Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Deopara Inscription Of Vijayasena

Umashankar · 2012/02/01

PDF Proofread

Front matter

उमापतिधरकृता
विजयखेनप्रशस्तिः
( copara Inscription of Vijayasena)
( सटीका सानुवादा)
टीकाकारः
प्रो. उमाशङ्करशर्मा 'ऋषिः'
एम० ए०, साहित्यरत्नम्
( लब्यस्वर्णपदकः)
संस्कृताध्यापकः, पटना कालेनः
पटना
प्राप्तिस्थानम्
पं० पष्ठीप्रसादशर्मा
ग्रा० पो० पोन्दिल
मण्डल-गया

उमापतिधरकृता
विजयसेनप्रशस्तिः
( देवपाडाशिलालेखः)
( सटीक सानुवाद.)
T
टीका
प्रो० उमाशङ्करशम
एम० ए०, माहित्यरत
(लब्धस्वर्णपदक.)
संस्कृताध्यापक , पटना कालेजः
पटना
प्रथम संस्करणम्
१९६०

प्रकाशक
पं० षष्ठी प्रसाद शर्मा,
प्रा०पो०-पोन्दिल,
मण्डल-गया।
प्रथम संस्करण १६६०
सर्वाधिकार प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
मुद्रक
म्पार्क प्रेम प्रा. लि.,

and .. Man लेखक परिचय श्री उमाशङ्कर शर्मा 'ऋपि' का जन्म रविवार, पो. कृ. ६. १६६४ वि० को एक मुप्रतिष्ठित ब्राह्मण-कुल मे हुआ था। विभिन्न स्थानों में शिक्षा ग्रहण करने के बाद इन्होंने प्रवेशिका परीता १६५३ ई० में ससम्मान उत्तीर्ण की । १६५७ ई० मे विहार विश्व. विद्यालय से बी० ए० संस्कृत ऑनर्स लेकर उत्तीर्ण हुए जिसम प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान तथा डिस्टिक्शन भी मिला। १९५६ ई० में पटना विश्वविद्यालय से एम० ए० (संस्कृत) में दर्शन-वर्ग लेकर प्रथम श्रेणी में प्रथम हुए। सं० २०१५ में हिन्दी साहित्य- सम्मेलन, प्रयाग की साहित्य-रत्न की परीक्षा में भी प्रथम श्रेणी पाई। बिहार सरकार की छात्रवृत्ति लेकर नालन्दा मे कुछ दिनों तक बौद्ध अनुसन्धान करने के बाद जनवरी १६६० मे पटना कॉलेज में संस्कृत-प्रोफेसर होकर आ गये । विता में इनकी रुचि बचपन से थी। इन्होने कृष्णचरित्रायण (हिन्दी काव्य ), रामवनवास (हिन्दी काव्य ), शान्तिविजयम् (नेहरू की रूस-यात्रा विषयक सस्कृत काव्य ), कविकुञ्जम् ( सस्कृत प्रहसन ) तथा सोहराव और रुस्तम (मैथ्यू आर्नल्ड का हिन्दी-पद्या- नुवाद ) लिखा है। ये संस्कृत, हिन्दी तथा अंगरेजी में समान रूप से कविता करते है। चौखम्बा-विद्याभवन से इनका 'निरुक्त' शीघ्र ही । ग्रन्थ-रचना की ओर इनकी प्रवृत्ति बहुत न्याय मे प्रकाशित हो रहा अधिक है। है । -प्रो० सनिन्द पाठक नालन्दा।

समर्पणम्
'सरस्वती श्रुतिमहती महीयताम्'
शिथिलशरीरं परममधीरं
मां पश्यसि न चिराय हे
ऋति
तव चरणेषु ममाञ्जलयः।
नवसमयोऽयं प्रकृतोऽयं स्वागतमेव तनोति,
अपि शुभकालेऽनागतवाले कि हृदयं न दुनोति ?
तव शुभसार मधुरविचार
याति स्मृतिमविहाय हे
तव चरणेपु ममाञ्जलयः।
चेतोहारिणि सगतिकारिणि क गता सा खलु देवी ?
हारं हारं मम हृदि भारं चरणानामिह सेवी ।
हृदि तव चित्र परमपवित्र
कल्पत एव वराय हे
तव चरणेपु ममाजलयः।
'ऋषि:

परिचय ( स ) आदि मुख्य भी प्रान और उसके सामने तालाब का निर्माण कराया था जिसका प्रस्तुत लेख में वर्णन है। विजयमेन कार पल्लालसेन हुआ जिसकी पत्नी चलुक्य-कुश की राजकुमारी रामदेवी थी (माधाइ नगर.)। उसम भी नइहाली दानपन मिला है। इसका पुत्र विप्यात लघमणमेन हुआ जिसकी पत्नी चद्रा देवी या त्यष्टनदेवी थी। इसने सक्षमण-सत् चलाया। इसक कह देख मिले है। इसकी राज नमा में का पण्डित थे जिनमें अयत्व उमापविधर, धोबी, गोवद्धन, शरण थे। इसके दो पुत्र विरवरूपमेन और देशवसेन थे जिनक लेख । इनसे ही वगाल के सेनवंश का अन्त पाया जाता है क्योकि इस समय तक यवनों का भारमण दोन लग गया था। • कृषि उमापतिघर प्रस्तुत प्रयस्ति के रचयिता उमापतिधर है। यही नहीने इसमें विजयसेन तक के ही राजानी का वर्णन किया है किन्तु मेस्ता प्राय चितार्माण के आधार पर इन्ह लदमयासेन की सभा में श्रदा स्थित माना गता है। इसके अलावे मदेव का यह प्रसिद्ध श्लोक भी प्रामाणिक माना जाता है गोपनश्च शस्यो जयदेव उमापति । पविराभव स्नानि समिता लक्ष्मणश्य ॥ पुन श्रीमद्भागवत ही भावार्थ दीपिनी रीका पर वैष्णव वोपी नाम की टीम में एक स्थान पर लिखा है--धीजयदेवमहपरणेन महाराजलक्ष्मणसेनमन्त्रि घरणोमापतिपरण' (से. शब्दार्थ कौस्तुभ परिशिष्ट, पृ...)। हमने य. निक निकाला जा सकता है कि उमापतिघा विश्यन से लेकर लस्मगाउन तक के सभामद् रहे होंगे। इनक समकालीन स्मन (गीतगाविन्द कार), पोती या कविराम (पानतर शरण (दर्धा क रचयिता), गोपन (आर्यासराती) आरिबर- वि और पण्डित थे। प्रम्भिक अन्गो समातिभर की रचनायें चिपुर सस मुभाषितमुहागनी और शान घर पनि में मिनती है। ३ उमापतिधर की काव्य शैली प्रस्तुत प्रशस्ति में ही श्रीन वैचित्र्य है जिसे हम पूरी प्रशस्ति में पाते हैं विशेषनया शिव के विषय में कही गई उक्तियों बड़ी ही मार्मिक ह ( रजोक ३.३१,३९ ।। कवि के विषय में यहाँ स्थानाभाव से अधिक न कहकर यही कहना पर्याप्त होगा- चाचण यशातामुपैति सदेव प रमणीयताया । ४ प्रशस्ति -यह प्रशस्ति ३ मी..६ जम्बे तथा १ फुट १५ चौट पत्थर पर खुदी हुइ सन् १८६५ई में मे काफ के द्वारा पायी गई थी। सम्प्रति कलकत्ता के संग्रहालय ( Indian Museum ) में रखी है। इसका सम्पादन मेकाम्ने (Journal of Asiatic Society of Bengal) में तग कोलहान न एपिमाफिया इडका ( भाग • १ पृ. ३.५ १५) में किया था। पुन. हा नैनी गोपाल मजुमदार ने स्नवशीय रामानों के शिलालेखों के साथ से Inscriptions of Bengal ( Vol III ) में प्रकाशित किया। ५ प्रस्तुत प्रयास - इसकी औरणा गुरुपर आचार्य चन्द्रकान्त पाण्ड्य से सम्म हेमिहीन मेरो नियुक्ति पटना कालेज में हो जाने पर मेरी स्वाभाविक रवि देखकर मुझे षष्ठ पप में यह विषय पमने को दिया। माधुनिक शानिक युग ग चार छात्रों को पारड ताप स पात्त देख मुझ परत पेद हुमा तथा इसे प्रकायत करन का सर्वरप कर तिया । संस्कृत म प्रना बाख्या तथा हिदी अनुवाद के साथ इसे मन होली की छान्यो म जान दिन का म बैठकर दिन रात लग तार परिश्रम करक तयार ही कर लिया। इसलिये भ मपन भैया का बहुत द्वाता हूखिइन तीन दिनों में घर मे उहो भले ही हिनाद किया परन्त मम साधना में वत्पर देखकर विलकुल छोड़ दिया। प्रस्तुत प्रयास की अच्छा बुराई कृपालु पाठका और विद्वानों पर ह। यदि मह रति उह पाद भाई तो शीघ्र ही म शिलालेखों का बड़ा साहित्य प्रसाश मे खाऊगा। शान्ति शान्ति शान्ति सेवक धन्तोत्सव ११६. सचि विजयसेन-प्रशस्तिः - प्रभाख्यव्याख्यावांलता 'पश्य देवस्य काव्य न समार न जीयति' (अथर्व . )। नमो नित्यं सरस्वत्यै गुरवे वनमालिने । वाणी मे सफला भूयाच्छिलालेखप्रकाशने ॥१॥ नावीतं पदशास्त्रमप्यवगतः कोशो न सम्यडमया साहित्येऽपि न सावना फिल कृता तक सदा धर्षितः । वाग्देवीपदवन्दनार्जितयशोराशिप्रकाशीकृत- स्वानन्दप्रभवा प्रमेयमधुना व्याख्या समाख्यायते ॥ २ ॥ श्रा नभवान्महाकविरुमापतिवर. स्वाश्रयदस्य राज्ञो विजयसेनस्य कीर्ति - भूतस्य प्रधु म्नश्वरमन्दिरस्य निर्माणवर्णनापं स्वप्रतिपित्सितम प्रतिपित्सुः 'मन- लानि मनलमध्यानि मालान्तानि च शास्त्राणि प्रथन्त' इति भगवतो भाष्यकारस्य पतन्जले चन स्मार दरिडनो महाकवे 'अशीनमन्क्रियावस्तुनिर्देशो वाऽ प तन्मु- सम् इनि व नमनुसृत्यादो नमस्कारात्मकमालमुखमारभते प्रशस्तिकाव्यमिदम् - ॐ ॐ नम. शिवाय । औमिति॥ ॐकारी मजलावाची, उसञ्च- ओद्वारश्चाय शब्दश्च द्वावेती ब्रहाण' पुरा । कण्ठम्भित्वा विनिर्यातौ तस्मान्माजलिकाविमौ ।। ७० कारद्वय मजलप्रकार्यम् । अथवा प्रथम ॐकारो मङ्गलवाची, अपरस्तु नम. शिवायेति पञ्चाक्षरमन्त्रस्यारम्भद्योतनाथ श्रूयते हि तन्त्र पु-'न श्रोङ्कारम- नाटत्य कश्निन्मन्त्र प्रवर्तते । एतेन मन्त्रशब्देन वैदिको मन्त्रस्तान्त्रिो वापि प्रतीयते। अत एव श्रीहर्षादीना काव्येषु ओहारमप्रेसरमस्य कुर्या इत्यादीनां साधीयस्त्वम् । मालच विघ्नविनाशनहेतुभूतम् । नम इति स्वापदृष्ट-धपूर्वक परीकृष् पयोधक शब्द ॥ सम्प्रति शिवस्तुतियां प्रशस्तिमारमते- वोशुकाहरणसाध्यसकृष्टमौलि- माल्यच्छटाहतरतालयटीपभास । देव्यास्त्रपामुकुलित मुखमि दुभाभि- दियाननानि हसितानि जयन्ति शम्भो ॥१॥ पत्तोंशु केति ॥ पतसि विराजमानस्याशुकस्य वस्त्रस्थाहरणादरीकरणा- सवम भर्य, तेन कारणेन को स्वरमा मौलरिशरसी मायं तस्यच्छटा। क्षया चन्या रतालयस्य रतिगधनस्य वीपाना भारवि इता यया तस्या देव्या पात्या । इन्दुमाभिश्चन्द्रज्योतिर्मिरत्रपया तज्जया मुलितं मुख क्मलस्य सदशम् हनुमामि कमलानामेत्र निसगर्वरत्वात् । अतएव कमलसहतस्यैघाननस्य हरशिर स्थितस्य चन्द्रस्य प्रकाशन प्रपामुकुलितत्वं साधीय । तपाभूत पावत्या मुख पीन शम्मोहमिनानि पञ्च ननानि जयन्ति उत्तपत्वेन बन्यानि स्युरित्यर्थ । एतनी माया मारपच्छाया सर्वप्रकाशकल जगत पित्रोरच परस्परसंयोगजारम्प भाल दोत्यते । प्रायेणानौजी गुण' पथाह दण्डी- ओष समासभ्यस्त्वमेतद् गपस्य जीवितम् । पक्ष निलकं उत्तम् ।।१।। सम्प्रति देवनाई पर्णपति- लक्ष्मीवल्लभशैलजादयितयोरद्वैतलीलागृह प्रगुम्नेश्वरशब्दलान्छनमधिष्ठान नमस्कुर्महे । यत्रातिदनभङ्गकातरतया स्थित्वा तरे कान्तयो- देवीभ्या कथमप्यभिन्नतनुवाशिल्पेऽवराय कृत ॥२ लक्ष्मीवि ॥ वदम्या बालमस्य विष्णो शैलजाया पावस्या दयित्तस्य पत्सु शिषम्य चाह ततोलाथा एकीभवनमीडाया गृह, पनी लीलाम्, भयो क्यस्म चित्र भवनमित्य । प्रद्युम्नेश्वरश दस्यायत्वे 'पटुमसर इस्मस्य शाह- - । ( ४ ) कीर्तिमद्वियशोयुक्त भूषेऽभ्यत । निश्च परशरस्यापत्येन म्यासेन विश्वस्य धरणेषु परिसर प्रसारस्तान प्रोणनाय प्रसादाय येषा नरपतीनो चारित्रस्यानुचिताऽनुस्मरण तेन परिचयस्तत एव शुचय पूतास्तथास्ता मुक्तय एष मान्धीकर्य मधुनो धारास्ता प्रणीता निमिता । व्यासेनाऽपि तेषा चारित्रमितिका वर्णितमित्यय । अनुप्रामोऽलहार । सग्धरा राम् ॥४॥ रवशीय सामन्तोन वर्णयति तस्मिन्सेनान्यवाये प्रतिसुभटशतोत्साउनब्रह्मवाती समात्रियाणामजनि कुलशिरोदाम सामन्तसे।। ' उद्गायन्ते यदीया स्सलदुधिलोल्लोलशीतेषु सेतो शान्तेष्पप्सरोभिर्दशरथतनयस्पद्धया युद्धगाथा ॥५॥ , तम्भिनिति ॥ तस्मोक सेनस्यान्ववाये घशे प्रतिगना विरोधिरपा समग वीरारतेषा शास्याप्युत्साइन विनाशे यद् ब्रह्म वीसिंगान तदतीति राबादी। अथवा धीरोत्सादन च ब्रा च बात स्म-ग्रामचनिययो कम करोति स्मेत्यय । एतेन तस्य वक्ष्यमाएवाचत्रियवीयता सिदा। स नामबनियागामेरजातीनां पुराम्य शिरीदम निहार प सामनसेनोऽअनि गात । अप्परोमियदीया युद्धस्य गाथा दशरयतनयस्य रामस्न पया प्रतियोगितया, स्खलन्तो मृत्यन्त उधय समुद्रास्तेषा मनस्यौलीलत्वेन चान्चयेन शतेषु सेतो रामेश्परस्पस्य कच्चा तेषु तीरेद्गीयन्ते । एतेन सामसेनस्थातो राज्य सूच्यते । फ्यायशि- रहार । सवरा वृतम् ।।५।। यस्मिन्सदरचत्वरे पटुरदत्त र्योपहूतद्विप-- बगें येन कृपजकालमुभग खेलायित पाणिना । वैधीभूतविपतकुञ्जरपटाविश्लिप्टकुम्भस्थली मुक्तास्थूलवराटिकापरिकाप्त वदद्याप्यभूत् ॥६॥ यस्मिन्निति ॥ पटु सत्य एता दयता तथा विभिमोपहता विपन्त- रात्रास्तेषा वर्गसमूहो गरिमस्सयामते यस्मिन् सारवत्सरे रणाने येन सामन्तसेनेन पाणला पाशमेव कात सासनासी सुभग सवायित । Fine भया सपजोसित तीति भाव - ( ५ ) प्राशि तूर्यशश्टेन सर्प सेलयात, तथाऽयौ राजाऽपि कृपागायौशलं पाणिना प्रदर्शय- । तद्रणाशनमद्यापि, द्वैधीभूता विच्छिना यत्र तत्र पलायिता विपक्षस्य शत्रो. राणा गजाना घुटा ममहास्तेषा वश्लिष्टा विदीर्णा कुम्भस्य पोनस्य स्थनी, तस्या मुक्तामणयस्त एव निर्मूल्यत्वेन स्थूला अशोभना वराटकाः कादिन्य (कोशी) ताया रिकरस्समूहाप्तम् । बहव शत्रुगजा निदता इति भाव । पकमलजार ॥६॥ गृहाद् गृहमुपागत नजनि पत्तन पत्तना- द्वनादनमतुद्र त भ्रमति पादप पाटपात् । गिरेगिरिमश्रित तरति तोगवि तोयधे- यदीयमरिसुन्दरीरारकपृष्ठलग्नं यश 1111 गृहादिति ।। यदीय यस्य राजो यशस्तस्यारीणा सुन्दरीणा (पलायमानाना मतीना) मरक प्रयाण सस्य पृष्ठे लग्न मन् । तामा यानानुगामीति यावत् । गृहारम्मादयः गृहमुपागत, पत्तनान्नगरानारान्तर प्रगति, बनानान्तरमनुद्र तं धानि रम, पादपाय पादपान्तरं प्रमात, गिरनिय॑न्तरमधिषित, तोयधे. ममदादपर ममुद्र सरीत। तरिमुन्दर्य पटापन्नाः सर्वत्र भ्रमन्ति स्मात भाव । की तम् ॥७॥ दानाहामायणाम्य विजयमाद- पानामयमरि कुलाकीणकर्णाटलदमी- नुगटाराना रुदनमतनोत्तागेमागवीर.। मायविनामामाममंट मुभिना A . " - HIAN या SHIKAगनिषहमहिम्ना वेश्म हेमन्तसेन ॥१०॥ रविहतानि न नगनि वसामासमेदासि ततस्तेषां सुमित सुलभता मस्या त दक्षिणों दिशन स्पति। अपरिमेयारातिविनाशाषा पादयोऽयत्वेऽमीणा इत्युक्लिवे- विश्यम् । यमश्च दक्षिणदिग्यासी तस्य हेतुस्पोनित । म दाकान्ता वृत्तम् ॥ साम्प्रतमस्य वामप्रस्थदशामाइ- 4tat उद्गन्धीयाज्यधूमैमृगशिशुरसिताखिन्नवैखानसस्त्री- स्तम्यवीराणि कीरप्रकरपरिचिवमहापारायणानि । म ज्येनासेव्यन्त शेपे वयसि भवभयास्कुन्दिमिमस्करीन्द्र "पूर्णोत्सङ्गानि गहालिनपरिसरारण्यपुण्याश्रमाणि HER उद्गन्धीनीति ॥ येन राशा शेषे पयसि वरखे भाग्यस्य घनत्य घूमेग-- भीनि तद्गतो गन्धो येषा तथाभूतानि । गवस्ये पूतिमुमुरभिभ्य (४१३५) दतीदानम । भूगशिशुभी रसिलान्यास्वादितान्यविधा प्रसन्ना इत्यर्थ । पलानसाना भुनीना स्त्रियस्तासा स्तन्यानि वीराणि येषु तानि। कीराणा शुकानां प्रकरनिधये परिचितो ब्रह्मणो धेदस्य पारायण पाम येषु तानि । कादम्बर्यानी छन्--'अगुग्न हेऽभ्यरतममस्तवाल भरिति' (श्लोक ११)। मन पुनर्जन्म सत्य मयारकन्दिनि शुष्यद्रियुज्यमाने । स्कदितिशोषणामी, ताच्छील्ये शिनि । मस्करीन्द्र योगीरवर । मकरमस्करितो बेशुपरिजकयो (६११५४ हवि निपातनामुट् । पूरा सा प्रशो। येषा तानि, गाया प्रतिनाय तीरस्य परिसरे प्रदेशेऽररायेषु पुण्यानि, तथाभूता बाश्रमायसेभ्यन्त सेवितानि । बबवेल बनमगात् । अनुप्रासोऽलद्वार साम्पत्तं तत्तनय हेमसेनं पश्यति- अचरमपरमात्मज्ञानभीष्मादमुष्मा- माण मिनमुजमदमचारातिमाराधीर । अभवन्नषसानोमिननिणित्तत्तद्- अचरमेति ॥ नास्ति घरमो दितीयो यस्य तयाभूते परमात्मनो नदी भम इस अमुष्मान्ताम तसेनानिशाना भुजाना मदेनामिमानेन माता येऽ रातय 1969 Form Anिt nium . मारो मारणमइश्विहीं यस्य स चाऽसौ वीर । नावसानमन्तं यथा तथोदिन्नाः स्पष्टा निर्णिका निर्मलास्ते ते प्रत्येक गुणास्तेषा निवहस्य समूहस्य महिम्ना वेश्म गृहं वासो हेमन्तसेनस्तत्पुत्रोऽभवत् । रुपक्मलङ्कारः । मालिनी वृत्तम् ।।१०।। मूर्धन्यद्धेन्दुचूडामणिचरणरजः सत्यवाक्कण्ठभित्तौ शास्त्र श्रोत्रेऽरिकेशा. पदभुवि भुजयोः क रमौर्वीकिणाङ्क । नेपथ्य यस्य जज्ञ सततमियदिद रत्नपुष्पाणि हारा- 'स्ताटङ्क नूपुरस्रक्कनकवलयमप्यस्य भृत्याङ्गनानाम् ॥११॥ मूर्द्ध नीति ॥ मूद्ध नि शिरस्यर्द्ध इन्दुश्चन्द्र एव चूडाया मणिर्यस्य स शिव- स्तस्य वरणरजो धारयति, कण्ठमेव भित्तिस्तस्या सत्यवाक्, श्रोत्रे कर्णयो. शास्त्र, पदमुषि चरणतले 5 रीणा शत्रणा केशाः, भुजयो- क्रूरा मौर्वी धनुर्ध्या तया किणः चुणं तस्याकश्चिहम्-एवमेव यस्य नेपथ्यमाभरण सततं अज्ञऽभूत् । तेषु अजपु रत्नान्येष पुष्पाणि तानि मुद्धनि, हारा कण्ठे, तारई कर्णाभरण कर्णयो', नूपुरं पदयो., सगमाल्यं च भुजयो, एतान्याभूषणानि त्वस्य भृत्यागनानामेव, दास्य एष धारयन्ति स्मैतानि । बाह्याभरणत्यागपूर्वकमान्तरगुणधारणरूपोऽ र्थो व्यङग्य ॥११॥ यहोर्वल्लिविलासलब्धगतिभिः शल्यै विदीर्णोरसा वीराणा रणतीर्थ वैभवशाद्दिव्य वपुबिभ्रताम् । ससक्तामरकामिनीस्तनतटीकाश्मीरपत्राङ्कित वक्ष प्रागिव मुग्धसिद्धमिथुनै सांतङ्कमालोकतम् ॥१२॥ यदिति ॥ यस्य दो जावेव वल्ली तयोर्विलासेन लब्धा गतियस्तै. शल्यः शस्त्रवि दोणमुरो येषा तेषा,पुन रणमेव तीर्थ तस्य वैभवसमृद्धिस्तदशातोदिव्य वपुः शरोर विनता धारयता वीराणान् । पागेव पूषामेव, यथा पूर्व रक प्रवहति स्म तवैवेदानीमपि । ते वीरेषु सा11 प्रणाऽऽसतानाममरकामिनीना देवाशनाना स्तनतटीपु यत्काश्मीरत्र रतवर्णा कुछ मरेखा'तेनातिं पक्ष । मुग्धा भोता ये सिद्धास्तपा मिधुनै सात सभयमालोकित दृष्टम् । पूर्व शस्त्रविदीर्णवनसा वीराणा वन मु यथा रकवर्णो ननु तयैवेदानी स्वगताना देवाजनासहाना त “सो . गोल महाराही यस्य स्वपरनिखिलान्त पुरवधू- ज्वलं च यशो यस्यास्तथाभूता। पुनस्त्रिषु भुवनेष्वपि मनोसा घमनीयमा सधपुश्बुमरस्तपर्णानां वर्णों वर्तत इति समयमलोकि। भ्रान्तिमा चयो सहर ॥१२॥ HALA प्रत्यथिव्ययकैलिकमणि पुर स्मेर मुख विनतो- रेवस्यैतदसेश्च कौशलमभूहाने द्वयोरगुतम् । it शत्रो कोऽपि दधेऽ असावमपर सख्यु प्रसाद न्यधा- 10 देको हारमुपाजहार सुदामन्य प्रहारं द्विपाम् ॥१३॥ प्रत्यर्थीति॥ प्रत्यारना राणा मित्राय वा व्पयो पिनायो पनत्यागोवा यस्मिस्तरिम कलिक्मणि । शत्रुनाश मित्रामोरे येत्यर्थ । पुरोऽन एक मेर स्मित मुख नियतीरियतौरेतस्प राबरचतस्मासे पाणस्य चैव योनि दानविषयेऽद्भुत शशममत् । कयमित्याह-रोपि रूपाणमित्यर्थ । शोरवसाद दुख पकार अपरतु राजा सख्युमित्रस्य प्रसाद प्रसन्नता व्यपादतनोद । पुनरपेको राजा मुददा मित्राणा स्मिन्केतिकर्मणि हारमुप बहारोपाहारबनाददात् । अयोड स्मासिस्त दिषा शत्रूणा, 'वत्सूद्विधः (३३६१) इत्यादिगा दिया। प्रहार बातमेपोपाहारवेनाददात् । यमककाम्यतित्रयो समष्टि ॥१३॥ शिरोरत्नने पीकिरणसरणिस्मेरचरण। (निधि का ते साध्वीअववित्तनित्योज्ज्यलयशा यशोदेवी नाम त्रिभुवनमनोहाकविरभूत् ॥१४॥ महेति ॥ यस्य योदेवी माम महाराशी स्वेषाप परेषा प शमियाणा मित्यय । निखिलाना सर्वसामन्तपुरमधूना शिरस्तु पानि रत्नानि तेषा श्रेया पर किरणाना सरण्यो मार्गास्त स्मेरी प्रकाशितौ चरणौ यस्सा सा 1 साप कान्ते शोभाया निधि , साध्वीना पतिव्रताना प्रत तम विततं विस्तीर्ण नित्यम कृतिर्यस्या एषम्भूता साऽभून् । मनुप्रासोऽपुष्पकच । शिरिणी उम् ॥१४॥ साम्प्रतमस्य सून' विजयसेन बर्णयति- (६ ) तनस्त्रिजगदीश्वरात्समजनिप्त देव्यास्ततो जयरातिनाणातनोज्ज्वलकुमार केलिनमः । तुलग्मेि बलावलय नीमपिवम्भरा-- विशिष्ट जानान्वया विजनन वीपनि । १६॥ तत इति । ततप्तस्माधिजगताऽधीश्वरालामन्तना त-या दव्यान, अरातीना रानगा वत्तस्य शातनन विनगशनोज्जयत कुमारित सालक.: बीटा- मार्गो यस्य तथाभूत । चतुर्गा जन्न पानामेव मग्बलावलयं पाञ्चाटभन तस्य सीमा पारे,वर्यस्यास्तनाभूनाया विश्वम्भराया पृथिव्या विशिष्टो जय इति ज्य' , नामयोग्यः । तेन सान्वयोऽ न्वर्थनामा विजयसनश्चासौ पनपातश्च समजाट -सआत । जनेनुडि सिच् ।।१५।। गणयतु गणश. को भूपतीस्ताननेन प्रतिदिनरणभाला ये जिता वा हता वा । इह जगति विषेहे स्वस्य वंशस्य पूर्वः पुरुप इति सुधांशो केवलं राजशब्द ॥१६।। गणयत्विति ॥ प्रतिदिण रणं भजते रचयति तेनानेन राज्ञा ये भूपतयो जिता ये वा हतास्तान्भूपतीन्गणश समुदायेन को गण्यतु । न कोऽपीत्यर्थ । तथा चानेन स्वस्य वशस्य पून. प्रथम पुरुषश्चन्द्रवंशत्वात् ( श्लो० ३)। इत्येव ज्ञात्वेह जर्गात केवल सुवाशौ चन्द्रमस्येव राजेति शब्दो विषेहे सहते स्म ! 'परि. निविभ्यः सेवसितसयसिवुसहसुटस्तुस्वजाम्' (८-३-७०) इति षत्वम् । सोमोऽ- स्माकं ब्राह्मणाना राजेति श्रुतेः । अन्ये तु राजानस्तेन विनष्टा एवेत्यस्य चक्र- वर्तित्वं द्योत्यते ॥१६॥ सहयातीतकपीन्द्रसैन्यविभुना तस्यारिजेतुस्तुला किं रामेण वदाम पाण्डवचमूनाथेन पार्थेन वा । हेतो खड्गलतावतंसितभुजामात्रस्य येनार्जितं म्भोधितटीपिनद्ववसुधाचत कराज्यं फलम् ॥१॥ । --- गत्यस्ततापन - $5h ( १ ) सयेति ॥ तस्यारिजेतु जियिनातुलामुपमाम् । तुल्याभातुलो- पमाभ्याम् (२३७२) इति षष्ठी। कि सरमामतीता । द्वितीया धितातीत- (२११४) इति द्वितीयासमास । त चपीवास्तेषां सन्यस्य विमुना स्वामिना रामेश बदाम किवा पारडवामा चमूस्सेना तस्या मायेन पार्थेनाऽ जु नम वा बदामेति स देह । रम सद्ग व लता,तयाऽवयिता शोभिता मुजैन सस्य । खडगयुहन्तस्यैवेति भाव । तस्यहनो फ्ल व सप्तानामम्भीधीना तटी पिनदा धता वस्त्रादरपेण मया बसुषया तायारचक मण्डलमेषेवराज्य तथा भूनमनितम् । अल्पस्य कारणस्यानरूपफलत्वाद्विभावनालदार vil एकफन गुणेन य परिणत तेषा विवकारते कश्चिद्ध-त्यपरश्च रक्षति सृजत्य यश्च कृत्स्न अगत् । योऽय तु रणे तो बहुतिर्थीमान् धान द्विपो वृत्तस्थानपुषच्चकार च रिपूछदन दिव्या प्रजा ॥ १८ ॥ बास्त्रदेवरकपन प्रत्यक्मान गुणेन कृत्स्न जगत्परिणत प्रवस्ति, तथा देवानाम् । यतस्त्र निर्धारणम् ( २३४१) शत पछी । विषेकात निविवेक कर्तामात विचित्य पश्चिन्त--शिव अपरी चिति-विष्णु अन्यस्य सुजाति-मक्षा यत वषो धीमा परी अन् । पहुना प्रतिष । 'तस्य परणे (.. ८) पात और परत बहुमगनपस्य कि (५४५२) हात तिथुगागम । गुणे त, यतो द्विषा शापान, वृत्तस्थास्वमतिनी अषत, रिपुणावदेन चाम्या प्रा. स्वाधारकार देवाना प्रबेकमेको गुण, अस्य तु सब गुणा एका पति विशेष ॥10॥ दत्वा दिव्यभुव प्रतिक्षितिभूवामुमुरीकुर्वता वीरासग्लिपिनाविनतोऽसिरमुना प्रागेव पत्रीकन । नेत्यं चेत्कथमन्या वसुमती मोगे विवादोन्मुखी वत्राष्टकपाणधारिणि गता मत द्विपा सातति ॥६॥ रत्वेति ॥ प्रतिगत ना - किस्ता नपणा दिल्या अपवार एकेति॥

- ่ ( १ ) तान्नु स्वर्ग येल्पः। तस्य त्याने शे: जनरोज्यता स्वीयताउनुना। रुधु स्वगत्यु तेषा राज्यं तेनाकृतमिद। प्राब नियतविनिमव्यापरति बीर जन्व तिदिस्तया ताजो तितो पत्रहतः। पत्र राजकीय व्यागरते स्त्रमादितः । न वेदव्या भोग भोगविषये विवादोन्मुखी कृतविवादा दमतो वयनिय तदर्वाना स्पद । अनन्त मोर्गावश्ये अवृष्यं कृपणं ( पत्रं ) धातु शीत यस्य ताजा विष्ण आन्तनिक गता पराजिता । गेव पत्र लिहिते उति, विवादे Fळ तदर्शना बम्ब शव पदश्च पराजित । तस्नीमरूप पत्रमाजान्दा त्र पत्र तिखिने पृथ्वी तदवोना गमावधानि । सञ्च-वादेऽन्ति पत्रम् । ब्यजन्दलितोऽदं तोन्यत्मरमरः ॥१६॥ व नान्यवीरविजयीति गिरः कृतीनां अत्वाऽन्यथा मननढनिहरोषः। गौडेन्द्रनवाकृत - कामरूप- न कतिकपि यस्तरसा जिगाच ॥२०॥ त्वमिति।। नान्यायदेशर- दरदेशल्य व विजयी अति न गिर ... नाटयपत्। तथ्य-वीरविजरी स्ट करतो निगो मुमतल रोः केन्न्तदान्तो यस्तरमा शोधिन्वन् बोरवयीत प्रशासन गौन्दन्द्रदन्दराजितबन्न , कन्न वाकून दूरस्कार। दुकर को गन्दनवनेन्ट' (१-३-३२) इमादन पसन् , तु शिव 'र' (१....) इति किला गुज- 'हत्या ( ८.२.२७) ईद मनोरः । कृषि जिगर जिन्वन् । 'सन्तो' (७.३-५७) इंसं त्वम् । एवम्चान्दारविषयी बमवेतनवः । २०॥ रुन्नन्य इवाति नान्य किनिह स्वं राज्य स्तात्रते सर्दा वन मुञ्च वीर शिरवो नाद्यापि दर्पस्तव ? .

GunM
१२
)
८५५..
Anhu
इत्य योन्यमहर्निश प्रणयिमि कोलाहले इमामुजा .hort
५ यत्कारागृहयामिकैनियमितो निद्रापनोक्लम ॥२॥
शूरमिति ।। प्रारमान शूरं मयते इति शुरम्मय । प्रारममाने खस्य'
३१८३) इति खशि 'अद्विपदा तस्य मुम (६०६७) इति मुमागम ।
स इव हे नान्य ! स्वमसि । है राघव | स्वमिह स्त्रमात्मान किं श्लाघमे प्रशमसे
कुनो न रणे काशलं प्रदर्शितम् ! हे घर्धन ! त्व स्वकीया स्पर्धा परस्सयांसहनमा
पराभिमधेच्छा मुन्श्व स्यज। हे पीर । ते दोऽद्याप न विरतो वस्त । इत्येव
प्रकारेर यो यं परस्परमहनिश प्रायमिरत्पयमानै क्षमामुमा सेन वन्दीकताना
भूपालाना कोलाहलैर्यस्य कारागृहस्य यामिकामे नियुक्त प्रहरिमिरित्यय । 'वत्र
नियुक ४४ ६) इति उन । निदाया अपनोदी विनाशस्तस्मिन्य क्तम
अम.सनिमितोऽल्पीकन | सतदानध्वनिमिरते प्रसचा सत प्रहरिणो निद-
ज्येष्यवान्ता एवेतिमावा ॥२१॥
पाश्चात्यचक्रजयकेलिषु यस्य यायद्
ht
गगाप्रवाहमनुधावति नौविताने ।
भर्गस्य मौलिसरिवम्भास भस्मप-
लग्नोमितेष सरिरिन्दुकला चकास्ति ॥२२॥
पाश्चात्त्येति ॥ परचाजातम्पारचात्य पश्चिमम् । 'दोषणापरवात्पुरसस्स्य
(२०) इति त्या। दवल्याना चक्राणा राज्याना जय एष केलि मीठा
तेषु नावा नौकाना बिताने धमहे सत्य तरिनों का यावद्गाप्रवाहमनुधापति तावस्था
नौमर्गस्य शिवस्य मौली स्थिता या सरिद गजा तस्या अम्मासि मले भस्म एव पर
स्तस्मिलग्ना पुनरुग्मिता महा। सुप्मुपैति समास । इन्युकलेव कास्ति
शोमवे। जयतिरा देनास्य अययात्रा गजकेनिषदेव सरलेति सूच्यते ॥ कीसह
रणमहोदयस्तु तरिमेवोपमानमिदुकलाम्बोपमेयं मन्यते, तन जययातायो तरेरेव
प्रस्ततपस्तुलान् ।
मुला कर्पासचीजमरकतशकल शाकपत्र
पुष्प रूप्याणि रत्न परिणतिमिदुरै कुक्षिमिदासिमाना।
เรา
mar
उपमाहार. ॥२२॥

मुक्ता इति ॥ faala कुष्माण्डीवल्लरीणां विकसितकुसुमैः काञ्चनं नागरीभिः शिक्ष्यन्ते यत्प्रसादाबहुविभवजुपां योपितः श्रोत्रियाणाम् ॥२३॥ यस्य राज्ञ प्रमादाद्वहावभव जुषन्ते सेवन्त इति तेषा, प्राप्त- बहुवनानामित्यय श्रोत्रियाणा वेदाध्यायिना योपित स्त्रियो नागरीमिनगरवासि- नीमि भिरचतुराभिरित्यर्थ । शिक्ष्यन्ते ज्ञातुम् । एका. कामाना वीजैः, मरक- तस्य शक्ल खण्ड शाकपत्र , मप्यााण अलावूना ( लोकी ) पुष्पै श्वेतत्वात, रत्नं टाटिमाना परिणत्या भिदुरैर्विच्छिन्न । नादामदिच्छिदे कुरच्' ( ३-२-१६२) कुनिाभ वाजै, काञ्चन कुष्माण्डीना कुम्हड़ा ) वल्लरीणा लताना विकासतैः कुसुम : जानन्ति स्म । श्रीत्रयाणा स्त्रयो रत्नादीना परिज्ञानेऽसमर्था. सत्यो नगर- स्त्रीभ्य महाशात्मादृश्यनोपमानप्रमाणे तपा ज्ञान कुवन्तीत्यर्थः । एतन राज्ञो वहुदानशालत्व ग्रामस्त्रीणा मुग्यात्वं च व्यज्यत ॥२३॥ न अश्रान्तविश्राणितयज्ञयूपस्तम्भावली द्रागवलम्बमान ॥ १६ यस्यानुभावासभुवि सञ्चचार कालक्रमादेकपदोऽपि धर्म. ॥२४॥ अश्रान्तति ॥ यस्यानुभावाच्छक्त्या कालस्य क्रमात्परिवर्तनादेकपदः खञ्ज , कलौ युगे त्वेकचरणोऽपि सन्धर्म भुवि पृथिव्याम् । न श्रान्त रुद्धमित्य- धान्त निरन्तरमिति यावत् । विश्राणिर सम्पादित पुरस्कृतो वा यज्ञस्तस्य यूपस्य स्तम्भानामवली पतिम् । अवलिशब्दो दी? ह्रस्वी वा। तामेव दाग्झटित्यवलम्बमान स्वचचाराचरत् । राज्ञो निरन्तरयज्ञसम्पादनं. सूच्यते ॥२४॥ मेरोराहतवैरिसड कुलतटाटाहूय यज्वामरान् xena.५ व्यत्यास पुरवासिनामकृत य स्वर्गस्य मतस्य च । उत्तुङ्ग. सुरसम्मभिश्च विततैरतल्लैश्च शेपीकृतं चक्रे येन परस्परस्य च सम द्यावापृथिव्योपु ॥२५॥ ॥ श्राहता वैरिणस्तै सटकुलं व्याप्त तटं यस्य तस्मान्मेरीरमरा- न्देवानाहयामी यज्वा विधिन्ष्टवान्स रवर्गस्य सत्तस्य च पुरवासिना व्यत्यास hiananmohan ५६AL Cfami dsm 'मेरोरिति ॥

-- 440 भानोऽचारि कृतोऽस्ति दक्षिणशि कोणान्दवासी मुनि 1 जा यावाफि तथापि नास्य पनवी सोघश्य गादि विनिमन, स्मारवा याचनमा! हा वीच स्वग प्रणेत भाव | मन च। सारतात भित्राये कयाफले ) त्यामनपदम् । *रधिकीनने नुममिदेवालयश्च तितावस्तीस्वरुले खातस्तानैश्च बागप्राययोशनास वपु पामरस्म येन राजा समं च तम् । खानविस्तीरावर भर पता बभूष स्वर्गस्योर मन्दिरैरधिकतनेत्र । परम्परमवमुमयो नेन सम बभूवेति भाव । अनेन म यलोक एव स्वगत इति पश्यते ॥५॥ अस्य मन्दिरनिमितिमाह-min दिशासामूनकाण्ड गगनतलमहाम्भोधिम पानगरीय भानो प्राप्रित्यगद्रिस्थितिमिलनयास्तस्य मध्याहराज्ञम् । श्रालम्बरसम्ममेक त्रिभुवनमवनस्येकरा प गिरोणा म प्रस्नरपरस्य व्यधित घमुमतीवासघ सौधमुन्चे ॥२६॥ गिति ॥ हिश एव शाखा पत्र (पश्चा । मूल काण्ड प्रवाना भागरच यस्प तन् । गगनलमैत्र महम्भोधि स स बस्य मम पारीमधुन्चस्तमो भागच । प्राक्प व प्रत्यकपरचमच तन्न यो पर्वतस्तस्य स्थिती स्थाने मिति प्राप्यत, तास्थान स्पृशताति कचित् । अन्यश्वास्तच यस्य सयानस भानो मरस्य म पाल म म मिमिति घोतक रानम् । त्रिभुममे भान तरम लम्बाय भाभस्लम् । गिरीयामेरोष मैनाकामि । समय गगनगदरमित्यादि। एवम्भूत प्रधुम्नवरस्पीच सष प्रासाद मन्दिरस बस्तीवामब मी सधन निर्मितवान् । विसंकाय पाली लुसियालन पदव 'स्वायोचि (11-" इतरवे हि (. -२४) इति सलो।पकमलार ॥१॥ 44 प्रासादन तवामुनव हरि समस्या निरुतो मुधा अन्यामुपयोऽयमृच्चतु दिश दियोऽ-यसो पर्व'नो A0AM AUR Lyi ( १५ ) 2 प्रासादेनेति ॥ हे भानो, सूर्य, तव हरितामश्वानामध्वा मार्गोऽमुना प्रासादेनैव निरुद्धो नान्येन केनचिद् विध्यादिना । मुधा व्यर्थमेव मुनिरगस्त्य- स्त्वया दक्षिणस्या दिश. कोणस्यान्ते निकट उषितुं शीलमस्य तथाभूत कृतः । उद्ध तो नष्टः शपथो यस्य म उन्पथ. सन्नन्यामुत्तरा दिशमृच्छतु गच्छतु । असो विन्ध्योऽपि यावती शक्तिस्तावन्मान', 'यादवधारणे' ( २.१.८) इत्यव्ययीभावः । वर्द्ध ताम् । तथापि सौधस्यास्य पदवी मार्ग न गाहिष्यने प्राप्स्यति। विन्ध्य. किलागस्त्यशिष्योऽनीवोत्तम' सनर्यस्याध्वानमवरुणद्धि स्मेति सूर्यप्रार्थितोऽगस्त्यो विन्ध्यसमोपमगात् । विभ्यस्त नमस्कत्तु भावे यावन्नमति तावदेवर्पिणा शपये बद्धो यदगस्त्यस्य दनिर्णादश प्र यावर्तन यावदेष तथैव स्थितः स्यादगस्त्यस्तु दत्तिणतो नाद्यापि प्रत्यायुत्त इति रामायणी कथाऽनुसन्धेया ( 2-११)। प्रासादोऽय विध्यादप्युच्चैस्तर इति भाव । मानस्य तिरस्कारात्प्रतीपमलवार ॥२७॥ स्रष्टा यदि स्रक्ष्यति भूमिचक्र सुमेरुमृत्पिण्डविवर्तनाभिः । जा तदा घट स्यादुपमानमस्मिन्सुवर्णकुम्भस्य तदर्पितस्य ॥२८॥ स्रष्टेति ।। यदि प्रष्ट्रा भुमिरेव चक्र ( चाक ) तस्मिन्सुमेरुरेव मृत्पिण्टं तस्य विवत्त ना सम्चालन ताभि दयति घटमिति शेष । तदास्मिन्मन्दिरे तेन राज्ञाऽर्पितस्य सुवर्णकुम्भस्योपमान तथोक्तो घर स्यात् । अतिशयोक्ति । च-'पुष्प प्रवालोपहितं यदि स्यात्' (कुमार० ११४.), 'उभी यदि प्योम्नि पृथक०' (शि. व. ३८) सन बिलेशयविलासिनीमुकुटकोटिरत्नाङकुर- २००५७ Ans स्फुरत्किरणमञ्जरीच्छुरितवारिपूरं पुरः। प्रति चखान पुरवैरिण स जलनग्नपौरागना- स्तनणमदसौरभोच्चलितचञ्चरीकं सर ॥२६॥ रिलेशयेति ।। स पुरवरिण प्रद्यम्नेश्वरस्य पुरोऽप्र। बिले शेरत इति विलेशया मस्तेिषा विलासिनीना पत्नीना मुकुठेषु कोटिभी रत्नाद कुरै रत्नखण्डः स्फुरन्त फिरणान्तेषा मजरी ताभिश्चरितमात वारि तस्य पूर पूत्तियस्मिस्त- 'भूत, 'पु न अहे पु मग्नाना पोरानाना स्तनपु, एणो मृगविशेषस्तस्य मदः यया नि - कार कस्वरीति भाव । तस्य सौरभेण गधेनोच्चलिता आकृष्णरचयसरीका यस्मिंस्त- थाभूत सरश्चहान पानयामामेत्यर्थ ॥२ उनिचत्राणि दिगम्बरस्य वसनान्यद्धाइनास्वामिनो रत्नाला तिमिविशेस्तिकपुशोभा शर्त सुभ्रध। पोराध्याश्च पुरी 'मशानवसतेभिताभुजोऽम्याक्षया लक्ष्मी स व्यवनोदरिद्रभरणे सुज्ञो हि सेना वय 1॥३०॥ उदिति ॥ शि एदा परमस्य दिगम्मस्तस्य शि स्रोच्चवार पर नानि वस्त्राग ग्यतनो तिवाद सहव । अङ्गिनाया स्यामनोऽना रबरस्य शिव रत्नेरननिभिश्च शिपता पतिता वपुषा शरीराणा शोभा याभिस्ता अत्रबना शत व्यत्तमोन् । स्मशन पसतिनिवामो यस्य तरय रिनागरिक राना समक्षा पुरीष्यतनोत् केमिपुरी नामद निति क्थयात । मिचा भुनीति तस्थ शिवस्य कृतेऽध्या लक्ष्मी श्रिय मनोत् । एवं सेनानामहपापमानाम वा वेश दरिद्वारा भरण पोषण हि मुशश्वतर || || चिन्ननोमेमचा हत्यविनिहितस्थूलहारोरगेन्द्र श्रीसगडक्षोतमस्मा रमिलितमहानीलरत्नारामाल । वपस्तेनास्य तन गहडमणिलतागोनस कान्तमुक्ता- Akdile नेपथ्यवस्थिरिच्छासमुचितरचन पल्पमापालिकस्य ।।२।। चित्रेति ॥ न राशाऽस्य, कल्पे प्राये कपालधारिणो रस्मै छाया सहायता रचना यस्म प वेषस्तेन सम्पादित । किप्रकार ! चिन वर्म पहम पर मेवेमस्य गजस्य धर्म पस्मिन । शिब चौम पस्तमेव गचर्म मन्यति मात्र । हृदय विनिहित स्थापित स्थूलो हारो मलामेवोरगाणा स्पाणामिन्द्रो पस्मिन्स । श्रीखरउफन्दनरर चोदरचूर मेव भस्म यास्मन्स । र मिलितानि पितानि महानीसरला ययानमाला यस्य स | खमण ना. सतय गोनस सपविशषो परिमस्वथाभूत । पा ताना सुरीमो मुहाना नपर- माभरणमेव नरस्पास्थि यस्मिस । एष रि वावरलमर पेष सम्पाइत ||" ( १७ ) वाहोः केलिभिरद्वितीयकनकच्छत्र धरित्रीतल कुर्वाणेन न पर्यशेषि किमपि स्वेनेव तेनेहितमा कि तस्मै दिशतु प्रसन्नवरदोऽगद्धेन्दुमौलि पर- स्व सायुज्यमसावपश्चिमदशाशेपे पुनयिति ॥३॥ वाहोरिति तन रवेनात्मनैव वाही कालमि. नीडाभिरत्रीत्ल न द्विती- यमेक कनकस्यच्छत्र यस्य तनाभूतमकराज्य कुवाणन एमपीहमिट न पर्यशपि, प्रत्युत “मेरित पूर्णम् । इदानी तम्म प्रसारचाना वाद. सन प्यर्द्धन्दुमौलिाशव परमविक कि दिशनु ददातु ? पुनरसो, न पाश्चमाया दशाबाशेपत्तस्मिन्कने न्त्यकाला-प्रागेति भाव । स्वं सायुज्यमात्मन्येवीभावमेव बबल टास्यति । नर्व- साधनरम्पन्नस्य शिवस्यापि तस्य वरदानेऽसमर्थत्वम् ॥३॥ काव: स्वाभिमान परिहरति- प्रस्तोतुमस्य परितश्चरित क्षम. स्या- 1964 पाचेतसो यदि परोशरनन्दनो वा। तत्कीर्तिपूरसुरसिन्धुविगाहनेन वाच. पवित्रयितुमत्र तु नः प्रयत्न ॥३३॥ प्रस्तोतुमिति ॥ अस्य चरितं परित. सर्वतः प्रस्तोतु प्राचेतसो वाल्मीकि- यदि या पराशरनन्दनो व्यासः नम स्यात् । अत्र नोऽस्माकं प्रयत्नस्तु तस्य कीर्तेयः पूर पूति स एव सुरसिन्धुर्गङ्गा तस्मिन्विगाहर्नन स्नानेन वाच पवित्रयितुमेवैतत्की- तिगानन घाचो मे पूयन्ताम् । तथा च नैपवे-'पवित्रमत्रातनुते जगा ग (१॥३). इति ॥३३॥ यावद्वास्तोस्पतिपुरधुनी भूभु वि.स्वः पुनीते Admin यावच्चान्द्रो कलयति कलोत्तसता भूतभत्तु । यावच्चेतो गमयति सता श्वेतिमानं त्रिवेदी तावत्तासा रचयतु सखी तत्तदे॒वाम्य कीर्तिः ॥३४|| यावदिति ॥ यावद्वारतोरपतारन्द्रस्य पुरस्य चुनी नदी गङ्गा भूम व स्व पृथि- व्यन्तरिक्षरगाणि पुनीत पवित्र्यात, यावच्छन्द्रस्य चान्द्री क्ला भूतभर्तु शिव- 12 Aymm ५१॥AG12.SA ( १८ ॥ स्योच सता शिरोमपण कलय ते रश्यति यावन्तयाणा वेदाना साधियही सना चेतो नमः वेतिमान धरनर गमयति धवलयीत्यथ । तावत्तासा सपोहाना मक्षी मित्रमस्य कीतिरपि तत्तन्य बस्तु रचयतु । पावयन शोभा बद्ध यतु, प्रकाश अस्विति भाr ril निणिरूसनकुनभूपतिगैक्तिकाना- nees मामन्थिलप्रयनपत्मलसूत्रवल्लि । एपा को पदपदार्थ विचारशुद्ध- युद्ध समापतिधरस्य कृति प्रशस्ति ॥३५॥ नियिकेति ॥ निर्णिका स्वच्छारच ते मेनकुतस्य भूपतय एव मोशिकानि सेवाम् । प्राचिन निय सरल च समथन काम्यरचना तय पदमल, नमनयो पक्षमेव सदर पून तस्य पल्लिला तर पषा प्रशस्ति पदस्य पदार्थस्य च विचा- रेण शुद्धा दियस्य तस्य कवरमापतिधरस्य कृति ॥३॥ धर्मप्रयता मनतासनता हस्ते सूनुरिमा प्रशस्विम् । चसान वारशिल्पिगोष्ठीचूडामणी राएकशूलपाणि ॥३६॥ धर्मेति ॥ धमस्य प्रणमा प्रपौत्रो मनामस्य पौत्र गृहस्पते सून पुत्री नरेन्द्र कायोत्तरवास्य शिस्पिना गोप्ठोमा सभामा तामणि रव राणाशमपाशिर्माम खनक इमा प्रशस्त खान । ३६॥ ।। इति भामागरमागरम वसादस्वैरकर्षकाण्डसनयासिन पौत्रेण पडी प्रसादस्यानुभमपाल शहिर तिन पुणपति ख्यातेन बालकविनोमाशहरेण चिनेय विजयोनप्रशस्ति पाख्या प्रभारथा समाशिमगान् ।। - ।

हिन्दी-अनुवाद "शि का नमस्कार। [अपनो ] 7नो पर कर हटाने पर. दर के कारण वीबो गई को माना की छ, नियम कापा को पार को मन्द करनेवाला देवी समुंद को रहर, जो ( मुह ) चा प्रकार कारण लज्जा म मग्मा गया था, nि P१न हुए (पोका ) . की जय हो ।।१।। जो लक्ष्मापान (विपणु ) श्री उमापनि । nिa ) के दान म लालागृह है. उम 'प्रशुश्वर' नन्द म अभिहित भवन से [ हम ] प्रणाम करते है। जहाँ प्रालि गन छूट जान क भय म दोनों प्रियतम के पीर ठर, दाना देवियों ने [ कम--कम ] उन (हरि हर ) का पभिन्न शरीर चिान वानी ला में तो [उनके एकत्व में ] काबर डाल दो ॥२॥ अमृत की किरगांवान (चट ) प्रयागना को जय दो, नत्र का मुनाना अटायमूह हो जिमका मिहामन है, ग 1 के जलकरणमीमारी के मनिम नचर इलात है तथा उजले और कने हुए फरण के श्रवन रे युष्ठ, रि पर रा करने वाला, ज्योनिग्या-मा माप ही सिकार है वागनाथी की जगातार रति क्रीड़ा को मानी ढनेत्राने ( स्वर्गीय) उम [रा] क पश में, दाक्षिणात्य के नरेश तथा चारों तरफ कीर्तिवाले वीरसेनादि हु, जिनक चरित्र * स्मरण से परिचित होने के कारण पवित्र. नकि की मधु को धारायें, श्याम ने, समार के कानों में टकर प्रसन्न करने के लिए यहाई । ४॥ - उम सेनवश में, संकड़ा विरोयो बोरा के नाशनी कोर्ति का प्रकाशक (या नाश और ब्रह्मविचारक ), ब्रह्मवत्रिय कुन का शिरोमणि मामन्तसेन हुश्रा जिनके युद्ध की कथायें, उन्नत हए समुद्र-जल को चचलता मे शोतल, सेतुबन्ध - ( २० ) ( रामेश्वर ) के किनारों पर, अप्सराये थीरामचन्द्र की सपा से गाती हैं। जिस रणागन में जोर ओर से आवाज करनेघाले डके से बुलाये गये शत्र वर्ग पर, उमने [ अपन। हाथों से तलवार--पी सुन्दर साँप को सेल या वह (ऑगम) श्रा भी शत्रुओं के विच्छिन ( तितर-विसर) हुए हाथियों के मुह के चीरे हुए पोला म तिकले माती पी बड़ी-बड़ी कौकियों के समूह से भरा हुमा है ॥६॥ शत्रुनाका सुन्दारयों के प्रयाण के पीछे लगा हुआ उसका यश एक घर से दूसरे घर ग पहुँबा नगर नगर में चलन लगा, बनमै रोहन लगा, वृक्ष रख तक घूम गया पहार-पहाइ पर ठहरा तथा एक समुह से दूमर में तैरने लया ॥७ विष्णु क समान वीर उस ( सामन्तपन) नश्कल से ही कर्णाट "श की लक्ष्मी के दुराचारी लुटरी का ऐसा निनाश किया कि प्रता क स्वामी (यम) प्रजा को प्रसन्न करके, भाग भी, अक्षय घसा मास और चर्बी की सुविभाषाली दवण दिशा को नहीं छोड़ते ॥ जिसने अपनो मन्तिम अवस्था में गया के किनारों पर के वनों में स्थित उन पुण्यात प्राधमा में निवास किया था जो बी के धुएँ से सुगवित थे, जहाँ हरिण क बच्चों के द्वारा अपने स्तन का दूध पिये जाने पर भी तपस्विया की स्त्रियाँ प्रसन्न रहती थी, ऑसगे वेदपाठ से परिचित थे और पुनजन्म के भय से सिन परिमाणक भिनक बीच में भरे रहते थे। अद्वितीय परमात्मा के शान में मीष्मतुल्य उस (सामतसेन से हैम तसेन हुआ जो अपने मुगभाव से मतवाले बन हुए शनुमों को मारनवाला बीर या तथा अनात स्पष्ट और निमत प्रत्येक गुण-समूह की महिमा का परम सिर पर अर्धे हुदो बदामणि बनानेवाले ( शिव ) की चरण धूलि कठस्पी दीवाल में सत्यव पी, कान में शास्त्रवाश्य, वरणभूमि में शत्रुओं के केश, भुजाओं में और धनुष की रस्सी ग प्रया-बिह-सदैव इस प्रकार के ही सिसक श्राभूषण हुए, रत्नपुष्प हार कराव नपर, सोन का बैगम - ये तो उसकी पारियों पहनती थी ॥११॥ जिसकी भुभाषी लतामा के विलास से चलनवाले शस्त्र से छाती परि जानएर रणम्पी तीर्थ के पैमष से न्यि शरीर धारणा करना पीसी बाती लपटी हुई देवागनाओं के स्तन पर की कम-रथा से न भी, भील गिनों के जोर, उसे पहले के समान ही भयभीत होकर दखते थे ।

विकीर्तिकृत
ऐहोलशिलालेख
(Aihole Inscription of Pulikesin II
( सानुवाद)
प्रो० उमाशङ्करशर्मा 'ऋषि
संस्कृत-विभाग
पटना कॉलेज, पटना
प्रथम संस्करण
१६६०

प्रकाशक
५० षष्ठी प्रसाद शर्मा
मा०+ पो०-पोन्दिल
मण्डल-नाया
एम० ए० की पाठ्य-पुस्तक
जुलाई-१९६०
मुद्रक
स्पार्क प्रेस प्रा. लि., पटना-

भूमिका आज पाठकों के समक्ष शिलालेखमाला केतृतीय-पुष्परूप में ऐहोलशिलालेख को रसते हुए मुझे अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है । न केवल एम. ए. (सस्कृत नया प्रत्न भारतीय इतिहास) के छात्रों के लिए, अपितु साहित्य और दतिहास के सामान्य पाठकों के लिए भी यह लेय बडा महत्वपूर्ण है । एक नो शिनालेयो की पुस्तकें सम्प्रति दुर्लभ हो ही गई हैं, दूसरे, हिन्दी के राष्ट्र- भाषा हो जाने पर भी अभीतक विद्वानों का ध्यान शिलालेखों को हिन्दी में लाने की ओर नहीं गया है। हर्ष का विषय है कि श्रीजयचन्द्रविद्यालकार- जसे इतिहास के अधिकारी-विद्वान् ने 'उत्कीर्णलेखान्जलि' मे पॉच संस्कृत- प्रशस्तियों को हिन्दी मे लाने का स्तुत्य-प्रयास किया है। हिन्दी की सर्वाङ्गीगा उन्नति के लिए हमें इस ओर जोर-शोर से लग जाना होगा। प्रस्तुत-शिलालेय राप्तम-शती के दक्षिण-भारत के राजनैतिक इतिहास महत अधिक प्रकाश डालता है। इस दृष्टि से इसका वही महत्त्व है जो उत्तर-भाग्न के लिए समुद्रगुप्त के प्रयाग स्तम्भलेस का। यह लेख चाई गज्य के बीजापुर जिले में ऐहोल नामक स्थान में मेगुती नाम के एक बेन मन्दिर में मिला है । पापाण के फलक पर इसमें १६ पंक्तियाँ खुदी हुई है। साक्टर फ्लीट ने इंडियन एटिक्वेरी के ५।६७ तथा ८१२३७ मे इसे दो चार गम्पादिन किया था । पुन कीलहान ने एपिग्राफिया इंडिका के पड़ गाग के प्रारम्भ में इसे प्रकाशित कराया। पर - यद्यपि टम लेग गे जैनमन्दिर के निर्माण का ही उल्लेख प्रधान है किन्तु अपने राजा सत्याधय तथा उसके वश का भी सुन्दर वर्णन इसमे किया । मुविधा के लिए इराकी विषय-वस्तु को हम विभक्त कर सकते हैं (१) निनन्द्र को नमरकार, (२) चालुक्य-वंश (8) सत्याश्रय (पुलिकेनी गया है --- दिलीय) मन्दिरकार का सरक्षक (१) जयसिद्ध वल्लभ (1) उसरा पुन रणराग () उसग पुत्र पुलकेशी (प्रथम) जिमन वातापि (माधुनिक बादामि) म राधानी बनाई, (५) उसका पुत्र कतिवमा नल-मार्य-क्दम्प का विजेता (6) उसरा अनुज भगलेश पर रि और रेवती दीप का विजेता (6) पुलकेशी (द्वितीय)-राज्य को चाचा से छीनना आग्यायिक और गोविन्द पर विजय बनवासी भर घेरा गग अलूप मौर्य विजय पश्चिम समुद्र की पुरी पर घेरा लाट मालव, गुर्जर को अधीन भरना हर्षवर्धन को रोकना नर्मदा के किनारे सैनिक १ हजार गोवा वाले महाराष्ट्र की विजय, कलिग कोसल विजय पिष्टपुर को मिला और इणाल बाप को लेना बोधी पल्लवो को हराना चोल विजय (10) सत्याश्रय शासन काल में ५.६ शक्-सवत् (१३४ ई०) मे जिन-विर का रविक्रीति के द्वारा निर्माण (११) रविकीति भी बनाई हुई प्रशस्ति कविता में कातिदास और भारचि के समान । के इतिहास-प्रखत शिलालस चालुक्य वश के प्रधान राजा पुलकेशी द्वितीय के वीर कार्यों का वर्णन करता है । उसमा दसरा नाम सत्याश्रय भी था। सत्याशय प्राय समरत दक्षिण भारत का राजा था। इसी समम हर्षवधन भी समरत उत्तर भारत का राजा था। उसम भी उल्लेस इस लेप म है। इस सप का समम ५४६ शक-सवत् अर्थात् ६३४ई है। हर्ष न ६ ६ ६४७६ तक राज्य किया। गेनी यात्री भन्साय ने इसी के राज्यकाल में समस्त भारत का परिभ्रमण क्या था । वह ४१ ई. म बादामी (वातानी धानुक्यो की राजधानी) भी गया था। अतएवं इस लप की नाजो की झुलना इस चीनी यात्री क वणन से भी की जाती है। शान्यवराम उत्पा प्रथम दो रासाओ--- गसिह जार रणराग वी को निश्चित सूचना का मिनती। रणराग के पुत्र पुरास्थी (प्रथम) ने इन्दुराधि पुरी से आर वातापि म अपनी राजधानी निसा राजा (सम्भात इरिनर्मा) को हरि प्राय ५ इ म बनाइ । इसन भश्वमध ३ यज्ञ किया था, दूसरे शिलालेखों में इसके द्वारा कई यज्ञ किये जाने का वर्णन है जैसे-अग्निष्टोम, अग्निचम, वाजपेय, बहुसुवर्ण तथा पौण्डरीक । उसके पुत्र कीर्तिवर्मा ने प्राय ५६७ ई० में राजा होकर नल, मौर्य और कदम्ब-राजाओं को हराया। नल राजाओं के दो लेख मिले हैं-एक तो जयपुर के पास पोदागढ पहाडी में जिसमें नलों को कलिग का राजा कहा है । सभव है कि चालुक्यों के राज्य-विस्तार से ये भाग गये हों। दूसरे रीठपुर के ताम्र लेख (मध्यप्रदेश) से मालूम होता है कि वहॉ भी इनका राज्य था। मौर्य लोग उत्तरी कोंकण के राजा थे। कदम्ब लोग बेलगोव तथा धरवार जिले में पश्चिमी भाग के और कनारा के राजा थे। कीर्तिवर्मा ने कृष्णवर्मा (द्वितीय) को हराया होगा। अपने अनुज मंगलेश की प्रेरणा से इसने कई मन्दिर भी बनवाये थे। मंगलेश प्राय ५६७ ई० में राजा हुआ। रेवती द्वीप (आधुनिक रेदि) को इसने जीता तथा कलचुरी-राजा (बुद्धराज) को परास्त किया। बुद्धराज चूं कि गुर्जर और मालवा का राजा था अत मंगलेश ने उन देशों पर भी आक्रमण किया था । इसने अपने पुत्र को राज्य देने का प्रयास किया था। किन्तु पुलकेशी के सामने सफल न हो सग (श्लोक १४-१५)। पुलकेशी इस वश का सबसे बडा राजा हुआ किन्तु मंगलेश की मृत्यु के बाद राज्य की स्थिति को डगमग देखकर गोविन्द और आप्पायिक ने भीमा नदी के उत्तरवर्ती क्षेत्र पर आक्रमण किया। पुलकेशी ने ऐसा प्रत्याक्रमण किया कि गोविन्द ने तो सन्धि कर ली और आप्पायिक हार गया। इसके बाद पुलकेशी ने वरदा नदी के किनारे के वनवासी किले को ले लिया। यह उत्तर कनारा में है तथा कदम्यों की राजधानी यही थी। यहो उसने भोगिवर्मा के पुत्र विष्णुवर्मा को हराया होगा । पुन उसने गग और अलुप को हराया था। गग-जाति मैसूर के गगवानी में राज्य करती थी। पुलकशी ने शायद गगराजा दुर्विनीत को हराया था। वह विदान् भी था और उसने ६०५ से ३५०ई० तक राज्य किया था। अनुप जाति मालवार की नाग जाति की एक शाता थी। उत्तरी कोंकण के मौर्य लोग सम्भवत मगलेश की मृत्यु के बाद स्वतन्त्र हो गये थे उपुलकेशी ने फिर हराया। सायों की राजधानी पुरी म ही होगी । बाट मालप और गुजरान पर भी उसने बदाई की थी। पुलकेशी का सबसे बड़ा काम या हर्षवधन को नमदा किनारे रोक्ना। इस घटना का वर्णन नपाग न भी स्थिया है। पुलकेशी के उतराधिकारियों ने अपने शिलालेखों में इसका प्रतिरजन र दिया है तथा कहा है कि उस घटना के बाद पुलकेशी ने परमेश्वर की उपाधि ली थी। उसने नर्मदा के स्निारे एक बगै सेना रख छोड़ी थी जो विदेशियों को रोज सक। महाराष्ट्र के तीन देश को भी उसने जीता । उसके बाद कोमल सया कलिग देशों की भी विजय पाई। कोसल तो महानदी पार गोदावरीके बीच का मध्यप्रदेश भा तथा पलिग उत्कल का दक्षिणी मार्ग था जिसरी मलिंगम् राजधानी थी।णालीप को लेकर उसने पाँची के पल्लव- महेन्द्रवर्मा-को हराया था। अंत मनावरी पार करके वह चोल बैरल और पायों से मिला । इस प्रकार यह शिक्षालेख इतिक्षस के एक गूढ पृष्ठ का अनावरण करता है। साहित्यिक महत्व न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से अत्युत साहित्यिक- दृष्टि से भी मह शिलालेख समुद्र के प्रयाग-स्तम्भलेख के समान ही मालपूर्ण है। सस्कृत के दो महावियों-कालिदास और मारिव-के नामोग्लेख से इसका महल और भी पड़ गया है। इन दोना के अती मन्तिम-सीमा इसी शिलालेख से मालूम पखती है। सन् ६३४ ई सक ये बहुत प्रसिद्ध हो गये थे। रविकीति का यह स्थन कि उसने कालिदास मार भारवि की नीति पा ली है, बिलकूल अतिशयोकि है। वस्तुतः यह संखत के कवियों की पंक्ति में रखने योग्य है। हर्ष-चरित मैं कहे गये 'उहोचा दाक्षिणात्येषु के अनुसार यह बास्तविक दाक्षिणात्य । उसकी उपेक्षामें बहुत बमकारक है यद्यपि प्राय सभी सरे कवियों से ली हुई है। मालिस्ता का अभाष रवि- ५. । है कीति में यटकता है। किन्तु इसमे उस अगाव अध्ययन का भली-भाँति परिचय मिलता है अलंकारशास्त्र के सभी नियमो को वह अच्छी तहर जानता कुल ३७ पद्यों में ही उसने १७ छन्दों का प्रयोग किया है जो छोटे-बहे कई प्रकार के हैं। देवपादा शिलालेख मे मो गेमा ही वर्णन है किन्तु उसके छन्द बडे-बटे हैं तथा सभी पठनीय, जबकि प्रस्तुत लेख में आर्या (१, २, ३, ४, ५) और आर्यागीति (३७) जैसे विचित्र छन्द भी है। छन्दों की विभिन्नता से राजाओ के परिवर्तन तथा उनकी विभिन्न कृतियों की सूचना स्पष्ट होती है। भौगोलिक और ऐतिहासिक नामों से यह शिलालेस भरा पड़ा है. जिसमे काव्य-प्रवाह रुक जाता है और हमें वैज्ञानिक अनुसंधान करता पड़ता है। इस विचार से देवपाडा शिलालेस कही अच्छा है जिसके प्रत्येक श्लोक में उक्ति-वैचित्र्य भरा पटा है। इस लेस में भी चमत्कार है किन्तु दवा दिया गया है। सौन्दर्य की दृष्टि से श्लोक-संख्या १०, १२, १६, १७, १८, २१ तथा २८ का विशेप मनन करें। इनमे अन्तिम वाला देख-कुनाल झील के पास हाथियों का समूह सडा है, घायल मनुष्यों के रक्त से जल लाल हो रहा है, मालूम होता है कि वादलों से भरा हुआ आकाश हो और उसमे संध्या की लाली छिटकी हुई है। कितनी सुन्दर उत्प्रेक्षा है ! रघुवंश में भी कुश किराती से ऐसा ही कहते हैं- पश्यावरोध शतशो मदीयैर्विगाह्यमानो गलितांगरागैः। सन्थ्योदयः साध्र इवैप वण पुष्यत्यनेकं सरयूप्रवाह. ॥(१६३५८) इसी प्रकार अपनी उत्प्रेक्षाओं मे वह पूर्वकवियों का, विशेपतया कालिदास और भारवि का ऋणी है। डा. कीलहॉर्न ने ऐसे स्थलो की पूर्ण सूची दी है। हम इनमे मुख्य स्थानो को देखें-श्लोक १-कि. ५।२२ वीतजन्मजरसा, ५ नृत्यभीमकवन्ध - र० १४८ नृत्यल्कवन्धं समरे ददर्श, १० पृयुकदम्बकदम्ब-कि० ५।६ पृथुकदम्बकदम्ब, १८ हंसावली- मेसला-कि. ४१७ तत म कूजत्कलहसमेसला, २१ जलनिधिरिव व्योम- . - ६ इस प्रार र ४।२६ भुवस्तलमित्र व्योम नुवन् व्योमेर भननम् । शब्दापहरण आर अर्यापहरण क का स्थान है। शालारा का प्रेम रविन म बात है। अमर अनुपायादि का प्रचुर प्रयोग हुला । ये प्राय प्रत्यार पर मह । मायुय-गण म १-4 नामपना ही रयान । थानाराम प्रधानतया पक उपमा और उत्नना जिन्ह अनुवाद के गाम लगा दिया है। रविरीति अपन को भारवि आर कानिदास कहल किंतु न तो उमम भारवि का अनाविक अर्थ-गाम्भीर्य है और न कालाम की जनुपम उपमाय । इस पुलक की रचना म मन सालर की पुस्तक (Selections from Sanskrit Inscriptions) से सवारिक सहायता ली है। बुद्धील (Dubreul History of Deccan) तथा जार डी बनी की कृतियों का उपयोग भी अथास्थान किया गया है। इनका म पूर्ण कृतज्ञ पटना कालेज के अपने सहयोगिया तथा स्नातकोतर विभाग के अपने छात्रों को भी म भाभारी रहूंगा विनरी प्रेरणा से निरन्तर घट रहा है। शिलाजपा के साहित्यिक अध्ययन के लिए म भरनी अगली कृति (A Literary Study of Sansknt Inscriptions) dia 21799 समक्ष रगा। तुलसी जय ती २०१७ निवेदक- उमाशशर्मा ऋषि

ऐहोलशिलालेखः
जयति भगवाग्जिनेन्द्रो वीतजरामरणजन्मनो यस्य ।
ज्ञानसमुद्रान्तर्गतमग्विल जगदन्तरीपमिव ।।१॥
भगवान जिनेन्द्र की जय हो, जो बुढापा, मृत्यु और जन्म से रहित हैं
तथा जिनके जानरूपी समुद्र के भीतर सारा ससार द्वीप के समान है।
(रूपक, उपमा ) ॥१॥
तदनु चिरमपरिमेयश्चलुक्यकुलविपुलजलनिधिर्जयति ।
पृथिवीमौलिललाम्नां य प्रभव पुरुपरत्नानाम् ॥ २॥
शूरे चिदुपि च विभजन्दानं मानं च युगपदेकत्र ।
अविहितयाथासंख्यो जयति च सत्यानय सुचिरम ॥ ३ ॥
उसके बाद चलुक्य-चश-रूपी विशाल और अपरिमित समुद्र की सदा
जय हो, जो पृथ्वी के सिर पर अलंकार के रूप में सुशोभित पुरुषरूपी रत्नों
का उत्पत्ति-स्थान है। (रूपक )।२।। वीर और विद्वान् किसी एक पर, एक
साथ ही, दान और सम्मान प्रदान करनेवाले सत्याश्रय (पुलिकेशी द्वितीय)
की भी सदा जय हो, जो संख्या के कम ( यथासख्य ) को नहीं मानता ।
['यथासंख्यमनुदेश समानाम्' । पा० सू० १।३।१०) के अनुसार वीर
और विद्वान् को क्रमश दान और सम्मान करना चाहिये किन्तु सत्याश्रय
दोनों में किसी एक को भी दोनों चीजें दे देता था। यथासंख्य एक अलंकार
भी है जिसमें भी यही बात रहती है। अत दोनों प्रकार के यथासंख्यों का
उल्लघन वह करता या ]॥३॥

२ रणा जयसिंह और रणराग प्रतिचीवल्लभशी येपाम बथता गिर जात । तद शपु जिगीषु तपु यहुपवतात ॥४॥ नानाहेतिशताभिघातपतितभ्रातावपत्तिद्विपे नृत्यद्भीमक्श्रन्धसङ्गरिरण वालासहस्र लक्ष्मीभाषितचापलाऽपि च कृता शौर्येण येनात्मसात् राजासीजयसिहबल्लभ इति रथातश्चलुक्याचय ॥५॥ जिनके लिए पृथ्वीपति शब्द (उपाधि) सदा सार्थक होता रहा उराके वश में उत्पन्न ऐसे बहुत से विजयच्छ राजाला समाप्त हो जाने पर-0m विख्यात बलुक्य-वंशी राजा जयसिंहवल्लभ हुमा जिसने चंचलता दिपानवाली लक्ष्मी को भी अपनी वीरता से रण म अपने अधीन कर लिया, उस रण म नाना प्रकार के सैकदो शस्त्रों ( हेति ) के प्रहार गिरकर घोरे पदल और हाथी कॉप रहे थे तथा जिसम हजारों भयकर घरे (काप) और तलवार की किरणों की ज्वालाय नाच रही थी 114 तदात्मजोऽभूद्रणरागनामा दिव्यानुभावो जगदेकनाथ । अमानुपत्व किल यस्य लोक सुप्तस्य जानाति वपु प्रकर्षात् ॥६॥ उसका पुत्र रफराग नाम का था जो दिव्य महिमायुक्त तथा ससार का एकमात्र स्वामी था सो जाने पर जिसके मौकिक व्यक्शित्व को ससार उसके शरीर के उत्कर्ष से ही समझता था [थदि रणराग देवता है तो उसे देवताओं के समान ही आँखे मन्द नहीं करनी चाहिये किन्तु निद्रावस्था में तो वह बार बन्द करता ही था ऐसी दशा में उसका देवल शरीर के उतब से समझते थे1॥९॥ तस्याभवचनूज पोलेकेशी य श्रीवल्लमोऽप्ययासीद् वावापिपुरीवधूवरताम् ॥७॥ यत्रिवर्गपदवीमल शिवी नानुग मधुनाऽपि राजकम् । भूरच येन हयमधयाबिना प्रापितावभृथमज्जनायो ।। थिते दुकान्तिरपि।

. कीर्तिवर्मा-मगलेश उराका पुत्र पोलेकेशी हुआ जो चन्द्रमा को शोभा ( या दन्दुमान्नि नाम की नगरी ) को धारण करने पर भी तथा श्रीवल्लभ [ नामकी उपाधि लेने ] पर भी ( अर्थात् दो पत्नियों को होन पर भी ) वातापिपुरी (आधुनिक वदामी) रूपी वधू का वर हो गया। (विरोधाभास ) || जिपक त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम ) के मार्ग का अनुकरण करने में आज भी पृथ्वो में कोई राजा समर्थ नही। अश्वमेध-यज्ञ करनेवाले उस राजा ने जब पृथ्वी को- अवभृथ ( यज्ञसमाप्ति का ) स्नान कराया तो वह चमकने लगी ||८|| नलमौयकदम्बकालरात्रिस्तनयस्तस्य बभूव कीर्तिवर्मा । परदारनिवृत्तचित्तवृत्तेरपि धीर्यस्य रिपुत्रियाऽनुकृष्टा ।।६।। रणपराक्रमलब्धजयश्रिया सपदि येन विरुग्णमशेपतः । नृपतिगन्धगजेन महौजसा पृथुकदम्बकदम्बकदम्बकम् ।।१०।। उसका पुत्र कीर्तिवर्मा हुआ जो नल, मौर्य और कदम्ब जातियों के लिए प्रलय की रात्रि ही या, परस्त्रियों से अपनी मनोवृत्ति को अलग रखने पर भी उसकी बुद्धि शत्रुओं की लक्ष्मी (धन ) मे अनुरक्त थी (रूपक, विरोधा- भास)॥॥ युद्ध में पराक्रम दिखाकर जिसने विजयश्री पाई थी, उस गन्ध-गज (जिर्स हाथी का मद सुगन्धित होता है) रूपी राजा ने शीघ्र अपनी बड़ी शक्ति से कदम्बजाति-रूपी विशाल कदम्बवृक्षों के समूह (कदम्ब) का समूल उच्छेद कर दिया (रूपक ) ॥१०॥ " alre IA तस्मिन्सुरेश्वरविभूतिगताभिलापे 했 राजाऽभवत्तदनुज. किल मगलेश । यः पूर्वपश्चिमसमुद्रतटोपिताश्व- ६१८- Hind सेनारज पटविनिर्मितदिग्वितान ॥१२॥ उस राजा ने जब देवराज इन्द्र की विभूति पाने की इच्छा की (मर गया) तव उसका छोटा भाई मंगलेश राजा हुआ जिसने पूर्व और पश्चिम समुद्र के किनारे ठहरे हुए घुड़सवारो की सेना की धूल-रूपी वस्त्र से ही दिशाओं na 3 - chara

पुनरपि च जिघृक्षोस्सैन्यमामातसाल -
४
मगलेश का राय हरण
का वितान ( tent ) या कर लिया था ( उसके राम की सीमा पूष
आर पश्चिम सागर तरथी ॥११॥
स्फुरन्मयूमैरसिदीपिकाशते व्युनस्य मातङ्गतमिस्रसञ्चयम् ।
अवाप्तवान् यो रणरङ्गमन्दिरे क्टरिश्रीललनापरिग्रहम् ॥१२॥
निम गनान चनम्ती र रिनाले पटग-रूपी सरन के सहारे,
शायरीजमर-गम हटाकर रणशस्वी पर म मरि-राज्य
की सत्मीरूपी क्या रा (पाणि) ग्रहण किया था (रूपक)॥१२॥
रुचिरयहुपताक रेवतीद्वीपमाशु ।
सपरि महदन्चचोयसका वबिम्ब
वरणचलमियाभूदागतं यस्य वाचा ॥ १३॥
आर उसके बाद जब उसन रेवती-वीप को शीत लेने की इच्छा की तब
उसकी वह विशाल सेना जिसने [ीप के 1 प्राचीरों (दीवाली) पर
पढाइ कर दी थी तया बहुत सी को छी पतााम से युक्त थी समुद्र
के जल में दिखलाई परनेवाली छवि से युक्त वरण की सेना के समान
उसकी आज्ञा से शीन ही चली आई ॥१३॥
तस्यामजस्य सनये नहुषानुमावे
लदम्या किलामिलपिते पुलिकेशिनाम्नि ।
सासूयमात्मनि भयन्तमत पितृश्य
ज्ञात्वापरचरितज्यवसायबुद्धी ॥ १४ ॥
स यदुपचितमन्त्रोत्साहरातिपयोग-
ज्ञपित्तवनविशेषो महगलेश समन्तात् ।
स्वतनयगवयन्यारम्भयत्नेन साद्ध
निजमतनु प राज्य जीवित योग्मति स्म ॥ १५ ॥

सत्याश्रय का राज्य ५ उसके बडे भाई के पुलिकेशी नामक पुत्र ने, जो राजा नहुष के समान प्रतापी था तथा लक्ष्मी जिसे [ राजा बनाना ] चाहती थी, अपने चाचा ( मगलेश ) को अपने ऊपर ईर्ष्या करते हुए तथा उसे हटाने के कार्य में ( अपरुद्ध-चरिते ) स्थिर संकल्प किये हुए जाना और- ॥ १८ ॥ उस मग- लेश ने ही, जिसका वडा वल उस (पुलिकेशी) के द्वारा मंगृहीत मंत्रशक्ति ओर उत्साहशक्ति के प्रयोग से क्षीण कर दिया गया, अपने पुत्र के राज्या- भिषेक करने के प्रयास के साथ-साथ ही, अपने विशाल राज्य और जीवन को भी त्याग दिया। (राजा की तीन शक्तियों है-प्रभु, मत्र और उत्साह) राजा न होने से पुलिकेशी को प्रभुशक्ति नहीं थी मत्र ( Counscl) और उत्साह ( energy से ही उसने मंगलेश का चल क्षीण कर दिया या.॥ १५ ॥ तावत्तच्छत्रभङ्ग जगदलिलमरात्यन्धकारीपरुद्ध यस्यासह्यप्रतापधु तिततिभिरिवाकान्तमासीत्प्रभातम् ! नृत्यद्विद्युत्पताकैः प्रजविनि मरुति क्षुगणपर्यन्तभागै- गर्जदभिर्वारिवादरलिकुलमलिन व्योम यातं कदा वा ? ॥१६॥ जैसे ही उस ( मंगलेश) का प्रभुत्व नष्ट हुआ कि अन्धकार से ढके हुए समूचे ससार मे प्रभात हो गया मानों उस ( पुलिकेशी ) के असह्य बल के ज्योति पुंज से आक्रान्त हो गया हो। वेगवान् वायु के [ बहने पर ], नाचती हुई विजली-रूपी पताकाओं से युक्त तथा जिनके किनारे के भाग नष्ट हो गये है, ऐसे गरजनेवाले मेघों से, आकाश कवतक भ्रमर-समूह के समान मलिन रह सकता है ? ॥ १६ ॥ लब्बा काल भुवमुपगते जेतुमा'पायिकास्ये गोविन्दे च द्विरदनिकररुत्तरा भैमरथ्या । अस्यानीकैयु धि भयरसज्ञत्वमेक प्रयात- रतत्रावाप्त फलमुपकृतस्यापरेणापि सद्यः ॥१७॥ -

६
सत्याश्रय की विजय याना
अवसर पास भमरथी (आधुनिर भीमा-नी) क उत्तर की भाम ने
जीतने के लिए राथिया के माथ गय हुए जापााय मार गोपिद में एक
ने नो उमरी सेना के द्वारा युद्ध म भय का रम जान निया (= भाग गया)
और दूसरे ने भी शीर ही वहा उपकार ( पुलिरशी की दया या गोविन्द
द्वारा की गइ सेवा) का फल पा लिया भयान् सधि कर ली (पर्या
योक्ति)॥ १७॥
वरदातुगतरजरगविलसद्ध सावलीमेखला
पनवासीमयमृद्नत सुरपुरप्रस्पधिनी सम्पन्न ।
महता यस्य बलार्णवेन परित सम्बादितोवातल
स्थलदुर्ग जलदुर्गवामिव गम तत्क्षणे पश्यताम् ॥१८॥
अपनी सम्पत्ति से इम्पुरी की स्पर्धा करनेवाली बनवासी-पुरी का मदन
जय बह कर रहा था जो (पुरी) मेखला के रूप म वरदा नदी की ऊंची
तरंग रूपी रगमंच पर विलास करनेवाले इसा की पक्ति धारण किये हुए थी
तब वहा का स्थलदुर्ग जिसका परावल उस (राबा) के विशाल सन्य-समुद्र
से चारो और घिरा हुआ था देखनेवालो के लिए शीघ्र ही जलदुग के रुप
में परिणत हो गया (उत्प्रेक्षा) ॥१८॥
गडालुपेद्रा व्यसनानि सप्त हित्वा पुरोपार्जितसम्पदोऽपि ।
यस्यानुभावोपाता सदासुन्नासन्नसेवामृतपानशोगडा ॥१॥
कोडणेषु यदादिष्टचपडण्डीम्बुषीथिमि ।
सदस्तास्तरसा मौर्यपल्बलाम्खुसमृद्धय ॥२०॥
गग और मलुप के राजाओं ने सात व्यसनों को छोड़कर पहले सम्पति
भर्जित की थी फिर भी उसकी महिमा से अवनत होर उसके समीप रहकर
सेवा-श्पी अमृत का पान करके मतवाले हो गये थे ( सात व्यसन-तं मास
मुरावेश्याखेटीयपराइना । महापापानि सा व व्यसनानि त्यजेत् पुष ।)
सरा धोने के बाद पुन सुरा-सेवक हो गये (विरोधाभास ) ॥१॥

हर्प की पराजय कोका-देश में, जिसके द्वारा भेजी गयी मैना म्पी प्रचगट तरग के द्वारा, मौर्य- रूपी तालाब की याद ( जलवृद्धि ) बैग में समाप्त हो गई (स्पक) .. || अपरजलधेर्लक्ष्मी यस्मिन्पुरी पुरभित्रभे मदगजघटाकारैर्नावां शतैरवमृद्नति । जलदपटलानीका कीर्ण नवोत्पलमेचक जलनिधिरिव व्योम व्योम्नः समोऽभवटम्बुधि ॥२१॥ प्रतापोपनता यम्य लाटमालवगुर्जरा.। दगोपनतसामन्तचर्याचार्या इवाभवन् ।।२२।। जव त्रिपुर-नाशक (शिव) के समान कान्ति वाता वह [ पुलिकेशी ], मतवाले हाथियों के समूह के आकार की अपनी मैकड़ों नावो के महारे, पश्चिम-सागर की लक्ष्मीस्वरूपा पुरी का मर्दन कर रहा था तो मेघ-समूह रूपी सेना से घिर कर और नये कमल के ममान काला बना हुआ आकाश समुद्र के समान हो गया और समुद्र भी आकाश के समान हो गया ( उप- मेयोपमा) ॥२१॥ जिसके प्रताप से पराभूत होकर लाट, मालव और गुर्जर मानों उसके बल से दवे हुए सामन्तों के व्यवहार [ रूपी पाठ ] को पढानेवाले बन गये ॥२२॥ अपरिमितविभूतिस्फीतसामन्तसेना- 빴 मुकुटमणिमयूखाक्रान्तपादारविन्दः । युधि पतितगजेन्द्रानीकबीभत्सभूतो भयविगलितहों येन चाकारि हर्षः ॥२३॥ अमित-धन से समृद्ध सामन्तो के समूह के मुकुट की मणियों की किरणो से जिस (हप) के चरणारविन्द ढंके ये युद्ध मे गिरे हुए बडे-बड़े हाथियों के समूह से जो घृणित हो गया था ऐसे हर्षवर्धन ने उसके चलते भय से अपना आनन्द छोड दिया था ॥२॥ - A MA अब वह दिग्विजय भुवमुरुभिरनी शासतो यस्य रेवा-- विविधक्षिनशोभावन्ध्यांवोपकराठ । अधिकतरमराजलम्वेन तेजोमहिन्ना शिखरिभिरिभवों वर्मण स्पद्ध येव ॥२४॥ विधिवदुपचिताभि शक्विभि शक्रकल्प विसृभिरपि गुणो स्वैश्च माहाकुलाये । अगमदाधिपतित्व यो महाराष्ट्रकाणा नवनयतिसहस्रनाममाजा प्रवाणाम् ॥२५॥ अपनी विशाल सेना के सहारे पृथ्वी पर शासन कर रहा था, तप रेवा (नर्मदा) नदी के विविध बालुकामय तटों ( पुलिन) की शोभा से समूह बना हुआ बिन्ध्याचल का समीपवती प्रदेश उस प्रताप की महिमा है और मधिक शोभने लगा [किन्तु यह शोभा उसका हाथियों के द्वारा त्याज्य [ समझी गइ ] क्याकि वे भानों अपनी विशालता के कारण पर्वतों से ईर्ष्या कर रहे बैं (उप्रेक्षा) उस इन्द्रोपम राजा न विधि संगीत वीना शक्तिया (प्रभु मत्र उत्साह ) के द्वारा भार अपन उच-बुल मादि अनेक गुणा के द्वारा, नौ और नव्ये (1) हजार गावा वा तीना महाराष्ट्रको का आधिपत्य पाया था ॥२५॥ गृहिणा स्वगुणैस्निवर्गतुझा विहितायतितिपालमानभङ्गा । अभवन्नुपजातमीविलिना यदनीकेन सकोसला बलिहा ॥२६॥ पिष्ट पिप्टपुर येन जात दुगमदुगमम् । चित्र यस्य कलेत जात दुगमदुर्गमम् ॥२४॥ । अपन यहा रहनवाले ] गृहस्थों के अपन गुणा के कारण जो त्रिवर्ग म अर्ष काम ) म ऊँचा था दूसरे राजाभा के सम्मान नष्ट करने म प्रसिद्ध था-मह पलिंग देश कोषत क साथ-साथ उराकी सेना द्वारा

।
Feel पल्लवानीकनीहारतुहिनेतरतीधिति ॥३२॥ Mere
१०
मनिरनिमाण
कावेरी इतराफरीविलोलनेत्रा चोलाना सपरि जयोगवन्य यस्य ।
प्रश्चोतमदगजसेतुरुद्धनीरा सरपश परिहरति स्म रत्नराशे ||३०|
चोलकेरलपायडयाना योऽभूत्तत्र महद्धये।
जब वह चौल-देश पर विजय पाने को शीघ्र तयार हुआ तब छोटी
मक्कनी के समान चबल ऑखोंबाली कावेरी समुद्र के स्पर्श का परिहार पर
रही थी क्योंकि उसका जल मद चुलाने वाले हाथियों के पुल से रुक गया
पापुतिकेशी ने कावेरी के दक्षिण प्रदेश को जीतने के लिए नदी पार की
भी पानी रुक जाने से समुद्र म नहीं पहुंच रहा था। कावेरी नायिका समुद्र
स्पी पति के पास भय से नहीं जाती थी कि वह नायिका में गभ देखकर
उपपति रमण की शमा कर जेगा। दुल षु ४४५--स सैन्यपरिभोगेन
गज-दानसुधिना। कावेरी सरिता पत्यु शनीयामिवारोन् ॥ ॥३॥
पल्लवों की सेना रूपी वहासे के लिए सूर्यस्वार [ बह राजा ] बहाँ बोल
केरल और पाड्य देशों को समृद्ध करने लगा ॥३१।।
उत्साहप्रभुमन्त्रशक्तिसहिते यस्मिन्समस्ता दिशो
जित्वा भूमिपतीन्धिमृय महितानाराध्य देवद्विजान ।
वातापी नगरी प्रविश्य नगरीमेकामिवोषीमिमा
चम्चन्नीरधिनीलनीरपरिखा
सस्याश्रये शासति । ३२॥
सभी दिशामों को जीतकर प्रतिष्ठित राजाओं को हटाकर देवता-बामण
फा सत्कार कर और मातापी पुरी म प्रवेश करके, उत्साह, प्रभु और मत्र की
शक्षियों के साथ वह सत्याश्रय (पुलिकेशी द्वितीय ) जब अक्ली नगरी-सी
पृथ्वी पर शासन र रहा था जिसकी परिसा (यहारदीवारी की खाई) के
रूप में चल समुद्र का नीला अल था--॥३॥
त्रिशत्सु त्रिसहस्रषु भारतादाहयादित ।
सप्तादशवयुक्त पुगतेष्यन्येषु पञ्चसु ॥३३॥

रविकीर्ति ११ तया funbir uftar LITIA फचाशत्सु कलौ काले पटसु फचशतासु च । समासु समतीतासु शकानामपि भूभुजाम् ॥३४॥ भारत-युद्ध से आज तक जब तीस, तीन हजार, सात सौ और पाच (३०+ ३०००+ ७००+५=१७३५) वर्ष बीत गये ॥३॥ कलियुग में शक राजाओं के भो पचाम, छह तथा पोच मौ (५.५६) वर्षों के बीत जाने पर ।। 360 तस्याम्बुधित्रयनिवारितशासनस्य เหง 26 सत्याश्रयस्य परमाप्तवता प्रसादम् । शैलं जिनेन्द्रभवनं भवनं महिम्ना Preet-atni निर्मापित मतिमता रविकीर्तिनेदम् ॥३५।। जिसका शासन-क्षेत्र तीन समुद्री से परिवृत है, उस सत्याश्रय की परम पाये हुए बुद्धिमान रविकीर्ति ने, सभी महिमा के भवन-स्वरूप पत्थर के इस जिनेन्द्र-मन्दिर को बनवाया ॥३५॥ north प्रशस्तेर्वसतेश्चास्या जिनस्य त्रिजगद्गुरोः। Asia कर्ता कारयिता चाऽपि रविकीर्तिः कृती स्वयम् ॥३६।। येनायोजि नवेऽश्मस्थिरमर्थविधी विवेकिना जिनवेश्म स विजयतां रविकीर्तिः कविताश्रितकालिदासभारविकीर्तिः । ३७॥ इस प्रशस्ति को तथा तीनो संसारो के गुरु जिन के मन्दिर को [ क्रमशः ] बनानेवाला और बनवाने वाला स्वय विद्वान् रविकीर्ति ही है ।।३६॥ जिस बुद्धिमान् ने नयी तरह से (उसी) वात को कहने के लिए, पत्थरो का दृढ जिन-मन्दिर बनवाया, उस रविकीर्ति की जय हो जिसने कविता में कालिदास और भारवि की कीर्ति पा ली है (पादान्तयमक) ॥३७॥ कृपा

Deopara Inscription Of Vijayasena

Author
Umashankar
Title
Deopara Inscription Of Vijayasena
File name
Deopara Inscription Of Vijayasena
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2012/02/01
Publisher
Patna, Sanskrit College
Language
Sanskrit
Pages
45
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
407823
Barcode
99999990071049.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
7tqur4UOfJP
Download PDF

Deopara Inscription Of Vijayasena