भवति यो धूमादिहेतु. सोऽनुगामी ततो | आप्नोति-आत्मवशता नयति । प्रज्ञा० ३६२ । जातमानुगामिकं, अनुमानं, तद्रूपो व्यवसाय । ठाणा १५१ । आप्रच्छना-भदन्त ! करोमीदमित्येवं गुरो. प्रच्छनमाप्र. आनुपूर्वी-यथासम्नम् । प्रज्ञा० ५०३ । कूर्परलालगोमू- च्छना । अनु० १०३ । सम० १५८ । त्रिकाकारेणा यथाक्रम द्वित्रिचतु समयप्रमाणेन विग्रहेण भवा- आप्फोडिऊण-आस्फोट्य । आव० १६८ । न्तरोत्पत्तिस्थानं गच्छतो जीवस्यानुश्रेणिनियता गमनपरि- गाबद्धसेओ-आबद्धस्वेद । आव० ५१५ । पाटी। प्रज्ञा ४७३ । अन्तर्गतौ गत्यन्तरमानुपूा प्राप- भाबद्धो-आबद्ध , आरब्धः । भाव० ५१५ । णसामर्थ्य, शरीराङ्गोपाङ्गानां विनिवेशक्रमनियामकं पा कर्म । आबाहा-आवाधा, ईषद्वाधा। भग० २१८ । ज० प्र० १२४ । तत्त्वा० ८-१२ । जन्मजरामरणक्षुत्पिपासादिका आवाधा। ठाणा० ४८८ । अनुक्रमः-अनुपरिपाटी । अनु० ५१ । आबाहाए-अन्तरे कृत्वेति शेष.। सम० १६। आपणवीही-आपणवीथि , रथ्याविशेष । जं० प्र० ४१३ । आभंकरं - सनत्कुमारकल्पे त्रिसागरस्थितिक विमानं । आपणवीथिः । भग ४७६ । आपन्नपरिहारः-मासिक वा द्विमासिकं वा यावत् षण्मा- आभंकरपमंकर-आभंकरवत् । सम० ८ । सिक वा प्रायश्चित्तं । व्य० प्र० ४५ आ । आभंकरे-आभङ्करः, सप्ततितमग्रहनाम । ठाणा० ७९ । आपाकः-भाण्डपचनस्थानम् । ठाणा० ४१९ अष्टषष्टितमग्रहनाम। जं० प्र० ५३५ । आपागपत्तं - आपाकप्राप्तम् , ईषत् पाकांभिमुखीभूतम् । आभट्ठो-आभाषित., सलप्तः । आव० २४१ । प्रज्ञा० ४५९ । आपाण्डु-आ-ईषच्छुभ्रत्वभाज', पाण्ड । उत्त० आभरण-आभरणानि, मुकुटादीनि । जं० प्र० १४५। आपीड:-शेखरक । जीवा० २७२ । आमेलक -शेखरक.। आभरणचझेरी-देवछन्दके पूजोपकरणम् । जीवा० २३४ । जीवा० २०७, ३६१ । आभरणपिया। नि० चू० तृ. ९ अ । आपुच्छणा - आप्रच्छनमापृच्छा, विहारभूमिगमनादिप्रयो- | आभरणवासा - आभरणवर्या, आभूषणवर्पणम् । भग जनेबु गुरो कार्या , समाचार्या षष्ठभेद. । आव० २५९ । गिरिविडकादि- आपृच्छना। ओघ० १५१ । भग० ९२० । स्वकार्यप्रवृ. आभरणविचित्ताणि-आभरणविचित्राणि, त्तावापृच्छनम् । वृ० प्र०.२२२ अ । विहारभूमिगमनादिषु विभूषितानि । आचा० ३९४ । नि० चू० प्र० २५५ भ । प्रयोजनेषु गुरो पृच्छा। ठाणा० ४९९ । आभरणविधी-हारऽद्धहारादिया आभरणविवी। नि० चू० आपूपिकः। नंदी १६५ । प्र. २७६ आ। उपभोगविधिविशेप. 1 उपा० ३। आपूरितं - आपूर्यमाणम् , परिसस्थिते पवने भूयो जलेन आभरणवुट्ठी-आभरणवृष्टि । भग• १९९ । ध्रियमाणम् । जीवा. ३०८ । आभरणाणि - भाभरणानि, अजपरिधेयानि । ज० प्र० आपूरियं - आपूरितम् , व्याप्तं, मृत, वासितम् । विशे० २२१ । आभरणप्रधानानि । आचा० ३९४ । नि० चू० सम. ८। १९९ । 1 १५०। प्र० २५५ अ । (३६) .

[आभवंतितो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आभियोगिय] नामवंतितो-आभवन्तिक -व्यवहार. व्य. द्वि० ३.१ आ। आभिणियोहिय-आभिनिवोधिकम् , अमिमुखो-योग्यदेशा- जाभवति-स्वं भवति । आव० ८२१ । वस्थितवस्त्वपेक्षया नियत-स्वस्वविषयपरिच्छेदकतयाऽव- पाभवं-आभाव्य, गक्ष शैक्षिका वा । वृ० द्वि० ७० आ । वोध.-अवगमोऽभिनिवोधः, स एवाभिनिवोधिकम् । उत्त. भा-आभा, आकारः। प्रज्ञा० ८० । छायावर्ण । सम० ५५७ । विशे० २२६ । अर्थाभिमुखो नियत -प्रतिनियत- १४० । प्रतिभासः । जीवा० ३११ । वर्णस्वरूपम् । जीवा० स्वरूपो बोधो-बोधविशेषः, अभिबुध्यतेऽस्माद् अस्मिन् १०३. वेति । प्रज्ञा० ५२६ । भाभिनिवोधिकम्-मतिज्ञानम् । मागी-भोक्ता । आव० ८१५ । आव. १८ । आभिमुख्येन निश्चितत्वेनावबुध्यते-सवेदयते भासइ-आभासयति, समन्ततः सर्वासु दिक्षु अवभास आत्मा तदिति, आभिनिबोधः, अवग्रहादिज्ञानं, अथवा यति। जीपा० ३१२ । आत्मा तेन प्रस्तुतज्ञानेन तदावरणक्षयोपशमेन वा कर. भासिआ-म्लेच्छविशेष । प्रना० ५५ । णभूतेन घटादि वस्त्वभिनिबुध्यते, तस्माद् वा प्रकृतज्ञानात् भासिता-लवणान्तरद्वीपनाम । ठाणा० २२५ । क्षयोपशमाद्वाऽभिनिवुध्यते, तस्मिन् वाऽधिकृतज्ञाने, क्षयो- भासितो-आभाषिकः, अन्तरद्वीपविशेषः । जीवा० १४४ । पशमे वा सत्यभिनिबुध्यतेऽवगच्छतीत्यभिनिवोधो ज्ञानम् , जाभासियं-अभाषिकमू-विवक्षितभापामजानानः । आव० क्षयोपशमो वा, सो वा 'अभिणिवुज्झए'त्ति, अथवाऽभिनि- ६१४॥ वुध्यते वस्त्वभिगच्छतीत्यभिनिवोधः, स एवाभिनिवोधिकम् । भासिय-आभाषिक., म्लेच्छविशेष । प्रश्न० १४ । विशे० ५३ । अमीत्याभिमुख्ये नीति नैयत्ये, ततश्चाभिमुखो- माभासियदीवे-अन्तरद्वीपनाम । ठाणा० २२५ । वस्तुयोग्यदेशावस्थानापेक्षी नियत-इन्द्रियाण्याश्रित्य स्वस्व- भिओग-आ - समन्तादाभिमुख्येन युज्यन्ते-प्रेष्यकर्मणि विषयापेक्षी बोधः, अभिनिवुध्यते आत्मना स.। अभिनि. व्यापार्यन्ते इति आभियोग्या -शकलोकपालप्रेष्यकर्मकारिणो बुध्यते वस्त्वसौ इत्यभिनिवोध. स एवामिनियोधिकम् । व्यन्तरविशेषा । जं० प्र० ७५ । आभियोग्यम्-कर्मकर- अनु० २ । भाव । दश० २४८ । अभियोग्यभावना-कुमितभावना। आभिणिवोहियनाण-अर्थाभिमुखोऽविपर्ययरूपत्वात् निय- उत्त० ७०७ । अभियोगभावनाजनित । ठाणा. २७४ । तोऽसशयरूपत्वाद्वोध -संवेदनममिनिबोध. स एव स्वार्थिके भिओगसेढीओ- आभियोग्या:-शकलोकपालप्रेष्यवर्म- कप्रत्ययोपादानादाभिनिवोधिक ज्ञातिर्ज्ञायते वाऽनेनेति ज्ञानम् कारिणो व्यन्तरविशेषास्तेपामावासभूते श्रेण्यौ । ज० प्र० आभिनिवोधिक च तज्ज्ञानं चेति आभिनिवोधिकनानम् , इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तो बोध इति । भग० ३४३ । इन्द्रिय. गमिओगिए-आभियोगिक' अभियोगे-प्रेष्यकर्मणि व्या- पञ्चकमनोनिमित्तो वोध. । अनु० २। अर्थाभिमुखो नियतो पार्यमाणत्वे नियुक्ता. । जीवा० २४३ । वोध , अभिनिवोधे भवं तेन वा निवृत्तं तन्मयं तत्प्रयो- माभिओगिय-आभियोगिकः, वशीकरणाय मन्त्राभिसस्कृ- जनं वा, अथवा अभिन्बुिध्यते तत् , अथवा अभिनिवुध्यते तम् । आव० ६४२ । ऽनेनास्माद्वा अस्मिन वा तत् तदावरणकर्मक्षयोपशम इति भिओग्ग-आमियोग्यम् , बगीकरणादि द्रव्यतो द्रव्यस- भावार्थः । आव० ७ । अभिनिवोधिकम् , आत्मैव वाऽभि- योगजनित, भावतो विद्यामन्त्रादिजनितम् , बलात्कारो वा। निवोधोपयोगपरिणामानन्यत्वाद् अभिनिवुभ्यत इति वा । प्रश्नः ३८ । आमियोग -कार्मणम् । ६० तृ. १२२ आ। भिग्गहिओ-आमिग्रहिक, अभिग्रहेग निवृत्त , कायो- आभियोगिक- अभियोगभावनाभावितत्वेनाभियोगिकदेवे त्सर्ग, । आव० ७८३ । पुत्पन्ना अभियोगवर्तिनः। भग१९० । नाभिचारुका-विद्याविशेष । वृ० तृ. २०३ आ। माभिट्ट-आपतितम् । पउ० ४-४२ । आभियोगिय - आभियोगिक , अभियोजनं-विद्यामन्त्रा- माभिडणं-आवरणम् । ओघ० २०४ । दिभि. परेपा वशीकरणादि गेषा ते। प्रज्ञा० ४०६ । । आव० ७॥ . (६३२) - - -- [ आभियोगी - अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आमट्ट] । - - 2 आभियोगी-अभिओगा- किङ्करस्थानीयदेवविशेषास्तेषामिय अपोलिथं अग्गिणा ण पति, अण्णेण वा केणइ पगारेण माभियोगी। बृ०प्र० २१२ आ । आभियोग्या-आभिमुख्येन न पर-णिज्जीवं । नि० चू० द्वि० १५७ । असत्यपरिणयं । युज्यन्ते-प्रेष्यकर्मणि व्यापार्यन्त इत्याभियोग्या , किङ्कर दश० चू० ५१ । अनुमतार्थद्योतकमव्ययम् । वृ० द्वि. स्थानीयदेवविशेषाः । बृ० प्र० २१२ आ। १६६ भ । सचित्तं । दश० चू० ८६ । अपक्करसम् । प्रश्न. आभिसेक-आभिषेक्यम् , अभिषेकयोग्य , राजपरिधेयम् । ६० । अनुमतौ सम्मतमेतदस्माक सर्वमितिभावः । व्य० प्र० जे० प्र० २१६॥ ७१ अ। अपक्व । व्य० द्वि० १०६ आ । जओ तेहिं आभीरविसमओ-आमीरविषय , देशनाम । आव० ४१२। उग्गमादिदोसेहिं घेप्पमाणेहिं चारित अविपकं अपज्जतं नि० चू० द्वि० १०२ आ। आम भवति तेण ते आमं भण्णति, शब्दमात्रोच्चारणम् सरही. आमोइत्ता-आभोगयित्वा, ज्ञात्वा । दश. १७९ ।। भूत जो परिससतायुपुरिसो वरिससत अतरे मरतो आमो आभोईतो-आभोगितः । उत्त० १३३ । भण्णति । नि० चू० द्वि० १२६ अ । अपक्कम् । आव० १३०॥ आभोए-आभोगयित्वा; उपयोरापूर्वकेनावधिना विज्ञाय । स्वीकारेऽव्ययम् । आव० ६४ | आव० १९४ | आव. आप० १२८॥ ४०८ । अशस्त्रोपहतम्। आचा० ३४८ । दश० २२९ । आभोएति-आभोगयति।आव० । १.१४ । अजीर्णम् । दश. २७० । आमाम्-असिद्धां, सचेतनाम् , आभोग - पाभोगः, जानता योऽविचार. कृतः । आव० भपरिणत, अपक्काम् । दश० १८५ । अपरिशुद्धम् । आचा. ५६४ अभिसन्धिः भग०२०। आलोचनमभिसन्धि । १३१ । प्रज्ञा० ५०० । उपकरणम् । ओघ० ३३ । उपयोग । आमंडे-आमलकम् , परिणामिकयां सप्तदशमोदाहरणम् । बृ० द्वि०.२११ आ। ठाणा० ५०५। आभोगनमाभोग , नदी १६५। आम्लकम्-आमलकम् । आव० ४३६ । उपयोगविशेष । आव० ६१९, ६२६ । विस्तार । विपा० आमंतणी-आमन्त्रणी, असत्याभूषाभाषाया. प्रथमो भेद । ३९ । दश. २१० । हे देवदत्त । इत्यादिरूपा भाषा। प्रज्ञा आभोगण-आभोगनम् , अर्थावग्रहसमनन्तरमेव सद्भूतार्थ- २५६ । हे देवदत्त ! इत्यादिका, असत्यामृषाभाषा। भगः । विषयाभिमुखमालोचनम् । १७६ । आभोगणिवत्तिए-यदा परस्यापराधं सम्यगववुद्धय कोप- आमंतयामो-आमन्त्र्यावहे, पृच्छाव । उत्त० ३९८ । कारणं च व्यवहारत: पुष्टमवलम्ब्य नान्यथाऽस्य शिक्षो- आमंतिओ-आमन्त्रित , सम्भाषितः, पजायते इति आभोप कोपं विधत्ते तदा स कोप आभोगनि आमंतिओ-आमन्त्रित , सम्भाषितः, पृष्टो वा। उत्त. ३९२॥ तित । प्रज्ञा० २९१ आभोगेन निर्वतित.-उत्पादित आभोग- निर्वर्तित आहारयामीतीच्छापूर्व निर्मापित । प्रज्ञा ० ५०० । आमंतेयम्वो-आपुच्छियन्वो । नि० चू० तृ० ९७ आ । आभोगवउस आभोगवकुश , य आभोगेन जानन् करोति आमग-अपक्कम् । भैग० ६८४ । स , बकुशस्य प्रथमो मेद । उत्त० २५६ । आभोग -साधूना- आमगंधि-आमगन्धयः, विश्राः । सम० १३६ । मकृत्यमेतच्छरीरोपकरणविभूषणमित्येव ज्ञानं तत्प्रधानो वकु- मामजति - अक्खिपत्तरोमे सठवेति । नि० चू० प्र० श आभोगवकुश । ८९० । शरीरोपकरणभूपयो १९० अ। हत्येण आमज्जति । नि० चू० प्र. १८७ आ ।' सञ्चिन्त्यकारी । ठाणा० .३३७ ! आमजमाणे-आमर्जयन् , सकृद्धस्तादिना शोधयन् । आचा. आभोगिणी-य परिजपिता सती मानस परिच्छेदमुत्पादयति सा। बृ० तृ० ३३ अ । जा विजा जविता माणस परिच्छे- | आमजिज-सकृदामृज्यात् । आचा० ३३७ । .दमुप्पादयति सा। नि० चू. प्र. १७५ अ। आमट्ठ-विपर्यामीकृतम् , परामह । ओघ० १९२ । आमृष्टम् , आम-आमम् । दश० १७६ ! अपरिणतम् । पिण्ड० ६५। तेज प्रकर्षारोपणाय मन शिलादिना समन्तात्परामृष्टम् । उत्त० भविशोधिकोटि । वृ० प्र० २०१ अ, ५१ अ । आम णाम जं । 1 भग । । -- (१३३) and -- [ आमडागं आचार्यश्रीभानन्दसागरसूरिसङ्कलितः भायं] ५ - भामडागं-आमपत्रम् , भरणिकतन्दुलीयकादि तच्चाईप- | आमेलग-आमेलकः, आपीडकः, शेखर"। जीवा० २७५॥ 'छमपर्क वा। आचा० ३४८) आपीडः, शेखरकः। जे० प्र० ५२ । जीवा० २०७ ॥ आममहुरे-आममधुरम् , ईषन्मधुरम् । ठाणा० १९६ । आमेलय-आमेलक', चूडा। औप० ६३ ।' आमरणदोसो-आमरणदोषः, महदापद्गतोऽपि स्वतो म- आमेलिय-आपीडिका, चूडा। भग० ३१८ ॥ हदापढ़तेऽपि च परे आमरणादसजातानुताप., अपि त्व- आमो-असत्योवहतो। नि० चू० प्र० १९६ भ! समाप्तानुतापानुशयपर इति । आव. ५९० । आमोभ- आमोद , मानसे उत्सव. । आव० मामरणतदोसे-आमरणान्तदोषः-आमरणान्तमसजातानु आमोकः-कचवरपुजः । आचा० : ४११ । तापस्य हिसादिषु प्रवृत्ति सेव दोष.। ठाणा० १९० । आमोक्ख-आमोक्षः, आमुच्यन्तेऽस्मिनित्यामोक्षणं वाऽs- आमयाँपधिः-ऋद्धिविशेषः । प्रज्ञा० ४२४ । मोक्ष. । आचा० ६ । आमलए-आमलकम् । आव० ८३१ । आमरकः, साम• आमोडणं-हत्थेहि आमोडणं । नि० चू० प्र० २४५ मा। स्त्येन मारि: । ठाणा. ५.८ । फलविशेषः । पिण्ड० २२॥ मोडेति-सीमन्तयति । नि० चू. द्वि० ३१ । दश० १००1 आमोद-गन्धः । उस० ३६९ । मामलकप्प-भामलकल्पा, नगरीविशेषः । आव० ३१४, आमोयगो-आमोदकः । जीवा० २६८ । ३१५, ७०७ । उत्त० १५९ । विशे० ९५० । आमोसगा-आमोषकाः, चौराः । ठाणा० ३१५ । मामलग-आमलक, वहुचीजो क्षविशेष. । प्रज्ञा० ३२ । आमोसलि-आमर्शवतिर्यगूर्ध्वमधो वा कुड्यादिपरामर्शव- भग० ८०३ । द्यथा न भवति। उत्त० ५४१ । आमलगा-आमलकानि । अनु० १९२ ॥ आमोसहि - आमदैषधिः, तत्रामर्षणमामर्प.-संस्पर्शनमि- आमलपाणगं-फलविशेषप्रक्षालनजलं । आचा० ३४७ । त्यर्थः, स एवौषधिर्यस्यासावामौषधि , करादिसस्पर्शमा. माघाओ-अमाघातः, (अमारीपटहः)। आव० ४०१ । त्रादेव घ्याध्यपनयनसमयी लब्धिलब्धिमतोरमेदोपचारा- आमिस - आमिषः-मांसः । उत्त० ६३४ । आमिपाद साधुरेवामपौषधिः। विशे० ३७९ । आचा० १७८ । गृद्धिहेतोरभिलपितविषयादेः। उत्त० ४०९ । आमषधि । ठाणा० ३३२ । आमर्शणमामर्शः-सस्पर्श- मामिलभोगगिद्ध - भामिषभोगगृद्ध., आमिषस्य-मासा नमित्यर्थ , स एवौषधिः । आव० ४७ । आमर्षणमामपः- देर्भोग.-अभ्यवहारस्तत्र गृद्धः। उत्त० ६३४ । हस्तादिसंस्पर्शः । औप० २८ । आमिसापत्ते-मासाद्यर्थ परिभ्रमणम् । ठाणा० २८८ । आमोसे-आमर्षणम् आमर्षः-अप्रमृज्य करेण स्पर्शनम् । आमुसंत - भामृशन् , स्पृशन् । दश० १३७। आचा० आष० ५७४ । आमोषाः-आ-समन्तान्मुष्णन्ति-स्तन्य ११। आमृशन् , भगवत्पादारविन्दं भक्तितः करतलयुगा कुर्वन्तीति। उत्त० ३१२ । दिना स्पृशन् । ठाणा० ९ । उत्त० ८.। आम्नाय-गुणनं, घोपविशुद्धं परिवर्तनं रूपादानं । तत्त्वा० आमुसिज्जा - आमर्पणम् , सकृदीषद्वा स्पर्शनम् । दश० १५३ । आम्रसालवनम् - आमलकल्यानगर्या वनम् । विशे० आमे-आम., अविशोधिकोव्याख्यदोषः। सूत्र. १४५ ॥ आमेड-आमेल:, आपीड., शेखरकः । जीवा० १७२ । आम्लसलिकायाम् । विशे० ६०६ । आमेडणा-आमेडना, विपर्यस्तीकरणम् । प्रश्न० ५६ । आम्लम्-चतुर्थरसम् । आव० ८५४ ।" अविला । उत्त. आमेल-आपीड., शेखरकः । प्रज्ञा० ९६ । भग. ४५९ । ६७७ । पुष्पशेखरक । औप० ५१। आय-तोमलिविसए सीयतलाए आयाण खुरेमु सेवालतरिया आमेलओ-आमेलका, आपीडः, शेखरक । जीवा० ३६१। लग्गति, तत्य वत्या कीरति । नि० चू० प्र० २५४ आ भामोटक -पुष्योन्मिश्रो वालबन्धविशेषः । उत्त. १४३ ॥ कर्माधवलक्षगम् । सूत्र. १८९ । इटफलम् । भग० ४। ९-२५ । "TIT ९५०। . (१३४) P -- [ आयंक अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आयगुचे ] - . । प्रजा० आयंक-आतङ्कः, आशुघाती रोग । आव० ७५९ । सद्यो- | आयंबिलं-मायाम्लम् , ओदनकुल्माषादि। औप० ४० । घाती रोगः । दश० २७३ । कृच्छ्रजीवन दुख | आचा० आचाम्लम् । आव० ८५२ । शुद्धौदनादि । अनुत्त० ३ । ७५ । आशुघाती शूलादि.। जं० प्र० १२५ । भग० सकूरा। आव० ८५५। पानकम् । ओघ० १३३ । ४७१ । सद्योघातिथ्याधि. । भग० १२२ । नरकादि- आयंबिलपाउग्गं-आचाम्लप्रायोग्यम् , (कूरविहाणाणि ) दुखम् । आचा० १६० । कृच्छ्रजीवितकारी, सद्योघाती आव० ८५५। त्यर्थ. शूलादि । ठाणा० ११९ । शूलविचिकादिः सद्यो- आयंबिलवडमाणं-आचाम्लवर्द्धमानम् , तपोविशेष । अन्त० घाती। ठाणा० १५० । व्याधिः । भग० ६९० । आङिति ३२। सर्वात्मप्रदेशाभिव्याप्त्या तंकयन्ति - कृच्छ्जीवितमात्मानं | आयंविलिए-आचाम्लिकः । ठाणा० २९८.। कुर्वन्ति इत्यातंका -सद्योघातिनो सेगविशेषा । उत्त० ३३८॥ आयंभरे- आत्मानं विभर्ति-पुष्णातीत्यात्मम्भरि । ठाणा? आतङ्कः, सद्योघातिन । औप ९६। आव० ५८५ । २४८ । ज्वरादि । पिण्ड० १७७ । आचा० २९७ । कृच्छ्रजीवित- आयंस-आदर्श., वृषभादिप्रीवाभरणम् । अनु० ४७ । दर्पणः । कारी ज्वरादिः । भग० ७०२ । आतङ्कः, आशुकारी जं० प्र० ३९२ । आदर्श । जं० प्र० ५१० । व्याधिविशेषः । दश० चू, १४ । रोगः । उत्त० ४८६ । आयंसघरं-आदर्शगृहम् । आव० १७० । ज्वरादि। आव० ८४८ । ओघ० १९० । कष्टजीवितकारी। मायंसघरगं - आदर्शगृहकम् , आदर्शमयमिव गृहकम् । विपा० ४०। आशुजीवितापहारी शूलादिक । सूत्र० २९२ । जीवा० २००। जं० प्र० ४५ आचा० २०५, ३३०, ३६२ । आयंसमुहदीवे-आदर्शमुखद्वीपः, अन्तरद्वीपनाम । ठाणा. आयंकसंपभोग- आतङ्कसम्प्रयोग , आतङ्क -रोग तस्य २२६। योग । औप० ४३ । आयंसमुहा - आदर्शमुखनामा नवमोऽन्तरद्वीप । आयगुल-पुरुषात्मसम्बन्धि आत्मागुलम् । अनु० १५६ । ५० । जीवा० १४४ । अगुलस्य प्रथममेद । प्रज्ञा० २९९ । आयंसलिवी-ब्राह्मीलिपिपञ्चदशमेद.। प्रज्ञा० ५६ । आयंचणं - गोमुत्त। नि० चू० तृ. १२७ अ । व्य० प्र०। आय-आय , श्रुतनाम । दश० १६ । लाभ । अनु० १५४ । आत्मा-शरीरम्। उत्त० ४१५। जीवश्चित्तं वा। उत्तर आयचामि-लिंपामि, आसियामि। उपा७:३२ । ५०४ । अतति-सततं गच्छति तानि तान्यध्यवसायस्धाना- न्तराणीति आत्मा-मन. । उत्त० ३१४ । आयंतकरे आत्मनोऽन्तम्- अवसान भवस्य करोतीति आत्मान्तकर , धर्मदेशनानासेवक प्रत्येकबुद्धादि । ठाणा० आयइ-आयति.-अनागत, उत्तरकालम् । आव० ५०९ । आयकाय-अनंतकायविशेषः । भग० ८०४ । २१३ । आयक्खाहि-आख्याहि, कथय, निवेदय । भग० ११२ । आयंति-आगच्छन्ति, उत्पद्यन्ते। आव० १७९।। आयगय-आत्मनि गत. आत्मगत., आत्मज्ञ इति । सूत्र आयंतियमरणे-यानि नारकाद्यायुष्कतया ' कर्मदलिकान्य- नुभूय म्रियते मृतश्च न पुनस्तान्यनुभूय मरिष्यतीति । आयगवेसए-आत्मगवेषक , आत्मान-कर्मविगमाच्छुद्धस्व- सम०.३२ ।। रूप गवेषयति-अन्वेषयते यः स । आयगवेषक.-आय - आयंती आयान्ती। आव० ३०७ । सम्यग्दर्शनादिलाभस्तं गवेषयतीति । आयतगवेषक -सूत्र- आयते-आचान्तः, नवानामपि श्रोतसां शुद्धोदकप्रक्षालनेन वाढायतो वा-मोक्षस्तं गवेपयतीति वा । उत्त० ४१५ । गृहीताचमन । जीवा० २४३ । कृतपानः । भग० १६४। आयगुत्ते - आत्मा- शरीरं तेन गुप्त. आत्मगुप्त -न यन- आयंदमे - आत्मदम , आत्मानं दमयति-शमवन्तं करोति स्तत करणचरणादिविक्षेपकृत् , गुप्तो-रक्षितो सयमस्थानेस्य शिक्षयति वेति । ठाणा० २१४ । आत्मा येन स । उत्त० ४१५। . H १०४ आ। । . १२४ । - (१३५) [आयजोगे आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आयमणं ] त्मक " - ३९ । प्रज्ञा० २९०। मायजोगे-आत्मयोगी, आत्मनो योगः-कुशलमनःप्रवृत्तिरूप | आयतीहितं-आगामिकालहितं, आत्मना हितं वा । दश० आत्मयोगः, स यस्यास्ति स तथा, धर्मध्यानावस्थित. । सूत्र. चू० १५७। आयते-आयतः, संस्थानपञ्चममेद । प्रज्ञा० २४२ । भग० आयटुं- आत्मनोऽर्थ आत्मार्थः, स च ज्ञानदर्शनचारित्रा- आत्मने हित-प्रयोजनमात्मार्थ, चारित्रानुष्ठानमेव, आयतो-आयत , मोक्षः। सूत्र० १५३ । मोक्खो । दश० आयतः-अपर्यवसानान्मोक्षः स एवार्थ.। आयत्त -मोक्षा, चू० ८८ । अर्थ:-प्रयोजनं यस्य । आचा० ११० । आत्महितं । आचा० आयत्तं-आयत्तम् , सम्मिश्रम् । पिण्ड ० ८१। आधिनीकृ. १०९ । ज्ञानादिरूपं स्वकार्यम् । वृ० द्वि० ७१ अ । तम्। आव० ३६६ ।। भायट्ठी-आत्मार्थी, यो बन्यमपायेभ्यो रक्षति सः, आत्म आयत्ताप-आत्मत्वाय-आत्मीयकर्मानुभवाय । आचा० वान । सूत्र. ३४२ । २३३ । आयणाणं आत्मज्ञानम् , वादादिव्यापारकाले किममुं प्रति- आयपइट्टिते-आत्मप्रतिष्ठितः, आत्मना वा परत्राक्रोशा- वादिनं जेतुं मम शक्तिरस्ति न वा ? इत्यालोचनम् । उत्त० दिना प्रतिष्ठितो-जनित भात्मप्रतिष्ठितः। ठाणा० ९२ । आत्मापराधेनैहिकामुष्मिकापायदर्शनादात्मविषयः । ठाणा० आयणीली-वल्लीविशेषः । प्रज्ञा० ३२ ॥ आयणं-आकीर्णम् , स्थानविशेष । ओघ० १५४ । आयपतिटिए- आत्मप्रतिष्टितः, आत्मन्येव प्रतिष्ठितः । आयतंगुली-एगापएसिणी। नि० चू० प्र० २०८ भ । आयतगुत्ते-आत्मगुप्त-सततोपयुक्त । आचा० २७२ । आयपवायं-आत्मप्रवाद, सप्तमपूर्वम् । ठाणा० १९९ । भायतजोग - आयतयोगः-सुप्रणिहितं मनोवाकायात्मकम् । आयप्पवाय-आत्मप्रवादः, यत्रात्मन. ससारिमुक्ताद्यनेक. आचा० ३१४ । ज्ञानचतुष्टयेन सम्यम्योगप्रणिधानं । आचा० मेदभिन्नस्य प्रवदनम् । दश० १२ । आत्मानं-जीवमनेकधा ३१४॥ नयमतभेदेन यत्प्रवदति तत् । नंदी २४१ । आयतणं-आयतनम् । गुणीनामाश्रयः, अहिंसाया सप्तच- आयप्पवायपुवं - आत्मप्रवादनाम सप्तमपूर्वम् । सम० त्वारिंशत्तमं नाम। प्रश्न० ९९ । आविष्करणं कथनं, निर्ण २६ । विशे० ९४६ । यनं वा। सूत्र० १८१ । स्थानम् । ओघ० २२२ । नि० चू० आयभाव-आत्मभाषः, स्वस्वरूपः । अनु० २२६ । जीव- प्र० १९२ आ। देवकुलम् । नि० चू० द्वि० ६९ । दोषाणा सम्बन्धः । अनु० २२० । उत्थानशयनगमनभोजनादिरूप स्थान। आचा० ३२९ । ज्ञानादित्रयम् । आचा० २०७। आत्मपरिणामविशेषः। भग० १४९ । अनादिभवाभ्यस्तो मायतणा-आयतनानि-बन्धहेत्वः। ठाणा० ४५१ । मिथ्यात्वादिक , विषयगृध्रुता वा । सूत्र० २४० । मायतणाई-आयतनादीनि, दोपरहितस्थानानि, वसतिग- मायभाववंकणया - आत्मभाववंकनता, आत्मभावम्याप्र- तानि, संस्तारकगतानि च । आचा० ३७२ । देवकुलपार्था शस्तस्य वकनता-वक्रीकरण प्रशस्तत्वोपदर्शनता । ठाणा. पवरका । आचा० ३६६। कोपादानानि । आचा. ४०७ । उपभोगास्पदभूतानि । आचा० १२७ । कर्मोपादान- मायभाववंचणा- आत्मभाववञ्चनता, मायाप्रत्ययिकीकि- स्थानानि । आचा० ३५६ । टोपस्थानानि । आचा० ३८६ । यायाः प्रथमो मेद. । आव०.६१२ । आयतरो-तववलिओ। नि० चू० तृ. १२३ अ। आयभाववत्तव्वया-आत्मभाववकव्यता, अहंमानिता। मायतसंठाण-आयतसस्थानम् । प्रना० ११। भग० १३९ । मायता-दीर्घा। जीवा. १६४। आयमणं-आचमनम् , निलेपनाटि । ओघ० १३७, १९०, आयती-सन्तनि । वृ० द्वि० २१३ अ । १६२ | आशातनायाः दशममेद. । आव० ७२५ । गण्ड. । ४२ । । , । (१३६) [ आयमाणे अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आयरियते ] पादिकरणम् । उत्त० ३७० । निर्लेपनम् । बृ० तृ. २०४ आ। दुर्गतिपतनात् त्रातोऽनेनेति, रक्षिता आयाः-सम्यग्दर्शना- जिल्लवण | नि० चू० प्र० २२० आ। पुरीषोत्सर्गानन्तरं शौच. दिलाभा येनेति । उत्त० ४१४ । करणम् । पिण्ड ० ११। आचमनम् । ठाणा० ३३९ । आयरणं-आचरणम् , अनुष्ठानम् । उत्त० ५३३ । आयमाणे-आददानः, प्रवर्त्तमान । सूर्य. १२ । आयरणया-आदरणं, अभ्युपगमं आचरणम् वा। भग० आयमेजा-निर्लेपनं चापाने एवमेव कुर्यात् । ओघ० १२५ । ५७३। आयय-आयतम् , प्रसारितम् , दीर्घम् । भग० २३० । आयरणा-आचरणा, विधिः, मर्यादा, सीमा च। आव० मायतः- मोक्ष , आयतम्-अत्यन्तम् । दश० २५८ । ६३९ । ततियभङ्गविकप्पो। नि० चू० प्र० १९८ अ । आकृष्ट , दीर्घश्च । भग० ९३, ३३३ । मोक्ष. । व्य० चर्या। बृ० तृ. १२९ आ । द्वि० १९७ भ । आत्मा । आचा० १२२ । मोक्ष. सयमो आयरिअ-आचार्य , शिल्पपदेशदाता। भग०३१७। औप० वा । उत्त० ५८७ । सयत । आचा० ३१४ । प्रयत्नवान् । ६२ । अनुयोगाचार्यः । उत्त० १७ । व्य० प्र० १३७ अ । भग० ९३ । दीर्घः सर्वकालभवनात् मोक्षः। सूत्र. ७५ । अनुयोगधरः। आचा० ३५३ । सपरसिद्धतपरूवगो। नि० आययकण्णायत्तं-आयतकर्णायतम् , प्रयत्नवत्कर्ण याव चू० प्र० १६ अ । आयरिए-आचार्य.-प्रतिवोधकप्रव्राजकादि दाकृष्टम् । भग० ९३ । अनुयोगाचार्यो वा । ठाणा० १४३, २४४ । आययचक्खू - आयतचक्षु - दीर्घमैहिकामुष्मिकापायदर्शि | आयरिय-आचरितम् , आसेवितं । आव० २६३ । आर्य - चक्षुः-ज्ञान यस्य स । आचा० १३६ । आराद् यात पापकर्मभ्य इति । भग० ९० । भाचरण- आययट्ठिए-आयतार्थिकः, मोक्षार्थी । दश० २५६ । माचरितं तत्तक्रियाकलाप । उत्त० २६६ । आराद्यातं आययट्ठिया-आयतार्थिका , आयतो-मोक्ष सयमो वा स सर्वकुयुक्तिभ्य इत्यार्य-तत्त्वं तत् । उत्त० २६६ । आर्यम्- एवार्थ प्रयोजन विद्यते येषामिति । उत्त० ५८७ । आयत - आर्याणां कर्तव्यं आचार्य वा, मुमुक्षुणा यदाचरणीयं ज्ञान- मोक्षस्तत्र स्थिता आयतस्थिता उद्यतविहारिण सविग्ना दर्शनचारित्रम् । सूत्र. १८४ । पापकर्मभ्य आराद्यातमि- इत्यर्थ । ध्य. द्वि० १९७ अ । त्यार्यम् । ठाणा० ११९ । आययट्ठी-आयतार्थी, मोक्षार्थी । दश. १८७ । आयरिय-आचार्यः । प्रज्ञा० ३२७ । शिल्पी। जै० प्र० आययणं-आयतनम् । आव० २११ । आदानम् । अन्त० २१२ । आरित्यमिव्याप्त्या मर्यादया वा स्वयं पञ्चविधा- २४ । गमनम् , गृहम् । जीवा० २७९ । स्थानम् । जं. चारं चरत्याचरयति वा परान् , वा, मुक्त्यर्थिमि- प्र० ७७ । दश० १९८ । आल्-अभिविधौ समस्तपापा रासेव्यत इति। उत्त० ३७। आ-मर्यादया-तद्विषयविन- रम्मेभ्य आत्मा आयत्यते-आनियम्यते यस्मिन् कुशला. यरूपया चर्यते-सेव्यते, जिनशासनार्थोपदेशकतया तदा- नुष्ठाने वा यत्नवान् क्रियत इत्यायतनं-ज्ञानादित्रयम् । काक्षिमिरिति, आचार:-ज्ञानाचारादि , आ-मर्यादया वा आचा० २०६ । उत्पत्तिस्थानम् । उत्त० ६२३ । चारो-विहार आचारः तत्र यः स्वयंकरणात्प्रभापणात्प्रदर्शनाच आययतरे-आयततर', आयमनयोरतिशयेनायत आयत साधु स , आ-ईषत्-अपरिपूर्णाः हेरिका ये ते चारा:- तर । आचा० ०९४ । यत्नेनाध्यवसित । आचा० २९३ । आचारा -चारकल्पा', युक्तायुक्तविभागनिरूपणनिपुणा विने- आयरंति-आचरन्ति, आसेवन्ते । दश० १९८ । या शिष्यास्तेषु यो यथावच्छास्त्रार्थोपदेशकतया । भग० ३। आयरंतो-आचरन् , व्यवहरन् , कुर्वन् वा। उत्त० ६४ । आयरियउवज्झाए - आचार्योपाध्याय , आचार्येण महो- आयरक्खा-आत्मरक्षा, स्वाम्यात्मरक्षा । भग० १९४ । पाध्यायः । भग० २३२ । आचार्येवोपाध्याय । नि० चू० अगरक्षा रानाम् । ठाणा० ११७ । प्र० १९६ आ। आयरक्खिए-आत्मरक्षितः, आत्मा रक्षितो दुर्गतिहेतोरप-आयरियजणवय-देशविशेष । नि० चू० प्र० ३४४ आ । ध्यानादेरनेनेति । उत्त० ९९ । आयरक्षित -आयो वा- आयरियते - आचार्यकम्-तद्ग्रन्थव्याख्यातृत्वम् । ध्य० ज्ञानादिलाभो रक्षितोऽनेनेति । उत्त० ९९ । आत्मा रक्षितो प्र. १६६ मा आचर्यते वा, । (१३७) [आयरियवं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलित आयाणं ] . आयरियव्वं-पटियव्च । नि० चू० प्र० ५ आ । आयसा-आत्मना। सूत्र० १०६ । थायवणाम-आतपनाम-यदुदयात् जन्तुगरीराणि स्वरूपेणा- आयसी-लोहमयी, दर्भमयी च | प्रश्न० १३ । नुष्णान्यपि उष्णप्रकाशलक्षणमातप कुर्वन्ति तदातपनाम, आयसंवेणिजा-आत्मसवेदनीया-आत्मनों क्रियन्ते ये, उप- तद्विपाकश्च भानुमण्डलगतेषु पृथिवीकायिकेष्वेव न वह्नी, सर्गा । आव० ४०५। प्रवचनेऽपि निषेधात् , तत्रोष्णत्वमुष्णस्पर्शनामोदयात् , उत्कट- | आयसरीरसंवेयणी-आत्मशरीरसवेजनी, संवेजनीकथाया लोहितवर्णनामोदयाच प्रकाशकत्वम् । प्रज्ञा० ४७३ । प्रथमोमेदः । दश० ११२ । आयरिया-आचार्या -प्राणाचार्या वैद्या । उत्त० ४७५ । आयसरीराणवकंखिया-स्वशरीरक्षतिकारिणी क्रिया । व्य० प्र० १७१ । ठाणा० ४३ । आयरिसो-आदर्श.। आचां० ५। आयसेण - आत्मसेन , जंबूद्वीपैरवते अस्यामवसपिण्या आयरेणं-भादरेण, प्रयत्नेन । जं० प्र० १९२ । चतुर्थतीर्थकृत् । सम० १५९ । आयरो - आदरः, भाद्रियते भादरणं वा, परिग्रहस्याष्टमं | आया आत्मा, जीवः। आचा० १६। आत्मा । भग० नाम । प्रश्न० ९२। सम्भ्रम । बृ० तृ० ११ । १२२ । आत्मा, रूपं । नंदी २१२। द्वादशशते आत्म- आर्य-अज, पितामहः । ध्य० प्र० १७१ भ। अजुगु. भेदनिरूपणार्थों दशमोद्देशक.। भग० ५५२ । अतति- प्सीत्कारी। व्य० प्र० १४ अ । सततमवगच्छति 'अत सातत्यगमन' इति वचनादतो आयल्लयं-गृहम् । पउ० ३३-६६ । पराधीनताम् । पठ. धातोर्गत्यर्थत्वाद्गत्यर्थानां च ज्ञानार्थत्वादनवरतं जानातीति २४-१५। निपातनादात्मा-जीव. उपयोगलक्षणत्वादस्य सिद्धसमार्यव- आयवं-आतपवान् , चतुर्विंशतितममुहर्तनामविशेष । सूर्य० स्थाद्वयेऽप्युपयोगभावेन सतताववोधभावात् , अतति-सततं १४६ । जं. प्र. ४९११ रविविम्वजनित उष्णप्रकाश. । गच्छति स्वकीयान् ज्ञानादिपर्यायानित्यात्मा, ससार्यपेक्षया उत्त० ५६१ । आतप , आ-समन्तात्तपति सन्तापयति नानागतिषु सततगमनात् मुक्तापेक्षया च भूततद्गावत्वा- जगदिति । उत्त० ३८ । धर्म । उत्त० १२२१ । दात्मेति । ठाणा० १० । आयवतत्तए-आतपतप्तं पय । भग० ६८० । आयाए-आत्मविराधनादोषः । ओघ० ७९ । आयवत्ताई-आतपत्राणि, छत्राणि । जं. प्र. ८१ ! आयाणं-आदानम् , ईप्सितार्थग्रहणम् । औप० १८ । अर्ग- आयवाइ-विश्वकारणात्मवादिन । आव० ८१६ । लास्थान वा। औप० १८ । दुष्प्रणिहितमिन्द्रियं । आचा. आयवाई-आत्मघादिन , क्रियावादिविशेष । सम० ११० । ३०४ । कर्मादानम् । भाचा० ३३७। आदीयते-स्वीमि. 'पुरुष एवेद नि' मित्यादि प्रतिपत्तुरिति । ठाणा० २६८ । यते प्राप्यते वा मोक्षो येन तत् , ज्ञानदर्शनचारित्रत्रयम्। आयवाभा- आतपाभा, सूर्यस्य ज्योतिपेन्द्रस्य द्वितीया सूत्र. ५२ । डगलगा। नि० चू० प्र० २२० आ । गहण, अप्रमहिपी । जीवा० ३८५। सूर्यस्य पलीनाम । भग० जेग मग्गेण गतूण दगमहियहरियादीणि घेप्पति त दगमट्टिय । ५०५। दश० चू० ७८ । कुचादिग्रहणम् , सम्प्राप्तकामस्य॑कादशो आयवी - आत्मवित्, आत्मानं श्वभ्रादिपतनरक्षणद्वारेण मेद । दश० १९४ । आदान -आदीयतेऽनेनेत्यादानो- वेतीति । आचा० १५४ । मार्ग । दश. १६८ । इन्द्रियम् , करणम् । भग० २८६ । आयवीरियं-वीर्यस्य पयममेद । नि० चू० प्र० १९ अ । आदीयते-द्वारस्थगनार्थ गृह्यत इत्यादान । ज० प्र० १११॥ मायसंचयणिजा आत्मना सचेत्यन्ते-क्रियन्त इति आदीयते- गृह्यते आत्मप्रदेश सह लिप्यतेऽष्टप्रकार कर्म आत्मसचेतनीया (घटन-पतन-स्तभन-ल्पजन्या उप येन तदादानम् , हिंसाद्या प्रवद्वारमष्टादशपापस्थानरूपं वा। सर्गा )। ठाणा० २८० । आचा० १७०। संयमानुष्ठानं । आचा० १२८। कर्मों- आयसंचेयतो-आत्मसचेतनीयः-आत्मनवात्मनो दु खोत्पा. पादानं। आचा० २४३, ३३० । आदीयते-मावद्यानुष्टानेन दनम् । व्य० प्र० १९६अ। स्वीक्रियते १९३। आदि । व्याप्र० २१८ - । आचा. (१३८) - [आयाणपएण अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः आयारकहा ] - भा। हिंसाद्याश्रवद्वारमष्टादशपापस्थानरूपं वा तत्स्थिवेनि- | आयाणी-क्वचिद्देशविशेषेऽजा सूक्ष्मरोमवत्यो भवन्ति, तत्प. मित्तत्वात्कषाया वा। आचा० १७१ । आदीयत इति, मनिष्पमानि आजकानि भवन्ति । आचा० ३९४ । धनधान्यादि। उत्त० २६५ । आदीयत इति आदि ~ आयाणीय-आदानीयम् , प्राधम् । आचा० ३८ । प्रथमम् । उत्त० ५७० । आदीयन्ते-गृह्यन्ते शब्दादयोऽर्था आयाती-आयाति , गर्भानिर्गम । ठाणा० ६७ । एमिरिति आदानानि-इन्द्रियाणि। बृ० प्र० २११ भा। आयापरिणामो आज्ञया परिणाम । व्य. द्वि० आदीयते -सद्विवेकैद्यत इति, चारित्रधर्म । उत्त० ३३८ । ४५० । आदीयते गृह्यतेऽर्थ अनेनेत्यादानम्-इन्द्रियम् । भग० २२४ । आयाम अवशायनम् । आव० ५४ । दैर्घ्यम् । अनु० आदान , आदेयो रम्य । प्रश्न. ८१। भादीयते-स्वीक्रियते १८०, १७१ । भग० ११९ । ठाणा० ६९ । आव० १८४ । आत्महितमनेनेति-सयम । उत्त० २२५ । सम्यग्दर्शनज्ञान अवश्रावणम् । ओघ० १३३ । पिण्ड० १७। आचामः। चारित्ररूपम् । सूत्र० ४०५ । ठाणा० ३३९ । अवसामणं । नि० चू० प्र० ४७ भा। आयाणपएण - आदीयते-प्रथममेव गृह्यत इत्यादानं तच्च आचाम्लम् । उत्त० ७०६ । उच्चत्वम् । भग० २६९ । तत्पदं चादानपदं तेन आदानपढेन । आचा० १९६ । आयामगं-आयामकम् , अवश्रावणम् । उत्त० ४१९ । आयाणपय आदानपदम् , शास्त्रस्याध्ययनोद्देशकादेवादि आयामणया-आकर्षणम् । भग० ९३ । पदम् । अनु० १४१ । आयामते-आयामकम्-अवश्रावणम् । ठाणा० आयाणपरिसाडे-आधानपरिसाटम् , गर्भाधानपरिसाटरूप- आयामविपखंभो-आयामविष्कम्भ । आव० १५० । मूलकमंतृतीयभेदः । पिण्ड० १४२ । आयामुसिणोदग-अवश्रावणमुष्णोदकं च । ठाणा० ३३९ । आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिई - आदानभाण्डमात्र- | आयामे-आयाम , दैर्घ्यम् । प्रज्ञा० ४२७ । निक्षेपणासमिति , भाण्डमात्रे आदाननिक्षेपविषया समिति - आयामेति-ददाति । भग० ६६३ । सुन्दरचेष्टा । आव० ६१६ । आदाने-प्रहणे भाण्डमात्राया आयामेत्ता-आयामेन समाकृष्य । सूत्र. ३०९ । आयम्य, वत्राद्युपकरणरूपपरिच्छदस्य, उपकरणस्य वा, भाण्डस्य- आकृष्य । भग० ९३ । वस्त्रान्मयभाजनस्य वा मात्रस्य च-पात्रविशेषस्य निक्षे- आयामेत्था-भोजितवान् । भग० ६६२ । पणायां-विमोचने ये समिता -सुप्रत्युपेक्षितादिक्रमेण सम्यक् | आयाय-आदाय, स्वीकृत्य, चरित्वा । उत्त० १२८ । अव- प्रवृत्तास्ते। औप० ३५। गम्य । आचा० ३३९ । गृहीत्वा मयैतदर्थ यतितव्यमिति आयाणरक्खी- आदानरक्षी, आदीयते-स्वीक्रियते आत्म- निश्चित्य बुद्धधा सम्प्रधार्येतियावत् । उत्त० २६८ । वुद्धपा हितमनेनेत्यादान -सयमस्तद्रक्षी । उत्त० २२५ । गृहीत्वाऽभ्युपगम्य। उत्त० २५३ । गृहीत्वा, अवगम्य । आयाणसो-आदानश.-आदेरारभ्य । सूत्र. ४२४ । आचा० ३३५ । बुद्धया गृहीत्वा । उत्त० १०४ । आयार-स्वरूपम् । जं. प्र. १८ । मूलगुणादि । दश. आयाणसोय - आदानस्रोत , आदीयते - सावद्यानुष्ठानेन २५६ । लोचास्नानादि । दश० ११०! आल्-मर्यादाया स्वीक्रियत इति आदानम्-कर्म ससारयीजभूतं तस्य स्रो- चरणं चार -मर्यादया कालनियमादिलक्षणया चार आचार तासि-इन्द्रियविषया मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकषाययोगा वा । इति। आव. ४४८। चतुर्थनियुक्ति । आव० ६१। श्रुतज्ञानादिविषयमनुष्टानं कालाध्ययनादि। भग० १२२ । भायाणसोयगढिए संसारबीजभूतेन्द्रियविषय मिथ्या- व्यवहार. । ठाणा० चारित्रम् । उत्त० ५८३ । त्वादिगृद्ध -अध्युपपन्न । आचा० १९३ । ज्ञानाचारादि । उत्त० ५८३ । आयाणिज-आदानीयम्-श्रुतं । आचा० १२२ । कर्म । आयारअक्खेवणी-भाचाराक्षेपणी, आचारो-लोचास्नाना- २४२। आदातव्यं भोगागं, आढानीयं-कर्म दिस्तत्प्रकाशनेन भाक्षेपणी। ठाणा. २१० । आवा० १२० । ग्राह्य , आदेयवचनश्च । आचा० १९१। आयारकहा । नि० चू० द्वि० ६५ अ। आचा० १९२ । - ाचा. (१३९) [आयारकुसल आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आयोधनस्थानम् ] आयारकुसल-जानाद्याचारेण कर्मकुशानां लावकः । व्य० आयारसमाही-आचारसमाधिः, चतुर्थ विनयसमाधिस्था- प्र० २३४ । आचारे ज्ञातव्ये-प्रयोक्तव्ये वा दक्ष , अभ्युत्थाना नम् । दश० '३५५ । मनप्रदानायुपहितान्तगुणानामाकरो वा। व्य० प्र० २३६ । मायारे-आचार. । नि० चू• तृ० १४८ भा। ज्ञानादि- आयारक्खी-आत्मरक्षी, आत्मानं रक्षत्यपायेभ्यः कुगति. विषयाऽऽसेवा । ठाणा० ३२५ । आचार्याणां नमस्काराईत्वे गमनादिभ्य इत्येवंशील। उत्त० २२५ । तृतीयहेतु , तानाचारवत आचाराख्यापकांश्च प्राप्य प्राणिन भायारगोअर - आचारगोचर , क्रियाकलाप । दश० आचारपरिज्ञानानुष्टानाय प्रभवन्ति। आव० ३८३ । १९१। आचार. - मोक्षार्थमनुष्टानविशेषस्तस्य गोचर । आयारो-आचार., साधुसामाचारी। प्रश्न० १२५ । आचा- आचा० २६६। येते आसेव्यत इत्याचार.। आचा० ५। आचार । व्य. आयारग्ग-चूलिका । आचा० ७ । द्वि० ३९१ । आयारतेणे-आचारस्तेन , विशिष्टाचारवत्तुल्यरूपः इति । आयावए-आतापनाकारी । प्रश्न. १०७। दश० १९०। मायावगा-असुरकुमारविशेष । भग० ६२० । आयारदंसणं-आचारदर्शनम् , प्रत्युपेक्षणादिक्रियादर्शनम् । आयावणा-आतापनास्थानम् । आव० ३९१ । आव० ४४८॥ आयावादी-आत्मवादी । आचा० २२ । आयारदोसो-आचारदोष । आव० ६५४ । आयावतं-सकृदीषद्वा तापनमातापनम् । दश० १६३ । आयारपकप्प-आचारप्रकल्प , आयरणं आयारो सो य आयाविंतो-आतापयन् । आव० ३७१। पञ्चविहो-णाणदसणचरित्ततववीरियायारो य, तस्स पकरिसेणं कप्पणा-सप्तभेदप्रतपणेत्यर्थः । नि० चू० प्र० ४ आ । आयास-पीडा । ओघ० १५७ । लोहमयम् । भग० ३१९ । आचार-प्रयमाझं तस्य प्रकल्प.-अध्ययनविशेषो निशीथ- मन प्रभृतीना खेद., परिग्रहस्य चतुर्विंशतितमं नाम । प्रश्न मित्यपराभिधानं, आचारस्य वा-सावाचारस्य ज्ञानादिविष- यस्य प्रकल्पो व्यवस्थापनमित्याचारप्रकल्प । सम० ४८ । आयासकर-आदेशितः आदेशः, आदेशत इति आदेश. । उत्त० ६१६ । (निशीथ ) आचार एव । आव० ६६० । व्य. द्वि० ३३६ आ। प्रत्याख्यानपूर्वस्य विंशतितमं प्रामृतं । आचा० ३१९, ३२० । आयाहिणंपयाहिणं आदक्षिणप्रदक्षिण , आदक्षिणात्- निशीथाध्ययनम् । ठाणा० ३३५ । दक्षिणहस्तादारभ्य प्रदक्षिण.-परितो भ्राम्यतो दक्षिण एव । आयारपभासणं-कालनियमाद्याचारव्याख्यानम् । आव० सूर्य० ६। आव० १२४ । जं० प्र० १७ 1 भग० ११४ । आयाहिण-आदाहिणा, आदक्षिणाप्रदक्षिणा । आव० २३२ । आयारफल-आचारफलम् , मुक्तिलक्षणम् । उत्त० ५८३ । आयुःकर्मानुभूतिः - स्थितिर्जीवनमिति । प्रज्ञा० १६९ । आयारमंडए-आचारभाण्डम् । अनुत० १। आयुःक्षेमस्य-जीवितस्य । आचा० २९१ । आयुष क्षेम - आयारभंडग-आचारभाण्डक-पात्र कम् । ओघ० १५ । सम्यक्पालनं तस्य । आचा० २९० । आयारभाव-विशिष्टाचार । दश. १९० । आयुर्वेदः-वेदकशास्त्रम् । विपा० ७५ । आयारमंतरे-आचारान्तरे । आव० ७९३ । आयो-लाभः । भग० ९ । गमनं, वेदनम् । ठाणा० ३४८ । आयारवं-पंचविहं भायारं जो मुगइ आयरइ वा सम्म आयोगठाणं - आयोगस्थानम् , मेलनस्थानम् । मो। नि० चू० तृ० १२८ आ । नानादिपञ्चप्रकाराचारवान् । ८२३ । ठाणा० ४२४, ४८४ । आयारवंतं-आकारवत् , मुन्दराकार, आकारचित्रं घा। आयोग्गहो-आयपमाणं स्वेत्तं । नि० चू० प्र० २४६ आ । औप० २। मायोधनस्थानम्-अट्टालकम् । उत्त० ३११ । ९२ । ४४८ । आव० (३४०) -- - - [ आरं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आरभड ] - अरण्ये भवः, . . आरं-आरः, ससारः । बृ० प्र० ५१ अ, २०१ अ । इहभवः, | आरक्खिय - आरक्षकः । उत्त० १६५। दण्डनायकः । गृहस्थत्वम् , संसारो पा। सूत्र० - ५६। इहलोकाख्य दश० १६६ । आव० ६३३ । ओघ० १०६ । आरक्षिका- मनुष्यलोकं वा। सूत्र. १५२ । णामप्युपरि स्थायिनो हिंडिका आरक्षिकाः, पुररक्षिकाः। आरंभ - आरम्भ., जीवोपघातः, उपद्रवणं, सामान्येन व्य० प्र० १३५ अ। वाऽऽश्रवद्वारप्रवृत्ति । भग० ३१। श्रावकस्याष्टमी प्रतिमा। आरक्खियपुरिसो-आरक्षकपुरुषः । आव० ३५१ । आव० ६४६ । आरभ्य । आव०६८८ । सावधानुष्ठानम्। आरगय - आराद्गतम्-आराद्भागस्थितमिन्द्रियगोचरमागत- आचा० ७८ । जीवोपघात.। भग७३५१ पृथिव्याद्युप मित्यर्थः । भग० २१७ } मर्दनं । ठाणा० १०८ । सावधक्रियानुष्ठानम्। आचा० | आरघट्टिकम् । उत्त० ३८२ । १५६ । आरम्भणमारम्भ., शरीरधारणायानपानाद्यन्वेषणा। आरटन्ती-रुदन्ती । नंदी १५४ । भाचा० २९० । प्राणिवध । तत्त्वा० ६-९ । द्रव्योत्पादन- | आरणं-संशब्दनम् । ओघ० ८१ । व्यापाराः । उत्त० ४५६ । पृथिव्याद्युपमर्दनम् । प्रज्ञा० आरणा आरणा , कल्पोपगैकादशवैमानिकमेद । प्रज्ञा ३३५। जीव , - कृष्यादिव्यापारः, जीवानामुपद्रवर्ण वा। प्रश्न. ६ । नि० चू० प्र० -३३. आ। व्यापारः । प्रश्न आरण्ण-आरण्यः, तापसादिः । अनु० २४४ । ६३ । हलदन्तालखनन । आव० ८१८ । आरण्णगतणं-श्यामाकादितृणम् । वृ० द्वि० २२० अ । आरंभर-आरभते-पृथिव्यादीनुपद्रवयति । भग० १८३ । भारपिणय-आरण्यकः, तीर्थिकविशेष. । सूत्र आरंभो - आरम्भज , आरम्भात्-हलदन्तालखननाज्जा ४२२ । यते स । आव० ८१८ । आरण्यकम्-लौकिकश्रुतम् । आव० ४६५ । मारंभकहा-आरंभकथा, छागतित्तिरमहिषारण्यकादिका हता आरत-अत्र इतो वा। उत्त० ५४० । अत्रेति प्रशंसन द्वेषणं वा। भककथायास्तृतीयमेद । आव. आरत्तं-आरक्तम् , ईपद्रक्तम् । आचा० १२१ । ५८१ । तित्तिराद्युपयोगकथा । ठाणा० २०९ । आरद्धो-आरब्धः । विशे० ९८१। आरंभपरिणाए-आरम्भ -पृथिव्याधुपमर्दनलक्षण. परि- आरनालं-कजिय (देसीभासाए)। नि० चू० प्र० ४७ अ । ज्ञात -तथैव प्रत्याख्यातो येनासावारम्भप्रतिज्ञात , श्रमणो- | आरनिवद्धा-आरकनिवद्धा, गन्त्री । पिण्ड० १०२। पासकाष्टमी प्रतिमा । सम० १९ आरनिय-अरण्ये वसतीति आरण्यकः। सूत्र० ३१५ । आरंभसमारंभो-आरंभसमारंभः, आरंभा-जीवास्तेषां समा- आरवके - आरवदेशोद्भवान् , म्लेच्छविशेषान् । जं० प्र० रंभ.-उपमर्दः, अथवा आरंभ.-कृष्यादिव्यापारस्तेन समा २२० । रंभो जीवोपमर्द , अथवा आरंभो-जीवानामुपद्रवणं तेन सह आरयदेशजा-आरव्यः । जं० प्र० १९१ । समारंभ , परितापनमिति वा, प्राणवधस्यैकादशपर्याय । आरवी-आरवदेशवासिनी स्त्री । भग० ४६० । प्रश्न० ५।। आरवो-आरव , चिलातदेशवासी म्लेच्छ । प्रश्न. १४ । आरंभिया- आरंभिकी, आरभ -पृथिव्याशुपमर्दनं स प्रयो- आरभंती-आरभमाणा, षटकायान् विनाशयन्ती । पिण्ड जन-कारणं यस्या सा, सम्यग्दृष्टे. प्रथमक्रिया । प्रज्ञा० ३३४ । विंशतिक्रियामध्ये प्रथमा। आव० ६१२। आर- आरभटभसोल:-त्रिंशत्तमो नाट्यविधि । जीवा० २४७ । म्भणमारम्भ तत्र भवा आरम्भिकी। ठाणा० ४१ । आरमड आरभटम् , नृत्यविशेष. । जं. प्र. ४१२ । आरक्खि-आरक्षक चौरप्राहक । वृ० द्वि० १०७ अ। नि० चू० तु, १ अ। जहाभिहितविधाणतो विवरीयं, अहवा भारक्षिकः । ओघ० ८९ । तुरियं अण्णमि वा दरपडिलेहंति अण्णं आढति । नि० आरक्सिगो-दंडवासिगो। नि० चू० तृ. ३० आ। चू० प्र० १८१ आ । वितथकरणत्पा, त्वरित सर्वमारभमा- आरक्खितो-कोहवालो। नि० चू० प्र० २६२ अ । णस्य, अर्द्धप्रत्युपेक्षित एवंकत्र यदन्यान्यवन ग्रहणं मा । ठाणा. -- . १५७ । । १४१) [ आरयं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः आरियदंसी] - ३६१ । विपर्गना प्रन्युपेक्षणा, आकुल यदन्यान्यवस्त्रग्रहणं | आराहओ-आराधक , अविराधक' । ओघ० ११२ । तद्वा। ओघ० १०९ । मोत्साह मुभरः तेषामिदम् । ज० आराहगा-आराधका:-आराधयन्ति-अविकलतया निष्पा. २० ४७ । अष्टाविंशतितमो नाट्यविधि । जीवा० २४७ । दयन्ति सम्यग्दर्शनादीनि इत्याराधका । उत्त० २३३ । ज० प्र० १४७ । आवर्जका । उत्त० ३६१ । आरयं - आरतं, उपरतम् । सूत्र. १०५। अभिविधिना आराहण-आराधनम् , अखण्डकालकरणम् । भग० २९७। आसक्त। प्रश्र. १३८ । भाराहणा-आराधना, सम्यगासेवना। उत्त० ५८६ । अनु. आरसि-आरस्य, रुदित्वा। आव० ५०४ । ठानम् । उत्त० ५९१ । ज्ञानाद्याराधनात्मिका । उत्त० ५८२। आरसियं-आरसितम् , गन्दित । आव० २२७ । आवर्जनार्थम् । उत्त० ५९१। अखण्डकालस्य करणम् । आरा आरा, प्रवणदण्डान्तर्वर्तिनी लोहशलाका । प्रश्न आव० ८४० । चरमकाले निर्यापगरुपा। दश०.२६२ । २२ । तुट्टोवाणसिव्वट्ठा । नि० चू० द्वि० १८ अ। मोक्षमार्गाखण्डना। आव० ५६२ । आवश्यकस्य पर्याय । आराडी-आराटी, आरसनम् । आव० ६७७ । विशे० ४१५। अष्टमशते दशमोद्देशक । भग० ३२८ । आरादण्डः - प्रतोद । दश० २५० । अखण्डकालकरगम् । उपा० १२। मोक्षाराधनाहेतुत्वात् । आराम-तत्र रमणीयतातिशयेन स्त्रीपुरुपमिथुनानि यत्र आर. अनु० ३१। निरतिचारज्ञानाद्यासे। ठाणा० ९८ । मन्ति म विविधपुष्पजात्युपशोभित आराम। अनु० २४ । आराहणामरणंते-आराधनामरणान्ते, मरणकाले आरा- विविधपुप्पजात्युपशोभितः । ठाणा० ३१२ । रति. आचा० धना, योगसङ्ग्रहे द्वात्रिंशत्तमो योग । आव० ६६४ । २२९ । आराम.-आरमन्ति यस्मिन्माधवीलतादिके दम्प- आराहणी-आराधनी, आराध्यते-परलोकापीडया यथावद- त्यादीनि स आराम । भग० २३८ । आरामा -दम्पत्या- भिधीयते वस्त्वनया, द्रव्यभावभाषामेद । दश० २०८ । दीनि येप्वारमन्ति ते । अनु० १४९ । वाटिका । प्रश्न. ८ । आरमन्ति-यस्मिन् माधवीलतागृहादौ दम्पत्यादीनि | आराहा-आरोहन्ति ते आराहा। नि० चू० प्र० २७७ अ । क्रीडन्तीति । औप. ? । पुष्पप्रधानवनम् । औप० ४१ । आराहिय - आराधितम् , एमिरेव प्रकार सम्पूर्णेनिष्टा दम्पत्योर्नगरासन्नरतिस्थानम् । ज० प्र० नीता । ठाणा० ३८८ । सफलीकृत । उत्त० २९८ । ३८८। आगत्य रमन्तेऽत्र माधवीलतागृहादिषु दम्पत्य इति स । जीवा० आराहियचरणया-आराधितचरणता, घरणप्रतिपत्तिसम- यादारभ्य मरणान्तं यावनिरतिचारतया तस्य पालना। २५८ । दम्पतिरमणस्थानभूतमाधवीलतादिगृयुक्त । १२७ । दम्पतिरतिस्थानलतागृहोपेतवनविशेष । प्रश्न. ७३ । भग० ६९५ । माधवीलतायुपेतो दम्पतिरमणाश्रयो वनविशेष । प्रश्न आराहेइ-आराधयति, साधयति । उत्त० ५८२ । १२६ । आरिप-आर्या , आराद् याताः सर्वहेयधर्मेभ्य इत्यार्या - समारार्णवत वर्तिन क्षीणघातिकाशा. समागेदरविवर- आरामाइ-विविधवृक्षलतोपशोभिता. कदल्यादिप्रच्छन्नगृहेषु वतिभावाद तीर्थकृत । आचा० ११६ । ऋद्धिप्राप्ता स्त्रीसहिताना पुमा रमणस्थानभूता । ठाणा० ८६ । अर्हदादय , क्षेत्रजाखाद्यार्या । सम० आरामागार-आराममध्यवतिगृहम् । औप०६१। उद्यान- चारित्राई । आचा० १३१ । गृहम् । आचा० ३६५। आचा० ३०६ । आरामिओ-आरामिक.। आव० ३९० । आरिओ-आर्य, आराद् यात सर्वहेयधर्मेभ्य इति । सूत्र आराहइत्ता-आराध्य, उत्सत्र प्ररूपणादिपरिहारेणावाधयित्वा । ३३ । आराद्यात. सर्वहेयधर्मेन्य इति, मोक्षमार्ग मम्य- उत्त० ५७२ । यथावदुत्सर्गापवादकुशलतया यावज्जीवं नद- ग्दर्शनमानचारित्रात्मक । सूत्र. १७२ । निवनेन । उत्त० ५७२ । आरियदंसी-आय-प्रगुणं न्यायोपपन्न पश्यति तच्छील क्षेति आराहए - आराधयति, प्रगुणीकरोति । दश० २२४ । आर्यदर्गी-पृथक्प्रहेणकरयामागनादिसकल्परहित.। आचा० आराधक.-निरतिचारपार नात् । उत्त० ५७८ ! १३१ । प्रश्न १३५ । आर्य - (१४२) [ आरियपदेसिए अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आर्यश्यामः] २४७ । प्र० १२४ आ। - आरियपदेसिए-आर्यप्रदेशित -तीर्थकरप्रणित.। आचा० आरोवणाकसिणं-आरोपणाकृत्स्नं, पाण्मासिक ततः परस्य भगवतो वर्द्धमानस्वामिनस्तीर्थ आरोपणस्याभावात् । व्य० आरियपन्ने - आर्यप्रज्ञ -श्रुतविशेषितशेमुषीक. । आचा० प्र० ११८ आ। १३१ । आरोवणापायच्छित्तं-प्रायश्चित्तमेदः । व्य० प्र० ११ अ। आरिया-आर्या , आराद्धेयधर्मेभ्यो याता -प्राप्ता उपादेय- आरोहकः । उत्त० ४८ ॥ धर्मरिति। प्रज्ञा० ५५। आरोहणा - आरोपणा-प्रायच्छित्तविशेष । व्य. आरुग्ग-आरोग्य-सिद्धत्वम् । आव० ५०७ । आरुग्गवोहिलाभो-आरोग्यवोधिलाभ., आरोगस्य भाव | आरोहपरिणाहयुक्तता-आरोहो-दैर्घ्य परिणाहो-विस्तर- आरोग्य-सिद्धत्वं, तदर्थ गेधिलाभ -प्रेत्य जिनधर्मप्राप्ति । स्ताभ्या तुल्याभ्या युक्तता, शरीरसम्पत्प्रथममेद । उत्त० आरोग्याय बोधिलाभ । आव० ५०८ । आरुभिता-छायाया नवमभेद । सूर्य० ९५ । आरोहा-महामात्रा। विपा. ४६ । आरुहयं-आर्हतम् । आव० ४६५ । आरोहो-उस्सेहो । नि० चू० प्र० २६६ आ। नातिय नाति- आरुहेत् । आचा० ३७९ । ह्रस्वता शरीरोच्छ्यो वा। वृ० प्र० ३०१ आ। आरुह्यते-अध्यास्यते । उत्त० ५१० । आर्जिका-अज्जिए, आर्यिका, मातुः पितुर्वा माता। दश० भारुढ-आरुढ., अध्यासित । उत्त० ३४९ । २१६ । आरूढे पाउयाहि-आरुढ पादुकयो -काष्ठमयोपानहो , | आर्जवम्-भावदोषवर्जनम् । तत्त्वा० ९-६ । एषगाया नवमदायकदोष । पिण्ड० १५७ । आर्ताः-दु खिन रागद्वेषोदयेन। आचा० १८३ । आरुवणा-आरोपणा, यत्रैकस्मिन्त्रायश्चित्तेऽन्यदप्यारोप्यते। आर्द्रकः-आर्द्रकनगराधिपतिः। सूत्र० ३६। विशिष्टतप- प्रश्न. १४५ । आचारप्रकल्पस्याष्टाविंशतितमो भेद । आव. श्वरणफलवान् । सूत्र. २९९ । सचित्तं तरुशरीरम् । आव. ६६० । पर्यनुयोग । विशे० ११५२ । पच्छित्तं । नि० चू० प्र० २३९ आ। आर्द्रकुमार:-प्रतिमादर्शने दृष्टान्त । वृ० प्र० १८५ अ। आरे-पकप्रभापक्रान्तमहानरका । ठाणा० ३६५ । सदाचारप्रयत्नवज्ज्ञात । सूत्र. ३८५ । आरेण-आरत , प्रत्यूषसि । ओघ० १४८ । आरात् । सूत्रों आर्यः-आरात्-सर्वहेयधर्मेभ्योऽर्वाग् यात । नंदी ४९ । ४२३ । समारभ्य। विशे० ९२८ । आर्यकम्-हरितम् । दश० १८५ । आरोगसाला-अणाहसाला । नि० चू० द्वि० ३८ आ । आर्यकृष्ण-अजकण्हे, आचार्यनाम । विशे० १०२० । आरोग्ग-आरोग्य, रोगाभाव । आव० ३४१। नीरोगता। आर्यखपुट-विद्यावले दृष्टान्तः । बृ० तृ० १५६ भ । विद्या- आव० ३४१। सिद्ध , सिद्धमन्त्रः । दरा० १०३ । आरोग्गा-अरोगा -ज्वरादिवर्जिता । ठाणा० २४७ । आर्यगङ्गः-आचार्यनाम । विशे० ९२७ । आरोवणा - आरोपणा, आरोपणमेकापराधप्रायश्चित्ते पुन आर्यमंगु-आचार्यनाम । बृ० प्र० २४ अ । पुन आसेवनेन विजातीयप्रायश्चित्ताध्यारोपणम्। ठाणा० आर्यरक्षित-अजरक्खिय, आचार्यनाम । विगे० ९२९, २००१ प्ररूपणाया प्रथममेद । आव० ३८२ । परस्परा. ९३०, १००२ । वधारणम् । आव० ३८३ । प्रायश्चित्तम् । बृ० प्र० ८५ आ। आर्यवचनम् - अज्जवयणं, आर्याणां-तीर्थकृता वचनम्- चडावना ( मायाप्रत्ययमधिकप्रायश्चित्तम् )। ठाणा० ३२५ । आगम । उत्त० ५२६ । चढावणा, अहवा जे दव्वादि पुरिस विभागेग दाण सा आर्यवज्रः-कर्णाभ्या श्रुते दृष्टान्त । वृ० प्र० ६३ अ। आशेवगा । नि० चू० तृ० ८५ अ । आचारास्याष्टविंशति- आर्यवैर:-अज्जवेर, भाचार्यनाम । विशे० ९२९ । तममध्ययनम् । उत्त० ६१७ । आर्यश्यामः-आचार्यविशेष । प्रज्ञा० ०६ । ८२८॥ , - (२४३) [ आर्यसमुद्रः आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलित आलिंगण ] - . आर्यसमुद्रः-आचार्यविशेषः । ६० प्र० २४ अ ।, ।,, आलभिया-आलंभिका, नगरीविशेषः। भग० ५५० । आर्यसुहस्ती-आचार्यविशेषः । वृ० प्र० २४ आ. नगरीविशेष. । भग. ६७५। आर्या अज्जा, प्रशान्तरूपा । अनु० २६ । भिक्षुणी । आलय - आवास। ओघ० १५६। आश्रय । जीवा० ओघ० २०८। १७६ । जं० प्र० १२१ । आर्याषाढा-भाचार्यनाम । विशे० ९५२ । आलयविन्नाणं-आलयविज्ञानं-ज्ञानसंनतिः । सूत्र० २६ ।' आर्यासूत्रम्-अज्जासुतं, सूत्रमेद । वृ० प्र० २०१ आ । आलयगुणेहि-आलयगुणे , बहिश्चेष्टाभिः प्रतिलेखनादिभिं- आर्यिका-आर्जिका, मातु पितुर्वा माता। दश० २१६ । रुपशमगुणेन च । बृ० प्र० ६२ अ । आर्यैः-तीर्घकृद्भिः । आचा० २७४ । सकलहेयधर्मेभ्यो दूरं आलवंते-आलपन् , अत्यर्थ लपन् । अनु० १४२ । आल- यातैस्तीर्थकरादिभिराचार्यैर्वा । उत्त० २९३ । पति, आङिति ईषल्लपति-वदति । उत्त० ५५ । आलंकारिअभं-आलङ्कारिकभाण्डम् , आभरणभृतभाज- आलविज-इषत्सकृद्वा लपनमालपनम् । दश० २१६ । नम् । जं० प्र० २५५ । आलवित्तए-आलपनम् , सकृत्सम्भाषणम् । आव० ८११। आलंकारियं - आलङ्कारिकम् , अलङ्कारयोग्यं भाण्डम् । आलपितु-सकृत्सम्भाषितुम् । उपा० १३ । जीवा० २३६। आलस्स-आलस्यम् , अनुद्यमस्वरूपम् । उत्त० १५१ । अनु: आलंच-आलच , द्रव्यस्य बहुत्वेतरादिभिर्लोके प्रतीतभेद । त्साहात्मा। उत्त० ३४५ । प्रश्न. ५६ । आला-विद्युत्कुमारीमहत्तरिका । ठाणा० ३६१ आलंब-आलम्वः, प्रलम्बः। भग० १७५ । आलाएति-आलगयति । आव. १००। आलंवण-आलम्बनम् , प्रपततां साधारणस्थानम् । आव० आलानम्-हस्तिवन्धनस्तम्भम् । नंदी० १५३ । ५३४ । प्रवृत्तिनिमित्त शुभमभ्यवसानम् । आव० ५८६ ! आलाव-आलापः, सकृजल्पः । भग० २२३ । आलाप ग्लानादि। उत्त०५८७। रज्ज्वादिवदापद्गादिनिस्तारकत्वा- आङ ईषदर्थत्वादीषल्लपनम् । ठाणा० ४०७ । दालम्बनम् । भग० ७३८, ७३९ । आश्रयणीयं गच्छकुटुंध आलावगो-आलापक । आव० २६० । कादि । ठाणा० १५४ । आलावणवंधे - आलापनबंधः-आलाप्यते-आलीनं क्रियत आलंवणवाहा-अरलस्वनवाहा , द्वयो पार्श्वयोरवलम्बना- एभिरित्यालापनानि रज्ज्वादीनि तैर्वन्धस्तृणादीनाम् । भग० श्रयभूता भित्तय । जं० प्र० २९२। ३९५, ३९८॥ आलइन-आलगितम् , भाविद्धम् । आव० १८५। यथा- स्थानं स्थापितम् । जं० प्र० १६० । प्रज्ञा० १०१ । आलावो-बहुमाणणेहभरितो सरभस णमोक्खमासमणाण- आलइयमालमउड - आगालितमालमुकुटम् , आगलित- तितो गुरुआलावो भण्णति । नि० चू० प्र० २३७ आ । मालि-वनस्पतिविशेषः । जीवा० २०० । मार्ल मुकु! यस्य स. । भग० १७४ । आलगितमाल- मुकुटः । आचा० ४२३ । आलिंग-आलिङ्ग , यो वादकेन मुरंज आलिङ्गय वाद्यते । आलए-आलय , आश्रय । जीवा० २७९ । उत्त० ४५४ । ज० प्र० १०१। मुरजो वाद्यविशेष । जं० प्र० ३१॥ जं० प्र० १८। वसति , सुप्रमार्जिता स्त्रीपशुपण्डकविवर्जिता मृन्मयो मुरज । जीवा० १०५। वा । आव० ५२९ । आलिंगकसंठित-आलिअसस्थित , आवलिकाबाह्यस्य चतु- आलग्गो-अधृतिमापन , कातर. । आव० ८०० । दशं सस्थानम् । जीवा० १०४ । आलपाल-प्रलाप.। आव० ६६९ । आलिंगण-आलिङ्गगनम् , ईपत्स्पर्शनम् , सम्प्राप्तकामस्य आलभिमा-आलंभिका नगरीविशेष , वीरस्य सप्तमवर्षा- दशमो मेदः -दश० : १९४ । स्पृशनम् । नि० चू० प्र० राजस्थानम् । भाव० २०९, २२१ । , । २५६ आ । (१४४).

आलिंगणवट्टि अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः आलोअणं ] आलिंगणवट्टि-आलिङ्गनवर्ती, शरीरप्रमाणमुपधानेन वर्त्तते यत्र दक्षिण पादमग्रत कृत्वा वामपादं पृष्ठत सारयति, यत् । ज० प्र० २८५ । जीवा० २३२ । सूर्य० २९३ । अन्तरं द्वयोरपि पादयो पञ्च पदानि तत्स्थानम् । उत्त० आलिंगणि - आलिङ्गिनी, अप्रतिलेखितदूष्यपञ्चके चतुर्थो २०५। दक्षिणमुरुमग्रतो मुख कृत्वा वाममूरु पश्चात्मुख- मेद । आव. ६५२ । मपसारयति, अन्तरा च द्वयोरपि पादयो पञ्च पदा ततो आलिंगपुक्खरे - आलिङ्गपुष्करम् , मुरजमुखम् । भग० वामहस्तेन धनुर्पहीत्वा दक्षिणहस्तेन प्रत्यञ्चामाकर्पति तत् । -१४५ । व्य० प्र० ४६ आ। योधसस्थानं । आचा. ८९ । योध- आलिंगणी-पुरुपप्रमाण पार्श्वमुपधानं । बृ० द्वि० २२० । स्थानम् । ठाणा० ३। वामूरुअ अग्गओ काउ दाहिण पि. जाणुकोप्परादिसु आ दिजति सा । नि० चू० द्वि० ६१ भ। हतो वामहत्थेण धणू घेत्तूणं दाहिणे एयं गच्छइ । नि० आलिंगिता - पुरिसेणित्थीस्तनादिषु स्पृष्टा। नि० चू० चू० त० ९० भ। प्र० ११३ अ। आलीणाणि-ईसिं लीणाणि। दश० चू० १२५ । आलिंगो-आलिंजयः। जीवा० २६६ । आलिङ्ग , मुरजो आलीणे-आलीन । जीवा० २७३ । गुरुसमाश्रित , संलीनो वाद्यविशेषः । जीवा० १८९ । वा । भग० ८१। आलिंपइ-सकृत् लिंपइ। नि० चू० द्वि० ७६ आ। आलीवग-आदीपिक , गृहादिप्रदीपनककारी। प्रश्न० ४६ । आलि-वनस्पतिविशेष । ज० प्र० ४५। जीवा० २०० । आलीवणं-व्याकुललोकाना मोषणार्थ प्रामादिप्रदीपनकम् । खल । विशे० ६११। औषधविशेष । प्रज्ञा० ३३ विपा० ३९ । आलिखिजति-आलिख्यते । आव० ८५७ । आलीवण । नि० चू० द्वि० १७० अ। आलिघरं -आलिगृहकम् , वनस्पतिविशेषस्तन्मयं गृहकम् । आलुंचनं-आलुम्चनं, ग्रहणम् । आव० ५६२ । जीवा० २००। आलुपे - आलुम्प , निर्लाञ्छनगलकर्तनचौर्यादिक्रियाकारी। आलिट्ठमणालिहूं-आलिष्टानाश्लिष्टम् , कृतिकर्मणि चतुर्भङ्ग आचा० १०२ भिन्नः सप्तविंशतितमो दोष । आव० ५४४ । आलुए-आलुक - अनन्तकायमेद । भग० ३०० । कन्द- आलित्त-अमिविधिना ज्वलित । भग० १२१ । आदीप्त । विशेष । उत्त० ६९१ । आलु क्रम् - साधारणवनस्पति- अन्त० १७ । आलित्र, नौवाहनोपकरण । आचा० ३७८ । कायिकमेद. 1 जीवा० २७ । आलुका-कुण्डिका। अनुत्त० आलिद्धा - आदिग्धा , शिलाया शिलापुत्रके वा लग्ना । भग० ७६६ । आलुयं-आलुकम् , कन्दविशेष । अनुत्त० ६ । त्रयोविंशति- आलिन्दकम्-अलिंदग, कुण्डुल्कम् । अनु० १५१ । तमशतकाद्योद्देशक । भग० ८०४ । आर्द्रकम् । भग० ८०४ । आलिसंदग-चपलका । ज० प्र० १२४ । चवलकप्रकारा, आलेख:-विचित्रम् । जीवा० १९९ । । चवलका । भग० २७४ । धान्यविशेप । भग० ८०२ । आळवणं-आलेपनम् । आव० ६२३। आचा० ३२ । आलिसिंदया-चवलया। ठाणा० ३४४ । आलेहो-आलेख , चित्रम् । ज० प्र० ३२ । आलिहइ-आलिखति, विन्यस्यति । ज० प्र० १९२ । आलो-आल, अशक्यक्रियम् । आव० ९४ । आलिहमाण-आलिखन् , ईषत् सकृद्वाऽऽकर्षन् । भग० ३६५। आलोअ-अवलोक , नियूहकादिरूप । दश० १६६ । वहि - आलिहाविजा ईपत्सकद्वाऽऽलेखनम् । दश० १५२ । प्रस्थानभाविनि शकुनानुकूल्यालोकेन । ज. आलिहित्ता - आलिख्य, आकारकरणेन कृत्वा -अन्तर्वर्ण मौरप्रकाशम् । प्रजा० ५०० । कादिभरणेन पूर्णानि कृत्वा । जं. प्र. १९२ । आ(अव)लोअचलं-आ(अवलोकवलम् , अवलोकनमालो. आलीढं-आलीढम्, आक्रान्तम् । आव० ७०४ । दक्षिणपादम कस्तरिमेश्वलं, दर्शनलालसम् । आव० ७८४ । प्रतो भूतं कृत्वा वामपाद पधात्कृत्यापमारयति, अन्तर द्वयोरपि आलोअणं-आलोकनम् , निरूपणम् । ओघ० ५२ । अण्णेगि पाढयो. पच पादा ,लोकप्रवाहे प्रथम स्थानम् । आव० ४६५। आख्यानं । नि० चू० प्र. ४ अ । आलोक्यन्ते दिनोs - (२४५) [आलोषणा आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलित आवईसु दढधम्मया ] -- -- स्मिन् स्थितैरिति । उत्त० ४५१ । आलोचनम्-गुरुनिवेद- | आलोयं - आलोकम् । ओघ० ८४ । दृष्टिपथम् । औप. नम् । ठाणा० १३७ । प्रायच्छित्तमेद । ठाणा० २०० । ६९ । स्थानदिक्प्रकाशादिसप्तधाऽऽलोकम् । बृ० । तृ. आलोअणा-आलोचना, आभिमुख्येन गुरोरात्मदोषप्रकाश १४० । प्रकाश' । आव० ६४२ । आलोकस्थानं-गवाक्षा- नम् । आव० ४६९ । दिक । आचा० ३४१ । आलोअभायणं-आलोकभाजनम् , मक्षिकाद्यपोहाय प्रका- आलोयणं - आलोचनम् , यथागृहीतभक्तपाननिवेदनम् । शप्रधानं भाजनम् । दश० १८० । प्रश्न० १११। आलोचना, प्रयोजनतो हस्तशताबहिर्गम- आलोइज-आलोचयेत्-प्रकाशयेत् । उत्त० ५४४ । नागमनादौ गुरोर्विकटना, मिथ्यादुष्कृत च । आव० ७६४ । आलोइजा-आलोकयेत्-पश्येत् -ब्रुयात् । आचा० ३२८ । एकादशी गुर्वाशातना। आव० ७२५ । गुरोः पुरतो वचसा अवलोकयेत् । आचा० ३९६ । प्रकटीकरणम् । व्य० प्र० १४ अ । ठाणा० २०० । अल- आलोइता-आलोकिता, ईषद्बष्टा । उत्त० ४२५ । समन्ता- वण । व्य० द्वि० ३३५ भ । सकृत् अनेकश प्रलोकनम् । द्रष्टा । उत्त० ४२५। नि० चू० प्र० २२२ अ । आलोइत्तए-आलोचयितुम् , गुरवेऽपराधान्निवेदयितुमिति । आलोयणा - आलोचना, आङिति-मकलदोषाभिव्याप्त्या लोचना-आत्मदोषाणां गुरुपुरत प्रकाशना । उत्त० ५७९ । ठाणा० ५६ । आलोइयं-आलोकित-प्रत्युपेक्षितं । आचा० ४२८ । आलोचना। ओघ० २२५ । योगसमहे प्रथमो योग । आलोइयपडिक्कते-आलोचितप्रतिक्रान्तः, आलोचितं गुरूणां आव० ६६३ । परस्स पागड करेइ । नि० चू० तृ० ८५ अ। व्य० प्र० १०७ आ। यदतिचारजातं तत्प्रतिकान्तम्-अकरणंविषयीकृत येनाथवा- ऽऽलोचितश्वासावालोचनादानात्प्रतिकान्तश्च मिथ्यादुष्कृत- आलोयणाणुलोमं - आलोचनानुलोम्यम् , पूर्व लघवर आलोच्यन्ते पश्चाद् गुरव । आव० ७८१ । दानादालोचितप्रतिक्रान्त । भग० १२८ । आलोयणारिह-आलोचना-निवेदना तल्लक्षणा शुद्धिं यदर्ह- आलोए-आलोक , दर्शनम् । भग० ३१८ । दर्शनं, दृश्य- त्यतिचारजातं तदालोचनाहम् । भग० ९२० । मानता। जीवा० ३९१। आलोचयेत्-दत्तावधानो भवेत् । आलोयभायणं - आलोकभाजनम् , प्रकाशमुखे भाजने, आचा० ३४२। चक्षुर्दर्शनपथे। ओघ० १८३ । अथवा आलोके-प्रकाशे नान्धकारे पिपीलिकावालादीनामनु- आलोएइ-आलोचयति । आव० ७२५ । पलम्भात् , तथा भाजने-पात्रे, पात्र विना जलादिसम्पतित- आलोपज्जा-आलोचनं-गुरुनिवेदनम् । ठाणा० १३७ । सत्त्वादर्शनादिति । प्रश्न. ११२ । आलोपत्तो-आलोयणा। व्य० प्र० १०८ अ । आलोविअ-अलोपिक । दश० ४४ । आलोको- आलोक्यत इति आलोक -स्थानदिगादिनिरू- | आलोवेइ-आलोचयति। आव० ७१० । पणम् । ओघ० १८१। अतिस्निग्धदीपशिखादिदर्शनम् । | आवंति-आचारप्रकल्पे प्रथमश्रुतस्कन्धस्य पञ्चममध्ययनम् । उत्त० ६३१ । सावकाशं मुक्त्वाऽभ्यन्तरे स्वपन्ति । ओघ० प्रश्न. १४५ । आचारागस्य पञ्चममध्ययनम् । उत्त० ६१६ । १०७ । आलोक्यन्ते दिशोऽस्मिन् स्थितैरिति। उत्त० ४५१ । आचारांगे प्रथमश्रुतस्कधस्य पंचमाध्ययनम् । सम० ४४ । आलोग - आलोकम् , सौरप्रकाशम् । ज० प्र० २२९ । आचा. १९६। यावन्त । आचा. १८५। आचारप्रक- चोपलपादी। दश० चू० ७६ । समो भूभागः । ओघ० १९३ । ल्पस्य पञ्चमो भेद । आव० ६६० । आलोकनमालोको यावदृष्टिप्रसर । ओघ० २३ । आवंती-लोकसारापराभिध, आचारांगपंचमाध्ययनम् । ठाणा. आलोचनम् - प्रकटनं प्रकाशनमाख्यानं प्रादुष्करणम् । आवर-आगच्छत्यापतति। उत्त० २८० । आलोचयति-गणयति प्रेक्षते च। आव० ५३६ । आवईसु दढधम्मया - आपत्सु दृढधर्मता, योगसङ्ग्रहे आलोचयेत् । व्य० द्वि० ७१ अ। तृतीयो योग । आव० ६६४ । . ४४४ । तत्त्वा० ९-२२ । (१४६) [ आवकधाते अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आवत्तणपेढिया ] आवकधाते-यावत्कथा-यावज्जीवम् । ठाणा० २३६ । आवडिओ - पतितः । आव० ५७८ । आस्फालित । आवकहियं-यावत्कथिकम् , प्रव्रज्याप्रतिपत्तिकालादारभ्या आव. १९६ । आपतितम् । उत्त० १७० । आव० ३२० ॥ प्राणोपरमात् तच्च भरतैरावतभाविमध्यद्वाविंशतितीर्थकरतीर्था- आवडिया-आपतितौ, प्राप्तौ। उत्त० ५३० । न्तरगताना विदेहतीर्थान्तरगतानां च साधूनामवसेयम् । आवण-आपण., हट्ट । भग० २३८, १३६ । प्रश्न० ८। प्रज्ञा० ६३ । सकृद्गृहीतं यावज्जीवमपि भावनीयम् । आव० वीथिः। दश. १७६ । ज० प्र० १०७। अनु० १५९ । ८३९। यावज्जीविक व्रतादिलक्षणम् । आव० ५६३ । आपण , पण्यस्थानम् । प्रश्न० १२७ । यावज्जीविक महावतभक्तपरिज्ञादिरूपम् । ठाणा० ३८० आवणवीहि-आपणवीथिः, हट्टमार्ग , रथ्याविशेष । जीवा० ये कल्पसमाप्त्यनन्तरमध्यवधानेन जिनकल्पं प्रतिपत्स्यन्ते २४६ । ते यावत्कथिका । प्रज्ञा० ६८ । आवणाइ-आयतनानि, आपतनानि वा उपभोगार्धमागम- आवजणं-आवर्जनम् । ओघ० १६९ । नानि । जं० प्र० १२१ । आवजय-आवर्जक , आराधक । उत्त. ३६१ । आवण्ण-आपमपरिहारिका । वृ० तृ. २० अ। आवज्जीकरणं - आवर्जीकरणम् , आवर्जित -अभिमुखी आवण्णपरिहारो-आपनपरिहारिक , जो मासिय वा जाव कृतः मोक्षगमनं प्रत्यभिमुखीकृतस्य करणं-क्रिया शुभयोग- छम्मासिय वा पायच्छितं आवण्णो तेण सो सपच्छित्ती व्यापारः । प्रज्ञा० ६०४ । आवर्जीकरणम्-अन्तहित्तिक असुद्धो अ विसुद्धचरणेहिं साहहिं परिहरिजति इह तेण उदीरणावलिकाया कर्मप्रक्षेपव्यापाररूपम् । ठाणा० ४४२ । अहिकारो। नि० चू० तृ० ८९ आ। आवट्ट -आवर्त शह्वसत्क । उत्त० ६०५। ससार.। आवण्णसत्ता-आपन्नसत्त्वा, गर्भवती। उत्त० ५३ ! आचा० ६२। आवती-प्रतिसेवनापंचमभेद.। भग० ९१९ । आपत्य - आवजोणी - आवतयोनि , आवतॊपलक्षिता योनि । द्रव्यत प्रासुकद्रव्यं दुर्लभ क्षेत्रतोऽध्वप्रतिपन्नता कालतो उत्त० १८३1 दुर्भिक्ष भावतो ग्लानत्व। ठाणा० ४८४ । आवट्टणं-आवर्तनम् , परिभ्रमणम् । सूर्य० २७६ । आवतीगंगा-गंगामहागगासादीनगंगामृत्युगंगालोहितगंगात मावती-आवर्त्यते, पीड्यते-दु खभाग्भवति । सूत्र० १९० । सप्तगुणा आवतीगंगा। भग० ६७४ । आवट्टितो-आवृत्त । आव० ९५ । आवत्त - आवर्त , आवर्तनम् , प्रादक्षिण्येन परिभ्रमणम् । आवट्टो-आवर्त , भावर्त्तयति-प्राणिनं भ्रामयतीति । सूत्र. जं. प्र. १८७। पोडशसागरस्थितिक महाशुक्रविमानम् । ८६ । उत्त० १८३ । जीवा० २४३ । सम० ३२। आवर्तक , पयमा भ्रम । जं. प्र. १११ । आवड-आवर्त -मणीनां लक्षण । जीवा. १८९ । चिकुरसस्थानविशेष । जं. प्र. १८३ । मणीना लक्षणानि आवडइ-आपतति, भवति । ओघ० ९.। ज० प्र० ३१ । महाविदेहे विजयनाम । ज० प्र. ३४६ । आवडण- अभिघात , आपतनं वा । बृ० द्वि० ७७ आ। अप्राप्तम्-अस्पृष्टम् , आवर्त आवृत्तिरावर्तन-परिभ्रमणम् । प्रस्फोटनम् । ओघ० १२२ । भाभिडण। ओघ. २०४। भग० १२८ । आवर्तिका । जीवा० २४४ । पक्खलण । नि. चू० प्र० ४९ अ। आपतनं-द्वारादौ आवत्तकूडे - आवर्तकूटम् , नलिनकूटे तृतीयकूटनाम । शिरसो घट्टनम् । वृ० प्र० २९५ अ । जं० प्र० ३४६। आवडणपडणादी-आपतनपतनादय । ओघ० ९० । आवत्तगा-एकखुरविशेषचतुष्पद । प्रना० ४५। आवडणा-उस्मादिसु पक्सलणा। नि० चू० तृ० २१ भ। आवत्तणपेढिया-आवर्तनपीठिका, यनेन्द्रकीलिका। जीवा. आवडिऊण-आपत्य। आव० १९६ । २०४ । यनेन्द्रकीलको निवेशित । जीवा० ३५९ । यत्र- आवडिए - अवकोटितानि, अधस्तादामोटितानि । उत्त. न्द्रकीलो भवति। जं. प्र. ४८ । अप्रहारम् । नि० चू० तृ० १९अ। भावर्तनम्-भक्तीभवनम् । व्य. प्र...आ। - (१४७) [ आवत्ता आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आवस्सग ] - . आवत्ता-आवर्ता, ग्रामविशेष । आव० २०६ । आवर्त्तव- । आवलिया - आवलिका- असख्यातसमयमाना। ठाणा० हुलजला नदी । वृ० तृ० १६२ आ। धातकीखडे तमाम ८५ । आवलिका, श्रेणि. । जीवा १०५ । असख्येयसम- महाविटेहगतो विजय । ठाणा० ८० । यसघातोपलक्षित काल । आव० ३१ । परंपरा। आव० आवन्ते-आवर्त , विजयस्य नाम । जं० प्र० ३४६ । घोष '८५८ । असङ्ख्यातसमयात्मिका। भग० २११। वश , व्यन्तरेन्द्रलोकपाल । ठाणा० १९८ । प्रवाह । जं० प्र० १६६। तत्र या विच्छिना एकाते आवत्तो-आवर्त , एकखुरविशेष । प्रश्न. ७। एकखुरश्च- भवति मण्डली सा आवलिका। व्य. द्वि० २१ अ। तुष्पद । जीवा० ३८| नाट्यविशेष , भ्रमभ्रमरिकादा असङ्ख्येयसमयसमुदायिका। सूर्य० २९२ । वंश ; प्रवाह । ननतनम् । जं० प्र० ४१४ । जीवा० २४६ । जं० प्र० २५८ । आवपनम्-लोहमयं शकटोपकरणम् । पिण्ड० २२ । आवलियाठावगो-आवलिकास्थापक आचार्यपारम्पर्यम् । आववहुले--अब्बहुलम् , जलवहुल, रत्नप्रभापृथव्यास्त आव० ३०७। तीयकाण्डः। जीवा० ८९ । मावलियापविठ्ठ-आवलिकाप्रविष्टम् , यत्पूर्वादिषु चतस्पु आवयं-आवर्त , अहोकायमित्यादि सूत्रगर्भो गुरुचरणन्यस्त दिक्षु श्रेण्या व्यवस्थितम् । जीवा० ३९७ । हस्तशिर स्थापनारूप , सूत्राभिधानगर्भ कायचेष्टाविशेषः । | आवलियावाहिरं - आवलिकाबाह्यम् , यत्पुनरावलिकाऽऽ- आव० ५४२॥ विष्टानां प्राणप्रदेशे कुसुमप्रकर इव यतस्ततो विप्रकीर्णम् । आवयइ-अतिपतति । आचा० २६५। जीवा० ३९७ । आवरणं-आवरणम् , स्फुरकादि । प्रश्न० १३। आवियते | आवली-हार । वृ० प्र० ४८ अ । पुद्गलाना दीर्घरूपा आकाशमनेनेति, भवनप्रासादनगरादि तलक्षणशास्त्रम् । श्रेणि । सूर्य. १३० । आवली, पक्कि । ओघ० ८२ । ठाणा० ४५१ । सन्नाह । प्रश्न० ४९ । कवचादि । उत्त० आवल्लिक-आवल्लिक । विशे० १३५५ । १४३। आव० ३४६ । कपाट। वृ० द्वि० १११ अ। आवल्लो-बलीवर्द । आव० ६६५। उत्त० १९२ । कवच । भग० ९४ । आवरणे-प्रच्छादनपटे । जं० प्र० आवसंत-आवसन् , विवसन् । आचा० ११। आछिति- २३६। फलकादि। आचा० ६०। स्फुरककण्टकादि। गुरुदर्शितमर्यादया वासना। उत्त० भग० ३१८ ।आडो मर्यादेपदर्थवचनस्वात् ईषन्मर्यादया वाऽऽ मया गुरुकुले आमृशन् । सम० २। आवसन्-सेवमान । वृणवन्तीत्यावरणा , ततश्च सर्वविरतिनिषेधार्थ एवायं वर्तते आचा० २१३॥ इन देशविरतिनिषेधे खल्वावरणशब्द । आव० ७८ । खेटकं आवसह आवसथ, आश्रय । उत्त० ६२६ । दशक सन्नाहं वा । जं० प्र० ३५९ । सन्नाह । ठाणा० ४५० । २४५। शेषभवनप्रकार । उत्त० ३८५ ! आवसथ, परि- आवरणप्रविभक्तिः-अष्टमनाव्यमेद । जं. प्र. ४१६ । व्राजकस्थानम् । प्रश्न. १२६ । औप० ६१ । परिव्राजका- आवरिसणं--पाणिएण उप्फोसण । नि० ८० प्र० १७२ आ। श्रय । प्रश्न० ८। उटजाकार गृहम् । सूत्र० ३१५ । आवरेत्ता-आवृत्य-अवष्टम्य । भग० ५७६ । आवसहिय-आवसथिक , तीथिकविशेष । सूत्र ४२२ । आवर्जनम्-आराधना। उत्त० ५९१ । आवर्षण गन्धो आवसिया-आवश्यिकी, अवश्यकर्त्तव्योंगेर्निष्पन्ना । आव० दकादिना । अनु० २६ । २५९। आवर्तना-आउट्टणा, आवर्जन, निवेदनम् । वृ० प्र० ४७ आ । आवस्सए-आवश्यकम् , अवश्यकर्त्तव्यं सयमव्यापारनि- आवलगनादिकाः-क्रियाविशेषा' । आचा० १२४ । प्पन्नम्। आव० ११९ । कायिकादिव्युत्सर्गम् । ओघ० आवलणं-आवलनम् , मोटन, अथवा गलकस्य बलादावलनं मारण चेति । प्रश्न० २२ । आवस्सग-आवश्यकम् , समन्तादात्मवश्यकारकम् । अनु० आवलियपविट्टो- आवलिकापविष्ट , श्रेणिव्यवस्थित । ११ । अवश्य कर्तव्यं आवश्यक-कायिकाव्युत्सर्गरूपम् । जीवा० १०५। ओघ० • १४९ । कायिकोच्चारादि । ओघ० ८७ । प्रतिक्रमणम् । ८० । ठाणा० ९ । - १४७ । 1 (१४८) , . .

[ आवस्सय अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः आविए] करोति । अनु० । ओघ० ९३, ५८ । सामायिकादि षडध्ययनकलाप । अनु० आवागो-आपाकः, भ्राष्ट्रं । आव० १०१। ७। आवश्यकम् , श्रमणादिभिरवश्यं क्रियत इति, आवाडा-आपाता इति नाम्ना किराता । ज० प्र० २३२ । ज्ञानादिगुणा मोक्षो वा आ-समन्ताद् वश्य क्रियतेऽनेन इति, आवातभद्दते - प्रथममीलके दर्शनालापादिना भद्रकारी । आ-समन्ताद्वश्या इन्द्रियकपायादिभावशत्रवो येषा ते तथा, तैरेव ठाणा. १९७१ क्रियते यत् तत् । अनु० ३) । आवासक वा समग्र आवाय-आपातः, तत्प्रथमतया ससर्ग । भग० ३२६ । गुणग्रामावासक वा। अनु० ३१ । दोषल्यागलक्षणमवनता. आभिमुख्येन समवाय । आव० ३२६ । अभ्यागमः । दिकम् । आव० ५४५। गुणानां मा-समन्ताद्वश्यमात्मान ओघ० ११९ । १०। श्रमणादिभिरहोरात्रमध्येऽवश्यंकर- आवारि-लघ्वापणम् , आस्पदम् । आव० ६७५ । णात् । विशे० ४१५। नियमत करणीयम् । आव० ५९४ । आवावकहा-आवापकथा, ईयद्रव्या शाकघृतादिश्चात्रोप- अवश्यं कर्त्तव्यम् , सामायिकादिरूपम् , आ-समन्ताज्ज्ञाना युक्का इत्यादि प्रशसनं द्वेषणं वा, भक्तकथाया. प्रथममेदः । दिगुणे शून्यं जीवं वासयति, तैर्युक्तं करोतीत्यावासक-सामा आव० ५८१। शाकघृतादीन्येतावन्ति तस्या रसवलामुप- यिकादिरूपम् । विशे० २। भद्रम् । आव० ४२६ । मूल युज्यन्त इत्येवंरूपा कथा आवापकथा । ठाणा० २०९। गुणोत्तरगुणानुष्ठानलक्षणः । आव० २६७। आवर्तादिकम् । आवास - आवासः, देववासस्थानम् । जं० प्र० ३९७ । आव० ५११। कायिकाव्युत्सर्गलक्षणम् । ओघ० १५२ । आवश्यकम्-प्रतिक्रमणम् । आव. ७८४ । ओघ० २०० । सामायिकादिषड्विधम् । ठाणा० ५१ । अवश्यं कर्तव्य- प्रज्ञा० ६०६ । निवास । जीवा० १८० । मावश्यक, अथवा गुणानामावश्यमात्मानं करोतीत्यावश्यकं, यथा अन्त करोतीत्यन्तक , अथवा 'वस निवासे' इति गुण- आवासग-आवासकम् , समन्ताद्वासयति गुणैरिति । अनु० शून्यमात्मानमावासयति गुणेरित्यावासकम् । आव० ५१ । ११ । गुणशून्यमात्मानमावासयति गुणैरिति, गुणसान्निध्य- मात्मन करोतीति भावार्थ । आव० ५१। प्राभातिकवैका- आवस्सय अपाश्रय.-आधार । विशे० ४१५। सज्ञा लिकप्रतिक्रमणलक्षणे। व्य० द्वि० १८२ अ। कायिकीलक्षणम् । वृ० द्वि० २६१ अ । आवस्सयाई - आवश्यकानि, शरीरचिंतादेवातर्चनादीनि । आवासिय-आवासितः, स्थितः । दश० १०७। आवासेंति-आवासयन्ति, वसन्ति । आव० ६५४ । व्य० प्र० १६९ आ। आवस्सिा-आवश्यकी, क्वचिद्वहिर्गमनकाये समुत्पन्ने- आवाह-सरीरवजा पीडा । नि० चू० प्र० ३३५ अ । ऽवश्यंगन्तव्यमितिभणनम् । वृ० प्र० २२२ अ । ज्ञाना. आवाह-आवाह , विवाहात्पूर्व ताम्बूलदानोत्सव. । जं० प्र० द्यालम्बनेनोपाश्रयाद् वहिरवश्यंगमने समुपस्थितेऽवश्य- १२३ । जीवा० २८१ । कर्तव्यमिदमतो गच्छाम्यहमित्येव गुरुं प्रति निवेदना । अनु० आवाहणं-आवाहनम् , गमनम् । प्रश्न० २० ! १०३ । आवाहिओ-आहूत । आव० ३६९, ३९३ । आवस्सिता-चतुर्थी सामाचारी। ठाणा० ४९९ । आवाहो-आवाह , अभिनवपरिणतस्य वधूवरस्यानयनम् । आवस्सिया-आवश्यिकी, अवश्यकर्त्तव्यैश्चरणकरणयोगैनि प्रश्न. १३९ । सुहं दिवस । नि० चू० द्वि० ९२ आ। वध्वा वृत्ता । आव० ५४७ । बृ. द्वि० २२४ अ। वरगृहानयनम् । वृ० तृ० ४३ आ। आहूयन्ते स्वजनास्ता- आवहो-दारकपक्षिणामावह । व्य० द्वि० ३४२ मा । म्वूलदानाय यत्र स । जीवा० २८१ । आवाए-आपात , अन्यतोऽन्यत आगमनात्मक। उत्त. आविंध-परिधेहि । आव० ९९ । आवि-आवि , जनसमक्ष प्रकाशदेश इतियावत् । उत्त० ५४ । आवाओ-आपाक. । विशे० ८७३ । आपाकोती-नूतना। आविइ-अनुसमयम्-प्रतिक्षणम् । भग० ६२५ । आविइत्ता-अवनस्य दद्यात् । व्य. द्वि० आवागसीसाओ-आपाकशिरस । नंदी. १७७ । आविए-आपिच । उत्त० ३३९ । १ ८६ । विशे० ६३० । (१४२) [ आविद्धं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आसकिसोरो] 1 - ॥ आविद्धं-परिहितम् । ज०प्र० १९०, २७८ । आलगितम् । आ-समन्ताद्विशन्ति यत्र नदावेशनम् -शून्यगृहम् । आचा० प्रना. १०१1 व्याप्तम् । उत्त० ५४८ । समन्तात्ताडितः। ३०७ । उत्त०, ४९५। शिरस्यारोपणेन आविद्ध-। भग. १९३: । आशातनम्-आ-समन्तात् शातयति मुक्तिमार्गाद् भ्रशयति । भाविद्धामो-परिदध्मः । आव० ६५ । अनन्तानुवन्धिकषायवेदनम् । विशे० २८३ । आविर्भाव:-प्रकाश , प्रकटत्वम् । विशे० १०६२ । आशाम्बरा:-दिगम्बरा । प्रज्ञा. २० । आविलं-आविलम् , सकालुष्यमाकुल वा। प्रश्न ५३ । आश्यानः । ओघ० ३२ । अविमलमस्वच्छ प्रकृत्या । जीवा० ३०३ । आश्रयं गच्छामि-भक्तिं करोमीत्यर्थ । आव० ५७१ । आविष्टलिंग। नंदी ११ आश्रित्य-प्रतीत्य । जीवा० ५६ । उत्त० ६०२ । आविसामि-आविशामि, निषेवे । विशे० १२४७ । आसं-अश्वम् , मन । प्रज्ञा० ६०० । आशा-भोगाकाक्षा। आचा० १२७ । । आवी-गंगागामी नदीविशेषः । ठाणा० ४७७ । आवीईमरणे-आ-समन्ताद्वीचय इव वीचय -आयुर्दलिक- आसंकलनम्-चयनम् । ठाणा० १७९ । आसंतर- अश्वतरः, वेगसर , अजात्या, घोटकः । दश० विच्युतिलक्षणाऽवस्था यस्मिंस्तदावीचि, अथवा वीचिः-विच्छे- १९४ । दस्तदभावादवीचि, दीर्घत्वं तु प्राकृतत्वात्तदेवंभूतं मरण- मावीचिमरणं-प्रतिक्षणमायुर्द्रव्यविचटनलक्षणम् । सम० ३३ । आसंदओ-आसन्दकः । आव० ५५८ । आसंदग-कट्ठमओ । बृ० द्वि० २११अ । कमओ अज्झू- भावीचिमरण-आवीचिमरण, सप्तदशमरणमेदे प्रथम । सिरो । नि० चू० प्र० २०८ अ । पल्यत । आव० ३५८ । उत्त० २३० । आसंदयं-आस्यन्दकम् । आव० ६९३ । आवीचियमरणं - आ-समन्ताद्वीचय -प्रतिसमयमनुभूय- आसंदी - मच्चिका । पिण्ड० १०९ । उपवेशनयोग्या मानायुषोऽपरापरायुर्दलिकोदयात्पूर्वपूर्वायुर्दलिकविच्युतिलक्षणा- मच्चिका। सूत्र० ११८ । दश० २०४। उपवेशनाईमास- ऽवस्था यस्मिन् तदावीचिक, अथवाऽविद्यमाना वीचि नम् । दश० ११७ । आसनविशेषः । सूत्र० १८२ । मञ्चक । विच्छेदो यत्र तदवीचिक अवीचिकमेवावीचिक तच्च तन्मरणं सूत्र. २७८। चेत्यावीचिकमरणम् । भग० ६२४ । आसंसइयं-असशयित, नि सशयं मन सश्रित वा। सूत्र आवीलए-आङ् ईषदर्थे, ईषत्पीडयेद्-अविकृष्टेन तपसा शरी. ३१०. रकमापीठयेत् , एतच्च प्रथमप्रव्रज्याऽवसरे। आचा० १९२। आसंसपओगो-निदानकरण । नि० चू० प्र० ३५ अ । आवीलाविजा-आपीडनम् , सकृदीषद्वा पीडनम् । दश० आसंसा-आशसा-अप्राप्तप्रापणाभिलाषः। आंचा० ११५। १५३ । आस-अश्व, वाल्हीकादिदेशोत्पन्न , जात्य । दरा० १९४ । आवे-आपातुम् , भोक्तुम् । दश० ९६.। क्षेप.। आव० ३६४ । आवेढिओ-एगदुतिदिसिट्टितेसु, अहवा एगपंतीए समता आस-आस्ते । आव० ३९६ । ठिएसु, आङ् मर्यादयाऽऽवेष्टित । नि० चू० तृ० ४६ आ । आसइत्तु-आसितुम् , उपवेष्टुम् । दश. २०४ । आवेढियं-आवेष्टितम् , सकृदावेष्टितम् । ठाणा० ५०२ । आसपण आश्रयतीति आश्रय -धूमवलकादि । अनु० आवेढियपरिवेढिए - आवेष्टितपरिवेष्टित , गाढतरं सवे. २१४ । हित । प्रज्ञा० ३०६ - आसकण्णो-अश्वकर्ण , सप्तदशान्तरद्वीप । जीवा० १४४ । आवेयणं - आवेदयति, निवेदयति कालमित्यर्थ । ओघ० आसकन्नदीवे-अन्तरद्वीपनाम । ठाणा० २२६ । आसकन्ना-अश्वकर्ण , सप्तदशान्तरद्वीप । प्रना० ५० । आवेलिज-आपीडयेत् ,- गाढमवगाहयेत् । उत्त० ४७५ । आसकरणं-आससिक्खावणं । नि० चू० द्वि० ७१ भ! आवेसणं लोगसमवायहाण। नि० ० द्वि० ६९ आ। | आसकिसोरो-अश्वकिशोर । आव० ३७०, २६१ । .. । २०४ । (२५०) . - [ आसक्खंधसंठिते अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः आसमपय ] । आसपखंघसंठिते-अश्वस्कन्धसंस्थितम् , अश्विनीनक्षत्रस. आसणमणुप्पयाणं-आसनानुप्रदानम् , आसनस्य स्थाना- स्थान । सूर्य० १३० । न्तरसञ्चारणम्। ठाणा० ४०८ । सम० ९५। आसखंघसंठिओ-अश्वस्कन्धसस्थित , उभयोरपि पार्श्वयो आसणाणुप्पयाणं - आसनानुप्रदान , गौरव्यमाश्रित्यास- पञ्चनवतियोजनसहस्रपर्यन्तेऽश्वस्कन्धस्येवोन्नततया पोडश- नस्य स्थानान्तरसचारणम् । भग० ६३७ । योजनसहस्रप्रमाणोच्चैस्त्वयो शिखायाभावात् । जीवा० ३२५। आसणाभिग्गह-आसनाभिग्रह.-तिष्ठत एव गौरव्यस्यासना- आसगं-आस्यकम् , मुखम् । जीवा० ११९ । आस्यके, नयनपूर्वकमुपविशतेतिभणनम् । भग० ६३७ । यत्र यत्रो- पिठरादिमुखे। ठाणा. १४८ । पवेष्टुमिच्छति तत्र तत्रासननयनम् । औप० ४२ । तिष्ठत आसग्गीव-अश्वग्रीव , त्रिपृष्ठवासुदेवशत्रु । आव० १५९ । एवादरेणासनानयनपूर्वकमुपविशताऽत्रेतिभणनम् । दश० ३० । महामाण्डलिकराजा आव० १७४ । आसणेय-आश्वासन । ज० प्र० ५३४ । आसचडगर-अश्वसमूह । आव० ३७० । आसतरगा-वेसरा। नि० चू० प्र० १४४ आ। आसज-आसाद्य-अगीकृत्य। आचा० १५९ । आसत्त-आसक, भूमौ लमः । जं० प्र० ७६ । आ-अवाङ् आसण-आसनं, सिंहासनादि । प्रश्न० १६१ । आधारलक्ष अधोभूमौ सक्त आसक्त., भूमौ लम । प्रज्ञा० ८६ । णानि धर्मास्तिकायादीना लोकाकाशादीनि, स्वस्वरूपाणि वा। जीवा० १६० । जीवा० २२७ । भूमौ सम्बद्धः । औप० ५। आव० ५९९ । पीठ फलकादिकम् । आव० ६५४ । स्थानम् । आसत्तमल्लदामा-आसकमाल्यदामा'। आव० १८४ । उत्त० १०९। पीठकादि। आव० ७९५ दश० २८१। आसत्ती-आसक्ति , धनादावास , परिग्रहस्यैकोनत्रिशत्तम अपवादगृहीतं पीठकादि । दश. २३१ । दश० २२८ । नाम । प्रश्न० ९३ । वसत्यादि । सूत्र. ६६ । कठ्ठपीढगादि। दश० चू० १२६ । आसत्थ-पीप्पलक । भग० ८०३ । असुरकुमारचैत्यवृक्ष । विष्टरम् । प्रश्न० १३८ । प्रश्न ८ । सिंहासनादि। ठाणा० ४८७ । मनागाश्वासित । ओघ० ५२ । अनंतजिन- जीवा० ४०६ । आसन्दकादिविष्टरं, आस्यते-स्थीयतेऽ चैत्यवक्षविशेषः। सम० १५२ | आश्वस्त । आव० ३९० । स्मिन्निति वाऽऽसन-शय्या। आचा० १३४। उपवेश- | आसन्दकम्-आसनम् । दश० २१८ । आचा० १३४ । नम् । उत्त० ६०९ । अवस्थानम् । ६२६ । आसन्नं-समुखीनम् । निर० ८ । आसनं गोदोहिकोत्कुटुकामनवीरासनादिक । आचा० ३१२ । आसपुराओ-धातकीखडे विदेइविशेषस्य राजधानी । ठाणा० पादपीठपुञ्छनादि । उत्त० ४२३ । सिंहासनादि । उत्त. २६२। पीठकादि । सम. ३८ । शक्रादीना सिंहासनम् । आसम-आश्रम, तापसादिस्थानम्। भग० ३६ । अनु० ठाणा. ११७ । आसन्दकादि । दश० २१८ । आचा० ६०। १४२ । सूत्र. ३०९ । तीर्थस्थानम् । आचा० ३२९। भग. २३८ । आस ग-आसनप्रदान, गुर्वादीना समागताना ठाणा० २९४ । ठाणा. ८६ । तापसावसथोपलक्षित आ- पीठकायुपनयनम् । व्य० प्र० २३५ आ । श्रय । आचा० २८५। प्रथमतस्तापसादिभिरावासितः पश्चा. आसणअणुप्पदाणं-आसनानु पदानम् , स्थानात्स्थानं सचा. दपरोऽपि लोक तत्र गत्वा वसति । वृ० प्र० १८१ मा । रणम् । दरा० ३० । तापसावसथादि , आ-समन्तात् श्राम्यन्ति-तपः कुर्वन्त्य. आसणअभिग्गहो-आसनाभिग्रह , तिष्ठत एवासनानयन स्मिन्निति । उत्त० ६०५ । व्रतग्रहणादिस्प । दग० २७९ । पूर्वकमुपविशतोऽत्रेतिभणनमिति । सम० ९५ । ठाणा० ४०८। आश्रम, तापसादिनिवास । प्रश्न० ५२। तापमावसयो- आसणगाणि पंताणि-पाशुत्करशर्करालोष्टायुपचितानि का. पलक्षित आश्रय । प्रना. ४८ । जीवा० ४० । जीवा० टानि च दुर्घटितानि । आचा० ३१० । २७९ । तापमाद्यावास । औप. ७४ । आसणत्थ-आसनस्थ, निपद्यागतम् । आव० ५४१ । आसमडे-अश्वमृतः, मृताश्वदेह । जीवा० १०६ ।. आसणदाणं - आसनदानम् , पीठकाद्युपनयनम् । दश० आसमपय-आश्रमपदम् , पार्श्वनाथदीक्षास्थानम् । आव० २४१। पीठा.देदानम् । उत्त० ६०९ । १३७ । आ-समन्तान प्राम्यन्ति-तप कुर्वन्त्यस्मिन्नित्या. उत्त ८० । (३५१) [मासममारी आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आसाढभूई ] श्रम -तापसावसथादिस्तदुपललितं पदं-स्थानम् ।' उत्त० आसवमओ-आश्रावक., वन्धकः । विशे० १०९३ । ६०५ । आसवदारं-आश्रवद्वारम् , कर्मवन्धद्वारम् । आव० ८५१ । आसममारी-मारीविशेषः । भग० १९७ । आश्रवण-जीवतडागे कर्मजलस्य सगलनमाश्रव-कर्मनि- आसमरूवं-आश्रमरूपम् । भग० १९३ । बन्धनमित्यर्थः, तस्य द्वाराणीव द्वाराणि-उपाया आश्रवद्वा- आसमित्त - अश्वमित्रः, कौण्डिन्यशिष्यः । विशे० १६० । राणीति । ठाणा० ३१६ । आव० ३१६ । उक्त० १६३ । चतुर्थनिहवनाम । ठाणा० आसवपीतो-पीतासवः । उत्त० २६३ । ४१० । यस्मात्सामुच्छेदा उत्पन्ना' । आव० ३१११ आसवबुच्छेओ - आश्रवव्यवच्छेद.- कर्मवन्धद्वारस्थगनेन मासमुहदीवे-अतरद्वीपमेद । ठाणा० २२६ । सवरणेनेत्यर्थः । आव० ८५१। आसमुहा-अश्वमुखनामा त्रयोदशान्तरद्वीप' । प्रज्ञा० ५० । आसवार-अश्ववार., अश्वारूढपुरुषः । भग० जीवा० १४४। आससणाय वसणं-आशसनाय-विनाशाय व्यसनम् , आसय-आशयः, निदानम् । आव० ६१० । तृतीयाधर्मद्वारस्य षड्विंशतितमं नाम । प्रश्न० ४३ । आसया - आस्वादते-अभिलषति, आश्रयति वा। सम. आससप्पओगे-आशंसा-इच्छा तस्याः प्रयोगो-व्यापारण करणं आशंसव वा प्रयोगो-व्यापारः आशंसाप्रयोग । ठाणा. आसरयणे-अश्वरत्नम् । ठाणा० ३९८ । ५१५ । आसरह-अश्ववहनीयो रथ । भग० ३२२ । अश्वरथ -नियु- क्तोभयपार्श्वतुरङ्गमो रथ इत्यर्थ । जं० प्र० १९८ । आससा-आशंसा । विशे० १००८ आव. ३२२। अप्रा- आसल - आसलं, आस्वायम् । जीवा० ३३१। जीवा० प्तप्रार्थनम् । ठाणा० १४५ । ३७० । आस्वादनीय.। जीवा० ३५१ । आससाए-आशंसया, यद्यत्यन्तप्रवर्षणं भावि तदा स्थलेषु फलावाप्तिरथान्यथा तदा निम्नेध्वित्येवमभिलाषात्मिकया। आसव-आसव', मद्यम् । उत्त० ६१९ । पत्रादिवासकद्रव्य. मेदादनेकप्रकार.। जीवा० २६५ । पुष्पप्रसवमद्यम् । उत्त० उत्त० ३६१। ६५४ । आश्रवाः-उपादानहेतवो हिंसादयः । उत्त० ५९२। माससेण-अश्वसेन , पार्श्वजिनपिता । सम० १५२ । पच- चन्द्रहासादिकम् । जीवा० १९८ । चन्द्रहासादिपरमासवम् । मचक्रिपिता । सम० १५१ । जं० प्र० ४२ । नि० चू० प्र० ३५ भ। माधव -सूक्ष्म आसा-अश्वा । आव० २६१। आशा-इच्छाविशेष. । रन्ध्रम् । भग० ८३ । आश्रवन्ति-प्रविशन्ति कण्यिात्म प्रश्न० ६४। औप० ४७ । नीत्याश्रव.-कर्मवन्धहेतुरितिभाव , स चेन्द्रियकषायानतक्रि- आसाइजा-आशातयेत्-हीलयेत् , वाधयेत् । आचा० २५७। यायोगरुप. । ठाणा० १८ । आश्रयं । प्रज्ञा० ५६ । आसाएजा-आस्वादयेत्-परिभुञ्जीत । आचा० ३९८ । आसवा आसवाः कर्मवन्धस्थानानि । आचा० १८१ । आसाएमाणे-आस्वादयन् , ईपत्स्वादयन् । भग० १६३ । पापोपादानस्थानानि । आचा० ४१३ आसादयेत्-सस्पृशेत्। आचा० ३८० । आचा० १८२ । पत्रादिविशेषेण व्यतिरिक्त आसव । प्रज्ञा. आसाढ-आषाढ , निहवनाम । विशे० ९३४ । यस्माढव्यक्ता ३६४ । आश्रष -आ-समन्तात् शृणोति-गुरुवचनमार्ण उत्पन्ना । आव० ३११ । तृतीयो निहव । ठाणा० ४१० । यतीति । उत्त० ४९ । कर्मवन्धहेतुर्मिथ्यात्वादि । आसाढग-तृणमेद । भग० ८०२ । ५९८ । माधव.-इन्द्रियजयादिरूपः परमार्थपेशलः काय- आसाढवहुलं-आषाढबहुल, आषाढकृष्णपक्षम् । आव० वाङ्मनोव्यापार । दश० २७९ । जलप्रवेशस्थानम् । व्य० आसाढभूई - आषाढभूति -देशभाषानेपथ्यादिविपर्ययकरणे प्र० १६७ मा । पापोपादानहेतुरारम्भादि । जीवा० १२८ । दृष्टात । सूत्र० ३२९ । दर्शनपरीपहभग्नः। (मर०) । शुभाशुभकर्मादानहेतु | ठाणा० ४४६ । - - वन्धका । आव० व्य० प्र० १९६अ। (१५२) [ आसाढायरिया अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः 'आसुर ] आसाढायरिया-चेल्लयसुरेण थिरीकया आयरिया। व्य० आसासि-आश्वासय, स्वस्थीकुरु । उत्त० १२७ । प्र० १९ अ। आसासिआ-आश्वासिता। आव० २२२ । आसायए-आशातयति, कदर्थयति। दश० २४४ । आसाहीणाएहि-दुद्दतेहिं । दश० चू० ११६ ॥ आसायण-आशातकपाराच्चिकः। ठाणा० १६३ । भासिआवणं-स्तैन्यम् । वृ० तृ० ८६ आ। मासायणसील-आशातनाशीलः, शातयति-विनाशयती- आसिसा-तिष्ठ । (मर०)। त्याशातना तस्या शीलं-तत्करणस्वभावात्मकमस्येत्यत्याशा- आसित्ता-आस्वाद्य-भुक्त्वा । आचा० ३३० । तनागील । उत्त० ५७९ । आसित्तो-आसिक्त , सबीज. । वृ० तृ० ९७ आ । जस्स आसायणा-आशातना, लघुतापादनरूपा अथवा स्वसम्य- पुण अवच्चं उप्पजति सो। नि० चु० द्वि० ३१ अ.. ग्दर्शनादिभावापहासरूपा। दश० २४४ । ज्ञानाद्यायस्य शा- | आसियं-आसिक्त, आसेचनं, ईषदुदकच्छट्टकः । प्रश्न० १२७॥ तना। आव० ५४७ । आशातना प्रश्न० १४६ । आ उदकच्छटम् । जीवा० २४६ । निर्धाटनं, निष्काशनम् । सामस्त्येन शात्यन्ते-अपध्वस्यन्ते यकाभिस्ता आशातना वृ० द्वि० ६१ आ। रत्नाधिकविषयाविनयरूपा पुरतोगमनादिका । ठाणा० आसियावणं-हरणं । नि० चू० प्र० २६७ अ । अपहरणम् । .५११ । आय -सम्यग्दर्शनाद्यवाप्तिलक्षणस्तस्य शानना: वृ० प्र० ३०९ आ। हरति । नि० चू० द्वि० १३ आ। खण्डनं निरुक्तादाशातनाः । सम० ५९ । आसिले - आसिल, महर्षिविशेष.। सूत्र० ९५ । आसायणिजं - आस्वादनीयम् , सामान्येन स्वादनीयम् । आसिवावितो-प्रव्राजित. । नि. चू० प्र०:२८६ अ । जीवा० २७८। आसी-आश्यो-दंष्ट्राः । प्रज्ञा० ४७ । विशे० ३८० । आव. आसालए-आशालकः, अवष्टम्भसमन्वित आमनविशेष । ४८ । आसी -दंष्ट्रा । आव० ५६६ । . दश० २०४॥ आसीणे-आसीन , आश्रित । आचा० २९३ । आसालओ-ससावगम (सावट्ठभं) भासण । दश० चू० ९९ । आसीयावणा-निष्कपायितुमासादनम् ।व्य० द्वि० ३६१ अ । आसालिए-आसालिक., उर.परिसर्पमेद. । सम० १३५। आसीविल-आशीविष. शवविजये वृक्षस्कार । जं० प्र० आसालिय-आसालिका, उर परिसर्पविशेष ।' प्रश्नं० ८। ३५७ । नाग । प्रश्न. १०७ । आश्यो-दंष्ट्रास्तासु विपं •जीवा० ३९। उर परिसर्पमेदविशेषः । प्रज्ञा० ४५ । येषा ते। ठाणा. २६५ । जीवा० ३९। सीतोदादक्षिणत: आसास-आश्वासः, आश्वसन्त्यस्मिन्नित्याश्वास । आचा०५। वक्षस्कार । ठाणा० ३२६ । उर परिसर्पविशेषः । जीवा० आश्वासयति अत्यन्तमाकुलितानपि जनान् स्वस्थीकरोतीति । ३९ । विशे० ३८० [ उत्त० ३१८ । आशीविष -भुजङ्ग । उत्त० २१२। आव०.५६७ ॥ आसासग-अवस्यास्य-मुखं, तत्र गत फेन सोऽश्वास्यगतः। आसु-आशु, शीघ्रम् । उत्त० ६३८ । जं० प्र० २०२ । , प्रज्ञा० ९५ । आमासक --पीयकाभिधाने वृक्ष । राज० ९। आसुकारिणः-दुष्टा । नि० चू० प्र०, ७५ आन आसासणय-आशसनम् , मम पुत्रस्य शिष्यस्य वा इद- आसुकोहो-तक्खगमेव कोहो । दश० चू० १२५ । मिदं च भूयादित्यादिरूपा आशी । भग० ५७३ । आसुक्कारो-आशु-शीघ्र सजीवस्य निर्जीवीकरणम् , अहि- आसासदीव - आवासद्वीपः, आकुलितजनस्वस्थकारको विषावशचिकाटि । वृ. तृ. १४७ अ। शीघ्रकारः, अहिविष- हीपविशेप । उत्त० २१२। आश्वासनमाश्वास , आवा- आश्वा- विशूचिकादिक. ! आव० ६२९ । माय द्वीप आश्वासद्वीपः । आचा २४७ । आश्वास्यते- आसुपन्ने-आशुप्रज्ञ., शीघ्रमुचितकर्तव्येषु यतितव्यमिति ऽस्मिन्नित्याश्वास , आवामवासी द्वीपश्चाश्वासहीप: । आव० प्रज्ञा-बुद्धिरस्येति । उत्त० २१७ । सततोपयुक्त । आघा. २६८। मासासय-आगासकः, यक्षविशेष । औप० ११। आसुर - अमुरभावनाजनित आसुर., भवनपतिविशेषम्याय. आसासा-आश्वामा-विधामा । ठाणा० २३६। मामुर. । ठाणा. ०७४ । कोहो । दा० चू० १२२ । . २४७। (१५३) [ आसुरत्तं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः आहया] । - ६१। - - आसुरत्तं-आसुरत्वम्, क्रोधभावम् । दश० २३१।' आसोकंता-मध्यमप्रामपंचमी मूर्च्छना। ठाणा० ३९३। . आसुरत्तभावणा-आसुरत्वभावना। उत्त० ७०७ । आसोटे-अश्वत्थः । आचा० ३४८ । आसुरत्तो-क्रुद्ध । आव० ३८९ । आसोठे-अश्वत्थ , बहुवीजवृक्षविशेष । प्रज्ञा० ३२१ :.' आसुरिनामा-कपिलशिष्यः । आव० १७१ । आसोत्थमंथु । आचा० ३४८ । आसुरिपत्तं । नि० चू० द्वि० ६० भ । आस्तिक्यम्-सम्यक्त्वस्य पञ्चमलक्षणम् । आव० ५९१ । आसुरियं-असुरभावम् । प्रश्न० १२१ । अविद्यमानसुर्याम्। आस्थानमण्डपः उपस्थानगृहम् । भग० २००। नंदी उत्त० २७६ । असुराणामियमासुरीया । उक्त०- २७६ । आसुरी - असुरा-भवनपतिदेवविशेषास्तेषामिय आसुरी । आस्फोटनम्-सकृदीषद्वा स्फोटनम् । दश०, १५३ । वृ० प्र० २१२ आ। आस्यान्यत्रास्यते यथासुखेन स्वाभ्यायपूर्वकम् । ओघ० ६९ । आसुरुत्ते-आगुरुप्तः, आशु-शीघ्र · रुप्त -कोपोदयादिमूढ. आत्रपः-मूल । ०.प्र. ४९९ । स्फुरितकोपलिङ्गो वा । भग० ३२२। आशु-शीघ्रं रुप्त' आहंसु-आहुः, उक्तवन्त । भग० ९८। आख्यातवान् । क्रोधेन विमोहितो य स.। आसुरोक्त आसुरं वा-असुर प्रश्न. २६ । सत्कं कोपेन दारुणत्वादुक्त-भणितं यस्य स. । विपा० ५३ । आहश्च-आहत्य, कदाचित् । भग० ३०५, २२ । उत्त. आसुरुत्त -शीघ्र कोपविमूढवुद्धिः, स्फुरितकोपचिह्नो वा । १८०, ४८ । प्रज्ञा० ३३३ । बृ० तृ० ११४ आ। कादा- भग० १६७। क्रुद्धः । आव०.६५, १५२, ७११ । आशु- चित्कम् । भाव० ५३० । सहसा । नि० चू० द्वि० १२,० भ । शीघ्रं रुष्ट -क्रोधेन विमोहितो य स आशुरुष्टः, आसुर वा- कदाचित् सान्तरमित्यर्थः । भग० ४३ । उपेत्य स्वत एव, असुरसत्कं कोपेन दारुणत्वात् उक्तं-भणित यस्य स आसु अत्यर्थ कदाचिद्वा । आचा० ५५ । ढौकित्वा । आचा०२७२। रोक्तः। निर० ८। उपेत्य । आचा० ३६२। सहसा। आचा० ३२२, ३५५ । आसुरे काए - असुराणामयमासुरस्तम् -- असुरसम्बधिनं, कदाचित् अनन्यगत्या। व्य. प्र. ८ आ। आहत्या-आह. चीयत इति कायस्तं, निकायमित्यर्थ । उत्त० १८२ । असु ननं प्रहार । भग ६७३ । रसम्बन्धिनि काये असुरनिकाये इत्यर्थ । उक्त० २९६ । आहश्च गथा-आहृतग्रन्था-व्ययीकृतद्रव्या। आचा०२७२। आसूणि-आशनिः, इलाधा। सूत्र० १८० । येन घृतपाना- आहठ-आहृत्य, उपेत्य। सूत्र० ३०० । गृहीत्वा । आचा० दिना आहारविशेषेण रमायनक्रियया वा अशून• सन् , २८२, ३४५) समन्ताच्छूनीभवति-वलवानुपजायते तत् । सूत्र० १८० आहट्टो-आडम्बर ( उपाधि.)। आव० ३४१ । मासूणियं-आशूनितम् , ईषत्स्थूलीकृतम् । प्रश्न० ४९ । आहडं - आहृतम् , स्वप्रामादे साध्वर्थमानीतम् । प्रश्न. आसूय-आसूयम् , औपयाचितकम् । पिण्ड० १२० । १५४ । साध्वयोग्यमशनादि। दश० २०३ । आसेवणसिक्खा - आसेवनशिक्षा, प्रत्युपेक्षणादिकियोप- आहणइ-आहन्ति, समीकरोति । आव० ३८५। देश.। विशे० ९1 उत्त० ५४५ । शिक्षाद्वितीयमेद. । आहत्तहिए-सूत्रकृतांगे त्रयोदशाध्ययनम् । “सम० ४२। नंदी २१० । सामाचारी शिक्षणम् । वृ० प्र० ६४ अ । प्रत्यु- माहम्मिए जोगे-वशीकरणादीनि । आव० ६६२ । पेक्षणादिक्रियारूपोऽभ्यास । आव० ८३३ । आयंति-कथयन्ति । नि० चू० प्र० २७७ अ । मासेवियं-स्तोकं आस्वादितं, अनास्वादितं वा। आचा० आहय - आहतं, लक्षणया लिखितम् । जं० प्र० २०३ । ३२५ । आख्यानकप्रतिवद्धं यनाटयं तेन युक्तं तद्गीतम् । ठाणा० आसो-जात्या आशुगमनशील. अश्वः । जीवा० २८२ । .४२१ । आहतं, आख्यानकप्रतिवद्धम् । सूर्य० २६७ । जीवा. मनः । प्रज्ञा० ८८ । य एकस्मिन् द्वित्रादीनान् वक्ति १६२। आव० २९८ । आख्यानकप्रतिवद्धं, आस्फालितं यथा अश्नातीत्यश्वः, आशु धावति न च श्राम्यति । वृ० वा। औप० ७४। प्र. ३४ अ। चतुष्पदविशेष. । प्रज्ञा० ४५ । आहया-आख्यानकप्रतिवद्धानि। राज. १६ । आ- . (१५४) - [ आहरणं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः 5. आहारटि] - N प्रज्ञा० ४७० । आहरणं-आ-अभिविधिना ह्रियते-प्रतीतौ नीयते अप्रतीतो- | आहार-आहारः,भोजनम् , जीवनम् । प्रश्न० १०६ । मनसा अर्थोऽनेनेति । ठाणा० २५४ । साध्यसाधनान्वयव्यतिरेक तथाविध पुद्गलोपादानरूपः । भग० ८६ । त्रयोदशशतके प्रदर्शनं दृष्टान्तो वा । आव० ६२ । . पंचमोद्देशकः। भग० ५९६ । अष्टाविंशतितममाहारप्रतिपा- आहरणतइसे-आहारणतद्देश', आहरणार्थस्य देशस्तद्देश दकन्वादाहार । प्रज्ञा०६। स चासावुपचारादाहरणं चेति प्राकृतत्वादाहरणशब्दस्य पूर्वनि- आहारए - आहारकम् , चतुर्दशपूर्वविदा कार्योत्पत्तौ योग- पाते आहरणतद्देश इति यत्र दृष्टान्तार्थदेशेनैव दान्तिकार्थ- वलेनाहियत इति। प्रज्ञा० २६८। तथाविधकार्योत्पत्ती स्योपनयनम् क्रियते तत् । ठाणा० २५४ । चतुर्दशपूर्वविदा योगवलेनाहियत इति । ठाणा० २९५ । आहरणतहोसे - आहारणतदोष , आहारणस्य सम्बन्धी चतुर्दशपूर्वविदा तीर्धकरस्फांतिदर्शनादिकतथाविधप्रयोजनो- साक्षात्प्रसङ्गसम्पनो वा दोषस्तदोष, ..सा चासौ .धर्मे त्पत्ती सत्या विशिष्टलब्धिवशादाहियते-निवर्त्यते इति । धम्मिण उपचारादाहरणं,चेति आहारणस्य दोषो यस्मिंस्तथा जीवा० १४ । प्रज्ञा० ४०९ । तथाविधप्रयोजने चतुर्दशपूर्व- यत्साध्यविकलत्वादिदोषदुष्टं तदोषाहरणं । ठाणा० २५४ । विदा यदाह्रियते-गृह्यते तत् । आहियन्ते-गृधन्ते केवलिन आहरणा-घोरयति घोरण करोति। ओघ० ५८ । ज्ञात समीपे सूक्ष्मजीवादयः पदार्था अनेनेति वा। अनु० १९६ । विशेष । ठाणा० २५३ । उदाहरणम् । दश० ३५ । आहारयति-आहारं गृह्णातीति । नंदी ९० । आहरे-आहारयेत्-व्यवस्थापयेत् । आचा० २९२ । आहारपसणा-आहारैषणा। दश. १८ । माहवणी-आवंगी, आथर्व गाभिवाना मद्योऽनर्थकारिणी आहारगं-आहारकम् , तृतीयं शरीरम् । प्रज्ञा० ४६९ । विद्या । सूत्र० ३१९। आहारगंगोवंगणाम-आहारकालोपाङ्गनाम, उपाङ्गनाम । आहा-आधा। भग० १०२ । साधूना मनस्याधानम् साधू- नाश्रित्य । प्रश्न० १२७ । आधानम् , साधूनिमित्तं चेतमः आहारगत्तं - आहारकत्वं, आहारकशरीरकरणलब्धिः । प्रणिधानम् । पिण्ड० ,३५। अधस्तात् । नि० चू० प्र० ठागा० ३३२ । २९४ आ। आधीयतेऽस्यामिति । पिण्ड० ३६ । आहारगबंधण-आहारकबन्धनम् , बन्धननाम । प्रज्ञा० आहाकम्म-आधाकर्म, आधाय-निमित्तत्वेनाश्रित्य पूर्वोक्तम- टप्रकारमपि कर्म वध्यते, शब्दस्पर्शरसरूपगन्धादिक। कर्मनि. आहारगमो-आहारगमः, प्रज्ञापनाया भष्टाविंशतितमाहा. मित्तभूता मनोज्ञेतरशब्दादय एवाधाकर्म । भाचा० ९८ । रपदोक्तसूत्रपद्धतिः। भग० १०९ । आधानं आधाकरण तदुपलक्षितं कर्म। यथाकर्म वा तत्तद्ग- त्यनुरूपचेष्टित वा । उत्त० १८२ । साधुप्रणिधानेन यत्सचेतन- आहारगसंघायणाम-आहारकसङ्घातमाम, यदुदयवशादा- मचेतनं क्रियते अचेतनं वा पच्यते चीयते वा गृहादिकं हारकगरीररचनाऽनुकारिसधातरूपा जायते तदाहारक- सहातनाम । प्रज्ञा० ४७० । व्यूयते वा वस्त्रादिकं तदाधाकर्म। भग० १०२ । प्रथम उद्गमदोष । आधानं आधा तया आधया कर्म-पाकादि- आहारगसमुग्धात-आहारकसमुद्रातः, आहारके प्रारभ्य. क्रिया, आधाय-साधु चेतसि प्रणिधाय यत् क्रियते भक्तादि माणे समुद्धातः । जीवा० १७ । तत् । पिण्ड० ३४ । चतुर्थशवलदोष । प्रश्न. १४४ । आहारट्ठ-आहारार्थ., आहारप्रयोजनमाहारार्थित्वम् । भग० सम० ३९ । २०। आहारलक्षणं प्रयोजनं, आहाराभिलापो वा । प्रज्ञा. आहाकम्मियं-आधाकर्म, दोषविशेष । आचा० ३२९ । ५००। आहाकम्मेहिं - आधाकर्मभि , आधान-माधाकरणं भात्म- आहारटि-आहारार्थी, आहारमर्धयते-प्रार्धयते इत्येवंशील, नेतिगम्यते, तदुपलक्षितानि कर्माण्याधाकर्माणि, तै:-खक अर्थों वा-प्रयोजनमस्यास्तीत्यर्थी, आहारेण-भोजनेन अर्धी तकर्मभिः । उत्त० २४७ ॥ आहारार्थी, आहारम्य-भोजनस्य घाऽर्थी आहारार्थी । मग. माहाण-आधानम् , विधानम् । विशे० ८४७ । ४७० । r (१५५) [ आहारपश्चक्खाण आचार्यश्रीभानन्दसागरसूरिसङ्कलितः आहिए] । -- आहारपश्चक्खाण-आहारप्रत्याख्यानम् , अनेषणीयभक्त. ६ । आधार । भग० ७३८ । फलपत्रकिशलयमूलकन्द- पाननिराकरणरूपम् । उत्त० ५८८ । त्वगादिनिवर्त्य । आचा० ६० आहारपदे-प्रज्ञापनाया अष्टाविंशतितमपदम् । प्रज्ञा० २५ । आहारेत्ताइतो-आहृतवान् । आव० ३०८ । नंदी १०५ । आहारे भोयणा-ओहाराभोगता। प्रज्ञा० ५४३ । आहारपयाई-आहारपदानि, आहारग्रहणविषयकानि पदा- आहारो-आहार, कूरादि एक चेव खुधं णासेति पाणे तक- नि । ज० प्र० ४६१ । खीरुदगमजादि एगगिया तिस णासेति, आहारकिञ्च च आहारपरिणा-आहारपरिज्ञा, सूत्रकृताने द्वितीयश्रुतस्कंधे करेंति खाइमे एगगिया फलमंसादि आहारकिञ्च च करेंति, तृतीयाध्ययनम् । आव० ६५८। ठाणा० ३८७ । उत्त० साइमेऽवि मधुफाणिम तंवोलादिया एगगिया खुहं णासेति। नि० चू० द्वि० ५० आ । मुक्खत्तो जं किंचिवि भ॑जति सो आहारपर्याप्तिः-यया शक्त्या करणभूतया भुक्तमाहारं खल- सव्वो आहारो। नि० चू० द्वि० ५१ अ । आधार आधेय- रसरूपतया करोति सा । वृ० प्र० १८४ मा ।शरीरेन्द्रियवाङ्म- स्येव सर्वकार्येषुः लोकानामुपकारित्वात् । भग० ७३९ । नप्राणापानयोग्यदलिकद्रव्याहरणक्रियापरिसमाप्ति । तत्त्वा० आहारोवचया-आहारोपचया., माहारेणोपचयों येषां ते। आचा० २७५। ८-१२ । आहारपोसहे आहारपौषधः, आहारनिमित्तं पौषधः, आहार्यः-अभिनयचतुर्थमेदः । जै० प्र० ४१४ । काष्टफल- आहारनिमित्तं धर्मपूरण पर्वेति भावना । आव० ८३५ । पुस्तमृत्तिकाचर्मा दिघटितप्रजननैोषिदवाच्यप्रेदेशासेवेनमित्य- र्थ.। आव० ८२५ । आहार्य अन्धकाररहितत्वं । समः आहारसण्णा-आहारसम्ज्ञा, आहाराभिलाष -क्षुद्वेदनी १४०1 योदयप्रभव आत्मपरिणाम । आव. ५८० । आहालंदिया-कल्पविशेष । नि० चू० प्र० ३३८ आ। आहारसना-आहारसज्ञा, क्षुवेदनीयोदयाद् या कवला- आहावंति-आगच्छन्ति । बृ० द्वि० ०२१३ अ। द्याहारार्थ तथाविधपुद्गलोपादानक्रिया सा । प्रज्ञा० २२२ । आहावणा-आभावना, उद्देश । पिण्ड० ११६ । क्षुवेदनीयोदयात्कावलिकाद्याहारार्थ पुद्गलोपादानक्रियैव आहाविज-आधावेत् । आव० ६३३ । सज्ञायतेऽनया तद्वानित्याहारसज्ञा । भग० ३१४ ॥ आहासिया-आभासिकनामद्वितीयान्तरद्वीप । प्रजा० ५० । आहाराभिलाष:-क्षुवेदनीयप्रभवः खलु आत्मपरिणामवि- आहिंडाल्ल । ओघ० ९६ । शेष । जीवा० १५॥ आहिंडओ-आहिण्डक , दूरदेशविहारकर्ता । आव० ५३६ । - आहारवं-आलोइजमाणं जो सभेदं सर्व अवधारति मो। माहिंडगा-विहरता। नि० चू० प्र० ३१४ अ । नि० चु० त० १२८ मा। अलोचितापराधाना अवधारणा- आहिंडा-सततं परिभ्रमणशीला । बृ० तृ० १८४ मा । वान् । भग० ९२० । आहिंडिओ-आहिण्डक , आहेटकं । आव० आहाराइणियाए - रत्ने -ज्ञानादिभिर्व्यवहरतीति रात्लि- अगीतार्थ , चक्रस्तूपादिदर्शनप्रवृत्त । ओघ०' ६० । क -बृहत्पर्यायो यो यो रात्निको यथारात्निकं तद्भावस्तत्ता आहिंडितो-आहिण्डिक । उत्त० १०८ । तया यथारानिकतया-यथाज्येष्ठ । ठाणा० ३०१ । आहिंधर-परिदधाति । आव० ३६० । आहारुद्देस - आहारोद्देश , प्रज्ञापनाष्टाविंशतितमपदस्यो- आहिमग्गि-आहिताग्नि , अग्निं गृहीत्वा स्वगृहे स्थापनात् । द्देशक । भग० २०॥ आव० । १६९। ब्राह्मग । दश० २५२ । कृतावस्थादि. आहारेंति-विशेषाहारापेक्षया सामान्याहारस्याविशिष्टशरीर ह्मिण । दश. २४५ । प्रतिपादितोऽनुष्ठितो वा। सूत्र० वन्धनसमय एव कृतत्वात् । भग० ७६३ । १७८ आहारे-आहार , चरमाचरमपदगतसूत्रम्। प्रज्ञा० २४६॥ | आहिए-आहित , जनितः । सूत्र० ६९ । प्रथित , प्रसिद्धि आहारप्रतिपादकं प्रज्ञापनाया अष्टाविंशतितमं पदम् । प्रज्ञा० गत.। सूत्र. ६९ । - 2 (१५६) [ आहिज अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः- इंगालभूया ] . -- इ १९८ । आहिजइ-आधीयते, व्यवस्थाप्यते, आख्यायते वा। सूत्र० | आहेति-आधाय, कृत्वा । उत्त० २४७ । - ३३७ । सम्बभ्यते। सूत्र० ३०६। आख्यायते । सम. आहेवच - आधिपत्यम् , अधिपतिकर्म । भग० १५४॥ ११३। अधिपते. कर्म, रक्षा । ज० प्र० ६३ । जीवा० २१७, १६२ । आहितविशेषम्-आहितविशेषत्वं-वचनान्तरापेक्षया ढौकि- आहेवणं-आक्षेपम् , पुरक्षोभादिकरणम् । प्रश्न० ३८ । तविशेषता। एकत्रिंशत्तमवाणीगुण । सम० ६३ । आहोपुरुषिका-आत्मशक्त्याविष्करणम् । सूत्र० ३४५ । आहितुण्डिग-आहितुण्डिक , गारुडिक । दश० ३७ । आहोहिओ-आधोऽवधिकः, परमावधेरधस्ता योऽवधिस्तेन आहितो-आख्यातः, कथित । सूत्र. ११ । यो व्यवहरति स. परिमितक्षेत्रविषयावधिक । भग आहित्थं । जीवा० १९४ । आहिय-आहितम् ढौकितम् । सूत्र० ७१ । आत्मनि व्य आहोहिय-नियतक्षेत्रविषयावधय । सम० ९६ । वस्थित, आ-समन्तात् हितं ना। सूत्र. ६८ । गृहीतम् । आहोही-यप्रकारोऽवधिरस्येति यथावधिः परमावधेर्वाऽधो- वर्त्यवधिर्यस्य सोऽधोऽवधि । ठाणा० ६१ । आव० ३७०॥ आहियग्गी-वंभणो । दश० चू० १३२ । आह्निका-पिशाचे चतुर्थभेद । प्रज्ञा० ७० । आहियते-निवर्त्यते । जीवा० १४ । आहियडमरं-आहिंतडमरम् , शत्रुकृतविड्वरोऽधिकविड्वरी वा। औप० १२ । आहिया-आख्याता । ठाणा० ३९७ । इंखिणिका-कर्णमूले घण्टिका चालयन्ति । आव० १३० । आहियोग - आभियोगदेवेपत्पन्ना आदेगवर्तिनः । भग० इंखिणी- विजाभिमंतिया घंटिया कंण्णमूले चालिज्जति, तत्थ देवता कटिंति कहेंतस्स पसिणापसिण सभवति स भाहिव्वण-आहित्यम् , अहितत्वं-शत्रुभावम् । प्रश्न० ३८ । एव इंखिणी भण्णति। नि० चू० द्वि० ८५ अ। निन्दा । सूत्र०६१। आही-आधि , मन पीडा। प्रश्न. २५ । इंगना-इगना, सज्ञा । नदी १५ । । आहुइ-आहुति , अग्नौ घृतादिद्रव्यप्रक्षेपरूपा । दश० २४५ । आहुणिए-आधुनिक । सूर्य० २९४ । अष्टाशीतौ ग्रहेषु इंगाल-अङ्गार , दग्धेन्धनो विगतधूमज्वाल । आचा० ४९ । चारित्रेन्धनमजारमिव यः करोति, भोजनविषयरागाग्नि मो- पचमग्रहनाम । ठाणा० ७८ । जं० प्र० ५३४ । जार. । भग० २९१ । अङ्गाराणामयमाझार । दश० १६४। आहुणिज-आहवनीय-सम्प्रदानभूतम् । औप० ५। ज्वालारहितोऽग्नि । दश० १५४, २२८। महाग्रहविशेष । आहुणिय-आधूय । आव० . १२१ । भग० ५०५। निचलितेन्धनम् । भग० २१३ । विगत- आहुस्स-आहोतुः, दातु । औप० ५। धूम । प्रना० २९ । निधूमाग्निः । जीवा. १०७ । विगत- आहूप-सहत । आचा० ४२१ । धूमज्वालो जाज्वल्यमान खदिरादिः। जीवा० २८ । आहतो-उत्पन्नः । आव० ३४३ । लग्न , उत्पन्न । उत्त० अङ्गार । आव० ४२२, ३१३ । रागो। नि० चू० त० ४; अ। ज्वालारहितो वहि , अग्नेस्तृतीयमेद । पिण्ड० माहय - आहूतम्-आह्वानमामन्त्रणं नित्य मद्गृहे पोष- १५२ । मात्रमन्नं ग्राह्य इत्येवंरुपम् , कर्मकरायाकारण वा माश्वयं इंगालए - अङ्गारक , अष्टाशीतितममहाग्रहविशेष । सूर्य स्थानान्तरादन्नाद्यानयनाय यत्र स , स्पर्धा वा। भग० २९४ । महाग्रहविशेष । ज० प्र० ५३४ 1 ठाणा० ७८ । २९३ । भग० २९४ । इंगालकहिणि-ईपद्वकाग्रा लोहमययष्टिः। भग० ६९७ । आहेडगो-मिगव्य । नि० चू० द्वि० १३६ आ। इंगालकम्म - अडगारकर्म, अङ्गारकरणविक्रय किया । आहेणं-जमन्नगिहातो आणिज्जति त अहवा जं वहुगिहातो आवर ८२९ । वरगिह णिजनि त । नि० चू० द्वि० २२ अ । यद्विवाहोत्तर- इंगालदाहओ-अङ्गगारदाहक. । आव० १५१ । काले वधूप्रवेशे वरगृहे भोजन क्रियते । आचा० ३३४ । इंगालम्भूया-अङ्गारराशिना भूता। भग० १६६ । १४८ । । (१५७) [ इंगालवडेंसए आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः इंदजसा] . + भग० ५०५। - ra J . । इंगालवडेंसए - अङ्गारावतंसकं, ज्योतिषविमानविशेष । इगिताकारसम्पन्न - इंगिताकाराभ्या गुरुगतभावपरिजानमे वोन तेन सम्पन्न -युक्त । उत्त० ४४ । इंगालसोल्लियं-अनारैरिव पक्वम् । भग० ५१९ । औप० 'इंग्यते-प्रतिनियतदेश एव चेष्टयते । सम० ३५ । ९१ । निर० २६ । इत-आयान्तम् । उत्त० ३२५, १३९ । इंगाला-अणिधणाणि जाला। नि० चू० प्र० ५२ आ| इंती-एति--आगच्छन्ति । ओघ० ७८ । इंगिम-इङ्गितम् , अन्यथा प्रवृत्तिलक्षणम् , निष्ठीवनादिलक्ष-- इंतो-आयान् , आगच्छन् । दश० ३७। आव० ८.१ ।- णम् । दश० २५२। नयनादिचेष्टया। ज० प्र० २२३ । बृ० तृ० १७९ अ. इंगिणि-इगिनी, अनशनविशेषः । आव० ६७० । इंद-एकोनविंशतिसागरोपमस्थितिक विमानम् । सम० ३७ । इंगिणिमरणे-इङ्गिनीमरणम् , प्रतिनियनदेश एव चेष्टयते. इंद-इन्द्रः, सप्तमदिनस्य सैद्धान्तिक नाम। सूर्य० १४७ । ऐन्द्री-पूर्वदिक्स द्वान्तिकनाम । ठाणा० १३३.1. ऽस्यामनशनक्रियायाम् , सप्तदशमरणे षोडशः। सम० ३३ } इङ्गिते प्रदेशे मरणं इङ्गितमरणम् । आचा० २६२ । इंगि- इंदकाइया-त्रीन्द्रियविशेष । प्रज्ञा० ४२ ॥ त्रीन्द्रियजन्तु. विशेष । जीवा० ३२। , यदेसमि सय चउन्त्रिहाहारचायनिप्फन्न । उव्वत्तणाइजुत्त इंदकील-इन्द्रकील , गोपुरे कीलविशेष । जीवा० ३५९, नऽण्णेण उ इगिणीमरणं"। ठाणा० ९६ । यावत्कथिकानशन- द्वितीयभेद । ठाणा० ३६४ । २०४। गोपुरकपाटयुगसन्धिनिवेशस्थानम् । जं० प्र० ४८ ॥ गोपुरावयव विशेष । औप० ३। गोपुरकपाटयुगसन्धिनिवे. इंगिणी-इङ्गिनीमरणम् , मरणस्य पोडशो मेद । उत्त० २३।। शस्थानम् । भग० १७५। पुरमध्यस्थम् । नंदी १५० । इङ्गिनी, इश्यते-प्रतिनियतप्रदेश एव चेष्टते अस्यामनशन- इंदकुंभ-कुम्भानामिन्द्र -विजयदेवाभिषेककलशाः । ज० प्र० क्रियायामिति । उत्त० २३५ । सम० ३५। विशे० १०.! इंगितं-सूक्ष्मवुद्धिगम्यचेष्टा । ठाणा० ४ । सूक्ष्मचेष्टाविशेष । इंदकुंभसमाणो- इन्द्रकुम्भसमान , महाकुम्भप्रमाणकुम्भ- वृ० प्र० ४३ अ। सदृशः । जीवा० ३६० ।- इंगिनीमरणं - उक्तन्यायत. प्रतिपद्य शुद्धस्थण्डिलस्थाता | इंदकुमारिया-इन्द्रकुमारिका । आव० ४३४ । एकाक्येव कृतचतुर्विधाहारप्रत्याख्यानस्तत्स्थंडिलस्यान्तश्छा- | इंदकेऊ-इन्द्रकेतु , लोकमहनीयो ध्वजविशेष । उत्त० ३०३ । यात उष्णमुष्णाच्च छाया स्वयं संक्रामति । उत्त० ६०२ । | इंदकेतू-इन्द्रकेतु , रश्मिनियन्त्रिते वेन्द्रयष्टि । प्रश्न० १३४ । 'नियत प्रदेशस्थायित्वेऽशनादित्याग । आव० ५६३ । इंदखीलो-दन्द्रकील । आव० ४१७ । इंगियं-इङ्गितम् , ज्ञान विशेष । आव० ७२४ । नयनादि इंदगाइ-त्रीन्द्रियजीवविशेष । उत्त० ६९५ । चेष्टाविशेष । निर० ८। ज्ञाता० ४१ । निपुणमतिगम्यं ४१ । निपुणमतिगम्यं | इंदगाह-इन्द्रप्रह , उन्मत्तताहेतु.। भग० १९८ । 'प्रवृत्तिनिवृत्तिसूचकमीप शिर.कम्पादि । उत्त. ४४ । इंदगोवए-इन्द्रगोपक , प्राबृटप्रथमसमयभावी कीटदिशेष । अगभंगादि। उत्त० ६२६ । प्रज्ञा० ३६१ इंगियपत्थिय-चेप्टितप्रार्थित । ( मर०)। इंदगोवया-इन्द्रगोपक , त्रीन्द्रियजन्तुविशेषः । जीवा० ३२। इंगियमरणं-इंगितमरणम् , इंगिते प्रदेशे मरम्। दश० त्रीन्द्रियविशेष । प्रज्ञा० ४२ । इंदगोवसमाइय-त्रीन्द्रियजीवमेद. । उत्त० ६९५ । इंगियागारकुसलो-इगिताकारकुशल । आव० ५६ । इंदगोवेइ-इन्द्रगोपक , प्राबृट्कालभावी कीटविशेष । ज० इंगियागारसंपन्ने-इंगिताकारसम्प्रन , इंगित-निपुणमति. प्र० ३४ । आचा० ३७६ । गम्यं प्रवृत्तिनिवृत्तिसूचकं, आकार--स्थूलवीसवेद्य प्रस्थानादि | इंदग्गहो-इन्द्रग्रहः । जीवा० २८ । भावाभिव्यक्षको दिगवलोकनादि , द्वन्द्वे इंगिताकारी, तो इंदग्गी-इन्द्राग्निः, ग्रहविशेष । ठाणा० ७९ । ज० प्र० ५३५ । अर्थाद्गुरुगतौ सम्यक प्रकर्षण जानातीति। उत्त० ४४ । । इंदजसा-दन्द्रयशा, ब्रह्मराजरानी । उत्त० ३७७ । ५० । - + (२५८) - [ इंद्रजालिओ अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोष इंदियत्था ] । . इंदजालिमो-इन्द्रजालिक -भूतिलाभिधः । आव०१२१९-। महावीरस्वामिनो गौतमगोत्रो ज्येष्ठ. शिष्य । भग०, इंदज्झओ-इन्द्रध्वज , शेपञ्चजापेक्षयाऽतिमहत्त्वादिन्द्रशासौ २०६। ध्वजश्च इन्द्रध्वज इति विग्रहः, इन्द्रत्वसूचको ध्वज इति । इंदमह - इन्द्रमह , इन्द्रोत्सवः। उत्त० २११ । अश्वयुक्- वा। मम०६१ । पौर्णमासी। ठाणा० २१४ । लौक्किमहोत्सव.। आव. इंदट्ठाणे- इन्द्रस्थानम् , यत्रेन्द्रयष्टिरुदीक्रियते । अन्त० ३५८। उत्सवविशेष । आव० ६९२ । आचा० ३२८ । २३ । यदश्वयुपूर्णिमाया भवति कार्तिके वा। आव० ७३६. इंदणागो-टन्द्रनागः, येन वालतपसा सामायिक लब्धम् । इन्द्रोत्सव । आव० ३५८ । इन्द्रस्य-शक्रस्य मह -प्रति- आव० ३५३ । वमन्तपुरे दारको य एकपिण्डिको जात । नियतदिवसभावी उत्सव । जीवा० २८१ । आव० ३५२ । इंदमुद्धाभिसित्ते-इन्द्रमूर्द्धाभिषिक्त ,सप्तमदिनस्य सैद्धान्ति- कनाम। जं.प्र. ४९० । इंददत्त-इन्द्रदत्त , अभिनन्दनजिनप्रथमभिक्षादाता। आव० इंदसम्मो-इन्द्रशर्मा, गृहपतिविशेष । आव० १९४ । प्रति- १४७ । मम० १५१ । इन्द्रपुरनगरनृपति । विपा० २२। चरक । आव० १९०। व्य० द्वि० १५१ भ । व्य०वि० १७. आ । तितिक्षोदा- इंदसिरी-इन्द्रधी , ब्रह्मराजराजी । उत्त० ३७७ । हरणे इन्द्रपुरनगरनरेश । आव. ७०२ । मथुराक्षाद्ध' इंदसेणा-रक्तवतीसगमिका नदी। ठाणा० ४७९ । पादच्छेदक । (मर०)। वासुपूज्यपूर्वभव । सम० १५१ । इंदा-ऐन्द्री, पूर्वदिक् । आव० २१५ । भग० ४९३ । नाग- इन्द्रपुरे राजा। आव० ३४३ । मथुराया पुरोहितविशेष । कुमारेन्द्रस्य पश्चमानमहिपी। भग० ५०४ । पचमविद्यु. उत्त० १२५। श्रावस्त्या कपिलगिक्षको ब्राह्मण | उत्त० त्कुमारी महत्तरिका। ठाणा० ३६१। रक्तवतीसगमिका २८६, २८७ । इन्द्रपुरनृपति । उत्त० १४८ । नदी। ठाणा० ४७७ । इंदधणु-इन्द्रधनु । जीवा० २८३ । विविधवर्णमभ्रमण्डले इंदासणि-इन्द्राशनि , इन्द्रवज्रम् । उत्त० ४७५ । जायमान तेजोमण्डलम् । भग० १९५ । इंदियं-इन्द्रिय, प्रज्ञापनाया पञ्चदश पदम् । प्रज्ञा० ६॥ इंदनीले-इन्द्रनील , रत्नविशेष । प्रज्ञा० २७ । पृथिवीभेद । इन्दनादिन्द्र -जीव , सर्वविपयोपलब्धिभोगलक्षणपरमैश्वर्य- आचा० २९ । मणिमेद । उत्त० ६८९ । योगात्तस्य लि तेन दृष्टं सृष्टं जुष्टं' दत्तमिति' वा, श्रोत्रादि । इंदपयपवतो-गजाग्रपदपर्वतापरनामा पर्वत , षड्दिग- ठाणा० ३३४ । 'औदारिकादित्वार्थपरिच्छेदकत्वलक्षणधर्म- क्षेत्रावग्रहस्थानम् । नि० चू० प्र० ३८१ अ । द्वयोपेतम् । ठाणा० ३५६ । इन्द्रलिंगदृष्टदिष्टादिरूपम् ।' इंदपाउया-इन्द्रपादुका, इन्द्रकुमारी। आव० ४३७ । तावा० २-१५। इंदपुरं-इन्द्रपुरम् , नगरविशेष । उत्त० ३८० । इन्द्रदत्त- इंदियउद्देसए - प्रज्ञापनाया पंचदशपदस्य प्रथमोद्देशक ।' राजधानी। उत्त० १४ । तितिक्षोदाहरणे नगरविशेष । भग. ४४०, ७७७, १३१ । प्रना० ५४५ । आव० ७०२ । नगरविशेष । विपा० ५४, ९५ । इन्द्र- इंदियकरणं-टन्द्रियकरणम् , इन्द्रियाणा--चक्षुरादीना करण दत्तराजधानी । विपा. ८८। नगरविशेष । आव० ३४३ । भवस्थान्तरापादनम् । उत्त० १९८ । व्य. द्वि० १५१ अ, १७० आ। इंदियत्थ-औदारिकादित्वार्थपरिच्छेदकत्वलक्षणधर्मयोपेत. इंदभूई-इन्द्रभूति , प्रथमगणधर । आव. २४० । श्रीवीर मिन्द्रियं, अर्थ-विषयो जीवादि । टाणा० ३५६ । प्रथमगणधर । मम० १५२ । इंदियत्थविकोवणयाते -इन्द्रियार्थविक्रोपनं-कामविकार । इंदभूती-इन्द्रभूति इति मातृपितृकृतनामधेय , महावीर- स्वामिन. प्रयमशिष्य । भग. ११। महावीरस्वामिनो इंदियन्था - इन्द्रियार्था टन्द्रियरर्यन्ते-अधिगम्यन्त ति ज्येष्ठ शिप्य । भग० १३९ । श्रीमहावीरप्रथमगणधर । टन्द्रियार्था.-गब्दादयः । ठाणा. २५३ । टन्द्रियाणामर्या- सत्र. ४०७। रविप्रश्ननिर्णये चम्पानगर्गा पुण्यभवत्ये तविषयाः-शब्दादय । ठणा । ठाणा० ४४७ । (:५९) [ इंदियनिग्गहो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः एक्खागा] प्र० १८४ आ। । इंदियनिग्गहो- इन्द्रियनिग्रह , इन्द्रियाणां - श्रोतादीना ३३४ । परमैश्वर्ययोगात्प्रभुमहान् । ठाणा० १९८ । भवन- निग्रह -इष्टेतरेषु शब्दादिषु रागद्वेषाकरणं, पञ्चैतेऽनगारगुणा । वास्यायधिपा । तत्त्वा० ४-४ । आव० ६६० इंदोकतं-एकोनविंशतिसागरोपमस्थितिक विमानम्। सम० इंदियपञ्चक्खे - इन्द्रिय-श्रोत्रादि तन्निमित्तं-सहकारिकारणं ३७. यस्योत्पित्सोस्तदलिंगिक शब्दरूपरसगन्धस्पर्शविषयज्ञान इंधणपलिआम - जहा कोद्दवपलालेणं अवगादि फलाणि मिन्द्रियप्रत्यक्षम् । अनु० २११ । वेढेत्ता पाविज्जति आदिग्गहणेण सालिपलालेण वितत्थ इंदियपजत्ति-इन्द्रियपर्याप्ति -यया धातुरूपतया परिणमिता- जे ण पका फला ते इंधणपलियाम भण्णति । नि० चून दाहारादिन्द्रियप्रायोग्यद्रव्याण्युपादायैकद्वित्र्यादीन्द्रियरूपतया द्वि० १५२ आ। परिणमय्य स्पर्शादिविषयपरिज्ञानसमर्थो भवति सा । बृ० । इंधणपलियामं-इंधनपर्यायाम-कोद्रवपलालादिना वेष्टयि- त्वा पाच्यानि फलानि । वृ० प्र० १४२ आ। इंदियपडिपुण्णो-नोविगलिंदियो। नि० चू० प्र० २६६ आ। इंधणसाला-जत्थ तणाकरिसभारा अच्छति। नि० चू० इंदियवलं-इन्द्रियवलम् , चक्षुरादीन्द्रियाणां बल-स्वस्ववि- तृ० २१ आ । तृणकरीषकचवरस्थानम् । बृ० द्वि० १७५ अ । पयग्रहणपाटवम् । जीवा० २६८ । इइकटु-इतिकृत्वा, निश्चित्य । ज० प्र० ३८६ । इतिकृत्वा- इंदियमुंडा-न जितेन्द्रिया. । नि० चू० द्वि० ३७ भ । यस्मात् कारणात् । अनु० १६ । इंदियलद्धी-इन्द्रियलब्धि , पञ्चेन्द्रियप्राप्तिः । उत्त० १४५ । इइकम्म-इतिकर्म, इति-सासारिक दु ख कर्म-अष्टप्रकार- इन्द्रियाणाम्-स्पर्शादीनां मतिज्ञानावरणक्षयोपशमसम्भूताना- कर्मकृतम् । आचा० १४५। मेकेन्द्रियादिजातिनामकर्मादयनियमितकमाणा पर्याप्त कनाम इइहास-इतिहास -पुराणम् । औप० ९३ । भग० ११२। निर० २३। कर्मादिसामर्थ्य सिद्धाना द्रव्यभावरूपाणा लब्धिरात्मनीती- न्द्रियलब्धि । भग० ३५० । इक-देशीवचनम् । विशे० १३१४ । इंदियलाघवं - इद्रियलाघवं, इद्रियाणि तस्य वशे वर्तते । इक्कडं-कठिनं तृणविशेष । बृ० तृ० ५२ आ। ढंढणसदृशं व्य. द्वि० १०२ आ। तृणविशेषम् । प्रश्न. १२८ । तृणविशेष । भग० ८०२॥ इंदियाई-इन्द्रियाणि-नयननासिकादीनि । उत्त० ४२५ । इक्कडदासो-इक्कडदास । उत्त० २८६ । इंदियाईणं-इन्द्रियादीनाम् , पृथ्व्यायेकेन्द्रियाणाम् । विशे० इक्कडा-लाडदेसे वणस्सतिमेओ। नि० चू०प्र० १३४ आ । वनस्पतिविशेषा । सूत्र० ३०७ । २६०। इंदियाणि-इन्द्रियाणि-नयननाशावंशादीनि । सम० १६ । इक्कमिक-एकैकम्-परस्परम् । उत्त० ३८२ । इंदीवरे-हरितविशेष । प्रज्ञा० ३३ । इक्काई-राष्ट्रकूटविशेष । विपा० ३९ । इकारसालंकारं- एकादशालङ्कारा., स्वरप्रामृतकयिताल- इंदुत्तरवडिंसगं-एकोनविंशतिसागरोपमस्थितिक विमानम्। कारा । जं० प्र० ३९ । सम० ३७ इक्खाग-टक्ष्वाकु , कुलविशेष. । आव० १७९ । इंदुवसु-इन्दुवसु , ब्रह्मराजराज्ञी । उत्त० ३७७ । इक्खागकुलो-इक्ष्वाकुकुल , कुलविशेप । नि० चू० प्र० इंदे-इन्द्र । ठाणा० २९२। मल्लिनाथप्रथमशिष्य । सम० २९० अ। आव० १०९ । इक्खागभूमि-इक्ष्वाकुभूमिः, ऋषभजन्मभूमि । आव० इंदो-इन्द्र , अधिपतिः । प्रज्ञा० १०५। इन्दनाद्-इन्द्र आत्मा। प्रज्ञा० २८५ । जीवा० १६। इन्दनात्-इन्द्र , इक्खागा-इक्ष्वाकव , नामेयवशजा । भग० ४८१ । औप० सर्वोपलब्धिभोगपरमैश्वर्यसम्बन्धाज्जीव । आव० ३९८ । ५८ । कुलार्यमेदविशेष । प्रज्ञा० ५६ । प्रथम प्रजापतिवराजा । जीव -सर्वविषयोपलब्धिभोगलक्षणपरमैश्वर्ययोगात् । ठाणा० टाणा० ३५८ । ऋषभस्वामिवधिका । आचा० ३२७ । १५२ ॥ । १६०। (१६०) ----- [ इखु अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः । इक्खु-इक्षु । भग० ३०६ । दश० १८३ ।। इच्छाणुलोमियं-इच्छा-चेत प्रवृत्तिरभिप्रायस्तस्यानुलोमम्- इक्खुगारा-इपुकारा , धातकीखण्डपुष्करवरद्वीपार्द्धयो मेद अनुकूल तत्र भवमैच्छानुलोमिकम् । ठाणा० १७५ । कारिणो दक्षिणोत्तरायताः पर्वतविशेषा । प्रश्न० ९५। इच्छापरिमाणं-इच्छाया परिमाणम् । आन० ८२५ । इक्खुवाडिया-ईश्वादीना मूलवर्ग (वंशवर्गवत् )। भग० इच्छापुन्निमा-इच्छापूर्णिमा । सूर्य० ११५ । ८०२१ इच्छामणं - इच्छामन , कायपरिचारेच्छाप्रधानं मन । इक्खुवाडि-पर्वगविशेषा । प्रज्ञो० ३३ । प्रज्ञा० ५४९। इक्षु-पर्वगविशेष । प्रज्ञा० ३० । इच्छामुच्छा - इच्छामृर्जी, इच्छा-परधन प्रत्यभिलाप मूर्छा-तत्रैव गाढाभिष्वङ्गरूपेति, तृतीयाधर्मद्वारस्य सप्त- इक्षुरसा- वापीनाम, पंडकवन आग्नेयप्रासादवापिका । ० विंशतितम नाम। प्रश्न. ४३ । प्र० ३७१। इक्षुवरः-घृतोदसमुद्रानन्तर द्वीप , तदनन्तर समुद्रोऽपि । इच्छालोभ-इच्छारूपो लोभ इच्छालोभ -चक्रवर्तीन्द्रत्वा- द्यभिलाषादिको निदानविशेष । आचा० २९५ । महालोमः । प्रमा० ३०७॥ इगं-इकम , देशीपदम् । आव० ४७४ । बृ० तृ० २४६ । ठाणा० ३७४ । इच्छं-इच्छामि । आव० २६५ । इच्छियं- इष्टम्-ईप्सितम् । भग० १२१ इच्छितं-दष्टं- इच्छया-बलाभियोगमन्तरेण । ठाणा० ५०० । अनुमतम्। उत्त० ५०३ । इच्छाविषयीकृतम् । जीवा. इच्छसि-मृगयसे । आचा० १६८ । २७९ । इच्छियपडिच्छियं - इष्टप्रतीप्सितम् , युगपदिच्छाप्रतीप्सा- इच्छा-इच्छा, बलाभियोग । ठाणा० । ४९९ । इच्छा- विषयं वा। भग० १२१ । इच्छाया अवग्रहो नाम इच्छि- प्रार्थना कामोऽभिलाष काक्षा गार्य मूर्छा। तत्त्वा० ७-१२। तप्रतीच्छितेन इच्छा सजाताऽस्येति इच्छित, प्रतीच्छा सजा- एकादशीरात्रिनाम। ज० प्र० ४९१। सूर्य० १४७॥ ताऽस्येति प्रतीच्छितं, इच्छितं च तत् प्रतीच्छित च इच्छि- धनादिविषयाभिलाष । ठाणा० २९१। चेत प्रवृत्तिरभि- तप्रतीच्छितम् । व्य० द्वि० ९३ अ । प्राय । आचा० १७५ । अभिलाषमात्रम् । प्रश्न. ९७ । इच्छियपडिच्छियववहारो- इच्छितप्रीच्छितव्यवहार , अप्राप्तार्याभिलाषरूपा। प्रश्न. ९२ । वन्दनके प्रथम स्था- ईप्सितप्रतीप्सितव्यवहार । आव० १००। नम् । आव० ५४८ । इजंजलि-इज्याञ्जलि , यागविषयो जलाञ्जलि । अनु० २९ । इच्छाकामा-इच्छाकामा , एपगमिच्छा सैव चित्ताभिलाष- मातुनमस्कारविधौ तद्क्तः क्रियमाण करकुमलमीलनल- रूपत्वात्कामा इति। दश० ८५। मोहनीयभेदहास्यरत्यु. क्षणोऽअलि । अनु० २९ । पूजायामजलि । अनु० २९ । द्भवा । आचा० १३५। इजंत-एजंत-आयान्तमागच्छन्तम् । उत्त० ३५८ । इच्छाकार-उद मदीय कार्यमिच्छया कुरुत न वलाभि. इज्ज-इज्या, पूजा। उत्त० ५३१ । गमनम्। उत्त० ३५८ । योगेनेत्येवमिच्छया करणम् । वृ० प्र० २२२ अ । आज्ञावला- यजन-याग । अनु० २९ । माता। अनु० २९ । पूजा- भियोगरहितो व्यापार । अनु० १०३ । दगविधसामाचार्या गायत्र्याटिपाठपर्वक विप्राणा सन्ध्याऽर्चनम् । अनु० २९ । प्रथमभेद,। ९२० । वलाभियोगमन्तरेण करण इजिसिया- इज्यैषिका , इज्या-पूजामिच्छन्त्येषयन्ति वा इच्छाकार -इच्छाझिया। आव० २५८ । ये त एव । भग० ४८२ । इच्छाणुलोमा - यथा कश्चित्किञ्चित्कार्यमारभमाण कचन उदृग-मेवकिका, मानोत्पत्तिकारणम् । पिण्ड० १३३ । पृच्छति, म प्राह-करोतु भवान् ममाप्येतदभिप्रेतमित्येव- इट्टाल-इष्टिकाखण्ड । दश० १७५ । नि० चू० तृ० ७४ आ। रूपा भापा। प्रशा० २५६ । प्रतिपादयितुर्या इन्छा तदनु- इटुं-इष्टम् । आध० २४० । वाटभ -पृजित । भग० ५६० । लोमा-तदनुकूला। भग० ५०० । असल्यामृपाभापाभेद । इट्टगा-(क्षणविशेष) इट्टगा मुत्ताउला (सेवतिका)। नि. दा० २१०॥ चू. हि० १०० आ। भग० (१६१) [इडर आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः इत्तरियं दिसं] । - इहर-गन्त्रीढम्चनकम् । भग० ३१३ । गन्न्या सम्बन्धि । शय्यातरः । व्य० द्वि० २७६ अ। अन्तप्रान्त. कुल । ओघ० १६६, १६७ । आचा० २४३ । इडरग-इटरक-महत् पिटकम् । राज. १४१ । इता-ज्ञाता। आचा० २८६ । इडरिकादिः-पर्युषितकलनीकृता. अम्लरसा भवन्ति, आर- इति-इति -प्रवृत्ति । ठाणा० ३४३ । उपदर्शने। सूर्य नालस्थिताम्रफलादिर्वा । ठाणा० २२० । २८६ । प्रज्ञा० २५५। परिसमाप्ती एवमर्थे वा । उत्त. इड्डि-ऋद्धि -आमर्पोषध्यादि । दश० १०३। भवनपरिवा- ६७ । उपप्रदर्शनार्थ । विशे० १५३ । एवंप्रकारार्थः । रादिका । ज० प्र० ६२। उत्त० ३५० । आव० १७८ । ठाणा० ५०३ । पूर्वप्रक्रान्तपरामर्शक | आचा० १४५ । ठागा० १३२। इतिसदो वा अर्थे । नि० चू० द्वि० १३७ मा । आमंतणे परि- इडिपत्ता-ऋद्धिप्राप्ता आर्या । प्रज्ञा० ५५ । ऋद्धिप्राप्ता- समत्तीए उवप्पदरिसणे वा। दश० चू० ६३ । हेतौ । आर्यप्रथममेद., अर्हदादय । सम० १३५ । आचा। १००। उपप्रदर्शने । उत्त० ५७० । दश० ७६ । इडिम-इस्सरो। नि० चू० द्वि० १६६ आ । आद्यर्थ । उत्त० ५६१ । प्रत्येकं पर्यायस्वरूपनिर्देशार्थ । इडिमत-ऋद्धिमत.-विस्मयनीयवर्णादिसम्पत्तिमत । उत्त. उत्त०८। आद्यर्थे। आव. २८। प्रख्यातगुणानुवाद- नार्थ । भग० ६७ । एवंप्रकारा । ठाणा० ३५४ । इडिसिय-रुढिगम्या । भग० ४८१ । इतिकत्तव्वं-इतिकर्तव्यं । आव० २१३ । इतिकर्तव्यता- इड्डी-ऋद्धिः । प्रज्ञा० ४२४ । इस्सरियं। नि० चू० प्र० आदर्शनिक्षेपे सपूर्णकर्तव्यतार्थ । आचा० ५। १३ आ।आत्मशक्तिरूपा । प्रज्ञा० ४६७ । भवन परिवारादिका। | इत्तरं-इत्वरम्-अल्पकालीनम् । विशे० २४ । स्वल्प । निक जीवा० २१७ । विभवैश्वर्य । जीवा० २८० । विमानपरि. चू० प्र० १८९ अ । परिमितकालम् । दश० २६ । चतुर्थादि वारादिका । सूर्य० २५८ । ठाणा० ११६ । औषधि विशेष । षण्मासान्तमिद तीर्थमाश्रित्य । ठाणा० ३६४ । पादपोपग- उत्त० ४८० । कनकादिसमुदाय । उत्त. २८४ । आम. मनापेक्षया नियतदेशप्रचाराभ्युपगमादिगितमरणम्। आचा० पौषध्यादि.। आचा० १७८ । विमानवस्त्रभूषगादि । उपा० २८५ । २६ । दीनानाथदानादिका विभूति । उत्त० ४६५ । श्राव. इत्तरकं-इत्वरकम् , स्वत्पकालं, नियतकालावधिकं । उत्त० कोपकरणादिसम्पदामोषध्यादिरूपा। उत्त० ६६८ । ६०० । इड्डीगारवं - ऋद्धिगौरवम् , ऋद्धया-नरेन्द्रादिपूज्याचार्या-इत्तरकालिकं-प्रथमपश्चिमतीर्थकरतीर्थेष्वनारोपितव्रतस्य टत्व- दित्वामिलापलक्षणया गौरव - ऋद्धिप्राप्त्याभिमानाप्राप्ति रकालिकम् । ठाणा० ३२३ । अल्पकालिकम् । भग० ९०९ । सम्प्रार्थनाद्वारेणात्मनोऽशुभभावगौरवम् । आव० ५७९ । इत्तरा-इत्वरा, ये कल्पसमाप्त्यनन्तरं तमेव कल्प गच्छ वा ऋस्था-नरेन्द्रादिपूजालक्ष गया आचार्यत्वादिलक्षणया वा समुपयास्यन्ति ते इत्वरा । प्रज्ञा०६८1 स्वल्पकालभाविनी । अभिमानादिद्वारेण गौरवम् , ऋद्धिप्रात्यभिमानाप्राप्तप्रार्थना. अनु० १३ । प्रस्तुतकल्पपरिसमाप्तौ ये भूय. स्थविरकल्पं द्वारेणात्मनोऽशुभभावो भावगौरवम् । ठाणा० १७३ । प्रतिपद्यन्ते ते। बृ० प्र० २२७ आ । इणं-अयम् , अनन्तरोक्तत्वेन प्रत्यक्ष । भग० ३४ । इत्तरिए अल्पकालीनं । भग० ९२१ । नि० चू० प्र० इणमो-इदं, वक्ष्यमाणतया प्रत्यक्षामन्नम् । प्रश्न० २। नम । २३९ अ। पउ० ६-६३ । इत्तरियं-इत्वरम्-स्वल्पकालभावीनि आव० ८३८ । उत्तर- इणामेव-एवमेव। प्रना० ६००। गुणप्रत्याख्यानम् । आव०८०४ । अल्पकालिकं देवमिकादि प्रतिक्रमणमेव । आव० ५६३ । इण्हि-इदानीम् । आव० २७३ । इतः-स्थित. । २६९ । इत्तरियं दिसं-टत्वर दिगम्-आचार्यलक्षणाम् । ध्य० द्वि० इतर - सामान्य माधुभ्यो विशिष्टतरः । आचा० २४३ । २०० अ। । (१६२) [रत्तरिय अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः इन्द्रियदुष्प्रणिहितकायिकी ] ३१॥ इत्तरिय - इत्वरं, भरतैरावतेषु प्रथमपश्चिमतीर्थकरतीर्थ- | इथिवेय-स्त्रीवेद , स्त्रिया पुंस्यभिलाप.। जीवा० १८ । प्वनारोपितमहाव्रतस्य शैक्षकस्य विज्ञेयम् । प्रज्ञा० ६३ । इत्थिसंसग्गी-अक्खाइगउल्लावादि । दश० चू० १२७ । अयनशीलम्-स्वल्पकालभावी । उक्त० ३३५। इत्वरा.- इत्थिसंसत्तो-त्रीससक्त -स्त्रीसम्बन्ध.। प्रश्न० १३८ । प्रस्तुतकल्पपरिसमाप्तौ ये भूय. स्थविरकल्पं प्रतिपद्यन्ते इथिसागारिए-त्रीजन । नि० चू० तृ. १० अ। ते । वृ० प्र० २२७ आ । इथिसागारियं । नि० चू० द्वि० ३४ अ। इत्तरियतवो - इत्वरतप स्वल्पकालं अनशनरूपं तपः । इत्थी-झी, पुरुषोत्तमवासुदेवनिदानकारणम् । आव० १६३ । उत्त० ६००। इत्थीउ-स्त्रिय , अष्टम परीपह । आव० ६५६ । स्तरियपरिग्गहियागमणे-तत्रेत्वरकालपरिगृहीता काल- इत्थीणपुंसिया - इत्थिवेदो वि से नपुंसकवेदमपि वेदेति । शब्दलोपादित इत्वरपरिगृहीतागमनम् , भाटीप्रदानेन किय. नि० चू० द्वि० २५ आ। न्तमपि कालं दिवसमासादिक स्ववशीकृताया गमनं-मैथुना- इत्थीनामगोत्तं-स्त्रीनामगोत्रम् । आव० १२०॥ सेवनम् । आव० ८२५ । इत्थीपण्हाइ-स्त्री उपलक्षणमेतत् पुरुपो वा प्रस्तौति प्रस्यदते इत्तिरिउग्गहो- रुक्खातिहेट्ठठिताण वीसमणट्ठा इत्तरिओ मिथुनकर्म समारभते इत्यर्थ । व्य० द्वि० १९५ आ । उग्गहो भवति । नि० चू० प्र० २३९ आ । इत्थीपरिणा-स्त्रीपरीजाभ्ययनम् , सूत्रकृताझे प्रथमश्रुतस्क- इत्तिरियं-इत्वर, स्वल्पकालिकं देवसिकरात्रिकादि। ठाणा. न्धे चतुर्थमध्ययनम् । सम० ३८० । नि० चू० प्र० ३५४ आ । इत्थंथं - इत्थ तिष्ठतीति इत्थंस्थं । प्रज्ञा० १०९ । मारका- इत्थीपसुविजिअं-स्त्रीपशुविवर्जितमित्येकग्रहणे तज्जातीय- दिव्यपदेशबीज वर्णसस्थानादि तत् । दश० २५८ । ग्रहणात् स्त्रीपशुपण्डकविवर्जित स्याद्यालोकनादिरहितम् । इत्थतं-अनेन प्रकारेणेत्थं तद्नाव इत्थत्वं, मनुष्यादित्वम् । दश० २३७ । इत्थीरूवं- अणाभरणा इत्यीरुवं भण्णनि। नि० चू० प्र० इत्थत्थं-इत्यर्थम् , एनमर्थम्-अनेकशस्तिर्यनरनाकिनारकग. इत्थीविग्गह-स्त्रीविग्रह , स्त्रीशरीरम् । दश० २३७ । तिगमनलक्षणम् । भग० १११ । इत्थीविपरियासो-स्त्रिया विपर्यास स्त्रीविपर्यास -अब्रह्मा- इथिकहा-स्त्रीकथा-स्त्रीणां स्त्रीषु वा कथा, विकथायाश्चतुर्थ- सेवनम् । आव० ५७५ । मेद । ठाणा० २०९ । दश० ११४ । इत्थिपोसए-स्त्रीय पोषयतीति स्त्रीपोषकः, अनुष्ठानविशेष । इत्थीवेदे-स्त्रीवेट , त्रियं यथावस्थितस्वभावतस्तत्सवन्धवि. पाकतश्च वेदयति-जापयतीति, वैगिकादिक स्त्रीस्वभावाविभा. सूत्र० १११। इत्थिरयणे- नीरत्नम् , चक्रवत्ते. पञ्चमं पञ्चेन्द्रियरत्नम् । वक शास्त्रमिति । सूत्र. ११२ । ठाणा० ३९८। इदुर-सम्बादिटचनकादि तदिदूरम् । अनु० १५१ । इथिलिंग - स्त्रीलिङ्गम् , स्त्रीत्वस्योपलक्षणमित्यर्थ । प्रज्ञा० इद्धं-चित्त । नि० चू० प्र० ३६ अ। इन्द्रकूपः-उंडतम कूपविशेष । आव० ८२७ । इथिवऊ - स्त्रीवाक् , स्त्रीलिङ्गप्रतिपादिका भाषा । प्रज्ञा० इन्द्रजालम्-कुकम् । दश० २५४ । इन्द्रनीलः - रत्नविशेष । जीवा० ०३1 आव० १८१, इत्थिवेए - त्रीवेद , स्त्रिया पुमास प्रत्यभिलाष । प्रना० २५९। प्रजा० ९११ ४६८। इन्द्रियगोचरा-विषया. । आव० ५८४ । इथिवेदो- अतो भणुममय डाहो अगुवमतो वि घहिन इन्द्रियदुष्प्रणिहितकायिका-आयेन्द्रिय -श्रोतादिभिदुष्प्र- माण दिप्पंतो फुफुअग्गिममाणो इत्यिवेटो । नि० चू० द्वि० णिहितम्य इष्टानिष्प्रविपय प्राप्ती भनावमप्ननिर्वदद्वारेणापवर्ग- ३१ अ॥ मार्ग पनि व्यवस्थितस्य दिया । आव० ११ । भग० १११। ७७ अ । २०॥ २४९। (१३) + -- [ इन्द्रियार्थावग्रहः आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः इलादेवी] । । इन्द्रियार्थावग्रहः-स्पर्शनादीन्द्रियाणा ये स्पर्शाटयो अर्था इरिया-ईरणमीर्या-गतिपरिणाम । उत्त० ५१४ । वर्तनी।. तेपा अवग्रह -सामान्यमानानं । नंदी १७४ । उप० मा० गा० ३६० । ई-आचारप्रकल्पस्य द्वादशो इन्धनं-गोमयो भण्यते। ओघ० १२९ । भेद । आव० ६६० । ईर्या-गमनम् । भग० ३२३ । ईर- इच्भ-इभमर्हतीति इभ्य । बृ० प्र० १९९ अ। यद्रव्य णमीर्या-गमनमित्यर्थ । आचा० ३७४ । ईर्या-आचारप्रक- निचयान्तरितो हस्त्यपि न दृश्यते । इभो-हस्ती तत्प्रमाण ल्पस्य द्वितियश्रुतस्कन्धस्य तृतीयमध्ययनम् । प्रश्न० १४६ । द्रव्यमहतीति निस्तादिभ्य । ज० प्र० १२२ । हस्तिप्रमा ईर्या-गमनं, ईर्याकार्य कर्म । आव० २६५ । ईर्या-गमनम्। 'णद्रविणराशिपति । औप० २७ । अर्थवान् । ठाणा० ४६३ । भग० १०६ । यद्रव्यनिचयान्तरितो महेभो न दृश्यते । औप० ५८ । इरियाइ-ईर्यादि, सयमविपया विराधना । ओघ० ८० । इभमहन्तीतीभ्या. - यद्रव्यस्तूपान्तरित उच्छ्रितकदलिका- | इरियामि-ईरे-गच्छामि गोचरचर्यादिष्विति । उत्त० ४४५ । दण्डो हस्ती न दृश्यते ते। ठाणा० ३५८। महाधना । इरियावह - ईर्या-गमनं, तत्प्रधान पन्था ईपिय ।। भग० ४६३ । धनवान् । प्रज्ञा० ३३०। इभो-हस्ती आव० ५७६ । तत्प्रमाणं द्रव्यमर्हतीतीभ्य । यत्सत्कपुजीकृतहिरण्यरत्नादि- इरियावहकिरिया - ईर्यापथक्रिया, या उपशान्तमोहादा- द्रव्येणान्तरितो हस्त्यपि न दृश्यते सोऽविकतरद्रव्यो वा रभ्य सयोगिकेवलिनं यावदिति । सूत्र. ३०४ । इभ्य इत्यर्थ । जीवा० २८० । अनु० २३ । यावतो इरियावहियं-ऐर्यापथिकी, ईर्या-गमनं तद्विषय पन्था- द्रव्यस्योत्करेणान्तरितो हस्ती न दृश्यते तावद् द्रव्यपतय । मार्गस्तत्र भवा, केवलकाययोगप्रत्यय कर्मवन्ध इत्यर्थ । प्रश्न० ९६ । भग० १०६ । ईरणमीर्या-गतिस्तस्या पन्था यदाश्रिता इन्भजाति - मातिपक्खविसुद्धा इब्भजाइ । नि० चू० प्र० सा भवति तस्मिन् भवमभ्यात्मादित्वाढकि ऐर्यापथिक, २९० । विशिष्टा जातय । ठाणा० ३५८ । पथिस्थरि टच्चैर्यापथिकम् । उत्त० ५९५ । इमंपि-इदमपि, इतिपूर्वकोऽपिशब्द । आचा० ६५ । इरियावहिया - ईर्यापयक्रिया, क्रियायास्त्रयोदशो भेद । इमेसु-इमेषु । आचा० ३२६ । ६४८ । ईर्यापथिकी - विंशतिक्रियामध्ये विंशति- इय-इत ,आपत्वात अस्य । प्रज्ञा ०.११२ । आगत । (मर०)। ६१२ । ऐर्यापथिकी-गमनप्रधानः पन्थाः इयहि-इत इदानीम् । ठाणा० १४३ । ईर्यापथस्तत्र भवा। आव० ५७३ । ईर्यापथिवी-चक्मण- इयपट्टा-इतिप्रष्टा -प्रधाना , वाग्मिन. । उपा० ४६ । किया। बृ० तृ. २७ अ । इयरं-इतर, रजोहरणनिषद्या औपग्रहिक कार्यामिक औणिक इरियासमिइ - ईर्यासमिति - निरवद्यप्रवृतिरूपा । प्रश्न वा चीर, सार्यो वा। ओघ० २३ । इतरशब्देन रजोहर १४३ । ईर्यासमिति -आवश्यकायैव सयमार्थ सर्वतो युग- णनिषद्योच्यते । ओघ० २३ । मात्रनिरीक्षणायुक्तस्य शनैन्यस्तपदा गति । तत्त्वा० ९-५। इयरेयर-इतरेतर , इतरेतरसयोग । उत्त० २३ । इरियासमिए-ईरण-गमनमीर्या तस्या समितो-दत्तावधान इरिआवहं-ईरणमीर्या, पयि ईर्या ईर्यापथं-गमनागमनम् । पुरतो युगमात्रभूभागन्यस्त दृष्टिगामीत्यर्थ । आचा० ४२८ । इला-हिमवते चतुर्थकूट । ठाणा. ७१। धरणेन्द्रस्य महि- इरिआवहिए - ऐर्यापथिक , केवलयोगप्रत्यय कर्मबन्ध , पीनाम। भग० ५०४ । क्रियास्थाने त्रयोदश क्रियास्थानम् । सम० २५। इलाइपुत्त-ससवेग । (मर०)। इरितासमिती-जीवसरक्खणजुगमेत्ततरदिहिस्स अप्पमादिणो इलादेवया - इलादेवता, इलावर्द्धननगरदेवता। आव० सजमोवकरणुप्पायणणिमित्त जा गमणकिरिया सा। नि० चु० प्र० १६ आ। इलादेवी-पश्चिमरुचकवास्तव्या दिछुमारी । आव० १२२ । इरिमंदिर-लक्ष्मीमन्दिरम् , लक्ष्म्यालयं, प्रभूतलक्ष्मीकम् । पुष्पचूलाया पश्चममध्ययनम् । निर० ३७ । पाश्चात्यरुचक- दग० ५८॥ वास्तव्या प्रथमादिश्वमारीमहत्तरिका। ज. प्र० ३९१। आव० तमा। आव० । ओघ० ३७ । (१६४) Mum - 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[ इलादेवीकूडे अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः इहलोगसंवेगणी] १७२। प्रश्न. ६९ । प्रज्ञा० ९८ । इलादेवीकूडे - इलादेवीकूर, क्षुल्लहिमवत्कूट. । ज० प्र० । इसिया-मुजागर्भभूता शलाका। सूत्र० २७९ । २९६ । इलादेवीदिक्कुमारीकूटम् । ज० प्र० ३८१ । इसिवज्झा-ऋपिवध्या-ऋषिहत्या। उत्त० ४४० । इलापुत्तो - इलापुत्र , इलावर्द्धननगरसार्थवाहीपुत्र । आव० इसिवाइंदा-वाणमन्तरविशेष । ठाणा० ८५ । ३५९ । तीर्थकराचार्यव्यतिरिक्तेभ्य श्रुत्वा प्रतिवुद्धः । सूत्र इसिवाइय-ऋषिवादिक , वाणमन्तरविशेष । प्रज्ञा० ९५। व्यन्तरनिकायानामुपरिवत्तिनो वाणव्यन्तरजातिविशेपा । इलावद्धणं-इलावद्धन, नगरविशेष । आव० ३५९ । इलि आगई-इलिकागति , गत्यंतरगतिविशेष । विशे० २४४ । इसिवालए-वाणव्यंतरऋषिपालेन्द्र । ठाणा० ८५ । भग० ८४। ठाणा० ८९ । आव० ३६३ । इसिवाले - ऋपिपाल , उत्तरपिवादिकव्यन्तराणामिन्द्र । इलिएण। नि० चू० प्र० १६ अ। इलिका- धान्य कीट । भग० ८४ । धान्यजन्तुविशेष । इसिवालो- तोसलिवामिना क्रीत उज्जयिनीकुत्रिकापणा- आव०३६३। धिप. सुर । वृ० द्वि० २६७ आ। पंचमवासुदेवपूर्वभवनाम । इलू-धान्यविशेष । नि० चु० तृ० १४९ अ। सम० १५३ । इष्टकापाका यनेष्टका पच्यन्ते तत् । जीवा० १२४ । इसिवुवी-ऋषिवृद्धि , ब्रह्मदत्तस्याप्टाग्रमहिपीणा मध्ये सप्तमी इसत्थं-प्राकृतशल्या इपुशास्त्र-नागवाणादिदिव्यास्त्रादिसूचक राज्ञीनाम । उत्त० ३७९ । शास्त्रम् । ज० प्र० १३८ । इसी-ऋषिः, विशिष्टतपश्चरणोपेतो महर्पि । सूत्र० २९८ । इसत्थे। नि० चू० प्र० २६७आ। दक्षिणऋषिवादिकव्यन्तराणामिन्द्र । प्रज्ञा० ९८ । पश्यतीति इसि-ऋषय -गणधरव्यतिरिक्ता शेषा जिनशिष्या । मुनय अतिशयज्ञानी। औप० ७८ । सुविहित । ओघ० २२२ । यतयो वा। सम० १५९ । त्रिकालदगनिन । राज. ४६ । इसिगणिया - ऋपिगणितदेशवास्तव्या देवानन्दादासी । इसु-इपु, शर । दग० १८ । इपु -ज्याविष्कभयोवर्गविशेष- मूल विष्कंभाच्छोभ्यं शेपार्धम् । तत्त्वा० ३-११ । भग० ४६० । इसिञ्चेव-वाणवतरपणपन्निदा । ठाणा० ८५ । इसुसत्थं-इपुशास्त्रम् , वाणकला। आव० ३९२ । इसिज्झयं-पिवज-मुनिचिह्न रजोइरणादि । उत्त० ४७८ । इस्सरियं-ऐश्वयं-प्रभुत्व, द्रव्यादिसमृद्धिर्वा । उत्त० ४७४ । इसितडाग - ऋषित गक, तोमलिनगरे सर । वृ० द्वि. इस्सरे-भूतेन्द्रविशेष । ठाणा० ८५ । इस्सा - ईर्ष्या । आव० ४१०। परगुणासहनम् । उत्त. २५७ अ । इसितलागं | वृ० द्वि० १३६ अ । इसिदासे-ऋषिदास , अनुत्तरोपपातिकदशाना तृतीयवर्गस्य इहत्थे-दहार्य ईहास्थो वा । ठाणा० २४८ । तृतीयमभ्ययनम् । अनुत्त० २। इहरा-इतरथा, अन्यया। पिण्ड. १८१। अन्यथा । आव० इसिदिण्णं-ऋपिदिकम् , ऐरवते पंचमजिननाम । सम० २६०। १५३ । इहलोगइया-मणुस्सा । नि० ० द्वि० ७१ आ। इसिपम्भारा-सिद्धगिलानाम । सम० २२ । इहलोकभते - इहलोकभयं-मनुप्यादिकस्य सजातीयादन्य- इसिभद्द-आलभिकाया श्रमणोपासकविशेप । भग० ५५० । स्मान्मनुण्याडेरेव सकाशाद्यद्यम् । ठाणा० ३८९ । यत्य- इसिभासिआ-ऋपिमापिता । आव० ६१ । जातीयाद् भयम् । मम० १३ । इहलोके भय स्वभावाद् यत् इसिभासिय । वृ० ३५ अ । प्राप्यते । आव० ४७२ । स्वजातीयात् मनुष्याटेर्मनुप्यादि- इसिभासियाई-अपिभाषितानि, उत्तराध्ययनादीनि । विशे० कस्पंव भयम् । प्रश्न. १४३ । ९११ । आव ० ३८९ । ऋषिभापितं-उत्तराभ्ययनादि । सूत्रः इहलोगसंवेगणी-सवेगनीकथाया प्रथममेट , दह्लोक मनुष्यजन्म, तत्स्वरूपश्यनन सवेगनी । टाणा० १० । (२६५) - [ इहलोगासंसप्पओगे आचार्यश्रीभानन्दसागरसूरिसङ्कलितः ईसा] wa 1 - इहलोगासंसप्पभोगे -- इहलोकाससाप्रयोगः, इहलोक.- | ईश्वरकारणिकः-क्रियावादिद्वितीयविकल्प । सम० ११०। मनुष्यलोकस्तस्मिन्नागसा-अभिलापप्रयोग । आव० ८३९ । ईश्वर कारणिनः-क्रिणवादिद्वितीयविकल्प । ठाणा० २६८॥ इहलोगो-इहलोकः, मनुष्यलोक । आव० ८४० । ईश्वरपुत्रः-इभ्याना पुत्र ईश्वरपुत्र । नंदी २५८ । इहलोयभयं - इहलोकभयं-मनुष्यादिसजातीयादन्यस्मान्म- | ईश्वरवादिनः। आव० ८१६ । नुष्यादेरेव भयम् । आव० ६४५। ईषन्कुटिला-कुण्डलीभूता। जं० प्र० ११३ । इहलोयसंवेयणी-इहलोकसवेज़नी, सवेजनीकथायास्तृतीयो ईषा गात्रविशेष । जं० प्र० ५५ । राज० ९३ । मेद । दश० ११२ । ईसक्खो-ईशाख्य , ईशनमैश्वर्यमात्मन' ख्याति अन्तर्भूत इहेहे-वि'साभिधानं सम्भ्रमख्यापनार्थ, यदि वा इहेति लोके ण्यर्थतया ख्यापयति-प्रथयति य स । जीवा० २१७ ॥ इहेत्यस्मिन् मृत्यौ। उत्त० ४०९ । ईसत्थ-इघुशास्त्रम् , यनुर्वेद । आव० १२९ । प्रश्न० ९७। धणुवेदादि-धनुर्वेदादि । नि० चू० तृ. २० आ। ईइ-ईति , गडरिकादिरूपा । जीवा० १८८॥ जं० प्र० २९। ईसत्थसत्थरहचरियाकुसलो इष्वस्त्रशस्त्ररथचर्याकु ईति- दुरितविशेष । भग० ८। धान्याद्युपद्रवकारिशल- शल । उत्त० २१४ । भमूपकादिः। ज० प्र० ६६ । ईसर - ईश्वर , भोगिकादि अणिमाद्यष्टविधैश्वर्ययुक्तो वा। ईती-ईति -धान्याद्युपद्रवकारी प्रचुरमूषकादिप्राणिगण । सम० ज. प्र. १२२ । लवणे उत्तरपातालकलश. ठाणा० ४८०, ६२। २२६। प्रभुरमात्यादि । अन्त. १६ । स्फातिमान्। ईप्सितप्रतीप्सित-व्यवहारविशेष । विशे० ६२४ । जीवा० ० ३६५। युवराजादिः भोगिको वा। प्रश्न. ९६ । ईरियट्ठा-ईविशुद्धयर्थम् । ठाणा० ३६० । भोगिकादि , अणिमाद्यष्टविधैश्वर्ययुक्तो वा । जीवा० २८० । ईरिया-गमन ! ठाणा० ३४३ । ईरणमीर्या-गतिपरिणाम.। वृ० तृ० २५५ आ। युवराज , अणिमाद्यैश्वर्ययुक्त । औप० ५८ । प्रज्ञा० ३३०, ३२७ । महेश्वरः । प्रश्न ईरियावहिया-ऐपिथिकीक्रिया, योगमात्रज कर्मवन्धः । ३३ । प्रधान , प्रभु , स्वामी । आव. ५०२ । भूतवादि- आव० ६१२। ईर्या-गमनं तत्प्रधान पन्था-मार्ग ईर्या- कव्यन्तरेन्द्र । प्रज्ञा० ९८ । 'ईम ईश्वर्ये' ऐश्वर्येण युक्त पथस्तत्र भवमैर्यापथिक्- केवलयोगप्रत्ययं कर्म । भग० ईश्वर , सो य गामभोतियादि। नि० चू० प्र० २७० भ । ३८५ । आव० ६४८, ६४९ । गृहस्वामी। आचा० ४०३, ३७० । द्रव्यपति । उत्त० ईरियावहियाकिरिया- ईर्यापथिकक्रिया-यदुपशान्तमोहा- ३५३ । युवराजो माण्डलिकोऽमात्यो चा, अणिमाद्यष्टविध- देरेकविधकर्मवन्धनमिति। ठाणा. ३१६ । श्वर्ययुक्त ईश्वर । ठाणा० ४६३ । युवराज सामान्यमण्डलि कोऽमात्यश्च । अनु० २३ । युवराज । भग. ईरियासमिइ-ईर्यासमिति , ईर्याया समिति , ईर्याविषये एकीभावेन चेष्टनम् । आव० ६१५। रथगकटयानवाह्ना. युवराजादा । भग० ४६३ । औप० १४ । युवराजा । कान्तेषु मार्गेपु सूर्यरदिमप्रतापितेपु प्रासुकविविक्तेपु पथिषु युगेमात्रदृष्टिना भूत्वा गमनागमनं कर्त्तव्यम् । आव० ६१५। ईसरस्स-पातालकलश । सम० ८७ । ईर्याप्रत्ययं-ईरणमीर्या-गमन तेन जनितम् । सूत्र. १२ ।। ईसरा-ईश्वरा , युवराजा , अणिमाद्यैश्वर्ययुक्ता । ज० प्र० ईर्याप्रथप्राप्ताः-योगसयमप्राप्ता । तत्त्वा० ९-४८ । ईर्याविशुद्धि-ईर्या-गमनं तस्या विशुद्धियुगमात्रनिहितदृष्टि- ईसरिए-ऐश्वर्य , मदस्य पष्ट स्थानम् । आव० ६४६ । त्वम् । ठाणा० ३६०। ईसरी-ईश्वरी, मोपारके श्राविकाविशेष । आव० ३०४ । ईलिकागतिः-गतिविशेषः । प्रना० १५१ । दी. १५३ । ईसा - ईशा, पिशाचकुमारेन्द्रस्याभ्यन्तरिका पर्पत् । जीवा. ईली-करेंवालविशेष । प्रश्न । ४८ । १७१ । ईश्वरी-लोकपालाग्रमहिंपीणा आद्या पर्पद। ठाणा० उत्त० ७२४॥ १८। . राज. १२१। १९०। (१६६) [ ईसाण अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः ईहा ] । 1 १२७ । ईर्ष्या-प्रनिपक्षाभ्युदयोपलम्भजनितो मत्सरविशेष । त्वादीपत्प्रागभारा। ठाणा० ४४० । सम० २२ । मिद्धशिला आव०६११॥ आव० ६०० । ईसाण-ईशान -ईशानावतंसकाभिधविमानोपलक्षित द्विती- ईसी ओढावलंविणी-ईपढोष्ठावलम्विनी, ईषद् ओष्टमः यकल्प । अनु० ९२ । लम्बते-तत परमतिप्रकृष्टास्वादगुणरसोपेतत्वात् झर्टीि ईसाणवडिसए-ईशानावतसक , ईशानकल्पमध्येऽवतंसक । परत प्रयाति । जीवा० ३५१। जीवा० ३९१। ईसी तंवच्छिकरणी-ईपत्ताम्राक्षिकरणी, किंचिन्नेत्ररक्तत ईसाणवडेसए-ईशानकल्पेन्द्रविमानं । भग० २०३ । करणी। जीवा० ३५१ । ईसाणा-ईशानदेवलोकनिवासिन ईशाना , द्वितीयो देवलोक । ईसीप-भारगए-ईषत्प्राग्भारगत । आव० ६४८ । प्रज्ञा० ६९ । पूर्वोत्तरदिक्कोणनाम । ठाणा० १३३ । ईसाणी-पूर्वोत्तरदिक्कोणनाम। भग० ४९ । ऐशानी ईशा- ईसीप-भारा-ईपत्प्राग्भारा, सिद्धभृमि । आव० ४४२ नकोण, पूर्वोत्तरमभ्यवर्तिदिक् । आव. २१५ । अष्टमभूमि , अन्त्याभूमि । आव० ६०० । पञ्चचत्वारिंट द्योजनलक्षायामविष्कम्भप्रमाणा शुद्धस्फटिकसकाशा सिद्ध ईसाणे-द्वितीयकल्पेन्द्र. । ठाणा० ८५। अहोरात्रस्यैकादश- मुहूर्तनाम । सूर्य० १४६। एकादशमुहूर्तनाम । ज० प्र० शिला । प्रज्ञा० २२८ । ईपद्-अत्पो रत्नप्रभाद्यपेक्षया प्रारभार ४९१ । देवलोकविशेप 1 आव० ११५ । उच्छ्यादिलक्षणो यस्या सा। ठाणा०, २५१ । मिद्धगिला प्रज्ञा ईसिं-उषत् , मनाक् । जीवा० १८१ । १०७ । ईषत्-अल्पो योजनाष्टकवाहत्यपञ्चचत्व ईसिं ओटुवलंविणी-ईषदोप्टावलम्बिनी, ईषत्-मनाक् तत. रिंशल्लक्षविष्कम्भात् प्राग्भार पुद्गलनिचयो यस्या सा ठाणा० १२५ । परम्परमास्वादतया झटित्येवाग्रतो गच्छति ओप्टेऽवलम्बते- लगतीत्येवशीला । प्रजा० ३६४ । ईसेणिआ-ईसिनिका । जं० प्र० १९१ । ईसिं ओणयकाओ-ईपदवनतकाय । आव० २१६ । ईहइ-ईहते-पर्यालोचयति । आव० २६ । इसिं तवच्छिकरणी-ईपत्ताम्राक्षिकरणी,ईषत्-मनाक् ताने । ईहते-पूर्वापराविरोधेन पर्यालोचयति । नंदी २५० । अक्षिणी कियेते अनयेति। प्रज्ञा० ३६४ । ईहा - अन्वयधर्मघटनप्रवृत्तश्चापायाभिमुख एव बोध ईसिंपन्भारगओ - ईषत्प्राग्भारगत ईपदवनतकाय । विशे० १७० । सदर्थविशेषालोचन । भग० ३४४ । मन आव० २१६। भिमुखा ज्ञानचेष्टा । भग० ६३३ । 'हिचेष्टायाम्' ईहनमीह ईसिं वोच्छेदकडुई - ईषद्व्युच्छेदकटुका, ईपत्-मनाक् सतामन्वयिना व्यतिरेकिणा चाऽर्थानां पर्यालोचना । विगे पानव्यच्छेदे मति तत ऊर्व कटुका एलादिद्रव्यसम्पर्कत २२६ । वितर्क । सम० ११५ । अवग्रहादुत्तरकालमय उपलक्ष्यमाणतिक्तवीर्यति । प्रजा० ३६४ । जीवा ३५१ । यात्पूर्व सद्भतार्थविगेपोपादानाभिमुखोऽसद्भतार्थविगेपपरित्य ईसि-ईपत् , मनाक । प्रज्ञा ० ९१ । आव० ८५७ । ईपत्प्रा गाभिमुख -प्रायोऽत्र मधुरत्वादय. गहादि व्दधर्मा दृश्यन ग्भारानाम । प्रना० १०७ । मिशिलानाम। रत्नप्रभाद्यपेक्षया न खरकर्कगन्ष्टिरताढय गादिशब्दधर्मा इत्येवम्पो मन हस्वत्वाद ईयत् । ठाणा० ४४० । सम० २२ । विशेप । नंदी १६८ । ईहनमीहा-मदर्थपर्यायलोचनम् ईसिगि-परस्सछली-त्वक् । नि० चू० तृ० ६३ आ। नदी १८६ । ईहनमीहा-मतामर्थानामन्वयिना व्यति ईसिपंचहस्सक्खरुच्चारणद्धा-अयोगिकालमान ! उत्त. काणा च पर्यालोचना । आव० १८। तदवहीतार्थ ५७७ । ईपदिति-स्वल्प प्रयत्नापेक्षया पचाना हस्वाक्षराणा विगंयालोचनम् । आव० ९ । उनीहा-मद्भतार्थपर्यालोच अइ उलइत्येवस्त्पाणामुञ्चरणमुच्चारो भगनं तस्याद्धा-कालो नरुपा चेष्टा । प्रज्ञा० ३१०१ नंदी १६८। विमिदमित्थम यावता न उच्चार्यन्त । उत्त० ५९६ । तान्यथेत्येत्र सदालोचनाभिमुवा मति चंथा। और इसिपभाग-उपत्प्राम्भारा, ईपगाराकान्तपुरपवन्नता अन्ते. ९९। सदर्थपर्यालोचनात्मिका । दा. १२६ । अवगृह पिति । अनु. ९२ । सिद्धगिलानाम, प्राम्भारम्य हस्च तायकीमा छेपानुगमनं । निधाविगेपजिनासा । तत्वा । - - (१६७) [ ईहामिग आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उउवद्धपीढफलगं] ४८७। . - १ - १५। अवग्रहार्यगतासद्भूतसद्भूतविशेषालोचनम् । उंबर-उदुम्बर., बहुबिज कवृक्षविशेष । प्रज्ञा० ३२ । भग० राज० १३०। ८०३। चतुर्थभवनवासिदेवस्य वृक्ष । ठाणा. ईहामिग-ईहामृग.-वृक । भग० ४७८ । जं० प्र० ४३ । उम्बर । व्य. द्वि० ३६२ अ । गिहेलुको । नि० चू० द्वि० जीवा० १९९ । नाट्यविधिविशेष । जीवा० २४६ । जं. ८३ आ। प्र० ४१५। आटव्य पशु । आचा० ४२३ । उंबरदत्त-उदुम्बरदप्त , दु खविपाके सप्तममध्ययनम् । विपा. ईहामिय-ईहामृगा -वृका । राज० २८ । ७८ । पाटलखण्डनगरे सागरदत्तसार्थवाहसुत । विपा० ७४ | जनविशेष । विपा० ७४ । उंछ-उञ्छ-भक्तं । ओघ० १५४ । अन्यान्यवेश्मत स्व- उबरमंथु-चूर्णविशेष । आचा० ३४८ । ल्प स्वल्पमामीलनात् । उत्त० ६६७। जुगुप्सनीय, गद्यम्। उंवरवञ्च-उंवरस्स फला जत्थ गिरिउडे उच्चविज्जति तं सूत्र० १०८। भैक्ष्यम् । सूत्र० ७४ । अल्पाल्पम् । प्रश्न उंबरवच्च भण्णति । नि० चू० प्र० १९२ -आ । १११ । छादनाद्युत्तरगुणदोषरहित. । आचा० ३६८ । अज्ञात- उंवरिय-वृक्षविशेष । भग० ८०३ । पिण्डोञ्छसूचकत्वादिति साधोरुपमानम् । दश० १८ । उंबरो-उदुम्बरदत्त, सार्थवाहसुत , दु खविपाकाना सप्त- एषणीय. । आचा० ३७६ । उञ्छ्यते-अल्पाल्पतया गृह्यत ममध्ययनम् । विपा० ३५ । इति, भक्तपानादि । ठाणा० २१३ । उ-उपयोगकरणे । आव० ४४९ । उंछवित्ती-उञ्छवृत्ती-कणयाचनवृत्ति । आव० ७०५ । उअत्तं-उत्तीर्णम् । नि० चू० प्र० ३४५ आ । व्य० द्वि० ३५९ अ। उअरदंते-उदरदान्त -येन वा तेन वा वृत्तिशील । दश० उंछविही-कणयाचनवृत्ति । आव० ७०५ । २३३ । उंजणं-अवमं(स)तुअण । दश० चू० ६९ । उआहणित्ता-उपाहत्य, समीपमानीय । दश० ५९ । उंजण-उञ्जनम् । उत्सेचनम् । दश० २२८, १५४ । उइंति-उद्यन्ति, उदयं यान्ति । उत्त० ४८६ । उजायणा-वासिष्टगोत्रस्य नामविशेष । ठाणा० ३९० । उइओदए-उदितोदय , सिद्धौ कायोत्सर्गफलमिति द्रष्टान्ते उजेजा-उत्सिञ्चेत् । दश० १५४ । राजा। आव० ८०० । उंडअ-उण्डक , पिण्डक । ओघ० २९ । उइजति-उदीर्यन्ते, उद्रेकाऽवस्था नीयन्ते । आव० ५६८ । उंडगं-उन्दकम् , स्थण्डिलम् । दश० १५६ । उइण्णा-अवतीर्णा। उत्त० उडत्तं-उद्वेध । ठाणा० ५२५ । उइन्न-उदीर्ण -विपाकापन्न । आचा० १५१ । उंडया-ग्रन्थय. । नि० चू० प्र० २४५ आ। उईरयं-उदीरक-प्रवर्तकम् ।। प्रश्न० ८६ । उंडिं-मुद्राम् । व्य० द्वि० १६७ आ । उईरयइ-उदीरयति-अन्यान् चातान् जलमपि चोत्-प्रावल्येन उंडिका-मुद्रा। वृ० प्र० ३३ अ। प्रेरयति । जीवा० ३०७। उंडुअं-उन्दुकम्-स्थानम् । दश० १७० । बृ० प्र० २०२ भ। उउ-उत । नि० चू० प्र० ३४८ अ । ऋतु । भग० ५४३ । उंडेरगा। नि० चू० द्वि० १२५ आ। ऋतु-रक्तरूप, शास्त्रप्रमिझो वा। रक्तप्रवृत्तिलक्षग । ठाणा० उंडेरय-वटकाः । आव. ६८० । उंदर-उन्दुर.। प्रश्न० ८ । उउवद्ध-अनुबद्ध उच्यते शीतकाल उष्णकालश्च । ओघ० उंदु-उन्दु-मुखम् । अनु० २९ । ११८ । ऋनुवर्द्ध । आव० १८९ । गीतोष्णकालयो । ओघ० उंदुर - उन्दुर -मृपक । ओघ० १२६ । आव० ६४१। २०५। शीतोष्णकालो मिलितौ चैव भण्यते । ओघ. उत्त० १०९ । नि० चू० द्वि० २२ अ । १३१।। उंदुरुकं-मुखेन वृपभादिशब्दकरणम् । अनु० २९ । उउवद्धपीढफलगं- य पक्षस्याभ्यन्तरे पीठफलकादीना उंदोइयाए-अडोलिया, यवनृपतिदहिता। वृ० प्र० १९१ अ । वन्धनानि मुक्या प्रत्युपेक्षणा न करोति यो वा नित्या- । (१६८) [ उउवद्धोग्गहो अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उक्कलियावाए ] १७०। ज० प्र० ४८७ । वस्तृतसस्तारक गोऽबद्धपीठफलक तम् । व्य० प्र० १६४ । उक्कडुम - उत्कटुकानि, यथाम्यानमनिविष्टानि । ज० प्र० जो य पक्सस्स पीढफलिगादियाण वधे मोत्तु पडिलेहणं ण करेति सो सजओ उउवद्धपीढफलगो अधवा णिच्चणिय- उकडुआसणिए-उत्कुटुकासन-पीठादौ पुतालगनेनोपवेशन- सथारगा णिच्चुत्थरियसथारगो य उडवद्धपीढफलगो भण्णति । रूपमभिग्रहतो यस्यास्ति स । टाणा० २९८ । नि० चू० वि० ९१ म। उक्कडग-अपकर्षक , यो गेहाद्ग्रहणं निष्काशयति, चौरान उउवद्धोग्गहो-ऋतुबद्धावग्रह । नि० चू० प्र० २३९ अ । वा आकार्य परगृहाणि मोषयति, चौरपृष्टवहो वा । प्रश्न उउपरियइ-ऋतुपरिवर्त - ऋत्वन्तरम् । आचा० ३२७ । उउय-ऋतुज -कालोचित । प्रश्न. १६२ । उक्कड्डियं-उत्कर्षितम्-उत्पाटितम् । पिण्ड० ११६ । उउसंधी-ऋतुसन्धि -ऋतो पर्यवसानम् । आचा० ३२७ । उक्कत्थणं-उत्कथनं-त्वचोऽपनयनम् । प्रश्न० २४ । उऊ-ऋतु, मामद्वयमान । भग० २११। ऋतु । आचा. उक्कम-उत्क्रम , पश्चानुपूर्वीभवनम् । विशे० १६ । उत्क्रम । ३२७॥ विशे० १७४। उऊसंवच्छरे-ऋतवो-लोकपसिद्धा वसन्तादय तदव्यव- | उक्कमणअणाभोगकिरिया-उत्क्रमणानाभोगक्रिया, लच- हारहेतु सवत्सर ऋतुसवत्सर , तृतीयप्रमाणसवत्सर । नालवनधावनासमीक्ष्यगमनागमनादिक्रिया। आव०६४ उक्करं - उत्कर-क्षेत्रगवादि प्रति अविद्यमानराजदेयद्रव्यम् । उप-शिल्पे चतुर्थभेद । अनु० १४९ । विपा० ६३ । उकट्टणं-गाडतरम् । नि. चू० प्र० ११५ अ। उकरियामेदे-उत्कटिकामेढ -द्रव्यस्य पचममेद । प्रजा उकंचण - ऊ कंचनमुत्कचन-हीगगुणस्य गुणोत्कर्षप्रति २६७ । पादनम् । उत्कोचा। राज. ११५ । उक्करिसियखग्गो-आकृष्टखड्ग । आव० ५५४ । उकंचणदीव-ऊ वंदण्डव्रत । भग० ५४८ । उक्कलंविजिउं-उल्लम्वयितुम् । आव० २२० । उकंचणया-उत्कचनता-मुग्धवञ्चनप्रवृत्तस्य समीपवर्तिविद- उक्कलं बेह - अबलम्बयति । आव० ४२६ । उदयनाति। ग्धचित्तरक्षार्थ क्षणमव्यापारतयाऽवस्थानम् । औप० ८१ । नि० चू० हि० ५० आ । मुग्धव वनप्रवृत्तस्य ममीपवतिविदग्धचित्तरक्षगार्थ क्षणमव्याः । उक्कलं बेति- उबंधेति । नि० चू० प्र० ११८ अ । पारतया अवस्थानम् । राज. २९ । उकल-उत्कल -ऊर्च वर्मकलाया यत्तत् । प्रश्न० २७। उत्कल उकंतो-उत्क्रान्त , आयु क्षयेग मृत । उत्त०४६० । उत्कृत प्रदेशविशेष , नमित्तिकविशेष । आचा० ३५९ । नैमित्तिक । त्वगपनयनेन छिन । उत्त. ४६०। आचा० ३५९ । त्रीन्द्रियजीवभेद । उत्त० ६९५ । रकविओ-वंगादिवम्याभिरववद्ध । आचा० ३६१ । उकलति-उत्कलति - उच्छलति । उत्त० १२४ । उक-उल्का । व्यः द्वि० २४१ अ । गगनाग्नि । दश० १५४ । उकला-उत्कया, उत्कला वा। ठाणा० ३४३ । उक्कडयकरणं-मिव्वण, तुण्णण । नि० चू० प्र० १२४ अ। उक्कलिया-उत्कलिका-लघुतर समुदाय । औप० ५७ । उकच्छिय-आयिकाणा त्रयोदशमेटोपची एकादशी। ओघ० भग० ४६३ । त्रीन्द्रियजन्तुविशेष । जीवा० ३ ० । उत्साह । सूर्य० २९६ । लघुतर समुदाय । भग० ११५। उक्कच्छिया-कन्छाए ममीव उवकच्छ, न छादयंतीति । नि० उक्कलियाअई-वक्खोलियाअडग। दश० १२१ । चू० प्र. १८० अ । उक्कलियावाउ - उन्कलिकावात , वादरवायुकायगेट । उक्कन्जिय-डडायत । नि० चू० तृ. ७९ अ। उकडं-उत्कटं-उपेतम् । ज० प्र० २५५ । दुष्कृतम् । आव० उक्कलियावाए-उत्कलिकाभि प्रचुरतराभि मम्मिश्रितो यो ७८२ प्रचुर । आव० ७७८ । वात उमलिकावान । प्रना ३० । जीवा० २.। . - आचा. ७४ ।

[उक्कलियावाया आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उक्कि] अ । उत्की. आचा० २४४। । उक्कलियावाया-उत्कलिकावात , उत्कलिकाभियों वाति | उक्कालिए-उत्कालिकं-कालवेलावर्ज पठ्यते तदूर्व कालि- म । भग० १९६। ये स्थित्वा स्थित्वा पुनर्वान्ति । उत्त० कादित्युत्कालिक-दशकालिकादि । ठाणा० ५२। कालवेला. वर्ज पठ्यते तत् । नंदी २०४ । उक्कस-उत्कर्ष -औन्नत्यम् । दश० १८९ । उक्कावाते-उल्का-आकाशजा तस्या. पात उल्कापाप्त । उक्कसप-उदगंतेण प्रेरण । नि० चू, तृ. ६३ आ। ठाणा० ४७६ । व्योमसम्मूच्छितज्वलनपतनरूप. प्रसिद्ध उक्कसाई-उत्कपायी-प्रवलकपायी। उत्त० ४२० । एव । अनु० १२१ । उक्कसाहिजा । आचा० ३७८ । उक्कासे-उत्कर्षण, उत्काशनं वा। भग० ५७२ । उक्कसिस्लामि-लघु सदपरशकललगनत उत्कर्षयिष्यामि। उक्किट्टणा-सूत्रार्थकथनम् । बृ० तृ. २५ तना-सशब्दना । आव० ५६ । उक्कसे-उत्कर्षेत्-उकामयेत् । आचा० २९३ । उक्किट्ठ-उत्कृष्टं - उत्कृष्टिनाद , आनन्दमहाध्वनि. । प्रश्न उक्कस्स-उत्कर्पन्तीत्युत्कर्षा -उत्कर्षवन्त , उत्कृष्ट सङ्ख्या, ४९ । प्रधाना वर्षणनिषेधाद्वा । भग० ५४४। उत्कृष्टि :- परमानन्ता । ठाणा० ३५ । आनन्दध्वनि । ज० प्र० २०० । उत्कृष्टि.-आनन्दमहाध्वनि । उक्का-उल्का-चुडुली। जीवा० २९ । ये मूलामितो वित्रुट्य भग० ११५ । उत्कृष्ट -उत्कर्षवती। भग० १६७ । उत्कृ वित्रुट्याग्निकणा प्रसर्पन्ति ते। जीवा० १२४ । महदेखा टम्-कालिगालावुत्रपुषफलादीना शस्त्रकृतानि श्ला खण्डानि प्रकाशकारिणी, रेखारहितो विस्फुलिङ्ग प्रभाकरो वा । आव० चिञ्चिणिकाटिपत्रसमुदायो वा उदूखलकण्डित.। दश० १७० । ७५२ । दीपिका । नंदी ८४ । चुली। आव० ५६६ । निप दोद्धियकालिंगादीणि उक्खले छुभति । दश. चू० १७९ । तन् रेसायुक्तो ज्योतिपिण्ड । ओघ० २०५। स्वदेहवर्णा उक्किट्ठकलयलो-उत्कृष्टकलकल । आव० १७३ । रेखा कुर्वन्ती या पतति सा रेखाविरहिता वा उद्द्योत कुर्वन्ती | उक्किट्टरस-उत्कृष्टरस -प्रचुररसोपेत । पिण्ड० १४९ । पतति मा। आव० ७३५ । गगनाग्निज्वाला। ज० प्र० उक्किटि-उत्कृष्टि -आनन्दमहाध्वनिः । औप० ५९ । राज० ५२ । चुली । प्रज्ञा० २९ । पगासविरहितो य, महंतरेहा पहा । नि० चू० तृ० ७५ आ। सदेहवण्ण रेहं करती जा | उफ्किटिसीहनादो-उत्कृष्टिमिहनाट । आव० ३४५ । पडा सा उक्का, रेहविरहिता वा उज्जो करेंती पडती मा उक्किहीं-उत्कृष्टि । आव० ४१३ । उन्कर्षवशः । सूर्य वि उहा। नि० चू० तृ० ७० अ । अग्निपिण्डा । ठाणा० ४२० । आकाशजा । ठाणा० ४७६ । उक्किण्णं-उत्कीर्ण-भुषमुत्कीर्य पालीरूपम् । सम० १३७ । उपकापडणं-उल्कापातनम् , उल्कापात । आव० ७३५।। उक्किण्णंतरा-उत्कीर्णान्तरा , उत्कीर्णमन्तरं यासा खात- उयकापाए - उल्कापात -व्योग्नि समूच्छितज्वलननिपतन. परिखाना ता । जीवा० १५९ । रूपः । जीवा० २८३ । उक्किण्ण-उत्कीर्ण -गुण्डित । प्रश्न० ५९ । उत्कीर्गमिवो- उक्कापाय - उल्कापात , सरेख मोद्योतो वा तारकस्येव त्कीर्ण, अतीवव्यक्तम् । जं० प्र० ७६ । आकीर्ण । प्रश्न २५ । प्रजा० ५६१। ओघ० ५४ । उक्कामयंति-उत्क्रामयन्ति-अपनयति । दश० ८६ । उक्कित्तण-उत्कीर्तनम् , सामान्येन सशब्दनम् । आव० उक्कामुहदीवे-अन्तरद्वीपनाम। ठाणा० २०६। ६०४। सशब्दनम् । विशे० ४४२ । उक्कामुहा-उल्कामुखनामकविंशतितमोऽन्तरद्वीप । प्रजा. उक्कित्तणा-उत्कीर्तना, प्रावल्येन-परया भक्त्वा सन्दना । ५० । अन्तरद्वीपविशेष । जीवा० १४४ । उकारिपमेय-उत्कारिकामेद , एरण्डबीजानामिव यो भेद । उक्कित्तिया-उत्कीर्तिना-कथिता । मर्य० २९६ । उक्किन्न-अतीवव्यक्तम् । प्रज्ञा ० ८५ । १२२ । २८१ । पात । भग. १९६। - आव० ४९२ । भग २२४ । (१७०) [ उक्किनंतर अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उकोसतिसामासा ] । उक्किनंतर-उत्कीर्णमन्तर यासां खातपरिखाणा ता उत्की- | उक्कुडुयासणिए - कायक्लेशमेद. । भग० ९२१ । काय- र्णानन्तरा । प्रज्ञा० ८५ । क्लेशद्वितीयमेद.। ठाणा० ३२७ । उक्किन्न-उत्कीर्ण-शिलादिषु नामकादि। दश० ८६ । उक्कुद्दइ-उत्कूदते-ऊचं गच्छति। उत्त० ५५१ । उक्किरणगाई-फलखाद्यककपर्दकादिविकिरणानि। बृ० द्वि० उक्कुरुडिका-तृणभस्मगोमयागारादिमीलक ।उत्त? ३५९ । १५५ अ। उपकुरुडिया-उत्कुरुटक । आव० १९४ । उक्किरिजमाण-क्षुरिकादिभि. कोष्टादिपुटाना कोष्टादिद्र- उक्कूइय-उत्कूजित-कृताव्यक्तमहाध्वनि । प्रश्न० २० । व्याणां वा उत्तीर्यमाण । जीवा० १९२ । उत्कीर्यमाण- उस्कृजिय - उत्कूजित - अव्यक्तमहाध्वनिकरणम् । प्रश्न क्षुरिकादिभि कोष्टादिपुटाना कोष्ठादिद्रव्याणा वा उल्लिख्यमान । ज० प्र० ३६ । उक्कूलं-उत्कूलयति-सन्मार्गादपध्वंसयति कुलाद्वा-न्याय. उक्किलंतो-उत्कलन् । आव० २०७ । सरित्प्रवाहतटादूर्ध्व यत्तत् उत्कूलम् । द्वितीयाधर्मद्वारस्य उक्कीरमाण-उत्किरन्-वेधनकेन मध्याद्विकिरन् । अनु० पञ्चदश नाम । प्रश्न० २६ । २२३ । उक्केरो-उत्केर.-समूहः । ओघ० ११७, ११६, २१३ । उक्कुंचणं-उत्कुम्चनं, अचं शूलाद्यारोपणार्थ कुञ्चनम् । सूत्र० स्थित्यादिवर्धनरुप उत्कोच -उद्वर्तना । विशे० १००६ । उक्कोचा-उत्कोचा-उत्कोटा, लचा। औप० २। उपकुन्जिय-ऊर्बकायमुन्नम्य । आचा० ३४४ । उक्कोड-लचा । नि० चू० द्वि० ४५ अ । उक्कुटुं। आचा० ३४२ । उक्कोडा-उत्कोटा-उत्कोचा-लचा । विपा० ३९ । उत्कोचा, उक्कुट्ठहत्थो - उच्चट्ठ-सचित्तवणस्सतिपत्तकुरुफलाणि वा लचा । औप० २। उक्खले छुन्भनि, तेहिं हत्थो लित्तो एम । नि० चू० प्र० उक्कोडालंच-उत्कोटालंचयो -द्रव्यस्य बहुत्वेतरादिभिर्लोके प्रतीतमेदयो । प्रश्न० ५६ । उक्कुट्ठि-उत्कृष्टि -हर्षविशेषप्रेरित । आव० २३१ । उक्कोडिय- रत्कोटा-लना तया चरन्ति उत्कोटिकाः । उक्कुटिकलयको-उत्कृष्टिकलकल । आव० १५५ । उक्कुट्टिसीहणायं-उत्कृष्टि सिंहनाद., हर्षविशेषप्रेरितों स्व- निविशेष. । आव० २३१ । उक्कोस-उत्कृष्टत -अतिगयेन । ओघ० २२७ । उत्कर्षतीति उक्कुट्ठी-पुकारकरण । नि० चू, तृ. ६१ आ । उत्कर्ष , उत्कृष्ट । सूर्य० १३। जात्यादिभिर्मदस्थानलघुप्र- उक्कुट्टो-सचित्तवणस्मतिपत्तंकुरुफलाणि वा उक्खले छुन्भंति। कृतिं पुरुषमुत्कर्षयतीति उकर्षक -मानः । सूत्र नि० चू० प्र० ३८ अ। उत्कोश -कुरर । प्रश्न० ८। उत्कृष्टम्-कमनीयम् । दश० उक्कुड-उत्कुटुकासन । आव० ६४८ । ठाणा. २९९ । उक्कुडुअ-उत्कुटुकम् , यथास्थानमनिविष्टम् । भग० ३०८1। उक्कोसए-उत्कर्ष एव उत्कर्षका उत्कृष्ट । सूर्य० ११.। ओघ० १०७ । मुक्तासन । उत्त० ५५। आधारे पुता. उत्कर्षिका उत्कृष्टा । सूर्य० १४ । लगनरूपम् । भग १२५ । आचा. ४२४ । उक्कोसए कुंमे-उत्कृष्टक कुम्भ -आटकातनिष्पन्न । अनु० उक्कुडुगासण-उत्कुटुकासनम् , कायक्रेशमेद । दश००८ । उक्कुडुती - उत्कुटुका-आमनालग्नपुत पादाभ्यामवस्थित उक्कोसकसिणं-मतमहस्समूल्ल । नि० चू० प्र० १३९ आ। उत्कुटुस्तस्य या सा। ठाणा० ३०२ । उकोसगमयपत्तो-उत्कर्पण मद प्राप्त. उत्कर्गमदप्राप्त । उक्कुडयभाणवत्ये-उत्कुटुकः सन् भाजनवनाणि-गोच्छ- जीवा० ३५० । कादीनि प्रत्युपेक्षयेत् ,यतो वस्त्रप्रत्युपेक्षणा उत्कुटुकेनैव कर्तव्या। उक्कोसतिसामासा-जेहो आमाटो य। नि० चू० प्र० ओघ० ११७ । ३८अ। राज० २। । ६९। २११ । १५१ । १२३ आ । (१७१) - [उक्कोसतिसामासे आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उग्ग] व्य. प्र० उक्कोसतिसामासे-उत्कृष्टतृण्माम -उत्कृष्टा तृड्मामयो - | उक्खित्तपुव्वा - उत्क्षिप्तपूर्वा -तेषामादौ दर्शिता यथा- ज्येष्ठापाढयोर्यस्मिन् काले म । ओघ० २१० । ऽस्या वसत यूयमिति । आचा० ३६९ । उक्कोससंथरणं-उत्कृष्ट सस्तरणं-भिक्षार्थमवतीर्णास्तत उक्खित्तय-उत्क्षिातं-प्रथमत समारभ्यमाणम् । जीवा पर्याप्त हिंडित्वा यावत् तृतीयपौरुप्या आठौ स्वाध्याय २४७ प्रस्थापनवेला तावत् मन्निवर्तते एतद् , अथवा तृतीयपौ- | उक्खित्तविवेगो-उत्क्षिप्तविवेक । आव० ८५४ । रुष्या आदी स्वाध्यायप्रस्थापनवेलावान सनिवर्तते एतद् । उक्खित्ता-उत्क्षिता -सिक्ता. । जं० प्र० २२१ । व्य० द्वि० १६३ आ । उक्खित्तायं-उक्षिप्तक-प्रथमत समारभ्यमाणम् । जीवा० उक्कोसा - उत्कर्ष.-प्रकर्ष तद्योगादुत्कर्षा उत्कर्पतीति वा १९४ । उत्कर्पा-उत्कृष्टा । ठाणा० १३९ । उक्खित्तो-उत्क्षिप्त -कृत स्थापितः। आव० ४३३ । उक्कोसेणं । अनु० १६३ । उक्खिविया-उत्क्षिप्ता। आव० ३७० । उक्वं-उक्ष-सम्बन्धो-विषयविपयीभावलक्षण । नदी ७१। उक्खु-वनस्पतिविशेष । भग० ८०० । सम्वन्धन-अन्यजनकभावलक्षणम् । ठाणा० ५० । उक्खुलनियत्था - उखुलनिवसिना, विपर्यस्तवस्त्रा । वृ० उखदं-उत्क्रन्दम् । आव० १७५ । अवस्कन्द । आव० द्वि, २५५ अ। ३०० । उक्खेव-उत्क्षेप -हस्तोत्पाटनम् । व्य० प्र० २३२ आ। उक्खंधो-अवस्कन्द , छलेन परवलमर्दनम् । प्रश्न० ३८ । उक्खेवओ-उत्क्षेप -प्रारम्भवाक्यम् । निरय० २३ । उक्खपिर-उत्कण्ठित । (म०)। उक्खेवग-उत्क्षेपक -वशदलादिमयो मुष्टिग्राह्यदण्डमध्यभाग । उक्खड्डमडा - देगीपदं, पुन पुन शब्दार्थे । भग० ४६८ । गिष्याणामुत्क्षेपक । व्य० प्र० २३२ आ । ६५ आ। । उक्खेवण-उतक्षेपक -वशदलादिमयो मुष्टिग्राह्यो दण्डमध्य- उक्खणिहिति-उत्खनी । आव० २२६ । भाग । ज्ञाता० ४८ । उक्खलं-स्थानविशेष. । नि० चू० द्वि० ८३ आ । उक्खेवो- उत्क्षेप -प्रस्तावना । विपा० ५५ । क्षेपणम् । उक्खलि-उसा-स्थाली । पिण्ड० ८४ । ओघ० ११० । उक्खिओ-सेवित । मर० । उक्खो-परिधान वस्त्रैकदेश । वृ० प्र० १७७ अ। परिधाण, उक्खित्त-उत्क्षिप्त, गेय विशेष । जं. प्र. ४१२ । उत्पा वत्थस्म अभितरचूलाए उवरि कण्णो णाभिहिज्ज उक्खा दितम् । विपा० ४७ । भाजनगतम् । ओघ० ८८ । भण्णति । नि. चू० द्वि० १५४ अ । उक्खित्तचरए उत्क्षिात-स्वप्रयोजनाय पाकभाजनादुद्धृतं उखंदचोरभएणं । नि० चू० प्र० २६० अ । तदर्थमभिग्रहविशेपाचरति-तद्गवेषणाय गच्छतीति उत्क्षि उखल-उदूखला । प्रश्न० ८ । प्तचरक । ठाणा० २९८ । उखलियं-पुटियाकार । नि० चू० द्वि० १ आ। उक्खित्तचरगा-पिण्डपगामेदविशेष । नि० चू.तृ. १२ । उखली-उदूखली । आव. ८५५ । उक्खित्तचरगो-उरिक्षातचरक -उत्क्षिप्त-पाकपिटरादुद्- उखा-स्थाली । भग० ३२६ । धृतमेव चरति-गवेषयति य म । प्रश्न० १०६॥ उखुत्तो-णिसगो। नि० चू० प्र० ७७ अ । उक्खित्तणा - ज्ञाताया प्रथममभ्ययनम् । आव० ६.३ । उगहणंतगो-योनिद्वाररक्षार्थक वस्त्रम् । ओघ० २०९ । पाटाने प्रथम बातम् । उत्त० ६१४ । उग्गं-उग्रम्-अप्रधृष्यम् । सूर्य० ४ । भग० १२ । ज्ञाता० ९ । उक्खित्तणाए-पष्टाने प्रथमनात । सम० ३६। ज्ञाताया उग्ग-उग्र -क्षत्रियपुस्पेण शगस्त्रिया जान । आचा० ८ । आदिदेवावस्थापिताऽऽरक्षकवंगजात । ११५ । प्रयममध्ययनम् । आव० ६५३ । उक्खित्तणिक्खित्तचरगा- पिण्डेयणाभेदविशेष । नि० आरक्षक । आव. १०८। आदिंढवेन य आरक्षकत्वेन ० नृ० १२ । नियुक्तस्तद्वगनश्च। औप० २६ । शुभाथ्यवसाय प्रवल । । भग (१७२) + [ उग्गेकुलं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उग्गहिआ ] उप- . आव० ८०२ । आरक्षिकाः। भाचा. ३२७ । आदिराजेनाऽऽ- | उग्गविसा - उग्रं विषं येषा ते उग्रविषा । प्रना० ४६ । रक्षक्त्वेन ये व्यवस्थापितास्तद्वंश्य । ठाणा० ३५८। भग- उर परिसर्पविशेष । जीवा. ३९ । वतो नाभेयस्य राज्यकाले ये आरक्षका आसन् । ठाणा० उग्गसेण-उग्रसेन , द्वारिकायां राजा । आव० ९४ । नृप- ११४ । आरक्षकादय । उत्त० ४१८ । आदिदेवेनारक्षकत्वे विशेष । बृ० प्र० ३० भ । मथुरानृपति , कसपिता। उत. नियुक्तास्तद्वश्या । भग० ४८१ । ४९०। राजमुख्य । अन्त० २। उग्गकुलं-उग्रकुलम् । आव० १७९ । उग्गह-योनिद्वारं तद्वस्त्रमपि । बृ. द्वि० २५१ आ । उग्गच्छ-उद्गल्य-क्रमेण तत्रोद्गमनं कृत्वा। भग० २०७ । उग्गह-अवग्रह । ओघ० १५२ । धर्मलाभदानम् । दश० उग्गतवा-उग्रतपा.-अप्रधृष्यानशनादिवान् । सूर्य० ४ । १६७ । अव-ईषत् सामान्य गृह्णातीति। विशे० १६० । अष्टमादि। ठाणा. २३३ । उग्रं-उत्कटं दारुण वा कर्मश आश्रय । विपा० ३३ । जोणिदुवारस्स मामइकी संना त्रून् प्रति तप -अनशनादि । उत्त० ३६५ । उग्गह इति । नि० चू० प्र० १७९ आ। उग्गतवित्ती उम्गते आदिच्चे वित्ती जस्स सो, आदिच्च ग्रहम्-अवष्टम्भम् । ओघ० १५४ । पतद्ग्रहम् । ओघ० मुत्तीए जस्स वित्ती सो उम्गतवित्ती। नि० चू० प्र० ३०८ आ। १७५ । प्रथमपरिच्छेदनं अशेषविशेषनिरपेक्षानिर्देश्यम्पा- उग्गतेय-उग्रतेजा -तीव्रप्रभाव , तीव्रविष । प्रश्न० १०७ । देरवग्रहणम् । ठाणा० ५१ । अवगृह्यते-स्वामिना स्वीफियते उग्गपुत्तो-उग्रपुत्र., क्षत्रियविशेषजातीय । सूत्र० २३६ । यः सोऽवग्रह । भग० ७०० । सामान्यार्थस्य-अशेषविशे- उग्गम-उद्गम -षोडशविध आधाकर्मादिदोष । प्रश्न० १५५ । षनिरपेक्षस्यानिर्देश्यस्य रूपादे अव इति प्रथमतो ग्रहणं- आधाकर्मादिदोषविशेष' । आव० ५७६ । उद्गमनमुद्गम परिच्छेदनमवग्रह. । भग० ३४४ । अवप्रह-अध्यक्तरूप पिण्डादे प्रभव.। ठाणा० १५९ । परिच्छेद । प्रजा० ३११ । अवधारणम् । सुन्दरा एत इत्य- उग्गमर-आगच्छति। आव० ४२२ । वधारणम् । उत्त० १४५। अवग्रह -परिग्रहः । सूत्र उग्गमकोडी- उद्गमकोटि - उद्गमदोषरूपा । पिण्ड० १७९ । अविवक्षिताशेषस्य सामान्यरूपस्यानिर्देश्यस्य रूपा- १९७॥ देरवग्रहणमवग्रह । राज० १३० । पडिग्गहो। नि० चू० उग्गमितं-उद्गमितम् । आव० ८५९ । द्वि० ११६ अ । अवग्रह -आभवनव्यवहार । व्यद्वि. उग्गमोवघाते-'उद्गमोपघात -उद्गमदोषैराधाकर्मादिभिः ९३ अ। अवग्रहणमवग्रह -अनिर्देश्यसामान्यमात्ररुपार्थ- षोडशप्रकारभक्तपानोपकरणालयानामशुद्धता। ठाणा०३२० । प्रहणम् । नंदी १६८ । आवास । निरय० २। अवग्रहण- उग्गय-उद्गत -निष्कागित । औप० ६८। ऊर्च गत्ता सम्बध्यमानस्य शब्दादिरूपस्यार्थस्याव्यक्तरूप परिन्छेद । उद्गता -व्यवस्थिता । नाता० १४ । व्यूता। ज्ञाता० नंदी १६८। २३। उद्गता-सस्थिता। ज० प्र० ७१ । निविदा । उग्गहजायणे - अवग्रहयाचा-वसतिस्वाम्यनुजा । आव. भग० ४७८ । उपरिवर्तिनी । जं० प्र० २९२ । ६५८ ॥ उग्गयमुत्ती- सूर्योद्गमात् पर प्रतिश्रयावग्रहाद् वहि उग्गहणंतयं-योनिद्वाररक्षार्थक वस्त्रम् । वृ० द्वि० २५१ आ। प्रचारवच्छरीरत्वात् । बृ० तृ. १७९ अ। मूर्ति -गरीर, उग्गहणमेधावी-अवग्रहमेधावी, स्त्रार्थग्रहणपटुप्रनावान् । तं जस्स प्रतिश्रयावग्रहात् उदिते आइच्चे वृत्तिनिमित्त प्रचार वृ० प्र. १२५ आ। करोति सो। नि. चू० प्र० ३०८ आ । उग्गहपडिमा - अवगृयत इत्यवग्रहो-वमतिस्तत्प्रतिमा उग्गयवित्ती - उग्गय इति वा उदओति, वननं बत्ति - अभिप्रहा अवग्रहप्रतिमा । ठाणा० ३८७ । आचारागम्य उग्गयए सूरिए जस्म वित्ती मो। नि० चू. प्र. १०९ आi पोटशमध्ययनम् । उत्त० ६१७। आचा० ४०२ । सम. उग्गवई-उप्रवती, रात्रितिधिनाम । जं० प्र० ४९१ । ४४। आचारप्रकल्पे द्वितीयश्रुतस्कन्धस्य सप्तममध्ययनम् । उग्गवती-उग्रवती, रात्रिनिथिनाम । सूर्य १४८ । प्रश्न. १४५ । आचारप्रकल्पस्य षोडगो मेट ।आव० ६६० । उग्गविसं-दुर्जरविषम् । भग० ६७२ । उग्गहिआ-अवगृहीता-पञ्चमी पिण्टेपणा । आव ० ५७२ । । (१७३) [ उग्गहिए आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उच1 । उग्गहिण-अवगृहीत-परिवेपणार्धमुत्पाटित । ठाणा० ४६५ । | उग्गोवणा-उद्गोपनम्-विवक्षितस्य पदार्थस्य जनप्रकाश- उग्गहियं - अवगृहीतम्। आव. २८८ 1 बद्ध । भग० चिकीर्षा । पिण्ड० २९ । ४५९ । अवगृह्णाति-आदत्ते हस्तेन दायस्तद । ठाणा० उग्गोवेति-उम्पाएति । नि० चू० प्र० २३४ अ । १४८ । अवगृहीता-भोजनकाले शरावादिषूपहृतमेव भोज- उग्घडयं-अनुवर्तनम् , अनुकरणम् । आव०. ५१५ । नजातं यत्ततो गृह्णत. । ठाणा० ३८६ । यद् अवगृह्णाति उग्घाइए-उद्धाइए-उद्घातित, विनाशितं विनाशयिष्यमाण- यच सहरति यच्च आस्यक प्रक्षिपति। व्य० द्वि० ३५४ अ। त्वेनोपचारात् । ठाणा० ५०२। परिवेषणार्थमुत्पाटितम् । औप० ३७ । अवग्रहोऽस्यास्तीति उग्धाहम-उद्घातिमम्-उद्घातो-भागपातस्तेन निवृत्तम् , अवग्रहिक-वसतिपीठफल कादिक। औपग्रहिक-दण्डकादिक लघु । ठाणा० १६३ । मुपधिजातम् । औप० ३७ ॥ उग्घाड-उद्घाट-अदत्तार्गलमीपत्स्थगितं वा । आव० ५७५ । उग्गहियए-अवगृहीतक -बद्ध । राज. ४४ । उग्घाडकवाडउग्घाडणा-उद्घाटकपाटोद्घाटमा, उद्- उग्गहिया-ज परिवेमगेण परिवेपणाए परस्म कडुच्छुतादिणा घाटम्-अदत्तार्गलमीषत्स्थगितं वा कपाट तस्योद्घाटन-सुतरा उग्गहियं आणियति वुत्त भवति, तेग य तं पडिसिद्ध तं प्रेरणम् तदेव । श्वानवत्सदारकसघट्टना। आव० ५७५ । तहुक्खि त चेत्र साधुस्स देति एमा उवग्गहिया। नि० उग्घाडणकवाड-उद्घाटकपाट-अनर्गलितकपाट । ओघ० १६६ । चू० तृ० १२ अ। उग्घाडाए पोरिसिए-उद्घाटपौरुष्याम् । आव० ८३८ । उग्गा-आरक्षिकाः । वृ० द्वि० १५१ आ। कुलार्यप्रथमभेद । उग्घाडितो-उद्घाटित । आव० ३१७, ३१८ । प्रना० ५६ । खाद्यविशेषः । जं० प्र० ११८ । आदिदेवा- 'उग्घाडिया-उद्घाटिता । आव २९२ । वस्थापिता । राज० १२१ । प्रभुणा आरक्षकत्वेन नियु- उग्घात उद्घात -भागपात । ठाणा० १६३, ३२५ । क्तास्ते उग्रा । ज० प्र० १४५। लघूकरणलक्षण । ठाणा० ३११। उग्गाढो-प्रगुण । वृ० प्र० २९७ अ । उग्घातिते-उद्घात -भागपातो यत्रास्ति तदुद्घातिक, लधि- उग्गारो-उद्गिरण उग्गालो । नि० चू० प्र० ३१५ अ । त्यर्थ । ठाणा० ३२५ । उग्गालिदासो-दामविशेष । नि० चू० द्वि० ४० अ । उग्गाले-उद्गालयेत्-लश्मनिष्ठीवनं कुर्यात् । ओघ० १८६ । उग्घाय :- आचाराङ्गस्य पइविंगतितममध्ययनम् । उप्त. ६१७ । भाचारप्रकल्पस्य पड्विंशतितमो भेद । आव० उग्गालो-उगिरणं उग्गालो। नि० चू० प्र० ३१५ अ। उग्गाहिऊणं-उग्राह्य । आव० ३९९ । उग्घायाइ-लघूनि । १० प्र० १४५ अ। उग्गाहिएणं-उग्राहितेन-पात्रवन्धवद्धन पात्रकेण । ओघ० उग्घोसणाहाणीया-उदघोपणास्थानीया । आव० ३८५। उग्रतेजाः-आधाकर्मग एव अभोज्यताया पदाति । पिण्ड० उग्गाहितं-उग्राहितम्-गृहीतम् । आव० ६१८ । उत्क्षिप्तं. उपकरणम् । ओघ० ७२ । उग्रसेनः-भोगराजा, राजीमत्या पिता । दरा० ९७ । उग्गाहिम-अवगाहिम, पक्वान्नं खण्डखाद्यादि । प्रश्न० १६३ । | उग्रसेनतनयः-नभ सेनकुमार । विशे० ६१० । उग्गाहिय-उग्राहितं-गृहीत पात्रकम् । ओघ० १४९ । उघरिसा। नि० चू० प्र० १०५ आ । उग्गाहे-उग्राहयति-सङ्घट्टितेनास्ते । ओघ. १८४ । उघोसेहि । नि० चू० प्र० ३४४ आ। उग्गाहे-उद्ग्राह्य-सयन्त्रयित्वा। ओघ० ७४ । उचितः-जित , अभ्यस्तो वा। आव० ५९.४ । उग्गाहेऊण-उद्ग्राह्य । उत्त० १०० । उचूलयालगं-अध शिरम उपरि पादस्य कृपजले वोल. उग्गिरिऊणं-उदगीर्य । आव. २०८ । णाकर्पगम् । विपा. ७२। उग्गुंडिया-उद्भूलितम् । भग० ३०८ । उच्च-उच्च - पूज्य । भग० १६४ । - . १२२ । ७१ । (१७४) । उच्चंतप- अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उच्चूलं ] - २१९ अ । । उच्चतए-उच्चन्तक -दन्तरागः । प्रजा० ३६० । उच्चतगो- । प्र० १४८ । ठाणा० ३४३ । शरीरादुत्-प्रावल्येन च्यवते- दन्तराग । ज० प्र० ३३ । अपयाति चरतीति वा उच्चारः-विष्ठा । आचा० ४०९ । उञ्चते-उच्चतगो-दन्तराग । राज. ३२ । पुरीषपरिष्ठापनम् । उत्त० ३५७ । गृहस्थै सह पुरीषव्यु- उच्चपिय-सघातित । (त०)। त्मगं कुर्वन्ति, श्लेष्मण परिष्ठापनमङ्गणे कुर्वन्ति वा। उञ्चछंदो-उच्चछन्द -उच्चो-महानात्मोत्कर्षणप्रवणश्छन्द' ओघ० ० ५६ । अभिप्रायो यस्य स । प्रश्न० ३१ । उच्चारभूमी - उच्चारभूमि -पुरीषभूमि । आव० ७८४ । उच्चता-उच्चतया-निटेजत्वेन । अप्रातिहारिकतया। बृ० द्वि० उच्चारप्रश्रवणविधिसप्तैकक , सप्तसप्तक्या तृतीयस्य भेद । ठाणा० ३८७। उञ्चतायभयगो-तुमे मम एच्चिर कालं कम्म कायव्वं उच्चालइय-ऊर्ध्वमुत्क्षिप्य भूमौ । आचा० ३११ । उच्चा- जं ज अहं भणामि, एत्तिय तेण धण दाहामित्ति । नि० लयितारम्-अपनेतारम् । आचा० १६९ । चू० द्वि० ४४ । उञ्चालियंमि-उच्चालिते-उत्पाटिते। ओघ० २२० । उञ्चत्तं-उच्चत्वं । ज० प्र० २० । अनु० १७१। उच्चत्वं-उच्चावइत्ता-उच्चै कृत्वा । उत्पाट्य । प्रज्ञा० ३५७ । उत्सेध । ज० प्र० ३२१ । उच्छ्रय । ठाणा० ६९ । ऊर्ध्व- उच्चावए-उच्चावच -उत्तमाधम । जीवा० ३७४ । स्थितस्यैकमपर तिर्यकस्थितस्यान्यत् गुणोन्नतिरूपम् । ठाणा० उच्चावतं-उच्चावचम्-असमन्जस। ठाणा० २४७ 1 उच्चावयं-उच्चावच-उच्च नाम मैव कुर्वन्तु, अवचं नाम उच्चत्तछाया-उच्चत्वछाया, छायाया षष्टो भेद । सूर्य० ९५। कुर्वन्तु । आचा० ३६३ । शोभनाशोभनम्। जीवा० १६६। उच्चत्तभयते - उच्चतामृतक -मूल्यकालनियम कृत्वा यो उच्चावचम् । दश. १६६ । अनुकूलंप्रतिकूलम् , असमास नियत यथावसर कर्म कार्यते स। ठाणा० २.३। वा। भग० १०१ । उञ्चत्तविसाणो - उच्चविषाण उच्चशृङ्ग । उत्त० ३०३ । उच्चावया-अनुकूलप्रतिकूला, असमजसा। अन्त. १८॥ उत्तमविषाण । आव० ७१९ । उन्चावचा -गुरुलघवो नानारूपा वा। सूत्र० २०७ ॥ उच्चत्ता-मुधिकता । पिण्ड० १००। ऊर्च चिता उच्चा, शीतातपनिवारकत्वादिगुणे शय्यान्तरो- उश्चयबंधे-उच्चय -ऊर्व चयनं-राशीकरण तद्रूपो बन्ध परिस्थितत्वेन वा उच्चा, तद्विपरीतास्त्ववचा', अनयोईन्द्वे उच्चयवन्ध । भग. ३९५ । उच्चावचा , मानाप्रकारा वा । उत्त० ११०। शोभनाशो- उधरेति। नि० चू० प्र० २०२ आ । भनमेटेन नानाप्रकारा। दश० १८४१ असमन्जसा । उच्चलिओ-उच्चलित । आव० ३८५ । आव० ३१७ । भग० ६८३ । ज्ञाता० २०० । उञ्चा-ऊदुर्च चिता, उपरिस्थितत्वेन वा। उत्त० ११० । उच्चावयाई-उच्चावचानि-विकृष्टाविकृष्टतया नानाविधानि उच्चाओ-उच्चातो-धान्त । ओघ. १७७ । नि० चू० प्र० उच्चव्रतानि वा शेषत्रतापेक्षया महाव्रतानि। उत्त० ३६३ । उचिम-उच्चित, उच्चित्ताकरण, पादस्योत्पाटनम् । ज० उच्चागोए -उच्चैर्गोत्र-यदुदयवशादुत्तमजातिकुलवलतपोरुपै. प्र० २६५। श्वर्यश्रुतमत्काराभ्युत्थानामनप्रदानाञ्जलिप्रग्रहादिसम्भवस्तत्। उञ्चिक्खित्तं-उच्चोरिक्षप्तम् । पिण्ड ० ११० । प्रजा. ४७५ । मानमत्कारार्ह । आचा० ११६ । उचिट्ठ-कासारादिभक्षणेनोच्छिष्टे । वृ० प्र० २१५ । उच्चागोत्ते -उच्चैत्र -उच्चै -लक्ष्म्यादिक्षयेऽपि पूज्यतया | उचिट्ठए-उच्छिष्टम्-भ्रष्टम् । दा० १०४ । गोत्र-कुलमस्येते। उत्त० १८८ । उचिणिउ-उच्चेतु-गृहीतुम् । आव० ८ १९ । उच्चारे - उच्चार -विष्ठा । भग० ८७ । सज्ञा । वृ० प्र० उञ्चियपउम-उच्चितपद्म । आव० १७० । ३०६ अ। सका। निचू० प्र० १४३ आ। पुरीप । आव उच्चुण्णे-अवचूर्ण्य, गुण्डयित्वा । ओघ० १४३ । ५६४,६१६, ७८१ । उत्त. ५१७ । सम० ११ । ज० | उच्चूलं-अवचूल-गकन्यस्तावोमुखकूर्चक । औप० ६३ । १८८ अ । -- - (१७५) [ उती आंचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उच्छोभवंदणयं] । - ܚܝ उञ्चती-उच्चिन्वती-अवचय कुर्वती। दश० ४१ । उच्छिन्नसामिय-उच्छिन्नस्वामिकम् , नि सत्ताकीभूतस्वामि- उच्चैःश्रवा-सुरवरेन्द्रवाहनं हय । जं० प्र० २३५ । कम्। भग० २०० । उच्चोदए-उच्चोदय , ब्रह्मदत्तस्य प्रधान प्रथम प्रासाद । उच्छिन्नसेउय-उच्छिन्नसेतुकम् त्यक्तमर्यादम् । गग० २०० । उत्त० ३८५। उच्छिन्ना-निर्नष्टसत्ताका । ठाणा, २९४ । उच्चोलपहि-उच्चुलुक , छंगभि. चुलकै । आव० ६७८ | उच्छु-इक्षु । दश० २२६ । आव० ८५४ । उच्छंग - उत्सङ्ग.-पृष्ठढेश । जं० प्र० २६५ । पृष्टदेश । उच्छुक्किमओ-जुगुप्सित । वृ० द्वि० २५५आ । औप० ७१। भग० ४८० । उच्छुखण्ड-इक्षुखण्ड । दश. ११६ । उच्छण्णं-उन्छिन्नम् , क्षीणम् । आव० ६७०, ६७१ । उच्छुगंडिय-इक्षुगण्डियं-सपर्वेक्षुशकलम् । आचा० ३५४ । उच्छदयति-बोलं करोति । ओघ० १५३ । उच्छुघर-इक्षुगृहम् । व्य० द्वि० ३१९ अ । आव० ३०१ । उच्छन्नं-अपशब्द-विरूपं छन्नं-स्वदोषाणा परगुणाना वाऽऽ नि० चू० द्वि० १०९ अ । विशे० १००० । वरणमपच्छन्नं । उत्थत्व, न्यूनत्वं वा, द्वितीयाधर्मद्वारस्य | उच्छुजंतं-इश्यन्त्रम् । आव० ८२९ । चतुर्दशं नाम । प्रश्न० २६ । उच्छुड्डो-उन्मन्न । विशे० '५१५ । उच्छन्ननाणी - उच्छन्नबानी-यावत्शक्तिप्रच्छादितज्ञानी । उच्छुद्धं-विक्षिप्तम् । ओघ० १५० । परित्यक्त । बृ० द्वि० प्रज्ञा० ४६१ । १३३ आ। रोगाघ्रातं । बृ० तृ. २३ आ । उच्छयं-उच्छ्रयं-व्याप्तम् । आव० १८४ । उच्छुभ-आधिक्येन क्षिप, प्रवेशयेत्यर्थ । प्रश्न० २० । उच्छलंत-उच्छलन्त -उद्वलन्तः। प्रश्न० ६२ । उच्छुभह- -किञ्चितिक्षपतेत्यर्थ । भग० ६८५ । उच्छ(त्थ)ल-उत्-उन्नतानि स्थलानि-धूल्युच्छ्यरूपाण्युच्छ उच्छुमेरगं-अपनीतत्वगिक्षुगण्डका। आचा० ३४८ ! (स्थ)लानि । भग० ३०७ । उच्छुहा अवष्टम्नाति, विध्यतीत्यर्थ । ज्ञाता० ६८ । उच्छलिओ-उच्छलित -निर्गत । आव० ४०२ । उच्छूढं-उज्झित सस्कारपरित्यागात् । सूर्य० ५। उज्झि. उच्छवो-उत्सव -शकोत्सवादिः । प्रश्न. १५५। इन्द्रोत्स तम् । भग० १२ । राज० ५७ । विपा० ३४ । ओपन वादिः । प्रश्न. १४०। ८४ । जं० प्र० १६ । उच्छहया-उत्सहनु-अर्थोद्यमवान् । दश० २५३ । उच्छूढ-नि मृत । सूर्य० ९२। अवक्षिप्त -अर्गलास्थाना- उच्छा-तुन्छा, रिक्ता । (गणि०) । निष्कासित । जीवा० २७२। स्वस्थानादवक्षिातो-निष्का- उच्छाइमओ-उत्सादित । आव० ३९८ । शित । ज० प्र० १११। प्रश्न. ८१ । उच्छाएइ-आच्छादयति । आव० १२४ । उच्छूढसरीरे-उच्छूढशरीर:-उज्झितमिवोज्झितं तत्सम्का- उच्छाडणं । नि० चू० प्र० १२१ अ । रत्यागात् शरीर येन स । भग० १२ । उच्छायणयाए-उच्छादनतायै, सचेतनाचेतनतद्गतवस्तू. : उच्छूढाई-लटितानि । बृ० प्र० ५७ अ । उच्छ्रनं । ओघ० २१६ । उच्छाह-उत्माह -वीर्य । सम० ११८। उच्छूनावस्था-विनष्टावस्था । जीवा० १०७ । उच्छिपक-अवच्छिम्पक -चौरविशेष । प्रश्न० ४७ । उच्छूरं-अकालम् । ओघ० १४८ । उच्छिंपणं - उत्क्षेपण-जलमध्यान्मत्स्यादीनामाकर्षणम् । उच्छूरिया-सुप्रावृत्ता। बृ. द्वि० ३५६ आ । प्रश्न० २२ । उच्छेवा-उच्छेवा नाम यत्र पतितुमारब्धं तमान्यस्येष्टकादे उच्छिण्ण । नि० चू० द्वि० १०४ अ । मस्थापनम् । व्य० द्वि० ७ अ । उच्छिन्नगोत्तागारं-टन्छिन्नगोत्रागारम् , उच्छिन्न गोत्रागार- उच्छोडेइ-उच्छोम्यति । आव० ३९९ । तत्स्वामिगोत्रगृह यस्य तन । भग २००। उच्छोभवंदणयं-उच्छामि समाममणो वंटिर जावणिजाए - 7 - च्छादनाय । भग०६८४ । 1 1 (१७६) , [ उच्छोभो अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उजाण ] - - । निसीहियाए तिविहेणं एवं उच्छोभवंदणयं । नि० चू० द्वि० ९३ अ। उच्छोभो-आलः, कलङ्क । आव० ४०१ । उच्छोलणं- एक्कसि धोवणं उच्छोलण । नि० चू० द्वि० ११८ आ। तेल्लादिणा फासुगअफासुएण देसे उच्छोलण । नि० चू० द्वि० ८९ अ। उच्छोलनं-अयतनया शीतोदकादिना, हस्तपादादिप्रक्षालनम् । सूत्र० १८१। उच्छोलणा-उच्छोलना-पुरीषमुत्सृज्य प्रभुतेन पयसा क्षा- लनम् । भोघ० ५५ । ओघ० १२० । एकसि उच्छोलणा। नि० चू० प्र० १८८ अ । उच्छोलणापहोअ- उत्सोलनया - उदकायतनया प्रकर्षण धावति-पादादिशुद्धिं करोति य स उत्सोलनाप्रधावी । दश. १६० । उच्छोलिंति-प्रक्षालयन्ति । गणि० । उच्छोलेइ-अग्रतो मुखा चपेटा ददाति । भग० १७५। उच्छोलेज-ईषद् उच्छोलनं विदध्यात् । आचा० ३६३ । सकृदुदकेन प्रक्षालनं कुर्यात् । आचा० ३४२ । उच्छोलेति-सकृदुदकेन प्रक्षालनम् । नि० चू० प्र० ११६आ। उजु-ऋजु:-मायारहित सयमवान वा। दश० २६२ । उजुगं-दृष्टिवादे सूत्रमेद । सम० १२८ । उजुमइ-ऋजुमति , ऋज्वी-प्रायो घादिसामान्यमात्रमा. हिणी मति । विशे० ३८० । उजुवालिआ-ऋजुवालिका, वीरस्य केवलोत्पत्तिस्थानम् । आव० १३९। उज-आषत्वादुद्योतयतीति उद्द्योत । उत्त० ३८ । उजमंतो-मूल त्तरगुणेमु विमुद्धो विवित्तो। नि० चू० द्वि० २५ । उजम-उद्यम -यथाशक्ति अनुष्ठानम् । आचा० १५० । अना- लस्यम् । औप० ४८। उजममाणो-उद्यच्छन्-उद्यम कुर्वन् । आव० ५३४ । उज्जयनी-नगरीविशेष । नंदी १४५ । उज्जयन्त--पर्वतविशेष । ज० प्र० १६८ । क्रीडापर्वतवि. शेय. '। भग० ३०६। रैवतकम् । उत्त० ४९२ । अनमल. वास्तव्यनगरम् । व्य. द्वि० ३५७ अ। उज्जयिनी-चप्टप्रद्योतराजधानी । प्रश्न, ९० । नगरीविशेष । आचा० २४८ । बृ० तृ०,२१८ आ । विशे० ४९६ । कुणा. लम्य पितृदत्ता नगरी। विशे० ४०९ । उज्जयिनीराजपुत्र-उज्जयिन्या. राजपुत्र । आचा०२४८।। उजरा--प्रवाहा । आव० ६२० । उजल-उज्ज्वल'-विपक्षलेशेनायकलङ्कित । भग० ४८४, २३१ । निर्मल । जीवा० २२७ । ज्ञाता. २२१ । बहि - श्वेतवर्ण । ज० प्र० ५२८ । उज्जवलम्-मुखलेगवर्जितम् । प्रश्न. १५६ । शुद्धम् । जीवा० १८८ । उजला-उज्ज्वला ।आव० १९२ । विपक्षलेशेनाप्यकलविता । प्रश्न. १७ । उत्-प्राबल्येन मलिनशरीरा अलब्धसुखास्वा. दाश्च । बृ० द्वि० ४० अ। उज्जा-ऊर्जा-बलम् । ध्य० प्र० १४४ आ । उज्जाण-जत्य लोगो उज्जाणियाए वञ्चति । जं वा इसि णग- रस्स उवकंठ ठिय तं । नि० चू० प्र० २६५ अ । पुष्पादिमद्- वृक्षसकुलादौ उत्सवादी बहुजनभोग्यम् । प्रश्न. १२७ । ऊर्वे यानमस्मिमिति उद्यानम्-उदकम् । आव० ७९७ । पुष्पा- दिमवृक्षसकुलमुत्सवादी बहुजनोपभोग्यम् । जीवा० २५८ । आव० १९७ । ऊर्च यानमुद्यानं-मार्गस्योन्नतो भाग , उदृड्क इत्यर्थ । सूत्र०८८ । पुष्पादिमवृक्षसकुलबहुजनभोग्यवन- विशेष । प्रश्न० ७३ । पुष्पादिमवृक्षसकुलमुत्मवादी बहु. जनभोग्यम् । प्रश्न. १२७ । औप० ३। झीटार्थागतन- नाना प्रयोजनाभावेनोविलम्बितयानवाहनाद्याश्रयभूतं नम्- खण्डम् । ज० प्र० ३८८। पुष्पफलोपेतादिमहावृक्षममुदाय. रूपम् । औप० ४१। जनक्रीडास्थानम्। दश० २१८ । पुष्पादिमवृक्षसकुल, उत्सवाटी बहुजनभोग्यम् । भग० २३८ । पुष्पादिमयवृक्षसकुलमुत्सवादी बहुजनोपभोग्यम् । राज० ११२ । ऊर्ध्वं विलम्वितानि प्रयोजनाभावात् यानानि यत्र तदुद्यान-नगरात्प्रत्यासन्नवर्ती यानवाहनक्रीडागृहाद्या- श्रयस्तरखण्ड । राज० २३ । चम्पकवनायुपशोभितमिति। ३१२ । औद्यानिक्या निर्गतो जनो भुक्ते । व्य. द्वि३६२ अ । वस्त्राभरणादिममल- कृतविग्रहा सन्निहिताशनाद्याहारमदनोत्सवादिषु क्रीडार्थ लोका उद्यान्ति यत्र तच्चम्पकादितस्यण्डमण्डितम् । अनु० २४। पत्रपुष्पफलच्छायोपगतवृक्षोपशोभित, विविध- वेषोन्नतमानश्र बहुजनो यत्र भोजनार्थ यातीति । ममा ११७ । पुष्पफलादिममृद्धानेकवृक्षसकुलानि उत्मवादी बहु. - ठाणा. यत्र - (१७७) [ उजाणगिहाणि आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उज्जुसुते] . १५४ । । नंदी ६० । जनपरिभोग्यानि । अनु० १५९ । पुष्पादिमवृक्षयुक्तम् । । उज्जुकडे-ऋजुकृत -ऋजु-सयमस्तत्प्रधानं ऋजु वा-माया. भग० ४८३। आराम क्रीडावन वा । उत्त० ४५१ । त्यागत कृतम्-अनुष्टानं यस्य स । उत्त० ४१४ । उजाणगिहाणि-उद्यानगृहाणि । ठाणा० ८६ । उज्जुग-ऋजुम् । आव० ३८४ । दक्षिणहस्त । ओघ० उजाणानि- उद्यानानि-पत्रपुष्पफलछायोपगादिवृक्षोपगोभि -१७५) तानि वहुजनस्य विविधवेषस्योम्नतमानस्य भोजनार्थ यानं- उज्जुजडु-ऋजवश्व प्राञ्जलनया जडाश्च तत एव दुष्प्रतिपा- गमनं येपु । ठाणा० ८६। द्यतया-ऋजुजडाः। उत्त० ५०२ । उजाणियलेणाइ-उद्यानगतजनानामुपकारिकगृहाणि नगर- उज्जुतभिन्न-यत् चिर्भटादिक विदार्य ऊर्वफालिरूपाः पेश्य प्रदेशगृहाणि वा । भग० ६१७ । कृत तद् ऋजुकभिन्नम् । वृ० प्र० १७५ अ। उजाणिया-उद्यानिका । आव० ६७९ । उज्जुते - ऋजुक -अवक्रः, उद्यतो वा-अनलसः। प्रश्न उजाणियागओ-उद्यानिकागत । आव० ४०२ । १५७ ॥ उज्जाणियागमणं-उजानिकागमनं । आव० ४५३ । उज्जुत्तो-उद्युक्त । ओघ० १६० । उजाणेत्ति-प्रतिलोमगामिनीत्यर्थ । नि० चू० प्र० ४४ आ। उज्जुदंसी - ऋजुदर्शी-ऋजुर्मोक्ष प्रति ऋजुत्वात्सयमस्तं उजालंतं-उज्ज्वालनम्-व्यजनादिभिवृद्धयापादनम् । दश० पश्यत्युपादेयतयेति ऋजुदर्शी-सयमप्रतिवद्ध । दश० ११८ । उजुपन्न-ऋजुप्रज्ञ । टाणा० २०२। उजालओ-प्रज्वालक.। नि० चू० प्र० ५० अ। उज्जुभूयं-ऋजुभूत-प्रगुणीभूतम् । उत्त० १८५। उज्जालेह-उज्ज्वालयत, दीपयत। ज० प्र० १६२ । उज्जुमर-ऋजुमति -मार्गप्रवृत्तबुद्धि । दग० १६० । उजितगिरि-उज्जयन्तगिरि , पर्वतविशेष ।आचा० ४१८। उज्जुमई - ऋज्वी-सामान्यग्राहिणी मतिरस्य म। नंदी १०९, १०८ । ऋज्वी-मामान्यतो मनोमात्रग्राहिणी मति उजिओ-बलवान । वृ० द्वि. १९५ अ । मन पर्याय ज्ञानं येषा ते । औप० २८ । उजितं-ऊर्जितम् । आव० ३०४ । उज्जुया-ऋजुका-न वक्रा। जीवा० २७१। उजीवाविया-उज्जीविता। आव० ५५९ । उज्जुवालिया-ऋजुवालिका, वीरस्य केवलोत्पत्तिम्यानम् । उज्जीवितेवाशीर्वाद । नंदी १६० । आव० २२७॥ उज्जु-मम सजमो वा । दश० चू० ५२ । ऋजो - ज्ञानदर्शन- उज्जुसंधिसंखेडयं-उज्जुसधिसखेडयाओ वा मगढमग्गं चारित्राख्यस्य मोक्षमार्गस्यानुष्ठानादकुटिलः, यथावस्थितप पर्वदेति। नि० चू० द्वि० ८६ अ । दार्थस्वरूपपरिच्छेदाद्वा, सर्वोपाधिशुद्धोऽवक । आचा० १५४ । उज्जुसुम-ऋजु-अतीताऽनागतपरिहारेण परकीयपरिहारेण ऋजु -अकुटिल । आचा० ४२ । अवक, अविपरीतस्व. वाऽकुटिल वस्तु सूत्र यतीति ऋजुसत्र । विशे० ३१ भाव: । ठाणा. १८३ । अवक्र । उत्त० ५९० । गृहाभि- ऋजुमन ऋजु वर्तमानमतीनानांगतवपरित्यागाट मुस । ओघ० १५६ । वर्तमानमतीतानागतवकपरित्यागाद् वस्त्वखिल तत्सूत्रयति-गमयतीति । ऋजुश्रुत:-ऋजु-वक्रवि. वम्वसिल, वनविपर्ययादभिमुख वा । आव० पर्ययादभिमुख श्रुत-जानमस्येति । आव० २८४ । ऋजु- अतीतानागतपरकीयपरिहरणमाखल वस्तु। अनु० १८ । अवक श्रुतमस्य सोऽयमृजुश्रुत , ऋजु-अवक्र वस्तु स्त्र- उज्जुअ-ऋजुकम्-मायारहिन । पिण्ड० १४७ । अभिमुख । यतीति ऋजुसूत्र । विशे० ९०७ । ठाणा० ३९२ । उज्जुसुते - ऋजु-वक्रविपर्ययाभिमुखं श्रुतं-ज्ञानं यम्यामी उजुआयता - ऋजुश्वासावायता चेति ऋज्वायता यया ऋजुश्रुत , ऋजु वा-वर्तमानमतीतानागतवकपरित्यागाद्वस्तु जीवाटय ऊर्ध्वलोकादेर वोलोकादौ ऋजुतया यान्ति । भग० स्त्रयति-गमयति इति ऋजूसूत्र । ठाणा० ३९० । जु- ८६६। ऋज्वी-सरला सा चामावायता च-दीर्घा ऋज्या वक्रविपर्ययादभिमुखं श्रुतं-जानं यस्य म । टाणा० ३९२ । ऋजु-अवक्रमभिमुम्ब श्रुतं--श्रुतनानं यस्येति । ठाणा० १५२ । । २८४॥ दग. १८४ । यता । ठाणा. ४०७ । (१७८) [ उज्जुसुयं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उज्झक्खणिया ] , ऋजु -अवकं श्रुतमस्येति। अनु० २६५। स्वकीयं-संप्राप्त दृष्टान्ते नगरी। आव० ६७२ । प्रथमे आलोचनायोगे नगरी। च वस्तु नान्यदित्यभ्युपगमपर , ऋजु-वा-अतीतानाग आव० ६६४ । योगसग्रहे आपत्सु दृढधर्मत्वदृष्टान्ते नग. तवकपरित्यागाद्वर्तमानं वस्तु सूत्रयति-गमयतीति ऋजुसूत्र । रीविशेष । आव० ६६७। हस्तिमित्रगाथापतिस्थानम् । ठाणा० १५२। उत्त० ८५। देवदत्तागणिकावसननगरी। उत्त० २१८ । उन्जुसुयं-ऋजुसूत्र-नयगतौ मेद । प्रज्ञा० ३२७ । ऋजु- उज्जयिनी-नगरीविशेषः । उत्त० ९९, २९४, १२७, ८७ । अतीतानागतपरिहारेण प्राञ्जल वस्तु सूत्रयति-अभ्युपगच्छ- प्रद्योतनराजधानी। उत्त० ९६ । चेटीदेवतोक्त भनमाधु- तीति ऋजुसूत्र.। अनु० १८। स्थानम् । बृ० प्र० १७१ आ। बृ० प्र० ३९ अ। नगरी- उज्जुसेढीपत्ते ऋजुश्रेणिप्राप्त'-ऋजु -अवका श्रेणि - विशेष । नि० चू० प्र० २४३ अ। नि. चू० द्वि० ५७ आकाशप्रदेशपक्तिस्ता प्राप्त. । अनुश्रेणिगत । उत्त० ५९७ । आ। बृ० प्र० १९१ अ। बृ० द्वि० २६७ अ। कालका- उज्जुहित्ता-प्रेर्य । उत्त० ५५१ । चार्यविहारभूमिः । नि० चू० प्र० ३३९ आ। वृ० प्र० ४७ अ। बृ० तृ० १४९ अ। उज्जू-ऋजु.-यति , यतिरेव परमार्थत ऋजु.। आचा० उज्जेणीनयरी-अवन्तीजनपदे नगरी। उत्त० ४९ । १५६ । उज्जेणीसावगसुतो - उज्जयनीश्रावकपुत्र -उज्जयिन्या उज्जूहिगा-गावीओ उज्जूहिताओ अडविहुत्तीओ उज्जुहि- श्रावकसुत । उत्त० २९४ । ज्जति अहवा गोसखडि उज्जृहिगा । नि० चू० द्वि० ७१ अ। उज्जोय-उद्द्योत -प्रभासमूह । जीवा० २६७ । अनुष्र्ण- उज्जेंत-रैवतक । बृ० द्वि० १०६अ । उज्जयन्त:-पर्वतवि- प्रकाश । जं० प्र० ४३३ । दीप्यमानता। जीवा० ३९९। शेष । आव. ८२७ । परदारगमने पर्वतविशेष । आव. उद्योत-चान्द्रप्रकाशम् । जं० प्र० २२९ । ८२३॥ उज्जोइंति-उद्द्योतयन्ति । भग० ३२७ । उज्जेणय-उर्जायनीक । आव० ६३६ । उज्जोएइ-उद्योतयति-भृशं प्रकाशयति । भग, ७८ । उज्जेणा-उपयोजना-सघट्टना । बृ० द्वि० १४६ अ। उज्जोपमाण-उद्योतयन् । औप० ५० । उज्जेणि-उज्जयिनी, गुरुनिग्रहविषये पुरी। आव० ८१३ । उज्जोओ-उद्योत -रत्नादिप्रकाश । उत्त० ५६१ । मर्वकामविरक्तताविषये नगरी। आव० ७१४ । अज्ञातोदा- उज्जोयगरे - उद्योतकर. - केवलालोकेन तत्पूर्वकप्रवचन- हरणे प्रद्योतराजधानी। आव० ६९९ । मालवदेशे नगरी। दीपेन वा सर्वलोकप्रकाशकरणशील । आव० ४९४ | दश० ५७। शिल्पसिद्धदृष्टान्ते पुरी। आव० ४१० । उज्जोयणामे-यदुदयाज्जन्तुशरीराण्यनुष्णप्रकाशकरूपमुंद्योतं कायदण्डोदाहरणे नगरीविशेष । आव० ५७७ । भद्रगुप्त कुर्वन्ति यथा यतिदेवोत्तरवैफियचन्द्रनक्षत्रतारविमानरत्नी- ग्धविरनिर्यामणास्थानम् । आव० ३०२ । षधयस्तदुद्योतनाम । प्रज्ञा० ४७४ । उजेणिगाओ-औजयिन्य । आव० ६४ । उज्जोवणं-गाविण पसरणं । नि० चू० प्र० १०७ अ। उज्जेणिया-उद्यानिका । आव० २१० । उज्जोवेंति-उद्योतयन्ति । सूर्य • ६३। उद्योतयन -मृग उज्जेणी-उज्जयिनी, लवालवोदाहरणे नगरी । आव० ७२१ । प्रकाशयत । ज० प्र० ४६१ । गुणविषये पुरी। आव० ८१९। विनयदृष्टान्ते पुरी। उज्जोवेमाणा-उद्योतयमान स्थूलवस्तूपदर्शनत. । ठाणा० आव०, ७०।। शिल्पकर्मविषये नगरी । आव० ४०९ । स्थिरीकरणोदाहरणे नगरी। दश० १०३ । -योगसग्रहेऽनि- उज्झंतर्ग-उज्झितक, त्याज्यम् । आव० ६६८ ।' टिनोपधानदृष्टान्ते नगरी। आव० ६६८ । जितगत्रुराज. उज्झंता-क्षपयन्त. । अनु० १३१ । धानी । उत्त० २१३, १९२। औत्पात्तिकीदृष्टान्ते नगरी । उज्झंसिओ-तिरस्कृत । आव. २०४ । आव० ४१५ । भद्रगुप्ताचार्यस्थानम् । आव० २९२ । नग- उज्यवणिया - पवनप्रेरिता उदककणिका । बृ. द्विक गविशेष । वृ० प्र० १९१ अ, १९० आ। योगसनटे शिक्षा- .. 1 ४२१ । २९ आ। (१७९) -- [ उत्खणी आचार्यश्रीभानन्दसागरसूरिसङ्कलितः उट्ठा(हा)] -- उज्यखणी-दगवातो-सीतभरो सा य उज्झखणी भण्णति। उज्झियधम्मा-चतुर्थी वस्त्रेषणा । आचा० २७७ । यत्परि- नि० चू० प्र० २३२ आ। लागार्ह भोजनजातमन्ये च द्विपदादयो नावकाङ्क्षन्ति उज्झणं-बहिर्नयन । विशे० १०२९ । तदईत्यक्त वा गृह्णत इति, सप्तमी पिण्डैषणा । ठाणा. उज्झनं-परिशाट । आव० ५७६ । ३८७ | आव० ५६८, ५७२ । उज्झमज्जी-उद्घाटनम् । आव० ६६५ । उज्झियधम्मिय-उज्झितधर्मिक-उज्झितं-परित्याग स एव उज्झयारेमि-उपकरोमि । वृ० प्र० ४६ आ। धर्म -पर्यायो यस्यास्ति तत् । अन्त०३ । उज्झितर्मिका- उज्झर-अवझर.-पर्वततटादुदकस्याध पतनम् । भग० २३८॥ सप्तमी पिण्डेषणा । आचा० ३५७। जं असणादिगं गिही प्रवाह । (तं.)। उज्झरः-प्रवाहः। नंदी ४७। गिरि उजिउकामो साहू य. उवहितो तं तस्स देति ण य तं कोई तटादुदकस्याध पतनानि। ज० प्र० ६६ । गिरिष्वम्भसा अण्णो. दुपदादि अभिलसति एसा उज्जियधम्मिया। नि० चू० प्रस्रवा । प्रज्ञा० ७२ । निर्झरः । ज्ञाता० २६॥ तृ. १२ अ । नि० चू० द्वि० १६३ आ। उज्झररवो-निर्झरशब्द । ज्ञाता० १६१ । उझियधम्मे-उज्झितमेव धर्म:-स्वभावो यस्य तद् उज्यि- उज्झा-उज्झा-उपयोगपुरस्सर ध्यानकर्तार । विशे० १२२९ । तधर्म-परित्यागाईम् । बृ० प्र० ९७आ। अयोध्या, सगरराजधानी। आव० १६१। अजितनाथ- उट्ट-उष्ट्र । प्रना० २५२ । उष्ट्र:-द्विखुरचतुष्पदविशेष । जन्मभूमि । आव० १६० । उ इत्येतदक्षर उपयोगकरणे प्रज्ञा० ४५ । जीवा० ३८ । म्लेच्छविशेषः । प्रज्ञा० ५५ । वर्तते, ज्झ इति चेदं ध्यानस्य भवति निर्देशे, ततश्च प्राकृ- उदृण-आवर्तनम्-भक्तीभवनम् । व्य० प्र० २०३ आ। तगेल्या उज्झा, उपयोगपुरस्सर ध्यानकर्तार इत्यर्थ । उवामा-उष्ट्री । आव० ४१८ । आव० ४४९ । अनन्तनाथजन्मभूमि । आव० १६० । उज्झाइओ-विरूपः । वृ० द्वि० २४१ अ। उट्टिए-उष्ट्राणामिदम् औष्ट्रिकम् । अनु० ३५। उष्ट्रिका- उज्झाइग-जुगुप्सा । वृ० द्वि० २२९ आ । बृहन्मृन्मयभाण्डम् । उपा० ४। उज्झाइतं-विरूपं । वृ० द्वि० २२९ आ । उट्टिते-उष्ट्रलोममयम् । ठाणा० ३३८ । उज्झातो-उपाध्याय । उत्त. १४९ । उट्टितो-उव्वसिओ। नि० चू० प्र० १७८ । उज्झाहि-उज्झी । आव० २१७ । उट्टियं-उट्टरोमेसु उहियं । नि० चू० प्र. १२६ अ । उन्झिआ-उज्झिता-सद्विवेकशून्या। सूत्र. ९२ । उट्टिया - उष्ट्रिका-महामृण्मयो । भाजनविशेष । औप० उज्झिणिका-पारिष्ठापनिका । बृ० तृ. १२३अ । बृ० द्वि० १०६ । मृण्मयो महाभाजनविशेष । उपा० २१। सुरा- तैलाढिभाजनविशेष । उपा० ४० । उवरिहुत्तिकरण । निक उज्झितं-छर्दितं, त्यागम् । पिण्ड० १६९ । चू० त० ५९ अ, ६१ अ । उज्झितक-विजयसार्थवाहपुत्र । ठाणा० ५०७ । दु खविपा- उट्टियासमणा - उष्ट्रिका-महामृप्मयो भाजनविशेषस्तत्र काना द्वितयमध्ययनम् । ठाणा० ५०७ । प्रविष्टा ये श्राम्यन्ति-तपस्यन्तीति उष्ट्रिकाश्रमणा । औप. उज्झित्तए - उज्झितु-सर्वस्या देशविरतेस्ल्यागेन | नाता. १०६ । १३४ । उर्ल्ड-ओष्ठ-कर्णम् । ओघ० २१ । उज्झिय-उज्झित -उज्नितधर्मा, सप्तमी पिण्टेपणा । आव० उटुंभिया-अवटभ्य-आक्रम्य । आचा० ३१२ । ५७२। उज्झितधर्मा। आव० ५६८ । उट्टण-उत्थित । वृ. द्वि० ७९ अ। उझियए-उज्झितक -मुभद्राविजयमित्रमार्थवाहयो मुत । उट्ठवेसि-उद्धरसि । जता० ६९ । विपा० ४६ । मार्थवाहपुत्र , अन्तकृद्दशासु दु.सविपाकाना उट्ठा-उत्था-कायस्योर्ध्वभवनम् । औप० ८ । ऊध्वं वर्तनम् । द्वितीयमध्ययनम् । विपा. ३५ । सूर्य. ६। भग० १४ । उष्ट्री। दश० १९३ । उज्झियतो-उझिन -वक्त । आव० ८२३ । उट्ठा(ट्टा)-उष्ट्रा -जलचरविशेपा । 'पत्र. १६० । - २४२ आ । (१८०) [ उट्ठाए अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उडुति ] - सूर्य . - नंदी २०७। उहाप-उत्याय-उद्यनविहारं प्रतिपद्य मर्वालङ्कार - परित्यज्य | उडए-उटज -तापसाश्रमगृहम् । निरय० २६ । पञ्चमुष्टिकं लोच विधायैकेन देवदुज्येणेन्द्रक्षिप्तेन युक्त कृत- उडओ-ओटज -तापसाश्रमः । उत्त० १३४ । सामायिकप्रतिज्ञ आविर्भूतमनःपर्यायज्ञानोऽष्टप्रकारकर्मक्ष- उडव-उटज -तापसाश्रम । जीवा० १०५ । कोटिंवो। नि. यार्थ तीर्थप्रवर्तनाथं चोत्थाय । आचा० ३०१। उत्थानं चू० द्वि० ७७ मा।' पर्णकुटी। आव. १८९ । उत्था-ऊध्वं वर्सन । राज. ५८ । उडवसंठिया-उटजंसस्थिताः-तापसाश्रमसस्थिता । आव. उहाण-उत्यानम्-उद्वसनम् । नंदी २०७१ प्रथममुद्गमनम्। लिकावाह्यस्य दशमं संस्थानम् । जीवा० १०४ । उत्त० ३५१ ।'जन्म। भग० ६६१ । चेष्टाविशेषः । ठाणा । उहुंकरिसि--अपिविशेष । नि० चू० द्वि० ६८ आ । २३ । उत्थानम् ।' पिण्ड० ७१! 'ऊर्वीभवनम्। भग० उडंडुग-उदंडक -जनहास्य । नि० चू० तृ ५० अ । ३११। सूर्य० २८६ । श्रवणाय गुरुं प्रत्यभिमुखगमनम् । | उड्डु-ऋतु । नि० चू० प्र० २३९ भ । उडुप-तरणकाप्ट- ० २९६ । देहचेष्टाविशेप । प्रज्ञा० ४६३ । ऊवं भव तुम्बकादि । पिण्ड० १०२॥ नम् । जं० प्र० १३० । उत्पत्तिः । ज्ञाता० १८९ । उडुकः-तप्र. । विशे० ३५३ । उहाणपरियाणियं-परियानं-विविधव्यतिकरपरिगमनं तदेव उडुकल्लाणिआ-ऋतुकल्याणिका', ऋतुषु षट्स्वपि कल्या- पारियानिक-चरितं उन्थानात्-जन्मन आरभ्य पारियानिकं णिका - ऋतुविपरीतस्पर्गत्वेन सुखस्पर्गा अथवाऽमृत. उत्थानपारियानिकम् । भग० ६६०। कन्यात्वेन सदा कल्याणकारिण्यः । ज० प्र० २६३ । उहाणपरियावणियं-उत्थानपर्यापन्निकम् । आव० ६५। उखुपं-नौ । आचा० ४१ । उट्ठाणसुए-उत्थानश्रुतं--उद्वमनं तहेतु श्रुतमुत्थानश्रुतम् । उडुबद्धियं-ऋतुबद्धम्-शीतोष्णकालयोसिकल्पम् । आचा० ३६५ । उडुवई-उडुपति -उड़ना-नक्षत्राणा पति -प्रभु म । उत्त. उद्याय-उत्थाय-अभ्युपगम्य | आचा० ३८। सर्व सावध कर्म न मया कर्तव्यमित्येवं प्रतिज्ञामन्दरमारुन्ध । आदाय- ३५१ । उदुविमानं-सौधर्मे प्रथम प्रस्तट । ठाणा० २५१ । गृहीत्वा । आचा० १४० । उडू- कालविशेषः । भग० ८८८ । ऋतवः-द्विमासमाना । उठावणा-उच्चेव ठावणा उत्-प्राबल्येन वा हावणा उट्ठावणा। ठाणा० ८६ । नक्षत्र । उत्त० ३५१ । नि० चू० द्वि० ४७ अ। उट्ठावणागहणं- उपस्थापनायां हस्तिदन्तोन्नताकारहस्ता- उडूसंवच्छरे-ऋतुसवत्सर , कर्मसंवत्सर , मवनसवत्सरश्च । सूर्य. १६८ । यस्मिन् सवत्सरे त्रीणि शतानि षष्ट्यधिकानि दिभि यद् रजोहरणादिग्रहण । वृ० द्वि० २८६ अ 1 परिपूर्णान्यहोरात्राणां भवति एष ऋतुसवत्सर, ऋतवो उटिअ-उद्युक्त । ओघ० २२० । उत्थित -उद्वसितः । ओघ० लोकप्रसिद्धा. वमन्तादय तत्प्रधानसवत्सर ऋतुसवत्सर । ४९ । उद्यत । भोघा २२० । सूर्य. १६९। उट्टिए-उत्थित -ज्ञानदर्शनचारित्रोद्योगवान् । आचा० १७६ । उई-कुड्यं । बृ. द्वि० ६१ आ। उत्-प्रावल्येन स्थित उत्थितः । आचा० २५८ । उइंचकादि-उद्घट्टकादि । ओघ० ८९ । उट्टिय-उत्थित -मयमोद्योगवान । आचा० २२४ । रूभ । उहुंचगा-उच्चका -याचका । बृ० प्र० ८६ आ। नि० ० ० ०.८ आ । ईश्वरीभृतम् । पिण्ड. १०३। उचय - उनका -उदघेटकास्तान कुर्वन्ति, आलापकान उट्ठी-अष्टा । आव०, ६२४ । कर्णाघाटकेन पठिन्वा तथैवोच्चगन्ति इत्यर्थ. । बृ० द्वि उटुभह-अवष्टीव्यत-निष्ठीव्यन । भग. १८५ । उठेर-उत्थाय-वियुद्धय । भग. १२२ । उइंचये-कुट्टियाओ। नि, चु० प्र० १७१ भ । उटेमि-आयामि-आगन्छामि । आव० ६८५ । उडुंडग-जीकृतदण्ड । औप० ९. । उडंकरिती-ऋषिविगेप। वृ० प्र० २८६ आ। उइंति-व्यवस्थापयन्ति । भाव० ५१९ । ० आ। (१८९) । [ उइंचालग आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उहाई] आव० ००४ । 1 । उडुवालग - कोट्टपालक । आव० २०४ । आरक्षक । २६८। अनाच्छादितममालगृहम् । ठाणा. १५७। उई । नंदी १५४ । उइग-पलालं । नि० चू० द्वि० ६१ अ । उडकवाडे-ऊर्ध्वमपि लोकान्तं स्पृष्टे ते अधोऽपि च लोकान्त उटुच्छे-उद्घोपिते । नि० चू० द्वि० १३२ अ । स्पृष्टे- ते ऊर्ध्वकपाटे । प्रज्ञा० ७५ । उडुणकं-प्रपच । नि० ० तृ० २६ आ । उहकाएहिं-ऊर्वकायै -द्रोणैः कार्कक्रियः । सूत्र० १३॥ उडु(रेति । नि० चू० प्र० २३२ आ। उड्डगो । ठाणा० १५८ । उडुमरं-उत्थाणं । नि० चू० प्र० १९४ आ । उडघट्टणा-ऊर्ध्वघट्टना-मुसलीद्वितीयमेद. । ऊर्ख कुट्टिका- उडमादी-खितिखाणतो उडमादी । नि० चू० द्वि० ४४ आ। दिपटलानि घट्टयति । ओघ० १०९। उडहणं-व्यङ्गनयोईयोरनवस्थाप्य । वृ० प्र० ३०८ भ । उद्दचरा-ऊर्ध्वचरागृध्रादयः । आचा० २९१ । - उड्डाह - उपघात । ओघ० ८९ । प्रवचनहीला। ओघ० उहठाण - ऊर्ध्वस्थानम्-कायोत्सर्गादि । उत्त० ६९९ । ४८ । खिसा। पिण्ड० १०९। अपवाद । आव०८०० । कायोत्सर्ग., ऊर्ध्वतया स्थानम्-अवस्थानं पुरुषस्य ऊर्च- उपघात । ओघ० १४९ । आव० १९५ । स्थानम् । ठाणा० ३। उडाहितो-निर्भसित । उत्त० १३९ । उड्डत्ता-मुख्यता। भग० २५४ । ऊर्ध्वता-लघुपरिणामता। उडिओ-अवतारित । आव० ३९६ । प्रज्ञा० ५०४। भग० २३ । उडियाओ-अवतारिता । दश० ५७ । उहमंतो- उद्वमन् - अधस्तनमध्यमत्रिभागगतवातसरलोभ- उड्डयं-उद्गारितम् । आव ० ७७९ ॥ वशाजलमूर्ध्वमुक्षिपन् । जीवा० ३०८ । उड्डयरो-य उहरेणु - ऊर्ध्वरेणु -ऊर्ध्वाधस्तिर्यक्चलनधर्मोपलभ्यो रेणुः । -यः समुद्दिशन् सज्ञा वा व्युत्सृजन् चपलतया भग० २७७ ॥ हस्तादीन्यपि लेपयति । वृ० प्र० २७२ अ। उहुरेणू-ऊर्ध्वरेणुः-स्वतः परतो वा अधिस्तिर्यक्चलनधर्मा उड्डयालेउं-मथितुम्-मन्थन कर्तुम् । दश० ६० । रेणुः । अनु. १६३ । उडुति-छद्रेति । नि० चू० प्र० २९० अ। उड्ढलोए-तिर्यग्लोकस्योपरिष्टादूर्ध्वलोक । प्रज्ञा० १४४।- उद्देह-धरथ । नि? चू० प्र० २३७ अ। उढलोयतिरियलोए-ऊर्वलोकस्य यदधस्तनमाकाशप्र- उड-वमनं । नि० चू० प्र० ३१५ आ।-नि० चू०५८ भ । देशप्रतर यच्च तिर्यग्लोकस्य सर्वोपरितनमाकाशप्रदेशप्रतरमेष वृ० प्र० ७५ अ। णदीए ममुद्दे वा वेलापाणियस्म प्रति. ऊर्ध्वलोकतिर्यग्लोक । प्रजा. १४४ । कूल उड्ड । नि. चू० तृ. ६३ आ। उद्दलोयपयरं-ऊर्ध्वलोकप्रतरै-तिर्यग्लोकस्य चोपरि यदेक- उहउंचन-ऊर्वग्थितम्यकमपरं, तिर्यस्थितस्यान्यत् , गुणो 'प्रादेशिकमाकाशप्रतरं तत् । प्रज्ञा० १४४ । नतिम्प, नत्रेतगपोहेनोस्थितस्य यदुचत्व तदूर्वोचत्वम् । उडवाए - ऊर्ध्वमुद्गच्छन् यो वाति वातः स ऊर्ध्व- वात । जीवा० २९ । ऊद्र्वमुद्गच्छन् यो वाति वात. उहूंकप्पे-ऊर्व करपेपु-ऊर्व कल्पोपरिवर्तिपु ग्रंवेयकादि स ऊर्ववात । प्रज्ञा० ३० । विमानकेयु कल्पेषु-सौधर्मादिषु, ऊचे वा उपरिकल्प्यन्ते उडवियर्ड-मालरहित छाद्यरहितं परं पावत कुड्ययुक्न विशिष्टपुण्यभाजामवस्थितिविषयतयेति सौधर्मादयो. अवेयका. तदूर्ध्वविवृतं भवति । वृ० द्वि० १८१ अ । दयश्च सर्वऽपि कल्पा एव तेषु । उत्त० १८६ । उड्डवेश्या-ऊदुर्घवेदिका, यत्र जान्वोपरि हस्ती कृत्वा उद्बुजाणू-शुद्धपृथिव्यासनवर्जनात् औपग्रहिकनिषद्याभावाच्च प्रतिलिख्यते मा। ओघ० ११० । उत्कटुकामन मनपदिश्यते ऊर्ध्व जानुनी यस्य स ऊर्वजानु. ! उड्ढस्सासो-ऊर्ध्वधास. । आव० ६२९ । उड्डा-ऊर्ध्व-वमनम् । वृ० प्र० ७५ अ । -अर्च-कर्णक । ओघ० १६८ । सर्वोपरिस्थितम् । उन० । उहाई-ऊर्धाटि-छर्दनादिदोष । ओघ० १३६ । ठाणा:। ज्ञाता० २। (१८०) [ उड्डिया अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उत्तमट्टगवेसए ] ओघ० ४१। उढिया-ऊर्वीकृता। आव० २२३ । उत्कम्पनदीपाः-ऊर्ध्वदण्डवन्तः । ज्ञाता० ४४॥ उड्ढोववनगा-अर्चलोकस्तत्रोपपन्नकाः-उत्पन्ना ऊर्बोप- उत्करिकामेदः-समुत्कीर्यमाणप्रस्थकस्येवेति । ठाणा० ४७५। पन्नकाः। ठाणा० ५७ । सौधर्मादिभ्यो द्वादशभ्यः कल्पेभ्य | उत्कर्षण । ठाणा. २१२। आचा० २७७ । ऊर्ध्वमुपपन्नाः ऊर्थोपपन्ना । जीवा० ३४६ । उत्कुट्टित-चिंचनकादि । व्य० प्र० २८ अ । उणादि-उपप्रमृतिप्रत्ययान्तं पदम् । प्रश्न० ११७ ॥ उत्कुरुटिकादि-आसनविशेष । ओघ० ४१ । तुषराश्यादि। उणुयत्ता-स्थिता। आव. २७२ । उण्डी-पिण्डी। ज्ञाता० ९१। उत्क्षिप्तचरका-उत्क्षिप्त-पाकपिठरात् पूर्वमेव दायकेनो- उण्णए - उच्छिन्न नतं-पूर्वप्रवृत्तं नमनमभिमानादुमतम् , दृत्त तये चरन्ति-गवेषयन्ति ते। बृ० प्र० २५७ आ। उच्छिन्नो वा नयो-नीतिरभिमानादेवोन्नयो नयाभाव इत्यर्थ । उत्क्षिप्यते । ओघ० २१५ । भग० ५७२ । उत्तइया-उत्तेजिता-अधिकं दीपिता। दश० ११५ । उण्णणं । नि० चू० प्र० १२४ अ। उत्तणं-उत्तृणम्-उद्गततृणम् । प्रश्न० १४ । उण्णमणी-उमामिनी-विद्याविशेष । दश० ४१ । उसणा-दीर्घत्रि(१)गा। नि० चू० प्र० ३३६ अ । उण्णय-उन्नत -प्रधानजातिक। आव० २४०। उत्तणाणि-उत्तृणानि-ऊर्थीभूतानि तृणानि दीर्घाणीतिया- उण्णयविसालकुलवंसा-उन्नता' प्रधानजातित्वात् वि- वत् तानि यत्र मार्गे भवन्ति । बृ० द्वि० ७९ आ। शाला--पितामहपितृव्याद्यनेक्समाकुला कुलान्येव वंशा उत्तत्तकणगवन्ना - उत्तप्तकनकवर्णा - ईषद्रक्तवर्णा । अन्वया येषा ते उन्नतविशालकुलवंशा' । आव० २४० । प्रज्ञा० ९५1 उण्णया-उन्नतानि-गुणवन्ति, उच्चानि । औप० ३ । उत्तम-उत्तमो गिरिषु सर्वतोऽप्यधिकसमुलतत्वात् , मेरोश्व- उण्णयासणं-उन्नतासनं-उच्चासनम् । जीवा० २०० । उपणागं-उर्णाकं, प्रामविशेष । आव० २११। तुर्दश नाम । जं० प्र० ३७५ । गिरीणामुत्तम इति उत्तम. । उण्णिए-अविलोममयम् । ठाणा० ३३८ । ऊर्णाया इदम् मन्दरस्य चतुर्दश नाम । सूर्य० ७८। मिथ्यात्वमोहनीय- औणिकम् । अनु० ३५। ज्ञानावरणचारित्रमोहादिविविधतमस उन्मुक्ता इति उत्तमा । उणियं-ऊरणो रोमेसु उणियं । नि० चू० प्र० १२६ भ । आव० ५०८ । उपरिवर्ति । देवलोकाद्यपेक्षया प्रधानम् । उपणेज्ज-उपनेयम् । दश० ८६ । उत्त० ३१९ । ऊर्ध्वं तमस -अज्ञानाद्यत्तत्तथा, अज्ञानरहित उण्हं-उष्णं, उष्णरूप । सूर्य० १७२ । उपति-दहति जन्तु- इत्यर्थ । ज्ञाता० ७६ । मिति उष्णम् । उत्त० ३८ । चतुर्थ परीषह । आव० उत्तमकट्ठ-उत्तमकाष्ठा-प्रकृष्टावस्था । जं. प्र. ९८ । उत्तम- ६५६ । उष्ण:-धर्म । ठाणा० ३४५ । काष्टा-परमकाष्ठा, उत्तमावस्था परमकप्टो वा। भग० ३०५। उण्हकालो-उष्णकाल -ग्रीष्मः । ओघ० २१२ । उत्तमकट्टपत्त-उत्तमकाष्ठाप्राप्त -परमप्रकर्पप्राप्त.। सूर्य उण्हयं-उष्णम् । आव० ८५८ । उण्हवणं-उष्णापनम्-उष्णीकरणम्। पिण्ड० ८२ । उत्तमकट्टपत्ता- परमकाष्टाप्राप्ता, उत्तमावस्थाया गता, उण्हा-उष्णा। आव० ३८९ । परमकष्ट प्राप्ता वा। भग० ३.५। उण्होदए-उष्णोदक-स्वभावत एव क्वचिन्निज्झरादावुष्ण- उत्तमट्ठ अनगनाय । (आउ०)। नुत्तमार्थ -अनशनम् । परिणामम् । जीवा० २५ । ओघ० १४ । उत्तम प्रधानोऽर्थ -प्रयोजन म उममार्थ - उपहोदय-उष्णोदक । आव० ८५५ । । मोक्ष । उत्त ३५३ । पर्यन्तसमयाराधनारूप । उत्त. उण्होला-घृतेलिका । आव० २१७ । ४७९ । मोक्ष । उत्त० ५२३ । उत् - प्रावल्येन, अपुनर्भवरूपतया वा। प्रज्ञा० ११२ । उत्तमट्टकालंमि-उत्तमार्थकाले-अनगनकाले । ओघ० २२७ प्रावल्ये। प्रजा० ५५९ । उत्तमट्टगवेसए-उत्तमार्धगवेषक -उत्तम -प्रधानोऽर्थ -प्रयो. ११ । - १ ११८३) [ उत्तमट्टपत्ता आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उत्तरगुणपथक्वणि ] जन उत्तमार्थः, स च मोक्ष एवनं गवेपर्यति-अन्वेष- | उत्तरकिरियं-उत्तरतियम्-उत्तरा उत्तरशरीराश्रया क्रिया- यतीति । उत्त० ३५३ । गतिलक्षणा यत्र गमने तदुत्तरक्रियम् । भग० २१२ । उत्तमट्ठपत्ता - उत्तमार्थप्राप्ता , उत्तमरन तत्कालापेक्षयो- उत्तरकुरा-उत्तरपूर्वरतिकरपर्वतस्य पश्चिमायामीशानदेवेन्द्र- स्कृष्टानर्थान्-आयुष्यकादीन् प्राप्ता उत्तमार्थप्राप्ताः, उत्तम स्य रामाराश्या राजधानी। जीवा० ३६५। ठाणा काटा प्राप्ता वा-प्रकृष्टावस्था गता । भग० २७७ । २३१। नेमनाथशिविकानाम। सम० १५१। उत्तरकुरु । उत्तमसाहवेहि-उत्तमसाधुभि । पउ० १-१०। आव० ११६ । मेरोर्जम्बूद्वीपगतः उत्तरत उत्तरकुरुनामा उत्तमा-उत्तमा -प्रधाना, ऊर्ध्व वा तमस इति उत्तमस. । विटेह.। जं० प्र० ३१०। आव० ५०७ । पूर्णभद्रस्य तृतीयाग्रमहिषी। भग० ५०४।। उत्तरकुरु-कुरुविशेष । जीवा० २६६ । वापीनाम । ज० ठाणा० २०४। प्रथमगत्रिनाम। सूर्य. १४७ । जं० प्र० प्र. ३७० । नेमनाथस्य शिबिका। उत्त० ४९२ । साकेत. नगरे उद्यानम् । विपा० ९५। आव० ११५ । क्षेत्रवि- उत्तमाघम्-पराघ, महाघ वा । दश० २२१ । शेषः । ठाणा० ६८। अकर्मभूमिविशेष । प्रज्ञा० ५० । उत्तमुत्तम-उत्तमोत्तम्-अतिशयप्रधानम् । उत्त० ३१९ । उत्तरकुरुकूडे-उत्तरकुरुदेवकूटं। ज० प्र० ३३७ । उत्तमेणं-ऊर्ध्वं तमस -अज्ञानाद्यत्तत् तथा तेन ज्ञानयुक्तेन । | उत्तरकुरुदहे-उत्तरकुरौ महाद्रह । ठाणा० ३२६ । उत्तर- उत्तमपुरुषासेवितत्याद्वोत्तमेन । भग० १२५ । कुरुहट' द्रहविशेष । ज० प्र० ३३०। उत्तयंतं-उत्तुद्यमानं-ऊर्य व्यथ्यमानम् । विपा० ७४ । उत्तरकुरुवत्तव्वया-उत्तरकुरुवक्तव्यता । भग० २७६ । उत्तरं-वासकप्पकवली । नि० चू० प्र० ३५३ आ। उत्तरकुरुवाए-उत्तरकुरुषु। पउ० ३१-८॥ उत्तरंग-उत्तराङ्ग । जीवा० ३५९ । उत्तरङ्ग-द्वारस्योपरि ति- उत्तरकृरुकुड- उत्तरकुरुकृटं-गन्धमादनपर्वते चतुर्थकूट । यंग्व्यवस्थितं काष्ठम् । जीवा० २०४। ज० प्र० ४८ । उत्तर-उत्तरत-उत्तरदिरवर्ती सर्वेभ्यो भरतादिवर्षेभ्य इति, । उत्तरकलग-गङ्गाया उत्तरकूल एव वास्तव्यम्। भग० मेस्नाम । जं० प्र० ३७६ । ऐरावते द्वाविंशतितमतीर्थकरः । ५१९ । औप० ९०। । सम० १५४ । अग्रवर्ती । विद्यादिशक्त्यभावेऽनुल्लचनीय । उत्तरकुला-उत्तरकुलगा-गङ्गोत्तरकूलवास्तव्यास्तापसा । ४६२ । भवधारणीयशरीरापेक्षया कार्योत्पत्ति- निरय० २५। कालापेक्षया चोत्तरकालभावि। जं० प्र० ४०२ । कार्यम् । उत्तरखत्तियकुंडपुर-नगरविशेष । आचा० ४२१ । उत्तरगंधारा-उत्तरगान्धारा-गान्धारस्वरस्य पञ्चमी मूर्छना। उत्तरअंतरदीवा - उत्तरम्या दिशि येऽन्नरद्वीपा । भग० जीवा० १९३ । गान्धारग्रामस्य पञ्चमी मृर्छना। ठाणा 1 ज० प्र०:१३। ज० सूत्र. २८५ ३९३ । १८७॥ उत्तरउत्तरा-उत्तरोत्तरविमानवासिन , उत्तरो वा उपरितन- उत्तरगजभो-उत्तरगर्जभ.-वातविशेषः । आव० ३८७ । म्यानवी, उत्तर:-प्रवानो येषु ते उत्तरोत्तरा। उत्त० | उत्तरगुण-उत्तरगुण , पौरुषीपुरिमांधकामनकोपवामादितपो. रूप । विशे० १०१। उत्तरकंचुइज-उत्तरकञ्चुक -तनुनाणविशेष । त्रिपा० ४।। उत्तरगुणनिर्मितः – पुम्पप्रायोग्याकारवन्ति द्रव्याणि । उत्तरकंचुइय - 'उत्तरकल्चुक -तनुत्राणविशेष । विपा० ४७ । उत्तरकरणं - मलत स्वहेतुभ्य उत्पन्नस्य- पुनस्त्तरकाल ' उत्तरगुणनिर्तितः -- गस्तु काष्ठचित्रकर्मादिम्बानिगित विरोपाधानात्मकं करणम् । उत्तर १९४ । औदारिकवे. मु । ३० प्र० १४३ अ। स्यिाहारेपु तंजमकार्मणयोस्तटसम्भवादनोपाननामवोत्तरक- | उत्तरगुणपश्चकखाण -- उनरगुणप्रत्याख्यानम् । भाव" ग्णमिीि। उन० १०७ । आव० २७७ । । (१८४) [ उत्तरगुणलविं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उत्तरा] भग० ७९५॥ ० 1 । उत्तरगुणलद्धिं - उनरगुणा -पिण्डविशुद्धयादयस्तेषु चेह । उत्तरपुरच्छिमिल्लाओ-उत्तरपूर्वेण, उत्तरपूर्वस्यां दिशि । प्रक्रमात्तपो गृह्यते ततश्च उत्तरगुणलब्धि-तपोलब्धिम् । जीवा० १४४ । उत्तरपुरच्छिमे-औत्तरपौरस्त्य , उत्तरपूर्वारूपो दिग्विभाग:- उत्तरगुणा-दशविधप्रत्याख्यानस्पा । भग० ८९४ । नि. ईशानकोण । सूर्य० २। चु० द्वि० १६६अ। मूलगुणापेक्षया स्वाध्यायादीन् । उत्त० उत्तरपुरस्थिमेल्लं-उत्तरपूर्वे, ईशाने कोणे इत्यर्थ. । सूर्य ५३६ उत्तरगुणे-उत्तरगुणविषय-फ्रीतकृतादि । आव० ३२५ । उत्तरपुवा-ईशानकोण । आव० ६३०। उत्तरचूलियं-उत्तरचूडम् , यद् वन्दनं कृत्वा पश्चान्महतो उत्तरफग्गुणी-उत्तरफाल्गुनी, हस्तोत्तरा । आव० २५५ । शब्डेन मस्तकेन वन्द इति भणति, कृनिकर्मणि एकोनत्रिं- उत्तरवलिस्सहगणे-गणविशेषः । ठाणा । ४५१ । शत्तमो गुण । आव० ५४४ । उत्तरभद्रपदा:-प्रोष्ठपदाः । सूर्य० ११४ । उत्तरज्म-उत्तराध्य -उत्तगभ्ययनम् । तृतीया नियुक्तिः । उत्तरमंदा -उत्तरमन्दाभिधा गान्धारस्वरान्तर्गता मप्तमी . आव०६१ मूर्च्छना। ज० प्र० ३८ । मध्यमग्रामम्य प्रथमा मूर्छना। उत्तरायणा-उत्तराध्ययनानि । आव. ७५९ ।। ठाणा० ३९३ । गान्धारस्वरस्य सातमी मूर्छना। जीवा उत्तरज्झयणाई - उत्तराध्ययनानि-सर्वाण्यपि चाध्ययनानि १९३। प्रधानान्येव तथाऽप्यमन्येव रुढयोत्तराभ्ययनशब्दवाच्यत्वेन उत्तरमहुर-वणिग्विशेष । नि० चू० प्र० २१० अ । प्रसिद्धानि। नदी २०६ । उत्तरवाए-उत्तरवाद'-उत्कृष्टवाद । आचा० २४३ । उत्तरज्झाए-उत्तराध्याया -उत्तरा -प्रधाना अधीयन्त इत्य- उत्सरवेउविते-उत्तरवैक्रियम् । प्रज्ञा० २९८ । ध्याया -अध्ययनानि तत उत्तराश्च ते अध्यायाध। उत्तर उत्तरवेउब्वियं-उत्तरवैकुर्विकम्, उत्तरमुत्तरकालभविनस्वभ- ७१२। उत्तरार्द्धभरतनाम्नो देवस्य निवास- विनस्वभाविकमित्यर्थ , वैकुर्विक विकुर्वणे तेन निवृत्त उत्तरढभरहकूड वैकुविकम् । विशिष्टवस्तू विशिष्टाभरणसुश्लिष्टतत्परिधानस- भूत कूट. उत्तरार्धभरतकूटम् । ज० प्र० ७७ । उत्तरणं-निरंतर । नि० चू० द्वि० ७७ अ । एकाए चेव अप्पो मीचीनकुङ्कुमाद्युपलेपनजनितमतिमनोहारिरामणीयकम् । व्य य गच्छा मे उत्तरण । नि० चू० द्वि० ७७ आ। तुंबोडपादिभि- प्र० १९५ आ। उत्तरवैक्रियम्-पूर्ववैक्रियाऽपेक्षयोत्तरकाल- नविर्जितैयद् उत्तीर्यते तद् उत्तरणम् । बृ० तृ. १६१ अ । भाकि वैक्रियम् । भग० ७२' । जन्य तरंतो जल संघटेति त सव्व उत्तरण भन्नति । नि. उत्तरवेउब्विया-उत्तरवैक्रिया, तद्ग्रहणोत्तरकाल' कार्यमा- चू० द्वि० ४८ आ। श्रित्य या क्रियते सा । अनु० १६३ । उत्तरदारिता-उत्तरद्वारिका । ठाणा ०.४०४। उत्तरसत्तासुओ-उत्तरसत्त्वासुक , उत्तरपौरस्त्यवातभेद । उत्तरद्धे-उत्तरार्द्ध-उत्तरभागे. ज..प्र. ४४२ । आव० ३८६ । उत्तरपओगकरणं-उत्तरप्रयोगकरण, जीवप्रयोगकरणद्वितीय- | उत्तरसाढा - उत्तराषाढा,-अकम्पित जन्मनक्षत्रम् । आव० भेद । आव० ४५८ । २५५ । उत्तरपट्टो-उत्तरपट्टक । ओघ० २१ । उत्तरपट्ट । ओघ० उत्तरसाला - अत्यानिगादिमडवो यगयाण उत्तरसाला । नि० चू० प्र० २६९ अ । उत्तरपदव्याहतं-गल्यागनिलक्षणे द्वितीयो भेद । आव० उत्तरा-उत्तरमथुरा । आव०६८८ । उत्तरवाचाला । आव. -१९५ । उत्तराभाद्रपदा-उत्तराफाल्गुनी “उत्तराषाढा" । सूर्य उत्तरपरिकर्मक्रियते-उद्धियते । आव० ७६५ । १३० । उत्तरफाल्गुनी, उत्तगपाढा, उत्तरभद्रपदा। ज. उत्तरपासो-उत्तरपार्श्व। जीवा० ००४, ३५९ । प्र. ५.२ । उत्तरमथुग। आव०३५६। वोटिकगिव. - ० ८३ । २८१ । . (१८५) [ उत्तराधर्यम् आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उतुअणा] . भूतेर्भगिनी। आव० ३२४ । शिवभूतेभगिनी। विशे० | उत्ताणयं-उत्तानक-उतनीकृतम् । प्रज्ञा० १०७ । उत्तान- १०२२ । मध्यमग्रामस्य तृतीया मूर्छा । ठाणा० ३९३ । कम्-ऊर्ध्वमुखम् । उत्त० ६८५। भग० १२५ । उत्तराधर्यम् । भग. २६८ । उत्ताणसेज्जए । निरय० ३४ । उत्तरापथे-देशविशेष । नि० चू० तृ. ४४ अ। उत्ताणा-उत्ताना । ठाणा० २९९ । उत्तरावकमणं-उत्तरस्या दिश्यपक्रमण-अवतरण यस्मा तद् | उत्तानं-स्पष्टम् । प्रज्ञा० ५९९ । प्रतलम् । ठाणा० २५८ । उत्तरापक्रमणम्-उत्तराभिमुख पूर्व तु पूर्वाभिमुखमासीदिति । स्वच्छतयोपलभ्यमध्यस्वरूपत्वम् । ठाणा० २७८ । भग० ४७७ । उत्तरस्या दिश्यपक्रमण-अवतरण यस्मात्तदुः उत्तानीकृतं । सूर्य० ३६ । तरापेक्रमण-उत्तराभिमुखम् । ज्ञाता० ५६ । उत्तान्ती-अवतारयन्ती। आव० ६७६ । उत्तरावह - उत्तरापथः, उतरदिविभाग । आव० ९९ । उत्तारो - उत्तार'-अधस्तादवतरणम् । जीवा० २६९ । नि० चू० प्र० ९६ आ । उत्तरदिग्गता देशा । विशे० ६२४ । जलमध्यावहिर्विनिर्गमनम् । जीवा० १९७१ उत्तरदिकसम्बन्धी देश । आव० ८३०, २९५ । वृ० उत्तालं-उत्-प्रावाल्यार्थे इत्यतितालमस्थानताल वा। ठाणा. दि० २२७ अ। नि० चू० प्र० १६अ। ३९६ । अनु० १३२ । उत्-प्रावल्येन अतितालं अस्थान- उत्तरासंग-उत्तरासगः, वक्षसि तिर्यविस्तारितवन विशेषः । तालं वा। जं० प्र० ४० । जीवा० १९४ । जं० प्र० १८७ । उत्तरीयस्य देहे न्यासविशेष ॥ भग० उत्तालिजंताण-आलपनम् । राज० ४६ । १३८ । उत्तासणओ-उद्वेगजनक । ठाणा० ४६१ । उत्तासणगं-उत्त्रासनक-भयङ्करम् । ज्ञाता० १३३ । उत्तासणयं -उत्त्रासनिका-स्मरणेनाप्युद्वेगजनिका । भग० उत्तगसमा मध्यमग्रामस्य चतुर्थी मूर्छना । ठाणा० ३९३ । १७५। उत्तरासाढा-उत्तरापाढाना-उत्तराषाढापर्यन्तानां नक्षत्रा- | उत्तासिया-उतासिता-आस्फालिता। भग० १५४ । णाम् । सूर्य ११४ । उत्तिंग-उत्तिग.-पिपीलिकासन्तानक । आचा० २८५ । उत्तरासाढाणक्खत्ते-उत्तरापाढानक्षत्रम् । सूर्य० १३० । तृगान । आचा० ३२२। रन्नम्। आचा० ३७९ । उत्तरित्तए-उत्तरीनु-लधयितुम् । ठाणा० ३०९ । उदगं हत्थादिणा पिहेति। नि० चू० तृ. ६३ आ। किटिका- उत्तरिज-उत्तरीयम्-उत्तरासगः। जं० प्र० १८९ । भग० नगरम् । दश० १७५। सर्पच्छनादिः। दश. २२९ । ३१९ । वसनविशेष । भग० ४६८ । उपरिकायाच्छादनम्। गर्दभाकृतिजीवविशेष , कीटिकानगरं वा। आव० ५७३ । जाता. २७ । - कीलियावासो। नि० “चू० प्र० २५५ आ। कीडयणगरगो उत्तरिज्जयं-उत्तरीयक-उपरितन्वसनम् । उपा० ५० । उत्र्तिगो, फरुगद्दभो वा। नि० चु० द्वि० ८३ अ। कीटिकान. उत्तरीकरणं- उत्तरकरणं पुन. सस्कारद्वारेणोपरिकरणमु गरम् । वृ० तृ० १६६आ। छिद्रं । नि० चू, तृ० ६३ आ। च्यते, उत्तरं च तत् करणं च इत्युत्तरकरणं, अनुत्तरमुत्तरं कीडियानगरयं । दश० चू० ८० । क्रियत इत्युत्तरीकरणम् । आव ७७९ । उत्तिंगसुहुम-उत्तिजसूक्ष्म-कीटिकानगरम् । दश० ०३० । उत्तरीयं-प्रावरण प्रच्छदपटीयर्थ । उत्तरीयं पुनर्यत् तदु उत्तिण्णो-उत्तीर्ण -अवतीर्ण । ओघ० २० । परि प्रस्तीर्यते । वृ० प्र० ९८ अ । उत्तिन्न-अवतीर्ण । दश० १९५ । उत्तरोट्ठरोमा-दाढियाओ। नि० चू० प्र० १९. अ। उत्तिमं-उतमम्-श्रेष्ठम् । आव० ४८७ । उत्तरो - उत्तरग्रहणात् सजतसम्मटिटिग्गहण । नि० चू० उत्तिमट्ठो-उत्तमार्थ -अनशनम् । वृ० द्वि० १०० अ । उत्त- मार्थ -कालधर्म । प्र०६३ ॥ आव० ६२६। भताप्रत्यारन्यानम् । उत्ताणग-उत्तान ।' आव० ६४८ । उत्तानका -ऊर्चमुख. आव० ५६३ । गायिन । जं. प्र. २३९ । उत्ती-क्तिः, शब्दकरणम् । आव० ४६४ । ' उत्ताणतो-उत्तानक । उन० २४४ । उत्तअणा-उत्तेजना। ३० द्वि० ७२ आ। । 1 ।

[ उत्तुइउ अल्पपरिचित सैद्धान्तिकशब्दकोषः उदउल्ल] . उत्तुइउ-(देशी०) गर्खे। व्य० प्र० २१० आ । उत्सर्गसमितिः-स्थण्डिले स्थावरजङ्गमजन्तुवर्जिते निरीक्ष्य उत्तुइया-उत्तेजिता । बृ. तृ. २७ आ । प्रमृज्य च मूत्रपुरीषादीनामुत्सर्गः । तत्वा० ९-५ । उत्तुडियाइ-राज्यादि । आव० ५५५ । उत्सर्गसूत्रं । वृ० प्र० ५१ । उत्तुपियं-उतुपितं -स्नेहितम् । प्रश्नः । ५९ । उत्सर्गापवादसूत्रं । बृ० प्र० ५१ आ। उत्तड-बिन्दुः । पिण्ड० १० । उत्सर्पण-क्रियाविशेष । आचा० ३६४ । उत्तेत्ता-अपवर्त्य । आव० ६२४ । उत्सादितं । उत्त० ६५। उत्थरंत-आस्तृण्वन्-आच्छादयन् । प्रश्न. ४७ । उत्साहा-सूत्रार्थपरावर्तनायामभियोग. । बृ० प्र० ११३ आ। उत्थरमाणो-अभिभवन् । आव० ५६७ । उत्सितं-काक्षिकस्य सौवीरिणीतो यद् निष्काशनं तत् । बृ० उत्थल - उन्नतानि-स्थलानि धूल्युच्छ्रयरूपाणि । ज० प्र० प्र० २७५ । १६८ 1 उत्सिता। उत्त० ३१९ । उत्थल्लं । ओघ १९२ । उत्सूर वेलातिक्रम । पिण्ड० ७१ । विशे० ६३७ । उत्था-उत्थान-मूलोत्पत्तिम् । उत्त० ४७५ । उत्सृजति-मुञ्चति, निसृजति । विशे० २०९ । उत्थाण-अतिसार । व्य० द्वि० २७४ भ । उत्सृ(च्छु)तम् प्रासादादि । आव० ८२६ । 'उस्थिए-यूथ-सङ्घान्तरं, तीर्थान्तरमित्यर्थ । उपा० १३ । उत्सृष्टम्-उत्सर्जनम्-त्यागे । आचा० ३६२ । उत्थितवादः उत्थितस्तद्वादः । आच.० २०३ । उत्थिय-उत्थिय -यूथिक । भग० ३२४ । उत्सेधबहुलं-उत्सेधाख्यो नामेरधस्तनो देहभांगो गृह्यते, तत सह आदिना-नामेरधस्तनभागेन यथोक्तप्रमाणल. 'उत्थुमण-अवस्तोभनम् , अनिष्टोपशान्तये निष्ठीवनेन थुथुक- क्षणेन वर्तत इति सादि, उत्सेधबहुलमिति भाव । जीवा० रणम् । बृ० प्र० २१५ अ । उत्पला-हस्तिनागपुरे भीमस्य भार्या । ठाणा० ५०७ । उत्पलिनीकन्द-पद्मनीकन्द । प्रज्ञा० ३७ । उदंक-उदको-येनोदकमुदच्यते। ज० प्र० १०१। जीवा. 'उत्पातनिपातप्रसक्तसंकुचितप्रसारितरेकरचित- २६६। भ्रान्तसम्भ्रान्त:~ एकत्रिंशत्तमो नाट्यविधि । जीवा उदंचनम्-अरघट्टघटीनिवहादिभिरुत्सेचनम्-। उत्त० ५९९ । पिण्ड० १५३ । २४७॥ उत्पादपूर्व-प्रथमपूर्वनाम। उत्त० ३४२ । उदंत-सरीरवट्टमाणी, वत्ता। नि० चू० तृ० १३३ अ । उदन्त-वृत्तान्त । आंव० ६९२ । 'उत्पादसभा-उत्पादभवनविमानमादिनी सभा। प्रश्न० १३५॥ 'उत्पादिताच्छिन्नकौतूहलं-स्त्रविषये श्रोतृणां नितम- उदंतवाहगो-उदन्तवाहक , वृत्तान्तवाहक । आव० ५३६ । विच्छिन्न कौतुक येन तत्तथा। षड्विंशतितमो वचनातिशय.। उदंतवाहतो-उदन्तवाहक -दूतः । उत्त० १०८ । सम० ६३. उदइए-उदय.-कर्मणां विपाक. स एवौदयिक:-क्रियामानं, उत्प्रासनं । उत्त० ४३४ । उदयेन निष्पन्न औदयिक । भग० ६४९, ७२२ । औद- उत्प्रासयेत्-आचा० १२९ । यिक -ज्ञानावरणादीनामष्टानां प्रकृतीनामात्मीयात्मीयस्वरू. उत्प्रासवचनं । नि० चू० प्र० १०८ आ। पेण विपाकतोऽनुभवनमुदय स एव, यथोक्तेन वोदयेन उत्पास्यमान-उन्नतमाना-गर्वाधमातो महता चारित्रमोहेन निष्पन्न. । अनु० ११४ । मुद्यति ससारमोहेन वोह्यत इति । आचा० २१६ । उदई-उदय -अनुकमोदितस्यैवेति । भग० ५१२ । अनुक उत्प्लुत-भीत । ज्ञाता० १६१ मगतानामुदय । भग० ९७३। 'उत्प्लत्य-बुद्धधा गत्वा । सूर्य० ४७ । उदउल्ल-उदकाई , गद् विन्दुसहितं भाजनादि गलद्विन्दु- उत्सकलय-अनुजानीहि । ओघ० ६८ । रिति । ओघ. १७० । स्पष्टोपलभ्यमानजलससर्ग, अप्का. ११८७) [ उद-उल्लादि आचार्यश्रीभानन्दसागरसूरिसङ्कलितः उदमा ] . - . यम्रक्षितचतुर्थभेद.। पिण्ड० १४९ । उदकेनाद्र । अनु० १०। सम० ३६। ज्ञाताया द्वादशमध्ययनम् । आव- १६० । गलविन्दु । आचा० ३४६, ३७९ । उदउल्लादि-उदकार्दादि । आव०.५२ । उदगतीरं-उदगागारातो जत्थ णिज्जति उदग त उदगतीर, उदए-पर्वगवनस्पतिविशेष प्रज्ञा० ३३ ॥ उदय.। ओघ० दूरपि जति उदग तम्हा ण होइ तं उदगतीरं, तो जत्तिय ११३। उदक -अन्ययूधिकः । भग० ३२३ । - पेढालपुत्रो णदीपूरेण अक्मति तं उदग़तीर, - अहवा जहिं ठिएहिं निग्रन्थ । सूत्र. ४०९ । षष्ट आजीविकोपासकः । भगः जल दीसति अहवा णदीए तहीए उदगतीर, अह्वा जहिं २६९ । जलरुहवनस्पतिविशेष । प्रज्ञा० ३१, ३३ । ठितो जलटिएण- सिंचति सिंधुगंगादिणा तं जलतीर, अहवा जम्बूद्वीपभरते आगामिसप्तमतीर्थकरः। सम० १५३ । जावतियं विविओ फुसति अहवा जावतितं जलेण फुडं तं तृतीयतीर्थकृत्पूर्वभवनाम। सम० १५४ ।, उदय:-जीवगतो उदगतीरं । नि० चू० तृ० १६ आ । लेश्यादिपरिणाम , फलप्रदानाभिमुख्यलक्षणं कर्म। उत्तर उदगत्ताभा-गौतमगोत्रोत्तरभेदः । ठाणा० ३९० । ३५ । उदय.-विपाकवेदनानुभवरूप । पिण्ड० ४१ । उदक ! उदगदोणी-उदगढोणी वा-अरहट्टस्स भवति जीए उवरिं प्रश्न. २२ । निर्ग्रन्थविशेष । सूत्र. ४०७ । घडीओ पाणिय पाडेति । अहवा घरंगणए कट्ठमयी उदएचरा-उदकुचस.-उदके चरन्तीति उदकचरा-पूतरक- अप्पोदएमु देसेसु कीरइ तत्थ मणुस्सा हाति। दश० चू० च्छेदनकलोणकत्रसा मत्स्यकच्छपादयः। आचा० २३८ । ११०। जलभाजनं यत्र तप्त लोहं शीतलीकरणाय क्षिप्यते। उदकं-जलम्हविशेष । जीवा० २६ । जलरुहमेद । आचार भग०, ६९७ ॥ उदकद्रोणि -अरहट्टजलवारिका । दशा २१८ आ ।। उदगपउरो-उदकप्रचुर, देशविशेष सिन्धुविषयक्त । बृ. उदकगृहम्-उदकभवनम् । आचा० ३४१; २३८ । तृ० १३८ आ। उदकप्रतिष्ठापनमात्रक-उपकरणधावनोदकप्रक्षेपम्यानम् । उदगपडणं-उदकपतनम् । आव० २७३ । आचा. ३१ । उदकरजः-उदकरेणुसमह । औप० ४७ । जीवा० .१९१ । उदगविंदु-उदकविन्दु । 'अनु० १६१ । उदकाई-बिन्दुसहित । वृ० प्र० २८२ आ।. उदगभाविया-जा उदके, छुढपुल्का सा । नि० र प्र. ४६ - . उदग-उदक । स्त्र० ३०७। अणतवण'फई ! दश० चू० उदगभासो - उदकभास. --शिवकभुजगेन्द्रस्यावामपर्वत । । १२० ।' नि० चू० द्वि० ७९ अ । उदकम्-अनन्तवनस्पति- जीवा० ३११।। विशेषः। दश० ०२९ । नगरपरिखाजलम् । ज्ञाता०.१० । उदगमच्छ-उदकमत्म्य -इन्द्रधनु:खण्डम् -- भग९६ । जलाश्रयमात्रम् । भग० ९२ । जनपदसलत्वे पयः, उद- इन्द्रधनुष, खण्डम् । जीवा. २८३ । इन्द्रधनु.वण्डानि । कादिपर्याय. । दश० २०८ । पूत्युदकोपमानत - खल्वनपा- अनु०, १२१। नमुपभोक्तव्यम् । माधोरुपमानम् । दश. १९ । शिरापा- उदगमाला उद कमाला- ममपानीयोपरिभता माला। • नीयम् । दश. १५३। जीवा० ३२४ । उदकशिखा, वेलेत्यर्थ । ठाणा. ४८० । उदगगम्मे-उदकगर्भ -कालान्तरेण जलप्रवर्षणहेतु । भग० : उदगवलणी। नि० चू० प्र० ३४. अ । १३३॥ उदगवारगसमाणं-उदकवारकसमान-लघुपानीयघटसमा. उदगजोणिया-उदस्य योनय.-परिणामकारणभूता उद- नम् । जीवा. १२२ । रकोनयन एवोदकयोनिकाउटकजननस्वभावा ।. ठाणा० उदगावत्तं-उदकावत्तोंद्रकबिन्दोर्मध्ये अवगाह्य निष्टदित्यर्थः । अनु० १६१। उदगणाए-पष्ठाझे द्वादश ज्ञातम् । उत्त० ६१४। उदक उदग्ग-उदग्र -उन्नतपर्यवमानेन उत्तरोत्तर- बुद्धिमान् । भग० नगरपग्खिाजलं तदेव नातं.-उदाहरण उदकमातम् । नाता० । १२ । उच्चं, ममुन्छितशिर इत्यर्थ , प्रधान , वहि । जीवा . - . - - . .. प '(१८८) [उदढे अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उदायिनृपः] - १९९। १९९। ३४३ । उदन.-उच्च । ज्ञाता० ६६ । उदग्रः-तीव्र. ।। उदरिं-वानपित्तादिममुत्थमष्टधोदरं तदस्यास्तीत्युदरी । आचा० ज्ञाता० ७६ । २३५। उदरी-जलोदरी। प्रश्न. १६१ । उदढे-रत्नप्रभायां अपक्रान्तमहानरक । ठाणा० ३६५ ॥ उदवाहा-उदकवाहा:-अपमष्टान्यल्पान्युदकवहनानि । भग० उदतण-उदयण-उदयगामि, प्रवर्द्धमानं । ठाणा० ३४२ । उदत्त-तुदत्रम् भूमिस्फोटनशस्त्रविशेषः । आव० ८२९ । उदसि-उदस्वित् । नि० चू० प्र० ६ अ । उदात्त.-उन्नतभाववान् । भग० १२५। उदहिकुमारा-उदधिकुमारा -वरुणस्याज्ञोपपातवचन निर्देश उदधि-जलनिचयः । ठाणा० १७७ । वत्तिनो देवाः। भग० १९९ । भुवनपतिदेवविशेष. । उदधिधनं । जीवा० १९१ । प्रज्ञा० ६९। उदपानं-कूप. । बृ० प्र० १८३ भ। उदहिकुमारीओ-- उदधिकुमार्य - वरुणस्याज्ञोफ्पातवचन- निर्देशवर्तिन्यो देव्यः । भग० १९९। उदप्पील - उदकोत्पीलः-तडागादिषु जलसमूहः । भग० उदहिनामाणं- उदधिनाम्नाम्-आर्यसमुद्राणाम् । आचा० उदग्मेया-उदकोझेदः-गिरितटादिभ्यो अलोद्भवः। भग. २६२। उदहीसरिसनामाणं - उदधि -समुद्रस्तेन सदृक्-सदृश उदय-उदीरणावलिकागततत्पुद्गलोद्भूतसामर्थ्यता । आव० नाम-अभिधानमेषामुदधिसहग्नामानि-सागरोपमाणि (उत्त. ६४७। ७७ । आयामः। भग. १८७ । पनाका। भग० १८७॥ उदाइ-उदायी-कणिकराज्ञो हस्ती। भग. ३१७ । नृप. पेढालपुत्र । पाश्वजिनशिष्य । ठाणा० ४५७। भाविया। विशेषः। आव० ६८७। भग० ६७३, ६७५ । नि० चू० प्र० २६४ आ। उदाइजा। भग० १८३1 'उदयट्ठी-उदयार्थी, लाभार्थी । सूत्र० ३९४ । उदाइमारक-साधुवेषधारकः । नि० चू० प्र० २९३ आ। । उदयण-उदयन.-वीणावत्सराजः । उत्त० १४२ । उदाइमारय - श्रमणवेषधारको विनयरत्नमुनि. । नि० चू० उदयणकुमारं-उदयनकुमार, भृगावतीपुत्र । भाव० ६७। तृ. २३ आ। उदयणमाया- उदयनमाता, भावप्रतिक्रमणदृष्टान्ते मृगा. उदाइयाए-असिर्व उदाइयाए भभिक्षुत । नि० चू० प्र० वती आर्या । आव० ४८५ उदयनिप्पन्ने-औदयिक्भावस्य द्वितीयभेद । भग० ७२२ । उदात्तं-उदात्तत्व-उच्चवृत्तिता। द्वितीयो वचनातिशय । सम० उदयपहो-उदकपथ , लोकानां जलानयनमार्ग । ६४०। उदायण - वीतभयराजा। भग० ६१८ । नि० चू० द्वि० उदयभासे-वेलन्धरनागराजस्यावास । ठाणा. २२६ । १४५ अ । शतानीकराजपुत्र.। विपा० ६८ । भग० ५५६ । उदयवद्दलं-उदकवल भाविरेणुसन्तापोपशान्तये । आव० अन्तिमराजर्षि । ठाणा० ४३० । उदायनः-विगतिद्वारे २३०। वीतभयनगराधिपति । आव० ५३७ । आव० उदयवर्तित्वं-समुदय , समुदायो वा । प्रश्न० ६३ । सौवीरराजवृषभो राजा। उत्त० ४४८ । प्रद्योतराज्ये गान्धः उदयास्तान्तरं-तापक्षेत्रम् । जे० प्र० ४४२ । प्रकाशक्षेत्र, वविद्याप्रधान । आव० ६७३ । विदर्भकनगराधिपति. । तापक्षेत्रम् । जं० प्र० ४५५ । प्रश्न० ८९ । अन्तिमराजर्पि.। ६० प्र० १६६ अ। उदरं । आचा. ३८। उदायितकुमारो- उदायिकुमार---पद्मावतीपुत्र.। आव. उदरपोप्पयं-उदरामर्शनम् । आव० ६६ । उदरवलिमंसं- उदरवलिमांसं, उदरोपरि या वलयाकारा | उदायिनृपः- यः कृनिमसाधुभिर्मारितः। सूत्र० २५० । मांसरेखा तस्या मांस । आव० ६७८ । आव० ५२९ । सून. ३६५। आचा० । ९७ अ। आव. २९८।

[ उदायिनृपमारक आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उदुम्बरदस] . - उदायिनृपमारक - श्रमणवेषधारको मुनि. । बृ० प्र० भग. २०७। उदीचीनं च तदुदीच्या आसन्नत्वात् प्राचीन २०४ अ । विशे० १२५५ । ठाणा०-१८५1 , च प्राच्या प्रत्यासन्नत्वादिति । जं० प्र०। ४८० 1 उदायिमारगो - उदायिमारक - श्रमणवेषधारको मुनि । उदीणवापल्यः उदीच्या दिशः समागच्छति वातस उदी. नि० चू० द्वि० ३९ अ, ४१ अ। चीनवात' 1 जीवा०२९1 य. उटीच्या दिश समागच्छति उदायी-कृणिकराजस्य , हस्विराज.। भग० ७२० । कोणि वात स उदीचीतवात' 1 प्रज्ञा० ३०। कपुत्र । ठाणा० ४५६ । उदीर-उदीरिंसु ३ उदयप्राप्ते दलिके अनुदितास्तान् आकृ. उदार-उदार-उद्टम्। ज० प्र० २०३ । उदारत्व-अभि- ध्य करणेन वेदितवन्त ३। टाणा. २८९ । उदीरितवन्त..- धेयार्थस्यातुच्छत्व गुम्फगुणविशेपो वा। द्वाविंशतितमो वचना- अध्यवसायवशेनानुढीर्णोदयप्रवेशनत । ठाणा० १७९ । तिगय । सम० ६३ । शोभनं । छाणा० २३३1 प्रधा- उदीरइ-उदीरयति-प्रावल्येन प्रेरयति, पदार्थान्तरं प्रतिपा- नम् । प्रजा० २६९ । ठाणा० २९५। तीर्थकरगणधरश- दयति वा। भग० १८३ । रीरापेक्षया शेषशरीरेभ्य. प्रधान, सातिरेकड्रोजनसहस्रसा- उदीरण - अनुदयप्राप्तस्य करणेनाकृष्योदये प्रक्षेपणमिति । नत्वाच्छेषशरीरेभ्यो महाप्रमाणं वा । अनु० १९६ । ठाणा० १०१, १९५ । उदीरणम्-अनुदितस्य करणविशे औदार्यवान् । भग० १२५.. . पादुदयप्रवेशनम् । भंग० ५३ । उदीरणाकरणवशत. कर्म- उदाला-उदारा-महान्तः । उत्त०.४१९ । पुद्गलानामनुदयप्राप्तानामुदयावलिकाया प्रवेशनम् । प्रज्ञा. उदाहड-भणिया । नि० चू० तृ. ४९ आ। २९२ । करणेनाकृष्य दलिकस्योदये दानम् । ठाणा० ४१७ ॥ उदाहरण-चरितकल्पितमेदम् । आव० ५९७ । कथनम् । उदीरणा-अप्राप्तसमये उदयप्रापणं सैव उदीरणा । जं. प्र. १६८ । अप्राप्तकालफलाना कर्मणामुदये प्रवेशनम् । उत्त० ३२२ । उदाहरणम्-साध्यसाधनान्वयव्यतिरेक प्रदश- ठाणा० २२१ । नमुदाहरणं, दृष्टान्त । दश० ३३ । । उदीरणाभवियं-उदीरणाभविक्रम्-तत्र भविष्यतीति भवा उदाहरे-उदाहरेत् उदाहृतवान् । उत्त० २४१ । सैव भविका, उदौरणा भविका यस्येति, उदीरणायां वा उदाहु - उताहो निपातो विकल्पार्थ । भग० १७ । भग० भव्यं-योग्यमुदीरणीभव्यमिति। भग-५८ २३७ । उक्तवान् । आचा० १२८ । आहोश्वित्। उपा० उदीरिए-उदीरणम्-स्थिरस्य सतः प्रेरणम् । भग. १८ । ३८ । उदीरणा-उदीरगा नाम अनुदयप्राप्त चिरेणाऽऽगामिना कालेन उदिए-उदित -उदयं प्राप्त , स्थित इत्यर्थ. । ज० प्र० ५२८ । यद्वेदयितव्य कर्मदलिक तस्य विशिष्टाध्यवसायलक्षणेन कर- उदिओदए-उदितोदय , कायोत्सर्गदृष्टान्ते राजा । आव० णेनाकृष्योदये प्रक्षेपण । भग० १५। ७९९ । पारिणामिकीवुद्धौ पुरिमतालपुरे राजा। आव० उदीरिय-उत्-प्रावल्येनेरित-प्रेरितं उदीरितं । जीवा० १९२ । ४३० । उदितोदित -पुरिमतालनगराधिपतिः । विपा० ५८ ॥ उदीरिया - उदीरिता -स्वभावतोऽनुदितान् पुद्गलानुइय- श्रीकान्तापति.। नंदी १६६ । प्राप्ते कर्मदलिके करणविशेषेण प्रक्षिप्य यान् वेदयते । उदिक्खंते-प्रतीक्ष्यमाण. । वृ• तृ० ११६ आ। भग० २४ । उदीरिता-उदयमुपनीता, वेदिता। भग० उदिण्णं-उदीम-पीडितम् । आव० ८६३ । विपाकोदय- १८५ । मागतम् । प्रज्ञा० ४०३ । उदीरेंतं-उदीरयन्तं-वस्त्वन्तर प्रेरयन्तम् । ठाणा० ३८५ । उदिन-उदीर्गम्-स्वत उदीरणाकरणेन वोदितम् । भग० ९०। उदीरेइ-उदीरयति-भणति, प्रवर्त्तयति । ठाणा० १९७॥ उदिनमोह-उदीर्गमोह.-उत्कटवेदमोहनीय । भग० २२३ । उदुम्बर-द्वितीयं महाकुष्टम् । प्रश्न० १५१ । महाकुष्टविशेष । उठीणपाइणं-उदगेव उदीची प्रागेव प्राचीन उदीचीनं च आचा. २३५। कर्मविपाक्स्याष्टममध्ययनम् । ठाणा० तदुदीच्या आसन्नत्वात् प्राचीनं च तत्याच्या प्रत्यासन्नत्वाद् ५०८ । खाद्यवृक्षविशेष । आव. ८२८ । उटीचीनप्राचीनम्-दिगन्तर क्षेत्रदिगपेक्षया पूर्वोत्तरदिगित्यर्थ. 1 | उदुम्बरदत्त-सागरदत्तसार्थवाहसुत । ठाणा० - ५०८ । । (१९०) A [ उदुरुसेजा अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उद्दालक ] आव. । . उदुरुसेजा-रुष्येत् । नि० चू० द्वि० ४९ आ। . उद्दवणया-कूःपाशधारणता। भग० ९३ । विज्जाए सप्पो उदुसुहं-ऋनुसुख, ऋतुशुभ वा-कालोचितम् । प्रश्न० १४१। अन्यत्र नीयते । नि. चू०प्र० ३३५ अ । उद्, उडू-द्विमासप्रमाणकालविशेष- ऋतु । ठाणा० ३६९ । उद्दवणा-उपद्वणमपद्रवण वा। प्राणवधस्य नवम पर्याय । उदूखल-काष्टनिमित्तं खण्डनोपयोगि शस्त्रम् । भग० २१३ । प्रश्न० ५। आचा० ३४४.॥ उद्दवातितगणे-गगविशेषः । ठाणा० ४५१ । उदूरूढी-पडिनियत्तो । नि० चू० प्र० १८४ अ । उहविया-अवद्राविता उत्त्रासिताः। ५७४। उदो-उद -म्लेच्छत्रिशेष । चिलातदेशनिवासी। प्रश्न० १४ । मारिता. । भग० ७६६ । उद्गमनप्रविभक्ति-चन्द्रसूर्ययोरुद्गमनं-उदयनं तत्प्रवि- उद्दति - अपद्रावयन्ति-जीविताद् व्यपरोपयन्ति । प्रज्ञा० भक्ती-रचना तदभिनयगर्भ यथा उदये सूर्यचन्द्रयोर्मण्डल- ५९३ । मरुणं प्राच्या चारुण प्रकाशस्तथा यत्राभिनीयते तदुद्ग- उद्दवेउ-अपद्राव्य । उत्त. २०७ । मनप्रविभक्ति । षष्टो नाट्यविधि । ज० प्र० ४१६ । उहचेह-विनाशयत । उपा० ४९ । उद्गीर्ण-वान्तम् । 'उत्त० ३३९ । उद्दवेहिइ - अपदावयिष्यति-उपद्रवान् करिष्यति। भग० उद्माहित-मेलितम् । नंदी १५९ । ६९१॥ उद्घाटित:-प्रकाशित , प्रकटित । ठाणा० ४१२ । उदाइंता-शोभमाना । ज्ञाता० २७ । उद्घाटितशः-प्रथमो विनेयः । प्रज्ञा० ४२५ । उद्दाइ-उद्ददाति-रचयति । भग० ९३ । उद्याति-जलस्योपरि उद्धेट्टका-उडच्चका । बृ० द्वि० ६० आ। वर्तते। भग० १८४ । अपद्रवति-म्रियते । भग० १११। उइंडगा-ऊर्ध्वकृतेदण्डा, ये सञ्चरन्ति । भग० ५१९ । उहाइ-उपद्राविका, उपद्रवकारिणी। ओघ० १७ । उप- उद्दडपुर-नगरनाम। भग० ६७५ । द्रोत्री-1 ओघ० १५ उइंडा-ऊर्ध्वकृतदण्डा ये संचरन्ति । निरय० २५ । उद्दाइत्ता-अपहृत्य-मृत्वा। भग०,१११.। अपद्राय-मृत्वा । उदंडुको-जनोपहास्य । ६० द्वि० २४२ अ। ठाणा० ४७१। अवद्राय-मृत्वा । जीवा० २६२ । ज० उइंस-त्रीन्द्रियजीवमेद । उत्त० ६९५ । उइंसगा-त्रीन्द्रियविशेष । प्रज्ञा० ४२ । उदाणं-उदाणं, वैधव्यम् । आव० ४३७ !! उहंसे-उद्देश. । आव० २१७ । उद्दाणगं-मृतकम् । आव० ७०० । उदए मारणंतिए-उदये मारणान्तिके वेदनोदये मारणा- उदाणभत्तारा-अपद्राणभतृका, भत्तारेण परिठविता । नि० न्तिकेऽपि न क्षोभ कार्य । योगसग्रहे एकोन त्रिंशत्तमो योग । चू० प्र. १०९ आ। आव० ६६४- उहाणि - उद्रा:-सिन्धुविषये मत्स्यास्तत्सूचनचर्मनिष्पन्नानि उद्ददरं-सुभिक्ख । नि० चू० प्र० ८९ अ। सुभिक्षं । नि. उद्राणि । आचा० ३९४.। चू० प्र० ३१५ अ । ऊर्ध्वदरं ते दरा ऊर्ध्वं यत्र पूर्वन्ते उद्दाम - उद्दामः - चरणनिपातजीवोपमईनिरपेक्षत्वाद् द्रुत- तदूर्ध्वंदरम् । वृ० द्वि०,१०० अ । दुविधा दरा-वण्णदरा चारी। अनु० २६॥ य पोट्टदरा य, ते जद पूरति जत्थ त उद्ददरं-मुभिक्ख । उहामिया-उद्दामिता-अपनीतवन्धना, प्रलम्भिता । विपा० नि० चू० प्र० २२६ अ। उद्दवणं-उत्थान-नाश । बृ० द्वि० ७९ -म । उहायति-अपद्रान्ति-प्राणैविमुच्यन्ते । आचा० २१७ । उद्दवण - अपद्रावगम्-अतिपातविवर्जिता-पीडा । पिण्ड० | उद्दापणं-वीतभप्रणगरे राया। नि० चू० प्र० ३४६ मा । उद्दाल - अवदाल , विदलन, पादादिन्यासे अधोगमनम् । उद्दवणकर - मारणान्तिकवेदनाकारि धनहरणायुपद्रवकारि विदलनम् । जीवा० २३२,। राज. ९१ । वा। औप. ४२१ उद्दालक-एकोएकद्वीपे वृक्षविशेषः । जीवा० १४५ । - प्र० ४२५ ।

[उद्दाला भाचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उहेसिमबरिमतिग] । - । । उद्दाला-उद्दालाः, द्रुमविशेष. । ज० प्र० ९८॥ उहिस्स-उद्दिश्य, उद्दिशति । भाचा० ३२५ । उहालिओ-उद्दालित -बलाद्गृहीतः। आव० ५१०१ अप- 'उहिस्सपविभत्सगती-उद्दिश्यप्रविभक्तगतिः-प्रविभकं प्रति- हत । उत्त० ३०१ । नियतमाचार्यादिकमुद्दिश्य यत्तत्पाश्वे गच्छति सा । विहायो- उद्दावणया-उत्त्रासनम् । भग० १८४ । गतेस्रयोदशो मेदः । प्रज्ञा० ३२७ । उद्दावो- उद्दावः-स्थानान्तरेष्वद्याप्यसनामितः । जीवा० उहिस्सामि-वाचयामि । विशे० १२९५ । उड्ढं-मुषितम् , ( देशी० ) । बृ० द्वि० १०५ अ । नि. उदाह-प्रकृष्टो दाहः । ठाणा० ५०० । चू० प्र० २२७ । 'उहिक्खाहि-प्रतीक्षस्व । नि० चू० प्र० ३२२ भ । उद्देढसेस-जं लुटागेहिं अप्पणट्ठा बाहिं गिणीतं तं भोक्तुं उदिढ-यावदर्थिका पाखण्डिनः श्रमणान्-साधून उद्दिश्य सेर्स छढ़ियं । नि० चू० द्वि० २० आ। दुर्भिक्षापगमादौ यदभिक्षावितरण तदौद्देशिकमुद्दिष्टम् । प्रश्न. १५३ । उद्दिष्टम्-स्वार्थमेव निष्पन्नमशनादिकं भिक्षाचराणा उद्देस उद्देशः अध्ययनैकदेशभूतम् । दश० ५। उद्देशनं • दानाय यत् पृथकल्पितं तत् । पिण्ड० ७७ । उद्दिारूवेण उद्देश -वस्तुन सामान्याभिधान । विशे० ६३९ । वाच. भोभासंति। नि० चू० द्वि० १६३ अ। भासति । नि० चू० नासूत्रप्रदानम् । व्य० प्र० २६ अ। उदिश्यते इति उप. द्वि० १६३ आ। वस्त्रेषणायाः प्रथमों मेद. । आचा० २७७ । देशः, सदसकतव्यादेशः। नारकादिव्यपदेशः उच्चावचगोत्रा- दिव्यपदेशो वा । आचा० १२४ । गुरुवचन विशेषः । अनु० उद्दिष्टा-अमावास्या। भग० १३५ । उहिट्ठआदेस-समणा निग्गय सक तावसा गेरुय आजीव ४ । यावदर्थिकादिप्रणिधानम् । पिण्ड०, ३५। उद्देशनमु. एतेसु उद्दिष्टआदेस भण्गति । नि० चू० प्र० २३० भा। देश -सामान्याभिधानरूप । अनु० २५७। उद्देशक:- उहिट्ठभत्तं-उद्दिष्टभक्तं-दानाय परिकल्पितं यद्भक्तपानादिकं द्वीपसमुद्रोद्देशकावयवविशेषः । भग० ७६९ । अध्ययनार्थ- देशाभिधायी अध्ययनविभाग. । भग० ५। सामान्याभि- सत् । सूत्र० '३९९। उद्दिभत्तपरिणाए - उद्दिष्ट-तमेव 'श्रावकमुद्दिश्य कृर्त धानमध्ययनम् । भाव० १०४। गुरो सामान्याभिधायि भक्त-ओदनादि उद्दिष्टभक्तं तत्परिज्ञातं येनासावुद्दिष्टभक्त- वचनम् । उत० ७३ । उद्देसो अभिनवस्स । नि० पू० परिज्ञात , श्रमगोपासकस्य दशमी प्रतिमा । सम० १९। प्र० २२३आ । वाचयामीति गुरुप्रतिज्ञारूप. उद्देशः । विशे० उद्दिवजए-उद्दिष्टवर्जक , श्रावकस्य दशमी प्रतिज्ञा । आव० १२९६ । अविसेसिओ उद्देसो । नि० चू० द्वि० १०८ भ) ६४६। क्षेत्रकालविभाग । बु. -द्वि० २६९ अ। उद्दिवसमादेसं-णिग्गंयासाह । नि० चू० प्र० २३० आ । उहेसग-उद्देशक:-श्रीन्द्रियजन्तुविशेष । जीवा० ३२ । उहिट्ठा-उद्दिष्टा यस्या स्थापनायाः उत्कृष्टा आरोपणा ज्ञातु- उद्देसणंतेवासी-उद्देशनान्तेवासी । ठाणा० २४० । मिष्टा सा ईप्सिता। ध्य० प्र० ७५ आ। अमावास्या। उद्देसणकाला-उद्देशनकाला. उद्देशावसरा. श्रुतोपचार- जीवा० ३०५। ठाणा० २३७ । राज० १२३ । उपदिष्टा। औप. १००। विपा० ९३ । कषिताः। उत्त० २२९। उद्देसणायरिय -उद्देशनाचार्य , आचार्यविशेषः । दश० 'उहिट्ठाओ-उद्दिष्टाः-सामान्यतोऽमिहिताः। ठाणा० ३०८। उहिट्ठो-उद्दिष्टः-प्रतिपादितः । सूत्र. १७६ । उहेसणायरिए-उद्देशनम् अङ्गादे पठनेऽधिकारित्वकरण उहित्ता-प्रज्वालितः । बृ० द्वि. ६१ आ ! तत्र तेन वाऽऽचार्य -गुरुः उद्देशनाचार्य । ठाणा० २४० । 'उद्दिष्टं । पृ० प्र० ८३ अ। उद्देसिअ- उद्दिश्य कृतम् औदेशिकम्-उद्दिष्टकृतकर्मादि. 'उहिसति-उर्सपजते इत्यर्थः । नि० चू० प्र० २९१ मा । भेदम् । दश० १७४। उहिसियवस्थ-गुरुसमक्ष उद्दिष्ट-प्रतिज्ञातं वस्त्र उद्दिष्टवनम्। उद्देसिअंचरिमतिग-उद्देशभरमत्रितयम् , मौदेशिकस्म पाखण्डश्रमणनिर्मन्यविषयम् । दश० १६१ । रूपा. । सम० ४६। ८ ७० प्र० ९७ आ।

उहेलियं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उद्धाइओ] प्र० १४४ । F . १२ अ॥ अत्यन्तशान्त- , उद्देसियं उद्दिस्स कज्जइ तें उद्वेसिय, साधुनिमित्त आरंभो। उद्ध-ऊर्च । ज० प्र० ४६२ । नंदी: १५४ ॥ दश० चू० ५० । इह यावन्त केचन भिक्षाचरा समागच्छन्ति । 'उद्धघणभवण -ऊर्ध्वघनभवनानि-उच्चाविरलगेहानि । • जं. तॉवत ' सर्वान् ” उद्दिश्य न्यत् क्रियते तत् । बृ० प्र० ८३ अ। औद्देशिक-विभागौदेशिकप्रथमो भेद । इह उद्धट्टा-उवउट्टा-ध्राता। नि० चू० प्र० १५२ अं। यत् उद्दिष्टं कृतं कर्म वा यावन्त केऽपि भिक्षाचसः- उद्धटु-उद्धृत्य । आचा० ३७७ । ममागमिष्यन्ति पाखण्डिनो गृहस्था वा तेभ्य सर्वेभ्योऽपि- उद्घटाणं-कायोत्सर्गम् । नि० चू० प्र० ११३ आ । दातव्यमिति सङ्कल्पित भवति तदा तत् । पिण्ड० ७९ । शवलस्य षष्ठो भेद. । सम० ३९। औदेशिक-याव- ३९ । औद्देशिक-याव- उद्धड-उद्धृता, स्थालादौ स्वयोगेन भोजनजातमुद्धृतम् । दर्थिकादिप्रणिधानेन निवृत्त, द्वितीय उद्गमदोष. । पिण्ड. तृतीया पिण्डैषणा । आव० ५७२ । जत्थ उवक्खडियं भायणे ३४ । औद्देशिक-अर्थिन पाखण्डिनः श्रमणाभिम्रन्थान् ताओ उद्धरिय छप्पगादिसु एस उघडा । नि० चू० तृ० वोद्दिश्य दुर्भिक्षात्ययादौ यद्वक्त वितीर्यते तत् । ठाणा० -,४६६ । साध्वकल्प्यमशनादि । दश० २०३ । उद्दिष्टं -प्राक् उद्धतरेणुयं-उद्तरेणुक-ऊर्ध्वगतरजस्कम्। ज० प्र० १४५। सङ्कल्पितम् । आचा० ३९५ । उद्धत्त-औद्धत्यम्-अहङ्कारः । उत्त० ५२६ । उद्देसुद्देसं-उद्देश -अध्ययन विषय तस्य उद्देश. उद्देशो- उद्धत्तमणहारिणो-औद्धत्यं-अहङ्कारस्तत्प्रधान मन औद्ध- त्यमनस्तद्धरणशीला. औद्धत्यमनोहारिण इंश आव० १०६ । उद्देहगणे-गणविशेषः'। ठाणा० ४५१ । चित्तवृत्तय , यतन इत्यर्थ । उत्त० ५२६ । उद्देहलिका-भूमिस्फो स्कविशेष । आचा० ५७ ।। उद्धपुरीया - ऊर्ध्वपुरीततः-उर्ध्वगतान्त्राः । प्रश्न० ५६ । उद्देहिका-काष्ठनिश्रितो जीवविशेषः । आचा० ५५.। उद्धपूरित - ऊर्ध्वपूरित -श्वासपूरितोच॑काय ऊर्बो वा उद्देहिगा-उद्देहिकाकृतवल्मीकमृत्तिका । पिण्ड० २० । स्थितो धूल्या पूरित. । प्रश्न० ५६ । उद्देहिया-उद्देहिका', जन्तुविशेष ! ओघ० १२६ । त्रीन्द्रि- उद्धमंताणं-यथायोगमुद्ध्मायमानादिषु। राज० ४६ । यजीवविशेष । उत्त० ६९५ । त्रीन्द्रियजन्तुविशेष । जीवा० | उद्धमुइंगागार - ऊर्ध्वमृदङ्गाकार' - मल्लकसम्पुटाकार. । ३२ । प्रज्ञा० ४२ भग० २४९ । उद्दोहक-उद्दोहक -घातक । उद्दहको वा-अटप्यादिदाहकः । -घातक । उद्दहको वा-अटव्यादिदाहकः। उद्धम्ममाणं-उत्पाव्यमानम् । प्रश्न० ५० । उत्पाद्यमानम्। प्रश्न. ६२ । उद्धंसणं-निर्भर्त्सनम्। बृ० तृ. ९० अ । उद्धरंति-उत्पाटयन्ति । ओघ. २२७ । उद्धंसणा - उद्धसना, उडुलना-आकोश । मोघ० ४५ । उद्धरणं-उद्भियते-उत्तरपरिकर्म क्रियते । भाव० ७६४ । प्रवचनविषया होला । बृ० द्वि० १८० आ। दुष्कुलीनेत्यादि । उद्धरुट्ठो-तीव्ररोष रोषकाले। आव० ६३२ । कुलाद्यभिमानपातनार्थः । ज्ञाता० २०० । उद्धरेणू - स्वत परतो वा ऊर्ध्वाधस्तिर्यचलनधर्मो उद्धंसणाओ-अवहेलना । आव० ६५। जालप्रविष्टसूर्यप्रभाभिव्यङ्ग्यो रेणुरू रेणु । जं०' प्र. ९४ । उद्धंसणाहि-दुष्कुलीनेत्यादिमि कुलाभिमानपातनाथूर्व उद्धलोगवत्थव्वा-'ऊर्वलोकवासित्वं-समभूतलात् पञ्चश- चन । भग०.६८३ । तयोजनोचनन्दनवनगतपञ्चशतिकाष्टकूटनिवामित्वम् ।। ज. उखंसणो-वध. 1 ओघ. २१५ ।- उद्धंसिया-खरंटियाणि । नि० चू० प्र० २१२ आ। उद्धर्षि- उद्धसियरोमकूवो-उद्भूषितरोमकूप. । भाव० ५१३ । ता-खरंटिता । बृ, दि० २.१७ । ओभासिया। नि. . उदाओ-उद्धावित । भाव० २०६, १९२ । अवधावित । आव० ५१३। . प्रश्न० ४६ । । प्र० ३८८ । . प्र. १९५ । T [ उद्धाइया. आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलित. उन्नासिजंते ] t उद्धाइया-उद्धाविता. । उत्त० १०० । वेगेन प्रसृता । उत्त०, उद्भामकभिक्षाचर्या - वहिामेषु · भिक्षार्थ पर्यटनम् । बृ० प्र० -२०६आ । उद्धाईया-उद्धाविता समागता । उत्त० १७९ । उद्यतकं उच्छिन्नम् । प्रश्न० १५४ । पामिच्चं, भिक्षादोष । उद्घायमाणो-उत्तिष्ठन् । प्रश्न. ६२। उद्धावमाण:-प्रव आ चा० ३२९ । ईमान । ज्ञाता. ७० । 'उद्यतविहारेण मासकत्पादिना । उत्त०-५८७।। उद्धारपलिओवमे- तत्र वक्ष्यमाणस्वरुपवालाग्राणां तत्ख. उद्यानि-प्रतिश्रोतोगामिनी सा । व्य० प्र० २५ आ। ण्डाना वा तद्द्वारेण द्वीपसमुद्राणा वा प्रतिसमयमुद्धरणं- | उद्युक्तः परायण । आव ५८७ । । अपोद्धरणमपहरणमुद्धार तद्विषय तत्प्रधानं वा पल्योपम- उदा:-सिन्धुविषये मत्स्यास्तत्सूक्ष्मचर्मनिष्पन्नानि । आचा मुद्धारपल्योपमम् । अनु० १८० । उद्धावणं-कार्यस्य निष्पादनम् । व्य० प्र० १७२ अ । उद्राणि-सिन्धुविपये मत्स्यास्तत्सूक्ष्मचर्मनिष्पन्नानि । आचा. उद्धिअ-उदृत -देशानिर्वामित । ज० प्र० २७७ । ३९४ । उद्धिय-उद्धृता-निष्काशनम् । ठाणा० ४६३ । । उद्वर्तनं-निष्क्रमणम् । आचा० ६९ । स्थित्यादेवृद्धिकरण- उद्धी-उद्धि । ज० प्र० ४५४ । 'मेलितु पण्हियाओ चलणे स्वरूपम् । भग० २५ । . वित्थारिऊण वाहिरओ। ठाउस्सग्गं एसो बाहिरउद्धी मुणे उद्वर्तनकरणं-करणविशेष । भग० २४, ९०।। यव्यो । अगुट्टे मेलविउ वित्थारिय पण्हियाओ वाहिं तु । ठाउ उद्वर्त्य-निष्क्रम्य । आव० १७७ ।। स्सग्ग एनो भणिओ अभितरुद्धित्ति ॥ आव० ७९८ । उद्वसं-शून्यम् । उत्त० १०९। उद्धीमुहकलंबुआपुप्फसंठिता - ऊर्वमुखकलम्वुकपुष्प- उहसितगृह-शून्यागारम् । उत्त० ६६५ । सस्थिता-ऊर्ध्वमुखस्य कलम्वुकापुष्पस्येव-नालिकापुष्पस्येव उद्वालयन्-आलोडयन् ।' दश० १८ । सस्थितं-सस्थानं यस्या सां। सूर्य० ६७ । उन्न-औणिक । ठाणा० ३३८ । उर्दुअ -'इतस्ततो विप्रमृत.। ज० प्र० ५१। जीवा० उनए-उन्नत । सम०७१। १६०, २०६। उन्नतमणे-उन्नतमणा.-प्रकृत्या औदार्यादियुक्तमना । ठाणा उद्धृताए-उद्भुतया-दातिशयेन । भग० ५२७ । १८३ । उद्धम्ममाणं-उत्पाद्यमानम् । औप० ४७ । उन्नतरूवे-सस्थानावयवाढिसौन्दर्याद् उन्नतरूप । १८३ । उद्धय-उद्भुतः उद्भूत । औप० ५। इतस्ततो विप्रसृत । सूर्य. २९३ । उद्भूत । भग० ५४० । उद्भूता-वायुना । उन्नतावत्त-उन्नत--उच्छ्रित. स चासावावर्त्तश्चति उन्मता- वर्त । ठाणा० २८८ । ज्ञाता० ८०॥ उडुयाए - उद्धृतया - वनादीनामुद्भूतत्वेन, उद्धतया वा | उन्नय-उन्नतं-अङ्गुलिपर्वाणि । ओघ० १७१। गुणवन्ति, उच्चानि च । ज्ञाता० ३ सदर्पया.। भग० १६७ । उन्नयनं-शृङ्गारविशेष । ज० प्र० ११६ । उद्धवमाणं-उत्पाद्यमानम् । औप० ४७ । उन्नयमाणे-उन्नतमान , उन्नतो मानोऽस्येत्युनतमान , उन्नत उद्धसियं-रोमाञ्चितम् । उद्धुपितम्। नि० चू० प्र० ३१५आ। वाऽऽत्मान मन्यत इति । आचा० २१५ । उद्धय-उद्धृतः । आव० ५२० । उन्नाडीओ। नि० चू० प्र० ११२ अ । उलिता-सरक्खा । नि० चू०प्र० ३२४ आ। उन्नात-महाविदेहे नगरविशेपः। निरय० ४२ . उद्भिजत्व-सम्मूर्च्छजत्वम् । ठाणा० ५१४ । उन्नामओ-ऊर्गामय । आव० ४१८ । उद्धामक-उद्यतविहारी। व्य० प्र० १६८ । उन्नामिजंते-उन्नाम्यते ऊर्चमुस्लिप्यते । जीवा० ३०७ । । TE ठाणा० , - (१९४) [ उन्नामिजइ(ए) अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उपाया ] B उन्नामिजइ(ए)-उन्नामित -उत्क्षिप्त , प्रसिद्धिं गत, इति उपमानं- दृष्टान्त । ओघ० १७ । श्रुतातिदेशवाक्यस्य यावत् । अनु० १४३ । समानार्थोपलम्भने सज्ञासज्ञिसम्बन्धज्ञानमुपमानम् । ठाणा० उन्निद्रीकृतं-बोधितम् । जीवा० २७१ । २६२ । उनिय-और्णिकम् । ठाणा० ३३० । उपयुक्तद्रव्यसम्यक् - यदुपयुक्तं अभ्यवहृत द्रव्यं मन.. उन्मनजला-नदीविशेष । ठाणा० ७१ । समाधानाय प्रभवति तत् । आचा. १७६ । उन्माथितः। आव० १५६ । उपरतकायिकी- अप्रमत्तसयतस्योपरतस्य -सावद्ययोगेभ्यो उपकारिका-राजधानीस्वामिसत्कप्रासादावतंसकादीना पी- निवृत्तस्य क्रिया। कायिकीक्रियायास्तृतीयो भेद । आव० ठिका। जीवा० २२२ 1 ६११ । उपकार्योपकारि . - राज्ञामुपकार्योपकारिका। ज० प्र० उपरितनक्षुल्लकप्रतराः-तत्र तिर्यग्लोकमध्यवर्तिनः सर्व- ३२१ । जीवा० २२२ ।। लधुरज्जुप्रमाणात् क्षुल्लकप्रतरादारभ्य यावदयो नव योज- उपगतलाधं- उपगतलाघवं-उक्तगुणयोगात्प्राप्त लाघता। नशतानि तावदस्या रत्नप्रभायां पृथिव्या ये प्रतरा. ते उप- चतुर्विंशतितमो वचनातिशय । सम० ६३ । रितनक्षुल्लकातरा । नंदी ११० । उपगृहनं-परिष्वजनम् । नि० चू० प्र० २५६ आ । उपरिमाण-उपरितना। आव० ६४७ । उपघसरं-निर्द्धमनम् । ओघ० १६२ । उपर्यविनम्भः । आचा० १०६ । उपलिंपंति - घटकमुखस्य तत्पिधानकस्य च गोमयादिना उपचयद्रव्यमन्दः य परिस्थूरतरशरीरतया गमनादि- रन्त्र भजन्ति । ज्ञाता० ११९ । व्यापार कतुं न शक्नोति। वृ० प्र० ११३ अ । उपवस्तुं-उपवासान् कर्तुम् । पिण्ड० १६७ । उपचयभावमन्दः-यो 'बुद्धेस्पचयेन यतस्तत. कार्य कर्तु उप-तो-उपागच्छन , आगच्छन् । आव० ४३४ । नोत्सहते। बृ० प्र० ११३ अ ।' उपशमनिष्पन्नः-उपशान्तक्रोध इत्यादि उदयाभावफलरूप उपचारोपेतं-उपचारोपेतत्व-अग्राम्यता। तृतीयो वचनाति- आत्मपरिणाम इति भावना। ठाणा० ३७८ । शय । मम० ६३ । उपशान्ता-प्रदेशतोऽप्यवेद्यमाना कषाया । ठाणा० ५। उपचियमंसो-बल्लियमरीरो। नि० चू०प्र० ०६६ आ । उपश्रा-द्वेष. । व्य. प्र. ७ अ। उपदर्शना - जम्बूद्वीपनीलवर्षधरपर्वते' नवमकूट । ठाणा० उपसंप-उपसम्पत्-उपसम्पत्ति -प्राप्तिः। भग० उपसंपदालोचना-आलोचनाया द्वितीयो मेद. । व्य० प्र० उपदिष्टा - महाकल्याणकसम्बन्धितया पुण्यतिथि वेनं प्र- ४८ आ। ख्याता, तथा पौर्णमासीषु च तिसृष्वपि चतुर्मासकति- | उपसङ्घात-अनिष्टरूपस्तूपमचात । नंदी १५१ । थिष्वित्यर्थः । सूत्र. ४०८ । उपस्थं-उपस्थितम् । व्य. द्वि. २२२ आ । उपदेशः श्रुतस्य पर्याय । विशे० ४१६ । उपस्थापनं--पुनर्दीक्षण पुनश्चरण पुनर्वतारोपणम् । तत्त्वा. उपधानकं-द्रव्योपधानम् । आव. ६६८ । बिब्बोयणा । ९-२२॥ विव्वोयणा, तपनीयमय्यो गण्डोपधानका । जीवा ० २३१ । उपस्थापयितुं-उत्स्थापनाकरणतः । व्य० द्वि० २१५ भ । उपनीतराग-उपनीतरागव-मालकोशादिग्रामरागयुक्तता। उपस्पृशति-वस्त्राणि प्रक्षालयति । आव० ४३४ । सप्तमो वचनातिशय । सम० ६२ । उपहितं-भोजनस्थाने ढौकित भक्तमिति भाव.] ठाणा. उपपत्ति । भग० १५ । उपहयन्-अनुमोदयन् । ज्ञाता० १८ । उपादानकारणं-मृदादि । ठाणा० ४९ । उपभोगपरिभोगः - अगनादिवाहनान्ताना बहुसावद्याना उपाधिः-उपाधानमुपाधि -सन्निधि. । भग० ४ । वर्जनमल्पसावद्यानामपि परिमाणम् । तत्त्वा० ७-१६ । उपाया-व्याख्याज्ञानि । आचा०८२ । ९०४। १४८ । (१९५) ब [ उपायोपेयभावलक्षणः आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उप्पलहत्य] 17 Y -- - - उपायोपेयभावलक्षणः-वचनरूपापन्न प्रकरणमुपायः तत्प. । उप्पयंते-भूतलादुत्पतत । ज्ञाता० ४६ 1 रिज्ञानं चोपेयम् । प्रज्ञा० २। उप्पयनिवयं-उत्पात -आकाशे उल्लनं निपात -तस्माद. उपाईभाग-पोषचतुर्थभाग । आचा० ३२६ । वपतनं उत्पातपूर्वो निपातो यस्मिन् नदुत्पातनिपातम् । उपलिंभ-उपालम्भ विनेयस्याविहितविधायिन.। ज्ञाता. दिव्यनाट्यविधि । ज०प्र० ४१२।। उप्पराउ-उपरित -उपरिष्टांत् । दश०३८ । उपालक-नियूंह', गवाक्ष । व्य० प्र०-१३३ अ। उप्परामुहो-उपरिमुख । आव० १८ । उपैति-करोति । आचा० २१७ । उप्पराहुतो-उपरिभूतः । आव० ५०२ । उपोद्घातनियुक्तिः-नियुक्तिभेद । ठाणा० ६ ।। उप्पलं-उत्पल-नीलोत्पलादि । आचा०. ३४८ । चतुरशीति- उपायं-उत्पत्तिकं-उद्भूतम् । उत्स० ११९ । रुत्पलाशतसहस्राणि । - जीवा० ३४५ । - गर्दभकम् । उपपजंते- उत्पद्यन्ते, एतत्प्रभावात् स्फातिमद्भवन्ति। ज. राज. ८। जीवा० १७७ । उत्पलकुष्ठ, नीलोत्पलं, वा। प्र० २५८ । जीवा० २७७। उत्पल। प्रज्ञा० ३७।- जलरूहविशेष। उपपज्जमाणकालं उत्पंद्यमानकालं -'आद्यसमयादारभ्यो प्रज्ञा० २३ ।। कालविशेष.।। भग० २७५। उत्पलं-चतु. त्पत्त्यन्तसमय यावदुत्पद्यमानत्वस्येष्टत्वाद् वर्तमानभविष्य रशीत्या, लक्षरुत्पलाः । अनु०.१००।- उत्पलार्थ एका- कालविषयं द्रव्यम् । भग० '१८ 1 दशशते प्रथम उद्देशक । भग० ५१११ कालविशेष. । भग०; उप्पडा-त्रीन्द्रियविशेष । प्रजा० ४२ । ८८८ । भग० २१०। कालविशेषः । सूर्य०.९१ । नीलो: उप्पण-उत्पन्न-विधिना प्राप्तम् । 'दश० १८१ । त्पलमुत्पलकुष्ठ वा। सम० ६१ । औप० १६१..आरणकल्पे उप्पण्णमिस्सिया-उत्पन्नमिश्रिता-उत्पन्ना मिश्रिता अनु विमानविशेष । सम० ३८ । उत्पलकुष्टं-गन्धद्रव्यविशेष । त्पन्नः सह सङ्ख्या पूरणार्थ यत्र सा। सत्यामृषाभाषाया ज्ञाता. १२९ । उत्पलं-नीलोत्पलादि । दश१ -१८५, प्रथमो भेदः। प्रज्ञा० २५६ । उत्पलं-कुष्ठम् । जं० प्र० ११७ । उपपत्ति-उत्पत्ति-निदानम् । व्य० प्र० ९१ अ। उप्पलंग-उत्पला - चतुरशीतिहूहुकशतसहस्राणि । जीवा. उपपत्तिभं-पर्वतिथिमन्तरेणाकस्मिकं भोज्यम् । वृ० द्वि. ३४५। कालविशेषः । ठाणा० ८६ । उत्पलाङ्ग, कालवि- १९२ । शेष । सूर्य० ९१ । भग० ८८८ । उत्पलाल चतुरशीत्या उप्पत्तिा- उत्पत्तिरेव न शास्त्राभ्यासकर्मपरिशीलनादिक लक्षहहुकै । अनु० १००। 'प्रयोजनं-कारण यस्याः सा औत्पत्तिकी । नंदी १४४ उप्पलगुम्मा-उत्पलगुल्मा, पुष्करिणीनाम । जं. प्र. ३३५, उप्पत्तिकसाय-द्रव्यादे यिात् कषायप्रभवः तदेव कषाय- निमित्तत्वात् उत्पत्तिकषाय. । आव० ३९० । शरीरोपधि- उप्पलनाल-उत्पलनाल-उत्पल-नीलोत्पलादि नालं-तस्यै- क्षेत्रवास्तुस्थाण्वादयो यदाश्रित्य तेषामुत्पत्ति । आचा० ९१ । वाधार । आचाः ३४८ । उप्पत्तिया-औत्पत्तिकी- उत्पत्तिरेव प्रयोजनं यस्या. सा, उप्पलपउमोपसोभिता - उत्पलपद्मोपशोभिता । आव. बुद्धिविशेष । आव० ४१४। उत्पत्तिकी-अदृष्टीश्रुताननु भूतविषयाकस्माद्गवनशीला । राज. ११६। उपलबेटिया- उत्पलयन्तानि नियमविशेषात् प्राह्यतया उप्पत्ती-उत्पत्तिकर स्वकल्पनागिल्पनिर्मित. शतम्पकादि । भैक्षत्वेन येषा सन्ति ते उत्पलवृन्तिकाः । औप० १०६ । 'आप० ४९९ । आरम्भमात्रम् । ठाणा० २८५। सामा उप्पलयं-उत्पलक-गर्दभकम् । जीवा. १८२ । न्यतो या च विशेषत । ठाणा० ४४९ । उप्पलहत्थगा - उत्पलाख्यजलजकुसुमसमूहविशेषा । ज. उप्पन्न-उत्पन्नविषया-सत्यामृषाभाषामेद । दश० २०९ । प्र० ४४ । उत्पलांख्यजलजकुसुमसघातविशेषा.। राज० ८। उप्पन्नमीसते - उत्पन्नविषयं निध-सत्यामृषा उत्पमित्रं उप्पलहत्यय-उत्पलहस्तक. - उत्पलाय जलजकुसुमसमूह तदेवोत्पन्नमिश्रकम् । ठाणा० ४८९ । विशेष । जीवा० १९९ ।। s । - - ८१९ । - 1 JA [ उप्पला अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उप्पिलणा] M . A उप्पला-पिशाचेन्द्रकालस्य तृतीयाप्रमहिषी । ठाणा० २०४ । उपायणा-उत्पादना-धान्याढिका षोडशविधा प्रश्न०१५५ । पुष्करिणीविशेषः । जं० प्र० ३६० । धान्यादिलक्षणदोषविशेषः। आव० ५७६ । उप्पलाई-गईभकानि इषनीलानि वा | जं० प्र० २६ । . उप्पायणोवघाते- उत्पादनया-उत्पादनादोषैः, उपघात उप्पलावप-उत्प्लावयति । दश० २०५। अशुद्धता उत्पादनोपघातः । ठाणा० ३२० । उप्पलुजला-उत्पलोज्ज्वला, पुष्करिणीनाम । ज० प्र० ३३५, | उप्पायपव्वए-उत्पातपर्वत । सम० ३३ । तिर्यग्लोकगम- ३६० । नाय यमागत्योत्पतति स । भग. १४४ । उप्पलहेसप - उत्पलोद्देशक -एकादशशते प्रथम । भग० उप्पायपव्वयगा-उत्पातपर्वताः-यत्रागत्य बहवः सूर्याभवि- मानवासिनो वैमानिका देवा देव्यश्च विचित्रक्रीडानिमित्त उप्पह-उत्पथ -उन्मार्ग । उत्त० ५४८ । परसमय । ठाणा. वैक्रियशरीरमारचयन्ति । राज० ७९ । २४१ । उपायपवया-यत्रागत्य बहवो व्यन्तरदेवा देव्यश्च विचि. उप्पा-उत्पाद।। ठाणा० १९ । त्रक्रीडानिमित्त वैक्रियशरीरमारचयन्ति । जं० प्र० ४४ । उप्पाइओ-उत्पात. । आव. २९८ । जीवा० १९९। उप्पाइत्ता-उत्पादयितु-सम्पादनाय,अथवाऽनुत्पन्नानां भोगा उप्पायपुवं-उत्पादपूर्वम् , तत्थ सव्वदव्वाणं पज्जवाण य नामुत्पादयिता-उत्पादक . । ठाणा० २६४ । सम्पादनशील । उप्पायमगीकाउ पण्णवणा कया। नंदी २४१॥ यत्रोत्पाद- ठाणा० ३८६ । माश्रित्य द्रव्यपर्यायाणा प्ररूपणा कृता तद् । 'सम० २६ । उप्पाइया-उत्पाता -अनिष्टसूचका रुधिरवृष्टयादयस्तद्धेतु उप्पाया-त्रीन्द्रियविशेष । प्रज्ञा० ४२ । का येऽनास्ते औत्पातिका' । सम० ६२ । उप्पाल-प्रहरणकोशविशेष । जीवा० २३२। प्रहरणकोश - उप्पाए - उत्पातं-सहजरुधिरवृष्टयादिलक्षणोत्पातफलनिरूपक प्रहरणस्थानम् । राज. ९३ । मत्तवारणम् । जीवा० २७९ । निमित्तशास्त्रम् । सम० ४९ । उत्पाद । आव० ६६२ । उप्पालसंठिओ-उत्पालसस्थित -मत्तवारणसस्थित जीवा. उप्पाएति - उत् - प्राबल्येन पावयति । नि० चू० प्र० २७९ । २५२ आ । ' उप्पासितो-उत्प्रासित -असूयितः । आव० १०१। उप्पाएमाणे-व्युत्पादयन् । उत्त० १५७ । उप्पासिया-हसिताः । नि० चू० प्र० ६९ अ। उप्पाओ- उत्पाद -उत्पत्तिहेतुभूत. क्रियालक्षण । विशेष उप्पि-उपरि । भग० ८२ । ठाणा० ४३२ । २४१ । उपिजल-उप्पिजल-आकुलकम् । राज० ५२ । उप्पाते-उत्पाद -सहजरुधिरवृष्टयादि । ठाणा० ४२७ ॥ उप्पिच्छ-श्वामसयुक्तम् । ज० प्र० ४० । श्वासयुक्त, त्वरि. उपाय-उत्पातपूर्व-प्रथमपूर्वनाम। ठाणा० ४८४ । उत्पात - तम् । ठाणा० ३९६ । अनु० १३२ । आकुलं रोपभृतं प्रकृतिविकारो रक्तवृष्टयादि । प्रश्न० १०९ । उल्कापातदिग्दा वोच्यते । श्वासयुक्त वा। जीवा० १९४ । भीती। ज्ञाता. हादिकम् । अनु० २१६ । उत्पाद -यतो नानुत्पनं वस्तु १६१ । लक्ष्यते अतोऽयमपि वस्तुलक्षणम् । आव० २८२ । उत्पा- उप्पिट्टणयं-उत्पिडनक-कुट्टनोत्पिट्टना। उत्त० ८ । तं-सहजरुधिरवृष्टयादिकम् । आव. ६६० । उत्पातं-वपि । उप्पिट्टणा-उत्-प्रावल्येन पिट्टना उत्पिडना । उत्त० ८.I. हसितादि । सूत्र० ३१८ । प्रथमपूर्वम् । नदी ५२ । ठाणा० उप्पित्थं-श्वासयुक्तम् । उप्पिवंत-उत्पिवन्त -आसादयन्त । प्रश्न० ६३। उप्पायग-उत्पादक -ये भूमि भित्त्वा समुक्तिष्ठन्ति ते। व्य. उप्पियंतं-मुहुर्मुहु. श्वमन्तम् । व्य० द्वि० ५३ आ। दि० २८८ आ। उप्पियणं-मुहु श्वसनम् । व्य० द्वि० ५३ अ । उप्पायण उत्पादना सम्पादन, गृहस्थात्पिण्डादेस्पार्जन- उप्पिलणा-उत्पीडन-प्राणादीनां प्लावनम् । व्य० द्वि० मित्यर्थ । ठाणा० १५९ । १० । -- १९९। (१९७) [उपील. आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उम्भावण ] - P ट - - ४७० । - उप्पील-उत्पील -समूह. । प्रश्न० ५० । उव्वुड-अन्तःप्रवेशितम् । अनुत्त० ७। उप्पीलइ-उत्पीडयति-प्राबल्येन वाधते। जीवा० ३२६ 1 उन्बुडनिबुड्यं-उन्ममनिमग्नत्वम् । प्रश्न० ६३ ।” उप्पीलिय-उत्पीडिता प्रत्यञ्चारोपणेन, वाही वद्धा। भग०,१९३॥ उभं-तव । उत्त० १४७ 1 गाढीकृता। राज. ११८1 भग० ३१७ । ज्ञाता० २२१ । उभंडो-असवृतपरिधानादि 1 बृ० तृ० २२५. अ । जीवा० २५९ । उत्पीडित -गाढं बद्धः । प्रश्न० ४७ । उत्पी- उन्भजिय-उद्भिद्य । उत्त० १९२ 1 डिता-गुणसारणेन कृतरवपीडा, बाही बद्धा वा । भग० उभ-अभ्यर्थितम् । पिण्ड० ९० । ३१८ । कृतप्रत्यञ्चारोपणा । विपा० ४७ । आरोपितप्रत्यञ्चा। उन्भड-उद्ष्टं-विकरालम् । जं० प्र० १७० । अनुत्त०] औप, ७१ । आक्रान्ता गुणेन । ज्ञाता० ८५। । भग० ३०८ । स्पष्टम् । भग० ३०८ । उप्पीसेजा। भग० ७६६ । उभमा-उत्-प्रावल्येन भ्रमयन्ति उद्रमा -भिक्षाचरा व्य. उप्पुया-उत्प्लुता.-उत्सुका. । प्रश्न० ५२ । प्र० १५३ आ। उप्पूर - उत्पूर-प्राचुर्यम् । प्रश्न० ४३ । जलप्लव । प्रश्न उम्भमे-उद्धमत्-यायात् ।।आचा. २९१ । ७६ । उम्भव-उद्व -सम्भव । ज्ञाता० ५०। सम्भूति भग उपेक्खेज-उपेक्ष्यते । आव० ६४० । उप्फंदति-उत्स्पन्दते-प्रविशति । उत्त० ३५५ । उब्भवणं-निव्वावणं । नि० चू० प्र० ५२ आ। उफंसणं-। ओघ. १९५। - उन्भवेति-उच्छ्यति । आव० ३४२ । उप्फणिंसु-साध्वर्थ वाताय दत्तवन्तः । आचा० ३४३ | उभातो-निसण्णो। नि० चू० प्र० ३५ आ। उप्फसणा-अप्कायस्पर्शनं यत्सहचरित लवणोत्तारणम् । उभाम-भिक्षाचरणाम । व्य० प्र० २५० भ । वृ० द्वि० ६१ आ। उब्भामइला-उद्भामिला-स्वैरिणी। व्य० द्वि०-३१ आ। उप्फालग-उत्प्रासकम् । उत्त० ६५६ । उन्भामओ-उद्भ्रामकः, जार. । पिण्ड० १२३ । पारदा- उप्फिडइ-मण्डूकवत्प्लवते। उत्त० ५५१ । रिक । ओघ० ९२ । वृ० तृ. ४८-अ । उप्फुल्लं--विगसिएहिं इत्थीसारीर रयणादि वा ण निज्झाइ- उभामग-भिक्खायरिया। नि० चू० प्र० ७७ आ। नि० यव्च । दश० चू० ७७ । उत्फुल्ल-विकसितलोचनम् । चू० प्र० ३६ भा। पारदारिका । ओघ० -७५ । बृ० द्वि० दश० १६८ । निष्पुष्प । नि० चू० प्र० ,२०१ अ । २६ अ । पारदारिगो। नि० चू० प्र० १०७ भ। सघा- उप्फेणओफेणीयं-सकोपोष्मवचन. यथा भवति। विपा० डगो। नि० चू० द्वि० ९४ आ । ८३। उभामनितोय - उद्घामकनियोग.-ग्राम । व्य० उम्फेस - मुकुटम् । औप० २५ । शिरोवेष्टनम् । आचा० १५३ आ. ३८०। प्रज्ञा० ८७ । उम्भामिगा-उदामिका कुलटा । व्य० द्वि० १५० आ । उद्धा- उम्फेसि-शिरोवेष्टन, शेखरक इत्यर्थ । ठाणा० ३०४ । मिका-मनोगुप्तिदृष्टान्ते श्रेष्टिसुतश्रावकजिनदासभार्या। आव० उग्फोसं-उत्स्पर्गन छटनम् । वृ० प्र० २८५ अ । - ५७८ । असती। दश० ५७ । उप्फोसणं-क्रियाविशेषः । नि० चू० द्वि० १६६ अ। उम्भामिज्जेंति-अपभ्राज्यन्ते । बृ० तृ० १३७ आ। उम्फोसणा-जलच्छटा । नि० चू० द्वि० ६३ भ। उम्भामिया - कुशीला । वृ० द्वि० २६४ आ । उद्रामिका- उप्फोसेज-रुष्येत् । नि० चू० प्र० १८६ आ। स्वैरिणी। आव० ४२१ । उफुल्लो-निष्पुष्प । ओघ० ९७ । उभामे-भिक्खायरियं गच्छति। नि० चू० प्र० ११३ आ1 उबद्धो-अववद्ध । आव० २९९ । भिक्षाभ्रमणम् । ठाणा० २६६ । उबद्धओ-उद्वद्धः । आव० ४५२ । . उम्भावण-उद्दावन - महर्दिकतासम्पादनं कृतवान । बृ० उबुडा-उद्याता । आव० ६७७ । तृ० ९३ अ । परिभव । ओघ० १४८ । - प्र० - . -- -- (१९८) [ उम्भावणा अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उम्मग्गजला ] . h उच्भावणा-उद्ावना-उत्प्रेक्षणा।भग० ४८९ । उत्क्षेपणानि। उभयकाला-दिया रातो य । नि० चू० तृ. २१आ।' ज्ञाता० १७७। उद्भावना । दश० ४४ । प्रकाशनम् । ४४ । प्रकाशनम् । उभयकिडकम्म-उभयकृतिकर्म-वन्दनम्। ओघ० २२ । नंदी. ५३ । अपभ्राजना। उत्त० १६९ । उभय-गुणनिष्पन्नं, समयप्रसिद्धञ्च । पिण्ड० ४ । उभिगा-उद्भिदो-भूमिमेदाजाता उद्भिज्जा --खञ्जनकादय । उभयतरो-तं च तवं करेंतो आयरियाइवेयावञ्चपि करेति ठाणा० ३८६. सलद्धित्तणओ एस उभयतरो। नि० चू० तृ. १२३ अ। उभिज । नि० चू० प्र० ३३५ आ । उभयनिसेहो-उभयनिषेध , सङ्घातपरिशातशून्यं, यस्य स्धू. उभिज- उमेद्या वस्तुलप्रभृतिशाकभर्जिका। पिण्ड णोदाहरणम् । आव० ४६२ । १६८ । उद्भिद्य भुव जाता उद्विजा खजनकादिः । प्रश्न उभयपंता-उभयप्रान्ता-अभद्रिका, अशोभनेत्यर्थः । ओघ० ९० । १५ । उभिजमाण-उद्द्यिमानं-उद्घाट्यमानम् । जीवा० १९१ । उभयपइट्टिते - उभयप्रतिष्ठित -आत्मपरविषयः । ठाणा. उन्भिन्न-उद्भेदनं उद्विग्नं साधुभ्यो धृतादिदाननिमित्तं कुतुपादे १९३ । मुखस्य गोमयांदिस्थगितस्योद्घाटनं तद्योगाद्देयमपि घृतादि | उभयपदव्याहतं-गत्यागतिलक्षणे भेदः । आव० २८१५ उद्भिनम् । द्वादश उद्गमदोष । पिण्ड० ३४ । उभयपदाव्याहतं-गत्यागतिलक्षणे मेद । आव० २८१ । उभिय-उद्भेदनमुद्वित् उद्द्विजन्म येषा ते उद्जिा -पत्ता- | उभयभविए - उभयभविकं-इहपरलक्षणयोर्भवयो यदनुगा- खञ्जरीटपारिप्लवादय । दश० १४१। उद्विज्ज-लवणाक. मितया वर्तते तदुभयभविकम् । भग० ३३ । राद्यत्पन्नम् । आचा० ३५५ । उभयाशया- पञ्चविधाचारपरिज्ञानकरणोद्यतगुर्वादेशादेरन्य- उन्भुतिया-आभ्युदयिकी, देवतापरिगृहीता गोशीर्षचन्दन थाकरणलक्षणया गुरुप्रत्यनीकद्रव्यलिङ्गधार्यनेकश्रमणवत् सत्रा- मयी मेरी । आव० ९७ । ोभयैर्विराध्येत्यर्थ । सम० १३३ । उन्भूयावेउ । दश० चू० ८० । उभयास्तिकः । सम० ४२ । उन्मेति-उच्छ्रयन्ति । आव० ३४२ । ऊर्ध्वयन्ति। उत्त० उमंथण-अवमंथमधोमुखम् । व्य० द्वि० ३२३ आ। उमजायणसगोत्ते-पुष्यनक्षत्रस्य गोत्रम् । सूर्य० १५० । उन्मेहम-उमेद्यं-सामुद्रादि । अप्रासुकम् । दश० १९८ । उमा-प्रद्योतराजधान्यामुजयिन्यां गणिका । आव० ६८६ । उभओ- उभयत -उमौ-शिरोऽन्तपादान्तावाश्रित्य । ज्ञाता० द्विपृष्ठवासुदेवमाता। भाव. १६२ । सम० १५२ । १५ । उमाए-अवमितः परिच्छिन्नो वा। सूर्य० ९५ । उभयं- उभयं-सयमासयमस्वरूपं श्रावकोपयोगि । उमाणं-प्रवेशः स्वपक्षपरपक्षयोर्येषु तानि तथा। आचा. १५८ । सघायसाडण, सङ्घातशातनकरणं, यस्य शकटोदाह- रणम् । आव० ४६२ । उमाव्यतिकर | आचा० १४६ । उभयंभागा - उभयभागा-चन्द्रेणोभयतः - उभयभागाभ्या | उम्मग्गं-विवर उन्मज्यतेऽनेनेति वोन्मज्यम् , ऊर्ध्व वा मार्ग. पूर्वत पश्चाच्चेत्यर्थो भज्यन्ते-भुज्यन्ते यानि तानि उभय. मुन्मार्ग, सर्वथा अरन्ध्रमित्यर्थ । आचा० २३४ । अका- भागानि, चन्द्रस्य पूर्वत. पृष्ठतश्व भोगमुपगच्छन्तीत्यर्थ. । र्याचरणम् । आचा० २०३। उन्मार्ग । आव० ७७८ । ठाणा० ३६८। उभयभागानि - उभयं-दिवसरात्री तस्य मार्गादूर्व, क्षायोपशमिकभावत्यागेनौदयिकभावसटकम । दिवसस्य रात्रेश्चत्यर्थ , चन्द्रयोगस्यादिमधिकृत्य भागो येषा । आव० ५७१। तानि । सूर्य । १०४ । उम्मग्गगो-अडविपहेण गच्छति भहवा अपंथेण चेव । नि. उभयओ-उभयत., उभयो -पार्श्वयो । सूर्य २९३ । चू० प्र० ३१९। उभयकप्पिय - उभयकल्पिक -यो द्वावपि सूत्रार्थी युगपद् उम्मग्गजला- उन्मम जलं यम्या सा उन्ममजला । जं. प्रहीतुं ममर्थ । वृ० प्र० ६३ अ। प्र० २३०॥ - १४७ । दश० [ उम्मग्गदेसणाए आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उयारं ] . - । उम्मग्गदेसणाए-उन्मार्ग देशनया-सम्यग्दर्शनादिरूपभाव- | उम्माय - उन्माद -नष्टचित्ततया आलजालभाषणम् । अस. मार्गातिकान्तधर्मप्रथनेन । ठाणा. २७५ । प्राप्तकाममेद । दश. १९४ । चित्तविभ्रम । ठाणा० १५०। उम्मग्गनिम्मग्गो - उन्ममनिमम-अधिोजलगमनम् । महामिथ्यात्वलक्षण. तीर्थकरादीनामवर्ण वदतो भवत्येव प्रश्न०६३। तीर्थकराद्यवर्णवदनकुपितप्रवचनदेवतातो वा यत् । ठाणा० उम्मजगा- उन्मज्जनमात्रेग ये स्नान्ति । तापसविशेषा । ३६० । सग्रहत्वम् । ठाणा० ३६० । ग्रहो बुद्धिविप्लव. । निरय० २५। भग० ५१९ । ठाणा. उम्मजगो-उन्मज्जक -उन्मजनमात्रेण य स्नाति । औप० । उम्मिमालिणीओ-नदीविशेषः । ठाणा० ८० । उम्मिल्लिजंते-उन्मील्यमाने । आव० ६३ । उम्मजणिमजिय-उन्ममनिमग्निका-उत्पतनिपता। ठाणा० उम्मी- ऊर्मय'-महाकल्लोला । भग. ७११। ऊर्मि - सवाध । औप० ५७ । विचि , तरा। आव० ६.१। १६१ । उम्मजति-स्पृशति । नि० चू० प्र० ११५ अ । ऊर्मिम -सबाधः । भग० ४६३ । कल्लोल । ठाणा० ५०२। सम्बाध , तरङ्ग, कल्लोलाकारो वा जनसमुदाय । भग उम्मज्जा - उन्मजनमुन्मज्जा-नरकतिर्यग्गतिनिर्गमनात्मिका। ११५ । उत्त० २८०॥ उम्मीलिआ-उन्मिषितलोचना । जं० प्र० ५४, २९८ ॥ उम्मत्तजला-रम्यक्विजये महानदी। जं० प्र० ३५२ । बहिष्कृता। ज० प्र० २९७, ५४॥ नदीविशेष । ठाणा० ८० । उम्मीलिय-उन्मीलित-बहिष्कृतम् । सूर्य २६४ । प्रज्ञा. उम्मना-मन्मथोन्मादयुक्ता , विटा । वृ० द्वि० १३८ । ९१ । जीवा० २०९ । उम्मत्तिगा-उन्मत्ता । आव० ४०० । उम्मीसं-उन्मिश्र-शबलीभूतम् । आचा० ३२१ । आगामु- उम्मत्तो-उत्-प्राबल्येन मत्ते उन्मत्ते, दरमत्तो वा उन्मत्तो। कसत्त्वसवलितं सक्तुकादि । आचा० ३२२ । एकीकृत्य । नि० चू० प्र० २७६ आ । ओघ० १६९ । पुष्पादिमम्मिश्रम् , सप्तम एषणादोष । उम्मरीय-उम्बरीय -प्रत्युदुम्बरं रूपको दातध्य टत्येव लक्षण । पिण्ड० १४७ । वृ० तृ. ५१ अ । उम्मुक्को-उन्मुक्त -प्रावल्येन मुक्त , पृथगभूत । आव० ५०८। उम्माओ-उन्माद -क्षिप्तचित्तादिक.। आव० ७५९ । उम्मुग्गा-उन्ममा-नदीविशेष । आव० १५० । उम्माणं-उन्मान-तुलारोपितस्यार्द्धभारप्रमाणता। प्रश्न० ७४ । उम्मुय-औल्मुक । प्रश्न० ७३ । ज० प्र० २५२ । ठाणा० ४६१ । खण्डगुडादि धरिमम् । उम्मूलणा सरीराओ-उन्मूलना शरीरात् , निष्काशनं ठाणा० ४४९ । तुलाकर्षादि तद्विषयम् । ठाणा० ४४९ । जीवस्य देहादिति । प्राणवधस्य द्वितीय पर्याय । प्रश्न०५। नाराचादिः । आचा० ४१३ । तुलाकर्षादि । ठाणा० १९८ । उम्ह-उष्मा-परिताप । बृ० द्वि० १९४ अ । तुलारूपम् । भग० ५४४ । कर्षपलादि खण्डगुडादिद्रव्यमा- उयट्टी-कटी, जवा । उत्त० ११८ । नहेतु । जं० प्र० २२७ । अर्दभारमानता । भग० ११९ । उयत्ति-तेयस्मिणो। नि० चू० प्र० ३०१ आ। अर्द्धभारप्रमाणता । ज्ञाता० ११ । उयत्तिया-अपवत्य । आचा० ३४६ । उम्माणजुत्तो-जइ तुलाए आरोविओ अद्धभार तुलति तो उयरं-जलोयर । नि० चू० प्र० ५८ आ । उम्माणजुत्तो। नि० ० चू० तृ. ६१ अ । पुरिसो तुलारोवितो | उयल्ला-मृता । आव० २७२ । अद्धभार तुलेमाणो उम्माणजुत्तो। नि० चू० द्वि० ८५ आ। उयविय-विशिष्ट परिकर्मितम् । राज. ९३ । उम्माणा-उन्मानानि-तुलायाः कर्षादीनि । ठाण० ८६ । । उयति-एतद्ग्रहे तत्र समुद्देशाप्यते इत्यर्थ । व्य० द्वि. उम्माद-चतुर्दशशते द्वितीय उद्देश । उन्मादार्थाभिधायकत्वा- ४५२ अ। दुन्मादो द्वितीय । भग० ६३० । उयारं-उपकार । (महाप्र.)। । (२००) [ उयाहरे अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उल्लंघणं] सम० उयाहरे-उदाहरेत्-उद्घट्टयेत् । उत्त० ३४५ । उरस्सं-उरसि भव उरस्यम् । जीवा० १२२ । उरसि भत्र उयाहु-उदाहु-उदाहृतवान् । उत्त० २७० । उरस्य-आन्तगेत्साह । ज० प्र० ३८७ । उरं-उर-वक्ष. । आचा० ३८ । उरस्सवल-अन्तरोत्साहवीर्यम् । उपा० ४७ । उरंमुहो-अर्वाङ्मुख । आव० ४२७ । उरस्सबलसमण्णागए - भोरस्यबलममन्वागत -आन्त. उरकंठसिरविसुद्धं-उर कण्ठशिरोविशुद्धम्-यारसि स्वरो रोत्साहवीर्ययुक्त । अनु० १७७ । विशालस्तर्घरोविशुद्धं, कण्ठे यदि स्वरो वर्तितोऽतिस्फुटितश्च ! उरस्सबलसमन्नागए-उरस्यबलसमन्वागत -आन्तरोत्सा- तदा कण्ठविशुद्ध, शिरसि प्राप्तो यदि नानुनासिका। हवीर्ययुक्त । जीवा० १२२ । स्तत शिरोविशुद्धम् , अथवा उर कण्ठशिरस्म श्लेष्मणाऽ उराल-विस्तराल, विशालम् । ठाणा० २९५ । उदार-स्थूलम्। व्याकुलेषु विशुद्धेषु प्रशस्तेषु यद् गीयते तत् । अनु० १३२ । सत्र. ५१ । स्वल्पप्रदेशोपचितत्वात् बृहत्त्वाच्च, मासास्थि उरक्खंधगेवेजय - उरस्कन्धग्रेवेयक-भूषणविधिविशेष । पुयवद्ध यच्छरीर तत्समयपरिभाषया उरालम् । जीवा० २६८ । १४२ । घडियं आभरणादि । नि० चू० प्र० ८२आ । प्रधान । उरक्खय-उर क्षत-उरोविघात , हृदयबावा। विशे० १३१॥ सूर्य० ५। ठाणा० ५०३। आव. २८७ । वनस्पति- उरगपरिसप्पा-उरो-वक्षस्तेन परिमर्पन्तीति उर परिसर्या । विशेष । प्रज्ञा० ३३ । गोभनो मनोनो वा। सूत्र. १८४ । उत्त० ६९९ । अत्यन्तोइट , समग्रमामग्रीक., मधुमद्यमामायुपेत । सत्र० उरगविही-शुक्रस्य महाग्रहस्य षष्ठी विथी । ठाणा० ४६८ । ३२५ । उरत्थ-उरस्थः, वक्षोभूषणविशेष । ज० प्र० २१३ । आचा० । उराला-उदारा -बादरा । ठाणा० १६१ । ४२३ । हृदयाभरणविशेष । ज. प्र. १.५ । उरिणणं । ओघ० १६६ । उरपरिसप्पा-उरमा-वक्षमा परिमार्पन्तीति उर परिमार्पा.- उरितिय-उरमि त्रिकम् । औप० ५५ । सोदय । ठाणा० ११४ । सम० १३५ । उरमा परि- उरुमेह-अवतारयति । आव० ४०८ । सार्पन्तीति उर परिमर्पा । प्रज्ञा० ४५ । उरोविघातः-उर क्षतं, हृदयवावा ।-विगे. १३१ । उरब्भ-उरभ्र -ऊरण । जं० प्र० ३१ । जीवा० १८९। उरोहओ-अतेपुर । नि० चू० तृ. ४१ अ । उरभरुहिरं-उरभ्ररघिरम् । प्रजा० ३६१ । उर्वशी-अरणि । नंदी १९ । उरभिजं-उत्तराभ्ययनस्य सप्तममध्ययनम् । उत्त० २७१ । उलग्गंति-अवलगन्ति । आव० ३९६ । सम० ६४ । उलजायगं-वीरलो । नि० चू० प्र० १५५ अ । उरलं-विरलप्रदेशम् । प्रज्ञा० २६९ । अल्पप्रदेशोपचितत्वाद् उलूक-ऊर्चकर्ण । अनु० १५० | मतविशेष । आव० ३७६ । - , बृहत्त्वाच । ठाणा० २९५ । उरविसुद्ध-ययुरसि स्वरो विशाल स्तर्हि उरोविशुद्धम् । अनु० उलूगि-उलकी, तत्प्रधाना विद्या । आव० ३१९ । उलूयपणीयं-उलूकप्रणीतं-वैशेषिकप्रणीतम् । आव० ३२१ । १३२ । उलोट्टए-अपवर्जन्ते । प्रश्न० ८६ । उरसे-उपगतो-जानो रसः-पुत्रस्नेहलक्षणो यस्मिन् पितृ. 'उल्मुकं-अलातम् । ओघ० १७ । प्रज्ञा० २९ । दश० १५४ ॥ स्नेहलक्षणो वा यस्यासावुपरम , उरसि वा-हृदये स्नेहा- उल्कादि । आव० ५८८ । द्वर्तते य म ओरम । पुत्रस्य पञ्चमो भेट । उरमा वर्तत उलं-आई-प्रचुरव्यञ्जनम् । दग० १८१ । इति ओरसो-बलवान । ठाणा. ५१६ । उल्लंघणं-अर्व लखनम् । भग० ९२५ । उहन-कटमा- उरशुद्ध-यारमि स्वरो विशालस्तर्हि उरोविशुद्धम् । जं. दीनामतिक्रमणम् । औप. ४२ । सहजात्' पादविक्षेपान्म- नागधिकतर पाठविक्षेप उठानम् । प्रना०६०६। उल- उरस्ताडं-वक्षस्ताडम् । नदी १५७ । धन -वालादीनामुचिनप्रतिप्रत्यकरणतोऽध कर्ता । वत्सडिम्मा- प्र० ४० । (२०६) [ उल्लंडेड आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उल्लोभ ] ५१९ । - । दीना चण्डश्चारभटवृत्त्याश्रयणत: । उत्त० ४३४ । तथाविध- | उल्लालेमाणे-उल्लालयन्-ताडयन । जं० प्र३९७ । निमित्तत ऊर्ध्वभृमिकाद्युत्क्रमणे गायतिक्रमणे वा । उत्त० उल्लाव - उल्लाप -वचनम् । उत्त० ३३४ । काक्कावर्णनम् । ठाणा. ४०७ । काक्कावर्णनम् । ज्ञाता. ५७ । भग० ४७८ । उल्लंछेइ-विगतलाञ्छन करोति । ज्ञाता. ८८ । प्रतिवचनम् । ओघ० ५२। उल्हापम् । आव. २२३ । उल्लंट-उच्छृङ्खल. | आव० ३८४ । काक्कावर्णनम् । औप० ५७ । उलंडगा-मृद्गोलका । नि० चू० प्र० ३५६ आ। उल्लावितो-उल्लापयन् । उत्त० ८५ । उल्लंडणा-उल्लघणा। दश. चू० ७७ । उल्लिंचइ-उल्टिश्चति-आकर्षति । पिण्ड० ११८ । उल्लंडा-मृद्गोलका । वृ० द्वि० २७१ आ । उल्लिंचण-उदकनिष्काशनम् । नि० चू० प्र० २०७ आ । उल्लंवण-उल्लम्बनं-वृक्षशाखादावुद्वन्धनम् । सम० १२६ । उल्लंवियगा- अवलम्बितका उल्लिंचाविजिहिति । ओघ० ३३ । रज्ज्वा बद्धा गाढाववता- रिता. । औप० ८७॥ उल्लिउ-उल्लिखित । उत्त० ४६० । उल्लिय-आर्द्र । आव० ६.१। उल्ल-आर्द्र । ओघ० १८८ । उत्त० ५३० । भग० २३२ । उलिहावेइ-चुम्बयति-आस्वादयति। आव० ६८० । आर्द्रा स्तिमितसकलचीवरेतियावत् । उत्त० ४९३ । उल्ली - पनक । ठाणा० ४३० । पणगो। नि० चू० प्र० उल्लग-आर्द्र । आव० ६२१ । २५५ आ। पणओ। दश० चू. ८० । उल्लगजाति-वीरल्लगसउणो । नि० चू० प्र० २०४ आ। उल्लीण-अपह्राम । ( मर०)। उल्लच्छणा-अपवर्तना, अपप्रेरणा । प्रश्न० ५६ । उल्लीना-उपलीना-प्रच्छन्ना। आचा० ३७१ । उल्लण-येनौदनमार्दीकृत्योपयुज्यते उल्टणम् । पिण्ड० १६८ । उल्लाराइ। ओघ १३७ । ओघ० १४६ । उल्लणिया-स्नानजलाशरीरस्य जललूषणवस्त्रम् । उपा० ४ । उल्लुका-जनपदो नदीविशेषश्च । विशे० ९२७। नीवि. शेष । विशे० ९२७ । उल्लदेत्ता-अवलाद-उत्तार्य । आव० २९१ । उल्लपडसाडो-आर्द्रपटशाटक । आव० २११ । उल्लुकातीरं-उल्लुकानद्या समीपे नगरविशेष । धूलिप्रा- उल्लपडसाडगो-आर्द्रशाटिकापट । आव० ६८७ । कारातत्वात् खेटमुच्यते। विशे० ९२७ । उल्लपडसाडया-स्नाने ना पटगाटिके-उत्तरीयपरिधानवस्त्रे। उल्लुगं-अवरुग्णम्-भग्नम् । प्रश्न० २२ । ज्ञाता० ८४ । उल्लुगतीरं - उल्लुकतीर-उल्लु कानद्याम्तीरे नगरविशेष । उल्लल्लिया-चलिता। वृ० द्वि० १४९ आ। उत्त० १६५। १६५। आव० उल्लवइ-उत्-प्रावल्येनासम्बद्धभाषितादिरूपेण लपति-वक्ति | उल्लुगा - उल्लुका-नदीविशेष । उत्त० उल्लपति। उत्त० ३४४ । ३१७ । उल्लवितं-उलप्तम् । आव० ३४३ । उल्लुगातीरं - उन्ल कातीरम् । पञ्चमनिहवोत्पत्तिस्थानम् । उल्लविय-उल्लपितम्-मन्मनभाषितादि । उत्त० ४२८ । विशे० ९३४ । आव० ३१२, ३१७ | उल्लत-उल्लापयन् । आव० ६९२ । उल्लुग्गंगी-म्लानाङ्गी । आव० ३९४ । उल्लति-आलापयन्ति । ( गणि.)। उल्लुण्हि-शिम्बी । नि० चू० द्वि० १४४ आ । उल्लनेइ-उल्लपति 1 आव० २१६ । उल्लुयतीरे - उल्लु कतीर-उल्लुकानद्यास्तीरे नगरविशेष । उल्लवेयवो-विध्यापयितव्य । आव० ३८४ । उल्लहिजंति-उल्लिख्यमाना। आव० २०० । उल्लूहं । ओघ० १५८ । उल्ला-तिता। नि० चू० प्र० ४६ अ। आई । आव० ६२२। उल्लेति-आर्द्रयति। आव० १०१। उल्लाट्टा-प्रत्यावर्त 1 व्य० प्र० १६७ आ। उल्लोअ-उलोक -उपरिभाग. । ज० प्र० ३०१ । भग. ७०५1 (२०२) re [ उल्लोइआ अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उवकप्पिया ] - उल्लोइआ-उन्नोऽयमिव उल्लोडअ च मेटिकादिना कुड्यादिषु उवएस-उपदेश -आदेश । व्य० प्र० १० आ । गुरुणा- धवलनम् । ज० प्र० ७६ । ऽनुजात । ओघ० १५१ । हिताहितप्रवृत्तिनिवृत्त्युपदेश- उल्लोइयं-मेटिकादिना कुड्याना यवलनम्। भग० ५८२ । नादुपदेश. । अनु० ३८ । अन्यतरक्रियाया प्रवर्त्तनेच्छो- कुज्याना मालम्य च सेटिकादिभि सभृष्टीकरणम् । जीवा० त्पादनं उपदेश । वचनविभक्तेर्द्वितीयो भेद । अनु० १३४ । १६० । राज. ३६। सम० १३८ । कुड्यमालाना सेटि. यथा आत्मा न वध्यत इत्यादिविषय । दश. १२० । कादिभि ममृष्टीकरणम् । औप० ५। कुड्याना मालस्य उपदेश -गुर्वादिना वस्तुतत्त्वकथनम् । प्रज्ञा० ५८ | श्रुतस्य च सेटिकादिभि समृष्टीकरणम् । जीवा० २२७ । प्रजा० ८६ । पर्याय । विशे० ४२३ । कथनम् । आव० ६०४, २६५ । उल्लोए-उल्लोक , उल्लोच । भग० ६४५। उपरिभाग । ६४५ । उपरिभाग । उवएसदश्वमूलं-उपदेशद्रव्यमूलं-यचिकित्मको रोगप्रति- ज० प्र० ४९, ४००। जीवा२०५। उल्लोच -चन्द्रो- घातसमर्थ मूलमुपदिशत्यातुरायेति । आचा० ८८ । दय । सूर्य० २९३ । उन्लोक --उपरिननभाग । जीवा० । उवएसरुई-उपदेशो-गुर्वादिना वस्तुतत्त्वकथनं तेन रचि २०९, ३६५ । जिनप्रणीततत्त्वामिलाषरूपा यस्य स उपदेशरुचि । प्रजा. उल्लोय - उल्लोक -उपरिभाग । भग० ५४० । उद्देश । भग. ६५९। लेगोद्देश । वृ० प्र० २५० आ। उल्लोयगं-उल्लोचम् । आव० १२४ । उवएसिया-उप-मामीप्येन देशिता उपदेशिता । आव० उल्लोलिया-मलगुटिका । गुटिका। आव० ६८० । उल्लोलेइ-उत्लोडयत् । आचा० ४२ । उवओग-उपयोग -स्वस्वविषये लक-यनुसारेणात्मन परि- उल्हविजंतो-विभ्यापित । आव० ३८४ । च्छेदव्यापार । जीवा० १६ । उपयोजनमुपयोग -विवक्षित- उवंगा - उपाशानि - शिक्षादिषडनार्थप्रपवनपरा प्रवन्धा । कर्मणि मनसोऽभिनिवेश । नदी १६४ । ज्ञान, संवेदन, भग० ११४ । शिक्षादिषडगव्याख्यानरूपाणि । अनु० ३६। प्रत्यय । विशे० ३६ । साकारानाकारमेदं चैतन्यम् । ठाणा. उवंगाई-उपाङ्गानि-अङ्गावयवभूतान्यगुल्यादीनि । प्रना ३३४ । जीवस्य बोधरूपो व्यापार । अनु० १६ । अवहित. त्वम् । उत्त० ५६१। भावेन्द्रियस्य द्वितीयो भेद । भग०८७॥ उंव - उप-मामीप्यार्थः । प्रना. ४ । दशः १४५। भग० मनि । ओघ० ११६ । उपयोग -लब्धिनिमित्त आत्मनो ३७। उपमेतिवत्मादृश्येऽपि दृश्यते । उत्त० २३५ । सकृदयें, मनस्साचिव्याद् अर्थग्रहणं प्रति व्यापार । आचा० १०४ । अन्तर्वचन । आव० ८२८। अभ्यधिक पुन पुन । उपयोग -आन्तरः श्रुतपरिणाम । विशे० २९७ । चेतना- उत्त० ६४४। विशेप । भग. १४९ । चैतन्य माकारानाकारभेदम् । उवइअ-उपचिती, उन्नती, औपयिकी, उचितौ, अवपतिती, भग० १४८ । उपयोजनमुपयोग:-विवक्षिते कर्मणि मनमो. क्रमेण हीयमानोपचयो। जं० प्र० ११२ । मिनिवेश । आव. ४२६ । विपाकानुभवनम् । दा० उवइगं-उद्देहिका । नि० चू० प्र० ५७ आ। ८६ । श्रोतुस्तदभिमुखता। आव० ३४१ । सावधानता। उवइजा-अवपतेत, आगच्छेत् । आचा० ३६५। औप० ४८ । स्वाध्यायागुपयुक्तता । उत्त० १४५ । स्वस्त उवइस्सइ-उपदिश्यते-श्रोतृभावापेक्षया सामी'येन कथ्यत । विपये लब्भ्यनुमारेणात्मनो व्यापार प्रणिधानम् । प्रना दश० ११० । २९४ । प्रजापनाया एकोन त्रिंशत्तमं पदम् । प्रना० ६ । उवउग्गहकरो-किरियापरो । नि० चू० प्र० २६६ अ । उपयोजनं उपयोग भावे घन्, यहा उपयुज्यते-वस्तुपरि- उवउत्त-उपयुक्त.-अनन्यचित्त । दश. १०६ । अवहित । च्छेद पनि व्यापार्यते जीवोऽनेनेत्युपयोग . 'पुनाम्नि घ' इति भग० ८९ । णमोकारपरायणो । नि० वृ० प्र० ४७अ । उप करणे घप्रत्ययो बोवस्पो जीवस्य तत्त्वभूतो व्यापार । प्रजा० युक -अमिष्वगवान । भग० ९०५ । व्यापृतः, निष्टा गत । ५२६ । दा० १०८ । विगे० ९७४ । अभ्यवहृतम्। आचा० १७६ । उवकप्पिया-उपकत्पिता । उत्त० २८७ । - (२०३) WMM [ उवकरण आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उवकस] नेत्युपक्रम -- उवकरण-उपकरण-अजादानाख्य । वृ० तृ० ९८अ । उप-' ऽस्मिन शिष्यश्रवणभावे सतीति, उपक्रम्यतेऽस्माद्विनीतविनेय. करणं-पलानाद्यवस्थायामन्येनोपकारकरणम् । प्रश्न. १२९ । विनयादिति वा । अनु० ४५। विशे० ४३० | उपक्रमग- उपधि । परिग्रहम्य पञ्चदश नाम । प्रश्न० ९२ । अङ्गम् । मुपम इति भावसाधन व्याचिख्यासितशास्त्रम्य समीपा- भग० २२४॥ नयनेन निक्षेपावसरप्रापण, उपक्रम्यते वाऽनेन गुरुवाग्योगे- उवकरणपणिधाणे-उपकरणस्य लौकिकलोकोत्तररूपस्य वस्त्र- इति करणसाधन', उपक्रम्यतेऽस्मिन्निति वा पात्रादे मयमासयमोपकाराय प्रणिधानं-प्रयोग उपकरण शिष्यश्रवणभावे सतीत्युपक्रम इत्यधिकरणसाधन , उपक्र- प्रणिधानम् । ठाणा० १९६ । म्यतेऽस्मादिति वा विनयविनयादित्युपक्रम इत्यपादानमाधन उवकरणसंवरे- उपकरणसवर ~अप्रतिनियताकल्पनीयव इति । जं० प्र०. ५ । उपक्रम्यते-क्रियतेऽनेनेन्युपक्रम : खाद्यग्रहणरूपोऽथवा विप्रकीर्णस्य वस्त्राद्युपकरणस्य सवरणम् । कर्मणो बद्धत्वोदीरितत्वाग्निा परिणम नहेतुर्जीवस्य शक्ति- ठाणा० ४७३ । विशेषो योऽन्यत्र करणमिति रूढ , वन्धनादीनामारम्भ । उवकरिंसु-अवकीर्णवन्त । आचा० ३११ । ठाणा. २२१ । वस्तुपरिकर्मरूप । ठाणा० २२१ । अप्रा- उवकरिज-उपकुर्यात्-ढौकयेत् । आचा० ३५१ । प्तकालस्य निर्जरणम् । भग० ७१५ । आनुपूर्व्यादि । सम. उवकरेउ-उपकरोतु । उपा० १५ । ११५ । निरुक्तिस्तु उपक्रमगं उपक्रम इति भावमाधन , उवकरणे-उपकरणे । वृ० द्वि० २८१ अ । शास्त्रस्य न्यासदेशसमीपीकरणलक्षण , उपक्रम्यते वाऽनेन गुरु उवकुलं-कुलस्य समीपं उपकुलम् । जं० प्र० ५०६ । वाग्योगेनेत्युपक्रम इति करणसावन , उपकम्यतेऽस्मिन्निति उवकुला-उपकुलानि । सूर्य. १११ । वा शिष्यश्रवणभावे सतीत्युपक्रम इत्यधिकरणसाधन , उप- उवकोसा-कोशाया लघ्वी भगिनी उपकोशा | आव० ६९५ । कम्यतेऽस्मादिति वा विनीतविनेयादित्युपक्रम इत्यपादान आव० ४२५ । इति । ठाणा० ४ । कर्मोंदीरणकारणम् । ठाणा० ८९ । उवकम-उपक्रमण-आयु पुद्गलाना सवर्तनं समुपस्थितं । उवक्कमकाल - उपक्रम काल अभिप्रेतार्थसामीप्यानयन. तत् । आचा० २९१ । उपक्रमणमुपक्रम , उपक्रम्यतेऽनेना लक्षण । विशे० ८३७ । अभिप्रेतार्थमामीप्यानयनलक्षग. स्मादस्मिन्निति चोपक्रम -व्याचिख्यासितशास्त्रस्य समीपा सामाचार्यायुष्कमेदभिन्न । दश. ९ । नयनम् । आचा० ३ । उपक्रमणं उपक्रमः-दीर्घकालभा उवक्कमिओ-औपक्रमिक -दण्ड कशशास्त्रादिनाऽसातवेदनीयो- विन्या' स्थिते स्वल्पकालताऽऽपादनम् । उत्त० ३२१ । दयापादक । सूत्र. ७८ । उपेति-सामीप्येन क्रमण उपक्रम -दूरस्थस्य समीपापादनम्।। उवकमिया-उपक्रम गमुपकम -स्वयमेव समीरे भवनमुदी- ओघ० १ । उपायेन परिज्ञानम् । ठाणा० १५५ । उपाय रणाकरणेन वा समीपानयनं तेन नियंता औपक्रमिकी । पूर्वक आरम्भ । ठाणा० १५४ । प्रकृत्यादित्वेन पुद्गलाना प्रज्ञा० ५५७ । औपक्रमिकी। सम० १४६ । प्रना० ५५४ । परिणमनसमर्थ जीववीर्यम् । ठाणा० २०१ । अभिप्रेतार्थ उपक्रमेण-कर्मोदीरणकारणेन निता तत्र वा भवा औपक. सामीप्यानयनलक्षण । आव० २५७ । कालगमनम् । बृ० मिकी-ज्वरातीसारादिजन्या । ठाणा ८९ । कर्मवेदनोपाय- द्वि० २३० अ । नाश' । (आउ०)। उप-सामीप्ये, 'कमुपा स्तत्र भवा औपक्रमिकी स्वयमुनीर्गस्योदीरणाकरणेन चोद- दविक्षेपे' उपक्रमणं दूरस्थस्य शास्त्रादिवस्तुनस्तैस्तै प्रतिपा यमुपनीतस्य कर्मणोऽनुभव । भग० ६५। स्वयमुदीर्णस्यो- दनप्रकार समीपीकरण-न्यासदेशानयनं निक्षेपयोग्यताकर दीरणाकरणेन चोदयमुपनीतस्य वेद्यस्यानुभवात् औपकमिकी । णमित्युपक्रम :-विशे० ४३० । कर्मवेदनोपाय । भग० ६५ । स्वयमेव समीपे भवनमुदीरणाकरणेन वा समीपान उवकम्म-उपक्रम्य-आगत्य । सूत्र. ३५६ । यनम् । प्रज्ञा० ५५७ । उपक्रम -दूरस्थस्य वस्तुनस्तैस्त उवक्कयं-उपस्कृत-नियुक्तम् । जीवा० २६८ । प्रतिपादनप्रकारैः समीपमानीय निक्षेपयोग्यताकरणं, उपक्र- उवकेस - उपक्केशा -कृषिपाशुपाल्यवागिज्याउनुष्टानानुगता म्यते-निक्षेपयोग्य क्रियतेऽनेन गुरुवाग्योगेनेति, उपक्रम्यते । पण्डितजनगहिता शीतोष्णश्रमादयो घृतलवगचिन्ताद- 4 भग० ४९७ । - (२०४) [ उवक्खड अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उवग्गह ] । - ठाणा० २२० । यश्च । दश० २७३। उपक्लेग -स्वगतंशोकादि । भग कवलकार्गलादि। आचा० ६० । उपकरोतीति उपकरणम् । ९२५ ओघ० २०७। वस्त्रादि । भग० ७५० । धर्मशरीरोपष्टम्भहेतुः । उवक्खड - उपस्कृत - उपस्कर्तुमारब्धम् । पिण्ड० ६५ । उत्त० ३५८ । अनेकविध कटपिटकशूर्पादिकम्। अनु० १५९ । उपस्करणमुपस्कृतं-पाक । ठाणा० २२० । लवणवेसवारादि रजोहरणदण्डकादि । ओघ०१२५ । द्रव्येन्द्रियस्य द्वितीयो मेद.। सस्कृतम् । उत्त० ३६० । भग० ८७ । प्रज्ञा० ०३ । खड्गस्थानीयाया बानिवृत्तेर्या उवक्खडणसाला-महाणसो । नि० चू० प्र० २७२ आ। खड्गधारास्थानीया स्वच्छतरपुद्गलसमूहात्मिकाऽभ्यन्तरा- उवक्खडाम-जहा चणयादीण उवक्खढियाण जेण सिज्झति निवृत्तिस्तस्या शक्तिविशेष । जीवा. १६ । हस्त्यश्वरथासन- ते ककया न उवक्सडियाम भण्णति । नि० चू द्वि. ! मञ्चकादि । आचा० १०० । औपप्रहिकम् । उत्त० ३५८ । उवगरणपडिया - उपकरणप्रतिज्ञा-उपकरणार्थिन समा- १२५ अ। उवक्खडियं । ओघ १६० । गन्छेयु । आचा० ३८४ । उवक्खडेति-उपस्कुर्वन्ति । आव० २९१ । उवगरणसंजमे-उपकरणसयम -महामूल्यवस्त्रादिपरिहार , पुस्तक्रवस्त्रतृणचर्मपञ्चकपरिहारो वा। ठाणा० २३३ । उवक्खडे-उपस्कृतानि-नियुक्तानि । ज० प्र० १०५ । उवक्खडेउ--उपस्करोतु-राध्यतु । उपा० १५ । उवगरयं(वरए)-अपवरकम् । आव० ६६६ । उवक्खडेजा-तदशनादि पचेत् । आचा० ३५१ । उवगसित्ताणं-उपसप्लिष्य, समीपमागत्य। सूत्र० १०७ । उवक्खरो-मपर्णादिक । नि० चू० प्र० ३५६ अ । उपक- उवगहिओ-उपगृहीत --उपकृत । आव० ७६८ । उपप्र- हित । आव० ७९३ । रणम् । (मर०)। उपस्क्रियतेऽनेनेति उपस्कर -हिङ्ग्वादि । । उवगा-उपगा--प्राप्ता । प्रज्ञा० ७०। उपगच्छन्ति-तदेक- चित्ततया तत्परायणो वर्तन्ते। जीवा० २६० । उवग--गा। वृ. द्वि. ३१ अ! उवगओ-उपगत । आव० ४०० । सामीप्येन कर्मविगमः . उवगारग्ग-उपकाराग्रं यत्पूर्वोक्तस्य विस्तरतोऽनुक्तस्य च प्रतिपादनादुपकारे वर्तते तद् । आचा० ३१८ । लक्षणेन प्राप्त । आव० ३८६ । उवगारियलेणा - औपकारिकलयनानि-प्रामाठादिपीठक- उवगच्छया-कक्खा। नि. चू, प्र. २५५ अ । त्पानि । भग० ६१७ । उवगत-उपगत । आव. ३०८ । उपगत -आश्रित । उवगारिया-राजधानीस्वामिसत्कप्रासादावतंसकादीन् उपक- उत्त. १७८ । रोति-उपष्टभ्नातीति उपकारिका-राजधानीस्वामिसत्कप्रासा- उवगम-उपगच्छति-सादृश्येन प्राप्नोति । उत्त० २३५ । दावतंसकादीना पीठिका। जीवा० २२२ । पीठिका। राज० उवगमण-उपगमनं-अवस्थानम् । सम० ३५। अस्पन्द. तयाऽवस्थानम् । भग० १२० । उवगिण्हह-उपगृणीत-उपष्टम्मं कुरुत। भग० २१९ । उवगयं-उपगन-सामीप्येनात्मनि शब्दादिज्ञानं परिणतम् । । उवगृहिअ - उपगृहिन-परिष्वक्तम्। मम्प्राप्तकामस्य पष्टो नदी १८० । मृतम् । पिण्ड. १३४। उपगत--ज्ञातम् । मेद । दश० १९४ । उवगो-अन्यगच्छीय साधु । वृ० तृ० २१० अ। खुट्टा उवगरण-चोलपट्टको रजोहरण नैपद्याद्वयोपेतं मुखवत्रिका कुमारो वा । नि० चू० प्र० उपलक्षणत्वादौष्णिकसौत्रिकी च कल्पी । वृ० प्र० २९५ अ । उवग्गं-उपान-समीपभूतम् । आव० ४०७ । दडकं रजोहरण च । वृ० प्र० ७१ आ। उपकरण-औपाहिः उवग्गछाया-छायाभेद । सूर्य० ९५ । कम् । प्रश्न. १५६ । उपकरण-उपधिरेव । आव. ५६८ । उवग्गह-उपग्रह -शिष्याणामेव ज्ञानादिपु मीदतामुपष्टंभक- आवरणप्रहरणादिकम् । भग० ९४ । लौहीकडच्छुकादि । रणम् । व्य० प्र० १७२ अ। उपष्टम्भ । पिण्ड० २७। भग. २३८! कटादिकम् । भग. ३२२ । व्यजनकटक उपगृह्णातीति उपग्रह । ओघ० २०७। गिष्याणा भक्ता- ८१॥ आव. ८१२। ८८ अ। (२०५) [ उवग्गहितो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उवचिन] ठाणा. - २१० अ। १०८। अनादिदानेनोपष्टम्भनम् । प्रश्न. १२६ । अनाचार्याणामन्य. उत्त० ५१८ । पिण्डादेरकत्पनीयताकरण, चरणम्य वा शबली- गणसत्काना दिग्वन्ध कृत्वा धरणम् । व्य० प्र० २३५ अ । करण, आधाकर्मत्वादिभिर्दुष्टता। ठाणा० १५९ । ग्रहणम् । ओघ १४७ । वत्रादिभिस्पष्टम्भ । उवघायजणयं-उपघातजनकं सत्त्वोपघातजनकम् । सूत्रदोप- ३३२ । अवष्टम्भम् । ओघ० १५४ । उपगृहातीति उपग्रह विशेष । आव० ३७५ । मत्त्वोपघातादिप्रवर्तकम् । विशे० मतादि । भोघ० १८३ । उचग्गहितो - उवजति उवग्गदिनो। नि० चू० द्वि. उवघायणामे-यदुदयात् स्वशरीरावयवेरेव शरीरान्त परि- वर्द्धमान प्रतिजिह्वागलवृन्दलम्बकचोरदन्तादिभिरुपदन्यते, १11आ। उवग्गहिय-औपग्रहिक्म् । ओघ० २१७ । उपधि । उत्त० यहा स्वयंकृतोद्वन्धनभैरवप्रपातादिभिरुपयातनाम । प्रजा. ४७३ । उवग्गहोवही-औत्पत्तिक कारणमपेक्ष्य सजमोपकरण इति उवधायनिस्सिय-उपधातनिमृता-मृपाभापा भेद । दशक गृह्यते । नि० चू० प्र० २०९। १७९ अ । उपग्रहोपधि -उपधे- द्वितीयो भेद । अवग्रहोपधि -य कारणे आपन्ने सयमा उवघेत्तु-उपग्रहीतु, सस्थापयितु, निर्वापयितुं वा । वृ० द्वि० गृह्यते स । ओघ० २०८ । उवग्गाहियं-औपग्रहिक, सामुदानिकम् । उत्त उवचए-उपचीयते-उपचयं नीयतेऽनेनेति उपचय -पुद्गल- उवग्गे-उपाने-समीपभूते । विशे० ११७८ । प्राप्ते । (महाप्र०) सङ्ग्रहणसम्पत , पर्याप्तिरिति । प्रज्ञा० ३०९ । प्राभूत्येन चय । प्रज्ञा० ४३२ । स्वस्यावाधाकालस्योपरि ज्ञानावर- उवग्घाय - उपोद्घात.-उपोद्घनन- व्याख्येयस्य सूत्रस्य णीयादिकर्मपुद्गलाना वेदनार्थ निषेक । प्रज्ञा० २९२ । व्याख्यानविधिसमीपीकरणम् । विशे० ६३८ । अनु० २५८ । उवचओ-उपचय -प्रभृततरा वृद्धिः । पिण्ड० ४१। परिग्र- उचग्घायनिज्जुत्तिअणुगमे - उपोद्घननं - व्याख्येयस्य हस्य चतुर्थ नाम । प्रश्न० ९२ । सूत्रस्य व्याख्याविधिसमीपीकरणमुपोद्घातस्तस्य तद्विषया उवचयति - उपचीयते-विशेषत उपचयमायाति । वा नियुक्तिस्तद्रूपस्तस्या वा अनुगम उपोद्घातनियुक्त्य- २२८ । नुगम । अनु० २५८ । उपोद्घातनियुक्त्यनुगम , नियु उवचरंति- उपचरन्ति-उपसर्गयन्ति । उप-सामीप्येन मासा- क्त्यनुगममेद. । आचा० ३ । दिकमश्रन्ति अथवा श्मशानादौ पक्षिणो गृध्रादय उपचरन्ति उवघाइयणिस्सिया- उपघातनि मृता चौरस्त्वमित्याद्य इति । आचा० ३०८। +याख्यानम् । प्रज्ञा० २५६ । उवचरप-उपचरक-चर । आचा०३७७ । उपचारक। उवधाइयाआरोवणा-सार्द्धटिनद्वयस्य पक्षस्य चोपघातनेन आचा० ३६५. लघूना मासादीना प्राचीनप्रायश्चित्ते आरोपणा उपघातिका- उवचरगो-राजछिद्रान्वेषी । नि० चू० प्र० ३३५ अ । रोपणा। समः ४७ ॥ उवचरितु-गृहीत्वा । नि० चू० प्र० २१ अ । उवघात- उपधातो-पीडा व्यापादन वा। नि० चू० प्र० उवचार - उवचरति-पडिजागरति, उवचरति पुन्छति, १३७ आ। अशुद्धता। ठाणा० ३२०। सत्त्वधातादि । लोगोपचारमात्रेणागच्छति, माणं मजाया चेव ज गिला. सूत्रम्य द्वात्रिंशद्दोपे द्वितीय । अनु० ०६१ । वाधा। ओघ० णम्स वटियव्व एस, जानादिक तस्समीपादीहतीत्यर्थ , पच्छित्त १३७। मा मे भविस्सतित्ति निजरार्थ एस उपचार । नि० चू० प्र० उवघातनिस्सिते- उपघाते--प्राणिवधे निश्रित-आश्रित उप १९ अ। ग्रहण अधिगमेत्यर्थ । नि० चू० प्र० २० आ। घातनिधितं दशम मृपा। ठाणा० ४८९ । उवचारमेत्तं-कल्पनामात्रं । नि० चू० प्र० २१ अ । उवधाय-उपघात -प्रतिसेवणादि। ओघ० २२५ । मर्वतो उवचिअं- उपचित-सावितम् । आव० १७६ । परिकर्मि- घातनम् । १३७ सयमात्मप्रवचनवाधात्मक । तम् । औप० १७॥ प्रजा० प्र० (२०६) [ उवचिप अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः उवट्ठाणं ] 1 भग - उवचिए-उपयोभित-मृत । ज० प्र. २९२ । उपचित- । पज्योतिष्का -अग्निममीपवर्तिनो महानमिका ऋत्विजो वा। समृद्ध । ज्ञाता० ९८ । उत्त० ३६४ । उवचिओ- उपचित -निवेशित । प्रना. ८६। जीवा० । उवज्झाए-उपाध्याय । प्रज्ञा० ३२७ । अध्यापक । आव० २०७, १६०। ३५३ । उवचिजति-निषेकरचनत निकाचनतो वा उपचीयन्ते । उवज्झाओ - उपयोगपूर्वक पापपरिवर्जनतो ध्यानारोहणेन भग० २५३ । कर्माण्यपनयतीति उपाध्याय | आव० ४४९ । उवचिट्ठइजा-उपतिछन्-विनयेन सेवेत । दश० २४५ । उवज्झाय-उपाध्याय -उप-समीपमागत्य अधीयते-पठ्यते उवचिण - उपचितवन्त --परिपोषगत । ठाणा० १७९ ॥ यस्य. स , उप अधि-आधिक्येन गम्यते स , उप अधि- उपचयनं-चितस्यावाधाकाल मुक्त्वा ज्ञानावरणीयादितया आधिक्येन स्मर्यते सूत्रतो जिनप्रवचनं यस्मात् स , उपाधि - निषेक । ठाणा. १९५। परिपोपणम् । ठाणा० ४१७ । सन्निधिस्तेन तत्र वा आय -लाभ श्रुतस्य यस्य, उपा- वीना-विशेषणाना आयो-लाभ यस्मात् म , उपाधिरेव- उवचिणाइ - प्रदेशवन्धापेक्षया निकाचनापेक्षया वेति । मन्निधिरेव आय-इष्ट फल दैवजनितत्वेन आयाना इष्टफ. १०२ । उवचिणिंसु-उपचितवन्तः । ठाणा० २८९ । लाना समूहस्तटेकहेतुत्वाद् यस्य, आवीना-मन पीडाना आयो-लाभ आन्याय , अधिया-कुवुद्धीना आयोऽध्याय उचिय-उपचित-तेजितम् । प्रज्ञा० ९१। उपचित-परि- दुर्थ्यानं वाऽव्याय, उपहत आध्यायो वा अध्यायो कर्मितम् । राज. ३७ । जीवा० २१० । युक्तम् । जीवा० येन म । भग ३। सूत्रदाता। ठाणा. २९९। २०४ । मासलम् । जीवा० २७१ । समानजातीयप्रकृत्यन्त- आचारगोचरविनयं स्वात्याय वा आचार्यादनु तस्मादु- रदलिकमक्रमेणोपचय नीत । नीत । प्रज्ञा० ४५९ । मृत । पाधीयते सग्रहोपग्रहानुग्रहार्थ वा । तत्त्वा० ९-२४ । उप- ४२ । परिकर्मितम् । भग० ५४० । विशिष्ट गम्योपेत्य यतो येभ्योऽधीयते पठन्ति शिष्यास्त उपाध्याया , परिकर्मितम् । राज. ९३ । उपचय -पौन पुन्येन प्रदेशा- यच्च यस्मादुप-समीपे गतं-प्राप्त शिष्यमभ्यापयन्ति तत नुभागाटेवर्धनम् । भग० ५३ । औपचयिक -उपचयनित उपाध्याया , यस्माच्च स्वपरहितस्योपायभ्यायका उपायचि- औपयिको वा-उचित । प्रश्न० ८१ । निवेशित । औपक न्तकास्ततस्त उपाध्याया । विशे० १२३० । सूत्रार्थतदु- ५। बहुग प्रदेशमामीप्येन शरीरे चिता एवेति । भग० भयविद ज्ञानदर्शनचारित्रेपयुक्ता--उपयुक्तास्तथा शिष्याणा २४ । युक्त । ज० प्र० ४८ । सूत्रवाचनाप्रदानादिनिष्पाटका एतादगा भवन्ति । व्य० प्र० उवचीयइ - उपचीयते-उपचयमायाति। जीवा० ३२०, १७१ आ । ३०६ । उपचगमुपगच्छति । जीवा० ४०० । उवट्टगा। नि० चू० प्र० २३२ आ । उवच्छगो-कक्खो। नि० चू० प्र० २११ उवट्टणं-सुकृत् उवट्टण। नि० ८० प्र० १९० आ । उवच्छुमे । आव० १८० । उवट्टित्ता-उबृत्य-तत्परिलागेनान्यत्र गत्वा । उत्त० २९६ । उवजाइय-उपयाचिते-देवताराधने भव औपयाचितक । उवट्टिय-उपम्यापितः । आव० २८८ । ठाणा. ५१६ । उवट्ठवेति-उपस्थापयति, उपटोकयति, प्रामृतीकगेनि । जं. उवजीवइ-उपजीवति-अनुभवति । भग० ११२ । उवजीवति - उपजीवति-जीवनार्थमाश्रयते । उवट्ठाइ-उत्तिष्ठते । आव० ३१८ । १६. आ। उवट्टाएज्जा- -उपतिष्ठेत् , उपस्थानम्-परलोकक्रियाम्वभ्युप. उवजीविओ-उपजीवित । ठाणा० ३७२ । गमं कुर्यादित्यर्थ । भग० ६४ ।। उवजेमणा-रमवती । नि० चू० प्र० ३४९ आ। । उवट्ठाणं-गोमादिठाण : नि० चू० द्वि० ७० अ। उपग्थानेन- उवजोइया-ज्योतिष ममीपे ये त उपज्योतिषस्त पत्रो वर्मचरणाभामोयमेन वर्तते दनि उपम्यान । आचा० २२७॥ ज० प्र० . अ। । प्र० २४४ । व्य. (२०७) [ उबट्ठाणगिह आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसंकलितः उवत्थाणी] उवट्टाणगिह - उपस्थानगृहं - आस्थानमण्डप । ठाणा. उवणीम-उपनीत -नियोजित । ठाणा० २५९ । उपसहा. ०९४ । भग २०० । रोपनययुक्तमुपनीतम् । अनु० १३३। उपनयोपसहृतमुप. उवट्ठाणसाला-उपस्थानशाला-आस्थानमभा। औप० २३ । नीतम् । अनु० २६२ । उपसहारयुक्तम् । ठाणा० ३९७॥ आस्थानगाला। आव० ३००। उपवेशनमण्डप । निरय० प्रापितम् । ठाणा. ४९४ । निगमित, योजितम् । ठाणा. ८ । आम्थानमण्डप । निरय० १० ज० प्र० १८७। उवट्ठाणा - मामद्वय चतुर्मासद्वयं चावर्जयित्वा पुनस्तत्रैव | उवणीए-उपनीतं-योजितम् । ज. बसतामुपस्थानेति । ठाणा. ३२१ । उवणीते-उपनीतं-प्रापित, दशमो विशेष । ठाणा० ४९२ । उवट्ठावणा-उपस्थापना-महाव्रतारोपणरूपा । उत्त० ५६८। । उवणीय-उपनीत-योजितम् । जीवा० २६८ । उपनयो- उप-सामीप्येन सर्वदावस्थानलक्षणेन तिष्ठन्त्यस्यामिति उप पसहृतम् । आव० ३७६ । विनीतं, ढौकित, दायकेन पर्णि. म्यापना-शय्या। व्य. द्वि० १०४ अ। तगुणं वा। औप० ३९ । प्रापित । आचा० ७८ । उवट्ठावणाए गहणं-तत्रोपस्थापनाया विधीयमानायां उवणीयअवनीयवचनं विधीयमानायां उवणीयअवनीयवचनं - उपनीतापनीतवचनं - कश्चिद हस्तिदन्तोन्नताकारहस्तादिभिर्यद् रजोहरणादि गृह्यते तद् गुण प्रशस्य कश्चिनिद्य । आचा० ३८७ । उपस्थापनाग्रहणम् । वृ० द्वि० २५६ अ । उवणीयवयणं- उपनीतवचन-प्रशसावचनम् । आचा० उवट्ठावणायरिते-उत्थापनयाचार्य । ठाणा० २३९ । ३८७ । प्रज्ञा० २६७ । गुणोपनयनरूपम् । प्रश्न० १९८ । उवट्ठाविए गहणं - उपस्थापितस्य - छेदोपस्थापनीयचारित्र उवणीयावणीयवयणं उपनीतापनीतवचनं - यत्प्रशस्य प्रापितस्य यद् उपधेर्धारणं परिभोगो वा तद् उपग्थापितग्रहणम्। निन्दति । प्रज्ञा० २६७। यत्रैक गुणमुपनीय गुणान्तरमप- वृ० द्वि० २८६ । नीयते तत् । प्रश्न० ११८ । उवट्ठावित्तए उत्थापयितु - महाव्रतेषु व्यवस्थापयितुम् । उवणेइ-उपनयति, प्राभृतीकरोति। जं० प्र० २०४ । टाणा० ५७ । उवण्णं-प्रोशित । नि० चू० प्र० २७४ आ। उवटिअ-उपस्थितं-उद्यतम् । ओघ० १७६ । उवण्णत्थ-उपन्यस्तं-उपकल्पितम् । दश. १७१ । उवट्टिए-उपस्थित-प्रत्युद्यतम् । आव० ५४१। दीक्षित उवण्हाणयं-माषचूर्णादिसिणाण । नि० चू० प्र० ११६ आ। बृ. द्वि० २६४ अ। अत्यन्तावस्थायि । भग. १००। उवतत्तो-उपतप्त -आपन्नसताप । प्रश्नः १९ । उवट्टिता-दूरीकृता। नि० चू० द्वि० ९४ आ । उवतेसणे-उपदिश्यत इति उपदेशनं-उपदेशक्रियाया व्याप्य- उवट्टिताओ-गोलोपलखनि । नि० चू० द्वि० ४० आ। मुपलक्षणत्वादस्य क्रियाया यद व्याप्यं तत् कर्मेत्यर्थ । उवट्टिय-उपस्थापित । आव० ५५९ । उपस्थित -उद्यत.। द्वितीया वचनविभक्ति । ठाणा० ४२८ । उत्त० ६३७ । प्रत्यासन्नीभूतम् । उत्त० ६६८ । उवतेसरुई-उपदेश -गुर्वाढिना कथनं तेन रुचिर्यस्येत्युप- उवणयं-उपनयनं-कलाग्रहणार्थ नयनं धर्मश्रवणनिमित्त वा देशसचि । ठाणा० ५०३। उत्त० ५६३ । साधुसकाशं नयनम् । आव० १२९ । उवत्तावलिए-चतत्रावलित । सूत्र० ३८७ । उवणयणं-कलाग्राहणम् । भग० ५४५ । उपनयनं-बालाना | उवत्तिया-अपवर्तिता। ज्ञाता० ४८ । कलाग्रहणम् । प्रश्न० ३९ । उवत्थड-उपस्तीर्ण - उपच्छादित । भग० ३७, १५३ । उवणिक्खिवि-उपनिक्षिप्य । आव० ५५५ । उवत्थम-अस्तं। नि० चू० तृ. ६० अ। उणिवाय-उपनिपात --जनमीलक । ठाणा. उवत्थाण-उपस्थानं-प्रत्यासक्तिगमनम् । निरय० ३३ । उवणिविट्ठ-उपविष्टं-मामीप्येन स्थितम् । जीवा० १९९ । उवत्थाणियं-उपस्थानं-प्रत्यासक्तिगमनं तत्र प्रेक्षणककर- उवणिहि - उप-सामीप्येन निधि. उपनिधि -एकस्मिन् णाय यदा विधत्ते । निरय. ३३ । विवक्षितेऽर्थे पूर्व व्यवस्थापिते तत्समीप एवापरापरस्य उवत्थाणी - उपस्थानिक-प्रामृतम् । ज० प्र० २०३, वक्ष्यमाणपूर्वानुपूर्व्यादिक्रमेण यन्निक्षेपणं स । अनु० ५२ । . ४२॥ २५२। (२०८) [ उत्थिए अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोप' उवयंति ] २९८ । उवत्थिए-अभ्युपगत । ज्ञाता० २२० । । कृतिगणत्वेन मत्वर्थीयाणप्रत्यये औपनिहित इति । ठाणा. उत्थिया-उपस्थिता-उपनता। सम० १८ । उवदंसं-उपदर्शनम् । आव० ७२६ । उवनिहिय-उपनिधिना - प्रत्यासत्त्या चरति-प्रत्यामन्नमेव उवदंसणकूड-उपदर्शनकुट, उपदर्शननामक कूटम् । जं. गृह्णाति य स औपनिधिक । प्रश्न० १०६ । उनिही-उपनिधि -प्रत्यासत्ति । प्रश्न० १०६ । उवदंसिजति उपदर्यन्ते-निगमनेन शिष्यबुद्धौ नि शङ्क उवन्नास-उपन्यसन उपन्यास । दश० ३५ । व्यवस्थाप्यन्ते । नंदी २१२ । उपदय॑न्ते उपनयनिगमनाभ्या | उवन्नासोवणए-वादिना अभिमतार्थसाधनाय कृते वस्तू- यकलनयाभिप्रायतो वा। सम० १०९ । पन्यासे तद्विधरनाय य प्रतिवादिना विरुद्धार्थोपनय उवदंसिया-उप-सामीप्येन यथा श्रोतृणा झटिति यथाव कियते पर्यनुयोगोपन्यासे वा य उत्तरोपनय स उपन्या. मोपनय । ठाणा० २५४ । स्थितवस्तुतत्त्वावबोधो भवति तथा स्फुरवचनैरित्यर्थ , दर्शिता -श्रवणगोचर नीता उपदिष्टा । प्रज्ञा० ४ । उपप्पयाण-उपप्रदानं-अभिमतार्थदानम् । विपा० ६५। उप- उवदंसेइ-सकलनययुक्तिभि उपदर्शयति । भग० ७११ । प्रदानम् । दश० १०९ । ठाणा० ५०३। उपदर्शयति-प्रकाशयति। भग० १४९ । उववूहियं - उपवृहित-समर्थित , अनुमत वा। आव० ५३९। उवदिट्ठाभावमूलं-उपदेष्टभावमूल - उपदेष्टा-यै कर्मभि प्रागिनो मूलत्वेोत्पद्यन्ते। आचा० ८८ । उवभोग-उपभुज्यत इति उपभोग -मकृद्रोगोऽशनपानादि, अन्तर्भाग , आहारादि वा । आव० ८२८ । सकृद्भोग । उवद्दवा-उपद्रवा राजचौर्यादिकृता । भग० ४६९ । भग० २९७। आव० ८३० । पुन पुनर्भुज्यत इति उप- उबद्दवेद-उपद्रवयति-उपद्रव करोति । ठाणा० ३०५ । भोग -वस्त्रालङ्कारादि । प्रज्ञा० ४७५ । हाणवत्थाभरणगंध. उबद्दवेह-उपद्रवयथ-मारयय। भग० ३१८ । मल्लाणुलेवणधूवणवामतबोलादि । नि० चू० तृ. १ आ। धार- उवधाणं-उपदधातीत्युपवान-तप । दश० १०४ । णमुपभोग । आव० ३२५ । उपभोग -पौन पुन्येन चोप. उवधायपडगो-पडगस्स वीयो मेओ। नि० चू० द्वि० भोजनमुपभोग । भग. ३५०। ३१ अ। उवभोगतराए - उपभोगान्तराय - यद्भुदयवशात् सत्यपि उवधारणया-धार्यतेऽनेनेति धारण, उप-सामीप्येन वारण विशिष्टवस्त्रालङ्कारादिसम्भवेऽसति प्रत्याख्यानपरिणामे उपवारण-व्यवनावग्रहेऽपि द्वितीयादिसमयेषु प्रतिसमयपूर्वा वैराग्ये वा केवलकार्पण्यान्नोत्सहते भोक्तुं तत् । प्रज्ञा . पूर्वशब्दादिपुद्गलादान पुरस्सर प्राक्तनप्राक्तनसमयगृहीत- शब्दादिपुद्गलधारणपरिणाम तद्भाव उपधारणता । उवम-उपमीयतेऽनेन दान्तिकोऽर्थ इत्युपमानम् । दश० ३४॥ दी १७४ । उपवारणता - अविच्युतिस्मृतिवासनाविषय- उवमा-उपमा-मादृश्यम् । उत्त० २७९ । दृष्टान्ता । वृ० करणम् । ठाणा ४४१ । प्र. १६८ आ। सादृश्योपदर्शनम्पा । उत्त० २७२ । उपमा- उवधारियं-उपधारित-अवधारितम् । भग० १०१ । दोष -हीनाधिकोपमानाभिधान, अष्टाविंशतितम. सूत्रदोष । उवनंद-रपनन्द । आव० २०१ । आव० ३७४। उपमा। प्रज्ञा० ३६४। खाद्यविशेप । उवनगरगाम-उपनगरग्राम । आव० ३०१ । जीवा० २७८ । उपेत्युपयोगपूर्वक मेति ज्ञानं, उपमा- उपनिक्खित्ते-उपनिक्षिात -व्यवस्थापित । आचा० ३४४ । सम्प्रधारणा। उत्त० २२४ । उवनिग्गय-उपविनिर्गत -निरन्तरविनिर्गत । राजा ६। उवमाणं-उपमानं-दृष्टान्त । ओघ० १७। उपनिहिते-उपनिवीयत इति उपनिवि -प्रत्यागन्न यद्यथा- उवमादोसो-उपमाढोप -यत्र हीनोपमा क्रियते । सूत्रस्य द्वात्रिं- कथबिदानीत तेन चरति तद्ग्रहणायेत्यर्य इत्योपनिधिक , शद्दोपेऽष्टाविंशतितमो टोप । अनु० २६२ । उपनिहितमेव वा यस्य ग्रहणविषयतयाऽस्ति म प्रनादेरा- उवयंति-अवपतन्ति-अवतरन्ति । आचा० ०६६। च ४७५ । (२००) [उवयरयं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उबलमेजा] उत्तर- 1 उवयरयं-अपवरकम् । आव० ७२२ । तस्स गामस्स उवरिएणंति मज्झेण गंतुकामा । नि० चू० प्र० उवयातिते-उपयाचिते-देवताराधने भव गौपयाचितक । ३१६अ । उपरितन । आव० २६२ । ठाणा० ५१६ । उवरिचरे-उपरिचर सत्यवादी वसू राजा । जीवा० १२१ । उवयार उपचार | आव० ५६, २१३ । पूजा। उवरिभासा-उपरिभाषा-उत्तरकालं तदेव किलाधिक यद गजः ३६। प्रजा० ८६। जीवा. २२७, २५५ । जं. भाषते सा । आव० ७९२ । प्र. ७७ । औप० ५। आराधनाप्रकार । ढग. २५० ।। उवरिमागारो-उपरिमाकार -उपरितन आकार लोकव्यवहार । औप० १३ । देवतापूजा। प्रश्न० ५१ । झादिरूप । जीवा० २१६ । पूजा । उपकार । प्रश्न० ११७ । दश० ७९ । पूजा। भग० उवरियलेणं-उपरितलम् । भग १९५ । ५४० । व्यवहार । ठाणा० ४०९ । व्यवहार , पूजा वा। उवरिल्लए-उपरितनं, उपरिभवम् । दश. २११ । भग० ९२५ । यनो मुख्याभावे मति प्रयोजने निमित्ते उवरिल्ले-उपरितनम् । अनु० १७७ । चोपचार प्रवर्तते । विशे० १६६ । उवरिल्ले माणसे - उपरितनमभ्यमाधस्तनाना मानमाना उवयारियलेणं-गृहस्य पीठवन्धकापम् । भग० १४६ । सदभावात् तदन्यव्यवच्छेदायोपरितने, माणसे -गगादिप्रत उवयारिया-उपकरोति-उपष्टभ्नाति प्रासादावतंसकानित्युप. पणत. प्रागुक्तस्वरूपे मरमि सर प्रमाणायुष्कयुक्ते इत्यर्थ । कारिका-राजधानीप्रभुसत्कप्रासादावर्तमकादीना पीठिका । जं. भग० ६७४ । प्र० ३२१ । उवरिल्ले माणसुत्तरे-उपरितनमानसोत्तरे । भग० ६७४ । उवयालि-अनुत्तरोपपातिकदशाना प्रथमवर्गस्य तृतीयमध्य- उबरुद्द-उपरौद्र -नरके षष्ठ परमावार्मिक । आव० ६५० । यनम् । अनुत्त० १७२ । यस्तु तेषामलोपाङ्गानि भनक्ति सोऽत्यन्तरौद्रत्वादुपरौद्र , उवयाली- अन्तकृद्दगाना चतुर्थवर्गस्य तृतीयमध्ययनम् । नरके षष्ठ परमाधार्मिक. । मम० २८ । उपरुद्र -पष्ट. अन्त० १४ । परमाधार्मिक । सूत्र. १२८ । उवयिगा-उद्देहिया । नि० चू० प्र० ५३आ। उवरुवरि-उपर्युपरि-निरन्तरम् । प्रश्न० ५१ । उपयिया-त्रीन्द्रियजन्तुविशेषः । जीवा० ३२ । उचरेगं-उपरेक-एकान्त, निर्व्यापारता वा । उत्त० १९३ । उवयोगपदं--प्रज्ञापनायामेकोनत्रिंशत्तम पदम् । भग० ७१३। उवरोह-उपरोध -निषेध । दश० १०८ । महट्टनादि- उबरए--उपरत - सङ्कुचितगात्र. । लक्षण 1 आव० ५९३ । उपरोध -उपघात । विशे० ७४८ । उपरत कालगत । व्य. द्वि० ३४आ । उवलंवयरज्जू - विमानानामुपरितोऽधम्ताद्यावद रज्ज । उवरति-उपरति -विरत्तिः । ठाणा० ३ । (दे० ) उवरतो-उपरत.-रावः । उत्त. २१८ । उवल-उपल गण्डशेलादि । उत्त० ६८९ । टङ्कायपकरण- उवरय-उद्वलको-वियोजक । मम. ४७ । उपरता । परिकर्मणा योग्य पाषाण ।जीवा० २३ । प्रना०२७ । पृथिवी आचा० ३५० । मेद । आचा० २९ । दग्धपाषाण ।भग० २९३ । छिन्न- उवराग-पराग -ग्रहणम् । भग० १४७ । उपरअनं ग्रहण पामाणा । नि० चू० द्वि० ८०अ । छिन्नपाषाणा । बृ० न. मित्यर्थ । प्रश्न. ३९ । १६२आ। उवराते- उपराग' - राहुविमानतेजमोपरजनम् । ठाणा० उवलद्धिमंति-उपलब्धिमन्ति-द्रष्ट्रणि । दश० १२९ । उवलद्धी-उपलब्धि , उपलब्धये-उपलब्धिनिमित्तम् । आव० उवरि- उपरि-कुब्यस्थाने । ओघ० १७५ । नीबादौ । २८० । ओघ० १६२ । अग्रे। ठाणा० २२५ । उवलभसि-उपलम्भयसि, दर्शयमि । भग० ६८३ । उरिएणं-जत्थ गामे सखडी तत्थेव गतुफामा जे वा उवलमेजा-उपलमेत-प्राप्नुयात । जीवा० १२३ । आचा २०४ 1 ४७६ । (२१०) [ उवलिंपिज अल्पपरिचितसेद्धान्तिकशब्दकोषः उवसंत ] छगल. ४४ । उप- पाते भव उपलिंपिज्ज-उपलिम्पनम् । आचा० १३५ । उववायं-उपपातं-जन्म । आचा० १६३ । भवन पतिस्व. उवलित्ता-जातिजुगितामेओ । नि० चू० द्वि० ४३आ । स्थान प्राप्त्यामिमुख्यम् । भग० १४३ । उत्पातेन निवृत्त उवलेद्दा-सतुष्ठा । उत्त० १९२ । औत्पातिकम् । आव० ७३१ । उप-समीपे पतन-स्थानं उवलेवण-उपलेपन छगणादिना । अनु० २६ । उपपात दृग्वचनविषयदेशावस्थान । उत्त० मट्टियाए लिवण । नि० चू० प्र० २३१भ । पात -सेवा । भग० १६८ । उवलेषणकओवयारो-कृतोपलेपनोपचार ।आव० ४१६। उववायगई-उपपाताय-उत्पादाय गमनं सा उपपातगति । उल्लियंती-उपलीयन्ते-आश्रयन्ति । व्य० द्वि० २७८आ । भग. ३८१ । उवल्लिसामि-उपालयिष्ये-वत्स्यामि । आचा० ४०६ । उववायगती-उपपात एव गति उपपातगति | गति- उववजति-उत्पद्यते । जीवा० ११० । प्रपातस्य चतुर्थो भेद । प्रज्ञा० ३२६ । उववजिऊण-उपयुज्य-उपयोगं दत्त्वा । ओघ० ११६ । उववायसभा-सिद्धायतनस्योत्तरपूर्वस्या सभा उपपातसभा। जीवा० ० २३६ । उववज्झा-उपवाया -राजादिवल्लभा । औपवाद्या -राजादि वल्लभाना कर्मकरा इति । दश० २४८ । उववास-उपवास , अभक्तार्थकरणम् । ठाणा० १२६ । उववण्णो-उपपन । जीवा० ९७ । उववूह-उपबृंहण-समानधार्मिकाणा सद्गुणप्रगमनेन तद्- उववत्तारो-वचनव्यत्ययादुपपत्ता भवति इति 'ठाणा ० ४२० । वृद्धिकरणम् । दश. १०२ । उपबृंहणमुपवृहा-दर्शनादि- उववनो-उपपन्न -आश्रित । सूर्य० २८१ । गुणान्विताना सुलब्धजन्मानो यूयं युक्तं च भवादृशामि- दमित्यादिवचोमिस्तत्तद्गुणपरिवर्द्धनं मा | उत्त० ५६७ । उववाइए-उपपात -प्रादुर्भावो जन्मान्तरसकान्ति , उप- समानधार्मिकाणा सद्गुणप्रशसनेन तवृद्धिकरणम् । प्रज्ञा० औपपातिक । आचा० १६ । उपपादुक भवान्तरसङ्क्रान्तिभाक् । आचा० २० । उववाइय-उपपातेन निवृत्त औपपातिक - भवाद्वान्तर- उववेओ - उपपेत इति लक्षणव्यन्ननगुणोपपेत । टाणा० उववूहइ-उपबृंहते-समर्थयति । दश० ४४ । गामीति । सूत्र. २० । उपयाच्यते-मृग्यते स्म यत्तत् उप- । याचितं-ईपिसतं वस्तु । नाता० ८४ । उववेय - उपपेत -युक्त । जीवा० २७४ । भग. ११९ । उवचाइया-उपपाताजाता उपपातजा अथवा उपपाते उप अप इत इति शब्दत्रयस्य स्थाने शकन्वादिदर्शनादु. मवा औपपातिका-देवा नारकाच । दश० १४१ । पपेत -युक्त । ज्ञाता० ११ । उववाए - उपपात – उपपाताभिमुख्येनापान्तरालगतिवृत्त्ये उवसंकमित्ता-उपसङ्क्रम्य । सूर्य० ११ । त्यर्थ । भग० ९६३ । देवजन्म । ठाणा० ४१९ । नादकागुप. उबसंकमित्तुं-उपमङ्क्रम्य, आमन्नीभूय । आचा० ३३१ । पातार्थ , द्वादशशते षष्ठोद्देशक । भग० ५९६ । उपपात उपमङ्कम्य-उपेत्य । आचा० २७१ । प्रादुर्भाव । प्रना० ३२८ । उवसंखा-उपमख्या-मम्यग्यथावस्थितार्थपरिनानम् । सत्र उववाएणं-उपपतनमुपपात , वाटरपृश्वीकायिकाना पर्या- नाना यदनन्तरमुक्त स्थान तत्परत्याभिमुख्यमिति भावः उवसंत-उपशान्त-अनाकुलम् । ओघ० १७६ । यत् शेष नेनोयपातेन, उपपातमङ्गीकृत्य । प्रना० ७३ । मत्तायामनुदयागत वर्त्तते तद। विष्कम्भितोदयमुपनीतमिल्या. उववात-उपपात-नारकठेवाना जन्म । ठाणा० ४६६ । स्वभावं च । विशे० २८६ । किञ्चिन्मिथ्यात्वरूपतामपनीय उपपात -गमनमात्रम् । ठाणा० ३७६ । मम्यक्त्वरूपतया परिणतं किञ्चिन्मिथ्यात्वत्पमेव । वृ० उववातसभा-उपपातसभा-यस्यामुत्पद्यते मा । प्र. २आ । रागद्वे पपावकोपशमाद उपगान्त । आचा० १५० । रूपालोकानाधौत्सुक्यलागत । अनु० १४० । उववातो-उवसपजण । नि० ८० प्र० २४१अ । अन्तर्वत्त्या उपमान्त । विधम्भिता- . २१४ । ठाणार । भग. ४९० [ उवसंतकसातो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलित. उवसमिए] । । ओघ. दयमपनीतमिथ्यास्वभाव च । विष्कम्भितोदयमित्यर्थ । उवसंहार-उपसहार -उपनय । दश० २२ । बृ० तृ. ठाणा० ४८ । उपशान्त-न सर्वथाऽभावमापन्नं, निकाचि १३६आ । ताद्यवस्थोद्रेकरहित वा । प्रज्ञा० ४०३ । औप० ३५ । उवसग्ग-उपसृज्यते-धातुसमीपे नियुज्यते इति उपसर्ग । ज० प्र० १४६ । ज० प्र० ३८९ । जम्बूद्वीपैरवते तीर्थ प्रश्न० ११७ । वांधाविशेषाः । ठाणा० २८० । राजादि- करनाम । सम० १५३ । पवजापरिणतं । नि० चू० द्वि० जनित १९० । उप-सामीप्येन सर्जनम् २८अ । उपशान्त -उपरत । दश. २०६। सूत्र. ४१७ । उपसृज्यतेऽनेनेति वा करणमाधन , उपसृज्यतेऽमाविति अपगतसन्देह सवत्त इति । सूत्र. ४०९ । अनुदयावस्थ । वा कर्ममाधन । आव० ४०४ । प्रव्रज्याग्रहणे निवारणम् । प्रज्ञा० २९१। पिण्ड. १३९ । देवादिकृतोपद्रवा । ठाणा० ५.३ । उवसंतकसातो- उपशान्तकषाय . । उत्त० २५७ । राजस्वजनादिकृतो देवमनुष्यतिर्यचकृतो वा । पिण्ड० १७० । उवसंतजीवी- अन्तवृत्त्यपेक्षया उपशान्तजीवी । प्रश्न. उप-सामीप्येन सृज्यते तिर्यग्मनुष्यामरै कर्मवशगेनात्मना १०६ । क्रियत इति उपसर्ग । उत्त० १०९ । उपसर्ग --उप- उवसंतमोह-उपशान्तमोह -अनुत्कटवेदमोहनीय । भग० सर्जनं, धर्म भ्रशनम् । दिव्यादय । भग० १.१ । २२३ । श्रेणिपरिसमाग्तावन्तर्मुहूर्त यावटुपशातवीतराग । उवसग्गपरिण्णा - उपसर्गपरिज्ञा, सूत्रकृताङ्गाद्यश्रुतस्कन्धे भूतग्रामस्यैकादश गुणस्थानम् । आव० ६५० । तृतीयमध्ययनम् । आव० ६५१ । उत्त० ६१४ । उवसंतमोहनिजो-उपशान्तमोहनीय - उपशान्त-अनु. उवसग्गपरिन्ना-सूत्रकृताङ्गे तृतीयमययनम् । मम० ३१ । दय प्राप्त मोहनीय दर्शनमोहनीय यस्यासौ । उत्त० ३०६ । उवसग्गसहो-उपसर्गमह । आव० ६४८ । उवसंपजहण- उवसपदनं उपसम्पद् - अन्यरूपप्रतिपत्ति , उवसत्तो-उपमक्त -गाढमामक्त । उत्त०६३२ । सा च हान च स्वरुपपरित्याग उपसम्पद्धानम् । उत्त० ४७० । उवसमंति - उपशाम्यन्ति - सवतकवायुविकुर्वण्णान्निवर्तन्ते, उवसंपजइ-उपसम्पद्यते । आव० ८२५ । सवर्तकवातविकुर्वणमुपसहरन्तीति भाव । राज० ०३ । उवसंपजणा-उपसम्पद । दश० १०५ । उवसम-उपशममिति औपशमिकम् । विपाकोदयविष्कम्भण- उवसंपन्जमाणगति-उपसपद्यमानगति -यदन्यमुपसम्पद्य लक्षग । दश. ४३ । उपशम -विपाकोदयविष्कम्भणलक्षण । आश्रित्य तदवष्टम्भेन गमनम् । विहायोगतेस्तृतीयो मेद । नदी ७७ । क्रोधाद्युदयाभावे भवति । आचा० १५० । प्रज्ञा० ३२७ । शान्तिरूप । दश० २३४ । पत्रदशदिवसनाम । ज० उवसंपजसेणियपरिकम्मे-पञ्चम परिकर्म । सम० १२८ । ४९० । सूर्य० १४७ । क्षायोपामिक । सूत्र. ६ । विंशति उवसंपजित्ता-उपसम्पद्य-सामीप्येनाङ्गीकृत्य । दश० १५० । तमो मुहूर्तनाम । ० प्र० ४९१ । मध्यस्थपरिणाम । उपसंपन्नं-उपमम्पन्न-नियमायोत्थितम् । सूत्र. ४१० । ८५१ । उदीर्णस्य क्षय अनुदीर्गस्य च विपाकन उवसंपया-उपमपत्-सामीप्येनाङ्गीकरण यदेतदुत्प्रव्रजनम् । प्रदेशतवाननुभवनम् । सर्वथैव विष्कम्मितोदयत्वमित्यर्थ । दश० २७३ । सामाचार्या दशमो मेद । उपसम्पत्-इतो भग० ५९ । खमा । दश. चू० १२४ । उदयनिरोधोदय. भवदीयोऽहमित्यभ्युपगम । ठाणा ४९९ । उपसम्पत् । आव. प्राप्ताफलीकरणम् । दश० २३४ । २५९ । सामाचार्या दशमो मेद । उपमम्पत्-ज्ञानादि- उवसमणा-उपशमना - उदयोदीरणानिधत्तनिकाचनाकरणा- निमित्तमाचार्यान्तराश्रयणम् । भग० ९२० । उपसंपनिरुप नामयोग्यत्वेन कर्मणोऽवग्यापनम् । टाणा० २२१ । सपत्-ज्ञानाद्यर्थ भवदीयोऽहमित्यभ्युपगम । ठाणा० १४० । | उवसमविवेयसंवरं - उपशमविवेकसवरम् , चिलातस्य प- त्वदीयोऽहमित्येवं श्रुताद्यर्थमन्यदीयसत्ताभ्युपगम । अनु० देश । आव ३७१। १०३ । उबसपदन उपसम्पत्-अन्यरुपप्रतिपत्ति । उत्त० उपसमिए-उपगम --उदीर्णम्य कर्मग क्षयोऽनुदीर्णम्य विक म्मितोदयत्व स एकोपामिक -क्रियामात्र, उपगमेन वा प्र. आव० (२१२) [ उवसामि अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उवहि ] ११४ । निर्वत औपशमिक -सम्यग्दर्शनादि । भग० ६४९ । औप श्ररणम् । सूत्र. २५१ । अनशनादिक तप शमिक - उपशमनमुपशम -कर्मणोऽनुदयाक्षीणावस्था भस्म ५८ । आगमोपचाररूपमाचाम्लादि । उत्त० १२८ । पटलावच्छन्नाग्निवत् स एव, तेन वा निर्वत । अनु० गुणोपष्टम्भकारि । प्रश्न० १५७ । उच्छीर्षकम् । बृ० द्वि० २२० । उपधान-करणम् । व्य० प्र०५०आ। स्थगनम् । व्य० उवसामिअ- उपशमित- भस्मछन्नाग्निकापता प्रापितम् । द्वि० ५आ। प्रायश्चित्तम् । व्य. द्वि० १९५अ । विहित- आव० ७९। शास्त्रोपचार । उत्त० ६५६ । तप ठाणा० ४४५ । उवसामेमाण-क्षुद्रव्यन्तराधिष्ठितं समयप्रमिद्धविधिनोपशम उपधान-तप । सम० ५७ । ठाणा० ६५, १९५ । उप- यन्त इति । ठाणा० ३५३ धीयते-उपष्टभ्यते श्रुतमनेनेति उपधान-श्रुतविषयस्तपउप- उवसाहिजउत्ति-पच्यताम् । नि० चू० प्र० ३४९आ । चार । ठाणा० १८१ । विवानम् । सम. १२७ । उवसित-उपाश्रित -अङ्गीकृत । वैयावृत्त्यकरत्वादिना प्रत्या. उपदधातीत्युपधान-उपकरोतीत्यर्थ । ओघ० ११३ । अझा- मन्नतर । द्वेष । शिष्यप्रतीच्छककुलाद्यपेक्षा । भग० ३८५ । नगाध्ययनादौ यथायोगमाचाम्लादितपोविशेष । उत्त० ३४७ । उवस्सप-उपाश्रय । प्रश्न० १२७ । उवहाणग - पूयादिपुन्न सिगेवहाणं । नि० चू० द्वि० उवस्सओ-उपाश्रय -वसति । प्रश्न. १२७ । ६१अ । उपधानम् । ठाणा० २३४ । उपधानक-अप्रति- उवस्लग-उपाश्रय -वसति । ओघ० १७३ । लेखितदूष्यपञ्चके द्वितीयो मेद । आव० ६५२ । उवस्लगा-उपाश्रया । वृ० द्वि० १८३अ । उवहाणपडिमा-उपधान-तपस्तत्प्रतिमोपधानप्रतिमा, द्वा- उवस्सते-उपाश्रय -निलय । प्रश्न० १२८ । दश भिक्षुप्रतिमा एकादशोपासक प्रतिमाश्चेत्येवरूपा। ठाणा. उवस्सय-उपाश्रय -वसति । ओघ० ६५, १७३ ६५ । सम० ९६ । दश० २१८ । ज० प्र० १२१ । उपाश्रय -गृहपतिगृहा- उवहाणवीरिए-उपधान-तपस्तत्र वीर्य यस्य स उपधान. दिकम् । ठाणा० ३१५ । वसतेत्तिपरिक्षिप्त , परेषामना वीर्य -तपस्यनिगूहितबलवीर्य । सूत्रः ६५ । लोकवत इत्यर्थः । ज्ञाता० २०५ । उपाश्रया -उपा- उवहाणसुयं - उपधानश्रुतं-- आचाराङ्गस्याष्टममध्ययनम् । श्रीयन्ते-भज्यन्ते शीतादित्राणार्थ ये ते उपाश्रया -वस उत्त० ६१६ । सम० ४४ । उपधानश्रुतं, आचारप्रकल्पे । ठाणा० १५. । पडिस्सयो । सव्वग वा आसण । प्रथमश्रुतस्कन्धस्याष्टममध्ययनम् । आव० ६६० । दश० चू० १११ । १४५ । उवस्सयसंकिलेसे-द्वितीय सक्लेश । उपाश्रयो-वसतिस्तद्- | उवहारं-उपहार । आव० १९० । बलि । आव० ६९८ । विषय मक्लेश -असमाधि उपाश्रयसक्लेश । ठाणा० उवहारा-बलिमादिया । नि० ० चू० प्र० २६९अ । उवहारियं-अवधारित-निर्णीतम् । आव० ६३५ । उवस्सित-उपाश्रित'-द्वेप । शिष्यकुलाद्यपेक्षा । ठाणा० उवहि-उपदधातीति उपधि -उप - सामीप्येन सयम धार- ४४१ । द्वेष , शिष्यप्रतीच्छककुलाद्यपेक्षा । ठाणा० ३१९ । यति पोषयति चेत्यर्थ । स च पानादिरूप । ओघ० १२ । उवहडे - उपहृत - भोजनस्थाने ढौकितं भक्तमिति भाव । उपकरणम् । उत्त० ५८८ । वकित्पादि १४८। ३५८ । उपकरणमाभरणादिद्रव्यतो, भावतस्तु छद्मादि उवहतो-अविसुद्धो । नि० चू० द्वि० ११६अ । येनात्मा नरक उपधीयते । उत्त० ४६३ । उपधिः-मस्ता. उवहय-उपहति । उत्त० १४५ । सदोस । नि० चू० तृ. रकादि । ओघ० ८० । रजोहरणादि । ठाणा० ३१७ । उपधीयते-मगृह्यन इनि उपधि । आचा० १८० । आग- उवहयपरिणामो-उपहतपरिणाम । आव० ५१३ । मोक्त वस्त्रादि । दा० १९९ । पाननियोगादि । व्य०प्र० उवहरह-उपहरति-विनाशयति । ज्ञाता. १९२ । । उपवि -वस्त्रादि 1 प्रश्न० १२४ । उवहाणं-उपधान-तप । सूत्र० ६५, ६९, ७५ । सप- धीयते-टोक्यते दुर्गति प्रत्यात्मा येनासावुपधि -माया, अष्ट. तय प्रश्न. उत्त० - ठाणा. ८१आ। २३७ अ - उप.

[ उवहिअसुद्धं आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलित. उवागच्छति] । प्रकार वा कर्म । सूत्र. ६८ । उपकरणम् । आव० ५६८ । आव० ४१४ । प्रज्ञा० २९१ । प्रश्न. ३९ । उपदधातीति उपधि । ओघ. उवागच्छति-पविसति । नि० चू० प्र० २३० अ। २७७ । माया । प्रश्न. ०८ । औधिक । प्रश्न. १५६ । उवागच्छिज्जा-उपागच्छेयु -अतिथयो भवेयु ।आचा० ४०३॥ माया । सूत्र० १०३ । उपदधातीति उपधि -उप-सामी उवागमण-उपागमन-स्थानम् । आचा० ३७५ । प्येन सयम धारयति पोषयति चेति पानादिरूप । ओघ० १२ । उवात-अवपात । सेवा । ठाणा० १२९, ५१६ । ज्ञाता०४॥ आव० ६६१ । उपधीयते येनासावुपधि - वञ्चनीयसमीप- उवातिणा-नयति । नि० चू० द्वि० २२ आ । गमनहेतुर्भाव । भग० ५७२ । उपधि -उपकरणम् । पिण्ड०, उवातियं । नि० चू० द्वि० १४४ अ । १२ । कपाय । दश०७६ । उवकरणं । नि० चू०प्र० ६४ आ। उवातिया-उपयाचितम् । नि० चू० प्र० ३५१ आ । उवहिअसुद्ध-उपधिना-मायया अशुद्धं-सावा उपध्यशुद्ध, उवाते-उपाय -उपेय प्रति पुरुष उवाते-उपाय -उपेय प्रति पुरुषव्यापारादिका साधनसामग्री अधर्मद्वारस्यैकोनत्रिंशत्तमं नाम । प्रश्न० २६ । स यत्र द्रव्यादावुपेये अस्तीत्यभिधीयते यथतेषु द्रव्यादि- उवहिए-उपधिक -मांयित्वेन प्रच्छन्नचारी । ज्ञाता० ८१ । विशेषेषु साधनीयेष्वस्त्युपाय , उपादेयता वाऽस्य यत्राभि- उपहित -प्रक्षिात -प्राप्त । भग० १०० । उपहितानि-गुरो धीयते तदाहरण्मुपाय । आहरणस्य द्वितीयो मेद । ठाणा. राहाराद्यर्थ ढौकितानि । विशे० ४४० । उवहिओ-अधिकज्ञानाद्यर्थक सन् गुरुपु वहुमानपर । व्य० उवातो-आणानिद्देमो । दश० चू० १३९ । प्र० २३६अ। उवादानं-उपादान-आय., हेतु । विशे० ५४३ । उवहिय-उपहित -क्षिप्त । विशे० ९४३ । औपधिक उवादिणावेत्ता-उपादाय-गृहीत्वा, आकम्य । सूत्र० २३४ । मायाचारी । प्रश्न० ३० । उवादीयमाणा-उपादीयन्ते-कर्मणा वध्यन्ते । आचा० ७८ । उवहिसंकिलेसे-प्रथमसक्लेशः । उपधीयते - उपष्टभ्यते । उवाय-खड्डा । दरा० चू० । उपाय -उदाहरणस्य सयम सयमशरीर वा येन स उपधि -वत्रादिस्तद्विषय सङ् द्वितीयो भेद । ३५ । एकान्तमृदुभणनादिलक्षण । दश० क्लेश -असमाधि । ठागा० ४८९ । २४७ । उप-सामीप्येन (आय ) विवक्षितवस्तुनोऽविकल् लाभ- उवहिसंभोग-उपधे सभोग उपधिसभोग । व्य० द्वि० हेतुत्वाद्वस्तुनो लाभ एवोपाय -अभिलषितवस्त्ववाप्तये व्यापा- ११९ आ। रविशेष । दश० ४० । उपार्जनहेतु । उत्त० ६३१ । उवही-उवधि -परवंचनाभित्राय । वृ० तृ० ४६ आ । नि० | उबायकारी-उपायकारी-सूत्रोपदेशप्रवर्तक । सूत्र. २३४ । चू० प्र० २८९ आ । उवायकिरिया-उपायकिया-यद्रव्यं येनोपायेन क्रियते सा । उवाइ-उलावक प्रधाना विद्या । विशे० ९८२ । सूत्र० ३०४ । उवाइकम्प-उपातिक्रम्य-सम्यक् परिहृत्य । आचा० ३५६ । उचायणं-अवपातयतो- प्रशतोऽकुर्वत. । व्य० प्र० २९अ । उवाइणावित्तए - उपानाययितु, सप्रापयितुम् । वृ• तृ. उवायवं-अवपातवान्-वन्दनशील , निकटवर्ती चा । दश० ११४ आ । उपादापयितुं ग्राहयितुमित्यर्थ । ज्ञाता० १७७ । २५३ । उवाइणावित्ता-उपादापय्य-प्रापय्य । भग० २९२ । उवारियालेणे - चमरचनावलीचवामिधानराजधान्योर्मव्य- उवाइणित्ता-उपनीय-अतिवाह्य । आचा० ३६५ । भागे तद्भवनयोर्मव्योन्नताऽवतरत्पापीठम्पे अवतारिकल. उवाइति-उपयाचते । आव० ४०४ । यने । मम० ३१ । उवाईय--उपादित-उपभुक्तम् । आचा० १०८ । उवालंभ-उपालम्भन उपालम्भो-भयन्तरेणानुशासनमेव स उचाईयसेसेण-उपादित-उपभुक्तम् , तस्य शेषमुपभुक्तशेपम् । यत्रामिधीयते स । आहरणतद्देशे द्वितीयो भेद । ठाणा० २५३ । उपालम्भ -इयमेवानौचित्यप्रवृत्तिप्रतिपादनगर्भा उवाए-उपाय.-अप्रतिहतलाभकारणम् । ज्ञाता. ३४ । ठाणा० १५५ । सपिपासशिक्षारुप उपालम्भ । वृ० प्र० उवाओ-अवपात । गत । आचा० ३३८ । उपाय १५०आ । सानुनयोपदेशप्रदानम् । व्य० प्र० ११७ अ । - आचा० १०८ । - (२१४) [ उवाल्लियह अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः उवेहा ] उपालम्भ उपालम्भ -भंग्यैव विचित्र भणनम् । दश० ४६ । मवलम्बमान. । आचा० ४३० । उत्प्रेक्षमाणः-अवगच्छन् उवाल्लियइ-उपलीयते । आचा० ३६५ । आचा० २१२ । पर्यालोचयन् । आचा० २२४ । उवासंतर-अवकाशान्तर-आकागविशेप , अवकाशरूपान्त- उहा-उपेक्षा-उप - सामीप्येनेक्षा, अवधीरणायां वर्तते ओघ० ११४ । उवासंतराति । ठागा ८६ । उवेहे-उपेक्षेत-औदासीन्येन पश्येत् । उत्त० ९१ । उवहतो-अवपतन् । आव० २०३ । उवासंतरे-द्वयोरन्तरमवकाशान्तरम् । भग० २७२ । ठाणा. उबट्टइ-उद्वर्त्तयति-म्रक्षिततैलापनयनं करोति । जं. प्र. राल वा । भग० ७७ । उवासग-उपासक --श्रावक । आव० ६४६ । नि० चू० द्वि० २५अ । सम० ११९ । साधू चेहए वा पोमहं उवामतो उवासगो भवति । नि० चू.द्वि० १२आ । उपासते-सेवन्ते यतीनित्युपासका -श्रावका । उत्त० ६१३ । उवासगदसा-उपासकाना-श्रमगोपासकाना सम्बन्विनोऽ. नुष्ठानस्य प्रतिपादिका दशा -दशाध्ययनरूपा उपासकदशा.। उपा. १ । दश० ४७ । उवासणा-उपासना-नापितकर्म । आव० १२९ । उवासमाणा-रात्रिजागरणात्तदुपासनां विदधाना. । ठाणा० ३५३ । उवासय-उपासक । दा० ४७ । उवाहणं-उपानत् । आव० ३०५, ३४१ । उवाही- उपाधीयते -- व्यपदिश्यते येनेत्युपाधि - विशेषण स उपाधि । आचा० १५६ । उविच्च-उपेत्य स्प्रवृत्त्या । उत्त. ३९१ । उविनो-अवबद्ध । आव० ३५१ । उविय-परिमितम् । ज्ञाता० २३ । उवीलगो-आलोयय गृहत ने महुरादिवयणपओगेहि तहा भणइ जहा सम्म आलोएति सो रवीलगो । नि० चु० तृ. १२८आ। उवीलणं-निश्चयम् । नि० चू० प्र० १४२अ । अवपीडना, वन्धनविशेष । ज्ञाता. २३२ । उवीलेमाणे-अवपीलयन-वाधयन । विपा० ३९ । उक्खेजा-उपेक्षेत-अवधीरयेत् । उत्त० ११२ । उवेक्खेयवो-उपेक्षितव्य । आव० ६४१ । उवेच-उपेत्य, आकुट्टिकया । बृ० द्वि० १३९आ। उवेहमाण-पेक्षमाण -अकुर्व । । आचा० १५६ । परी पहोपसर्गान् महमान इष्टानिष्टविपयेपु वोपेक्षमाणो माध्यस्थ्य- उबट्टण-उद्वर्तनं-तत्प्रथमतया वामपार्श्वन सुप्तस्य दक्षिणपा- वेन वर्तनम् । आव० ५७४ । अपवर्तना । विशे० १००६ । उद्वर्तना-नारकतिर्यगेकेन्द्रियेभ्यो निर्गम । आव० ५३३ उद्वर्तन-लोठनम् । पिण्ड. १६४ । पड्कापनयनलक्षणम् दश० ११७ । उबट्टण?-उद्वर्तनाथ-उद्वर्तननिमित्तम् । दश० २०६ उवयं-उद्वर्तक-चूर्णपिण्डम् । ज० प्र० ३९४ । उन्वट्टा-उवृत्ता' । प्रज्ञा० ३९७ । उबहिताणि-उद्वतितानि । आव० ९८ । उध्वट्टिया-उद्वत्तिता-च्याविता । पिण्ड ० १२३ । उव्वदृति-एक सिं उव्वति । नि० चू० प्र० ११६आ । उवट्टो-उवृत्त । आव० १७३ । उवणवेसो-उल्बणवेष । ओघ० १४६ । उज्वपणो-उत्कठितः । व्य. द्वि २०३आ । उच्चत्ततो-उद्वर्तयन् । आव० ३१३ । ओघ० ८४ । उन्वत्तणं-उद्वर्तनम्-मार्गपरावर्तनं । वृ० तृ० १२९आ । उत्ताण्यस्म पासल्लियकरण । नि० चू० प्र० २१११ । उद्व- तते-यतो व्रजस्ततो याति । ओध. ४७ । उब्वत्तणा-परावत्तणागुचणपसारणा कायव्वा । नि० चू० प्र० ६०अ। उच्चत्तमाणे-अपवर्तयन् । आचा० ३४३ । उन्नत्ता-ज पाडिहारियणिज तं । नि० चू०प्र० २२५आ। उच्चत्तिया-तेणेव अगणिनिक्खित्त ओयत्तेऊण एगपासेन देति । दश० चू० ८० । उव्वत्तेहि-उद्वर्त्तय । आव० ३५८ । उव्वर-अतिप्रशस्यम् । व्य. द्वि० ४२१आ । उच्चरए । वृ० द्वि० ६२अ । उव्वरग-अपवरकम् । आव० ६२२ । नि०चू०प्र० १७४अ । (२१५) [ उव्वरति आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उसम] । . सम० ९७ । उच्चरति-उद्धरति। आव० ८५९ । उनीहामि-उच्चेष्यामि । नि चु० प्र० २०१३ । उज्वरयं-अपवरकम् । आव० ५६१ । उन्वेयग-उद्वेगक -इष्टवियोगादिजन्य उद्वेग , उद्वेजको वा उव्वरिअ-उदवरितं । गदधिक जातम । ओघ. १८८ । लोकोद्वेगकारी चौरादि । भग० १९८ । अतिरिक्तम् । ओघ० ० १८६ । उज्वेयण-उद्वेजनं-चलनम् । भग० ४७१ । उवरिय-उद्धरितम् । पिण्ड ७९ । अगनाटे शेषभाग । उव्वेयणओ-उद्वेजनक -चित्तविप्लवकारी, उद्वेगकर । प्रश्न आव० ८५९ । उव्वरो-उद्वर -धर्मोपताप । बृ० द्वि० २९३अ । उव्वेयणयं-उद्वेगकृत् । महाप्र० । उचलणं-उद्वलनं, अभ्यङ्गनम् । बृ० द्वि० २१९ । उब्वेला-उद्वेला । आव. ५१४ । उव्वलणेहि-उद्वेलनानि-देहोपलेपनविशेषाः । ज्ञाता० १८३ । उन्चेलियं-उद्वेलित, उत्सारितम् । वृ० द्वि० २५५आ । उव्वसिए-उद्वमित:-उत्थित । ओघ० ४९ । उज्वेलेंति-उद्वेलयन्ति । आव० १८९ । उव्वसिय-उद्वस्य (उदुष्य) । आव० ७१ । उज्वेलेउं-उद्वेलयितुं, उद्वेष्टयितुम् । वृ० द्वि० २५७अ । उल्वाओ-श्रान्त । नि० चू० प्र० १६०अ । उबेह-उद्वेध । अनु० १७१ । जीवा० ३२२ । उण्डत्वम् । उधाण- उद्वानं-किञ्चित्सस्निग्ध । ओघ० १७१ । ३२५, ३४३, २२७ । राज. ९१ । जब प्र० २८४ । उव्वाता-परिधान्त । १०द्वि० ८०आ । व्यद्वि० १५७। ठाणा० ५२५ । चाहल्यम् । ज० प्र. उवाया-उद्वाता:-अतीवपरिश्रान्ता । वृ०प्र० २४३आ । ३२७ । भुवि प्रवेश । ठाणा० ६९ । भूगतत्वम् । ज. परिश्रान्ताः । व्य. द्वि. २०२आ । प्र. २८२ । भूमाववगाह । ठाणा० ४७९ । भूमिप्रवेश । उव्वालना-उद्वालना, निष्काशना । वृ. द्वि० २५० । जं० प्र० ७२ । उच्चासिअ-उद्वामित --शोषित' । ओघ० १७४ । उज्वेहलिया-वनस्पतिविशेष । भग० ८०४ । उवासेइ-उपहसति । आव० ६६९ । उष्णः-स्पर्शस्याष्टमो भेद । प्रज्ञा० ४७३ । उडिवग्ग-उद्विग्न-खिन्नम् । भग० १६६ । सातमय । उष्णरूपा-योनिमेद । आचा. २४ । विपा. • ४३ । उद्विग्ना -अथ पुनर्नानेन सार्द्ध युद्धयामहे | उस-अवश्याय । विशे० १०२९ । इत्यपुन करणाशयवन्त । जं० २३९ । उद्वेगवान् । प्रश्न. उसकण-रंधियपुवस्स उसकणं करेज । नि०चू०प्र०९४२आ। उसकावेउ-उरवक्य, अध प्राप्य । आव० ६२५ । उन्विद्ध-उद्विद्धं-ऊर्ध्वम् । औप० ३ । उद्विद-उण्डम् । उसको-उत्कण्ठल । नि० चू० तृ० ३६अ । ज्ञाता० २ । ऊवंगत । ज० प्र० १४४ । उच्चा । आव० उसगार-मत्स्यविशेष । प्रज्ञा० ४८ । १८४ । उन्मिता , उच्चस्त्वेन वा । अनु० १५८ । उद्रिद्ध उसडा-उत्सता-उच्चा ।ज० प्र०४४ । अत्यर्थमुच्च । औप० ९ । उच्च । राज० ५। उसण-उष्ण -प्रतिकूल । ठाणा, ४४८ । उन्विहंताई-उत्पतन्ति । ज्ञाता० २३२ । उसणं- लोअगपरिभोग उमण भण्णइ । नि० ० दि० उविहइ-ऊर्ध्वं विजहाति, ऊर्ध्वं क्षिपति । भग० २३० । उद्वि १५९ों। जहाति-ऊर्व क्षिपति । ज्ञाता ० १६८ । उसहसण्हिआओ-अतिशयेन प्राबल्येन च अगलक्ष्णि- उन्विहति-उप्पाडेति । नि० चू० प्र० २५६आ । का उलक्षणलक्ष्यिका । अनु० १६३ । उविहामि-नयामि । ज्ञाता. १३९ । उसम-ऋषभ, पञ्चदश कुलकरनाम । ज० प्र० १३२ । उचिहिय- उध-उत्प्रेयं । भग० ६२८ । भरतचकिपिता । आव. १६२ । सम० १५२ । वृषभ . उच्चीलए-अपनीडक -लज्जापनोदको यथा पर मुखमालोच. भूषणविधिविशेष । जीवा० २६९ ) ब्रह्मदत्तपल्या शिलाया यतीति । ठाणा० ४८६ । पिता । उत्त० ३७९ । ममग्रसयममारोदवनाट वृषभ । उन्बीलणं-अपकर्णनम् । उप० मा० गा० ७७ । आदिजिन । आव० ५०० । सम्प्रदायगम्य द्रविडवंग- ~ ११ """ (२१६) . उसम [उसभकण्ठो अल्पपरिचितसद्धान्तिकशब्दकोषः नन्य उद्वेग , ग्रेजी .१९८॥ - ग. 10 प्लबकारी, देगला प्रत 0 । वृ० वि० २९४ा। । १८५। 1० वि० २५७। जीवार ३२२ । उग्दत्तम्। ११ । ०७० २०४ . । वाइल्यम् । ३०० ६९ । भूगतलम् । ३० गणा० ४७१ । भूमिव । भग ८०१ जं० प्र० १०७। पट्ट. 1 सम० १४९ । परिवेटन पट्टः । ठाणा. चू० द्वि० ११८ । निदाघादिताप ३५७ । प्रज्ञा० ४७२ । उष्ण -धर्म । ठाणा० २८७ । आह उसभकण्ठो-वृषभकण्ठ -वृषभवण्ठप्रमाणो रत्न विशेष धनुगत । अनु० ११० । उष्णो माईव जीवा० २३४ । उष्ण -अप्रासुकम् । दश० २०६ । उसभकूड-ऋषभकूट , जम्बूद्वीपे उत्तरार्द्धभरते पर्वत । उसिणपरितावे-उष्णपरिताप --उष्ण- जं० प्र० ८७ | आव० १५१ । लादि तेन परिताप । उत्त० ८९ उसभज्या-वृषभध्वजा:-वृषभचिह्नोपेता ध्वजा । जीवा उसिणभूए-अस्वाभाविकमौष्ण्य प्रा २१५ । उसिणोदए-उष्णोदकं-स्वभावत एव उसमनाराय-ऋषभनाराच-यत्पुन, कीलिकारहितं संहननं परिणामम् । वादराप्कायभेदः । प्र तत् । प्रज्ञा० ४७२ । उसिणोदग-उष्णोदकं-क्वथितोदकम् उसभदत्त-नाम विशेषः । भग० ६२०,५३३, ५४९, ५५६, वृत्तत्रिदण्डम् । पिण्ड० १७ । ५९७ । आचा० ४२९ । नवमशते त्रयत्रिंशत्तमोद्देशकेऽभि- उसिणोदगवियडेण-उष्णोदकविको हित । भग० ४७५ । ऋषभदत्त -इषुकारनगरे गाथापति. । नात्रिदण्डोवृत्तेन पश्चाद्वा सचित्तीभूते विपा० ९५ । जम्बूस्वामिन पिता । नि०चू०वि० २९आ। उसिय-उत्सृतानि-लम्बमानानि । र उसमपुरं-ऋषभपुरं, द्वितीयनिहवोत्पत्तिस्थानम् । विशे० उसीर-उशीर-वीरणीमूलम् । ज्ञाता० ९३४ । धनावहराजधानी । विपा० ९४ । राजगृहस्या राज. ३४ । मूलविशेष । जीवा० परनाम । आव० ३१५ । नगरविशेषः । उत्त० १०४ । मूलम् । प्रश्न० १६२ । राजगृहम् । ठाणा० ४१४ । जीवप्रदेशप्ररूपफनिवोत्पत्ति- उसीसट्ठवणं-सीमस्स समीव उवमीसं स्थानम् । आव० ३१२ । उसीस हवर्ण-णिक्खेवो । नि० चू० उसमसिरि-श्रीऋषभः । मम० १०६ । उसु-इषु -बाण । भग० ९३, २३० उसभसेण-मुनिसुव्रतजिनस्य भिक्षादाता । मम० १५१ । दाय. । भग० २३० । ऋषभस्वामिन प्रथमगणधरः । मम० १५२ । बृ० प्र० उसुअ-इघुक -इपुकाकारमाभरणं, तिल २५४अ । ऋपभसेन -भरतपुत्रः । आव० १४९ । उसुआर-इषुकार -राजपुत्र विशेष । उसभा-ऋषभा-शाश्वतप्रथमप्रतिमानाम । जीवा० २२८ । उसुआरपुर-इघुकारपुर-नगरविशेष उसवियं-उवसामिय । नि० चू० प्र० २९४अ । उसुकारिजं-इपुकारीयं-उत्तराध्ययने उसह-ऋषभ , सयमभारोद्वहनादृषभ इव ऋषभ , वृषभो वा । उत्त० ३९३ । इति संस्कार , तत्र वृषभ इव वृषभ इति वा, वषेण , उसुकाल-उक्खलं, उदूखल । नि० भातीति वा वृपभः । जं० प्र० १३५ । उसुगारपव्वय-पर्वतविशेष । ठाणा उसहकूडप्पभाई-ऋषभकूटप्रभाणि, ऋषभकूटाकाराणि । उसुत्तियल्लयं-जेण वा कट्ठाइ सचाले ययं । नि० चू० प्र० ११६आ । उसहकूडे-ऋपभकूट । जं० प्र० २५० । उसुद्धसरीरो-मलपकियमरीरो उमुद्धर उसहछाया-वृषभच्छाया-छायाया मातमो मेट । प्रना० चू० द्वि. ६५अ । उसुमट्टिता-कुट्टिया पुणो मट्टियाए उसहपुरं-ऋषभपुर-नगरविशेष । उत्त० १०५ । नि चू० तृ० ६४अ । उसा-हो । नि. चु० द्वि० ८३अ । उसुयार-इपुकार -नगरविगेप., ऋषभ • ४३ करेवा नि०यू०प्र० १४. आ प्या आव0-11 . मण्याइ । निः वृदि. जं० प्र० ८८ । प्रावल्येन च भारत नाम 1 1001 -- सम० १५. 14- । प्रदतपल्या शिलामा १ m7 पम।

[ उसुयारपुर आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः उस्सिंचण ] | आव० ४४२ । ७०अ। - उसुयारपुरं-इपुकारपुर, कुरुजनपदे नगरं, पुकारराजधानी। ! सैव श्लक्ष्णलक्ष्णिका उत्-प्रावल्येन श्लक्ष्णश्लक्ष्णिका उत्. उत्त० ३९५ । क्ष्णश्लक्ष्णिका । भग० २७५ । उसुयारिजं-उत्तराध्ययने चतुर्दशमध्ययनम् । मम० ६४ । उस्सन्नं-प्रायश । आव० ५६८ । अविरुद्धं । नि० ० द्वि. उसू-इपु:-शर । सिद्धिगमने दृष्टान्त तिलगो । नि० चू० द्वि० ० ९५भ । उस्सनकयाहारो-प्रायशोऽकृताहार. । आव० ५६८ । उसूयालं-उदूखलम् । आचा० ३९७ । उस्सप्पि-उत्सर्पिता वत्युत्सर्पणेन । जं० प्र० १०२ । उसे-ऊषा-पाशुक्षार । दश० १७० । उस्सप्पिणी-सागरोपमाणा दशकोटीकोट्य एव दुप्पमदुष्षमा- उस्सओ-उच्छ्रय भावोन्नतत्वम् । अहिंमाया. पञ्चचत्वारिं. घरकक्रमेणैकोत्सपिणी । जीवा० ३४५ । उत्मर्पति-वर्धते गत्तमं नाम । प्रश्न० ९९ । आरकापेक्षया वर्धयति (वा) क्रमेणायुरादीन् भावानित्युत्सर्पिणी। उस्सकइ-उत्ध्वष्कते-तदाकारभावमात्रधारणतस्तत्प्रतिविम्ब. जं० प्र० ८९ । उत्सप्पिणी-दशसागरोपमकोटाकोटिमाना । मात्रधारणतो वोत्सर्पतीत्यर्थ , कृष्णलेश्यातो हि नीललेश्या अनु० १०० । ठाणा० ८६ । उत्सर्पति-वर्द्धतेऽरकापेक्षया विशुद्धा ततस्तदाकारभावं तत्प्रतिबिम्बमात्र वा दधाना मती उत्सर्पयति वा भावानायुष्कादीन् वर्द्धयतीति । ठाणा० २७ । मनाक् विशुद्धा भवतीत्युत्सर्पतीति । प्रज्ञा० ३७२ । उस्सय-यस्मिंश्च सत्यूर्व श्रयति जात्यादिना दध्मिातः पुरुष उस्सकण-उत्ध्वष्कणं-परत करणम् । पिण्ड ० ९१ । उत्तानीभवति स उच्छ्राय:-मान । सूत्र. १८० । उस्सग्गनिवाइयाण-उत्सर्गपातिनामुत्सर्गेण संयममनुपाले- उस्सरति-उत्सर्पति । आव० ३०३ । यता यासाम् । व्य० द्वि० ४२९भ । उस्सवित्ता-उहहुत्ताणि काऊण । दश० चू० ८० । उस्सग्गो-उत्सर्गः-उपयोग । ओघ० १५५ । परिष्ठापनम् । उस्सविया - सस्थाप्योच्चावच्चैविश्रम्भजनकैरालापैर्विश्रम्मे ओघ. १३८ । कायोत्सर्ग । आव० ७८२ । उवओगे, पातयित्वा । सूत्र. १०६ । काउस्सग्गो । नि० चू० द्वि० १६४अ । पइण्णकहा । नि० उस्सा-अवश्याय -नेह । आकायभेद । प्रज्ञा० २८ । चू० प्र० २४०अ । कारणनिरपेक्षं मामान्यस्वरूपम् । बृ० रजन्या यस्नेह पतति । आचा० ४० । तृ० ९७आ। उस्साग-यनिर्विशेषण क्रियते । उप. मा. गा० ४०० । उस्सणं-लोअगपरिभोग उस्सण्ण भण्णइ । नि० चू० द्वि० उस्लाविन्दुथियुगो-अवश्यायविन्दु । आव० ८४५ । १५९भ । उस्सणं एकान्तेनैव अलक्षणयुक्ता गोंदि सरीरमित्यर्थ । उस्सारिता-उत्सारिता-समीपमागता । आव० ८४१ । नि० चू० द्वि० ८५आ । उत्सनं-बाहुल्यत । औप० ८६ । उस्सासनाम-उच्छ्वासनाम-यदुदयवशादात्मन उच्छ्वाम उत्सनं-अनुपरतम् । आव० ५९० । नि श्वासलन्धिरुपजायते तत्। उच्छ्वासनि श्वासयोग्यपुद्गल. उस्सण्णदोस-उत्सन्नदोष -अनुपरत बाहल्येन प्रवर्तते इति । ग्रहणमोक्षविषया लब्धिरुपजायते तत् । प्रज्ञा० ४७३ । उस्सासविसा-उच्छ्वासे विषं येषा ते उच्छ्वासविषा । उस्लण्णपए-उत्सन्नपदे-प्रभूतपढे । व्य० प्र० ९३भ । प्रना० ४६ । उस्सण्णा-अवसन्नाः-पक इव निमनाः । प्रश्न० ६९ । उस्सासा-उच्छ्वास -मुखादिना वायुग्रहणम् । भग० ४७० । उस्सण्णो-बहुतरगुणावराही । नि० चू० द्वि० ९०आ । उस्सासो-उच्छ्वास । आव० ८४५ । उस्सण्हसहिआ-उत्तरप्रमाणापेक्षया उत्-प्राबल्येन लक्ष्ण- उस्साहे-उत्साह -श्रवणविषये मनम उत्कलिकाविशेष । सूर्य अक्षिणका उच्छलक्ष्णलक्ष्णिका । ज० प्र. ९४ । उस्सण्हसहिया - व्यावहारिकपरमाणुपुद्गलाना समु- उस्सिंघइ-उज्जिघ्रति, जिघ्रति । आव० ६७४ । दाया:-द्वयादिसमुदायास्तेषां समितयो-मीलनानि तासा समा- | उस्सिंघणा-उद्माणम् । आव० ४२४ । गम -परिणामवशादेकीभवनं समुदयसमितिसमागमस्तेन या ! उस्सिंचण-उर्ध्व सेचन उत्सेचनं-कूपादे कोशादिनोत्से परिणाममात्रेति गम्यते, सा एकाऽत्यन्तं लक्ष्णा श्लक्ष्णश्लक्ष्णा । पणम् । आचा० ४२ । इतौ वातम्य प्राबल्येन पूरणम् । आचा आव० ५९०। २९६ । । (२१८) [ उस्सिचणाए अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः ऊरणय] २८१ । - 4 0 अपगत ७४, ३७९ । उस्सेतिमामं-जहा पिढे पुढविकायभायण आउक्कायस्स उस्सिचणाए-उत्सेचनेन-अरघट्टघट्टीनिवहादिभिरुदञ्चनेन । भरेत्ता मीसए अद्दहिज्जति मुहं से क्त्येण उहाडिजति, ताहे उत्त०५९९ । पिट्ठपयणय रोट्टस्स भरेत्ता ताहे तीसे थालीए जलभरियाए उस्सिचमाणे-उत्सिचन-आक्षिपन् । आचा० ३४३ । उवरि ठविजति ताहे अहोछिट्टेण त पि ओसिन्नति हेटाहुत्तं वा उस्सिंचिया-उत्सिच्य-अतिभृतादुज्झनभयेन ततो वा दा ठविजति तत्थ जं आम तं उस्सेतिमाम भण्णति । नि. नार्थ तीमनादीनि दद्यात् । दश० १७५ । चू० द्वि० १२५ । उस्सिउस्सिओ-उच्छ्रितोच्छ्रित । आव० ७७९ । उस्सेतिमे-उत्स्वेदेन निवृत्त उत्स्वेदिम-येन ब्रीह्यादिपिष्टं सु- उस्सिमोदए-उच्छितोदक - ऊर्ध्वद्धिगतजल । भग० राद्यर्थ उत्स्वेयते तत् । ठाणा० १४७ । उस्सेहंगुल-उच्छ्रयाजुलं-अङ्गुलस्य द्वितीयो मेद ।प्रज्ञा०२९९। उस्सिट्ठा-उत्सृष्टा-प्रबलतया सर्वासु दिक्षु प्रस्ता । प्रज्ञा०९९ । अनन्तानां सूक्ष्मपरमाणुपुद्गलानामित्यादिक्रमेणोच्छ्यो वृद्धि- उस्सित्तं-उत्मिक्तं-अत्यर्थ जलाभिषेचनम् । प्रश्न० १२७ । नयनं तस्माजात तत् । उत्सेधो-नारकादिशरीराणामुञ्चस्त्वं उस्सिन-अस्विन्नम्-वन्युदकयोगेनानापादितविकारान्तरम्। तत्स्वरूपनिर्णयार्थमगुलमुत्सेधाङ्गुलम् । अनु०१५६,१६० । दश० १८५-1 उत्स्विन्नम्-मुण्डेरकादि । बृ० प्र० २६७ आ । उस्लेह-उत्सेध --उच्चत्वम् । सम० ११४ । उत्सेध -शिख- उस्सियं-उच्छृत-प्रख्यातम् । सूत्र०४०८। उच्छ्रितं-उत्कटम् । रम् । जीवा० २०४, ३६० । सर्वाग्रम् । जीवा०. २२५ । सूर्य० २६२ । उत्सृतां, उच्छ्रित्येवोच्छ्रित्य-उत्तरोत्तरसयमस्था उच्छ्रय -शिखरम् । राज. ६२ । नावाप्त्या तामुच्छ्रितामिव कृत्वा वा । उत्त० ३४१ । उत्सृत.- उस्सेहपरिवुढी-उत्सेधपरिवृद्धि - सर्वाग्रपरिवृद्धि. । जीवा ।ज्ञाता० १०९ । ३२३ । उस्सियनिसन्नओ-उत्सृतनिषण्ण । आव० ७७२ । उस्सोच-उत्सोह्य-असोढ्वा । व्य० प्र० १६४भ । उस्सियपडाग-उच्छ्रितपताकम् । भाव. ७०३ । उहरिय-पेढियमादिसु आरुभिरं ओआरेति, अथवा कार्य उस्सियफलिह-उच्छ्रितं स्फटिकमिव स्फटिक-अन्त करणं उच्च करेज्जा उक्कज्जियडंडायतं तद्वद् गृह्णाति, कायं उद्धं यम्य स । ज्ञाता० १०९ । कृत्वा गृह्णाति उग्णमिय इत्यर्थ । नि० चू० तृ० ५९ अ। उस्सीवेत्ता-उन्सीव्य । आव० ४२१ । उहसेइ-अपहमति । आव० २१९ । उस्सुक्क-उच्छुल्का-अविद्यमानशुल्कग्रहणम् । विपा० ६३ । (ऊ) उच्छुल्का-मुक्तशुल्का । भग० ५४४ । ज्ञाता. ४० । ऊखा-कुम्भी । प्रश्न. १७ । उस्सुगो-उत्सुकः । आव० ३०१ । ऊणं-ऊनम्-वर्णादिभिीनम् । सूत्रदोषविशेष. भाव० ३७४ । उस्सुत्तं-सुत्तादवेनं । नि०चू०द्वि० २३आ। ऊर्ध्वं सूत्रादुत्सूत्र , यद् व्यञ्जनाभिलापावश्यकैरसम्पूर्ण वन्दते, कृतिकर्मणि सत्रानुक्त' । आव० ५७१ । आव० ७७८ । अष्टाविंशतितमो दोष । आव० ५४४ । उस्सुय-उत्सुक । ज्ञाता० १६० । ऊणगसयभागो-ऊनशतभाग - शतभागोऽपि न पूर्यत उस्सूर-अकाल । नि० चू०४० १३६आ । ओघ० ९८ । इत्यर्थः । आप० ५२२ । उस्सूरलंभो-उत्सूरलाभ । आव० ८४३ । ऊणोअरिआ-ऊनोदरस्य भाव ऊनोदरता । दश० २७ । उस्सूरीभूतं-उत्सू-भूतम् । आव० ८५२ । ऊणोयरिया-अवमस्य-ऊनस्योदरस्य करणमवमोदरिका । उस्सूलय-खातिका परवलपातार्थमुपरिच्छादितगर्ता वा। उत्त० ३११ । ऊन अक्षरपदादिमिरेव हीनमूनम् । हेतुदृष्टान्ताभ्यामेव हीन- उस्सेइम-पिष्टोत्स्वेदनार्थमुदकम् । आचा० ३४६ । मरहट्ठ मूनम् । अनु० २६१ । विसए टस्सइया दीवगा मीओदगे वुज्झति, अहवा पिट्ठस्म ऊयरिणिया । नि० चू० प्र० ६१ आ। उस्सेजमाणम्म हेट्ठा जं पाणियं तं । नि० चू० तृ० ६०भ । ऊरणय-करणिका । भाव० ६.३ । भग. ९२१ । (२१९) [ एकतोव० आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः एगंतदिट्ठी] न । 1 । एकतोवऋद्विधातोवक्रएकतश्चक्रवालद्विधातश्चक्रवा- एकई-एकीकृत्य-योगपद्येन । ओघ० - १११ । ..... --- लचक्रार्द्धचवालाभिनयात्मक-चतुर्थी नाट्यविधि । एकगमा-एकगमा -तुल्याभिलापा । ठाणा० ५८ 1 जीवा० २४६ । जं० प्र. ४१५। एकगमे-एकगम -पड्भ्योऽप्यन्तेऽङ्क एव पाठ 1 अन्त० ४। पकतोवक-एकतोवकं नाम नटानां एकस्या दिशि धनुरा- | एक्कडे-पर्वगविशेप । प्रज्ञा० ३३ । कारश्रेण्या नर्तनम् । जं. प्र. ४१५ । एकमुहा-जेमिं एकओ णालाण मूहा ते एकतोमूहा। नि. एकतोवेदिका-एक जानु वाह्योरन्तरे कृत्वेति । ठाणा० चू० प्र० १६१ अ । एकल्लओ-एकाकी। आव० १९३ । एकत्तवियक-एकत्ववितर्कम् । आव० ३२७ । एक्कवारिआ । भोघ० ९७ । एकत्ववितर्कमविचारं - शुक्लध्यान द्वितीयमेद । आव० एक्कसंकलितवद्धा-एकश्रृंखलावद्धा । आव० ६३ । ।' ६०३ । एक्कसरा-सहैव । आव० ३६७ । एकधारं-शस्त्रविशेष । दश० २०१। एकसिं-एकश । आव० ८१३ । एकभविक-तत्र एकस्मिन् भवे तस्मिन्नेवातिक्रान्ते भावी। एकसेल-एकशैल -वक्षस्कारपर्वत । जं० प्र० ३४७ ।- एकभविक -योऽन्तर एव-भवे इन्द्रतयोत्पस्यत इति । ठाणा० एक्काणिया-एकाकिनी । आव० ५६० । १०३ । पक्कारसी-एकादशी तिथि । ज्ञाता० -१५३ । पकभावं-एकत्वम् । उत्त० ५८०१, एक्काहिजा-व्यन्तरीविशेषा । नि० चू. प्र. ३०४ .आ'। एकमुखं । ओघ० ९९ । एगंगिओ-सघातिमासघातिमो एंगगिओ भवति । नि० -चू एकल्लओ-एकाकी । भाव. ३०६ । द्वि० ७९ अ । एकल्लशाटक-एकवस्त्रक । ओघ० ४३ । एगंगियं- एकागिकं तज्जातदमिक सदसिकाकम्बलीखण्ड- एकविहारप्रतिमा-पञ्चमी प्रतिमा ।. सम० ९६ । निष्पादितम् । ओघ० २१४ । य एकेन फलकादिना कृत। एकस्थीकृतं-न एकस्थमनेकस्थं अनेकस्थमेकस्थमिव कृत- बृ० तृ. १६२ अ । एकाशिक-तज्जातदशिक न वा द्वयादि- मेकस्थीकृतम्। आचा० ६३ । सण्डनिष्पन्नम् । बृ० द्वि० २३९ में। एका-एका -श्रेष्ठा सज्ञाशब्दत्वान्न सर्वादित्वम् । जं० प्र० १३१। एगंत-एकान्त-विजनम् । ज्ञाता० ८८ । नियम. 1 उत्त० एकाए-एक । व्य. दि. ४१७ अ । २४१ । एक अद्वितीय , कर्मणामन्तो यस्मिमिति, मोक्ष । एका त-एक एवाहमित्यन्तो-निश्चय । उत्त० ३०७ । उत्त० ३०७ । एकनिश्चय.। भग. २९० । एकान्तं- एकान्तर:-अनन्तरसमय । आव० १४ । अनुपघातक स्थानम् । दश० १५६ । निश्चय । उत्त. एकान्तवित्-एकान्तेन विदितससारस्वभावतया मौनीन्द्र ५८७ । इतरव्यासपरिहारात्मकम् । उत्त० ६२२ । मोक्ष । मेव शासन तथ्यं नान्यदित्येवं वेत्तीति । सूत्र. २६५ । दा० १६५ । विजनम् । भग० ३२३ । योजनमण्डला- एकायतनं - एक-अद्वितीयं आयतन-ज्ञानादित्रयम् । दन्यत्र । ज० प्र० ३८८ । एगंतचरिया-एकान्तचर्या-द्रव्यक्षेत्रकालभावेष्वसम्बद्धता । एकावलिः-भूषणविधिविशेष । जीवा०-२६८ । दश० १५१ एकावली-विचित्रमणिककृता एकसरिका। ज० प्र० १०५। पगंतदिट्ठी-एकान्तदृष्टि - एकोऽन्तो-निश्चयो यस्या. सा विचित्रमणिका ! ज्ञाता०४३। कनकावल्यभिलापेनेत्यर्थ । तथा, सा चासो दृष्टिः, अनन्यांक्षिप्ता । उत्त० ४५७ । एका- औप० ३० । न्तदृष्टि -एकान्तेन तत्त्वेषु-जीवादियु पदार्थेषु दृष्टिर्यस्यासी । एकाशीतिपदवास्तुन्यासः। जं० प्र० २०८ । सूत्र. २३४ । एकोऽन्तो-निश्चयो यस्याः सा एकान्ता सा, एकिका-प्रश्रवणम् । आचा० ४०९ 1 दृष्टि -बुद्धिर्यस्मिन् एकान्तदृष्टि । ज्ञाता०५१। एकान्ता-प्रा- 4 आचा० २०७ । L २२२ [ एगंतदिडीए अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः। पगग्ग] - यमेवेदं मयेत्येवमेवः निश्चया दृष्टिर्यस्य सः । ज्ञाता० -८० । ज्ञाता० ३४ । सहरा. । ज्ञाता० ५७ । एक -रागद्वेषरहित- एकान्तेन निश्चला जीवादितत्त्वेषु- दृष्टि -सम्यग्दर्शनं यस्य तया ओजा , यदिवाऽस्मिन् समारचक्रवाले. पर्यटनसुमान् स एकान्तदृष्टि-निष्प्रकम्पसम्यक्व । सूत्र. १४१ । स्वकृतमुखदु खफलभाक्त्वेनैकस्यैव परलोकगमनतया सदैकक पंगतदिट्ठीए-एकोऽन्तो-निश्चयो यस्या मा एकान्ता मा एव भवति । सूत्र० २६५। समान । राज० ४९ । मोक्ष दृष्टि -बुद्धिर्यस्मिन्निन्थे प्रवचने-चारित्रपालनं प्रति तदेकान्त सयमो वा। सूत्र. २३५ । दृष्टिकम् । एकान्ता-एकनिश्चया दृष्टि -दृक् यस्य स एकान्त- | पगइओ-एकदा कदाचिद् एकचरो वा। आचा० ३३० । दृष्टिक । ज्ञाता० ५१ । एगइया-एकका , एके केचनेसर्थ । भग ३२ । पगतधारा-एकत्रान्ते-वस्तुभागेऽपहर्तव्यलक्षणे धारा-परो- एगइयाणं-एकेषा, न तु सर्वेपाम् । भग० १२९ । पतापप्रधानवृत्तिलक्षणा यस्य स एकधार । ज्ञाता० ८० । एगईओ-एक - कश्चिदेकाकी वा । आचा० ३३० । एकान्तधारा-तीनधारा । उत्त० ३२७ । एकान्ता-एकवि एगउ-एकस्मिन् देशे। ज्ञाता० । ९३ । भागाश्रया धारा यस्य या एकान्तधारा । ज्ञाता० ५१ । एगओ-एकत । ज्ञाता० ७० । एकः स एव एकक , एको एगंतपंडिए-एकान्तपण्डित -साधु । भग० ९१ । वा प्रतिमाप्रतिपत्त्यादी गच्छतीत्येकग । एकं वा कर्ममाहि- एगंतबाले-एकान्तबाल -मिथ्यादृष्टि अविरतो वा। भग० त्यविगमतो मोक्षं गच्छति-तत्प्राप्तियोगानुष्ठानप्रवृतेर्यातीत्ये: म ९० । कग । उत्त० १०८ । 1511 , एगंतमत-एक इत्येवमन्ती-निश्चय यत्रासावेकान्त एक | एगओखहा-एकस्या दिश्यकशाकारा । ठाणा० ४०७। यया इत्यर्थ अतस्तमन्त भूभागम् । भग २९० । जीव पुद्गलो वा नाड्या वामपाश्र्थादेस्ता. . प्रविष्टस्तथैव, पगंतमोणेण-एकान्तमौनेन-सयमेन करणभूतेन । सूत्र. १३९ । गत्वा पुनस्तद्वामपार्शदावुत्पद्यते. सा एकन खा, एकस्यां पगंतर-एकान्तरोऽनन्तरसमय । विशे० २०९ । एकान्तरं- दिगि वामादिपावलक्षगाया खस्य-आकाशस्य लोकनाही; एकैन चतुर्थलक्षणेने तपसाऽन्तर-व्यवधान यस्मिस्तत् ध्यतिरिक्तलक्षणस्य भावादिति । भग० ८६६ । उत्त० ७.६ । एगओजण्णोवइयकिञ्चगए ।. भग० १९०.। एग-एकः अमहायो रागद्वेषादिमहभावविरहितो गौतभादि-गोवंका-एकन -एकस्यां दिशि वा-घका . एकनोवका । रित्यर्थः । उत्त० २४१ । तथाविवती किरनामकर्मोदयादनु- भग० ८६६ । ar तराबाप्तविभूतिरद्वितीय, तीर्थकरः। घातिकर्म साहित्यरहित । एगओवचा-द्वीन्द्रियजीवविशेषा । प्रज्ञा० ४१ ॥ उत्त: २४१ । एकत्र । ओघ० ३३ । अमहाय. । ठाणा० ३५। एगखम्भ-एकस्तम्भ -एक स्तम्भो यस्मिन् स प्रासाद..। तत्र प्रदेशार्थतया असख्यात प्रदेशोऽपि जीवो द्रव्यार्थतया एक , दश० ४१ । अथवा प्रतिक्षग पूर्वस्वभावक्षयापरस्वरूपोत्पादयोगेनीनन्त- एगखुर-प्रतिपदमेक खुरो येषां ते एकखुरा -अश्वादय । मेऽपि कालवयानुगामिचतन्यमात्रापेक्षया ए , अथवा जीवा० ३८ । प्रतिपदमेक खुर -शफो येषा ते एकखुरा - प्रतिसन्तानं चैतन्यभेदेनानन्तत्वेऽप्यात्मना सग्रहन अश्वादय । प्रज्ञा० ४५ । एक खुर -चरणे येषामधोव~- याश्रितसामान्यरूपापेक्षयैकत्वम् इति । सम० ५ ॥ स्थिविशेगो ये ते एक वुरा-हयादय । उत्त० ६९९ । मोक्षोऽशेषमलकलङ्करहित्वात् संयमो वा रागद्वेषरहितत्वात्। एगगय-एगागिक-तक्रम् । व्य० द्वि० ८१ आ। आचा० २१२ । पूर्वपूर्वरूप उत्तरोत्तररूप, आद्य , पर्यः एगगुण-एकगुण 'एकेने गुणो-गुणनं-ताटनं यस्य स एक वमानो वा । प्रज्ञा० . २६५ । धर्ममहायविप्रमुक्त' अल्पसा. गुण. । ठाणा० ३५ । गारिकस्थितो वा । दश० १८४ । उद्रेकावस्थावतिनैकेन । एगगुणकालए-एक.-सर्वजघन्यो गुण.-अशस्तेन कालक गुणेन स्पर्शाख्येनोपलक्षित 'इति एक -वायु.। आचा० ७५। परमाण्वादिरेकगुणकालकः-सर्वजघन्यकृष्ण । अनु० १११ । एकाकी, असहायः । ठाणा. १९ । आन्तरव्यक्तरागादि. एगग्ग-एकाग्रस्य-एकालम्बनस्याच्चितसो भाव एकाम्यं- सहायवियोगात् अद्वितीय तथाविधपदात्यादिसहायविरहात् । ध्यानम् । उत्त० ६२१ । T २२३ [एगग्गचित्त आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः एगपरवं] ओघ० ९९ । -- १७१ । - - पगग्गचित्त-एकाग्रचित्त -एकापालंवन । दश० ५७ । एगढिमागे-एकषष्टिभागान् । सूर्य०- २५ । एगग्गमणो-एकाममना--अवहितचित्त । उत्त० ५९९ । एगठिया-एकमस्थिकं फलमध्ये येषां ते । भग०. ८.४। पगग्गहण-एकग्रहणेन-एकशब्देन । भग० १४९ । एकमस्थिक-फलमध्ये बीज येषा ते एकास्थिका.। भग. पगग्गहणगहिया- एकग्रहणगृहीता-एकप्रहणेन-एकशब्देन ३६४ । एकास्थिका-नौः। विपा० ८० । शाता० २२५ । धर्मास्तिकाय इत्येवंलक्षणेन गृहीता ये ते तथा, एकश. फल फलं प्रति एकमस्थि येषां ते एकास्थिकाः। प्रज्ञा० ३१। ब्दाभिधेया इत्यर्थ । भग. १४९ । एगठाणं-एकस्थानम् । आव० ८५२ । एक. सहाटकः । एगचरा-एकचरा -एकाकिन । आचा० ३०८ । एगचक्खू-अतिशयवत् श्रुतज्ञानादिवर्जितो विवक्षित इति । एगणासा-एकनाशा पश्चिमरुचकवास्तव्या पन्चमी दिक- एकचक्षु' चक्षुरिन्द्रियापेक्षया। एक चक्षुरस्येति । ठाणा० मारीमहप्तरिका । जं० प्र० ३९१ । पगणिसेज्जाए -एकेनासनपरिग्रहेण । मम• ७२ । पगचक्खू विणिय -'एकचक्षुर्विनिहत -एक चक्षुर्वि- एगतियाओ-एकका -काश्चन । जीवा० १९८ । निहतं यस्य स । प्रश्न० २५ । एगतो-एकत:-एकस्मिन स्थाने । व्य० प्र० १७४ भ । एगचरिया - एकचर्या - एकाकिविहारप्रतिमाऽभ्युपगमः । गतोनिसहसंठिया - एकतो-रथस्य एकस्मिन् पार्श्व यो आचा० २४३ । नितरां सहते स्कन्धपृष्ठे वा समारोपितं भारमिति निषधो- एंगचोरों-एकचौर -यं एकाकी मन् हरति स. । प्रश्न०४६ । बलीवईस्तस्येव मंस्थितं-संस्थानं यस्याः मा एकतोनिषध. एगधा-एकाा-अद्वितीयपूज्या सयमानुष्ठाने वा असदृशी संस्थिता। सूर्य ७१। 'भर्चा-शरीरं येषा ते एकाएं । उपा० २९ । एगतोवंका-एकओवंका-एकस्या दिशि वका । ठाणा•४०५। पगच्छत्त-एकछत्रा एकं छत्रं-नृपतिचिह्नमस्यामिति, अवि- एगतोवत्ता-एकतोवर्ता -द्वीन्द्रियजीवविशेषा । जीवा०३।। द्यमानद्वितीयनृपतिः । उत्त० ४४८ । पगतोवेति-एगखीला । नि० चू० प्र० १२७ श्र। एगजंवूप-उल्लुकतीरे चैत्यविशेष. । भग० ७०५ । पगत्त-एकता, यैकता-निरालम्बनत्वम् । भग० एगजडी-एकजटी-एकाशीतितमो 'प्रहः । जं० प्र० ५३'५ । एकत्वं--अमेद, । ठाणा० १०११, भ्यशीतितमो प्रह । ठाणा० ७९ । एगत्तवियक्के - एकत्वेन-ममेदेोत्पादादिपयोयाणामन्यतमै. पगजं-एक्यम्-एकवाक्यतया सप्रधार्य । आचा० ३३० । कपर्यायालम्बनतयेत्यर्थी , वितर्क -पूर्वगतश्रुताश्रयो व्यजन. एगट्ठ-एकस्थ.-एकत्र । आव० ७१० । एकार्थ-अनन्य रूपोऽर्धरूपो वा यस्य तदेकत्ववितईम । ठाणा. १९१ । विषयं एकप्रयोजनं वा । भग. एगत्तीकरण-एकत्वकरणं-एकाग्रत्वविधानम् । शाता०४६ । पगढभागमुहुत्तेहि-मुहृत्तकपष्टिभागाभ्याम् । मूर्य० १६ । एगत्था-एकार्था.- एके च ते अर्धाति एकार्था , एकेषा. एगट्ठाण-एकस्थानक-यथा अङ्गोपाङ्गस्थापितं तेन तथाव चिन् न मर्वया निखिलानां वक्तुमशक्यत्वाटर्या --जीवादयः। स्थितेनैव समुद्देष्टव्यम् । आव० ८५३ । सम. ११३ । एगटि-एगीगं । नि० चू० प्र० ५६ आ। एगदिसिं-एकया दिशा पूर्वोत्तरलक्षणया । जाता. ४५ । पगढिमाणुओगे - एकश्वासावर्थश्च-अभिधेयो जीवादि. स एगदुवारा-एकद्वारा--एकप्रवेगनिर्गममार्गा । जाता० २३८ । येषामस्ति त एकाधिकाः-गब्दास्तैरनुयोगतत्कथनमित्यर्थः । एगदिट्ठी-एकदृष्टि -बद्धलक्षः। प्रश्नः १५८ । एगन्तुच्छेय-सर्वथा उत्-प्रावल्येन छेदो-विनाशः एका- एगट्टिए-एकश्चासावर्धश्व-अभिधेय. एकार्थ म यस्यास्ति स न्तोच्छेद.-निरन्वयो नाश इत्यर्थ । दग० ४० । एकाधिकः, एकार्थवाचक इत्यर्थ । ठाणा० ४९२ । एगपक्खं-एकपक्ष , एक. पक्षो ब्राह्मणलक्षणो यस्य तन् । एगद्विभागमुहुत्तेहिं-मुहर्तकपष्टिभागाभ्याम् । मर्य० १२ । । ९२४.1 1 १७ । । ( 1 ठाणा० ४८१1 - एस. ३६ .

[ एगपक्खी अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोष पगा] ओघ० ११३ । एगपक्खी-एकपक्षिक -एकवाचन , एककुलवर्ती । व्य० प्र० एगराई-एकरात्रिकी । आव० ६४८ । २१२ भ । एकपक्षिक -अल्पश्रुत । व्य० प्र० २१३ अ । एगरायं एका रात्रियंत्र तत् एकरात्र । एका रात्रिं यावत् गुरुभ्राता भ्राता गुरुगुर्गुरुनाता समानकुलश्च ममानश्रुतो वा! तत् । उत्त० ११० । बृ० तृ० १३६ आ। एगलंभिए- य एक प्रधान शिष्यमात्मना लभते गृह्णाति एगपत्ती-एकपत्नी। आव. ९५ । । शेषास्त्वाचार्यस्य समर्पयति, म एकलाभेन चरतीति एक- एगपयेसोगाढं-एकप्रदेशावगाढम्-जीवापेक्षया कर्मद्रव्या. लाभिक । व्य० प्र० ०३२ आ । पेक्षया च ये एके प्रदेशास्तेष्ववगाढम् । भग० ५३ । एगल्ल-एकाकिन । ठाणा, ४१६ । एगभविय-एकभविक -नोआगमत द्रव्यदुमस्य प्रथम. एगल्लविहार-एकाकिविहार । आव० ३६५ । प्रकार , य. एकेन भवेनानन्तर द्रुमेघूत्पस्यते । दश्० १७। एगवंद-कबन्द एकाकी। व्य० प्र० ००१ अ। एगभायणो-समपंक्तिः । नि० चू० तृ० ४७ अ। प्रगविऊ-एकमेवात्मान परलोकगामिन वेत्तीति एकविन , म एगभाव-एको .. भाव -मासारिकसुखविपर्ययात् स्वाभाविक मे कश्चिद् दु खपरित्राणकारी महायोऽम्तीत्येवमेकवित् । एका. सुखरूपो यस्यासावेकभाव..। भग० ६४० । मध्यस्थता । न्तविद् वा -एकान्तेन विदितसमारम्वभावतया मौनीन्द्रमेव शायनं तय नान्यनित्येव वेत्तीत्येकान्त वित् , एक.- एक.-मोक्ष. एगभूए-एकभूतः एक एव-आत्मोपम । ठाणा० २१ । एकत्व सयमो वा त वेतीति । मृत्र. २६५। प्राप्त । भग०६४७ । एगविह-एकविधः । विठो० ३९६ । एगमंडवे-एकमडम्ब नाम यस्य निवेगम्य सर्वासु दिक्षु विदिक्षु | एगविहि विहाणा-एकेन विधिना प्रकारेण चक्रवाललक्ष- च नास्ति कोऽयन्यो ग्रामो नगर वा तम्मिन्नेकमहम्ने । णेन विधान स्वम्पस्य करणं येपा ते एकविधिविधाना । व्य. द्वि० २१६ अ। भग० २८२ । पगमणा-एक-दानान्तरीक्तजीवाजीवविभक्तावगतत्वेन मन चित्त येषा ते एकमनस -श्रद्धान वन्तः । उत्त. एगसरा-विचिनहिं एगमरा एगावली। नि० चू०प्र० २५४ आ। ६७१। जहा मजतीग पयालणी कमामिव्वणी णिभंगे वा दिजति । एगमणो-एकमना.-- एकाग्रचित्त । आव० ७४० । नि० च० प्र० १२७ अ। पगमना-एकम्- एकत्र प्रस्तुते वस्तुन्य भिनिविष्टत्वेन मनो यस्यासौ एकमना । उत्त० ५९९ । एगसाडियउत्तरासंगकरण-एका शाटिका यम्मिम्तत्तथा, पगमेगं-एफैकम् । सूर्य० ३३ । तच्च तदुत्तरामनकरण च-उत्तरीयस्य न्यायविशेष । नाना० एगयओ-एकन एकस्कन्धतया । भग० १०४ । कत एकीभय, सयुज्येत्यर्थ । भग. २६९ । ७७४ । एकत्र । ठाणा. एगसालय-एकशालकम् । जीवा० ३१४ । पगसिस्थ एकतिस्थु-यत्रकमेव सिक्यु भुज्यते नत् । उत्त. पगयर एकतर, अन्यतमत् । आव ७३ ।' एकतर - ६०४ । • अनुकुल | आचा० २४२ । पगसेल कृडे- एक्सेलकुटं, एकगलवक्षस्कारकूटनाम। जं. एगगईदियाए-दादी एकगत्रमानति । ज्ञाता० ७३ । एगराइया-एकगत्रिक -अपान्तराले वमामि तत्र गोकुलादी एगसेलग । जाता० २४२ । प्रचुर गोरमादिलामेऽपि प्रतिबन्धमकुर्वना कारणमन्तरेण मयेक- एगसेले। एजंगलो बाताबण्डपश्रिमावस्थमन्दरपर्वतम्धे रात्रमेव वस्तव्य नाविकमित्येवंम् पेणाभिग्रहेण । व्य० प्र० स्वनामख्यात वक्षमारपर्वत । ठाणा० ८० । एकगलो जम्बू- १३६ आ। एकगत्रिकी । उत्त० ५३१ । आव० ०१६।। द्वीपन्यम द्वीपन्थमन्दरपर्वतममीपस्ये स्वनामन्याते वनस्कारपर्वते । एगराइयाभिक्खुपडिमा - गत्रिपमाणा द्वादशी भिक्षुप- ठाणा० १०६ । निगा। मम० २१ । ।एगा पया-अद्विनीगा। आव ४६५। . -- ४६ । . प्र. ३४७ ।

[एगागारो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः पतमटुं] -- एगागारो-एकाकार• एकस्वरूप । जीवा १४३ । प्रहारो यत्र भस्मीकरणे तदेकाहत्यम् । भग० ६७० ॥ एगागिसमुद्दिसगा-ये न मण्डल्युपजीविन. । ओघ० ८७ । एक घातं, एकेन घातेनेति भाव । राज० १३४ । पगाणिओ-एकाकी । आव० ५५८ । एगाहजातगा-एकाहर्जाता एकदिवसोत्पमा । आव० ११६। एगाणुप्पेहा-एकस्य-एकाकिनो असहायस्यानुप्रेक्षा-भावना एगाहिगारिगा-एकस्मिन् शय्यातर पिण्डादावधिकृतदोषेऽ- एकानुप्रेक्षा। ठाणा. १९० । नालोचिते एव यानि शेषदोषसमुत्थितानि प्रायश्चित्तानि तानि एगाभिमुहा-एक भगवन्तं अभिमुखं येषा ते एकाभि एकाधिकारिकाणि, एकाधिकारे भवानि एकाधिकारिकाणि । मुखा । ज्ञाता. ४५ । व्य० प्र० ३० अ। एगाभोगो-एगा योगो भण्णति । नि० चू० प्र० ४७ म। एगाहिय-ज्वरविशेष । भग० १९७ । पगामोसा- त्रिभिरगुलीभिर्वा यद्गृहीतव्यं तदेकायै एगुरूया-एकोरुक -अन्तरद्वीपविशेष.। जीवा० १४४। गृह्णाति सा, मध्ये गृहीत्वा हस्ताभ्या वस्त्रं घृषन् त्रिभागा- एगूरूता। ठाणा० २२५ । वशेषं यावन्नयति द्वाभ्यां वा पार्श्वभ्या यावद् ग्रहणा। एगूरूयदीवे-अन्तरद्वीपे प्रथमः। ठाणा० २२५ । ओघ० ११०। एकामर्शनं एकामर्शा । उत्त० ५४१ । एगेभवं-एको भवान् । ज्ञाता० ५१० । एगाय-एकाकिन.। सूत्र. १४० । एगोदगं-एकोदकं, सर्वात्मनोदकप्लावितम् । जीवा० ३२६ । एगालंभी- एकलामी-य प्रधान शिष्य तमेकं यो न एगोरुया-अन्तरद्वीपविशेष । प्रज्ञा० ५० । ददाति अवशेषास्तु सर्वानपि प्रव्रजितान् गुरूणा प्रयच्छति । एचिरेण-इयता। ओघ० ६५ । येषामेक एव लाभो-यथा यदि भक्त लभन्ते ततो वना. एज एजतीति एज -वायु कम्पनशीलत्वात् । आचा० ७५ । दीनि न, यथा वस्त्रादीनि लभन्ते तर्हि न भक्तमपि, | एजंत-आयान्तमागच्छन्तम् । उत्त० ३५८ । मायान्तम् । एकमेव लभन्ते इत्येवशीला एकलाभिन । आव० २८७. २३२ आ। एज्ज-एयाता-समागच्छताम् । बृ० तृ० १४१ अ। एगावलि-तपविशेष । आचा० ४२३ । एकावली-नानामणिक- एजमाणं-इयत् , आगच्छत् । जं० प्र० २३३ । प्रत्यागच्छन् । मयी माला। औप० ५५ । विचित्रमणिका । ज्ञाता० ४३ । ज्ञाना० १३९ । एज्यमान कम्प्यमानम् । जीवा० १८१। विचित्रमणिकमयी। भग० ४७७ । एज्जा-आगच्छेत् । बृ० हि. १८७ अ । एगावलिसठिते-एकावलिसस्थित अनुराधानक्षत्रसस्थानम्। एडगारूढो-एडकारुढ । आन० ४१७ । सूर्य० १३०॥ एडेंति-एडयन्ति-अपनयन्ति । जं० प्र० ३८८ । एगावली-एकावलिका-जघन्ययुक्तासङ्ख्यातकसमयानो समु. एडेइ-छईयति, तीरे प्रक्षिपति। ज० प्र० २३० । दाय । जीवा० ३४४ । विचित्रमणिकमयी । भग० ४५९ । | एडेति-अपनयति । भग० ६६५ । एगावाती-एकवादी-तत्रैक एवान्मादिरर्थ इत्येवं वदतीति । एडेसि-छईयसि । ज्ञाता० ६९ । एणी स्नायु । प्रश्न० ८० । हरिणी । ज० प्र० ११० । ठाणा० ४२५ । जीवा. २७० । एण्य -स्नायव । ज० प्र० ११० । एगासणं- एकाशनं नाम मकृदुपविष्टपुताचालनेन भोजनम् । आव० ८५३ । एगीयारा-एगी-हरिणी मृगग्रहणार्य चारयन्ति-पोषयन्ति एगाह-एकाहं एकमहर्यावन् । जीवा० १०९ । दिने दिने गत्वा ये ते। प्रश्न. १४ ॥ नोदयति, एकान्तरितं वा । वृ० तृ० १४२ आ। एकाह-अभ- पणेजग-गोगालपरावत्तिस्थानम् । भग० ६७४ । कार्थम् । व्य० द्वि० ३८६ अ। पतं-एनम्-एकम् । प्रश्न. १९ । पगाहच्च-एका हत्या-हननं-प्रहारो यत्र जीवितव्यपरोपणे पतमटुं-एत-पुद्गलानामपरापरपरिणामलक्षणमर्थम् । ज्ञाना. तदेकाहत्यम् । भग० १२३ । एका एव आहत्या-आहनन व्य० प्र० १७. 1 २२६ [ एतेवं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः 18 सदोरे ने तानि पनि। ४॥ - ४५ तम्। एतेवं-एतदेवमित्यर्थः । भग० ४५५ । परंडवीयाण-उत्कटिकाभेद । प्रशा० २६६ । पत्ताहे-अधुना । आव० ३५९ । एरंडमिंजिया-एरडमक्षिका-एरंडफलम् । भग पत्तिओ-एतावान् । आव० ४२२ । एरगा-एरका-गुन्द्रा मद्रमुस्तक इत्यर्थः । वृ० प्र० एत्तिल्लयं-एतावत् । आव० ५५५ । एरवए-ऐरवत:-क्षेत्र विशेष. । ठाणा० ६८ एत्तियपरिक्खओ-ईयत्परीक्षक । आव० ८२६ । सूर्य० २२ । ऐरवत - कर्मभूमिविशेषः । प्रज्ञा. पत्तो-एषु । उत्त. १४२। इत.-अहिकडेवरादिगन्धात् । परवतीणदी-नदीविशेष । नि० चू० दि. ७९ मकाशात् । ज्ञाता० १३० । एरावण-ऐरावण.-शकगज । प्रश्न १३५। एत्थं-अत्र, इह । दश० ९९ । ठाणा० ३०२ । आव० ३५९ । गुच्छाविशेष । प्र पत्थ - अशोकवरपादपस्य यदधोऽत्रेत्येवं संबन्धनीय । एरावणदहे-द्रविशेष । ठाणा० ३२६ । ज्ञाता०६। एरावती-नदीविशेषः । ठाणा० ४७७। कुणालानर पत्थोवरए-अस्मिन् संयमे भगवद्वच सि वा उप-सामीप्येन नदी । वृ० तृ० १६१ आ । रत व्यवस्थितः । आचा० १६२ । एरावय ऐरावत-उत्तरपार्श्ववर्तिभरतक्षेत्रप्रतिरू पदहो-एतावान् । आव० ३४१ । शेष । जं० प्र० ३३० । एमेए-एवं अनेन प्रकारेण एते-येऽधिकृता. प्रत्यक्षेण वा एरिंड-वृक्षविशेष । भग० ८०२ । परिभ्रमन्तो दृश्यन्ते । दश० ६८ । पलप-एलक-उरभ्र । प्रश्न०३७ । एयं-एतत् , एतावत्प्रमाणम् । सूर्य० ११३ । पलक-ऊरणक । अनु० १२९ । एयंतं-एजमानं, क्म्पमानम् । ठाणा० ३८५ । एयंतगं-आगच्छत् । आव० २९१ । एलकच्छं-एडकाक्षं - योगसंग्रहेऽनिश्रितोपधाना यत्पूर्व दशार्णपुर नाम नगरमासीत् , यत्र गजा एयइ-एजते-कम्पते। भग० १८३ । पर्वतस्तत् । आव० ६६८ । पयकम्मे-एतद्वयापार , एतदेव वा काम्यं-कमनीयं यस्य पलगच्छा-एडकाक्ष -कायोत्मर्गे दृष्टान्त । आव स । विपा० ४० । एलकाक्ष -ग्रामविशेष । उत्त० ८७ । एयग्गो-एकाग्र -एकचित्त । आव० ७५३ । एयणुद्देसप - एजनोद्देशक -भगवतीमत्रस्य पञ्चमशतकस्य एलगमूओ - भाषमाण एडक इव बूवुयते एक आव०६२८ । सप्तमोद्देश । भग० २४६ । एयविजे-एषैव विद्या-विज्ञान यस्य स एतद्विद्य. । विपा. एलगा-एडका --द्विखुरचतुष्पदविशेषाः । जीवा० एलते-एडक -और्णक । प्रज्ञा० २५२ । एयसामायारो- एतत्सामाचार -एतज्जीतकल्प । विपा० । एलभूअय-एलमक्ता-अजाभाषानुकारित्वम् । दर एलमूओ-एलभूगो भासह एलगो जहा बुडवुद्धति ण्यारूव-एतद्रपं-वक्ष्यमाणरूपम् । भग० ३२२। एतद्रूप : मूगो भासति । नि० चू० द्वि० ३६ आ । एतदेव रूप-स्वरूप यस्य स । ज० प्र० २२ । एलयं-एलक-ऊरणकम् । उत्त० २७२ । पयायंति-एतावन्त । आचा० २३ । एलवालु-चिर्भटविशेषरूपम् । प्रज्ञा० ३७ । पांड-हडक्कित । १० द्वि० २१९ अ । तृणविशेष । प्रजा० ३३॥ एला - फलविशेष । जं० प्र० ३५। जीवा० १३६ एरण्ड । आचा० १९७ । पलापाडल-एलापाटला-पाटलाविशेष । ज्ञाता० एरंडइए-हडपयित । वृ० द्वि० १०६ आ। एलापुडाण-गन्धद्रव्यविशेष । ज्ञाता० २२० । परंडकट्ठसगडिया एरण्डशकटिका-एरण्डकाष्टमयी । एलारस-एलारस-मुगन्धिफलविशेषरम । प्रश्न जाता० ७६ । एलालुकी-बड़ीविशेष । आचा० ५७ । छ। - न २२७ [एलावच्चसगोतं आचार्यश्रीभानम्दसागररिसङ्कलितः एसणिजं] ठाणा. १४४ । एलावच्चसगोत्तं-इलापतेरपत्यं एलापल , एलापत्येन सह एवंमहालियं-इतिमहतीम् । ज्ञाता० ६२ । गोत्रेण वर्तते यः स एलापत्यसगोत्र । नंदी ४९ । एवंमहालिया-एतावन्ति महान्ति। जीवा० ३९९ । पलावच्चा--गोत्रविशेष । ठाणा० ३९० । एलापत्या-राने एव - एवकार -क्रमप्रदर्शनार्थः। भाव. १०। समुच्चये। तृतीयं नाम । सूर्य. १४ । ५०४। एव -अवधारणे भिन्नमश्च । उत्त. पलावालुकी-वल्लीविशेष । प्रज्ञा० ३२ । २९४ । इति गाथालङ्कारमात्रे। विशे० १३४७ । पूरणार्थे । एलासमुग्गयं-एलासमुद्गकम् । जीवा० २३ ४ । आव० ११० । एवम्-अनन्तरोक्तप्रकारेण । उत्त० २८५) पलिका-तृणपत्र निश्रितो जीवविशेप । आचा० ५५ । क्रमनियम प्रतिपादनार्थ । ओघ० २१ एवकार.-परिमाणे। एलिक्खं-ईदृगोऽभिहितार्थाभिन्न । उत्त० २८२ । प्रज्ञा० ५५९ । एक्शब्द -अपिशब्दार्थ । व्य० प्र० २१३ ।। पलिया-एडका। आव० ८.४ । एवढे-एतावन । आव० ४३० । एलिसय-ईदृश- एतादृशम् । वृ० द्वि० २८७ अ । एवमेयं - एवमेवेतत् पद्वनि प्रतिपादितं तत्तवेत्यर्थ । पलुए-एलुक -देहली। ज० प्र० ४८ । , जाता०४७ । ग्लुकावालुकं -तिल्लकम् । दश० १८० । एवमेवं-विन्दोरलाक्षणिकत्वादेवमेव । उस० ४०९ । एवमेव-उपनयवचन मिति। ज्ञाता० ९६ । एलुकः-उदम्बर , देहली। वृ० प्र० २५७ आ । एपः-एष -एपणमेपो-गवेषणम् । उत्त० ५१४ 1.. पलुग-देहली । आचा० २२२ । एपणायामसमतित्व-विंगतितममसमाधिस्थानम् । प्रश्न एलुगा-एलका -देहल्यः । राज०६१ । जीवा० २०४, ३५९ । पत्र-एवं प्रकारवचन शब्द । द. १३। प्रकारवा- एपणासमिति -धर्मसाधनानामाश्रयस्य चोदगमोत्पादन- चक । ओध० ५। उपमार्य । उत्त० २०४। प्रकागय । पगाटोपवर्जनम्। तत्त्वा० ९-५ । प्रजा० २५५ । इत्यंकरणाय । ज्ञाता० ११३ । एपणीय-प्रामुकम् । भग० १११ । एवं आया-एवमात्मा-एवम्प । नंदी २१२ । एपयति-प्रेरयति, प्रयोजयति । विशे० ४९८ । एवं चतुर्यु - पूर्वापरविदेहढे वकुत्तरकुरुम्पेषु क्षेत्रविशेषेषु । सणा-एपणा-अभिलाप । पिण्ड० २। एपणमेपो-गवेषण चतुर्विधस्य पर्याय । नं० प्र० ३१० । त करोतीति णिक् तत श्रीलिङ्गे भावे युटि एपणा। उत्त. एवं भागा एवभागानि-वक्ष्यमाणप्रकारभागानि । मर्य ५१४ । गृहिणा दीयमानपिण्डादग्रहण एपगा । ठाणा. १५९ । गविनादिलक्षणा । ५७६ । गवेषणा। एवंभृओ-एवम्भूत , यथाभूतो नय विशेपयति । आव० २८४ । प्रश्न० १०८ । अनुनः । पिण्डविशुद्धिः । भग• २९ ।। शब्डेनोच्यते चेष्टाक्रियादिक प्रकारस्तमेव भूतप्राप्त पसणासमिइए- एपणा-गवे गादिभेदा शङ्कादिलक्षगा वा यत्कियाविगिष्टं गदेनाच्यते तामेव क्रिया कुर्वद्वस्तु तस्या ममिति एषणाममिति , गोचरगतेन मुनिना सम्य. एभनम् । अनु. २६६ । गुपयुक्तेन नवकोटीपरिशुद्ध ग्राह्यम् । आव० ६१६ । एवंभूत-एवमिति तयाम्न सत्यो घटादिरया नान्यथे- पसणाऽसमिए-एपणाऽममित , योऽनेपणा न परिहरति । त्येवमभ्युपगमपर एभूतो नय । ठाणा० १५३ । शब्द विशतितममममाधिस्यानम् । आव० ६५३ । नयस्य तृतीयो भेद । उत्त० ७७ । य शब्दे नोच्यते चेष्टाकि- एसणासमिति - सुत्नानुमाग रयहरणवत्थपाटामगपाण- यादिक प्रकारम्तद्विगिष्टम्यैव वस्तुनोऽभ्युपगमात्तमेव भृत निलओमहणेपण । नि? चु० प्र० १७ अ । प्राप्त एवभूत । अनु० २६६ । ययागदार्थ एवं पदार्थो भूत एसणाऽसमिते-अनेषणा न परिहरति । विशतितममममा- मन्नित्यर्थोऽन्यथा भूनोऽमन्निति प्रतिपनिपर एबभूत । ठाणा० . विस्थानम् । सम० ३७ । ३९० । एसणिज्जायते -गवेष्यते उदगमादिदोपविकलतया माद- पवभूय-दृष्टिवाटे सत्रस्य भेद । मम० १२८ ! एवभूत मिर्यत्तद् एपणीय-करग्यम् । ठाणा० १०८, २१ । एण्यन नय विशेष । प्रना. ३२७। इत्येवणीय-कायम । भग २० । १०४ । आव य . । २२८ [ एलणोवघाते अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः ओगाहणनामनिहत्ताउए 3 पसणोवधाते-एषणया-तद्दोषैर्दशभिः शङ्कितादिभि. तस्यो । ओअवेहि-साधय-अस्मदाज्ञाप्रवर्तनेनास्मद्वशान् कुरु । ज० प्र० पघात -अकल्प्यता। ठाणा० ३२० । २१८। एसि-एपणीय-शुद्धम् । पिण्ड० १४८ । ओआलितं-द्रावितम् । आव० ३५० । एसिआ-गोष्टा । आचा० ३२७ । ओडधइ-उत्तारयति । पउ० ३४-१५ । एसिजा-एपयेत्-पर्यवमितवृत्त्या कुर्यात् । उत्त० ४६ ओइण्णेसुं-उत्तिण्णेसु-अवतीर्णषु कियतस्वपि गृहिपु मध्ये स्थित प्रयाति । ओघ. ३२ । एसिय-एपगीयं-आधाकर्मादिदोषरहितम् । आचा० ३३१ । ओए- ओज -तैजसम् । सूत्र. ३४३ ।' एक-अमहाय एपणीय-गवेषणाविशुद्धया गवेषितम् । भग० २९ । । सूत्र० १०८ विषम , प्रथमतृतीयपञ्चममप्तमा । पिण्ड ०१६९ । एसिया-एषितु शीलमेषामिति एपिका-मृगलुब्धका हस्ति- एको रागादिविरहात् । आचा० २५६ । एकोऽशेषमलकलङ्का- तापसाश्च मामहेतोर्मुगान् हस्तिनश्च एषन्ति, ये चान्ये पाख वरहित । आचा० २३ । ण्डिका नानाविधैरुपायर्भेक्ष्यमेषन्त्यन्यानि वा विषयसाध- ओओ-ओज -आरोहादिकयुक्तता । बृ० प्र० ३०९ आ । नानि ते। सूत्र. १७७ ॥ ओकच्छिया । ओघ० ० २०९ । एसु-एण्याम । ओघ० ७० ॥ ओकसणं-पंकपनकयो परिव्ह्मणम् । वृ० तृ• २२९ भ। एप्सुहुम-एतावत्सूक्ष्मः। प्रना० ६०१। जीवा० ३७५ । ओकुरुडो-उत्कुरुट:-कुणालानगर्या ढोपालतर उपाध्याय- एसे-एष्यति-आगमिष्यति । पिण्ड० १६७ । विशेष । आव० ४६५ । पस्सा-एण्या:-भविष्यन्त । आव० ६८७ । ओगसणं-नाशनम् । महाप्र० । एस्सुहुमो-एतत्सूक्ष्म । -एतत्सूक्ष्मः । औप. १०९ । ओगाढं-अवतीणां अवगाढा वा प्रकर्षप्राप्ताम् । ठाण०३९९ । एहंता-एधयन्त -अनुभवन्तः । दश० २४८ आत्मप्रदेशेन सह एकक्षेत्रावस्थायि अवगाढम् ।प्रज्ञा० ५०२ । एहति-एधते-प्राप्नोति । उत्त० ३१४ । भग०२।।लोलीभावं गत । भग०८३ । अट्ठीभूतं । नि० चू० पहा-एधा-समिधो यकाभिरग्नि प्रज्वाल्यते। उत्त० ३७२ । प्र० ३२७ आ । साधुप्रत्यामनीभूत । ठाणा० १९० । एधा -समिध , काष्ठानि । आचा० ३८९ । ओगाढरुइ-अवगाढनमवगाट-द्वादशाङ्गावगाहो विस्तारा- पहामो-एष्याम । ओघ० ६५ । धिगमस्तेन रुचि , अथवा ओगाढ-माधुप्रत्यासन्नीभृतस्तस्य पहि-अर्वाकालिकः । इदानीम् । नि० चू० द्वि० १०९ भ। साधूपदेशाद् रुचिरवगाढरुचि । भग० ९२६ । ओगाढरुती-अवगाहनमवगाढं-द्वादशागावगाहो विस्त. एहिअगुणा-ऐहिकगुणा -इहलोकगुणा भक्तपानादय । ओघ ३९॥ राधिगम इति सम्भाव्यते तेन रुचि , अथवा ओगाडत्ति- पहिइ-एण्यति । उपा० ४० । साधुप्रत्यामनीभूतस्तस्य साधूपदेशाद् रुचिः । ठाण. १९० । ओगाढा-प्रविष्टा । ज्ञाता० १३७ । ओगालीफलग-आर्यक(प्रायक)प्रभृतीनामावल्या समागतं पेापथिक-केवलयोगप्रत्ययः कर्मवन्ध । प्रश्न० १४३ । चंपकपट्टादिफलग । व्य० द्वि० १०७ आ। पेरावणापदम् । ठाणा० ४६९ । ओगास-पडिस्मगस्मेगडेसो। नि० चू० प्र० ८३ भ । अव. पेरावती-शिखरिणि वर्षधरे दशम कूटः । ठाणा० ७० । काश -स्थानम् । आव० ५३५ । मार्ग । आव० ६७८ । एरावतीया-स्त्राविशेष । जीवा० ६० । ओगाहंती-अवगाहन्ती-आगच्छन्ती । आव० २३२ । ओ ओगाहणग्गं-यद्यस्य द्रव्यम्यावस्तादवगाढं तर्दवंगानाग्रम् । ओअं-ओज -मानमोऽवम्टभ' । औप० ३३ । आचा० ३१८ ॥ ओभंसी-ओजस्वी-आत्मना वीर्याधिक । ज० प्र० २१९ । ओगाहणनामनिहत्ताउए- अवगाहनानामनिधत्तायु - ओअट्टणं-उद्वर्तनम् । गाढतरमुद्वर्त्तयति । वृ० तृ० ७१ अ । भवगाहते यस्या जीव साऽवगाहना-शरीरमौदारिकादि ओअविअ-परिकर्मितम् । ज० प्र० ५५ । तस्य-नाम औदारिकगरीग्नामकर्म तेन मह निधत्तमायु ओअविआ-आगपितानि । उ० प्र० २९० - ऐ । प्रना० २९.1 २२० -L [ ओगाहणवग्गणाओ आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसकलितः भोज] ८४२ ४५० । ठाणा. ७ । ओगाहणवग्गणाओ-अवगाहना एकैकस्य भाषाद्रव्यस्या- ओग्गह-अवधारणं अवग्रह । आव० ३४१ । धारभूता अमङ्ख्येयप्रदेशात्मकक्षेत्रविभागरूपास्तामामवगा- ओघ-औधिक', अशुभकर्मप्रकृतिजनितो भावोपसर्ग। सूत्र०७८ हनाना वर्गणा -समुदाया. अवगाहनावर्गणाः । प्रजा ०२६५ । ओघ -सामान्यम् । आव० २५८, ४५८, ४८० । विशे० ओगाहणसंठाण -प्रज्ञापनायामेकविंशतितमं पदम् । भग०३९६ ४९५, ८४२ । अवगाहनास्थानम् । प्रज्ञापनाया एकविंशतितम ओघजीवितं-नारकाद्यविशेषितायुर्द्रव्यमानं सामान्य जीवितम् पदम् । प्रजा० ६। ओगाहणसेणियापरिकम्मे-परिक चतुर्थामदासम०१२८१ ओघनिष्पन्नः-ओघ--सामान्यमध्ययनादिकं श्रुताभिधानं तेन ओगाहणा-अवगाहना-तनु , तदाधारभूतं वा क्षेत्रम् । निष्पन्न । अनु० २५१ । सामान्यशास्त्रनिष्पन्न आव०५८ । भग०७१ । नियतपरिमाणक्षेत्रावगाहित्वम् । भग० २३६ । ओघनिष्पन्न निक्षेपः । ठाणा० ६ । पड़जीवनिकायाना पाटसङ्घटनम् । पिण्ड० १६१। अव- ओघरूपा-सामाचारीविशेषः । उत्त० ५४७ । गाहन्तेऽस्यामवस्थायामिति अवगाह ना-स्वावस्थैव । आव० ओघसामाचारी-सामाचार्याः प्रथमभेद ।ध्य०प्र०१९ आ। ४४४ । प्रज्ञा० १०८ 1 अवग्रहण-परिच्छेदः । प्रज्ञा० ३०९ ओघनियुक्ति । ओघ० १। अवगाहन्ते क्षेत्रं यस्या स्थिता जन्तव साऽवगाहना-तनुरि- ओघसामाचार्युपक्रमकालः-सामाचार्युपकमकालस्य त्यर्थः । नंदी ९१ । अवगाहते यस्या जीवः सा अवगाहना- प्रथमो भेदः । ओघ० १। शरीरं औदारिकादि । प्रज्ञा० २१८ । ज्ञाता० २५० । ओघस्सरा । ज० प्र० ४०७ । ओगाहिम-आदिमे जे तिणि घाणा पयतिते चलवलेत्ति, ओघा-उन्मुखा निरीक्षमाणा । व्य० प्र० १३० भ । तेण ते चलवल ओगाहिम भण्णति । नि० चू० प्र० १९७ । ओघाडिजा-उद्घाय्यते-बाह्यः क्रियते । आव० ६९७ । मोगाहिमगं-पक्वान्नम् । बृ० प्र० ३१२ आ । अवगाहिमम् ओघादेसेणं-सामान्यत । भग० ८६३ । ओघाययण-ओघायतनानि यानि प्रवाहत एव पूज्य- |आव० ८५४ । ओगाहिमतो-अवगाहक । उत्त० १९८ । स्थानानि तडागजलप्रवेशोधमार्गो वा । आवा० ४११ । ओगाहिमाइ-अवगाहिमादि-पक्वान्नमण्डकप्रभृति ओचार-अपचारि-दीर्घतरधान्य कोष्ठाकारविशेषः । अनु०१५१ पिण्ड० १५२। ओचिया-आरोपिता । जीवा० १९९ । ओगाहे-आगच्छति । ओघ० १.४ । अवगाह -शरीरोच्छ्रय । ओचूल-अवचूला -प्रलम्बगुच्छा.। ज०प्र०२६५ । प्रलम्ब. मानगुच्छ. 1 औप० ७० ! भग० ४८० । जं० प्र० ५३० । ओगाहेजा-अवगाहेत-आश्रयेत । भग० २३३ । ओचूलग- अवचलक-अधोमुखाञ्चल, मुत्कलाबलम् । ओगाहेत्ता-प्रविश्य । सम० ८८ । जं० प्र० २४७ । ओगाहो-पत्तद्ग्रहः । वृदि० २५० आ। ओच्छगं--वस्त्र, आलिङ्गनम् । आव० ६८२ । ओगिज्झिय-अवगृध-आश्रित्य । आचा० ४०३ । ओच्छन्नपरिच्छन्न-अवच्छन्नपरिन्छन ओगिण्हणयाते-अवग्रहणतायैमनोविषयीकरणाय । दित । जीवा० १८८ । ओच्छवियं-अवच्छादितम् । ज्ञाता० २८ । ओगुडिं-विसा, निन्दाम् । पढ० ५६-१५ । ओगुंडिया-मलदिग्धदेहा । वृ० प्र० २७८ आ । ओच्छाइय-आच्छादित'-निरूद्ध । प्रश्न. १३४ | अवच्छा- ओगेण्हणया-अवगृश्यतेऽनेनेति अवग्रहण, करणेऽनट, प्रथम- दित ।माता० २८॥ समयप्रविष्टशब्दादिपुढगलादानपरिणाम , तद्भावोऽवग्रहणना, ओच्छाहिओ-उत्माहित -उत्कर्पित. । पिण्ड० १३४ । नंदी १७४ । ओज-ओज:-बलम् । प्रश्न० ११६ । आहारादि । भग० २० । । प्रजा. १८१ । अत्यन्तमाच्छा ठाणा० ४४१। ૨૩૦ ओजप्रदेशं धनचतुरनं] अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः ओवद्धओ] अवनत-उत्तमाङ्गप्रधान अवनत | आव० २७७ । प्रज्ञा ११ । ओजःप्रदेशं धनचतुरस्रं-सप्तविंशतिपरमाण्वात्मकं सप्त- | ओणए-अवनत , उत्तमाङ्गप्रधान, प्रणमनमित्यर्थ । सम. विंशतिप्रदेशावगाढ च, तत्र नवप्रदेशात्मकस्यैव पूक्तित्य २४ । आसन्नम् । भग० ३५ । प्रतरस्याध उपरि च नव नव प्रदेशाः स्थाप्यन्ते, तत ओणता-अवनता । आव० २३७ । सप्तविंशतिप्रदेशात्मकमोज प्रदेशं धनचतुरस्रभवति। प्रज्ञा० १२० ओणमओ-अवनमत । ओघ० १७८ । ओजःप्रदेशं धनव्यनं-पञ्चत्रिंशत्परमाणुनिष्पन्न पञ्चत्रिं- ओणमित्ता-अवनम्य । आव० २३७ । शत्प्रदेशावगाई च, तच्चैवं-तिर्यग् निरन्तरा पञ्च परमा. ओणयं-उत्तमांगप्रधानं प्रगमनम् । वृ० तृ. १० भ। अवनति णव स्थाप्यन्ते, तेषा चाधोऽध क्रमेण तिर्यगेव चत्वार- प्रणमनम् । आव० ५४२ । स्त्रयो द्वावेकश्चेति पञ्चदशात्मक प्रतरो जात , अस्यैव च प्रतरस्योपरि सर्वपक्तिवन्त्यान्त्यपरित्यागेन दश, तथैव ओणामिणी-अवनामिनी-विद्याविशेष । दश० ४१ । तदुपर्युपरि षट् त्रय एकश्चेति क्रमेणाणव स्थाप्यन्ते, एते ओतपोतं-(देशी०) आकीर्णम् । बृ० द्वि० १३९ अ । मिलिता पचत्रिंशद्वंति। प्रज्ञा० १ ओतपोयं-(देशी०) मालयन्ति, । वृ० तृ. ७० अ। ओजःप्रदेशं धनवृत्तं-सप्तप्रदेश सप्तप्रदेशावगाढं च, तच्चैव- ओतप्रोत.-तद्रूप । भग० ६५ । तत्रैव पञ्चप्रदेशे प्रतरवृत्ते मभ्यस्थितस्य परमाणेारुपरिष्टाद- ओतारो अवतार । आव० ३८४ । धस्ताच्च एकैकोऽणुरवस्थाप्यते, तत एव सातप्रदेश भवति । ओतिनो-अवतीर्ण -गन्तुमुपक्रान्त । उत्त० २४७ । ओदइ-पश्यति । नदी ९९ । ओज प्रदेशं प्रतरचतुरस्रं-नवपरमाण्वात्मकं नवप्रदेशा- ओदइए-कर्मणामुदयेन निवृत्त औदयिक कर्मोदयापादितो , वगाढ च, तत्र तिर्यग् निरन्तर त्रिप्रदेशास्तिस्र पङ्क्तय गन्याद्यनुभावलक्षण । सूत्र. २३० । स्थाप्यन्ते । प्रज्ञा० १२ । ओजःप्रदेशं प्रतरत्र्य न-त्रिप्रदेश त्रिप्रदेशावगाढं च तच्चव- ओदइयभावमूल-औदयिकभावमूलं - वनस्पतिकायमूलत्व- मनुभवन्नामगोत्रकर्मोदयात् मूलजीव एव । आचा० ८८ । पूर्व तिर्यगणुद्वय न्यस्यते, तत आद्यस्याध एकोऽणु । प्रज्ञा० ११ ओदग्गे-उत्कट उदग्रवय स्थितत्वेन वा उदग्रः । उत्त०३४९ । ओजःप्रदेशं प्रतरायतं-पञ्चदशपरमाण्वात्मकं पञ्चदश ओदण-ओदन ।ओघ० २१५। करो। नि० चू० प्र० ५८ आ। प्रदेशावगाढ च, तत्र पञ्चप्रदेशात्मिकास्मिस्तित्र पक्तयस्तिर्यक् ओदन-हिङ्ग्यादिभिरसस्कृत ओदनादि । ठाणा० २२० । स्थाप्यन्ते। प्रना० १२ । भक्तम् । उत्त० २७२ । ओज'प्रदेशं श्रेण्यायतं-त्रिपरमाणु त्रिप्रदेशावगाढं च, ओदरा । नि० चू० दि० २२ अ। तत्र तिर्यग् निरन्तरं त्रय स्थाप्यन्ते । प्रज्ञा० ११ । ओदरिअ-औदरिका. भट्टपुत्रा. । ओघ० ९५ । ओजःप्रदेशप्रतरवृतं-पञ्चपरमाणुनिष्पन्नं पञ्चाकागप्रदेशा- ओदारं-प्रधानं तीर्थकरादिशरीराणि प्रतीत्य । सम० १४२ । वगाढं च, तद्यथा-एक परमाणुर्मध्ये स्थाप्यते, चत्वार क्रमेण ओदूढो-आशातित', थूत्कृतः । उत्त० ३५६ । पूर्वादिषु चतसृषु दिक्षु । प्रना० ११ । ओइसिक-यावन्त. केचन भिक्षाचरा समागच्छन्ति तावन्त: ओझा-उपाध्याय । दश. २४२ । सर्वानुद्दिश्य यन् क्रियते तत् । पृ. प्र. ८३ अ । ओझा-तुलादंडववयोरपि मध्ये वर्तते स । वृ०प्र० १६० अ । ओधाइओ-अवधावितः। आप० ४२४ । ओट्टिय-औष्ट्रिकम् । आव० ४२५ । ओधूणण-अवधूननम्-अपूर्वकरणेन कर्मप्रन्थ टापाटनम् । ओडादि । ठाणा० २०३ । ओढणपरिहाणेसु । नि० चू० प्र० १४० आ। ओपल्ला-अपदीर्णा, कुण्ठीभृता । ज्ञाता० १९२ । ओदेऊणं । ओघ० २१५ । ओबद्धओ-विद्यादायकादिप्रतिजागरक । ठाणा० १६० । t आचा० २९७।

[ ओवपिंडितो आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः श्रीमीयरण] । पञ्चपष्टितमो ग्रहः । - । ओवद्धपिंडितो-अवबद्धपिण्डिक । उत्त० २१५ । ओमचरओ-ओमत्ति-अवममुपलक्षणत्वादवमौदार्य चरति- ओवारं-अवद्वारम् । आव० ३४९ । आसेवते अत्रमचरक.-न्यूनत्वासेवक । उत्त० ६०६ । ओवोले-उवुडयितुम् । आव० १९७। ओमचेलिए-अवमचेलिक , असारवत्रधारी। आचा० ३९७ ओभावणा-उवहावणा-परिभव । ओघ. १३१ । अप ओमच्छगरयहरणं-उन्मस्तकरजोहरणम् । आव० ६३८ । भावना-लाघवम् । वृ. प्र. २७९ अ । ओमज्जायणं-अवमजायनं, पुष्यगोत्रविशेष.। ज०प्र०५०० । ओभासंति-अवभासयन्ति-सप्रकाशा भवन्ति । भग०३२७। ओमत्तं-अवमत्व-ऊनता। भग० ७४२ । अवमता-हीन- अवभासयन्ति । सूर्य० ६३ । त्वम् । प्रज्ञा० ३०३ । ओभासंतो-अवभासयन् । ईपदुद्द्योतयन् । अ०प्र० ४६१ । ओमत्थिम-उद्घाटमस्तक., प्रच्छन्न इति । ओघ० १५ । ओभास-अवभास'-प्रभा । ज्ञाता० ४। अवभास , प्रभा- | ओमत्थिय-ओमस्थित., अवोमुखीकृत । ओघ० १४३ । विनिर्गम । प्रज्ञा० ८० । प्रतिभाविनिर्गम । जीवा० १०७। ओमद्विया-उन्मर्दिका-बहुमर्दनकारिका। भग• ५४८ । जं. ० प्र० ५३५ । मप्तपष्ठितमो महाग्रह ओमया-पराजय , पश्चा द्वनम् । वृ० द्वि० ७१ । विशेष । ठाणा० ७९ । ओमरत्त-अहोरात्रम् । ओघ) ११६ । अवमा-हीना ओभासइ-अवभासते । आविर्भवति, प्राप्यते इति । रात्रिरवमरात्रो-दिनक्षय । ठाणा ० ३६९. । सूत्र० २१४ । अवभासयति-प्रकाशयति । सूर्य० ६। ओमराइणिओ-अवमरात्निक । ओघ० १५० । ओभासणता । नि० चू० प्र० २४७ अ । ओमराइणिय-अवमरात्निक । आव० ७९३ । ओभासिज-अवभाषेत-दातारं याचेत् । भाचा० ३४० । ओमंरायणिको-अवमरात्निक । ओघ० १.२ । ओभासिजा-अवभाषेत-याचेत । आचा० ३५२ । ओमाण-प्रवेश । उत्त. ५५२ ।अपमानम् । वृ.तृ. १२०अ । ओभासितं-अवभाषितं-याचितं याचनं वा ।वृ०द्वि० १४२। ससवत्तिय । नि० चू० प्र० २०५'आ। अवमानानि-क्षेत्रादीना ओभासी-अवभासते-प्रतिभाति, अवभाषते-याचत इत्येवं प्रमाणानि हस्तादीनि । ठाणा० ८६ । अवमानं-स्वपक्षपरपक्ष- शीलोऽवभासी । ठाणा० २०७ । प्राभृत्यजं लोकावहुमानादि । दश० २८० । ओभासेई-अवभामयति-ईषत्प्रकाशयति । भग० ७८ । ओमानं-अवमानं-अवमम् । वृ० प्र० २९० मा । ओभुग्ग- अवभुग्नं-वक्रम् । ज्ञाता० १३८ । ओमुयं-उल्मुकम् । ओघ० ११२ । ओमंघ-पात्रमवाङ्मुखम् । बृ० प्र० १०७ आ । ओमोअं-अवमोचक , आभरणम् । जं० प्र० १८८ । अब- ओमंथियं-अधोमुखीकृतम् । विपा० ४९ । निरय० ६ । मुच्यते-परिधीयते यस्सोऽवमोचक -आभरणम् ।ज०प्र०१८८१ जाता०३३ । अवाड्मुखम् । वृ० तृ० १९८ आ। ठाणा०२९९। ओमोअर- अवम-न्यूनमुदर-जठरमस्यासाववमोदरस्त गाव ओम-वाल । ओघ० १५१ । लघुपर्याय । ओघ० १८५। अवमौदर्य -न्यूनोदरता । उत्त० ६०४। भत्पाहाराख्यम् । अवं-दुर्भिक्षम् । ओघ ११, १८, ६३ । पिण्ड ०७७ । आव. उत्त० ६०४। ५३६ । न्यूनम् । आव० १३० । दुर्भिक्षम् । नि० चू० प्र० ओमोदरिता-दुभिक्ख । नि० चू० प्र० ७५ अ । १८३ आ । नि० चू० प्र० ५४ आ । अवमानि-अमाराणि । ओमोहरिए-अवमोदरिका,धर्मम्मिणोरभेदाट वा अवमोद उत्त० ३५९ । अवमरात्निक । वृ० द्वि० १९ अ। दुर्भिक्षम् । रिक -साधु । भग० २९३ । व्य. प्र. १९८ आ । अवम-हीनम् । आचा० १६४ । ऊण । ओमोयं-अवमुच्यते-परिवीयते यः मोऽवमोक -आभरणम् दश० चू० १६२ । ऊनम् । उत्त० ६०४ । अवमा-न्यूना । | भग० ५४३ । उत्त० ५३७ । पर्यायलघु । ओघ ० - १५० । अवमम् । ओमोयरण-अवमं च तदुदर चावमोदर तस्मात्करोत्यर्थ न्यूनम् । दग० २७२ । णिचि ल्युटि चावमोदरण, अवमोदरकरणम् । उत्त० ६०४ । । २३२ [ ओमोयरिय अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः ओराल] ओमोयरिय-अवमौदर्य-दुर्भिक्षम् । आव० ६२६ । अवम जीवा०२७२ । परिकर्मितम् । प्रश्न० ८१ । न्यूनमुदर-जठरमस्यासाववमोदरस्तद्भाव अवमौदर्य-न्यू- | ओयविया-कुशला । वृ० त० ५८ अ । नोदरता । उत्त० ६०४ । ओयवेइ-उपैति । आव० १५० । ओमोयरिया-अवम- ऊनमुदर-जठर अवमोदरं तस्य करण- ओयसंठिती-ओजस - प्रकाशस्य सस्थिति -अवस्थानम् । मवमोदरिका । ठाणा० ३६४ । अवमं-ऊनमुदर-जठर सूर्य० ७९ । यस्य स , अवमं चोदर अवमोदर तद्भावोऽवमोदरता, अव ओया-ओजः-प्रकाश । सूर्य० ७९ । मोदरस्य वा करणमवमोदरिका । ठाणा ० १४८ । ओयाए-उपायात -उपागतः । भग० ३१९ । सम्प्राप्त । ओम्मिमालिणी-और्मिमालिनी-नदीविशेष ।ज०प्र०३५७ । निरय० ६ । उपायात-उपागत जाता. १६७ ओयं-रसम् । (त०) ओजसा-दाहापनयनादिस्वकायकरणशक्त्या। ज्ञाता०१७० । ओयंसी-ओजस्विन:-मानसावष्टम्भयुक्ताः । भग० १३६ । ओयाणेत्ति- अनुश्रोतोगामिनी, पानीयानुगामिनी । नि० ओज -मानसोऽवष्टम्भस्तद्वान् ओजस्वी । राज. ११८ । चू० प्र० ४४ आ । निरय० २ । ज्ञाता० ७ । ओजस्विन -मानमवलोपेतत्वान् ओयारिया-अवतारिता । आव० ६८५ । अवतारिका । । सम० १५६ । आव० ३५० । ओय-ओजः-आहारग्रहणे प्रथमो भेद । ठाणा०९३ । ओज ओयारो-अवतार.-जलमध्यप्रवेगनम् । जीवा० १९७ । -आर्तवम् । ठाणा० १४५ । ओज -प्रकाश' । सूर्य० ७ । ओयाहारे-ओज -उत्पत्तिदेशे आहारयोग्यपुद्गलसमूह, विषम । सूर्य १५६ । उत्पत्तिदेशे आहारयोग्यपुद्गलसमूहः। ओज आहागे येषां ते ओजआहारा । प्रना० ५१० । तेजमेन प्रज्ञा० ५१० । कार्मणेन च शरीरेणौदारिकादिशरीरानिप्पत्तेर्मिश्रेण च य ओयइ-पश्यति । विशे० ३७४ । आहार सर्वोऽपि ओजाहार , औदारिका दिगरीर. ओयणं-ओदनं । सूर्य० २९३ । कूर । प्रश्न. १५३ । पर्याप्त्या पर्याप्तकोऽपीन्द्रियानपानभाषामन पर्याप्तिमिर- कूरादि । ओघ० १३३ । ओदनं-कोद्रवीदनादि । आचा. पर्याप्तक शरीरेणाहारयन ओजाहार । सत्र. ३८३ । ३१३ । ओयत्तण-व्याघात । पिण्ड० १६२ । ओयो-सजमो । नि० चू० प्र० २१७ अ । ओयत्तति-परावर्तते । दश० १०८ । ओरभं-औरत्रं-उत्तराध्ययनेषु सप्तममध्ययनम् । उत्त० ९। ओयने-ज्ञाताया मप्तदशमध्ययनम् । आव० ६५३ । ओरस-आन्तर । भग० ६३।। ओयपप स-विषमसंख्यप्रदेश । भग० ८६१। ओरस्स-उरसि भवं-औरम्य-गरीरवलम् । सूत्र. १६६। ओयरह-अवतरत । आव• ३५२ । ओरस्सवली-महापराक्रमा । वृ० तृ० १७. आ। ओयरिआ-औदरिकानाम-यत्र गता तत्र स्पकादिक प्र- : मोरालं-विस्तरवत् , समयपरिभाषया माया िथम्नावाद्यव- क्षिप्य समुद्दिशन्ति, समुद्देशनानन्तर भूयोऽप्यग्रतो गन्छन्ति वदम् । प्रना० २६९। मायास्थिस्नावाद्यववद्धम् । ठाणा. । बृ० द्वि० १२५अ । २९५ । उदार-अत्यद्भुतम् । सूर्य० २९४ । उदार -प्रधान । ओयरिया-औदरिका-उदरभरणैकचित्ता । ओघ० ७१ । भीम । औप० ८४ | ओगलं-आशंसारहिततया प्रधानम् । ओयवणं-साधनम् । ज० प्र...४८ । भग० १२५॥ उदार:-प्रधान ।भग १२॥ भीम -भयानक । ओयविभ-अल्पसागारिक.-श्रावक , खेदज्ञम् । ओघ० ५१ । जाता० ७ । स्फाराकार । गज० ११९ । भीप्म , उग्रादि- ओयविए-प्रसाधिते । व्य० द्वि० १७६आ। विशेपणविशिष्टतप करणत पार्श्वस्थानामन्पमत्त्वाना भयानक । ओयवियं-सुपरिकर्मितम् । सूर्य० २९३ । तेजितम् । जीवा. जं० प्र. १६ । भग १२ । मूर्य० ५। उदार जीवा०:२२ १६४ । विशिष्ट परिकर्मितम् । जीवा० २३२ । परिकर्मितम्। एकेन्द्रियापेक्षया प्राय म्थला द्वीन्द्रियादय इति । इत्त०६९३ म । २३३ [ओरालतसा आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः ओवया] ठाणा० १२४ । ओरालतसा-त्रसत्वं तेजोवायुष्वपि प्रसिद्ध अतस्तव्य- ओलग्गए-अवलगक । आव० १७६ । वच्छेटेन द्वीन्द्रियादिप्रतिपत्त्यर्थमोरालग्रहणम् ।ठाणा०३३५। ओलग्गति-अवलगति-अनुसरति । उत्त० आराला तसा-औटारिकत्रसा -स्थूरत्रसा । जीवा० २८ । ओलग्गयमणूसो-अवलगकमनुष्य । आव० ९२ । ओरालवण्णकित्तिसद्दा-उदारवर्णकीर्तिशब्दाः । आव. ओलग्गा-सेवा । परिचर्या । दश० ९७। जीर्णा । ज्ञाता० २९३ । २८ । ओगलसरीरे-उदारशरीर । उत्त० ३२५ । ओलग्गाए-अवलगनया । आव० ९० । मोरालाइं-मनोहराणि । ठाणा० २९४ । उदाराणि-आशंसा- ओलग्गिउं-अवलगितुम् । आव० ७१६ । दोषरहिततयोदारचित्तयुक्तानि । ठाणा० २४७ । ओलग्गिऊ-अवलगितुम् । दश० ९७ । ओरालिए-उदार-प्रवान, विस्तरवत्, उरल-विरल प्रदेशं न ओलग्गिजामि-अवलगामि । आव० ३५६ । तु धन, ओराल-समयपरिभाषया मासास्थिस्नायवाद्यवबद्ध ओलग्गिता-सेवितुमारब्धा । आव० ८१८ । तदेव शरीर, उदारमेव औदारिकम् । प्रज्ञा० २६८ । ओलग्गिय-अवलगित । आव० ४०१ । ओरालिय-औदारिकम् । प्रज्ञा० जा०४६९ ९ । उदारमेव-प्रधानमेव ओलिंति-अवलीयन्ते-प्रत्यागच्छन्ति । विशे० ८५३ । बृहदेव वा औदारिकम् । जीवा० १४ । उदार-प्रधान ओलिकापातः । ओघ० २०७ । उदारमेव औदारिकम् । ठाणा० २९५ । ओलित्त-अवलिप्त । भग० २७४ । आव० ५५९ । ओरालियसरीरणाम-यदुदयादौदारिकशरीरप्रायोग्यान पु- द्गलानादाय औदारिकशरीररूपतया परिणमयति परिणमय्य | ओलित्ता-द्वारदेशे पिधानेन सह गोमयादिना अवलिप्ता. च जीवप्रदेश सह परस्परानुगमरूपतया सम्बन्धयति तदौ- दारिकशरीरनाम । प्रज्ञा० ४६९ । ओलिहति । नि० चू० प्र० १९०अ ओरालियशरीरा-औदारिकशरीरा । आव० ७९९ । ओलुग्गसरीरा-भग्नदेहा. । विपा० ४९ । निरय० ९ । ओरुहइ-अवतरति । आव० १८६ । अवरुग्णमिव-जीर्णमिव शरीर यस्या सा, अवरुणा वा चेतमा अवरुग्णशरीरा । ज्ञाता० २८ । ओरोह-अवरोवं , अन्तःपुरम् । उत्त० ३०७ । अतेपुरं । नि० चू० प्र० ८० । विपा० ८२ । अवरोध -प्रतोलिद्वारे ओलुग्गा-अवरुग्णा-भममनोवृत्ति । विपा० ४९ ! निरय०९। स्ववान्तर प्राकार । औप० ०३। प्रतोलीद्वारेवन्त प्राकार । क्षीणा । आव० ७१६ । जीर्णा । ज्ञाता० ३३ । राज. ३ । अवरोधः-अन्त पुरम् । उत्त० १२० । ओलुहति-अवरोहति । आव० १८१ । अवरोध । आव० ३५९ । प्रतोलीद्वारेष्ववान्तरप्राकार । | ओलेंति-परिभ्रमन्ति । आव० २७४ । ओलेत्ता-आर्द्रयित्वा । आव० २०९ । ओलंडेति-उल्लङ्घयन्ति । ज्ञाता० ६२ । ओलोयणं-अवलोकनम् । आव० २२४, ३७८ । ओलंडेह-उल्लङ्घयत । दश० ९९ । आव० ३५० । ओलोयणगए-अवलोकनगतम् । उत्त० ९१ । ओलव-अवलम्ब-अवलम्बनस्थानम् । ज० प्र० ५२९ । ओलोयणहिओ-अवलोकनस्थित । आव० १४५ । ओलंवणदीव-शृङ्खलावद्धद्वीप । भग० ५४७ । ओलोवणे । नि० चू० प्र० २१७अ । ओलंवितो-अवलम्बित । उत्त० १२५ । ओल्यां-पनके वा आगन्तुकप्रतनुद्रवरूपे कईम एव ओल्याम्। ओलइओ-अवलगित । आव० २९७ । ठाणा० ३२८ । ओलइयं-अवलगित-गोपितम् । उत्त० ११६ । ओल्लं-वासं । नि० ० चू० प्र० ६७आ । ओलएइ-उपलगयति । आव० २१७ । ओल्लि । नि० चू० प्र०. १२१भ । ओलगिउं-अवलगितुम् । उत्त० ३०० । ओवइया-त्रीन्द्रियजीवविशेष । प्रज्ञा० ४२ । - , ज्ञाता० २ । । २३४ [ओवक्कमियं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः ओवीलं] . ओवकमियं-उपक्रम्यतेऽनेनायुरित्युपक्रमो ज्वरातीमारादिस्तत्र | ओवयारिअविणय । औपचारिकविनय -विनयस्य द्वितीयो भवा या सा औपक्रमिकी । ठाणा. २७ । भेद । दश० ३१ । ओवक्खडितं-उपस्कृतम् । आव० ३५३ । ओवरणं-अपवरकम् । आव० ५६० । ओवग्गहिओ-औपाहिक । उवग्गहित -गच्छमाहारणो। ओवरिऊण-अवतीर्य । उत्त० ११९ । ओघ० ९२ । ओवसमिए-कर्मोपशमेन निवृत्त औपशमिक कर्मानुदयलक्षण । ओवज्झणं-प्रवाहे वहन । बृ० तृ० २२९अ । सूत्र. २३० । ओवहिए- औपधिक -उपधिना-छद्मना चरतीयोपधिकः । ओवट्टणा-वालना पवादानयनम् । बृ० द्वि० ८५आ । उत्त० ६५६ । ओवणिहिए-उपनिहित यथा कथञ्चित् प्रत्यासन्नीभूतं तेन ओवहिया-औपधिका-मायाप्रयोजना-कपायप्रत्यया , उप- चरति य स औपनिहितिक , उपनिधिना वा चरतीति करणप्रयोजना वा । औप० १०७ । स औषनिधिक । औप० ३९ । ओवाइणित्तए-उपादातु-ग्रहीतुं, प्रवेष्टुम् । ठाणा० १५७ । ओवतिउं-अवपतितु-जेतुम् । दश० ५० । ओवाइयं-उपयाचितम् । विपा० ७७ । याचितस्य-प्राणि- ओवत्तिया अपवर्त्य-अग्निनिक्षिप्तेन भाजनेनान्येन वा दद्यात् । तस्य प्राप्तरुपरि देवेभ्यो देयम् । उत्त० १३८ । उपया- दश. १७५ । चितम् । आव० ७०९ । ओवमिए-उपमया निर्वृत्तमौपमिक, उपमामन्तरेण यत्काल- ओवाई-ओलावयप्रवाना विद्या । आव० ३१९ । प्रमाणमनतिशायिना ग्रहीतुं न शक्यते तदीपमिक्रम्। ओवाय-उपाये-मृदुपरुषभाषणादी भवं औपाय, उपपतनमुप- ज० प्र० ९२ । उपमया निवृत्तमौपमिकं, उपमानमन्तरेण पात -समीपभवनं तत्र भव औपपात-गुरुसस्तारास्तरण- यत्कालप्रमाणमन तिशायिना ग्रहीतु न शक्यते तदोपमिकम्। विश्रामणादिकृत्यम् । उत्त० ५८ । विनम् ( मर० ) अनु० १८१ । अवपात-निर्देश । सूत्र. २४२ । अवपान -प्रपातस्थान, ओवमिय-उपमया निर्वृतं औपमिकम् , उपमामन्तरेण यत् यत्र चलन् जन सप्रकाशेऽपि पतति । जं० प्र० १२४ । कालप्रमाणमनतिशयिना ग्रहीतु न शक्यते तदोपमिकम् । अवपात -गर्लादिरूपम् । दश० १६४ । अवपात -गा- भग० २७६ । विशेष । प्रश्न० २२ । ओवम्म-औपम्य-उपमा । उत्त, ३२१ । उपमानमुपमा ओवायकारी-उपपातकारी-आचार्यनिर्देशकारी, यथोपटेशं सेवौपम्यं-सदृश । ठाणा० २६२ । क्रियासु प्रवृत्त , सूत्रोपदेशप्रवर्तक । सूत्र० २३४ । अव- ओवमसच्चा-औपम्यसत्या-पर्याप्तिकमत्याभाष या दगमो पातो-निर्देशतत्कार्यवपातभारी-वचननिर्देशकारी सदा आज्ञा- मेद । प्रजा० २५६ । उपमैवोपम्य तेन सत्य औपम्यमत्यम् । विधायी । सूत्र. २४२ । सत्याभापाया दशमो भेद । ठाणा० ४८९ । औपम्यमत्य | ओवासो-अवकाश । दा० ५८ । नाम समुद्रवत्तडाग । सत्याभापाया दशमो भेद । दश. ओवाही-विशेषेण उपाधीयत इति चोपाधि । आचा० १७४। २०९ । उपमीयते-सदृशतया गृह्यते वस्त्वनयेत्युपमा सैव ओविअ-ओपित-परिकर्मितम् । भग० ४७८ । ओपित औपम्यम् । भग. २२२। उपमानमुपमा सैवीपम्य अनेन उज्ज्वालित । जं० प्र० २००, ४६ । गवयेन सदृशोऽसौ गौरिति सादृश्यप्रतिपत्तित्पम् ।ठाणा०२५४। ओविय-परिकर्मितम् । औप० २४, ६६ । राज. ४८ । ओवयइ-उत्पतति-ऊर्ध्वं गच्छति । भग० १३९ । उज्ज्वलित । ज्ञाता० २२० । ओपित -परिकर्मितम् । ओवयण-अवपदन-प्रोड्नकम् । ज्ञाता० ४३ । प्रश्न० ७६ । ज्ञाता. १९। ओवयमाण-अवपततो-व्योमाजगाढवतरत । ज्ञाता०४६ । ओविया-आगेपिता । ज० प्र० ४३ । अवपतन् । ज्ञाता० १६६ । ओवीलं-अवपीड-शेखर, उपपीटा वा वेदना । विपा०७२ । - २३५ [ ओवीलण आचार्यश्रीभानन्दसागरसूरिसङ्कलितः ओसरे] ११आ। ओवीलए-अपनीडयति विलजीकरोति यो लज्जया सम्य. नानुपरतन्वन । ठाणा० १८९ । प्रायस । आव० २८५ । गनालोचयन्त मः यथा सम्यगालोचयति तथा करोतीत्य उस्सणं-प्राचुर्येण । प्रश्न. २२ । अवसन -सामाचार्यासेव. पवीडक । ठाणा० ४.४ । नेऽत्रसन्नवत् भवसन्न । आव० ५७ । एकान्तः । वृ० प्र० ओवत्तिऊण-अपवर्त्य । ओघ० २१ । ओश्विग्गमणो-उद्विग्नमनाः । आत्र. २२० । ओसन्नकारणं-वाहुल्यं, वाह्यकारणम् । प्रज्ञा० २२३ । ओप्ट -दन्तच्छद । आचा० ३० । बाहुल्यकारणम् । प्रजा० ५०३ । ओस-अवश्याय , शरत्कालभावी इलक्ष्णवर्प । उत्त० ३३४। ओसन्नदोसे-वाहुल्येनानुपरतत्वेन दोषो हिंसादीना चतुर्णा- क्षपाजलम् । ठाणा०२८७ । अवश्याय -नेह । दश०१५।। मन्यतर ओसन्नदोप । ठाणा. १८९ । अवश्याग -भग्दादिषु प्रभानिकसूक्ष्मवर्ष । उत्त० ६९१ : ओसन्नया- ओसन्नया-पराभव. । उप० मा० गा० ३.० । ओसक्कात्ता-उवष्क्य-उत्सृत्य लब्धावसरतयोत्सुकीभूय। ओसन्नविहारी-अवमन्नाना विहारो-वहूनि दिनानि यावत्तथा अवष्वष्क्य-अपमृत्यावसरलाभाय कालहरण कृत्वा यो वर्तन अस्यास्तीति अवसन्नविहारी । ज्ञाता० १११ । विधीयते स तथा । ठाणा०३६५ । अवमl, प्राप्य वा । योसप्पिणि-अवमर्पति हीयमानारकतयाऽवसर्पयति वा-क्रमे- आव० १९ । णायु शरीरादिभावान् हापयतीत्यवसर्पिणी । जं० प्र० ८९ । ओसकणं-रन्धनवेला । ओघ. १४८ । अवष्वष्कणम्, दशकोटीकोट्य सागरोपमाणां सुषमसुषमाद्यरकक्रमेण अव- विवक्षितविध्वंसनादिकालस्य हासकरगम् , अकिरणम् । सर्पिणी । जीवा० ३८५ । वृ० प्र० २६आ । अवध्वष्कण-स्वयोगप्रवृत्तनियतकालाव- ओसप्पिणी-अवसर्पन्ति-प्रतिसमयं कालप्रमाण जन्तूना धेरकरणम् । पिण्ड० ९१ । वा शरीरायुःप्रमाणादिकमपेक्ष्य हासमनुभवन्त्यवश्यमिति अव. ओसक्किय-प्रज्वाल्य । आचा० ३४५ । सर्पिण्यः, दश सागरोपमकोटिकोटीपरिमाणा । उत्त० ६५७ । ओसक्किया-अवसl, अतिदाहमयादुल्मकान्युत्सार्येत्यर्थ । अवसर्पिणी-अवसर्पति हीयमानारकतया अवसर्पयति वा. दश० १७५ । ऽऽयुष्कशरीरादिभावान् हापयनीति, सागरोपमकोटीकोटीदशक- ओसढ-उत्सत --उपधातेभ्यो निर्गत । दश० २१९ । प्रमाणः कालविशेष । ठाणा० २७ । अवसप्पिणी-दश- एमंगितं । नि० चू० द्वि० १८आ । सागरोपमकोटाकोटिमाना । अनु०९९ । कालविशेष. । भाव. ओसण्ण-चिरायण अपरिभोगट्ठाणं । नि० चू० प्र० १९३। १२०, भग० ८८८ । दशसागरोपमकोटीकोव्यः प्रमाणा । ओमन-बाहुल्यम् । प्रज्ञा० ५०३ । बाहुल्येन । भग० ३०८ । ठाणा० ८६ । अवमन्ना-धान्ता । भग० ५०२ । ओ यो वा सजमो ओसमणं-व्यवशमनम् । बृद्वि० ७७अ । तमि सग्णी ओमयो । नि० चू० प्र० २१७अ । ओसरह-अपसर्पति । उत्त० ५३ । अपसरति । उत्त० ३०२ । ओसण्णद्धो-अपसनद्धः । उत्सनद्ध | आव० ७१२ । आव० ६४०, ३५९ । ओसत्समल्लदामा । आचा० ४२३ । ओसरणं-वहना साधूनामेकत्रमीलनम् । वृ०४०२१८आ । ओसत्तो-उत्सत -उपरिसवद्ध. । औप० ५। ज्ञाता० ४। समवसरणम् । वृ०प्र०२७आ। चउ० व्याख्यानश्रवणादि । ओसधी-वण्णाइफला अबादिया । नि० चू० द्वि० १५७४ । वृद्वि०२५२आ । अवसरणं साधुसमुदाय.। पिण्ड ०९२ । ओसधीओ । ठागा० ८० । ओसरणा-आर्यिकाणामुपकरणविशेष । ओघ• २०९ । ओसन्न-उत्सन-प्रायेग । विशे०९२६॥ अवसन:-विवक्षिता- ओसरिऊण-अपमृत्य । आव० २९२ । नुष्टानालसः, आवश्यकस्वाध्यायप्रत्युपेक्षणाभ्यानादीनामसम्य- ओसरिओ-अपमृत । आव० ४०५ । कारीत्यर्थ । जाता० ११३ । बाहुल्यलक्षणम् । भग० २१ । ओसरित्ता-अपमृत्य । आव० ११३ । व्युत्सृज्य । आउ० । प्राय । भग० ३०९ । प्रवृत्ते. प्राचुर्य वाहुल्य, वाहुल्ये. | ओसरे-अवसर्पन्ति । आव० ६१८ । anvi [ओसवणं अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः ओहवले ] ओसवणं-प्रशमनम् । नि० चू० प्र० २०७ अ । उत्त. १४२ । उशीरं-वीरण मूलम् । जं० प्र० ३५ । ओसह-औषध । अन्तरुपयुज्यते । ओघ०१३४ । एका वीरणीमूलम् । ज्ञाता० २३२ । गम् । प्रश्न०१५३ । महातिक्तकघृतादि । भग०३२६ । केव. ओसीरपुड-पुष्पजातिविशेष । ज्ञाता० २३२॥ लहरीतक्यादि, अन्तरुपयोगि वा। पिण्ड०१९ । एकद्रव्यरूपम् । ओसीसं-उच्छीर्षम् । आव० ४५३ । । विपा० ४१ । ज्ञाता० १८१ । त्रिकटुकादि । ज्ञाता० १३६ । ओसीसओ-उच्छीपक । आव० ३५४ । आव० ११५ । उत्त०१४२ । हरितक्यादि । ओघ०६८ । ओसीसा-सीसस्स समीवं उवसीस । नि००प्र०२४७अ । एलाद्यचूर्गगादि । नि० चू० प्र० ७६अ । बहुद्व्यसमुदाय । ओसूरो-उत्सूर्यः । आव० ४१६ । नि०चू०प्र० १४४आ। एकद्रव्याश्रय,त्रिफलादि । औप०१००। ओसोवणि-अवस्वापिनीम् । आव० ३७१ । ओसहङ्ग-औषवाङ्गम् । औषवकारणम् । उत्त० १४२। ओस्सट्टो-उत्साह । नि० चू० प्र० २८४आ । ओसहजुत्ती- ओषवयुक्ति -ओषधादीना-अगुरुकुंकुमादीना ओस्सन्नं-बाहुल्येन-अनुपरतत्वेन । भग० ९२६ । सज्जिकाराजिकादीनां च युक्ति -योजनं समविषमविभाग- ओसारेह-उत्सारयत-पारयत । उत्त० १७८ । नीतिर्वा । उत्त० ३० । ओहजलिया-चतुरिन्द्रियजन्तुविशेष । जीवा० ३२ । प्रजा ओसहाइ-औषधादि-अगुरुकुंकुमादि सज्जिकाराजिकादि च । ४२ । उत्त० ३० । ओसहि-औषधय , फलपाकान्ता', ओह-ओघोपधि -उपधे. प्रथमो मेद यो नित्यमेव गृह्यते । ते च शाल्यादय । प्रज्ञा० ओघ० २०८ । सक्षेपः । नि० चू० प्र० १७९अ । ओघ - ३० । औषधि -शाल्यादि । भग. ३०६ । आचा० ३० । प्रवाह । जीवा० २०७ । सामान्यं, स्वपरपृथग्विभागकरणा- ओसहिपत्ता-सर्वरोगापहारित्वात्तपश्चरणप्रभवो लब्धिविशेष भावरूप । पिण्ड ०७७ । प्रवाह । उत्त० २४१ । जं०प्र०५३, । प्रश्न० १०५ । ओसही-औषधि -जयाविजयर्द्धिवृद्ध्यादय । उत्त० ४९० । ११५। ओघ -सामान्य श्रुताभिधानम् । दश०१५ । भवौध , फलपाकान्ता । उत्त० ६९२ । औषधी राजधानीनाम । ससार , अष्टप्रकार कर्म वा । सूत्र० २९ । अविच्छेद., ज० प्र० ३४७ । औषधि -फलपाकान्ता , शाल्यादि । अवित्रुटितत्वम् । प्रश्न० ८२ । ससारसमुद्र । सूत्र० १४५ । जीवा० २६ । प्रवाहेणाविच्छिन्नम् । प्रश्न. ७४ । सामान्यम् । पिण्ड० भोसहीमो-औषधय , शात्यादिका । जं० प्र० १६८ । १४७ । सामान्य । आव० ३३६ । प्रवाही । जीवा० २७७। सालिमातियाओ । नि० चू० प्र. १९५आ । सामान्यम् । जं. प्र. ७ । उस्सग्गो-तत्य सव्वं कालियसुत्त ओसही तिणा-औषधितृणानि-शाल्यादीनि । उत्त० ६९२ । ओयरति त सव्वं ओहो भण्णति । पेढिया निसीहपेढिया । ओसा-अवश्याय -जलविशेष । आव०५७३ । त्रेह । जीवा. नि० चू० प्र० ९७आ। सुते सुत्ते ज उस्सग्गदरिमण त ओहो, २५ । स्थानविशेषः । उत्त० ३७९ । रात्रिजलम् । भग० जो पुण अविसिट्टा आवत्ती सो ओहो । नि०चूतृ०१४५आ। ६९४ । सामान्यमध्ययनादि नाम । ठाणा० ५। ओघ -प्रत्यक्षोप- ओसारिय-अवसारित-अवल वितम् । भग०३१८ । ज्ञाता० लभ्यमानं ससारसमुद्र । दश० २५६ । सक्षेप्त । ओघ. २२१ । प्रलम्चीकृता । ज्ञाता० २३९ । ओसारेजा-अपसारयेत्-पाटयेत् । अनु० १७६ । ओहजीव-ओघजीव , भावजीवस्य प्रथमो भेद । दश०१२॥ ओसावणि । नि० चू० प्र० ७६अ । ओहटुं-प्रार्थितम् । ओघ० ६७ । याचित । नि० चू० प्र० ओसारेयब्बो-परित्याग । नि० चू० प्र० ३४२अ । १६५ अ। ओसासिअ-आवश्यकी । वृ० द्वि० २१७आ । ओहनिफण्ण-ओघनिप्पन्न । निक्षेपमेद । दग०१५ । ओसितं-अवसिक्त , आर्टीकृतम् । आचा० ३२१ । भनाभ्ययनादिसामान्याभिधानन्याम । आचा० ३ । ओसीरं-ओशीरं-वीरणीमूलम् । प्रश्न० १६३ । चन्दनम् । मोहवले-ओघवल । अव्यवन्छिन्नवल । औप० ७८ । । ८८ 1 ૨૩૭ [ोहय आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरिसङ्कलितः ओहायणं] - मोहय-उपहत.-विनाशित । जं०प्र०२७७ । राज्यापहारा- | ओहाडियं-स्थगितम् । आव० ८८८ ।स्फे ितम् ।आव०२०५॥ दुपहता । ठाणा० ४६३ । विनाशनेनोपहता । ज्ञाता० ओहाडिया-उद्यायिता । आव० ५१४ । अपस्फेरिता। आव० ३६८। ओहयमणसंकप्प-उपहत.-ध्वस्तो मनस संकल्पो-दर्पहा- ओहाडेइ-आच्छादयति । आव० ३७० । दिप्रभवो विकल्पो यस्य स । भरा० १८० । ज्ञाता० २९ । ओहाडेति । दश० चू० ८८ । उपहतमन सहकप । आव ६८२ । ओहाण-उवयोगो । नि० चू०वि०५८आ। विहारो, धावणेण ओहयहय-उपहतहत । आव० ६५० । लिंगो धावणेण वा। नि० चू० त० ३५ अ । अवधानम्-अप- ओहरति-उपहरति-विनाशयति । ज्ञाता० १९२ । सरणम् । दश० २७१ । अवधावमाना. । ओघ० ६१ । ओहरिए-विनाशयति । ज्ञाता० १९० । अवधावनम् । ठाणा० २११ । ओहरितभारो-उत्तारितभार. । ओघ० २२७ । ओहाणपेही-छिदं अलभमाणो रातो समाहिपरिट्ठवणलक्खेण ओहरिय-अग्निकायोपरि व्यवस्थित पिठरकादिकमाहारभा ओहावेज्जा । नि० चू० प्र० १९४अ । जनमपवृत्त्य । आचा० ३४५ । तिरश्चीनो भूत्वा । | ओहाणुप्पेही-अवधावनानुप्रेक्षी । दश० ९४ । आचा० ३४४ । पाश्वतो मुक्तः । उप०मा०गा० ४९९ । ओहातेजा-उपहन्यात् । ठाणा० ३२८ । ओहसभोग-ओघसभोग , उपध्यादिद्वादशप्रकारः । व्य० ओहामिए-अपभ्राजित । आव० ६६५ । द्वि० ११९आ । ओहामिओ-अपभ्राजितः, हीलित । आव० ६९४ । अप- ओहसण्णा-मतिज्ञानाद्यावरणक्षयोपशमाच्छब्दाद्यर्थगोचरा भ्राजित , तिरस्कृत । ओघ० ५३ । सामान्यावबोधक्रियैव सज्ञायतेऽनयेत्योघसज्ञा । ठाणा० ५०५। ओहामिज्जह-अवधाव्यते । आव० २९५ । ओहसन्ना-ओघसज्ञा-मतिज्ञानावरणर्मक्षयोपशमनाच्छब्दा- ओहार-अधो जले नावो नेता मत्स्य विशेष । बृन्त०१६१॥ द्यर्थगोचरा सामान्यावबोधक्रिया, दर्शनोपयोग इति, सामान्य जलजन्तुविशेष । प्रश्न० ५१ । कन्छप । पिण्ड० १०२ । प्रवृत्तियथा वळ्या वृत्त्यारोहण वा। प्रज्ञा० २२२ । मति मच्छो । नि० चू० द्वि० ७८आ । ज्ञानावरणक्षयोपशमाच्छन्दाद्यर्थगोचरा सामान्याववोधक्रियैव ओहारयित्ता-अवधारयिता-शङ्कितस्याप्यर्थस्य नि शङ्कितस्यै- सज्ञायते वस्त्वनयेति ओघसज्ञा। दर्शनोपयोग । सामान्य. वमेवायमित्येवं क्मता, अवहारयिता-परगुणानामपहारकारी । प्रवृत्तिरोघसज्ञा । भग० ३१४ । सम० ३८ । ओहसामायारी-ओघसामाचारी-सामान्येन सक्षेपत साधु- ओहारसंखड । नि० चू० द्वि० १०७ अ । समाचाराभिधानरूपा । विशे० ८४२ । ओहारिणी-अवधारणी-अवधारणात्मिका । उत्त० ५६ । मोहसियं-अवघर्षणमवर्षितं भूत्यादिना निमज्जनम् अवधार्यते-अवगम्यतेऽर्थोऽनयेति अवधारणी-अवबोधबीज- जीवा० २१३ । भूता । प्रज्ञा० २४६-२४७ । सकिया । दश० चू० १४० । ओहस्सरा-ओघस्वरा-चमरेन्द्रस्य घण्टा । जं० प्र० ४०७ । अवधारणी-अवबोधबीजभूता । भग० १४२ । ओघेन-प्रवाहेण स्वरो यासा ता ओघस्वरा । जीवा० २०५ | ओहारित-अवहृतं-गृहीतम् । आव० ८५९ । ओहा-अपभ्राजना । वृ० प्र० ९९आ । ओहारेमाणीओ-वीजयन्त्यः । जीवा० २३३ । ओहाइया-उद्धाविताः । आव० ६६ । ओहावंत-अवधावन्ते, अवसर्पन्ति । ओघ० ६२ । ओहाडणी-अवघाटिनी-आच्छादनहेतुकम्बोपरिस्थाप्यमान. | ओहावइ-अवधावति । उत्त० १३३ । महाप्रमागकिलिचस्थानीया । जीवा०१८० । ज०प्र० २३ । ओहावणं-अपभ्राजनं, अपमान, निन्दा वा । पिण्ड० १४० । ओहाडिभ-अवथाटित.-आच्छादित । ज० प्र० ७३ । अवधावनं-पार्श्वस्थादिविहाराश्रयणम् । बृ० द्वि० १६३आ । मोहाडिओ-आधाटी । आव०२८५ । निष्काशित । आव० लिंगविवेकवुझ्या गमनम् । व्य०प्र०२४९ । अपभ्राजना- ३५८ । लान्छना । आव० ५३७ । अपभ्राजना । आव०३१९,६६५। । ।

[ ओहावि अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोपः औलूक्यं] । ठाणा० ४४८ । मलना । ओघ० ९३ । गृहस्थीभवनम् । वृ०४०१४४अ । ओहियं-औधिकम् । ओघ ० २१५, १९९ । औधिकम्-निर्वि- अपभ्राजना । उत्त० १९२ । परिभव । ओघ०१४८। हीलना । शेपण नरकम् । भग० ४५ । ओघ० ७४ । ओहियमत्तगं-प्रश्रवणमात्रकम् । नि०चू०४० १३२आ । ओहाविभ-अवधावित -अपमृत. । दश० २४७ । ओहिया-औघिकी-तिर्यस्त्री । जीवा० ५९ । ओहाविउकामो अवधावितुकाम । उनिष्क्रमितुकाम । उत्त. ओही-अवधि -प्रज्ञापनायास्त्रयस्त्रिंशत्तमं पदम् । प्रज्ञा०६। १३३ । अव-अधो विस्तृत वस्तु धीयते परिच्छिद्यतेऽनेनेति अवधिः- ओहावेज्जा-अवधावेत् । व्य० प्र० १६६आ । मर्यादा वा रूपिष्वेव द्रव्येषु परिच्छेदकतया प्रवृत्तिरूपा ओहासणं-समयपरिभाषया विशिष्टद्रव्ययाचनम् । आव० तदुपलक्षितं ज्ञानमप्यवधि । प्रज्ञा० ५२७ । ५७६ । ओहासणभिक्खा-ओहासणभिक्षा-विशिष्टद्रव्ययाचनं स- ओहीपदं-प्रज्ञापनाया त्रयत्रिंशत्तम पदम् । भग० ५१९ । मयपरिभाषया ओहासण तत्प्रवाना या भिक्षा । आव०५७६ । ओहीरमाणी-प्रचलायमाना । भग० ५४० । वारवार ओहासिअ-ओभासिअ-पार्थित । ओघ०७०। सूत्र० ३८६ । ईषन्निद्रां गच्छन्तीत्यर्थः । ज्ञाता० १५। ओहिंजलिया-चतुरिन्द्रियजीवमेद । उत्त० ६९६ । ओहुए-अवधुत उल्लंधित । वृ० द्वि० ६१ अ । ओहि-अवधि.-अवधीयतेऽनेनास्मादस्मिन्वेति।ठाणा०३४७ ।। ओहे-ओघमरणं सामान्यत सर्वप्राणिना प्राणपरित्यागात्म- रूपिमर्यादा, करणनिरपेक्षो वोधरूप कम् । उत्त० ३२० । अवधीयतेऽनेनेति, अवधीयत इति, अधोऽधोविस्तृत परि. ओहेणं-ओघेणं-सक्षेपेण- । ओघ० ८८ । च्छिद्यते भर्यादया वेति, अवधीयतेऽस्माद् अस्मिन् वा, ओहोवधी-ओह -सक्षेपः, स्तोकः, लिङ्गकारक , अवश्यं. अवधानं वा विषयपरिच्छेदनम्। आव०८ मध्ये। ओघ०२०८। ग्रायः । उपधेर्मेंदः । नि० चू० प्र० १७९ अ । अवोऽधो विस्तृतविषयवेदकम् । परिच्छेद । मर्यादा। उत्त० ओहोवही-ओघोपधिः-उपधेर्भेद । उत्त० ५३७ । ओघोपधिः ५५७ । अव-अवोऽधो विस्तृतं वस्तु धीयते-परिच्छिद्यतेऽने नित्यमेव यो गृह्यते ओघोपवि । ओघ० २०८ । नेत्यवधि , अथवा अवधिर्मर्यादा रूपिष्वेव द्रव्येषु परिच्छेद- औदारिक-चह्निकम् । ओघ० ९० । उपादानात्प्रभृति अनु. कतया प्रवृत्तिरूपा तदुपललितं ज्ञानमप्यवधि , यद्वा अवधानं समयमुद्गच्छति वर्धते जीर्यते शीर्यते । तत्त्वा० २-४९ । -आत्मनोऽर्थसाक्षात्करणव्यापारोऽवधि निंदी:५। अवधि औदारिकवन्धनं-यदुदयवशाद् औदारिकपुद्गलानां गृही- अवशब्दोऽध शब्दार्थ , ततश्चाध इत्यधस्ताद्धावति अवोऽधो ताना गृह्यमाणाना च परस्पर तैजसादिपुद्गलश्च सह विस्तृतविषयवेदकतयेत्यवधि , औणादिको डि , यद्वा 'अवे' सम्बन्ध उपजायते तत् । प्रज्ञा० ४७० । त्यध एव धानं धातूनामनेकार्थत्वात् परिच्छेदोऽवधि , 'उप- औदारिकसङ्घातनाम-यदुदयवगादौदारिकशरीररचनाऽनु. सर्गे घो किरिति (पा. ३-३-८२) कि', अथवाऽवधि कारिसङ्घातरूपा जायते तत् । प्रज्ञा० ४७० । मर्यादा सपिष्वेव द्रव्येषु परिच्छेदकतया प्रवृत्तिरित्येवंरूपा औदारिकाङ्गोपाङ्गनाम-यदुदयवशादौदारिकशरीरत्वेन प. तदुपलक्षितं ज्ञानमप्यवधि । तृतीयं ज्ञानम् । उत्त०५५७ । रिणताना पुद्गलानामङ्गोपाङ्गविभागपरिणतिरुपजायते तत् । औधिक -विशेषगरहितः । प्रज्ञा० ३४२ । ओहिदंसणं-अवधिदर्शनं-अवधिरेव दर्शन-रुपिसामान्यप्रह- औद्देशिक-शवलस्य पष्टो भेद । प्रश्न० १४४ । आधाकर्म । औदार्य-दाक्षिण्यम् । जे० प्र० १८४ । णम् । जीवा० १८ । ओहिमरणं--अवधिमरण-सप्तदशमरणभेदे द्वितीय । उत्त०२३० सूत्र० १९१॥ पञ्चविधमरणे द्वितीय.। भग० ६२४ । अवधि -मर्यादा तेन औद्भूतिकी-द्वितीयभेरीनाम । विशे० ६१९ । मरण अवधिमरण, यानि हि नारकादिभवनिबन्धनतयाऽऽयु . औपसर्गिक-पदस्य तृतीयो भेद । आव०३७९ । परीनि कर्मदलिझान्यनुभूय म्रियते यदि पुनस्तान्येवानुभूय मरिष्यति औपमर्गिकम् । अनु० ११३ । तदा तन् । सम० ३३ । औलूक्यं-मतविशेषः । उत्त० ३३७ इति प्रथमो विभागः समाप्तः। प्रज्ञा० ४७० ।

आगमवाचनादात - बहुश्रुत-युगप्रधानसदृश - देवसूरतपागच्छसामाचारी- संरक्षणकटिबद्ध-थेष्ठिदेवचन्द्रलालभाईजैनपुस्तकोद्धार- श्रीजैनानन्दपुस्तकालयाद्यनेकसंस्थासंस्थापक अनेकग्रन्थप्रणेतृ - श्रीवर्धमानजैनागममंदिर- (सिद्धक्षेत्र श्रीवर्धमानजैनताम्रपत्रागममंदिर- (सूर्यपुर )संस्थापक-आगमोद्धारक-ध्यानस्थस्वर्गत- आचार्यश्रीआनन्दसागरसूरीश्वरसङ्कलितः श्रीअल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोषः (समस्तस्वरस्वरूपः प्रथमो विभागः) श्रेष्ठि-देवचन्दलालभाई-जैनपुस्तकोद्धारे ग्रन्थाङ्कः १०१ ॥ ५ مد

Shri Alpaparichit Saidhantik Shabda Kosh

Author
Acharuya Shri Anandsagarsurishwarji
Title
Shri Alpaparichit Saidhantik Shabda Kosh
File name
Shri Alpaparichit Saidhantik Shabda Kosh
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2010/10
Publisher
Shri Jain Pustakoddhar Fund Surat
Language
Sanskrit
Pages
298
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Keywords
xxxx
DLI number
327095
Barcode
99999990002580.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
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