Government College, Kota
Sanskrit Gadh Veethi
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संस्कृत-गद्य-वीथी
स्नातकपरीक्षार्थिनां कृते प्रतिनिधिर्गद्यसंग्रहः
भमिकाब्याख्यादिभिः संवलितः
प्रणेता
(स्वर्गीय) पण्डित चन्द्रशेखर पाण्डेय
एम० ए०, शास्त्री
“भूतपूर्व अध्यक्ष, सस्कृत-विभाग, सनातन धर्म कॉलग, कानपुर
तथा
डा० शान्तिकुमार नानूराम व्यास
एम० ए०, पी-एच० डी०
‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान', नई दिल्ली
ओरिएराटल बुक-डिपो
१७०४, नई सड़क, दिल्ली
प्रकाशव
ओरिएण्टल बुक-डिपो,
१७०४, नई सडक
दिल्ली
प्रथम सस्करण १६५८
द्वितीय सस्वरण १९६०
तृतीय सम्मरण १६६३
मूल्य
२ स्पये ७५ नये पैसे
मुद्र
प्रकाश प्रिटिंग वस,
सीताराम बाजार,
दिल्ली-६
निवेदन संस्कृत की पुनः प्रतिष्ठा के इस युग में समय की यह मांग है कि अधिकाधिक छात्रों को उसके अध्ययन की ओर आकृष्ट करने के लिए उसका एक सरल, रोचक और वैविध्यपूर्ण रूप उपस्थित किया जाए । प्रस्तुत संग्रह में यही दृष्टि रखकर वैदिक युग से आधुनिक युग तक के कतिपय प्रतिनिधि- गद्यकारों की चुनी हुई श्रेष्ठ रचनामों का संकलन किया गया है। हमारे विश्वविद्यालयों की वी०ए० कक्षा का संस्कृत-छात्र जहाँ 'पञ्चतन्त्र' और 'हितोपदेश' की-सी बालोपयोगी संस्कृत के स्तर से ऊपर उठा हुआ होता है वहाँ वह दीर्घकाय या आयासजनक गद्य-ग्रन्थों का अध्ययन करने के लिए भी पर्याप्त साहस और अवकाश नहीं वटोर पाता । वह तो संस्कृत-गद्य-सोपान के मध्य तक पहुँचा हुआ एक तरुण पथिक है, जिसे अनतिसरल और अनति-क्लिष्ट रचनाओं का पाथेय प्रदान करके ही रसास्वादन कराया जा सकता है । प्रस्तुत गद्य-वीथी में उसे वैदिक, औपनिपदिक, शास्त्रीय, दार्शनिक, काव्यात्मक सभी प्रकार के गद्यों में चञ्चु-प्रवेश का अवसर मिलेगा और इन गद्यांशों के मूल रस-स्रोतों में अवगाहन करने की प्रेरणा प्राप्त होगी। उद्बोधक स्तुति, सरस संवाद, सोद्देश्य आख्यान, उदात्त उपदेश, रसप्रवण कथा, भाषा-विषयक ऊहापोह, कारुणिक प्रसंग, प्राकृतिक वर्णन, दार्शनिक विवेचन, मार्मिक व्यंग्य आदि नानाविध स्थल पाठक के मस्तिष्क, हृदय और आत्मा को पर्याप्त आन्दोलित करेंगे। प्रत्येक गद्यांश के चुनाव में इस बात का ध्यान रखा गया है कि वह किसी-न- किसी रूप में संस्कृत के सांस्कृतिक गौरव को, उसके शिल्प-सौदर्य को, उसकी शब्द-सम्पत्ति को, उसकी ऊर्जस्विता को, उसकी भाव-गरिमा को प्रकट करे और अन्येता पर एक सात्त्विक प्रभाव छोड़ जाए। 'संस्कृत-गद्य-मञ्जरी' के नाम से हमारा एक संग्रह सन् १६४५ में ६ सस्कृत-गद्य-बीयो प्रकाशित हुआ था जो इतना लोकप्रिय सिद्ध हुआ कि उसके पांच मस्करण प्रमाणित हुए और जो यद्यावधि यागरा, राजपूनाना, विनम-प्रभृति विश्व- विद्यालयों में पाठ्य-ग्रन्य के रूप मे स्वीकृत रहा। किन्तु बहुत पुराना हो जाने के कारण उसकी नवीनता जोर रोचकना प्राय ममाप्न हो चनी थी तया, सार ही, उसया मुद्रण भी दोषपूर्ण था। इस कारण अध्यापन-वाय मे सलग्न कई आदरणीय मित्रा एव हितपियो ने हमे एक एमा नवीन परिबधित एव मुमुद्रित सक्लन तैयार करने का सुझाव दिया, जिसम अधिक प्रतिनिधि रचनाआ का समावेश हा । प्रस्तुत सग्रह इसी दिशा माफिया गया एष विनम्र प्रयास है । पहले के म ग्रह को तुलना म उसका यथासम्भन अधिव राचक' और विविधतायुक्त बनान की चप्टा की गई है। मुद्रण में भी सुधार पिया गया है । सस्तृत-गव के विकास का नय सिर स विवेचन पिया गया है और उसकी धारा का आधुनिक वाल त लाया गया है। छात्रों के स्वाध्याय ने निए व्याख्या को पर्याप्त विस्तृत और विशद करने यासल किया गया है। समस्त गद्याचार्यों से सम्बंधित प्रशग्नियो तथा उनके गद्यासा की चुनी हुई सूक्तियां जन्त मे एकत्र की गई है। लाता है, इस म्प में यह गधयी मारे पूर्व सग्रह नी अपक्षा अधिक उपाश मिद्ध होगी। फिर भी कोई प्रयास सवधा त्रुटि-रहित नहीं होता, अन म कृतज्ञ हागे पठन-पाठन में लगे उन छानो और प्राध्यापका के नाम पुस्तक को व्यवहार में लारर इमी लुकी-छिपी त्रुटियो की ओर हमारा ध्यान नापित करेंगे, जिनमे जागामी सम्बरण म उनका परिहार किया जा सके। स सक्लन के प्रणयन में हमेजनेस अनुभवी विद्वानों के परामश का लाभ मिनाहै। दाल धर्मेद्रनाथ शास्त्री, एम० ए०, डी० लिट्., अध्यक्ष, सम्कृत-विमा,मेरठ कारंज, मेरठ,ने पाण्डुलिपि के वृद्ध या पदवर कतिपय परिवर्तन मुसाग। पण्डिन सयनापयण पाण्देय, एम० ए०, वतमान अध्यक्ष, सम्कृत-विभाग, मनातनधम वालेज, वानपुर,ने भी अपने परामदा से हम लाभान्वित किया। गद्यामा चुनाव, मम्पादन, स्पष्टीकरण आदि ने हमें अपने व्युत्पन्न मित्र प्रो० लाजपनराय, एम०ए०,दिल्ली, ने प्रचुर सहायना निवेदन मिली है। प्रो. रामेश्वर गौरीशकर ओझा, एम० ए०, अजमेर; प्रो० विश्वनाथ गौड़ एम०ए०, शास्त्री, कानपुर, प्रो० शिवराज शास्त्री, एम०ए०, मेरठ, श्री द्वारिकाप्रसाद नैथानी, गास्त्री, एम० ए०, एम० ओ० एल०, दिल्ली आदि ने भी विभिन्न रूपो में हमें सहयोग दिया है। इन सबके प्रति हम अपना हार्दिक आभार प्रकट करते है। साथ ही, उन टीकाकारों, लेखको एव अन्यान्य संग्रहकर्ताओं के भी हम ऋणी है, जिनकी कृतियों से हमे सहायता मिली है अथवा बहुमूल्य संकेत प्राप्त हुए हैं। नई दिल्ली, प्रणेता गणतन्त्र-दिवस, १९५८ अनुक्रमः ४८ भूमिरा-सस्कृत-गध का विकास १ भद्र नो वितरन्तु देवा (अथववेद) ३३ २ सत्यमेव जयते (ऐतरेयत्राह्मणम्) ३४ ३ आचार्योऽन्तेवामिनमनुशास्ति (तत्तिरीयोपनिषत, ४ ब्रह्म एव महीयते (केनोपनिषत्) ५ अधिकारिवगैषु राज्ञो जागरूकता (कौटिल्य ) ३७ ६ अनन्तपार पिल गन्दशास्त्रम् (पतन्जलि ) ७ सत्मेवित पन्या (चरर) ४२ ८ न याग्नि प्रभवति (आर्यनूर ) दारगुणा (दण्डो) १० प्रणम्या दूरत बला (मुबन्धु ) ११ दति निदाघो नितराम् (याणभट्ट) १२ वि स्वर्णम् ' चारित्र्यम् , को निक्षो । विपदेका (वापभट्ट) ५५ १३ अहो प्रभावस्तपसाम् (वाणभट्ट) १४ अतिगहन तमो योदनप्रभतम् (वाणमट्ट) १५ प्रवृत्तिनिरत्तिलक्षणो ये धर्म (शङ्कराचार्य) १६ पितृवत् परकन्यासु (अम्बिकादत्तव्यास) ६७ १७ वृक्षाणा परिपत् (हपोक्शशाम्बी भट्टाचार्य) ७१ १८ वश पनेन हि पुनर्नवता विधत्ते (क्षमा राव) ७५ ८३ गधारा प्रवास्यन्त आचार्यरधिकारिमि - घ्याख्या अष्ठस्या सक्तय १६६ संस्कृत-गद्य का विकास भारतीयो की प्राचीन भाषा के दो सुस्पष्ट वर्ग पहचाने जा सकते है---एक वैदिक, दूसरा संस्कृत । वैदिक भाषा वैदिक साहित्य में--- संहिताओं, ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों और मूनों में- -प्रयुक्त हुई है तथा संस्कृत समस्त परवर्ती साहित्य में । वैदिक साहित्य में भाषा उत्तरोत्तर विकसित होती दिखाई देती है, पर पाँचवी शताब्दी ईस्वी-पूर्व में पाणिनि ने सदा के लिए उसे 'संस्कृत' बना दिया, अर्थात् व्याकरण के नियमों से उसका 'सस्कार'-परिष्कार एवं संशोधन----कर दिया, और तब से संस्कृत, इन ढाई हजार वर्षो में, पाणिनि के नियमों द्वारा ही वरावर नियन्त्रित रही है, उनके प्रतिकूल वोलना-लिखना अशुद्ध माना जाता है। इसके अतिरिक्त, वैदिक साहित्य जहाँ प्रारम्भ में पद्यात्मक और बाद में गद्यात्मक हो जाता है, वहाँ संस्कृत-साहित्य अधिकांश पद्या- त्मक है । यहाँ तक कि ज्योतिप, गणित, व्यवहार (कानून), आयुर्वेद- जैसे शास्त्रीय विषयों में भी संस्कृत साहित्यकारों ने पद्य का ही आश्रय लिया, चाहे इससे स्पष्टता का भली-भाँति निर्वाह न हुवा हो । गद्य का प्रयोग व्याकरण-ग्रन्थों, कथाओ, आख्यायिकाओं तथा आंशिक रूप से नाटकों में हुआ है। संस्कृत साहित्य के विपुल विस्तार को देखते हुए उसमे गद्य का भाग वहुत कम है । लेखकों और जनता दोनों का रुझान पद्य की ओर ही अधिक रहा है। कण्ठस्थ करने मे सुगम होने के कारण पद्य के प्रति यह पक्षपात स्वाभाविक था, विशेषकर उस युग मे जबकि अध्ययन-अध्यापन : मुख्यतः मौखिक था। 'रामायण', 'महाभारत' तथा विशाल पुराण-साहित्य "प्रायः सर्वाश मे पद्य ही में रचे गए। पर शीघ्र ही गद्य ने, अपने व्याच- १० सस्कृत-गद्य-वीयो हारिक महत्व के कारण साहित्य में प्रतिष्ठिन पद प्राप्त पर निया और उभे रविया की सच्ची मोटी माना जाने गा. -गद्य कवीना निकप वति।' । वैदिक गद्य वैदिक गद्य का'ऋग्वेद' जितना प्राचीन नमूना म आज नहीं मिला। पर नमन विद्वान् ओल्डेगरगं का अनुमान है नि 'ऋग्वेद'वे सवादात्मक मूकनाम, बीच-चीन मे, गय वी वडियां रही होगी, जो समय के प्रवाह मे गुप्त हो गई। प्राचीन गद्य ' पद' म दृष्टिगोचर होता है । 'यजुर्वेद' में 'शुभल' और 'कुरण' दोना गमरणो में गय प्रयुक्त हुआ है, किन्तु 'शुत की अपक्षा 'पण' में गद्य की गरिमा अधिक लक्षित होती. है । 'कृष्ण-यजुर्वेद' मा गद्यारा ब्राह्मणों की गली में 'शुक्ल यजुर्वेद' का ध्याच्या मारूप है । 'यजुर्वेद' को गद्य-म्नुतियो को 'यजूपि' की मज्ञा दी जाती है। इन स्तुतियो का गध वहीनही जनुप्रागमय और पवित्वपूर्ण भी है। 'अयववेद' के १५थ और १६वे काण्डो में भी गद्यारा पाए जाते हैं। वैदिक महिमा का यह गद्य मुप्यन यन-सम्बर्थी, आप नया स्वरयुक्त है। १ अर्थात् 'गध को वियों को सौटी रहते हैं।' यह सुप्रसिद्ध वाश्य- 'स्यालकारमून' १।३।२१ पर वामन द्वारा अपनी काव्याललकार- मूत्रपत्ति' में उपत है। २ 'पनुबंद' को एक सुप्रसिद्ध गद्य-स्तुति देसिए-~-'पश्येम शरद शरम्, जीयेम भारद शतम्, शृणुयाम शरद शतम्, प्रश्नवाम शरद शतम्, अदीना स्साम सरर तम्' (भु यनु० ३६।२४) । ३ प्राचीन साहित्य के जी व्याकरण प्रयोग पाणिनि 4 नियमो से मेल नहीं खाने, उन्हें पापं रहा जाता है। ४ बेदक भाषा में--गज़ में भी स्वरों का प्रयोग किया जाता है, नोक्कि में नहीं।
संस्कृत गद्य का विकास बाह्मण ब्राहाण-ग्रन्थों में आफर गद्य आर्यों के याज्ञिक क्रिया-कलापो का समर्थ माध्यम बन गया- उसका प्रभाव और प्रयोग बढ़ता गया।वैदिक साहित्य में ब्रह्म' शब्द यज के लिए भी प्रयुक्त हुआ है, अतः यज्ञ से सम्बन्ध रखने के कारण ये ग्रन्थ 'ब्राह्मण' कहलाते हैं । सभी ब्राह्मण पूर्णतः गद्य में रचित है। कर्मकाण्ड-सम्बन्धी विवेचना करना ही इनका मुख्य उद्देश्य है । यनों के अनुष्ठान की विधियों के साथ-साथ इनमें वैदिक मन्त्रों को पौराणिक एवं धार्मिक व्याख्याएँ भी दी गई है। इनमे गद्य का प्रयोग भापा-विषयक ऊहा- पोह करने तथा परम्परागत आख्यानो का वर्णन करने में किया गया है । स्वभावतः यह गद्य कर्मकाण्ड की छाया से आक्रान्त है। वाक्य-विन्यास और शब्दावली भी बहुत-कुछ आप है । ब्राह्मणों के गद्य को भी स्वर-सहित पढ़ने का विधान है। उनकी शैली सरल और शक्तिशाली है, पर शब्द- वहुल और अपरिष्कृत भी । प्रमुख ब्राह्मणों में उल्लेखनीय 'ऐतरेय-बाहाण', 'कौपीतकी ब्राह्मण', 'तैत्तिरीय ब्राह्मण', 'ताण्ड्य ब्राह्मण', 'गोपथ ब्राह्मण', 'शतपथ ब्राह्मण आदि है। ब्राह्मणों के पिछले भाग में आरण्यक आते हैं, जिनमें कर्मकाण्ड के स्थान पर जानकाण्ड को प्रधानता दी गई है तथा दार्शनिक सिद्धान्तों का विवेचन किया गया है। ये भी गद्य मे विरचित है। इनकी भापा लौकिक संस्कृत के निकट है। उपनिषद् उपनिषद् भी वेदों के ज्ञानकाण्ड के अन्तर्गत बाते है । उनके सबसे प्राचीन वर्ग मे 'वृहदारण्यक', 'छान्दोग्य', 'तैत्तिरीय', 'ऐतरेय' और 'कोपी- १. ब्रह्म वै यज्ञः । ऐतरेय ब्राह्मण १२२ २. 'शतपय बाह्मण' का एक सुविख्यात गद्य-मन्त्र देखिए-'असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमय' (१४१३११:३०) ।
१२ सस्कृत-गद्य-धीयो - नवी' गिने जाते हैं । इन्हे बुद्ध-पूर्व अर्थात् ६०० ई० पू० से पहले का माना जाता है। ये मव गद्य में हैं और इनकी शैली वाह्मणो की भांति अपरि- प्कृत है । दूसरे वर्ग में 'ईश', 'वेन', 'कठ', 'श्वेताश्वतर', 'मुण्डव' और 'महानारायण' आते हैं, जो कि मब पद्यमय हैं । 'वेन', जिसका कुछ अश गद्यमय है और कुछ पद्यमय, इन दोनो वर्गों के बीच का है। नीमरे वर्ग के 'प्रश्न', 'मैत्रायणीय' और 'मादूक्य' उपनिपदो की भाषा फिर गद्यमय हो गई है, पर पहले वर्ग के उपनिषदो-जैमी अपरिष्कृत नही है और प्राचीन लौकिक सस्कृत से अधिर मिलती-जुलती हैं। चौथे वर्ग में परकालीन अथर्ववेदीय उमनिपदो की गणना है, जिनमें गे कुच गद्य मे हैं और कुछ पद्य में। उपनिषदों का गद्य स्वम्य, प्रमन्न (प्रमाद-गण-युक्त'), निराडम्बर और चुहल मे भरा होने के कारण अतीव आवर्पर है। जहाँ वैदिक गद्य, या-याग की काष्ठमपी प्रक्रिया के विस्तार के कारण नीरम है, वहाँ योप- निपदिक गद्य स्वच्छन्द और म्वाभाविक है-उममेलास्यात पो (निया- पदो) की प्रचुरता है, पदा कोरपिपर पुनरवित है और लम्बै-सम्बै ममामो का प्राय अभाव है। सूत्र वैदिक काल में ही गद्यकारा ने एक अनूठी मूत्र-दर्शनी का आविष्कार किया, जो ए माय लघुतम मक्षेप एव विपुल विस्तार का आश्चर्यजनक उदाहरण है। श्रोत तथा गृह्य मूत्रों में हम गद्य-शैली का प्रयोग जारम्भ हो गया और शीघ्र ही यह लोकप्रिय बन गई। टमी गली में वेदाङ्गा की १ अलङ्कार शास्त्र के अनुसार 'प्रसाद' को परिभाषा यह है-- चित्त च्याप्नोति प- क्षिप्र गुरे यनमिवानल । प्रसाद समस्तेषु रमेष रसनामु च ।। मादास्तव्यम्जरा अयोधा अतिमात्रत । (साहित्य-दर्पण) स संस्कृत गद्य का विकास रचना की गई। सक्षेपीकरण के लिए सूत्रो मे एक नया आश्रय ढूंढ़ लिया गया--दीर्घकाय समास, जो बाद मे लौकिक सस्कृत गद्य का एक सामान्य लक्षण बन गया । यास्क (७०० ई० पू०) का 'निरुक्त' सूत्र-शैली में रचित है । पाणिनि (५०० ई० पू०) ने भी अपना अष्टाध्यायी' को सूत्रो मे गूंथा है। सूत्रों की प्रक्रिया का उत्कृष्ट रूप यही है और इसी को हमारे छहों दर्शनकारों ने तथा पाणिनि के बहुत बाद आने वाले वैयाकरणो ने अपनाया है। सूत्रो की सक्षिप्तता के कारण उन्हे टीका को सहायता के विना समझना असम्भव-प्राय है। उदाहरणार्थ पाणिनि के एक सूत्र को देखिए, जिसमें केवल पॉच अक्षर है--इकोऽयणचि-पर जिसके अर्थ मे यह विपुल भाव भरा है कि यदि किसी शब्द के अन्त मे इक् प्रत्याहार (इ, उ, ऋ, और लु) हों और उसके बाद मे आनेवाले शब्द के आरम्भ में कोई भी स्वर हो तो इक के स्थान पर यण (व, व, र, और ल) क्रमशः हो जायेंगे'। संस्कृत गद्य-तीन प्रकार लौकिक सस्कृत-काल में गद्य प्रायः तीन रूपों में प्रयुक्त हुआ है-पोरा- णिका, शास्त्रीय और साहित्यिक । पौराणिक गद्य मे वैदिक काल के बचे- खुचे आर्प-प्रयोग रह गए है । इस प्रकार का गद्य कही-कही 'महाभारत',. १ पाणिनि के सूत्रों को श्रोत तथा गृह्यसूत्रों से मिलाने पर एक मौलिक भेद प्रत्यक्ष दीख पड़ेगा, वह यह कि जहाँ पाणिनि ने अनुवृत्ति, अधिकार आदि उपकरणों का सहारा लेकर संज्ञा, परिभाषा, विधि, नियम, अतिदेश एवं अधिकार-रूप पविध सूत्रों की रचना करके वाकी सब कुछ गण आदि को सौंप दिया है, वहां श्रौत और गृह्यसूत्र- कारों को अनुकृति, अधिकार आदि की प्रक्रियाएँ अज्ञात है। यह एक बड़ा भेद है, जो इस कोटि के सूत्रों के गद्य को पाणिनि-कोटि के पृथक करता है। (डा० सूर्यकान्त-'पाणिनि और पलअलि का गद्य-साहित्य', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान', १२ जून, १९५५) । सूत्रों के गद्य से सस्कृत-गद्य-योथी 'श्रीमद्भागवत' तथा 'विष्णुपुराण" म मिलता है। यह गद्य वैदिक गद्य और मस्कृत गद्य को मिलाने का काम करता है। शास्त्रीय गद्य मे शाब्दिक मौन्दय कम रहता है, जबकि साहित्यिक गद्य मे काव्य का-मा जानन्द आता है। शास्त्रीय गद्य शास्त्रीय गद्य-गली का प्राचीनतम उदाहरण तीसरी शताब्दी ई० पू० म रचित पतन्जलि का महाभाप्य' है, जिसमें पाणिनि के सूत्रों पर तथा फाल्यापन (४०० ई० पू०) के वार्नित्रा पर विस्तृत व्यास्यात्मक विवेचन है। 'पनजलि के अनुमार व्याररण भाषा को घडता नहीं, अपितु शिष्टा में प्रचलित मापा का विवरण करता है । शिष्टो के इमी परिपत गद्य में पतञ्जलि ने अपने 'महाभाप्य' की रचना की है । फरत उनका गद्य अत्यन्त प्रान्जल, प्रमपी एव जभिव्यञ्जनाशीत मम्पन्न हुआ है। उमये बास्य छोटे-टाटे, मोनी में विशद एव सारगर्भ हैं । उसने किया-पदो की उट-बैठ देखते ही बनती है और उसके नामिक देश को प्रचलित भाषा से चुने गये हैं । अपने गद्य मे पतन्जति ने न तो जवाहनीय मक्षेप का पल्ला पकड़ा है और न वर्ण-मधुर ममासो को ही अपनाने का प्रयत्न पिया उसमेहाने कृत्रिमता का परिहार करते मरता और मनोज्ञता का अभ्न- पूर्व मम दय किया है। इसमें न्याकरण-जमा दुम्ह गाम्य भी रोचा और हृदयमानी बन गया है। भास्त्रीय गद्य का उदाहरण दर्शन-ग्रथा में भी मिलता है । पड्दानी । १ विष्णुपुराण के गर का एक नमूना देखिए---'यपंच प्योम्नि वह्नि- पिण्डोपम त्वामहमपश्य तथवाद्यापतो गनमप्यय भगवता विञ्चिन्न प्रसादीकृत विशेषमुपलक्षयामीत्युक्ते भगवता सूर्येण निजाठादुमच्य स्यमता नाम महामणिवरमंदतार्य एकान्ते न्यस्तम् (४११३३१४) । २ डा० सूतवही।
संस्कृत गद्य का विकास , न्यायमूत्रों घर रचित भाप्यों में जिस दार्मनिक गद्य के दर्शन होते है, वह निर्मल एवं गहन-गम्भीर है। मीमांसासूत्रो पर शबरस्वामी का भाप्य, पर वात्स्यायन का भाष्य तथा वेदान्तसूत्रो पर शङ्कराचार्य का भाप्य दार्श- निक गद्य के विशिष्ट उदाहरण है। शङ्कराचार्य के भाष्यों में प्रयुक्त प्रसन्न- गम्भीर गद्य इस नाते आदर्श है। उनके वाक्य सारगर्भित,प्रौढ़ और प्राञ्जल है तथा शैली विवेचनात्मक एवं तर्कप्रवण है। बाद दर्शन-ग्रन्थों मे, उदाहरणस्वरूप नव्य-न्याय की कृतियो में, इस तर्क-प्रधान शैली की इतनी अति कर दी गई कि लेखक का अभिप्राय ही तर्क-वितकों के जटिल जाल में उलझ कर रह गया। किन्ही-किन्ही शान्त्रीय ग्रन्थों में गद्य-पद्यमयी शैली का भी आश्रय लिया गया। इनमे मुख्य विषय का विवेचन तो गद्य मे किया जाता है तथा दृष्टान्त या समर्थन के तौर पर अथवा साराश-रूप में पद्यों का प्रयोग कर दिया जाता है । यह शैली चिकित्सा-शास्त्र और अलङ्कार-शास्त्र के कतिपय ग्रन्थों मे नया कांटिल्य के अर्थ-शास्त्र में प्रयुक्त हुई है। पर लेखकों को शीघ्र ही अनुभव हो गया कि नपे-सुग्ने गब्दों में तथ्य-विवेचन के लिए गद्य-शैली हानिकारक है । अत व्यवहार (कानून) की व्याख्याओं में नया साहित्य-शास्त्र की रचना मे लेखको ने गद्य को ही अधिक अपनाया। इन वैज्ञानिक ग्रन्थों का गद्य मूत्र-शैली मे प्रभावित है। उसमे पारिभापिक १. शबरस्वामी की शैली का एक उदाहरण-'इच्छपात्मानमुपलभामहे । कति ? उपलब्धपूर्वे हभिनेते भवतीच्छा । यया मेल्नुतरेण यान्यस्मज्जातीयरनुपलब्धपूर्वाणि स्यानि वृक्ष-फलानि न तानि प्रत्य- स्माकमिच्छा भवति' (१।१५) । २. जिन साहित्यिक मन्यों में ऐनी मिश्र शेलो प्रयुक्त हुई है, वे 'चम्पू' कहलाते है-'पद्यमय काव्य चम्परित्यभिधीयते'---साहित्यदर्पण । पञ्चतन्य' और 'हितोपदेश' में भी यही शैली व्यवहृत है, पर ये ग्रंथ भिन्न कोटि में आते है।
सस्कृत-गद्य-वीथी शब्दा की प्रचुरता तथा दीर्घ समासो की बहुलता दीख पडती है। साहित्यिक गद्य सस्कृत के साहित्यिक गद्य अथवा गद्य-काव्य के प्रारम्भिक ग्रन्थ आज लुप्त हो गए है । इस कोटि के गद्य का सवप्रथम दर्शन हमे दण्डी, सुबन्धु. और बाण की कृतियो मे होता है, वह भी अपने परिपुष्ट रूप मे। उनके पूवाचाया के वार म हम नहीं क बरावर जानकारी है, पर इतना तो निर्वि- वार है कि इन गद्याचायों स बहुत पहले ही इस प्रकार की काव्य-प्रधान गद्य-पालो का शताब्दियो तक अभ्यास किया जाता रहा होगा। कात्यायन न आख्यायिकाना का बहुवचन में उल्लख क्यिा है।' पतञ्जलि ने आख्या- यिकाआ क उदाहरण म वासवदत्ता', 'सुमनात्तरा' और 'भैमरथी' का नाम-निदश क्यिा ह।' भाज न अपन 'शृङ्गारप्रकारा' मे 'मनावती' और 'सातकणाहरण नामक रचनाआ का मार सक्त किया है, जो ईस्वी सन् प्रारम्भ म लिखा गइ होगी। दण्डी न भा 'मनावता' का प्रशसा की है। हाल (७८ इस्पा) के राजवि श्रीपालित ने 'वरङ्गवता' क्या लिखी।। रामल-सामल न भूद्र-यथा' का रपना ना।'हपचरिल म बाण ने १ 'सुवाल्यापरम्या बहुसम्', प्रारयानाख्यायिकातहासपुराणेम्पश्च'- "- वातिर ३ २ यह 'वासवदत्ता' सुबपु को 'वासवदत्ता' से मन है । 'अधकृत्य कृते प्रय इत्यत्र सुदास्यामिभ्यो बहुस सुग्वस्तम्य । वासवदता सुमनोत्तरा न च भवति भमरपा ।' महामाध्य ४।३।८७ 'धवलप्रभवा राग सा तनोति मनोवती।' अन्तिमुन्दरीकया ५ 'हालेनोत्तमपूजया कवियप श्रीपातितो लालित'-अमिनन्द-कृत रामचरित, 'पुण्या पुमाति गगेव गां तरङ्गवती कया'-पनपाल-कृत निलामञ्जरी। ६ तो भूदयाकारी बन्यो रामिलसोमिली। काग्य यमो योरासीरधनारीश्वरोपमम् ॥ -जल्हा संस्कृत गद्य का विकास १७ भट्टार हरिचन्द्र के मनोहारी गद्य की प्रशंसा की है । यद्यपि इन कृतियों और लेखकों के बारे में हमारी विशेष जानकारी नहीं है, तथापि इन नामोल्लेखो से इतना तो प्रमाणित हो ही जाता है कि दण्डी, सुबन्धु और वाण से लगभग १,००० वर्ष पहले से गद्य-काव्यो का सृजन किया जाता रहा । हो सकता है, ये गद्य-काव्य, अन्य उत्कृष्टतर गद्य-काव्यो ही रचना हो जाने के कारण, वाद में जनता द्वारा भुला दिए गए हों। प्रशस्तियाँ सरलता के बाद अलङ्करण का युग आया करता है और पतञ्जलि के बाद भी ऐसा ही हुआ । अव सस्कृत गद्य-लेखको की रुचि अलङ्कार- प्रयोग द्वारा भापा के आडम्बर की ओर अधिक जाने लगी। यों तो अलङ्कारो का प्रयोग वैदिक वाङमय में भी जगह-जगह मिलता है, पर उनके विधान में खोज और प्रयास की गन्ध नहीं है; वे तो परिन्दों की नाई मन्त्र-द्रष्टाओ की प्रतिभा के मच से अनायास ही उतरे है । पर पतम्नलि के गद्य के बाद खिलाड़ियो की आँख अलङ्कारों की खोज में रहने लगी, जिसका फल हमे १५० ई० मे लिखे गए महाक्षत्रप रुद्रदामा के गिरनारवाले शिलालेख में मिलता है। इसके गद्य मे दीर्घ समास, अनुप्रास तथा अन्य अलङ्कार प्रचुर मात्रा में प्रयुक्त हुए है। इसमें ऐसे गद्य और पद्म का उल्लेख हुआ है, जो 'अलकृत, कवि-समयो का अनुसरण करने के कारण उदात्त तथा स्पष्ट, लघु, मधुर, आकर्षक और रमणीय - १. पदवन्योज्ज्वलो हारी कृतवर्णक्रमस्थितिः । भट्टारहरिचन्द्रस्य गद्ययन्धो नृपायते ॥ हर्पचरित २. इसका एक नमूना देखिए--'प्रमाणमानोन्मानस्वरगतिवर्णतारसत्वा दिमिः परमलक्षणव्यञ्जनरुपेतकान्तमूतिना स्वयमधिगतमहाक्षत्रप- नाम्ना नरेन्द्रकन्यास्वयंवरानेकमाल्यप्राप्तदाम्ना महाक्षत्रपेण रुद्र- हाम्ना सेतु सुदर्शनतर कारितम् ।'
सस्कृत-गद्य-वीयो मन्दो से निर्मित है (स्फुटलघुमधुरचित्रकान्तदाब्दसमपोदारालतगद्यपद्य) इस प्रकार की रमना का प्रौढ रूप ३५० ई. के लगभग हरिषेण द्वारा रचित समुद्रगुप्त की प्रशस्ति में मिलता है, जो प्रयाग वै एन साम्भ पर उत्तीर्ण है।' इसमे चन्द्रगुप्त प्रथम की राज्य-विधात्ति जोर समुद्रगुप्त के राज्यारोहण का सुन्दर एव चमत्कृत वर्णन है। इसमे एक मुदीघ, समामबहुल, तिहारी गद्य-काव्य की मनोज्ञ छटा मिल जाती है । इस प्रशस्ति मे दलेप का भी एक प्रयोग मिलता है, जो आगे चलकर गद्य- काव्यवारो का अत्यन्त प्रिय बन गया। हरिषेण का यह गद्य-गुच्छ म्पष्ट रूप से शब्दाडम्बर-बहुल रचना-शैली का राजद्त है, जिमना परिपान सुबघु और वाण की कृतियो मे उपलब्ध होता है । 'पनजलि के गद्य में और इन प्रदाम्तियो के गद्य में आनाश-पाताल घा अन्तर है। कह सकते हैं कि इस अतर का कारण दोना वे विषय वा मौलिक भेद है, रिन्नु प्यान देने योग्य बात यह है कि जहाँ पतन्जलि ने गय में आध्यात अभीप्ट सम्या में उपलब्ध होते हैं, वहीं प्रास्तियो के गद्य मे वे प्राय चन दमे हैं और उनका म्यान नामिर शैली ने अपना लिया है। विभक्तियाँ हूँ? ही मिलती है, जब उना काम लम्बे-लम्बे समाम देने लगे हैं । देवना-द और वहीहि ना ऋग्वेद में भी मिलते बौर प्रचुर मात्रा में मिलते है, जितु देवता-दन्दा वे म्प में और दो शब्दा के वयोदि के म्प में। इसके विपरीत प्रगग्नियो के १ इसका एक वाक्याश देखिए-'सदंपथिवी विजयनिनोदयव्याप्त- निखिलावनितता कोतिमितस्तिदशापतिभवनामनामप्तललितसुख- विचरपामाचक्षाण इव नयो पाहायमुरियत स्तम्भ ।' २ इसका अर्थ यह है कि प्राचीन संस्कृत में पातुओं के निडत-रप बहत पाए जाते थे, पर प्रमा उन प्रयोग घटला गया और उनकी जगह पम्प प्रयुक्त होने लगे, जैसे 'अद्रातीत', 'जगाम' आदि के स्थान पर 'दष्टवान्', 'गत ' आदि लिखे जाने लो। .
संस्कृत गद्य का विकास गद्य में दस-दस शब्दों को एक ही द्वन्द्व में टाँग दिया जाता है और वहुव्रीहि समास में तो मनमाने शब्द-नीहि भर दिए जाते हैं।" कथा और आख्यायिका दण्डी, सुबन्धु और वाण से बहुत पहले भी गद्य-काव्यों का अनुशीलन किया जाता था। इसका एक और प्रमाण यह है कि उनसे पूर्व ही कथा और आख्यायिका के नाम से गद्य-काव्य का भेद किया जाने लगा था, जिनके विशिष्ट लक्षण निर्धारित हो चुके थे और कयाकारों से इनका पालन करने की अपेक्षा की जाती थी। आख्यायिका में ऐति- हासिक आधार होना चाहिए, पर कथा कल्पना-प्रसूत होता है, जैसा कि 'हपंचरित' और 'कादम्बरी' के उदाहरण से ज्ञात होता है। किन्तु गद्य-काव्यों के इन दोनों वर्गों के विषय में, दण्डी और वाण के समय में, कई मतभेद उठ खड़े हुए थे । दण्डी के अनुसार आख्या- यिका का वक्ता स्वयं नायक होता है, कथा का नायक अन्य कोई । किन्तु यह नियम सर्वत्र घटित नहीं हुआ है; फिर वक्ता-रूप में स्वयं नायक हो अथवा अन्य कोई व्यक्ति, इसमें विशेप अन्तर नहीं है, इस- लिए यह भेद अवास्तविक है । कुछ विद्वानों का मत था कि आख्यायिका में वक्त्र और अपरवक्न छन्दों का प्रयोग किया जाता है और उसमें कथांश उच्छवासों में बंटा रहता है । यद्यपि दण्डी ने प्रसंगवश कया में भी इन लक्षणों का होना लिखा है और इस भेद को अस्वीकार किया है; तथापि बाण के 'हर्षचरित' मे यह लक्षण अवश्य घटित होता है । १. डा० सूर्यकान्त-वही। २. आख्यायिकोपलधार्या प्रबन्धकल्पनाकथा। अमरकोश, ११५१५-६ ३. देखिए डा. वासुदेवशरण अग्रवाल-कृत 'पंचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन', पृ०५॥ ४. देखिए काव्यादर्श, ११२३-३० ।
२० सस्कृत गद्य-बोयो दण्डा के मन म ता क्या और आस्यायिका मे वेदत्र नाम ही का भेद है, दाना की जाति एक है। पर वाण ने 'पचरित' को आख्या- यिरा और 'कादम्बरी' को कथा माना है। 'हारित' के आरम्भ मे उन्हाने कहा है कि म इस आग्यायिका-रूपी ममुद्र म चपलतावश जिह्वा का चप्पू चला रहा हूँ (क्रोम्याग्यायिकाम्वोधौ जिह्वाप्लवनचापलम्)। 'कादम्बरी की भूमिका में वाण गे उने 'दामपदत्ता और 'बृहस्था' इन दोनो को मान कर देनेवानी (अतिद्वमो) क्या कहा है। दण्डी दण्डी (६०० ई०) दक्षिण भारत में निवासी य । उहीन 'काव्या- दस' नामर अलवार-ग्रन्थ के अतिरिक्त दो गद्य-वाव्य निवे-'अन्ति- सुन्दरीक्या' और 'दशकुमारचरित' । 'अमन्तिसुन्दरीकथा' अपूर्ण है और उसे दण्डी की ही कृति मानने मे विद्वानो में ऐक्मत्य भी नहीं । 'दवा- कुमारचरित' को भी दण्डी ने आदि-अन्न लिसे बिना ही अधूरा छोड दिया या । वाद वे लेखका ने उसम पूर्वपीठिका और उत्तरपीटिशा जाहार उमे ममग्र रूप दिया। 'दशकुमारचरित', जिसमे दम राजकुमार के पयटन जोर दुम्साहम । का हृदयग्राही वर्णन है, मस्कृत के गद्य-मादिय में एक अनूठी रचना है। अनूठी इसलिए कि यह यथार्थवादी है, द्वि-विराधी है । दण्टी ने अपनी वृति में उम परम्परा का उल्लघन पिया है, जिसके अनुसार गद्य-चाव्य में भी (जो ति काव्य का ही एक अवान्तरम्प है) विसी उदात विपय का प्रतिपादन होना चाहिए और उसका नाम भी शालीन, धीर एव लोका- तीत गुणा से सम्पन होना चाहिए । 'दशकुमारचरित' के नायक इप्ट- सिद्धि के लिए उचित-अनुचित साधनो मे कोई अन्तर नहीं करते । वे एक १ तत्त्यात्यायित्येश जाति सज्ञाद्वयाङ्किता। अत्रवान्तभविष्यन्ति दोषाचारयानजातय ॥ काव्यादर्श, १२८ संस्कृत गद्य का विकास २१ -- ऐसे समाज में विचरण करते हैं, जहाँ मान, मद, मोह, मत्सर का वोल- वाला है तथा छल, कपट, हिसा, परस्त्री-हरण और अवैध प्रेम का नि.सकोच आश्रय लिया जाता है। पाखण्डी साधु, चतुर जागर, कामान्ध पुरुष, हृदयहीन वेश्याएँ, धूर्त कुट्टनियाँ और कजूस सेठ अपने अद्भुत व्यापारों से समस्त कृति को अतिशय सजीव और मनोरजक बना देते है । अपने सजीव कथानक के अनुरूप ही दण्डी ने सजीव भापा का व्यव- हार किया है। उनका गद्य प्रासादिक, दिन-प्रतिदिन के व्यवहार के योग्य, चुस्त और प्रवाहपूर्ण है । वह न श्लेष के बोझ से दवा है, न समासों के प्रहार से प्रताड़ित है, न अलङ्कार-बाहुल्य से आक्रान्त है । सहज भावाभि- व्यक्ति- अर्थ की स्पष्टता-उनके गद्य की आत्मा है। उनका पदलालित्य दर्शनीय है (दण्डिनः पदलालित्यम्); उनकी शब्द-योजना मे रस छलका पड़ता हे ।' हास्य, वाक्पटुता एवं सूल की चटकीली उर्वरता स्थल-स्थल पर दृष्टिगोचर होती है । उन्होंने अपने कथानकों को इस प्रकार क्रमबद्ध किया है कि वे सर्वथा सुसंगठित होकर खिल उठे हैं । भाषा-वैभव का जदर्शन उन्होंने न किया हो, ऐसी वात नही , पर साहित्यिक अनङ्करण में कही-कही फंस जाने पर भी वह दुरूह और अरुचिकर नहीं है । मुललित एवं सुभग गद्य लिखने में दण्डी निष्णात है और उनकी रचना, कला से चमत्कृत सामाजिक चुनौतियो के कारण एक महान्, प्रौढ और रम-पेशल रचना सम्पन्न हुई है। सुबन्धु गद्य-काव्यो को ललकारो से बोझिल तथा अक्षराडम्बरो से चित्र- विचित्र वनाने की प्रवृत्ति, जिससे दण्डी अपने को बहुत्त-कुछ मुक्त रख १. उदाहरणार्थ, 'अयुग्मशरः शरशयने शाययिष्यति', 'असत्येनास्य नास्यं संसृज्यते', स पुग्यैः कर्मभिः प्राप्य पुरुषायुपं पुनरपुण्येन प्रजानाम- गण्यतामरेषु ।'
२२ सस्कृत-गद्य-बीयी सके, उनके वाद बढती गई। अलवार-शास्त्रिया ने यह सिद्धान्त स्थिर किया कि 'गद्यकाव्य का उत्वप शब्द-विन्यास के सौप्ठव, वणन की पराचना, अलद्वारा की सुभगता, दीघ समस्त पदो की प्रयोग-चातुरी, वाक्यो के सहित विस्तार एव ध्वनि तथा ध्वन्य के साटाप रखनन और अवपतन में निगूढ है।' इस काटि के गद्य-वाव्य की छटा, अपने उच्चतम उदेक मे, मुबन्धु की 'वासवदत्ता' में मिलती है। 'वामवदता' मे राजकुमार कन्दर्पनेतु और राजकुमारी वासवदत्ता की प्रणय कथा वर्णित है। स्थानक अत्यन्त लघु है, पर प्रवृति-वर्णन, सौ दर्य-चित्रण तथा पाण्डित्य-प्रदशन द्वारा उसका विपुल विस्तार किया गया है, जिससे वथा-प्रवाह मे याधा पहुंची है । 'वासवदत्ता' एक श्लेप- वहुल रचना है, उसके रचयिता का दावा है कि उनके काव्य के प्रत्येक अक्षर मे दलेप है (प्रत्यक्षरइलेयगयप्रपञ्चयियारावेदप्यनिधि प्रवन्धम्)। पौराणिक सबैता से युक्त इलेपो का उन्हाने एक बीहड जगल खडा कर दिया है, जिसमे रास्ता ढढ पाना पाठन के लिए एक श्रमसाध्य मानसिर व्यायाम हा जाता है ।' सम्भवत , सुव धु-जसे लेखको के लिए ही श्री मानन्दवचन ने यह कहा है कि पविगण बहुघा क्थावस्तु और रस की अभिव्यक्ति का ध्यान नहीं रखते और अलवार-कौशल दिखाने में ही निमग्न रहते हैं । जहाँ दण्टी ने सरल, प्रासादिक एव मनोरम वैदर्भी पोली को अपनाया है, वहीं मुदधु ने अतिशयोक्ति, अनुप्रास और ममास- प्रधान गोडी दौली को, जिसमे दीर्घ वाक्य-विन्यास, शब्दाडम्बर तथा में प्रवाह . १ जैसे, 'नदगोप इव यशोदान्वित , जरासन्ध इव घटितधिविग्रह', अर्थात् यशोदा से मुक्त नन्दगोप के समान वह यश और दया से मुक्त जरा के द्वारा मटित अनवाले राजा जरासघ के समान पर सधि और विग्रह के सम्पादक थे। २ वृश्यन्ते च क्वयोलडारनिबन्धनकरसा अनपेक्षितरसा प्रवधेषु । -~-ध्वन्यालोर ।
संस्कृत गद्य का विकास २३ कृत्रिमता अधिक होती है। फिर भी सुबन्धु ने संवादों में तथा अन्य उपयुक्त स्थलो पर छोटे वाक्यो का भी प्रयोग किया है । सुवन्धु की कृति अपने ढग की चमत्कारपूर्ण, मॅजी हुई रचना है । सास्कृतिक सामग्री की दृष्टि से भी वह महत्त्वपूर्ण है। बाणभट्ट को गद्य-शैली सस्कृत गद्य-काव्य का चरमोत्कर्ष वाणभट्ट की कृतियो मे देखा जा सकता है । बाण गद्य की पाञ्चाली शैली के अनुयायी है, जिसमें अर्थ के अनुरूप ही शब्दों को गूंथा जाता है। अपनी कृतियों मे बाण ने काव्य और गद्य की शैली के विषय मे अपने विचार प्रकट किए है। इस समय लोक में राग-द्वेप से भरे हुए, वाचाल, मनमाने ढंग से कविता करनेवाले (कामकारिणः) कुकवि भरे हुए है। ऐसे कवि घर-घर मे है, जो वस्तु के यथार्थ स्वरूप-मात्र के वर्णन को कविता समझते है, किन्तु नई वस्तु का निर्माण करनेवाले कवि थोड़े ही है।' (असंख्या जातिभाजः, उत्पादका न बहवः कवयः) । इसमे 'जातिभाजः' पद द्वारा वाण ने उस पूर्ववर्ती शैली की ओर सकेत किया है, जिसमे स्वभावोक्ति पसन्द की जाती थी। वस्तु के यथार्थ रूप को वैसा ही कहना पहले के कवियो को इष्ट था। 'ललित- विस्तर', आर्यगूर-कृत 'जातकमाला' आदि बौद्ध सस्कृत-साहित्य के ग्रन्थः १. ओजःप्रकाशवर्णबन्ध आडम्बरः पुनः । समासबहुला गोडी ..॥ -साहित्य-दर्पण। २. उदाहरण के लिए देखिए---'रविविरहविघुरायाः कमलिन्या हृदयमिव द्विधा पपाट चक्रवाकमियुनम् । आगमिष्यतो हिमकरदयितस्य पावें सञ्चरन्तो कुमुदिन्या भ्रमरमाला दूतोचालक्ष्यत ।' ३. शब्दार्ययोः तमो गुम्फः पाञ्चाली रीतिरिष्यते । शिलामट्टारिकावाचि बाणोक्तिषु च सा यदि॥ सरस्वतीकण्ठाभरणम् ४. डा. वासुदेवशरण अग्रवाल-वही, पृ० ३-५ सस्कृत-गद्य-वीयो । इसी शैली मे है । विन्तु धीरे-धीरे स्वभावोक्ति के प्रति लोगा की अचि हो गइ और वोग्नि पमन्द की जाने लगी। इस प्रतिक्रिया ने मुबकी 'वासवदत्ता' को जन्म दिया। वाण ने लगातार इलेपो मे भरी हुई शली दी प्रशसा की है, माय ही मुन्दर जानि (स्वभावोक्ति)-प्रधान वर्णनो को भी ग्राह्य माना है, ऐमी उभय शैली म यिन रचना की तुलना उन्होंने उस जूही की मात्रा में की है, जिसमे चम्पर-युप्प पिरोए गए हो- निरन्तरश्पधना सुजातयो महासनश्चम्पाकुड्मलेरिव । वाण का कहना है कि उत्तरी भारत के लोगो मे नेप-प्रधान दौली का रिवाज है, पश्चिमी भारत मेनंती पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना अर्य या कथावस्तु पर, दाक्षिणात्य लोगों में कल्पना की उडान या उत्प्रेक्षा ही काव्य काण है, किन्तु गोडों में अर्यात् प्राच्य भारत मे विक्ट शब्द-योजना ही पमन्द वी दाती है- दलेपप्रायमुदीच्येषु प्रनोवेष्वधमात्रम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणान्येप गौडेविक्षरडम्बर ॥ दाण ने इस प्रकार की दौलिया कोकागीमाना है। उनके अनुसार विषय की नवीनता, मुरुचिपूर्ण म्वमाप्ति सरत नेप, मट म्प में प्रतीयमान रस तथा भारी-भरसम शन्द-याजना श्रेष्ठ गद्य-रचना के लक्षण - नयोऽयों जातिरप्राम्या इलेपोऽविरुष्टप स्कुटो रग । विक्टाक्षरवपदच वृत्स्नमेस्त्र इम समवय-प्रधान दौनीरा अपनाना वाण को विपता है। वाण में यभिनव अर्थ की कल्पना', प-प्रधान गव्दी को बद्न योजना, दूसरे के मन के भादों का यरानध्य चित्रण', वन्तुनो के यथार्य वर्णन, ममाम-बटुल पद-दियान तथा क्या-वस्तु एव शंती मे प्रस्टम्प मे बहती हुई १ उत्कृष्ट कविगमिर विविधवर्णणिप्रतिपाद्यमानामिनदाराचयम्। २ अन्यचिन्तितस्वमायामिप्रायदेदकम् ।-वादग्दरी संस्कृत गद्य का विकास रस-धारा--ये सभी सहज ही प्राप्त होते है । बाण ने तीन प्रकार की गद्य-शैलियाँ प्रयुक्त की है--उत्कलिकाप्राय (दीर्घ समासवाली), चूर्णक (छोटे-छोटे समासयुक्त पदों में बिखरी हुई) तथा वृत्तगन्धि (समातरहित)। राजवैभव, रमणी-विलास अथवा प्राकृतिक भव्यता के चित्रण में उत्कलिकाप्राय गैली का आधय लिया गया है, जिसमे दीर्घकाय समास, विपुल वाक्य, विशिष्ट एवं श्लिष्ट पदावली तथा चित्रकाव्य के सभी साधनो का प्रचुर प्रयोग दीख पड़ता है। शूद्रक, जावालि-आश्रम, विन्ध्याटवी, महाश्वेता और कादम्बरी के वर्णन इसी शैली के उदाहरण है। ऐसी प्रगाढ शैली के बाद बाण फिर ढील छोड देते हैं । युवक दधीच का वर्णन शब्दाडम्बरपूर्ण उत्कनिकाप्राय शैली से आरम्भ करके अन्त में उनके पार्वचर के वर्णन मे छोटे-छोटे समासोबाली चूर्णक गैली से समाप्त किया गया है। जहाँ विषय मामिक अथवा गम्भीर होता है, वहाँ वाण वृत्तगन्धि गैली का प्रयोग करते हैं, जो बडो सशक्त और प्रभावोत्पादक सिद्ध होती है। इसमे वाक्य छोटे- छोटे होते है, दीर्ध समासो का अभाव होता है और विशेषण-पद न्यून होते है । वाण ने मदन-व्यथा से पीडित पुण्डरीक की भर्त्सना कपिञ्जल के मुख से इमी शैली मे कराई है। विरह-वर्णन मे, उपदेश देने समय अथवा शिष्टाचार दिखाते समय वृत्तगन्धि प्रयुक्त हुई है। इसका अच्छा उदाहरण 'शुकनासोपदेश' में पाया जाता है। वाण ने भट्टार हरिचन्द्र के गद्य-अन्ध की प्रशंमा करके यह इगित १. सपादः पदसन्तानो गा सक्तु विधा स्मृतन् । शूर्णकोनलिकामायवृत्तन्धिप्रसेदतः अपाचोराक्षरं स्वल्पसमासं चूकिं विदुः । तत्तु भिरीतित्वं गद्य चतरं भवेत् ।। मदुत्कलिकाप्रायं समासाट्यं दृढाक्षारम् । वृत्तकदेशत्तम्दामाद वृत्तन्धि पुनः स्मृतम् ॥---छन्दोमजरी सस्कृत-गद्य-वीथी किया है कि वह इसकी गती का बादश मानते हैं। इसमे पदों की सुन्दर रचना थी और इसकी रीति भी मनोहर थी । वाण की दृष्टि में शब्द ऐमे हाने चाहिए, जो मुख-प्रवोध हो, सरलता से समझ म आ सकें र सुदर अक्षरो स बने हा। हर्षचरित और कादम्बरी 'हपचारत' में वाण ने मम्राट् हप के जीवन, उनके व्यक्तित्व तथा पतिपय नमकानीन घटनाआ और पात्रो का काव्यमयी शैली में वर्णन दिया है। प्रारम्भ के ढाई जव्याय म वाण ने अपने जीवन की भी कुछ झाक्यिों दी हैं। वर्णन की आलकारिक और कल्पना-प्रचुर शैली ' कारण 'हषचरित' विशुद्ध ऐतिहासिक प्रथ नहीं कहा जा सकना । फिर मी उमा ऐतिहामिर एव सास्कृतिक महत्त्व कम नहीं है । हर्ष के समकालीन चीनी यात्री ह्वेनमाग के वर्णन से 'हर्षचरित' की घटनाएँ मेल माती है जोर वाण वे सूक्ष्म एव व्योरेवार वर्णन में उसके यात्रा- विवरण की यथायता परसन में राहायता मिलती है । इसके अतिरिक्त कला, धर्म, दर्शन, राजनीति, लाचार-विचार ी दृष्टि में वाण ने सास्कृतिक महत्व की बहुमूल्य मामग्री प्रस्तुत की है। 'कादम्बरी' सत्वृत-साहित्य की सर्वोत्तम कथा अथवा उपन्यास है । उमम चन्द्रापीड और कादम्बरी की प्रणय-यथा सम्कृत भाषा के समस्त वैभव, गौरव और कौशल कै माय वर्णित है। 'दशकुमारचरित' का भांति उममे भी मुख्य क्या में अनेक उप-क्याएँ या गई हैं, पर कवि ने पर्याप्त कुगतना से उनका निवांह और विकास किया है। विशद चरित्र चित्रण, वणन प्रतिभा, नापा-नपुण्य तथा मानव-भावो मार्मिक एव मूक्ष्म अवन में 'कादम्बरी' मम्कृन मे एव वेगाड कृति है। उसमे वाण के बहुमुखी जीवन के विविध अनुभव मातार हो गए हैं। तलालीन सामाजिक प्रथाओं पर भी 'कादम्बरी' से पर्याप्त प्रकाश पडता है। उस युग के नगर, उद्यान, राजपथ, मनपुर, हाट-बाजार, क्ला-चौगल, घम और संस्कृत गद्य का विकास विश्वास कादम्बरी' में बाण की सौन्दर्यदर्शी दृष्टि पाकर मूर्तिमान् प्रकट हुए है। वाण वर्णनात्मक शैली के धना है। उनकी वाणी थकना या रुकना नही जानती। अपने वर्य विषय को महिमा और सौन्दर्य से मण्डित करने मे वह श्लेषों की झड़ी बांध देंगे, विरोवाभास का तुमार खडा कर देगे, श्लिष्ट उपमाओ, अनुप्रासों और यमकों का जगल ही लगा देगे । इन वर्णनों से न उकताकर, उनके भीतर पेठकर, हमे रसास्वादन करना चाहिए ---अकृपण कवि-प्रतिभा के औदार्य का अवलोकन करना चाहिए। और तव याण की सूक्ष्म निरीक्षण-शक्ति, उर्वर कल्पना, प्रकृष्ट प्रकृति- प्रेम तथा अजन्त्र शब्द-राशि हमें मन्त्र-मुग्ध किए विना न रहेगी। परवर्ती गद्य-काव्यो पर वाण की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।' उनकी शैली का अनुकरण कवि-साफल्य का मापदण्ड माना जाने लगा। १०वी शताब्दी की धनपाल की 'तिलकमन्जरी' तथा बादीसिह की १. बाण का प्रभाव गोस्वामी तुलसीदास पर भी देखा जा सकता है। 'रामचरितमानस' में चन्द्रोदय का वर्णन करते हुए उन्होंने सिंह का उपमान दिया है.--- पूरव दिसि गिरि गुहा निवासी । परम प्रताप तेज वल रासी ॥ मत्त नाग तम कुम्भ विदारी । ससि केसरी गगन वनचारी विथुरे नभ मुकुताहल तारा । निसि सुन्दरी केर सिंगारा ।। इसकी तुलना वाण के इस वर्णन से करने पर कितनी समानता दिखाई देती है --'शशिकेसरिविदार्यमाण तम करिकुम्भसम्भवेन मुक्ताफल- क्षोदेनेव धवलतामुपनीयमानमुदयगिरि सिद्धसुन्दरीकुचच्युतेन चन्दनचूर्ण- शशिनेव पाण्डुरीक्रियमाणम् ।' तुलसीदासजी ने-~- जहें विलोकि मृगसादक नयनी । जनु तहँ वरसि कमल सित सयनी ।। लिखकर जो सुन्दर उत्प्रेक्षा की है, वह बहुत पहले वाण में दी जा सकती है-'अपाङ्गविक्षेपश्चलितकुवलयवनमयीमिव क्रियमाणामवनीम् ।' ।
२८ सस्कृत-गद्य-वीयो 'गद्य चिन्तामणि' ऐमी ही रचनाएँ हैं। इसी समय के लगभग साहित्य मे चम्पू-ग्रन्थो का निर्माण किया जाने लगा, जिनमे गद्य-पद्य दोनो का ममान म्प मे व्याहार हुआ संस्कृत गद्य-काव्यो को विशेषताएँ आज के व्यावहारिक युग मे मम्कृत गद्य-गव्य एक विचित्र प्रकार का साहित्य उपस्थित करते हैं। याधुनिक भारतीय भाषामो में उनके- जसा गद्य निवने वी किमी को न कापना हो सकती है, न सामर्थ्य । दे तो उम प्राचीन युग की देन हैं जय प्रत्र भद्र नागरिस मे, वात्स्यायन के अनुसार, साहित्य-या में पारगन होने की अपेक्षा की जाती थी। जन, धन तथा अवाग की वतता, ला और मम्वृति के प्रति अनन्य अनुराग, माहित्यकारा और कलाकारा का प्रभूत सम्मान, शिष्ट और सुशिक्षित विद्वन्-समार-मै वातावरण में निश्चिन्त होरर हमारे प्राचीन गद्याचाों ने, जपने ममा में प्रचलित नादों और सढियो के अनुसार, अपन समरन उपाजित ज्ञान-विनान को मुक्त हम्न में सहदयो के लिए वितरित किया था। अत जाधुनिर आलोचना के सिद्धान्नो को कसौटी पर मथना वर्तमान युग की जावश्यकता को ध्यान में रपार उनकी यानाचना या समीक्षा करना जगत होगा। उसकृत गद्य-गती ही उनके समय में समादृन थी । समाय-बाहुल्य गद्य का प्राण ही समझा जाता था।' लाधर या लघुकायना मम्कन गद वा एक निगेय लक्षण है, अधिक-से-अधिर बर्थ को कम मनम दादा मे व्यसा करना उममा ध्येय है । जत समाता का प्रयोग इमरे नि अनिवार्य होता है । मस्कृत मे गद्य म ममावरा काव्य के अन्तर्गन ही दिया गया है।' इस विभागीकरण से भी सन्कृत गद्य का काव्यत्र लक्षित हो जाता है। १ पोज समासभूयस्त नेतद्गद्यम्य जोधितम् । दायादर्श १८० २ पद्य गद्य च मिश्र चतत् त्रिव व्यवस्थितम्।-पाच्यादा ११ संस्कृत गद्य ता विकास २६ काव्य-रचना के लिए छन्दोबद्धता अनिवार्य नहीं है, इसका पुष्ट प्रमाण संस्कृत के गद्य-काव्य है । लोक-कथाओ से कथानक का वीज लेकर उन्हे पद्यकाव्यों की शैली पर ही पल्लवित किया गया है । प्रकृति का विस्तृत चित्रण, नायक-नायिका की शारीरिक और मानसिक दशा का अतिरजित अंकन, कल्पना और पाण्डित्य का गहरा पुट तथा अलंकारों एव पौराणिक मंकेतों का प्रचुर प्रयोग-इन गद्य-काव्यो की विशेषताएं है। उनमे सस्कृत भाषा अनुचरों से घिरे सम्राट की भांति प्रस्थान करती है, और कथा पीछे-पीछे प्रच्छन्न भाव में छत्रधर की भॉति आता है । यदि लोव- कथाओं के सीधे-सादे कथानक को साहित्यिक सौन्दर्य से प्रतिमण्डित देखना हो; कल्पना-वैचित्र्य, पदलालित्य, भापा-सौष्ठव और वर्णन-वैभव का एका चमत्कार देखना हो; भावनाहिता और गाढ़वन्धता का निराला ठाठ, ओज और प्रौढत्व का उदात्त सन्निवेश एव वैदग्ध्य और बाक्पटुता का चार निदर्शन अनुभव करना हो तो संस्कृत गद्य-काव्यो का अनुशीलन करना चाहिए। उनकी गद्य-गरिमा के समक्ष आज की व्याव- हारिक भाषा गौरवोन्तत गजराज के समक्ष चचल अरबी घोड़ी की तरह लगती है । लोक-सम्पर्क से दूर होने पर भी उस गजराज की शान और शोभा से कोन इन्कार कर सकता है ! । वर्तमान युग वर्तमान युग में भी सस्कृत गद्य का अनुशीलन अप्रचलित नहीं है । काशी के स्वर्गीय पंडित अम्बिकादत्त व्याम का 'शिवराज-विजय' प्राचीन शैली के प्रौढ़ गद्य का श्रेष्ठ नमूना है। उनकी वर्णन-चातुरी और शब्द- योजना अतिशय आकर्पक है । पंडित हुपीकेश शास्त्री भट्टाचार्य की 'प्रबन्ध-मञ्जरी' में सामयिक विषयों पर सुरुचिपूर्ण निवन्ध संग्रहीत है। उन्होने 'विद्योदय' नामक संस्कृत-पत्रिका का लाहौर से ४४ वर्ष तक सम्पादन किया था । उनकी भाषा अत्यन्त प्राञ्जल तथा प्रवाहपूर्ण है। उनकी-सी सरस व्यंग्य-शैली आधुनिक संस्कृत गद्य में बहुत कम देसी.
सस्कृत-गद्य-धीयो । जाती है। पदिता क्षमा राव को दस शताब्दी की प्रथम कोटि की मस्कृत-लेखिका एव कवयित्री के रूप मे म्मरण किया जाएगा, जिन्होंने प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाकर एक चिर-पुराण भाषा मे नवीन प्राण फूकने की चेष्टा की। उनकी 'क्या-मुस्तावली' सरन, प्रामादिक गद्य में रचित कहानियो का मग्रह है । ये कहानियाँ रोचक्ता एव घटना-वैचिन्य की दृष्टि में आधुनिक युग के सर्वया उपयुक्त वन पड़ी हैं । इन्दौर वे श्रीपाद शास्त्री हसूरकर ने सरल और प्रवाहपूर्ण गद्य में कई चरितात्मक प्रयो का प्रणयन किया है । श्रीकृष्णमाचार्य ने 'रपुवदा- विमर्ग' लिखा है । नामिर के पटिन मेधानत कविरत्न ने 'शिवराजविजय' के अनुकरण पर 'कुमुदिनी-चन्द' नामक उपन्याम निखा है। स्वामी भागवताचार्य तथा श्री चारुदेव शास्त्री ने महात्मा गाधी की जीवनी को मस्कृत गद्य में उतारा है। वगलौर की श्रीमती राजम्मा के 'चन्द्रमौलि' उपन्यास में सामाजिक बुराइया पर जच्या प्रकाश टाना गया है। काशी के श्री नारायण शास्त्री विस्तेने मरल और प्रान्जल गय में ' विच्चरिण- पञ्चत्रम्' लिया है । मद्राम के थी व्यासराय शास्त्री ने यातिदाम- नाट्य-कथा-मञ्जरी' के नाम मेवानिदास वे नाटकों की कहानी बढ़िया गद्य मे निसी है । इसी प्रकार पडित महानिङ्ग शास्त्री ने भाम के नाटी की पथाएँ लिभी हैं । मद्रास के एक विद्वान् ने शेक्सपियर के नाटतो की क्याओं को प्रवाहपूर्ण मस्कृत गद्य का परिधान पहनाया है। श्री हरिचरण भट्टाचार्य ने वरिमचन्द के उपन्यास 'क्पानकुण्डला' वा इसी नाम से मस्कृन में रूपान्तर क्यिा है और उनके पारण्यमयी' उपन्यास का अनुवाद कोल्हापुर के श्री अप्पाशास्त्री ने किया है। श्री जगन्नाथप्रसाद के हिन्दी-उप याम 'मसार-चक्र' वा अनुवाद श्री अनन्ना- चार्य ने किया है । निवेन्द्रम् वे स्वर्गीय पडित टी० के० गणपति शास्त्री ने 'सेतुयात्रानुवर्णनम् नामक एक यात्रा-ग्रन्थ लिखा,जो पाडिन्यपूर्ण वितु सरल संस्कृत गद्य का अच्छा नमूना है। वाराणसी के डा० मगलदेव शास्त्री ने अपने 'प्रवर-प्रकाम' में वैदिव विपयो पर अच्छे प्रबघ लिये है।
संस्कृत गद्य का विकास , "स्वर्गीय महामहोपाध्याय पंडित रामावतार शर्मा ने 'भारतानुवर्णनम्' नाम से भारत का एक संक्षिप्त इतिहास लिखा था। श्री हंसराज अग्रवाल तथा श्री द्विजेन्द्रनाथ शास्त्री ने संस्कृत-साहित्य का इतिहास संस्कृत में लिखा है । 'भापा' (संस्कृत-साप्ताहिक) के सम्पादक श्री सोमयाजी ने टाल्सटाय की एक पुस्तक का 'कणः लुप्तः गृहं दहति' (एक चिनगारी घर जला देती है) के नाम से अनुवाद किया है, जिसमे सस्कृत का सरलतम रूप दर्शनीय है। संस्कृत गद्य में आज भी अनेक पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं, जिनके द्वारा काफी मौलिक रचनाएं सामने आई हैं। साप्ताहिक पत्रों में 'भवितव्यम्' (नागपुर), 'संस्कृतम्' (अयोव्या), 'भाषा' (गुन्नूर) और 'पण्डित-पत्रिका' (काशी) के नाम उल्लेखनीय है । मासिक पत्रों में 'मञ्जूपा' (कलकत्ता), 'भारती' (जयपुर), 'संस्कृत-रत्नाकर' (दिल्ली), 'बालसंस्कृतम्' (बम्बई), 'मधुरवाणी' (गदग-फर्नाटक), 'उद्यान- पत्रिका' (तिरुवयक-तंजौर), 'सूर्योदय' (काशी) और 'वैदिकमनोहरा' (काजीवरम् ) के नाम लिए जा सकते है। त्रैमासिक पत्रिकाओं में 'सरस्वतीसुषमा' (वाराणसी), 'महाविद्या' (अड्यार) तथा 'महाराज- संस्कृतपत्रिका' (मैसूर) प्रमुख है। लोक-व्यवहार से दूर जा पडे संस्कृत गद्य को लोकप्रिय बनाने में इन सब प्रकागनो का योग बहुमूल्य माना जाएगा । वस्तुत: संस्कृत को अनु- माणित करने के लिए आज उसके गद्य को सरल, लघु और व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता है-रूढिवाद को तोड़कर उसमे चोज (सारवत्ता) और चटक, ज्ञान-विज्ञान की सजीवता और नवीनता, खेतों और खलिहानों की खुली हवा और धूप लानी होगी, उसे युग-धर्म मे दीक्षित करना होगा। तभी देववाणा संस्कृत सर्वजनप्रिय बनकर अपने सौरभ का प्रसार कर सकेगी। प्रस्तुत संग्रह संस्कृत के गद्य-साहित्य मे से उत्कृष्ट अंशों को चुनकर आज तक अनेक सस्कृत-गद्य-वीयो सग्रह नंयार दिए गए है। प्रस्तुत सग्रह भी इसी परम्परा का निर्वाह करता है । फिर भी यह प्रयल क्यिा गया है कि ऐसे ही गद्यास लिए जाए, जा वतमान परिस्थितिया घे सन्दर्भ में साया एव उपादेय मिद्ध हा। शृङ्गारिव स्थल इसम प्रार नहीं के बराबर मिलगे, फिर भी शक्ति- बुमार की भावी पली को पारकला-प्रवीणता एव अनवद्य मुदरता, शिवाजी और रागनारा का राग-सिक्न मवाद तथा कश्मीरी सुन्दरी हिमा का पदम्य साह्म एव एकनिष्ठ पति-प्रेम दम सकरन का नोरम और स्क्ष नहीं बनन दग । सरकारी क्मचारिया में भम्भावित भ्रष्टाचार पर रार लगान का जाग्रह वर वौदित्य ने एष भामयिक प्रश्न पो उठाया है । सुबन्धु ने सल-हृदय की खूबियो पर विस्तार से प्रकाश डालकर माना गास्वामी तुलसीदामजी की 'प्रथम दन्दि खल जन सनि भाएं, जे दिनु काज दाहिनेहु वाएँ' से प्रारम्भ होनेवाली गल-वन्दना का पूर्याभास दिया है । ग्रीष्म को प्ररता और लू-नपटा का वाण-कृत वर्णन आज भी दृग्गाचर किया जा सकता है। शङ्कराचार्य-वृत धर्म की व्यास्या हमारे धर्म-निरपक्ष राज्य में भी शायद ही विमी को अमा य हो । जहाँ 'सुननामोपदेश' में योवन और लक्ष्मी के दुनिवार प्रमाप को नियन्त्रित सपने मी घेतावनी दी गई है, वहां पर मुनि के 'सद्वृत्तम्' में एक मातीन नाई की आवार-महिता उपस्थित की गई है । 'शब्दा- नुशासनम् का प्रकरण एर कुदाल भाषा गियी की कृति है, जो व्यावरण जैरा नाहे वे चने को गोदन पिण्डयन् मृदु और सुपाच्य बना देती है । पैनोपनिषद्' वाली निगवे की क्या, जिसमें देयना अपनी महत्ता में श्रोत ब्रह्म को इनार स्वर अपने को महिमावित मान बैठते हैं, क्या आज +उन जन-प्रतिनिधिया पर घटित नहीं होती, जो यह भून जाते हैं कि नी महिमा का सात जनता-जनार्दन है ? बादालि और उनके तप - पून आयम का वर्णन जाज के वातावरण में भले ही विचित्र और अव्यावहाग्दि लगे, किन्तु नगरी की चकात्रोंच से अस्त नागरिको के लिए, वह निम्मदेह नेत्रमन कान्नम्' है । दावानल को भी शान्त हो संस्कृत गद्य का विकास जाने का आदेश देनेवाले बतख बच्चे की वाणी मे क्या उस अहिसक की तेजस्वी वाणी नहीं सुनी जा सकती, जो बड़े-से-बड़े अत्याचारी को भी सत्य-बल से पराजित कर देता है ? अपने माता-पिता से हपं का वियोग प्रत्येक तरुण को इस अवश्यम्भावी वज्रपात को पूर्व-सूचना देता है और 'विपदि धैर्यम्' का चिर सम्वल प्रदान करता है। नाभानेदिष्ठ का निश्छल, सच्चा व्यवहार, जो प्रतिपक्षी को भी पानी-पानी कर देता है, उस देश में आज भी समावृत है, जिसकी भित्ति 'सत्यमेव जयते' की आधार-शिला पर खड़ी है। 'तैत्तिरीयोपनिषद्' का दीक्षान्त-भाषण हमारे सद्यःस्नातकों को सद्गृहस्य बनाने में सहायक होगा तथा अथर्व- वेदीय ऋषि की उदात्त वाणी उन्हे आशा, उत्साह, आत्मविश्वास और आत्मोन्नति का ओजस्वी सन्देश देगी।
संस्कृत-राय-बीथी.
१---भद्रं नो वितरन्तु देवाः
निर्दुरमण्यः। ऊर्जा मधुमती वाक् । मधुमतीः स्थ । मधुमती
वाचमुदेयम् । उपहूतो मे गोपाः, उपहूतो गोपीथः ।
सुश्रुतौ कौँ, भद्रश्रुतौ कणी, भद्रं श्लोकं श्रूयासम् ।
सुश्रुतिश्च मा' उपश्रुतिश्च मा हासिष्टाम् । सौपर्ण चक्षुः,
अजस्र ज्योतिः ।
मूर्धाऽहं रयीणाम्, मूर्धा समानानां भूयासम् । रुजश्च मा
वेनश्च मा हासिप्टाम् । मूर्धा च मा विधर्मा च मा हासिष्टम् ।
बृहस्पतिर्म आत्मा । तृमणा नाम हृद्यः । असन्तापं मे
हृदयम्, उर्वी गव्यूतिः, समुद्रोऽस्मि विधर्मणः ।
नाभिरहं रयीणाम्, नाभि समानानां भूयासम् । स्वासदसि
सूषा अमृतो मत्येवा।
मा मां प्राणो हासीत् । सूर्यो मा अह्नः पातु, अग्निः
पृथिव्याः, वायुरन्तरिक्षात्, यमो मनुष्येभ्यः, . सरस्वती
पार्थिवेभ्यः ।
स्वस्ति अद्य उपसो दोपसच । सर्वा आपः सर्वगणो
अशीय।
-~~-अयर्ववेद १६॥२-४
१. जिस 'मा' के नीचे रेखा अंकित है, वह अनुदात्त स्वर है और
'माम् के अर्थ में प्रयुक्त है।
सस्कृत-गद्य वीयी
२-सत्यमेव जयते
नाभानेदिष्ठ वं मानव ब्रह्मचर्य वसन्त भ्रातरो निरभजन ।
सोऽब्रवीदत्य-कि मह्यमभाक्त ?' इति ।
'एतमेव निष्ठावमववदितारम्' इत्यब्रुवन् ।
स पितरमेत्याब्रवीत्---'त्वा ह वाव मह्य तताभाक्षु'
इति।
त पिताऽब्रवीत् - 'माँ पुत्रक तदादृथा । अङ्गिरसो वा
इमे स्वर्गाय लोकार्य सत्यमासते। तैपर्छ पप्ठमेवाहरागत्य
मुह्यन्ति । तानेते सूक्ते पप्ठेऽहनि शसय । तेपा यत् सहस्र
सत्त्रपरिवेपण तत्त स्वर्सन्तो दास्यन्ति' इति।
तथेति । तानुपत्-प्रतिगृभ्णीत मानव सुमेधस' इति ।
तमब्रुवन्-'किकामो वास ।" इति ।
'इदमेव व पप्ठमह प्रज्ञापयानि' इत्यब्रवीत् । 'अथ
यद्वा एतत् सहस्र मत्त्रपरिवेपण तन्मे म्वर्यन्तो दत्त' इति ।
तथेति । तानेते सूक्ते पप्ठेयशंसयत् । तातो व ते प्र
यज्ञमजानन्, प्र स्वर्ग लोकम् । तद् यदेते सूक्ते पप्ठेऽहनि शसति,
यज्ञस्य प्रज्ञात्य, स्वर्गस्य लोकम्यानुस्यात्य । त स्वर्यन्तोऽब्रुवन्--
"एतत्ते ब्राह्मण सहस्रम्' इति ।
तदेन समाकुर्वाण पुरुष कृष्णशवास्युत्तरन उपोत्थाया-
ब्रवीत्-~-'मम वा इद, मम वै वास्तुहम्' इति ।
सोऽब्रवीत्-'मह्य वा इदमदु' इति ।
तमब्रवीत्-'तद्वै नौ तवैव पितरि प्रश्न' इति ।
स पितरमंत् । त पिताऽब्रवीत्-'मनु ते पुत्रक, अदु
'अदुरेव मे' इत्यब्रवीत्-'तत्तु मे पुरष कृष्णरावास्युत्तरत
उपोदतिप्ठत्-मम वा इद मम वं वास्तुहम् इत्यादित
"
इति ।
इति।
३७
आचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति
तं पिताऽब्रवीत्-'तस्यैव पुत्रक तत् । तत्तु स पुत्रक
तुभ्य दास्यति' इति ।
स पुनरेत्याह-'तव ह वाव किल भगव, इति मे पिताऽऽह'
इति।
मोऽब्रवीत्---'तदहं तुभ्यमेव ददामि, य एवं सत्यमवादी:,
इति।
-ऐतरेयत्राह्मणम् २२६
३-आचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति ।
सत्यं वद । धर्म चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय
प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सी: । सत्यान्न
प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुगलान्न प्रमदितव्यम् ।
भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
तृदेवो भव पितृ भव। आचार्यदेवो
अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि,
नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि,
नो इतराणि । ये के चास्मच्छ यांसो ब्राह्मणास्तेषां त्वयाऽऽसनेन
।
सस्कृत-गद्य-बीयो प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयाऽदेयम् । श्रिया देयम् । हिया देयम् । भिया देयम् । मविदा देयम् । अथ यदि ते कर्मविचिक्त्मिा वा वृत्तविचिकित्सा वा म्यात्, य तत्र ब्राह्मणा सम्मशिन , युक्ता , आयुक्ता , अलूक्षा , धर्म- कामा स्यु , यथा ये तत्र वर्तेरन् तथा तत्र वाय। । एप मादेश । एप उपदेश । एपा वेदोपनिषत् । एतदनुगामनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् । -तैत्तिरीयोपनिषत् ११११ ४-ब्रह्म एव महीयत । ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये । तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त रोक्षन्लाम्माकमेवाय विजयोऽस्माक्मेवाय महिमति । तदपा विजनी । तेभ्यो ह प्रादुर्वभूव । तन्न व्यजानत किमिद यक्षमिति । तेऽग्निमब्रुवन्जानवेद एतद्विजानीहि किमिद यक्षमिति । तथेति । तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोऽसीत्यग्निर्वा अह्मस्मीत्य- ब्रवीज्जातवेदा वा अह्मस्मीति । तम्मिस्त्वयि कि वीर्यमिति ? अपीद सर्व दहेय यदिद पृथिव्यामिति । तस्मै तृण निदधा- बेतहहेति । तदुपप्रेयाय सवजवेन तन्न शशाव दग्धुम् । सनत एव निववृते, नेतदगक विज्ञातु यदेतद्यक्षमिति । अथ वायुमवन्-वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति । तथेति। तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोमीति वायुर्वा अह- अधिकारिवधु राशो जागरुकता भस्मीत्यववीमातरिश्वा वा अहमस्मीति । तस्मिस्त्वयि किं वीर्यमिति ? अपीदं सर्वमावदीयं यदिदं पृथिव्यामिति । तस्मै तृण निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजनेन तन्न शशाका- दातुम् । स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञातु यदेतद्यक्षमिति । अथेन्द्र गब्रुवन्---मघवन्नेतहि जानीहि किमेतद्यक्षमिति । तथेति । तदस्मद्रनत् । तस्मात्तिरोदधे । स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम । बहुशोभमानामुमा हैमवती तां होवाच किमे- तद्यक्षमिति । सा ब्रह्मेति होवाच, ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति । ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति । तस्माद्वा एते देवा अतितरा- मिव.न्यान्देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रस्तेन झेलन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते होनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति । तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरा- मिवान्प्रान्देवान्स ह्यगन्नेदिष्टं पस्पर्श, स ह्येनत्प्रथमो विदा- ञ्चकार ब्रह्मेति । ----केनोपनिषत् ३. -अधिकारिवर्येषु राज्ञो जागरूकता अमात्यसम्पदोपेता: सर्वाध्यक्षाः शक्तितः कर्मसु नियोज्याः । कर्मसु पां नित्यं परीक्षां कारयेत्। चित्तानित्यत्वात्मनुष्याणाम् । अश्वसधर्माणो हि मनुष्या नियुक्ताः कर्मसु विकुर्वते । तस्मात् कर्तारं करणं देश कालं कार्य प्रक्षेपमुदयं चैपु विद्यात् । ते यथा सन्देशमसंहता अविगृहीताः कर्माणि कुर्युः । संहता ४० सस्कृत-गद्य-धीयो मक्षयेयु । विगृहीता विनाशययु । न चानिवेद्य भर्तु कच्चिदा- रम्भ कुर्यु रन्यत्रापत्प्रतीकारेभ्य । प्रमादस्थानेषु चंपामत्यय स्थापयेद्दिवसवेतनव्ययद्विगुणम् । यश्नपा ययादिप्टमर्थ मविशेप वा करोति स न्यानमानी नभेत । य ममुदय पन्हिापयति स गजार्थ भक्षयति । न चेदनाना- दिभि परिहापयति तदेन यथागुण दापयेत् । य समुदय द्विगुणमुद्- भावयति म जनपद भक्षयनि। म चेद्राज'नमुपनयति । अल्पापगधे वारयितव्य । महति ययापराध दण्डयिनव्य । य ममुदय व्ययमुपनयनि म पुरपकर्माणि भक्षयति । म कर्म दिवमद्रव्य- भूत्यपुस्पवेतनापहारेषु यथापगघ दण्डयितव्य । तस्मादस्य यो यस्मिन्नधिकरणे शासनस्थ स तम्य कर्मणों' याथातथ्यमायव्ययौ च व्यासममामाभ्यामाचक्षीत । मूलहर नादात्विक्कदर्याश्च प्रतिपेधयेत् । य पितृपंताममर्थमन्यायेन भक्षयति म मूलहर । यो यद्यदुत्पद्यते तत्तद्भक्षयति म नादान्विक् । यो भृत्यात्मपीडाभ्यामुपचिनोत्यर्थं स कदर्य । अध्यक्षा सन्यायक्लेवकरूपदर्शकनीवीगाहोत्तराध्यक्ष- सखा कर्माणि कुर्यु । हम्त्यश्वरयारोहाम्नेषामन्तेवामिन मिल्प- शौचयुक्ता सस्यायकादीनामपमर्पा । वहुमुग्यमनिन्य चाधि- गरण म्यापयेत् । मत्स्या ययान्त मलिले चरन्तो ज्ञातु न शक्या सलिल पिवन्त । युक्तास्तथा कार्यविधी नियुक्ता ज्ञातु न गक्या धनमाददाना ॥ अपि दाक्या गति तु पतता खे पतत्रिणाम् । न तु प्रच्छन्नभावाना युक्ताना चरता गति ॥
अनन्तपारं किल शब्दशास्त्री ४१ न भक्षयन्ति ये त्वर्थान्यायतो वर्धयन्ति च । नित्याधिकाराः कार्यास्ते राजः प्रियहिते रताः ।। -~-कौटिल्यः, अर्थशास्त्रम् २६ ६-अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रम् , अथ शब्दानुशासनम् । केषां शब्दानाम् ? लौकिकानां वैदिकाना च । तत्र लौकिकास्तावद्-- 'गौः, अश्वः, पुरुपः, हस्ती, शकुनि:, मृगः, ब्राह्मणः' इति । वैदिकाः -खल्वपि-~-'शं नो देवीरभिष्टये। इपे त्वोर्जे त्वा । अग्निमीडे पुरोहितम् । अग्न आ याहि वीतये' इति । अथ गौरित्यत्र क: गव्दः ? किं यत्तत्सास्नालागूलककुदखुर- विषाण्यर्थरूपं सः शब्दः । नेत्याह । द्रव्यं नाम तत् ।। यत्तहि तदिङ्गितं चेष्टितं निमिपितमिति स शब्दः ? नेत्याह । क्रिया नाम सा । यत्तर्हि तच्छुक्लो नीलः कपिलः कपोत इति स शब्दः ? नेत्याह ! गुणो नाम सः । यत्तहि तद्भिन्नेष्वभिन्न छिन्नेप्वच्छिन्नं सामान्यभूतं स शब्दः? नेत्याह । आकृति म सा । कस्तहि शब्द: ?
४२ रास्त गद्य-वीयो येनोच्चारितेन सास्नाताडगूलककुदखुरविपाणिना सम्प्र- त्ययो भवति म शब्द । अथवा प्रतीतपदार्थको लोके ध्वनि शब्द इत्युच्चते। तद्यथा-शब्द कुर, मा शब्द काी , शब्दकार्यय माणवक , इति ध्वनि वुर्वन्नेवमुच्यते । तम्माद् ध्वनि शब्द । - " कानि पुन शब्दानुशासनन्य प्रयोजनानि ? रक्षोहागमलध्दसन्देहा प्रयोजनम् । रक्षार्थ वेदानामध्येय व्याकरणम् । लोपागमवर्णविकारज्ञो हि सम्यग्वेदान्परिपाल- मिप्यतीति । अह खन्वपि-न सर्वेलिङ्गन च सर्वाभिविभक्ति-- भिवंदे मन्त्रा निगदिता । ते चावश्य यज्ञगतेन पुरपेण यथायथ विपरिणयितव्या । तान्नावैयाकरण शक्नोति यथायथ विपरिणमयितुम् । तस्मादध्येय व्याकरणम् । आगम मल्वपि-'ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्म पडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च' इति । प्रधान च पदम्बङ्गेयु व्याकरणम् । प्रधाने च कृनो यत्न फलवान् भवति । लवर्थ चाध्येय व्याकरणम् । न चान्तरेण व्याकरण लधुनोपायेन शब्दा गन्ना ज्ञातुम् । अमन्देहार्य चाध्येय व्यानरणम् । याशिका पठन्ति-. 'स्थूलपनीमाग्निवारगोमनट्दाहीमाल भेन' इति । मन्देह --म्यूला चामो पृपती न न्यूलस्पतो, न्यूलानि पृपन्ति यम्या सेय म्यूलतीनिता बरावयामण स्वरतोऽयसम्यति- यदि पूर्वपदप्रतिस्मरत्व ननो बलीहि,ग्ध नमामानो-- दानव तनम्नायुम्प इति । तल्या अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रम् ४३ शब्दानुशासनमिदानी कर्तव्यम् । तत्कथं कर्तव्यम् ? किं शब्दोपदेशः कर्तव्यः, आहोस्विदप- शब्दोपदेशः, आहोस्विदुभयोपदेश इति । यदि तावच्छन्दोपदेशः क्रियते गौरित्येतस्मिन्नुपदिष्टे गम्यत एतद्---गाव्यादयोऽपशब्दा इति । अथाप्यपशब्दोपदेशः क्रियते गाव्यादिपूपदिष्टेपु गम्यत एतद्-गौरित्येष शब्द इति । किं पुनरत्र ज्यायः ? लघुत्वाच्छब्दोपदेशः । गरीयानपशब्दोपदेशः। एककस्य शब्दस्य वहबोऽपभ्रंशाः। तद्यथा गौरित्यस्य शब्दस्य 'गावी', 'गोणी', 'गोता', 'गोपोतलिका' इत्येवमादयोऽपभंशाः । इप्टावा- स्थान खल्वपि भवति । अनभ्युपाय एप शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः । एवं हि श्रूयते---बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्य वर्षसहस्र प्रतिपदोक्तानां शब्दानां शब्दपारायणं प्रोवाच । नान्तं जगाम । वृहस्पलिश्च प्रवक्ता, इन्द्रश्चाध्येता, दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालो न चान्तं जगाम ! कि पुनरद्यत्वे ? यः सर्वथा चिरं जीवति वर्षशतं जीवति । चतुभिश्च प्रकाविद्योपयुक्ता भवति-- आगमकालेन, स्वाध्यायकालेन, प्रवचनकालेन, व्यवहारकालेनेति । तत्र चास्या- गमकालेनवायुः कृत्स्नं पर्युपयुक्तं स्यात् । तस्मादनभ्युपाय: शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः । -~~-पतञ्जलिः, महामाष्यम् १।११ सस्कृत-गद्य-वीयो ७-सत्सेवितः पन्थाः . मवृत्तमखिलेनोपदेक्ष्याम । तद्यथा- -देवगोब्राह्मणगुरु वृद्धसिद्धाचार्यानर्चयेत् । अग्निमुपाचरेत् । औपधी प्रशस्ता घारयेत् । द्वौ कालावुपस्पृशेन् । मलायनेप्वभीक्ष्ण पादयोश्च वैमल्यमादध्यात् । त्रि पक्षम्य केशश्मश्रुलोमनखान् महारयेत् । नित्यमनुपहतवामा मुमना मुगन्धि स्यात् । माधुवेग , प्रमाधितकेग, मूर्घथोत्रघ्राणपादतलनित्य , पूर्वाभिभापी, मुमुख , दुर्गप्वभ्युपपत्ता, होता, यप्टा, दाता, चतुष्पथाना नमस्कर्ता, वलीनामुपहर्ता, अतिथीना पूजक , पितृभ्य पिण्डद , काले हितमितमधुगर्थवादी, वश्यात्मा, धर्मात्मा, हेतावीर्यु , फ्ले ने' , निश्चिन्त , निर्भीक , धीमान्, ह्रीमान्, महोत्माह , दक्ष ,क्षमावान्, धार्मिक ,आस्तिक , विनय- बुद्धिविद्याभिजनवयोवृद्धसिद्धाचार्याणामुपासिता, छत्री, दण्डी, माली, मोपानत्क , युगमात्रदृग्विचरेत् । मङ्गलाचारशील , कुचलास्थिकण्टकामेध्यकेतुपोत्करभम्मक्पा तस्नानलिभूमीना परिर्ला। प्राक् श्रमाद् व्यायामवर्जी स्यात् । सर्वप्राणिषु बन्धुभूत म्यात् । ऋद्धानामनुनेता, भीनानामाश्यामयिता, दीनानामभ्युप- पत्ता,सत्यसन्ध, मामप्रधान , परपम्पवचनमहिष्णु , अमर्पघ्न , प्रशमगुणदर्शी, गजद्वेषहेतूना हन्ता । - नानृत ब्रूयात् । नान्यम्बमादद्यात् । नान्यस्त्रियमभिनपेन्नाम्य- श्रियम्। न वैर रोचयेत्। न कुर्यात्पापम् । न पापेऽपि पापी म्यात् । नान्यदोपान् ब्रूयात् । नान्यरहस्यमागमयेत् । नाधामिनं नरेन्द्र- द्विष्टं सहामीन नोन्मत्तनं पतित्तन भ्रूणहत्तृभिर्न क्षुदन दुष्ट ।
सत्सेवितः पन्याः ४५ । क्षपास्व- न दुष्टयानान्यारोहेत् । नाजानुसमं कठिनमासनमध्यासीत,. नानास्तीर्णमनुपहितमविशालमसमं वा शयनं प्रपद्येत, न गिरि- विषममस्तकेप्वनुचरेत् । न द्रुममारोहेत् । न जलोरवेगमवगाहेत। कूलच्छायां नोपासीत । नारन्युत्पातमभितश्चरेत् । नोचैर्हसेत् । न शब्दवन्तं मारुतं मुञ्चेत् । नासंवृतमुखो जृम्भां क्षव) हास्य वा प्रवर्तयेत् । न नासिकां कुष्णीयात् । न दन्तान् विघट्टयेत् । न नखान् वादयेत् । नास्थीन्यभिहन्यात् । न भूमि विलिखेत् । न छिन्चात्तृणम् । न लोप्ट्र मृद्गीयात् । न विगुणमंगचेष्टेत । ज्योतीष्यनिप्टममेध्यमशस्तं च नाभिवीक्षेत। न हुं कुर्याच्छवम् । न चैत्यध्वजगुरुपूज्यागस्तच्छायामाकामेत् । मरसदनचैत्यचत्वरचतुप्पथोपवनश्मशानाघातनान्यासेवेत । नैक: शून्यगृहं न चाटवीमनुप्रविशेत् । न पापवृत्तान् स्त्रीमित्रभृत्यान् भजेत । नोत्तमविरुध्येत । नावरानुपासीत । न जिह्यं रोचयेत् । नानार्यमाश्रयेत । न भयमुत्पादयेत् । न साहसातिस्वप्नप्रजा- गरस्नानपानाशनान्यासेवेत । नोर्ध्वजानुश्चिरं तिष्ठेत् । न व्यालानुपसर्पन्न दंष्ट्रिणो न विपाणिनः । पुरोवातालपावश्या- यातिप्रवातान् जह्यात् । कलि नारभेत । नासुनिभृतेऽग्नि- मुपासीत । नोच्छिष्टो नाधःकृत्वा प्रतापयेत् । नाविगतक्लमो. नानाप्लुतवदनो न नग्न उपस्पृशेत् । न स्नानशाट्या स्पृशेदु- त्तमांगम् । न केशाग्राण्यभिहन्यात् । नोपस्पृश्य त एव वाससी विभृयात् । नास्पृष्ट्वा रत्नाज्यपूज्यमंगलसुमनसोऽभिनिष्क्रामेत् । न पूज्यमङ्गलान्यपसव्यं गच्छेन्नेतराण्यनुदक्षिणम् । नारत्नपाणिनास्नातो नोपहतवासा नाजपित्वा नाहुत्वा देवताभ्यो नानिल्प्य पितृभ्यो नादत्त्वा गुरुभ्यो नातिथिभ्यो नोपाथितेभ्यो नापुण्यगन्यो नामाली नाप्रक्षालितपाणिवदनो नाशुद्धमुखो नोदड्मुखो न विमना नाभक्ताशिष्टाशुचिक्षुधित-.
सस्मृत-गद्य-वीयो परिचरो न पात्रीप्वमेवयासु नादेशे नाकाले नाकीणे नादत्त्वाऽग्र- मग्नये नाप्रोक्षित प्रोक्षणोदकनं मन्त्रैरनभिमन्त्रित न कुत्मयन् न कुन्सित न प्रतिकूलोपहितमन्नमाददीत, न पर्युपितमन्यत्र मासहरितकशुप्कशाकफलभक्ष्येभ्य । नागेपभुक् म्यादन्यत्र दधिमधुलवणसक्तुसपिभ्य । न नक्त दधि भुजीत । न सक्तूने- कानश्नीयात्, न निशि, न भुक्त्वा, न बहून्, न द्वि . नोदकान्न- रितान्, न छित्त्वा द्विजर्भक्षयेन् । नानृजु क्षुयान्नाद्यान्न शयीत । न वेगितोऽन्यकार्य स्यात् । न वाय्वग्निमलिलमोमार्कद्विजगुम्प्रतिमुख निप्टीविकावातवर्गों- मूत्राण्युत्सृजेत् । न पन्यानमवमूत्रयेत् । न जनवति नान्नकाले न जपहोमाध्ययनवलिमङ्गलत्रियासु श्लेप्ममिवाणक मुञ्चेत् । न सतो न गुम्न परिवदेत् । नाशुचिरभिचारकर्मचैन्य- पूज्यपूजाध्ययनमभिनिर्व येत्। न विद्युत्स्वनार्तवीपु, नाम्य दितासु दिक्षु, नातिमम्प्लवे, न भूमिकम्पे, न महोत्मवे, नोल्कापाते, न महामहोपगमने, न नष्ट- चन्द्राया तिथी, न मन्ध्ययो , नामुखाद् गुरो , नावपतितम्, नानि- मात्रम्, न तान्तम्, न विस्वरम्, नातिद्रुतम्, न विलम्वितम्, नातिक्लीवम्, नात्युच्च तिनीचं स्वररध्ययनमभ्यमेत् । नातिममय जह्यात् । न नियम भिन्द्यात् । न नक्त नादेगे चरम् । न मन्च्याम्बभ्यवहाराध्ययनम्त्रीस्वप्नमेवी म्यात् । न बालवृद्धलुब्धमूक्तिप्टक्तीवं सह सख्य कुर्यात् । न मद्यधूत- वेश्याप्रमगरचि स्यात् । न गुह्य विवृणुयात् । न कञ्चिदव- जानीयात् । नामानी स्यान्नादक्षो नादक्षिणो नासूयक । न गवा दण्डमुद्यच्छेत् । न वृद्धान्, न गुरुन्, न गणान्, न नृपान् वाऽधिक्षिपेत् । न चातिब्रूयात् । न बान्धवानुरक्तकृच्छद्वितीय- गुह्यज्ञान् वहि कुर्यान् ।
नयनाग्निः प्रभवति ४७ 'नाधीरो नात्युच्छ्रितसत्त्वः स्यात्, नाभृतभृत्यः, नाविश्नब्ध- स्वजनः, नैक: सुखी, न दुःशीलाचारोपचारः, न सर्वविश्रम्भी, न सर्वाभिशङ्की, न सर्वकालविचारी। न कार्यकालमतिपातयेत् । नापरीक्षितमभिनिविशेत् । नेन्द्रियवशग. स्यात् । न चञ्चलं मनोऽनुभ्रामयेत् । न बुद्धीन्द्रियाणामतिभारमादच्यात् । न चाति- दीर्घसूत्री स्यात् । न कोधावनुविदध्यात् । न शोकमनुवसेत् । न सिद्धावीत्सुक्यं गच्छेन्नासिद्धौ दैन्यम् । प्रकृतिमभीक्ष्णं स्मरेत् । हेतुप्रभावनिश्चितः स्यात् हेत्वा- “रम्भनित्यश्च । न कृतमित्याश्वसेत् । न वीर्य जह्यात् । नापवाद- अनुस्मरेत् । ~ चरकसंहिता ८ ८-न यत्रान्तिः प्रभवति सत्यपरिभावितां वाचमरिनरपि न असहते लवयितुमिति सत्यवचनेऽभियोग: करणीयः । तद्यथानुश्रूयते । बोधिसत्वः किलान्यतमस्मिन्तरण्यायतने वर्तकापोतको भवति स्म । स कतिपयरात्रोद्भिन्नाण्डकोशः प्रविरोक्ष्यमाणतरुणपक्ष:
४८ सस्कृत-गद्य-वीयो परिदुर्वलन्दादलक्ष्यमाणाङ्गप्रत्यङ्गप्रदेश स्वमातापितृप्रयलरचिते तृणगोपगूढे गुल्मलतासनिश्रिते नीडे मम्बहुलंभ्रातृभि साध प्रतिवर्मात म्म । तदवस्थोऽपि चापरिप्लुतधर्मसजत्वान्मातापित- भ्यामुपहृतान्प्राणिनो नेच्छनि स्माभ्यवर्तुम् । यदेव त्वस्य तृण- वीजन्यग्रोधफलागुपजहतुर्मातापितरां तेनैव वतंयामाम । तस्य तया म्क्षाल्पाहारतया न काय पुष्टिमुपययो । नापि पक्षो सम्यक् प्रविस्रोतु । इतरे तु वर्तकापोतका यथोपनीतमाहारमभ्यवह- रन्तो वलवन्त सजातपक्षाश्च बभूवु । धर्मता ह्येषा यदुन--- धर्माधर्मनिराश नर्वाशी सुखमेधते। धम्यां तु वृत्तिमन्विच्छन्विचिताशीह दुखित ॥ ह्रीमना त्विह दुर्जीव नित्य गुचिगवेपिणा । सलोनेनाप्रगल्भेन शुद्धाजीवेन जीवता ।। तेपामेवमवम्याना नातिदूरे महान्वनदाव प्रतिभयप्रमकन- निनदो विजृम्भमाणमराशिवितीर्यमाणज्वालावलीलोलविस्फु- लिङ्ग सन्यामनो वनचराणामनयो वनगहनाना प्रादुरभवत् । भयगुतोद्घालविङ्गमार्थ परिभ्रमद्भीतमग ममन्तात् । धूमोघमग्न पट्टवह्निशब्द वन तदात्येव भृश रगम ।। क्रमेण चोत्पीड्यमान म इव वह्नि पटुना मारतेन तृणगला- नुसारी तेपा नोडममीपमुपजगाम। अथ ते वर्तकापोतका मय- विरमव्याकुलविरावा परस्परनिरपेक्षा सहमा ममुत्पेतु । परि- दुर्बलत्वादमजातपक्षत्वाच्च वोधिसत्त्वम्नु नोत्पतिनु प्रयल चवार। विदितात्मप्रभावमन्वयम्भ्रान्न एव स महामत्त्व:- न यत्राग्निः प्रभवति ४६ सद्यः । अवापि त सरभसमिवोपसर्पन्तग्नि सातुनयमित्युवाच- व्यर्याभिवान चरणोऽस्म्यविरूढपक्ष- स्त्वत्सम्भ्रमाच्च पितरावपि मे प्रडीनौ । त्वदोग्यमस्ति न च किञ्चिदिहातिथेय- मस्मान्नितितुमतस्तव युक्तमग्ने । इत्युक्ते सत्यपरिभावितवचसा तेन महासत्त्वेन- उदीर्यमाणोऽप्यनिलेन सोऽग्न्ति- विशुष्कससक्ततृणेऽपि कक्षे। नदीमिव प्राप्य विवृद्धतोया लद्वाचमासाद्य शगाम हिमवति प्रथित प्रदेश दावाग्निन्नशिखोऽपि समीरणेन । मन्त्राभिशप्त इव नैकशिरा भुजङ्ग. मङ्कोचमन्दलुलिताचिरुपति गान्तिम् ।। तत्किमिदमुपनीतमिति, उच्यते- वेलामिव प्रचलितोमिफण समुद्रः शिक्षा मुनीन्द्रविहितामिव सत्यकामः । सन्यात्मनामिनि द लङ्कयितु यदाज्ञा शक्त. कृशानुरपि सत्यमो म जह्यात् ।। नदेवं सत्यवचनपरिभाविता वाचमग्निरपि न प्रसहते लयितुमिनि मत्यवचनेऽभियोग करणीयः । आर्यशुरः (जातकमालायां वर्तकापोतकजातकम्) सस्कृत-गद्यन्चोयो -दारगुणाः अस्ति द्रविडेषु काञ्ची नाम नगरी। तस्यामनेरुकोटिसार थेप्ठिपुत्र शक्तित्रुमागे नामामीत् । सोऽष्टादशवर्षदेशीय- चिन्तामापेदे- 'नास्यदाराणाम् अननुगुणदाराणा वा सुख नाम निकय नु गुणवद् विन्देय कलत्रम्' इति । अथ परप्रत्ययाहुतेषु दारेषु यादृच्छिकी मम्पतिमन- भिसमीक्ष्य काःन्तिको नाम भूत्वा वस्त्रान्तपिनद्धगालिप्रस्थो भुव वभ्राम। 'लक्षणोऽयम्' इत्यमुप्म कन्या कन्यावन्त प्रदर्शयाम्बभूवु या काञ्चिलक्षणवती सवर्णा कन्या दृष्ट्वा स क्लि स्म ब्रवीति--भद्रे, शक्नोपि विमनेन शानिप्रस्थैग गुण- वदन्नमस्मानभ्यवहारयितुम्' इनि। स हसितावधूतो गृहाद् गृह प्रविश्याश्रमत् । एकदा तु शिविपु कावेरोनीरपत्तने मह पितृभ्यामवसित- मद्धिमवशीणभवनमारा पान्या प्रदर्शनाना काञ्चन विरल. भूपणा कुमारी ददर्श । अन्धा ससक्तचक्षुश्चातयत्-.-'अस्या खलु कन्यकाया मर्द एवापयवा नातिस्थूला नातिकमा नाति- ह्रस्वा नातिदीर्घा न विक्टा मजावतश्च । रतलाइगुली यवमत्स्यकम कलशाधनेकपुप्यलेखालाञ्छिनौ करो, सम- गुल्फसन्धी मासलावगिरालो चाहनी, तनुतरमीपन्निम्न गम्भीर नाभिमण्डलम्, पलित्रयेण चालतमुदरम्, धनधान्य- पुत्रमयस्त्वविह्नलेखालान्छितनले स्निग्धोदनकोमलनसमणी ऋज्वनुपूर्ववृत्तताम्राङ्गुली मनतासदेशे सौकुमार्यवत्यो निमग्न- पर्वसन्धी च वाहुलते, तन्वी फम्बुवृत्तवन्धुरा च कचरा, वृत्त- - ५१ दारगुणाः मध्यविभक्तरागावरम् असंक्षिप्तचारुचिबुकम् आपूर्णकठिन- गण्डमण्डलम् असङ्गतानुवक्रनीलस्निग्वधूलतम् अनतिप्रौढ- तिलकुसुमसदृशनासिकम् असितधवलरक्तत्रिभागभासुरमधुरा- धीरसञ्चारमन्थरायतेक्षणम् इन्दुशकलसुन्दरललाटम् इन्द्र- नीलशिलाकाररम्यालकपंक्ति द्विगुणकुण्डलितम्लाननालीकनाल- ललितलम्बश्रवणपाशयुगलमानरकमलम्, अनतिभङ्गुरो बहुलः पर्यन्तेऽप्यकपिकलरुचिरायामवानेकैकनिसर्गसमस्निग्धनीलो गन्ध- पाही च मूर्धजकलापः । सेयमाकृतिर्न व्यभिचरति शीलम् । आसज्जति च मे हृदयमस्यामेव । तत्परीक्ष्यनामुदहेयम् । अविमृश्यकारिणां हि नियतमनेकाः पतन्न्यनुशयपरम्पराः' इति स्निग्धदृष्टिराचष्ट --'भद्रे, कच्चिदस्ति कौशलं शालिप्रस्थेनानेन सम्पन्नमाहारमस्मानभ्यवहारयितुम्' इति । ततस्तया वृद्धदासी साक्तमालोकिता। तस्य हस्तात्प्रस्थ- मात्र धान्यमादायक्वचिदलिन्दोद्देशे मुसिक्तसंमृष्टे दत्तपादगौच- मुपावेशयत् । सा कन्या तान् गन्धशालीन्संक्षुद्य मात्रया विशो- प्यातपे मुहुर्मुहुः परिवर्त्य स्थिररामायां भूमौ नालीपृष्ठेन मृदु मृदु घट्टयन्ती तुपैरखण्डस्तण्डुलान् पृथक्चकार । धात्रीम्--'मातः, एभिस्तुपैरथिनो भूपणमृजाक्रियाक्षमः स्वर्णकाराः। तेभ्य इमान्दत्त्वा लब्धाभिः काकिणीभिः स्थिर- तराण्यनत्याणि नातिशुष्काणि काप्ठानि मितंपचां स्थालीमुभे शरावे चाहर' इति । जगाद च तथाकृते तया तांस्तण्डुलाननतिनिम्नोत्तानविस्तीर्णकुक्षौ ककुभोलूखले लोहपत्रवेप्टितमुलेन समशरीरेण विभाव्यमान- मध्यतानवेन व्यायतेन गुरुणा खादिरेण मुसलेन चतुरललितो- ५२ संस्कृत गय वीथी रक्षपणावक्षेपणायामितभुजम् अमकृदद्गुलिभिरुद्धत्योढत्यावहन्य शूर्पयोधितकणकिशारकाम्तण्डुलानसकृद्भ प्रक्षात्य क्वथित- पञ्चगुणे जले दत्तचुल्लीपूजा प्राक्षिपत् । प्रश्लयावयवेपु प्रस्फुरत्सु तण्डुलेषु मुकुलावस्थामतिवर्तमानेपु मक्षिप्यानलमुप- हितमुखपिधानया म्यात्यान्नमण्डमगालयत् । दा चायघट्टय मात्रया परिवर्त्य समपक्वेपु सिक्येषु ता म्यालीमधोमुखीमवा- तिष्ठिपत् । इन्धनान्यन्त सागण्यम्भमा ममभ्युध्य प्रगमिता- ग्नीनि कृष्णाङ्गागकृत्य तथभ्य प्राहिणोत्-'एभिलब्धा काकिणीदत्त्वा शाक धृत दधि तलमामलक चिञ्चाफत च यथा-लाभमानय' इति। तथानुष्ठिते च तया द्विवानुपदगानुपाय नदन्नमण्डमाई - वालुकोपहितनवगरावगतमतिमृदुना तालवृन्तानिलेन जीतनी- कृत्य, मलवणमम्भार दत्ताङ्गारपवाम च यम्पार, तदप्पामलका इलक्षणपिष्टमुत्पलगन्धि कृत्वा धानीमुम्बेन म्नानाय नमचोदयत् । तथा च स्नानमुद्धया दत्ततेलामलक क्रमेण पस्नौ । स्नात मिक्तमृष्टे कुट्टिम फतकमाह्य पाण्डहरितस्य विभागोप- लूनस्याङ्गणक्दलीपलागम्योपरि दत्तगगवद्वयमार्द्रमभिमगन्न- तिष्ठत् । मा तु ता पेयामेवाग्रे ममुपाहरन् । पीत्वा चापनीतान- कनम प्रहन्ट प्रकिनन्नमरलगाव स्थितोऽभूत् । ततस्तस्य शाल्योदनस्य दींद्वय दत्त्वा मपिर्माता भूपमुप- दा चोपजहार । इम च दघ्ना च विजानकावचूणितेन मुरभि- गीतलाभ्या च कालशेयकाजिकाभ्या भेषमन्नमभोजयन् । सोप एवान्यस्यसावतृप्यत् । अयाचत पानीयम् । अयनव मृङ्गारसम्भृतमगुन्धुपधूपिनमभिनवपाटलाकुसुमवामितमुत्फुल्लो- प्रणम्या दूरतः खलाः त्पलग्रथितसौरभ वारि नालीधारात्मना पातयाम्बभूव । सोऽपि मुखोपहितशरावेण हिमशिशिरकणकरालितारुणायमानाक्षिपक्ष्मा धारावाभिनन्दितश्रवण: स्पर्शसुखोद्भिन्नरोमाञ्चकर्कश- कपोल. परिमलप्रवालोत्पीडफुल्लघ्राणरन्घ्रो माधुर्यप्रकर्षा- वजितरसनेन्द्रियस्तदच्छं पानीयमाकण्ठं पपौ। शिरःकम्पसंजा- वारिता च पुनरपरकरकेणाचमनमदत्त कन्या । बुद्धया तु तदुच्छिष्टमपोह्य हरितगोमयोपलिप्ते कुट्टिमे स्वमेवोत्तरीय- कर्पटं व्यवधाय क्षणमशेत । परितुष्टश्च विधिवदुपयम्य कन्यां निन्ये । नीत्वैतदनुपेक्षः कामपि गणिकामवरोधमकरोत् । तामप्यसौं प्रियसखीमिवो- पाचरत् । पतिं च देवतमिव मुक्ततन्द्रा पर्यचरत् । गृहकार्याणि चाहीनमन्वतिष्ठत् । परिजन दाक्षिण्यनिधिरात्माधीनमकरोत् । लद्गुणवशीकृतश्च भर्ता सर्वमेव कुटुम्वं तदायत्तमेव कृत्वा तदेकाधीनजीवितशरीरस्त्रिवर्ग निर्विवेश । तद्रवीमि~- 'गृहिण. प्रियहिताय दारगुणा' इति । -दंडी (दशकुमारचरितम् ६) १०-प्रणम्या दूरतः खलाः अनिष्टोद्भावनरसोत्तरं हि भवति खलहृदयम् । को नामाऽस्य तत्त्वनिरूपणे समर्थः ? तथाहि---भीमो नवकद्वेषी, आश्रयाशोऽपि मातरिश्वा, अतिकटुरपि महारसः, सर्पपस्नेह इव करयुगलालितोऽपि शिरसा धृतोऽपि न कटुत्वं जहाति । ताल- फलरस इवापातमधुरः परिणामविरसस्तिक्तश्च । पादपराग सस्कृत-गद्य-योयो इवावधूतोऽपि मूर्धान कपाययति । विपतरुप्रसूनमिव यथा यथा- ज्नुभूयते तथा तथा मोहमेव दृढयति । नीचदेशस्येव न वारिविरहोऽस्य जायते। निदाघदिवस इव वहुमत्सर सुमनसा मन्ताप वहति । अन्धकार इव दोषानुवन्धचतुरो विश्वकर्माव- लोपनोद्यतश्च । रुद्र इव विरुपाक्ष , विष्णुरिव चक्रधर । मक्राश्व इवोच्च श्रवा नदेशजप्रशसी च । शरस्येव विभिन्न- स्यापि मत स्नेह दर्शयत तक्राट इव हृदय विलोडयति । यक्षबलिरिव आत्मघोपमुखरो मण्डतभ्रमणकश्च । मातङ्ग इव स्ववशालोलमुसोऽधरीकृतदानश्च । वृपभ इव सुरभियानविकल । कामीव गोत्रस्खलनविधुरो वामाध्वानुरक्तश्च। जीर्णरोग इव कलेवर वचसि मन्दिमानमावति । वञ्चक इव रक्त कटपले विभावरीरक्तश्च । परेत इव वन्धुतापदर्शन । परशुरिख भद्रश्रियमपि सण्डयति । कुदाल इव दलितगोत्र क्षमाभाज. प्राणिनश्च निकृन्तति । रतिकील इव जघन्यकर्मलग्नो हपयति साधून् । दुष्टशूपश्रुतिरिव काननरचिरनुगतमपि यवम सतत नानुमोदते । अवाजादेव जायन्ते, अकाण्डादेव प्ररोहन्ति खलन्यमनाङकुरा , दुरच्छेदाश्च भवन्ति । असता हृदि प्रविष्टो दोपलव करालायते। मता तु हृदि न प्रविगत्येव । यदि कथमपि प्रविगति तदा पारद इव क्षणमपि न तिष्ठति । मृगा इव विनोदविन्दोवंशगा न भवन्ति माधव । सुख जना हि मवादृना शरत्समया इव हरन्ति मित्रमण्डलस्य । न च मचेतना विसदृशमुपदिशन्ति । अचेतनानामपि मैत्री ममुचितपक्षे निक्षिप्ता । तथाहि-माधुर्यशैत्यशुचित्वसन्ताप- शान्तिभि पय इति। शब्दमाम्याच्च मित्रतामुपगतस्य तत्सङ्गमाद- भिवधिनस्य क्षीरस्य क्वाथे परतो ममंव क्षयो युक्त इति विचि- न्त्येव वारिणा क्षीयते । -सुबन्धु (वासवदत्ता) दहति निदाघो नितराम् ११-दहति निदाघो नितराम् कदाचित्कुसुमसमययुगमुपसंहरन्नजृम्भत ग्रीष्माभिधानः सम्फुल्लमल्लिकाधवलाट्टहासो महाकालः । प्रत्यग्रनिजितस्या-- स्तमुपगतवतो वसन्तसामन्तस्य वालापत्येष्विव पयःपायिषु नवोद्यानेषु दर्पितस्नेहो मृदुरभूत् । अभिनवोदितश्च सर्वस्यां पृथिव्यां सकलकुसुमवन्धनमोक्षमकरोत्प्रतपन्नुष्णसमयः । स्वयमृतुराजस्याभिषेकादश्विामरकलापा इवागृह्यन्त कामिनी- चिकुरचया: कुसुमायुधेन। हिमदग्धसकलकमलिनीकोपेनेव हिमालयाभिमुखीं यात्रामदादंशुमाली। अथ ललाटन्तपे तपति तपने चन्दनलिखितललाटिकापुण्ड्रक- रलकचीरचीवरसवीतैः स्वेदोदविन्दुमुक्ताक्षवलयबाहिभि- दिनकराराधननियमा इबागृह्यन्त ललनाललाटेन्दुभिः । चन्दन- धूसराभिरसूर्यम्पश्याभिः कुमुदिनीभिरिव दिवसमसुप्यत सुन्दरीभिः । निद्रालसा रत्नालोकमपि नासहन्त दृशः, किमुत जरठमातपम् । अशिशिरसमयेन चक्रवाकमिथुनाभिनन्दिताः सरित इव तनिमानमानीयन्त मोडुपाः शर्वर्यः। अभिनवपटु- पाटलामोदसुरभिपरिमलं न केवल जलम्, जनस्य पवनमपि पातुमभूदभिलापो दिवसकरसन्तापात् । क्रमेण च खरखगमयूखे, खण्डितशेशवे, शुण्यत्सरसि, सीद- स्रोतसि, मन्दनिर्झरे, कातरकपोतकूजितानुबन्धवधिरितविश्वे, श्वसत्पतत्रिणि, करीपत्रपमरुति, विरलवीरुधि, रुधिरकुतूहलि- केसरिकिशोरकलिह्यमानकठोरधातकीस्तवके, लोहितायमान- मन्दारसिन्दुरितसीम्नि, धर्ममर्मरितगर्मुति, तप्तपांशुकुकूलकातर- विकिरे, विवरशरणश्वाविधे, रजनीराजयक्ष्मणि, कठोरीभवति. निदाघकाले प्रावर्तन्तोन्मत्ता मातरिश्वानः ।
सस्कृत-गद्य-वीयो मर्वतश्च क्वचित्स्वच्छन्दतणचारिणो हरिणा , क्वचित्तर- तलविवरविवतिनो वभ्रव, क्वचिज्जटावलम्बिन कपिला , क्वचिच्छकुनिकुलकुलायपातिन श्येना , क्वचिद् धूमोद्गारा मन्दस्चय , क्वचित् मकलजगद्ग्रामघम्मग मभम्मका , क्वचित् वेणुशिखरलग्नमूर्तयोन्यन्तवृद्धा पवचिदचनोपयुक्तशिवाजतव क्षयिण , क्वचिन्मर्वग्मभुज पीवान , क्वचिदग्धगुग्गुलवो गैद्रा क्वचिज्ज्वलितनेत्रदह्नदग्धमयुसुमाग्मदना कृतम्याम्यितय , चटुलशिखा नर्तनारम्भाग्भटीनटा , स्वमपि धूममम्भोदममुद्- भूतिभियेव भक्षयन्त , स्वेदिन इव विलीयमानमधुपटलगोल- गलितमच्छिप्टवृष्टय काननेपु, खलतय इव पग्गिीर्यमाण- शिखासहतयो महोपरेषु, गृहीतशिताक्वला इद उवतितमूर्य- मणिगकलेपु गिलोच्चयेपु, प्रत्यदृश्यन्न दाणा दावाग्नव । -बागभट्ट (हर्षचरितम् २) कि स्वर्णम् ? चारिश्यन् ; को निकपो ? विपदेका १२--किं स्वर्णम् १ चारिख्यम् ; को निकयो ? विपदका पातयति महापुरुषान्सममेव वहूननादरेणैव । परिवर्तमान एक: काल. औलानिवानन्त. ।। अन्यस्मिन्नहनि समीपमस्य' (हर्पस्य) गजकुलात् द्रुतगति- वशविशीर्यमाणालद्वारझाकारिणी 'इव कुमार:. क्व कुमारः ?' इति प्रतिपुरुष पृच्छन्तो वेलेति नाम्ना यशोवत्याः प्रतीहार्या- जगाम । विपणलोकलोचनप्रत्युद्गता चोपसृत्य कुट्टिमन्यप्तहस्त- युगला गलन्तीभि पिञ्चन्तीत्र गुप्यन्त दशनदीधितिधाराभि- राधूसरमधरमधोमुखी विज्ञापिनवती... 'देव, परिनायस्व, परित्रायम्य जीवत्येव भर्तरि किमप्यध्यवसित देव्या' इति । ततस्तदपरमा कर्ण्य च्युत इव सत्त्वेन, द्रुत इव दुःखेन, आचान्त इव चिन्तया, तुलित इव तापेन, अङ्कीकृत इवातङ्कना- प्रतिपत्तिगमीत्। आसीच्चास्य चेतसि प्रतिपन्नसंजस्य- 'वहुमोऽपि हृदये दुःख भिपङ्गो निपतन्नश्मनीव लोहप्रहारः कठिने हुनभुजमुत्थापयति न तु भस्ममात्करोति मे निरनुक्रोगस्य कायम्' इति । उत्थाय च त्वरमाणोऽन्तःपुरगमात् । तत्र च प्रविशन्नेव निर्यान्तीम्, दत्तसर्वस्वापतेयाम्, गृहीतमरणप्रसाधनाम, जानकी- मिव जातवेदसं पत्युः पुरः प्रवेष्यन्तीम्, प्रत्यग्रस्नानादेहतया श्रियमिद भगवती सद्यः समुद्रादुत्थिताम्, कुसुम्भवभ्रुणी वाससी दिवमिव तेजसी मान्ध्ये दधानाम्, धात्र्या भर्तृ भक्त्या च निजया प्रसाधिताम्, मूर्च्छया जरत्या च संस्तुतया धार्यमाणाम्, सख्या सस्कृत-गद्य-धीयो पीडया च व्यसनसङ्गतया समालिङ्गिताम्, परिजनेन सन्तापेन च गृहीतसर्वावयवेन परीताम्, कुलपुत्ररुच्छ्वसितश्च महत्तर- रधिष्ठिताम्, कञ्चुकिभिर्दु खैश्चातिवृद्धरनुगता मातर ददर्श । दूरादेव च वाप्पायमाणदृष्टिरभ्यधात्-~-'अम्ब, त्वमपि मा मन्दपुण्य त्यजसि प्रसीद। निवर्तस्व' इत्यभिदधान एव च मस्नेहमिव नूपुरमणिमरीचिभिश्चुम्ब्यमानचूडश्चरणयोन्यपतत् । देवी तु यशोमती तथा तिष्ठति पादनिहितशिरसि विमनमि प्रेयसि तनये गुरुणा गिरिणेवोद्वैगावेगेनावष्टभ्यमाना, कृत- प्रयत्नापि निवारयितु न शशाक याप्पोत्पतनम् । वृतान्त गह- माणा मुक्तकण्ठमतिचिर प्राकृतप्रमदेव प्रारोदीत् । प्रशान्ते च मन्युवेगे मनेहमुन्यापयामास मुतम् । सुतवदन- विनिहितनिभृतनयनयुगला चिर स्थित्वा पुन पुनरायत नि श्व- म्यावादीत्—'वत्न, नागि न प्रियो निर्गुणो वा परित्यागार्हो वा। स्तन्यनैव सह त्वया पीत मे हृदयम् । अम्मिश्च समय प्रभूतप्रभुप्रसादान्तरिता ला च पश्यति दृष्टि । अपि च पुनक, कुलकलत्रमस्मि चारित्रमात्रधना धर्मधवल कुले जाता । वीरजा वीरजाया वीरजननी च मादृशी पगक्रमनीता कथमन्यथा कुर्यात् । एवविधन पिया ते भरतभगीरथनाभागनिभेन नरेन्द्र- वृन्दारकेण गृहीत पाणि । आसेवित मेवासम्भ्रान्तानन्त- मामन्नसीमन्तिनीयमावजितजाम्वूनदघटाभिषेक शिरमा । लब्धी मनोरथदुर्लभो महादेवीपट्टबन्धमत्कारलाभो ललाटेन । आपीती युप्मद्विध पुत्रंगमित्रकलप्रवन्दिवृन्दवियूयमानचामरमर- च्चलचीनाशुक्धरी पयोधरौ। सपत्नीना शिर सु निहित नम. निखिलक्टक्कुटुम्बिनीविगेटमाणिक्यमालाचित चरणयुगल- कि स्वर्णम् ? चारित्र्यम्; को निकपो ? विपदेका कम् । एवं कृतार्थसर्वावयवा किमपरमपेक्षे क्षीणपुण्या? मर्तुमविधवैव वाञ्छामि । न च शक्नोमि दग्धस्य स्वभर्त- रायपुत्रविरहिता रतिरिव निरर्थकान् प्रलापान् कर्तुम् । मरणाच्च मे जीवितमेवास्मिन्समये साहसम् । अतिशीतलः पति- शोकानलादक्षयस्नेहेन्धनादस्मादनलः । दुःखदग्धानां च भूति- रमङ्गला चाप्रशस्ता च निरुपयोगा च भवति । वत्स, विधवानां यशसा स्थातुमिच्छामि लोके न वपुषा । तदमेव त्वा तावत्तात प्रसादयामि न पुनर्मनोरथप्रातिकूल्येन कदर्थनीयास्मि ।' इत्युक्त्वा पादयोरपतत् । स तु ससम्भ्रममपनीय चरणयुगलम्, अवनमिततनु- रुभयकरविधृतवपुपम् अवनितलगतगिरसम्, उदनमयन्मातरम् । दुर्निवारितां च शुचः समवधार्य, कुलयोपिदुचितां च तामेव श्रेयसीं मन्यमान: क्रियाम्, कृतनिश्चया च तां ज्ञात्वा तूणीमधो- मुखोऽभवत् । अभिनन्दति हि स्नेहकातरापि कुलीनता देशकालानु- रूपम् । देव्यपि यशोवती परिवज्य समाघ्राय च शिरसि निर्गत्य चरणाभ्यामेव चान्तःपुरात्पौराक्रन्दप्रतिशब्दनिर्भराभि- रूपरुध्यमानेव दिग्भिः सरस्वतीतीरं ययौ। तत्र च स्त्रीस्वभाव- कातरर्दृष्टिपातः प्रविकसितरक्तपङ्कजपुञ्जरिवार्चयित्वा भगवन्त भानुमन्तमिव मूतिरैन्दवी चित्रभानु प्राविशत् । इतरोऽपि मातृमरणविह्वलो वन्धुवर्गपरिवृतः पितुः पार्श्व प्रायात् । अपश्यच्च स्वल्पाबशेपप्राणवृत्ति, परिवयंमानतारकं तारकराजमिवास्तमभिलषन्तं जनयितारम् । असह्यशोकोद्रेका- भिद्रुतश्च त्याजित: स्नेहेन धैर्यम् । आग्लिप्यास्य सकलदुर्मद- ६० सस्कृत-गद्य-वीयो महीपालमौलिमालामालिनी पादपद्मा विमुक्तागवरिचर गेद । राजा तु नमुपरुध्यमानदृष्टिविग्नदिनशब्दाधिनश्रवण प्रत्यभिज्ञाय शनं गनं ग्वादीन् –'पुत्र, नाम्येव भवितुम् । भव- द्विधा न ह्यमहामत्त्वा । महामत्त्वता हि प्रथममवलम्बन लीकम्य पश्चाद्राजवीजिता। सत्त्वक्ता चाचणी मातिशयाधित ग्व भवान्, क्व वैक्लव्यम् ? 'फुलप्रदीपोऽमि' इति दिवसकर- सदृगतेजस्तै लघुकरणमिद । "पुग्पनिहोमि' इति गौर्य-. पटुप्रज्ञोपवृहितपगत्र मम्य निन्देव । 'क्षितिग्यि तव' इति लक्षणाव्यातचक्रवतिपदस्य पुनरक्तमिव । 'गृह्यता श्री' इति म्वयमेव श्रिया पग्गिहीनस्य विपरीतमिव । 'अध्यास्यतामय लोर' इन्युभयलोमिनिर्गपो पुप्पलभिव । 'म्वीक्रियता कोश' इति शमिकरनिकरनिर्मलयश मचयकाभिनिवेशिनो निम्पयामिव । 'आत्मीक्रियता गजकम्' अनि गुणगणात्मी- कृतजगतों गतार्थमिव । उहता गज्यभार' इति भुवनत्रय- भारवह्नोचिनस्यानुचितनियोग इव । 'प्रजा परिरक्ष्यन्ताम्' इति दीर्घदोर्दण्डागलिनदिदमुसम्यानुवाद इव । 'परिजन परिपाल्यताम्' इति गोकपालोपमम्यानुगकमिव । 'मातत्येन शस्त्राभ्याम कार्य ' इति धनुर्गविणकाइबालीकृतप्रोष्टम्य किमादिभ्यते। 'निगह्यता चापलजानम्' इति नूननतरवयसि निगहीतेन्द्रियम्य निरवकागेव में वाणी । “निरवगैपता शत्रवो नेया' इनि महजम्य तेजम ण्वय चिता।" इत्येव वदन्नेवापुन- सन्मीलनाय निमिमील राजर्जामहो नोचने। अम्मिन्नेवान्तरे पूपाप्यायुपैव तेज व्ययुज्यत । ततश्च लज्जमान इव नरपतिजीवितापहरणजनितादात्मापराधादघो- मुस गमभवत् । भूपालाभावशोकशिखिनेवान्नम्नाप्यमान- स्तानना प्रपेदे । मन्द मन्दमप्रियप्रश्नाथमिव नापिकी स्थिति अहो प्रभावस्तपसाम् ! मनुवर्तमानोऽवातरहिव. 1 दिसुरिव जनेशाय जलालिमपर- जलनिधिसमीपमुपससर्प । सद्योदत्तजलाञ्जलिःखदहनदग्धमिव करसहस्रमालोहितमाधत्त । -~-वाणभट्टः (हर्षचरितम् ५) १३-अहो प्रभावस्तपसाम् ! अनतिदूरमिव गत्वा दिशि सदा सन्निहितकुसुमफलरारण्य- स्थलीभिरुपशोभितप्रान्तम्, आगृहीतसमित्कुशकुसुममृद्भिरध्य- यनमुखरशिप्यानुगत. सर्वत, प्रविशद्भिर्मुनिभिरशून्योपकण्ठम्, अनवरतश्रवणगृहीतत्रपटकारवाचालशुककुलम्, अनेकसारिकोद्- धूप्यमाणसुब्रह्मण्यम, अरण्यकुक्कुटोपभुज्यमानवैश्वदेववलि- पिण्डम्, परिचितशाखामृगकराकृप्टिनिष्कास्यमानप्रवेश्यमान- जरदन्धतापसम्, इभकलभकार्बोपभुक्तपतितै सरस्वतीभुजलता- विगलितं. शङ्खवलयरिव मृणालशकलः कल्मापितम्, ऋषि- जनार्थमेणकविषाणशिखरोत्खन्यमानविविधकन्दमूलम्, अम्बु- पूर्णपुष्करपुटवनकरिभिरापूर्यमाणविटपालवालकम्, उपजात- परिचय. कलापिभिः पक्षपुटपवनसंधुक्ष्यमाणमुनिहोमहुताशनम्, सुरभिविलेपनधरमपि सतताभिभूतव्यधूमगधम्, मातङ्गकुला- ध्यासितमपि पवित्रम्, उल्लसितधूमकेतुशतमपि प्रशान्तोपद्रवम्, परिपूर्ण द्विजपतिमण्डलयनाथमपि सदा संनिहिततरूगहनान्ध- कारम्, अतिरमणीयम्, अपरमिव ब्रह्मलोकम् आश्रम- मपश्यम् ।
६२ सस्कृत-गद्य-बीयो . यन च मलिनता हविर्भूमेषु न चरितेषु, मुखराग शुकेषु न कोपेषु, तीक्ष्णता कुशाग्रेपु न स्वभावेपु, चञ्चलता कदली- दलेपु न मन मु, चक्राग कोकिलेषु न परकलत्रेषु, मेखला- बन्धो व्रतेषु नेाकलहेपु, म्लनस्पर्शी होमधेनुषु न कामिनीपु, पक्षपात कृरुवाकुपु न विद्याविवादेषु, भ्रान्तिरनलप्रदक्षिणामु न शास्त्रेषु, वसुसवीर्तन दिव्यकथामु न तृष्णानु, गणना न्द्राक्ष- वलयेषु न शरीरेषु, मुहिवालनाश क्रतुदीक्षया न मृत्युना, रामानुगगो रामायणेन न यौवनेन, मुसभङ्गविकारो जरया न धनाभिमानेन । यत्र च महाभारते शनिवघ , पुराणे वायु- प्रलपितम्, वय परिणामेन द्विजपतनम्, उपवनचन्दनेषु जाड्यम्, अग्नीना भूतिमत्त्वम्, एणकाना गीतथवणव्यमनम्, शिखण्डिना नृत्यपक्षपात , भुजङ्गमाना भोग , कपीना श्रीफलाभिलाप , मूलानामधोगति । च तापमकुमारिकाभिरालवादत्तपीतपिप्टिपञ्चा- इगुलस्य परिमण्डलतया विस्तीर्णावकाशस्य रक्ताशोक्तरो- रघश्यायायामुपविष्टम्, मन्तान्महर्षिभि परिवृतम्, स्थैर्यणा- चलाना गाम्भीर्येण सागराणा तेजमा मवितु प्रशमेन तुपार- रस्मेनिमलतयाम्बरतलस्य सविभागभिव कुर्वाणम्, वैनतेयमिव म्वप्रभावोपात्तद्विजाधिपत्यम्, कमलामनमिवाश्रयगुरम्, जर- च्चन्दनतरमिव भुजगनिर्मोक्यवलजटाकुलम्, प्रगम्नवारण- पतिमिव प्रलम्वकर्णवालम्, वृहस्पतिमिवाजन्ममवर्धितकचम्, दिवममिवोद्यदकविम्वभास्वरमुखम्, शरत्वालमिव क्षीणवर्पम्, शन्ननुमिव प्रियमत्यव्रतम्, अम्बिकाकरतलमिव रद्राक्षवलय- ग्रह्णनिपुण, शिगिरममयसूर्यमिव कृतोत्तरानगम्, वडवानल- मिर सन्तनपयोभक्षम्, यून्यनगरमिव दीनानाथविपन्नदारणम्, पशुपतिमिव भस्मपाण्दुरोमाश्लिप्टशरीरम्, भगवन्त जाबालि- मपश्यम् । तत्र अहो प्रमावस्तपसाम् ! अवलोक्य चाहमचिन्तयम् -- 'अहो प्रभावस्तपसाम् ! इयमस्य शान्तापि मूर्तिरुत्तप्तकनकावदाता परिस्फुरन्ती सौदा- मिनीव चक्षुषः प्रतिहन्ति तेजांसि, सनतमुदामीनापि महाप्रभाव- • तया भयमिवोपजनयति प्रथमोपगतस्य । पुण्यानि हि नामग्रहणा- न्यपि महामुनीनाम्, किं पुनदर्शनानि । धन्यमिदमाश्रमपदम- यमधिपतिर्यत्र। वहलाज्यधूमपटलमलिनीकृताश्रमस्य भगवतः प्रभावाद्भीतमिव रविकिरणजालमपि दूरतः परिहरति तपोवनम् । एते च पवनलोलपुजीकृतशिखाकलापा रचितालय इवात्र मन्त्रपूतानि हवीपि गृहन्त्येतत्प्रीत्याशुशुक्षणयः । तरलितदुकूल- वल्कलोऽयं चाश्रमलताकुसुमसुरभिपरिमलो मन्दमन्दचारी मशङ्क इवास्य समीपमुपसर्पति गन्धवाहः । प्रायो महाभूतानामपि दुरभिभवानि भवन्ति तेजांसि । सर्वतेजस्विनामयं चाग्रणीः । 'एप प्रवाहः करुणारसस्य, सन्तरणसेतु: संसारसिन्धो , आधारः क्षमाम्भ माम्, परशुस्तृणालतागहनस्य, सागरःसन्तोषा- मृतरसस्य, उपदेष्टा सिद्धिमार्गस्य, अस्तगिरिग्सद्ग्रहस्य मूल- मुपशमतरो:, नाभिः प्रज्ञाचक्रस्य, स्थितिवंशो धर्मध्वजस्य, तीर्थ सर्वविद्यावताराणाम, वडवानलो लोभाणवस्य, निकपोपल: शास्त्ररत्नानाम्, दावानलो रागपल्लदस्य, मन्त्रः क्रोधभुजङ्गस्य, दिवसकरो मोहान्धकारस्य, अर्गलाबन्धो नरकद्वाराणाम्, कुलभुवनमाचाराणाम्, आयतनं मङ्गलानाम्, अभूमिमंद- विकाराणाम्, दर्शक: सत्पथानाम्, उत्पत्तिः साघुतायाः, नेमि- रुत्साहपक्रस्य, आश्रयः सत्त्वस्य, प्रतिपक्षः कलिकालस्य, कोशस्तपसः, सखा सत्यस्य, क्षेत्रमार्जवस्य, प्रभवः पुण्यसंचयस्य, अदत्तावकाशो मत्सरस्य, अरातिविपत्तेः, अस्थानं परिभूतः, अननुकूलोऽभिमानस्य, असम्मतो दैन्यस्य, अनायत्तो रोपस्य, अनभिमुखः सुखानाम् । 'अस्य भगवतःप्रसादादेवोपशान्तवैरमपगतमत्सरं तपोवनम् । . .
सस्कृत गद्य-वीयो अहो प्रभावो महात्मनाम् । अत्र हि शाश्वतिकमपहाय विरोधमुप- शान्तात्मानस्तियञ्चोऽपि तपोवनवसतिसुखमनुभवन्ति । तथा हि एप विक्चोत्पलवनरचनानुकारिणमुत्पतच्चारचन्द्रकशत हरिणलोचनद्युतिशवलमभिनवशालमिव विशति शिखिन. कलापमानपाहतो नि शवमहि । अयमुत्सृज्य मातरमजातकेमरै केसरिशिशुभि महोपजातपरिचय क्षरत्क्षोरधार पिबति कुरङ्ग- गावक सिहीस्तनम् । एप मृणालकलापाङ्किभि शशिकरधवल सटामारमामीलितलोचनो बहु मन्यते द्विरदालभराकृप्यमाण मुगपति । इदमिह कपिकुलमपगतचापलमुपनयति मुनिकुमार- केभ्य स्नातेभ्य फ्लानि । एते च न निवारयन्ति मदान्धा अपि गण्डस्थलोभाजि मदजलपाननिश्चलानि मधुकरकुलानि सजातदया कणताल करिण । कि बहुना, तापमाग्निहोत्रधूम- लेखाभिरुत्मपन्तीभिरनिशमुपपादितकृष्णाजिनोत्तगमगशोभा फलमूलभृतो वल्पलिनी निश्चेतनास्तरवोऽपि मनियमा इव लक्ष्यन्तेऽस्य भगवत । किं पुन मचेतना प्राणिन ' इति । -यागमट्ट (कादम्बरी) अतिगहनं तमो यौवनप्रभवम् १४-अतिगहनं तमो यौवनप्रभवम् निसर्गत एवाभानुभेद्यमरत्नालोकोच्छद्यमप्रदीपप्रभापनेय- मतिगहनं तमो यौवनप्रभवम्। गर्भेश्वरत्वमभिनवयौवनत्व- मप्रतिमरूपत्वममानुपशक्तित्वं चेति महतीय खल्वनर्थपरम्परा । सर्वाविनयानामेककमप्येषामायतन किमुत समवायः । यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः । अनुज्झितधवलतापि सरागैव भवति यूनां दृष्टिः । अपहरति च वात्येव शुष्कपत्र समुद्भूतरजोभ्रान्तिरतिदूरमात्मेच्छया यौवन- समये पुरुषं प्रकृतिः । इन्द्रियहरिणहारिणी च सततमतिदुरन्तेय- मुपभोगमृगतृष्णिका। नवयौवनकषायितात्मनश्च सलिलानीव तान्येव विषयस्वरूपाण्यास्वाद्यमानानि मधुरतराण्यापतन्ति मनस. । नाशयति च दिङ्मोह इवोन्मार्गप्रवर्तक: पुरुषमत्यासङ्गो विपयेषु । गुरुवचनममलमपि सलिलमिव महदुपजनयति श्रवण- स्थित शूलम भव्यस्य। अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव रजनिकरगभस्तयों विशन्ति सुखमुपदेशगुणाः । गुरूपदेशश्च नाम पुरुषाणामखिल. मलप्रक्षालनक्षममजल स्नानम्, अनुपजातपलितादिवरूप्यमजरं वृद्धत्वम्, अनारोपितमेदोदोषं गुरूकरणम्, असुवर्णविरचनमग्राम्य कर्णाभरणम्, अतीतज्योतिरालोकः, नोद्वेगकरः प्रजागरः। विशेषेण तु रानाम् । विरला हि तेपामुपदेप्टारः । अहङ्कारदाहज्वरमूर्छा- न्धकारिता विह्वला हि राजप्रकृतिः । अलोकाभिमानोन्माद- कारीणि धनानि । राज्यविपविकारतन्द्राप्रदा राजलक्ष्मीः । आलोकयतु तावत्कल्याणाभिनिवेशी लक्ष्मीमेव प्रथमम् । न ह्येवविधमपरमपरिचितमिह जगति किञ्चिदस्ति यथेयमनायो। लव्यापि खलु दुःखेन परिपाल्यते। दृढगुणपाशसंदाननिष्पन्दी- कृतापि नश्यति। न परिचयं रक्षति । नाभिजनमीक्षते। नवंदाध्य मस्कृत-गद्य-वोयो गणयति। न त्यागमाद्रियते।न विशेषज्ञता विचारयति । कमलिनी- सचरणच्यनिकरलग्ननलिननालकण्टकेव न क्वचिनिर्भरमाव- घ्नाति पदम् । यया यथा चेय चपला दीप्यते नथा नथा दीपशिम्वेव कज्जलमलिनमेव कर्म केवलमुद्वमनि । न हि त पश्यामि यो ह्यपरिचितयानया ननिर्भरमुपगूढो यो वा न विप्रलब्ध । नियत- मियमालेख्यगतापि चलति, पुस्तकमय्यपीन्द्रनालमाचरति, उन्कीर्णापि विप्रलभते श्रुताप्यसन्धत्ते, चिन्तितापि वञ्चयति । एवविधयापि चानया दुराचारया कथमपि देववोन परि- गृहीता विक्लवा 'भवन्ति राजान , सर्वाविनयाधिष्ठानता च गच्छति। तेषा दाक्षिण्य प्रक्षाल्यते, हृदय मलिनीमवनि, मत्यवादितापहियते गुणाश्चोन्मार्यन्ते । केचिच्छमवशमिथिल- शकनिगलपुटचपलाभि पद्योतोन्मेषमुहूर्तमनोहगभिर्मनस्विजन- गहिताभि सम्पद्रि प्रलोम्यमाना रागावेशेन वाध्यमाना विह्वलतामुपयान्ति। आसन्नमृत्यव इव वन्धुजनमपि नाभि- जानन्ति । अदूरदशिन पापेनेवाघ्मातमूर्तयो भवन्ति । तद- व्यसनशनमख्यतामुपगता वत्मीकतृणाग्रावस्थिता जलविन्दव इव पनिनुमध्यात्मान 'नावगच्छन्ति । अपरे , तु स्वार्थनिष्पादनपरनपिगितग्रामगृरास्थान- नलिनीबकडूंत विनोद इति, पान विलाम इति, प्रमत्तता शौर्य- मिति, गुरवचनावधोरणमपरप्रणेयत्वमिति, स्वच्छन्दता प्रभुत्व- मिति, तरलनोत्माहमिनि दोपानपि गुणपक्षमध्यारोपर्या- रन्त स्वयमपि विद्धि, प्रतारणकुशलधूनरमानुपोचिनाभि स्तुतिभि प्रतार्यमाणा प्रारव्यदिव्योचिनचेप्टानुभावा मर्व- जनम्योहास्यतामुपयालि। दर्शनप्रदानमप्यनुग्रह गणयन्ति । दृष्टिपातमप्युपकारपक्षे स्थापयन्ति । म्पर्ममपि पावनमाक्ल- -यन्ति । मिथ्यामाहात्म्यगर्वनिर्भराश्च न प्रणमन्ति देवताभ्य , वस्थाश्च गुरून् । अतिगहन तमो यौवनप्रभवम् नाभिवादयन्त्यभिवादनान्,ि नाभ्युत्तिष्ठन्ति जरावैक्लव्यप्रलपितमिति पश्यन्ति वृद्धजनोपदेशम् । आत्मप्रजा- परिभव इत्यसूयन्ति सचिवोपदेशाय । कुप्यन्ति हितवादिने । सर्वथा तमभिनन्दन्ति, तं पावें कुर्वन्ति, तं संवर्धयन्ति, तं बहु मन्यन्ते, तमाप्ततामापादयन्ति योऽह्निशमनवरतमुपरचिताञ्जलिरधि- देवतमिव विगतान्यकर्तव्यः स्तौति, यो वा माहात्म्यमुद्भावयति । तदेवंप्राये राज्यतन्त्रेऽस्मिन्महामोहकारिणि च यौवने कुमार तथा प्रयतेथा यथा नोपहस्यसे जनैः, नोपालभ्यसे सुहृद्भिः, न प्रतार्यसे विटैः, नावलुप्यसे सेवकवृकै, न प्रलोभ्यसे वनिताभिः, नोन्मत्तीक्रियसे मदनेन, नाक्षिप्यसे विषयः, नावकृष्यसे रागेण, नापहियसे सुखेन । तरलहृदयमप्रतिवुद्धं च मदयन्ति धनानि । विद्धाममपि धीरमप्यभिजातमपि पुरुषमियं दुविनीता खली- करोति लक्ष्मीः। कुलक्रमागतामुह पूर्वपुरुपैरूढां धुरम् । भवनमय द्विपतां शिरांसि । उन्नमय स्ववन्धुवर्गम् । -वाणभट्टः (कादम्बरी) ६८ सस्कृत-गद्य-चौथी १५--प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणो वै धर्मः स भगवान् मृप्ट्वेद जगत्, तस्य च ति चिकीर्षमरीच्या- दीनग्र सृष्ट्वा, प्रवृत्तिलक्षण धर्म ग्राह्यामास वेदोक्तम् । ततो- ऽन्याँश्च सनकमनन्दनादीनुत्पाद्य निवृत्तिधर्म ज्ञानवैराग्यलक्षण ग्राहयामास । द्विविधो हि वदोक्तो धम प्रवृत्तिलक्षणो निवृत्ति- लक्षणश्च । तत्रंको जगत स्थितिकारण प्राणिना माक्षादभ्यु- दयनि थ्रेसहतुय स धर्मो ब्राह्मणाचर्वणिभिगश्रमिभिश्च श्रेयो- थिभिरनुष्ठीयमानो दीर्येण कालेनानुष्ठातृणा कामोद्भवाद्धीय- मानविवेकविज्ञानहेतुकेनाऽधर्मेणाभिभूयमाने धर्म, प्रवर्धमाने चाऽधर्म, जगत स्थिात परिपिपालयिपु स आदिकर्ता नारायणा- ख्यो विष्णुभौमम्य ब्रह्मणो ब्राह्मणत्वम्य रक्षणार्थ देवक्या वसुदेवादशेन कृष्ण क्लि सम्बभूव । ब्राह्मणत्वम्य हि रक्षणेन रक्षित म्यादिको धम , तदधीन-वाद्वर्णाश्रमभेदानाम् । म च भगवान् ज्ञानेश्वयक्तिबलवीर्यतेजोभि सदा मम्पन्न- स्त्रिगुणात्मिका वैष्णवी म्बा माया मूलप्रकृति वगीकृत्याजो- ऽव्यया भूतानामीश्वरों नित्यशुद्धबुद्धमुक्तम्वभावोऽपि मन् म्य- मायया दवानिव जात इव लोकानुग्रह कृर्वलक्ष्यते ।म्बप्रयाजना- भावेऽपि भूतानुजिघृक्षया वैदिक धमद्वयमर्जुनाय गोकमोह- महोदधौ निमग्नायोपाददेश, गुणाधिकाहि गृहीताऽनुष्ठीयमानश्च धर्म प्रचय गमिष्यतीति । त धर्म भगवता यथोपदिष्ट वेदव्याम. मर्वनो भगवान गीताम्य सप्तभि इलोक्यतस्पनिववन्ध । नि श्रेयस च मर्वममन्यासपूर्वकादात्मज्ञाननिष्ठाम्पा- धर्माद् भवति । तथेममेव गीतार्थवममुद्दिश्य भगवतवोक्तम्-- 'म हि धर्म सुपर्याप्तो ब्रह्मण पदवेदनम्' इत्यनुगीतासु । कि चान्यदपि तत्रवोक्तम्-'नव धर्मी न चाधर्मी न चैव हि शुभा- ।
६६ पितृवत् परकन्या शुभी, यः स्यादेकासने लीनस्तूष्णीं किञ्चिदचिन्तयन्' इति; जानं संन्यासलक्षणम्' इति च । इहाऽपि चान्त उक्तमर्जुनाय- 'भर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं कारण ब्रज' इति । अभ्युदयार्थोऽपि यः प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो वर्णाश्रमांचोद्दिश्य बिहित. स च देवादिस्थानप्राप्तिहेतुरपि मन्नीश्वरार्पणवुद्ध्या- नुप्ठीयमानः सत्त्वशुद्धये भवति फलाभिसन्धिवजित. 1 गुद्धसत्त्वस्य च ज्ञाननिष्ठायोग्यताप्राप्तिद्वारेण ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन च नि:- श्रेयसहेतुत्वमपि प्रतिपद्यते। यथा चेममर्थमभिमन्धाय वक्ष्यति---- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि यतचित्ता जितेन्द्रियाः । योगिन: कर्म कुर्वन्ति सङ्ग त्यक्त्वात्मशुद्धये।' ---शंकराचार्यः (गीताभाष्योपक्रमणिका) १६-पितृवत् परकन्यासु वेधा द्वधा भ्रमं चक्रे कान्तामु कनकेषु च । तासु तेप्वप्यनासक्तः मामाद्भर्गो नराकृतिः ॥ तोरणदुर्गे तु रसनारी काभिश्चन मूच्छितप्रायाभिल्ल्याप्य समानीताभिः पुनः प्राप्तसंजाभि: चेटीभिः महिना, मञ्चामन्दी- पल्यऋवितानतूलिकोपवर्हादिसकलपरिच्छदपरिष्कृतायाम् अति- रम्यहम्याट्टालिकायामवरुद्धा-'क्वाऽऽयाता? केन संयता ? कि भाबि ?' इति किमपि न वेत्ति स्म । तत्परिचर्यायामितरा -- ७० सस्कृतभाद्य-वीयो महाराष्ट्रदेशीया अपि दास्य आसन्, किन्तु ता अपि रमनार्या बहुश प्रलोभिता अपि सप्रश्रय पृष्टा अपि तेषु तेषु विषयेषु वाच- मेव न यच्छन्ति स्म । 'क एवमाद्रियते? कस्य कक्षे आपतिता कोऽधुनापि मर्यादा न भनक्ति ?' इति तया किमपि ज्ञातु न शक्यते स्म । अर्थकदाऽट्टालिकाया पर्यटन्त्या, दक्षिणस्या सुदूर विस्तृताना काननानाम्, अभ्रलिहाना शैलशिखराणाम्, कपोतानाम्, क्रौञ्चानाम्, कुरराणा च शोभा पश्यन्त्या अकस्मादथावि पादध्वनिरिव बहूनाम् । झटिति तत आगत्य द्वारोपरिस्थगवा- क्षाच्चाऊलोकितवती यदेक ईपच्छ्यामल सुन्दरो मरक्तमणि- महामालालसितगलक्मनीयो युवाऽऽगच्छतीति । एप एव च सम्बोभोति पतिवृढोऽस्मत्लुण्ठकगणस्येति मन्यमाना, किञ्चिद् भीतव, स्तब्धव, खिन्नेव, क्षुभितेव, उद्विग्नेव च मा सवित्त । अथ रमनारी म्बोपवेशदेश प्रविश्य स्विन्ना गण्डस्थली यावत्पटान्तेन परिमाप्टि, तावत्प्रतिसीरामुत्क्षिप्य झटिति प्रविश्य शिरोनमनपुर मरमादगचार विदधदवलोक्ति स एव वीरवर । इय तमादरोगतं , तद्वचनसुधाधारापिपासिताभ्यामिव कर्णाभ्या परमकतानताजहाकृताभ्यामिव नयनाभ्या चित्रापितेवाभूत् । महाराष्ट्रराजस्नु बद्धकरमम्पुट ममवतत । न च विन्दुमपि तत पगवीना तदाकारमौजन्यलावण्य- गाम्भीर्यादराचागद्यवलोकनमोहिता रसनारी स्वयमेवारभ्य एवमालपत्। ग्मनारी-जागम्यतामियमामन्दी सनाथ्यताम् । गिवराज ---यदाज्ञाप्यतेऽभवत्या। [इत्येकस्यामासन्या महाराष्ट्रराज , अपरस्या रसनारी, सादहस्तो. छायाया कोशेयवसनाच्छनाया सजलदु मुमस्तवाला कृतमप्यापा. - विसर्गमपि चाबूत ।
पितृवत् परकच्या वलपीठिकायाः प्रान प्रत्यक् चोपाविक्षताम् । रसनारी-वीर, अतिसमादृताऽपि सुत्रं स्थापिताऽपि दुःखिताऽस्मितमाम्, यतो यत्लैरपि न ज्ञातुमशकं निजधन्यवाद- भाजन धन्यधन्य कमपि मान्यवदान्यम् ; यत्प्रदत्तं द्राक्षादाडिम-- जातमास्वादमास्वाद केकिकेकाकोकिलकूजितानि श्रावं श्रावं दर्श दर्श चोत्यकाशाद्वलेपु शम्वरशल्लकीशशकशिवापलायनानि. दिनानि गमयामि। शिवराजः-आर्ये, अपि कस्यापि महाराष्ट्रवीरस्य शिव- राज इति नामधेय श्रीमत्या. कर्णशष्कुलीमस्पार्षीत् ? रसनारी (क्षणं चिन्तयित्वेध)-[क पार्वतोन्दुरुः शिव इति? शिवराजः ('दिल्लीकलङ्का वराका एते मां पार्वन्तोदुरु- मेवाऽऽख्यान्ति' इति स्वगतमेव विधार्य किञ्चिद् ह्रीण इच पुन- रुन्नतीयूय)-भद्रे, महाराष्ट्रगजः शिनवीरः । रसनारी (स नौग्ध्यन्)-तत्कि पार्वतोन्दुरुः कोऽप्यन्य: ?' शिवराज–अत्रभवती न वेत्ति ममतस्य । अस्माकं सदैव युद्धानि भवन्ति श्रीमत्यास्तातचरणैः सह । वयं सदैव तान् विजयामहे । तदीयानि कदर्याणि आचरणान्यवलोक्य च 'दिल्लीकला इमे' इति कथयाम. ते च दग्धहृदया अस्मान् 'पार्वतोन्दुन्न्' प्रचक्षते, परन्तु यथा तय तातस्तत्र राजा, तथा शिववीरोऽत्र राजा । तव तातस्य प्रजासु तु, तेपां दारा अपह्नियन्ते, येपां देवमन्दिराणि निपात्यन्ते, येषां च तीर्थस्थानानि बला- द्विलोप्यन्ते, ते प्रतिप्रभात प्रतिसायं च वाप्पवारिविन्दुसन्दोहै- सननं क्षालयन्तः, दग्धहृदया:,धमद्धमद्धमनीधावमानरुधिरधारा- दुर्धर्षवदताः, हस्तावुनमय्य तब तातस्योच्छेदाय गपन्ते । शिव- ७२ सस्कृत-गद्य वीयो राज-राज्ये तु प्रजा प्रतिक्षणमाशीगगीनुच्चाग्यन्ति । त्वपितृ- राज्य बहिरेव, न तु प्रजानामन्त करणे। शिवम्य नु राज्य महाराष्ट्रदेशीयप्रजानामन्तर्वहिश्च । रमनारी (सलज्जम् )-नन कि शिवराज्ये यवना अपि मोदन्ते? शिवगज –मर्धामा प्रजाना ममान एव मोद , न भवति शामनकाले जानिनामाघट्टकनमावश्यकम् । रमनारी-तत किमित्यहमण्हारिताऽम्मि ? शिवराज -मा म्म भूच्ट्रीमन्या काचन बलात्कारभीति । 'वहुभी रुधिरप्रवाहभंगवती विश्वम्भग म्नापिता, वहवश्च युद्धातवीररमण्यो गेदिता , इनि यदि भवनीमाश्रित्य भवत्या पित्रा सह मन्धातु यक्यत, तद्यत्नायव ममानोता मङ्गल- मय्यत्र भवति । नतद् मौद्गलगज्यम्, यत्र प्रजानामपि भवेद् वनात्कारमाध्यमम् । अत्र तु महाराष्ट्राणा गज्यम्, यत्र परि- पन्थिनामपि युवजनमनोमोहोंनातिमधुरेण कौमागत् परेण वयमाऽऽलिङ्गिना अपि मौन्दर्यमारविरचिता इवापि दुहितर मम्मान्यन्ते, न त्ववहेन्यन्ते । अत्र भवत्येवान प्रमाणम् । ग्मनारी (तदाकप्यं शिरो नमयिावा, अपाङ्गक्षिातलोलतार- 'लोचनेन शिवमुखमसकृदीक्षमाणा, उरोजयो स सदिव वस्त्र पुन कन्धयो क्षिप्या)-अथ क्वामी महाराष्ट्रराजो मोदितमकल- ममाजी रणधीर गिववीर ? त दिदृक्षन एप जन । शिवराज (समुत्थाप)--एपोऽत्र भवन्या मम्मुख एव बद्धकरसम्पुट उपतिष्ठले शिव ।नदाज्ञाप्यता काचन मेवा । ग्मनारी (सेसम्भ्रममुत्याय) -आ} एवमेतन् ? अपि श्रीमानेव महाराष्ट्रराज , यो मामेव धृष्टवादिनी मनोरम- वृक्षाणां परिषत् नम्रालापर्लज्जयते ? उपविश्यतामुपविश्यताम् ! मनसाऽप्यकल्प- नीयोऽयमीदृशः स्वभावः, यत् सपत्न्योऽप्यादरेप्वेव सयत्नो "भवान् । तत. परमुपविष्टयोर्मुहूर्त यावद् वहव आलापास्तयोः परस्परं चकितयोर्मुदितयोरनुरक्तयोश्चाभूत्रन्। --अम्बिकादत्तव्यासः (शिवराजविजयः) १७---वृक्षाणां परिषत् वृक्षाणा परिषदियम् । अत्राश्वत्थो वक्ताऽपरे श्रोतारः । निरन्तरमहवामाद्वयमेतेपां भापासु सम्यगभिजा एव । तंद् यदि भवद्भ्यो रोचेत वयमेतेपा प्रजल्पनमनुवदामः । सञ्चालितपल्लवकराग्रः सुमहानश्वत्थो वदति--भो भो वनस्पतिकुलप्रदीपा महापादपा., कुसुमकोमलदन्तमचो लता- कुलललनाश्च, सावहिताः शृण्वन्तु भवन्तः । अद्य मानवाते- वास्मत्समालोच्यविषयः । मानवा नाम सर्वासु सृष्टिधारासु निकृष्टतमा सृष्टिः। समन्तादभिनवोत्तरविलक्षणसृष्टिमुत्पाद- यता भगवता जगत्सवित्रा यादृग् बुद्धिप्रकर्पः सप्टिनैपुण्यं च सस्तृत-गद्य-वीथी प्रशितम्, मानवमर्ग विदधता पुनरनेन तत्सर्वमेकपद एवाप- हाग्तिम् । प्राक्तनकर्मप्रभावाज्जडत्वमापन्नानामस्माक वार्ता ताव- दस्तु दूरे, जीवसृष्टिप्रवाहेषु मानवा इव परप्रतारका स्वार्थ- साधनपरा मायाविन कपटव्यवहारकुशला हिंसानिरता जीवा न विद्यन्ते (सचे स्वशाखापर्पण कृत्वा आनन्द सूचयन्ति)। भवन्तो नित्यमेवारण्यचारिण सिहव्याघ्रप्रमुखान् हिस- स्वभावतया प्रसिद्धान् श्वापदानवलोकयन्ति प्रत्यक्षम्, तेपा नित्यनैमित्तिकनियाकलापांच पश्यन्ति, ततो भवन्त एव सानुनय पृच्छयन्ते-कथयन्तु भवन्त याथातथ्येन किमते हिमादि-- नियामु मनुष्येभ्यो भृश गरिष्ठा ? श्वापदाना हिंसाकर्म क्लि प्रतिनियमोद्दीप्तजठरानलनिर्वाणमात्रप्रयोजनकम्, क्रूरचेप्टि- तानि च स्वोदरपूर्तिपर्यन्तावमानानि । प्रशान्ते तु जठरानले मदुपजानाया स्वोदरपूती नहि ते करतलगतानपि हरिण- गादीनुपघ्नन्ति, नवा तयादिधदुर्बलजीवघातार्यमटवीतोऽटवी ममुद्धत पारभ्रमन्नि, प्रन्युत मुनिव्रता इव शान्तभावमापन्ना निश्चेप्टा विविक्तविजनप्रदामाथित्य विधाम्यन्ति । मनुप्याणा हिमावृत्तिस्तु निरवधि । पशुहल्या तु तेपामा- नीटनम्, येवल विक्लान्नचित्तविनोदाय महारण्यमुपगम्य ते यथेच्छ निर्दय च पशुधात कुवंलि । मनुप्या यथा मृगयामपदिश्य हिमावृत्तेश्चरितायता सम्पादयन्ति, हिस्रम्वभावा अपि स्वापदा. कि कदाचित् मनुप्यालयमाविश्य तादृशमतिदारण कर्म समनु- निप्पलि? (सर्वपा करतलघोपम्) । यर्थहिक मुखलिप्मया मनुप्या ममुन्साहेन जीर्वाहमा सम्पाद्यान्त करणम्यानिनिष्ठुर ७५ वृक्षाणां परिषत् क्रूरभाव प्रकटयन्ति, पारत्रिकविशुद्धनित्यसुखप्राप्त्याशयापि ते तथैव महोत्साहेन महोत्सवपूर्वक स्वाभीष्टदेवताग्नतः सर्वथा- निरपराधान् रोरुद्यमानानासन्नमृत्युशङ्कावेपमानकलेवरान् पशून् वलादुपहृत्य स्वहृदयस्यातिकर्कशनृशंसतायाः परिचयं ददति । वस्तुतस्तेषां पशूपहारव्यापारमालोक्य जडानामप्यस्माकं विदीयते खलु हृदयम्। पशूनां न केवलं भक्ष्यनियमस्तृप्तिश्च तेषामनायाससाध्या, ते स्वोदरपूर्तिमात्रपर्याप्त मध्यवस्तु समधिगत्यैव परमां परितृप्ति लभन्ते, नाधिकमाकाक्षन्ति । भक्ष्यवस्तुनीवान्यत्र विपयेप्वपि सुलभः खल्बमीषां तृप्तियोगो यस्तावन्मानवेषु. सुदुर्लभ एव । तृप्तिलाभस्तु न विलिखितो विधात्रा मनुष्यभाग- धेयेपु। निरन्तरमात्मोन्नतिमभिविधित्सवोऽव्याहतलोभविक्षो- भितहृदया मनुजन्मानः किल प्रतिक्षणं स्वार्थसाधनाय सर्वात्मना प्रवर्तन्ते, न धर्ममनुधावन्ति, न सत्यमनुवघ्नन्ति, पर तृणवदुपेक्षन्ते स्नेहम्, लोप्टवत् परित्यजन्ति शौचम्, अहितमिव परिहन्त्या- र्जवम्, अमङ्गलमिबोपघ्नन्ति विश्वासम्, न स्वल्वमपि बिभ्यति पापाचारेभ्य., न किञ्चिदपि लज्जन्ते मुहुरनृतव्यवहारात्, न हि क्षणमपि विरमन्ति परपीडनात्, न वा कदापि विमुखीभवन्ति महतोऽपकृत्यात्, केवल सिसाधयिपन्ति स्वार्थम् । यथायथैव स्वार्थसिद्धिर्घटते तथातथैव परिवर्धतेज्मीपां गरीयसी विषय- पिपासा। न केवलमेते पशुभ्यो निकृष्टास्तृणेभ्याऽपि निस्सारा एव । तृणानि खलु प्रवलवात्योद्गमाव्यवहितपूर्वक्षणपर्यन्तं न किञ्चि- न्मानं विचलन्ति, न वा स्वल्पमात्रगपि विकम्पन्ते, किन्तु निर्भी- ७६ सस्कृत-गद्य-वीथी कानीवाविङ्कितचित्तानीव सर्वथा मुम्यिगण्यवतिष्ठन्ते, विच वात्यया मह म्वशक्तिन सुचिम्मभियुध्य मम्मुखसमरप्रवर्तमाना वीरपुरपा इव शक्तिक्षये क्षितितले निपतन्ति, न तु कदाचित् कापुस्पा इव स्वस्थानमपहाय दुत प्रपलाय ते । मनुष्या पुन म्वचेतमाऽग्रत एव मुद्भविष्यकालमटिप्यमाण कपि विप- त्पातमारलय्य परिकम्पमानालेवग भीतभीता निरन्तरगुरु- चिन्तानान्तहृदया दुखदु मेन ममयमनिवाह्यन्ति, परिकल्पयन्ति च पर्याकुला बह्वायामैवविधान् पनोकागेपायान् । येन मनुष्य- जीवने शातिमुख मनोरथपथानिकान्तमेव । जथ भवितव्यताया अवश्यम्भावितया दुर्लभ्यतया च नियतिनियमाना तेपा सर्व- प्रतीकारप्रयत्नान् विफलीकृत्य यदि कदाचित् ममापतति तावत् तथायिताऽऽपत्तदातेपामेवपद वान्लर्थत्ते विद्यावत्ताभिमान , ग्वीभवति नीक्षणबुद्धिनैपुण्यप्रभवो गर्व , प्रलीयतेच परिकल्पिता- त्ममर्वज्ञतारामुदित सुमहानद्धार । ततश्च ममुदेति मद्य एव योऽपि किर्तव्यविमूटभावजनितो हृदयावमाद , भृग परिक्षीयते चिरपोपिता नास्तिक्यबुद्धि मुद्ग्मपाच्छति च मा परमेश्वर- प्रतिद्वन्द्रिता, येन ने तदानीमात्मत्राणाय वद्वाञ्जलय साश्रुनयना प्रणमन्त वरण विलपन्नश्च गगण समुपयान्ति जगच्छरण्य जगदीश्वरम्, ममुपामते न श्रद्धया निराकारम्याप्यम्य बहुविधा परिवल्पिता मूर्ती । परित्यजति च सर्वविधामात्मभग्नाम् । भवन्ति च तथाविवावमरे अवश्यरक्षितव्यान पूजकलत्रादिम्व- जनान् विहाय 'आन्मान मतत रक्षेद्दारपि धनरपि' इति नीति- मनुसरन्त जात्ममात्रपरिमाणपरायणा । विमत परममीपा- ममारताप्रनिपादने प्रमाणान्नगपेक्षा वर्तते । अथ ये तावत्तृणे- भ्योऽप्यमाग पगुभ्योऽपि निकृष्टतगम्तृणारिमृप्टेग्नन्नर तथा- विधजीवनिर्माण विश्वविधातु कीदृश नाम बुद्धिमत्ताप्राप प्रस्टयति? (सर्वेषामुच्चहास्यम्) ७७. क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते इत्येवं हेतुप्रमाणपुरस्सर सुचिरं बहुविधं विशदं च व्याख्याय सभापतिरश्वत्थदेव उद्भिज्जपरिषदं विसर्जयामास । वयमपि तामश्वत्थव्याख्यातां मानवचरितस्यासारतां मुहुर्मुहु- विभावयन्तो विस्मयमानमानसाः स्वगृहं प्रति प्रस्थिताः । यथा दृष्टं श्रुत व निवेदित प्रियपाठकेभ्यः । -~-हृषीकेशशास्त्री भट्टाचार्यः (प्रवन्धमञ्जरी), १८-क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते यथा यथाधिकायास: पुण्यवृद्धिस्तथा तथा । पुण्यं हि सात्त्विक नूनमशक्यमपि साधयेत् ।। अवमितप्रायो दिवसः। अस्ति निविष्टं मणिमयगिरिमेखलाया: किष्टिवाराख्य.. ग्रामस्य च मध्ये क्वचिद्विविक्तस्थले कस्यचिद् ग्रामीणस्य कुटीरमेकम् । प्रदोपेऽस्मिन् काचिद्रूपयौवनसम्पन्ना हिमानाम्नी युवतिः सृष्टिसौन्दर्यमालोकयन्ती कुट्या वहिश्चिनारनाम्नस्तरु- विशेपस्यालवालं परितो रचितायां वेदिकायामुपविष्टासीत् । दरीदृश्यते तस्याः पुरः कुटिलः पन्था यः शालिक्षेत्रा- दारभ्य कारवाहीगुल्मेण्वन्तहितस्तश्च पुनः सुदूरं दृष्टिगोचरो भवति । नेदीयनः परःशतपादायतस्य गिरेरघस्तात्सुदरं प्रसृतः प्रचण्डो जलप्रवाहः प्रतिवघ्नतःप्रस्तरान् शकलीकुर्वन् फेननिकरो- सस्कृत-गद्य-वीयो द्गारभासुरो निझरझर्झरनिनादेन दिगन्नमापूग्यन्निवामीत् । आस्तामुभावपि पाश्वों पर्वतस्यावृतो नानाविधपुप्पितवन्य- गुत्मनन्दनवनरमणीयताविडम्विभि । अतिमनोहर हिमालयस्या- द्भुतमौन्दर्य दर्श दर्ग विस्मृत्यात्मान हिमा गाढ समाहितेव तस्यों। अय यावत्तरणी दीर्घ नि स्वमिति तावत्तम्या माता पृष्ठल समुपेत्य तारम्वरेण पप्रच्छ-'हिमे, अयि कि चिन्तयसि वचन मर्वथा तम्य मूढमतेस्तापसम्य श्रीनगरनिवासिन ? निमित्त- ज्ञोऽय धर्मकञ्चुकीति निश्चिनोमि।' हिमा-मात, किमिति वृथा तापममुपालभमे वृद्धा--अपि तेन मनिश्चय नापितानि तव पत्युरन्युजस्य मकेतस्थानमुद्दिश्य । अम्बुजस्य वृत्तोपलब्ध्यै गतवत्यह मह त्वया तत्मविधे, न पुनम्नविचित्रमुखावलोस्नाय । आ, वञ्चक एवासौ। पिनापि तस्य त्रिगे व परिभ्रमणसक्तो भार्या मासजातापत्य च विसृज्यामरनाथयात्राबद्धादरो गेहान्निर्गतो न पुननिवृत्त इति श्रुतमम्माभि । गेहिनी तम्यानवरतनयनाम्बु- धारा वर्षन्ती मोकानलेन प्लुप्टेव म्वमिंग ग्राहिताम्बुजनामक तदानीमेकाब्ददेशीय कम्मैचित् मुहृदे ममर्प्य दिव गतवतीत्यपि मुविदितमेव नौ। हिमा—पर चिगतिरोहितम्य पितुरन्वेपर्णवधिया प्रस्थितो हिमाचल प्रति तव जामाता, न तु विहारसुखोपभोगाय न वा पर्यटनासक्त्या। वृद्धा-प्रवृत्तिरीदृशी वरापरम्परागतास्नीति न सन्देह । वत्से, वृद्धाया मे वच शृणु तावत् । अतिसंत्यादावा म यावच्छि- लायिते भवावस्तावदेव श्रीनगर निवतिष्यावहे ।
७६ क्लेशः फलेन हि पुनर्नवा विधत्ते हिमा (सविस्मयम्)---किम् ? इयद् दूरमागत्य निवति- घ्यावहे ? मातः, प्रोक्तमेव मयाऽसकृद्यन्न कोऽपि जगतीतले मत्प्रतिज्ञां मिथ्याकर्तुप्रभविष्यतीति। तस्मादल निषेधवचोभिः । वृद्धा (किञ्चित्कुपिता)-मूढासि त्वं यत्पराधीनेऽपि विषये एवंविधा प्रतिज्ञा कृता त्वया । अतो गम्यतामेकाकिन्येव । निवतिष्येऽहमितः श्रीनगरम् । । ततश्च पर्वतश्रेणीतः पर्वतश्रेणीम्, अटवीतोऽटवीम्, शिखरामाच्छिखराग्रम्, अधित्यकातोऽधित्यका समुल्लङ्घ्य निर्भयं सनिश्चयं प्राचलत् प्रगल्भेयं तरुणी। पर्यन्ते श्रीमदमरनाथगुहाया बहिःस्थाधित्यका दृष्टिगोचराऽभूत् । ततो यावत् पिसुनाम्नः शैलस्योत्सङ्गे स्मयमानशेषनागाख्य- सरोवरमवलोकयन्त्यवित्यका समुपैति सा, तावद् बृहदक्षोट्ट- द्रुमस्याधो ध्यायन्तं कञ्चित्तापसवृद्धं व्यलोकयद्धिमा । प्रदोष- स्यैधमानान्धकारे निष्प्रभनीललोहितपर्वतच्छायाभिर्घनीभूते स प्रवया जीर्णपर्णमिव वलितपीतवर्णास्य आनाभिविलम्बमानसित- सान्द्रकू! भस्मधूलिरूपितजटाजूटकोऽशिथिलाकुञ्चितगात्रो दाक्षिण्याङ्कितललाटो भद्रतयेव स्नातशरीरो भ्रूमध्यस्थापिता- चलदृष्टिः शताधिकवर्षदेशीयः पुरातनकालप्रतीक इव समुदलसत् । हिमायाः पदन्यासशब्दमाकायतद्योतमानं नयनयुग्म- मुन्मील्यान्वयुक्त तां-'वत्से, कुतः प्रतिपन्नं त्वयेदमति- क्लेशकरं प्रयाणम् ?' इत्यनुयुक्त्तया युवत्या तस्य तेजस्विमुख- मण्डलं निपुणं निरीक्ष्यमाणया श्रीनगरकृतावासस्य तापसस्य सन्देगो निवेदितस्तस्मै । निःशब्द दिला गनैः शनैः स्वलिता- ८० सस्कृत-गद्य-वीयो क्षर म्वीयमितिवृत्न तम्मै न्यवेदयत्-चिरादन्नहितस्य भर्तु - वार्ताम्, तद्वियोगवदनाजन्य दु खम्, निज पर्यटनाभिपङ्ग च । योगोन्द्रोऽभिनन्ध तत्मकल्पम्, इङ्गितेन ममीपवर्तिनी निम्न- पटला निजकुटी तम्य निर्दिष्टवान् । सव्रीट दोलायमानमानसा- मेता साग्रह समाव चाभापिप्ट–'वाले, प्रविभ्यता कुटीरमिद निर्भयमाप्रातश्च विधान्तिसुप नेव्यताम्' इति । तत्कारण्येन प्रफुल्लहृदया तरणी प्राविगत् कुटीम्, विस्तृत्य चाम्तरण भूमी सपदि गाढनिद्रया गृहीताभूदानिशीथम् । ततश्च गवाक्षान्तनिविष्टसुधाकरकरचुम्बितानना जागरि- तेय मय्या विसृज्य कुटीराद् बाट स्थित्वा कौमुदीदुग्धप्रवाहपूर- घलित काननमालोकयन्ती विधातु सृष्टिचमत्कारेण परवशी- भूतामीन् । मरक्तनीतेऽस्मिन् पनागमरोवरे रजन्या ध्यानपग वान प्रतिविम्वितामीत् । आलोकस्यात्यद्भुतरमणीयत्वपरा-- धानायास्तम्या विचारमग्या समापतत् म्मरण चिराद्वचतीताना वर्षाणाम्, स्वभर्तृ मनायीकृनम्वर्गहस्य, आत्मीयस्वल्पकाल- स्थायिवैवाहिकजीवनयात्राया, अब्दपञ्चक्त पूर्व सवृत्तस्या- म्बुजम्य प्रस्थानम्य मन्दिगत् । दूरस्थापित्यकातम्तम्य स्वरप्रति- ध्वानरयावीति च मा व्यभावयत् । भावनय तु क्षणिकम्वप्न इव विनष्टाऽभूत्पुनश्च गादनि शब्दता गर्वर्या मर्वत प्रामरत् । शीतीतोष काल योगीन्द्र पूर्वेद्युरिव ध्यानावस्थितमद्रासीत् सा। सन्ध्यायामम्यान्तगयो मा भूदिति यावत्मा पुनश्चलितु प्रवर्तते तावन्मुनर्नयनयुगमुन्मीलित वलितानने चास्य किञ्चिन् मन्दम्मितमाविरभून् । कृतज्ञताभरपुरम्मरमापृच्छमाना युति मुनीन्द्रोमापिष्ट-'वत्से, याहि पुर । शश्वत्स्थाम्यति तव पुण्यम् । गिवास्ते मनु पन्थान । सर्वथा स्वस्ति वितरन्तु ते क्लेशः फलेन हि पुनर्नवता विधते १ देवाः' इति । X x तत्क्षण अथ पर्यन्ते नानाविधविलक्षणभावनाभङ्गिप्रवाहपुर- प्लावित्तान्तरा श्रीमदमरनाथस्य गुहान्तिक सम्प्राप। आसीद्वि- शालस्थल्यां कन्दराद् वाित्रिकजनार्गव:-क्वचिच्छतशः परि- गतवयस्काः कुघटिताङ्गयष्टय., क्वचित्परःसहस्राणां ब्राह्मणानां समूह इतस्ततो यात्रिकेभ्यो धनाशया साहाय्यं चिकीर्षुः, क्वचित्पर शतानामन्धपङगुमूकबधिरादिभिक्षुकाणां बातो जीर्ण- चोवरवेष्टिताङ्ग. कम्पमानः, क्वचिदनेकेयां परदेशीयानां समुदायो निवर्तमान: श्रीनगरम्, क्वचिदर्वनग्नाः शिशवः स्वस्वमातृनितम्बलग्नाः । बधिरोन्निनादभयाक्रान्तं युगपत्प्रायोऽनेक-- रन्ध्रेभ्यो निर्गत्य कपोतवृन्द समुडिड्ये वहिः कन्दरात् । तत्र च ज्वलखूपसौरभजात म्लानगात्रो तां पुनरुदजोवयदिव । न चिरात् सा पटान्तेन सवाष्पनयने प्रमृज्य यावत्समुत्तिष्ठति तावत्पृष्ठतः सा चकितचकितेव प्राचलत् । तस्यौ हि पार्वे वद्धनिष्ठां ता सकोतुकं निरीक्षमाणः प्रवया योगीन्द्रो येन स्व- कुटोरे कतिपयदिनेभ्यः पूर्व प्रदत्ताश्रयासीत् सा । 'धन्या ते धर्म- निष्ठा ! भगवानमरनाथस्तवाभीष्टं सफलीकुर्यात् । वत्से, बहुतिथं कालमद्यापि जीविप्यसि । देवा हि तरुणजीवनध्वंसन- मवलोकयितुं नोत्सहन्ते खलु । अनुसर मां तावत् । स्वयमेव द्रक्ष्यसि मत्प्रतिपादनस्य तथ्यताम् ।' इत्युक्त्वा गुहायाः समीप- वतिष्बनेककुहरेष्वेकं प्रति प्राचलत् स मुनीन्द्रः । सा च जोष' तमन्त्रसरत् । क्षगोतर प्रविश्य तत्र गवपीठिकाकारां बृहत्तमामेकां हिम- सस्कृत-गद्य-वीथी शिला समुपेनवन्तावुभौ । नतस्तुपारराशिमगुल्या निर्दिश्य प्राह वृद्धतापम --'वत्से, पश्येमम्' इति । अघश्च सा विलोक्य मद्यो विस्फारितलोचना म्यगितेव क्षण जडीभूतेव तस्थौ । ततश्च व्यलपत्--'अहह मम दयित, मम दयित, इति । अवमन्नगात्री मुक्तकण्ठमरोदीद् विलोक्य हि हिशिलयोरभ्यन्तरे निवेगित कस्यचितरणस्य पञ्चविंशतिवीयम्य कलेवरम् । पञ्चभ्योऽ- ब्देभ्य पूर्व गृहात् प्रस्थितीऽम्बुजो प्रथालोक्यत तयैव विञ्चित् म्मेरानन प्रतोऽपि ददृशे । झटिति मा ललाटमण्डनायमान मौभा- 'ग्याटक कुकुम कमलोदरमोदरकरणेन प्रमृज्य ग्रीवायाश्च मङ्गलसूत्रमा नामपनीय पारदर्शकह्मिशिला च मूधम निम्प्य प्रेतस्य हैम बादनपटोपरि ता न्यघात् । 'अहह हृदयेश्वर, हृदयेश्वर' इ परिदेवमाना गोम्पारावारकरलोलनिक्षिप्नेव मा भूमौ न्यपनत् । माक्षान्निगशाया नरिव विह्वलविवर्णानना हिमवन्पाण्डुवर्णा च समभवत् । गणाच्च तबाइपल्तको निर्जीवोपाङ्गमिवालम्बेता नि मत्त्वी। 'वत्से, वत्से, प्राणिना जीवन जलबुद्बुदस्य भद्गुरुत्व- मनुकरोनि । अल चिन्तया मृतम्य । भगवतो ध्यान कुर, निर्वाण चान्विच्छ' इति योगिवरी युवति मान्त्वयामास । ग्रमेण तदीया- नने शान्तित्यागादिभारा प्रादुरभवन् । अथ यावच्छीतशीतलहैमसमाधिकुहरादुभी निर्गन्छनम्तावद- द्वाप्टा तो श्यामश्मश्रुल चमाञ्चुकधारिण धृनलोमनगिरस्क दीर्घदुप्फरपर्यटनधान्त धूलिम्पितानन च त्रिंशद्वर्षदेशीय पात्यमेक समायान्तम् । अथ मियोऽवलोक्तिमात्री तरणीतरणौ क्षण यम्भ्रान्तो स्थिती। पथिक महया पृष्ठनश्चलितम्तत क्षणमान साशवमान्दोल्यमानचित्त समाह्वयावति–'हिमे, ३ क्लेशः फलेन हि पुनर्नवत्तां विधत्ते हिमे' इति । इत्थं सम्बोधिताऽध्वगस्यानने दृष्टि स्थिरयन्ती स्थगितेव स्वचक्षुरषोरविश्वसतीव च हिमा तस्थौ भूलग्नेव । स च स्वजीर्णपोलिकां भुवि निक्षिप्य मरोमाञ्चं सविस्मय- मवाप्तपरमप्रमोदसन्दोहो झटिति सोज्झम्म हिमाया पार्श्व-' मासाद्य तां सरभसमुद्धृत्य गाढमाश्लिष्यत् । अवगन्तुमक्षमा विलक्षणमिमं व्यतिकरं युवतिर्धान्तभ्रान्ताभूत् । स च तामुदा- सीनामवस्थितां क्रियासमभिहारेण सम्बोधयन् प्राह-'प्रेयसि, अपि नाभिज्ञातस्त्वयाहमम्बुजस्तव भर्ता ?' इति तेनानुयुक्ता सा शून्यदृष्टया क्षण त सूक्ष्म निरक्षत । ततश्च शिरसा संज्ञां दत्त्वा तस्मै, परावृत्य च समाधिकुर पुनः प्राविगत् । पान्थश्च योगीन्द्रद्वितीयः सकुतूहलं नामन्वगमत् । उपेतशवपीठिका सा क्षणं जोप स्थित्वा प्रश्नपूर्वकमिङ्गितेनैव पथिकाय हिमशिलामधिशयानं तरुणस्य समाधि निरदिशत् । स च प्रेतमालोक्य विस्फारितनेत्रः क्षणं निरूप्य विम्वरमा- क्रन्दत्---'अहो, इमे मे तातपादाः। प्रेयसि, व्यतीतानि पञ्च- वर्षाणि पितुरन्वेषणकपरायणस्य परिभ्रमतो मे। सर्वेऽपि प्रयत्ना मोघीभूताः । परं हन्त, त्वयाद्य तत्कार्य सफलत्वं नीतमिति धन्यासि खलु' इत्युदीर्य स निपातितजानुः शिलाया- मुपविश्य करौ सम्पुटीकृत्य साष्टाङ्ग पतितः। ततश्च मुहूर्त दिललाम प्रकामं शान्तिः । 'अहो विधातु: सृष्टेरयमेकतमोऽद्भुतचमत्कारः । त्रिशत- मब्दान् हि तरुणस्यास्य हिमशय्यायामस्यां कृतपदस्य निरन्तर- प्रस्वापसुखमनुभवत्त इव कालहस्तेनास्पृष्टं कलेवरं स्थितम्' इत्युक्त्वा हिमशिलोपरि निहितां मङ्गलसूत्रवजमादाय मुनिः पुनरनवीदम्वुजम्---'बधानतां मालिकां ग्रीवायां ते प्रेयस्याः ।
,
सस्कृत-गद्य-बोयो
ममागमोऽय युवयोरस्यास्तपसा परिणाम' इत्युदीर्य हिमाम्बुजी
प्रमोदपारावारप्रवाहपूरपरिलुप्तौ विसृज्य कुहारान्निर्ययो
योगीन्द्र ।
-समाराव, (क्यामुक्तावली ६)
१ -भद्रं नो वितरन्तु देवाः 'अथर्ववेद' सास्कृतिक दृष्टि में भारतीय साहित्य की एक अमूल्य निधि हैं । राष्ट्रीयता, साहस, वीर-गर्जना. उद्बोधन आदि के प्रेरणाप्रद स्थल उसमे स्थल-स्थल पर मिलेंगे। आशा, उत्साह और नई चेतना का संचार करने वाली इन संकलित गच-पंक्तियों में प्राचीन वैदिक गद्य की एक झाँकी मिलेगी । इनमें देवों को मनुप्य का रक्षक मानकर उनसे कल्याण की आकाक्षा की गई है । एक स्वस्थ. ओजस्वी दृष्टिकोण से ओतत्रोन हैं इस वैदिक भक्त के ये उद्गार-इनमें दैन्य अथवा होनना की भावना कही नही टपकती। हमारी ज्ञानेन्द्रियों की तेजस्विता ही हमारी लौकिक उन्नति का मुन्य कारण होती है । अतः भक्त उनके विकास की, उनकी निर्वाध प्रगति की कामना करता है; कामना ही नहीं करता, इसमें अपना अटूट विश्वास प्रकट करता है। [ पृ० ३३ निर्द:--निर्दटु का वैदिक रूप; नि.श्वास छोड़ा। अर्मण्य:--- (न)-मन्यः, ऋतम्भरा धियः, सत्यमयी धारणाएँ, भाव- नाएँ । निर्दु, अर्मप्य. अर्थात् भावनाएँ उच्छ्वनिन हो उठी। ऊर्जा मधुमती वाक् ---बागी वही है जो ऊर्जस्विनी (बलवती) और मधुर हो। इसके बाद के सारे वाक्य भक्त अथवा स्तोता कहना है । मधुमतीः स्य- (हे मेरी भावनाओ, जिम प्रकार) - तुम मधुर हो। मधुमती वाचम् उदेयम् ---(उसी प्रकार) में भी मधुर वाणी बोलू । उपहूतो मे गोपा:-- मैंने (वाणी के अधिष्ठाता देव) वाचम्पति (गोपा.) की स्तुति की है (उपहूतः) । उपहूतो गोपीयः- मैने स्वयं वाणी (गोपीय. उद्गीय: गीतम्) को आराधना की है। - *व्याख्या पृष्ठ-संख्या के क्रम से की गई है।
सस्कृत-गद्य-धीयो सथ तो कणों -मेरे कानो में मधुर श्रुतियां भर जाएँ । मद्रश्रुतौ कणी -मर कान कल्याणकारी वात मुने । मद्र श्लोक श्रूयासम्म सुन्दर स्तुति (इलोकम् = प्रशस्ति ) सून । सुश्रुतिश्च हासिप्टाम्-सोभन श्रुतिया तथा क्या-वार्ताआ(उपथुनि) मे म वचित न हाऊँ (मा हासिष्टाम्) । अहासिष्टाम्—हा (त्यागे), लुड् प्रथमपुरप द्विवचन, यहाँ 'अट का 'न माइ यागे' के अनुमार लोप हुआ है। सौपर्ण चक्षु , अजस्त्र ज्योति --मेरी आँखे गम्ट के तेज और अक्षय ज्याति मे भरी रहें। मूर्धा अह रयीणाम्म प्रेरणाओ (रयीणाम्) का वेन्द्र (मूर्ग) बना रहूं। मूर्घा समानाना भूयासम्–(उन प्रेरणाओ अर्थात् विचारा मे) उच्छ्वामा का भी केन्द्र बना रहूं (अर्थात् मेरे विचार और मेरी वाणी एक्स्प रहें, जैसा म माचू वैसा ही हूँ) । समानानाम्- प्राणानाम् । रजश्च हासिष्टाम्-कम्णा की अनुभूति तथा मगीत में म बचित न हाऊँ । रुज-र+ज =करणा+प्रमूत । तुलना कीजिए-नोक्न्वमापद्यत यम्य शोक' (रघुवरा)। वेन -वीणा । मूर्धा हासिप्टाम् --अन्नमुखी भावना (मृर्घा) म तथा वझिगी याणी (विधर्मा) मे में वचित न हाऊ । बृहस्पति मे आत्मा-जात्मा ही मेरी वाणी का अधिष्ठाता देव (वृहस्पति == गोपा) हा । नृमणा नाम हृद्य ---- (मेरी वाणी म उमी बृहस्पति की) कलात्मकता जोर हृदयम्पगिता हा । नृमणा=न+ मन्+ना - नृत्यगीन । हृद्य = हृदयप्रसून ! असन्ताप मे हृदयम्- मेरा हृदय मन्ताप-रहित हा (अर्थान् मेर हृदय में उठी करुणा की अनुभूति कविता में प्रम्पुटिन हो, और इस प्रकार मेग हदय निगल हा) । उर्वी गति – (मेरी वाणी की)पहुँच विशाल हो । गम्यूति: गवी-उनि , अवनति उति । उर =विद्याल । समुद्र अस्मि विधर्मण - मै अमीम (वि+धर्मन् =अ+सीम) ममुद्र बन जाऊँ । नामि अह रयीणाम्-म प्रेरणाओ का, भावनायीका केन्द्र (नाभि = - सत्यमेव जयते (व्याख्या) मूर्या) बना रहूँ। नामिः समानाना भूयासम्मै उन (प्रेरणाओं, भावनाओ) के उच्छ्वासो का भी केन्द्र बना रहूँ। स्वाससि (स्व+ आसत्-+-असि)---(हे वृहस्पति) तुम हमारी अन्तरात्मा में आसीन हो आसत् = आ + सद्+क्विय् । सूषा अमृतः मर्यवा- हम मयों मे तुम उपा के समान दिव्य ज्योति मे पूर्ण (सु+उपा) अमृत (-पात्र) हो । माहासीत-~~-मैं कभी प्राणो से वचित न होऊँ। सूर्य पार्थिवेभ्यः- द्य लोक (अह्न --दिव से सूर्य, पृथिवी-लोक से अग्नि, अन्तरिक्ष-लोक से वायु, मानव-लोको से यम तथा अन्य पार्थिव लोक-लोकान्तरो से सरस्वती मेरी रखवाली करे । (वेद मे मनुष्य के लिए जो 'पञ्चजन शब्द आया है, वह सम्भवत. इन पांच भौतिक तत्त्वी का सूचक है ।) स्वस्ति दोषसश्च - उपाएँ और सन्ध्याएँ मुझे सदा कल्याण से सरसाती रहे। अद्य अदिति : अखण्ड रूप से, निरन्तर । सर्वा... अशीय-सब रस-धाराओं का में सबके साथ उपभोग करू। आपः- अप' । सर्वगण:-सर्वे गण बन्धुवान्धवै. सह सामान्येन सम्मजन् ।। अशीय--अश-ना-ति, अश् का आशीलिङ् मे उत्तमपुरुष एकवचन । २-सत्यमेव जयते यह कथानक 'ऐतरेय ब्राह्मण से लिया गया है । 'ऐतरेय ब्राह्मण' का सम्बन्ध 'ऋग्वेद' से है । इसके रचयिता इतरा के पुत्र ऐतरेय. महीदास माने जाते है। वेद में लिखा है--सत्येन उत्तमिता भूमिः, अर्थात् हमारा यह पार्थिव जीवन सत्य पर आश्रित है। इसी के उदाहरणस्वरूप हम प्रस्तुत आख्यान को समझ सकते है । कथानक से स्पष्ट है कि यज्ञ के बहिरङ्ग अनुष्ठान, विनियोग आदि की अपेक्षा अन्तरङ्ग भावना, हृदय की सचाई का महत्व अधिक है। नाभानेदिष्ठ ने किस निर्भयता से ८८ सस्मृत-गद्य-वीयो अगरिमा को स्पष्ट कह दिया कि आप लोगा के यज्ञ मे कही कुछ दोप रहता है, जिसके कारण जाप स्वग के द्वार ना पहुँचकर भी वापस आ जाते हैं। यही निभयना, यही निश्डनता, यही मचाई उसने अपने प्रतिपक्षी पुरोहित (कृष्णगवामी पुरष) के प्रति भी बरती और उसका हृदय जीत लिया। [१० ३४] नामानेदिष्ट मनु का गनिष्ठ पुत्र था, मम्भवत पिता का मबसे प्याग, जमा कि उसके नाम मे ही न्यजित है--नामा नेदिष्ठ, नाभी नेदिष्ठ , हृदये अन्नम्नमन्वेन म्यित , हृदय के निकटतम । मानव मनो अपत्य पुमान्, मनु का पुत्र । ब्रह्मचर्य वम तम्-गुरो अन्तेवामि- नम्, जो के आश्रम में विद्याध्ययन कर रहा था। निरभजन- निर+भज्, लङ् प्रथमपुरुष बहुवचन, भाग में वचित कर दिया। एत्य----आ-1-1-1-त्वा (य-त्य). वापस जाकर, गुरुकुल मे लौटकर। किम मह्यम् अमाफ्त-मेरे नि तुमने क्या भाग ग्ब छोडा है ? अमाक्त (वैदिक) - भाजयत् (लड्), अवीभजन (नृड्), मध्यमपुरप बहुवचन । निष्टायम् = (१) निष्ठापागम् तब श्रद्धेयम्, तुम्हारे अंदा-पात्र प्रिय पिता, (२) नि-प्टाव, ठाँव करनेवाला, वमीयत का बंटवारा करने- वाना । अवदितारम् --(१)निवदितारम्, निष्ठावम् , (२) अवमन्ना- रम्, जो हो मदा नीचा ही दिखाया करता था (उमरा प्यार मिफ तुम्हारे लिए था) 1 जाख्यान का भाव यह है कि नाभानेदिष्ठ मनु का मयमे चहेता वेटा था, दोष पुत्रो ने मनु का उनना प्रेम नहीं था । इसका फ्ल उपेक्षित पुत्रा ने वाप और बेटा दोनो को चबा दिया, मारी सम्पत्ति आपम में बांट ली। नामानेदिष्ठ जब जपनी गिजाममाप्त करके लौटा, ना उमरे भाइयों ने उन पर तरह-तरह के व्यग्य कमे-"तुम्हें हिस्मा चाहिए ? तुम्हारे हिम्मे में हमने तुम्हारी सवन प्रिय वस्तु रख छोड़ी है । आज मे 'हमारे' श्रद्धेय पिता केवल तुम्हारे रहगे। कितना बडा त्याग कर रहे हैं हम तुम्हारे लिए " स्वा ह वाव मह्य तत (तात) अमान -पिनाजी, इन्होंने जो बंट- .
8 - सत्यमेव जयते (व्याख्या) बारा किया है, उसमें (इनके अनुसार) मेरे हिस्से में आप ही आते हैं .(यह क्या मजाक है ?)। ह=किल- एते मे भ्रातर' कथयन्ति इति "भाव: । वाब-वे, ही, अच्छी रही तत तात-पिना; ननु विस्तारे, सन्तान का जनक। मा पुत्रक तत् आदृथाः--बेटा, इस बात मे बहुत चिन्तिन न होओ; क्यों व्यर्थ मे अपने दिल को दुखाते हो। अङ्गिरसः 'आसते-ये अंगि- रस लोग स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा मे अखण्ड यन (सद्+त्र) कर रहे हैं। 'वा-- नाम (क) 10. मुह्यन्ति- वे हर छठे दिन आकर विचार-मूढ़ हो जाते है (अर्थात् पूर्णाहुति को वेला मे वे, यज-शेष का अतीव आस्वादन करने के कारण, मन्त्रादि भूल जाते है और इस प्रकार उनका यन अधूरा ही रह जाता है)। तान शंसय-उन्हें (ऋग्वेद के) ये दो सूक्त (१०।६१-२) मुनाओ । (ऐतरेय ब्राह्मण मे आया नाभानेदिष्ठ का यह आख्यान बग्वेद के इन्ही मूक्तों पर आधारित है लेषां दास्यन्ति---- जो हजार (गौओ) का दान यज्ञ की परिममाप्ति पर उन्होंने पुरोहित को देना (निश्चित कर रखा) है, वह मब वे (तुममे इस प्रकार सन्तुष्ट होकर) स्वर्ग जाते समय तुम्हे ही देने जाएँगे। सत्त्रपरिदेपणम्--- यज्ञ के अन्त में परोसी (दी) जानेवाली वस्तु (दान-दक्षिणादि) : बनान्ते परिवेषणीयम् -- ब्राह्मणेभ्यः दातव्या दक्षिणा । म्व ---यन्त स्वर्ग गन्छन्तः। तथेति--- अच्छा, पिताजी । तान् उपत—(तदनुसार) नाभानेदिग्ठ अंगिरसों की सेवा में उपस्थिन हुआ। उपत-उप-+आ+इ, लड्, प्रथम- पुरुष एकवचन । प्रति सुमेवतः-हे बुद्धिमान् अंगिरसो. मुझ मनु के "पुत्र का अभिवादन स्वीकार कीजिए। प्रतिगणीत-प्रति-- ग्रह, लोट्, मध्यमपुरुष बहुवचन (अभिवादयन्तं अनुजानीत)। किकामः--कः कामः अस्य स किंकाम; कि काम्यति इति किकामः, किस इच्छा से (तुम यह कह रहे हो); परन्तु यह अभिवादन तुम कर 'किम म्बार्थ से रहे हो ? उसने कहा इदम् प्रज्ञापयानि यही कि आपके सस्कृत-गद्य-धीयो छर दिन (की समस्या) को सुलझाने में आया हूँ। प्रज्ञापयानि-(प्र+ मा-णिच्) लोट् उत्तमपुरुष एकवचन, प्रज्ञा बोध दातुम् आगतोऽस्मि । अय दत्त-परन्तु स्वग जाते हुए आप यह गोदान की मस्र दक्षिणा मुझे देते जाएँ। तयेति--अगिरसा ने कहा, हम यह गत स्वीपर है । ततो व ते यज्ञ प्र-अजानन्-और मचमुच (नाभानेदिष्ठ के) इस मुझाव म अगिरमो की अपने यज्ञ की सव गुत्थियां सुना गई। स्वर्ग लोक च प्र-अजानन्- म्वग व्या है, यह भी उन्हें स्पष्ट हो गया। तद् यदेते अनुस्यात्य- अगिरम लोग ही नहीं, जो कोई भी इन सूना का यज्ञ के घरे (अन्तिम) दिन पाठ करता है, वही यज्ञ की महिमा को बखूबी जान रास्ता है, और म्बग के प्रत्यक्ष दर्शन कर सकता है। (स) प्रज्ञात्यं, अनुष्यात्य (अल भवनि)=प्रज्ञातुम् अनुव्यातुम् वे वैदिक स्प। तदेन वास्तुहम्-पर तु जब नाभानेदिप्ठ उस (मत्त्रपग्वेिपण) को बटोरने लगा,नव उतर दिमामेव पाला-कलूटा ब्राह्मण न जाने में आ टपरा और बोला-“यह भेगह, दमयन-दक्षिणा का अधिकारी में हैं।" समाकुर्वाणम्-मम् +आ++गानन्, मग्रह कुर्वन्तम् । कृष्णावासिन्- (१) कृष्ण+वामिन् (राती कमली लोटे हुए), (२) वृष्ण+शव+ आमिन् (वाला- तूटा और गवा पर निवाह करनेवाला अघोरी)। उत्पोत्याय-उप+ उद्+म्या+वा,निकटम हो वही मे, न जाने कहाँ मे (उपक पडा) । वास्तुहम-वास्तु+हम्, यनान्ने अवशिष्टम् । हम होनम्, अवशिष्टम् । तद्वं परिप्रश्न ~~मा चला, हम दोना के वीच इस यगटे का निपटारा तुम्हारे ही पिना कर दें। ननु अटु --कि मत्य पुत्र, अगिरम वा दक्षिणा तुम्य दत्त्वा एव स्वगम् अगच्छन् । ननु, ति प्रश्न । [१० ३५] इत्या -दगंरह-वगैरह । तस्यैव पुत्रक तत् = बेटा, (वह भी टीक कहता है,) इस दक्षिणा का मूल अधिकारी मचमुच वहीं है (क्यादि वह शायद उनका कुल-पुराहित है) । मगव (बंदिव) = भगव - भगवन् (मम्बोधन ग्ववचन)। - आचार्योऽन्तेवासिनम् अनुशास्ति (व्याख्या) ३---आचार्योऽन्तेवासिनम् अनुशास्ति यह भारत के प्राचीन आश्रम-विद्यालयों में दिया जाने वाला दीक्षान्त- उपदेश है। जब शिष्य अपना वेदाध्ययन समाप्त कर चुकता है नव आचार्य समावर्तन-संस्कार के समय उसे गृहस्थाश्रम मे प्रवेश कर गृहस्थ-धर्म का पालन करने की शिक्षा देता है। गृहस्थाधम को ही भारतीय मनीपियो ने सव आश्रमो मे श्रेष्ठ बताया है चतुर्णामाश्रमाणा हि गार्हस्थ्यं श्रेष्ठ- मुत्तमम् (धा० रामायण २११०६।२२), क्योकि गृहस्थ की उदारता पर हो अन्य आश्रमचारी निर्भर रहते है। अत आचार्य शिष्य से कहता है कि अब वह समय आ गया है जव ससार से विरक्त न रहकर उसमे प्रवेश करने की और सदाचारपूर्वक गार्हस्थ्य धर्म का पालन करते हुए समाज-कल्याण मे योग देने की आवश्यकता है । इस उपदेश में कही हुई बाते चिरन्तन सत्य है, वे सभी देश-काल के विद्याथियो के लिए, आध्यात्मिक और सासारिक क्षेत्र मे, पथ-प्रदर्शक है । अकृत्रिम जैली में, सीधी और सरल भाषा मे, उपनिषत्कार ने वे सारभूत बाते कर दी है, जो हमारी ऐहिक और पारलौकिक उन्नति के लिए अपेक्षित है। क्या आश्चर्य, यदि आज भी काशी, दिल्ली तथा गुरुकुल कागड़ो के विश्वविद्यालयों मे, दीक्षान्त- समारोहो के समय, 'तैतिरीय उपनिषद्' के इस अश का वहाँ के उप- कुलपतियों द्वारा नव-स्नातको के समक्ष उद्घोष किया जाता है ! 'तैत्तिरीय उपनिपद्' को गणना उपनिषदो के सबसे प्राचीन वर्ग में की जाती है। कृष्ण-यजुर्वेद की तैत्तिरीय गाखा से सम्बद्ध होने के कारण यह 'तैत्तिरीय उपनिपद्' कहलाता है । इसके तीन खण्ड है, जो 'वल्ली' कहलाते है--शिक्षा-बल्ली, ब्रह्मानन्द-वल्ली और भृगु-वल्ली। प्रस्तुत अग शिक्षा-वल्ली का ग्यारहवाँ अनुवाक है । [पृ० ३५] अनूच्य (अनु+वच्-यत्वा (य) = अनु--उक्त्वा)- अध्याप्य, अध्ययन कराकर । अन्तेवासिनम्-गुरो, अन्ते समीपे वसति इति अन्तेवासी तम्, सप्तम्याम् अन्नु, अपने आश्रम में रहनेवाले विद्यार्थी सस्कृतनाद्य-चौथी को।अनुशास्ति--अन्यग्रहणाद् अनु पश्चात् शान्ति तदयं ग्राहयति इत्यर्थ , (अध्ययन की ममाप्ति पर) गिक्षा देता है, उपदेश देता है । यह उपदेगा इस प्रकार है- (सत्य यद-तुम सत्य वाता। तुलना कीजिए--'मत्यपून वदेद्वाच मन- पूत ममाचरेत् ।' धर्म चर-घम का आचरण करो। धम के अन्तर्गत कई बातें समाविष्ट की जाती हैं, जैसे--(१) अपने वण-आश्रम के अनुकूल शास्त्र-मम्मन धर्म, (२) वर्तव्य, (३) मदाचार, (४) जीवन के मौलिक नतिक सिद्धात इत्यादि । स्वाध्यायात्-म्वाध्याय मे। स्वाध्याय का नात्पर्य वेदो के अम्यास, मन्ध्या-वन्दन, गायत्री-जप आदि नित्य-यम मे है। मा प्रमद -भी न चूका, प्रमाद मा कापी । म्वाध्याय में भी प्रमाद न करना, अर्थात् न तो कभी उमे अनादरपूर्वव करना और न आलम्यवश उसका त्याग ही करना। आचार्याय-गुर वे लिए। प्रिय धनम्--(दक्षिणा रूप में) वारित घन । आहृत्य (आ+ह - ल्यप्) आनीय, नागर देवर। आचार्य में विद्या पाने के उपलक्ष्य में उसे दक्षिणा देवर प्रसन्न करना शिष्य 'का नंव्य है । प्रजातन्तु मा व्ययच्छे सी -आचार्येण च अनुज्ञात अनुम्पान् दारान् आहत्य प्रजातत प्रजासन्तान मा व्यवस्रेमी प्रजास तते विच्छित्तिर्न वर्तव्या, अर्थान् (गुरु की आज्ञा से अनुरूप स्त्री से विवाह करके) मतान- परम्परा को जारी रखो, उसमा उच्छेद(नाग) न वगे। गुरु का कहना है कि शास्त्रविधि के अनुमार विवाहित धर्मपत्नी के माय ऋतुवाल मे नियमित सह- वास करके मतानोत्पत्ति का कार्य अनासक्तिपूर्वक करना। वश-परम्परा को अविच्छिन वनाए रवना, भारतीय शास्त्रारी के अनुसार, गृहस्थ का परम धर्म है। रयवच्छरसी ---वि+अव+रिउद्, गट मध्यमपुम्प एक्वचन, 'न माद योगे' मूत्र के अन्मार मा के योग मे अट् का लोप हो गया है । सत्यात् न प्रमदितव्यम्- सत्य में कभी नही डिगना चाहिए, प्रमाद न बतव्य , अर्थात् तुम्हे हमी- दिगी या व्यर्थ की वातो में वाणी वी शविन को न तो नष्ट करना चाहिए और न परिहाम जादि के बहाने कभी भूठ ही बोनना चाहिए। धर्मात् न प्रमदितव्यम्-धर्म-पालन में आचार्योऽन्तेवासिनम् अनुशास्ति (व्याख्या) - भूल नहीं करनी चाहिए, अर्थात् कोई बहाना बनाकर या आलस्यवश कभी धर्म की अवहेलना नहीं करनी चाहिए । कुशलात् न प्रमदितव्यम् -- शुभ कर्मों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए, उनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपितु उनका यथायोग्य अनुष्ठान करते रहना चाहिए। श्रो राजगोपालाचार्य के अनुसार 'समाज का योगक्षेम करनेवाले कार्यों में से कोई कार्य करो।' भूत्यै-~मङ्गलयुक्ताकर्मण., उन्नति के साधनों से कभी नही चूकना चाहिए, अर्थात् धन-सम्पनि बढ़ाने वाले लौकिक उन्नति के साधनों के प्रति भी उदासीन नही होना चाहिए। स्वाध्याय- प्रवचनाभ्याम्-- स्वाध्याय: अध्ययन प्रवचनम् अध्यापन ताभ्याम्, अच्ययन और अध्यापन से, पढ़ने और पढ़ाने से (कभी नही चूकना चाहिए)। देवपितृकार्याभ्याम्- देवकार्य और पितृकार्य से । अग्निहोत्र, यश आदि का अनुष्ठान देवकार्य है, और श्राद्ध, तर्पण आदि पितृकार्य । इनके सम्पादन में भी आलस्य या अबहेलनापूर्वक प्रमाद नही करना चाहिए । मातृदेवो भव-माता देव. यस्य स मातृदेव भव स्या., तुम माता को देव-रूप समझनेवाले बनो, अर्थात् माता का देवता की तरह सम्मान करो । उपनिषत्कार का आशय यह है कि माता, पिता, आचार्य और अतिथि, इन चारो को ईश्वर की प्रतिमूर्ति सममकर सदा इनकी आना का पालन, इन्हें नमस्कार और इनकी सेवा करते रहना, इन्हे सदा अपने विनयपूर्ण व्यवहार में प्रसन्न रखना । यानि सेवितव्यानि--जो-जो निर्दोष (अनिन्दित) कर्म है, उन्ही का तुम्हें सेवन करना चाहिए । मो इतराणि-दूसरे (दोपयुक्त) कर्मों का कभी आचरण नहीं करना चाहिए। अनवद्यानिन अवद्यानि निन्दितानि इति । यानि अस्माकं सुचरितानि हमारे (आचरणों में ने भी ) जो-जो अच्छे आचरण है । तानि त्वया उपास्यानि----उन्ही का तुम्हे सेवन करना चाहिए । गुरु के भी सभी आचरण अनुकरणीय होते हों, ऐसा नहीं; जिनके विषय में जरा-सी भी शंका हो, उनका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिए । शङ्कराचार्य कहते हैं-'सावधानि गिष्ट- कृत्यान्यपि नो कर्तव्यानि', गिप्टों द्वारा भी किए जानेवाले सदोष कर्मों 1 सस्कृत-गद्य-योथी -- . का आचरण नहीं करना चाहिए। ये के च अस्मन् श्रेयास (प्रशस्यतरा) ब्राह्मणा -जो कोई भी हम म श्रेष्ठ (गुरजन एव) ब्राह्मण (तुम्हारे पाम) आएँ । तेषा या आसनेन प्रश्वसितव्यम्-- उनको तुम्हे आसन प्रदान कर विश्राम दना चाहिए । [पृ० ३६] प्रश्वमितव्यम् - एतेगा आमनदानादिना त्वया प्रश्वमितव्यम्, प्रश्वमन प्रश्वाम श्रमापनय , तेषा श्रम त्वया अपनेतव्य इत्यथ । अथवा, शङ्कर के जनुमार, 'न प्रश्व- मिनव्यम् मश्वामोऽपि न क्तव्य केवल तदुक्तमारग्राहिणा भवितव्यम्', उन मामने कोई गब्द नहीं उच्चारित करना चाहिए, जो वे कहते हैं उनका हमें मार मात्र ग्रहण करना चाहिए, उनके माथ अनावश्यक विवाद में नहीं उतरना चाहिए । श्रद्धया देयम्--श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिए । अश्रद्धया प्रदेयम्-... विना श्रद्धा के नहीं देना चाहिए । विना श्रद्धा के किए हुए दान आदि कम अमत् माने गए हैं.--'यश्रद्धया हुन दत्त नपम्नप्न कृत च यत् । अमदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो दर ।।' (गीता १७४२८)। श्रिया- देयम्-अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दना चाहिए । डा. गधा- कृष्णन् ने 'बिया' का अर्थ 'प्रचुरता में' विधा है । ह्रिया देयम्---लग्जा मे, नम्रा के माथ दान देना चाहिए । भे जो कुछ दे रहा हूँ, वह भी बहुत कम है, या मोचार, सकोच का अनुभव बग्ने हुए, दान देना चाहिए। मन में दानीपन के अभिमान का नहीं आने देना चाहिए। मिया देयम् --भय मे देना चाहिए । यह भय गजा का, शास्त्र का या मजूम ठहराये जाने का हो माना है (राजादिभयन, शाम्प्रभीत्या, कार्पप्यारवादभयेन वा) । सविदा देयम् --मैग्यादिवायेंण, मित्रो और मधियों की सहायता के रूप देना चाहिए, उथदा (जो कुछ भी दिया जाए वह भब) विवपूवर देना चाहिए। ऐसा दान ही मान्विक दान कहलाता है । 'दातव्यमिति यहान दीयनेन्नुपवारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दान मात्त्विक स्मृतम् ।।' (गीना ७२०) विचिकित्सा सदेह । वृत्तविचिरित्सा-आचारलक्षणे मगय ।
प्राचार्योन्तेवासिनम् अनुशास्ति (व्याख्या) । 'अय'कर्मविचिकित्सा-इसके बाद यदि नुमको कर्तव्य का निर्णय करने में किसी प्रकार की शंका हो । वा वृत्तविचिकित्ता वा-या सदाचार के विषय में कोई शंका कदाचित् (वा) हो जाए तो ।ये तब ब्राह्मणा... वहाँ जो ब्राह्मण । सम्मशिनः-- विचारक्षमा , उनम विचारवाले । युक्ताः- अभियुक्ताः कर्मणि वृत्ते वा, (सत्कर्म और सदाचार में) भनी भॉनि लगे हए। आयुक्ताः-अपरप्रयुक्ताः, स्वतन्त्र विचारोवाले । अनुक्षाः (अरुक्षाः का वैदिक रूप) । रूपन मे रहित, अरमतयः, अच्छे स्वभाववान्न । धर्मकामा:---धर्म के अभिलाषी, वर्मपरायण। स्युः --हो । यथावतक्षः- वे जिस प्रकार ऐसे प्रमंगों में बर्ताव कर, वैमा ही उन प्रनगो में तुम्हे भा बर्ताव करना चाहिए। भाव यह है कि यदि तुमको किमी अवसर पर अपना कर्तव्य निश्चित करने में दुविधा उत्पन्न हो जाए, अपनी बुद्धि मे किसी एक निश्चय पर पहुंचना कठिन हो जाए, तुम किकर्तव्यविमूढ हो जाओ, तो ऐसी स्थिति में वहाँ जो कोई विचारवान्, सदाचारी, स्वतन्त्र प्रवृत्तिवाले, स्नेहनील एवं धर्मात्मा ब्राह्मण (या अन्य कोई वैने ही महापुरुष) हो, वे जिस प्रकार ऐसे प्रसंगों पर आवरण करते हों, उनी प्रकार का आचरण तुम्हे करना चाहिए। ऐसे न्यलों में उन्ही के सत्परामर्श के अनुसार उन्ही के म्यापित आदर्श का अनुगमन करना चाहिए । एपः आदेश:-यह (शास्त्र की) आजा है । एष उपदेश:--यही (गुरुजनों का अपने शिष्यों और पुत्रों के लिए) उपदेश है । एषा वेदोपनियत्--यही वेदों का रहस्य है। 'उपनिषत् गन्द स्त्रीलिंग है और रहस्य का वाचक है। एतद् अनुशासनम् ----यही (परम्परागत) शिक्षा है। एवम् उपासितब्यम्-इसी प्रकार (तुम्हें कर्तव्य एवं सदाचार का पालन करना चाहिए । एवम् उ च एतद् उपास्यम्-इसी प्रकार यह पालन (अनुष्ठान) करना चाहिए । यहाँ शब्दों की पुनरावृत्ति इसलिए की गई है कि स्नातक इन शिक्षामो का महत्त्व भली भांति हृदयंगम कर लें । उ और। .
१६ सस्कृत-गद्य-चीयो ४- ब्रह्म एव महीयते एक छोटा-सा तिनका । क्तिना क्षुद और नगण्य ! न उममें कोई सौदय, न कोई शक्ति । बलवानो द्वारा सदा उपेक्षित और तिरस्कृत। परन्तु यह घाटा-सा तिनका भी बडे-बडे शक्तिशाली और तेज पुज अभिमानिया का दप-दलन करने की कितनी अमोघ शक्ति रखता है, इसका वडा राचक और शिक्षाप्रद वणन 'केनोपनिपद्' की प्रस्तुत क्या म आया है । अमुरा पर विजय प्राप्त करने के बाद दवताआ का अपने वल का अभिमान हा गया था। उनक इम अभिमान को दूर करने के लिए परमात्मा एक विशाल यक्ष के रूप म आवाग म प्रकट हुए। दवतानो ने उस यक्ष का पता लगाने के लिए अग्नि और वायु को एक- ब-याद-एक उसरे पास भजा। यक्ष ने दन अभिमानी देवताजा का ६५ दूर करने के लिए एक मूग्वा तिनका आगे रखकर उसे जलाने और उडाने के लिए कहा, परन्तु अपनी शक्ति लगाकर भी न नो अग्निदेव उमे जला सके और न पवनदेव उमे तिर मात्र भी दिला सके। जन में इन्द्र के जाने पर प्रीति हुई कि परमेश्वर की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिन सकता, जन हम लोगो का अभिमान वरना वृथा है । यह क्या 'कैनापनिपद्' के तीमरे प्रकरण में ली गई है। इस वथा द्वारा उपतिपत्कार ने यह ममझाया है कि विश्व में जा कोई भी प्राणी या पक्षाय विनमान्, मुदर और मिय प्रतीत होता है, उमरे जीवन में जो सफलता दोगनी है, वह सब परब्रह्म परमेश्वर के अस की ही महिला है। इन पर यदि कोई अभिमान करता ह ता वह वही भूल करता है। 'नोपनिषद्' मामा नाम इमनिए पहा कि इसका पहला मात्र केन गन्द ने आरम्भ हाता-केनेपित पतति प्रेषित मन (यह मन किमी प्रेरणा पाकर अपने विपया ना पहुंचना है। यह उपनिषद् मामवेद के लदवार ब्राह्मण' के अन्नगत है, इसलिए इने तलबकार उपनिषद्' ब्रह्म एव महीयते (व्याख्या) . भी कहते है। इसके प्रथम दो प्रकरण गद्य मे है और अन्तिम दो पद्य में। 'केनोपनिषद्' को देवता-गर्व-हरण की यह कथा 'देवीभागवत पुराण' में भी आई है। {पृ० ३६] ब्रह्म ह देवेभ्यः विजिग्ये ब्रह्म ने ही देवताओ के लिए (असुरो पर विजय प्राप्त की। विजिग्ये-जि, लिट्, प्रथमपुरुष एकवचन । है ही, निश्चयपूर्वक । तस्य 'अमहीयन्त--किन्तु ब्रह्म की उस विजय मे सब देवता अपने को बड़ा मानने लग गए, उन्होंने अपने मे महत्त्व का अभिमान कर लिया । अमहीयन्त-मह (च्चि), लुइ, प्रथमपुरुष बहुवचन , अमहान्तः महान्तः अभवन् । ते ऐक्षन्त--वे समझने लगे। अस्माकम्" महिमेति-~-कि यह हमारी ही विजय है, यह हमारी ही महिमा है । अभिप्राय यह है कि परब्रह्म ने देवो पर कृपा करके उन्हे शक्ति प्रदान की, जिससे उन्होंने असुरों पर विजय प्राप्त कर ली । यह विजय वस्तुत. ईश्वर की थी, देवता तो केवल निमित्त-मात्र थे, किन्तु इस ओर देवताओं का ध्यान नहीं गया और वे ब्रह्म की कृपा की ओर लक्ष्य न करके उसकी महिमा को अपनी महिमा समझ बैठे और अभिमानवश यह मानने लगे कि हम बड़े शक्तिशाली हैं, हमने अपने ही वल-पौरुप से असुरों को परा- जित किया है । तत् ह एषां विजज्ञो–उस (ब्रह्म) ने इन (देवों) का (भाव) जान लिया। देवताओं के मिथ्याभिमान को भगवान् समा गए। उन्होंने सोचा कि इसमें इनका पतन हो जाएगा। इसलिए देवताओं का दपं चूर्ण करने के लिए तेभ्यः ह प्रादुर्दभूव-वह ब्रह्म उनके सामने गया ! तब देवता आश्चर्यचकित होकर उस अत्यन्त विशाल रूप को देखने और विचार करने लगे कि यह दिव्य यक्ष कौन है । तत् न' व्यजानत किम् इदं यक्षम् इति–वे यह नही जान पाए कि यह यक्ष कौन है। यक्षम् पूज्यं महद् भूतम्, कोई पूज्य महाप्राणी । ब्रहा अपनी शक्ति से देवताओं के समक्ष साकार प्रकट हो गया---'स्वयोगमाहात्म्य- निमितेनात्यद्भुतेन विस्मापनीगेन रूपेण देवानाम् इन्द्रियगोचर प्रादुर्वभूव' (शङ्करः)।
६८ सस्कृतच-बीयो ते अग्निम् अवन्- देवता उस अतिविचित्र महाकाय दिव्य यक्ष को देखकर मन-ही-मन मम से गये और उसका परिचय पाने के लिए व्यग्न हो उठ । अग्नि परम तेजस्वी है, इसलिए देवताजी ने इस कार्य के लिए उसे ही उपयुक्त समझा और उसमे कहा जातवेद एतत् विजानीहि किम् एतत् यक्षम् इति-हे जानवेद, इस बात का पता लगाओ कि यह कौन है । जातवेदस्=सर्वज्ञ (सर्वशक्त्पम्), अग्नि समस्त जात पदार्थों का ज्ञान रखना है, जात नवं वेत्ति इति जातवेद । यह नाम अग्नि को ऋग्वेद में दिया गया है। अग्नि देवता को अपनी बुदि-शक्ति का गवं था, यत उसने कहा-तया इति, ऐमा ही होगा, मै अभी जाकर पता लगाता हूँ। तत् अस्यद्रयत्--अग्नि दौडकर उसके समीप गया। उसे अपने ममीप बहा देवकर तम् अभ्यवदत्-(यय ने) उस (अग्नि) से पूछा- असि इति-कि तुम कौन हो ? अग्नि ने मोचा कि मेरे तेज पुन्ज स्वरूप को सभी पहचानते हैं, इसने कमे नहीं जाना, इसलिए उसने तमककर उत्तर दिया-अग्नि में अहम् अस्मि, दि में ही अग्नि हूँ। जातवेदा वं प्रहम् अस्मि इति--वि में ही जातवेद के नाम से प्रसिद्ध हूँ। तब यक्ष-रूपी ब्रह्म ने पूटा तस्तिन् त्वयि किं वीर्यम् इति-कि उक्त नामी वाले तुम (अग्नि) मे क्या सामथ्यं है ? इस पर अग्नि ने सगव उत्तर दिया---अपि इति-कि में इस पृथ्वी पर यह जो कुछ भी है, इस सबको जलाकर भस्म कर दू, अर्थात् मैं चाहूँ तो दस सारे भूमण्डल में जो कुछ भी देखने में जा रहा है, सवना जलाकर अभी राख का ढेर कर द । तब उस दिव्य पक्ष ने तस्मै तृण निदयौ--उसके सामने एक निनका रख दिया (और यह कहा) एतत् दह इति--कि इसे जला दो। तत् उपप्रेयाय--(उप+ प्र--, लिट् प्रथमपुरष एकवचन) वर तिनके पर टूट पडा। सर्वजन- सर्वोत्माहतेन देगेन, पूण शक्ति लगावर। तत् न शशाप दाधुम-उसे जनाने में रिसी प्रकार समर्थ नहीं हुआ। तत एव निववृते-(तब लग्जित होरर) वहाँ में लौट गया (और देवताओ मे वोगा)-नएतत् यशकं विज्ञात यत् एतत् यक्षम् इति–पि में यह जानने में समर्थ नहीं ब्रह्म एव महीयते (व्याख्या) हो सका कि यह यक्ष कौन है । अग्नि में जो अग्नित्व है, दाहिका शक्ति है, वह तो शक्ति के मूल भंडार परमात्मा से मिली हुई है । वह यदि इस शक्ति-स्रोत को रोक दे तो फिर शक्ति कहाँ से आएगी ! अग्नि इस बात को न समझकर ही डींग हाँक रहा था। पर जब ब्रह्म ने अपनी शक्ति को रोक लिया, तव सूखा तिनका भी अग्नि से नहीं जल सका । अय वायुम् अब्रुवन्-जव अग्नि असफल होकर लौट आया तब देव- ताओं ने इस कार्य के लिए अप्रतिम-शक्ति वायु को चुना । [पृ० ३७] मातरिश्चा--मातरि अन्तरिक्षे स्वयति इति मातरिश्वा । एतत् आदत्स्व इति—इसे उड़ा दो। आदातुम्-~-उडाने में। तदनन्तर देवताओ ने स्वय देवराज इन्द्र को इस कार्य के लिए चुना। मघवन --हे इन्द्रदेव ! पर इन्द्र के पहुंचते ही तस्मात् तिरोदधे----वह यक्ष उसने सामने से अन्तर्धान हो गया। इन्द्र में इन देवताओं से अधिक अभि- मान था, इसलिए ब्रा ने उसको वार्तालाप का भी अवसर नहीं दिया; परन्तु इस एक दोष के अतिरिक्त अन्य सब प्रकार से इन्द्र अधिकारी था, अत: उसे ब्रह्म-तत्त्व का ज्ञान कराना आवश्यक समझकर इसीकी व्यवस्था के लिए वह स्वयं अन्तर्धान हो गया। यक्ष के अन्तर्धान हो जाने पर इन्द्र वहीं ग्यडा रहा, अग्नि वायु की भांति वहाँ से लौटा नही । इतने मे ही स तस्मिन् । हैमवतीम्-वह उसी आकाश-प्रदेश मे (यक्ष के स्थान पर हो) अतिशय सुन्दरी, हिमाचलकुमारी उभा के पास आ पहुँचा (और बोला कि यह यक्ष कौन था ?)। इन्द्र पर कृपा करके परब्रह्म ने उमा-रूपा साक्षात् ब्रह्म-विद्या को प्रकट किया । सा ब्रह्म इति ह उवाच-उसने स्पष्ट उत्तर दिया कि वह परब्रह्म परमात्मा था । ब्रह्मणः वै एतत् विजये महीयध्वम् इति--उस परमात्मा की ही इस विजय में तुम अपनी महिमा मानने लगे । ततः एव-उमा के इस कथन से ही । ह विदाञ्चकार ब्रह्म इति--इन्द्र ने निश्चयपूर्वक समझ लिया कि वह ब्रह्म ही था । डा. राधाकृष्णन् के अनुसार यह आख्यान, कि हिमालय-पुत्री उमा ने देवों को ब्रह्म का रहस्य उद्घाटित किया, यह , सस्कृत-गद्य-वीयी - सूचित करता है कि वनवासी ऋपिया ने अपना औपनिपदिक चिन्तत हिमा- लय की क्न्दरामा में जारर विकसित-पल्लवित किया। उमा(ब्रह्म-विद्या) को हैमवती इमीलिए कहा गया है कि हिमालय में माधु, सन्त और यात्री माताब्दियों में जाने रहे है और आध्यात्मिक शान्ति पात रहे है। विद्या समस्त मुन्दर वस्तुओम सुन्दरतम वस्तु है.---'सर्वेपा हि शोभमानाला शोभ- नतमा विद्या, विस्पोऽपि विद्यावान् बहु गोभते । तस्मात् ये एते देवा इसीलिए य तीना देवता यद् अग्नि वायु इन्द्र -जो कि अग्नि, वायु और इन्द्र के नाम में प्रसिद्ध हैं, अन्यान् देयान् अतितराम् इव-दूसरे (चन्द्रमा आदि) देवा की अपेक्षा मानी अतिशय थेप्ठ है। हिं से एतन् नेदिष्ठम् पस्पृशु -क्योकि उन्होंने ही इस समीपस्थ (ब्रह्म) को (दर्शन रा) म्पर्ग दिया है । नेदिष्ठ नेद् (निफ्ट)+ईप्ठन्, निक्टनम । पस्पृशु --म्पदा, लिट् प्रथमपुरुष बहुवचन । ते हि एनत् प्रथम विदा- चार महा इति---और उन्होंने ही इसको सबसे पहले जाना है कि यह ब्रह्म है । ममस्त देवताओं में अग्नि, वायु और इन्द्र को ही परम श्रेष्ठ मानना चाहिए, क्योति उन्ही तीनो नै ब्रह्म का मस्पर्श प्राप्त किया है और उन्होंने ही इस सत्य को समझा कि हम लोगो ने जिलका गान प्राप्त किया है, जिमने वार्तालार किया है और जिसका शक्ति में असुरो पर विजय प्राप्त की है, वही माक्षात् पूर्ण ब्रह्म परमात्मा है। (अन्य देव- ताओ ने तो उनसे वेवन सुनकर जाना कि हम जो दिव्य यक्ष दिखाई द रहा था, वही ब्रह्म था ।) इसी प्रकार जिन सौभाग्यशाली पुरषो को विमी भी कारण से ईश्वर के सम्पर्श का, उसके दर्शन, स्पर्श और उसके साय सदानाप का सुजवसर प्राप्त हो चुका है, उनकी महिमा भी इन्द्रादि देव- ताओं के समान है। इन तीनो देवताओ में भी अग्नि और वायु की अपेक्षा इद्र श्रेष्ठ है, इसकाकारण अगले मात्र में बताया गया है । तस्मात व इन्द्र' अन्यान् देवान् अतितराम् इव-इसीलिए इन्द्र दूसरे देवताओ की अपेक्षा मानो अतिशय येष्ठ है । हि स एनत् नेदिष्ठम् पस्पर्श-क्योकि उसने इस समीपम्य (ब्रह्म) को (उमादेवी से सुनकर सबमे पहले मन अधिकारिवगैष राजो जागरूकता (व्याख्या) १०१ के द्वारा) स्पर्श किया । स हि'ब्रह्म इति-(और) उसी ने अन्यान्य देवताओं से पहले यह जाना कि यह ब्रह्म है ! अग्नि, वायु और इन्द्र तीनों को बह्म का दर्शन और तत्त्व-ज्ञान की प्राप्ति हुई, परन्तु इनमे भी इन्द्र ने सबसे पहले इस तत्त्व को समझा कि ब्रह्म की महिमा में ही मारे देव महिमान्वित हैं, इसलिए इन्द्र सबसे श्रेष्ठ माना गया । डा० राधाकृष्णन् के अनुसार इस आल्यान मे रूपकात्मक ढग से नाना वैदिक देवताओं पर परब्रह्म को सर्वोच्च सत्ता प्रतिष्ठित की गई है। ५-अधिकारिवर्गेषु राज्ञो जागरूकता चन्द्रगुप्त मौर्य के अमात्य कौटिल्य (चाणक्य) का 'अयंशास्त्र' (४०० ई० पू०) अर्थशास्त्र-साहित्य का सर्वोत्तम ग्रन्य है। उसे प्राचीन भारत का आर्थिक एवं राजनीतिक कोग कहा जा सकता है। राजकुमारों की शिक्षा-दीक्षा, मन्त्रि-मण्डल, गुप्तचर, राजदूत, अन्त.पुर, शासन-प्रबन्ध, दुष्टों का निग्रह, व्यवहार (कानून), चीजो में मिलावट, मूल्य-नियन्त्रण, भूठे नाप-तोल को रोकने के उपाय, कूटनीति, युद्ध-मंचालन, गुप्त विद्याएँ आदि अनेकानेक विषयों पर कौटिल्य ने सुलझे हुए विचार प्रकट किए हैं, जिनसे आज के परिवर्तित युग मे भी लाभ उठाया जा सकता है। 'मर्थगास्त्र' की भाषा गद्य-प्रधान है, जिसमें कही-कही पद्य भी आ गए हैं । गद्य में सूत्र और भाप्य दोनों शैलियों का सम्मिश्रण पाया जाता है। प्रस्तुत पाठ में भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के प्रति शासक किस प्रकार जागरूक रहे, इस विषय पर ऊहापोह किया गया है । कौटिल्य के मुझावों को क्या आज भी कार्य-रूप में परिणत किया जा सकता है, यह भले विचारणीय हो, पर मार्क की बात यह है कि आज से लगभग २५०० वर्ष पहले ही भारत के राजनीतिन सरकारी विभागो मे भ्रष्टाचार के सस्कृत-गद्य-वीयो उमूलन के लिए क्सि गम्भीरता से सोचते थे। सोचते ही नहीं थे, वरन् ऐमे व्यावहारिव नियम भी बनाते थे, जा उन दिनो अवश्य ही लागू किए जान रहे हागे। कौटिल्य का गद्य औपनिपदिक गद्य मे अधिक प्रान्जल और सयत है । निराडम्बरता और सरलता इसके विरोप गुण हैं । लम्वे समासो का प्रयोग दिखाई देता है। वाक्य-विन्यास चुस्त और गठा हुआ है । पदो की पुनापित लुप्त हो गई है। [पृ० ३७] अमात्य नियोग्या ---अमात्या की योग्यता (सम्पदा) मे युफ्त व्यक्तियो को, उनकी निजी सामथ्र्य के अनुसार (शषितत ), मरकारी विभागों के अध्यक्ष पद पर नियुक्त करना चाहिए। कारयेत् -बाय-सलग होने पर उनकी प्रतिदिन जांच-पह- ताल करनी चाहिए। चित्तायोकि मनुष्यो का चित्त चचल होता है। अश्वसधर्माण विकुर्वते-मनुप्या के गुण (धर्म) घोडा-जैसे होते हैं और विमी काम में लगाए जाने पर उनमे विकार आते रहते है । विकुर्वते- विपरीत कुवन्ति । तस्मात्०--दमलिए कर्ता, साधन, देश, काल, कार्य, उसका प्रारम्भ और परिणाम इन सबका पता रखना चाहिए। ते यथा कुर्य-वे (विभागीय अध्यक्ष) आदेशानुसार काम करें, न उनमे घनिष्ठना हो (असता) और न वे आपस में लड़ें (अवि- गृहीता)। [पृ० ३८] सहता मक्षयेषु -घनिष्ठता होने पर वे (राज्य की आय) हडप जाएंगे। विगृहीता विनाशयेयु -~~लडने पर वे काम बिगाड देंगे। न चानिवेद्य कारम्य-आपत्तियों के निवारण के अति- रिक्त (=अयत्र) व कोई भी काम म्वामी की अनुमति बिना यारम्म न करें। प्रमाद द्विगुणम्---असावधानी करने पर दैनिक वेतन तया मर्च का दुगुना जुर्माना (अन्ययम्) उन पर दिया जाए। यश्चषा लभेत-इन (अध्ययो) मे जो (राजकीय) बाय को यादेश के अनुसार या उसमें वही अधिक एकत्र करता है, उसे पद-वृद्धि और सम्मान प्रदान करना चाहिए।
अधिकारिवर्गषु राज्ञो जागरूकता (व्यास्या) समुदयम्-~~~आय । परिहापयति-कम करना है या हानि पहुंचाता है। राजार्थ भक्षयति--राजा का भाग हडपता है । अज्ञानादिमिः यदि वह अनजाने में (राज्य की आय मे) हानि पहुंचाता है तो उसे उस हानि को उसी मात्रा में (यथागुणम्) पूर्ति करनी होगी। द्विगुणम् उद्भाव- यति----दुगुनी बढ़ा देता है । जनपदं भक्षयति-~-वह देश को हानि पहुंचाला है ।'स चे राजानम उपनयति यदि वह (उस दुगुनी आय को) राजा तक पहुँचा देता है तो अल्पापराचे वारयितव्यः-अपराध अल्प होने पर उसे चेतावनी देनी चाहिए। महति०--- -~-अपराध गम्भीर होने पर उसे अपराध के अनुसार दडित करना चाहिए । यः समुदयं । भक्षयति--जो आय को (मुनाफा अजित किए बिना) खर्च कर डालता है वह कर्मचारियो के परिश्रम को खाता है (व्यर्य करता है ।) सः । दण्डयितव्य:-~-उसे (व्यर्थ गए) काम के दिनो, (बेकार गई पूंजी की कीमत तथा कर्म- चारियों को दिए गए वेतन के हिसाव से दड देना चाहिए । आधकरणे शासनस्य:-विभागाध्यक्ष । कर्मपाः यथातथ्यम् -काम का वास्तविक परिमाण । आयव्ययौं ब-तथा आय और व्यय । व्यास- समासाभ्याम् --एक साथ और अलग-अलग करके । आरक्षीत-जाँचे । मूल · प्रतिवयेत् उसे मूलहर, तादात्विक और कदर्य लोगो पर रोक लगानी चाहिए (उन्हे बरखास्त कर देना चाहिए) । य: मूलहरः-जो बाप-दादों के पैसे को (वशानुगत सम्पत्ति को) अन्याय से खाता है, वह मूलहर है । यः तादात्विकः-जो कुछ कमाता है उसे सारा चट करने- वाला तादाविक है। यो कदर्यः--जो अपने नौकर-चाकरी को तथा स्वयं अपने को कष्ट पहुँचाकर धन जोड़ता है, वह कदयं है । अध्यक्षाः · कुर्यः-अध्यक्षों को चाहिए कि वे गणक या लेखा-परीक्षको (संख्यायक), लेखकों, सिक्कों की जांच-पड़ताल करनेवालों (रूपदर्शक), कोषाध्यक्षों (नीवीग्राहक) तथा सैनिक अधिकारियों (उत्तराध्यस) के साथ सह्योगपूर्वक अपना-अपना कार्य करें। हत्य · अपसाः हाथी, घोड़े और रखों के अधिकारियों के पास.
१०४ सस्कृत-गद्य-वीयो रहनेवाला को, जो चतुर और ईमानदार हो, गणको आदि पर निगरानी रखने के लिए गुप्तचर नियुक्त करना चाहिए। बहुमुख्यम् स्थापयेत- प्रत्येक विभाग के वई अस्थायी अध्यक्ष होने चाहिए। मत्स्या ०-जिम प्रकार पानी के अन्दर विचरण करती हुई मछलियो को पानी पीते हुए नहीं जाना जा मक्ता, उसी प्रकार राजकीय काम में लगे सरकारी नौकरी को (अपने लिए) पैसा बटोरते हुए नहीं देखा जा मकता। [१० ३६] अपि शक्या-आकाश म उहते हुए पक्षियों की गति- विधि जानी जा सकती है, लेग्नि गुप्त भावनाले मरवारी कर्मचारियो की चाल टाल का पता नहीं लगाया जा सकता । न क्षयन्ति-जो राजा की आय को पाने के बजाय न्यायपूर्वक बढाते हैं और उसके प्रिय और हित में सलान रहते हैं, उसकी नौकरी स्थायी कर देनी चाहिए। ६-अनन्तपार किल शब्दशास्त्रम् पाणिनि को 'अष्टाच्यायो' पर सबसे प्रामाणिक टीया पतञ्जति का 'महाभाष्य' है। इमरे नो पाह्निों में आचार्य ने व्यापरण के कर्ता की प्रतिभा पर विस्तृत प्रकाश डाला है। पतञ्जलि का उद्देश्य कात्यायन यादि मध्यवर्ती भाचायों द्वारा उठाए गए मभी पापो की छानबीन नहीं था। पागिनि की वंज्ञानिक धारा एक बार स्पष्ट हो गई, वहीं सबके-मब आक्षेप यापमेनाप स्पष्ट हो जाते हैं, क्योकि पाणिनि कीकृति एक स्खे क्यावरण की न होकर मूरत एव भाग-ज्ञानिक की थी। पतनि पग-पग पर पाटग को हम सही दृष्टिकोण मे अदात मरते चलते हैं। प्रस्तुत यश 'महाभाप्य के प्रथम बाहिक का एक उद्धरण अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रम् (व्याख्या) है। इसमे आचार्य ने इन तीन प्रश्नों को उठाकर इनका समाधान किया है---(१) शब्द क्या है ? (२) व्याकरण के प्रयोजन क्या है ? (३) च्याकरण के अध्ययन का तरीका क्या होगा? [पृ० ३६] शब्दानाम् अनुशासनम् शब्दानुशासन शब्दशास्त्रम् । अनुशासनम् - छानबीन । पत्तञ्जलि व्याकरण को गध्दशास्त्र कहना अधिक उपयुक्त मानते है। इस पर दार्शनिक प्रश्न उठा सकता है-'शब्द' से आपका अभिप्राय है ? पनजलि गौ' का उदाहरण देकर एकदम स्पष्ट कर देते है कि शब्द सम्पूर्ण वस्तु का ब्वनि-रूप प्रतिनिधि है, मात्र द्रव्य, क्रिया, गुण, आकृति आदि का द्योतक नहीं। केषां - वैदिकानांच-पाणिनि का व्याकरण मुख्यत संस्कृत भाषा के लिए है और संस्कृत के भी दो रूप हैं वैदिक और लौकिक । सर्वसावारण में प्रायः यह आस्था रही है कि वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं, अत्त. वैदिक मन्त्रों अथवा शब्दों की परीक्षा अनधिकार नेप्टा है। किन्तु पतञ्जलि के अनु- भार संस्कृत के ये दोनों ही रूप व्याकरण की वैज्ञानिक परीक्षा के लिए “एक-से स्थान हैं । अब पतञ्जलि लौकिक (संस्कृत) और दैदिक शब्दों के कुछ उदाहरण देते हैं । शं नो देवीः अभिष्टये--दिव्य गुणों से युक्त ये जल- धाराएँ (आप.) सव तरह मे (अभिष्टये----अभि-'- अश् +-क्तिन्-डे) हमारे लिए कल्याणकारी हों। यह अथर्ववेद का मात्र है। इपे त्वा कर्जे त्वा-मै अन्न के लिए, बल के लिए तेरी उपासना करता है । यह यजुर्वेद का मन्त्र है। अग्निम् ईडे पुरोहितम्-मै एक अग्नि की ही उपासना करता हूँ, मेरा पुरोहित (ऋत्विक, होता सब कुछ) वही है । यह ऋग्वेद का मन्त्र है । अग्नि आ याहि वीतये-हे अग्नि, आओ और हमारे इन उपहारों का रस लो (पीतये रसास्वादाय) । यह सामवेद का मन्त्र है । मथ गौः इत्यत्र कः शब्दः-'गौ' इसमें आप किसे शब्द मानते हैं ? कि यत्तत्-पया जो गलकम्बल (सामना), पूंछ, कूबड़, सुर, जोंग- वाला पदार्थ है, वही शब्द है ? नेत्याह~-पतञ्जलि उत्तर देते हैं--- नही, इसे द्रव्य (वस्तु) कहते हैं, शब्द नहीं । यहि-तब क्या गो की - , १०६ सस्कृत-गद्य-वीयो चेप्टाना को, आँख झपकाने यादि को शब्द कहते हैं। नहीं, यह तो किया है । इङ्गितम् अभिप्रायस्य सूचक शरीरव्यापार । चेप्टित बायपरिस्पन्द ।। निमिपितम् यक्षिव्यापार । यहि तत् शुक्ल शब्द -तब क्या गपेद, नीला, भूरा, कबूतरी आदि जा गौ का रंग होता है, उसे शब्द कहते हैं ? नहीं, यह तोगुण है । यहि-क्या तव सारी गौओ में जो सामाय गोत्व अश है, उसे शब्द कहते हैं ? नहीं, इसे तो आरति कहते हैं । [१० ४०] येन उच्चान्तिन-जिम ध्वनि का उच्चारण होते ही वस्तु का ग्रहण (मम्प्र- त्यय-ज्ञान) हो जाता है, उम घ्वनि को शब्द कहते हैं । अथवा०-ससार में भी हम देखते हैं कि जिम ध्वनि से पदाथ वी प्रतीनि अथवा बोध होता है, उम शब्द कहते है । दाब्दवारी अब मादक -यह शोर मचानेवाला वञ्चा है. यह शोर मचानेवाले दालक के विषय मे ही कहा जाता है । दाद की परिभाषा करने के दाद पतन्जलि शब्दानुगामन (व्याकरण) के पांच प्रयोजनों को गिनाते हैं-(१) रक्षा-व्यापरण-अध्ययन का श्री. गणंग सम्भवन वैदी के सही अर्थ को समझने के लिए हुआ था । (२) उहा-अनेक स्थलो पर वेद मे वित्ति का लोप और विपयय मिलता है, उसकी अनुमान से पूर्ति (महा) भी व्याकरण के विज्ञान द्वारा ही हो मक्ती है । (३) यागम-पीदे परम्परा (बागम) ने भी व्यावरण को ही छह वेदाङ्गो में प्रधानता दी। (४) लघु-व्याकरण मापा-विज्ञान का 'शाट क्ट' (लघु) है। (५) मस देह-व्याकरण द्वारा ही, उदाहरणतया, यह सदेह दूर हो सकता है कि यहाँ एव ममम्न पद (म्यूलएषती) स्वर- भेद से बहुवोहि है और कहाँ तत्पुरुष । लोपागम०-एक वयावरण ही बता सक्नाह देद के मन्त्रो में वहां कौन-सा वणं सधि यादि के नियम से लुप्त (लोप) है या वहां वह उपर में आ गया (आगम) है (थया', ३),या कहाँ उसका स्पातर (विवार) हो गया है । इस प्रकार दयावरण ही वेद के मही अयं तक पहुँच सक्ता है । -अनुमान। न सर्व . अर्थात् वेदा में स्थान-स्थान पर लिङ्ग-- व्य यय तथा विभक्ति-व्यत्यय (अनियम) दृष्टिगोचर होता है। ते ५ - अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रम् (व्याख्या) १०७ अवश्यं तव्याः-पुरोहित के लिए यह गावश्यक है कि उसे वैदिक मन्त्रो के सही अर्थ का ज्ञान हो। विपरिणयितव्याः (वि---परि+नम्+ रिगच्+इट्+तव्य) - अर्थानुसारेण सम्यक् ज्ञातव्या. ! ब्राह्मणेन "व्याकरणम्-ब्राह्मण के लिए यह आवश्यक है कि वह किसी प्रलोभन के बिना धर्म का, अर्थात् साङ्गोपाङ्ग वेद का, अध्ययन करे । वेद के छह अंगो मे व्याकरण प्रधान है, अत. व्याकरण के अध्ययन से अन्य वेदाङ्गो का अध्ययन सुकर हो जाता है । लघ्वर्थम्--व्याकरण के अध्ययन के लिए एक और युक्ति भी दी जा सकती है, वह यह कि शब्दशास्त्र के ज्ञान के लिए इससे सरल और संक्षिप्त कोई अन्य उपाय नहीं। असन्देहार्थम् 1-~वाक्य का अर्थ समझने मे कभी-कभी सन्देह हो जाता है; उसके निराकरण मे व्याकरण ही सहायक हो सकता है। इसका आचार्य एक उदाहरण देते है-याज्ञिकर इति-यज्ञ मे अग्नि और वरुण का नाम लेकर किस प्रकार की गौ का आलम्भन (बलि) किया जाए, इसके सम्बन्ध में यज्ञाचार्यों की उक्ति है--स्यूलपृपती०, अर्थात् वह गौ 'स्थूलपृषती' होनी चाहिए । तस्यां सन्देहः--अब स्वभावतः प्रश्न उठता है कि यहाँ 'स्थूलपृपती' का क्या अर्थ है ? क्या यह कि 'भ्यूल और पृपती' ? अथवा यह कि 'स्थूल पृषलोवाली' ? पृपती- पत्+ई-लोमवती, रोएँवाली)। तान् न अबयाकरणः" इत्ति--- इसके सही अर्थ पर कोई अवैयाकरण प्रकाश नही डाल सकता, क्योकि उसे स्वर का जान नहीं। स्वर-प्रक्रिया के नियमानुसार यदि उदात्त स्वर पूर्वपद पर है तो 'स्थूलपृपती' इस समस्त पद का अर्थ बहुव्रीहि के अनुसार (स्थूलानि पृपन्ति यस्याः सा) करना होगा; और यदि स्वर उत्तरपद पर है तो उसका अर्थ तत्पुरुष के अनुसार (स्थूला च पृपती च) करना उचित होगा। [पृ० ४१] तत्कथं कर्तव्यम्-अब प्रश्न यह उठता है कि शब्दों के अनुशासन (शब्द-परीक्षा) के सम्बन्ध में प्रणाली कौन-सी अपनाई जाए ?
. महत-गद्य-वीयो (१) क्या मूल (संस्कृत) गद का सम्लन (उपदेश) ही पर्याप्त हागा इसे 'शब्दोपदेश-प्रणाली' कहते हैं। (२) अथवा ( -आहोस्वित्) अपशब्दो / = अपभ्रशा) को तुलनात्मक ममीभा भी आवश्यक है ? इसे 'अपशब्दोपदेश-प्रणाली' कहते हैं। (३) अथवा मूल शब्द और अपभ्ररा दोनों की साय-साय परीक्षा करनी चाहिए? इसे 'उभयोपदेश-प्रणाली' या 'प्रतिपदोन-शब्दपारायण प्रसानी' कहते हैं। 'उपदेश' एक पारि- मायिक शब्द है, जिसके अन्तर्गत मालन, तुनना, समीक्षा आदि का ममावेश होता । पतञ्जति दूमरी और तीसरी प्रणाली की अनुपयुक्तता सिद्ध करने प्रथम प्रणाली को ही समीचीन बताते हैं। यदि तावत- उदाहरण के तौर पर यदि शब्दोपदेश-प्रणाली के पनुमार म्ल शन्द 'गो' का सालन ही पर्याप्त समझा जाए तो म्वभावत 'गावी', 'गोणी', 'गोता', 'गोपोनिका' आदि 'गो' शब्द के मभी अपभ्रश व्याकरण की दृष्टि में अमुद्ध ठहाँगे । परन्तु इन अपभ्रशो का प्रयोग भी लोव-व्यवहार में उसी प्रकार होता है जिस प्रकार मूल (शुद्ध) शब्दो का । यदि इसके विपरीत अपशब्दोपदेश-प्रणाली को अपनाकर पहले इा सव अपभ्रयो का संग्रह कर ले तो तुना द्वारा ही हम मूल 'गो' शब्द तक पहुँच सकते हैं, अन्यया नही। कि पुन अन ज्याय --अब देखना यही है कि इन दोनो प्रणालियों मे मरत (ज्याय ) कौन-सी है और क्लिष्ट (गरोयान्) कौन-सी' लघुत्वात् शब्दोपदेश-प्रणाली सरत है, क्यानि वह लघु (सभिप्त) होती है। गरीयान-अपशब्दोपदग-प्रणाली विजप्ट है, क्योकि एक ही शब्द ये, उदाहरणत 'गो' के, अनेकानेर जपभ्रा या स्पान्तर मिनत हैं । इप्टान्वारयान खलु अपि भवति-दादोपदेश-प्रणाली का एक और नाम यह है कि मूत शब्द (इप्ट) को पकड़ने के पश्चात् उप शब्द का ऐतिहासिक और तमिर विकाम (अनु-+-याम्यान) भिन्न-भिन्न नपभ्रगी म स्वय म्पप्ट होता चलता है। अनभ्युपाय पाठ ~गदानुशासन में एक ही पद के भिन्न-भिन अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रन (व्याख्या) १०६ रूपान्तरों, अपभ्रंशों की पग-पग पर समीक्षा न उचित जंचती है, न सम्भव ही. (अनम्युपाय:) । मरणवर्मा मनुष्यो की बात तो छोडिर, देवताओं के विपय में भी यह अव्यावहारिक है। इनके विषय में एक कथा आती है (अनुश्रूयते)--बृहस्पति ने इन्द्र को उभयोपदेश-प्रणाली (शब्द तथा उसके हरएक अपभ्रंश की सोमा) के अनुसार शब्दानुशासन का पाठ पढ़ाया । हजार वर्ष बीत गए, किन्तु यह पहला पाठ ही समाप्त होने को न आता था । यह स्मरण रहे कि इन्द्र-जैसा विद्यार्थी और बृहस्पति-जसा आचार्य सामान्य नहीं होता और यह पठन-पाठन हजार वर्ष (वर्ष का मापदण्ड भी पार्थिव न होकर अलौकिक था) चलता रहा । पर इन्द्र का अध्ययन-काल समाप्त नही हो सका। कि पुनः अद्यत्वे-फिर बाज के युग की बात क्या करें । यः सर्वचा...जीवति कोई विरला पुरुप बहुत लम्बी आयु जी भी जाए तो यही न कि सौ साल । चतुभिः प्रकारैः-- किसी विद्या या विज्ञान पर पूर्वाधिकार तब होता है जब (१) उसे सही-सही गुरु-मुख से प्राप्त किया जाए (आगम), (२) फिर उसे मनन द्वारा आत्मसात् किया जाए (स्वाध्याय), (३) इस गृहीत ज्ञान को यध्यापन द्वारा शिष्यों में वितरित किया जाए (प्रवचन), तथा (४) दैनिक जीवन में उसका उपयोग किया जाए (व्यवहार) । (कुछ टीका- कार परम्परा के अनुसार 'व्यवहार' का अर्थ 'यन-कर्म' ही समझते हैं।) तत्र च "स्यात्--अव सोचिए, यदि कोई शिप्य इस उभयोपदेशं (अथवा, प्रतिपदोक्त शब्दपारायण) प्रणाली के अनुसार गुरु-मुख से शब्दानुशासन का पाठ पढ़ना शुरू करे तो उसकी सारी आयु इस विद्या के ग्रहण (आगम) में ही बीत जाएगी। तब फिर स्वाध्याय कव होगा? प्रवचन कव होगा ? और उस विद्या का व्यावहारिक उपयोग कब होगा? तस्मात् पाठः-इसलिए शब्द-शब्द पर उसके अपभ्रंश रूपान्तरों की साथ-साथ समीक्षा असम्भव है, अनुपयुक्त है । यह स्थिति ऐसी है जैसे कोई यात्री बीच समुद्र में पड़ जाए और उसे कही ओर-छोर न दीले शब्दशास्त्र भी इसी प्रकार का एक अनन्त-अपार सागर है ।
सस्कृत-गद्य-चीयो ७–सत्सेवितः पन्या व्याकरण में जो स्थान पाणिनि और पतञ्जनि का है, वही आयुर्वेद में चरक मुनि का है। भारतीय चिकित्साशास्त्र के वह प्रमाणभूत आचार्य हैं । वह प्रथम शताब्दी ई. में महाराज कनिष्प के चिकित्मक थे । 'चरक- सहिता' गद्य मे लिम्वित है और प्रत्येक अध्याय के अन्त मे श्लोक दिए गए हैं। चरक ने शल्य-रिया को छोडकर चिकित्सा के सभी विपया का विवे- चन किया है। उनके अनुसार स्वास्थ्य के तीन आगार हैं-भोजन, विधाम और सयम । स्वच्छता के उन्होंने कई नियम बताए हैं तथा पाप को रोग का एक कारण मानते हुए कई धार्मिक और नैतिक उपदेश भी दिए हैं। ८०० ई० में कश्मीर के दृढदल ने 'चरफ महिता' में सशोधन एव परि- वधन दिया था। इससे काफी पहले ही उसका फारमी में अनुवाद हो चुका था । फारसी से उसे अरवी मे अनूदित किया गया। प्रस्तुत प्रकरण में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी नियमो का निर्देश है । स्वच्छता और शिष्टाचार, सदाचार और आत्म- सयम को चरक ने स्वास्थ्य के अतगन रखा है। घरव के वनाए हुए नियमो से तत्कालीन भारतीय समाज की गई विशेषताओ पर प्रकाश पडता है । उनमें से कई आज भी हमारे बीच माय हैं। चरक की भाषा सरल और गनिमान् है। [१० ४२] सवृत्तम्---स्वास्थ्यवर शुभम् आचरण सद्वृत्तम्, यद- नुप्टानेन शरीरस्य, मनस , द्वेश्च स्वास्थ्य प्राप्नोति नर तत् सद्वृत्तम् । सिद्ध.---तपस्वी । अग्निम् उपाचरेत् --अग्नि की सेवा अर्थात् होम मरे। योषधी प्रास्ता धारयेत् ---उत्तम-उत्तम ओषधियों धारण करे। (सदा पास रपे, जैसे 'मपंदगोपचार' बूटी कस्तूरी वादि) । Sो कालो उपस्पदोत् (स्नायात्, सध्याम् सपासीत)-दोनो समय स्नान तथा सन्ध्या करे । मला मादध्यात्-गुदा आदि मत-मार्ग तथा परो को सदा स्वच्छ रखे । मलायनेप-मननि सरणमार्गषु । त्रि सहारयेत~~ सत्सेवितः पत्याः पक्ष में (कम-से-कम) तीन बार दाढ़ी-मूंछ (श्मश्रु) और सिर के बाल तथा नख कटवाए। पञ्चभिः पञ्चाभिः दिन क्षौर नखकर्तन च विधेयम् । नित्यम्--प्रतिदिन ऐसे वस्त्र पहने जो स्वच्छ हो, फटे हुए न हो, प्रसन्नमन रहे, सुगन्धि (जैसे इन) धारण करें। अनुपहतवाता:--- अम्लानवस्त्रः, अत्रुटितवस्त्रो वा । साधुवेश:-वेग उत्तम हो, शिष्टजनोचित हो। प्रसाधिलकेशः -- वालों को (तेल-कधी से ) संवारकर रखे। मूर्ष ०--सिर, कान, नाक तथा पैरों में रोज तेल लगाए। पूर्वाभिभाषी---- (परस्पर मिलने पर दूसरे के बोलने से पहले (सत्कारयुक्त वचनों से) बोले । सुमुख:-प्रसन्न- मुख रहे। दुर्गध्वन्युपपत्ता-दुर्गतिपतिताना रक्षिता, कठिनाई में पडे हुओं का रक्षक बने ।होता-होम करने वाला। यष्टा ---यज्ञ करनेवाला। चतुप्पयानां नमस्कर्ता-चौराहो पर नमस्कार करनेवाला। बलीनाम् उपहर्ता--बलिवैश्वदेव यज्ञ करनेवाला (कुत्ते, रोगी, चाण्डाल आदि के लिए बलि देने वाला) : पितृभ्यः पिण्डदः--पितरो को पिण्ड देनेवाला। काले०-समय पर और हितकर वचन बोलनेवाला, मितभाषी और मधुर वक्ता । वश्यात्मा---जिसने अपनी इन्द्रियों को वश मे कर रखा है। हेतावीर्घः (हेती ईपुः) फले नेर्पः (फले न ई[:)--श्रेष्ठ कर्म करने में उसके फल की इच्छा न रखनेवाला (तुलना कीजिए--- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्व- -कर्मणि ॥ गीता २।४७); अथवा, कारण में ईर्ष्या रखनेवाला परन्तु, फल में ईर्ष्या न करने वाला; अर्थात् 'अमुक व्यक्ति जिन कर्मों के करने से धनवान् या विद्वान् बना है, वही कर्म में भी करूं, जिससे कि मैं भी धनवान् या विद्वान् बन जाऊँ', ऐसी इच्छा मनुष्य को अवश्य करनी चाहिए, किन्तु यह इच्छा कि 'अमुक व्यक्ति का धन में ले लूं'; इस प्रकार की ईया से दूर रहना चाहिए। निश्चिन्तः-जिनके विचार डांवाडोल (चिन्ताकुल) न हों। निर्भीकः--भयरहित। धीमान्--बुद्धिमान् । "ह्नीमान्--लज्जायुक्त । विनय-विनय, बुद्धि, विद्या, कुल तथा आयु प्रयत्नशील परन्तु सस्कृत-गद्य-वीयो , मे वृद्धो तथा सिद्ध आचार्यों का उपासर (उनका सत्मग करने वाला), छत्री-छाता लगानेवाला। दण्डी–दण्ड (चडी) रखनेवाला। मौली- सिर पर पगडी, टोपी नादि धारण करनेवाला । टममे ज्ञात होता है कि चरण के समय में मिर नगा रखना अच्छा नहीं माना जाना था। सोपानर - जूना पहननेवाला । न नग्नचरण चरेत् । युगमात्रक विचरेत-युग (चार हाय) मार दूरी तक अपनी दृष्टि र, अर्यात् चलते समय चार हाय की दूरी का रास्ता देव-भाल कर चते। इससे ज्यादा दूर या कम देखनेवाला ठार पाता है। मगलाचारशीत - मगल- आचारी मे तत्पर, उन कर्मकाण्डो का का जो मागलिक, ऋद्धि-मिद्धि- दधा हो । कुचल०-सी जगह न जाए, जहाँ चीय. (हुचल), हड्डी, कांटे पढे हो, जो अपवित्र (यमेध्य) हो, जहाँ वेग पडे हो, तुपो का ढेर नगा हो, राम्ब पड़ी हो, पान (टूटे हुए मिट्टी आदि के वतन) मादि पडे हो, जहाँ लोग स्नान करते हो (क्योकि ऐसे स्थलों पर टोरें पाने, फिमलने आदि का डर रहता है) तया जहां वलि दी जाती हो। प्रार--- पकावट होने से पहले ही व्यायाम बन्द कर दे। सर्व स्पा-ममम्न प्राणियों को अपना बन्दु समझे । ऋदानाम् अनुनेता-युद्ध पुरषों को अनुनय-विनय द्वारा समझाने वाला । मोता०-टो हुने यो बारवासन देनेत्राता। दीना--दीनो का सहारा। सत्यमय-सत्यमनिज्ञा सामप्रधान –शान्नियुक्त । परपरप०-दूमरो के कठोर वचन महने- वाला। अमन --यमाहिष्णुता या पोय (अमर्प) का नागक, अर्यात् विनोदप्रिय। प्रशमगुणदी-शान्तिको गुण-म्प में देखनेवाला । राग- राग, द्वेष आदि के कारणो का नारा हो। न अयस्वम् यादद्यात्-दूसरे के धन का अपहरण न करे। नायनि- मम्-दूसरे की लक्ष्मी को न चाहे । न वैर रोदपेन्-वर मे रचिन रखें। न पापे अपि पापी' स्यात्-पाप के उपस्थित होने पर भी पारी न हो, ययवा पापी के माय भी पार न करे, भारत के प्रति भी मारन करे, नान्यदोषान् यूपत्-दूसरे के दोगे को न कहे, दूसरो की निन्दा .
सत्सेवितः पत्याः (व्याख्या) न करे। नान्यरहस्य---- -दूसरे के रहस्यो को न खोले 1 नायामिकः... सहासोत. अवामिक और राजद्वेषी लोगो के साथ न वै । नोन्मत्तः... दुष्टः- इसी प्रकार उन्मत्त (पागल), पतित (धर्मभ्रष्ट), भ्रूणहन्ता (गर्भपात करनेवाले), नीच और दुष्ट पुरुषों के साथ न रहे। पृ० ४३] न दुष्टयानानि आरोहेत-दुष्ट सवारियों पर न बैठे। न माजानु०- घुटनों से ऊँचे या नोचे आसन पर, जिस पर कुछ विछा न हो, न बैठे। नाना प्रपद्यत--जिस शय्या (चारपाई आदि) पर विस्तर आदि न विधा हो (अनास्तीर्णम्), सिरहाना न लगा हो (अनुपहितम्), जो छोटी हो (अविशालम्), या ऊँची-नीची हो (असमम्), उस पर न सोए । न गिरि · चरेत--पहाड़ा की ऊँची-नीची चोटियो पर भ्रमण न करे । न भलो.---उग्र वेग वाले जल मे स्नान न करे। फूलं "नोपासीत--- नदियो यो किनारों की छाया में न बैठे, उसके पास न जाए । मारिन. चरेल-कहीं आग का उत्पात होने पर उसके चारो ओर न घूमे । न शब्द मुञ्चेत्--शब्दयुक्त हवा को मुंह से न छोडे (इससे दूसरों पर यूक पड़ने का डर रहता है); अथवा शब्दयुक्त अपान-वायु को न छोड़े, अर्थात् अपान-वायु छोड़ते समय ऐसा प्रयत्न करे जिससे शब्द न हो। न असंवृत्त । प्रवर्तयेत्---जम्हाई, छीक (खाँसी) तथा हँसने के समय मुंह को हाथ से ढक लेना चाहिए । न नासिकां कुष्णीयात् - नासिकारन्न अलि प्रवेश्य नखेन कण्डूयनं च न कार्यम्, नाक को न कुरेदे । न दन्तान विघट्टयेत्-दांतो को न बजाए, अथवा दांतो को न कुरेदे । न नखान् यादयेत्नखों को वजाए नहीं। "हन्यात--हड्डियो को परस्पर न टकराए, घर्षण न करे । न भूमि बिलिखेत् -~-जमीन पर (पैर आदि से) लिख नहीं। न छिन्यात् तृणम्--तिनकों को न तोड़े । न लोष्ट्रं मृदगी- यात्-मिट्टी के हेलों को न तोड़े। म विगुण०-~~-अपने अङ्गों द्वारा विगुण चेष्टाएँ, वुरी हरकतें न करे । ज्योती “वीक्षेत्-अत्यन्त चमक- चाली ज्योतियो (सूर्य आदि) को, तथा अनिष्टकारी, अपवित्र और अप्रशस्त वस्तुओं को न देखें। न हुं कुर्यात् शवम्-शव (मुर्दे) को देख- सस्कृत-गद्य-वीयी कर घृणा-सूचक हुकार न करे। य गव हु करोनि तेन मोमो वहिनिरस्ती भवति, इत्यागम । न चत्य आक्रामेत्--चत्य (ग्रम अथवा नगर का प्रधान वृक्ष), ध्वजा, गुरु तथा अन्य पूज्य एव अप्रास्ता की छाया को न लाँधे । न क्षपासु आसेवेत राभि के समय अमर सदन (देवगृह, मन्दिर मादि), चैत्य, चत्वर (चौक आंगन, मुली जगह), चतुपय (पौराहा), उपवन (बाग-चीचा), श्मशान नया मापातन (वध-स्थान) में निवास न परे। नैक प्रविशेन-~-अवेला ही रिसी गून्य-गृह (निजन या बहुत दिनो मे खाली पड़े मकान) मेलौर जगन में न जाए। न पाप- पाप का आचरण करनेवाली स्त्री, मिन तथा नौकर के मायन । नोसम --पोटजनो से विरोध न करे। न अपरान् उपानीद-नीचो के पास न जाए। न जिह्म रोचयेत्छन-दम गे रचि न । न भयम् उत्पादयेत्-क्सिी का डराए नहीं और स्वयं भी न डरे ! साहा माम (सामथ्य में यढकर दिया गया शारीरिक धर्म), नथा अत्यधिक मोने, जागने, नहाने और खाने-पीने से बचा रहे । न अध्यं निरन- घुटनो का ऊँचा उदार अर्थात् उर्दू भानन में देर तर न बैठ । न च्याला०-मपं, व्याघ्र, चीता आदि दप्ट्री (दाँतमाने) पगुना तया गाय, बैल, भंस आदि विषाणो (मीगवाले) पशुश्रा के समीप न जाए । पुरो ब्रह्मात्---पुरोवात (पूर्व की वायु अथवा टोर सामने से आनेवाली वायु), प, अपश्याय (गोरा) और अतिप्रवान (जॉपी) वा मेवन न करे। वलि नारभेत–कह शुरू न करे। नागु०- पान चित्त हुए बिना होम न करे । नोच्दिष्ट प्रतापयेत्-उच्छिप्ट (जव शरीर पर जूटन रगी हो) होकर तथा अग्नि को नीचे रखकर अपने को न रोके । नायिगत उपस्तीत-~-जब तन थकावट दूर न हो जाए नव तक म्नान न करे, सिर को गीला सिए विना स्नान न करे, नवथा नग्न होकर भी म्नान न करे। म स्नान-स्नान वी घोती में मिर का स्पर्श न रे। न देशा-देशो चे अप माग को इटाए नहीं। नोपस्पृश्य विभयात- स्नान करके उन्ही (ग्नान से पहले धारण किए हुए) दम्श्री को न पहने, - ११५ तसेवितः पन्थाः (व्याख्या) अथवा जिन वस्त्रों में स्नान किया है उन्हीको धो-निचोड़कर पुनः गोले ही न पहन ले। वाससी-द्विवचन से अभिप्राय अघोवस्त्र (लँगोटा, जाँघिया और बनियान से है। अस्पृष्ट्वा निष्क्रामेत्---रत्न, घृत, पूज्य, मांगलिक द्रव्य, पुप्प आदि का स्पर्ग किए विना घर से बाहर न निकले । न पूज्य.--पूज्य एवं मगलकारी पदार्थो को वाएँ करके न जाए और न अमंगलकारी पदार्थों को दाएँ करके जाए। अब भोजन-सम्बन्धी नियम बताए जाते है-अरल' सन्नम् आददीत । न अरत्नपाणि:- हाथ मे रत्न लिए विना (भोजन न करे)। न अस्नात: स्नान किए दिनां (भोजन न करे) । इस तरह हर पद के वाद 'भोजन न करे' का अर्थ इष्ट है । उपहतवासा:-फटे वस्त्र पहने हुए । त अपित्वा (गायत्री आदि) मन्त्रों के जप के विना (सन्ध्या किए बिना) । न अहुत्या देवताभ्यः---देवताओं के लिए होम किए विना। न आनिरूप्य पितृभ्यः-पिता, माता आदि को भोजन कराए विना । न अदत्वा गुरुन्यः न अतिथिन्यः न उपाश्रितेन्यः—गरु, अतिथि तथा आश्रितो को दिए विना । [१० ४४] न अयुण्यगन्धः--शुभ, गन्ध का अनुलेपन किा विना , न अमाली माला धारण किए बिना । न अप्रक्षालित०-हाथ, पैर और मुंह धोए बिना । उदङ मुखः--उत्तर की ओर मुख करके । विमना:--अन्यत्र मन लगाकर अथवा बिन्त मन ने। न अभक्ता०--अभवत (जो नौकर स्वामी के प्रति प्रीति न रखता हो), अशिष्ट (नीच, चाण्डाल आदि), अशुचि (अपवित्र) तथा क्षुधित (भूखे) नाफरी से (लाया-पकाया गया भोजन न करे) । पात्रीपु अमेष्यासु- अपवित्र पात्रों मे । अदेशे-अप्रवस्त स्थान पर। अफाले-बेवक्त । याको”---जहाँ लोगों की भीड़-भाड़ हो. या जहाँ बहुत-सी चीजें विखरी होने के कारण जगह तंग हो । न अदत्त्वा मनम् अग्नये---सबसे पहले अग्नि को दिए बिना (इससे भोजन के विपयुक्त होने पर विप का ज्ञान भी हो सकता है) 1 न अप्रोक्षितं प्रोमगोदक:--प्रोक्षण जल से सिंचन किए बिना । न मन्त्रः अनभिमन्त्रितन् मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित किए सस्कृत-गय-वीयो विना । कुरसयन्-~-निन्दा करते हुए । कुत्सितम्--निन्दित । प्रतिकूलीप- हितम- जो शत्रु द्वारा दिया गया जथवा उसरे तरीके मे रखा हुआ हो, या जा अपने शरीर के लिए अनुकूल न हो। आददीता+दा, विधि- लिड्, प्रथमपुरुप एक्वनन, मेवन करे । न पर्युपित भयेभ्य मास, अदरम्ब जादि, सूत्रे साग, फल एव अय भक्ष्य (लद आदि) पदार्थों के सिवा चासो (पर्युपितम् -पूर्वदिनावशिष्टम् गतरानिकम्) भोजन न बरे । अथान् ये पदाय नो कई दिन पडे रहने पर भी खाए जा मुक्त हैं। नमशेष सपिम्य -दही, शहद, नमक, मत्तू, जल और घी ये अतिरिक्त अय पदार्थो दो नि गैप न पाए, अर्थात् जितना दिया जाए उसमे मे कुछ बचा दे।न नवरा दपि भुजीन-रात के समय दही न खाए । न समजून एकान् अग्नीयात्- सतुआ वा एक-एक करके (दाना- दाना करके) न खाए । निशि मत्तू रात में न खाए । भुक्रवा--- भोजन कसे (सतू । खाए) । वहून्-अधिा माना में । न उदकान्त- रितान्याट, घी अथवा जल के बिना ( न खाए) । न यिन्या द्विज भक्षयेत् -- दानो मे काट पर सत्तुओ योन पाए । नयनजु शयीत--टेढा होकर न छोरे, न पाए और न लेटे। क्षयान्-दिक्क्येत् । न गित स्यात्--(मल-मूत्र आदि का) वेग होने पर दूसरे काय में न लगे, न लगा रहे । न पा उत्सजेन्---- वायु, अग्नि, जत, चन्द्रमा, सूर्य, द्विज तया गुस्ती को और मुंह पर न धूके, न अपान वायु छोडे तथा न मल-मूत्र मरे । म पन्याम्० ---रान्त मे मूत्र-रयाग न करें। न जनवति मञ्चेत् -अप होम, अध्ययन (पाठ), दलि तथा अन्य मागनिर नियाओ म समारना और ना साफ करना उचित नहीं । श्लेष्मसिद्धाणरम्-नामिकाविनि सृतमलम् । वदेन-मरपुरषो और गुरुओ की निदान करें। यदि अशुद्ध अवस्था में अभिचार-वमं (मन्त्र-तन्त्र प्रयोग), चत्य (मदिर, वृक्षा) एव पूज्यों की पूजा तया पठन-पाठन न करे। अभिनिवर्तयेत्--- मनि+निर + वृत्+गिच्, विधिलिङ्, प्रथमपुरुष, एकवचन ।
सत्सेवितः पन्याः (व्यास्या) न विद्य त्सु अनातवीपु-बेमौसमी विजली चमकने पर ऋतो साध्वी इति आर्तवी; सा न भवति इति अनार्तदी, तामु विद्युत्सु । इस तथा वाद के पदों का सम्बन्ध अध्ययनम् अन्यसेत् मे है । न अभ्युदितासु दिक्ष --- दिशाओं के प्रज्वलित होने पर । न अग्निसम्प्लवे-कही आसपास आग लग जाने पर ! नहामहोपगमने-- सूर्य-ग्रहण या चन्द्र ग्रहण के समय । नष्ठचन्द्रायां तियो अमावस के दिन । न अवपतितम् - न लेटकर । न अतिमात्रम् [अधिक मात्रा में। न तान्तम्--न तोड-फोड़कर (अर्थात् वाक्य या पद को बहुत लम्बा करके) । न विस्वरम्-- न बेसुरा । न अतिल्लीदम्न निर्वीर्य वाणी से । अतिसमय:--बहुभिः मिलित्वा कृतः नियमः । न नक्तं अदेशे घरम्--रात्रि में या अनुचित स्थान पर न घूमे । न सन्ध्यासु"स्यात्- सन्ध्या-समव भोजन (अभ्यवहार). अध्ययन, स्त्री और निद्रा का मेवन न करे । स्लिष्ट:-कुण्ठ आदि रोगो से पीड़ित । न गुह्यं विवृणुयात्--- कितीका भंडाफोड़ न करे, गुप्त बातों को प्रकट न करे । न कञ्चित अवजानीयात्---किसी की अवज्ञा न करे । पृ० ४५] न अहंमानी-- महङ्कार (घमण्ड) न करे। न अदक्षः-- कर्मकुगल. । न अदक्षिणः-- उदारचेता 1 न असूयकः-किसी से ईर्ष्या-द्वेप न करे । न गवां दण्डम् उद्यच्छेत् ---गौओं पर इंडा न उठाए । गण:-~-पचायत । न अधिक्षिपेत्--- इनकी अवज्ञा या निन्दा न करे । न वान्यवकुर्यात् -- भाई-बन्धु, अनुरागी (प्रेमी), आपत्ति में सहायता करने वाले (कृच्छद्वितीय) और रहस्य जानने वाले (घर की गुप्त बातें जानने वाले) को कभी अपने से अलग न अवीर-वैर्य-रहित न हो । न अत्युच्छ्रितसत्त्वः स्यात्-स्वाभिमान को अहंकार का रूप न दे दे। न लभूतभृत्यः-- भृत्यों आदि का पालन करे; अयवा उनकी भृति (वेतन) आदि को न दवा ले । न अविश्रध्ध- स्वजन:--ऐसा काम न करे, जिससे स्वजन भी विश्वास करना छोड़ दें। 'नंकः सुखो-अकेला ही मुखी न हो- अपने सुख में दुसरों को भी हिन्ना सस्कृतनाद्य-वीयो दे । न दुशीलाचारोपचार -दुराचार और दुराचारिया में अपने का सविधम्भी-~मपु विश्वासी। न सरकालविवारी 1---हर समय विचारा में ही न हया रह । न कायकालम् अतिपातयेन् - काय करने के समय को ऐसे ही न गंवा दे । न अपरीक्षितम् अभिनिविशेत--अपरीवित काय म एकदम न लग जाए । न चन्चल०-चञ्चल मन को सुना ही न ठोड दें। न आवघ्यात् --द्धि और इन्द्रिया (ज्ञानेन्द्रिया) पर जत्यन्त भार न टाल । दीयंसूत्री--जालमी । न मोक्पों अनुविदध्यात् (जनु +त्रि--भा, विविलिइ}-गोक या प म जाकर आगे मे बाहर न हो जाए । न शोरम् गुरसेत्--चिरकाल तद शान मे ही न पा रह । न मिद्धाल---मफन होने पर पिन न तो, न असफल शो पर दगी । प्रति अभीक्ष्ण स्मरेत्-प्रत्येर कार्य करते हुए अपनी प्रति (अपनी मीमा, गवित आदि) वा निरनर ध्यान रहे । हतप्रभाव निश्चित स्यान्- -मो मा पन मिरी दगा, यह हमेशा ध्यान रने । हेवा- रम्भनिन्य -समस्त कर्मों (आरम्ग) मे ध्येय (रेतु) को मदा अपने मामने । न दृतम् इत्याद--काय ममाप्त हो गया मो अव आसन न जाए, निठाना न बैट । न अपवादम मनुम्मरेत् -रिसी के द्वारा की गई निदा पा स्मरण न परे, जमना शुभ कर्मचाते हुए लोकापादने न दो। ८--न याग्नि प्रभवति भावगूर-नजानामागा' अथवा 'वाधिमत्वापदानमाला' म पच्च- नर को तार उपग-प्रधान पाना या सरह है। चम्मू-काव्या की नानि इममें भी गद्य-पगमयी भाषा का प्रयाग हृमाई, प्रिन्तु उपदेश- न याग्निः प्रभवति ध्यात्या) ११६ युक्त होने के कारण जातको को चम्पुओ से पृथक मान कर नीति-कथा की कोटि में रखा जाता है । जातको मे भगवान् बुद्ध के जन्म-जन्मान्तरों की कहानिया वर्णित है। हर कया के प्रारम्भ में नीति, उपदेश या गाश्वत सत्य की कोई बात कही जाती है, और इसी के दृष्टान्त-स्वरूप कथा का वर्णन किया जाता है । अन्त में उसी उपदेश की पुनरावृत्ति कर कथा समाप्त की जाती है । जातक-कथाओ के ये सामान्य लक्षण प्रस्तुत कथा पर भी घटिन होते है । आयपूर के एक ग्रन्थ का ४३४ ई० में चीनी भाषा में अनुवाद किया गया था । अत उनका स्थिति-काल ईसा की तीसरी शताब्दीये. आस-पान माना जा सकता है। ६७१-६६४ ई० में भारत-भ्रमण करने वाले चीनी पर्यटक इत्सिग का कहना है कि 'जातकमाला' बौद्धो में बड़ी लोकप्रिय है जोर उपका बहुन पठन और प्रचार है । अजन्ता और सारनाथ के निनिचिनो मे 'जानमाला के कतिपय वर्णनो की नांकी दली जा सकती है । जातकमाला' का प्रथम सुसम्पादित सस्करण १८९? में अमरीका के हार्वर्ट-विश्वविद्यालय में प्रकाशित हुआ था। आर्यगूर की भापा नरस, सरल और मनोहर है । गद्य-काव्य के जो लक्षण सुबन्धु और वाण मे जाकर परिपक्व हुए है, वे वहाँ मर्यादित रूप में देखे जा सकते हैं। दीर्व समासो का प्रयोग होते हुए भी वह विरल. और अक्लिष्ट है । भाषा का अलकरण सुरुचिपूर्ण है ! पद्यों में काव्यत्व और लालित्य है। किशोरो और तरुणो को सत्य, सदाचार, शील और लोकोपकार-जम गुण हृदयङ्गम कराने के लिए आर्यशूर की कथाएँ बडी रोचक और उपादेय है। प्रस्तुत कशा में एक सरल-स्वभाव वर्तकापोतक (वनख-बच्चे ) की कहानी वागत है । एक छोटे-ये कथानक मे कुशल लेखक ने धर्म, समाचार और आत्मबर की महत्ता अनूठे ढग से समना दी है । बच्चा छोटा है, पर उसमें धर्म-अधर्म का ज्ञान है; उसका गरीर कमजोर है. पर आत्मा सगक्त है। जब लपलपाती दावाग्नि के सामने वह अपनी - १२० सस्कृत-गद्य-वीयो - क्सिी जगल विवशता बालोचित सरलता के माय रख देता है, तब प्रतिपक्षी का हृदय महज ही पसीज उटना है। [१०४५] सत्य करणीय - मत्य मे उज्ज्वल वागी का पल्लपन करने में अग्नि भी असमय है, इस सत्य-वचन म विश्वास (अभियोग अभिनिवस ) कीजिए । सत्यपरिभाविनाम्-सत्येन ऋतेन परिभाविता तेजोमयीम् । लद्धयित न प्रसहते-अतिक्रमिनु न समय भवति । तद्यथानुधूयते-- जैसा कि सुना जाता है- अरण्यायतने-अरण्यस्य वनस्य जायतन स्थान न मन्, में । यतकापोतक —चनचटकशिगु, दतख का बच्चा। स फोप कतिपयदिवसातिकमे अग्डमध्यात् निगत , उसे अण्ड से निकले कुछ ही दिन हुए थे। प्रविरोदयमाणतरणपक्ष -प्रविरोख्यमारणौ (प्र+वि+रह+ स्य+शानच्) उपत्स्यगानो तम्णो कोमलौ पक्षी यस्य स , उसके नरम- नरम पाप निगल रहे थे। [१०४६] परि प्रदेश -परिदुवलत्वात् काण- तया नियमाणा अदृश्यमाना अङ्गाना प्रत्यानाना प प्रदेशा सन्धि- म्थलानि, वर इतना कमजोर या कि उमरे बग-प्रत्यगा जोडो का पता ही नही चना था। तृण नोटे-तृणगहन तृणकुञ्ज तेन उपगूढे आच्छ ने गुगलना मनरत्ती तस्या सनिश्रित रचित नीड तस्मिन् , वह अपने माता-पिता द्वारा घनी झाटियों के बीच प्रयत्नपूर्वक रचे गए घोंसले में अपने बहुन ने (सम्बहले बहुसस्य ) मारयो के साथ रहता था। तयवस्योऽपि-उस दशा मे भी, पक्षी-योनि में या पटने पर भी. परि- प्लुतधर्मसरत्वात-घमंग ज्ञान लुप्त न होने के कारण । उपद्दतान्– लाए गए । प्राणिन -नोटान् । मम्यवर्तम्-पादितुम् । न्यौप - वट । उपहा (उप++निट) लाते थे। वर्षायामास--जीवन- वृत्ति चमार, पासो ३ बीज और वरगद के पल आदि जो कुछ उसके माता-पिता लाते थे, उसी से वह अपना निर्वाह करता था । रक्षापहार- सपा--स्सा और थोड़ा भोजन करने के कारण ! काय -शरीरम् । न पुष्टिम् उपपयो-हृष्ट-पुष्ट नहीं हुआ। नापि पक्षो०--और न उसके न यत्राग्निः प्रभवति (व्याख्या) १२१ बनदान:- पंख ही भली भांति उगे। प्रविसरोहतुः-प्र+वि+रुह , लिट् प्रथम- पुरुप द्विवचन । यथोप० --जो कुछ भी आहार लाया जाता उसे । अभ्य- वहन्त:---- खादन्त' । धर्मता हि एपा --यह तो (गरीर का) धर्म ही है कि पौष्टिक भोजन करने पर बह पुष्ट होगा) यकृत-क्योकि धर्माधर्म०-- अर्थात् धर्म और अधर्म का विचार न करके सब कुछ खानेवाला (सर्वाशी) व्यक्ति हृष्ट-पुष्ट रहता है (मुग्वम् एधते), किन्तु धर्म की ओर प्रवृत्ति रखकर सुनी हुई बीजे ग्वानेवाला (विचिताशी) व्यक्ति ससार मे दुखी रहता है। हीनता-सदाचारी (शुचिगवेपिरणा), निर्दोप माधनो से आजी- विका चलानेवाला (शुद्धाजीवेन जीवता), नियमित जीवन वितानेवाला (सलीनेन), धर्मभीरु (अप्रगल्भेन) तथा मकोचशील (ह्रीमता) व्यक्ति के लिए ससार मे जीवन-यापन करना कठिन (दुर्जीवम् ) हो जाना है। -बनवह्निः, दावाग्नि । प्रति निनदः-- प्रतिभय मभयं प्रसक्तः निनद. शब्द. यम्य मः, जिसका शब्द डरावना था। विजम्माण- घूनराशि:--- विजुम्माणा विमर्षमाणा धूमराशिः यस्य म, जिसमे चार के अम्वार उठ रहे थे। विकीर्य · स्फुलिंगः---विकीर्यमाणा प्रसग्न्त्य या ज्वालावल्लय. तासु लोला' चञ्चला विस्फुलिङ्गा. अग्निकणा यभ्य म , जिसकी फैलती हुई लपटें चिनगारियाँ बरसा रही थी। सन्त्रासनः बनवराणाम्- वन में रहनेवाले जीवों को वस्त करनेवाला । अन्यः (अरश्नक भक्षक ) वन- गहनानाम्-धने जगलो को निगलनेवाला। भयगुतो०-- मुख्य बाप्य है, तत् वनं आत्येव भृशं र रास- बह वन मानो पीड़ा के कारण (आा इव-दाहजनितफ्लेमेन इव) जोर-जोर से विलाप करने लगा। गेप शब्द वनम् के विगेपण हैं। समन्तात्सब योर से । भय सार्थम्---भयेन द्रुता पलायिता. उद्भ्रान्ताः मोद गाः विहशसार्याः पक्षिसमूहाः यस्मिन् तत्, जिसमे डर के मारे पक्षियों के समूह उद्विग्न होकर सब ओर भाग रहे थे । परि.' "मृगम्-~परिभ्रमन्तः सस्कृत-गद्य-वोयो परित धावन्न भीता च मृगा हरिणादय यम्मिन् तत्, जिममे भयभीत हिन्न चारो ओर दौड रहे थे । धूमौघमानम्-धूमोरे धूमपटरो मग्नम्, जा धुए ममूह मे दूब गया था। पटुह्निशब्दम्पटु महान् वह्नि- मद दावााध्यनि यन तन्, जिमम दावानत की जार-जोर से आवाज हा हायी। ररास (न्स+रिट) दशन्द चचार, विलताप इव इति भाव । पटुना सारी--धने घास का अनुसरण करती हुई बाग, जिसे मानो तन वा पदेड रही थी। उत्पीड्यमान (उत्+पोद+णिच+ नानच)-निद्रावित । मदिरसव्याकुलावरावा -भय ने व्याकुल हान कारण जो तुरी तरह चीर रह ६ । परस्परनिरपेक्षा -एक-दूमर की परवाह न परत ए । समुपेतु - उड गए । असम्भ्रान्न --विना घर- गए हुए । विदिता-निमे अपने प्रभाव का योव था। महासत्य - निता (जाग्दि) शदिन महान् यो। [पृष्ट ४७] सरभसम् इव उप- सन्तम्-जो माना तेभी मजार वट रहा था। यर्याभिधानधरण व्यायानी वरमा चरणी पादा यम्य म , चलितुम् असनयत्वात् , मेरे दोनारदार है। अविरपक्ष-मिन्दी अमन्टोपो यस्य स , पतिनुम् नमन - च० , मर दोनो पप तो नहीं है । त्यो सम्भ्रमात- स्वद् आमभयार, तुम्हारे भय में। प्रडीनी-उहीय काऽपि ननां, वही गरह । स्वघो०--तुम्हारा आतिथ्य बन्न योग्य (तुम्हार मजण कोय) सौभागही। अस्मात्०-टमति है मन, तुम्हारा पागोट जानाही उचित ह। दिशु पक्षे-बिगुप्तानि नामाणि समागानि सान्द्रापितृगानि पत्र नगि Eि T शुरचननगहे, और घााबारे जग म्यान म भी । उदीरमाग (न-17+गानच्)-वृद्धि यमान , दमा से वदाए जाने पर भी। नदीमत्र-दह नाग (बोधिमत्त्व-पी) उस बनन-बच्ची वाणी सुनार मी क्षण मान्न हा गई, माना यह वाढ- वाती भिी नदी तक पहुँच गई हो । विवृद्धतोयाम्-तारानिकालगताम्, विसापानी ग्निागम ऊपर चट आया हो।
दारगुणाः (व्यारया) १२३ ०- अद्यापि आज भी हवा में परिवचित लपटोवाला दावाग्नि हिमा- लय के उस प्रसिद्ध स्थान तक पहुंचकर, मन्त्र में शापित अनेक सिरोवाल सांप के समान, संकोच के कारग, अपनी चचल लपटो को शिथिल कर शान्त होता जा रहा है । सङ्कोच०--सङ्कोचेन अवरोधेन मन्द शिथिल लुलितम् अल्पीभूतम् अचि. ज्वाला यस्य सः । तत् किमिदम् उपनीतम्--यह क्या हो गया: वेलानिव० -जैसे उफनती हुई लहरो-रूपी फनोवाला समुद्र तट को नहीं ला सकता, प्रचलिताः ऊर्मयः तरक्षाः एव फला गिरासि यस्य स । शिक्षान्- जैसे कोई सत्यवादी बोधिसरद द्वारा दी गई शिक्षा का उल्लघन नहीं कर सकता । सत्यात्मना कृशानुरपि--वैसे ही अग्नि नी सत्य पर दृढ़ रहनेवालों की आज्ञा का उल्लघन करने में असमर्थ हो गया । सत्यम्, अतः न जह्यात्- इसलिए सत्य को नहीं छोड़ना चाहिए। दारगुणाः 'दशकुमारचरित' से लिये नए म 'गोमिनी-वृत्तान्त' में एक आदर्श गृहिणी की उन विपताओं पर रोचक ढग प्रकाश डाला गया है, जो आज भी हमारे समाज में समादृत है । अग-प्रत्यग का नैसर्गिक लावण्य, पाक-कला-प्रवीणता, कुगल गृह-प्रवन्ध नथा, सवने अधिक, पति ने दोषी की उपेक्षा और उमीके प्रिय एव हिन की चिन्ता भारतीय पत्नी के विशिष्ट गृा है । सच तो यह है कि उसके नुग-निर्भर हृदय ने पति के अवगुणों के लिए ज्याग हो कहाँ है--गुणनिर्भरे मम हृदये तब दोचा न भान्ति । गक्तिकुमार नामक एक धनी नवयुवक गुरगवती पत्नी की खोज में निगरा पड़ता है । चतुर पल्ली की उसने एक विचित्र कसोटी बना रखी है । वल एक त्रुमारिका इस कसौटी पर खरी उतरती है। थोड़े-ये १२४ सस्कृत-गद्य-वीयो । धान से ही वह कुशलतापूर्वक उसके लिए अनेक व्यजनयुक्त सुम्वादु भोजन तैयार कर देती है। अपने शिष्टाचार, साफ-सुथरेपन और अतिम सौन्दय से उसे मुग्ध कर देती है नया विवाह के बाद, उमवे कुपथगामी होने पर भी, अपनी अविचल निष्ठा द्वारा पुन उसमा हृदय जीत लती है । दण्डी की पद-लालित्यमयी गैली म इम मनोहर क्था का प्रभाव टिणित हो जाता है। [पृ० ४६ द्रविडेपुकारी के दक्षिण-पूर्व में स्थित समुद्र-तटवर्ती भू-भाग । काञ्ची-आधुनिक बाजीवरम । अनेक्योटिसार -बहुमोटि- सख्यक , जिसके पास करोडो पण रे। श्रेप्टिपुत्र --मेठ का लटका, वएिक्-पुत्र । देशीय -शब्द नत मे इस प्रत्यय का प्रयोग 'लगभग' या 'कुछ कम' के अर्थ में किया जाता है । सापेदे–प्राप्तवान् । अदारा- णाम्-पत्नीपानाम् । 'दार' गन्द नि य पुल्लिज और बहुवचन है। अगनुगुणदाराणाम्- अननुगुणा प्रतिकला दारा यंपा तथाभूतानाम् । सुस नाम नास्ति- उन्हें नाग को भी मुग नहीं मिलता। 'न गृह गृह- मित्याहिणी गृहमुच्यते ।' पत्नी रा न होना और प्रतिपूल पली का होना दोनो ही बाने दुख दायी हैं। तत् क्यम्-मो में बसे गुरगवती भार्या (पला) प्राप्त का? परप्ररयातेप- -~-पगम्य अयस्य प्रत्ययेन वि वामेन आहृतेषु मगृहीत परिगोनेषु । यादृच्छिकीम्-म्वेच्छानुस्पाम । सम्पत्तिम्--गुणान् । मनभिसमोदय-अदृष्ट्वा, जर्थात् दूसरो द्वारा प्रमद की गई लड़कियो मे इष्ट गणों की सम्भावना न देवर। काःतिको नाम भूत्या- ज्योतिषी वा बाना पहनकर । वस्त्रान्त०- वस्त्रातेन वमनप्रातभागेन पिनस बद्ध मातिप्रत्य धायसमुदाय येन म, वस्त्र के छोर में एक प्रस्थ (एष मेर) साटी के धान बांधकर । लक्षणा अयम् इति-उसे 'नगरपा' (ज्योनिधी, गरीर के मामुद्रिक मालोक्त लक्षणो का ज्ञाता) जानकराया प्रवीति-जय वह कोई ऐसी लडकी देख पाता, जो उसकी मजातीय और मुनक्षणा होती, नो उममे कहता । भट्टे हारयि.
दारगुणा: (व्याख्या) १२५ । तुम्हे कल्याणी, क्या तुम इन एक प्रस्थ धानो से हमे बढ़िया भोजन खिला सकती हो ? अभ्यवहारयितुम् खादयितुम् । हसितादबूतः-~- कृतोपहासतिरस्कृतः । शिविषुशिवि लोगां के प्रदेश मे। पत्तने-नगरे। सह पितृभ्याम् अंसितमहद्धिम् (अवसिता नष्टा महत्ती द्धि भूति. यस्या ताम्)--- माता-पिता के साथ जिसकी सम्पत्ति भी नष्ट हो चुकी थी। अबशीर्ग- भवनतारा-~-जिसके घर का मूल्यवान् सामान नष्ट हो गया था; अयवा जिसका केवल एक टूटा-फूटा मकान बच रहा था। विरलभूषणाम्--- स्वल्पालङ्काराम् । संसक्तचक्षुः-~-आवद्धदृष्टिः, उस पर नजर जमाकर । अतर्कयत्- मनसि विचारयामास । न अतिस्यूलाः--न बहुत मोटे । न अतिकशा:-न बहुत दुवले । ह्रस्वाः-छोटे। विकटा:-कर्कशा., डरावने । मृजायन्तः -- मजा शुद्धिः तन्तः, स्वच्छता से युक्त, साफ-सुथरे । रमततलाङ गुली (करी का विशेषण) ---लाल हलियों और उंगलियों- वाले । यव लामिछती-जो, मछली, कमल, कलश आदि कई शुभ आकृतियों से चिह्नित । ये चिह्न धन, सन्तान, सौभाग्य आदि के सूचक होते है । समगुल्फसन्धी (अङ्ग्री का विशेषण) ----सम और सुडौल टखनों और जोडोमाले (पैर) मांसलौ अशिराली (पैरों के विशेषण)- जो मांस से भरे हुए है तथा जिनकी नसें उभरी हुई नहीं है । तनुतर मण्डलम् --नाभि छोटी-सी और कुछ-कुछ गही है । धन "तले (बाहुलते का विशेपण)- -धन, धान्य और पुष की सूचक रेखाओंवाली हवेलियों में युक्त । भूयस्त्वम्--वाहुल्यम् । चिह्नलेखाः-रेखाकाराणि । स्निग्ध.. मणी-स्निग्धाः उदगाः कोमलाश्च नखमणयः ययोः ते, जिसके मरिण- तुल्य नख चिकने, उभारदार और कोमल है। ऋज्व०-हाथों की उंगलियां सीधी (ऋजु), क्रमश. गोल होनेवाली (अनुपूर्ववृत्त) तथा गुलाबी (ताम्र) है । संनतांसदेशे-संनतो नम्री अंसदेशो स्कन्धी ययो. तादृशी, कन्चे उचके हुए नहीं, बल्कि ढलवां और सुडौल है । सौकुमार्य- वत्यौ-मुलायम । निमग्नपर्वसन्धी-जिनमें जोड़ों की गाँठे दवी हुई है, - १२६ सस्कृत-गद्य-बीयो दिवाई नहीं देती । तन्वी-पतली । कम्बुवृत्तवन्धुरा-चम्बुवत् शखवत् वत्ता दर्तला वन्धुग नतोन्नता, गम-जैमी गोत्र और ऊंची-नीची (धारी- दार) । कधरा-ग्रीवा । [पृ० ४६] वृत्तमध्यविभक्तरागाधरम् (यह और दाद के पद जाननरमलम् के विरोपण है)-जिसके ऐमे गोल-गोल होठ है, जिनमे बीच के स्थान पर ऊपर-नीचे के होंठो का राग (गुलावी- पन नग-अलग दिखाई पड़ता है। असक्षिप्तचारचिबुकम्--जिसकी ठोटी भरी-पूरी (जमक्षिप्त, स्पष्ट दिवाई देनेवाली) और सुन्दर है। आपूर्ग मण्डलम् -आपूर्ण सम्यक पुष्ट कटिनम् शिथिल गण्डमण्डल कपोलदेश यत्र तादृशम्, जिसके गाल पूर्णतया पुष्ट (विकसित) और दृढ हैं । असङ्ग लतम्-जिसकी लता-जमी भौंह विना मिली हुई (असगत), मुटी हुई (अनुवा), काली (नीत) और चिपनी (स्निग्ध) है । जनति नासिकम्----निमकी नार विक वही नहीं (अनतिप्रोट, छोटी है और हित के फूल की तरह है। अमित क्षणम्-जिमी वडी-बड़ी (नायत) आँखो मे काली (अमित) पुतली के साथ सफद (पवत) भाग के अन्दर वही-रही लाल (ग्न) दोरे नी पडे दिमाई देते हैं, म तरह उनकी आय तीन भागों से युक्त हैं, उन आँगो में चमर (भासुर) और नजर मे मिठाम (मपुर) है, पुनलियां यद्यपि उधीर-मी बनी फिरती हैं, फिर भी उनकी हवा (मचार) मे अलगता का भार है। इन्दु०-माथा स्वच्च जोर मुदर है, माना चाद का दुरडा किसी नै ला रया हो । इन्द्र परित बानी की रट एक कतार में पटी हैं, ये ऐसी मनोहर (रम्य) हैं कि नीलम की गिता का आभास होता है। दिगुण युगलम्---द्विगुण द्विरावृत्त यथा नया कुण्डलिनन बुग्दनी- कृतेन म्लानेन ईपन्मलिनेन नानीवनालेन पद्मवृन्तन लगित सुन्दर लम्द लम्बमान श्रयगपागयो पर्णपारायो युगद द्वय यन तादृशाम्, जिसके दोनो मुन्दर कानों में मुरयाई, दोहरी लिपटी मा-नान लटक रही हैं। अनतिभड गुर'-अत्यधिर टेटे (घुघराल) नहीं । बहुल-घने । पर्यन्ते यपि अपिलरचि -किनारो पर भी भूगपन (फोकापन) नहीं दारगुणाः (व्याख्या) है। आयामदान --आयामः दैर्ध्य तद्वान्, लम्बे । एकफनिसर्गसमलिग्ध- नील:---प्रत्येक बाल स्वाभाविक तौर पर एक-सा चिकना और काला है। गन्धवाही सुगन्धयुक्त। नवजकलाप:--फेशयागः । सेयम् शोलम्- ऐती आकृतिवाली स्वभाव से भी बुरी नही होती । तुलना कीजिये- 'न तादृा आकृतिविदोपा गुगाविरोधिनी भवन्ति ।' आसजलि-सक्त भवति, इसकी ओर मेरे नन का रुझान हुआ। उन्हेयम्-परिस- प्यामि, विवाह कहेंगा। अविमुत्य परम्परा:--जो लोग बिना सोचे- विचारे कोई काम कर बैठते है, उन्हें बार-बार पछताना पड़ता है। अविदृश्यकारिणाम् -- कारिणम् । अनुभवपरम्पराः= पश्चात्तापाः । पतन्तिभवन्ति इन्वर्यः । स्निग्धदृष्टिः--ग्नेहपूर्ण दृष्टि से। सम्पन्नम्- मम्पादिनम्, नंगर किया । जन्यवहारयितुम् -- जोपयितुम् । सानादन --माभिप्रायम् । आशय-: -गृहोला । अजियोशे-द्वारो- 'पान्तप्रदेण, दरवाजे के पास दरामदे मे। सुसिक्तसंमृष्टे-जो भली भाँक्ति जल मे छिड़का गया तथा माड़ा-वारा गया था। दत्तपादशौचम्---दत्तम् अपित पादांच पादप्रक्षालनार्थजलं यल्न तम्, पैर धोने का जल देवर । उपावेशयत्--उपवेशितवती, बैठा दिया. वृद्धदासी इति गन्यज्ञालोद--गन्धयुक्तान्द्रहीन, सुगन्यवाले धान । संक्षुद्य-कुदृयित्वा, कूटकर. छाँट-फटककर ! मात्रया' परिचय--उनमें से घोड़े धानों को घाम में डाल दिया और उन्हें लोट-पीटकर (ऊपर-नीने करके) सुवा दिया । मात्रया अल्पपरिमाणेन । परिवर्त्य तत्तनः सञ्चाल्य । स्थिर... चकार-~-पक्की इकतार जगह पर मृतल ने उन धानों को धीमे-धीमे फूटा और धान के दानों को तोड़े बिना (तुपैः अखण्डः, अर्थात् ऊपर के छिलके छुड़ाकर) सावुत चावल अलग कर लिए । नालीपप्लेन मुसल. विण । 'तुपः' ने तृतीया का प्रयोग 'पृथग्विनानाभिस्तृतीयाऽन्यतर- स्यान्' सूत्र के अनुसार हुआ है । तुः अधिनः--जिन्हें धान की आवश्य: कता रहती है । 'यहाँ 'सुपमें तृतीया विभक्ति लगने का कारण यह है कि अथिनः' के चोग में इप्ट वन्तु में तृतीया होती है। नूपण क्षमः दोपः।
सस्कृत-गद्य-धोथी (नुपं का विशेषण) -गहने साफ करने मे ममय । अलवारशोधनार्थ स्वर्णकारास्तुपान् गृह्णन्ति इति प्रसिद्ध । लब्धामि --तन्मूत्यत्वेन प्राप्ताभि । कारिणीभि-पदिकाभि , कौडिया से। स्थिर काष्ठानि- ऐसी लकड़ियां जो तनिक वोझिल हो (स्थिरतराणि-सारवति), न बहुत गीली हो (अनति-आणि) और न विल्कुल सूखी हुई हो। विञ्चिद् आणि काप्ठानि मन्द मद ज्वलति इनि भाव । मितपचाम् (स्थालीम् का विशेपण)-म्वल्पपाचिनीम्, निश्चित माप की स्थाली (=पकाने का बतन, हाँडी आदि), जिसम नप-तुने चावल रंघ सरे । उभेदारावे---- मृत्पा-युग्मम्, मिट्टी के दो मरवे । आहरआनय । तयाते तपा-धाय उप भूसी यो वेचकर वे सब चीजे ले थाई। अनति उवूखले-(उन चावलो को) रमी उसली (म डाला), जो ज्यादा गहरी (निम्न) भी नहीं थी और न बहुत उथली (उत्तान) यी, जिसका पट (युक्षि -आभ्य तरभाग ) अधिक पंता (विस्तीर्ण) न था, जो थर्जुन वृक्ष (क्युभ) की लक्टा में बनी थी। लोपर मूसले-~- मूसल से, जिसके मुंह पर लाह का पत्ता चढा हुनाथा, जो समान भागार वाता था (समशरीर), जिसरे बीच में हिम्मे का पतलापन (तानव) माफ दिमाई देना था, जो अच्चा फैला हुआ (व्यायत) और मारी (गुर) या और जो रोर की लकडी का बना था (वादिरण)।तनोर्भाव ताननम्- चतुर भुजम् ---2 में ढग मे, जिसमे जत्दी-जल्दी (चतुर = चपल) और सलीके से (ललित-मुदर)मूसल को ऊपर-नीचे लाने-ले जाने मे बांह थर (मायामित) जाती है। [१० ५०] उरक्षेपणम् = अझैपरणम् । अपक्षेपणम् =अध पातनम् । असकृद् बड गुलोमि उद्धृत्य. उद्धृत्य (सन्चान्य)---(दूसरे हाथ की) उँगलियो से वह उन्हें बार-बार उठाती (पर-नीचे)करती। यवहत्य-सम्पिप्य, कूटार । शूप तण्डुलान- ऐसे चावल, जिनमे मूप में फटक-पटवकर मिट्टी-वक्ड (करण) और तिनके (दिसाव) अलग कर दिए गए हैं । असकृद् अद्भि प्रक्षाल्य- पानी से कई बार धोकर । दत्तचुल्लीपूजा-(अपने घर के चलन के अनु- दारगुणाः (व्याख्या) १२६ सार) उसने (धान के कुछ दानो से) चूल्हे की पूजा की । पथितपञ्च- गुणे जले प्राक्षिपर---अर्थात् चावला से पाच गुना पानी हाँडी में खोला कर (पथिते= उणीकृते) उसमे वे चावल छोड़कर चूल्हे पर चढ़ा दिए। प्रश्लय तण्डुलेषु- -जब चावल गलकर (प्रश्लथ) फूल गए । प्रश्लथाः शिथिलाः क्लिन्ना. इति यावत् अवयवा. येषा तेपु । प्रस्फुरत्सु स्पन्दमानेषु। मुकुला : नेषु-मुकुलावस्था कठिनभावम् अतिवर्तमानेयु अतिक्रामत्सु, चावलो की पहली कड़ी अवस्था को छोड़कर, फूलकर भात बनने पर (अर्थात् जब चावलो मे कच्चापन न रहा)। संक्षिप्य (मन्दीकृत्य) अनलम्- मांच धीमी कर दी । उहितमुखपिधानया (स्थाल्या का विशेषण)--उप हितं स्थापित मुखे पियानम् आच्छादन यस्या. तया, जिसका मुख (तिरछा) ढका हुआ था। अन्नमण्डम् अगालयत् --चावलों का मांड्हेंडिया से पसा- कर निकाल दिया । दा च अवघट्य-करछुल से चावलों को चलाकर। माश्या--(अर्शन) परिचयं-उन्हे थोड़ा ऊपर-नीचे करके । समपरवेषु सिक्थेषु -सव चावलो के समान रूप से पककर भात बन जाने पर। मधो- मुखीन्-~-उलटा करके। अवातिष्ठिपत्- (अव+-स्था--रिणच्, लुङ्, प्रथम पुरुष एकवचन) अवस्थापयामास, रख दिया। इन्धनानि अन्तःसाराणि सम- न्युक्ष्य (आकृत्य) प्रशमिताग्नीनि -उन लकड़ियो पर, जिनके अदर सार- भाग मौजूद था, पानी डालकर उनकी आग बुझा दी (प्रशमित)। कृष्णा- नारीकृत्य-(उन अधजली लकड़ियो के) कोयले कर लिए । तदथिभ्यः प्राणिोत्-जिनको उन कोयलो की आवश्यकता थी, अर्थात् खरीदारों को वैचने के लिए (धाय के हाथ) भेज दिया। एभिः · दत्वा--इन्हें बेचकर बो कौड़ियाँ मिले उनले । मामलकम् --आँवला। चिञ्चा-इमली। ययालाभम्-किफायत से। तथानुष्ठिते च तया-जव धाय उसके कहने के अनुसार सब चीजें ले आई । द्वित्रान् उपदंशान् उपपाद्य (सम्पाद्य)-दो-तीन तरह की सब्जियाँ पकाई । उपदशान् व्यंजनानि शाकादीनि। आई'गतम्-अर्थात् उसने कोरे सरवों को गीली वानू पर जमाकर उनमें चावलोका माड़ भर दिया।
'उठने १३० सस्कृत-गद्य-वीथी अतिमदुना शीतलोकृत्य-ताड की पत्तियो मे वने पसे मे धीमी-धीमी ह्वा (अनिल) करके उभे ठडा कर लिया । सलवणसम्भारम् - नमक- मसाना मिलाकर । दत्त सम्पाद्य-अगारो पर (जीरा, होग आदि डालने से) उटनेवाली मुगन्ध से (मांड को) सुवापित किया , अर्थात् उनमे इनका धंगार दिया । तदपि कृत्या--उस जावने, टमली को सूब बारीक पीसकर (चटनी बनावर) उसे पमलो की मुगघ वाला बना frया (अर्थात् चटनी मे से मसालो की कमन-डेमी गोपी-मोधी मत लगी)। धात्रीमुखेन धात्री मम्प्रेप्य, धाय को भेतकर। अचोदयत् ---- प्रेरयामास, म्नान के लिए कहलाया। स्नानाय--स्नान कर्तुम् । स्नान- (भुया---म्वय स्नान कृत्वा तया धाश्या पाय नहा-धोकर पहले ही तैयार हो गई थी। वह गावित्रघुमार को सिर धोने और मालिश के लिए आंचला- तेल दे नाई। सित्तमाटे--(आदो सिक्त जलेन आकृत पश्चात् मृष्ट शोधित तम्मिन्) कुहिम-(पद्धभूमौ गृहाग्य तरे इत्ययं ) फलक (पाठम) धारा--(वनोपपिश्य)---छिडकाव ये वाद माफ किये हुए पद पर रखे एका पाढे पर बैठ गया । पाण्डु उपरि-मांगन मे लगे पेने ये पेड के कुछ-कुछ परे पने पर, जिसके (इठला नरफ या) एक चोयाई भाग काट दिया गया था (जर्यान् दोपतीन-चौथाई पना धोकर थाली की तरह - विद्या दिया गया और इस पर मांड से भरे गए थे दोना नग्वे रच दिये गए-दर पारायद्वयम)। निकाशेपानस्य-ज्यो भागा अशा शेषा अगिप्टायम्मिन् पणि तद्यथा नरय छि नरय । आम्-ये सरदे पानी ने तर अभिमझन्-हस्तेन स्मृदान, राय ने दरवापर (जोगन वी प्रतीक्षा में बंट गया, अनिष्टत्) 1 सा समुपाहर-नर्यात् उस लड़की ने घाय मे भक्तिनुमार यो कहलाया कि परले इस मारको पी लोजिए । समुरा- हरत--परिवेशितरती। अपन तम्पपलम दूरीहतमार्गश्रमा, राम्ते पी सारी मान जाता रही।प्रल नसक्लगान-टप्णम टपाना स्वेद- व्या तनिग्विलावया, गरम-गरम मांडपीने से जिसके बारे थगी मे पसीना आ गया था। .
दारगुणाः (व्यात्या) १३१ झाल्योदनस्य दाद्वयं दत्वा--इसके बाद उस लड़की ने (उसके आगे) दो करहल साठी का भात परोसा । सूपम् --दाल, जिसमें सपिः मात्राम कुछ धी पड़ा था। उपजहार-अर्पितवती । इमम् -गक्तिकुमारम् । दना च "अभोजयत्--(भात खा चकने पर) लड़की ने उसे (सौंठ, मिर्च, पीपल, नमक. हींग आदि) सुगन्धित द्रव्यों वाला दही, स्वशवदार और ठंडा मट्टा (कालेनय) तथा महकदार और गीतन कांजी (कनिका) परोसी । त्रिजातकं नुगन्वितद्रव्यविगैपः त्रिका वा तेन अवणितं आलो. डितं तेन तादृशेन दन्ना । सशेष एव अन्यसि (अन्ने) असी अन्यत् --- थोड़ा भोजन चच ही रहा था कि वह (मक्तिकुमार) नुप्त हो गया । नवभृङ्गारसम्मृतम् (गरि का विशेषण)-नवे नतने भृडारे जलपात्र- विशे सम्भृतं पूरितम्, नई (कोरी) मुराही (झारी) में भरा हुआ। अगुरुधूपबूपितम् --अगरु, खुप आदि से सुवासिन । अभिनवपाटलाकुसुम- वासितम्-अभिनवः प्रत्यग्नविकसितः पाटलाकुनुमै वालितं सुरभीकृतम्, ताजे पाटल के फूलों से सुगन्धित । पृ०५१] उत्कृल्लोत्पलप्रथिततौरमम्- जिसमें खिले हुए कमलों की-सी महक उठ रही थी। नालीदारात्मना---- मृङ्गारस्य जलनिर्गमनमार्गः नाली तम्या धारात्मना धारारूपेण. राही में लगी टोंटी से यार गंधकर (भरवे में) पानी डाला। मुझोपहित- शरावण-सरने में मुंह लगाकर । हिम · पमा-हिमवत् तपारवत् शिशिरःशीतलः कण: जलविन्दुभिः करालितानि व्याप्तानि अस्पायमानानि रक्तीभूतानि अक्षिपदमाणि नेत्ररोमाणि यस्य तादृशः, बरफ-जसे ठंडे पानी के छीटों से जिसकी आंखों की बरौनियाँ लाल पड़ गई थीं। घारा "श्रवणः-सरवे से पानी की धार के गिरने का शब्द उसके कानों को बढ़ा प्यारा लग रहा था । ल कपोलः अर्थात् मुंह पर पानी के जो छोटे पड़ने, उनका सर्ग दाकिनार के लिए इतना सुखप्रद हुआ कि उसके गालों के रो। खड़े हो गए, जिसो उसका चेहरा ककंग (खुरखुरा) हो गया 1 परिमल रन्ध्रः-नाती में से गहरी निकलनेवारी (प्रवालोत्पीड) महक से न ने (नाण-रन्त्र) खूब तर हो गए । माधुर्य ..
सस्पृन-गध-वीयो रसनेन्द्रिय - (पानी मे) मिठास की अधिकता से उसकी जीभ दशीभूत (लावजित) हो गई। अयम् =निमतम् । काठम-जी भरपर। शिर कम्पमजावारिता-(गन्तिकुमार द्वारा) सिर हिलावर (कन्या को) एक जाने का इशारा करने पर। पुनरपर०-लपी ने गरी सुराही (करण) से उसे कुला करवाया । वृद्धया तु०--इम समय त बूढी धाय ने जूठन साफसरदी (अपोह्य दूरीइत्य) हरित पुट्टिमे--ताजे गोवर से निप फश पर । स्वमेव -स्वयमव। उपरोयापटन = उत्तरीय- घस्त्रम् । व्यवधाय-बारतीय, निदाकर। विधिवद् उपयम्य-विधिपूर्वक विवाह पसे । निये- स्वगृह नीत- वान् । एतद् अनपेक्ष ---(भाया वे प्रति) उदासान हो गया । गणिराम्- वेश्या । अवरोम् =-पत्नीम् । उपाचरत्-व्यवहार किया। मुस्त- तन्द्रा-आलस्यरह्निा। पर्यचरत्-रोया करती रही। अहोनम्- सुचारु । अन्यातप्यत्-सम्पादयामास । दाक्षिण्मनिधि --चतुरता की खान । परिजनम् -नौकर-चाकरो यो। तदायत्तम्-तरया अधीनम् । तदेकापीनजीवितशरीर --तस्या एवम्या अधीनम् आयत्त जाग्नि प्राणा शरीर च यम्य तादृश । विदा निविदेश-विगं (धर्म-अर्थ- काम) को पा निया। गहिण गुगृहस्थम्य प्रिय हित च क्तुं दारणा पत्नीगा भवति, पत्नी पे गुण गृल्य का घिय और हित करने के लिए ही होते हैं। प्रस्तुत वृत्तान्त से सरकालीन समाज के कुछ रीति-रिवाजो पर भी प्रकार पड़ता है. (१) वरिणव-वर्ग में पुरुषो वे लिए १८ वर्ष की यायु विवाह-योग्य मानी जाती थी। विवाद सनातीयो में होता था। व का चुनाव प्राय अभिभावक करते थे, पर कभी-कभी वर स्वय भी करता था। (२) विवाह योग्य क्याओं के भविष्य निर्णय में ज्योनिपियों के महत्व पर भी इम क्या में प्रकाम पडता है । (३) प्राचीन भारत में स्त्री-मौन्दर्य दे क्या मानदण्ड 4 और सी कन्या सुलणकी मानी जाती थी, यह दण्डी ने मुक्त भाव में बताया है। (४) कन्याओं का सौन्दर्य प्राय, निराकरण हझा करता था। (५) पार-क्ला-नपुप्य विवादोन्मुष कुमारि- प्रणम्या दूरतः खलाः (व्याख्या) कामों का अपेक्षित गुण माना जाता था । (६) कन्याएँ अजनबियों से बातचीत नहीं करती थी। (७) धान से चाक्ल अलग करने, भात पकाने, चावल के मांड का एक स्वादिष्ट पेय वनाने आदि क्रियाओं की इस आस्यान से जानकारी मिलती है। (८) रसोई में स्थाली, शराव और दर्वी अनिवार्य पात्र थे। (६) स्नान में तेल, ऑचला आदि का व्यवहार किया जाता था। (१०) भोजन के व्यंजनों मे भात, नमक- मिला मांड, घी, दाल (सूप), त्रिजातक-युक्त (मसालेदार) दही, दो- तीन उपदंश (साथ लगाकर खाने की चीजे), शाक, इमली, कांजी, महर, और आँवले की चटनी उल्लिखित हैं। मछली, भिलाई और दूध का उल्लेख नहीं है । (११) भोजन करने का क्रम भी दर्शनीय है । (१२) कोडियां (काकिणी) सिवकों के रूप मे प्रचलित थी। वह रास्तेपन का जमाना था। धान के छिलके और अबजली लकडियो के कोयले सुनारों को बेचे जा सकते थे। १० ---प्रणम्या दूरतः खला: प्रस्तुत गद्यारा सुवन्धु की 'वासवदत्ता' का एक अपेक्षाकृत सरल स्थल है, फिर भी यह उनकी श्लेष एव विरोधाभास-प्रधान शैली का पर्याप्त प्रतिनिधित्व करता है । इसमे प्रारमा से अन्त तक प्रायः प्रत्येक पद मे नमस्कार है, पाण्डित्य है, असाधारण कल्पना है, सूक्ष्म दृष्टि है तथा व्यापक अनुभव वा सारभूत वर्णन है । इस गवाश के वाक्य छोटे- छोटे हैं, पर उन्हें पूर्णतया समझने के लिए परिश्रम और पौराणिक ज्ञान को अपेक्षा हे । दुष्टों के स्वभाव का वर्णन करने के माथ-साथ सुबन्धु पाठका का परिचय अनूठी ज्ञानवर्चक बातों से करा देते है। सुबन्धु का यह यशल संस्कृत-जैसी भाषा मे ही सम्भव हो सकता था, क्योंकि सस्कृत-गद्य-बीयो नानाथ-बोधक शब्दो कीजैसी समृद्धि सस्कृत में पाई जाती है, वैसी किसी अन्य भाषा में नहीं। सस्कृत में शब्द-लायब की जो विशेषवादीस पडती है, उसका भी यह गद्याश अच्छा उदाहरण है। सुवधु के छोटे-छोटे वाक्यो को समझाने के लिए काफी लम्बी व्याख्या की थावश्यकता होती है। यह सत्य है कि दलेप के अतिशय प्रयोग से सरसता कम हो जाती है तथा वन्य विषय की रूपरेखा अस्पष्ट होने लगती है, तथापि इस विशिष्ट मंली की गहरी छाप पाठक के हृदय पर पडे विना नहीं रहती। जय राजकुमार क दर्पवेतु स्वप्न में राजकुमारी वासवदत्ता के सम्मो- हक सौदर्य को देखकर भ्रात-मा हो जाता है, तब उसका मित्र मकरन्द उसे सचेत करने के लिए दुजनो के वाचरण का इन शब्दो मे विशद चित्रण करता है। [१० ५१] मनिप्टो हृदयम्-दुष्ट का हृदय (दूसरो का) यहि करने में तृप्ति का अनुभव करता है, अनिष्टस्य उद्भावने उत्पादने य रम तृप्ति प्रीतिर्वा तस्मिन् उत्तर प्रवणम् । यो समयं --उसकी असलियत का कौन पता लगा सकता है । तथाहि-उदाहरणार्थ । इसके बाद विरोधाभास-युक्त रितप्ट पदावली भारम्भ होती है । भीमो नवक- देवी-इस पद का प्रक्ट अर्थ यह हुमा नि दुष्ट व्यक्ति भीमसेन होते हुए भी धन का द्वेपी नहीं है । यह परस्पर-विरोधी कथन है, क्योकि भीम ने वर राक्षस का वध किया था, यत इसका सगत यर्थ यह होगा कि 'दुष्ट पुरुप भयवर (भीम) और सज्जनो (नवर) से हप करने- वाला होता है । भीम = (१) भीमसेन, (२) भयकर । नवरद्वयी- (१) वयस्य वासुरस्य द्वपीद्वेप्टान, (२) नव सौम्य के मन आत्मा का येपा ते नवका सज्जना तान् द्वेप्टि! मात्र रिश्या-वह अग्नि हुए भी वायु है, अर्थात् अपन माश्रयदाता का नाश करनेवाला तथा माता के प्रति भी कुत्ता बन जाता है (वृत्ते-जैसा क्रूर या अनुचित आचरण करनेवाला बन जाता है) । आश्रयाश --(२) आश्रय स्वाधार- भूत काप्टादिवम् अनाति भक्षयति स आश्रयाश वह्नि , (२) याश्रय- 4 प्रणम्या दूरतः खलाः (व्याख्या) नाशकः । मातरिश्वा = (१) मातरि आकाशे श्वयति गच्छति इति मात- रिश्वा वायु.; (२) मातरि जनन्या स्वपोपके वा कुक्कुरः तद्वत् क्रूरः अनुचिताचरण, वा । अति रस:-~बह अत्यन्त कडवा होते हुए भी मधुर होता है, अर्थात् अनेक अनुचित कार्य करनेवाला और बड़ा अरसिक होता है । अतिकदुः- (१) कटुरसविशिष्टः; (२) अकार्यबहुल:; अत्यन्त मत्सरी, दूपणयुगत: वा। महारसः- (१) महान् अतिमिप्टः रस. अस्य इति महारस , इनु , (२) महान् अरसः अलस वा, रलयोः अभेदात् । सर्षपः · जहाति---दुष्ट पुरुष, दोनो हाथ जोड़ने पर भी तथा (पैरो में) सिर रखने पर भी, अपनी क्रूरता नहीं छोड़ता, जैसे सरसों का तेल, दोनों हाथो से मले जाने पर भी और सिर पर लगाने पर भी अपना कडवापन नहीं छोड़ता। करयुगलालितः= (१) कर- युगेन हस्तयुगलेन गालित पूजित (दुष्ट के साथ); (२) ल.लि. स्पृष्टः (सर्पपन्नेह, सरसो के तेल के साथ) । कन्दुत्व :- (१) क्रूरताम्, (२) कटुरसत्वम् । ताल - तिक्तश्च---दुप्ट पुरुष (परिचय के) आरम्भ में मधुर किन्तु अन्त मे नीरस और तीखा (तीव-स्वभाव) होता है, जैसे ताल-फल (ताडी) चखते ही मीठा प्रतीत होता है किन्तु अन्त में नीरस और ताजा हो जाता है। आपातमधुरः-- (१) आपाते तदात्वे परिचयारम्ने मधुर मृदुव्यवहार (दुप्ट के साथ); (२) आपाते पान- समये मधुर. मिष्ट, (तालफल के साथ) । परिणामविरसः- (१) परिणामे अस्ते विरसः नारस- (दुष्ट के साथ); (२) परिणामे अवसाने परिपाके बिरस. मदजनकत्वात् (तालफल के साथ) । [१० ५२] पादप फपाययति-दुष्ट पुरुप, तिरस्कृत किए जाने पर भी, मन को पीड़ा पहुँचाता है, जैसे (ऊपर) फेकी हुई पैर की बूल, उपेक्षा किए जाने पर भी, मस्तक को गदा कर देती है। पादपरागः -चरणधूलिः । जयधूतः (१) उपेक्षित, तिरस्कृतः वा (दुष्ट के साथ), (२) विक्षिप्तः (धूल के साथ) । कपाययति (कपाय, नामधातु) =पीडयति, कलुपयति । विपतरु - दृढयति-दुर्जन अधिकाधिक सम्पर्क में जाने पर अज्ञान हो प्रपाट करता या बढ़ाता है, जैसे विष-वृक्ष का पुप्प जितना अधिक सूंघा ल .
सस्कृत-गश-वीची . जाता है उतनी ही अविर मूर्छा नाता है। अनुभूयने-(१) परिचीयते (दृष्ट के मात्र), (२) शिघ्रचने (पुष्प के मात)। मोह दृढपति- (१) अज्ञान परामयति (दुष्ट के माय), (२) मच्छी दर क्रोति (पुष्प के साय) । नीच जायते -दर्जन पुष्प कभी मनोम रन्नि ही होता, जैसे नीची भूमि म जन का अभाव नही गेला । न पारिविरह-(१) न वा गरिदिरट मागिरह (माके मार), (२) न पारिरिद जनाभार (निम्न देश के साथ) 1 निदाय यही दुजा विश सज्जनो को क्लदा पहुँचाता रहता है, जंगे गग्मी + गत मनिग्नयोवाले दिन पुग्पो को मुरझा दते है । वहुमत्सर = (१) दर ममर मा नर्यम् ईयां यम्य ग (मा के माय), (२) वय मन्मग तिना यस्मिन् स' (निदापदिवन दे माय) । सुमनसा स ताप वहरि---(१) गुद्धात करणाना सज्जनाना पन्नाा पीडा वति जाशी (गद दे साप), पुप्पामा रातार म्नाना। वानि करोनि (निदावदिवस ये गय) । मन्च नोयनश्च-दुनि पुस्प दूसरो पर दोप लगाने में चतुर नया रासी याजीविका का नाश करने में प्यारता है, तंगे रागनिका अनुसरण करने मे चतुर और मूसे ढसो म न पर रखा है। बीमार चतुर दोषाणाम् अनुव ने पारोष्य को (नुवनने वा) तुर निपुण (पत के साय), दोष रानि सन्या जनुकरे अनुवृत्ती चतुर (जैवरे में माय)। विश्व छा (१)विश्वानि ममग्रागिण मन्च्यान दनादानि कर्माणितेपाम् यनोपने परियारे उद्या तदार , या विश्वैपामरिजनाना यानि यर्माशि तेषान् जनतौने नागन ज्या (पत्र साय), (२) विदवकर्मा सूर्य तम्य उतपने लाडादने अनमन वा उद्यन (मोरे ये माय) रख पास --उगना व्यवहार (या ज्ञान) विपरीन हाता है, जमे मिलोचन शार व नेत्र विपिन- प (रवि, चन्द्र और अग्नि-रूप) होते हैं (धवा जैसे शिव रिन्पो पर, कुरूकोपर भी कृपा-दृष्टि रखते है)। दिस्पास (१) स्पि विपरीत पक्ष ज्ञान व्यवहार वा यस्य म (मल के माय), (२) विविधानि रविचन्द्राग्निम्पारि पक्षीसिनेतारिण यस्य स , विन्पेषु प्रणम्या दूरतः सलाः (व्याया) अपि अक्षि कृपादृष्टिः यस्य इति वा (रुद्र के साथ) । विष्णु :--- वह वक्रवारी विप्पा के समान कपट-व्यवहार में तत्पर रहता है । चामर:-(१) चक्र दम्भविशेषः तस्य घर धारक (खल के साथ); (२) चचत्रायुधं तस्य धरः (विष्ण के साथ) । शनाश्व ' मंसी - वह समुद्र ने उत्पल तथा प्रशंसनीय उच्चैःश्रवा नामक इन्द्र के घोड़े के समान उच्च प्रथा (दूसरों का काम सुनने में बहरा) बन जाता है तथा कभी भी चपने देशवासी लोगों की प्रशंसा नहीं करना । बच्चःशवा:--- (१) उच्च अधिक श्रयः शरणं यस्य सः नयोक्त; परकीयालापश्रवणे तत्परः इत्यर्वः; परकीयकार्यप्रवणे बधिरः इति का (जल के साथ); (२) उच्नःश्रवा एतन्नामक घोटक: 1 देशजप्रांसी-(१) देश स्वजनपदे जाता: देश झा, सान् अगानितु गीलम् अस्य इति देशजप्रशंसी, स. न भवति; (२) नदानाम् ईशः नदेग मुद्रः तस्माज्जातः नदेशजः, प्रांसी प्रशंसा- बान् च । शरस्य - दिलोटयति-दुर्जन, निलम हुए (फिर भी) प्रेम प्रदर्शित करने वाले राजनों के यन्तःकरण को पलेग पहुँचाता रहता है, जैसे नवानी, खय मथने के कारण ऊपर घी की वर्दै दिखाई देने पर भी, व्ही को विनोती ही जाती है । विनिम्नस्य : (१) विच्छिन्नसम्बन्धस्य (सज्जन के साथ); (२) अदितस्य (दही के माथ)। स्नेहा = प्रेमा- गम् ; घृतम् । शरस्य दतः । हृदयन् =मनः; मध्यभागम् । विलोड- यति-अनितरादयति मनाति च । तक्रार:-मन्थनदण्डः । चा" अमाफश्च--- दुर्जन आत्म-सा में तत्पर तया (व्यर्थ ही) इधर-उधर घूमता रहता है, जैसे वनों को दी जानेवाली वलि कौओं के शब्द से युक्त तया कुत्तों को सर-उमर (आनसान) घुनाती है। मानधोपमुलर (१) आत्नयोपेरण आत्मस्तुतिनन मुखरः वाचाल: (दुप्ट के साथ); (२) जात्मयोपेरण काकेन तच्छब्देन मुखर: सगब्दः (यक्षबलि के साथ)। (१) मण्डले देगे भ्रमति इति मण्डलक्रमणः स एव मण्डलनमणकः (दुष्ट के साथ); (२) मण्डलाः इवानः तान् ब्रमयति इति मण्डल ननणकः (वश्यलि के साय)। पिग्डमाप्तिलो मैन श्वान: बलि- मण्डलनमणक::.
सस्कृत-गद्य-दौथी समापे परिभ्रमति । माग दानश्च-दृप्ट पुरप अपने चपत मुग्न को अपने अर्धन मानता है (अ य जनो की मनमानी निन्दा करता है) तथा दान का तिरस्कार करता है (कभी दान नहीं करता), जैसे कोई मद- चुआता हाथी अपनी हथिनी के प्रति चचल-मुस बना रहता है । स्ववशा- मोलमुखर -(१) स्यवश स्वाधीनम् आलोल चपल मुग यस्य स (दुष्ट के साथ), (२)स्वदशाया निजकरिण्याम् बालोल स्नेहप्रदर्शनचन्चल मुस यस्य स (हाथी के साथ) अधरोहतदान – (१) परीकृत तिरस्कृत वर्जितम् इत्यय दान वितरण येन म (१प्ट के साथ), (२)अधरीकृतम् अतिवपणादधस्तात्कृत प्रच्युन वा दान मदन यन सं (हाथी के साथ)। युपम विक्ल --- यह (पापाचरण म) देवताओ से भी भयभीत नहीं होता, जैसे सार गौक पर दौटने से या जाता है । सुरभियानविकरा (१) मुरनिया न मिग्ल, देवभयेन न विकल विहल भीत न (दुप्ट के साय), (२) गुर्गम गा यानेन उपसपरोन नद धारनेन या विकर परि- यात (पभ के साय) । फार्मी,व रसतश्च--टुजन अपने कुलोचित आचार से भ्रष्ट होकर उसमें हीन हो जाता है और प्रतिरल (अनुचित) मार्ग में अा रक्त रहता है, जैसे वामी पुष्प (मामानेग के वारण) कुछ का कुर नाम उच्चारण करने से व्याकुल तथा स्त्रियों की रमामद करने' मे लीन रहता है । गोत्र घर ~(१) गोत्रात यशात् वशाचारात् यत् स्सलन प्रयुति तेन विधुर हान (पल के साथ), (२) गोभे नाम्नि यस्वनन तस्य व्यतापन उच्चारण तेन विधुर व्याकुल (वामी के साथ) : परस्त्रिया म नामबन कामीजन भून स कुटुम्बिया के सामने अपनी परकीय प्रेयसी का नाम से बैठने हैं । यामाध्यानुरया - (१) वामे निसरते लोक्वजिते अध्वनि मार्ग आचारे अनुरक्त तत्पर (पल के, साय), (२) वामाना स्त्रीणाम् अध्वनि तत्पनादनपद्धती अनुरक्त कामिन परिचर्याततर. (वामी वे साथ) । जीणं वहति-दुष्ट पुरुष इसरो के मधुर जौर श्रेष्ठ वचनो के प्रति (द्वैपा) उदासीन हो जाता है उनकी एसया, नहीं बरसा), से पुराना रोगी शरीर से टुपल और 1 . प्रणम्या दूरतः खलाः (व्यास्या) १३६ बात करने में असमर्थ हो जाता है। कलेवरे वचसि-(१) कले मधुरे वरे श्रेष्ठ वचसि (खल के साथ); (२) कलेवरे गरीरे वचसि भापरणे (रोगी के साथ) । मन्दिनानमावहति--(१) मन्दिमानम् औदासीन्यं वहति धारयति (खल के साथ); (२)मन्दिमान कृशतां वहति धारयति । वञ्चक'' रक्तश्च---- दुर्जन रिश्वत लेने में अनुरक्त होता है तथा विवाद या नीच स्त्रियों से स्नेह रखता है, जैसे गीदड़ शव-मास का प्रेमी होता है तथा रात को पसन्द करता है। कटपले- (१) उत्कोचे; (२) शवमांसे । विभावरीरयतः--(१) विभावर्या विवादे, पुट्ट या कुटिलयोपिति वा, रक्तः स्नेहः(खल के साथ); (२) विभावर्या रात्रौ रक्तः (गीदड़ के साथ)। परेत · दर्शन:-(१) कुटुम्बी जनो के लिए अदृश्य मृत की तरह दुष्ट व्यक्ति वन्धु-बान्धवो के कप्टो को देखता है (किन्तु उनके निवा- रण का कोई उपाय नहीं करता)। वन्धुतापदर्शनः:- (१) वधूनां तापं कप्टं पश्यति इति, तेपा कष्टं दृष्ट्वापि तत्प्रतीकारपराङ्मुखः इत्यर्थः (खल के साथ); (२) वन्धुतायाः वन्वुसमूहस्य अपदर्शनः, बन्युभिः अदृश्यमानः इत्यर्थः (मृत के साथ) । परशु खण्डयति-दुर्जन सत्पुरुषों की लक्ष्मी (ऐश्वर्य) का भी नाग कर डालता है, जैसे कुल्हाड़ी चन्दन वृक्ष को भी काट देती है (उसे चन्दन तथा अन्य वृक्षो मे कोई भेद प्रतीत नहीं होता)। भद्रश्रियम् - भद्राणां साधूना थिय सम्पद् , चन्दन-वृक्षम् । कुदाला निकृन्तति-दुर्जन अपने कुल का विनाश कर मान्ति-सम्पन्न लोगों को कष्ट पहुँचाता है, जैसे कुदाली भूमि को खोद देती है नोर पृथ्वी पर के कीड़े-मकोड़ों को काट डालती है । दलितगोत्र:-(१) दलित विना- शितं स्वाचारेण अप्रतिळां नीतं वा गोत्रम् स्ववश. येन सः (दुप्ट के साथ); (२) दलिता लाता गोत्रा भूमिः येन सः (कुदाल के साथ) क्षमाभागः प्राणिनः--शान्तियुतान् ननुप्यान् ; भूमियान् कोटादीन् । निद्वन्तति- क्निग्नाति; छिनति। रति सावून-वह कुत्ते की तरह नीच कार्यों में संलग्न होकर सत्पुरुपो को लज्जित करता है। रतिकोलः-श्वा दुष्ट मोदने--(अनेक पापाचरण करने से) दुष्ट जन की मुख-श्री फीकी पड़ जाती १४० सस्कृत-गद्य-पोयी है, तथा वह सकार में चुस्त और उनटे पड़े जानेवाले यवम' (मवयस -मुद्द) का भी अभिनन्दन न करता, जैसे दुष्ट हायी वन मे जाने की इच्छा से सदा पान में रहा तृण आदि को भी पसन्द नहीं करता। शूर्पति - पवन् प्रति थदण यस्य म यूपति गज । काननरचि (१) का ईपत्मिता पा जाननरपि मुसान्नि यस्य न (खल के माय), (२) कानने वने चि प्रति यग्य म (हाथी के साय) । अनु- गतमपि ययम सनतम् ---(१) गदास पश्चात गत प्रानि तोम्येन पठितम्, सनत मेन सरारोग तन यात पुस्तम् इत्य प्रतितोमपटिा सवार- युम्तश्न य पग्मगब्द सापम त्यागारन जान नवाच्य गुहदम् यपि इत्य (टुप्ट के साथ), भार यह है कि 'ययम' शन्द वो उनटा पढ़ने मे 'नवय' पद वनना है और इममे 'स' जोड दो ने 'मवयन' शन्द बनता है, जिनका नर्थ 'मुद्' होता है, दुष्ट पुत्प 'सदयम' का भी अभिनन्दन नहीं परता, (२) सतत मर्मदा अनुगा मौरर्येण प्राप्तम् यपि यान तृण नानुमोदते (हानी ये साथ)। अगीन अर कुरा -(साया- रणत तसार मे अर जमे ही उत्पन्न होता है और सागाओ द्वारा ही बटते देखे जाते हैं, फिन्तु) दुर्जनों द्वारा उत्पन पिने गए दुग-पी भर पिना कारण हीदा होने गौर नगर पिना ही बटने दे जाते हैं। अग्रीमान बिना, हेतु दिना । समाडा--स्वन्ध विना, जनसर दिना । दुपधेत उतयितुम् जनपया । दोपर-ट्रमरा का जरा-सा भी दो। इरालायरे-नयार स्प धारण कर रोता है, कराल भोपपम् इव आचति, न्यावर भवति इत्ययं । पारद पारा। मज्जन दूसगे ये दोष को तुरल भृा जाते हैं । मगा मापद --मन्जन मनोरजन की प्रवृत्ति के लेग-गान भी दर मे नही होते, जमे हरित उस व्यक्ति के दम मनी जाते, जो पतियो यो रिगाने में प्रयोग है (पर मृगौ के आट में जनभिन्न है) । विनोदक्दिो - (१) विनोदम्य जालिगम्य तदाथ- यागनाविषयर ने दिए प्रति स्वमार नन्च (सापत्र के साथ), पुरुष। प्रणम्या दूरतः सलाः (व्याख्या) १४१ (२) बीनां पक्षिणा नोदः प्रेरण विनोदः तत्र विन्दुः ज्ञाता विनोद- विन्दुः पक्षिरमणपटुः (मृगा. के साथ) । इस वाक्य का एक और अर्थ यह भी हो सकता है कि 'विनोदविन्दु (व्याय) के वश में हो जानेवाले मृगों की तरह सज्जन विनोद के वशीभूत नहीं होते।' हि- किन्तु । भवादृशाः--तुम्हारे जैसे कामासक्त लोग। हरन्ति-(१) नाशयन्ति (भवादृशाः के साथ); (२) जनयन्ति (शरत्समया. के साथ) । मिन्न- मण्डलस्य- (१) सुहृत्समूहस्य (भवादृशा के साथ); (२) सूर्य- मण्डलस्य (शरत्समय, के साथ); अर्थात् जहाँ तुम जैसे कुपयगानी अपने मित्रवर्ग का सुख छीन लेते है, वहां शरत्काल (मेघादि उपद्रवों का नाश- कर) सूर्य-मण्डल को सुख पहुंचाता है। मित्रमण्डलस्य हरन्ति (सूर्यस्य जनयन्ति), शेपत्वविवक्षया पाठी। सचेतना:~ ज्ञानी, विवेकी विसहशम् ---विपरीतम् । अचेतना निक्षिप्ता-अचेतन जड़ वर्ग भी योग्य या अनुरूप वस्तुओं के प्रति मित्रता निभाता है। उदाहरणार्य, माधुर्य · वारिणा कीयते--- इस वाक्य का भाव यह है कि 'जल और दूध में मित्रता होती है, क्योकि एक तो दोनो का एक ही नाम (पय.) है और दूसरे दोनों में मधुरता, शीतलता, निर्मलता, ताप-निवारण आदि गुण हैं । साथ ही (दूध में जल का भी अंश होता है और यह) जल द्ध के संसर्ग से ही बहुमूल्य माना जाता है। अतः जब दूध को औटाया जाता है, तब मित्रभाव से प्रेरित हो जल सोचता है कि पहले मुझे ही जलना चाहिए, इसीलिए वह नष्ट होता है ।' मकरन्द के कहने का अभिप्राय यह है कि इस प्रकार जब अचेतन वर्ग भी उचित स्थान पर अपनी मित्रता का परिचय देता है, तब हम सचेतन प्राणी तुम-जैसे अपने मित्र को नष्ट होते या कुपथ में जाते देखकर अपनी मित्रता का परिचय क्यों न दे, तुम्हें सत्पथ पर क्यों न लाएँ ?
१४२ सस्कृत-गद्य-धोयी ११-दहति निदाघो नितराम् यह ग्रीष्म-वर्णन उम समय का है, जव वाण विविध अनुभवो से भरी अपनी यात्रा समाप्त कर मुखपूर घर में रह रह थे। यहां वाण ने कठोर निदाघ-काल का बहुन की ज्वलन्त चित्र पोचा है । मन- साहित्य में इसकी जोटमा दूगरा ग्रीष्म-वर्णन नहीं मिलना । इसमें वाण की सूक्ष्म प्रकृति-निरीक्षण और वणन की अद्भुत शक्ति वा परिचय मिलता है। वाण की मार-गर्भ शैली का यह एक प्ठ नमूना है। सास्कृतिक दृष्टि से भी दम प्रमग में कई उल्लेखनीय वाते है । [१०५३] कदाचित् महाकाल -टमवाश्य मे उग्र गीप्म-मृतुवा भैरख शिव से स्पक बाधा गया है। मुमप्समययुगम्-मुमममय (वसन्त ) एव युग मासद्वयम् । उपमहान् (उप-+ सम् ++शतृ)---- (वसत ऋतु का) वन्त करता हुआ। शिव भी प्रलय ये समय-युग को समाप्त कर देते हैं । अजम्मत (जृम्भ लइ, प्रथमपुरुप, एकचन)----- बढने लगा (श्रीप्म के साय) , जमुहाई की (गिव के माथ) प्रोप्माभि- पान न अभियान नाम यस्य । सम्फुल्ल हास -(१) सम्पु- ल्लामि उत्फुल्लामि मल्लिकाभि घनला अट्टा विक्रयस्थानानि एव हामा यस्य, अर्थात् जो फूली चमेलियो मे श्वेत हुई मडियो के रूप मे हंस रहा था (प्रीम के माय), (२) मम्मुल्लमल्लिकावत् धवल अट्ट- हास उद्धत इसित यस्य, अर्थात् जिनको उद्धत हंसी फूली चमेलियो- शुक्र है (शिव के साय) । भगवान् शिव मा जोर से हंसना 'अट्टहास' बहलाता है । चमेली गरमियो में फुलती है। महाकात --प्रीम तु पयवा शिव । पूरे वाक्य का अर्थ यो होगा--'तर वसन्त ऋतु वा अन्त परता हुआ और फूली हुई चमेलियों से श्वेत यनी मटियो के म्प में हराता या ग्रीष्म नामद भीषण समय बढने लगा, जान पड़ता था मानो भगवान् शिव ही, युगों का अन्त करते हुए चमेलियों-जैसा 'शुभ्र हए, जमुहाई से रहे हों।' प्रत्यन अभूत्-अव कवि ने यहास करते प्रणम्या दूरतः खलाः (व्याख्या) १४३ रूपक बदल दिया है । ग्रीष्म एक विजेता है, जो वसन्त-रूपी सामन्त को हरा देता है, पर हारे हुए शत्रु के बच्चो के प्रति, शुरू-शुरू में, कोमल बना रहता है । वच्चों के रूप में नये उद्यानो की कल्पना की गई है । प्रत्यन- निजितस्य-हाल ही में जीते गए । अस्तमुपगतवत:-अस्त हुए । वसन्तः एव सामन्तः तस्य । बालापत्येपु:- नन्हें बच्चों के प्रति । पयः- “पायिधु-~-(१) दूध पीनेवाले (वालापत्येषु के साथ); (२)पानी पीने वलि अर्थात् प्यासे (नवोद्यानेषु के साथ) । दगितः स्नेहः आर्द्रता प्रीतिर्वा येन । नवोद्यानेषु ---नये वर्गाचो पर; बालापत्येषु के विशेषण-रूप में इसका अर्थ होगा "जिन्होने अभी-अभी चलना सीखा है', नवं उद्यानं उद्गमनं वैपा तेपु । मृदुः अभूत् - ग्रीष्म ने आते ही वीचो को झुलसा नहीं दिया; आरम्भ में वह अकठोर था। पूरे वाक्य का शब्दार्य इस प्रकार हुआ---'तत्काल जीत गए और तमाप्त हुए वसन्त के नये प्यासे बाग-बगीचों के प्रति स्नेह (आर्द्रता) दिखाते हुए (नीम प्रारम्भ में) कोमल ही बना रहा, वैसे ही जैसे (कोई विजेता) हाल ही में विजित और अस्तगत (निस्तेज) सामन्त के दुधमुंहे नन्हे बच्चों पर, जो अभी- "अभी चलने लगे है, स्नेह (प्रीति) दिनाता हुआ दयानु बना रहता है।' -अभि · समय:-इस बाध्य में नीम और नवाभिपित राजा का रूपक है। अभिनवोदित:- (१) नबोदित, नवागत (उप्णतमय के साथ ; (२) नूतन राज्याभिपिक्त (राजा के साथ) ( साल बारोत-सभी फूलों के बन्धन खोल दिए ; अर्थात् गरमी आने पर सारे फूल झुलस गए और अपने दन्त से टूटकर गिर पड़े। नया राणा भी अपने राज्यानिक के समय वन्दियों को छोड़ देता है । विशिष्ट अवसरों पर बन्दियों को रिहा करने की प्रथा है--युवराजानियके या परचनाबरोपणे । पुत्रजन्मनि वा मोक्षो बन्धनस्य पियीयले स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लवसर पर भारत में मी बहुत-ने वन्दियों को रिहा किया गया था। प्रतपन्- (१) गरम होते हुए (उपणसमय के साप); (२) प्रताप दिखाते हुए (सजा के 'साथ) । स्वयम् मादर चूचक है। ऋतुः एव राजा तस्य ।
१४४ सस्कृत-धन्योयो अभिषेश -यह विशेषण 'चामर-क्लापा' (चंवर) और 'कामिनिचिकुरचया' (रमणियो के केरा-वताप) दोना का है। रमणियो पे देश-वलाप स्नान (भिपेक) ये वाद गीले रहते हैं और उधर चंबर भी गयाभिपेर के बाद गीले हो जाते हैं। स्वर युधेन-अर्यात् कामदेव ने रमणिया के स्नान से गीले वेशा को हाय में ले लिया, मानो उमने म्वय तुराज वे अभिपेक स गाने चंवर उठा लिये हो । दृसर शब्दाम, रमणिया के गीले सही ग्रीप्मरान को भोले चंवर थे, जिन्ह कामदेव न उठा लिया था। स्नान से गीले हुए वाल सुन्दर लगते हैं यार कामापय हाते है । ग्रीष्म के कठोर समय मे कामदेव इन बालो को अपना लेता है। वाण का यह वर्णन वालिदास के इस पद्य वा स्मरण दिलाता है-'स्नानाद्रमुनतेप्यनुरूपवास विन्यस्तसायन्तनमित्ल- केषु । कामो वसन्नात्ययमन्ददीय केगेपु लेभे रनिमगनानाम् ॥' रघुवरा १६५०) राजशेखर ने भी लिखा है--'तदा ते स्नानाना दरदलितमत्ली- मुकुरिणाम् ।' हिमालय मालो-सूर्य ने हिमालय के विरुद्ध युद्ध- याना बारम्भ कर दी (अर्थात् मूय उत्तर की ओर उत्तरायण हो गए, पीप्म ऋतु म सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं)। इसका कारण या हिमदग्ध०-- वफ से सभी क्मत नष्ट हो गये थे, इसलिए सूर्य को मानो नाव आ गया था। कमल मूर्य निकलने पर दिवसित होता है, अत मूय जोर कमन म स्वाभाविक जनुराग होता है। पर सूय को यह मालूम हुगा वि हिमालय में (गरमी से) वर्फ पियरने पर कमल अतम गए है, तब उन्होंने नुन हो हिमालय के विरुद्ध अभियान कर दिया । ग्रीष्म मे सूर्य के उत्तरायण हो जाने का यह बाल- पारिक वर्णन है । अमून मलति घारपति इति अनुमाली । डा. वासुदेव- शरण अग्रवाल ने इससे यह सास्कृतिक तथ्य निकाला है कि "किसी सकट से बचो के लिए लोग देवी-देवता का कोप-निवारण रने की इच्छा से लात फूलो की माता पह्नर 'जात' देने जाते थे। जानि के लिए प्राचीन शन्द 'यात्रा' था । 'जान देना' मुहावरा रास्कृत में प्रयुक्त चले गए, - दहति निदाघो नितराम् (व्याख्या) १४५ हुआ है (यात्रामदात्) । सम्भवतः वाण उस समय की लोक-भापा से इसका संस्कृत में अनुवाद कर रहे थे।" ललाट तपति इति ललाटतपः । अय 'तपते-जिस समय मारेको तपानेवाले सूर्य तप रहे थे; अर्थात् जब सूर्य प्रखर हो गए। ललाट के बाद अनुनासिक (न्) पारिणनि के इस सूत्र के अनुसार लगाया गया है- 'अद्विपदजन्तस्य मुम्' (६।३।६७) । तपने -सूर्यो। ललनाललादेन्दुभिः दिनकरारावननियमाः इव अगृह्यन्त - रमणियो के सुन्दर ललाट-मानो सूर्य की आराधना करने के नियमों का पालन करने लगे। 'ललाटेन्दुभिः' के तीन विशेपण है, जो ब्रत का पालन करनेवाले पर भी घटित होते है- (१) चन्दनेन लिखित: ललाटिका एव पुण्ड्रकः यैः, जिन पर चन्दन से सलाटिकां और पुण्डक बने थे । 'ललाटिका' और 'पुण्डक' ललाट पर चन्दन से अकित किए जाने वाले अलंकार-रूप चिह्न (तिलक) होते थे । व्रतधारी भी ललाट पर पुण्ड्रक (सम्प्रदाय-विशेष का तिलक) लगाता है। (२) अलका: एव चीरचीवरं तेन सवीतैः, केशों की लटो के रूप में जो चीर-चावरों (संन्यासी के वस्त्रो) से ढके थे। (३) स्वेदो०-- जो पसीने की बूंदों के रूप में मोतियों की रुद्राक्ष-माला धारण किये हुए थे। व्रतधारी भी अक्षमाला पहनता है। चन्दन · सुन्दरीमिः- इसमें सुन्दरियों और कुमुदिनियों में साम्य स्थापित किया गया है। दिवसम- सुप्यत सुन्दरीनिः- सुन्दरियाँ (कुमुदिनियों की तरह) दिन में सोने लगीं। दिवसम् का प्रयोग द्वितीया में 'द्रव्यकर्मणि लादिविधानात् कर्मणि द्वितीयव' इस नियम के अनुसार हुआ है । चन्दनवूसरामिः-- (१) चन्दनेन धूसराभिः (सुन्दरीभिः); (२) चन्दनवत् धूसराभिः (कुमु- दिनीभिः) । धवल होने के कारण कुमुदिनी को चन्दनधूसर कहा गया है । असूर्यम्पश्याभिः (१) जो (गरमी के कारण) सूर्य के दर्शन नहीं करती थी (सुन्दरीभि. के साथ); (२) जो (स्वभाव के कारण) सूर्य को नहीं देखती थीं, दिन में नहीं खिलती थीं (कुमुदिनीभिः के साथ) । निद्रालसा "तपम्--उनकी (सुन्दरियों को) नोंद से भारी माखें रत्नों 1 १४६ संस्कृत-गद्य-पोयो को जगमगाहट को भी नहीं सह सक्ती थी, कठोर धूप की बात तो दूर रही । अशिशिर शवय चरवाद-जोहो ने प्रीप्म-ऋतु मे क्षीण पड जानेवाली चांदनी रातो का उन नदियों की भांति अभिन दन (स्वात) किया, जो गरमियो में पतली पड जाता है और जो देहा से युक्त होती हैं । चकवानो के जोडे रात के समय विद्युह जान हैं. अत गरमी की छोटी रात उनके लिए हर्ष का विषय थी। चक्रवाय नदियों के किनारे रहते हैं, अत ये भी उनके हर्ष का कारण होती हैं। सोडुपा -(१) उडुन चन्द्रेण सह (शदय), (२) उडुपैन प्लवेन सह (नद्य)।यमि- नव पटु तीब पाटलानाम् आमोद तेन सुरमि परिमल यस्य (जवम् और पवनम् का विरोपण) । मूर्य ताप ये कारण लोगों को सिले पाटल- 'पुषो की तीव्र सुगन्ध मे सुगन्धित जरा ही नही, हया भी पाने की इच्छा हो गई । पाटल ग्रीष्म का एक मुगन्धयुक्त फूल है । तुलना कीजिए- 'मुलमलिलावगाहा पादलससर्गसुरभिदनयावा' (शाकुन्तन)। [पृ० ५४] योदय इस प्रकार है--क्रमेण च निदाधकाने प्रावन्त मातरिश्ता । खरपगमयूखे-सराः प्रप्सरा खगस्य सूर्यस्य मयूखा मिर- पानि यस्मिन्, जिसमे सूर्य की किरणें प्रसर होने लगी। शराबविगा खगा' इत्यमरः । यह और वाद के पद 'निदायवाले के विशेषरण हैं। सतिशंशवे-पण्डित शिव यस्य, जिराका (पाप्म का) मोाव बीत चला । सीदलोनसि-मीदति सोतासि यस्मिन्, पाराएँ पतली पड़ने लगी। पातर विश्व-जब दोन वदूतरो के अनवरत पूजन से ससार बहरा हो रहा था। वर्षीवाले पक्षी होने के कारण क्यूतर गरमी नहीं सह सकते। वम त्रिणि-दूसरे पशिगण निरास छोड रहे थे। पोपद्धपमरुति-वरीप गोमय पति शिति सरत् दायु यस्मिन्, जद हवा सूबे गोवर को उड़ा रही यो। 'सघालाभ्रवरीपेय कप' पारिपनि ३३२६४२ ।'सर्वइप खुल, कूलपा नदी, फरीपपा वात्या' सिद्धान्त- कौमुदी । विरलवीरधि-विरला बोरय. सता यस्मिन्, (गरमी के पारण पत्तो के गिर जाने मे) लताएँ विरल हो गई, धनी नहीं रही।
दहति निदायो नितराम् (व्याख्या) १४७ रघिर रतबके~-घातकी (लता) के पूर्ण विकसित लाल-लाल पुप्प- गुच्छों को शेर के बच्चे रुधिर के लोभ से चाटने लगे। वातकी के बहुत लाल होते हैं । लोहिता “सोम्ति-अलोहिता लोहिताः भवन्तः लोहितायमानाः तैः मन्दारैः सिन्दुरिताः आहितसिन्दूराः इच सीमान यस्मिन्, लाल होते हुए मन्दार वृक्षों से सीमाएँ सिन्दुर-लिपी दीखती थीं। उस काल में यह प्रथा जान पड़ती है कि गांवो की सीमा पर मन्दार के वृक्ष लगाए जाते थे, अथवा सीमाओं पर लोग लाल रंग के चिह्न बनाकर हदवन्दी प्रकट करते थे (सिन्दुरितसीमा) । आज भी हदवन्दी के पत्थर सिन्दूर से पोत दिए जाते हैं । धर्म गर्मुति-धर्मेण मर्मरिताः शुष्कत्वेन शब्दायमानाः गर्मुतः लताः यस्मिन्, गरमी से सूखी लताएँ मर्मर शब्द कर रही थी। तप्त - विकिरे तपी धूल से (उत्पन्न) भूसी की आग (कुक्कल) से मुर्गे आदि पक्षी कातर हो रहे थे । विवर · विधे--विवरं शरणं येषां ते विवरणरणाः श्वाविधाः यस्मिनु, साही-जैसे हिंसक जन्तु "दिलों की शरण ले रहे थे । रजनीराजयमणि---रातें क्षय-रोग से ग्रस्त हो गई थीं । गरमी में रातें, क्षय-ग्रस्त रोगी की तरह, धीरे-धीरे समाप्त होती हैं । कठोरी · काले-जव ऐसी ग्रीष्म ऋतु प्रौढ़ हो चुकी थी, पूरी तरह से आ चुकी थी। प्रावर्तन्त-बहने लगी । मातरिश्वानः-- हवाएँ । • याक्य-सम्बन्ध इस प्रकार है--सर्वतः प्रत्यदृश्यन्त दारुणाः दावाग्नयः, दारुण दावाग्नियाँ चारों ओर दिखाई देने लगी। दोप सारे पद 'दावा- ग्नयः' के विशेपण हैं। क्वचित् । हरिणा:-कही स्वच्छन्द रूप से धास घरनेवाले हरिणों की तरह वे दावाग्नियां पीले रंग (हरिणाः) की थी और घास खा (जला) रही थीं। यह और बाद के 'स्थितयः' तक के पद दो अर्थवाले हैं--वे 'दावाग्नयः' तथा एक और वस्तु से सम्बद्ध हैं। इन दूसरी वस्तु की, संज्ञा और विशेषण, दोनों रूपो में व्याख्या की जा सकती है । पवित्र बभ्रवः-कहीं पेड़ों की जड़ों में बने बिलों में लोटने- वाने नेवलों (चत्रवः) की तरह (वेदावाग्नियां) लाल-पीली (बनवः) ।
१४८ सस्कृत-गद्य-वीथी पी और पेडों की जडो के विलो मे धुम रही थी ।श्वचित् कपिला कही जटाधारी वपिल मुनि की तरह वे भूरे रंग की थी और कद-मूलो (जटा) का आश्रय ल रही थी। कपिल सास्य-दर्शन के प्रवर्तक थे। बहुवचन का प्रयोग आदरसूचक है। 'कपिला' का अर्थ कपिल मुनि के अनुयायी' भी हो सकता है ! वचित् इयेना-वही वे (दावाग्नियाँ) ध्वेत वर्ण की थी (श्येता ) और चिडियो के घोसलो (कुलाय ) को गिरा रही थी, इस प्रकार व उन बाज पक्षियों की तरह थी, जो छोटे पक्षियों के घोसती को गिरा देते है । दचित् रुचय -नही वे घुओं उगल रही थी और उनका प्रकाश मद पड गया था (मन्दरुचय ),उन मन्दाग्निवाले (मन्दरचय ) लोगो की तरह जो मुंह से घुला (इकार) छोडते रहते हैं। धूमस्य उद्गार तेन मह सदमो० (दादाग्नय के साथ), सघूम उद्गार येपाम् (मन्दरचय के साथ) । डा. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार यहाँ धूम्रपान को मन्दाग्नि का कारण बताया गया है। यचित् स- मस्मका नहीं दे भस्मयुक्त थी और सारे ससार का कौरचनार र क्षण करना चाहती थी, भम्म रोग मे पंडित उन व्यक्तियो की तर जो समस्न ससार में होनेवाला अन्न चट करने को तैयार रहते है। घस्मर:-. भक्षक । भस्मक व्यापि मे भूख बहुत लगती है। परचित वृद्धा. वहीं वे बांसो के सिरो पर लगी (जलती) दिखाई देती थी और आरार में बहुत वढ गई थी, उन अत्यत वृद्ध पुरपो की तरह जो लाटियो पर अपना शरीर थमाए रहते हैं । क्वचित् क्षयिण -कही वे पर्वतो पर गिलाजीत खाकर विनाश फैला रही थी, उन क्षय-रोगियों की तरह जो निरन्तर शिलाजीत साते रहते हैं। इससे ज्ञात होता है कि सातवी शताब्दी में शिलाजीत की जानकारी हो चुकी थी। शिलाजीत क्षय-रोग मे उपादेय माना जाता है । टीकाकार शकर का कथन है वि शिला-धातु के प्रयोग से, शिव की कृपा से अथवा वरी के मूत्र से क्षय-रोग क्षौरा होता है, अन्य किसी प्रकार नही-'शिताधातुप्रयोगाद्वा प्रसादाद्वाय शावरात् । अजामूत्रप्रयोगाद्वा क्षय क्षीयेत नात्यया ॥' पवचित् पीवान -कहीं चल आदि (द्रव्य वम्तुनो) को सुखाकर वे मोटी हो गई थी, उन स्थूल दहति निदाघो नितराम् (व्याख्या) १४६ लोगों की तरह जो पटस भोजन करते है । क्वचित् । रौद्रः--कहीं वै गूगुल जलाकर रोद्र (भीषण) हो गई थी, उन रौद्रों (रुद्रपूजकों) की तरह जो (माये के उपर) गूगुल (की बत्ती) जलाकर अपना मांस और हड्डी तक जला डालते हैं। क्वचित् । स्यितयः-ज्वलितानि नेत्रारिण मूलानि तेषां दहनेन दग्धाः सकुसुमा शरा: मदनाश्च येपु; कृता स्यारणषु स्थितिः यः, कहीं वे दावाग्नियाँ जलती जड़ों की आग से फूलों-सहित शाखाओं तथा मदन नामक वृक्षों को जलाकर ठंठे झाड़ो पर ठहरी हुई थीं और इस प्रकार उन शिव का-सा व्यवहार कर रही थीं, जिन्होंने जलती आँख को आग से पुष्पधनुप-सहित कामदेव को जला दिया था (ज्वलितेन नेत्रदानेन दग्धः सकुसुमगरः मदनः यै ; कृता स्थाणोः शिवस्य स्थितिः व्यवहारः औः) । चटुल · नटा:--चचल लपटोंवाली दावाग्नियां आरभटी शैली से नाचते हुए उन नर्तकों की तरह लगती थी, जो खुले वालों को इधर-उधर फटकारते हुए नृत्य का आरम्भ करते हैं । इस प्रकार वाल खोलकर सिर को और शरीर को प्रचंड अंग-संचालन द्वारा हिलाने की नृत्य-पद्धति बलूची और कवायली लोगों की अभी तक विशेषता है । स्वम् मक्षयन्त:--अपने धुएँ को भी बादल बन जाने के डर से वे खा जाती थी। दावाग्नियों को भय था कि उनका धुआँ कही बादल न वन जाए और बादल कहीं वर्षा से उन्हें शान्त न कर दे । स्बेदिनः । कानने -~~वनों में पिघलते मधुकोश से तू रहे मोम को बरसाने से ये मानो पसीने से तर हो गई थीं (विलीयमानः मधुपटलगोलः माक्षिककरण्ड. तस्मात् गलितं मधूच्छिष्टं तस्य वृष्टिः येषां ते० तृष्टयः) । खल · रेषु नितान्त असर स्थानों में लपटों का पनापन (संहतिः) कम हो जाने कारण ये (दावाग्नियाँ) उस गंजे आदमी की तरह जान पड़ती थी, जिसके सिर पर बहुत कम बाल होते हैं । गृहीत · जयेषु-शिला-समूहों में सूर्यकान्त-मणियो से दीप्त होने के कारण ये शिलाओं का ही कोर बनाती हुई प्रतीत होती थीं । सूर्य के प्रकाश में सूर्यकान्त-मणि आग उगलती है । ग्रीष्म में इन मणियों की ज्वाला के साय दावाग्नियों के मिल जाने से ऐसा जान पड़ता था कि वे दावाग्निा शिलाओं को ही ग्रास बना रही है। ।
सस्कृतनाद्य-वीयो १२-कि स्वर्णम् ? चारित्र्यम्; को निकपो ? विपदेका प्रस्तुत अवतरण मे राजकुमार हर्ष के (जिन्होने बाद में सन् ६०६- ६४७ ई. तक सम्राट हर्षवधन के नाम से) उत्तरी भारत का शासन किया, माता-पिता की मृत्यु का वणन है। मरणोन्मुख माता यशोवती तथा पिता प्रभाकरवधन द्वारा हर्म को दिया गया उपदेश मामिक्ता की दृष्टि से हपचरित' क सबसे सुन्दर स्थलो म से है । इस प्रकरण में वाण ने कई प्रकार की वपन-दोलियो का प्रयाग किया है। इस गद्याश के शीप का अध है-चारित्र्य (सदाचार) ही सच्चा सोना है और विपत्ति ही उसकी सरी कसोटी (निक्प)। [१ष्ठ ५५] आरम्भ में भार्या छद मे श्लेष का प्रयोग है-एक परिवतमान अनन्त परन्तरहित काल ,शलान् परिवर्तमान बनात आप इव, महापुरुषान् पातयति , अर्थात् काल जब करवट लेता है, अनेक महा- पुरुषो को भी एक साथ, अनादरपूर्वक (विना क्सिी सोच-विचार के), विलट डालता है, जैसे दोषनाग अपने फना को हिलाकर मनापास ही पहाडी को गिरा देता है । यह पद्य हपं पर माता-पिता की मृत्यु के रूप मे आ पडने वाली विपत्तियो । सूचर है 1 मा यता है कि सपनाग के हजार फनी पर पृथ्वी टिकी हुई है और जब वह सुस्ताने के लिए फनो को हिलाता है तब भूकम्प आते हैं । वाल्मीकि रामायण के अनुसार पृथ्वी एक बड़े दिग्गज ये मस्तर पर टिकी है और जब वहमरावट के मारे मस्तक हिलाता है तव पृथ्वी डोलो लगा है-'यदा पर्वणि कामुत्स्य विधामार्य महागज । पदाच्चारयते शीर्ष भूमिव म्परतदा भदेत् ॥' (१।४०।१५।) न्यस्मिन् मनिदूसरे दिन । इससे एक दिन पहले ही हपं अपने पिताकारणता कासमाचार पाकर, प्रवास से घर लौटे थे। उनके पिता मरण-सय्या पर और इससे सावा चित्त निताव द्विग्न हो उटा था। इतपति रिणी-नातिवर्शन सरितगतियगात् दिशीयंमारा युट्यमान बलङ्कार भूपणं झावारिणी दादापमाना, सेजी से चलने के कारण टूट कि स्वर्णम् ? चारित्र्यन्; को निकषो ? विपेदका (व्याख्या) १५१ पड़नेवाले माभूषणों से जो यावाज कर रही थी। क्व "पृच्छन्ती--'कुमार (हप) कहाँ है, कुमार कहाँ हैं, इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति से पूछती हुई। प्रतीहारी-~~द्वारपालयुवती। विषण्ण गता--लोगों ने विपाद-भरी आँखों से उसका स्वागत किया। कुट्टिम"युगला-~~-कुहिमे निवद्धाया भूमी न्यस्तं हस्तयुगलं यया, जिसने अपने हाय फर्श पर टिका दिए थे। गलन्तोभिः - दशनदीधितिधाराभिः शुष्यन्तम् अधरं सिञ्चतीव-दाँतों से निकलती हुई किरणो (दीधिति) से अपने सूखते हुए और कुछ-कुछ धूसर अधरों को मानो सींचता हुई। प्रहरी का होठ दु.ख के कारण सूख गया था; जब उसने नीचा मुंह करके निवेदन करना आरम्भ किया, तब उसके चमकते दांतों की आभा होंठ पर पड़ने लगी । यह मामा जल की धारा- जैसा प्रतीत होती थीं। किमपि · देव्या-रानी ने कुछ विचित्र निश्चय (पति के जीवित रहते अनुमरण का, सती होने का सकल्प) कर डाला है । अघ्यवसितम्-निश्चितम् । अपरम् ---यहं दूसरा अशुभ वृत्तान्त । अभी तक तो हर्प अपने पिता की बीमारी से व्यग्र थे कि उन्हें माता के लिए भी चिन्तित होना पड़ा। च्युतः इव सत्येन--वह मानो धीरज खो बैठे । द्रुतः इव दुःखेन---दुःखसे मानो गल गए, विलीन हो गए । आचान्तः इव चिन्तया--चिन्ता से मानो ग्रस्त हो गए । सचान्तःपीत: ग्रस्तः । तुलितः इव तापन--ताप से जैसे तोल लिये गए । अङ्गीकृतः ३५ आतङ्कन आतङ्कने, भय ने जैसे उन्हें अपनी गोद मे भर लिया, अर्थात् वह अत्यन्त भयाकीत हो गए। अतिपत्तिः आसीत्- ऐसी थी उनको सज्ञा-विहानता, तिकर्तव्यमूढता। प्रतिपन्नसंज्ञस्य-प्रतिपन्ना प्राप्ता सज्ञा चेतना येन तस्य, होश में आने पर (उन्होंने मन मे सोचा) । कठिने-यह 'हृदये' और 'अश्विनि' दोनो का विशेषण है । दुःखाभिपङ्गः-दु.खत्य अभिपङ्गः अभिभयः, दु.खों का आक्रमण । निरनुकोशस्य-निर्गत: अनुमोशः अनुकम्पा यस्मात् तस्य निर्दयस्य ! पूरे वाक्य का अर्थ यह हुआ-जैसे कठोर पत्थर पर लोहे की 'चोट नागपैदा करती है (हुतभुजम् उत्यापयति),वैसे ही मेरे कठोर हृदय २५२ सरकृत-गद्य-चीयो पर अनेक प्रकार से होनेवाला यह दुखो काआश्मण भाग तो पैदा करता है, पर मुझ निर्दय की काया को भस्म नहीं करता । प्रविशन्नेव निर्यान्तीम्-भीतर जाते ही उन्होंने माता को बाहर निकलते देखा (निर्यान्ती निर्गच्छतीम्)। यह तथा वाद के समस्त द्वितीयान्त एकवचन पद 'मातरम्' के विशेषण हैं । दत्त तेयाम्- दत्त सर्व स्वापतेय धन यया, जिसने अपनी समरत सम्पत्ति वा दान कर दिया या । स्वापतेयम् -- (स्वपति+दन्)-स्वपतीसाघु स्वापतेयम् , यह पाब्द पाणिनि के इस नियम के अनुसार बना है-पथ्यतिथियसतिरवपतलं, यति 'पयिन्', 'यतिषि', 'वसति' और 'स्वपनि' में 'साधु' के अर्थ मे ढ प्रयय जुडता है । गृहीतमरणप्रसाधना-गृहीत मरणप्रसाधन सतीत्वाय सोभापचिह्नानि यया, जिसने मरण-काल के (मनी बनने के ) सभी अल- कार धारण कर रते थे। जामको प्रदेश्यन्तीम्-जैसे सीता ने पनि वे सामने (पुर.) अग्नि मे प्रवेग दिया था,वैमेही वरीपति से पहले (पुर) यग्नि-प्रवेश करनेवाली थी। प्रत्यन उत्यिताम् – अभी-अभी स्नान करने के कारण उसका शरीर गीता था, मानो भगती लक्ष्मी उसी क्षण समुद्र मे से निकली हो । लक्ष्मी समुद्र में से निम्तने समय यशेवती थी तरह भीगी रही होगी। प्रत्यग्र सद्य सम्पादित स्नान तेन या पिलन देह यस्या सा, ता देहाम्, तम्या भाव देहता, तया । कुसुम्न दधानाम- वह मुम्भ पूत्र के समान दो लाल वस्त्र पहने पी, मानो जापाश ने दोनो सन्ध्याएं धारण कर रखी हो। धान्या प्रसाधिताम्- अपनी धाय द्वारा वह जलपत की गई थी, साथ ही वह अपनी पति-भक्ति से श्री विभूषित यी। धात्री (धात्रेयी या पानी-मुना)का काम गनी का प्रसाधन करना या : इममे तथा वाद वे वापयासों में 'प्रमाधिताम्'-जैसे शब्दो दे दो अर्थ है, एक गाब्दिक, दूमरा स्पकात्मक । मूच्या धार्यमाणान--- एक दिया नौर मूळ, इन दो परिचितो (सरतुन) ने उसे महाग दे गा था। [१० ५६] व्यसनसङ्गतया-जो उसके दुख की सगिनी थी (मसी के साथ); जो उनकी विपत्ति से सम्बद्ध थी (पीड़ा के साथ), कि स्वर्णम् ? चारित्र्यम् ; को निकपो ? विपदका (च्याख्या) १५३ सखी और पीड़ा, विपत्ति के इन दोनों साथियों ने उसका आलिंगन कर रखा था । परिजनेन 'परीताम्--- सेवकों से, जिन्होने उसके सारे अंगों को पकड़ लिया था, वह घिरी थी; साथ ही, वह सन्ताप से भी, जो उसके समस्त अवयवों में प्रविष्ट था, व्याप्त थी । कुल · अधिष्ठिताम्-- बड़े-बडे कुल-पुत्र तथा लम्बी-लम्बी साँसें उसके साथ थी । कञ्चुकिभिः गताम्- थूढे कंकी उसके पीछे आ रहे थे; उसका दुःख वहुत बढ गया था और उसके पीछे लगा था। वाप्पायमाणा (वाप्पम् उद्वमन्ती)~-वाष्प, नामधातु, शानच् । सस्नेहम् चूड:-- जिसके सिर के ऊपर के बाल नूपुरो के रत्नों की किरणो द्वारा स्नेहवश चुम्वित हो रहे थे । जब हर्प माता के चरणो पर गिर पड़े, तब माता के रत्नजटित नूपुरों की आभा उनके बालो पर पड़ने लगी । कवि उत्प्रेक्षा करता है कि ऐसा उन्होने स्नेह से प्रेरित होकर किया। गिरिणे... माना~~-जिसके शोक का आवेग मानो एक बडे पहाड ने रोक दिया था। मार्ग में रुकावट आ जाने से धारा और भी वेग से प्रवाहित होने लगती है। रानी का गोकावेग भी, जिसको उसने जबरदस्ती रोक रखा था, फूट पड़ना चाहता था। अवष्टभ्यमाना (स्तम्भिता) ---अव+स्तम्-+-यक-+ -शानच् । वाष्पोत्पतनम्-अश्रुप्रवाहम् । रानी आँसुओं का गिरना न रोक सकी । कृतान्तं गहमाणा-काल को कोसती हुई। प्राकृतप्रमदा इव- सामान्य स्त्री की तरह । प्रशान्ते च मन्युवेगे- -जब दुःख का आवेग शान्त हो गया । सुत · युगला--सुतस्य वदने विनिहितं निभृत (शान्त) नयनयुगलं यया सा । नासि · वा--ऐसा नहीं है कि तुम अप्रिय, गुगरहित या त्याग कर देने के योग्य हो । स्तन्यन्-रतने भवं स्तन्यं दुग्धम्, स्तनों का दूध । प्रभूत- प्रभुप्रसादान्तरिता T-प्रभूताः प्रभोः प्रभाकरवर्धनस्य प्रसादाः तैः अन्त- रिता, अर्थात् मेरी दृष्टि इस समय स्वामी के अनुग्रहों से आच्छादित है, मुझे इस समय अपनी पति-भक्ति ही दीख रही है, पुत्र-स्नेह नहीं । कुलफलत्रम् बस्मि- --~-भै एक उच्च परिवार की वधू हूँ। धर्मधवले-~-धर्मेण धवले, । .
१५४ संस्कृतनाद्य-वीयो अपनी धर्मपरायणता ये कारण उज्ज्वल । वीरजा-पार की पुत्री। बाण ने उस राजवश क बार म कुछ नहीं बताया है, जिसमे यशावती का जन्म हुआ था। पराक्रमीता-पराम्म से खरीदी गई, यर्यात् जो केवल पराक्रम की परवाह करती है, या पराक्रम पर ही जो अनुरक्त है। मरत-वाण पा सकेत सम्भवत दुप्पन और शकुन्तता के पुत्र भरत की ओर है । एक और भी भरत हुए थे, जो ऋषभ के पुत्र और नाभि के पौत्र थे, जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारलवप पडा। भगीरथ-- गगा वा पृथ्वी पर लानेवाले । नामाग-रामायण के अनुसार यह नहुप के पुत्र और अम्बरीप के पोन य (२।११।३३) । बन्दारक-श्रेष्ठ । यासेवित शिरमा-सेवा म होट करने वाली अन त सामती स्त्रियो में सोने के घड़ी को उँटेलकर इस सिर पर अभिषेक किया, धनन्तसामन्त- सीमतिन्य , वाभि समावजित जाम्बूनदघटै अभिपेर । महादेवी ललाटेन-इस ललाट वा महारानी के पट्टबन्ध का मनोरय-दुलभ मलार प्राप्त हुआ। अर्थात्, यशोवता के सिर पर पहले सुवर्ण-घटो से अभिषेक किया गया था और तव ललाट पर महादेवा-पद का सूचक पट्टरन्ध बांधा गया था। वराहमिहिर के अनुसार महादेवी-पट्ट साढे दस इच सम्बा, बीच में सवा पांच इन चौटा और किनारो पर इसकी याची चौडाई का होता थायमिन घरौ~अमिशाणा क्लत्राणि एव बन्दोवृन्द तेन वियूय- मान चामर तस्य माता चल चीनामुक तस्य वरी (पयोनरी का निशे- पण)- जिन रतनो पर काबीना रेशमी वस्त्र शनु-पत्नियो द्वारा हुलाए जाते चदरी मात्रा में हिलता रहता था। यशोवती चीनामुक का उत्तरीय धारण करती थी। सपनीना शिर सुनिटिन चरणयुगलरम्- इसका शब्दार्य नही ग्रहण करना चाहिए, आशय यह है नि उसने अपनी समस्त सौतों पर राज दिया था । नमन् अषितम् --जिन (परी) की पूजा राजधानी-भर वा कुटुम्बिनियो ने प्रणाम करते समय अपने मुकुट पर की मणि-मालानी से की थी। पि० ५७] हतार्यसवयवा-इस प्रकार मेरे सभी अवयव कृतकृत्य हुए । न च स्तम्- स्वामी के भस्म कि स्वर्णम् ? चारित्र्यम्; को निकपो ? विपदेका (व्याख्या) १५५ हो जाने पर, आर्यपुत्र से रहित होकर मैं रति की भांति निरर्थक प्रलाप नहीं कर सकती। अतिशीतलः । अनल:- पति-वियोग के इस शोकानल से, जिसका इन्धन अक्षय स्नेह है, यह अनल (अन्ति) अतिशीतल है। दुःख · भवति दुःख से दग्ध व्यक्तियों की समृद्धि (भूति) अशुभ, अभि- शप्त और निरुपयोगी होती है । भूति का अर्थ भस्म भी होता है । यज्ञ की भस्म के अतिरिक्त सव राख अमगल होती है। 'भूतिस्मनि सम्पदि' इत्यमरः । विश्वानां - वपुषा- इस लोक में मैं विववाओं के यश से रहना चाहती हूँ, न कि शरीर से । विववाओ का यश उनका सती हो जाना है । पुनः कवर्थनीयास्मि-मेरे (सती होने के) मनोरथ के प्रति- कूल होकेर पुझे फिर क्लेश न पहुंचाना ! फदर्थनीर-कदर्य (नामधातु)+ यनीय । कुत्सितः अर्थः कदर्थः । ससम्भनम् ---सम्भमेण देगेन सहितं यया स्यात्तथा। उभपकर०.-- उभयकराभ्यां विधृतं वपु. यस्याः, माता का शरीर अपने दोनों हाथों से पकड़कर । दुनिवारतां । सनववार्य---माता का शोक रोकना अत्यन्त कठिन है, यह सोचकर। कुल · क्रियाम् -कुलागनाओं के लिए वही क्रिया (सती हो जाना) श्रेयस्कर है, ऐसा मानकर । अभिनन्दति रूपम् --स्नेह से कातर होने पर भी कुलीन व्यक्ति देश और काा के अनुरूप आचरण करता है । बाण के अनुसार, इसी कारण हर्ष ने अपनी माता का सती होना स्वीकार कर लिया। पौरा - दिग्लि:- नगर-निवासियों के अन्दत से भरी दिशाओ ने जैसे इसे रोकना चाहा । सरस्वती-इस नदी के तट पर पंजाद के करनाल जिले का चानेसर (स्थानीयर) नगर अवस्थित है। यह नदी आगे नेगिस्तान में जाकर लुप्त हो जाती है । स्त्री - पात:---स्वभाव के अनुक्न कातर दृष्टि- पातो से (अग्नि की पूजा की) । प्रविकसित पुजः-जो विकसित लाल कमलो के समूह जान पड़ते थे। भानुमन्तनिव मूतिः ऐचवी- जैसे चन्द्रमा का आकार (अमावस्या के दिन सूर्य में प्रवेश करता है।
सस्कृत-गद्य-वीयो m चित्रभानु का अर्थ मूर्य और अग्नि दोनो है। इतरोऽपि–इसका सकेन हर्ष की ओर है। स्वल्पा वृत्तिम्- -- स्वल्प अवशेप यस्या सा शेपा प्राणवृत्ति , यस्य तम्, जिनमे थोडीही प्रारण-शक्ति बची थी। परिवर्त्य मानतारम---(१) जिनको आँखो को पुतलियां घूम रही थी (जनयितारम् के साथ), (२) जो तारो को घुमाता है (तारकराजम् के साथ )| अस्तम् अभिलपतम्- (१) मृत्यु को इच्छावाले, (२) अस्त होने की इच्छावाले । असह्य द्रुत असह्य शोक मे आधिक्य से अभिभूत । त्याजित स्नेहेन धैर्यम्-स्नेह ने उनसे मारा धीरज छुडवा दिया, स्नेह के वश हो वह धैर्य त्याग वैठे । [पृ० ५८] साल लालितो-सारे उद्धत राजागे की मस्नकम्पी माला मे दोभित । विमुक्नाराव -विमुन आराव विलापशब्द येन । उपदध्यमानष्टि --~-उपरोपवती दृष्टि यस्य, जिनकी दृष्टि झपकी जा रही थी। अवि श्रवण -अविरतादितगन्देन आभिती ववरणो यस्य, जिनके कानो में (हां के) लगातार रोने का शन्द पढने ने। प्रत्यमि- शाय-~-पहचान लिया। मवद् सत्वा-नाप-जमेपुग्प अधीर नहीं होते। अविद्यमान महासत्व येपा ते अमहासत्त्वा । महा वोजिता-लोगों का पहला महारा मनोरत (मनस्विता या धैर्य) है, दूसरा राजन (लोक या ससार महापर्यशाली के आश्रय से ठहरता है, राजा या यश तो वाद की पौन है)। लोग किमी ग महारा पहले यह देकर लेते है कि वह धर्यवान् है या नहीं, उमा राजवश मे मम्बन्धित होना गौण वस्तु है । राजवोटिता=राजा वयिना । सर्वातिशयाथित - मभी गुणो के आश्रय- स्यान । क्व वदो क्र का प्रयोग महान् अन्तर या विरोध दिसाने के लिए दिया जाता है, वहां जाप मनम्बियो (धारो) में श्रेष्ठ, सभी गुणो में माराय और वहाँ यह पपराहट | कुल करणमिव —'कुल-प्रदीप हो', एसा रह्ना तुम्ह द्योटा बनाता है, क्योंकि तुम मूर्य के ममान तेजस्वी हो। प्रदीप-(१) दीपक, (२) भूषण। पुरष निन्देव-'तुम पुग्पो में - - 1 कि स्वर्णम् ? चारित्र्यम्; को निकषो ? विपरेका (व्याख्या) १५७ सिंह हो', यह कहना तुम्हारी निन्दा है, क्योंकि तुमने तो शूरता और प्रखर प्रज्ञा से अपना पराक्रम वढ़ाया है (जवकि सिह के पास केवल बारीरिक शक्ति होती है); शीर्यण पटुप्रज्ञया च उपट्ट हितः अभिवधित: पराक्रमः यस्य ! क्षितिः' 'पुनरपतमिव-~~-'यह पृथ्वी तुम्हारी है', यह पुन- रूक्ति है, क्योंकि तुम्हारे लक्षण ही तुम्हारा चक्रवर्ती होना बता रह हैं; लक्षणैः आख्यांतं चक्रवर्तिपद यस्य ।गृह्य "विपरीतीमव-“लक्ष्मी को ग्रह करो', यह उलटी वात कहना है, क्योंकि स्वयं लक्ष्मी तुम्हे ग्रहण करें चुकी है। ऐसा ही भाव ‘कुमारसम्भव' के पांचवें सर्ग मे आया है.~~~'लभेत वा प्रार्थयिता न वा श्रिय श्रिया दुराप. कथमीप्सितो भवेत् ।' अध्यास्य.. अपुष्कलमिव ----'इस लोक को स्वीकार करो,' यहं तुम्हारे लिए पर्याप्त, नहीं है, क्योंकि तुम दोनों लोक (इहलोक और परलोक) जीतने के इच्छुक हो। अपुष्कलम् --अपर्याप्त । अध्यास्यताम्---अधि+आस्, लोट्, प्रथमपुरुप एकवचन, कर्मवाच्य । स्थी । योगमिव-'कोश स्वीकार करो, यह कहना बेकार है; क्योकि तुम चन्द्र-किरण-सदृश निर्मल यश का सचर्य करने में दत्तचित्त हो, शशिनः कराणां निकरः समूहः तद्वत् निर्मल यशः तस्य संचये एक: केवल: अभिनिवेशः. संकल्पः अस्ति अस्य इति वेशिनः । आत्मी मिव-'राजाओं के समूह को अपनाओ', यह कहना निरर्थक (गतार्थम्) है, क्योंकि तुमने अपने गुणों से संसार-भर को अपना बना लिया है । राजकम् = राज्ञा समूहः । उह्मतां नियोगमिव-~-'राज्य-भार वहन करो, यह अनुचित आदेश है, क्योकि तुम तीनों लोकों का भार वहन करने के योग्य हो। प्रजा ' मनु- वादः इव-'प्रजा का पालन करो,' यह पुनरुक्ति (अनुवाद) ही है, क्योकि तुम अपनी लम्बी भुजाओं से दिशाओं की रक्षा कर रहे हो; दीर्धाभ्यां दोर्दण्डाभ्यां अर्गलितानि वद्धानि दिङ्मुखानि येन । 'अनुवाद' पूर्वमीमांसा का पारिभाषिक शब्द है ; जर्वे किसी वैदिक विधि का पुनःकथेन, स्पष्टी- करण या उदाहरण दिया जाता है, तब उसे 'अनुवाद' कहते हैं-'विधि विहितस्य वचनमनुवादः।' परिजनः मिव परिजनों (अनुचरों) का , सस्कृतनाव-धीयो पालन करो, यह कला लोक्पाल-जैसे तुम्हारे लिए थानुपङ्गिक ही है। आनुपङ्गकिम्-अनुपङ्गात् आगत ठ । भानुपगिक उसे कहते है, जो किसी कार्य के बाद स्वत ही घटित होता है, जब हर्प लोक्पाल की तरह थे, समस्त समार के पालक थे, तर इससे यह स्वत सिद्ध है कि वह अपने स्वजनों सेवकों को भी रक्षा करेंगे। सातत्यो दिश्यते-'निरन्तर शस्त्राभ्यास करो', ऐसा आदेश उसे क्या दिया जाए, जिसकी वाह धनुष की होरी के पर्पण से काली पड गई है, धनुर्गुणस्य विणं तस्य क्लक तेन काकृत प्रकोष्ठ स्तान यस्य । निगृहातां वाणी-'चपलता को वश में करो (रोग)', मेरा यह कला उसके लिए बसमय की बात है, जिससे छो.ीवायु मे ही इन्द्रिय-निग्रह कर लिया है । निरव दिना- 'शत्रुओ को समाप्त कर दो,' यह तुम्हारे सहज तेज के लिए (तुम-जैसे स्व- भाव रो तेजस्वी व्यक्ति के लिए) सोचने की बात है, अर्थात् यह समस्या तो तुम स्वर अपने स्वाभाविक तेज मे हल कर दोगे, मुझे इसके लिए तुम्हे प्रेरित करने की कोई यावश्यकता नहीं। इस वाक्य का यह अर्थ भी हो सकता है अपने शत्रुओ को समाप्त कर देने के लिए तुम्हें कहना तुम्हारे तेज पर सन्देह (चिन्ता) वरना है । अपुनरामीलनाय-फिर कभी न खोलने के लिए; पुन अप्रबोधनाय। निनिमील (नि+मौल, लिट्)-न्यमीलपत् । पूपापि-मूर्य भी, पि' का भाव यह है कि इधर राजा ने प्राण छोडे तो उपर सूर्य भी निस्तेज हो गए । यस्मिन्नेवान्तरे-इसी बीच । मायुपेव तेजसा-तेज-स्पी आयु से । व्ययुज्यत-वियुक्त हो गये, वि+युज्, मद, प्रथमपुरुष एकवचन, कर्मवाच्य । ततश्च समभवत्-राजा का जीवन अपहरण करने में उनका जो अपराध हुआ, उससे लजाते हुए उन्होंने यपना मुंह नीचे लटका लिया (अर्थात् वह पश्चिम मे नीचे उतर पाए, अस्तप्राय हो गए)। दिन में सूर्य के अधिकार-समय मै-- राजा के मरने से सूर्य भी अपराधी हुए। [१० ५९] भूपाल प्रदे--- गर-मृत्यु की चौवाग्नि से मानो मौतर-ही-मीतर जलते हुए वह लात हो गए, भूपालस्प अमाव मरण तेन शोक स एव विसी यग्नि तेन ।
महो प्रभावस्तपसाम् ! (व्याख्या) १५६ जो चीज अग्नि में गरम की जाती है वह भी लाल हो जाती है । मन्द 'दिवः-मानो अप्रिय प्रश्न पूछने के लिए लोकाचार का अनु- सरण करते हुए वह आकाश से धीरे-धीरे उतरे । 'अप्रिय प्रश्न कुशल- प्रश्न का उबटा है, मृत्यु-सम्बन्धी प्रश्न । दित्सु ससर्प-~~-मानो राजा को जलांजलि देने की इच्छा से वह पश्चिम सागर (अपरजलनिधि) के समीप पहुँचे । दित्सुः-दत्तुम् इच्छु । सद्य माधत्त--जलांजलि देते, ही उनके सहस्र 'कर' (हाय, किरण) मानो शोकाग्नि से जलकर लाल-से हो गए। अहो प्रभावस्तपसाम् ! गोदावरो-तट पर स्थित महर्षि जाबालि के आश्रम के इस बारण-कृत भव्य वर्णन को पढ़कर मन जैसे शान्ति और संयम के जल से प्रक्षालित हो जाता है। कुछ अशों में कवि-कल्पना-प्रसूत होने पर भी इस वर्णन में प्राचीन यारण्यक जीयन के वातावरण को पुनः मूर्त रूप देने का सच्चा प्रयत्न पायो जाता है। जिस प्रकार 'हर्पचरित' में वाण ने बौद्ध पण्डित दिवाकर मित्र के आश्रम का भव्य चित्र खींचा है, वैसे ही वैदिक परम्पराओं के पुजीभूत आदर्श के रूप में जावालि के दिव्य आश्रम की भी कल्पना की गई है । डा. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार, जावालि के उदास चित्रण में उन सब उत्तम गुणो एवं चारित्रिक पूर्णताओं का उल्लेख हो गया है, जो गुप्त-युग में बोधिसत्त्व-तुल्य महापुरुषों के आदर्श चरित्र की विशेषताएँ मानी जाती थीं। : इस कथांश का वक्ता वैशम्पायन शुक है, जो शूद्रक की राजसमा में अपनी बापपीती सुनाता है । [१० ५६] अनितदूरम् इव गत्वा-मुछ ही दूर जाकर । दिशि दिशि- हर एक दिशा में । संनिहितकुसुमफलैः , १६० सस्कृत-गद्य-वीयो (स्थलीभि का विरोपण)—सनिहितानि निकटस्यानि कुसुमानि फलानि च येषात ,अर्थात् फल-फूलो से लदी। आरण्यस्यलोमि -वन-भूमियो से। उपशोभितप्रान्तम्-जिसका आसपास का प्रदेश (प्रान्त) सुशोभित था। यह और बाद के समस्त द्वितीय एकवचन के पद 'आयमम्' के विशेषण हैं । आगृहीत मट्टि (मुनिभि का विशेपण)-जिन्होंने (हाय मे) समिधाएं, दर्भ (कुश), पुष्प और मृत्तिका (मृद्) ले रखी थी। अध्ययन गर्न अध्ययनेन वेदपारायणेन मुखरा वाचाला ये शिप्या ते अनुगत युक्त, जिनके साथ वेदो का घोर करते हुए शिप्य चल रहे थे । अन्योपकण्ठम् अगून्य अविरहित परिपूर्ण उपक्ण्ठ निकटदेश यस्य तम् । भाव यह है कि वहाँ समिया, दर्भ, पुन और मृत्तिका हाय मे लिये वेदपाठी शिष्यो के साय मुनिगण चारो आर प्रवेश कर रहे थे। अनवरत कुलम् ---अन. वरत श्रवणेन निरन्तराक्णनेन गृहीता शिक्षा प्राप्ता ये वषट्कारा हवि . समर्पणमन्त्रा ते तदम्यासरतं वाचाल शब्दायमान शुककुल कीरगण यस्मिन् स त तादृशम्, अर्थात् वपट्वार (हवि-मन्त्रो) को निरन्तर सुनते रहने के कारण मुग्ग उन्ह सीख गए ये (गृहीत) और उन्हें रट रहे थे। यज्ञ मे वपट्कार का उच्चारण वहुत उच्च स्वर में किया जाता है, जैसा कि इस पाणिनि-सूत्र में कहा गया है-'उच्चस्तरा वा वपट्कार' । अनेक मुब्रह्मण्यम्-अनेकाभि मारिवाभि पोतपादाभि उ प्यमाणम् उच्च स्वरेण उच्चायमारण सुब्रह्मण्य वेद यत्र तम्, जहाँ सारिकाएँ वेद-मन्त्र का उद्घोष (उच्च स्वर से उच्चारण) कर रही थी । अरण्य पिण्डम् -- अरण्यकुक्कुट उपभुज्यमान भक्ष्यमाण देवयज्ञस्य बलिपिण्ड यत्र तम्, जहाँ जगली मुर्गे. वैश्वदेव-वनि के पिण्ड सा रहे थे। परिचित तापसम्- परिचिताना साखामृगाणा वानराणा राष्ट्या हस्ताकपणेने निष्कास्य- माना बहि त्रियमाणा प्रवेश्यमाना अन्त प्रदेश कार्यमाणा च जरन्त वृद्धा नेत्रविहीना तापमा तपोषना यत्र तम्, जहाँ बूढे बोर अन्धे तपस्वी परिचित (सिखाये हुए) बन्दरो द्वारा हाय पक्डकर बाहर-भीतर लाये- ने जाए रहे थे । इम बल्मापितम्-इभक्लभाना हस्तिपोतानाम् अ?- अहो प्रभावस्तपताम् ! (व्यास्या) १६१ पनुक्तानि च तानि पतितानि तैः सरस्वत्याः भुजलताभ्यां विलितः चन्नः शंतवलयः कम्बुकटक: इव मृणालनकल: विसखण्ड: कल्मापित चित्रितम्, जो टन कमल-नालों के टुकड़ों से चित्रित थी, जिन्हें हाथियों के बच्चों ने आदे-नाचे खाकर गिरा दिया था और जो सरस्वती की लता-जैसी भुजाओं से खिसके हुए श्वेत मंत्र-वलय जैसे लग रहे थे। बलय कताई के आभूषण, कड़े। ऋषि फन्दमूलम्-ऋषिजनार्य' मुनिभ्यः एणः हरिण विशाणगितः शृङ्गप्रान्तः उत्खन्य नानानि विविधानि कन्दमूलानि यत्र तम्, जहां ऋषि-मुनियों के लिए हिरन अपने सोंगों की नोक ले नाना प्रकार के कन्द-मूल खोद रहे थे। लम्बु आलवालकन्- अन्ना जलेन पूर्णानि पुष्करपुटानि येषां तः वन- करिभिः बापूर्यमाणानि विटपानांपादपानाम् बालवालकानि बाधारबन्धाः या तम्, जहाँ जंगली हायो कमन-दत के बड़े दोनों में जल भरकर वृक्षों के मालवाल (थाला) सींच रहे थे। उपजातः हुताशनम्---उपजातः नजातः परिचयः संस्तवः येषां तैः क्लापिभिः मयूरैः पलपुटानां पबनेन बायुना संयुष्यमाणः मुनीनां होनस्य हवनस्य हुतादानः वह्निः यन तम्,. जहां हिले हुए मोरों द्वारा अपने पंतों की हवा ते मुनियों की होमान्नि प्रज्वलित की जा रही थी। अद विरोवाभास बलङ्कार द्वारा बालन का वर्णन किया जाता है। सुरनिगन्यम्-सुरनिविलेपनम् बङ्गरागोचित चन्दनादिकं घरति इति नः (नुरमेः गोः विपनं गोमयं यस्यां सा पृथ्वी यत्र) तं तादृशं अपि सततम् आविर्भूतः प्रकग्निः हत्यमगन्धः यस्मात् जो मुरभि-विलेपन (चन्दनादि सुगन्धित द्रव्य, गोवर से लिपी भूमि) मे युक्त होने पर भी होम के धुएं की गन्ध प्रकट करता था। मातङ्ग" पवित्रम्-मातङ्गनेन वाण्डालकुलेन अध्यात्तितम् अपि पवित्रम् इति विरोधः चाण्डालन्य अपवित्रत्वात् परिहारस्तु नातकुल हल्तिकृतम्, जो मातङ्ग कुल (चाण्डालों; हाथियों के समूह) ते बसा होने पर भी पवित्र था। उल्लसित उपद्रवन्—उल्लस्तिम् लवन स्थितं धूमकेतुगतं नयापि प्रशान्ताः उपद्रवाः पत्र इति विरोध; एकस्यापि महतोत्सा- सस्कृत-गध-वीयो तस्य नक्षविगेपस्योदये वा सति उपद्रवशतसम्भवात् विमुन तच्छनोदये, परिहारस्तु धूमकेतु वह्नि , जो मैक्डो धूमकेतुत्रो (पुच्छन तारो, होम की अग्नियों) के उगने पर भी उपद्रव-रहित था। 'अग्न्युत्पाती धूम- केलो' इत्यमर । परिपूर्ण अन्धकारम् --परिपूर्णस्य सम्पूणस्य द्विजपते चन्द्रस्य मण्डलेन सनाश सहितम् अपि सदा सर्वदा सनिह्नि ममीपस्थ तरुगहने दक्षकानने अन्धकार यत्र इति विरोध, परिपूर्णा ज्ञानेन पूर्ण द्विजपतय विप्रा तेपा मण्डलेन सनायम् अपि, इति परिहार , जोपरिपूर्ण द्विजपति-मण्डल (पूरे चन्द्रमा के बिम्ब, ज्ञान से मरे पूरे विप्र-वर्गो)मे युक्त होने पर भी निकटवर्ती पेडो के जगल के बैंधेरे से सदा छाया रहता था । [पृ० ६०] अतिरमणीयम्-अतिमनोहरम् । अपरम् इव वह्मलोकम् -- 'द्वितीय ब्रह्मलोकम् इव इत्यर्थ । यत्र घ मलिनता चरितेप-जहाँ मैलापन (कालौस) अग्निहोन के धुएँ मे दिखाई देता था,(मुनियो के चरित्रोमे नहीं) मुलराण कोपेप- मुंह की भासी सुग्गो में थी, तोप में नहीं । तीक्ष्णता स्यमावेप- नीक्ष्णता बुगाओ के अपमाग में थी, मानव के स्वभाव मे नही । पञ्च- लता मन सु-चचलना केले के पत्ता में थी, (मुनियो के मन में नहीं। चन परक्लत्रेषु-ने-राग (आँखो की लाली) कोयलो में थी, पराई स्त्रियों के लिए चशु-राग (वासना-भरी दृष्टि)नहीं। मेपता क्लहेषु- मेखला-बन्ध (माजी-धारण) उपनयन-जैसे व्रतो मे होता था, ईर्ष्या-जय बलह मे (तलवार वी भूठ) नही (परही जाती थी)। स्तन कामिनीषु-- होम की गौओ के ही यन हुए जाते थे, अनुराग-भरी रमणियो के स्तन नहीं। पक्षपात विवादेषु-पक्षपात (पखाका गिरना) कुक्कुटो मे होता था, वाद-विवाद में पक्षपात नहीं। भ्रान्ति शास्त्रेषु-भ्रम (सख्या- सम्बन्धी) अग्नि की प्रदक्षिणा में होता था,शास्त्र का अर्थ लगाने मे नही । पसु सुष्पासु-वसु देवताओं का गुणगान दिव्य कथाओ मे होता था, तृष्णा-वस (घन की चर्चा मे) नहीं। गणना शरोरेप-गिनती (जप में) रदास-माला की की जाती थी,नश्वर शरीर (सम्मान-भावना) यी नहीं।
अहो प्रभावस्तपसाम् ! (व्याख्या) मुनि 'मृत्युना--मुनियों के बालों का नाश (मुण्डन) यज्ञ-दीक्षा के समय होता था, मृत्यु से मुनि-कुमारों की शरीर-हानि नहीं। रामा "यौवनेन- रामानुराग (राम-सम्बन्धी प्रेम) रामायण में उत्पन्न होता था, यौवन मे (स्त्री-प्रेम) नही । मुख'मानेन-मुख-भंग-विकार (झुर्रियों का पड़ना) • वृद्धावस्था से होता था, धन के घमंड से (मुंह मोड़ना) नहीं। यत्र च महा- भारते शफुनिवधः-जहां शकुनि-वध केवल महाभारत में था, आश्रम में पक्षि-हत्या नही । पुराणे वायुप्रलपितम्-वायुप्रलपित (वायु-द्वारा प्रव- चन) उस नाम के पुराण में था, मुनियों में (उन्माद-रोग) नहीं। वयःपरि- पामेन द्विजपतनम् --द्विज-पत्तन (दांतों का गिरना) बूढी उम्र में होता था, आश्रम में ब्रह्मचारियों का स्खलन नहीं। उपवनचन्दनेषु 'जाड्यम्--- जड़ता(शीतलता)उपवनों के चन्दनों में थी, मुनियों के पास (जाड्य==प्रज्ञा- हीनत्व) नहीं । अग्नीनां भूतिमत्त्वम्----भूति (भस्म) अग्नियों में होती थी, मुनियों में (अमीरी) नहीं । एणकानां 'व्यसनम्---गान सुनने की आसक्ति मृगों की ही थी, मुनियों की नहीं। शिखण्डिनां नृत्यपक्षपातः---नृत्य-पक्षपात (नाचते समय पंखों का गिरना)मोरों में होता था, मुनियों में (नृत्य की अमिरचि) नहीं । भुजङ्गमानां भोगः-भोग (शरीर) सर्पो में था, मुनियों में (बासना-सुख) नहीं। कमोनां श्रीफलामिलाप:-श्रीफल (बिल्व-फल) की इच्छा बन्दरों को होती थी, मुनियों को (लक्ष्मी के फल की) नहीं। मूलानाम् अधोगति:--अधोगति (नीचे फैलना) वृक्षो की जड़ों में थी, - मुनियों में (अध:पतन) नहीं। अन आश्रम में विराजमान ऋषिजावालि का वर्णन किया जाता है। सारे द्वितीयान्त एकवचन पद 'जावालिम्' के विशेषण है । तत्र च तापस" उपविष्टम्-जावालि एक ऐसे लाल अगोक वृक्ष के नीचे छाया में बैठे हुए थे, जिसके आलवाल में तपस्वि-कन्याओं ने पोले ऐपन (पीतपिष्ट से पंचांगुल छापे लगाए थे और गोलाकार होने से जिसकी छाया (अवकाम) बहुत फैली हुई थी।त्ययग "संविभागम् इव कुर्वाणम् स्थिरता से पर्वतों को, गम्भीरता से समुद्रों को, शान्ति से चन्द्रमा को तया स्वच्छता से आकामा १६४ संस्कृत-गध-वीयो को मानो हिस्मा (सविभाग) दे रहे थे। स्वकीयवस्तुन किञ्चित्किञ्चिदा- दाय परेभ्य प्रदाने सविभाग । बनतेयम् पत्यम्-जिस प्रकार गरुड ने अपने प्रभाव से पक्षियों (हिजो) पर स्वामित्व प्राप्त किया था (उपातम् = अजितम्), उसी प्रकार जावालि ने अपने तेज से विप्रो (द्विजो) परआधि- पत्य पाया था । कमला गुरुम् --ब्रह्मा (कमलासन) (ब्रह्मचय आदि चार) आश्रमो के नियता (गुरु-नियामक) हैं, उसी प्रकार वह उस तपोभूमि (आश्रम) के नियन्ता (गुर-आचार्य) थे। जरत् जटाकुलम्--जैसे पुराना (जरत) चन्दन-वृक्ष श्वेत जटा-जैसी सांप की केंचुली से ढका रहता है, वैसे ही वह भी सांप को केंचुली-जैसी धवल जटाओ मे व्याप्त थे। प्रशस्त “कर्णवालम्--जैसे किसी उनम (प्रशस्त) हस्निपति (हाथियो के नायक) के यान और (पूंछ के बाल लटकते रहते है, वैसे ही उनके कानो के बाल (काटे न जाने के कारण) लम्वे थे । बृहस्पति कचम्-जैसे सुराचार्य बृहस्पति ने अपने पुत्र बच. को जन्म से पाल-पोसकर वडा किया था (सधित), वैसे ही उन्होंने भी जन्म से अपने देश (कच) बढ़ा रखे थे। दिवस गुलम्----जैसे दिन का आरम्भ (मुख) उगते हुए सूर्य-मण्डल से दीप्तिमान् (भास्वर) रहता है, वैसे ही उनका मुख-मण्डल भी उदीयमान सूर्य-बिम्ब की तरह प्रकाशः . मान् था। भारत वर्षम् -क्षीग वर्षावाली शरद्-ऋतु की तरह उनके भी वर्ष (मायु) क्षीण हो चले थे । [१० ६१] शन्तनु दलम्-जैसे शन्तनु को भीम (सत्यव्रत) प्रिय थे, वैसे ही उन्हे सत्य का व्रत प्रिय था। अम्बिका निपुणम्-जैसे पार्वती (अम्बिका) का हाप भगवान् शङ्कर की आंख-स्पी (रुद्राक्ष)वलय को प्रण करने में निपुण होता है, वैसे ही उनका हाय भी रद्राक्ष की माला फेरने मे कुशल था। शिशिर सङ्गम्- भीत-ऋतु पे मूर्य थमा उत्तर दिशा से सम्बध (उत्तरा+सङ्ग) स्थापित कर लेते हैं, वैसे ही उन्होंने उत्तरीय वस्त्र (उत्तर+आसङ्ग) धारण कर रखा था। यहया भक्षम्-जैसे वडवानल (समुद्राग्नि) मवंदा केवल पानी (पय ) पोता रहता है, वैसे ही वह भी नित्य दुग्ध 1 अहो प्रभावस्तपसाम् ! (व्याख्या) (पयः)-मात्र पीते थे। शून्य "शरणम्-जैसे किसी जन-शून्य नगर में 'घर-बार (शरणानि= गृहाणि) शोभाहीन (दीन), स्वामि-रहित (अनाथ) और नष्ट-भ्रष्ट (विपन्न-विनष्ट हो जाते हैं, वैसे ही वह दोनों, अनाथों और विपत्तिग्रस्त लोगों के रक्षक (शरण) थे। पशु शरीरम् --जैसे महादेव (पशुपति) का शरीर भस्म से सफेद बने रोओ से व्याप्त रहता है, वैसे ही उनका शरीर भी भस्म-जैसे श्वेत रोओ से व्याप्त था। अथ मुनिविषयक: विचारः। अवलोक्य व अहम् अचिन्तयम्--- महर्षि जाबालि को देखकर वैशम्पायन शुक सोचने लगा । अहो प्रभावः तपसाम्!-अहा, तपस्या का भी कैसा प्रभाव है ! इयमस्य तेजांसि--- इनकी यह तपे हुए सोने के समान उज्ज्वल (अवदात) मूर्ति (स्वरूप), शान्त होते हुए भी, विजली-सी चमचमा रही है, जिसे देखकर आँखों की ज्योति भी हतप्रभ हो जाती है (अर्थात् आँखे चकाचौंध हो जाती हैं)। सततम् गतस्य-निरन्तर उदासीन बनी रहने पर भी (इनकी यह मूर्ति) सर्वप्रथम आनेवाले व्यक्ति में भय उत्पन्न कर देती है, ऐसा है इनका महाप्रभाव । पुण्यानि - दर्शनानिमहामुनियों का नाम लेने से भी पुण्य होता है, फिर दर्शन की तो वात ही क्या ! बहलाज्य तपो- चनम् --धी की आहुति से उठनेवाली प्रचुर धूम-राशि से जिनका आश्रम मलिन हो रहा है, ऐसे भगवान् जावालि के प्रभाव से मानो भय-भीत होकर सूर्य-किरणों का समूह भी तपोवन को दूर से छोड जाता है । एते 'च आशुभुक्षणयः-जिनकी लपटें (शिखा-समूह) हवा से चंचल होकर इकट्ठी हो गई है और इस तरह मानो (आहुति पाने के लिए) हाथ 'पसार रही है, ऐसी होमाग्नियाँ (आशुशुक्षणय ) महपि के प्रेम के कारण मन्त्रों से पवित्र की गई आहुतियों को प्रेमपूर्वक ग्रहण कर रही है। पवनेन लोल: चपलः पुजीकृतः च शिखाकलापः ज्वालासमूहः येषां ते तादृशाः । 'शिखावान् आशुशुक्षणिः' इत्यमरः । एतत्प्रीत्या---एतन्य महर्पिजाबालेः प्रीत्या स्लेहेन । तरलित गन्यवाहः-आश्रम-लताओं के फूलों की तृप्तिकर मुगन्ध (सुरभिपरिमलः) से युक्त यह पवन महर्षि के - सस्कृत-गद्य-वाची ग्शमी वस्त्र-जैसे वल्कल को हिलाकर, मानो डरते-डरते (सराज इव), धीरे-धीरे बहता हुआ, इनके समीप आ रहा है । 'सुरभिर्धारणतर्पण' इत्यमर । तरलित कम्पित दुकूलवत् शोमवसनवत् वन्कल येन स तादृश । प्रायो तेजासि--(सिह, हाथी नादि) महापारियो के भी तेज या बडी कठिनाई मे सामना पिया जा सकता है । महाभूतानाम्-महाजन्तुना मृगपतिगजादीनाम्, पृयिन्यादीना वा । दूरनिनवानि-दुखेन अतिक्रमित मक्यानि । सवतेजस्विनाम् अय अग्रणी - (फिर यह तो) समस्त तेजस्थियो में अग्रगण्य है। प्रवाह करणारसस्य-करणं रम के प्रवाह। सन्तरप०-ससार- सागर तरने के लिए सेतु आधार ०.-क्षमा-स्पीजल के आधार पर - तृष्णा-स्पी लताआ जगल (गहन) को काटने के लिए कुल्हाड़ी। उपदेप्टा-मोक्ष-पय के उपदेशक । अस्तगिरि०–दुष्ट ग्रहो के वस्ता- चल । मूलम्०-याति-स्पी वृक्ष की जड । नानि -बुद्धि-म्पी चम की नाभि (केन्द्र-म्यान) । स्थिति०-धर्म-रूपी ध्वजा को स्थिर रखनेवाले वॉन । स्थितिवश = अवस्थानवेणु । तीर्थम् ---समस्त विद्यानी में प्रवेश (अवतार) के लिए तीर्य । वडवानल -लोम- स्पी समुद्र (को मोवने) के लिए बडवानल । निक्पो०-शास्त्र- मपी रना की मोटी (निवपापल -- उत्त्पपिपिंपरीक्षाप्रम्नर)। दावानल --पिपया मे आसक्ति-म्पा पत्ते (को जलाने) के लिए दावाग्नि । मन प्रोग-पी सप (ये वगीकरण) के लिए मन्त्र । दिवस०--भार (तान)-रूपी उधेरे के लिए सूर्य । अर्गला- -नरक- द्वारो के जगला-बघ (कपाटर करणकीक, दरवाजा बन्द करने की कुडी) । [पृष्ट ६२] वुलनयन०-सदाचारी के कुल-परम्पगगत आयय- गृह (बुलभवा, मूतगृह) । मायतनम् =निरे उनम् । अभूमि ०–जह- वार-वृत्तियों के लिए पात्र । उत्पत्ति -जन्म-म्यान। नैमि उन्माद (मध्यवसाय)-पी चवरे के नेमि (प्रान्न-नाग) । आश्रय - सत्त्वगुण वे जापार । प्रतिपक्ष - कृतियुग के गोश -नियि , -- . अहो प्रभावस्तपसाम् ! (व्याख्या) १६७० भण्डार । क्षेत्रम् -~-सरलता के उत्पत्ति-स्थान । प्रभवः ----पुण्यों के जनक । अदत्ता-~-ईया-दृष-को जिन्होंने (अपने अन्दर) कोई स्थान नहीं दिया है। अरातिः विपत्तेः-विपत्तियों के शत्रु (अराति.) । अस्यानं परिभूतेः-- :-~-अनादर के लिए अनुपयुक्त । अननुकूलो०- अभिमान के लिए प्रतिकूल । असम्मतो दैन्यस्य-शुद्रता या हीनता के सम्मत या इण्ट नहीं । अनायत्तो रोषस्यकोच के अधीन नही। अनायत्तः---अवशगः, अनधीनः । मनभिमुखः सुखानान--सुखो की ओर इन्होने कभी मुख नहीं किया । अनभिमुख:--अनिच्छक । अस्य भगवतः तपोवनम् ---इन्ही भगवान् जावालि के प्रसाद से तपोवन में (प्राणियों की) परस्पर शत्रुता मिट गई है और उनका प- भाव दूर हो गया है । अपगत दूरीभूतः भत्सरः परगुणोत्कर्षासहन यस्मात् तथाविध वर्तते । अहो-~-आश्चर्यम् । हि-क्योकि । अन्न · अनुभवन्ति-~-- यहाँ पशु-पक्षी भी अपनी चिरकालीन पारस्परिक शत्रुता त्यागकर शान्त चित्त से आश्रम में रहने का सुख उठा रहे है। सपाहि--उदाहरणार्थ । भिनय · महिः-यह साप धूप से घबराकर (आतपाहतः) मोर के पंखों में नइं घास के ढेर की तरह निर्भय प्रवेश कर रहा है । शेष द्वितीयान्त पद 'कलापम्' (भोपल) के विशेषण है । विकयोत्पलवनरचनानुसारिणम्- विकच विकसित यद् उत्पलवनं नीलकमलवनं तस्य रचनायाः निर्मितेः अनुफारिणम्, विकसित नीलकमल-वन की सृष्टि का अनुकरण करने वाले । उत्पतच्चारचन्द्र कशतम् ---उत्पनत् ऊर्च गच्छत् चार मनोहर चन्द्रकांत मेचकातं यस्मिन् तम्, ऊपर उठे हुए सैकडों मनोहर चन्द्रा- कार चिह्नौ से अकिंत । हरिणलोचा तिशबलम्-हरिणस्य या लोचन- द्यक्ति: नेत्रकान्ति. तत् शवलं कर्तुरम्, हिरनो के नेत्रों की शोभा की तरह रंग-बिरंगे । अयम् उत्सृज्य सिंहोस्तनम्-~सिह के बच्चो से जिनकी अयाल अभी उगो नहीं है, हिला हुआ यह मृग-छौना अपनी मा को, छोड़कर शेरनी के झरने दूधवाला स्तन पी रहा है। अजातकेसरः-- अनुत्पन्नसः १ एप: मृणाल मृगपतिः- हाथी के बच्चे सिंह को चन्द्र-रश्मि संस्कृत-गद्य-वीयो के समान शुभ्र अयाल को कमल-नाल (मृणाल) समझकर खींच रह हैं और वह मृगपति अपनी जाँखें मूंदकर इस अनुभव का आनन्द उठाना है। मृणालाना बिसाना कलाप ममूहम् आशङ्कन्ते तच्छीला ते द्विरदाना हस्तिना क्लभ पोत आकृष्यमाणम् अवकृप्यमारण शशिवरधवल चन्द्र- किरणवद् विशद मटाभार केसरसमूह आमीलिते निमीलिते लोचने येन तादृश मन् बहु मन्यते । इदमहि फलानि–य वानरगण अपनी म्वा- भाविक चपलता को छोडकर म्नान किये हुए मुनिकुमारों को (भोजन के 'निए) फर लाकर दे रह हैं। एते च न निवारयति करिण -ये हायी 'मद से अन्धे होने पर भी, दया-वा उन भौरो को कान हिलाकर नही उहाले, जो उनके गण्टस्थल पर निश्चन होकर मद-जल पी रहे हैं। किंबहुना-औरतो क्या ! तापसाग्नि भगवत ---भगवान् जावाति के ये छालवाले (वल्बलिन ). फन-मूल-चारी, निश्चेतन वृक्ष भी, तपस्वियों के अग्निहोत्र से निरन्तर उठनी हुई धूमलेखापा के रूप में कृष्ण मृग चर्म या उत्तरीय पहने हुए, मुनियों का व्रत माधते हुए दिखाई देते हैं। तापमाना मुनीना यानि अग्निहोत्राणि नेपा धूमलेग्वाभि दहनवेतन- पक्निभि । उत्सर्पन्तीभि उत्तिष्ठन्तीभि । अनिग मनतम् । उपपादिता विहिता कृष्णाजिनोतरासगस्य कृष्णमारयुगचमरचितीत्तरीयम्य शोभा कान्तिरिय शोभा येषु ते नादृशा । किं पुन फिर मचेतन मागियो की नो बात ही क्या है । ० १४-अतिगहनं तमो यौवनप्रभवम् गजकुमार चद्रापीड को अमात्य भुवनाम द्वारा दिया गया प्रस्तुत उपदेश मानो हर नवयुदक को लक्ष्य करके लिखा गया है और कवि के व्यापक मासारिस अनुभव का मार्मिकम्प मे अभिव्यक्त करता है। यौवन अतिगहनं तमो यौवनप्रभवम् (व्याख्या) १६६ की दुर्बलताओं, लक्ष्मी के मद, धन की अस्थिरता, चाटुकारों की खसा- मद एवं विषय-भोगों के आकर्षण को गद्याचार्य वारणभट्ट ने समीचीन दृष्टान्तों, उपयुक्त उपमाओं, तीखे व्यंग्यों और चुटीले कटाक्षों के साथ अंकित किया है तथा प्रकारान्तर से शील और संयम, आचार-शुद्धि और चारित्रिक स्थिरता का प्रभावशाली उपदेश दिया है । भारतीय आदर्शों और मान्यताओ के अनुरूप रचित यह भव्य उपदेश संस्कृत के गद्य- “साहित्य में वेजोड़ है। [पृ० ६३] निसर्गत:--स्वभावत', स्वभाव से ही । अभानुभधम्---- (आगामी पद तमः के विशेषण हैं)--सूर्यररम्या अपि अनुच्छेद्यम्, जो सूर्य-किरणों से भी नहीं भेदा जा सकता। अरलालोकोच्छेद्यम्--- रत्नानी मणीनां आलोकेन प्रभया उच्छेद्य दूरीकर्तुम् योग्यम्, जो रलौं के प्रकाश से भी दूर नहीं किया जा सकता। अप्रदीपप्रभापनेयम्---न प्रदीपप्रभया दीपालोकेन अपि अपनयं दूरीकरणीयम्, जो दीपक के प्रकाया से भी हटाया नही जा सकता । अतिगहनं तमः यौवनप्रभवम्- दुर्दमनीयं तारुण्यजनितं तमः अज्ञानं विचारशक्त्यावारकम्, युवावस्था में उत्पन्न होनवाले अज्ञान या अविवेक का अंधकार अत्यन्त अभेद्य होता है। समान भाव के लिए देखिए'काव्यादर्श' (२११२७)-'अरत्नालोकसंहार्यमवार्य सूर्यरश्मिभिः । दृष्टिरोधकरो यूनां यौवनप्रभवं तमः ॥' गर्भेश्वरत्वम्- गर्भात प्रभृति गर्भसम्भवात् आरभ्य ईश्वरत्व धनसम्पन्नता, गर्भ अर्थात् जन्म ये ही धन-सम्पत्ति । अभिनवयौवनत्वम्--- नूतनं तारुण्यम्, उठती जवानी। अप्रतिमरूपत्वम्--अनुपम सौन्दर्यम् । अमानुपशक्तित्वम्-अलौकिकसाम- 'यंम् । चकारः समुच्चयार्थः । इति समाप्तौ । महतो इयं खलु अनर्थपरम्परा -~~~-अनर्थकारी वस्तुओं का यह निश्चय ही वड़ा विकट संयोग है । सर्व... आयतनम् ---इनमें में प्रत्येक (वात) सब प्रकार के अविनयों (दुष्कर्मों) का घर है । किमुत समवायः---फिर इन सबके समूह का तो कहना ही क्या ! हितोपदेश' में भी ऐसा ही भाव व्यक्त हुआ है...-'यौवनं धन- सम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता। एकैकमप्यनाय किमु यत्र चतुष्टयम् ।'
सम्कृत-गद्य-वायी - शास्त्र निर्मला अपि-शान्तम् नाम एवं जन नेन यत्वचालन बोधन न मिलाअपगनमला पि, निगत अज्ञानरपमा यम्या नादृशी नि, शास्त्रो (अध्या-स्पी) मल से घृतकर निमन होने पर भी। कालाप्यम, उपयात - मागि पाप्नाति, सदसद्विवेकाक्षमा भवति इमर्य , का(मलिन) हो जाती है, मन् और सन् रा विश खो दनी है । अनु दृष्टि - युवो नी दृष्टि, जपती मफेदी को न छोरते हए भी, सराग (र वाननायुमत) हो जानी है। अनुम्झितपवलता--- न किसान यता पालना लदा यया सा। सरागा--रारोप सह वर्तमाना, राग रखनत्वम् इति विरोध , पक्षे राग विषयामिलाप इति परिहार । अपहरति प्रकृति --युवावस्था में मनुष्य की प्रकृति, जिसमें रजोगुण ने कारण भ्रम हो जाना है (सभी बातें उपटी रागने लगती हैं), मनुष्य गेम्वय दूर बीच ले जाती है, वैसे ही जमे परदर (बाया), नियम पूग पार दाधार उस्ती है, जपा में पड़े सूखे पन पो दूर उद्या ले जाता है। समुद्भूनरजोनाति (प्रकृति और पात्या दोना का दिौ- पण)-(१) समुना समुत्पन्ना रजसा रना गुणेन धानि नम यस्या मा प्रकृति , जिममे रजागुण के आधिवय से दस्तुओका माल ज्ञान होना है । रजोगुण के पतिरेरा में मन वासनामय हो जाता है और विवेक कम हो जाता है। तुलना कीजिए- 'रजो रागात्मकरिस्तिष्णासहसमुद्भवम् , “चोम प्रतिरारम्न वर्मगामाम स्पृहा । रजस्यगानि जायन्ने विदे भरती ।" (२) गमुना रनसा रणूना सम भमरा यम्या सा पापा वानमन', जिनमें पूरा बापर उनी। इन्द्रियहरिण- हारिणी--इन्द्रियाणि वरानि एव हरिणा तेषा हारिगी विभिनी, इन्द्रिय-रूपी भूमो का सुभानेपानी । मगदुरना-दिनागवारी परिणाम- पाली, अरवा अनहीं। उपनोगमगागरा-उपभोग शब्दस्सर्गादि- दिपमोनोग एर मृगरि मरमरीचिका, विषय-भोग-स्पी मृगतृष्णा । मनस-~- जवानी में जात्मा के विकृत (वायत) होने पर मनोमिन-भिन्न विषय-भोग, नास्वादन निये जाने पर, वही पिर अतिमहतं तमो यौवनप्रभवम् (व्याख्या) १७१ मधुर लगते है, जैसे मुंह के कसैला हो जाने पर जल अधिक मीठा लगने लगता है । नाशयति विषयेषु-विषयो मे अत्यन्त आसक्नि मनुष्य को कुमार्ग पर ले जाती है और अन्त मे उसे नष्ट कर देती है, जैसे दिग्भ्रम मनुष्य को गलत रास्ते पर डालकर कष्ट देता है। दिड मोहः--(१) मार्ग-भ्रष्ट हो जाना; (२) दिग्-भ्रम। उन्मार्गप्रवर्तकः---(१) उत्क्रान्त. मार्गात् उन्मार्गः कुपथः तत्र प्रवर्तयति इति लो मनुष्य को बुरे रास्ते ले जाता है अथवा धर्म-पथ से विचलित कर देता ह (अत्यासङ्गः के पक्ष में); (२) उन्मार्गे अपथै प्रवर्तयति इति, गलत (अन्यत्र ले जानेवाले) रास्ते पर लगा देता है (दिङ्मोह के पक्ष मे) । गुरु " अभ्यस्य----गुरुओं के साधे-सरल वाक्य दुप्ट या अयोग्य व्यक्ति के कानों में पड़कर उसे अप्रिय लगत है, जैसे जल, निर्मल होने पर भी, जय कान में भर जाता है, तो पीड़ा पहुंचाता है । अमल---(१) सरल भाववाले (गुरु-वचन); (२) निमल, स्वच्छ (सलिल) । श्रवणत्यतम् ---(१) सुने हुए (गुरु- वचन); (२) कान में भर जानेवाला (जल) । शूलम्-(१) कटुः (२) पीड़ा। अभव्यत्य-भवति इति भव्यः साधुः, सः न भवति इति तस्य असाधो., यद्वा अयोग्यस्य । अपगत गुणाः----जब मन दोप-रहित हो जाता ह तभी उसमें उपदश की हितकारक वाते घुसती है, जैसे साफ को गइ स्फाटेक-णि में ही चन्द्रमा की किरणे (रजनिकरगभस्तयः) प्रवेश कर सकती है । अपगतमले--(१) अपगता मला. संशयविपर्यय- मोहादरूपा, यस्मात् (मन के साथ); (२) अपगत मल. फानुप्यं यस्मात् (स्फत्रि के साथ)। तुलना कीजिए-~'प्रभवति शुचिबिम्बोद- ग्राह मारएन मृदा चय.'; धीरेषु सत्कविवचो लभते विकासम् ।' आगे के वाक्य में गुरूपदेश की भव्यता का रूपकात्मक वर्णन किया गया है । कखिल स्नानन्-गुरु का उपदेश एक ऐमा लान है, जो जन को बिना ही किया जाकर समस्त (अज्ञानजन्य) मल को दूर कर देने की सामर्थ्य खता है । अनु वृद्धत्वम्-गुरूपदेश द्वायन्या की तरह है (वृद्धावस्था अनुभव आदि गुणों को उत्पन्न कर देता है. जिसमें सफेद बालों के १७२ सस्कृत-गद्य-वीयो आ जाने से (शरीर मे) कुरूपता नहीं हाती और मनुष्य (आयु से) बूदा नहीं होता। मनु ने वृद्ध की परिभाषा इस प्रकार की है-'न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलित शिर । यो वै युवाऽप्यधीयानम्त देवा स्थविर विदु ।' अनारोपित करणम् --अनारोपित अकारित मेदस वसाया दोप येन एवभूत गुम्करण स्थूलीकरणम्, गुरु का उपदेश गरीर में मेदसू (चवीं) बढाए बिना ही मनुष्य को भारी कर देता है (महत्त्वपूर्ण वना देता है)। असुवर्ण भरणम् = नास्ति सुवरणम्य विरचन घटना एतादृक् वर्णाभरण वर्णभूपणम् ग्राम्य मुदर च, गुम्पदेश एक गेसा कान का आभूषण है, जो न तो सोने का बना है और न ग्राम्य (गंवार) है, अर्थात् गुर का उपदेश, श्रवण करनेवाले व्यक्ति वा मम्य और शिष्ट बना देता है। अतीत- ज्योति आलोक = यह बिना दीपक या प्रकाश है, अर्थात् गुरु का उप- देश अन्य सब प्रकागो से विलक्षण है, वह अन्त करण मे जलकर प्रकाग करता है और अज्ञानाधारको दूर करता है। न उद्वेगकर प्रजागर यह वह जागरण हैं (क्र्तव्य और धम के प्रति जागरकता है), जो कष्ट नहीं देता। विशेषेण तु राजाम् - ये मब वाने गजालो के लिए विशेष रूप से सुनने योग्य है । अहङ्कार कारिता-अहवार एव दाहज्बर सन्तापकारी ज्वर तेन या मूर्चा नया जन्यकारिता लुप्तमज्ञा, जहवार- स्पी दाहक ज्वर मे हानेवाली मूर्छा ने जिसकी चेतना मिटा दी है। विह्वला-व्याकुल, कनन्य-ज्ञान-यूय । राजप्रकृति -- गजाओं का स्वभाव । अलीका कारीणितीर मिथ्या य अभिमान गर्व आत्म युसारोप वा म एद उन्माद व्यापिविशेष , यहाजलीवाभिमानेन य उन्माद चित्तविभ्रम त कुर्वन्ति एवमीलानि धनानि, धन भूठा अभिमान-रूपी उमाद-रोग (चिन-भ्रम, अविवेक) पैदा करनेवाला होता है । तुलना कीजिए—'मदय न्युद्धना दोपा यम्मादुन्मार्गमाश्रिता । मान- मोऽयमठो व्याघिरमाद दति कीनित ॥ मुथुन । राज्यविपरियारतन्द्रा- प्रदा--राज्यम् एव विष तेन य विकार विकृति तेन वृता या तन्द्रा प्रमीला तत्पदा, राज्यपी विष के प्रभाव में आनेवाती निद्रा (मविवे- भतिगहनं तमो यौवनप्रभवम् (व्याख्या) १७३ किता) देनेवाली। कल्याणाभिनिवेशी-कल्याणे मङ्गले अभिनिवेश. आग्रहः यस्य एव- भूतः त्वम्, कल्याणकारी कार्यों को करने मे कटिवद्ध । चन्द्रापीड़ को इस विशेषण से सम्बोधित कर शुकनास यह संकेत करता है कि वह इस उपदेश को सुनने का अधिकारी है । आलोक्यतु-विचारयतु । शुकनास अव लक्ष्मी के दोषों का वर्णन करता है। [पृष्ठ ६४] दृढगुगल-वृद्ध गाढ़ गुणाः शौर्यादयः, यद्वा 'सधि विग्रहो यानमासनं हूँधमाश्रयः' इति पगुणाः नीतिशास्त्रसम्मताः गुणाः, ते एव पाशा: तैः सन्दानं वन्धनं तेन निप्पन्दीकृता अपि निश्चलीकृता अपि ; रस्सी के फन्दे के मजबूत बन्धन से जकड़ी होने पर भी; अथवा शौर्य, औदार्य, या राजनीति में कथित पड्गुणों आदि से परिश्रमपूर्वक उपार्जित करके स्थायी बनाए जाने पर भी । न अभिजनम् (कुलम्) ईक्षते---ऊँचे कुल का विचार नहीं करता। कुल ऊँचा हो और धनाढ्य भी हो; यह आवश्यक नहीं। न घेदव्यं गणयलि-~-चतुरता को भी कुछ नहीं समझती। चतुर पुरुष भी घन नही प्राप्त कर पाते । त त्यागम् आद्रियते त्याग (दान) के लिए भी अपने मन में आदर नहीं रखती। कंजूस के घर में भी लक्ष्मी देखी जा सकती है। विशेषज्ञताम्-विशेषेण सर्वार्थवेदिताम् । अव कवि उत्प्रेक्षाओं द्वारा लक्ष्मी की अस्थिरता का वर्णन करता है । कमलिनी०- कमलिनीषु संचरण- व्यतिकरेण संचरणयोगेन लग्ना. नलिननालस्य कण्टकाः यस्याः यद्वत्, मानो कमलिनी-वनों में धूमने से इसके पैर में कमल-नाल के कांटे लग गए हों, इसलिए न क्वचित् निर्भरम् आबध्नाति पदम्---कहीं निश्चिन्त होकर पैर नही रखती । पदम् का अर्थ स्थान भी हो सकता है। काँटा लगा होने के कारण वह कहीं बैठने का स्थान निश्चिन्त होकर नहीं बनाती या नहीं बैठ सकती ! यया यथा “उद्वति-ज्यों-ज्यों वह चंचल लक्ष्मी अपना प्रकाश दिखाती (किसी मनुष्य के पास रहती) है, त्यों-त्यों यह काले (बुरे) कामों को ही उत्पन्न करती है, जैसे दीपक की लौ ज्यो- ज्यों जलती है, त्यों-त्यों काजल पैदा करती है । निर्भरम् उपगुट:---- - १७४ सस्कृत-गद्य-वोयी प्रगाढ आलिङ्गन किया हुआ। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसके पास लक्ष्मी सदैव रहती हो । विप्रलब्ध ठगा हुआ । जव मनुष्य को धन मिल जाता है और वह उसका उपभोग करने की सोचता है, तभी वह उससे हाय घो बैठता है। प्रालेख्याता अपि चलति-चित्र-लिखित होने पर भी चलती है। पुस्तकमयी अपि-पुस्तको में केवल लिम्बी होकर भी। इन्द्रजातम् याचरति—जादू रचती है । उत्तीर्ण (उन्+कृ+वत)- पत्थर आदि पर उकेरी हुई। विप्रलभते-~-धोखा देती है। अभिसन्यत्ते- सराय करोति । वञ्चपति=विप्रलमते । देववशेन-दुर्देवेन । परिगृहीता स्वीता । विक्लया -विह्वला , सर्वत हता इन्यर्थ । सविनय गच्छन्ति ---सब प्रकार की बुराइयो के घर बन जाते हैं । अविनयानाम्-दुर्बुद्धीनाम् । दाक्षिण्य प्रक्षाल्यते --- उनकी उदारता नष्ट कर दी जाती है । दक्षिणस्य भाव दाक्षिण्यम् । 'दक्षिण सरलोदार परच्छन्दानुवर्तिपु' इति शाश्वत । अपहियते-हर ली जाती है । उत्सायन्ते-दूरीरियन्ते । श्रमवशचपलाभि (यह और आगे के दो तृतीयान्त पद 'सम्पद्भि' के विशेषण हैं)--श्रमवमेन प्रयासा- धिक्येन शिथिल श्लय अदृढ शकुने मयूरस्य अन्यस्य वा पक्षिविपस्य य गल कण्ठ तस्य यत्पुट तद्वत् चपनाभि चञ्चलाभि , अधिक परिश्रम करने के कारण यो हुए मोर आदि पक्षियो के (हाँपते) गले के समान घचल । मयूरम्य कण्ठ थमवशेन अत्यन्त चाल म्यात् इति तदुपमानम् । खद्योतो मनोहराभि यद्योत ज्योतिरिङ्गण तस्य य उन्मेप अवभाप्त तद्वत् मुहूर्त क्षण मनोहराभि चित्तहारिणीभि , जुगनू की चमक की तरह क्षण-मर मनोहर लगनेवाली । मनस्विजनहिताभि-मनस्विजना पण्डिन- लोका तै गर्हिताभि निन्दिताभि , बुद्धिमानो द्वारा निन्दित । प्रलोम्य- माना -लोम प्राप्यमाणा , लुब्ध दिए जाकर । रागावेशेन वाध्यमाना तीव्र इच्छाओ से पीडित होकर । आसन्नमृत्यद इ०-उन लोगों को तरह जिनकी मृत्यु समीप ही है, वे स्वजनो को भी नहीं पहचानते । नामिदानन्ति-नोपलक्षयन्ति । पापेन इव माध्मातमूतंय (स्थूलदेहा)- अतिगहनं तमो यौवनप्रभवम् (व्याख्या) मानों पाप से मोटे होते जाते हैं । व्यसन · उपगता:-व्वसनानां छूता- दीनां शतं तस्य सख्यातां मित्रताम् उपगता प्राप्ता , मैकड़ों व्यसनों (बुरी बादतो) से उनकी मित्रता हो जाती है। वल्मीक विन्दवः इव वावियों के ऊपर उगनेवाली घास के अग्रंभाग में स्थित जल-करणों के समान । राजाओ के दोष गिनाने के बाद अब श्रीमन्तो के दोप गिनाए जन रहे हैं । वाक्य इस प्रकार है-अपरे तु धूर्त. स्तुतिभिः प्रतार्यमाणा सर्वजनस्य उपहास्यताम् उपयान्ति । स्थानिष्पादनपरैः- :-~~-अपना स्वार्थ सिद्ध करनेवाले; परैः तत्परैः। आगे के पद 'धूर्त.' के विशेपरण है । धनपिशितग्रासगृध्र: धनं द्रव्य तदेव पिशितं मासं तस्य ग्रासे ग्रहणे गृघ्न : दूरदृग्भिः यथा तथा द्रव्यार्जनपरैः इत्यर्थः, धन-रूपी मांस को खाने के लिए गीध के समान (लोलुप) आस्याननलिनीबकैः---आस्थानां राजसभा तदेव नलिनी कमलिनी तस्यां वकः इव स्थितः, राजसभा-रूपी सरोवर में खड़े हुए बगुलों के समान । धूतं विनोद इति दोषान् अपि गुणपक्षम् अध्यारोपर्याङ्कः-~-अर्थात् ये धूर्त लोग धनबालो को समझाते है कि जुला तो एक प्रकार का मनोरंजन है, पाप नहीं; शराब पीना विलास है, लोपर- वाही (प्रमत्तता) साहस है, बड़ों की आज्ञा का उल्लघन करना रवतन्त्रता है, अपनी इच्छानुसार कार्य करना प्रभुता का सूचक है, विना सोचे हुए ही शीघ्र काम करना उत्साह है, इस तरह दोपो को भी गुण बनाते है । अपरप्रयत्वम्-~-परपणेयत्वं परवशता तद्राहित्य स्वातन्त्र्यम् इत्यर्थः । {पृ० ६५] प्रतारणकुशलः- :-~~-प्रतारणा वञ्चना तत्र कुशः अभिन्नैः । प्रारब्ध "भावा:-प्रारब्धाः याः दिव्योचिताः देवजनयोग्या: चेष्टाः क्रियाः ताभिः अनुभाव. माहात्म्य येषां ते तया, बड़ो की चेष्टाओं का और उनके वहप्पन का मिथ्यानुकरण करनेवाले । उपहास्यताम् उपयान्ति---(प्राप्नु- --सब लोगों के उपहास के पान बनते हैं। दर्शन गणयन्ति-~- दर्शन देने को ही कृपा समझते हैं ; लोकानां दर्शनप्रदान स्वात्मप्रकटनम् अनु- ग्रह प्रसादं गणयन्ति मन्यन्ते । दृष्टि · स्थापयन्ति-देख-भर लेने को उपकार कर लेना मान लेते है । स्पर्शम् आकलयन्ति-अपने स्पर्श को वन्ति) .
१५६ सस्कृत-गद्य-दीयो ही पवित्र करनेवाला मान लेते है (आकलयन्ति=विचारयन्ति) मिथ्या-, माहात्म्यमनिर्भरा-मिथ्या वृया यो माहात्म्यगर्व माहात्म्याभिमान- तन निभरा मृता, अपने झूठे बहप्पन के अभिमान से भरे हुए ।मम्यु- तिष्ठन्ति-उत्थान कुवन्ति । जरा उपदेशम् - जरा वार्द्धवय तस्या- वक्तव्य विकलता तेन प्रलपित जल्पितम्, वृद्धो के उपदेश को बुडापे में विकत हुइ बुद्धि का प्रलाप' (बकवास) समझते हैं । आत्म देशाप- मचिवा की मन्त्रणा को अपनी निजी बुद्धि की हारमानकर उससे ईर्ष्या परत है । 'दुहप्यार्थाना य प्रति कोप' सूत्र के अनुसार 'असूयन्ति' के याग म 'सचिवापदश' में चतुर्थी हुई है। पावें कुवन्ति-बगल मे बैठा लते हैं । सवषयान्त-वृद्धि प्रापयन्ति। माप्तताम् आपदयन्ति-शिष्टता प्रतिपादयन्ति, उसे शिष्टता को कोटि प्रदान करते हैं। उपरचिताञ्जलि हाय जाडकर । आपदवतम्-~स्वामी, इष्टदेव। विगतान्यकर्तव्य --अन्य क्तव्या की उपेक्षा करक । माहात्म्यम् उद्धावति-उसके बढप्पन को चढाता है। एवप्राये-अधिकतर इस प्रकार के। राज्यतन्त्रे-राज्य-व्यवहार. मा महामोहकारिण--अत्यन्त मोह उत्पन्न करनेवाले। न उपालम्पसे- मित्रो द्वारा तुम्ह उलाहना न दिया जाए । विट. असदाचरणकारिभि । न अवलुप्यरो सेवकसक कही ऐसा न हो कि सेवक-रूपी भेडियो द्वारा तुम्हारा अनिष्ट कर दिया जाए। न प्रलोम्पसे-सुन्ध न किए जाओ। थानता–सुदरी। न उन्मत्तीक्रियसे-उन्मत्त न बना दिए जाओ। न माक्षिप्यसे-न प्रेयमे, वही विषय-भोग तुम्हें कुमार्ग पर न ले पाये। न विकृप्यसे-आकृप्यमे, वश मे न कर लिए जाओ । अपहियसे-परि-- त्यज्यसे, कही सुख तुमने मुंह न मोड लें। तरलहृदयम्-चचल-चित । मप्रतियुद्धम्वोधरहितम् । मदपन्ति–समद दुर्वन्ति, नशे मे कर देते. हैं । अभिजातम्-कुलीनम् । दुदिनीता-अपगतविनया इत्यर्थ । सती- करोति-सन्मार्गान् स्वलना प्रापयति, पथभ्रष्ट कर देती है । कुल धुरम-कुल-परम्परा से प्राप्त उस उत्तरदायित्व का वहन करो, प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणो वै धर्मः (व्याख्या) जिसे तुम्हारे पूर्वजो ने भी उठाया है। अवनमय-नम्राणि कुरु, झुका दो। - १५-प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणो के धर्मः धर्म के सम्बन्ध में साधारण जनता का मन काफी उलझा रहता' है । इस लोक को सुधारें या परलोक को, यह गुत्थी है जिसे जितना सुल- शाओ, उतना उलझती जाती है। पर वास्तव में इस गाँठ को खोलने का' बहुत सरल है। वह ढंग है वेदान्त । वेदान्त की दृष्टि से ही श्री गङ्कराचार्य (७८८-८२० ई०) ने श्रीकृष्ण के गीतोक्त उपदेश की व्याख्या की है, जिसके अनुसार धर्म और कुछ नहीं, पूर्ण निःस्वार्थ भाव मे तथा ईश्वरार्पण बुद्धि से अपने कर्तव्य का पालन-मात्र है । सः - वेदोक्तम् --- प्रजापति ब्रह्मा ने इस जगत् की सृष्टि की और उस सृष्टि को स्थिर रखने के प्रयोजन से (स्थिति चिकी'.) सर्वप्रथम मरीचि आदि मुनियों को उत्पन्न किया तथा उन्हें वेदों में प्रतिपादित प्रवृत्ति- रुप धर्म का उपदेश दिया। चिकीर्षुः (कृन-सन् +-उ)= विधित्सुः । मायामास (उपदिदेश)--ग्रह, +रिणच्, लिट्, प्रथमपुरुष एकवचन । ततः साहयामास-मरीचि आदि मुनियों की सृष्टि कर चुकने के अनन्तर भगवान् ने पुनः सनक, सनन्दन आदि को उत्पन्न किया और उन्हे'. जान तथा वैराग्य आदि लक्षणों से युक्त निवृत्ति-रूप धर्म में दीक्षित किया। सत्र एयः "हेतुः--सांसारिक जीवन की स्थिति, अर्थात् प्राणि- मात्र को लौकिक प्रगति (अभ्युदय) एवं पारलौकिक सद्गति (निःश्रेयस), धर्म के इन दो रूपों (प्रवृत्ति और निवृत्ति) में से प्रवृत्ति (तब एकः) पर आधित है । यः सः धर्मः अनुष्ठीयमानः-चारों वर्ण तथा चारों आश्रम अपने-अपने श्रेय की इच्छा से इसी प्रवृत्ति-रूप धर्म का अनुसरण करते हैं ।
सस्कृत-गध-दीयो जाए, अनुष्ठीयमान (क्रियमाण )-अनु+स्था+ (क्मवाच्ये) य+शानन् । दोघेण अधर्म-(यह प्रवृत्तिमयी वर्णाश्रय-व्यवस्था) बहुत युगों तर यथावत् चलती रही, किन्तु बाद में काम की प्रवृत्ति के बढ़ जाने से धीरे- घीरे लोगों का विज्ञान तथा विवेक नष्ट होता गया (हीयमाने) और इस प्रकार धम पर अधर्म हावी हो गया--अधर्म का ही वोलवाला हा गया । हीयमान हेतुकेन-हीयमानयो क्षीयमाणयो विवेकविज्ञानयो हेतुकेन हानी हेतुभूतेन (अधर्मण)। जगत सम्बभूव तव जाकर सृष्टि के पालक प भगवान् विष्णु अर्थात् नारायण को चिता हुई कि विस प्रकार इस स्थिति को सम्हाला जाए (स्थिति परिपिपालयिपु), किम प्रकार मृष्टि के मूल तत्त्व विमुद्ध (मोम) ब्रह्म की रक्षा की विस प्रकार ब्राह्मण-धर्म को सुरक्षित रखा जाए ?, यह मोचकर वह वमुदेव ये यश से देवी के गर्भ मे भगवान् कृष्ण के रूप में जन्मे । परिपिपाल- यिषु -परि+पाल्+णि+सन्+उ । ब्राह्मणत्वस्य भेदानाम्--- बाहरण-धर्म की रक्षा ही सच्चे अर्थों मे वैदिक धर्म की रक्षा है, क्योकि सम्पूर्ण वर्णाश्रम-व्यवस्था एक ब्राह्मण-वरां की शुद्धता पर ही आश्रित है । सच भगवान् सम्पन्न --~-भगवान् तो सदा ही अपनी प्रकृति के द्वारा ज्ञान, ऐश्वर्य, गक्नि, वल, वीयं, तेज आदि मे सम्पन हैं । निगुणा वशीकृत्य-सी उन्होंने सत्त्व-रज-तमोमयी अपनी स्वभाव-मिद्ध (मूल) प्रकृति (वैपावी मायाम्) को अपना साधन बनाया (वशीकृत्य) । यो लभ्यते-भगवान् तो म्वभाव से ही अजन्मा, अपरिवर्तनशील (अव्यय), प्रारिण-मात्र के स्वामी हैं, सदा-सर्वदा अनासक्त (शुद्ध) चित्म्वरूप (द) तथा निर्लिप्त (मुक्त) हैं, फिर भी वह अपनी देवी माया से शरीर धारण करते हैं (देहान् जान), वयो' स्पष्ट है (लक्ष्यते), लोक-प्रेम के वशीभूत होकर । स्वप्रयोजनाभावेऽपि इसमे उनका अपना कोई म्वार्य नही था। भूतानुजिपक्षया-भूतानुग्रहेच्छया, उनका हृदय तो प्राणि-मात्र के लिए एक्-मा पसीज उठा था। जिपक्षा (प्रह- सन्+या)--ग्रहीतुम् इच्टा । वैदिक उपदिदेश-उब उन्हनि ३ प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणो व धर्मः (व्याख्या) १७६ कुरुक्षेत्र को रण-भूमि में शोक-मोह के महासागर में डूबे अर्जुन के प्रति इस प्रवृत्ति-निवृत्ति-रूपवैदिक धर्मका उपदेश दिया था। गुणाधिक: गमिष्यति इति--उन्होंने सोचा कि जब (अर्जुन-सरीखे) गुणी जन इस धर्म को अपनाकर इसे जीवन में उतारेंगे (अनुष्ठीयमानः), तब स्वभावतः इससे धर्म का प्रचार (प्रचय) स्वयमेव होता चलेगा। उपनिबन्ध-उप-+ वि+वन्द, लिट्, प्रथमपुरुष एकवचन । निःश्रेयसं भवति---(यदि मनुष्य के लौकिक अभ्युदय का रास्ता प्रहत्ति है, तो) पारलौकिक कल्याण (निःश्रेयस) का मार्ग निवृत्ति है-- निवृत्ति अर्थात् सब प्रकार के कर्मों में प्रवृत्ति का सर्वथा त्याग (संन्यास) करने से उपलब्ध हुवा मात्म-बोध (आत्म-शान) । तथा इमम् एव उक्तम्-~-धर्म के इसी स्वरूप को हम गीता का धर्म कह सकते हैं, और जैसा कि स्वयं भगवान् ने 'अनुगीता' में कहा है--[पृ० ६७] सहि वेदनम्---आत्मबोध ही धर्म का अपने-आपमें पूर्ण लक्षण है, इसीके द्वारा बाह्मी स्थिति (ब्रह्मणः पदवेदनम्, ब्रह्मपदस्य वेदनम् आप्तिः उपलब्धिः) को प्राप्त किया जाता है । किं च इति----'अनुगीता' में ही पुनः कहा गया है कि जो पुरुष संसार से निरासक्त होकर (किञ्चित् अचिन्तयन्) गौनपूर्वक एक ही आसन से (अन्तर्मुख हो) बैठ जाता है, उस पर धार्मिक-अधार्मिक, शुभ-अशुभ आदि विशेषण लागू नहीं होते। ज्ञानं संन्यासलक्षणम्--(संन्यास का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य निठल्ला हो- कर बैठ जाए), आत्म-बोध की परम स्थिति का हो दूसरा नाम संन्यास है । इह अपि । व्रज-गीता में भी उपदेश के अन्त में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं यदि कल्याण चाहते हो तो (विविध) धर्मों के पचड़े को छोड़ मेरी शरण में या जाओ। मम्युदयार्थः वजितः- (निःश्रेयस एवं निवृत्ति के बारे में हम कह चुके) अब अभ्युदय एवं प्रवृत्ति के विषय में कहा जाता है। सामान्यतः वम्युदय अयवा प्रवृत्ति का मार्ग वश्रिम-व्यवस्था लिए विहित है । यही नहीं, इससे मनुष्य देवत्व भी प्राप्त कर सकता है। इस १८० सस्कृत-गद्य-वायी पर भी हर काय यदि ईश्वर के प्रति पूर्ण आत्म-समपए की बुद्धि में किया जाए, फन की आकाक्षा मन को छू भी न जाए (फा-अभिसन्धि- वर्जिन ) तो उसने जन्त करण की शुद्धि (मत्त्वशुद्धि) भी स्थत हा हा जाती है । शुद्ध प्रतिपद्यने -जिस मनुष्य का अन्त करण शुद्ध हो गया, उसमें आत्म-बोध की योग्यता ही नहीं, आत्म-बोध रक्त पनप उठता है और इस प्रकार अभ्युदय एव प्रत्ति का माग भी नि श्रेयस एव नित्ति में परिणत हा जाता है। यथा वपति- इसी को लक्ष्य करके (अभिम घाय) गीता मे कहा गया है। ब्रह्मणि गाधाम यात्म- शुद्धये- योगीजन सवप्रथम मन और इन्द्रिया को वश मे करते हैं और फिर ईश्वर के प्रति समपण-भाव से (ब्रह्मणि आपाय), सर्वथा नि स्वार्थ होकर (सङ्ग त्यक्बा), वामकाज मे जुट जाते है । उनका ध्येय एक ही रहता है-आम-शुद्धि । १६-पितृवत् परकन्यासु स्वर्गीय पण्डित अम्बिकादन व्यास (१८५८-१९००) के सुप्रसिद्ध- सस्कृत-उपन्याम 'शिवराजविजय' मे लिये गए प्रस्तुन अरा में शिवाजी और औरगजेव की पुत्री रोगनारा वा रोचक सवाद यक्ति है। औरगजेव ने अपने पुन और पुत्री के साथ एक विशाल वाहिनी 'पार्वतोन्दुर' (पहाडी चूहे) शिवाजी का काम तमाम करने के लिए भेजी थी। पर उसे लेने- के देने पड़ गए । शाहजादा और शाहजादी दोनो मराठो की वद मे पद गए। पर सिवाजी ने उनके प्रति शिष्ट और उदार व्यवहार किया। क्या आश्चर्य यदि इस 'लुण्ठवगण के परिदृढ' वे प्रति वह मुगल. शाहजादी आकर्षित हो जाए। लेकिन छत्रपति ने उसके प्रति 'पितृवत् परपन्यासु', पराई लडकियो के प्रति पिता का-सा ही आचरण किया।
पितृवत् परफन्यातु (च्यात्या) भी अम्बिकादत्त व्यास की भाषा प्रासादिक और प्रवाहपूर्ण है । उनके संवाद स्वामाविक और रोचक बन पड़े हैं। 'गिवराजविजय' में ऐतिहासिक पटनायों पर कल्पना का पुट चढ़ाकर एक हृदयग्राही कथानक प्रस्तुत किया गया है। उसमें कहीं-कही दण्डी और बाण की मैली की सफल अनुकृति पाई जाती है। प्रशंसकों ने उसके लेखक को 'अभिनत्र वाण' की भी उपाधि । दी है". [पृ० ६७] वेधारा--अर्थात् विधाता ने श्रम दो प्रकार से उत्पन्न किया स्त्रियों में और सोने में । दोनों में आसक्त न होनेवाला व्यक्ति मनुष्य-रूप में साक्षात् शंकर है। रसनारो-रोशनारा (औरगजेव की पुत्री) का सस्कृत-रूप । मुख्य वाक्य है- तोरणदुर्ग रसनारी वेत्ति स्म।काभिः सहिता-उन दासियों के साथ, जो प्रायः मूच्छितावस्था में उठाकर लाई गई थी और फिर होश में आ गई थी। आसन्दी-कुर्ती । पल्लङ्कः ---पर्यडू, पलंग । विता- नम्-दोवा । तूलिका गद्दा । उपवहः-तकिया। परिच्छवः- “रंजाई। हन्याहालिका-~महल की अटारी । अवल्दा--- निगृहीता. कंद की हुई। 'एव आपाता कहां से आई हूं' केन संपता बदा.वन्दीकृता)---- किसने मुझे वन्दी किया है ? किंभादि---(अत्र) क्या होगा ? [पृ० ६८] तत्परि स्मअर्थात् सनारी की परिचर्या करने के लिए महाराष्ट्र प्रदेश की कुछ दासियाँ थीं, किन्तु वे भी रसनारी द्वारा अनेक प्रकार से ललचाए जाने पर भी (प्रलोभित), विनयपूर्वक (सप्रश्यम्) पूछे जाने पर भी इन प्रश्नों का कोई जवाब नहीं देती थी । आदिते-आदरं करोति । फस्य कक्षे आपतिता-किसके घर में आ पड़ी हूँ ? क: भक्ति-कौन मेरी मर्यादा (सतील) को अब तक भंग नहीं कर रहा है ? भनावित-म. लट्. प्रथमपुरुष एकवचन । जय०-पापय का सम्बन्ध इस प्रकार है-अर्थकदा अट्टालिकायां यंटन्या यहूनाम् इव पादध्वनिः अधावि, अर्थात् नत्र एक दिन अटारों T १८२ सस्कृत-गद्य-वीची -- पर चहलकदमी करते हुए उसे बहुतो की-सी पैरो की ध्वनि सुनाई दी। अथाव (श्रुता)-थू, लुङ्,प्रथमपुरप, एक्वचन,कमवाच्यापप्ठी में बाए सारे शब्द शोभा से सम्बद्ध हैं । रसनारी गटारी से इन-इन वस्तुओ की शोभा निहार रही थी । अभ्रोलहानाम्-अभ्र मेघम् आकाश वा ढि बास्वादयति इति अभ्रलिह , तेषाम् अत्युच्चानाम् । कोकानाम्-चवा- काणाम् । कोराणाम्-शुकानाम् । कुरराणाम्--पक्षिविशेषाणाम् । माटोत--त्वरितम्, शीघ्रता से। द्वारो०-दरवाजे के ऊपर के झरोखे से । ईपत् श्यामल -विन्धित् कृष्णवण । भरफ्त कमनीय --भरकत- मणे महामालया लमितेन मण्डितन गलेन ग्रीवया कमनीय मनोहर, अर्थात् मरक्त-मणि (पन्ने) के विशाल हार से उसका गला मुशोभित था। सम्बामोति (अतिशयन भवति)-सम् +4+यङ् (क्रियासमभिहारे)। परिवृढ तुण्ठकगणस्य-लुटेरो का सरदार । क्षभिता-व्याकुला। सम- वित्त (समवतत)-सम+विद्, लुङ्ग, प्रथमपुरुष एकवचन । स्वोपर्यादेशम्-स्वावासभूमिम् । स्विन्नाम्-पसीने रो तर । गण्डस्थलीम् (कपोलपालिम्) -गाल । पटान्तन-आंचल के छोर से । परमाण्टि (माञ्छति)-परि+मृज्, लट्, प्रथमपुरुष एकवचन, पोछा । प्रतिसीराम् (यवनिकाम्)--पर्दे को । उत्क्षिप्य (उत्याप्य)-उठाकर । शिरो विदधत-सिर झुकाकर नमस्कार द्वारा शिष्टाचार प्रदर्शित करते हुए वही वीरवर दिखाई पड़ा। इयम् = रसनारी। यादरेगित- यादरसूचक्चेप्टाभि । तद्वचन वर्णाभ्याम्-रसनारी के कान जैसे उसकी वचन-म्पी अमृत धारा को पीने के लिए उत्सुक थे। परमक नयनाम्याम्-मत्यत एमाग्रता (एपतानता) के कारण मानो जडीभूत बने नेत्रा से । चित्रापिता इव-चित्रलिखिता इव, चित्रलिम्दी-सी पान पहती थी । बद्धकरसम्पुट -कृताञ्जलि , हाथ जोडे हुए । न च विन्दुम् अपि अत्-अर्थान् उनके मुंह से एक शुन्द भी नहीं निकला । तदाकार मोहिता-उसकी आकृति, मजनता, सुन्दरता, गम्भीरता, शिष्टाचार , आदि से मुग्ध ।
पितृवत् परकत्यातु (व्याख्या) इयम् आसन्दी सनाच्यताम् अर्थात् इस आसन पर विराजिए । यह वक्ति आगन्तुक के प्रति वस्ता का अतिशय आदर प्रकट करती है। आजायसे-~~-आदिश्यते । यह उक्ति भी अतिशय विनम्रता को सूचक है। {१० ६६] सार्थहस्तोछायापा:-जिसकी ऊँचाई (उच्छायः) डेढ़ हाय थी, अर्थेन सह विद्यमान. हस्तः, अर्थात् सार्थंक. हस्त. औन्नत्यं यस्याः तस्याः (पीठिका का विशेषण) सजल मध्यायाः~~-जिसके बीच में जल-सहित (फूलदानों में) पुष्प-गुच्छ (गुलदस्ते) रखे हुए थे। वर्तुलसी ठिकागोलाकृत्तिकाप्ठपोठिका, गोल मेज । प्राक् प्रत्यक्-पूर्व- पश्चिम । उपाचिक्षताम् (आसिपाताम्)--उप+विश्, लुङ, प्रथमपुरुष द्विवचन, बैठ गए। । निजघन्यवादभाजनम्अपने धन्यवाद के पात्र को । मान्यवदा- त्यम्----अत्यन्तादरणीयम् । आस्वादम् आस्वादम् --खाते-खाते । फेकि- केकाः मोरों की बोलियाँ । धाई कायम् ---श्रुत्वा-श्रुत्वा । दर्श दर्शम् - दृष्ट्वा दृष्ट्वा । उपत्यकाशाद्वलेषु-उपत्यका (पहाड़ की तलहटी) के हरे-भरे मैदानो में । शम्बर:-मृगविशेषः। शल्लको----साही । शशक:--- खरगोश । शिया-लोमड़ी। दिनानि गमयामि---दिन बिता रही हूँ; निरर्थं यापयामि कालम्, इति भाव. । कर्ण० अर्थात् पया श्रीमती ने शिवराज नाम के किसी मराठा वीर का नाम सुना है ? कर्णशप्फुलोम्---श्रोत्ररन्ध्रम् । अस्पाति--स्मृङ्, लुइ प्रथमपुरुष एकवचन । पार्वतोग्दुरु-पहाड़ी चहा । वराका:-दुष्टाः। आख्यान्ति-कथयन्ति । ह्रींण:--सज्जितः । समोरध्यम्---मुग्धतापूर्वक, भोन्नेपन से। मर्म रहस्यम् । श्रीमत्याः तातचरणः-आपके पूज्य पिताजी से। कदर्याणि-अतिनिन्दनीय । दग्धहृदयाःजल-भुनकर ! प्रचक्षते (कय- यन्ति) --+स्या, लट्, प्रथमपुरुप बहुवचन । बिलोप्यन्ते नष्ट कर दिए जाते हैं । [१० ७०] वापशारिसन्दोहै:-भुना की धाराओं से। क्षारयन्तः-धोते हुए । धमद् वदना:-~(भय के कारण) तेजी से.
सस्कृत-गद्य-वीथी - घडक्ती हुई नाडियो में दौडती रघिर-धारा से उनके चेहरे डरावने पड गए हैं । हस्ती उन्नमय्य-हाय उठावर ! उच्छेदाय शपन्ते---समूल नष्ट हो जाने के लिए शाप देते है । भाशिरामोन्-ढेरो आशीर्वाद । मोदन्ते-प्रसन्नताम् अनुभवति। उट्टङ्कनम्-भवटीवरणम् , जाति, नाम आदि प्रकट करना आवश्यर नही तत 0-तब फिर मेराजप- हरण क्यो किया गया विश्वम्भरा--परती, युद्ध में प्रचुर रक्त-धाराओं से पृथ्वी देवी को नहलाया जा चुका है। बहवाचलयुद्ध में मारे गए वीरों की अनेक स्त्रियां रलाई जा चुकी है । सन्धातुम् अर्थात् आपके जरिए आपके पिता से मन्धि की जा सके, इसका यत्न करने के लिए (आपको यहाँ लाया गया है)। मौद्गल-मुगल । साध्वसम्-भीति । पर हेल्यन्ते-- युवको के चित को आकर्षित करने वाले ति मधुर यौचन से सयुक्त (आलिङ्गित) होने पर भी (अर्थात् नवयुवती होने पर भी) तथा मानो लावण्य में सारभूत तत्त्व से निर्मित होने पर भी (जन्यत स्पवनी होने पर भी) शत्रु-कन्याओं का जहाँ आदर किया जाता है, न कि निरादर । युवजनमनोमोहनेन-तरुणहृदयापरण। कौमारात्परेण वपसा-तारुण्येन । आलिङ्गिता-आश्लिप्टा , ननयुनत्य इत्यर्य । सो दर्यसारविरचिता लावायतत्त्वनिर्मिना । दुहितर कन्या । अपहेल्यन्ते-~तिरस्त्रियन् । अपदम विषय में स्वय आप प्रमाण है, यत न पौनजन्यम् । अपाङ्ग तारकेप-पा) नेत्रप्राते क्षिप्ता प्रेरिता लोला चञ्चला तारखा कनीनिका यम्य तेन लोचनेन नयनेन, चञ्चल नेत्रो पोयोरो से । असकृत् --अनेक्वारम्। ईक्षमाणा-नवलोरयती। उरोजयो लिप्त्वा- स्तनो पर से विमते वस्त्र को पुन कन्धो पर फेंककर। इससे रसनारी की शिवाजी के प्रति बामक्ति सूचित होता है। मीदितसकलसमाज - मोदित प्रसन्नीकृन सक्ल समस्त समाज जनसमूह येन ग , जिसने सारे समाज को प्रमन कर दिया है। दिक्षते-दृष्टुम् इच्छति, दृश्+मन्, सद, प्रथमपुरष एकवचन [पृ० ७१] यो माम् सन्जयते-जो मुझपृष्टता मे बातें करनेवाती वृक्षाणां परिषत् (व्याख्या) को. विनत्र और मनोहर शब्दों से इस प्रकार लज्जित कर रहे हैं । नम्रालाप:---कोमलभापणैः । यत० जो आप शा के प्रति मी मादर प्रकट करने में प्रयत्नशील है। १७-वृक्षाणां परिषत् प्रस्तुत अवतरण मे वृक्षों के मुंह से, वनस्पति-वर्ग के दृष्टिकोण से, मनुष्यों की आलोचना की गई है । महावन के एक निर्जन प्राङ्गण में पादपो की संसद् हो रही है, जिसमें पधारे हुए हैं पुराने जटा-जूटवाले पितामहस्या- -नीय महावृक्ष और ललित भंगिमावाली लता-नसनाएँ । सम्मेलन के सभा- पति अश्वत्यदेव (पीपल महाराज) है, जो अपनी वक्तृता में एक के बाद एक तर्क देकर यह सिद्ध कर रहे हैं कि ईश्वर की अन्यथा मांझसुन्दर सृष्टि मै मानव ही एक भद्दा धब्बा है । श्रोतागण वीच-बीच मे माला-धर्पण आदि द्वारा यथावसर करतल-घोप करते, व्यंग्यपूर्ण हंसी हँसते और हर्ष प्रकार करते हैं । सारा उद्धरण व्यग्योक्तियो और आक्षेपोने परिपूर्ण है। पं० हपो. केय शास्त्री भट्टाचार्य (१८५०-१६१३) की मैगी सरस और प्रार्जन है तथा ऐसी ताजगी और नवीनता लिये हुए है, जो 'मुद्रयति बदन विवर मृतभाषावादिना मुहेराणाम्', संस्कृत को मृत भाषा कहने की धृष्टता करनेवालों का मुंह बन्द कर देती है। [पृ० ७१] सञ्चालिलपल्लवकरानः---प-रूपी हाय के अग्रभाग को हिलाकर । वनस्पतिकुलप्रदीपा:-वनस्पतियों के कुल-दीपक । कुसुम- कोमलदन्तश्चः-पुरुष के समान (अथवा, पुष्प-रूपी) कोमल दांतों की चमकवाली । तुलना कीजिए-'श्रुतितुखमरस्थनगीतर कुसुमकोमल- दन्तरुचो बभुः। उपवनान्तलता. पवनाहतः निरालयः सलयरिख पाणिनिः ।' रघुवंश ६३५ । लताकुलललना:--लताओं से वंगा में उगन होनेवाली -- सस्कृत-गद्य-वीयी . स्त्रियो, अथवा, लता-रूपी कुत्रवधुओ। सावहिता-व्यानपूर्वक । यद्य विषय --आज की सभा का विचारणीय विषय मनुष्यो की चर्चा करना है । निकृष्टतमा -सबमे अधिव नीच। समन्तात् एव अपहारितम्--- विश्व के सप्टा भगवान् ब्रह्मा ने चारो ओर इस नवीन एव आश्चर्यकारी ससार की रचना करके जो वुद्धि-उत्सर्प और रचना-नैपुण्य दिखाया, वह मनुष्यो की मृप्टि करके एक्दम नष्ट कर दिया । [१०७२] प्रायतनकर्मप्रभावात -पूर्वजन्म के वर्मों के प्रभाव से अथवा माग्यवा । 'पूर्वजन्मकृत कम तद्देवमिति कथ्यते।' जडत्यम् आप नानाम- जडता को प्राप्त हुए । अस्माक वार्ता तावदस्तु दूरे हम लोगो की बात छोडिए । जीवसृष्टिप्रयाहेषु -मसार के सभी प्राणियो की परम्परा में। परप्रतारका दूसरो का घोषा देनेवाले ।मायाविन ~दनी । हिमस्य- मावतया प्रसिद्धान्---हिंसर वृत्ति के लिए प्रसिद्ध । नित्य क्लापान- दैनिक यौर विशिष्ट कार्यादि । यायातथ्येन-वस्तुन । क्मेिते गरिष्ठा-- क्या ये हिंसक पगु-हिमा यादिवों मे मनुष्यो से भी वढे-चढे हैं ? गरिष्ठा. (गुरु+ इप्छन्) = गुम्तमा । प्रतिनियमो प्रयोजनकम् --प्राकृतिक नियमों से प्रज्वलित होनेवाली पेट की अग्नि (भूख) की शान्ति के लिए हो है। फर अवसानानि और उनके यूर क् पेट भर जाने पर समाप्त हो जाते हैं । सद् पूती '--एक बार पेट भर जाने पर । करतलगतान- हाय मे बाये हुए। न वा तयाविधि परिभ्रमति-औरन वे उस तरह के दुर्वल जीवो को मारने के लिए जगन-जगल घूमते हैं । समुद्धतम् (सम्+उत्+क्त)-उघम के साथ (समुदत यया स्यान् तथा)। प्रत्युत-बाल्लि । मुनि विश्राम्यन्ति-ऋपि-मुनियो के आचरण को भौति शान्त होकर एवाल (विविस) और निर्जन स्थान में जाकर विश्वाम करते हैं। निरवधि -मीमा-रह्नि । आत्रीडनम्-खेल, विनोद। विक्लान्त- चित्तविनोदाय --य हुए चित्त का अनुरजन करने के लिए 1 मृगयाम् अपदिश्य-गिकार के बहाने मे। हिसावृत्ते चरितार्थता सम्पादयन्ति-- वृक्षाणां परिषत् (व्याख्या) १६७ अपनी हिन्न मनोवृत्ति को चरितार्थ करते हैं, कार्य-रूप में परिणत करते है। मनुष्यालयं प्रविश्य-मनुष्यों की वस्ती में जाकर । समनुतिष्ठन्ति-- करते हैं। ऐहिकसुखलिप्सया-सासारिक सुख पाने की लालसा से । समुत्साहेन-बड़े उत्साह से । पारत्रिकप्राप्त्याशया---परलोक का शाश्वत (नित्य) एवं विशुद्ध (दु.खादि से अमिश्रित) सुख पाने की आशा से । पू० ७३] आसन्न कलेवरान्---जिनके शरीर विलकुल निकट आई हुई मृत्यु के डर से कॉप रहे हैं । उपहत्य-मारकर । स्वहृदयस्य -अपने हृदय की अत्यन्त कठोर क्रूरता का । विदीर्यते----फट जाता है। भक्ष्यनियम-भोजन सम्बन्धी नियम । अनायाससाध्या-सहज ही पूरी की जा सकनेवाली। स्वोदर समधिगत्य--पेट भरने लायक खाने की वस्तु पाकर ही । परितृप्तिम्-सन्तोष । अन्यत्र विपयेषु अपि---और बातों में भी । तृप्तियोग:--सन्तोप-लाभ । भागधेयेषु-भाग्य मे । अभि- विधित्सवः (अभि+वि+या+सन्+उ)----(प्राप्त करने की इच्छा करने वाले । अव्याहत हृदया:-निर्वाध लोग से जिनका हृदय विक्षुब्ध (परेशान) रहता है । मनुजन्मानः-मनुष्य । सर्वात्मना प्रवर्तन्ते--हर प्रकार से लग जाते हैं । न धर्मम् अनुधारन्ति-धर्म का पालन नहीं करते । न सत्यम् अनुबध्नन्ति-सत्य का आग्रह नहीं करते । तृणवत्_०.. स्नेह की तिनके-जैसी उपेक्षा करते है । लोष्टवत्-पवित्रता का कंकड़- पत्थर की तरह परित्याग कर देने है । अहितमिव०- to---सरलता से वैसे ही बचते हैं जैसे शत्रु मे । अमङ्गलमिव०विश्वास की वैसे ही हत्या करते हैं जैसे अमगल वस्तुओं की । पापाचारेभ्य:-~-पापाचरण से। अन्तव्यवहारात -असत्य व्यवहार से । नहि पोडनात्-क्षणभर के लिए भी दूसरों को कप्ट देने में विरत नहीं होते । न वा · अकृत्यात---- बुरे से बुरा काम करने से भी मुंह नही मोड़ते । सिसायिषन्ति---- साथ-+-णिन्-+-सन्, लट्, प्रथमपुरुप बवचन, साधने की इच्छा करते हैं। यथा "यर्थव०. ज्यों-ज्यो उनकी म्वार्थ-मिद्धि होती जाती है, त्यों-त्यों नकी विषयो की प्याम अधिकाधिका बदनी जाती है।
२८८ संस्कृतनाद्यन्वीयो एते-मनुष्या निष्टा-जघम, नीच । निस्सारा--व्यय,देकार। प्रयल पर्यन्तम्--प्रवल आंधी याने के ठीक पहले नव , प्रदावात्याया उद्गमस्य अव्यवहित पूर्वक्षरण यावत् । विचलन्ति-हिलते-जुलते है। नि कानि इव-जैसे निडर होकर । अविशङ्कितचित्तानि इव--मे निशङ्क-चित्त होकर । सर्वथा अतिष्ठन्ते- दट होकर जमे रहते है। [पृ०७४] स्वशक्तित जपनी पूरी तारत गाकर । सम्मुस पुस्खा इप-- सग्राम मे मामने घटे वीरा की तरह 1 सुदूर आक्लय्य-मुद्र भविष्य में आ पडनेवाली सिमी विपत्ति की कल्पनाकर के परिकम्पमान- घलेदरा -कापते हुए शरीर से। निरन्तर हृदया --जिनवा हृदय सदा भारी चिताओ मे पीटित रहता है।टुस वाहयन्ति--बड़े कष्ट से समय बिताते हैं । परिकल्पपन्ति प्रतीशरोपायान -- व्याकुनहो वडे परिश्रम में विपत्ति के मुकाबले के लिए उपाय करते हैं । येन अतित्रान्तम् एय- जिससे मनुष्य जीवन न मान्नि-मुख कभी प्राप्त नही होता (उच्चा-पूर्ति के 'माग से दूर ही रहता है) । मवितय्य तपा-भक्तिया (भावी) अनिवार्य होने के कारण । दुरांध्यतया च नियतिनियमानान्- भाग्य के नियमो थे अटल हो के कारण। एक्पदे एव --अचाना हो । अन्तर्धत्ते 'विद्यादत्ताभिमान --विद्या या गर्व -प्त हो जाता है। सवीं गवं तीक्ष्ण बुद्धि-चातुर्य मे उत्पन्न होनेवाला गर्व गप्ट हो जाता है। प्रलोयते अहसार -- अपने को सर्वज्ञ मानने से होने वाला अभिमान गुप्त हो जाता है । समुदति-उत्पन्न होता है। कोऽपि हृदयाघमाद --किव्यविमूढता मे होनेवाती दिन्नता हृदय पर टा जाती है। नशा बुद्धि -निर कार से परिपुष्ट हुई नाम्निाना बिन ना हो जाती है । सुदूरम् प्रतिद्वन्द्विता-ईश्वर में की जानेवाली होट दहुत दूर चली जाती है। आत्मग्राणाय-आत्मरक्षा के लिए । परित्यजन्ति आत्मभरताम्-- हर प्रसार की आत्मनिर्भरता यो टोड देते हैं । भवन्ति च०---भाव यह है- यो तो नियम यह है मिस्त्री-पुत्र-न्दजनो की सदा रक्षा करनी चाहिए, पर विपत्ति के समय वे इस नीति का अनुमरण करने लगते हैं कि 'सदा अपनी क्लेशः फलेन हि पुनर्नवत्तां विधत्ते (व्याख्या) १८६. ही रक्षा करनी चाहिए, चाहे स्त्री से चाहे धन से, और केवल अपना बचाव' करने के फेर में पड़े रहते है । फिमतः परं वर्तते--मनुष्यों की असारता दिखाने में क्या इसके अतिरिक्त और किसी प्रमाण की आवश्यकता है ? अथ ये प्रकटयति- इस प्रकार जय विश्व-विधाता ब्रह्मा ने तृणादि की मृष्टि रचकर मनुप्यो-जैसे जीवो की रचना की, जो तिनकोसे भी गए- जरे और पशुओं में भी नीचे है, तब यह वात ब्रह्मा के बुद्धि के उत्कर्ष को कहाँ तक सिद्ध करती है [पृ०७५] हेतुप्रमाणपुरत्तरम् - -हेतुभि प्रमाणैश्च पुरस्सृतं (युक्तम् ) यथा स्यात् तथा, तर्क और प्रमाणपूर्वक । विभावयन्त:-चिन्तयन्तः । 7 १९-क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते पण्डिता क्षमाराय (१८६०-१९५४) उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध संस्कृत- विद्वान् श्री शकर पाण्डुरग पण्डित को पुत्री थी। वह कई वर्षों तक यूरोप मे भी रही । संस्कृत के अतिरिक्त अंग्रेजी और फासीसी भाषाओ की भी वह अच्छी जानकार थी। उन्होंने संस्कृत गद्य और पद्य दोनों में आधुनिक विषयों पर सुन्दर रचनाएँ को हैं । उनकी 'सत्याग्रह-गीता' पेरिस से १६३२ में प्रकाशित हुई थी, जिसमें सहात्मा गांधी के सत्याग्रह-आन्दोलन के मार्मिक म्पन्दनों को काव्य सुकुमार तन्तुओं में बांधा गया है । उनको 'उत्तर सत्याग्रह-गीता' (वम्बई,१६४८) गांधी-गाया को १६४४ तक ले आती है। उन्होंने मराठी के तीन सन्तों--तुकाराम,रामदास बोर ज्ञानेश्वर--- तथा अपने पिता की जीवनी को काव्य का परिवान पहनाया है। उनकी . अन्य उल्लेखनीय काव्य-कृतियां ये है--'कयापञ्चकम् (बम्बई, १६३४), 'विचित्र-परिप-यात्रा' (बम्बई, १९३९), मीरा-लहरी'(बम्बई, १९४४), तया 'ग्रामज्योति' (कलकत्ता, १९५४)। कयामुक्तावली' (बम्बई,१९५५), १६. सस्कृत-गद्य-चौथी जिनमें से प्रस्तुन वथा ली गई है, उनकी पन्द्रह गद्य-कहानियो का भग्रह है । उन्होंने कई नाटक भी निले, पर वे अभी अप्रकाशित हैं। आलोचकोने पण्डिता क्षमाराव की प्रतिभा की मुक्त कण्ठ से प्रशसा की है । महामहोपाध्याय पाण्डुरग वामन कारणे के मतानुसार उनकी भारी रचनाओ मे 'सरल और अलका भापा, चुने हुए शब्दो का प्रयोग, छन्द - कौशन, नाना अलङ्कारो का उपयोग, विशद वर्णन तथा उच्च स्तर का काव्य-गुग्ग' परिलक्षित होते हैं। प्रस्तुत कथा एक ऐमी युवती की कहानी है, जो अपने पति की लाज में अकेली निकल पडती है । करणा, रहस्य, सयोग तथा आश्चर्य का पुट कथा को अतीव रोचक बना देता है। [१०७५] आयास =परिथम । अवसितपाय --लगभग बीत चुका या। मणिमयगिरिमेखलाया -मणिमयनाम्न गिरे मेखलाया , मेखला-- यांचल । गाँव का नाम किष्टिवार था। विवक्तेः एकान्ते । दरोदृश्यते- दृश्+यङ्, लट्, पौन पुन्येन दृश्यते, स्पष्ट दिखाई देती है। कारवाही. गुल्मेषु अन्तहित -कारवाही की झाडियो मे छिपा हुआ। नेदीयस निकट+ ईयस्, पष्ठी एक्वचन, पाम के । पर शतपादायतस्य-जिसकी तलहटियां (पाद) सौ से भी अधिक थी। प्रतियघ्नत -प्रति+व+ शत, द्वितीया एक्वचन, रोक रहे । शक्लीकुर्वन-टुक्डे करते हुए। कैननिकरोद्गारभासुर --पेन समूह के निकलने से चमकदार । [१०७६] निसरझसरनिनादेन--झरने की झर-झर आवाज से दिगन्तम् आप्नरयन इव.--अन्तराल (दिगत)को भरता हुआ। नाना विडम्बिभि-पर्वत की दोनो वाजुएं नाना प्रकार को ऐसी पुष्पित जगली झाडियो से छाई हुई थी, जो नन्दन-वन की मनोटरता की विडम्बना (उपहास, तुलना) कर रही थीं। समाहिता इय-समाधिस्य-सी, हक्की-चक्यो,आत्म-विस्मृत-सी । तारस्वरेण-ऊंचे स्वर से । तापसस्य श्रीनगरवासिन ~~ग्रीनगर- निवासी किसी तपस्वी ज्योतिषी ने हिमा के पति के विषय मे यह भविष्यद्वामी यी थी कि उसका पता अमरनाथ-गुफा में लगेगा। निमितज्ञ ज्योतिषी । - क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते (व्याख्या) १६१ धर्मकञ्चुकी-धर्म की केंचुल पहने हुए; ढोंगा। निश्चिनोमि-~-मुझे निश्चय होता है कि यह ज्योतिषी ढोगी है। अम्बुजः - यह हिमा के पति का नाम था। संकेतस्थानम् उद्दिश्य---- मिलने के स्थान के विषय में। वृत्तोपलव्ध्य -- -~-समाचार पाने के लिए। तत्सविधे-उसके पास। तस्य-अम्बुजस्या परिभ्रमणसक्त: -पर्यटन के शौक में पड़कर । अमरनाथयात्रावद्धादरः-अमरनाथ की यात्रा में श्रद्धा रखकर । अनवरतः वर्षन्ती-आँखों से निरन्तर आंसू बहाती हुई। शोकानलेन प्लुष्टा (दवा) इव-शोकाग्नि से मानो जलकर । स्वशिक्षु ग्राहिताम्बुजनामफन्---अपने पुत्र को, जिसका नामकरण अम्बुज किया गया था। तदानीम् एकाददेशीयम् -जो उस समय एक वर्ष के लगभग था। चिरात लिरोहितस्य --दीर्घकाल से आँखो से मोझल हुए। पितुः अन्देषणकधिया-एक मात्र पिता को खोजने की नीयत से । अम्बुज के पिता का बहुत दिनो से पता नहीं चलता था। उन्ही की खोज में अम्बुज "घर से निकल पड़ा था । अति शिलायिते---सत्यधिक सर्दी से हम दोनों (ठिठुरफर) जव तक पथरा नही जाते । शिलायते---शिलेव जडीभूते । [पृ० ७७] असकृद्---अनेक वार । अलं निषेधवचोभिः--बस, मुझे रोको मत । अधित्यका-पहाड़ी चोटी; उपत्यका-तलहटी। प्रगल्भा:--- साहसी । पर्यन्ते-दूर सामने । पिसुनाम्नः शैलस्य उत्सङ्ग-पिसु नामक पहाड़ की गोद में । स्मयमान अवलोकयन्ती--झिलमिलाते हुए अथवा पुष्पित शेषनाग सरोवर को देखती हुई । वृहद् अक्षोद्गुमस्य अधः ध्यायन्तम्--अखरोट के बड़े वृक्ष के नीचे ध्यान में लीन । प्रदोषस्य एघमानान्धकारे---सन्ध्या के बढते अन्धकार में। एधमान-ए- शानच्; वर्धमान । निष्प्रभ घनीभूते (अन्धकारे)-ज्योतिहीन पर्वत की नौल एवं लोहित छायामों से घनतर हुए (अन्धकार में) । प्रवया:--- बढ़ी वयस् वाले, बूढ़े । वलितपीतवर्णास्यः---जिनके मुंह पर झुरियां और पीलापन है। आनामिक-नाभिपर्यन्तं विलम्बमान: सितः सान्दः १६२ संस्कृत-गद्य-वीयो कूर्च यस्य स , जिनकी सफेद घनी दाढी नाभि-स्थल तक लम्बमान पी। भस्मधुलि०-जिनको जटाएं रास में पुती (अन लाली लिये) थी। अतिथिल -जिनका गरीर झुका हुआ (चित) अवश्य था, किन्तु शिथिल नहीं । दाक्षिप्यातिललाट -जिनके मस्तर पर स्पष्ट उदारता का भाव यकित या । नद्रतयाइव स्नातशरीर --भ्रतामे मानो जिनकी देह डूबी हुई थी। भ्रूमध्य-जिन्होंने भौहो के बीच दृष्टि स्थिर कर रखी थी। पुरातनकालप्रतीक इव समुदलसन-प्राचीन समय के प्रतीक की तरह विराजमान थे। आयतद्योतमान नयनयुगमम् उन्मोल्य-बड़ी-बड़ी चमकदार आँखों का खोलते हुए । अन्दयुड यन-आ+ युज्, लड्, पूधा । प्रतिपातम्-~- स्वीकृतम् । अनुयुवतया -पूठी गई, पूछे जाने पर। [१०७८] स्खलि- तासर-टूटी-फूटी जवान मा चित् वार्ताम्-चिरकाल से खोये हुए पति की कहानी । पपटनामिषङ्गम्-(अपने) यात्रा-हेनु को । निम्न- पटलाम्---नीची छतवानी (कुटी को) 1 दोलायम नमानसा- जिसका मन डांवाडोल पा । दोलायमान-दोला इथ आचरल, दौता (नामधातु) +यानच् । समादवम्--मृद्धतापूर्वव । अमापिष्ट---भाष, नुन आप्रात ---प्रात कालपर्यन्तम् । मास्तरपम् आस्तीयं-बादर (दरी, चटाई) विटार । मानिशीथम् -- आधी रात तक । गयाक्षान्त०-झरोखे से अन्दर वा रही चन्द्रमा को किरणें जिसका मुंह मानो चूम रही थीं। कौमुदी आलोक्य तो-दूध के समान चिट्टी यांदनी प्रवाह मे स्वच्छ बने नगर को देखनी हुई। मरक्ततोले-- नौतम रग । रजन्या आसीत् -रात्रि की ध्यानावस्थित मुद्रा उसमे प्रतिविम्बित हो रही थी। आलोक्स्य पराधीनाया ---उस अत्यन्त अद्भुत एवं रमणीय प्रकाश के सर्वथा वश होवर। तस्या. विचार- सरण्या समापतत् स्मरणम्-उसी विचार-धारा में स्मृति जाग उठी। सम्+या+पन, लङ् । स्यमत ०. 6-घर की उस समय को याद, जब उसके पति ने घर नही छोडा था। यात्मीय०-अपने थल्यासीन वैवा- फ्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते (व्याल्या) १३.२ हिक जीवन का । अब्दपञ्चकतः पूर्वम्-पांच वर्ष पूर्व । संवृत्त-घटित । मन्दिरात----गेहाद् । दूरस्या०-उसे लगा जैसे उसने दूर चोटी से अपने पति के स्वर की गूंज सुनी । व्यभावयत्-उसे लगा । शीतशीतोषःकाले-- अत्यन्त शीतल उप काल मे। पूर्वेद्य : इव---पहले (पिछले) दिन की भांति। अन्तरायः-विक्षेप, विघ्न । वलिता "आविरभूत-उनके झुरियोंवाले चेहरे पर मन्द मुसकान झलक उठी। कृतज्ञताभरपुरस्सरम् आपृच्य- मानाम्--जो कृतज्ञतापूर्वक जाने की अनुमति मांग रही थी। [पृ० ७६] नानाविध०--तरह-तरह की अद्भुत भावनाओं तथा भगिमाओ के प्रवाह से जिसका हृदय पूर्ण था । अन्तिका-समीपम् । सम्भाप-सम्-+-प्र+आप, लिट् । विशालस्यल्याम्--लम्बे-चौड़े मैदान - में । यात्रिकजनार्णवःयात्रियो का समुद्र । शतशः परिणतवयस्का:--- - सैकड़ो बूढ़े । कुटिताङ्गयप्ठयः-टूटे-फूटे अगोयाले । परःसहस्राणाम्-- हजारो-लाखों की संख्या मे । चिकीर्षु:-कर्तुम् इच्छुः । बात:-समूहः । जोर्णधीवरधेष्टिताङ्ग:-फटे-पुराने चीथड़ो मे शरीर को लपेटे हुए। बधिरी फ्रान्तम्-कानों को वहरा कर देनेवाले शोर से भयभीत (कपोतवृन्द) । युगपत् एक साथ । अनेकर भ्यः--कई दरों से। पपोतवृन्दम् -- कबूतरों का झुड । समुडिये- सम्-:-उत्+डी, लिट् । ज्वलधूपसौरभजातम् --जलती हुई धूप की तरह-तरह की खुशबू । बहुतियं कालम्-लम्बी अवधि तक ! देवा हि०-देवता भी सहन नहीं कर सकते कि यौवन योंही बरबाद जाए । जोपम्-तुप्णीम्, चुपचाप [१० ८०] शब हिमशिलाम्-~शव रखने के बक्से के भाकार की एक बड़ी शिला के निकट । समुपेतवन्ती-पहुँचे । तुपार निदिश्य--- बर्फ के ढेर को अपनी उँगली से दिखाकर । अवसन्नगात्री~-जिसके अंग- प्रत्यंग सुन्न हो गए थे। हिम · निवेशितम्-वर्फ की दो सिल्लियों में जकड़ा हृला । स्मेराननः-- गुसकाराते हुए । झटिति प्रमृज्य-तुरन्त उसने अपने मस्तक पर शोभायमान सौभाग्य-चिह्न कैसर को कमल-पुट (उदर) के । । .
६४ सस्कृतनाव-धीयो समान (मोदर भाई) हाथ से पोंछ डाला। हैमाच्छादनपटोपरि- मुर्दे पर पड़ी बर्फीली चादर पर । न्ययात-नि+था, लइ । परिदेव- मानारोती हुई । शोक' निक्षिप्ता इव-शोक-समुद्र की लहरों पर जैसे आ पही हो। निर्जीवापाङ्गम् इव-जिनकी उँगलियाँ, कलाई (उपाङ्ग) सुन्न पड गई हैं। आलम्बेताम्-आ+लम्बू, लङ् । निसत्यो-सत्त्वशून्यो। प्राणिनां जोवनम्०ससारी प्राणिर्या का जीवन जल के बुलबुलो की तरह क्षणिक होता है। निर्वाण च अन्विच्छ-शान्ति की खोज कर। शीतशीतलहेमसमाधिहरात् 1-अत्यन्त शोतल वर्फीली समाधि-गुहा से । अदाप्टाम् --दृश, लुङ्प्रथमपुरुष द्विवचन । श्यामश्मयुलम्-काली मूंछोवाले। चर्मकञ्चुरधारिणम्-चमडे का कोट पहने। धृतलोम- शिरस्कम-रोएवाली टोपी पहने । दोर्य सान्तम्-लम्बे और कठिन पर्यटन से पके हुए । पान्यम्-~-वोही को। मिप -परस्पर । [पृष्ठ ५१] अवग --यात्री । स्थगिता इव-मानो गतिय । स्ववक्षुषो०- अपनी सांसो पर जैसे विश्वास न करले हुए। पोट्टलिका-पोटली । याप्तपरमप्रमोदसन्दोह-सुशी से फूलानसमाताहुआ। सोन्याम्पम्- उदलकराव्यतिकरम्-घटित परिस्थिति । भ्रान्तभ्राता-अत्यन्त भ्रान्ता। कियासमभिहारेण--एक ही वाक्य मे, सक्षेप म । उपेतशवपीठिका-शुव के आधान के निकट मारर तातपादा-पिताबी । मोपोभूता व्यर्थी. कृता । दिसलास-सुशोभित हुई। प्रकामम-पर्याप्तम्, प्रगाढम् । [१०८२] निरन्तर इव-जमे अटूट, निर्विघ्न निद्रा का सुम्न यनुभव करते हुए। कालहस्तेन अस्पृष्टम्-जिसे समय के हापा ने हा तक महीं, जो मरकर भी सडा-गला नही। प्रमोद परिप्लुतो -आनन्द के पारावार में दूदते-उतराते। - . - .
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गद्यकाराः प्रशस्यन्त आचायरधिकारिभिः
वेद.
सरस्वती श्रुतिमहती महीयताम् । कालिदासः
ब्राह्मणम्
ब्रह्म सत्यं विजानीयात् ब्राह्मणं ब्रह्मणः सुतम् ।
ययादृष्टानुवादित्वात् ब्राह्मणं ब्राह्मणं मतम् ।।
कात्यायनी
उपनिषद्
देहलोदीपकस्थित्या भासयन्तो भुवं दिवम् ।
मृत्युजीवनयोनित्यं स्वानुमावेन सान्त्वनम् ॥
सर्वोपनिषदोऽमृतम् । शूर्पणखारिः (शोपेनहावर)
कौटिल्यः
कुदिलमतिः
एष येन
क्रोधाग्नी प्रसभमदाहि मन्दवंशः । विशाखदत्तः
पतञ्जलिः
योगेन सूत्रस्य पदेन वाचा
मलं शरीरस्य च वैद्यकेन ।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां
पतर्जाल प्राञ्जलिरानतोऽस्मि ॥ यः कश्चित्:
चरक.
देवाकर्णय सुश्रुतेन चरकस्योरतेन जानेऽसितं
स्यादस्या नलदं विना नदतने तापस्यकोऽपि क्षमः।
नोहर्षः
स
१६
सस्कृत-गध-वीयो
बायंगूर
यआर्या, दिव्यावदानानि सोपानानीव सर्वया ।
मारा जातकानीत्य
मुद्धत्वपदप्राप्तये ॥
सत्य भूरा भवन्तु है। प्रियदर्शी
दण्डी
आचायंदण्डिनो वाचामाचान्तामृतसम्पदाम् ।
विकासो येघम पल्या विलासमणिदपंणम् ॥ गगावी
सुबन्धु
सुबघुर्वागमश्च कविराज इति वय ।
घकोक्तिमार्गनिपुणाश्चतुर्यो विद्यते न वा ॥ कविराज
वागभट्ट
रुचिरस्वरवर्णपदा रसभाववती जग मनो हरति ।
साक तरुणो? नाह नहि वाणी माणस्प मधुरमोलस्य ।।
धर्मदास
शङ्कराचार्य
वादितातगजेन्द्रदुर्मदघटादुर्गसङ्घर्पण
श्रीमच्छङ्करदेशिके द्रमगराइमायाति सर्यायवित् ।
दूर गच्छत वादिदुःशठगजा सन्यासदष्ट्रायुधो
वेदान्तोरवनाश्रयस्तदपर हूँत वन भक्षति
अम्बिकादत्तव्यास
मुहुरवतीर्णस्य भुवि विनाशाय नु दुष्कृताम् ।
शिवस्य स्तुतरे पाणीमम्बा यस्म ददौ स्वयम् ॥
व्यासाय नय्यसे नम । अरस्थानी
दृषीक्सचाम्त्री भट्टाचार्य
मुद्रयति धदनवियर मृतभाषायादिना मुहेराणाम् ।
स्मरपति च मट्टयाणे मट्टानार्यस्य सा पाणी॥
गिरिधरशर्मा चतुर्वेद
गधकाराः प्रशस्यन्त आचार्यरधिकारिभिः
क्षमाराव
सत्यं स्पृष्ट्वा हृदयं स्नेहेनानाविलेन मातेव ।
अन्याऽहिसाऽदितिवत्सं भारतं विनती क्षमा॥
युगं जज्ञे सरस्वती । प्रभास्वती
कण्ठस्थेयाः सदुक्तयः अचेतनानामपि मंत्री समुचितपक्ष निक्षिप्ता । अतिशीतत पतिशोकानलादक्षयस्नेहे घनादस्मादनल। अनिष्टोद्भावनरसोत्तर हि भवति खलहृदयम् । को नामाऽस्य तस्व- निरूपणे समयं ? अवीजादेव जायते, अकाण्डादेव प्ररोहति खलव्यसनना कुरा ,दुरुच्छे- दाश्च भवन्ति। अमिनन्दति हि स्नेहनातरापि कुलीनता देशालानुरूपम् । अलोकाभिमानो मादकारोणि धनानि । अविमृश्यवारिणां हि नियतमनेका पतन्त्यनुशयपरम्परा' । मश्वसधर्माणो हि मनुष्या नियुक्ता कर्मसु यिकुर्वते । असता हृदि प्रविष्टोदोषलव करालायते, सतातु हृदि म प्रवितात्येव । अहो प्रमावो महात्मनाम् । इन्द्रियहरिणहारिणी च सततम् यतिदुरन्तेयम् उपभोगमगतष्णिका। ऊर्जा मधुमती वाक् । गर्भश्वरत्वम् अभिनवयौवनत्वम् अप्रतिमरूपत्वम् अमानुपाक्तित्व चेति महतोय खल्वनर्पपरम्परा । गहिण प्रियहिताय दारगुणा । गुणाधिहि गृहीतोऽनुष्ठीयमानश्च धर्म प्रचय गच्छति । तृप्तिलाभस्तु न विलिखितो विधात्रा मनुष्यभागधेयेषु । देवा हि तरुणजीवनध्वसनमवलोयित नोत्सहन्ते रालु । टु सदग्धानां च भूतिरमङ्गला चाप्रसस्ता च निरूपयोगा व भवति । 'ये सूक्तियां इसी प्रकार के पाठो से अकारादि-क्रम से सकलित हैं।
कण्ठस्येयाः सदृश्तयः
१६५
द्विविधो हि वेदोक्तो धर्मः प्रवृत्तिलक्षणो निवृत्तिलक्षणश्च ।
न गुह्यं विवृणुयात् ।
न नक्तं दघि भुजीत।
न नियम मिन्द्यात् ।
न पन्यानमवसूत्रयेत् ।
न पापेऽपि पापी स्यात् ।
न बुद्धीन्द्रियाणामतिभारमादध्यात् ।
• न सर्ववियम्भी न सर्वाभिशकी।
न नानृतं ब्रूयात् ।
नान्यस्त्रियमभिलषेत, मान्यश्रियम् ।
.नान्यस्वमादद्यात् ।
नास्त्यदाराणामननुगुणदाराणां वा सुखं नाम ।
नोसमविरुध्येत ।
पुण्यानि हि नामग्रणान्यपि महामुनीनाम्, किं पुनर्वर्शनानि ।
'पुण्यं हि सात्त्विकं नूनमशस्यमपि साधयेत् ।
प्रतीतपदार्थको लोके ध्वनिः शब्द इत्युच्यते ।
'प्रधाने च कृतो यत्नः फलवान् भवति ।
प्राक् थमा व्यायामवर्जी स्यात् ।
प्राणिनां जीवनं जलवुवुदस्य भइ गुरत्वमनुकरोति । अलं चिन्तया
मृतस्य।
प्रायो महाभूतानां दुरभिभवानि भवन्ति तेजांसि ।
ब्राह्मणत्वस्व हि रक्षणेन रक्षितः स्याद् वैदिको धर्मः, तदधीनत्वाद्वा-
अमभेदानाम् ।
भगवानमरनाथस्तवाभीष्टं सफलोकुर्यात् ।
मधुमती वाचमुदेयम् ।
मनुष्याणां हिसावृत्तिस्तु निरवधिः।
सस्कृत-गद्य-योयी । महासत्यता हि प्रयममवलम्बन लोक्स्य पश्चाद्राजवीजिता । माना नाम सर्वासु सृष्टियारासु निकृष्टतमा सृष्टि । य सर्वया चिर जीवति वर्षशत जीवति। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । पौवनारम्भ प्राय सास्त्रजलप्रदालननिर्मलापि कालुप्यमुपयाति बुद्धि । विद्वासमपि घोरमपि अमिजातमपि पुरपम् इय दुविनीता खलीकरोति सम्मो । विधवाना यशसा स्थातुमिच्छामि लोके न वपुषा । शाश्वत्स्यास्पति ते पुण्य । शिवास्ते सन्तु पयान । श्वापदाना हिसाकर्म क्लि प्रतिनियमोद्दीप्तजठरानसनिर्वाणमात्र- प्रयोजनकम् । सत्यपरिभाविता वाचमग्निरपि न प्रसहने सहुयितुम् । समुद्रोऽस्मि विधर्मण । सर्वप्राणिपु यन्युभूत स्यात् । सेपमातिनं व्यभिचरति शीलम् । स्वस्ति अद्य उपसो दोपसच । स्वाध्यायप्रवचनाम्या न प्रमदितव्यम्।